Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Nyayvinishchayvivrnam Part I Granthank Iii
Front matter
JÑANA-PĪTHA MŪRTIDEVI JAINA GRANTHAMĀLĀ
SANSKRIT GRANTHA No. 3
NYAYA VINISCAYA VIVARANA
OF
S'RĪ VĀDIRĀJA SŪRI
the commenlary on
BHATTĀKALANKADEVA'S
NYAYA VINISCAYA
Vol. 1
[PRATYAKŞA PRASTAVA
EDITED WITH
introduchon, appendices, variant i cadings, comperative noies etc.
MAHENDRA KUMĀR JAIN
NYĀTĀCĀRYA JUIN PRĀCINA NYĀratiktu ErC
Professor of Bauddha Darsuna.
DAXARAS HIXDU UNICRSITY.
Published by
BHARATIYA JNANAPÍTHA, KASHI
First Edition
600 Conics.
HAGIA, VIRA SANYAT 4115
VIERANA SAKSAT 2003
FEBAVARY, 1947,
(Price
Rs. 15/
BHARATIYA JNANA-PITHA, KASHI TOUNDED BY SETH SHANTI PRASAD JAIN IN MENONY OF JIS LATE VENETOLENT MOTHER Sri MŪRTI DEVI JÑANA-PITHA MŪRTI DEVI JAIN GRANTHAMĀLA IN THIS GRANTHAMĀLA CRITICALLY EDITED JAIN AGAMIC PHILOSOPHICAL, PAURANIC, LITERARY, HISTORICAL AND OTHER ORIGINAL TEXTS AVAILABLE IN PRAKRIT, SANSKRIT, APABHRANSHA, HINDI, KANNADA & TAMIL ETC, WILL BE PUBLISHED IN THEIR RESPECTIVE LANGUAGES WITH THE TRANSLATIONS IN ZIODERN LANGUAGES AND CATALOGUES OX JAIN BHANDARAS, INSCRIPTIONS, STUDIES OF COMPETENT SCHOLARS & POPULAR JAIN LITERATURE ALSO WILL BE PUBLISHED OENERAL EDITOR OF THE SANSKRIT SECTION MAHENDRA KUMAR JAIN NYAYACÁRYA JAINA & PRACINA NYAYATIRTHA Professor of Bauddha Darsana Sansirt Malmıniyalyu BANARAS HINDU UNIVERSITY, SANSKRIT GRANTHA NO. 3 PUBLISHER AYODHYA PRASAD GOYALIYA, SECY., BHARATIYA JÑĀNAPÍTHA, DURGAKUNO ROAD, BANARAS CITY, Vakrans Samrat 2000 18th Feb, 191 rounded 191 Falguna Kriskaa All Rights Reserved. regelen
न्यायविनिश्चयविवरण
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र२० मूर्तिदेवी, मातेश्वरी सेठ शान्तिप्रसाद जैन
अनुक्रम ३८ ४४ ६५ १७ गुण और धर्म पृ०६८) प्रत्यक्ष लक्षण प्रस्तावना मन्ध विभाग] ९.६४, ज्ञान का आत्मदिन परोक्ष ज्ञानवादका एण्डन १ शानी साकारता दर्शन की परिझापा १ जैन दर्शन की देन धौलाभिमत साकारवादको मीमांसा শান সখা লালয় स्पादाद वाह्य अर्भका सजाय स्यात् गद का अर्थ | अर्थ सामान्यधिोपात्मक और दमा मो. बलदेव उपाध्याय के मन की आलोचना 10 पर्यायाम है डॉ. देवराज के मत की समीक्षा युदफे शून्य निर्माणको समीक्षा महापंडित राहुल सांकृत्यायन के मत की जैनदर्शनकी पाय व्यवस्था समालोचना बुर और संजय २१ विशदज्ञान प्रत्यक्ष २५ परपरिकल्पित प्रत्यक्षलक्षमनिराम श्री सम्पूर्णानन्द के मन की समीक्षा मानर प्रत्यक्ष निराकरण अनेकान्त दर्शन का सांस्कृतिक आधार स्वसंवेदन प्रत्यक्ष वादन सर राधा कृष्णन के मत की समीक्षा बौद्धसम्मत विकष लक्षणका निरास मो० हनुमन्तराब के मत की मालोचना ३. सरल और नयायिक प्रत्यक्ष लक्षणका निरास ५६ विषय परिचय- ३२ प्रत्यक्षके भेद अन्धका काम ३२ / परमार्थ मन्यक्ष ५८ प्रायविनिश्चय की अलकाता १२ / ग्रन्थकार विभाग अन्यगतममेय ३२-३३ | अफलके समयके सम्बर्ग कारिका संस्था ३३ पादिरागसरि (मेमीजी द्वारा लिखित) म्यायविनिश्चमविधरण का परिचय ३५-३६ / अन्यकी विषय सूवी प्रत्यक्ष परिच्छेद का विषय ३६ मूलग्नस्थ प्रमाण के भेद - - सम्पादकीय मन् १९३३ से ही जब मैने त्यायमुदचन्द्र का सम्पादन आरम्भ किया था, यह संकल्प था अलदेव के ग्रन्यों का शुद्ध सम्पादन किया जाय। इस संकल्प के अनुसार मालग्रन्थाना में पाई निश्रय की मूल कारिका भी उत्थान पाक्यों के साथ प्रकाशित की जा चुकी है। इन कारिवाओं को समय न्यायधिनिश्चयविवरण की उनामान्तीय कतिपय प्रनियाँ देखी गई थी। ये प्रतियाँ अादिबहुल थी ही पर इनमें एक एक दो दो पत्र तक के पाठ यत्र तत्र सूटे हुए थे। उस समय मूहविद्री के घरिवार बिलास मयत से नादरनीय प्रति भी मंगाई थी। उसके देखने से यह आशा हो गई थी कि इसका भी ई सम्पादन हो सकता है । प्रमाणनानिकारकार जैसे पूर्वपक्षीय चौद्ध ग्रन्थों की प्रतियाँ प्राप्त हो जाने से यार्य असाध्य नहीं रहा। सन् १९४४ में दानवीर साहु शान्तिप्रसाद जी ने ज्ञानपीट की स्थापना की । इसमें स्व. माई सरी मूर्तिदेवी के स्मरणार्थ मूर्तिदेवी जन प्रन्यमाला प्रारम्भ की गई। संस्कृत विभाग में न्यायविनिया विवरण का सम्पादन लगातार चलता रहा है । इसके संशोधनार्थ वनारस, आरा, सोलापुर, सरसा मुडबिट्टी और पारंग के मठ से चार कागत की तथा वो ताडपत्र की प्रतिपा एकत्रित की गई। बनारस की प्रति स्यावाद जैन विद्यालय के असर सरस्वती भान से । इसकी संज्ञा सी गई है। अशुद्ध पर मुवाच्य है। आरा की प्रति जैन सिद्धान्त भवन की है । इसकी संज्ञा आ० रखी है। यह यनारम की प्रति ताह ही अशुद्ध है। वनारस को प्रति इया प्रति से लिखी गई है। सोलापुर से प्र० सुमति वाई शाह ने जो प्रति भिजवाई ी यह यंबई के ऐलक पन्नालाल दि. सरस्वती भाग की प्रति थी। यह भी अशुद्धप्राय है। इसकी संज्ञा सा है। सरमावा से पं परमानन्द जी शास्त्री ने पीर सेस मन्दिर की प्रति भिजाई थी । यह पूर्वो प्रतियों से कुछ शुद्ध है। इसकी संज्ञा प० है। ये प्रतियाँ कागज पर लिखी गई है तथा इनमें पत्तिय तो अनेक स्थानो पर टूटी ही है एक एक दो दो पत्र तक के पास एट है। चीरवाणी विधास भवन मूडबिदी से जो ताडपत्रीय प्रति श्नही लिपि में प्राप्त हुई थी , उसे हमने आदर्श प्रति माना है। इसमें २७७ पत्र, एक पत्र मे ९-१० पति तथा प्रति पंक्ति १५३-१५४ अक्षर है। यह प्रति प्रायः पूर्ण और शुद्ध है। मुल कारिकाओं के उरयान बार के भागे । इस प्रकारे का कारिका भेदक चिन्ह बना हुआ है। इस प्रति में कही कहीं टिपण भी हैं, जिन्हें 'ता. दि०' इस मंनके साथ टिप्पण में दे दिया है। जहाँ इस प्रति में बिलकुल ही अशुद्ध पाठ रहा है पर इसका पाठ पाठान्तरटिपण में देकर अन्य प्रतिया शापाठ अपर दिया है। सभी प्रतियों में जहाँ भशुद्ध पार है नया सम्पादक को शुद्ध पाउ मूला ऐसे स्थान में बाष्पीय प्रति का अशुद्ध पाठ हो मूल मे रा है नथा सम्पादक द्वारा किया गया संशोधन गोल ( ) किट में दिया है या सन्देहारमा (१) चिद दे दिया है। हमने स्वसंशोधित 3 मूल शामिल करके नई प्रति को जन्म नहीं दिया है । ऐसे स्थान में ताप प्रति के सिराय अन्य नियों पाठटिपण मेंदे दिए है। एक ताडपत्रीय प्रति पाश के मर की भी हमें प्राप्त हुई थी। इसका उपयोग मो संदिग्ध पाli निर्णय के लिए यरामा किया गया है । यह प्रति प्रायः अमुद्र है। टिप्पण-इस ग्रन्थ में भी भापकुमुमचन्द्र जैसे तुलनात्मक टिप्पण देने का विचार यावी HRIA भी थी और सामग्री भी । पर यह कार्य बहुत समय भीर पति से लेता । मनः मध्यम माग भलान लेकर टिपण संक्षिप्त कर दिए हैं। इनमें महार के पाठभेद नया पक्ष का द्वारपूर्व रा. 4 - - रने के लिए तत्तत्पूर्वपक्षीय ग्रन्थों के पाठ उसकी टीका तथा अर्थबोधक टिपण ही विशेषरूप से लिखे हैं । न्य को समझने में इनसे पर्याप्त सहायता मिलेगी। टाइप-मूल कारिकाओं के लिए प्रेटेन । अवतरण पाक्यो के रिए मेट न २ और विवरण के टमेट न ४ टाइप का उपयोग किया गया है । टिप्पण मे ग्रन्या के नाम तथा प्रतियो के नाम कारे इप में दिए गए हैं। प्रस्तावना में प्रथ और अन्धकार से सम्बन्ध रसने बारे कुछ खास मुद्दों पर सक्षेप में चार किया है। कुछ प्रमेयो को नए दृष्टिकोण से देखने का भी रघुप्रयत्न हुआ है । स्याद्वाद ओर सप्तमंगी विषय में प्रचलित अनेक भ्रान्तमती की समीक्षा की गई है। ग्रन्थकार अकल के समय के सम्बन्ध विस्तार से रिखने का विचार था पर अपेक्षित सामग्री की पूर्णता न होने से कुछ कार के लिए यह 'यं स्थगित कर दिया है । ज्ञानपीठ मूर्तिदेवी ग्रन्थमाला में आगे न्यायविनिश्चय विवरण का द्वितीय भाग "यार्थवार्तिक और मिद्धिपिनिश्चय टीका ये अकरकीय ग्रन्थ प्रकाशित होने वाले हैं। जिनमें न्यायविनिश्चय यिय. र द्वितीय भाग आधा छप भी गया है। तत्वार्थवार्तिक तीन ताडपत्रीय तथा अनेक कागज पर लिखी गई चीन प्रतिया से शुद्धतम रूप में सम्पादित हो चुका है तथा मिद्धिविनिश्चयटीका पर भी पर्याप्त श्रम किया चुका है। आशा है यह समस्त अरवाडमय शीघ्र ही प्रकाश में आएगा। तय तक अपलध के समय दि की साधिका सामग्री पर्याप्त माना में प्रकाश में आयगी। ज्ञानपीठ के अनुसंधान विभाग में अप्रकाशित अम्लङ्कीय वाङ्मय का प्रकाशन तथा अशुद्ध काशित का शुद्ध प्राशन और तत्वार्थसून की अप्रकाशिरा टीकाओ का प्रकाशन यही कार्य मुख्यतया मेरे पक्रम में है। विविध विषय के संस्कृत प्राकृत और अपनश भाषा के दस ग्रन्थ अधिकारी विद्वानी हरा सम्पादित हो चुके है, जो छपाई की मुविधा होते ही प्रकाशित हागे । सस्कृतिसेग्यो, जिनवाणीभक्तो और साहित्यानुरागियों को ज्ञानपीठ के साहित्य का प्रसार करके उसके इस सास्कृतिक अनुष्ठान में सहयोग ना चाहिए। आभार-दानवीर साहु शान्तिप्रसाद जी तथा उनकी समरूपा धर्मपत्नी सौजन्यमूर्ति रमाजी ने सास्कृ. रोक साहित्योद्धार ओर नव साहित्य निर्माण की पुनीत भावना से भारतीय ज्ञानपीठ का मस्थापन किया है और इसमें धर्ममणा स. मावेश्वरी मूर्तिदेवी की गज्य भावना को मूर्तरूप देने के लिए ज्ञानपीठ मूर्तिदेवी न अन्यमारा का सस्कृत प्राकृत हिन्दी आदि अनेक भाषाआ में प्रकाशन किया है । इनकी यह सस्कृति देवा भारत के गौरवमय इतिहास का आरोकमय पृष्ठ यनेगी। इस भद्र दम्पति से ऐसे ही अनेक सास्कृ. तेक कार्य होने की आशा है श्रद्धेय ज्ञाननयन प सुखलाल जी की शुभ भावनाएँ तथा उपलब्ध सामग्री का यथेष्ट उपयोग रने की सुविधाएँ और विचारोत्तेजन आदि मेरे मानम विकास के सम्बल है । श्रीमान् प० नाथूरामजी प्रेमी का किन शब्दों में स्मरण किया जाय, ये चतुर माली के समान ज्ञानाङ्करा को पल्लविन और पुप्पित करने अपनी शक्ति का देश भी नहीं छिपाते । आपका घादिराज सूरि वाला निबन्ध ग्रन्थकार भाग में उद्धत या गया है। सुहृदर महापडित राहुल साकृत्यायन ने अपनी कठिन तिव्बत थाना में प्राप्त प्रज्ञाकर- सस्त प्रमाणपातिगारद्वार की प्रति देकर तो इस ग्रन्थ के शुद्ध सम्पादन का द्वार ही सोल दिया है । इन सब ज्ञानपथगामियो का पुन पुन स्मरण करता हूँ। श्री प० देवरभट्ट शर्मा न्यायाचार्य ने ताडपत्रीय जड प्रति का आद्यन्त वाचन ही कहीं किया सन्तु सम्पादन में भी अपने वैदुप्य से पूरा पूरा सहयोग दिया है । प०महादेवजी चतुर्वेदी व्याकरणाचार्य ने मन्ध के भ्रूफ सशोधन में पूर्ण सहकार किया है। श्री प० भुजपरी जी शास्त्री तथा प. लोकनाथजी स्त्री भूबिदी ने ताडपत्रीय मतियों को भेजा है। घी य० नेमीचन्द्रजी आरा, पं० जुगुरुकिशोरजी मुख्तार साया आदि महानुभाषा ने अपने अपने ग्रन्थ भण्डार की प्रतियाँ सम्पादनार्थ दी। मैं इन सबका भार मानता हूँ। . - ५
मानपीट या अन्य कार्य देग्ने हुए इन चार वर्षों का समम जितनी भी निरापरता से इस शान
में एग सका है उसका यात कुण श्रेय ज्ञानपीट के ममना मन्त्री श्री अयोध्याप्रसादजी गोपलीय,
है। उगने भनी सिधारी को महाल कर भी याद में मी सदा उम्मन रखा है।
प्रवेश कार्य सामग्री में होता है। मे दम सामनी वा एक महा इसमे अधिक नहीं ।
भारतीय ज्ञानपीठ
मार्गशीर्ष मुरर ५
पीर सम्मत
-~-महेन्द्रकुमार जैन
प्रकाशन व्यय
२२५०) छपाई
१००) चित्र क्यर
१०००) सागज
७५०) भेंट आलोचना
६००) जिद
२००) विज्ञापन
२२५२) सम्पादन २०००) कर्माशा आदि
२५.०)पवन्या, प्रकाशन आदि
कुर जोड़ १६५०)
६०० प्रति छपी, लागत मूल्य 1९1)
कीमत 1५).
प्रस्तावना १ ग्रन्थ विभाग दर्शन-संसार के यावत् घर अचर प्राणियों में मनुष्य को धोना सविशेष विकसित है। उसका अन्य प्राणियों की तरह केवल माहार निद्रा रक्षग और प्रजनन में ही नहीं बीतता किन्तु यह अपने स, मरणोत्तर जीवन, जड़ जगत् , उससे अपने सम्बन्ध आदि के विषय में सहज गति से मनन-विचार रेका अन्यासी है। सामान्यतः उसके प्रश्नों का दार्शनिक रूप इस प्रकार है-आरमा क्या है ? परलोक नहीं ! यह जद जगत् क्या है ? इससे भामा का क्या सम्बन्ध है ? यह जगत् वयं सिद्ध है या की बैटन शक्ति से समुत्पर है ? इसको गतिविधि किसी चैतन से नियन्त्रित है या प्राकृतिक साधारण से आबद्ध ? क्या असत् से सत् उबप हुआ ? क्या किसी सत् का विनाश हो सकता है ? इत्यादि नव जाति के आदिकाल से बराबर उत्पन्न होते रहे है और प्रत्येक दार्शनिक मानस इसके समाधान स करता रहा है। ऋग्वेद तया उपनिषत् कालीन प्रश्नों का अध्ययन इस बात का साक्षी है। दर्शन- ऐसे ही प्रश्नों के सम्बन्ध में उहापोह करता आया है। प्रत्यक्षसिद्ध पदार्थ की व्यारण में मतभेद हो है पर स्वरूप उसका विवाद से परे है किन्तु परोक्ष पदार्थ को व्याख्या और स्वरूप दोनो ही के विषय है। यह ठीक है कि दर्शन का क्षेत्र इन्द्रियगाय और इन्द्रियातीत दोनों प्रकार के पर मुख्य विचार यह है कि दर्शन को परिभाष्य क्या है ? उसका वास्तविक अर्थ क्या है ? रणतया दर्शन का मुख्य अर्थ साक्षात्कार करना होता है। यस्तु का प्रत्यक्ष ज्ञान ही दर्शन का भिधेय है। यदि दर्शन का यही मुख्य अर्थ हो तो दर्शनों में भेद कैसा ? किसी भी पदार्थ का पूर्ण प्रत्यक्ष दो प्रकार का नहीं हो सकता। अग्नि का भरपक्ष गरम और उण्डे के रूप में दो तरह नुभवगम्य है और न विश्वासयोग्य ही। फिर दर्शनों में तो पग-पग पर परसर विरोध विधमान री में किसी भी जिज्ञासु को यह सन्देह स्वभावतः होता है कि जब सभी दर्शन-प्रणेता ने सब का साक्षादर्शन करके निरूपण किया है सो उनमे इतना मतभेद क्यों है? या सो दर्शन । साक्षात्कार अर्थ नहीं है या यदि यही अर्थ है सो पक्ष के पूर्ण स्वरूप का पद दर्शन नहीं है या पूर्ण स्वरूप का दर्शन भी हुआ हो सो उसके प्रतिपादन की प्रक्रिया में अन्तर है ? दर्शन के परस्पर का कोई न कोई ऐसा ही हेतु होना चाहिये। दूर न जाइये, सयाः सनिकर भारमा के स्वरूप शनकारी के साकार पर विचार कीजिये-सोर भारमा को स्थानिय मागरी है। इसके नारमा झा सरूप अगादि अनन्त अधिकारी निष्प है। योग इसके विपरीत शिक्षण परिवर्तित रूप ही भामा मागते हैं। मैमायिक पैशेषिक परिवर्तन तो मानते हैं, पर यह गुणों सकती है। मीमांस मे आगा में भरपामेशव परिपर्सन स्वीकार करके भी मर गिय सकार योग का भी पी अभियान है। अनी मे अपस्याभेदशा परिमान के मूल आभार मार सनकाल में किसी भी अपरिपरि भंश को सीकार नहीं किया। फिना प्रविधि पर्याय के पार रहगे को ही माप माना है। पाक इग सथ पक्षों से मिस भूतपापरूप हो Fat Trar है। परो माया के तमाम के रूप में दर्शन नहीं हुए। यह सो दुई भारमा के पा। उसकी भाति पर निधार फोगिये तो ऐसे ही भनेक पनि मिलते हैं। मामा भमूत Mar भी दागा राम है कि पद हमारे धर्मों से नहीं दिगई दे सस्ता इसमें किसी को ही है। इसलिए मतोरिनपस कर पियों में अपने दरांग से पतापा कि भामा समापफ है। दिमी को मिला कि भारमा भगुरूप है, गाय के समान भति गश्म है। पुर को दिया कि 'दशा - - प्रस्तावना संसार के समस्त पदार्थ ज्ञेय अर्थात् ज्ञान के विषय होने योग्य है तथा ज्ञान पर्याय में य के जानने की योग्यता है, प्रतिबन्धक ज्ञानावरण कर्म जब हट जाता है तब वस्तु के पूर्ण स्वरूप का भान १ शुद्ध कांच , मुक्त जीव का चैतन्य, शुद्ध विन्मात्र २ कलई लगा हुआ कांच दर्पण (प्रतिविम्ब रहित) २ सशरीरी संसारी जीवका चैतन्य, पर शेयाकार शल्प, दर्शनावस्था निराकार ३ सप्रतिविम्ब दर्पण ३ जयाकार, साकार, ज्ञानावस्था इस तरह चैतन्य के दो परिणमन-एक निर्विकार अबद्ध अनन्त शुद्ध चैतन्यरूप मोक्षावस्थाभावी और दूसरा शरीर धर्म मादि से बद्ध सावकारी सोपाधिक समारावस्थामायी। संसारावस्थाभावी चैतन्यके दो परिणमन एक सप्रतिविम्व दर्पण की तरह ज्ञेयाकार और दूसरा निष्प्रतिविम्ब दर्पण की तरह निराकार । ज्ञयाकार परिणमन का नाम ज्ञान तथा निराकार परिणमन का नाम दर्शन । तत्त्वार्थ राजवार्तिक में-जीवका लक्षण उपयोग किया है और उपयोग का लक्षण इस प्रकार दिया है- "याह्याभ्यन्तरतुद्वयसमिधाने यथासंभयमुपलधुश्चैतन्यानुविधायी परिणाम उप- योगः।"(त. वा. २८) अर्थात्- त्-उपलब्धा को (जिस चैतन्य में पदार्यों के उपलब्ध अर्थात् शन करने की योग्यता हो) दो प्रकार के बाह्य तथा दो प्रकार के सम्यन्तर हेतुओं के मिलने पर जो पैतन्य का अनुविधान करनेवाला परिणमन होता है उसे उपयोग कहते हैं । इस लक्षण में पाए हुए 'उपल-धुः' और 'चैतन्यानुविधायी' ये दो पद विशेष ध्यान देने योग्य है । चैतन्यानुविधायी पद यह सूचना दे रहा है कि जो ज्ञान और दर्शन परिणमन माया- भ्यन्तर हेतुओं के निमित्त से हो रहे हैं ये स्वभावभूत चैतन्य का अनुविधान करनेवाले हैं अर्थात् चैतन्य एक अनु. विधाता दयाश है और उसके ये पायाभ्यन्तर हेवधीन परिणमन हैं। चैतन्य इनसे भी परे शुद्ध भवस्थामें शुद्ध परिणमन करनेवाला है । "वपलन्धुः' पद चैतन्यकी उस दशाको सूचित करता है भबसे चैतन्यमें बाघभ्यान्तर हेतुओं के निराकार या साकार होने की योग्यता होती है और वह अवस्था अनादि कालसे धर्मवद्ध होने के कारण मनादिसे ही है । सात्पर्य यह कि अनादिसे कर्मबद्ध होनेके कारण चैतन्य कांवमें वह कलई लगी है जिससे यह दर्पण यना है इसीमें बाह्याभ्याकार हेतुओं के अधीन निराकार और साकार परिणमन होते रहते हैं जिन्हें प्रमशः दर्शन और शान कहते हैं । पर अन्तमें मुक्त अवस्थामें जर सारी कलई धुर जाती है विशुद्ध निर्विकार निर्विकल्प अनन्त अखण्ड चैतन्यमात्र रह जाता है तब उसका शुद्ध चिद्रूप ही परिणमन होता है। ज्ञान और दर्शन परिणमन यायाधीन है। उसमें शान और दर्शनका विभाग ही दिलीन हो जाता है। तत्त्वार्थ राजवार्तिक (18) में घटके स्वपरचतुष्टयका विचार करते हुए अन्तम पटशानगत झयाकारको घटका स्वारमा बताया है और निष्प्रतिबिम्ब ज्ञानाचारको परारमा । यया- "चैतन्यशकी आफारौ शानाफारो झेयाकारएच । अनुपयुक्तप्रतिविम्याकाराद - तलवत् सानाकारः, प्रतिविम्याकारपरिणतादर्शतलपत् श्रेयाकारः।" इस उदरणसे स्पष्ट है कि चैतन्यशक्तिक दो परिणमन होते है- यार और शानाकार । रामवातिकमै शेयाकार परिणमन उसका साकार परिणमन हे तथा शानाकार परिणमन निराकार | जर तक शेयाकार परिणमन है तब तक यह वास्तविक मर्पण ज्ञानपर्यायको धारण करता है और निझे पाकार दशामें दर्शन पर्यायको । धवला टीका (५० पृ.) और महझम्पमह (पृ. १-४२) में सौदान्तिक रष्टिये जो दर्शनको म्पा की है उसका तात्पर्य भी यही है कि-विषय और विषयोंके सन्निपात के पहिले जो चैतन्यही निराकार परिणति या स्वाधर परिणति है उसे दर्शन कहते हैं। राजपातिकमें चैतन्यशक्तिके जिस शानामरकी परवा है यह वास्तविकमें दर्शन ही है। इस विवेचनसे इतना तो स्पष्ट ज्ञात हो जाता है कि-चैतन्यको एक पाप है जिसमें प्रतिक्षण उत्पाद म्पस धोभ्यात्मक परिणमन होता रहता है और जो मनादि मनन्ताल तक प्रवाहित रहने गाली है। इस पारामें कर्मबन्पन पर सत्य मन इन्दिय आदि के सन्निपान ऐसी फलई लग गई है जिसके कारण इस जगाधर-अर्यात पदार्पो जानने म परिगमन होता है । इसका शानावरण कर्मके क्षयापेशमानुपार विभ्रम होता है। सामान्यतः शरीर समर १२ न्यायविनिश्चयविवरण शाम पर्याय के द्वारा अवश्यम्भावी है। ज्ञान पर्याय की उत्पत्ति का जो क्रम टिपणी में दिया है उसके अनु. सार भी जिस किसी वस्तु के पूर्णरूप तरु ज्ञानपर्याय पहुँच सकती है यह निर्विवाद है । जब ज्ञान वस्तु के अनन्तधर्मात्मक विराट् स्वरूप का यथार्थ ज्ञान कर सकता है और यह भी असम्भव नहीं है कि किमी भारमा में ऐसी ज्ञान पर्याय का विकास हो सकता है राय वस्तु के पूर्ण रूप के साक्षात्कारविषय प्रश्न काममाधान हो ही जाता है । अर्थात् विशुद्ध ज्ञान में वस्तु के विराट् स्वरूप की झांकी जा सकती है और ऐसा विशुद्ध ज्ञान तावश अपियों का रहा होगा। परन्तु वस्तु का जो स्वरूप ज्ञान में झलकता है उस सबका पादों से कथन करना असम्भव है क्योंकि शब्दों में यह शक्ति नहीं है जो अनुभव को अपने द्वारा जला सके। - सामान्यतया यह तो निश्रित है कि वस्तु का स्वरूप ज्ञान का य तो है। जो भिख भित्र ज्ञाताओं के द्वारा जाना जा सकता है वह एक ज्ञाता के द्वारा भी निर्मल शान के द्वारा जाना जा सकता है। तात्पर्य यह कि वस्तु का नसण्ड अनन्तधर्मान्मा विराटस्वरूप अखण्ट रूप से ज्ञान का विषय वोपन जाता है और तत्वज्ञ ऋषियों ने अपने मानसशान और योगिज्ञान से उसे जाना भी होगा। परन्तु शब्दों की सामध्यं इतनी अत्यल्प है कि जाने हुए वस्तु के धर्मों में अनन्त बहुभाग तो अनभिधेय है अर्थात् शब्द से कहे ही नहीं जा सकते। जो कहे जा सकने है उनमा अनन्तवाँ भाग ही प्रज्ञापनीय अर्थात् दूसरों के लिए समझाने लायक होता है। जितना प्रज्ञापनीय है उसका अनन्तवा भाग शव-श्रुतनिषद होता है । अत कदाचित् दर्शनप्रणेता ऋपियों ने वस्तुतत्व को अपने निर्मल ज्ञान से अखण्डरूप जाना भी हो तो भी एक ही वस्तु के जानने के भी दृष्टिकोण जुदे जुदे हो सकते हैं। एक ही पुष्प को वैज्ञानिक, साहित्यिक, आयुर्वेदिक तथा जनसाधारण भाखों से समप्र भावसे देखते है पर वैज्ञानिक उसके सौन्दर्य पर मुग्ध न होकर उसके रासायनिक संयोग पर ही विचार करता है। कपि को उसके रासायनिक मिश्रण की कोई चिन्ता नहीं, कल्पना भी नहीं, वहतो केवल उसके सौन्दर्य पर मुग्ध है और वह किमी कमनम्प कामिनी के उपमाल कार में गुथने की कोमल काना से आकलित हो उठता है। जब कि वैयजी उसके गुणदोपों के विवेचन में अपने मन को केन्द्रित कर देते हैं । पर सामान्य जन उसकी रीमी रीमी मोहक सुवास से पासित होकर ही अपने पुष्पज्ञान की परिसमाप्ति कर देता है। तात्पर्य यह कि घस्तु के भनन्त धर्मात्मक विराटस्वरूप का अखण्ड भाव से ज्ञान के द्वारा प्रतिभास होने पर भी उसके विवेय अभिप्राय साथ ही इस चैतन्यशक्तिका फल्ईवाले कांचकी तरह दर्पणवत् परिणमन हो गया है। इस दर्पणवत् परिणमन. वाले समयमें जितने समय तक वह चैतन्य दर्पण किसी सेयके प्रतिबिम्बको लेता है अर्थात् उसे जानता है तब तक उसकी वह साकार दशा ज्ञान कहलाती है और जितने समय उसको निराकार दशा रहता है यह दर्शन कही जाती है। इस परिणामी चैतन्यका सांख्यके चैतन्यसे भेद स्पष्ट । मायका चैतन्य सदा अविकारी परिणमनशून्य और कूटस्य नित्य है पर कि जैनका चैतन्य परिणमन करनेवाला परिणामी नित्य है। सांय. के यहाँ बुद्धि या ज्ञान प्रकृतिका धर्म है ना कि जैनसम्मत शन चैतन्यो हो पर्याय हैं। प्रख्यका पैवम्य संसार दशा में भी शेगार परिच्छेद नहीं करता जबकि जैनध चैतन्य उपाधि दशा याकार परिणत होता है उन्हें जानता है। स्कूल भेद तो यह है कि जन जैनके यहाँ चैतन्यकी पर्याय है जबकि पश्यि- के यहाँ प्रकृतिकी । इस तरह शान चैतन्यकी औषाधिक पर्याय है और यह संधार दशमैं पार चालू रहती है जब दर्शन अवस्था होती है तब ज्ञान अवस्था नहीं होती और जब ज्ञान पर्याय होती होती है पदर्शन पर्याय नहीं । ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्म इन्हो पर्यायोंको होनाधिक रूपये भारत करते हैं और इनके क्षयोपशम और क्षयके अनुसार इन अपूर्ण और पूर्ण विकास होता है। संक्षाजस्थामें बर ज्ञानापरणका पूर्ण क्षय हो जाता है तब चैतन्य शशिको साकार पर्याय ज्ञान अपने पूर्ण रूपमें वियसको प्राप्त होती ।। , "पण्णवणिया भावा भद्रभायोमणमिलप्पाण। पणवाणिजाण पूण अणंतभागोर मुदणिवतो."-गो• और गा.१५ वगा प्पमिमेद से अनन्त हो सकते हैं। फिर अपने अपने अभिप्राय से घस्तुविवेचन करनेवाले शब्द भी अनन्त है। एक बैज्ञानिक अपने रष्टिकोण को ही पूर्ण सत्य मानकर कवि या वैध के दृष्टिकोण या अभिमाप को पस्तुतस्य या अप्राहक या असत्य ठहराता है तो वह मथाद्रष्टा नहीं है, क्योंकि पुष्प तो भगवण्ड भाव से सभी के दर्शन का विषय हो रहा है और उस पुष्प में अनन्त अभिप्रायों या रष्टिकोणों से देखे जाने की पोग्यता है पर दृष्टिकोण और तत्प्रयुक्त शन्द सो जुदै अदे हैं और वे आपस में टकरा भी सकते हैं। इसी टकराहट से दर्शनभेद उत्पन्न हुआ है। तय दर्शन शब्द का क्या अर्थ फलित होता है जिसे हरएक दर्शन- पादियों ने अपने मत के साथ जोड़ा और जिसके नाम पर अपने अभिप्रायों को एक दूसरे से टकराकर उसके नाम को कलंकित किया ! एफ शब्द जय लोक में प्रसिद्धि पा लेता है तो उसका लेबिल तदाभास- मिथ्या वस्तुओं पर भी लोग लगाकर उसके नाम से स्वार्थ साधने का प्रयत्न करते हैं । जब जनता को डाने के लिए खोली गई दूकानें भी राष्ट्रीय-भण्डार और जनता भण्डार का नाम धारण कर सकती है और गान्धी. छाप शराब मी व्यवसाइयों ने यना डाली है।तो दर्शन के नाम पर यदि पुराने जमाने में तदाभास पल पड़े हो तो कोई भाश्चर्य की बात नहीं। सभी दार्शनिकों ने यह दावा किया है कि उनके ऋषि ने दर्शन करके तत्व का प्रतिपादन किया है। ठीक है, किया होगा? दर्शन का एक अर्थ है-सामान्यावलोकन । इन्द्रिय भौर पदार्य के सम्पर्क के याद जो एक पार ही वस्तु के पूर्ण रूप का असण्ड या सामान्य माप से प्रतिभास होता है उसे शास्त्रकारों ने निर्विकल्प दर्शन माना है। इस सामान्य दर्शन के अनन्तर समस्त झगदों का मूल विकल्प भाता है जो उस सामान्य प्रतिभास को अपनी कल्पना के अनुसार चित्रित करता है। भर्मकीर्ति आचार्य ने प्रमाणवार्तिक (३।४४ ) में लिखा है कि- "तस्मादृष्टस्य भावस्य दृष्ट एवासिलो गुणः। भ्रान्तेनिश्चीयते नेति साधनं सम्प्रवर्तते ॥" अर्थात् दर्शन के द्वारा दृष्ट पदार्थ के सभी गुण दृष्ट हो जाते हैं, उनका सामान्यावलोकन हो जाता है। पर भ्रान्ति के कारण उनका निश्चय नहीं हो पाता इसलिए साधनों का प्रयोग करके तसवी का निर्णय किया जाता है तारपर्य यह कि-दर्शन एक ही बार में वस्तु के अखण्ड सरूप का अवलोकन कर लेता है और इसी अयं में यदि दर्शनशास्त्र के दर्शन शब्द का प्रयोग है तो मतभेद की गुंजाइश रह सकती है क्योंकि यह सामान्यावलोकन प्रतिनिपत्त अर्थक्रिया का सापक नहीं होता। अर्थकिपा के लिए तो तत्तदंशों के निशय की आवश्यकता है। अतः असली कार्यकारी तो दर्शन के बाद होनेवाले शब्दप्रयोगवाले विकल्प हैं। जिन विकलों को दर्शन का पृष्यल पास है ये प्रमाण है तथा जिन्हें दर्शन का पृष्टपल प्राप्त नहीं है अर्थात् जो दर्शन के बिना गाय कल्पनामसून है वे अप्रमाण हैं। अतः यदि दर्शन शब्द को भारमा आदि पदार्थों के सामान्यावलोकन अर्थ में लिया जाता है तो भी मतभेद की गुंजाइश कम है। मतभेद तो उस सामान्यावलोकन की प्यारया भीर निरूपण करने में है। एक मुन्दर खी का मृत शरीर देखकर विरागी भिक्षु को संसार की असार दशा की भावना होती है। कामी पुरुष उसे देखकर सोचता है कि कदाचित यह जीवित होती... तो कुत्ता अपना मा समझकर प्रसन्न होता है। यपि दर्शन तीनों को हुभा है पर जापाएँ जुदी दी है। जहाँतक वस्तु के दर्शन की बात है यह विवाद से परे है। पाद तो शन्दों से शुरू होता है। यद्यपि दर्शन पस्तु के बिना नहीं होता और वही दर्शन प्रमाण माना जा सकता है जिसे भयंका बमास हो अर्थात् जो पदार्थ से उत्पन हुआ हो। पर यहाँ भी वही विवाद उपस्थित होता है कि कौन दान पदार्य की सत्ता का भविनाभावी है तथा कौन पदार्थ के दिना केपट कालनिक है। प्रत्येक यही कहतारिदमारे दसन ने भामा को उसी प्रकार देता है जैसा हम करते हैं, तब यह निर्णय कमेरो कि यह दर्शन वास्तविक अर्पममुबूत है भौर यह दर्शन मात्र कपोलकलित ! निर्विकसक दर्शन को - - - न्यायविनिमयविवरण प्रमाण मानने वालों ने भी उसी निर्विकल्पक को प्रमाण माना है जिसकी उत्पत्ति पदार्थ से हुई है। अन मइन ज्यों या न्यो है कि दर्शन शाद का धास्तविक क्या अर्थ हो सस्ता है ? जैसा कि उपर लिखा जा चुका है कि अनन्तधर्मवाले पदार्थ को ज्ञान करने के टिकोणों को शब्द के द्वारा कहने के प्रकार अनन्त होते हैं। इनमें जो दृष्टियाँ वस्तु का स्पर्श करती है तथा अन्य वस्तुस्सी रटियों का समादर करती हैं दे सन्योन्मुख हैं। जिनमें यह आग्रह है कि मेरे द्वारा देखा गया ही पस्तुत सबा भीर धन्य मिथ्या वे वस्तुस्वरूप से परागस होने के कारण विसंवादिनी हो जाती है। हम सर कस्तु के स्वरूप के आधार से दर्शन शद के अर्थ को बैठाने का प्रयास कथमपि सार्थक हो जाता है। जब यस्तु स्वयं नित्य भनित्य, एक-अनेक, भाव-अमाव, आदि विरोधी द्वन्द्रों का अविरोधी क्रीडास्थल है, उसमें उन सब को मिलकर रहने में कोई विरोध नहीं है, तब इन देखनेवारो (दृष्टिकोणों) को क्यों। पुरात सूक्षता है जो उन्हें एक साथ नहीं रहने देते ! प्रत्येक दर्शन के ऋषि अपनी आनी टि के अनुसार पस्तु म्वरूप को देखकर उसका चिन्तन करते है और उसी माधार से विश्वव्यवस्था बैटाने का प्रयास करते हैं उनकी मनन-चिन्तनधारा इतनी सीम होती है कि उन्हें भावनावश उस पस्त का साक्षाकार जैसा होने लगता है। और इस भावनात्मक साक्षात्कार को ही दर्शन संज्ञा मिल जाती है। सम्यग्दर्शन में भी एक दर्शन वाद है। जिसका एक्षग तराईच में साधदान किया गया है। यहाँ दर्शन शब्द का अर्थ सतया श्रद्धान ही है । अर्थात् सालों में भर पायदान का होना सम्यग्दर्शन कहलाता है। इस अयं से जिसकी जिमपर श्रद्धा अर्थात् तीम विरास है यही उसका दर्शन है। और यह अर्थ जी को राता भी है कि अमुक अमुक दर्शनप्रणेता ऋपियों को अपने हार प्रणीत तर पर विश्वास था । विश्वास की भूमि को जी चुदी होती है। अत. जर दर्शन विधास की भूमिरा पर आकर प्रतिष्टित हुआ तब उसमें मवभेद का होना स्वाभाविक यात है। और इसी मतभेर के कारण मुण्डे मुण्टे मतिर्भिक्षा के प्रीपित रूप में अनेक दर्शनों की एष्टि हुई और सभी दर्शनों में विधास की भूमि में उप होकर भी अपने में पूर्णता और साक्षारवार का ग्यांग भरा और अनेक भपरिहार्य मतमेवों की पुष्टि की, जिनके समर्थन के लिए दाम्रा हुए, संघर्ष हुए और नाम इतिहास के पृष्ठ करंजित किए गए। सभी दर्शन पिपास की भूमि में पनपार भी अपने प्रणेताभी में साक्षारमर और पूर्ण ज्ञान की भावना को फैलासे रहे फलतः मिशासु सन्देह के चौराहे पर पहुंच कर दिग्धान्त होता गया। इस एर्शनों ने अपने अपने विधान के अनुसार जिज्ञासु को सत्य साक्षात्कार या सार साक्षात्कार कापूरा भरोसा सो दिया पर तापज्ञान के स्थान में संधार ही उसके पहले पड़ा। जैनदर्शन में इस दिशा में उस्लेख योग्य मार्ग प्रदर्शन किया है। उसने प्रया की भूमिका जन्म का भी यह पस्तुस्वरूपी विधार प्रस्तुत किया है जिससे पर पदा की ममिका से निकल कर तायसाक्षाकार के कर्मच पर आ पहुंचा है। उसने बताया कि अगर का प्रपेकपा मूलतः एक रूप में सत् है। प्रत्येक सर पापरष्टि से उस पिनष्ट होस भी दम्प की पनापन धारा में माहित रहता है अर्थात् म यह कूटस्थनित्य हैन सातिराय नियम भनिय किन्न परिणामीनियो। आर के किसी सत् का विनाश नहीं हो सकता भोरन किसी ममत् की उपपिइस सस सस्ता पाय उत्पाद और धौम्मामक है। प्रत्येक पा निय-अमिय, एक अनेड, स-भस से ममेड शिरोधी पन्नों का अविरोधी आधार है। यह मनन्त शफियों का भवः माहिती सहा परिशमन प्रतिक्षम होता रहता है पर उसको मूलपारा प्रवाह न तो नहीं राखता है भोर न सिसी यूगरी पार में मिलीन ही होता है। जगदमें अनन्त चेतन दम्प अनन्त मधेतन मप एक पर्मदर एक अपमदार एक भाकाश म्य, मोर भल्यास प अपनी भनी स्वतन्य मत्ता दो।। रे कमी एक दूसरे में रिलीन मही शेतको भोर भएना मुहम्पाप महीं पोर सकते। प्रत्येक प्रतिक्षम परिगामी है। उप परिगमन सा मी होता है पिसा भी। मध्यान्तरसवान्वि इनमें कदापि नहीं हो पाती हम पहन - प्रस्तावना अचेतन द्रव्य अनन्त धर्मों का अखंड अविभागी मौलिक ताव है। इसी अनेकान्त अनन्तधर्मा पदार्थ को प्रत्येक दार्शनिक ने अपने अपने दृष्टिकोण से देखने का प्रयास किया है। कोई दार्शनिक वस्तु की सीमा को भी अपनी कल्पनादृष्टि से संघ गए हैं। यथा, वेदान्त दर्शन जगत् में एक ही सत्-ब्रह्म का अस्तित्व मानता है। उसके मत से अनेक सत् प्रातिभासिक हैं। एक सत् का चेतन अचेतन मूर्त अमूर्त निष्क्रिय सक्रिय आदि विरुद्ध रूप से मायावश प्रति- भास होता रहता है। इसी प्रकार विज्ञानवाद या शुन्यबाद ने बाल घट परादि पदायों का लोप करके उनके प्रतिभास को पासनाजन्य बसाया है। जहाँ तक जैन दार्शनिकों ने जगत् का अवलोकन किया है वस्तुको स्थितिको अनेकधर्मात्मक पाया, और इसीलिए अनेकान्तात्मक तत्व का उनने निरूपण किया । वस्तुके पूर्णरूपको अनिर्वचनीय वाङ्मानसागोचर या अवक्तव्य सभी दार्शनिकोने कहा है। इसी वस्तुरूपको विमिस रष्टिकोणोंसे जानने और कथन करने का प्रयास मिन भिन्न दार्शनिकों. ने किया है। जैन दर्शनने वस्तुमात्र को परिणामीनित्य स्वीकार किया। कोई भी सत् पर्याय रूपसे उत्पक्ष भौर विनष्ट होकर भी द्रव्य रूपसे अविच्छिन्न रहता है, अपनी असतीर्ण सत्ता रखता है। सांख्य दर्शन में यह परिणामिनित्यता प्रकृति तक ही सीमित है। पुरुष तत्व इनके मतमें फूटस्थ निय है । उसका विश्व व्यवस्था में कोई हाथ नहीं है। प्रकृति परिणामिनी होकर भी एक है। एक ही प्रकृति का घटपटादि मूर्त रूप में और आकावादि अमूर्तरूप में परिणमन होता है। यही प्रकृति बुद्धि भह- धार जैसे चैतन भावों रूप से परिणत होती है और यही प्रकृति रूपरस गन्ध आदि जड़भाव रूप में। परन्तु इस प्रकार के विरुद्ध परिणमन एक ही साथ एक ही तत्व में कैसे सम्भव हैं ? यह तो हो सकता है कि संसार में जितने चेतनमिन पदार्थ है वे एक जाति के हों पर एक तो नहीं हो सकते। चेदान्ती ने जहाँ चैतन भित्र कोई दूसरा तत्व स्वीकार न करके एक सत् का चेतन और अवेतन, मूर्त-अमूर्त, निफिय-सक्रिय, मान्तर-बाह्य आदि अनेकधा प्रतिभास माना और दृश्य जगत् की परमार्थ सत्ता न मानकर प्रातिभा. सिक सत्ता ही स्वीकार की यहाँ सांख्य चेतनतत्व को अनेक स्वतन्त्रसत्ताक मानकर भी, प्रकृति को एक स्वीकार करता है और उसमें विरुद्ध परिणमनों की वास्तविक स्थिति मानना चाहता है । वेदान्ती की विरुद्ध प्रतिभास पाली यात कदाचित् समझ में आ भी जाय पर सांख्य को मितपरिणमनों की वास्तविक स्थिति स्पष्टतः धाधित है। वेदान्त की इस असङ्गति का परिहार तो सांख्य ने अनेक चेतन और जदप्रकृति मानकर किया कि- 'अद्वैत महा साप में बद्ध और मुक्त चैतन्य जुदा जुदा कैसे हो सकते हैं? एक ही ग्रातत्व चेतन और जड़ इन दो महाविरोधी परिणमनों का आधार कैसे बन सकता है ? अनेक चेतन मानने से कोई यह भौर कोई मुक्त रह सकता है। जड़ प्रकृति मानने से जड़ात्मक परिणमन प्रकृति के हो सकते हैं ? परन्तु एक अखण्डसत्ताक प्रकृति अमूर्त भाकारा भी बन जाय और मूर्त घदा भी वन जाय । बुद्धि अहंकार भी यने और रूपरस भी बने, सो भी परमार्थतः, यह महान् विरोध सर्वथा अपरिहार्य है। एक सेर घजन के घड़े को फोड़कर भाधा आधा सेर के दो वजनदार ठोस टुकदे किये जाते हैं जो अपनी पृथक् ठोस सत्ता रखते हैं। यह विमाजन एक सत्ताक प्रकृति में कैसे हो सकता है। संसार के यावद जड़ों में सत्व रजस्तमस इन तीन गुगों का भन्दय देखर एकजातीयता तो मानी जा सकती है एकसत्ता नहीं। इस तरह सांप की विश्वव्ययस्था में अपरिहार्य असंगति धनी रहती है। न्यायवैशेषिकों ने जदूतत्व का भक् पृथक् विभाजन किया। मूर्तदन्य जुदा माने अमूर्त जुदा । पृषिधी भादि के अनन्त परमाणु स्वीकार किए । पर ये इतने मेद पर उतरे कि क्रिया गुण सम्बन्ध सामान्य मादि परिणमनों को भी स्वतंत्र पदार्थ मानने लगे, यद्यपि गुण किया सामान्य भावि की पृभा उपलब्धि नहीं होती और न ये प्रसिद्ध ही है। वैशेषिक को संप्रस्थयोपाध्याय कहा है। इसको प्रकृति है-जितने मध्यप हो उतने पदार्थ स्वीकार कर लेना । 'गुणः गुणः प्रत्यय' हुमा सो गुण पदार्थ मान लिया। 'फर्म कर्म' प्रत्यय हुआ एक स्वतन्त्र कम पदार्थ माना गया। फिर इन पदार्थो का द्रव्य के साय सम्बन्ध स्थापित न्यायविनिश्चयविवरण करने से लिए समपाप नाम का स्वतन्त्र, पदार्थ मानना पड़ा। जल में गाय की अग्नि में रस की और घायु में रूप की अनुभूति देखकर शृथक् पृथक् अन्य माने । पर वस्तुतः वैशेषिक का प्रत्यय के माधार से स्वतन्त्र पदार्थ मानने का सिद्धान्त ही गरत है। प्रत्यय के आधार से उसके शिपषभूत धर्म को जुदा जुदा किसी तरह माने जा सकते हैं, पर स्वतन्त्र पदार्थ मानना किसी सरह युक्तिसंगत नहीं है। इस तरह एक ओर वेदान्ती या सांख्य ने क्रमशः जगत् में और प्रकृति में अभेद की कल्पना को यहाँ वैशेषिक ने आत्यन्तिक भेद को अपने दर्शन का आधार बनाया। उपनिषद में महाँ पतु के कूटस्यनित्यत्व को स्वीकार किया गया है। अजित देशमबलि जैसे उच्छवादी भी विधमान थे। शुद्ध ने आत्मा के मरणोत्ता जीयन और शरीर से उसके भेदाभेद को अव्याकरणीय बताया है। बुद्ध को र था कि यदि हम आरमा के अस्तित्व को मानते है तो निधारमवाद का प्रसङ्ग आता है और यदि भामा का नास्तित्व कहते है तो उच्छेववाद को आपत्ति साती है। अतः उसने इन दोनों बादों के डर से उसे अस्या- करणीय कहा है। अन्यथा उनका सा उपदेश भूतबाद के विरुद्ध आत्मवाद की मिति पर है ही। अन दर्शन पास्तव बहुत्ववादी है। यह अनन्त रेतनतार, अनन्त पुरवाय-परमाणुरूप, एक भद्रम्प, एक अधर्मद्रव्य, एक सकाराइन्य और असंख्य कालान्य इस मसार अनन्त वास्तविक मासे अखण्ड द्रष्यों को स्वीकार करता है। हम्य सत्-स्वरूप है। प्रत्येक सद् चाहे वह चेतन हो पा शेतनेतर परिणामी नित्य है। उसका पर्यायरूप से परिगमन प्रतिक्षण होता ही रहता है। यह परिणमन अपर्याय कहलाता है। अर्थपर्याय सदा भी होती है और विसदर भी । शुद्ध द्रव्यों की वर्षपर्याय सदा एकसी TET होती हैं, पर होती है अवश्य । धर्मलम्य अधर्मण्य कालदम्य आकाशदप गुरजीपाय या परिणमन सदा साश होता है। पुद्गल का परिणमन सदा भी होता है विस भी। जीव और पल इन दो दायों में वैभाषिक शक्ति है और इस शक्ति के कारण इनका विसास परित मग भी होता है । जब जीव शुद्ध हो जाता है तर विलक्षण परिणमन नहीं होता। इस वैभाषिक शक्ति का स्वाभाविक ही परिणामन होता है। तात्पर्य यह कि प्रत्येक सदापाव पथ प्रीव्यशाल होने से परिणामी निल्प है। दो स्वतन्त्र सद में रहनेवाला एक कोई सामान्य पदार्य नहीं है। फेवल अनेकजीयों को जीवाप मामक साश्य से संबह करके उनमें एक जीवद्रव्य हयवहार कर दिया जाता है। इसी सरह 'चेतन और अधे- हन दो भिनजातीय प्रमों में 'सन' नाम का कोई स्वतन्त्र पाक पदार्थ नहीं है। परन्तु सभी ग्यों में परि. नामिनिष्यत्व नाम को सशक्षा के कारण 'सन, सत्' या म्यवहार का रिया आता है । अनेक मयों में रहने पाला कोई स्वतन्त्र सत् नाम का कोई वस्तुभूत सब नहीं है। ज्ञान, स्पादि गुण, दक्षेपण भारि किया, सामान्य पिशव शादि सभी दम्प की अवस्था है पृषक सत्ताक पदार्थ नहीं। यदि पुर इस वसरियति पर गहराई से विचार करते तो इस निरूप में म उन्हें उच्छेदवाद का भय होता और न कासवाद का। और जिस प्रकार उनने प्राचार के क्षेत्र में मध्यमप्रतिपदा से उपाइप बताया है उसी तरह इस अनन्तधर्मा यस्खलाब के निरूपण को भी परिणामिनित्या में दाल देते। स्याबाद-जनदर्शन ने इस नरह सामान्य से यावत् सन् को परिणामनित्य माना है। प्रत्येक सत् अनन्तभमाना है। उसका पूर्णरूप पधनों के अगोचर है। अनेकाल भर्प पर निर्युटरूप से कपन करने शली भाषा साद्वादरूप होती है। उसमें जिस धर्म का निरूपण होता है इसके साथ 'स्पाता शाप इसलिए लगा दिया जाता है जिससे पूरी प्रस्तु उसी धर्म रूप न समझ लो जाप । भविश्वक्षित शेरधमरे का भक्तिरव भी उसमें है यह प्रतिपादन 'त्या' शब्द से होता है। स्याद्रपद का अर्थ है--स्यार-अमुक निश्चित अपेक्षा से। अमुनिश्चत भरेक्षा से घट अस्ति ही है मार अमुक निश्चन अपेक्षा से घट भासि ही है। स्यात् का अर्थ न हो शायद है न संभात, और न कदापित हो । 'या' साद मुनिभित एष्टिकोण्ड का प्रतीक है। इस शाद के भय की पुराने मतवादी पर्शनिकों ने ईमानदारी से समझने का प्रयास तो नहीं ही किया किन्तु भाज भी शाजिक टिकी धाई देने वाले दर्शनोखा उसी प्रान्त परम या पोरण मते अरते हैं । ।
ना स्थाद्वाद-सुनय का निरूपण करनेवाली भाषा पद्धति है। 'स्यात्' शब्द यह निश्चित रूप से बताता है कि वस्तु केवल इसी धर्मवाली ही नहीं है उसमें इसके अतिरिक्त भी धर्म विद्यमान है। तात्पर्य यह कि-अविवक्षित शेष धर्मों का प्रतिनिधित्व स्यात् शब्द करता है । 'रूपवान् घट' यह वाक्य भी अपने भीतर 'स्यात्' गन्द्र को छिपाये हुए है। इसका अर्थ है कि 'स्यात् रूपवान् घटः' अर्थात् चक्षु इन्द्रिय के द्वारा ग्राह्य होने से या रूप गुण की मसा होने से घड़ा रूपवान् है, पर रूपवान् ही नहीं है उसमें रस गन्ध स्पर्श आदि अनेक गुण, छोटा बड़ा आदि अनेक धर्म विद्यमान हैं। इन अवि. पक्षित गुणधों के अस्ति'च की रक्षा करनेवाला 'म्यात्' शब्द है। 'स्यात्' का अर्थ शायद या सम्भावना नहीं है किन्तु निश्चय है। अर्थात् घड़े में रूप के अस्तित्व की सूचना तो 'रूपवान्' शब्द दे हो रहा है पर उन उपेक्षित शेष धर्मों के अस्तित्व की सूचना ‘स्मात्' शब्द से होती है। सारांश यह कि 'स्यात् शब्द 'रूपवान्' के साथ नहीं जुटना है, किन्तु अविवक्षित धर्मों के माथ। वह 'रूपयान्' को पूरी पस्तु पर अधिकार जमाने से रोकता है और कह देता है कि वस्तु बहुन बडी है उसमें रूप भी एक है। ऐसे अनन्त गुणधर्म वस्तु में लहरा रहे हैं। अभी रूप की विवक्षा या दृष्टि होने से वह सासने है या शब्द मे उचरित हो रहा है सो वह मुख्य हो सकता है पर वहीं सब कुछ नही है। दूसरे क्षय में रसको मुरयता होने पर रूप गौण हो जायगा और वह अविवक्षित शेष धर्मों की राशि में शामिल हो जायगा। 'स्थात्' शब्द एक प्रहरी है, जो उच्चरित धर्म को इधर उधर नहीं जाने देता। वह उन अविवक्षित धर्मों का संरक्षक है। इसलिए 'रूपवान्' के साथ 'स्यान्' शब्द का अन्वय करके जो लोग घड़े में रूप की भी स्थिति को स्यात् का शायद या संभावना अर्थ करके संदिग्ध यनाना चाहते है ये अममें है । इसी तरह 'स्यादस्ति घटः' वाक्य में 'घर: अस्ति' यह अस्तित्व अंश घट में सुनिश्चित रूप से विद्यमान है। स्यात् शब्द उस अस्तित्व की स्थिति कमजोर नहीं यनाता फिन्तु उसकी वास्तविक आंशिक स्थिति की सूचना देकर अन्य नास्ति आदि धर्मों के सद्भाव का प्रतिनिधित्व करता है। सारांश यह कि 'स्यात्' पद एक स्थतन्त्र पद है जो वस्तु के शेषांश का प्रतिनिधित्व करता है। उसे डर है कि कही 'अस्ति' नाम का धर्म जिसे बाद से उचरित होने के कारण प्रमुखता मिली है पूरी वस्तु को न हड़प जाय, अपने अन्य नास्ति आदि महयोगियों के स्थान को समाप्त न कर जाय। इसलिए वह प्रति याक्य मैं चेतावनी देता रहता है कि हे भाई अस्ति, मुम वस्तु के एक अंश हो, तुम अपने अन्य नारित आदि भाइयों के हक को हड़पने की घेटा नहीं करना। इस भय का कारण है-'नित्य ही है, अनित्य ही है' आदि अंशाक्यों ने अपना पूर्ण अधिकार यस्तु पर जमा कर अनधिकार चेष्टा की है और जगत् में अनेक तरह से वितण्डा और संघर्ष उत्पन्न किये हैं। इसके फलसरूप पदार्प के साथ तो अन्याय हुआ ही है, पर इस पाद-प्रतिवाद ने अनेक मतवादा की सृष्टि करके अहंकार हिमा संघर्ष अनुदारता परमतासहिष्णुता आदि से विश्व को अशान्त और भाकुलतामय यना दिया है। 'स्थास्' शब्द पाक्य के उस जहर को निकाल देना है जिससे अहंकार का सर्जन होता है और वस्तु के अन्य धर्मों के अस्निय मे इनकार करके पदार्थ के साथ अन्याय होता है। 'स्यात्' शब्द एक निधिन अपेक्षा को ग्रोसन करके जहाँ 'अस्तित्व' धर्म की स्थिति मुहद सहनुक बनाता है यहाँ यह उसकी उस सर्वहरा प्रवृत्ति को भी नष्ट करता है जिससे यह पूरी यस्तु का मालिक यनना चाहता है। यह न्यायाधीश की तरह तुरन्त कह देता है कि अस्ति, तुम अपने अधिकार की सीमा को समझो । सद्व्य-क्षेत्र-काल-भाव की दृष्टि से जिस प्रकार भुम घट में रहते हो उसी तरह पर दयादि की अपेक्षा 'नास्ति' नाम का तुम्हारा भाई भी उसी घट में है। इसी प्रकार घट का परिवार पहुन पया है। अभी तुम्हारा नाम लेकर पुकारा गया है इसरा इतना ही अर्थ है कि इस समय नुमसे फाम है मुम्हारा प्रपोजन है तुम्हारी विषक्षा है। अतः इस समय मुम मुख्य हो । पर इसका यह अर्थ कदापि नहीं है जो मुम अपने समानाधिकारी भाइयों के सद्गाय को भी मष्ट करने का दुष्प्रयास को पास्तपिक चान हो ।
न्यायविनिश्चयविवरण यह है कि यदि पर की अपेक्षा 'नास्ति' धर्म न हो तो जिम पड़े में तुम रहते हो यह घड़ा पदा ही न रहेगा कप आदि पारूल हो जायगा | अतः जैमी तुम्हारी स्थिति है कैसी ही पररूप की अपेक्षा 'नासि' धर्म की भी स्थिति है मुम उनकी हिंसा न कर सको इसके लिए अहिंसा का प्रतीक 'स्यान्' शम्द मुमसे पहले ही यार में लगा दिया जाता है। भाई अस्ति, यह तुम्हारा दोष नहीं है। तुम तो यराबर अपने नालि भादि अनन्य भाइयों को यस्तु में रहने देते हो और बड़े प्रम से सबके सर अनन्त धर्मभाई रहते हो, पर इन पस्तुशियों की दृष्टि को क्या कहा जाय । इनकी सटि ही एकाही है। ये पाद के द्वारा गुममें से किसी एक 'अस्तिाभादि को मुख्य करके उसकी स्थिति हानी अहकार पूर्ण कर देना पाहते है जिससे पह अस्ति' आप का निराकरण करने लग जाय। यस, 'स्यात् शाद एक मजन है जो उनकी दृष्टि को चिकृत नहीं होने देता और उसे निर्मल तथा पूर्गदर्शी बनाता है। इस मविवक्षिनसंरक्षक, दृष्टिविपहारी, शब्द को सुधारूप मनाने राले, मधेतक प्रहरी, अहिंसक भावना के प्रतीक, जीवन्त न्याय. रूप, मुनिश्चित अपेक्षाघोतक स्थात् पारद के म्यरूप के साथ हमारे दानिका ने न्याय तो किया ही नहीं' किन्तु उसके म्यरूप का मायद, संभर है, कदाचिन्। जैसे भ्रए पर्यायों से विकृत करने का दुष्ट प्रयत्न अवश्य किया है तथा किया जा रहा है। सब से थोथा तक तो यह दिया जाता है कि पा जय अस्ति है तो नास्ति कैसे हो सकता है, घड़ा जय एक है तो अनेक कैसे हो सकता है, यह तो प्रत्यक्ष विरोध है' पर विचार तो करो घड़ा घडा ही है, कपड़ा नहीं, कुरसी नहीं, रेबिल नहीं, गाय नहीं, घोड़ा नही, तापर्य यह कि वह घटभिन्न अनन्त पदार्थरूप नहीं है। तो यह कहने में आपको क्यों संकोच होता है कि 'घड़ा अपने स्वरूप से अस्ति है, घटभिन्न पररूपा से नास्ति है। इस घड़े में अनन्त पररूपों की अपेक्षा 'नास्तित्य धर्म है, नहीं तो दुनिया में कोई शक्ति पड़े को कपड़ा आदि यनने से नहीं रोक सकती ! यह 'नास्ति' धर्म ही घड़े को घड़े रूप में कायम रखने को हेतु है। इसी नास्ति धर्म की सूचना 'अस्ति' के प्रयोग के समय 'स्यात्' शब्द दे देता है। इसी तरह घड़ा एक है। पर वही घड़ा रूप रस गन्ध स्पर्श छोटा पड़ा हलका भारी भादि अनन्त शासियों की दृष्टि से अनेकरूप में दिखाई देता है या नहीं ? यह आप स्वय यता । यदि अनेक रूप में दिखाई देता है तो आपको यह कहने में क्यों कष्ट होता है कि पड़ा द्रष्य एक है, पर अपने गुण धर्म शक्ति आदि की दृष्टि से अनेक है । कृपा कर सोचिए कि घस्तु में जब अनेक विरोधी धर्मों का प्रत्यक्ष हो ही रहा है और स्वय वस्तु अनन्त विरोधी धर्मों का अविरोधी कीडास्थल है तब हमें उसके स्वरूप को विकृत रूप में देखने की तो नहीं करनी चाहिए। जो 'स्यात्' शब्द वस्तु के इस पूर्ण रूप दर्शन की याद दिलाता है उसे ही हम "विरोध सशया जैसी गालियों से दुरदुराते हैं किमावर्यगत परम् । यहाँ धर्मकीर्तिमा यह श्लोकाश ध्यान में आ जाता है कि- 'यदीयं स्वयमर्थेभ्यो रोचते तत्र के वयम् ।' अर्थात्-यदि यह अनेक धर्मरूपता वस्तु को स्वयं पसन्द है, उसमें है, यस्तु स्वयं राजी है तो हम बीच में काजी बनने धाले कौन ? जगत् का एक एक कण इस अनन्तधर्मता का आकार है। हमें अपनी दृष्टि निमल और विशाल बनाने की आवश्यकता है । वस्तु में कोई विरोध नहीं है। विरोध हमारी दृष्टि में है। और इस दृष्टिविरोध को अमृतीपधि 'स्पात्' शब्द है, जो रोगी को कटु तो जरूर मालूम होती है पर इसके बिना यह दृष्टिविपम-स्वर उतर भी नहीं सकता । प्रो. बलदेव उपाध्याय ने भारतीय दर्शन (पृ० १५५) में स्याद्वाद का अर्थ यताते हुए लिखा है कि-"स्यात् (शायद, सम्भवत) शब्द अस धातु के विधिलिद के रूप का तिहन्त प्रतिरूपक अध्यय माना जाता है। घड़े के विषय में हमारा परामर्श 'सादस्ति सभवत यह विद्यमान है' इसी रूप में होना चाहिए।" यहाँ 'स्थात्' शब्द को शायद का पर्यायवाची तो उपाध्यायनी स्वीकार नहीं करना चाहते । इसीलिए वे शायद शब्द को कोटक में लिखकर भी भागे 'संभवत शन्द का समर्थन करते हैं।
। १८ न्यायविनिश्चयविवरण यह है कि यदि पर की अपेक्षा 'नास्ति' धर्म न हो तो जिस घदे म तुम रहते हो वह घड़ा घड़ा ही न रहेगा कपका आदि पररूप हो जायगा। अतः जैसी तुम्हारी स्थिति है वैसी ही पर रूप की भपेक्षा "नास्ति' धर्म की भी स्थिति है तुम उनकी हिंसा न कर सको इसके लिए अहिंसा का प्रतीक 'स्यात् शब्द नुमसे पहले हो पाक्य में लगा दिया जाता है। भाई अस्ति, यह तुम्हारा दोष नहीं है। तुम तो बायर अपने नास्ति आदि अनन्य भाइयों को वस्तु में रहने देते हो और यह मेम से सबके सर अनन्त धर्मभाई रहते हो, पर इन पस्तुशियों की दृष्टि को क्या कहा जाय । इनकी दृष्टि ही एकाङ्गी है। ये शन्द के द्वारा नुममें से किसी एक 'भस्ति'आदि को मुख्य करके उसकी स्थिति इतनी अहङ्कार पूर्ण कर देना चाहते है जिससे यह 'अस्ति' अन्य का निराकरण करने लग जाय। बस, 'स्मात्' शब्द एक जान है जो उनकी दृष्टि को विकृत नहीं होने देता और उसे निर्मल तथा पूर्गदर्शी बनाता है। इस अविवक्षितसंरक्षक, रष्टिविपहारी, शम्द को मुधारूप बनानेवाले, सचेतक महरी, अहिंसक भावना के प्रतीक, जीवन्त न्याय- रूप, सुनिश्चित अपेक्षाद्योचक 'स्यात्' शब्द के स्वरूप के साथ हमारे दार्शनिको ने न्याय तो किया ही नहीं किन्तु उसके स्वरूप का 'शायद, सभर है, कदाचिन्। जैसे भ्रष्ट पर्याया से विकृत करने का दुष्ट प्रयत्न अवश्य किया है तथा किया जा रहा है। सब से थोथा नर्क तो यह दिया जाता है कि घड़ा जर अस्ति है दो नास्ति कैसे हो सकता है, घड़ा जब एक हे तो अनेक कैसे हो सकता है, यह तो प्रत्यक्ष विरोध है' पर विचार तो करो घडा पडा ही है, कपड़ा नहीं, करसी नहीं, टेबिल नहीं, गाय नहीं, घोड़ा नही, तात्पर्य यह कि यह घटभित्र अनन्त पदार्यरूप नहीं है। तो यह कहने म आपको क्यों स कोच होता है कि 'घड़ा अपने स्वरूप से अस्ति है, घटभिन्न पररूपा से नास्ति है। इस घड़े में अनन्त पररूपों की अपेक्षा 'नास्तित्व' धर्म है, नहीं तो दुनिया म कोई शक्ति पड़े को कपडा आदि वनने से नहीं रोक सकती । यह नास्ति' धर्म ही पड़े को घड़े रूप म कायम रखने को हेतु है। इसी नास्ति धर्म की सूचना 'अस्ति' के प्रयोग के समय 'स्यातू' शन्द दे देता है। इसी तरह घड़ा एक है। पर वही घडा रूप रस गन्ध स्पर्श छोरा बड़ा हलका भारी आदि अनन्त शक्तियां की दृष्टि से अनेकरूप म दिखाई देता है या नहीं ! यह भाप स्वय बसावें । यदि अनेक रूप म दिखाई देता है तो आपको यह कहने में क्या कष्ट होता है कि घड़ा द्रव्य एक है, पर अपने गुण धर्म शक्ति आदि की दृष्टि से अनेक है । करा कर सोचिए कि वस्तु में जब अनेक विरोधी धर्मों का प्रत्यक्ष हो ही रहा है और स्त्रय वस्तु अनन्त विरोधी धर्मों का अविरोधी क्रीडास्थल है तब हमें उसके स्वरूप को विकृत रूप में देखने को दुष्टि तो नहीं करनी चाहिए। जो स्यात्' शब्द वस्तु के इस पूर्ण रूप दर्शन की याद दिलाता है उसे ही हम 'विरोध सशया जैसी गलियों से दुरदुराते हैं किमानमत परम् । यहाँ धर्मकार्तिका यह श्लोकांश ध्यान में आ जाता है कि--- 'यदीयं स्वयमर्थेभ्यो रोचते तत्र के क्यम् ।' अर्थात्-यदि यह अनेक धमरूपता वस्तु को स्वयं पसन्द है, उसम है, वस्तु स्वयं राजी है तो हम बाच म काजी बनने वाले कौन ? जगत् का एक एक कग इस अनन्तधर्मता का आकार है। हम अपनी दृष्टि निमल और विशाल बनाने की आवश्यकता है। वस्तु में कोई विरोध नहीं है । विरोध हमारी दृष्टि में है। और इस दृष्टिविरोध की अमृतोषधि 'स्पा' सन्द है, जो रोगी को कटु तो जरूर मालूम होती है पर इसके बिना यह दृष्टिविषमज्वर उत्तर भी नहीं सकता। प्रो. बलदेव उपाध्याय ने भारतीय दर्शन (पृ. १५५) म स्याद्वाद का अर्थ यताते कि--"स्यात् (शायद, सम्भवत) शब्द अस् धातु के विधिलि के रूप का तिइन्त प्रतिरूपक अभ्यप माना जाता है। घड़े के विषय में हमारा परामर्श 'स्थादस्ति = सभवतः यह विद्यमान है। इसी रूप में होना चाहिए । यहाँ स्यात्' शब्द को शायद का पर्यायवाची वो उपाध्यायजी स्वीकार नहीं करना चाहते । इसीलिए वे शायद शब्द को कोष्टक म लिखकर भी आगे 'सभवत शब्द का समर्थन करते हैं। लिखा है प्रस्तावना १९ । वैदिक आचार्यों म शकराचार्य ने शाकरभाष्य मे स्याद्वाद को सशयरूप लिखा है इसका संस्कार आज भी कुछ विद्वानों के माधे में पड़ा हुआ है और वे उस सस्कारवश स्यात् का अर्थ शायद लिख ही जाते हैं । जब यह स्पष्ट रूप से अवधारण करके कहा जाता है कि-'घट स्यादस्ति' अर्थात् घडा अपने स्वरूप से है ही। घट स्यानास्ति-घट स्वभिन्न स्वरूप से नहीं ही है। तब सशय को स्थान कहाँ है ' स्यात् शब्द जिस धर्म का प्रतिपादन किया जा रहा है उससे भिन्न अन्य धर्मा के सद्भाव को सूचित करता है। वह प्रति समय श्रोता को यह सूचना देना चाहता है कि वक्ता के शब्दों से वस्तु के जिस स्वरूप का निरूपण हो रहा है वस्तु उतनी ही नहीं है उसमे अन्य धर्म भी विद्यमान है । जब कि सशय और शायद में एक भी धर्म निश्चित नहीं होता । जैन के अनेकान्त में अनन्त धर्म निश्चित हैं, उनके दृष्टिकोण निश्चित है तब सशय और शायद की उस भ्रान्त परम्परा को आज भी अपने को तटस्थ माननेवाले विद्वान् भी चलाए जाते हैं यह रूदिपाद का ही माहात्म्य हे इसी संस्कारवरा प्रो० बलदेवजी स्यात् के पर्यायवाचिया म शायद शब्द को लिखकर (पृ० १७३) जैन दर्शन की समीक्षा करते समय शकराचार्य की वकालत इन शब्दो म करते हैं कि-"यह निश्चित ही है कि इसी समन्वय रष्टि से वह पदार्थों के विभिन्न रूपा का समीकरण करता जाता तो समग्र विश्व में अनुस्यूत परम तस्व तक अवश्य ही पहुँच जाता। इसी दृष्टि को ध्यान में रखकर शकराचार्य ने इस 'स्याद्वाद' का औमिक खण्डन अपने शारीरक भाष्य (२, २, ३३) म प्रबल युक्तियों के सहारे किया है।" पर उपाध्याय जी, जब आप स्यात् का अर्थ निश्चित रूप से 'साय नही मानते तब शकराचार्य के खण्डन का मामिकत्व क्या रह जाता है ? आप कृपाकर स्व. महामहोपाध्याय डा० गंगानाथ झा के इन पाक्यों को देखें-"जब से मैंने शकराचार्य द्वारा जैन सिद्धान्त का खंढन पढ़ा है, तब से मुझे विश्वास हुआ है कि इस सिद्धान्त में बहुत कुछ है जिसे वेदान्त के आचार्यों ने नहीं समझा।" श्री फणिभूपण अधिकारी तो और स्पष्ट लिखते हैं कि-'नधर्म के स्यावाद सिद्धान्त को जितना गलत समझा गया है उतना किसी अन्य सिद्धान्त को नहीं। यहाँ तक कि शकराचार्य भी इस दोष से मुक्त नहीं हैं । उन्होंने भी इस सिद्धान्त के प्रति अन्याय किया है। यह बात अल्पज्ञ पुरुषों के लिए क्षम्य हो सकती थी। किन्तु यदि मुझे कहने का अधिकार है तो मैं भारत के इस महान् विद्वान् के लिए तो अक्षम्य ही कहूँगा, यद्यपि मैं इस महषि को अतीव आदर की दृष्टि से देखता हूँ। ऐसा जान पड़ता है उन्होंने इस धर्म के दर्शनशास्त्र के मूल ग्रन्थों के अध्ययन की परवाह नहीं की।" जन दर्शन स्याद्वाद सिद्धान्त के अनुसार वस्तुस्थिति के आधार से समन्वय करता है। जो धर्म पस्तु में विद्यमान हैं उन्हीं का समन्वय हो सकता है। जैनदर्शन को आप वास्तव बहुत्ववादी रिख आये हैं। अनेक स्वतन्त्र सत् व्यवहार के लिए सदप से एक कहे जाये पर वह काल्पनिक एकस्व वस्तु नही हो सकता ? यह कैसे सम्भव है कि चेतन और अचेतन दोनों ही एक सत् के प्रतिभासिक विवर्त हो। जिस काल्पनिक समन्वय की ओर उपाध्याय जी सकेत करते है उस ओर भी जैन दार्शनिकों ने प्रारम्भ से ही दृष्टिपात किया है। परम सग्रह नय की दृष्टि से सद्रूप से यावत् चेतन अचेतन द्रव्यों का सग्रह करके एक सस्' इस सन्दव्यवहार के होने म जैन दार्शनिकों को कोई आपत्ति नहीं है। सैकड़ों कालपनिक व्यवहार होते है, पर इससे मौलिक तत्वन्यवस्था नहीं की जा सकती ! एक देश या एक राष्ट्र भपने में गया वस्तु है ? समय समय पर होने वाली युद्धिगव दैशिक एकता के सिवाय एकदेश या एक राष्ट्र का स्वतन्त्र अस्तित्व ही क्या है ? अस्तित्व नुदा उदा भूखण्डों का अपना है। उसमें व्यवहार की सुविधा के लिए प्रान्त और देश संझाएँ जैसे काल्पनिक है न्यवहारसत्य है उसी तरह एक सत् या एक ब्रह्म काल्पनिकसत् होकर व्यपहारसत्य बन सकता है और कल्पना की दौड़ का परम बिन्दु भी हो सकता है पर उसका तरवसा या परमार्थसत् होना नितान्त असम्भव है। आज विज्ञान एटम तक का विश्लेषण कर चुका है और सब मौरिक भगुओं की पृथम् सत्ता स्वीकार करता है। उनमें अभेद भौर इतना रहा भभेर जिसमें चेवन अचेतन मूर्त अमूर्त आदि मभी रीन हो जाय कलनासाम्राज्य की अन्तिम कोटि है ।
प्रस्तावना १९ वैदिक आचार्यों में शकराचार्य ने शांकरभाष्य में स्याद्वाद को सशपरूप लिखा है इसका संस्कार आज भी कुछ विद्वानों के माथे में पड़ा हुआ है और वे उस सस्कारवश स्यात् का अर्थ शायद लिख ही जाते हैं । जब यह स्पष्ट रूप से अवधारण करके कहा जाता है कि-'घट स्यादस्ति' अर्थात् घडा अपने स्वरूप से है ही। घट स्यानास्ति-घट स्वभिन्न स्वरूप से नहीं ही है। तब सराय को स्थान कहाँ है । स्यात् शब्द जिस धर्म का प्रतिपादन किया जा रहा है उससे भिन्न अन्य धर्मों के सद्भाव को सूचित करता है। वह प्रति समय श्रोता को यह सूचना देना चाहता है कि वक्ता के शब्दों से वस्तु के जिस म्वरूप का निरूपण हो रहा है वस्तु उतनी ही नहीं है उसमें अन्य धर्म भी विद्यमान हैं । जब कि सराय और शायद में एक भी धर्म निश्चित नहीं होता । जैन के अनेकान्त में अनन्त धर्म निश्चित है, उनके दृष्टिकोण निश्चित है तब संशय और शायद की उस भ्रान्त परम्परा को आज भी अपने को तटस्थ मामनेवाले विद्वान् भी चलाए जाते हैं यह रूदिपाद का ही माहात्म्य है। इसी संस्कारवश प्रो० बलदेवजी स्यात् के पर्यायाचियों में शायद शब्द को लिखकर (४० १७३) जैन दर्शन की समीक्षा करते समय शकराचार्य को वकालत इन शब्दों में करते हैं कि-"यह निश्चित ही है कि इसी समन्वय दृष्टि से वह पदार्थों के विभिन्न रूपो का समीकरण करता जाता तो समप्र विश्व में मनुस्यूत परम तत्व तक अवश्य ही पहुँच जाता। इसी दृष्टि को ध्यान में रखकर शंकराचार्य ने इस 'स्याद्वाद' का मार्मिक खण्डन अपने शारीरक भाष्य (२, २, ३३) में प्रबल युक्तियों के सहारे किया है।" पर उपाध्याय जी, जन आप स्यात् का अर्थ निश्चित रूप से 'संशया नहीं मानते तय शंकराचार्य के खण्डन का मार्मिकत्व क्या रह जाता है | आप कृपाकर स्व. महामहोपाध्याय डा. गंगानाथ शा पायों को देखें-"जय से मैंने शंकराचार्य द्वारा जैन सिद्धान्त का खंडन पढ़ा है, तब से मुझे विश्वास हुआ है कि इस सिद्धान्त में बहुत कुछ है जिसे घेदान्त के आचार्यों ने नहीं समझा।" श्री फणिभूपण अधिकारी तो और सष्ट लिखते हैं कि-"जैनधर्म के स्यावाद सिद्धान्त को जितना गलत समझा गया है उतना किसी अन्य सिद्धान्त को नहीं। यहाँ तक कि शंकराचार्य भी इस दोप से मुक्त नहीं है । उन्होंने भी इस सिद्धान्त के प्रति अन्याय किया है। यह बात अल्पज्ञ पुरपी के लिए क्षम्य हो सकती थी। किन्तु यदि मुझे कहने का अधिकार है तो मैं भारत के इस महान् विद्वान् के लिए तो अक्षम्य ही कहूँगा, यद्यपि मैं इस महर्षि को अतीव आदर की दृष्टि से देखता हूँ। ऐसा जान पड़ता है उन्होंने इस धर्म के दर्शनशास्त्र के मूल प्रन्यों के अध्ययन की परवाह नहीं की।" जन दर्शन स्याद्वाद सिद्धान्त के अनुसार घस्तुस्थिति के आधार से समन्वय करता है। जो धर्म घस्तु मे विद्यमान है उन्हीं का समन्वय हो सकता है। जैसदर्शन को आप वास्तव बहुखवादी लिख आये हैं। अनेक स्वतन्त्र सत् व्यवहार के लिए सद्रूप से एक कहे जायँ पर वह कारपनिक एकरप घस्तु नहीं हो सकता ? यह कैसे सम्भव है कि चेतन और अचेतन दोनों ही एक सत् के प्रातिमासिक विवर्त हो । जिस कारपनिक समन्वय की ओर उपाध्याय जी सकेत करते है उस भोर मीन दार्शनिकों ने प्रारम्भ से ही रष्टिपात किया है। परम समद नय की दृष्टि से सदूप से यावत् चेतन अचेतन दप्यों का समह करके एक सत्' इस शब्दव्यवहार के होने में जैन दार्शनिकों को कोई आपत्ति नहीं है। सकड़ों काल्पनिक व्यवहार होते है, पर इससे मौलिक तावच्यवस्था नहीं की जा सक्ती ? एक देश या एक राष्ट्र भपने में क्या घस्तु है ? समय समय पर होने घारी युद्धिगत दैशिक एक्ता के सिनाय एकदेश या एक राष्ट्र का स्वतन्त्र अस्तित्व ही क्या है ? अस्तित्व जुदा उदा भूखण्डों का अपना है। उसमें म्यवहार की सुविधा के लिए प्रान्त और देश मज्ञाएँ जैसे काल्पनिक है व्यवहारसत्य है उसी तरह एक सत् या एक प्रश काल्पनिकसत् होकर व्यवहारसा रन सस्ता है और कल्पना की दौड का परम पिन्दु भी हो सकता है पर उसका तस्यमन् या परमार्थसन् होना नितान्त असम्भव है। आज विज्ञान एटम तर का यिनेपग कर चुका है और सब मौलिक अगुभी छी पृथर पत्ता स्वीकार करता है। उनमें भभेद भोर इतना बड़ा भभेद जिसमें चेतन भवेतन मूर्त अमन भादि सभी सीन हो जाय कसनामाम्नाग्य की अन्तिम कोरि।
- न्यायविनिश्चयविवरण और इस क्ल्पनाकोदि को परमार्थ सन् न मानने के कारण यदि जनदर्शन का स्याद्वार सिद्धान्त आपको मूलभूत तत्व के स्वरूप समझाने में नितान्त भाममर्थ प्रतीत होता है तो हो, पर वह पस्तुमीमा का उरंधन नही कर सकता और न करपनाराक की लम्बी दाह ही लगा सकता है। स्यात् शब्द को उपाध्यायजी सभय का पर्यायवाची नहीं मानते यह तो प्राय निश्रित है क्योंकि आप स्वयं लिखते हैं।( पृ० १७३) कि-"यह अनेकान्तवाट मशयवाद का रूपान्तर नहीं है ।" पर आप उसे संभववाद अवश्य कहना चाहते है। परन्तु स्थान का अर्थ 'ममवत' वरना भी न्यायसंगत नहीं है क्योंकि संभावना समय में जो कोटियाँ उपस्थित होती है उनी अनिश्चितता की भोर सकेत मात्र हे, निश्चय उससे भिन्न ही है । उपाध्यायजी स्याद्वाद को संशयवाद और निश्चयवाद के बीच सभा वनाबाद की जगह रखना चाहते है जो एक अनध्यवसायामा अनिश्चय के समान है। परन्तु जब म्याद्वाद स्पष्ट रूप से दके की चोट यह कह रहा है कि-घडा स्यादस्ति अथीत् अपने स्वरूप, अपने क्षेत्र, अपने कार और अपने आकार इस स्वचतुष्टय की अपेक्षा है ही यह निश्चित अवधारण है । घडा स्वसे भिन्न यापन पर पदार्थों की दृष्टि में नहीं ही है यह भी निश्चित अवधारण है। इस तरह जब दोनों धर्मों का अपने अपने दृष्टिकोण से पड़ा अविरोधी आधार है तब घड़े को हम उभय दृष्टि मे अम्बि नास्ति रूप भी निशित हो कहते है । पर शब्द में यह सामध्ये नहीं है कि घट के पूर्ण रूप को-जिसमें अस्ति मास्ति जपे एक अनेक निन्य अनिन्य आदि भनेको युगर धर्म पहरा रहे है कह सके भत समप्रभाव से घटा अवक्तव्य है। इस प्रकार जब रयावाद सुनिश्चित दृष्टिकोगों से तत्तत् धर्मों के वास्तविक निधय की घोषणा करता है तब इसे सम्मावनाबाद में कैसे रचा जा सकता है ? स्मात् शब्द के साथ ही प्रधकार भी लगा रहता है जो निम्ति धर्म का अवधारण सूचित करता है तथा स्थान् नन्द उस निर्दिष्ट धर्म से अतिरिक्त अन्य धर्मों की निश्चित स्थिति की सूचना देता है। जिससे श्रोता यह न समक्ष है कि वस्तु इसी धर्मरूप है। यह स्माद्वाद करिपत धर्मों तक व्यवहार के लिए भरे ही पहुँच जाय पर घस्नुव्यवस्था के लिए धातु की सीमा को नहीं लाँधता । अन ने यह मनायबाट है, न अनिश्चयवाद और न सभावनाबाद ही, किन्तु बग अपेक्षा प्रयुस निश्चयवाद है। इसी तरह डॉ. देवराज जी का पूर्वी और पश्चिमी दर्शन (पृष्ट ६५) में किया गया स्थान शब्द का पदाचिन्' अनुवाद भी भ्रामक है। कदाचिन् भन्दकालापेक्ष है। इसका सीधा अर्थ है किसी समय । और प्रचलित अर्ध में यह सशय की ओर ही झुकाता है। स्थात का प्राचीन न है कथञ्चिन् अर्थात किमी निश्चित प्रकार से, स्पट शब्दों में अमुक निश्चित दृष्टिकोण से। इस प्रकार अपेक्षापयुम निश्चयवाद ही स्याहाद का अभ्रान्त धाच्यार्य है। महापढित राहुर सारयायन ने तथा इत पूर्व प्रो० योगी आदि ने स्थावाद की उत्पति को सजर लहिपुस के मत से बताने का प्रयय किया है। राहुलजी ने दर्शन दिग्दर्शन (पृ० ४९६) में लिखा है कि- "आधुनिक जैनदर्शन का आधार याद्वाद है । जो मालूम होता है सजय वेलहिपुत्त के चार मग पारे अनेकान्तवाद को लेकर उसे सात अंगाला किया गया है। सजय ने तत्वों (पररोक देवता) के बारे में कुछ भी निश्चयात्मक रूप से कहने से इन्कार करते हुए उस इन्कार को चार प्रकार कहा है- है? नहीं कह सरता। ३ नहीं नहीं कह सकता। ३भी और नहीं भी नहीं रह सकता। न और नहीं है? नहीं कह सकता। इसकी तुलना कीजिये जैनी के सात प्रकार के स्थादाद में- 1है। हो सकता है (स्यादस्ति) २ नहीं है ? नहीं भी हो सकता है (स्याशास्ति) ३६मी भार नहीं भी है भी और नहीं भी हो सकता (स्मादलिप नाम्नि ब) - प्रस्तावना । उक्त तीनो उत्तर क्या कहे जा सकते है (= चराच्य है) इसका उत्तर जैन 'नहीं' में देते हैं- ४ स्याद् (हो सकता है ) क्या यह कहा जा सकता (= वक्तव्य) हे ? नहीं, स्याद अ-अनन्य है। ५ 'स्यादस्ति' क्या यह धनव्य है ? नहीं, 'स्याद् अस्नि' अवक्तव्य है। ६ 'स्याद् नास्ति' क्या यह वक्तव्य है ? नहीं, 'स्याद् नास्ति' अवक्तव्य है। ७ 'स्याद् अस्ति च नास्ति च' क्या यह वक्तव्य है ? नहीं 'स्यादम्ति च नास्ति च' अ-वनव्य दोनों के मिलाने से मालूम होगा कि जैना ने सजय के पहिलेवाले तीन वाक्या ( प्रश्न और उत्तर दोनों) को भएग करके अपने स्याद्वाद् की छह भगियाँ बनाई है और उसके चौथे वाक्य 'न है और न नहीं है। को जोडकर 'स्याद्' भी अवस्थ्य है, यह सातवाँ भंग तैयार कर अपनी सप्तभंगी पूरी की इस प्रकार एक भी सिद्धान्त (= वाद) की स्थापना न करना जो कि संजय का वाद था, उसी को सजय के अनुयायियों के लुप्त हो जाने पर जैनो ने अपना लिया और उसकी चतुभंगी न्याय को सहभगी में परिणत र दिया।" राहुल जी ने उक्त सन्दर्भ में सप्तभर्गा और स्याहाद् के स्वरूप को न समझकर केवल शब्दसाम्य मे एक नये मन की सृष्टि का है। यह तो ऐसा ही है जैसे कि चोर से "क्या तुम अमुक जगह गये थे? यह पूछने पर वह कहे कि मैं नहीं कह सकता कि गया था" ओर जज अन्य प्रमाणो मे यह सिद्ध कर दे कि चोर अमुक जगह गया था। तब सन्दसाम्य देवकर यह कहना कि जश का फैमला चोर के वपान से निकला है। सजयलहिपुत्र के दर्शन का विवेचन स्वय राहुलजी ने (पृ. ४९.) इन शन्दी मे किया है- "यदि आप पूलें-क्या परलोक है ? तो यदि मे समझता होऊँ कि पग्लोक है तो आपको बतलाऊँ कि परलोक है। मैं ऐसा भी नहीं कहता, वैसा भी नहीं रहता, दूसरी तरह से भी नहीं कहता। मैं यह भी नही कहता कि यह नहीं है। मैं यह भी नहीं कहना कि वह नहीं नहीं है । परलोक नहीं है । परलोक नही नहीं है। परलोक है भी और नहीं भी है । परोक न है और न नहीं है।" मजय के परलोक, देवता, कर्मफ्त और मुनि के सम्बन्ध के ये विचार वातप्रतिशत अनिश्चयवाद के है। वह स्पष्ट कहना है कि-"यदि मैं जानता हो तो बताऊँ ।" संजय को परलोक मुक्ति आदि के का कुछ भी निश्चय नही था इसलिए उसका दर्शन पर राहुल जी के मानय की सहजसुद्धि को अंग में नहीं डालना चाहता और न कुछ निश्चय कर भ्रान्त धारणाओं की पुष्टि ही करना चाहता है । तात्पर्य यह कि संजय घोर अनिश्चयवादी था । युद्ध और लजय-बुद्ध ने "रोक नित्य है', अनित्य है , नित्य अनित्य है, न निन्य न अनिन्य है', रोक अन्तवान् है', महीं है,हे नहीं है, न है न नहीं है', निर्माण के बाद तथागत होते है', नहीं होते', होते नहीं होते', न होते न नहीं होते , जीव शरीर से भिन्न है, जोर शरीर में मिल नहीं है।" (माध्यमिक वृत्ति पृ० ४४६) इन चौदह वस्तुभी को अग्याकृत कहा है। मनिअमनिकाय (२३) में इनकी संरया दश है । इसमें आदि के दो प्रश्नो म तीसरा और चीया विक्रप नहीं गिना गया है। इनके अप्राकृत होने का कारण उद ने बताया है कि इनके बारे में कहना सार्थक नहीं, भिक्षुचर्या के लिए उपयोगी नहीं, न यह निषेद निरोध शान्ति या परमजान निर्माण के लिए आवश्यक है। तात्पर्य यह कि बुद्ध की दृष्टि में इनका जानना मुमुक्षु के रिए आवश्यक नहीं था । दृमरे शब्दों में बुद्ध भी मंजय की तरह इनके बारे में कुछ कहकर मानव की बहन यदि को भ्रम में नहीं डालना चाहते थे और न प्रान्त धारणाजी को पुष्ट ही करना चाहते थे। हाँ, संजय जब अपनी अज्ञानता पा अनिश्चय को साफ साफ शन्नों में कह देना है कि यदि मैं जानता हो तो बताऊँ, नन बुद्ध अपने जागने न जानने का उल्लेख न करके उस रहस्य को शिष्यों के लिए अनुपयोगी बनाकर अपना पीला धुरा रेने है। किसी भी तार्दिक का पह प्रश्न अभी तक भसमाहित ही रह जाना है कि इस भगाईतना और सजय के भनिधयवाद में . - - २२ न्यायविनिश्चयविवरण क्या अन्तर है ? सिवाय इसके कि संजय फकड़ की तरह सरी सरी यात कह देना है और बुद्ध बड़े भादमियों की शालीनता का निर्वाह करते है। बुद्ध और संजय ही क्या, उस समय के धातावरण में आत्मा रोक परलोक और मुक्ति के स्वरूप के सम्बन्ध में-है (सत्), नहीं (असत), है-नहीं (सदसत् उभय), न है न नहीं है (अवक्तव्य या अनुभय)।" ये चार कोटियाँ गूंज रही थीं। कोई भी मानिक सिी भी तीर्थर या आचार्य में विना क्सिी संकोच के अपने प्रश्न को एक साँस में ही उन चार कोटियों में विभाजित करके ही पूछता था। जिस प्रकार आज कोई भी प्रश्न मजदूर और पूंजीपति शोपक और शोप्य के द्वन्द्व की छाया में ही सामने आता है, उसी प्रकार उस समय आन्मा आदि अतीन्द्रिय पदार्थों के प्रश्न सत् असत् उभय और अनुभप-अनिर्वचनीय इस चनुकोटि में आवेष्टित रहते थे। उपनिपद् या ऋगवेद में इस चतुष्कोटि के दर्शन होते हैं। विश्व के स्वरूप के सम्बन्ध में असन् से सत् हुआ ? या मन से सत् हुआ ? या सदसत् दोनों रूप में अनिर्वचनीय है ? इत्यादि प्रश्न उपनिषद् और वेद में बराबर उपलब्ध होते हैं ? ऐसी दशा में राहुल जी का स्याद्वाद के विषय में यह फतवा दे देना कि सजय के प्रश्नों के शब्दों से या उसकी चतुर्भट्टी को नोडमरोड कर मसमगी बनी-कहाँ तक उचित है यह ये सयं विचारें। बुद्ध के समकालीन जो छह तोर्थिक थे उनमें महावीर निग्गण्ठ नाथपुरकी, सर्वज्ञ और सर्वदर्शी के रूप में प्रसिद्धि थी। वे सर्वज्ञ और सबंदी थे या नहीं यह इस समय की चरचा का विषय नहीं है, पर वे विशिष्ट तरप- विचारक थे और किसी भी प्रश्न को संजय की तरह अनिश्चय कोटि या विक्षेप कोटि में या बुद्ध की तरह अध्याकृत कोटि में डालने वाले नहीं थे और न शिष्यों की सहज जिज्ञासा को अनुपयोगिता के भयप्रद चक्कर मे दुवा देना चाहते थे। उनका विश्वास था कि संघ के पंचमेस व्यक्ति जब तक पस्तुतत्त्व का टीक निर्णय नहीं कर देते तब तक उनमे यौद्धिक दृढता और मानमबल नहीं आ सकता। ये सदा अपने समानशील अन्य संघ के भिक्षुभी के सामने अपनी बौद्धिक दीनता के कारण हनप्रभ रहेंगे और इसका असर उसके जीवन और आचार पर आये बिना नहीं रहेगा। वे अपने शिष्यों को पर्देवन्द पद्मनियों की तरह जगत् के स्वरूप विचार को बाह्य हवा से अपरिचित नहीं रखना चाहते थे, किन्तु चाहते थे कि प्रत्येक प्राणी अपनी सहज जिज्ञासा और मननशक्ति को वस्तु के यथार्थ स्वरूप विचार की ओर एगावे । न उन्हें युद्ध की तरह यह भय व्याप्त था कि यदि आग्मा के सम्बन्ध में है। कहते है तो शल्धतवाद अर्थात् उपनिषद्वादियों की तरह लोग नित्यत्व की ओर दुक जायेंगे और नही कहने से उच्छेदवाद अर्थात् चार्वाक की तरह नास्तिस्य का प्रसग प्राप्त होगा । अत इस प्रम को भव्या- कृत रखना हो श्रेष्ट है। वे चाहते थे कि मौजूद तक का और सशयों का समाधान वस्तुस्थिति के आधार मे होना ही चाहिये । अत उन्होंने वस्तुस्वरूप का अनुभव का यह पता कि जगत का प्रत्येक सन् चाहे वह घेतनजातीय हो या अवेताशालय परिमरी है। यह सिम्पर प्रतिक्षा परिवर्तित होता. रा. है। उसकी पर्याय बदलती रहती है। उसका परिणमन कभी सदृश भी होता है कभी विसरश भी। पर परिणमनसामान्य के प्रभाव से कोई भी अछूता नहीं रहता। यह एक मौरिक नियम है कि किसी भी सन् का विश्व से सर्वथा उच्छेद नहीं हो सकता, यह परिवातत होकर भी अपनी मौरिक्ता या सत्ता को नहीं खो सकता। एक परमाणु है यह हाइड्रोजन बन जाय, जल बन जाय, भाप बन जाय, फिर पानी हो जाय, पृथिवी बन जाय, और अनन्त आकृतियों या पयायों को धारण कर ले, पर अपने प्यन्य या मौलिकत्व को नहीं खो सस्ता । किसी की ताकत नहीं जो उस परमाणु की हस्ती या अस्तित्व को मिटा सके। तात्पर्य यह कि जगत् में जितने 'सत्' है उतने धने रहंगे। उनमें से एक भी कम नहीं हो सकता, एक दूसरे में विलीन नहीं हो सकता। इसी तरह न कोई नया 'मन्' उत्पन्न हो सकता है। जितने है उनश ही आपसी प्रो. धर्नानन्द कोसाम्बी ने संजय के बाद को विक्षेपवाद सज़ा दी है। देखो भारतीय संस्कृति और हिंसा पृ. ४७. + - प्रस्तावना २३ संयोग-वियोगी के आधार से यह विश्व जगत् (गच्छतीति जगत् अर्थात् नाना रूपो का प्राप्त होना) बनता रहता है। तात्पर्य यह कि विश्व में जितने सत् हैं उनमें से न तो एक कम हो सकता है और न एक बन सकता है। अनन्त जड परमाणु, अनन्त आत्माएँ, एक धर्मद्रव्य, एक अधर्म द्रव्य, एक आकाश, और असंख्य कालाणु इतने सत् है। इनमें धर्म अधर्म आकाश और काल अपने स्वाभाविक रूप में सदा विद्यमान रहते हैं उनका पिलक्षग परिणमन नहीं होता। इसका अर्थ यह नहीं है कि ये कूटस्थ नित्य हैं किन्तु इनका प्रतिक्षण जो परिणमन होता है। वह सदश स्वाभाविक परिणमन ही होता है। आरमा और पुदगल ये दो दव्य एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। जिस समय आत्मा शुद्ध हो जाता है उस समय यह भी अपने प्रतिक्षणभावी स्वाभाविक परिणमन का ही स्वामी रहता है, उसमे विलक्षण परिणति नहीं होती। जब तक आत्मा अशुद्ध है तब तक ही इसके परिणमन पर सजातीय जीवान्तर का और विजातीय पुद्गल का प्रभाव आने से विलक्षणता आती है। इसकी नानारूपता प्रत्येक को स्वानुभवसिद्ध है। जड पुनल ही एक ऐसा विलक्षण द्रव्य है जो सदा सजातीय से भी प्रभावित होता है और विजातीय चेतन से भी। इसी पुदल दुव्य का चमकार आज विज्ञान के द्वारा हम सब के सामके प्रस्तुत हैं। इसी के हीनाधिक संयोग-वियोगो के फलस्वरूप असंख्य आविष्कार हो रहे हैं । विद्युत् शब्द आदि इसी के रूपान्तर है, इसी की शक्तियों हैं । जीव की अशुद्ध दशा इसी के संपर्क से होती है । अनादि से जीव और पुद्गल का ऐसा सयोग है जो पर्यायान्तर लेने पर भी जीव इसके संयोग से मुक नहीं हो पाता और उसमें विभाव परिणमन राग द्वेप मोह अज्ञानरूप दशाएँ होती रहती है। जन यह जीय अपनी चारित्रसाधना द्वारा इतना समर्थ और स्वरूपप्रतिछ हो जाता है कि उस पर बाह्य जगत् का कोई भी प्रभाव न पड़ सके तो वह मुक्त हो जाता है और अपने अनन्त चैतन्य में स्थिर हो जाता है। यह मुक्त जीव अपने प्रतिक्षण परिवर्तित स्वाभाविक चैतन्य में लीन रहता है। फिर उसमें अशुद्ध दशा नहीं होती। अन्तत. पुद्गल परमाणु ही ऐसे हैं जिनमें शुद्ध या अशुद्ध किसी भी दशा में दूसरे संयोग के आधार से नाना आकृतियाँ और अनेक परिणमन संभव हैं तथा होते रहते हैं । इस जगत् व्यवस्था मे किसी एक ईश्वर जैसे नियन्ता का कोई स्थान नहीं है यह तो अपने अपने सयोग-वियोगों से परिणमन- शील है । प्रत्येक पदार्थ का अपना सहज स्वभावजन्य प्रतिक्षणभावी परिणमनचक्र चालू है। यदि कोई दुसरा संयोग आ पड़ा और उस द्रव्य ने इसके प्रभाव को आत्मसात् किया तो परिणमन तत्प्रभा- वित हो जायगा, अन्यथा यह अपनी गतिसे बदलता चला जायगा। हाइड्रोजन का एक अणु अपनी गति से प्रतिक्षण हाइड्रोजन, रूप. में बदल रहा है। यदि आमीजन का अणु जुयस क्षा. जुय तो दोना का जलरूप परिणमन हो जायगा । वे एक बिन्दु रूप से सदृश संयुक्त परिणमन कर लेंगे। यदि किसी वैज्ञानिक के विश्लेषणप्रयोग का निमित्त मिला तो वे दोनों फिर जुदा जुदा भी हो सकते है । यदि अग्नि फा संयोग मिल गया भाफ बन जायेंगे। यदि साप के मुख का संयोग मिला विपविन्दु हो जायेंगे। तात्पर्य यह कि यह विश्व साधारणतया पुद्गल और अशुद जीव के निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध का धास्त- विक उद्यान है। परिणमनचर पर प्रत्येक दव्य चढ़ा हुआ है । वह अपनी अनन्त योग्यताओं के अनुसार भनन्त परिणमनों को क्रमश. धारण करता है । समस्त 'सत्' के समुदाय का नाम लोक या विश्व है। इस रष्टि से अब आप लोक के शाश्वत और अशाश्वत वाले प्रश्न को विचारिए--- (1) क्या लोक शाक्षत है ? हाँ, लोक शाश्वत है। द्रव्यों की संख्या की दृष्टि से, अर्थात् जितने सत् इसमे हैं उनमें का एक भी सत् कम नहीं हो सकता और न उनमें किसी नये सत् की वृद्धि हो हो सकती है। न एक सत् दूसरे में विलीन ही हो सस्ता है। कभी भी ऐसा समय नहीं आ सकता जो इसके अंगभूत द्रव्यों का लोप हो जाय या वे समाप्त हो जायें । (२) क्या रोक अशाश्वत है ? हाँ, लोक अशाश्वत है, अङ्गभूत गव्यों के प्रतिक्षण भावी परिणमना की दृष्टि से १ अर्थात् जितने सत् है वे प्रतिक्षण सदृश या विसदृश परिगमन करते रहते हैं । इसमे दो क्षण - - न्यायविनिश्चयविवरण तक ठहरनेघाला कोई परिणमन नहीं है। जो हम भनेक क्षण ठरहनेसला परिणमन दिखाई देता है वह प्रतिक्षणभावी महश परिणमन का स्थूल दृष्टि में अवलोकनमात्र है। इस तरह सतत परिवर्तनशील संयोग-वियोगों की दृष्टि से विचार कीमिये तो लोक अशाश्वत है. अनिन्य है, प्रतिक्षण परिवर्तित है। (३) क्या रोक शाश्वत और अमानत दोनों रूप है ? हाँ, क्रममा उपयुक्त दोनो दृष्टिया में विचार कीजिए तो लोक यासत भी है (इष्य दृष्टि में ) अशासत भी है (पर्याय दृष्टि मे)। दोनों दृष्टि कोणी को कमराः प्रयुक्त करने पर और उन दोनों पर स्थूल पि में विचार करने पर जगत् उभयरूप ही प्रतिभासित होता है। (४) क्या लोक शाक्त दोनो रूप नहीं है ? आखिर उसका पूर्ण रूप क्या है ? हो, लोक का पूर्णरूप अबक्तव्य है, नहीं कहा जा सस्ता । कोई शब्द ऐसा नहीं जो एक साथ शाश्वत और अशाश्वत इन दोनो स्वरूपा को तथा उसमे विद्यमान अन्य अनन्त धर्मों को युगपन कह सके । अतः शब्द की अमाम के कारण जगत् का पूर्णरूप अवक्तव्य है, अनुभय है, घचनातीत है। इस निरूपण में आप देखेंगे कि वस्तु का पूर्णरूप पचना के अगोचर है अनिर्वचनीय या अवक्तव्य है । यह चौथा उत्तर वस्तु के पूर्ण रूप को युगपत् कहने की दृष्टि से है। पर वही जगत् शाश्वत कहा जाता है दव्यदृष्टि से, अशाश्वत कहा जाता है पर्यायदृष्टि मे । इस नरह मूलतः चौथा, पहिला और. दूसरा ये तीन ही प्रश्न मालिक हैं। तीसरा उभयरूपता का प्रश्न तो प्रथम और द्वितीय के मंयोग रूप है। अब आप विचारें कि संजय ने जब लोक के शाश्वत और अशाश्वत आदि के बारे में स्पष्ट कह दिया कि मैं जानता हो तो बताऊँ और बुद्ध ने कह दिया कि इनके चक्कर में न पडो, इसका जानना उपयोगी नही तब महावीर ने उन प्रश्नों का वस्तु स्थिति के अनुसार यथार्थ उत्तर दिया और शिष्यों की जिज्ञासा का समाधान कर उनको बौद्धिक दीनता से ग्राण दिया । इन प्रक्षों का स्वरूप इस प्रकार है- मंजय महावार , क्या लोक शाश्वत है? मैं जानता हो तो इसका जानना अनु- हाँ, लोक दन्य दृष्टि से बनाऊँ, (अनिश्चय, पयोगी है (अन्याकृत शाश्वत है, इसके किसी भी अकथनीय) सन् का सर्वथा नाश नहीं हो सकता।। २ क्या लोक अशाश्वत है? हाँ लोक अपने प्रतिक्षण भावी परिवर्तनों की रष्टि से अशाचन है, कोई भी पदार्थ दो क्षणस्थायी नहीं। ३ क्या लोकशाश्वत और अशा. हाँ, दोनों टिकोणों से श्वत है? प्रमशः विचार करने पर रोक को शाश्वत भी कहने है और अमावल भी। ४ क्या लोक दोनो रूप नहीं है हाँ, ऐसा कोई शब्द नहीं जो लोक के परिपूर्ण स्वरूप को एक साथ समग्र भाव से कह सकें। उपमे शाश्वत अशा- श्रत के सिवाय भी अनन्त रूप विद्यमान है अत. समम भाव में घस्तु अनुभव है, अवतन्य है, मनिर्वाचनीय है। मक्ष विक्षेप) " " भनुभय है।
प्रस्तावना २५ संजय और बुद्ध जिन प्रभा का समाधान नहीं करते, उन्हें अनिश्चय या अन्याहत कह कर अपना पिण्ड छुदा लेते है, महावीर उन्ही का वास्तविक युक्ति संगत समाधान करते हैं। इस पर भी राहुलजी, और धर्मानन्द कोसम्बो आदि यह कहने का साहस करते हैं कि 'संजय के अनुयायियों के लुप्त हो जाने पर संजय के बाद को ही जैनियों ने अपना लिया। यह तो ऐसा ही है जैसे कोई कहे कि भारत में रही पर- तन्त्रता को ही परतवताविधायक अंग्रेजों के चले जाने पर भारतीयों ने उसे अपरतन्त्रता (स्वतन्त्रता) रूप से अपना लिया है, क्योकि अपरतन्त्रता में भी 'प र तन्त्र ता' ये पाँच अक्षर तो मौजूद है ही। या हिंसा को ही बुद्ध और महावीर ने उसके अनुयायियों के लुप्त होने पर अहिंसारूप से अपना लिया है क्योकि अहिंसा में भी 'हि सा' ये दो अक्षर है ही। यह देखकर तो और भी आश्चर्य होता है कि-आप (पृ० ४८४) अनि- श्चिततावादियों की सूची में संजय के साथ निग्गंठ नाथपुर (महावीर) का नाम भी लिख जाते है, तथा (पृ० ४९१) संजय को अनेकान्तबादी। क्या इसे धर्मकीर्ति के शब्दों में 'धिग व्यापकं तमः' नहीं कहा जा सकता? 'स्यात्' शब्द के प्रयोग से साधारणतया लोगों को संशय अनिधय या संभावना का भ्रम होता है। पर यह तो भाषा का पुरानी शेली है उस प्रसङ्ग को, जहाँ एक वाद का स्थापन नहीं होता। एकाधिक भेद या विकल्प की सूचना जहाँ करनी होती है वहाँ 'स्यात्' पद का प्रयोग भापा की शैली का एक रूप रहा है जैसा कि मझिमनिकाय के महाराहुलोवाद सुत्त के निम्नलिखित्त अवतरण से ज्ञात होता है- कतमा च राहुल तेजोधात? तेजोधातु सिया अज्झत्तिका सिया वाहिरा।" अर्थात् तेजो धानु स्यात् आध्यात्मिक है, स्यात् बाह्य है। यहाँ सिया ( स्यात् ) शब्द का प्रयोग तेजो धातु के निश्चित भेदो की सूचना देता है न कि उन भेदों का नंशम अनिश्चय या सम्भावना बताता है । आध्यात्मिक भेद के साथ प्रयुक्त होनेवाला स्यात् शन्द इस बात का द्योतन करता है कि तेजो धातु मात्र आध्यात्मिक ही नहीं है किन्तु उससे व्यतिरिक्त बाह्य भी है। इसी तरह 'स्यादस्ति' में अस्ति के साथ लगा हुआ 'स्यात्। शब्द सूचित करता है कि अस्ति से भिन्न धर्म भी वस्तु में है केवल अस्ति धर्म रूप ही पस्तु नहीं है। इस तरह 'स्यात्' शब्द न शायद का न अनिधय का और न सम्भावना का सूचक है किन्तु निर्दिष्ट धर्म के सिवाय अन्य अशेप धर्मों की सूचना देता है जिससे श्रोता वस्तु को निर्दिष्ट धर्ममात्र रूप ही न समझ बैठे । सप्तभंगी-वस्तु मूलतः अनन्तधर्मात्मक है। उसमें विभिन्न दृष्टियों से विभिन्न विवक्षाओ से अनन्त धर्म है । प्रत्येक धर्म का विरोधी धर्म भी दृष्टिभेद से वस्तु मे सम्भन है । जैसे 'घटः स्यादस्ति' में घट है ही अपने द्रव्य क्षेत्र काल भाव की मर्यादा से। जिस प्रकार घट में स्वचतुष्टय की अपेक्षा अस्तित्व धर्म है उसी तरह घटम्पतिरिक्त अन्य पदार्थो का नास्तिष भी घट में है। यदि घटभिन्न पदार्थों का नास्तित्व घट में न पाया जाय तो घट और अन्य पदार्थ मिलकर एक हो जायेंगे। अतः घट स्पाइस्ति और स्यानास्ति रूप है । इसी तरह वस्तु में द्रव्यदृष्टि से नित्यत्व पर्यायदृष्टि से अनित्यत्व आदि अनेको विरोधी धर्मयुगल रहते है । एक वस्तु मे अगन्त सप्तभङ्ग बनते हैं । जब हम घट के अस्तित्व का विचार करते है तो अस्तित्वविषयक सात भत हो सकते हैं। जैसे संजय के प्रश्नोत्तर या बुद्धके अव्याक्त प्रश्नोत्तर में हम चार कोटि तो निश्चित रूप से देखते है-सत् , असत् , उभय और अनुमय । उसी तरह गणित के हिसाब सेतीन मंगों को मिलाने पर अधिक से अधिक सात अपुनरुक्क भंग हो सकते हैं। जैसे घड़े के अस्तित्व का विचार प्रस्तुत है तो पहिला अस्तित्व धर्म, दूसरा तद्विरोधी नास्तित्व धर्म और तीसरा धर्म होगा अवक्तव्य जो पस्त के पूर्ण रूप की सूचना देता है कि वस्तु पूर्ण रूप से वचन के भगोचर है। उसके विराट रूप को शब्द नहीं छू सकते । भक्तन्य धर्म इस अपेक्षा से है कि दोनों धर्मो को युगपत् कहनेवाला शब्द संसार में नहीं है अतः वस्तु यथार्थतः वचनातीत है, अवक्तव्य है। इस तरह भूल में तीन भा है- इत्यादस्ति घटः २त्यासास्ति घटः ३ स्यादवक्तव्यो घटः भवतव्य के साथ स्यात् पद लगाने का भी अर्थ है कि वस्तु युगपत् पूर्ण रूप में यदि अवतम्य है तो क्रमशः अपने अपूर्ण रूप में वक्तव्य भी है और यह अस्ति नास्ति आदि रूप से पचनों का विषय ४ न्याययिनिहायविवरण भी होती है । भनः यस्तु स्याद् प्राप.. 1 जय मूल भन नान तप इन दिमयोगी भंग मी तीन होगे सपा निपयोगी भग एक होगा जिस रोटि में मर और अमा को मिलाकर प्रश्न होता है कि 'श्या सम् होकर भी पस्नु भमत् है? उमी सरह पे भी प्रश्न हो सकने हैं कि का सत् होकर भी पर अयमय है! २ या भगन् in भी पसु भातव्य है ! ३ क्या मन्-अमत् होकर भी वस्तु भययन नो प्रभा का समाधान संयोगज पार भंगा में है । अर्थात्- (1) अम्ति नारित उभय रूप धम्म है-पगुष्टय धौर परश्य पर प्रमश: दृष्टि रखने पर और शेनों की सामूहिक विपक्षा रहने पर। (4) अस्ति भयरुप्य पाय--प्रयम ममय में मनुष्टय धीर द्वितीय समय में युगपत् ३. पर धनुष्टप पर क्रमशः हि रराने पर और दोनों दी सामूहिक विषक्षा रहने पर। (6) मास्ति भय पनु:-प्रथम समय में पर चतुष्टय और द्वितीय समय में युगपत् स्व. पर धनुष्टय की समाप्टि रपने पर और दोनों को सामूहिक पियशा रहने पर। (6) भरित नास्ति तस्य यम्गु है प्रथम समय में सचतुश्य, द्वितीय ममय में पर धनुष्टय गया तृतीय समय में युगपत् स्य-पर घनुष्य पर प्रमाः रष्टि गरने पर और तीनों को सामूहिक विवक्षा रहने पर। जब अस्ति और नास्ति की सरह भरतर भी यस्तु का धर्म है तब से अस्ति और नास्ति को मिलाकर चौथा भंग बन जाता है येसे हो अरक्तस्य के साथ भी अम्ति, नास्ति और अस्ति नास्ति मिलकर पॉप ठयं और सात भंग की पुष्टिहो जाती है। इस परह गणित के सिद्धान्त के अनुसार तीन मूल पस्तुओं के अधिक से अधिक अपुनरुत सात दी मंग हो सकते हैं। तात्पर्य यह कि यस्तु के प्रत्येक धर्म को लेकर सात प्रकार को जिज्ञासा हो सस्ती है, सात प्रकार के प्रम हो सकते हैं मनः उनके उत्तर भी सात प्रकार के ही होते हैं। दर्शनादिग्दर्शन में श्री राहुएजी ने पाँच छठये और सातवें भंग को जिस भ्रष्ट तरीके से तोड़ा. मरोदा है यह उनकी अपनी निरी फलना और अतिपाइस है। जब वे दर्शनों को सापक नई और वैज्ञानिक रष्टि से देखना चाहते हैं तो किसी भी दर्शनको समीक्षा उसके सरूप को सरीक समझ कर ही करनी चाहिए। ये भत्तव्य नामक धर्म को जो कि सन के साथ स्वतन्त्रभाव से द्विसंयोगा हुआ है, तोड़कर अ-वक्तव्य करके संजय के 'नहीं' के साथ मेल येवा देते हैं और संजय के घोर अनिश्चपपाद को ही अनेकान्तवाद कह देते हैं!किमाश्चर्यमतः परम् । श्री सम्पूर्णानन्दजी 'जैनधर्म' पुन्नक की प्रस्तावना (पृ. ३) में अनेसन्तवाद की ग्राह्यता स्वीकार करके भी ससमझी न्याय को पालकी चाल निकालने के समान आवश्यकता से अधिक यारीकी में जाना समझते हैं। पर सहभगी को भाज से अढाई हजार वर्ष पहिले के वातावरण में देखने पर वे स्वयं उसे समय की मांग कहें विना नहीं रह सकते । अदाई हजार वर्ष पहिले आयाल गोपाल प्रत्येक प्रश्न को सहज तरीके से 'सत् असन् उभय और अनुभया इन चार कोटियों में गूंथ कर ही उपस्थित करते थे और उस समय के तीन भारतीय आचार्य उत्तर भी चतुष्कोटि पाही, हाँ या ना में देते थे तब जैन साधकर महावी ने मङ्गो के गणित के नियमानुसार अधिक से अधिक सात प्रश्न बनाकर उनका समाधान ससभी द्वारा किया जो निश्चितरूप से वस्तु को सीमा के भीतर ही रही है । भनेशनबाद ने जगत् के वास्तधिक अनेक सत् का अपलाप नहीं किया और न वह कंघल कल्पना के क्षेत्र में विचरा है। १ जैन कथाप्रन्धों में महावीर के बालजीवन की एक घटना का वर्णन आता है कि-'संजय और विजय नाम के दो साधुओं का संशय महावीर को देखते ही नष्ट हो गया था, इसलिए इनका नाम सन्मति रखा गया था। सम्भव है यह संजय विजय संजयवेलहि पुन ही हों और इसी के संशय या बनियम का नाश महावीर के सप्तभंगी न्याय से हुआ हो और वेलष्टिपुत्त विशेषण ही भ्रष्ट होकर विजय नाय का दूसरा साधु बन गया हो। । - प्रस्तावना मेरा उन दार्शनिको से निवेदन है कि भारतीय परम्परा में जो सत्य की धारा है उसे 'दर्शनमन्ध' लिखते समय भी कायम रखें और समीक्षा का स्तम्भ नो बहुत सावधानी और उत्तरदायित्व के साथ लिखने की कृपा करें जिससे दर्शन केवल विवाद और प्रान्त परम्पराओं का अनायबघर न वने । यह जीवन में संवाद लाये और दर्शनप्रणेताओं को समुचित न्याय दे सके । इस तरह जैनदर्शन ने दर्शन शब्द की काल्पनिक भूमिका से निरल कर वस्तु सीमा पर खड़े होकर जगत में वस्तु स्थिति के आधार से संवाद समीकरण ओर यथार्थतत्वज्ञान की दृष्टि दी। जिसकी उपासना से विश्व अपने पास्तविक रूप को समझ कर निरर्थक विवाद से बचकर सच्चा संघादी बन सकता है। अनेकान्तदर्शन का सांस्कृतिक आधार- भारतीय विचार परम्परा में स्पष्टत. दो धाराएँ हैं। एक धारा वेद को प्रमाण मानने वाले वैदिक दर्शनों की है और दूसरी वेद को प्रमाण न मानकर पुरुषानुभव या पुरुषसाक्षात्कार को प्रमाण माननेवाले श्रमण सन्तों की। यद्यपि चार्वाक दर्शन भी वेद को प्रमाण नहीं मानता किन्तु उसने आस्मा का अस्तित्व जन्म से मरण पर्यन्त ही स्वीकार किया है। उसने परलोक, पुण्य, पाप और मोक्ष जैसे आत्मप्रतिष्ठित तस्वी को तथा आरमसंशोधक चारित आदि की उपयोगिता को स्वीकृत नहीं किया है। अत. अवैदिक होकर भी पह श्रमगधारा में सम्मिलित नहीं किया जा सकता । श्रमणधारा वैदिक परम्परा को न मानकर भी आत्मा, जइ भित्र ज्ञान सन्तान, पुण्य-पाप, परलोक, निर्माण आदि में विश्वास रखती है, अत. पाणिनिकी परिभाषा के अनुसार आस्तिक है। चैद को या ईश्वर को जगत्कर्ता न मानने के कारण श्रमणधारा को नास्तिक कहना उचित नहीं है। क्योंकि अपनी अमुक परम्परा को न मानने के कारण यदि श्रमण नास्तिक कहे जाते हैं तो श्रमण परम्परा को न मानने के वारण वैदिक भी मिथ्याष्टि आदि विशेषणों से पुकारे गये हैं। श्रमणधारा का सारा तत्वज्ञान या दर्शनविस्तार जीवन-शोधन या चारित्र्य वृद्धि के लिए हुआ था। वैदिक परम्परा मे तत्त्वज्ञान को मुक्ति का साधन माना है, जब कि श्रमणधारा में चारित्र को वैदिक- परम्परा पैराग्य आदि से ज्ञान को पुष्ट करती है, विचारशुद्धि करके मोक्ष मान लेती है जव कि श्रमण परम्परा कहती है कि उस ज्ञान या विचार का कोई मूल्य नहीं जो जीवन में न उतरे । जिसकी सुवास से जीवनशोधन न हो यह ज्ञान या विचार मस्तिष्क के व्यायाम से अधिक कुछ भी महत्व नहीं रखते । जैन परम्परा में तत्त्वार्थसूत्र का आधसूत्र है-"सम्यग्दर्शनशानचारित्राणि मोक्षमार्ग" (तत्वार्थसून 1) अर्थात् सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित की आत्मपरिणति मोक्ष का मार्ग है। यहाँ मोक्ष का साक्षात् कारण चारित है । सम्यग्दर्शन और सम्पग्ज्ञान तो उस चारित के परिपोषक है। बौद्ध परम्परा का अष्टांग मार्ग भी चारिन का ही विस्तार है। तात्पर्य यह निश्रमणधारा में ज्ञान की अपेक्षा चारिन का ही अन्तिम महत्व रहा है और प्रत्येक विचार और ज्ञान का उपयोग चारित्र अर्थात् आत्मशोधन या जीवन में सामञ्जस्य स्थापित करने के लिए किया गया है। श्रमण सन्तो ने तप और साधना के द्वारा पीतरागता प्राप्त की और उसी परम वीतरागता, समता या अहिंसा की उत्कृष्ट ज्योति को विश्व में प्रचारित करने के लिए विश्वनवी का साक्षात्कार किया। इनका साध्य विचार नहीं आचार था, ज्ञान नहीं चारिभ्य था, पापिरास या शास्त्रार्थ नहीं, जीवन शुद्धि और संघाद था। अहिंसा का अन्तिम अर्थ है-जीपमान में (चाहे वह स्थावर हो या जंगम, पशु हो या मनुष्य, ब्राह्मण हो क्षत्रिय हो या शूद्र, गोरा हो या काला, एतद्देशीय हो या विदेशी) देश, काल, शरीराकार के आवरणों से परे होकर समत्व दर्शन । प्रत्येक जीव स्वरूप से चैतन्य शक्ति का अग्रण्ड शाश्वत आधार है। यह कर्म या पासनाओं के कारण घृक्ष, कीडा मकोड़ा, पशु और मनुष्य आदि शरीरो को धारण करता है, पर असण्ड चैतन्य का एक भी अंश उसका नट नहीं होता । यह घासना या रागद्वेषादि के द्वारा विकृत अवश्य हो जाता है। मनुष्य अपने देश काल आदि निमित्तों से गोरे या फाले किसी भी शरीर को धारण किए हो, अपनी वृचि या कर्म के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, पैश्य और चूम किसी भी श्रेणी में उसकी गणना व्यवहारत. की जाती हो, किसी भी देश में उत्पन्न हुआ २८ - न्यायविनिश्रयविवरण हो, किसी भी सन्त का उपासक हो, यह इन ध्यावहारिक निमित्ती से ऊँच या नीच नहीं हो सकता। किसी धर्गविशेष में उत्पस होने के कारण ही यह धर्म का टेरेदार नहीं यन सम्ता मानवमात्र के मुलन समान अधिकार है, इतना ही नहीं किन्तु पशु पक्षी, कीदे मकोदे, वृक्ष आदि माणिया के भी । अमुक प्रकार की आजीविका या व्यापार के कारण कोई भी मनुष्य किसी मानवाधिकार से घचित नहीं हो सकता। यह मनवसमस्य, भावना, प्राणिमात्र में समना और उटि सचमंत्री अहिंसा के विकसित रूप है। श्रममन्तों ने यही रहा है कि एक मनुष्य किसी भूमण्ड पर या अन्य भौतिक साधनी पर अधिकार कर रोने के कारण बार में महान यनार दुसरो के निदरन का जन्मसिद्ध अधिकारी नहीं हो सकता। किमी वर्णविशेष में उत्पन्न होने के कारण दूसरों का शासक या धर्म का ठेकेदार नहीं हो सस्ता । भौतिक साधनों की प्रतिया यार में कदाचित् हो भी पर धर्मक्षेत्र में माणिमात्र को एक ही भूमि पर बैठना होगा। हर एक माणी को धर्म की शीतर छाया में समानभाव से सन्तोष की साँग रेने का मुअम्मर है। आत्मसमात्य, वीतरामाय या महिला के विकास से ही कोई महान हो सस्ता है न कि जगन् म विपमना पैरानेवाले हिंसक परिग्रह के सत्रह मे । आदर्श त्याग है न कि सग्रह। इस प्रार जाति, धर्ण, रग, देश, आकार, परिग्रहममह आदि विषमता और सघप के कारणों में पो हो। प्राणिमात्र को समाय, अहिंसा और वीतरागता का पावन मन्देश इन श्रमगसन्ती ने उस समय दिया जर यन आदि वियाकाण्ड एक वर्ग विशेष की जीविका के साधन बने हुए थे, कुछ गाय, सोना और खिों की दक्षिणा से स्वर्ग के रिकिट माप्त हो जाते थे, धर्म के नाम पर गोमेध अजामेध चिन् नरमेध ता का खुला बाजार था, जातिगत उच्चव नीचच का विष समाज शरीर को दम्य कर रहा था, अनेक प्रकार से सत्ता को हथियाने के पड्यन्त्र घालू थे। उस पर युग मे मानवसमत्य और प्राणिमैत्री का उदारतम सन्देश इन युगधर्मी सन्तों ने नास्तिकता का मिथ्या लाउन सहते हुए भी दिया और भान जनता को सच्ची समाजरचना का मूलमत्र बताया । पर, यह अनुभवसिद्ध यात है। अहिंसा को स्थायी प्रतिष्टा मन शुद्धि और पचनशुद्धि के बिना नहीं हो सकती। हम भले ही पारीर से दूसरे प्राणियों की हिसा न करें पर यदि वचन व्यवहार और चित्त गत विधार विषम और विसवादी है तो कायिक अहिसा पल ही नहीं सस्ती । अपने मन के विचार अर्थात् मत को पुष्ट करने के लिए ऊँच नीच शद घोरे जायेंगे और फरत हाथापाई का अवसर भाए बिना न रहेगा । भारतीय शासायों का इतिहास अनेक हिंसा काण्डों के रसरक्षित पसा से भरा हुआ है । अत आवश्यक था कि अहिंसा की सगीग प्रतिष्ठा के लिए विश्व का यथार्थ तत्वनान हो और विचार शुद्धि मूलक पचनशद्धि को जीवन व्यवहार में प्रतिष्टा हो । यह सम्भव ही नहीं है कि एक ही वस्तु के विषय में परस्सर विरोधी मतवाद चरते रह, अपने पक्ष के समर्थन के लिए उचित अनुचित शाखाय होते रहे, पक्ष प्रतिपक्षा का सगठन हो, शास्त्रार्थ में हारनेवाले को तैर भी जलती कड़ाही में जीविन तल देने जैसी हिंसक होहे भी लगें, फिर भी परस्पर अहिंसा बनी रहे। भगवान महावीर एक परम अहिंसक सन्त थे। उनने देखा कि आज का सारा राजकारण धर्म और मतगादियों के हाथ में है | जर तक इन मतवाले कर परतु स्थिति के भाधार से समन्वय न होगा तब तक हिंसा की जड़ नहीं कर सकती। उनने विश्व तवाका साक्षात्कार किया और बताया कि विश्व का प्रत्येक चेतन और जड़ ताप अनात धर्मों का भण्डार है। उसके विराट् स्वरूप को साधारण मानव परिपूर्ण रूप में नहीं जान सकता। उसका क्षुद ज्ञान पस्तु के एक एक अशको जानकर अपने में पूर्णता वा दुरभिमान कर बैठा है। विवाद वस्तु में नहीं है। विवाद तो देखने घालों की दृष्टि में है । काश, ये वस्तु के विराट अनन्त धारमक या अनेकात्मक स्वरूप की झंकी पा सके। उनने इस अनेकान्तामा तस्य ज्ञान की ओर मतवादियों का ध्यान सींचा और बताया कि-देखो, भयेक वस्तु अनन्त गुण पाय और धर्मों का अखण्ड पिण्ड है। यह अपनी अगायनन्त सन्तान स्थिति की रिसे निस्य है। कभी भी ऐसा समय नहीं आ सकता जब विश्व के रंगमन्च मे एक कग का भी समूल विनाश हो जाय । साथ ही प्रति क्षण उसकी पर्याएँ बदल रही है, उसके गुण धर्मों में भी सर या विसहश परिवर्तन हो रहा है, अत: - यह प्रस्तावना ०९ यह अनित्य भी है । इसी तरह अनन्त गुण, शक्ति, पर्याय और धर्म प्रत्येक वस्तु को निजी सम्पत्ति है। इनमें से हमारा स्वरप ज्ञामलव एक एक अश को विपय करके क्षुद्र मतवादा की सृष्टि कर रहा है। आत्मा को नित्य सिद्ध करने वालों का पक्ष अनी सारी शक्ति आत्मा को अनित्य सिद्ध करने वाली की उखाड पडा में रमा रहा है तो अनित्यवादियों का गुट नियवादियों को भला बुरा कह रहा है। महावीर को इन मतवादियों की बुद्धि और प्रवृत्ति पर तरस आता था। ये बुद्ध की सरह आरम. नित्यत्व और अनित्यत्व, परलोक और निर्वाण आदि को अध्याकृत (अकथनीय) कहकर बौद्धिक नम की सृष्टि नहीं करना चाहते थे। उनने इन सभी सरसो का यथार्थ स्वरूप वताकर शिष्यों को प्रकाश में लाकर उ मानस समता की समभूमि पर ला दिया। उसने बताया कि वस्तु को तुम जिस दष्टिकोण से देख रहे हो वस्तु उतनी ही नहीं है, उसमे ऐसे अनन्त दृष्टिकोणों से देखे जाने की क्षमता है, उसका विराट् स्वरूप अनन्त धर्मात्मक है। तुम्हें जो दृष्टिकोण विरोधी मालूम होता है उसका ईमानदारी से विचार करो, वह भी वस्तु में विद्यमान है । चित्त से पक्षपात की दुरभिसन्धि निकालो और दूसरे के दृष्टिकोण को भी उतनी ही प्रामाणिकता से पस्तु म सोजो यह वही लहरा रहा है। हाँ, घस्तु की सीमा और मर्यादा का उल्लंघन नहीं होना चाहिए । तुम चाहो कि जद में चेतनत्य खोजा जाय या चेतन में जडत्व, तो नहीं मिल सकता। क्योंकि प्रत्येक पदार्थ के अपने अपने निजी धर्म नि त है। मैं प्रत्येक वस्तु को अनन्त धर्मात्मक कह रहा हूँ, सर्वधात्मक नहीं । अनन्त धर्मों में चेतन के सम्भव अनन्त धर्म चैतन में मिलेंगे तथा अचेतन गत सम्भव धर्म अचेतन में । चेतन के गुण धर्म अचेतन में नहीं पाये जा सकते और न अचेतन के वेतन में। हाँ, कुछ ऐसे सामान्य धर्म भी है जो चेतन और अचेतन दोनो में साधारण रूप से पाए जाते है । तात्पर्य यह कि बस में बहुत गुंजाइश है। वह इतनी विराट् है जो हमारे तुम्हारे अनन्त दृष्टिकोणों से देखी और जानी जा सकती है। एक क्षुद्र दृष्टि का आग्रह करके दूसरे को दृष्टि का तिरस्कार करना या अपनी दृष्टि का अहंकार करना वस्तु के स्वरूप की नासमझी का परिणाम है । हरिभद्रसूरि ने लिखा है कि- "आग्रही बत निनीपति युक्तिं तन यत्र मतिरस्य निविष्टा । पक्षपातरहितस्य तु युक्तियत्र तत्र मतिरेति निधेशम् ॥"-लोकतत्वनिर्णय] अर्थात्----आग्रही व्यक्ति अपने मतपोपण के लिए युक्तियाँ ढूंदता है, युक्तियों को अपने मत की ओर ले जाता है, पर पक्षपातरद्वित मध्यस्थ व्यनि युक्तिसिद्ध यस्तुस्वरूप को स्वीकार करने में अपनी मति की सफलता मानता है। भनेकान्त दर्शन भी यही सिखाता है कि युक्तिसिद्ध वस्तुस्वरूप की ओर अपने मत को लगाओ न कि अपने निश्चित मत की ओर वस्तु ओर युक्ति की खींचातानी करके उन्हें बिगाडने का दुष्प्रयास करो, और न कल्पना की उड़ान इतनी लम्बी लो जो वस्तु की सीमा को हो राँघ जाय । तात्पर्य यह है कि मानससमता के लिए यह वस्तुस्थितिमूलक अनेकान्त सत्वज्ञान अत्यावश्यक है। इसके द्वारा इस नरतन धारी को ज्ञात हो सकेगा कि वह कितने पानी में है, उसमा ज्ञान कितना स्वरप है। और यह किस दुरभिमान से हिंसक मतवाद का सर्जन करके मानवसमाज का भहित कर रहा है। इस मानस अहिंसात्मक भनेकान्त दर्शन से विचारों में या दृष्टिकोणों में कामचराऊ समन्वय या दीलादाला समझोता नहीं होता, किन्तु वस्तुस्वरूप के आधार से यथार्थ तत्त्वज्ञानमूलक समन्वय दृष्टि प्राप्त होती है। डॉ० सर राधाकृष्णन् इण्डियन फिलासफी (जिल्द । पृ. ३०५-६) में स्थाद्वाद के ऊपर अपने विचार प्रकट करते लिखते हैं कि इससे हमें केपल आपेक्षिक भथया अर्धसत्य का ही ज्ञान हो सस्ता है, स्थाद्वाद से हम पूर्ण सत्य को नहीं जान सकते । दूसरे शब्दों में-स्याद्वाद हमें अर्धसत्यो के पास हराकर पटक देना है और इन्हीं अर्धसत्यो को पूर्ण सत्य मान देने की प्रेरणा करता है। परन्तु केवल निश्चित भनिश्चित भसी को मिलाकर एक साथ रख देने से यह पूर्ण सत्य नहीं कहा जा सकता।" आदि ।
न्यायविनिश्चयविवरण - क्या सर राधाकृष्णन् यताने की कृपा करंगे कि स्यावाद ने निश्चित अनिश्चित अर्धपयों को पूर्ण सस्य मानने की प्रेरणा कैसे की है ? हाँ, यह घेदान्त की तरह चेनन और अचेतन के कालानिए अभेद की दिमागी दौड़ में अवश्य शामिल नहीं हुआ। सौर न पह किमी ऐसे मिदान्त का समन्वय करने की सलाद देता है जिसमें वस्तुस्थिति की उपेक्षा की गई हो। सर राधाकृष्णन् को पूर्णपय स्प से यह कारपनिक अभेद या ब्रह्म इष्ट है जिसमें चेतन अचेतन मूर्त अमूर्त सभी काल्पनिक रीति से समा जाते हैं। ये स्यावाद की समन्वयाटि को अर्धसयों के पास लाकर पटकना समरते हैं, पर जर प्रयक वस्तु स्वरूरत अनन्त धर्मात्मक है तय उम वास्तविक नतीजे पर पहुँचने को अर्धसरप कैसे कह सकते हैं? हाँ, स्याद्वाद उस प्रमाणविरुद्ध कारपनिक अभेद की ओर पस्तुस्थितिमूरक दृष्टि से नहीं जा सकता। वैसे, स ग्रहनय की एक चरम अभेद की कपना जैनदर्शनकारों ने भी की है और उस परम सग्रहनय की अभेद दृष्टि से बताया है कि-'सर्यमेक मदविशेष अयात्-जगत् एक है, सद्प से चेतन और अवेतन में कोई भेद नहीं है । पर यह एक सपना है, क्योंकि ऐसा एक सत् नहीं है जो प्रत्येक मौलिक द्रव्य में अनुगत रहता हो । अत यदि सर राधाकृष्णन् को चरम अभेद की करसना ही देखनी हो तो वे परमसंग्रहना के दृष्टिकोण में देख सकते हैं, पर यह केवर कल्पना ही होगी, वस्तुस्थिति नहीं। पूर्णसत्य तो वस्तु का अनेकान्तारमक रूप से दर्शन ही है न कि कायनिक अभेद का दर्शन । इसी तरह प्रो० वरदेव उपाध्याय इस स्याद्वाद से प्रभावित होकर भी सर राधाकृष्णन् का अनुसरण कर स्यावाद को मूर मूततच (एक ब्रह्म) के स्वरूप के समझने में नितान्त अपमर्थ बताने का साहस करते हैं । इनने तो यहाँ तक लिख दिय है कि-'इसी कारण यह व्यवहार तथा परमार्थ के यीचाबीच तारविचार को कतिपय क्षग के लिए विमम्म तया विराम देने वाले विश्रामगृह से बढ़कर अधिक महत्व नहीं रखता" (भारतीय दर्शन पृ० १७३)। आप चाहते हैं कि प्रयेक दर्शन को उस कालनिक अभेद तक पहुँचना चाहिए। पर स्यावाद जर वस्तुविचार कर रहा है तब वह परमार्थ सत् वस्तु की सीमा को कैसे लाँघ सकता है। ग्रीकराद न केवर युक्तिविरुद्ध ही है पर माज के विज्ञान से उसके एकीकरण का कोई वास्तविक मूल्य सिद्ध नहीं होता । विज्ञान ने एटम तर का विश्लेपण किया है और प्रत्येर की अपनी स्वतन्त्र सत्ता स्वीकार की है । अत यदि स्थावाद वस्तु की अनेकान्तामक सीमा पर पहुँचाकर बुद्धि को विराम देना है नो यह उसका भूपग ही है। दिमागी अभेद से वास्तविक स्थिति की उपेक्षा करना मनोरन्जन से अधिक महत्व की बात नहीं हो सकती। इसी तरह श्रीयुत् हनुमन्तराव एम ए ने अपने "Jain Instrumental theory of Knowledge' नामक रेस में लिखा है कि-"स्याद्वाद सरर समझौते का मार्ग उपस्थिन करता है, पह पूर्ण सत्य तक नहीं ले जाता ।" आदि। ये सब एक ही प्रकार के विचार है जो स्थाद्वाद के स्वरूप को न समझने के या घस्तुस्थिति की उपेक्षा करने के परिणाम हैं । मैं पहिले लिख चुका कि-महावीर ने देखा कि वस्तु तो अपने स्थान पर अपने विराट रूप में प्रतिष्टित है, उसमें अनन्त धर्म, जो हमें परस्पर विरोधी मालूम होते है, अधिरद्ध भाव से विद्यमान है, पर हमारी दृष्टि में विरोध होने से हम उसकी यथार्थ स्थिति को नहीं समझ पा रहे हैं। जैन दर्शन पास्तव बहुस्वपादी है। यह दो पृथक् सत्ताक वस्तुओं को व्यवहार के लिए कल्पना से अभिन्न कह भी दे, पर वस्तु की निजी मर्यादा का उल्यन नहीं करना चाहता। जैन दर्शन एक व्यक्ति का अपने गुण पर्यायों से धास्तविक अभेद तो मानता है, पर दो व्यक्तियों में अवास्तविक अभेद को नहीं मानता । इस दर्शन की यही विशेषता है, जो यह परमार्थ सत् वस्तु की परिधि को न सँधकर उसकी सीमा म ही विचार करता है और मनुष्यों को कल्पना की उड़ान विरत कर वस्तु की ओर देखने को बाध करता है। जिस घरम अभेद तक न पहुंचने के कारण अनेकान्त दर्शन को सर राधाकृ'गन् जैसे निवारक अर्धसत्यों का समुदाय कहते हैं उस चरम अभेद को भी भनेकान्त दर्शन एक व्यक्ति का एक धर्म मानता है । यह उन अभेदकल्पकों को कहता है कि धस्तु इससे भी बड़ी है अभंद तो उसका एक धर्म है। दृष्टि को और उदार तथा विशाल करके वस्तु के पूर्ण रूप को देखो, प्रस्तावना 1 - उसगे अभेद एक कोने में पड़ा होगा और अभेद के अनन्तो भाई-बन्यु उसमें नादाम्य हो रहे होंगे। अरा इन ज्ञानरावधारियों को उदारदृष्टि देनेवाले तथा वस्तु की झाँकी दिखानेवाले अनेकान्तदर्शन ने वास्तविक विचार की अन्तिम रेसा खींची है, और यह सब हुआ है मानस समतामूरक तत्वज्ञान की खोज से । जब इस प्रकार वस्तुस्थिति ही अनेकान्तमयी या अनन्त धर्मास्मिका है तर सहज ही मनुष्य यह सोचने लगता है कि दूसरा धादी जो कह रहा है उसकी सहानुभूति से समीक्षा होनी चाहिये ओर वस्तुस्थिति मूलक समीकरण होना चाहिये। इस स्वीयस्वरपता और वस्तु अनन्त धर्मता के वातावरण से निरर्थक करपनाओ का जाल टूटेगा और अहकार का विनाश होकर मानससमता की सृष्टि होगी। जो कि अहिसा का सजीवन वीज है। इस तरह मानस समता के लिए अनेकान्त दर्शन ही एकमात्र स्थिर आधार हो सस्ता है। जय अनेकान्त दर्शन से विचारशुद्धि हो जाती है तब स्वभावत वाणी मे नग्नता भोर परसमन्वय की वृत्ति उत्पा हो जाती है । यह वस्तुस्थिति को उल्लघन करनेवाले शब्द का प्रयोग ही नहीं कर सस्ता । इसीलिए जैनाचार्यों ने वस्तु की अनेकथर्मान्मकता का द्योतन करने के लिए 'स्यात्' सन्द के प्रयोग की आवश्यकता यताई है । शब्दों में यह सामर्थ नहीं जो कि पल के पूर्णरूल को युगपत् कह सके । यह एक समय में एक ही धर्म को कह सस्ता है। अत उसी समय वस्तु में विद्यमान शेप धर्मों की सता का सूचन करने के लिए 'स्यात्' शब्द का प्रयोग किया जाता है। 'सार' का 'मुनिश्चित टिशेगा या निर्णीत अपेक्षा' ही अर्थ है 'शायद, सम्भव' कदाचित् आदि नही । 'स्यादस्ति' का याच्यार्थ है-स्वरूपादि की अपेक्षा से घस्तु है ही' न कि शायद है', 'सम्भव है', 'कदाचित् है' आदि। संक्षेपत जहाँ भनेरान्त दर्शन चित्त मे समता, मध्यस्थभाव, पीतरागता, निष्पक्षता का उदय करता है यहाँ स्थाद्वाद पाणी में निर्दोपता जाने का पूरा अरसर देता है। इस प्रकार अहिया की परिपूर्णता ओर स्थायित्व की प्रेरणा ने मानस गुद्धि के लिए अनेकान्त दर्शन और पचन शुद्धि के लिए स्याद्वाद जैसी निधियों को भारतीय संस्कृति के कोपागार में दिया है। योरते समय पता को सदा यह ध्यान रहना चाहिए कि वह जो वोर रहा है उतनी ही घस्तु नहीं है, किन्नु यहुत यदी है, उसके पूर्ण रूप तक शब्द नहीं पहुँच सकते। इसी भाव को जताने के लिए यता स्यात् शान्द का प्रयोग करता है । 'स्यात्' शद विधिलि में निप्पन्न होता है, जो अपने पक्तव्य यो निश्चित रूप में उपस्थित करता है न कि सशय रूप में। जैन तीर्थकर ने इस तरह समांगीण अहिंसा की साधना का धैयक्तिक भीर सामाजिक दोनों प्रकार का प्रत्यक्षानुभूत मार्ग यताया है। उनने पदार्थों के स्वरूप का यथार्थ निरूपण तो किया ही, साथ ही पदार्थों के देसने का, उनके ज्ञान करने का और उनके रूप को घचन से कहने का नया वस्तुस्पर्शी मार्ग बताया। इस अहिंसक दृष्टि से यदि भारतीय दर्शनकारा ने यस्तु का निरीक्षण किया होता तो भारतीय जत्रकथा का इतिहास रजित न हुआ होता और धर्म तथा दर्शन के नाम पर मानवता का निर्दलन नहीं होता। पर अहयार और शासन भावना मानर को दानन बना देती है। उस पर भी धर्म और मत का 'अहम्' तो अति दुनिगार होता है । परन्तु युग युग म ऐसे ही दानवों को मानव बनाने के लिए हिसा सन्त इसी समन्वय दृष्टि, इसी समता भाप और इसी सरांनीण अहिमा का सन्देश देते भाए हैं। यह बैन दर्शन की ही विशेषता है जो यह महिमा की तह तक पहुँचने के लिए पेपल धार्मिक उपदेश तक ही सीमित नहीं रहा अपि तु यास्तविक स्थिति के आधार से दार्शनिक युक्तियां को सुलझाने की मालिक दृष्टि भी सोज सका । म फेरल प्टि ही भिन्तु मन पचा और काप इन तीनों घरों से होनेवाली हिसा को रोरने का प्रशालतम मार्ग भी उपस्थित कर सरा। भान डॉ. भगवान्दास जैसे मनापी समन्यय और सय धमों की मारिफ पुरता की भावज पुलन्द कर रहे है। थपों से कह रहे है कि समन्य ष्टि प्राप्त हुए बिना स्वराज्य स्थायी नहीं हो सरता, मानर मानर नहीं रह सकता । उन्होंने भरने 'समन्वय' भीर 'दर्शा का प्रयोजन' आदि अन्यों में इसी समन्वय तार का भूरि भूरि प्रतिपादन किया है। जैन ऋषियों ने दम समन्यय (रसाद) सिदान्त पर ही संख्यायद मन्य रिसे है। इनका विश्वास है कि जय समष्टि में समीचीनना नहीं भायगावर सक न्यायविनिश्चयविवरण मतभेद और संघर्ष पना ही रहेगा। नए दृष्टिकोण से पस्तु स्थिति तक पहुँचना ही विवाद से हटाकर जीवन को संपादी बना सकता है । जैन दर्शन की भारतीय संस्कृति को यही देन है। आज हमें जो स्वातम्य के दर्शन हुए वह इमी अहिंसा का पुण्यफल है। कोई यदि विश्व में भारत का मस्तक ऊँचा रस सक्ता है तो यह निहपाधि वर्ण, जाति, रहा, देश आदि की क्षुद्र उपाधियों से रहित अहिंसा भावना ही है। इस प्रकार सामान्यतः दर्शन शब्द का अर्थ और उनकी सीमा तथा जैनदर्शन की भारतीय दर्शन को देन का सामान्य वर्णन करने के बाद इस भाग में आए हुए अन्यगत प्रमेय का वर्णन संक्षेप में किया जाता है- विपयपरिचय ग्रन्थका याास्वरूप 1 यस्य. नाम-भाचार्य सिद्धसेन दिवाकर ने जैन न्याय का अवतार करने वाला न्यायावतार मन्थ लिखा है। न्यायावतार में प्रत्यक्ष, अनुमान भार श्रुत इन तीन प्रमाणों का विवेचन किया गया है। अकलकदेव ने प्रकृत्त प्रन्य न्यायविनिश्चय में भी प्रत्यक्ष अनुमान और प्रवचन ये तीन ही प्रस्ताव रसे है। धमकीति के प्रमाणवार्तिक में प्रत्यक्ष, स्पायर्यानुमान और परार्थानुमान इन तीन का विवेचन है। परार्थानुमान और शब्द प्रमाण की प्रक्रिया रगभग एक्ली है। धर्मकीति का एक प्रमाणविनिशय ग्रन्थ भी प्रसिद्ध है। यह अन्य गद्यपद्यमय रहा है । धादिदेवसूरिने स्याद्वाद स्नाकर (पृ. २३) में 'धर्मकीर्तिरपि न्यायविनिश्च- • .." यह उल्लेख करके लिखा है कि न्याययिनिधय के तीन परिच्छेदों में प्रमश प्रत्यक्ष, स्वार्थानुमान और परार्थानुमान का वर्णन है । यदि धर्मकानि का प्रमाणविनिश्चय के अतिरिक्त न्यायविनिश्चय नाम का भी कोई ग्रन्थ रहा है तो अक्लवदेव ने नाम की पसन्दगी में इसम उपयोग कर लिया होगा। अभी तक के अनुसन्धान से धर्मकीति के न्यायधिनिश्चय ग्रन्थ का तो पता नहीं चला है । हो सकता है कि धादिदेवसूरि ने प्रमाणधिनिश्चय का ही न्यायविनिश्चय के नाम से उल्लेख र दिया हो क्योंकि उसके प्रत्यक्ष, स्वार्थानुमान और परार्थानुमान परिच्छेद प्रमाण के ही भेदों के विवेचक हैं। अत प्रमाणवार्तिक की तरह प्रमाणविनिश्चय नाम की ही अधिक सम्भावना है। अफल देव ने न्याय को कलिदोप से मटिन हुआ देखकर उसके विनिश्चयार्थ न्यायावतार और प्रमगविनिश्चय के आद्यन्त पदो से अन्य का न्याय पेनि- श्वप नामकरण किया होगा। न्यायविनिश्चय को अकल कर्तृकता-अलङ्कदेव अपने प्रन्या में कहीं न कही 'अलङ्क' नाम का प्रयोग अवश्य करते है । यह प्रयोग कही जिनेन्द्र के विशेषण के प में, कहीं अन्य के विशेषण के रूप में और कहीं लक्षणघटक विशेषण के रूप में दृष्टिगोचर होता है। न्यायविनिश्चय ग्रन्थ (कारिका नं ३८६ ) में "विनन्धरकलपुरननिचयन्यायो विनिश्चीयते" इस कारिकारा के द्वारा अफल और न्यायवि निश्चय दोनों की हृदयहारिणी रीति से सप्ट सूचना दे दी है। वादिराजसूरि के पुष्पिका वाक्य, अनन्तीय की सिद्धिधिनिश्चय टीका (पृ. २०८ B) का उल्लेख, विद्यानन्दि का आप्तपरीक्षा (४० ४९) गत 'सदुरामकलदेव' कह कर उद्धृत की गई न्यायधिनिश्चय की 'इन्द्रजालादिपु' आदि कारिका, न्याय- दीपिकाकार धर्मभूपगति द्वारा 'तदुक्त भगवद्भिरकर देव न्यायविनिश्चये लिखकर 'मपक्षलक्षणं प्राहु' इस तीसरी कारिका का उद्धत किया जाना इस ग्रन्य की अफलइक्र्तृकता के प्रथल पोषक प्रमाण हैं। ग्रन्थगतप्रमेय-न्यायविनिश्चय में नीन प्रस्ताव है-चक्ष, २ अनुमान, ३ प्रवधन । इन प्रस्तावों में स्थूल रूप से निम्नलिखित विषयों पर प्रकाश डाला गया है- प्रथम प्रत्यक्ष प्रस्ताव में प्रत्यक्ष का लक्षण, इन्द्रिय प्रत्यक्ष का एक्षण, प्रमाणसम्पए वसूधन, चक्षुरादि बुद्धियों का व्यवसायात्मकत्व, विकल्प के अभिलापवस्त्र आदि लक्षणों का मण्डन, ज्ञान को परोक्ष .
प्रस्तावना मानने का निराकरण, ज्ञान के सस वेदन की सिद्धि, ज्ञानान्तरवेद्यज्ञाननिरास, साकारज्ञाननिरास, अचैतनज्ञाननिरास, निराकारज्ञानसिद्धि, सवेदनाद्वैतनिरास, विभ्रमवादनिरास, यहिरर्थसिद्धि, चित्रज्ञान- खण्डन, परमाणुरूप बहिरर्थ का निराकरण, अवयवा से मिन अवयवी का खण्डन, द्रव्य का लक्षण, गुण और पर्याय का स्वरूप, सामान्य का स्वरूप, अर्थ के उत्पादादित्रयात्मकत्व का समर्थन, अपोहरूप सामान्य का निरास, व्यक्ति से भिम सामान्य का खण्डन, धर्मकीर्तिसम्मत प्रत्यक्ष लक्षण का साउन, बौद्धकल्पित स्वसंवेदन-योगि-मानसप्रत्यक्षनिरास, सायकल्पित प्रत्यक्षलक्षण का सण्डन, नैयायिक के प्रत्यक्ष का समालोचन, अतीन्द्रिय प्रत्यक्ष का लक्षण आदि विषयों का विवेचन किया गया है। द्वितीय अनुमानमस्तावमें-अनुमान का एक्षण, प्रत्यक्ष की तरह अनुमान की यहिरर्थविषयता, साध्य साध्याभास के लक्षण, बौद्धादि मती में साध्यप्रयोग की असम्भवता, शब्द का अर्थवाचकत्व, शब्द- सतग्रहणप्रकार, भूतचैतन्यवाद का निराकरण, गुणगुणिभेद का निराकरण, साध्यसाधनाभास के लक्षण, प्रमेयत्व हेतु की अनेकान्तसाधकता, सत्त्वहेतु की पारिगामिरवप्रसाधकता, रूप्यखण्डनपूर्वक अन्यथा- नुपपत्तिसमर्थन, तर्क की प्रमागता, अनुपलम्भ हेतु का समर्थन, पूर्वचर उत्तरचर और सहचर हेतु का समर्थन, भसिद्ध विरद्ध अगान्तिक और अकिन्चिकर हेलाभासों का विवेचन, दूपणाभासलक्षण, जातिलक्षग, जयेतरव्यवस्था, दृष्टान्त दृष्टान्ताभासविचार, चाद का रक्षण, निग्रहस्थानरक्षण, वादाभास- लक्षग आदि अनुमान से सम्बन्ध रखने वाले विपयों का वर्णन है। तृतीय प्रवचन प्रस्ताव में--प्रवचन का स्वरूप, सुगत के आतत्व का निरास, सुगत के करणा- परव तथा चतुरार्पसत्य प्रतिपादकत्य का परिहास, भागम के अपौरपेयत्व का खण्डन, सर्वज्ञत्वसमर्थन, ज्योतिज्ञानोपदेश सत्यस्वप्मज्ञान तथा इक्षणिकादि विद्या के हटान्तद्वारा सर्वज्ञत्वसिद्धि, शब्दनित्यायनि- रास, जीयादि सरवनिरूपण, नैरात्म्य भावना की निरर्थकता, मोक्ष का स्वरूप, सप्तभगी निरूपण, स्याद्वादमें दिये जानेवाले सशयादि दोषी का परिहार, स्मरण प्रत्यभिज्ञान भादि का प्रामाण्य, प्रमाण का फल आदि विपी पर विवेचन है। प्रस्तुत न्याययिनिश्चय में तीन प्रकार के श्लोको का सग्रह हे--(1) वार्तिक (२) अन्तरलोक (३) संग्रहालोक । इस भाग में 'प्रत्यक्षरक्षणं माहु' आदि तीसरा श्लोक मूरगार्तिक है क्योंकि आगे इसी लोकगत पदी का विस्तृत विवेचन है। पृत्ति के मध्य में यन रान आनेवाले अन्तरश्लोक है। तथा वृत्ति के द्वारा प्रदर्शित मूरवार्तिक के अर्थ का समह करानेवाले समहश्लोक है। घादिराजसूरि ने (पृ० २२९) स्वय "निराकारेत्यादय अन्तरश्लोमा वृत्तिमध्यवर्तित्वार' विमुसत्यादि धार्तिकव्याख्यानमृत्तिमन्यमध्यवर्तिन. सदरमी लोका । सग्रहश्लोकास्तु घृत्युपदशितस्य पार्तिकार्यस्य रामहपरा इति विरोप ।" इन शब्दों में भन्तरलोक और रामहक्षोक की विशेषता बताई है। वादिराजसूरि की व्याख्या गाभाग पर तो नहीं ही है। पर्यो में भी सम्भवत. कुछ पद्य अन्यारयात छुट गए हैं। कारिका संख्या-न्यायविनिश्चय की मुल्कारिकाएं पृथक् पृथक् पूर्णरूप से लिखी हुई नहीं मिलती। इनका उद्धार विवरणगत कारिकाशो को जोड़कर किया गया है । अत जहाँ ये कारिकाएँ पूरी नहीं मिलती यहाँ उद्धत अंको ] इस मैकिट में दे दिया है। अलङ्गप्रन्याय में न्यायविनिश्चय घुका है। उसमे प्रथम प्रस्ताव में १६९३ कारिकाएँ मुद्रित है पर घस्तुत इस प्रम्नाव की कारिकाओं की अभ्रान्त सरया १६८३ है। अकलङ्कप्रन्थनगत न्यायविनिश्चय में हिताहिनाप्ति' (कारिका न०७) कारिका मूल की समझकर छापी गई है, पर अब यह कारिका पादिराम की महत जात होती है। न्यायविनिश्चयविवरण (४० ११५) में रिसा है कि-"करिप्यते हि सदमासान इत्यादिना इन्द्रिय प्रत्यक्षस्य, परोक्षशान इत्यादिना अनिन्द्रियप्रत्यक्षस्य, लक्षणं सममित्यादिना चातीन्द्रिय- प्रत्यक्षसमर्थनम्" इस उल्लेख से ज्ञात होता है कि तीनों प्रत्यक्षों का प्रकारान्तर से समर्थन कारिकाओं में किया गया है लक्षण नहीं । मूल कारिकाओं में न तो भनिन्द्रिय प्रत्यक्ष का एक्षग है और न भतान्द्रिय प्रत्यक्ष का, सय केवल इन्द्रियप्रत्यक्ष का लक्षण क्यों किया होगा? दमरे पक्ष में इस शोक की प्याख्या मूल प्रकाशित हो ។ न्यायपिनिश्चयविवरण (१० १०५, १११) विचरण में मौजूद है और प्याग्या के आधार से ही उक्त श्लोक को मैंने पहले मूल का माना था। हो सकता है कि पादिराज ने स्टा श्लोक वा ही तारपर्योद्घाटन किया हो। अयवा घृत्ति में ही गद्य में उ एक्षग हो और पादिराज ने उसे पचय कर दिया हो। जैसा कि एपीयनप स्वृत्ति (.२१) में "इन्द्रियार्थानं स्पएं दिवादितमाप्तिपरिहारसमर्थ प्रादेशिक प्रत्यक्षम्" यह इन्द्रियमत्यक्ष का एक्षण मिलता है । अथया इसे ही पादिराज ने पायद्ध कर दिया हो। परत हमने इस लोक को इस विवरण में पादिराजमव ही मानकर छोटे टाइप में छापा है। भरलान्यमय की प्रस्ता- धना में इस लोक के सम्बन्ध में मैंने ५० कैलासचन्द्रजी के मत की घरचा की थी। अनुसन्धान से उनका मत इस समय उचिन मालूम होता है। अकलकामन्यमय में मुद्रित पारिसर न. ३८ का 'ग्राहाभेदो न संवित्ति भिनत्याकारमयषि" यह उत्तरार्ध मूल का नहीं है। पारिका न० १२९ के पूर्वार्ध के याद "तथा सुनिश्चितस्तेस्तु तस्यतो विप्रशंसतः" यह उत्तरार्ध मूर का होना चाहिए । इस तरह इस परिच्छेद की कारिकाओं की सस्या १६८३ रह जाती है। प्रस्तुत विवरण में छापते समय कारिकाओ के नम्बर देने में गड़बड़ी हो गई है। तापनीय प्रति में माय मूर श्लोरों के पहिरे इस प्रशर का चिन्ह बना हुआ है, जहाँ पूरे श्लोक आए हैं। कारिका न. ४ पर यह चिद नहीं यना है। अवर अन्याय में मुद्रित प्रथम परिच्छेद की कारिकाओं में निम्नलिखित संशोधन होना चाहिए- कारिका नं. -दान्दो -शतो। कारिका न -वन्यचे-1 कारिका न. न विज्ञाना- न हि ज्ञाना-1 कारिका नं. -मेपनिप्रय -मेप विनिश्रय । कारिका कथा तन् पारिका न. १०२ द्रुमेष्व- ध्रुवेष्व-। पारिका न० ११० अतदारम्भ- अतदाभ- द्वितीय और तृतीय परिच्छेद में मुदिन कारिकाओं में निम्नलिखित कारिकापरिवर्तनादि है-- फारिश नं० १९४ की रचना--"अतद्धतुफलापोहा सामान्यं चेदपोहिनाम् । सन्दश्यते यथा बुद्ध्या न तथाऽप्रतिपतितः।" इस प्रकार होनी चाहिए। कारिका न० २८३ के वर्ष के बाद "चित्रचैत्तविचित्राभदृष्टमङ्गप्रसङ्गतः। स नेकः सर्वथा इलेपात् नानेको भेदरूपतः।" यह कारिका और होनी चाहिए। कारिका न० ३७२ का "पूर्वपक्षमविज्ञाय दूपकोऽपि विदूषकः" यह उत्तराध मूल का नहीं है। कारिका न० ४३१ के बाद "ततः शब्दार्थयोनास्ति सम्पन्धोऽपरिपेया" यह कारिकाधं और होना चाहिए । कारिका न० ४७५ के बाद "प्रमा प्रमितिहेतुस्यात् प्रामाण्यमुपगम्यते' यह कारिकाधं और होना चाहिए । अत अकरा- प्रन्ययगत न्यायविनिश्चय के भडोके अनुसार संपूर्ण ग्रन्थमें १८०३ कारिकाएँ फलित होती है। न्यायचिनिश्चय विवरण-न्यायविनिश्चय पद्य भाग पर प्रबलतार्किक स्याद्वादविद्यापनि धादिराजसूरि कृत तापय विद्योतिनी व्यारयानरत्नमाला उपलब्ध है। जिसका नाम न्यायविनिश्चय विवरण है। जैसा कि वादिराकृत इस श्लोक से प्रकट है- १६ २४ घयतत। - १ परम्परागत प्रसिद्धि के अनुसार इसका नाम न्यायकुमुदचद्र के न्यायकुमुदय द्रोदय की तरह न्यायविनिश्चयारद्वार हद हो गया है। परन्तु वतुत वादिराज के उस श्लोक गत उल्लेखानुसार इसका मुख्य भाख्यान न्यायविनिश्चयविवरण है , दसरे शब्दों में इसे तात्पर्यावधोतिनी व्याख्यानरत्नमाला भी कह सकते हैं। पर न्यायविनिश्चयालद्वार नाम का समर्थन किसी भी प्रमाण से नहीं होता। पं. परमानन्दजी शास्त्री सरसावा ने प्रस्तावना ३५ - "प्रणिपत्य स्थिरभच्या गुरून परान युदारघुद्धिगुणान् । न्यायविनिश्चयविचरणमभिरमणीयं मया क्रियते " लघीयत्रय की तरह न्यायविनिश्चयविवरण (प्रथमभाग पृ० २२९) में आए हुए 'वृत्तिमध्यवर्ति। स्वात', 'वृत्तिचूर्णीनां तु विस्तारभयामास्माभिर्यास्यानमुपदश्यते' इन अवतरणों से स्पष्ट है कि न्याय. विनिश्चय पर अभएकदेव की स्ववृत्ति अवश्य रही है। वृत्ति के मध्य में भी लोक थे जो अन्तरलोक के नाम से प्रसिद्ध थे। इसके सिवाय चूति के द्वारा प्रदर्शित मूलवार्तिक के अर्थ को समह करनेवाले संग्रह- श्लोक भी थे। वादिराजसूरि ने जिन ४८०३ श्लोकों का व्यापान विवरण में किया है उनमें अन्ताश्लोक और संप्रहलोक भी शामिल हैं । कितने संग्रहश्लोक हैं और कितने अन्तरश्ठीक इसका ठीक निर्णय द्वितीय भाग के प्रकाशन के समय हो सकेगा। पर वादिराजसूरि ने वृत्ति या चूर्णिगत सभी श्लोको का प्यारयान नहीं किया। पृ० ३०१ में 'तथा च सूत चूर्णी देवस्य घचनम्' इस उत्थान पाक्य के साथ “समारोपव्यवच्छेदात्' आदि श्लोक उद्धत है। यदि वादिराजसूरि न्यायविनिश्चय की स्ववृत्ति को ही पूर्णिशब्द से कहते हैं तो कहना होगा कि आपने वृत्ति या चूर्णिगत सभी श्लोको का व्याख्यान नहीं किया, क्योंकि 'समारोपच्यवच्छेदात्' श्वोक मूल में शामिल नहीं किया गया है। इस तरह वृत्ति के यावत् गद्यभाग की तो व्याख्या की ही नहीं गई, सम्भवतः कुछ पद्य भी छूट गए हैं । जैसा कि सिद्धिविनिश्चयटीका (पृ० १२० A) के निम्नलिखित उल्लेखों से स्पष्ट है- "तदुक्तं न्यायविनिश्चये-- चैतद् पहिरेव । किं तर्हि ? यहिहिरिव प्रतिभासते। फुत एतत् ? भ्रान्तः । तदन्यन समानम् । इति।" सिन्द्रिविनिश्चपटीका (१० ६९ A ) में ही न्यायविनिश्चय के नरम से 'सुखमाबहादनाकार श्लोक उद्धत है--"कथमन्यथा न्यायविनिश्चये सहभुवो गुणा इत्यस्य सुखमाहादनाकारं विज्ञानं मेययोधनम् । शक्तिः क्रियानुमेया स्यात् यूनः कान्तासमागमे ॥ इति निदर्शनं स्यात् ।" यह श्लोक सिद्धिविनिश्चयटीका के उल्लेखानुसार न्यायविनिश्चय स्ववृत्ति का होना चाहिए। क्योंकि पह 'गुणपर्ययवव्यं ते सहकमवृत्तय' (लो० १.१) के गुण शब्द की वृत्ति में उदाहरणरूप से दिया गया होगा। यह भी सम्भव है कि भररसदेव ने स्वयं इस श्लोक को वृत्ति में उद्धृत किया हो धयोंकि यादिराज इसे स्याद्वादमहार्णव मन्य का बताते हैं। यह भी चित्त को रगता है कि न्यायविनिश्चय की उक्त वृत्ति ही सम्भवत स्थाद्वादमहार्गव के नाम से प्ररयात रही हो। जो हो, पर भभी यह सप साधक प्रमाणों का अभाव होने से सम्भावनाकोटि में ही है। न्यायविनिश्चयविवरण की रचना अत्यन्त प्रसन्न तथा गौरिक है। सत्तत् पूर्वपक्षों को समृद्ध और प्रामाणिक यनाने के लिए अगणित अन्यों के प्रमाण उद्रत किये गये हैं। जहाँ तक मैंने अध्ययन किया है पादिराजसूरि के ऊपर किसी भी दार्शनिक भाचार्य का सीधा प्रभाव नहीं है। पे हरएक विषय को इसका न्यायविनिमयालद्वार नाम भी मानकर इसके प्रमाण निर्णय से पहिले रचे जाने के सम्बन्ध में प्रमाणनिर्णय (पृ. १६) गत यह मातरण एकीभावस्तोत्र की प्रस्तावना (पृ.१५) में उपस्थित किया है- अत एव परामर्शमकवं साटयमेव मानसप्रलक्षस्य प्रतिपादितमर द्वारे-दमित्यादि परमानमभ्या. सात् परत स्थिते । साक्षाकरणतखान प्रत्यक्षं मानसं मतम् ॥" परन्तु इस अवसरण में मलद्वार शन्न से न्यायविनिधयारद्वार इट नहीं है क्योंकि यह लोक कादिराप्रसूरि के न्यायविनिययविवरण का नहीं है विन्द प्रसासरगुप्तत प्रमाणवाति सरकार (लिखित पृ. ४) का है, और इसे दादिरान ने न्यायविनिश्चयविवरण (पृ. ११९) में पूर्वपाप से उदात किया है । वादिराज ने स्वयं न्यायदिनिश्पयविरण में दोनों जगह प्रमाणकार्तिगादार कामगार' नाम,से उत्रेत किया है । वः न्यायपिनियपविवरण कान्यायविनियादार नाम निल है और मात्र थुतिमानिमित्त ही प्रचम्वि हो गया है।
- । न्यायविनिश्चयविवरण स्वयं आत्मसात् करके ही व्यवस्थित ढंग से युक्तियों का जार विद्याते हैं जिससे प्रतिवादी को निगल्ने का भवसर ही नहीं मिर पाता। सांख्य के पूर्वपक्ष में (१० २३) योगभाष्य का उल्लेप 'पिन्ध्यवासिनी भाप्यम्' शन्द से किया है। साल्यकारिका के एक प्राचीन निवन्ध से (पृ. २३४ ) भोग की परिभाषा उद्ध्त की है। चौद्धमतसमीक्षा में धर्मकीर्ति के प्रमाणयार्तिक और प्रसार के वार्तिकालद्वार की इतनी गहरी और विस्तृत भारोचना अन्यत्र देखने में नहीं आई। घातिकारकार का तो आधा सा भाग इसमें आलोचित है। धर्मोत्तर, पान्तभद्र, अर्चट आदि प्रमुख बौद्धग्रन्थकार इनकी तीसी आलोचना से नहीं हटे हैं। मीमांसादर्शन को समालोचना में शर उम्बेक प्रमाकर मण्डन कुमारिल आदि का गम्भीर पालोचन है। इसी तरह न्यायरोपिक मत में व्योमशिन, आय, भासर्वन, विश्वरूप आदि प्राचीन आचार्योंके मत उनके ग्रन्थों से उद्धत कर के आरोधित हुए है। उपनिषदों का वेदमस्तक शब्द से उल्लेख किया गया है। इस तरह जितना परपक्षसमीक्षण का भाग है वह उन उन मतों के प्राचीनतम अन्यों से लेकर ही पूर्वपक्ष में स्थापित करके आलोचित किया गया है। स्वपक्षसंस्थापन में समन्तभदादि आचार्यों के प्रमाणवाक्यों से पक्ष का समर्थन परिपुष्ट रीति से किया है। जब पादिराज कारिकाओं का व्यारयान करते हैं तो उनकी अपूर्व वैयारणचुन्चुता चित्त को विस्मित कर देती है। किसी क्सिी कारिका के पाच पाच अर्थ तक इन्हाने किए है। दो अर्थ तो साधारणतया अनेक कारिकाओं के दृष्टिगोचर होते हैं। काव्यछटा और साहित्यसर्जक्ता नो इनसी पद पद पर अपनी आभा से न्यायमारती को समुज्वल बनाती हुई सहृदयो के हृदय को भारादित करती है। सारे विवरण में करीब २०००-२५०० पद्य स्वयं धादिराज के ही द्वारा रचे गए हैं जो इनकी काव्य चातुरी को प्रत्येक पृष्ठ पर मूर्त किए हुए हैं। इनकी तर्कणाशक्ति अपनी मौरिक है। क्या पूर्वपक्ष और क्या उत्तर पक्ष दोनों का वन्धान प्रसाद ओज और माधुर्य से समल हन होकर सरवणता का उच्च अधिष्ठान है । इस लोक में कितने शोज के साथ यमक में अधर्ट का उपहास क्यिा है- "अर्चतचटक, तदस्मादुपरम दुस्तर्वपक्षवलचस्नात् । स्याद्वादाचरविदरनचुञ्चुन तयास्ति नयचा" (पृ. ४४९) इस तरह समय अन्य का कोई भी पृष्ठ वादिराज की साहियप्रवणता शब्दनिष्णातता और दार्शनिकता की युगपत् प्रतीति करा सकना है। एकीभावरतोत्र के अन्त में पाश जानेवाला यह पद्म वादिराज का भूतगुणोद्धारक है मात्र स्तुतिपरक नहीं- "धादिराजमनु शाब्दिक्लोको वादिराजमनु तार्किक सिंह । वादिराजमनु कान्यकृतस्ते धादिराजमनु भव्यसहायः ॥" धादिराज का एकीभावस्तोत्र उस निष्ठावान् और भक्ति विभोरमानस का परिस्पदन है। जिसकी साधना से भव्य अपना चरम लक्ष्य पा सक्ता है। इस तरह पादिराज तार्किक होकर भी भक्त थे, वैयाकरण- घणप होकर भी काव्यका के हृदयाहादक शीलाधाम थे और थे अक्टइन्याय के सरल व्यापारमा जैन दर्शन के प्रन्यागार में धादिराज का न्यायविनिश्चयविवरण अपनी मौलिकता गम्भीरता अनुचिटष्टना युक्तिप्रवणता प्रमाणसंग्रहता आदि का अद्वितीय उदाहरण है। इसके प्रथम प्रत्यक्ष प्रस्ताव का सक्षिप्त विषयपरिचय इस प्रकार है- प्रत्यक्ष परिच्छेद न्यायविनिश्चय ग्रन्थ के तीन परिच्छेद हैं- मत्यक्ष २ अनुमान और ३ प्रवचन । इस प्रन्य में मालदेव ने न्याय के विनिश्चय करने की प्रतिज्ञा की है। न्याय अर्थात् स्याद्वादमुद्राक्ति जैन आसार को करिकार दोप से गुणद्वेषी व्यक्तियों द्वारा मलिन क्यिा हुआ देखकर विचलित हो उटने हैं और भन्य । " - - पुरुषो की हितकामना से सम्यग्ज्ञान वचन रूपी जल से उस न्याय पर आए हुए मल को दूर करके उसको निर्मल बनाने के लिए कृतसङ्कल्प होते है । जिसके द्वारा वस्तु स्वरूप का निर्णय किया जाय उसे न्याय कहते हैं । अर्थात् न्याय उन उपायोंको कहते हैं जिनसे वस्तु तत्व का निश्चय हो । ऐसे उपाय तत्वार्थसून (१६) में प्रमाण ओर नय दो ही निर्दिष्ट हैं। आत्मा के अनन्त गुणा में उपयोग ही एक ऐसा गुण है जिसके द्वारा आत्मा को रक्षित किया जा सकता है। उपयोग अर्थात् चितिशक्ति । उपयोग दो प्रकार का एक ज्ञानोपयोग और दूसरा दर्शनोपयोग । एक ही उपयोग जब परपदार्थों के जानने के कारण साकार बनता है तब ज्ञान कहलाता है वही उपयोग जब बाह्यपदार्थों में उपयुक्त न रहकर मात्र चैतन्यरूप रहता है तब निराकार अवस्था में दर्शन कहलाता है । यद्यपि दार्शनिकक्षेन में दर्शन की व्याख्या बदरी है और वह चैतन्याफार की परिधि को राँधकर पदार्थों के सामान्यावलोकन तक जा पहुंची है परन्तु सिद्धान्त ग्रन्था में दर्शन का 'अनुपयुक्त आदर्शतस्यत्' ही वर्णन है । सिद्धान्त अन्यों में स्पष्टतया विषय और विषपी के सन्निपात के पहिले दर्शन का काल बताया है। जब तक आत्मा एकपदार्थविषयकज्ञानो- पयोग से च्युत होकर दूसरे पदार्थविषयक उपयोग में प्रवृत्त नहीं हुआ तब तक बीच की निराकार अवस्था दर्शन कही जाती है । इस अवस्था में चैतन्य निराकार या चैतन्याकार रहता है । दार्शनिक प्रन्यों में दर्शन विषयविषयी के सक्षिपात के अनन्तर पस्तु के सामान्यावलोकन रूप में वर्णित है। और यह है बौद्धसम्मत निर्विकल्पकज्ञान और नेयायिकादिसम्मत निर्चिक्रपक ज्ञान की प्रमाणता का निराकरण करने के लिए। इसका यही तात्पर्य है कि बौद्धादि जिस निर्विकल्पक को प्रमाण मानते हैं जैन उसे दर्शनकोटि मे गिनते है और यह प्रमाण की सीमा से बहिर्भूत है। अस्तु, उपायतत्व में ज्ञान ही आता है । जब ज्ञान वस्तु के पूर्ण रूप को जानता है तब प्रमाण कहा जाता है तथा जब एक देश को जानता है तय नय । प्रमाण का लक्षण साधारणतया प्रमाकरणं प्रमाणम्' यह सर्व स्वीकृत है। विवाद यह है कि करण कौन हो ? नैयायिक सन्निकर्ष और ज्ञान दोनों का करण रूप से निर्देश करते हैं । परन्तु जैन परम्परा में अज्ञान निवृत्ति रूप प्रमिति का करण ज्ञान को मानते है। आचार्य समन्तभद्र और सिद्धसेन ने प्रमाण के रक्षण में 'स्वपरावभासक' पद का समावेश किया है इस पद का तात्पर्य है कि प्रमाण को 'स्व' और 'पर' दोनों का निश्चय करानेवाला होना चाहिए । यद्यपि अकलवदेव और माणिक्यनन्दी ने प्रमाण के लक्षण में 'अनधिगतार्थग्राही' और 'अपूर्वार्थव्यवसायात्मक पदी का निवेश किया है, पर यह सर्वस्वीकृत नहीं हुभा। भाचार्य हेमचन्द्र ने तो 'स्वावभासक' पद भी प्रमाण के रक्षण में अनावश्यक समझा है। उनका कहना है कि स्वावभासरत्व ज्ञानसामान्य का धर्म है। ज्ञान चाहे प्रमाण हो या अपमाण, पह स्वस वेदी होगा ही। तात्पर्य यह है कि जैन परम्परा में ऐसा स्वसवेदी ज्ञान प्रमाण होगा जो पर पदार्थ निर्णय करनेवाला हो । प्रमाण सकलदेशी होता है वह एक गुण के द्वारा भी पूरी वस्तु को विषय करता है। नय विकलादेशी होता है क्योंकि वह जिस धर्म का स्पर्श करता है उसे ही मुरय भाव से विषय करता है। प्रमाण के भेद-सामान्यतया प्राचीन काल से जैन परम्परा में प्रमाण के प्रत्यक्ष और परोक्ष ये दो भेद निर्विवाद रूप से स्वीकृत चले आ रहे है। आत्ममात्र सापेक्ष ज्ञान को प्रत्यक्ष कहते है तथा जिस ज्ञान में इन्द्रिय मन प्रकाश आदि परसाधनो की अपेक्षा हो वह ज्ञान परोक्ष कहा जाता है। प्रत्यक्ष और परोक्ष की यह परिभाषा बैन परम्परा को अपनी है । जैन परम्परा में प्रत्येक घस्तु अपने परिणमन में स्वयं उपा. दान होती है। जितने परनिमित्तक परिणमन है ये सब व्यवहार मूलक हैं। जितने मान सनिमित्तक परिणमन है वे परमार्थ हैं, निश्चयनय के विषय हैं। प्रत्यक्ष और परोक्ष के लक्षण में भी वही स्वाभिगुस रष्टि कार्य कर रही है । और उसके निर्वाह के लिए अक्ष शब्द का अर्थ (अक्ष्णोति च्याप्नोति जानातीत्यक्ष भारमा) आत्मा किया गया । प्रत्यक्ष के लोकप्रसिद्ध अर्थ के निर्वाह के लिए इन्द्रियजन्य ज्ञान को सान्य- वहारिक सज्ञा दी। यद्यपि शास्त्रीय परमार्थ व्यारया के अनुसार इन्द्रियजन्य ज्ञान परसापेक्ष होने से परोक्ष है किन्तु रोक्व्यवहार में इनकी प्रत्यक्षरूप से प्रसिद्धि होने के कारण इन्हें सध्यवहार प्रत्यक्ष कह - - - । २ ५ न्यायविनिश्चयविवरण दिया जाता है। जैनष्टि में उपादानयोग्यता पर ही विशेष भार दिया गया है, निमित्त से यद्यपि उपा. दान योग्यता विकसित होती है पर निमित्ताधीन परिणमन उस्कृष्ट या शुद्ध नहीं समझे जाते । इसीलिए प्रत्यक्ष जैसे उष्ट ज्ञान में इन्द्रिय और मन जैसे निकटतम साधनों की अपेक्षा भी स्वीकार नहीं की गई । प्रत्यक्ष व्यवहार का कारण भी आरममात्रसापेक्षता ही निरूपित की गई है और परोक्ष व्यवहार के हिए इन्द्रिय मन आदि परपदार्थों की अपेक्षा रखना। यह तो जैनदृष्टि का अपना आध्यात्मिक निरूपण है। उस प्रत्यक्षज्ञान की परिभाषा करते हुए अकलदेव ने कहा है कि- "प्रत्यक्षलक्षणं प्राहुः स्परः साकारमअसा । द्रव्यपर्यायसामान्यविशेषार्थात्मवेदनम् ॥" अर्थात्-जो ज्ञान परमार्थतः स्पष्ट हो, साकार हो, मध्यपर्यायात्मक और सामान्यविशेषात्मक अर्थ को विपय करनेवाला हो और आत्मपेदी हो उसे प्रत्यक्ष कहते हैं । इस लक्षण में अलङ्कदेव ने निम्नलिखित मरे विचारकोटि के लायक रखे है- १ ज्ञान आत्मवेदी होता है। ज्ञान साकार होता है। ३ शान अर्थ को जानता है। ४ अर्थ सामान्यविशेषात्मक है। अर्थ द्रव्यपर्यायात्मक है। ६ यह ज्ञान प्रत्यक्ष होगा जो परमार्थतः स्पष्ट हो। शान का आरमदित्वज्ञान आत्मा का गुण है या नहीं। यह प्रश्न भी दार्शनिकों की पर्चा का विषय रहा है । भूतचैतन्यवादी चार्वाक ज्ञान को पृथ्वी आदि भूतों का ही धर्म मानता है। यह स्थूल या दृश्य भूतो का धर्म स्वीकार न कर के सूक्ष्म और अदृश्य भूतों के विलक्षणसंयोग से उत्पर होनेवाले भवस्याविशेष को ज्ञान कहता है । सांख्य चैतन्य को पुरुषधर्म स्वीकार कर के भी ज्ञाा या बुद्धि को प्रकृति का धर्म मानता है । सांस्प के मत से चैतन्य और ज्ञान जुदा जुदा हैं । पुरुषगत चैतन्य बाह्यपदार्थों को नहीं जानता । बाह्यपदार्थों को जानने वारा वुद्धिनरव जिसे महत्तत्व भी कहते हैं प्रकृति का ही परिणाम है। यह पुद्धि उभयत प्रतिविम्धी दर्पण के समान है। इसमें एक ओर पुरपगत चैतन्य प्रतिफलित होता है और दूसरी और पदार्थों के आकार । इस घुद्धि मध्यम के द्वारा ही पुरुष को "मैं घट को जानता है" यह मिथ्या अहवार होने लगता न्याय-भैशेषिक ज्ञान को आत्मा का गुण मानते अवश्य है, पर इनके मत में आत्मा द्रव्यपदार्थ पृथक् है तथा ज्ञान गुणपदार्थ जुदा । यह अस्मा का यावदन्यभावी अर्थात् जब तक आरमा है तब तक उसमें अवश्य रहनेवाला-गुण नहीं है किन्तु भारममन संयोग मन इन्द्रिय-पदार्थ सन्निकर्ष आदि कारणों से से उत्पन होनेवाला विशेष गुण है। जब तक ये निमित्त मिलेंगे ज्ञान उत्पन होगा, न मिलेंगे न होगा। मुक्त अवस्था में मन इन्द्रिय आदि का सम्बन्ध न रहने के कारण ज्ञान की धारा उच्छिम हो जाती है। इस अवस्था में आत्मा स्वरूपमात्रमग्न रहता है । तात्पर्य यह कि पुद्धि मुख दुख भादि विशेष गुण भीपा- धिक हैं, स्वभावत. आत्मा शानशून्य है। ईश्वर नाम की एक आत्मा ऐसी है जो अनाद्यनन्त नित्यज्ञानवाली है। परमात्मा के सिवाय अन्य सभी जीवात्माएं स्वभावतः ज्ञानशून्य हैं। वेदान्ती ज्ञान और चैतन्य को जुदा जुदा मानकर चैतन्य का आध्रय ब्रह्म को तथा ज्ञान का आश्रय अन्त करण को मानते हैं। शुद्ध ब्रह्म में विषयपरिच्छेदक ज्ञान का कोई अस्तित्व शेष नहीं रहता। मीमांस शान को आरमा का ही गुण मानते हैं। इनके यहाँ ज्ञान और आत्मा में तादाम्य माना गया है। - - प्रस्तावना १ बौद्ध परम्परा में शान नाम या चित्तरूप है। मुक्त अवस्था में चित्तसन्तति निरालव हो जाती है। इस अवस्था में यह चित्तसन्तति घटपटादि वाह्यपदार्थों को नहीं जानती। जैनपरम्परा ज्ञान को अनाद्यनन्त स्वाभाविक गुण मानती है जो मोक्ष दशा में अपनी पूर्ण अवस्था में रहता है संसार दशा में ज्ञान आत्मगत धर्म है इस विषय में चार्वाक और सांख्य के सिवाय प्रायः सभी वादी एकमत हैं। पर विचारणीय बात यह है कि जब ज्ञान उत्पन्न होता है तब वह दीपक की तरह स्वपरप्रकाशी उत्पन्न होता है या नहीं ? इस सम्बन्ध में अनेक मत है-१ मीमांसक ज्ञान को परोक्ष कहता है। उसका कहना है कि ज्ञान परोक्ष ही उत्पन्न होता है। जब उसके द्वारा पदार्य का बोध हो जाता है तब अनुमान से ज्ञान को जाना जाता है-चूं कि पदार्थ का बोध हुआ है और क्रिया विना करण के हो नहीं सकती अतः करणभूत ज्ञान होना चाहिए। मीमांसफ को ज्ञान को परोक्ष मानने का यही कारण है कि-इसने अतीन्द्रिय पदार्थ का ज्ञान पेद के द्वारा ही माना है। धर्म आदि अतीन्द्रिय पदार्थों का प्रत्यक्ष किसी व्यक्ति विशेष को नहीं हो सकता। उसका ज्ञान वेद के द्वारा ही हो सत्ता है। फलतः ज्ञान जब अतीन्दिय है तब उसे परोक्ष होना ही चाहिए । दूसरा मन नैयायिकों का है। इनके मत से भी ज्ञान परोक्ष ही उत्पन्न होता है और उसका शान द्वितीय ज्ञान से होता है और द्वितीय का तृतीय से। अनवस्था दूपण का परिहार जब ज्ञान विषया- न्तर को जानने लगता है तब इस ज्ञान की धारा रुक जाने के कारण हो जाता है । इनका मन ज्ञानान्तरवेद्यज्ञानवाद के नाम से प्रसिद्ध है। नैयायिक के मत से ज्ञान का प्रत्यक्ष संयुक्तसमवाय. सलिक से होता है। मन मारमा से संयुक्त होता है और आत्मा में शान का समयाय होता है। इस प्रकार ज्ञान उत्पन्न होनेपर सनिकजन्य द्वितीय मानसज्ञान प्रथम ज्ञान का प्रत्यक्ष करता है। सांस्य ने पुरुष को स्वसंचेतक स्वीकार किया है । इसके मत में बुद्धि या ज्ञान प्रकृति का विकार है। इसे महत्ताप कहते हैं । यह स्वयं अचेतन है। पुद्धि उभयमुख प्रतिबिम्धी दर्पण के समान है इसमें एक ओर पुरुष प्रतिफलित होता है तथा दूसरी ओर पदार्थ । इस बुद्धि प्रतिबिम्बित पुरुप के द्वारा ही बुद्धि का प्रत्यक्ष होता है स्वयं नहीं। वेदान्ती के मत में ब्रह्म स्वप्रकाश है अतः स्वभावतः ब्रह्म का विवर्त ज्ञान स्वप्रकाशी होना ही चाहिए। प्रभाकर के मत में संवित्ति स्वप्रकाशिनी है वह संवित्त रूप से स्वयं जानी जाती है। इस तरह ज्ञान को अनात्मवेदी या अस्वसंवेदी मानने वाले मुख्यतया मीमांसक और नैयायिक । । । - अकलङ्कदेव ने इसकी मीमांसा करते हुए लिखा है कि यदि ज्ञान स्वयं अप्रत्यक्ष हो अर्थात् अपने स्वरूप को न जानता हो तो उसके द्वारा पदार्थ का ज्ञान हमें नहीं हो सकता । देवदत्त अपने ज्ञान के द्वारा ही पदार्थों को क्यों जानता है ,यज्ञदत्त के ज्ञान के द्वारा क्यों नहीं जानता ? या प्रत्येक व्यक्ति अपने ज्ञान के द्वारा ही अर्थ परिज्ञान करते हैं आत्मान्तर के ज्ञान से नहीं । इसका सीधा और स्पष्ट कारण यही है कि देवदत्त का ज्ञान स्वयं अपने को जानता है और इसलिये तवभिन्न देवदत्त की आत्मा को ज्ञात है कि अमुक ज्ञान मुझमें उत्पन हुआ है । यज्ञदत्त में ज्ञान उत्पन्न हो जाय पर देवदत्त को उसका पता ही नहीं चलता। अतः यज्ञदत्त के ज्ञान के द्वारा देवदत्त अर्थबोध नहीं कर पाता। यदि जैसे यज्ञदत्त का ज्ञान उत्पस होने पर भी देवदत्त को परोक्ष रहता है, उसी प्रकार देवदत्त को स्वयं अपना शन परोक्ष हो अर्थात् उत्पन होने पर भी स्वयं अपना परिज्ञान न करता हो तो देवदत्त के लिए अपना ज्ञान यज्ञदत्त के ज्ञान की तरह ही पराया हो गया और उससे अर्थवोध नहीं होरा चाहिये। यह ज्ञान हमारे आत्मा से सम्बन्ध रखता है इतने मात्र से हम उसके द्वारा पदार्यरोध के अधिकारी नहीं हो सकते जब तक कि वह स्वयं हमारे प्रत्यक्ष अर्थात् स्वयं अपने ही प्रत्यक्ष नहीं हो जाता । अपने ही द्वितीय ज्ञान के द्वारा इसका प्रत्यक्ष मानकर उससे ४० न्यायविनिश्चयविवरण भर्थ योध करने की कल्पना इसरिए उचित नहीं है कि कोई भी योगी अपने योगज प्रत्यक्ष के द्वारा हमारे ज्ञान को प्रत्यक्ष कर सकता है जैसे कि हम सयं अपने द्वितीय ज्ञान के द्वारा प्रथम ज्ञान का, पर इतने मान से यह योगी हमारे ज्ञान से पदार्थों का बोध नहीं कर रेता। उसे तो जो भी घोध होगा स्वयं अपने ही ज्ञानद्वारा होगा। तात्पर्य यह कि-हमारे ज्ञान में यही स्वकीयत्व है जो वह स्वयं अपना बोध करता है और अपने आधारभूत भारमा से तादात्म्य रसता है। यह संभव ही नहीं है कि ज्ञान उत्पन्न हो जाय अर्थात् अपनी उपयोग दशा में आ जाय और आत्मा को या स्वयं उसे ज्ञान का ही पता न चले। यह तो दीपक या सूर्य की तरह स्वयंप्रकाशी ही उत्पन्न होता है। यह पदार्थ के बोध के साथ ही साय अपना सवेदन स्वयं करता है। इसमें न तो क्षणभंद है और न परोक्षता ही। ज्ञान के स्व- प्रकाशी होने में यह बाधा भी कि-यह घटादि पदार्थों की तरह ज्ञेय हो जायगा नहीं हो सकती, क्योंकि ज्ञान घट को शेयत्वेन जानता है तथा अपने स्वरूप को ज्ञानरूप से। अन उसमें ज्ञेय. रूपता का प्रसङ्ग नहीं आ सकता। इसके लिए दीपक से बढ़कर समदृष्टान्त दूसरा नहीं हो सकता । दीपक के देखने के लिए दूसरे दीपक की आवश्यक्ता नहीं होती, भले ही वह पदार्थों को मन्द या अस्पष्ट दिसावे पर अपने रूप को तो जैसे का तैसा प्रकाशित करता ही है। ज्ञान चाहे संशयरूप हो या विप. यरूप या अनध्यवसायास्मक स्वयं अपने ज्ञानरूप का प्रकाशक होता ही है। ज्ञान में सशयरूपता विपर्यथरूपता या प्रमाणता का निश्चय बाह्यपदार्थ के यथार्थप्रकाशक और अयथार्थप्रकाशकत्व के अर्धान है पर ज्ञानरूपता या प्रकाशरूपता का निश्चय तो उसका स्वाधीन ही है. उसमें ज्ञानान्तर की आवश्यक्ता नहीं होती और न वह अज्ञात रह सकता है। तात्पर्य यह कि कोई भी ज्ञान जब उपयोग अपरथा में भाता है तब अज्ञात हो कर नहीं रह सकता। हाँ, लब्धि वा शक्ति रूप में यह ज्ञात न हो यह जुदी बात है क्योंकि शक्तिका परिज्ञान करना विशिष्टज्ञान का कार्य है। पर यहाँ तो प्रश्न उपयो- गात्मक ज्ञान का है। कोई भी उपयोगात्मक ज्ञान अज्ञात नहीं रह सकता, वह तो जगाता हुआ ही उपस होता है उसे अपना ज्ञान कराने के लिए किसी ज्ञानान्तर की अपेक्षा नहीं है। यदि ज्ञान को परोक्ष माना जाय तो उसका सद्भाव सिद्ध करना कठिन हो जायगा । अर्थप्रकाश रूप हेतु से उसकी सिद्धि करने में निम्नलिखित बाधाएँ है-पहिले तो अर्थ प्रकाश स्वयं ज्ञान है भत. जर तक अर्थप्रकाश अज्ञात है तब तक उसके द्वारा मूलज्ञान की सिद्धि नहीं हो सकती। यह सक सर्वमान्य सिद्धान्त है कि-'अप्रत्यक्षीपलम्भस्य नार्थसिद्धिः प्रसिध्यति"-अर्थात् अप्रत्यक्ष अज्ञात ज्ञान के द्वारा अर्थसिद्धि नहीं होती । "नाज्ञानं ज्ञापकं नाम"-स्वयं अज्ञात दूसरे का ज्ञापक नहीं हो सकता। यह भी सर्वसम्मत न्याय है । फलत: यह आवश्यक है कि पहिले अर्थप्रराश का ज्ञान हो जाय। यदि अर्थप्रकाश के ज्ञान के लिये अन्यज्ञान अपेक्षित हो तो उस अन्यज्ञान के लिए तदन्यज्ञान इस तरह भनवस्था नाम का दूपण भाता है और इस अनन्तहानपरम्परा की करपना करते रहने में आद्यज्ञान अज्ञात ही बना रहेगा। यदि अर्थप्रकाश सवेदी है तो प्रथमज्ञान को स्ववेदी मानने में क्या बाधा है? स्ववेदी अर्थप्रकाश से ही अर्थबोध हो जाने पर मूल ज्ञान की क्लाना ही निरर्थक हो जाती है। दूसरी बात यह है कि क्य तक शान भऔर अर्थप्रकाश का अविनाभाय सम्बन्ध गृहीत नहीं होगा तब तक उससे ज्ञान का अनुमान नहीं किया जा साता। यह अविनाभाषप्रहण अपनी आत्मा में तो इसलिए नहीं बन सकता कि अभी तक ज्ञान ही अज्ञात है तथा अन्य मात्मा के ज्ञान का प्रत्यक्ष नहीं सकता। अत अविनाभाव का महण न होने के कारण अनुमान से भी ज्ञान की सत्ता सिद्ध नहीं की जा सकती। इसी तरह पदार्थ, इन्द्रियाँ, मानसिक उपयोग आदि से भी मुलज्ञान का अनुमान नहीं हो सकता । कारण-इनका ज्ञान के साथ कोई अपिल नाभाव नहीं है । पदार्थ भादि रहते हैं पर कभी कभी ज्ञान नहीं होता। कदाचित् अविनाभाव हो भी तो उसका ग्रहण नहीं हो सकता। आहादनाकार परिणत ज्ञान को ही मुख कहते है। सातसंवेदन को सुख और अमावसंवेदन को दुस सभी धादियों ने माना है। यदि ज्ञान को स्वसंधेदी नहीं मानकर परोक्ष मानते हैं तो परोक्ष सुख प्रस्तावना ज्ञान द्वारा हमे - दु.ख से आत्मा को हर्ष विपादादि नही होना चाहिए। यदि अपने सुख को अनुमानमा या ज्ञानान्तर- माह माना जाय और उसस मारमा में हर्षविपादादि की सम्भावना की जाय तो अन्य सुसी आत्मा के सुख का अनुमान करके हम हर्प होना चाहिए । अथवा केवली को, जिसे सभी जीवा के सुखदु खादि का प्रत्यक्ष ज्ञान हो रहा है, हमारे सुखदु स से हर्प विपादादि उत्पन्न होने चाहिए । चूँकि हमारे सुखदुख से हमें ही हविपादादि होते है अन्य किसी अनुमान करनेवाले या प्रत्यक्ष करनेवाले आस्मान्वर को नहीं, अत. यह मानना ही होगा कि वे हमारे स्वयं प्रत्यक्ष है अर्थात् वे स्वप्रकाशी है । यदि ज्ञान को परोक्ष मानो जाता है तो आत्मान्तर की बुद्धि का अनुमान नहीं किया जा सकता। पहिले हम स्वयं अपनी आत्मा में ही जत्र तक बुद्धि और वचनादि व्यापारों का अविनाभाव ग्रहण नही करेंगे तब तक वचनादि चेष्टाओ से अन्यत्र बुद्धि का अनुमान कैसे कर सकते है और अपनी आत्मा में जब तक बुद्धि का स्वयं साक्षात्कार नहीं हो जाता तर का अविनाभाव का ग्रहण असम्भव ही है । अन्य आत्माओ मे तो बुद्धि अभी असिद्ध ही है । आन्मान्तर म बुद्धि का अनुमान नहीं होने पर समस्त गुरु- शिष्य देनलेन आदि व्यवस्थाओं का लोप हो जायगा । यदि अज्ञात या अप्रत्यक्ष ज्ञान के द्वारा अर्थ बोध माना जाता है तो सर्वज्ञ के सर्थशान होना चाहिए। हमें ही क्यो, सबको सबझे जान के द्वारा अर्थबोध हो जाना चाहिये । भत. ज्ञान को स्वसंवेदी माने विना ज्ञान का सद्भाव तथा उसके द्वारा प्रतिनियत अर्थबोध नहीं हो सकता । अत यह आवश्यक है कि उसमे अनुभवसिद्ध आरमसंवेदित्व स्वीकार किया जाय। नैयायिक का ज्ञान को ज्ञानान्तरवेद्य गानना उचित नहीं है, क्योंकि इसमें अनवस्था नामका महान् दूषण आता है । जबतक एक भी ज्ञान स्वसंवेदी नहीं माना जाता तब तक पूर्व पूर्व ज्ञान का योध करने के रिये उत्तर उत्तर ज्ञानों की क्ल्पना करनी ही होगी। क्योकि जो भी शानव्यक्ति अज्ञात रहेगी यह सर्व ज्ञान व्यक्ति की घेदिका नहीं हो सकती । और इस तरह प्रथम ज्ञान के अज्ञात रहने पर उसके द्वारा पदार्थ का बोच नहीं हो सकेगा। एक ज्ञान के जानने के लिए ही जब इस तरह अनन्त ज्ञानप्रवाह चलेगा तब अन्य पदार्थों का ज्ञान का उत्पन्न होगा ? थक करके या अरुचि से या अन्य पदार्थ के सम्पर्क से पहिली ज्ञानधारा को अधूरी छोड़कर अनवस्था का धारण करना इसलिये युक्तियुक्त नहीं है कि जो दशा प्रथम शान की हुई है और जैसे वह बीचमै ही अज्ञात दशा में लटक रहा है वही दशा अन्य ज्ञानी की भी होगी । ईश्वर का ज्ञान यदि अररसंवेदी माना जाता है तो उसमे सर्वज्ञता सिद्ध नहीं हो सकेगी, क्योंकि एक तो उसने अपने स्वरूप को ही स्वयं नहीं जाना दूसरे अप्रत्यक्ष शान के द्वारा वह जगत् का परिज्ञान नहीं कर सकता। ईश्वर के दो निन्य ज्ञान इसलिए मानना कि-एक से यह जगत् को जानेगा तथा दूसरे से ज्ञान को-निरर्थक है, क्योंकि दो ज्ञान एक साथ उपयोग दशा में नहीं रह सरते। दृसो यदि वह ज्ञान को जानने याला द्वितीय ज्ञान स्वयं अपने स्वरूप का प्रत्यक्ष नहीं करता तो उससे प्रथम अर्यज्ञान का प्रत्यक्ष नहीं हो सकेगा। यदि उसका प्रत्यक्ष किसी तृतीय ज्ञान से माना जाय तो अनवस्था दूपण होगा। यदि द्वितीय ज्ञान को स्त्रस घेही मानते है तो प्रथम ज्ञान को ही स्वस येदी मानने में क्या बाधा है सांख्य के मन में यदि ज्ञान प्रकृति का विकार होने से अचमन है, वह अपने स्वरूप को नहीं जानता, उसका अनुभव पुरुष के संचेतन के द्वारा होता है तो ऐसे अचेतन ज्ञान की कल्पना का क्या प्रयोजन है ? जो पुरुष का संचेतन ज्ञान के स्वरूप का संवेदन करता है वही पदार्थों को भी जान सकता है । पुरप का संचेतन यदि स्वसंवेदी नहीं है तो इस अकिञ्चिकर ज्ञान की सत्ता भी किससे सिद्ध की जायगी ? अत. सार्थसंवेदक पुरुषानुभत्र से मिल किसी प्रकृतिविकारात्मक अवेतन ज्ञान की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती । करण या मा यम के लिए इन्द्रियों और मन मौजूद है। घस्तुत. ज्ञान और पुरुपगतसंचेतन ये दो जुदा हे ही नहीं । पुरुष, जिसे सांख्य कूटस्थ नित्य मानता है, स्वय परिणामी है पूर्वपर्याय को छोड़. कर उत्तर पर्याय को धारण करता है । संचेतगा ऐसे परिणामीनित्य पुरप का ही धर्म हो सकती है। ।
न्यायचिनिश्चयविवरण इससे पृथक् किसी अचेतन ज्ञान की आवश्यकता ही नहीं है। अत ज्ञानमान स्वम दी है। वह अपने जानने के लिए किसी अन्य ज्ञान की अपेक्षा नहीं करता। शान की साकारता-ज्ञान की साकारता का माधारण अर्थ यह समझ लिया जाता है कि जैसे दर्पण में घट पट आदि पदार्थों का प्रतिबिम्प आता है और दर्पण का अमुक भाग धरायाशान्त हो जाता है उसी तरह ज्ञान भी घटापार हो जाता है अर्थात् ५८ का प्रतिविम्य ज्ञान में पहुँच जाता है । पर वासन यात ऐसी नहीं है । घट और दयण दोनों भूर्त और जड पदार्थ है, उनमें एक मा प्रतिविम्व दूसरे में पड सकता है, किन्तु चेतन और अमन ज्ञान में मूर्त जह पदार्थ का प्रतिबिम्ब नहीं आ सकता और न भन्म घेतनान्तर का ही। ज्ञान के घटाकार होने का अर्थ है-ज्ञान का घट को जानने के लिए उपयुक्त होना अर्थात् उसका निश्चय करना । तस्वार्थ वार्तिक (१६) मे घट के चतुष्टय का विचार करते हुए लिखा है कि घर शब्द सुनने के बाद उत्पन्न होनेवाले घट ज्ञान में जो घटविपरक उपयोगाकार है वह घट का स्वामा है और बाह्यघटाकार परास्मा । यहाँ जो उपयोगाकार है उसका अर्थ घट की ओर ज्ञान के व्यापार का होना है न कि ज्ञान का घट जैसा रम्मा चौड़ा या वजनदार होना । आगे फिर लिखा है कि- "वेतन्यशतशिकारी भानावारो ज्ञेयाकारश्च । अनुपयुक्त प्रतिबिग्दाकारादर्शतलवत् झानाकार , प्रतिबि भ्याझारपरिणतादर्शतस्यत् ज्ञेयाकार । तन याकार स्वात्मा ।" अर्थात् चैतन्यशक्ति के दो आकार होते हैं एक ज्ञानाकार और दूसरा शेयाकार । ज्ञानाशर प्रतिविम्बशुन्य शुद्ध दर्पण के समान पदार्थविषयक व्यापार से रहित होता है । याकार सप्रतिविम्य दर्पण की तरह पदार्थविषयक व्यापार से सहिन होता है। साकारता के सम्बन्ध में जो दर्पण का दृष्टान्त दिया जाता है उसी से यह भ्रम हो जाता है कि-ज्ञान में दर्पण के समान लम्बा चौड़ा वाला प्रतिविम्ब पदार्थ का आता है और इसी कारण ज्ञान साकार कहलाता है। यान्न जिम अश को समझाने के लिए दिया जाता है उसको उसी अा के लिए रागू करना चाहिए। यहाँ दर्पण दृष्टान्त का इतना ही प्रयोजन है कि चैतन्यधारा ज्ञेय को जानने के समय याकार होता है, शेप समय में ज्ञानापार । - है धया (० पु० पू० ३८०) तथा जपधयला (म. पु. पृ० ३३७) में दर्शन और ज्ञान में निराकारता और साकारता प्रयुक्त भेद बताते हुए स्पष्ट लिया है कि जहाँ ज्ञान से गृथक् घस्नु कर्म भात विषय हो वह साझार है और जहाँ अन्तरङ्ग घस्नु अर्थान् चैतन्य स्वय चैतन्य रूप ही हो वह निराकार । निराकार दर्शन, इन्द्रिय और पदार्थ के सम्पर्क के पहिले होता है जर कि सारार ज्ञान इन्द्रियार्थ सन्निपात के बाद। अन्तरङ्गविषयक अर्थात् स्वापभासी उपयोग को अनार तथा बाह्यापभासी अर्थात् स्व से मित्र अर्थ को विषय करनेवारा उपयोग साकार कहलाता है। उपयोग की ज्ञानसमा यहाँ से प्रारम्भ होती है जहाँ से वह स्वव्यतिरिक अन्य पदार्थ को विषय करता है। जर तक वह मात्र स्वप्रकाश निमल है लय तक यह दर्शन निराकार कहलाता है। इसीरिए ज्ञान में ही सम्यवाव और मिष्याच प्रमाणत्य और अममाणस्य ये दो विभाग होते हैं। जो ज्ञान पदार्थ की यथार्य उपस्धि कराता है वह प्रमाण अन्य अप्रमाण पर दर्शन सदा एकविध रहता है उसमें कोई रर्शन ममाग और कोई दर्शन अप्रमाण ऐसा जातिभेद नहीं होता। घशुदर्शन अवक्षुदर्शन भादि भेद तो आगे होनेवाली तत्तत् ज्ञानपर्यायों की अपेक्षा है । बरूप की अपेक्षा उनमें इतना ही भेद है कि एक उपयोग अपने चानुपज्ञानोपादकशतिरूप स्वरूप में मम है तो दूसरा अन्य शर्शन आदि इन्द्रियों से उत्पन्न होनेवाले ज्ञान के जनक स्वरूप में लीन है, तो अन्य अधिज्ञानोत्पादक सरूप में भोर अन्य फेवर शामगहभावी स्वरूप में निमन है । तात्पर्य यह कि--उपयोग का स्व से मित्र किसी भी पदार्थ को विषय करना ही साकार होना है, न कि पंग की तरह मतिबिम्वाकार होना। निराकार और साकार या ज्ञान और दर्शन का यह सैदान्तिक सहमपिदलेगा दार्शनिक युग में अपनी उस सीमा को साँधकर 'यापदार्थ के सामान्यालोकन का नाम दर्शन और विशेष परिज्ञान क प्रस्तावना का नाम ज्ञान' इस पाहापरिधि में आ गया। इस सीमोल्लंघन का दार्शनिक प्रयोजन चौद्धादि सम्मत निर्विकल्पक की प्रमाणता का निराकरण करना ही है। अकलदेव ने विशद ज्ञान को प्रत्यक्ष यताते हुए जो ज्ञान का साकार विशेषण दिया है यह उपर्युक्त अर्भ को थोतन करने के ही लिए । बौद्ध क्षणिक परमाणु रूप चित्त या जड़ क्षणा को स्वलक्षण मानते हैं । यही उनके मत में पर- मार्थसत् है, यही धाम्नयिक अर्थ है । यह स्पलक्षण शन्दशन्य है, सन्द के अगोचर है। पान्द का वाच्य इनके मत से बुद्धिगत अभेदांश ही होता है। इन्द्रिय और पदार्थ के सम्बन्ध के भनन्तर निर्विकल्पका दर्शन उत्पन्न होता है। यह प्रत्यक्ष प्रमाण है। इसके अनन्तर शब्दसङ्केत और विकल्पवासना आदि का सहकार पाकर शब्दसंसर्गी सविक्रुपक ज्ञान उत्पन्न होता है। शब्दसंसर्ग न होने पर भी शब्दसंसर्ग की योग्यता जिस ज्ञान में आ जाय उसे विकल्प कहते हैं। किसी भी पदार्थ को देखने के बाद पूर्वए तत्सदृश पदार्थ का स्मरण होता है, तदनन्तर तद्वाचक शब्द का स्मरण, फिर उस शब्द के साथ वस्तु का योजन, तव यह घट है इत्यादि शब्द का प्रयोग । यस्तु दर्शन के बाद होनेवाले-पूर्वदृष्ट स्मरण आदि सभी न्यापार सविकसक की सीमा में आते हैं। तात्पर्य यह कि-निर्विकल्पक दर्शन यस्तु के यथार्थ स्वरूप का अवभासक होने से प्रमाण है। सविरुष्पक ज्ञान शब्दवासना से उत्पन्न होने के कारण यस्तु के यथाधं स्वरूप को स्पर्श नहीं करता, अत एव अप्रमाण है। इस निर्विल्पक के द्वारा घस्तु के समग्ररूप का दर्शन हो जाता है, परन्तु निश्चय यथासम्भव सविकल्पक ज्ञान और अनुमान के द्वारा ही होता है। अफलंकदेव इसका सण्डन करते हुए लिखते है कि किसी भी ऐसे निर्विकल्पक ज्ञान का अनुभव नहीं होता तो निश्चयात्मक न हो। सौग्रान्तिक यासार्थवादी हैं। इनका कहना है कि यदि ज्ञान पदार्थ के आकार न हो तो प्रतिकर्म- अवस्था अर्थात् घटज्ञान का विषय घट ही होता है पर नहीं नहीं हो सकेगी। सभी पदार्थ एक ज्ञान के विषय या सभी ज्ञान सभी पदार्थों को विपय करनेवाले हो जायेंगे। अतः ज्ञान को साकार मानना आवश्यक है। यदि साकारता नहीं मानी जाती तो विपयज्ञान और विपयशागज्ञान में कोई भेद नहीं रहेगा। इनमें यही भेद है कि एक मानविषय के आकार है तथा दूसरा विषय और विषयज्ञान दो के आकार है । विपय की सत्ता सिद्ध करने के लिए ज्ञान को साकार मानना नितान्त आवश्यक है। अलंकदेव ने साकारता के इस प्रयोजन का मान लिया है। उन्होंने लिखा है कि निण्य प्रनि- नियम ज्ञान की अपनी शक्ति या क्षयोपशम के अनुसार होता है। जिस ज्ञान में पदार्थ को जानने की जैसी योग्यता है वह उसके अनुसार पदार्थ को जानता है। तदाकारता मानने पर भी यह प्रश्न ज्यों का त्यों बना रहता है कि ज्ञान अमुक पदार्थ के ही आकार को क्यों ग्रहण करता है ? अन्य पदार्थों के आकार को क्यों नहीं ? अन्त में ज्ञान गत शक्ति ही विषयप्रनिनियम करा सकती है तदाकारता आदि नहीं । 'जो ज्ञान जिस पदार्थ से उत्पन्न हुआ है वह उसके आकार होता है। इस प्रकार तदुत्पत्ति से भी आकारनियम नहीं बन सकता ; क्योंकि ज्ञान जिप्स प्रकार पदार्थ से उत्पन्न होता है उसी तरह प्रकाश और इन्द्रियों से भी । यदि गदुत्पत्ति से साकारता आती है तो जिस प्रकार ज्ञान घटाकार होता है उसी प्रकार उसे इन्द्रिय तथा प्रकाश के आकार भी होना चाहिये । अपने उपादानभूत पूर्वज्ञान के आकार को तो उसे अवश्य ही धारण करना चाहिये। जिस प्रकार ज्ञान घट के घटाकार को धारण करता है उसी प्रकार वह उसकी जडता को क्यों नहीं धारण करता? यदि घट के आकार को धारण करने पर भी जता अगृहीत रहती है तो घट और उसके जडत्व मे भेद हो जायगा । यदि घट की जस्ता अतदाकार शान से जानी जाती है तो उसी प्रकार घर भी अतदाफार ज्ञान से जाना जाय । वस्तुमान को निरंश माननेवाले घौद्ध के मत में घस्तु का खण्डशः भाग तो नहीं ही होना चाहिये । समानकालीन पदार्थ कदाचित् ज्ञान न्यायरिनिश्चयविवरण में अपना भागर भति भी फर दें, पर भाति और अनामत आदि अपिधमान अर्थ जान में अपना आकार पैगेरेमको? पिसभा और विषयमानान में भी अनार दान की अपनी योग्यता में ही हो माता। आकार मानने पर भी भला योग्यता र सरनी ही पड़ता है । भन पादपरिषदिपन साकारता भनेर पगों में तिने ये पारणान या धर्म नहीं हो पाती। भान पी मावारता का अर्थ है भान या उम पदा या निभय वरना या उम पदार्थ की और उपयुम होना। निर्षियपर भार सद मंमग पी योग्यता भी सहितको भार हो साता है यह अनुमगिद्ध नहीं है। धान अर्थ फो आमा --गुग्यतया हो पिधारधारा हम गम्बन्ध में हैं। एक यह विमान भपने से भि पता रणगारे पदभार घन पदाथों को जाना है। इस विचारधारा के अनुसार जगा में अनन्त पेन और अगन्न अयोग पदार्थों की पतन्त्र मसा है। दूसरी विचारधारा याहा बन पदायों की पारमाधिर मसा नहीं मानती, किन्तु साग प्रानिामिक भीतच मीगार करती है। इन मत पटाटादि पाहा पक्षाचं अनाधिकारी विचित्र वामनानी के कारण या माया अविधा आदि के सारण विधियप में परिमाबित होते हैं। पि प्रसार म्यान या इन्द्रजार में बाध पदायों या अनिर न होने पर भी अनाविध भरिधारी पदार्थों का मायाप्रतिभाम होता है उसी तरह अविद्या पासना के कारण नानाविध विधिग्र धयों का प्रतिमाय हो जाना है। इनमें मत से मात्र चेतनतत्व की ही पारमाधिक एसा है। इसमें भी धनेक मतभेद हैं। येन्ती एक नियमाएर मह काही पारमार्थिक अम्मिन्य मीरार करते हैं। यही प्रा नानाविध जमा और अनेक प्रकार ये घटादिग्प याहा अयों के स्प में प्रतिभासिन होता है। मवेदनाहतवादी क्षणिक परमाणुरुप अनेक भागक्षण वा पारमार्थिक अनिय मानते हैं। इनके मत से अनेक ज्ञानमन्तान पृथर थर पारमार्थिक अनिय रखती है। अपनी अपनी पामनाओं के अनुसार भागक्षण नाना पदायों के रूप में भामित होना है। पहिलरी विचारधारा का अनेक- विध विनार न्याययित, माययोग, जैन, मागान्तिक याद आदि दर्शनों में देखा जाता है। माशालोप भी दूसरी विचारधारा का आधार यह माल्न होना है कि-मयेर पनि अपनी कल्पना के अनुमार पदार्थों में मकेत पर व्यवहार करता है । जैसे एक पुम्ना को देयर उम धर्म का अनुयायी उसे धर्म समझार पूज्य मानता है । पुनमारयाध्यक्ष उसे अन्य पुन्नको की तरह मामान्य पुस्तक समदाना है, तो दुकानदार उमे रही के भाप परीद कर पुदिया बांधता है। भगी उसे कूदा चरा मानकर राइ सकता है। गाय भम आदि पशुमान उसे गुहग कर एंज समझरर घास की तरह स्वर सरते है तो दीमक आदि बीड़ी को उसमें पुनर यह कल्पना ही नहीं होगी। भर आप विचार कीजिए कि पुम्नक में, धर्मग्रन्थ, पुनर, रहो, कचरा, घाम की तरह खाद्य आदि समाएँ तपनियों के ज्ञान से ही आई है अर्थात् धर्मग्रन्य गुम्नक आदि का सद्भार उन व्यनियों के मान मे है, याहिर नहीं। इस तरह धर्मग्रन्थ पुम्नक आदि की यहारमना है परमार्थसत नहीं । यदि धर्मप्रन्य पुस्ता आदि की परमार्थ सत्ता होती तो वह प्राणिमात्र-गाय, भैगयो भी धर्मप्रन्य या पुस्लर दिपनी चाहिये थी। अन जगा कैचर कल्पनामा है, उसमा धास्तविक अस्निर नहीं। इसी तरह घट एक है या अनेक । परमाणुओं का मयोग देश से होता है या सर्वदेश से। यदि एक्देश से तो यह परमाणुओ से संयोग करने चारे मध्य परमाणु में यह अश मानने पड़ेंगे । यदि दो परमाणुओं का सर्वदेश से सयोग होता है तो अणुओं का पिंड अणुमान हो जायगा। इस तरह जैसे जैसे यान पदाधों पर विचार बरसे हैं वैसे मे उनका अम्ति व मिद्ध नहीं होता। बाइ पदार्थों का अम्निन्ध तदाकार ज्ञान से सिद्ध किया जाता है। यदि नीलाकार ज्ञान है तो मोर नाम के बाह्य पदार्थ की क्या आवश्यक्ता यदि नीलाकार ज्ञान नहीं तो नील की सत्ता ही वैये सिद्ध की जा सकती है ? अत. ज्ञान ही यास और आन्तर माद और प्राइक रूप मे स्वय प्राशमान है कोई याद्धार्थ नहीं । पदार्थ और शान का सहोपरम्भ नियम है भत दोनो अभिन्न है। 1 - प्रस्तावना ४५ - अकलदेव ने इसकी आलोचना करते हुए लिखा है कि- अद्वय तत्त्व स्वतः प्रतिभासित होता है या परतः १ यदि स्वत ; तो किसी को विवाद नहीं होना चाहिए। नित्म ब्रह्मवादी की तरह क्षणिक विज्ञान- वादी भी अपने तत्व का रवतः प्रतिभास कहते हैं। इनमें कोन सरा सगझा जाय ? परत प्रतिभास पर के बिना नहीं हो सकता । पर को स्वीकार करने पर अद्वैत तत्व नहीं रह सकता । विज्ञानवादी इन्द्रजाल या स्वप्न का दृष्टान्त देकर बाह्य पदार्थ का लोप करना चाहते हैं। किन्तु इन्द्रजालप्रतिभासित घट और बाह्यसर थट में अन्तर तो स्त्री बाल गोपाल आदि भी कर देते हैं। वे घट पट आदि बाह्य पदार्थों में अपनी इष्ट अत्रिया के द्वारा आकांक्षाओ को शान्त कर सन्तोप का अनुभव करते हैं जब कि इन्द्रजाल या मायादृष्ट पदार्थों से न तो अर्थक्रिया ही होती है और न तजन्य सन्तोपानुभव ही। उनका काल्पनिकपना तो प्रतिभास काल में ही ज्ञात हो जाता है । धर्मग्रन्थ, पुस्तक, रद्दी आदि संज्ञाएँ मनुष्यकृत और काल्पनिक हो सकती है पर विस चननवाले रूपरसगन्धस्पर्शचाले स्थूल पदार्थ में ये संज्ञाएँ की जाती हैं वह तो काल्पनिक नहीं है। यह तो ठोस, वजनदार, सप्रतिघ, रूपरसादिगुणों का आधार परमार्थसत् पदार्थ है। उस पदार्थ को अपने अपने संवत के अनुसार कोई धर्मग्रन्थ कहे, कोई पुस्तक, कोई बुक, कोई कितार या अन्य कुन कहे । ये संकेत व्यवहार के लिए अपनी परम्परा और वासनाओ के अनुसार होते है उसमें कोई आपत्ति नहीं है। दष्टि का अर्थ भी यही है कि-सामने रखे हुए परमार्थसत् ठोस पदार्थ में अपनी दृष्टि के अनुसार जगन् व्यवहार करता है। उसकी व्यवहारसंज्ञाएँ प्रतिभासिक हो सकती है पर यह पदार्थ जिसमें ये संज्ञाएँ की जाती हैं, बहा या विज्ञान की तरह ही परमार्थसत् है। नीराकार ज्ञान से तो कपड़ा नहीं रंगा जा सकता? कपड़ा रंगने के लिए ठोस परमार्थसत् जद नील चाहिए जो ऐसे ही कपवे के प्रत्येकनन्तु को नीला बनायगा । यदि कोई परमार्यसन नील अर्थ न हो तो नीलाकार वासना कहाँ से उत्पन्न हुई ? वासना तो पूर्वानुमत्र की उत्तर दशा हे । यदि जगत् में नील अर्थ नहीं है तो ज्ञान में नीलाकार कहाँ से आया । पासना नीलाकार कैसे बन गई ? तात्पर्य यह कि व्यवहार के लिए की जानेवाली संज्ञाएँ, इष्ट अनिष्ट, सुन्दर असुन्दर, आदि कल्पनाएँ भले ही विकल्पकल्पित हो और टिष्टि की सीमा में ही पर जिस आधार पर ये सब करना कल्पित होती है वह आधार ठोस और सन्य है। विप के ज्ञान 'मरण नहीं हो सकता । विपरा खानेवाला और विप दोनों ही परमार्थसत् है तथा विप के संयोग से होनेवाले शरीर- गत रासायनिक परिणमन भी । पर्वत मकान नदी आदि पदार्थ यदि ज्ञानात्मक ही है तो उनमें मूर्तय स्थूलत्व सातिपय आदि धर्म कैसे आ सकते हैं । ज्ञानस्वरूप नदी में स्नान या ज्ञानात्मक जर से तृपा शान्ति अथवा ज्ञानात्मक पत्थर से सिर तो नहीं फूट सकता ? यदि अद्वपज्ञान ही है तो शास्त्रोपदेश आदि निरर्थक हो जायेंगे। परमतिपत्ति के लिए ज्ञान से अतिरिक्त वचन की सत्ता आवश्यक है। अनुयज्ञान में प्रतिपत्ता, प्रमाण, विचार आदि प्रतिभास की सामग्री तो माननी ही पड़ेगी अन्यथा प्रतिभास कैसे होगा ? अद्वयज्ञान में अर्थ-अनर्थ, तत्त्व अत्तत्य आदि की व्यवस्था न होने से तनाही ज्ञानों में प्रमाणता या अप्र- मणता का निश्चय कैसे किया जा सकेगा ? ज्ञानाद्वैव की सिद्धि के लिए अनुमान के अगभूत साध साधन दृष्टान्त आदि तो स्वीकार करने ही होंगे अन्यथा अनुमान कैसे हो सकेगा? सहोपलम्भ-एक साथ उप- हब्ध होना-से अभेद सिन्द नहीं किया जा सकता, कारण दो भिन्नसत्ताक पदार्थों में ही एक साथ उप- एब्ध होना कहा जा सकता है । ज्ञान अन्तरंग में चेतन रूप से तथा अर्थ बहिरङ्ग में जरूप से अनुभव में आता है अत. इनका सहोपलम्भ असिद्ध भी है । अर्धदान्य ज्ञान स्याकारतया तथा ज्ञानशन्य अर्थ अपने अर्थरूप में अस्तित्व रखते ही हैं भले ही हम ये अज्ञात हो । यदिहम बाह्य पदार्थो का इदमित्यरूप निरूपण या निर्वचन नहीं कर सकते तो इसर यह तात्पर्य नहीं है कि उन पदार्थों का अस्तित्व ही नहीं है। अनन्तधर्मात्मक पदार्थ का पूर्ण निरूपण तो सम्भव ही नहीं है। शब्द या ज्ञान की अशक्ति के कारण पदार्थों का लोप नहीं दिया जा सकता । नीराकारज्ञान रहने पर भी कपड़ा रंगने को नीलपदार्थ की नितान्त आवश्यकता है। ज्ञान में नीराकार भी बिना नील के नहीं आ सकता। अनेक परमाणुओं से जो सन्य बनता है उस स्वन्ध वा कोई पृथक् अस्तित्व नहीं है उन्हीं परमाणुभ का कथन्चित्तादानय सम्बन्ध न्यायविनिश्चयविवरण अर्थात् रासायनिक मिश्रण होने पर पररपर यन्ध हो जाता है और यह स्कन्ध स्थूल और हन्द्रियग्राह्य होता है । यही अनुभवसिद्ध है। न तो उसस एकदेश से सम्बन्ध होता है और न सर्पदंश से किन्तु जड़ पदार्थों का स्निग्य और रूक्षता के कारण दियाकार स्थायी विलक्षणवन्ध हो जाता है। जिस प्रकार एक ज्ञान स्वय ज्ञानाकार शेयापार और असिस्वरूप अनुभव में आता है उसी प्रकार प्रत्येक पदार्थ अनेक धों का आधार होता है इसमें विरोध आदि दृषणों का कोई असर नहीं है। इस तरह अ तामज्ञान से पृषा, स्वतन्त्र सत्ता रखनेश बाह्य जड़पदार्थ है। इन्हीं ज्ञेयों को ज्ञान जानता है। अत अवरदेव ने प्रत्यक्ष के स्वरूपनिरूपण मे ज्ञान का अर्थवेदन विशेषश दिया है जो ज्ञान को आगवेदी के साथ ही साथ अर्थवेदी सिद्ध करता है। इस तरह ज्ञान स्वभाव से स्वपरवंदी है स्वार्थस वेदक है। 1 अर्थ सामान्यविशेपात्मक और द्रव्यपर्यायात्मक हे- ज्ञान अर्थ को विपय करता है यह विवेचन हो चुकने पर विचारणीय मुद्दा यह है कि अर्ध का क्या परप है जैन दृष्टि से प्रत्येक पदार्थ अनन्त धर्मात्मक है या संक्षेप से सामान्यविशेपारमक है। वस्तु में दो प्रकार के अस्तित्व है~-एक स्वरूपाम्नित्व ओर दूसरा सादृश्याम्नित्य । एक द्रव्य को अन्य सजातीय या विजातीय किसी भी द्रव्य से असङ्कीर्ण रखनेवारा स्वरूपासिव है। इसके कारण एक दव्य की पर्यायें दूसरे समातीय या विजातीय द्रव्य से असङ्कीर्ण पृथक् अनि च रसती है। यह स्वरूपास्तित्व जहाँ इतरदायों से यात्ति कराता है वहाँ अपनी पर्यायों में अनुगत भी रहता है । अत इस स्वरूपास्तिस्य से अपनी पर्याया में अनुगत प्रत्यय उत्पन्न होता है और इतरदव्या से ध्यावृत्त प्रत्यय । इस स्वरूपास्तित्व को ऊचंता सामान्य रहते है । इसे ही द्रव्य कहते है। क्योंकि यही अपनी प्रमिक पर्यायों में द्रवित होता है, मम प्राप्त होता है। दूसरा सादृश्यास्तिव है वो विभित अनेक द्रव्यों में गो गो इत्यादि प्रकार का अनुगत व्यवहार करता है। इसे तिर्यसामान्य कहते हैं। तात्पर्य यह कि अपनी दो पयायों में अनुगत व्यवहार करानेवाला स्वरूपानिव होता है । इसे ही अवतासामान्य और दुव्य कहने है। तथा विभिन्न दो दव्या में अनुगन व्यवहार करानेवाला सादृश्यास्तिव होता है। इसे तिर्यरसामान्य या साहस सामान्य कहते हैं । इसी तरह दो द्ण्यों में व्यायत्त प्रन्यय करानेवारा व्यनिरय जाति का विरोप होता है तथा अपनी ही दो पर्यायों में विरक्षण प्रत्यय करानेवाला पर्याय नाम का विशेष होता है । निप यह कि एक्दथ्य की पर्यायों में भनुगत प्रत्यय पर्वतासामान्य या इप्य से होता है तथा व्यावृत्तप्रत्यय पोय-विशेष से होता है। दो विभिन्न द्रव्यो में अनुगतप्रत्यय सादृश्यसामान्य या तिर्यमामान्य से होता है और ध्यावृत्तप्रत्यय व्यतिरेकविशेष से होता है। इस तरह प्रत्येक पदार्थ सामान्यविशेषात्मक और व्यपर्याया स्मक होता है। यद्यपि सामान्यविशेषात्मक कहने से मन्यपर्यायास्मरप का बोध हो जाता पर इप्यपर्यायात्मक के पृथर कहने का प्रयोजन यह है कि पदार्थ न केवर द्रव्यरूप है और न पर्यायरूप । पिन्न प्रत्येक सत् उत्पाद व्यय धोत्यवाला है। इनमें उत्पाद और व्यय पर्याय का प्रतिनिधित्व करते है तथा ध्रौव्य द्रव्य का। पदार्थ सामान्यविशेशरमक तो उत्पादध्ययधोव्यात्मक सन् न होकर भी हो सकता है, अत उसके निन स्वरूप का पृथक् भान कराने के लिए मध्यपर्याया मक विशेषण दिया है। सामान्यविशेषामा विशेषण धर्मरूप है , जो अनुगतप्रत्यय और व्याहत्तम यय का विषय होता है। व्यपर्यायात्मक विशेष परिणमन से सम्बन्ध रस्ता है। प्रयेक वस्तु अपनी पर्यायधारा में परिणत होती हुई अतीत से पर्तमान और वर्तमान से भविष्य क्षण को प्राप्त करती है । यह धर्तमान को अतीत और भविष्य को वर्तमान यमानी रहती है । प्रतिक्षण परिणमन करने पर भी भतीत के पाभव सरकार इसके वर्तमान को प्रभावित करते हैं या यो कहिए कि इसमा घर्तमान अतीतमारपुज का कार्य है और वर्तमान कारण के अनुसार भविष प्रभावित होता है । इस तरह यद्यपि परिणमन करने पर कोई अपरि पर्तित पा पदस्य नित्य अंश धस्तु में शेष नहीं रहता जो निकालावस्थायी हो पर इतना विस्टिस परिणमन प्रस्तावना भी नहीं होता कि अतीत वतमान और भविष्य बिलकुल असम्बद्ध ओर अतिविच्छिन्न हो । वर्तमान के प्रति अतीत का उपादान कारण होना और वर्तमान का भविष्य के प्रति, यह सिद्ध करता है कि तीनो क्षणों की अविच्छिन्न कार्यकारणपरम्परा है। न तो वस्तु का स्वरूप सदा स्थायी नित्य ही है और न इतना विलक्षण परिणमन करनेवाला जिससे पूर्व और उत्तर भिवसन्तान की तरह अतिविच्छिन हो । भद-त नागसेन ने मिलिन्द प्रश्न में जो कम और पुनर्जन्म का विवेचन किया है (दर्शनदिग्दर्शन गृ० ५५१) उसका तात्पर्य यही है कि पूर्वक्षण को प्रतीत्य अर्थात् उपादान कारण बनाकर उत्तरक्षण का समुत्पाद होता है। मझिमनिकाय में "अस्मिन् सति इदं भवति" इसके होने पर यह होता है, जो इस आशय का धाक्य है उसका स्पष्ट अर्थ यही हो सकता है कि क्षणसन्तति प्रवाहित है उसमें पूर्वक्षण उत्तर- क्षण बनता जाता है जैसे वर्तमान अतीतसस्कार पुज का फल है वैसे ही भविष्यक्षण का कारण भी। श्री राहुल सांकृत्यायनने दर्शन-दिग्दर्शन (पृ. ५१२) में प्रतीत्यसमुत्पाद का विवेचन करते हुए लिखा है कि-"प्रतीत्यसमुत्पाद कार्यकारण नियम को अविच्छिन्न नहीं विच्छिन्न प्रवाह बताता है। प्रतीत्य- समुत्पाद के इसी विच्छिन्न प्रवाह को लेकर आगे नागार्जुन ने अपने शून्यवाद को विकसित किया " इनके मत से प्रतीत्यसमुत्पाद विच्छिन्न प्रवाहरूप है और पूर्वक्षण का उत्तरक्षण से कोई सम्बन्ध नहीं है। पर ये प्रतीत्य शब्द के हेतु कृत्वा' अर्थात् पूर्वक्षण को कारण वनाझर इस सहज अर्थ को भूल जाते हैं। पूर्व. क्षण को हेतु बनाए बिना यदि उत्तर का नया ही उत्पाद होता है तो भदन्त नागसेन को कर्म और पुनर्जन्म की सारी व्याख्या आवारशून्य हो जाती है। क्या द्वादशाङ्ग प्रतीत्यसमुत्पाद में विच्छिन्नमवाह युति सिद्ध है ? यदि अविद्या के कारण संस्कार उत्पन्न होता है और संस्कार के कारण विज्ञान आदि तो पूर्व और उत्तर का प्रवाह विच्छिन्न कहाँ हुआ ? एक चित्तक्षण की अविधा उसी चित्तक्षण मे ही संस्कार उत्पन्न करती है भन्य चित्तक्षग में नहीं, इसका नियामक यही प्रतीत्य है। जिसको प्रतीत्य जिसका समुत्पाद हुआ है उन दोनों में अतिविच्छेद कहाँ हुआ ? राहुलजी पही (पृ०५१२) अनित्यवाद की "युद्ध का अनित्ययाद भी 'दूसरा ही उत्पन्न होता है । दूसरा ही नष्ट होता है। के कहे अनुसार किसी एफ मौलिक तर का बाहरी परिवर्तन मात्र नहीं बल्कि एक का बिलकुल नाश और दूसरे का विलकुल नया उत्पाद है। बुद्ध कार्यकारण की निर- न्तर या अविच्छिन्न सन्तति को नहीं मानते ।" इन शब्दों में व्याख्या करते है। राहुलजी यहाँ भी केवल समुत्पाद को ही ध्यान में रखते है, उसके मूलरूप प्रतीत्य को सर्वथा भुला देते हैं । कम और पुन- जन्म की सिद्धि के लिए प्रयुक्त "महाराज, यदि फिर भी जन्म नही ग्रहण करे तो मुक्त हो गया, किन्तु कि यह फिर भी जन्म ग्रहण करता है इसरिए (गुक्त) नहीं हुआ।" इस सन्दर्भ में 'वह फिर भी' शब्द क्या अविच्छिन्न प्रवाह को सिद्ध नहीं कर रहे हैं । बौद्धदर्शन का 'अभौतिक अनात्मवादी नामकरण केवल भौतिकवादी चाक और आत्मनित्यवादी भोपनिपदो के निराकरण के लिए प्रयुक्त किया जाना चाहिये, पर घस्तुत बुद्ध क्षणिकचित्तवादी थे। क्षणिकचित्त को भी अविच्छिन्न सन्तति मानते थेन कि विच्छिन्नमवाह । आचार्य कमलशील ने तत्वसंग्रहपंजिका (पृ. १८२) में क्र्तृकर्मसम्बन्धपरीक्षा करते हुए इस प्राचीन श्लोक के भार को उद्धत किया है- "यस्मिन्नेव तु सन्ताने आहिता कर्मवासना। फलं तत्रैव सम्यत्ते कार्यासे रकता यथा ॥" अर्थात्-जिस सन्तान में कर्मवासना प्राप्त हुई है उसका फल भी उसी सन्तान में होता है । जो लास के रङ्ग से रंगा गया है उसी कपास बीज से उत्पन्न होनेगरी रूई लाल होती है अन्य नहीं । राहुलजी इस परम्परा का विचार करें और फिर बुद्ध की विच्छिन्नाप्रवाही बताने का प्रयास करें ! हाँ, पह अवश्य था कि वे अनन्त क्षणों में शाश्वत सत्ता रसनेमारा यूटस्थ नित्य पदा स्वीकार नहीं करते थे। पर वर्तमान क्षण अनन्त अतीव के संस्कारों का परिवर्तिन पुंज स्वगर्भ मे लिए है और उपादेय भविष्यक्षण 1 ।
४८ न्यायविनिश्चयविवरण उससे प्रभावित होता है , इस प्रकार के शालिक सम्बन्ध को वे मानते थे। यह बात बैद्ध दर्शन के कार्यकारणभाव के अभ्यासी कोसहज ही समझ में आ सकती है। निर्वाण के सम्बन्ध में राहुरजी सर राधाकृष्णन की आरोचना करते समय (2० ५२९) बड़े आत्मविश्वास के साथ लिख जाते है कि-"किन्नु बौद्ध-निर्वाण को अभावारमक छोड़ भावारमक माना ही नहीं जा सरता" कृपाकर वे आचार्य कमलशील के द्वारा तत्रसंग्रह पजिका (पृ. १०४) मै उद्दत इस प्राचीनश्लोक के अर्थ वा मनन करें- "चित्तमेव हि संसारो रागादिक्लेशवासितम् । तदेव तैर्विनिमुक्तं भवान्त इति कथ्यते ॥" अर्थात्-चित जब रागादिदोष और क्लेश संस्कार से सयुक्त रहता है तय समार कहा जाना है और और जर नदेव-वही चित्त रागादिक्लेश वासनाओं से रहित होकर निरासपचित्त बन जाता है तब उसे भवान्त अर्थात् निर्माण कहते हैं। शान्तरक्षित तो (तत्वसं. Z० १८५) बहुत स्पष्ट लिखते हैं कि "मुक्तिनिर्मलता धिय' अर्थान्-चित्त की निर्मलता को मुक्ति कहते है। इस श्लोक में किस निर्वाण की सूचना है ? यही विस रागादिमवाह से यासित रहकर ससार बना और वही रागादि से शून्य होकर मोक्ष बन गया । राहुरजी माध्यमिकवृत्ति (पृ० ५१९) गत इस निर्माण के पूर्वपक्ष को भी ध्यान से देखें- "इह हि उपितबहाचर्याणा तथागतशासनप्रतिपन्नाना धर्मानुधर्मप्रतिपत्तियुक्ताना पुद्गलाना द्विविध. निर्वाणमुपवर्णितम्-पोपधिपं निरुपधिपं च । तत्र निरवशेपस्य अविद्यारागादिकस्य शगणस्य प्रहाणात् सोपधिशेपं निर्वाणमिप्यते । तत्र 'उपधीयते अस्मिन् आत्मस्नेह इत्युपधि । उपधिशब्देन आत्मप्रशसिनिमित्ता पन्धोपादानस्कन्धा उच्यन्ते । शिप्यने इति शेप, उपधिग्य शेप उपधिशेष-सह उपधिशेपेग यतंत इति सोपधिशेषम् । कि तत् ? निर्वाणम् । तच सन्धमारकमेव केरलं सरकायदृष्ट्यादि- परेशतस्कररहिनमवशिष्यते निहताशेपारगणग्राममानावस्थानसाधयेण, तत् सोपधिशेपं निर्वाणम् । यत्र तु निर्वाणे स्कन्धमावकमपि नास्ति ततिरुपधिशेप निर्माणम् । निर्गत उपधिशेषोऽस्मिन्निति कृत्वा । निहताशेयचौरगणस्य प्राममात्रस्यापि विनाशसाधम्र्ये" अर्थात् नियंग दो प्रकार का है- सोपविशेष २ निरूपविशेष । सोपधिशेप में रागादि का नाश होकर जिन्हें आत्मा कहते है ऐसे पाँचस्कन्ध निरास्रव दशा में रहते है। दूसरे निरपधिशेष निर्माण में स्कन्ध भी नष्ट हो जाने हैं। यौद्ध परम्परा में इस सोपधिशेष निर्वाण को भावात्मक स्वीकार किया हो गया है । यह जीवन्मुक्त दशा का वर्णन नहीं है किन्तु निर्वाणावस्था का । आखिर वाद्धदर्शन में ये दो परम्पराएं निरोण के सम्बन्ध मे कशे अल्ति हुहै? इसका उत्तर हमे बुद्ध की अव्याकृत सूची से मिल जाता है । युद्ध ने निर्माण के बाद की अवस्था सम्बन्धी इन धार प्रश्नों को अन्याकरणीय अर्थात् उत्तर देने के अयोग्य बताया । " या मरने के बाद तथागत (बुद्ध) होते हैं १२ क्या मरने के बाद तथागत नहीं होते १३ क्या मरने के बाद तथागत होते भी है नहीं भी होते हैं १४ क्या मरने के बाद तथागत न होते हैं न नही होने हैं ?" मालुक्य पुत्र के प्रश्न पर धुद्ध ने कहा कि इनका जानना सार्थक नहीं है क्योंकि इनके शारे में रहना भिक्षुर्या मिद या परमज्ञान के लिए उपयोगी नहीं है । यदि बुद्ध स्वयं निर्वाण के म्यरूप के सम्बन्ध में अपना सुनिश्चित गत रखते होते तो दे अन्य सैकड़ों लौकिक अरोक्कि प्रश्नों की तरह इस प्रक्ष को अव्याकृत कोटि में न डालते । और यही कारण है जो निर्माण के विषय में दो धाराएं बौद्ध दर्शन में प्रचलित हो गई है। इसी ताह बुद्ध ने जीव और शरीर की भिडता और अभिन्नता यो अव्याहत कोटि में डालकर श्री राहुलजी को बौद्धदर्शन के 'अभौतिक अनात्मवाद' जैसे उभयपतिपेधक नामकरण का अवसर दिशा पद अपने जीवन में देह और आत्मा के अदापन और निर्वाणोत्तर जीरन आदि अतीन्द्रिय पदार्थों के शतराहे , प्रस्तावना ४९ - धीच्य रहना। - पर अपने शिष्य को सड़ाकर लक्ष्यच्युत नहीं करना चाहते थे। इसलिए लोक क्या है ? आत्मा क्या है? और निर्माणोत्तर जीवन कैसा है ? इन जीवन्त प्रश्नों को भी उनने अन्याकरणीय करार दिया। उनकी विचारधारा और साधना का केन्द्रविन्दु वर्तमान दुःख क निवृत्ति ही रहा है। राहुलजी एक और तो विच्छिन्न प्रयाह मानते हैं और दूपरी ओर पुनर्जन्म । वे इतनी बड़ी असगति को कैसे पी जाते है कि यदि पूर्व और उत्तर क्षण विच्छिन्न है तो पुनर्जन्म कैसा और किसका ? क्या बुद्धवाक्यों की ऐसी ही असंगत व्याख्या को सम्हालने का प्रयत्न शान्तरक्षित और कमलशाल जैसे दार्शनिकों ने किया है, जो एक अविच्छिन्न कार्य- कारण प्रवाह मानते हैं ? अविच्छिन्ना का अर्थ है कार्यकारणभाववाली। जैन दर्शन की दृष्टि में प्रत्येक सत् परिणामी है और यह परिणमन प्रतिक्षणभावी स्वाभाधिक है। उसमें किसी अन्य हेतु की आवश्यकता नहीं है। यदि अन्य कारण मिले तो वे उस परिणमन को प्रभावित कर सकते है पर उपादान कारण तो पूर्व पाय ही होगी और उसमे जो कुछ है सब अखण्डरूप ही है । अत. द्वितीय क्षण में वह अपण्ड का अखण्ड उत्तरपर्याय या जाता है। चूंकि पुराना क्षण ही वर्त- मान बना है और भविष्य को अपने में शक्ति या उपादान रूप से छिपाए है अतः स्मरण प्रत्यभिज्ञान आदि व्यवहार सोपपत्तिक और समूल बन जाते हैं। परिणामी का अर्थ हे उत्पाद और व्यय होते हुए आपाततः यह मालूम होता है कि जो उत्पादविनाशयाला है यह ध्रुव कैसे रह सकता है ? पर भव्य का अर्थ सदा स्थायी कूटस्थ नित्य नहीं है और न यह विवक्षित है कि वस्तु के कुछ अंश उत्पाद विनाश के कारण परिवर्तित होते है तथा कुछ अंश उस परिवर्तन से अटते ध्रुव बने रहते हैं और न परिवर्तन का यह स्पूल अर्था ही है कि जो प्रथमक्षण में है दूसरे क्षण में यह बिलकुल बदल जाता है या विलक्षण हो जाता है। परिवर्तन सदश भी होता है रिसदृश भी । शुद्ध चेतनगव्य मुक्त अवस्था में प्रतिक्षण परिवर्तित रहने पर भी कभी विलक्षण परिवर्तन नहीं करता उसका सदा सदृश परिवर्तन ही होता रहता है। इसी तरह आकाश, काल, धर्म और अधर्मगन्य सदा स्वभावपरिणमग करते हैं। उनमें परिवर्तन करते रहने पर भी कहने लायक कोई विलक्षणता नहीं आती । यो समझाने के लिए परद्रव्यों के परिवर्तन के अनुसार इन्मे भी परप्रत्यय विलक्षणता दिखाई जा सकती है पर न तो इनमें देशभेद होता है न आकारभेद और न स्वरूपविल. क्षणता ही । इनका स्वाभाविक परिणमन तो अगुरुरघुगुणस्त ही है । रह जाता है पुद्गलगन्य, जिसका शुद्ध परिणमन कोई निश्चित नहीं है । कारण यह है कि शुद्ध जीव को न तो जीवान्तर का सम्पर्क विकारी बना सकता है और न किसी पुलमव्य का संयोग ही, पर पुद्गल में तो पुद्गल और जीय दोनों के निमित्त से विकृति उत्पन्न होती है । लोक में ऐसा कोई प्रदेश भी नहीं है जहाँ अन्य पुद्गल या जीव के सम्पर्क से विवक्षित पुद्गलागु अछूता रह सकता हो। अनः कदाचित् पुद्गल अपनी शुद-अणु अवस्था में भी पहुंच जाय पर उसके गुण और धर्म शुद्ध होगे या द्वितीयक्षण में शुद्ध रह सकते हैं इसका कोई नियामक नहीं है। अनेक पुगलद्रव्य मिलकर स्कन्ध दशामें एक संयुक्त बद पर्याय भी बनाते है पर अनेक जीव मिलकर एक संयुक्तपर्याय नहीं बना सकते । सयका परिणमन अपना जुदा जुदा है । एफन्धगत परमाणुओं में भी प्रत्येकशः अपना सदृश या विसदृश परिणमन होता रहता है और उन सब परिणमना की औसत से ही स्कन्ध का वजन, रूप, रस, गन्ध और स्पर्श व्यवहार में आता है। स्कन्धगत परमाणुओं में क्षेत्रकृत और आकारकृत सादृश्य होने पर भी उनका मौलिकत्व सुरक्षित रहता है। लोक से एक भी पर. माणु अनन्त परिवर्तन करने पर भी निःसत्व-सत्ताशून्य अर्थात् असत् नहीं हो सकता। अतः परिणमन में विलक्षणता अनुभूत न होने पर भी स्वभावभूत परिवर्तन प्रतिक्षग होता ही रहता है। नन्य एक नदी के समान अतीत पर्तमान और भविष्य पर्यायो का कल्पित प्रवाह नहीं है। क्योकि नदी विभिन्नसत्ताक जलकणों का एकत्र समुदाय है जो क्षेत्रभेद कर के आगे बढ़ता जाता है। किन्तु अतीत पर्याय एक एक क्षण में क्रमश. वर्तमान होती हुई इस समय एकक्षणवर्ती वर्तमान के रूप में है। भतीत पायों का कोई पर्याय-अस्तिस्य नहीं है पर जो वर्तमान है वह अतीत का कार्य है, और यही भविष्य का कारण है । सत्ता एक समयमान वर्तमानपर्याय की है। भविष्य और अतीत क्रमशः भनुत्पन्न और विनष्ट । ७ - न्यायविनिश्वयविवरण है । अतन्त. धोव्य इतना ही है कि एक द्रव्य की पूर्वपर्याय दप्यार की उत्तर-पर्याय नहीं बनती और न पहीं समाप्त होती है। इस तरह प्यान्नर से समाहर्ष का नियामक ही धाग्य है । इसके कारण प्रत्येक दव्य की अपनी वतन मत्ता रहती है और नियत कारणरापरम्परा चार रहती है।यह नविच्छिन्न होती है और न मंकर ही। यह भी अतिसुनिश्चित है कि किसी भी गये प्रथ्य का उत्पाद नहीं होता और न मौजूद का भयन्त पिनारा हो । ययल परिवर्तन, सो भी प्रतिक्षश शिवाध गति से । इस प्रकार प्रयेक द्रव्य अपनी संतन सता रमता है। वह अनन्त गुण और अनन्त शनियों का धनी है ।। पर्यायानुसार कुछ शक्तियाँ आविर्भूत होनी हैं कुछ तिरोभूत । जनदर्शन में इx सत् का एक रक्षण तो है "उत्पादययनोपयुन सन्" दूसरा है "सद् द्रव्यलक्षणम् । इन दोनो लक्षणों का मधि सार्थ यही है कि द्रव्य को सत् कहना चाहिए और वह द्रव्य प्रतिक्षण उपाद व्यय के साथ ही साथ अपने अविष्टियता रूप धौव्य को धारण करता है। द्रव्य का लक्षण है.--"शुगपर्य पवद् इव्यम्" अर्थत् गुण और पर्यायवाण द्रव्य होता है । गुग सहभावी और अनेक शनियों के प्रतिरूप होते है जर कि पर्याय मम भावी और एक होती है । द्रव्य का प्रतिक्षण परिणमन एक होता है। उस परिणमन को हम उन उन गुगों के द्वारा अनेक रूप से वर्णन कर सकते है । एक पुगाणु द्विवीय समय में परिवर्तित हुआ तो उस एक परिणमन का विभिन्न रूपरमादि गुणों के द्वारा अनेक रूप में वर्शन हो सकता है। विमित गुगों में सतन्य सत्ता न होने से स्वतन्त्र परिणमन नहीं माने जा सकते। अपलदेव ने प्रत्यक्ष के ग्राहा अर्थ का वर्णन करते समय दव्य पर्याय-सामाम्य-विशेष इस प्रकार जो चार विशेषण दिए हे वे पदार्थ की उपर्युक्त स्थिति को सूचित करने के लिए ही है। द्रव्य और पर्याय पदार्थ की परिणति को सूचित करते हैं तया सामान्य भार शिंप अनुगत और व्यावृत्त व्यवहार के विषयभूत धर्मों की सूचना देते है । मैयायिक वैशेपिर-प्रत्यय के अनुमार वातु की व्यस्था करने है । इन्होंने जितने प्रकार के ज्ञान और शब्द व्यवहार होते हैं उनका वर्गीकरण करके अमाश्यंभार से उतने पदार्थ मानने का प्रयन किया है। इसलिए इन्ह 'संप्रत्ययोपाध्याय' कहा जाता है। पर प्रत्यय अर्थात् ज्ञान और सन्द व्यवहार इतने अपरि पूर्ण और एचर है कि इन पर पूरा पूरा भरोसा नहीं किया जा सकता। ये तो वस्तु स्वरूप की ओर इशारा मान ही कर सकते हैं । 'दव्यम् द्रव्यम्' ऐसा प्रयय हुआ एक द्रव्य पदार्थ मान लिया । 'गुग गुण' प्रत्यय हुआ गुण पदार्थ मान लिया। कर्म कर्म ऐसा प्रत्यय हुआ क्रमं पदार्थ मान रिया । इस तरह इनकं यात पदार्थों की स्थिति प्रत्यय के आधीन है । परन्तु प्रत्यय से मालिक पदार्थ की स्थिति स्वीकार नहीं की जा सरती । पदार्थ तो अपना अखण्ड ठोस स्वतन्त्र अस्तित्व रखता है, वह अपने परिणमन के अनुसार अनेक प्रत्ययों का विषय हो सरना है । गुण क्रिया सम्बन्ध आदि स्तन्त्र पार्थ नहीं है, ये सोध्य की अवस्थाओं के विभिन्न व्यवहार हैं । इसी तरह सामान्य कोई स्वतन्त्र पार्थ नही है जो नित्य और एक होकर अनेक स्वतन्त्र सत्ताक व्यनियों में मोतिया में सून की तरह पिरोया गया हो । पदार्थों के परिगमन कुछ सहा भी होते हैं और कुछ विसरश भी। दो विभिन्न सत्ताक पनियों में भूय साम्य देएर अनुगत व्यवहार होने लगता है। अनेक आत्माएँ अपने चिभित बारीरों में वर्तमान है पर जिनकी अश्यपरचना अमुक प्रकार की सा है उनमें 'मनुष्य मनुष्य ' ऐसा सामान्य व्यवहार किया जाता है तथा जिनकी घोड़ी सी उनमें अश्र अश्व' यह व्यवहार । जिन आत्माओं में साक्ष्य के आधार से मनुष्य व्यवहार हुआ है उनमें मनुष्यत्व नाम का कोई सामान्य पदार्थ, जो कि अपनी स्वतन्त्र सत्ता रखता है, आकर समवाय- नामक सम्बन्ध पदार्थ से रहता है यह वरपना पदार्थस्थिति के विरद्ध है। 'सन् सत्' 'द्रव्यम् इन्यम् इत्यादि प्रकार के सभी अनुगत व्यवहार सादृश्य के आधार से ही होते हैं। साश्य भी उभयनिष्ठ कोई स्वतन्त्र पदार्थ नहीं हैं। किन्तु यह बहुत अवययों की समानता रूप ही है। तत्तद् अवयव उन उन व्यक्तियों में रहते ही है । उनमें समानता देखकर द्रष्टा उस रूप से अनुगत व्यवहार करने एगता है। यह सामान्य निय एक और निरश हॉरर यदि सर्वगत हे तो उसे विभिन्न देशस्थ स्वनियों में खण्डश रहना होगा, क्योंकि एक वस्तु एक साथ भिन्न देश में पूर्ण रूप से नही रह सकती । नित्य निरश सामान्य निस - प्रस्तानना - - । समय एक व्यक्ति में प्रकट होता है उसी समय उसे सर्वत्र-व्यक्तियों के अन्तराल में भी प्रकट होना चाहिए। अन्धया धचित् व्यक्त और धचिट अन्य रूप से स्वरूपभेट होने पर अनित्यत्व और साशय का प्रसङ्ग प्राप्त होगा। यदि सामान्य पदार्थ अन्य किसी सत्तासम्बन्ध के अभाव में भी स्वत सत् हे तो उसी तरह दव्य गुण आदि पदार्थ भी स्वत सत् ही क्यो न माने जायें ? अत सामान्य स्वतन्त्र पदार्थ न होकर व्यों के सदृश परिणमगरूप ही है। वैशेषिक तुत्य आकृति तुल्य गुण वाले सम परमाणुओ में परस्पर भेद प्रयय कराने के निमित्त स्वती विभिन्न विशेष पदार्थ की सत्ता मानते है । वे मुक्त आत्माओं में मुक्त आमा के मनो में विशेष प्रत्यय के निमित्त विशेष पदार्थ मानगा आवासक समझते हैं । परन्तु प्रत्यय के आधार से पदार्थ व्यवस्था मानने का सिद्धान्त ही गरत है। जितने प्रकार के प्रत्यय होते जायें उतने स्वतन्त्र पदार्थ यदि माने जाँय तो पदार्थों की कोई सीमा ही नहीं रहेगी। जिस प्रकार विशेष पदार्थ स्वत परस्पर भित हो सकते हैं उसी तरह परमाणु आदि भी स्वस्वरूप से ही परस्पर मित्र हो सकते हैं। इसके लिए किसी स्वतन्त्र विशेष पदार्थ की कोई आवश्यकता नहीं है। व्यक्तियाँ स्वय ही विशेष है। प्रमाण का कार्य है स्वत सिद्ध पदार्थ की अल कर व्यारया करना। योद्ध सशपरिणमनरूप समानधर्म स्वीकार न कर के सामान्य को अन्यापोह रूप मानते हैं । उना अभिप्राय है कि--परस्पर भिन्न वस्तुओं को देखने के बाद जो बुद्धि मे अभेदभान होता है उस बुद्धिप्रतिविम्बित अभेद को ही सामान्य करते हैं । यह अभेद भी विध्यामक न होकर अतद्व्यावृत्तिरूप है। सभी पदार्थ किसी न किसी कारण से उत्पन्न होते हैं तथा कोई न कोई कार्य उत्पन भी करते हैं। तो जिन पदाथों में अतकारगव्यावृत्ति और अतःकार्यव्यावृत्ति पाई जाती है उनमें अनुगत व्यवहार कर दिया जाता है। जैसे जो व्यक्तियाँ मनुष्यरूप कारण से उत्पन्न हुई है और आगे मनुष्यरूप कार्य उत्पन्न करेंगी उनमें अमनुष्यकारण कार्यव्यावृत्ति को निमित्त रेकर 'मनुष्य गनुष्य' ऐसा अनुगत व्यवहार कर दिया जाता है। कोई वास्तविक मनुष्य व विध्यात्मक नहीं है। जिस प्रशर चक्षु आलोक ओर रूप आदि परस्पर अत्यन्त भिन्न पदार्थ भी अल्पशानजननच्यावृत्ति के कारण 'रूपज्ञानजनक' व्यपदेश को प्राप्त करते है उसी प्रकार सर्वत्र अतद्व्यागृत्ति से ही समानाकार प्रत्यय हो सकता है। ये शब्द का चाव्य इसी अपोहरूप सामान्य को ही स्वीकार करते है । विकल्पज्ञान का विषय भी यही अपोहरूप सामान्य है। अकल देव ने इसकी आलोचना करते हुए लिसा हे कि सादृश्य माने विना अमुक व्यक्तियों में ही अपोह का नियम कैसे बन सकता है ? यदि शायरेय गोव्यक्ति वाहुरेय गोव्यक्ति से उतनी ही भिन्न है जितनी कि किसी अश्यादिव्यक्ति से, तो क्या कारण है कि शालेय और बाहुलेय में ही अतयावृत्ति मानी जाय अश्व म नहीं । यदि अश्व से कुछ कम विलक्षणता हे तो यह अर्थात् ही मानना होगा कि उनमें ऐसी समानता हे जो अश्य के साथ नहीं है । अत सादृश्य ही व्यवहार का सीधा नियामक हो सकता है। यह तो प्रत्यक्षमिन्द्र हे कि वस्तु समान और भसमान उभयविध धो या आधार होती है। समान- धों के आधार से अनुगत व्यवहार किया जाता है और असमान धर्म के आधार से व्यावृत्त व्यवहार । अन्य नहीं, 'अतव्यावृत्ति' यही एक समान धर्म तसव्यक्तियों में स्वीकार करना होगा। बोद्ध जब स्वयं अपरापर क्षगों में सादृश्य के कारण एक भान तथा सीप में सादृश्य के ही कारण रजतभ्रम स्वीकार परते हैं तब अनुगत व्यवहार के लिए सादृश्य को स्वीकार करने में उन्द क्या बाधा है ? अतव्यावृत्ति और बुद्धि- गत अभेद प्रतिबिम्ब का निर्वाह भी सादृश्य के विना नहीं हो सकता । अत सहश परिणामरूप ही सामान्य मानना चाहिए । याद और विकरपज्ञान भी सामान्य विशेषात्मक पस्तु कोही विषय करते है, न केवल सामान्यात्मक को और न केवल विशेषात्मक को ही। सामान्यतया क्सनाओ का लक्ष्य द्विमुसी होता है-एक तो अभेद की ओर दुसरा भेद की ओर । जगत् में अभेद की ओर चरम कल्पना चेदान्त दर्शन ने की है। वह इतना अभेद की ओर बढ़ा किवास्तविक स्थिति को सँधकर क्रपनालोक में ही जा पहुँचा । चेतन अचेतन का स्थुल भेद भी मायारूप बन गया । - 1 न्यायविनिश्चयविवरण एक ही ताप का प्रतिभास चेतन और अचेतन रूप में माना गया । इस तरह देश काल और स्वरूप, हर मार से चरम अभेद की काटि पेदान्त दर्शन है। बौद्धदर्शन प्रत्येक चित् अचिन बरक्षणी की धास्तव स्वतन्त्र मत्ता मानकर ही धुप नहीं रहता। यह उनम काहिर भेद भी क्षणपर्याय तक स्वीसर करता है। यहाँ तक तो उसका पारमार्थिक भेद है। जो प्रथमक्षण में है यह द्वितीय में नहीं, जो जहाँ जिस समय जैसे है यह वहीं उसी समय से ही है, द्वितीयक्षश में नहीं । दो देशों में रहनेवारी दो क्षणों में रहनेवारी कोई यस्तु नहीं है। इस तरह देश काल और स्वरूप की दृष्टि मे अन्तिम भेद यौद्धदर्शन का लक्ष्य है। पर अभेद की तरफ वेदान्त दर्शन और भेद की ओर योद्धदर्शन वास्तववाद से बारपनिरत्ता या अवास्तष पाद की ओर पहुँच जाते हैं । बौद्धदर्शन में विज्ञानवादी विभ्रमवादी शून्यगदी सभी कारपनिक भेद के उपासक है। उनने पायजगत् का अस्तित्र ही स्वीकार नहीं दिया। किसी ने उसे सोन कहा तो किमी ने उसे अविद्यानिर्मित पहा तो फिर्मा ने उसे प्रत्ययमात्र । जैन दर्शन ने भेद और अभेद का अन्तिम विचार तो दिया पर वास्तवमीमा को लाँधा नहीं है। उसने 'प्रसार के भभेदमपोजक सामान्य धर्म माने तथा दो प्रकार के विशेष, नो भेद पल्पना के विषय होते है । दो विभिन्न सत्ताक द्रव्यों में अभेद व्ययहार यादृश्य ये ही हो परना है एकप से नहीं । इसलिए परम संग्रहनय यद्यपि घेदान्त की परसता को विषय पाता है और कह देता है कि 'मदूपेण चेतनाचेतनानां भेदाभापान अर्थात् सदप से चेतन और अचेतन में कोई भेद नहीं है। पर यह व्यवहारनय के विषयभून चाम्नव भेद का रोप नही करता। यह स्पष्ट घोषणा करता है कि चेतन और अचेतन में सन् सादृश्य रूप में अनुगत्तव्यवहार हो सरना है पर कोई ऐमा एक सन् नही जो दोनों में धान्ना अनुगत सत्ता रसता हो, सिवाय इसके कि दोनों में 'सत् सत् ऐसा ममान प्रत्यय होता है और 'सत् सत्' ऐसा शब्द प्रयोग होता है। एक द्रव्य को कालक्रम से होने वाली पर्यायों में जो अनुगतम्यवहार होता है यह परमार्धसत् एकदव्यमूलक है। यद्यपि द्वितीयक्षण में अयिभनव्य अखण्ड का असण्ट बदलता है-परिवर्तित होता है पर उप सन का जो कि परिवतित हुआ है अनिय दुनिया से नष्ट नहीं किया जा सस्ता, उसे मिटाया नहीं जा सकता। जो वर्तमानक्षण में अमुक दशा में है वहीं अखण्ड का अखण्ड पूर्वक्षण में अतीतदशा मे था, वही बदलकर आगे के क्षण में तीसरा रूप लेगा, पर अपने स्वरूपमाप को नही छोड सस्ता, सर्वथा महाविनाश के गर्त मे प्रलीन नहीं हो सकना । इसका यह तात्पर्य बिलार नहीं उपमे कोई साइयत यूदस्य भश है, किन्तु बदरने पर भी उसका सन्तानप्रवाह चालू रहता है कभी भी उच्छिन्न नहीं होता और न दूसरे में विलीन होता है । अत एक द्रव्य की अपनी पर्यायो में होनेवाला अनुगत व्यवहार जतासामान्य या द्रव्यमूलक है। यह अपने में वस्नुमन् है। पूर्व पर्याय का असण्ड निचोड उत्तरपर्याय है और उत्तरपर्याय अपने निचोडभूत भागे की पर्याय कोजन्म देती है। इस तरह जैसे अतीत और वर्तमान का उपादानोपादेय सम्बन्ध है उसी तरह वर्तमान और भविष्य का भी । परन्तु सत्ता वर्तमान क्षणमात्र की है। पर यह वर्तमान परम्परा से अनन्त अतीता का उत्तराधिकारी है और परम्परा से अनन्त भविष्य का उपादान भी बनेगा । इसी दृष्टि से द्रव्य को कालजयवर्ती कहते है । शब्द इतने लचर होते हैं कि वस्तु के शतप्रतिशत सरूप को अभ्रान्त रूप से उपस्थित करने में सर्वत्र समर्थ नहीं होते। यदि वर्तमान का अतीत से बिल्कुल सम्बन्ध न हो तभी निरन्वय क्षणिकन्य का प्रसङ्ग हो सकता है, परन्तु जय वर्तमान अतीत का ही परिवर्तित रूप है तब वह एक दृष्टि से साधय ही हुआ। वह केवल पत्ति और सेना की तरह व्यवहारार्थ किया जानेवारा सकेत नहीं है किन्तु कार्यकारणभून ओर खासकर उपादानोपादेयमूरक तत्व है। वर्तमान जलबिन्दु एक ऑक्सिनन और एक हाइड्रोजन के परमाणुओ का परिवर्तन मान है, अर्थात् ऑक्सिजन को निमित पाझर हाइड्रोजन परमाणु और हाइड्रोजन को निमित्त पाकर ऑक्सिजन परमाणु दोनो ने ही जल पर्याय प्राप्त कर ली है। इस द्विपरमाणुक जरबिन्दु के प्रत्येक जलाणु का विलेपण कीनिए तो ज्ञात होगा कि जो एटम ऑक्सिजन अवस्था को धारण किए था वह समूचा बदलार जल बन गया है । उसका और पूर्व ऑक्सिजन का यही सम्बन्ध है कि यह उसरा परिणामह। वह जिस समय जल नहीं बनना प्रस्तावना - और ऑक्सिजन का ऑक्सिजन ही रहता हे उस समय भी प्रतिक्षण परिवर्तन सजातीय रूप होता ही रहता हे । यही विश्व के समस्त चेतन अचेतन द्रव्यों की स्थिति है । इस तरह एक धारा की पर्यायों में अनुगत व्यवहार का कारण सादृश्य समान्य न होकर उर्ध्वतासामान्य प्रौव्य सन्तान या द्रव्य होता है। इसी तरह विभिन्न ध्या में भेदका प्रयोजक व्यतिरेक विशेष होता रे जो तद्व्यक्ति व रूप है । एक द्रव्य की दो पर्याया ग भेद व्यवहार कराने पारा पर्याय नामक विशेष है। जैन दर्शनो उन सभी कल्पनाआ के ग्राहक नय तो बताए हैं जो वस्तुसीमा को लॉधकर अवारत वाद की ओर जाती है। पर साथ ही स्पष्ट कह दिया है कि ये सब बना ये अभिप्राय है, उसके सकल्प के प्रकार है । परतुस्थिति के ग्राहक नहीं है। गुण और धर्म-वस्तु में गुण भी होते हैं और धर्म भी । गुण स्वभावभूत ह और इनकी प्रतीति परनिरपेक्ष होती है। धर्मोकी प्रतीति परसापेक्ष होती है और व्यवहारार्थ इनकी अभिव्यक्ति वस्तु की योग्य- ता के अनुसार होती रहती है । धर्म अनत होते हैं । गुण गिने हुए हैं । यथा-जीव के असाधारण गुण-ज्ञान, दर्शन मुख, वीर्य आदि ह । साधारण गुण वस्तु व प्रमेयत्व सत्त्व आदि । पुद्गल के रूप रस गन्ध स्पर्श आदि अराधारण गुण है। धर्मद्रव्य का गतिहेतुत्व, अधर्मद्रव्य का स्थितिहेतुत्व, आकाश का अवगाहन निमित्तल और कालकर घर्तनाहेतुरव असावारण गुण है । साधारण गुण पस्तुल सत्व अमिधेयस्य प्रमेयव आदि । जीप में ज्ञानादि गुण की सत्ता और प्रतीति निरपेक्ष है, स्वाभाविक है । पर छोटा बडा, पितृत्व पुत्र ध, गुरु व शिष्य व आदि धर्म सापेक्ष है। यद्यपि इनकी योग्यता जीव म है पर ज्ञानादि के समान ये स्वरसत. गुग नहीं है। इसी तरह पुद्गल में रूप रम गन्ध ओर स्पर्श ये तो स्वामाविक परनिरपेक्ष गुण हे परन्तु छोटा घड़ा,एक दो तीन आदि सरया, सकेत के अनुसार होनेवारी घाच्यता आदि ऐसे धर्म है जिननी अभिव्यक्ति व्यवहारार्थ होत है। गुण परनिरपेक्ष स्वत प्रतीत होते हैं तथा धर्म परापेक्ष होकर । घस्तु म योग्यता दोना की है। सामान्यविवक्षा से सभी वस्तु के स्वभार माने जाते हैं। सप्तभङ्गी में धर्मों की कल्पना वक्ता के प्रश्ना के अनुसार की जाती है। एक धर्म को केन्द्र म मानने पर उसका प्रतिपक्षी धर्म आ जाता है। फिर दानो रूपको एकसाथ शब्द से कहने का प्रयन समय नहीं है अत वस्तु का निजरूप अवक्तव्य उपस्थित हो जाता है। इस तरह सा असत् और अरक्तव्य इन तीन धमाँ को रकर अधिक से अधिक सात ही प्रश्न हो सकते हैं। अत सप्तभनी का निरूपण अधिक स अधिक सात प्रश्नों की सभावना का उत्तर है। प्रश्न सात हो सस्ते है इसका कारण सात प्रकार की जिज्ञासा का होना है। जिज्ञासा का सात प्रकार का होना सात प्रकार क सशया के अधीन है। तथा सशय सात इमलिए होते हैं कि वस्तु के धर्म ही सात प्रकार के हैं। विशदशान प्रत्यक्ष-इस तरह ज्ञान द्रव्यपर्यायात्मक और सामान्यविशेषात्मक अर्थ को विषय करता है। केवल सामान्यात्मक या विशेषात्मक कोई पदार्य नहीं है और न केवल द्रव्यात्मक या पर्ययामक ही। इसीलिए अकरकदेवने प्रत्यक्ष का लक्षण करते समय चार्तिक म द्रव्य पर्याय सामान्य और विशेष ये चार विशेषण अर्थ के दिए है। इनकी सार्थकता उपयुक्त विवेवन से स्पष्ट हो जाती है । ज्ञान के लिए उनने लिखा है कि उसे साकार और स्वसवेदी होना चाहिए । यहाँ तक साकार स्वसवेदी और द्रव्यपर्याय सामान्यविशेपार्थवेदी ज्ञान का निरूपण हुआ। ऐसा ज्ञान जब अजसा स्पष्ट अर्थात् परमार्थत विशद हो तब उसे प्रत्यक्ष कहते है । साधारणतया ददानान्तरों में तथा रोकव्यवहार में इन्द्रियजन्य ज्ञान को प्रत्यक्ष माना गया है। तथा इन्द्रिय के परे रहनेवारे पदार्थ का बोध परोक्ष कहा जाता है। पर जैन दर्शन का प्रत्यक्ष और परोक्ष का अपना स्वोपज्ञ विचार है। यह इन्द्रिय आदि पर पदार्थों की अपेक्षा रखने वाले ज्ञान को परोक्ष अर्धार परतन्त्र ज्ञान मानता है, तथा इन्द्रियादि निरपेक्ष आरममानोरथ ज्ञान को प्रयक्ष । यह प्रयक्ष का कारणमूरक विवेचन है। पर स्वरूप में जो ज्ञान विशद हो यह प्रत्यक्ष कहलाता है। यह विशदना व्यवहार में अशत इन्द्रियजन्य ज्ञान में भी पाई जाती है अत इन्द्रियान्य ज्ञान को सध्य वहार प्रत्यक्ष कहते है । यद्यपि आगमों में इन्द्रियजन्य मति को परोक्ष कहा है और वह आगमिक परिभाषा " , न्यायविनिश्चयविवरण में उचित भी है पर रोक व्यवहार में निवांहा पेशधार का सद्भार होने ये उमे याहार मन्यक्ष भी का गया है । शव का पक्षण आदेर ने स्वयं स्यीययय (कारिक ) में पर किया है-- "मनुमानातिरोण विशेषमनिभासनम् । तशय मतं युद्धेरवेशधमत्तः परम् ॥ अर्थात् अनुमरन आदिक से अधिक, गियत देश कार और आकार हप से प्रचुरहर विरोपी के प्रतिभाग को शप कहते है । दूसरे शादी में निय ज्ञान में अन्य दिमी शान वी महायता अपेक्षित ने हो घहसार विगद कहलाता है। जिस तरह अनुमान आदि भान अपनी उत्पति में रिंगज्ञान आदि ज्ञानान्तर की अपेक्षा करते है उस तरह प्रत्यक्ष अपनी उत्पत्ति में किसी शा ज्ञान की आवश्यना नहीं देता। यही अनुमानादि से प्रत्यक्ष में अतिरेक-अधिरना है । यद्यपि आगमिक रष्टि से इन्द्रिय शासक थानान्तर शियी भी झारण की अपेक्षा रानेवाला ज्ञान परोक्ष है और आममात्रप्सापेक्ष ही ज्ञान प्रायक्ष, पर दार्शनिक क्षेत्र में आरदेष के सामने प्रमाणविभाग की समस्या थी जिसे उन्होने यही रवन्धित रंति से सुरमार है। तावार्थभूत्र में गति और ध्रुव इन दोनों शानों को रहा है और यही मति रमृति सझा चिन्ता और भभिनिरोध को अनर्यान्तर बताया है। अनन्तर करने का नाराय इतना ही है कि ये सब मलिज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम से होते है। मति में इन्द्रिय और मन से उत्पन्न होनेवाले आमद इंटर अवाय और धारणा मान सम्मिलित हैं। अकरदेव ने मति को सोमवहारिक प्रत्यक्ष रहकर रोकप्रसिद्धः इन्दिपज्ञान की रक्षता या निनाद किया और स्मृति प्रत्यभिज्ञान र अनुमान और प्रति इन सब को परोक्ष प्रमाण रूप से परिगणित किया । आगम में मठि और श्रुत परोक्ष थे ही । स्मृति आदि मतिज्ञानाकरण के क्षयोपशम से उत्पन्न होने के कारण मतिज्ञान थे ही इसलिए इनरा परीक्षन्य भी सिद्ध था 1 मास इन्द्रिय और मनोजन्य मति को साम्यवहारिक प्रत्यक्ष बना देने से समस्त प्रमाण अवस्था जम गई और रोक प्रसिद्धि का निर्वाह भी हो गया । यद्यपि अदेय ने ल्पीयखर में स्मृति प्रत्यभिज्ञान सर्क और अनुमान को भी मनोमति कहा है और सम्भवत ये इन्हें भी प्रादेशिक प्रत्यक्षकोटि में लाना चाहते थे पर यह प्रयास आगे के आचार्यों के द्वारा समर्थिन नहीं हुआ। दम तरह अपसहदेव ने विशदज्ञान को प्रत्यक्ष कर धीसिद्धसेन दिवार के 'अपरोक्ष प्राहक प्रत्यक्ष हप प्रत्यक्ष रक्षण की कमी को दूर कर दिया। उत्तर कान समस्त जैनाचार्यों ने अटोपन इस रक्षा और प्रमागध्यवस्था को स्वीकार किया है। यद्यपि धोद भी विशदज्ञान की प्रायक्ष कहते हैं फिर भी प्रत्यक्ष के रक्षण में भारदेव के द्वारा विशद पद के साथ ही प्रयुक्त' सापार और अजमा पद खास महाच रसते है । यौह निमिष शान को प्रत्यक्ष कहने है । यह निर्विल्पक ज्ञान जैनासनिक परम्परा में प्रमित विषयविपर्याससिपात के बाद होनेवाले सामान्यानभासी अनाकार दर्शन के समान है। अमलादेव की इदि में जर निर्विकएपक दर्शन प्रमाणकोटि में ही बहिभूम है सब उसे प्रायक्ष तो कहा ही नहीं जा सकता था। इसी बात की सूचना के रिक उन्होंने मायक्ष के रक्षण में साकार पद दिया है । जो निराकार दर्शन तथा धौसमात निर्विल्पर. प्रत्यक्ष निराकरण कर निश्चयामक विशदशन को ही प्रत्यक्षकोटि में रखता है। पौद निर्विकल्पक प्रत्यक्ष के बाद होने वाले 'नीर मिदम्' इत्यादि प्रत्यक्षज विकतों से भी सच्यपहार में प्रमाण मान रेते है। इसका कारण यह है कि यक्ष विषयभूत इस सरक्षण में विश्व के विषपभून विलय सामान्य का एकस्वापवसाय करके प्रवृत्ति करने पर स्वलग ही पास होता है, अत विकतान भी सम्पबहार में प्रमाण बन जाता है। इस विकल्प में निमिएकी ही दिनदना आती है। इस कारण है निर्विकल्स और सदिक्षा का अतिशोध उत्पन होना या एक साथ होना । तात्पर्य यह किबीर मन से सविकल्पक में न तो अपना वैद्य है और न प्रमाणत्व । इसका निरास करने के लिए भालकदेव ने अंगमा विशेषम दिया है और सूचित किया है कि वियज्ञान या विशद है संध्यवहार ये नहीं।
प्रस्तावना परपरिकल्पित लक्षण निरास- बोद्ध निर्विरपक ज्ञान को प्रत्यक्ष मानते हैं । कल्पनापोढ और अनान्तज्ञान उन्ह प्रत्यक्ष इष्ट है। शन्दस सृष्ट ज्ञान विकरप कहलाता है। निविकल्पक शब्दससर्ग से शून्य होता है। निविकल्पक पर मासत् स्वलक्षण अर्थ से उत्पन्न होता है। इसके चार भेद होते हैं-इन्द्रियप्रत्यक्ष, मानसप्र यक्ष, स्वस धे दनप्रत्यक्ष ओर योगिप्रत्यक्ष । निधिकरपा स्वयं व्यवहारसाधक नहीं होता, व्यवहार निविल्पकजन्य सवि- कदपक से होता है। सचिकटपक ज्ञान निर्मर नहीं होता । विकल्प ज्ञान की विशदता सविरूप में झलकती है। ज्ञात होता है कि वेद की प्रमाणता का साइन करने के विचार से योद्धा में शब्द का अर्थ के साथ वास्तविक सम्बन्ध ही नहीं माना और यावत् शब्दस सर्गी ज्ञानों को जिनका समर्थन निविक्रपक सेनहीं होता अप्रमाण घोषित कर दिया है। इनने उन्ही ज्ञाना को प्रमाण माना जो साक्षात् या परम्परा से अर्थसामर्थ- जन्य हैं । निर्यिक्रपक प्रत्यक्ष के द्वारा यद्यपि अर्थ में रहनेवाले क्षणिकत्व आदि सभी धर्मों का अनुभव हो जाता है पर उनका निश्चय यथासभव पिकलकज्ञान और अनुमान से ही होता है। नील निधिक त्पक नीलाश का 'नीरमिदम्' इस रिकरपज्ञान द्वारा निश्चय करता हे और व्यवहारसाधक होता है तथा क्षणिकाश या सर्व क्षणिक सत्त्वात्' इस अनुमान के द्वारा । यूँ कि निर्षिकत्पक 'नील मिदम्' आदि विकरपी का उत्पादक हे और अर्थस्वलक्षण से उपन्न हुआ है अत प्रमाण है। विकल्पज्ञान अस्पष्ट है क्योकि वह परमार्थसत् स्वलक्षण से उत्पन्न नहीं हुआ है। सर्वप्रथम अर्थ से निविकरपक ही उत्पन्न होता है। उस निविकरपावस्या में किसी विकटपक दा अनुभव नहीं होता। वित्त करिपतसामान्य को विषय करने के कारण तथा निविकरपा के द्वारा गृहीत अर्थ को ग्रहण करने के कारण प्रयक्षाभास है। अफल देव इसकी आलोचना इस प्रकार करते है--अर्थक्रियार्थी पुरुष प्रमाण का अन्वेपण करते है। जर व्यवहार में साक्षात् अर्थक्रियासाधता सविकल्पक म ही हे तब क्यो ग उसे ही प्रमाण माना जाय? निविकल्पक में प्रमाणता लाने को आखिर आपको सविकरपक ज्ञान तो मानना ही पड़ता है। यदि निविकल्प के द्वारा गृहीत नीलाद्यश को विषय करने से विकल्पज्ञान अप्रमाण है, ता तो अनुमान भी प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत क्षणिकपादि को विषय करने के कारण प्रमाण नहीं हो सकेगा। निर्विकल्प से जिस प्रकार नीराद्ययो म 'नीर मिदम्' इत्यादि पिकाप उत्पन्न होते हैं उसी प्रकार क्षणिकवादि अशे म भी 'क्षणिकमिदम्' इत्यादि विकल्पज्ञान उत्पन्न होना चाहिये। अत व्यवहारसाधक सवि- परपज्ञान ही प्रत्यक्ष कहा जाने योग्य है। विकल्पज्ञान ही विशदरूप से प्रत्येक प्राणी के अनुभव म आता है, जब कि निधिरत्रज्ञान अनुभव सिद्ध नहीं है। प्रत्यक्ष से तो स्थिर स्थूल अर्थ ही अनुभव म आते हैं, अत क्षणिक परमाणु का प्रतिभास कहना प्रत्यक्षविरुद्ध है। निर्विकल्पक को स्पष्ट होने से तथा सविकल्पक को अस्पष्ट होने से विषयभेद भी मानना सीक नहीं है, क्याकि एक ही वृक्ष दूरवी पुरुष को अस्पष्ट तथा समीपवता को स्पष्ट दीखता है। आद्य प्रत्यक्षकाल में मी कल्पनाएँ बराबर उत्पन तथा विनष्ट. तो होती ही रहती है, भरे ही ये अनुपलक्षित रहें। निधिरप से सविकल्प की उत्पत्ति मानना भी ठीक नहीं है, क्योंकि यदि अशब्द निविश्रपक से सराब्द विक्रपज्ञान उत्पन्न हो सकता है तो शब्दशन्य अर्थ स ही विश्पक की उत्पत्ति मानने म क्या पाया है ? अस मति, स्मृति, सज्ञा, चिन्तादि यायद्विवरपज्ञान सघादी होने से प्रमाण है। जहाँ ये बिस यादी हो यही इन्ह प्रमरण कह सकते हैं। निविस्टपक प्रत्यक्ष में अर्थक्रियास्थिति अथात् अर्थक्रियासाधक्य रूप अविसवाद का लक्षण भी नहीं पाया जाता, अत उसे प्रमाग कैसे कह सकते हैं ? शन्दससृष्ट ज्ञान को विकल्प मानकर प्रमाण कहने से शास्त्रोपदेश से क्षणिस्वादि की सिद्धि नहीं हो सकेगी। मानस प्रत्यक्ष निरास-धौद्ध इन्द्रियज्ञान के अनन्तर उत्पन्न होनेवारे विशदज्ञान को, जो कि उसी इन्द्रियज्ञान के द्वारा ग्राह्य अर्थ के अनन्तरभावी द्वितीयक्षण को जानता ह, मानस प्रत्यक्ष कहते हैं । अकलङ्क देव कहते है कि-एक ही निश्चयात्मक अर्थसाक्षाकारी ज्ञान अनुभा में आता है। आपक द्वारा यताये गये मानस प्रत्यक्ष का तो प्रतिभास ही नहीं होता । 'नीलमिडम्' यह विकस ज्ञान भी मानस .
५६ न्यायविनिश्चयविवरण प्रत्यक्ष का अगाधक है, क्योंकि ऐमा विश्रप शान तो इन्द्रिय प्रत्यक्ष से ही उत्पन्न हो सकता है, इसके रिये मानस प्रत्यक्ष मानने की कोई आवशकता नहीं है। बड़ी और गरम जरेची पाले समय जितनी इन्द्रियबुद्धियाँ उत्पन होती हैं उतने ही सदनन्तरभावी अर्थ को विषय करनेगार मानस प्रत्यक्ष मानना हो, क्योंकि बाद में उतने ही प्रकार के विषयज्ञान उत्पन होते हैं। इस तरह अनेक मानम प्रत्यक्ष मानने पर मन्तानभेद, हो जाने के कारण 'जो मै साने वाला हूँ वही मैं संघ रहा हु यह प्रत्यभिज्ञान नहीं हो सकेगा। यदि समम रूपादि को विषय परने पारा एक ही मास प्रत्यक्ष माना जाय, तर तो उसी से रूपादि का परिज्ञान भी हो ही जायगा, फिर इन्द्रियबुद्धियाँ विस रिये स्वीकार की जाय । धांसर ने मानम प्रयक्ष को आगममसिद्ध कहा है। असल देय ने उसकी भी आलोचना की है कि जनपद मात्र आगममसिद्ध ही है, सय उम रक्षग का परीक्षण ही निरर्थक है। खसंवेदन प्रत्यक्ष सण्डन-यदि म्बसवेदन प्रत्यक्ष निर्विकल्पक है नो निद्रा तथा मूदि अस्याओं में ऐसे निर्विकल्पक प्रयक्ष को मानने में क्या याधा है ? सुपुप्त आदि अवरशाओं में अनुभवसिद्ध ज्ञान का निपंध तो किया ही नहीं आ सस्ता । यदि उक्त अवस्थाभी में ज्ञान का अभाव हो तो उस समय योगियों को पनु सत्यविषयक भावनाओं का भी विच्छेद मानना पड़ेगा। ग्रौद्धसम्मत विकल्प के रक्षण का निरास-बौद्ध 'अभिरापयती प्रतीति कल्पना' अर्थात् जो शान शब्दस मर्ग के योग्य हो उस ज्ञान को करपना या विकल्प ज्ञान कहते हैं । अकलदेव ने उनके इस लक्षण का सपान करते हुए रिसा है कि-य शब्द के द्वारा कहे जाने लायक ज्ञान का नाम सपना है तथा बिना शब्दमय के कोई भी विपरपज्ञान उत्पन्न ही नहीं हो सस्ता, तप शब्द तथा श दासों के स्मरणात्मक विकल्प के लिये तद्वाचक अन्य शन्दों का प्रयोग मानना होगा, उन अन्य शन्दी के स्मरण के रिए भी नवाचक अन्य शब्द स्वीकार करना हागे, इस तरह दूसरे दूसरे शब्दों की कल्पना करने से अनवरया नाम का दूपण आता है। अत जा विकल्पज्ञान ही मिद नहीं हो पाता तर विकल्पज्ञानरूप साधक के अमर में निविपक भी असिद्ध ही रह जायगा और विपिकरपा तथा सविस्पकरूप ममाणहयक अभाव में साधक प्रमाण न होने से सक्ल प्रमेय का मी अभाव ही भास होगा। यदि शब्द तथा शद्वाशा फा स्मरणात्मक विकल्प तद्वाचा शब्दप्रयोग के बिना हो होता है तो विकल्प का अभिलापवाय रक्षण अश्याप्त हो जायगा और जिस तरह शब्द तथा शब्दाशों का स्मरणामक विकल्प तद्वाचक अन्य शब्द के प्रयोग के बिना ही हो जाता है उसी तरह 'नील मिदम्' इत्यादि विकल्प भी चन्दप्रयोग की योग्यता के निा ही हो जायगे, तथा चधुरादिबुद्धियाँ शब्द प्रयोग के बिना ही नीलपातादि पदार्थों का निश्चय फरने के कारण स्वत. भवसायामक सिद्ध हो जायगी । अत विकल्प का अभिलापवत्त्व लक्षण दूपित है। विकल्प का निदाए रक्षण है-समारोपविरोधी ग्रहण या निश्चया मक्त्व । सांख्य प्रोत्रादि इन्द्रियों की वृत्तियों को प्रत्यक्ष प्रमाण मानते हैं। अक्लकदेर कहते हैं कि-श्रोना दे इन्द्रियों की वृत्तियाँ तो मिरिक रोगी को होने वाले द्विचन्द्रज्ञान तथा अन्य सशयादिज्ञानों में भी प्रयोजक होती है, पर ये सभी ज्ञान प्रमाण तो नहीं है। नेया यफ इन्द्रियों और अर्थ के सनिकर्प को प्रत्यक्ष प्रमाण रहते है । इमे भी मालकदेव ने सर्वज्ञ के ज्ञान में अव्याप्त बताते हुये लिखा है कि-विरार निलोक्यर्ती यावत् पदाधों को विषय वरने दास का ज्ञान प्रतिनयत्त शक्तियाली इन्द्रियों से तो उत्पय नहीं हो सकता, पर प्रत्यक्ष तो अवश्य है। भत सप्रिकर्ष भन्याप्त है । शु के द्वारा स्प का प्रत्यक्ष सग्निक के बिना ही हो जाता है। चाभुप प्रत्यक्ष में सनिक की आवश्यकता नहीं है। काँच आदि से व्यवहित पदार्थ का ज्ञान सन्निकर्ष को अनावश्यक्ता सिद्ध कर ही देता है। प्रत्यक्ष के भेद-भारत देव ने प्रत्यक्ष के तीन भेद किये है- इन्द्रिय प्रत्यक्ष २ अभिन्द्रिय प्रत्यक्ष ३ अतीन्द्रिय प्रत्यक्ष । चषु आदि इन्द्रिया से रूपादिक का सष्ट ज्ञान इन्द्रिय प्रत्यक्ष है । मनक द्वारा सुप आदि की अनुभूति मानस प्रत्यक्ष है। अक्सर देव ने लघीयस्त्रयस्यवृत्ति मे स्मृति संज्ञा चिन्ता - प्रस्तावना और अभिनिबोध को अतिन्द्रिय प्रत्यक्ष कहा है। इसका अभिप्राय इतना ही है कि-मति स्मृति संज्ञा चिन्ता और अभिनिबोध ये सब मतिज्ञान है, मतिज्ञानावरण के क्षयोपशम से इनकी उत्पति होती है। मतिज्ञान इन्द्रिय और मन से उत्पन्न होता है । इन्द्रियजन्य मतिज्ञान को जय संव्यवहार में प्रत्यक्ष रूप से प्रसिद्धि होने के कारण इन्द्रियप्रत्यक्ष मान लिया तब उसी तरह मनोमति रूप स्मरण प्रत्यभिज्ञान तर्क और अनु- मान को भी प्रत्यक्ष ही कहना चाहिये । परन्तु संध्यवहार इन्द्रियजन्य मति को तो प्रत्यक्ष मानता है पर स्मरण आदि को नहीं । अत. अफलक की स्मरण आदि को अनिन्द्रिय प्रत्यक्ष मानने की व्यारया उन्ही तक सीमित रही। वे शब्दयोजना के पहिले स्मरण आदि को मतिज्ञान और शब्दयोजना के बाद इन्ही को भूतज्ञान भी कहते हैं । पर उत्तरकाल में असंकीर्ण प्रमाण विभाग के लिए--'इन्द्रिय आर मनोमति सान्य- वहारिक प्रत्यक्ष, स्मृति आदि परोक्ष, श्रुत परोक्ष और अवधि मन.पर्यय तथा केवलज्ञान ये तीन ज्ञान परमार्थप्रत्यक्ष यही व्यवस्था सर्वस्वीकृत हुई। परमार्थप्रत्यक्ष आत्ममान से उत्पन्न होता है। अवधि और मन पर्यय ज्ञान सीमित विपयवाले है तथा केवलज्ञान सूक्ष्म व्यवहित विप्रकृष्ट आदि समस्त पदार्थों को जानता है। परमार्थप्रत्यक्ष की सिद्धि के लिए अरुला देव का निम्नलिखित युक्तिवाद अन्तिम है- "शस्यावरणविच्छेदे शेयं किमवशिप्यते । अप्राप्यकारिणस्तस्मात् सर्वार्थानवलोकते ॥" न्यायवि० श्लो० ४६५-६६ । अर्थात-ज्ञम्वभाव आत्मा के ज्ञानावरण कर्म के सर्वथा नष्ट हो जाने पर कोई ज्ञेय शेप नहीं रह जाता जो उस ज्ञान का विषय न हो सके। चूंकि ज्ञान स्वभावत. अप्राप्यकारी है अत. उसे पदार्थ के पास या पदाथों को ज्ञान के पास आने की भी आवश्यकता नहीं है । अत. ऐसे निराकरण अप्राप्यकारी पूर्ण ज्ञान से समस्त पदार्थों का बोध होना ही चाहिए । सबसे बडी बाधा ज्ञानावरण की थी सो जब वह समूल नष्ट हो गया तो निरावरण ज्ञान यज्ञेय को जानेगा ही। इस तरह इस प्रत्यक्ष प्रस्ताव में प्रत्यक्ष का साङ्गोपाङ्ग वर्णन किया गया है। २ ग्रन्थकार न्यायविनिश्चय मूलमन्थ के प्रणेता जैनन्याययामय के अमर प्रतिष्ठापक, उनटवादी, जनशासन के चिरस्मरणीय प्रभावक, अनेकान्तवाद के उपस्तोता आचार्यवर भट्टाक्लङ्कदेव है। जिनके पुण्यगुणों का स्मरण, जिनकं त्याग की पूतगाथा आज भी जीवन में प्रेरण भार स्फूर्ति देती है । जो न केवल जैन सम्प्रदाय के ही अमरररन थे किन्तु भारतमाता का मुकुट जिन इनेगिने नररवा से आलोक्ति है उनमें अग्रणी थे । वे भारती के भाल की शोभा थे। शास्त्रयों में जिन्हे देवावल भी परास्त नहीं कर सकता था। उन शब्द-अर्थ के धनी पर अकिञ्चन अफलकब्रह्म के मुरय ग्रन्थ न्यायविनिश्चय का तदनुरूप व्याख्याकार वादिराजमूरि के विवरण के माथ प्रथम बार प्रकाशन किया जा रहा है। अन्य के प्रत्यक्ष प्रस्ताव का संक्षिप्त विषयपरिचय पहिले लिखा जा चुका है। प्रन्धकारों के विषय में खासकर उनके समय आदि का ज्ञात परिचय कराना असरप्राप्त है । अफलदेव के समय आदि के विषय में मैं 'अफलङ्क अन्याय की प्रस्तायना में विस्तार से लिए चुका हूँ। उसमें मने प्रन्यो के आन्तर परीक्षण के आधार से इनका समय सन् ७२० मे ७८० तक निश्चित किया था। धर्मकीति तथा उनके शिष्यपरिवार के समय की अवधि के जो दशक निश्चित किए गए हैं, श्री राहुल साल्पायन की सूचनानुमार उनमें संशोधन को गुजाइश है। निशीथचूर्णि में दर्शनप्रभाषक प्रन्या मे जो सिद्धिविनिश्चय का उल्लेख पाया जाता है यह सिद्धिविनिश्चय निश्चयतः अकलंककृत ही है और निशीपचूर्णि के कर्ता वे ही जिनदासगणि महत्तर है जिनन शासं० ४९८ अर्थात् सन् ६७६ में नन्दीचूर्णि ५८ न्यायविनिश्चयविवरण की रचना की थी। ऐसी दशा में सन् ६७६ वे आसपास रची गई निशीथपूर्णि में भारको मिद्धिमिनिश्चय का उल्लेख एक ऐमा मूल प्रमाण यन साता है जिसके आधार से न केवल अलका ही समय निश्चित किया जा सरना है अपितु इस युग के भनेक बौद्धाचार्य और वैदिक आचार्यों के समय पर भी मौरिक प्रकाश दाला जा सकता है। मैं इसी अन्य के द्वितीय भाग की प्रस्तावना में या राजयाति प्रन्य की परतावना में इसकी साधार मानीन परना चाहता हूँ । अभी तक जो सामग्री प्राप्त हुई है उसके आधार से उपयुस सूचना देकर पिराम रेता हूँ। धादिराजसूरि का समय सुनिश्चित है। उसने अपना पानायचरित्र शक सं० ९४७ कातिक सुदी ३ को बनाया था। ये उस समय चालुक्य घरवती जयसिहदेव की राजधानी में निवास करने थे। उनके इस समय की पुष्टि अन्य ऐतिहासिक प्रमाणों से भी होती है। अत सन् १०३२ के आसपास ही इस ग्रन्थ की रचना हुई होगी । जैन समाज के सुप्रसिद्ध इतिहत्तज्ञ २० नाथूरामनी प्रेमी ने अपने 'जैन साहित्य और इतिहास' ग्रन्थ में वादिरानसूरि पर सानोपाङ्ग रिसा है। उनका यह नियन्य पाठको की जानकारी के रिए साभार उद्धत किया जाता है। चादिराजमरि परिचय और कीर्तन-दिगम्बर सम्प्रदाय में जो बडे बडे तारि दुप है, वादिराजसूरि उन्ही में से एक हैं। ये प्रमेयामरमार्तण्ड न्यायकुमुदचन्द्रादि के फर्ना प्रभाचन्द्राचार्य के समकालीन है और उन्हीके समान महाफलक देव के एक न्याय अन्य के टीकाकार भी। तार्किक होकर भी ये उचकोटि के कवि थे और इस दृष्टि से उनसी नुरता सोमदेवसूरि से की जा सकती है जिनकी बुद्धिरूप गऊ ने जीवनभर शुष्क तरप धाप्त सार काव्यदुग्ध से महृदयजनों को तृप्त किया था। वादिराज इमिल या द्रविण २घ के थे। इस मघम भी एक नन्दिप था, जिसकी अगल शाखा के ये आचार्य | । भर गल किसी स्थान या ग्राम का नाम था, जहाँ की मुनिपरम्परा अगलान्त्रय कहलाती थी। एक्षपण्मुख, स्याद्वादविद्यापति और जगदेकमालबादि उनकी उपाधियाँ थी। एकीभावम्तोत्र के अन्त मे एक श्लोक है जिसका अर्थ है कि सारे मान्दिक (वैयाकरण), ताकि और भव्यमहायक यादि- राज से पीछे है, अर्थात् उनकी बराबरी कोई नहीं कर सकता। एक शिलालप में कहा है कि सभा में वे अरला देव (जैन), धर्मकीति (वाद, पृहस्पति (चावाक), और गौतम (नैयायिक) के तुल्य ह और इस तरह वे इन जुदा जुदा धर्मगुरुओं के एकीभूत प्रतिनिधि से जान पड़ते है। महिलणे प्रशस्ति म उनकी और भी अधिक प्रशसा की गई है और उन्ह महान् वादी, विजेता और कवि प्रकट किया गया है। १-देखो 'दविंण रुप में भी नन्दिसप। जैन साहिल और इतिहास प्र.५४। २--पस्तामुख स्याद्वादविद्यापलिगल जगदेकरल्लादिगल एनिसिर धोकादिराजदेवम् । -~fi• राइसद्वारा सम्पादित नगर ताल्लुका के इस नं.३६॥ ३-वादिराजमनु शाब्दिकलीको वादिराजमनु ताकिसिंह । वादिराजमन काव्यक्तस्ते वादिराजमनु भन्यसहाय ॥-एकीभावस्तीन । 1- सदपि यदा' कीर्तने धर्म तिर्वचसि मुरपुरोधा न्यायवादेभपाद । इति समयगुणामेक्त संगताना प्रतिनिधिरिव देवो राजते वादिराज -इ.न. १९ ५--यह प्रशस्ति श० सं० १.५० (वि. स. ११४५) की उत्कीर्ण की हुई है। 1-प्रोक्यदीपिका वाणी द्वाभ्यामेवौदयादिह । जिनराजत एकरसादेऊस्मादिरात ..॥
प्रस्तावना वे श्रीपालदेव के प्रशिष्य, मसिसागर के शिष्य और रूपसिद्धि (शाकटायन व्याकरण की टीका) के पर्ता दयापाल' मुनि के सतीर्थ या गुरुभाई थे। वादिराज यह एक तरह की पश्वी या विशेषण है, जो अधिक प्रचलित होने के कारण नाम ही बन गया जान परता है परन्तु वास्तव नाम कुछ और ही होगा, जिस तरह वादीभसिंह का असल नाम अजितसेन था। समकालीन राजा-चौलुक्यनरेश जयसिंहदेव की राजसभा में इनका बड़ा सम्मान था और ये प्रख्यात घादी गिने जाते थे। महिलपेण-प्रशस्ति के अनुसार जयसिंह द्वारा ये पूजित भी ये-'सिंहसमर्य- पीठविभवः' । जसिंह (प्रथम) दक्षिण के सोलंकी वंश के प्रसिद्ध महाराजा थे। पृथ्वोवलम, महाराजाधिराज, पर- मेश्वर, चालुक्यचश्वर, परमभहारक, जगदेकमाल आदि उनकी उपाधियाँ थी। इनके राज्यकाल के तोप से ऊपर शिलालेख दानपन आदि मिल चुके हैं जिनमें पहला लेख श०सं० ९३८ का है और अन्तिम श० सं० ९६४ का है। अतएव कम से कम ९३८ से ९६४ तक तो उनका राज्य काल निर्विवाद है। उनके पोपत्रदी द्वितीया श०सं० ९४५ के एक लेख में उन्हें भोजरूप कमर के लिये चन्द्र, राजेन्द्र चोल (परकेसरी पर्मा) रूप हाथी के लिये सिह, मालवे की सम्मिलित सेना को पराजित करने वाला और चेर-चोल राजाभी को दण्ड देनेवाला लिखा है। वादिराज ने अपना पाइर्वनाथ चरित सिंहबकेश्वर या चालुक्यचकवी जयसिंह देव की राजधानी - आरद्धाम्बरमिन्दुबिम्बचितौत्सुक्य सदा यद्यश- इछत्रं वाचमरीजराजिम्चयोऽन्यणं च यत्कर्णयोः । सेव्यः सिहसमय॑पीठविभवः सर्वप्रवादिप्रजा- दत्तोचैर्जयकारसारमहिमा वादिरानो विदाम् ॥४॥ यीयगुणगोचरोऽयं वचनविलासप्रसरः कवीनाम्- धीमच्चोळुन्यचकेश्वरजयकटके वाम्बधूजन्मभूमी निष्काण्ड डिण्डिमः पर्यटति पटुरटो वादिराजस्य जिष्णोः। जयद्यद्वाग्दो जहिहि गमकता गर्वभूमा जहाहि, व्याहारेर्यो नहीहि स्फुट मृदु-मधुर-श्रव्यकाव्यावलेपः ॥४२॥ पाताले व्यालरानो व सति सुविदितं यस्य जिलासहस्र निर्गन्ता स्वर्गतोऽसो न भवति धिषणो वनमृद्यस्य शिष्यः । जीवेतान्ताघदेतौ निलयबलवशावादिनः केऽत्र नान्ये, गर्व निर्मुच्यं सर्व जयिनमिन-सभे पादिराजं नमन्ति ॥४३॥ बाग्देवीमुचिरप्रयोगसुदृढ़प्रेमाणमप्यादरा- दादत्ते मम पार्श्वतोऽयमधुना धीवादिराजो मुनिः । भी भी पश्यत पश्यतैप यमिना कि धर्म इत्युच्चकै- रब्रह्मण्यपराः पुरातनमुनेतृत्तयः पान्तु वः ॥४४॥ -हित पेण! यस्य नृणामुदात्तवाचा निबद्धा हितरूपमिद्धिः। वन्द्यो दयापालमुनिः स पाचा सिखस्मताम्मूद्धनि यः प्रभावैः ॥३८॥ म०प्र० । २-सालभुवनपालानम्रमूर्दादबद्धस्फुरितमुकुटचूडालौढपादारविन्दाः । मदवदखिलवादीभेन्द्रकुम्भप्रभेदी गण मृदजितसेनो भाति यादीभसिंहः ॥५७ ३-वादिराज की एक पदवी 'जगदेकमल्ल-वादि' है । क्या अाश्चर्य जो उसका अर्थ जगदेकमल्ल (जयसिंह) का बादि ही हो।
न्यायविनिश्शयविवरण में ही निवास करते हुए स० स० ९५७ की कार्तिक मुढी ३ को बनाया था। यह जयमिह का ही राज्य काल है। यह राजधानी लक्ष्मी का निवास थी और सरस्वती देवी (चावध) की जन्मभूमि थी। यशोधरधरित वे नसरे मर्ग के अन्तिम ८५३ पद्य में और चौथे सगंदे उपान्य परा में कवि ने चतुराई मे महाराजा जयसिंह का उल्प दिया है। इससे मालूम होता है कि यशोधरधरित की रचना भी जयसिंह के समय में हुई है। राजधानी-चालुक्य जयसिंह की राजधानी कहाँ थी, इममा अभी तक टीम सीक पता नदी गा है। परन्तु पार्श्वनाथ रित की प्रशस्ति के छठे सारेर मे मा मादम होता है कि वह 'कहगेरी' नामक स्थान में होगी जो इस समय महास मदनं मराग में की गदग-होटगी शारया पर एक माधा रण मा गाँव है और जो यटामा से १२ मीर उत्तर की ओर है । यह पुराना महर है और इसर्व चारों ओर भय भी शहर-पनाह के चिन्ह मौज्ड है । उन इलोव का पूर्वान' मुद्रित प्रति में हग्य प्रकार का है-- लक्ष्मीवाले यसति कटके पट्टगानीरभूमी फामायाप्तिप्रमदसुभगे सिंहचकेश्वरस्य । हममे मिहचा वर अर्थान् जयसिंहदेवकी राजधानी (करक) का वर्णन है जहाँ रहो हुए ग्रन्थ कां ने पानाधचरित की रचना की थी। इसमें राजधानी का नाम अवश्य होना चाहिये, परन्तु उन पाठ मे उमका पता नहीं चलता । गिर्म दनना मालूम होता है कि वहाँ रक्ष्मी का निवास था, और पह पहा नदी के होर की भूमि पर थी। हमारा अनुमान है कि शुद्ध पाट 'कटगेरीनि भूमी' होगा, जो उत्तर भारत में अद्ध'दग्ध लेपका की कृपा मे 'फगातीरभूमी' बन गया है। उन्हें क्या पता कि 'कगर्ग' जैमा अडबड नाम भी किसी राजधानी का हो सकता है। अमिह के पुत्र सोमेश्वर या आहरमर ने 'पत्याण' नामक नगरी बसाई और यहाँ अपनी रान. धानी स्थापित की । इसका उल्लेव विरक्षण ने अपने 'विक्रमाक देवचरित' में दिया है । कपाण का नाम इससे पहरे के किसी भी शिलालेख या ताम्रपत्र में उपलब्ध नहीं हुआ है, अतः इसके पहले चौलुस्यों की राजधानी 'गेरी' में ही नहीं होगी। इम स्थान मे चालुक्य विक्रमादिय (दि.) का ई०प० १०५८ का पनढी शिलास भी मिला है जिससे उसका चालुक्य नाग्य के अन्तर्गत होना स्पष्ट होना है। कहगा नाम की कोई नदी उप तरफ नहीं है। मठाधीश-पाश्वनाथचरित को प्रशस्ति में वादिरानमूरि ने अपने दादागुर श्रीपालदेव को 'सिंहपुरेक्मुस्य' लिखा ह और न्यायविनिश्चयविवरण को प्रशस्नि में अपने आप को भी 'सिंहपुरेश्वर' लिखा है । इन दोनो शब्दों का अर्थ यही मालूम होता है कि वे सिंहपुर नामक स्थान के स्वामी थे, अर्थात् सिंहपुर उन्हें जागार में मिला हुआ था और शायद वहीं पर उनका मठ था। श्रवणबेलगोर के ४९३ नम्बर के शिरारेच म-जो २० स० १०४७ का उकीर्ण किया हुआ है-- चादिराज की ही शिष्यपरम्परा के श्रीपाल विद्यदेव को होटपर-नरेश,विष्णुवर्द्धन पोय्पलदेव के द्वारा निन मन्दिर के जीणों द्वार और ऋपियों को आहा दान के 'हेतु शत्य नामक गाँव को दानस्वरूप देने का वर्णन है और ४९५ नम्बर के शिरालेख में-नोश० स० ११२२ के लगभग का उत्कीर्ण किया हुआ है- लिखा है कि पड्दर्शन के अध्येता श्रीपालदेव के स्वर्गवास होने पर उनके शिष्य धादिराज (द्वितीय) ने ~यातन्दजयसिहता रणमुपे दोघं दधौ धारिणीम् । २-रणमुखजयसिंहो राज्यला मी मभार ३-सर्ग लोक ॥ ४-इस मुनि परस्परा में वादिराज और श्रीपादेव नाम कई आधाई हो गये हैं। ये वादिराज दसरे हैं। ये गगनरेश राचमल्ल चतुर्थ या सत्यवाक्य के गुरु थे।
प्रस्तावना 'परिवादिमल्ल जिनालय' नाम का मन्दिर निर्माण कराया और उसके पूजन तथा मुनियों के आहार-दान के लिये कुछ भूमिका दान किया। इन सब बातो से साफ समझ में आता है कि वादिराज की गुरशिप्यपरम्परा मठाधीशों की पर- म्परा थी, जिसमे दान लिया भी जाना था और दिया भी जाता था। वे स्वयं जैनमन्दिर बनवाते थे, उनका जीर्णोद्वार कराते थे और अन्य मुनियों के आहार दान की भी व्यवस्था करते थे । उनका 'भन्यमहाय' विशेषण भी इमी दानरूप सहायता की ओर संकेत करना है । इसके सिवाय वे राजाओं के दरबारी में उपस्थित होते थे और वहाँ वाद-विवाद करके वादियो पर विजय प्राप्त करते थे। देवसेनसूरि के दर्शनपार के अनुसार द्राविडमघ के मुनि कच्छ, खेत, बमति (मंदिर) और वाणि. ज्य करके जीविवा करने थे और शीतल जल से स्नान करते थे। मन्दिर बनाने की बात तो ऊपर आ चुकी है, रही खेती बारी, सो जब जागीरी थी तर यह होती ही होगी और आनुषङ्गिक रूप में वाणिज्य भी। इस- • लिये शायद दर्शनसार में द्राविडसंघ को जैनाभास कहा गया है। कुष्ठ रोग की कथा-वादिराजसूरि के विषय में एक चमकारिणी कथा प्रचलित है कि उन्हें कुछरोग गया था। एक बार राजा के दरबार में इसकी चर्चा हुई तो उनके एक अनन्य भक्त ने अपने के बाद के भय से झूठ ही कह दिया कि उन्हें कोई रोग नहीं है।' इसपर वहस छिड़ गई और आखिर राजा ने कहा कि 'मैं स्वयं इसकी जाँच करूंगा। भक्त घबदाया हुआ गुरजी के पास गया और बोला 'मेरी लाज अब आपके ही हाथ हे, मैं तो कह आया।' इसपर गुरजी ने दिलामा दी और कहा, 'धर्म के प्रसाद से सब ठीक होगा, चिन्ता मत करो।' इसके बाद उन्होंने एकीभावस्तोत्र की रचना की और उसके प्रभाव से उनका कुष्ट दूर हो गया। एकीभाय की चन्द्रकीर्ति भट्टाररुकृत संस्कृत टीका मे यह पूरी कथा तो नहीं दी है परन्तु श्लोक की टीका करते लिखा है कि "मेरे अन्त करण में जब आप प्रतिष्टित है तब मेरा यह कुष्टरोगाकान्त शरीर यदि सुवर्ण हो जाय तो क्या आश्चर्य है ? "अर्थात् चन्द्रकीर्तिजी उक्त कथा से परिचित थे। परन्तु जहाँ तक हम जानते हैं यह कथा बहुत पुरानी नहीं है और उन रोगों द्वारा गदी गई है जो ऐसे चमत्कारी से ही आचार्यों और भट्टारको की प्रतिष्ठा का गाप किया करते थे । अमावस के दिन पूनो के चन्द्रमा का उदय कर देना, चवालीस या अडतालीम बेडियो को तोडकर कैद में से बाहर निकल आना, माँप के काटे हुए पुत्र का जीवित हो जाना आदि, इस तरह की और भी अनेक चमत्कारपूर्ण स्थायें पिछले महारको की गढी हुई प्रच- लित हैं जो असंभव और अप्राकृतिक तो हैं ही, जैनमुनियों के चरित्र को और उनके वास्तविक महत्व को भी नीचे गिराता हैं। यहाँ यह स्मरण रखना चाहिये कि सच्चे मुनि अपने भक्त के भी मिथ्याभाषण का समर्थन नहीं करते और न अपने रोग को छुपाने की कोशिश करते है। यदि यह घटना सत्य होती तो महिलपेग प्रशस्ति (श०सं० १०५०) तथा दूसरे शिलालेखों में जिनमें वादिराजमूरि की बेहद प्रशंसा की गई है, इसका उल्लेख अवश्य होता । परन्तु जान पड़ता है तर तक इस कथा का आविर्भाव ही न हुआ था। इसके सिवाय एवीभाव के जिस चोथे पद्य का आश्रय लेकर यह स्था गढी गई है, उसमें ऐसी कोई यात ही नहीं है जिससे उन घटना की कल्पना की जाय। उसमें कहा है कि जब स्वर्ग लोक से माता के गर्भ में आने के पहले ही आपने पृथ्वीमंडल को सुवर्णमय कर दिया था, तब ध्यान के द्वारा मेरे अन्तर मे प्रवेश करके यदि आप मेरे इस शरीर को सुवर्णमय कर दे तो कोई आश्चर्य नहीं है। यह एक भक्त कवि की सुन्दर और अनूठी उप्रेक्षा है, जिसमें वह अपनेको कर्मों की मलिनता से रहित मुवर्ण या उसवल बनाना ५-हे जिन, मम स्वान्तगेई ममान्त करणमन्दिरं त्वं प्रतिष्ठ सन् यत इदं मदीयं कुष्टरोगाकान्त शरीरं सुवीकरोपि, तर्हिक चित्रं तकिमाश्चर्य न किमपि आश्चर्यमित्यर्थः ।
न्यायविनिश्चयविवरण चाहता है। आगे ५, ६, ७ पयों में भी इसी नाह के भाव हैर आप मेरी चिसशरा पर विधाम करेंगे, सो मेरे कोशी को कैसे सहन करेंगे ? आपकी स्याहाद वापिका में स्नान करने से मेरे दु मगन्ताप क्या न दर हंगे जब आप घरण रसने में नीनों रोक पवित्र हो जाते है तर सांग रप में आपसे स्पर्श करने यारा मेरा मन क्यो कल्याणभागी न होगा? आदि। सम्राट हर्षवर्धन के समय में मदर कपि ये विषय में भी जो महामवि याण के समुर और सूर्य- शतक नामर स्तोत्र के पती है एक ऐसी स्था प्रसिद्ध है। मम्मटकृत काव्य प्रराश के टीकाकार जयराम ने लिया है कि मयूर कधि मोरोको से सूर्य का स्तवन करके कुष्ट रोग से गुरु हो गया। सुधामागर नाम के दूसरे टीकाकार ने लिखा है कि मयूर कवि यह निश्चय करके कि या तो कुछ से मुन हो जाऊँगा या प्राण ही छोड़ दूंगा हरद्वार गया और गगातट पे एवं बहुत ऊँचे झाड की शाया पर सौ रस्सियों पाले डीके में बैठ गया और सूर्य देव की स्तुति करने लगा | एक एक पद्य को कहकर यह टीके को एक एक रस्पी चाटता जाता था। इस तरह करते करने सूर्यदेव सन्तुर हुए और उन्होंने उमा शरीर उसी समय नीरोग और मुन्दर कर दिया। काव्यप्रकाश के नीमरे दीवार जगन्नाथ ने भी सभा यही बात कही है। हमारा अनुमान है कि इसी सूर्य-शनक म्नवन की क्या के अनुकरण पर वादिराजमूरि के एकीभाव स्तोत्री कथा गदी गई है। हिन्दुओं के देवना तो 'क्नुमा मन्यथापतु समर्थ' होने है, इसरिये उनके विषय में इस तरह थी कथायें कुछ अर्थ भी रखती है परन्तु जिनभगवान् न तो स्तुतियों से प्रसन्न होते है और न उनमें यह साम है कि किमी भयंकर रोग को बात की बात में दूर कर दें। अतएव जैन धर्म के विश्वासों के माथ इस रह की क्याओं का कोई मामजस्य नहीं बैठना । ग्रन्थ रचना-धादिराजमूरि के अभी तक नीचे लिखे पाँच ग्रन्थ उपलब्ध हुए है- १-पार्श्वनाथचरित-यह एक १२ सर्ग का महाकाव्य है और 'माणिचन्द्र जैन ग्रन्थमारा' में प्रकाशिन हो चुका है। इसकी बहुत ही सुन्दर सरम और प्रीद रचना है। ' पानार्थंकाकुत्स्थचरित नाम में भी इसका उदरेख किया गया है २-यशोधरधरित 1- यह एक चार सर्ग का छोटासा सण्डकाव्य है जिपमें मय मिराकर २९६ पद्य है। इसे नंजीर के स्व० टी० एम० कुष्पस्वामी नास्त्री ने बहुत समय पहले प्रशशित किया था सो अब अनुपलभ्य है। इसकी रचना पार्श्वनाथचरित के बाद हुई थी। क्योंकि इसमें उन्होंने अपने को पार्श्वनाथचरित का कत्तां बताया है। ३-एकीभारम्तोत्र-यह एक छोटा सा २५ पौ । अनिशय सुन्दर स्तोत्र है और 'एकीभाई गन इव मया से प्रारम्भ होने के कारण एकीभार नाम से प्रसिद्ध है। - १-"मयूरनामा कवि एतदलोरेन आदित्यं स्तुत्वा पुष्टान्निस्तीर्ण इति प्रसिद्धि। १-पुरा किल मयूरशर्मा कुष्ठी कवि क्लेशमसहिष्णु सूर्यप्रसादेन कुठानिस्तराम प्राणान्या त्यजामि इति निश्चित्य हरिद्वारं गत्वा गंगातटे अत्युच्चशाखवलम्बि शनरज्जुशिक्यमधिस्ट सूर्यमस्तीपीन् । भकरोचैरे. कपद्यन्ते एक करज्जुविच्छेदम् । एव नियमाणे काव्यतुष्टो रविः गय एव निरोगी रमणीयां च तत्तनुमकापीत् । प्रसिद्ध तन्मयूरशतर्फ सूर्यशतमारपर्यायमिति ।" ३-~धी मन्मयूरभ पूर्वजन्मदुष्टहेतुक्मलितकुष्टजुष्टो .... यादि । ४-~धीपार्शनाथकाकुस्थचरित येन वीनितम् । नेन धीवादिराजेन दृब्धा याशोधरी कथा ॥५-रशोधरचरित, पर्व १। पहले मैंने भूल से 'श्री पार्वनाशकाकुत्स्थचरित' पद से पार्श्वनायवरित और काकुत्स्यवरित नाम के दो अन्ध समझ लिये थे। मेरी इस भूल को मेरे बाद के लेखकों ने भी दुहराया है। परन्तु ये दो प्रध होते तो द्विवचनान्तपद होना चाहिए था, जो नहीं है । 'कारस्थ' पावनय वे वंश का परिचायक है।
प्रस्तावना ४-न्यायविनिश्वयविवरण-यह भट्टाकलंकदेव के 'न्यायविनिश्चय' का भाष्य है ओर जैन- न्याय के प्रसिद्ध ग्रन्थों में इसकी गणना है। इसकी श्लोक संख्या २०,००० है। ५-प्रमाणनिर्णय-प्रमाणशास्त्र का यह छोटा सा स्वतंत्र ग्रन्थ है जिसमें प्रमाण, प्रत्यक्ष, परोक्ष और भागम नामके चार अध्याय है। माणिकचन्द्र-जैन-ग्रन्थमाला में प्राशित हो चुका है। अध्यात्माटक-यह भी एक छोटा सा आठ पोका ग्रन्थ है और माणिकचन्द्र ग्रन्धमालामें प्रकाशित हो चुका है । पर यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि इसके कत्तों ये ही धादिराज है। त्रैलोक्यदीपिका नाम का अन्य भी वादिराज सूरिफा होना चाहिये जिसका संकेत उपर टिप्पणी में उद्धृत किये हुए 'प्रैलोक्यदीपिका बागी' आदि पद्य में मिलता है। स्व० सेट माणिकचन्द्रजी ने अपने यहाँ के अन्य-संग्रह की प्रशस्निपो का जो रजिस्टर बनवाया था उससे मालूम होता है कि उक्त संग्रह में 'बैलोक्यदीपिका' नाम का एक अपूर्ण ग्रन्थ है जिसमें आदि के दस और अन्त के ५८ वें पत्र से आगे के पन्न नहीं है। सम्भव है, यह वादिराजसूरि को ही रचना हो। इसे करणानुयोग का ग्रन्थ लिखा है। पार्श्वनाथचरित की प्रशस्ति श्रीजैनसारस्वतपुण्यतीर्थनित्याबगाहामलवुद्धिसत्यैः ।। प्रसिद्धभागी मुनिपुङ्गवेन्द्रः श्रीनन्दिसघोऽस्ति निवहितांहाः॥१॥ तस्मिन्नभूदुघतसंयमधीस्वैविद्यविद्याधरगीत कीर्तिः । सूरिः स्वयं सिंहपुरैकमुख्यः श्रीपालदेयो नयवर्मशाली ॥२॥ तस्याभवद्भव्यसरीखदाणां तमोपदो नित्यमहोदयश्रीः । निषेधदुर्मार्गनयमभावः शिष्योत्तमः श्रीमतिसागराख्यः ॥३॥ तत्पादपद्मनमरेण भूम्ना निश्रेयसश्रीरतिलोलुपेन । श्रीवादराजेन कथा निबद्धा जैनी स्वयुद्धेयमनिर्दयापि ॥४॥ शाकान्दे नगवार्धिरन्ध्रगणने संवत्सरे शोधने माले कार्तिकनाम्नि चुद्धिमहिते शुद्ध तृतीयादिने । सिंहे पाति जयादिके वासुमती जैनी कथेयं मया निष्पत्तिममिता सती भयत्तु का कल्याण निष्पत्तये ॥ लक्ष्मीवाले वसतिकरके कगातीरभूमौ कामावाप्तिप्रमदसुभगे सिंहचकेश्यरस्य । निप्पन्नोऽयं नघरससुधास्यन्दसिन्धुप्रवन्धो जीयादुच्चैर्जिनपतिभवप्रक्रमकान्तपुण्यः ॥६॥ अन्यश्रीजिनदेवजन्मविभवच्यावर्णमाहारिण. श्रोता यः प्रसरत्प्रमोदसुभगो व्याख्यानकारी च यः । सोऽयं मुक्तियधूनिसर्गसुभगो जायेत किं चैकशः सर्गात्तेऽप्युपयाति वाड्मयलसलक्ष्मीपश्रीपदम् ॥७॥ समाप्तमिदं पार्श्वनाथचरितम् । .
न्यायविनिश्चयविवरण न्यायचिनिश्चयविवरण की प्रशस्ति श्रीमन्यायविनिश्चयस्तनुभृतां चेतोगुवा नलः सन्मार्ग प्रतियोधयनपिन तान्तिाश्रेयसमापणम् । येनायं जगदेकयसलधिया लोकोत्तरं निर्मितो देवस्तार्किकलोकमस्तकमणिभूयात्स वः श्रेयसे ॥१॥ विद्यानादमनन्तवीर्यसुपर्द श्रीपूज्यपादं दया-- पालं सम्मतिसागरं कनकसेनाध्यमभ्युद्यमी । शुद्धयनीति नरेन्द्रसेनमालंक धादिराज सदा, श्रीमत्स्वामिसमन्तभद्रमतुलं वन्दे जिनेन्द्रं मुदा ॥२॥ भूयो भेदनयावगाहगहनं देवस्य यद्वाड्मयं कस्तद्विस्तरतो विविच्य यदितुं मन्दप्रभुर्मादृशः। स्थूलः कोऽपि नयस्तक्तिविषयो व्यक्तीकृतोऽयं मया स्थेयाच्चेतसि धीमतां मतिमलप्रक्षालनकक्षमः ॥३॥ व्याख्यानरत्नमालेयं प्रस्फुरनयदीधितिः । प्रियतां हदि विद्रदिस्तुदंती मानसं नमः ॥en श्रीमसिहमहीपतेः परिपदि प्रख्यातवादोन्नति- स्तन्यायतमोपहोदयगिरिः सारस्वतः श्रीनिधिः। शिष्यः श्रीमतिसागरस्य विदुणं पत्युस्तपाश्रीभृतां भर्तु : सिंहपुरेश्वरो विजयते स्याद्वादविद्यापतिः ॥५॥ इति स्याद्वादविद्यापतिविरचितायां न्यायविनिश्चयतात्पर्यावद्योतिन्यां व्याय्यानरत्नमालायां तृतीयः प्रस्तावः समाः । इस तरह अन्य और प्रन्यार के सम्बन्ध में कुछ खास ज्ञानस्य मुद्दों का निर्देश करके इस प्रस्तावना को यही समाप्त किया जाता है। अफल की जैनन्याय को देन, आलङ्क का समय तथा न्याय- चिनिश्चयविवरण के अनुमान और प्रवचन प्रस्ताव का विषय-परिचय इसी अन्य के द्वितीय खण्ड की प्रस्तावना मे चर्चित होंगे। भारतीय ज्ञानपीठ काशी। मार्गशीर्ष वीर सं० २१७५ ~पहेन्द्रकुमार जैन कृष्ण ३० - विषयसूची २७ ४० 1८४ ५८ पृष्ठम् सृष्टम् घिवरणकर्तुङ्गलम् १ | मंशयज्ञान-आदर्शमुखज्ञानदृष्टान्ताभ्यां अन्वय- मगलप्रयोजनप्रतिपादनम् व्यतिरेकवद्वस्तुविषयत्वप्रतिपादनम् मूलग्रन्थकतो मङ्गलम् विकल्पकत्वस्य विविधमुखेन खण्डनम् १३२ भगवतो शान न सर्वार्थविपयम् अपितु हेयो 'शब्दसंसर्गशून्यत्वं विकल्पकत्वम्' अस्मिन् पादेयतत्वाविषयमेवेति बौद्धमतस्य निरा. पक्षे अप्रमाणप्रमेयत्वदोपः 1३४ करणम् न मोजना पारमार्थिकीति प्रझाकरमतस्य न्याययिनिश्वयकरणहेतुप्रतिपादनार्थ समालोचनम् द्वितीयकारिका न स्थूलाकारस्य अपतः प्रतिभासः अपि तु म्पत एप वेदस्य अर्थप्रतिपादकास्वमितिमीमां- परमार्थसतो बहिरर्थस्य सकमतस्य प्रत्याख्यानम् २८-३२ क्रमण परापरपर्यायाविष्यग्भावस्वभावस्य संवेदनाद्वैतस्य आलोचनम् द्रव्यस्य प्रतिभासनम् शून्यवादपराकरणम् न प्रत्यक्षेण गुणव्यतिरिक्तस्य द्रव्यस्य साक्षा- वसामर्थप्रतिपादकत्वसमर्थनम् ४२-४८ स्वारः अपितु जास्यन्तरस्य आदिवाक्यप्रयोजनविचारः ५१ गुणन्यतिरिक्तस्य दप्यस्य साक्षात्कार इति प्रत्यक्षलक्षणनिरूपणपरा योगमतस्य निरासः १८१ तृतीयकारिका न प्रत्यक्षे क्षणविशरारूपर्यायप्रतिभासः करणम्वरूपविमर्शः | स्वसंवेदनप्रत्यक्षविवेचनम् १८६ कारकसाकल्यस्य प्रमाणस्वनिषेधः ६० | परोक्षज्ञानवादनिरासः भर्थपदेन शुक्तिकारजतशानस्य जपच्छेदः स्वसंवेदनमपि व्यवसायस्वभावमेव न तु स्मृतिममाणस्य निराकरणम् निर्विकल्पकम् विचार: प्रमाणं न घेत्यादि विचारः ७६ | अर्थज्ञानं स्वसंवेदनात्मकमिति समर्थनम् शागस्य स्वसंवेदनसिद्धिः मुखादयः स्वसं विदिता एव सातादिकारिणः २०१ प्रत्यक्षस्य लक्षणम् ८५) मुखादेरप्रत्यक्षत्वे भोगानुपपत्तिः स्पष्टत्वस्य विषेचनम् बुद्धरप्रत्यक्षत्वे तत्स्वरूपसिद्धिरपि दुर्लभा 'सनिहितार्थत्वात् स्पष्टं प्रत्यक्षम्' इत्यत्र ज्ञामान्तरवैद्यज्ञानवादिनो नैयायिकस्य मत- सन्निहितत्वस्य विचारः विदलनम् भवैशयविचारः ९० स्वात्मावबोधकन्याभावेऽपि ज्ञानस्य परबोध. प्रत्यक्षस्य विध्यप्रतिपादनम् कत्वमिति भासर्वशीयमतखण्डनम् २१५ इन्द्रियप्रत्यक्षलक्षणम् स्पारमनि क्रियाविरोधात ज्ञानं स्वप्रकाश- मणिमगामणिज्ञानस्य न प्रत्यक्षरवम् कमिति पक्षस्य निराकरणम् अनिन्द्रियाप्रत्यक्षम्वरूपनिराकरणम् 111 | वेद्यत्वहतोर्निरामः २१९ सांख्यवल्पितज्ञागम्यरूपनिरासः १३ | ईश्वरस्य ज्ञानयमग्युपगन्तव्यम् , तद्वयति- एकस्मिन्नपि प्रमेये प्रमाणसाप्तवसमर्थनपरा रेकेण वा सर्वज्ञवम् , अनित्यस्वे सति चतुर्थकारिका इति वा स्तुविशेषणं देवमिति भास- सामान्यविशेषष्टान्तेन प्रत्यक्षस्य व्यावृत्य- वैज्ञमतनिराकरणम् २२२ नुगमात्मकार्यनिश्वायकवसमर्थनम् १२ , साकारज्ञानेऽपि न प्रतिकर्मण्यवस्था १८७ ७. १९७ ४२८ ४४० ४४१ ४५० दृष्टम् पृष्टम् रचेतनशानधादिन माग्यस्य अभिप्रायपरा चिनातगादस्य निषेध करणम् २२९ । अहतवादे क्य सुगतस्यापि पृथक् मत्वम् ३८९ बिपवास्यभिमनभोगस्वरूपस्य निराम २६ पुनरपि विज्ञानवादनिरास ३९५ म्पर्मपिदितत्वेऽपि जामस्य न बहिविषयत्व मिति योगापारस्प मतनिरसनम्, मा क्षणिस्परमाणुरूपयामार्थस्य नानाविकरूप निराकरणम् कारवादनिरामश्च २४० ननित्यनिरशेकावयविनोऽपि प्रयक्षविपपत्यम् १०९ ज्ञानस्य प्रतिरमध्यवस्था प्रकाशनियमोधा इहेदमयपरिक्षस्य समयय निराकरणम् ५२० योग्यतात एव न प्रतिषिम्यत २६३ / पुनरपि प्रसङ्गतो नित्यनिर मेगावययधिनी प्रसनतो विज्ञानवादनिरास २६८ निगस मानस्य तदाकारत्वनिराकरणम् २८५ निराकारमपि ज्ञान शतिप्रतिनियमात् प्रति दम्यस्य गुणपर्ययवस्वलक्षणसमर्थनम् नियतार्थपरिटेदकम् 'गुणधद्रव्यम्' इति इत्यस्य लक्षणान्तर 'अभेद एर नाव न भेद, भदस्य जरचन्द्र निरूपणम् यत् काल्पनिक यान् इति मण्डनस्य मन दत्यस्य उत्पादध्ययधाव्या मकघसमर्थनम् समीक्षा कुण्डहादिषु मर्पयदिति दृष्टान्ते उपादादि সমাবেন प्रया मरवानिपादनम् ३१२ विश्रमवादनिराम प्रयामक वम्नुनि अगेनदोषाणामुद्वार म्यांशमात्रावरम्मिभि विवरपैन पर्वतादि अर्थरस सामान्यविशेपात्मकत्वसमर्थनम् व्यवस्था ३२८ प्रसातो ब्रह्मवादम्प विस्तरतो निराकरणम् विकल्पाना बहिरविषयवसमर्थनम् 'तभाव परिणाम' इति परिणामलक्षणा समारोपव्यवच्छेदोऽपि नसाध्य मविपर्क ३३६ नुगमनप्रदर्शनम् पुनरपि विकल्पाना बहिरर्थविषयवसमर्थनम् ३३७/ प्रसङ्गत साट्स्याभिमतप्रधानरवरूपस्य विभ्रमेतरामारम वेदनवन् क्रमानेशान्त समालोचनम् समर्थनम् उपदण्ययीभ्यामक विपतिमाननादनिराम ३४३ निरूपणम् भेदस्य वस्तुधर्मस्वसमर्थनम् प्रसङ्गतो नित्यनिरंशैक्वाह्मणत्वजानिनिरास मूर्षियतादायपि ज्ञानसद्भावनिरूपणम् ३४८ वैशपिकाभिमनियकानेशानुगतमामान्य आत्मनानात्वसमर्थनम् ३५० पदार्थनिरास बलावादनिरास ३५१ अनेकान्ता मकस्य वस्नुन उपसहार पुनरपि सवेदनातनिरास , सहापहम्भ बौदाभिमतनिधिपस्प्रत्यक्षस्य निरास नियमात्' इत्यादि हेनुखण्डन घ ३५६ मोगवाभिमतमानसप्र यक्षलक्षणस्य निरास निरशकावयविवादस्य निराकरणम् ३६६ धर्मात्तरोतागमसिदमानमध्यक्षस्य निराम आवृतानावृतत्व रकारलव चराचर स्वमवेदनम यक्षरक्षणपतिविधानम् त्वादिदोषापादनम् ३७.रोगतोक्योगिमायशक्षणासनम् अवयविनि देशादिवृत्तिदोपनिरूपणम् ३७३ / माइस्थाभिमतम यक्षरक्षणसमारोचनम् भशश्यविवेचनस्वस्य अनेकविपनिरी नैयायिकोप्रत्यक्षलक्षणनिरास करणम् ३०९ अतीन्द्रियप्रत्यक्षस्य रक्षणम् ४०२ ३४१ / पुनरपि मत १८ ५०. ५०५ ५२० ५२४ ५३१ ५१५ न्यायविनिश्चयविवरणम् [प्रत्यक्षप्रस्तावः
"श्रीमद्भट्टाकलङ्कस्य पातु पुण्या सरस्वती ।
अनेकान्तपरुन्मार्गे चन्द्रलेखायितं यया ॥"
---शुभचन्द्रः।
"वादिराजमनु शान्दिकलोको वादिराजमनु तार्किकसिंहः ।
वादिराजमनु काव्यकृतस्ते वादिराजमनु भव्यसहायः ॥"
--एकीभावस्तोत्रे ।
श्रीमद्भट्टाकलङ्कदेवविरचितः न्यायविनिश्चयः स्याद्वादविद्यापतिश्रीमद्वादिराजाचार्यरचित- न्यायविनिश्चयविवरणसहितः [ प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः ] श्रीमज्ज्ञानमयो दयोमतपदव्यतो विविकं जगत्, कुर्वन् सर्वतनूमदीक्षणसखैर्विश्वं वचोरश्मिभिः । व्यातन्वन भुवि भव्यलोकनलिनीपण्डेवखण्डनियम् , श्रेयः शाश्वतमातनोतु भवतां देवो जिनाहर्पतिः॥ १ ॥ विस्तीर्णदुर्नयमयप्रवलान्धकार- दुर्बोधतत्त्वमिह वस्तु हितावबद्धम् । व्यक्तीकृतं भवतु नः सुचिरं समन्तात् सामन्तभद्रवचनस्फुटरत्नदीपैः ॥ २ ॥ गूढमर्थमकलङ्कवाडमयागाधभूमिनिहितं तदर्थिनाम् । व्यञ्जयत्यलमनन्तवीर्यवाग्दीपवर्तिरनिशं पदे पदे ॥ ३ ॥ यरसूक्तसारसलिलस्तपनेन सन्तः चेतोमलं सकलमाशु विशोधयन्ति । लड्व्यं न यत्पदमतीय गभीरमन्यः ते मां पुनन्तु मतिसागरतीर्थमुख्याः ॥ ४ ॥ प्रणिपत्य स्थिरमक्त्या गुरून् परानप्युदारबुद्धिगुणान् । न्यायविनिश्चयविवरणमभिरमणीय मैया क्रियते ॥ ५ ॥ विद्यासागरपारगैविरचिताः सन्त्येव मार्गाः परे, से गम्भीरपदप्रयोगविपया गम्याः परं तादृशैः। बालानां तु मया सुखोचितपदन्यासक्रमश्चिन्यते मार्गोऽयं सुकुमारयत्तिकतया लीलागमान्वेपिणाम् ॥ ६ ॥ १० १५ २० . समन्तभद्राचार्यायति वचनविशेषणम् , पक्षे समन्तात् भद्रकारवति । २ अक्लकाचार्यायेति वाडाय- विशेषणम् , पक्षे कलइरहितैति । ३ अनन्तवीर्याचार्यसम्बन्धीति वाविशेषणम् , पक्षे अनन्तसामर्थ्यविशिष्टेति । ५ न्यायविनिमयविवरणकर्नुवादिराजस्य गुरोर्नाम । ५ वादिराजेन ।
२ न्यायविनिश्चयविवरणे अभ्यस्त एव यहुशोऽपि मैयप पन्था, जानामि निर्गममनेकमनन्यदृश्यम् । तन्मामिहादरवशेनं कृतप्रचार के नाम दूपणशरैः परिपन्थयन्ति ॥ ७ ॥ अथवा, येपामस्ति गुणेषु सस्पृहमतिर्थे वस्तुसारं विदुः तेपामा मनः प्रविष्टमसकृत्तुष्टिं परां गच्छति । ये वस्तुव्यवसायशून्यमनसो दोपाभिदित्सापराः छिश्नन्तोऽपि हि ते न दोपकणिकामप्यत्र वक्तुं क्षमाः ॥ ८ ॥ १० अपि प, यस्य हृधमलमस्ति लोचनं वस्तुवेदि सुजनः स मद्यति । मत्सरेण परमद्यते परो विद्यया तु परया न मद्यते ॥ ९ ॥ तदास्तां प्रस्तुतमुच्यते-- जयति सकलविद्यादेवतारत्नपीठ हृदयमनुपलेपं यस्य दीर्घ स देवः । जयति तदनु शास्त्रं तस्य यत्सर्वमिध्या- समयतिमिरघाति ज्योतिरेक नराणाम् ।।१०॥ शाखस्यादी अद्भुतमहिमोदयाधिष्ठानभगवदहत्परमेष्ठिनिरुपमगुणस्तवनं कुतः कुर्वन्ति शाप्रकारा इति चेत् ? सस्य परममगलत्वेन शास्रोपयोगित्वात् । भगवद्गुणस्तवनं खलु २० पैरममङ्गलम् ; मलस्य पापस्य गालनात् , मङ्गस्य सुकृतविशेषस्य च कार्यत्वेन लानात् । सति च तत्कृते मलाभावे सुकृतविशेपेच शास्त्र निर्विघ्नपारगमनं वीरपुरुपमायुष्मत्पुरुपं च भवतीति मलहरण-सुकृतविशेषकरणाभ्यामुपपन्नं शास्त्रोपयोगित्वं मगलस्य । सदाचारपरिपालनमपि मङ्गलस्य प्रयोजनमिति चेत्, न; तस्य शास्रोपयोगित्वाभावात् । अकृततत्परिपालनस्याधर्मोत्पत्तेः शास्त्रमेव विहन्यत इति चेत् ; अधर्मनिवारणादेव तर्हि तस्य तदुपयोगित्वम् , तई मङ्गलादेव २५ सिद्धमिति किं तदर्थेन तत्परिपालनेन ? १ मयैव २०, ५०, स., आ० । २ पमद्यते २०, परिमद्यते प० । परः दुर्जन पर केवलं मत्सरेण अद्यते व्याकुलोक्रियते इत्यर्थः । ३ -रपूति-२०, स. ५ तुलना-"अहवा बहुभेयगयं णाणावरणादिदब भावमलभेदा। ताई गालेइ पुढे जदो तदो मंगलं मागद ॥ अहवा मंग सोख लादि हु गेण्हेदि मंगल तम्हा । एदेण कनसिद्धि मंगद गच्छेदि ग्यात्तारो।"-विलोय गा० १४, १५। ५-पेशा- ता. मलादीनि हि शास्त्राणि मगन्ते वीरपुरुषाणि च भवन्त्यायुध्मत्पुरुषाणि च" -पात म. || . स्फुटार्य अमि०पृ. र सदाचारपरिपालनस्य शालोपयोगितम् । ९ अधर्मनिवारणच । १० तदये तन्न परि-य०, ५०, स., मा० । अधर्मनिवारणार्थेन ।
३ ५ श मथमा प्रत्यनप्रस्ताव मङ्गलादेव यत्सिद्धमधर्मप्रतिरोधनम् । तदर्थं न सदाचारपरिपालनमर्थवत् ॥११॥ न होकेन कृतं कार्य हेतावन्यत्र सस्पृहम् । सिद्धस्य निरपेक्षत्वादनवस्थितिरन्यथा ॥१२॥ सिद्धे पापप्रतिध्वंसे सदाचारानुपालनात् । मङ्गलस्यैव वैययं किन्न स्यादित्यसम्मतम् ॥१३॥ तदभावे तेदाचारपालनस्याप्यसम्भवात् । तत्प्रयोजनभावेन तैत्येष्टत्वात् स्वयं परैः ॥१४॥ नास्तिकत्वसमाधानं मङ्गलादिति चेत् । तेतः कः शास्त्रस्योपयोगः स्यात् ? आदेयत्वं भवेद्यदि; ॥१५॥ श्रादेयं युक्तिसामया॑द्युक्त्यर्थं यदि तद् भवेत् । नास्तिकत्वनिषेधेऽपि नादेयं वदयुक्तिकम् ॥१६॥ शास्त्रनिर्वहणानगमपि सदाचारपरिपालनादिकं मङ्गलस्य प्रयोजनमुक्तं तस्यापि ततः . सम्भवात् । न हि शास्त्रागमेव तत्प्रयोजनं वक्तव्यमिति नियमः सम्मवतोऽन्य (-पति, अन्य-) स्यापि वचने भोपाभावादिति चेत् ; न ; अप्रस्तुताभिधानस्यैव दोपत्वात् । १० अपि च, २० सदाचाराभिरक्षादि यद्वन्मङ्गलतो मतम् । निर्विपीकरणाद्यन्यत्तद्वदाम्नायते न किम् ? ॥१७॥ ततस्तदपि वक्तव्यं शाखादी तत्प्रयोजनम् । परैः प्रयोजनेयत्ता कथमेवं नियम्यते ? ॥१८॥ स्तुतिप्रयोजनं तस्माद्वक्तव्यं प्रस्तुतोचितम् । अतिप्रसङ्गासम्बद्धप्रपादौ भवतोऽन्यथा ॥१९॥ तदन्तरायविध्वंससुकलोत्सादनात्मना । विदुः शास्त्रोपयोगित्वं मङ्गलस्य मनीषिणः ॥२०॥ स्यान्मतम्- निर्विघ्ननिर्वहणादिकं न मङ्गलात् सत्यपि तस्मिन् केचित्तदभावात् , २५ असत्यपि "कचित्तद्भावात् । न हि यस्य "भावेऽपि यन्न भवति अभावेऽपि भवति तत्तस्य कार्यम् , अन्वयव्यतिरेकानुविधानाधीनत्वाद्धेतुहेतुमद्भावस्य, अन्यथा कुम्भादेरपि कुविन्दादि- १ मालाभावे । २ सदाचार । ३ मालस्य । ४ तुलना-"परमात्मानुध्यानाद् प्रन्यकारस्य नास्तिक- तापरिहारसिद्धिः तद्वचनस्यास्तिकैरादरणीयस्वेन सर्वत्र ख्यात्युपपत्तेस्तदाध्यानं तसिद्धिनिवन्धनमित्यपरे। तदप्यसारम् । प्रेयोमार्गसमर्थनादेव वर्नास्तिकतापरिहारपटना।" -त. लो. पृ०१।५ नास्तिकत्वपरिहारात् । ६ शास्त्रम् । - शास्त्रानामालप्रयोजनस्य संदाचारपरिपालनादेः । ८ निर्विघ्नीक-य० । ९ उदयनाचार्यकृतकिरणावल्यादौ । १. चार्वाकप्रन्धेषु।" भावे या प० ।
४ - न्यायविनिश्चयविधरणे फार्यत्वासङ्गादिति । तदसत् ; समप्रस्यैव हेतुल्यात् । असमग्रस्य व्यभिचारेऽपि दोपाभावान् , अन्यथा न पावकरयापि धूमहेतुत्यम् , आन्धनादिविकलस्य धूमयभिवायत् । तस्मात-- आन्धनादिसहकारिसमग्रतायां यद्वत्करोति नियमादिह धूममग्निः । तद्विशुद्धयतिशयादिसमप्रतायां निर्विघ्नतादि विदधाति जिनस्तयोऽपि ॥२१॥ माप्यसति तस्मिन् तद्भावः । तस्य नियद्धस्याऽभावेऽप्यनिवद्धस्य तस्य परमगुरगुणा- नुस्मरणात्मनो मङ्गलस्यावश्यम्भावात , तदस्तित्वस्य च तत्कार्यादेवानुमानान् धूमादेः प्रदेशादि- व्यवहितपावकानुमानयत् । मालसामग्रीकल्यस्य च चिरात्कार्यस्य वैकल्यादेवानुमानात् १० धूमाभावात्तदुत्पादनसमर्थदहनाभावानुमानवत् । यदि परमगुरगुणानुस्मरणमपि मङ्गलं तर्हि तत एव समीहितसिद्धः किमन्येन वाचिकेन कायिकेन या ? सतोऽपि तस्यान्तरङ्गसहितस्येय सममत्वात् अन्तरङ्गस्य तु केवलस्यापि माङ्गलिकप्रयोजनसमर्थत्वादिति चेत् ; इदमनुमतमेवा- स्माकम् , “आभ्यन्तरं केवलमप्यलं ते" [ वृहरस्य० श्लो० ५९ ] इत्याम्नायात् । न च तावता याचिकादेवैयर्यम् ; तस्य सामप्यन्तरत्यात् । एकस्मिन् काय किं सामध्यन्तरेणेति चेत् न ; दहनकार्य काठादिवन्मण्यादेरपि सामध्यन्तरस्योपलम्भात् । अन्यदेव दहकार्य मण्यादेर्यकाठादेनं भवतीति चेत् ; मङ्गलकार्यमप्यन्यदेव परमगुरगुणानुस्मरणात् यद्वाचिकादेर्न भवतीति समानमुत्पश्यामः । यद्येवं भगवद्गुणस्तयनादिवत मिध्यातीर्थकरगुणस्तवनादिकमपि सामध्यन्तरं भवेत्तु ततोऽपि मङ्गलकार्योपलम्भादिति चेत् ; कस्तद्गुणो नाम ? यदि सर्वज्ञपरम- वीतरागस्वादिः । स तर्हि भगवद्गुण एव, "तदपरस्य तद्गुणत्वं नास्तीति यथास्थानं निवेदनात् । २० अतः सर्वत्र सगुणस्नवनमेव मङ्गलं तत एव तत्प्रयोजनभावान्नापरम् । किं पुनस्तत् ? इत्यत्राह- मसिद्धाशेषतत्त्वार्थप्रतिपुर्वकमूर्तये । नमः श्रीवर्धमानाय भव्याम्बुसहभानवे ।। १ ।। अत्यायमर्थ:-"श्रीवर्द्धमाना यस्माद्विनेयानां स श्रीवर्खमानो भगवतां समूहस्तस्मै 'नमस्क- रोमि' इत्युपस्कारः। ननु यदि 'श्रीवर्धमानाय' इत्युक्तेऽपि सर्वेषामेव भगवता प्रति- पत्तिस्तहि 'श्रीजिननाथाय' इति वाच्यम्, एवं हि लध्वी प्रतिपत्तिः अस्य सामान्यबाचित्वात् निर्विननिहलादिसद्भावः । २ निबद्धस्य भावेप्यतिबदस्य तस्याभावेपि परम-ब., मा०,५०। प्रत्याभूतस्य । ३-स्य तस्यामावपि पाम -6.1 प्रन्यानन्तर्गतस्य मनोवावायव्यापाररूपस्य । १ माल. कार्यात निर्विघ्नंपरिसमाप्त्यादेरेव । ५ असमासमन्यादौ। ६ वाचिकस्य कायिकस्य था। . परमगुरुगुणस्मरणा- त्मकस्य । अन्तरहस्य क्लस्य माङ्गलिक योजनसमर्थवे । ९ यदैवं ब०, १०, आ.। स्थायतिरिकस्य । १५ श्रीवर्धमाना यस्माद्विनेगना सदनी भा०,०,१०॥ १. सर्वोतराम , , . , श१] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तायः छन्दसोऽप्यनुपहतत्वात् , श्रीवर्धमानशब्दस्य तु भगवति पश्चिमतीर्थकर एव रूढत्वात् ततो झटिति तस्यैव प्रतीतिर्न सर्वेषाम् । भवतु तस्यैवाय स्वतः प्रधानत्वात् , तदुपदिष्टमिदानीन्तन- मिदं खलु धर्मतीर्थम् , अतन्य शास्त्रकारस्य निःश्रेयसमार्गनिर्णय इत्युपकार प्रति प्रत्यासन्नत्येन प्रधानत्वात् स एव स्तोतव्यो न सर्वेऽपीति चेत् , सैघपामपि स्तुतिविषयबुद्धिपरिगृही- ५ तानामिदानीमेव पापमछापायोपकारित्वेन प्रत्यासन्नत्वाविशेषात् तदपाये निःश्रेयसमार्गनिर्णय- "स्याप्यवश्यम्भावात् , कथं वा "वन्दित्वा परमर्हतां समुदयम्" [ अष्टश० पृ० २ ] इति शानान्तरे सर्वेषामपि स्तवनमुपरचितम् ' कचित्सर्वेपामपि प्राधान्यं क्वचित्पश्चिमस्यैव विवक्षात इति चेत् ; स्वेच्छापरवशस्तर्हि शास्त्रकारो न गुणपरवश इति यत्किश्चिदेतत् । व्युत्पत्तिवशात् अंत एव सर्वप्रतिपत्तो प्रतिपत्तिगौरवमिति चेत् , न , चोद्यसमाधानार्थत्वात् एवंवचनस्य । १० भवति घन चोद्यम्- कुतः स्तवस्य सामर्थ्य तादृशं यत्करोत्ययम् । निर्विधनतादिकं कार्य नासमर्थ हि कारणम् ॥२२॥ स्वकारणवलासस्य यदि शक्तिर्भवेदियम् । श्रीवर्द्वमानस्तस्यासो विषयः किमुदीर्यते ॥२३॥ स्तुतिनिर्विपया नास्तीत्ययं तद्विपयः प॑तः । इति चेनियमः कस्मात् ? यः कश्चन विधीयताम् ॥२४॥ अवमाह-'श्रीवर्द्धमानाय' इति । श्रीमङ्गलस्य मलापहरणादिशक्तिरेव मङ्गलार्थि- भिरभिलपितत्वात् तल्लक्षणत्वाच्च श्रियः, सा वर्द्धमामा वृद्धि "व्रजन्ती यस्मादसौ श्रीवर्द्धमानो भगवत्समूह इति । ततः प्रतिपत्तेर्गुरुत्वेपि कृत्वा गजनिमीलनम् । कृता श्रीवर्द्धमानोक्तिरस्यार्थस्य प्रसिद्धये ॥२५॥ स्यान्मतम्-न भगवतः सामिप्रायात् मङ्गलस्य तच्छक्तिः सर्वत्रोपेक्षापरत्वात् , न हापेक्षापरस्य इदमित्थं करोमि इत्यभिप्रायः सम्भपति, "उपेक्षापरत्वहानेः । नापि निरभिमायात् , निरभिप्रायप्रवृत्तेरदर्शनादिति , तन्न , पद्मविकासकरणे "भानोनिरभिप्रायस्यापि प्रवृत्तिार्शनात् । २५ शक्तितो हि कारणस्य कारणत्वं नाभिप्रायात् । अभिप्रायेण हेतुत्वे, भानुः पद्मविकासने । न हेतुः स्यात् , सशक्तश्चेत् , भगवतस्तद्वदिष्यताम् ॥२६॥ एतदेवाह-'भव्याम्बुरुहभान' इति । भव्य मङ्गलं भवतेमङ्गलार्थत्वात् । तथा च पठन्ति- २ महावीरे। ३ -पामय स्तु- आ०, २०, प., स०। ४ -स्यावश्य-प०। ५ 'परमाईताम्' -अष्टश०। ६ श्रीवर्धमानायति पदादेव । ७ सवस्य । ८ श्रीवर्धमान 1 ९ इस आ०, ब०, प०, स० । १० तीर्थकर । " व्रजन्ति य -आ०, २०, प०, स०।१२ उपेशापरवाहाने आ०,०, प०, स. १३ तुलना-"तःस्खाभाव्यादेव प्रकाशयति भास्करी यथा लोकम् । तीर्यप्रवर्तनाय प्रवर्तते तीर्य कर एवम् ॥"-त. भा. का० १०॥ २० १ अनुष्टुभ ।
६ ५ . न्यायविनिश्चयविवरणे [१ "सत्तायां मङ्गले वृद्धौ निवासे व्याप्तिकर्मणि । गतौ चापि समाख्यानं पडथं भवति विदुः ॥" इति । भव्यमेवाम्बुरुहवदम्बुरहं भगवदभ्यर्चनागत्वातस्य भानुरिव भानुर्भगवान् स्वशास्ति- स्तन्उषिविकासकारित्वात् । स्वभावत एव मङ्गलस्य तच्छत्तिः शब्दशक्तिवान् अर्थप्रत्यायनशधियदिवि घेस्, न , स्वार्थपत्यायनशकेरपि पुरुपायत्तस्वात् , निदर्शनस्य साध्यवैकल्यात् । न हि पधुरादिवदेव स्वभावतः शब्दस्य स्वार्थावद्योतनमामय॑म् अंसमितम्यापि प्रसङ्गात् , उपाध्याययोपत्तेः । सभितस्येति चेत् ; समयात्तर्हि तस्य तच्छतिर्न स्वभावात् पुरपवशवत्तित्वाभावप्रसङ्गात् । अनुधावन्दि घ पुरुषेच्छामपि शब्दाः पुम्पेण यथाकाम प्रसिद्धादर्थान्तरेऽपि प्रयुग्यमानानां तेषां सदवद्योतनं प्रत्याभिमुख्यस्येव प्रपिपत्तेन मुख्यस्य । सातित एव तंत्रापि तदामिमुख्यं न तदिच्छाठ १० इति चेत् । न , इच्छाविरहेऽपि तत्प्रसद्गात् । सत्यामेव तस्यां तेपा तच्छतिरिति पेत् ; तस्कृतैय तर्हि सा तेपामिति न शब्दस्य स्वार्थावयोधनशतिः स्वभावान् अपि तु समयात् , स च पुरुषादिति पुरुपायव उच्छक्तिः तदाह- श्रीयमानाय । भीर्षचनस्यार्थ- "मत्यायनशक्तिः धर्द्धमाना शिष्यमशिष्यपरम्परया पृद्धि गच्छन्ती यस्रादिति व्युत्पत्तिा । दुतः पुनरत्यन्त हतार्थस्येन निरीहस्य भगवतः शम्दशतिकरणब्यापार इति चेत् ? न; तथाविधस्य स्वभावनियमस्य" भावात् भानोः पद्मविकासनवन् । "सदाह- भव्याम्बु- रुहमानये । निःश्रेयसतत्कारणपर्यायेण भवन्तीवि भव्याः तेपायुराहमिवाम्पुरहं प्रवचन सकलवस्यनिवेदनश्रीनिवासस्थान , तस्य भानुरिव भानुर्भगान , "अनभिसन्धेरपि स्वभावत- "सच्चतिविकासकारित्वात् । नन्वेयं मवचनमेव भगवत्कृतमुकं भवति शक्तिखोरभेशन , तथा पाप्रमाणमेव प्रवचनं प्राप्तम , अनभिसन्धाय प्रत्तत्वात् पाटोन्मत्तादिवाक्यवदिवि पम् । अनाह- 'प्रसिद्ध' इत्यादि । निःश्रेयमाथिमिरयमानत्वार्या अनन्तनशपत्यादयो गुणाः, तत्त्वेन न "संवृत्या अस्तित्त्वार्थाः, अशेपा अविकारतस्थास्तेिषां प्रतिपुलं प्रयुद्धोधन प्रतिमन्धविगमे समुन्मीलम् 'भाधे उपत्ययविधाना' अशेताकार्यवियुद्धम् , असि प्रमाणनिश्चित तच तशेषतत्त्वार्थप्रतियुद्ध घ ततधेयोषम् , सेव एका प्रधानभूगा स्पसमा प्रति अनन्यापेक्षत्येनासाया वा मतिः स्वभाशे यस्य स बयोकरवरमा इति । अनन्तशाशक्त्यादिप्रतियोधप्रसिद्धता । प्रभोश सरस्वमापत्यं पधायकं पदिश्यते ॥२५॥ अनन्तानसाम्राज्यप्रतियोधे सति प्रभोः । शासनं तिषितार्थमप्रमाणं कुचो भवम् ॥२८॥ , मलारणा देशालि । २ भरतसतस्यार। मामा-भा.,.,... Vशदस्य । ५ यदि सभाष शमय अपंप्रायनाक रसाना पुरसभान न रविवि भार । सिपि 1 0 पुजाम्। ८ अगापियोइन हि ! ९ोले। 1.-प्रयन-भा..., ५०."-दा-1.,प.। १२-तपद भा., प.प.1 १६ अभिमन्टेशोपि.मा. अभिप्रायापितस्मान।।४ प्रवनशकि। १५ सपना ।
११] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः इदमन्यत् व्याख्यानम्- श्रीः देवागम-नमोयान-सुरपुष्पवृष्टि-हरिविश्रादिलक्षणा निरतिशयपुण्यपरमवैराग्याविहंतताल्वादिकरणशक्तित्वादिलक्षणा चा बर्द्धमाना प्रतिदिवस. मभिवृद्धिं वजन्ती यस्य भगवता समूहस्य सन्मतेर्वा तस्मै श्रीवर्द्धमानाय नमः। प्रसिद्धानि प्रमाणनिश्चितानि अशेपाण्यविकलानि तत्त्वानि जीवादीनि तान्येवार्थो विषयो यस्याः सा प्रसिद्धाशेपतत्त्वार्था, प्रतिबुद्धा स्वावरणसम्बन्धनिद्राव्यपगमे सति प्रतिव्यक्त्युहुद्धा, एका ५ अविच्छिन्ना असहाया वा मूर्तिनिदर्शनादिरूपा यस्य तस्मै 'प्रसिद्धाशेपतत्त्वार्थप्रति. बुईकमूर्तये इति । "किमर्थमन प्रसिद्धमणम् ? भगवतः सुगतादिभ्यो व्यवच्छेदार्थम् तेषां प्रसिद्ध- तत्त्वार्थाया बोधमूर्तेरभायात् प्रतिभासाद्वैतादेस्तद्बोधविपयस्याप्रमाणत्वादिति चेत् ; उच्यते-- प्रतिभासाद्वैतादिकं तत्त्वम्, अतवं वा ? तत्वमपि ज्ञातम् , अज्ञातं वा ? यद्यज्ञातम् ; १० कथं 'तत्त्वम्' इत्युक्तिः ? ज्ञाते एव तदुपपत्तेः । ज्ञातं चेत् ; कथमप्रमाणत्वम् ? तस्य तत्त्वरूपतया ज्ञातत्वेन सप्रमाणत्वस्यैवोपपत्तेः । ज्ञातमप्यतत्त्वमेव तदिति चेत; तथापि सत्त्वपदेनेवातत्त्ववियो भगवतस्तत्वविदो व्यवच्छेदात् किं प्रसिद्धपदेन कर्त्तव्यम् ? पराभ्यु- पगमेन तत्वमेव तदिति चेत् ; तथाऽपि न प्रसिद्धपदमर्थवत प्रसिद्धतयाऽपि परेण तस्याभ्यु- पगमात । अभ्युपगमनिबन्धना प्रसिद्धिरप्रसिद्धिरेवेति चेत , "तन्निवन्धनं तत्त्वमप्यतत्त्वमेषेति, १५ व्यर्थ प्रसिद्धपदमिति चेत ; न व्यर्थम; परोपन्यस्तस्य "साधनस्यासिद्धत्वोद्भावनार्थत्वात । अन्न हि परमतम्-"यस्तावदसर्वज्ञ एव सर्वज्ञो भवति तस्य परोक्षार्थपरिज्ञाने को हेतुः१ न खल्वीदृशं किमपि कारणानुपलक्षितं यदनुष्ठानात् सर्ववेदनं सम्भवति । मत्रतत्रादयस्तु प्रायशः सकलसमयसम्भविनः" [प्र० पार्तिकाल० ११२९ ] इति ; सत्रेदमुच्यते- असिद्धः कारणाभावः । प्रसिद्धपदसूचितस्य प्रमाणस्यैवाशेषतत्यगोचरस्य सर्वज्ञत्वनिमित्त्यात्त । २० किं पुनस्तादृशं प्रमाणं छदास्थस्य सम्भवति ? बाढम् , कथमन्यथा पट्प्रमाणकृतसर्वज्ञत्याशीकरणं मीमांसकस्य ? तथाहि- यदि प्रमागमेकं न पटप्रमाणार्थगोचरम् । "यदि पड्भिः प्रमाणैः स्यात' इत्यादि कथमुच्यते ॥२९॥ न होकेन प्रमाणेन प्रत्यक्षादिप्रमाणपदकं तद्विपयं च सर्वमनुपसङ्कलयन् 'इदमनेनार्य २५ जानाति' इत्यगीकर्तुमर्हति स्वयमप्रतिपन्नस्याडीकारायोगात् । प्रतिपद्यत एथ, परं नैकेन, किन्तु पड्भिरेव प्रमाणैर्यथास्वं "तानि तद्विषयांश्च पृथगेवावगच्छतीति चेत् । "एकमत्य- न -- १ अप्रतिहत । २- च-१०, ५०।-णा व-पा० । ३ महावीरस्य पश्चिमतीर्थकरस्य । ५ "जीवा- जीवात्रवन्धसंवरनिर्जरामोक्षास्तत्वम्"-त० सू० १३ । ५-कत्युरोधा मा०, य०, ९० ५० । ६ आदिशब्देन अनन्तवीर्य-अनन्तसुस्तपरिमहः । ७ किमर्थ प्रसि-पा०1८ प्रतिमासाद्वैतादेः। ९ गतादिभ्यः। १० सार्थकम् । 11 अभ्युपगमनिपन्धनम् । १२ साधनस्यासिद्धित्वो-१०, य०, आ०। १३ मो० श्लो० ॥१२॥१२ । ११ मीमांसकः । १५ प्रत्यक्षादिप्रमाणानि । १६ एकप्रन्ययेन प्रमाणपतद्विषयाणामनुसन्धानामारे ।
८ न्यायविनिश्चयविवरण [२१ योपसङ्कलनाभावे 'पड्भिरेव नैकेन' इत्यपि वक्तुमशक्यत्वात् । तथाहि- हि यस्येकं प्रमाणं प्रमाणपटकतनोपरार्थविषयमस्ति, न च प्रत्यक्षादीनि स्वविषयपरिच्छेदमात्रोपक्षीणानि अपर- प्रमाणतद्विषयगन्धमपि शन्ति, तत्कथमसो प्रमाणपटक तद्विपयं वा जानीयात् , येनैवमुच्यते- "यदि पद्भिः प्रमाणैः स्यात्सर्वज्ञः केन वार्यते ।" इति । भवत्येवेदमुपसङ्कलन ५ प्रमाणं तु न भवति अपूर्वार्थत्याभावात , यथास्वं प्रमाणनितिस्यैव प्रत्यनादिप्रमाणतद्विपय- कलापस्य स्मरणेन सङ्कलनात् अपूर्वार्धं च प्रमाणे न गृहीतमाहीति चेत् ; 7 विपयिविषय. सन्दोहस्य "प्रागसिद्धेः प्रत्यक्षादेरेकैकस्य "तत्सन्दोहाविपयत्वात , तत्सन्दोहाविपयं च सङ्क- लनस्य गृहीतमाहित्वं त सन्दोहासिद्धी न सियेति । ततस्तत्सन्दोहे तदपूर्वार्थत्वात प्रमाण- मिति कधमप्रमाणम ? अपि च, गृहीतप्रणात् मानतद्वद्याकलनं यदि । न मानं मानमेकत्यप्रत्यभिज्ञा कथं भवेत. ? ॥३०॥ पूर्वोत्तयवयोधाभ्यामेकत्वस्याग्रहो यदि । मानवेयसमूहोऽपि किमन्यस्येप गोचरः ? ॥३१॥ यथैव हि पूर्वोत्तरज्ञानाभ्यां स्वकालनियतपर्यायमात्रपरिच्छेदिभ्यामे कत्वस्याग्रहणात् १५ अपूर्वार्थमे फत्वप्रत्यभिज्ञान तथेत्र प्रत्यायन्यतमापरिच्छिन्नविषयिविषयसन्दोहगोचरमपि सङ्क- उनज्ञानमपूर्वार्थमनुमन्तव्यम् । तच प्रमाणम् , इत्यस्ति तद्वन् सकलजीवादिविषयमप्यागमिक तस्य प्रमाणं यदनुमानान मर्ववस्तुसाझाकरणं भगवत इति न युक्तमेतत् -'कारणाभावान्नास्ति कस्यचित् सर्वज्ञत्वम्' इति । स्यादापूनम्- अस्ति निरवशेषवस्तुविषयं सङ्कलनम, तत्तु न सकलविपये कप्रमाण- २० सामात "तदभावात , अपि त्यात्मसामथ्यांत । आत्मा हि स्वपरप्रकाशादिरूपः परिस्फुरन् सकलप्रमाणतवेधसन्दोई सङ्कलयति, सामर्थ्यप्रयुक्तं चेदं यदि इत्यादिपवन नैकप्रमाण- मामर्थ्यप्रयुक्तम् । न चात्मनः प्रमाणत्वं प्रमातृत्वेन निश्चयात् । प्रमाणत्वे" हि तस्यापि प्रमाताऽन्यः प्रकल्यताम् ।। ३२ ।। तस्यापि प्रमाणत्वोपकल्पने। प्रमाताऽन्यः प्रकल्प्यः स्यादेवं स्यादनवस्थितिः ॥ ३३ ॥ -- स्वपरहस्य १ ~माणेनि-4, ०, आ.२ "सर्वस्तुरसम्धेऽथे प्रामाण्य स्मृतिरन्यमी मो.1111 इत्युक्तस्वात् । ३ विषयविषरिस-आ०, २०, ५०, मा ५ सङ्कलनात्पूर्व देनापि ज्ञानेनाग्रहणात् । ५ विष यिविषयसमुदायाविषयत्वात् । तत्सन्देहावि-२०, ५०, आ० । ६ सङ्कलनज्ञान। प्रमाणम् । ८स्मरण- नुभवाभ्याम् । १-विषयविषयिस-ब०, मा०, २०, स ... श्रुतशानात्मकम् ।" सकलविषयमाणा भावात् । १२ परिस्पुरन्तु स-ता। १३ भामसामर्थ्य । " -णत्वेन त-हा।
११] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः - न विना च प्रमातारं प्रमाणस्योपपन्नता । न हि कर्तृनिराशंसं करणं व्यवलोक्यते ॥ ३४ ॥ तन्न प्रमाणं सर्वार्थमेकं यस्य बलादियम् । 'प्रसिद्ध(द्धिः)सर्वतत्त्वानां प्रसिद्धेत्यादिनोच्यते ॥ ३५ ॥ इति, तदसङ्गतम् , यस्मादात्मन एव सर्वप्रमाणतवेद्यसन्दोहमाकलयतः स्वविषयाव्यभिचारे ५ प्रामाण्यात् , तव्यभिचारे 'तबलात्सुनिश्चितस्य 'यदि' इत्यादिवचनस्यानुपपत्तेः । आत्मनः प्रामाण्ये प्रमातृत्वं न स्यादिति चेत , न, विरोधाभावात । विपयपरिच्छित्ति प्रति स्वतन्त्रशक्त्य- पेक्षया प्रमातृत्वात् साधकतमशक्तधपेक्षया च तस्यैव प्रमाणत्वात् , एकन च शक्तिनानात्वस्य 'आत्मनाउनेकरूपेण' इत्यादिना निवेदनात् । तन्न प्रमाणात् प्रमातुरन्तरत्वं प्रमितेरपि "तस्य तत्प्रसङ्गात् । न चैतत्पध्यं भवताम्, विपयामितिवत् स्वप्रमितेरपि तस्मादर्थान्तरत्वे १० स्वसंविदितात्मवादाभावप्रसङ्गात् । क्रियाकर्तस्वभावत्वमेकस्य शक्तिभेदप्रयुक्तम् वि (क्तमवि) रुद्धमिति चेत्, तर्हि तत एव कर्तृकरणस्वभावत्वस्याप्यविरोधात् नात्मनः प्रमाणत्वे प्रमानन्तर- परिकल्पनं यतोऽनवस्थानं भवेत् । तस्मादात्मैव सर्वार्थवेदी स्याद्वादशासनात् । प्रमाणं भावना तस्य सर्वदर्शित्वमावहेत् ।। ३६ ॥ १५ ततः स्थित प्रसिद्धमहणं परसाधनस्सासिद्धतोद्भावनार्थमिति । यत्पुनरिदं बौद्धस्य मतम्-भवतु किञ्चित्प्रमाणं यदभ्यासात्तत्त्वदर्शित्वं भगवतः तत्तु न सर्वविपर्य तदसम्भवात् । न हि संसारिंणस्तदस्ति , सर्वस्य सर्वदर्शित्वप्रसङ्गात् । "सम्भयेऽपि तदभ्यासस्य वैफल्यात् । कस्यचित्तदभ्यासनिबन्धनसकलार्थदर्शनसाधने निःश्रेय- सार्थिना प्रयोजनाभावाच्च । "ते खलु सोपायहेयोपादेयगोचरमेव कस्यचिज्ज्ञानमन्विच्छन्ति २० "स्वयं तवाम्नायात् , सोपायहेयोपादेयतत्त्वपरिज्ञाने हेयस्य हानादुपादेयस्य चोपादानात् निःश्रे- यसावा या पुरुषार्थपरिसमाप्तेः, सकलार्थज्ञानं तु कस्यचिदयस्करकुटीरकोटरान्तर्गतकीटक- गणनादिगोचरं विद्यमानमपि नास्मदादिमिरन्वेषणीय पुरुषार्थोपयोगाभावात् । तदुक्तम्- "तस्मादनुष्ठेवगत ज्ञानमस्य विचार्यताम् । कीटसंख्यापरिक्षानं तस्य नः कोपयुज्यते ॥” [प्रमाणवा० १६३३] इति, २९ १ प्रसिद्धत्स-ता । २ आत्मप्रामाण्यवलात् । ३ न्यायवि. का. १ । ४ प्रमातु । ५ अर्थान्तरत्वासद्वात् । ६ स्वप्रतीतैरपि आ०, २०, स०, प० । ७ प्रमातुरात्मन । ८ शक्तिभेदप्रयुक्तादेव कारणात् । ५ सकलपदार्थ विपयैकप्रमाणासम्भवात् । १० सकलविषयकैक्प्रमाणसम्भये तु। निश्रेयसाथिन । १२ "हेयोपादेयतत्वस्य साभ्युपायस्य वेदकः । य प्रमाणमसानिष्टो न तु सर्वस्य वेदर ।। तस्माद्धयतत्त्वस्य दु ससत्यस्य साभ्युपायस्य समुदयसत्यान्वितस्य उपादेयतत्वस्य निरोधसत्यस्य साभ्युपायस्य मार्गसत्यसाहितस्य प्रमाणपरिशुद्धस्य यो वेदका स प्रमाणमिष्टो न तु सर्वस्य यस्य कस्यचिद्वेदक । न खलु सफलज्ञानादार्यसत्यचतुष्टयदेशना अपि तु तज्शनखात् तदुपदेष्ट तयैव च प्रामाण्यमिप्यते ॥"-४० वा०म० ॥३४॥ १३ कस्यचिदवस्मरकु-ता० । विष्टास्थानसमुत्पन्न- कोटसंख्यादिविषयम् । १४ ससारटु सप्रशमोपायम् । १५ प्रमाणपुरुषस्य । . , । . १५ न्यायविनिश्चयविवरण अदमुच्यते- किं तत्प्रमाणं यदभ्यासादनुष्यवस्तुसाक्षात्करण तथागतस्य ' प्रत्यक्ष- मिति चेत् ;न, अनुष्ठानयर्थ्यप्रसद्गात् । अनुमान हि प्रमाणविपयसाक्षात्करणार्थम् , प्रत्यक्षस्यैव च'तत्साक्षात्करणरूपरचे किं तदनुष्टानेन ? न घाऽसाक्षात्करणरूपं प्रत्यक्षम्; अनुमानाद्य. विशेषप्रसहात । साक्षात्करणतारतम्याददोष इति चेत्, स्वादास्तम्-प्रत्यनमपि किञ्जि. ५ साक्षात्कारि तदन्या साक्षात्कारितरं तदन्यत् साक्षात्कारितममिति सातिशायनमेव, तन प्रथमा- भ्यासाहितीयस्य नदभ्यासात्तृतीयस्य तदभ्यासादपि तत उत्कृष्टस्याध्यक्षस्य सम्भवानानुष्ठान- वैयर्थ्य दोप इति, तन्न, विपयविशेषाभाये प्रत्यक्षविशेषानुपपत्तेः। तथा हि-न साक्षातरणतार- सन्यमध्यक्षस्य स्वलक्षणविषयम् , तस्यैकरूपत्वात् । यदि तस्य विशदविशदतरादिज्ञान नानारूपं भवेत् , भवेदपि तद्विषयमध्यक्षस्य माक्षात्करणतारतम्य फ्लवत् । न चैवम् , तस्य २. "निरंशत्वेन नानाम्पत्वस्यासम्मवात् । सम्भवे या प्रथमप्रत्यक्षत एव तथावमासनात् तवस्थमनुष्ठानवैयर्यम् , असमप्रप्रतिभासस्य स्वयमनभ्युपगमात् । "तस्मात् दृष्टस्य भावस्य इष्ट एवासिलो गुणा" [प्र. चा० ३।४४ ] इति वचनान । प्रत्यक्षस्य भिंदा किं स्यादेकरूपे ग्यलक्षणे । "नानारूपं न वत्कस्मादायेऽध्यक्षेऽवभासते ॥३७॥ यदनुष्ठानवेयध्यं न स्यात् । नाप्ययभासनम् । अममप्रस्य भावस्य मांगतरनुमन्यते ॥३८॥ नन्न स्वलक्षणेप्येष विशेषोऽध्यक्षगोचरः। 'अन्यत्र चेत , तथाप्यस्य कैमर्थक्येन कल्पनम् ? ॥३९॥ तत्त्वस्वलक्षणं यस्माद्विना तेनापि गृह्यने । "विशेपेणोत्तरेणेति नानुमानस्य तत्परम् ॥१०॥ तन्न "प्रमाणे प्रत्यक्षं यदनुष्ठानाचत्वदर्शित्वम् । भनुमानमिति चेत् ; न, वस्य "प्रतिबन्धाहणमन्तरेणासम्भवात् । तद्रहणश्च न योगिप्रत्यक्षात्, अरमदादौ सदभावात् । अरम- दादिप्रत्यक्षादेवेति चेत , तदप्यन्वयविषयम्, व्यतिरेकविषयं वा स्यात् ? अन्वयविषयमपि १ अनुष्यवस्तु । २ इद बौदस्य आकूनमभिप्राय स्यात् । ३ "तन यदर्थक्रियासमर्थ तदेव वस्तु स्वलक्षणमिति ।"-प्रमाणसमु. टी. पृ. ६ । “यस्यार्थस्य मानिधानासन्निधाना या ज्ञानप्रतिभासभेद तस्व. लक्षणम् । तदेव परमार्थसत् ।" न्यायवि० ११३, १४ । “स्वममाघारण लक्षण तत्त्व स्वरक्षणम् ।"-न्यायधि- टी० पृ. २२ । "अर्थक्रियासमर्थ यत्तदन्न परमार्थसात् । अन्यन् सतिस प्रोक्त ते स्वमामान्यलक्षणे ॥" -प्र. वा. ३१३ । एतन्मने स्वलक्षण क्षणिक निरश परमाणुरूप च । ४ स्वक्षणस्य । ५ "एक्स्यार्थस्वभावस्य प्रत्यक्षस्य सन स्वयम् । कोऽन्यो न हो भाग स्याच प्रमाणे परीक्ष्यते ॥ सर्व एवं दृशे निरशवादावरय । एकोहि अर्थात्मा निरश । स नापत् प्रत्यक्षोऽभ्युपगन्तव्य ।" -५० वा. रघ टी० पृ. १२१ । भिधा २०, ५०, आ। ७ स्वलक्षण परमार्थत एकरूपम् , यदि नानारूप स्यात् तथापि य तहमानारूप प्रथमप्रत्यक्ष एव भावभासते । यत सामाकरणविशेषार्थ क्रियमाणमनुत्रान व्यर्थ न स्यात् । अपि तु स्यादेवेति भार । स्वलक्षणभिने । ९ अक्षगोचरविशेषल्या १० स्वरक्षणभिने कम्पितेन । प्रमाण 10,1०,१०० १२ भविनाभावसम्बन्ध । २० प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताका ११ सकलव्यक्तिविषयम् , प्रतिनियतव्यक्तिविषयं वा स्यात् ? 'न सकलव्यक्तिगोचरम, तद्वतः सर्व- शत्वापत्तेः । प्रतिनियतव्यक्तिगोचरं चेत् , तर्हि तद्गतस्यैव प्रतिवन्धस्य तेन ग्रहणं भवेन्न निरपशेपव्यक्तिगतस्य । न हि या व्यक्त्यो न तद्गोचरा तन्निष्टस्य प्रतिबन्धस्यान्यस्य वा धर्मस्य तेन प्रतिपत्तिः सम्भवति, आधेयप्रतिपत्तेराधारप्रतिपत्तिनान्तरीयफत्वात् । एफर्न तद्ब्रह्णमेवान्य- त्रापि तद्हणमिति चेत् , अन्यत्र तदग्रहणमेपैकनापि तदग्रहणं किन्न स्यात् । एकर तहणं ५ प्रत्यक्षत एवानुभूयत इति चेत् , अन्यत्र तद्ग्रहणमपि तत एवानुभूयते तदन्यविषयपराङ्मुख- त्वन तस्य स्वयमनुभवात् । "अत: "अन्यत्र साध्याभावेऽपि साधनं सम्भाव्येत, "तथा च फथमदृष्टपूर्वधूमादिदर्शनात् निश्चिता पावकादिप्रतिपत्तिर्भवेत् ? तन्न अन्ययविषयात्प्रत्यक्षात्प्रतिबन्ध- प्रतिपत्तिः । व्यतिरेकविपयादेवान्योपलम्भरूपादिति चेत्, "तस्य च साध्याभावप्रयुक्तसाधनाभा- वनियमाधिकरणभावाभिमतकतिपयविपक्षगोचरत्वे स एव दोप: "तनिष्ठस्यैव तथाविधतदभाव - १० नियमस्य तेन ग्रहणान्न निरवशेषविपक्षनिष्ठस्येति । न हि यो यस्याविषयः" "तत्तस्य कस्यचि. सदसत्वप्रतिपत्तौ समर्थं मेरुशिसरे मोदकसदसत्त्वप्रतिपत्तियत् । सकलविपक्षग्रहणे चोक्तम्- 'तद्वतः सर्वज्ञत्वापत्तिः' इति । तथा च "दु:ससत्यस्य "यत् अनित्यत्वे कदाचिदुपलभ्यत्व दुःखत्वे हेतुपरवशत्व शून्यत्वे चोवासभावनानिर्मितत्त्वम् अनात्मत्वे चानात्मकार्यकारित्वं साधनमुक्त तत्सा- कल्यव्यतिरेकनिश्चयविरहात् विपक्षेपि संभाव्यमानं कथमुक्तसाध्यप्रत्यायनसामर्थ्य मुद्हेत् यतों तुराकारस्य दुःखसत्यस्य निर्णयः स्यात् । एवमन्यत्रापि । तन्न परस्यानुमानं यदभ्यासादनुष्ठेय- वस्तुसाक्षात्करणम् । स्यान्मतम्-न सकलविपक्षग्रहणात् व्यतिरेकनिर्णयो येनायं दोषः स्यात् अपि तु "तादात्म्यतदुत्पत्तिप्रतिबन्धसामर्थ्यात् । तथा हि "दुःखसत्यस्य कदाचिदुपलभ्यत्वमनित्यत्व- स्वभावं तदभावे न भवत्येव । नित्यत्ये हि नित्योपलभ्यस्वभावस्यैव प्रसङ्गात् । तदुक्तम्- २० २ प्रतिवद्धस्य ब०,आ०,१०,स० । ३ स हि ता०। ४ अस्मदादिप्रत्यक्षविषया । ५ वस्तुगत सम्बन्धोऽन्यो का धर्म । ६ प्रत्यक्षगोचरव्यक्तौ । ७ प्रत्यक्षागोचरे व्यक्तौ । ८ तद्ग्रहणमेवैरापि तग्रहण आ०,०, प०, स०। सम्बन्धाग्रहण । ९ स्वविषयातिरिक्तविषयपराङ्मुखत्वेन । १० यत प्रत्यक्ष प्रतिनियत विषयम् आ । १स्वागोचरल्यत्तौ । १२ स्वागोचरम्यत्ती अन्वयन्यभिचारे सति । विपक्षीपलम्भरूपात् । विपक्षोपलम्मरूपस्य व्यतिरेकविषयक्प्रत्यक्षस्य । १५ व्यतिरेक नियम । १६ कतिपयविपक्षनिष्टस्यैव साभ्याभावप्रयुक्तसाधनाभावरूपव्यतिरेकनियमस्य । १७ -भावानि १९ तत् ज्ञानम् तस्य स्वाविषयीभूतपदार्थनिष्ठस्य कस्यनित् धर्मस्य । २० दुखसत्त्वस्य मा०, २०, ५०, स.। २१ "दु स ससारिण स्कन्धा "-म. पा. ११४९ । 'यत्' इत्यस्य साधनमित्यनेनान्दय ! २२ "दु खसत्यच्च अनित्यतो दुखत अन्यतोऽनात्मतश्चेति चतुराकारमाख्यातु माह-कदाचिदुपलम्भात् तदध्रुव दोपनिश्चयात् । दुख हेतुक्शत्वाच न चात्मा नाप्यधिष्टितम् ॥ कदाचिदुपलम्भात्, दुखमध्रुवम् भनित्यम्, दोपनिश्चयात् रागादिदोपाश्रयेणोत्पत्ते हतुवंशनाच सा परवश दु खमिति न्याया दुख तत् । न चात्माश्रयम् अनामन आत्मविलक्षणत्वात् , नाप्यधिष्ठितम् अधिष्टातुरात्मनोऽभावात, अनेन शून्यत इत्या ख्यातम् ।"-प्र. चा० म. 11७८,७९ । २३ "तन दुखसत्यै नत्तार आकारा । तद्यथा अनित्यतो दु सत शुन्यतोऽनात्मतश्चेति ।"-धर्मस पृ०२३ । २४ “स च प्रतिबन्ध साध्येऽर्थे लिङ्गस्य वस्तुतस्तादात्म्यात् साध्या- दुत्पत्तेध ।"-न्यायवि० पृ. ४१ । हेतुबिकरी० पृ. ५५ । स्वभावहेती तादाम्यसम्बन्ध , कार्यहेतौ च तदुत्पत्ति सम्बन्ध । २५ दु खसत्यत्वस्य भा०,०प०,मः । २६ अनित्यत्वाभावे । २७ नित्यत्वोपल् आ०,१०,५०,स। १ न तत्सक-प.. १३ ११ -ता० । 1८-यस्ततस्तन कस्य-ताक ।
१२ न्यायचिनिश्चयविवरणे "न हि नित्यस्य नित्यमुपलभ्यस्थमावस्य केदाचिदुपलम्भो युक्तः उपलभ्येतरस्वभावयोः परस्परपरिहारस्थितत्वेन विरोधात् , उपलभ्यत एंव सचेति (स इति) प्रतिपादनात् । न च सर्वदा सर्वमुपलब्धुं शक्यं क्रमोपलभ्यस्यानित्यत्वात् । न च क्रम एकाचे सम्भवति क्रमवत एकत्वेनाप्रतिभासनात् प्रत्यक्षस्थाप्रवृत्तेः अनुपानस तदभावे अभागत ५ प्रत्यक्षपूर्वकत्वादनुमानस्य, अनुमानपूर्वकत्वे अन्धपरम्पराप्रसङ्गात् ।" [प्र.वार्तिगल. २११७८ ] इति । एवमन्यमापि सभावहतो वक्तव्यम् । तन्न तत्स्वभावस्यान्यस्वभावत्वं तत्स्वभा- वस्यामाप्रसङ्गात् । नाप्यनिसहेतुकस्य दुःससत्यस्य अहेतुक्त्वं नित्यहेतुक्त्वं वा सम्भावयितुं शक्यम् ; अहेतुफाये नित्यत्वस्य नित्यहेतुफत्ये चानियननस्य प्रसङ्गात्कारणवैक्ल्याभाये कार्यनिवृत्चे- १० रयोगात् । ततो निवर्तमान कार्य कारणस्य निवृत्तिमेव गमयति नानिवृत्तिम्, 'तत्र स्वय- मप्यनिवृत्तत्वप्रसगात् । न चानिवृत्तिरूपमेव दुससत्यम्, "तस्य "कदाचिदुपलभ्यत्वेनानित्य- त्वस्य सावनात् । तदुत्तम्- "अहेतोनित्यतैवाऽस्तु नित्यहेतोः यः कुत्तः । "हेतुवैफल्यमप्राप्य कथं भावो निवर्तते १ ॥ यस्य हेतुकृतो भावस्त दभावान तद्भवेत् । "तदभावेऽपि भावश्चेदभावोऽस्य कुत्तो भवेत् ? ॥ अनित्यहेतुको भागे हेत्वभावानिवर्तते । "नित्यहेतोरभावोऽस्ति न हेतोन निवर्तते ।।" [प्रत्यार्तिकाल० १११३५] इति । एवमन्ययापि कार्यहेतो वक्तव्यम् । तन्न तत्कार्यमहेतुकमन्यहेतुकं या युध मिति, अने. २० दमुच्यते- यत् यत्स्वभावं यत्कार्य वा सर्वत्र सर्वदा तत् तत्स्वभावमेव नान्यस्वभावम् । र्थमेव नाकार्य नान्यकार्य घेवि । 'नहि दिना 'अहेतो.' इत्यादिना घोच्यमानः कस्य पुनः प्रमाणस्येतावान् व्यापारः ' प्रत्यक्षस्यैवेति चेत्, न, तस्य सनिहिने तात्कालिवस्तुमानगोचर- तया निरपशेपसपक्षविपक्षाभिमतन्यविनिरनिरीक्षणशत्तिविक्ट-वन इयतो व्यापारस्याऽसम्भ वात् । प्रदेशतरतादात्म्यतत्कार्यत्यग्रहणमेव देशकालव्यापित्वनामि तद्रहणमिति चेत, स्याहत- मेतत्-यदि प्रदेशतस्तद्रहणं कथं तस्यापित्येन तहणम् १ सच्चेत्, कथं प्रदेशतरतगृहणम् । 'प्रदेशवश्च, तव्यापित्वेन च इति स्पष्टो व्याधातः । पथमन्यथा स्तम्भस्यापि प्रदेशनियत त्वेन ग्रहणमेव "तख्यापित्वेन ग्रहणं न स्यात् । यत इद सूक्तं स्यात्- तत्का- , , कश्चिदु-आ०, ब०, प., स० । २-हारस्थितित्वेन मा०, ०,१०, सः । ३ इस सत्तेति "उप- लभ्यतयेव म इति"-. बार्तिकार। ४ सर्य या आ.ब०,१०,०।५ नित्यत्वे । प्रत्यक्षामावे। -वादन मानपूर्व ता.14 तुलना-'न हेतुरुत्वे नित्यहेतुचल्वे का निर्तनाय व्यापार सफल ।" प्र०.पातिगाल. ११.३५॥ ९ गदि निवर्तमान कार्य कारणस्यानिति गमयेत् तदा कारणस्यानिवृत्ती स्वय कार्यस्यापिन निति स्यादिति भाव । १. दु ससत्यस्य । कदाचिदप्युप-मा०,०,ए. स. १३ हैतोवैकल्य-मा०,१०,प० । १३ हैवभावात् ।।४ वारणाभावेऽपि यदि कार्यसख स्यात् तदा यस्स-कार्यस्य समाव बुत कारणात् स्यात् ५ मत नित्यकारणवस्यात्य मावो नास्ति सत स हेतीन निवर्तते। १६ सर्वोपमहादेगा | सक्सदेशकालच्यापित्वेन ।
३ ११] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव "यो यौव स तत्रैव यो यदैव तदैव सः । न देशकालयोाप्तिर्भावानामिह विद्यते ॥" ] इति । तन प्रत्यक्षस्यायं व्यापारः, तस्यान्वयविषयस्य व्यतिरेकविषयस्य वेयतो व्यापारस्याऽ- नुपपत्तेः। तंजन्मनो विकल्पस्येति चेत् ; कः पुनरसौ विकल्पः ? अनुमानमेवेति चेत् ; अनुमानातईि व्याप्तिग्रहणम् , तदपि न सम्या; तेनैव तद्ब्रहणे परस्पयश्रयप्रसङ्गात् । ५ अन्येन तद्हणे अनुमानपूर्वकत्वमनुमानस्योक्तं स्यात् । भवतु को दोप इति चेत् ; किं "पुनरिदमियानीमेवोतं भवद्वचनं भवतैव विस्मृतम् 'अनुमानस्यानुमानपूर्वकत्वे अन्धपरम्पराप्रस- गात्' इति ? अनुमानपूर्वकमेवानुमानं तथैव व्यवहारात्; न च व्यवहारो विचारमर्हति तस्या- विचारितरमणीयत्वात् , तद्विचारे सकलभेदव्यवहारविरहनसङ्गादित्यपि न बन्धुरम् ; अनित्या- द्यनुमानवनित्याद्यनुमानस्याप्यङ्गीकारप्रसङ्गात् । नित्यादित्वेनादृश्यमाने दुःखसत्यादौ कथं १० तथानुमानमिति चेत् ? स्यादेतदेवं यदि दर्शनपूर्वकमनुमानं स्यात, न चैवम् , तस्यानुमान- पूर्वकत्वेनोपगमात्, अन्धपरम्पराप्रसङ्गस्य चाविचारितरमणीयव्यवहारपद्धतिमुग्धवारयनिता- पारवश्येनैव निवारणात् । व्यवहारादपि नित्याद्यनुमानमप्रसिद्धमेव तत्र तस्यानुपयोगादिति चेत् ; न ; व्यवहारे तस्यैवोपयोगात् , प्रवृत्ति निवृत्त्यादिव्यवहारस्य नित्यत्वादिनिमित्तत्वेन व्यवहारिणां प्रसिद्धत्वात् । न हि निरंशक्षणिकादिरूपतया वस्तु किञ्चिनिश्चितं विपश्चितां १५ व्यवहारकारणम् । कथम्न्यथा अभ्यासावस्थायां "प्रत्यक्षविपयतयाऽध्यारोपितं दृश्यप्राप्येकत्वमेव व्यवहारकारण भवतैव "ततो"भाव्यथविपयं "विषयान्तरगोचरम् । प्रमाणपध्यारोपेणे "व्यवहारावरोधकृत् ॥ [प्र. वार्तिकाल० १।१] इति ब्रुवता निरूपितम् ? "तदनुमानाङ्गीकरणे च न दुःखसत्यस्यानिस्यत्वं तन्नित्यत्वस्यानुमानेन साधनात् । नापि"तस्यानात्माभितत्वम् ; अनुमानसिद्धनित्यादिरूपस्यात्मनः तदाश्रयत्वोपपत्तेः । २० १ प्रत्यक्षपृष्ठभाविनः। २ प्रकृतानुमानेनैव स्वीयव्याप्रिग्रहणे । ३ व्याप्तिग्रहणे सति अनुमानी- स्थानम्, सति चानुमाने व्याप्तिग्रहणमिति । ४ द्वितीयानुसानेन प्रथमानुमानव्याप्तिग्रहणे । दानी-ब.. ६ नित्यादित्वेन । -रमणीयत्वव्य-आ०, २०, ५०, स.। ८ तन व्यवहारे तस्य नित्यादि- वस्तुनः । ९ तस्मादुप-१०। १०-हारेणाप्र-प० । -हारेणां प्र- आ०, ५०, स०। 11 "अन्यो हि दर्शन. काल. भन्यव प्राप्तिकाल , किन्तु यकाल परिच्छिन्नं तदेव तेन प्रापणीयम्। अभेदाभ्यवसायाच सन्तानगतमेकत्वं द्रष्टव्यमिति ।" -न्याययि टी. पृ०० । १२ दर्शनविपयभूतः क्षणः दृश्यः, प्रवृत्त्यनन्तरं प्राप्तिविषयीभूतः क्षणः प्राप्यः । बौद्धाना मते सर्वस्य क्षणिकत्वात् अन्यत् दृश्यम् प्राप्यच अन्यत् स्यात् अनश्च विसंवादात् भप्रामाण्यं व्यवहारविसंवादश्च प्राप्तः तस्परिहारार्थ ः 'यद् दृष्टं तदेव प्राप्तम्' इति विभिन्नक्षणगतसन्तानात्मकमध्यारोपितमे. करवं स्वीक्रियते । ततश्च ज्ञानप्रामाण्य व्यवहारश्च निर्वहति । १३ प्राप्त्यपेक्षया। १५ दर्शनापेचया अतीतक्षगगो- चरम् । १५ सन्तानात्मकैकत्वारोपेण । १६ "व्यवहारावशेषकृत्"-:. वार्तिकाल । १७ नित्याद्यनुमान• स्वीकारे । १८ तस्यात्म्पत्रि-आ०,०,०, स.दु.ससत्यस्य ।
१४ १० न्यायविनिश्चय विवरणे [११ फारणय किद्विकम्यविदाश्रयन्केगा धिमायरम अनुपचारिणनदयोगान । न प नित्यम्यात्मनोऽ. न्यस्य या कारणत्यम ? तलथं रोन दुःयमत्यम्याधिष्टानम ? सदुराम-"नाकारणमधिष्ठाता नित्यं वा कारणं कथम् १" [प्र. या० १.१७९ ] इति पेन , उच्यते- गन्यिदं पारणत्यं च मयत्येव न तत्वतः यदुफ पीसिनेयेदं "गंवृत्यान्तु यथा तथा" [प्र. या० २१४ ॥ ४१ ॥ रोकाभिप्राय एयाय मंत्ययोऽपि नापरः। में नित्यस्य हेनुत्तमरिचाई प्रास्पये ॥ ४२ ॥ सय तस्य मदानात् क्षणिकाली विपर्ययात् । इति प्रपञ्चतः पश्चारावास्थानं यदिप्यते ॥ १३ ॥ हेतुत्यदेव दुश्यस्य तेनामा स्यादुपाश्रयः । तत्स्थं दुःससत्यस्य पतुरागरतोच्यते ॥ १४ ॥ तको निराशतमेतत्-"चतुराकारं "दुःससत्यमनित्यतो दुःखतः "शून्यतोऽ- नात्मतच" [प्र. यार्तिकाल० १११७८ ] इति । ननायं "व्याप्ति विकल्पोऽनुमानात् । मा भूतथापि योग्यतयेर साध्यसाधनाधिनाभावसनस्वगोचरः कश्चिदपर प्रवायं विरल्प इति चेत्, १५ अम्ति सहि निरवशेपास्तुविषयं "छमस्थम्यापि विचित्रमाणमिति वदभ्यास एव सक्लार्थ- दर्शनार्थिना पतव्योग नियतविषयानुमानाभ्यासः, 'तद-पासे सफलार्थदर्शनासम्भयात् । नहि. नियतविषयप्रमाणाभ्यासाद् अशेषविष दर्शनमुपपन्नम् अतिमसद्गात् । तस्मादशेपदर्शनस्या- दोपविषयमेव प्रमाणं पारणं नापरमिति प्रतिपादनार्धम् "अोपग्रहणम् । यत्पुनरेतत्-भवतु मगरदर्शनमोपविषयम् , तथापि कि "तस्य परीक्षया पुरुषार्थानुप- २० योगात् १ यत्पुनस्तद्दर्शनं "चतुरार्यसत्यगोचरं तदेय परीक्षितयं पुरुपार्योपयोगित्यात् नापर- विपयं विपर्ययादिति, तनेदमुच्यते- तत्सत्यव्यतिरिक्तं "यदि किञ्चिन्नास्ति सहि"तावदेव कियारहितस्य । २ नित्यस्य ममयोगपद्याभ्यामर्थरियाविरहान्। ३ क पनयंत्र। ४ "इयमेव खल सवृति उच्यते येय विचार्यमाणा विधीयते।" "माणमन्तरेण प्रतीन्यमिमानमात्र राति भनिरूपिततरवा हि प्रतीति संनिर्मता।" -मघातिकार. २४ । “रावियन शात्रियते यथाभूतपरिज्ञान स्वमावावरणादारतप्रकाशनाचानयति संगति । भरिया मौहो विपर्यास इति पर्याया । अविद्या बससदार्थस्वरूपारोवियत स्वमायदर्शनावरणामिका च सनी संशतिरुपपद्यते । अविद्योपदर्शितं च प्रतीपममुत्पन्न बस्नुरूप सहतिरक्यते। तदेव लोकसं निमत्यमित्यभिधीयते।" -बोधिच.प.तृ. ३५२ । ५ लोकानियायात्मक सहत्यर्थ । ६ नित्य एव । ७ तरयासदावा-आ०,०, ५०, स० हेतु वस्य। ८ येनात्मा २० । यतमा सानामा ३०, सतेन नित्यस्य हेतुत्वसमर्थनेन। ९ धर्मसप्रह प्रमाणवार्निवादी निर्दिए । पश्यतु पृ०११टि ३३१० दु सत्य सत्य-०,२०,५०,०111शून्यवतो-आ०, २०प० स० । ११ व्याप्तिविकल्पोऽनामा मा-ता० । १३ अल्पज्ञस्य । १५ तदैव प० 1 सक्लसाध्यसाधनगोचर- च्याशिविकल्पाभ्यास । १५ नियतविषयानुमानाभ्यासे । १६-नाभापार भा०,१०,१०,१० । १७ प्रसिद्धाशेष तत्वात्यन । १८ तदशेषविषयत्वस्य । १९ "सन्य न्युकानि चत्वारि दुस समुदयस्तथा । निरोधी मार्ग एतेषा यथाभिसमर्थ कम ॥"-अभिधर्मको. हार । धर्मसं० पृ० ५। २०यकि-भा०, २०, ५० स०२१ सम्य• चतुष्टयपरिमितम् ।
५ ११] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव जगदिति कथन्न तदर्शनस्याशेषविषयत्वम् ? कथं या न पुरुपापियोगित्वं यतस्तत्परीक्षणमु- पेक्ष्यते ? न हि सर्वविषयस्यैवाऽसर्यविपयत्वं पुरुपार्थहेतो; तदहेतुत्वमुपपन्नम् ; विरोधात् । ततः सत्यचतुष्टयवेदित्वेन फस्यचित्प्रामाण्यमभ्युपगच्छन् अशेयेदित्वेनैव अभ्युपगच्छतीति व्याहतमेतत्- "हेयोपादेयतत्त्वस्य साभ्युपापस्य वेदकः । यः प्रमाणमसाविष्टो न तु सर्वस्य वेदकः ॥" [प्र० वा० ११३४] इति । भवतु तहिं चतुःसत्यव्यतिरिक्तं किमपि यद्विषयं सुगतदर्शनमपुरुषार्थोपयोगीति चेत् ; कस्य न तत् पुरुषार्थोपयोगि-सुगवस्य, विनेयानां वा ? [न] तावत्सुगतस्य; तस्य निरवशेप- चतुःसत्य-तद्व्यतिरिक्तरराशिद्वयदर्शने तद्गतसत्वक्षणिकत्यादिसकलसाध्यसाधनधर्मव्यातिप्रति- पत्तो सुनिश्चितस्य स्वार्थानुमानलक्षणस्य पुरुषार्थस्य सम्भवात अन्यथा तँदयोगात् । न हि १० ध्याप्तिग्रहणनिरपेक्षस्य प्रादेशिकतद्हणसापेक्षस्य वाऽनुमानस्य सम्भवः; अतिप्रसङ्गात । अत एवो- तमलङ्कारकारेण- "सहभावस्तु यो व्याप्तौ न तस्मादनुमोदयः । कादाचित्कतया "तस्य "सर्वत्रास्त्वनुमाऽथवा ॥” [प्र० वा० १।४] इति स्यान्मतम् , न सुगतस्यानुमानात्मा पुरुषार्थो यतस्तदुपयोगित्वेनाशेपदर्शनस्य विचा- राहत्वम्, अपि तु प्रत्यक्षादेव (क्षात्मैव) "तस्य च न व्याप्तिग्रहणसापेक्षत्वं यतस्तत्राशेपदर्शन- स्योपयोग इति; तदसारम्; अनुमानस्यैव सर्वाकारगोचरस्य सौगतप्रत्यक्षत्वेन परैरभ्युमगमात् । यस्मादुक्तम्- "सर्वाकारानुमान यदध्यक्षात्तन्न भिद्यते । नेन्द्रियेगापि संयोगस्त तोऽधिकविशेषकृत् ॥” [प्र० वा० १।१३८] इति यद्यनुमानमेव प्रत्यक्षं तर्हि 'प्रत्यक्षात् व्याप्तिग्रहणम्' इति" 'अनुमानात्तग्रहणम्' इत्युक्तं भवति, न चैतन्न्याय्यम्, तत एवानुमानात्तद्रणे" परस्पराश्रयप्रसङ्गात् , गृहणे तत्राप्यन्यतस्तद्रहणमित्यनवस्थापत्तेः प्रस्तुतार्थप्रतिपत्त्यभावप्रसङ्गात् । उक्तश्च प्रज्ञाकरण- . अन्यतस्त- - १-विषयस्यासर्व-भा०, २०, ५०, स०। २ तत्सत्य-आ०, २०, ५०, स.. ३-छतीति मा०, २०, ५०, स०। ४ सन्य वतुष्टयव्यतिरिक्तस्य जगतोऽभाषान् सन्यचतुष्टयवेदित्वमेव अशेषार्थ- वैदित्यम्। ५ पश्यतु-पृ. ९टि०१२ । ६ यद्विषयगतद-आ०,५०,प०१७ अनुमानायोगात्। ८ व्यक्तिविशेपे व्याप्ति- ग्रहणापेक्षस्य । ९-स्यैवानु-१० । १० प्रमाणवार्तिकालकारकता प्रज्ञाकरगुप्तेन "सदभावपयोोप्या न""-:. वातिकाल. 11 ११ सहभावस्य । १२ यदि कादाचित्र सहभावेनानुमान स्यात् तदा बहिनापि धूमानुमान स्यान् कादाचिरकसहभारस्याविशेषात् । १३ प्रत्यक्षा"व-आ०,ब०,०1म व ता० । १५ प्रत्यक्षात्मनः पुरुषार्थस्य । १५ “यत्सल साकारपदार्थस्वरूपवेदनं तदेवाध्यक्षम् । साक्षात्करणाऱ्या हि प्रत्यक्षार्थ:--."-प्र. चार्तिकाल. 11.३० १६ सबोकारानुमानात्मकप्रत्यक्षापेक्षया । १७ इति कथनेग। १८ स्वायव्याशिग्रहणे ।
न्यायविनिश्चयविवरणे [११ "अनुमानान्तराक्षेपादनवस्थावतारतः । प्रकृताऽप्रतिपत्तिः स्यात्तस्य तस्येत्यपेक्षणात् ।।" [प्र. वार्तिकाल० ११४ ] इति चेत् । अस्तु सौगतस्यैवाय दोपो यस्माद्वयवहारमात्रादेव प्रसिद्धमनुमानम्, तदभावे प्रवृत्त्यादिव्यवहारविरहप्रसङ्गात् । प्रत्यक्षस्यायनुमानपूर्वकस्यैव व्यवहारकारित्वात , अनुमानमेय ५ सल्वत्यन्ताभ्यासपादवपरिकलितशरीरमननुस्मृतसाध्यसाधनसम्बन्धतयोपजायमानम् अकरमा- झूमदर्शनाहिसंवेदनयत् अध्यक्षव्यपदेशमनुभवन् प्रवृत्यादिव्यवहारमारचयति नापरम् । तत्र यदि अन्धपरम्पराप्रसङ्गापादनादनुमानमवसाय्येत व्यवहार एवापसारितः स्यात् । तत्र योता- वता परितोपस्तदा न किञ्चित्कर्तव्यमिति मुक्तिरेव संसारात् तस्यात्यन्तमसम्भवात् । अथ व्यवहारप्रसिद्धः संसारः; तर्हि सिद्धमेवानुमान व्यवहारस्य तन्नान्तरीयकत्वात् । अतस्तद्गृहीत- १० व्याप्तिसामर्थ्यात् सर्वाफारगोचरमनुमानं सुगतस्योपजायमानमनवद्यमेवेनि चेत्, आस्तां तावदे- तत, तत्त्वपदतात्पयचिन्तायां विचारणात् । तन्नानुमानात्तस्य सर्वाकागनुमान दर्शनादेखें तदुपपत्तेः। यदि "तदर्शनमर्ने नुमानं कथमनुमानात्मकं तत्प्रत्यक्षमुफमिति चेत्? न; एवमपि परस्यैव दोषात् । तन्न सुगतस्य निखशेषदर्शनमपुरुषार्थकरम् , तदभाव तत्पुरुषार्थस्य स्वार्थानुमानस्या- भावप्रसङ्गात् । एतेन 'विनेयानामपि तत् पुरुषार्थकर ' इति चिन्तितम् । सदभावे स्वार्थानु- मानवत्, "तन्निबन्धनस्य परार्थानुमानस्यापि विनेयपुरुषार्थतयाऽभिमतस्याभावप्रसङ्गात् । साध्यप्रतियलिङ्गोपदर्शनपरं हि वचनं परार्थानुमानम', तेनैव" सुगतोपदिष्टेन विनेयानां तत्त्वप्रतिपत्तेः, न वचनमात्रेण "तस्य वस्तुनि "प्रामाण्यानभ्युपगमात्, प्रमाणसाझ्याच्यापात- प्रसङ्गात् । न चासति स्वार्थानुमाने तदुपदर्शनपरं वचनम् । न प निरक्शेपदर्शनमन्तरेण २० स्वार्थानुमानमिति स्वपरार्थसिद्धिमूलनिबन्धनत्यादखिलवस्तुसाक्षात्करणस्य कथनाम विचारभूमि- भागविधेयत्वन्न भवेत? अपि च, परमपीदं "प'पर्यनुयुज्यते- यत्तचतु:सत्यव्यतिरिक्त तत् चेननम् अचेतनम्,पा गत्यन्तराभावात् ? चेतनमेव कीटसझनादिलक्षणमिति चेत् ; बत्रापि सङ्घयायतः, साहसाया था ५ . १प्रकृत्ताप्रकृता वा रया-२०। प्रकृनाच प्रकृता स्या-सा २-परिकरितश- ताश्य- ताभ्यासनस्तस्स मटित्येव तदर्थविन् । अकस्मादधमतो रहिप्रतीतिरिव देहिनाम् ॥"-• पार्तिकाल .३। ४ व्यवहारापसारणैन । तुलना-"तन यद्येतावता परितोषस्तदान किचिल्लत्तव्यमिति मुक्तिरेव · ..." -4. घातिकाल. 11५। ५ व्यवहाररूपस्य संमारस्य । ६ अनुमानाबिनामाविवात । ७ चतु स य तद्वयतिरिकाशि- दूरदर्शनगृहीन । प्रगिद्धाशेषतरवाति इलोकोतरवपदविचारावसरे। ९-मानं तद्दर्श-भा०, २०, ५०, १० राशियदर्शनादेव। ११ गुगत प्रत्यक्षम् । १२-नमनुमा-आ०, ब०, ५०, स.। १३ मुगनस्वार्थानुमन- निबन्धनस्य । १५ "निरूपलिझाल्यानं पार्थानुमानम्"-न्यायवि०पू०६। "तत्र पार्यानुमान स्वार्थप्रा. शनमित्याचार्यायलझणम्"-:. म. 11 १५ साध्यप्रतिलिट्रोपदर्शकवचनेनैव । १६ वचनम् । १० "वचसा प्रतिवन्धी वा को शालेयपि वस्तुपु। प्रतिपादयता तानि यनेषां स्था प्रमाणता ॥"-तत्वमा श्लो. १५३।१८ यतोदि बौद्धः प्रत्यक्षमनमानधेति प्रमाणद्वय मेवानुमन्यते । ११ सौगतम् ।
- ११] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव दर्शनमपुरुषार्थकरम् ? न तावत्सहयावतः; तद्धि' 'निरवशेपदेशकालाधिष्ठानं फीटनिकुरुम्ब- कमेव, न च तदर्शनाभावे तदधिकरणचतुःसत्यसंवेदनं सम्भवति । न हि चतुःसत्यं नाम किम्वित्स्वतन्त्रमस्ति, दुःखसमुदयादेश्वेतनसन्तानाधिकरणस्यैव तत्त्वात् । चेतनसन्तानस्य च नारकतिर्यड्नरसुरभेदभिन्नस्य प्रत्येकमनेकधा भेदमनुभवतः प्रतिव्यक्तिदर्शनविरहे तद्- धिकरणनिरवशेषचतुःसत्यसाक्षात्करणासम्भवात् कथन्न तदर्शनस्य पुरुषार्थोपयोगित्वम् ? ५ सामान्यरूपतयैव सकलचतुःसत्यवेदनान्न प्रतिव्यक्तिनिरवशेपचेतनसन्तानदर्शनमर्थवदिति चेत् ; न; सर्वाकारचतुःसत्यवेदनविरोधात् । न हि सामान्येन गृहीतं सर्वाकारेण गृहीतं नाम । सर्वाकारग्रहणं चाभिमतं भवताम् "सर्वाकारानुमानं यत्" [प्र. वार्तिकाल० १।१३८ ]. इत्यादि ववनात् । भवतु सुगतस्य प्रतिव्यक्तिगतदर्शनेनैव सकलचेतनसन्तानसाक्षात्करणम् अस्माकं तु तदर्थवन्न भवति, अस्मदर्थे चतुःसत्योपदेशे तन्मानगोचरस्यैव सुगतज्ञानस्योपयो- १० गात् , अत एवास्मदादेशेन नसा साक्षानिर्दिशति- 'कीटसंख्यापरिज्ञानं तस्य नः कोपयुज्यते" [प्र. वा० ११३३ ] इति । ततस्तन्मानगोचरमेव ज्ञानं सुगतस्य परीक्षितव्यम्-'किं तस्य "तदस्ति था न वा' इति, तदभावे "तचतुःसत्योपदेशासम्भवात् , न सर्वचेतनसन्तानविपयं तदभावेऽपि "तत्सम्भवादिति चेत् । न ; दत्तोत्तरत्वात् , सकलचेतनसन्तानादर्शने तन्निष्ठत्वेन चतु:सत्योपदेशासम्भवात् । १५ न हि कूपमपश्यतः 'कूपे जलम्' इत्युपदेशः सम्भवति । "तनिष्ठत्वेन तदुपदेशो नार्थवानिति चेत् ; कथं तर्हि तदुपदेशोऽर्थवान् ? अतन्निष्ठत्वेनेति चेत् ; न ; "तनिष्ठतया ज्ञातस्याऽतन्निष्टत्वे- नोपदेशे वञ्चकत्येनोपदेष्टुरप्रमाणत्वापत्तेः । एवेन कतिपयतव्यक्तिनिष्ठत्वेनेति प्रत्युक्तम्; न्याय स्य समानत्वात् । स्यान्मतम्-विनेयानुरोधादेव भगवतो देशना, विनेयाश्च सु(स्वगतमेव चतुःसत्यमुपदेशा- २० दवबोद्भुमिच्छन्ति तस्यैवानुष्ठेयत्वान् न सर्वगतं विपर्ययात् , ततः सर्वचेतनाधिकरणत्वेनाधिगतमपि विनेयाभिप्रायवशात् प्रतिनियततद्व्यक्तिगतत्वेनैव चतुःसत्यमुपदिशति नान्यथेति प्रतिनियत- चेतनव्यक्तिज्ञानमेव तस्य परीक्षायोग्यं न सर्वचेतनव्यक्तिज्ञानमिति ; तन्न ; विनेयनियमाभावात् । तत्त्वबुभुस्सावन्तो हि विनेयाः, ते च न मनुप्या एय, सरीसृपादीनामपि तत्त्वयुभुत्सावत्त्वे तदविरोधात् । तेपां तत्त्वबुभुत्सावत्त्वमेव नास्तीति चेत् ; मानवानां कुतस्तद्वत्त्वम् ? संसार- २५ दुःखपरिपीडनोरोधितात् कुतश्चिद्वासनाविशेषादिति चेत् ; न; सरीसृपादीनामपि तदविरोधात् । । 18 .. १ चतुः सत्यव्यतिरिक्त संख्यावचेतनं खलु। २ कालत्रयत्रिलोकवर्तिकोटसमूह एव । ३ कोटसम्हाधिकरणक । ४-समुदायादे-आफ, ब,५०,स० । समुदेति भरमादिति समुदयः दु सशरणं तृष्णेति यावत् । ५-दर्शनविरहिने त- ता० । ६ संख्यातकीटादिदर्शनस्य । ७-दादेपदेशेन न साक्षानि-मा०, २०, ५०, स०। अस्मतशब्दस्थाने आदेशीभूतेन 'नोपयुज्यते' इत्युक्त 'नः' इति पदेन । ८ "तस्मादनुष्टेयगत शानमस्य विचार्यताम्" इति पूर्वार्द्धः। ९ अस्मदीयचतु सत्यमात्रगोचरमेव । १० अस्मदीयचतु.सत्यगोचरज्ञानम् । ११ अस्मदीयचतुःसत्योपदेश । १२ अस्मदादिचतु सत्योपदेश । ।३ सालचेतनसन्ताननिष्टतया चतु.सत्योपदेशः। १४ सफलचेतनसन्ताननिष्ठतया । १५ सुगतस्य । १६ विनयताविरोधात् । ३ न्यायचिनिश्शयविवरणे सुगतानुमहादिति चेत्, न; तस्यापि सर्व रेतनसाधारणत्वात्, अन्यथा सुगतस्य जगद्धितपित्वा- नुपपत्तेः । न हि सण्डशो जगदनुशलता समयं तद्वितैपित्वमुपपन्नम् । सरीमपादीनां तत्त्वयु. भुत्सावत्त्वेपि न विनेयत्वं तत्त्वज्ञानामृतोपदेशभाजनस्वाभावात् , व्यक्तया याचा वेषामोश- यितुमशक्यत्यादिति चेत् ; मा भूतु व्यक्तया तपोधनम् , अव्यक्तया तु वद्वद्यया स्यात् । न ५ तोदशी मुगतस्य यागस्तीति चेत् ; अन्याशी पुत: ? तदन्यासादिति चेत् ; सापि तत एवास्तु । संदभ्यासोऽपि तस्य नास्तीति चेत् ; इतरवागभ्यासः कुतः ? तद्वागुपदेशादिति चेत् ; अन्यक- वागुपदेशोऽपि नास्तीति कुतोऽवसितम् । अनुपलम्भादिति चेत् । न; सर्वविव्यापारस्यानुफल- ब्धस्यापि सम्भवात्, कथमन्यथा योग्यगुण्यलक्षणस्य शेपस्य भावानिशेपं दुःखहेतुप्रहाणं सुगतस्य स्यात्, यवो निःशेषार्थमुपसर्गस्योत सूक्तं स्यात् ? ततः कश्चित्सर्वेषां विनेयत्वोपपत्तितः । प्राणिनां तत्परिझानं तंत्र किन्न परीक्ष्यताम् ॥४८॥ "अजानन हि "वास्तेपामुपदेष्टा तथागतः । "तया चेत् ; बुद्धिवैगुण्यं कथनस्य निवर्तताम् ॥ ४९ ॥ अस्तु फोटावबोधोऽपि तेन चेन्नास्ति यः फलम् । युप्मबोधेन कीटानामपि नेति समं न किम् १ ॥ ५० ॥ ततो यथेदं फोटान्प्रत्युच्यते धर्मकीर्तिनी । 'कीटसमापरिज्ञानं तस्य नः क्वोपयुज्यते' ।। ५१ ॥ तथैव कीटकरेतद्वतव्यमितान् प्रति । मिसयापरिक्षानं तस्य नः कोपयुज्यते ॥ ५२ ॥ इति । तन्न सहयादिवतः कीटादिचेतनवर्गस्य ज्ञानमपुरुषार्यकरम् , तदभाये सफलयेतनवर्गा- भितनिरवशेषानुष्यतत्त्वोपदेशानुपपत्तेः । नापि तत्साध्यायाःतस्यास्तव्यतिरेकेणाभावे तज्ज्ञान- स्यैवासम्भवान्। सम्भवतो हिज्ञानस्यानुपयोगियेनोपेक्षणीयत्वं वक्तव्यं नाऽसम्भवतः परीक्षाया परेरण्यनभ्युपगमात् । न चाविप्रतिपत्तिविपय एर विवादः तदनुपरमपसद्वान् । अथ यस्य सहया विद्यते स्यादिनः तस्यापि तद्विषयं तदानशानमपुरुषार्थकरमित्ये. २५ सदैदम्पय॑म् ; इदमपि न सुन्दरम, कीटसकागोचरस्याप्तज्ञानस्य प्रायश्चित्तविभागादापदेशहेतुत्वेन २० । "प्रमाणभूताय जगद्वितपिणे नमोस्तु तमे सुगताय तायिने ।।"-8 समु र सरोस्पादिदेया धन्यसा वाक् । ३ अव्यस्वागभ्यासोऽपि १ अनुपलब्यस्यापि अव्यक्तदागुपदेशस्यानीगरे । ५ अध्यत्ततागुपदेशा. सामर्य । ६ "हेतो. महामं निगुणं भुगतत्वम्-देतो समुदत्य महा! निरोध पुगतत्वम् । तच त्रिगुणं गुणत्रय युक्तम् । मुशब्दस्य निविधोऽर्थ. प्रशस्तता मुरूपयत् , अपुनरावत्तिः सुनष्ट ज्वरवत् , नि शेषता च सुपूर्णपटक्तू." -प्र. या ११११११७ मुतपटकग्राब्दस्य । ८ सलचेतनसन्तानगतचतु सत्यशशिनम् । गते । १. अशानं न हि ता ते-मा०,०,१० बानं न हितान् तेस"सर्वप्राणिनः । १२ सर्व प्राणिनोऽजा- नमपि यदि उपदेष्टा स्यार । १३ युष्मार्क मिणाम् । १४ प्रमाणवाटिके(११३३)। १५ भिक्षून प्रति । १३सल्या. वदनिभतया । १७ असम्भवदर्थपरीक्षाया. १८ विभिनीटहिसाजन्यतीवमन्दादिपापपरिहारकविविधभापति ११] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव: पुरुषार्थोपनिवन्धनत्वात् , उपनतकीटवर्गपरिसङ्ख्यापरिज्ञानस्यैव हि द्विन्यादितव्यापादनोपनीत- विनेयदोपपरिहारणोपायभूतस्य प्रायश्चित्तविभागस्योपदेष्टुत्वं भगवतो न तद्विपरीवस्य । तन्न चतुःसत्यव्यतिरिक्तस्य चेतनत्यम् । अचेतनत्वं तर्हि भवतु ; तदपि मूर्तम् , अमूर्त वा ? मूर्त चेत् ; पृथिव्यादिकमेव । तच्च संस्खेदजादिचेतनवर्गाधिकरणमेवेति भवतामाकूतम्- "न स कश्चित्शथियादेशो यत्र न जन्तवः । संस्वेदजाद्या जायन्ते सर्व बीजात्मकं ततः ॥" [प्र०वा० १२३९] इति पार्वाकं प्रति धर्मकीर्वचनात् । तादृशस्य च तस्य परिज्ञानं कथन पुरुषार्थकारणम् ? तदपरिक्षाने तदधिकरणचेतनवर्गस्य 'तेनानवयोथे च तंगोचरचतुरायनिरवशेषसत्यस्यानवगमे- नोपदेशानुपपत्तेः। तन्न मूर्तम् । तदमूर्तमेव गगनादिकमिति चेत् ; न; तस्य स्वयमनभ्युपंगमेना- सत्त्वात् । पराभ्युपगमात्सत्त्वे पुरुषार्थहेतुत्वमपि तस्य तदभ्युपगमादेवास्तु । तन्न जगति १० किश्चिद्पुरुषार्थसाधनं यत्परिज्ञानं सर्वज्ञस्यापरीक्ष्यं भवेत् । ततो "निराकृतमेतत्-"पुरुषार्थज्ञता- मात्रात् सम्पूर्ण शासनं मतम्" [प्र० वार्तिकाल. १११३८] इति ; मात्रशब्दस्य व्यव- च्छेदामावेन वयात् , 'तेदभावश्च सर्वज्ञानस्यापि पुरुषार्थज्ञानत्वात् , 'तदपि साक्षात्पारम्पर्येण वा सर्वस्य यत्परिज्ञानं पुरुषार्थहेतुत्वात् । अत एवोक्तमलङ्कारकृता-"न च कार्यकारणभाव- मतिवृत्त्य परस्परं सकलं जगज्जायते" [प्र० वार्तिकाल० १११३८ ] इति । तदयम् एवं- १५ वचनात् सर्वज्ञानस्य पुरपार्थज्ञानत्वमुररीकुर्वन्नेव अपुरुषार्थज्ञानमपि किश्चिच्चेतसि कृत्वा तद्व्यवच्छेदार्थ मात्रशब्दमप्युपादत्त इति प्रज्ञाकरव्यपदेशमात्मनि अन्धे सुलोचनव्यवहारसह- शमावेदयति । यत्पुनरेतत्- "सर्व जानातु सर्वस्य वेदको न निषिध्यते । नास्मामिः शक्यते ज्ञातुमिति सन्तोप इप्यते ॥" [प्र. वार्तिकाल० ११३३] इति ; तत्र चतुःसत्यवेदनं सर्वविदः कुतोऽवसितम् ? प्रमाणसंवादिनस्तत्सत्योपदेशादिति "चेत् ; तते एव सर्ववेदनमप्यवसातव्यं तस्य तन्मान्तरीयफत्यादित्युक्तत्यात्। ततः सूक्तम्-'सर्ववेदनस्य सप्रयोजनत्वात् सुज्ञानत्याच तदर्थमशेपविपयमेव प्रमाणमभ्यसितव्यं न नियतविपयमनुमानमिति । २० १-परिशानं यस्य तस्यैव । २ -चेत- भा०, ५०, १०, स.। ३ भगवता- मा०, या, ५०, स० । ४ -देशो आ०, २०, ५०, स०। ५ जीवात्म-आ०, २०, स०। ६ "न स कश्चित् पृथिव्यादेशः प्रदेशी यत्र जन्तवः संवेदनाया भावशन्दाजरायुजाण्डाप्रमतयो न जायन्ते ततः सर्वभूतपरिणतिजातं प्राणादिजनने घोजारमममिति नास्ति बीजविरुद्धस्वभावता कस्यचित् ।" -प्र० घा० म. १॥३९ । ७ चेतनवर्गाधिकरणस्य पृथिव्यादेः । ८ सुगतेन । ९ पृथिव्यायधिकरणचेतनसमूहनिष्ठ । १० द्रष्टव्यम्-तापसं० श्लो• ६२७-1 "निराकूतमे-आ०, २०, ५०, सः । १२ वैयर्य तद-आ०, २०, स०। १३ व्यवच्छेदाभावच । १४ सर्व- शानस्य पुरुषार्थशानत्वमपि । १५ सर्वस्य प्रामिनः यत्किंचिदपि परिज्ञानं भवति तत्सर्वमपि साक्षात् परपरया वा पुरपार्यहेतुर्मवरपेवेत्यर्थः । १६ प्रज्ञाकरः। " चेत् न तत मा०, १०, १०, स० सविसंवादिचतुःसत्योप- देशदेर । १९ सर्ववेदनाविनाभाविन्यात् । २० -त्वाचत-मा०, २०, ५०, सः ।
२० न्यायचिनिश्चयविवरणे कथं वाऽनुमानाभ्यासारं कस्यचित्तत्त्वदर्शनं मिथ्याज्ञानत्वात् ? मिथ्याज्ञानं सल्वनुमानम् अवस्तुसामान्यावमासिस्वात् । तदभ्यासादपि तत्त्व ने स्यादतिप्रसङ्गः-नित्याधनुमानाभ्या- सादपि संतासगात् । ननु न 'मिध्याज्ञानम्' इत्येव सर्व समान प्रतिवन्धभावाभावाभ्यां विशेपात् । तत्त्वप्रतिबद्धं हि चतु:सत्याद्यनुमान तत्प्रतिवद्धारकार्यात् स्वभावाच्च लिगात्तदुत्पत्ते, ५ अत एव प्रमाणं प्रत्यक्षवत् । न हि प्रत्यक्षमपि प्राप्ये ववभासनात् प्रमाणं तस्य सन्निहित- वर्तमानवस्तुस्वलक्षणावभासित्वेन प्राप्यावभासित्वासम्भवात, अपि तु तदभावे तदभावनिय- मेन तत्र प्रतिबन्धात् । प्राप्यविश्यमेव च प्रत्यक्षप्रामाण्यमर्थवत् तस्यैव प्रवृत्तिविषयत्वात् न वर्तमानविषयम् , तस्यानुभूयमानत्येनाप्रवृत्तिविपयत्वात् । विपयानुभावार्थी" हि प्राणिना प्रवृत्तिः, सति च विषयानुमये किं तया? तदनुपरमप्रसङ्गान् । प्रतिवन्धसामध्यांच्च प्रत्यक्ष- १० प्रामाण्यमतुमानामाण्यमवकल्पयति तस्यापि तदविशेषादित्यविशेष एव प्रत्यक्षानुमानयोः । तदुक्तम् - "अर्थस्यासम्भवेऽभावात् प्रत्यतेऽपि प्रमाणता । प्रतिवन्ध(बद्ध) स्वभावस्य" तद्धेतुत्वे समं द्वयम् ॥" [इति] न चैवं नित्यादिप्रतिबद्धं किञ्चिहिङ्गमस्ति तल्वभावस्य तत्कार्यस्य च कस्यचिद् (६) १५ दर्शगात् । न हि नित्यस्वभावं किश्चिप्रत्यक्षवेद्यम् । तत्र” उदनयमासनस्य यस्यमाणत्वात्। प्रत एव न तस्कार्यम् । न च लिहान्तरम् । तत्कथं तदनुमानस्य" वस्तुप्रतिवन्धत्वं यतः प्रामाण्यम् ? ततो मिथ्याज्ञानत्येपि चतु:सत्यायनुमानाभ्यासादेध तत्त्वदर्शनं तस्य सत्त्वप्रतिबन्धान नित्यानुमानाभ्यासात् तस्य विपर्ययात् तत्कथमतिप्रसङ्ग इति चेत् । उच्यते- यद्यनुमानस्य वस्तुप्रति- बन्धाद्वस्तुदर्शनं सर्वज्ञस्य तद्वद सुसामान्यदर्शनमपि स्यान सामान्येऽपि तस्य प्रनियन्यात्, २० वस्तुप्रतिवन्धापेक्षया तत्सामान्यप्रतियन्धस्य प्रत्यासन्नवाच । तदुत्पत्तिलक्षणो हि वस्तुन्य- "नुमानस्य प्रतिबन्धः स च "भिन्नाधिकरणत्याविरुष्टः तत्सामान्यप्रतिबन्धस्तु तादात्म्यमभिन्ना- धिकरणमिति प्रत्यासन्नः। अतो वसुदर्शनात् प्रागेव सर्वपेदिनलदर्शनेन भवित यम् । तथा २१ मिश्याहानाभ्यासादपि २ तत्वदर्शनप्रमशात् । अवेनाभावसम्बन्धसद्भावासद्दामाभ्याम् । ४ तत्प्रतिबन्धात् भा०, २०, ५०, स. तत्वप्रतिशत् । ५ यत. प्राय बानु भावि, ने वर्तमानेजभायने । ६ वणिकपरमाणुनिरंशरूपं बस्तु स्वलक्षणम् । ७ स्वलक्षणवस्वभावे प्रयत्यानुपत्तिनियमन । पसल वस्तुनि तदुत्पत्या सम्बन्धात् । ९ वनमानविषयस्य । 1. अनुभव' अनुमाव• इति इसमप्येकाम् । १५ विषयानुभवकाल एव यदि प्राति स्यात् तदा विषयवन् साम्यनुभूयत एवति तदर्य प्रायन्तरापेक्षा स्यान , प्रवृस्यन्तरस्य च तदैवानुभूयमानले तदर्थमपि प्रात्पन्तरमपेक्षणीयमिति प्रत्युममाभावादनवस्था । १२ अनु. भानस्यापि प्रतिबन्धसामर्थ्यजन्यस्वाविशेषान् ।। "अत एवाह-मर्यस्यासम्मवे...प्रतिवसमावस्य समेत समं योः ।" -प्र.पातिकाल 11 तादाम्येन नदुपस्या का अर्थमाRREER लिस्य अनुमान हेवाये । १५ प्रयो। नित्यस्य क्मयोगरयाभ्यामरियाकारिवाभावात् इति भाव । १० नि-यापनमानस्य । १८ स्वलक्षणवस्तुदर्शनवत् । १९ अवस्नुभूत यसामान्यम् । २. अनुभूतसामान्वेधी । २१नुमानप्रति- भा०, य, प., स. 1 २२ यतो हि अग्ने यो जाने धूमाद धूमदर्शन ततश्च मान्यनुमानम् , धन भनिन- लक्षणेन सइत्पत्तिसम्बन्धी धूमवल शणस्व न स्वग्न्यनुमानरय इति गिझाधिकरणकम् । २३ जानुभून या समा- रोप्य नाणमग्निसामान्यम् । २५ विषयाशाबारज्ञानस्य विषयवियिशोवादाभ्यम् । २५ अपराभूतसामान्यदर्शन !
प्रत्यासन्नश्च १ ७ ११] प्रथम प्रत्यक्षप्रस्ताच' चेत , सामान्यविपयत्वात् सविकल्पकमेव संदिति कथमिदमुक्तम्-“योगिनां प्रत्यक्ष विधूतकल्पनाजालम्" [ ] इति । प्रतिबन्धस्य सद्भावादनुमानस्य वस्तुनि। तदभ्यासेन चेद्वस्तुदर्शन सर्वदिनः ॥ ५३ ॥ अवस्तुरूपसामान्ये तद्वस्किन्न दृशीभ (शिर्म) वेत् । अनुमानस्य तनापि प्रतिवन्धो यदस्त्ययम् ।। ५४ ॥ भिन्ने वस्तुनि सम्बन्धात् सामान्ये यदभेदिनि । सम्बन्धोऽनुमानस्यावलोक्यते ॥ ५५ ॥ सामान्यदर्शने तस्य सर्वत्रस्य कथं भवेत् । 'विधूतकल्पनाजालं प्रत्यक्षं कीर्तिकीर्तितम् ॥ ५६ ॥ सामान्याकारतादात्म्यमनुमानस्य नास्ति चेत् , कथं तदषमासिव त्वया तस्योपवय॑ते १ ॥ ५७ ॥ तदुत्पत्तेर्यदि व्यक्त बस्तु सामान्यमागतम् । उत्पत्तिरनुमानस्य न युक्ता यदवस्तुनः ॥ ५८ ॥ अर्थक्रियासमर्थ यत्यवस्विमुच्यते । स्वलक्षणं च तस्यापि नान्यद्वस्तुत्वलक्षणम् ॥ ५९ ।। उत्पन्नमपि तत् तस्मात्तत्स्वरूप न चेत्कथम् । 'तेद्वेदि १ *यदि वद्वेदि, नष्ट सारूप्यवर्णनम् ॥ ६० ॥ तत्सारूप्ये तु सामान्यतादात्म्य पुनरागतम् । अनुमाने, तदभ्यासात्तदृष्टैश्च विकल्पनम् ॥ ६१ ॥ ततोऽपि यदि तद्भिन्नं सारूप्यादनुमानकम् । तदवभासित्वमित्यादि पुनराननेत् ॥ ६२ ॥ "अनवस्थोत्तरेणातश्चम्केणोपसर्पता । जिहाग कीलितं "बौद्ध भवतः सन्दते कथम् ॥ ६३ ।। च ५ १२० -प्र. १ सर्ववेदिदर्शनम् । २"प्रागुत योगिना ज्ञान ते तद्भावनामयम् । विधूतक पनानाल सष्टमैवावमासते।" पा. २॥२८॥। ३ निर्विकल्पकम् । ४ बास्तुभूनसामान्यविषयत्वम् । ५ अनुमानस्य । ६ सामाग्यस्य पस्तुत्व स्यात् इत्यर्थ । ७ अवस्तुभूतात् सामान्यात् । ८ सामान्यम् । ९ स्वलमणमपि अक्रियासमर्थमिति तस्यापि भवस्तुत्वप्रसा, यतो हि अर्थक्यिासामर्थ्यव्यतिरिकमन्यत् यस्तु वलपण नाति । १० आमानम् । सामा यात् । १२ सामान्याकारम् । १३ सामान्यविश्यम् । अगदाचारमप्यनुमान यदि सामा यविषयम् । १५ सामान्याकारले । १६ अनुमानाभ्यासात् सामा यदर्शन प्राप्त सर्ववेदिन ततश्च तदर्शनस्य सविक पाल स्यात् । १७ सामा याकारमप्यनुमान यदि सामा याद् भिनम् । १८ अनवस्था उत्तरे अते यस्य ।।९ चार मा०,०प०।
२२ १० न्यायविनिश्चयविवरणे सामान्यप्रतिभासित्वं यदि योग्यतया भवेत् । अनुमानस्य सम्बन्धनियमस्ते विहन्यते ॥ ६४ ।। संदभ्यासेन तनापि तत्सामान्यस्य दर्शने । निर्विकल्पकमध्यक्षं न सिशिपथमृच्छति ॥ ६५ ।। अथ तत्प्रतिभासित्वं नानुमानस्य ते मतम् । पिलक्षणस्य यतर्ने स्वरूपस्यावभासनम् ।। ६६ ।। अध्यक्षमेव तप्राप्तम् नानुमान तथा सति । पस्याभ्यासादिदानी स्यात्तत्त्वदर्शी तथागतः ॥ ६७ ॥ अध्यक्षाभ्यासचिन्ता तु मागेव विनिवारिता । वन सामान्यभासित्यमन्तरेणानुमास्ति यः ॥ ६८ ॥ स्यान्मतम्-न सामान्य नाम अनुमानादिविकल्पादन्यदस्ति प्रमाणाभावात् , तत्पति- निम्बमे केवलमन्यतिरिक्तमबाह्यमनन्वितमपि व्यतिरिक्तमिव बाह्यभिजान्यितमिव चानादिवास- नासामर्थ्यादध्यवसीयने, ततोऽभ्यासपाटवे सति सकर विप्लवव्यपगमादयतिरिनादिरूपरयेव तस्य दर्शनात् कुतस्तद्दर्शनस्य सविकल्पकत्यमिति ? वन सारम् , व्यतिरिक्तादिरूपतया १५ गृहीतस्याभ्यासादपि तथैव दर्शनोपपत्तेः। न हि तेंदूपतयाऽभ्यस्तमन्यथा द्रष्टुं शक्यमतिप्रसङ्गात् । अभ्यासोऽपि तस्यान्यथैवेति चेत् , न, तथा गृहीतस्यैव तत्सम्भवात् , अन्यथा” विद्यमानतया गृहीतस्य कामिन्यादेरन्यथाभ्यासात् तद्दर्शनमप्यन्यथैः स्यादिति निरस्तमेतत्-"पश्यति (न्ति) पुरतोऽधस्थितानि"[प्र०वा०] इति , पुरतोऽवस्थितत्त्वस्य अविद्यमानतया दर्शनस्य च विरो- धान् । अथ कदाचिद्विद्यमानतयापि कामिन्यादेरभ्याससम्भवात् तदर्शनं पुरोऽवस्थितत्येन पठ्यते, । २० तर्हि सामान्यस्यापि व्यतिरितादिरूपतया कदाचिभ्याससम्भवात् सविकल्पफमपि दर्शन पठ्यतामविशेषात् । न पूर्वमपि सामान्यस्य "व्यतिरितादिरूपमनुमानावगतमस्ति यतस्तदभ्या सादर्शनमपि तस्य तथैव स्यादिति चेत् , कुतस्तर्हि "तस्य तपमवगतम् बिनो विकल्पान्तरादिति चेत्, न, तेनापि स्वनस्तस्य "तथाऽवगमे अनुमानेनापि स्यादविशेषात्। पत्रापि विकल्पान्तरादेव तदाकारस्य व्यतिरिक्तादिरूपावगमो न स्वत इति चेत् , तत्रापि 1 १ वासनाबलावल- 28 न, १ तदाकारण विनापि । २ तदुत्पत्ति-तादात्म्यान्यतरलक्षणसम्बन्धनियम । ३ अनुमानाभ्यासेन । * अनुमाने । ५ "तस्वभावविकल्पा धोस्तदयें वाप्यनथिका । विकस्मिकाऽतत्कार्यार्थभेदनिष्टा प्रभायते ॥ तस्या यद्रूपमाभाति बाह्यमेकमिया यत । व्यावृतमि निस्तत्व परीक्षानहमारत ॥ अर्थ ज्ञाननिविटात एवं व्याहत्तरूपका । अमिना इव चाभान्ति व्यारत्ता पुनरम्यत ॥"-30 वा. १०५, ७६, ७.1 विकल्प प्रतिविम्बितमेव । विकल्पाकारभूतस्य सामा यस् । ८ व्यतिरिकादिरूपेणैव । १ व्यतिरिक्षादिरूपतया । १. भव्यावृत्तादिरूपेणैव । 11 अन्यथा गृहस्तस्य भन्यथाऽभ्यासेन अन्यथा दर्शनराम्भवे। अविरमानलया ऽभ्यासात् । १३ विद्यमानत्वेनैव । १४ "कामशोकभयोन्मादचौरस्माधुपप्लुता । अभूतानपि पश्यन्ति पुरतोत्र स्थितानिव ॥"-३० वा० स२८२ । १५ -स्य विद्यमान- ता. १६ मुगतदर्शनम् । १७ व्यतिरिक्ततादि- मार,ब०, १०, स०116 सामान्यस्य । १९ व्यतिरिक्तादिरूपेण । २. सामान्यस्य । २१ व्यतिरिनादिरूपेण । २२ विकल्पान्तरेऽपि । २३ सामान्याकारस्य।२४ अनन्तरोरुविकल्पान्तरेऽपि।
तत तथागत:। १] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव २३ 'तेनापि' इत्यादेरावृत्तेश्चक्रकादनवस्थानाच्च । ततो 'निराकृतमेतत्-"तच्च सर्वत्र चुद्धिरूपमध्या- रोप्यते ततः सामान्यमन्यापोहोऽवस्त्वंशश्व" [प्र. वार्तिकाल२११७० ] इति ; सध्यारोपस्योक्तप्रकारेणावगन्तुमशक्यत्वात् । ततोऽनुमानमन्यं वा विकल्पं परिकल्पयन् । एव तदाकारणहणं वक्तुमर्हति ॥६९|| तत्र सिद्धं तदभ्यासात् स्पष्टं सामान्यदर्शनम् । सविकल्पं ततश्चेदं प्रतिषिद्धं तयो (त्वयो) दितम् ॥७॥ "तस्माद्भूतमभूतं वा यद्यदेवातिभाव्यते । भावनापरिनिष्पत्तौ तत्स्फुटाकल्पधीफलम्"11७१॥ "फुटकल्पधियोऽप्येवं तत्कलस्योपवर्णनात् । विकल्पानभ्युपाये च नानुमानस्य सम्भवः ।।७२।। तस्कथं सदनुष्ठानात्तत्त्वदर्शी यतस्तस्य प्रमाणत्वं भवता परिकल्प्यताम् ॥७३॥ ततोऽनुमानादभ्यस्तात्सर्ववित्तत्त्वग यदि । सामान्यदर्शी सम्प्राप्तो विकल्पोपहतश्च सः ॥७॥ किश्च, वस्तुन्यनुमानवद्रूपादौ सादेरपि प्रतिबन्धात् तदभ्यासतो रूपादिदर्शनमपि भवेत् । रूपायवभासित्वं न रसादेरिति चेत् ; वस्त्ववभासित्वमपि नानुमानस्येति समानम् , अन्यथा" प्रत्यक्षाविशेषप्रसङ्गात् । लेशतस्तदवभासित्वं तस्यास्त्येवेति चेत् ; न ; निरंशत्वेन वस्तुनो लेशाभावात् । कल्पितो लेश इति चेत् ; न तर्हि तस्य लेशतोऽपि वस्त्ववभासित्वम् , कल्पितस्यावस्तुरूपत्वात् । 'एकत्वाध्यवसायाद्वस्तुरूपत्वमिति चेत् ; न; एकत्वस्यापि कल्पितत्वे- नावस्तुरूपत्वात् । 'तस्याप्येकत्वाध्यवसायाद्वस्तुरूपत्वमिति चेत् ; न; 'एकत्यस्यापि' इत्यादेरा- वृत्तिपीनःपुन्येन चक्रकरयानवस्थानस्य व प्रसङ्गात् । तन्न लेशवोऽपि तस्य वस्त्ववभासित्वम् । तथापि तदभ्यासाद्वस्तुदर्शने रसाद्यभ्यासाद्रूपादिदर्शनमपि स्यात् प्रतिबन्धाविशेषात् रूपादीना- मेकसामान्यधीनत्वात् , तथा च कथमन्धादिव्यवहारः ? अन्धो न सोऽस्ति लोके यो रसाद्यभ्यासवर्जितः। अभ्यासोऽपि स नो यस्मान्न सम्बद्धार्थदर्शनम् ॥७५॥ ततोऽन्धस्यापि रूपे स्यावश्यं 'दर्शनं ततः । तथा चान्धव्यवस्थेयं विनष्टा सार्वलौकिकी ॥७६॥ अनन्धोऽप्यन्धकारस्यो रसमास्वादयन् जनः । १ निराकृतमे-आ०,२०,५०,सन"सामान्यमन्यापोहो वस्त्वंशथति"-प्रध्यातिकाल ३ तथोदि-१०। ४ प्रमाणवार्तिके ( २१२८५)। ५ सविस्ल्पबुद्धः । ६ -दशिसम्प्राप्ती आ०, ब., ५०। ७-मानादिव- भा, ब०, ५०, स.। सादेरप्यनुर- भा०, घ, प., स.। भासित्वेऽनुमानत्व। 11 वस्त्ववभासित्वम् । १२ अनुमानत्य । १३ कवितांशस्य वस्तुना एकत्साध्यवसायात् । १५ एकत्वस्यापि। १५ अनुमानस्य । १६ वस्त्वनवभासिवेपि । १० दर्शनात्ततः भा०, ब०, १०, स २५ १रसाद्यभ्यासतः। १. स्वलमभवत्व- ५ २४ न्याययिनिधयविवरणे [AR रूपाद्यम्यक्षता पश्यन् अनुमानं किमिच्छति ॥७॥ सामध्यधीनस्य इत्यादि नन्न सुभाषितम् । अभ्यासादरती च साफल्यं नाक्षसंहतेः ॥७॥ मायोधिमार्गादभ्यासाद्दर्शनं चेन्न देहिनाम् । भौविन्यन्यासतोऽध्यनं कथमुक्तं प्रवृत्तिहत् ? ६७९।। अविचार्य तदुक्तं चेत् व्यवहारप्रसिद्धये । दसद ; व्यवहारखाऽयन्यथेय प्रसाधनात् ॥८०॥ वृत्यादिव्ययहारवेदत्यया यन सम्भवेत्। सदभ्यासजमध्यक्षं तव स्याहाविगोचरम् ।।८१॥ ९० न चैवम् ; वर्तमानार्थदर्शनानस्य सम्भवात् । व्यावर्णयिष्यते चैतत्पश्चादेव सविस्तरम् ।।८।। व्यवहारप्रसिद्ध घेद्धाव्यध्यक्षं तदप्यसत् । तदलि व्यवहारस्य व्यवहारियदर्शनात् ॥ ८३॥ पश्यति व्यवहारी पेलानपानादि भाव्यपि । "वृत्तिप्रयोजनं सिद्धं वृत्तिस्तस्य फिर्थिका ।।८४॥ न हि सामाक्रियातोऽन्यदस्ति वृत्तिप्रयोजनम् । तत्सिद्धी च प्रवृत्तिश्चेत् प्रवृत्तेर्न व्यवस्थितिः ॥८॥ भाविदर्शी च पृष्टः सन् 'रस: कोरशः' इत्ययम् । किं यक्ति जोत्तरं स्वादुर्लवणो येत्यसंशयम् (१८६॥ व्यवहारमतिक्रम्य भाव्यध्यनस्य कल्पने। अन्धस्य रूपदर्शित्वं किमेवं नावकल्प्यते ? १८७|| सन्न अनुमानीभ्यासाकस्यक्तित्त्वदर्शनम् , रसाधभ्यासाइन्धस्यापि पदर्शगपत्तेः प्रतिबन्धाविशेषात् । यत्पुनरुक्तम्-न नित्यप्रतिवद्धं किञ्चिलिङ्गमस्ति' इति; कुत एतत् नित्यस्येय कस्यचिद २५ (चिन्द)र्शनादिति, तत्समानं निरंशस्खलक्षणेऽपि । न हि तदपि तथाविध पश्यामो यथा व्यावयेते परैः,यहिः स्पष्टज्ञानसनिवेशिनः स्थूलत्यैकस्य अन्तश्च हर्षविपादाद्यनेकाकारविपरस्य घस्तुनः" प्रत्यवभासनात् । तदपये सर्वापहवान्न किश्चिद्भवेत् , तत्कथं स्वलक्षण प्रतिवद्धमपि किञ्चिल्लिङ्ग यतोऽनुमानम् । १“एकसामध्यधीनस्य रूपादे रसतो गति । हेनुधर्मानुमानेन धूमैन्धनतिकारवत् ॥" - 410 २“यत्र भाविगतिस्तत्रानुमा मानमिष्यते। धर्तगानेतिमानेण वृत्तावष्यमानता । रासन्ताभ्यासralert मतोपि प्रवर्तनं तत्र प्रस्पर्श प्रमाणम् ।" -प्र. वातिकाल० २५६ । ३ प्रत्यादिव्यवहार। , यवहारस्य ! ५ प्रवृत्तिप्रोजनम् । ६ अनवस्था स्थादित्यर्थः । -गाद-यासा- आ०, ३०, २०, 8.1 ८ सम्बन्धविशपात । ११०२० ५.१४ । • घायवयविनः । " आयनः। ११ हि धूलस्य मात्मनोऽपहवे । २० हात १११] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव १० तदुक्तम्- "अनशं बहिरन्तश्चाऽप्रत्यक्षं तदभासनात् । कस्तत्स्वभावो हेतुः स्याम्कि तत्कार्य यतोऽनुमा ॥"[लघी० श्लो०१७]इति। कल्पित 'लिग तत्प्रतिबन्धश्च नित्यादावपि, तदनुमानव्यवहारस्यापि प्रसिद्धः । ततो- ऽनुमानाभ्यासात्- सुगतस्तत्त्वदर्शी चेत्कणादोऽपि न किं भवेत् ? तत्त्वक् सोऽपि चेत् , मौनं किन्न वः सोऽपि बुद्धवत् ।।८८॥ अभूतोक्तर्न चेत् , सापि तत्त्वक्त्वे कथं भवेत् । तोक् चाभूतवादी चेत्येतदन्योऽन्यबाधितम् ॥ ८९॥ कथं वा भूतवादित्वं सुगतस्यावगम्यताम् । प्रमासंवादमावाच्चेन्न निरंशे सँ नित्यवत् ॥९॥ संवादः कल्पनातश्चेत् , कणादवचने न किम् ' । कणादे सत्यपि स्तोत्रं सुगतस्यैव यद्भवेत् ॥९१॥ ततो न युक्तमेतत्-"भगवानेव प्रमाणं नापरः" [ ] इति । न परमार्थतः कणादस्य तत्त्वदर्शित्वं तदभिमतस्यात्मादेरप्रमाणसिद्धत्वेनातत्त्वरूप- १५ त्वात् । नापि संवृत्या, यौगाना तदभ्युपगमाभावादिति चेत् , मा भूद्योगानां तदभ्युपगमा, भवतस्तु न्यायनिपुणचूडामणिम्मन्यस्य "सांवृतंन्याय(-तन्याय-) बलायाते फणादतत्त्वदर्शित्वे कस्मादनभ्युपगमः, यतस्तदुपदेशोपनीतं नित्यादिकमेव तत्त्वं नानुमन्येथाः १ तस्मादयुक्तमेतत्-- "ततो न परमार्थोऽसावीश्वरो नापि "सांवृतः।" [प्र. वार्तिकाल० ११९] इति , तस्थापि संमृत्या सुगतवत्"तत्वदर्शित्वस्योपपादनात् । तस्मादन्ययोगव्यवच्छेदेन सुगतस्यैव तत्त्वदर्शित्वे २० तदर्शनोत्पत्तिनिवन्धनमभ्यासेनाधिष्ठीयमान प्रमाणमपि तत्त्वविषयमेवानुमन्तव्यं नापरम् , उक्तादतिप्रसङ्गादित्येतत् तत्त्व'पदेन दर्शयति । "तस्यापि तत्त्वविषयत्वे प्रत्यक्षेतरयोः को विशेष इति चेत् ? 'साक्षात्करणाऽसाक्षात्करणरूप:' इति ब्रूमः । तथा चोक्तम्-"भेदः साताद- सानाच" [आप्तमी० श्लो० १०५] इति । १२ । लिग च प्रतिवद्धश्च मा०, २०, ५०, स० । २ नित्यायनुमान । ३ प्रमागम् । ४ असत्योपदेशात् । ५ तरवद्रष्टा । तादम्बाभूत-आ०, ब०, प०, स०। ६ प्रमासवाद । ७ “तद्वद्रमाणं भगवानभूतविनिवृत्तये । भूतोक्ति साधनापेक्षा ततो युक्ता प्रमाणता ॥ • यतस्तस्य भगवतो भूतोतिस्तत स एव सर्वशे नापरस्तथा च प्रमाणम्"-प्र. वार्तिकाल. ९। ८ सयतिस्वीकार । ९-मणिम्मन्यमानस्य आ०, ५०, ५०, स०।१० सौगताभिमतसतिरूपेण कणादतत्वदर्शित्वस्य सिद्धौ।"सति "-4 यातिकाल1 १२ कणादस्यापि । १३ तस्वदर्शिस्वीप-मा०,१०,१०,स.1 ११ "विशेष्य सङ्गतैवकारोऽन्ययोगण्यवच्छेदवोधक , यथा पार्थ एव धनुर्धर । अन्ययोगव्यवच्छेदो नाम विशेष्यभिन्नतादात्म्यादिव्यवच्छेद । तन एवकारेण पार्थान्यतादात्म्याभावो धनुर्धरे बोध्यते तथा च पार्थान्यतादात्म्यामाववद्धनुर्धराभिन्न पार्थ इति बोध ।" -सप्तमहि० पृ. २६ । वैयाकरण भू० १० पृ. ३५०। १५ भुगतदर्शन । १६ अभ्यस्यमान प्रमाणमनुमानम् । १७ प्रसिद्धाशेपेतत्त्वाति तत्त्वपदेन । १८ अनुमानस्यापि । ४ न्यायविनिश्चयविधरणे असाक्षात्कारिता चास्य तत्त्वज्ञानस्य कारणात् । भवतीति वदिष्यामः शिष्य विश्वस्यनामिदम् ॥१२॥ नोपवर्णितप्रमाणाभ्यासात् भगवतो निरपशेपतत्त्वज्ञानम्, अपि तु तैदावरणविगमा- दिति चेत् । न तस्य तव्यतिरेकात् । सकलावरणविरागो हि न सकलानादन्यः, तज्ज्ञान- ५ 'कैवल्यरूपत्वात् तदावरणवैकल्यस्य, नीरूपस्याभावस्यानभ्युपगमात् । न च तदेव तस्य कारणम; सदसत्समयविकस्पानुपपत्तेः । तथा हि- यदाऽस्ति सकलज्ञानं वदा किं तेन हेतुना ?। सिद्धं न हेतुसापेक्षं सिद्धमेवान्यथा न तत् ॥१३॥ यदापि नास्ति तज्ज्ञानं तदा कस्य फ हेतुता । न सित् सरशृङ्गादि स्वरूपेऽन्या या क्षमम् ॥९४॥ इति । स्यान्मतम्-सकलज्ञानप्रथमपर्याय एव तदावरणविश्लेपामा तत्समय एव तत्पूर्वकाल- भाविनिरवशेपावरणप्रध्वंसनाद् अन्धकारविश्लेपात्मकप्रदीपप्रथमपर्यायवत्, उत्तरस्तु तत्पर्यायो न तद्विश्लेयात्मा ततः पूर्वमावरणस्यैवाभावात् । न हाविद्यमानं कचिद्विदिलष्टमुपदिलष्ट वेवि व्यपदेशमर्हति वस्तुसगोचरत्वात् तद्व्यपदेशस्य, अवस्तुत्वे सति तदयोगात् । “स तु तद्विश्ले- १५ पात्मनः प्रथमतत्पर्यायादेव अन्धकारविरहात्मप्रदीपपर्यायातदुत्तरपर्यायवत "वस्यैव तदपेण परिणामाद्भवति ततस्तदावरणविगमस्य तत्कारणत्वमुच्यते" । न चेदमत्र मन्तव्यम्-तदुत्तरो- तरस्य तर्हि तत्पर्यायस्य तविश्लेपहेतुफत्वं न स्यात् पूर्वपूर्वस्य तत्कारणपर्यायस्यावरणप्रध्य- साधिकरणत्वाभावादिति, तस्यापि "विश्लेपप्रभवपर्यायवंध्यत्वेन तद्धेतुक्त्वाविरोधादिति; तदपि न सम्यातम् ; तद्विश्लेपकारणावचनात् । प्रथमस्य हि निरयोपावरणविश्लेपस्य हेतुर्वक्तव्यः, २० तदहेतुकत्वासम्भवात् । तत्पूर्वभावी तद्विश्लेप एव तद्धतुरिति चेत् ; न, 'तस्यापि तद्धतत्वे अनादितद्विश्लेपस्यानिष्ट[स्य] प्रसङ्गात् । आवरणोपश्लेपनिधा" (दा)नभूतमिथ्याज्ञानविरोधी सम्यग्ज्ञानाभ्यासस्तद्धेतुरिति चेत् ; अनुकूलमावरसि, तभ्यासस्यैव प्रमाणाभ्यासत्वात् । नयादावरणविश्लेपो न "तदभ्यासादिति चेत् , न, तस्यैव रत्ननयत्वात् । आदरोपगृहीतस्य तत्त्वज्ञानपरिमलनस्य २३ तदभ्यासव्यपदेशात्, प्रशब्देन च प्रकर्पवाचिना तस्याप्यभिधानात् । कुनः २५ पुनरावरणोपश्लेपविगमकारणत्वं प्रमागाभ्यासस्वावगतमिति चेत् ? 'आवरणोपरलेपनिदानविरो- १ अनुमानस्य । २ ज्ञानावरण । ३ आपरणविगमस्य । ४ करय प्रतियोग्यमानम्, प्रहने व आवरण- रहितत्वम् । ५ नुन्धस्य । ६ सदमत्वमयवि-आ०,व०,५०,स। तद्धि कारणं मवत् कार्यकाले या स्यात्, कार्या- भावकाले वा ? ७ सयोम-आ.,य०,०म०६८ प्रथमरर्यायकाल एवं । ९ सालसमपर्याय । १. उत्तर: सकलज्ञानपर्यायः। प्रथमपर्यायस्यैव उत्तरपर्यायरूपेण । १२ परम्परया । ५ द्वितीयपर्याय १४ भावरणविलेप हेनुकत । तदनुलावि-आ०, ५०, प., स. १५-कारणवचनात् मा०, २०, ५०, ता आवरणविश्लेप। १५ तत्पूर्वभादिनी विलेपस्यापि स्यपूर्वभाविविश्पहेनुस्त्वे अनादितद्विरलेषकल्पनायामनवस्यति मात्र । १४-पत्रि- धान-ता० । १९ आवरणविश्लेपहेतुः । २० सम्यग्दर्शनशनयारित्राणि लम् । २० सम्ममानाम्यासाद । २२-परिमेलनस्य भा०, प.प., सरदाभ्यासस्य । २३ सम्परशान्तभ्यास। २४ प्रसिदाशेपेत प्रशन्देन ।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः " १।१] धित्वात्' इति ब्रूमः । तथाहि-यत् यत्कारणविरुद्धं तत्तस्याभावकारणम् यथा शीतस्पर्शविरोधी दहनः तत्स्पर्शहेतुकस्य रोमादेः, आवरणोपश्लेपकारणमिथ्यानानाभिनिवेशविरोधी च सम्य- रज्ञानाभ्यास इति कारणविरुद्धोपलब्धेः अन्यथानुपपत्तिनियमनिश्चयवत्याः सुनिश्चित एव प्रमाणाभ्यासस्यावरणविश्लेपं प्रति कारणभाव इति । यथास्त्यावरणं तस्य मिथ्याज्ञानं च कारणम् । तथा तृतीये वक्ष्यामः सा हि तद्विस्तरैक्षितिः ॥९५|| तदनेन श्लोकस्य प्रथमपादेन भगवतः स्वार्थसम्पत्कारणमुक्तम् । स्यान्मतम्-निःशेषयस्तुविषयज्ञानजनितं भगवद्वचनं निःशेपार्थमेव स्यान्न नियतार्थम्, नियतार्थज्ञानजनितं हि वचनं नियतार्थं स्यात् । न च भगवतो नियतार्थ वेदनमस्ति । नियतार्थत्वञ्च वचनेषु दृश्यते । न सलु सर्वं तद्वचनं सवार्थमेव प्रतीतिबाधनात् , वचनान्तर- १० वैययन प्रयन्धविलोपप्रसङ्गाच्चेति ; तन्न ; सर्वविषयत्वेऽपि तज्ज्ञानस्य प्रदेशतो नियत- विषयत्वस्यापि भावात् । सप्रदेशं हि तज्ज्ञानम् “अत्मनाऽनेकरूपेण" [ न्याय वि० श्लोक ९] इति वचनात् । तत्प्रदेशयोगपद्ये तन्निमित्तसकलवचनयोगपद्यमिति चेत् ; न ; प्रतिपित्सु- प्रश्नसहायस्यैव तत्प्रदेशस्य वचनकारणत्वात् । न च प्रतिपित्सुः सर्वमेव पृच्छति। ततस्तप्रदेश- निमित्तस्य वचनसन्दर्भस्य नियतीार्थत्वमित्येतत् 'प्रतियुद्धग्रहणेन प्रतिव्यक्तिनियतभगवत्प्र- १५ षोधप्रदेशवाचिना कथयति । ततो नेदमत्र दूपणं प्रज्ञाकरस्य- "सर्वार्थदर्शनायातः शब्दः सर्वार्थवाचकः ।" [अ० वार्तिकाल० १।९] इति । एकग्रहणेन तु सकलप्रदेशालकृतनिसिलवस्तुगोचरभगवत्प्रबोधप्रदेशवाचिना तन्नि- मित्तस्य तत्सन्दर्भस्य सर्वार्थत्वं दर्शयति । 'सर्वार्थ' इत्यादि पुनरस्मिन् पक्षे अनुकूलत्यादेव न दूपणम् । अत एवोक्तम्- "स्याद्वादकेवलज्ञाने सर्वतत्त्वप्रकाशने ।" [ आप्तमी० श्लो. १०५] इति । मूर्तिग्रहणं तु ज्ञानतद्वदभेदावबोधार्थम्", अन्यथा"शत्यायोगस्य वक्ष्यमाणत्वात् । तद- नेन द्वितीयपादेन स्वार्थसम्पनिवेदिता । श्रीवर्द्धमानशब्देन तु "निरतिशयापदानकर्मपरमवैराग्यादिसम्पाचिना भगवदाम्ना- यस्य प्रामाण्यमायेदयता परार्थसम्पत्कारणमभिहितम् । परमवीतरागस्योपदेशै एव कस्मात् ? २५ निप्रहबुद्धिबदगुमहयुद्धेरपि "तस्याऽसम्भवात्, अवीतरागत्वप्रसङ्गादित्यत्रेदमाह-भव्याम्बुरुह- भानवे । भव्यानामन्बुरुहत्वेन रूपणं विकासयोग्यतासाधात्, भानुत्वेन भगवतो" रूपर्ण तत्प्रबोधनप्रवृत्तिस्वाभाव्यसाधात् । स्वभाव एव खल्वयं तस्य यत्सर्वदर्शी वीतरागोऽपि २० . अन्यथा साध्याभावे अनुपपत्तिरभावः साधनस्य, अविनामावनियम इत्यर्थः । २-रक्षतिः आ०,व०,५०, सं० । विवरणस्थानम् । ३ वचनोत्तर-आ०, ब०, ५०, स० । ४ उपदेशपारम्पर्य । ५ - प्रदेश-आ०,१०,५०, स० । सांशम् । ६ युगपत् । -तार्थमि-आ०, २०, प, स. 1 ८ प्रतियुकिमूत्तय इति प्रतियुद्धपदेन । ९ प्रज्ञा- करगुप्तस्य वचनम् । १०-भेदावरोधार्थम् आ० ।-भेदार्थम् ब०, ५०, स० । ११ ज्ञात्वायो-आ०, ५०, १० । १२ अतिप्रशस्तक। १३-शास्तस्मानि-प०) १४ परगवीतरागस्य गगवतः1१५-तो निरूप-भा०,१०,५०,स० २८ ५ न्यायविनिश्चयनिधरणे [२ भव्योपदेशे व्याप्रियते । न हि स्वभावाः पर्यनुयोगमर्हन्ति भावानां नि:स्वभावतापत्तेः । स च तत्स्वभावः तत्कार्यादीम्नायादेवावगम्यते, तस्यापीरुपेयस्य निषेधात् । अनेन च परार्थसम्पत्स्वरूपं निरूपिवम् । ततः सूक्तमेतदर्थतो देवस्यै- "यो निःशेषपदाथतत्त्वविषयज्ञानाभियोगादभूव , प्रत्यर्थस्फुरितप्रदेशविशदज्ञानकमूर्तिर्जिनः । पैराग्यातिशयायचिन्त्यविभवात्सत्योद्यवादी च यः, तस्मै भव्यसरोजतिग्मरुचये भत्तया नमस्कुर्महे ॥" [ ] इति । अथ यदि भगवतो भव्याम्बुरुहभानुत्वं तत्तर्हि 'वाड्मयमयूससापेक्षमेव नान्यथा । न हि तत्सन्निधानादनुपदेशमेव भव्यानां तत्त्वज्ञानमिति सौगतवत् स्यावादिनामभिनिवेशोऽरित, १० ततस्वद्वाड्मयादेवं तत्त्वज्ञानसिद्धाटायमिदमपार्थकम् । न होकवाडायसाध्ये तदन्तरमुप. योगवत् । तत्रापि तदपरापरवाड्मयोपयोगपरिकल्पनायाम् अनरस्थाप्रसङ्गादिति । तत्रेदमाह- वालानां हितकामिनामतिमहापापैः पुरोपार्जितः, माहात्म्यात्तमसः स्वयं कलिबलात्मायो गुणद्वेषिभिः। न्यायोऽयं मलिनीकृतः कथमपि प्रक्षाल्य नेनीयते, सम्यग्ज्ञानजलैर्वचोभिरगलं तत्रानुकम्पापरैः ॥२॥ इति । इदमत्र तात्पर्यम्-भवति भगवडाड्मयादेव भत्र्यानां तत्त्वज्ञानम् । यदि तव्याप्य- ( तदधाप्य-) मलिनीकृतमेव स्थितम् । न चैवम् । न च मलिनीकृतस्य "भव्यजनमगसि तत्त्वावद्योतनसामर्थ्य सम्भवति, परिशोधितमलस्यैव तस्य निरवद्यविद्यानिबन्धनत्वात् । अतस्त- न्मलपरिशोधनार्थमिदपर वाड्मयमारभ्यमाणं नापार्थकत्वदोषगुद्वहति प्रयोजनविशेषसम्भवात् । "यस्य तु"शब्द[:] स्वरूपं स्वार्थश्च यथावस्थितभवद्योतयति' तस्य भवत्येव वत्र शास्त्रस्यान्यस्य चानुपयोगिलं प्रयोजनविशेपवैधुर्यात् । तथा हि- शब्दश्वेदात्मनस्लत्त्वं स्वरवर्णक्रमादिभिः । दोतयेत् स्वमहिम्नैव प्राप्तं व्याकरणं पृथा ॥१६॥ यतो वेदस्य नित्यस्य स्वत एवाचबोधिते । स्वरूपे न भवन्त्येव मिथ्यात्वाज्ञानसंशयाः ॥१७॥ तदभावे न तस्यास्ति प्रत्यवायरततः कुतः । क्रियते वेदरक्षायै विच्छब्दानुशासनम् ॥९८॥ २० उपदेशाम्नायात् । २ आम्नायस्य शास्त्रोपदेशस्य । ३ मकर देवस्य । ४ पाङ्मयूख-भा०,०,१०, स०। ५ "सम्भारावेपतलस्य पुंसदिचन्तामणैरिव निसरन्ति यथाकाम कुब्यादिभ्योपि देशना ॥"-सायस. श्लो० ३६०८। ६ भगवदुपदेशादेव । ७ एतद्वन्यात्मकम् । ८ यदि भगवामयमय यात् निर्मलमेव स्यात् । ९ भगवदानायस्य 11. भन्यजनस्य म-आ.,०,१०, स.।" भगवदानायस्य । १२ एतद्वन्यात्मकम्। १३मीमांसकस्या १४ वेदः। १५-तमेव योतयति मा., प. प.स.। १६ "रक्षार्थ वेदानामध्येय ध्याकरणम्"-पा० म. पप ।
१० १२] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव २९ स्वतो हि निर्मलक्षाने जाते तत्र प्रदीपवत् । नाज्ञानादिमलं तस्मिन् हेत्वन्तरशवादपि ॥९९॥ एतेन व्यञ्जकास्तस्मिन् वेदे व्यर्था निरूपिताः । स्वतो हि तस्यामिव्यक्ती व्यञ्जकैः किं प्रयोजनम् ? ॥१०॥ आवारकप्रति सो व्यञ्जकैर्यदि वर्ण्यते । स्वतस्तद्व्यक्तिशक्तिश्चेत् ; कुर्वन्यावारकाच किम् ॥१०१।। शक्तिध्वंसे त्वनित्यत्वं वेदस्य स्यात्तदात्मनः । शक्तिमिव तस्माचेत् स्वतोऽसौ घोधकः कथम् ? ॥१०२॥ शक्तरेव यदि ज्ञानं वेदस्य व्यर्थता भवेत् । पाहत्वाचेन्न वैयय॑म् ; अहेतोः ग्राह्यता कधम् ? ॥१०३॥ वेदोऽपि शक्तिसम्बन्धाद्धेतुश्चेद्वोधजन्मनि । तत्सम्बन्धोऽपि तेंद्भिन्नस्योपकाराटते कथम् १ ॥१०४॥ अशक्तस्योपकर्तृत्वे पूर्वशक्तिप॒था भवेत् । शक्तिरस्ति विभिन्ना चेत्सव स्यादुपकारिणी ॥१०५॥ वेदोऽपि शक्तिसम्बन्धादुपकारी यदीप्यते । 'प्रसङ्गः पूर्व एव स्यादनवस्थाभयप्रदः ॥१०॥ तस्मादभिन्ना तच्छक्तिनित्यं सा च व्यनक्ति तम् । तत्तदात्यभिव्यक्ती नान्यतो युक्तिमृच्छतः ॥१०७॥ न"चान्यथाकृतिस्तस्य "ताशस्योपपद्यते । १२अनाधेयादिरूपत्वात् कूटस्थस्य विशेषतः ॥१०८॥ अजानन्वेदसामर्थ्य " भट्टस्तदिदमत्रवीत् । "अन्यथाकरणे चास्य बहुभ्यः स्यानिवारणम्'[मी०लो०१।१।२।१५०]इति। अन्यथाकरणस्यैवासम्भपादुक्तनीतितः । नाप्राप्तस्य निषेधोऽयं निषेधः प्राप्तिपूर्वकः ॥११०॥ किश्व, अन्यथाकरणं चैतत्स्वरूपमनुधावति । तत्पौरुपेयमेव स्यात्पुरुपेणान्यथाकृतेः ॥१११॥ 1 तसिान् वेदे अभिव्यक्तिशक्तिः । २ शायात्मनः । ३ सतोऽसौ आ०, २०, ५०, स० । ४ ज्ञानानुत्पा- दवस्य । ५ शक्तिभिमस्य । यतः भिन्नयोः उपकार्योपकारकभावं विना सम्बन्धासम्मवात् । ६ यदि वेदोऽशकोऽपि शक्तयुपकारं कुर्यात् तद्वत् ज्ञानेत्पत्तिमपि विदध्यादिति ज्ञानोत्तादिकायाः पूर्वशतेवैयध्ये स्यात् । । वेदे पूर्वशत्तयुप- कारिका भन्या शतिर्विद्यते परं सा भिचा। ८ पूर्वशतयुपकारकशक्तिसम्बन्धात् । ९ वेदः किमशकः सन् शक्युपकार करिष्यति शक्त्या वा ! शक्त्या चैत् ; सा ततो मिन्ना, ततस्तत्सम्बन्भार्थमन्या शक्तिः परिकल्पनीयेत्यनवस्था । १. अन्यथाकरणम् । १५ नित्यस्य । १२ महि नित्ये कश्चिदप्यतिशयः आधीयते नापि तस्मात् कश्चन प्रदीयते, भनाधेयाप्रइयातिशयरूपत्वाग्निस्यस्य । १३ भारः आ०, २०, ५०, स. २० २५ - - ३० न्यायविनिश्चयविवरणे [१२ यद्यन्यथाकरणं वेदस्वरूपमनुधावति, दहि पौरपेयमेव स्यात्, पुरुषेणान्यथानिय मरणत्वात् कलशादिवत् । अथ नानुधापति पुरुपकृतस्यान्यथाभावस्य वेदादन्यत्वादिति चेत् ; कथं तहि कथितम् 'अन्यथाकरणे चास्य' इति ? न हि तस्मार्थान्तरं तस्येति सम्बन्धाभावे व्यपदेशमर्हति । न सम्वन्यात सत्तस्येति व्यपदेशः, अपि तु पुरुषाभिप्रायादेव, निवारणस्यापि ५ बहुमिस्त परणादिति चेत् , चुतस्तेभ्यस्तन्निवारणम् ? तेपा "वेदेश्यम्भावपरिज्ञानादिति चेत् , तदपि न प्रत्यक्षात् ; न वेदेतरसाधारणस्यैव वर्णपदादेः प्रतिभासनात् । सम्प्रदायाचेत्, पुत्तस्तस्यैव सत्यत्वं नानित्यम्भावसम्प्रदायस्यापि ? येइस तथैर्य सत्यत्वाच्चेत् , तदपि कुतः ? तत्सम्प्रदायस्य सत्यत्वाच्चेत् , न , परस्परांश्रयात् । अनादित्वादित्थंसम्प्रदाय एव सत्यो नान्य इति चेत् , तदपि कुतोऽवसितम् ? अनादिः काल इत्यंसम्प्रदायवान् कालत्वात् अद्यकालवदिति २० चेत् , न, अन्यगापि साम्यात्-- अनादिः कालः अन्यथासम्प्रदाययान कालत्वात् अद्यकालवदिति । साध्यविकलं निदर्शनम् अद्यकालस्यान्यथासम्प्रदायरत्त्वादर्शनादिति चेत् । पत्य तर्हि निवारणम् ? येनोच्यते--'अन्यथाकरणे चास्य बहुभ्यः स्यानिवारणम्' इति । न हान्यथासम्प्रदायादन्यद् अन्यथाकरण नाम। तस्मादनादित्वाद् इत्यसम्प्रदायवद् अन्यथा- सम्प्रदायस्यापि सत्यत्वादनिवारणमेस स्यात् । अबहुजनपरिगृहीतत्वात् असत्य "एवायम् १५ अत एव 'बहुभ्यस्तन्निवारणम्' उच्यत इति चेत् , न, म्लेच्छादीना धर्मसम्प्रदायस्य प्रामाण्य- प्रसङ्गात् , उक्त्नीत्या तस्याप्यनादित्वाद्भूयोजनपरिग्रहाच्च । भूयासो हि म्लेच्छादया रोपा याशि- कापेक्षयातिशयेन बहुत्वास , तत्पथं जीपति नत्सम्प्रदाये चोदनाया पर धर्म प्रामाण्यम् पौरपेयत्वादप्रमाणमेव स२ इति चेत् , न , वेटेश्यम्भावसम्प्रदायस्यापि पौरुषेयत्वाविशेषात् । गुणवत्कृतोऽयमिति चेत्,कः पुनरत्र "सम्प्रदातुर्गुणः १ वेदतत्त्वज्ञानमेव अन्यस्यानुपयोगदिति २० चेत् , कुतस्तस्य" तज्ज्ञानम् ? सम्प्रदायान्तराच्चेत् , न , धर्मतत्त्वज्ञानस्यापि म्लेच्छादिषु तथाभावात् "नेपामपि गुणवत्वापत्तेः । तन्न सम्प्रदायादिविवेचनम् अन्यथाऽपि तत्सम्प्रदायात् । तस्माद्वेदस्य स्वायद्योतनस्वभावत्वादेव विवेचनं नान्यथा । न च "तत्रान्यथावरण कृतश्चिदपीति व्यर्थ तनिवारणार्थमन्यापेक्षणम् । तथा- - स्वभावादेव वेदस्य स्वार्थावद्योतकारिणः । कि परापेक्षया कार्य व्याख्यानादि यदिष्यते ॥११२॥ व्याख्यानादिसहायाचेद्वेदात् स्यार्थे मतिर्भवेत् । नियतो यदि तस्याओं व्याख्याभेदः कथं तथा ॥११३॥ ? - 1 कुमारिलमटेन । २-दन्तस्यैति आ०,५०, ५०, १० । ३ तस्येदमिति म्यपदेशम् । ४ पुषाभिप्राय एव । ५ वेदेऽर्थभावनगपरि-आ०,१०,५०,०१६ वैदैत्यम्भावपरिशानमपि । इयम्भावसम्प्रदायस्यैव । म्भूतत्वेनैव । १ सदि हि सम्प्रदायसस्यत्वे घेदस्य इत्यम्भूतत्वेन सत्यत्वसिद्धि, सति च तस्मिन् मम्प्रदायसत्यत्व सिद्धिरिति । १. अनि यम्मावसम्प्रदाय । -परिगृहीतत्वाय भा०,०, ५०, स.1२ म्लेच्छसम्प्रदाय । श्वेदेत्यम्भावसम्प्रदाय ! १५सम्प्रदायपवर्तकस्य । १५सम्प्रदायकत् । रेग्धानामपि । नित्यनेदस्वरपे।
११२] ३१ . ' प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तायः अस्ति चायं वदत्येको धर्म द्रव्यगुणादिकम् । वेदवादी परों धर्ममपूर्वाख्यं वदत्यलम् ॥११४॥ श्येनत्यानर्थरूपत्वादधर्मत्वं प्रपद्यते । भाष्यकारस्तदुम्बेको नेवगित्यगच्छति ॥११॥ घधस्य विहितस्यापि सौख्याचा दुखहेतुताम् । श्रेयस्करत्वमन्ये तु मन्यन्ते वेदवेदिनः ॥११६॥ एवमादिः परोप्यस्ति तद्व्याख्याभेदविस्तरः । तन न ज्ञायते किं तद्व्याख्यानं वस्तुगोचरम् ॥११७॥ न चाविदिततत्त्वार्थव्याख्यानसहकारिणः । वेदात्तत्त्वं प्रपद्यन्ते प्रेक्षावन्तो विचक्षणाः ॥११८॥ वेदस्य नियतार्थत्वात्तद्भिन्नार्थावबोधनः । न च सर्वोऽपि तद्वेदस्तत्त्वार्थ इति युज्यते ॥११९॥ तत्त्वार्थ यदि मन्येथाः व्याख्यानं युक्तिसङ्गतम् । वेदात्मा यदि सा युक्तिः सर्वं तद्युक्तिसङ्गतम् ।।१२०॥ सर्वव्याख्यानुकूल्येन तं तमर्थं वदत्ययम् । वेदो न झेप तद्भेदे कापि दृष्टः पराङ्मुसः ॥१२१॥ युक्तिरन्यैव वेदाचेत्साऽपि वेदार्थडग्यदि । तदा धर्म प्रमाणत्वं घेदस्यैवेति नश्यति ॥१२२॥ अवेदार्थेव युक्तिश्चेत् व्याख्या तत्सङ्ग मात्कथम् । तत्त्वार्था काचिदन्यासा सर्वासा तत्प्रसद्गतः ॥१२३॥ अथ "वेदान्तरं युक्तिस्तत्सङ्गायुक्तिसङ्गमः । "तद्व्याख्यायुक्तिसाङ्गत्ये तर्हि वेदान्तरं भवेत् ॥१२४॥ २० य 1 कुमारिलभ । श्रेयो हि पुरुषप्रीति सा द्रव्यगुणकर्मभि । चोदनालक्षणे साध्या तस्मात्तेवेव धर्मता "-मी. इलो. १३१२।१५। २ प्रभाकर ! "चौदनत्यपूर्व ब्रूम"-शावरभा० २१११५। "तस्य स्वपूर्वरूपत्वं वेदवाक्यानुसारत ।"-प्रा०प०पृ. १९५ । ३ शधरस्वामी कोऽनर्थ । प्रत्यवायाय पेनो वन इपुरित्येवमादि । तनानों धर्म उको मा भूत् इत्यर्थग्रहणम् । कम पुनररावन १ हिंसा हि सा, सा च प्रतिषिद्धति । कय पुनरनर्थ कर्तव्यत्तयोपदिश्यते ? उच्यते , नैव श्येनादय कर्त्तव्यतया विशायन्ते । यो हि हिसितुमिच्छेत, तस्यायमभ्युपाय इति र तेषामुपदेश -'श्येनेनाभिचरन् यजेत' इति हि समामनन्ति न अभिचरितव्यमिति ।"-शायरमा० १११२ 1 ५ "श्यैनादीना तु न साक्षान्नाप्युपचारेण नापि तत्फलस्यानर्थवमिति तस्यानर्थत्वप्रतिपादनपरम्-'श्येनो पन इधु' इत्येवमादि भाष्यमुपेक्षणीयम् ।"-मो० श्लो. सा० पृ.१०८१५ “स प्रीतो हेतु अविशुद्ध पशुहिंसात्मकत्वात् ।"-सा० माठर० का०२। “ज्योतिष्टोमा- दिजन्मनः प्रधानापूर्वस्य पहिसादिज-मनाऽनहेतुनापूर्वण सदर । -सा. तस्वकी० का०२ । ६ मीमांसकाः । • व्याख्याभेद । ८ वेदार्थदृशा यव्याख्यानं कृत तत्सत्यमिति । ९ तथा धर्म प्र-आ०, ब०, ५०, स० । १० वेदार्थ शो गरस्यापि शामाण्य स्यादिति भाव । " प्रकृतवेदव्याख्यासमर्थनार्थ यदि वेदान्तरमपेक्ष्यते । १२ वेदान्तरव्याख्या।
३२ १० न्यायत्रिनिश्चयश्वि I IR तनाध्येयं प्रसङ्ग स्यादनवस्था महीयसी । तन्न व्याख्यानसम्यकं सुगम युक्तिसङ्गमात् ॥१२॥ सर्वव्याख्यासमत्वे च सन्दिग्धा नियतार्थता । वेदस्य कुरुते तूर्णमप्रामाण्यभयन्वरम् ॥१२६॥ अथानियत श्वार्थो वेदत्य विदुषां मतः । तत्तद्र्व्याख्यानभेदेन तत्तदर्थगतिस्ततः ॥१२७॥ सर्वसम्प्रविपत्तिः स्यात्सर्वार्थेषु तथा सति । कश्चिदर्थः कथं नाम केतचित्प्रतिपिच्यते ॥१२८|| अनर्थेतररूपत्वं शबरोम्येकसम्मतम् । श्येत्तस्य यस वेदार्थो विरुद्धोऽपि भवेन्न किम् ? ॥१२९॥ अर्थातर्थत्वरूपेण त्यागोपादानवर्जितः । श्येनोऽपि यदि वेदार्थः सुस्थितः प्रेरको विधिः ! ॥१३०॥ अग्निहोत्रादिधाक्याद्यन् सव्याख्यानात्प्रतीयते । 'श्वमांसभक्षणं तस्य वेदार्थत्वं कथन्न वा ? ॥१३१॥ असव्याख्यानमेतच्चत् सव्याख्यानं किमुच्यताम । यत्र वेदानुकूल्यं चेदेतत्रापि दृश्यते ॥ १३२॥ ततो व्याख्यासहायाच्चेद्वेदादर्थोऽवसीयते । सर्वव्याख्यार्थतार्थ्यमसमञ्जसमापतेत् ॥१३३॥ नित्यं तद्बोधशतस्य नापेक्षेति च वक्ष्यते । अशतस्यापि काऽपेक्षा नापेक्षा शतकारिणी ॥१३४॥ तस्माद्वेद [:] स्वतस्त्वं प स्वार्थ चान्यनिराश्रयः । व्यकं वकीति वक्तव्यं स्वतःप्रामाण्यवादिमिः ॥१३५॥ न चेदृशा स्व[-शस्व-]भावस्य स्वरूपस्वार्थयोर्द्वयोः । सम्भवेन्मलिनीभावो नरयनशतादपि ॥१३६॥ न हीदमेव मे रूपमयमेवार्थ इत्यपि । जानुपातं वदन् वेदः शक्यप्रच्छादनः परः ॥१३७॥ सरस्वतो निश्चिते वेद वेदार्थे च तदर्थकम् । यद्व्याकरणमीमांसाद्यतत्सर्थमनर्थकम् ।। १३८॥ ततः स्थितमेतत्-- असम्भवन्मलिनीकारस्यैव यत्रान्तरवैफल्यं नापरस्य । सम्भव ३० मलिनीकारश्च भावदाम्नायः स्वरूपतोऽर्थतन्य छैनस्थानां साझानादिमलसद्भायात् इवि विरत तात्पर्य वृत्तस्य । २० २५ . "तेनाग्निहोत्रं जहुाद स्वर्गकाम इति श्रुतौ । सादेसिमित्येष नार्थ इत्पन छपमा ।"-प्र० पा. २२ नेदस्य १३ मीमासका। ७ नित्यस्वभावस्य वेदस्य । ५ अल्पज्ञानाम् ।
-- - .. प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः अधुना पुनरवययव्याख्यानं क्रियते-न्यायोऽन स्याद्वादामोपलाञ्छनो भगवदाम्नायो. ऽभिमतः । न चैवमशब्दार्थत्वम् ; तस्यापि न्यायत्वात् । सामान्यवाचिना न्यायशब्देन कुत्तो विशेषप्रतिपत्तिरिति चेत् ? 'भव्याम्बुरुहभानवे' इत्युक्त्वा पुनरस्य वचनात् । भगवतो हि भव्यकमलाकरविकासकारिणा मरीचिनिवरेण भवितव्यं तदभावे तत्करणायोगात् । स च न भगवज्ञानरूपो युक्तः , ततो' भव्यानां तत्वप्रतिपत्तिविकासासम्भयात् , प्रतिपुरुपं शानकल्पना- ५ वैयात् , सर्वस्य सर्वदर्शित्यापत्तेः, प्रतिपाद्यप्रतिपादकभावाभावप्रसगाश्च । नाऽपि विनेयज्ञान. रूपस्तनिकरः; सदसद्विकल्पायोगात् । न ह्यसतस्तस्य तनिकरत्वम् ; खरशृङ्गस्यापि प्रसङ्गात् । नापि सतः, प्रयोजनाभावात् । भन्यक्रमलविकासः प्रयोजनमिति चेत् ; न ; तव्यतिरेकात् । तत्त्वप्रतिपत्तिरूपो हि तद्विकासः कथं तत्त्वज्ञानाद्भिद्येत यतस्ततः स स्यात् ? भेदे स्वमतविरो- धात् । कुतो वा तस्य संत्स्वम् ? विनेयभाविन एव कुतश्चिद्धेतोरिति चेत् ; निष्फलस्तर्हि भग- १० वव्यापार इति नासौ तत्वजिज्ञासायद्भिरन्येपणीयः स्यात् । भावव्यापारीदिति चेत् ; सा कोऽपरोऽन्यनाम्नायात् इत्याम्नाय एंव न्यायग्रहणेन गृह्यते । यद्येवमाम्नाय इति वक्तव्यं स्पष्ट- त्वात् छन्दोभङ्ग स्याप्यभावादिति चेत् ; न ; आम्नायस्यापि तत्त्वप्रतिपत्तिहेतुत्वेन न्यायस्पत्यो- पवर्णनार्थत्यादेवचनस्य । 'निश्चितं च निर्माधं च यस्तुतत्त्वम्" ईयतेऽनेनेति न्यायः' इति व्युत्पत्तेः । तदुपवर्णनश्च प्रमाणमेकमेव द्वे एवेति नियमव्याघातोपदर्शनार्थम् । कुतः पुनाय. १५ रूपत्वमाम्नायस्येति चेत् ? आस्तां तावत्तृतीये तद्विस्तरात् । कः पुनरसी १ इत्याह-अयं प्रतीयमानो वर्णपदाद्यात्मको न प्रमाणागोचरः स्फोटादि- रिति । स किम् ? इत्याह-नेनीयते। कः पुनरत्र यऽर्थः ? सुसाशुभावसौष्ठवलक्षण इति धूमः। सुखेन नीयते नेनीयते इति । सुसं पुनरिह नयनोपायानां सुगमत्वम् , सुगमैरुपायैयित इति । अत एवाशुभावस्यापि परिग्रहः सुगमोपायस्योपेयस्य आशुभावोपपत्तेः । सुष्टु नयनाद्वा नेनीयते । सौष्ठवं तु नयनस्याविचलितयुक्तिगोचरत्वम् । अविचलिताभियुक्तिभिनीयते नेनीयत इति । पौनःपुन्यं भृशार्थो वा "यडर्थः। पुनः पुनर्नीयते नीयमानः क्रियते नेनीयत इति । किं नेनीयचे ? इत्याह-अमलम् । मलाभावम् अर्थाभावेऽव्ययीभावात्, अवदा- २० "तत्वमिति यावत् । स्यान्मतम्-"एकदा यद्यवदातत्वं नीतो न्यायः किं पुनर्नीयते नयननयोजनस्यावदा- २५ तत्वप्राप्तः प्रागेव सिद्धत्वाद् अशक्यत्वाच । तथा हि-तदेव, अन्यद्वा पुनर्नीयते न्यायः ? न तावत्तदेव ; यतस्तस्य प्राप्तत्वात् । न हि प्राप्त प्रति नयनं सम्भवति, अप्राप्तस्य नयनविपय- स्वात् । अन्यदेव सर्हि पुनर्नीयत इति चेत् ; न , तस्यात्राऽनिर्देशात् , एकस्यैवामलार्थस्योपात. त्यात् । तन्न पौनःपुन्यमत्र यडर्थ उपपन्न इति ; सन्न "सुमतम् ; विषयभेदस्यान भावात् । मरीचिनिकरः । ३ भगवज्ञानात् 1 ३ विनेय ज्ञानस्य । ४ स्वयम् ब०, प० । ५-यत्वात् आ०, २०, प०, स०। ६ विनयशानसरवम् । ७ एवं न्या- ता०10 'भानायो मलिनीकृत.' इति कृते राति । ९-रूपोप- मा०, ब०, प्र० स०।१०-स्य अनि- आ०, ५०, प, स-तत्त्वं नी- मा०, ५०, प.। १२ "पान पुन्यं मृशाश्व कियाराममिहारः तस्मिन् योगे यल् स्यात्"-सिकौ ॥२११३ निर्मतत्वम् । १४ एकथा ब० । १५ सुगम भाप, प०, सा!
(२२ न्यायचिनिश्चयचिधरणे नावदातत्वमेकमेवात्र विषयः, अवदाततरत्वादेरन्यस्यापिभावात् । अप्रतिपादितस्य कथं प्रतिपत्ति. रिति चेत् ? न ; अमलशब्देन एतत्प्रतिपादनाव-तस्य सामान्यशब्दत्वात् । भवति हि सामा- न्यशब्दाद्विशेषगतिः नीलशब्दात् नीलनीलतरादिविशेपव्यवसायदर्शनात , तद्वदापि अमलशब्दे. मैव अमल तरत्या प्रतिपत्तिः । ततोऽमलत्वं नीतो न्यायः पुनरमस्तरत्वं पुनरमलतमत्वं ततोऽपि ५ सातिशयममलतमत्वं नीयत इति न शास्त्रस्यावृत्तिवैफल्यं वालक्रीडादोपो वा विशेषप्रतियम्भात् । आम्नायस्य हि नैर्मल्यं नाम ज्ञानस्य नैर्मल्यमेव । तच्चारमान्यायशास्त्रादाविर्भवत् पुनरात्ति- सहायात सविशेषम् , ततोऽपि तथाविधात् सविशेषतरं सविशेषतमश्च भवनि । दृश्यते घ शाखस्य अभ्यासाधिष्ठितस्य स्वविपये ज्ञानविशेर्पकारित्यमिति नात्र विद्वलनस्य विवादः । फैस्य पुनरभ्यासेन शास्त्रत्याधिधानम् ? आचार्यस्येति चेत् ; न ; प्रयोजनाभावात् । तद्विषय- १० ज्ञानविशेषः प्रयोजनमिति चेत् । न ; तस्य प्रागेव सिद्धत्वात् , अन्यथा शास्त्रकरणस्यैवाऽसम्भ- यात् अस्मदादिवदिति चेत् ; सत्यम् , स्वयं प्रयोजनाभायः शास्त्रकारस्य, प्रतिपाद्यस्यैव तु वदभ्या- सात्तद्विपयज्ञानविशेपोत्पत्तेः । शास्त्रकारो हि शास्त्रमावर्तयन् प्रविपाचस्य शास्त्रार्थज्ञानं सातिशय- मुपजनयति परार्थत्वात्तत्मत्तेः । तन्न प्रयोजनामावस्तभ्यासस्य । अत एव भृशार्थस्यापि यह. धस्योपपत्तिः, भृशं नीयते नेनीयत इति, फलाविशयरूपस्य भृशार्थस्य सम्भवात् । तदनेन पुन- १५ रावृत्तिनि महस्थान प्रत्युक्तम् ; सातिशयज्ञानस्य तत्साध्यत्यांत् । न हि समयोजनादेव बच. नात् निप्रहापाप्तिः ; अतिप्रसङ्गात् । तत्त्वजिज्ञासावन्तं प्रत्येव तद्वचनं सप्रयोजनं तेनैव ततः सातिशयज्ञानस्याभीष्टत्वात् न विजिगीपावन्तं प्रति, न हासो ततस्तत्त्वज्ञानमिच्छति, तत्तिरश्चि. कोर्पयैव तस्य प्रवृत्तेः, अतस्तं प्रति पुनर्वचनस्य निरर्थकत्वानिमहाधिकरणत्वमिति चेत् । न ; प्रथमवचनस्यापि तत्त्वप्रसङ्गात् , ततोऽपि तस्य तत्त्वज्ञानं प्रत्यनादरस्य ततिरस्कारपरत्वस्य २० पाविशेषात् , ततस्तद्वचनमपि" निग्रहस्थानेषु गणयितव्यम् । तदभावे वाद एव न भवेदिति चेत्, मा भूत , को दोप: ? वादिनो जयलाभाधभाव इति चेत् ; न; "तद्वचनेऽपि तदभावस्य सम- स्वात् । न हि निरर्थकात्प्रथमवचनादपि तल्लाभादि; द्वितीयादपि प्रसङ्गात् । "सार्थकत्वसमर्थन पुनर्वचनेऽपि समान। निरूपविश्यते तदापसरमिति नेह प्रवत्र । हमादुरदात .एवं सुखादियड थैःप (थप)रिग्रहः । पौन:पुन्यभृशार्ययोरेय "शब्दविद्यायां यदर्थत्वमनुश्रूयते न सुखा- से दीनामिति चेत् ; न ; तेषामपि कैश्चित्तदर्थत्वानुस्मरणात् । तथा च पठ्यते-- "पौनःपुन्य भृशार्थो वा दूराभ्याससुखानि च । आशु सुष्टु बहुत्यञ्च यर्थाः परिकीर्तिताः ॥" ] इति । पोनःपुन्यभृशार्थमात्रयडर्थवादिभिस्तु भृशार्थ एव दूराभ्यासादीनामतर्भावान पृथगुपा- दानं कृतमिति न कश्चित् व्याधातः । -- . 1-नैव प्रति-मा०,०,५०, स. १-वं तसो भा०, २०, ५०, १० ते शानस्य ता। तिसाहाय्यात् भा०,०, २०, ५ शास्त्राभ्यासात-पाराव-सा शस्त्राभ्यासकर्ता का स्यात् इति प्रश्नार्थः । ८ शाशकार हो। २ पुनरुतं नाम निप्रहस्थानम् । “निप्रहाधिकरण 11 प्रथमवयनमपि । १२ प्रयमबचनेऽपि । प्रपमवचने यदि सार्थकत्वं प्रमीते 1.12R सारा ग प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्ताव .. । २२] कीदृशो न्यायः ? इत्याह-मलिनीकृतः विप्रतिपत्तिमलीमसः कृतः इति, निर्मलस्य निर्मलतानयने प्रयोजनाभावात् । किं कृत्वा ? इत्यनाह-प्रक्षाल्य मलिनीकृत- न्यायं परिशोध्य । कै ? सम्यग्ज्ञानजलैः निर्मलत्वान्मलशोधनत्याच जलसाधात् सन्य. रज्ञानानि जलनेन निरूपितानि । ज्ञानग्रहणम् अज्ञातोपदेशनिषेधार्थम् । तथाहि-यापदेष्टव्य' न स्वयं जानाति कथमुपदिशेत्, उपदिशन्वा कथं प्रमाणमुन्मत्तवत् ? नन्वेवं सुगतस्याप्रमाण- ५ त्वमेव स्यात् अज्ञातस्यैव वैहि वहेतुफलभावादेस्तेनोपदेशात् । परिज्ञात एव लोबुद्ध्या यहि वहेतुलभावादिरिति चेत्, का पुनरियं लोकबुद्धिः १ प्रायसाहकभावोपप्लयाधिष्ठिता वितधाकोरा विज्ञप्तिरिति चेत् ; सा यदि विनेयसम्वन्धिनी, कथं तया बुद्धस्य बहिर्भावादिपरि- ज्ञानं तस्यारतेनापरिज्ञानात् ? तामपि लोकयुद्ध्यन्तराज्जानीत इति चेत् ; न ; अनवस्थानात् । आत्मसम्बन्धिन्येव लोकवुद्धिरिति चेत्, न, अतत्त्वदर्शित्वप्रसङ्गात् । तथा हि- वितथा हि विज्ञप्तिर्लोकबुद्धिनिंगद्यते । तद्वतस्तत्त्ववित्त्यं चेत्, अतत्त्वज्ञः क उच्यताम् ? ॥१३९।। अविद्यापरिहाणिश्च कथं तस्यैवमुच्यताम् ? अविद्यामभवा ोपा विज्ञप्तिर्वितथाकृतिः ।। १४०॥ 'यथास्त्र प्रत्ययापेक्षादविद्योपप्लुतात्मनाम् । विज्ञप्तिर्वितथाकारा जायते तिमिरादिवत् ॥' [प्र० वा० २।२१७ ] इति 'कातियचोभावात् , अविद्या चेत्परीक्षिता । नास्त्येव तर्हि युद्धस्य लोकबुद्धिर्यथोदिवा ।।१४२॥ "असत्यपि सुगतस्याविद्योपप्लवविकलतया तद्दशायां मिथ्याज्ञाने प्राच्यतज्ज्ञानजनितात् संस्कारादु- पपद्यत एव बहिर्भावाद्युपदेशः । तदुक्तम्-""पूर्वावधेन देशनासम्मवाचक्रनमणवत्" [प्र० २० वार्तिकाल० २।२१९ ] इति चेत् ; तन्न; "यस्मात्तदावेधस्याज्ञानत्वं चेत्, सिद्धमज्ञातीपदे- शित्वम् । तस्य ज्ञानत्वेऽपि मिथ्याज्ञानत्वं चेत्; न ; दशायां तदभावात् । पूर्वमासीदिति चेत् ;न; तस्येदानी क्वचिदनुपयोगादात्मदर्शनवत् । यदि पुनरपक्रान्तस्यापि मिध्याज्ञानस्येदानीमुपदेश- हेतुत्वम् ; आत्मदर्शनस्यापि "वियपक्रान्तस्य पुनरावृत्तिनिवन्धनत्वं भवेदिति सुगतस्य पुनर्जन- नमात्मवादयश्च दोपा भवेयुः पुनरावृत्तेस्तद्रूपत्वात् , "पुनरावृत्तिरित्युक्तौ जन्मदोपसमुद्भवौ" २५ [प्र. वा० १११४२ ] इति वचनात् । तथा च दुर्व्याहृतमेतत्-"आत्मदर्शनीजस्य १ वस्तु । २ -णतत्व- आ०, ब०, १०, स०।३ बाद्यपदार्थनिछकार्यकारणभावादः । १ "वैवल लोकम्येन बाह्यचिन्ता प्रमान्यते" -१० पा० २।२१९ । ५-कार वि- आ०, ब०, ५०। ६ विनेयसम्बन्धिन्या विशः । ७ सुमतस्य । 'अनाविद्योपप्लुतात्मनामप्रहीपक्लिष्टज्ञानानां पुसा यथास्वं यत्य भ्रमस्य व आत्मीयः यथास्वं प्रत्ययस्तस्यापैच गमपेक्ष । तम्माद्वितयौ ग्राह्यग्राहकाकारौ यस्या. सा तादृशी विज्ञाप्तिर्जायते । तिमिरादिवत् तिमिरादादव, वितथाकारचन्द्रप्यादिविज्ञप्तिः।" -प्र. वा० म०२२२१७। ९ धर्मकीर्ति । १० असत्यस्यापि आ०व०,१०,स. 1 ११ पूर्वावदेन भा०,१०,१०,स.) पूर्वसंस्कारेण । २ यस्म तदावेदस्य भा०,०प०स० ११ पूर्वसंEकारस्य १४ सुगतावस्थायाम् । १५चिरोपका-श्रा०, घ०, प०, त [ १० न्यायविनिश्चयविवरणे [१२२ हानादपुनरागमः" [प्र. वा० १११४३] इति । प्रागप्यात्मदर्शनं न सुगतस्येति चेत, न तर्हि तस्य कदाचिदपि संसारः कारणाभावात् । आत्मदर्शनं हि संसारस्य मूलकारणं तृष्णाया अपि संसारहेतोस्तत्प्रभवत्वात् । तदभावे चानादिरेव संसारविरहः प्रसज्येत फारणाभावे कार्याभावस्य नियमात् । न यम्, उपायाभियोगनिनन्धनस्य तद्विरहस्याभ्युपगमात् । ५ न चासतो विरहः समारस्य सरशृङ्गयत् । सतोऽपि न विनात्मदर्शनेन सम्भवः, तदन्यहेतुफरवस्य चाहेतुकत्वस्य च स्वयमनभ्युपर्गमादित्यस्त्येव तस्यापत्रान्तमात्मदर्शनम्, ततश्च मिथ्याज्ञानात. स्कार्यमिर कथमिदानी न पुनरावृत्तिर्भवत्विति चेत् ? न, "अपुनरावृत्त्या गतः सुगता" ] इत्ययं विरोधात् । किश्य, आत्मदर्शनमुच्छिन्नमपि कार्य करोति चेत् । व्यर्थमेव मुमुक्षूणां तदुच्छेदाय चेष्टितम् ॥१४३॥ मिथ्याज्ञानादपकान्तान्मिध्यातान ग तस्य विम् । उपदेशस्ततो भावी न तदित्येप विस्मयः ।।१४४॥ मिथ्याज्ञानमलेनैव परित. परिवेष्टिता । विधूतरल्पनाजाला मूर्तिस्ताथागनी कथम् ॥१४५॥ १५ यत्पुनरत परस्य समाधानम्- "निरुपद्वभूतार्थस्सभारस्य विपर्ययः । न बाधा यतायेपि युद्धस्तत्पक्षपात:॥ न हि स्वभानो यनरहितेन निवर्तयितुं शक्यः । यत्नश्च दोपदर्शिनो गुणषु प्रवर्तते दोपेषु च गुणदर्शिनः । न च सात्मीभूतनैरात्म्यदर्शनस दोपेषु गुणदर्शनं न गुणेषु २० दोपदर्शनमदर्शनं वा गुणेषु, नैरात्म्यदर्शनस्य निरुपद्रवत्वात् । ततः स्वभावो भूतात्मा निरुपद्रय एव च । कथमस्य परित्यागः शक्यः कतुं सचेतसा ।। पक्षपातच चित्तस्य न दोपेषु प्रवत्तते । ततस्तस्य न दोपाय यनः कश्चित्प्रवर्तते ॥" [० यातिकाल १।२१२]इति, २५ वन्न समीचीनम्, मिथ्याशानवत् मिथ्योपदेशस्याप्यभावप्रसङ्गात् , तस्याप्यभूतार्थविपयस्य सोपद्र- "य पश्यत्यात्मानं तस्याहमिति शाश्वत स्नेह । स्नेहात सुखेषु तृष्यति तृष्णा दोषास्तिररस्ते । गुणदशी परितृष्यन् ममेति तत्साधनान्युगदते। तैनात्माभिनिवेशो यावत् तावत् स संसारे।।"-प्र.पा.१९-२२॥ १ भागप्यारमार्शनाभावे । ३ नैराम्यदर्शनाभ्याससारनस्य । ५ दशम्यम्-१.शा. स्व. ३३३६-३७॥ ५ सुग तस्य । ६"अपुनरावृत्या गमन मुगतवम्""-मवा०म० १४२ । ७ सुगनस्य । ८ मिथ्याज्ञानयुक्त मुगतात् । ९"विधूतकल्पनाजालगम्भीरोदारमूर्तये" (२० पा०111) इत्यादिना स्तूयमाना। " "दापरावेजकस्य प्रहाणेन निरुपद्रवात्य प्रमाणसवादित्वेन भूतार्थस्य सत्यार्यस्यानारोक्तित्वन स्वभावस्य प्रकृम राल्यस्याभिरवितविध यस्य विपर्ययध्वात्माद्याकारेश्वभ्यासे सोपद्रवत्वादिना प्रयत्न एव तापन्न सम्भवति प्रशस्य । सामवेषि वा विपर्ययै न बाधा नराम्यस्य सामीभूतस्य स्वभावस्यास्ति पुस्तित्र दोषप्रतिपक्षे गुणवति मागे पक्षपातात् ।"- या. 1 म. १३१२ 1 .. - १२] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव: वत्वेन दोपत्वात् , दोपतया च निश्चिते तस्य प्रयन्नासम्भवात् । प्रयोजनवशाहोपेऽपि प्रयत्न इति चेत् ; न ; पक्षपातामाये तदसम्भवात् । न च दोपे पक्षपातः "पक्षपातश्च चित्तस्य" इत्यादि विरोधात् । दोप एवायं नै भवति प्रयोजनवत्त्वेन गुणत्वादिति चेत्, न, गुण एयायं न भवति अभूतार्थत्वेन दोपत्वात् । प्रयोजनवत्त्वं गुणो दृश्यत इति चेत् ; न ; अभूतार्थत्वस्य दोपस्यापि दर्शनात् । तथा च, गुणत्वान पक्षपातोऽस्मिन् दोपत्वात्तद्विपर्ययः । युगपत्प्राप्नुयातां ते धर्मावन्योन्यपाधितौ ॥१४६॥ पक्षपाताद्विधेयत्वमविधेयत्वमन्यतः उपदेशस्य तच्चैतदौःस्थ्यं ते महदागतम् ।।१४७॥ तदस्मात्सङ्कटावेशानिर्मुच्येत तथागतः । कयन्नामेति चेतो नः कृपया परिपीड्यते ॥१४॥ वस्तुभूतेप्यभूतार्थतया दोपत्ये गजनिमीलनं कृत्वा गुणत्वस्यैव प्रयोजनयत्त्वलक्षणस्या- मिसन्धानात् पक्षपात एवं न तत्र विपर्यय इति चेत् ; किं तत्प्रयोजनं यत्पक्षपातनिवन्धन भवेत् ? मार्गावतारो विनेयानामिति चेत् ; कः पुनरसौ मार्गः ? यहिरादिज्ञानमेवेति चेत्; फस्यासौ मार्गः १ पुरुषार्थस्य प्रवृत्तिनिवृत्त्यादिलक्षणस्येति चेत् ; न ; वस्तुतस्तद्भावात् , स्वय' तथैवाभ्युपगमात् । अवस्तुसतश्च दोपत्वेनापक्षपातविषयत्वात् कथं तदर्थोऽयं कारणान्वेपणप्रयत्न- स्तथागतस्य ? दोपे दोषतया निर्माते तदसम्भवाच, अन्यथा “यतश्च दोपेषु गुणदर्शिनः" इत्यस्य विरोधात् । प्रवृत्यादेरपि प्रयोजनवत्वेन गुणत्वात् पक्षपातविषयत्वमेव, अभूतार्थत्वेन तु दोपत्वे सत्यपि गनिमीलनविधानादिति चेत् । "तत्प्रयोजनस्याप्यपरप्रवृत्त्यादिरूपत्वेन 'वस्तुतरतदभायात्' इत्यादेरावृत्त्या चकानवस्थयोः प्रसङ्गात् । तदन्यरूपत्वे च समाधानस्याभि- धास्यमानत्वात् । तन्न. प्रवृत्यादिः पुरुषार्थः । निःश्यसमेव स्वाभिमतं पुरुषार्थ इति चेत् ; न; सत्र अहिरर्थाविज्ञानस्यामार्गवात् सफलधर्मनैरात्म्यदर्शनस्यै तन्मार्गस्येनोपगमात् । “मुक्तिस्तु शून्यतादृष्टेः” [प्र०या० ११२५५] इति वचनात् । तन्न बहिरादिज्ञानं मार्गः । सम्यग्ज्ञान- मेन वहि नेराम्यदर्शनं मार्ग इति चेत्, न, नत्र तत्त्वोपदेशस्यैव हेतुत्वात् । न हि तत्त्वोपदे- शकार्यमनत्योपदेशाद् अनग्नेधूमवत् । अतत्त्वोपदेशश्चायमुपदेशो पहिरर्थादेस्तद्विपयस्य वस्तु- वृत्तेनाभावात् । मिथ्योपदेशादपि तत्त्वज्ञानं चेत् ; न; मिथ्याज्ञानादपि प्रसङ्गात् । तत्वसिद्धि- नियन्धनले मिथ्याज्ञानत्यमेव तस्य न स्यादिति चेत्, ने, उपदेशस्याप्यते एवामिथ्यात्वप्रस- जात् । तन्न बहिरादिज्ञानं नैरात्म्यज्ञानं वा तदुपदेशस्य प्रयोजनं यतस्तत्र पक्षपाताप्रयत्नो न तदोपे मा०, ब०, ५०, स. । २ मिथ्योपदेश. । ३ न च ग-भा०,५०, प०, स.। ५ मिथ्यो- पदेशे। ५ एव तन ता । ६ उपदेशे पक्षपाताभाव । -र्गावतारती भा०, प०, ५०। ८ प्रवृत्तिलक्ष- मा०, २०, ५०, स. ! ९ बौद्धः । १. तस्यप्रयो-आ०, या, प० ।-रात्म्यस्यैव भा०, १०,५ १२ तत्त्वसिद्धिनिबन्धनखादेव ।
[२ न्यायविनिश्चय विवरण भवेत् । अप्रयत्नेऽपि च 'पूर्वावधात् भवति तदुपदेशः । न हि प्रयत्नादेव सर्व कार्यम् अप्रयत्नाना- न्तरीयकस्य विद्यु दादेरभावप्रसङ्गादिति चेत् ; उक्तमा-'सुगतस्य मिथ्याज्ञानमपि भवेत् तत्कार- जस्यापि तैदावेधस्य भाषात्' इति । तेन चीप्रयत्नसिद्धेन तत्वज्ञानपान सम्मवादसम्बद्धमेवत्- 'निरुपद्रव' इत्यादि । सतोऽपि मिथ्याज्ञानस्य तत्त्वज्ञानाबायकत्ये प्रगपि न स्यात् । सत्य- : मेतत् , मिथ्याज्ञानस्यैव वस्तुतः कस्यचिदभावात् , असतो हि विपयस्य ग्रहणे निध्यात्वम् , सच बहिर्भावादिरेव, न चास्य कचित्प्रागपि प्रत्यवभासनं स्वरूपमात्रवस्तुविषयत्नात् सर्वसंवे. दनानाम् , केवलं भौतमुद्रामात्रकमेवैतत् यत्तदैवभासकल्पनम् । ततो न प्रागपि श्रुतचिन्ताकाले सम्यग्ज्ञानं या नया)धनसामर्थ्य मिध्याज्ञानमलाना किं पुनर्विधूतसकरविष्टये सुगतभावे प्रभास्वरवित्तमयत्वात् तदा भगवतः । तदुतम्- "प्रभास्वरमिदं चित्तं प्रकृत्यागन्तवो मलाः । तत्प्रागप्यसमर्थानां पश्चान्छक्तिः क तन्मये ॥" [प्र. वा० १२२१०] इति चेत्, न, उसोत्तरवात् । असति घस्तुवृत्या मिथ्याशाने न तन्निबन्धनो रागादिरित्यनादि- शुद्धिः सुगतस्य स्यात् । अविद्यापरिकल्पितमस्त्येव तदिति चेत् , न , सतोऽपि तस्य गगादा- पन्यत्र "चासामर्थ्यात् । अपि च, मिथ्याज्ञानमशकं चेत्तत्वसंवित्तिगाधने । मिथ्योपदेशसामध्यं कथं "तस्यापकल्प्यताम् १ ॥१४९॥ यदि सन्निहितमपि मिथ्याज्ञानं तत्त्वज्ञानराधनाय न समर्थम् अविद्या निर्मितस्य तस्यैव विधारासहत्वादिति, हन्तवं कथं "तारशस्यैव तस्य चिरापमान्तस्य मिध्योपदेशसामध्य यतो बहिरादिदेशना बुद्धस्य भवेत् १ ततो नासामर्थ्यात्तस्य तदवाधनम् अपि त्वसत्त्वात्, २० तदपि विरातीतस्याहेतुत्वादेव, तद्वन्मिध्योपदेशोऽपि चिरापमान्तानिमध्याज्ञानान सम्भवति । नापि तात्कालिकात्, सुगतावस्थायां सदभावात् । सन्न लोकबुद्ध्या मिथ्याविकल्परूपया" घहिदिचिन्ताप्रतननं बुद्धानाम् । यत इदं सूक्तम्- "तदुपेक्षिततत्त्वार्थेः कृत्वा गजनिमीलनम् । केवल लोकयुद्धथै बाधचिन्ता प्रतन्यते ।" [प्र. या० २।२१९] इति । 1 पूर्वावेदात् मा०, २०, ५०, स. पूर्वसस्कारात् । २ तदावेदकस्य 86,०, २०,२० पूर्वमिथ्या ज्ञानसस्वारस्य । ३ मिथ्याशानेन । ५ प्रश्न विना केवल रास्काररामुद्भतेनैव । ५ रासायंवरपायागपि । र भास . "तत्र श्रुतमयो भूयमाणेभ्य परार्थानुमानवाक्येभ्य समुत्पद्यमानेन श्रुतशब्दवाच्यतामाता निता पर प्रकप प्रतिपयमाना स्वार्थानुमानलक्षणया चिन्तया नियता वितामयी भावनामारमते ।"-माए. का० ८३14 "प्रभास्वरमिदं चित निस्यसविरहितस्यैव वैन महणादागन्तवो मला , असान्तसमारोपयामलकरवेन भौतमुवामानकत्वात न परमार्थतो नित्यख पवित्प्रतिभाति ।"-म घातिकाल 110101 ९ दप्तोत-I, 1., ५०, स. १० मिथ्या लम् । पासामा-भा०, ५०, १०, स.1 निराधान्तमिध्याज्ञानस्य । १३ अविधाकालतस्यैव । १४ मिथ्या शनस्य । १५ तत्वानापनाभार । ११-पान लो-भा०,.,.,. १७-काता मा..,.,स। .
4. , १२२ प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव नाऽपि तत्त्वज्ञानात्तत्प्रतननम् ; बहिरादेरवस्तुलेन तत्वज्ञानस्य सदविषयवाद् अन्यथा मिथ्याज्ञानत्यप्रसङ्गात् । 'विधिपरत्वेनैव तद्विपयत्वे मिथ्याज्ञानत्वं न निषेधपरत्वेन, ततो निषेधविषयोपदर्शनार्थं तत्त्वज्ञानेनैव बहिराद्यनुवादेऽपि न दोष इति चेत् ; न ; तद्वनि- त्येश्वरादेरप्यनुवादप्रसङ्गात् , तस्यापि निपेघविपयत्वाभ्यनुज्ञानात् । तथा च बहिरादिवत्तस्यापि संवृतिसत्यत्वोपपत्तेर्न किञ्चिदसौगत मतं भवेत् । पूर्वपक्षसेनानुदितस्य कथं सत्यत्वमिति चेत् ? ५ कथं बहिरादेरिति समानम् ? मा भूत्तस्यापि तदिति चेत् ; तरसन्नस्तर्हि संवृतिसत्यव्यवहारो बहिरादिव्यतिरेकेण तदसम्भवात् । तन्न तत्त्वज्ञानादपि तत्प्रतननमिति सिद्धमज्ञातोपदेशित्वं बुद्धस्य, ततश्चानाप्तत्यम् अनवधेयवचनत्यात् । न ह्यज्ञस्य वचनं प्रेक्षावतामवधेयमिति चेत् ; साधुचोदक, साधीयस्तव चोद्यम् , अनुमतमेवैतदस्माकम् । न हि चोद्यमित्येव समाधातव्यम् , न्यायोपपन्नस्यानुमतिविपयत्वात् । सम्यग्रहणं तु संशयितस्य विपर्यस्तस्य चोपदेशनिवृत्त्यर्थम् , तदुपदेशेऽप्युपदेष्टुरनव- धेयवचनत्वेनानाप्तत्वप्रसङ्गात् । तत्र- सन्दिग्धं संविदद्वैतम् , सद्धि नः (न) प्रतिभासतः । सिद्ध्यति, प्रतिभासस्य बहिर्भावे" विभावनात् ॥१५॥ न वस्य प्रतिभासद्, अद्वैतस्य कथं भवेत् ? अपहवे हि दृष्टस्यादृष्टस्य नितरामयम् ॥१५१॥ पहिरर्थोऽपि यद्यस्ति तदद्वैतं कथं भवेत् ? न हि ज्ञानार्थयोर्भावे द्वयोरद्वैतसङ्गतिः ॥१५२॥ याध्यत्वात्मतिभावोऽपि"नास्त्यसावित्यसङ्गतम् । बाध्यबाधकभावस्य स्वयं बौद्धनिराकृतेः ॥१५३।। संवृत्या बाधनेऽर्थस्य वस्तुतस्तदनिहयात् । अद्वैतं "सांवृतं प्राप्तं प्राप्तं बाह्यं तु वस्तुसत् ॥१५४॥ तस्मानिर्भासतो वस्तुसदसत्तानुधाविनः । सन्दिग्धं संविदद्वैतं तन्न वाच्यं मनीषिणाम् ॥१५५।। एवं यत्कल्पितं सर्वैः सर्वथैकान्तवादिभिः । सत्प्रमाणविपर्यस्तमनाप्तोपत्रमुच्यते ॥१५॥ 'सम्यग्ज्ञानजलैः' इति बहुवचनं तद्वहुत्वस्य वक्ष्यमाणत्यात् । एवमपि बहुभिरेव प्रक्षालनं नैकेन नापि द्वाभ्यामिति प्राप्तमिति चेत् आह-'कथमपि इति । एकादीनां मध्ये - २० २५ . १ माधचिन्ताविस्तारः । २ माह्यार्थाः सन्तीति विधिरूपतया । ३ बाह्याभाव इति निषेधरूपसया । ४ निस्येश्वरादेरपि । ५-गत भ-भा०,०प०,स०। ६ वहिरोदेरपि । सत्यत्वम् 10 अन्य. कश्चिदुपहसति । ९ चेक सा-मा०, २०, ५०,०। १० जनानाम् । 11-वेऽपि भाव-ता० । अस्मिन् पाठे अपिशब्दः एवार्थको शेयः । १२ बहिर्भावस्य । ११ संवेदनादेतस्य । १४ अपक्षत्र स्यात् । १५ मास्ति बहिरथः। टम्यम्-. वार्तिशाल RED पृ. ४१।१७ याम्प्रतम् मा०, ५०, ५०, स.।
४० , - . न्यायपिनिश्चयविवरण 1११२ केनापि प्रकारेणेति । एकेन समझालने कि तन द्वाभ्यां यहमिवा पेयप्यादिति चेत् १ म, ततोऽपि तदतिशयस्य सम्भवात् , सम्याज्ञानानां सापल्यस्यामापाश्चेति निवेदनात् । पथं वर्हि महुपरने हृयादिप्रतिपत्तिरिति चेत् । न, यहुषु द्वयादेत येग ततस्तत्प्रतिपत्तेरविरोधात् । कर्नेनीयवे ? इत्याह वचोभिः । न्यायविनिश्चयवपनैरिति । 'प्रत्यक्षलक्षणम्' इत्येवमादीनि हि ५ एनानि, तेच प्रत्यक्षादिक्मेव निर्मलत्य नीयते नाम्नायस्तरकथं ते स तन्नेनीयत इत्युच्यत इति चेत् ;न, तृतीये तेरेयाम्नायस्यापि सन्नयनात् । प्रत्यक्षादेस्तहि तन्नयन किमर्थम् अप्रस्तुमाभि- धानदोपादिति चेत् ? न , तस्याप्याम्नायपरिशोधनार्थत्वात् । प्रत्यक्षादी हि निर्मलता नीते निर्मलतत्प्रमाणपरिशुद्धद्रव्यपर्यायसामान्यविशेषात्मकजीवादिपदार्थगोचरतया सुपरिशुद्धमाग्ना- ग्रहानप्रामाण्यं भवति । अत एव प्रत्यक्षादिकं परिशोव्य पश्चादाम्नायः परिशोधितः, निश्चित- १. प्रामाण्यप्रत्यक्षाद्यविरोधेन निष्प्रतिपक्षस्याम्नायप्रामाण्यस्य व्यवस्थापनार्थम् । यद्वत्यति- "सकलागमाविषयज्ञानाविरोधं घुधाः प्रेक्षन्ते" [न्यायवि० श्लो० ३८५ ] इति । लोकप्रसिद्धयेव परिशुद्ध प्रत्यक्षादिक किं तत्परिशोधनेन ? परिशुद्धशोधने अतिप्रसङ्गदिति चेत् न, तस्याप्याम्नायवन्मरिनीकृतत्वात् । न महिं यस्यचिदपि परिशोधनम् उपायाभावात् । सर्वप्रमाणामलिनीभावे हि क इवोपायः परिशोधनस्य स्यात्, प्रमाणस्यैव परिशोधनोपायत्वात् , १५ तस्य च मलिनीभावात् , अप्रमाणस्य तदुपायचे प्रमाणकल्पनायय॑म्, प्रमाणवस्त्रमेयस्यापि अगाणदेव परिशोधनोपपत्तेः । यदि सर्वप्रमाणानामुच्यते मलिनीकृतिः । उपायाभावतस्नेपा परिशुद्धिक्रिया कथम् ? ॥१५७॥ प्रमाणस्यैव वक्तव्या परिशुमानुपायता । न च तन्मलिनीभूतमुपायत्वाय कस्पते ॥१५८॥ मलीमसमुपायाचेत् , मलप्रक्षालन पृथा । अप्रमाणमुपायश्चेत्, प्रमाणान्येपणं यथा ॥१५९॥ प्रमेयपरिशुद्धिश्च प्रमाणपरिशुद्धिवत् । अप्रमाणादुपायातू यत्मसिद्धिपदच्छति ॥१६॥ इति चेत् , असदेतत्, यन दि सर्व मलीमसम् । प्रमाणम्, परिशुद्धत्य सम्भवात्तस्य कस्यचित् ।।१६१॥ तेने चापरिशुद्धस्य परिशोधनसम्भवात् । पायामापतो नास्ति शुद्धिरित्यसमञ्जसम् ॥१६२।। सर्वशून्यप्रवादे हि शु पानमकरमपम् । सकलमपान तज्ञानाच्छून्यत्वं यत्प्रसिद्धपति ॥१६३|| रचनात् । ३ वक्ष्यमाणकारिकामागि। ते बचोषि से अप्राय तत् अमला हैगीयो। * प्रवचनप्रस्तावे। ५ अमल प्रापणात् । -क किं तत्सरिराखशोधनेन मा.स. परिशुभ- प्रमाणे असिवादि प्रमाण स्वीफर्राय : २० ३० r.
- १० शर प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव ४१ अशून्यवेदनं तेन नीयते निर्मला दशाम् । यद्यशून्यं न किञ्चित्स्याच्छून्यज्ञानं कथं भवेत् ।।१६४॥ शून्यज्ञानं भवत्तच्च स्वसत्तां प्रत्यनाकुलम् । 'भावसंवित्तिनमल्यं खतोऽनद्योतयत्यलम् ॥१६५॥ अद्वैतवेदनेनैवं निर्मलेन मलीमसम् । विधूतमलसम्बद्धं भवेद् द्वैतप्रपेदनम् ॥ १६६॥ अबाधितोपलम्भश्चेदद्वैतमकल्पयेत् । द्वतं किन्न सं एवायमवकल्पयितुं क्षमः ॥१६७॥ अस्ति चं द्वैतसंवित्तिरस्ति चास्यामघाधनम् । इति निणेप्यते 'पंश्चादलमनाप्रहेण ते ॥१६८॥ स्वरूपवेदनं यस्य संविदा परिशुद्धिमत् । तस्य तेन यहिर्वस्तुबुद्धिः शुद्धिपथं व्रजेत् ॥१६९॥ बहिर्वस्तुपरिच्छेदि न किञ्चिद्यदि वेदनम् । "संवेदनबहुत्वं तु प्रसि ति कुतस्तव ॥१७०॥ अनासादितबाधत्वान्निर्मलं चेत्स्ववेदनम् । अर्थवेदनमध्यस्तु ततोऽर्थोस्तु निराकुलः ॥१७१।। स्वसवेदननैर्मल्यमर्थनिर्मलवेदनात् । सिद्धमेतेन मोद्धव्यमन्यथा" तदसम्भवात् ॥१७२॥ "एकान्तवेदनं यच परिशुद्धं परैर्मतम् । घुद्धिस्तेनाप्यनेकान्तगोचरा" परिशुद्ध्यति ॥१७३॥ एवमादि यथान्यायं सूरिविस्तारयिष्यति । तत्प्रयासैः किमस्माकं "प्रन्थविस्तरकारिभिः ॥१७४॥ सस्मादाम्नायपरिशोधनोपायत्यादुपपन्नमध्यक्षादिपरिशोधनम् । तत्परिशोधनोपायस्यापि परिशोधनादनवस्थानमिति चेत् , न, अपरिशुद्धस्यैव परिशोधनात्, प्रसिद्धपरिशुद्धिकस्य "तदभा- वात् ,तेनैवापरपरिशोधनात,"तत्सद्धायरय चानन्तरमेव निवेदनादिति न किञ्चिदवद्यम्। ततःसूक्तम्-- २५ १५ २० , 'सर्व शून्यम्' इति वेदन यदि सकल्मप तदा सर्वस्य अशन्यत्वमेव स्यादिति भाव । २ यदि सर्वशन्यता- प्राहक प्रमाणमपि अशून्य न स्यात् तदा कथ सर्वशून्यताप्रतिपत्ति ? ३ अशून्यमय चाविसवादि । ४ यथा शून्य. शानमशून्य तया बाह्यार्थज्ञानमप्यशून्य स्यादिति भाव । ५ स्वतो यद्यो-ता०, २० । स्वती विद्यो-५० । ६ शन्यादैतज्ञानेन । ७ बाह्यार्थशानम् । ८ द्वैतविषयाऽवाधितोपलम्भ। 1 ९ चेद्वैत-आ०,५०, ५०, स०।१० पश्चादमलान प्रहेण-भा०,२०प०स० । घटपटादिविषयभेदात् सवेदनबहुत्वम् । १२ अर्थसवेदननैर्मल्याभावे सवेदननैर्मल्यमपि न स्यादिति भाव । अन्यदा आ०, २०, प०, स.। १३ सर्वथा क्षणिकत्वादिप्राहकम् । ११ स्वयमिप्टेन रूपेण सदात्मकम् तदन्यरूपेण असदात्मरमिति सदरादात्मकवस्तुमाहिणो युद्धि स्यात् । १५ मन्य- विस्तार-ब० ॥ १६ परिशोधनाभावात् । १७ प्रसिद्धपरिशुद्धिकस्य ज्ञानस्य ।
न्यायविनिश्चयविवरणे 'वचोभिः' इति । अनेन न्यायनमल्यनयनस्यानन्योपायवं दर्शयति, अन्योपायवे तद्वचनासम्म वात, वसामप्रमाणत्वात् कथं तःस तन्नेनीयत इति चेत्नवप्रामाण्यस्य वक्ष्यमाणत्वात् । यस्य तु तेपामवस्तुविषयत्वात् प्रामाण्यमनभिमतम्, तस्य निष्प्रयोजनमेव शास्त्रं तन फस्यविष्यर्थस्थानिवेदनात, तन्मतोपजीषिनो वादिनच निग्रहावाप्तिः असाधना यवनात् । ५ तथा प"देवस्य वचनम् “समस्तो वा वाक्यराशिरनर्थक" [ ] इति । न वचनमात्रस्या- नर्थकत्वं प्रमाणानुपपन्नपातुवादिनो वेदादिवचनस्यैवानर्थकत्वात् , निश्याप्रमाणपयःपरिपेक- परिशुद्धस्य तु त्रिरूपस्य लिदस्य तत्साध्यैसम्बन्धस्य च प्रतिपादक बचन प्रमाणमेव तस्य परार्थानुमानत्वेनं सोगतैरङ्गीकरणात् । न च शास्त्रस्य नियोजनत्यम्, लिङ्गतासाभ्यासम्म धाभिधायित्वेन तत्य प्रयोजनवत्वात्तस्यापि परार्थानुमानत्वात् । न च तन्मतोपजीविवादि. १० पचनस्याऽसाधनाङ्गवचनत्यम् , लिङ्गादेः साधनाङ्गस्यैव तेनाभिधानादिति चेत् । न वचसाम- यस्तुविषयत्वाभावप्रसहात् । तथा हि-तेपामवस्तुविषयत्वं प्रसज्यप्रतिषेधेन वा स्यात् "'वस्तुविष- यत्वं वचसा नास्ति' इति," पर्युदायेन या स्यात् 'परतुनोऽन्यदवस्तु तद्विपयत्वं वचसाम्' इति ? न तावदाद्यो विकल्पः; लिङ्गस्य तत्साध्यसम्बन्धस्य च वस्तुनः "तद्विपयत्यात् । तद्व्यतिरिक्त वस्तु न तद्विषय इति चेत् ; कुत एतत् ? व्यभिचारात् , व्यभिवरन्ति हि शब्दा घटादिकं यस्तु १५ सदभावेऽपि तत्प्रवृत्तेरिति चेत् ; अत एव लिङ्कादिविषयत्वमपि न स्यान, शब्दादो चाक्षुपत्याद्य- भावेऽपि तद्वयसां प्रवृत्तिदर्शनान् , अन्यथा तदसिद्धत्याधु-दावनाभावप्रसङ्गात् । न हनभिदि- तस्य दोपोद्धावनमुपपन्नम् ; अतिप्रसङ्गात् । शब्दान्यत्वमन्यत्रापि समानम् । स्यान्मतम्- अन्य एव स शब्दो यश्चाक्षुपत्यादी सत्येव भवति, सोऽप्यन्य एघ यस्वद- भावे । न चान्यस्य दोपेणान्यस्य दोपवत्वं चौरदोपेण सायोरपि तद्वत्यप्रसङ्गादिति, तन्न; अन्य प्रापि समानत्वात् । अन्येपामपि हि शब्दानो स्वविषयभावमाविना तद्विपरीतानाश्च परस्परतो विशेषात् । विशेपानभासनस्य च "टिङ्गशब्देप्वपि समानत्वात् । एतेन पर्युदासोऽपि प्रत्युत्त लिङ्गशब्दवदितरेपामपि वस्तुगोचरत्वेन अपरशु- "विषयत्वानुपपत्तेः । लिङ्गशब्दानामध्यवस्तुविषयत्वमेव लिङ्गस्यावातुरूपत्यास् , स्वलक्षणं हि वस्तूच्यते नस्यैवार्थक्रियासामर्थ्यात् , न च तस्य लिङ्गस्यमनन्ययात् , सायेनान्वित १ लिङ्गम्, स्थलक्षणस्य च न धर्मिणि नदन्वयः" शक्यनिर्णय:, साध्यस्याद्याऽयमध्यव- सायात् । न चानध्यवसिते साध्ये "तदन्वयः सुकराऽध्यवसायः ; अतिप्रसङ्गात् । सपने वचनैः न्यायः समसत्वं प्राप्यते । सोहर । "यापारविषयो योऽयों बुद्धी प्राशते । प्रामाण्यं तत्र शब्दस्य नार्थतरपनियन्धनम् ॥"-"३ शायण । ४ पक्षसिद्मनाभूत । ५ वेदस्य भाग, घ., १०,०। ६ इति वच-आ०,००।-ध्यसाबस्स स. त्रिस्पलिहाल्यानं पार्था- नमानम् । श्रोणि पश्यन्वयन्यतिरेकपक्षधर्मवसंज्ञकानि यस्य तत् त्रिरूपम् । निस्पं a तस्यास्या- नम् ।"-यापवि० पृ० १९१५-नस्य सा~मा, घ, प., स. 16-दवान-मा०, २०, प., । -ति विपयु-०,०,९०, सनिस्पलिङ्गवचन । लिङ्गतासाध्यसायव्यतिरिकम् । 1 अनित्यः पादः पातुपवादित्यादौना। ५ पटपटादिशब्दानाम् । ११ पटपटादिशन्देषु इमे शब्दाः सविषयमा प्रयुक्ता इमे २ तदभावे इति मेदानवमानम् । शिक्षाशब्देष्वपि । १४-स्वारिति ना, प., प. १९-विषयत्वेगानुप-मा०,१०,१०, २०-यशश्य-०, २०, ५०० स्वलगलिशान्धयः । - - १० २१२] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः तदन्वयाध्यवसाय इति चेत् । न ; धर्मिगतस्य हेतुस्सलक्षणस्यान्यत्रासम्भवात् , तवो. पलम्भात् । तथाविधत्याप्यन्यत्र भावे न किञ्चित्प्रादेशिकं स्यात् । सामान्यरूपेण तदेवा- न्यत्रेति चेत्, न; तपस्य व्यतिरिक्तस्याव्यतिरिक्तस्य वा स्पष्टप्रतिभासेनापरिच्छेदात् । प्रत्यभि. ज्ञानेन तत्परिच्छेद इति चेत् ; न , तदर्शनाभावे तदनुत्पत्तः । वासनावलात्तदुत्पत्ती कामि- न्याविज्ञानववस्तुविषयं प्रत्यभिज्ञानं भवेत् । अवस्तुविषयमेव तेदस्तु सामान्यस्य तद्विपयस्या- ५ वस्तुत्वादिति चेत् ; सिद्धं सहि लिङ्गस्थावस्तुत्वं तस्य सामान्यरूपत्वात् । तदने तत्साध्य- सम्बन्धस्याप्यवस्तुत्वं निवेदितम् । न हि सम्वन्धिनः सामान्यस्यावस्तुत्वे वत्सम्यन्धस्य घस्तुत्वमुपपन्नम् ; वन्ध्यारतनन्धयावस्तुत्वे तत्सौन्दर्यवस्तुत्वप्रसङ्गात् । तन्न लिङ्गादिशब्दा- नामपि वस्तुगोचरत्वं यतस्तद्वदन्येपामपि तद्गोचरत्वं सम्भाव्येत इति चेत् ; उच्यते- अवस्तु यदि लिङ्गं स्यात्सर्वशक्तिविवर्जितम् । कथं तद्विपयो वित्तेविषयः कारणं हि वः ॥१७५।। यद्यवस्तुरूपमेय लिङ्गं ते' तहि सफ्टशक्तिपैक्ल्यस्यभावं कथं बत् कस्यचिद्विज्ञानस्य विपयः स्यात् ? विज्ञानं प्रति कारणस्यैव तद्विपयत्वात्, “नाकारणं विपयः" [ ] इति वचनात् । न चावस्तुनः कारणत्वम् ; वस्तुत्वप्रसङ्गात् , अर्थक्रियासामर्थ्यस्य वस्तु लक्षणत्वेनाभ्यनुज्ञानात्" । अकारणत्वेऽप्यवस्तुमहणे वस्तुग्रहणमपि स्यादित्यसदेतत्-"नाकारणं १५ विपयः" इति । वस्तुनो यदि वेद्यत्यमनिमित्तस्य "कस्यचित् । "सर्वस्यैकेन संवित्तिः सर्वैरेकस्य वा भवेत् ॥ १७६।। सर्वस्य सर्ववेदित्वमनुपायं ततो भवेत् । प्रतिपाद्यादिभायस्य कथयाऽपि कथं गतिः ॥१७॥ अवस्तुयेदि(द)नेप्येतद्रूपणं दृश्यते समम् । ततस्तस्यापि" वेद्यत्वमहेतोरेवमुच्यताम् ॥१७८॥ यद्यकारणस्यैव कस्यचिद्वस्तुनो ग्रहणम् । तदा सर्वस्यैकेन ग्रहणम् अकारणत्याविशे- पादित्युपायाभ्यासरहितमेव सर्वस्य सर्वदर्शित्वं भवेत्। वादिप्रतिपन्नस्यैव च प्रतिवादिना प्राश्निफेश्च नियमेन प्रतिपत्तौ न वार्तयापि प्रतिपाद्यप्रतिपादकभावः प्रतिलब्धुं शक्यते । न हि २५ "प्रतिपन्नतद्भाव एव परः प्रतिपादयितव्यः, प्रतिपादकस्यापि प्रतिपाद्यत्वेनानवस्थानप्रसङ्गादि-" त्ययं पर्यनुयोगः परस्य स्वमतं प्रत्यनुरागमयमानध्यमावेदयति । न छपरीक्षित परीक्षालोचनः स्व- २० १५ धमिमात्रोपल्ब्धत्यापि सपक्षे सद्धाये । २ अन्यायवृत्ति। ३ चौद्धदृष्टया अन्यापोहात्मकस्य सामान्यस्य । ४ प्रत्यमिज्ञानानुत्पत्तेः । ५ प्रत्यभिज्ञानम् । ६-न सा-आ०, २०, ५०, स०। ७ संमान्यते भा०, ५०,५०, स०। ८ बौद्धानाम् । ९ बौद्धस्य । तत्तहि-भा०, २०, ५०, स० । १० "अर्थक्रियासामर्थ्यरक्षणवादस्तुनः ।" -न्यायवि० पृ. २३ । । कस्य चेत् भा०, २०, ५०, स०। १२ अर्थस्म । १३ ज्ञानैः । १४ वस्तुनोऽपि । १५ ज्ञातार्थः । १६-वस्थानसशादि-भा०, २०, ५०, १० ११७-चनस्व-भा०, व०, ५०॥
४४ न्यायचिनिश्चयविवरणे [२ पभधातिनमेव दरेष परपक्षे निक्षिपति । समानः सल्वयं पर्यनुयोगः 'परस्यापि । अवरतुनोऽध्य कारणस्यैव महणे सर्वसर्वज्ञत्वस्य प्रतिपाद्यप्रतिपादकभावाभावस्य च समानत्वात् । न हि निया- मकाभावे तत्रापि विज्ञानानां विषयप्रविनियमः सम्भवति । विज्ञानशतेनियामक्त्वं वस्तुग्रहणेऽपि समानम् । ततो वस्तुववस्तुनोऽपि नाकारणास्य संवित्तिरिति सर्वहेतूनां सुबुद्धमज्ञानासिद्धत्व. ५ मवबुध्यते । किच, 'लिङ्गम, अवातु च' इति व्याहतम् । लीनमर्थ गमयतीति हि लिङ्गम्, लीनाथगमनश्च नापरं तज्ज्ञानकरणात् , न चावन्तुर्नस्तकरणम्, वस्तुत्वप्रसङ्गादित्युक्तत्वात् । तत्कथं तद्वचनस्यासाधनाङ्गवचनस्याग्निप्रस्थानत्वं न भवेत् १ वरत्वेक्त्वाध्यवसायात वस्त्वेष लिङ्गम् , यन्तुना हि धूमादिस्वरक्षणेन धूमत्वादिसामान्यमेक्त्वेनाध्ययसितं वस्त्वेव ततो न तस्याशक्तिर्यनामहणमलिङ्गवश्वेति चेत् , न सारमेतत् , यस्मात्- अवस्तुनोऽपि शक्तिश्चेद्वस्त्वेकत्वेन निर्णयात् । अवरत्वभेदनितिरशक्तिस्तुनो न किम् ? ॥१७९॥ विशेषस्याप्यशक्त्वे सामान्यवदयस्थिते । कुतोऽनुमेयसंवित्तिं लभन्ते हन्त ! सौगताः ॥१८॥ एकत्वाध्ययसायेऽपि पलयत्वेन बस्तुनः । अपस्तुनि भवेच्छति शक्तिर्यस्तुनौति चेत् ; ॥१८१॥ अनन्वितत्त्वमप्येवं वस्तुधर्मः कथन ते । शचिवप्रमिशेल्लिङ्गे पस्त्वेकत्येन निश्निने १९८२॥ सामान्यस्येव लिङ्गवमन्वयार्थ तच्छतः। असाधारणसास्यैवं प्राप्तेयं व्यभिचारत् ॥ १८३॥ सामान्य पुनरन्यञ्चदन्ययायोपमृग्यते । "यत्वभेदनयामाचे दर्थ तस्यापि लिगता ॥१८४॥ तदभेदनये तस्य प्राच्यवत्स्यादनन्वयः । पुनः सामान्यक्लप्तिस्तु जनयेदनवस्थितिम् ॥१८५॥ एतेनाभ्यासभोमे" यत्प्रत्यक्षमुपवर्णितम् । अविसंवादशून्यत्यं तस्याप्युक्तममन्वयात् ॥ १८६॥ अभ्यासावस्थायां हि दृश्यप्राप्ययारेक्त्यमत्यारोप्य तरसामदियक्षरयायिसंपादपले २० 1 बीवस्यापि । २ पटज्ञानस्य घट एवं विषय न तु पर इत्याकारक । ३-नवार-भा,.,.. Y-नसरकार न-श्रा, ब०,५०,०। ५ सौगनमतीपजीविवादिवचनस्य ।। भवस्तुना सह एकत्ताव सायात वस्तुनः अशक्ति' किस स्यात् ! . यथा घूमरवलक्षणगता कि एकत्साध्यवसायपलान् धूमसामान्य उप- सध्झामति तथा धूमस्वलक्षणगतमनन्वितत्वमपि धूमसामान्य रुपमानामेत् क्या व अनन्ययात न हेतुत्वमिति भाव। ८ भवेधत आ०, १०, प., स.1 ९ सामान्यस्यैर । १.वस्तुना सद्द एकस्वाध्यवसायामारे। "अभ्यासबहुवे ।-सभूमी य-भा०, ६०,१०,१० । १२ वार्तिकामा (२)। १३ स्यापि मंदपाय- भाव..
- , १० १२]] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव मनुमन्यते परैः 'यदेव दृष्टं तदेव प्राप्तम्' इत्यभिप्रायनिवेदनात् । तदेकत्यस्याप्यवस्तुस्वभावस्य वस्तु- स्वलक्षणाभेदाध्यवसाये वस्तुस्वभावभूतानन्वयधर्मानुपातित्वेन 'स्वान्वयस्वभावपरियागात् कथम- विसंवादकारित्वं स्वलक्षणवत्त पुनरप्यविसंवादनिमित्तमेकत्वान्तरपरिकल्पनायां तदेवस्थमनवस्थानम्। स्यान्मतम्-न सर्वस्य वस्तुधर्मस्य बलवत्त्वं व्यवहारोपयोगिन एव तस्य बलवत्त्वात् , तदुपयोगित्यन्च शक्तरेव नान्य (नानन्व) यस्य, ततः शक्तिरेव अवस्तुन्यध्यारोप्यते नानन्वया, तंद- ५ ध्यारोपे हि न प्रत्यक्षं संवादाभावात् । न हि तस्यानन्धितवस्तुविषयत्वे संवादित्य नाम अति- प्रसगात् । नाप्यनुमानम् ; लिङ्गाभावात् , अनन्वितस्य लिगत्यायोगादिति प्रवृत्त्यादिव्यय- हारः सर्व एवोच्छेद्येत, तस्य प्रत्यक्षादिनिबन्धनस्य तदभावे गत्यन्तराभावात् । न च व्यवहारमुप- जीवतां तदभावायोपक्रमः श्रेयान् । तदनुपजीवने तु प्रत्यक्षादिनिराकरणमभिमतमेव ताथागता- नाम् , सकलव्यवहारपरिस्पन्दाभावे निरघशेपविकल्पनिष्क्रान्तस्य संवेदनपरमार्थपर्यवसितस्य सर्वथा मुक्तत्वेन प्रत्यक्षादिचिन्तया प्रयोजनाभावात् । तदुक्तम्- "यद्यद्वैते न दोपोऽस्ति मुक्त एचासि सर्वथा । वर्त्तते व्यवहारश्चेत् प्रत्यक्षाद्यपि चिन्त्यताम्।।''[प्र०यार्तिकाल ० १।३६] इति । ततः प्रयोजनवशाच्छक्तिरेवाघ्यारोप्यते "नानन्यय इति ; तदसमीचीनम् ; अनन्वयानारोपे शक्तरप्यनारोपप्रसङ्गात् "तस्यास्तरस्वभावात् । न हि सा तत्स्वभावा "ततो निष्कृष्याध्या. १५ रोपायतुं शक्यते, स्वरूपत निष्कर्पणासम्भवात् स्वरूपाभावप्रसङ्गात् । फल्पनया निष्कर्पणमिति चेत् ; न ; अनिष्कृष्टस्वभावायाः ततोऽपि तदसम्भवात् । न हि कल्पनाप्यभेदिनी भिनत्ति "तदानीमेव तदभेदाभावप्रसङ्गात् । अन्थदा भिनत्तीति चेत् ; न ; तदा शक्तरेवाभावात् । न ह्यविद्यमाना भेत्तु शक्यते, तदापि तद्भावे क्षण- क्षायत्वाभावापत्तिः। सत्यम् , न कल्पनया भिद्यते शक्तिः, केवलमभिन्नापि भिन्नेव तस्यां "प्रत्यय. भासत इति चेत् ; कल्पनागतैव तदि शक्तिरध्यवसितव्या, न वस्तुगता। न चैतत्पध्य भव- ताम्, सच्छतेरप्यवस्तुरूपस्यात् । न चावस्तुनस्तथाविधादेव सामर्थ्यादर्थक्रियाकारित्वं फूर्मरोमसा- माध्यासाद् बन्ध्यासुतस्यापि सुतप्रयोजनकारित्वप्रसङ्गात् । वस्तुभूतैव "कल्पनाशक्तिः वस्तु- शक्तस्तन्नाध्यासादिति चेत् ; न; अनन्विताया एपाध्यासप्रसङ्गात तत्स्वभावत्वात् अनन्वयनिष्क- टाया असम्भवात् । कल्पनया सम्भव इति चेत् ; न, 'कल्पनागत तर्हि' इत्यादेरावृत्त्या २५ "ततो व्यवहारप्रसिद्धमवयरिन एक्ख समाश्रित्य यदेव दृष्टं तदेव प्राप्तमिति व्यवसायात प्रमाणताव्यवहारः स च एकवाध्यवसायो देशकालाद्यभेदात् ।"-प्र०वार्तिकाल. १५ । २-वस्थातुस्व-प्रा०,२०प० । ३ सान्वय- मा०,५०, १०, स०। ४ नान्वयः भा.,ब०,१०,स.1५ पस्तुमतस्य अनन्वितस्य अध्यारोपे । ६-झं प्रसंवादा- भा०,०,५०,स० । प्रमात्मकं भवेदिति भावः । ७ प्रत्ययस्य । ८ व्यवहाराभावाय । ६ संवेदनस्य पर-भा०, २०, ५०, स.। १. जनस्य । ११ "यचद्वैतेन तपोऽस्ति व्यवहारश्चेत्परलोकोऽपि चिन्त्यताम् ।"-प्र. धातिकाल. ॥३६ । दोषोऽस्ति' अस्मिन् पाठे 'यधद्वैत निर्दोषम्' इत्यर्थो ग्राह्यः। १२ नान्वयः भा०,१०,५०, स। १३ धर्मधर्मिणोरभेदात् शत्तरपि वस्तुवत् अनन्वयस्वभावत्वात् । १५ अनन्वयत । १५ कल्पनातोऽपि । १६ शक्तिम् ।-प्यभेदेन-भिनं-प० । १७ उत्पत्तिक्षण एव। १८ तणिकत्वात्तस्याः । १९ उत्तरकालेऽपि । २. कल्पनायाम् । २। कल्पनाया प्रतिमासिता शक्तिः । २२ गत इव त-आ०, २०, ५०, स०। एव २० [२ न्यायविनिश्चयविवरणे चक्रकप्रसद्वादनवस्थानापत्तेध । तन्न अवस्तुनि वस्वध्यासः सम्भवति, यतोऽभ्यासावस्थायां दृश्य- प्राप्ययोरेकत्वस्य अविसंवादकारित्वं लिङ्गस्य वा स्वरूपसाध्यसंवित्तिहेतुत्वमिति दुप्परिहार- मज्ञातासिद्धत्वं सर्वलिङ्गानाम् , तेपामवस्तुसामान्यरूपतया स्वज्ञानाहेतुत्वात् । अत एव साध्य- संवित्तिकरणाभावात् 'तद्वचनानामसाधनाङ्गवचनत्वच । वरत्वेव यदि सामान्य ज्ञानरूपतयोच्यते । 'लिगाताऽर्थस्य हन्नेयमसामान्यात्मनः कथम् ! ॥१८॥ अर्थादेव च धूमादेयवहाराय सौगताः । पावकाद्यनुमानेन प्रवृत्ति कल्पयन्त्यमी ॥१८८|| अध्यासाज्ञा (साजा) नधर्मस्य यद्यर्थस्यापि लिङ्गता। १० अध्यस्तं ननु सामान्यमवत्येवेति भापितम् ॥ १८९॥ ज्ञानात्मनापि सामान्य वस्तु यद्यन्वयात्मना । अर्थात्मनाऽपि किन्न स्याद्वस्तु सामान्यमन्वितम् ? ॥१९॥ अन्वयमणं यद्वन्झानेऽर्थऽपि तथा भवेत् । ततोऽभिधेयं यस्त्वेव पहिः सामान्यमागतम् ॥१९१॥ नचैतदभ्यनुज्ञानं सौगतानां हितावहम् । "तदवस्त्वभिधेयत्वात्" इति 'कीर्तिधवःश्तेः ॥१९२॥ "खालक्षण्यन सामान्य वस्तु चेज्ज्ञानगोचरम् । व्याजोतया किम् ? न सामान्यं सर्वथास्तीति कथ्यताम् ||१९३।। खलक्षणरूपतयैव ज्ञानरातस्यापि सामान्यस्य वस्तुत्वे घहिरन्तश्च स्वलक्षणमेवास्ति २० वस्तुतो न सामान्यमिति स्पष्टमभिधातव्यं किमनया 'ज्ञानात्मना वस्त्येव सामान्यम्' इति व्याजोतया न च सामान्यामाये वचनव्यवहारोऽपि विषयाभावात् खलक्षणस्यानं द्विपयत्वात् । हॉनस्वलक्षणमेपाबालमपि पाह्यतया अनन्वितमप्यन्विततयाऽध्यवसीयमानं सामान्यमिति चेत् , कुतस्तस्यै तथाऽयवसायः १ स्वत एवेति चेत्, न, स्वलक्षणतयेव स्वतस्तस्य वेदनसम्भवातस्य- भावत्वात् न सामान्यरूपेण विपर्यया । "चदपि ३त्य स्वभाव इति चेत्, न; बस्तुत एघ २५ सामान्यसिद्धेऽक्तत्वात् । अस्वरूपमपि वासनादोपात्तेन" तहत इति चेत् । न, प्रतिबन्धाभावात्। न हि तितस्तस्योत्पत्तिः, स्थावस्तुत्वेनाहेतुत्यात् प्रतिबन्धान्तरस्य' धानभ्युपगमात् । कारणत्वमेव च ग्राह्यत्वम , "ग्राह्यतां विदुहेतुत्वमेव" [प्र०वा०२।२४७] इति वचनान । अकारणस्यापि "तस्य स्खयोग्यतयैव संवेदनं प्राहफमिति चेत् ; न, स्वमतव्याघातेन ध्यानस्य- , हेतुप्रतिपादकवचसाम् ।२ लिङ्ग नोऽर्थ-प्रा०, ३०, ५०, स० । ३ शाना मना मासमानमपि सामा- न्यम् । "न तद्वश्वमिधेयत्वात् तत् सामान्य न वस्तुरूपादिखभावम् अमिधेपत्वात् ।"-R R.म. ५ ज्ञानस्वलपहपतया । ६ कथ्यते प्रा०, २०,१०,०। . समायोचरवाद प्राधा ३७५-७७ । इष्टव्यम्-पृ. २०५१९ शानस्वलक्षण 1. सामान्यरूपमपि।" तैन शानस्थलक्षणत्वेन तत् सामान्यम् । १२ तत सामान्यात् तस्य ज्ञानरलक्षणत्या कार्यकारणभावातिरित्या १५ "मिस काल क्थं प्राथमिति चेत् । प्रायता विदु । हेतुत्वमेव युरिश्य हानाकाराणशमम् ॥"-प्रया। १५ सामान्यस्य । १६ न वारष्य-भा....! । धर्मकीर्ति ।
१२] प्रथमः प्रत्यक्षमस्तांव: ६७ प्रसङ्गात् । अपि च, अवस्तुतोऽपि सामान्यस्यैव संवित्तिविषयत्वं स्यादन्वितरूपत्वाविशेषात् । वक्ष्यते चैतत्- "प्रमाणमर्थसम्बन्धात्प्रमेयमसदित्यपि । केवलं ध्यानध्यमेवैतत्किन्न सन्तं समीक्ष्यते ॥” [न्यायवि० फा०२८९] इति । तन्नास्वरूपस्य ग्रहणम् । ततो न पहिरन्तर्वा सामान्य बस्तुभूतमिवावस्तुभूतमपि सम्भ- ५ वति यल्लिङ्गं भवत् शब्दवाच्यं भवेत् । तदनेन लिङ्गसाध्यसम्बन्धस्य तद्वाच्यत्वं प्रत्युत्तम् ; लिङ्गाभावे तत्साध्यसम्बन्ध- स्यायोगात् । सतो यदुक्तम्-"लिङ्गस्य तत्साध्यसम्बन्धस्य या प्रतिपादकं वचनं परार्थमनुमानम्" । ] इति ; तत्प्रतिविहितम् । न लिनेऽपि वचनमब्यमि- चारितया प्रत्ययकरं सत्यपि तैस्मिन् प्राक्प्रवृत्तप्रविबन्धविषयप्रमाणपर्यालोचनादेव लिङ्गप्रतिपत्तेः १० वचनमात्रात्तदभावात्। वचनं तु केवलं तत्प्रमाणानुस्मरणमेवोपस्थापयतीति तत्रैव तत्प्रमाणं न पहिरर्थे । तदुक्तम्-"अर्थ हि वचनमप्रमाणं प्रमाणे तु प्रमाणमिति न किञ्चित्तीयते" [ ] इति चेत् ; न प्रमाणेऽपि तेस स्वयोग्यतयैव प्रमाणत्वे तृतीयं तत्प्रमाणं भवेत् । शाब्दज्ञानस्य विकल्पत्येन प्रत्यक्षानन्तर्भावात् लिङ्गनिरपेक्षत्वेन चाननुमानत्वात् । ततः प्रमाणसंख्यानियम एव क्षीयत इति कथमुक्तम्-'न किश्चित्तीयते' इति १ भवतु तर्हि वचन- १५ मनुमानमेव प्रमाणे तस्य तंत्र प्रतिबद्धत्वेन लिङ्गत्वोपपत्तेरिति चेत् ; कस्य तत्प्रमाणं यत् वच- नादनुमातव्यम् ? प्रतिपादकस्येति चेत् ; उपपन्नमेतत् ; वचनस्य "तत्रैव भावात् । लिङ्ग हि यत्र स्वयमवस्थितं तद्वत्तमेव साध्यं गमयति नान्यगतम, पर्वतधूमात् "महोदधौ पावकानुमानप्रसङ्गात्, किन्तु तेनानुमितेनापि प्रतिपाद्यस्य किं फलमिति वक्तव्यम् ? सम्बन्धग्रहणमिति चेत् ; न; अन्यप्रमाणेनान्यस्य तद्ब्रहणायोगात् प्रतिपुर प्रमाणभेदकल्पनावैयापत्तेः एकीयप्रमाणेच सर्वस्य तद्विपयपरिच्छेदसम्भवात् । तन्न प्रतिपादकस्य तत्प्रमाणम् । प्रतिपाद्यस्येति चेत् ; न ; वचनस्य तत्राभावात् प्रतिपादकवचनाच न "तदनु- मानम् ; प्रतिबन्धाभावात् । न हि प्रतिपाद्यप्रमाणोद्भवं प्रतिपादकवचनम् ; सन्तानान्त- रासिद्धिप्रसङ्गात्, सन्तानान्तरमाविनो "व्याहारादेः स्वबोधादेवोत्पत्तिप्रसङ्गात् । तज्जा- तीयादुत्पन्नं ततोऽप्युत्पन्नमेवेति चेत् ; स्यान्मतम्-प्रतिपाद्यप्रमाणसजातीयं हि प्रतिपादक- २५ सदुद्भय' वचनं प्रतिपाद्यप्रमाणादप्युत्पन्नमेव ततस्तदनुमानम् । न पानापक्ष- धर्मत्वम् , तत्सजातीयपक्षधर्मत्वेनैव वत्पक्षधर्मत्वस्यापि लाभादिति; तदसारम् ; स्वस- म्बन्धिनो व्याहारादेर्मुताभिमतशरीरे चैतन्यानुमानप्रसङ्गात् , तस्यापि तत्सजातीयकार्यत्वा- २० प्रमाणम् । लिशशब्दवाच्यत्वम् । २ वचने । ३ अविनामावग्राहिप्रत्यापृष्ठभाविविकल्पज्ञान । ४ प्रमाणानुम्मरणे । ५ पचनस्य ! ६-मः क्षी-मा०, ५०, ५०, स० । ७ व्याप्तिप्रादिप्रमाणे । ८ वचनस्य । ५ प्रमाणे । सत्पति- बन्ध-आ०, ५०, ५० । तर प्रतिबन्ध-स। १० प्रतिपादक एव ।। महानसादौ पाकानु-भा०, ०, प० स०। १२ प्रतिपाद्यप्रमाणानुमानम् । १३ प्रतिपाद्यप्रतिपादकयोरेकसन्तानत्वं स्यादिति भावः । १४ वच- नादेः। १५-वं हि वच-भा०, २०, ५०, स.। प्रतिपादकप्रमाणोद्भवम् ।
४८ [१२ .. -- . .. न्यायविनिश्चयविवरणे विशेषात् । 'तत्र चैतन्यमेव नास्ति कथं तत्सजातीयत्वमात्मचैतन्यस्येति चेत ? प्रतिपाद्येऽपि तर्हि प्रमाणमस्तीति कुतः यतस्तत्मजातीयत्वं प्रतिपादकप्रमाणस्य स्यात् ? अत एवानुमानादिति घेत; न ; उभयत्र 'साम्यात् । अनुमानात्तत्सिद्धी तत्सजातीयत्वं स्वचैतन्यस्य, ततोऽपि वचनस्य तत्सजातीयकार्यत्वम् , अतश्च मृतशरीरे चैतन्यं सिद्ध्यति, इति चक्रकापादनस्य च ५ प्रतिपाद्यप्रमाणानुमानेऽप्यनिवारणात,ततो मृतव्यवस्था क्षीयते इति;अत्रापदि वक्तव्यम्- 'कथमुक्तम्-- न किश्चित्तीयते' इति । तन प्रमाणेऽपि वचनस्य प्रामाण्यं यहिरर्थवत् । सत्यमेतत् , न हि वयनात्प्रमाणप्रविपत्तिः स्वसंवेदनादेव तत्प्रतिपत्तेः, वचनं तु केवलमनुवादकमेवेति चेत् ; किमि- दमनुवादकत्वं नाम ? प्रतीतप्रत्यायनमिति चेत् ; न; वचनात् तत्प्रतीत्यभावात् । न हि यादृशंस्य स्वसंवेदनात्मविपत्तिा प्रमाणस्य तादशस्य वचनादस्ति प्रतिपत्तिः । तस्य लक्षणाकाराविषयत्वान् । १० आकारान्तरविपयत्वे तु न तेने प्रमाणमनूद्यते । न ह्यन्यविपयेणान्यदनूदित मपति, अतिप्रसङ्गात्। तद्विषयसामान्याफारस्य प्रमाणस्वलक्षणकत्याध्यवसायात् तेन तदनयत एवेति चेत् । न तदाकारस्य तदेकरवाध्यवसायस्य प चिन्तितत्वात् । ततो वचनमकिञ्चित्करमेयेति न तेन शास्त्रमन्यता फर्तव्यम् । परस्य पुर्यनश्च तत् यन्तुनो यस्तुगोचरं तृतीयमेव प्रमाणमङ्गीकर्तव्यम् , अन्यथा "सत्कृतस्य शास्त्रादेरकृतकल्पत्यप्रसङ्गादित्येतद् वचोभिः' इत्यनेन निवेदयति । वचसां विशेषणमाह-तत्रानुकम्पाप'इति ताम्रायते सांसारिकघोरदुःखगर्चा- वर्तपरिपातात् परिपालयतीति तत्रा, सा चासावनुकम्पा कृपा च सैव अपरा आदिभूता हेतुत्वे येषां तरिति । परसाब्दस्योत्तरार्थत्वात् तत्प्रतिपक्षवाविनश्च अपरशब्दस्य आद्यार्थत्वोपपत्तेः एवं व्याख्यानम् । तदनेन "परपरिरक्षणपरायणया झपया वचसा प्रवृत्ति दर्शयन् शास्त्रस्य पाराय दर्शयति । के पुनस्तच्छब्देन परामृश्यन्ते ? येपामयं न्यायो मलिनीकृत इति चूमः । कपा मलि. २० नीकृत इत्साह-बालानाम् इति । हितेतरवियेक विकला पालास्ते पामिति । यद्येवं न ते प्रज्ञावलविकलत्यादेव सुभापितैर्थिनो भवन्ति, बलवत्प्रज्ञानां हि महा. स्मनामेप धर्मो न पुनरप्रतिवलप्रज्ञानां यालानाम् । ते हि सहजात् "आहार्याञ्च मात्सर्यबलान्न केवलमनादरमेव सूचालापिषु मुन्ति प्रत्युत् 'प्रद्वेषमण्यारश्यन्ति ततो न परोपकारचिन्तया शास्त्रकपायामनुबद्धस्पृहं मनः कर्मव्यम् , अपि तु सूक्तगोचरसुचिराभियोगविवर्द्धितव्यसनया २५ चित्तस्यैवेति । तदुपम्- "प्रायः प्राकृतशक्तिरप्रतिवलप्रज्ञो जनः केवलं “नानयं सुभाषितः परिगतो विद्वेष्ट्यपीमितः । १ मृतशोरे । २ प्रतिपाद्यगतप्रमाणे मृतशरीलगतचैतन्ये च । ३ सामान्यात् आ०,०,१० मृतशरीरे चैतन्यसिद्धौ । ५ अस्मादेवानुमानात् प्रतिपाधगतप्रमाणसिदी तत्वजातीयत्वं प्रतिपादकममाणस्य, इतोऽपि चनस्य तरसजातीयकार्यवमतश्च प्रनिपाचप्रमाणसद्धिरिति चक्रकम् । ६ वेदनानुभूतप्रमाणप्रनीत्यभावाद । -स्य संदे-मा०,य०प० । वचनस्य । ६ वचनेन । १० वचनविषयावचनेन । ११ बौद्धस्य पासादिकं कुर्वतः १३ वचनम् । १४ तत्कृतशा-प्रा०,५०,०। ६५ परिस-पा०,२०, प.। "भारोपितात् । प्रदेष- मेवाचरयन्ति भा०, २०, २०11८ मानव-आ०, २०, २०।
प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्ताव '४९ तेनायं न परोकार इति नश्चिन्ताऽपि 'चेतश्विरं सूक्ताभ्यासविवर्द्धितव्यसनमित्यत्रानुबद्धस्पृहम् ॥” [प्र० वा० १।२] इति चेत् ; अत्राह-हितकामिनाम् । हितानि न्यायविनिश्चयवचनानि हितस्य परमागमस्य तैः नर्मल्यनयनात् । परमागमस्य च हितत्वं हितस्य निःश्रेयसस्य तत्कारणस्य च यथावदन्वा. ख्यानात् । तानि कामयन्ते प्रतिप्रहीतुमिच्छन्तीति हितकामिनस्तेपामिति । कुतः पुनः बालानां हितकामित्वम् ? न हि ते हितमिदमिति जानन्ति बाल्यविरो- धात् , अजानन्तश्च कथं नाम तत्कामयन्ताम् , परिज्ञातविषयत्वात्कामनाया इति चेत् ? न ; अव्युत्पन्नसन्दिग्धयोः स्वयं तत्परिज्ञानाभावेऽप्यावार्यवचनात्तदुपपत्तेः, आचार्ये तयोरामबुद्धि- सम्भवात् , असम्भवदाममुद्धिकयोरभव्ययोप्रतिपादनेऽप्यदोपात्, "क्रिया हि द्रव्यं विनयति नागव्यम्" [ ] इति न्यायात् । विपर्यासोपहतस्य तु यद्यपि न तत्र हितबुद्धिस्तथा- १० ऽप्यसौ पूर्वपक्षबुद्ध्या तत्कामयत एव अपरिज्ञातपूर्वपक्षस्य स्वपक्षनिर्णयासम्भवात् "विमृश्य पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं निर्णयः" [ न्यायसू० १।१।४१ ] इति वचनात् । न हि धर्मकोरपि 'सूक्ताभ्यास' इत्यादि वचनात् सूक्तमाहित्य प्रकारान्तरात् सम्भवति । न हि तस्यापि स्वत एव सूक्तपरिज्ञानम्, अन्यथा तद्वदन्येषामपि तत्सम्भवात् 'अप्रतिवलप्रज्ञो जनः इत्यसद्गतं स्यात् । अथ येषां तदसम्भवः; तान्प्रति सङ्गवमेवेदमिति चेत् ; न तर्हि सर्वथा १५ शास्त्रस्यापरार्थत्यम् असम्भवतत्परिज्ञानान प्रति अपरार्थत्वेऽपि तद्विपरीतान् प्रति तत्त्वोपपत्तेः । तथा चेदमपर्यालोचितवचनम् 'तेनाऽयं नपरोपकारः' इत्यादि । स्वयं च शाखान्तरस्य "कृपया तन्नीतिरुद्योत्यते" [ ] इति कृपापदोपादानात् पाराय॑मभ्यनुजानन्नेय चार्तिकस्य तत्मत्याचष्ट इति कथमनुन्मत्तो नाम ? न हि शाबस्यैव कस्यचित्पारार्थ्यम् अपारायंमपरस्या- नुन्मत्तः प्रतिपत्तुमर्हति । ततोऽनुकम्पावतां पारायेनैव शास्त्रकरणं न व्यसनितया । नन्वनुकम्प्यतामव्युत्पन्नः सन्दिग्धश्च, विपरीतस्तु कथं प्रतिकूलत्यात ? न हि स्वमत- प्रतिकूलमेव कश्चिदनुकम्पितुमर्हतीति चेत् ; न ; महापुरुषव्यापारस्येवंविधत्वात्, महान्तो हि प्रतिकूलेऽप्यनुकम्पामेवोपनयन्ति । न च तंत्रासी निष्फलैव; तत्वप्रतिपादनस्य वत्कलस्य भावात्। प्रतिपाद्यमानोऽप्यसौ मत्सरित्वान्न प्रतिपद्यते प्रत्युत्त तत्मत्याख्यानायैव प्रवर्तते ततो विफलैव तत्रानुकम्पेति चेत् ; किमिदं प्रतिपाद्यमानत्वं नाम ? प्रतिपत्तिकारणोपसमर्पणमिति चेत् ; न २५ तहि सदप्रतिपत्तिः अविकलकारणसमर्पणे ह्यनिच्छतोऽपि तत्प्रतिपत्तिरवश्यम्भाविनी सन्निहित- प्रदीपस्यानभिमतरूपदर्शनवत् । प्रतिपद्यमानोऽपि तदगीकारं न समर्पयति मात्सर्यादिति चेत् । न; उपपत्तिमद्वस्तुप्रतिपत्ती मात्सर्यपरित्यागस्यापि सम्भवात् । विजिगीपुतया प्रवृत्तस्य तेजस्विनो २० - - , "चेतस्ततः"-प्र०या० । २-ज्ञानवि-आ,ब०प० । ३ द्रयं भव्यम् । धर्मकीर्तेरपि । ५ सम्भवपरि- ज्ञानान शिष्यान्। प्रमाणवाति कस्य । ७ पारार्थ्यम् । ८-तश्च क-आ०, ब०, ५० । १ विपरीते अनुकम्पा । " विपरीतः। 11-पसर्पणमिति-आ०, २०, प० । २ विपरीतस्य अप्रतिपत्तिः । ७ ] न्यायविनिश्चयविवरणे [१२ न तत्सरित्यागसम्भव इति चेत् न, स्वयं तदपरित्यागेऽपि प्राचिनकैः तत्प्रत्युक्छेन परिष- द्वलेन वा परित्यागस्य प्रयोजनात् । मत्सरिणोऽप्यनुकम्पनीयत्वे निमाह्यत्वं न स्यात् 'अनु. कम्प्यते निगृह्यते च इति वियेयादिति चेत्, सत्यमेतत् ; वस्तुतो निमहाभावात् । न हि तत्त्वज्ञानस्य निःश्रेयसावाप्तिनिबन्धनस्य पात्रतामुपनीयमान एव निगृह्यते, तदुपनयनस्यानुमद- ५ त्वात्। कथं तहि कथितम् "स्वपक्षसिद्धिकस निग्रहोऽन्यस्य वादिनः"[ इति चेत्न; निप्रहशब्देन मिथ्याभिनिवेशनिवर्तनस्याभिधानात् । स्वपक्षसिद्धिस्तेनाभिधीयत इति चेत्, न; तत्सिद्धरपि नियत्तिरूपत्वात् । न च तन्निवर्तनस्य वस्तुको निग्रह- स्थानत्वम् अनन्तसंसारसरिस्पातनिबन्धनतदभिनिवेशनिवर्तनस्य सुतगमनुग्रहस्थानत्वात्, निमहत्थानशब्देनाभिधानं तु प्राचिनकाभिप्रायवशात् । प्राश्निका: सलु तस्य सनिवर्तनादगी- १० फववस्तुनिर्वाहशक्तिवैकल्यमाकलय्य पराजयमुद्धोषयन्ति, स्वयं च यादी तेजस्वितया स्वशक्ति- भङ्गेन 'सियते इति तदभिसन्धिवशात्तन्निवर्णनं निग्रहस्थानमुक्तं न पत्तुतः । अन्वेवमपि तस्यास्त्येव परितापः, न चानुकम्पाविषयः परितापयोग्य इति चेत् ; भवतु फियानपि परितापो न घेतावचा वदनुकम्पा दुप्यति, दुरन्तदुःसहसंसारदुःसकारणस्य तेतस्वयाऽपसारितत्वात् । न हि महतो व्याघेरससारकारणमातुरस्य तदात्वकटुकमपि "दिव्यमौषधं दोषमुहति । भवत्वियं तत्र धार्ता यस्यैवमभिप्रायः 'प्रतिवादिवयनेनोपपत्तिभूपितेनोद्घाटितौ" मम निरवनिःश्रेयसप्रासादशिखराधिरोहणद्वारकवाटो विघटितश्चाधोगतिपातालभवेशमार्गः चिराय मे कृतार्थत्वं भवितव्यताबलेनोपस्थापितम्' इति भूयसः परितापस्याप्यभाषात , यस्य तु सभ्य- साक्षिकं स्वबुद्धिमत्यपन्य पराजितस्यापि नैवमभिप्रायः पुतश्विदान्तगदोपान केवल पराजय- पीडेव महती, तत्र कयमनुकम्पा न दुष्यतीति चेत् ? उच्यते-यदि सस्य परिपीडामयात्स्यायो २० न कर्तव्यः तर्हि वस्य वचनाप्रामाण्यात् योऽप्युन्मार्गमनुपान्तस्तस्यै महान्तमनन्तदुःखनिय- न्धनमशुभासवमापायेयुः, पराजितस्य तु तस्य ययनविश्वासाभावात् न "तैपां तदनुपातस्तको नायं प्रसङ्ग इनि तात्कालिकखेदहेतुत्येऽपि अनुभासवनिरोधरूपमहोपफारफारणत्यास् "तत्राप्यनु- कम्पा न दुप्यत्येव । यस्य तु प्रतिपादयमानस्याप्यप्रतिपति: "अन्तरजकल्यात्, गापि स्वमवा- नुरागप्रयुक्तात् “काकवासितादुपरवि (तिः) न तत्रानुकम्पनम् अपिनेये माध्यस्थ्यम्" १५॥ ] इत्यागमात् । नापि तस्य यस्तुवादेऽधिकारः प्राश्निकैस्तनिवारणात् । न हि ते शक्तिविकलतयाऽध्यवसिवमपि बादेऽधिकारयन्ति "सपर्थवचनं वादः" [प्रमाणस० ६५१] इति तलक्षणापरिक्षानप्रसङ्गात् , झाकयासितस्य च तेजस्विना नरपतिता निधारणात् । तदुपपन्नं विपरीतोऽप्यनुकम्प्यत इति । , मात्सर्यपरित्याग । २ परिषद्लैन-आ, ता। सभ्येन । ३ मासर्यपरित्यागस्य । १ मिथ्याभिनि- शनिति । ५ मिष्यामिनिवेशनिदर्तनात् । मिद्यते-मा०, ७, १०। प्रदिनकाभिप्राय । ८ घेवा में। भ-आ०, ५०० १ ततः वादिनः तया अनुकम्पया। "दिस्यलमा-भा०, म., ५० ।। गोरभूषितो मा०, ३०, २०1१२ मानायादार । १३ उपयभाषिणो विपरीतवादिनः 11 तृणम् । १५ विपरीत- वादिन्या । १६ बोधशक्त्यभावात् । ७ काकशब्दपहिरकालापान । १८ "मैत्रीप्रमोदकामध्यभाग्यस्यानि र सत्य-गुणाधिक क्लिश्यमानाविनेयेषु ।"-त० सू० .
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः २२] के पुनस्तेणं न्यायो मलिनीकृत इत्याह-'अतिमहापापैः' इति । मलोपलेपस्य पापकार्यत्वामिनिवेदनेनाहेतुफत्वं प्रत्याचक्षणः तस्याशक्यप्रक्षालनत्वाभाव निवेदयति, हेतुमतः स्वभावस्यापि तद्वेतुविपक्षोपस्थानेन शक्यनिवनत्वात् , तन्निराकृतमेतत्- "पृष्यमाणोऽपि नाङ्गारः शुलतामेति जातुचित् ।। 3348 ५ निजस्वभानसम्पर्कः केनचिन्न निवार्यते ।।" [प्र. वार्तिकाल० ११२३४ ] इति । पापानामतिमहत्त्वप्रतिपादन तु मलस्य तन्मात्रनिबन्धनत्वाभावात् अन्यथाऽतिप्रसङ्गः शुद्धन्यायविदामपि तन्मानसद्भायाविरोधात् । कुतस्तेपा तानि पापानि १ मलिनीकृतान्न्याया- चेत्, सोऽपि कैः ? तैरेवेति चेत् , न , परस्पराश्रयप्रसद्गादित्यत्राह-'पुरोपार्जितैः इति । अदमैदम्पर्यम्- न हि य एव न्यायस्तैरधुना मलिनीक्रियते तत एव तानि येनार्य दोपः किन्तु १० प्रागेवोपार्जितानि, तदुपार्जने चापरस्तत्पुरोपार्जितो मलिनीकृतो न्यायो हेतुः सोऽपि तदपरपाप. निबन्धन इत्यनादिरय तत्प्रवन्ध इति । अनेन सहजो मलसम्बन्धो दर्शितः । तं पुनराहाय्यं दर्शयति-'स्वयं गुणद्वेषिभिः' इति । 'न्यायो मलिनीकृतः' इति वर्तते । गुणद्वेपिणश्चैकान्तवादिनः तैः परमागमन्यायगुणस्य उपपन्नजीवादिपदार्थप्रकाशनरूपस्य द्वपात् । स एव फुत इत्याह-'कलिबलात्' कलिकालशक्तेः। तस्य साधारणत्वात् सर्वेपामपि १५ तवेषः स्यादित्यवाह-प्रायः प्राचुर्येण । तदपि कुत' इत्याह-माहात्म्यात्तमसः । अविद्या- न्धकारसामर्यात् । न केवलं काल एव गुणद्वेषकारणमपि त्वविद्यासामर्थ्यमपि । न च "तत्सर्वेषामिति भावः । विवृतो वृत्तस्यावयवार्थः । समुदायार्थस्तु सम्बन्धाभिधेयप्रयोजनलक्षणः । तत्र न्याय एवाभिधेयम् । तेन च शास्त्रस्य वाच्यवाचकभावः सम्बन्धः। स च सामोक्तः । न हि तेन" न्यायमनुवाणेन स २० नैर्मल्यं नेतु शक्यते । प्रयोजनं तु शास्त्रस्य न्यायनर्मल्यनयनम्, तेन सम्बन्धो हेतुहेतुमद्भावः, शास्त्रस्य तद्धेतुत्वात् , तस्य च तत्कार्यत्वात् । स च कण्ठोक्त एव 'वचोभिर्नेनीयते' इति वचनात् । किं पुनः शास्त्रादी सम्बन्धाद्यमिधानस्य प्रयोजनमिति चेत् ? "केचिदाहुः-भोजन- प्रवर्तनम् । सति हि सम्बन्धाद्यभिधाने तदभिहितप्रयोजनं प्रति आशापरवशीकृतचेतसः श्रोत- २५ जनस्य शास्त्रश्रवणतभ्यासादो भवति प्रवृत्ति सति । तदुक्तम्- "सर्वस्यैव हि शास्त्रस कर्मणो वापि कस्यचित् । यावत्प्रयोजनं नोक्तं तावत्चत्केन गृह्यते ॥ । - -भावालि-आ०,५०,०स०।२-खाग्निरा-ता०३ पापलेश । पापोश । ५ न्यायमलिनीकार १ पापान्न्यायमलिनीकार तस्माच पापोद्भव इति। ७ पापानि । ८ द्वैष । ९ कलिबलस्य । १० तत्सर्वेषामपि मा-मा०,4011 शास्त्रैण । १२ न्याय । १३ मीमांसका।
न्यायविनिश्चयशिवाणे [ ११२ सिद्धार्थ सिद्धसम्बन्धं श्रोतुं श्रोता प्रवर्तते । शास्त्रादी तेन वक्तव्यः सम्बन्धः सप्रयोजनः ॥" [ मी० शो० १११११ सो० १२, १७ ] इति , दिदमनुपपन्नम् , प्रेक्षावतो वचनमागत् क्वचित्महत्तेरयोगात् । निरषयप्रमाणव्यापारपदीपा- ५ लोकपर्यस्लेकिरो हि यस्तुनि प्रवर्त्तमानः प्रेक्षावानित्युच्यते । स फयमनाकलितवस्तु- तत्वाद्वचनमानात् प्रवर्तेत प्रेक्षाक्त्ताविलोपप्रसङ्गात् ? वचनमपि प्रमाणत्वादाकलित- वस्तुतत्वमेवेति चेत् , कुतन्तस्य प्रामाण्य वस्तुनि प्रतिबन्धाभावात् ? न प्रतिबन्धात्तस्य प्रामाण्यमपि तु योग्यतयैव कृत्तिकोदयवच्छकटोदय , न हि त्रापि तादाम्यं तदुत्पत्ति प्रतिबन्यः सम्भवति , तदभावस्य यथावसरं निवेदनादिति चेत् , किमिदं कृत्तिकोदयस्य योग्य- १० त्वम् १ अन्यथाऽनुपपन्नत्यमिति चेत् न तर्हि तत् वचनस्य स्वार्थापेक्षया सम्भवति, तस्यापि लिङ्गत्वप्रसङ्गात् । अन्यथानुपपन्नस्याप्यलिङ्गले न लिङ्ग नाम फिश्चित तल्लणान्तरा. भावान् । समान्यथानुपपन्नत्वम् । अन्यदेव तदिति चेत् , न , वृत्तिकोदये "तस्यासम्भवात् निदर्शनस्य साधनयेक्ल्यापत्तेः। अथ मतम्-पस्यचिकिविद्योग्यत्वम् , अन्यथानुपपनत्य कृत्तिकोदयस्य अन्यच्च पचनस्य, न चैव "साधनस्याऽसिद्धत्व तद्विषटता वा निदर्शनस्य , १५ योग्यतासामान्यस्य हेतुत्यात् , तस्य चोभयोरपि साध्यदृष्टान्तधर्मिणो वादिति , तन्न , अन्य- स्थापि माविक्स्याभावात् , वचनस्य "समयानुपालनप्रयासवैफल्यप्रसङ्गात् । "सहकारीति चेत् , न, तस्य मिथ्याप्रत्ययहेतोरपि दर्शनात् । आप्तोपनीतस्य न तद्धेतुत्वमिति चेत् , सत्यमेतत् , आतत्य यथार्थवेदितया "दोपविकरतया च मिथ्यावादासम्भवात् । तदेव तु नाप्तत्वमद्यापि शालकारस्य निश्चितमित्यस्माकमस्ति सेद.माकारि खेदः । तदाप्तभावस्य सुप्रसि- २० द्धत्वादिति चेत् , किं तर्हि प्रयोजनवचनेन ? विनापि तेने निश्चिततदातभायस्य तद्वधनमात्रा- देव मतिसम्भवात् । न हि 'इदं त्वया प्रोतव्यम्' इत्याप्तेनाज्ञातः 'तद्वचन प्रयोजनबदन्यथा वा' इति सन्दिग्धुमईति, तथा सन्दिहानस्य ताप्लयुद्धरेवाभावप्रसङ्गात् । न हातस्य निष्पयो. जनवचनसम्भवः तस्य परहितोपनिषद्धशुद्धचित्तवया सर्वव्यापाराणा साफल्यनियमात् । सत्यम, अस्त्येवाप्तवचनस्य प्रयोजनम्, तत्तु प्रतिपाद्यस्याभिवान्छितमन्यद्वेस्यनुपदर्शने न ज्ञायत इति २५ चेत् , न, उपदर्शनेऽपि समानत्वात्। न झुपदर्शिनमित्येव अभिवाञ्छितं भवनि अनभिवाञ्छित- स्थाप्युपदर्शनसम्भवात् । "अनभिवाञ्छितेऽपि प्रवृत्तिरनुपदर्शिते प्रयोजने स्यात् आतस्वनस्या- नुहट नीयत्वादिति चेत् , अस्तु, न कश्चिदोपः, तत्प्रवृत्तेः पुरुषार्थहेतुत्वात् । तदेव तस्याः क्य- . 18 एच तस्य , . - । ५ तदिदमुर- मा०,०प०स०) २ प्रेशवश्ववि-आ०, २०, ५०, स.। ३ वचनस्य । १ 'उदेष्यति शक्ट कृतिकोदयात्' इत्यनुमाने । ५ शकौदयत्तिकौदस्यो । ६ भन्यशानुपपनत्वम् । ७ वचनस्थापि । अर्या भावे अनुपपनस्यादिवचनस्याशिये। १ योग्गलम् । १. अन्यथानुपपन्नत्वन्यतिरिकत्या ११ सप्पनरयापिसि- आ०,२००१ १२ योग्यतासामान्याय । १३ अन्यथानुपरन्नवालिरितस्य । १४ सतहण ( १८ मत एव । १६ यस्य ता० । वचनस्य । १० सालीति मा०, 4. प०, १० । १८ वचनस्य । ११ दोपविक नया आध,१०,१०स। २० प्रयोजनवचनेन। २१ अनस्य । २२ अभिवा-ता । २३ प्रवृत्ते ।
5 १० १२] प्रथमः प्रत्यक्षमस्ताव: मिति चेत् ? 'बालकपाठप्रवृत्तिवत्' इति त्रूमः 1 यदि चायं निर्वन्धः प्रथममभिहितसम्बन्धा- दिकमेव शास्त्रमादेयमिति ; एवं तादिवाक्यस्याप्यादेयत्वनिवन्धनम् । सम्बन्धादिवचः पूर्व वाच्यमन्यत्प्रसज्यते ॥१९४॥ तत्राऽप्यन्यत्ततः पूर्वं ततः पूर्वं ततः परम् । आदिवाक्यप्रबन्धे स्यादेवं सत्यनवस्थितिः ।।१९५॥ अल्पत्वादादिवाक्यस्य सम्बन्धाद्युक्तिो विना । प्रवृत्तिविषयत्वं चेत्कुतश्चिदवकल्प्यते ।। १९६॥ प्रत्येकं सर्ववाक्यानामरूपत्वं ननु दृश्यते । सम्भवेत्तन्महत्त्वं चेदादिवाक्येऽपि तत्समम् ।। १९७|| प्रत्येकं वाक्यवृत्तेश्य शात्रवृचिर्न चापरा । 'सा चाल्पविषयत्वान्न सम्बन्धायुक्तिसस्पृहा ।।१९८॥ अलौकिकश्च मार्गोऽयं यत्प्रागुक्तप्रयोजनम् । वाक्यमल्म महद्वापि ब्रजयादेयतामिनि ॥१९९।। तन्नास्य मानरूपत्वात् स्वार्थनिर्णयनिर्मितः (तेः)। श्रोहप्रवृत्तिहेतुत्वमादिवाक्यस्य सङ्गतम् ॥२०॥ "अन्यस्त्वाह-नेदं सुनिश्चितप्रमाणतया सम्बन्धादिविशेषनिर्णयनिबन्धनत्वात् प्रवृत्ति- कारणम्, अपि तु तद्विपयसंशयकरणात् । असति ोतस्मिन् 'किमिदं शास्त्रं सम्बन्धादि- रहितमेव वालोन्मत्तादिवाक्यवत् , तत्सहितमपि किमनभिमतप्रयोजनमेव मावृविवाहविधिक्रम- व्याख्यानवत, अभिमतमयोजनमपि किमशक्यप्रयोजनमेव ज्वरोपशमनकारणफणिपतिचूडामणि- २० गुणव्यावर्णनवत् ?' इत्यनेकधा संशयविकल्प; प्रादुर्भवन् प्रेक्षावता प्रवृत्तिमेव शास्त्रे प्रतिरु- ध्यात् , उपदर्शिते पुनः सम्बन्धादिविशेपे प्रागुपदर्शितानर्थसंशयव्यवच्छेदेन तद्विपयस्यैवार्थ- संशयस्य प्रादुर्भावात् भवत्येव तेपा तत्र प्रवृत्तिः । न चार्थसंशयात् प्रवृत्ती प्रेक्षावत्तापरिक्षतिः; १ सम्बन्धकथनमन्तरेण । २ पाक्यप्रवृतेश्च आ०,१० 1 वाक्प्रवृत्तः प० । ३ वाक्प्रवृत्तिः । ४ शास्त्रस्य । ५ सार्थनिर्णयस्वरूपस्यात् । ६ धर्मातरः । ७ तद्विषयस्य सं-आ०, ब०, प०, स० । "अनुक्तेषु तु प्रतिपत्तृभि- निष्प्रयोजनमभिधेयं सम्भाव्यतास्य प्रकरणात्य काकदन्तपरीक्षाया इव, अश्मयानुष्टानं वा ज्वरहरतक्षकचूडारना- लकारीपदेशवत्, अनभिमतं वा प्रयोजन मातृविवाहकमोपदेशवत्, यतो वा प्रकरणालधुतर उपायः प्रयोजनस्य, अनुपाय एव वा प्रकरणः सम्माध्येत । एतामु चानर्थसम्भावनाकस्यामप्यनर्थसम्भावनाया न प्रेक्षावन्तः प्रवर्तन्ते । अभिधेयादिध्वसम्भावनाऽनर्थसम्भावना विरुद्धोत्पद्यते । तया तु प्रेजायन्तः प्रवर्तन्ते । इति प्रेक्षावतां प्रत्यङ्गमर्थ- सम्भावना का सम्बन्धादीन्यभिधीयन्त इति स्थितम् ।" न्याय वि० टी० पृ० १। ८ सम्बन्धादिविशेपे । ९ -यत्येव प्रा-आर, ब०, २०, स०। १० "संशयेनापि प्रतिदर्शनात् । यथा कृषीवलादीनाम् । स्यादे- तद्यपि कृषीवलादेर्भाविनि फले संशयस्तथापि तत्फलसाधननिश्चयस्तेषा विद्यत एव । तेन निश्चयपूर्विकैव तेपा प्रवृत्तिरिति; तदसम्यक् ; यदा हि यस्य प्रवृत्तिः सा तत्संशयेऽपि तस्य भवतीत्येतावदिह प्रकृतम् । न च कृषीवल.. दयः साधनार्थ तेषु मवर्तन्ते येन साधनविषयनिधयसद्भावानिश्चयपूर्विका प्रवृत्तिरेवमुपययंते । किं तर्हि ? फलाध ते प्रवर्तन्ते । तन च फले प्रतिबन्धादिसम्मवान निधयोऽस्त्रीत्यतः संशयपूर्विकैव तेषां प्रतिका"-तत्व सं०प००३ ॥ .
. सोऽपिन न्यायविनिश्चयविवरणे [R कुष्यादी कृषीवलादीनां 'तत्कृतप्रवृत्तिकत्वेऽपि सत्परिक्षतेरभावात् । अथ तेपामङ्घयापेये संश- येऽपि तदुपाये कृप्यादौ निर्णय एय, ततो निर्णीतोपायतया प्रवृत्तत्वानुपपन्नं प्रेक्षावस्वम्, शास्त्रे तु यथोपेये संशयस्तथा तस्य तदुपायभावेऽपि ततः केवलादेव संशयात्प्रवृत्तेः कथन तत्परिक्षय इति चेत् ? न सारमेतत् , अङ्करायुपेयनिर्णयाभावे कृप्यादितदुपायभावस्यापि दुष्करानणे. ५ यत्वार, उपेयसापेक्षं हि कस्यचिदुपायत्वं तत्कथं संदनिश्चये शक्यनिश्चयमिति सन्दिग्धोपाय. तययोभयत्रापि प्रवृत्तिरिति न फुप्यादे शाखाकिमपि वैलमण्यमुपेक्ष्यत इति । युक्तकारी विचार विकलत्वात् ; तथा हि-यद्येवदाप्तवचनं कथमस्मात्संशयः १ निर्दोपवचनस्य नियमेन निर्णयनिमन्धनत्वात् , निर्दोपताया एवामित्वात् । नन्विदमेवातस्यातत्यं यत्स्वप्रतिभासालतिक्रमेण वचनम्, स्वप्रतिभासमाविकम्य वदव एव १० कम्पकतेनानाप्लादिति चेत् ; किमिदानी शास्त्रकारस्यापि सम्बन्धादिकं सन्दिग्धमेव ? तथा थेन् ; सुस्थितं तस्य शास्त्रकारत्वम् ! न च स्वप्रतिभासानतिरमतो वचनमेवाप्तत्वम् : घालोन्मत्तादेरपि तत्प्रसङ्गादिति प्रमाणपरिशुद्धवचनमेवातत्वम् । न च तद्वचनादर्थसंशयः, अर्थनिर्णयस्यैवोपपत्तेः । न च धर्मोत्तरेण शास्त्रकारस्यातत्वमनभिप्रेतमेव, "व्याख्यातारो हि क्रीडाद्ययं विपरीताभिधायिनोऽपि सम्भाव्यन्ते न प्रणेवार" ] इति "तद्वचनात् । १५ नचाविपरीताभिधानादन्यदन्यस्याप्तत्वं नाम । शब्दस्यैवैप स्वभावः यदाप्तमापितोऽपि संशय- मेवोपजायतीति चेत् , म ; अनर्थसंशयस्यापिजननप्रसवात् , तथा च "अर्थसंशयमेव प्रवृत्यङ्गं कर्जुमादावभिधेयादिकमाहे"[ ] इत्यपेशलं स्यात् । यदिपस्वाभाव्यादरय संशयहेतुत्यं धुतस्तहि तत्संशयस्य व्यपच्छेद ? "शास्त्रादेवाधिगवादिति चेत्, न ; तस्याप्यादिवाक्यवत् शब्दात्मकत्वेन संशयतुत्वात् , वत्संशयस्यापि" शास्त्रान्तयत् व्यवच्छित्तिकल्पनायाम् अनब- २० स्थानात् । प्रमाणात् संसायन्यवच्छेद इति चेत् ; तद्यदि प्रमाणं शास्नादन्यत एवाधिगतम् । शानमनर्थकं प्रयोजनान्तराभावात् । शाखादेवेति चेत् ;न; तत्रापि ततः संशयस्यैव भावात् , न; 'तयदि शब्दस्य तत्करणस्वभावत्वात् । तत्संशयस्यापि प्रमाणान्तयद् व्यवच्छेदश्येत् , इत्यादेः प्रसङ्गस्य पुनरावृत्तेरनवस्थाप्रसङ्गात् । , १ अर्थसंशयकृत। २ तदुपायो भावेऽपि आरु, य०, ५०, स०। ३ प्रेक्षावत्तापरिक्षय. । ४ उपेया- निर्णये।५ कृष्यादी शास्त्रे च । ६ "आत नोरिछन्नदोषेण"-रन॥५॥"भागमो खातवचनमाप्त दोपश्याद्विदु । क्षीणदोयोऽन्तं वाक्यं न यादेवगम्भवात्"-सासयका माठर० पृ० १३ । ७ यत्प्रति-आ०, २०, ५०, स. एकच तत्त्वे-मार, ०,१०, म. ९ "भार. एल साक्षात्कृतधर्मा यथास्यार्थस्य विख्यापविषया प्रयुक्त उपदेष्टा ।" न्यायमा "यो यत्राविसंवादक सनाप्त परोऽनात 1 तत्वप्रतिपादनमविसंपाद तदर्थज्ञा नात ।"-अष्टश०,अष्टसह०पृ. २३६ १ ३० "व्याख्यातण हि धनन मोडायर्थमन्यथापि सम्भाव्यते शास्त्रका तु प्रकरणप्रारम्भे न विपरीताभिधेगद्यभिधाने प्रयोजनमुत्पश्यामो नापि प्रत्तिम् ।"-पायवि० से. ४० ॥ "सशयोऽपि हि प्रहत्या प्रेशावताम् । अनपराशयो निपश्यनम् । अत एव शास्त्रकारेणैव पूर्व सम्बन्धादीनि युज्यन्ते वतुम् ।" न्यायवि० से. पृ० ।। १२ शब्दस्य । १ शालादेवाग-भा०, २०, ५०, सा। १५ शानदेवकसशरस्थापि। १५ शमामकात् शास्त्रात् ।
प्रथम प्रत्यक्षप्रेस्ताव ८ ततो दूरं गतेनापि वाक्यमाप्ताभिजल्पितम् । अर्थनिर्णयकृद्वाच्यमादिवाक्यं तथा न किम् ? ॥२०१॥ अङ्गीकारस्तवात्रापि न युक्तः परिदृश्यते । आप्नोक्तिपक्षे वैफल्यं वाक्यस्यास्य हि दर्शितम् ॥२०२॥ यंच श्रोतुः प्रवृत्त्यङ्गं श्रद्धाद्युत्पादनं बुधैः । व्यावर्णितमसन्दिग्धमादिवाक्यप्रयोजनम् ॥२०३॥ तदप्याप्तोक्तितश्चेत्स्यात् ; वाक्यमेतद् वृथा भवेत् । आप्ताशयैव श्रद्धादेः सम्भवादादिवाक्यवत् ॥२०४॥ अन्यथा हादिवाक्येऽपि श्रद्धाद्युत्पत्तिकारणम् । वाक्यान्तरं प्रतीक्ष्य स्यादनवस्थानदुःसदम् ॥२०५॥ अनाप्तवचनत्वेऽस्य वालोन्मत्तादिवाक्यवत् । श्रद्धाकुतूहलोत्पत्तिरतः सम्भाव्यते कथम् ? ॥२०६॥ यत्पुनरेतत्-व्यापकानुपलब्ध्या प्रत्यवतिष्ठमानस्य तदसिद्धतोद्भावनमादिवाक्यस्य प्रयोजनम् । अत्र हि 'नारब्धव्यं न श्रोतव्यमिदं शास्त्रं सम्बन्धादिरहितत्वात् उन्मत्तवचनवत्' इति कस्यचित् औरम्भनवणादिव्यापकसम्बन्धाद्यभावोपदर्शनेन आरम्भादिनिवारणार्थ प्रत्यव- स्थाने तत्सम्बन्धाधुपदर्शनेन दिनुपलम्भस्यासिद्धत्वमनेनोद्भाव्यते, अन्यथा शाखारम्भादो प्रेक्षा- घसामप्रवृत्तिप्रसङ्गादिति ; तदपि न चतुरस्त्रम् ; बचनमात्रात् सुनिश्चितसम्यन्धाद्युपदर्शनासम्भ- वेन तदसिद्धतोद्भावनस्य दुर्विधानत्वात् । न हि 'व्यापकोपलम्भमवितथमनुपस्थापयन् तदनुपल- म्भप्रत्याख्यानाय बचनमेसत्समर्थम् । तदुपलम्भस्यैव तदनुपलम्भनिपेधित्वात् । केवलस्य तदु- पदर्शनसामर्थ्यवैकल्येऽपि सकलशास्त्रश्रवणसहितस्य तत्सामर्थ्यमस्त्येव, अधिगतशास्त्रस्य सम्ब- न्धादौ निर्णयोपपत्तेरिति चेत् , न, व्यापकानुपलम्मे जीवति "तच्नणस्येवासम्भवात् अन्यथा तदसिद्धतोद्भावनवैयात् । उपमृद्यते तदनुपलम्भ इति चेत् , कुतस्तदुपमर्दनम्"" सम्बन्धादि. निर्णयात् । सोऽपि कस्मात् ? तच्छ्षणात्। तदपि कुतः ? तटुपमर्दनादिति चेत्, न;"चक्रक- १५ २० "श्रद्धाकुतूहलोत्पादनार्थ तदित्येके ।"-त. इलो० पृ. ५। "तद्वाक्यादभिधेयादौ श्रमाकुतूहलोत्पादः तत प्रवृत्तिरिति वेचित् स्वयूथ्या ।" -सिद्धिवि० टी० ५० ५। २ आताज्ञया थद्वाद्युत्पत्यभाने। ३ "तस्मात 'गत् प्रयोजनरहितं वास्यम्, तदर्यो वा न तत् प्रेक्षावताऽऽरभ्यते कर्तुं प्रतिपादयितु वा तया दशदाडिमादि. वाक्यं फाकदन्तपरीक्षा च निष्प्रयोजन वेद प्रकरण तदर्थो वा' इति व्यापमानुपलब्ध्या प्रत्यवतिष्ठमानस्य तदमिद्धतीद्भावनार्थमादी प्रयोजनवाक्योपन्यास ।" -हेतु वि० टी० पृ०२। न्या० प्र० ० पृ०। "तत्र निषेध्यत्य यद्व्यापकं तस्यानुपलब्धि व्यापानुपलपिलच्यते । तया हि मन आरम्भगीयत्वं निषेध्यम् , तस्य व्यापकं समयौजनत्वम्, तस्यानुपलब्धि."-न्यायप्र० पृ०प० पृ० ३९॥ ४-व्य श्रोतव्यमितिदम् मा०,०प०,०। ५ शास्त्रारम्भश्रवण । ६ सम्बन्धाद्यनुपलम्भस्य । ७ साधारणवचनात् । ८-ये तद- भा०, २०, ५०। ९ सम्बन्धादि। 10 सकलशाम्रर्थश्रवण । " -पदर्शनम् भा., म०, १०, स. । १२ शास्त्रश्रयणात् । १३ सति शास्त्रश्रवणे सम्बन्धादिनिर्णय , सति च तस्मिन् व्यापानुपलम्भोपमर्दनम्, तस्मिय- राति पानश्रवणमिति ।
न्यायविनिश्चयविवरण दोषस्य सुव्यक्तत्वात । आप्रवचनत्वेन प्रमाणत्वाद् अन्यनिरपेक्षमेवेदं सम्बन्धाशुपदर्शन- समर्थम् ; इत्यप्यसारम् ; उदीरितोत्तरत्वात- अन्तरेणापि वचनमाप्वाज्ञयेव सम्पन्धादिसिद्धी व्यापकानुपलम्भस्यासिद्धत्वं (त्य) निर्णयात् आदिवाक्यरत् , अन्यथा तत्रापि तदनुपलम्म. निषेधाय वचनान्तरकल्सनायामनवस्थानात् । तन्नेदमपि विवेकचतुरवेतमा चेतसि प्रीतिकरम् । प्रतिज्ञायचनमेतत् ; इसपि तारगेय ववनमानात् प्रतिज्ञार्थासिद्धः सर्वत्र हेतुफाल्यास- डात् । यक्ष्यमाणः शास्त्रार्थों हेतुरिति चेत्न प्रत्यक्षपरोक्षरूपस्य प्रमाणस्यैव शाखार्थत्यात् । तस्य च स्वरूपादिविषयचतुर्विधविप्रतिपत्तिनिराकरणमुसेन यथास्थानमुपवर्ण्यमानरुपपत्तिविशेषै- निर्णय(ये शास्त्रार्थपरिज्ञानस्य परिपूर्णत्वात् किंमपरमवशिष्यते यदन्न प्रविनायमानं शास्त्रार्थ- ज्ञानसाध्य भवेत् ? तभेदमपि तत्प्रयोजनम् पूर्वोपन्यस्तप्रयोजनवा विचारासहत्वात् । अयमेव च शान्तकारस्याप्यभिप्रायः, सर्वस्याप्यस्यादिवाक्यप्रयोजनस्य चूणो निराकर- यात् । न च तदीयमेव गावं व्यायाणेस्तदनभिमतमेवादिवाक्यप्रयोजनमभिधातुं युक्तम् । चर्हि किमप(फिम्पारमिदमादिवाक्यमिति चेत् ? 'सङ्क्षेपेण शास्त्राभिधेयशरीरप्रतिपादनपरम्' इति भूमः । तथा हि-वचोभिर्नेनीयते' इति सव्यापार शब्दशरीरमुपदर्शितम् । 'न्यायः' इत्यभिधेयशरीरम् । इतरत्सर्व यथासम्भवमुभयत्र विशेषणम् । किम्प्रयोजनं सझेपेण तदुप- १५ दर्शनस्येति चेत् ? विनेयव्युत्पादनमेव, विस्तरेण तदुपदर्शनवत् । नन्विदमपि शास्त्रकारस्या- नभिप्रेतमेव सडझेपतः शाखशरीरोपदर्शनस्यापि चूर्णी प्रतिपात्; "सत्यम् । शब्दंगडमात्रा- पेक्षया तत्प्रतिक्षेपः, वाङ्मात्रेण निश्चयायोगात्" [ ] इति तत्रैव" वचनात् । न चेदं वाइमात्रमादिवाक्यम् ; आप्तोपनीतत्वेन वाग्विशेषत्वात् । आप्तत्वमेव शासकारस्य न निश्चित. मिति चेत्, न ; कुतश्चित्" चिरसंवासादेस्तनिश्चयसम्भवात् । अनिश्चिततदाप्तभावस्य ने २० तदुपदर्शनक्षममिति चेत् । न ; प्रत्यक्षादावपि समानत्वात् । न हि तदप्यनिश्चिततव्यभिचारा- दिविशेपरय स्वविषयोपदर्शनक्षमम् । न च सड्झेपावगमे विस्तरचैयर्यम् । प्रतिपत्तिविशेपस्य तदधीनत्यात् । प्रवृत्त्यङ्गत्वमेवाप्तवंचनवादस्य क्स्मान्न भवतीति चेत् ? 73; वचनमन्तरेणापि प्रवृत्तेराप्ताशयय" सम्भवादित्युसत्यात् । संशयादिकारणत्वं तु निवारितमेव । सन्न किश्चिम परिहास्यमस्तीति पर्याप्तं "प्रसङ्गेन । कस्यचिदन घोयम्-"प्रमाणादिएसंसिद्धिरन्यथाऽतिप्रसङ्गतः।" पृ० ६३] इति वचनात् न्यायमलप्रक्षालनस्यापीटत्यात । तदपि प्रमाणादिति वक्तव्यं न सम्प- ग्ज्ञानादिति । न सम्यग्ज्ञानमेव प्रमाणम् ; अज्ञानस्यासम्यग्ज्ञानस्य च तस्य भागत् । नच प्रमाणप० २५ १ शालम् । २ आमाशया सम्बन्धादिसियभावे 1 ३ आदिवाक्येऽपि। ४-श-भार, ०,१०, सा। ५ "चतुर्विधा चात्र विप्रतिपत्ति.-सयालक्षणगोचरफलविषया ।"-न्यायषि० टी०१.९१ अक. लदेवस्य । अकलकार्य शान्णयविनिश्चयाख्यम् । ८-क्षाणे सदमि -आ०, २०, ५० -सगैस्तदभि-8.1 ९ युक्तिशन्यनिरर्थक शब्दापेक्षया । १० चूर्ण विरसहवामाई 1 १२ आदिवाक्यस्य । १५-राशायैव भा; छ, रायथैव ५० 11 आदिवास्यस्य विशेषतः यी निम्नमधेषु द्रष्टव्या न्यायम. पृ. १ । सन्मसिटीक गृ.१०. तावतलो.०४ । स्पा १०१०१४।१५ न्यायमलप्रक्षालनमपि प्रमाणस्य ।
११३] प्रथमःप्रत्यक्षप्रस्तावः शब्दलिङ्गादेरशानस्य लोके प्रामाण्यं न प्रसिद्ध युक्तियुक्तं वेति शक्यं वक्तुम् ; उभयस्याप्युपपत्तेः। लोकस्तावत् 'दीपेन मया दृष्टं चक्षुपाऽयगतं धूमेन प्रविपन्नं शब्दानिश्चितम्' इति व्यवहरति । न चीपचारिक वेषां प्रामाण्यमिति युक्त वक्तुम् ; यतो यस्य प्रमितिक्रियायां साधकतमता तस्य प्रामाण्यमिति प्रसिद्धिः, प्रमाणपदाच्चोक्तस्यैवार्थस्यावगमः । तथा शास्त्रान्तरेपि-अव्यभिचारादि. विशेषणविशिष्टोपलब्धिजनकस्य बोधस्यायोधस्य वा सामान्येन प्रमाणत्वप्रसिद्धिः। यथा ५. पोक्तम्-"लिखितं साक्षिणो भुक्तिः प्रमाणं त्रिविधं स्मृतम्" [ '] लोकेऽपि तथाभूतस्यैव प्रमाणत्वम्यवहारो यथाऽऽहुः-अस्मिन्निश्चयोऽस्माकमयं पुरुषः प्रमाणम् । युक्तियुक्त चैतन् , यतः प्रमाणपदं करणत्वाभिधायकं प्रमीयतेऽनेनेति प्रमाणम् । करण विशेषस्य विशिष्ट. कार्यजनकत्वेन प्रमाणत्वात्, कार्ययिशेर्पश्च कार्यान्तरेभ्यः प्रमाणत्वेनाव्यभिचायदिस्वरूपत्वेन वा । तन्न सम्यग्ज्ञानमेव प्रमाणम् अन्यस्यापि भावात् । ततो न 'सम्यग्ज्ञानजलैः' इत्युपपन्नम्। १० निरवशेषप्रमाणसंग्रहाभावात् । सम्यग्ज्ञानात्मनेव प्रमाणेन न्यायमलप्रक्षालनात् किमितरप्रमाण- परिग्रहेणेति चेत् ? न सदेतत् , एवं प्रेमाणसम्प्लवस्यानभीष्टिप्रसङ्गात् । अभीष्टश्च कथञ्चित्प्र. माणसम्प्लवः स्याद्वादिनामिति । तदेतच्चोथुनिराचिकीर्पया सम्यग्ज्ञानात्मकत्वमेव प्रमाणस्य व्यवस्थापयन्नाह- - प्रत्यक्षलक्षणं प्राहुः स्पष्टं साकारमजसा । द्रव्यपर्यायसामान्यविशेपार्थात्मवेदनम् ।।३।। इति । 'न्यायः' इत्यनुवर्तमानमर्थवशाद्विभक्तिपरिणामेन द्वितीयान्तमिह सम्बध्यते । ततो- ऽयमर्थः-न्यायं माहुः स्वामिसमन्तभद्रादयः । किं प्रशब्देन आहुरिति पर्याप्तत्वादिति चेत् १ म; 'प्रपन्धेन आचार्योपदेशपारम्पर्येण आगतमाहुः प्राहुः' इति व्यारयानार्थत्यात् । सदनेनानादिरयं शास्त्रमबन्धः, फेवलं तत्सडझेपादिविधायेव शस्त्रकाराणामाधिपत्यमिति दर्शयति । १० न्यायं किं प्राहु: ? चेदनम् ज्ञानम् । कथं प्राहुः १ स्पष्टम् शब्दवादितत्त्वेन (2) परिस्फुटं यथा भवति "तत्वज्ञान प्रमाणम्" [आप्तमी० श्लो० १०१] इत्यादिना तथैव प्रवचनात् । अनेना. घेदनात्मकत्यं न्यायस्य व्यवच्छिनत्ति, तदव्यवच्छेदे येदनात्मकत्वविधानानुपपत्तेः । नहि शब्दस्य नित्यत्वमन्याच्छिन्दन्ननित्यत्वं विधातुमर्हति। कथं वचनमात्रात्तव्यवच्छेद इति चेत् ? न ; सोपपत्तिकत्वादस्य पचनस्य । तथा च प्रयोगः-न्यायो घेदनामा, न्यायत्वान्यथानुपपत्तेः । २५ फर्य धन्येर हेरिति चेत् ! न ; तस्यापि हेतुत्याविषेधस्य पक्ष्यमाणत्वात् । -- दलितादीनाम् । २ "सम्यनिवारिणीमसन्दिग्धामोपलब्धि विदधती धामोधखमावा सामदी प्रमा- णम् ।"-न्यायम• ४०१२। ३ यथोषम् श्रा०,०प०,RI "प्रमाणं लिखि मुक्ति सामिगति हार्तितम् ।" -पाश-२२२१ ५-पग भा०,०,५०, स०। ५ एचस्मिन् प्रमेये पहुनां प्रमानां प्रतिः प्रमाणसम्म । "उपयोगपिपस्यामा प्रमाणसम्सात्यानभ्युपगमात् । सनि हि प्रतिरतुपयोगविगेरे देशदिमिव मनाया मन प्रतिरणमनि दिरणीतर स पुनरनुमानार प्रतिषिसते तप्रतिरस्यूमादियाबारणात् प्रतिपतिविपटनात् । पुनराव पक्षको मुभुमो तरसम्बन्धमा विशेषतमासिनः।" भटमा• 2.1 प्रमेपक...। --नि-मा..., स.1 ८ द्वितीय सोना। ८ न्यायधिनिश्चयपिधरणे [१३ असिद्धमन्ययाऽनुपपन्नत्वम् अचेतनास्यापीन्द्रियादेायत्वाविरोधात, नीयतेऽनेनेति हि नीतिक्रियाकरणं न्याय उच्यते, तशाचेतनमपि नानुपपन्नं प्रसिद्धियुक्तिभ्यां तस्य समर्थितत्वादिति चेत् । अत्र प्रतिविधानम् ; अचेतनस्य सामग्येकदेशस्य, सामग्रीरूपस्य या प्रमाणत्वं भवेत्त् प्रका- यन्तरासम्भवानी न तावत्सामध्येकदेशस्य ; साधकतमत्वासम्भवात् । प्रमितिक्रिया प्रति करणत्वे हि ५ तस्पप्रामाण्यं भवेत् फरणत्यय साधकतमत्वमेव साधकतम करणम्" [पा०व्या ०१।४।४२] इति वचनात 1 सांमध्येकदेशस्य च नयनप्रदीपादेर्यदि हेतुत्यमेव साधकतमत्वम् । तदा सर्वतद्धेतूनामपि साधकत्तमत्वेन प्रामाण्यान्न कश्चित्प्रमाता नापि किश्चित्प्रमेयमित्यतिमहदसमन्जसं प्राप्त करणस्यैव कत्वादिविरोधात् । हेतुत्याविशेपेऽपि सर्वेषां किञ्चिदेव करणं तत्रैव करणत्वस्य विवक्षित- स्वात् "विवक्षातः कारकाणि भवन्ति"[जैने०महा० ११४१४१] इति न्यायात्; इत्यायसङ्गतम् १० अमात्रादेरपि विवक्षया करणत्यप्रसङ्गात् विवक्षाया विषयनियमाभावात् । कथं या पुरुषेच्छानिबन्धनं कस्यचित्प्रमाणत्वं वस्तुप्रतिपत्ताबुपयुज्येत ? सांकृतस्यैव प्रमाणप्रमेयतत्फलभावस्य प्रसङ्गात् । कारणस्यैवातिशया साधकतमत्वमिति चेत् ; न तदपरिज्ञानात् । अन्त्यक्षणप्राप्तिरतिशय इति चेत् । न; प्रमाणाभिमनप्रदीपादिवत् कदाचित् प्रमेयस्य घटादेन्त्यक्षणप्राप्तिभावात् । एतेन सग्निपत्यका. रित्वमतिशय इति प्रत्युक्तम्, प्रमेयस्यापि सन्निपत्यकारित्वसम्भवात् । स खलु सन्निपत्यकारीत्यु- १५ ध्यते यस्मिन्सति नियमेन कोर्यस्य भावः, सम्भवति चायं प्रमेयापेक्षयाऽपि प्रकारः, कदाचित्मदी- पादिकरणान्तरसाफल्येऽपि प्रमेयसनिधिविरहविधुरीकृतप्रादुर्भावस्य घटादिसंवेदनस्य तत्सन्निपाते नियमेनोत्पत्तिदर्शनात् । न केवलं विषयस्यैव सन्निपत्यजनकत्यम्, प्रमातुरपि "तत्वात । "न हि तदसनिधानेऽपि" अनवधानकृते मूर्छादिनिबन्धने वा विषयज्ञाननिष्पतिः तदनवधानाद्यपगम एवं नियमेन "तनिष्पत्तेः। अतःप्रमातुरपि सन्निपत्यजनकत्वान् साधकतमत्वं भवेत् विश्वरूपस्यैवं वव- नाथ । तन्नायमप्यतिशयः साधकतमत्त्रव्यवस्थाहेतुः अतिव्यातिदुत्वात् । निरपेक्षकारित्वमतिशय इति चेत् ; न ; असिद्धत्वात्, सामध्येकदेशानामन्योन्यसहकारित्वेन कार्यकारित्यार । सामन्यन्त- रतदेकदेशनिरपेक्षत्वं तु न प्रदीपादेरेव, प्रमानादेरपि भावात् । एवं पेतनस्यापि संशयादिज्ञानस्य सामग्येकदेशस्य प्रामाण्ये साधकतमत्वं निरूपयितव्यम् । सन्न मामध्येकदेशस्य प्रदीपादेः प्रमि. तिक्रियाकरणत्वम् असाधकतमत्वात् प्रमात्रादिवत् । अनाह विश्वरूप:-"सत्यमेतत्, सामध्येकदेशस्य न प्रामाण्यं मयापि विचार्य २५ तत्परित्यागा"। ] इति; सोऽपि न सम्यम्बादी; बोधमात्रलक्षणप्रमाणवादिन' प्रति प्रदीपादिभिस्तदेकदेश: अव्यासिदोपस्यानुद्भावनप्रसङ्गात् । यदि हि "तपां प्रामाण्यम् , नथ 1 आत्मादीनामपि । २ हैम.१० १० ११ "न चानेककारकजन्यत्वेऽपि कार्यस्य विज्ञान. कारकाणि भवन्तीति न्यायान, साधक्तमत्वं विवक्षात इति वक्तव्यम् , पुरुपैच्छानिवन्धनत्वेन वस्तु व्यवस्थितरयो- गाद।"-सन्मति० टी. पृ. ४७१। २ कल्पितस्यैय । ४ अतिशयशानाभायात् । ५ कार्याध्यवहित प्राक्ष वृतित्वम् । ६ तस्यापि प्रमाण स्यात् । ७“समिपत्य जनकत्वमतिशयः इति चैन"-यायम. पृ० १२॥ कार्यायाभावः आ., १०,५०,स, । १० -ततरमा-ता. प्रमेय ८- खल्वस-आ०,०,एग,स' । सभिधाने । १२ सशिपयजनकत्वात् । १३- तदस-आ०,२०,०स० । द्रव्यम्-सम्मति.टी.पृ. ४०१ । ११ सविधाने सत्यपि । १५ विषमज्ञानोपजैनादिकं प्रति । १७ सामग्रदेशः । १८ प्रदीपादीनाम् ।
१३ ] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव तत्र तल्लक्षणं तदा स्यादव्याप्तिः, अप्रगाणे तु प्रमाणलक्षणभावो न दोपाय अतिव्याप्त्यभावस्य गुणत्वात् । लोकप्रसिद्ध्या 'तत्प्रमागत्वमङ्गीकृत्य तैरव्याप्तिरुद्भाव्यते न वस्तुवृत्त्या । अत एयोक्तम्-'लोकवस्तावदीपेन मया दृनमित्यादि व्यवहरति' इति पर्यन्तमिति चेत् ; वस्तुवृत्त्या तहि बोधप्रमाणलक्षणमन्याप्तिदोपरहितमेवेति कथं तत्र सदुद्भावनं 'निरनुयोज्यानुयोगान्निग्रह- स्थानं न भवेत् ? वस्तुतश्च तेपामप्रामाण्ये कथमिदमुक्तम्-'युक्तियुक्तं चैतत्' इत्यादि; अवस्तु- ५ भूतस्य युक्तियुक्तत्वानुपपत्तेः । किच, तेपो प्रामाण्ये युक्तिः प्रमितिक्रियाकरणत्वमेव । यदुतम् -'प्रमाणपदं करण- स्वाभिधायकं प्रमीयतेऽनेनेति प्रमाणम् ।' इति, तस्य च साधकतमस्वभावस्याभावं स्वयं प्रतिपद्यमान एव कथमिदं वक्तुमर्हति 'युक्तियुक्त चैतत्' इति ? यथाज्ञानमेव परार्थप्रवृत्तानां वचनक्रमोपपत्तेः, अन्यथाज्ञातस्यान्यथावचने हि वञ्चकत्वान्न परार्थकारी स्यात् । अस्तु तर्हि १० वस्तुत एव तेपा प्रामाण्यमिति चेत्, न; तस्य निरस्तत्वात् । वस्तुभूतप्रमाणसामध्येकदेशतया तेषां तदिति चेत् ; नन्वेवमुपचार एव स्यात् , प्रमाणेकदेशतया तेषां प्रामाण्यात् । न चैतत्पध्य भवताम् 'न चौपचारिकं तेषां प्रामाण्यम्' इत्यस्य विरोधात् । "सामप्रीतद्वत्तोरव्यतिरेकात् सामग्री- प्रामाण्यवत् तत्प्रामाण्यमपि वास्तवमेव नौपचारिफमिति चेत्, कथमेकक्रियायां स्यादनेक कारणं पृथक् । "धास्यादिभेदे यद्भेदशिछदेरप्युपलभ्यते ॥२०७॥ प्रमितेरपि भेदश्चेत्, न; "सकृत्तदसम्भवात् । ज्ञानानां युगपज्जन्म न यद्वः शासने मतम् ॥२०८॥ क्रमेण तस्य भावश्चेत्;"अक्रमात्तत्क्रमः कथम् ? कारणादक्रमान्तो यत् कार्य क्रमवदीक्ष्यते ॥२०९।। तन्नेदं युक्तम्-"प्रदीपादियत् प्रमात्रादेरपि वस्तुतस्तत्प्रसङ्गाच । तस्यापि “तद्वत्तदेक- देशत्वात् तत्र प्राप्तमपि प्रामाण्यं विशेपविधिना प्रमावृत्यादिना बाध्यत इति चेत्; फः पुनरयं तस्य"बाधो नाम ? सामग्रीतादात्म्यनिषेध इति चेत् ;न; "तदभावात् । अन्यथा प्रमातृत्वादेरप्य. भावप्रसङ्गात् । न हि सामग्रीबहिर्गतस्य "तत्त्वम् ; अतिप्रसङ्गात् । तदन्तर्गतस्यापि" प्रामाण्य. मेव निषिध्यत इति चेत् ; न; तदन्तर्गमयतिरेकेण नेत्रादीनामप्यपरस्य प्रामाण्यस्याभावात् । २९ ततो 'यद्यन्तर्गमो न प्रामाण्यनिषेधः, "स चेत् ; नान्तर्गमः' इति महानयं व्याघातः परस्य । कीदशेन वा सेन "तस्य बाधनम् ? गौणेनेति चेत् ;न; "तदवस्थायां प्रामाण्यत्याप्रसक्तः १ अलक्ष्ये एमाणाभावस्य । २ प्रदीपादि प्रामाण्यम् । ३ "अनिग्रहस्थाने निग्रहस्थानाभियोगो निरनुयोज्या. नयोग. ("-न्यायसू० ५।२।२२ । ४ पृ० ५७ ५०७ । ५ प्रीपादीनां सामग्र्यैकदेशानाम् । ६ पृ०५७ १०८॥ ७ सामध्ये कदेशस्य । ८सामध्येकदेशानां प्रदीपादीनाम् । ९प्रामाण्यम् । १० सामग्रीतदेकदेशयोःरणभेदे क्रियाभेद एवोपलभ्यते न वभेदः । १२ युगपत् । १३ ज्ञानजन्मनः। १४ क्रमरहितात् सामग्रीलपकरणात् । १५ प्रदीपारिष प्र-आ०, ५०, १०, १० ! 16 तदेक-आ०, २०, ५०, स०। १७ प्रमानादौ । १८ बोधो नाम भा०, 40% प०, स० । १९ सामग्रीतादात्म्यनिषेधाभावात् । २० प्रमात्रादित्वम् । २१ प्रमानादेः। २२ प्रामाण्यनिषेधः । २३ प्रमातृत्वादिना । २४ प्रामाश्यस्य । २५ गौणदशायाम् । २० . न्यायविनिश्चयविवरणे I 'तनिमित्ताभावात् । न चापत्तस्य चाधनम्: तस्य प्राप्तिपूर्वक्रवात् । मुख्येनेति चेत् ; किमायत्त स्य मुख्यत्वम् ? कारकसाकल्यायतमिति चेत् ; ननु प्रामाण्यमपि तस्य तदायतमेव, तत्वथ- मेकायत्तयोः एकस्यान्यदाधकं स्यात् ? समावेशस्तु स्यात्, पाभ्ययाधयोरेकायत्तत्वासम्भवात् । नेत्रादीनामपि प्रमातृत्व सङ्गः, कारकसाकल्यस्य 'तत्प्रयोजकस्य तत्रापि भावादिति चेत् ; सायम्; ५"अयमस्य नैयायिकम्मन्यस्य दोपः स एवं वदति । न तदायतं प्रमातृत्वादिकं तस्यान्याधीनस्वा- दिति चेत्, कथं तदमुक्त भववैय-प्रमातृप्रमेययोः सत्त्वेऽपि कथञ्चित्कारककल्ये गौणता निमित्तान्तरात्तु वत्साकन्ये अमियतममाख्यकार्यनिष्पादनादगौणः प्रमाप्रपेप- भावा" ] इति । किं था तदन्यत्, यदायत्तं प्रमातृत्वादिकं स्यात् ? ज्ञानसमवायिकारणत्वं ज्ञानविषय. १० त्वचेति चेत् ; न तस्यैव प्रमात्रादित्वात् । नहि तदेव वदायत्तम् , तद्धावस्य भेदगोचरत्वात् । सन्न तद्भावस्यान्यायत्तत्वमिति न मुख्येनापि तेन "तस्य याधनम् । ततो न सागम्येकदेशत्येन नयनादीनां प्रामाण्यम्, आत्मादायपि प्रसङ्गात् । नाप्युपचारेण ; अनभ्युपगमात्, अप्रमाणत्वे वा कथं "रोधमाप्रमाणलक्षस्य अव्यापकत्योद्भावनमिति परस्येपा समन्ततः पाशारज्जु, तदलमेकदेशविचारेण । कारकसाफल्यमेव तर्हि प्रमाणमस्तु साधक्तमत्वादिति चेत्, ननु साधकारपेक्षया साधकतम भवति, अतिशायनस्यैवरूपस्यात् , तदर्थत्वार्थ तमप्रत्ययस्य, दकिमिदानी साध. फादिकं या अपेक्ष्यं स्यात् । तदेकदेश एवं दीपादिरिति चो; तस्य तत्त्वं गौणम् , मुख्यं पा स्यात् । न वापद्रोणम्, सफलावस्थायां "तदभावात् , अनभ्युपगमात् । विकलदशायामेव "तदस्त्विति चेत् ; तद्यदि क्रियान्तरविषयम् ; न तदपेक्षया तत्साकल्यात्य साधकतमत्वम्, २० क्रियाविषयमेव फञ्चिदमकृष्टं हेतुमपेक्ष्य तदुपरस्य प्रष्टस्य साधक्तमत्वध्यवहागत् । एक- क्रियाविषयमेवेति साधक-साधक्तमयोरन्योन्यसहकारित्वं मिन्नकालत्वात् । "सहादरय योगपद्यार्थत्यात भिन्नकालयोश्च तदसम्भवात् तत्सहकारित्यानिटो" चान्यदा पादिकम् अन्यदा च करणमिति दृष्टविपरीतमापद्येत । तन्न गोणं वदिति युक्तम् । मुख्यमेवेति "चेत् नन्वव्यवहितक्रियाकारित्वमेव मुख्यत्वम्, 'तच तस्य कारपसाक- २५ ल्यायत्तमेव "मुख्यगौणभावस्य कारकसाकल्यभावाभावायचसाद" [ 1 इति भवत एव बना । "सदायत्तत्यश्व "तस्मादुत्पन्नत्वात् , तद्र पत्याद्वा स्यात् ? उत्पन्नत्वमपि सायफवम- स्वभावात् , तद्विपरीताद्वा? न तायचस्वभावात्; अपेक्ष्यस्य पूर्वमभावेन सदसम्भयात् । श्य- निष्पत्ती तत्सम्भव इति चेत् ;न; 'तत्सम्मपात्तनिष्पत्तिः, दत्तश्च तत्सम्भयः' इति सुव्यक्त्वात एक. न . प्रामाण्यानिमित्तस्य मुख्यत्वस्याभावात् । २ वाघनस । माहापाई। प्रमालल्लादिप्रयोजाय । ५ अस्यैव भा०, २०, ५०, स.१६-पा एवं सामवत्येर भा०,००,०। ८ तदायरात्वस्य । ९ प्रमावादित्वेन । १० प्रामाण्यस्य 11 नयनादिभिः १ अतिश्यार्थत्वाच । साधकादित्वम् । १४ पौणत्वा- मापात् । ३५ गोग साधकादित्वम् । १६ सहचरित्वपटण्यदाय । १० तयोर्मुगन्धर्यकर्तृवाभावे । १८२ व्यद-पा०प०,०, १९ मुख्य साधकादिवं दोपदे। ३. कारस्साकल्यायरावध । १३ बरस्साकस्पाद ।
- - १३] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव परस्पराश्रयस्य । तद्विपरीतात्तदुत्पत्तो नतत्साकल्यस्य प्रामाण्यम् असाधकतमत्वात् । पश्चात्तत्स्वभाव- भावे तस्यैव प्रामाण्य स्यात् अव्यवहितक्रियत्वात् न तत्साफ्ल्यस्य विपर्ययात्। पश्चाद्धाव्यप्यसो साकल्यात्मकमेवेति चेत् , न, साकल्यद्वयस्याप्रतिपत्तेः । तन्न तत्कार्यत्वात्तदायत्तत्वम् । तद्रूपत्वा- चेत्, न , तस्य साधकतमरूपत्वे ताद्रूप्यात्तदेकदेशानामपि साधकतमत्वमेव न साधकत्वा- दिकम् , दभाव न च साधकतमत्वम् अपेक्ष्यभावादिति न कारफसाकल्यस्यापि साधकत- ५ मत्वम् । कादाचित्कतत्साकल्यताद्रूप्ये तदेकदेशानामपि कादाचित्कत्वोपपत्तेरात्मादेरनित्यत्वप्रसङ्ग इति किन्नोद्भाव्यते ? इति चेत् , वत्स, "भवत्प्रतिबोधनार्थं तदुद्भावनम्, स्वयमेव चेद्भवान् प्रतिबुद्ध्यते किमरमाकं तदुद्भावनप्रयासेन ? "अताप्यस्यापि भावान्नैकान्तेन तदनित्यत्वम् । तदुक्तम्-“साकन्यं हि "तेषामेव धर्ममानं नैकान्तेन वस्त्वन्तरम्" [ ] इति चेत्, न , एयमपि तन्नित्यानित्यात्मकत्योपपत्तेः स्याद्वादानुगमनप्रसङ्गात् । तवो न तत्साकल्यमपि १० "नदचेतनप्रामाण्याभावात् । नासिद्धगन्यथाऽनुपपन्नत्वम्, चेतनत्व एव "न्यायत्वस्योपपत्ते. नीतिक्रियासाधकतमत्वस्य "तत्रैव भावात् । परनिरपेक्षं हि "कारणत्वं साधकतमत्वम्, सन्निपत्य ननकत्वस्यापि तद्रूपत्वात् , तवार्थनिर्णये ज्ञानस्यैव तस्य "ततोऽनन्तरत्वात् न नेत्रदिविपर्ययात् , तस्यापि तत्र" साधक- तमत्ने तदनन्तरत्वस्यावश्यम्भावात् कथमचेतनत्व चेतनादन र्थान्तरस्य तत्त्वायोगात् । अनर्था- १५ न्तरत्वे कथं क्रियाकारणभावः ? भेद एच छिदि-युठारयोः "तद्भावप्रतिपत्तरिति चेत् , का तन्त्र छिदिः काष्ठस्य द्वैधीभाव इति चेत्, न , तर काष्ठगतस्य "तत्परिणामसामयस्यैव साधकतमत्वात्, असति तस्मिन् सत्यपि फुठारव्यापार वनादौ तदभावात् । सामादेव"छिदो किं कुठारेणेति चेत् । न , तक्रियाया "वत्सामाभिमुख्ये "तस्य व्यापारात् । यावत्तः तस्य" व्यापारस्तावत्तत्नियायामेव कस्मान्न भवतीति चेत् ? न , वादावपि प्रसङ्गात-तदामि- २० मुख्ये यदि तव्यापारः तक्रियायामपि स्यात् तस्य ततोऽनन्तरत्वादिति चेत्, भवत्येवम् , तथापि न "तत्र तस्य साधकतमत्वं तत्सामध्यसव्यपेक्षत्वात्, साधफत्वमेघ तु भवति सापेक्षस्य तत्त्वोपपत्तेः सामर्थ्यस्य तु तदभिमुसस्य न किश्चिदपेक्ष्यम्, “अतः प्रमाणम, . १ - १ असाधकतमात् साधकादिगतमुख्यत्वोत्पत्तौ । २ साधकतमस्वभावत्वे । ३ साधकतमखमाव । ४ साक. ल्यस्वरूपत्वात् । ५ कारससाकल्यरूपस्य । ६ प्रदीपादीनाम् । ७ साधकादित्वामावे। ८ तमप्रत्ययस्य कचिदपेक्ष्य मावात् । ९ कारकसाकल्यगतसाधकतमत्वस्य अनित्यत्वे। १० मवेप्रति-मा०, ब, प., स.। आत्मादी प्रमातृस्वाद असाधक्तमरूपस्यापि भावात् । १२ कारकाणाम् । १३ आत्मादौना कदाचित्तसाधकतमस्वरूपापेक्षया अनित्यत्वम् , अतादूप्याच्च नित्यत्वमिति । १४ कारकसावल्यान्तर्गताचेतनानाम् । १५ न्यायस्योप-आ०, ब०, ५०, स.। प्रमाणत्वस्य । १६ चेतन एव । १७ कारपत्वम् मा०,०प०स०1१८ ज्ञानस्य । १९ अर्थनिर्णयात् । २. नेनादेरपि। २. अर्थनिर्णये ।२२ -दान्त-आ०, २०, ५०, स० । २३ अचेतनवायोगात् । २४ क्रिया करणमाव। २५ वैधीभावपरिणननशक्तरेव । २६ सामर्थ्ये । २७ छेद किंभा, ०,१०, स. २८ काट- गतद्वैधीभावपरिणमनशपिप्राकट्ये । २९ कुठारस्य । ३० सामाभिमुल्ये । ३. कुठारस्य । ३२ छिदिक्रियायामेव। ३१ भाभिमुख्यस्म । ३. नियात । ३५ दिौ । ३६ कुखरस्य । ३० छैद्यगतशक्ति । ३८ सापकत्वोपपत्ते । ३९ तदभिमुख्यत्य भा०, ब, ५० । नियाभिमुखत्म। ४० कुन आ०, २०, ५०। , - न्यायविनिश्चयचिवरणे [३ साधकतमत्वम् । एवमन्यदपि व्यतिरिक्त कारणं सर्वत्र वस्तुपरिणतो साधकमेव 'तद्योग्यत्वसव्य. पेक्षत्वात्, तद्योग्यत्वमेव तदभिमुसं तत्र साधकमेव 'निरपेक्षत्वात् प्रतिपत्तव्यम् । नन्वेवं तदा- मिमुख्यपर्यायोऽपि सामर्थ्यस्य 'प्राच्यादेव तच्छक्तिपर्यायात् , तस्यापि तदाभिमुख्यपर्यायः प्राच्यादेव तच्छविपर्यायादिति किं व्यतिरिक्तेन सङ्गादिनेति चेत् १ न ; सर्वथा तदामिमुख्यस्य ५ निरपेक्षत्वे तदन्वयव्यतिरेकानुविधानस्याभावप्रसङ्गात् । अस्ति चैतत् , अतस्तस्यापि तत्र कारणत्वं वक्तव्यम् । अत एवोक्तम्- "विशेष कुरते हेतुर्वित्रसा परिणामिनाम् । मुद्रादिर्घटादीनामन्ययव्यतिरेकवान् ॥" । ] इति । तस्मात् सर्वन वस्तुपरिणती मिन्नस्य तच्छतयामिमुख्यमाने व्यापारः । भवतु तदभिमुसस्य १० तत्सामर्थ्यस्यैव साधकतमत्वम्, सत्क्रियानर्थान्तरत्वं तु कथं तस्येति "चेत् १ न, छिन्नं काष्ठम्' इति तत्नियासामानाधिकरण्येन 'तत्प्रतिपत्तेः । ततः काष्टस्यैव तदनन्तरत्वं न तत्मामर्थ्यस्येति चेत, न, तस्यापि" तव्यतिरेकात , व्यतिरेफे सामर्थ्यतद्वद्भावानुपपत्तेर्यथास्यान विचारणात् । तन्न विधाभायः छिदिबिया। कुठारख्यापार एवोत्पातनिपाठादिरिदिरिति चेत् , सत्यम् , कुठारस्य साधकतमत्यं तस्य तत्मियापरिणामसामर्थ्यरूपत्वात् , नतु तस्य तस्मियातोऽन्तरत्वम् 'निपतत्युत्पतति वा कुठारः' इति "तत्सामानाधिकरण्येन तत्प्रतिपत्तेः । समवायादेवं प्रतिपत्ति- नानन्तरत्यादिति चेत्, न, समनायनिमित्तत्वे "तस्यैय तमें प्रतिभासप्रसङ्गात् । न चैवम- भेदस्यैव प्रतिभासनात् । न "तस्यापि प्रतिभासनं सामानाधिकरण्यस्यैवाघमासनादिति चेत्, न, अभेदस्यैव तत्स्यात् । समपायस्यैव तत्त्वं कस्मान्नेति चेत् ? न, 'सामान्यमेव विशेषः सामान्यविशेप:' "इत्यादावभेदस्यैव तत्त्वेन परस्यापि सुप्रसिद्धत्वात् , समवायस्य च निपेत्स्य- २० मानत्वात् । युतः पुनः परिणामसामर्थ्य भावस्येति चेत् तदाम्ता तायत् तदुपपत्तिसाम्राज्य. स्यैव सविस्तरमुत्तरत्र निरूपणात् । वन किश्चिनियाव्यतिरिक्तं "करणम् । ततो नयनादेरपि नीतिक्रियाफरणत्वं तव्यतिरेके स्यादिति तदचेतनत्वं विरध्येत । तस्य प चेतनत्वे निष्पयो- जनमेव तदपरजानकल्पनम् , अनेनैवाभिप्रायेण भाष्यकारैरप्यादिष्टम्-"न ह्यचेतनेन किश्चिद मीयते ज्ञानकल्पनाफल्यप्रसद्भाव"। ] इति । सदनेन सशयादिज्ञानस्यापि प्रामाण्यं निरस्तम्: तस्यापि नीतिकरणस्ये तदनन्तरत्वनियमान्न सशयादित्यं स्यात् । न हि . २५ १ पस्तुगतसामर्थ्य । २ फ्यिाभिमुखम् । ३ तन्निर-आ०, १०, १०, १०। ४ तत्पूर्ववर्तिन । ५ पूर्वसा मर्यस्यापि । ६ खसादिनिरपेक्षते । समादेरपि। हिदिवियायाम् । ९ कारकत्व भार, २०, ५०, स.. १० सामर्थस्य " चेत् हि-आ०,५०,०, स. १२ अनर्यातराप्रतीते । विर्ष काष्टमिति प्रनीतिन । १५ तदर्था-आ०, २०, ५०,०। ५ मामय॑स्यापि । १६ कुयरगतम्यापारे। तकियार्था-आ., १०, प० । कुठारगतक्रियातः। १८ क्यिासामामानाधिकरण्येन ! ११ समकायस्य । २. प्रतीती। २१ भद- स्थापि। २२ सामानाधिकरण्यात् । २३ इत्यायमे-आ०, ०,१०,०।२. "तथा सामान्यमेव ध्यभ्यात्ति हेतुत्वाद्विशेषो द्रव्यत्वादि !"-प्रश० व्यो० १० १२ । २५ कारणम् मा, २०, प., स. २६ नयनादे । २० -त् क्रियते भार,..., स..
१३] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव: नीतितादात्म्ये 'तस्य तत्त्वम् ; नीतेनिर्णयरूपत्वात् । न हि निर्णय एव संशयादिः, विरोधात् । निर्णयात्मिका च नीतिनिरूपयिष्यते । ततो न नयनादेः संशयादेर्वा नीतिसाधकतमत्वं तद- नर्थान्तरस्य वेदनस्यैव तत्त्वात् तस्य तेत्र परनिरपेक्षत्वात् । न हि स्वयं तकियासामर्थ्य (समर्थ) स्यान्यापेक्षणम्। असिद्धं परनिरपेक्षत्वम् । इन्द्रियमनसोरपेक्षणात् "इन्द्रियमनसी विज्ञानकार- णम्"। ] इति वचनादिति चेत् । न ; ज्ञानस्योत्पत्तावेव तदपेक्षणात् , उत्पन्नस्य तु तस्य ५ . स्वत एव विषयनिर्णातिान्यतः । न चैवं नयनादेः संशयादेवा स्यतस्तन्निीतिः, अचेतनत्व- संशयादित्वविरोधात् । निर्विकल्पकदर्शनमपि न स्वतस्तन्निर्णयसमर्थम्। तत्पृष्ठभाविविकल्प- फल्पनाषैफल्यप्रसङ्गादिति न तस्यापि मुख्यं प्रामाण्यम् । निर्णयज्ञानहेतुत्वेन तु नेवादीनां प्रामाण्यमीपचारिकमेव न मुख्यम् । उक्तश्च- "सिद्ध यन्न परापेतं सिद्धौ स्वपररूपयो। तत्प्रमाणं ततो नान्यदविकल्पमचेतनम् ॥" [ सिद्धिवि० प्र०परि०] इति । अंत्र अविकल्पमहणेन सत्त्वनिर्णयस्वभावविकलत्वात् दर्शनस्य संशयादेश्च परिग्रहो नयनादेः अचेतनग्रणेन । घेदनं तत्फलाभिन्नं कथं तत्करणं यदि ? कुठारस्तत्फलाभिन्नः कथं तत्करणं भवेत् ? ॥२१॥ प्रश्नस्तत्रापि "तुल्यइचेत्क ने तस्य" प्रवर्तनम् । व्यतिरिक्त फलाद्यच्चे (ब्चे ) नाभिन्नस्यैव दर्शनात् ॥२११॥ विचाराड्यतिरिक्तं चेदभिन्नस्यापि दर्शने । दर्शनातिकमसौ" ज्यायान् किरूपो वा स कथ्यताम् ? ॥२१२॥ साध्यरूपं फलं तस्मादभिन्नं साधनं कथम् । साध्यमेव हि "तद्युक्तमभेदः कथमन्यथा १ ॥२१३॥ सिद्धं च साधनं तस्मादभिन्न साध्यते कथम् ? । "स्यात्सिद्धस्यापि साध्यत्वे साध्यत्वापरिनिष्ठितिः ।।२१४॥ साध्यसाधनभावश्च वेदनार्थावसाययोः । अभेदश्चेति यागेपा पूर्यापरविरोधिनी ॥२१५॥ भेदोपाधिर्हि "तद्भावो नाभेदं क्षगते भवन् । अभेदश्च न “भेदम् , "तव्यमेकन दुर्घटम् ॥२१६।। २० १ संशयादेः। २ तदर्थान्त-आ., घ०, १०, ०। नीतिक्रियातोऽभिलस्य । ३ साधकतमत्वात् । ४ नीतिकिगायाम् । ५ "ततः सुभाषितम्-इन्द्रियमनसी कारणं विज्ञानस्य अर्थो विषय इति"-धो स्वर का. ५४ । ६ इन्द्रियमनसौरपेक्षणात् । ७ ज्ञानस्य । ८ श्लोके । ९ कुठारगतोपतननिपतनव्यापाररूपा हिदिकिया। १० तुल्यचेत् आ०, ब. , स०।११नु आ०, ब०, प०।१२ प्रश्नस्य । १३ विवारः।" साधनम् । १५ सिद्धासाधनादभिन्नस्य फलस्यापि सिद्धत्वात् कर्थ साध्यत्वमिति भावः । १६ कथित् । १७ साध्यसाधनमायः। १८ भेदश्च दय-भा०, ५०, ५०, स.। क्षमते इति पूर्वेशान्वयः । १९ भेदाभेदी।
है ६४ न्यायविनिश्चयविवरणे इति चेत्सत्यमेकान्ताभेदे दूपणमीदशम् । नेवं स्यावादिनामिष्टिः स्यादभेदस्य वाञ्छनात् ॥२१॥ तथा हि-दमयंनिर्णयरूपमेव वेदनम् स्वनिर्णयरूपत्याभावप्रसङ्गात् । न प नास्त्येवता 'सायम् ; युक्तितस्तस्य व्यवस्थापनात् । नापि स्वनिर्णयरुपमेव अर्थनिर्णयरूपत्वाभावप्रसङ्गात् । न व नास्त्येव तस्य ताप्यम् ; युक्तितस्वस्यापि व्यवस्थापनात् । न च तदुभयव्यतिरिक्तमेव, तस्यासंवेदनात् निर्णयवेदनयोः संसर्गपशादविवेकावभासनं न वस्तुत "एवाविवेकभावादिति चेत् ;न; विवेकनियमस्य निपेत्स्यमानत्वात् । ततो निर्णयवेदनयोः कश्चिन् व्यतिरेकस्यापि भावान्नायुक्त कियाफारकभावः । एतदर्थ व कारिकायाम् अर्थात्ममहणम् । विषयभेदेन निर्णयभेदेऽपि तत्साधनज्ञानस्यामिद्यमानस्य अन्वयव्यतिरेकाभ्यां कथञ्चित् व्यतिरेकस्य 'तेनो. १० पदर्शनात् । सत्यपि व्यतिरेके निर्णयसमसमयस्य वेदनस्य कथं तकरणत्यमिति चेत् ? न; अर नैयायिकस्याविमतिपत्तेः, कार्यसमकालस्यं नित्यस्य अन्यथा हेतुत्वाभावप्रसगात् । निर्णयसह- जन्मनस्तस फ" सलारित्वमिति चेत् ? न; एकान्तेन तत्सदजन्मामावात्, क्षणभङ्गस्य निपेत्स्यमानस्यात् । इन्द्रियादिना तर्हि "किमुखाद्यते ? न निर्णयः, तस्य वेदनकार्यत्वात् । मापि वेदनम् । तस्याणिकत्वेन "तव्यापारात् प्रागपि भावादिति चेत् ; न; निर्णयसमर्थस्य "तस्य १५ सदुत्पाद्यत्वास । पूर्ष तर्हि तदनिर्णयसमर्थमिति चेत् ; न; तदापि विषयान्तरनिर्णयसमर्थत्वात् । "तस्य पान्यत इन्द्रियादेर्भावात् । स्वार्थनिर्णयविफलस्य तु न तस्य भामाण्यं सुपुप्तवानवत् । निरूप. यिष्यते चैतत् । सामर्यस्य साधकतमस्ये स्वसंवेदनव्याघात"रास्याप्रत्यक्षत्वात् क्रियानुमेयस्येनो- पगमात् ""शक्तिः क्रियानुमेया" । ] इति वचनात् , स्वविदितन प्रमाणमिति सिद्धान्त इति चेत् । अस्तु "शक्तिरूपेण तद्व्याधातो न कश्चिद्दोषः, "शक्तेलब्धिलक्षित- २० भावन्द्रियस्वभाषाया अप्रत्यक्षत्योपगमात् । तत एवं सुमतिदेयकक-"शक्तिः परोक्षति चेन्न काचित्ततिः J इति । स्वसविदिनत्वं सूक्त" स्वरूपापरोक्षनिर्णय नियावादा. स्यात् । "तक्रियाया अपि परोक्षशक्तितादात्म्यात् परोक्षत्वप्रसङ्ग इति चेत्, "अभिमतमेवैतत परोक्षेतरस्वमायतया सर्पस्यापि वस्तुनोऽभ्यनुज्ञानात् । वक्ष्यति च- "प्रत्यक्षं पहिरन्तरच परोक्षं स्वप्रदेशतः" [ न्यायवि० श्लो० १२८ ) इति । ततो घेदनस्यैवार्थात्मविषयस्य मामाण्यादुपपन्नमेतत्-'न्यायो वेदनात्मैव न्यायत्वान्यशानु. पपत्तेः' इति । 1-४. स्य-०, २०, २ स्वनिर्णयरूपत्वम् । ३ अर्थनिर्णयरूपत्वम् । १ अभेदावभासनम् । ५ बभेदात् । ६ अर्थात्मणदणेत ! . निर्णयसाधक्तमत्वम् । ८-स्थानि-6, म., प., स. वैदनस्य । - सहका-भा०, ५०, प., स. "किमुत्पा-आ., १०, २०, ०1 11 इन्द्रियादिव्यापारात् । यदस्य । विषयान्तरनिर्णयसमर्थ पैदनस्य । १५ सामर्यस्य । १६ "कन्यथा न्यायविनियय भुवो गुणाः' इत्यस्य 'भुखमाहादापरं विशन मेयोधनम् । शक्ति मियानुमेया स्यापूनः शान्तासम्रागमे ।' इति निदर्शने स्यात् ।"-सिद्विचिक पृ. १९1१७ शचिनिरूपेण त-आ., 40,२०,anrg. श्योगी मान्दियम् । अर्थप्रहशापिलब्धिः । उपयोगः पुनरग्रहणण्यासरः ।"-सो. स्व. इलो. ५॥ १९ धामध्यस्य । २. निर्णयरूपक्रिया ! २१ निर्णयक्रियायाः । २२ भिमसमेतत् मा. . . .
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव: १३] नन्वर्थस्य घटादेः आत्मनश्च योधस्वभावस्य वेदनमेव कथम् ; अशक्तस्य तदसम्भवात् । न ह्यशक्तस्य सन्यग्बुद्धिविपयत्वम् ; योग्यस्यैव तदुपपत्तेः । शक्तस्यैच तस्य चेदनमिति चेत् । न; एकान्तेन द्रव्यरूपत्वे पर्यायस्वभावत्वे सामान्यात्मकत्ये विशेषाकारत्वे च तस्यार्थक्रिया- सामर्थ्यस्य शास्त्रकारेणैच निषेधात् । न च द्रव्यादे रूपान्तरमस्ति, यतस्तस्याऽनिषिद्धसामर्थ्यस्य किञ्चिद्वदनं स्यात्तदसम्भवात् । साध्यरूपेयं प्रतिक्षेति चेत् । अत्राह-'द्रव्य' इत्यादि । ५' तात्पर्यमत्र-यद्यप्येकान्तनित्यादिरूपत्वे अर्थात्मनोः शक्तिवैकल्यम् अर्थक्रियाविरहान , कथञ्चित नित्यादिश्वभावत्ये तु नायं दोपः तत्रार्थक्रियासामर्थ्यस्य निरूपणाद्वदनविषयतोपपत्तेः निरवद्यत्वं प्रतिज्ञाया इति । एकान्ततो नित्यमनित्यमेवं समानमन्य न वस्तु किश्चित् । अर्थक्रियायां तदशक्तिभावात् तथाविधस्याप्रतिवेदनाच ॥२१८॥ १० अविद्यमानं कथयन्ति सन्तस्तद्वेदनं नाम कथं प्रमाणम् । अवस्तुसंस्पर्शितया सतोऽपि को नाम मानव्यवहारयोगः ॥२१९॥ ततोऽस्तु जात्यन्तरमेव रूपमन्तर्वहिर्वस्तुपु वस्तुवृत्त्या । तस्यार्थशक्तो प्रतिवेदनाच्च व्योमारविन्दप्रतिमं तदन्यत् ॥२२०॥ तथोदितं स्वामिसमन्तभद्रैरकान्तनीतिव्रततीकुठारः। अभेदभेदात्मकमर्थतत्त्वं तव स्वतत्रान्यतरत्खपुष्पम् ॥” [युक्तयनु० श्लो०७] तद्वेदनं तन्निरपद्यरूपं प्रमाणतत्त्वेन निरूप्यमाणम् । अयुक्तिमन्नेति वदत्युदारं "द्रव्यादिशब्दाहणेन देवः ॥२२२॥ स्यान्मतम्-आगमार्थ एव प्रमाणार्थो वक्तव्यः, आगमनमल्यनयनोपायतया संदपर- प्रमाणपरिचिन्तनात् , एकचिपयत्वे च संवादसामर्थ्यात् तस्य तदुपायत्वं न भिन्नविषयत्वे २० तत्सामर्थ्याभावात् । हेयोपादेयतत्त्वमेव च "सोपायमागमार्थो न द्रव्यादिरूपावर्थात्मानौ तत्कथं तयोः प्रमाणार्थत्वमुक्तं न हेयादितत्त्वस्य सोपायस्येति ? तन्न सारम ; अर्थात्मनोरेव सोपाय- हेयादिरूपत्वात् ,"द्रव्यादिस्वभावकथनं तु तदभाये हेयादिरूपस्यैवासम्भवप्रतिपादनार्थम् "तथैव यथावसरं निरूपणात् । ततश्च"प्रत्यागमानां द्रव्यादिरूपवस्तुवादविमुखत्वेन वस्तुभूतहेयादितत्त्व- प्रतिपादकत्वाभावादप्रामाण्यम्, परमागमस्य घान्ययोगव्यवच्छेदेन तद्वैपरीत्याद् हेयादिविपयं २५ प्रामाण्यमवस्थापितं भवति । ततो निरवयं यथोक्तविषयस्य वेदनस्यैव न्यायत्वं तदन्यथानुपपत्ति- नियमनिश्चयात् । अनिश्चितान्ययस्य कथं हेतुत्वमिति चेत् ? न ; अन्यथानुपपत्यैव निश्चितथा अन्व- यस्यापि निश्चयात् तस्यास्तद्रूपत्वात् । साधर्म्यदृष्टान्तानुपदर्शने कथं "चन्निश्चय इति चेत् ? न, पक्ष - - द्रव्यपर्यायसामान्यविशेषातिरिकम् । २ असिद्धा । ३ विशेषरूपम् । ४ भेदनिरेपक्षोऽभेद,अभेदनिरपेक्षय भेदा, केवल मैदः अमेदच न तस्वमिति भावः। ५ कारिकाया द्रव्यपर्यायेत्यादिपदोपादानेन । ६ अकलङ्कदेवः । ७ आगमभिशप्रत्यक्षादिप्रमाण | आगमभिषप्रमाणस्य । ९-वेन तत्सा-भा०प०,५०,०।" हानोपायो- पादानोपायसहितम् । ११ द्रव्यादै स-पा०, य०, प०, स० । १२ तदैव आ०, ब०, ५०, स० । १३ बौद्धाया. गमानाम् । १४ अन्वयनिश्चयः ।
। ६६ न्यायविनिश्चयविवरणे [ ११३ एव वनिश्चयोपपत्तेः विपक्षे बाधकसामर्यात्, तस्य चोजत्वात् । निरूपयिष्यते चैतत्सविस्तर- मिति नातीव निर्वाध्यते । यथोक्तस्य वेदनस्यैव मामाण्ये शैदलिङ्गयोस्तन्न स्यात् शब्दस्या- वेदनत्वात् लिङ्गस्यावेदनत्यापि भावात, यथा च तन्निरूपणमप्रस्तुतामिधानम्, प्रमाणमेव हि तच्छास्त्रे निरूपयितन्यं नापरमिति चेत् । अत्राह-'अक्षसा' इति । तात्पर्यमत्र- ५ यथोकमेव संवेदनं मुख्यतः प्रमाणम्, तदेतृत्वेन तूपवरित भामाण्यमचेतनस्यापि शब्दलिहा. देरनिवारितमिति । कथं शब्दादेवबेतुत्वमिन्द्रियादेश्य तदेतत्यान् "इन्द्रियमानसी विज्ञानकारणम्"। ] इति वचनादिति चेत् । न; इन्द्रियप्रत्यक्षापेक्षया तन्नियनाभि- थानातू, अन्यथा स्त्रमतव्यापातापते । दर्शनस्य प्रामाण्यासङ्गः, नाप्यालनोरेव सत्तारूपेण महात् "सामान्यग्रहणं १० दर्शनम् । ] इति पचनात् । इत्यत्राह-साकारम् इति । घटः पट इति या जीवः पुद्गल इति या ‘यो योऽयमतद्रूपपरावृतो भावत्वभावः साकारः, खेन विपयेण सह बर्तत इति साकारम् । अर्थात्मवेदनम्' इत्यनेन ज्ञानस्यैव प्रामाण्यमुपदर्श- यति तस्यैव साकारत्वान् "सायारणाण"[ ] इति वचनात् । अर्थात्मप्रहणेनेय घेदनस्प साकारस्वमुक्त भेदनिर्देशात्,सन्मात्रापेक्षायां तदनुपपत्तेरिति चेत; न ; समावस्यापि तद्र पस्या- १५ तदुपपत्तेः । अर्थात्मरूपमेव हि वस्तु प्रथमचन्यदिप्रणिधागवेलायाम् अपरामृष्टभेदतया- अनुभूयमानं सन्मावमुच्यते नापरम् । अवो दर्शनापेक्षया “भेदनिर्देशो न तन्त्रम् , ज्ञानापेक्षयैष तस्य तत्त्वादित्यस्ति "संशयायकाशततो न पौगहकार्य साफारमहणस्य । दर्शनस्यापि किन शमाण्यं यतः साफारमहणेन तन्निवर्यत इति चेत् । न ; "ज्ञानं प्रमाणमित्याहुः" [ सिमि- वि० परि० १०] 'इत्यागाविरोधापत्तेः । आगमोऽपि फरमान वत्प्रामाण्यमिच्छसीति र १ २० न ; अनिश्चयरूपत्वात् । न पानिश्चयरूपः प्रमाणार्थ: 'प्रकर्षेण संशयादिश्ययच्छेदलक्षणेन मीयते वस्तुतत्त्वं येन तत्प्रमाणम्' इति तदर्थोपादानात्, "निर्णयात्मकत्वमन्तरेण "ता- वच्छेदायोगात् । “दर्शनमपि निर्णयहपमेवेति चेत् ; ; विपयेन्द्रियराग्निपातानन्तरमवामहस्येय निर्णयात्मनोऽनुभवात् । “विषयविपयिसनिपातानन्तरमाचं महणमवग्रहः” [लपी० स्व० श्लो० ५] इति वचनाच"। र्शनेन त्वषग्रहव्यवधानमनुमानते एव न निर्णयात् । , १ निर्वध्यते सा.भाग, स.। लिङ्गशब्दयो ०,०, ५०, स. १३ शम्दति निष्णम् । १ इन्दियमनमोविशनकारणावनिक्ष्म । ५ "वं सामग्गरगहन ईमणमय-सन्मति २६ । RI ६ "पमाणदो पुषभूदे कम्ममायारी"-जयध० पृ. ३३१) 0"सागार से पाणे भवति, पणागार से देखने मनति।" -अशाप० ९० ३० २०३४ साकारं ज्ञानमनाथ दर्शन मिति ।" साधसि. २९ । ८ अर्थात्मेति विपनिर्देशानुपपत्ते. ! ९ अत्यापदादू विशेषनिर्देशोपपते. अर्थात्मेति विशिष्य ग्रहणम् । दानस्य प्रामाय नवेत्याकाणं होदि पसाण"-ति-धीरलो.५ प्रमाण दलो०४५। १३ न्यायकुमु पृ०४८५०४ निर्णयकरवमन्त्रा68.1 १५ संम्यादिव्यपदा शोमात 198 रुपमपि भा०, ५०, ५०,.150 दम्-सबोधसिक १५HET.. १३५॥ i दर्शने -म,,s,RE ) यतः पूर्वकालभाविदर्शनमेव मन पथात् मानम अवमहात्म भावमा तत् स्वयमनिर्णयात्मकम् ।
१३] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव एतच "अक्षार्थयोगे सत्तालोका" [ लघी०इलो० ५] इत्यादिव्याचक्षाणैर्भाष्यकारैरेवं निरू- पितम्। प्रमाणमेव तत् निर्विकल्पकप्रत्यक्षत्वादिति ब्रह्मविदः, तदास्ताम् यथावसरं निरूपणात्। शुक्तिकारजसज्ञानस्य साकारत्वात् प्रामाण्यप्रसङ्ग इति चेन्; न ; अर्थग्रहणेन तन्निवर्ग- मात् । न हि तद्रजतमर्थः, तद्देशादी तदप्राप्तेः । तदप्यर्थ एवान्यदेशादी सत एव तस्य प्रति- वेदनात्, नतो नार्थपदेन तन्निवर्चनम् , अतो 'बाँधविवर्जितम्' इति वकन्यम्, अर्थज्ञानस्यापि ५ बाध्यमानस्याप्रामाण्यप्रतिपादनार्थमिति चेत् कथमज्ञानस्यैवं बाधनम् अतिप्रसङ्गात् ? सन्नि- हितदेशत्वादेरसत एव महणादिति चेत् ; न तस्याप्यन्यदेशादी सत एवं ग्रहणात् । तस्यापि सन्निहितदेर्शत्वादिकमसदेव गृह्यत इति चेत; न; तत्रापि तस्यैवोत्तरत्वात्। तन्न दूरमनुसरतोऽपि किञ्चिदसवेदनमस्ति यत्प्रामाण्यव्यवच्छेदेन वाधविवर्जितपदमर्थवद्भवेत् । असत एव कस्यचिद्वेदने वा रजतस्यैवासतो वेदनमस्तु विशेषाभावात् । असतः कथं वेदनमिति चेत् ? सन्निहितदेशत्यादेः १० कथम् ? अहमेव तत्रापि चोदक इति चेत् ; "स्वतस्तर्हि कथं चेदनम् ? योग्यत्वाच्चेत् क तस्य योग्यत्वम् ? वेदनोत्पत्ताविति चेत् ; कुतस्तदवगतिः ? तत एव वेदनादिति चेत् ; तन्न; यस्मात्- यदि तद्वदनेनैव "तस्यार्थाजन्म घेद्यते । तदर्थास्तित्वसन्देहः कस्यचित्कथमुद्भवेत् । ॥२२३॥ जानदेव कथं ज्ञानमात्मनोऽर्थात्समुद्भवम् । स एवास्ति न येत्येवं विकल्पाय प्रकल्पते ॥२२४॥ दृश्यते चात्मसंवित्तौ सत्यामप्यर्थसंशयात् । अर्थिनामपि तद्वद्येष्यप्रवृत्तिस्तनूमृताम् ॥२२५।। अनिश्चयात्मकत्वाच्चेत् तन्ज्ञानात्संशयोद्भवः । अविशेषात्तथाऽन्येप किन्न स्यादात्मसंशयः॥२२६॥ तथा सत्यर्थविज्ञानमर्थकार्यत्वमात्मनः । तदेव प्रतिवेत्तीति संशयानः कथं वदेत् ॥२२७॥ सन्न तेनैव तद्युक्तिः, यदि तद्युक्तिरन्यतः" । अनर्थसम्भवं "तच्चेत् कथं स्यादर्थवेदनम्?।।२२८॥ यद्विद्यादर्थकार्यत्वं प्राच्यज्ञानस्य तत्वतः । तस्यापि विषयोत्पत्तिरन्यथा तु वृथा भवेत् ॥२२९॥ 'तदप्यर्थोद्भवं चेन्न तद्गतिः पूर्ववत्स्वतः । तदन्यज्ञानक्लप्तिस्तु विध्यादनवस्थितिम् ॥२३०॥ १ थकलकदेवैः। तदनन्तरभूत सन्मानदर्शनं खविषयव्यवस्थापनविकल्पमुत्तरपरिणाम प्रतिपयतेऽवप्रहः।" -यो. स्व. लो० ५। २ दर्शनम् । ३ शुतिकायां भासमानं रजतम् । ४ बापवर्जि-भा०, २०, ५ संशयादेरेव । ६ -खादसत ता.। सन्निहितदेशवादेरपि। ८-देशकत्वादिक-वा० । ९ सनिहितदेशस्वादः। १० सतः मा०,०,१०, सखस्य । १२ वदे ता.। 11 खस्य अर्थाजन्मावगतिः । ११ शानात् । १५ अन्यज्ञानम् । १६ प्राप्यज्ञा-भा०, २०, प० । प्राप्तजा-स ०१७ अन्यज्ञानम् । २० , स.1 ।
१८ ५ न्याययिनिश्चयविवरणे [१३ ताज्ञानेकार्य योग्यत्वं नाध्यक्ष विषयस्य तत् । नानुमेयमलिङ्गत्यात्, लिङ्गं यद्यस्ति कथ्यताम् ? ॥२३॥ संवितिनियमो लिङ्गम् ; अशक्तस्य हि घेदने । तद्वधं सकलं प्राप्त तथा तन्नियमः कथम् ? ॥२३२॥ इति चेन्न; स्वशक्त्यैव संवितेनियतार्थता । तच्छत्तिरपि तद्बतोरर्थशपत्या तु किं फलम् ? ॥२३३॥ मानमर्थादनु न चेन्नियतगोचरम् । अर्थो ज्ञानादनुभृतो वेद्यः स्यानियतः कथम् ? ॥२३४॥ अन्योन्यहेतुकत्वञ्च न सदन्योन्यसंभयात् । तद्वद्यवेदकाभावाद् भायनरात्म्यमागतम् ॥२३५॥ अशानजस्याप्ययस्य स्वशक्तिशतो यदि ।। नियतस्यैव वेद्यत्वं यथादर्शनमुच्यने ॥२३६॥ ज्ञानमेवमनर्थोत्थ निर्यतार्थ न कि मतम् ।। स्वयमेवेदमन्यने देवः स्पष्ट न्यवेदयत् ॥२३७॥ "स्वहेतुजनितोऽप्यर्थः परिच्छेद्यः स्वत्तो यथा । तथा ज्ञानं स्वहेतूत्यं परिच्छेदात्मक स्वतः ॥" [लघी० इलो०५९] इति । तन्न वेदनोत्पत्तापर्थस्य योग्यत्वम् । विषयभावपरिणाम इति चेत् , न ; नित्यमणिकयोरविषय. त्वप्रसवात् , तत्परिणामामायात् । परिणामिनो भावस्य विपयत्वमिति चेत् ; सत्यम् ; तथापि नार्थसामर्थ्यकृतं वेदनं तत्परिणामस्यैव तत्कृतत्वात् । न च सं एव वेदनम् ; अर्थज्ञानयो- २० रभेदभरागात् । स्वहेतुजनितस्यापि घेदनस्यार्थाभिमुख्यमर्थसामादिति चेत् ;न; "तस्यापि स्वरूपाभिमुख्यरत् स्वशतित एव भावात् । किमिदानी तत्परिणामेनेति चेत् । यद्येवं जानाधि निर्मुध्यतां तत्र निर्गन्धः । ततो यदुक्तं धर्मकीर्तिना- "नित्यं प्रमाणं नास्ति प्रामाण्याद्वस्तुसद्गतः । शेयानित्यतया तस्य अधौव्यात्॥" [अ० वा० १११० ] इति । तभिरस्तम् ; शेयकार्यत्वे हिज्ञानस्य तदनित्यतया स्यादनित्यत्वम्, न चैयम् ,तकार्यत्वस्यान- न्तरमेव निषेधात् 1 मा भूतकार्यत्वं तथापि वस्तुसद्गतित्याचस्यै प्रामाण्यम् । यस्तुसतित्वच वस्तुनि सति व्यापारात।नच वस्तु सर्वदाम्ति यतस्तव्यापारस्य सर्वदास्तित्वम्, अतो वस्तुसद- नित्यतया तत्र व्याप्तं ज्ञानमप्यनित्यमेव, तव्यापारततोरभेदार । व्यापारोऽयव्यापारान भिद्यत इति चेत् न । शेयस्य ज्ञातेतरवस्मयोरविशेषप्रसङ्गात् सर्वमशमेव सर्वक्षमेव या १-कार्ययो-भा०, ३०,१०, स.। २- निदे-१,२०, २०, संवित्तिकारणत् ।। ६ नियतार्यान भा, प... । सपीयनये। तयोरसवात विषयगावपरिणामामावात् । १ अर्थगतविश्यभावपरिणामस्यैव वसामयकृतत्वात् । १० विषयमावपरिणाम । " अर्थाभिमुख्यस्यापि । २ शेयानित्यतया । १३ शनस्य । - २५ शान्यत्वम् । ५ ययाप्रतीति ।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावा - . .. जगत्प्राप्तम् । न चवम् , अतो वस्तुनि सत्येव तत्र ज्ञानस्य व्यापारो न पूर्व नापि पश्चादित्युप- पनं क्षेयानित्यतया वस्तुसद्तरध्रौव्यमिति चेत् ; कुतः पुनरिदं ज्ञेयानित्यत्वमवगतं येनैवमुच्यते? तद्विपयादेव ज्ञानादिति चेत् ; न ; तस्य नित्यस्याभावात् "नित्यं प्रमाणं नैवास्ति' इत्यस्य विरोधात् । अनित्यात्ततस्तदवगम इति चेत् ; अनित्यत्वेन तेंदज्ञाने कथम् 'अनित्यात्' इति वचनम् । न च ज्ञानस्याज्ञातं रूपम् ; स्वसंवेदनरूपत्वात्तस्य । न च खण्डशस्तद्वेदनम् “तसाद् दृष्टस्य ५ भावस्य" [प्र. चा० ३१४४] इत्यादि "विलोपप्रसङ्गात्। अस्त्येव तस्य तत्त्वेन ज्ञानमिति चेत् । कुतस्तज्ज्ञानम् । अन्यत एव फुतश्चिदिति चेत् ; न ; 'ज्ञेयानित्यतया' इत्यस्य वैयर्थ्य- प्रसङ्गात् । शेयानित्यत्वादेवेति चेत्, तदपि कुतः ? तज्ज्ञानस्यानित्यत्वादिति चेत् ; न ; परस्परा. श्रयात्-ज्ञेयस्यानित्यत्वेन तज्ज्ञानस्यानित्यत्वम् , ततश्च तदनित्यत्वमिति । तन्न ज्ञेयानित्यत्वं तज्ज्ञानादेव शक्यायसायम् । नाप्यतज्ज्ञानात् ; अप्रतिपन्ने धर्मिणि सद्धर्मप्रतिपत्तेरयोगात् । १० ततो न ज्ञेयानित्यत्वं ज्ञानानित्यत्वस्य कारक ज्ञापकं वेति न किश्चिदेतत् । ततो वेदनस्य सद्विपयत्वमपि स्वशक्तित एव तद्वदसद्विपयत्वमपि स्यात् । यद्यसदेव रजतं कुतस्तस्य देशादिनियागेन वेदनम् असतो देशादिनियमस्यासम्भवात् , वस्तुधर्मत्वात्तनियमस्येति चेत् ? न ; वेदनस्यैव तथा सामर्थ्यात् । तदपि यदि "स्यो- पादानप्रकृतेरेव, सर्वस्यापि वेदनस्यासद्विपयत्वासनः, तत्सामर्थ्यहेतोः स्योपादानप्रकृतेर- विशेषादिति चेत् । न ; आवरणोदयात् तत्सामर्यभावात् । न च तदुदयस्य सर्वत्राविशेषः । स्वहेतुनियमेन "तनियमात् , आवरणसद्धावस्य च निवेदनात् । सर्वमसत् किन्न चेद्यत इत्यप्यनेनाऽपास्तम् ; आवरणशक्तिनियमात् नियतस्यैव वेदनोत्पत्तेः। ततो रजतवेद- नस्यानर्थवेदनत्वेन अर्थपदेनैव तद्व्यवच्छेदात न तदर्थं वाधवर्जितपदमर्थवत् । रजतज्ञानमप्यर्थज्ञानमेव अर्थस्यैव शुक्तः रजतरूपतया वेदनादिति चेत् ; कुतस्तस्य तद्रूपतया वेदनम् ? 'तवेदनहेतुत्याचेत् ; न ; ज्ञानस्यार्थकार्यत्वनिषेधात् । अनिषेधेऽपि कथं शुक्तिकार्य ज्ञान रजतप्रतिभासं भवेत् अतिप्रसङ्गात् ? कारणदोपादन्यकार्यस्यापि 'तदवभासित्वम् , न "चातिप्रसद्गः तदोपशक्तिनियमेन “नियतज्ञानभावादिति चेत् ; न; तद्गुणादेय अतजनितस्यापि तद्विपयत्वोपपत्तेः, सर्वत्र विपयकार्यज्ञानकल्पनावैफल्यप्रसङ्गात्। ने' चाकारणार्थवेदने सर्वतदिनप्रसङ्गः, तद्गुणशक्तिनियमेन तन्नियमोपपत्तेः। तन्न तज्ज्ञानहेतुत्वात्तस्य वद्रूपतया वेदनम् । स्वयं तद्रूपत्वादिति चेत् ; न; शुक्तिरूपत्वाभावप्रसङ्गात् । न हि रजतमेव तद्रूपं भिन्नप्रयोजनत्वात् । अरजतरूपापि "शुक्ती रजतरूपत्येनावमासते कारणदोषादिति चेत् । १प्रमाणस्य । २ ज्ञानस । ३ ज्ञानात् । ४ ज्ञानाज्ञाने। ५ ज्ञानस्याज्ञानतया स्व-आ.ब.प.स.। ६ ".."दृष्ट एषाखिलो गुणः" इति शेषः । । पिलोपापत्तिा-ना०,५०,५०,सः। ज्ञानस्य । ९ अनित्यत्वेन । १० वैदनगतम् असतो देशादिनियमवेदनामर्थ्यम् । ११ प्रकृतज्ञानस्य उपादानभूत तत्पूर्वज्ञानम् ।।१ -प्रसातत्सा -आ०, ५०, ५० । १३ भावरणोदयनियमात् । 18 शुक्जिरूपार्थस्य । १५ रजतज्ञान । १६ रजताव मासिवम् । १७ यदि शुक्तिनमपि रजतज्ञान रजतप्रतिभासं तद्वत् घटादिप्रतिभा नभवति?14 नियतज्ञानाभा-पा० । १५ कारणगुणादेव । २० ज्ञेयाजनितस्यापि । २१ न च पार-मा० । २२ शुक्तिरूणार्थस्य । २३ रजतरूपत्वात् । २५ शुचिरूपम् । २५ शुचिरज-आ०, २०, ५०, स०॥ .. ૨૫ , .. न्यायविनिश्चयविवरणे घस्तुसता, तद्विपर्यतेन चा ? वस्तुसता घेत् ;न; रजतमानस्य प्रामाण्यप्रसङ्गात् । न हि यस्तुसज्ञानमेवाप्रमाणम् ; प्रमाणविलोपप्रसङ्गात् । घाधनादप्रमाणमिति पेन्; न; तदेव वस्तुसज्ञानस्य कथम् १ स्ववस्तद्विपयस्य बस्तुसत्त्वेऽपि शुकिरूपत्वेनाभावादिति चेत् । यदि तर्ने प्रतिभासते कथं याधनं स्वरूपनियत्तस्येचे प्रतिभासनात् ? प्रतिमासते चेत् । कथमसत् , ५ असतः प्रतिभासानभ्युपगमात् ? अन्यथा रजतस्यापि तद्वदसत, एवं प्रतिभाससम्भवान तद्वस्तुसत्त्वं भवेत्। तद्विपरीतेन चेत् ; सिद्धं तर्हि वज्ञानस्यावस्तुविषयत्वाद् अर्थपदेनैव निर- सनम् । अथ तद्र पं" स्वयमवस्तुसदपि वस्तुसच्छुक्तितादात्म्याद् वस्तुसदेव ततो नार्थपदनिवपत्वं "तज्ञानस्य; न तर्हि तस्य बाधनमपि त्यात "वस्तुसज्ञानस्य तदयोगात् । स्वतस्तद्विषयस्या- वस्तुसत्त्वात्तस्य तदुपपत्ती अर्थपदनिवर्त्यत्वमपि स्यादविशेपात् । न च सर्व एव असदाकारी १० पस्तुतादात्म्येनेवावभासते यतस्तत्प्रयुक्तं तस्य वस्तुत्वं भवेत्, स्वतन्त्रस्यापि गन्धर्वनगयदेः प्रविभा. सनात् । यस्यापि भानुमन्मरीचिप्रमयदिभावान्तरतादात्म्येनेव प्रतिभासनमिति चेत् ; तत्तादात्म्यस्य" तहि कथमसतः स्वतन्त्रस्य प्रतिभासनम् ? चदपि "तसादात्म्यादेवेति चेत् । न तब "तव्या- पारस्याभावादनवस्थापन प तस्मैं स्वतन्वावभासिनो वस्तुत्यम् अवस्तुधर्मत्वात् । तस्मात्स्व. तन्त्रमेव तत् "अवस्तुभूतब्चावभासत इति न्याय्यम् । तद्वद् गन्धर्वनगरादिरप्यसदाकारः प्रतिमा- वीति किं तत्र भावतादात्म्यपरिकल्पनेन अदृष्टकल्पनादोपप्रसङ्गात् ? असतः स्वतन्त्रस्य प्रतिभा ससम्भचे कथमुक्त "शास्त्रकारेण भ्रान्तिलक्षणम्- "अतस्मिन् तद्रहो भ्रान्ति" [ सिद्धिवि० परि०२ ] इति ? अनेन हि शुकपादिता- दात्म्येनैव रजतादिप्रतिभासनमभिधीयते न स्वातन्त्र्येण । अस्मिन् शुतवादी तद्रहो रजतादिपह इति व्याख्यानादिति चेत्, न; 'अवस्मिन्' इत्यसदाकारपरत्यान्लिदेशस्य, अतस्मिन् 'असति २० तस्मिन्' इति तदर्थत्वात्, न पुनः तस्मादन्यस्मिन् तस्मिन् इति । एवं हि यत्रैवान्यरूपत्वेना. सदरभास तत्रैवेदं लक्षणं भवेन्नान्यत्र, तदस्तित्वस्य च निवेदनात् । अभिप्रेतञ्च शास्त्रकारस्या- नन्यरूपत्वेनायभासनम् । “यथैवात्मायमाकारमभूतमवलम्बते" [न्यायवि० श्लो० ३५] इति वचनात् । भूततादात्यनियमेनावभासने हि कथम्-'अभूतमवलम्यते इति वचना इति ब्रूयात ? परमप्यत्र यथास्थान चिन्तयिष्यते । तस्मादसत्प्रतिभासनमेव रजवानमिति २५ अर्थपदेनैव तव्यवच्छेदान्न तदर्थ प्रयत्नान्तरमास्थेयम् । "अन्यस्य मतम्-ग किश्चिदसद्विपयं ज्ञानमस्ति यदर्थपदस्य ध्यच्छे स्यात् । शुक्ति १५ १४ रजतरूपत्वेन । २ बाधनमपि । ३ रजतरूपत्वस्य । ३ शुक्रूिपलम् । ५ रजापत्यविशिष्टस्यैव । ६ कथमसतः प्रतिभासोऽनभ्युप-भा, ब, १०, समुक्तिरूपत्ववत् । प्रतिभासने भवेन तदस्त-ता। ९ भवतुराता। १० रजतरूपम्।।तदानस्य लाई भा०प०, ५०, स.। रजतज्ञानस्य । ११ पतरक्षा -आ०,०,५०, स. १३ साधनायोगात् । १५ रजतरूपस्य । १५ रजतानस्य । १६ बाधनोपपगी। १७ भावान्तरतादात्म्यस्य ।।८ भावान्तरतादाम्यादेव । १९ भाषान्तरतादात्म्यव्यापारस्य । २० भावान्तरतादा. स्म्यस्य । २१ श्रवस्तुम्तमय-आग,प., प०, स० । २२ सालदेवेन । २३म् मत-आ०,५०,०,स.। तस्सिन्' इत्यत्र पदस्पेन] तस्मादन्यसिन तलिन इत्येवार्थः स्यात्, पर्युदासः सदृशमाहीति नियमात् । २४ प्रभाकरस्य।
. [३] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव शकलादो 'इदं रजतम्' इति ज्ञानमसद्विपयमिति चेत्; न ; तंत्रापि 'इदम्' इत्यस्य प्रत्यक्षत्वात् 'रजतम्' इत्यस्य स्मरणत्वात् । न च प्रत्यक्षस्मरणयोरसद्विपयत्वम् ; अनभ्युपगमात् । न चापरं तत्रासद्विपयं संवेदनम् अननुभवादिति; तदसङ्गतम्; रजतज्ञानस्य स्मरणरूपतया अननुभवात, पुरोवर्तिरजतावभासित्वेनानुभवस्वभावस्यैव तस्य प्रतिवेदनात् । स्मरणरूपत्वे त्वतीतविपयतया तदनुभवप्रसङ्गात् । न चैवम् । तन्न तस्य स्मरणत्वम् । अतद्रूपावभासिनोऽपि तद्रूपत्वे नीलस्य ५ निरवशेषजगदूपत्वं भवेत् प्रतीतिविरोधस्योभयत्र साम्यात् । स्मरणमेव तद्वस्तुतः प्रमुपितत्वान्न स्वरूपेण वेद्यत इति चेत् ; न, प्रमोपापरिज्ञानात् । अस्वसंवेदनं प्रमोप इति चेत्, न; प्रश्न- स्यैवोत्तरत्वात् 'किन्न स्मरणं तत्त्वेन संवेद्यते' इति प्रश्नः, तत्कथम् 'अस्वसंवेदनात्' इति सै एवोत्तरीभवति ? प्रश्नसमाधानयोरविशेषप्रसङ्गात् । न चास्वसंवेदनं संवित्तेः स्वमतव्या- घातात् । 'संवित्तिरपरोक्षा' इति स्वैमतत्वात् । अनुभवस्वरूपत्वेन ग्रहणं प्रमोप इति चेत; न; १० तंत्र तपस्याभावात् । असतश्च ग्रहणानभ्युपगमात् । अभ्युपगमे वा सिद्धमसद्विपर्य ज्ञानमिति कथं तद्व्यवच्छेदार्थमर्थपदं न भवेत् ? किम्चैवम् इदम्प्रतिभासस्यापि स्मरणत्वासगो रजतप्रतिमासादभेदात् । न हि स्मरणादभिन्नस्यास्मरणत्वम् । अभेदश्चाभेदप्रतिमासात् । विवेक एव तयोर्न प्रतिभासते नाभेद इति चेत; तहि रजतमपि न प्रतिभासते तदन्याप्रतिभासनस्यैव भावात् । रजतप्रतिभा- सनमेव तदन्याप्रतिभासनमिति चेत् अभेदप्रतिभासनमेव विवेकाप्रतिभासनमपि स्यात् । अभेदप्रतिभासनादन्यदेव "तदिति चेत् ; रजतप्रतिभासनाद् अन्यदेव अन्याप्रतिभा- सनमपि स्यात् । को दोप इति चेत् सकलप्रतिभासविरहप्रसगात् । स्मृतिप्रमोप इति चेत् ; न ; गाढमूर्छादेस्तत्त्वप्रसङ्गात् । इदम्प्रतिभासाभावान्नेति चेत् ; न ; 'तस्यापि अनिदम्प्रतिभासनिवृत्तिमात्रत्वेन तत्रापि भावात्। यदि च इदम्प्रतिभासोपाधिकाति-२० भासचिरहे एव तत्प्रमोपः ; सकलं जगत्तत्प्रमोप एव स्याद् इदम्प्रतिभासस्यैव सर्वत्र भावात् । कथं घटादिप्रतिभास इति चेत् ? न ; तस्याघटादिप्रतिभासनिवृत्तिमानत्वात्। तत्प्रतिभासत्वेना- नुभूयमानः कथं वदन्यप्रतिभासनिवृत्तिरेव स्यात् ? रजतप्रतिभासनमपि "तत्त्वेनानुभूयमानं कथं तनियुत्तिरेव स्यात् ? बाधनादिति चेत् ; न ; तत्प्रतिभासाभावे चाधनस्यैवासम्भवात् । प्राप्ते हि तस्मिन् बाधनं नामाप्ते निर्विपयत्वप्रसङ्गात्। प्राप्ती वा तस्य न तदन्यप्रतिभासनिवृत्तित्वमेव, २५ एव 1 "रजतमिदमिति नैक ज्ञान किन्तु वे एते विज्ञाने । तर रजतमिति स्मरणम् , तस्याननुभवरूपरवान प्रामाण्यप्रसारः । इदगित्यपि विज्ञानमनुभवरूपं प्रमाणमिप्यत एव ।"-प्रक० प. पृ० ४४ । बृह. प० पृ. ६५॥ २ "मसमीति शानशून्यानि स्मृतिशानान्येतानि"-बृह. पृ०७२ । अनन्तरच रजते स्मृतिर्माता तयापि च । मनोदीपातदित्वंशपरामर्शविवर्जितम् ॥"-प्रक. प.पृ. ३४ । ३ प्रश्न एव । ४ "किन्तु संविदा प्रत्यक्षत्वात्" -गृह पृ० ७६ । "प्रत्यक्षा च नो युद्धिरित्येतदुक्तं भवति प्रत्यक्षा च न संवित्"-गृह पृ०४७ । "स्वयं• प्रकाशैव मितिः"-मक-प०५०५७।५ सरगे।६ भनुभवरूपस्य । प्रत्यक्षमरणयो। "महणस्मरणे मे दिवस. नवभासिनी।" -प्रक. १०० ३४ । ८ प्रतिभासत इत्यन्वयः। ९ रजतभिन्नत्याप्रतिभासनात् । १. विवेका- प्रतिभासनम् । ११ सकलप्रतिगासाभावः । १२ गाटमू दी इवमिति प्रतिभागाभावात् । १३ इदम्प्रतिभासत्यापि । १५ गातमीदावपि । १५ इदम्प्रतिभासमानम् । १६ स्मृतिप्रमोपः । १० घटप्रतिभासत्वेन । १८ रजत्दैन ।
. न्यायविनिश्चयविवरणे [१३ रजतप्रतिभासतयेवानुभवात् । तदपहर घटादिप्रविभासोऽपि न कनिदिवि सर्वत्र इदम्पतिमा. सस्यैव सकलभेदप्रतिभासविकलस्य भावाई' विजयी परमात्मवादः स्यात् । अथवा, शून्दवाद एव इदम्प्रतिभासस्थाप्यपह्वयाविशेषात् । अशक्यापहवत्वे वा तस्य तद्वदेव रजवप्रतिभासस्य इदम्प्रतिभासात् तदभेदप्रतिमासस्य पाशक्यापहयत्वात् सिद्धम् इदम्प्रतिभासस्यापि स्मरण. ५ रूपत्वं रजतप्रतिभासात्तद्रूपाइभेडात् । स्पष्टप्रविभासत्यान्नैयमिति ; समान रजतमतिभासेजी। तन्नैप स्मृतिप्रमोपवादो न्याय्यः । तस्मादसदाचारप्रविभास एवायम् , तव्यवच्छेदार्थमर्थपदरूप इति व्यवस्थितमर्थवेदनस्यैव प्रामाण्यम् । कुतः पुनरर्थवेदनस्य तत्त्वावगमः १ प्रत्यक्षादिति चेत् । बदपि तदेव, सदर्यान्सर घा भवेत् ? वान्तरमिति पेत् ; नेकविषय पूर्वमादविशेषत् । न हि तदविशिष्टमेव १० तरप्रामाण्यमगमयति 'तत एव तदषगमनप्तङ्गात् । अव एष न सजातीयविषयम् , मिया. मानप्रामाण्यासगाध माविकालोपशानेऽयुत्तरवावीयानभायात् । संवादप्रत्यय एवं शलम अर्थक्रियाधिगमात्मा प्रत्यक्षमयशिप्यते । न च "तेनान्यविपयेग साधनहानत्यावीताय प्रामाण्य शक्यमवगन्तुम् अध्यक्षस्यातीतविषयत्वामावात् । तमार्थान्तयम् प्रत्यक्षात् तमामाण्याषगमः । तत एयेति चेत् । न ; सन्देहान् । उत्पन्नेऽपि हि जलशाने भाति सन्देहः 'विमिदं सत्य होयम् १५ अन्यथा या' इति । ततो न "ततः स्पषिपयस्यार्थनियासाधन वापगमः सम्भवति । न हि सन्दिग्पादेव प्रत्ययात्तत्यप्रतिपतिः अतिप्रसङ्गात् । अर्थशानस्य योधात्मरत्वमेव प्रामाण्यम् , वच तत एय तस्य सिद्धपतीति पेत् ; न; योधात्मरत्वस्य मिरलनेऽपि भार सम्पारि प्रामाण्यप्रसार । पाधाविधुरं पोधात्मकरसमेव प्रामाण्पमिति पेन्ग, पाधायेधुर्यस्याप्युत्तर यस्थायामप्रवेदनात् । मयेदने या न ततः प्रासंमानोपि (नोवि) पलभ्येत । नापगतप्रामाण्यावर पोपासवर्तमानस्य विश्लभो न्याया, सदवगमस्येवाभारममगार । एरोन मिध्याशानस्य स्वतोपाधिवपरिधान मसाल्यातम् । रवतो हिमपरिगाने म ! "फायधिसद्विपयासिया प्रतिः। न दिनिर्विषयत्य परिजानलेव सर पर प्रनिमनु. सरति सत्सरितानस्येवाभावापसे सम्म प्रथम पापविरहसिसिका अर्धरियाधिगमरमये यशप ससिद्धिः, स्नानारार्धबियाधिगमे दि जलस्य तस्माघनत्वं मतिपमाना वननिरिमभ्या. स्यतीति चेत् । नेप सत्सारम् । एयमबियाधिगमस्येवामगभराम् । वदधिगमो हिममिपूर्व, प्रति सोयस्यापारिल्यनिर्णयात् । न पानवतामाया नाप्रियः माभावि । यदि रियाधिगमात् प्रागेव कुत्रियोयोदनस्य माध्यमगत भाति तदा योयम्मान सम्पन्भागमाम् पर्शमानस्यानियाधिगमायुपर "वदर्भसारितोययनामापयनियनम् ।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव , १३] न चैव (व) तनिश्चयेन किञ्चित् , प्रागेव 'तस्य निश्चितत्वात् । अर्थक्रियासम्बन्धाच प्रामाण्ये मिथ्याज्ञानस्यापि प्रामाण्यप्रसङ्गः, तदधिगतादपि स्वप्नंसुरतादे रेतोनिर्गमाद्यर्थक्रियादर्शनात् । तत्कृता सा तक्रिया न भवति ततः कदाचित्प्राप्तरिति चेत् ; अन्यतोऽपि न भवेत् , ततोऽपि कदाचिदप्राप्तः । यत्र तत्प्राप्तिरसन्दिग्धा तत्त्रमाणमिति चेत्, न; प्रतिभासाभेदे सन्देह- स्यैवानिवृत्तेः । अभिलप्रतिभासं हि सत्यतोयज्ञानं तद्विपरीतात् , तत्कथं तत एव प्राप्तिसन्देहवि-५ निवृत्तिः ? विलक्षपाप्रतिभासात्तनिवृत्तिरिति चेत् । न ; सस्य तदानीमनुपरक्षणात् । पश्चादे. वाभ्यासात्तदुर्पलक्षणमिति चेत् । न ; परस्पराश्रयप्रसङ्गात्-आकारविशेषावधारणात्प्रामाण्यनिर्णये तज्ज्ञानाभ्यासः, ततश्च तथा तन्निर्णय इति। तन्न ततोऽन्यतो वा प्रत्यक्षात्तत्प्रामाण्यावगमः । .प्रतिपादितं चैतद्वार्तिकालकारे- "संवादः प्रत्ययः सोऽन्यविषये यदि वर्तते । तेन पूर्वस्य मानत्वंमतीतस्येक्ष्यते कथम् ? ॥ साधनप्रत्ययस्यापि सन्देहविपयत्वतः । साधनत्वं कथं तस्य प्रमाणत्वाप्रतीतितः ।। योधात्मकत्वान्मानं चेत्नसक्ता" "सर्वमानता अबाधितार्थबोधोऽपि प्रथमं न प्रसिद्ध्यति ।। अथार्थकारितां ज्ञात्वा तदर्थस्य प्रमात्ववित् । प्रमाणं प्रागसिद्धं यत् तस्य वित्तिः कथं ततः १ ।। यदि प्रमाणं प्राक् सिद्धं क्रियया तस्य "योगवित् । अर्थक्रियातस्तज्ज्ञानं प्रमाणमिति गृह्यते ।। यत्रैवार्थक्रिया तत्र प्रमाणमथ चेन्मतम् । अर्थक्रियोदयो दृष्टः "सोऽप्रमाणागतादपि ॥ 'ततो नार्थक्रिया सा चेत् । अन्यतोऽपि कथं मता । ततः कदाचिदप्राप्तिः साऽन्यत्रापि" समीक्ष्यते ॥ यतो न प्राप्तिसन्देहस्तत्ममाणं मतं यदि । सन्देहस्य निवृत्तिर्हि समानाकारतः कुतः ? ।। अभ्यासालक्ष्यते पवादाकारः स विलक्षणः । ततःप्राप्त्यविनाभावः एप सोज्योज्यसंश्रयः॥" [प्र. वार्तिकाल० ११४ ] इति । २० । तीयवेदनप्रामाण्यस्य । २ मुप्तसुर-आ०, घ०, ५०, स० । ३-मादर्थ-पा०, ५०, १०, स० । धमिध्याज्ञानाधिगतस्वममुरतादिकृता । ५ सत्यज्ञानाधिगतादपि । ६ सरप्रामाण्यसि-भा०, ब०, ५०, स०। ७-हनि-भा०, ५०,५०, स.1 विलक्षणप्रतिमासानुमवनम् । ९-त्वमिति तस्य-स.11.-सर्वमानसा मा०प०, १०, स.1 " अर्थक्रियासम्बन्धज्ञानम् । १३ "सोऽप्रमाणान्मतादपि"-. पार्तिकाल । २५ सप्रमाणात् । १४ अप्रमाणहातात् । १५ प्रमाणवतेऽपि ।
भ्यायविनिश्चयविधरणे मा भूप्रत्यक्षात मामाण्यावगतिः अनुमानावेत, तथा हि-नानपानादिसमर्थतोय. दर्शनाहितसंस्कारस्य तोयान्तरदर्शने पूर्वतोयानुरमरणात् 'इदमपि तोयं स्नानादिप्रयोजनश्रम् शाशरगत् पूर्वतोयवत्' इति वोयार्थरियासम्स्यविपयानुगानगुपजायते । तदेव च सोयवेदनप्रामाण्यवानम्, अर्थक्रियासम्बन्धादन्याय प्रामाण्यस्याभावाद् अबाधितत्वादेरपि ५ चंदायचत्वादिति चेत् ; असारमेतत् ; साध्यसाधनसम्बन्धाप्रतिपत्तो अनुमानानुदयात् । तत्सवि. पत्तिध न प्रत्यक्षात , सत्मामाण्यानिधयात् । अनुमानानिधयश्चेत्, न; परस्परानयप्रसङ्गात्--अनुमानेत प्रत्यक्षमामाण्यनिश्चये वा सम्बन्धमानम् , तवयानुमानमिति । 'फयं या प्रत्यक्षेण प्रागपि ठोयतत्प्रयोजनयोः पूर्वापर- समयभारिनो सम्पन्धवेदनम् ? कयन्त्र न स्यात् ? इतरेतरविषयपरिहारेणावस्यानात् । तोयप्रत्यई १० हि तोयमानगोचरं न समयोजनविषयम्, अपरिच्छिन्नतत्प्रयोजनश्च कर्य रखेतुत्वं खविपयस्य जानीयात तत्प्रयोजनमत्याच स्नानादिमानपर्यवसितं न पूर्वतोयमधिगच्छति, अनधिगवतद्रूपाव कथं वत्कार्यस्व स्वविषयस्य गृहीयात् ? न च तत्समुदायेन सम्बन्धवेदनम् , क्रमभावितो. स्तदैमावात् । नाप्येकमुभयसमयव्यापि प्रत्यक्षम् । क्षणिकत्वात् सर्वभावानाम् । भवदपि सम्बन्धप्रहणं प्रत्यक्षारादि व्याप्ट्या भवति तदा भगत्यनुमानं व्यभिचार. १५ परिशहनाभावात् । न हि सकलदेशकालभापिनस्तोपकलापस्य स्नानपानादिप्रतिमन्धनिर्धारणे ऽयभिचारसम्मायनं सम्भवति, निर्धारणसम्भावनयोविरोधात् । अपि तु नामदादिप्रत्यक्षास व्यापिसन्यन्धप्रक्ष्णे सामध्यमस्ति ; सर्वस्य सर्वदर्शित्वासहा । साहचर्यभानस्य तु ध्यामिविकरस्य न सम्बन्धत्वम् । न च तत्परिक्षामादनुमानम् , व्यभिचारसम्भवात् । सम्मवन्यभिचारादप्यनुमाने तत्पुरत्यादेरपि स्यात् । तस्माद् व्याप्त्या सम्बन्धमानमङ्गीकर्त. व्यम् । न घरान प्रत्यक्षस्य सामर्थ्यम्, वेन हि पुरोवर्षिन एप गोयस्य तदर्थक्रियासम्बन्धः परिगृह्यते न देशालान्तरभाविनः तत्व तेनामहणात्, अहणे वा तदधिकरणस्य देशादेरपि सर्वस्य तेन प्रहणं स्यात्, अन्यथा तंद्रगतसकलतोयव्यतिपहणाभावेन व्याप्त्या सम्बन्धज्ञानस्या- सम्भवादनुमानामाव एव स्यात् । सम्बन्धज्ञाननिरपेनमेशनुमानमिति घेत , न, प्रतिपादकवत् प्रविणद्यस्यापि स्वत एव वत्प्रसङ्गात् , तथा च गतमिदानी शिष्योपाध्यायादिव्यबहारेण । वन्न युक्तिसइमेतत् साहसातिरेकत्यास् । तर "शान्तवोयतत्प्रयोजनसम्बन्ध स्थापि प्रत्यात्मविपति:- अनुमानात्तत्प्रतिपत्तो तनावपरी'टेष्टान्तः, तस्यापि स्वप्रयोजनसम्बन्धोऽनुमानान्तरायगन्तव्यः सायेदमित्यपरापरानुमानप्रतीक्षायामनवयानान प्रस्ततोयज्ञानप्रामाण्यसिद्धिः स्यात् । को .. २० - २५ -- स -वातत्पूर्व-मा०, ०, २२ . २ अर्थविभासम्बधायापार । । अविनामावनिश्चय । १ समुदायासम्भवात् । । सर्वोपसहस्रेप १५ किन्नु। अधिनाभावश्यस्य । ५ गर्भस्य मैत्रताय. यासो 'भवितुमर्हति तत्पुरत्वादितरप्रवन्' इत्यादै । ८ मा स-मा०, २०, ०० ५ सकलदेशपात । १. दशारणीतचौयान्तस्यापि भाग, १०, प.स.1 1 - १० २३] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः न प्रत्यक्षात् नानुमानात् प्रामाण्यावगमः, न चापरं प्रमाणमस्ति यतस्तदवगमः स्यात् । तत्कथं प्रमाणसिद्धिः यतस्तल्लक्षणप्रणयनमिति ? एतदपि तनव प्रतिपादितम्- "तदृष्टाव्य दृष्टेषु संवित्सामर्थ्य भाविनः । सरणाद् व्यवहारवेदनुमान तथा सति ॥ तच्चानुमानमध्यक्षादध्यक्षमनुमानतः। अन्योन्यसंश्रयादेवं नास्त्यन्यतरसंस्थितिः ॥ स्वरूपस्वालम्बनाकारपरिच्छेदि हि प्रत्यक्षं न हि तृणस्यापि कुञ्जीकरणे समर्थम् । न पूर्वापरयोस्तेन सम्मन्धः परिगृह्यते । देशकालान्तरव्याप्त्या सङ्गतियोग उच्यते ॥ देशकालान्तरल्याप्तेरध्यत्तं ग्रहणे क्षमम् । यदि; सर्वस्य सर्वार्थदर्शितैव प्रसज्यते ।। सहभावस्तु यो [s]व्याप्त्या न तस्मादनुमोदयः । कादाचित्कतया वयं सर्वत्रास्त्यनुमाऽथया ।। इदानीमेवमाकारमेतदस्तीति वेद्यताम् । अध्यक्षतः, न देशाधन्तरस्थग्रहणं ततः॥ अगृहीते च देशादौ तद्व्याप्तिर्गृह्यते कथम् ? । तदग्रहेऽनुपानं चेदेवदत्यन्तसाहसम् ।। अनुमानान्तराक्षेपादनवस्थावतारतः। प्रकृताप्रतिपत्तिः स्यात्तस्य तस्येत्यपेक्षणात् ।। प्रत्यत्तानुमानाभ्यामपरं मानमिष्यते ।" [प्र. वार्तिकाल. ११५] इति चेत्, अत्राह -'प्रत्यक्षलक्षणम्' इति । प्रतिपक्षमक्ष्णोतीति प्रत्यक्षम् , परस्यानन्तरं विचारज्ञानम् , तेन प्रमाणप्रतिपक्षस्य तदभावस्य स्वविषयत्वेन व्यापनात् , तदेव लक्ष्यतेऽनेनेति लक्षणम् , प्रत्यक्षं लक्षणं यस्य तत्तथोक्तम् अर्थवेदनम् । कथं पुनः परविचारेणार्थज्ञानस्य तत्त्वमयागम्यत इति चेत्? उच्यते-यद्ययं विचारः प्रमाणं न भवति, कथमतः प्रमाणाभावसिद्धिः २५ तद्भावसिद्धिवत् । न चैवं कस्यचित् पचित्पराजयः , प्रमाणनिरपेक्षायाः स्वार्थसिद्धः सर्वत्र सुलभत्वात् ? नापि विजयः , तस्य पराजयसापेक्षत्वात् , 'तस्य चाभावादित्यभाव एव चादव्य- वहारस्य "प्राप्तः । तस्मात्परपक्षव्युदासेन स्वपक्षसिद्धिमन्विच्छता प्रमाणमूलैव तत्सिद्विरङ्गी- कर्तव्या नान्यथा अतिप्रसङ्गात् । १५ २० , प्रमाणबार्तिकालकार एव । २-करणसम-भा०, २० । ३ प्रत्यक्षेण । ४ ये व्या-मा०,५०,० ५ भन्याप्त्या अविनाभावमन्तरेण । ६ सहभावस्य । ७ व्यातिमहणमन्तरेण । ८ प्रामाभ्याभावस्य । ९ अप्रमा- णत्वम् । १० पराजयस्य । ११ प्राप्तिस्त-आ०, २०, ५०, सः ।
• . १० न्यायचिनिश्चयविधरणे भवतु विचारः प्रमाणमिति चेत् ; सांवृतम् , पारमार्थिक वा ? सांकृतले न ततः पारमार्थिकी प्रमाणामावसिद्धिा, उपायस्य सांवृतत्वे तदयोगात्, अन्यया तव एव वादशी सद्भाव सिद्धिरपि स्यादित्यपार्थकत्वमेव प्रमाणनिराकरणप्रयासस्य प्राप्तम् । तेदावसिद्धी सांवमपि प्रमाणं मास्तीति चेत् किमिदानी मनोराज्येऽपि दारिद्रयमस्ति ? विचारयाहां प्रतिभासमान हि ५ संऐतिः, सा च येयाययं प्रमेयेषु विद्यत एव प्रवादिनाम्। विचारामिका न विद्यत इति चेत् ; न; वस्या अपि "प्रमाणमात्मसात्कुर्वन्" न्यायवि० सो० ४९] इत्यादिरूपायाः प्राथुर्येण भावात् । सांकृतात्प्रमाणात प्रमाणामायसिद्धिरपि सांप्रतेवेति चेत् ;न; तथापि वप्रयासवैययस्य वदवस्यत्वात् , साँवृतस्य तदभावस्थारमाभिरप्यङ्गीकारा पास्तपस्येव वस्यागभ्युपगमात् । वन्न सांवत्वेन विचारः प्रमाणम् । पारमार्थिकस्येनेति पेत् ; ; ततोऽप्यपरिक्षावात् स्वार्थसिद्धरयोगात् । स्वतः प्रामाण्यनिराकरणाभावप्रसङ्गात् । नापि परिक्षावात् ; स्वतः परतश्च तत्परिज्ञानाभावस्य स्वयमेव प्रतिपादनात् । अस्त्येव तत्सरिज्ञानमभ्यासात् , अपामाणासम्भविनः प्रतिभासविशे. पस्याभ्यासवलेनावधरणात् । 'तत्पमाण्यपरिक्षाने भूयस्तदभ्यासः, तस्मा। तत्परिझानम्' इति परस्पपश्य इति चेत् । स्यादेवं यदि वत्कृतादेवाभ्यासात् तत्परिक्षानम् , न चैवम् , पूर्वा. १५ झ्यासस्य वत्परिझानहेतुत्वात् , तस्यापि तथाविधतत्पूर्वज्ञानाभ्यासतो भावात् , इत्यनादिरय- मध्यासमबन्धा, तत्र पूर्वपूर्वरमादवधृतविशेषस्यैव उत्तरोत्तरज्ञानस्योत्पत्तेः न विचारप्रामाण्य- परिमानमिति चेत् । अनुकूलमाचरसि ; प्रत्यक्षादेरप्येवं प्रामाण्यपरिज्ञानस्यानपवादस्य प्रसङ्गात , तत्राप्यभ्यासबलेनेव प्रमाणप्रत्यनीकपदार्थासम्भविनः प्रतिभासविशेपस्य "अप्रवृत्तेनैवाब- धारणात् प्रामाण्यपरिज्ञानत्योपपत्तेः, अभ्यासानादित्वेनैव परस्पराश्रयस्यापि परिहारात् । न २० पाभ्यासादेव "तद्विशेषावधारणात् ; तदभावेऽपि क्षयोपशमापरनामधेयाइदृष्टसामर्थ्यादप्रवृत्तस्यैव तवधारणसम्भवात् । ततो निराकृतमेतत्-"यवो न प्राप्तिसन्देहः" [प्र०वार्तिकाल० ११५] इत्यादि। 'समानाकारतः' इत्यस्यासिद्धत्वात् विशेपायधारणस्यैव भावात् । दृश्यते घ घालायलादीना. मपि 'पुरोवर्तिभावप्रतिमासेष्व [दृष्टाद] भ्यासतो या प्रवृत्तेः प्रागेव 'सत्यार्थोऽयम् अन्यथैव चायम्' इति देशकालनरान्तरापेक्षयाऽप्यसम्भवत्परिस्खलनस्य विशेषस्थावधारणम् । अव 'ऐव वक्ष्यते- "इन्द्र जलादिषु प्रान्तमीरयन्ति न चापरम् । अपि चाण्डालगोपालवाललोलविलोचनाः ।। तत्र शौद्धोदनेरेर कथं प्रज्ञाऽपराधिनी। पभूयेति वयं तावद्वहुविस्मयमास्महे ॥" न्यायवि० श्लो० ५१,५२] इति । ,पारमार्थिकी। ३ प्रमाणसद्भावसिद्धौ। ३ द्रव्यम्-पृ. टि.११यपा यथा -बा0,4040, 8.1 ५-दन्तीत्या-भा.म.प.स. १६-वे वि-१०-रणमाव-ता०1८ स्यादेतदेव स०१५ पदार्थ. सम-भा०,०,१०स० पुरुपेश, प्रहरी भागेप। प्रतिभासविशेषावधारणम् । १२ इत्यस्यापि सिद्धि- भा.सा इत्यस्यापि सिद्ध-२०१३-स्य भावा-ता०१४ पुषतिप्रतिमात्त्येष्टभ्यापतो या मा०,०,५॥ पुरोवर्तिप्रतिभासैष्टस्यासतो वास य एवं व-भा, ३०, प.स.I-रयन्ते न मा., ०, प.
.. . - ३] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव अपरिस्खलितप्रत्ययवेद्योऽपि स विशेषो न तात्त्विक इति चेत् ; व्याहतमेतत्- 'प्रत्ययश्च न परिस्खलति, स च तात्विको न भवति' इति, विपयतात्त्विकत्वनिवन्धनत्वात् तत्प्रत्ययापरिस्खलनस्य । वासनादाय निवन्धनमेव तदपरिस्खलनं न तद्विपयभावनिमित्तमिति चेत् ; न ; अत्रापि प्रत्ययापरिस्खलनस्यैवोपायत्वात् , तस्य चायथार्थवे' ततोऽस्याप्यर्थस्या- सिद्धः । अयमप्यभाविक एवार्थ इति चेत् ; कुत एतत् ? सथैव प्रत्ययापरिस्खलनादिति ५ चेत् ; न तस्यायथार्थत्वेन यथार्थतदभाविकत्वसिद्धायनुपयोगात् । तदभाविकत्वमप्ययथार्थमेवेति चेत् ; न ; 'कुत एतत्' इत्यादेरनुवृत्तेरनवस्थाप्रसगात् । यदि च घासनादायहेतुकत्वस्या- भाविकत्वमप्ययथार्थमेव, भाविकमेव तर्हि तत्प्राप्तम् , अभाविकत्यायथार्थत्वे भाविकत्वस्या- वश्यमनवमव)स्थानात् । तस्यापि न परिज्ञानोपायः ; प्रत्ययापरिस्खलनस्यायथार्थत्वप्रति- पादनात् । अथेदं वासनादाय॑हेतुकत्वात स्यापरिस्खलनं न वासनादााद् अपि तु तद्धेतु.. १० कत्वलक्षणस्वविषयस्य भावत एव भावात् ; किमेवं प्रत्यक्षादिप्रामाण्यप्रत्ययस्याप्यपरिस्सलनं तत्प्रामाण्यलक्षणतद्विपयतावादेव न भवति यतो वासनादाळनिमित्तत्वेन तंतस्तत्प्रमाण्य- सिद्धिनं भवेत् । अवश्य चैतदेवमभ्युपगन्तव्यम् , अन्यथाऽनन्तरविचारस्यापि प्रामाण्या- सिद्धिप्रसद्गात् । न हि तत्प्रामाण्यमपि तद्विपयप्रत्ययापरिस्खलनादन्यतः सिद्धपति, "तस्माच्च तद्विपयसद्भावप्रयुक्तादेव "तसिद्धिर्न वासनादाळप्रयुक्तात् । न चासिद्धप्रमापयाद्विचारात् १५ प्रत्यक्षादीनामप्रामाण्य सिद्धयतीत्युक्तम् । अथ न विचारः 'प्रमाणम् अन्यथा" या' इति विचारयितव्यः। स खलु परस्य परी. क्षाहेतुरेष न स्वयं परीक्षाभूमिः अनवस्थाप्रसङ्गात् । तत्परीक्षायां हि विचारान्तरमवश्यम्भावि, विना तेन परीक्षाऽयोगात., तत्परीक्षायामिति पुनर्विचायन्तरमिति परापरविचारपरीक्षायामेव आसंसारं व्यापारान्न प्रकृतप्रत्यक्षादिप्रामाण्यपरीक्षायां व्यापारः स्यात् । ततः सुदूरं गत्वापि २० अविचारितादेव कुतश्चिद्विचारात् तदपरपरीक्षायाम् आद्यादपि तथाविधादेव विचारात्प्रत्यक्षादि- प्रामाण्यं परीक्ष्य परित्यज्यत इति चेत् ; ननु तत्परित्यागो नामाप्रामाण्यमेव प्रत्यक्षादीनाम्, तत्कथम्, अकृतविचाराद्विचारप्रामाण्यात् सिद्धयति ? प्रामाण्यमेव वा "तेषां ततः किन्न सिद्धधति ? सिद्धयति न परं (ति पर) तत्तुन पारमार्थिकं व्यावहारिकत्वात्। इदमेव हि तस्य व्याव- हारिकत्वं यदपरीक्षापरिशुद्धप्रमाणसिद्धत्वम् । न हि तथाविधस्य पारमार्थिकत्वम् ; परीक्षापरिशुद्ध- २५ प्रमाणवेद्यस्य "तत्त्वात् । इन्चाभिमतगेव बौद्धस्य, "प्रामाण्यं व्यवहारेण" [प्र०या० १५] इति वचनादिति चेत् ; कथमिदानी विचारप्रामाण्यस्य पारमार्थिकत्वम् । तस्याप्यपरीक्षाशुद्धत्वात् । -- 1-खेन ततोप्यर्थसिद्धः भाग, ब०,५०।२ अस्खलत्प्रत्ययात् । ३ प्रत्ययापरिस्खलन वासनादानिमित्र न तद्विषयभावनिमित्तमित्यस्य । ४ अभावरूपः । भावरूपमेव । १-यस्याप-आ०,०, १०, स०।७ प्रत्य- यापरिस्खलनात् । ८ प्रामाण्यसि-स०, ५०, ता० । ९-प्रत्ययपरि-ता० । १० प्रत्ययापरिस्सलनात् । । विचार- प्रामाण्यसिद्धिः । १२-या न वेति पा०, ब०,प०,स.। १३ विचारः। विचारितादेव । १५ प्रत्यचादीनाम् । १६ विवारिताद्विवागत् । १७ पारमार्षिकत्वात् ।
-- १० न्यायविनिश्चयविवरणे (१३ भवतु विचारः प्रमाणमिति चेत् ; सांकृतम् , पारमार्थिक पा? सांवृतत्वे न ततः पारमार्थिफी प्रमाणामावसिद्धिा, उपायस्य सांतवे तदयोगात्, अन्यथा तत एव तोदशी तद्भाव. सिद्धिरपि स्यादित्यपार्थक्त्वमेव प्रमाणनिराकरणप्रयासस्य प्राप्तम् । तद्भावसिद्धी सांवृतमपि प्रमाणं नास्तीति चेत् ; किमिदानी मनोराज्येऽपि दारिद्रयमस्ति ? विचारवाह्य प्रतिमासमा हि ५ संयुतिः, सा च यथायथं प्रमेयेषु विद्या एव प्रवादिनाम्। विचारारिमका न विद्यत इति चेत् , न; तस्या अपि "प्रमाणमात्मसारकुन्" न्यायवि० श्लो० ४९] इत्यादिरूपायाः प्राचुर्येण भावात् । सांताप्रमाणात प्रमाणाभाषसिद्धिरपि सांडवैवेति चेत् न , तथापि तत्प्रयासवैययस्य तदवस्थत्वात्, सांवृतस्य तदभावस्यास्माभिरप्यङ्गीकाराद् वास्तवस्येव तस्यानभ्युपगमात् । तन्न सांवृतत्वेनं विचारः प्रमाणम् । पारमार्थिकस्येनेति चेत् ; न ; ततोऽप्यपरिहातात् स्वार्थसिद्धरयोगात् । स्वतः प्रामाण्यनिराकरणाभावप्रसगात् । नापि परिशातात् ; स्वतः परतश्च तत्परिज्ञानामावस्य स्वयमेव प्रतिपादनात् । प्रस्त्येव तत्परिक्षानमभ्यासात् , अप्रामाणासम्मविनः प्रतिभासविशे- पस्याभ्यासयलेनावधरणात् । 'तममाण्यपरिमाने भूयसदभ्यासः, तस्माच तत्परिज्ञानम्' इति परस्पयश्रय इति धे, स्यादेवं यदि तत्कृतादेवाभ्यासात् तत्परिज्ञानम् , न चैवम् , पूर्वा. १५ भ्यासस्य तत्परिज्ञानहेतुत्वात् । तस्यापि तथाविधवत्पूर्वज्ञानाभ्यासतो भागत् , इत्यनादिरय- मभ्यासप्रबन्धः, तर पूर्वपूर्वस्मादवकृतविशेपस्यैव उत्तरोत्तरज्ञानस्योत्पत्तेः न विचारप्रामाण्य- परिज्ञानमिति चेत् ; अनुकूलमाचरसि ; प्रत्यक्षादेरप्येवं प्रामाण्यपरिक्षानस्यानपवादस्य प्रसङ्गात् , ताप्यभ्यासरलेनैव प्रमाणप्रत्यनीकपदार्थासम्भावना प्रतिमासविशेषस्य "अप्रवृत्तेनैवाव- धारणात् प्रामाण्यपरिज्ञानस्योपपत्तेः, अभ्यासानादित्वेनैव परस्पराश्रयस्यापि परिहारात् । न २० पाभ्यासादेव "तद्विशेषावधारणात् ; तदभावेऽपि क्षयोपशमापरनामधेयादयसामर्यादप्रवृत्तस्यैव तदवधारणसम्भवात् । ततो निराकृतमेतत्-"यतो न प्राप्तिसन्देहः" प्र०वार्तिकाल० १५) इत्यादि। 'समानाकारतः' इत्यस्यासिद्धत्वात् विशेपावधारणस्यै] भावात्श्यते पचालावलादीना. मपि 'पुरोवर्तिभावप्रतिभासेप्प धाद] भ्यासतो वा प्रवृत्तेः प्रागेव 'सत्यार्थोऽयम् अन्यथैव चायम्' इति देशकालनरान्तरापेक्षयाऽप्यसम्भवत्परिस्खलनस्य विशेपस्यायधारणम् । अव 'ऎव वक्ष्यते-- "इन्द्रजलादिषु प्रान्तमीरयन्ति" न चापरम् । अपि चापडालगोपालचाललोलविलोचनाः ।। तत्र शौद्धोदनैरेख कथं प्रज्ञापराधिनी । बभूवेति वयं ताबहुविस्मयमास्महे ॥" न्यायविश्लो० ५१,५२] इति । पारमार्थिको । २ प्रमाणसद्धावसिद्धौ । ३ इटव्यम्-पृ. १३ टि. यया यथा प्र-मा०,२०T., स। ५-दन्तीत्या-मा०,२०,५०,०1-वे वि-९० 10-रणमाव-ता.14 स्यादेवदेव सागर पार्थ- सम-आ०,५०,०,९०11० पुरुषेय, प्रारी प्रागैव । "प्रतिमासविशेषावधारणम् । १२ इत्यस्यापि सिद्धि- मा.स.1 इत्यस्यापि सिद्ध-प० । १३-स्य भावा-ता1 पुरोवर्तिप्रतिमास्यैष्टभ्यासती वा मा. पुरोवर्तिप्रतिभामैत्रत्यासतो वास। १५ एवं व-म, २०,०स०१६-रयन्ते न मा., ०,१०, स..
७७ .. १॥३] मथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव अपरिरखलितप्रत्ययवेद्योऽपि स विशेपो न तात्विक इति चेत् ; व्याहवमेतत्- 'प्रत्ययश्च न परिस्खलति, स च तात्विको न भवति' इवि, विषयतात्त्विकत्वनिबन्धनत्वात् तत्प्रत्ययापरिस्खलनस्य । वासनादानिबन्धनमेव तदपरिस्सलन न तद्विपयभावनिमित्तमिति चेत् । न ; अनापि प्रत्ययापरिस्खलनस्यैवोपायत्वात् , तस्य चायथार्थत्वे' ततोऽस्याप्यर्थस्या- सिद्धः । अयमप्यभाविक एवार्थ इति चेत् ; कुत एतत् ? तथैव प्रत्ययापरिस्खलनादिति ५ चेत्न 3: तस्यायथार्थत्वेन यथार्थतदभाविकत्वसिद्धावनुपयोगात् । तद्भाविकत्वमप्ययथार्थमेवेति चेत् ; न ; 'कुत एतत्' इत्यादेरनुत्तेरनवस्थाप्रसङ्गात् । यदि च पासनादायहेतुकत्वस्या- भाविकत्वमप्ययथार्थमेव, भाविकमेव तर्हि तत्प्राप्तम् , अभाविकत्वायथार्थत्वे भाविकत्वस्या- वश्यमनव मव)स्थानात् । तस्यापि न परिज्ञानोपायः ; प्रत्ययापरिस्पलनस्यायथार्थत्वप्रति- पादनात् । अथेदं पासनादायहेतुकत्वप्रत्ययस्यापरित्खलनं न वासनादाढयाद् अपि तु तद्धतु-१० कत्वलक्षणस्वविपयस्य भावत एव भावात् ; किमेवं प्रत्यक्षादिपागाण्यप्रत्ययस्याप्यपरिस्सलनं तत्मामाण्यलक्षणतद्विषयतद्भावादेव न भवति यतो वासनादानिमित्तत्वेन ततस्तत्प्रमाण्य- सिद्धिनं भवेत् । अवश्यं चैतदेवमभ्युपगन्तव्यम् , अन्यथाऽनन्तरविचारस्यापि मामाण्या- सिद्धिप्रसङ्गात् । न हि तत्प्रामाण्यमपि तद्विपयर्प्रत्ययापरिस्खलनादन्यतः सिद्धयति, "तस्माच तद्विपयसद्भावप्रयुक्तादेव "तत्सिद्धिर्न वासनादायप्रयुक्तात् । न चासिद्धप्रमाण्याद्विचारात् १५ प्रत्यक्षादीनामप्रामाण्यं सिद्धयतीत्युक्तम् । अथ न विचारः 'प्रमाणम् अन्यथा" या' इति विचारयितव्यः। स खलु परस्य परी- क्षाहेतुरेव न स्वयं परीक्षाभूमिः अनवस्थाप्रसङ्गात् । तत्परीक्षायां हि विचारान्तरमवश्यम्भावि, विना तेन परीक्षाऽयोगात् , तत्परीक्षायामिति पुनर्विचारान्तरमिति परापरविचारपरीक्षायामेव आसंसारं व्यापारान्न प्रकृतप्रत्यक्षादिप्रामाण्यपरीक्षायां व्यापारः स्यात् । ततः सुदूरं गत्वापि २० अविचारितादेव कुतश्चिद्विचारात् तदपरपरीक्षायाम् आद्यादपि 'तथाविधादेव विवायत्मत्यक्षादि- प्रामाण्य परीक्ष्य परित्यज्यत इति चेत् ; ननु तत्परित्यागो नामामामाण्यमेव प्रत्यक्षादीनाम्, तत्कथम् अकृतविचायद्विचारप्रामाण्यात् सिद्धपति ? प्रामाण्यमेव वा "तेषां ततः किन्न सिद्धपति ? सिद्धयति न परं (ति पर) तत्तुन पारमार्थिक व्यावहारिकत्वात्। इदमेव हि तस्य व्याव- हारिकत्वं यद्परीक्षापरिशुद्धप्रमाणसिद्धत्वम्। न हि तथाविधस्य पारमार्थिकत्वम् । परीक्षापरिशुद्ध- २५ प्रमाणवेद्यस्य "तत्त्वात् । इदञ्चाभिमतमेव बौद्धस्य, "प्रामाण्य व्यवहारेण" [प्र०वा. ११७] इति वचनादिति चेत् ; कथमिदानी विचारप्रामाण्यस्य पारमार्थिकत्वम् ? तस्याप्यपरीक्षाशुद्धत्वात् । 1-स्वेन ततोप्यर्थसिद्धेः भा०, ब०, ५०।२ अस्खलन्प्रत्ययात् । ३ प्रत्ययापरिस्खलनं वासनादाळनिमिर न तद्विश्यभावनिमित्तसमित्यस्य । ४ अभावरूपः। ५ भावरूपमेव । ६-यस्याप-भा०,३०, ५०, स०। ७ प्रत्य. यापरिस्खलनात् । ८ प्रामा -स०, ५०, ता०1९-प्रत्ययपरि-ता.13 प्रत्ययापरिस्खलनात् । ३॥ विचार- प्रामाभ्यसिद्धिः । १२-या न घेति भा०,ब०,०स० १३ विचारः। १४ अविचारितादेव । १५ प्रत्यक्षादीनाम् । १६ अविचारिताद्विचारात् । १७ पारमार्थिकत्वात् ।
७८ .. .. न्यायविनिश्चयविवरणे [१३ भवतु को दोप इति चेत् । न ; ततः प्रत्यक्षादीनामप्रामाण्याय पारमार्थिकस्यासिद्धिसङ्गात् । नापारमार्थिकादुपायात् पारमार्थिकस्य कस्यचित्सिद्धिः अन्यया 'तथाविधादेव प्रत्यक्षादि- प्रामाण्यात् वहिरोदेरपि पारमार्थिकार्य सिद्धिः स्यादिति व्यर्थ प्रामाण्यस्य व्यावहारिकत्वोप- वर्णनं प्रयोजनाभावात् । तद्धि. बहिरादेः पारमार्थिकस्य निगमरणार्थ परेरम्यनुज्ञातम् , इदानी पुर्नस्तथाविधादेव तस्मात् पारमार्थिकाहिरादिसिद्धौ कथन्ने प्रयासमानमेव तघ्याव- हारिकत्ववर्णनं भवेत्, तद्विपयपारमार्थिकरवनिराकरणस्याभिमतस्यासिद्धः १ 'विपर्यपरमार्थत्वे विपयिणः कथमपरमार्थत्वम्' इत्यपि न पर्यनुयोगः, विचारप्रामाण्येऽपि साम्यात् । अप्रामाण्यमध्य- पारमार्थिकमेव प्रत्यक्षादीनामिति चेत् ; न ; प्रयासवैफल्याद् अविप्रतिपत्तेः । न झपारमार्थिक तमामाण्य कस्यविद्विपतिपत्तिरस्ति येन तत्साधनप्रयास [E] साफल्यमुद्हेत् । अपारमार्थिकत्वे १. चापामाण्यत्य प्रामाण्यमेव तेषां पारमार्थिक भवेत् । तदपि अपारमार्थिकमिति चेत् ;न3 परस्परपरिहारस्थितित्वभावयोरेक्स्य पारमार्थिकत्व एवान्यायापारमार्थिकत्योपलम्मात् नित्यत्वाऽ- नित्यत्ववत् । सत्येव ह्यनित्यत्वस्य पारमार्थिकत्वे नित्यत्वस्यापारमार्थिकत्वं परस्यापि प्रसिद्धम् , तत्कथमुभयापारमार्थिकत्वम् ? ततो यदि प्रामाण्यमपारमार्थिकमेव अप्रामाण्येन "तविपरीवेन भवितव्यमिति कथनोतो दोप:-'यदपरिशोधितप्रामाण्याद्विपारात्प्रामाण्यवत्तदपि १५ सिद्धपति' इति? कासत्यत्वभन्योऽन्यपरिहारस्वभावयोः । "विनाऽन्यतरसत्यत्वं नास्ति नित्येतरत्वक्त् ॥२३८॥ तन्नोभयोरसत्यत्वं क्वचिन्मानेतरत्वयोः । मानत्वं चेदसत्यं स्यात् ; सत्यमावश्यकात्परम् ॥२३९॥ तर दोपः कथनोक्तो विचारादपरीक्षितात् । प्रामाण्यस्येव तस्यापि न सिद्धिस्ताविकीति यः ॥२४॥ न विचारादमानवं येनैवं प्रतिपाद्यते । प्रत्यक्षादेः प्रमाणत्वं किन्तु दुर्बोधमुच्यते ॥२४१॥ इति चेत् , अपरिज्ञानं तदस्ति यदि तत्त्वतः । पहिरर्यादिरस्येव तन्मानस्यानिपेधनात् ॥२४२॥ वथा च कथमच्येत "स्वरूपस्य स्वतो गतिः ।" [५० या० ११६ ] प्रमाणाद्वहिरादेरपि यद्गतिरक्षता ॥२४३॥ न २० १अपारमार्थिकादेव । २-स्यासि-आ०, २०, ५०, स.1 ३ चौगते विज्ञानवादिमि. ४ अपार माथिकादेव । ५- तत्प्रया-आ०,१०,१०, ६ विषयपारमार्थिकले आग, ९, १०, R.1 --स्यादपि प्रति-आ०,०प०स०। चाप्रामाण्यमेव तेषां ता०।९ प्रत्यक्षादीनाम् । १. प्रामाण्यमपि । पारमार्थिक केन । १२ एकसत्यत्व-ar३ विनान्यतरास-आ०, २०, सा, सा11४ प्रत्यक्षादीको प्रामाण्यम् । १५ प्रामाण्याच-प। निर्दष्ट।
- -२३] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव मानाच्चेदपरिज्ञाताद्विपयो नाधिगम्यते । मानमेव कथं वत्स्याद्विपयाधिगमाक्षमम् ॥२४४॥ अथ नास्त्येव ; नास्तित्वं तर्हि तस्य प्रतीयताम् । दुर्बोधत्वं कथं तस्य विचारात्परिकल्प्यते ॥२४५॥ अस्त्वेवमिति चेत् ; तस्याभावः कीदृश उच्यताम् । तुच्छश्चेत् ; स कुतः सिद्धः ? विचाराच्चेद्ययोदितात् ; ॥२४६॥ प्रतिबन्धाटते तस्य तस्मासिद्धिः कथं भवेत् ? । प्राह्यग्राहकमावो यत्प्रतिवन्धे परैर्मतः ॥२४७॥ तादात्म्यं चेद्विचारस्याभावेनें ; अभाव एव तस्यापि सिद्धिरन्यस्माद्विचाराचाहगात्मनः ॥२४८॥ तस्याप्यन्यत इत्येवमनवस्थानमुद्भवत् । प्रामाण्याभावसंसिद्धिं प्रतिबध्नाति तावकीम् ॥२४९॥ नाप्यभावात्समुत्पत्तिर्विचारस्यास्त्यशक्तिकात् । नासक्त सरशृङ्गादि दृष्टमर्थक्रियाक्षमम् ॥२५०॥ विचारादपि यद्यपः परमार्थेन सिद्धयति । विचारस्य प्रमाणत्वं तत्र स्यात्पारमार्थिकम् ॥२५१॥ प्रत्यक्षादेरपि स्वार्थे तथा किं तेन्न सिद्ध्यति । प्रमाभङ्ग प्रवादस्ते यतो निर्व्याकुलो भवेत् ॥२५२॥ विचारात्सांवृतत्यैव "तस्य सिद्धिर्यदीप्यते । सिद्धसाधनमेवं स्यात् स्यात्प्रयासो वृथेव ते ॥२५३॥ तन्न तुच्छः प्रमाभावो विचारात्तव सिद्ध्यति । भावान्तरस्वभावश्चेत् ; सोऽपि कः परिकल्प्यताम् ? ॥२५४॥ प्रमाणभावनिर्मुक्तो ज्ञानवर्गः स चेत् ; असत् | अन्यानन्यविकल्पाभ्यां तस्य तत्वाव्यवस्थितेः ॥२५५॥ तथाहि-तादृशो ज्ञानवर्गो विचाराव्यतिरिक्तो वा स्यात,व्यतिरिक्तो वा गत्यन्तराभावात्! २५ अव्यतिरिक्तश्चेत् ; विचारस्यैव तर्हि स्यादप्रामाण्यं तत्स्वभावाज्ज्ञानवर्गाव्यतिरेकात् । न प्रमाणाव्यतिरिक्त[म]प्रमाणं न भवति, अन्यतिरेकस्यैवंविधत्वात् । तदेतत्स्ववधाय कृत्योत्था- पनं प्रज्ञाकरस्य, परपरिकल्पितप्रमाणनिराकरणोपक्रमेण स्वाभिमतविचारस्यैवाप्रामाण्योपपादनात्।। १५ २० १ कर्य तु स्या-आ०,०,५०,०।२ प्रमाणाभावस्य । ३ विचारात् । ४ प्रमाणाभावेन । ५ विचार । ६अभापारमन । ७-वेत् प०, स०। ८ प्रमाणभाव. । ९प्रमाणत्वम् । १० प्रमाणाभावस्य । 19-दिष्य- मा०, ब, प०, स०। १२ अप्रामाण्यत्वभावात् । १३-ज्ञानमार्गा-भा, या, प० । १४-विरुद्धत्वात् भाग, प.प., स.। १५-वं प्रा-प० ।- प्रा-भा०, २०, स.1 ८० . न्यायविनिश्चयविवरणे असिसचेतत् प्रमाणवादिनामिति न साध्यपक्षे निक्षेपमहति । व्यतिरिक्तश्चेत् । तत्रापि तद्वर्ग विचारस्य यदि व्यभिचारः कथं तंततस्तसिद्धिः प्रामाण्यसिद्धिवत् । अन्यिभिचारश्चेत् ; अविचलितं तत्प्रामाण्यं भवेत् तस्य तल्लक्षणत्वात् । अत्र चोकम्-"प्रत्यक्षादेरपि स्वविषया- व्यभिचारलक्षणं तद्वदेव तदप्रतिपिद्धम्" [ ] इति । अत उक्तम्-प्रत्यक्ष- .५ लक्षणमर्थवेदनमिति। ननु भवन्नपि परस्यास्मिन् विपये विचार: किनाम प्रमाणम्-प्रत्यक्षम्, अनुमानम्, अन्यद्वा भवेत् ? प्रत्यक्षमिति चेत् ; न ; 'प्रत्यक्षमविचारकम्' इति स्वमतव्याघातात् । भवदपि तत् सर्वस्माज्ञानवर्गादयतिरिक्तं यदि; स एव वर्हि यथास्वमप्रामाण्यं प्रतिपद्यत इति प्राप्तम् , न चैतदुपपन्नम् । तद्वर्गस्य स्खया कुतश्चिदविपयीकरणात् । न यविषयीकृतः ११० सकलदेशकालगोचरपुरुपाधिष्ठानस्तद्वर्गः स्र्वंगतमप्रामाण्यमेव प्रतिपद्यते नापरमिति सम्भवति निर्णयः । एतदपि तद्वर्गणेव प्रतीयत इति चेत् ; न, अापि तस्यैवोत्तरत्वात् । अविषयी- कृते तस्मिन् 'तेनैवेदं प्रतीयते' इति दुरवरोधमेतदिति । पुनरपि वथा समाधाने हदेयोत्तर- मित्यनवस्थानं भवेत् । यदि च ज्ञानवर्गस्य सर्वस्यापि स्वत एवाप्रामाण्यप्रतिपत्तिः, न तर्हि तर कस्यचिदपि विप्रतिपत्तिरिति सोगतमेव सकलं जगत्स्यात् । अप्रमाणेऽपि तस्मिन् प्रमाणत्व- १५ समारोपाद्विप्रतिपत्तिरिति चेत् ; कुतस्तत्समारोपः १ तत एव ज्ञानवर्गादिति चेत् । न ; तस्य स्वतोऽप्रमाण्यप्रतिपत्तेरभ्युपगमात । न ह्यभामाण्य प्रतिपद्यमानस्य स्वतः प्रामाण्यारोपणमुप- पन्नम् । तत्यप्रतिपत्ति मिथ्यारोपयोरेकज्ञानेन विरोधात् । अविरोधे वा" न कुनश्चित्तदारोप- निवृत्तिः, तत्वज्ञानस्य "तदात्यनीकत्वात् , अपरस्य तत्प्रत्यनीकस्याभावादित्य मुत्तिरेख संसारात् । आरोपात्मकत्वे च तद्वर्गस्य न प्रत्यक्षत्वम्, प्रत्यक्षस्य कल्पनापोढत्वात्, आयेपस्य च कल्पना- २० त्मकत्वात् । अशब्दसंसर्गादविकल्पत्वमेव तैमिरिकस्य द्विचन्द्रग्रहणवदिति चेत; तथापि न प्रत्यक्षत्वम् प्रत्यक्षस्थानान्तत्वात् 'प्रत्यक्षमभ्रान्तम्" [ इति वचनात् । भारोपाय च स्वप्रतिभासिनि प्रामाण्ये यद्यप्रामाण्यं न स्वतः प्रतीयते "सर्वस्याप्रामाण्य स्वतः प्रत्येयम्' इति प्रकृतपरित्यागः । प्रतीयते चेत् ; तदवस्थो विप्रतिपत्त्यभावः । न हि स्वाप्रामाण्ययेदिन एवं मानात् तद्विपयसद्भावावयम्भेन विप्रतिपद्यन्ते विद्वांसः। दापि पुनः प्रामाण्यायेपाद्विप्रति- २, पद्यन्त एवेति चेत् ; न ; 'युतस्तत्समारोपः' इत्यादेः पुनरावृत्त्या धाकानवस्थाप्रसङ्गात् । एतेन परतस्तत्समारोप:' इत्यपि प्रत्युग्म् , तत्समायेपस्यापि "स्वाप्रामाण्यावेदिवे प्रकृ. तप्रतिज्ञापरित्यागस्य, तद्वेदिवे विप्रतिपत्त्यनगत्वस्य, तत्राप्यपरतत्समारोपकल्पनायाम् 'कुनतत्स- . प्रमाणमावनिर्मफज्ञानवर्गको प्रमाऽभावे । र विचारतः । ३ प्रमाऽभावसिद्धिः । ४ विचारप्रामाण्यम् । ५ प्रामाम्यस्य । ६"कल्पनापोटमभ्रान्त मत्यशम्"-न्यायशिपू."1" ययामप्रा-भा.प.। यथातमा -प० यथावा-तास्वगतप्रा-आग,.,प.स.९शानवरें। 1. या न कु-स।" तदविरु - दत्वात् ।।१ शानदर्मस्य । १३ "मन कल्पनापोटमधान्त प्रत्यक्षम् ।"-यायवि. १.१ "प्रत्यक्ष कल्पना- पोडमधान्तम् ।"-4 पार्तिकाल• २।२१ । १५ गते । १५ सर्वस्यापि प्रामार्य पत भा०,40.प.स १६-यादिन भा०, ब, १०, स. 11 सामाण्यवे-80116-ततास-स .
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव ८१ मारोप:' इत्याद्यावृत्तश्चाविशेषात् । तन्न तद्वत्तव्यतिरिक्तम् । नाऽपि व्यतिरिक्तम् ; उक्तदोपत्वात् । तन्न प्रत्यक्षं विचारः । नाप्यनुमानम् ; प्रत्यक्षाभावे तदभावात् ; तस्य तत्पूर्वकत्वात् । अप्रामाण्यप्रतिबन्धे हि लिङ्गस्य प्रत्यक्षसिद्धे स्यादनुमानम् । न चाप्रामाण्यं प्रत्यक्षसिद्धमिति कथं तत्सम्बन्धः प्रत्यक्षवेद्यः स्यात् ? सम्बन्धाधिकरणप्रतिपत्तिमन्तरेण सम्बन्धप्रतिपत्तेरनुपपत्तेः। सत्यपि प्रत्यक्षादप्रामाण्य- ५ परिज्ञाने न तत्सम्बन्धस्य प्रत्यक्षवेद्यत्वम् , 'स्वरूपस्वावलम्बनाकारपरिच्छेदि हि प्रत्यक्षम् इत्यादेः 'एतदत्यन्तसाहसम्' इत्यन्तस्य दोपत्य परपक्षोकस्य अत्रापि प्रसङ्गात् । नापि अनु- मानवेद्यत्वम् ; 'अनुमानान्तराक्षेपात्' इत्यादिप्रंसगात् । तन्नानुमानमपि विचारः । प्रमाणान्तरमित्यपि न युक्तम् , “न प्रत्यक्षानुमानाम्यामपरं मानमिष्यते" [प्र. चार्तिकाल. १२५] इति स्वमतव्यापातप्रसङ्गादिति चेत् ; भवतु सौगतस्यायं पर्यनुयोगः तेने- १० यास्य विचारस्याप्रामाण्यप्रतिपत्त्यर्थमङ्गीकारान्न जैनस्य विपर्ययात् ।जैनेन तु केवलम् 'अप्रमाणा- द्विचारादितरज्ञानवर्गस्याप्रामाण्यं तत्मामाण्यवदशक्यप्रतिपत्तिकमिति प्रमाणयितव्यो विचारः, तद्वदेव चार्थज्ञानस्यापि प्रामाण्यमशक्यप्रतिषेधम्' इत्येतावदुच्यते । स्यान्मतम्-न सौगतस्याप्ययं प्रमाणम् । न हानेन किञ्चिविधीयते नापि प्रति- पिध्यते, केवलमर्थ ज्ञानप्रामाण्ये संशय एवापाद्यते न च संशयापादकं प्रमाणं विरोधादिवि ; १५ तदसङ्गतम् ; अर्थनिषेधनियमनिर्णयाभावे "स्वरूपस्य स्वतो गतिः" [प्र. वा. १।६ ] इति विरोधात् । न हि सन्दिग्धेऽर्थे स्वरूपस्यैव न पररूपस्य गैतिरिति नियमो न्याय्यः । किञ्च, विचारित चेत्सन्दिग्धम् , असन्दिग्धं किमुच्यताम् ? संवेदनस्वरूपं चेत् ; विचारस्तत्र नास्ति किम् ? ॥२५६॥ नास्ति चेत् ; अविकल्पत्वक्षणिकत्वादिकं तव । तंत्र मानाकुतः सिद्ध्येत् ? स्वसंवेदनतो यदि ॥२५७|| कुतस्तदपि संसिद्धयेत् ? विचारेण विना कृतम् ? प्रसिद्धत्लाद्विचारेण किं तत्रेत्यपि दुर्मतम् ॥२५८॥ मीमांसकादयस्तत्र यत्प्रसिद्धिं न मन्यते । विना विचारतस्तत्वं प्रतिबोध्याः कथं त्वया ॥२५९॥ अपि च व स्वसंवित्तो विचारविरह घुवन् । स्वशास्त्रज्ञानशून्यत्वमात्मनः कथयस्यलम् ॥२६०॥ .. १ भप्रामाण्यात्मासाश्येन सह लिङ्गस्य यविनाभाचे । २०७५। ३ विचारण। ५ एवापद्यते भाग, स०।५ पतिनि-आ०, २०,५०, स०। ६ किश्चिदुच्य-मा०, ५०, १०, स.। ७ स्वसंवेदनस्व- रूपे । ८ स्वसंवेदने। तमञ्चते आo, ब०, १०, स०।०शिष्या इति शेषः। ११ ५ म्याययिनिधयपियरणे [. "अप्रत्यत्तस्योपलम्भस्य नार्थरष्टिः प्रसिद्धयति ।" 'इत्यादेचंहुलं तर तद्विपारस्य दर्शनात् ।।२६१॥ पशु, वन विचारमचेचच सन्दिग्धमस्तु यः । सद्विपारस्य सम्यस्यानिधितं चेत्तदुच्यते ॥२६२॥ मानमेव स सम्यक्चे सत्य लक्षणत्वतः । न पेयम् , मानसंशीतेः स्वयमेव निरूपणात् ॥२६३॥ सन्दिग्धमानधत्वादर्थवत्तस्सवेदनम् । त्याज्यमन्तु, उभयत्यागश्योपायेन विना कथम् १२६४।। थस्ति कश्चिदुपायश्चेत् ; द्वयत्यागः कथं भवेत् ? सत्यागे फोऽवशिष्येत यस्योपायत्वकल्पनम् ॥२६५।। सस्मात्स्यवेदनं पाह्मज्ञानाप्रामाण्यमेत्र वा। विचापदन्यतो वाऽपि प्रमाणादेव सिध्यति ॥२६६॥ तदेव प्रमाणत्वमर्थज्ञानस्य किन्न तत् । 'प्रत्यक्षलक्षणं प्राहु' इति सूक्तं ततो बुधैः ॥२६७॥ अथया 'आत्मवेदनम्' इत्ययुक्तम् ; अर्थज्ञानस्य स्वतो वेदेनायोगात् , स्वात्मनि क्रियाविरोधात् छिदिक्रियावत् । न ह्यतिनिशितोऽपि करवाल आत्मानमेव छिनचीत्यत्रेदमाद- 'प्रत्यक्षलक्षणमात्मवेदनम् इति । आत्मवेदनाविपक्षस्य तदमावत्यै स्वविपयेत्वेनाक्षणात् प्रत्यक्षं संदभावज्ञानं तदेव लक्षणं यस्यात्मवेदनस्य वचथोकम् । तथा हि- स्यसंवेदनवैकल्यं सर्पमत्ययगोचरम् । स्वतधेदवगम्येत प्रतिज्ञा भज्यते वव ॥२६८॥ अन्यतश्चेत् । तदन्यस्य यदि "संवेद्यते स्वतः । प्रतिज्ञाभङ्गदोपस्ते पुनरम्यनुपज्यते ॥२६९।। तन्नापि तस्य संविचिरन्यतो यदि कलयते । तत्राप्यन्यत इत्येवमनवस्था कथं न वैः ॥२७॥ છે - : "अप्रसिद्धोपलम्भस्य मार्यवित्तिः प्रसिद्धपति ।"-सावस. का. २०७४ । ३ अर्म-स्वसंवेदनो. भय 1-भयं श्या-आ०, २०,५०-भयस्या-सः। ३ वेदनात् स्वा-आ०, प., प., स .. "स्वात्मनि वृत्तिविरोधात् , न हि तदेव अगुल्यमं तेनैव अगुल्योण स्पृश्यते, सैवारिपारा तयैवासिधारया छियते ।"- फुटाय. अभिष० पृ. ८ । "न छिनत्ति यथात्मानमसिधारा तथा मनः । यथा मुतीक्ष्णाप्यसिधाप सनधारो तदन्यवदामान पकीयं न हिनत्ति न पिपटपति स्वामनि कियाविरोधात् दया मनः, . भसि- घायश्चित्तमपि स्वारमानं न पश्यतीति योज्यम् ।"-शोधिधर्या. पू. ३९२१५-स्य वि-भा०,....। मात्मवेदनाभावज्ञानम् । ७ स्वसंवेदनवैकल्य संवेद्यते । ८ स्वसंवेदनवैकल्यस्स । ९वास।
२३ . १३] प्रथमः भत्यक्षप्रस्ताव: काक्षणस्य निवृत्तेश्वेत् ; काक्षणीयं किमुच्यताम् ? सर्वज्ञानस्वसंवित्तिवैकल्यज्ञानमेव चेत ॥२७१॥ तहि तस्मिन्ननिष्पन्ने कथं काइनानिवर्त्तनम् ? फाइक्षितार्थप्रक्लृप्तिर्हि कालाव्यावृत्तिकारणम् ॥२७२।। मनसोऽन्यन गमनादित्यप्यनुचितं वचः। काक्षितार्थ परित्यज्य तंत्र तन्नत्यसम्भवात् ।।२७३॥ अदृष्टादन्यतो वापि तत्र तेंद्गतिसम्भवे । मा स्म भूदनवस्थानं प्रकृतं तु न सिध्यति ॥२७४।। साकल्येन स्वसंवित्तिवैकल्यस्याप्रवेदनात् । वस्मात्तद्विपयं किञ्चिज्ञानमस्तु स्वतो गैतम् ॥२७५॥ तदेव पार्थविज्ञानस्यात्मवेदनलक्षणम् । प्रत्यक्षलक्षणं देवः प्राह तेनात्मवेदनम् ।।२७६॥ न स्वसंवेदने कश्चिद्विरोधोऽप्यस्ति वस्तुतः । निर्वाधं तस्य दृष्टत्वात् दृष्टे फानुपपन्नता ॥२७७।। छिदिक्रिया विरुद्धास्तु तस्याः स्वात्मन्यदर्शनात्। म स्वसंवेदनं तस्य दर्शनादर्थ वित्तिवत् ॥२७८॥ अन्यथार्थात्मसंवित्योर्विरोधेनोपपीडनात् । निद्रायितं जगत्प्राप्तमस्वसंवित्तिवादिनाम् ॥२७९॥ सफलज्ञानानां हि स्वसंवेदनवैकल्यं यदि स्वत एव प्रत्येतव्यम् ; तदा तदेव पां खसंवेदनमिति तद्वैकल्यप्रतिज्ञाव्याघातः कथन्न भवेत् ? अन्यतोऽगम्यत इति चेत् ; न ; २० तस्यापि स्वतस्तद्वैकल्यवेदने प्रतिज्ञाव्याघातस्य तदवस्थत्वात् । अन्यतस्तद्वेदने तस्यापि तदन्यत. स्तद्वेदनमित्यनवस्थाप्रसगात् । निवृत्ताकाइस्य न तत्प्रसङ्ग इति चेत्, नन्वियमाकाखा साकल्येन सद्वैकल्यपरिज्ञानगोचरा कथं तत्परिज्ञानापरिसमाप्ती निवृत्तिमती स्यात् ? आकातिप्रयोजनपरि. समाप्तिरेव ह्याकाहानिवृत्तिनियन्धनं नापरं किश्चित् । अन्यत्र गतमनसस्य न तत्प्रसङ्ग इत्यप्यतु- चितमेव वचनम् ; आकाडाविषयव्यतिक्रमेण तदन्यत्र गमनासम्भवात् । अष्टसामध्येन ईश्वर- चोदनया या तत्सम्भववेत् ; भवतु निवृत्तमानवस्थानम् , प्रस्तुतसिद्धिस्तु नास्त्येव सकलज्ञान गतस्य स्वसंवेदनवैकल्यस्यैवमप्रवेदनात् । ततस्तद्विषयं स्वसंविदितमेव किम्पिद्विज्ञानमङ्गीकर्त्त- च्यम्, अन्यथा सदसिद्धेः, तदेव व सकलस्यार्थवेदनस्यापि स्वसंविदितत्वमवस्थापयति । तत इदमुक्तम्-'प्रत्यक्षलक्षणमात्मवेदनम्' इति । न चार्थज्ञानानां वसंविदितत्वे फश्चिदपि 1-व्यापूतिका--आ०,०, १०, स०।२ अन्पन्न ।। मनोगति। -स्याप्यवे-आ०, ५०, प०, स. ५ गतिः स. १६ भन्यमात्मार्थसं-ता। -तन-मा०, य०, ५० । । २५ २५ ५ न्यायविनिश्चय विधरणे वियेधः तस्य निर्याधमनुभूयमानावात् । न चानुभवातिान्तसङ्गस्वरूपगोचरछिदिक्रियानिदर्शनेन अनुमाधिस्टस्य संवेदनस्यापि विरोधपरिकल्पनमुपपन्नम्, अर्थवेदनस्यापि तत्प्रसङ्गात् । सतो न स्वरूपस्य नार्थस्य वेदनमिति सकलं जगनिद्रामुद्रितनेय अस्वसंवेदनशानयादिनां प्राप्तम् । सरमादनुभवोपस्थापितापरस्वाद अर्थवेदनवदप्रतिक्षेपामेव आत्मवेदनमपि, साकल्यत: नैद्विपमा- घेदनान्यथानुपपत्तेा प्रामाण्यवत् । भवतु प्रामाण्यमप्रतिक्षेपाईम् , अन्यथा तद्विचारस्यापि तत्प्रतिक्षेपे साफल्येन तात- प्रतिक्षेपायोगात् । तस्य तु कुवः प्रतिपत्तिः १ "वद्विषारप्रामाण्यस्य कुत इति चेत् ; नेदमुत्तरम् । भव्युत्पन्नप्रभस्य तवाीि समानत्वादिति चेत्न पवित्वतः कचित्परतश्च"तन्निश्चयसम्भवान। 'पैरतस्तन्निश्चयेऽनवस्थानमिति चेत् । न ; पर्यन्वे कस्यविस्तासिद्धप्रामाण्यत्यापि सम्भवात् । १० यया चैतत्सुबद्धं तथोत्तरत्र निरूपयिष्यामः । एतदेवाह-'प्रत्यक्षलक्षणम्' इनि । स्वरांवे- दनमत्र प्रत्यक्षम्, तदेय लक्षणं गमकं यस्य न्यायस्य ते प्राहुः इति । प्रत्यक्षयहणमुप. लक्षणम् , तेन 'परलक्षणमपि तं प्राहुरिति प्रतिपत्तव्यम् । तदेवमभिहितं प्रमाणस्य सामान्यलक्षणम् । अधुना पुनरभिहितलक्षणस्य वत्सामान्यस्य विभागो लयितथ्य इत्यनयर कारिफया भावृत्तिन्यायेन प्रत्यक्षस्य लक्षणं दर्शयति तस्य नदिमागत्यात् । परोक्षमपि तद्विभाग एय तस्य १५ फरमान मणमुपदयते ?"शानान्तरे वस्म तदुपदर्शनमिति चेत् । न ; प्रत्यक्षस्यामि वनव वदुपदर्शनात् । इहापि तृतीये परोक्षस्य तदुपदर्यत एव "प्रत्यक्षपञ्जसा स्पष्टमन्यच्युतम्" (न्यायवि० श्लो० ४६९ ] इत्यनेनेति चेत; न सहि प्रत्यक्षमप्यन्न लयितव्यं तस्यापि तत्रैव तदुपदर्शनात् । स्योक्तोपसंहारत्याय तस्य तदुपदर्शनीयम् , अनुतस्योपसंहार- योगात् ; इत्यप्यसमाधानम् ; पपेक्षेऽपि समानत्यात् । द्विवीयेनानुमाघस्य तृतीयेन २० शाब्दस्य १ पपेक्षविभागस्य लक्षणोपदर्शनात् परोक्षमपि लक्षितं भवत्येवेति चेत्, न; विभागलक्षणस्य सामान्यानुपातित्वाभावात् , इतरथा प्रमाणमपि न सामान्येन लक्षयितव्य प्रत्यक्षादितद्विभागलक्षणादेव तल्लक्षणोपपत्तरिति चेत्, नेदमशक्यपरिहारम् । अत्रैव परोक्ष- स्थापि सामन लक्षणात् , . तस्य प्रत्यक्षविसदृशत्वात् । प्रत्यक्ष व स्पष्टम्' इति लक्षित वद्विसहशत्वाद् 'अस्पष्टम् परोअम्' इति भवत्यापतिपत्तिः । वस्य तद्विसदृशत्यमेव कुत इति १५ चेत् १ परोशत्वादेव, अन्यथा तदपि प्रत्यक्षमेव स्यात् । न हि प्रत्यक्षसमातीयमप्रत्यक्षमुप- पनम् । न च प्रत्यक्षमेव प्रमागम् ; परोक्षस्याप्युपपत्तिरलेन व्यवस्थापनात् । उपसंहारे च परि, .. -वादितिह-मा०,५०,०, ०। २-सतन-आ-, २०, ५०,०) ३ लात्मवेदनाभाव । द्विपक्षवेदना-सा साकल्यतः प्रामाण्यप्रतिक्षेरे । ও সামৰিৱ্যাবি। ঘামাৰ । विचारतः। प्रामाण्यप्रतिक्षेप । ९प्रामाण्यस्य । १७ प्रामामप्रतिक्षेपविचारप्रामाण्यस्य । "प्रामाण्य- निश्चय। १२ परतध नि-आर, २०, ५०। १३ प्रत्यक्षभिन्न परोक्ष पर 1-ल-प्रा०, २०, प.स.१५ प्रत्यक्षस्य । १६ प्रमाणसामान्यविभागः। 10 लघीयत्रयादौ । प्रत्यक्षस्य १९-तरशसप- भा, ब, १०, स.१२ -1. लाते थापा . ११३] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः स्फुटमेव प्रत्यक्षवैसंदृश्य परोक्षस्य प्रतिपादितम् 'अन्यच्छ्रुतम्' इति । तत्र 'अन्यत्' इत्यनेन प्रत्यक्षविजातीयत्वस्य प्रतिपादनात् । प्रत्यक्षमेव पैरोक्षलक्षणबलेन किन्न लक्ष्यत इति चेत्, न ; विशेपाभावात् । कः पुनरत्र विशेषो यत्प्रत्यक्षलक्षणबलेन परोक्षं तल्लक्षणबलेन वा प्रत्यक्ष लक्ष्यत इति ? प्रत्युत प्रत्यक्षमेव प्रथमं लक्षयितव्यं तत्पूर्वकत्वेन परोक्षस्यैव पश्चालक्षणोपपत्तेः । अत इदमुच्यते 'प्रत्यक्षलक्षणम्' इत्यादि । लक्ष्यतेऽनेनेति लक्षणम् , प्रत्यक्षस्य लक्षणं [प्रत्यक्ष] ५ लक्षणं तत् प्रत्यक्षस्यैव स्वरूपम् , असाधारणेन स्वरूपेणैव भावानां लक्षणसम्भवात् । अत एव पु स्खलक्षणप्रसिद्धिः । तत् प्राहुः । कीदृशम् ? 'स्पष्टम् इति । किं पुनरिदं स्पष्टत्वं नाम ? साक्षात्करणमिति चेत् ; तदपि दुरवबोधम् । आलोकपरि- कलितत्वेन प्रहणमिति चेत् ; न; अतिव्यापकत्यात् , पावफानुमानेऽपि भावास् , आलोकालिङ्गि- तस्य पर्वते पाव कस्यानुमानात्मतिपत्तेः । अव्यापकत्वाच रसादिप्रत्यक्षेपु, अन्धकायन्तरितरूप- गोचरनक्तश्चरादिप्रत्यक्षेष्वपि अविद्यमानत्वात् । 'अव्यवहितग्रहणम्' इत्यपि तादृशमेव ; काचादिव्यवहितरूपदर्शनदशायामभावात् । व्यवधायकमेव कापादिकं न भवति यस्तुग्रहणप्रतिवन्धाभावात् , तत्प्रतिबन्धेन हि व्यवधायकत्वं" नान्यथेति चेत्, किमिदानी व्यवधानोपाधिकं वस्तुग्रहणमेव नास्ति ? तथा चेत् । तद्ब्रहणमेव साक्षात्करणमिति वक्तव्यं किमव्यवहितविशेषणेन व्यवच्छेद्याभावात् । न चेदमुचितम् ; १५ अनन्तरमेव निरूपणात् । व्यवधानोपाधिकवस्तुग्रहणसम्भवे तु सिद्धं काचादेरपि व्यवधाय- कत्यमिति कथं नाव्यापकत्वं साक्षात्करणलक्षणस्य ? काचाद्यन्तरितवस्तुमहणस्य 'प्रत्यक्षवे. ऽप्यव्यवहितग्रहणस्याभावात् । प्रत्यक्षमपि तन्न भवति व्यवहितपणत्वादिति चेत्, न; सर्वज्ञ- विज्ञानस्यापि काचावन्तरितवस्तुमाहिणः प्रत्यक्षत्वाभावप्रसङ्गात्, तदाहित्वेन सर्वज्ञत्वाभावा- पत्तेः। सत्यप्यन्तर्धाने वस्तुस्वरूपस्य प्रणात् प्रत्यक्षमेव तदिति चेत्, सिद्धमस्मवाविज्ञानस्यापि. प्रत्यक्षत्वम्, तत्रापि काचभाण्डंपैर्यवगुण्ठितसण्डशर्करापिण्डस्वरूपग्रहणस्यानुभवादिति सिद्ध- मव्यापकत्वं तल्लक्षणस्य । भयतु तर्हि वस्तुस्वरूपग्रहणमेव साक्षात्करणमिति चेत् ; न ; अनुमानादावपि प्रसङ्गात् तस्यापि वस्तुस्वरूपग्राहित्येन स्याद्वादिनः प्रसिद्धत्वात् , "बौद्धस्य प्रसाधयिष्यमाणत्वात् । सामान्यरूपेणैव तस्य तदाहित्वं न विशेषरूपेणेति चेत् ; न; शब्दाद्युपाधिसम्बन्धेनैवानियत्वादेः तेन ग्रहणात् । न सकलोपाधिकसम्बन्धेनेति चेत् ; न ; प्रसिद्धप्रत्यक्षेणापि तदभावात् , । २० । १ पैसादृश्यं आ०, ५०, ५०, स० । २ इति प्र-आ०, २०, प., स.। ३ परोक्षवलेन भा०, घ०, ५०, स०,४ प्रत्यचपूर्वकखेन । ५ लक्षणं प्रत्यक्षस्यैव बा०, २०, ५०, स०। ६-न रूपेणैव भा., ७ पावकानुमा-भा०, ५०, ५०, स०।-प्ववि-भा०, २०, ५०, स. 1 9 -बन्धमा-ता। .-करवानान्यदेति स०।-कत्सामान्ययेति प्रा०, २०, ५०। " वस्तु प्रहणमेव । १२ प्रत्यक्षस्ने व्यव-भा, २०,५०,स०। १३ अन्तरितवस्तुप्राहि सर्वशविज्ञानम् । १४-पर्यवगुणित-ता० । १५ बौधस्य प्रसाद इष्य-आ., ब०, प० । १६ अमानस्य । १७ वस्तुस्वहसमाहित्वम् । १८-पाधिस-भा०, २०, ५०, स.।
- न्यायविनिमयपिपरणे [१६ पाणादिदहनविशेषमविपत्तावपि प्रविक्षणपरिणामादेस्तविशेषस्यागहणात , अन्यथा नविषयप्रमाणा- न्तरुयापारखफाल्यापत्तेः। 'संशयरहितं द्वहणमेव सामाकरणम् इत्यप्यनुपपलम् । अनुमानादिनाऽविव्यारेक संशयमेवानुमानादिकम् 'चाणे या दहनः पार्णो वा इति तत्र तदुपलम्मादिति चेत् ; न ; तस्यै ५ तदात्मनामावात् । प्रमाणस्यैव तदात्मकारचे सत्यप्रतिपत्तिविफलमखिलं जगह येत्, अनुपाय- स्वात, संशयोपायस्वे चातिप्रसङ्गात् । अन्यत्तत्र संशय इति चेत् ;न; तस्याप्यनुमित पर्वते • पावकादायभायात् । तार्णादो तद्विशेष इति चेत् ;ने ; तत्याननुमेयत्वात् विशेषव्याप्रमणात् । विषयविशेषसंशये चानुमानस्य दोपे प्रसिद्धमत्यक्षस्यापि स्यात् 'मधुरं क्षारं वा जलम्'इति तद्विपयविशेपेऽपि संदायदर्शनात् । 'विशेपानाकारयों न पदर्शनम्' इत्यप्यसद्गतम् । अनुमानादावपि १० साम्यात् । वनेदमपि साक्षात्करणम् । फरतहि साक्षात्करणार्थ इति चेत् ? 'अर्थशानस्यैष प्रतिभासविशेपः क्षयोपशमादि- नियन्धनः' इति ब्रूमः । यदस्यति- "प्रत्यक्षमञ्जसा स्पष्टं विप्रकटे विरुध्यते । न स्वप्नेक्षाणिकादीनां ज्ञानातिविवेकतः ।।" १५ [ न्यायवि० श्लो० ४०७ ] इति । ततो निर्मलप्रतिमासत्वमेव सरत्वम् । स्वानुभवसिद्ध पैतत् सर्वस्यापि परीक्षक स्येति नातीय "नियोप्यते । ततो यदुक्तं भासर्यज्ञेन-"स्पष्टत्वं नाम सामान्यविशेषः" ] इति । तदनः मतमेव जैनस्य यदि सदृशपरिणामः से उच्यते । परस्तु ( परस्य तु) नित्यन्यापिगोत्वादिपि २० तद्विशेपो न सम्भवति किमन स्पष्टत्यमिति करिष्यत एवं प्रबन्धः । प्रत्यक्षं सविकल्पफमेय जैनात्य, यदाह 'साकारम्' इति । सबिकल्पकत्वन नाम- आस्यादिविषयत्वम्, न चैतद्वस्तुतः सम्भवति "निशिवविचारवानिपावाक्षमत्वात् , केवल मध्यारोपसिद्धम् । न चाध्यापितविपयार्य विज्ञानस्य परिस्फुटत्वम् ; स्वप्नेन्द्रजालादि. विकल्पेवदर्शनात् । स्थूलनीलादिविकल्पे श्यत एवेति चेत्, न; तस्यापि सोपाधिकत्वात् । २. निरंशपरमाणुस्वलक्षणशिनगवं हि "सत्वं कुत्तश्चित्प्रत्यासत्तिविशेषात् सद्विकल्पमति- १ अनुमानादेः । २ सध्यात्मवाभावात् । ३ मशयास्मात् । ५ संशय सरपित्युपायापरवे । ५ अनुमानाती। पर्वते पा-मा०, २०, प.स.10 -विपे संश-मा०, ३०, R०,801ो सतर्ग- भा.प.स.१९-लभासिल-स० उतमिदम् । “विश्व स्यानादविद्यापतिना-यापदी निर्वध्यते आ०, ३०, स०, ना०1 11 सामान्यदिशेष । १२-यसात् न मा०, २०, ०० "al कल्पना च की चाह नामजादयादियोडना-याच्या शन्देषु नाम्ना विशनोऽर्थ उरले दित्य इति । आतिशब्देषु मात्या गौरयमिति । गुणशब्देषु गुपेन शुरु इति । क्रियाशब्देषु कियया पाचक इति । द्रव्यशम्दै द्रव्येन दमी विषाणीति ।" प्रमापास टो: पु०१ "विक्रयो नामसंश्रयः ।"-20 TO R१२३ । निश्चित दि--, ...स..-पितद्विषयस्य भा, १०, १०, स! १५ स्फुटत्वं बाल, ब.प., स.
॥३] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव सक्रान्तं प्रत्यवभासते नोत्पत्तिकमिति चेत् ; अत्राह-'अञ्जसा' इति तत्त्वत इत्यर्थः । तात्पर्यमत्र'-न दर्शनं वद्विकल्पादन्यत् ; अनुपलम्भात् । असतश्च न वैशद्यम् , तत्कथं सस्यान्यन प्रतिसक्रमकल्पनम् ? न हि व्योमकुसुमसौरभप्रतिसक्रमकल्पनं तरुकुसुमेपु प्रीति- पदं (प्रतीतिपदं) प्रेक्षावताम् । भवदपि तत्तत्र प्रतिसझान्तं फुतः प्रतिवेद्यताम् ? तत एव विकल्पादिति चेत् । ५ न; तस्य स्वरूप एव व्यापारात् । तस्यं च वैशद्यविविक्तत्वात , अविविक्तत्वे तत्प्रतिसजा- मायोगात् । न च तद्विविक्तवेदनमेव तवेदनम् , पीतविविक्तशङ्कवेदनस्यैव पीतवेदनत्वप्रसङ्गादिति सर्ववेदनविभ्रमत्वापत्तिः । तद्विवेकस्तस्य न स्वसंवेद्य इति चेत् ; अस्वसंवेद्य एव तर्हि विकल्पः, सद्विवेकव्यतिरिक्तस्य तद्रूपस्याभावात् । "सच्चेतनादिकमस्तीति चेत् ; न ; तस्यापि "तद्विवेकादव्यतिरेकात् । न ह्यसंविदिताव्यतिरिक्त संविदितं नाम ।"व्यतिरेके वा "वेशद्याव्यति- १० रेकः स्यात् , तद्विवेकव्यतिरेकस्य तव्यतिरेकस्वभावत्वात् । तथा च- वदपि प्रतिसक्रान्तं "सचैतन्यादिकं तव । प्रतिसक्रान्तवैशद्याव्यतिरेकात्तदात्मवत् ॥२८॥ तत्सकामोऽप्यधिष्ठानमेवमन्यइपेक्षते । तस्यापि तदभेदे स्यात्सहकान्तत्वमसंशयम् ॥२८१॥ तत्राप्येवमधिष्ठानपारम्पर्यप्रकल्पनात् । अनवस्थाभुजङ्गी त्वामासंसारं न मुञ्चति ॥२८॥ तस्मादव्यतिरिक्तं च पाट्य सङ्घान्तिमत्कथम् ? । वैशयादव्यतिरेके हि सच्चैतन्यादिकमपि सझान्तमेवं भवेत् । न हि प्रतिसक्रान्ता- दव्यतिरिक्तम् अप्रतिसक्रान्तमुपपन्नम् । तत्प्रतिसक्रमे वा अविष्ठानान्तरमझीकर्तव्यं निरधिष्ठा- २० नप्रतिसक्रमाभावात्। तदधिष्ठानस्यापि तत्प्रतिसक्रमाव्यतिरेके प्रतिसक्रमत्यापत्तेः वदपराधि- धानपरिकल्पन तत्राप्येवमित्यनवस्था दौःस्थ्यमतिदुस्तरमासंसारमनुसरदासज्येत । "तदासङ्गतश्च विभ्यता सच्चेतनादिकं तात्त्विकमशीकर्त्तव्यम् । तदव्यतिरिक्तञ्च वैशयं कथं तदपि प्रतिसतका- न्तम् १ अतो यास्तवमेव विकल्पस्य वैशद्यम् । तन्न तत एव विकल्पातत्प्रतिपत्तिः। अन्यत इति चेत् ; न ; "तेनाऽपि तद्विकल्पस्य स्वरूपमात्रविषयत्वेनाग्रहणात्, २५ सदमहणे" च न तत्प्रतिपत्तिः, "अनधिगताधिष्ठानस्य तद्रतप्रतिसडक्रमप्रतिपत्तेरसम्भवात् । - द-भा०, ब०, ५०, स० । २ प्रतिपदं आ०, ५०, ५०, स० । ३-पि तम भा०, २०, ५०, स। तर निर्विकल्पकस्साटरपंतन विकल्पे । ५ विकल्पस्य । ६ स्वरूपस्य । ७ वैशद्यभिन्नत्वम् । ८ वैशच. विवेक । ९-स्याप्यमा-भा०, २०, ५०, स० । १० सचेतनादि-आ, य०, १०, स०१११ वैशक्विात् । ११ वैशयविवेकाद् मित्रत्वे । १३ वैशयतादात्म्यमेव स्यात् ।। सचेतन्या-स०,ता० । १५ तत्संच-स०प० । 1:-क्ष्यते आ०,०प०,स। 10-4 च म-मा०,य०प० । १८-स्थानदौ-आ०,५०,०,०। १९ तवा- संगतेच भा०,५०,१०,स० । २० वैशयसमान्तिप्रतिपत्तिः । २१ ततोऽपि भा०.३०प०,स। २१ विकल्पा. प्रहणे । २३ वैशासक्रान्तिप्रतिपत्तिः । २४ अनादिगता-आ०,१०,१०,स० । २५ तहतस्य प्रति-सा ।
८८ न्यायविनिश्चयविवरणे अप्रतिपनशुक्त्यधिष्ठानोऽपि तत्र रजतप्रतिसक्रम प्रतिपात एवेति चेत् ; न; रजतस्याप्रति- मकमरूपत्वाद, अनधिष्ठानतयैव प्रतिपत्तः। किं वढि अतिशकलेन कर्तव्यमिति चेत् ? न किञ्चित् । तदभावेऽपि फुतो न रजवप्रतिभासनमिति चेत् ? भवत्येव यदि 'तत्कारण- सन्निधानम् । विद्याशक्तिविरचितस्याशुक्तिशकलस्यैव वस्यावलोकनात् । न हि तत्र किञ्चि- ५ दधिष्ठानम्, अप्रतीते। कथं तहिं 'शुक्तिशकलमेव रूप्यरूपतया प्रतिभातम्' इति पश्चामत्यभिज्ञा- नमिति चेत् ; कः पुनस्तच्छकैलस्य रूप्यप्रतिमासेन सम्बन्धो येनैवमुच्यते ? ग्राहात्वमिति पत्न; घरूपेण तदभावात् । पररूपेण तु परस्यैव ग्राह्यत्वं न तस्य अतिप्रसङ्गात् । कारणत्व. मिति चेत् वत्येव तर्हि ते महणं न "रूप्यस्य । अन्यकृतेनाप्यन्यग्रहणे चक्षुरादिकृतेनैव "तगृहणमस्तु, पर्याप्तं तच्छकलस्य "तत्कारणत्यकल्पनया। नापि चक्षुरादिना सर्वदा तत्प्रविमास- १० चोदनम् । तच्छकलेऽपि समानतान् । "तस्य विशिष्टस्येव वद्धेतुत्वं न तन्मात्रस्येति चेत् ;न; चक्षुरादेरपि कामलादुपहतिपरिग्रहपरीतस्यैव तद्धेतुत्वेन अतिप्रसङ्गपरिहारस्य सुकरस्वात् । अवश्यं चैतदेवमङ्गीकर्तव्यम् , अन्यथा विद्याशक्तिविरचितस्य रउतादेरप्रतिभासप्रसाद, तत्र ततोः कस्यचिदधिष्ठानस्याभावात्। विद्याशक्तिरेवाधिष्ठानमिति चेत्न; आकाशे तदभावात, आकाशगतस्य च तदा रजवस्य प्रतिभासनं न वन विद्याशतिस्तस्या बोधरूपत्वेन पुरुषाधिष्ठान- १५ त्वात्। मन्त्र एवं तच्छक्तिः तस्य च न सम्भव एवेति चेत् । न ; तस्यापि गुप्तभापितस्य मुस. विवरमात्रपर्यवसितत्वेन बाह्याकाशगतत्वासम्भवात् , अन्यैरपि सनिहितैस्तच्छूषणप्रसङ्गात् , अश्रुतिगोचरस्य सम्भवे" च न तस्य शब्दत्वम् , शब्दस्य श्रोताहणलक्षणत्वात् । आकाश- मेवालोकपरिकलितमधिष्ठानमित्यपि नोपपत्तिपूरितम् ; उपरतरूप्यप्रतिभासस्य तथा प्रत्यभिज्ञान- प्रसङ्गात् । न चैवम्, ततो न पराविधानत्वं रजवस्य येन तद्वदनधिगवाधिष्ठानस्य विकल्पवेशद्य. २० "स्याप्यध्यवसाय: स्यात् । कथं तर्हि 'शुक्तिशकलमेव रजवरूपतया प्रत्यभासिष्ट' इति प्रत्यभिज्ञा- नमिति चेत् १ न; "तेनापि खहेतुदोयोपजनितविभ्रमात्मना ताप्यस्यासत एवं प्रतिवेदनार, सद्विश्रमस्य च विचापदवगतः । पन्न "निर्विकल्पवैशद्यस्य विकल्पे प्रतिसडनमः । नाऽपि विकल्पधर्मस्य निश्चयस्याविकल्प; तत्प्रतिक्षेपन्यायस्य समानत्वात्। न योरि- तरेतराधिष्ठानप्रतिसक्रमः; स्वाधिष्ठानगतत्वेनैव तत्प्रतिभासस्य परेणाभ्युपगमान् , तत्कयमे २५ वमाशङ्केति चेत् ? किं पुनरेतदनात्मशल्पितम्- "मनसोयुगपद्वृत्तेः सविकल्पाविकल्पयोः । विमूडो "लघुवृत्तेर्वा तयोरैक्यं व्यवस्यति ।" [R० घा- २।१३३] इति ? .. १ रजतप्रतिभासहेनुसानिध्यम् । २ इन्द्रजालादिविद्या । ३ रजतत्वेन । १ शुक्तिशकलस्य । ५ शुक्ति- पेण। ६ रजतरूपेण । शुकिशकलस्यैव । ८ रजतप्रतिभासन । ९ ग्रहणाल भा०, ब०, १०, स.. • स्पस्य 11 रजतग्रहणम् । १२ रजतप्रतिमासधारणत्वा शुशिलस्य १४ मासे । शनस्य आकाशगुणवाद । १५-पेन पतस्प आ०, २०, ५०, स. १६ तद्वदनादिगदा-भा, १०, प.स.। 10-स्याप्यन्य-आ०, ब०,१०, स.१८ ततोऽपि मा०,५०,०प०।१९ निर्विकल्पा-आs,T. प.स.२० निर्विकल्पविकरमधर्मपो। ११ -सविल्पवि-ता-1 २२-शोमतेः ।
. २३) प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव नन्यनेनापि न 'तथा तत्प्रतिसडक्रमः प्रतिपाद्यते, निर्विकल्पेतरैकत्वव्यवहारमात्रस्य प्रतिपादनादिति चेत् ; कः पुनरयं तद्व्यवहारो नाम ? तव्यवसाय इति चेत् ; कथन्न तथा प्रतिसडक्रमो व्यवसीयमानस्य तदेकत्वस्यैव प्रतिसडकमार्थत्वात् ? तद्वचनमिति चेत् ; न; 'व्यव. स्यति' इति विरोधात् । न च व्यवस्यतीति वक्तीत्यर्थः, शाब्दिकसमयस्यैवमभावात् । कुतो वा तयोरेकत्वव्यवहारः १ योगपद्यादिति चेत् ; नियमवतः, नियमरहिताद्वा ? ५ नियमयतश्चेत् ; सहोपलम्भनियमात् वास्तवमेव तदेकत्वं नीलतज्ज्ञानवत् , कथं तस्य व्यवहार- मात्रसिद्धत्वं सहोपलम्भनियमस्यानैकान्तिफरवप्रसङ्गात् ? नियमरहिताच्चेत् ; न ; नीलधव- लयोरपि प्रसद्गात् । एकार्थकारित्यादिति चेत् ; कः "पुनरेकोऽर्थः ? प्रवर्त्तनमेव, तथा च प्रज्ञाकरः :-"प्रवर्तनस्यैकस्य कार्यस्य भावात्" [प्र. वार्त्तिकाल० २।१३३ ] इति ; तदपि न निरूपितम् ; रूपादावपि प्रसङ्गात् ; उदकाहरणादेरेकस्य कार्यस्य तत्रापि भावात् । १० अस्त्येव साधारणशक्तिप्रयुक्तः "तत्राप्येकघटव्यवहार इति चेत्; विशेषशक्तिप्रयुक्त एव रूपे रस इति रसे वा रूपमिति किन्न भवति तद्व्यवहारः ? तच्छतेरन्योन्यमभावादिति चेत् ; विकल्पाविकल्पयोरपि तर्हि फथं "विशदनिश्चयव्यवहारः तस्यापि विशेपशक्तिप्रयुक्तत्वात् , "तस्याश्य परस्परमसम्भवात् । सम्मवे या न विशेपशक्तिः, तत्प्रयुक्तस्य "तब्यवहारस्योभयना- प्यनुपचरितत्वं भवेत्। फुतः पुनर्विकल्पेतरयोर्योगपद्यम् , अयोगपद्ये सहकारित्वाभावेनेकप्रवृत्तिकारित्वानु- पपत्तेरिति ? अन परस्य वचनम् "युगपद्विपयसन्निधानादेव” [प्र० वार्तिकाल० २११३३] इति ; तदेतत्रातीव चतुरसम् ; विकल्पस्यापि वस्तुत एव स्पष्टत्वप्रसङ्गात् सन्निहितविपय. स्वात् , दर्शनस्यापि "तत एव साप्ठ्यात् । अत एव "देवस्य ययनम्-"स्पष्टं सन्निहितार्थ- त्वात्" । [ प्रमाणसं० श्लो० ४ ] इति । नास्त्येव विकल्पस्य विषय इति चेत् ; न 'युगपत्' इत्यादिस्ववचनस्य व्याघातप्रसङ्गात् । न ह्यसतो "युगपदन्यथा वा सन्निधानं सम्म- वति । फल्पितोऽस्त्येव "तद्विपयो न यस्तुत्रलागत इति चेत्, केन तत्कल्पनम् ? सेनेच विकल्पेनेति चेत् । तस्यैव कुतः सम्भवः उद्धेतोरभावात् तद्विपयसन्निधानं तद्धेतुश्चेत् । सदपि फुतः । तस्मादेव विकल्पादिति चेत् ; न ; परस्पराश्रयदोपस्य "सुव्यक्तत्वात् । अन्येन "तत्कल्पनं घेत् ; तेनापि दर्शनविषयेण समसमयस्यैव तत्य" फल्पने न युगपद्विषयसन्निधानम् । २५ तत्समसमयस्य कल्पने न तस्यापि दर्शनयोगपद्यम् । युगपद्विषयसन्निधानाद्भवतु को दोप इति .२० -- तदा तन-मा०, ५०, ५०,स०२ निर्विकल्पेतरेकरवस्यैव । ३ निर्विकल्पेतरयोः । ५ चैन नियम- आ०, ५०, १०, स.। ५ एकत्लस्म । ६ -मानासि मा., प., प०, स. पुनरेकार्थः स. 10-नकस्य स.। ९ रूपरसादावपि । 1. रूपादावपि । " विकल्प विशदव्यवहारः निर्विरन्ये च निययव्यवहार इति । १२ विशेषतः । १३ विरपे पिशदन्यवहारस्य निर्विकल्ये च निश्ययव्यवहारस गुरुम वमेव स्यामारोपित्तमिति भावः । प्रज्ञाकरगुप्तस्य । १५ समिहितविषयत्वादेव । १६ अकलस्य ।। -चनभ्या- मा०,५०प०.स. १८ युगपयथा पा श्रा.,प०,१०,१०१९ विरुपविषयः। २. सति तद्विपमराणिपाने विकन्पोत्पत्तिः, सति व विकन्ये सविषयसमिधानमिति । २. विक्रयविषयकन्यनम् । २२ विकल्पविश्यस्य । ब २० M अन्यथा न्यायविनिश्चयविधरणे [ha चेत् । 'तत्यैव पुतः सम्भवः' इत्याद्यनुबन्धादन्योन्यसंप्रयस्य अनापि सुपरिरकुटत्वात् । पुनल्येन तत्कल्पनायामनवस्थापत्तिः । नन्विदमेव तस्य फल्पने नाम यचनिर्मासितया विकल्पोत्पाद इति चेत्, कुतस्तदुत्पादः १ वासनायलाच्चेत् ; कुतस्तस्य दर्शनयोगपद्यम् १ 'तत एवेति चेत् ; न ५ पुनरपि 'युगपत्' इत्यादिस्ववचनविरोधात् । किन, फः पुनर्विकल्पा, को या तस्य विपयः ? गौरिति परामदों विकल्पः, तस्य *गकारादिपिय इति चेत् । न तस्य समस्तस्यैकविकल्पयद्यत्वायोगात् , क्रममावित्वात् । विकल्पोऽपि ममभाव्येक एवेति चेत् ; न ; क्रमवरचे विषयवदेकत्यायोगात् , शेयानित्यतया सद्बुद्धेरनित्यत्वव्यवस्थापन परत्यापेक्षावत्त्वमुपक्षिपति । व्यस्त एव से वद्विषय १० इति चेत् ;ना प्रतिवर्ण विकल्पभेदप्रसङ्गात् । अस्त्येव तथा" तझेदः, तथा च परस्य वचनम्- "गकारादिवर्णविकल्पानामपि क्रमेणोदयमासादयतामेकत्वाभावः' [प्र० वार्तिकाल. २११३३ } इति; तदिदमसम्बद्धम् ; एकत्याध्यवसायस्यैवमभावप्रसङ्गान" , संदधिष्ठानस्य गौरित्येकस्य विकल्पस्याभावात् । अः(गः) इत्यस्तीति चेत्, न, "'अयं गः' इति तदध्यवसाय. स्याप्रसिद्धः । व्यवहारप्रसिद्धस्य च तस्येदमुपायपरिचिन्तनम् ।न' ' "इत्यप्येरविकल्प- १५ सम्भवः, गकारस्याप्यर्द्धमा निकस्यानेकक्षणामभाविन एकत्वानुपपत्तो सगोचरविकल्पानेकत्व- स्यापि सुप्रसिद्धत्वात् । न च निरंशतद्भागविकल्पः शक्यनिरूपणः । एवमौकारादायपीत्यभार एवं विकल्पस्यापतितः । सोऽयं लाभनिच्छतो मूलच्छेदा-सतो विकल्पस्य दर्शनकत्वाध्यवसाय- मुपपादयितुमुपक्रान्तेन तदभावस्यैवोपपादनात् । गकारमागेवेक एवं विकल्प इति चेत्; गकारादिवणेष्यप्येक एप स्यादिति दुाहतमेतत्-"गफारादिवर्णविकल्पानामपि” इत्यादि। वस्तु- पुत्तिपोलोचनया "वदुक्तं संवृत्या तु स एवायगित्येकत्वकल्पगया तदेकत्वं न निवार्यते इति चेत् नु वस्तुवृत्तिपालोधनायां व एच "चिकल्पा न सम्भवन्तीति प्रतिपादितम्, तत्कथं तेषां "क्रमेणोद्ययत्त्वभन्यवा सम्भवति ? सम्भवतामपि पां स्पसंविदितयार परिरपुटे भेदवेदने तदेव कथं वनेकरमप्रत्यभिज्ञानविभ्रमः १ तस्वसंवेदनस्या निर्णयरूपत्वेन तद्गृहीतस्यापि तन्- दस्याऽगृहीतकल्पत्यादिति चेत; न; "नहि दृश्यस्य भेदेन नदेयकत्वविनमः" [प्र. २५ धार्तिकाल० २।२५४ ] इति स्ववचनोपद्रयापत्तेः । “अनेन दर्शनविषय एवा () निश्चिते भेदे तदैकत्वविध्रमाय प्रतिक्षेपात विकल्पविषयस्य । २ विकल्पस्य । ३ विकरपादेव । १ यतो हि निर्विकोतरयोग्य । युगपदिएका विधानमूलक किन्तु विकरुपमूलकम् । ५ गराषि-मा, प०,५०,81 गादे 1: "नेपानियतया माधोव्यात."-वा1111८ सौगतस्य । २ गयारादिः । प्रतिषणम् । "-माधि-मा-40, १०, स. १२ एक्साभ्यवसायाधारभूतस्य ! १३-चादित्यस्ती-भा,ब०,०,स.१४ अपमिति मा०,01 १५ च इत्य-सा० । १६ इत्यस्यविकल्प-पा०, २०, ५०, स.।"-मारेक-t०, २०, प.स. गधारादिपर्णविकल्पानामित्यादि वाक्यं कथितम् । ३९ विक्ापना ना०१.स. २. प्रमेणोदयल-ATH, ०००।२विकल्पानाम् । २२ स्वसंवेदनमहोतस्यापि । २५ विकल्पभेदस्य । २४ वयनेन ।
. - १३] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव: अतत्परगेव' एतद्वचनम् , न हि सर्वमेव वचनं स्वप्रतिपाद्यवस्तुतत्परमेव, असत्सरस्यापि प्रतिवादिचित्तव्याकुलीकरणबुद्धया प्रयोगसम्भवादिति चेत् ; नेतन्न्याय्यम् ; विकल्पस्य विक. ल्पान्तरादिवत् निर्विकल्पादपि भेदस्यागृहीतकल्पत्वप्रसगात् , तद्भेदस्याप्यमिलापानमिलापवत्त्व- लक्षणस्य स्वसंवेदनादेवानिर्णयस्वभावात्प्रतिपत्तिप्रतिज्ञानात् । अभिमतमेवेदं परस्य तंत्राप्येकत्व- विश्नमस्याभ्यनुज्ञानादिति चेत् ; कथमिदानोम्- "प्रत्यवं कल्पनापोडं प्रत्यक्षेणैव सिद्ध्यति । प्रत्यात्मवेद्यः सर्वेषां विकल्पो नामसंश्रयः ।।" [प्र० घा० २।१२३] इत्येतदनवसरं नभवेत् न हि यद्गृहीतमगृहीतकल्पमेवतदेव परप्रतिपत्त्यङ्गत्वेन प्रेक्षायद्भिरुपक्षिप्यते। तन्नेदमभिहितार्थतत्परं न भवति वचनम् अतिप्रसङ्गात् । स्वसंवेदनसिद्धस्यापि विकल्पेतरभेदस्य (स्या) सिद्धत्वे कथं तनैकत्वाध्यवसाय: निर्विवादस्य सिद्धत्यात् , तन च तदनुपपवेरिति १० चेत् । अयमपरः परस्यैव दोपोऽस्तु, पौर्यापर्यमनालोच्य वचनात् । अपि च, गफारादिविकल्पानाम् एकत्यप्रत्यभिज्ञानमपि 'य एव गकारविकल्पः स एवोकारादिविकल्प:' इत्युदयमासादयदपरापरपरामर्शरूपत्वात् न नानात्वेन निर्मुच्यते, तत्कथं वदन्यव्यवस्थितैकत्वस्वभावं गकारादिविकल्पानामेकत्वमध्यारोपयितुमर्हति ? तत्रापि प्रत्यभिज्ञानादन्यस्मात् एक्रयाध्यारोपपरिकल्पनायाम् अनयस्थाप्रसङ्गात् । तन्त गौरित्ययमेको १५ विकल्प:, कथमस्य दर्शनैकत्वाध्यसायः, स्वयमविद्यमानस्य तदयोगात् ? सत्यम्; न वस्तुवृत्त्या विकल्पसम्भवः, संवृत्यैव तत्सम्भवात् । न च तस्य विचारसूचीमुसनिपातेन निर्लोपनमुपपन्नम्। सकलव्यवहारविलोपप्रसङ्गात् , विकल्पाधीनत्वात्सर्व- स्यापि लोकव्यवहारस्य । तस्मादविचारितरभ्यसद्भाव एय विकल्प इति चेत् ; न; दर्शनात्तद्- व्यतिरेकस्यापि तथात्वप्रसङ्गात् । न हि धर्मिणो विकल्पस्याविचारक्षमत्ये तद्धर्मस्य दर्शनन्यति. रेस्य विचारक्षमत्वम् । मा भूदिति चेत् ; फयमिदानी" भावतो" दर्शनस्य निर्विकल्पफत्वम् ? तदप्यविचारक्षममेवेति चेत् ; "सविकल्पत्वं तर्हि तस्य भाविकं भवेत् । तदप्यभाविकमेव दर्श- नात्तदन्यतिरेकस्यापि तव्यतिरेकवदभाविकत्वादिति चेत् ; "विकल्पेतरविभागविनिर्मुक्तं वर्हि भावतः प्रत्यक्षमिति तथैव तहक्षणमभिधातव्यम्, सत्पथमुवम् "प्रत्यत्तं फल्पनापोदम्" [प्र०वा० २११२३ ] इति । स्वत एव प्रत्यक्षस्याविकल्सत्वं न विकल्पव्यतिरेकात् । न हि स्वत एवा- विद्यमानं "तव्यतिरेकाद्भयति, विकल्पान्तरस्यापि प्रसङ्गादिति चेत् ;न समीचीनमेतत् यस्मात्-- सविकल्पत्वमप्येयं स्वतः फस्मान्न कल्प्यते । तस्यापि "यत्स्वतोऽसत्त्वे परतोऽपि न सम्भवः ॥२८३।। -यता-आ०, ५०, ५०, स०१२-दिचैतव्या-भा०,०स०1३ सदस्या-वानिर्विकल्पवि. कल्पमेदस्य । "सचित्तसानामात्मगीदनस्य प्रत्ययात्"-.पातिकमाउ०२।२९।५निर्विकल्पविकल्पकयो। ६-साये नि-मा०, प., प.स.10 इत्याधयमा-भा०, २०, ५०, स! ८ सनविकल्पस्य । ९ दिवा. राक्षमतप्रसवात् । १.-विचार-स .1-नीममार-भा.प.,प.स । ३ बस्तुनः । ३ विकरपावं मा०, ५०,५०, स. १४ सविष्यवमरि। ५ विकलो तरभाग-11-पत्वम्प-आ०,०००। विकल्पम्मतिरेप्रत् । १८ सपनोऽयपे मा०, ५०,५०, रा.। २० ९२ न्यायविनिश्चयविवरणे [३ न तथा तत्प्रवीतिश्चेदन्यथा सा धुत्तो भवेत् । स्वत एवेति चेत्, नैवम्, विवादस्यावलोकनात ॥२८॥ स्वत एवाविकल्पत्वं यदि तस्य प्रसिद्धयति । विवदन्ते कथं तस्मिन्यथास्वं तीर्थकाः परे ॥२८५॥ प्रसिद्धेऽपि विवादश्चेत्, स कुत्तस्वहि लुप्यताम् । प्रसिद्धत्वात् , न तस्यान्यदस्ति निर्गुप्तिकारणम् ।।२८६॥ अन्यतश्चेदकल्प उद्यदि तन विवादतः। संदेवासिद्धमन्यस्य क्थं सिद्धिनिबन्धनम् ।।२८७।। तस्यापि सिद्धिरन्यस्माद्यदि कल्प्येत वादशात् । भवन्तमनवस्थाख्या न मुञ्चेद्वनरावला ॥२८८॥ अन्यविकल्पक चेत्, न, तत्त्वतस्तदसम्भवात् । कल्पितातु कथं तस्मात्कस्यचित्सिद्विराञ्जसी ॥२८९॥ अन्यथा कल्पनासिद्धपावकान्माणवादपि । फरमादोदनपाकादिस्तत्त्वतो न भवत्ययम् ॥२९॥ कल्पितोऽपि विकल्पेश्चेत्तत्वसंवित्तये तदा । प्रत्यक्षे सविकल्पवसिद्धिः किन्न ततो भवेत् ॥२९१॥ सोऽपि तत्र न चेदस्ति, कस्य न ? व्यवहारिणः । संन्न, 'मूढस्तयोरक्य व्यवस्यति' अस्य वाधनार ॥२९२॥ व्याख्यातुर्नास्ति चेत्, कस्मात् ? कल्पनादोपनिहवात् । अविकल्पत्वमप्येवं स" कुतः प्रतिबुध्यताम् ॥२९३] यदि प्रत्यक्षस्याविकल्पत्वं स्वत एव, सविकल्पत्वमपि स्यात् । न हि तदपि स्वत एवा. विद्यमानम् अन्यतः पुनश्चित्सम्भवति व्यवसायात्मकं ज्ञानं प्रत्यक्ष स्वत एव न." ] इति वचनाच । सविकल्पकत्वं न कुतश्चिदपि प्रतीयत इति चेत्, निर्विकल्प. स्वस्य कुतः प्रतीतिः ? स्वत एवेति चेत्, न, अन्यगपि समत्वात्, विवादावलोकनाच्च । यदि २५ प्रत्यक्षस्य खत एवाविकल्पत्य प्रतियन्ति प्रतिपत्तारः, कुतस्तर्हि तत्र विवादमारवयन्ति ? नहि प्रतिपत्तिविषय एव विप्रतिपत्तिभूमिः, विरोधात् । अस्ति "च विप्रतिपत्ति.-"केचित्प्रत्यक्ष निर्वि- कल्पकमिति । अपर सविकल्पकमिति । अन्ये" सर्वविकल्पव्यपेतमिति न च प्रसिद्ध एव विवादे विवादनिवृत्तिः सम्भवति, प्रसिद्धिव्यतिखेण तनिवृत्तिहतोरमावात् । तन्न स्वतस्तत्प्रतिपांच."! - २० [ , प्रत्यक्षस्य । २ विचारहवेत् आ०, ०,१०, स.। ३ तदेव सि-ता.1४-दिस्ततो पा०, २०, १०,०।५-रुपश्चेत्तत्त्वसंवि-भा०, ५०, स.।६-ख सि-या०,०,१०, स.स.10 म. वा. २॥३३९ व्याख्यातु ना-मा०, २०, २०, स ... व्याख्याता।" प्रति-आ.ब. प०,०२ पौधा । ३ शन्दवादिन 11 ब्रह्मवादिन । १५ प्रत्ययस्य विकल्पापप्रतिपति ।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव ११३] अन्यतश्चेत; न; तस्यापि निर्विकल्पत्ये विवादास्पदत्येन स्वयमेवासिद्धत्वात् । न चासिद्धमन्यसिद्धिनिबन्धनम् ; अतिप्रसङ्गात् । तस्यापि सिद्धिरन्यस्मानिर्विकल्पादिति चेत्, न, भवतो दुर्विमोचाऽनवस्थामयवनशृङ्खलानिपातप्रसङ्गात् । अन्यतो विकल्पादेव तसिद्धिरिति चेत् ; न; वस्तुवृत्या सदभावात् । कल्पितात्त न ततस्तात्त्विकस्याविकरूपत्वस्य सिद्धिः । न [पप्लुतादुपायाद् अनुपप्लुतफलावाप्तिः, अन्यथा कल्पितादपि माणवकपावकात्तात्त्विकमेवीदन- ५ पाकादिकं भवेत् । सविकल्पत्वमपि प्रत्यक्षस्य तात्त्विकं तत एव सिद्धयेत् । नास्त्येव तादृशोऽपि विकल्पस्तत्रेति चेत् ; कस्यासो नास्ति ? व्यवहारिण इति चेत् ; न, “विमूढो लघुवृत्तेर्वा तयोरैक्यं व्यवस्यति" [प्र. वा० २।१३३] इत्यस्य विरोधप्रसगात् । अनेन प्रत्यक्षे सवि. फल्पत्वाध्यवसायस्य व्यवहारिपु प्रदर्शनात । व्याख्यातुरिति चेत्, फुत एतत् ? तस्यासत्कल्पना- व्यापारोपप्लवप्रत्यस्त्यमयादिति चेत् ; तर्हि स कुतः प्रत्यक्षस्य निर्विकल्पत्वमपि प्रतिपद्यत इति १० महानयं परस्य विपमविचारगावपातः। तन्न स्वत एव प्रत्यक्षस्याविकल्पत्वम् , अपि तु विक- रूपन्यतिरेकादेव । न चावस्तुसतो विकल्पाद् वस्तुसद्व्यतिरेकः, ततो वस्तुसन्नेव विकल्पः । स चोक्तया नीत्या न सम्भवतीति कस्य दर्शनैकत्वपरिकल्पनं परैः प्रतन्यताम् १ तत्परिकल्पना हेतोरेकमवर्तनकार्यकारित्वस्य भागाश्रयासिद्धत्वात् । कथं भागाश्रयासिद्धत्वं स्याद्वादिप्रसिद्धस्यैवा- भिधानात् , ईतरनिरपेक्षतया व्यवसायात्मनो विकल्पस्य एकप्रवृत्तिकार्यकारित्वादिति चेत् ? न तथापि" "तदसिद्धत्वस्याविचलनात् तद्विकल्पादन्यस्य "दर्शनस्याभावात् , पुरोवर्तिघनैकाकार. स्तम्भादिप्रतिभासो हि तद्विकल्पः, न च तस्मादपरं दर्शनं प्रतीतिपथोपस्थितमस्ति, निरंशपरमा- गुस्वलक्षणाकारस्य पराभिमतस्य "तस्य स्वप्नेऽपि परिस्फुटप्रत्ययविषयत्वानवलोकनात् । भागतः स्वरूपासिद्धश्चायं हेतु; तथा हि कदा पुनर्विकल्पस्य प्रवकत्वम् ? अभ्यासे इति चेत् ; न; तदा दर्शनस्यैव "तदगीकारात् , "विकल्पमन्तरेणापि त्वम्यासात्प्रवर्तते" २० [प्र. वार्तिकाल० १४ ] इति वचनात् । अपिशब्दात् 'विकल्पादपि प्रवर्तते' इत्यस्य समुशय इति चेत् ; न; तस्यैवमैदम्पर्याभावात् , ततो "हेयोपादेयविपये धीरेव पूर्विका प्रवर्त्तनात्प्रमाणम्" [प्र० यार्तिकाल० ११४ ] इत्युत्तरफटिकाविरोधात्, "तया दर्शन एव प्रवर्तकत्वस्यावधारणात् । अत एवैवकारस्य व्यावर्त्यमाह, "न विकल्पादयः" [प्र. वार्ति- फाल० १।४] इति । अनभ्यास इति चेत् ; न; तदानीमनुमानस्यैव प्रवर्तकत्वात् । विकरूपा- न्तरस्य "सवोऽपि तत्रैवान्तर्भावाभ्यनुज्ञानात् , “यत्र तु नाम्यासस्तत्रानुमानमेर प्रत्यभि- . ज्ञादयः" [प्र. वार्तिकाल० ११४ ] इति वचनात् । अनुमानस्यैव तदा दर्शनेन सहकप्रय. . 1 विकल्पात् । ३ -साता-आ०, प०, ५०,स। कल्पितविकल्पादेव । ५ कलियतोऽपि । ५ व्यव- हारेषु भा०, ५०,५०, स०। ६ नित्या मा०, य., ५०, सः । ७ भावाश्मय-मा०, य० स० । "विकल्पे. तरयोरेकरवम् एकपातन कार्यकारिस्वात्' इत्यत्र विकल्पस्यासिद्धस्वरूपत्वात् भागाश्यासिदावम् । ८ इतरनिर- पेशितयाभ्यव-मा०,०, १०, स०।९-स्यैव प्रत्- म०, २०, ५०, स.। १० स्याशदिसिनविशत्यस्य एकप्रवर्तन कार्यकारित्वाहीकारेऽपि । १ मामाधयासिद्धत्वस्य । १२ निर्विकल्यस्य । १३ दर्शनस्स। 11 प्रवर्तकला स्वीकारात् । १५ अपि पुया-पासात् प्र पाटिकाल.।१६ उत्तरपत्रिकया। ततोऽपि 10 अनन्यास । - .. न्यायचिनिययविवरणे तैनकार्यकारित्वमिति चेत्, न; दर्शनस्य तदा प्रवर्तकत्वानभीष्टेः अभ्यासवत , अनुमानवैफल्य- प्रसङ्गात् । केवलममवर्तकं दर्शनभनुमानसहितं तु प्रवकमिति चेत्, न, माणसम्सवस्यास- म्मतत्वात् । तन्न एकप्रवर्तनकार्यकारित्वं हेतु:, असिद्धत्वात् । तदयं प्रदेशान्तरे विकल्पस्य प्रवर्तक्वं प्रतिषिध्य पुनरत्याभ्युपगच्छन् स्ववाचैव स्वचरितं विम्ययतीति कथमनुनमत्तः ५ प्रशाकरः तन्नेदं विकल्पे वैशयमुपचरितं तनिमन्धनाभावात् । किं तर्हि । वरतुभूवमेव । फुत एतत् ? अनुपचरितत्वे सति वेद्यमानत्वात् वदन्यस्व- रूपयत् । अअसापदेनानुपचरितत्वमुकम्, वेद्यमानत्वं तु केनेति चेत् ! न ; आत्मवेदनपदेन तस्याप्युक्त्यात् । तदयमा प्रयोगः-तात्विकं सविकल्पकप्रत्यक्षस्य वेशद्यम् , उपचारविरहे सति स्वानुभवगोचरस्यात् , तदपराकारयदिति । न चेदमाश्रयासिद्ध साधनम् ; तत्प्रत्यक्षवैशयस्य स्वसंवे- १० दनप्रत्यक्षसिद्धत्वात् । अत एव न स्वरूपासिवम् । नाऽपि विरुद्धम् ; अंसति उपचरित व वैशये यथोक्तस्य साधनसासम्भवात् । अत एव न व्यभिचारवत् । तस्मादसिद्धत्यादिमलविकलवाद् भवत्येव अतस्तत्प्रत्यक्षस्य तात्विकी वैशधसिद्धिः । अथ न तद्वैशा स्वसंवेदनवेद्यं विप्रतिपत्तेः । न चेयमनुमानादन्यतः शल्यनिव-नेति तदेव वकव्यम् । तच्चेदमेव-विशदमेव प्रत्यक्ष प्रमाणद्वितयान्यथाऽनुपपत्तेः । प्रत्यक्षं परोसमिति १५ हि प्रमाणद्वितयं प्रमाणोपपन्नदया प्रत्याय्यमानमनुपपन्नमेव भवति यदि प्रत्यक्षमप्यविशदव, परोक्षस्यैव प्रमाणस्य व्यवस्थितेः अवैद्यस्य वलक्षणत्वात्। न चैवम्, तो विशदभेव प्रत्यक्ष मिति । तत्रेदं विचार्यते-न प्रमाणस्व व्यतिरिक्तं द्वित्वम् असम्भविपतेः । प्रमाणस्य च स्वरूप प्रत्यक्षत्वपरोक्षत्ये । तयोश्च यदि प्र तत्साधनत्वम् , उमयोपादानमपार्यकमिति कथमकिञ्चि करत्वं नाम न साधनदोषः १ समुदितयोस्तत्साधनत्वे प्रत्यक्षमेवक प्रमाणं प्राप्न तलक्षणस्यैव २० वैशहास्य तत्समुदायेन साधनात्, न परोक्षं तक्षणसाधनोपायाभावादिति विरद्धो हेतुः, इष्ट. विरुद्धसाधनात् । इदं हि प्रमाणद्वित्वं वद्विरुद्धं चैकप्रमाणत्वम्, वत्सापने च स्पष्टमेवेष्टविरुद्धसा. धनत्वं तस्य । परोक्षप्रमाणावैशधसाधनेऽव्ययमेव हेतुरिवि चेत् । कयमेवं प्रत्याशयसाधने परोक्षावैशयेन तरसाधने व तदपरेण व्यभिचारवत्त्वं हेवो भवेत् ? अथ वेशद्यमवेशी वा न प्रत्येक तत्समुदायसाभ्यम्, अपितु समुदितमेव तदयमदोष इति चेत् तदप्येकाधिकरणम् , २५ भिन्नाधिकरणं वा स्यात् ? एकाधिकरणं चेत् । तदात्मकमेकमेव प्रमाणमिति न प्रमाणद्वयसिद्धिः", अतो हेतुविरुद्धप्रतिज्ञार्थः स्यात् । मिनाधिकरणमिति चेत् किं कस्याधिकरणम् । प्रत्यक्षमेव अनभ्याये । २-नभीष्रेटिरभ्या-मार, ५०, १०,०1३ एस्मिर प्रमेये बहूनां प्रमाणान प्राप्ति प्रमाणसम्रुवाबौद्धमते हि" प्रत्यक्षपशा-या मेयस्यान्यस्य सम्मव । तस्मात् प्रमैयद्विवेन प्रमाणद्विस्वमिष्यते॥" [प्र.पा. १] इत्युक्त्वात प्रमाणव्यवस्व तु सम्प्लवः । क्षणिस्वाश्च पदार्यानो नैकना बहुप्रमाणार्मा इशपारः । इष्टव्यम्-३० वार्तिका २१ ५ देतोरसि-ता-1 ५ सदिकल्पकप्रत्यक्षा ६ बसपाय। असर-मा. स. ७ विप्रतिपत्ति । -गद्वितीया-पा०,१०, २०,०। १ तस्यापरोक्षप्रमाणवैश्य -मा०,००, स प्रत्याशयेन । "-सिद्धरतो हेदविरुद्धार्थः भा०, १०, ५०, स..
२३] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव: ९५ वैशद्यस्य परोक्षमेव चावैशद्यस्येति चेत्, तद्विपर्ययः कस्मान भवति ? तथापि भिन्नाधिकरणत्वा- विरोधात् । लोकव्यवहाराद्विपर्ययनिवृत्तिः, लोको हि प्रत्यक्षादिकमेव वैशद्यादेरधिकरणं प्रत्येति न परोक्षादिकम् , लोकप्रसिद्धस्य चेदं प्रत्यक्षादेत्रिप्रतिपत्तिव्यवच्छेदाय लक्षणकथनमिति चेत् ; लोकस्यापि कुतोऽधिकरणनियमप्रतिपत्तिः ? प्रत्यक्षादिति चेत् ; अलमनुमानेन वैशद्यधर्मस्यापि तर्ते एव प्रतिपत्तेः । न ह्यप्रतिपन्नतद्धर्मकं प्रत्यक्षं तदपेक्षमधिकरणनियम प्रत्येतुमर्हति । तन्निय- ५ मप्रतिपसिरनुमानान्तरादित्यप्यनेन प्रत्युक्तम् । तन्नेदमनुमानं प्रय॑क्षवैशधप्रत्यववोधनसमर्थम् । इदं हि तर्हि स्यात्-प्रत्यक्षं विशदज्ञानात्मकम् , प्रत्यक्षत्वात्, यद्विशदज्ञानात्मकं न भवति न तत्प्रत्यक्षम् यथा अनुमानादिज्ञानम् , प्रत्यक्षं च विवादास्पदीभूतम् , तस्माद्विशद- ज्ञानात्मकमिति चेत्, अत्रापि किमिदं प्रत्यक्षत्वं नाम यत्साधनत्वेनोपन्यस्तम् ? प्रत्यक्ष- शब्दस्य व्युत्पत्तिनिमित्तमिति चेत् ; तदपि किम् ? इन्द्रियाश्रितत्वमेव, अआणीन्द्रियाणि १० तानि प्रतिगतं तत्कार्यत्वेन तदाश्रितं प्रत्यक्षमिति व्युत्पत्तिविधानादिति चेत् ; न, हेतोर्मागा- सिद्धत्वप्रसद्गात् , अनिन्द्रियप्रत्यक्षे अतीन्द्रियप्रत्यक्षे चाऽभावात्, तदुभयप्रत्यक्षसद्भावस्य च प्रतिपादनात् । आत्माश्रितत्वं प्रत्यक्षत्वम् , अश्नुते स्यं परं च विषयत्वेन व्याप्नोतीत्यक्ष आत्मा तं प्रतिगत प्रत्यक्षमिति व्युत्पादनादिति चेत् । न ; सारणादेरपि प्रत्यक्षत्वमसङ्गात् आत्मा- १५ श्रितत्वाविशेपात् । तथा च तस्यापि वेशद्यम् , अन्यथा हेतोरनैकान्तिकत्वमसङ्गादिति नेदानी वैधयं दृष्टान्तो यतः केवलव्यतिरेकि साधनस्य प्रत्यक्षवैशद्यव्यवस्थापनपरस्य सम्भवः । अक्ष- मेव प्रतिगतं प्रत्यक्षं न स्मरणादिकं तथाविधम्, अन्यस्यापि संस्कारप्रयोधकादेरपेक्षणात् , ततः परापेक्षणात्परोक्षमेव तदिति चेत् ; न तहीन्द्रियज्ञानम् "अवमहादिधारणापर्यन्तं प्रत्यक्षम् , आत्मव्यतिरेकिणः श्रोत्रादेरपि वेनापेक्षणात् । श्रोत्रादेरपि आवरणक्षयोपशमविशेपानान्तजीव- प्रदेशविशेपत्यान्न तदपेक्षणपरापेक्षणमिति चेत् ; न"वत्स्वभावभावेन्द्रियवत् द्रव्येन्द्रियस्यापि पनिवृत्युपकरणरूपस्यापेक्षणात् तस्य चात्मपरत्वेन प्रसिद्धत्वात् । मायेन्द्रियस्यैव साक्षादपेक्षण नद्रव्येन्द्रियस्य, सत्यपि तस्मिन् अन्तरङ्गशक्तिवैकल्ये "शब्दादिसंवेदनाभावात् , तवैकल्ये पुन- रसत्यपि तव्यापारे स्वप्नादी सत्यशब्दादिसंवेदनसम्भवात् । केवलम् उपकरणप्रदेशपर्यवसि- तत्वाद् भावेन्द्रियस्य साक्षात्तदपेक्षात् , तदपेक्षमपीन्द्रियज्ञानमुपकरणापेक्षमिव लक्ष्यमाणं प्रत्या- २५ सत्तिनिवद्धोपचार परोक्षव्यपदेशमासादयति । अत एव गवाक्षसमानत्वप्रसिद्धिरिन्द्रियाणामिति घेत् ; भवतु कथमपि परापेक्षणात् परोक्षत्यम् , तथापि सावधारणस्याक्षप्रतिगमनस्य विघटना- .. २० १ विपर्ययेऽपि । तथाहि मि-आ०, घ०, ५०, स०।२ -स्वेदं भा०, २०, ५०।३ -त्तिःवप्र-आ०, १०, ५०, स.। प्रत्यशादेव । ५ अधिकरणनियम । ६ -शं चै-आ, ०,१०, स। ७ "प्रतिपतमाश्रितम क्षम्.."-न्याययिल्टी० पृ. 1010 "अणोति व्याप्नोति जानातीति वक्ष आत्मा प्राप्तक्षयोपशमः प्रक्षीणावरणो पा, तमेव प्रतिनियतं प्रत्यक्षमिति ।"-राजवा. १२.१ -की साध-मार, ०, १०, स०1१० भय. प्रहणादि- ता०।। आत्मस्वमाव । १२ नितिः गोलकादिः, उपकरणच अहिपमादि। १३ द्रव्येन्द्रियस्य पुदलरूपस्य । १४ भामभिनवेन । १५ शन्दादे सं-भा०,१०,५०,०।१६ उपकरणापेक्षणात् ।। -निव. न्धोप-आ, ५०, ५०,० - न्यायविनिश्चयविवरणे [३ दसिद्धमेवेन्द्रियज्ञानस्य प्रत्यक्षत्यम् , अन्यथा स्मरणादीनामपि न तद्विघटनं भवेत् । तैरप्यन्तरङ्ग- शक्तिसाकल्यस्यैव सानादपेक्षष्मात् बहिरङ्गापेक्षणस्योतन्यायेनोपचरितत्वोपपत्तेः । भवतु परोक्षमे- वावग्रहादिकमिति चेत् ;न: तस्येन्द्रियप्रत्यक्षत्वकथनविरोधात् । औपचारिक तत्व प्रत्यक्ष- त्वमिति चेत् ; किमुपचार नियन्धनम् ? वैशद्यमिति चेत् । तदपि कुतः ? प्रत्यक्षत्वाञ्चेत् ; ; ५ परस्पराश्रयात्-वैशद्यात्प्रत्यक्षत्वम् , ततोऽपि वैशद्यमिति । तबैशा स्वसंवेदनासिद्धमिति चेत् ; पर्याप्तमनुमानेन, तस्यापि "वत्साधनार्थत्वात् , सिद्धस्य च साधनासम्भवात् । अवघ्यादिज्ञान- वैशयसापनार्थमनुमानम् इन्द्रियज्ञानवैशद्यस्य स्वसंवेदनादेव सिद्धत्वादिति चेत् ; न ; अस्य. हेतोरन्वयित्वस्यापि प्रसङ्गात , इन्द्रियज्ञाने वैशद्यान्वितस्य प्रत्यक्षत्वस्य प्रतीतः, तथा च कथ- मयं फेवलव्यतिरेकी हेतुरका १ नचावथ्यादिज्ञानवैशयेऽपि अनुमानमर्थवत् । तस्यापि स्वसं. १० वेदनसिद्धत्वाविशेपात् । तन्न व्युत्पत्तिनिमित्त प्रत्यशत्वम् । अथ व्युत्पतिनिमित्तेनैकार्थसमवेतमन्यदेव 'प्रवृत्तिनिमित्तं प्रत्यक्षत्वम् , तभ सर्व. प्रत्यक्षव्यक्तिसाधारणमिति न भागासिद्धत्वं साधनस्येति ; किं तस्य सतो रूपं न वर्षेव्यम् । आवरणविगमविशेप इति चेत् ; न ; तस्य नीरूपस्याभावात् । नीलादिप्रतिभासविशेष एव स इति चेत् ; न ; वेशद्यस्यैव तद्रूपत्वात्, तदन्यस्य विचापसहत्वात् । वव भवत्पिति १५ चेत्, न, साध्यस्यैव हेतुत्वप्रसङ्गात् प्रत्यक्षत्ववैशयशब्दयोरेकार्थत्वात् । 'प्रत्यरत्वात- विशदत्वेन प्रतिभासनात् , विशदक्षानात्मकम्-वदात्मक व्यवहव्यम्' इति हेतुप्रतिश्योरर्थ इति चेत् ; सिद्धं नः समीहितम् ,"अस्मत्प्रयोगस्यैवानया भया 'प्रतिपादनात् । न वापि फेवलव्यतिरेकित्यं हेतोः ; नीलादेस्तत्वेनावासमानस्य तद्व्यवहारविषयवेन प्रसिदस्य साधर्म्यधान्तत्वात्। ननु यदि वैशद्यमेव प्रत्यक्षत्वम्, नरयेन्द्रियज्ञानेऽपि तत्वत एव भावात मुख्य- २० मेव तस्यापि प्रत्यक्षत्वं तत्कथं तस्य सांव्यहारिकत्वम् १ यत इदं शास्त्रकारस्य वचनं शोभेत- "प्रत्यक्षं विशदं ज्ञानं मुख्यसंव्यवहारत" [लघी० श्लो० ३ ] इति चेत् । न, 'सूत्रकारमतस्य व्यवहारस्य पानुसरणेन तथा पचनात् । तथा हि- सूत्रकारस्य यसरिरपुदमाममात्रापेक्षं च तदेव प्रत्यक्षम्, इदं तु पुनरिन्द्रियमान परिस्फुटमपि नात्ममात्रापेक्षं तदन्यस्येन्द्रियस्याप्यपेक्षणात् । अत एकानविकलतया परोक्षमेति मतम् । पतरतन्मतानुसरणेन अवभ्यादिशानस्य समपलभणतया प्रत्यक्षत्वप्रतिपादनार्थ मुख्यपहणम् । इन्द्रियज्ञानमपि व्यवहारे घेशशमाण प्रत्यक्षं प्रसिद्धम् , अतस्तदनुसारेण प्रत्यक्ष मुख्यत इति शापनार्थ संव्यवहारपदोपादानम् । मुख्यदया हि तत्प्रत्यक्षयवर्णने 'सूत्रविधा स्यात् तत्र तस्य परोक्षत्वकथनार, सतो न किश्चिदवयम् । स्मरणादिभिरका-पन्यायोपचारितलो-त. अवग्रहादेः। १ अनुमानस्यापि । ५ वाय साधनावाए। ६ भवेयादि-भा०, २०,२०० हेतौरनयिच-पा, प ... मानव-ता। ९ धावेशदि-आ०, २०, ५०, स.1 10-प्रतिरतिनि-भा०, ... मतियोग-भा, ", प०,१० ११ प्रतिसाधनान् भा००.स.।"पात्र के-मा०,८०,१०,१इन्द्रियानस्य । १५ "आये परोशम्" ह. २०1111 दवि प्रणात् इन्द्रियमानस्य परीश्व एत्रपरमः ।।५-4-101 १०दियानस्य प्रध्यमत्वम् ।...। - f प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव: । १३] यत्पुनरेतत्-सप्टं प्रत्यक्षं सन्निहितार्थत्वात् , पराभिमतदर्शनवदिति; तत्र किमिदमर्थस्य सन्निहितम् ? स्वज्ञानजननसामर्थ्यमिति चेत् ; न तस्य निषेधात् । योग्यदेशाद्यवस्थानमिति चेत्, क्य देशादेर्योग्यत्वम् ? अर्थज्ञानजनन इति चेत्, न; तस्यापि तज्ज्ञानविपयटये तदयोगात् । अविषय एवासी चक्षुरादिवदाधिपत्यमात्रेण प्रवृत्तेरिति चेत्, न; अन्नापि "इन्द्रियमनसी विज्ञानकारणम्" [लघी० श्लो० ५४] इत्यस्य विरोधात् । न हीन्द्रियमनोभ्यामन्यस्यापि देशदेस्तद्धेनुत्यै सदु- ५ भयमेव तद्विज्ञानकारणमित्युपपनम् । अर्थस्य प्राद्यत्वसम्पादने देशादेर्योग्यत्वमिति चेत्, न; तस्य ज्ञानशक्तित एव भायात्, अन्यथा तत्कल्पनावयात् । तच्छत्तितः सर्वत्र कस्मान्न तदिति चेत्, देशादिशातितोऽपि करमान भवति ? प्रतिनियतत्वात्तस्या इति चेत् ; ज्ञानशक्करपि समानः प्रतिनियमः । यस्य॑ तु न प्रतिनियतशक्तिकत्यं ज्ञानस्य तच्छक्तितो भवत्येव सर्वस्य प्राह्यत्वम् । तन्न योग्यदेशाद्यवस्थानमर्थस्य सन्निहितत्वम् । नेटममिति चेत् । तदपि न देशकृतम्; दूरतारकादिप्रत्यक्षेष्वसत्त्यात् । नापि कालकृतम्। चिरभाविवस्तुविपर्यसत्ययस्वप्नादिप्रत्यक्षेप्वविद्यमानत्वात्। एतेन तदुभयकृतं प्रत्युक्तम्; तदुभयदूरस्यापि सत्यस्वप्नसंवेदनविपयत्यात् । तदयं भागासिद्धो हेतुः, पक्षीकृतेष्वपि दूरतार- कादिप्रत्यक्षेप्वविद्यमानत्वात् । अथ न तेषां पश्चीकरणम; कुतस्तर्हि तद्वैशद्यसिद्धिः? अन्यत इति चेत्, तदेवासन्नवृक्षादिप्रत्यक्षेऽपि वक्तव्यं व्याप्तेायात् किमनेन १ दूरासन्नादिप्रत्यक्षसाधारणं किश्चित्साधनमिति चेत्, न; यद्यथा निर्वाधमवभासते तत्तथैवास्ति यथा नीलं नीलतया, निर्वाधमवभासते च सष्टतया प्रत्यक्षमित्यादेर्भावात् । महणशक्यत्वमपि न तस्य सन्निहितत्वम् ; असिद्धः, प्राह्यत्वस्य ज्ञानवलादेव द्विचन्द्रवद्भा- यात् । अनेकान्तिकत्वाश-स्मरणाद्यर्थस्य ग्रहणशक्यत्वेऽपि तद्वेशद्याभावात् , तदर्थविषयत्वस्य च निरूपयिष्यमाणत्वात् । तन्नेदमपि तस्य सन्निहितत्वम् । योयं कथमुक्तं शास्त्रकारेण-"स्पष्टं सन्निहितार्थत्वात्" [ प्रमाणसं० श्लो० ४ ] इति चेत् । न ; परमतानुज्ञामात्रेण तद्वचनात् । न हि शास्त्रकारस्येदं स्वतन्त्रवेशद्यसाधनम्, उक्तदोषा- जामशक्यपरिहारत्वात् , अपि तु योऽसो मन्यते सौगत:-"निर्विकल्पकं दर्शनं सनिहितार्थ- स्वाद्विशदम्" [ ] इति; तं प्रत्यनेकान्तगोचरस्याप्यअज्ञानस्य वैशयं तेनैव तत्प्रसिद्धन हेतुना प्रतिपाद्यते सौकर्यार्थम् । पये हि तत्प्रसिद्धनैव हेतुना प्रतिपाद्यमानः प्रतिपत्तिसोफर्य प्राप्नोति । न चान तस्य दोपोगायनमपि सम्भवति निर्दोपतया प्रसिद्धत्वात्, अन्यथा तो निर्विकल्पै वेशद्यसाधनायोगात् । किं तर्हि शासकारस्य स्वतन्त्र पेशद्यसाधनमिति चेन् ? उक. २० 1-वं पवि-आ०, २०, ५०, स.। २ योग्यावस्यापि । ३न तहीन्धि-भा०, २०, ५०, स.। "-खेन तदु-भा०प०,०स० । ५ शानसफितः । ६ सर्वशस्य । - धमि-मा०, २०, ५०,स. १८यस्य सत्य-आ०, ५०, ५०, स. ९ भर्पस्य । १. रमरणादिषु पैशाभावात् । स्मरणादीनाम् सर्पविषयत्वस्य १२ स्वतन्त्रं - भा०, ५०, ५०, ससिदान्तसम्मतवैराच । । "इन्दियगोचरो प्रयः विशद तेभाधन, विप्रष्टे. चार्थे सापटप्रतिभागिना।"-प्र. पार्तिकाल. शा३०।-सहस-मा०, प. प.,.1 १५ सतना-भा०,५०,०स०।
न्यायविनिश्चयविषरणे न्यायेन प्रत्यक्षमेवेति घूमः । तत्र या प्रसिद्धमपि वन तथा व्यवहति स तेनैवाध्यक्षप्रतिसिद्ध- (प्रसिद्ध) तत्प्रतिभासेन हेतुना तव्यवहारः कार्यते तथाविधापरव्यवहारविषयनिदर्शनोपदर्शनात् । तदुक्तं सिद्धिविनिश्चये- "पश्यन्सलवणान्येक स्थूलमक्षणिक स्फुटम् । यव्यवस्यति वैशय तद्विद्धि सशस्मृतेः॥" सिद्धि वि०प्र० परि०] इति । तक सूचम्-'प्रत्यक्षलक्षणं प्राहुः स्पष्टमन्जसा' इति । वदेयं तद्वपनसामात् परोक्षमस्पष्ठमञ्जसेति निवेदितं भवति प्रत्यक्षप्रतियोगित्वात् परोक्षस्य । वत्मतियोगित्वं च तद्विरुद्धधर्माभ्यासादेव । न हि सद्धर्माकान्तस्यैव तत्प्रतियोगित्वम्, सवत्प्रतियोगिन एव पस्यपिदभायापत्तः । तत्प्रतियोगित्वमेव तस्य फैस्मात् ? अवैशद्यात् । वदधि- १. पुतः १ वत्प्रतियोगित्वात् । परस्पराश्रय इति चेत् , दमिशनी प्रयत्नसाध्यं प्रसिद्धत्वात् । तस्मति योगित्वं हि तद्विजातीयत्वम्, तच्च लोकत एव प्रसिद्धम् । पेवलं प्रत्यभे वैश्येन लक्षिते परो- क्षमशयन लक्षितव्यम्, अन्यथा तद्विजातीयत्वायोगादित्येतदेवान प्रतिपत्तव्यम् । यद्येवं क प्रत्यक्ष प्रस्तावत्वमस्येति चेत् ? न, प्रत्यक्षस्यैव प्राचुर्यात् । भवति हि प्राचुर्येण व्यपदेशो यथा माकन्दवनमिति । न हि तत्र माकन्दा एवं, स्तोकशा वृक्षान्तराणामपि सम्भवात् , एवं सामर्थ्यात्परो- १५ क्षलक्षणनिवेदनेऽपि प्रत्यक्षस्येव प्राचुर्यात् , तेनैरायमाद्यः प्रस्तावो व्यपदिश्यते नापरेण विपर्ययात् । प्रत्यक्षप्राचुर्यञ्च ततॊदस्येन्द्रियादिप्रत्यक्षस्य सविस्तर निरूपणात् । किं पुनरिदमवेशद्यं नाम ? व्यवहितवस्तुविषयवमिति चेत्, न, देशकालव्यवायेऽपि क्वचि. देशद्योपलम्भात् । स्वभावव्यवहितस्यं तु प्रहणमेव नास्ति । न चाहणमेवावैशयम्, स्याद्वादिमतस्या- नेपंविधत्वात् , अतिप्रसद्गाच्च नीलदर्शनत्यापि तदापत्तेः, वस्यापि नीलव्यतिरिक्तनिरवशेषपदार्था- न्तरपरिच्छेदपराइमुखत्वात्, अविपययाहुल्यनियन्धनाच्च प्रवेशद्यप्राधुर्यादविशदमेव वा सकल छमस्यसंवेदनं प्राप्तम्, विषयस्तोकनिवन्धनस्य वैशधलेशस्य सतोऽप्यसत्कल्पत्वात् । येदनान्तरसापेक्षत्वमवेशद्यमिति चेत्, उत्पत्ती, ज्ञातो वा तदपेक्षणम् ? उत्पत्ताविति चेत्, न, अतिप्रसगात्, सर्वस्यापि वेदनाय पूर्वपूर्ववेदनसापेक्षतयैवोत्पत्ते. । विषयज्ञप्ती तु तदपेक्षणे प्रामाण्यमेव न स्यात, स्वपरपरिच्छेदं प्रत्यनन्यसापेक्षस्यैव तत्त्वप्रतिक्षामात्-"सिद्धं यन परापेक्षम्" सिद्धिवि०प्र० परि०] इत्यादिवचनात् । प्रमाणस्य चेदमवेशद्यचिन्तनम् । ततो यदि ईशमवै. शयं न मामाण्यम्, तच्चेत् नेदृशमवेशधम्' इत्येक सन्धित्सोरन्यत्प्रच्यचेत । तन्नेदमप्यवैद्यधम् । ध्यामलितप्रतिभासित्यमिति चेत्, उच्यते- न ध्यामलावभातित्वमन्यवैशयमाञ्जसम्। रूपदर्शन एयेदं यत्न शब्दादिवेदिने ॥२९॥ - प्रत्यवसिद्धमपि । ३ प्रतिपिद्ध-२० । ३ वरिप्रसाश-प-1 तस्सात् भा,... ५ एवास्तोक-पा०,०,५०,०-स्य तद्रह-भा०,०, ५०, स.1. वेदनान्तरापेक्षणे । ८ -तस्यै दमा, प०, ५०,०।
५ १।३] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः न च तद्वेदनं सर्व स्पष्टमेवेति युक्तिमत् । शब्दादिगोचरस्यापि स्मरणादेः प्रसिद्धितः ॥२९५॥ किन्घ ध्यामलितत्वं चेदर्थधर्मोऽभिमन्यते । शानस्य तेनावैशवं कधं नामोपपत्तिमत् ? ॥२९६॥ अन्यथार्थस्य नीलत्वान्नीलं तद्वेदनं न किम् । शानधर्मो मतं तच्चेत्, चाक्षुषं तत्कथं भवेत् १ ॥२९॥ अन्धकारप्रतिच्छायं गृह्यने तद्धि चक्षुपा । न ज्ञानं चाक्षुपं चक्षुरमूर्ती यन्न वर्तते ॥२९८॥ तस्यानुभयधर्मत्ये तकि यदि न किञ्चन । कथं भाति १ विभात्येय मृगतृष्णाम्युयद्यदि ।।२९९।। कथं तेनाप्यवैशय वेदने परिकल्प्यताम् । साकारज्ञानवादस्य कथं प्रच्युतिरन्यथा ? ॥३०॥ ध्यामलितप्रतिभासित्वमवेशद्यमित्यनुपपन्नम् , अव्यापकत्वात् , रूपवान एव तस्य भावात् शब्दादिवेदनेषु विपर्ययात् । न च शब्दादिज्ञानं सर्वमपि स्पष्टमेवेत्युपपन्नम् ; तद्विपयस्यापि स्मरणादेः परोक्षज्ञानस्य सुप्रसिद्धत्वात् । अपि च, इदं भ्यामलितत्वमर्थधर्मश्चेत् ; फथं तेन ज्ञानमविशदव्यपदेशं प्रतिलभेत ? विपयधर्मस्य विषयिण्युपचाराचेत् ; परमार्थतस्तहि सकलमपि ज्ञानं विशदमेवेवि प्राप्तम् । न चैतदुचितम् , अनभ्युपगमात् । अर्थस्यै च ध्यामस्तित्वातज्ज्ञानस्यापि तत्त्वे नीलत्वमपि तस्य स्यात् तदर्थस्य नीलत्वात् । तन्नायमर्थधर्मः । नापि ज्ञानधर्मः; पक्षुर्विषयत्वात् । न हि पक्षुपो ज्ञानगोचरत्वम् तस्य मूर्तिमत्पदार्थ. २० विपयत्वेन प्रसिद्धत्वार, ज्ञानस्य चामूर्तिमत्त्वात् । न च ध्यामलिताकारस्य चक्षुर्विपयत्वमसिद्धम् । अन्धकारप्रतिकञ्चुकस्य तस्य चक्षुर्वेद्यतयेव प्रतीतेः । अनुभयधर्म एवायमिति चेत् ; न3; शानार्थव्यतिरेकिणस्तृतीयस्य राशेरभावात् । नीरूपमेयेदमिति चेत् ; वादशस्य कुतः प्रतिमासनम् ? फारणदोपसामान्मृगतृष्णिकाजलवदिति चेत् ; भवत्वेवम्, तथापि कथं तेन ज्ञानस्यावेशद्यम्? पदाकारत्यादिति चेत् ; ग ; साकारसंवेदनवादप्रतिक्षेपाभावप्रसङ्गात् । वन्दमवेशद्यम् । 'अवस्तुसामान्याकारत्वं तत्' इत्यप्यसमञ्जसम् ; साकारवादनिषेधेन वनिपेधात् । वस्मादर्थज्ञानस्यैव प्रतिबन्धकारष्टविगमविशेष नियन्धनपरिणतिविशेष एव "कश्चित्तदित्यनवयम् । व प्रत्यक्षं तल्लक्षणसामर्थ्यात्परोक्षं च वेशद्याऽवेशद्याभ्यां लक्षितम् । वयोभयं निर्वि. फल्मकोवि' फश्चित् , तबाह-'साकारम्' इति । करोति;"अत्र निश्चयार्थः । "कृतेनाकृतवी- १५ शम्दादिवेदनम् । २ पामलितत्वम् । ३-स्प प्या-आर, ५०,००-स्यापि पीतये मा, प.०,५पामलितले । ६-मपि सा-मा०,००, स.1 --प्यनिररेण स-मा.....। पन्न शा-w,.., ०, सः। ९-नमपरिणनिविशेषः -भा०, प.प., स.। अवैशयम् । "-ति पुतस्वि-आ.,.,.स .२-वित नि-मा०, २०, ५०,सा।
- १०० न्यायविनिश्चयविवरणे [१३ क्षणात्" [ ] इत्या निश्चितेनानिश्चितदर्शनात्' इत्यर्थमहणात् । आइ अभिव्याप्ती, अभिव्यामिश्च शतपेश्या ततो यस्य यावती शक्ति तावत्येव विपये सोवेदितव्या । तदयमर्थ:- आ समन्तात् करणमाकारः शक्यविषयाभिव्यापी निश्चयः, तेन सह वर्तत इति साकार प्रत्यक्ष लक्षणम । सामर्यलक्षितं च पोममिति । ननु च निश्चयो नामाभिजल्पवान् प्रतिभासः । स थ संवेदनस्य स्वरूपे वा स्यात् , अर्थरूपे का ? न तावत्स्वरूपे ; तस्य अशक्यसमयत्वात् । अभिजल्पसमयो हि क्रियमाणः 'इदास्य वारकं वाच्यं या' इति नियते । न च क्षणमानपर्यवसितं तत्ररूपमन्या किश्चिद- स्येत्यनुवदितु शस्यम् , क्षणावं तदभावात् , अप्सतश्चानुवादायोगात् । न च वत्सत्ताक्षण एवानुवादः, तस्यानुविवदिपितवस्तुस्वरूपसंवेदनपूर्वकत्वेन समसमयत्यानुपपत्तेः । अतीतस्यापि १० स्मरणोपनीतस्यानुवाद इति चेत् , किमिदं न तस्योपनयनं नाम ? स्वस्वरूपवेदनमिति चेत् , असतस्तदयोगात् । न ह्यसत् स्वरूपेण वेदितु शक्यम् , सत्त्वप्रसङ्गात । न हि स्वरूपप्रतिभा- सनाद् अन्यदन्यस्यापि सत्त्वम् । असतोऽपि सत्येनाध्यारोप इति चेत्, अध्यारोपितस्येव वर्हि तदाकारस्य शैक्यामिजल्पसमयत्वं न संवेदनस्वरूपस्य, तस्य पूर्वापरीभावविधुरशरीरत्वेनाशक्या- नुवादत्वात् । न चाहतसमयस्यामिजल्पस्य त योजनम् , सर्वस्य सर्व योजगप्रसङ्गात् , १५ इत्यनभिजल्पानुपगमेव सर्वस्यापि ज्ञानस्य स्वरूपवेदनम्-उत्पद्यमानमेव हि तत् संवित्तिविषय- गावं विभर्ति तव्यतिरेकेण तत्संविनेरभावात् , तदा च न पूर्वापरभावो नाप्यभितल्पयोजन यतः सविकल्पकत्वं भवेत् । तस्मात्तत्मण एव जातस्य साक्षाद्वेने निर्विकल्पफ्त्वमेव । सहजा- भिजल्पसंसर्गात सविकल्पकत्वमेवेति चेत्, न, सहर्जस्य अभिरापस्याभावात् । भावेऽपि स्वत- स्वद्विविकत्वात् सवेदनस्य न "तत्संसृष्टत्वेन वेदनम् । समसमयत्वेन वेदनमेव संसर्ग इति घेत , न , वस्येतरेतयध्यासरूपत्वात् , तस्य च वाच्यवाच:भावनिनन्धनत्वात् । तद्भाव न स्वाभाव्यादेव, सर्वस्यापि वप्रविपत्तिप्रसङ्गात् समयययोपत्तश्च । समयादिति "घेत् , न, तदेवोत्पन्ने 'तदशक्यत्वस्य निरूपितत्वात । भवति बात परस्य वचनम्- "तदेव चोदितस्यास्य साताद्वित्तौ न कल्पना । अभिलापेन संसर्गादिति चेन्नामिलाप(पि)ता ॥ ज्ञानस्य तद्विविक्तत्वे कथं संसर्गसम्भवः । समानकालविन्मानान्नैव संसर्ग उच्यते ॥"[०वार्तिगल. २।२४९] इति । तन्न संवेदनस्याभिजल्पवत्त्व स्वरूपे सम्भवति । २० । २१ . भाभावोऽगि-भा०,२०,०स० । २ अभिव्याप्ति । ३ "विकल्पो नामसश्रयः"-प्रवा२.१३ । १ अनुवादस्य । ५ शत्रत्यानि-मा०,१०,५०, शक्मराह नवम्। तत्प्रयो-भा०,२०,१०,१• [0-7 प्रयोज-आ० ५० ५०,०1८-नेन नि-मा०,१०,१०,१० । ९-स्याप्यनि-आ०,२०,०, १० अभि अल्पससष्टत्वेन।।।न्यत्वे वेद-पा०,401१२-इव न तस्वा-मा०,१०,१०। १३ चेत्तदेवोत्प-आO,10,8.) १४ सद्देताशक्यत्वस्य । १५ तदेव चो-आ०,१०,१०,०"तदैव चोदित तस्य अभिलापस्य ससर्गादिति चे नामि सापिता। सुखध्य तद्विविक्त वे समानकालवि मात्रान्नैव ""-रत्यार्तिक १६-जलपत्व मा०,०प०,स . २३] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताचा अर्थरूपे तत्सम्भव इति चेत् ; न; तस्यापि यदि ग्रहणम् । तदा तनिर्विकल्पकमेव .. तद्विषयस्याप्यतिसूक्ष्मसमयमात्रमग्नशरीरस्य अशक्यसमयत्वेनाभिजल्पयत्त्वायोगात् , परिस्फुट- प्रतिमासस्वाच । यदि तस्य न ग्रहणम् ; तथापि न सत्र विकल्पसम्भवः । न ह्यमहणमेव विकल्पः, अतिप्रसङ्गात्-सर्वसंवेदनानामन्योन्यविषयापेक्षया तदप्रहणात्मक- त्याविशेषात् । अध्यारोपितार्थापेक्षया तर्हि विकल्पसम्भव इति चेत् ; न; अध्याये. ५ पार्थापरिज्ञानात । अर्थग्रहणमध्यारोप इति चेत् ; न; कधितोत्तरत्वात् । तदग्रहणं से इत्यपि तादृशमेव । न चापरमध्यारोपस्य रूपं पर्यालोच्यमानं सम्भवति । यत्र तर्हि ग्रहणम- ध्यारोपश्च तत्र तत्सम्भव इति चेत् ; ननु यदि महणारोपयोर्न भेदः किमुभयोपादानेन पोनरु- त्यदोपात् ? ग्रहणमित्येव था आरोप इत्येव वा वक्तव्यम्, वत्र च प्रागेव दूपणं प्रतिपादितमिति न पुनः प्रतिपाद्यते । यदि पुनर्भेद एव तैयोस्तथापि विज्ञानद्वयमेवैककालं प्रसक्तम्-यद्हणात्मकं १० वनिर्विकल्पकं यमारोपात्मकं तत् सविकल्पकमिति; तदिदमप्यसमञ्जसम् ; आरोपस्य प्रहणाग्रह- णाभ्यां विचारितत्वात् । भवति पान परस्य वचनम्- "यदि ग्रहणमर्थस्य विकल्पः कथमत्र सः १ । अथाग्रहणमर्थस्य विकल्पः कथमत्र सः ? ॥ अथार्थारोपतस्तत्र विकल्पत्वं निरुच्यते । ग्रह्णाग्रहणे मुक्त्वा तत्राप्यर्थोऽस्ति नापरः ॥ ग्रहणारोपसाचे विकल्प इति चेन्मतिः । ग्रहणारोपयोरैक्ये द्वयोः सम्भव इत्यसत् ॥ तत्रैकपक्षनितिप्तो दोपः प्रागेव वर्णितः । अथ भेदस्तयोरस्ति द्वयमेव प्रसज्यते ॥ निर्विकल्प संवित्तिः सरिकल्पा तदैव च ।" [प्र०वार्तिकाल ० २।२४९] इति । तन स्वरूपेऽर्थरूपे वा निर्णयसम्भवः, तस्मादयुक्तं साकारमहणमिति चेत्, नेदमतिनिन्ध. प्रतिविधेयम् अतिमुग्धभापितत्वात् । तथाहि-योऽयं तदैव चोदितस्य' इत्यादिवयनप्रक्रमः स यदि निष्प्रयोजन एव । कथं तत्र प्रलापमात्रे प्रेक्षावतामादगे यतोऽर्य शास्त्रोपनियन्धः क्रियते ? कथं या तत्प्रमोपन्यासकारिणो निमहाधिकरणत्वं न भवेत् असाधनाद्गवचनत्वात् । समयोजनत्वे २५ यदि तत्प्रयोजनं सकलसंवेदननिर्विकल्पकत्वसाधनादन्यदेव; स एव दोपः तद्वादिनो निमहाधि. फरणत्यमिति प्रस्तुतानुपयोगिनस्तत्प्रक्रमस्यासाधनाद्गवचनत्वात् । तन्निर्विकल्पत्यसाधनमेव सत्म- योजनमिति चेत् ; तदपि उत्प्रक्रमस्य स्वयं तत्परिच्छेदरूपत्वास, तत्परिच्छेदहेतुत्वाद्वा भवेत् ? स्वयं तत्परिच्छेदरूपत्वे सिद्धमभिजल्पयत्त्वं तत्प्रतिभासस्य स्वभावभूतस्यैवामिजल्पस्य वैत्र २० .. -मानामग्न-मा०, २०, ५०, स.। २ मध्यारोपः। महणारोपयोः। ४ "सविकसरवित्तिः अविकल्पा तदेव च ।"-प्रधानिकाल: । ५ यनदेव भा०, ५०, ५०, स.। ६ भभिजल्पपरिन्छेद। "तप्र. भावा-मा०, प. प.।
१०२ न्यायधिनिभयविधरणे भावात । अभिजप प्यासी फेवलं न प्रतिभास इति चेन्न, स्वयं तत्परिच्छेदरूपत्वाभावप्रसङ्गात् । न घप्रविमासः परिच्छेदो नाम । भवतु स एव एकः प्रतिभासोऽभिजल्पवान्नापर इति चेत् ; न, सर्वसंवेदननिर्विकस्पत्वप्रतिज्ञाव्याघातात, तद्वदन्यस्याप्यभिजल्पवैवसम्भवाच्च । तथा हि- विवादाध्यासितः वः प्रतिमासोऽभिजल्पवान् । तस्वात्तनिर्विकल्पवसाधनप्रतिमासवान् ॥ ३०१ ॥ स्वदोऽमिजासत्याना प्रत्ययानां प्रवेदनात् । प्रत्यशेणास्य पक्षस्य पाधनं यदि कथ्यते ।। ३०२ ॥ अनिश्चितस्वभावं चेत्तत्स्वसंवेदनम् तदा । असिद्धमेव तत्तच्च फस्यचिद्वाधकं कथम् ? ॥ ३०३ ॥ अनिश्चयेऽपि तेंसिद्धी हेतुसिद्धिः कथन्न यः । तथा पासिनिविच्छित्यै "हेतो निर्णयवर्णनम् ॥ ३०४ ॥ यत्कृतं कीर्तिना तस्यादपर्यालोच्य भापितम् । रखवेदनस्य तत्सिविनिश्चयादेव हेतुबत् ॥ ३०५ ।। निश्चयो नाभिजलेन विना वः सम्भवत्ययम् । उत्सिद्धाः प्रत्ययाः पर्वे साभिजल्पस्ववेदनाः।। ३०६ ।। तथा च कस्यचिद्वाक्यं विकल्पकवादिनः । "म सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमारतें" || ३०७ ।। इति; वन तस्य स्वयं "वत्परिच्छेदरूपत्वात् तत्ययोजनबत्त्वम् । तत्परिच्छेदहेतुत्वादिति चेस; न, अकृतसमयस्य "तदयोगात । वाक्यमकृतसमयमेव स्वार्थपरिच्छेदनिमित्तम्, अनभ्यस्वशव्याख्यानस्थापि दर्शनात, अन्यथा तद्योगादिति चेत् न, एवमपि तस्तदर्थज्ञानस्य "तदनविद्धतया सविकल्पकस्यैव भावात् सर्वस्यापि तत्तस्तदर्थ- प्रतिपत्तिप्रसाच्च। न केवलस्यैव वाक्यस्य "तत्परिज्ञानकारणत्वमपि तु पदतदर्थसम्बन्धपरिज्ञानसहितस्य, तस्य व सर्वत्रभावान्नातिमसङ्ग इति चेत्, कथं नातिप्रसङ्गः ? "तत्सम्बन्धपरिज्ञानस्यापि समय- निरपेक्षत्वे- सर्वन कसमान भावः' इति परिचोदनस्य तदवस्थत्वात । समयसापेक्षमेव तदिति चेत; ना अशक्यसमयत्वप्रतिक्षाव्याघातात् । "तज्ज्ञानस्य चाभिजलपरत्वेन सविकल्पकत्वात, २५ २५ 1-वरवामम्भ-मा०, ५०, ५०, स.। २ सर्वपति-आ०, ३०, १०, स. ३ तथा भा०,०,प, स. १७ तसिद्धो आ०, २०, ५०, ०। ५ हेतनिणे-मा०, ०, १०, स. "हेतौस्त्रिषपि रूपैषु निश्वयत्तेन वन्ति । असिविपरीतार्थभ्यभिचारि विपक्षतः ॥" (Hoपा. ४) इत्यनेन हेतोः असिद्धादिदोषपरि- हाराय निरूपत्वमुक्त धर्मकीर्तिना। ७ नदि अल्पेन आ०, ५०, १०,861 पाक्यप० ॥१४॥ ९ वचनप्रक- मस्य । अभिजन्यपरिच्छेद । निर्विकल्पवानस्पप्रयोजनकत्वम् । १२ शन्दपरिच्छेदहेतुत्वायोगातूर १३ वाक्यात् । १४ शन्दानुस्यूतावेन । १५ भक्तस तस्यापि । १६ वाक्यात । तदर्थपरिश्शन । १८ पदव- दर्थरासन्ध । १९ अर्थज्ञानस्य ।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव: १० १३] सर्वसंवेदननिर्विकल्पत्वव्यावर्णनं प्रेक्षावत्त्वं परस्य प्रतिक्षिपति । पदस्य च शक्यसमयत्वे वाक्यस्यापि तवश्यम्भावि, पदपर्यायविन्यासव्यतिरेकेण वाक्यस्यैवाभावात्, तदभावस्य चोत्तरत्र निरूपणादिति सिद्धमभिजल्पवत्त्वं वाक्यार्थपरिज्ञानस्येति कथमिव सर्वथा विकल्पाभाव- प्रवादः शोभेत ? तन्नास्य तत्परिच्छेदहेतुत्वेनापि तत्प्रयोजनत्वम्, विकल्पसिद्धिप्रसङ्गात् । विकल्पास्तित्वसमारोपव्यवच्छेद एवानेने क्रियते न तत्परिच्छेद इति चेत् ;न, समारोपार्थापरिज्ञानात् । तदस्तित्वग्रहणं तदर्थ इति चेत् ; ननु तदेव नास्ति सर्वसंवेदना निर्विकल्पकत्वप्रतिज्ञानात् । कथमसतो ग्रहणं च ? प्रहणं हि तस्य स्वरूपप्रतिभासनमेव, न चासतः स्वरूपम्; विरोधात् । ग्रहणमपि तस्य समारोपादिति चेत्, न, 'समायेपार्थापरि- ज्ञानात्' इत्यादेः प्रसङ्गादनवस्थापत्तेश्च । तदाहणं तदर्थ इति चेत्, तथ्यवच्छेदस्तर्हि तहणं प्राप्तम् , तदिदं शान्तिविधानेन वेतालोत्थापनम्, विकल्पसद्भावव्याधिविध्वंसनार्थ तत्स. • मायेपन्यवच्छेदं कुर्वता तदस्तित्वमणस्यैव स्वचित्तपरितापकरस्योत्थापितत्वात् । प्रत्याख्यातं चाग्रहणस्य समायेपत्यम् । प्रहणामहणाभ्यामन्य एव तर्हि तदर्थ इति चेत् ; न; "ग्रहणाग्रहणे मुक्त्वा तत्राप्यर्थोऽस्ति नापर।" [प्र. वार्तिकाल० २।२४९] इति स्ववचनव्याघातापत्तेः । कथं पास्य सद्व्यवच्छेदकरत्वम् ? विरोधादिति चेत् ; न; निश्चयस्यैव समारोपविरोधात्, अस्य च घचनप्रक्रमस्याचेतनत्वेनानिश्चयरूपत्वात् । 'तद्विरोधिनिश्चयनिमित्तत्वेन "अस्यापि १६ तविरोधित्वमिति चेत् ; न ; सन्निमित्तत्वे विकल्पस्यानिपेधात् । ततः स्थिवम्-विकल्पान- भ्युपगमे अतिनिष्प्रयोजन एवायं वचनप्रक्रम इति । भवतु तर्हि विकल्पः कल्पनया" न परमार्थतः, सर्वस्यापि संवेदनस्य स्वमाद्यविपये शब्दसम्बन्धवर्जितस्यैव प्रवृत्तेः । तथा चोक्तम्- "असाक्षात्करणाकारे यत्र स्यात्कल्पनान्तरः। च्यवहारः स एवान विकल्पो लोकसम्मतः। दर्शनाभिमतिर्यत्र तज्ज्ञानमविकल्पकम् । "साक्षात्कृत्यवि(धि)मोताच प्रत्यक्षमिति गीयते ॥ परमार्थतस्तु विज्ञानं सर्वमेवाविकल्पफम् । स्वग्राह्यविपये सर्वस्याविकल्पेन पृत्तितः ॥ [प्र. वार्तिकाल० २।२४९ ] इति चेत् ; अग्राह-अञ्जसा परमार्थत एव साकारं न कल्पनयेति । तथा हि- भरित यस्तुभूतो विकल्पः, तत्कल्पनान्यथानुपपत्तेः । अस्पष्टप्रतिभासे हि प्रत्यये परेण विकल्पत्व. 4 २० कमविन्यास । २'तदेव चोदितस्याम्य' इति वचनप्रकमेण । ३ "सकलसंवेदननिर्विकल्पस्वपरिच्छे"-सा. टिपिकल्पास्तिव। ५ विकल्पास्तिवमेव । विकल्पस्य । विकसानहर्ण समारोपाः। ८ विसमा पम् । ९ समारोपार्थः । .चनप्रझमस्य। ।। अस्य वर-भाग, य०,५०, स.९ समारोपविरोधि ।। पचनप्रक्रमस अनिवेधप्रसार । १५-या परमा-भा०,०,०, साक्षात्कृत -मा०,40 प., स.। "साभारकस्यपिमोशाम"-३० पासिंह।
, . न्यायविनिश्चपचियरणे [१३ परिकल्पनमभ्यनुज्ञायते । केन पन तापस एव तस्य विकल्पत्व कापयति , पगारमात्वात् । 'परमार्थतस्तु विज्ञानम्' इत्यादि वचनात् । न शकल्पनात्मनस्तरकल्पनम्, प्रत्यक्षेऽपि तत्प्रसङ्गात् । कॅल्सनारमापि तस्यास्तीति चेत् , निर्मपरतत्कल्पनेन वैयात् । बदामामि यदि वस्तुत एव, सिद्धं नः समीहितम्, पारमार्थिकस्यैव विकल्पस्य व्यवस्थापनात् । ५ सोऽपि कल्पित एवेति चेत् , न, तत्रापि न तावत्स एव' इत्यादेोपात् चक्रप्रसङ्गात् , अन- वस्थापत्तेश्च । परतस्वनं तेलसमिति चेत्, न , परेणापि स्वयमविकल्पात्मना तलस्पना- ऽयोगात् । विकल्पारमापि तस्येति चेत्, न, वस्य परमार्थत्वे परमतसिद्धिप्रसङ्गात् । पल्पिवत्वेऽपि नस्यतस्तरकल्पनम् , सक्दोषत्वात् । परतरतत्कल्पन चेत्, न , 'परेणापि' इत्यादिप्रसागौना- पुन्येन चाकानवस्ययोरमतिहतमसरत्वात् । ततो दुर्भाषितमेतत्-'यत्र स्यात्फल्पनान्तरया- १० हार' इति , परमार्थतः “कल्पनाया च कल्पनान्तराणामेवासम्भवात् । भवतु वर्हि "परमार्थत पय कवियद्विकल्पः, तथापि रिमायात प्रत्यास्य येन तदपि सविकल्पकगुच्यते इति चेत् ? अभिमतस्यापि पुतः सविफल्पकत्वम् ? तत्प्रतिभास. स्थाभिजल्पयत्यादिति चेत्, न अतसमयेनाभिजल्पेन नस्य "वद्वत्यायोगात् अति- प्रसङ्गात् । नापि कृतसमयेन , विस्मृतेनापि तत्प्रसङ्गात् । अनुस्मृतेनेति चेत्, न, १५ तदनुस्मरणस्य "निर्विकल्पत्वे नद्विपयस्यान्य योजनाऽसम्मवात् क्षणक्षयादियत्। सविकल्पकत्वे - तस्याप्यभिशल्पपत्वम् अनुस्मृतेनेवाभिजल्पेन, सदनुस्मरणस्यापि तद्वत्वं तदुपरानुस्मृताभि- जल्पनेत्यनवस्थानान्त प्रकृतविकल्पनिप्पत्तियेत् । तन्नाभिजल्पयत्वात्तस्य सविकल्परत्वम् । "अभिजल्पयोग्यविपयत्यादिति चेत्, कोऽसो तद्विपयः अनुवृत्त यात्तादिस्वभावो भार एय, वदपरस्य तद्योग्यस्यासम्मयादिति चेत्, नदियमकरमादरमाक महानिधिमाप्ति. प्रत्यक्षस्यापि २० 'सत एष सपिकल्पकत्वोपपत्ते, इदमेवाह 'द्रव्य' इत्यादि । द्रव्यं चान्ययरूप सुवर्णवत्, पर्यायाश्च व्यावृत्तिधर्माणः फटकवण्डलादिवत् , सामान्य च साशपरिणामस्वभाय कुण्डल युगलचत्, विशेपश्च विसदृशपरिणामलक्षण. केयूरहारयत , द्रयपर्यायसामान्यविशेषास्त एवार्थारमानो तयोस्त पत्यात वयोवेदन प्रत्यक्षरशणम् , अतश्च साकारमिति । तदेवलक्षण प्रत्यय विविध भवति । पर्थ पुन कारिकायामनुक्त विध्यमवगम्यते ? २५ "प्रत्यक्षं विशद ज्ञानं विधा" [प्रमाणस० श्लो० २] इति शास्त्रान्तरे प्रतिपादनादिति चेत् , न, सामान्यलक्षणस्यापि सनेष प्रतिपादनादिहावयनप्रसङ्गात् । इहापि कृतिकारेण • वैविध्यमुक्तमेवेति चेत् , सोऽपि कथ पारिकायामकथित कथयेत् , धृत्तित्वात् , अनुस्व्याख्यानस्य विपर्ययादिति चेत् । न , अगापि पृथक् पृथक् तत्समर्थनेन क पारिकाविवरणत्यैर्व - तिम व सावन भा०, २०, ५०,०1 मपटप्रतिभास । विस्य । कल्पनास्वरुपमपि । ५ सपष्टप्रतिभास्य । ६-पर सरक-आ०, २०, ५० स०। ७ कल्पनास्वरूपमपिआपटप्रतिभाने। ९ विकल्प कल्पनाया च भा०, २०, ५०1"परमार्थ एव ता.१३ तद्वत्तायो-RIA,TOI १३ निर्विकल्पलेपित-मा०,००, ४-श्यनयोज-मा०,००,०1१५ शामिज -AIR, २० अनुसतम्यावृतादिस्वभावभावविषयवादेव । 10-विचारस्यैव भार, ०००।
१३] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव वैविध्यावगमात् । करिष्यते हि 'सदसज्ज्ञान' इत्यादिना इन्द्रियप्रत्यक्षस्य 'परोक्षज्ञान' इत्यादिनाऽनिन्द्रियप्रत्यक्षस्य, 'लक्षणं समम्' इत्यादिना चातीन्द्रियप्रत्यक्षस्य समर्थनम् । अत इन्द्रियप्रत्यक्षादिभेदेन त्रिविधमेव तदिति भवत्येव निर्णयः । तत्र- हिताहिताप्तिनिर्मुतिसममिन्द्रियनिर्मितम् । यदेशतोऽर्थज्ञानं तदिन्द्रियाध्यक्षमुच्यते ॥३०८॥ इन्द्रियाणि चक्षुरादीनि तैनिर्मितं सहेतुकं यदर्थस्य बहिर्घटादेः ज्ञानं तदिन्द्रियप्रत्यक्षं परि- स्फुटत्वेन वल्लक्षणयोगात् । कुतः पुनश्चक्षुरादीन्द्रियकार्यत्वं घटादिप्रत्यक्षस्यावगम्यत इति चेत् ? सुतोऽयं प्रभः ? सर्वन कार्यकारणभावस्यैवासम्भवादिति चेत् ; न ; स्ववचनव्याघावात्-प्रस्तुतं हि प्रभवचनं परस्य स्ववचनम् , तदेव व्याहत्येत । यदि न सर्वत्र तद्भावसम्भवः, तस्याहेतुकस्या- सम्भवान् व्योमकुसुमवत् । सम्भवेऽपि देशकालादिनियमानुपपत्तेः । हेतुनिबन्धनो भावानां १० तेनियमः कथं तदभावे भवेत् । तथा च वादिवत् प्रतिवादिप्रालिकादेरपि तलाभवचनप्रसद्गान कस्यचिदुत्तरयादित्वं न परीक्षकत्वं नापि नियामकत्वमिति प्राप्तम्, प्रश्नकृत एव तदनुपपत्तेः । वादिन एव तत्प्रश्नवचनं तस्यैव "हेतुहेतुमद्भावनिधयाभावान्न प्रतिवाद्यादेविपर्ययादिति चेत् ; "तन्निश्चयपूर्वकं तर्हि तद्वचनमगीकर्तव्यं तन्नान्तरीयकत्वात् , तथा च कथं सर्वत्र कार्यकारणभावा- भावः तद्वदन्यत्रापि "न्याप्तिव्यतिरेकयोः"सद्भावोपपत्तेः । तैर्दय सनिश्चयतत्पर्यनुयोगवचनयोः ३५ कार्यकारणभावं स्वयमेवोपदर्शयति सर्वत्र तदभावञ्च कथयति इति कथं स्ववचनव्याघातपाश- पन्यान्निर्मुच्येत ? तन्न तदमाव('तद्भाय स्यासम्भवात्तत्पर्यनुयोगवचनम्", सम्भवेऽपि तस्य दुरवयोधत्वात् । . दुरवोधं सल्विदं यत्किञ्चित्कस्यचित्कार्य कारणं चेति, तद्भावस्य पूर्वापरभावाधिकत्वात् ,"तत्र च प्रत्यक्षस्य सन्निहितविषयमात्रपरिच्छेदस्वभावत्वेनाप्रवृत्तेः । सदप्रवृत्ती तत्पूर्वकत्वेनानुमानस्यानुत्पत्तेरिति चेत् ; तदप्यसमीचीनम् ; "तदनवयोधतत्पर्यनुयोग- २० पचनयोरपि "वझवपरिज्ञानामावापत्तेः। भवोत्वति चेत् ; न“तींदमुपपन्नम्-'तदनव- योधात् तत्पर्यनुयोगः' इति । तदनयोहे तुफलमायपरिक्षाने "सत्येव एवंचनोपपत्तेनान्यथा रध्यापुरुषवत् । फथं तर्हि "सद्भावपरिझानम् ! परस्यापि कथमिति चेत् ? भयतु परस्यापीई चोयं न “तायतेव स्वपक्षे समाहितं भवतीति चेत् ; आस्तां तावदेतत् , हेतुफलभावपरिमानस्य यथावसरमुत्तरत्र निरूपणात् । तस्मादुपपन्नम् इन्द्रियकार्य यत्तदिन्द्रियप्रत्यक्षमिति । न्यायवि.का. ५। २ न्यायवि. का. "।३ व्यायवि. का. १६८। । हन्यते भा०, २०, ५०, स.। ५ कारपमाव । ६ प्रश्नवचनस्य । • देवमात्मदिनियमः। ८ चानादिवत् मा., प.प., स.। देशलादिनियमाभावे । ९ उत्तरवादित्यायनुस्पतः।-द्भावामावनि-ता हेतुहेतु महारनित्वपूर्वकम् । १२ प्रचतप्रश्नवचनम् । १३ प्रसनप्रश्नवचनवद । १५ अन्वयव्यतिरेकयोः। १५ वद्भावी- सा-यं निश्च-आर, पर, ०।१७ हेहेतुमदावनिश्वय । १८ वर्षचरणमावस्य। ११'युतः पुनश्चनुरारीन्द्रियकार्यवं पटादिप्रन्यास्य गम्पते !' इति परनुयोगवचनम् । २० कार्यकारणभावस्ल । २१ - कल्पित सचिर्द प्रा, य०, २०२१ दुरवरोध कल्पितं य-ह.। २३ पाउरभाव । २५ पार्यभरममावा- नवरोष । २५ प्रर्यनरपभाव । ३६ हेतु हेनुमद्भापनिवगर्म वचनम् । १७ तदनवरोधकानयोगयोः । २८ सपेवं व-आ..,प.स.१२९ सदावर आ०,००,०1१. तार येव मा.,.,५०, .
.. न्यायविनिश्चपयिषण 1 ११३ धमत्यमस्य निर्णयात्मस्त्यात् , गेन प स्यविषयस्य सर्वाफारेण प्रहणान सद्विपये मानान्तरस्य शब्दान्रत्य या व्यापारः, सिद्धोपस्थायित्वेन येयध्यान , समारोपण्याच्छेदस्य पाऽभावार निधिने समायेपानुत्सत्तेरिति पेत; न'वस्य प्रादेशिकत्वात् । तत्सत्यहि स्यविषयस्य प्रदेशात एष महणे स्वाप्रियुपनियोगाधिदित न साकारण, वय यस्य निर्मा- ५ धमययोधात् सरमादयमप्रसाए । निष्पदेशमेय सबलं यरतु फथं तस्य प्रदेशतो प्रहर्ण " मण मणस्प विभ्रमरूपायमसनादिति चेत् ; आस्वामिदम् , अनन्तरमेय निरूपणात् । भयस्येयं तथापि फयमिन्द्रियप्रत्यमस्य प्रामाण्यम् ? क प न स्यात् ? अप्रवर्तकत्वादिति पेत् ; कि प्रयतफरवेग प्रामाण्यं ध्यानम् ? न घेत् ; 'तदभाये तदभावानुपपत्तिः, अविप्रस. मात् । व्याप्तमेयेति पेन् । नसंवेदनयोगिमत्यग्नयोरप्रामाण्यप्रसगात् । न हि स्वसंवेदनं १० यरूपेऽन्यत्र या प्रवचम् ; स्वरूपस्यानुभूतत्यान् , अन्यस्य चाविषयत्वात् । नापि योगी धन- स्यात् पचित्प्रपत्तने कृतार्थत्वात् । यातुयायाम्यविपयत्यात्मामाण्यम्' इन्द्रियप्रत्यारेऽपि समानम् । महरो: मार द्विषयत्वमेव कयमगन्तव्यम् , प्रविमासस्य सत्येवरविषयसाधारण. स्यादिति पोइन । स्वसंवेदनादायपि प्रसङ्गात् । त्यहेतूनिश्वार फुधित्सामा प्रत्ति- निरपेक्षमेय समामाण्यं वेदेवाच्यतीति चेत् ; इन्द्रियप्रत्यक्षमपि किमयं न मयेत् । संशयादि. १५ दर्शनादिति चेत् निःसंशयादेरेव नमामाण्यनिर्णयरयावलोकनात् । न हि"सुवियभ्यासपरिकलिय. पुरोपतिनानिफरनिर्भासयतः प्रत्यक्षस्याकृतप्रवृत्तिकस्यैव न प्रामाण्यपरिज्ञानम् , नापि सन्देहाय- नास्यादितविपयत्वम् । यत्रापि न सवलत्परिशानं बढेतुशक्तिकल्यात्, समापि कुतचिद् दर्दुरा- रावादेखिझान विपयतयात्रवेदने तत्परिज्ञानोपपचेरनुपयोगिन्येय प्रवृत्तिः । अय प्रवृत्तिकामस्य यदि तन्न प्रवर्तकं किं तेन प्रमाणेनापीति घेत ?; फ एषमाह-'तस्य न प्रवर्तकम्' इति । २० प्रवृत्तिविषयोपदर्शकस्य प्रवर्तकत्वोपपत्तेः । वर्तमानस्य प्रतिविषयत्वं तस्यानुभवात् प्रवृत्तवानु भयार्थत्वात् । तत्फलसिद्धावपि प्रवृत्ती तदनुपरमप्रसङ्गात् । अनुभवान्तयां पुनः प्रवृत्तिरिति घेत् ;न; "वदन्तरकाले प्राचीनविषयानवस्यानात् , निर्विषयस्य चानुभवस्याभावात् । भावी तु भवतु प्रवृत्तिविषयः, प्रवृत्तिकामस्य वनाभिलापात् । किन्तु न वाय प्रत्यक्षेण प्रहणम् , व्यापारस्य वर्तमानपुरोयत्तिपर्यायमापर्यवसायित्वेन भाविभावागोचरत्वे तदुपनिरद्धजन्मनः प्रत्यक्षस्यापि "त्राव्यापारात् । प्रवृत्तिविषयत्वं वर्तमानस्य दर्शनात् । प्रवृत्तिदर्शनार्थव दर्शने सति किं गया ? ॥३०९|| निष्फलाऽपि प्रवृत्तिश्चेत्तस्या" उपरमः फयम् । . . -सि-भा०, २०, ५०, स.1३-स्य भावा- मा, ब०,१०, सा३ इन्द्रिय प्रत्यक्षस्य । तस्थ तथा मा०,०,०। ४ तद्रहणमिति पदं निरर्थक प्रतिभाति । ५ यदि ज्यात न स्यात् । ६ प्रव. स्वाभावे प्रामाण्यामागो न स्यात् । । स्वसंवेदनयोप्रित्यायो। ८-तूपनिबन्धात् माग, प., प., स.. १ स्वसंवेदनयोगिप्रत्यक्षम् । १० स्वचिरा-आ०, २०, ५०, १०प्रवर्ग-भा, ५०, पास अनुमवान्तरसमये 11 भाविनि । तनापि च्या-मा०, २०, ५०,01:४-वस्या मा, ब०, १०, स..
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव: ११३] ने दर्शनानन्तरार्थापि तत्काले विपयास्थितः ॥३१०॥ भावित्याकातित्वेन प्रवृत्तिविषयोऽपि सन् । नेन्द्रियोपनिवद्धन प्रत्यक्षेणोपलभ्यते ।।३११॥ वर्तमानपुरोवर्तिव्यापृतादिन्द्रियात्कथम् । भाचे भाविन्यताक्षे प्रत्यक्षमुपजायताम् ? ॥३१२॥ अष्टेऽपि प्रवृत्तिश्चेत् भाविन्यभ्युपगम्यते । अतिप्रसङ्गदोपेण कथमेवं न लिप्यसे ? ॥३१॥ इति चेत् । अत्र प्रज्ञाकरस्य निर्वाह:-'अभ्यासदशायां वर्तमान एव जलादिरूपे भाविनस्तदू- पस्योपादानत्वेन तत्सहभाविनश्व स्पर्शादेः तदेकसामग्यधीनतया तत्सहकारित्वेनाध्यारोपाद् दृश्य-, दर्शनमेव भाविनि प्रवर्तकम् । न चैवमतिप्रसङ्गिनी प्रवृत्तिः, अध्यारोपविषय एव तदुपग- १० मात् । न चाध्यारोपस्याप्यतिप्रसद्गित्वम् ; सत्येव सम्बन्धे तद्भावात् । अनभ्यासे तु तद. ध्यारोपाभावात् , माव्यविनाभावितोयाद्याकारविशेपलिङ्गदर्शनोपनिवद्धादनुमानात्प्रवृत्तिः' इति; तत्रेदमुच्यते-कोऽयं तदध्यारोपो नाम ? दृश्यप्राप्ययोरेकत्वग्रहणमिति चेत् ; न तहदि प्रत्य- क्षतः सम्भवति; तेस्य क्षणपर्यवसितवस्तुविषयत्वेनाभ्यनुज्ञानात् । पारमार्थिकस्यैव तस्य तद्व. स्तुविषयत्वम् , सांव्यवहारिकस्य तु तदेकत्वग्रहणमविरुद्धमेव । यदाई-"सांव्यवहारिकप्रत्य- १५ सापेक्षया तु कर्त्तत्वस्य प्रतीतिरित्युच्यते" [ ] इति । तात्पर्यमत्र-कर्तृत्वं हि क्रियायां स्वातन्त्र्यम् , क्रिया च पूर्वापरामिका । न तत्र वास्तवस्य प्रत्यक्षस्य प्रवृत्तिः, अतः सांव्य- वहारिकस्यैव तस्य तत्र व्यवहार इति ; तदिदमसम्बद्धमेव ; क्षणमात्रपर्यवसितवस्तुविपयस्यैव प्रत्यक्षस्य सांव्यवहारिकत्वात् । न दि पारमार्थिकस्य तस्य तद्विपयत्वम् ; सकलविकल्पातीतसंवे- दनपरमार्थविपयत्वेन "तदगीकारात् । तदयं स्वमतमपर्यालोचयन्नेव यथावाञ्छितं कचिदन्यथाऽपि २० कथयनीति कथमनुन्मतः १"विकल्पेन तर्हि नदेकन्वं वेद्यत इति चेत् । न उस्तै दम्पलिरि. फस्य "तेनाप्रतिवेदनात , विकल्पस्य बहिर्विपयत्वानभ्युपगमात् । अव्यतिरिक्तस्य चेदनमिति चेत् । कथं "ततो भाविनि प्रवृत्तिः ? पहिर्विपयादपि जलादिदर्शनात् "तत्र "तामनिच्छन् वहिःस्पर्शगन्धमप्यनाददा" (धा) नाद्विकल्पादिच्छत्तीति कथं स्वस्थः ? तदर्शनादेव तद्विकल्पसहा- .. , i - । तदर्शनान्तरास्थापि सः । दर्शनान्तरास्थापि मा०, २०, ५०। २ "तन मापिस्वरूपे उलारणन्देनक- तारोपः। पर तु स्पर्शादी तदेकसामध्यघीनवैनेवि न विशेषः"-५० पार्तिकाल 1121 ३ -नले तस्सह- . मा०, ५०, ५०। ४ -सहादिनिवृत्ति-आ०, २०, प., स.। ५ तस्य लक्षण-आर, २०, २०, स.। प्रत्यक्षस्य। क्षणापर्यवसितवस्तु। ८ "नच प्रत्यक्षतः कर्तृवमपि पूर्व प्रतिपत्रम् , पौर्वापर्ये प्रत्यक्षस्या- वृत्तेः । सौन्यवहारिकप्रत्यचापेक्षया प्रतीतिरित्युच्यते ।"-:. पार्तिकाल. ९ क्षणमात्रपर्यवसित वस्तुविषयत्वम् । .. "इदं च पुनर्वाह्यार्थमाश्रित्य प्रायप्राइकमावयाभ्युपगम्य उच्यते । परमार्थवस्तु सकलमेव स्वसंवेदनमान नेन्द्रियादिप्रत्ययप्रविभागोऽति ।"-प्र. वार्विकाल. १२५०। । विकल्पलेन भा०, ५०, प., स. १३ एकत्वस्य । १३ विकल्पश्यनिरिक्तस्य । १४ विकल्पेन । १५ विकल्यात् । १६ बहिर्विषये । 1.प्रत्तिम् । १८ -प्यनादर्शनादि-ता.1 १९ व्यवहारतः पहिविषयकप्रत्यक्षादेव। १२॥
1 .. । न्यायविनिश्चयविपरणे [२३ यात प्रवृत्तिरिति चेत् ; कथं 'वयमतद्रोचरमतगोचरसहायमपि तत्र प्रवर्तकम् ? न हान्धस्य सदनचरसाचिव्येऽपि रूपदर्शनसामध्यम् । अथ यहिगोचर एव विकल्पः, तव्यतिरि- सस्यापि तद्वेश्य यहीरूपत्वेनाध्यवसायादिति चेत् । न ; सहीरूपत्वस्यापि व्यतिरिक्त. त्वेनाप्रवेदनात् । अन्यतिरेकेण घेदनमिति चेत्, न; 'कथं ततो भाविनि प्रवृत्तिः' इत्याद्यनुत्तेत्र- ५ प्रकोपक्रमान् अनपस्थानदोःस्थ्याच 1 कथं वा प्रवृत्तिकायें दर्शनसहायत्वं विकल्पस्य भिन्नविपय. स्वात् , नीलज्ञानवत् पीतदर्शनस्य। तदेकरवाध्यवसायात् ;न; दर्शनस्य निर्विकल्पकत्वेन तवस्त- दसम्मवात् । विकल्पात्तत्सम्भव इति चेत् ; न ; वेनापि तद्व्यतिरिक्तस्य तदेकत्वस्यानध्यव- सायात् । अव्यतिरिकस्याध्यवसायेऽपि स्वरूपमेवाध्यवसितं न तदेकत्वम् । पुनरपि तस्य तदेक. त्याध्यवसाये स एव प्रसङ्गः 'न दर्शनस्य'इत्यादिरनवस्था च । ननु एवं व्यवहार न विधेच. १०, यति प्रवृत्तिवियेधित्वात् । न हि प्रवृत्तिकामस्य वद्विपेधिनि विचारे सादरत्वं तत्कामत्वविरोधात् । किमिदानीमविचारितरमणीयमेव ज्ञान प्रवृत्तिकामस्य पक्षतः १ तथा चेत् । अनर्थकं तर्हि से प्रति प्रमाणलक्षणप्रणयनम् । व्याख्यातारं प्रति नानर्थकम् "व्याख्यातार खन्चेचं विवे. चयन्ति: १० वा. स्व० १९७२] इति वचनादिति चेत् ; न ; तस्यापि प्रवृत्तिकामवा- विशेषात् आहारादी प्रवृत्तिदर्शनात् । न हि प्रवृत्त्युपायस्य विचारमीरुतां विवेचयन्नेव वत्कृता १५ प्रवृत्तिमुपजीवितुमर्हति । विवेश्यन्नपि सहजेन व्यामोहेन तामुपजीवतीति चेत् ; न, विवेकया. मोहयोः तम:प्रकाशवद्विरोधात् । अन्य एव विवेक आहार्यस्य अन्य एष प सहजव्यामोहस्य विरोधी, तत्र शास्रोपनीतेन विवेकेनाहार्यस्य निवृत्तावपि को विरोधो यत्सहजस्य तस्यावस्थानं तत्कृतश्च प्रवृत्त्युपजीवन" न भवेदिति चेत् ? उच्यते- आहार्येण विरोधोऽस्य विवेकस्य कुनो मतः । विरुद्धविषयत्वाच्चेत् ; सहजेनापि "तन्न किम् ? ॥३१४॥ अविरुद्धार्थतायां तु विवेको मोहतां ब्रजेत् । "आहायोऽपि ततो मोहस्तन्मोहात्" नाशवान् कथम् ॥३१५॥ मोहो मोहाविरोधान मोहध्वंसाय कल्पते । न तमामालनं लोके तमसैवोपलभ्यते ॥३१६॥ ततः शास्त्रस्य वैयध्यमागतं सौगते मते । तन्नेदमिह साधूक्तम्-"शास्त्र मोहनिवर्त्तनम् ॥३१७॥ [प्र. वा० ११७ ] । बहिर) । २ परमार्थतः दर्शन बहिरोगोचरं सत् अहिरागोचरविकल्पमहायादपि कथं बहिरर्थे प्रवर्तक स्यादिति भावः । स्वयमतद्गोचरसहायमपि मा०, ब०, ५०, स.। ३-वेनापि व्यवहा-आ, ०,०,स। ५ दर्शनात् एकत्वाध्यवसायासम्भवात् । ५ तत्प्रति-मा०, २०, ५०, स. । व्यवहारिणं प्रति । "व्याख्यातारः एवं विवेचयन्ति न तु व्यवहारः, ते तु स्वालम्बनमेव अपेकियायोग्यं मन्यमानाः दृश्यविकाध्याविकीकृत्य प्रवर्तन्ते ।"-प्र• का. स्ववृ ॥७२॥ ७ व्याख्यातुरपि । ८ आरोपितस्य व्यामोहत्य । ९ व्यामोहत्या 1.-भ-मा०, ब, १०, स.1 विरुद्धविषयत्वम् । १२ भाडाऽपि मा०, प.स.१५ यत. विवेकः सहजव्यामोहादविरुद्धः अतः स्वयं मोहरूपः सम्प्राप्तः तथा च कथं तेन भावार्यमोइस्प नाशः इति भावः । २० प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव १३] १०९ तद्विवेकाविरुद्धार्थो मोहो या सहजस्तव । विवेक एव संधृत्तो व्याख्यातुरिह धीमतः ॥३१८॥ आहार्येतररूपाभ्यां व्याख्याता रहितस्ततः । क्वचित्कथं प्रवर्तेत कुतश्चिद्वा निवर्तताम् ।।३१९|| पुनर्मोहान्तरं तस्य सहतं यदि कल्प्यते । पूर्वसर्वप्रसङ्ग स्यात् सानवस्थानचककम् ॥३२०॥ शास्त्रोपेनिवद्धजन्मनो विवेकस्याहार्येणापि मोहेन तद्विरुद्धविषयत्वादेव विरोधो नान्यथा। मोहस्य हि दृश्यप्राप्ययोरेकत्वं तद्विवेकस्य तु तन्नानात्वं विषय इति ; यद्येवं सहजेनापि स्य विरोध: स्यात् तस्यापि तदेकत्वविषयत्वाविशेषात् । अविरोधे तु सहजमोहवत्तद्विवेकस्यापि तदेकत्वगोचरत्वेन तस्यापि मोहरूपत्वम् , आरोपितविपयत्वात् , तथाच कथमाहार्यस्यापि मोहस्य १० तस्मादपवर्त्तनम् । न हि मोहादेव मोहान्तरमपसरति तस्य तदविरोधिरूपत्वात् । न हि तमस एष तमःप्रक्षालनं क्वचिदप्युपलब्धम् । तथा च मोहप्रसरहेतुरेव शास्त्रं न मोहवि. भ्वंसकरमिति न साधु भाषितमेतत्-"शास्त्र मोहनिवर्त्तनम् ।" [प्र० वा० ११७ ] इति । मोहस्य था सहजस्य विवेकैकार्थत्वेन विवेकरूपतापत्तो न व्याख्यातुराहार्यः सहजो वा मोह इति कथं तस्य क्वचित्प्रवर्तनं निवर्त्तनं वा कुतश्चित् ? पुनरपि सहजमोहान्तरपरिकल्पनादोप १५ इति चेत् ; न; पूर्वनिरवशेषप्रसङ्गपोनःपुन्यादनवस्थादौःस्थ्यावहस्य चक्रकस्य प्रसगात् । तन्न प्रविचारितरम्ये संवेदनप्रामाण्ये शास्त्रप्रणयनमर्थवत्, विचारपरिशुद्धं तत्प्रामाण्यमिति । व्यामोहनिपेपार्थत्वात् न हि तस्यानर्थक्यमिति चेत् ; न ; निषेधस्य प्रवृत्तिकामेस्तद्विरोधित्वे- मानभ्युपगमात् । कस्यचित्कचित्प्रवृत्तिरपि नास्त्येव पूर्वापरीभावस्यादर्शनवेद्यत्वादिति चेत्, न; भेदमागस्यैवमप्रतिपत्तिप्रसङ्गात् । भवतु सर्वभेदविनिर्मुक्तं संविन्मानं तत्त्वम्-"स्वरूपस्य स्वती २० गतिः" [प्र. वा० १६ ] इति वचनादिति चेत् ; आस्तां तायदेवत्-'स्वतस्तत्त्वम् "इत्यादी विचारात् । तन्न अभ्यासदशायामेकत्याध्यारोपात्प्रत्ययस्य भाविविषयत्वोपपतेः भाचिनि प्रवर्तकत्वम् । नाप्यनभ्यासदशायाम् अनुमानस्य ; लिङ्गाभावेन तस्यैवाभावात् । दृश्यमेव जलादि लिङ्गमिति चेत् । न ; वस्य प्राप्यैकत्वेनाध्यवसितत्वात् । न हि साध्यमेव साधनम् ; अति- २५ प्रसद्गात् , स्वभावहेतोरपि व्यवसितसाध्यन्यविरेकस्यैव लिङ्गत्वात् । दृश्यमपि व्यवसितप्राप्य- व्यतिरेकमेवेति चेत् ; न ; व्यवसायस्याभ्यासनिबन्धनत्येन तदभाव अनुपपत्तेः क्षणविवेक- व्यवसायवत् , अन्यथा 'तद्व्यवसायस्याप्यनभ्यास एवं सम्भवात् यदुक्तम्-"अभ्यासपाटवाय- .. यासरजसप भार, ०,१०,१०।२-पनिरल्य-मा०, २०,९०, स.1 विकस्सा सहज- ज्यामोहस्यापि । ५ विवेकस्यापि । विवेचत् । शास्त्रं तदेव मोह-मा., म.प.,स01 शामप्रणयनस्य । प्रत्तिविरोधित्वेन । 1. प्रत्यक्षाविषयत्वात् । न्यायपि श्लो. ५६।१३-२ अश्य-मा०,५०,०० । १३ साध्यमिततया शतस्य । १५ क्षणविवेश्य्यवसायस्यापि ।
ए न्यायविनिश्चयविवरण भाषान्न क्षणविवेकव्यवसाय ] इति सदपर्यायोचितवचनं भवेत्, आणविवेकान गानस्य च वैफल्यात् । निश्चिते समायेपाभावात् तद्व्यवच्छेदकलस्वानुपपरः । तदयमभ्यासदशा- यो दृश्यमाप्यविवेकव्यवसायप्रसवोचितायामपि तदेकत्याध्यवसायमेशभिदधानः पुनरनभ्यास. समये सदगुपितेऽपि तद्विवेकव्यवसायमावेदयतीति सत्यं तथागतप्रज्ञ तप वाथागतः। किश्व- लिमालेनिविभागेन दृश्यप्राप्यार्थनिश्चयात् । अभ्याससमये मानमनुमानं तवोचितम् ॥३२१॥ अन्यदा तु प्रमाणत्वमभ्यक्षरयोपपत्तिमत् । तोफत्वावसायत्य निरभ्यासेन सम्भवात् ॥३२२॥ सैनगन्यायमुल्लङ्घ्य कुर्यतस्तव्यतिकमम् । १० तय प्रनाकरस्यापि कुन प्रज्ञाविपर्ययः १ ॥३२३॥ यदि धाभ्यासतोऽध्यक्षं दृश्यमाप्याविवेक्टर । पश्येत्सौगतमध्यक्षं क्षणानामन्ययं तथा ॥३२४॥ अभ्यासातिशयोद्भूतं तद्यतो भवतो मतम् । तत्सर्व क्षणिकं यात्कथं नाम महामुनिः ॥३२५॥ अन्यथा वस्तु पश्यश्चेदन्यथोपदिशेदयम् । कथनाम प्रमाणं स्यादविसंवादवर्जनात् ? ३२६॥ अभ्यासोऽपि सुगतस्य क्षणिकतयैव मायेषु तथैवानुमानादिति चेत् ; व्यवहतरपि तथैव स्यात्तथैव दर्शनास , अन्यथा-"पश्यनयं क्षणिकमेव परपति" ! इत्याप विरोधात् । तन्न प्रज्ञाकरस्यैवमेकत्वाध्यवसायतः । भाविप्रवृत्तिचिन्तायामुपपत्तिमती मतिः ॥३२॥ कथं तर्हि भाविनि प्रचिरिति चेत् ? तस्य साक्षादेव दर्शनादिति धूमः । यदि दर्शनं किं प्रत्त्या ? तस्या दर्शनार्थत्वात् , वस्य च सिद्धत्वात् , न हि सिद्धप्रयोजनहेतवः प्रयोजनार्थि- भिरभ्यर्यन्त इति चेत्न, प्रवृत्तेर्दर्शनगोचरमाविरूपसहभाविपादिमाप्त्यर्थत्वात् । स्पर्शा- २५ देरपि यदि दर्शनं न प्रवृत्तिः, वैफल्याद, नाप्यदर्शने अतिप्रसङ्गादिति चेत् ; न तस्य दृश्यमान- रूपतादात्म्येन कथञ्चिद्दर्शनस्यापि भावात् । सर्वात्मना दर्शनादर्शनयोरेव प्रवृत्तिवैफल्यातिप्रसङ्ग- दोयोपनिपातात् । एवेनेन्द्रियान्तरवैफल्य प्रत्युक्तम् ; स्पशादेविशेषत इन्द्रियान्तरादुरलाधे। रूपस्यापि कार्य भाविको दर्शनम्, अनक्षविषयत्वात् , कथं वा तस्य स्पर्शायकत्वं विरुद्धधर्माध्यासादिति ३० बेत् ? आस्तो शायदेतत् यथास्थानं निवेदनात् । मुनरभ्या-०, २०, २०, स. १२ तथागः भा०, वन, प०,801 ३ अन्यथा तु का, प०। ४ वरकमन्याध्यमु-त.} ५ साकाक्षादेव भा०, २०, ५०, सिक्षिप्रयोजन-मा १०।७ प्रतिवे-आ०, ०,१०,२२ । ८ रूपहभाविपर्शादः । ९- तेने-सा. , १३] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः [ प्रत्यक्षेत्वं प्रत्युक्तम् । ननु यदि भाविन्यपि प्रत्यक्षं प्रवर्तकं कथं तर्हि भाष्यकारैर्वर्तमान एव तस्य तत्त्वमुक्त- मिति चेत् ; न; वर्तमानप्रवृत्ति एव भाविप्रयोजनावाप्तः न तदर्थमेकत्वाध्यवसायेन प्रत्यक्षस्य माविविषयत्वं प्रति सौगतेन प्रयतितव्यमिति निवेदनार्थत्वात् तथा वचनस्य । यथा च ततस्त- दवाप्तिस्तथा तैरेव सविस्तरं निरूपितम् । यत्पुनः "अभ्यासेऽपि भाविज्ञानमनुमानम्" ] इति तेषां वचनम् । तदप्येकत्वाध्यवसायप्रयत्नसाधितमपि प्रत्यक्षं न प्रत्यक्षमिति ५ निवेदनार्थम् । कथन्न प्रत्यक्षमिति चेत् ? आरोपितविपयत्वात् । आरोपितं हि दृश्ये तत्कारणत्वेन भाविरूप तज्ज्ञानस्य विषयः, तादृशस्य च सविकल्पकत्वान्न प्रत्यक्षत्वम , कल्लानापोढस्य तत्वात् । व्यवहारी नैवं मन्यत इति चेत् ; किं पुनर्व्यवहारादन्यत्र कल्पनापोढत्वं प्रत्यक्षलक्षणमुक्तम् ? तथा चेत् ; न तत्प्रमाणम् , "प्रामाण्यं व्यवहारेण" [प्र. वा० ११७ ] इति वचनात् । न चाप्रमाणे प्रत्यक्षम् ; प्रमाणविशेपस्य तत्त्वात् । ततो व्यवहारादेव कल्पनाविरहस्य प्रत्यक्षलक्षण- १० स्वात् नारोपितविषयस्य प्रत्यक्षत्वं विकल्पकत्वात् । एतेन कुश्चिकाविवरमणिप्रभामणिज्ञानस्यापि आरोपितविपयत्वेन विकल्पकत्वाविशेषात् । तर्हि विकल्पक तदिति वक्तव्यं किमनुमानं तदित्युक्तमिति चेत् ? न; परस्य निर्दर्शनाभावनिवेदनार्थत्वात् । परस्य हि वचनम्-"अभ्यासे भाविज्ञानवत् प्रभामणिज्ञानवच आरोपितविषयमपि प्रमाणमनुमानम् अर्थाविसंवादात्" [ ] इति । तत्रेदमुच्यते-निदर्शनज्ञानं किन्नाम प्रमाणम् १ १५ न प्रत्यक्षम् ; विकल्पकत्वात् । न च तन्मात्रं प्रमाणम् ; प्रमाणद्वयनियमव्यापत्तेः । वस्मादनुमान- मेव सत्। न च तस्य निदर्शनत्वम् , अनुमानान्तरवत् विवादविषयत्वात्। विवादे किं निमित्तमिति चेत् ; अनुमानान्तरे किम् ? आरोपितविपयत्वमिति चेत् ; न ; प्रकृतेऽपि तद्भावात् , अन्यथा तस्य स्वलक्षणविषयत्वेनाध्यक्षाविशेषप्रसद्गात् । ततो न किञ्चिन्निदर्शनं यदनुमानप्रामाण्यसाधनं प्रत्युपयुज्यत इति निवेदनार्थ भाविज्ञानस्यानुमानत्ववचनम् । ततः समञ्जसं प्रत्यक्षस्य भावि. २० विषयत्वेन तन प्रवर्तकत्वम् इति सूक्तम्-हिताहितप्राप्तिपरिहारक्षममिन्द्रियप्रत्यक्षम् । हितस्या- नुकूलवेदनीयतत्कारणरूपस्य अहितस्य च प्रतिकूलवेदनीयतत्कारणरूपस्य यथासंख्येन प्राप्तो परिक्षारे च तस्य शक्तिसम्भवादिति सुविवेचितमिन्द्रियप्रत्यक्षम् । अनिन्द्रियप्रत्यक्षं तु सर्वचेतसा स्वसंवेदनम् , तस्य क्षयोपशमविशेषापरनामधेयाद् अनिन्द्रियादुत्पत्तः, वद्विशेषव्यतिरिक्तस्य त्यनिन्द्रियस्य "सतोऽपि स्वसंवेदनं प्रत्यनुपयोगात् , २५ तथा प भाष्ये सविस्तरं निर्णीतम् । कथं पुनः संवेदनानामात्मवेदनमिति चेत् ? कथमर्थवेद- नम् ? निर्वाधात्तदनुभवादिति चेत् ; समानमात्मवेदनेऽपि । स्वरूपपरिच्छेदपराहरातया बहि. रगोपग्रहमात्रव्याघृतानो" तेपामनुभयात् , "अर्थग्रहणं युधिः" न्यायभा० ३।२।४६] इवि- अकलदेवैः । २ प्रत्यक्षस्य । ३ प्रवर्तकन्वम् । ४ प्रत्यक्षत्वान् । ५ "तस्मान् मणिप्रभायामपि मगिदान प्रत्यक्षमेव"-प्र.पातिकाल. रा५ । बौद्धेन हि अनुमानप्रामाण्यसाधनाय मणिप्रभामणिशानं रटान्तवनी- पन्यरतम् (प्र. पा. २५७)। तय मणिप्रभामणिज्ञानस्य अनुमानत्वापादनेन विघटत इति भावः । परस्यापि वय-भा०प०, ५०, स.। ८ मणिप्रभामणिशनम् । ९ विकल्पमानम्। १. खतोऽपि स.। "च्यायुतानाम् भा०, प., ५०, स.।
.. न्यायविनिधयविवरणे वचनान हेपामात्मवेदनमिति चेत् ; न ; वचनमानात् अपरिस्सलितपतीविश्यागपेपदर्शितस्य तस्य प्रत्याख्यातुमशक्यत्वात्, अन्यथा अर्यवेदनस्यापि प्रत्याख्यानवसहात, "स्वरूपस्य स्खतो गतिः" [२०वा० ११६] इति सत्प्रत्याख्यानपरस्यापि वचनस्य भावात् । 'मानान्तरयेद्यसर्थज्ञानं वेशत्वात् कलावत्' इत्यनुमानानुपहात् पूर्वमेव वचनमुपपत्तिमात्, नापरमिति चेत्, न, 'स्वसंवेद्य- ५ मेव ज्ञानं वेद्यत्वात् मुसादिवत'इसनुमानानुमहस्य पैरवचनेऽपि भावात् । कुतः पुनः सुखादेपि स्वसंवेद्यत्वमिति चेत् ! कळशादेः अन्यत्रेयत्वक्त् प्रवीवेरेव । कथमेवमपि तत्स्वसंवेदनस्वभाव- नियमस्यानुमानविषयत्वे न प्रतिज्ञाव्यापातः १ न पान्तरमूवानुमानविण्यतामावहत एव नियमेन स्वानुभवस्वभावत्वम् । अंतद्विपयने तु कथमतद्विपयमनुमानं तत्प्रतिपादनपरस्य स्वरूप. स्य इत्यादिवचनस्यानुमाहकं यत्तदेवोपपत्तिमद्भवेदिति चेत् ; उच्यते-- संविदामन्यवेदयत्वस्यानुमान स्यविद्यदि । तदन्यवेद्यनियमप्रतिज्ञा तव भज्यते ॥३२८1 स्वयमतातसत्त्वं संत् अस्वसंवेदने कथम् । अर्थग्रहणमित्यादेयंचसोऽनुग्रहशमम् ।।३२९॥ अननुपाहकोनाप्येवं तस्किन करप्यते । इत्यमेवान्यथा नेति नादृष्टं शक्यकल्पनम् ॥३३०।। अन्यतो वेदनं तस्याप्यनुमानस्य चेन्मतम् । न तदाना तत् , अन्यस्य वेदनस्यामवेदनात् ||३३१॥ पश्चादेव तेदस्तित्वे पश्चादपि न जायते। यदा तदा कर्थ नाम वदित्यम्भाववेदनम् ॥३३२॥ विपये सति तज्ज्ञानं स्यादेव नियमाद्यदि । तस्याप्यज्ञातसत्त्वस्य "तद्वित्त्वं कथमुच्यताम् ॥३३३॥ तस्यापि वेदनाद्वितिरन्यतश्चेत्प्रकल्प्यते । न तदानी तदन्यस्येत्यादि पूर्वप्रसञ्जनात् ॥३३४॥ चनकं भवतः प्रासमनवस्थाभयप्रदम् । ततोऽनुमान स्वाभासस्वभावमभिवर्ण्यताम् ।।३३५॥ वतः प्रतिज्ञान्यापात: समाधातुं न शक्यते । ततो नातिशयः कश्चिद्योगसीगतयोर्मियः ॥३३६|| तस्मात्प्रवीत्युपाध्यायैर्यथा वारतु (वस्तु) मतीयते । सवाभ्युएमन्तव्य निमुंच्याप्रदेशसम् ॥३३७ - १ आत्मवेदनस्य । "तस्मात् झानान्तरसंवेद्य स्वेदन नेशन्वान् घादिवत्"-शयो.पू. ११९ विधिषि न्यायका २९ ३ अर्यग्रहण बुद्धिरिवि वरनम् । सत्य ततो गतिरिति सबनेऽपि । ५ मनु मानाविषयत्वे तु। स्वसवेदनात्मक यदि । अनुमानम्। अन्यतो वेदनम्।९पन्यवेदनास्तित्व तद्वेदिलम् ।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः . .. २४३ ] अर्थवेदनयत्तस्मात्प्रतीतं स्वप्रवेदनम् । अशक्यमेवापह्रोतुमिवरस्याप्यपहवात् ।।३३८॥ संवेदनानामन्यवेद्यत्यनियमानुमानं यदि स्वसंवेदनस्वभावम्; कथन्न तनियमप्रतिज्ञा- व्याघातः ? न चेत् तत्स्वभावम्; वर्हि तदेवासिद्धसत्ताकं कथम् "अथग्रहणम्" [न्यायभा०] इत्यादेर्वचनस्यानुपाहक परिकल्प्यताम् ? तदननुपाहकत्वस्यापि परिकल्पनाप्रसङ्गात् । न धनुपल- ५ म्भगोचरीकृतं किञ्चिद् इत्यमेव नान्यथा' इति शक्यमवस्थापयितुम् , भावेषु तदतद्भाकव्यव- स्थाया उपलम्भनिवन्धनत्वात् । अन्यथा उपलम्भस्यैव आनर्थक्यादतिप्रसगाच । स्वत एव तद. वेदनमन्यतस्तु वेदनं विद्यत एवेति चेत; न; अनुमानसमसमयस्य तस्यायेदनात् । युगपद्वेदनो- त्पत्तेरनभ्युपगमाच्च । पश्चादेव तवेदनमिति चेत् ; न; पश्चादपि यदा तन्न जायते तदा कथ- अनुमानस्य इत्थम्भावाध्यवसाय: स्यात् ? स्यादेवायम्, सति विपये तत्संघेदनस्यावश्यम्भाषा- १० दिति चेत् ; न; तस्याप्यविदितस्य अनुमानस्वरूपेत्यम्भावगोचरत्वानवगमात् । तस्याप्यन्यतो वेदनं चेत् ; न; अनुमानसमेत्यादेरनुगमेन चक्रकोपनिपातात । पुनरन्यतस्तस्यापि वेदनपरिक- स्पनायाम् अनवस्थापत्तेश्च । ततोऽनुमानस्य विपयनियमं व्यवस्थापयितुकामेन स्याभासस्वभावं सदभ्युपगन्तव्यमिति कयन्न भवतोऽपि प्रतिज्ञाव्याघात: ? यदिमी अन्यवेद्यानन्यवेद्यनियमवादिनी न परस्परमतिशयाते । तस्माभिरयद्यप्रत्ययोपाध्यायोपदर्शिते यमनि प्रवर्तमानः प्रेक्षावह्निः १५ स्वपक्षानुरागपरिप्रहपरिहारेण यथाप्रतीति भावतत्त्वमभ्यनुज्ञातव्यम् । प्रतीयते चार्थसंवेदनयत् संवेदनानामात्मसंवेदनमपि; तत्कथं शक्यापलापम् ? अर्थवेदनस्याप्यपलापेन ज्ञानवानॊच्छेदप्र- सगात् । स्वपरपरिच्छेदविकलस्य ज्ञानत्यायोगात् मृदादिवत् । न च ज्ञानाभावे ज्ञेयमपि किञ्चित् ; सधीनत्वात्त व्यवस्थायाः इति विजयेरन सकलयस्तुधर्मनैरात्म्यवादिनः । तदुचम्-'ज्ञाना- भावे कथं ज्ञेयं पहिरन्तश्च ते द्विपाम् ।" [ आप्तमी० फा० ३० ] इति । एतेन परोक्षा बुद्धिरिति प्रत्युक्तम् ; अर्थस्यापि परोक्षत्वप्रसङ्गात् । अनुभवोपारूढत्वा- न्वमिति चेत; तदुक्तम्- "स हि वहिर्देशसम्बद्धः प्रत्यतमनुभूयते" [शावरमा० १२११५] इति; तदसत् अन्तर्देशसम्बद्धतया बुद्धरपि प्रत्यक्षत एवानुभवात् । वदनुभवापलापे घार्यानु- भवस्याप्यपलापान्न झानं नापि किञ्चिशेयमिति दुप्परिहरः शून्यवादगर्तावपातो मीमांसकस्य । न घशानानुभयाभावेऽर्थानुभवसिद्धिरिति फरिप्यत एवान प्रबन्धः । वरमादर्थवेदनान्यथानुपपत्त्या २५ विज्ञानस्य स्ववेदनप्रसिद्धिः। एतेन कापिलानामपि ज्ञान व्याख्यावा; तस्यापि स्ववेदनशून्यस्य अर्थवेदनात्यानुप- पत्तः । प्रतीवमर्थवेदनमिति चेत् न स्वसंवेदनस्यापि प्रतीतेः । सत्यम् ; वस्यापि प्रवीतिनं तु २० भर्भवेदनस्यापि । २ -नसमपत्य मा०, ५०, ५०, स०1३ भन्यवेदनस्य । १-याया-मा प., प., स.।५-तेन त-भा०, ५०, ५०, स० सयव्यवस्थायाः । ."अर्थविषया हिमपरपुदिन पुगनारविरान बातेऽर्थ कधिद्बुद्धिमुपलभते, शते स्वनुमानास्वमञ्चति ।"तुम्मायक्षा पुलिः।" -सायरमा.1111८ दुष्परिहारः -भा०, २०, ५., स.९ स्वविद-प्रा०, २०, प., स.। १५ . १० न्यायविनिश्चयविवरण वास्तवस्य, शानस्य प्राक्तत्वेनाचेतनस्य वस्तुतः स्ववेदनाभावात् , चेतनोपाधिसामर्थ्यात्तु चेतना- यमानस्य तस्य स्ववेदनमोपाधिकमेव न पाचवमिति चेत्, उच्यते-- उपाधिसिद्ध चैतन्यं तकार्याय कथं क्षमम् । न मुसं मुखफायर्याय दर्पणप्रतिबिन्त्रितम् ॥३३९॥ सत्कार्यकरणे वा तदवस्तु कथमुच्यताम् ।। वस्तु कार्यक्षम यस्मात्कथ्यते वस्तुवेदिभिः ॥३४०॥ फुर्वन्तपि भयं सत्यं रज्जुसो न वस्तु चेत् । नेतत्सारम्; भयाभ्यासादेव तस्य समुद्भवात् ।। ३४१॥ सर्पज्ञानाद् भयाभ्यासेऽमित्र्य हि भयं भवेत् । भयाभ्यासविहीनस्य तज्ज्ञानेऽपि तदत्ययात् ॥३४२॥ सर्पस्यानुपयोगश्चेकि 'तज्ज्ञानमपेक्ष्यते । इति चेद भयसंस्कारल्यको तच्छक्तिदर्शनात् ॥३४३॥ सध्यतिरपि सच्चित् ; न, अवस्तुत्वादशक्तिः । गम्यते तदवस्तुत्यमपि वाधकनिर्णयात् ॥३४४] तस्मादुद्बुद्धसंस्कारकार्यत्वेन विनिश्चितम् । न वत्सपाय नापि ततानादुपजायते ॥३४५१ संस्कारस्य च वस्तुत्वमस्सललाययार्पितम् । शक्यमेवापहोतुं विदिवाधिपतेरपि ॥३४६॥ तन्न कार्यक्षम किंचिदवस्तु यदुपाश्रयात् । अवस्तु ज्ञानवैतन्यमर्धवित्यै प्रकल्प्यते ॥३४७॥ किन फेनैप गन्तव्यो "ज्ञाने चैतन्यसनिधिः । न चैतन्येन तस्यामसंवित्यैव व्यवस्थितः ॥३४८ नप ज्ञानेन चैतन्यस्यात्मनो वाऽपि वेदनम् । जडत्वात, "उभयाज्ञाने ज्ञेयस्तत्सन्निधिः कयम् ॥३४९।। तस्मात्स्यसनिधिज्ञाने चिच्छत्या यदि वद्यते । ज्ञानस्यापि सथा वित्तिः स्वरूपस्यैव कथ्यताम् ॥३५॥ तय पहिरथानां तवैव प्रतिवेदनात् । निष्प्रयोजनमेव स्यात्तदन्यज्ञानकल्पनम् ॥३५१॥ । १ खसवेद-मा०, २०, २०,३ - दुनै-ता । ३ सव मा,प.स. 1 सर्पज्ञानेऽरि । ५-fक न भा-पा०, घा, १०, स ( सजानम् १५ सर्पशनशकि। - रावस्तुत्वम् । ९ पदपा-आ, २०, ५०,801 यशान्तात् । १० हानत-मा०,०,५०,स.1 1 उभयकाने पार, १०, १०,० १२ तस्यसनिधि ।
१३] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावा पहिरर्थग्रहे तस्या ज्ञानं चेत्साधनं मतम् । मानमहे परं ज्ञान साधनं परिकल्प्यताम् ॥३५२॥ झानानामनवस्थैवं कापिलानां प्रसज्यते । ज्ञानग्रहे विना ज्ञानादेवमर्थग्रहो न किम् ? ॥३५३॥ तन्न चैतन्यसंवेद्यो ज्ञाने चैतन्यसन्निधिः । मानवेद्यः से चेन्ज्ञाने स्वसंवेदनमिप्यताम् ।।३५४॥ अन्यथा ज्ञानचैतन्यद्वयस्याप्रतिवेदनात् । तेन तव्यसान्निध्यं दुर्योधं हि निवेदितम् ॥३५५॥ यदि तवयसानिध्यमन्यज्ञानेन वेद्यते । न तस्यापि जडत्वेन तद्वित्तौ शक्त्यसम्भवात् ॥३५६॥ १० तस्यापि चितिसानिध्याचिद्रूपत्वोपकल्पने । वेद्यं तदपि सानिध्य बोधस्यैवापरस्य यः ॥३५७॥ तत्राप्ये विचारे स्यादनवस्थानवैशसम् । विच्छक्तिसन्निधिज्ञानं निर्मूलं यनिसन्तति ॥३५८॥ ततश्चित्सन्निधिज्ञानमनुपाधि स्ववेदनम् । १५ ज्ञानत्वात्तद्वदन्यच सर्व विज्ञानमुच्यताम् ॥३५९॥ तदिदं वचनं वस्तुस्वरूपमैपि विचका फापिलैः ( मविविन्य कापिले. ) कथितम्- "तस्मात्तत्संसर्गादचेतनं चेतनावदिह लिङ्गम्" [सांख्यका० २०] इति । ततः सिद्धगनिन्द्रिय- प्रत्यक्षं तस्य स्ववेदनरूपत्वात् । वस्य चोकन्यायेन सर्वसंवेदनेषु साधिवत्वात् । अतीन्द्रियं तु प्रत्यक्षमवितथमच्यापा, लोकोत्तरं कालत्रयनिलोकाधिकरणनिरयशेप- पदार्थतत्त्वसाक्षात्करणदक्षमतिस्पटमुत्कृष्टं ज्योतिः । सन्सद्भावे च प्रमाणं 'लक्षणम्' इत्यादी, "अन्यन व यथावसरं निरूपयिष्यते । तदेतत् त्रिविधमपि प्रत्यक्षं द्रव्यादिस्वभाववस्तुगोचरमिति साधूनम्-'द्रव्यपर्याय. सामान्यविशेपार्थात्मवेदनम्' इति । प्रत्यक्ष निविधं देवैः दीप्यतामुपपादितम् । द्रव्यपर्यायसामान्यविशेपार्थात्मवेदनम् ॥३६०॥ फश्चिदाह-यदि साकारं निश्चयात्मकं प्रत्यक्षं तब एवं निरवशेपोपाधिगर्भस्य भावस्य निश्चयात् किं प्रमाणान्तरेण अपूर्वार्याधिगमस्य सत्कलस्याभावात् , समारोपव्यवच्छेदस्य प निधिते समारोपामानासम्भवादिति , अत्रेदमाह- ,चिच्यते । २ चैतन्यसषिधिः । ३ पाश्यर-बा०,२०,०, स.।र-पि चेति भा०,०प०,म.। ५-मपि विरिछापि-मा०, २०, प.-मपि विरिद्यायपि-स०। ६ तनावे भा०, प., प., स.. • न्यायदि सो. १६८ प्रमाणसं.लो. ९१ ८ दिन्यतम् भा..., स.। देवः उपादित विविध प्रत्यक्ष दीप्यताम् यन्वर । २० . म्यायधिनिश्चयधिवरणे [११४ सदसज्ञानसंवादविसंवादविवेकतः। सविकल्पाविनाभावी समक्षेतरसम्प्लवः ॥४॥ इति । अस्यायमर्थः-सङ्गतम् इन्द्रिय कारणत्वेन यस्मिन् तत् समक्षम् इन्द्रियप्रत्यक्ष तव इतरच प्रमाणान्तरमनुमानादि तयोः सम्भव एकविपयत्वेनोपसर्पणं समक्षेतरसम्लवा, उपपद्यते इति ५ शेषः । फुत एतत् ? इष्टत्यात् । न हि दृष्टमनुपपत्तिपयनुयोगस्य भूमिा; अतिप्रसङ्गात् । सत्यम् , प्रत्यक्षविषय एव प्रमाणान्तरसनाये दृश्यते सत्वपूर्याधिगमस्य समारोपव्यवच्छेदस्य प तत्प्रयोजनस्याभावात् निष्प्रयोजना पर्यनुयुध्यत इति चेन् । अत्राह-सविकल्पाविना- भावी' इति । विकल्पो गृहीतेतरत्वेन निश्चितेतरत्वेन चार्थस्य कश्चिद्रेदः तदधिनाभावी व- मान्तरीयकस्तनियन्यतः स प्रस्तुतः तत्सम्मच इति । गृहीतश्यागृहीतश्च यदि प्रत्यक्षगोचरः । अपूर्वाधिगमस्तस्मिन् किन मानान्तरात्परम् ॥३६१ ॥ निश्चितश्चेतश्चैवमर्थश्वेदक्षगोचरः । तबारोपोपपरोस्तव्यवच्छेदैः प्रमान्तरात् ॥३६२॥ न सस्वरमदादिप्रत्यक्षं निरर्वशेषाभावोपाधिप्रतिपत्तो समर्थम् ; विकलोपाधिविपयतयैव १५ तस्यानुभवात् । ततस्तैद्गृहीतापशिष्टस्य भावभागस्य भागत् तदुपमहमवृत्तस्य प्रमाणावरस्य अपूर्वार्थाधिगमान्न निष्पयोजनतया शक्यः पर्यनुयोगः । न च निश्चयात्मकरऽपि प्रत्यक्षस्य ततः सर्वतद्विपयोपाधीनां निश्चयः पचिनिश्चयरूपस्यान्यनानिश्चयात्मनश्च परिच्छेदस्य ततः सम्म- वात् । निश्चयात्मनः प्रत्यक्षात् कथमनिश्चयात्मा परिच्छेद इति चेत् ? न, एकान्तेन तस्य तदा- त्मकत्वाभावात् । कथं तर्हि व्यवसायात्मकं ज्ञान प्रत्यक्षमियुक्तमिति चेत् । न अभिप्रायापरि- २० शानात् । न बनेन प्रत्यवाभिमतवानस्य अनिश्चयरूपत्यभायान्तरप्रतिक्षेपः क्रियते, सत्यपि रूपान्तरे व्यवसायापापेक्षयैव तस्य प्रत्यक्षत्वं नेतरमागापेयेति एवम्परत्वाचवदनाय । दो निश्चयावशेपितस्यापि भावोपाधे धान्न तद्विषयस्य प्रमाणान्तरस्य नैफल्यपर्यनुयोगः सुलभाव- काश इति । स्यादाकूतम् - एतदेव विपतिपत्तिस्थानं यदेकस्य गृहीतेतरवेन निश्चितेतरत्वेन प विकल्प इति, वत्कथं तन्निबन्धनः समक्षेतरसम्लव इति ? तन निश्चितस्य विप्रविपत्तिस्थान. बायोगात् , निश्चित एव वद्विकल्पो जैनवत् सौगतस्यापि । नदाह-'सदसज्ञान इत्यादि । सद् विद्यमानम् असद् अविद्यमानं च ज्ञातं ययोस्तयोवियेको निश्चयः सौगतस्थापि सदसज्ज्ञान- 1-धमतीन्द्रिय-स.1 २-जनं पर्य-आ०,०, १०, ०1 - -भा, ०, २०,०-पशेषोपाधि-मा०, ६०, प०,414 प्रत्यागहीन । ६ प्रत्यवाद । निश्चयात्मकत्या- भावात् । ८ घी का० ६० "हमनन्तरीक स्प, विशदं व्यवसायात्मकं शनम् । कयम्भूतम् ! स्वर- निशानान्वयव्यतिरेकानुविधायि प्रतिसंध्यानिरोपरिसंवादकं प्रत्यक्ष प्रमाणं युक्तम् ।"-सिद्धिवि० स० १० ११ । ९ निश्चितावशिष्टस्य, अनिश्चितस्यैरयर्थः । निश्चयाविशेषि-मा०, १०,५०, सक ५ १४] प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्ताव विवेकः तस्मादस्ति वस्तुपु गृहीतेतरत्वेन विकल्प इति भावः । तंत्र परमाणूनां नीलाद्याकारः सज्ञानः तस्य प्रत्यक्षेण परिज्ञानात् , असज्ज्ञानस्तु तेषामेव परसरतो 'विवेकः तस्य सतोऽपि प्रत्यक्षेणावेदनात्, अन्यथा स्थूलाकारप्रतिवेदनाभावप्रसङ्गात् । विवेकः परमाणूना प्रत्यक्षे यदि भासते। स्थूलैकाकारनिर्भासाभाव एव प्रसज्यते ॥३६३॥ न च नास्ति स नि सो निर्वाधात् स्वप्रवेदनात् । तदभावे न किञ्चित्स्यादणुज्ञानाप्रवेदनात् ॥३६४|| शून्यवादापवादश्च ननु पश्चाद्धविष्यति । तेनालमुसुकायित्वात् प्रस्तुते दीयतां मतिः ॥३६५॥ सतोऽपि स्थूलनि सस्येन्द्रियत्वं न चेदसत् । तस्यैवेन्द्रियजत्वं यद्वक्ति प्रज्ञाकरः स्फुटम् ॥३६६।। "को वा विरोधः" [प्र. वा० २।२२३] इत्यादि कारिकाव्याल्याने खलु अलैंका- रकारेण-"यथैव केशा दवीयसि देशेऽसंसक्ता अपि घनसन्निवेशावभासिनः परमाणोऽपि तथेति न विरोधः" [प्र. चार्तिकाल० २।२२३ ] इति ब्रुवाणेन परिस्फुटमेव परमाणुपु घनसन्निवेशप्रतिमासस्य इन्द्रियजत्वमुक्तम् । विकल्परूपत्वे हि तस्यान्यदेव किञ्चिदिन्द्रियज्ञानम् , १५ तन च परमाणवः परिमण्डलावभासिन एवेति कथं घनसन्निवेशावभासिनो यतः 'परमाणवोऽपि इत्यादि वचनमुपपन्नं भवेत् । विकल्पज्ञान एव ते घनसन्निवेशावमासिनो न इन्द्रियज्ञान इति चेत् ; न तस्य॑ तेंद्रो (तदगो) चरत्वात्, अन्यथा तंत्रापि विवेकस्यावभासने "तदनुपपत्तेः । अनवभासने" स्विन्द्रियज्ञानेऽपि अनवभासितविवेका एव ते घनसन्निवेशप्रतिभासिनो भवेयुर- विशेषात् । तस्मादिन्द्रियज एव तन्निर्भासः सन एव दूरविरलकेशवनसन्निवेशप्रतिभासस्य २० तथाविधस्यैव "निदर्शनत्वमुक्तम् , न केवलं विरलवस्तुनिबन्धनत्वेन निदर्शनसादृश्यं तन्निर्मा. सस्य, अपि तु इन्द्रियजत्वेनापीत्यवद्योतनार्थम् । ततो न परमाणूनो विषेकस्याध्यक्षेण महणं घनसनिवेशस्यैव प्रहणात् । "तदग्रहणे तदव्यतिरित्तो नीलाद्याकारः कथं गृहात इति चेत् ? न; दर्शनादभ्युपमाच्च । "हेतुभाषाहते नान्या ग्राह्यता नाम काचन" [प्र०या० २।२२४] इत्यादि व्याख्यानं कुर्वता हि "परेणोक्तम्-"परमाणनामियं नीलाकारता" [प्र० वार्ति. २५ फाल० २।२२४]इति । ततोऽवगम्यते "तत्प्रत्यक्षत्वं तेनाभ्युपगतम्, अन्यथा 'इयम्' इति प्रत्यक्ष- निर्देशानुपपत्तेः । गृहीतोऽपि"तदाकारो भ्रान्त एव स्थूलाकारादिवदिति चेत् ; न; 'परमाणूनाम्' - १ तन प्रमाणानाम् स० । २ भेदः । ३ -घात्सप्रवे-मा०,००,५०,०। ४ प्रमाणवार्तिकालङ्कारकता । ५-वेऽपि तस्य भा०, २०, ५०, सः। ६ विकल्पस्य । - परमावविषयत्वात् । विकल्पस्य परमाणु विषयखे । ९ विकल्पज्ञानेऽपि । १० घनसनिवेशप्रतिमासानुपपत्तेः। 11 परमाणुविषयत्वे परमाणुभेदानवभासने । १२ -सत एव भा०, २०, ५०, स.1 १३ निदर्शनमुक्तम् आ०, ०,१०, स.। १४ परमाण्वप्रह। १५ प्रज्ञाकरेण ।।६ नीलपकारताप्रत्यक्षत्वम् । १० नीलाद्यानरः ।
व्यायान्, न्यायविनिश्चयविवरणे [M इति वचनात् । न हि खलक्षणस्वभावस्य भ्रान्तत्वम् ; बहिरर्थवादाभावप्रसङ्गात् । न चार्य तद्वाद एय स्थित्वा "परमाणनाम्” इत्यादिवचनात् । ततः सिद्धम्-परमाणुपु नीलाद्याकारस्य सत एव ग्रहणम्, अग्रहणं च विवेकस्यति सदसज्ञानत्वं तयोः । स्यान्मतम्-न विरकारहणं धर्मकीरभिमेतं सकलोपाधिवेदनस्येव तदभिमतत्वात् ५ "तसाद दृष्टस्य भावस्य दृष्ट एवासिलो गुणा” [अ० वा. ३१४४] इति वचनात् । ने च तस्यानभिप्रेतं मोगतसिद्वान्ततया प्रत्येतव्यम्, तद्वचनमूलत्वान् वसिद्धान्तपरिमानस्य । निय. न्धनफारस्यं तु सदपि विवेकापरिझानवपनमनादेयमेव 'तसात् दृष्टस्य' इत्यादि मत्यनीक- त्वात् । न हि तस्यैव शास्त्र व्याचक्षाणस्य तन्मतविरुद्धं वचनमुफ्पन्नमिति, वदमत्, "नच ते बुद्धिगोचराः" । ] इति धर्मकीर्तिनव प्रतिपादनात । अनेन हि विवेकरूपतयेवपर. १० माणूनामघुद्धिगोचरत्वमुच्यते न नीलादिस्पदया, प्रतीरिवाधानात् । क्थ नर्हि तस्मादित्यादिक तस्य वचनमिति चेत् भवत्वयं तस्य दोपः, परस्परविरुद्धाभिधानात् । न तावता वियेकामहणं तस्यानभिप्रेतम्' इत्यासीयते । ततः सिद्ध एर सौगतस्यापि गृहीतेतररूपतया भावभेदः निश्चितानिश्चितरूपतया च । तदाह-'संवादविसंवादविवेकतः' इति । संवादो निर्णय एव "नावः परो विसंवाद" [ ] इति वचनान् । तदभावो' विसंवादः तयोरपि १५ विवेक एकवस्तुविपयतया निश्चय एव जैनवत् सौगतस्यापि तलावात् । तथा हि- नीलबक्षणभङ्गादेर्मनोऽध्यक्षादवेदने । "एकस्यार्थस्वभानस" इत्यादि सूक्तं वचः कथम् ? ॥३६७॥ वेदने तु तवस्तस्य निश्चयो यदि नीलवत् । तत्रानुमानवैपल्यं वदेव क्थं न वः १॥३६८॥ न गृहीतिहीतत्वानिश्चितत्वान्न निश्चयः । तत्यानुमानादन्यत्तु फलं तस्य किमुच्यताम् ? ॥३६९।। निश्चिते च समारोपो विरोधान्नोपजायते । फलं यतोऽनुमानस्य "तद्विच्छेदः प्रकल्प्यताम् ॥३७०॥ समारोपन्यवच्छेदमनुमानात्तदिच्छता । पत्तव्यः क्षणमादेर्मनोऽध्यक्षान्न निश्चयः ॥३७१॥ तस्येव यदि नीलादेरपि तस्मान्न निश्चयः । मानसं कथमध्यक्षं निश्चिदं निश्चयात्मकम् ॥३७२॥ २० २१ । यहिरवदभाव-आ०, २०,९०,स. 1 यहिरवाद। नीलयावर विवेकयो । म समित आ०,३०,०,१५-स्वासति-आ०, २०, ५०, स.१६ प्रज्ञाकरस्य । तस्मार रस भावस्येत्यादि । ८ धर्मको ११-वोऽपि विस-आ०,०, प, सI.RAN. १२"क्षणमहादे । १ समारो पन्यवाद: तस्यैव भा०, ०,१०, साक्षपभादेति।
२४] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः न हि किश्चिदनिश्चिन्वत् युज्यते निश्चयात्मकम् । स्वापमूर्छादियोघेऽपि सत्त्वस्यातिप्रसञ्जनात् ॥३७३॥ नाप्येतन्निर्णयात्मत्वं मानसस्याप्रसिद्धिमत् । यतः प्रज्ञाकरस्येदमस्मिन्नर्थे वचः स्थितम् ॥३७४॥ "इदमित्यादि यज्ज्ञानमभ्यासात्पुरतः स्थिते । साक्षात्करणतस्तत्र प्रत्यक्ष मानसं मतम् ॥ [प्र० वार्तिकाल०२।२४३] इति इदमित्येवमुल्लेखान्नान्योऽन्यत्रापि निर्णयः । स चेदस्ति मनोऽध्यक्षे सिद्धं तन्निर्णयात्मकम् ॥३७६॥ तस्यै च तदात्मकत्वं नीलादावेव न क्षणक्षयादो उक्तदोपत्वात् । ततो गृहीतावशेपितस्य निश्चि- तावशेपितस्य च भावभागस्य भावात्तद्ब्रह्णाय तन्निश्चयाय च प्रवर्त्तमानस्य प्रमाणान्तरस्य न चैफल्यमिति साधूक्तम्-'सदसज्ज्ञान' इत्यादि । यदि वा यदुक्तमन्यैः-'द्रव्यपर्याय' इत्याद्यर्युक्तम्, विरोधात् । अन्ययो हि द्रव्यस्य स्वभावः व्यतिरेकश्च पर्यायस्य, तयोश्च लक्षणतो विरोधात् कथमेकत्वम् ? सामान्यविशेषयोश्च, तयोरपि सादृश्यवैसंदृश्यरूपतया लक्षणतो विरोधस्य सुप्रसिद्धत्वात् । तत्कथं 'द्रव्यपर्यायसामा. न्यविशेषात्मकत्वमर्थज्ञानयोर्यतस्तद्वेदनं प्रत्यक्षम्' इति । तत्रेदमाह-'सदसज्ज्ञान' इत्यादि- १६ सम्यक् सङ्करादिपरिहारेण अक्ष्णोति व्याप्नोति स्वपर्यायानिति समक्षं द्रव्यम्, इतरे व्याप्तिविप- ययात् पर्यायाः । अथवा, समरूपतया अक्ष्यते गम्यत इति समक्षं "तिर्यक् सामान्यम् । इतरे तद्रूपवैपरीत्याद् विशेषास्तेषां समक्षेतराणां सम्प्लयः। समित्ययमुपसर्गः एकत्वे, 'समर्थः' इत्यादी दर्शनात्, प्लवः संवेदनम् , गत्यर्थस्य धातोर्ज्ञानार्थत्वात् । तदयमर्थः-समक्षेतराणां द्रव्यपर्यायाणां सामान्यविशेषाणां चैकत्वेन वेदनम् । केनेति चेत् ? प्रत्यक्षलक्षणेन । पूर्वश्लोकादनुवर्तमानस्य २० तृतीयापरिणामेन सम्बन्धात् । इदमत्र ऐदम्पर्यम्-न द्रव्यादीनामप्रतिपत्तो तत्रैकत्वप्रतिपेधनमुप- पन्नम्, अप्रतिपन्नप्रदेशे मशकप्रतिषेधस्याऽप्रवेदनान् । प्रतिपन्ना एव द्रव्यादय इति चेत्, कुतस्त- अतिपत्तिः ? प्रत्यक्षादिति चेत् ततस्तहि- अन्वितानन्धितत्वेन यथा भेदोऽवगम्यते । द्रव्यपर्याययोस्तद्वदभेदोऽप्यवसीयते ॥३७७॥ प्रत्यक्षेणोपलब्धोऽपि यद्यभेदो विरुध्यते । विरुध्येतैव भेदोऽपि पद्विशेपानवेक्षणात ॥३७८1। ततश्च भावनैरास्यप्रवादो दुस्त्यज्ञो भवेत् । उपपत्तिनं तत्रापीत्येतदने वदिष्यते ॥३७९॥ निश्चयात्मकत्वसद्धावस्य नसमात् । सत्यस्यापि प्रस-भा, १०, १०, स.।२मनोऽध्यक्षस्य । ३ निर्ण- यात्मकत्वम् । तदारमन्वं सा०, स०। ४-स्य च भा-आ०, ब०, प० । ५ बौद्धः। तस्वसं० पृ. ११८, ५८९ । हेतुमि० टी० पृ० ८ । ६ -दि यु-मा०, ५०, ५०, स. १७ वैसा-मा०, २०, ५०, स.। "सदशपरिणामतिर्यक् खण्डमुण्डादिषु गोत्ववत्"-परीक्षामु०१४।
१२७ न्यायविनिश्चय विवरणे Le कुतः पुनरेतवातम्-'द्रव्यपर्यायतादाम्यं प्रत्यक्षतोऽवगम्यते' इति ? सनाह- सविकल्पाविनाभावी । स तत्सम्मको विशेषेण संशयादिव्युदासेन कल्पनं समर्थन विकल्पो निर्णय इति यावत्, वदविनाभावी सन्नान्तरीयकः तदात्मकत्वात् । एतदुक्तं भवति-प्रत्य. क्षप्रयुक्तो हि तत्सम्प्लयो निर्णयस्वभावः ततस्तस्य वत्तादात्म्यावगमरूपत्वं स्वत एक निश्चित. ५ मिति किं तनिश्चयार्थेन प्रमाणान्तरेणेति ? कथमेव तन्त्र विप्रतिपतिःन हि प्रत्यक्षत एव तेचा. चाम्यावगमे तत एव च तस्य तद्विपयत्वनिर्णये वर कस्यचिद्विप्रविपत्तिर्भवितुमर्हवि निर्णयस्य विपतिपत्तिप्रत्यनीकल्वात् । दृश्यते च तत्रानेकधा विप्रतिपत्तिः प्रवादिनामिति चेत् न, शाखा- न्तरसंस्कारविकलानां तद्भावात् । न हि कुण्डलितस्य प्रसारितस्य च पन्नगपतेरेकत्वे तद्विप- यत्वे च प्रत्यक्षस्य नेपा विप्रतिपत्तिः सर्वेषां तकवाक्यत्योपलम्भात् । तर्हि वान्प्रति शाख- १० मनर्भकमेव, स्वत एव विप्रतिपत्यभावे सनिवर्तनस्य शत्रफलस्यामावादिति चेत्, न; वान्प्रत्यन्यपरत्वाच्छात्रस्य । वे हि कुतश्चित्प्रत्युत्पन्नश-रेन्द्रियविषयनिर्वदा भुमुक्षुराया मोक्ष- मार्गप्रश्नेन विदिततन्मार्गतत्त्वं देवं सप्रश्रयमुपपन्नास्तेन च सम्यग्ज्ञानं तन्मार्गमुक्ताः पृच्छेयुः "किं तत् सम्यग्ज्ञानम्' इति ? तर सस्यानव्यवहारविषयोपदर्शनाय तत्प्रसिद्धमेव द्रव्य. पर्यायस्वभावपदार्थगोचरं प्रत्यक्षादिज्ञानं शाररेणान्यत इति कथमनर्थकत्वं तस्य ? तत एष १५ कैदिवदुक्तम्-"प्रमाणानुवादः" ] इति । अयादिनां तु विद्यन्त एव विप्रतिपतयः । न चैतावता स्वविषयनिर्णयस्वभावरहितमेव प्रत्यक्षम्, निवेऽपि विषये कुतळभियोगमा अन्तरदादपि दोषोपप्लयात् मन्दप्रज्ञानां विप्रतिपत्तिविधानोपपतेः, अन्यथा सकलपतिपतृनि- श्चयाधिष्ठाने बहिर्विपयादो विप्रतिपत्तिविरहाद् विज्ञानवादादिविफलं सकलं जगत्माप्नोति । तासां च विप्रतिपत्तीनां कचित् वमतानुरागविपमहत्यापत्तिविकलेषु सत एव वचनमानो- २० पसूचितान्निर्णयात्मनः प्रत्यक्षानिवृत्तिरिति मन्यानेनेवमभिदितम्-'सविकल्याविनाभावी' इति । येषां तु बलवती स्वमतपक्षपातिनी मतिः नेपामपि तत एव प्रेत्यरत्य विकल्पाविनाभा. वित्वात् यथाविहितवसुनिर्णयस्वभावापरव्यपदेशाद् अनुमानव्ययस्थापिता विपतिपत्तिव्यावृत्तिः, नप निर्णयरूपत्वाविशेषात् अध्यझनिर्णयवत् अनुमाननिर्णयस्यापि विमतिपतिविषयत्वेन १३- परानुमानव्यवस्थायामनवस्थानम्; स्वप्रसिद्धनिदर्शनबलोपनीतत्येनानुमाननिर्णयस्य अशक्य- २९ विप्रतिपत्तिमलोपलेपत्यात् । तच्चेदमनुमानम्-विवादास्यासिवं प्रत्यक्षम् अन्धयत्यतिरेकवद्वस्तु- निश्चयरूपं प्रत्यक्षत्वात् । किमन परमसिद्धमुदाहरणम् ? सदसज्ञानप्रत्यक्षम् । तदाह- 'सदसज्ञानविवेकतः' इति । सर्च गृहम् असच्च विशेषणं देवदत्तादिपकत्य तयोर्ज्ञानं तस्य वियेका प्रत्यक्षेण निर्णयः । तस्तमुदाहरणत्वेनाश्रित्य सविकस्पाविना भावीति । एकं हि प्रत्यज्ञानं देवदत्ताभाववद्विशिष्टगृहविषयमुपजायमानं विशेषणप्रतिमासा- ३० द्विशेष्यप्रतिमासस्य तत्पतिमासाच विशेषणप्रतिभासस्य नीलपीतप्रनिभासयद अर्थान्तरवाह प्रत्यक्ष देव्यपर्यायतादाम्य । ३ खरय । विवादामादात् । ५ वादिनाम् । -ज्ञानस्य भ्यव-HTe, RRB-पादौ प्रति-भा, प०, २०,०1८-समतानु-भाग 1 ५ "प्रत्यक्षादिति पाठ."-ता. 'देवदार भावर गृहम्' इत्यत्र ।
1 १४] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः १२१ भयाकारं परस्यापि प्रसिद्धम्। तथा च विश्वरूपस्य वचनम्-"ततोऽपि विशेषणविशेष्यत्त्वेन प्रतिभासादभावगृहयोरेकज्ञानावलम्बनत्वम्" [ ] इति । तच्च तदुभयप्रतिभासल- क्षणाकारापेक्षया सव्यतिरेकम्, तदाकाराधिष्ठानसंवेदनापेक्षया तु सान्वयम् इत्यन्वयव्यतिरेक- वस्तुरूपमिति सिद्धं तद्विपयस्य स्वसंवेदनस्यान्यस्य वा प्रत्यक्षस्यान्वयव्यतिरेकवद्वस्तुनिर्णय- रूपत्वमिति साध्यापैकल्यमुदाहरणस्य । अथवा, सामान्यविशेपज्ञानमत्र उदाहरणम् । तदाह-सदसज्ज्ञानविवेकता' इति । सीदति स्वविशेपव्यापकत्वेन गच्छतीति सत्, न सीदति विजातीयविशेषव्यापकत्येन न गच्छत्तीत्यसत् । सच्चासावसच्च सदसत् सामान्यविशेप इत्यर्थः । प्रसिद्धयायमर्थः परस्य । तथा च "सामान्य विशेष इति युद्ध्यपेक्षम्" [वैशे० सू० ११२।३] इति । अत्र भाष्यम्- "तत्रैकं गोत्वं घुद्धिवशात्सामान्य विशेष इति चोच्यते, अनुवृत्तबुद्धिहेतुत्वात्सामान्यं १० व्यावृत्तबुद्धिहेतुत्वाद्विशेषः।" [ ] इति । तस्य ज्ञानं तत्प्रत्यक्षं सदसज्ज्ञानं तस्य विवेको निश्चयः । तस्मादुदाहरणात् सविकल्पाविनाभावीति । तथा हि- यत्सामान्यविशेपस्य व्यावृत्त्यनुगमात्मनः । विनिश्वायकमध्यक्षं काणादस्य प्रसिद्धिमत् ।।३८०॥ तदुदाहरणादन्यदपि प्रत्यक्षमझसा । व्यावृत्त्यनुगमात्मार्थनिश्चयानं नियुध्यताम् ||३८५।। स्यान्मतम्-गोत्यस्यान्यस्य सामान्यरूपमेव पस्तुसत् न विशेपरूपं सत्तु परमुपचारात् , ततो न वस्तुसद्ध्यावृत्त्यनुगमात्मनिर्णयरूपत्वं तत्प्रत्यक्षस्य । सतः साध्यपैकल्यमुदाहरणस्य, तथा च "द्रव्यत्वं गुणत्वं कर्मत्वञ्च सामान्यानि विशेपाच" [वैशे० सू० १।२।५] इति । अत्र भाष्यम्-'तत्र द्रव्यत्वमनेकवृत्तिसादञ्जसा सामान्य २० सत् व्यावृत्तप्रत्ययहेतुत्वादौपचारिकी रोपाख्यामपि लभते"[ ] इति । तत्रेदमुच्यते-फः पुनरसी विशेपो द्रव्यत्ये यस्योपचारः क्रियते ? गुणकर्मभ्यो व्यायत्तत्वमिति चेत् ; न; तस्स मुरयस्येव भावात् , अन्यथा तव्यात्प्रत्ययस्येवानुदयप्रसगात् , वस्य सद्विशेपनिवन्धनत्वात् । उपपारसिद्धात्तद्विशेपात्तत्प्रत्यय इति चेत् ; न ; तत्प्रत्ययाभावे तदुप- पारस्येवायोगात् । तदयं परस्पराश्रयः -व्यातृत्तप्रत्ययाद्विशेषोपचारः, तदुपचाराच्च सत्प्रत्यय २५ इति । यदि च द्रव्यत्वस्य गुणकर्मभ्यो व्यावृत्तत्यमोपचारिकम् , तदनुस्त्तत्वं तर्हि पारमार्थिक- मिति गुणकर्मणामपि द्रव्यत्वोपपत्तेः सुव्यवस्थितो द्रव्यादिभेदः स्यात् । पृथिव्यादिप्पनुचिरेप देवरसामावद् गइमिति शनम् । २-ति न साप्यादि-भा०,५०,१०,०1३ पृथिवी यादिकमित्यर्थः । ५ "अपरं दम्य वगुगरवकर्मवादि अनुत्ति यात्तिहेतुन्वान् सामान्य विशेषच भवति । "एवं पृथिवीत्वरूपलाशे. पनवगोत्वपटवपटवादीनामनि प्रायमागिगतान मनुप्तिम्यातिइनान सामान्यविशेषमायः सिद्धः ।"-रा.मा. १६५।५ चोदते मा०,०, प., स.। "एतानि नु द्रव्यवादीनि प्रभूनविश्य वात् प्राधान्येन सामान्यानि, साधपविशेष वागण्या विरोषस्यानोति।"-मरामा 2. गुरमभ्यो द्रव पानामाते प्रम्पयस्य । • गुणधर्ममात्तिमिबन्धनवार । ८ गुराधमांनुत्तचम् । घा - १ १२२ न्यायधिनिश्चयविवरण [१४ तस्य गुणकर्मभ्यो व्यावृत्ति परेवि थे ; गुणकर्मभ्यो व्यापतिरेव तस्य पृथिव्यादिष्वनुवृत्ति- नांपरेत्यपि करमान स्यात् । अन्यत्तप्रत्ययेन पृथगेवानुवृत्तेऽयवस्थापनादिति चेत् ; न; व्यावृत्तप्रत्ययेनापि पृथगेत्र व्यावृत्तव्यवस्थापनप्रसङ्गात । व्याहतप्रत्ययोऽपि नापरोऽनुवृत्त- प्रत्ययात् । तथा च भाप्यम्-"कः पुनर्द्रव्यत्वनिमिचो द्रव्यस्यानुवृत्तप्रत्ययः ? 'द्रव्यं ५ द्रव्यम्' इति । व्यावृत्तप्रत्ययोऽपि स एव" [ ] इति । तत्कयमसिद्धादेव व्यावृत्तप्रत्ययान पृथव्यावृत्तेर्व्यवस्थापनमिति चेत् । न ; वचनमावात् तत्प्रत्ययापलापस्य दुरु- पपादत्वात अनुवृत्तप्रत्ययस्याप्यालापस्य प्रसङ्गात् । शक्यं हि वक्तुम् याः पुनः द्रव्यत्वनिमित्तः पृयिव्यादिषु व्यावृत्तप्रत्ययः ? रूपाद्युत्क्षेपणादिविलक्षणाः पृथिव्यादय इति, द्रव्यमित्यनुवृत्त- प्रत्ययोऽपि स एष, इति । पृथगवानुवृत्तप्रत्ययोऽनुभूयत इति चेत् ; न ; व्यापत्तप्रत्ययस्यापि १० पृथगेयानुभवात् । व्याहतश्चैतत:-अनुवृत्तप्रत्ययस्यैव व्यावृत्तप्रत्ययत्वमिति, नीलप्रत्ययस्यैव वदपरसफलपदार्थप्रत्ययत्वप्रसङ्गात् , एयश्च सर्वस्य सर्ववेदित्वमुपायाभियोगनिरपेक्षमेव भवेत् । नीलात् पदपरसफलपदार्थवावस्य अर्थान्तरमालायमतिप्रसङ्ग इति चेत् । अनुगमावायत्तेरन- र्थान्तरत्वं फरमात ? अनुगमप्रत्ययस्यैव व्यावृत्तप्रत्ययत्वादिति चेत् । तदपि कस्मात् ? अनुगमाव्यावृत्तेरनान्तरत्यादिति चेत् ;न ; सुव्यचत्वात्परस्परा यस्य । न च विषयवशात् १५ प्रतीविव्ययस्था ; प्रतीतः प्राक् विषयस्यैवासिझेः । प्रशीविश्वानुवृक्षप्रतिमासक्ती व्यावृत्तपति- भासवदी घ भिन्नाकारैवेति कयन्न ततस्तद्विपयभेदसिद्धिः । युगपद् बुद्धिद्वयं न प्रतिभासत इति चेत्, नीलपीतयोरपि युगपद्हणे बुद्विद्वयं न प्रतिभासते एय । मा भूत् बुद्धिद्वयमिति चेत् ; फि सहि स्यात् ? एकव बुद्धिरिति चेत् ; सा यदि नीलविपयैव कुतः पीतमतिभासनम् । न कुतश्चिदिति चेत् ; न ; नीलेऽप्यपरापरावयवानामेकाययपमहणेनाऽमहणप्रसङ्गात् असण्डे- २. फावययमहणमेवावशिप्येत । न च तस्योपलब्धिरिति प्रतिविषयज्ञानभेदवादिना निःशेषप्रतीति- विलोप एवं स्यात् । अवययिप्रतीते: नेवमिति चेत् ;न; अवयवाप्रतीतो सदमतीतः । प्रतियह लान्धकारयेलायाममतीतायवैवाययविप्रतीतिरिति चेत्, न; तथापि मध्यपादिभागेप्रतिपत्ते. रवश्यम्भावात् , अन्यथा पशुमनुष्यादिविभागपरिज्ञानप्रसङ्गात् । अस्ति च तवस्थायां तत्परिज्ञानम् । तन्न अययवतिपचिविकला कचिदप्यत्रयविपतिपत्तिरिति दुरपवाद एव सवाल- २५ प्रतीनिविलोपः प्रत्यर्थनियतज्ञानवादिनाम् । अस्तु वहिं नीलघुद्धिरेव पीतविषयेति चेत्, न; नीलाभिमुखेनैव रूपेण तस्यास्तद्विष. यत्वविरोधात, सदपरनिरबशेषपदार्थविषयत्वाविप्रसङ्गस्याभिहितत्वात् । एतेन तारानिफरम्बस्यैकज्ञानवेद्यत्वं प्रत्युत्तम् ; एकज्ञानस्यैकताराभिमुखेनैव रूपेण तारान्तरविपयत्यानुपपत्रः । तथा च सदसद्वर्गः कस्यचिदेकज्ञानालम्बनम् अनेकत्वात् हारानि. ३० कुरम्यवदिति न निदर्शनम् , साध्यविकलत्वात् । अस्त्येव तईि पौवाभिमुखमाप रूपं तबुद्धे 1 अनायासम् । २ अनुगमप्रत्ययस्यैव व्याहतप्रत्ययावे अनुगमा व्यारत्तेरनर्यान्तरलम् , तमिश्च अनुगम- प्रत्ययस्य च्या वृत्प्रत्ययत्वमिति । ३ अखण्डशायरवस्य । -यय-प्रा०प०, १०, स.। मप्रतातर-- भाग 1, 4, 6-गादिपार-मा०, यसपनीलादिमुसे-मा०, ५०, १०,.1 प्रथमः प्रत्यक्षमस्तायः १२३ - ४] रिति चेत् ; सिद्धं तर्हि द्रव्यत्यादिसामान्यप्रत्ययस्यापि अनुवृत्तरूपाभिमुखादन्यदेव व्यावृत्त- रूपाभिमुसं रूपम् , अन्यथा तस्य तद्विषयत्वायोगादिति न सर्वथा अनुवृत्तप्रत्ययादनान्तरमेव व्यावृत्तप्रत्ययः, संथात्वे वा "गोत्वमनुवृत्तबुद्धिहेतुत्वात् सामान्यम्' [ ] इत्येतदेव भाष्यमर्थवत् सामान्यस्य तयुद्धेश्च तद्विपयस्य भावात् , "व्यावृत्तबुद्धिहेतुत्वाद्विशेष!" इति तु नार्थवत् विशेषस्य सदुद्वेश्च तद्विपयस्याभावात् । अनुवृत्तादिभाष्यस्यैव व्यावृत्तादि- ५ भाष्येण व्याख्यानमिति चेत्, न ; अवाचकत्वात् । न धनुवृत्तवत्प्रत्ययपदार्थयोः व्यावृत्त- तत्प्रत्ययपदे वाचके । न थावाचकेन व्याख्यानम् ; तस्य व्यामोहनत्वात् , ततः प्रत्ययभेद एव भाष्यभेदोपपत्तिर्नान्यथा । सदयम् 'अनुवृत्तयुद्धि' इत्यादिना भाष्येण अनुवृत्तन्यावृत्तप्रत्यय- योर्भेदमाचक्षाण एव 'कः पुनः' इत्यादिना तयोरभेदमेवाचष्ट इति कथमनुन्मत्तः आत्रेयः ? तन्न व्यावृत्तरूपस्य विशेपस्योपचारः। एफवृत्तित्वं विशेपो द्रव्यत्वरयोपचर्यते "एकत्ति- १० विशेषः" । ] इति तल्लक्षणादिति चेत् ; न; तस्यापि मुख्यस्यैव भावात् । अनेकवृत्तिनि कथमेकवृत्तित्वमिति चेत् ? न ; तस्य प्रस्थे फुडववत् अनेकवृत्तिनि सम्भव- प्रमाणसिद्धत्वात् अवधृतस्यासिद्धिरेव, न एनेकवृत्तिन 'एकवृत्तित्वमेव' इत्यवधृतमेकवृत्तित्वं सिद्धमिति चेत् ; फः पुनरवधारणार्थः ? व्यावृत्तिरन्यत इति चेत् ; सैव तर्हि विशेपो नेकवृत्तित्वमात्रम्, सा चेकवृत्तिवदनेकवृत्तिन्यपि भवन्ती विशेपः कस्मान्न भवेदविशेषात् ? १५ एकवृत्तित्वोपाधिरेव 'सा विशेपव्यपदेशाय करप्यते नानेकवृत्तित्वोपाधिकेति चेत् । कुत एवत् ? सत्तासामान्ये सत्यामपि तस्यां विशेपव्यपदेशादर्शनादिति चेत्, न; द्रव्यत्यादिपु विशेपव्यपदेशस्य तत एव दर्शनात् । ततो न विशेपोपचारस्य किञ्चित्प्रयोजनं मुख्यत पव विशेषात्सकलतत्प्रत्ययानां निप्पत्तेः । तस्मान्मुख्यत एव द्रव्यत्वे अनुत्तव्यावृत्ताकारद्वितयो- पपत्ती तत्मत्यक्षस्य अन्वयव्यतिरेकवद्वरतुनिश्चयरूपत्वेन साध्यवेकल्यानुपपत्तेः उपपनमेतत् २० 'अन्ययन्यतिरेकपवस्तुनिश्चयस्वरूपं प्रत्यक्षं प्रत्यक्षत्वात, द्रव्यत्वसामान्यविशेपप्रत्यक्षवत्' इति । न चेदनुमन्तव्यम् अभसिद्धमुदाहरणम् द्रव्यत्वस्याप्रत्यक्षविपयत्वात्, अन्यथा अनुमानेन तम्य- वस्थापनावैफल्यादिति; "प्रत्यक्षत्वेऽपि तस्य दृढनिर्णयार्थमनुमानमिति परैरभ्युपगमात् । तथा च भाप्यम्--"भवतु वा द्रव्यत्वं प्रत्यक्षं तथाप्यनुमानोपन्यासः दाार्थ इत्यदोप" ] इति । अथवा , संशयप्रत्यक्षम् अगोदाहरणम्, उदाह-संवादविसंवादविवेकता' इति । संवादविपयत्वात् संवादो वोधस्वभारः विसंवादो विरोधः, वद्विपयत्वात्तद्धर्मी संवाद- विसंवादी अवधारणानधारणस्वभावी, संवादविसंपादौ योपनिष्टो निर्णयानिर्णय धी तयोविवेकः तत्प्रत्यक्षेण निश्चयः तस्मात् सविक्ल्पाविनाभावीति । तथा च प्रयोगः-प्रत्यक्षम् .. [ १ प्यातिप्राययस्य अनुप्तधन्ययादभिन्नले अनुत्तप्रत्यये एप अपशिष्यमाणे । २-मप्रपमा दिपच पदे मा०, ५०, १०, स. "प्रयमाद्विवचनम्"-ता. टि. एव पत्तित्व पविशेषस्यापि । ५ प्रश्ये पद्मपदेनेर -का, १०, १०, सामन्यतो प्याति- 1 0 भान्ति वि-मा.००1०1८ अन्यनो याति.। १अन्यतो पाती। 1. प्रन्योऽपि मा०, २०,५०, स.यो धर्मा पा., य०,१०,8.1 म्यायविनिश्चय विवरणे [१४ अन्ययन्यविरेकवद्वातुनिर्णयरूपं प्रत्यक्षत्यात् संशयप्रत्यक्षवत् । अन्वयात्त्वञ्च संशयवस्तुनो योधरूपेण तस्य व्यतिरेक्स्वभाव-यापित्वात् , व्यतिरेकवत्पन्न निर्णयानिर्णयरुपाम्यां तयोः परस्परतो व्याहतेः। प्रसिद्ध चेतत्परस्यापि । तथा च संशयलक्षणसू' भाष्यम्-"वाय- मुर्खतासामान्यविशिष्टस्य धर्मिणोऽधारणं निर्णयः स्थाणुर्वा शुरुषो वेति विशेषानवधारणं ५ संशयः, एक एव प्रत्ययः।" [ ] एकस्यावधारणानवधारणात्मकत्वानुपपत्तिरिति चेत् ; दृष्टत्यादप्रतिषेधः । दृष्टमिटम्-कं ज्ञानं सामान्यविशिष्टस्य वस्तुनोऽवधारणं सद्विशेषा- नवधारणात्मकं यथा स्थाणुर्वा पुरुषो वेति । दृष्टस्य चापलयो न युक्त इति । तन्न संशय. प्रत्यक्षस्य साध्यविकलवम् । आदर्भमुग्यशानप्रत्यक्षम् अगोदाहरणम् अनेनेव प्रतिपादितं पविपत्तव्यम् । तत्रापि १० संपादन विषये मुरझाने परस्परप्रस्यनीकतया विसंचादविषययोः सभ्यािध्याप्रविमासयोः सत्यव्य. क्षेण निश्चयतः साध्यरेकल्यदोपानवफाशात् । प्रयोगश्चात्र-'प्रत्यक्षम् अनुगमन्यतिरेकात्मक वस्तुनिर्णयस्वभावं प्रत्यक्षत्यात् आदर्शमुसज्ञानप्रत्यक्षवत्' इति । 'आदर्शमुसज्ञानमनुगम. व्यावृत्तरूपम्' इत्यविप्रतिपत्तिस्थानमेय वैशेपिरस्य । सम्यबिध्याप्रतिभासयोः परस्पर- व्यावृत्तयोर्योधात्मना तेन व्याप्तः स्वशास्त्रप्रसिद्धत्वात् । तथा च "आत्मेन्द्रियार्थसनि- १५ कत्"ि इत्यादी भाष्यम्-"बादर्शादिषु मुसम्' 'अभिमुखं मुंखम्' इति च भ्रान्तः प्रत्ययो मुसमित्येतायता सम्यक्” इति । ततः स्थितम् अनन्तरोतादनुमानात् परप्रसिद्धनिदर्शन- घलोपहितात् प्रत्यक्षस्य विकल्पाविनामावित्वनिश्चये तदेवोपवर्णितस्वभावं समक्षेतरसम्बर- मवस्थापर्यत् प्रयादिनां विप्रतिपचिमलं प्रमालयितुं क्षमत इति । तन्न प्रत्यक्षस्य निश्चयात्म. करनेऽपि प्रमाणान्तरशब्दान्तरवैफल्यम् , भावस्य सांशत्येन प्रत्यक्षापरिच्छिन्नस्यापि तद्भागस्य २० वैद्विपयत्वोपपत्तेः, प्रत्युत्त निरंशवस्तुवादिनामेव तद्वैफल्यं विपयाभावात् प्रत्यक्षेणैव सर्वात्मना भावस्य परिच्छेदात् । न भावपरिच्छेदात् प्रमाणान्तरस्यानुमानस्य शब्दस्य का साफल्यम् अपि तु समारोपन्यपच्छेदादिति चेत्; कोऽयं समारोपो नाम १ अतस्मिन् तद्ध्यवसायी विकल्प इति चेत्, ननु न तस्य निर्विकल्पकमेव रूपम् "अभिलापसंसर्ग' न्यायवि०पू०१३] इत्यादिवचनस्य निविषयत्यप्रसङ्गात । नापि विकल्पक्मेव, "सर्वचितचैत्तानाम् [न्यायवि. २५ पृ० १९]"इत्यादिवचनव्यापनः । उभयरूपरचे च तद्भेदेन तदात्मनो ज्ञानस्य भेदो वा स्यात् , अभेदो वा? यद्यभेदः, तदानीम् अझमयन् प्रमेणापि सत्यपि विरुद्धधर्माध्यासे भावस्य कथञ्चि- देकत्वमविरुद्धं भवेत् । वक्ष्यते चैतत्-"विरुद्धधर्माध्यासेन स्याविरुद्ध न सर्वथा।" इति"। . "सामान्यप्रत्यशाद् विशेषाप्रत्यक्षाविशेषस्मृतेश्च राशय ।" -वैशे. सू. २२।१७ । २ आयकृतम् । ३ "आत्मेन्द्रियार्यसन्निात् यनिप्पयते तदन्यत् ।" -वैशे० सू. ३016 ! ५ समादर्शनादि- ५ मुखमिई च भ्रा-आ०, ब., ५०,०।६-यन् प्र-०,१०,५०, स... प्रमाणान्तरशन्दान्तरविषयतोपपत्ते । तद्विषयोप-आ, २०, ५० । "अमिलाएसंसर्गयोग्यप्रतिमाखप्रतीठि कल्पना" ज्यादि. १३१९-पि निर्विक-आ०,म०प०,०1. "सर्वचितचतानामात्मसंवेदनम् (तसं वैदनम्)" स्यापवि० पृ. १९. न्यायवि० श्लो. २६ ॥ आ०, ०,१०,स.।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः ? तथा च तदेकत्वज्ञानम् अविपरीतार्थविषयत्वात् कथमध्यारोपः ? यतोऽनुमानातव्यवच्छेदः, तदभावे च कथं तस्य प्रामाण्यम् विरुद्धधर्माध्यासेऽपि निर्विकल्पतरात्मना । तदात्मनश्चेद्बोधस्याभेद एव प्रतीतितः ॥३८२॥ तद्वदेव क्रमेणापि प्रतीतेरनुपद्रयात् । विरुद्धधर्माध्यासेऽपि भावकत्वं न दुष्यति ॥३८३॥ एकत्वज्ञानमेवं चाविपरीतार्थगोचरम् । अध्यारोपः कथं यस्य व्यवच्छेदोऽनुमाबलात् ॥३८४॥ नाध्यारोपव्ययच्छेदान्नापि वस्तुप्रहात्ततः । प्रामाण्यमनुमानस्य स्याद्वादन्यायविद्विपाम् ॥३८५।। १० एतदेवाह 'एकत्र' इत्यादिना- [एकत्र निर्णयेऽनन्तकार्यकारणतेक्षणे । अतद्धेतुफलापोहे कुतस्तत्र विपर्ययः ॥ ५॥] एकत्र एकत्वे 'बुद्धेः' इति शेषः । भावप्रधानश्च निर्देशः । तस्मिन् किम् ? इत्याह--अनन्तकार्यकारणता। कारणं प्रमाणमित्यर्थः । "हेतुरपदेशो लिङ्ग निमित्तं १५ प्रमाणं कारणमित्यनर्थान्तरम्" [वैशे० सू० ९।२।४ ] इति वैशेषिकाणां सूत्रदर्शनात् । कारणस्य भावः कारणता, प्रामाण्यमिति यावत् । तत्प्रतिषेधोऽकारणता प्रामाण्याभाव इत्यर्थः । कस्य ? अनन्तकारिणः। अन्तो विनाशः, प्रक्रमवशात् समारोपस्येति गम्यते, तं करोतीति शीलं तत्कारि न तत्कारि अनन्तकारि तस्य अनुमानस्येत्यर्थः । अनुमानप्रामाण्या- मायसाधने साधनमेतत् द्रष्टव्यम् । तदयमों भवति- समारोपन्यवच्छेदेन प्रामाण्यमनु- २० मानस्य तन तस्यासाधकतमत्वात् । तदेव फरमादिति चेत् ? व्यवच्छेदस्य समारोपस्येवा- भावात् । इदमेवाह-कृतस्तत्र विपर्ययः । तत्र पहिरन्तश्च भाषेषु फुतः प्रत्ययात् विपर्ययः समारोपः, न पुतश्चित, एक्त्वप्रत्ययस्य विपर्ययत्वेनाभिप्रेतस्य सम्यग्ज्ञानत्वादिति भावः । कदा न विपर्ययः ? इत्याह-निर्णये निश्चये। फस्येत्यपेक्षायां समक्षेत्यादिकमिह पप्ठयन्त- मभिसम्बन्धनीयम् । तदयमर्थ:-समभेतरसम्प्वस्य समक्षस्य द्रव्यस्य इतरेषु पर्यायेपु समित्ये. २५ फत्वेन च अवस्य ज्ञानस्य निर्णय इति विकल्पाविकल्पाद्यक्रमपर्यायकत्वज्ञानवत् क्रमभाविसुस. दुःसादिनानापर्यायकत्वज्ञानस्यापि तस्यतानतया निश्चये नासो समारोपः वदभावान्न तद्व्यवच्छे. दफत्वेनानुमानस्य प्रामाण्यमिति समुदायार्थः। तन द्वितीयो विकल्प उपपन्नः । : अनुमानस्य । २ "एका निर्णयेऽनन्तकारिणतेही । तदेतुपलापोहे पुतस्तत्र विपर्वमः । शनि वातिरेन" -धा. रिक। ३ सिरिति भा., .,५०, सः। ४ -त्वादेव क-ताः। ५-दम्पन्देन भा.प., पं. स.1 . -- . च्यायविनिश्चयविवरणे (११९ भयतु तहिं प्रथम एव विकल्पो बोधाकारभेदे बोपभेदस्यावश्यम्भावित्वादिति चेत्, तत्रापि न निर्विकल्पकमागस्य समारोपत्वं तस्य यथायस्थितस्वरूपसंवेदनस्वभावलेन तत्त्वज्ञान- त्वात् । सदभावे च फथं तद्व्यरच्छेदकत्येनानुमानस्य प्रामाण्यम् । एतदेवाइ-ईक्षणे निर्वि. फल्पकज्ञानभागे। किम् ? अनन्तकार्यकारणतासमारोपव्यवच्छेदविफलस्यानुमानस्य न प्रामाण्यम् । ५ धुत इति चेत् ? कुतस्तत्र विपर्ययः विपर्ययाभावो यव इत्यर्थः । भवतु विकल्प भाग एष समारोप इति चेत् ; पुतस्तस्य प्रतिपत्तिः १ अप्रतिपन्नस्य भावे अतिप्रसगात् , ज्ञानत्वानभ्युपर- माघ । स्वसंवेदनादिति चेत् । तदपिन निर्विकल्पकम् । तस्य तस्मात्पृथक्तत्वात् । न हि पृथ. फ्कृतं घेदन स्वसंवेदनं नाम, अन्यवेदनाभाषप्रसङ्गात् । अन्यत एव तस्य वेदनमिति चेत् ; न ; अन्योयत्यनियमे जडत्यप्रसङ्गात् , समसमयस्य अकारणत्वेनाविषयत्वाच । वेदनात् प्राच्यसमय एव विकल्पभाग इति चेत् । तदा तर्हि परिज्ञानशून्यस्य कथं बोधत्वम् १ स्वसंवेदनादिति चेत् । न ; 'तदपि न निर्विकल्पकम्' इत्यादेः 'कथं चोधत्वम्' इति पर्यन्तस्य प्रसङ्गात् । पुनरपि स्वसंवेदनाद्बोधस्वमिति चेत् ; न ; अनास्थावाहिनश्चक्रकस्य प्रसङ्गात् । कारणत्वेऽपि अतदाकारेण न तस्य वेदनम् ; साकारजाननादस्य अनवसरत्वप्रसगात् । आकारवत्त्वे तवेदनस्य पुनरपि विकल्पेतररूपत्वमेकस्य विज्ञानस्य प्राप्तम्, न चैतदुपपन्नम् उक्दोषत्वात् । १५ पुनस्तदुभयाकारपृथकाराभ्यनुज्ञाने तत्रापि 'न निर्विकल्पकभागस्य'इत्यादिकम् 'उपदोपत्वात् इतिपर्यन्तमावर्तमानम् अनवस्थातरङ्गिणीमाकर्पतश्चमकस्योपनिपातकं भवेत् । तन्न स्ववस्त- द्वेदनं निर्विकल्पकं यतस्तत्प्रतिपत्तिः, अप्रतिपन्नस्य समायेपस्यासत्त्वात् कथं तद्व्यवच्छेद- फत्वेनानुमानस्य प्रामाण्यम् ? एतदेवाह-अतद्धेतु । तत् स्वसंवेदननिर्विकल्प पत्ते आत्मनि धारयतीति तद्धः तस्मादन्यः अतद्धः स्वसंवेदनप्रत्यक्षरहितो विकल्पभाग इत्यर्थः, तस्मिन् । तुशब्दः अपिशब्दार्थः, न केवलं दर्शनभागे किन्तु अवद्धेऽपि विकल्पमागे । किम् ? अनन्तकार्यकारणतासमारोपच्यवच्छेदविकलस्यानुमानस्य न प्रामाण्यम् । फुत एतदिति धेन ? कुतस्तत्र विपर्ययः । विपरीतायेपो न कुवश्चिदप्यवगम्यत यत इत्यर्थ । विकल्पकमेव तर्हि वस्य स्वतो घेदनमिति चेत् ; न तर्हि तत्प्रत्यक्षम्, कल्पनापोढस्यतत्त्वात् , अन्यथा लक्षण- स्याव्याप्तिदोपैपित्तः । नाप्यनुमानम् ; विषयभेद एव तद्भावात्। न चाप्रमाणात् प्रविपनस्य प्रतिपन्नत्यं प्रमाणकल्पनायेयात् । अपि च, विकल्पभागो नामाभिजल्पयोग्य आकारः, तस्य सामान्यरूपत्वेनावस्तुत्वात् कथं स्ववित्तिफलत्वम् ? अवस्तुनो निष्फलत्वात् । फलयत्त्वे पस्तुत्वापत्तेः । ततो न विकल्पकमपि तस्य स्वतो वेदनम् । अविदितस्य च असमायेपत्वात् कथं तद्व्यवच्छेदेनानुमानस्य प्रामाण्यम् । एतदेवाइ-फलापोहे। फलमपोयते असम्बन्धित्वेन साप्यते तस्मादिवि फलापोहः सामान्याकाये विकल्पभागः तस्मिन् । किम् ? अनन्तकार्या. ३० रणतासमारोपव्यवच्छेदरहितस्र्य न प्रामाण्यम् ? पुव इति चेत् ? कुतस्तत्र विपर्ययो ईसणे इति निर्विकल्पकभागे ज्ञान-आ०, २०, प.,। २ज्ञानाविषयत्वात् । ५ चेतया ताई भार, २०, ५०1४-वस्वस्य वि-आ०,१०,१०,०1५-पि तनिर्वि-आ०, १०, प., स.1 प्रत्ययवाद । •-दोषोपपत्ते ०,०।८-स्य तत्प्रा-भा०,३०,०। . ।
१२७ . २५] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः विपरीतारोपो न कुतश्चिनिश्चीयते यत इत्यर्थः । सत्यम् ; विकल्पेतराकारयोर्वस्तुवृत्तेर्न नानात्वं विकल्पान्तरोपनीतं तु वदभेदमाश्रित्य समारोपास्तित्वमास्थीयत इति चेत्, न; विकल्पान्तरस्यामि भाच्याहोपादसम्भवात् । तस्यापि विकल्पान्तरोपनीतत्वकल्पनायामनवस्थापत्तेः। तस्मात् समारोपत्र्यवच्छेदकारित्वेनानुमानं प्रमाणयता गृहीतेतरादिरूपेण वस्तु सांशमभ्युपगन्त. व्यम् , अन्यथा समारोपासम्भवेन तस्य तद्व्यवच्छेदकारित्वानुपपत्तेरिति 'एकत्र' इत्यादि-५ पातिकतात्पर्यम् । अपि च, समारोपव्ययच्छेदो नाम तन्निवृत्तिमात्रम्, भावान्तरस्वभावो वा स्यात् ? निवृत्तिमात्रं विच्छेदो यदि तस्योपकल्यते । तदा तत्करणान्मानमनुमान कथं भवेत् ? ॥३८६॥ अन्यथा स्वापमूर्छादेर्मानत्वं केन वार्यते । १० ततोऽपि यत्समारोपनिवृत्तिर्न विशिष्यते ॥३८७॥ तेदाप्यारोपसद्भावाभ्यनुज्ञाने कथं भवेत् । चैतन्यशून्यस्यापादिप्रवादस्त, तात्त्विकः ॥३८८।। तत्तृतीयं प्रमाणं ते भवेत्स्वापादिसज्ञितम् । अचेतनत्वात् , यत्तस्य नान्तर्भावः प्रमाणयोः ॥३८९॥ १५ प्रमाणसाव्याघातध्याघ्रादेवमनुद्रुतात् । "कुर्वीथाः दुर्विदग्धस्त्वं फथमात्माभिरक्षणम् ? ॥३९०॥ भावान्तरं समारोपव्यवच्छेदो यदीप्यते । सदप्यज्ञानरूपं चेत किन्न स्वापप्रमाणता ॥३९१॥ स्वापादपि यदज्ञानं किञ्चिद्वस्तूपजायते । अज्ञानकरणाद्भेदस्तन्न स्वापानुमानयोः ॥३९२।। "वत्त्वज्ञानस्वभावश्चेत्तत्रापि तकल्पनम् । तज्ज्ञानमनुमानं तत्, यद्वा तस्मात्परं भवेत् ? ॥३९३॥ अनुमानमेव तत्त्वज्ञानमिति चेत् ; अनाह - एकत्र निर्णयेऽनन्तकार्यकारणतक्षणे । अत तुफलापोहे कुतस्तत्र विपर्ययः ॥५॥ इति । कुतः ? फस्मात् । तत्र वेषु भावेषु। विपर्ययो विपर्यतायेपः ? न पुतश्चित् । स हिन वावन्नियवभावविषयः सम्भरति । फदा न सम्भपति ? इत्याह-'अनन्त' इत्यादि । २० १-रवीयतह-, २०, प.स. २ अनुमानस्य। समारोरस्य । तत्परगारमा-भा..., ५., स.१५ तदास्यारोप-प्रा०, प०,०। स्वापारस्थायाम् । पाद गुस्स सिरान प्रबोधे पूवेदनात् । जायते व्यायानेन घलेनेति विनिरितम् ॥"-:. पार्टिाड 11४९ । शेरस्य । ८ वटा दुर्विदपस्तं भा०, म.,५०,म.रानधारणा-भाग, ६.०स० • धमारोपध्यवरटेदारम भावान्तरं तरवानरूपश्येत्। तदा विरुपायं मयति ।
। न्यायविनिश्चयविधरणे अन्तशब्दोऽत्रावधियाची, स प द्विधा पूर्वान्तः परान्तश्चेति । न विद्यते अन्ती ययोस्ते अनन्ते, कार्य प कारणं च कार्यकारणे, पुनरस्य अनन्तशब्देन कर्मधारयः-परान्तरहितत्वात् अनन्तं फार्यम्, पूर्वान्तरहितत्यादनन्तं कारणम्, तयोर्भावोऽनन्तकार्यकारणता, अनादे कारणप्रपन्धस्य अनन्तस्य च कार्यप्रयाहस्य भाव इति यावत् । तस्या ईक्षणमनुमानम् । तेखा- ५ प्युक्तन्यायेन वस्तुविपयत्वात् ईक्षणव्यपदेशविषयत्वोपपत्तेः । यद्येवमीक्षणस्य विकल्पाविरोधात भवत्येव सत्यपि तस्मिन् विपर्यय इति चेत् । अत्राह-निर्णये निश्चयात्मनि तदीक्षणे न निर्विकल्पै अनुमानस्य निर्विकल्पत्वाभावात् । प्रतिसमारोपं तद्व्यवच्छेदकानुमानभेदाभ्युपगमेन यदि 'कुतस्तत्र विपर्ययः' इत्युच्यने, तदा सिद्धसाधनमिति चेत् । अत्राह-एकत्र एकस्मिस्तदीक्षण इति । तद्यमर्थः-यथा तदर्जातप्रथमवित्तगोचरं कुतश्विव्याहारादिविशेपालिङ्गा- १, दुपजायमानमनुमानं तच्चित्तस्वरूपस्य चेतनत्वस्य निश्चयात् तद्तमचेतनत्वसमारोपं व्यवच्छि- नति तथा सण्डशस्तनिश्चयानगीकायदन्यस्यापि तत्स्वरूपस्य हेतुमत्त्वसजातीयहेतुकत्वशरीराय- नुपादानत्यादेस्तेनैव निश्चयान, अहेतुकत्वविज्ञानीयहेतुकत्वशरीरापादानत्यादिसमारोपाणामपि तते एव ज्यवच्छेदोपपत्तेः, यदुतम्-"आय चित्तमहेतुकं न भवति कादाचित्कत्वात् घटवदिति । तथा तचित्रं प्राक्तनचित्तप्रभवं चित्तत्वात् अवलग्नचित्तवदिति, तथा १५ यस्मिन्नविकृतेऽपि यद्विक्रियते न तत्तदुपादानं यथा गन्यविकृतेऽपि विक्रियमाणो गयो न गयोपादानः, विक्रियते चाविकृतेऽपि शरीरादौ चित्तम्" [ 7 इति, तद्वदन्यदपि तथाविधमनुमानं तत्सर्व व्यवच्छेद्याभावेन व्ययच्छित्तिफलविकलत्वार्दनर्थकमेव । तया वेन "तस्य हेतुमत्त्वं निश्चिन्वता यदपेक्षमस्य हेतुमत्त्वं तदपि प्रायन चित्तं निश्चेतव्यम् । "तनिश्चयाभावे वदपेक्षस्य तद्धेतुमत्वस्य निश्चयायोगात् । तथा च स्वयमुक्तम्- २० "द्विष्टसम्बन्धसंवित्तिकरूपप्रवेदनात् । द्वयस्वरूपाहणे सति सम्बन्धवेदनम् ॥ [१० चातिकाल० ११ ] इति । तदपि निश्रीयमानं हेतुमदेव निश्चीयते इति तद्धतुभूतमपि प्राक्तनं चित्त तेनैव" निश्चेतव्यम् । एवं तापक्रव्यं यावदनादित तुप्रबन्धस्नेनैव निश्चितो भवति, तथा चादि- मत्संसारसमारोपव्यवच्छेदस्यापि तद एव भावात् न तदर्थमनुमानान्तरे प्रयवितव्यमिति । एतद् २५ अपूर्वान्तकारणेक्षणमहणेन दर्शयति । १-स्यानपान -भा०, ३०, १०,०। २ अनुमानस्यापि । ३ चित्तनिश्चय । ४ अनुमानेन । ५ मनु. मानादेव । ६ द्रष्टव्यम्-प्र० पा० ३।३४ । . "तस्मात्तत्रादिविज्ञान स्वीपादानबलोद्भवम् । विज्ञानवादिहेतुभ्य इदानीन्तनचितवन ।" -सरवत: श्लो० १८५७ । ८"अविश्स्य हि यवस्तु या पदार्थो , विशर्यते । वंशदानं न तत्तस्य युक्तं गोगवयादिवत् n" - वा. १३३ । "यत्पुनर्वस्वविकृत्यैव यद्विशर्यते न वाहन' पारानं यथा गडयमविकरय गौर्विकार्यमाणः । अविकृस्य व शरीरं मनोमतेर निष्टाचरणादिना हुमनानादिलक्षणस्य विकारस्योपादानं क्रियते ।"-तरवस. ३०.५२८ ! १-दनमेव स... आशचित्तस्य । प्राकन- चित्तनिश्चयाभावे । १२ तेनैवं नि-स।। यावदनादिसधेतु-प्रा., २०,५०, R.17 प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव . साया, तथा मरणचित्तस्य कुतश्चिदनुमानं यथा तच्चतन्यं निश्चिन्वत् तदचेतनत्यसमारोपं व्यव- च्छिनत्ति, तदुक्केन न्यायेन तदपरस्वरूपस्यापि भाविचित्तप्रतिसन्धायित्वादेस्तेनैव निश्चयात् तदप्रतिसन्धानादिसमारोपस्यापि तत एव व्यवच्छेदोपपत्तेर्न तदर्थमन्त्यचित्तलक्षणसमप्रकारण. लिगोपनियद्धप्रसवं भाविचित्तानुमानं स्वभावानुमानतया परैरभ्युपगम्यमानमर्थवत्ता प्रतिलभते, चित्तान्तरप्रतिसन्धायित्वमपि तेन तस्य निश्चिन्वता तदपि चित्तान्तरं निश्चेतव्यम् , निश्चयमन्त- ५ रेण तत्प्रतिसन्धायित्वनिश्चयायोगात् , तदपि निश्चीयमानं उदपरचित्तप्रतिसन्धाप्येष निश्चीयत्त इति तत्प्रतिसन्धेयमपि चित्तं तेनैव निश्वेतव्यम् , एवं तावदभिधातव्यं यावदनन्तस्य प्रतिसन्धे- यचित्तप्रबन्धस्य तेनैव निश्चयः कृतो भवति । तथा च संसारपर्यवसायसमारोपस्य तत एव व्यवच्छेदान तदर्थमनुमानान्तरमास्थातव्यम्, इत्येतत् परान्तरहितकार्येक्षणग्रहणेन दर्शयति । ननु कारणात्समप्रादेव कार्य न तद्विपरीतात् , ततः सम्भवत्यपि कार्यप्रवन्धस्य पर्यव- १० तत्कथमपरान्तरहितत्वं तस्येति चेत् ; न; तस्य पर्यवसायित्वे सन्तानावस्तुत्वस्य वक्ष्य- माणत्यान् । तन्नैकस्मिन् चित्तसन्ताने साफल्यमनुमानभेदस्य, तद्गतसकलसमारोपव्यवच्छेदस्यै- फस्मादेव सिद्धत्वात् । सन्तानान्तरेषु साफल्यं तद्भहस्येति चेत् ; अत्राह-अतद्धेतुफ- लापोहे । हेतवश्च फलानि च हेतुफलानि', तानि विवक्षितानि हेतुफलानि येषां ते सद्धेतुफला एकसन्तानक्षणाः । सदन्ये पुनः अतद्धेतुफलाः रोपामपोहः, अपोद्यन्ते ते येन सोऽपोहो निर्णयः १५ तदपोहस्तस्मिन् सति । कुतो न फुतश्चित् तत्र तेषु सन्तानातगेषु विपर्ययो विपरीतारोपो यतः तद्व्यवच्छेदार्थमनुमानबहुत्वमिति । तात्पर्यमत्र-एको हि वित्तसन्तानः कुतश्चिदनुमानान्नि- श्वीयमानः तदपरभावापोहस्सत एय निश्चेतव्यः तस्यै "तद्रूपत्वात् अपोहनिश्चयस्य चापोह्यानिधया- विनाभावात् एकानुमाननिश्वेयत्वं सर्वभावानां न्याययलायातमित्येकानुमाननिश्चयादेव निरवशेप. स्यापि तत्तद्धावगतारोपनिकुरम्बस्य व्यवच्छेदान चिरं पर्यालोचयन्तोऽन्यनुमानभेदस्य साफल्य. २० मुत्पश्यामः । तन्न तदेवानुमानं तत्त्वज्ञानं यत्समारोपव्यवच्छेदशब्दवाच्यं भवेत् । ननु अनुमा. नस्य समारोपव्यवच्छेदं प्रति कारणत्वात् "तस्मादर्थान्तरत्वमेव (पोतत्कथं 'तद्वाऽनुमानं तद्वपव. च्छेदः' इति विकल्पोत्थापनम् , तदभेद एवास्योत्थापनोपपत्तेरिति चेत् ? न; क्रियाकारकयोः प्रदीप-तमोऽपहारयोरिव अनर्थान्तरत्वस्य "परं प्रत्यपि प्रसिद्धत्येनादोपात् । यद्येवम् 'अन्यद्वा तत्वज्ञानं तद्वयवच्छेदः' इति विकल्पानुपपत्तिः, अन्यत्वे क्रियाका. २५ रफभायस्यानुपपत्तेरिति चेत् ; मा भूत क्रियाफारकभावापेक्षया तद्विकल्पोत्यापनम् , कार्यकारण- भावापेक्षया तस्योत्थापितत्वात् , तद्भावस्य च भेद एव परं प्रति प्रसिद्धत्वात् । निश्वितत्वात् भा०,१०,१०,२० । २ अनुमानात् । ३ पौः । "मरणक्षणविसर्न स्वोरादेयोदयशमम् । रागिणो होनसजस्यात् पूर्वविज्ञानवतया ॥"-तापस• श्लो. १८९९ | मरपचित्तस्य । ५ कार्या-पादनत्यस्य । ५-तानसाफ-भा०,१०,५०,स०। • अनुमानभेदस्य । सानि विव-स.। ९-नि वि-आ.,.,प.म.। ..विवतितचित्तसन्तानत्य । परमायापोइरूपवार । १२-स्यापो-मा०,२२,प.स.1-निधयारम् स। 11-नो शागरला-आ.२०,०,१०।१५-वगतस्यारी-मा०,य.,प... समारोपध्यवदान। 1. बौदं प्रति। "कियाकरणोरक्यविरोध इति चेदसत् । धर्मभेदाभ्युरगमास्वनिर्मितीच्यते॥"-2011 २३० न्यायधिनिश्चयविवरणे {१२५ भवतु तर्हि तत्त्वज्ञानमन्यदेव सन्यवच्छेद इति चेत् । तदप्यनुमानान्तरम् , प्रत्यक्षं षा स्यात् ? अनुमानान्तर मिति चेत् । न ; प्रथमानुमानापेक्षया तस्य विशेषाभावात् । इदमे- वाह -'कुतस्तत्र विपर्ययः इति । तत्र द्वितीयेऽनुमाने । कुतः ? न कुतश्चित् प्रथमानुम ना. पेक्षया परीत्यम् , तस्मादविशेष इति यावत्। निर्णयो विशेष इति चेत् ; न; 'वश्य प्रथमानुमा. ५ नेऽपि भावात् । तदाह-एकत्र निर्णये' इति । एकत्र प्रथमानुमाने, गणनकाले प्रथमस्येयक- शब्देन व्यपदेशदर्शनात् । निर्णये निश्चये सति 'कुतः' इत्यादि सम्बन्धनीयम् । समारोपव्य- वच्छेदो विशेष इति चेत्, न, तस्यापिप्रथमानुमानेऽपि भावात् । तदाह-'अतद्धेतुफलापोहें। अतद्धेतुफलशब्देन अध्यारोपितमाकारमाह-तस्यैव स्वलक्षणं प्रत्यहेतुत्वाइफलत्याच वदपोहस्तध्याव- च्छेदः तस्मिंश्च एकत्र सति 'कुतः' इत्याद्यमिसम्बन्धनीयम् । प्रथमस्यानुमानस्य द्वितीये चेदपेक्षणम् । अविशेपेऽपि तस्यापि तृतीये स्यादपेक्षणम् ॥३९४॥ चतुर्थे तस्य तस्यापि पञ्चमे पञ्चमस्य च । षष्ठे स्यादनवस्यान कयमेवं निवृत्तिमत् ? ॥३९५॥ इदमेवाह-'अनन्तकार्यकारणतेक्षणे कुतस्तत्र विपर्ययः' इति । अनन्तस्य १५ अनवसानस्य अनुमानप्रयन्धस्य कार्यकारणवा अपेक्ष्याऽपेक्षकता । सामान्यराब्दस्यापि प्रस्ताव पशाद्विशेपेऽपि प्रवृत्त । तस्या ईक्षणमुक्तेन न्यायेन दर्शनम्, तस्मिन् सति, अतस्तन परमतेऽन. वस्थानस्य प्रस्तुतत्वात् तन्निवृत्तिः विपर्ययः १ तेन अनुमानान्तरमपि तत्त्वज्ञानं यत्समारोप- व्यवच्छेदशब्दवाच्यं भवेत् । प्रत्यक्षमेव तर्हि तत्त्वज्ञानमिति चेत् ; सदप्यभ्यस्तात् , अनभ्यस्ताद्वानुमानात् भवेत् ? २० अनभ्यस्तादिति चेत्, न , एकानुमानप्रसयसमय एष व्याधूतसमारोपनिरंशक्षणिकवैस्तुदर्शने मति सकलप्रवत्यादिव्यवहारविलयप्रसङ्गात् व्यवहारस्याध्यारोपनिनन्यनत्वात् । 'एकत्र' इत्यादि । एकत्र एकस्मिन्ननभ्यस्ते निर्णयेनुमाने सति तत्वार्य यत् अनन्त. कार्यकारणतेक्षणम् । अन्तोऽध्यारोपित आकारः । अन्यते व्याप्यत्येन गम्यते क्षणप्रयन्धो. ऽनेनेति व्युत्पत्तेः, अनन्तं तद्रहितम् , तप तस्कार्यकारणतयोपादानोपादेयतयोपलक्षितमोक्षणं प २५ दर्शनप्रवाहस्तस्मिन् कुतस्तत्र वियक्षिते विधये विविध परि समन्तादयनं गमनं विपर्ययः सर्वः संसारव्यवहार इत्यर्थः । फदेषः १ इत्यत्राह -अततुफलापोहे । तस्माधिपशि- साढेतोः फलं तस्यातियपः स्योहोऽभिनिवेशस्तदभावोऽतहेतुफलापोहा तस्मिन् सवि । तात्पर्यमत्र- सदाह- निर्णयस्य । २ पोक-आय.प., ३ कयमेव निता....सतस्थान-मान, १०, ए.स.1५-बसपुर-मा०, ०,१०, ससस्वासोदाम-भार, य., R.R.।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताचा २५] क्षणिकत्वानुमानाच्चेदःभ्यासरहितादपि । एकत्यारोपनिर्मुकदर्शनप्रसयो भवेत् ॥३९६॥ पात्मदृष्टेस्वंदा नाशानात्मस्लेहात्त (स्नेहस्त) दाश्रयः । तभावे सुखार्थित्वं न भवेत्तन्निबन्धनम् ॥३९७॥ अनीक्षितसुखः करमादिदमस्मात्फलं भवेत् । इष्टमित्यभिसन्धत्तां यतस्तत्र प्रवर्तताम् ॥३९८॥ माय एव ततो मार्ग निर्वाणगमनं भवेत् । सकलक्लेशनिर्मुक्तज्ञानरूपं हि तत् मतम् ॥३९९।। वन्न अभ्यासरहितादनुमानाद् व्याघूतविपरीतारोपं प्रत्यक्षमुपपन्नम् । अभ्यासक्त उपपन्नमेवेति चेत् । तदप्यस्मदादीनाम् , अस्मद्विशिष्टानां या स्यात् ? अस्मदादीनामिति चेत् ;न; १० अस्मदादिपु क्षणिकरवलक्षणदर्शनानुपलक्षणात् । तदपि फरमादिति चेत् ? अन्तर्बहिन्य यावजीव- मेकत्वस्यैव निर्णयात् । तदाह-'एकत्र निर्णये कुतस्तत्र विपर्ययः' इति । एकत्रेति पप्ठ्यर्थमव्ययं भावप्रधानं च । एकत्वस्य पहिरन्तश्च निर्णये सति कुतस्तत्र भावेषु विपर्ययो विलक्षणपरिज्ञानम् ? विलक्षणपरिज्ञानमेकत्ये निश्चिते कथम् ।। न हि नीलपरिज्ञानं निश्चिते पीतवस्तुनि ॥४००॥ अन्यथा सर्वविज्ञानं सर्वत्र प्रसज्यते । सर्वसर्वज्ञता तच निराया प्रकल्पयेत् ॥४०१॥ मा भूदस्मदादीनां तदभ्यासजं स्वलक्षणप्रत्यक्षम् , अस्मद्विशिष्टानां तदस्त्येव तेपामनु- मानाभ्यासप्रकर्षभाविनो निर्मूलितसमारोपसंस्कारस्य सर्वाकारवस्तुदर्शनस्यानुपद्रवादिति चेत् ; २० -अनन्त कार्यकारणलेक्षणे अन्तको मृत्युः अर्थः स्वामी यस्य तत् अन्तकार्यम् उच्छेदवत् तदन्यत् अनन्तकार्यम् अनुच्छेद्यसन्तानम् अस्मद्विशिष्टानां वस्तुदर्शनम्, वस्य कारण- मनुमानं तद्भावरयेक्षणे पर्यालोचने । तत्रोत्तरम् 'अतत्' इति । तदनन्तरोक्तं तदीक्षणं नेत्यर्थः प्रसज्यप्रतिषेधे समासः कथम् असामर्थ्यादिति चेत् १ न ; 'अनाद्धमोजिवत्' अविरोधात् । फुत एतदिति चेत् ? आह-हेतुफलापा, हेतोः कारणात् फलस्य प्रयोजनस्य आपः २५ निष्पत्तिः नान्यस्मात् तत्र तस्मिन् हेतुफलापे न्याय्ये सति विपर्ययः अहेतोरनुमानाभ्यासात् सर्वाकारयस्तुदर्शनफलापो भवन्मतः । कुतो न कुतश्चिन् । हेशन्दा सम्बोधने । यथा प अनुमानाभ्यासः सर्वाकारवस्तुदर्शनस्य न कारणं तथा निवेदितं प्रथमझारिकाव्याल्याने, निवेदयिष्यते च तृतीये । वन निरंशवस्तुवादिना समारोपव्यवच्छेदादपि प्रामाण्यमनुमानस्यो। १५ अत्राह- - दर्शनकाले। २ सात्मदर्शननिमिचकः । ३ सात्मस्नेहमूलकम् । । निर्वाणम् । "तथा पोषम्- • चित्तमेव हि सारो राणादिक्लेशवासितम् । तदेव तैर्विनिर्मुकं भवान्त इति कथ्यते ॥"-उरवस... । ५-रोपप्रत्य-., म.प., स.। न्यसन मा०, २०, ५०, स० । प्रस्तावे।
- २३२ म्यायविनिश्चय विवरण पपन्नमिति साधूक्तम्-'एकत्र' इत्यादि । तस्मादनुमानस्य प्रामाण्य वस्तुगोचरत्वादेव, तञ्च सांशत्व एव भावानामुपपन्नम्, अतो न निश्चयरूपत्वेऽपि प्रत्यक्षस्य प्रमाणान्तरस्य शब्दान्तरस्य घा वैफल्यमिति स्थितम् । स्यान्मतम्-निश्चयो नाम विकल्पविशेपत्वात् सत्येव विकल्पे भवति, न च विकल्प ५ प्रत्यक्षं तत्र निर्विकल्पकत्वस्यैव प्रमाणोपपन्नत्वात्, तत्कथं तस्य निश्चयात्मकत्यमिति । तत्र किमिदं विकल्पकत्वं नाम ? वाचकशब्दविशिष्टतयार्थग्राहकत्वमिति चेत् ; का पुनर्वाचकः शब्दः स्वलक्षणरूपः, सामान्यरूपो था ? स्वलक्षणरूपश्चेत् । तस्यापि वाचकत्वं स्वहेतुबला- यातम्, साङ्केतिक वा १ स्वहेतुबलायातमिति चेत् ; न ; प्रथमश्रवण एव तद्वाचकत्यप्रतिपत्ति प्रसङ्गात् । सङ्केतादेव सहायकत्वाविपत्तिरिति चेत्, न; स्वलक्षणे सङ्केतासम्भवात् । अन्वयिनो १० हि शक्यसमयत्वं तत्र स्वयमुपलम्भस्य परं प्रत्युपदर्शनस्य च सम्भवात् । स्वयमुपलब्धे हि पुनः परं प्रत्युपदर्शिते भवति 'अयमस्य वाचकः' इति सङ्कतः ? सहतितस्य च व्यवहारोप- योगित्यम् । स्वयगुपलम्मादिश्च सत्येयास्वये ( यान्वये )। न च सलक्षणस्यान्वयः ; क्षण- क्षीणत्यनाभ्युपगमात् । बन्न शब्दस्वलक्षणस्य हेतुस्लामृत्तं वाचकत्वं सद्धवावगम्यत इदि युक्म् । एतेन साङ्केतिकमपि तस्य पाचकत्वं प्रत्युक्तम्; सङ्केतासम्भवे तदसम्भवात् । स्वतः १५ स्वलक्षणस्ये अवाचकत्येऽपि वाचकशब्दसामान्यैकत्वेनाध्यवसायाद्वाचकत्वम् , अत एव इन्द्रियज्ञाने "न ह्यर्थे शब्दाः सन्ति वात्मानो वा। येन तस्मिन् प्रतिभासमाने तेऽपि प्रतिभासेरन्" ] इति' "तदाकारत्वमेव निपिध्यते तन्निर्विकल्पकतासाधनार्थम् । कथञ्चिदवाय. कत्वे तु तस्य किं तत्रं तदाकारत्वनिषेधेन ? सत्यपि तत्र तत्स्वलक्षणाकारत्वे विकल्पापत्तिभ. याभावात् । अन्यथा रूपादिस्यलक्षणाकारत्वस्यापि निषेधप्रसङ्गात् । इन्द्रियज्ञानवावमुत्सन्ना सौगते मते । रूपाद्याकारनिर्मुक्तो यन्न तस्यास्ति सम्भवः ॥४०२।। वयं लाभमिच्छत्तो मूलविनाशः, इन्द्रियज्ञानस्य निर्विकल्पकत्वं साधयितुमुपक्रान्तेन वस्येवो.. न्मूलीकरणात् । “तत्सामान्याकारत्वस्यैव तत्र निषेध इति चेत् ; फयं तहि धर्मोत्तरेण कथि- सम्-"इह च यतो व्यपहर्तारो दृश्यविकल्प्यावावेकीकृत्य शब्दस्खलक्षणमेव वावकम- २५ व्यवस्यन्ति तस्यात्स्वलक्षणमेव पायकमङ्गीकृत्य तदाकारशून्यत्यानिर्विकल्पकं प्रत्य- तम्" [ ] इति ? किच" शब्दसामान्याकारषद् अर्थसामान्याकारस्यापि "तत्र निषेधः कर्तव्यः, सति प्रत्यक्षस्य । २-हकमि-त. 1 ३-वावये स.। १ बलवणस्य । ५-स्यार-मार,.., ५०, स.। ६ अर्थात्मानी वा शब्दा.। अर्षे 1. ८ प्रभास-पा.,.,.,.। .इति चाश्येन। उद्धृतमिदम्-न्यायप्र०५००३५।। शब्दाकारत्वमेव ।। -कत्वामा-भान, २०, प.स.। १२ सत्यप्दै- कस्वाध्यवसाये यदि स्वलक्षणस्य अवाचकत्वमेव न कयमपि वारकत्वं ददा। ५खलागस्य 11 इन्द्रियशाने । १५ शन्दाकारत ! : इन्द्रियाने। 10 वाकवलक्षणाकारते। १८ वारशब्दगनसामान्याधारस्व . श-मा०, ब.प., स. १.इन्द्रियहाने । । २० । - १२५] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव तस्मिन्नर्थस्य वाच्यत्वेन प्रतिमासनात् तत्प्रतिभासस्य सविकल्पकत्यापत्तेः । अर्थसामान्या- कारोऽपि "सदनिर्देश्यस्य वेदकम्" [ ] इत्यनेनै निषिध्यत इति चेत् ; न; शब्द- सामान्याकारस्यापि तेनैव निषेधात् 'न ह्यर्थे शब्दाः' इत्यादेवैयोपत्तेः । अनेन हि शब्द- सामान्याकारे निपिढेऽपि "शब्देनाव्याप्तीतस्य" [ ] इत्यादिकमर्थसामान्याकार- निषेधायावश्यं वक्तव्यम् , तेनेय च शब्दसामान्याकारत्यापि निर्देश्यत्वेन निषेधे सिद्धे "न ५ ह्यर्थे शब्दाः" इत्यादेर्न किञ्चित्कलमुत्पश्यामः, तन्न सामान्याकारस्यानेन निषेधः किन्तु स्वल- क्षणाकारस्यैव पाचकसामान्येकत्येनाध्यवसितस्य, ततो वाचकस्यलक्षणसम्बद्धतया ग्रहणमेव विकल्पानां विकल्पत्वमिति कश्चित् ; सोऽपि न विपश्चिन् ; श्रोत्रज्ञानस्यैवं सविकल्पकत्वा- पत्तेः । वस्य वाचफस्वलक्षणयिपयत्यात् । अय न सन्मात्रविषयत्वमेव विफल्पत्यम् अपि तु तद्विशिष्टवाच्यमहणम् , न च श्रोत्रज्ञानं तद्विशिष्टवाच्यविपयमिति चेत् ; न; वाचकमहणस्येव तद्विशिष्टंवाच्यप्रण- स्वात वाच्यरूपानवसाये वाचकत्वस्यैवानवसायात् , वाच्यवाचकयोरेकज्ञानस्या- न्यतरप्रतिपत्तिनान्तरीयकत्वात् । वाचकत्वमपि न श्रोत्रज्ञानवेद्यम् ; "शब्दस्य पूर्वापरी- भावे "तदप्रवृत्तः, तात्कालिकत्रस्तुगोचरव्यापाराद्धि श्रोत्रेन्द्रियात् तद्विपयस्यैव ज्ञानस्यो- त्पत्तेः । पूर्वापर्यभूतस्य च शब्दस्य यायकत्वं रात्रैव सङ्केतकरणादेः सम्भवादिति चेत् ; १५ कथं तर्हि "तद्परेन्द्रियज्ञानानां याचकविषयत्वम् ? तेपामपि तन्नास्ति पूर्वापरीभावे तेपा- मध्यप्रवृत्तेरिति चेत् ; व्यर्थ तर्हि तत्र शन्दस्वलक्षणाकारनिराकरणम्, सत्यपि" तदाकारत्वे वाचकस्थभावाग्रहणादेय विकल्पापत्तिभयप्रसङ्गस्य प्रतिक्षेपात् । सति तदाकारत्वे वाचकरूप:- मेव तदाकारमध्यवस्यन्तो व्यवहारः प्रत्यक्षस्य "तद्विपयत्यमेव प्रतिपद्येरन , अतस्तदभिमायनि- पेधेन निर्विकल्पकत्वसाधनार्थम् इतरेन्द्रियशानेषु शब्दस्वलक्षणाकारप्रतिक्षेपः; इत्यपि न पतुरम् ; २० भोगज्ञानेऽपि तदाकारप्रतिक्षेपप्रसङ्गात , तत्रापि सति तदाकारे व्यवहर्तृजनस्य 'वाचक एक सदाकारस्तद्विपयमेव च प्रत्यक्षम्' इत्यभिसन्धानस्यावश्यम्भावात् । अप्रतिक्षिप्तेऽपि तदाकारे तत्र "सदमिसन्धानमेव प्रकारान्तरेण प्रतिपिध्यत इति चेत् ; न; अन्यत्रापि" "तत एव वग्निपेधप्रस- मात् । किं वा तत्प्रकारान्तरम् ? प्रत्यक्षमिति घेत"; न तन्त्र पाचकविषयत्वस्यैव व्यवहार . -- 1 अर्थसामान्पाकारे। २-भासनस्य मा., ०, प.। ३ वाक्येन । ५-ताशामास मा०, २०, प., स. । उस्तोऽयम्-"यच्चासम्-मान्दैनाव्यापुतारपस्य पुरावप्रतिमासनात् । अर्धस्य याविवति।" -पोहसि..। ... भस्य शाविव तदनिर्देशस्य वेदकम् ।"-सम्मति० टी०.२१.। ".."रष्टाविर तरदाः कसिनगोयराः ॥"-हेतुवि०.१.४। ५ न य पदाः सन्तीति वाश्येन । ६ सम्पन्यतया । मा०, ५., १०, स...-स्पत्वम् भा, य०, १०,स। ८ वाचरिस्टियाच्या १-परवाव मा०, ५०, प., स... सन्दपूर्वा-स. 11 श्रोत्रशनारत्तः। २ चानुपादीनाम् । १३ इन्द्रियमाने । ४-पि निराधा-मा०, २०, प., स. १५ पायकरूपत्वमेव मा०प०,०, स.१६ यारसरियायमेव । १० सदपि सभा-माप., स.। १८ पतुरादीन्द्रियाने। १९ प्रकारान्तरादेव । २. चैप सरस परहारिणं प्रदिपार न पासिमसिनास म्हतारम् मा.,प०, २०, स.।
न्यायविनिश्चयविवरणे [१६ प्रति प्रसिद्धत्वात् । न हि वद्विषयादेव तद्विपयत्वप्रतिक्षेपः । सत्यम् ; अभिनिवेशमात्रात्तस्य वैद्विषयत्वं वस्तुवृत्तमन्यति घेत , अन्यथा वस्तुवृत्तमित्यपि कुतः १ तत एव प्रत्यक्षादिति चेत्, न, प्रतिपादिताभिनिवेशामातात् वदसिद्धः । अन्यथाभूतादिति चेत्, न, वस्य व्यवहारिणं प्रत्यसिद्धत्वात् । न चासिद्धमसिद्धस्य साधनम् , स्वयं सिद्धस्य अपरमसिद्धं प्रति साधनत्वो. ५ पपत्तेः । सकलविकल्पोपसंहारवेलायो सिद्धमेव तस्यै तदिति चेत् , न, तद्वैराया विचारपिप्य- माणत्वात् । वन्न प्रत्यक्षं प्रकारान्तरम् । नाप्यनुमानम् , तस्यापि प्रयक्षव्यापायनुसारिण: तदविपये प्रवृत्त्यसम्भवास् । तव्यापारनिरपेक्षत्वे तु तस्य स्वयमेवासम्भवात् ब्यातिपरि. ज्ञानस्य प्रत्यक्षाधीनत्यात् । अनुमानाधीनवे अनवस्थादोपस्य यस्यमाणत्वात् । ततो यद्यपरे. न्द्रियज्ञानेषु शब्दस्वलक्षणाकारे तत्रैव व्यवर्तुळचकरूणाभिनिवेशस्यावश्यम्भावात् तदाकार- १० यता तु ज्ञानानाम् अवश्यम्भाविनी पिकल्पापत्तिः' इति भयात् “वदोकानपेधे प्रयास', सहि त्रज्ञानेऽपि तत्प्रयासो विधातव्यः, क्या च विषयाभाने उदेय ज्ञान न भवेत । ततो न वारकरूपाध्यबसायाधिधितशब्दस्वलक्षणविशिष्टविषयपरिच्छेदो विकल्पलक्षणम् , प्रोप्रशनेन अतिव्यापित्वात् । वन्न शब्दस्वलक्षणस्य स्वभावतोऽन्यतो वा पाचकत्यं सम्भवति । सा भूतत्वलक्षणस्य वाचकत्वं तत्सामान्यस्येव तदभ्युपगमान् , "तस्य देशकालभिन्न- १५ व्यरधनुरामरूपत्वेन वत्र सबैतरणादेर्व्यवहारविनियोगस्य च सम्भवादिति चेत्, न, सामा न्यस्य वस्तुभूनस्यानभ्युपगमात् । अपोहरूपमबस्तुभूतमभ्युपगम्यत एवंवि चेत् , फयमरस्तुनो वाचकशक्ति यतस्तदविच्छिन्नविषयप्रण विकल्पः" स्यात् , वच्छतिभाये" तवस्तुत्वानुप. पत्तेः । स्वलक्षणशक्तरारोपात् शकिमानेयाऽपोह इति चेत्, , स्वलक्षणस्यापि वाचकशक्तरमा वात् , तदुक्तदोपप्रसझास। शतयन्तरस्यारोपेऽपि तत्प्रयोजनमेवापोहत्य स्यान्न विषयमविपादनम्। अपि च, आरोपरय विकल्पत्वेनावस्तुगोपरत्वात्, तारोपितापि शक्तिरवस्तुरूपैवेति कर्थ तशादपोहस्य वाचक्त्यम् १ आयेपितायामपि सती स्वलक्षणशक्तरारोपादिति चेत् , न, 'स्वलक्षणस्यापि इत्याइरभ्यासाचे कापरेरनपस्यानोपस्थानाय । सन्नापोहस्यापि वापकत्वम् । ततः कथं वाचकविशिष्टविषयप्रणं विकल्पलक्षणं. वाचकत्येवासम्भवान् ? एनदेवाद-- अभिलापतदंशानामभिलापविवेकतः। २५ अप्रमाणप्रमेयत्वमवश्यमनुपज्यते ॥ ६ ॥ इति ! अभिलप्यतेऽनेनेत्यभिलाप: शब्दसामान्य तस्यैव साक्षाद्वाचकत्वेन परैरभ्युपगमात् । अंशा इवांशा विशेषाः । किं पुनरंशसादृश्यं विशेषाणामिति चेत् ! अधिरपत्वमेव, अशिन प्रत्यशानामिव सामान्य प्रति विशेषाणामधिकरणल्यमसिद्धः। तस्याशास्तदंशाः अभिलापत्र प्रायशस्य । वाचकविषयत्वम् ३ म्यवहारिण । अन्यथाभूतम् अभिनिशिश्न प्रत्यक्षम् । १मस्य चाविषये। अनुमानस्य 10-4गता भा.प.16 सदस्वरमार प्रज्ञानमेव । शन्दसामान्य ११-ल्पस्य स्यात् मा०,40,प.स.१९ याचाशकिसद्भावे । १३ अपोहाशक्तिमानिति म्यप्रदेशमानमेव स्यात् । १५-मकोप-आo,१०,१०,०11५ प्रनामा,य०,९०, स.विशेषाणामधि-4T0,0, 1.स.
१।६] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः तदंशाश्व अभिलापतदंशास्तेषां शब्दसामान्यतस्यलक्षणानाम् । अभिलापविवेकत:- अभिलपनमभिधेयप्रतिपादनम् अभिलापः, तस्योक्तन्यायेन विवितो (विवेको) विरहः तस्मात् । ततो 'न विकल्पसम्भवः' इत्यध्याहारः । मा भूद्विकल्पः । तदुक्तम्- "परमार्थतस्तु सकलं विज्ञानमविकल्पकम् । तद्बाह्यविषये सर्वस्याचिकल्पेन वर्तनात् ॥” [प्र. वार्तिकाल० २।२४९ ] इति चेत् ; तदसारम् ; यस्मात्- विकल्पविरहे न स्यादनुमानं तदात्मकम् । तेदत्यये तु नाध्यक्षं यथाकामं प्रसिद्धयति ॥४०३॥ प्रत्यक्षं कल्पनापोढमर्थसामर्थ्यसम्भवात् । इत्यादिनानुमानेन साधनात्तव्यवस्थितेः ॥४०४॥ स्वत एवाधिकल्पं चेत्प्रत्यक्षं सिद्धिमृच्छति । भूतोपादानमध्यक्षं तद्वत्किन्न प्रसिद्धयति ॥४०५॥ तदुपादानभावेन तस्य चेन्नावभासनम् । निरंशोकस्वभावस्य किं तस्यास्त्यवभासनम् ? ॥४०६॥ चिकज्ञानवादस्तु वादिनः श्रेयसे न वः । पाच्यवाचकसंसिद्धेस्तनाग्रे प्रतिवेदनात् ॥४०७॥ कथं तद्वद्यसिद्धिः स्यादृध्यक्षे चानवस्थिते । प्रमाणपरिशुद्ध्या हि प्रमेयस्य व्यवस्थितिः ॥४०८॥ इदमेवाह-'अप्रमाणप्रमेयत्वमनुपज्यते' इति । प्रमाणमा प्रत्यक्षमेव अनुमानाभावस्य २० विकल्पाभायवादिना परेणैवाभ्युपगमात् । प्रमेयमपि तद्वधं स्वलक्षणमेव । प्रमाणश्च प्रमेयश्च प्रमाणममेये तयोर्भावः प्रमाणप्रमेयत्वम् , सदभायः अप्रमाणप्रमेयत्वम् , अनुपज्यते विकल्पाभावमन्यागच्छति प्रतिपादितन न्यायेनेति भावः । भवतु तर्हि सर्वस्यापि प्रमाणप्रमेयविभागस्याभावः सर्पभायनेराल्यस्यापि सोग. तरगीकारादिति चेत् । फवं स्यात्सर्वनेरात्म्य प्रमाण यदि तत्र घः । फचं स्यात्सनराम्यं प्रमाणं चेन्न तत्र यः ॥४०९।। प्रमाणमन्तरेणापि तत्सिद्धं यदि घुध्यते । मायनैरात्म्यपदार्यसद्भायः किन्न सिद्धिमान् ? ॥४१०॥ 1 पिकपारमकम् । २ भनुमानाभाये । ३ "अविसंवादश भर्षानुत्पत्ताध्यमिचारतः"-. पाति- डा. प्रसवस्य । ५-: भा०, ५०, १०, R. नैयरम्यम् । --वस्वमा मा०, ५०,.1 - - न्यायविनिश्चय विवरण एतदेवाह-अवश्यमनुपज्यते । अवश्य भावनेरात्म्य सौगतानामगोकारवशवर्तित्वात, अवश्य प्रमाणादिभावतत्त्वं विपर्ययात्, तदपि प्रमाणसिद्धिनिरपेक्षमेव सिद्धयतीति यावत् । इदमन्यद् व्याख्यानम्-यदि अमिलापसम्बन्धविशिष्टा एयार्थी विज्ञानय॑वसीये तदा न तावद्विशिष्टस्यमर्थानामौत्पत्तिकम् प्रथमदर्शन एवं तद्विशिष्टव्यवसायप्रसङ्गेन सहतवै. ५ योपत्तेः । सङ्केतकालगृहीतस्यामिलापत्यानुस्मृत्य योजनात् विषयस्य तद्विशिष्टत्वमिति चेत् ; अमाह-'अभिलाप' इत्यादि। अयमस्यार्थ:-अभिलप्यते यः स्वार्थः परार्थश्च स अभिला- पस्तेन विवेकः असम्बन्धः । कस्य ? अभिलापस्य तद्वाचकस्य शब्दस्य । तथा हि स्वार्थ- विशेषे निर्माते शब्दविशेपे स्मृतिः स्यात् नानिीते, अन्यथा दानादिचेतसां स्वर्गप्रापणसाम- ध्येऽनिर्णीतेऽपि द्विशेपस्मृत्या तद्योजनं स्यात् । न चैवम् अविवादप्राप्तेः । अस्याश्च तत्र १० सद्योजनायां स्वार्थविशेपनिर्णय इत्यन्योन्यसंश्रयः" । तन्न अभिलापत्य अभिलापेन सम्बन्धः । १ तथा, अभिलप्यते अनेनेत्यभिलापः शब्दः वेन विकः । केपाम् ? तदंशानां धकारादीनाम् । तथा हि-'यथा विशेषणविशिष्यार्थग्रहणं वद्विशेषणस्मृती नान्यथा तथा तदंशविशिष्ठाभिलापस्मरणं "केवलस्याऽवाचकत्वात् । तदंशस्मरणपूर्वकम्, तत्स्मरणमप्यभिलापविशेपस्मरणपूर्वकम्' इत्यन्योन्य. संभयो द्वितीयः" । तदेवम् अभिलापतदंशानाममिलापविवेकतो विकल्लामाव एव प्रातः, तदभ्यु- १५ पगमे" च निर्विकल्पस्याकिञ्चित्करस्यान्न प्रमाणम् , अत एव न प्रमेयम् , इति अप्रमाण- प्रमेयत्वं तद्विवेकतः अवश्यमनुपज्यते । इदमपरं तभ्याख्यानम्-यदि "अभिलापविशिष्टार्थव्यवसायस्तदमिलापस्मरणान् तद्वत्त- दपि" स्मरणं केवलस्य वस्याऽवाचफ्लात् "तदंशविशिष्टस्यैव, तदंशानां च स्मृतानामेय तद्विशेपणतयावसाय इति । अभिलापस्मरणं तदंशस्मरणश्च अपराभिलापतदंशस्मरणद्वये सति २० भवति । तदपि पदपरामिलापतदंशस्मरणे भवति, राप्येवमिति अनेकोऽनवस्थानदोष : प्रसज्यते । तस्मात् अभिलापतदंशानामभिलापविवेकतो याचकशब्दविरहात्तवस्त्र एव 'अममाण' इत्यादिदोंप इति । स्यान्मतम् -भवतु परस्पराश्रयः अनवस्थानं नु न सम्भवति, स्मर्यमाणस्य शब्दरय शब्दान्तरस्मरणनिरपेक्षत्वात् । स्वयमवायकस्य हि वाचकविशिष्टतया निर्णये व्यतिरिक्तवावक- २५ स्मरणमपेक्षणीयम्, शब्दस्य त्वर्थप्रतिपादनवत् स्वप्रतिपादनेऽपि व्यापायन तत्स्मरणे वाचका. १-ते इति अवश्य प्रा०,३०,०,12-वारसम् आ०,40,१०,०1३ कारणमन्यम् । -नुमत्य मा०,००,०।५-जना वि-ता-मि-भा०,१०,५०,८010 कस्यापि लामात्य भा ORRY शब्दविरोए । ९ शब्दयोजनं स्यात्तथा व दानमित्त स्वर्गप्रापणसमयम्' इति विकल्प. समुपयेव । सार्थविशेष निीते शब्दविशेष स्मृति', अस्याश्च शन्दविशेषस्मृतेय तन स्वार्थविशेषे तयोजनायाम्-शब्दयोजनायाम् स्वार्थ विशेषनिर्णय इत्सन्मोन्याश्रयः । , अभिराप्यस्य, अभिलप्यते यः इति व्युपतो.। १ शविरहितस्य । इलाम पान-आ०,०, प०, स ०१५ पाराशसरणमपि । १४-यतः मा०, २०,५०,०1१५ विकन्याभारे स्वीक्रियमाणे। ६ ममिलापविवेकतः । १७ अभिलापविशेषार्थ-सः । १८ अपिशब्दोऽय भिक्षनमा 'स्मरणम् इसस्थानन्तरममिसम्बन्धनीयम् । तदभिलापस्मरणमपि । १९ अभियांश । २०-स्थादोष- भा..... । .
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव . २४६] न्तरस्मरणमर्थवत् तत्कथमनवस्थानमिति । तदप्यसदेव मतम् ; शब्दस्य स्वप्रतिपादनस्वाभाव्या- भावात् । तद्भावे वा श्रोत्रज्ञानेऽपि स्ववाचकत्वेनैव तस्यावभासनात् स्मरणवत्कथं तस्यापि निर्वि- कल्पकत्यम् ? तंत्र तस्य न तथावभासनमिति चेत् ; किं तर्हि स्यात् ? अप्रतिभासनमिति चेत् ; न; तज्ज्ञानस्य निर्विषयत्वप्रसङ्गात् , न च विपयशून्यं विज्ञानमिति श्रोत्रज्ञानव्यवहार विध्वंसन- मेय प्राप्तम् । अन्यथाऽवभासनमिति चेत् ; न ; तस्याभ्रान्सत्वेन प्रत्यक्षत्वाभावापत्तेः । वन्न शब्दस्य ५ स्वप्रतिपादनस्वाभाव्यम् । तथा चेत् स्मरणेऽपि कथं तस्य तद्रूपतया प्रतिभासनम् ? अथ स्मरण- मतद्रूपमपि तद्रूपमिर्च अवद्योतयति । कुत एतत् ? तस्य विकल्पत्वेनैवस्वाभाब्यादिति चेत् ; सदपि कुतः ? वाचकरूपविद्योतनादिति चेत् ; न ; परस्पराश्रयात्-विकल्पत्याद्वानकरूपावद्योत. नम् , ततश्च विकल्पत्वमिति । अन्यदेव तस्य विकल्पत्वनिबन्धनं वाचफरूपावद्योतनमिति चेत् । न ; तस्याऽभावात् । भाये तदपि यदि तपरिकल्पितं स एव दोपः-तदवद्योतनात्तन्य १० विकल्पत्वम्, ततश्च तदवद्योतनमिति । पुनस्तद्विकल्पत्वनिबन्धनत्यापरतदवद्योतनस्य परिकल्पनायां कथमनवस्था न भवेत् ? अपि च, "स्वामिलापसम्बद्धा एपार्था विज्ञानय॑यसीयन्ते"[ घुयाणेन स एव तदभिलापो वक्तव्यः । पदं वाक्यं वेति चेत् ; ननु वाक्यं नाम पदसन्दोहकल्पितं नासण्डैकरूपं तस्य निपेत्स्यमानत्वात् , ततः पदयोजनया"तवक्तृप्तिः कर्त्तव्या, पदानां चानुस्मर- १५ "णोपस्थापितानामेव योजनम् । न च पदमपि किश्चिदखण्डैकरूपं तस्यापि निपेत्स्यमानत्वात्। वर्णयोजनया तु"तत्क्लूप्तिर्विधातव्या । वर्णानां च स्मरणोपस्थापितानामेव योजनम्। न च वर्णा निर्भागा, दीर्घादिव्यवहाराभावप्रसङ्गात् । भ्रान्तस्तव्यवहार इति चेत् ; भास्तां "तावदेतत्, तृतीये विचारणात् । सतो पर्णप्रक्लृप्तिरपि स्मरणोपनीततद्भागयोजनयैव सम्पादयितव्या । सावधैवं प्रक्रिया यावत्पर्यन्ते निर्भागाः शब्दपरमाणया, पां चाशक्यसङ्घनत्वेन अनभिला. २० सम्बन्धादस्मरणम् , तदस्मरणे च तद्विशिष्टतया "तदययविनो न स्मरणं तरिमश्च तद्विशिष्टतया "तदवयविन इति तावद्वक्तव्यं यावद्वाक्यानुस्मरणं न भवति । "तत्र च कथं स्वामिलापसम्बद्ध- सया अर्थव्यवसायः ? न हाननुस्मृताभिलापस्य तत्सम्बद्धतया सम्भवति तद्व्ययसायः, प्रथम- दर्शनेऽपि प्रसङ्गात् । तन्नाभिलापवत्वं विकल्पलक्षणम् असम्भवादिति । एतदेयाह-अभिला'- इत्यादि । अभिला युद्धिः, अभिलायते अभिगृसते विपयोऽनयेत्यभिलेति व्युत्पत्तेः । तस्याम् २५ अपसन्तो विपयत्वेनाऽप्रविशन्तोऽशा भागा येषां ते अभिलापतदंशा अनवगृहीतभागाः - शब्दस्य । र धोत्रशाने । ३ सन्दरय । . स्ववाचस्वेन । तदाव-आ०, २०, प., स. ५ राम्पत्य । ६ पायकविशिष्टतया । ५-भिवातयो-मा०, २०, ५०, स.। ८म्मरणस्य । ९ विकल्परिपतम् । ..-यानं न भ-भा०, २०, ५०, स.।" "स्वाभिधानविशेषापेक्षा एवार्या निश्चयऱ्यावसीयन्ते इत्यका- म्तस्य..."-एस: पृ० १२.। ११ वायरचना । १३-गोपनीनतद्भागस्थापि-मा०, २०, ५०, स.। १४ पदरचना । १५ वर्षेषु दोपदिमवहारः ! १६ तावदिदं -मा०, २०, ५०.स. १. प्रस्तावे। अभिलापसम्बन्धाभावात् । १९ वर्गस्य । २० पदस्य । २१ वाक्ये । २१ -सम्बन्धतया मा., य०, प., म.। २३ भभिला+आनन्+अंशाः।
. न्यायविनिश्चयचिवरणे परमाणव इत्यर्थः । तेषाम् अभिलापविकतः पाचकशब्दधिरहाद् अवश्यं नियमेन. अनुपज्यते अप्रमाणप्रमेयत्वम्। माणः शब्दा, मणेः शब्दार्थस्य घभि एवंरूपत्वात मष्टो माणः प्रमाणः, शब्दपरमाण्वपेक्षया तवयची तत्कलापापेक्षया पुनस्तदवयवी, वावदेवं यावदक्ष- राणि, तदपेक्षया पदम् , पदापेक्षया वाक्यम् , तस्य प्रमेयत्वं स्मरणतम् , सदभाषः अप्रमाण- ५ प्रमेयत्वम् । तदवश्यम्भायेनापद्यते तत्प्रतिपत्तिनिबन्धनस्य पूर्वपूर्वतयगानुस्मरणस्याभावात् , सोऽपि तत्पर्यन्तवर्तिशब्दपरमाणूनामनगुस्मरणात् । तन्न परस्यामिलापसम्भवः तदभावात् कथ- मुक्तम्-'अभिलापप्रतिवद्धतयैवार्था व्यवसीयन्ते' इति । भवतु धा कश्चिदमिलापः, तथापि तत्स्मरणस्यापयमिलापप्रतिबन्धे अनवस्थानमुक्तम् । तदप्रतिवन्धे यदि तैनिर्विकल्पकं न तद्विपयस्य शब्दस्यान्यत्र योजनं स्वलक्षणत्वादिति गतमर्थ- १० व्यवसाययातया । सविकल्पकं चेत् ; कयमव्यापकं विकल्पलक्षणं न भवेत् ? अनभिलापव- तोऽपि तत्मरणस्य मविकल्पकत्वात्। साक्षादमिलापबत्त्येऽपि उपचारादमिलापत्रदेव तरस्मरणम् । न हि साक्षादमिलापसम्बन्धादेवामिलापयत्वं प्रतीतेः, अपि तु अभिलापसम्बन्धयोग्याकारगो. चरत्वादपि । तयोग्यश्चाकारः साधारणाकार एय तत्र शब्दसङ्केतादेः शक्यविधानत्वात् । अत एवोत्तम्-"अमिलापसम्बन्धयोग्यप्रतिमासा प्रतीतिः कल्पना न्यायवि० १० १३]इति । १५ ततः शब्दस्मरणस्यापि शब्दसामान्यगोचरत्वेनोपचाराद् अभिलापवेत्त्वोपपत्तेरुपपन्नं विकल्पत्वमिति घेत् ; अनोच्यते-स सामान्याकारः फल्पितः, पारमार्थिको वा भवेत् ? कल्पितश्चेत् । कथं सस्यामिलापसंसर्ग प्रति योग्यत्वम् ? योग्यत्वं हि सामर्थ्यमेव । न हि तत् कल्पितस्योपपन्नम् । कल्पितश्चेत्कथं योग्यः ? योग्यवेकल्पितः कथम् ? योग्यच कल्पितयेति मियो निप्पीडितं यः ।। ४११ ।। कल्पितश्चेत्समर्थोऽपि कल्पितं स्यात्स्वलक्षणम् । सौगतानां ततः प्राप्तं न किञ्चित्परमार्थसत् ॥ ४१२ ।। कल्पनामानवादस्तु पश्चात्प्रतिविधास्यते । कल्पितोऽपि समर्थश्वेत् ; मरीच्यम्भोऽपि पीयताम् ।। ४१३ ॥ योग्यत्वमपि तस्य कल्पितमिति चेत् ; तहिं तेनाप्यभिलापसंसर्गयोग्येन भवित. २५ व्यम् , अन्यथा वनतिभातफ्त्याः प्रतीतेविकल्पकत्वानुपपत्तेः । तदपि तस्य तद्योग्यत्वं यदि पारमार्थिकम् ; स एष प्रसङ्गः कल्पितधेत्यादि । कल्पितम्चत् न; तहिं 'तेनापि इत्यादेः प्रसङ्ग स्यानुषन्धादनवस्थापत्तेश्च । यत्पुनरेतत्-विलक्षणमेष सामान्य तस्यैव ध्यसाधारणरूपेण प्रतीत्युपस्थापितस्य सामा. -- २० -स्यामागात् भाग, ५०,. 13 -बन्धनवार्योऽप्यवसीय इति भा०,०,प.स. अभिलप- स्मरणम् । ४ क्षमिलापस्मरणस्य। ५ बलापतैः मा, य०, २०, स.। ६ शब्दसामान्यामरस्यातमणि चैत् भा०,बर, २०, स. ८-पत्यानु-आ०,१०,५०,०। ९ तुलना-"यदा साक्षासानमनने प्रति शिवेन प्रतीयते वदासी स्वेन रूपेण लक्ष्यमाणत्वात् स्वलक्षणम् । यातु पारम्पयण शरता तरफेर प्रतीयते तदा सामान्यरूपेण समिति सामान्यलपणम्"-प्रवार्तिकाल सर।
१० १६] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः १३९ न्यव्यपदेशात् , ततो वास्तवमेव तस्यामिलापसम्बन्धसामर्थ्य मिति ; तत्रोच्यते-यदि साधारणं रूपं स्वलक्षणस्यास्ति न किञ्चित् संपतिसत् ? तदपरस्य तस्याभावात् । नास्ति चेत् । कथं तेनावमासनम् १ मरीचिकातोयवदिति चेत् ; उच्यते- स्खलक्षणस्य शक्तश्चेत्तद्रूपस्य प्रवेदनम् । सर्वदा तत्प्रवृत्तिः स्यात्तच्छकरविलोपनात् ॥ ४१४ ॥ अलुमशक्तिकत्वेऽपि सदा तच्चेन वेदयेत् । असाधारणरूपस्याप्यावेदनमागतम् ॥ ४१५ ॥ शक्तिमत्त्वं विहायान्यन्न तत्रापि निवन्धनम् । ततः स्वलक्षणस्यैव वार्ताऽपि विलयं गता ॥ ४१६॥ सेंचियाभावतो नो चेत्सर्वदा तत्प्रवेदनम् । तद्रूपदर्शनी शक्तिस्तदा तहि कथं भवेत् ? ॥ ४१७ ॥ भावेषु हि विना कार्य न शक्तिः शक्यकल्पना । सर्वकार्येषु सामध्ये सर्वेपामन्यथा भवेत् ॥ ४१८ ।। साऽपि नास्ति तदानीं चेत् ; प्राप्तेऽपि सचिवे कथम् ।। यत्साधारणरूपस्य तद्भावे स्यात्प्रवेदनम् ॥ ४१९ ।। सचिवात्सन्निधिप्राप्तात् न सा तस्योपजायते । समकालतया हेतुहेतुमत्त्याव्यवस्थितः ॥ ४२० ॥ "प्रागशक्तस्य पश्चाच्चेत्तस्य शक्तिस्ततो भवेत् । क्षणस्यस्थिती तस्य क्षणभनि जगत्कथम् ? ॥ ४२१ ॥ सन्न स्वलक्षणयलात्तदाकारप्रवेदनम् । विज्ञानवलादेवेति चेत् तदपि कथम् अविद्यमाने- मुपदर्शयेत् , कारणस्य विपयत्वोपगमात् ? न चासतः कारणत्वम् । अर्थज्ञान एवायं नियम इति पेत; "तनाप्यकारणस्य विषयत्वे को दोपः ? सर्ववेदनमेव प्रतिबन्धाभावाऽविशेषादिति चेत्, न; असद्वेदनेऽपि समानत्वात् । मरीच्यां जलवत्सर्वस्वासतः किन्न पेदनम् ? । प्रतिबन्धो न तत्रापि यदस्ति नियमक्षमः ॥ ४२२ ॥ सर्वस्याप्यसतो वित्तावेकरमादेव वेदनात् । अपरं सत्र विज्ञानं सर्वमेव वृथा भवेत् ॥ ४२३ ॥ सर्वसदनेऽप्येवं नेप दोपोऽन्यथा भवेत् । इत्यनिष्टप्रसङ्गोऽयं फथन्नाम निवार्यवाम् ॥ ४२४ ॥ १-रणरूपं वा०।२-चिश्चे-भा०,१०,१०, ३प्रोदने । ४ श्रीरामा-आ०,०००। सहकारिरिहात् । ५ सहकारिविरहावस्थायाम् । शक्तिः । गएच आ., प..। ८ पदकारिम- प्रणा९यस्तु । १. अशानेपि ।
. न्यापविनिश्वयविवरणे (१५७ मिथ्याशान तथा शनियतग्राहक यदि । अर्थज्ञानं वथा शर्नियतप्राहकं भवेत् ॥ ४२५ ॥ तवस्तरयोधकार्यत्यकल्पना युक्तिवर्जनात् । 'अकारण न विषयः' इत्येतद्वारमारितम् ॥ ४२६ ॥ ५ तस्मादसाकारस्याकारणायेन प्रहणाभारान्न साधारणाकारमणमपि विकल्पलक्षणम् । भयतु या संग्रहणम्, तथापि तेह्मशतया ज्ञानस्वरूपाहणणे तदाकारयत तवरुप. स्थापि मिथ्यात्वं भवेत् । न घसदाफारमहणाभिमुन खमायेन गृहीतमन्यथा भवति, नीला. भिमुखस्वभावगृहीतस्यापि पीवत्यमसद्गात् । न च ज्ञानस्वरूपस्य मिथ्यात्वम् ; अनभ्युपरमात्, सदप्रतिपत्तिप्रसगाध । नहि मिध्यारूपादेव मिथ्यात्वम् अमिथ्यात्ववन्धक्यप्रतिपत्तिकम् । १० शयन्तरेण तदहणे नंदुभयविसाधारणस्य विज्ञानस्य प्राप्तम् । भवतु पो दोप इति चेत् ; न; साधारणविषयवचस्यापि मिथ्यात्यप्रसङ्गान् । पुनरपि पसाधारणाकारकल्पने अनवायापत्तेः अग्रणमेव सामान्याकारस । तन्नेदमपि विकल्पलक्षणम् असम्भवात् । एतदेवाह-- पदार्थज्ञानभागानां पदसामान्यनामतः। तथैव व्ययसायः स्याचक्षुरादिघियामपि ॥७॥ इति । अर्थोऽभिधेयः पदस्याः पदार्थ: सामान्यम्, वय शब्दप्सतस्य सम्भवात् । सस्य ज्ञानं तम्य भागाः मगपरसामान्यरूपा अंशास्तेषां व्यवसाय: स्यात् । अब सायोऽधिगमस्तदमावो व्यवसायो विशब्दस्याभावार्थत्वात् "विमलादिवत् सः स्याभवेत् अन- यस्थानादिति भावः । कुतः सम्भवतां पां व्यवसाय इत्याह-पदसामान्यनामतः। पद्यन्ते झायन्तेऽनेनेति पदं ज्ञानमेव तत्र सामान्यानामपरापरात्मनाम्, तद्विषयत्वेन नमनम् इत- २० प्रकारणोपसर्पण तरमादिति । तर्हि मा मूज्ञातस्यात्मनि सामान्याकार इति चेत्, न; शक्ति भेदेन मानभेदप्रसङ्गात । "तथा हि-न सामान्यग्रहणं तद्हणस्य स्वसंवेदनशतिव्यतिरेपा । असंविदितस्य च यदिविषयत्यानभ्युपगमात् । पुनरप्यपरस्वसंवेदनशक्तिपस्पनायां स एव प्रसङ्गे शक्तिभेद इत्यादिरनवस्था च । ततः सुदूरमपि गत्वा शक्तिद्वयाधिष्ठानमेकं संवेदनमभ्यु- पगन्तव्यम् । ततो यदुक्तम्-"यहीरूपतयैव सामान्यं न ज्ञानरूपतया २५ तन्निपिद्धम्; ज्ञानरूपतयापि सामान्यस्योपदर्शितस्यात् । सदपि सामान्य ज्ञानरूपदयार्भ एष, इत्यपि न शोभनम; साधारणाकारस्य अर्थत्यानभ्युपगमात् । तदर्थत्वे घ तत्प्रतिपत्तरसम्भ- यात् न साधारणाफारमहणं विकल्पलक्षणमिति सायूफम्-'पदार्थ' इत्यादि । १ तथाशनिर्निय-आ०, ००1३ अर्थज्ञानस्य । ३ साधारणाकारग्रहणम् । ४ तदग्रहण-आग, ३, प, स-५-वरूप -आ. व.,१०, स.१३ ज्ञानस्वरूपस्यापि । मिथ्यात्वाप्रनिपत्ति । शान- स्वाश्मणे । ९ सापारणाचारप्रहाशचि वापदणशक्तिरिति शक्तिद्वय साधारणत्वम् । ०-यव-मार य, प० स० विकला-भा, ५०, १० 1 १२ सम्भवता ते-आ० ब०,०, सणातमा मा०,०,५०,०1४ तथापि न ता०11५ सश-R०, २००.! - १७] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः ५ १ भवन्तु तर्हि निर्विकल्पा एव बुद्धयो विकल्पबुद्धिव्यवस्थानोपायाभावादिति चेत्, अन्ना ह-'चक्षुरादिधियामपि' इति । चक्षुरादि]पां धोत्रादीनां तेषां कार्यभूता धियः तासा- मपि न केवलं मानसीनामित्यपि शब्दार्थः । किम् ? व्यवसायः अधिगमाभावः । कथम् ? तथैव तेनैव प्रकारेण । तथा हि- विकल्पबुद्धयो यद्वलोकरूढा अपि स्फुटम् । क्षोदक्षमत्वाभावेन विनश्यन्ति भवन्मते ॥ ४२७ ॥ निर्विकल्पधियोऽप्येवं चक्षुरादीन्द्रियोद्भवाः । विचारज्वलनालीदा विमुश्चन्त्येव जीवितम् ॥ ४२८ ॥ यत:- न तासामपि सामान्यं विपयत्वेन सम्मतम् । उक्ताश्च दोपो निःशेपस्तत्राप्येपः प्रसज्यते ॥ ४२९ ॥ 'निरंशं वस्तु तद्वेद्यं केवलं परवान्या । न जातु न चित्ताटक् पश्यामः प्रतिभासनम् ॥ ४३०॥ अभावे सर्वबुद्धीनां योद्धव्यस्यानवस्थितः । भावनैरात्म्यवादस्य साम्राज्यमधुनाऽऽगतम् ।। ४३१ ।। १५ तस्यापि न व्यवस्थेति प्रागेवेदं निवेदितम् । कल्पितं तन्न सामान्य बोद्धानामवतिष्ठते ॥ ४३२ ॥ पस्तुभूतं तु वत्तेषां नास्त्येवानभ्युपायतः । ततो न त निवन्ध शास्त्रकारः करोत्ययम् ॥ ४३३ ॥ भवतु या किमपि सामान्यम्, तथापि शब्दस्मरणवचक्षुरादिबुद्धीनामपि व्यवसाया- २० मेकत्वमनिवार्यमेव । तदाह-'पदार्थ' इत्यादि । पदमभिधानं तदेवार्थो विषयो येषां ज्ञानानां स्मरणरूपाणां तेषां भागा घहिर्विपया अंशाः, नात्मविषयाः तेपामध्यवसायस्यमावत्यात, तेपां व्यासायो निश्चयस्वभावः । कुतस्तेषां सः ? इत्याह-'पदसामान्यनामतः' इति । पदस्य स्मर्यमाणशब्दस्य सामान्य तत्र नमनात् तदाहकत्वेनोपनिपातात् । ततः किम् ? इत्याइ-तथे (तथैव इ) त्यादि । तफ्तेति श्रवणात् यथैयेति लभ्यते-तयोनिस्र्यसम्बन्धात् । ततोऽय- मर्थः-यथैव शब्दस्मरणभागानां स्वविषयसामान्यगोपरत्वेन व्यवसायस्वभावत्वं तथैर्य चक्षुरादि- बुद्धीनामपि। न हि तासामपि पर्युदस्तसामान्यवस्तुवेदित्वम् अनुभवपयोपेस्थापितमस्तीति भावः । -धियोऽस्त्येवं मा०, ५०, ५०, स.। २ निरंशव-सा० । ३ बौदोक्त्या । १ प्रदर्शपायाभावात् । ५-मवरव-आ०, २००६-तिलभ्यते स-10-सात् सम्ब-आ,..,.10-4 व चक्षु -भा०, २०, ५०, स. ९ अनुमदायोपमाविश्वातीतः । न चैकसमयावमिततद्यापारजन्मना तरज्ञानस्या परापरसमय गोवरवं सस्य सर्वाभाषस्तुदर्शित्वापत्तेः । तदाह-योम्यदेशस्थिनेऽचाणपृत्तिर्नातीतमाविनि । वनाधितं च विज्ञान न घालान्तरमादिनीति । न चापरापरसमयस्थापितमस्तीति-मा०, प.प.स.। भनुम" स्थापितमस्तीति सा.।
. न्यायविनिश्चयविवरणे स्यान्मतम्-न सामान्य चक्षुरादिक्षानस्य विषयः सम्भनवि । वद्धि कल्पितम् , वस्तुभूत या भवेत् । न तावत्कल्पितम् । तस्यावस्तुत्वेन वद्विषयस्य वज्ञानस्यावस्तुविपयत्वोपपत्तेः । न चैतन्न्याय्यम् , तस्याऽप्रत्यक्षत्वप्रसङ्गात् । न झवस्तुविषयं प्रत्यक्षं नाम, अतिप्रसङ्गात् , अक्षसा' पवैयपित्तश्च निवाभावात् । अस्तु वस्तुभूतमेव सामान्यमिति चेत् , तदपि तद्भवसामा- ५ न्यम् , सादृश्यसामान्य या भवेत् ? न तावत् तद्भवसामान्यम् , तैद्धि कालपयव्यापिरूपम्, तदपि कस्यचिद्विशेपात्मक्स्य, तमतिरिकस्य वा भवेत् । विशेषात्मास्य चेन्'; तस्यापि तद्रूप प्रतिक्षणमेदिनचक्षुरादिप्रत्यक्षस्य वेद्यम् , कालान्तरण्यापिनो का ? । न वावदायर , वर्तमानसमयपर्यवसिते चक्षुरादिव्यापारे वदायतोत्पत्तिकत्वेन तत्समय एव पर्यवसानात् । न चैकसमयपर्यवसिततद्व्यापारजन्मनः तज्ज्ञानस्य अपगपरसमयगोचरत्वम् , सर्वस्य सर्पाकार- १० वस्तुदर्शित्वापत्तेः । ददाह- "योग्यदेशस्थितेऽज्ञाणां वृत्तिर्नातीतभायिनि । तदाश्रितश्च विज्ञानं न कालान्तरमानिनि ।" [प्र.वार्तिफाल० २।१२६] न चापरापरसमयप्रतिपत्तिमन्तरेण वयापित्वं पायचित्सुरसायनोधम् , व्यापप्रतिपत्तेाप्पप्रति. पत्तिनान्तरीयकत्वात् , एकेन च प्रत्यक्षेण तहणे व्यर्थ एवापरापरमभुरादिन्यापारः सात् । १५ अपरापरतत्प्रत्यक्षार्थत्यान दोप इति चेत् ; न , तस्य प्रयोजनाभावान ! पारान्तरव्याप्ति- प्रहणं प्रयोजनमिति चेत्, न , तस्य प्रथमप्रत्यक्षादेव भावात् । नेपेन सतहणम् , अपरापरेणेव तेन तद्हणाभ्युपगमादिति चेत् , न, तस्यापि परपरसमयाननुसन्यायि. खेन स्वकालपर्यवसित एव 'विशेपे व्यापारान् । तर क्षणक्षीण प्रत्यक्षमेरमने या पालान्तर- 'व्यापिभावनिरीक्षणे दक्षता फीकवि । मा मृत्तस्य निरीक्षणदात्वं पारान्तरल्यारि- २० नस्तु भनत्येवेति चेत् , म, तस्यापि प्रथमपशुरादिव्यापाण्दुस्तस्यैव तर प्रवृत्ती अपगारवा व्यापारवेकल्यासहात्। "तव्यापारादपि तस्योत्पत्तिरिति पेत् : न, उत्पन्नस्योत्पत्ययोगात् । उत्पन्नस्यापराधीनस्वभावत्यात् , उत्पनस्यापि पारान्तरल्यानिः अपयपरटापारादिवि घेत् । न, 'मागेच फालान्तरख्यापित्तयोत्पन्नत्वात् ; "मागतम्यापितयोलनस्य पधावसापित्वं मारा. दिति चेत् ; न, प्राच्यातम्यापिरूपपरिक्षयाभाये हेतुशतेनापि पुनसम्मापिपररणासम्भवान २५ "विरोधात् । तत्सरिक्षयभावे पुनस्वदन्यदेव सद्यापरमगदिवं भवेत् । चन्न पाप" फालान्तर- च्यातिः अपरापरतव्यापारात् । ततः कालान्तरज्यामिमन्ति दर्शनान्येव पयपणण्युपत्रापन इति -मानविर-मा.,.,., स.1 तमामा-मा.....। -स्याप्तिरूपम् भा...। ५रितस्यापि .... पवमा न पर पूर्णपरसमयमावि वानी में क-., ., ... • अपरावरच गायराम रिम्या मा०, २०, ए., स.। ९-यापिनेरी-RI, ..,.,म...प्रपा ! गुर म्यापारादपि ५२ प्रपमप्र यशस्य ।। प्राणिय स..प्रमेव व.मा.प .५ मरम्पराए दिम्यापारोिपात तसारकमेव मा., ..., म. प्रकार।
.. १७] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः १४३ चेत् । न ; तेषां प्रयोजनाभावात् । प्रथमतद्व्यापारोपजनितेनैव कालान्तरख्यापिना प्रत्यक्षेण भावसामान्यस्य परिच्छेदात् किमेवं भावानां प्रेक्षावत्वमस्ति यत्सति प्रयोजने भयन्ति नास- तीति ? स्वहेतुसामर्थ्यायत्तजन्मानो हि ते संत्यसति च प्रयोजने भवन्त्येव नियमेनेति चेत् ; सत्यमेवैतत् ; यदि तथादर्शनं तेपाम् , दृष्टे चानुपपत्तिपर्यनुयोगस्यासम्भवात् । न चैवम् । न चादर्शनपथप्रस्थायिनि वस्तुनि एवमुत्तरमुचितम् , अतिप्रसगात् । तन्न कालान्तरख्यापि- ५ नापि प्रत्यक्षेण कस्यचित्कालान्तख्यापिरूपं सूपग्रहम् । तन्न विशेपात्मनः कालान्तरख्यापिरूपं सम्भवति; असम्प्रतिपत्तेः । तदुक्तम्- "एकत्र दृष्टो भेदो हि कचिन्नान्यत्र दृश्यते ।" [प्र० वा० २।१२६]इति । नापि विशेषव्यतिरिक्तस्य सामान्यस्य तंव्यापित्वम् ; तव्यतिरेकस्यैवाप्रतिपत्तेः विशेपबुद्धरेवो. पलभात् । यदि हि विशेषवसामान्यापि स्यात् तद्बुद्धिरप्युपलब्धैव स्यात्, न चैवम् । न १० घानुपलब्धस्यास्तित्वं व्योमकुसुमवत् । तदप्युक्तम्- "न तसाद्भिन्नमस्त्यन्यत्सामान्य बुद्धसभेदतः॥"[प्र०वा० २।१२६]इति । एतेन सादृश्यसामान्यमपि प्रत्युक्तम् । तस्यापि विशेपव्यतिरिक्तत्यानुपलम्भात् , विशे. पाणां चानन्ययात् । तन्न सामान्यविपयत्वमझज्ञानस्य यतो व्यवसायस्वभावत्वमिति । तवेदमुच्यते-प्रथमस्तावद्विकल्पोऽनुपपन्न एय; क्षणक्षीणस्य प्रत्यक्षस्यान्वयविषय. १५ त्याभावे "निर्विपयत्वप्रसङ्गात् । स्वरूपविषयत्वान्नेति चेत्, न तहीन्द्रियंप्रत्यक्षत्वम्, स्वरूपे सद्व्यापाराभावात् । क्षणिकरहिर्वस्तुविषयत्वात् तत्प्रत्यक्षत्वमिति चेत् । तस्य तद्विपयत्वं पुतोऽवसीयते ? “योग्यदेशस्थितेऽक्षाणाम्" इत्यादिकाद्विचारादिति चेत् ; स विचारः किन्नाम प्रमाणं भवेत् १ प्रत्यक्षमिति चेत् ; न ; तस्य निर्विकल्पत्वेन एवं विचारकत्यायोगात् । विधार- फस्यापि प्रत्यक्षत्वे तस्य समयत्रयगोचरत्वमुररीकर्तव्यम् , अन्यथा मध्यसमयपर्यवसितेन्द्रिय- च्यापायेपलब्धसत्ताकस्य कथमतिकान्तेऽनागते च प्रत्ययस्य प्रवृत्तिरिति ? अस्ये 'तव्यापारस्या- नुपपत्तेः । यदि हि तस्मत्यक्षं मध्यमसमयवत पूर्वापयवपि समयो पश्येत्तदा मध्ये इन्द्रियव्यापा- रस्य तत्प्रत्यक्षस्य प सद्भावं पूर्वापरयोश्च तद्भावं पश्येत् नान्यया । न हि भूतलमप्रतियत्प्र. त्यक्षं तत्र फस्यचिद् भावमभावं पा प्रत्येतुमर्हति । भवतु तस्य समयनयगोचरत्वमिति चेत् ; फथमुक्तम्-"म पूर्व परत्र न परं पूर्वत्र प्रत्यक्षम्" [प्र०यार्तिकाल० २६१२६] इति ? प्रस्तुत- २५ प्रत्यक्षवदपरस्यापि प्रत्यक्षस्य पूर्वापरसमयविपयतोपपत्तेस्तत्कृतस्य विशेषान्वयग्रहणस्याप्यनिवार. णात् । ततो निराकृतमेतत्-"व्यक्तीनां भावो न तासामन्वयः" [प्र. वार्तिकाल० २। १२६ ] इति । यदि पुनरिदमपि प्रत्यक्षं न पूर्वापरभणी पश्यति कथं "तबेन्द्रियव्यापारतद्- २० -जन्मनी मा., ५०,५०, स.१२ सत्यसनी । ३ कालान्तरन्यापित्वम् । । सामान्ययुद्धिरपि। ५ निर्विकल्पर प्र-भा०, २०,०।६ प्रन्या रव-भा., ५०, ५०, स| .प्रत्यक्षस्य । ८ भवेत्सत्यक्ष सन कस्यचि-मा०,०प० । ९ मध्यसमयव्यापापमप्र यक्षस्य । 1. प्र.यहम्य । परशगयोः ।
[१७ १० २४५ न्यायविनिश्चय विधरणे ध्यक्षयोरभारं पश्येत् ११ पश्यतु को दोष इति चेत् ; म; 'अपरमपि प्रत्या पूर्वापरक्षणापत्य- क्षयदेव तन्त्र कस्यचिदन्वयं पश्यतु न कश्चिदोपः' इत्यपि प्रसङ्गात् । ततो 'न पूर्व परत्र' इत्याद्यपि परस्य प्रयासमात्रमेव, तथापि कस्यचिनिष्टस्याऽभायात् । तन्नायं विचारः प्रत्यक्षम् । अनुमानमिति चेत्, न; लिङ्गाभावात् । इन्द्रियव्यापाराश्चितत्वमेव रिझम, नेन ५ तदध्यक्षस्य क्षणपर्यवसानसाधनादिति चेत् ; क पुनस्तस्य स्वसाध्याविनामावप्रतिपतिः। संहृत- सकलविकलावस्थायामिति चेत् ; न ; तस्या एवापरिज्ञानात् अनुपजातविकल्पकल्माया निरंश- भणक्षीणस्त्रपरविषयदर्शनप्रवन्धरूपा सेति चेत् ; नत्वियं श्रूयत एव भवनात्। न कदाचिदृप्यनु- भरपथमुपसर्पति अन्तर्वहिश्चान्वयिनो नानावयवसाधारणस्यव चेतनस्येतरस्य च मतिपत्तिदर्शनात् । तस्माद् दुरन्तसंसारदासदावाभोरुभिः । अष्टा कल्पितैवयं लोकविप्लवकारिणी ।। ४३४ ॥ तर्हि विपक्षे समयान्तरप्रवृत्तिलक्षणे आधकवलादविनाभावप्रतिपत्तिरिति चेत् ;न; विरोधाभावे वाधकानुत्पत्तेः । अस्तु क्षणमात्रपर्यवसितेन्द्रियव्यापारकृतं प्रत्यक्षं न च तन्मानपर्यवसितम्, किमत्र विरुद्धम् ? नियतातीतादिविषयत्वमेव । न यतीतादिविषयत्वसम्भवे प्रत्यक्षस्य नियन- तद्विषयत्वं शक्यमुपपादयितुम् ; तदन्यस्याप्यतीतादित्वाविशेषात् । एवञ्च सर्वः सर्वाकारदर्शी १५ स्यात् । न चैवम्, अतीते स्मरणस्य अनागळे च सम्भवानुमानस्य वैयोपत्तेः । अतो विरोध. घलोपनीतस्यातिप्रसङ्गस्यैव हेतुगधकस्य विपक्षे सम्भवात् कथं तदलेनाविनाभावप्रतिपतिर्न भवतीति चेत् ? न; वर्तमानविषयत्वेऽपि दोपात । तथा हि- महणं वर्तमानस्य प्रत्यक्षेणारगच्छतः । सर्वस्य वर्तमानस्य तेनैव महणं भवेत् ॥ ४३५ ॥ प्रत्यक्षान्तरमन्यर तथैवोपकल्पितम् । गृहीतप्रणाहोपात्परस्य स्मरणादिवत् ॥४३६॥ प्रत्यक्षं वर्तमानस्य यस्येवाकारसुद्धहेत् । तस्यैव महगं तेन न सर्वस्येवि चेन्मतम् ॥४३७॥ सर्वस्य वर्तमानत्वाविशेपारस्पेश्यातुवत् । तदेव नियतं करमादाफारोहनं भवेत् ।।४३८॥ 'यत्रैव योग्यमध्यक्षं तस्यैवाकारमुहहेत् । गृह्णाति च तदेव' इति प्रत्यवस्थान सम्भये १४३९॥ अतीतादिमहेऽप्येवं नियमः किन्न मन्यने । यत्प्रत्यक्षस्य तनादि सामन्य निवान्वितम् ॥४४०॥ .. - २० - यदेव मा०, २०, यस.! २ थघिदोष मा०, २०, ५०, स.11-निधमा-- ..,०, स०। ४ संलसकलविक-पावन ! ५ शान्तर । ६ क्षणमात्र । ७ तदाकावक-भा.,.,., स.12-मम्भवेत् मा ,य.. प.!
१७] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः 'सामध्यं ननु भावानां वेद्यते कार्यदर्शनात् । सामात्कार्यक्तृप्तिस्तु न युक्तान्योन्यसंश्रयात् ॥४४१॥ इत्यपि प्रत्यवस्थानं तमोबाहुल्यसम्भवम् । आकारनियमेऽप्येवं दोपवादानिपेधनात् ||४४२।। आकारनियमः सिद्धः प्रत्यक्षात् , 'स तु किंकृतः' । इत्यत्राध्यक्षसामर्थ्यस्योत्तरत्वेन वर्णनात् ॥४४३॥ नान्योन्याश्रयदोपश्चेत् ; गृहीतनियमेऽध्ययम् । समाधिः किन्न येन त्वं तंत्रवासि पराङ्मुखः ॥४४४॥ ५ अपि च- १० इन्द्रियस्याल्पकालत्वं तंदध्यक्षे भवेद्यदि । कारणस्याल्पदेशत्वं कार्य किन्नोपगच्छति ॥४४५॥ तथा सत्यल्पकाद्वहेर्ने महाधूमसम्भवः । वीजादप्यणुनो न स्यात् स्थूलनालाङ्कुरोदयः ।।४४६॥ प्रतीतियाधनानेवमिति चेदभिलप्यते । कालदेध्येऽपि संवित्तः प्रतीतिः किन्न विद्यते ॥४४७॥ देशव्याप्तिरणुत्वान्न भावस्येत्यपि दुर्वचः । अवयव्यादिसंसिद्धेर्यथास्थानं निरूपणात् ।।४४८।। न चापि देशव्यापित्वमत्रातीव प्रसक्तिमत् । योग्यतानियम मुक्त्वा नान्यदस्ति च कारणम् ।।४४१।। कालव्यामो च बोधस्य से समानस्ततः कथम् । अतिप्रसङ्गो येनास्या याधनं परिकल्प्यते ॥४५०१ तन्न पाधायलादप्यस्याविनाभावनिश्चयः । न चानिश्चिताविनाभावस्य गमरुत्वम् अतिप्रसङ्गात् । तदयममयोजको हेतु।असिद्धश्च; इन्द्रियव्यापारस्य क्षणमात्रनियमभावप्रतिपत्तेरुपायाभावात् अती- तस्य स्मरणेन भाविनश्च समयस्यानुमानेनावष्टम्भान तत्रेन्द्रियव्यापारः । न हि रमरणानुमान- व्यापार एवेन्द्रियव्यापारः तन्निबन्धनस्यापि विषयपरिच्छेदस्याध्यक्षत्वप्रसङ्गादिति चेत् ; न; २५ अध्यक्षयोग्ये अतीते भाविनि च स्मरणानुमानमवृत्तेरभावात् । स्मरणं हि नानासमयव्यवहित एवोपलब्धपूर्वे प्रवृत्तिमस् , न च तस्याधुनिक प्रत्यक्षविपयत्वम् । अनुमानस्य अनन्तरसमयगो- | परत्वमपि न प्रत्याविषयापेक्षम् अप्रत्यक्षविषय एव शब्दविद्युदायुत्तरपरिणामादो तदभ्युपगमास् । भानन्तर्याविशेपात्तत्परिणामस्यापि करमान्नेन्द्रियविषयत्वमिति चेत् ? न; योग्यतानियमेन विषय- २० उत्तवापि प-भा०,१०,१०। २ इन्द्रिययस्यो । ३ कालत्याप्ती मा०,०प०,स०। ४ योग्यतानियमः। ५ कालव्याप्तः । ६ प्रनिपतापाया-ता०, स. । ७ अनुमानाभ्युपमान् । ८ पादरियुदाद्युत्तरपरिणामस्यापि ।
. १४६ न्यायविनिश्चयविवरणे [१७ व्यवस्थाया निवेदितत्वात् । ततो नात्मानुपायादिन्द्रियच्यापारस्य क्षणनियमविपत्तिः । तव्या- पारजनितस्य प्रत्यक्षस्य क्षणनियमात् तळ्यापारस्यापि तन्नियमप्रतिपनिरिति चेत् । तत्मत्यनस्य फुतस्तनियमः ? संव्यापारस्य तनियमादिति चेत् ; न; परस्पराश्रयात्-इन्द्रियवृत्तेः क्षणनियतत्वे तत्प्रत्यक्षं क्षणनियतं स्यात् , तत्प्रत्यशक्षणनियतत्वादिन्द्रियवृत्तिः क्षणनियता स्यादिति । स्वत एपेन्द्रियवृतेस्तनियमः प्रतीयत इति चेत् । न, तद्वृत्तेरचेतनत्वात् । चेतनेव तद्वृत्तिः तद्वृत्ति- त्यात् स्वप्नोपलब्धतगृत्तिवदिति चेत् ; न ; तच्चेतनत्वस्य "चिप्लुताक्ष" "इत्यादी निराकर- णात् । तन्न कुतश्चिदपि तव्यापारस्य वलियमस्य सिद्धिः। सिद्धस्यापि न गमकाङ्गत्वं व्यभिचायत् । दृश्यते हि समयपर्यवसिवादपि वब्यापाराद् बलातक्षणध्वन्ययदर्शनम् अन्यथा चक्रान्तेरभावप्रसङ्गात् तस्यास्तदन्वयज्ञानरूपत्वात् , जानस्य चेन्द्रियजत्वात् । उपधातवशादस्पसमयादपि तव्यापाराचाज्ञानमविरद्धमिति चेत् । न ; स्तम्मक्षणेष्वपि तत एवान्वयज्ञानस्याविरोधप्रसङ्गात् । कुनस्तगोपघात इति चेत् ? अलातक्षणेषु कुतः १ तेषामेव शोमवृत्तितिरोहितभेदान्वयादिति चेत् ; न; स्तम्भक्षणानामपि शीघ्रगृत्तित्वा- विशेषात् , अन्यथा विलम्ब्य प्रतिपत्तिप्रसङ्गात् । उपधात जर मलातरमशानवत् तदन्वयज्ञा. नस्यापि विभ्रमः स्यादिति चेत् ; न, 'तथापि व्यभिचारस्यापरिहारात् । अपि च, यदि "तविभ्रमेण प्रयोजनं मा भूदुपधातनिरन्धनं तदन्वयज्ञानम् , अनुग्रहनिबन्धनं तु स्यास् , विपक्षणान्वयेन वस्तुभूतेनैव तदिन्द्रियस्यानुग्रहात् । विषयस्याकारणत्वात् कथं तदन्षयस्या- नुमाइकत्वमिति चेत् ; उपधातकत्वं कथम् ! सौगते मते विपयस्य" कारणत्वादिति चेत् । अनुप्राहकत्वमपि तत एयास्तु "तं प्रत्येव तदन्वयस्य वस्तुभावोपपादनात् , तद्वस्तुभावस्यापरि. स्सलिशातज्ज्ञानादेव प्रतिपत्तेः । न चैवम् अलातचक्राकारस्यापि वस्तुभावः; करण्यापारकृतशी. घ्रपरिवर्तनाभावेऽपि वाप्रविपत्तिप्रसङ्गात्, वस्तुप्रतिपत्ती तत्परिवर्तनस्याकिञ्चित्करत्वात् । तदेव तत्र सामप्रीति चेत् ; गतमिदानी विभ्रमवार्तया, काचाइरपि रजनीकर व्यापारप्रतिपत्ती सामभीरूपत्वोपपत्तेः","तळ्याकारस्यापि वस्तुत्वासनात् । बाधकप्रत्ययोपनिपातस्य चाकारेऽपि भावात् । तन्नापरिस्मलितप्ररायवेद्यत्वं "तदाकारस्य यतो वस्तुभावः स्यात् । स्तम्भाधन्वयज्ञान- मपि परिस्सलितमय "मनोविफस्पत्यात् मरीचिकातोयविकल्पयत् । क्षणक्षीणानि हि स्तम्भस्थल- क्षणानि प्रत्यक्षतो वेद्यन्ते, तदनन्तरकालभावी तुमनोविकल्पः तदन्वयमविद्यमानमेवोपदर्शयतीति चेत् । न तस्येन्द्रियन्यापारान्वयव्यतिरेकानुविधायिनो मनोविकल्पत्यानुपपरे: अलातयायि. भ्रमस्यापि तद्विकल्पत्वप्रसङ्गात् । तथा च व्याहतमेतत्-- ५ .. इन्द्रियव्यापार । २ क्षणनियमप्रतिपछि । ३६न्द्रियव्यापारस्य | ४ तदात्त वा-भा,१०,००। ५ न्यायवि०सो ४८ । ६ इन्द्रियव्यापारात । सनविरो-ला...स-1८-जन्तलात-आ-,३०,प, सा९ तदापि भा०,००1. अवज्ञानस्य सत्यचेन 1 स्याहार-To,., एस) र सौगतम् । १३ -मपरिवर्तनभा-भाप०,०स०11४-करमापार-NIR.स. !षयापार-१०१५-स्पकापते प.१६चन्द्रद्रयाकार । १७ लातवधाकारस्या ८ मनोविकलवात् आ०,५०,"परस्पररि विषाणुप्रयम. प्रविमासनम् । विकल्पकातु विजयनाद पराकारावमासिता ॥"-यातिकाल- २१२९ । मनोविकन्याद ।।
१४७ १२८ प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव "शीघ्रवृत्तरलातादेरन्वयप्रतियातिनी । चक्रभ्रान्ति गायत्ते न दशां घेटनेन सा ॥"[प्र०वा० २।१४०] इति । स्पष्टप्रतिभासत्वात् न चक्रसंवेदनस्य मनोविकल्पत्वम् । न हि तद्विकल्पाः स्पष्टावभासिनो भवन्ति । "ने विकल्पानुविद्धस्य स्पष्टार्थप्रतिभासिता।" [प्र० वा० २/२८३ ] इति वचनादिति चेत् ; न; स्तम्भाद्यन्वयज्ञानेऽपि स्पष्टप्रतिभासाविशेषात् । दर्शनसान्निध्यकृतः तत्रं तत्प्रतिभास इति चेत् ; न; चकसंवेदनेऽपि तत एव तदापत्तेः । तन्न तदन्वयज्ञानस्य मनोविकल्पत्वम् । 'ननु इन्द्रियव्यापारस्य अनुग्रहवशादन्वयज्ञानहेतुल्वे प्रथमतव्यापारादेव तदुत्पत्तेः अपरापरतद्व्यापारेण किं कर्त्तव्यम् ? परापरं तज्ज्ञानमेवेति चेत् ; न तस्यैव प्रयोजनानवधार- णात् । अन्वयमहणस्य प्रथमज्ञानादेव भावात्।' इत्यपिअलातचक्रज्ञाने समानः पर्यनुयोग:-प्रथमे- १० न्द्रियव्यापारादेवोपघातवशात् तज्ज्ञानोत्पत्तेरपरापरतद्वापारस्य तत्कृतस्य चापराएरशानस्य वैयर्थ्या- विशेषात् । अपरापरजानेनैव चक्राकारपतिपत्तौ अन्ययप्रतिपत्तिरपि तथैवास्तु । तथा च व्याहतमेतत्- "तथा सति परापरदर्शनानां विच्छेदात् एकेनापि न तत्कालान्तरस्थानग्रहः"[ ]इति । तन्नक्षणपर्यवसितस्येन्द्रियव्यापारस्य गमकाङ्गत्वं व्यभिचारात् । ततो नानुमानत्वमपि विचारस्य । अवस्तुसंस्पर्शी विकल्प एवार्य कश्चिन्न प्रमाणमिति चेत् ; कैथमतः प्रत्यक्षस्य क्षणनियमप्रति- १५ पत्तिः ? तद्विपर्ययप्रतिपत्तेरपि तत एव प्रसङ्गात् । तादृशाद् विकल्पात्पराभिमतसिद्धिं निवारयन तव एव स्वाभिमतमवस्थापयतीति किमतः परं परस्य साहसमुद्भावयामः । तथा च वक्ष्यति-- "सर्वथा वितथार्थत्वं सर्वेषामभिलापिनाम् । ततो वेद्यव्यवस्थानं प्रत्यक्षस्येति साहसम् ॥" न्यायवि०० १५६] इति । तन्न विचारवलाप्रत्यक्षस्य क्षणविपयत्वावगमः । स्वत एवेति चेत; न ; तथैवासम्प्र- विपत्तेः । एतदेवाह- आत्मनाऽनेकरूपेण पहिरर्थस्य तादृशः। विचित्रं ग्रहणं व्यक्तं विशेषणविशेप्यभाक् ।।८।। इति । 'चक्षुरादिधियाम्' इत्यनुवर्तते । तदयमर्थः-पक्षुरादिज्ञानानाम् आत्मना स्वभावेन पहिरर्थस्य स्तम्भादेद् ग्रहणं संवेदनं तद् व्यक्तम् उपहसनपरमेतद् अव्यक्ते व्यकोपादा- २५ नात् अन्यत्तमित्यर्थः । कीदृशेन तेन कीशस्य तस्य महणं व्यक्तमिति चेत् ? अनेकरूपेण ! न विद्यते एकमन्वितं रूपं यस्य तेन क्षणिकनेति यावत् । ताहशः अनेकरूपस्य क्षणिक- स्येति यावत् । २० । घटनेन भा०, २०, ५०,०। २ "म विकायानुपद्धस्य"-4. पातिगल | "न विकल्पानु- बदस्यास्ति रपटाविभासिता ॥"-० पा• म.३ सम्भाधन्वयशाने । ४ पथ्यतिमासः1५दर्शनसान्निध्यादेव । इसम्ययमानमेव । क्रयातस्य-आ., प. प.10-न् स्तुत भा०, २०, ५०, स.।
५ , - न्यायविनिश्चयविवरणे [११८ अध्यक्षादाक्षणक्षीणांत् क्षणिकस्यैव वेदनम् । तदव्यक्तं समाचष्टे सूरिनिविवर्जनात् ॥४५१॥ विचारस्य प्रमाणत्वं तत्र पूर्व निवारितम् । शास्त्रकारस्तदेवाह, विशेषणविशेष्यभार ॥४५२॥ इति । विशेषणं चक्षुरादिव्यापारस्य क्षणनियम एव विशिष्टज्ञानहेतुत्यात् , तच्च विशेष्यं चे तकृतं प्रत्यक्षस्य क्षणविषयत्वम् , ते स्वविषयत्वेन भजत इति विशेषणविशेष्यभाक् । विचाररूपं तदपि व्यक्तम् , अत्राप्युपहसनं तस्याप्रमाणत्वेन निरूपणात् , अप्रमाणोपाश्रयणेन कस्यचिदप्यसिद्धेरिवि भावः । स्वसंवेदनमेव तर्हि तंत्र प्रमाणमिति चेत् ; अत्राह-विचित्रम्' इति । चिदिति चिच्छतिरनुभव इत्यर्थः, सैव त्राणं वा परिरक्षणं यस्य तचित्रम् , तद्विपरीवे १० विचित्रं-क्षणक्षयविषयत्वं प्रत्यक्षस्य । अनुभवप्रसिद्धं खल्यनुभवपरिरक्षितं भवति । म चेदं तत्प्रसिद्धम् । न हि प्रत्यक्षं किञ्चिदपि क्षणविषयत्वेनात्मानमावेदयदुपलभ्यते । न चानु. पलब्धस्य कल्पनम् अतिप्रसद्गात् । तन्न क्षणविपर्य प्रत्यक्षम् । न च तस्य निर्विपयस्य सम्भव ईत्यसम्भवे असम्भव्येव प्रथमो विकल्पः । 'द्वितीयस्तु निरुपद्रव इति तमुपाश्रित्य प्रत्यक्षस्य सामान्यविषयत्वनिवेदनेन व्यव. १५' सायात्मकत्वं व्यवस्थापयन्नाह-'आत्मना' इत्यादि । आत्मना चक्षुरादियोधस्वभावेन प्रदणं साक्षात्करण बहिरर्थस्य घटादे व्यक्तं सर्वजनप्रसिद्धमिति । अनेन- अशक्यप्रतिषेधत्वं बहिरथस्य दर्शयन् । विज्ञानमात्रवादादेवक्ति स्वेच्छानिवद्धताम् ॥४५३।। कथं पुनर्वहिरर्थस्य महणम् ? कभच न स्यात् ? एकरूपत्वे वदयोगात्। यद्यकमन्तर्भाव- २० ग्रहणप्रवृत्तमेव प्रत्यक्षस्य रूपम् ; फवं तेन बहिर्भावस्य ग्रहणम् , बहिर्भावस्याप्यन्तर्भावत्व- । प्रसङ्गात् ? न हि अन्तर्भावप्रहकरूपेण गृह्यमाणस्य पहिर्भावत्वम् ; अन्तर्भावस्यापि तद्भावा- भावप्रसङ्गात् । पहिमायग्रहणप्रवृत्तमेव तर्हि तस्य रूपमिति चेत् ; न; अन्तर्भावस्थाननुभव. प्रसङ्गात् । न चानुमवानाघातस्य यहि गोचरत्यम्, 'परोक्ष' इत्यादिना" निगकरणात् । तत्कथं बहिर्भावग्रहणं सुप्रसिद्धम् , असम्भवदर्थस्य सुप्रसिद्धत्वायोगादिति चेत् ? अगह- २५ अनेकरूपेण' इति । अनेकम् आत्मनि" व्याप्तमन्यत् अन्यशाथै रूपं यस्य ता अनेक- भनेकरूपं प्रत्यक्षमात्मार्थग्रहणक्षमम् । एकस्वभावपक्षोक्तदोषेणालिप्यते कथम् ? ॥४५४।। रूपम् , तेनेति । विशोपेश दि-आ०,३०, १०, १३ चैतकतम् मा०, २०, ५०, स. १३ तत्प्रमा-मा..." प.स. परीक्षितं आ०, २०, ५०। ५ प्रत्यश्चत्पा ६ प्रायशस्याऽसम्भवे। ७ 'दिशेपात्मकता सामान्यस्वरूप प्रतिक्षणभेदिनः चतुरादिप्रत्यक्षस्य वेद्यम्' इत्याकारकः । द्रष्टव्यम्-पृ. १४३ . " ८ 'कालान्तरण्यापिनो का इत्याकारकः। ९ मन्तर्भावाभाव 1 1. प्रत्यक्षस्य न्यायवि. हो."। आत्मनि व्यावृत्तम् भा०,०, ५०1क्षात्मयातम् स.।
५ .. ११८] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव: १४२ वेद्यमेकस्वभावेन रूपं तच्चेदनेककम् । तस्य नानास्वभावत्वमेवं सति सुदुर्घटम् ।।४५५।। एकरुपमहाविष्टस्वभावस्यैव तत्परम् । विपयीभावमापन्नं कथं तस्मात्पृथक् भवेत् ? ॥४५६॥ वेद्यं नानास्वभावेन तच्चेत्स्यादनवस्थितिः । तस्यापि नानारूपेण परेणैव प्रवेदनात् ॥४५७॥ इति चेत् ; अत्र प्रतिविधानम्- अनेकरूपज्ञानं हि नान्यत्प्रत्यक्षवेदनात् । किं तनानेकरूपस्य परस्य परिकल्पनम् ॥४५८॥ अनवस्थानदी:स्थित्यं यत्सामर्थ्यादुपस्थितम् । यहिरर्थपरिज्ञानं निरुणद्धि प्रसिद्धिमत् ॥४५९।। न हि प्रत्यक्षवेदनादन्यदेव अनेकरूपवेदनम् । तच्च तच्छक्तिरूपादुपपन्नमेव,ततः किं तत्रापरानेकरूपपरिकल्पनेन ? यतोऽयमनवस्थानदोपो बहिरर्थपरिच्छेदनसिद्धिविध्वंसकारी निरा. वाधवृत्तिः प्रवत्तेत । तर्हि प्रत्यक्षीदव्यतिरिक्तमेवानेकरूपं तत्परिज्ञानविषयत्वात् तद्रूपवत् , चान्येन रूपेणार्थवेदनम् अन्येन च स्ववेदनमिति स्वराद्धान्तो विरुध्यत इति चेत् ; न; सर्वथा १५ तदव्यतिरेकस्याशक्यसाधनत्वात् । सर्वथा हि प्रत्यक्षादनेकरूपस्याव्यतिरेके तदेव प्रत्यक्ष निर्मा- गमवशिष्येत । न च निर्भाग प्रत्यक्षमन्यद्वा वस्तु किञ्चित्सम्भवति निरवद्यप्रमाणसंवेद्यत्वामा. वाविति करिष्यत एवान प्रवन्धः । कथञ्चिव्यतिरेकसाधनं तु सिद्धसाधनमेव, "रूपतद्वतर- त्यन्तव्यतिरेकस्यानभ्युपगमात् । नन्वेवमपि येनात्मना प्रत्यक्षात्तव्यतिरिकं तेन तत्परिज्ञान- गेव तस्यापि परिज्ञानमस्तु, येन तु "तद् व्यतिरिक्तं तेनान्यदेव "तद्वेदनाद् अनेकरूपवेदनमिति २० सन्निवन्धनमन्यदेव शतिरूप परिकल्पयितव्यम् , तद्रूपवेदनमप्यन्यस्मादेव शकिस्पादिति तदव- स्थमनवस्थानमिति चेत् ; अन्यदेव तद्वेदनमिति कुतः ? तथैवानुभवादिति चेत् ; न;"रूपतद्ध. द्विपयस्य वेदनद्वयस्याननुभवात् । अनुभवे वा कथमनवस्थानं तस्यानुभं वप्रतिकूलत्यात्, तदिद- मन्योन्यव्याहतम्-'अनुभवञ्चानवस्थानं च' इति । यदि भिन्नं 'सद्वदनं नास्ति; कथं ततः प्रत्य- क्षस्य वेदनम् । अवेदनविपयस्य शक्तिरूपस्य तद्वेदनानङ्गत्वात् , अन्यथा प्रत्यक्षस्याप्यविदितस्यैव २५ अर्थवेदननिबन्धनत्वापत्तेरिति चेत् ; कस्तस्यावेदनमाह ? प्रत्यक्षतादात्म्येन तद्वदनस्याभिहित- तथा .. प्रत्यक्षस्य । २ प्रत्यवस्य भनेकरूपम् । ३ -दुपनतमेव ता. ५ -कादिनिरा-भा०, व., प., स.।५-क्षादिव्य-आ०, 4०, ५०, स० १ ६ विरुभ्यत आ०, २०, ५०,०७ स्वभावतद्वतोः । ८ तत् भनेकरूपम् । ९ प्रत्यक्षपरिज्ञानमेव। . अनेकरूपस्यापि । १ अनेछापम् । १२ प्रत्यक्षवेदनात् । ११. रूपं कल्प-मा०, पा, प., स. १४ रूपतदि-आ०, प०,५०, I स्वभावतद्वद्रोचरस्य । ५-चप- रिकू-सा भनेकरूपवेदनम् ।
न्यायचिनिश्चयविवरणे [१८ अभ्यसाधमणोणात् क्षणिकस्यैव वेदनम् । तव्यक्तं समाचष्टे सूरिनिविपर्जनात् ॥४५१॥ विचारस्य प्रमाणत्वं तत्र पूर्व निवारितम् । शास्त्रकारस्तदेवाह, विशेषणविशेप्यभार ॥४५२॥ इति । विशेषणं चक्षुरादिव्यापारस्य क्षणनियम एव विशिष्टज्ञानहेतुत्वात् , तच्च विशेष्यं चे तस्कृतं प्रत्यक्षस्य क्षणविषयत्वम् , ते स्वविषयत्येन भजव इति विशेषणविशेष्यभार । विचाररूपं तदपि व्यक्तम् , अनाप्युपहसन तस्याप्रमाणवेग निरूपणात् , अप्रमाणोपाश्रयणेन कस्यचिदप्यसिद्धरिति भारः 1 स्वसंवेदनमेव वर्हि तंत्र प्रमाणमिति चेत् , अनाह-विचित्रम्' इति । चिदिति चिच्छतिरनुभव इत्यर्थः, सैव जाणं वा परिरक्षणं यस्य तभित्रम् , तद्विपरीत १० विचित्रं-क्षणश्यविपयत्वं प्रत्यक्षस्य । अनुभवप्रसिद्धं सल्वनुभवपरिरक्षितं भवति । न चेदं तत्प्रसिद्धम् । न हि प्रसन्न किचिदपि क्षणविषयत्वेनात्मानमादयदुपलभ्यते । न चानु- पलब्धस्य कल्पनम् अतिप्रसङ्गात् । तत क्षणविषयं प्रत्यक्षम् । न च तस्ये निर्विपयस्य मम्मर ईत्यसम्भवे असम्भव्येव प्रथमो विकल्पः । 'द्वितीयस्तु निरुपद्रप इति तमुपाश्रित्य प्रत्यक्षस्य सामान्यविषयत्वनिवेदनेन व्यव १५ सायात्मकत्व व्यवस्थापयताह-'आत्मना' इत्यादि । आत्मना चक्षुरादियोधस्वभावेन ग्रहणं साक्षात्करणं वहिरर्थस्य घटादेः व्यक्तं सर्वजनप्रसिद्धमिति । अनेन- अशक्यप्रतिषेधत्वं वहिरर्थस्य दर्शयन् । विज्ञानमानयादादेक्ति स्वेच्छानिवद्धताम् ॥४५३॥ कथं पुनर्गहिरर्थस्य महणम् ? कथचन स्यात् १ एकरूपत्वे तदयोगात्। यद्यकमन्तर्भाव. २० ग्रहणप्रवृत्तमेव प्रत्यक्षस्य रूपम् , क्थं तेन पहिर्भावस्य ग्रहणम् , बहिर्भावस्याप्यन्तभावत्व न हि अन्तर्भावमहणेकरूपेण गृहामाणस्य बहिर्भावत्वम् , अन्तर्भावस्यापि तद्भावा- भायप्रसङ्गात् । बहिर्भावग्रहणप्रवृत्तमेव तहिं तस्य रूपमिति चेत् , न, अन्तर्भावस्याननुभव प्रसङ्गात् । न चानुभवानाचातस्य वहिर्भावगोचरत्वम्, 'परोक्ष' इत्यादिना" तन्निराकरणात् । तत्कथं बहिर्भावग्रहणं सुप्रसिद्धम् , असम्भवदर्थस्य सुप्रसिद्धत्यायोगादिति चेत् ? अाह- 'अनेकरूपेण' इति । अनेकम् आत्मनि व्याप्टवमन्यन् अन्यज्ञार्थे रूप यस्य तत अनेक रूपम्, अनेकरूपं प्रत्यक्षमात्मार्थप्रणामम् । एकस्वभावपक्षोक्तदोपेणालिप्यते कथम् ? ॥४५४॥ - २५ देनेति । विशेषेण वि-आ०, ५.,५०,०।२ चैतहतम् भा०, २०,१०, स.। तत्प्रया-मा.. प.स.।४ परीक्षित प्रा०,१०,५०। ५प्रत्यक्षस्य। ६ मत्यशश्याऽसम्भवे। "विशेषात्मकतव सामान्यस्वरूप प्रतिक्षणमेदिन चतुरादिप्रत्यक्षस्य वेद्यम्' इत्याकारक । दव्यम्-० १४२ ६.७ ८ कालान्तरध्यापिनो वा' इत्याकारक । ९ अन्तर्भावाभाव । १. प्रत्यक्षस्य । न्यायविक की। १२ भा.मति व्यायत्तम् भा.,.,प० । आत्मव्यामृतम् स० ।
५ १1८] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव १४२ वेद्यमेकस्वभावेन रूपं तच्चेदनेकफम् । तस्य नानास्वभावत्वमेवं सति सुदुर्घटम् ॥४५५।। एकरूपग्रहाविष्टस्वभावस्यैव तत्परम् । विपयीभावमापन्नं कथं तस्मात्पृथक् भवेत् ? ॥४५६॥ वेद्यं नानास्वभावेन तच्चत्स्यादनवस्थितिः । तस्यापि नानारूपेण परेणैव प्रवेदनात् ॥४५७॥ इति चेत् ; अन्न प्रतिविधानम्- अनेकरूपज्ञानं हि नान्यत्प्रत्यक्षवेदनात् । किं तत्रानेकरूपस्य परस्य परिकल्पनम् ॥४५८।। अनवस्थानदो स्थित्यं यत्सामर्थ्यादुपस्थितम् । बहिरर्थपरिज्ञानं निरुणद्धि प्रसिद्धिमत् ॥४५९।। न हि प्रत्यक्षवेदनादन्यदेव अनेकरूपवेदनम् । तच्च तन्छक्तिरूपादुपपन्नमेव,ततः किं तत्रापरानेकरूपपरिकल्पनेन ? यतोऽयमनवस्थानदोपो यहिरर्थपरिच्छेदप्रसिद्धिविध्वंसकारी निरा. वाधवृत्तिः प्रवर्तेत । तर्हि प्रत्यक्षीदव्यतिरिक्तमेवानेकरूपं तत्परिज्ञानविपयत्वात् तद्रूपवत् , तथा चान्येन रूपेणार्थवेदनम् अन्येन च स्ववेदनमिति स्वराद्धान्तो विरुध्यत इति चेत् ; न; सर्वथा १५ तव्यतिरेकस्याशक्यसाधनत्वात् । सर्वथा हि प्रत्यक्षादनेकरूपस्याव्यतिरेके तदेव प्रत्यक्षं निर्भा. गमवशिष्येत । न च निर्भागं प्रत्यक्षमन्यद्वा वस्तु किञ्चित्सम्भवति निरवद्याप्रमाणसंवेद्यत्वाभा- वादिति करिष्यत एवात्र प्रवन्धः । कथञ्चिव्यतिरेकसाधनं तु सिद्धसाधनमेव, “रूपतद्वत्तर- त्यन्तव्यतिरेकस्यानभ्युपगमात् । नन्वेवमपि येनात्मना प्रत्यक्षात्तव्यतिरिक्त तेन तत्परिक्षान- मेव. "तस्यापि परिज्ञानमातु, येन तु "तद् व्यतिरिक्त नान्यदेव "तद्वेदनाद अनेकरूपवेदन मिति २० तन्निबन्धनमन्यदेव शक्तिरूपं परिकल्पयितव्यम् , तद्रूपवेदनमप्यन्यस्मादेव शक्तिरूपादिति तदवा स्थमनवस्थानमिति चेत् ; अन्यदेव तद्वेदनमिति कुतः १ तथैवानुभवादिति चेत् ; न; "रूपतद्व- द्विपयस्य वेदनद्वयस्याननुभवात् । अनुभवे वा कथमनवस्थानं तस्यानुभवप्रतिकूलत्वात्, दिद- मन्योन्यन्याहतम्-'अनुभवश्वानवस्थानं च' इति । यदि भिन्नं तद्वदनं नास्ति; कथं ततः प्रत्य- क्षस वेदनम् ? अवेदनविषयस्य शक्तिरूपस्य तद्वेदनानङ्गत्वात् , अन्यथा प्रत्यक्षस्याप्यविदितस्यैव २५ अर्थवेदननियन्धनत्वापत्तेरिति चेत; करतस्यावेदनमाह ? प्रत्यक्षतादाम्येन तवेदनस्याभिहित- . प्रत्यक्षस्य । २ प्रत्यक्षस्य भनेकरूपम् । ३ -दुपनतमेव वा०। ४-कादिनिरा-मा०, प., प., स. १५-शादिश्य-मा०, २०, ५०, स! ६ विरुध्यत मा०, २०, ५०, स० । • स्वभावतहतोः । तत् भनेकरूपम् । ९ प्रत्यक्षपरिज्ञानमेव । १० अनेररूपस्यापि । " भनेकरूपम् । १२ प्रत्यक्षवेदनात् । ३रूपं करूप-आ०, २०,९०, स०१४ रूपतदि-आ०, २०, ५०, स.। स्वमावतगौचरस्य । १५-व- रिक्-सा ।। भनेकरूपवेदनम् ।
१५३ न्यायविनिश्चय विवरणे [१४ समुशयप्रयोजननिवन्धनानमिति चेत् ; नतत्रापि 'अपि च' इत्यादेः प्रसङ्गस्यानिवर्तनात् चक्र. कापत्तेः अनवस्थोपनिपाताच्च । तंत्र विकल्पात विचारोहेसानां सम्भवति समुञ्चयः । सन्ता- मात् सम्भवतीति चेत् ; न तन्नापि विकल्पबदोषान् । अपि प, समुच्चयः कथं तस्मात्सन्तानश्चेदवस्तुरान् । तत एवान्यथा प्राप्तमन्यदप्यर्थवेदनम् ॥४६५॥ तत्पूर्वत्वात्युमर्थस्य व्युत्पाद्यः स्यात् स एव वः । निष्प्रयोजनमेवावः सम्यग्ज्ञानविचारणम् ।।४६६॥ तस्य वरतुत्वमारोपादित्यप्यतेन चिन्तितम् । किनारोपेण वस्तुत्यमवस्तुत्यान्न भिद्यते ॥४६७॥ अन्यथा माणकोऽप्यग्निरध्यारोपेण कल्पितः। सुप्रसिद्धाग्निवत्कुर्यात् किन्न पाकप्रयोजनम् ? ॥४६८ वस्तुसन्नपि सन्तानो, भियते चेत्प्रतिक्षणम् । विचारोल्लेसमागोक्रेप दोपैन मुच्यते ॥४६९॥ न चेद्भिद्येत; भिद्यत क्षणभनिजगत्कथा । अधित्त्वादन्वितोऽप्येपः समुञ्चयकरः ऋथम् ?॥४७॥ "चित्त्वेऽप्येकस्वभावत्वे सन्तानान्न समुच्चयः । तस्मिन्नय चायं चेति व्यापारस्याप्यसम्भवात् ॥४७॥ 'चित्पर्ययस्वभावत्ये मतान्तरगतिर्भवेत् । तन्न सन्तानतो युक्तं सर्वशब्दार्थकल्पनम् ॥४७२॥ अनेनेव पथाऽऽत्मापि योगोतः प्रतिवर्णितः। तस्याप्यचेतनत्वेनानधिकापसमुच्चये ॥४७३॥ चेतनेन स्वनिष्ठेन समुच्चेता स चेन्मयः । प्रत्युल्लेसगतं तद्रा यāकोल्लेपगोचरम् १ ॥४७४|| एकोल्लेखगतेनासी चेतनेन कथं पुमान । अन्योल्लेखानविनातान समुच्चयपथं नयेत् ? ॥४७५|| अतिप्रसङ्गदुष्टोऽयमविज्ञातसमुच्चयः । एवं हि चेतनं न स्यादेकोलेखेन सार्थकम् ॥४७६॥ प्रत्युःखगतत्वे तु तस्यापि क्रमभाविनः । उल्लेसा बहवलेपामपि क्षणविनाशिनाम् ॥४७७॥ १५ २५ , स्यादिव-आर, य०, ५०,०।२ तनिधिक-स. ३ एवात. -आर, 40, प.स. ५ सन्तानस्य । ५-ते चित्प्र-आo.०, य., स.१६ कयास भाग ३०, सचिरोऽभ्य-HIT, ५०,०। ८ चित्पांय-मा०,०, २०, स.।
२८] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव: १५३ न तत्समुच्चयाङ्गत्वं प्रत्येकं प्राच्यदूषणात् । नापि सम्भूय; सम्भूतेः क्रमाविष्वसम्भवात् ॥४७८॥ समुच्चितास्तदनं चेत्,कः समुच्चयकुत् ? पुमान् । न; अनेनैव पथेत्यादेर्दोषयात्राभियोगतः ॥४७९।। सचक्रफानवस्थानदूषणस्यानिवारणात् । तस्मान क्षणिकोल्लेखैः सर्वैरपि समुच्चयः ॥४८०॥ कश्चिन्नित्यरूपैस्तैः समुच्चेता पुमान्यदि । तन्नित्यत्वे पुमानन्यो निष्फलः परिकल्प्यते ।।५८१॥ स्मृतिप्रत्यवमर्शादेरात्मकार्यस्य सर्वथा । तत्रैवान्वितविज्ञाने सर्वस्यापि समाप्तिः ॥४८२।। सूरिणी स्वयमेवेदं यथास्थानं वदिष्यते । तन्नात्मापि स्वनिप्ठेन चेतनेन समुच्चयी ॥४८३॥ आत्मा चेतनप्तम्बन्धाच्चेतनश्चेदुपाधिजम् । तच्चैतन्यम्, कथं तेन चेतनस्तत्त्वतः पुमान् ? ॥४८४॥ अतत्त्वे[5]चेतनश्चासो चेतनार्थक्षमः कथम् ? । मणेरुपाधितो रक्तान हि रक्तप्रयोजनम् ॥४८५॥ अन्यथा तादृशेनैव सन्तानेन समुच्चयात् । आत्मकल्पनययय॑मनिवार्य प्रसज्यते ॥४८६॥ तस्मादयेतनोऽतत्त्वचेतनो वा नरोऽधमः । न क्षमश्चेतनार्थाय सन्तानवदयुक्तितः ॥४८७॥ साम्बन्धिकस्य चिर्वस्य तास्यिकत्वेऽपि तद्यदि । नरादर्थान्तरम् । तेन नरः स्याच्चेतनः कथम् ? ॥४८८॥ आकाशस्यापि तेनैव चेतनत्यानुपञ्जनात् । पुंस्येव तस्य सम्बन्धान्नेति चेत्; असदुसरम् ॥४८९।। साम्यन्धिकं पुनश्चित्तमेवं सत्यन्यदागतम् । तेनाप्यर्थान्तरेणात्मा चिच्येत् ; व्योम न किं तथा ॥४९०॥ पुनः साम्बन्धि चिस्वमात्मन्येवेवि फल्पने । प्राच्यदोषानुवृत्तिः "स्यादनवस्थानवेशसम् ।।४९१॥ नगदव्यतिरिक्त चेच्चित्त्वमीपाधिकं तदा । २० -भावौष्टसं-भा०, २०, ५०, स. २ -रूपस्तैः भा., प., स.। उस्लेसानां नित्यने । ५-यान्वयमेवेदं माया, प०, स-1 आत्मये-आ०, य.,प.-तनं चे-मा०,०, प०, स • तत्वभूतेनेव । चित्तस्य भा०, २०, ५.स.1 ९ कथा भा, २०, ५०, स... मनैवेति भा०, २.प.स.11-त्तिः स्वा-मा०,१०,५०, स -२ तथा भा०, य०, ५.1 .. न्यायविनिश्चयवियरणे [२८ अनित्यत्यं नरस्यापि दुरं चित्त्ववद्भवेत् ॥४९२॥ निरन्ययस्यानित्यस्य न चात्मत्वं सयुक्तिकम् । स्मृतिप्रत्ययमादिकायें तस्याश्रमत्तः ॥४९३|| नित्यानित्यस्वभावत्वं यदि तस्योपवयेते । स्याद्वादानुप्रवेशोऽयं महान् दोपस्तयापतेत् ॥४९४॥ तन्न पुंसश्चिदात्मत्वं कथश्चिदपि युज्यते । विचारोडेखभागानां समुच्येता यतो भवेत् ॥४९५|| तन्न विचारोलेसाना कुतश्चिदपि सम्भवति समुच्चयो यतः सर्वेषां विचारत्वमुपपद्यते । तन्न प्रथमो विकल्प उपपत्तिमान् । भवतु वहि द्वितीय एवं विक्ल्पः अन्वितज्ञानाधिष्ठानानामुयानां विचारत्वोपगमा• दिति चेत सिद्धं तर्हि विचारस्य प्रमानेकान्तरूपत्वमिति निरवयं तस्य निदर्शनत्वम् । ननु संशयादिदोपादनेकान्तः कथं तदात्मनि परमार्थ इति चेत् ? क्थं विचारे ? तत्रापि मा भूदिति चेत् ; नारत्येव तर्हि विचारः। तथा चेत् ; न संशयाधु-द्भावनं तस्य विचारनिनन्धनत्यात् । अथ तत्र संशयादिरेव नास्ति निरयद्यप्रतीतिविषयत्वादिति ; समानमेतत, तदात्मन्यपि, रादने. कान्तस्यापि स्वतोऽनन्तरानुमानाच निरवद्यादेव प्रतीतः । ततो विचारवदक्षज्ञानात्मनि उपपन्नमने- कान्तात्मकत्यम् । एतदेवाह-अनेकरूपेण । अनेकश्वासी क्रमभौविनानोहेसत्वान् रूपश्चासौ निरूपणत्वात् इत्यनेकरूपः, तेन दृष्टान्तेन य: सिद्धः मानेकरूपश्चक्षुरादिज्ञानात्मा तेनेति । नन्वेक एव 'अनेकरूपेण' इति शब्दः, तेन यदि साध्यमभिधीयते निदर्शनमनभिधानं प्राप्तम् , तदभिधाने साध्यमवचनमेवापन्नम्, एकेन युगपदनेकार्थनिवेदनायोगादिवि चेत् ; २० आवृत्त्या साध्यवचनादेव निदर्शनस्यापि प्रतिपत्तेः। भवत्येवम् अर्थज्ञानस्य अममवत् प्रमेणाप्यनेकरूपत्वं न्यायोपपन्नत्वात् , न पुनर्यहिरर्थस्य तस्य निरंशत्वात् क्षणक्षीणत्वान्येति पेस; अनाह-ताशः। याहा अक्षज्ञानात्मा सम्भवमाभ्यामनेकरूपः तादृशः तरसरशस्य पहिरर्थस्य ग्रहणं तस्यापि संम्भवक्रमाभ्यामनेकरूपत्ये न्यायसद्भावात् , युगपनानाशवयात्म- विज्ञानवत् नानानीलाद्याकारस्य बहिर्भावस्य प्रत्यक्षेणेव वेदनात् । प्रत्यक्षस्य च क्रमानेकरूपत्ये- "ऽवस्थिते अवस्थित्तमेव अहिरर्थस्यापि ताप्यम्, तस्यैव तद्हणोपायत्वात । न हि निरवणे तद्ब्रहणोपाये तदनवस्थानमुपपन्नम् । यत्पुनरेतत्-अर्थज्ञानस्योपपश्नमेव विचित्रकरूपत्यम् अशक्यविवेचनत्वात् न बहिरर्थस्य तदभायादिति, तदास्ताम्, उत्तरत्र विचारात् । तस्मादयस्थितम्-अन्तहिश्च तद्भवसामान्यविषय. त्वमक्षनानाय । विशेषत्र्यतिरिक्तस्य तु सामान्यस्य निराकरणमभिप्रेतमेवेति न प्रत्यवस्थीयते । न 1-सनारकुत-आ०, २०,५०,०1३ -भाविनोल्ले-आ०, २०, R.स. १-नम भषा- भा०, २०, ५०, स.। ४ संभवाममा-भा०, २०, ५०, स. कमयागपछा-याम्। ५-वस्थापिलेश-मा घर, १०, स.। "वित्रामासापि युधिरेकव वाचचित्रविलक्षणत्वात् शक्यविवेचन चित्रमनेकम् , अशक्यनि- घनाश्च युद्धनीलाश्य ।"-प्र. धार्तिकाल २२२२.1 १५५ ११८] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः तदेतेन सादृश्यसामान्यविषयत्वमप्यक्षज्ञानत्य निवेदितमवगन्तव्यम् , अन्वितव्यावृत्त. रूपवत् समानासमानरूपयोरपि भावेषु भावत एव भावात् । तदाह-आत्मनाडनेकरूपेण समानासमानरूपेण ताश: समानासमानरूपतया तत्सदेशस्य बहिरर्थस्य ग्रहणमिति । यदि पुनरय निर्वन्धो वस्तुपु वस्तुभूतं सादृश्यं नास्तीति ; तदा कथन्नाम भावक्षणे- प्वेकत्याध्यवसायी विकल्पो यद्व्यवच्छेदाद् अनुमानप्रामाण्यमवकल्प्येत ? विलक्षणस्खलक्षण. ५ दर्शनादेव तद्विकल्प इति चेत् ; न; घटकपालक्षणदर्शनादपि तत्प्रसङ्गात् । तथा च "अन्ते क्षयदर्शनादादावपि तया" [ ] इत्यनवसरं भवेत् , आदिवदन्तेऽपि समारो- पतिरोहितस्य क्षयदर्शनस्य क्षयव्यवस्थापकत्वायोगात्, अन्यथा समारोपन्यवच्छित्तिकल्पना- वैफल्यापतेः । तन विलक्षणस्वलक्षणदर्शनादेकत्वविकल्पः । भवतु सटशाकारदर्शनीदेवासी,तत्तु सादृश्यं न वस्तुभूतम् , असदृशव्यावृत्त्या कल्पित. त्यादिति चेत् । कथं तर्हि कथितम्-"साधर्म्यदर्शनाल्लोके भ्रान्ति मोपजायते ।" [प्र. वा० २।३६१ ] इति ? दर्शनस्य कल्पिताकारगोचरत्वे सविकल्पकात्यप्रसङ्गात् । दर्शनशब्दे- नापि विकल्पकमेव किञ्चिद्विज्ञानमुच्यते न प्रत्यक्षमिति चेत् ; न ; पश्चादेकत्वविकल्पाभावप्रस- गात् । न हि सशविकल्पविपये एवैकत्वविकल्पस्य सम्भवः क्षणक्षयविकल्पविषयेऽपि नित्यविकल्पप्रसङ्गात् कथं क्षणभङ्गानुमानस्य समारोपनिवारकत्वं यतः प्रामाण्यं स्यादिति सर्प १५ एवं मण्डूकेन भक्षितः । किच, तस्यापि सदृशविकल्पस्य कुत उत्पत्तिः ? सदृशापरापरदर्शनादिति चेत् ; न ; सादृश्यस्यावस्तुत्वेन दर्शनविपयत्वायोगात् । दर्शनशब्देन विकल्प एव कश्चिदुच्यत इति चेत् ; तस्यापि कुत उत्पत्तिः ? तद्विकल्पादेव पूर्वस्मात् , न चैवमनवस्थानम् अनादित्वात्तत्प्रयाहस्येति चेत् ; न ; अनादित्वासम्भवात् । न हि घटपर्यायविपया एव सर्वदा सदृशविकल्पाः, पटादि. २० पदार्थान्तर विषाणामपि सेप "पूर्व भावात् । तथा चानुत्पतिरेकार्थस्य पटवर्थयसशविकल्पल प्राप्ता पूर्व तारशविकल्पाभावात् , अन्याशाच्च तारशस्यानुत्पत्तेः । अथ पूर्वमपि घटपर्यायगोचर- सदृशविकल्पवासना विद्यत एव तर्हि तैदापि कस्मात्तद्विकल्पानुत्पत्तिः ? वासनाप्रयोधकस्या- भावादिति चेत् ; पश्चात् कस्य तत्प्रबोधकत्वम् ? घटपर्यायगोचरस्य दर्शनस्यैवेति चेत् ; प्रागपि घटपर्यायगोचरस्य तस्य तत्प्रयोधकत्वं कस्मान स्यात् ? तस्य घटपर्यायविलक्षणविपयत्वान्नेति २५ घेत् ; घटपर्यायदर्शनस्यापि तदविशेषात्, तत्पर्यायाणामपि मियो विलक्षणत्वात् । विलक्षणत्वेऽपि तेषामस्ति काचित्प्रत्यासत्तिा, अतस्तदर्शनस्यैव वत्प्रमोधकारित्वमिति चेत् ; का परा तत्प्रत्या- सत्तिरन्यन समानपरिणामात् । . , -- -दशबहि-आ०, २०, ५०,। २ चयव्यवस्थापकाने एकत्वाध्यवसायात्मकः समारोप एव न स्यात् तथा च कस्य म्यवच्छेदः इति भावः। ३ -नादिवासी भा०, २०, ५०,०। ४-ये पैक-भा०,०, ५०, स०।५ पूर्वममा-मा०, म०प०।६-पघट-मा०, ५०, प., स.। . तथापि भा०, २०, ५०, स० । दर्शनस्य ।
१० न्याययिनिश्चयधिधरणे [१८ अपि च, दर्शनशब्दस्य विकल्पयाचित्वात्, यदि सशविकल्पादेव तद्विकल्पः । तर्हि सर्वम्यापि मनोविभ्रमध्यान्तरुपतवजत्यमेवापतितम् , तथा चेदमेव वाव्यम- "अस्तीयमपि या स्यन्वरुपप्लवसमुचा" [प्र० पा० २।३६२ ] 'भ्रान्तिः' इति, न "साधर्म्यदर्शनाल्लोके भ्रान्तिः" इति, तस्यार्थान्तराभावात् । न चैकवचनप्रतिपन्नेऽर्थे ५ क्यनान्तरमर्थवत् ; अतिप्रसङ्गात् । ततो न दर्शनशब्दस्य विकल्पार्थत्वम्, प्रत्यक्षार्थत्वस्यैवोप- पत्तेः । प्रत्यने च तद्दर्शने न सादृश्यस्यावस्तुत्यम् ; दर्शनविषयस्य तदयोगान् । दर्शनस्यापि भारतत्वाप्न तद्विपयत्वेन वस्तुत्वं सारश्यस्येति चेत् । न ; सर्पदा संशस्येव विषयस्य दर्शने प्रतिभासनात् । तथा हि- धूमान्तरसमस्येव धूमस्येह प्रवेदनम् । निराकारेऽपि विधाने नात्यन्ताय विधर्मणः ॥४९६॥ धूमधायमिति ह्येवं प्रत्यभिज्ञानमन्यथा । कथं येनास्य लिङ्गत्वं पर्वताग्निप्रसाधने ? ॥४९७॥ पश्यतोऽत्यतिवैधये प्रत्यभिज्ञा यदीदृशी। पापाणायुपलम्भेऽपि किमेवं नोपजायते ? ॥४९८॥ तथा च सति सर्वत्र सरस्मादविशेषतः। हुताशनानुमानं स्याद् वस्तुसादृश्यविद्विपाम् ।।४९९॥ धूमवासनाप्रयोधयत्येव धूमप्रत्यभिज्ञानम्, न च पापाणादावस्ति तत्मबोधयत्त्वं तस्य धूमस्वलभ- णातिविलक्षणत्वेन तत्मबोधं प्रत्यनुपयोगात् तत्कथं तत्र तत्प्रत्यभिज्ञानं यतः पावकानुमाने लिङ्गमिति चेत् ?न, धूमान्तरस्यापि धूमस्वलक्षणादतिविलक्षणत्यात् । तत्वार्यकारित्वान्नासिविलक्षण- २० स्वमिति चेत् ; न; असिद्धत्वात् , एकधूमकार्य एव धूमान्तरव्यापारस्यातीतः, तत्सदृश एवं तदन्तरस्य व्यापारोपरम्भात् । अस्तु सदृशकार्यकारित्वादेवावलक्षण्यमिति चेत् । पुतः कार्ययो. रपि सादृश्यम् ? सारशापरकार्यद्वयजननादिति चेत् । न तवयस्यापि सादृश्ये उदपरसरश "तद्वयजननादित्यनवस्थानापत्तेः । स्वत एव कार्यसादृश्ये धूमसादृश्यमपि स्वत एवास्तु किं "तत्र कार्यसाहश्यपरिकल्पनया ? कारणसादृश्यात् तत्सादृश्यमित्यप्येतेन प्रत्युक्तम्, न्यायस्य २५ समानत्वात् । ततो वस्तुत एव "सादृश्यस्य भावात् कथमन्तर्बहिश्च तद्विपयं तदर्शनं न भवेत् १ अन्योन्यसदृशोरेव वेदनं स्वार्थयोरिति । अनुक्तसिद्धमेवेदं साकारज्ञानवादिनः ॥५०॥ १० 1-साथस्यैवो-मा०,०, ५०, स० । २ सादृश्यदर्शने । ३ साइशस्यैव ना०, ०। ४ घूमस्य प्रतिवे- म०प्र० स०।५-वतैव धूम-भा०, २०, ५०, स. ६ पापाणस्य । . धूमकार्य । ८ एक कपधूम-आ०,०, ५०, स० । ९ -प्रतिपत्तेस्तरस-आ, घर, प० । 1. एक बात-भा, २०, प.स.1 "-तद्वयदर्शनादि-मा०,०,१०,०। १२ तत्वार्यता-मा, ६०,५०, स. १६ सायाभावातत्यप- मन्तहिय तहिषयदर्शनम् भा०,०प०, सा।
१० १८] प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्तावः दर्शनस्यार्थसारूप्यं यदि तत्कल्पितं भवेत् । कल्पनाविरहाभावात् प्रत्यक्षं तत्कथं भवेत् ? ॥५०१॥ सविकल्पफमेवेदं प्रत्यक्षं यदि कल्प्यते । प्रत्यक्ष कल्पनापोडं भवेदव्यापि लक्षणम् ॥५०२॥ परमार्थेन सारूप्यस्याभावादर्थवेदने । कल्पनाविरहस्तरिमन्नस्त्येवेति यदोच्यते ॥५०३॥ अतद्रूपस्य तस्यार्थविषयत्वं तदा कथम् । सर्वसाधारणस्यास्य नियमोऽपि कचित्कुतः ? ॥५०४॥ स्वहेतुबलतस्तच्चेदर्थविनियतार्थकम् । तत्काल्पनिकमप्येवं सारूप्यं तर्हि निष्फलम् ॥५०५।। न चार्थदर्शनं नास्ति तस्य पूर्व समर्थनात् । अर्थदर्शनमध्यक्षं तद्ब्रुवाणैः परिस्फुटम् ।।५०६।। अकल्पनाकृतं वाच्यं सारूप्यमपि तेंद्गतम् । सारूप्यदर्शनं तच्चेद्धान्तिरेवार्थबोधयोः ॥५०७।। अन्यथादर्शनाभावान्नाभ्रान्तपदमर्थवत् । १५ तस्माद्वस्तुसदेव द्रव्यपर्यायात्मकत्ववत् सामान्य विशेषात्मकत्वमपि भावस्य, तद्विपय- त्वच प्रत्यक्षस्येति सूक्तम्-"आत्मनाऽनेकरूपेण पहिरर्थस्य तादृशः । व्यक्तं ग्रहणम्' इति । तद्विशिनष्टि विचित्रं शवलं सामान्यस्य विशेपात्मकं विशेपस्य सामान्यात्मकमिति । रात्र यदि विशेषात्मकमित्यत्रावधारणम्; शबलमिति व्याख्यानमनुपपन्नम्, विशेषकात्मनः शबल- २० त्यायोगात् । एतेन सामान्यात्मकमित्यपि विचारितम् । नोभयत्राप्यवधारणम् , विशेषात्मनि सामा- न्यात्मनः, तदात्मनि च विशेषात्मनो विद्यमानत्वादिति चेत; उपपन्नमेवं शवलमिति व्याख्यानम् विचित्रपदं तु पुनरुक्तं भवेत् महणशावल्यस्य 'अनेकरूपेण' इत्यनेन गवत्यात । प्रत्यक्ष- शामल्यमेव तेनं गतं नार्थप्रहणशावल्यमिति चेत् ;न, प्रत्यक्षात्तदर्थग्रहणस्याव्यतिरेकात् । तन्नेद व्याख्यानमित्यन्यथा व्याख्यायते- विचित्र स्पष्ट-स्पष्टतरादिप्रतिभासभेदेन नानाप्रकारमिति । नन्विमपि वैचित्र्यम् । अनेकेत्यादिनैव गतं तत्कथं पोनरुक्त्यैपरिहार इति चेत् ; एकपुरुषप्रत्यक्षस्येव 'तेन तदभिधानम् , अनेन तु नानासन्तानग्रहणगतस्य प्रतिभासभेदस्यामिधानमिति पोनरुक्त्यनवतारात् । कस्यचिद्धि प्रत्यासन्नस्य सष्टमर्थग्रहणम् अन्यस्य प्रत्यासन्नतरस्य २५ .. 1 दर्शनस्य । ३ विषयप्रतिनियमः । ३ -कमित्येवं १० । ४ प्रत्यक्षगतम् । ५ तत् सारूपदर्शन भ्रान्ति- चेत् । अयोधयोः भन्यथादर्शनामावात् इत्यायन्वयः । ६ अनेकरूपेणेति पदेन । ७ -पत्यपहार मा०, २०, प., स. ८ अनेकरूपेणेति पदेन । विचित्रपदेन । - न्यायविनिश्चयविवरणे [ स्पष्टतरम् अपरस्य प्रत्यासन्नतमस्य स्पष्टतममिति 'इष्ट एवायं विभागः। वथा च "ययसा- दिनप्रतिभासं न तत्तेनेकविपयं यथा रसज्ञान रूपज्ञानेन, प्रत्यक्षाद् भिन्नप्रतिभासं चानुमानम्" [ ] इत्यत्र भिन्नप्रतिभासत्वं व्यभिचारीति निवेदिवं भवति, स्पष्टज्ञानात् स्पष्टतगदिशानस्य भिन्नप्रतिभासत्वेऽप्येकविपयत्वोपलम्भात् । करिष्यते चात्र द्वितीये विस्तर ५ इति नेहातीव निर्वध्यते । पुनरपि ग्रहणविशेषणं 'विशेषण' इत्यादि । विशेषणं च जात्यादि व्यवच्छेदक्वान्, विशेष्यश्च सैद्वन् व्यवच्छेद्यत्वात् , विशेषणविशेष्ये विषयत्वेन भजतीनि 'विशेषणविशेष्य- भाक' इति । अनेनार्थग्रहणस्य विकल्पकत्यमुक्तम् । तथा हि-यन् सविशेषणप्रहणं तत्सवि. कल्पकं यथा दण्डीति ग्रहणम् । सविशेषणमहणञ्च जात्यादिमदर्थग्रहणमिति । स्यान्मतम्-विशेपणं विशेष्यमिति च सत्येव योजने भवति तदभावे तभतीतेः । 'योजन सत्येय भेदे । न च जात्यादि-वद्वतामस्ति परस्परतो भेदः, तदनवमासनात् । संस. त्तिदनवभासनमिति चेन् ; सति भेदे संसर्ग एवं करमात् ? समानदेशकालस्वादिति चेत् । न; समानदेशकालानामपि स्वरूपस्य भेदात् । भिन्नदेशकालानामपि स्वरूपभेदादेव थापविभासो न देशकालभेदात् । यदि हि तन न स्वरूपभेदो देशादिभेदेऽपि न भेदप्रतिभासनम् । देशाय- १५ भेदेऽपि परेपां वर्णसंस्थानयोरवभासत एव भेदो वातातपयोश्च इति न देशाद्यभेदावभासभेदो हीयते । अथ समवायसम्बन्धबलादेकलोलीभावेन प्रतिभासनम् ; तथा सति सर्वत्र संघात्व. कल्पनामसङ्गतः सर्य एवाभेदप्रतिभासो नाभेदसाधनं भवेत् । ततोऽनवभासनानास्त्येव जात्यादि-तद्वतां भेद इति न तदायत्त पत्र योजनम् , अयोजने च न विशेषणादिकमिति कर्थ तद्भावत्वं प्रत्यक्षस्य यतो विकल्पकत्वं तस्येति ? तदपि न साधु मतम् ; ऐकान्तिस्य भेद- २० प्रतिमासस्यामावेऽपि जात्यादि-तद्वता कथञ्चितत्प्रतिभासस्य प्रागेव प्रतिपादितत्वात् । सति तस्मिन् कञ्चिदेभेदात्मनो योजनस्यापि भावात् । अवश्यं चैतदेवगङ्गीकर्तव्यम् ऐकान्तिके भेदप्रतिभासे तदभेदप्रतिभासवद् योजनस्यैवाभावापत्तः । नन्वयमिष्टे स्थाने वृष्टिलाभस्तधागतानां योजनामावस्य तैरभ्युपगमात् । तथा च चपर्न प्रज्ञाकरस्य- २५ "अभिन्न प्रतिभासस्य योजनं कस्य केन वा ? विभिन्न प्रतिभासस्य योजनं न प्रतिभाति (प्रतीतिभार) । इत्यभिन्नप्रतिभासं हि तत् एकमेव कस्तत्र योजनार्थः उभयापेक्षत्वायोजनायाः । अथ भिन्न प्रतिभासद्वयं तदा परस्परवियेफेन प्रतिमासनाविवराम् अयोजनेत्यसम्मव एवं १ स्पष्ट मा०,ब., १०, स.। २-प्रत्यरभासने न मा०,०, ५०, R.1 तबर-मार, प०, स०। ४ योजनं स-आ०, या, ५०, स. १५ मिठप्रतिभासः । ६ तयारसना-भा०, २०, ५०, R.1 ७ क्यभेदभेदात्मनो स० ) क्यभेदाभेदात्मनो ए.। ८-नं न प्रतिभामति स । “योभनं न प्रतीतिमाद"-प्र. घातिककाल प्रथम. प्रत्यक्षप्रस्ताव १५९ - ~ - - , १२८] योजनायाः। तन्त्र पारमार्थिकी योजना।" [प्र०वार्तिकाल०२।१४६] इति चेत् ,कथ तर्हि तेनै- वोत्रम्-"संयोज्यग्रहण हि कल्पना" [प्र० वार्तिकाल०२।१४६ इति ? योजनाभावे तत्पूर्वकस्य ग्रहणस्यासम्भवात् । तदयं योजनमनिच्छन्नेव तत्पूर्वकं ग्रहणमिच्छतीति कथं स्वस्थः सवृत्या तदिष्टेरदोष इति चेत् , न,'संवृत्यर्थापरिज्ञानात् । असत्यपि योजने तदाभासं ज्ञानं तदर्थ इति चेत् , नन्विदमपि ज्ञान नेन्द्रियजम् , तन योजनप्रतिभासस्यानभ्युपगमात् । कल्पनैवेति चेत् , ५ न, योजनाभावे सदसम्भवात् । सत्सम्भयेन योजनमिति चेत् , न, अन्योन्याश्रयस्य सुव्यक्त त्वात् । न योजने पुरोधाय कल्पना येनैवं प्रसङ्गः किन्तु सैदात्मिकेव सोपजायत इति चेत् , न, 'संयोज्य ग्रहणं हि कल्पना' इत्यत्र योजनस्य ग्रहणपूर्वकालत्याभिधानविरोधात् । न विरोध एककालत्वेऽपि च्यादाय स्वपिति' इत्यादिवत् औपसंख्यानिकस्य क्त्वाप्रत्ययस्य भावादिति चेत् , न, भेदप्रतिभासयोजनयोरप्येवमेककालत्वप्रसङ्गात् । तथा च तदुक्तं परेण- १० "योजनात्पूर्व प्रत्येकदर्शनपूर्विका कल्पना" [प्र. वार्तिकाल० २।१४६] इति , तत्पति- विहितम् । अपि च, किंविषयं तद्योजनं यदात्मिका कल्पनोत्पद्यते ? न तावद्भहिर्विपयम् , कल्प- नाया निर्विपयत्वात् । अन्तर्विषयमिति चेत् , न, तनापि भेदप्रतिभासाभावे तदसम्भवात् "अभि- नप्रतिभासस्य" इत्यादि वचनात् । तत्प्रतिभासेऽपि नितरा तदनुपपत्तेः "विभिन्नप्रतिभासस्य" १५ इत्याद्यभिधानात् । न चानुपदर्शितविपय योजनं नाम , अयोजनमेव तत्स्यात् । सत्यमयोजन- मेव तत् , संवृत्या तु तस्य योजनत्वमिप्यते इति चेत् , 'संनृत्यर्थापरिज्ञानात्' इत्यादि- कस्य 'अयोजनमेव तत्स्यादिति' पर्यन्तस्यावर्तनात्, पुनरपि 'सत्यम्' इत्यादिवचने तस्यैवा- वर्तनात् चक्रकस्यानवस्थावाहिनः प्रसङ्गात् । तन्न परमार्थत इव संवृत्यापि परस्य योजनमिति न कल्पना नाम । मा भूदिति चेत् , पुतस्तदभावे योजनामावस्यायगतिः १ 'अभिन्नप्रतिभा• २० सस्य' इत्यादिफाद्वचनादिति चेत् , न , शब्दगडमानात् , कस्यचिदवगमविरोधात् , ज्ञानकल्प. नापरिश्रमकल्यापत्तेः । सदुपजनितज्ञानादेवेति चेत् , न ततोऽपि तुच्छामावस्यावगतिः असम्बन्धात् । नापि भावान्तरस्वभावस्य , विशेषात्मनः शाब्दज्ञानाविषयत्वात् । सामान्यात्म- नोऽपि कचिदयोजितस्याप्रतिमासनात् । योजितप्रतिभासने तु कथं सर्वात्मना कल्पनाभावः ? सत्प्रतिभासस्यैव कल्पनात्वात । "संयोज्य" इत्यादिवचनापारमार्थिकी चेयम्, संमृतिवादे २५ अनवस्थादोपस्योक्तत्वात् । ततो दुरुक्तसेतत् "न पारमार्थिकी योजना" [प्र. वार्तिकाल. २।१४६] इति । फिश्च, माभूदभेदैकान्ते योजनं तस्योभयापेक्षत्वात् , तर चोभयरूपाभावात्, भेदै- फान्ते तु कथन्न योजन तन तद्भावात् ? अमित्रत्वेन प्रतिभासनादिति चेत् , किं पुनर्मिश्रणमेव . 1 संवत्यार्थापरि-भा०, २०, ५०, स० । २ सरत्यर्थ । ३ योजनामिका कल्पना। ४ योजनापूर्व प्र- मा०प०, ५०, स. । “योजनापूर्व प्रत्येक • "-प्र. वार्तिककाल । ५ कल्पनाना मा मा०, २०,५०, स. । ६ शब्दागममानात् भा०,५०,१०, स०। ७ उभयरूपसद्भावात् ।
-- ५ ... उप- अनि- न्यायचिनिश्चयविवरणे योजनम् । तथा चेतन ; दण्डदेवदत्तयोरप्यमिश्रप्रतिभासत्वेन तदभावे दण्डीति विकल्पानु- सत्तिप्रसगात् । मा भूतदुत्पत्तिरिति चेत् । न ; संयोग्यग्रहणं प्रति वन्निदेर्शनप्रदर्शन विरोधात् । परमसिया तत्प्रदर्शन मिति चेत् ; फवं परोऽप्यमि प्रतिपद्यमान एव मिभं प्रति.. पद्येत ? प्रतिपद्यमानो दृश्यत इति चेत् । तत्प्रतिपत्तिरेव वर्हि विरोधोभावनेन निवारयितव्या । अपि च, वल्लोकव्यवहारत्यैयविधत्वात्कृतः स्वयं वदभ्युपगमः क्रियते प्रयोजनक्शा- दिति चेत् ; किं प्रयोजनम् ? विकल्पस्य संयोऽयमहणत्प्रसाधनम् ; तथा हि-यद्विकल्पक सत्संयोज्यमहर्ण यथा दण्डीति विकल्पकम् , विकल्पकच विवादास्पदमिति चेत् । निदर्शनस्य वस्तुतः साध्यविफलत्वात् । परोपगमाचविकलत्वमिति चेत् ; न गममानसिद्धस्याऽवस्तुरूपत्वात् । न चापस्तुरूपनिदर्शनचलोपनीतस्य साध्यस्यापि यातु. १० रूपत्वम् । अवस्तुरूपमेव तदपि सर्वस्यापि संयोज्यग्रहणस्य सातत्यादिति चेत् । तर्हि कि तत्साधनप्रयासेन प्रयोजनाभावात् १ प्रयोजनवत्वे यस्तुरूपत्यापत्तेः । मा भूत्साध्यस्य प्रयोजन- वत्वं सत्साधनं तु सप्रयोजनमेव, प्रत्यक्षे तद्रूपकल्पनाभिपेधनस्य सत्प्रयोजनत्वात् , रूपिताकारस्य निषेध्यस्य क्वचिनिपेघायोगात् । स चायं तनिषेधप्रयोगः-यन्न भेदप्रतिमातं वन संयोज्यमहणं यथा क्षीरवारिहानमतद्वेदिनः, न भेदावभासच जातिभातिमदादिरूपेण १५ प्रत्यक्षम् , यच्च न संयोज्यप्रणं न तद्विकल्पकं यथा तदेव क्षीरसारिवेदनमतद्वेदिनः, न संयोज्यमहणञ्च प्रत्यक्षम्, नतो निर्विकल्पकमिति चेत् ; न; तत्रावस्तुरूपकल्पनाविरहस्य पर प्रत्यपि प्रसिद्धत्वेन तत्साधने सिद्धसाधनदोपापत्तेः । अवस्तुभूतायामपि' कल्पनायों परस्य वस्तुमावाभिनिवेशात् प्रत्यक्षे "तत्सद्भाव एव प्रसिद्धो न तहिरहस्तकथं सिद्धसाधनत्यमिति चेत् ? स्वोपगमतस्तहि तनावस्तुभूताया एव कल्पनाया निषेधात् ,"वस्तुमूतया कल्पनया सविकल्पकमेव २० प्रत्यक्षं प्राप्तम् । वस्तुभूता कल्पनैव नास्तीति चेत् ; न, सभा कल्पितकल्पनाया अप्यभाषा- पः । उभयकल्पनाविलोपस्य च फल्पनामन्तरेण दुरखयोधत्यादित्यायेदितत्वात् । कल्पनयत कल्पनाविलोपप्रतिपती च विशेषणविशेष्यतद्योजनप्रतिभासवती वस्तुत एवासी वक्तव्या, सदर प्रत्यक्षस्यापि तत्प्रतिभासवरयोपपत्तो कथन वास्तवी तत्र कल्पना ? ततो यथास्तुकल्पना- विरहस्तम साध्यते बस्तुकल्पनया विकल्पमेव तदापन्नम् । ततः प्रयासमात्रमेवैतत् धर्मकीत्त:- "विशेषणं विरोप्पश्च सम्बन्ध लौकिकी स्थितिम् । गृहीत्वा सङ्कलव्यैतत्तथा प्रत्येति नान्यथा ॥ यथा दण्डिनि जात्यादेविवेकेनानिरूपणात् । तदता योजना नास्ति कल्पनाऽप्यत्र नास्त्यतः "[04/०२३१४५Jइति । १ योजनाऽभावे । २ -दर्शनवि-भाग०,०R "प्रत्येक विशेषणा दीनो प्रहगमन्तरेण न मंत्री बन यया पोति प्रतीतो।"-प्रजातिकाल.11४।३ ष तार-मा०,०,4-R1 अपि तु स्प्रेड-सा। अपि स्खलौक-मा०,१०,५०। ५-स्येच सिदत्वात् 14.1 -जनविकास.. कल्पथ-पा०,१०,१०,१०1-पि सि-आक०,००18-विविक-प्रा०प०,५०म०116पनासदार । "दभूतावा: कुल्पनायाः -आ.,५०,५०, स.1 कल्पनाविशेषणविरोम्यतयोमप्रतिभास । २५ . १२८] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव वस्तुकल्पनाविरहस्य विप्रतिपत्तिस्थानस्यानेनासाधनात् । तत्कल्पनाविरह एवानेन साव्यत इति चेत् ; न ; तल्लक्षणापरिज्ञानात् । इदमेव विशेषणविशेष्यप्रत्येकदर्शनपूर्वकं संयोज्यग्रहणं तल्लक्षणमिति चेत् ; क पुनरिदं तल्लक्षणत्वेन प्रतिपन्नम् ? दण्डीति विकल्प इति चेत् ; न; तत्र योजनस्य-निनणस्य वस्तुतोऽसत्त्वात् अवस्तुविकल्पलक्षणत्यायोगात् । भवतु वा किमपि योजनम् , तथापि दण्डदेवदत्तयोः प्रत्येकदर्शनं विकल्पकम्, अविकल्पक वा ? विकल्पकञ्चेत्, ५ तर्हि सत्रापि दण्डस्य विशेष्यस्य तदययवानाञ्च विशेषणानां प्रत्येकं दर्शनं योजनञ्चापेक्षणीयम् । तंदवयवानाच दर्शनस्य विकल्पको तत्रापि तेषां तद्भागानाञ्च प्रत्येकं दर्शनं योजनं चापेक्षि. तव्यं तावदेवं यावदन्ते परमाणवा, तेपाञ्च न दर्शनम्, तस्मिंश्च न तद्विशिष्टस्य तदययविनो दर्शनम् , तत्र च न तद्विशेषणस्योत्तरावयविनो दर्शनम्, तावदेवं यावन्न दण्डदर्शनम् । देव. दत्तदर्शननिषेधेऽप्ययमेव न्याय इति प्रत्येकदर्शनाभावान संयोज्यग्रहणं दण्डस्य देवदत्तेनेति कथं तदण्डीति प्रहणम्, यत्रेदं विकल्पलक्षणमयगम्येत ? तन्न तयोर्दर्शनं विकल्पकम् । अवि. कल्पकमेव तदिति चेत् तत्र कस्य प्रतिभासः ? अवयविन इति चेत् ; न, तस्य "निरवयवस्य सदनुपलम्भात् "परस्यानभ्युपगमाच । सावयवस्येति चेत् ; न, तदर्शनस्य विशिष्टविषयत्वेना- विकल्पकत्वाभावासद्गात् । निरंशक्षणिकस्य स्वलक्षणस्य तन प्रतिभासनमिति चेत् ; भवत्येव निर्विकल्पकत्वं तदर्शनस्य यदि तत्क्वचिदुपलब्धुं शक्येत । नापि तद्विपयस्य क्वचिद्योजनमिति सुव्यवस्थितो दण्डीति विकल्पः । स्यान्मतम् -संवेदनाकारयोरेव दण्डदेवदत्तयोः प्रत्येकदर्शनं योजनच न वहिरा- कारयोः, विकल्पस्य वस्तुवृत्त्या निर्विपयत्वात् , तन्नायं प्रसङ्ग इति; तदपि न समीचीनम्, तसंवेदनस्यानवगमात् । दण्डिज्ञानात् पूर्व 'दण्डप्रतिभासं देवदत्तप्रतिभासञ्च विकल्पद्वयं तदिति चेत् । सम्भवत्यत्र प्रत्येकं दर्शनं न पुनर्योजनं क्षणिकत्वेन पश्चात्तभावात् द्वयस्थकीकरणायो- गाच । नन्विदमेव पुनर्योजनं यत्तद्वयेन उभयप्रतिभासमेकं दण्डिज्ञानमुपजन्यत इति चेत्, न; तद्वयस्य युगपदसम्भवात्, अनभ्युपगमात् । क्रमभाये च सन्निहितस्यैय कारणत्वं "नेतररयेति कथं तद्वयजन्यत्वं दण्डिविकल्पस्य १ सन्निहितस्यापि व्यवहितविकल्पसंस्कारप्रबोधगर्भस्यैव कारणत्वादेवमिति चेत् , अस्ति तर्हि फथञ्चित्प्राच्यविकल्पस्याप्युभयप्रतिभासयत्वम् । भवतु को दोप इति चेत् ? कुतस्तस्याप्युत्पत्तिः ? वारशादेव प्राच्यविकल्पादिति चेत् , क्व तर्हि प्रत्येक- दर्शनमुपयोगवत् ? यतस्तद्वचनमपर्यालोचितं न भवेत् । तन्न प्रत्येकदर्शनपुरस्सरं योजन वस्तुतो विकल्पलक्षणम्, उभयावभासित्वे सत्येकज्ञानत्वस्येव तल्लक्षणत्वेनावस्थानात् । तथा . २० २५ -स्य प्रति-भा०,०प०म० । २ वस्तुरून्पनाविरह । ३ मिश्रणय' इति पदं योननस्य' इति पदस्य टिप्पणभूत मूले प्रक्षिप्तमिति भाति । ४ - सत्वावस्तुवि-ता०।५ प्रत्येकदर्श-आ०,५०,०स० । ६ दण्डावयदा. नाम् । ७ परमाणुदर्शनाभावे । ८ - तावदेव-आ०,०,१०म० । ९ दण्डदेवदत्तयोः । १० अवयविनः।" निरंशस्य । १२ बौद्धस्य । १३ -लब्धं शक्ये-आ०,५०,५०,स०। ११ विकल्पकस्य स०।१५ दण्डिप्रति-आ०, १०,५०,स० । १६ -मावस्यैकीकरणा-भा०, २०, ५०, स० | १७ दण्डप्रतिमासेन देवदत्तप्रतिभासेन च । १० नोत्तरस्य ०,५०प०स०] १९-वदतःआ०,०,५०,सा-नानावस्थानात्-म-नादस्थान'त्-मा०,०,१०॥
न न्यायचिनिश्चयपियरणे [१५८ घान देवस्य वचनम्-"विविधानुविधानस्य विकल्पनान्तरीयकत्वात् ।" [प्रमाणसं० ख० श्लो०४] इति । तर्हि तल्लक्षणे एय विकल्पः प्रत्यो प्रतिषिध्यते इति चेत् , तत्प्रतिपेधः ? "जात्यादेविवेकेन" इत्यादिना न्यायेनेति चेत्, तेन प्रत्येकदर्शनपुरस्सर- योजनात्मकस्यैव तस्य निषेधात् , “विशेषणम्" इत्यायुक्त्वा तदभिधानात, तरक्षणस्य च ५ विकल्परयोकप्रकारेणासम्भवात् । न चाऽसम्भवतो निषेधैः स्वतः सिद्धेः रागवरिपशुकानाम् । अन्यतस्तनिषेध इति येत्, किं तदन्यत् । प्रत्यक्षमेर, तस्येकानेकप्रतिभासरिफ्ल्पविषरस्यानुभ वात् "प्रत्यक्ष कल्पनापोडं प्रत्यक्षेणैव सिद्धयति" [प्र. वा० २११२३ ] इत्यभिधानादिति चेत् न, तयं तद्विफल्पात्मन एव 'आत्मनाउनेकरूपेण' इति निवेदितत्वात् । सशयादि- दोषापादनेन जात्यन्तरनिराकरणातनं तेन्निपेध इति चेत् ,न ; तथा दण्ड्यादिविकल्पेऽपि तन्नि- १० पेधापत्तेः । कल्पित एव सोऽपि न वास्तव इति चेत्, न, वस्तुभूतग्रिकल्पाभाने तत्वत्पनानु- पपत्तेनिवदितत्यात् । ततो यदि "तद्विक्ल्पे जात्यन्तरस्य न संशयादिना पीडनं प्रत्यक्षेऽपि न स्यादविशेपात् । किञ्च किमिदं संशयाद्यापादनं प्रमाणम् । अप्रमाणापादितस्य दोपस्यादोपत्वात् । प्रत्यक्षमिति चेत्, न, तस्याविचारकत्यात् । अनुमानमिति चेत् , न, तस्य निर्विकल्पकरया- १५ भायात् , अनभ्युपगमात् । विकल्पकत्वेऽपि स्वयमनयगतस्य अदोपापादनत्यात् । अवगतमेव स्वसंवेदनाध्यक्षेण"तदिति चेत् कथमेवं विकल्पाविकल्पात्मना उभयात्मानमनुपद्रवं प्रतिपद्यमानमेव "तत् प्रत्यक्षस्य जात्यन्तरे संशयादिकमापादयेत् "स्वरूपानभिज्ञत्वप्रसङ्गात् ? तन्न तात्विकस्य विकल्पस्य प्रत्यो पुतश्चिदपि निषेच इति सिद्धं सविकल्पक प्रत्यक्षम् । ननु च विशेषणविशेष्यभाक्त्वेन तस्य सविकल्पकत्वमुक्तं न जात्यन्तरप्रतिभासत्वेन १० तत्कथमिदं तत्प्रयोजकमुच्यते ? जात्यन्तरप्रतिभासादन्यस्य तदाक्रवस्याभावादिति पेत् , न तर्हि 'विशेषणविशेष्यमाक्' इति पृथगभिधातव्यम् , जात्यन्तरप्रतिभासस्य' 'आत्मना' इत्यादिना प्रतिपादनादिति चेत् , न, उभयथा सिल्पावेदनार्थत्वादेवचनम्य । नथा हि-यदि निरंशविपयत्वं निर्विकल्पकत्वम् , न तर्हि प्रत्यक्ष निर्विकल्पम् , तस्थानेकरूपस्वपरावभासित्वेत विकल्पकत्योपपत्तेः इत्यावेदनार्थमिदाभिहितग-अनेकरूपेण तादृशो ग्रहणम्' इति । तथा यदि अकृतयोजनं प्रहणमविकल्पक्त्वम् , तर्हि प्रत्यक्षमपि यदेव "तथाविधं तदेवाविक- ल्पकम् , कृतयोजनं तु विकल्पकमेयेति प्रतिपादयितुं 'विशेषणविशेष्यभा'इत्युक्तम् । , १३ स्वरूपाशे , विवादानुविवादनस्य विकल्पान्त-आ०,०,५०,स। २ उभयावभासित्वे सत्येकज्ञानविलक्षण । ३ प्रतिपद्यते इति भा०, २०, ५०, स.1-4 सि-स.1 - स्व सिद्ध भा०,०,१०। ५ खत सिद्धवादित्यर्थः । ६ प्रत्यक्षम्य । -लात्मनाने-मा०, २०, ५०,०1८ प्रत्यक्षे । ९ विकल्पवानपे । १. दण्ड्यादिविकल्प। तद्विकल्पजा- आ०, प. प., स.. "मनुमानम्। निविकरपकम् , अर्थाशे र विपकमिति । १३ अनुमानम् । १४ अनुमानस्य जात्यन्तरत्वापत्तिभयात् विकास खमारखीकारे खानभिज्ञवं स्यादिति भाव । १५ -सनस्य मा., ०, ५०, R11६-१0 त- भा.,ब०,५०,०"भतयोजनम् ।
-- .. . १९] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव १६३ ननु च जात्यादितद्वद्भावेन भेदे सति तादात्म्यमेव योजनम् , तञ्च सर्वत्र प्रत्यक्षे विद्यत इति कथन सर्वस्य तस्य विशेषणादिविषयत्वमिति चेत् ? न ; गुणप्रधानभावोपाधिक- स्यैव तस्य योजनत्वात् , तन्द्रावस्य च सर्वत्राभावात् । भवतु विवक्षानियमेन तद्भावनियमः तस्य विवक्षानिवन्धनत्वात् , “विवक्षया मुख्यगुणव्यवस्था" [वृहत्स्व० श्लो० २५ ] इति वचनात् । प्रत्यक्षस्य तु कथं तद्विषयत्वं वस्य विवक्षारूपत्वाभावादिति चेत् ; तथापि विवक्षया ५ जनितसंस्कारप्रबोधगर्भस्य तस्य न विरुध्यत एव विशेषणादिविषयत्वम् , कथमन्यथा 'बहवः' इति 'एक' इति 'बहुविधम्' इति 'एकविधम्' इति च विशेपणादिरूपेण ग्रहणं यतो बबादिवेद्य- भेदेन अवग्रहादिभेदकथनमाम्नायप्रसिद्धमुपपनीपोत ? ततः स्थितम्-संयोजनमेव प्रत्यक्षं सविकल्प नापरमिति । 'संवं संयोजनमेय सविकल्पकमेव' इत्यनुज्ञाने तु यद्वक्ष्यति-"सकला- कारं वस्तु निर्विकल्पकम्" ] इति तद्विरुध्येत । निरंशप्रतिभासरूपनिर्विकल्पकत्यप्रत्य- १० नीकभावापेक्षया तु सकलमपि प्रत्यक्षं सविकल्पकमेव, तरय जीत्यन्तरगोचरत्येन सशिवस्तु- विपयत्वोपपत्तेरिति सर्व निरवद्यम् । ननु तदिदं भवतां जात्यन्तरं यत्पुरोवर्तितया प्रतिभाति नीलादिस्थूलरूपम् , तस्य च दूरविरलकेशादाविव अविद्यमानस्यैव प्रतिभासनात्कथं तद्रूपो बहिरर्थः पारमार्थिको यतस्तद्विप- यत्वं प्रत्यक्षस्येति चेत् ? अबाह- अर्थज्ञानेऽसतोऽयुक्तः प्रतिभासोऽभिलापवत् । इति । 'अर्थस्य' इत्यनुवर्त्तते । तदयमर्थ:-अर्थस्य विपयस्य प्राहकत्वेन सम्बन्धिनि सति । कस्मिन् १ अर्थज्ञाने, अर्य्यत इत्यर्थो विषयस्तस्माज्ञानम् , पश्चगीति योगविभागात्समासः, तस्मिन् ? किम् ? असतोऽविद्यमानस्य स्थूलाकारस्य प्रतिभासो घेदनविपयत्यम् अयुक्तः सनतो न भवति । तथा हि- अर्थकार्य यदि ज्ञानमर्थस्य ग्राहक मतम् । असतः स्थूलरूपस्य प्रतिभासस्तदा फयम् ? ॥५०८॥ असतो न हि विज्ञानमन्यद्वेहोपजायते । जायते चेदसत्तन्न सतः कार्य हि लक्षणम् ॥५०९॥ चन्द्रद्वित्वादिकस्यैवमहेतुत्वादवेदने । व्यावाभावतो न स्याद्धान्तपदमर्थवत् ॥५१०॥ २० १ तादात्म्यस्य । २ गुणप्रधानभावस्य । ३ गुणप्रधानभावनियमः । ॐ विशेषणादिविषयत्वम् । ५ "बहुपहु- विधक्षिप्रानि.सृतानुक्तध्रुवाणां सेतराणाम् । अर्थस्य"-तत्त्वार्थ १६,१७ । ६ -दमुपपद्येत प० । ० सर्वस्यो --भा०, २०, ५०, स०। ८ जात्यन्तरत्वेन आ०,३०प०स०। ९ "यथैव केशा दपीयसि देशे असंसचा अपि पनसनिवेशावभासिनः परमागवोऽपि त्येति न विरोधः।"-प्र० चार्तिकाल- २२२२३ । 10 -मानस्थूला-भा०, ०, १०, स.।" कल्पनापोढमन्नान्तमिति प्रत्यक्षलक्षणगतमन्नान्तपदम् ।
१६४ ५ १० म्यायविनिश्चय विवरण अहेतोरपि वित्तिश्चेत्तद्वित्वादे, तदा कथम् । 'कारणस्यैव वेद्यत्यम्' इत्ययं नियमो भवेत ? ॥५११॥ अहेतोर्वेद्यतां यक्ति नियम वक्ति चेशम् । केन धान्या (ध्यन्धा)यितो हन्त जगद्विजयधीरयम् ॥५१२॥ अपि च, यद्यसतोऽपि स्वलक्षणेषु स्थूलाकारस्य दर्शनम् ; शब्दस्य किन्न स्यात् ? स्थूलपति- भासो दृश्यते न शब्दप्रतिभास इति चेत् ; न, 'घटोऽयं पटोऽयम्' इत्यत्र शब्दप्रतिभासस्यापि दर्शनात् । विकल्पप्रतिभास एवायं न प्रत्यक्षपविभास इति चेत् न, अस्यैव मानसप्रन्यक्षल्येन प्रक्षा- करेण कथनात् । शब्दप्रतिभासयत्त्वे कथमस्य प्रत्यक्ष निर्विकल्परत्वाभावादिति चेत् । नन्वय तत्रैव दोपस्तरिकमात्र प्रश्नेन ? स्वकोपीनविवरणत्याप्रतिबुद्धव्यवहारत्वात् । नायं दोपः, शब्दप्रतिभासम्स्येऽपि पूर्वापरपरामर्शियाभावेनाविकल्पकत्वादिति चेत् ; उच्यते--यदि तत्परामर्शित्वादेव विकल्पकत्वं नहिं प्रत्यक्षे सर्वत्र नदेव निराकर्तव्यम् , विकल्पप्रसनभयस्य तत्प्रयुक्त्त्वात् न शब्दप्रतिभासवत्त्वम्, सत्यपि तस्मिंस्तत्मसमभयाभावात् । तदिदं व्याधमयपरिहाराय साधुव्यापादन तथागतस्य । तत्परामर्शस्यापि शब्दप्रतिमासमूलत्याल एव तत्र प्रतिपिध्यत इति चेत् न, मानसप्रत्यशेऽपि तत्प्रतिपेधप्रसङ्गात् । अस्त्येव घरवतस्त. १५ त्रापि तनिषेधः केवलं तत्प्रतिमासिना विकल्पेन एकत्याध्यासात् आभिमानि तदपि तत्प्रतिमा- समुच्यत इति चेत् ; स्तहि वस्तुत इन्द्रियज्ञानात्तस्य भेदः ? न कश्चिदिति चेत् ; नास्त्येव तहि "तदिति न"प्रत्यक्षचतुष्टयवाद। साधीयान् । यत्पुनरेतत्-आगमप्रसिद्ध तदभिप्रेत्य 'नालमिदम्' इत्यादिविकल्पप्रादुर्भावान्यथानु- पपत्या वानमितं तदगीकृत्य वचतुपयवाद इति ; तदातो तावत् प्रस्तावान्ते निरूपणात् । २० ततस्तस्येन्द्रियज्ञानाद् भेदं युवता वात्त्विक एव "तन शब्दप्रतिभासो वक्तव्यः ततः "कथन तत्परामर्शियं यतो विकल्पकवं न भवेत् ? सत्यपि "तत्प्रतिभासे "सत्र "तत्परामर्शामारे चक्षुरादिज्ञानेऽपि न भवेदिति "तत्र "तत्प्रतिभासनिपैधन प्रयासमात्रमेव कीतः । अतस्लनिरा करणादवगम्यते सति "तस्मिन्नवर्यभावी "तत्परामर्श इति कथन्न शिरुत्सर्फ मानस- प्रत्यक्षम् ? तथा सति प्रत्यक्षान्तरस्यापि तत्त्वमनिवार्यम् । तथा हि-इन्द्रियादिप्रत्यक्ष २५ विकल्पकं प्रत्यक्षत्वात् मानसप्रत्यक्षवत् । शब्दप्रतिभासाभावानेति चेत् ;न; तस्याप्यनु, १ सौगतः। "इदमित्यादि यशानमभ्यासात्पुरत स्थिते. । साक्षारणतस्तत्तु प्रत्पर्श मानय मतम् प्रदातिचालक २१२५३ । ३ नम्वयं न चैव दो-आ०,१०,1,स. पूर्वापरसरामर्शिरवमेव 1 ५ पायतर मा०,१०प०० ६शवप्रतिमास एवं । • चेन स प्रत्यक्षे-मा०,१०,१०,५०1८ शब्दप्रतिभसनिधः । ९ शब्दप्रतिभारिना । 10 मानसपत्यशश्य । " मानसप्रत्यक्षम् । १२ इन्दियमनोयोगितसंवेदनप्रत्यक्षचनु । १३ "एतच सिदान्तप्रसिद्ध मानसं प्रयक्षम् ।"-याविक-पृ.१। सकभर.१.१११५ मानसप्रत्यः । १५ कथं तत्प-भा०, २०, ५०, २०१६ शब्दप्रतिभाने। " मारसप्रत्यो। १८ पूर्वापरपरामर्शभावे । १९ चनुरादिनाने । २. शन्दप्रतिभाग 1 २१ सदप्रतिमासे । २२ पूर्वापरपरामर्शः।
प्रथम: प्रत्यक्षप्रस्ताव: १० । ११] मानात्-इन्द्रियादिप्रत्यक्षं शब्दप्रतिभासवत्, तत्त्वात् मानसाध्यक्षवदिति । स्वलक्षणेऽवसतः कथं शब्दस्य तत्र प्रतिभासनमिति चेत् ? स्थूलाकारवदिति चूमः । तदाह-अभिलापवत् । अभिलापः शब्दो विद्यतेऽस्मिन्नित्यभिलापवत् 'अर्थज्ञानम्' इति विभक्तिपरिणामेन सम्बन्धः । नदपि इन्द्रियजं 'विकल्पकम् इति भावः । ततो यथा नासतः स्वलक्षणे शब्दस्यावभासनं तथा स्थूलाकारस्यापि न स्यात , तदस्ति च । तस्मात्सन्नेवायमिति कथन तदात्मनो बहिरर्थस्य ५ परमार्थत्वम् ? अपि च, विरलकेशाधिष्ठानस्यापि धनाकारस्यासत्त्वं कुतोऽवसितम् ? तत्प्रतिभासात् इन्द्रियज्ञानादेवेति चेत् । न ; तत्प्रतिमासस्य तदभावप्रतिभासत्वविरोधात् । अन्यथा- नीलादेपस्तुजातस्य यदेव प्रतिमासनम् । तदेव तदसत्त्वस्याप्यवभासनमापतेत् ॥५१३॥ तद्धनाकारवत्प्राप्तं नीलाद्यसिलमप्यसत् । बहिरर्थप्रत्रादाय दीयतां सलिलाञ्जलिः ।।५१४॥ असत्वोपाधिकरयेन धन एवावभासते न नीलादि ततो नास्ति दोपोऽयमिति चेन्न तत् ॥५१५॥ घनज्ञानस्य मिध्यात्वं कथमेयं प्रकल्प्यताम् ? न ह्यसन्तमसत्त्वेन बुध्यमानं मृपोचितम् ॥५१६।। तस्यापि पनवोधस्य सम्यग्ज्ञानत्वमेव चेत् । निवर्तनीयमभ्रान्तपस्यैवं हि किं भवेत् ॥५१७॥ चन्द्रद्वित्वावमासं चेज्ज्ञानं तदपि दुर्घटम् । असस्त्रोपाधिकस्यैय तद्वित्वस्यापि भासनात् ॥५१८।। तथा प्रतिपत्तिश्चेद्धनाकारेऽपि तत्समम् । तन्न तत्प्रतिमासेन तदसत्त्वायनोधनम् ||५१९|| वदाह-'अर्थ' इत्यादि । अर्थस्य घनाकारस्य अर्यत इति व्युत्पत्तः, ज्ञानं तस्मिन् असतः असत्त्वस्य तदाकारसम्पन्धिन एव प्रत्यासचे प्रतिभासोऽव्यक्तः, 'व्यक्तम्' इत्यनुवर्तमानेन लिङ्ग परिणामेन उपहसनपरेण च सम्पन्धात् 'अव्यक्तः' इति लभ्यते । निदर्शन- २५ माहे-'अभिलापवत्' इति । अभिलापशब्देन तजनितं ज्ञानं गृह्यते, अमिलाप इयाभिलाप. वदिति-अयमों यथाभिलापर्ज विज्ञानं न स्वयमेव स्वविषयस्याभावं गमयति तथा घनाकार- ज्ञानमपीति । भवतु तर्हि बाधकप्रत्ययात्तभावावसाय इति चेत् , कस्तत्प्रत्ययः ? विरलकेश- विषय इति चेत् ; कीदृशास्ते केशा यदधिष्ठान विरलत्वम् । स्थूलरूपा इति चेत् । न ; २० -- 1 प्रत्यक्षत्वात् । ३ विकल्पमिति सः । ३ कुतोऽयस्थितस्तत्प्रतिभासो द्वीन्द्रिय-आ०, २०, २०, स.। -अर्थस्यैत्या-भा०, २०, ५०, स० । ५ -माह अमिलापशब्देन भा०, २०, ५०, स.। ६ -थानत्वं विर-आ०, ब०,५०,०।
- न्यायविनिश्चयविवरणे [११ स्थूलाकारस्यासदूपत्वे तदधिष्ठानविरलभावस्याप्यसदूपत्वेन तज्ज्ञानस्य मिध्यासानत्वात् । न हि मिध्याज्ञानमेव चनाकारप्रत्ययस्य याधकम् , अन्यथमदर्शनात् । व्यवहारतः सन्नेव विरलकेश- स्थूलाकार इति चेत् ;न ; स्तम्भादिस्थूलाकारस्यापि व्यवहारतः सत्त्वाविशेषात् । व्यावहा- रिकमप्रतिपिद्धमेव तत्सत्वं पारमार्थतत्सत्यस्यैव निपेधादिति चेत् ; युतरतग्निपेधः ? विरल. ५ फेशपनाकारनिदर्शनादिति चेत् । तदाकारस्यापि परमार्थसत्याभावात् निदर्शनत्वम्, व्यव. हारसत्त्वाभावावा ? परमार्थमस्वाभावादिति चेत् ; युवस्तस्य तदभावः ? सत्प्रत्ययस्य रखलना- दिति चेत. ; तदपि कुतः ? याधनाद्विरलकेशप्रत्ययेनेति चेत् ; स्यादेतदेवं यदि तस्य परमार्थ- विपयत्वम् , ताशेनैव तत्प्रत्यनीकविषयस्य वाधोपपत्तेः । न चैयम् , तस्य संवृतिसिद्धस्थूल- विरलकेशविपयत्वेन अनन्तरं प्रतिपादनात् । न व नागेन कचित् परमार्यसत्यस्य याधन- १० मुपपन्नम् ; संवृतिसिद्धसिंहजानेा माणयके मनुष्यज्ञानस्य वाधप्रसङ्गात् । तन्न परमार्थ- सत्त्वाभावात्तदाकारस्य निदर्शनत्वम् । व्यवहारसत्त्वाभावात्तु निदर्शनत्वे' ततो व्यवहार- सत्त्वाभाव एव स्तम्मादिस्थलाकारस्य शक्यापादनो न परमार्थसत्त्वाभावः । भवतु तर्हि परमार्थविषय एय स्थूलविरलकेशमत्ययोऽपीति चेत्, कुत एतत् ? वाधकपत्य- योपनिपातपरिपीडारहिवत्यादिति चेत् ; सानो रत्नवृष्टिः पतिता, स्तम्भादिस्थूलाकारप्रत्ययस्यापि १५ तत्पीडारहितत्वेन परमार्थसद्विपयत्वोपपत्तेः । तन्न स्थूलात्मानस्तत्केशाः । परमाण्वात्मान इति घेत; न; परमाणूनामप्रतिभासनात्, सर्वदा स्थलाकारस्येव यहिरवलोकनात् । स्यानातम्-विततत्वमेव स्थूलत्यम् , तच्च परमाणुपरस्परप्रत्यासत्तिरूपमेव मारण्डाय- यविरूपं तस्य कचिदप्यनवलोकनात् । अतः स्थूलप्रतिभास एव परमाणुप्रतिभासः, तत्कथं तद- प्रतिभास इति ? तन्न ; एवं योध्याभावप्रसङ्गात् । केशघनाकारप्रत्ययो "बाध्य इति चेत् । न ; २० एवं तस्यापि केशपरस्परप्रत्यासत्तिरूपचनाकारगोचरवेन यथार्थत्वात् , तादशस्य च बाध्यत्वानु. पपत्तेः । अवविविषय एव घनाकारप्रत्ययः तेन वाध्यत्वमिति चेन्; न; केशप्रत्ययस्यारि तद्विपर्यत्वतः तत्ततिभासत्यापत्त्या परमाणुप्रतिभासनाभावस्यापरिहारात् । अपि च, परमाणूनां प्रत्यासत्या यदि सदिस्याप्रतिरोधः कथं तदात्मक वेतत्यम्, विभिन्नेषु स्तम्भादिपु "तददर्शनात! भेदविभासस्य "तयाप्रतिरोध इति चेत्, न; भेदाव्यतिरेकात् परमाणूनां तत्प्रतिभासस्यापि 'तया तत्प्रसङ्गात । तथा च तत्सत्यासत्तिर्वैतत्यम् इति रिता वाचोयुतिः अनधिगतविपयत्वात् । नीलादितयावभासन्त एव परमाणव इति चेत; तथापि कथं वितला: ? प्रत्यासत्तिकताद् भेदा- . २५ 1- दर्श-आ०,०, ५०, स० । २ खम्भादिस्थूलाकारसत्त्वम् । ३ -स्याप्तदेवं मा०, ५०, , सः। ४ परमार्थविषयेणव । ५-त्याशधो-पा०, २०, ५०, स.1६-स्याबाय-, २०, एम.। ७-खे तया-आ., २०, ५०, स.॥ ८ निधन्वेन। १ याभ्यभाव-भा०, ब०, प., स. १. बाध्यत इति आ.ब०, १०, सन्यते इति चेल ताति-म, व०,'., स!" तदर्शना-भा०, ०, १०, स। १५ प्रत्यासत्या १४ परमाणुप्रतिमासस्यापि । १५ प्रत्यावरण १६ प्रतिरोधप्रसवात् प्रथमःप्रत्यक्षप्रस्ताव . [ १११] नवभासनादिति चेत् , कोऽसौ 'तदनवभासः ? तुच्छोऽवभासप्रतिषेध इति चेत् , न, तुच्छश्च स्थूलश्चेति व्याघातात । अभेदप्रतिभासस्तदनवभास इति चेत् , न, अभेदस्याभावात् । असन्ने वासों प्रतिभासत इति चेत् , न, तत्प्रतिमासस्य विभ्रमप्रसङ्गात् । को दोप इति चेत् , कथं ततो नीलादिसिद्धिः तत्राविभ्रमादिति चेत् , कथं विभ्रमाविभ्रमरूपत्वमेकस्य ज्ञानस्य ' विरोधात् । अविरोधे वा स्थूलसूक्ष्मरूपत्वमप्येकस्य वस्तुनस्तात्त्विकमेवेति नैकान्तेन स्याकारस्यापर- ५ मार्थसत्त्वम् । यत्पुनरस्मिन्नवसरे-'कथं भवद्भी रथ्यासु विप्रकीर्णः केशकलापः पलालपिण्डोऽन्यो वा स्थूल शस्यते व्यवस्थापयितुम् ? न हि इमेऽज्यविनो भवद्भिरभ्यनुज्ञायन्ते, अन्त्यावय- वित्वेन पलालादिव्यक्तीना द्रव्यान्तरानारम्भात' इति सौगतस्य चोदो त्रिलोचनस्य वचनम्- "नैप दोपः, पृथक्त्वाग्रहणनिबन्धनस्य पनप्रत्ययवदस्यापि स्थूलप्रत्ययस्य प्रान्तत्वात्" १० ] इति, तदप्येतेन चिन्तितम् , तथा हि- पिण्डे पलालबोधस्य विभ्रमो बाधनाद्यदि । । पलाले तर्हि तस्यास्तु निर्वाधत्वादविभ्रमः ॥५२॥ तयोरन्योन्यतो भेदे विभ्रमेतररूपयोः । भिनतपतादात्म्याद बोधस्यापि भिदा भवेत् ।।५२१।। बोधद्वितयभावे च तजन्म युगपत्कथम् ? ज्ञानाना युगपजन्म यळ योगेरभीप्सितम् ॥५२२।। कमतश्चेत्तदुत्पत्तिः दृश्यते युगपत्कथम् ।। आशुभावनिमित्तश्चेद्विभ्रमस्तादृशो मतः ॥५२३।। विभ्रमत्यं कुतो योगपद्ये १ बाधनतो यदि । चोधयोस्तर्हि तस्यास्तु निधित्यादयिभ्रमः ॥५२४॥ अगापि पूर्वन्यायेन बोधद्वन्द्वस्य कल्पने । तस्यापि युगपजन्म कथं न्यायविदो भवेत' ॥५२५॥ तजन्मग्रमभा व प्रसङ्गः पूर्ववद्भवन् । सपन कानवस्थानदुस्सहक्लेशमावहेत् ॥५२६॥ एकत्यं चेत्कथञ्चित्स्याद्विभ्रमेतरयोमिथः । भागानां भागिनश्वैवं तादात्म्यं किन्न मन्यते ॥५२७॥ २० ५ भेदानवमास । २ अभेद । ३ पलालबोधस्य । 'पला अपिण्डोऽयम्' इति बोधगतयो विभ्रमे. तररूपयो । ५ योपद्वितीय-भा, १०, १०, स.। ६ युगपद्मानरूप । ७ पूर्वव न्या-आ०, ब०, ५०, स०।८-गवेन आ०, १०,५०, स० ।
न्यायविनिश्चयविवरणे [१११ प्रतीतिरपि तादात्म्यविपर्ययात्र लौकिकी। तन्तयो यत्पटीभूता इति लोकोऽयगच्छति ॥५२८॥ जात्यन्तरमपाकस्य प्रतीतं भागभागिनोः। अन्यथा फल्पयंलोकमतिकामति फेवलम् ॥५२९।। भेदाभेदात्मकत्यं तद्वतन्यं भागतद्वताम् । एतदेव स्वयं देवैरफ सिद्धिविनिश्चये ॥५३०॥ प्रत्यासत्या ययक्यं स्याद्धान्तिप्रत्यक्षयोस्तथा । भागतद्वदभेदोऽपि ततस्तत्त्व द्वयात्मकम् ॥" [ सिद्धिवि० परि० ६ ] इति । सन्न परमाणू नो विवेकानवमासने नीलादितयाप्यवभासनमुपपन्नम् उत्तदोपात् । अविद्यमानश्च परमाणुरूपकेशविरलाकारप्रतिभासः कथं घनाकारप्रतिभासस्य बाधक इत्यनिश्चित- मेव तस्यातदर्थविषयत्वम् , एतदेवाह-युक्ता' इति । युक्तिः पाधोपपत्तिः, युक्तस्यायुक्त: प्रतिभासः, 'अन्यतः' इति पूर्यवदुपहासः । यस्य ? असतः असत्त्वस्य घनाकारसम्बन्धिन इति । निदर्शनमाह-अभिलापवत् । अभिलापादिव' अभिलापयदिति । यथा 'नास्ति १५ घनाकारः' इति वचनमात्रान तस्यावमासः तथा वाधोपपत्तेपि वस्या एवाभावादिति भावः। तन्न केशघनाकारप्रतिभासनिदर्शनेन रतम्भादिस्थूलाकारप्रतिभासस्यासदत्वनिश्चयः साधीयान् । यहपुनरेनत्-अंसदर्थविषयः स्थूलपतिभासो मानसत्वात् मरीचिकातोयप्रतिभासवदिति, तन्नः तस्येन्द्रियभावाभावानुविधायिनो मानसत्वायोगात् । अन्यस्यैव स्खलक्षणदर्शनस्य तदनु- विधायित्वं स्थूलप्रतिभासे तु तत्सान्निध्यात् सदाभिमानिकमेव न वास्तवमिति चेत् ;न, तदन्य. २० स्याप्रनिवेदनात नयनोन्मीलनानन्तरं झटिति स्थूलप्रतिभासस्यैव प्रत्यवलोकना । अप्रतिविदि. तस्यापि भाये ततोऽप्यन्यस्यैव तदनुविधायित्वं पुनरपि यतोऽप्यन्यत्ययेति न क्यचिदस्पिति- भवेत् । एकत्याध्यवसायातदप्रतिवेदन नाभावादिति चेत ; किं पुनरतदध्यासायस्तस्यै स्थूल. प्रतिभासात्पृथग्भाव प्रतिरुणद्धि, स्वसंवेदनं वातथाचे ; सिदो नः सिद्धान्त: 'स्थूलपतिमा- सान्नापरमस्ति' इति । अथ न प्रतिरुणद्धि; कुतो न भेदप्रतिवेदनम्? विद्यन एव तत् , २५ व्यवहार एव तदनुरूपोन भवतीति चेत्, तत्प्रतिवेदन चेत्तत्रं समर्थ सोऽपि फस्मान्न भवति । एकत्वाध्यवसायेन प्रतिरोधादिति चेत् ; न ; सति समर्थे कारये सद्योगात् । 'सामर्थ्यमेव तेन प्रतिरुध्यत इति चेत् ; न ; प्रत्यक्षस्यैव तत्पसङ्गात् । ततस्तस्याव्यतिरेकात् । अत्र फेवल १-मक तक्त-आग, 4०, १०, स०।२-प्रत्यययोस्खया ता. 1 ३ "प्रयात्मकम्"-सिद्धिवि० । ४-फ-मा, १०, २०, २०१५-पास मा०, १०, प., B.1 ६ थरामनियास्य-भा०, २०, ५०, स०। ७ तदनुविधायित्वम् । तथाभि-भा०, ०। स्खलक्षणदर्शनस्य । ९ जनानामा-भा०,०,०,101 १० स्वलक्षणदर्शनास । " 'वा'शब्दः समुचयार्थकः । १२ व्यवहारे । १३ भेदप्रतिवेदनगत व्यवहारसामर्थ्यम् । १४ एकरवाध्यवसायेन । १५ प्रतिरोधप्रसार 1 1 सामान् ।
- १७ ११] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः चोक्तम्-'सिद्ध इत्यादि । असमर्थ चेत् , न ; भेदवत् सचेतनादावपि तदभावप्रसङ्गात् । न चैवमेकत्याध्यवसायेन किनित् । अथ सन्निहितत्वात्तदभ्यवसाय एव लोक व्यवहारयति न भेदप्रतिवेदन तयासन्निहितत्वान, अयमेव च तदध्यवसायेन भेदव्यवहारस्य प्रतिरोध इति चेत् । न तत्प्रतिवेदनमपि यदा सन्निहितम् ; तदा तब्यवहारस्यापि प्रसङ्गात् । तन्नैकत्वाध्य- वसायेन भेदव्यवहारप्रतिरोधात् सतोऽपि भेदप्रतिवेदनस्यानुपलक्षणं किन्त्यभावादेव इति न ५ स्थूलप्रतिभासस्याभिमानिकमिन्द्रियभावाभावानुविधायित्यम् , वस्तुत एव तदुपपत्तेः । अपि च, यदि तत्प्रतिभासो मानस एवं प्रतिसल्यानतो निवर्तेत "शक्यन्ते हि कल्पनाः प्रतिसङ्ख्यानमणेन निवर्तयितुम्" [ ] इति स्वयमभिधानात् । न चैवम, निरंशं विकल्पयतोऽपि स्थूलप्रतिभासानिवृत्तेः, तस्मान्न स्तम्भादिस्थूलपविभासो मानसः प्रतिसङ्ख्यानेनानिवर्तनात् गोरूपस्थूलप्रतिभासवत् । ननु च न गोरूपोऽपि स्थूलाकारः परमार्थ- १० सन्नस्ति परमार्थतो रूपादिपरमाणूनामेव भावात् , घटाद्यवयविव्यवहारस्यापि तदधिष्ठानत्वात् । "यदि तर्हि नावयवी अपि तु रूपादय एव तदा न 'घटस्य रूपादयः' इति भवेत् । न हि भवति 'रूपादीनां रूपं "रूपादयः घटस्य घटः' इति पर्यालोचनं परस्याशक्य धर्मकीर्तिराह- "रूपादिशक्तिभेदानामनाक्षेपेण वर्तते । तत्समानफलाहेतुव्यवच्छेदे घटश्रुतिः ।। अतो न रूपं घट इत्येकाधिकरणा श्रुतिः । भेदश्चायमतो जातिसमुदायाभिधानयोः॥ रूपादयो घटस्येति तत्सामान्योपसर्जनाः । तच्चक्तिभेदाः ख्याप्यन्ते वाच्योऽन्योऽप्यनया दिशा ॥" [प्र. वा० १।१०२-१०४ ] इति । २० अत्र प्रज्ञाकरस्य व्याख्यानम् - "रूपादीनां "प्रतिनियतशक्तिभेदपनाक्षिप्य तेषु समानोदकधारणशक्त्याक्षेपेण घटश्रुतिः प्रवर्तते ततो 'न रूपादयो घटः' इति समाना- धिकरणता । अत एव समुदायशक्तिविवक्षायाम् अयं समुदायशब्दः, जातिशब्दस्तु प्रत्येकमेकफलत्वे यथा वनं यथा वृक्ष इति । कथं तर्हि 'रूपादयो घटस्य' इति व्यप- देशः १ "उदकाहरणसाधारणरूपादिप्रत्ययजननसमर्थाः प्रत्येकमित्यर्थः । अथ यथा २५ - १ सिद्ध इत्यन्यासम-आ०, ०, ५०, स.। "सिद्धो म. सिद्धान्तः' इत्यादि । २ यथा भेद- प्रतिवेदन भेदव्यवहारै असमर्थ तथ।। ३ व्यवहाराभावप्रसशात् । भेदनप्रति-भा०, २०, १०, स० । ५ तस्यानीतरवा-पा०, २०, ५० । तस्यानीलपा-स० । ६ भेइप्रतिवेदनम् । - स्थूलप्रतिभासः । "भशुभाद्यालम्बना रागादिप्रतिपक्षमूता प्रज्ञा प्रतिसङ्ख्यानम्"-तरवस. पं. पृ. ५५७ । ९ तुलना-"न चैतद् व्यवसायारमं प्रत्यई मानसं मतम् । प्रतिसत्यानिरोध्यखादर्थसन्निध्यपेक्षणात् ।"-सिद्धिवि० प्रत्यक्षपरि० । • "यदि तहि नावयवी रसादय एव तदा न घटस्व स्पादयः इति भवेन् । न हि भवति रूपादीनां रूपम् , नापि घटस्य पा घट इति पर्यालोचनं परम्याशझ्याह"-:. वार्तिकाल. २१००। रूपादयः' इति पदमधिक माति। २ प्रतिनियतशतिरे वघटमना-पा०,०प०, स१३ उदयापूरण-स..
१७० न्यायविनिश्चयविवरणे [१९ 'वृक्षाणां वनं वेता बनम्' इति तथा 'घटो रूपादीनां रूपादयो घटः' इति कसान भवति ? भवत्येव यदि शाखान्तरसंस्कारो न भवति । लोकस्तु प्रायशस्तत्संस्कारानु- सारी, ततो न भवति । यस्तु सम्यगवबोधयुक्तः तस्य भवत्येव सं प्रत्ययः 'रूपादय एवं केचित् घटः कार्यविशेषसमर्थाः, उदकाद्याहरणं च कार्यविशेषः; सनिवेशविशेषेण का ५ व्यवस्थिता, यतः सन्निवेशविशेपादुदकधारणविशेषः । 'रूपं घटः' इति तु न भवति सामानाधिकरण्यम् अवयवाक्यविभेदेन परस्परव्याप्त्यभावात् ।" [प्र०वार्विकाल०] इति । ततः कल्पितत्वात् गोरूपस्य मानस एव वत्प्रतिभास इनि कथन्न साध्यवेकल्यमुदाहरणस्येति चेत् ? कथमेवमिन्द्रियज्ञानस्य प्रतिसङ्ख्यानवलादनिवय॑त्वम् ( यत्वे ) भता तत्र गोदर्शनं निदर्शनमुकम् ? सामग्रीसाफल्ये अनिवां गोबुद्धिः अश्वं विकल्पयतोऽपि गोदर्शनादिति १. "तस्यापि मानसत्वे "प्रतिसयाननिवर्त्यत्वात् तदनिवर्त्यत्वं प्रति साध्यविकलत्वेनोदाहरण- त्यायोगात् । तदयमिन्द्रियज्ञानविषयत्वं गोरूपस्य प्रतिपयमान एवं तस्य विकल्पितत्वमप्याचष्ट इति कथमनुन्मत्तो धर्मकीर्तिः ? भारवहनाचेकप्रयोजनसाधनसाधारणरूपादिशक्तिरूपत्वात् अकल्पित एवं गवार्थः । यदाहे-"तेषु समानोदकधारणशक्त्याक्षरेण घटथुतिः" [५० यार्तिकाल०] इति चेत् ; न ; शकरप्रत्यक्षत्वेन दर्शनविषयत्वानुपपत्तेः । प्रत्यक्षत्येऽपि यथेका चाव्यतिरिक्ता १५ च रूपादिभ्यस्तच्छक्तिरभ्यनुज्ञायते; सिद्धस्तर्हि "परमार्थत एव सद्रूपो गौरवयीति "कथमुक्तम्- "अवयवा एव नावयवी विद्यते" [प्र. वार्तिकाल० १२९९] इति ? व्यतिरिक्ताऽवय- व्यभिप्रायेण तद्वचनमिति चेत्न; अव्यतिरेकेऽपि अवयवित्वायोगात्। कश्चिम्यतिरेके योग इति चेतन, स्याहादिमतानुप्रयेशप्रसङ्गात् । तन्नेका शक्तिः। प्रतिरूपादिव्यक्ति भिन्नति चेत् ; कथमेयम् एकगवात्ययविषयत्वमेक्स्यैव ?" अतत्फल. २० हेतुव्यवच्छेदस्य 'तासु भावादिति चेत् ; तव्यपच्छेदतर्हि गोऽवयमी ? सत्यम् ; यदाद- "तत्समानफलाहेतुव्यवच्छेदे" घटश्रुतिः" इति। इति चेत् ; न तहिं तस्य दर्शन- विषयत्वं नीरूपत्वेनाप्रतिबन्धात्, तत्कथमषं विकल्पयतो गोदर्शनादिति निदर्शनोपन्यासः ! तब्यवच्छेदस्य च गोऽषयविरवे तव्यवच्छेदो गोः इति प्रत्ययेन भवितव्यं न रूपादयो गो:' इति । ततो यदुकम्-'यस्तु सम्यगवयोधयुक्तस्तस्य' इत्यादि 'घटः' इति पर्यन्तम् । २५ तदसम्यगयबोधविजृम्भितमेव 'झाकरस्योत्पश्यामः । नव्यवच्छेदस्यशविरूपेभ्यो रूपादिभ्योऽऽय- । , श्वन-भा०,५०,५०,०२ सम्प्रत्यय:-भा.प.स.वातिश-३ यतस्तलिव- मार, २०, सः। यतस्तरसञ्जिवे-१०। ४ भवनात्र भा०, २०, ५०, स.1 ५-वर्सगोधुद्धिमत्व विकल्पयतो गोदर्शनादिति तस्यापि समानत्वे प्रतिसख्याननिवर्यत्वं तदनि-भा०, ९, ०। ६ गोदर्शनस्यापि । प्रति संख्याननिवर्त्यतं प्रति प० । एतस्य आ०, , २०, ०१९ यमाह भा०, ०.१., स... परमार्थ एवं मा०, ब०,०,०1 "कथं युकं आ०,५०, ५०,स. १२ तद्योग्य इ-मा०, २०, २०, स.। भवयविखयोगः। एमतत्कार्यकारणण्यात्तेः। ११ भितशति । १५-दे पर इवि चैन .,. साच्यस्वभावलेन सम्बन्धाभावात् । १७-रछेदा गौ-भा.१८ प्रज्ञाकारस्यो-मा-IN मतवफलण्यवरछेदस्य।
५ २९] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताथा विरेकात् त एव गोरित्यपि प्रत्ययो न दुष्यतीति चेत् ; न ; तस्य प्रतिशक्त्यभिन्नस्य तदत्र्यतिरेके तात्त्विकस्यैवावयविनः सिद्धिप्रसङ्गात् । तुच्छस्य तञ्चवच्छेदस्य तत्साधारणस्य कल्पने 'तव्यवच्छेदस्तहि' इसादेः 'तत्कथम्' इत्यादिपर्यन्तस्य प्रसङ्गस्य पुनः पुनरनुबन्धादा- भिचक्रमापद्यत । स्यान्मतम्-न तद्वयवच्छेदस्यैकत्वादेकगवप्रत्ययविषयत्वम् , अपि तु सन्निवेशविशे- पात् । यदाह-"सन्निवेशविशेषेण वा व्यवस्थिताः"[प्र० वार्तिकाल० १११००-१०२] इति; तन्नः अनापि समानत्वात्तत्प्रसङ्गस्य । तथा हि- रूपादिभ्यो विभिन्नश्वेत्सनिवेशः स एव गौः । न तु रूपादयस्तरमा गौरिति मतिः कथम् ? ॥५३१।। अविविक्तः स चेत्तेभ्यो यद्यखण्डश्च कल्प्यते । वास्तवोऽवयवी सिस्येत् स्याद्वादिभिरभिष्टुतः ॥५३२॥ तेभ्यश्चेदविविक्तः सः प्रतिरूपादि भेदवान् । तद्वत्तस्यापि नानात्वान्मतिरेकगवे कथम् ।।५३३।। सन्निवेशविशेपस्य पुनरन्यस्य कल्पने । पूर्व एव प्रसङ्गः स्यादव्यवस्थाभयप्रदः ॥५३४।। सन्न शक्तिव्यवच्छेदः सन्निवेशेषु कश्चन । गवार्थस्तात्विको यस्य दर्शनं निर्विकल्प॑कम् ॥५३५॥ स्यान्मतम्-अतत्फलहेतुव्यवच्छेदः सन्निवेशविशेपो वा न कश्चिदेकरूपो गौरस्ति, शक्तीनामेव बहीनां तत्त्वात्, एकत्वव्यवहारस्तु तत्रैकार्थक्रियानिबन्धन इति; तन्न; 'तत्समान' इत्यादिकस्य सनिवेशविशेपेण' इत्यादिकस्य चावचनमसङ्गात् । एकार्थक्रियानिबन्धनश्च एकत्य- २० व्यवहारो न तावद्दर्शनसमकालः । ततः पूर्व क्रियाया अभावात् तब्यवहारस्यासम्म- वात् । दर्शनमेव तरिक्रयेति चेत् ; न; तत्कार्यतद्व्यवहारस्य "वत्समकालत्वायोगात् । दर्शनोत्तर- कालस्तद्व्यवहार इति चेत् ; दर्शने तर्हि गोव्यपदेशभाजः परमाणयो विरलारमान एवं प्रत्यवभा. सेरन् । एषमिति चेत् ; कुत एतत्प्रतिपत्तव्यं न चेत्कोशपानं न चेवा बलवन्नरपालशासनम् । अनुभवबलं तु न ताशमुत्पश्यामो यतस्तान्प्रतिपद्येमहि । ततः कस्यचिदप्यवयवित्वेनानवस्था- २५ नात् कथं तदुपसर्जनरूपादिशक्तिभेदाः प्रतिपादोरन्। 'गवादे रूपादयः' इति । वन्न केवलम् 'अश्वं विकल्पयतः' इत्यादिकमेव, अपि तु 'रूपादयो घटस्य' इत्यादिकमपि दुर्भापितमेव । ततो गोदर्शनं निर्विकल्पकमवयव्युपसर्जनञ्च रूपादिशचिविशेपव्यपदेशं विधातुमिच्छता । व्यवच्छेदस्य । २ रूपादयः । ३ चित्तेभ्यः आ०,०, ५०, स४ रूपादिभ्यः । ५ सधिवेशः। 4-रुपनम् भा०,०,५०,०1 ७ गोत्वात् । ८ पर्मवीर्युकस्य । ९ प्रज्ञाकरोतस्य । १ दर्शनसमकालरदायोगात् । 1-मरशास-मा०, प., ५०,स। १२- गोचर उपायः भा०, २०, ५०, स.1 न्यायविनिश्चयविवरणे [९ तात्त्विक एवं गवादिरपयवी वक्तव्यः । तात्विकत्ये तस्य कुतो नाश्यववियनोपलम्भ इति चेत् । न कथञ्चिदवियकस्यापि भावात् । कथं पुनः सूक्ष्माविवेकित्वं स्थूलस्य विरोधादिति चेत् ? कथं शक्तिसामान्याविवकित्वं शक्तिविशेषस्य विरोधाविशेषात ? शक्तिविशेष एव रूपा. दीनां न वत्सामान्यमिति चेत् ; न तेषु समाग' इत्यादिवचन विरोधात् । कल्पितं तेषु ५ सरसामान्यमिति चेत्, न; अतो गौरिति या घट इति वा प्रत्ययस्यायोगात् , कल्पितस्थान- र्थकरत्वात् , अन्यथा नित्यादिप्रद्वेषस्य निर्मिवन्धनत्वापत्तेः । कल्पितादपि तम्मात्कथं वद्वि- शेपस्यावियेको विरोधपरिहाराभावात् ? विवेक एवारित्वति चेत् ; न; 'गादे रूपादयः' इति व्यपदेशाभावमसङ्गात् सम्बन्धाभावात् । सम्बन्धादपि कल्पितादेव तथा व्यपदेश इति चेत् ; 'रूपादयो घटस्य' इत्यादेविरोधात् । फरिपतस्तहिशेप इति चेत्न; ततोऽपि स्पमिति रस १० इति' व प्रत्ययायोगात कल्पितस्यानर्थकरत्यात् । अन्यथा नित्यविद्वषो निनिधनां व्रजेत् । तस्यापि शक्तिसङ्कल्पादकारित्वसम्भयात् ५५३६॥ कल्पितोऽप्यविविक्तोऽसौ शक्सिामान्यतो यदि । कल्पिताकल्पितात्मत्वं विरोधायुज्यते कथम् ? ॥५३७॥ विविक्त एव तस्मात्तस्येति कथमुच्यताम् । सम्बन्धेन विना सोऽपि कल्पितो यदि कथ्यते ॥५३८॥ तस्मादभिन्न तन्छक्तिभेदतवयं यदि । कल्पिताकल्पितारमत्वं विरद्धं भुनरापत्तेत ॥५३९॥ ततोऽपि तद्विवेकश्चेत्सम्बन्धाभावतः कथम् । स तस्येति क्योतिः सौगतस्योपपयते ? ॥५४०॥ पुनः सम्बन्धक्लुप्तौ तु प्राकप्रसद्वानुवर्तनात् । अनवस्थालता व्योमबिस्ताख्यापिनी भवेत् ॥५४॥ ततस्वच्छतिसामान्य वहिशेष इति द्वयम् । न्यायवर्मनि निष्णारवान्तव्यमाञ्जसम् ।।५४२॥ २५ भवतु तात्विकोव शक्तिद्वयम् , सत्तु परस्परं मिन्नमेरेवि घेन ; नदत्तोतरत्यात् । सम्बधाभावेन 'गवाई रूपादयः' इति व्यपदेशायोगात्, कल्पिते व सम्बन्धेऽनवस्थानदोपात.। हेतुफलमात्रे च तस्मिन् क्योरेकसमदत्वाभावप्रसङ्गादिति । परस्परमेदेऽप्येकेन हपादिना साहा- स्यात्तव्यपदेश इति चेत् ; एवमपि न काचित् क्षतिः, स्थूलेतराकारयोरप्येवमन्योन्यभेरे सत्यपि द्रव्येणकेन तादात्म्योपपत्रणयविनो जैनाभिमतस्य मुव्यवस्थानात । ततस्तारिवस्वाद १-देकोपल-मा०, १०, १०, म २-मान्यविवे-प्रा..., स.। प्रशस्तवन । शक्तिधामान्यात् । ५ शविविशेष परमासद) . परस्परमभि-0०,०, प., R.।
९] प्रथम. प्रत्यक्षप्रस्तावः अपि च, गोऽयविनो न तत्प्रतिमासस्य मानसत्वम् , अतो न साध्यकल्यमुदाहरणस्य । नापि साधन- वैफल्यम् , तत्प्रतिभासे प्रतिसल्यानानिवय॑त्व प्रति परस्याविवादात् । तन्न दृष्टान्तस्य कश्चिद्दोपः । नापि हेतोः । असिद्धत्वाहोप एवेति चेत् , न , प्रतिसल्यानेनानिवर्त्यत्वस्य घटादि- स्थूलप्रतिभासे धर्मिणि समर्थितत्वात् । अनेकान्तिकत्वादिति चेत् , न , विपक्षे सर्पादिविषय- मानसप्रतिमासे तदभावात् , तत्र प्रतिसङ्ख्यानानिवृत्तरेव दर्शनात् । विरुद्धत्वादिति चेत्, निश्चितविपक्षव्यावृत्तिकस्य विरुद्धत्यायोगात् । तस्मादसिद्धादिसकलावद्यविकलत्वादनवमिदं साधनम्-घटादिस्थूलपतिमासो न मानसः प्रतिसङ्ख्यानेनानिवर्त्यत्वात् गोरूपस्थूलप्रविभास- वदिति । एतदेवाह-'अर्थ' इत्यादि । सन् घटादिरवयवो तस्य स्वावयवेपु विद्यमानत्वात् तस्य प्रतिभासो धर्मिनिर्देशोऽयम् । अर्थम् अर्थनियासमर्थ स्वविषय जानातीति अर्थज्ञाः 'विच्येवं रूपत्वात् साध्यनिर्देशोऽयम् । 'न' इति 'इ' इति च प्रतिपेधाभ्यामस्यैवार्थस्याभिधानात् । अनेन १० कल्पितविपयत्वप्रतिषेधाद् अमानसत्वं तत्प्रतिभासस्याभिहितम् । हेतुमाह-योजन प्रतिसड् ख्यानकृतं समाधान युक्तं तदभावाद 'अयुक्तः' इति प्रस (प्रतिस)ख्यानेनासगाधेयत्वादिति । दृष्टान्तमाह-अभिलापवत् । अभिलप्यते परेणाभ्युपगम्य कथ्यत इति अभिलापो गोप्रति- भासः स इव वदिति । यो मानसप्रतिभासो नासो सन्निहितार्थो यथा अतीतादिप्रतिभासा, समिहि- १५ तार्थश्वायं घटादिस्थूलप्रतिभास., तन्न मानसः । न हि 'अयं पटः' इत्यसनिहितेऽर्थे भवति । इदं च नः प्रत्यक्षम् ,सन्निहितार्थनिश्चयलक्षणत्वात् । ननु क. पुनरसौ स्थूलो नाम यस्य विषयत्वेन सभिधानम् १ वर्ण एवेति चेत्, न तर्हि स्पृशतस्तत्प्रतीतिः स्यात्, भवति च परिपिहितलोचनस्य स्पृशतोऽपि तवलोकनात् । स्पर्श एवेति चेत् , न, अस्पृशतोऽप्युन्मीलितलोचनस्य तदुप- लन्धेः। "रूपाद्यधिकरणमन्यद्रव्यमेव से इति चेत् , न, 'अय घटः' इत्यत्र वर्णादेर- २० न्यस्याप्रतिवेदनात् । अत एवोक्तम्- "नार्य घट इति ज्ञाने वर्णप्रत्यवभासनात्" । ] इति । सतो न घटादिप्रतिभासश्चाक्षुषो नापि स्पार्शनः, अपि तु तदुभयजन्मा मानस एक, तस्मादसन्निहितार्थ एवायमिति चेत्, ने, रूपादेरन्योन्याविवेकलक्षणस्यार्थस्य सन्निधान एव वन- "तिभासभावात् । कथमन्योन्याविवेको विरोधादिति चेत् १ न, परस्परपरिहारस्यैव विरोधत्वात् । २५ तस्य चैकान्तिकस्यामावात , अविवेकस्यापि प्रतिभासात् । न च प्रतिमासादन्यद्विरोधेऽपि निव- न्धनमस्ति । कुतस्तत्प्रतिभास इति चेत् १ दर्शनादेवेति त्रूमः । 'तद्यदि चाक्षुपम् , स्पर्शादेस्ते- नाग्रहणात् कथं स्वविषयस्य तदविवेकं प्रत्येति तदविवेकपहणस्य तद्हणनान्तरीयफत्यात् ? १ गोल्पस्थूलप्रतिभासे । २-नानिवर्तकव आ., य० ५०, सः । ३-वर्यस्य मा०, ब०, प., स.। ४-ऐ सति तद-आ०, २०, ५०, सः । ५ सद् घटा-मा०, २०, ५०, स०। ६ विच्प्रत्यये सति 'अर्थशा इति सियति । विज्ये चैव रू-आ०,५०,प.स.। ७ नेति च प्रति-भा, २०, ५०, स. ८ स्पर्श कुर्वत । ९ स्थूलप्रतीति । स्थूलोपलधे । रूपाधिक-आ०,१०,५०,०। १२ स्थूल । ५-तिभासाभावा- १" दर्शनम् ।।५-स्य सद्गुइ-मा०, ०.५० । ।
- . न्यायचिनिश्चयविवरणे [२१९ एतेन स्पार्शनं तदित्यपि प्रत्युक्तम् ; सेनापि रूपादिकमजानता स्वप्राह्ये तदविवेकस्य दुनित्वात् , न च रूपादिसर्वस्वविषयं दर्शनान्तरमस्ति यत्तदविवेकमुपदर्शयेदिति चेत् । न ; अविवेकवत् विवेकस्याप्यग्रहणप्रसङ्गात् । तथा हि-न चाक्षुपमेव ज्ञानं स्पर्शादिकमप्रवियत् स्वविषयस्य वैद्विवेकं प्रत्येतुमर्हति, तद्विवेकप्रतिपत्तेरपि तत्प्रतीतिपुरस्सरत्वात् । एतेन सार्शनं बदित्यपि प्रत्यु- ५ तम् ; तेनापि रूपादिकमप्रतियता स्वविपये तद्विवेकस्य दुरवयोधत्वात् , सम्लरूपादिविषयस्य च दर्शनान्तरस्याभावात् न ततोऽपि तदवगम इति कथं दर्शनबलात् परस्परं विविक्तं रूपादिखलक्षणं शकामवस्थापयितुम् ? स्यान्मतम्-रूपादिदर्शनस्य स्पर्शाद्यविषयत्वेऽपि तैद्विवेकस्य स्वैविपयादनन्तरत्रात् स्वविषयं प्रतियत्तमपि नियमेन प्रत्येति अन्यथा अनर्थान्तरस्यायोगादिति ; वदयमरमाक- १० मानन्दहेतुरभूतस्यन्दः । तद्विवेकवत् तदविवेकस्याप्येवमवामोपपत्तेः, कश्चित्पाद्यविवेकस्य रूपादेर्दर्शनविषयादनन्तरत्वाविशेषात् अप्रतिपन्नादपि तद्विपयस्यावियेके दधिरूपस्योट्रस्पर्श- देरप्यविवेकः स्यात् अप्रविपन्नत्वाविशेषात् , ततश्च दधिकरभयोरेकावयवित्वात् दधनि प्रवृत्ति- चोदनायामुट्रेऽपि प्रवृत्तिः स्यादिवि चेत् ;न; वद्विवेकस्याप्येवमव्यवस्थितिप्रसगात् , रूपखल- क्षणस्य हि सर्वस्माद्विवेके स्वतोऽपि विवेक इति नीरूपमेव सदिति तचोदनायामुष्ट्रयद् दधन्यपि १५ न प्रवृत्तिः स्यात् नीरूपस्य व्योमवदशर्यंखादनत्वात् । तथा प फस्यचिद्वरनम् ;--"आका- शमास्वादयतः कुतस्तु कवलग्रहः ?" [ ] इति । सर्वस्माध्यतिरेकित्येतद्विशेषनिराकृतेः। स्वतोऽपि "व्यतिरेकित्वान्निास्वभावं भवेद्दधि ॥५४३॥ तथा च दधि रसदेति चोदिवोऽपीह मानवः । दधन्यपि च नीरूपे वर्त्ततां कथमुष्ट्रवत् ? ॥५४४॥ स्वरूपस्य प्रतिपन्नत्वात् कथं तत एव तस्य व्यतिरेक इति चेत् १० प्रतिपन्नत्वादव्य. तिरेके परतोऽपि न स्यात् तस्यापि फुतश्चित्प्रतिपत्तिसम्भवात् , अन्यथा सत्त्वानुपपतेः "उपलम्भः "सत्येव" [१० वार्तिकाल० २१५४ ] इति वचनात् । अन्यतिरेके प्रविपत्ति- रव्यतिरेकसाधनी, सा च स्वरूप एव न परत्र, तर व्यतिरेकप्रतिपत्तेरेव भावादिति चेत् । २५ न तर्हि दधिरूपस्यापि करभादव्यतिरेको व्यक्तिरेकप्रविपत्तैरेव तत्र मावात् । सत्यपि "सान व्यतिरेकसाधनीति चेत् ; न ; अव्यतिरेकस्यापि 'उत्प्रतिपत्तरसिद्धिप्रसङ्गात् । निधित्वात् ततस्तत्सिद्धिरिति चेत् ; न; व्यतिरेकेऽपि तुल्यत्वात् , तत्प्रतिपत्तेरपि निर्वाधत्वाविशेषात् । न हि लौकिकः परीक्षको वा करभविविक्तदधिरूपनिरूपणोपनियां बुद्धि बाधोपरुद्धामायुध्यते । २० .. १दर्शनम् । २ स्पर्शादिविवेकम् । ३ तद्विवेकविषयस्य भा०, २०, ५०,. स्पर्शादिविवेकस्य । ४ रूपादेः५ स्पर्शादिविवेकमपि । इ-वेका दधि-आ०, २०,९०-वैचोदधि-8-स्य सर्व-भा०,० ५०,०। ८-क्यमापन-भा०, २०,०। ९-रेक्त्वे पार, ०,१०,० .ध्यतिरेक्या-बा, प. प.स.।" सत्येति व-प्रा०,०,५०, स.। १३ "सत्तोपलाभ एवेति भावानो पारमारिंकी" -प्र.पातिकाल. २१५५ । १३ व्यतिरेकप्रतिपत्तिः।।४ भव्यतिरेक्यविपत्ता १२९] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तायः . स्यान्मतम्-येनातिशयेन दधिव्यपदेशनिबन्धनेन करभादधिरूपं व्यतिरिच्यते तस्य व्यतिरेकविधिस्वभावत्वे करभादिव स्पर्शादेरपि दधिगतात्तद्रूपत्य व्यतिरेक एव स्यात् । अतत्स्व. भावत्यै करभादप्यव्यतिरेकापत्तिः, अतो न वर्णस्पर्शाद्यात्मकत्वेनोभयात्मकत्वं दधिद्रव्यस्येति; सदपि स्ववधायैव परशुधारानिशातनं परस्थ; तथा हि-स्पर्शादेरपि येनातिशयेन व्यतिरिच्यते तद्रूपं तव्यपदेशनियन्धनेन तस्यापि व्यतिरेकविधिस्वभावत्वाविशेषात् दधिरूपस्य स्पर्शादेखि स्वरूपादपि व्यतिरेक एव प्रोतः, तस्यातत्स्वभावत्वे स्पर्शानेरप्यन्यतिरकापत्तेः, अतोन वर्णाद्या- त्मकत्वमपि दधिस्वलक्षणस्य, अपि तु नीरूपत्वमेव । तदुक्तमुम्बेकेन (१)- "न भेदो वस्तुनो रूपं तदभावप्रसङ्गतः ॥" [ ] इति। तस्य तद्विवेकविधिस्वभावत्वं स्पर्शादिविषयमेन स्वरूपविषयमिति चेत् ; फुत एतत् ? एवमनुभवादिति चेत् ? किं भवान् अनुभवव्यापारमपि जानाति ? तथा चेत् ; सुस्थितं तर्हि दधिरूपस्य तद्गतस्पर्शादेव्यतिरेकित्वम्, व्यतिरेकित्यश्च करभात् ,अनुभवव्यापारस्यैवमेव प्रतीतेः । एकसामध्यधीनतया कल्पित एव तस्य स्पर्शाद्यव्यतिरेकः, तत्कथं तस्यानुभवविपयत्वं कल्पितस्य सदयोगादिति चेत् ?न; नीलादिरूपस्यापि अविद्याविलासिनीविलासोपनीतशरीरत्वेन दर्शनविपय. त्याभावापत्तेः । तथा च वेदमस्तकवचनम्-"नेह नानास्ति किञ्चन" [पृहदा० ४।४।१९] इति "इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते" [ऋक्०४।७।३३,बृहदा०२।५।१५] इति च । नीलादेरपर १५ दर्शनवेद्यं न प्रतीयत इति चेत् ; न;"तव्यतिरेकशून्यस्यापि तद्वेद्यस्याप्रतीतेः । नीलादिमान प्रतीयत एवेति चेत् ; न ; अन्येनापि 'सन्मान प्रतीयते एव' इति कर्नु (वक्तु) शक्यत्वात् । ननु सन्माने वस्तुसति तव्यतिरिक्त दर्शनमेव नास्ति द्वैतवादापत्तेः, तत्कथं "तस्य तद्- वेद्यत्वमिति चेत् ; न; नीलादिमात्रेऽपि 'परमार्थसति तदभावात् । नीलादिसुखादिशरीरव्यतिरे". किणः तद्राहकस्य "अलङ्कारकारेणानङ्गीकारात । नीलादिसुखादिशरीरयोश्च प्राह्यत्वेन प्राहकत्वान- २० भ्युपगमात् । नीलादिरूपमेव तदर्शनमिति चेत्, सन्मानरूपमेव तदर्शनमपि किन्न स्यात् । सन्मात्रस्य सविवादत्वात्तदनन्तरत्वे दर्शनस्यापि सवियादत्वमिति न तस्य तन्न प्रामाण्यम् , निर्विवादस्यैव प्रामाण्यादिति चेत्, न; नीलादिदर्शनस्यापि तदभावप्रसङ्गात् । अत्यन्तासाधारण- स्य नीलादेरपि विवादाधिष्ठानत्वेन तदनन्तरत्वे तदर्शनस्यापि तदधिष्ठानत्वाविशेपात् । तदर्शन. विवादस्य कुतश्चिदुपपत्तिबलान्निराकरणमिति चेत् ; न; सन्मात्रदर्शनविवादस्यापि तत एव निरा- करणप्रसङ्गात् । तदुपपत्तिबलस्य सन्मानादनन्तरत्वे 'द्विद्विवादविषयत्वात् कुतस्ततस्तदर्शन- विवानिवृचिः विवादास्पदादेव सदयोगात् ? अन्यथा दर्शनादेव ताशात् तद्विवानिवृत्तेः "तब्द- . २५ १ अतिशयस्य । ३ दधिरूपस्य । ३ व्यतिरेकविधानत्वभावाभावे । ४ अतिशयस्यापि । ५ प्राप्त स्यात. रस्तभा-मा०, ५०, प०, स० । ६ इदं मण्डनमिश्रकृतब्रह्मसिदौ (२५) उपलभ्यते । -च तरस्वरू-मा०, प०,५०,०। ८ दधिरूपस्य । ९ उपनिषद्वचनम् । १० स्पर्शायभेदशुन्यस्य । १६ सन्मानस्य । १२ परमार्थसति आ०,०प०,स। १३ दर्शनाभावात् । १४-रव्यतिरेकेण त-भा०, २०, ५०, स०। १५ प्रहाकरणप्तेन । १६-स्स विदा-आ०, २०, ५०, स। १७ तदर्थान्त-मा०, 40, प., स.11८ सन्मादवत् । १९ विवादा. पदा । २० उपपत्तिवलोपकल्पन।
सन्मात्रा १० .. ग्यायशिनिधयपियरणे लोपल्पनफर यासहाय । गाविवादस्यापि सन्यामादुपपचिपलानियतनामिति चेत्, समापि 'प्रान्यामानविनयस्यानोपाना । अथांवरये तु द्वनोपोनिपातारा न मन्मा प्रमाहास्य दर्शनविषयसमिति पत्न; नी गदिम्पलाणविषयदर्शनाधिष्ठानविपादन्यावर्तनपर- रपापि उपपतिपरय शत्म्यमणादन तरत्ये' गद्विपातविण्यस्वेन तानवियादव्यावर्तपरवा. ५ भाषरय द्विवादस्याप्यन्योपपरियामायने अनायादोपाय पाविशेषान । अर्थान्तरत्वेऽपि यदि गरयामामारणापत्वं सदस्य एन संस्य तदनविवानिपर्नयामाषः तस्यापि वम्बरण. पद्वियाभूमिवान् । शद्विपादस्याध्ययमादसाधारणादेयोपपतिश्लानितिरिति घेत, न, द्विनी- याप अनस्थानीयस्य प्रमशाग 1 भयतु माधारणमेय तस्य स्पमिति चेत्, न, यातुमको मयन्मनेनाऽगाया. अयरतुमदेय तत पस्तित्वादिति घेत; न, वादशादेय तदलात नविवादरनिनिसमा मन नामपि ममम्मपनि तपारपीटनादिनि घेत, म, तस्य पस्तिस्येन नीरूपस्य अद्वेनवादमागनीक्रयायोगात् । भीमपात् कथं तद्विवाद- नियनमिति घेत् ? सथ तन एय म्यरमणदर्शनविचाइनिवर्तनमिनि समानः पर्यनुयोगः । सन्माये परनुमति परपनमपि पुनस्तद्वलस्य ? सन एय सन्मात्रादिति चेत; न तस्य स्वय. ज्योतीरूपस्य निन्यमुद्धलेनाभ्यनुशानात् । न च फन्पनाया म "तच्छुद्धिः,"तस्या मिथ्याप्रति १५ भासवनाशुद्धिस्मादिति चेत्., ना "असाधारणसअणवस्तुयादिनोऽपि पुनस्तद्वलस्य कल्पनम् । शानसलमणादेव पुनश्चिदिति चेन् , न, तस्य समवेदनारमनः शुद्धस्येवाभ्युपगमात् , तरच फल्सनारूपस्याशुद्धिदोषस्यानुपपत्तेः । नगनतः शुद्धर्व संबेदनम् स्वरूपापेश्नया शुद्धस्यापि प्रागाकारापेनया" तद्विपर्ययभागात, अन्यथा "अभिलापसंसर्ग" [ न्यायवि० पृ० १३ ] इत्यादेनिधियत्यामलादिति चेत् न, सत्तातत्त्वेऽपि तुझ्यत्वात् , तस्यापि पादयेणेव परि २० शुद्धिभावात् "विपादस्यामृतं दिरि" [यज० पुरुष० ३१६३। छान्दो० ३।१२१६] इत्याम्ना- यात् । पादतः पुनरपरिशुद्धिरेय, तस्य विश्यभूतत्याभिधानात् । नद्भूतानाच भेदप्रतिभासरूप- येनाऽशुद्धिरूपत्वे तदात्मनि तत्पादेऽयशुद्धिं प्रति विवादाभावात् । अन्यथा "पादोऽस्य विश्वा भूतानि" [ य० पुरुष० ३११३। छान्दो० ३।१२१६] इति श्रुतेनिर्विषयत्वापत्तेः । प्रस्त्येव वस्तुनो निर्विपयत्वं श्रुतेः पादतोऽपि तस्य परिशुद्धत्यात , अन्यथा मोक्षाभागानुपात! २५ अशुद्धिपरिक्षये मोन इति चेत् , न , अशुद्धस्तत्पादस्वभावत्वेन तत्परिक्षये तत्पाद स्थापि परिक्षयोपनिपातात् । न चैतत्पy परेपाम् , आत्मपरिक्षयस्य तैरनभ्युपगमात । फेवलमविचारसन्धुरमतिभासमारसावलम्पनैयेयं "पादोऽस्य" इत्यादिका श्रुतिरिति चेत्, न; अमिलापमंसर्ग न्यायधि०] इत्यादेरपि निर्विषयत्वात् परिशुद्धरूपरयैर सवेदनस्य भावात् । २ तु वैतहोपो-आ.,.,म.। मुनेतहोपो-१० । इसे तदविवा-मा०, २०, २०, स.! -नयाभ्यनुपर-आ०, २०, ५०० ५ तस्यादर्श-आ०, २, ५०, ६ उपपत्तिश्लत्या ७ धारणादेव। . उपपत्तिबरम् । ९ तुच्छ स्वभावानुपपत्तिवला ।" उपपत्तिालयावरघुद्ध भा., १०, ५०, स! १२ कल्पनाया । १३ असाधारणक्षणवस्तु-पा, प.स.१४ उपपतिबलत्य । १५-६ खस-4011६-पिप-भा०, प., प०, सका प्राण्यप्रस- भा.प., स.]
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव. १।१] "प्रभास्वरमिदं चित्तं प्रकृत्या" [प्र. वा० १।२१० ] इति वचनात् । मलपरिक्षय एवं प्रभास्वरत्वं न सर्वदेति चेत् । न; मलानां कदाचिदपि वस्तुवृत्तेनाभावात् । "परमार्थतस्तु विज्ञानं सर्वमेवाविकल्पकम्” [ प्र० वार्विकाल० २।२४९ ] इत्यलङ्कारात् । "अभिलापसंसर्ग" [ न्यायवि० ] इत्यादिस्तु श्रुतिवन्निष्टुरविचारपरीपहाक्षम- प्रतिभासमात्रविषय एव । ततः सत्तातत्त्ववादवन्न स्वलक्षणवादेऽपि तादृशं किञ्चिदस्ति ५ यत्तद्दर्शनविवादनिवर्शनपरमुपपत्तिबलमुपकल्पयेत् । प्रतिभासमात्रादेव तर्हि विचारविषवेधविश- रारुशरीरात् तदुपकल्पनम् ; इत्यपि दुर्वलम् ; मतान्तरेऽपि समत्वात् । ततो यदि रूपादेः स्पर्शादिभ्यो विवेक एष, अविवेकस्तु कल्पितः; तर्हि स्वरूपतोऽपि विवेक एव, तदवियेफस्तु कल्पित एवास्तु । ततस्तस्य स्पर्शायविवेकवत् स्वरूपतोऽपि न दर्शनविषयत्वं सत्तातत्त्वस्यैव सर्वत्र सर्वदा सर्वथा च विवेकविकलस्य तदुपपत्तेः। तथा च श्रुतिः-"पश्यन्या एतत् द्रष्टव्यं १० न पश्यति न हि द्रष्टुईटेविपरिलोपो विद्यते ।" [पृहदा० ४।३।२३ ] । स्यान्मतम्-वाइमात्रमेवेदं 'पश्यन्या' इत्यादि ; न हि निरस्तसफलभेदकल्लोलतत्प्रति- भासप्रपञ्चं सत्तातत्त्वमनुभवपथोपस्थापितमुत्पश्यामः । ततो यदि रूपादिरपि न स्यात् निर्वि- वादः शून्यवादावतारः स्यात् , न चायं न्याय्यः प्रमाणाभावात् । ततो न रूपादेः स्वरूपतो विवेकः परस्परत एव तद्भावात् , तथैवानुभवव्यापारस्य निरवद्यस्योपलम्भादिति ; तदपि न १५ समीधीनम् ; निरस्तस्पर्शाद्यविवेकतत्प्रतिभासस्य रूपादेरपि तत्पथोपस्थापितस्यसम्प्रतिपत्तेः शून्यवादावतारस्य तदवस्थत्वात् । ततो न रूपादेर्दधिगतस्य तत्स्पर्शादेविवेकः करभादेव तद्धा. यात् अनुभवव्यापारस्य तथैव संवेदनात् । धर्मकीर्तिनाऽपि तव्यापारानभिज्ञानादेवेदमभिहितम्- "सर्वस्योभयरूपत्वे तद्विशेषनिराकृतेः । चोदितो दधि खादेति किमुष्ट्र नाभिधावति १ ॥ अथास्त्यतिरायः कविधेन भेदेन वर्तते । स एव दधि सोऽन्यत्र नास्तीत्यनुभयं वरम् ॥"[प्र०या०३।१८१-८२] इति । ततः सिद्धं तदविवेकलक्षणावयविसन्निधानसापेक्षत्येन दध्यादिस्थूलप्रतिभासस्य सन्नि- हितार्थत्वं ततश्रामानसत्वम् । "तदाह-'अर्थ' इत्यादि । प्रतिभासः प्रस्तावात् स्थूलाकार- गोचरः स धर्मी, साध्यमाह-अयुक्तः असङ्गतः । कुतः सकाशात् ? असत, अत्यति प्रेरयति स्वविषयेष्विन्द्रियाणीत्यसं मनः तस्मात्तत इति इन्द्रियादेव युक्त इत्यर्थः । निमित्त- माह-अर्थज्ञाने अर्थस्यानन्तरोक्तस्य ज्ञानम् उक्तन्यायेन तत्प्रतिभासं प्रति सन्निहितस्वेनावगमः" .. २० . परीक्षय एव भा०,ब०,१०,१०।२ परार्यतस्तु भा०प०,०स०।३-पवेदषि-आ०,१०,१०,सा ५ सम्मतत्वात् भा०,०,१०, स. 14 दर्शनविषयत्वोपपसे । ६ टप्पमिति पदम् 'एतत्' इत्यस्य टिप्पणभूत सम्पातायातमिति भाति । “पश्यन्वैतान पश्यति"...-वृहदा० । विवेकभापात् । ८ तत्तद्यापारा-आ०,५०, ५०,8.) १ सिद्धान्तादवि-भा०, २०,१०,०11 तथाह भा०,५०,०स-ग भा.ब.प.,स। तस्मा- १७८ न्यायविनिश्चयविवरण (१० तस्मिन् इति, तस्मानिमित्तादिति यावत् । परप्रसिद्ध निदर्शनमाह-अभिलापवत् अभि सम- ताल्लानं सण्डनमामिला तामाप्नोतीत्यमिलापं स्वलक्षणं तस्येव तद्वदिति । तदयमत्र सहमहा- स्थूलाकारावभासोऽयमर्थसन्निधिसम्भवात् । अमानतोऽवगन्तव्य स्वालक्षण्यावभासवत् ॥५४५।। इति । तदेवं स्पादिनानावयवाधिष्ठानस्य तदविकलक्षणस्याश्यविनः पारमार्थिकस्यैव भावा. दुपपन्नं तस्य प्रत्यक्षविषयत्वम् । ततः सूक्तम्-'यहिरर्थस्य ग्रहणम्' इति । न केवलमवयविन एव तरय वद्विपयत्वमपि तु द्रव्यस्यापि अकमवत् क्रमेणापिपरापर- पर्यायाविश्वग्भावस्वभावस्य द्रव्यसंज्ञितस्य स्तम्भादेरविषेधात् । एतदेवाह- परमार्थंकनानात्वपरिणामाविधातिनः ।।९।। इति । १० एकं च नाना च एकनाना तयोर्भाव एकनानात्वम् 'एकत्वं च नानात्वं च' इत्यर्थः, भावप्रत्ययस्य प्रत्येकमभिसम्बन्धात् , स एव परिणामो विवर्तः । परमार्थश्चासौ अकल्पित स्वात् एकनानात्वपरिणामश्च स तथोक्तः, तम्य अविधातः प्रमाणैरप्रतिक्षेपः स विद्यतेऽस्मि- निति परमार्थंकनानात्वपरिणामाविघाती यहिरर्थस्तत्य 'प्रतिभासः' इति सम्बन्धः । कुतस्तत्प्रतिभास इति चेत् ? न; प्रत्यक्षादेव चक्षुरादिजनितात् क्रमानेकस्वभावादिति १५ निवेदितत्वात् । स्यान्मतम्-अपयवेभ्यो भिन्न एयावयवी, पर्यायेभ्यश्च द्रव्यमर्थान्तरमेय पहिरः, अवयवा एव वा, निरवयविनो निद्रव्या एव वा पर्यायाः बहिरर्थः, ततस्तस्यैव प्रत्यक्षात्प्रति. भासोन क्रमाक्रमानेकस्यभावस्येति । तत्राह- प्रतिज्ञातोऽन्यथाभावः प्रमाणैः प्रतिपिध्यते । इति । अन्यथा पूर्वोकादन्येन प्रकारेण भावः सत्वं पहिरर्थस्य प्रतिज्ञातः परेरगी- कृतः प्रमाण प्रत्यक्षादिभिः प्रतिपिध्यते प्रतिक्षिप्यते इति । ततो न तथा बहिरर्थ इति भावः । यदि तस्यान्यथाभावो न प्रतिपन्नः कथं प्रतिषेधः तस्य निर्विषयत्वायोगात ? प्रति- पनवेत् तत्रापि यदा तत्प्रतिपतिर्न तदा तत्प्रतिपेधः प्रविपत्त्यधिष्ठितस्य तदयोगात्, प्रतिपतित एव सत्त्यव्यवस्थितः, अन्यस्य नयवस्थित्युपायस्याभावात् । अन्यथा तु तत्मतिषेधे न सर्वया २५ तदन्यथाभावप्रतिषेधः, प्रतिपत्यवस्थायां तभावादिति चेत्, न ; प्रतिपन्नस्यैव तस्य प्रतिषेधेन समिविपयस्वाभावात् । नापि प्रतिपन्नस्यान्यदेव निषेधः; प्रतिपत्तिसमयेऽपि निषेधात् । तत्समये. ऽप्यसतः कथं प्रनिपत्तिरिति चेत् ? स्यादेतदेवम्, यदि विषयाधीनसत्ताकत्वं प्रतिपत्तेः,नवम्, तंत्र विपयाहेतुत्वस्य निवेदनात । पुतस्तहिं तत्प्रतिपत्तिरिति घेत् !, छात्रादेव । संस्कृत तु फुतश्विदात्मसम्यद्धात् पुद्गलविशेषादिति धूमः । तथा १ प्रयोग: सधैकान्तमान परापरपोयतादात्म्यरूपस्य । तिपेपरम १३ स्था त-मार, ००० प्रति पेवाभावा ५ प्रतिपतौ। रानादेव। . शाम्राकाराण तु । तरतो तात-आ०, २०, २०, स.
१११०] प्रथमा प्रत्यक्षमस्ताचा तादिना शरीरेन्द्रियादिव्यतिरिक्तजीवसम्बर्द्धपुद्गलपरिपाकपूर्वकं मिथ्याज्ञानत्वात् मदिराग्रुप. योगजनितमिथ्याज्ञानवत् । तज्ज्ञानत्वं च तस्य प्रत्यक्षादिना वाध्यमानत्वात् । तदुक्तम्- "जीवस्य संविदो भ्रान्तनिमित्त मदिरादिवत् । तत्कर्मागन्तुकं तस्य प्रवन्धोऽनादिरिष्यते ॥" [सिद्धिवि० पृ०३७३] इति । भविष्यति चास्य तृतीये विस्तर इति नेदानी क्रियते । "भवत्येवम् ; तथापि कथम- ५ सतो विपयस्य तत्र प्रतिभासनमिति चेत् ? तज्ज्ञानशक्ति एव, सतोऽपि तस्य तत एव तदु- पपत्तेः । निरूपितं चैतत्पूर्वमिति न निरूप्यते । यदि प्रतिपत्तिविषयस्याप्यभावो हन्तैवं कथमनेकान्तेऽपि विश्वास इति चेत् ? भवत्ये- वम् , यदि प्रतिपत्तिमात्रात्तत्सिद्धिरुच्येत, न चैवम्, तद्विशेषादेव निप्वाधात् वदभ्युपगमात , तस्य च प्रमाणैः तत्रोपस्थापनात् । यद्येवमनेकान्तविधिपरैः कथं तैरेफान्तप्रतिषेध इति चेत् ? १० ना प्रतिपेधपरत्वस्यापि तेषु भावात्, अन्यथा तैर्विषयेषु स्वरूपादिवत् पररूपादिनापि विध्युप- कल्पनायां नाऽवयवावयव्यादिविभागः, सर्वाभेदापत्तेः । नायं दोषो ब्रह्मवादिनामिति चेत् ; आस्तामेतत् , तन्मतस्य यथावसरं निरूपणात् । एतेन प्रतिषेधपरेप्वपि ते विधिपरत्वमप्यव- बोद्धव्यम् , अन्यथा तेर्विपयेषु पररूपादिवत् स्वरूपादिनापि प्रतिषेधोपकल्पनायामपि न तद्वि- भागसिद्धिः सकलविपयनि:स्वभावतापत्तेः । नायं दोषः शून्यवादिनामिति चेत् ; इदमप्यास्तां १५ निरूपितत्वानिरूपयिष्यमाणत्वाच । ततो विषयाणां परस्परतो विवेकमविवेकश्व स्वतो वदता. मवश्यम्भावी प्रमाणेषु विधिप्रतिपेधपरतया द्वैरूप्याभ्युपगमः । तथा च तान्येव आत्मन्यनेका- न्तम् एकान्तविरोधिनं प्रतिपद्यमानानि तत्र परप्रतिज्ञातं तदन्यथाभावं प्रतिपेधन्तीति किन्नः प्रयासेन ? बहिर्विषय एवाचेतने "तद्व्यापारोपदर्शनेन अस्माभिस्तत्प्रतिषेध"विधानात् । तव्यापा- रोऽपि पराभिमतबहिर्षिपयानुरूप एवेति चेत् ; किं तत्प्रमाणं यस्यैप व्यापारः १ प्रत्यक्षमेवेति २० चेत् ; म; अस्य अवयवावयन्यायकान्तभेदे "तददर्शनात् । अन्यथा तर न विवादः स्यात् , अस्ति च कैश्चित् तत्रात्यन्ताभेदस्य, अपरैः कथबिद्रेदस्य, योगेरेकान्तभेदस्य प प्रतिपादनात् । स्याद्रादिनामपि यदि कथञ्चिद्भदे तव्यापारः कथं विवाद इति चेत् ? न; सत्यपि "तव्यापारे बलवड्यामोहस्यानि (हादनि)अयसम्भवात् विवादोपपत्तेः, निश्चयस्यैव विवाद- विपेधित्वात् । न" चै नैयायिकानाम् , तत्प्रत्यक्षस्य निश्चयैकरूपत्वाद् "व्यवसायात्मकं प्रत्य- तम्" [ न्यायसू० १।१।४ ] इति तल्लक्षणश्रवणात्। स्याद्वादिनामपि निर्णयात्मकमेव प्रत्य- . .. २५ . 1-सम्बन्धपु-आ०,ब०,५०,स.। २ –बज्ज्ञानत्वं तस्य भा०,ब०,५०, स. 1 ३ मिथ्याज्ञानत्वम् । ४-न्तनिर्मितं स. 1५भत्र ताडपनं त्रुटितम् । भवत्येवं प०स०1 ६ शानशक्तित एव । ७ प्रतिपत्तिविशेषादेव । ८ प्रमाणः। ९ प्रमाणेषु । १० -ज्ञानं तद-आ०, २०, ५०, सप्रमागन्यापारोपदर्शनेन । १२ अन्यथाभावनिषेध । १३ तद्दर्शनात् आ०,५०,५०,स० 1 1 चैकस्तत्र भा०, ब०,१०,स० ) १५ बौद्धैः। १६ जैनैः, कुमारिलभट्टानुसारिभिश्व । १७ तब्यापारवलव-आ०, २०, ५०,०। प्रमाणन्यापारे । १८ न चैव वायुफ नैयायिकानाम् ।
१० न्यायधिनिश्चयविवरणे [RI क्षम् "व्यवसायात्मकं ज्ञान प्रत्यक्षम्" ] इति तलमणस्यापि श्रवणादिति चेत् । न; एकान्ततस्तदात्मकत्याभावात् , व्यवसायात्मनोऽपि तस्य कथञ्चिदव्यवसायस्यापि सम्भ. घात् । एकान्तव्ययमायस्यभायाभ्युपगमे हि तत्र तेषां स्याद्वादित्वस्याभावापत्तेः कथन्न स्वमतव्या. पत्तिः ? न चैवं नैयायिकानां तदेकान्तभेदे प्रत्यक्षमनिर्णयस्वभावमित्युपपन्नम् , अवयवावय. ५ व्यादावपि तस्य तत्स्वभावत्वापत्तेः कचिदपि व्यवसायाभावप्रसङ्गात् । न चैतन्न्याय्यम् , "व्यवसायात्मकम्" इति तल्लक्षणस्यासम्भवदोपानुपनात् । 'तेदेकान्तभेद एय तहव्यवसायं नावयन्यादो' इत्यप्यनुपपन्नम् ; व्यवसायेतरस्वभावतया उभयात्मकस्य तत्प्रत्यक्षस्याभ्यनुज्ञाने "तेपामनेकान्तविद्वेपाभावप्रसङ्गात । तस्मात् व्यवसायकस्वभावमध्यक्षमावक्षाणानाम् अवयव्या- दिवत् तद्विपयेण तदेकान्तभेदेनापि व्यवसितेनैव भवितव्यमिति कुतस्तत्र विवादप्रवृत्तिः ? स्यान्मतम्-यथा प्रत्यौनिीतेऽध्यवयवादी सौगतस्य विवादस्तथा यदि तदेकान्तभे- देऽपि को दोप इति ? तन्न; विवादस्यानन्त्यापत्तेः । तथा हि- विवादस्य निवृत्तिर्हि निर्णयादेव नान्यतः । निर्णीतेऽपि विवादश्वेत्कुतः स्यात्तनिवर्तनम् ? ॥५४६॥ अध्यक्षादनिर्वृत्तश्च सोऽनुमानादितः कथम् ? निवत न तस्यापि निर्णयादपरं बलम् ॥५४७॥ तदशक्यव्यवच्छेदो विवादोऽनन्ततां जन् । कथारम्भस्य नेप्फल्यं व्यक्तं वक्ति प्रवादिनाम् ॥५४८॥ विवादस्तन्न निर्णाते युक्तो न्यायविदामयम् । निश्चयश्च विवादश्चेत्यन्योन्यपरिपीडनात् ॥५४९।। यत्तूक्तम्-"यथेत्यादि निदर्शनम् ; तदयुक्तम् ; अवयव्यादी निर्णीते स्थूलादितया सौग- तस्य विषादाभावात् । तसरमार्थसत्त्वे विवाद इति चेत् । न यहिं निर्णात विवादः, तस्य तत्सत्वे निर्णयाभावात् स्थूलादायेव तद्भावात् । "यद्येवं न बहिरर्थपरमार्थसत्त्वं प्रत्याविषय इति"कथमिदमुक्तम्-'अर्थवेदनं प्रत्यक्षलक्षणम्'इति । इति चेत् न, व्यामोहविकलप्रतिपत्रपेक्षया तद्वचनात् , तेपा प्रत्यक्षलक्षणत एव तत्सत्त्वनिश्चयात् । तर्हि तान् प्रति निरर्थकमेव तद्वयन २५ विवादाभावेन तन्निवर्तनस्य तत्फलस्याभावात, प्रत्यक्षस्वरूपनिर्णयस्य च स्वत एव भावादिति चेत्, सत्यम् ; न तान्प्रति तद्वचनस्य तत्स्वरूपनिर्णयनार्थत्वं नापि तद्विपयविवादनिवर्तनफलत्वम्, तथापि न वैफल्यं संशयविशेषव्यवच्छेदार्थत्वात् । वथा हि-'सम्यग्ज्ञानं निःश्रेयसकारणम्" । प्रत्यक्षस्य । २ अनिर्णयखभावत्वापते.1 ३ यदेका-भा०,५०,०, भवयवावरम्यायेकान्तभेदै । * नैयायिकानाम् । ५-६ नि-आ,२०,५०,०। ६-वृत्तिच भा०,१०,१०,स1. अनुमानादेरपि । प्रजेन् आ०, २०, ५०, स. । ९ व्यक्ति भा०, २०, ५०म०। १० यदेत्या-भा०,०प० ।" यदैव मा.., प०स०१२ न्यायविनिश्चये तृतीयश्लोके । १३-क्य वस्तुन ए३ भा.,.,प.स. ४ निर्णयावं । १५-सकरणम् स.। २० । ५ १११०] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव १८१ इति श्रयणात् तेपामपि संशयः-'का पुनरसौ ? सम्यग्ज्ञानवचनस्य विषयः ?' इति । तत्र नापर. स्तद्विपयः किन्तु यदेवेदं भवतां सुप्रसिद्धमात्मार्थवेदनं तदेवेति तद्वचनविपयसंशययुदासार्थ. मिदमभिहितम्-'आत्मार्थवेदन प्रत्यक्षलक्षणम्' इति । एवं परोक्षलक्षणेऽपि वक्तव्यम् । येषां तु सतोऽपि विनिर्णयस्पानुकृपत्वादपरिढो व्यामोहस्तेषां तव्यापायेपदर्शनादेव व्यामोह. प्रध्वंसे निर्विवादत्वसम्भवात् । तत्प्रयोजनपरमिदमपि वचनमनवद्यमेव देवस्य- "न पश्यामः क्वचित्किञ्चित्सामान्यं वा स्वलक्षणम् । जात्यन्तरं तु पश्यामस्ततोऽनेकान्तसाधनम् ॥" [सिद्धिविष्पृ० १२१] इति। न चैवं नैयायिकानां तदैकान्ते प्रत्यक्षस्यानिर्णयत्वमनुत्कृष्टनिर्णयत्वं वा युक्तम् ; अवयव्यादि. मात्रेऽपि तत्प्रसङ्गात् अनेकान्तविद्वेपित्वेन तत्र निर्णयानिर्णययोः निर्णयोत्कर्षानुत्कर्पयोरप्य- सम्भवात् । ततः स्थितम्-नै तदैकान्ते प्रत्यक्षव्यापारो विवादादिति । ततो यदुक्तं व्योम- १० शिवेन-"प्रत्यक्षेण रूपादिव्यतिरिक्तस्य द्रव्यस्यावधारणात्तद्विपर्ययव्युदासः" [प्र०व्यो० पृ० ४४] इति; तत्प्रतिव्यूढम् ; एकान्ततस्तंव्यतिरिक्तस्य तेनानवधारणात्, अन्यथा विवा- दानवतारप्रसगात् । अवधारिते तदयोगादित्युक्तत्वात् । यदृप्यपरमुक्तं तेनैव-"द्वीन्द्रियग्राह्यं तु द्रव्यम् , कथमेतत् ? प्रतिसन्धानात् । तथा हि-'यमहमद्रानं चक्षुपा तमेतर्हि स्पृशामि यं चास्नातं तं पश्यामि' इति । न च १५ द्वाम्यामिन्द्रियाभ्यामेकार्थग्रहणं विना प्रतिसन्धान न्याय्यम्"प्रश० व्यो०१० ४ ४] इति ; तत्रापि प्रतिसन्धानस्य किंविषयमविनाभावित्वम्-कि द्रव्यविषयम्, किं वा तहणविपयम् ? द्रव्यविपयमिति चेत् ; अन्नापि किं तस्य तदविनाभावकथने प्रयोजनम् ? निश्चिताविनाभावात्ततः तत्परिज्ञानमेवेति चेत् ; तेदपि द्रव्यस्येति कुतः ? 'तंदविनाभावादिति चेत् , तर्हि "ततोऽप्य- न्यदेव "तत्परिज्ञानम् । "तस्यापि तदविनाभावात्तत्सम्बन्धिले ततोऽपि तत्परिज्ञानम- २० परमेवेति न वयमवधारयामः क पुनरिदमनवस्थादोपदूरं द्रव्यपरिज्ञानं लभ्यत इति । तन्ना- विनाभावात् तत्तस्येति युक्तम् । स्वयं "तत्परिच्छित्तिरूपत्वादिति चेत् ; न ; प्रतिसन्धान- स्यापि "तत एव तत्सम्बन्धित्वापत्तेः । इष्टमेवैतत् औलूक्यस्येति चेत् ; तर्हि किमर्थ "तस्य "तदविनाभावकथनम् ? तत्परिच्छित्तिरूपत्वनिवेदनार्थमिति चेत् ; न; अप्रतिपन्नस्य तन्निवेदना- योगात् , अविनाभावस्यैव तत्रासिद्धेधूमादिवत् । यक्ष्यते चैतत्-"अन्यथानुपपन्नत्यमसिद्धस्य २५ , . । तेषां तु भा०, २०, प० । एतेषां तु स० । २ -ययोरत्कर्पा-आ., ब०, प., स.। ३न भेदैका --आ., य०,१०,०। ४ रूपादिव्यतिरिकस्य द्रव्यस्य । ५ प्रत्यक्षेण । ६ प्रतिसन्धानस्य । ७द्रव्यविषया- विनाभावकयने । प्रतिसन्धानतः। ९ ट्रध्यपरिज्ञानम् । १० द्रव्याविनाभावात् । " दव्यपरिज्ञानादपि । १२ द्रश्यपरिज्ञानं म्याविनाभावीति परिशानम् । १३ अन्यपरिज्ञानस्यापि। १४-वेन ततोऽपि आ०, ५०, प., स.। १५ अन्यपरिज्ञानादपि । १६ अन्यपरिज्ञानं तदविनाभावीति तृतीयपरिज्ञानम् । १७ द्रव्यपरिज्ञान म्यस्येति । -वारास्यति मा०, ब०, ५०, स०।१८ द्रव्यपरिच्छित्ति । १९ तत्परिच्छिरिपत्वादेव । २० प्रतिसन्धानस्य । २॥ द्रव्याविनाभाविवयनम् ।
न्यायविनिश्चयविवरण [ १११० न सिद्ध्यति।"न्यायवि० श्लो. १२] इति । प्रतिपन्नस्यैव' 'शतस्तनिवेदनमित्यप्ययुक्तम् ; यतस्तत्प्रतिपत्ति तत एव तद्रूपत्वस्यापि प्रतिपत्तेः, तस्य तदनन्तरत्वात्', अन्यथा वद. योगात् अविनाभावनिवेदनानर्थकत्वस्य तदवस्थत्वात्, सण्डशा प्रतिपत्तेश्च निवारितत्वात् । तन्न तस्य द्रव्यविषयमविनाभाविव सप्रयोजनं यतस्तकथनमिति स्थित्तम् । भवतु तद्वंदणविषयमेव तस्याविनाभावित्यमिति चेत; तत्रापि स एव दोप:-किं तस्य' इत्यादिः । अपि च, यदि सस्य "तदविनामावित्वेन "तद्वभासित्वम् । कथं द्रव्ये प्रामा• ण्यम् ? अन्यविपयस्यान्यनं तद्योगात् अतिप्रसङ्गात् । प्रामाण्यमपि तस्य तद्दण एवेति चेत् ; न, "प्रतिसन्धानमर्थसिद्धौ प्रमाणम्” [ प्रशव्यो०५० ४५ ] 'इत्यस्य विरोधात् । न च द्वाभ्याम्' इत्यादिना तस्य तद्रहणाधिनाभावमुपक्रम्य 'प्रतिसन्धानम्' इत्यादिना १० द्रव्ये तत्प्रामाण्योपसंहारं कथं पूर्यापरवेदी विदध्यात्, "उपक्रमोपसंहारयोर्विसंधादादिति चेत १ सत्यम् ; अयमपरः परस्य दोपः। नास्ति दोपः, द्रव्ये तमामाण्यस्य तद्रहणप्रामाण्यद्वारोपनीत- स्यामुख्यस्य 'प्रतिपादनादिति चेत् । न , द्रव्येन्द्रियसन्निकर्पोपनीतजम्मनस्तस्य "वत्र गुख्यस्यैव प्रामाण्यस्योपपत्तेः । न च तत्सन्निकर्पजत्वं तस्यासिद्धम् ; "इन्द्रियमर्थेषु सविकल्पकज्ञानो- त्पत्तौ सङ्केतस्मरणापेक्षम्" [ प्रश. व्यो० ४० ४४ ] इत्यादिना स्वयमेव तत्समर्थनान् । १५ भवतु तर्हि मुख्यत एवं प्रतिसन्धानस्य द्रव्यविषयत्वम् , तस्यार्थकार्यस्य सतो निर्विषयत्वस्या- प्ययोगादिति चेत्न; द्विचन्द्रादिवेदनस्यार्थकार्यस्यापि निर्यिपयत्वदर्शनात् । "प्रतिभासवदर्थत्वेन न निर्विषयत्वमिति चेत् ; नन्वत्र प्रतिभासवानों नामावयवी, तस्य च नानुपलब्धपूर्वरय प्रतिमासनम् , अन्यथा दर्शनस्पर्शनविषयतया तहणायोगात् । न चैवम् , 'यमहम्' इत्यादिना तद्विपयतयैव तस्य कथनात् । उपलब्धपूर्वस्यैव भवतु प्रतिभासनमिति चेत् न ; उपलब्धेर्देश- २० नादिरूपाया अप्रतिभासे तद्विषयतया तस्य प्रतिभासासम्भवात् । भरतु दर्शनादेरपि प्रतिभास इति चेत् ; कस्तत्रेन्द्रियसनिकपः १ संयोग इति चेत् ; न तस्य गुणत्वेन गुणे वृत्त्यभावात, गुणश्च दर्शनादिरात्मनः । तत एव न नस्य श्रोत्रे शन्दरभारादी ममगार, अन्यगुणस्यान्यत्र "तदयोगात् । नापि संयुक्तसमवायादिः चक्षुरादिसंयुक्तऽवयविनि "तस्य समवायाभावादिति कथमतत्सनिकृष्टस्य तस्य प्रतिसन्धाने प्रतिभास तत्प्रसक्षत्वसमर्थनविरोधात् । अस्त्येव २५ सम्बद्धविशेपणभावः तत्रापि सनिकः चक्षुरादिसम्बद्धद्रव्यापेक्षया दर्शनादेविशेषण यात् 'ता. -- प्रतिसन्धानस्य । १ अविनाभावकथन। र तत्परिच्छितिरूपत्वनिवेदनम्। ४ प्रतिसन्धानप्रतिपत्ति । ५तपरिच्छिशिरूपत्वस्य । ६- न तस्य भा०,०,०, स.वं न-मा....1 ८ द्रव्यमहणविषयम् । ९ प्रतिसन्धामस्य । 1. प्रतिसन्धानस्य। "न्यग्रहणाविनामाक्विन । १२ द्रव्यप्रदगावमासित्वम् । १३ द्रव्यमहणविषयस्य । १५व्ये । १५ "प्रतिसन्धान व्यसिद्धी प्रमाणम्"-. प्यो।६हारविसं-स०।१७ व्यग्रहण । १८ प्रतिसाधनात् भा.,०, ५०.स.१९ प्रतिसन्धान । २. द्र। ९९ प्रनिभासमर्थकार्यत्वेन निर्वि-भा, य०, प.स.। २२-नानुपल-आ०, २०, ५०, सा! २३ दर्शनादौ। २४ समवायायोगात् । २५ दर्शनादे. २६ प्रतिमापाने प्रत्यक्षवमनस्य विरोधात २७ विौषणभावस्या प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताया नम्, , १.] वस्य च द्विशिष्टद्रव्यज्ञानान्यथानुपपत्त्येवाधिगमात् । 'द्रव्येणासम्बद्ध दर्शनादि कथं तद्विशे- पणमपि' इत्यपि वार्तम् , 'संयुक्त समवेतं वा विशेषणम्' इति नियमानभ्युपगमादिति चेत् , न, गुणादीनां सम्बन्धाभावे विशेपणभावस्य स्वयमेव निराकरणात् । "नैतदेवम् , गुणकर्म- सामान्यानां समवेतानामेव विशेपणतोपलब्धेः" [प्रशन्यो०० ५०] इति वचनात् । स्यान्मतम्-प्रतिसन्धानसमये दर्शनादेरपरमादपकान्त एव तद्विपयभावः, केवलं तदु. ५ पजनितसंस्काराभिव्यक्विशादविद्यमानस्यैव तस्य प्रतिभासनम् , तत्र च भ्रान्तमेव प्रतिसन्धा- शुद्ध एघ द्रव्ये तदविभ्रमोपगमादिति । तत्रेदमुच्यते-तद्भावाद् द्रव्यमविविक्तं चेत् , तदपि तद्वदविद्यमानगेवेति न प्रतिसन्धानात्तत्सिद्धिः, तद्भावस्य च द्रव्यादविवेके तस्यापि तद्वविद्यमानतैवेति कथं तत्र प्रतिसन्धानस्य भ्रान्तत्वम् ? अपरित्यक्तसदसत्स्वभाषयोः परस्पर- मविवेकादयमप्रसङ्ग इति चेत् , न, रूपस्पर्शयोरप्यनुन्मुक्ततदात्मनोरेवान्योन्यमविवित्तत्वा- १० पत्तेः। नियतेन्द्रियग्राह्यत्वान्नेति चेत्, न, प्रांच्ययोरपि भेदप्रतिभासविषयत्वेन तदभायानुपङ्गात् । यथैव हि नयनस्पर्शनाभ्यां रूपस्पर्शयोहिणमेवं तद्भावद्रन्ययोरपि भ्रान्तेतरप्रतिभासाभ्यामिति न विशेपं पश्यामः । तदुभयप्रतिमासात्मकमेकमेव तविज्ञानं तद्विपयत्वादविरुद्ध एव तयोरविवेक इति चेत् , न, नयनस्पर्शनोपजनितप्रतिभासभेदेऽपि नदात्मकस्य ज्ञानस्यैकत्वात् , तद्विषयत्वेन रूपस्पर्शाविवेकस्याप्यविरोधोपपत्तेः । अस्तु को दोप इति चेत् ' न, तस्यैव द्रव्यवस्थापनात् । १५ विविक्तमेय तद्विपयभावाद्व्यमिति चेत्, तस्य यदि तथा प्रतिभासनं न तर्हि तद्भावप्रतिभा- न हि पीतविविक्तशहावभासने पीतावभासनमुपलब्धम् । तथा चोत्सन्न एव 'थमहम्' इत्यादिरूपः प्रतिभासव्यवहारः स्यात् । नास्ति तथा तस्य प्रतिभासनमिति चेत् , न, अभेदात् द्रव्यरूपेणाप्यप्रतिभासनप्रसङ्गात् । सम्मूछिससत्प्रतिभासेतरस्वभावद्वयं तदेकमेव द्रव्यमिति चेत्, न, सम्मूछितरूपस्पर्शस्वभावद्वयस्यापि" द्रव्यस्यैकस्याभ्युपगमप्रसङ्गात् । तथा च तदेवावयवि- द्रव्यं तस्यैव प्रतिसन्धाने प्रतिभासनात् , 'अस्पाक्षम्' इति तहीनस्य स्पर्शस्य 'पश्यामि' इति रूपस्य 'यं तम्' इति च तद्विवेकस्यभावस्यावयविनरतबाध्यवसायात् नापरं विपर्ययात् । वक्ष्यति चैतत- "स्पर्शोऽयं चाचुपत्यान्न न रूपं स्पर्शनग्रहात् । रूपादीनि निरस्यान्यन्न चाप्युपलभेमहि ॥" [न्यायवि० श्लो०२८५] इति । ततो निराकृतमेतत् "रूपस्पर्शयोश्च प्रतिनियतेन्द्रियग्राह्यत्वादेतत्प्रतिसन्धान न सम्भवति" [प्रश० व्यो० पृ० ४४ ] इति , तत्रैव तत्सम्भवस्य प्रतिपादनात् । सनम् २० २५ - , दर्शनादि घटविशेषणम् “घटदर्शनम्' इत्यादिविशिष्ठज्ञानान्यथानुपपरी । २ "सयुक्त समवेत वा विशेषणमिति नियमानभ्युपगमाच"-प्रश०भ्यो पृ०५० 1 ३-लन्धिरिति मा०,१०,५०,०। ४ दर्शनविषयस्य । ५ विद्यमान एवं 1६ दर्शनविषयभावात् । ७ समावस्यापि । ८ व्यवत् । प्राप्ययोरपि चैतत्न-आ०,०प०,स। द्रव्यदर्शनविषयमावयोरपि । १० द्रव्यस्य । तद्विषयभावविविकत्वेन । १२ - तदभाव-आ०,०, ५०,स० । १३ विविक्तत्वेन । १४ द्रव्यस्य । ।५-खरूपयस्यापि मा०,९०प० । १६ असंरपार्शम् आ० । असमार्शम् स। असमर्शम् प०।
न्यायविनिश्चयविधरणे [१११० यदि च रूपमात्मामेकं द्रव्यं न भवेत् , क्थं भ्रान्तेवरस्वभावमेकं प्रतिसन्धानम् ? सदपि मा भूदिति चेत्, न, तस्येकान्ततो विभ्रमे दर्शनादिविषयत्ववान् द्रव्यस्याप्यसिद्धः । अवि. भ्रमे द्रव्यात्तद्विपयत्वस्यापि परमार्थत एव सिद्धेर्निवेदितत्वात् । अपि च, यदि न संम्भवत्येव भ्रान्तरम्पभावमे संवेदनम , न तर्हि इह प्रामे ५ पृक्षाः' इत्यपि झानं सम्भवेत् । तद्धि मामादाकव्यभिचारित्वेनाभ्रान्तं न इहमारे व्यभिचारात् । इहभागभारे कथ तज्ञानमिति घेन् ? न, अन्तरालादनमात्रेण तद्भावात् । तथाच परस्य वचनम्- "दाद् ग्रामारामयोरन्तरालमपश्यताम् इह ग्रामे वृताः' इति ज्ञानं दृष्टम्" प्रश० व्यो० पृ० १०७] इति । मा भूत्तदपि ज्ञानमिति चेत् , कथं वर्हि 'दृष्टम्' इत्युषम् कथं वा सम यायलक्षणे तापच्छेदार्थ सम्बन्धपदम् ? तदपि तदर्थ नेति चेन् , न , "दृष्टश्च प्रान्तेह- १० ज्ञानस्य व्यवच्छेदार्थ सम्बन्धपदम्" [प्रशच्योगपृ० १०७] इत्यस्य विरोधात् । 'इहाकाशे शनि.' इसपि ज्ञानमेतेन व्याख्यातम् , तस्यापि शकुनायव्यभिचारित्वे- नाधान्तत्वेऽपि इहभाये भ्रान्तत्वात् । आकाशस्यातीन्द्रियत्न तत्र इहेति प्रत्यक्षप्रत्ययायोगात् । तथा च परस्य वचनम्-''अतीन्द्रियेऽध्याकाशे यत् 'यह' इत्यपरोक्षजानं तत्केरल प्रान्तम्" [प्रशयोवृ० १०७] इति । मा भूत्तदपि ज्ञानमिति चेत् , तर्हि कथम् "इहाकाशे शकुनि- १५ रिति ज्ञानं दृष्टम्" प्रश००यो पृ० १०७]इत्युक्तम् ? कथ वा "तद्वयवच्छेदार्थम् आधार्या- धारग्रहणम्" [प्रशयो०० १०७] इत्यभिहितम् । तन्न प्रान्तेतराकारज्ञानपरित्यागः परस्य श्रेयान् । तदपरित्यागे च यथा उदाकारयोः परस्परप्रत्यनीकत्वेऽपि कश्चिदविवेयस्तथा वर्ण- स्पर्शयोरपि इति तदविवेक एवारयी नापर इति नासी चहिरर्थो नापि शुद्धाययवमानम् , च द्रव्यमेकान्तमिनं पर्यायेभ्यः, तस्य सर्वस्यापि 'प्रत्यक्षत एय निषेधात् तस्य तद्विरुद्धाव- २० भासितत्वात् । भवतु तर्हि निर्द्रव्यः पर्याय एव बहिरर्थः, तस्य दीपादिनिदर्शनेन अन्यनाप्यवगमात् । दीपादो च निर्विवाद प्रत्यक्षेणेवाधिगमात् । निर्विवादो हि दीपादौ क्षणभङ्गो पर्याय., प्रत्यक्षा- देव पावलानामपि तत्र सम्प्रतिपत्तेः । धर्मकीर्तिनापि तदुपदर्शनार्थमेव- "तथा हलिङ्गमावालमसंसृष्टोत्तरोदयम् । पश्यन्परिच्छिनत्ये दीपादि नाशिनं जनः "[प्र०या०२११०५] इत्यस्याभिधानादिति चेत्, न, तत्रापि विवादाविशेषात् । कथमन्यथा "न चक्दैकतैलजनित एक एवासी दीपमालामतानःश्वार्तिकाल०] इति प्रज्ञाकरण तस्योपदर्शनम् १ अविद्य- मानस्य तदयोगात । स्वयमुद्भावितस्योपदर्शन मिति चेत् , न, उद्भायनस्य प्रयोजनाभावात । . प्रतिसन्धानस्य । २ भिवतीत्येव भा०,१०,१० स०१३ अन्तरालदर्श-आर,२०,००'इट प्रान्ते "-प्रश०यो । ५ "अतीन्द्रियेऽप्यावाशे हेति ज्ञान देव प्रान्तम्"-प्रशन्यो । ६ सदाबा, 4.प.स.। वर्णस्पर्शायद । ८ नैयायिकाभिमत अवयवात् पृथग्भूत । ९ बौद्धाभिमत 11. प्रत्यक्ष एस मा०, ५०, प... नौलदीपा-मार,२०,.,.
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावा - ११.] परिहारः प्रयोजनमिति चेत् ; नन्वेवमनुद्भावनमेव न्याय्यम्, उद्भाव्यसमाधानस्य खाल्या समीकरणवत् अधुद्धिमलोकव्यवहारत्वात । तन्नायं स्वयमुद्भावितः, परेपामेव भावात् । यदि तत्रापि विवादः कथम् 'अलिङ्गम्' इत्युक्तम् ! विवादब्यवच्छेदस्य लिङ्गादेव भावात्, अन्यतस्त- दंभावस्यानन्तरमेव निवेदयिष्यमाणत्वात् , तस्मादलिङ्गवचनादविवाद एव दीपादौ तत्पर्यायः । तद्विवादोपदर्शनं तु शास्त्रविरुद्धमेव निबन्धनकारत्येति चेत् ; सत्यम् ; अस्त्ययं तस्य दोषः । ५ नास्ति दोपः, सत्यध्यलिङ्गत्वे विवादव्यवच्छेदस्य अन्यत एव भावादिति चेत् ; किं पुनस्त- दन्यदन्यत्र प्रत्यक्षात् ? सदेवास्तु इति चेत् ;न; तदतद्विपयविकल्पानतिक्रमात् । तद्विपयादेवेति 'चेत्, न; दीपादिवेदन्यत्रापि प्रत्यक्षत एव तत्तद्विवानिवृत्तेः अनुमानवैफल्यात् । अन्यत्र तस्यैव विवादनिमित्तत्वान्न ततस्तद्व्यवच्छेद इति चेत्, कुतस्तस्य सन्निमित्तत्वम् ? समानाकारगोचर- त्वादिति चेत्, न; दीपादावपि तदविशेपात् । समानाकाराभावान्नेति चेत्, न; "केवलं तु १० सादृश्यात् समानसामग्रीतो वा स एवायमिति व्यवहारः" [प्र० वार्तिकाल. ] इति तत्सारश्यानुवादिन्या अलङ्कारचूर्णेविरोधात् । तन्न तद्विपयादेव प्रत्यक्षातव्यवच्छेदः । तदन्य- विषयात् ; इत्यप्यसङ्गतम् ; अतिप्रसङ्गात्-नीलप्रत्यक्षादेव लोहिते पीतव्यवच्छेदापत्तेः। तन्न प्रत्य- क्षत्वे (ई) तदन्यत् । तर्हि तदुत्तरकालभावी विकल्प एव तदन्यः, तत एव संव्यवच्छेद इति चेत्, न ततोऽपि अप्रमाणात्तदयोगात् , अतिप्रसङ्गात् , प्रमाणसिद्विप्रयासवैफल्याच्च । प्रमाण. १५ मेवासी प्रत्यक्षत्वेनेति चेतन; उक्तोत्तरत्वात् । तृतीयप्रमाणत्वे च प्रमाणसख्यानियमव्यापत्तेः। सतः एकदा' इत्यादेविवादस्य यब्यवच्छेदकमुक्तम्- "यदि प्रथमसम्पातमात्रादुत्पत्र एव सः। कालान्तरण्यापितया वृथा तैलाद्यतः परम् ।।" [प्र०वार्तिकाल० २६१०५] इति; तदपाकृतम्, तस्य प्रत्यक्षत्वे तद्बलभाविविकल्पत्वे व दोपस्योक्तत्वात् । अनुमानविकल्प एवार्य विकल्पः कश्चिदिति चेत् ; ननु तद्विकल्पस्य लिलायत्तत्वात् लिङ्गादेव तव्यवच्छेद इत्यायातम् , तथा च स एव "शास्त्रविरोधा, तत्रालिङ्गवचनेन विवादाभावस्य प्रतिपादनात् , निबन्धनकृता" तु विवा- दत्य लिङ्गतस्तव्यवच्छेदस्य चाभिधानात् । स्यान्मतम्-अलिङ्गवचनानिर्विवादत्वं चरमसमय एव शास्त्राभिप्रेतं तत्र यालादेरप्य- विवादस्यैव नाशदर्शनस्य भावात् । न च तत्रैव विवादः, लिङ्गतस्तव्यवच्छेदो वा निबन्धन- कृता निरूप्यते, पूर्वपूर्वतत्पर्यायेष्वेव तन्निरूपणात् तत्रैव दर्शनस्य साश्यविपयत्वेन विवाद- निमित्तत्वात् , न घरमपर्याये तत्र तदुत्तरपर्यायस्यानुत्पत्ते, दर्शनस्य तत्सादृश्यविषयत्वाभावात् तत्कथं शास्त्रविरोध इति ? तन्न; 'नाशिनम्' इत्यस्य मध्यमपर्यायापेक्षयैव ब्याख्यानात् "अतादवस्थ्यं विनाशोऽनित्यतेति च व्यपदिश्यते" [प्र. वार्तिकाल०] इति । तदपि २० . सनित्या । २ तवमासनस्य आ.ब.प.,स०१३ प्रज्ञाकरस्य । ४ तदेवासोति भा०,५०,०स० ५ प्रत्यक्षस्यैव । विवादनिमित्तत्वम् । विवादल्यवच्छेदः 1 4 विकल्पः । ९ "कालान्तरस्थायितया"-प्रवाति- काल-11प्रमाणदार्विक 1 ११ प्रकरणुप्तेन अलङ्कारकना।
न्यायचिनिश्चयविवरणे [१t. चरमपर्यायापेक्षमेवेति चेत् ; ; "न च प्रदीपादीनां तादवस्थ्यम् अपि परापरतलो. पादानजन्यमाना परापरैव प्रदीपज्वाला" [प्र० वार्तिकाल० ] इति तत्रैव तद्व्याख्यानस्य समर्थनाद । घरमपर्यायापेक्षायां परापरेसनुपपत्तेश्वरमविरोधात् । ततो दुरुत्तर एवायं शात्र- विरोधः परस्येत्यलं निवन्येन । विवादस्तु विद्यत एव, तत्कथं सति तस्मिन् दर्शनादेव दीपादौ ५ क्षणभङ्गसिद्धिः अतिप्रसङ्गात् ? व्यवच्छिन्ने विवादे भवत्येवेति चेत् ; कुतस्तव्यवच्छेदः ? यदी. त्यादेविचारादिति चेत् ; न; कथञ्चिदक्षणिकत्वेऽपि प्रदीपादेरपरापरनैलादिना त्रैवापरापरस्याति- शयस्योपकल्पनात् । न च तस्य तस्मादेकान्तेन भेदो यतः सम्बन्धाभावान्न तस्येति व्यपदिश्येत, तेन वा संदन्तरस्य करणेऽनवस्थानं भवेत् , अपि तु अभेद एव । सोऽपि नैकान्तिकः, येन प्रदीपादिवत्तदतिशयस्यापि तदात्मनः प्रथमतैलादिसम्पातादेवोत्पत्तेरपरापरतत्सम्पातस्य वैयध्यम, १० तदतिशयवद्वा प्रदीपादेरपि तदात्मत्वेनापरापरस्वभावत्यादेकान्तिकमनित्यत्वमापद्यत भेदाभेदयो. रनेकान्तेनाभ्यनुज्ञानात् । न चैतद्वचनमानमा प्रत्यक्षेणैव भेदेतरात्मना प्रसिद्धत्वात् । न च तस्य तदात्मत्वमसिद्धमः अनुभवसिद्धत्वात् । यदीत्यादिविचारस्याप्यन्यथानुपपत्तेः । निरूपित चैतत् 'आत्मनाऽनेकरूपेण' "इत्यादी । सन्न विचाराद्विवादृव्यवच्छेदः तस्य तदनुकूलत्वात् । ततो न कचिदपि प्रत्यक्षानिर्विवादात् क्षणभद्गसिद्धिः, यतो निद्रव्यः पर्याय एव बहियों. १५ वविष्ठेत, सद्रव्यस्यैव तस्यावस्थानात, तत्रैव प्रत्यक्षस्य निर्विवादत्योपवर्णनात् । परमक्षणेऽपि किमेवं नावविष्यत इति चेत् । क एवमाह 'नावतिष्ठते' इति ? तर्हि कुत्तस्तदुत्तरक्षणे नोपलभ्यत इति चेत् ? अनुपलभ्यत्वेन परिणामादे । अविद्यमानत्यादेवानुपलभ्यत्वं किन्नेति चेत् १ न, वरमक्षणस्यावस्तुत्वप्रसङ्गात् अकार्यकारित्वात् । स्वविपयज्ञानकरणान्नैवमिति चेत्, न, सजातीय- करण एव विजातीयकरण नान्ययेति निवेदयिष्यमाणत्यात् । तन्न प्रत्यक्षं पराभिमतबहिर्विष- २० यानुरूपं तस्यानेकान्तानुरूपस्यैयोपलम्भात् । नापि प्रमाणान्तरम, तरयाप्यनेकान्तनियतत्वेन निवेदयिष्यमाणत्वात् । तथा चानेकान्तस्यैकान्तनिषेधात्मकत्वेन प्रमाणः तद्विधरेव "तन्निपेषत्वो. पपत्तेरुपपन्नमेतत्- प्रतिज्ञातोऽन्यथाभावः प्रमाणः प्रतिषिध्यते ॥१०॥ इति । तदेवं "व्याख्यातमिन्द्रियप्रत्यक्षं व्यवसायात्मकम् । तत एव प निदर्शनात् अनिन्द्रिय- प्रत्यक्षमपि स्वसंधेदनापरसम्झर्क व्यवसायात्मकमवगन्तव्यम् । स्वसंवेदनं प्रत्यक्षत्वात् इन्द्रियप्रत्यक्षवत् । न चेदमाश्रयासिद्धं साधनम् ; सर्वज्ञानानां खरूपवेद नस्यान्यनिरपेक्षप्रतिभासत्वेनालधनाहत्वात् । तत्मतिभासत्व एय विवाद इवि घेत् । न, तथा हि-व्यवसायात्म .२५ १ तनियन्धेन मा०,३०,५०,स. 1 २ यदित्या-आ०, ५०, १०, स. यदि भयमसम्पातमात्रानुसा' इण्यादिविचारात् । ३ -रतेलादीनामौका-प-!-रलादिनामवा-प्रा०प०स. 1 ४ अतिशयस्य । ५ दीपा । अतिशयेन। भतिशयान्तरस्य । ८ प्रदीपामन. १ अनिशयामकन । १. प्रत्यक्षस्य । दि.लो.। १२ "उतच-सतो न माशो दौरस्तुम पुगलमावतोऽति"-डा.नि.11-यारणामान्य भा०,०, ५०,०।१४ तनिषेधोप-भा०, २०,१०, स.11५ पाश्यानमि-मार,.,.,..
, २०११] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तायः नीलज्ञानादन्यस्य तद्वेदनस्याननुभवान्, तस्य च प्रतिभासनाद्विचादानुपपत्ते, अन्यथाऽर्थप्रतिभा- सेऽपि विवादात् न बहिर्नान्तः प्रतिभास इत्यन्धकल्पं जगद्भवेत् । तदाह- परोक्षज्ञानविषयपरिच्छेदः परोक्षवत् । इति । परोक्षं स्वप्रकाशविकलम् । ननु परोक्षमस्पष्टमिति प्रसिद्धं तत्कथं 'स्वप्रकाशविकलं तदुच्यते' इति चेत् ? न ; व्युत्पत्तिभेदेनार्थद्वयप्रतिपादनात् । अक्षमिति हीन्द्रियम्, तच्च ५ वैशयहेतु, आवरणविगमविशेषाधिष्ठानं जीवप्रदेश एवोच्यते तस्यैव मुख्यत इन्द्रियत्वात्, तत्प्रति- गतं प्रत्यक्षमिति स्पष्टप्रतिपतिः, तस्मात्परावृत्तमवैशधकारणावरणाधिष्टानजीवप्रदेशोपनीतं परोक्षमित्यत्रास्पष्टप्रतिपत्तिः । यदा अक्षणम् अर्थवत्स्वरूपस्यापि ग्राहकत्वेन व्यापनम् अक्षः, तस्मात्परावृत्तं परोक्षमिति, तदा स्वप्रकाशवैकल्यप्रतिपत्तिः । अन च स्वसंवेदनामावस्य प्रक्रमादयमेवार्थों गृह्यते नास्पटुत्वं विपर्ययात् । ततः परोक्षं स्वप्रकाशविकलं ज्ञानं येषां ते परोक्ष-१० ज्ञाना याक्षिकाः, तेषां विषयपरिच्छेदो परितः छेदो व्यावृत्तिर्यस्य सः परिच्छेदः, विपय- श्वासो परिच्छेदश्च विषयपरिच्छेदो माहाविशेष इत्यर्थः । परोक्षं विषयि सेन समानं वर्तते इति परोक्षवत् , सोऽपि परोक्ष एय भवति विवादाविशेषादिति भावः । लोकप्रसिद्धमप्येतज्ज्ञानानामात्मवेदनम् । याक्षिकस्य विवादाच्चेन्न भवत्येव तत्त्वतः ॥५५०॥ अर्थवेदनमप्येवं न भवत्येव तादृशम् । सत्रापि विवदन्ते यत्प्रयुद्धा बुद्धशासने ॥५५१॥ अविज्ञाने च बाह्यस्य तद्विशेपैः कथं पुनः । यज्ञं कुर्वीत येनायं याज्ञिकः स्वर्गमाप्नुयात् ५५२॥ अज्ञातस्येव यज्ञस्य करणं यदि कल्प्यते । व्यर्थिका धर्मजिज्ञासा किन्न स्याटेदवादिनाम् ॥५५३॥ अपरिज्ञातमेवास्ति नापि वरकरणं कचित् । सर्वेपी यज्ञकारित्वमन्यथा स्यादनाकुलम् ॥५५४॥ अर्थग्रहः प्रसिद्धोऽयमवलापालकवपि । विवादं विदधीवास्मिन्ननुन्मत्तो जनः कथम् ? ॥५५५॥ इत्यपि स्वगृहे तुल्यमुत्तरं निश्चयागतम् । तस्मात्स्वयेदनं सर्वज्ञानानामनुपद्रयम् ॥५५६॥ तथा प यदुक्तम्- "यदा तु ग्राद्यपाकारं नीलादिं प्रतिपद्यते । न तदा ग्राहकाकारसंविचिदृश्यते छचित् ।।" [मी० श्लोशून्य०७४] इति । २० .. ३० संपर्यापा-मा०, प., स.वं पया-र• ! २ थरिमाने मा०, २०, प., स.।
- पदर्शनात , - म्यायविनिश्चयविवरणे [२९ तत्र कीटशस्य तदाकारस्य सविचिर्न दृश्यते । नगदेव्यतिरिक्तस्येति चेत् , न कावित क्षतिः अस्माकमपि वदनिः। व्यतिरिक्तस्येति चेत् ; न, नीलवदहमिति सदाकार- स्यापि दर्शनात् । अहम्बुद्धापात्मन एव दर्शनं न नीलवेदनस्येति चेत् , न, नीलपदणस्वभावस्यैव अन्यथा नीलस्य कर्मत्वेन प्रतिमासविरोधात् । तद्ब्रहणस्वभावत्वमप्यात्मन ५ एवेति चेत्, अनर्थकमेव तर्हि ज्ञानं तत्प्रयोजनस्य विषयपरिच्छेदस्यात्मन एव भावात् । ज्ञानस्य तन करणत्वान्नानर्थकत्वमिति चेत् , न , कार्यस्यैव करणापेक्षणात् । न चात्मा कार्यम् , तस्य नित्यत्वात् । अनित्य एव विषयपरिच्छेदपर्यायावस्येति चेत् , न ; नगापि चक्षुरादेरेव प्रतीतस्य करणत्योपपत्तेः । ततो दुर्भाषितमेतत् - 'परोक्षात्मनो बुद्धिः" इति, युद्धेरेयाभावात् । सत्पर्याय एव घुद्धिरिति चेत् , न सर्हि तस्य परोक्षत्यम् अहम्बुद्धौ प्रत्यवभासनात् । तत्रापि १० न शक्तिरूपेण प्रतिभासनमिति चेत् , अस्तु तस्यैवं परोक्षत्वं वत्पर्यायस्य सु कथम् । तस्यापि तव्यतिरेकादिति चेत्, न तर्हि नीलादेरपि प्रत्यक्षय तच्छक्तिरूपातस्याप्यव्यतिरेकात् । प्रत्यक्ष मेव तस्य तद्रूपमिति चेत्, न , सस्यातीन्द्रियत्वोपरामात् । अन्यथा "तत्र प्रत्यक्षतो ज्ञाताहाहा. दहनशक्तता" [ मी. इलो० अर्था०३ ] इत्यादेरापत्तेफल्यात् । तथा चेर्दमपि दुर्भापित- मेवे-'प्रत्यक्षोऽर्थः" [ ] इति । ततो यथा पपेक्षत्वेऽपि "तपस्य प्रत्यक्षमेव ५५ नोलादिकं तथैवानुभवात् , तया तत्पर्यायोऽपि", नत्रापि तथाऽनुभयस्याविशेषात् । "मुतश्वेद निश्चितम् 'सकलं ज्ञान प्रकाशविरुलम्' इति ? "व्याप्तं चार्थसंचित्तौ"नात्मानं ज्ञातुमर्हति । तेन प्रकाशकत्वेऽपि योघायान्यत्प्रतीक्ष्यते ॥ "ईदृशं या प्रकाशत्वं तस्यार्थानुभवात्मकम् । सति प्रकाशकत्ये च व्यवस्था दृश्यते यथा !! रूपादौ चतुरादीनां तथानापि भविष्यति । प्रकाशकत्वं चाहोऽर्थे शक्त्यभावातु नात्मनि।" [मी०सोशून्य०१८४-८७] इत्यादेविचारादिति चेत् , उच्यते-यद्ययं विचारः सकलज्ञानान्त.पातिनमात्मानमपि वप्र. काशविकलमति, कथं सकलमपि ज्ञानं स्वप्रकाशविकलं विचारज्ञानस्य स्वप्रकाशप्रसिद्ध २१ अथ नावैति, कथ सकलज्ञानानां स्वप्रकाशबैकल्यमवगतम् , विचारशानन्य सदनवगमात् । तस्यापि विचारवानान्तरात्तदवगम इति चेत् , न, "तदन्तरस्याप्यपरतदन्तरात् तदुवामेऽन. २. 1 अहम्बुद्धौ। ३ नीलमदणस्वभावत्वमपि । ३ आत्मन । ४ "तस्मादप्रत्यक्षा बुद्धि"-मारमा !! ११५ ! ५ आत्मपर्याय एव । ६ शचिस्पस्यैव । " नीलादे । ८ शक्तिरूपम् । १ आकारमान् शाह्योऽर्थ , सी बहिर्देशसम्बद्ध प्रत्यक्ष मुपलभ्यते ।"-शावरमा०1111५1१. शातिरूपस्य सात्मपर्याशी कुत- शिदनि-आ०,व०,१०,१०१ १३ 'ज्ञान नारमानमन्छति -मी. इलो. 1 11'ईदर्श वा प्रकाशत्व तस्यानि भवात्मकम् । न चात्मानुभवोऽस्त्यस्येत्यात्मनो न प्रशासकम्।"-मौलो विचारसामानपिखामानं स्वप्रकाशविकलमनुभदनी विचारस्य स्वप्रकाशश्वमेशयातमिति भाव । १५ तदनन्तरस्या-मा, २०, ५ ..
" । २।११] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः वस्थादोपात् । न तद्दोषः, यावच्छ्रममेव विचारतानपयन्धोत्पत्तेः, प्रत्युत्पन्ने तु अमे तत एव तद्विनिवृत्तः, अभिरुचेस्तन्निवृत्तिवाञ्छया' वा तद्विच्छित्तेः। न हानभिरुचितं विचारमानं प्रबन्धु (प्रबधु ) मईति । विषयान्तरसम्पर्काढा तव्यावृत्तः । दृश्यते हि कविन्नीलज्ञानस्य प्रवर्त्तमानस्यापि पीतादिसन्निधावनवस्थानं पीतादिज्ञानस्यैव तदा प्रादुर्भावात् । तदुक्तम्- "यावच्छ्रमं च तद्बुद्धिस्तत्प्रबन्धे च सत्यपि । समारच्या(श्रमादुच्या न्यसम्पर्काद्विच्छेदो विपयेचिय" [मी०इलो शून्य०१९३] इति चेत् ; भवत्ययमनवस्थादोपस्य परिहाये न पुनः सकलसंवेदनस्वप्रकाशवैकल्यापरि. ज्ञानदोपस्य, तस्य तदवस्थत्वात् । ततस्तमपि दोपं परिजिहीर्पता सुदूरमनुसृत्यापि विचार- शानं स्वपरप्रकाशरूपमुररीकर्त्तन्यम्, अन्यथा स्वगतपरोक्षतायारतेनाप्रतिपत्तेः उक्तदोपापरिहारात् । एतदेव दर्शयितुमाह-परीक्ष' इत्यादि । परोक्षं स्वप्रकाशविकलं ज्ञानं जानातीति परोक्षज्ञाः १० मीमांसकरय सम्बोधनमेतत् । विचिप्रत्यये सति एवंरूपसिद्धिः। विषयपरिच्छेदो विपयस्य सकलज्ञानपरोक्षतालक्षणस्य परिच्छेदो विचारः परिच्छिद्यतेऽनेनेति व्युत्पत्तेः, स न परोक्षवत् परोक्षश्चक्षुरादिः स्वप्रकाशवैकल्यात् तद्वन्न तत्समानो न भवति, स्वप्रकाशस्यापि तत्र भावा- दिति भावः । ततो यथा विचारज्ञानस्य स्वप्रकाशत्यमपि तथैव निर्वाधादनुभावात् तथार्थज्ञान- स्यापि तदस्तु सदविशेपात् । तच्छक्तरपि तत्र तत एव विचारज्ञानवदधिगमात् । ततो नेदं पर्या- १५ लोचितवचनम्-'प्रकाशकत्यम्' इत्यादि । यद्यर्थज्ञानस्य 'विषयवदात्मन्यपि व्यापारः सर्हि चक्षुरादे स्पादिवद्रसादावपि व्यापारः बुन्तो नेति चेत् १ 'तथैोऽदर्शनात्' इति धूमः । तथा स्वरूपन्यापारस्यादर्शनम्, तदर्शनस्य निवेदितत्वात् । सत इदमपि "तादृशमेव-'सति प्रकाशकत्वे च' इत्यादि । तेन 'प्रकाशकत्वेऽपि' इत्यादि पुनः अनुभवप्रत्यनीकत्वादेव प्रतिविहितम् । किंवा तदनक्शेधे परिहीयते यतस्तदवयोधायान्यप्रतीक्षणम् ? अर्थप्रकाशनमेव, अपरि. झार"अपरमा)नादप्यपरिक्षातादर्थज्ञानप्रकाशनायोगात्, "वदपि स्वप्रकाशनाय ज्ञानान्तरं प्रतीक्षेत । "तदपि तदपरं ज्ञानान्तरमित्यप्यरापरज्ञानप्रतीक्षायामेवासंसार व्यापायन प्रथमज्ञानस्य प्रकाशनम्, “तदभायादर्थस्यापि न प्रकाशनमित्युपरतमिदानी वेधवेदकभारेन,तवो दूरमनुसृत्यापि फस्यचिदपरिक्षावस्येव" स्वविपयप्रकाशकत्वे प्रथमज्ञानस्यापि तद्वत्तदुपपत्तेः व्यर्थमेतत्परिमानार्थ. मन्यप्रतीक्षणम् । "वन्न अर्थज्ञानापरिज्ञानेऽर्थप्रकाशनस्य "परिहाणिः । अर्थज्ञानरमरणस्य सहि परिहाणिः, अपरिमाते तस्मिन् वदयोगात् तस्य परिझातविषयत्वात् । अस्ति प तज्ज्ञानस्य २० १ तषित-आ०,०, प., स.। अनवस्थानिरीः। ३ वाश्याया ता । ३ अनवस्थाविच्छिते। "अनवस्था पारः। ५ समाहत्या-1०।६-गर्माप मा., ०,१०, सनिर्वापानुमादेव । -न. दषि-भा, प.स. -शानादधि-ए। श्येयसदात्म-स.1 विषयवसादारम-प० । विषयवसाम- भा.,.1.---भा०, २०, ५०, साभार्यालोचितमेव । १३ स्वरूपानवरो।सद्विती. पशनात् । १४ द्वितीयशनमपि । १५ ही शनम्। प्रथमज्ञानप्रशासनामारे। "-रिनाले स.. ८ घनानापरिक्षाने भा०,०,०, स.१९ परिहाणे: भा.,.,.स. २प्रपमराने ।
سه म्यायविनिश्चय विवरण स्मरणम् परिक्षातो मया घटः' इत्यत्र विषय[पन] चिपयिणोऽपि प्रतिभासनात, • ततस्त- वन्यथानुपपत्या अर्थज्ञानस्य परिक्षानमवगम्यत इति चेत् ; न; भ्रान्तस्य 'वस्यासत्यपि वत्सरिक्षाने सम्भवास् , कचिदशतपूर्वेऽपि 'स' इति स्मरणविभ्रमयोपलम्मात् । अभान्तमेव स्मरणमिति चेत् ; कुन एतत् ? सत्येव तत्परिणाने भावादिति चेत; सत्येवेति कुतः ? स्मरण- ५ स्यानान्तत्वादिति चेत् नः परस्पराश्रयात्-सिद्धन तत्सत्त्वेन तदभ्रान्तस्वसिद्धिा, ध नस स्वसिद्धिः' इति । अन्यत एव तत्सत्त्वसिद्धिरिति चेत् ; न; स्मरणवैयपित्तः ।. अपि च, अन्यपि तद्विपयं यदि न भवेत् किं तस्य परिहीये ! स्वरिपरकासन मिति चेत् । न तोत्तरस्यात् । स्मरणमेव तद्विपर्य परिहीयते सत्येव तस्मिन् तदुपपवेरिति चेत् । न; 'प्रान्सस्य तस्य' इत्यादेः पुनरनुबन्धात् अनवस्थावाहिनश्चमकस्यापतेः । अभ्रान्तत्व १० स्मरणस्य निर्वाचत्वाइवाम्यते न द्वितीयज्ञानभायात् ततोऽयमदोप इति चेत् ; न तनिधित्व स्य स्वतो दुरयकोषत्वात स्वसंवेदनवादप्रत्युञ्जीवनापतेः। अन्यतस्तद्वयोधं इति चेत् ; न; ततोऽपि भ्रान्तात्तदयोगात् । अभ्रान्तमेव तदिति चेत् ; फुत एतत् ? सत्येव तनिधित्व भावादिति चेत् ; सत्येवेति कुतः । तस्याश्रान्तत्वादिति चेत् ; न ; पूर्ववत्परस्पराश्रयदोषात् । न सदोषा, तनिधित्वस्यान्यत एवायगमादिति चेत् ; न; प्राच्यस्पान्यस्य वैयापः । अपि च, अन्यदपि द्वितीयं यदि भ्रान्तम् ; कुतस्ततोऽपि "तवगमः अविप्रसङ्गात् । अभ्रान्तमेय तदपीति चेत् ; ना 'कृत एतत्' इत्यादेरावृत्या परिनिधान्यस्य "परिभ्रमणस्योप- निपातात् । तदनेनार्थज्ञानस्यापि निर्याधत्वं दुरपयोधमिति प्रतिपादितं प्रतिपत्तव्यं समानत्वान्या- यस्य । तत इदमसम्भव्येय "लक्षणं 'बाधवर्जितं प्रमाणम्' इति । स्वसंवेदनवादिनां तु नायं दोपः, कस्यचित्क्वविदभ्यासपाटयातिशयाधिष्ठानस्य देशकालनरान्तरापेक्षयापि निर्धाप- १० स्वस्य स्वत "पाध्यवसायात, अन्यथा सकलमवृत्यादिन्यवहारविलोपापशेरिति निरूपितम्, निरूपयिष्यते व यथास्थानम् । ततो न स्मरणस्यापि परिहाणिः यतस्तदलेनाज्ञानस्य स्वशा. नामान्यप्रतीक्षणमुपपात | अपि च- प्रतीक्ष्यमाणमप्यन्यतायवा लभ्यते कथम् । * हि विनेच्छया लब्धिघृतपूरस्य दृश्यते ॥५५७।। अर्थप्रकाशतस्तच्चेदन्ययानुपपत्तिकात् । तस्यापि निर्मुसस्थायें वशानोन्मुखता कथम् १ ॥५५८॥ तत्त्वरूपे हि निर्माते तस्येदं बुद्धिरुद्भवत् । शाद एव पितयेप बलत्येवि निर्णयात् ॥५५९॥ , 1 स्मरणस्य । र तत्परिशानसावेन । ३ प्रशमशानस्य परिज्ञानसत्वसिद्धिः । ४ द्वितीयमानम् । ५ अर शानविषयम् । ६ प्रथमज्ञानाय 10-बोधनमिति मा०,०.१०.१० । श्रश्रान्तरेव त-मा०,१०, प..। १ पूर्वज्ञानस्य निर्वापावे। १५ पूर्वमानस्य निरुत्वादामः। "चक १३"एतच विशेषणत्रयम्पाददानेन सूध कारण कारगदोपवायकरदिवमदीनमादि का प्रमाणमिनि प्रमाण सूचितम् ।"-शामदी 11191 एवं व्यवसा-मा..., ४ वाई विभाग, ., स."
१।११] प्रयमा प्रत्यक्षप्रस्ताव ज्ञानमात्रोन्मुसे तस्मिन् सम्बन्धग्रहनिर्मुसे । अर्थस्य ज्ञानमित्येप व्यवहारः क्षयं व्रजेत् ॥५६०॥ अर्थाभिमुख्ये तस्यापि तत्कृतात्तत्प्रकाशनात् । तज्जानमपि लभ्येत तत्राप्येवं निरूपणे ॥५६१॥ अनवस्थानदोपोऽयमनिवार्यः प्रसज्यते । विषयान्तरसश्चारनिषेधक्षमविक्रमः ।।५६२।। तत्तज्ञानावगाहिन्यः स्मृतयोऽप्यनवस्थिताः । प्राप्नुवन्ति तदन्यार्थस्मृतिसञ्चारवारिकाः ॥५६३॥ जानन प्रवर्तकं वाक्यं स्मरस्तज्ज्ञानेमप्ययम् । कथं तदर्थविद् विप्रस्तज्ज्ञानस्मृतिमान कथम् ॥५६४॥ येन तद्विपयं कुर्वन्ननुष्ठानमनाकुलम् । प्रत्यवायैत्रिमुच्येत प्रेत्य चेह घ याशिकः ॥५६५।। स्यान्मतम्-सत्यम् अर्थाभिमुसस्यैव तस्यार्थज्ञानाभिमुख्यम् अनवगतेऽर्थे 'तस्येदे ज्ञानम्' इत्ययगमायोगात् , प्रतियोगिनि पितरि ज्ञात एव 'तस्यायं पुनः' इति प्रतिपत्तिदर्शनात् । सम्बन्धमहणनिर्मुसतया ज्ञानमानस्य तेर्न ग्रहणे तु 'अर्थस्य ज्ञानम्' इति व्यवहारलोपप्रसगात् । १५ तर यद्यपि संस्कृवात्तदर्थप्रकाशनात्तद्विपयमपि ज्ञानम् , संस्कृतादपि ततस्तद्विषयं ज्ञानमित्य- : परापरझानोपकल्पनम् , तथापि मानवस्थानं यावच्छममेव तदुपजननात् , उपजाते तु श्रमे सदभावात् । तत एव न स्मृतीनामप्यनवस्थानम् ; तासामप्युपजातज्ञानपरम्पयमानपर्यवसायि- स्वेने परतः प्रवृत्तेरभावात् । तदुक्तम्- "घटादी च गृहीतेऽर्थे यदि तावदनन्तरम् । अर्थापत्याययुध्यन्ते विज्ञानानि पुनः पुनः ।। यावच्चमं ततः पश्चानानन्त्येव स्मरिष्यति ॥ [मी० श्लोशून्य०१९०] इति । सतः प्रवर्राकवाक्यरूपाद्विपयान्तरे तदर्थलक्षणे सञ्चारसम्भरे कथन "तज्ज्ञानं क्यं या न तज्ञानस्मरणं यतस्तदनुष्ठानासम्भवात् प्रेत्य चेह च याशिकस्य प्रत्यायनिर्मुचिर्न भयेदिति; तदपि न समीचीनम् , अमापरिज्ञानात्-'परय श्रमः, को या श्रमः ? इति । अर्थप्रकाशस्येव अमः, अन्यथानुपपतिवैकल्यमेवे व श्रम इति पेत् ; न, प्रथमस्याप्यर्थज्ञानस्यामहणप्रसद्गात् । नहि तस्याप्य,प्रकाशनादन्यतो महणम् । न चान्यथानुपपत्तिविकलादपरापरमानवतम्यादि १३ पेदवास्यम् । २ वाक्यज्ञानम्। ३ वाश्यार्थवत्ता । तदविग्रसरशनस्य स्मृतिमान् भार, 40, प., स.। यदि तदर्थव नासि कथमनुष्टान झाले अमानस्मरण स्यादिति भाव. । ५ द्वितीयानस्य । दितीय- शानेन । द्वितीयाशानन्तात् । ८ प्रथमशनस्य यो विश्प. द्विषामपि मानम् । तृतीयशनानादपि । ततत- पादपि भा.प.,.,... दितीयशनस्य यो विषय तविषयमपि शनम् । -यमितलेन मा., 20, ... २ कास्याशनम् । .11 बारया निम्मरणम् । १४ -वैकचनममेद व धमा-भा., स.-रस्यभम..। १५अपमानरमापि।
१९२ . , . न्यायविनिश्चयषियरणे ततो' ग्रहणमुपपन्नम्। अतिप्रसङ्गात् । सन्न वत्प्रकाशस्य श्रमः | आमना श्रम इति चेत् ; कस्त. स्यापि श्रम: ? अर्थज्ञानतज्ज्ञानादिप्रबन्धप्रतिपत्तापभिरुचिवैकल्यमिति चेत् ; न ; तवैकल्येऽपि साममीसद्भाव तत्मतिपत्तेरवश्यम्भावात् अशुचिमतिपत्तिवत् । वहिं सामनीवैकल्यमेव तस्य अम इति चेत् ; ननु अर्थप्रकाश एव सामग्री, स च विद्यत एव, कथं तद्वैकल्यम् ? न १ तन्मात्रमेव सामग्री येनैवम्, अपि त्वन्यथानुपपन्नतया सत्परिज्ञानमपि, न च तत्सर्वस्मिन्नपरापरे तत्प्रकाशे विद्यते, त्रिचतुदितत्प्रकाशे एव तद्भायात् तत्कथमनवस्थानमिति चेत् ? न तर्हि प्रथमस्याप्यर्थज्ञानस्य ग्रहणम् , तत्राप्यन्यथानुपपत्तिपरिझानाभावस्य पक्ष्यमाणत्वात् । ततो न प्रतीक्ष्यमाणस्यापि ज्ञातज्ञानस्य कुतश्विरसम्भवः । वदेवाह-'परोक्ष' इत्यादि । परोक्षज्ञानम् आद्यमर्थज्ञानं तस्य विषयो विषयप्रकाशः तात्थ्यात्ताच्छयोपपत्तेः । तेन परिच्छेदोपहणम् , परोक्षवत् परः पश्चाद्भाव्यक्षो योधरतस्येव तद्वदिति । आद्यस्याप्यर्थयोधस्य ग्रहणं नार्थदर्शनात् । अन्यथासम्भवाज्ञानादुत्तज्ञानतानवत् ॥५६६॥ तन्न अर्थप्रकाशादेवार्थज्ञान ग्रहणम् । अन्यथानुपपन्नतया परिज्ञातात् तंतस्तग्रहणमिति चेत् । सिद्धस्य, असिद्धस्य था "वस्य तत्परिज्ञानम् ? सिद्धस्येति चेत् ; फुतः सिद्धिः ? ५ स्वत इति चेत् । शानधर्मस्य, अर्थधर्मस्य वा ? ज्ञानधर्मस्य चेत् । न; ज्ञानस्यैव स्वतसिद्धिप्रसङ्गात् तस्य तत्प्रकाशाव्यतिरेकात् , तथा च व्यर्थ तस्यान्यथानुपपत्तिपरिज्ञानम्, तस्य ज्ञानप्रतिपत्यर्थत्वात् , तस्याश्च स्वत एव सिद्धत्वात् । अन्यत एव तसिद्धिरिति चेत्, तदपि कुतः सिद्धम् ? नत्कृतात्प्रकाशादिति चेत् ; न तस्यापि तज्ज्ञानधर्मले स्वतः सिद्धत्वे च"पूर्ववदोपात् , पुनरन्यतस्तत्मिद्धिकल्पनायाम प्यनवस्थापत्तेः । तन्न शानधर्मस्य कुतश्चिसिदिः। अर्थधर्मस्येवेति चेत् ; न, तस्यापि स्वतःसिद्धावर्थस्यापि तत एव सिद्ध नकल्पनावैफल्यम्। विज्ञानवादप्रत्युन्जीवन, संविदिततत्प्रकाशानान्तरत्ये विपयस्य तज्ञानत्यापत्तेनिर्विवाद- स्वात् । न च याज्ञिकस्य तदभ्युपगमः श्रेयान , पहिरर्थाभावे तनियन्धनस्य यागादेरभावप्रसगात् । तन्न स्वतस्तसिद्धिः नाप्यन्यतः वदभावात्। अज्ञानंतदस्तवियत् न, ततोऽस्य सिद्ध। "तरिसद्धरपि तत एव सिद्धिरिति चेत् ;न, तस्यार्थसिद्धि प्रत्युपक्षीणस्य तसिद्धि प्रत्यव्यापारात् । व्यापारे चानवस्थानात् , अपरापरतसिद्धौ तस्यैवासंसारं व्यापारात् । मा भूदर्थज्ञानात्तत्सिद्धिः, तदन्यत एव तद्भावादिति चेत् ;न; ततोऽप्यनर्थविषयात् तत्प्रकाशमहणायोगात् । अर्थविषयमेव तदिति चेत, कुतस्तदपि "ज्ञातम् ? तत्कृतादेवार्थप्रकाशादिति चेत् ; न, प्राकनार्थज्ञानवहोपात् , - - २० अर्थप्रकाशात् । २ -पत्तिईि वनिनो सा-आ., ब०, स० ।-पत्तिहि वर्मनि सा-प० । ३ भ्रम इति चैग्नार्थ-मा., ० ०.स.। अन्यथानुसपननया परिज्ञानमपि । ५-रात एव श्रा०, २०, ५०, स.। महणाला-भा., ०,१०,१.१५ प्रबन्धवत् । ८ परिज्ञानात्-मार, य०, ५०, स । ९ अर्यप्रकाशात् । 1. अर्थप्रकाशस्य । पूर्वदोशत् भार, २०, ५०, ११-यामव्यवस्थामा अर्थप्रकाशसिविः। १५ अप्रकाशसिदेरपि । १५ अर्थज्ञानादेव ! अर्थप्रकाशसिद्धि प्रति ! १७ ज्ञानम् भा..., स.।
स्मना ? . प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव तत्प्रकाशस्यापि ज्ञानान्तरासिद्धावनवाथानात् । तन्न सिद्धस्य तस्यान्यथानुपपत्तिपरिज्ञानम् । नाप्य- सिद्धस्यैव, न ह्यप्रतिपन्ने धूमे तस्य पावकापेक्ष सुपरिज्ञानम् अन्यथाऽनुपपन्नत्वम् । तदेवाह- अन्यथानुपपन्नत्वमसिद्धस्य न सिद्ध्यति ॥११॥ इति । अन्यथा अर्थज्ञानाभावप्रकारेण अनुपपन्नत्वम् अपटनम् उत्तप्रकारेण असिद्धस्य विषयप्रकाशस्य न सिध्यति । अपि च, अयमर्थधर्मः सन् कथं बुद्धिमनुमापयति । राहतत्वादिति चेत्, सौ यद्या- कथं तथा तदवेदने तरकृतत्ववेदनम् ? तस्या एव ततोऽनुमानादिति चेत् , एतदपि कुतः तथा संवेदनादिति चेत्त, किं तत्संवेदनम् । तदेवानुमानमिति चेत्, किं पुनस्तस्य स्वसंवेदन- मस्ति ? न चेत् , कथं ततस्तथा संवेदनम् ? अप्रतिविदितादेव तस्मातस्य प्रतिनियतपुरुपबुद्धि- गोचरत्वस्य दुरखयोधत्वात् । माभूत्तस्य स्वसंवेदनम् , अन्येन तु वेद्यमान तथाविधमेव तद्वद्यत १० इति चेत् ; तस्यापि तथाविधवद्वेदनविषयत्वं कुतः १ तथा संवेदनादिति चेत् ; किं तत्संवेदन तदेव ? अन्यदिति चेतू ; न ; अनापि 'किं पुनस्तस्य' इत्यादेनुबन्धात् अनवस्थानोत्तरस्य चक्र स्थापत्तेः । एतेन 'परस्य सा धुद्धिबुद्धिमानम्' इत्यपि प्रत्युक्तम् ; न्यायस्य समानत्वात् । तन्न बुद्धिकृतत्वमर्थप्रकाशस्य । अहेतुकरवे कथं सत्त्वमेव "तस्येति चेत्, न, अर्थहेतोरेव तदुपपत्तेः, यावदर्धभावि. १५ त्वं तस्य नीलत्वादियत् । ततः कादाचित्काव न स्यादिति चेत् , किं पुनस्तद्रहितोऽपि फदा. चिदर्थोऽस्ति ? तथा चेत् ; कुत एतत् ? तथादर्शनादिति चेत् , ननु तत्प्रकाश एव तदर्शनम् , तत्कथं स एवास्ति, स एव नास्ति' इत्युपपन्नं व्याघातात् १ चिरद्रष्टव्यान्तरालास्तित्वं प्रकाश- रहितमेव पश्चात्मत्यभिज्ञायत इति चेत् , प्रत्यभिज्ञायां यदि तन्न प्रकाशते कथं तस्यास्तद्विपय- स्वम् अतिप्रसङ्गात् । प्रकाशते चेत् , क्थं तस्य प्रकाशरहितत्वं व्यापातस्योत्तत्यात् ? प्रत्यमि- २० झायाः पूर्वमप्रकाशमेव सदस्तित्वमिति चेत् , न , तदपरिज्ञाने 'तदप्रकाशमन्यथा शु' इति दुरवयोधत्यात् । अर्थकारणात् भवतस्त प्रकाशस्य कथन्न सर्वप्रतिपत्तृसाधारणत्वं नीलवदिति चेत् , न, शानात्परोक्षात् भावेऽपि समानत्वात् , अन्यथा अज्ञानाधीनस्य नीलस्यापि तदभावप्रसगात् । न चापरिक्षातस्य तस्य कादाचित्कत्यवेदनम् । नापि परिज्ञातस्य , अर्थज्ञानादन्यतश्च सत्परि- ज्ञानाभावस्य निवेदितत्वात् । तस्मात्परोक्षले ज्ञानस्य तत्कृतो विषयपरिच्छेदोऽपि परोक्ष एव पुरुपान्तरज्ञानकृत- तत्परिच्छेदवदिति । एतदेव निवेदयति- परोक्ष'इसादिना । 'परोक्षवत्' इति । "परं पुरु- पान्तरज्ञानं तदुक्षात कृतो विषयपरिच्छेदस्तद्वदिति असिद्ध इति यावत् । न च तथाविधात्परि- १ . स्वपरिज्ञा-आ०, या, ५०, ४ । २ प्रशाशनस्य आ०, २०, ५०, स०। ३ अर्यप्रकाश । बुद्धि । ५ भात्मन इय बुद्धिरित्यवेदने । ६ फित्र सबै-भा०, २०, ५०, स० 1 . तदा भा०,१०,५०,० अन्यस्यापि । १कि पुन सवे-भाग,१०,५०,०110-कश्योपपत्ते भा०,५०,०, अर्थप्रकाशस्य । १२ भर्धप्रकाशरहितोऽपि । १३ मत्यभिज्ञाया अन्तरालविषयत्वम् । १४ अर्थप्रकाशस्य । १५ जडाधीनस्य । 18 सर्घप्रतिपतृसाधारणत्वाभाव । १७ परपुरपा-भा०,०,१०,१० | 10 तथाविधातापरि-आ०,१०,००।
- - १९४ न्यायविनिश्चयविचरणे [११ च्छेदात्स्वबुद्ध्यनुमानं पुरुपान्तरज्ञानकृतादपि ततस्तदनुमानप्रसङ्गात् । तस्य तदन्यथानुपपत्ति. नियमानिश्चयानेति चेत्, न, स्वयुद्धिकृतस्याप्यसिद्धस्यै तेदनिश्चयाविशेषादिति एतदेव वक्ति । 'अन्यथा इत्यादिना निवेदनात् तत्कस्तवातिशयो दूपणाभिधाने परसामर्थ्य मुपजीयत इति ? तनाह- मिथ्याविकल्पकस्यैतव्यक्तमात्मविडम्बनम् । इति । अनेदमैदापर्यम्-भदेवेदं भवत्सामर्थ्य यदि दूपणे भवतोऽधिकारः स्यात् । न चैवम् , अनुपायत्वात् । "पृष्टं (अदृष्ट) दृष्टयः"[प्रवा० २१४६८] इत्यादिर्विकल्प एव तनोपायः, तेना- स्वसविदितज्ञानेऽर्थगोचरत्वनिषेधस्य दूपणत्यापादनादिति चेत् , न , तस्य निर्विषयत्वात् , "विकल्पोऽस्तुनिर्भासात्" [ ] इत्यभिधानात् । न च तादृशात्कस्यचित्स्वचिदा- १० पादनम्, अतिप्रसङ्गात् । अस्वसविदितज्ञानादर्थदृटेनिफेधनम् । अवस्तुज्ञाद्विकल्पाच्चेत् , ततः करमान्न तद्विधिः ॥ ५६७ ॥ निषेध एव "तस्यास्ति प्रतिबन्यो विधी न चेत् । सोऽपि तद्वयनिर्ज्ञानाभावे केनावगम्यताम् ॥ ५६८ ।। तस्मादेव न तज्ज्ञान तस्य "साशव्यवस्थितः । न विकल्पान्तरात्तस्याप्येतदोपानचित्र मात ॥ ५६९ ॥ न घोभयापरिक्षाने तत्सम्बन्धप्रवेदनम् । "द्विष्ठसम्बन्धसवित्तिः" इत्यादिवचनक्षतः ॥ ५७० ।। सम्बन्धोऽपि यदि द्विष्टो विकल्पस्येह गोचरः । वदवस्तुविनिर्मासप्रादःस्थितिमान क्थम् ? ॥ ५७१ ।। सोऽपि तत्प्रतिवन्धाच्चेत्तद्व्यवस्थानिवन्धनम् । तस्यापि प्रतियन्धस्य विकल्पादन्यतः स्थिती ॥ ५७२ ॥ पपपरविकल्पानामासंसारमुपस्थिते. ! अनवस्थानदोपः स्याद्लयस्त्रिदशेरपि ॥ ५७३ ॥ खतो निराकृतमेतत्- "लिङ्गलिनिधियोरेयं पारम्पर्येण वस्तुनि । प्रतिनन्याचदाभासशून्ययोरप्यपश्चनम् ॥" [प्र०या० २१८२ ] इति , परिच्छेदात् । २-नैदिति भा.प.अस्वसविदितस्य । ४ अयथानुपत्तिनियमनिध- यामायाविशेषात् । ५ भनेदमेव तारार्यम् आ०,१०,१०,स०। ६ दृष्टय भा.,५०,०, MATEष्टयोऽन्येन ट्रा सा न हि वयित् । = हि यस्मादय टिसन ये से शपिदन्येन द्रष्टा इष्ट इति न, या निश्चय- विषया यु"-. बा. म. २१४६८ । विकल्पस्य । ८ निर्विपाविक पात् । ९ अथिविधानम् ।।. विपरस-यविज्ञाना-मा०, २०, प. २ वा व्यवस्थिते भा०,०, प., ०३ "दिष्ट प्रबन्धवितिन करप्रवेदनार । दयस्परूपाहणे सति सम्ममवेदनम् ॥"-मा पार्तिकाल । २० प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तायः , + प्रतिबन्धस्यैव दुरवबोधत्वात्। तस्मात् मिथ्या वस्तुतो निर्विषयत्वादसत्यो विकल्पः "अष्ट- दृष्टयः" इत्यादिर्वियारो यस्य तस्य मिथ्याविकल्पकस्य सौगतस्य एतत् परोक्षक्षानदोपो- द्भावनं व्यक्तं परिस्फुटं यथा भवति तथा आत्मविडम्बनम् , आत्मतिरस्करणम् असा. धनाङ्गवचनान्निग्रहावामः। अपि च, अप्रत्यक्षज्ञानादर्थदृष्टेः प्रतिषेधो यदि 'तुच्छः कथं तत्र अनन्तर विकल्पस्य ५ प्रतिबन्धः तत्तादात्म्याभायात् , अन्यथा विकल्पस्यापि तुच्छतापत्तेः, तत्कार्यस्वाभावाच तत्प्रति- पेधस्य तुच्छत्येनाहेतुत्वात् । प्रत्यक्षज्ञानार्थदृष्टिरेव पर्युदासवृत्त्या तैविपरीताराष्टिप्रतिषेध इति चेत; वदपि यथाप्रतिभासम् , यथाभ्युपगमं या स्यात् ' आयेऽपि विकल्पे यदि तद्विप. याकारम् ; दर्हि परस्परविंचिक्तानेकनीलपीवाद्याकारं तदेकमभ्युपगन्तव्यम्-"चित्रप्रतिभासेऽप्ये- कैर बुद्धिा"[० वार्तिकाल० २१२२०] इति वचनात् । तचाक्रमवत् क्रोणापि तथाविधत्वं न १० परित्यजति अशक्यविवेचनत्वस्य तत्रापि निरूपणादिति सम्भवक्रमाभ्यां सविकल्पकं तंत्माप्त विविधानुविधानस्यैव "विकल्पलक्षणत्वात् , शब्दसंसर्गस्य तु तल्लक्षणस्य 'अभिलापतदंशा- नाम्'इत्यादी" निषेधात् । अविपयाकारं चेत् ; न, तथाप्यनेकशक्तिकत्वस्याशक्यनिषेधत्वात् । अन्यथा युगपदनेकार्थवाहकत्वानुपपत्तो सञ्चितालम्बनत्वविरोधात् । "सम्भवानेकान्ताच "पर्यायानेकान्तस्य व्यवस्थानात् सिद्ध तथापि" सम्भवमाभ्यां सविकल्पकत्यम् । न च १५ "सविकल्पस्यार्थज्ञानत्वम् , तस्यावस्तुविषयत्वेनाभ्युपगमात् , तत्कथं प्रत्यक्षात्तस्मादर्थदर्शनमेष तद्विपरीतात्तनिषेधो यतस्तत्र विचार विकल्पस्य प्रतिबन्धः प्रत्यक्षस्य वा "तवः स्वसंवेदनसाधनं भवेत् ? सदाह-'मिथ्या इत्यादि । मिथ्या निर्विपयो विकल्प एफमनेकाकारमेकमनेक- शक्तिकं वा ज्ञानं यस्य तस्य सौगतस्य एतत् अर्थदर्शनान्यथानुपपत्त्या तद्विकल्पस्वसंवेदन- साधनं व्यक्तमात्मविडम्पनं विकल्पस्यानर्थविषयत्वेनार्थदर्शनलक्षणस्य हेतोरेवासिद्धत्वा- २० दिति भावः । तन्न यथाप्रतिमासं तत्प्रत्यक्षसंवेदनम् । तर्हि यथाभ्युपगमं तदस्त्यिति चेत् ; न , निरंशस्य 'तस्य साकारस्य निराकारस्य पाननुभवात् , विकल्पोपसंहारवेलायामपि चित्रावभासत्येव तस्य प्रतिसंवेदनात् , तदुपसंहार- व्युत्थाने तथैवानुस्मरणाच । ततस्तत्र व्योमकुसुमवत् स्वसंवेदनसाधनं प्रयासमात्रकमेव । 'तेदाह-मिथ्या' इत्यादि । अविकल्पकस्य निरंशदर्शनस्य एतत् स्वसंवेदनसाधनं मिथ्या २५ न समीचीनं अनुपायत्वेनाशपयत्वात् निरंशार्थदर्शनस्य तल्लिङ्गस्यासिद्धः, अतश्च व्यक्तमात्म. विकल्पवानिविषयः । २-दर्भदष्टेरैव मा०, ब०, १०, स०।३ अप्रत्यक्षज्ञानात् अर्धदृष्टिप्रतिषः । ४ प्रत्यक्ष ज्ञानम् । ५ प्रत्यक्षज्ञानम् । ३ एकत्वम् । ७ "चिनाभासापि धुद्धिीक्व याचित्रविलक्षणत्वात् , शश्य- विवेचनं चितमनेकम्, अशक्यविवेचनाश्च बुद्धनीलादय ।"-घातिकाल. १२२.1 ८ युगपरमाभ्याम् । ९ प्रत्यक्षज्ञानम् 110 "विविधानुविधानस्य विकल्पनान्तरीयकरवात्'-प्रमाणस पृ०२८। न्यायविरलो०६ । १२ युगपदकधर्मात्मकत्वात् । १३ क्रमेण अनेकपर्यायामकस्य । पर्यायोऽनेका-भा० ब०,१०,स.तथा हि मा०, ५०, १०, स. १५ पविकल्परस्या-आ०,१०,५०स० । १६ विचारात् । १७ तदस्तीति भा०, प०, स .१८ प्रत्यक्षस्य । १९ तथा भा०, २०, ५०, स. 1 " . न्यायचिनिश्चयविवरणे [११२ विडम्बन परोक्षज्ञानयादितिरस्कारेणात्मनः सौगतस्यापि तिरस्कारात् , तदभ्युपगतस्यापि संवेदनस्य 'वस्तुतः परोक्षत्वादिति मन्यते । यदि चायं निर्वन्धः नापरिज्ञातात् संवेदनादर्थदृष्टिर्भवतीति ; तहिं कथमव्यासिता. दपि व्यवसायादर्थव्यवसाय: स्यात् ' व्यासित एव व्यवसायो व्यवसायान्तरेणेति चेत् ; फुत ५ एतत् । तस्य स्मरणादेव, न हाव्यवसितस्य स्मरणपतिप्रसङ्गादिति चेत् । तर्हि व्यवसायस्यापि व्यवसायेन भवितव्यम्, तत्रापि स्मरणाविशेषादिति व्यवसायमालोपनीता स्यात्। अस्तु को दोप इति छन् । कुतस्तहि तन्मालाप्रसूतिः ? पूर्वपूर्वस्मात् व्यवसायादिति चेत् ; न, विषयान्तर- सञ्चाराभावप्रसङ्गात्-पूर्वपूर्वव्यवसायस्य स्वविषयापरापरल्यवसायजनन एवोपक्षीणस्य विषयान्त- ख्यवसायं प्रत्ययापारात् । न हि जनकत्वेन ग्राह्यलक्षणप्राप्त स्वसन्तानसम्बन्धित्वेनान्त- १० रगञ्च पूर्वपूर्वव्यवसायं परित्यज्योत्तरोत्तरव्यवसायस्य विषयान्तरख्यापारः सम्भवति । सम्भ. वत्येवार्थसन्निधौ, अर्थो हि सन्निधो (धौ)व्यवसायस्य पूर्वव्यरसायग्रहणाभिमुख्यं प्रतिबद्धय स्वप्र- हणाभिमुख्यमेवोपकल्पयतीति चेत्, न नर्हि व्यवसायस्य व्यवसायः स्यात्, अर्थव्यवसायस्यैय प्राप्तः, तर्था च व्यरसायस्य स्मृतिरेव न स्यात, अव्यसिते तदनुपपः। प्रतिवन्धकरयार्थ- स्यासनिधाने भवत्येवेति चेत्, न, असन्निहितार्थाया व्यवसायदशाया एवासम्भवात् । तथा च १५ निरवद्यप्रतिपतिरक्षाविधानविकलतयोत्सन्नमूला एघ व्यवसायबुद्धयस्तद्विपयाश्च स्मृतय इत्यु- ज्वलं ताथागतदर्शनम् । ततो यदुक्तम्- ज्ञानस्य -"ज्ञानान्तरेणानुभवो भवेत्तत्रापि च स्मृतिः । दृया तवेदनं वेन तस्याप्यन्येन चेदिमाम् ॥ माला ज्ञाननिदों कोऽयं जनयत्यनुनन्धिनीम् । पूंची धीः सैर चेन स्यात्सञ्चारो विषयान्तरे ।। तां ग्राह्यलक्षणप्राप्तामासना अनिकां धियम् । अगृहीत्योत्तरज्ञान गृह्णीयादपरं कथम् ॥ चाहः सन्निहितोऽप्यर्थस्तां पिपन्धुं ( पिनडु) नहि प्रभुः । धियं नानुमत्कश्चिदन्यथाऽथस्य सन्निधौ । न चासन्निहितार्थास्ति दशा काचिदतो धियः । उत्सन्नमूलास्मृतिरप्युत्सन्नेत्युज्ज्वलं मतम् ॥" [प्र०या० २।५१३-१८]इति, सत्प्रतिक्षिप्तम् , स्वपक्षेऽप्यनिवारणात् । नवयं पक्ष एंवाऽसौगताना यथासायस्य व्यवसायान्तरेण व्यवसाय इति, तत्कथमेवमुप- क्षेपः कृत इति चेत्न,स्ववस्तव्यवसायाभावे व्यवसायान्तरतस्तम्यवसायस्यावश्या युपगमनीयवात, , वस्तुनस्तापरी-प. वस्तुतत्परो-आ०, ३०, म० । २ परिज्ञानास-मा०, २०, ५०, स.1 ३ तन्मालोपस्मृति स.. तन्मालोलाप्रपस्मृति भा०, २०, प.1 ४ स्मरणानुपपरो । ५ चौरामासमिहि- भा.ब.प., स.1 -पन्नमू-आ., ५०, १०, स010 मालाज्ञानविधा आ.,प.प.8.10 पूर्णादि से-मा०,१०,५०,०१९-दन्यतोऽर्थ-भा०, २०, प., स... एव सौग-माग,पा,, स. ।
प्रथमः प्रत्यक्षपस्तावः २१२] अन्यथा ततोऽर्थव्यवसायस्य तस्मरणस्य चासम्भवात्। स्वसंवेदनवेद्यत्वात्तस्य ततोऽर्थव्यवसाय[] स्मरणञ्च तस्य, न व्यवसायान्तरवेदात्वादिति चेत् , कीदृशं तत्स्वसवेदनम् । अव्यवसायस्वभावमिति चेत् , न तर्हि व्यवप्तायस्य तत् स्वसवेदनं तस्याव्यवसायस्वभावाभावात् । व्यवसायस्वभावमेव हि संवेदनं तत्वसंवेदनं न तद्विपरीतम् , अन्यथा सुखस्वभावमपि स्वसवेदनं दुःपस्वसंवेदनं भवेत् । सुखदुःखयोर्भेदान्नेति चेत् , न , व्यवसायेतरयोरपि तदविशेषात् । मानूनत्तस्य स्व- ५ संवेदनम् अन्यदेवारिस्वति चेत् , तदपि यद्यव्यवसायस्वभावम् , स एष प्रसङ्ग:-'न तर्हि' इत्यादिः । पुनरपि तथाविधस्वसंवेदनकल्पनायामनवस्था । व्यवसायस्यैव कश्चिदव्यवसाय. स्वभाव इति चेत् ; भवत्येवम् , तथापि तस्याव्यवसायस्वभावेनैव पहिर्षिपयत्वं तेनैव प्रति- पन्नत्वान्नापरेण विपर्ययात् । को दोष इति चेत् ? अर्थव्यवसायाभाव एव । न व्यवसाय- स्वभावसंवेदनविपयतामुपगतस्य व्यासितत्वं नाम, अध्यवसितस्यैर कस्यचिदभावापत्तेः । १० संत्स्वभावमपि संवेदनमर्थव्यवसायमुपनयति व्यवसायस्नमागत् कथनिदनर्थान्तरत्वादिति चेत् , व्यवसायं किमेवं नोपनयति तदविशेषात् ' आत्मव्यवसायं प्रति तदनर्थान्तरत्वमनगामिति चेत् , अर्थव्यवसायं प्रति कथमङ्गमिति न किञ्चिदेतत् ' तन्नाव्यासायस्वभावं तस्वसदनम् । भवतु व्यवसायस्वभावमेव तदिति चेत् , न , अभिजल्पसंसर्गाभावात् । अभिजल्प- संसर्गे हि व्यवसायोऽवकल्प्यते । न च स्वरूपे तत्संसर्गोऽस्ति बहिर्व्यवसायाभावप्रसगात्- १५ पहिर्व्यवसायोऽपि सत्येव "तत्सस भवति, साम्प्रतं यदि स्वरूपे संसर्गः न वहिः स्यात् , युगपदभिजल्पद्वयसम्बन्धस्याप्रतिवेदनादनभ्युपगमाच । क्रमेणेकर ज्ञाने तद्वयसंसर्ग इति चेत , न ; एकस्य क्रमाभावात्" क्षणभङ्गवाव्यापत्तेः । नामिजल्पसम्बन्धाद् व्यवसायानां "ताप्यं येनायं प्रसङ्गः, किन्तु संशयादिव्यरच्छेदस्वभावत्वात् । तदपि नाभिजल्पसम्बन्धात् , अपि "तु स्वहेतुविशेषात् तच्छक्तित्वेन वेपामुत्पत्तेः । तस्मात् स्वशक्तित एव स्वरूपाधिष्ठान २० संशयादिव्यवच्छेदस्वभावत्वात् व्यवसायस्वभावमेव व्यवसायानां स्वसवेदनमिति चेत् , उपपन्न- मेवैतत एवमेव व्यवसायाना तत्त्वव्यवस्थितः, अन्यथा तदसम्भवात् । तथा हि-नाभिजल्पस्या- ननुस्मृतस्य योजनम् , न घादृष्टे तद्विपये" "तदनुस्मरणम् अतिप्रसङ्गात् । दृष्टेऽपि न पानिश्चिते", क्षणभङ्गाधभिजल्पस्याप्यनुस्मरणापत्तेः, तथा च तदर्शनानन्तरमेव तदभिजल्पा. नुषिद्धस्य "तव्यवसायस्योत्पत्तेनीलादिवत् , न"तवानुमानस्य साफल्यमुत्पश्यामः, "व्यवसिते २५ विपरीतारोपस्यानुत्पत्तेः तद्व्यवच्छेदस्याप्यसम्भवात् । निश्चित एव तर्हि तद्विपये तदभिजल्पा- , , व्यवसायात् । १ व्यवसायस्य । ३-स्वभावात् व्य-आ०, ब०, प०, स०। ४ तस्वसवेदनान आ०, घ०, ५०, स० । ५-भूतस्य प०, स० । ६ अव्ययसायस्वभावेनैव ज्ञातत्वात् । ७ नाम व्यव-आ०, ५०, १०, स.। ८ अव्यवसायस्वमावमपि । ९ स्वस्थ व्यव-आ०,०प०,०। १. शब्दससमें।"-त् लक्षणमन्या- भा०, २०, ५० स.1 ११ व्यवसायात्मकत्वम् । १३ तु विशेषात् मा०, २०, ५०, स०११ शब्दविषये । १५ शब्दस्मरणम् । १६ शब्दस्मरणं भवतीति शेष । १७ क्षणभङ्गदर्शनानन्तरमेव । १८ क्षणिकमिदमिति क्षण. भाविकल्पस्योत्पते । १९ क्षणभहे सर्व क्षणिक सरवादित्यनुमानस्य । २० विपरीतारोपनिषेधार्थ मनुमानसाफल्य स्यादित्याशदायामाह।
न्यायचिनिश्चयविवरणे [ ११२ नुस्मरणमिति चे , न, 'निश्चिते तस्मिन् तदनुस्मरणम्, तदनुस्मरणे च संयोजनया तनिश्चयः' इति परस्पराश्रयस्य सुव्यक्तत्वात् । ततः स्वहेतुमामादेव क्षयोपशमविशेषलक्षणात् संशयादि- व्यवच्छेदम्बभावतयोत्पत्तेः व्यवसायानां तत्त्वमरतिष्ठते नान्यथा । तथा प देरस्यान्यन वचनम्- "व्यवसायात्मकं ज्ञानं प्रत्यक्षं स्वत एव नः । अमिधानाद्यपेक्षायां भवेदन्योऽन्यसंश्रयः ॥" [ ] इति । ५ ततो यदुक्तम्- "रूपं रूपमितीक्षेत तद्धियं किमितीक्षवे । अस्ति चानुभवस्तस्याः संविकल्पः कथं भवेत् ॥" [प्रध्या० २।१७७] इति ; तत्प्रतिविहितम् , अभिजल्पसम्पन्धेन हि व्यवसाये रूपव्यवसायसमये तबुद्धिव्यवसायो न १० भवेत् , युगपदभिजल्पद्वयसम्पन्धाप्रतिवेदनात । अस्ति च तदापि तदनुभयः, स च कथं व्यर. सायात्मकप्रत्यक्षवादिन इति भरत्ययं पर्यनुयोगः । न चैवम् , अन्यथैव व्यवसायस्य व्यवस्था- पनात् । ततो व्यवसायात्मकमेव व्यवसायानां स्वसंवेदनम् । तच न"परस्य प्रत्यक्षम् , "तस्या- व्यवसायस्वभावतयाऽभ्युपगमात् । नाप्यनुमानम् , साध्यादर्थान्तरस्यानुमानत्वात , स्वसंवेदनस्य च व्यरसायेभ्यो भेदाभावात् । नाप्यन्यत्प्रमाणम्, प्रमाणद्वयनियमव्याघातात् । न चाप्रमाणम् , १५ अप्रमाणाड्यवसायसिद्धरयोगात् , प्रमाणचिन्तावैफल्यापत्तेः । अतो घरमस्वस नेदनमेव व्यक- सायानाम् । न चेदमपि शोभनम् , अव्यवसितैर्व्यवसायैरर्थव्यवसायायोगात , अन्यथा अप- रिच्छिन्नैरपि ज्ञानरर्थपरिच्छित्तिप्रसद्गात् । नन्वेव सन्तानान्तरज्ञानरर्थपरिच्छित्तिः किन्न भवति अपरिच्छिन्नत्याविशेषात् , तथा च प्रतिसन्तानं निष्फलमेव ज्ञानभेदकल्पनम् , एकसन्तानज्ञाने. रेव सर्वेपा बहिरर्थपरिच्छेदोपपरोरिति चेत् , व्यवसितिरप्यर्थानामन्यसन्तानव्यवसायैः कस्मान्न २० भवति अव्यवसितत्वाविशेषात् ? तथा च प्रतिसन्तानं 'तद्भेदकल्पनमपि निष्फलमेव, एक. सन्तानव्यवसायैरे सर्वेषां वायव्यवसायोपपत्तेः । अव्यवसितैरपि स्त्रव्यवसायेरेव स्वयमर्याय. सायो न परव्यवसायैरिति चेत् , न , 'अननुभूतैरपि स्वानुभवैरेव स्वयमर्थानुभवो न परा. नुभवै.' इत्यपि प्रसङ्गात् । अननुभूतानां तेपां स्वानुभवत्वमेव कुतोऽवगतं येनैवमुच्यते ? तादृशानामिन्द्रियाणां कथमात्मीयत्वमगम्यत इति चेत् १ मा भूत्तदवगमः, न काचित्क्षतिः । २५ कथं "तेरावगम इति चेत् ? न, तदभावात् । कथं तथा व्यवहार इति चेत् ? न, तस्य भाक्त्वात् , रूपादिविषयानुभवहेतुत्वेन तदुपपत्तेः। अनुभवस्य तु न भाक्तमर्थप्रतिपत्तिनिव. न्धनत्वम , तस्यानुभवान्तरनिमित्तत्याभावादनवस्थापः। तस्मादनुभवहेतू नामप्रसिद्धिर्न दोषाय नानुभवानाम, तदप्रसिद्धी विषयाप्रसिद्धः, अन्यथा सर्वदा सर्वविषयप्रसिद्धिप्रसङ्गात् । तदुत्वम्- - , १-तेऽस्मिन् भा०,५०,०प०१२ शब्दानुस्मरणम्। ३ शब्दयोजनया । अनिश्चय । ५-तयोपजायते म्य- भा.प.स.। ६ सोऽविकल्प बा०,व०,१०,स०प्र०वा.10 रूपव्यवसायकाले रूपबुधनुमत्र । कयमपरसा-मा-प०,५०,501९-यस्यैव व्यव-मा.य.प.म. बौद्धस्य । प्रत्यक्षस्य । अतो- भरमस्व-आ०,५०,५०,स. १३ व्यवसायभेद । १४ अननुभूतानाम् । १५ इन्द्रिये । १६ चनुपा पश्यामीत्यादि. व्यवहार । १७ इन्द्रियाणाम् ।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तापः १।१२] "आत्मानुभूतं प्रत्यक्ष नानुभूतं परैर्यदि । आत्मानुभूतिः सा सिद्धा कुतो येनैवमुच्यते ॥ व्यक्तिहेत्वग्नसिद्धिः स्यान व्यक्तेर्व्यक्तमिच्छतः। व्यक्त्यसिद्धावपि व्यक्त यदि व्यक्तमिदं जगत् ॥"[प्रश्वा० २।५४०-४१] इति चेत् ; न ; व्यवसायेप्वपि समानत्वात् । तेऽपि हि कथमव्यवसिता आत्मीयत्वेनाव- ५ गम्यन्ते ? तद्धेतयोऽनुभवादयस्तादृशा एव कथं तथावाम्यन्त इति चेत् ? माभूतथा तदवगमो न काचित् क्षतिः। कथं "तेरावसाय इति चेत् ? न; तदमावात् । कथं तथा व्यवहार इति खेत् ? न तस्य भाक्तत्वात् , बहिर्व्यवसायहेतुत्वेन तदुपपत्तेः । व्यवसायानां तु न भामर्थ- व्यवसायनिबन्धनत्वं तेषां तव्यवसायान्तरनिवन्धनत्वाभावादनवस्थापत्तेः। तस्मात् व्यवसाय. हेतूनामव्यवसायो न दोपाय न व्यवसायानाम् , तदव्यवसाये विषयाव्यवस्थितः, अन्यथा १० सर्वदा सर्वविषयव्ययसायापतेः । सदज्ञानमप्येयं ( तदत्राप्येवं ) वक्तव्यम्- आत्मनिश्चितमेव स्यानिश्चितं नान्यनिश्चितम् । यद्यात्मनिश्चयः सिद्धः कुतो येनैवमुच्यते ॥५७४॥ मा भूनिश्चयहेतूनां निश्चयस्लेन का क्षतिः । न वाहनिश्चयः सिद्ध्येनिश्चयेरप्यनिश्चितः ।।५७५॥ अनिश्चयेऽपि तेषां चेदों निधीयते परैः। तदा सर्व जगत्माप्त सुनिश्चयपथं गतम् ॥५७६॥ इति । प्रत्युक्तञ्च व्यवसायानां स्वतः परतश्च व्यवसायः । ततो मिध्येयेदं यत्-"अव्यवसि- तरपि व्यवसाया व्यवसीयते"[ ] इति । तदाह-'मिथ्याचिकल्पकस्यैतत्' इति । न विद्यते विकल्पनं विकल्पो व्यवसायो यस्य बत् अविकल्पं तय तत् कं प शान २० तस्य कार्यत्येन सम्बन्धि । किं तत् ? एतत् । याहां व्ययसितमिति । अस्येय परचेतसि स्थितत्वेनेतच्छब्देन परामर्शात् । तत्किम् ? मिथ्या, न सम्यम् । अन्यथा 'अव्यकेनाप्यनु- भवेन याचं व्यकम्' इत्यपि न मिथ्या स्यात् । ततः किम् ? इत्यनाइ-'ध्यक्तम्' इत्यादि । 'एतत्' इत्यत्रापि सम्बन्धनीयम् । एतत् परेणोच्यमानं "व्यक्त्यसिद्धावपि व्यक्त यदि व्यक्तमिदं जगत्" इति तत् व्यक्तं स्पष्टम् आत्मविडम्यनम् आत्मतिरस्करणम् , अदोपे २५ दोपोद्भायनात् । ततो न सौगतस्य दूपणवचनसामध्यम् असदूपणादित्यात् । तत्कथं तदुपजीवनं त्याद्वादिन इति कारिकारसण्डस्य तात्पर्यम् । "ननु पशुरादारननुभूते चपुरादिना रूपानुभूतमिति यषा तथा मानगुमवेऽपयों रात इति भविश्य- तौरयाह-अर्धम्याच हेतोश्यारादेरर्यदर्शनेऽप्यप्रसिद्धिरम्पतिः स्यात्, यनो न कारपदर्शनकि कादर्शनम् । न तु ध्यरुपलन्धः परमिरी पारसिदियुपर । यदि पुनर्घऐगिरावपि पप यस्तून्यते तदा समिदं जगद म्पर्क स्यार, अम्पादयसिस्वेन विशेषषभावान् ।"-प्रन्या.म. १०२८11 २ अनगुमनाः । एमात्मीय. लेन । ४ सनुभवानिमिः। ५ म्यवहारहेत-मा.प.स.1 अनुमवादीनाम् कि भा.प.R.M.
२०० न्यायचिनिश्चयविवरणे (AR तदेवं प्रासङ्गिक प्रतिपाद्य 'परोक्ष' इत्यादिकस्यैवार्थम् 'अध्यक्षम्' इत्यादिभिः श्लोक: सङ्ग्रहीतुकामः प्रथमं परप्रसिद्धेन। अर्थज्ञानानुमानेन अर्थज्ञानस्य स्वसंवेदनविषयतां व्यवस्थापयन्नाह- अध्यक्षमात्मनि ज्ञानमपरत्रानुमानिकम् ॥१२॥ नान्यथा विपयालोकव्यवहारविलोपतः । इति । अध्यक्ष स्वानुभवमत्यश्वेद्यत्वात् न प्रत्यक्षान्तरवेद्यत्वात् तस्य निपकरणात् । कि तत् । ज्ञानं नीलादिवेदनम् । कस्मिन् ? आत्मनि। कीदृशे तस्मिन् । अपरन्न अन- र्थान्तरे स्वात्मनीति यावत् । फुत एतत् ? आनुमानिकम् इति । अनुमानमत्रार्थापत्तिरेव, "ज्ञाते वनुपानादवगच्छति" [शावरभा० १।११५] इत्यत्र अर्थापत्तरेवानुमानशदे. नाभिधानात् । अनुमानेन गृह्यत इत्यानुमानिकम् । हेतुपदं चैतत् । तदयमर्थ:-सामनि स्वसं- वेदनप्रत्यक्षम् अर्थज्ञानम् , आनुमानिकरयादिति । किं पुनरानुमानिक स्वसवेदनाभावे न भवति १ न भवत्येव । वदाह-'नान्यथा' इति । अन्यथा स्वसदनाभावप्रकारेण आनुमानिक स्वात्मनि ज्ञानं न भवतीति । एतदेव कुतः ? इत्यत्राह-'विपर्य' इत्यादि । अत्रापि 'अन्यथा' इत्यनुवर्तयितव्यम् , अन्यथा अर्थज्ञानस्याध्यमत्याभावप्रकारेण विषयः अन- १५ न्यभावः स चान्यथानुपपत्तिरेव वस्य आलोको दर्शनं स एव व्यवहारो व्यवसायरू- पत्वात् , तस्य विलुप्तिर्विलोपस्तस्मात्तत इति । तथा हि-अर्थापत्तिस्तावद-यथानुपपत्तिरला- देव । तच्च नापरिज्ञातमेव नत्प्रसूतिनियन्धनम् अपरिज्ञातसमयस्यापि ततस्तत्मसूतिप्रसङ्गात् , तथा व निर्विवादं भवेत् । न हि अर्थापतित एवार्थनानं प्रतिपद्यमानस्तत्र विमविपत्तुमर्हति । भवति' चार विप्रतिपत्तिः-स्यानुभवप्रत्यक्षवेद्यमर्थज्ञानमिति जैनादेः, प्रत्यक्षान्तवेद्यमिति २० वैशेषिकादे, अर्धापत्तिवेद्यमिति च मीमासकस्य तदर्शनात् । भयतु परिज्ञातादेव तद्वलात्तत्प्रसूतिरिति चेत् , कुतस्तत्परिज्ञानम् १-अर्थज्ञानादन्यत एव कुतचिदिति चेत् , नेनापि यद्यर्थज्ञानस्याऽपरिज्ञानं कथं तद्विपयस्य तद्बलस्य तनः परिज्ञानम् ? सर्वोपरिज्ञानवतोऽपि कुतश्चित् सर्वविषयपुरुषविशेषज्ञानस्य परिज्ञानपसगात , तथा च दुर्भापितमेतत्- "सर्वज्ञोऽयमिति येवं तत्कालेऽपि भुत्सुभिः । तज्ज्ञानज्ञेयविज्ञानरहितगम्यते कथम्।।" [मी श्लो०१।११२,श्लो०१३४]इति। भवतु ततोऽर्थज्ञानस्यापि परिज्ञानमिति चेत् , अापत्तिरूपं तत्र तदभ्युपगन्तव्यम् , अन्यतसात्परिज्ञानायोगात्, "अनुमानादवगच्छति" इति वचनात् । अभ्युपगम्यत एवेति चेत , तबले तर्हि वत् किनाम प्रमाणम् ? अन्यदेव किमपीति चेत् , सहि प्राप्तमर्थ- २५ १ न्यायदि. इको...। २ अनन्यनाभाव भा, प., प। नान्यत्राभाव स.। ३-नस्य यस्यापि भा०, २०,५०,०। ४ भवतु चात्र भा०व०प०म० ।५ भन्यपानु पत्तिबलात् । ६ तद्बलेन तर्हि सामन्यमानुपपत्तिाले।
.. .. २०१३] प्रयमा प्रत्यक्षप्रस्तावः २०२ ज्ञानेऽर्थापत्तिः अन्यथानुपपत्तिरले चान्यदिति । तथा च न तयोरन्यतरेणाप्यर्थज्ञानविषयं तहल. मवगतं भवति, एकत्र प्रवृत्तेनान्यस्याऽपरिज्ञानात् । न केनोभयापरिज्ञाने तद्गतो विपयविपयि- भावः शक्योऽवगन्तुम् । स्यादातम्-अर्थापत्तितदन्यरूपवयोगयत्वमायमेकमेवेदं तदुभयविषयं नैकान्तभेद- वत्तया प्रमाणद्वयं तदयमप्रसङ्ग इति ; तन्न ; तस्य सप्तमप्रमाणत्यप्रसङ्गात् प्रत्यक्षादिष्वनन्त -५ पात् । भवतु तबलेऽपि तदर्थापत्तिरूपमेवेति चेत् ; न ; तत्प्रसूतिनिबन्धनस्य तद्वलान्तरस्या- भावात् । भावे तत एवार्थज्ञानार्थापत्तेः प्रान्यस्य तदलस्य वैकल्यं स्यात् । भवविति चेत् ; विलुप्तस्तर्हि तदा लोकव्यवहाये विफलताबहारे प्रयोजनाभावात् । तदलान्तरेऽपि व्यवहारविलोपनादिरेवं वफव्यः-तत्रापि तय नापरिज्ञातमेव इत्यादेः 'विलुप्तप्ताहि तयार- हारः' इत्यादिपर्यन्तस्य सुसनिरूपणत्वात् । पुनरपि तदलान्तरे सर्वोऽपि तत्प्रसनो वक्तव्य १० इति नानवस्थातो मुक्तिः । तन्न परतस्तत्परिक्षानम् । एतेन आत्मनस्तत्परिज्ञानमिति प्रत्युत्तम् । ततोऽपि तद्विपयप्रमाणपर्यायनिरपेक्षात् सदसम्भवात् , प्रमाणकल्पनत्यैव वैफल्यप्रसद्गात सकलप्रमाणविपयपरिज्ञानस्यात्मन एयोपपत्तेः। तत्पर्यायसापेक्षादेव ततस्तत्परिज्ञानमिति चेत् । न ; तस्यार्थज्ञानादन्यत्वे तदर्थापत्तिरपत्वस्य तद्दोपस्यं च निवेदितत्यात् । अस्तु तर्हि संतोऽर्थज्ञानरूपादेव तत्परिज्ञानमिति चेत् । ना तस्य १५ स्वसंवेद्यत्वाभावे ततोऽपि तत्परिज्ञानासम्भवात् । यदि हि तत् परिज्ञातस्वरूपं भवति, भय. त्येय ततः स्वविपयतलपरिज्ञानं नान्यया । न हि 'मद्विपयमिदमन्यथानुपपत्तिवलम्' इति परि. ज्ञानम् अनात्महत्ये ततः सम्भवति । न चापरिक्षातात ततोऽर्थापत्तिरर्धज्ञानस्येति स्वानुभव- प्रत्यक्षवेधं तदङ्गीकर्तव्यम् , अन्यथा तस्यानुमानिकरवायोगादिति सूक्तम्-'अध्यक्षम्'इत्यादि । तदयम् 'अन्यधानुपपन्नत्वम् इत्याधर्धस्य संग्रहः । स्वसंवेदनाभाये रास्वन्यथा. नुपपन्नत्वस्य दुरखमोषल्यमनेन प्रतिपाद्यते । तब अन्ययानुपपन्नत्यम्' इत्यादिनापि प्रति- पादितमेव-अन्यथानुपपन्नत्वम् असिद्धस्य स्वभावप्रत्यक्षायेद्यस्य सम्बन्धि तद्गमकत्वेन न सिद्धयति' इति तद्व्याख्यानभावात् । पुनरप्युक्तस्यैवार्थस सोपपति संग्रहमाह- आन्तरा भोगजन्मानो नार्धाः प्रत्यक्षलक्षणाः ॥१३॥ न धियो नान्यधेत्येते विकल्पा विनिपातिताः । इति । अन्तधेतसि भवा आन्तराः सुसादयस्ते प्रत्यक्षलक्षणाः प्रत्यक्षं लक्षणं प्रमाणं येषां से तथोक्ताः । न इति तेपो तयायप्रतिपेये। कथम् ? अन्यथा सरसयेदमस स्वारम- न्यध्यत्वाभावप्रकारेण । -- २५ - . स्वाहादिहतम् । २ अपांपरयुग्पत्ति । । सन्यथानुपतिनान्तरस्यमयात् । - गादिनिरूपणे च पक- भा.,प.स.1५स्मनः भन्यथानुपतिश्नपरिकानमिति । -स्प नि-मा०प०प०,भारमनः । ८ परिभातम् .. २०,०, स. ९न्याययिक श्लो.1110 येति भा०,२०,०,म.
२०२ । न्यायविनिश्चयपियरणे चयमत्र प्रयोगः-स्वात्मनि सुरगदिसंवेदनं प्रत्यक्षम्, अन्यथा सुसादीनामपि प्रत्यक्ष- त्वानुपपत्तेः । तथा हि-सुसादयः प्रत्यक्षविपयतामनुभवन्तः स्वतः, अन्यतो वाऽनुभवेयुः । अन्यत एवेति चेत् । तदपि वद्वेनं नियतम्, अनियतं वा भवेत् ? नियतमेवेति चेत् ; फुत एतत् ? सुखादीनामवश्यसंवेयत्वात् , तदपि सत्त्यादिति चेत् ; न ; सर्वस्य सर्ववेदित्वापत्ते, ५ विषयान्तरसञ्चाराभाषप्रसगाथ-सुपादिवत्तद्विपयस्य संवेदनस्यापि सत्त्वेन अवश्यसंवेद्यत्वात् , तथा तत्संवेदनस्यापीत्यासंसार तत्संवेदनप्रबन्धस्यैव प्रादुर्भावान विषयान्तरसञ्चारः संवेदनस्य स्यात् । सति विषयान्तरसन्निधाने भवत्येव तन तस्य सन्चार इति चेत्, न तहि सतोऽवश्य- संवेद्यत्वम् , तच्चरमसंवेदनस्य सत्त्वेऽपि तदभावात् । अपि च, तत्संवेदनं यदि सुखादिमानात् ;न प्रत्यक्षं स्यात् इन्द्रियसम्प्रयोगजस्य तत्त्वात्। १० नाप्यनुमानादि लिङ्गादिनिरपेक्षत्यात् । अपि तु प्रमाणान्तरमेव सप्तमं भवेत् । भवत्विति चेत् ; ननु तेनापि पश्चाद्वाधिना तात्कालिफस्यैव मुखादेवेंदनं न पोर्वकालिकस्य । तत्र च दोपं वक्ष्यामः । तात्कालिक एव सुसादिर्न पौर्वकालिक इति चेत् ; न; सर्वथा समानकालत्ये मुसादितत्संवेदन- योर्युवतिनयनयोरिय हेतुफलभावाभावापतेः । तन्न सुसादिमात्रात्तत्प्रत्यक्षम् । यदि पुनस्त- न्मनःसम्प्रयोगजमेव तदिति मतम्, तदपि न समीचीनम्, तत्सम्प्रयोगस्यानियमेन तत्संवेदन- १५ स्याप्यनियमापतेः । नियत एव तत्सम्प्रयागै इति चेत् ; न, बदिविपयेवेवमदर्शनात् । अन्त- विपयेवेवमेवेति चेत् ;न, सुसादिवत तत्संवेदन तत्संवेदनसंवेदनादिष्यपि तन्नियमेन तद्वदनस्यापि नियमप्रसद्भात विषयान्तरसञ्चागभावस्य तदवस्थत्वात् । वन्न तर नियतं किश्चित् वेदनम् । अनियतमेव भवत्विति चेत् ; किं पुनरेवं कदाचित्सुरनादेरसंवेदनमप्यस्ति ? तथा पेत् ; न, तस्य भोगरूपत्याभावापत्ते, असंवेदने तदद्योगात्, भोगरूपश्च सुखादिः । अत एवाह- २० "भोगजन्मानः' इति । भोगो मुक्तिवेदनारूपः स एव जन्म प्रादुर्भावो येषां ते तथोक्ता इति । न च स्वत्तोऽन्यतयाऽवेदने तस्य भोगरूपत्वमुपपन्नमतिप्रसङ्गात् । तथा हि- अविज्ञातोऽपि भोगश्चेत्सुसादिः परिकल्प्यते । सर्वदा सुखदुःखादिभोगाकान्तं जगद्भवेत् ॥५७७॥ संवित्तिसमये भोगसत्त्वस्य नियमो यदि । स्तम्भादेः संविदः पूर्वमपि सरवं फथं भवेत् ? ॥५७८॥ इत्यत्रोद्यं पुगभावः तत्र यच्छक्यकल्पनः । आफारभेदनितिर्वचनादपि तद्विदाम् ॥५७९।। प्रत्यग्रोऽयं पुराणों या गृहस्तम्भादिरित्यलम् । जानन्त्येव सदाकारदर्शनादेव देहिनः ॥५८०॥ अवश्यसवयत्वाभावात् । २ प्रत्यक्षत्वात् । ३ सुखदिसंवेदनम् । १ मन.सम्प्रयोग । ५-ते. संदे- भा.,.,.,. स्तम्मादौ । -ल्पना मा०, २०, ५., स. ८ तदिधाम् आ०, ५०, ५०, स.।
१० १२१५ प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्तावः २०३ याप्याकारवैशिष्य न स्वतः शक्यनिर्णयम् । तत्रापि तद्विवेकः स्याचदिदो वचनक्रमात् ॥५८१॥ नैवं भोगपुरासत्त्वमाकाराच्छक्यवेदनम् । तथाप्रतीतिवैधुर्यादविधानपदं गतात् ॥५८२॥ न चैकात्मसुसादीनां द्रष्टा कश्चिदिहापरः । यतस्तद्वपनापां पूर्वभावः प्रतीयताम् ॥५८३॥ तस्मादविदितो भोगः क्षणेऽपि यदि सम्भवेत् । सर्यदातनतत्सत्वं दुर्निवारं प्रसज्यते ॥५८४ ।। अमिहोत्राद्यनुष्ठान स्वर्गभोगाय तथा नित्यसिद्ध हि तद्भोगे किं निमित्तव्यपेक्षया ॥५८५॥ तदभिव्यक्तये तच्चेद्नुष्ठानमभीप्सितम् । इन्द्रियशनमध्येवं तद्धेतोळयमिप्यताम् ॥५८६॥ यत् 'बुद्धिजन्म प्रत्यक्षम्' इति सूत्रस्थितिः कथम् ? ।. जन्मश्रुतिर्यतो लोके नास्त्यभिव्यक्तिवाचिनी ॥५८७॥ तदपि व्यङ्ग्यमिष्टश्चेत सर्वकार्य तथा भवेत् । ततः साङ्ख्यमतं तन्च यथास्थानं निपेत्स्यते ॥५८८॥ तस्मादप्रतिपन्नस्य न यथा सर्वकालता । भोगस्य क्षणकालत्वमपि नैवं प्रकल्प्यताम् ।।५८९॥ भवतु सहि संवित्तिसगय एव सुसादिरिति चेत ; तथापि कथं नस्साचिदूपत्वे भोग- रूपत्वं मृद्विकारवत् ? अचेतनत्येऽपि यया किञ्चिन्नीलं धवलञ्च किञ्चित् , तथा किञ्चिद. २० महरूपं पीडारूपं किञ्चित् किमिति विरुद्धम् , यतोऽचेतनमपि भोगरूपं न भवतीति चेत् ? न सारमेतत् ; नीलादियद्भोगस्यापि साधारणत्वप्रसङ्गात् । अचेतनं हि नीलादि देवदत्चमिय अन्यान् प्रत्यपि जीलायेव न पीतादीनामन्यतमम् , एवमचेतनो भोगोऽपि फिल्चिदिव सर्वा- न्मत्यपि भोग एवं स्थानाऽभोगः। तथा च- भोगेनकेन सर्वेपा भोगरत्त्वं उनुभृताम् । दुनियारप्रसङ्गं स्यादापोगविदा मते ॥५९०॥ यो येन वेद्यते भोगो भोगी तेन स एव चेत् । अन्येन घेदने तस्य सोऽपि स्यात्तेन भोगवान् ॥५९१॥ अन्येन तस्य वित्तिधेन देहान्तर्गतत्वतः । देहान्तर्गव एवान्यः किन्न स्यात्तत्प्रवेदकः १ ॥५९२॥ २५ सद्भवेत् सा• । २ तर सत्स-भा०, २०, २०, स.11 "सत्सम्प्रयोगे पुस्पस्सेन्द्रिया बुदिगन्म तप्रत्यक्षमनिमित्त विरामानोपलम्मन वाद।"-मी मू. 10 जन्म १० २०४ न्यायधिनिधयविचरणे [१०१४ आत्मधर्मस्वतस्तस्य यद्यन्येनाप्रवेदनम् । अचेतन: कथनाम तद्धमा मृद्विकारचत् ॥५९३।। तद्धमत्वे या मा भूत्तस्याध्यक्षेण वेदनम् । अनुमानेन तद्विति, परस्यापि कथन्न २ः ॥५९४॥ वतोऽनुमानयेयेन भोगनेकस्य कस्यचित् । तदन्यस्यापि भोगित्वं निर्विवादमुपस्थितम् ॥५९५॥ "सामान्यमनुमावेद्यं तच्चाहादाद्यनात्मकम् । नास्ति तत्तन भोगित्वं परस्येत्युपकल्पने ॥५९६ ।। सामान्यं यदि तद्वस्तु हादायात्मैव तन्न किम् ? । अवस्तु यदि ; तरक्षानं प्रमाणमनुमा कथम् ? ॥५९७|| विशेषाग्रहणे तच्च सामान्यं गृह्यते कथम् ? । न हविज्ञातसण्डादेोत्यं शक्यप्रवेदनम् ।।५९८॥ विशेषग्रहणे सिद्धं भोगित्वमनुमावतः । विशेषस्यापि सामान्यरूपेण ग्रहणान्न चेत् ॥५९९।। क्यं तस्यान्यरूपेण ग्रहणम् ! यदि विभ्रमात् । विभ्रान्तस्य प्रमाणत्वमनुमानस्य तत्कथम् ? ॥६००॥ "तस्य सामान्यतादात्म्यात्तद्रूपेणे प्रवेदने । प्रत्यक्षेणापि तस्यास्तु तथै प्रतिवेदनम् ॥६०१॥ 'अन्यथा "तेन "तद्वित्तो भ्रान्तिः प्रत्यक्षमाश्रयेत् । वजगन्मान्यमानत्वगोरपक्षयकारिणी ॥६०२॥ प्रत्यक्षानुमयोरेवमभिन्ने विषयग्रहे। भोगाध्यश्रीव भोगी स्यास्किन्न भोगानुमानछन् ? ॥६०३॥ स्यान्मतम्-स्पष्टोपलम्भविषय एव भोगः परितोपादिनिधन्धन तदुपलम्भश्च प्रत्यक्षत पव नानुमानात् , तस्य अस्पष्टप्रतिभासत्वात् । न चापरितोपादिकारिणा भोगेन भोगवत्त्वं तदनु- २५ मानवतस्तदयमप्रसङ्ग इति; तन्न; अस्पष्टोपलम्भविपयस्यापि मनोज्ञादिरूपस्य परितोपादिकारि- त्वोपलम्भात् । अन्यभोगस्यात्मीयत्वेनाप्रतिपत्तेन तेन परितोपादिः'इत्यप्यनेन प्रतिविहितम् । नव- युवतिवदनकमलकमनीयरूपादेरनात्मीयत्वेन दर्शनेऽपि परितोपाशुपलम्गात् । प्रतिपत्तिविषयोऽपि "तधिददृष्टशक्तिवशात् कधिद्भोगः कस्यनिदेव परितोपादिहेतुर्न तदपरस्येति चेत् ; उच्यते- : भोगस्य । ३-न मा वा भू-ता। आत्मधर्मस्वेन । ३ भोगनेकन क-भा०, २०, ५०, स.। ५ भोगिरले रवीक्रियमाणे । ५ भोगत्वादिरूपम् । ६ अनुमानवेन भोगसामान्येन । प्रहण न चेन मा०, २०, १०.1 भोगित्वं परस्य 18 विशेषस्य सामान्यरूपेण । विशेषस्य" सामान्यरूपेग । विशेषल्प। १३सामान्यरूपेण । १५ सामान्यरूपेण । १५ प्रत्यक्षेण विशेषज्ञाने। १० कुतश्चिदृष्ट-आ.,ब०,९०,800 २० १३१४] प्रथमः प्रत्यक्षमस्तायः २०५ १० भोगः स्वयं यदि परितोपाचात्मा तदा तेनैव तदपरपरितोपाचारणेऽपि प्रत्यक्षभोगप्रतिपत्तिमत इवानुमानभोगप्रतिपत्तिमतोऽपि परितोपादिमत्योपपत्तेः कथन्न कस्यचिद्भोगेन तदपरस्यापि 'भोग- वत्त्वं भवेत् ? परितोपाद्यात्मत्त्वमपि तस्यादृष्टशक्तितः कश्चिदेव नापरं प्रवीति चेत् ; फुल एतत ? फेनचिदेव तस्य तद्रूपेण प्रतिपत्तेरिति चेत् ; न ; परेणापि तस्य तद्रूपेणैव प्रति. पत्तेः । रूपान्तरेण प्रतिपत्तिस्तु न तत्प्रतिपत्तिः अतिप्रसङ्गात् । रूपान्तरमपि तस्मादभिन्नमे५ वेति चेत् ; व्याहतमेतत्-'तदन्तररून तदभिन्नं च' इति । भेदैकान्तानुपाश्रयाददोपश्चेत् । एवमपि तत्प्रतिपत्ती यदि न परितोपादिप्रतिपत्तिः, अप्रतिपन्न एव परसुसादिर्भवेत् परितोपादि- नेव सस्य सुखादित्योपपत्तेः, अन्यथा सत्त्वादिमात्रेणापि तत्त्वप्रसङ्गात् । तदात्मना तत्प्रति- पत्ती तु कथन्न परोऽपि परितोपादिमान् यतः कस्यचिद्रोगेन परोऽपि तद्वान्न भवेत् ? तन्न स्वयं परितोपाद्यात्मत्वे भोगस्य प्रत्यात्म तत्प्रतिनियमः। स्वयं तदनात्मकत्वे तु कथं तस्य भोगत्वम् १ परितोपादिकरणादिति चेत् ; न; प्रक्चन्दनादेरपि तत्त्वप्रसगात् तेनापि तत्करणात् । अस्त्येवोपचारात्तस्यापि तत्वमिति चेत् ; उपचारत इति फुतः ? स्वयमपरितोपादिरूपत्वादिति चेत् ; न; तत एच सुसादेरप्युपचारत एवं तत्त्वापत्तेः । न चैवम् । तस्य स्वत एय भोगत्वेन सर्वप्राणभृतां प्रसिद्धत्वात् । एतदर्थञ्च 'भोगजन्मानः' इति वचनम् । “तस्योपचारभोगत्ये वा मुल्यो भोगो वक्तव्यः, वेन विना १५ उपचारस्यासम्भवात् । उत्कृतपरितोपादिमुख्य इति चेत् ; सोऽपि यद्यर्थान्तरज्ञानविपयतया कस्यचिद्रोगः, तदपरस्यापि स्यात, तेनापि तत्परिज्ञानाविशेषात् "वदविशेषेऽपि "तस्य परितोपा. धात्मत्यम् अदृष्टयशात् कञ्चिदेव नापरं प्रतीति चेत्, न, तत्रापि 'कुत एतत्' इत्याद्यनुबन्धादा- पृत्तिदोपस्यानवस्थितस्य प्रसङ्गात् । तन्न परतः सुखादीनां प्रत्यक्षत्यानुभवनमुपपत्रम्, "प्रत्यात्म सनियमाभावप्रसगात् । अस्तु तर्हि स्वत एव तेको" तदनुभवनमिति चेत् ; अपरोक्षं वदि नदिन वकम्यम्, अन्यथा "तदनान्तरत्वेन रोपामपि परोक्षत्येन ततो हांधनुदयप्रसङ्गात् । वक्ष्यति चैतत् 'मुख-दुःखादिसंवित्तेः' इत्यादिना' । ततः सूक्तमिदम्-'मुररादिवेदनम् आत्मनि प्रस. क्षम् अन्यथा मुसादीनामपि प्रत्यक्षत्यानुपपत्तेः' इति । पुनरप्यात्मनि शानस्य प्रत्यक्षत्वमुपपादयतीति-प्रत्यक्षमात्मनि ज्ञानम् । पुत एतत् ? २५ अर्थाः प्रत्यक्षलक्षणाः नान्यथा इति । अन्यथा तानस्यात्मनि स्वतः प्रत्यक्षत्वाभाय- प्रकारेण अर्था नीलधवलादयः प्रत्यक्षलक्षणाः प्रत्यक्षप्रमाणा न भवेयुः । यदि २० -गन्य भा, प०,०,०।२ तस्साशक्तिः निधिदेव भा०,१०,१०,801 ३ गोगस्य । परितोगविरूपेण । ५ भेदेशान्तानपाध-भा., य.,., स.। मुगाशिव। . तारमकत्वे मार,., प.,म परितोपायनात्मको। भौग वम् । ९ पुखादैः ।।• मुरादेः । ।मुलन । तदपि विरोरेप तस्यापरि-भा०, २०, ५०,111 मुरादेः। १४प्रया नि-मा.., प., स. १५ मुगादीनाम् । १९ पोपशनापभिसचेन। न्यायवि. सो. १४ २०४ न्यायविनिश्चयविचरणे [२११४ आत्मधर्मत्वतस्तस्य यद्यन्येनाप्रवेदनम् । अचेतनः कथनाम तद्धर्मो मृद्विकारवत् ॥५९३॥ तद्धमत्वेन वा मा भूत्तस्याध्यशेण वेदनम् । अनुमानेन तद्वित्तिः, परस्यापि कथन्न पः ॥५९४|| ततोऽनुमानवेद्येन भोगेनेफरय कस्यचित् । तदन्यस्यापि भोगिल्वं निर्विवादमुपस्थितम् ॥५९५।। “सामान्यमनुमावेद्यं तच्चाहादाद्यनात्मकम् । नास्ति तत्तेन भोगित्यं परस्येत्युपकल्पने ॥५९६॥ सामान्यं यदि तद्वस्तु हावाद्यात्मैव तन्न किम् ? । अवस्तु यदि जानं प्रमाणमनुमा कथम् ? ॥५९७॥ विशेषाग्रहणे तच्च सामान्यं गृह्यते कथम् ? । न हविज्ञातसण्टादेगौवं शक्यप्रवेदनम् ॥५९८॥ विशेपमहणे सिद्धं भोगित्वमनुमावतः । विशेपस्यापि सामान्यरूपेण ग्रहणान्न चे ॥५९९॥ कथं तस्यान्यरूपेण ग्रहणम् ? यदि विभ्रमात् । विभ्रान्तस्य प्रमाणत्वमनुमानस्य वत्कथम् ? ॥६००॥ "तस्य सामान्यतादात्म्यात्तद्रूपेणे प्रवेदने । प्रत्यक्षेणापि "तस्यास्तु तथैर्य प्रतिवेदनम् ॥६०१।। "अन्यथा "तेन "वद्वित्तो भ्रान्तिः प्रत्यक्षमाश्रयेत् । वजगन्मान्यमानत्वगौरवक्षयकारिणी ॥६०२।। प्रत्यक्षानुमयोरेवमभिन्ने विषयग्रहे । भोगाध्यक्षीय भोगी स्यात्किन्न भोगानुमानयत् ? ॥६०३॥ स्यान्मतम्-स्पष्टोपलम्भविषय एव भोगः परितोपादिनिबन्धनं तदुपलम्भश्च प्रत्यक्षत एव नानुमानात्, तस्य अस्पष्टप्रतिभासत्वात् । न पापरितोपादिकारिणा भोगेन भोगवत्त्वं तदनु- २५ मानवतस्तदयमप्रसङ्ग इति; तन्न, अस्पष्टोपलम्भविषयस्यापि मनोज्ञादिरूपस्य परितोपादिकारि- त्योपलम्भात् । अन्यभोगस्यात्मीयत्येनाप्रतिपत्तेन तेन परितोपादिः' इत्यप्यनेन प्रतिविहितम् ; नव- युपतिवदनम्मलकमनीयरूपादेरनात्मीयत्येन दर्शनेऽपि परितोपाशुपलम्भात् । प्रतिपत्तिविषयोऽपि "कुतश्चिददृष्टशक्तिवशात् कश्चिद्धोग: कस्यचिदेव परितोपादिहेतुर्न तदपरस्येति चेत् ; उच्यते- १५ २० .. . भोगस्य । २-३ मा दा भू-ता. भात्मधर्मवेन । ३ भोगेनैकेन क-मा०, २०, ५०, स.. ५ भोगिरवे रवीक्रियमाणे। ५ भोगत्वादिरूपम् । ६ अनुमानवेशेन गोगसामान्येन । • ग्रहण न चैन् मा०, २०, प.स.1 भोगित्व परस्स।विशेषस्य सामान्यरूपेण । १० विशेषस्य । सामान्यरूपेग । विशेषस्य । सामान्यरूपेण । 1 सामान्यरूपेण । १५ प्रत्यक्षेण । विशेषराने। १७ फुतश्विर-मा.व.,प.,सा १३१४] प्रथमः प्रत्यक्षमस्ताया भोगः स्वयं यदि परितोपागारमा तदा नैव तदपरपरितोपाधकरणेऽपि प्रत्यक्षभोगप्रतिपत्तिमत इवानुमानभोगप्रतिपत्तिमतोऽपि परितोपादिमत्वोपपत्तेः कथन्न कस्यचिद्भोगेन तद्पररयापि 'भोग. वत्वं भयेत् ? परितोपाधात्मत्त्वमपि तस्यादृष्टशक्तिनः कश्चिदेव नापरं प्रतीति चेत् । फुत एतत ? केनचिदेव तम्य तद्रूपेण प्रतिपत्तेरिति चेत् ; न ; परेणापि तस्य तद्रूपेणैव प्रति- पत्तेः। रूपान्तरेण प्रतिपत्तिस्तु न तत्प्रतिपत्तिः अतिप्रसङ्गात् । रूपान्तरमपि तस्मादभिन्नमे. ५ चेति चेत् ; व्याहतमेतत्-'तदन्तरञ्च तदभिन्नं च' इति । भेदैकान्तानुपाश्रयाददोपश्चेत् ; एवमपि तत्मतिपत्ती यदि न परितोपादिप्रतिपत्तिः, अप्रतिपन्न एव परसुसादिर्भवेत् परितोपादि- नव तस्य सुगादित्योपपत्तेः, अन्यथा सत्त्वादिमात्रेणापि तत्त्वप्रसद्गात् । तदात्मना तत्मति. पत्ती तु कथन परोऽपि परितोपादिमान् यतः कस्यचिद्भोगेन परोऽपि तद्वान भवेत् ? तन्न स्वयं परितोपाद्यात्मत्वे भोगस्य प्रत्यात्म तत्प्रतिनियमः । स्वयं सदनात्मकत्वे तु कथं तस्य भोगत्वम् ? परितोषादिकरणादिति चेत् ; न; सचन्दनादेरपि तत्त्वप्रसगात् तेनापि तस्करणात् । अस्त्येवोपचारात्तस्यापि त्वमिति चेत् ; उपचारत इति पुतः १ स्वयमपरितोपादिरूपत्वादिति चेत् ; न; तत एव सुखादेरप्युपचारत एव तत्वापः । न चैवम् ; तस्य स्वत एव भोगव्येन सर्वप्राणभृतां प्रसिद्धस्यात् । एतदर्थन्ध "भोगजन्मानः' इति वचनम् । तस्योपचारभोगत्ये या मुख्यो भोगो वक्तव्यः, तेने' विना १५ उपचारस्यासम्भवात् । तत्कृतपरितोपादिच्रय इति चेत् ; सोऽपि यद्यर्थान्तरज्ञानविषयतया फस्यनिद्रोगः, तदपरस्यापि स्यान, तेनापि तत्परिझानाविशेषात् "तविशेषेऽपि तस्य परितोपा- धात्मत्यम् अदृष्टयशात् कञ्चिदेव नापरं प्रतीति चेत् ; न; तत्रापि 'युत एतत्' इत्यादानुबन्धादा- पृत्तिदोपस्यानयस्थितस्य प्रसद्गात । वन्न परतः सुखादीनां प्रत्यक्षत्वानुभवनमुपपन्नम्, "प्रत्यात्म तनियमाभावप्रसद्गात् । अन्तु गाई स्वत एव तेषां तदनुभवामिति चेत् ; अपरोक्षं तर्हि तद्वेदनं वक्तव्यम्, अन्यथा “तदनन्तरत्वेन तेपामपि परोसत्वेन ततो हर्पाद्यनुदयासगात् । वक्ष्यति चैतत् 'सुग्य-दुःखादिसंवित्तेः' इत्यादिना" । ततः सूकमिदम्-'सुसादिवेदनम् आत्मनि प्रत्य- क्षम् अन्यया मुरादीनामपि प्रत्यक्षत्वानुपपत्तेः' इति । पुनरप्यात्मनि मानस्य प्रत्यक्षत्वमुपपादयतीवि-प्रत्यक्षमात्मनि ज्ञानम् । कुत एतत् ? अर्थाः प्रत्यक्षलक्षणाः नान्यथा इति । अन्यथा नानस्यात्मनि स्वतः प्रत्यक्षत्वामाव- प्रकारेण अर्था नीलपवलादयः प्रत्यक्षलक्षणाः प्रत्यक्षप्रमाणा न भवेयुः । यदि .. २० २५ , -गवं भा०,०,१०, स.१२ तात्याटस्तिः निधिदेव मा०,२०,०,80 1 ३ भोगस्य । परितोषदिलेग । ५ भेदकान्तानपाथ-मा०, य., ५०, ६ मुखादिल । . तशमरत्वे भा०, १०, ५०,१० परितोभयनात्मकरखे । ( भोगरम् । १ मुखाः ।।मुखादेः । " मुल्येन । १२ तदपि विशेपेऽपि सस्यापरि-मा०, ५०, ५०, RIR मुगादेः। 1। प्रन्याय नि-मार, १०, २०, २० । १५ मुखादीनाम् । १६परोपसानाभिरापेन 10 न्यायविरोः ।
स्वतः, . - + १ न . M २०६ न्यायविनिश्चयषिधरणे [१५ भवेयुः को शेष इति चेन् ? तहह्मणत्वापरिज्ञानमेवेति ब्रूमः । 'तल्लक्षणत्वं हि तेपा' परतो वा परिझायते ? न वायत् स्वतः , तस्या धर्मलाभावप्रसङ्गात् । अर्थधर्मत्वे हि नस्यार्थस्यापि स्वतः परिशेयत्वं भवेत् धर्मधर्मिणोरभेदनयाभ्यनुज्ञानात् । न चैवम् , अतो न तस्यार्थधर्मत्त्वम् । नापि ज्ञानधर्मत्वम् , ज्ञानस्यापरोक्षत्वापत्तेः, स्वतः परिज्ञानविषय- ५ त्वेनापयेक्षात तहक्षणत्वादव्यतिरेकात् । तद्धर्मत्वे या तेन कथमर्थस्तलक्षणो भवेत् अतिप्रसङ्गात् । तेनापि तस्य तहह्मणत्वफरणादिति चेत् । न , तस्यापि प्राच्यपात् मानधर्म- स्वात् , तेनाप्यर्थस्य नहह्मणत्वानुपपत्तेः । पुनस्तेनापि तस्यापरतल्लक्षणत्वररणे परिनिष्ठाभाव- प्रसङ्गात् । एतेन तस्यात्मधर्मत्वं प्रतिविहिवम् , समानत्वान्न्यायस्य । तन स्वतस्तस्य परिज्ञानम् । परत इति चेत्, किं तत्परम् ? अर्थज्ञानादन्यदेव ज्ञानमिति चेत् , कुत तत् १० तत्कृतस्य परिज्ञेयत्वस्य दर दर्शनादिति चेत् ; तस्य स्वतो दर्शने पूर्ववद्दोपात् । परवो दर्शने ' ितत्परम् ?' इत्यादिनसहरयानिवृत्तेख्यवस्थापत्तेः । एतेन 'आत्मा पर:' इति प्रत्युत्तम् , अनवस्थादोपस्याविशेपात् । अर्थज्ञानादेव तत्परिज्ञानमिति चेत् , "तेनापि "यद्यतत्वत्वेन तत्परिझानम् , प्रान्तमेव तद्भवेत् ,अर्थानां सहमणत्वस्य 'तत्कृतत्वात् ,तस्य चान्यथा तेने परिज्ञानात् । तत्कृतत्वेन तु तेन १५ परिनाने सिद्धं तस्य स्वतः प्रत्यक्षत्वम् ,अन्यथा तत्कृतस्य तहक्षणत्वस्य नेन परिक्षानायोगात् । न हि तदेवाजानतः शक्य "सत्कृतत्यपरिज्ञानम् । अपरिजात (परिमातं) तहमणत्वमेव "तेषां मा भूदिवि चेत् ,कथमिदानी "यागागद्गत्वेन तेषां स्वर्गादिसुखादिभोगहेतुत्वम् , अतहमणाना" तदनमावस्य पत्तुं मशस्यत्वान् ? भोगहेतवश्वार्थाः परस्याप्यमिमताः । तत एवाह-'भोग. जन्मान' इति । भोगस्य स्वर्गमुरगदेर्जन्म येभ्यस्ले भोगजन्मानोर्थी इति । ततो- २० श्ययम्भायिनि तेषां तरक्षणत्वे तत्परिशाने प तदन्यथानुपपत्तियलादेय स्वतः प्रत्यक्षमर्थानमभ्यु. पगन्तव्यम् । अतश्च तत्तथाऽभ्युपगन्तव्यम्-न, यतः अन्यथा तथा तदभ्युपगमाभावप्रकारेण धियो" बुद्धयः । बुद्धय एवं कीरश्यः ? प्रत्यक्षलक्षणाः। प्रत्यक्षरय लक्षणं सत्सम्प्र. योगहत्य उद्विशते सामिति मलमणाः, मस्र्थीयाकारप्रत्यये सति एवंरूरत्वात् , प्रत्यक्षमुद्धय इति यावन् । पुतस्ता न मान्तीति चेन् ? प्रमाणामावान् । यद्यपि न प्रत्यक्षं न ममाण- २५ [मनुमान मस्त्येवेवि पेत् , न , तस्य 'विपयेन्द्रिय'इत्यादिना" निषेधान । मा भूवन तर्हि तद्धिय इति पेत् ;न , तासामर्थपरिच्छेदरूपं भोगं प्रति हेतुत्वविरोधात् , असतीनां गगन. कुसुमय जामिनदयोगान् , नद्धेतवा साः । सहाह-"मोगजन्मान' इति । व्याख्यातमेवन् । . प्ररक्षणम् । ३ नीलधवगदीनाम् । प्रत्याशरणवस्य । ५ प्रत्यक्षमणवान् । ५ ज्ञान पशनधर्मण प्रयालागवेनापि भर्थस्य सपरप्रत्यक्षलक्षणलरणादिति चेत् ।।.अपयशलक्षणावे मापि । ८ तत्सरमामा-भाग,०,प.स. ९ मारक्षगवपरिज्ञानम् । १. अज्ञानेनापि । अर्थात. पेन। १२ अर्थक सात् ।। HTन सौग। 1 अधशनेन । १५ अर्पस्य । ।। तारि-आ०,प., प.प.11.अपरिशन -मा...,प.स.1 १८ अनाम्।। योगाय-भा०, २०, २०,मा १. प्रयशलभगतग्रन्यानाम् । ३५ यो युदय एष a. २९ म्यापवि. स.
. १२१५] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः तस्मावश्यम्भाविन्यर्थपरिच्छेदे सत्य एव तद्बुद्धयो वक्तव्याः । तत्र च स्वानुभवप्रत्यक्षमेष प्रमाणम् अनुमानस्यापि तन्नान्तरीयकत्वात् । वक्ष्यति चैतत् 'तावत्' इत्यादिना । ततः स्वात्मनि तत्प्रत्यक्षवेद्या एव प्रत्यक्षधियो वक्तव्याः । इति एवम् एते अनन्तरोका विकल्पाः भेदाः सुखादयो नीलादयश्च बुद्धयश्च ज्ञानस्याप्रत्यक्षते प्रत्यक्षलक्षणा न भवन्तीति विचार्य विनिपातिताः निराकृताः 'परोक्ष' इत्यादिकारिकार्धेन', तेनाप्यस्यैवार्धस्याभिधानात् । ५ वदनेन तदर्थस्यैवायं सड्मह इति दर्शयति । यत्पुनरेतत्-मा भूत् सुसादीनां प्रत्यक्षत्वमिति । तत्राह- सुग्वदुःस्वादिसंवित्तरवित्तेन हर्षादयः ॥ १४ ॥ इति । सुखदुःखादीनां संवित्तः परोक्षस्येन यदि अवित्तिः सदा तेषामपि तदना- न्तरत्वाद् , तदनन्तरत्वेऽप्यर्थवेदनोक्कन्यायेनावित्तिरेवेति कथं तेभ्यो हर्षादयः कस्यचित् , १० अतिप्रसङ्गात् ? हपदिय इति संयोगपरस्त्रेऽपि न पश्चमस्यं लघुत्वहानिा, फचिच्छन्दोधिचि- तिवेदिनां तदगीकारात् "कोपनिषण्णस्य प्रकृतिमलिनस्य"[ ]इतियत् । प्रत्यक्षेण तेपामवेदनेऽप्यनुमानेन वेदनाचेभ्यो हदिय इति चेत् ; न ; तस्यैवासम्भवात् लिनामावान् । सुखादीनां परिच्छेद एव लिङ्गमिति चेत् ; न ; तबुद्ध्यसिद्धी वदसिद्धत्वस्योक्तत्वात् । अभ्युपगम्याप्याह- आनुमानिकभोगस्याप्यन्यभोगाविशेषतः । इति । अनुमानेन यो गृह्यते भोगः सुखादानुभवस्तस्य अपिशब्देन तदभ्युपगमं दर्शयति, पुरुषान्तरभोगाविशेषात् न ततो हदय इति । तथा हि-न विवक्षितो भोगो हर्षादिहेतुः आनुमानिकत्वात् आत्मान्तरभोगपत् । पुत्रादिभोगेन व्यभिचारः साधनस्य तस्यानुमानिकत्येऽपि पित्रादेहेपादिकारणत्वादिति चेत् ; न ; असिद्धत्यात् । न हि तस्य तद्भोगानुमानादेव हर्षादयः, २० अपि तु सदनुमाने सति स्नेहपशस्य स्वयमेव स्वानुभवसंवेद्योगरूण परिणामान्, अन्यथा पैरीभूतपुत्रादिभोगानुमानादपि तस्य "वत्प्रसङ्गात् । ततो न सुखादियुद्धेरप्रत्यक्षत्यं न्याय्यम् । इतन न तन्न्याय्यमित्याह- तात्परत्र "शत्तोऽयमनुमातुं कधं धियम् ॥ १५ ॥ याचदात्मनि तचेष्टासम्बन्धं न प्रपद्यते । इति । परोक्षज्ञानयादिनोऽपि" मीमांसकरय परयोधप्रतिपत्तिरवश्यकर्तव्या" प्रतयाधविद्योप- देशादेरन्ययानुपपत्तेः । न च परयोधस्य प्रत्यस्तो वित्तिः; "अनिन्द्रियसम्प्रयोगात् । अनुमान- सस्तद्वित्तिस्तु लिङ्ग तस्तत्सम्बन्धपरिमानसन्यपेक्षा । न चामत्यो घोघे तरसम्बन्धो लिङ्गस्य २५ न्यायवि.स.१५१२-अवेध एव मा०, २०, ५०, स.। ३-चार्य निम-मार, ०, २०, RO IV न्यायवि.को.५मुस सादीनामपि। पाशरस्य घरस्प | मान-पुपि- प्रादि-मा...,.,.। मित्रा। हरदिशोऽमम् भा०, २०, १०, स. ११-नो मा-भा०, ५०, १०, स. ! १३ -मा तर न्यरि-भा०,.,.,.J१४ इन्दियगम्प्रयोगामार। - २०८ . न .. म्याययिनिधयविपरणे शक्यपरिज्ञाना, रातो यावत् असो आत्मनि प्रत्यगत एव योधपूर्ण व्याहारादेर्न प्रति- पधेत न तावत्पुरुपान्तरमोधमनुमातुमर्हतीति कथमस्य परार्थ किमपि चेष्टितमिष्टं भनेत् ? आत्मन्यपि बोधमनुमिमान एव तत्पूर्वक्त्वं व्याहारादेवगन्तीति चेत् , तदनुमानं यदि तस्मादेष रिङ्गात् , तदा 'ततः सम्बन्धपरिज्ञानम् , परिज्ञातसम्यन्याच लिङ्गात्ता' इति सुन्यक्त- ५ शुभयथा प्रफ्लूप्तिनिवन्धनमन्योन्याश्नयणम् । अन्यत एव लिङ्गोत्तदिति चेन् , वत्सम्बन्ध- स्याप्यन्यतोऽनुमानादवर्गमः, तदपि लिङ्गान् , तत्सम्बन्धस्यापि तदनुमानादरगम इत्यनयस्थादो. पात् । तन्नात्मनि योधक्षानगनुमामात् , लिङ्गाभागाध । तदाह- विपपेन्द्रियविज्ञानमनस्कारादिलक्षणः ॥ १६ ॥ अहेतुरात्मसंवित्तरसिद्धेय॑मिचारतः। इति । आत्मनि योधानुमाने हि विषयेन्द्रियादीनामन्यतमस्यैर लिङ्गत्वं सम्बन्धसम्भवात् , नापरस्य विपर्ययात् । तत्र न तावद्विपयेन्द्रियान्तःकरणानां लिङ्गत्वम् ; तेषां बोधं प्रति हेतुत्वेन व्यभिचारसम्भवात् । अप्रतिबद्धर्शचित्वेनाव्यभिचार एवेति चेत्, न, कार्यादने तस्यापरि. ज्ञानात् । विगुदादिचरमक्षणस्य संददर्शनेऽपि तत्परिज्ञानमिति चेत , सत्यम् , सजातीयकार्यापे. क्षया तत्सत्त्वादेव तत्परिशानं तस्ये "ना(तन्ना)न्तरीयस्त्वात्, "अन्यथा तत्स तानस्यैर १५ अवस्तुत्यापत्तेरित्युत्तरत्र विस्तरविधानात् । न चैवं विजातीयकार्यापेक्षयापि तवस्तत्परिज्ञानं बहुलं "तदभावेऽपि भावसत्त्वरयोपरम्भात् । विजातीयञ्च कार्य विषयादीना बोधलकथं तने "तेपामप्रतिहतशक्तिकत्वमिति सम्भवव्याभिचारस्वान्न लिङ्गत्वम् । असिद्धत्वाच । असिद्धा हि विषयादयः परोक्षनानवादिनाम् , तदपरिज्ञानस्य निवेदितवान् । एतेन विज्ञानस्यापि तत्रालिङ्गत्वमुक्तम् , स्वत एव परोझज्ञानवादिना "तदमिद्धत्वस्य २० सुप्रसिद्धत्वात् । किं पुनरिदं विज्ञानं नाम १ स एष साध्यो वोध इति चेत्, न, तत्र लिङ्गत्यसम्भावनस्याप्यतम्भनात् । न हि साध्यमेष कश्चिदनुन्मत्तो लिङ्ग सम्भाश्यति अनित्यत्वात् । सति तत्सम्भावने तर दूपणवचनम्, अन्यथाऽतिप्रसङ्गात् । अर्थापत्तिरनुमानं या विज्ञानमिति चेत् ; न , तवयस्यापि तद्विपयत्वे 'गापि तत्सम्भावनाऽभावात् , 'प्रत्यक्षेऽपि प्रसङ्गात् न कश्चित्प्रत्यक्षवेद्यो माव: "स्यात् । अतद्विपयत्वे" तदुद्यानुमाने तत्सम्भावनप्रसङ्गः २५ तथा तत्प्रभवानुमानेऽपीति न कचियवस्थितियतोऽनुमानगो बोधो भवेत् । ततो दूरमनुसत्यापि यदि तस्य सतस्तद्विपयत्वान्न तत्सम्भावना, आयस्यापि न स्याइविशेषात्, इति नार्थापत्या- . लिनादिति भा०, ब०, १०, स.। २ -स्थान्य-पा०, २०, ५०, स.। -गमन त-मा०, २०, प., स.। ४-किनाग-आ०, २०, ५०, स०। ५ अप्रतिबद्धशक्तिम्-वस्थेन । ६ कार्यादर्शनेऽपि । ७ कार्यसस्वादेव । ८ अप्रतिबद्धशक्ति वारिज्ञानम् । ९ कार्यस्य । १. अप्रतिवद्धशतकत्वाविनामावि वात् ।।" चरमणस्य कार्य लाभावे । १२ विजातीय कार्याभावेऽपि । १३ बोरे 11 विश्यादीनाम् । १५ विशनासिद्ध स्वस्थ । । स्वस्वरूपविषयले । १० साध्यात्मबोधेऽपि । १० लिङ्गमम्भावनाऽभावा । अर्थापरयनुमानयोरपि भोपस्यापि ज्ञानवेन स्वरूपविषयत्वादिति भाव । १९ स्वरूपविषय वेन प्रत्यक्षत्वेऽपि लिङ्ग यम्भावनायाम् , सर्वत्र प्रत्याविषयीमतेऽर्थ । २. स एव अनुमेय स्थादिति भाव । २१ स्वस्वरूपाविषयत्वे । २२ यत् तस्य स्वरूपा- विषयत्वात् । २३ लिसम्मावना। २१ प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव दिकमपि विज्ञानम् । साध्यज्ञानादुत्तरज्ञानस्यैव तत्त्वोपपत्तेः तत्र सम्बन्धसम्भवेन तत्सम्भाव- नस्य सम्भवात् । आदिशब्देन अनुक्तपरिग्रहः । अनुक्तश्च परिच्छिन्नो विषयः, तत्परि. च्छेदो वा स्यात ? | सोऽपि आत्मसम्वित्तः मीमांसकज्ञानस्य अहेतुःअगमकः इत्याह- असिद्धसिद्धि(ोरप्यर्थः सिद्धश्चेदखिलं जगत् ॥ १७ ॥ सिद्धम् [ तकिमती ज्ञेयं सैव किन्नानुपाधिका । ] इति । परिच्छिन्नस्य विपयस्य तत्परिच्छेदस्य वा नापरिजातस्यैव तद्धतुल्वम् ; अतिप्रसद्गात् । न चापरिज्ञातज्ञानस्तद्विपयः तत्परिच्छेदो वा 'परिज्ञातः' इत्युपपन्नम् ; 'असिलं जगत्परिज्ञातम्' इत्यप्युपपत्तेः । परिज्ञायत एव स्वतो मुख्यतोऽर्थविशेषणत्वेन वा तत्परिच्छेद इति चेत् ; सोऽपि यदि ज्ञानधर्मः; तत्राह-'तकिमतो ज्ञेयम्' इति । तत् अर्थज्ञानम् अतः परिच्छे. दात् किम् नेव ज्ञेयम् अनुमातव्यम् , परिच्छेदपरिज्ञानादेव तदनन्तरत्येन ज्ञानस्यापि १० स्वत एव परिज्ञातत्वादिति भावः। भवतु यार्थस्यैव धर्म इति चेत् आह-सैव किन्नानुपा- धिका ? सैव परिच्छित्तिरेव सिद्धिशब्दवाच्या किं न भवत्येव अनुपाधिका विषयज्ञान. विशेषणाशून्या ? परिच्छित्तेः स्वतः प्रत्यक्षायाः अव्यतिरेकेणार्थस्यापि तत एव प्रत्यक्षत्यात् विफलमेव ज्ञानम् , अतो विरुद्धो हेतुः, शानसाधनाय प्रयुक्तेन तदभावस्येय साधनादिति सात्पर्यम् । तदयं 'परोक्ष ज्ञान' इत्यादेः संग्रहः । १५ तदेव दूपणमन्यत्राप्यतिदिशन्नाह- एतेन येऽपि मन्येरन्नप्रत्यक्षं धियोऽपरम् ॥ १८ ॥ संवेदनं न तेभ्योऽपि प्रायशो दत्तमुत्तरम् । इति । एतेन परोक्षेत्यादिना मीमांसकपणेन तेभ्योऽपि नाऽदत्तं किन्तु दत्तमेवोत्तरम् । फथम् ? मायशो बाहुल्येन, परस्याप्युत्तरस्य वक्ष्यमाणत्वात् । मर्यात्मना तदाने तदनुपपत्तेः । २० ते यो येऽपि साइका मन्चरन् । किम् ? संवेदनम् चैतन्यम् । कीरा ? अप्रत्यक्षम् प्रत्यक्षस्य प्रमाणविशेषत्वात्, प्रामाण्यस्य च चित्तधर्मत्वात् , चित्ताच संवेदनस्य भिन्नत्वेन प्रत्यक्षत्यानुपपत्तेः । अत एवाह-घियो व्यवसायात्मिकाया बुद्धेः अपरं भिन्नमिति । तात्प. यमत्र परोक्षसंवेदनेन यदि बुद्धिप्रतिविम्बितार्थानुभवनं विषयानुभवनमेव किल स्यात् यतो म मीमांसकमतम् ? आक्षेपसमाधानयोरुभयत्रापि समानत्वादिति । एते समहश्लोकाः । नैयायिकरत्वाह-अर्थप्रकाशनमेव ज्ञानं नात्मप्रकाशनं तरिसद्धाधुपायाभावात् । अर्थ- प्रकाशनमेव तंत्रोपायः तस्य तदन्तरेणानुपपरोः । अत एव कस्यचिद्वयनम्-"अप्रत्यक्षोपलम्भस्य नाथदृष्टिः प्रसिद्धयति ।" [ ] इति । इति चेत् ; फेयमर्थप्टेः प्रसिद्धिः- किमुत्पत्तिः, आहोस्विदुपलब्धिः ? फश्योपलम्भोऽपि यत्याप्रत्सनचे सत्यर्थपिन प्रसितिकि २५ लिलीपपत्तः । २ विषयपरिच्छेदः । ३ 'प्रापरा.' इनि पचनानुपम: । ४ 'अन्ययानुराम रम्' हत्यारभ्य एतेन येऽपि स्यन्तमटो संप्रदालोकाः, 'परोक्षशानविश्य' इत्यादिवरय अर्थरस एभिः मंहा। ५ भामहाराने। (अर्थप्रकासनस्प। आमप्रकाशन दिना । ८-नीति व प्रा.,.,.,स.।
२१० . . म्याययिनिश्चयविवरण [१२१९ सैवार्थदृष्टिः, उत तेजनक ज्ञानमिति ? तर यभिमतिः सेवार्थदृष्टिरपरमाः, तस्याप्रत्यक्षत्ये सत्युत्पत्तिर्न सम्भवतीति, तदयुतम्, उत्पादे सति पयादर्थदृष्टेः प्रत्यक्षत्वं युक्तं न पूर्वमेव, अन्यथा अतिप्रदात् । अथ अर्थदृष्टिजनकं ज्ञानमुपलम्भः, तस्याप्रत्यक्षतेऽर्थरष्टिनोत्पद्यते इति, सदयुधम्, चक्षुरादियदप्रत्यक्षस्याप्युत्पादकत्वसम्भगत्, तीनस्पर्शादिना सुपुप्तप्रेगोधे पूर्वज्ञानासंगे- ५ दनात् । अथार्थदृष्टेः प्रसिद्धिरुपलन्धिः, तदाप्ययं स्याद्वाक्यार्थो भवति-अप्रत्यक्षोपलम्भस्य नार्थोपलम्भः प्रत्यक्ष इति । न चानेन निश्चित्साधित-भवति । अथ दृश्यत इति दृष्टिः अर्थ एच, ततश्चापत्यशोपलम्भास्यार्थोऽपि प्रत्यशो न भवतीत्यं वाक्यार्थः, न, उपलम्भादर्थान्तर. त्यात् । न चैकस्याप्रत्यक्षत्वेन अन्यस्याप्यप्रत्यक्षत्वम् , अतिप्रसङ्गात् । अथोपलम्भस्याप्रत्यक्षल्ये सति अर्थो दृष्ट इत्येवम्प्रतीतिर्न भवतीत्यभिमतमेतदस्माकम्, नागृहीतं विशेषणं विशिष्ट १० प्रतीतो निमित्तम् । न च सर्वत्र दर्शनविशिष्ट एवार्थों गृहाते। न हि 'शुक्लो गच्छति गोः' इत्या गोदर्शनगनुभूयते, अपितु गुणक्रियाविशिष्टो गोरेवानुभूयते । ततो नार्थदर्शनस्य स्वसंवेदनसिद्धावुपायत्यम् , अन्यथानुपपत्तिधुर्यादिति । सदेतत् व्यामोहविजृम्भितं भासर्वक्षस्य , स्वप्रकाशनाभावे ज्ञानस्य विषयनियमानुपपत्तेः 'नार्थदृष्टिः' इति निवेदनात् । न ह्यस्वप्रकाशस्य तस्य 'अयमेव विपयो नान्यः' इति शम्योपपादनम् । तत्कारणस्य १५ विषयप्रतिनियमात् तस्यापि तनियमः, प्रतिनियतविषय हि तत्कारणम् इन्द्रियसन्निकर्पादिकम् , अवगतदुपजनितं ज्ञानमपि प्रतिनियतविपयमेवेति चेत् , पुतः कारणस्य संनियमः १ ज्ञानस्य सन्नियमादिति चेत्, न, परस्पराश्रयस्य॑ सुव्यक्तत्यान् । कारणस्य तज्ज्ञानादेव"तनियम इति चेत् , न, तस्याप्यस्वप्रकाशस्य ननियम एवं विपयो नातनियम इत्यशक्योपपादनात् । तत्कारणस्य तद्विपयनियमात्तस्यापि तन्नियम इति चेत् , न, 'कुतः कारणस्य तनियम.' इत्याद्यनुबन्धादन- २० वस्थापत्तेश्च । ततो नाऽनात्मवेदनस्य ज्ञानस्य विषयप्रतिनियमो विवक्षितवदन्यत्रापि तस्य प्रवृत्ति- सम्भवात् । तदेवाह- विमुखज्ञानसंवेदो विरुदो व्यक्तिरन्यतः ॥१९॥ इति मुस स्वसवेदनम् अर्थप्रकाशस्य विपयनियमे तस्यैवोपायनाधुनैन निवेदनान, तस्याभावो विमुखम्-अर्थाभावळ्ययीभावविधानात् , तन्नानन्तीति विमुखज्ञाः, नैयायि. २५ काना सम्बोधनमेतत् । न संवेदः समीचीन वेदन सवेदो न सम्भवति युप्माकम् । '!' इत्यस्य पक्ष्यमाणस्य सिंहाविलोकिते सम्य धात् ।। कीदृशः सवेदो न सम्भवति ? विरुद्धः विषयप्रतिनियमेन स्वीकृतः । पुत इति चेत् । व्यक्तिरन्पतः विवक्षितार्थवदन्यत्रापि तत्संवेदनरूपा व्यक्तिः सम्भवति यत इत्यर्थः । तात्पर्यमा-- . १ तमन्ममिति सैव भा०,०प०,स। २-प्रबोधपूर्व-आ०, ५०, ५०, स०।३-नादयथार्थ-भा०, म.,प.स.1४-भप्रत्य-०,व.,प.स.1५-हेज-ता-स्य प्रका- मा०,०,५०, स.. -विषयप्रतिनियम । ८ पति कारणात्य विषयप्रतिनियमें शानस्य सनियम, तस्मिश्च कारणस्य विषयप्रतिनियम इति । ९ कारणहानादेव। . विषयप्रतिनियम । .
५ ११२०] प्रथमःप्रायक्षप्रस्ताधा ज्ञानस्यानात्मवेदित्ये तस्यायं विपयो घटः ! इति स्वेच्छानिवद्धोऽयमर्थात्मा नोपपत्तिमान् ॥६०४॥ स्वेच्छानिबद्धाः सर्वेऽपि तस्यैव विपया न किम् १ । यतो विवक्षितादादन्यत्रापि न सहतिः ॥६०५॥ स्यान्मत घटविज्ञान यदि सर्वत्र वर्तते । सर्वत्र व्यवहारोऽयं भवेदानयनादिकम् ॥६०६॥ न चैवं नियतार्थस्य व्यवहारस्य दर्शनात् । ततोऽपि नियतार्थत्वं ज्ञानस्यानात्मवेदिनः ॥६०७॥ इति तन्नेष्टभूमित्वाब्यवहारस्य देहिनाम् । यहूनां दर्शनेऽभ्यर्थे क्वचिदिष्टे तदीक्षणात् ॥६०८॥ नियतार्थनिबद्धश्च व्यवहारः कुतो गतः । तदृप्टेश्चेन्न तत्रापि चोद्यस्यास्य प्रवर्तनात् ॥६०९॥ अस्वप्रकाशात्तदृष्टेरपि तस्याः कथं भवान् । 'विषये व्यवहारोऽयं नान्य इत्यपि कल्पयेत् ॥६१०॥ अन्यतस्तनियमाच्चेन्नन्वेवमनस्थितिः । सर्वस्यापि प्रसङ्गस्य प्राच्यस्यानोपबृंहणान् ॥६११॥ तदस्वसंविदो बुद्धरर्थानां नियमास्थितेः । व्यवहारः क्वचित्सियन् तदन्यत्रापि सिद्धपति ॥६१२॥ पदेयोह- असञ्चारो न कः [स्थानमविशेष्यविशेषणम् । इति । 'अन्यतः' इत्यनुवर्तते । विवक्षिवादन्यत्रापि विपये समीचीनं घरणं सञ्चारः संव्यवहारः तदभावः असञ्चारः स न व इति पूर्ववत् । तन्न व्यवहारनियमादपि ज्ञानस्य विपयनियमः वस्येवासिद्धः। तदेवं सर्वविज्ञानसर्वार्थत्वे प्रसथिते । स्यादः सर्वज्ञकिन्चिज्ञविभागविकला स्थितिः ॥६१३॥ २. तदाह-'स्थानमविशेष्यविशेषणम्' इति । विशेष्याश्च सर्यशाः सफलवेदन- लक्षणविशेषणाधारत्यात् विशेपणाश्च किन्विज्ञाः तदमावात् , विशेष्यविशेपणा न विद्यन्ते यस्मिंस्तद् अविशेप्यविशेषणं स्थानम् । स्यान्मतम्न कारणनियमानापि कार्यनियमान् दर्शनस्य नियतविपयाभिमुख्य येने स्यात्, अपि तु अनुभवादेव । सर्वविपयत्ये दि 'सर्व दृष्टम्' इत्यनुभयः स्यात् । न पैथम्, ३० २० -पिन ययार्थ भा, य०, ५०, 8.। २ विषयव्य- मा.,.,.,.12-पाधारत्वात ५० प.1-पाधारणत्वात् स.. मा..
२१२ ५ -- १० , न्यायविनिश्चयपियरण [१२० 'घटो ष्टः पदो हटः' इति विपयनियमेनेय तम्यानुभवात् । योगिदर्शनस्य तु सार्थत्वमुपप- नमेव, सर्वत्रापि दृष्टत्वनय तदनुभवोद्भवान् , तत्कथमविशेष्यविशेषणं नैयायिकानावस्थानम अनुभववलादेव सपलेतरविषयसंवेदनभेदव्यवस्थितो सर्वकिञ्चिज्ञविभागोपपत्तेः सविशेप्य. विशेषणस्येव तदरस्थानत्य सम्भवादिति ? तत्रोच्यते-कोऽयमनुभयो येन दर्शनस्य दाभिमु. ख्यम् ? तदेव दर्शनमिति चेत; स्वतस्तहि तस्य सदाभिमुग्न्यवगन्तव्यम् । तथा चेत् ; ग; स्वसंवेदनप्रत्युज्जीयनेन तदभावप्रनिज्ञाविरोधान् । तदेवाह-'विमुग्वज्ञानसंवेदो विरद्धः' इति । विमुलं पता विषयावर निर्मुसत्वात्, मानञ्च घटादिदर्शनं विमुग्वज्ञानं तस्य यः स्वत एव संवेदः अन्यतः संवेदनस्य वदयमाणोत्तग्त्यात् । स विरुदो विरोधवान् स्वप्रकाश• विकलसफलज्ञानप्रतिज्ञयेति यावत् । भवतु तर्हि तदन्यदेव ज्ञानं तदनुभव इति । तदेवाह-'व्यक्तिरन्यतः' इति । दर्शनस्य यत्तदाभिमुख्यं तस्य अन्यतः दर्शनविपयादेव ज्ञानात व्यक्तिः प्रास्ट्यमिति । अत्रेदम ह-'असञ्चार' इति । समीचीनचारो ज्ञानं तदाभिमुख्यस्य तदभावः असञ्चार: तदन्यतोऽपि तस्य न सम्यक् परिज्ञानमित्यर्थः । तथा हि-तस्याप्याभिमुख्यं "नियताभिमुस एव दर्शने न सर्वाभिमु' इति कुतः परितानं येनैवमुच्यते नियताभिमुखमेव दर्शनं दृष्टमित्यनु- १५ भवारा अन्यथा च तदभावादिति चेत् ? न तत्रापि 'कोऽयऽमनुभवः' इत्यादि प्रबन्धस्यानु. बन्धादनवस्थानदोपानुपक्षनात । तदेवाह-'अनवस्थानम्' इति । अवस्थानमशक्तः, ईश्वरानुमहात् , अन्यतो वा भवतीति चेत् ; यस्य तर्हि ज्ञास्य स्वतः परसश्च न परिज्ञान तत्र्यापारस्येत्थग्भावेनानिरूपणात् न द्विपयस्य ज्ञानस्येत्थम्भाव. निर्णयः तदभावे च तद्विपयस्य, इति तावद्वक्तव्यं यावदर्थदर्शनस्य नियत्ताभिमुख्य निर्णयदूरं २० भवति । ततो न पदाभिमुख्यं विशेषणं तदर्शनञ्च विशेष्यमित्युपपन्नम् । तदाह-अविशे- ध्यविशेषणम् । विशेष्यविशेषणयोरुक्तरूपयोरभाव एव स्यादित्यर्थः। ततोऽनुभवबलमपि दर्शनस्य नियतविपयत्वे निधन्धनमिति कल्पनैव फेवलमवशिष्यते तस्याश्च सर्वत्रा विशेपारसी- भिमुन्नमपि तत्प्राप्तम् । ततो यदुक्तं व्योमक्ता (१)-"यस्मिन्नेव विषये ज्ञानमुत्पनं स एवोपलभ्यो नेतर इति विषयविपयिभावस्य नियामकत्यम्" [प्रश० व्यो० ५० ५२८ ] तदत्यन्तबालभाषितम् ; विषयविपयिभावस्यैवातिप्रसङ्गेन पर्यनुयुक्तत्वात् । न हि दोपेण पर्यनुयुक्तस्यैव तत्परिहारायोपदर्शनमुपपन्नम्, अन्यथा विप्रतिपच्या पर्यनुयुक्तस्य अनित्यत्वादेरेव तत्परिहारायोपदर्शनसम्भवात्तदर्थ कृतकत्वाद्युपदर्शनमुपपन्न न भवेत् । न चै कस्यचिदिष्टा- प्रसिद्धिः, विवादविषयमेवोपर्य वत्परिहारस्य सम्भव प्रयासरहितस्येव स्वपक्षत्र्यवस्थापनस्य सम्भवात् । तदरमादशक्यप्रतिषेधमेव दर्शनस्य सर्वविषयत्वम् । फस्यचित् तेन द्रष्ट्टये परस्यापि स्यात् तदनात्मप्रकाशस्याविशेपात् । नायं -मनास्था- भा०,००,०२ तथाभि- आ. य०,५०,०। ३ -लप्रनिशानप्रति-भा०,५०, २० मनद-भा०,५०,५०,स. १५ क्ल नेव भा०,२०,५०,स. 1 ६ व्योममतो था,ब०,१०,सः । अपि च, . १।२० ] प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्ताय. २१३ दोपः, सम्बन्धस्य नियामकत्वात् । अनात्मप्रकाशस्यापि यत्रैव तस्य सम्बन्धस्तत्येव तद्विपय. दर्शनं भवति न परस्य । तथा च परस्य वचनम्-"यस्मिन्नात्मनि समवेतं ज्ञानमुपजातं स एव द्रष्टा नान्यः । तत्र विनतितज्ञानासमवायात् ।” [ प्रश. व्यो० पृ० ५२९ ] इति चेत् , न, समायनियमस्य दुरवबोधत्वात् । तथाहि-कुत इदमवगन्तव्यम्-'कचिदेवात्मनि दर्शनस्य समवायो नान्या' इति ? तत एव दर्शनादिति चेत् , न , स्वसंवेदनप्रत्युजीवनात् । ५ हास्य च तदभावप्रतिज्ञया विरोधात् । तदाह-'विमुखज्ञानसंवेदो विरुद्धः' इति । व्याख्यानं पूर्ववत् । इयाविशेष:-'विमुखत्वं पूर्व विषयान्तरं प्रति, अधुना तु आत्मान्तर- सम्बन्ध प्रति' इति । भवतु तर्हि ज्ञानादन्यत एव तस्य तन्नियमावगमः । तदाह-व्यक्तिरन्यतः तन्निय. मस्येति । तनाह-असञ्चारः असम्प्रतिपत्तिः तनियगस्य । कुतः ? इत्याह-अनवस्थानं १० यत इति । तथाहि-तेदपि ज्ञानं तदात्मन्येव समत तद्विपयम् “एकात्मसमवेतानन्तरज्ञान- वेद्यमथज्ञानम्" ] इत्यभ्युपगमात् । तस्यापि कुवस्तानियमावंगमः १ तत एवेति चेत् , न, 'स्वसंवेदनप्रत्युजीवनात्' इत्यागनुबन्धादनवस्थोपस्थानस्य व्यक्त्वात् । तदुपस्थान. माकाइझानिवृत्त्या नियम्यत इति चेत् , न तहिँ चरमस्य तंन्नियमपरिज्ञानं तदभावान "तत्पू. र्वस्येति [न] दर्शनस्य कचित्समयायनियमः स्वतोऽन्यतश्च तदपरिज्ञानादिति न तज्ज्ञानं १५ विशेष्य नापि तस्य नियतात्मत्वसमतत्वं विशेषणमित्यायातम् । तदेवाह-अविशेष्यविशे- पणम् । विशेष्यविशेषणे व्याख्याते, तयोरभाव अविशेष्यविशेषणम् अर्थाभावेऽव्य- यीभावात् । अपि च, अनारमप्रकाशने ज्ञानस्य ज्ञानत्वमेव कथम् ' कथं च न स्यात् ? तत्पति. पत्त्युपायाभावात् । "तदेव तमोपाय इति चेत् , न, स्यसवेदनप्रत्युजीवनेने तदभावप्रतिज्ञावि. २० रोधात् । तदाह-'विमुखज्ञानसंवेदो विरुद्धः' इति । व्याख्यातं विमुखं तरय ज्ञानेन शानात्मना स्वत: संवेदो विरुद्धः पूर्ववत् । व्यपिस्तर्हि तज्ज्ञानत्रस्य अन्यतस्तद्विपयाज्ञानादिति परः, तबाह-'असञ्चार इति । तात्पर्यमत्र यत्तदन्याज्ञानं तत्प्रत्यक्षम्, अन्यद्वा भवेत् ? प्रत्यक्षमपि यद्यर्थप्रकाशनं न भवति कथं तदभिमुसस्य ज्ञानस्य प्रकाशन विपयापकाशने तदाभिमुरयास्याशस्यमशनत्वात् । २५ सदप्रकाशने तद्विशिष्टतयेव ज्ञानस्याप्रकारानम्, अतो मा भूत्तद्विषय सविकल्पक प्रत्यक्षं तस्य सविशेषणवस्तुप्रतिपत्तिरूपत्वेन विशेषणापतिपत्तावनुत्पत्तेः, निर्विकल्प तु तस्वरूपमानालो. पतरूपं प्रत्यों तदप्रतिपत्तावपि भवत्येति चेत् , न, तदभिमुसतयेर तस्य शानत्यप्रतिल. . 1-तिशाया मा०, ५०, १०, स.१२ पूर्वविर- मा०,०, ५०, R• । ३ -रसम्बई प्रति भा.,५०, प.स.1-मापगम भा०,०,प., स.. ५ वदपरिशन मा०, व., प., स.। । एकार्थसम- मा.,०,०,1 .-मापगम भा.,.,५०, स.1 ८भनयस्योपस्पानम् । ९ रामायनियम । १० उपचरमस्य । शानमेव स्वसिदो उपाय । १३ -बने तद-.11.विशेपणाप्रतिपत्तावपि ।
.. . २१४ ग्यायविनिश्चयवियरणे [ २२० म्भान, "अर्थग्रहणं बुद्धिः" [न्यायभा० ३।३१४६ ] इत्यभ्युपगमात् । तदाभिमुख्यस्य चेदप्रतिपत्तिः किमविशिष्टं तस्य रूपं यनिर्विरल्पप्रत्यक्षवेधं भवेत् १ प्रकाशमानमिति चेत् ; न, विषयविमुखस्य तस्येयाभागात् । सत्यम्, तदभिमुसमेर ता, केवलं तदाभिमुरयं न गृह्यते, प्रकाशमात्रस्यैव ग्रहणादिति चेत् ; न ; प्रकाशात्तदाभिमुख्यस्याभेदे कथममहर्जा प्रकाश. ५ स्यापि तत्प्रसङ्गात् ? गृहीतेतरस्वरूपवायाच विरोधात् । भेदे तु न प्रकाशस्य प्रसाशत्वम् अर्थाभिमुखत्याभावात् , अतिप्रसङ्गात् । भिन्नेनापि तदाभिमुख्येन सम्बन्धात्तदभिमुस्तयेव प्रकाश इति चेत् , नैवम् , स्वाभिमुसत्वस्यापि सम्भवात् , तत्सम्बन्धस्यापि तनोपपत्तेः । सत्प्रकाशमनात्मप्रकाशं ज्ञानम् । न च सविकल्पस्य प्रत्यक्षस्य तत्राभावे निर्विकल्पकमपि सम्भवति तस्यैव तन प्रमाणत्वात् । तथा च व्योमरता उराम्-"अथास्त्वेवं निर्विकल्पकज्ञा- १० नस्योत्पत्तिः, सद्भावे तु किं प्रमाणम् ? सविकल्पज्ञानोत्पत्तिरेव" [ प्रश० व्यो० पृ० ५५७ ] इति । ततः सत्यपि निर्विकल्पके सविकल्पकमङ्गीतव्यम्, अन्यथा तदसिद्धः । तस्य च न विपये सबारो न प्रवृत्तितत्कथं तेन तदर्थज्ञानस्य प्रकाशनम् ? तनासञ्चार एव तस्य कस्मादिति चेत् १ अतत्सन्निकर्पजत्वास, अर्थसन्निकर्पजं हि ज्ञानमर्थे सञ्चारमन्नापरम् । न च द्वितीर्यज्ञानं तत्सन्निकर्पजम् , अर्थज्ञानसन्निकर्पादेवं संयुक्समयायलक्षणात्तदुत्पत्तेः। अत. १५ भिकर्पजस्यापि तन सञ्चारे कथमयमेवास्य विषयो नापर इति व्यवस्था तदाह-अनच- स्थानम् विपयस्येति यावत् । तन्न प्रत्यक्षादर्थज्ञानस्य ज्ञानत्वपतिपत्तिः । भवतु तदन्यत एव तत्प्रविपत्तिद्वितीयस्येन दिम्ल्पस्य पादानादिति चेत् , न, किं तदन्यत् ? उपमानमिति चेत् , न, तस्योपलभ्य एव विषये वाच्यत्वोपाधिक्लेन प्रवृत्तः, अर्थज्ञानस्य चानुपलभ्यत्वप्रतिपादनात् । आगम इति चेत् , न, तस्मादप्यपरिशातात्तद्प्रतिपत्तेः । परिज्ञातादेव भवत्तिति चेत् , "तज्ज्ञानस्यापि "तज्ज्ञत्वं घेद्य चेदागमान्तरात्। तत्राप्येवं प्रसनः स्यात्तथा सत्यनवस्थितिः ॥६१४॥ अनुमानं तु नास्त्येव तज्ज्ञानत्वावबोधनम् । प्रत्यक्षपूर्वकत्वेन "तदभावे तदत्ययात् ॥६१५॥ म चास्ति पश्चमं मान न्यायतत्त्वविदो मते। अर्थबोधस्य बोधत्वं यतः स्यादुपपत्तिमत ॥६१६॥ ततः किम् ? इत्याह-अविशेष्यविशेषणम् ज्ञान विशेष्य तस्य विशेषणमर्थस- . "अभिमुख्यविशेषगरहितम्" -ता. टि.। २ -के प्र-०, २०,०म० । ३ सविकलस्यैव । ४ निर्विकल्पके । ५ व्योमवतायुक्त स. । व्योममरुक पयोममतापक्त आ०, ५०। ६ "अन्यया हि विशिधार्थानुपलब्धौ विशिष्टस्य सङ्केतस्मरणस्यानुपपत्ते सविकल्पक ज्ञान न स्यात् , तस्य तत्कार्यत्वात्"- ग्यो.. ५५010 च वि- भा०, ०,१०, स.। 4 -शा- भा०, २०, ५०, स.1 ९ मन संयुक्त भारमनि अर्थशानस्य समधेनसात् । १. भागमशनस्यापि ।" अर्थज्ञानज्ञत्वम् । तज्जवं मा०,०, स.। तमन्यत्वं प .१२ प्रत्यक्षामावे। २० २५ -प्रश १।२०] प्रथमः प्रत्यक्षपरतावा २१५ ] म्बन्धित्वं तदुभयं न भवेत् अनुपायत्येनाप्रतिपत्तिविषयत्वादिति । ततो यदुक्तं भासर्वज्ञेन- "स्वात्मावबोधकत्वाभावे कथमसौ बोधस्वभाव इति चेत्' इति पूर्वपक्षरित्या समाधानम्- स्वात्मदाहकत्वाभावेऽपि यथाग्निदहनस्वभावः स्वात्मदायकत्वाभावेऽपि यथा दात्रा दिकं दानादिस्वभावम् ।” ] इति ; तत्प्रतिविहितम् ; दृष्धान्तमात्रात्साध्यसिद्धी सर्वत्र हेतुबैफल्यात् अतिप्रसगाच्च । न तन्मात्रादेव तत्साधनमपि तूपपत्तिमत्तयाँ च, उप- ५ पत्तिय तथाप्रविपन्नत्यम् । सदयमर्थ:-अनात्मवेदनेऽपि ज्ञानं ज्ञानमेव तथाप्रतिपन्न- त्यात अनात्मदहनेऽपि वहिवत् ; इत्यपि न सारम् ; असिद्धत्वाखेतोः, तथाप्रतिपन्नत्वस्य प्रविपिद्धत्त्वात् । यंदण्यन्यदुक्तं तेनैव-"तदप्रसिद्धौ विपयस्याप्यप्रसिद्धिरिति चेद , इति पूर्वपक्ष. यित्वा समाधानम्-किं कारणम् ? न हि तदुपलम्भः स्वविषयं लिङ्गन्यत्साधयति येन तद- १० प्रसिद्धौ विषयस्याप्यप्रसिद्धिः स्यात् । किं तर्हि ? तद्गृहीतिरूपतयोत्पादमात्रेण तं विपयं व्यवहारयोग्यं करोति तदप्रसिद्धावपि विपयः प्रसिद्ध एवेत्युच्यते" [ इति ; तर्दयसम्बद्धम्; तद्गृहीविरूपतयोत्पादस्यैव दुप्परिज्ञानत्वेन प्रतिक्षिप्तत्वात् । ततो ज्ञानस्य विषयनियम नियतप्रमावृसमवायमर्थप्रकाशरूपत्वञ्च प्रतिपत्तुमिच्छता स्वप्रकाशरूपं तदभ्युपगन्त. अन्यथा तदसम्भवादुत्त यत् । स्वप्रकाशे तु ज्ञाने सम्भयति तत्प्रतिपत्ति:-'यद्विपयतया यदात्मस्वभावतया च स्वतस्तस्य वेदनं स एव तदर्थो नापरः स एव च तेन प्रमाता नापरः' इति, अस्यार्थपरिच्छित्तिरूपतया च स्वतः प्रवेदनात् 'ज्ञानमेव तत् नाज्ञानम्' इत्यस्य ध स्वत एच व्यवस्थापनात् । ततः स्वप्रकाशमेव ज्ञानं स्वहेतुबलात्तथैवोत्पत्तेः । यत्पुनरत्र तस्यैव वचनम्--"उत्पादे हि सति पश्चादधदृष्टेः प्रत्यक्षत्वं युक्तं न पूर्व- मेव" ] इति । तत्पराभिप्रायापरिज्ञानादेवोक्तम् । न हि सौगतस्यापि 'अप्रत्यक्षोपल. म्भस्य' इत्यादि मुवाणस्यायमभिप्रायः 'प्रागेवार्थदष्टेः प्रत्यक्षत्वं पश्चादुत्पत्तिः' इति, अपि तूत्पद्यमानेय सा स्वप्रकाशरूपतया प्रत्यक्षयोत्पद्यते, तपतयोत्पत्तावेध "तस्यास्तद्रूपत्वोपपत्तेः", मतद्रूपतयोततिः"अनुत्पत्तिरेयेति अनुत्पनैवार्थसर्भिवेदित्ययमेधै। सत्कथं पराभिप्रायसः पौर्वा- पर्यमर्थष्टी तत्प्रत्यक्ष यतदुत्पादयोर्यतस्तत्र 'नहि' इत्यादि दूपणमु प्येत ? "वदयमविज्ञातपूर्व- पक्षतया दूपणमुद्धोपयन्नात्मनो विदूपत्त्यमावेदयति । एवमन्यदपि तस्य दुर्विलसितमुपदर्य प्रतिविधातव्यम् । कथं पुनरात्मवेदनं भानस्य ? कथञ्च न स्यान् ? स्वात्मनि क्रियाविरोधादिति चेत् ; न; असिद्धत्यान् । विरोधोऽपि प्रमाणाधनमेव नापरः, ततः कस्यचिनिषेधायोगान् | सच व्यम् , .. २० - २५ । चेति पूर्व-स• । म तदिति पूर्द -4. 1२ स्वात्मादाहक- भा०, २०, ५०, स.। लवनार्य- कदाप्यातीः दायकः इति रूपम्, छेदक इति यावत् । ३ धानादि- भा०, २०, ५०। ४ च्याम्तमामादेव । ५-तया मोप- भा०, २०, ५०, स.1 ययप्य-मा०, पर, प., स. ७ भावनेनेव । तदप्यसम्बन्धम् हा..अधि.अर्यदृष्टः, अत्योपः। ११ -त्तिरन्योत्पत्ति-मा", ", प., 2018 प्रोगतस्थाभिप्रायः ४ तदयमपि ज्ञात-मा.,.,.,.
२९६ न्यायविनिश्चयवियरणे [११२० प्रेमाणप्रसिद्धेन सिद्ध्यति, 'तत्मसिद्धच तहाधित च' इति तत्रैव विरोधात् । प्रमाणप्रसिद्धन्च ज्ञानस्य स्वप्रवेदनं विषयनियमादिनाऽनुमानेन तब्ध स्थापनान् । 'सपक्षानुगमाभावानुमानमेव तन्न भवतीति चेत् , स्यादेतदेयम् , यदि तदनुगमस्यासाधारणतया 'तल्लक्षणत्वम् । न चैवम् , तदामासेऽपि तत्पुरत्यादी भावात् । तस्मादन्यथानुपपन्नत्वात्यैव तथा तल्लक्षणत्वम । ५ तच्चाविकलमेव विषयनियमादौ । नदेव कथं तदनुगमाभावे गम्यत इति चेत् ? न, विपक्षे बाधकरलादेव तदवगमात् , तस्य चोपदर्शितत्वात् । करिष्यते च तस्यैव तल्लक्षणत्वे प्रबन्ध इति नेह प्रतन्यते । ततः सम्यगेव प्रकृतमनुमानमिति न तद्विपये ज्ञानस्या-मटने कश्चिद्विरोधो यतस्तन्निपेघः स्यात् । प्रमाणसिद्धमप्येतद्विरुद्ध चेत्स्ववेदनम् । अर्थवेदनमप्येवं विरुद्धमवयुध्यताम् ॥६१७॥ प्रमाणमेव तस्यापि परित्राणाय नापरम् । ततः सवित्तेरवाणे वाणमर्थविदः कथम् १ ॥६१८॥ स्वार्थवित्तिविलोपे च ज्ञानमेव क्षयं प्रजेत् । ज्ञानाभाये कथं ज्ञेय स्वसवेदनविद्विपाम् ॥६१९॥ ज्ञानज्ञेयविलोपे च शून्यवादानुपजनम् । तस्मान्यायज्ञनिर्गन्धो मुन्यतामस्ववेदनात् ॥६२०॥ इदमेवाभिसन्धाय सौगतेनाप्युक्तम्- "यदा स्वरूपं तत्तस्य तदा कैर निरोधिता । स्वरूपेण विरोधे हि सर्वमेव "प्रलीयते ॥"[प्र८ यातिकाल० २।३२९] इति । कश्चाय "स्मात्मा नाम या क्रियाविरोध.१ रियायानेवार्थ.इति चेत्, सत्र" तद्विरोधे कथ क्रियानत्यम् ? क्रियावत्त्वे या कथं तद्विरोधो व्याघातात् । न व्याघात: तत्कर्मकत्वेन तत्र तद्विरोधस्याभिधानात् , तसर्तृका तु न विरुध्यत एव 'छिनति रागः' इति प्रतीते, कर्ग तु तत्र व्यतिरिफमेव सङ्गः काठ छिनत्तीति प्रत्ययादिति चेन्, न-वेव बुद्धेरप्यात्मसमवायिन्याः तत्कर्म- "कत्यमेव "प्रतिषिद्ध भाति, न चैतत्पथ्य भवताम् , आत्मनोऽप्रमेयलप्रसङ्गात् तस्यैव युद्धों कर्तृत्वात् । नदिन्मन्यत्र स-धानमन्यत्र पातः शरस्य, युद्धेः स्वसवेदनप्रतिपेधायोपमान्तेन आत्मनि प्रतिपत्तिकर्मत्वप्रतिषेधात् । तन्न नियायामर्थ. स्यात्मा । मियैवेति चेत् , कः पुनः क्रियाविरोध: ? ताद्रूप्यानुपपत्तिरिति चेत् , कथ पुनस्तरया एव तद्रूपत्वानुपपत्तिः व्यादी २० - प्रमाणसिद्धर्मसिद्धपोत - भा०, २०, प. प्रमाणसिद्ध सिद्यस्येतत्प्र- स. । १ सय पक्षा- मा०,२०, ५०, म। ३ तदनदगम- आ०, ब०,५०, स. सपक्षानुरामस्य । ४ अनुमानलक्षणतम् । ५ गर्भस्थ श्याम तत्पुत्रलात इतरपुत्रवदित्यादी । ६ असाधारणतया ! ७ अन्यथानुपपन्नात्वमेव । ८ सपक्षा नुगमामाचे। ९ अन्यपानुपपन वस्येव । १. प्रतीयते प०, सवामनाम् यत्र भा०, ब,०, स.। "स्वरमा दि क्रियाया स्वरूपम्, क्रियावादारमा का"-प्रमेयक पृ. १३६ । न्याय हुमु. पृ० १८८1 स्या. रना• पृ. २२९ । १२ कियावत्यथें । १३ बुद्धिवर्मरत्वमेव बुद्धिविषयत्वमेव । १५ प्रसिद्ध भा०प०,प.म.
२१७ .. न - १० १।२०] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः नामपि द्रव्यादिरूपत्यानुपपत्त्या शून्यवादानुपङ्गात्। तद्विपयत्वेनं तंत्र तदनुपपत्तिर्न तद्रूपत्वेनेति । न हि छिदिरात्मन्यपि छिदिर्भवतीति चेत् ; किंविपया तर्हि छिदिः ? निर्विपयत्वे स्वात्मनीति विशेषानुपादानप्रसङ्गात् । काष्टविषयेति चेत् ; कुत एतत् ? यसत्ताया एवेति चेत् , स्वात्मविषयत्वस्यापि प्रसङ्गात् । विशेषाधानादिति चेत् ; न; स्वात्मन्यपि तत्सम्भवात् । काष्ठ एव छिदिसतस्य विशेषस्य विनाशात्मनः प्रतिपत्तिर्न छिद्यात्मनीति चेत् ; न; काष्ठेऽपि साक्षा- त्तस्य तत्कृतत्वाभावात् , तदारम्भकाययवसंयोगविनाशस्तत्वात् । पारम्पर्येण छिदिकृतत्वम- पीति चेत्, सिद्धं तर्हि तस्याः स्वात्मविषयत्वमपि तद्विनाशस्यापि पारम्पर्येण तत्कार्यत्वात् । छिदिहि सगसमवायिनी सङ्ग काष्ठसंयोगात् स्वकार्यानिवर्तमाना भवत्येव परम्परया स्वविना- शस्य कारणम् । अथैवमपि तस्या न स्वविपयत्वम् ; काष्ठविपयत्वमपि मा भूत् । ततो न स्वात्मन्येव क्रियाविरोधः परात्मन्यपि तद्भावात् । तथा च- यथा विरोधमुवीक्ष्य "छिदेरात्मनि फल्प्यते । विरोधो वेदमस्यापि स्वात्मनि न्याययेदिभिः ॥६२१॥ तथाऽन्यत्रापि "तं दृष्ट्वा तस्याः किन्नोपकल्प्यते । वेदनस्य स्ववाद्येऽपि विरोधो बाधयर्जितः ॥६२२॥ "उभयत्र विरुद्धच ज्ञानं तदिति फेवलम् । प्रत्येतव्यं भवेदेतद्भौतमुद्राप्रमाणकैः ॥६२३॥ ततो न स्वामनि क्रियाविरोधेन अर्थज्ञानस्य स्वसंवेदननिषेधनमुपपनम् । तनिषेधे या कुतस्तस्य' प्रतिप्रत्तिः १ अप्रतिपत्तिकमेव तत्सर्वदेति चेत् ; न ; व्योम- कुसुमपत्तदभावापः । "एकात्मसमवेतानन्तरज्ञानादिति चेत् ; कुत इदमयसितम् ? 'अर्थज्ञानं ज्ञानान्तरवेयं वेद्यत्वात् "कलशवत " इत्यनुमानादिति चेत् ; कलशस्यापि कुतस्तद्वेधत्वमयसितं २० यतो निदर्शनस्य साध्यवैकल्यं न भवेत् ? तद्वेदनादेवेति चेत् ; न तस्यास्वसंवेदनस्यात् । यदि हि न "तत्स्वसंवेदनं भवत्येव ततः फलशान्यत्वस्य "तद्धर्मस्य प्रणम् । न चैवम् , श्रतो विरुद्धमेतत्-'अनात्मदिन एव ज्ञानात्तस्य पुतश्चिदन्यत्वं गृह्यते' इति । तदेवाह-'विमुस्ख' इत्यादि । विषयात् विभिन्नं मुसं रूपं यस्य तत् जानं विमुखज्ञानम् , तस्य यः स्वतः संवेदः स विरुद्धः स्वसंवेदनप्रसङ्गात् । व्यक्तिरन्यत: कलशज्ञानादन्यत एव ज्ञानात्तक- २५ लशान्यत्वस्य व्यक्ति प्रकाशनमिति परः । तत्राह-'असञ्चारः' इति । असञ्चार: असम्प्रतिपत्तिः कलशातदन्यत्वस्येति यावत् । .. .. रियाविषयस्यैन । २ रियायाम् । ३ कियारूपवानुपपत्तिः । १ स्वस्तैवेति मा०, य०, ५०, स० । ५छिदिएन । -पस्याश्य-भा०प०,५०,०। ७ चेदरिदं मा०, २०, ५०,०। ८ शिदिविनाश- स्यापि । ९ –णापि तपा-सा०, २०, ५०, स ०१० छिदिरामनि क-भा, य०, १०, सातयात- भार, ०,१०, स.1 विरोधम् । १२ बाये सत्मनि । १३ अयंगस्य । १ एमर्थराम-मा, २०, ५०, स। १५ लशादिवत् भा०, २०,.,समम्-पृ .१२ दि. २ पटना- पेदनम् । १८ कानधर्मस्य । १८ , [ २१८ न्यायचिनिश्चयविधरणे [१२२० अन्यत्वं फलशज्ञानस्यान्यतो यदि वेधते । तस्यापि कलशक्षानादन्यत्वं गम्यते पुतः ? ॥२४॥ तदन्यत्वापरिज्ञाने वचस्तत्तागं कथम् । कलशावेदनान्यत्वमन्यतो वेदनादिति ॥६२५॥ वेदनं न स्वतस्तस्य स्वसंवित्त्यपलापिनाम् । अन्यतो वेदने तु स्यादनवस्थानदूषणम् ॥६२६॥ तदाह-'अनवस्थानम्' इति । ततश्च न तज्ज्ञानं विशेष्यं नापि तस्य कलशार्थी- न्तरत्वं विशेषणमित्यायातम् । तदाह-'अविशेष्यविशेषणम्' इति । ततो निदर्शनस्य साध्यवेकल्यमिति भावः । यत्पुनरन परस्यानुमानम्-"कलशादर्थान्तरं तज्ज्ञानं चेतनत्वात् , यत्पुनस्तस्माद- नर्थान्तरं तन्न चेतनं यथा तस्यैव स्वरूपम् , चेतनञ्च तज्ज्ञानम् , तस्मात् ततोऽर्थान्तरम्" ] इति ; तदपि न समीचीनम् , अनुमानमानस्यापि 'तज्ज्ञानादन्यत्वस्य स्वतः पूर्ववदप्रतिवेदनात् , अनुमानान्तरपरिकल्पनायामनवस्थापत्तेः । अपि च, युतः कलशाच्चेतनत्वस्य व्यावृत्तिः ? तस्य तद्विरुद्धनाचेतनत्येन व्याप्तत्वा. १५ दिति चेत् , तदेव फुतोऽगतम् , यतस्तव्याप्तादनन्तरत्वात् व्यावर्तमानं चेतनत्वमर्थान्तरत्व पव नियतं तवगमयेत् ? तत एव कलशज्ञानादिति चेत् , तेनापि चैतन्यं क प्रतिपन्नं यत. स्तत्पर्युदासरूपमचेतनत्वं कलशस्य ततोऽवगम्यताम् ? अप्रतिपन्ने तस्मिन् वत्पर्युदासस्य दुरव. गमत्वात् अप्रतिपन्नमेशकपर्युदासयत्त् । आत्मन्येवं तत्प्रतिपन्नमिति चेत् , न, अनात्मयेदिति यस्मिन् तदयोगात् । ज्ञानान्तर इति चेत् , न, तस्य तदविपयत्यात् । तन्न कलशस्य तज्ज्ञाना २० देवाचेतनस्वपरिक्षानम् । अन्यतो ज्ञानादिति चेत् , न, ततोऽपि कलशमानविषयातदनुपपत्तेः। प्रतिपेध्यचेतनत्वविषयमपि 'तदिति चेत् , किं तश्चेतनम् ? तदेव ज्ञानमिति चेत् ; न, अस्थात्मवेदिनस्तस्य तद्विपयस्वायोगात् । कलशज्ञानमिति चेत् , कुत एतत् ?, "तस्य "तेनार्थ- वेदनत्वेन प्रहणाचदूपत्याच घेतनस्येति चेत् , ईशस्तव्यापारः कुतोऽवगतो येनैवमुच्यते ? तस्यानात्मविषयत्वात् । तादृशतड्यापारगोचरत्वस्य" स्वतः प्रतिवेदना. २५ भावात् । अन्यतश्च तत्कल्पनायाम् अनवस्थादोपान् । आकाहानिवृत्या तदोपनि. चिरिति चेत् , कथं पुनर्जिशासित्तताहशतव्यापारनिश्चयाभावे तदामासानिवृत्तिः "तस्या स्तनिश्चयनिबन्धनस्यात् ? अदृष्टादेस्ताद तदोपनिवृत्तिरिति चेत् सोऽपि यदि तावत्तत एवं - १-खविलापि-भा०, ५०, १०, म. १२ क्लशज्ञ नान् भिनत्वस्य । ३ कलशशनात् । चैतन्ये। ५-मशक्यपर्यु- भा०, २०, ५०, सः। ६ - न वत्प्र-80, ब०, ५०, १० 1 0 ज्ञानान्तरस्य । ८ कलश अनाविषयत्वात् । ९ज्ञानान्तरम् । १. कलाशानस्य । ज्ञानान्तरेण । १२-रयोरगौवरत्वस्य-गा.प., ५०, स.९ परिवेदना- भा०, २०, ५० ४ आवावानिवृत्ते । १५ भनवस्थाहशेष ।
3 २०] प्रथमः प्रत्यक्षमस्ताया २१९ तन्निश्चयमविधाय तदोपं निवर्त्तयति तदवस्थं तद्व्यापारापरिक्षानम् । तद्विधानमपि यद्यन्यतः कथं तदोपनिवर्त्तनम् । तत्राप्यन्यतस्तद्विधानस्यापेक्षणीयत्वात् । यड्यापारो घुमुत्सि- वस्तत एव तद्विधानमिति चेत् ; न; स्वसंवेदनवादप्रत्युन्मजनप्रसङ्गात् । तन्नान्यतो विज्ञानात् कलशस्यावेतनत्वं शक्यपरिज्ञानम् , पर्युदयसितस्य चेतनत्वस्य कचिदप्यपरिक्षानात् । वत्कथं तेनाऽनर्थान्तरत्वं व्याप्तं यतस्तस्माद्व्यावृत्तं चेतनत्वमर्थज्ञानस्य कलशादर्थान्तरत्वमवयोधयेत् १ ५ तदयं सन्दिग्धविपक्षव्यावृत्तिकत्वेनानकान्तिकत्वान्न सम्यग्धेतुः, अंतो नानुमानादपि कलशात. ज्ज्ञानस्यार्थान्तरत्वमिति साध्यबैकल्यादुदाहरणस्य न कलशज्ञानस्यार्थान्तरज्ञान विषयत्वसाधनं सम्यक साधनम् । व्यभिचाराच्च । व्यभिचारि सल्विदं वेद्यत्वं व्याप्तिज्ञानेन । नविज्ञातव्याप्तिकस्यानु. मानम् अतिप्रसङ्गात् । नापि प्रादेशिकतद्विज्ञानस्य ; र्यदेवाविज्ञातव्याप्तिकं तेनैव व्यभिचार. १० शवनात् । ततः साकल्येन तद्विज्ञाने तु तदेवालगतस्यापि वेद्यत्वस्य ज्ञानान्तरवेद्यत्वेन व्यामि प्रतियत् आत्मवेदनमेव न तदन्तरवेयमिति सुव्यको व्यभिचारः । साध्यसाधनसामान्यस्यैव तज्ज्ञानविषयत्वं व्याप्तेस्तनिष्ठत्वेन "तदपरिज्ञाने परिक्षानासम्भवात् , न व्यक्तीनां विपर्ययात् , व्यक्तिरूपं च "तज्ज्ञानं तत्कथं तस्य तद्विपयत्वमिति चेत् ? न ; तदपरिज्ञाने सामान्यस्याप्य. परिक्षानात् तस्य तन्नित्वात् । कतिपयन्यक्तिपरिज्ञानादेव भवति "तत्परिज्ञानमिति चेत्न; १५ "तावता व्याप्तिपरिज्ञानासम्भवात् , अन्यथा तत्पुनादावपि तत्सम्भवान्न व्यभिचार: स्यात् । याधनात्तत्रं व्यभिचार इति चेत् ; न; "लक्षणयुक्ते वाधासम्भवे तल्लक्षणमेव पितं स्यात्" [प्र. वार्तिकाल० २११५] इति घेयत्वादावपि बाधाविरहं प्रति न निःशवं चेतः स्यात् । पावस्यानुपलम्भान्निाशमेवेति चेत् ;न; अनुपलम्भस्य सर्वसम्बन्धिनः “सतोऽपि दुरख- योधत्वेनासिद्धत्वात् । आत्मसम्बन्धिनश्य "परचितो (चेदो) गृत्तिविशेपैयभिचारित्वात् । अतो २० नाबाधितविपयत्यमनुमानलक्षणम्, अपि तु विज्ञावव्याप्तिकत्वमेव, तय सफलव्यक्तिविज्ञानमुरे- मेव नान्यथेति कपन्न तव्याप्तिज्ञानस्य "तद्विपयत्यमिति सुन्यक्तमेव तेनानेकान्तिफत्यम् । "सुखादिना च, तस्यापि स्वत एव प्रकाशनात् । न हि तस्य वेद्यस्यापि पर प्रकाशन. मनुभूयत इति । तदाह-'विमुग्ध' इत्यादि । विमुखं स्वमहणपराट् मुखत्वात् अर्थज्ञान"वस्य ज्ञानमर्थान्तरं विमुखज्ञानं तस्य सम्बन्धी गमकत्वेन य: संवेदः संवेद्यत्वं हेतुः सः २५ - । निधविधानम् । २ अचेतनायेन । ३ ततो नानु आ०, ५०, ५०,:-स्थानान्तर-भा,., स०।५ कतिपय माणसाधनव्यक्तुि राडीतव्याप्तिस्य । यदेव वस्तु । यदेवाविज्ञानग्या- भा.,५०,०। . व्याप्तिहाने । तनिशातु तदे- श्रा०, २०, ५०, ८ व्याप्तिसनम् । ९ व्याप्तिशान । " सायसाधनसामान्या. परिशाने । " भ्यातिशानम् । १२ व्ययपरिशने । १३ सामान्यस्य । सामान्यपरिशनम् । १५ पतिपय. ध्यविपरिशानमाण । व्याप्तिशनसम्भवात् । १० तत्पुमरसादी १८ स्वतोभी भा., २०, प.स.। १९ परतोनिवृत्ति-शा परिचितोत्ति- प० । २० स्ववियामिति । २. नुलना-"मुसमवेदनेन हे तोर्य. भिधारात् मटेरपरमानेन " -प्रमेपक.१० ११२ । २२- च तस मा..., १०.स.।
। ५ २२० म्यायविनिश्चयविधरणे [१२० अविरुद्धों विपक्षेऽपीति शेषः, तस्माध्यभिचारीति भावः। च्यातिनाने सुखादिमानेऽपि तव्याप्तः मुसादेश्वान्यत एव ज्ञानात् व्यक्तिः ; इसाह-व्यक्तिरन्पत इति । तत्रोत्तरम् -'असञ्चार' इति । तत्र तव्याप्तेः सुखादेश्यान्यतो न सञ्चारः न परिज्ञानम् । पुतः ? इत्यत्राह-अनव. स्थानम् । 'यतः' इति शेप। । तथाहि- तदन्यत्रापि तद्ध्यातिरन्यतो यदि वद्यते । तत्राप्येवं प्रसङ्ग स्यादनवस्था कथन्न वः ? ॥६२७।। आकाहाविनिवृत्त्यादि पूर्यगेव विचिन्तितम् । तस्मात्तद्व्याप्तिसंवित्तिस्तत एयोपगम्यताम् ॥६२८॥ सुसाद्यपेश्या तु व्याख्यानम्-यधन्यदेव मुसादेस्तवेदनं तर्हि पश्चादेय न मुखाद्युत्प. १० तिसमये, ततः पूर्व तन्निमित्तस्य सन्निकर्पस्याभावादित्यविदितस्यैव तस्योत्पत्तिः। तथा च- 'उत्पन्नमात्रेणेव सुखादिना तद्वान् पुरपः' इति यवस्थानं व्यवस्था लोकरय तन्न स्यात्, अविदि. तस्यानुत्पन्नकल्पत्वादित्यनवस्थानम् । पश्चाद्वेदनान्न तत्कल्पत्वमिति चेत् । न ; व्यवधाने तद. योगात् तावत्कालं तदनवस्थानात् । अनन्तरमिति चेत् ; न; नियमाभावात् । न धुत्पन्नस्या. नन्तरमेव वेदनमिति नियमः, अन्यत्रैवमदर्शनात् । यत्पुनरत्र विश्वरूपस्य समाधानम्-"सुखादेर्धर्माधर्माभ्यामुत्पादः तौ च यथा सुखाद्युत्पनिमातिपतस्तद्वदनन्तरक्षणे तत्संवेदनमपि" [ ] इति; तदप्यनुपपन्नम् । उत्पत्तिसमय एव तेस्य संवेदनं न हि समसमयस्य "तस्यानन्तरसमयत्वम् ; "तत्समयस्यापि तदपरसमयत्वेन व्यवधानप्रसङ्गात् । अत्रापि यत्तस्य' प्रतिवचनम्-"या तूत्पत्तिकाल एय सुखादेः संवित्तिः सा भ्रमनिमित्तस्याशुभारस्य तत्र सम्भवात् तत्कृता, यथा घटादेरुत्प". २० घमानस्य प्रत्यत्तता, तत्रावरयं घटस्योत्पत्ति द्वितीयक्षणे रूपादिसमवायः तृतीये संवेदनम् अथ च "युगपत्संवित्तिः । सुखादी तु द्वितीयक्षणे संवेदनोत्पादात् स्वप्रकाश- भ्रमः" [ ] इति । तत्रोच्यने-फस्यासौ तद्धमः ? तस्यैव सुसादेरिति चेत् ; न, अचेत- नत्वात् । चेतनधर्मो हि विभ्रमः, स कथमचेतनस्य स्यात् घटादावपि प्रसङ्गात् ? आत्मन इति चेत् ; न तस्याप्यचेतनत्वात् । चेतन एवात्मा चेतनसमवायादिति चेत् ; तद्यदि चेतनमन्यवि. पयमेव कथं सुसादी वद्विभ्रमः स्यादतिप्रसङ्गात् ? तद्विषयमेवेति चेत् ; न; घटादावपि तद्वद. मस्य तद्विभ्रमत्वप्रसङ्गात् । ततश्चानिश्चितं तस्यान्यवेद्यत्वमिति कथमर्थज्ञानस्य तदन्तरवेद्यत्वे "तस्य निदर्शनस्वम् । आशुभायात्संवेदनस्य तत्र योगपद्यविभ्रम एव न स्वप्रकाशविभ्रम इति -दोषि ए-आ०,५०,०स. । २ व्याप्तिज्ञानेऽपि मा०,०,१०,सप ३ व्याप्तिाने मुखादिज्ञाने च । • सुखायुत्परोः प्राक् । ५ सुखादै । ६ करुपनत्वा-आ०,५०,१०,१०। ७ तदवस्या-मा०,०प०,१०।। -पादनात्ती आ०,८०,१०,स०।९ सुखादेः । १०सुखादिसवेदनस्य 1 !! अनन्तरसमयस्यापि । १२विश्वरूपस्य । १३-उत्पाद्यमा-मा०,०,१०,०।१४ -त्पतिः द्वि-ता १५ रूपवान् घट इति विशिष्टज्ञानम् । १६ घटवेय. नस्य । घटस्य। तदनन्तरवेश-भा०,५०,५०,०१९पटस्य । तस्य निदर्शनस्य निद-भा०,५०,०स० मधमा प्रत्यक्षप्रस्तावः E . श२०] २२१ चेत ; न, सुग्वादावपि तस्यैव प्रसङ्गात् । भवत्विति चेत् ; न; 'स्वप्रकाशभ्रमः' इत्यस्य विरोधात । सत्यपि योगपद्यभ्रमे कथं तस्य प्रत्यस्त्वम् अभ्रान्तस्यैव तत्त्वात् १ अप्रत्यक्षमेवे तदनमिति चेत् ; कथं ततः सुखादिसिद्धिः । विभ्रमात्तदयोगादतिप्रसङ्गात् । योगपद्य एव तस्य भ्रमत्वं न सुखादाविति चेत् । कथमेकस्य विभ्रमाविभ्रमस्वभावत्वम् विरोधात् ? अविरोधे वा यस्यैव सुसादित्वं तस्यैव स्वप्रकाशनत्वमपि भवेदिति न सुरसादेरन्यतः सञ्चारः तस्यैवान्य. ५ स्याव्यवस्थानात् । तदाह-अनवस्थानम् । ततः स्थितं सुखादिनापि वेद्यत्वस्य व्यभिचारित्वम् । "ईश्वरज्ञानेन च । न हि तस्यान्यवेद्यत्वम् ; एकत्वात् तस्य । नाप्यवेद्यत्यम् ; ईश्वर- स्यासर्वज्ञत्वप्रसङ्गात् । अस्त्येव तस्यापि ज्ञानान्तरम् , न चानवस्थानम् ; तयोरन्यस्यैकेनैकस्य चान्येन वेदनात् , नापि परस्परायणम् ; स्वप्रकाशनिरपेक्षयोरेव विपयप्रकाशत्वादिति चेत् । न; तथापि सप्रकाशस्यावश्यम्भावात् । तथा हि तदेकमन्यस्य आत्मविपयस्यैव प्रकाशनम्, न १० चामापरिक्षाने तद्विपयतया तस्य प्रकाशनमुपपन्नम् । आत्मपरिज्ञाने घ किमन्यज्ञानपरिकल्प. नया ? भवत्वेकमेव तज्ज्ञानं तथापि न व्यभिचार: तस्यापरिज्ञानात् , तव्यतिरेकेणैव तस्य सर्वज्ञत्वोपगमादिति चेत् । तदपरिज्ञाने तत्समवायित्वेत कथं तदात्मनोऽपि परिज्ञानम् ? मा भूदिति चेत् ; कथं तर्हि "स वेत्ति विश्वम्" [ श्वेता० ३।१९ ] इत्यादिना तस्य "स्वरूपोपदर्शनम् अपरिक्षातस्य तदयोगात् ? न चेदमपीरुपेयमेव; अनभ्युपगमात् । अपरिहा- १५ तस्य" चोपदेशे करणमपि "तस्यैवेति कथं जगतो बुद्धिमद्धेनुकत्वम् ? अतो न तदपरिज्ञान- मुपपन्नं यहुदोपत्यात् । "नाप्यन्यतस्तत्परिज्ञानमिति कथन तेन व्यभिचारः साधनस्य ? न व्यभिचारः अनित्यत्वेग विशेपणात ,"अनित्यत्यविशिष्टं हि वेद्यत्वं साधनं न तन्मा- अमेव, 'अर्थज्ञानं तदन्तरवेद्यम् अनित्यत्वे सति वेद्यत्वात् "कलशवत्' इति प्रयोगकरणात् । माहेश्वरे च ज्ञाने तद्विशिष्टस्य हेतोरभावात् , तस्य नित्यत्वादिति चेत् ; ग; हेत्वन्तरत्वेन २० निप्रहस्थानप्रसङ्गात् , “अविशेपोक्त हेतौ निषिद्धे पुनर्विशेपोपादानं हेत्वन्तरम्" [ न्यायसू० ५।२।६ ] इति वचनात् । प्रधममेव सधा वचने न दोप इति चेत् ; न; तथापि व्यभिचारस्यानिवारणात् विशेषणस्य विपक्षाविरुद्धत्यात् । न हि विपक्षणाविरुद्ध विशेषणं सतो हेतुं व्यापर्तयितुमलम् । अनित्यत्वं हि नित्यत्वस्यैव परिहारेण तस्यैवं तत्प्रत्यनी- फलात्, न स्वप्रकाशस्य विपर्ययात्, अत एव स्वप्रकाशोऽपि श्रावप्रकाशस्यैव परिहारेण नानित्य- २५ त्वस्येति न परस्परपरिहारेण स्वप्रकाशविरुद्धत्वमनित्यत्वस्य । नापि सहानवस्थानेन, असति -- . ७ योगपविभ्रमस्यैव । २ प्रयक्षत्वात् । ३ -सत्यमेव आ०, २०, प., स.1 ४ -द्विविध-मा, प.,., स. ५-स्य विनमत-आ०, २०, ५०, स..-धेन य-भा०, प.प.) -नाय- स.। "मदेश्वरार्थशानेन हेतोय॑मियारात्"- प्रमाणप० पृ०६०। युगधनुशा० टी० पृ०1। न्पाय- मु. पृ० १८३ । स्या रसा. पृ. २१३ । ८ शानापरिझाने । ९ स्वात्मनोऽपि । १० स्वरूपदर्श-श्रा, २०, ५०, स.।।। महेश्वरस्वरूप । १२ चौरदेशकरग-आग, २०, २०,०। १३ अपरिशतस्यैव । १४ गायतस्य-मा०, २०, प., स.। १५ मनिपत वैशेप सा- भा.,२०, प., स.।। कना- दिवत् भा०,१०,५०,स. 1 नित्यत्वात्यैव।
२२२ -- १० न्यायविनिश्चयविवरण [२२० परस्परपरिहारे संहायस्थानस्यापि सम्भवात् । फलशादावदर्शनान्न तत्सम्भव इति चेत् ; नित्यत्वस्यापि न स्यात् आत्मादावदर्शनान् , तत्कथमीश्वरज्ञानस्य नित्यस्यापि स्वप्रकाश- त्वम् ? कचिद (दद)र्शनेऽपि न नित्यत्वस्य तद्विरोध इति चेत् ; अनित्यत्वेन किमपराद्धं भवतो यतस्तत्रैव तद्विरोधमावेदयति १ ततो विपक्षाविशेषणस्य व्यावृत्तिनियमाभावात्तद्विशिष्टस्य ५ हेतोरपि न तेनियम इति संशयितविपक्षव्यावृत्तिकत्वानदयस्थं सविशेपणस्यापि व्यभिचारित्वम् । ततश्च यत्र भासर्वज्ञेन पक्षनयमुपन्यस्तम्-"अनेकान्तिकत्यपरिहारार्थ परमेश्वरस्य ज्ञान- द्वयमभ्युपगन्तव्यम्, तद्वयतिरेकेण वा सर्वज्ञत्वम्, अनित्यत्वे सति इति वा हेतुविशेषणं कर्तव्यम्" [ ] इति तत्प्रतिविहिवम् ; पक्षनयेऽपि अनेकान्तिकत्वस्याशक्यपरिहार- त्वेन प्रतिपादित्वात् इयलमतिप्रसङ्गेन । ततः साध्यविकर्लनिदर्शनत्यादनकान्तिकत्याच न वेद्यत्वं विशिष्टमविशिष्टं वा सम्यक् साधनमिति न ततो ज्ञानस्य ज्ञानान्तरवेद्यत्वं सिद्ध्यति । तदेवाह-'अविशेष्यविशेषणम्' इति । विशेष्यं ज्ञानं तस्य विशेषणं ज्ञानान्तरवेद्यत्वं तदुभयस्याभावः अविशेष्यविशेषणम् । ततो न ज्ञानं ज्ञानान्तरवेद्य प्रमाणाभावात् । स्वसंवेद्यत्वे च प्रमाणमुक्तमेव, ततस्तदेव प्रेक्षावद्भिरभ्युपगन्तव्यम्, अन्यथा तद्वत्त्वविघटना. दिति स्थितम् । अपि च, यद्यस्वप्रकाशत्वमेव सकलसंवेदनानां तदा क्थं फचिन्नरन्तर्य संवेदनानां तत्परिज्ञानं यर ? न हि-'देवदत्त गामभ्याज' इत्यादी कारादिविपयगेकमेय संवेदनम्, तस्य कालदीर्घस्यासम्भवात् , "उत्पन्नापयर्गिल्येनाभ्युपगमात् । क्षणक्षीणत्ये च नै दकारसंवे. दनस्यैव एकारादी प्रवृत्तिः, 'तस्यासनिकृत्वात् , असनिकृष्टेऽपि प्रवृत्तावतिप्रसङ्गात् "प्रत्यर्थ- नियता हि बुद्धयः" [न्यायमा० ३।२।४६ ] इति भाष्यविरोधाच । तस्मात् प्रतिवर्ण २० विद्यन्त एव तद्वेदनानि निरन्तराणि च, 'निरन्तरमुपरब्धा दुकारादयः' इति स्मरणात् । न च स्मरणम्" अप्रतिपन्ने 'तन्नरन्तये सम्भवति, अतिप्रसङ्गात् । न च तत्परिझानं "तेषां स्वत एव; तदस्वसंवेदनप्रतिज्ञाविरोधात् । एतदेवाह-'विमुख' इत्यादि । विमुखानां स्वप्रकाशविकलानां ज्ञानानाम् उक्तवाक्यदकापदिविषयाणां संवेदः “सड्कुलितत्वेन नैरन्तर्येण वेदनं स्वतो विरुद्धः" सदस्वसंवेदनप्रतिज्ञयेति । व्यक्तिरन्यतः २५ संवेदनानन्तर्यस्येवि पर, तबाह-'असञ्चारः' इति । "अन्यतस्तस्य न सञ्चारो न संवे- दनम् । कुतः ? इत्याह-अनवस्थानं यतः। तथा हि-तदन्यदेकं चेत् ; सर्वचरमेण तेन भवित- १५ १८ १ स्वप्रकाश अनित्यत्वयोः। २ कलादादनित्यत्वं वर्तते न स्वप्रशसत्वमिति । ३ स्वप्रशाशविरोधः । । विपक्षव्यावृत्तिनियमः। ५ भासर्वज्ञ वेन भा०, २०, ५०, स०। ६ -लदर्श-प्रा०, २०, ५०, स.। .-लवेदना- भा., य०, प.। ८ तथा भा०, व., प., स.। ९ तरवतानं भा०, प., प०, स.1 1. देवदत्तेत्यादिविषयस्यैकस्य संवेदनस्य ।। उत्पन्नापवर्गले-मा०, २०, ५०, ०२ न तदाकार-मा, च., ए., स. १३ एकारस्य । १४ स्मरणौघप्रति- भा०, २०, ५०, स. १५दकारादिनरन्तर्ये । १६ नैरन्तर्यपरिज्ञानम् । १० दकारादीनाम् । १८ संकलितत्वेन भा०, २०, ५०, स.। १९-द्धस्ततस्वसं- भा०प ००।-दस्तत्वसं-प० । २० अतस्तस्य भा०, ब., प., स.।
प्रथमः प्रत्यक्षमस्ताव: २२३ तस्य i १२० ] व्यं तदेव तद्वेदनसम्भवात् । भवत्विति चेत् ; न ; तेन तेपामवेदने तद्धर्मस्य नैरन्त- यस्यापि वेदनायोगात् । न च तेपामपि वेदनम् , तदा तेपामुत्पन्नापेवर्गित्वेनानवस्थानात् । अवस्थाने या कथं निरन्तरत्वं तदेकसमयमानतया कालक्रमाभावात् ? सत्येव तत्क्रमे तदुप. पत्तेः । 'अपरियकक्रमाणामेव तेषामवस्थानम्' इसपि न युक्तम् ; अवस्थितस्वभाषा- पेश्या नैरन्तर्याभावस्य कमवत्स्वभावापेक्षया च तदपरिज्ञानस्य पूर्ववत्प्रसङ्गात् । पुनरपि ५ क्रमापरिहारेणावस्थानकल्पने तदेवोत्तरमित्यनवस्थादोपपारम्पर्योपनिपातात् । तस्मात्सर्वात्मनः वावस्थानम् । तत्र च कथं नैरन्तयं कथं वा युगपज्ज्ञानानुत्पतिः ! "युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्म- नसो लिङ्गम्" [न्यायसू० १।१।१६ ] इति व्यवतिष्ठेत ? कथं वा सविषयत्वम् ? तत्काले दकारादीनामपक्रमात । अनपक्रमे वा कथन्न युगपद्ग्रहणम् ? तन्नायं पक्षः श्रेयान् । तस्मात्प्रतिवेदनं भिन्नान्येव तद्वदनानि । तत्र च पूर्व दकारवेदनं पुनस्तद्वेदन" ततोऽप्येकार. १० वेदनं पुनरपि"तवेदनमेवमुत्तरत्रापीति न वर्णज्ञानानां नैरन्तयं पश्यामः "तक्षानैर्व्यवधानात् , तत्कथं निरन्तरतया तत्परिज्ञानम् ? घटनादिति चेत् ; न; नरन्तर्यस्यैव घटनत्वात् , पाभावात् । आशुभावप्रयुक्ता द्विभ्रमाद् घटनमिति चेत्, "तकिमिदानीमवस्तुसव ? तथा चेत् : न; तदेकज्ञानसंसर्गितया" संवेदनानामप्ययस्तुत्वप्रसङ्गात्कथं तैर्वर्णप्रकाशनं व्योमकुसुमेरियावस्तु- सद्धिस्तदयोगात् ? घटन एव तज्ज्ञानस्य विभ्रमो व्यवधानज्ञानस्य वाधकस्य भावान्न वेदनस्वरूपे विपर्ययादिति चेत् ; न; 'तत्रापि घटनस्यैव रूपत्वात्। न हि कारज्ञानमप्यघटनरूपं सम्भवति । तथाहि-"अर्धमात्रिकत्वमपि दकारस्यानेकौ णक्रमोपनिवद्धमित्यवश्यम्भाविनि क्षणभेदे तत्तत्क्षण- भाविनां दकारभागानामपि भेदादयश्यम्भावी "तज्ज्ञानानामपि भेदः, तत्र चघटनं यदि विभ्रम- निबद्धमेत्र कथं तत्र फस्यचिद्धोधस्याभ्रान्तत्वं विभ्रमनिबन्धनपरिक्षानेन घाधनादिति न दकारक्षानग्यापि वस्तुत्वम् । वर्णान्तरज्ञानेऽप्ययमेव न्याय इति न किञ्चिद्वर्णज्ञानं यस्तुसद- २० स्तीति विलुप्तो वर्णव्यवहारः। वर्णज्ञानविलोपे च पदज्ञानं कथं भवेत् । सत्येव वर्णविज्ञाने पदज्ञानस्य सम्भवात् ॥६२९।। पदनानमनावृत्य यास्यवानश्च दुर्लभम् । पदज्ञानानुज यस्माद्वाक्यज्ञानं परैर्मतम् ॥६३०॥ पदवाक्यव्यवस्था च तज्ज्ञानासम्भये कथम् ? । व्यवहारो यतः शाब्दः सिद्धोन्यायविदा मते ? ॥६३१॥ 1 तदेव भा०,१०,१०,स.। २ सवंचरमभूनेन भन्यहानेन । ३ कारादिविंदनानाम् । । परमयमये । ५ -पवर्गले-मा०,५०,५०,स। कालक्रमे । नैरनार्योपपत्तेः। ८ दकारादिसपेदनानाम् । १ -ले तदा कारा-भा०प०१०स०11०दकारपेदनवेदनम् । १: एकारपैदनवेदनम् । १२ दारादिक्षानशन. । पट. नम् । १४ -संसर्गतया भा०,२०प०, १५ वेदनेऽपि । गकार-भा०,१०,१०,सन १७ अर्यमाश्निक- मा०, य०, १० पत्रिक-स० । १८ क्षणक्षमोप-आध, य० प.स.१९ दशरभागशनानाम् ।
२२४ न्यायचिनिश्चयविवरण [ १३२१ - १० . एतदेवाह-अविशेष्यविशेषणम् । विशेष्यो वर्णादिस्वरय विशेषणं ज्ञेयत्वं तस्याभावः 'अविशेष्यविशेषणम्' इति । ततो वर्णज्ञानस्य परमार्थसत्त्वमिच्छता सद्भागज्ञा- नघटनस्य तदभ्युपगन्तव्यं तस्यैव वर्णज्ञानत्वात् । न च तत् अन्यवेद्यत्वनियमे सम्भवतीति स्वसंवेद्यमेव तदङ्गीकर्तव्यम् । कथं पुनः सत्यप्यात्मवेदने घटितत्वेन वेदनं वेदनाना तैरितरे. ५ रितरापरिज्ञानादिति चेत् ? न तेषां कथञ्चिदन्वयस्यापि भावात् , अन्वितेनारमना पटाधिष्ठा- नज्ञानानां परिज्ञाने घटनस्यापि सुपरिज्ञानत्वात् । उक्तश्चैतत्-'आत्मनाऽनेकरूपेण' इात। प्रतिक्षणभेदनियमे तु 'तेपां न भवत्येव कचिदपि घटनज्ञानं तदधिकरणभेदपरिज्ञानस्य फुतश्विदसम्भवात् । न ोकमपरापरतदधिष्ठानभेदविपयं ज्ञानं 'तनियमवादिनां सम्भवति, सन्निहितविषयत्वेन तस्याभ्युपगमात् तत्कथं तद्गतघटनपरिक्षानम् ? ततो यदुक्तं प्रज्ञाकरेण-"तदाकारैकवुद्धिवेदने दीर्घवेदनव्यवस्था" [प्र. यार्तिकाल० २।४८५ ] इति; तत्प्रतिविहितम् ; दीर्घत्वं हि वर्णानां समयक्रमानुपातित्वम् , तदाकारत्वे बुद्धेरपि "तदनुपातित्येनाक्षणिकत्वानुपड्गात् । कल्पनयेव" तस्याः" तदाकारत्वं न वस्तुत इति चेत् ; न; कल्पनातलदाकारत्वस्य "पालानाम्" इत्यादिवृत्तव्याख्याने प्रति. विहितत्वात् । ततः समान एय नैयायिकवासीगतस्यापि शाब्दव्यवहाराभाव इत्यलं प्रसङ्गेन । साम्प्रतं विमुखेत्यादिकमेव व्याख्यातुकामो योगज्ञानदूपणं सोगतज्ञानेऽपि योजय- मिदमाह- निराकारतरस्यैतत्प्रतिभासभिदा यदि ॥२०॥ तत्राप्यनर्थसंवित्तावर्थज्ञानाविशेषतः । इति । निराकारं नेयायिकादेर्शानं तस्मात् इतरत् साकार तस्य एतत् 'विमुग्व' इत्यादि २० दूपणम् । कुतः ? इत्याइ- ह-अर्थज्ञानाविशेषतः । अर्थस्यैव न सरूपस्य ज्ञानं तस्मादविशेषा. दवैलक्षण्यात् । न हि यद्यस्मादविशिष्टं तत्तदूपणापरामृष्टं भवितुमर्हति तदविशिष्टरवस्यवाभाव. प्रसङ्गात् ।"असिद्धं तस्य तदविशिष्टत्वम् , वदाह-प्रतिभासभिदा यदि । प्रत्यात्म भासनं प्रतिभासः स्वप्रकाशनं तेन भिदा साकारज्ञानस्यार्थज्ञानाद्विशेगे यदि चेत्, तबाह-तत्रापि तद्भिदायामपि तदूषणं भवतीति यावत् । अत्रेदमैदम्पर्यम्-नाविशिष्टत्वमर्थज्ञानात् साकार- "शानस्यानात्मवेदित्वमुच्यते यतः प्रतिभासभिदोच्येत,किन्तु विषयविपयिणोरन्यतयपरिक्षानमेव । तथास्ति स्वप्रकाशेऽपि ज्ञाने । कदा ? इत्याह-अनर्थसंवित्ती अर्थपरिन्ठित्यभावे । तथा च, अर्थज्ञत्वं यद् दुर्योधं स्वप्रकाशशून्यस्य । स्वपराभ्यां तद्वोधप्रतिषेधात् पूर्वमस्माभिः ॥६३२।। परमार्थसत्यम् । २ सद्भागशानघटनस्यैव । ३-यम भइ-आ०, ब., ५०,०। ५ सत्यस्यात्म- भा०,१०,५०,०। ५ न्यायवि. सो. ८६शनानाम् । ७ घटनाधिकरणज्ञानाना भेदपरिज्ञानस्य । ८ प्रति. क्षणभेदनियम । ९ ज्ञानस्य । १. समयसमानुपातित्वेन । 1 कल्पनयेतस्याः भा०,५०,०प० । १२ शुद्ध। ३म्पायविश्लो. २११४ असिदत्वस्य त-आ.ब०,००।१५-शानस्यात्मदि-भा०प०,५०,०।
२२५ . .. ५ २२१] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव तद्वदिहार्थमहणे तत्सारूप्यं स्ववेदिनोऽपि कथम् । गम्येत, तन्मुखेन यदर्थग्रहणं भणन्ति परे ||६३३।। अर्थसरूपज्ञानग्रहणमेव हि परेषामर्थग्रहणम् उपचारात् , तत्त्वतस्तदेव च सारूप्यज्ञानं कैथमर्थापरिज्ञाने भवेत् ? ज्ञानमात्रपरिज्ञानाद्भवत्येवेति चेत् ; न ; सारूप्यस्य सम्बन्धवद् द्विष्ठत्वेन तत्परिज्ञानस्यैकरूपपरिज्ञानमायादसम्भवात् । द्विप्ठसारूप्यसंवित्तिनैकरूपप्रवेदनात् । द्वयस्वरूपाहणे सति सारूप्यवेदनम् ।।६३४॥ अन्यथा सम्बन्धज्ञानस्यापि तन्मात्रादेव सम्भवादश्लीलमेवेदं भवेत्-"द्विष्ठसम्बन्ध संवित्तिः" [प्र० कार्तिकाल० ११] इत्यादि । भवतु परिज्ञाते एवार्थे सारूयंपरिज्ञानमिति चेत् ; कुतस्तत्परिज्ञानम् ? तत एघ ज्ञाना- १० दिति चेत् ; यदि सारूप्यमनाइय ; निष्फलं तर्हि तत्कल्पनम् । तत्परिज्ञानमुखेनेवेति चेत् । न; 'अर्थपरिज्ञाने तत्परिज्ञानम् , "तन्मुखेन चार्थपरिज्ञानम्' इति परस्पराश्रयात् । सारू- प्यान्तरपरिबानमुखेनैवेति" चेत् ; न; एकार्थापेक्षया "तदन्तरस्याभावात् । भावेऽपि "कथमा- परिज्ञाने "तस्यापि परिज्ञानम् ? परिक्षात एवार्थ इति चेत् ; न; 'कुतः' इत्यादेरनुबन्धादन. "घस्थानानुपङ्गात् । वन्न तत्त एवार्थस्य तत्सारूप्यस्य च परिज्ञानम् । अत्रार्थे 'विमुग्व' १५ इत्यादेाख्यानम्-मुखमिव मुखं चैतन्यं वस्तुरसपरिज्ञानस्य तदधीनत्वात् , विगतं मुखं यस्मात्स विमुखः अचेतनार्थः, स च ज्ञानञ्च विमुग्वज्ञाने तयोः संवेदः समत्वेन स्वरूपत्वेन घेदनम् । स्वतो विरुद्धोऽनुपपन्न इति । अन्यत एव तर्हि ज्ञानात्तत्सारूप्यस्य व्यक्तिस्तेनार्थस्य तज्ज्ञानस्य च ग्रहणसम्भवादिति चेन् ; न;"तेनाप्यनारतसारूप्येण तवग्रह- णात् , प्रथमज्ञानेऽपि तत्कल्पनावैकल्यानुपङ्गात् । सारूप्यपरिज्ञानमुखेन तु तेन तद्हणे २० पूर्ववत् परस्पराश्रयस्य सारूप्यान्तरकल्पने चानवस्थानस्य प्रसङ्गात् । तन्न ततोऽपि प्रथमज्ञान. सारूप्यस्य सञ्चार सम्प्रतिपत्तिः, तत्सारूप्यस्यैवासम्प्रतिपत्तेः । तस्याप्यन्यतः परिज्ञानपरि- कल्पनायामनवस्थानम् । अन चार्थे 'व्यक्तिः' इत्यादि 'अनयस्थानम्' इत्यन्तं सुगम• वाड्याख्येयम् । ततो न प्रत्यक्षात्ततोऽन्यतो या सारूप्यपरिज्ञानम् । नापि तत्पृष्ठभाचिनो विकल्पात् । तस्यावस्तुविषयत्वात् । ततोऽपि वस्तुसिद्धावति- प्रसङ्गात् । वक्ष्यति चैतत् "अयमेवं न वेत्येवम्" इत्यादिना"। सारूप्यमप्यवस्वैयेति चेत् ; न; १ अर्यस्वरूप-भा०, म०, ५०, स० ! २ कथामर्थपरि-आ०, २०, ५०, स०। ३ ज्ञानहानमान- भा०, ५०, म । ज्ञानाज्ञानमात्र-प० । ४ एक्स्पज्ञानमात्रादेव । ५ -ज्ञान एवा-भा०, २०, ५.। व सारूप्य एवं परि-भा०,१०,१०,80 1 0 सामप्यफल्पनम् । ८ सारूयपरिशान । ९ सारूप्यपरिज्ञानम् । .. सारूप्यमुखेन । 11-पुरोनेति था,स.। २ सारूप्यान्तरस्य ! १३ करमपरि-मा०,१०,५०,स. 11 सामप्यान्तरस्यापि । १५-वस्थानुप-प्रा०,१०,१०,०६माप्यनारत-पा०प०,०। ७ अन्यशानेन । १८वमादिना आ०, म.प., स०।११ न्यायवि. लो०६२। " - २२६ न्यायविनिश्चय विवरणे सदात्मनः प्रत्यक्षत्याप्यवस्तुत्यप्रसङ्गात् । तदयम् अचनविन्यासादेव लोचनभद्गः। प्रत्यक्षस्य तत्प्रति संस्कारार्थनव सारूप्येण नीरूपत्वस्योपस्थापनात् । अवस्तुविषयस्यापि तस्य तत्र 'प्रामाण्यं प्रतिबन्धादिति चेत् ; न; अनुमानादन्यस्य वेदभावात् । तस्य च "प्रकाशनियमः" 'इत्यादी निपेत्स्यमानत्वात् । वतो न फुतश्चिदपि सारूप्यं सुपरिज्ञानम् । ततो न त ज्ञानं ५ विशेष्यं नापि तस्य विशेषणं सारूप्यम् , अत इदमुक्तम्-अविशेप्यविशेषणम् । इति सूकं 'निराकारतरस्य' इत्यादि । ततो न योगसौगतापन्योन्यमतिशयाते अस्ववेदनादिवे स्ववेदनादपि संवेदनादर्थसिद्धेरभावात् । मा भूत्तत्सिदिः, संवेदनमात्रस्यैवाभ्युपगमादिति चेत् ; न, "स्वतस्तत्वम्" इत्यादिना तनिराकरणात् । इदानीमनवस्थानमेव संविद्विषयं पूर्वोकं व्यवीकुर्वनाद- ज्ञानज्ञानमपि ज्ञानमपेक्षितपरं तथा ॥२१॥ ज्ञानज्ञानलताशेषनभस्तलविसर्पिणी। पर्यन्ते-'प्रसज्येत' इति । निराकारमेघ ज्ञानं ततो मानवस्थानं परतस्तत्र सारू. प्यपरिज्ञानाभावादिति चेत्, न; तद्वदेव प्रथमज्ञानस्यापि निराकारत्यापत्तेरविशेषात् । निरा. फारस्य कथं विषयनियमः ? इत्यपि न युक्तम् ; पर्यन्तज्ञानेऽपि समानत्वात् । शतिनियमात्तत्रं १५ तन्नियमः प्रथमज्ञानेऽपि न वैमुख्यमावति । तदेवाह- [प्रसज्येत ] अन्यथा तद्वत्प्रथमं किन्न मृायते ? ॥२२॥ इति । ततः प्रथमवत् पर्यन्तेऽपि "सरूपमेव ज्ञानम् । तस्य च परतः प्रतिपत्ती तदवस्थ एवं "तत्प्रसङ्गः। तत्र च सुदूरमनुसत्यापि पर्यन्तज्ञानस्य'धुतश्चिदप्रतिपत्तौ न ततस्तत्पूर्वस्य नापि 'ततस्तत्पूर्वस्य परिक्षानं यावत्प्रथमज्ञानमप्रतिपन्नम् । "अर्थप्रतिपत्तिराकारज्ञानप्रतिपत्तेरेव २० तत्प्रतिपत्तित्वात् , तस्याश्चाभावादिति प्रवृत्त्यादिव्ययहार विकलमखिलं जगद्धयेत् , "तस्यार्थ- तत्त्वप्रतिपत्तिमूलत्वेन तदभावेऽभावात् । एतदेवाह- गत्वा सुदूरमप्येवमसिद्धावन्त्यचेतसः । असिद्धरितरेषां च तदर्थस्थाप्यसिद्धितः ॥२३।। असिद्धो व्यवहारः इति । मा भूत्तव्यवहार इति चेदवाह- अयमतः किं कथयाऽनया ? इति । - La २५ स.. संसारा-मा०, ब., प., स.। २ निरूप-आ०, ०, ५०,०३ विकल्पस्य । पस्तुप्रतिबन्धात् । ५ प्रामाण्याभावात् । ६ न्यायवि० इलो० ३३। ० -दिव खवेदनार्थ-आ०, २०, ५०, ८ न्यायवि० सी० ५६ । १-परस्तथा भा, घ., १०, स...पर्यन्तज्ञाने विषयनियमः । "स्वरुप-मा० ५०, ५०, स०। १२ अनवस्थाप्रमः । १३ कुनम्वित्प्र-आर, १०,५०, स०।१४ पर्य- न्तानात् । १५ उपान्त्यज्ञानस्य । १६ उपान्त्यानात् । १७ अप्रिति-ता. १८ प्रत्यादिव्यवहारस्य । तस्यार्थप्र-भा०, ५०, प., स. ।
१।२४] प्रथमः प्रत्यक्षमस्ताः ७ २२७. अयं सौगतः किं न किञ्चित् 'कुर्यात" इति शेपः। कया ? कथया वार्तिकादि- रूपया, अनया प्रसिद्धया । कुतः ' इत्याह-'अतः' इति । अतो व्यवहारादेव'कथा यत इति । एतदुक्तं भवति-सति हि प्रतिपाद्यप्रतिपादकादिलक्षणे व्यवहारे सम्भवति कथा तस्यास्तद्विशेषत्वात् , असति तु तस्मिन् तस्या एवाभावान् । कथं तयाँ किमप्यसौं शिष्यब्युत्पादनमन्यता कुर्वीतेति ? यदि घा, 'निराकारेतरस्य' इत्यादिनैव प्रसङ्गागतं सौगतमवक्षिप्य नैयायिकमेव पुनरप्यपक्षिपन्नाह-'ज्ञानज्ञानम्' इत्यादि । ननु त प्रति न युजमनवस्थाप्रसञ्जनम् , न हि तन्मते ज्ञानज्ञानस्य परिज्ञाननियम:, तदपरिज्ञानेऽपि दोपाभावात् । तत्कथमस्य "तद- परापेक्षणं यतस्तत्प्रसङ्गः' ? प्रथमज्ञानस्यापि सन्नियमः कस्मादिति चेत् ? न; तथापि तदभावात् । न हि तस्यापि नियमेन परिज्ञानम् , अपरिज्ञातस्यैव तस्यापि विषयप्रकाश-१० कत्वात् , तावतैय व्यवहारस्यापि सम्भवादिति चेत् ; क इदानी परोक्षज्ञानवादिनो मीमांस- कात्तस्य विशेपः स्यात् ? अयमेव यत्तस्य परोक्षमेव ज्ञानम् , नैयायिकस्य तु कदाचित्प्रत्यक्षमपीति चेत् ; उच्यते-यदा तत्परोक्षम् ; तदा तदस्तीति कुतः १ भवतोऽपि "तथाविधं पावकादिकं "कचिदस्तीति कुत इति चेत् ? मा भूत् , "न काचित् क्षतिः। न चैवं "भवतः 'अपरिज्ञातस्यैव विषयप्रकाशत्वम्' इत्यभ्युपगमक्षतेः । अन्यदा प्रत्यक्षत्वादिति चेत् ; न तवस्तदैव तत्सत्त्वो. पपत्तेः । एकदा प्रत्यक्षस्यान्यदापि सत्त्वे नित्यमर्थज्ञानं भवेत् , “पूर्वापरकोट्योरपि अमतीतस्यैव सत्त्वोपपत्तेः । परोक्षस्यापि तत्कार्यान्यवहारादस्तित्वं पावफस्येवे धूमादिति चेत् ; न; व्यव- हारस्यापि धूमवदपरिक्षातस्यागमकत्वात । परिज्ञातस्यैव गमकत्वमिति चेत्, न; तत्परि- ज्ञानस्यापि अर्थपरिज्ञानवदपरिज्ञाने फुतोऽस्तित्वम् ? व्यवहारादेव तत्कृतादिति चेत् ; न; तत्रापि 'व्यवहारस्यापि' इत्यनुसन्धानाद" अव्यवस्थापत्तेः । ततो यदुक्तं भासर्वज्ञेन-'तदन- तीतो ततोऽमी व्यवहाराः प्रवृत्ता इति कुतोऽवगम इति चेत् ? इति पूर्वपक्षयित्वा तत्प्रति- वचनम्-तद्व्यवहारदर्शनादेव अङ्कुरदुःखादिदशनाद् वीजाऽधर्मादिनिश्चयवत्" । इति ; तत्प्रतिविहितम् ; व्यवहारतस्तदयगमस्य अनवस्थादोपोपहतत्वेन दुष्करत्वात् । ततो "यद्यभ्युपगम्यापि परोक्षत्वमनवस्थानदोपान्न निर्मुक्तिः, अर्थज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वनियम एवाही कर्तव्यः । तद्वत्तज्ञानस्यापि तन्नियमे कथं तदन्तरानपेक्षणं यतो 'ज्ञानज्ञानलता' इत्या- । -- -- २५ फुर्वतेति मा०, २०, प., स.) २ व्यवहारे देवस्था यतः त1 ३ कथयतः भा., ०५० । ४ व्यवहारविशेषत्वात् । ५ व्यवहारे । ६ कथया । ७ सौगतः । ८ नैयायिकम् । ९ ज्ञानज्ञानापरिझानेऽपि । १. तदन्मशानापेक्षणम् । मनवस्थाप्रसनः । १२ परिज्ञाननियमः। १३ प्रथमज्ञानस्य । १४ -प्रकारात्वात् ता०। १५ नैयायिकस्य । १६ मीमांसकस्य । १० घनम् । १८ परोक्षम् । १९वचिदस्ति कुतः भा०, २०, प०,स। २. नः का-भा०,२०,५०म० । २. भक्तोऽपि परि-ता। नैयापिरस्य । २२ प्रत्यक्षकाल एव । २३ उत्पत्तेः प्राक्कोटी विनाशात् पश्चारकोटो । २४ ज्ञानस्य । २५ -स्यैव धू-भा०२०प०।२व्यवहारपरिज्ञान- म्यापि । तत्परिझातस्या-भा०,६०।२० व्यवहारपरिज्ञानात्तात् । २८ - राधादन्य-ताग २९ यदभ्यु-मा०,०, ५०,०1३. में घाडी-आ०,९०,०स० 1 ३१ अर्थशनशानस्यापि । ३१ तदन्तराणे-मा-१०,०स० ।
२२८ न - . न्यायविनिश्चयविवरणे शिस धनवसरं भवेत् ? पर्यन्ते क्स्यचिज्ञानस्यात्मवेदन वादनपसरमेदमिति चेत् , न, तद्वत्प्रथम- शानस्यापि 'तत्त्वानुपङ्गात् । तदेवाह-'अन्यथा तद्वत्प्रथम किन मृग्यते' इदि । ततस्तस्याप्यन्यत एव चेदनादनवस्थानमेव । मानवस्थान विपयान्तरसन्निधानात् । सन्निहिते हि विषयान्वरे तव ज्ञानम् , ५ ज्ञानवानादायिति चेत् , न , सन्निहितेऽपि तस्मिन् तस्ययान्तरङ्गत्वेन बलीयस्यात् । अन्त- रशोऽपि (हि) ज्ञानज्ञानादिः आत्मसमवायात् , न विषयान्तरं विपर्ययात , प्रत्यासन्नसम्बन्धश्च । प्रत्यासन्नो हि तन मनसः सम्बन्धः संयुक्तसमपायलक्षणः यसन्निकर्षत्वात् , विषया. न्तरज्ञानहेतुरतु सम्बन्धो विमकृष्टः 'चतुष्टयादिसन्निकर्षस्त्रात् । ततो बरपति प्रत्यासनसम्बन्धे च ज्ञानज्ञानादो ग्यविषयज्ञानजननसमथे सति कथं सन्निहितेऽपि विपयान्तरे ज्ञानं यदनवस्थान १० न भवेत् । अव्यापकच "तत्सन्निधानम् , व्याप्तिविषये मानसप्रत्यक्षे सकलार्थवेदिनि माहेश्वरे च ज्ञाने तदभावात् । "ततो न विषयान्तरसन्निधानमङ्गमवस्थितेः । सत्यपि विषयान्तरसन्निधानादे. वस्थाने क्थं पर्यन्तज्ञानस्याप्रतिपन्नस्यास्तित्वम् । पुनः प्रतिपल्या व्याप्तमस्तित्वं येन तदभावे न भवेत् १ बाढम् , कधमन्यथा व्योमकुसुमादेत- भोन् । सर्वस्य तर्हि सर्वहस्त्र सतः सर्वस्य पेदनात् । प्रत्येक न घेदन "बहुभिरेव वेदनादिति चेत् , न, असर्वज्ञेनैवपि प्रतिपत्तुमशक्य. १५ स्यादिति चेत्, ससम् , अस्ति प्रतिपुरुष सर्वज्ञत्वम् , अन्यथा ठगामिपरिज्ञानाभायस्य निवेदनात् । पर्यन्तज्ञानस्यापि तर्हि पावकादियत् व्याप्तिज्ञानविषयत्यादेवास्तित्वमिति चेत् , कथं तदिमुक्त भासनेन -"न पुनरविदितो नास्त्येवोपलम्भः । ] इति । "थं या व्यामिज्ञानस्यास्तित्वम् ' भवतां कथम् ? स्पयमुपलम्भात् , ममाप्येवमिति चेत्, न, 'अन्यथा' इत्यादिशेषात् । उपलम्भान्तरादिति चेत् , अनुपातमनवस्थानम् , २० "तस्यापि "वदन्तरादस्तित्वोपपत्तेः । तत्रापि विषयान्तरसन्निधानावस्थानमिति" चेत् , न 'मसाप' इत्यादेख्नुवन्धेन चक्कासनादनवस्थापत्तेश्च । ततः पर्यन्तज्ञानस्याप्रतिपत्तिकत्वादभाव । पयाच्यः। तदनेन शक्तिपरिक्षयात् ईश्वरनियोगाचावस्थानमिति प्रतिविहितम् , पर्यन्तज्ञानस्या- मानिसिकत्येनाभावप्रसङ्गात् । तदगाने च "द्विषयस्याप्यभायरतावदेवं यावत् प्रथमज्ञानस्य ६. साधस्य घाभार इत्यसिद्ध एव तन्निबन्धनो व्यवहार इति । तदाह- . भारमवेदनत्वानुपशात् । २ पर्यनस्यापि ज्ञानस्य । ३ विषयान्तर एवं ! १ अन ताप त्रुटितम् । ५ -सने हि तन मन सु-०५०,०,401 ६ ज्ञानज्ञानादौ । ७ ज्ञानहानादि पारमा मनमति त्रयम् । ८ हेतुस्त- सम्बन्धी का०,०प०स०१५ विषयान्तरम् इन्द्रियम् अामा मनश्चेति चतुष्टयम् । १. विषयान्तरसन्निधानम् । 11 ततो विप-भा०.१.१-दनवस्थाने बा०,०प०, १३ -पक्षम्याप्तित्वम् मा०,१०,१०,१०। 1४ प्रतिपरया अस्तित्वव्याप्यमावे। १५ मस्ति वम् । १६ खत भा०,०,०,R.। सत्वेन पेग। सन् तत्तद्व्यतिरूपेण । १० सामान्यररतया । १९ व्यक्तिद्वारेण । २०-झन पुनर-RI,4.प.प.१२. कथ व्या-आ०,२०,५०,१० । २२ उपलाभान्तरस्यापि । २३ भयमा उपरम्मान्तरातः । २४-नादनवरयान- मिति बा०,१०, प., स., । २५ तद्विषयमन्या-मा०, २०, प. प. उपरान्स्यज्ञानस्य ।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावा ५ श२४] गत्वा सुदूरमप्येवमसिद्धावन्त्यचेतसः । असिद्धरित्तरेषां च तदर्थस्याप्यसिद्धितः ॥२३॥ असिद्धो व्यवहारोऽयम् इति । ततः किम् ? इत्याह- अतः किं कथयाऽनया ?। अतः अनन्तरन्यायात् । किम् ? न किञ्चित् 'व्युत्पाद्यम्' इति शेपः १ कया ? कथया सूत्रवार्तिकादिलक्षणया । अनया प्रसिद्धयेति । तत्वज्ञानव्युत्पादनमेव हि 'तस्याः प्रयोजनम्-अनन्तरन्यायेनं च तदभायानिप्पयोजनैव कथेति भाव इति । 'निराकारेतर' इत्यादयः अन्तरश्लोकाः वृत्तिमध्यवर्तित्वात् , "विमुख' इत्यादि- पातिकव्याख्यानवृत्तिमन्थमध्यवर्तिनः खल्वमी श्लोका । "वृत्तिचूर्णानां तु विस्तारभयानास्मा- १० भिर्व्याख्यानमुपदयते । सङ्ग्रहश्लोकास्तु वृत्त्युपदर्शितस्य वार्तिकार्थस्य संग्रहपरा इति विशेषः । तदेवमवस्थापितेऽर्थज्ञानस्यात्मवेदने साख्यः प्राह-सत्यम्, अर्थज्ञानं प्रत्यक्षमिति नात्र विवादः किन्तु तत्परार्थमचेतनश्च । परार्थं तत् संहतत्वात् , शयनासनाद्यङ्गवत् । शयनासनाद्यझं हि परस्परप्रत्यासत्तिविशिष्टतया संहतं परार्थमेवोपलब्धं तस्य सदुपभोक्तृशरीरार्थत्वेनोपलब्धेः, 'अतो न साध्यवैकल्यमुदाहरणस्य । नापि हेतोरसिद्धत्वम् ; अर्थज्ञानस्यापि गुणत्रयरूपतया संहत. १५ स्वोपपत्तेः । सन्निवेशविशेपो हि संहतत्वम् , तच्च भेदसत्र्यपेक्षम् , भेदश्चाविकलो गुणाना- मिति संहतमेव तदात्मकमर्थज्ञानम् । तदात्मत्वच तस्य यथासम्भवं सुखदुःसमोइनिमित्त. त्वेनाध्यवसायात्" । न ह्यतदात्मक तन्निमित्तं भवितुमर्हति अतिप्रसद्गात् । भवति च "ततः फस्यचित्कदाचित सुसम् "अन्यदा दुःखं मोहो वा । ततो गुणत्रयात्मकम् , ततश्च परार्धम् , अत एघाचेतनम् । परार्थत्वं हि परानुभषापेक्षत्वं विपयत्वमेवोच्यते । विपयश्च घटादिरचेवन एव प्रतिपन्नः । तत इदमुच्यते-'अर्थज्ञानमचेतनं विषयत्वात् घटादिवत्' इति । तत्रेदमाह- प्रत्यक्षोऽर्थपरिच्छेदो यद्यकिश्चित्करण किम् ॥२४॥ अथ नायं परिच्छेदो यधकिश्चित्करण किम् ? अर्थस्य नीलादेः परिच्छेदो निर्णयः अर्थपरिच्छेदः । प्रत्यक्षः स्वानुभवाध्यक्ष. वेद्यः तथैव व्यवस्थापितवान् । अनेन अर्थज्ञानमवेतनम्' इति प्रत्युत्तम् ; अचेतनले २५ - २० 1 कथायाः । २ -न तद-भा०, ब०, ५०, म.! ३ मध्यविवर्तिनः प्रा० } वृत्तिनिती तु भा०, २०, ५०, स.। ५ वृत्तिप्रदर्शितस्य भा०, ५०, २०, स.। ६ "सहानपरार्थमात्-इह लोके ये प्रज्ञाता है परार्या दृष्टाः पर्यवस्थामादयः"-मस्या मादर०, गौशाद, युधिदी, सावी. का. शयनासनायास्य । ८ ततो भा०,०, प., स.९ भेदसंख्यपेक्ष भा०, २०,स.11.वसायो न मा०, ०,१०, स.।सुखदुःसमोहाना-मम् । १२ अर्थशनात् । । अन्यया दु-आ., प., १०, सतत भा०, ५०, प., स.१५ भज्ञानश्चेव-मा०, ५०, ९०, स.।
૨૨૦ न्यायविनिश्चयविवरणे [१२२५ स्वसंवेद्यत्यायोगात्। तत इदमुच्यते-चेतनस्तत्परिच्छेदः, स्वसंवेद्यत्वात् , यस्तु न घेतनो नासो तथा यथा नीलादिः, स्वसंवेदश्च तत्परिच्छेदः, तस्माच्चेतन इति । नायं प्रयोजको हेतुः, स्वयमचेतनत्वेऽपि तस्य चेतनसंसर्गेण स्ववेदनोपपत्तेः । एवं तदनस्य विभ्रमः स्यादिति चेत् ; न ; अव्यतिरेकापेक्षया तदभ्युपगमात् । अभ्युपगम्यत ५ एच घेतनतत्परिच्छेदयोरव्यतिरेकवेदनस्य विभ्रमत्वम्, व्यतिरेकस्येव परमार्थत्वात् । प्रत्यक्षत्वं विभ्रमस्य कथमिति चेत् ? न ; पस्तुतस्तस्योप्यभावात् फेयलमनुत्पन्न विवेकदर्शनप्रतिपत्रमि. प्रायानुसन्धानमात्रेण तदभिधानात् । तन्न स्वसंवेद्यत्वं चेतनत्यसाधनायालं तत्परिच्छेदस्य अन्यथानुपपत्तिविकलत्यादिति चेत् ; तदिदगपालोचितगेव परस्य वचनम् ; विभ्रगविषयत्वेन चेतनतत्परिच्छेदयोरपि तदविवेकवदवस्तुतैव प्राप्नुयात् । इदमप्यभिमतमेवेति चेत् ; कथमि- १० दानी तदवस्तुत्वस्य प्रतिपत्तिः ? वस्तुभूतस्य तद्वेदनस्याभायात् , अवस्तुभूताच्च" अवस्तु- प्रतिपत्तेरपि दुरुपपादत्वात् । वक्ष्यति चैतत्- "विभ्रमे विभ्रमे तेषां विभ्रमोऽपि न सिद्धयति । न्यायवि० श्लो. ५४] इति । ततो वस्तुभूतमेव तद्वेदनमङ्गीकर्तव्यमिति कथन्न तनायं दोप:-'चेतनशानभागयोर. प्यवस्तुत्वं विभ्रमविपयत्वात् तदविवेकवत्' इति ? तयोरविभ्रान्तमेव तद्वदनं निर्वायत्वात् , तदविवेके तु भ्रान्तमेव "वाधयत्त्वात् , तस्मादसिद्धमेय "तयोविभ्रमविषयत्वमिति चेत् ; भवत्येवेदं यदि "तद्वेदनमेव लभ्येत । कुतो न लभ्यते ? विवेकावेदनादेव । विवेको हि ज्ञानभागाच्चेतनस्य तदविविक्त: । कथं "तदवेदने 'तस्यापि वेदनम् ? येदने वा- विदिताविदितत्वेन चिदाकारवियेकयोः । विरुद्धधर्माध्यासेन भेदस्तत्र कथन्न वः । ॥६३५॥ विवेकाद्भिद्यमानश्च तदाकारो बजत्यलम् । ज्ञानभागेन तादात्म्यमभावादन्यथा गतेः ॥६३६॥ तथा च वस्तुतस्तत्रं चिद्रूपत्वव्यवस्थितेः । विति संसप्तचित्वं तस्यत्वनुवितं वः ॥६३७॥ तस्मादेकान्ततो भेदाश्चित्स्वभावविवेकयोः । विरुद्धधर्माध्यासेऽपि नेवाय शक्यकल्पनः ॥६३८॥ एकान्ताभेदपक्षे च चिद्रूपस्याप्यवेदनम् । तद्विवेकवदेव स्यादिति "तत्सम्भवः कथम् ॥६३९॥ 1-द: संवे-आ०, २०, ५०। १-दि स्व-आ., २०, ५०, स०। ३ अर्थज्ञानस्य । १ -दन- योर-आ०,०,५०, स.। ५ प्रत्यक्षत्वस्य । ६ प्रत्यक्षस्वाभिधानात् । ७ वचनं हि वि.मा., ब०, प., स.। -त्वे चैतनतत्प-आ०. ५०, स०।-वे चेतनस्वात्तस्प-प० । ९ प्रतिपत्तर्वस्तु-आ०, ब०, ५०, स.। १० -ताच वस्तु-मा०,२०,प., स.।" बाधवरव त-आ०,००,०बाधकवात् स. १२चेतन- शानभागयोः । ३ भवतवेदं भाग, प, ५०।१४ चेतनशानभागयोर्वेदनमेव । १५ चैतनादमिनः । १६ वि. कावेदने । चेतनस्यापि । १८ विदाकारः। १५ शानभागे । २. चिद्रूपसद्भावः । २० प्रथमा प्रत्यक्षमस्ताका २३१ . १२२५] अविवेकपरिज्ञानं तेन ज्ञानस्य यद्भवेत् । 'संसारकारणत्वेन कापिलेरभिलप्यताम् ।।६४०॥ चिद्रूपवद्विवेकस्याप्यथया नियमाद्हे । कथञ्चिद्धेदकृप्तिस्तु ज्ञानदृम्भागयोरपि ।। ६४१॥ तद्वदेव भवेदेतद्देवैरन्यन्न भाषितम् । "वित्तेविषयनिर्मासविवेकानुपलम्भतः । विज्ञातायाः क्वचित्सिद्धो विरुद्धाकारसम्भवः ॥”[सिद्धिवि०प्र०परि०] इति । ततो यत् 'पतञ्जले. सूत्रम् - "दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवासिता"। [योगसू० २।६] इति । यच तत्रैव विन्ध्यवासिनो भाष्यम्-“भोक्तभोग्यशक्त्योरत्यन्तासङ्कीर्णयोर- विभागप्राप्ताविव सत्यां भोगः प्रकल्प्यते” [ योगभा० २।६ ] इति ; तत्प्रतिविहितम् ; १० इवार्थत्यानुपपत्तेः, यस्तुत एवोक्तन न्यायेन तयोरविभागस्य भावात् । न हि साक्षादेव सतस्त- पविभागस्य इवार्थत्वमुपपन्नम् ; तच्छक्योरपि तदर्थत्वप्रसङ्गात् । तथा च तद्वदेवावस्तुसत्त्वं तयोरपीति स एव पुनरपि मायावादः प्राप्तः । निरुपद्रवप्रतिपत्तिविपयत्वेन तच्छक्स्योरें- निवार्थत्वपरिकल्पन" तदविभागेऽपि समानम्-कथश्चित्तस्यापि" निरुपद्रवतयेय प्रतिवेद- नात् । कुतश्चायमिवार्थः प्रतिपत्तव्यः ? तत एव दर्शनशब्दवाच्यात् ज्ञानभागादिति चेत् ; १५ "तेनाप्यात्मानमप्रतियता कथं तत्र 'इंगेकत्वस्य इवार्थस्य प्रतिपत्तिः एक इयाई दशा' इति ? न हि स्फटिकमप्रतियतः 'प्रवाल इव स्फटिकः' इति "प्रतिपत्तिः । आत्मनश्च "यदि कलकत्य. सङ्कीर्णतयेव परिज्ञानम् ; न भवत्येव तत इयार्थवेदनम् । टफशक्त्या स्वमसकीणं तद्भागः प्रविदन्नयम् । तत्सङ्कीर्ण इवारमीति कथं नामावबुध्यताम् ? ॥६४३॥ शुभ्रमेव मणिं कश्चित् कस्यचित्परिपश्यतः । न शारक इवेत्येव तत्र बुद्धिः प्रवर्तते ।।६४४॥ फथं वा तदसङ्कीर्णस्यात्मनः स्यात्ततो" गतिः । सचेतनत्वात्तस्येप न धर्मोऽयं घटादिवत् ॥६४५॥ रक्शक्तिसवपत् सोऽपि चेतनो यदि कल्प्यते । पन्नासकीर्णतद्वित्तो तत्साहर्याव्यवस्थितः ॥६४६॥ २० . 1 --राकार-मा०, २०, ५०, १० । २ पातम्ज-ता० । ३ -रमतवालि-REO, २०, ५०, एवार्थ-आ०, य०, ५०, ०। ५ दग्दर्शनराधारपि । । इवात । ७ अविभागनदेव । ८ -वस्तुन्द स.। ९ -रनिवार्यस्व-प०, स.। १० अनिवार्थ यस्तुवमिति । " अविभागस्यपि। -यमेवार्थ: भा०, R., ५०, सा। 11-ति विवेनापि सः । ११ नमागेनापि । १५ रगेकलस्पार्थ-41., ५०, प., स. १६ एरेबाई मा०, ५०, १०, त...-तः पाटल व मा., ०,१०, स.। -पसितारम-आ०,५०,५०,०11९ रति तच्छध्य-आ.,प... । यदेतच्छश्य-स.। २.रक भाग, सशनभागार । १२ शानभागोऽपि । २१-मा-मा०, २०,०, स.।
न्यायविनिश्चयविवरणे [१३२५ अन्यया यदि 'सङ्कीर्ण(ण) छत्त्यात्मानमन्यया । असङ्कीर्णतया वेति विरोधानवकाशनात् ॥६४७॥ तन्न तत्सकरेऽप्येवमिवार्थल्योपकल्पने । प्राच्यप्रसङ्गतो यस्मादव्यवस्थामतिभ्रमः ॥६४८॥ कथं वा ज्ञानभागस्य स्वत एव चिद्रूपासङ्कीर्णतया परिक्षानं अचेतनत्वात् फलशा- दिवत् ? चेतनसङ्कीर्णतया चेतन एवामित्यपि न शोभनम् , वदसङ्करपरिज्ञानसमय एव तत्सङ्करस्याव्यवस्थितेविरोधात् । नास्ति विरोधा, यस्माद् अन्यैव सा कशक्तिर्यदपेक्षग. साङ्कर्यपरिज्ञानं तद्भागस्य, साप्यन्येय तच्छत्तिसकरापेक्षं तस्य चेतनायमानत्वमिति चेत् , न, "प्राच्यस्येव तत्सहकरस्यापि अविद्याविषयतयाँ इवार्थत्ये तत्रापि 'कुतश्चायमिवार्थः १० प्रतिपत्तव्यः' इत्यादिप्रसङ्गस्यानुबन्धादव्यवस्थया बुद्धिविभ्रमापत्तेः। प्रतिपित्सानिवृत्या तद्विभ्रमनिवृत्तिरवस्थितिभावात् , यावन्तः खल्वियार्थतया तच्छक्तिसड्कराः प्रतिपित्सिता निष्पन्ने तावतां तत्परिज्ञाने भवत्येव व्यवस्था, तद्परेपाम् इवार्थतया प्रतिपित्तावैकल्यादिति चेत् , कथमिदानीमप्रनिपन्नास्ते सूत्रभाष्याभ्या तदर्थत्वेनाभिधियेरन् , प्रतिपन्नवस्तुविषयत्वात् प्रेक्षावता यचनप्रवृत्तेः १ तस्मादवश्यम्भाविनी साकल्येन तत्प्रतिपत्तिरिति कथमनवस्था- १५ व्यावृत्तियतो मतिविभ्रमो न भयेन् । नापि तच्छक्केरपरापरत्वम् यतः कयाचित्तस्य सड्करः कयाचिच्च विपर्ययः परिकल्प्यते, परस्यैवमनभ्युपगमात् । तन्न तत एव तस्य तच्छक्ति- सडकरविक्लस्य प्रतिपत्तिः, यत इवार्थस्य तत एवाधिगमः स्यात् । नापि परतः, तस्याप्यचेतनत्वे घटादियदेव प्रतिपत्तिधर्मत्वानुपपत्तेः । 'टक्ाकिसाइक. र्याच्चेतन एवं परः' इत्यपि न युक्तम् , तत्रापि तत्साङ्कर्यस्य इवार्थत्वेन स्वतः प्रतिपत्तेरक्त- २० न्यायेनासम्भवात् , परत. प्रविपत्तो अनवस्थापत्तेः । दूरमनुसृत्यापि कस्यचिदन-याधीनमेव चिद्रूपत्वमभ्युपगन्तव्यम् । अन्यथा ततः कस्यचिदिवार्थापरिवानात् । इत्युपपन्नमर्थज्ञानस्य वस्तुभूतचेतनत्यनिवेदनाथ प्रसग्रहणम् , अनेतनत्ये कल्पितचेतेनत्ये च प्रत्यक्षत्वानुपपत्तः । भवतु प्रत्यक्षस्तत्परिच्छेद इत्यत्राह-'यदि इत्यादि । यद्ययमभ्युपगम्यते तदा अकिन्नित्करण न किञ्चित्करोतीत्यकिञ्चित्कर. पुरुषः, तत्यवास्तत्वाभ्युपगमात् , सेन २५ किम् ? न किञ्चित्फरम् । निष्फल एवासौ "कल्पित इत्यर्थः । सफल एवासी तत्परिच्छेदस्या. धिष्ठानात् , सं हि चेतनाधिष्ठित एव प्रवृत्तिमान् , चेतनश्च नापरः पुरुषादिति चेत् , अचेतनत्वस्यासिद्धत्वात्, तत्र स्वत एव चेतनत्वस्योपपादितत्वात् । एतेन भौगस्तत्फलमिति . न, 1 , सकीणं यच्छत्यात्मानमन्यया भा०, ५०, ५०, स. । २-रेवमिवा-आ०, २०, ५०, स.। ३ कथञ्चाज्ञान-प्रा०, य० प०, स.। ४ प्राच्यस्यैव भा०, २०, ५०, म.। ५ -तयैवार्ध-आ०, २०, १०स०।६ स्वन एवं भा०, ब०, ५०, स.10-न्यादौनमेव मा०, २०, ५०, स०। ८-तमचे-मा..., प०, स०। ९-तमवे-आ०,१०,५०, स.11. कलने इ-आ०,401 कप्यते इ-१० परिच्छेदः । १२ परिच्छेदे।
। श२५] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताचा २३३ प्रत्युक्तम् ; सस्यापि विषयदर्शनस्य तते एव भावात् । चेतनस्यापि तदुपराधिष्ठानादेव भोक्तृत्वकल्पनायामव्यवस्थितेः पुरुषेऽपि प्रसङ्गात् । अपि च, यद्ययं भोग: पुरुपादनन्य एव तद्वदेव नित्य इति व्यर्थ एव भोग्यसन्निधिः अकिञ्चित्करत्वात् । भोगार्थो हि तत्सनिधिः, भोगनित्यत्वे च किं नेन ? तत्सनिधिनित्यत्या. देव तन्नित्यत्वमिति चेत् ; न ; अनिमोक्षप्रसङ्गात् । आत्यन्तिको हिं परभोगोपरमो भोक्तु. ५ निर्मोक्षः, तस्य च भोग्यसन्निधिनित्यत्वे दुरुपपादत्वादपरिच्युतिरेव संसारस्येति कथगुपजात. तनिर्वेदस्यापि"तापत्रयनिवृत्तये तन्निवर्तनहेतौ जिज्ञासा तपश्चरण वा सम्भाव्येत ? तदुक्तमन्यत्र- "दृश्यदर्शकयोमुक्तिनित्यच्यापकयोः कथम् । यतस्तापाद्विमुच्येत तदर्थश्च तपश्चरेत् ? ।।" [ सिद्धिवि० परि०८] इति । तन्न तत्सन्निधेर्नित्यत्वम् । "तदनित्यतयैव तर्हि भोगोपरमादपवर्ग इति चेत् ; न; १. तदुपरमे तदात्मनः पुरुपस्याप्युपरमात् "पुरुषोच्छेदकैवल्यवादोपनिपातात् । तन्न भोगस्य पुरुपादनन्यत्वम् । अन्यत्वमेवास्तु तस्य तत्प्रतिबिम्मरूपत्यात्, पुरुपप्रतिविम्यं हि बुद्धिविवर्तगत त. निसरूपं भोगः । न च प्रतिबिम्बतद्वतोरभेदः, चन्द्रतोयतत्मतिबिम्पयोर्भेदस्यैव प्रतिपत्तेरिति चेत् ; उच्यते-तत्प्रतिबिम्बं यदि न "ततः; तदयस्थं तद्वैकल्यम् । तत एवेति चेत् ; तस्य यदि १५ नित्यं तत्करणसामध्यं नित्य एव भोग इति कथमपवर्ग: ? भोग्यसनिधावेव तत्साममिति चेत् ; न: प्रागसमर्थस्य "तदापि तदयोगात् , नित्यतया स्वरूपप्रच्युतेरसम्भवात् । प्राच्यास. मर्थरूपपरित्यागेन तदा तत्समर्थरूपोपादाने तु परिणाम्येव परमार्थतः पुरुष इत्ययुसमुक्तम्- "चितिशक्तिरपरिणामिनी' [ योगमा०१।२ ] इति । सत्यपि पूर्व सामर्थ्य तत्सन्निधावेव "तस्य "तत्कर्तृत्वं सामग्रीतः कार्यभावात् नान्यदेति २० चेत्,तदापि तस्य यद्यमुपचरितमेव तत्कारित्वं कथमुक्तम्- "गुणकर्तृत्वेऽपि तथा कतैव भवत्युदासीनः।" [ सांख्यका० २० ] इति ? उपचरितमेवेनि चेत् , वस्तुतस्तर्हि निष्फल एव पुरुष इति कथं भोगात्तदनुमानम् तस्याऽतत्फलत्यात् ? ततो निपिद्धमेवतत् (मेतत्) "पुरुषोऽस्ति भोक्तभावात्" [सांख्यका १७] . विषयदर्शनामस्य भोगस्य । २ परिच्छेादेव । ३ चैतनस्यापि परिच्छेदस्य । ४ तदा- पराधि-आ०, २०, ५०) ५ भोग्यसनिधिना। ६ भोगनित्यत्वम् । ७ हि भोगो-आ०, १०, १०, स० । . "बुद्धेरेव पुरुषार्यापरिसमाप्तिर्वन्धः, तदर्थावसायो मोक्ष."-योगमा० २१८ । "तदर्थावसाय. विवेक- स्यात्या पुरुषार्थसमाप्ति."-योगवा० २।१८।९ भोग्यनित्य-मा०, २०, ५०, स०। १० "टु खरयाभिषा- ताजिज्ञासा तदपपातके हेती"-सांयका० ।। 11 भोगसनिध्यनित्यस्वेऽपि । १२ पुरुषच्छेद-आफ, ब०, ५०, स०।१३ -दतश्च-आ०, ५०,०स०। १४ पुरुषात् 1 १५ भोग्यसनिधिकालेऽपि । १६ भोग्यसनिधावेव। १७ पुरुषस्य। मनिविम्य । ११मोग्यसनिधिसलेऽपि । , [ G १० २३४ न्यायविनिश्चयविवरणे [१२२५ इति सप्ततिकारस्य, "अयमेव च तस्य भोगो यत्तत्र छायासक्रमणसामर्थ्यम्" ] इति च तन्निवन्धनकारस्य । अपि च, तेन भोगेन भोग्यं भुञ्जानः पुमान्न तायदभुत्तेनेर भोक्तुमईति, मुक्तात्म. नोऽपि तत्त्वप्रसङ्गात् । तस्य स भोग एव न भवति तेन तस्याननुभवादिति चेत् , इतरस्यापि ५ न स्यात् तेनापि तदननुभवस्याविशेषात् । भुत्तेनैव मुक्ते इति चेत् , कुतस्तद्भुतिः ? स्वत इति चेत् , व्यथं तदोगकल्पनम् , भोगस्यापि स्वत एव तत्प्रसङ्गात् । भोगान्तरेण तत्प्रतिच्छा- यालक्षणेनेति चेत् ; न,तनापि तदन्तरकल्पनायामनवस्थानात् । नन्न भोगेन पुरुपस्य साफ्ल्यम् । नापि कैवल्यार्थेनोपक्रमेण, भोगाभावे तस्यैव वैफ्ल्यात् । भोगोपरम एव हि "केव- त्यम्, भोगस्य च रयत एवाभावात् किं तदुपरमार्थनोपरमेण ? भोगाभावे स्वतः सिद्धे किंशुके पाटरत्ववत् । पस्तदर्थं प्रवर्तेत यदि नोन्मादवान् जनः ॥६४९।। सत्यं न तस्य भोगस्तनिवृत्त्यै नापि वर्तनम् । सदा शान्तस्वभावत्वात् दृशिमारस्य तत्त्वतः ।।६५०१॥ केवलं धुद्धिसत्त्वस्थो भोगादिरुपचर्यते । तत्र स्वामिनि राश्येव सेनाव्यूहगतो जयः ॥६५१॥ इति चेदुपचारस्य निष्फलस्येव कल्पने । रातोऽन्यत्रापि तस्कृप्तिरनवस्थानमानयेत् ॥६५२॥ प्रमाणाविपये तस्मिन्नुपचारः कथञ्च या । प्रतीत एव यल्रोके दृश्यते तत्प्रवर्तनम् ।।६५३॥ न पुमान् तादृशः कापि प्रत्यक्षेणावलोक्यते । यादर्श कापिलाः प्राहुः प्रशान्तब्रह्मवादिनः ॥६५४।। भोगादेलिङ्गतः पूर्व तस्य नानं निवारितम् । प्रत्यक्षाद्यपरिज्ञात कथमाप्तोऽपि तं वदेत् ॥ ॥६५५॥ आप्तत्वस्यैव तज्ज्ञानरहिते सम्भवात्ययात् । आप्तान्तरोपदेशेन तज्ज्ञाने चानास्थितेः ॥६५६॥ नापि दृष्टानुमानाप्तवचनेभ्यः प्रमान्तरम् । यतस्तत्प्रतिपत्तिः स्यादित्यसन्नेव ते पुमान् ॥६५७॥ २० २५ . १ सावद्भुक्ते-मा०, ५०, ५०, स० । २ तत्प्रस-आ०, ब०, ५०, स.। भोक्तृत्वप्रपन्नात् । ३ मुकास्य । ४ तदनुभ-आ०, ब०, ५०, स० । ५ "पुरुषस्य उपचरितमोगाभाव शुद्धि , एतस्याम वस्था वैवल्यं भवति ।"-योगमा ३३५५ । ६ न सत्यमो-आ०, ५०, प. स. ७ कथन वा भाक, 40, ५०,०1८ उपचारप्रति । ९ अतो नानुमानात्तदनि । १० -ते आ०, ०,५०, स."
प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्ताव: १२२५] २३५ तन्न भाक्तोऽपि भोगादिस्तत्रेति मुविवर्चयन् । इदमाह वचो देवो 'यद्यकिश्चित्करण किम् ॥६५८।। सेनाव्यूहजयस्योपपन्न एघ राजन्युपचारस्तस्य प्रमाणतः प्रतीतेः । प्रतीतिविपयतया चोपचारस्य लोके प्रवृत्तिदर्शनात् । न चैवं पुरुषे भोगस्य कुतश्चित्तस्येयानधिगमात् । न हि प्रत्यक्षेण बुद्धिसत्वव्यतिरिक्तस्य चिद्रूपस्याधिगतिः; तस्यै स्वयमचेतनत्वात् । सांसर्गिकाच ५ चैतन्याव्यतिरिच्य प्रणानुपपत्तेः । नाप्यनुमानात् ; भोगादेशिस्य निपिद्धत्वात् , लिङ्गा. न्तरस्य च यथास्थानं निराफरणात् । नाप्यागमात् ; तस्याप्तवचनावाद , आप्तश्चापरिज्ञाते तस्मिन् कस्याश्चिदसम्भवात् । आप्तान्तरोपदेशात्तत्परिज्ञाने चानवस्थानदोपात् । न चापरं प्रमाणम् , यत्तस्तत्प्रतिपत्तिः "त्रिविधं प्रमाणमिष्टम्" [ सांख्यका० ४] इति वचनात् । ततो निःशेषप्रमाणव्या रपथपरिवर्तित्वेन व्योमारविन्दमकरन्दसौरभसन्निभ एव पुरुष इति कथं १० तस्योपचारादपि भोगवत्त्वं यतो निष्फलं तत्परिकल्पनं न भवेत् ? इति सर्वमेतच्चेतसि कुर्वतो देवस्येदं वचनमाविर्भूतम्-'अकिञ्चित्करेण किम्' इति । विकल्पान्तरमुपक्षिपति-'अर्थ' इत्यादि । 'अर्थ' इति वितकें । परिच्छेदोऽर्थनिर्णयो नीयं न प्रत्यक्षः, किन्त्वचेतन एवासाविति यदि अयं परस्याभिप्रायः । तत्रोत्तरम् , अकि- ञ्चित्करण तत्परिच्छेदेन किम् ? न किञ्चित् । असिद्धं तस्य अकिञ्चित्करत्वं मोगापव- १५ र्थित्वात्, "भोगापवर्गार्थ दृश्यम्" [ योगसू० २।१८ ] इति वचनात् । भोगार्थत्यं तु भोग्यप्रतिविम्यावहत्वात । विषयो हि तंत्र प्रतिविम्बित एव पुरुपस्य भोग्यो भवति, "बुद्ध्यध्य- वसितमर्थ पुरुपश्चेतयते" [ ] इति वचनात् । अपवर्गार्थत्वञ्च रजस्तमोभ्यामन- भिभूतस्य सत्त्वभूयिष्ठतया नितान्तनिर्मलस्य स्वरूपतच्छायागतपुरुषविवेकप्रतिपत्तिकरत्वात् । सति तद्विवेकपरिज्ञाने तत्रापि निविण्णस्य चेतनस्य वैराग्यवलेन 'तत्प्रतिरोधेन स्वरूपप्रतिष्ठान- २. स्यापवर्गस्योपपत्तेरिति चेत् ; उच्यते-तत्परिच्छेदः पुरुपस्यात्मनमनुपदर्शयन् कथं भोग्यमुप- दर्शयेत् "दर्पणादायेवमदर्शनात् ? उपदर्शितात्मन एव दर्पणादेस्तं प्रति "मुखाद्यपदर्शकत्वप्रसिद्धः । आत्मानमुपदर्शयन्नपि यदि तदन्तरप्रतिविम्बितमुपदर्शयति तदा तदन्तरमप्यपरतदन्तरप्रतिवि- म्बितमेवोपदर्शयति, तत्राप्येवमित्यपरापरतत्परिच्छेदकल्पनायामनवस्थानान्न 'प्रकृतभोग्योपदर्शनं सम्भवतीति कथं तस्य भोगार्थत्वं "यदकिञ्चित्करत्वं न भवेत् ? अतदन्तरप्रतिबिम्बितस्य २५ तस्योपदर्शने सुतरामकिञ्चित्करत्वं विपयस्यैव तथा तदुपदर्शनोपपत्तेः । । 2-वेचयेत् भा०, ब०, प०, स०। २-स्य श्लोके आ०, २०, ५० स०। ३ उपचारः इति शेषः । ४ प्रत्यक्षस्य । ५ नाप्युपगमा-RI०, २०, ५०, स. । ६ कश्चिदस-मा०, २०, ५०, स० । -क्षिपतैय-आ०, घ०, प०, स.। ८ नार्य प्र-मा०, ५०, प०, स०। ९ बुद्धौ । तत्प्रति-भा०, ५०, ५०, स० । १० तत्प्रतिविरी-आ०, ब०, ५०,801 ११-दर्पणादावेव दर्श-आ०, य०, ५०, स। १२ मुख्यायु-भा०, १०, प०, स० । १३ प्राक्तनमो-आ०, २०, ५०, स.। १५ यदि कि-भा०, प., प० स०॥ - २३६ न्यायचिनिधयविवरणे [ १२५ अमर- अकरणा न विषयप्रतिपत्तिः नियात्वात छिदिनियादिवत् । परणच मुरयं तत्परि- च्छेद एव व्यासायस्वभावत्वात, व्यवसायोपलवस्यैव विषयस्य उपल यत्योपपत्तेः, नेन्द्रियादिक विपर्ययात् । नापि तत्प्रतिपत्तौ करणान्तरपल्पनायामनपस्थान रयत एप करणवार , णस्य हि तदन्यतः प्रतिपत्तिः । करणस्य तु वद्रूपतया परत्र ज्ञानमुपनयतो नितरामात्मनि ५ सदुपनयन प्रदीपवत । प्रदीपस्य हि प्रकाशरूपतया प्रसिद्धमेरपरवात्मन्यपि परिक्षानोपनयनम्। तन्न तनिरपेक्षम्य विपयस्येव स्वरूपोपटर्शन मिति कथं तस्याकिञ्चित्वरत्वमिति चेत् । इदमध्य किञ्चित्करमेय वचनम् । तथाहि-यदि विपयोपरम्भस्वभावः पुरुषः किं तत्परिच्छेदेन ? पुरुपयत्तदुपलम्भस्यापि नित्यतया तनिरपेक्षत्यात् , निष्फ्रल्पनायामनवस्थानात् । तस्यातत्स्व. भारत्वेऽपि नितरा तस्य निष्फलत्वम् अन्य प्रति प्रदीपयत् । तत्सन्निधौ तस्य तदुपलम्भनमिति १० चैत् , न, स्वयमशक्तस्य तदयोगात् व्योमकुसुमवन् । स्वयमपि शकौ सैव तत्र साचात् करणम्, तत्र सत्यामसत्यपि प्रदीपादौ नवञ्चरेषु सान्धकाररूपदर्शनस्य प्राणिमात्रे अन्धकार दर्शनस्य च भायादिति किं तकल्पनेन ? तेंदुपधानेन व्यवसायस्वभावत्न तटुपलम्भस्येवि चेत्, न, स्वत एव वस्यापि भावात् । तत्परिच्छेदस्यापि तदुपस्त(२)म्भादेव तत्स्वभावत्व न स्वतोऽचेतनत्वात् । तन्न तस्य भोगार्थत्वम् । अत एवं नापवर्गार्थत्वम् , अपवर्गस्य भोगनिवृत्तिरूपतया भोगाभावेऽनुपपत्तेः । विवेकप्रतिपत्त्यगतया च तस्यापवर्गार्थत्वम् । न च तस्य तदङ्गत्वमिति निवेदितमिवार्थविचारे । तेतः सूक्तम् 'अकिश्चित्कोण किम्' इति । अपि च, नीलादिसुसादिविपयोपस्थापनेन हि तस्य भोगार्थत्वम्, तदुपस्थानच त प्रतिविम्यात् । तदपि कुतस्तस्यावगन्तव्यम् । तत एव"तत्सरिच्छेदात् , स एव हि 'मयीद प्रतिबिम्बमस्मादर्थादुपजातम्' इति प्रत्येतीति चेत् , न, तस्य अचेतनत्वेन तदयोगात् । चिच्छायासड्कमाच्चेतन एव स इति चेत्, न, तत्सडकमस्य पुरुपादनन्यत्वे वक्ष्यमाणो- नरत्वात् । अन्यत्वे तु न तस्य स्वतश्चेतनत्व "तस्य पुरुषधर्मत्वेन अन्यत्रायोगात् "चैतन्यं पुरुषस्य खरूपम्" [ योगभा० ११९ ] इति वचनात् । पिच्छायान्तरसइव मकल्पना यामनवस्थानात् । भवनपि कथचिच्चेतनो यदि पृथगेवार्थ पश्यति किं प्रतिनिम्ब- कल्पनेन ? पुरुपस्यापि तथा तदर्शनोपपत्ते । यदि न पश्यति, कथ तत्कार्यतया प्रति- निम्न प्रतीयात् । अप्रतिपन्ने कारणे तस्कार्यवस्याशक्यप्रतिपत्तिक्त्वात् । इन्द्रियस्याप्रतिपत्तावपि तत्कार्यतया रूपदिज्ञान कथं प्रतीयत इति चेत् ? न, स्वतस्तदनभ्युपगमात् । न हि तदेवे- न्द्रियज्ञानमात्मन इन्द्रियकार्यत्व प्रत्येति, तद्व्यतिरेकादेव लिगात्तत्प्रतिपत्ते । वक्ष्यति चैतत्- "अक्षादेरप्यदृश्यस्य तत्कार्यव्यतिरेकतः" [न्यायवि० श्लोक १७९ ] इति । २० - १ अर्धपरिच्छेदेन । २ विषयोफ्लम्मस्वभावाभावे । ३ विषयपरिच्छेदस्य । ४ शक्ती सत्याम् । ५ तदुपाधानेन ता० । ६ पुषस्य } + एवावर्गा-आ०, २०, ५०। ८ -ति वेदि-भा०, ब०, ५० ९भत भा०, ५०, प० । १. विषयपरि-छेदात् ।। चेतनवस्य । ११ -तदभ्युपगमान्-भा०, १०, प।
५ १ । . २२५] प्रथमःप्रत्यक्षमस्तावः २३७ अत्राप्येवमिति चेत् , आस्तांतावत् । तन्न तत एव तत्कार्यत्वावगमः । प्रत्यक्षादन्यत इति चेत्, न, तस्याप्याविषयत्वे नतोऽपि तदसम्भवात् । अर्थविषयत्वस्य यदि प्रतिबिम्बमन्तरेण; प्रथमप्रत्योऽपि व्यथं तकल्पनम् । प्रतिनिम्बेनेति चेत्, तदर्थकार्यत्वस्यापि न स्वतोऽवगमः पूर्ववत । अन्यतः प्रत्यक्षादिति चेत्, न, 'तस्याप्यर्थाविपयत्ये' इत्यायनुषन्धादव्यवस्थितेः । एतदेवाह- प्रत्यक्ष करणस्यार्थप्रतिविम्यमसंविदः ॥२५॥ इति । करणस्य बुद्धिविवर्तस्य स्सस्य परस्य वा प्रत्यक्षं स्फुटसंवेद्यम् अर्थपतिविम्यम् अर्थकार्य प्रतिबिम्नम् 'अयुक्तम्' इत्युपरिभागस्येन सम्बन्धः । पुतः इत्याद द-असंविदा अचेतनत्वात् । न हाचेतनेन कस्यचित्प्रत्यक्षत्यमुपपन्नम्, चेतनक्ल्पनावैपल्यापत्तेः । चेतनत्येना- प्युक्तन्यायेनारांविदोऽसम्प्रतिपत्तेः । तन्न प्रत्यक्षात्तत्परिज्ञानम् । १० नाप्यनुमानात् । प्रत्यक्षाभाने तदप्रवृत्तेलियाभावाच । विपयनियमो लिड्गमिति चेन: न, तस्य 'एतेन' इत्यादिना निराकरणात् । कार्यव्यतिरेकस्तर्हि लिङ्गम्, कार्यस्य प्रतिनिम्न- लक्षणस्य सत्यपि कारणान्तरसाकल्ये कदाचिदनुत्पद्यमानत्वादिदमवगम्यते-अस्ति कारणान्त- रमप्यस्य यदभावादिदानीमनुत्पत्तिरिति, स चार्थो व्यपदिश्यत इति चेत् ; न; ज्यातिरेकस्या- सिद्धः, सति पूर्वज्ञानादो तस्यावश्यम्भावात् । भवतु प्रतिबिम्पसादृश्ये तस्मादेव तस्योत्पत्तिः, १५ तद्वैसादृश्ये तु कथम् ? अतोऽर्थादेव तादृशात्तदुपजननमिति चेत्, तादृशत्वेऽप्यर्थस्य क्थं तदुपजनकत्वम् १ शक्तरिति चेत्, सा किमन्यत्र तत्कारणे नास्ति ? तथा चेत् ; कथमे रुमघा- नात्मकत्वं जगतः ? शक्त्यभेद एव तदुपपत्ते, शकेरेव प्रधानार्थत्वात् । शकीनां यदि मिलं हास्यात् प्रतिकारणम् (2) भेदान्तरवदेवासामपि कार्यत्वमापतेत् ॥६५९॥ तद्धेतुप्पपि शतीनामे भेदप्रकल्पने । शतिभेप्रमन्धस्यानादितायां कथं भवोत् ॥६६॥ एकशक्तिनिवद्धत्वं जगद्रेदस्य कल्पितम् ।। यतः प्रधान सत्ते सन्धसज्जीवनं भरत ।। ६६२॥ तकशचिसद्भावे प्रतिविम्वविधायिनाम् । असत्यपि पचित्ताय व्यतिरिल्येत तत्कथम् ॥६६२॥ तन मार्यन्यतिरेकस्यापि रिङ्गत्वमिति नानुमानादपि तत्परिक्षानम् । भवतु पुरुपादेव तत्परिज्ञानं तस्य साक्षादेवोपर विरूपत्वादिति चेन , न ; वेगापि पृथगर्थतत्प्रविनिम्त्रयोरपरिक्षाने तयोतुफ्लमारस्य दुरवयोधत्वान् । तत्सरिमानन्य यदि सत्पति- । प्रतिविम्वा पनम् । २ न्यायवि० शे. १८।३ पश्शिनादेव । ५ मिन हि स्या-प.। ५ कारणामे-मा., ...। प्रगद तर भा०, २०,१०॥ २० २३८ न्यायविनिश्चयविवरणे [२२६ बिम्बवतो विज्ञानात् । तस्यापि कुतस्तत्कार्यत्वमवगन्तव्यं तत्कात्तितस्तदवगतरयोगात् । पुरु- पादेवेति चेत् ; न ; तत्रापि 'तेनापि' इत्यादेः प्रसङ्गादनवस्थोपनिपाताच । स्वत एंव तैयो- स्तेने परिज्ञाने व्यर्थं सार्थप्रतिविम्नस्यापि ज्ञानस्य कल्पनम् विनापि स्वत एव पुरुपस्यार्था- वगमनसद्भावात् । भवत्ये (त्वे)वमिति चेत् ; तर्हि न कैवल्यम् , सर्वदाऽर्थस्य भावेन तदर्शन- ५ स्यानिवृत्तः । अभावे वा पुरुषविकलमेव कैवल्यं भवेत् , तदा दृश्याभावेन "तद्दर्शनस्य कैवल्ये "तदेवरूपस्य पुरुपस्यासम्भवात् । आत्मदर्शनरूपस्तदा पुरुप इति चेत् । न ; तदर्शनस्यापि 'दृश्यदर्शनादभेदात् , अन्यथा निरंशत्वव्यापत्तेः । भवतु तर्हि "तदा तस्य "स्वपरविपयत्वविशेषणरहिता इशिरेव रूपम्, "द्रष्टा दृशि- मात्रा" [योगसू० २०२०] इति वचनादिति चेत् ; कथमिदानों प्रागतद्रूपत्वे तदापि तद्रूपत्वं १० कोटस्थ्यव्यापत्तेः ? प्रागपि तद्रूप एव स इति चेत् ; क्यं दृश्यदर्शित्वम् ? इत्ययत्नसिद्धमेव कैवल्यं भवेत् । सत्यम्, न तदापि तस्य तद्दर्शित्वम्, दृश्यसन्निधानादेव केवलं "तव्यपदेशात् , संसारस्य च परमार्थतोऽसम्भवादिति चेत् ; कुतः सन्निधिज्ञानम् ? न वावद् दृश्यात् । अचेतन- त्वात् , विच्छायासक्रमाच्च चेतनत्वस्य प्रतिपिद्धत्वात् । नापि पुरुपात् ; तस्स वस्तुतो निविपयत्वात् । सन्निधेरपि “तदन्तरवशादर्शनकपनायाम् अनवस्थानान् । ततो दुभापितमेवेदं विन्ध्यवासिनः-"तस्माचित्तवृत्तिबोधे"पुरुपस्यानादिः सम्बन्धो हेतुः" [योगमा० ११४] इति; तस्यैव सम्बन्धस्यापरिज्ञानान् । न पापरिज्ञातविपया प्रेक्षावतां ववनप्रवृत्तिः । सत्यपि सन्निधाने न पायता तस्यै' तद्दर्शित्यम् , तद्ब्रहणपरिणामे सत्येव तदुपपत्तेः । अन्यथाप्रवृत्तस्यापि तद्दर्शित्यप्रसद्गात् , सर्वगतत्वेन सर्वदा "तत्सन्निधानभायात् । तपरिणामच न तस्याविकारिणः सम्भवतीति न पुरुपस्यापि वस्तु तदुपरक्तं चा चित्तं संवेद्यं सम्भवतीति । तदेवाह- अप्रत्यक्षं स्वसंवेद्यमयुक्तमविकारिणः । इति । पुरुषस्य हि दृश्यमप्रत्यक्षमेव प्रत्यक्षेण तत्प्रतिविम्मवत् , अतः (अन्तः) करणलक्षणे- नापरिज्ञातेन "सत्प्रतिपत्तेरयोगात्, "तदपरिज्ञानस्य च निवेदितत्वात् । भवतु स्वतस्तस्य तत्संवेयं न प्रत्यक्ष इति चेत् ; 'स्वसंवेद्यम्' इत्यप्ययुक्तम् त(कस्य ? अविकारिणः स्वतस्तद्वेदनाभावम्याभिहितत्वात् । ततो यदि "चित्तस्य दृश्यतम् स्यसंविदितमेव तदभ्युपगन्तव्यं .. . २० , अर्थकार्यत्वम् । २ विशनात् । ३ एवानयो-मा०, २०, ५०।४ अर्धतरपतिविम्बयोः । ५ पुरुऐण । ५ ज्ञानरूपना विनापि । ७ अर्थदर्शन । अस्यामा । ९ -भावे सदर्थदर्श-भा०, ५०, प०।१०६. दर्शनस्य ।। स्यदर्शनात्मकस्य । १२ -स्यासनावात् मा०, २०, प० । १५ दृश्यदर्शनाभे-भा०प०, ५० । १४ वयकाले । १५ सपाविषयत्वमिति विशे-प. 1-यसमितिशे-भा०, १० । १६ शिमाघसरूपम् । "मदर्शिवव्यपदेशात् । १८ दश्यसमिधानान्तर। १९-चित्रवृत्तियोधे-मा...,401 २.-नादिसम्बद्धी हे-मा०, २०, ५०1"-नादिसम्बन्धी"-योगमा । पुरुषम्य । तस्य दशि-भा०, २०, ५०।२२ स्य. दशिवम् । २३ -यापि दशि-भाः, य.,.! २५ सपमानिधान । २५ -परिशनेन भा., ०,१०। २६ श्यप्रतिपत्तेरयोगात् । २७ तदशानस्य भा०,५०,प.१२८ चेत् संवे-भा०, २०, ५० । २९ चेत्तस्य प० । चेनम्य भा., ०१.वमस-भा.,.,.।
२६) प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव: -- रागः, पुरुषवशेन तदनुपपत्तेः । कथं पुनश्चित्तस्य दृश्यत्वे स्वसंविदितत्वम् ? कथं च न स्यात् ? अन्यत्र चक्षुरादौ शब्दादी या 'दृश्ये तददर्शनादिति चेत् ; मा भूदन्यत्र तद्दर्शनं चित्ते तु विश्व एव । विद्यमानमपि तद्धान्तमेव, पुरुषसन्निधिलेन भावादिति चेत् ; न; तदपरिज्ञाने तद्वचनानुपपत्तेः । तत्परिज्ञानमपि यदि पुरुषात् 'ममेदं सन्निहितम्' इति, यदि वा चित्तास् 'ममायं सन्निहितः' इति; तदा तस्यावश्यम्भावि स्वपरविपयत्वमित्यफलमुभयपरिकल्पनं ५ चित्तत एव सकलसमीहितपरिनिष्पत्तः । स्वसंवेदने कथं तस्यार्थवेदनम् ? निर्णयरूपं हि वेदनम्, नोकनिर्णयसमय एघ निर्णयान्तरम् ; युगपत्तवप्रतिवेदनात् । तथा च सूत्रम्-"एकसमये चोभयानवधारणम् ।" [ योगसू० ४।२० ] इति । प्रसिद्धचार्थवेदनमेव चित्तस्येति न तस्य स्वतो रश्यत्वम् । नापि वित्तान्तरात् ; अनवस्थानात् तस्यापि तदन्तरदृश्यत्वात् । अश्यत्व- मेवेत्यपि न युक्तम् । तत्प्रचारसंवेदनेन सत्त्वानां प्रवृत्तिदर्शनात्-'युद्धोऽहम्, भीतोऽहम् , अमुत्र १० मे अमुन्न मे क्रोधः' इति । ततोऽन्यदेव तत्र दर्शनमभ्युपगन्तव्यम् । न चैवं चित्तव. तत्र दोपः, तस्य स्वतः परतश्चादृश्यत्वात् । विपयोपलम्भमात्रस्यैव तंदूपतयोपगमादिति चेत् ; न; दत्तोत्तरत्यात् । अपि च, दर्शनायत्तं तस्य रश्यत्वमिति कुत इदमवगन्तव्यम् ? "अनन्तरान्यायादिति चेत् ; न ; तेनापि" दर्शनदृश्ययोर्व्यवसाये ततोऽपि तदयोगात् । तद्वयवसाययो’ भेदे कथं १५ योगपद्येन भावो "श्यादन्यदेव दर्शनमिति "एक समये च" इत्यादिसूनविरोधात् । एफ एव तदुभयव्यवसायी न्याय इति चेत् ; पित्तमप्येकमेव स्वपरव्यवसायि किन्न स्यात् ? यतस्तस्मा. दन्यदेव दर्शनं न भवेस्। अवश्यं "चेदमभ्युपगन्तव्यम् , अन्यथा बनादिव्यवहारोऽपि न भवेत् व्यवसायबहुत्वे तद्नुपपत्तेः । न तत्र व्यवसायबहुत्वम् , एकस्यैव धवसदिरादिविषयस्य मेवफ्स्य व्यवसायस्याभ्यनुज्ञानादिति चेत् ; न ; स्वपरयोरपि तस्यैकस्य प्रसङ्गात् । एकव्यवसा. २० यविषयत्वे कथं "तयोर्भेद इति चेत् ? न ; धवसदिरादायपि समानत्वात् । तत्रापि प्रति- विषयं भिन्ना एव व्यवसाया इति चेत् ; फुतस्तेपामवगमः ? अनवगवानामभ्युपगमविरोधात् । फुतश्चिम्यवसायादिति चेत् ; न; "तत्रापि प्रतिव्यवसायं "त दे 'फुतः' इत्यादिप्रभादनिष्ठापत्तेः"। न प्रतिविषयं तद्भेदः "तस्मादेकमनेकार्थमयस्थितं च चित्तम्" [योगमा० १६३२] इति भाध्यविरोधाय । ततो यथा वहिः फञ्चिद विषयभेदाढावसायभेदेऽपि निशानमेकमेघ २५ . १ दृश्येत तह-मा०, २०, ५० । २ चित्तापरिज्ञाने । ३ चित्तस्य । ४ -समयकम्प-मा०, २०, ५० । चितपुरुषायुभयम् । ५ प्रतिमिर-भा०,५०। प्रतिनिद-१० । धारयमेवे-बा.१०,५. 1 0 प्राचारमानो भा०, प., प.। चित्तप्रचार । "स्वयुद्धिप्रचारप्रतिसंवेदनान् परवाना प्रसिदयते मुरीदं गीतोऽहम् अमुत्र में रागः समुत्र मे सोध इनि"-योगमा० १९८९सनस्य । ९ दर्शनरूपतया। चितम्य ! मन्त. रान्याय-भा, प... अनन्तरोपनानुभवात् । १२ अनन्तरानुमवेनारि । १३ दर्शनस्यव्यवसाययोः। १४ यतः स्यादभिसमेव दर्शनमिति । १५ तभयव्यवधायि शानम् । १६-स्य व्यव-मा०, ५०, ५०1 10 स्व. परयोः । १८ धवसदिरादारपि। १९ कुनस्यव्य-भा., ०, ५०। ३० व्यायायविरगहव्यवगाय है। ११-दनियतवा..
२४० न्यायविनिश्चयविवरणे [१।२६ तथा स्वपरयोरपि इति नार्थस्तदर्शनार्थेन दर्शनकल्पनेनेति | व्याख्यातमनिन्द्रियप्रत्यक्षम् । सोगतः प्राह-भवतु स्वसविदितमेव ज्ञान तस्य तु कथं यहि विपयत्वम् ' न सत्त्व- मानेण, अतिप्रसङ्गात् । सकलविषयसाधारणं हि तत्सत्त्वम् , तेन च तस्य वहिर्विपयत्वे सर्व सर्वविश्यमेव संवेदनमिति कथ प्रतिकर्मव्यवस्था-'नीलस्यैवेद संवेदन न पीतस्य' इति ? स्यान्मतम्-आलेचनाज्ञानेन्द्रियतद्विपयसन्निकादेरेव तळ्यवस्येति, तन, तस्यापि साधा- रणत्वात् । असाधारणस्य हि व्यवस्थापकत्यम् । न चासो तथा नीलाधिगमरत् पीताद्यधिगमेऽपि भावात् , तदधिगमोत्पादकत्वाच । न हि तदुत्पादकत्यैव तव्यवस्थापकत्वम् , एकनियानिमि. तस्य नियान्तरं प्रत्यनङ्गत्वात् । अन्यथा यतः दुतश्चिदखिलक्रियानिप्पोर्न कस्यचिदष्यभिमत- क्रियावैकल्यं भवेत् । अर्थेनैव तहि संसर्गिणा तब्यरथा, संसृष्टस्यैव नीलादेर्वेदनं नापरस्येति १० चेत् , न , तस्याप्यज्ञातस्य व्यवस्थापकत्येऽतिप्रमङ्गात् । न चा ययस्थाया तज्ञानम्। तऽज्ञाना. [त् व्यवस्थाया परस्पराश्रयात् । तस्मात्तदात्मभूतस्यैव यस्यचिद्भेदस्य व्यरस्थापकत्वम् । स पार्थाकार एव , तत एवाधिगमस्यार्थपटनोपपत्तेः । अन्यस्य तु मान्द्यपाटयादेः सतोऽपि तद्भेदस्य साधारणतया तंदनगत्वात् । तथा च वात्तिकं तन्नियन्धनञ्च- "तसाधतोऽस्यात्मभेदादयाधिगतिरित्ययम् । क्रियायाः कर्मनियमः सिद्धा सा तत्प्रसाधना ॥ [प्र० वा० २।३०४ ] १५ यतः स्वरूपभेदादस सवेदनस्य अयपस्य नीलस्यपीतस्य वाधिगतिः इति नियमः साधि- गतिस्तत्साधनों सिद्धा, तन्मात्रभावादेव नियमस्यास्य भानात् । तथा चोक्तम्-"भावा- देवास्य तद्भावे" [प्र०या० ११६] न चेयमर्थघटना सारूप्यादन्यतः संवेदनस्य । यतः- अर्थेन घटयत्येनां न हि मुक्त्वार्थरूपताम् । 'अन्य[:]स्वभागो ज्ञानस्य भेदकोऽपि कथञ्चन ॥ तस्मात्प्रमेयाधिगतेः साधनं मेयरूपता । साधनेऽन्यत्र तत्कर्मसम्बन्धो न प्रसिद्ध्यति ।। [प्र. वा० २।३०५,६ ] तदाकारं हि संवेदनमर्थ व्यवस्थापयति नीलमिदं पीतं चेति । यथा आकारयोगि- संज्ञानस्य तथोत्तरत्र प्रतिपादयिष्यामः । अन्यत्र तु साधने तेन कर्मणा सम्बन्धो न .मालोचनासानादेरपि । २ संसगिणोऽर्थस्य । ३ अर्याकारादेव । अर्थपनानहत्वात् । ५-गनि. नियम मा०, २०, ५०। ६-नासिद्धा t०, २०, ०७ "एनामधिपतिम् अर्थापनाम् अर्थसरूपता मुस्खा मान्य कचिदिन्द्रियादि स्वभेदात् कयाचन केनापि प्रकारेण ज्ञानस्य भेदकोऽप्यन शेयैन घटयति योजयति मौलस्येयमधिगति पीतस्य चेयमित्यादि। तस्मात्प्रमेयाधिगते फलभूनाया व्यवस्थाप्याया साधन प्रमाण मैयरूपता । अनि सारूप्यं तस्य प्रतिविषय मिनस्य सूपलक्षणत्वात् । सारूप्यात पुनरन्यत्र साधने तस्या क्रियाया धर्मसम्बन्धी नीलस्येयमविगति पोतस्स चे यादि न सिध्यति । इन्द्रियाधिगत वेशेषस्य सम्भवेयनुभवमानाम फज्ञानस्य विशेषक्खायोगात् । शागतस्यापरविशेषस्य लक्षगमेहेनानुरक्षणान् ।"-40 या०म० पृ. १३.५- १०६ । ८ अन्यस्य भावो भा०, २०,५०1"अन्य स्वभेदान्”-० वा०म०० १९ सम्बो भा०,००। २० २७ ] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तायः २४१ , प्रसिध्यति । संवित्तेस्तदाकारता चेत् परित्यज्यते; कथं तस्य संवदेनमिति नियमः ? साक्षात्करणादेव नियमो भविष्यतीति चेत्, किमिदं साक्षात्करणमर्थस्य रूपम् , अथ सवेदनस्य, अथान्यदेव किश्चित् ? अर्थस्य साक्षात्करणं यदि रूपं वदिप्यते । साक्षात्कारि हि विज्ञानं कथमर्थस्य तद्भवेत् १ ॥ अथ संवेदनस्यैव रूपं साक्षाक्रिया मता। साक्षात्कृतः कथं सोर्थो न झन्यस्यान्यरूपता ॥ अन्यत्वेऽप्येष दोपस्तु भवेदेवानिवारितः । तथा हि-यदि साक्षात्करणमर्थस्य स्वभावः नीलादिवत्साधारण इति सर्वस्य संविदितः सोऽर्थो भवेत् । साक्षाक्रिया चार्थस्य न युक्ता ज्ञानधर्मत्वात् । अथ ज्ञान. १० धर्मोऽसावर्थविपयः तेनार्थः संविदित उच्यते; अर्थविषय इति को हि विपयार्थः ? अर्थसंवेदनरूपत्वादिति चेत् । अर्थस्य संवेदनमिति किम्?अर्थरूपत्वात्संवेदनस्येति चेत् ; सैवार्थाकारता संवेदनस्य । अथार्थाजातत्यादर्थसंवेदनम् तथा सति चक्षुषोऽपि जातत्वात् चक्षुःसंवेदनमिति प्राप्तम् । अर्थ पश्यति न चक्षुरिति चेत् ; अर्थ पश्यतीति कोऽर्थः ? अर्थ पश्यत् दृश्यते तेन पश्यतीत्युच्यते; केन पश्यति ? स्वरूपेण । यथैव तर्हि स्वरूपं १५ संवेदनरूपेण पश्यति तथा अर्थमर्थरूपेणेत्यर्थरूपता अर्थस्य साधिका, संवेदनरूपता संवेदनस्येति तदाकारतैव सर्वस्य साधिका । नान्यः स्वभावो भेदकोऽपि ज्ञानस्यार्थेन घटयति ।" [प्र. वार्तिकाल० २।३०४ ] इति । अत्राह- एतेन वित्तिसत्तायाः साम्यात्सर्वेकवेदनम् ॥२६॥ प्रलपन्तः प्रतिक्षिप्ताः प्रतिविम्योदये समम् । इति । प्रलपन्तो निरूपपत्तिकमभिजत्पन्तलाथागताः प्रतिक्षिप्ताः । किं प्रलपन्तः? सर्वेकवेदनं सर्वस्य नीलधवलादरेकेनैव ज्ञानेनाधिगमम्। कुतः? वित्तिसत्तायाः साम्यात् निराकारज्ञानसद्भावस्य सकलविषयसाधारणत्वादिति । फेन तेपां प्रतिक्षेपः ? एतेनं कपिलदूप- जेनेति । तथाहि किं तदेकज्ञानम् यस्य निराकारत्वे सर्पविषयत्वमापाद्येत ! नीलादिविषयो निर्णय एयेति चेत् ; न ; तस्य निराकारमयैव नियतविषयस्य स्वानुभवप्रत्यक्षेणानुभवान् । निराकारत्वे २५ कुतो विषयनियम इति चन् ? स्वहेतुप्रयुक्तादेव शक्तिनियमादिति अमः । कुतस्तस्यावगम इति चेत् ? विषयनियमादेव । ननु "तनियमोऽपि शचिनियमादेवावगम्य" इति कथान परस्पयनय - ! साक्षाकार-आ०, २०, प० । २ अन्यथान्य-आ०, २०, २०। ३ संदिश्य-०, ५०, ५०। सदिय-प्र. पार्तिकाक्षः । १ नौलतादि-भा०, य०, प.। ५ षोऽपि दि-भा., म.,५०। ६ द्वितीयक- वचनम् । -गमात् मा०,८०.प.1 -न मति कापिल-भा.,.,प.1९शसिनियमस्य । १. विषयनिय. मोऽपि 11-सभ्यत इति भा०,०,९.।
3B २४२ न्यायविनिश्चयविवरणे [२२ इति चेत् ? न ; तनियमस्य प्रत्यक्षत एव सिद्धत्वात् । केवलं 'स कुत्ता' इति प्रश्ने नियमेन प्रत्यवस्थानं तसावश्यम्मायेनाभ्युपगम्यत्वात् , अन्यथा सारूप्यासम्भवस्यापि निवे. दनात् । ततो यद्यर्थस्य परिच्छेदो व्यवसायोऽभ्युपगम्यते तस्य प्रत्यक्षसिद्धत्वात् , तर्हि सत्रा. न्यत एव विषयनियमादकिश्चित्करमेय सारूप्यकल्पनमिति किं तेन ? तदाह- प्रत्यक्षोऽर्थपरिच्छेदो यद्यकिञ्चित्करण किम् ॥२७॥ इति । पक्षान्तरमाह- अथ नायं परिच्छेदो यदि [ अकिञ्चित्करण किम् । ] इति । अथ इति वितर्के । यदि अयम् अनन्तरपरिच्छेदी नीलादिव्यवसायरूपो न न विद्यत इति तत्राह-अकिञ्चित्करण किम् सारूप्यकल्पनेन विपयाभावात् ? न हि निर्विषय १० तत्कल्पनमुपपन्नम्। व्योमकुसुमेऽपि तत्प्रसद्गात् । सायकल्पितं पैतन्यं तद्विषय इति चेत् । न ; तस्यासस्वात् । कथमन्यथा "संसर्गादविवेकश्व[श्चत्]" [प्र०या०२।२७७] इत्यादिना तन्निराकरणम् ? सतस्तदेयोगात् । स्खलक्षणवदभ्युपगमसिद्धस्य तस्य तद्विपयत्यमिति चेत् । न; तसिद्धस्यापरमार्थत्वात् । अपरमार्थत एय संवेदनं सत्सारूप्यं चेति चेत् ; कुतः कि सिध्येदित्यन्धमूकं जगद्भवेत् ? स्वप्रसिद्धमेय तर्हि निर्विकल्पकं दर्शनं तद्विपय इति चेत् । १५ तस्यापि प्रतिक्षेप्यमानत्वात् । ततो निर्विपयत्वादुपपन्नमेव तत्परिकल्पनस्याकिञ्चित्करत्यम् भवतु तर्हि व्यवसायस्यैव तद्विपयत्वमिति चेत् ; न; तस्य स्वतः प्रत्यक्षत्ये सारूप्य. स्यापि तदात्मनः प्रत्यक्षत्वप्रसगात् । अस्तु को दोप इति चेत् ;न; निर्विवादत्वेन तत्साधन- प्रयासवैफल्यापत्तेः । प्रत्यक्षस्याप्यव्यवसायत्वेन विवाद इति चेत् ; कथं पुनर्व्यवसायस्याव्यय- सायस्वभावः स्यात् विरुद्धधर्माध्यासेन भेदात् ? इत्यस्यसंवेदनमेव व्यवसायस्याभ्युपगमविरुद्धमाए- २. तितमिति कुतस्तत्सिद्धिः अन्यतस्तसिद्धरनभ्युपगमात् ? स्वसंवेदनादेवान्यत इति चेत्, 'न तस्य स्वतः' इत्यादिप्रसद्गाधनकापत्तेरनवस्थानाच । ततः सव्यवसायमेव तत्स्वसंवेदनं तेन च जलयरूपयन सारुप्यन्यापि व्यवसायान्नवत्र विवाद इत्याकिटिचकर एव तत्साधनप्रयास उदाह- प्रत्यक्षोऽर्थपरिच्छेदो यद्यकिश्चित्करण वत्प्रयासेन किम् ? न किञ्चिदिति । यदि पार्य निर्वन्धो व्यवसायस्य स्वसंवेदनमव्यवसायमेवेति । तदेवाह-'अथ नार्य परिच्छेदो यदि' इति । 'अर्थ' इति पूर्ववत् यदि अयम् अनन्तरः परिच्छेदो व्यवसा- यस स्वसंवेदनं व्ययसाय एवेति निश्चयो न न विद्यते इति । पनाह-अकिश्चित्करण किम् सारूप्येण न किश्चित्फलमिति यावत् । विषयनियमस्तस्य फलमिति चेत्, न; अव्यवसिवात्तत- स्वदयोगात आणिकत्यादिवत् । न हि क्षणिकत्यादौ नास्त्येव सारूप्यं नीलावावपि तव्यतिरिक्त विषयनियमस्य । २ शक्तिनियमेन । ३-पि वै-मा०, २०, ५०। ४ प्रत्यक्षान्तरमाह भा.,., ५.। ५ तदप्रयो-०, १०, प.। ६ सलक्षणवदनभ्युप-आ. व., ५०। ७ व्यवसायप्रत्यभाय। ८-स्याप्यव-आ०, २०, २०१तत्सदे-आ०,२०, य. ..
-- । १२२८ ] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव तदभावप्रसङ्गात् । भवतु तत्रापि संवेदनस्य तत एव वैन्नियम इति चेत् ; किमिदानीमनुमानेन ? व्यवसाय इति चेत् ; न ; बहिःसाकारस्यैव ज्ञानस्य व्यवसायत्वात् । अव्यवसायत्वेऽपि किं तब्यवसायेन ? प्रवृत्तिरिति चेत् ; न ; तस्या दर्शनादेवोपपत्तेः "तत्प्रधानत्वात्" [प्र.. वा० ११५] इति वचनात् , क्षाणिकत्वादेरप्रवृत्तिविषयत्वाच । समारोपव्यवच्छेद इति चेत् तेनापि किम्? विषयनियम इति चेत् न, संवेदना- ५ दर्थान्तराततस्तदयोगात् , "तस्माद्यतोऽसात्मभेदात्" इति वचनव्यापत्तेः । अनन्तरादप्य- सारूप्यरूपान्न ततस्तनियमः "तसात्प्रमेयाधिगतेः साधनं मेयरूपता" [प्र०वा० २१३०६] इत्यस्योपद्रवात् । सारूप्यरूपत्वे तु तस्य संवेदनकारणादेव भावात् विफलमनुमानम् । तन्न विपयनियमः तद्व्यवच्छेदात् । संवाद् इति चेत्, ननु सोऽपि संवेदनविषयस्येत्थम्भावव्यवसाय एव, स च घटना. १० देव भवति पटनस्य व्यवसायरूपत्वात् । 'क्षणभङ्गादेरिदं संघेदनं नान्यस्य इति नियमनं हि घटनम्, तच व्यवसायात्मकमेव उल्लेसरूपत्वात् अतद्रूपस्य व्यवसायान्तरस्याप्यभावात् । पदनमपि तव्यवच्छेदादेवेति चेत् न, तस्य विपयसारूप्यादेव भावात् । तद्व्यवच्छेदसहाय- मेव "तदपि तन्निबन्धन न केवलं समारोपे तदप्रतिवेदनादिति चेत् ; न तर्हि सति तस्मि. नपश्यम्भावी तनियम इति दुर्भापितमेवेदम्-"भावादेवाऽस्य तद्भाचे" [प्र०या० ११६] इति । १५ तब्यवछेदाच्य तस्य विशेपे तत एष तन्नियमोन सारूप्यात् । अविशेपे तु न तदपेक्षणम् अवि., शेयकारिण्यपेक्षाया अनभ्युपगमात् । तत्सहायत्वमेव विशेष इति चेत् । न पृथर तस्य समर्थत्वे सहायेनेह किं फलम् । पृथक् तस्यासमर्थत्वे सहायेनेह किं फलम् ।। ६६३ ।। "सामध्यं ताशं तस्य सारूप्यस्य मतं यदि । सहाय यदपेक्ष्येव फुवि घटनक्रियाम् ॥ ६६४ ॥ सहायनियमेनैव स्वहेतुनलभाविना । चैतन्य नित्यमप्येवं किन्न स्यानियतार्थदृक् ।। ६६५ ।। सारूप्यमन्तरेणापि "नार्थनियमस्थितः । तत्साधनप्रयासोऽयं धर्मकीर्तेरतो वृथा ॥ ६६६ ॥ "तत्रानुभनमात्रेण ज्ञानस्य सदृशात्मनः । भाव्यं तेनात्मना येन प्रतिकर्म विभज्यते ॥" [प्र० पा० २१३०२] इति । २० क्षणित्पादावपि । २ सारूप्यादेव । ३ एव नियम आ०, २०, परिपत्रतिनियम-1म्पपसाय: सारूप्यस्य पटमिति चेत् । ५ "पातेसम्प्रधानावात्"-१० मा । ६ सौदनाद् मिन्नान् समारोपय्यवच्छेदात् । . समारोपण्यवच्छेदार विषयनियमः । ८ अनुल्लेखामरस्य ९ समारोपण्याच्दादेव । १. विषय. सारूप्यम् । -नरेपलं भा०, ५०, ५०२ साहये। १३ पारपत्य । ११ अमारोपव्यपच्छेदापेवणम् । ५ यामाह-आग, प. प. चैतन्ये ।
ग्यायचिनिन्धयविवरणे [११२८ सहायसन्निधानेऽपि तैदसग्निधिनत्स चेत् ॥ ६६८ ॥ पथमर्थविदित्येप सारूप्येऽपि समो नयः । तत इदमप्यलवारवचनं प्रत्युतम्- "यथा तबोध वस्तु तथैव तदनोधकम् । यदा तद्वोधकं वस्तु केन नेष्टमयोधकम् ॥"[प्र० वार्तिगाल० २।३०२] इति । सारूप्येऽपि समानत्वात् । तन्न तासहायत्वमपि तस्य विशेष इति निष्फलं तदपेक्ष- णम् । अतः क्षणक्षयादी सारूप्यस्यैव विपयनियमनियन्वनयात् कथन वैयय॑मनुमानस्य ? तदनिच्छता च न तंत्र तस्ये निमन्धनत्वमभ्यनुज्ञातव्यम् । तथा च क्थ नीलादावपि तस्य तत्वमविशेषादिति सूक्तम्-'अथ नायम्' इत्यादि । तन व्यवसाये सारू यस्य कल्पनं १० प्रत्यक्षविरोधात् । स्वतस्तनिश्चये च तत्प्रयासर्वपल्यात् । अनिश्चये च तस्याकिश्चित्करत्वात् । भवतु साइल्यस्यैव चैतन्ये तत्कल्पनम्, इदमेवाह-'अर्थ' इत्यादिना । कापिलीयः पुरुषः अयं सारूप्यविपय इति परिच्छेदो निश्चयः सौगतस्य यदि इति , तबाह-अकि- ञ्चित्करण पुरुपेण किम् ? न किञ्चित् । विपयाधिगमस्य तत्परत्वात् कथ तस्याकि- चित्करत्वमिति चेत् । न , आकारवादे पृथस्तदधिगमाभावात् । आसरद्वारा तदधिगम इति १५ चेत् , आकारस्यैव कुतोऽधिगम ? स्वत इति चेत् , न, कापिलैरतदनभ्युपगमात् । विपया- धिगमादेव स्वाधिगमो व्यवस्थाप्यते तदभावे तदनुपपत्तेरिति चेत् , न , पृथक् तदधिगमाभा- वस्य उक्तत्वात् । पृथगेव तदधिगमः कापिलैरभ्युपगम्यत इति चेत् , तदभ्युपगमस्य प्रमाणत्वे कथमाकारकल्पनम् ? तदभार एव तदुपपत्ते । अप्रमाणले तु न पृथक् तदधिगमः, यत, स्वाधिगमसम्पादनम् ? आकारद्वारादेव तंदधिगमात्तत्सम्पादनमिति चेत् , न, "तदसम्पादने २० तस्यैवासिद्धः"तत्सम्पादनात्तत्सिद्धौ च परस्पराश्नयात् । तन्न विपयाधिगमादपि तत्सम्पादनमुप- पन्नम् । तत इदं सायसिद्धान्तानभिज्ञतयैव परेणोक्तम्-"यथैव तर्हि स्वरूपं संवेदनरूपेण पश्यति तथार्थमर्थरूपेण" [प्र. वातिकाल, २१३०६] इति । ततो विपयाधिगमस्याकारवतस्त- उचैतन्यादभावादुपपनम्-'अकिश्चित्करेण किम्' इति । नापि निरशे दर्शने तत्कल्पनमुपपनमित्यावेदयति-'प्रत्यक्षम्' इत्यादिना । २५ करणस्य इन्द्रियस्य कार्य प्रत्यक्षं साक्षात्कारिझानम् । उपलक्षणमेतत् प्रत्यक्षान्तरस्यापि । तत् अर्थप्रतिविम्यम् अर्थाकारमिति अयुक्त युक्तिवर्जितम् । विपयनियम एवं सवेदनस्य तर युक्तिः तदभाये तदनुपपत्तेरिति चेत् , न, निरशस्य एतस्यैवाननुभवात् । न हि निर . -धानोऽपि-भा०, २०, ५०। २ समारोपव्यवच्छेदासन्निधानतुल्य स विशेष । ३ सदा मा०,०, ५०। ४ क्षणिकत्वादौ । ५ सारुप्यस्य । ६ विषयनियमनिर धनत्वम् । ७ चेत् आकार-मा०, ब०, ५० । ८-से प्रमा-आ०,०। ९ तदधिगमात्तत्सम्पादने मा०, २०, ५०1 विषयाधिगमात् स्वाधिगमसम्पादनम् । १. स्वाधिगमासम्पादने । स्वाधिगमसम्पादनात् । १२ यदैव भा०,५०,प• 1 11-स्य त-भा०,५०.५.।
२४५ .. १३२८] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव किञ्चित्संवेदनं कचिनियमवदुपलब्धं यतस्तस्य तदन्यथानुपपन्नत्वमवसीयेत । "अन्यथानु- पपन्नत्त्वमसिद्धस्य न सिध्यति" [ न्यायवि० श्लो० ११] इति वचनात् । एतदेवाह- असंविदः असम्प्रतिपत्तेः निरंशस्य प्रत्यक्षस्येति । तन्न व्यवसायादन्यत्र सारूप्यकल्पनमुप. पन्नम् । नापि व्यवसाये तस्य निराकारस्यैवानुभवात् । न तावता सर्वस्य विषयत्वम्। तस्य तथानुभवाभावात् । तर्हि न किञ्चिदपि तस्य प्रत्यक्षमाकारस्येति चेत् ; अत्राह -'अप्रत्यक्षम्' ५ इत्यादि । अविकारिणः आकारविकारविकलस्य व्यवसायस्य यत् स्वम् आत्मीयं संवेधं जीलादि तन् अप्रत्यक्षमित्ययुक्तम् अत्र 'अनुभवयाधनात्' इति भावगतो हेतुः प्रतिपत्तव्याः । यदि च, निराकारत्वे ज्ञानस्य प्रत्यासत्तिनियमाभावात्सर्ववेदनत्वम् ; तत एव सर्वा- कारत्यमपि भवेत् । सर्वस्य तत्कारणत्याभावान्नेति चेत् ; न; तत्रापि समानत्वात् प्रश्न 'समपि किन्न तस्य कारणम्' इति ? अतोऽत्रापि तदेव सर्वविषयत्वम् । एतदेव कारिफाशेपेण दर्शयति-प्रतिबिम्बोदये आकारवत्त्वे ज्ञानस्य समं सदृशं सर्वेकवेदनम् । स्यान्मतम्-न वस्त्वित्येव सर्व सर्वस्य कारणं शक्तिप्रतिनियमात् । प्रतिनियतशत्कयो हि भावाः प्रतिनियतमेव कार्य कुरिन न सर्वम् । न च कारणमित्येव चक्षुरादिकमपि तत्र स्थाकारसमर्पणक्षमम् , तच्छतिविशेषस्य नीलादावेव स्वहेतुबलभाविनो भावात् । ततो न १५ सर्वाकारत्वेन सर्वविषयत्वम् । नापि चक्षुदादिविपयत्वमिति; तन्नः शक्तित एव निस्तविपयत्वो- पपरोः आकारवादवैयर्थ्यापत्तिः । कल्पयताऽपि हाकारं शक्तिरभ्युपगन्तव्या, वदभावे तस्यैव नियतस्यासम्भवात् । तथा च तदवस्थ एव अर्थः स्वशक्तितो वेदनस्य विपयनियममय- कल्पयतीति व्यर्थमाकारकल्पनं संवेदनस्य । युक्तञ्चैतत् अर्थस्यैवमेव सिद्धेः । आफारयादे हि न तस्य सिद्धिः थगदर्शनात् । आकारदर्शनमेव तस्यापि दर्शनं सादृश्यादिति चेत् ; न; २० पृथगदष्टे सस्मिन् तत्सादृश्यस्यैव दुरपामत्वात् । न चानयगतं सादृश्यमुपचारकल्पनायालमिति निवेदितं पूर्वम्। तस्मान्नेदमा निदर्शनमुपपन्नम्-"यथा पितुः सदृशः पुत्र उत्पत्तिमान 'पितू. रूपं गृहातीति व्यपदिश्यते लोके विनापि ग्रहणव्यापारेण तथा विज्ञानेऽपि व्यपदिश्यते" [प्र. वार्तिकाल० २।३०५ ] इति; वैपन्यात् । उपपानं सल्विदम्-पुत्रः पितरूपं गृहातीति पृथगेय पितापुत्रयोस्वत्सादृश्यस्य चोपलम्भात् । न चैवमत्र, पृथग अर्थवदाकारयोस्तत्साधर्म्यस्य २७ पाप्रतिवेदनात् । तस्यादर्थशक्तित एव विषयनियमो युक्तः । "वस्तुवस्तु ज्ञानस्यैव "तत्र शक्तिः, अर्थत्य ज्ञान प्रत्यकारणत्यात् । न च ज्ञानमशक्तमेव; तत्र सदाकारस्याप्यभायप्रसङ्गात् व्योमकु- सुमवत् । शकस्याप्याकारद्वारेणेव यहिर्विपयत्वमिति चेत् ; न; पारम्पयंदोपात् । भवति एवं पारम्पय॑म् -'शक्षित आकारः, ततोऽर्थवेदनम्' इति । निराकारलेन । २ हृदयगतः। भावतो भा०,०, प.। ३ पत्तेः क-ता० । माधरम्यैव । ५ पृथ-०, प. प. अर्थयार। . यास-मान, २०, २०॥ ८ अ । २रिनुपम् मार, प.प.11.स्तुतस्तमा-भा०,.,. "विश्यनियम।
? ] . न्यायविनिश्चयचिधरणे [१२८ निराकारज्ञानमेव नास्ति अप्रतिवेदनात् तत्कथं तच्छक्तितस्तनियम इति चेत् ? न; तस्यैव 'नीलमहं येद्मि' इत्यनुभवात् । एवमपि कथं तस्य बहिर्विपयत्वमिति चेत् ? कस्याय प्रश्न: प्रयोजकस्य, प्रकारस्य, ज्ञापकस्य वा ? प्रयोजकस्तु 'प्रतिपादित एव । प्रकारः शक्ति- लक्षणः । ज्ञापकच स्वसंवेदनरूपः, स्वत एव तर बहिर्विपयत्वस्यानुभवात् । तदेव कीदृशमिति ५ चेत् ? नीलमपि कीदृशम् ? यादृशमनुभवेन द्रश्यते तादृशमेवेति चेत् ; न, प्रस्तुतेऽपि समानत्वात-बहिविपयत्वमपि ज्ञानस्य यादृशमनुभवोपारुढं ताशमेव तदिति । ततो निराक. त्वमेतत् -"नीलादिसुखदिकमन्तरेणापरस्य ज्ञानाकारस्यानुपलक्षणात्" [ इति, अपरस्यैव स्वपरपरिच्छेदरूपस्य तदाकारस्य दर्शितत्वात् । साक्षात्करणच तस्यैव धर्मो नार्थस्य । कथमेवमर्थः साक्षात्कृत इति व्यपदेश इति चेत् ? न, साक्षात्करणविषयत्वादेव १० तदुपपत्तेः । स्वयं तस्य तद्धर्मत्वे तु 'साक्षात्कर्ता सः' इति स्यान्न साक्षात्कृतः' इति । हि भवति छेदनधर्मंच सङ्गःछिन्न इति, 'छेत्ता' इति तत्र व्यपदेशदर्शनात् । तत्त इदमपि शब्द- न्यायापरिज्ञानादेव परस्य वचनम्-"अथ संवेदनस्यैव” इत्यादिकि' (दिकम् ।) ततो यदि निराकारत्वे सर्वविपयत्वं संवेदनस्य आकारवत्त्वेऽपि भवेत् , शक्तरनियामकत्ये तदाकारनि- यामस्याप्यसम्भवात् । इति सूचम्-'प्रतिविम्योदये समम् ।' इति । १५ पुनरपि साकारवादं दूपयन्नाह--- सारूप्येऽपि समन्वेति प्रायः सामान्यदूपणम् ॥२८॥ इति । सारूप्येऽपि न केवलं सामान्ये समन्वेति सङ्गतं भवति । किम् ? सामा. न्यस्य दूषणं प्रायो वाहुल्येन नित्यत्यादिदूपणस्य तनाऽभावात् । तथा हि-यथा सामा- म्यस्य कचित् दृश्यत्वे सर्वन दृश्यत्वमेवे, दृश्यत्वाद(त्या)श्यत्वे निरवयवत्वविरोधात् , तथा २० संवेदनस्य यदि नीलविषयत्वं तदाकारजया जडविषयत्वमपि तदाकारतयैव, अन्यथा विपयस्या- नुकतेतरत्वेन विपयिणश्च सरूपेतरत्वेन विरुद्धधर्माध्यासे निरंशत्यविरोधात् , अविरोधे वा सामान्येऽपि तदविरोधादसम्बद्धमेतत्-"जातिः सर्वत्र दृश्येत" [प्र०या० स्व० ३।१५८] इति । तथा च जड़मेव संवेदनमिति कथं ततः कस्यचिदधिगमो ज्ञानकल्पनावैफल्यापः । तदनेन अधिगमनियमस्य सारूप्यसाधने विरुद्धस्यमुक्तम् । अथ नीलं जाड्यादन्यदेव तत्स्थं तन' सारूप्ये जायेऽपि तन्नियम इति चेत् ? उच्यते-- २५ प्रतिवादिन एव । २ बहिविषयत्वमेव । ३ चेन नी-मा०, घ, प.। . "तस्मारमुखादिनीला. दिव्यतिरिफमपरमिह जगति सदनं नास्तीति"-प्र. धार्तिकाल० ३०५०६ । ५ ज्ञानाकारस्य । ६ तद्धर्म प्रत्ये सा-पा०,३०.५.२.१ ५.६ किं भवति सा-मा., प.प.) ९-व सास्यत्वाद् दृश्य-श्रा, ५०, प... चित् अश्यले इचिध दृश्यत्वे। "-वे वि-भा... प. १२ चिद् दृश्यावस्य इचियादृश्यत्वस्याविरोधात् । १३ नीले।
१२२८] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव: १० जडत्वानीलमन्यच्चेजई नीलं कथं भवेत् । सम्मन्याच्चेजडत्वेन सोऽपि कः परिकल्प्यताम् ? ॥६६९॥ म तादात्म्य विभिन्नत्वात्तदुत्पत्तेस्तु सम्भवे । जडत्वान्नीलमुत्पन्नं जडमेव पुनर्भवेत् ॥६७०।। प्रागुक्तस्तत्र दोपश्च तज्ज्ञाने जडतेत्ययम् । पुनस्तद्भेदफ्लृप्तो स्यादनयस्थानदूपणम् ॥६७१॥ जडत्वेतरनिर्मुक्तं नीलं चेटुपकल्प्यते । स्कन्धान्तरं तदापन्नं तच्च नानभ्युपागमात् ॥६७२।। तन्निर्मुक्तेरपि ज्ञानं तदाकारतयोद्भवत् । निर्मुक्तं भवेन्नीलप्रभवोत्तरनीलवत् ॥६७३।। 'नीलादिवा( दिव) कथं "तस्मान्नीलस्याधिगमस्तदा । चेतनस्यैव धर्मोऽयं यतो लोके प्रसिद्धिमान् ।।६७४।। तस्मादधिगमोऽन्यस्मात्ताहशादेव वेदनात् । इत्यवस्थानवैधुर्यादर्थवृत्तिः क्षयं गता ॥६७५।। तन्न जाध्यात्थनीलकल्पनेयं फलावहा । तथापि नीलसंविचेगनीत्याऽनयापनात् ॥६७६।। अतदाकारया वित्या जाड्यस्य यदि वेदनम् । नीलस्यापि तयैवेति व्यर्थमाकारकल्पनम् ।।६७७।। अविज्ञाते तु जाध्यत्य कथं तत्र प्रवर्तनम् । नीलमात्रामयोधाच्चेस्थं नातिप्रसज्यते ॥६७८।। सम्बन्धी जाड्य एवेति यदि तवं धर्तनम् । कथं तस्मिन्नविज्ञाते सम्बन्धोऽप्यगम्यताम् ॥६७९।। साधनज्ञानतोऽप्येवं साध्ये वर्तनसम्भयात् । अनुमानप्रमाणस्य कैमध्यक्येन पोपणम् ।।६८॥ 'अप्रवृति[:]कुतो जाड्चे? "लानादेः प्रापणं कथम् । नीलमात्रप्रवृत्त्या चेजाड्यमन्यदृथा भवेत् ॥६८१॥ सथा च नीलमेव स्यादिना जाइयेन चेतनम् । चैतन्येतरनिर्मुक्ततत्र पूर्व "निधनात् ॥६८२॥ २० -तरसभवात् प० ।-रोस्तुरसमवेत् आ०,०। २ तोद्भवेत् मा०, १०,५०1३ जावेतर- निकम् । ५ नीलादेवाकय पा०, २०, ५. ५ जडखेतरनिर्मुसानात् । -रोयनवा-80०, य०, ५० पाये एव । ८ जाये। ९ प्रस्तौ दौपागदना आत्ये अप्रतिरेवास्तु इयुफे माह। मप्रति कुत्तोगामे टा०,०,.11 यत. निवेदनात् मार, प., प० ।
२४८ न्याययिनिश्चयविवरणे [१२१ सण्डा- दूपर्ण चेतनत्वेपि पुरस्तादमिधास्यते । तदलं त्वरितत्वेन प्रस्तुते दीयतां मतिः ॥६८३॥ ततो न सारूप्यवादे बहिरर्थवेदनम् , इत्यसरूपमेव ज्ञानमभ्यनुज्ञातव्यम् । कथं पुनरसदूपेण तद्वेदनमिति चेत् १ कथमसामान्यस्वभावैः खण्डादिभिः समानप्रत्यय- ५ जननम् ? स्वहेतुनियतात् कुतश्चित्प्रत्यासत्तिविशेषादिति चेत् ; अनुकूलमाचरसि, निराकारादपि वेदनात्तत एव विपयाधिगमोपपत्तेः । सकलविषयाधिगमः कस्मान्न भवतीत्यपि न युक्तम् । खण्डाहीनामेवं सकलसमानप्रत्ययहेतुत्वापत्तेव्र्यवहारसायोपिनिपावात् । प्रतिनियतसमानप्रत्यय. हेतुरेव तत्र तद्विशेषों न सर्वतत्प्रत्ययनियन्धनमित्यपि समानमन्यत्र, निराकारेऽपि वेदने प्रतिनि- यतार्थाधिगमनिवन्धनस्यैव तद्विशेपस्य भावात् । सारूप्यमेव तत्र तद्विशेष इति चेत् ; १० दिष्वपि सामान्यमेव तद्विशेषः कस्मान्न भवति तदभावेऽप्येकप्रयोजनजननस्योपलम्भात ? उप- लभ्यन्ते हि चक्षुरालोकादयस्तदेकसामान्यानधिष्ठिता अपि रूपज्ञानमेकमुपजनयन्तो ज्वरो. पशमनादिकं वा गुडूच्यादयः , तथा सण्डादयोऽपि तादृशा एव समानप्रत्ययमेकमुपजनय. न्तीति कि तत्र सामान्यकल्पनयेति चेत् ? न; भाड्यवनीलादेरपि निराकारादेव वेदनादधिगम- प्रसङ्गात् पूर्वोपादेयत्ववद्वा । न हि नीलस्य पूर्वक्षणोपादेयत्वमसंवेद्यमेव नीलस्यापि तत्त्वापत्तेः, १५ निरंशवादे भागशस्तद्वेदनविरोधात् । न च "तदाकारत्वं "तवेदनस्य, "तस्यापि "तदुपादेय. त्वप्रसङ्गात् । न चेदमुचितम् ; चेतनस्याचेतनोपादेयत्वानभ्युपगमात् , अवेतनमेव तदपि प्राप्तम् , तथा च कथं ततस्तद्वेदनम् ? अन्यतस्तद्वेदनमिति चेत् ; न ; तस्यापि तदाकारत्वे पूर्ववत्प्रस- पुनरन्यतस्तद्वेदनपरिकल्पनायामनवस्थापत्तेः न किञ्चिदर्थवेदनमिति सुव्यवस्थितः सारू. प्यवादः तद्विपयाभावात् । ततो दूरमनुसत्यापि निराकारमेन तद्वेदनमभ्युपगन्तव्यं नियतविप- २० यच, तद्वन्नीलवेदनमपीति नार्थः सारूप्येण यतः स एव तत्र "तद्विशेषः स्यात् । फस्तहि तद्विशेप इति चेत् ? अतदर्थपरायत्तत्वमेव । नदेवाह- अतदर्थपरावृत्तमतद्रूपं तदर्धटक । इति । अतद्रूपम् अनीलादिरूपम् अपिशब्दो द्रष्टव्यः, तादृशमपि वेदनं सन्नीलादिक- गात, " 1-नवे तु पु-प० । २ नरवे पु-भा०,०। • इत्यसदूप-मा०, ५०, प० । ३ खण्डादौ । ४ प्रत्या. सत्तिविशेष । ५ भावनात् मा., ०,०।६"यधेन्द्रियालोकमनस्कारा आत्मेन्द्रियमनस्वारा रूपविज्ञानमेक जनयन्ति आत्मेन्द्रियमनोतरसन्निकर्षादा असत्यपि तद्धावनियने सामान्ये। शिशपादयो भिषाश्च पास्सरानन्द- येऽपि प्रकृत्या एकाकार प्रत्यभिज्ञानं जनयन्ति अन्या चा दहनगृहादिक काष्टसाध्यामर्थकियां यथाप्रत्ययम् । न तु भेदाविशेपेऽपि जलादयः । श्रोत्रादिद् रूपादिविज्ञाने ।..."यथा वा गुडूची व्यक्त्यादीनो सह प्रत्ये वा अवरादिशमनादिलक्षणानाम् एककार्यक्रियावत् । न तत्र सामान्यमपेश्यने । भेदेऽपि तत्प्रकृतित्वात् । न तदविशेपेऽपि दधिप्रसादयः ।" -प्र. वा. स्वा० ३१७५, ७६।७ एकसामान्यानधि छेता एव ।। असंवेद्यस्वापरोः । ९ मागतस्तद्व-भा०, 4. प ... पूर्वणोपादेय वाकारस्तम्। " नीलरेदनस्य । १२ नौलवेदनस्य । १३ पूर्वनोलक्षणोपादेयत । १४ नौलवेदनात् । १५ नीलस्य शनम् । १६ प्रत्यासत्तिविशेषः ।
. १॥३० प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव मेवार्थ पश्यतीति तदर्थदृग् अवधारणगर्भवात्समासस्या फुत एतत् अतदर्थपरावृत्तं यत इति । नीलादेरादन्यः पीतादिरतदर्थः तस्मात्परावृत्तं तद्हणपराङ्मुसत्यात् , तत्कथं तेन तदर्शनम् ? न हि तत्परावृत्तमेव तदर्शनं भवति । ननु अतद्रूपत्वे तत्परावृत्तत्वमेव कथमिति प्रश्नविपया, तत्कथं तस्येयोत्तरत्वम् ? प्रश्न विषयस्य मोत्तरले न कचित्साधनसाफल्यम् , विवादविपयादेव तसिद्धेरिति चेत् , न, शक्तिगतस्य तत्परावृत्तत्वस्य हेतुत्वात् , अधिगमगतस्य च साध्यत्वात् । ५ तेदयमर्थः-शक्तिनियमात् सवेदनस्याधिगमनियम इति । एतदेवोत्तरार्थ विवृण्वन्नाह- अथेदमसरूपं फिमतदर्थनिवृत्तितः ॥२९॥ तदर्थवेदनं न स्यादसमानामपोहवत् । इति । अथेति प्रश्ने । इदं स्वसंवेदनवेद्यं ज्ञानम् । कीदृशम् ' असरूपम् अविपयाकारम् । अनेन तत्सारूप्यसाधने प्रत्यक्षवाधनमुक्तम् । तदर्थवेदनं तस्य नीलादेरर्थस्य वेदनं तत्परिन्छेदि १० किन्न स्यात् १ स्यादेव। कुत एतत् अतदर्थनिवृत्तितः । व्याख्यातमेतत् । सैव कथमसरूप. स्येति चेत् ? अण्डादीनामियेति त्रूमः । तदाह-'असमानामपोहवत्' इति । यथा कर्काद्यपोहः खण्डादीनामसरूपाणामेव तथा तद्वदनस्यापीत्यर्थः । तन्निवृत्ते रूपलात्कथं ततो व्योमकुसुमादिन नियतमर्थवेदनमिति चेत् ? न ; सर्वथा तन्नीरूपत्वस्यासिद्धत्वात् , कथञ्चिद्भावतादात्म्येनेव तत्प्रतिपत्तेः। "नात्यन्तमन्यत्वमनन्यता च विधेर्निपेधस्य च शून्यदोपात् "[वृहत्स्व० इलो० ४२] इति वचनाच । परस्य तु भवत्येवायं पर्यनुयोगः किं तेषु तदपोहस्य फलमिति ? समानप्रत्यय इति चेत , न, नीरूपात्तदयोगात् । प्रसिद्धञ्च तस्य तन्नीरूपत्व "रूपं तस्य न किञ्चन" प्र०या० २१३०] इति वचनात् । 'वासनाप्रयोवादेव तत्सत्ययः, तर केरलं तदपोहस्य सहका- रिभान एवं'इत्यपि वासनामात्रविरसिरामेन, कारणस्यैव सहकारित्वोपपत्तेः । न च नीरूपस्य कार- २० णत्यम् , वस्तुत्वानुपगात् , तस्य तल्लक्षणतात, अन्यथा सलमणस्यापि तदभावोपनिपातान्न किञ्चिदयेत् । यत्पुनरेतत्-"समानप्रत्ययः समानतामन्तरेण सर्वस्य पिलतणत्वात्कथमुदयी " [प्र०यार्तिकाल. ४।१२] इति पूर्वपयित्या प्रतिपादितम्-"तदन्यव्यावृत्तिमानादेव निया- मकात्कचिदेव तदुदयः [ ] इति , तत्प्रतिनिहितम् , सन्मानस्य नीरूपत्वेन २५ व्योमकुसुमबत्तत्प्रत्ययनियामपत्यायोगात् । यम्प्यन्यदुक्तम-- "आरोपितो य आकारो यागनानीजनोधतः । तारन्माण पर्याप्तं जातिरन्या वृथा न किम्॥प्र०यार्तिकाल:४।१२] इति, - । तदयमर्थशति । २ प्रत्यक्षा-मार, २०, २० । ३ माादिए। कईयोहस्य । ५ परनः । । कारणलक्षगवन् । . “अपना तरूपम्यातिमात्रमेवास्तु मामान्यमिति न शति ।"-. पातिकाल ..
न - १० २५० न्यायविनिश्चयविवरणे [१।३० तदपि न किञ्चित् ; 'तदाकारस्य नीरूपत्वे ततोऽपि तदन्यापोहवत्समानप्रत्ययायोगात् । वस्तुरूपत्वे तु स एव वस्तुभूतः समानाकार इत्यसङ्गतमेतत्-"जातिरन्या वृथा न किम्" इति । ततो न फुतश्चिदपि नीरूपत्वात् समानप्रत्ययः । भवत्वेवम् ; तस्येवाभावात् । विशेपान्तरव्यापिरूपत्वे हि समानत्वम् । न च प्रत्ययस्य ५ रूपं तैदन्तरख्यापि, तन्मात्रपर्यवसायिन एव तस्य प्रतिभासनात् । ततः स्वलक्षणमेव तत् , सामान्यम् । तथा च परस्य वचनम्-"स च युद्ध्याकारः स्खलक्षणमेव न तत्सामान्यं बुद्ध्य- न्तरस्य तदानीमभावात् अर्थगतत्वाभावाच" [प्र०वार्तिकाल०४।१२] इति । ततो न समा- नप्रत्ययाभावो दोपायेति चेत् ; न; "प्रत्ययो यदि नामायं कचिदेव प्रवर्तते । नियमो हेतुमाने स्यात् सामान्ये तु गतिः कथम् १॥"[प्र०यार्तिकाल०४।१२] इत्यस्य विरोधात् । अनेर्ने सामान्यप्रत्ययमभ्युपगम्य तन्नियामकत्वेन सामान्यादन्यस्य अन्यापोहस्य प्रतिपादनात् । असत एव तस्याभ्युपगम इति चेत् ; न; प्रयोजनाभावात् । व्यव- हारः प्रयोजनमिति चेत् ; न तस्याप्यसतस्ततोऽसम्भवात् अप्रतिवेदनाञ्च । कुतो हि व्यवहारस्य प्रतिवेदनम् ? दर्शनादिति चेत् ; न; ततः स्खलक्षणस्यैव प्रतिवेदनात् । न च तस्यैव व्यवहार- १५ त्वम् ; निरंशक्षणक्षीणत्वात् , व्यवहारस्य च पूर्वापरभावाधिष्ठानप्रत्त्यादिम्पतया तद्विपरीतत्वात् , तत्र च दर्शनस्यापत्तेः । विकल्पादिति चेत् ; न; समानप्रत्ययापलापे तस्येवासम्भवात् तस्य तंदूपत्वात् । अङ्गीकारादस्त्येव तत्प्रत्यय इति चेन् ; न; तदर्थापरिज्ञानात् । दर्शनमगीकार इति चेत् ; न, तत्र समानाकारस्याप्रतिभासनात् । प्रतिभासनेऽपि स्खलक्षणवसत्वानुपपत्तेः । विकल्प इति चेत् ; न, समानप्रत्ययाभावे तदभावस्योक्त्वात् । अङ्गीकारादस्त्येव तत्प्रयय इति चेत् ; न, 'तदर्थापरिज्ञानात्' इत्याधनुबन्धादनवस्थापत्तेः । न गीकारो नापि चिक्ल्पः किन्तु तदभिनिवेशमानमिति चेत् ; न, तस्यापि चिद्रूपत्वे दर्शनविकल्पान्यतरकोटिव्यतिक्रमा. नुपपत्तेः । अचिद्रूपत्वे तु न ततस्तत्प्रत्ययप्रतिपत्तिः, ज्ञानकल्पनावैफल्यदोषाद। इति न विकल्पा- व्यवहारप्रतिवेदनम् । नापि व्यपहारान्तरात्, अनवरवानात् । ततो न अत्तचिदपि तत्परिका- नम् । अत: प्रतिषिद्धमेतत्- "व्यवहारमात्रमविचारिततत्त्वयापि जात्या सम्पाद्यते?" [प्र०वार्तिकाल०४.१२] इति; अपरिक्षातस्य "तया सम्पादन मिति दुरखबोधत्वात् । अपि च, किमिदमविचारिततत्त्वया" इति ? विचारभीरस्वभावया" इति चेत् ; ननु- , आरोपिताकारस्य । २ समानप्रत्ययस्यैवाभावात् । ३ विशेषान्तरम्यापि । ४ खमात्र । ५-कारख- भा०, १०, १० । लोकेन । ७ -ज्यस्यापोहस्य मा०, घ, ५०1८-ऋतिर्वि-आ.,०, ५० तद्रूप- वा- ब., ए.। १० व्यवहारस्य । "जात्या ! १२-तत्व इति भा०,०, ०३ -भीड़ स्वभाव इति भा०,.,प० । २० २५ ११३१] प्रधमा प्रत्यक्षप्रस्तायः ५ विचारों हि विकल्पात्मा तदभावे कथं भवेत् । यतस्तद्भीरुता जातितत्त्वस्येयं प्रकल्पते ॥६८४॥ अङ्गीकारात्तदस्तित्यं पूर्वमेव निवारितम् । से एव नास्ति तस्माच्च तद्धीतिरिति दुर्घटम् ।।६८५।। नित्यादिरूपं तत्प्राप्तं सामान्य निरुपद्रवम् । क्षणभगिजगद्वादवैतभ्यावेदनक्षमम् ॥६८६।। तस्माद्विचारसद्भावे विकल्पो निरुपद्रवः । स च सामान्यनि सस्तनिषेधस्ततः कथम् ? ॥६८७।। तस्माद्वरतुसनेव समानप्रत्ययः । न च तस्य नीरूपादन्यापोहादुत्पत्तिरिति दुरतिनमोऽयं दोपापातः सौगतस्य । शाखफारेण तु तदभ्यशामात्रेण इदमभिहितम् -'असमानामपोहवत्' ५० इति । ततः स्थितम्-यथा समानपरिणामविकलानामेवान्यापोहस्ततश्च नियत एवं समानमत्य. यः तथा सारूप्यविकलस्यैव संवेदनस्यातदर्थ निवृत्तिः, अतश्च नियतमेवार्थवेदनमिति । ननु यावदतदर्थव्यावृत्त्या नियतार्थत्वं ज्ञानस्य तावदवदाकारव्यावृत्त्येव फरमान्न भवति १ अतदाकारण्यावृत्तिर्नाम तदाकारत्वमेव, तर न कचिदप्युपलभ्यते, तत्कथं तेन नियतार्थत्वं सपुष्पेण(णे)चेति चेत् ; न; अन्यत्रापि तुल्यत्वात् । अतदर्थव्यावर्तनमपि तदाभिमु. १५ ख्यमेव तेनापि कथं नियतार्थत्वं तस्यैवादर्शनात् । अप्राप्तदर्शनमपि अर्थप्रतिपत्त्यन्यथानुपपत्त्या परिकल्प्यत इति चेत् ; न प्रतिकर्मनियमान्यथानुपपत्त्या तदाकारत्वस्यापि परिकल्पनात् । 'कुत्त- स्तस्यापि नियमः नियमविकलात् प्रतिकर्मनियमायोगात् ?' इत्यपि न युक्तः प्रश्नः वदाभिमु- ख्येऽप्येवं प्रश्नापतेः । शक्तिस्तु (शक्तिस्तु) न तत्रैव पक्षपातमुद्वहति । ततो यद्याकारवतो नार्थवेदनं तदन्यतोऽपि न भवेत् । तुल्यदोपतत्परिहारत्वात् इति उत्साद एव पहिरर्थस्य । स २० चाभिप्रेत पवाद्वैतवादिनः । न हि संवेदनस्यान्यत् वेद्यम् उकादोषात् । तत एव न तेत् अन्यस्य द्यमिति स्वप्रकाशमेव तदवशिष्येत । तदुक्तम्- "नान्योऽनुभाव्यो युझ्यास्ति तस्या नानुभवोऽपरः । तत्रापि तुल्यचोद्यत्वात्स्वयं सेव प्रकाशते ।" [प्र०या० २१३२७] इति चेत; अत्राह- अत्राक्षेपसमाधीनामभेदे नूनमाकुलम् ॥३०॥ स्वचित्तमात्रगर्तावतारसोपानपोपणम् । इति । अत्र अनयोः निराकारतरक्षानयोः आक्षेपसमाधीनांचोद्यपरिहाराणाम् उचप्रकारेण अभेदे विशेषाभावे सति । नु इति वित। यत्तचित्तमात्रं संविदद्वैतं स एव गर्नवत् दुःसापा- प्रमप्यते प० । २ विचार एव । १ दोषोपनिपातः ०,१०,१.। -नुनानमाग मा०, २०, प.। ५ संवेदनम्।
५ , ૨ न्यायविनिश्चयविवरणे [११३१ दहेतुत्वात् गत्तः तस्यावतारसोपानमवतरणमार्ग: "नान्योऽनुभाव्यः" इत्यादिस्तस्य पोषणं समर्थनं तदाकुलं न भवति । कुन: ? जनं यतः । अवनमनगमनम् : अवतेरवगमनार्थत्वात् विपि त्वरज्वल (ज्वरत्वर) [पाच्या०६।४।२०] इत्यादिना माचो वकारस्य अजा (उडा) देशे सत्येवंरूपात् उवा अवगत्या उन हीनम् अवगमरहितं यस्मादित्यर्थः । तथा हि-ग्राह्यादिनिपेधः कुतोऽवगन्तव्यः "यतो नान्यः" इत्यादि शोभेत ? माधाद्यपरिज्ञानादिति चेत ; न; अपरिज्ञानान् कस्यचिदप्रतिपत्तेः, अतिप्रसङ्गात् । तदपरिज्ञानमेय सन्निपेधापेक्षया परिक्षानम् । न चेदं व्याहतम् ; विपयभेदात , परिझानस्येवापरिज्ञानत्ववत् अपरिज्ञानस्यापि परिज्ञानत्वोपपत्तेः। प्रसिद्धं हि रूपपरिज्ञानस्यापि रसादावपरिज्ञानत्वमिति चेत् ; उच्यते -यदि तत्परिज्ञानानिषेधस्यान्यत्वम्-"नान्योऽनुभाव्यो बुद्ध्या" इति व्याह- १० न्येत, तनिषेधस्य तत्परिज्ञानादन्यस्यैव तेनानुभवात् । अनन्य एव ततस्तन्निधो ग्राह्यादिपर्यु: दासस्य तत्परिज्ञानरूपत्वादिति चेन् ; अप्रतिपन्ने ग्राहादी कथं तस्यं तत्पर्युदासरूपत्वमपि शक्य. मवगन्तुम् ? अप्रतिपन्ने कलशादी भूतलादेस्तत्पर्युदासरूपतया प्रतिपत्तेरप्रतिवेदनात् । एकान्ताप- रिझाने जात्यन्तरस्य कथं तत्पर्युदासस्पत्यमत्रगम्यत इति चेन् ? क एवमाह -नैकान्तपरिज्ञान. मिति ? सम्यगेकान्तस्य नैगमादिना नयविभागेन मिथ्यकान्तस्य” च परपरिकल्पनया प्रति. १५ वेदनात । प्राह्यादेरपि कल्पनयैव वेदनमिति चेत् ; न; तत्पर्युदासरूपादेव ज्ञानात्तत्कल्पना. नुपपत्तेः, ततस्तत्पर्युदासस्येव प्रतिवेदनात् । अन्यतस्तत्कल्पनायामद्वैतव्यापत्तिः । अपि च, अन्यस्यापि "तत्कल्पकत्यं तन्नि सित्वमेव । तघानुपपन्नम् “अविभागोऽपि युद्ध्यात्मा" [प्र० वा० २।३५४ ] इत्यस्य व्याघातात् । सत्यम् : न"तस्यापि वस्तुत. स्तन्नि सित्वम् , अन्यत एव तत्कल्पनादिति चेत् ; न, तम्यातन्निमित्वे ततस्तत्र २० तत्वल्पनानुपपत्तेः । न ह्यम्पनिर्भासमेव ज्ञानमन्यत्र तन्नि सित्वं कल्पयितुमलम् । भातु तस्य तन्नि सित्वमिति चेत् । न, अविभागबुद्धिप्रतिघातस्योक्त्वात् । तत्रापि तदन्यतस्तत्क- ल्पनायाम् अनवस्थापत्तेः । तन्न कुतश्चिदपि प्राह्यादिप्रनिवेदनम् । तत्कथमेतत्- "ग्राह्यग्राहकमविचिभेदवानिय लक्ष्यते ।" [प्र. वा० २।३५४ ] इति । "तल्लक्षणस्य स्वतः परतश्चासम्भवात् । "विचारावरुद्धं विशीर्यत पर बल्लक्षणम् , २५ अकृत्वा तु "तदवरोधं सदभ्युपगम्यत इति चेत् ; न; विचारस्यैव परामर्गभेदाधिष्ठानस्य वस्तु. वृत्तेनाभावात् । अवस्तुभूतातु तत्वतो न ततः क्वचित्तदभावप्रतिवेदनम् । "स्वसंवेदनादेव नत्प्रतिवेदन सर्वज्ञानानां प्राह्यादिभेदनिर्भासविकलराया स्वतः प्रतिवे- ! "ज्वरवास्तिव्यविमवामुपधायाश्च"-पा०स्. । २ अच्सहितस्य वकारस्य 'अव' इत्यस्य । ३ प्राया- दिनिषेधपरिज्ञानात् । ४ माद्यादिनिषेधस्य । ५ प्राश्वादिनिषेपपरिज्ञान। ६ ग्राह्यादिनिषेधस्य। ७ ग्रा यादिपर्युदास । ८ अनेकान्तस्य । ९ एकान्तपर्युदास । १० -हानेकान्त-आ.ब.प. 11-स्य कल्प-आ०,२०१२ पाया- दिकल्पकत्वम् । १३ भन्यज्ञानस्य । १४ प्राद्यादिभेदवानिव प्रतिभासस्य । १५ विचारागूढं वि-मा०, ५०, प० । १६ विचारविषयलम् । १७ सं-भा०, २०, ५० ।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव: ५ २३२] २५३ दनादिति चेत् ; न; निर्भासावेदने तवैकल्यत्य ततोऽपि 'दुरवगमत्यात् । सत्यपि कचित्तद्वे. दने कुतः क्वचित्तवैकल्यवेदनम् ? न तावत्तन्निर्भासादेव; तेन तवैकल्याधिकरणस्य ज्ञानस्या- प्रतिवेदनात् । तदप्रतिवेदने तदाधेयस्य तद्वैकल्यस्य दुरवबोधत्वात् । न च तदधिकरणस्ये सेन प्रविपत्तिः, "तस्या नानुभवोऽपरः" [प्र०या० २।३२७ । इत्यस्य ज्याघातात् । नापि तदधिकरणेनैव ज्ञानेन तद्वैकल्यवेदनम् ; तेनापि तन्नि सस्यानववोधात् । न च निषेध्यान- वगमे सन्तिपेधपरिज्ञानम् । न चोभयविषयमेर संवेदनमस्ति यतस्तवैकल्यस्य कचिदवगमः; तत्रापि “तस्याः" इत्यादरुपद्रवात् । कथमेवमेकान्तप्रतिपेधस्य जात्यन्तरे परिज्ञानम् ? जात्यन्तरविषयं हि प्रमाणम् । न च तेन प्रतिपेध्यस्यैकान्तस्य प्रतिपत्तिः, येन च तस्य प्रतिपत्तिर्नये न तेन तनिषेधाधिकरणस्य जात्यन्तरस्य प्रतिवेदनम् । न चोभयविषयमन्यत् ; सत्यापि प्रमाणत्वे एकान्तविषयत्वस्य नयत्ये जात्यन्तर- १० विपयत्वस्य चायोगान । प्रमाणनयमावविकलेन तु [1] वत्परिज्ञानम् ; प्रमाणादिपरि- कल्पनावेफल्यापत्तेः । न च फुराश्चिन्निध्यतन्निपेधाधिकरणपरिक्षानमन्तरेण तनिषेधप्रतिपत्ति- रुपपत्तिमतीति चेत् । न; आत्मनस्तदुभयविषयस्य भावात् । आत्मा हि' नयपर्यायात्ममाण". पर्यायमुपधायन्न सर्वथा तच्छक्ति परित्यजति यतस्तद्विपयपरिज्ञानाभावात्तद्विविक्तया जात्यन्त- रस्य परिक्षानं न भवेत् । तत्परित्यारे हि "निरन्वयवादादात्मेव न स्यात् । न चैवम् , तस्य ९५ व्यवस्थापनात् । प्रमाणपर्याय एष नयशक्तिभावे कथं प्रमाणत्वमेव तस्य न नयत्वमपीति येत् ; न; एकान्ततः "प्रमाणत्वानभ्युपगमात् । अत एवं 'स्यात्प्रमाणम् , स्यादप्रमाणम्' इत्यादि सप्तभङ्गीप्रवर्तनम् । न चैवं परस्यापि प्राद्यादितनिषेधाधिष्ठानविपयं किञ्चित्सम्भवति यतस्तद्विवेकपरिज्ञान क्वचिद्भवेत् । तदिदमप्रतिपन्नविषयमेव परस्य वचनम्-"अविभागोड पि युद्ध्यात्मा" [प्र०या०२१३२७ ] इति । ततः सूक्तम्-माह्यादिनिराकरणस्याद्वैतगर्ताव. तारसोपानस्य परिपोषणमाकुलम् अवगमरहितत्वात् इति । एतो अन्तरश्लोको । स्यान्मतम्-'सारूप्येऽपि' इत्यादिना सारूप्य-सामान्ययोः साधारणो"दोपसमन्वयः प्रतिपादितः, ततश्च कथं सारूप्यवसामान्यस्यापि वस्तुत्वम् ? मा भूदिति चेत् ; न तस्य 'सामान्यविशेपार्थात्मवेदनम्' इत्यनेन प्रत्यक्षविषयत्वनिवेदनात् , अवस्तुनः प्रत्यक्षषि- पयत्वानुपपतेरिति ; तबाह- सामान्यमन्यथा सिद्धम् [न हि ज्ञानार्थयोस्तथा ॥३१॥ अष्टेरर्थरूपस्य प्रमाणान्तरतो गतेः। ] इति । २० . मागादिप्रतिभासावेदने । २ स्वसंवेदनादपि । ३ मायादिवेदो। ४ तवैकल्यादिकार-भा., ५०, १० । ५ ज्ञानस्य । ६ -या ध्या-द.। . एकान्तस्य । - तच्चि-मा०, य०, प.1 ९दि नैय -RTO ५. 1 दिनयं प-१० । १० -जनयप-मा०, ५०, प० । 11 क्षणिस्त्वप्रमात् । १२ प्रमावा-भार, व.। १३ प्राह्मादिविवेकपरिक्षानम् । १४ दोषमन्वयः भा०,१०,११५ स्यापविक रसो.३।
११३२] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः २५५ भवत्वन्यत एव तत्प्रतिपत्तिरिति चेत् । तदपि यदि प्रत्यक्षम् । स एव दोपः-सारू- प्यानपेक्षे ततस्तत्परिनाने सारूप्यकल्पनावैफल्यस्य, तदपेक्षे तत्तस्तत्प्रतिवेदने परस्पराश्रयस्य चाविशेषात् । पुनरपि प्रत्यक्षान्तरात्तत्प्रतिपत्तिकल्पनायामनवस्थानात् । ततो नान्यतोऽपि प्रत्य. क्षादर्थवेदनं सम्भवति । तदेवाह-'प्रमाणान्तरतोऽगतेः' इति । प्रत्यक्षादन्यत्प्रत्यक्षं प्रमाणं तदन्तरं तस्माद् अगतेरपतिपत्तेः 'अर्थरूपस्य' इति । अनुमानात्तत्प्रतिपत्तिरिति चेत् ; न लिङ्गाभावात् । नीलाद्याकार एव लिङ्गं तस्यार्थ- कृतत्वादिति चेत् ; अत्र विश्वरूपस्य प्रत्यवस्थानम्-"क तन्निवन्धनं ज्ञानस्याकारवत्वं दृष्टं येनैवमुच्यते ? आकारद्वयदर्शनाभावात् । न हि ज्ञानाकारादन्योऽर्थाकार उपलभ्यते यतस्तत्कृतत्वं ज्ञानाकारस्थोपलभ्यते । उपलम्भे या तस्यापि प्रतिभारामानसात् ज्ञानाकार- तयेति तनिबन्धनमन्य एवार्थाकार उपलब्धव्यः । तत्राप्येवंकल्पनायामनवस्थैव । १० ततोयस्य वामानेण सत्ताभ्युगमो न प्रमाणनिवन्धनः" [ ] इति; तद्युक्तम् । अन्वयबलात् तदनुमानानभ्युपगमात् । न हि चौद्धस्य संवेदनाकाराद्विपयाकारानुमानम् अन्वयत्र- लात् येनैवंप्रसङ्गः स्यात् , अपि तु व्यतिरेकसामादेव । तथा च तस्य वचनम्-"चक्षुरालो. कमनस्कारेषु सत्स्वपि न भवति स्तम्भशून्याभिमते स्तम्भाकारमक्षविज्ञानम् , अन्यत्र- झटिति एव भवति ततो ज्ञायते-अन्येन केननिदन यस्तुना भवितव्यम् , यदभावादन्य. १५ प्राभाकः स तथाभूतोऽयः प्रमेयो बाह्यः" [प्र०वार्तिकाल० ३।३९०] इति । व्यतिरेकवला. दपि गमनमनुमानमिति प्रसिद्धमेव । नैयायिकस्यापि अन्तःकरणादेस्तत एंव प्रतिपत्तेः । भवतु सहि व्यतिरेकवलादेव ज्ञानाकारस्य लिङ्गत्वमिति चेत् ; न; असिद्धत्वात् । असिद्धो हि तदाकारो निराकारस्यैव ज्ञानस्यानुभवात् , तत्कथं तस्य व्यतिरेकः ? सिद्धस्येव क्वचित्तदुप. पत्तेः । सिद्धेऽपि यदाकारे ततोऽर्थस्य नान्यादशस्यानुमानम् ; सारूप्याभावप्रसङ्गात् । 'अन्या. २० दशश्चार्यः, तत्सरूपञ्च संवेदनम्' इति व्याघातात् । अथ यादृशं संवेदनं नीलरूपं तादशस्यैव ततोऽनुमानम् ; कुत एतत् ? ताशादेव ताशस्य सम्भवादिति चेत् ; न, अन्याशादापि सादशस्य सम्भवदर्शनात् यथा निर्विकलाद्विकल्पस्य । तत्रापि विकल्पवासनासहायादेव विक. ल्पत्वमिति चेत् ; आकारवत्वमप्याकाण्यासनासाहाय्यादेव किन्न स्यात् यतस्ततोऽर्थस्य तादृश- स्यानुमानम् ? यासनाप्रभवत्वे विकल्प एव दर्शनं भवेदिति चेन् ; किगिदं विस्पत्वं नाम ?, २५ साधारणाकारत्यमिति चेन् ; अवाप्सनाप्रभाले तत् किं नास्ति ? तथा चेन् । मनोऽपि कथम- सदाकारं तदाकारतानं जनयेत् ? तदाकारमेव गन इति चेन्; तवेदनं वहि सविकल्प माप्तम् , नानावययसाधारणस्य स्थूलरूपस्य वेन प्रतिवेदनात् । भस्विति चेत् । न तद्वदेव महिरयंवेदनस्यापि सविकल्पकत्वोपपत्तेः । अन्तरिख बहिरपि स्थूलरूपस्य परमार्थसत्त्वाऽविये. धात् । तदुक्तम्- -यथा स्यात् भा०. य., १० । २ व्यतिरेकबरगदेव । ३ सम्भवति दर्शनात् भा०, पा, प.। विकणेऽपि । ५विरुममेव ना.1 ६ विरुपाता.। -नदि मा, य...। तदेव पहिरवत बहि-आ०, मा। .. ३० - - २५४ न्यायचिनिधयपियरणे [११३२ येन हि प्रकारेण मामान्यं दुष्यति 'व्यक्तिभ्यो व्यतिरेकेण-न्यतिरेके हि 'वासां वन्' इवि व्यपदेशो न स्यात् , असम्बन्धात् । न चानुपकारे सम्बन्धोऽपि अतिप्रसङ्गात् । व्यक्तिभिस्तदभिन्यतिरुपकार इति चेत् , अभिव्यतिरपि नियताभिरेव पुतः ? कुत्तश्चित्प्रत्या- सत्तेरिति 'चेत , तया ताः समानप्रत्ययमेर पुर्वन्तु किं सामान्येन ? सत्यपि तस्मिन् सत्यल्प. ५ नस्यायश्यम्भायात् । एवं हि पारम्पर्यपरिश्रमः परिहतो भवति, अन्यथा नियमेन तस्योपनिपा- तात्-प्रत्यामतेरभिव्यक्तिः सामान्यस्य ततश्च समानप्रत्यय इति । नित्यत्वेन प-नित्यत्वे दि तस्य नित्योपलम्भनं नैच्छतेनित्यत्वात् । न तस्याः कुनश्चित्प्रतिबन्यो नित्यत्वहानेः । अतन्छ. तिने तु न पदाचिदपि दर्शनं व्योमारविन्दरत । न च तस्य फुतश्विच्छता वानम् अनित्य. वोपनिपातात । एतेन व्यापित्वमपि चिन्तितम् । व्यापित्रे हि तस्य सत्र प्रतिपत्तिः तच्छत्तो। अतच्छत्ती तु न क्वचिदपि स्यात् । शनिप्रविबन्धनदाधानयोः पूर्ववदयोगान्' इति । न तथा स्याहादिनां सामान्यं सिद्धं किन्तु अन्यथा अन्येन क्याञ्चिदव्यतिरेकादिप्रकारेण । संश- पर्यायस्पं हि सामान्य नै व्यक्तिभ्यो व्यतिरिक्तमेव तव्यतिरेकस्यापि दर्शनात् । न च तस्य नित्यत्वमेन, द्रव्यतो नित्यत्वेऽपि पर्यायतो विपर्ययात् । नापि व्यापित्वमेव, एक्त्वोपचारतो व्यापित्वेऽपि वस्तुतः प्रतिव्यक्ति पर्यवसानात् । प्रसिद्धच सामान्यमीदशं सोगतस्यापि प्रत्यक्ष- विपयतया तस्याभ्यनुज्ञानात्-"दृष्टेश्च यमलादिपु" [प्र. वा० २१३८१ ] इति वचनान् । ननु एवमर्थज्ञानयोरपि न दुप्यत्येव सारूप्यं दूपणनियन्धनस्य नित्यत्वादेस्तंत्राप्य- भावादिति चेत् , अाह-'न" हि ज्ञानार्धयोस्तथा' इति । तात्पर्यमत्र-मा भूत्सारूप्ये नित्यत्वादेः सामान्यधर्मस्याभावात् तत्प्रयुक्त उपप्यो निरंशत्यस्य तु सलक्षणेष्ववश्यम्भावान , "तत्प्रयुक्तस्य तु तस्य नास्त्येव परिहारः, तत एवं प्रायशः सामान्यदूषणमित्युक्तम् । तत्र सर्वात्मना सारूप्ये अर्थवत् ज्ञानस्यापि जटत्वादर्थस्येव जीवनं "न ज्ञानस्येति पस्य सारूप्यम् ? ज्ञानपद- र्थस्यापि वा चेतनत्वाज्ञानस्येवावस्थान नार्थस्येति केन सारूप्यमिति ? ववो न तथा जैन. कल्पितेन प्रकारेण ज्ञानार्थयोः सामान्यं सारूप्यं सिद्धम् । अपि च, सारूप्यं नाम द्विष्ठो धर्मः, तदधिकरणप्रतिपत्ताव शक्यते प्रतिपत्तु नान्य. तरप्रतिपत्तिमानादिति ज्ञानवदर्थोऽपि प्रतिपत्तव्यः । भवत्वेवमिति चेत्, कुतस्तत्प्रतिपत्तिः । तत एच प्रत्यक्षात् यस्य सारूप्य परिजिज्ञास्यत इति चेत्, ततोऽपि यासारूप्योपायमेव उद्वहणं व्यर्थमेव सारूप्यक्त्पनम् । सारूप्योपायमेति चेत् , न, परस्पराश्रयप्रसङ्गात्-'प्रतिपत्तावर्धस्य तत्सारूप्यपरिज्ञानम्, परिज्ञाते च तस्मिंस्तदुपायमर्थप्रतिवेदनम्' इति । तन्न ततोऽर्थदर्शनम् । तदेवाह-'अदृष्टेरर्थरूपस्य' इति । साधनमिदम्, 'न हि' इत्यादि साध्यम् । २० १ चेन तयो स-आग, ब०, ५०। २ व्यय । ३ तच्छतिनि-पा०, य, ५०। ४-चयादान- मा०, २०, ५० । ५ ननु तया श्रा० ब०,१०। ६ सादृश्यपर्याय-भा०, २०, प० । न तयत्ति-आ०, व, प.। तस्य द्रव्यत्व-भा०, २०, ५०। ९ तत्राभावा-भा०, घ.,५०।1.न विज्ञा-सा., ०,१०। निरशत्वप्रयुक्तम्य । १२ नार्थ ज्ञानस्येति तस्य भा०, २०, प० । १३ तद्विष्टो आ०, २०, प.। , प्रथमः प्रत्यक्षमस्तान: - १।३२] भगवन्यत एव तत्प्रतिपत्तिरिति चेत् ; तदपि यदि प्रत्यक्षम् ; स एष दोषः-सारू- प्यानपेक्षे ततस्तत्परिज्ञाने सारूप्यकल्पनायेफल्यस्य, तदपेक्षे ततस्तत्प्रतिवेदने परस्पराश्रयस्य चाविशेषात् । पुनरपि प्रत्यक्षान्तरात्तत्प्रतिपतिकल्पनायामनवस्थानात् । ततो नान्यतोऽपि प्रत्य- क्षादर्थवेदनं सम्भवति । तदेवाह-प्रमाणान्तरतोगतः' इति । प्रत्यक्षादन्यत्प्रत्यक्षं प्रमाणं सदन्तरं तस्माद् अगतेरप्रतिपत्तेः 'अर्थरूपस्य' इति । अनुमानात्तत्प्रतिपत्तिरिति चेत् ; न लिङ्गाभावात् । नीलाद्याकार एय लिङ्ग तस्यार्थ- ऋतत्वादिति चेत् ; अत्र विश्वरूपस्य प्रत्यवस्थानम्-"क्क तन्निवन्धनं ज्ञानस्याकारवत्वं दृष्ट येनैवमुच्यते ! आकारद्वयदर्शनाभावात् । न हि ज्ञानाकारादन्योाकार उपलभ्यते यतस्तत्कृतत्वं ज्ञानाकारस्योपलभ्यते । उपलम्भे वा तस्यापि प्रतिभासमानला ज्ञानाकार- तैवेति तन्निबन्धनमन्य एवार्थाकार उपलब्धव्यः । तत्राप्येवंकल्पनायामनवस्थैव । १० ततोऽर्थस्य यामात्रेण सत्ताभ्युगमो न प्रमाणनिबन्धनः" । ] इति; तदयुक्तम् । अन्वयबलात् तदनुमानानभ्युपगमात् । न हि बौद्धस्य संवेदनाकाराद्विपयाकारानुमानम् अन्वयय- लात् येनैवंप्रसङ्गः स्यात् , अपि तु व्यतिरेकसामादेव । तथा च तस्य वचनम्-"चक्षुरालो- कमनस्कारेषु सत्स्वपि न भवति स्तम्भशून्याभिमते स्तम्भाकारमक्षाविज्ञानम् , अन्यत्र- झटिति एव भवति ततो ज्ञायते-अन्येन फेनचिदत्र पस्तुना भवितव्यम् , यदभावादन्य. १५ प्राभावः स तथाभूतोऽथः प्रमेयो बाह्यः" [प्र०वार्तिकाल० ३।३९०] इति । व्यतिरेकवला- दपि गमनमनुमानमित्ति प्रसिद्धमेव । नैयायिकस्यापि अन्तःकरणादेखत एवं प्रतिपत्तः । भवतु सहि व्यतिरेकवलादेव ज्ञानाकारस्य लिङ्गत्यमिति घेत् ; न; असिद्धत्वात् । असिद्धो हि तदाकारो निराकारस्यैव ज्ञानस्यानुभवात् , तत्कथं तस्य व्यतिरेकः ? सिद्धस्यैव क्वचित्तदुप. पत्तेः । सिद्धेऽपि तदाकारे ततोऽर्थस्य नान्याशस्यानुमानम् ; सारूप्याभायप्रसङ्गात् । 'अन्या. २० दृशश्वार्थः, तत्सरूपञ्च संवेदनम्' इति व्याघातात् । अथ यादृशं संवेदनं नीलरूपं तादशस्यैव ततोऽनुगानम् ; कुत एतत् ? तारशादेव तादशस्य सम्भवादिति चेत् । न; अन्याशादपि सारशस्य सम्भवदर्शनात् यथा निर्विकल्पाद्विकल्पस्य । तत्रापि विकल्पयासनासहायादेव विक. रूपत्वमिति चेत्, आकारवत्त्वमप्याकारघासनासाहाय्यादेव किग्न स्यात् यतस्ततोऽर्थस्य तादश- स्यानुमानम् ? वासनाप्रभवत्त विकल्प एव दर्शनं भवेदिति चेत् ; किमिदं विर्फल्पत्वं नाम ?, २५ साधारणाकारत्वमिति चेत् ; अवासनाप्रभवे तत् किं नास्ति ? तथा चेन् ; मनोऽपि कथम- सदाकारं तदाकारतानं जनयेन् ? तदाकारमेव मन इति चेन्; नवेदनं तहि सविकल्प प्राप्तम् , नानावययसाधारणस्य स्थूलरूपस्य सेन प्रतिवेदनात् । भनत्विति चेत् ; न; तद्वदेव पहिरर्यवेदनस्यापि सविकल्पकत्योपपत्तेः । अन्तरिव बहिरपि स्थूलरूपस्य परमार्थसत्त्वाऽविरो. धात् । तदुक्तम्- - .. .. 1-वस्था स्यात् मा, य०, प० । २ व्यतिरेकवल्यदेव । ३ सम्भवति दर्शनार भाग, या, ५०॥ विकऽपि। ५विकल्पमेव दताविकाता। -पतन्कि माय.,१०। सदेव पहिरवत महि-मा०, मा ५ १० २५६ न्यायविनिश्चयविवरणे [११३२ "चिनार्थज्ञानचिनं वस्तुरूपं न कि बहिः ।" [ ] इति । विचारासहत्वान पहिः स्थूररूप परमार्थः इति चेत्, न, अन्तरपि तदसहत्वस्य यक्ष्यमाणत्वात । माभूदुभयत्रापि तदिति चेत् , असतः कथं तस्यावभासनम् ? मरीचिकातोय. चदिति चेत्, न, स्वतोऽप्रभासने तदसत्चविरोधान् , स्वसवेदनस्य मिथ्यात्वानभ्युपगमात् । अन्यतोऽपि न निराकारात् तदयभासनम् , सासारवादपल्यापत्तेः । आकारवये तु तदप्य. सदेव भवेत् असदाकारत्वात् । तस्याप्यन्यतस्तथाविधादयभासनमिति चेत् , न, अनरस्थानात् । मा भृदयमासनमपि तस्येति चेत् , न, दृष्टत्वान् । दृष्ट हि तस्यावभासनम् , तदपहरे नीलादी निरशे कः समाश्वासो यत्र दर्शनगन्योऽपि नास्ति १ भवतु सर्वाभावः तस्यापि वैश्चित्प्रतीक्षणा. दिति चेत्, ननु इदमत्यद्भुतमनभाति यत् 'सां नास्ति, तत्प्रतीक्षण च विद्यते' इति । तदप्युक्तम्- "चित्रमेकमनिच्छनिश्चिनं शून्यं प्रतीयते" [ ] इति । वन स्थूलाकारस्य प्रतिक्षेपो न्याय्यः । नाप्यसत एव तस्य प्रतिमासनम् । न च मरीचिकातोयमन निदर्शनम् , तस्याप्यसतः साकारयादे प्रतिभासायोगात् , पूर्वोतन्यायात् । ततः स्थलाकारमेवे दर्शनम् , तस्य च साधार- णाकारतया विक्ल्पत्वमवासनाप्रभवत्वेऽपि समागम् । न समानम् अननुसन्धायित्वात् , अनु- १५ सन्धायित्व हि विकल्पकत्वम् , तदभायात्साधारणाकारमपि दर्शन निर्विकल्पकमेवेति चेत्, न, वासनाप्रभवत्वेऽपि समानवान् । 'तत्प्रभवस्यापि स्थूलप्रतिभासस्याननुसन्धायित्वाविशेषात् । तथापि तस्य न वासना कारणमिति चेत् , विकल्पस्यापि न स्यात् । ततो निर्विकल्पाद्विकल्प. स्येव निराकारादेवार्या आकारवतोऽपि ज्ञानस्योत्पत्तिसम्भवात् न तदाकारादर्थस्य ताशस्यानु- मानमुपपन्नम् । एतदेह-प्रमाणान्तरतोऽगतेः। प्रत्यशादन्याप्रमाणं तदन्तरम् अनुमान २. तरमाद् अगतेरप्रतिपत्तेः 'अर्थरूपस्य' इति । तथा च निषिद्धमेतत्-"नयाभ्यामर्थ परि- छिद्य प्रपर्तमान" [ ] इति, प्रत्यक्षानुमानयोरन्यतरस्याप्यर्थस्याप्रतिवेदनात् । ततः स्थितम्- सामान्यमन्यथासिद्धं न हि ज्ञानार्थयोस्तथा ।। अष्टेरर्थरूपस्य प्रमाणान्तरतोऽगतः । इति । स्यान्मतम्-निराकारत्वे ज्ञानस्य कलस्य विपय, स्यात् ? समकालो नीलादिरिति चेत् , न, तत्र प्रतिरन्धाभावात् । अंप्रतिबन्धस्यापि ततिपयत्ने सर्वस्य सर्वदर्शित्वप्राः। हेतुन्वेन प्रतिबद्ध एव सोऽपीति चेत् , न तर्हि तत्समकालत्वम् । न हि हेतोः फलेन समकालत्वम् । तत्त्वे हि प्रागसत्त्वम् , असतश्चासामध्यं प्राक् । पश्चात्कार्यकाले सामर्थ्यमिति , परमार्थमिति भा०, २०, ५०1३-मासमाने भा०,०, प० । ३ त प्रत्यक्षं वि-भा०,०,५०। ५ -व निदर्श-भा०, २०, ५०। ५ नाप्रतिभासस्यापि । वासनाप्रभवस्यापि । ६ -रादेवासाधारणाकारवतोऽपि भा०,०प०।७ प्रतिव धरहितस्यापि । ८ तुलना-प्र. वातिकाल. १२४७ ।
चेत् । प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव कार्यकाले कार्यस्य विद्यमानत्वाद् व्यथं सामर्थ्यम् । एवं हि कार्यस्य कालो यदि तंदा कार्यस्य सत्त्वम् । तस्मात् प्रागेव सत्त्व सर्वहेतूनाम् । अतोऽर्थोऽपि हेतुर्न फलभूतस्वग्राहक- विज्ञानसमानकालभायी । तदुक्तम्- "असतः प्रागसामर्थ्यात्पश्चाचानुपयोगतः । प्राग्भावः सर्वहेतूनां नातोऽथः स्वधिया सह ॥' [प्र०वा०२१२४६] इति । ५ भवतु तर्हि प्राग्भाविन एव विषयत्वं तस्य हेतुत्वेन ज्ञाने प्रतिबन्धादिति चेत् ;न; ज्ञानकाले तस्याभावात् । न ह्यसतस्तत्काले तद्विपयत्वम् , एवं हि निर्विपयत्वमेव ज्ञानस्य स्यात् । साकारवादिना तु नायं दोषः, खाकारज्ञानहेतुतयेव तस्य तद्विषयत्वोपपत्तेः । तदप्युक्तम्- "भिन्न कालं कथं ग्राह्यमिति चेद्राह्यतां विदुः । हेतुत्वमेव युक्तिज्ञा ज्ञानाकारार्पणक्षमम् ।।" [अव्वा०२।२४७] इति ; तत्राह- अतीतस्यानभिव्यक्ती कथमात्मा त्मसमर्पणम् ॥३३॥ असतोऽज्ञानहेतुत्वे व्यक्तिरव्यभिचारिणी । इति यदि ज्ञानकाले अतीतस्य तद्धेतोरभावात् अनभिव्यक्ति अप्रतिपत्तिः तर्हि तस्या- मभ्युपगम्यमानायां कथमात्मसमर्पणं संवेदने स्वाकारोपनिधानम् ? 'अतीतस्य' इति १५ सम्बन्धः । कदेतदिति चेत् ? असतो ज्ञानफाले अविद्यमानस्यातीतस्य अज्ञानहेतुत्वे ज्ञानहेतुत्वाभाचे तद्धेतोरेव हि सनात्मसमर्पणं परस्याभिप्रेतम् "हेतुत्वमेव युक्तिज्ञाः” इत्या- दिवचनात् । असतश्च ज्ञानकाले यदि तरतुत्वं तद्वद्यत्वमपि स्यात्, निर्विपयत्वमेवं संवेदनस्य स्यात् । 'असत्तस्य वेद्यम्' इति 'सन्न वेद्यम्' इत्यादिति चेत् ; निर्हेतुकत्वमप्येवं स्थान 'असत्तस्य हेतुः' इत्यत्रापि 'सन्न हेतुः' इत्यर्थात् । स्वकाले सत एव हेतुत्यान्न मिति चेत् ; निर्विपयत्वमपि न भवेत, स्वकाले सत एव तस्य तद्वद्यत्वात् । अन्यकोलस्यापि वेद्यत्वे तदविशेपात् चिरातीवमपि वेद्यं भवेदिति न तत्र प्रमाणान्तरकल्पनं फलवत्, प्रत्यक्षत एव सिद्धेरिति चेत् । न हेतुत्वेऽप्येवं प्रसङ्गात् । अन्यकालत्वाविशेषेण पिरातीतस्यापि हेतुत्वे स्वात्मसमर्पणे च प्रत्यक्षसिद्धेः प्रमाणान्तरवैफलस्य चाविशेपात् । शक्तस्यैव हेतुत्वम् , न च चिरातीतस्य शक्तत्वम् अनन्तरस्यैव संवेदनोपजनने सामर्थ्यात् , ततो नायं प्रसङ्ग इति चेत् ; न; २५ प्रसङ्गान्तरस्याप्येवमनुपपत्तेः । शक्यत्यैव हि वेद्यत्वम्, न चिरातीतस्य शक्यत्वम् , कालातीतस्यैव तद्वित्तं ( तद्वित्ति) प्रति शक्यत्वात । तदेवाह-व्यक्तिरपभिचारिणी। व्यक्ति अतीतस्य प्रतिपत्तिर्न व्यभिचारशीला अनन्तरवचिरप्रवृत्तेवप्रवृत्तः। यत्पुनरेतत्-अतीतादेगपि प्रत्यक्षविषयत्वे वर्तमानत्वमेय अभिमतवर्तमानवदिति हेतुफत्व• २० अल्प- १ कार्यात प्रारकाले । तदाकारस्य-आ०, ब०, ५०। २ प्रबन्धा-भा०, ०, ५०। ३ कथञ्चि- दात्मरामर्पणं संवेदनस्वा-भा०, ५०, प.। ५ तदात्तस्य मा०, २०, ५०। ५-कालेस्यापि भा०, प., प.। ६ -लवादवि-भा०, प०, प० । ७ प्रसादकालान्तरस्याप्यैव-भा०, ९, १०, स०1 - न च सिद्धमेव साध्यम् , न्यायविनिश्चयविवरणे [१४ तत्रापि किमिदं वर्तमानत्वमेव नाम ? प्रत्यक्षविषयत्वमेवेति चेत्, न, साध्यस्यैव हेतुत्वा. योगात , तद्विपयत्वमेव हेतुस्तदेव साध्यमिति कथमिव न्यायवेदिनः प्रतिपद्येरन् ' 'अनित्यम् अनित्यत्वात' इत्यादिवत् साध्यत्वानुपपत्तेश्च सिद्धत्वात् । सिद्ध हि तद्विपयत्वमतीतादे। असिद्धस्य तत्त्वेन प्रसिद्धत्वात । वर्तमानत्वं वर्तमानव्यवहारविषय- त्वम् , तदेवातीतादो प्रत्यक्षविषयत्वेनोपपद्यते, न हि विषयत्वादन्यत् तव्यवहारनिरन्धनं तस्यैव तनियन्धनत्वेन प्रसिद्धेऽपि वर्तमाने प्रतिपत्तेरिति चेत्, किमेव नीले पीतव्यवहार- विपयत्वन प्रकल्प्यते । प्रसिद्ध पीते तद्विषयस्यैव तव्यपहारनिबन्धनत्वेन प्रसिद्धः, तस्य व नीलेऽपि भावात् । एवं लोको न क्षमते तस्य तथा प्रकल्पनाभावादिति चेत्, न, अन्यत्रापि तुल्यत्वात्-लोकस्यातीतादावपि वर्तमानव्यवहारकल्पनस्याभावात् । वर्तमानकालसम्बन्धित्वं १० वर्तमानत्वमिति चेत् , न, कालस्य तत्र प्रमाण(णा)भावोपन्यासेन स्वयं प्रतिक्षेपात् । अप्रतिक्षेपेऽपि यथा फस्यचित्प्रत्यक्षविषयस्य वर्तमानकालसम्बन्धाद् वर्तमानत्वम् , एवम् अतीतादिकालसम्ब- न्धादतीतादित्वमपि भवेदिति कथ सर्वस्य प्रत्यक्षविपयस्य वर्तमानत्योपपादनमुपपद्येत ? यदि चायं निर्गन्धः प्रत्यक्षयेद्यं वर्तमानमेव नातीतादिकमिति , तर्हि प्रत्यासन्नमेव तन दूरादिकमित्यपि भवेत् । शक्यं हि वक्तुम् 'पर्वतादयोऽपि दूरादितयाभिमताः प्रत्यासन्नाः १५ प्रत्यक्षवेद्यत्वात् पापीकूपादिवत्' इति । प्रत्यक्षवाधनान्नैवमिात, प्रत्यक्षेणैव पर्वतादी दूरादित्वस्य प्रतिपचेरिति चेत् , न, अन्यत्रापि समानत्वात् , अतीतादावपि वर्तमानकल्पने प्रत्यक्षबाधन- स्याविशेषात् , अतीतादेरतीतादितयैव प्रत्यक्षेण प्रतिपत्तेः। अतीतादी प्रत्यक्षमेव न पर्तते तत्काले तस्याभावात् , परप्रसिद्धेन तु तस्य विपयत्वेन वर्तमानत्वापादनमिति चेत् , दूरे पर्वतादावपि न वत्प्रवर्तते तद्देशेऽपि तस्याभावात् , अतद्देशेऽपि तत्प्रवृत्ती अतत्कालेऽपि स्यात् । २० अवश्य चैतदेवमभ्युपगन्तव्यम् , कथमन्यथा योगिप्रत्यक्षस्यातीतादी प्रवृत्तिः १ वर्तमानमात्र. विपयत्ये तस्याशेपज्ञत्वविरोधात् । तदपेक्षया सर्व वर्तमानमेवेति चेत् , कथमेवमतीतादित्वेन भावानामुपदेशो वर्तमानतयैव सदुपपत्तेः, धर्तमानतया प्रतिपन्नस्यावीतादित्वेनोपदेशे तस्य वच- फत्वेन प्रामाण्याभावानुपगात् । अस्मदापेक्षयाऽतीतादित्वमध्यस्त्येव पामिति पेत् , अरम. दादेरेव तर्हि तथा तदुपदेशो युक्तो न योगिन', तदपेक्षया "तेपु "तदभावात् । "किं वेदम्-अस्मदाद्यपेक्षयापि तेपामतीतादित्यम् १ अदर्शनविषयत्वमेव । "तस्मादती- तादि पश्यतीति कोयः ? अन्येनादृश्यमानं पश्यति" [ ५० यातिकाल० १११३८] इत्यलवारषचनादिवि चेत् , न, तात्कालिकस्यापि व्यवहितविप्रकृष्टादेरन्येनादर्शनसम्भयात् । अदृश्यमानं कथमस्ति उपलम्भलक्षणत्वात्ससाया इति चेत् ? किमिदानी यावदेव दृश्यमस्मक्षादे- स्तावदेवास्ति ? तथा पेत् , योगिनापि तापदेव दृश्यमिति न योगीवरयोः कश्चिद्विशेष: स्यात् । - 1-मामाघ माम मा., प., प.1 विषयत्वस्यैव । ३ व्यवहारनिव धनत्वेन । " "न प्रमाणे नारि गति कालस्य विद्यते ।"-प्र. वादिकाल. ११३८ । प्रयक्षवेधम् । अतीतकाले। . योग्य पेश्या । -दिमत्वेन भा.प.प.) ९ योगिन । १० । । अवीतादियामावात् ।।२ दिनम् ।
इति चेत् । - १॥३४] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः २५९ अस्मदादीनां दृष्टमतीतम् , द्रक्ष्यमाणमनागतमिति चेत्, तत्तहि कथं योगिदर्शनापेक्षयापि वर्तमानं भवेत् उपरतत्वादनुत्पन्नत्वाच्च । अस्मदादिदर्शनत्यैव तद्विपयस्योपरमानुत्पत्ती न वस्तुन तस्य तर्हि स्यादक्षणिकत्वं पूर्वापरकालव्यापित्वात् । तन्न अस्मदाद्यपेक्षया भावाना- मतीतादित्वात्तथात्वेनोपदेशः । तेपामुपदेशोऽपि वर्तमानतयैव तथैव स्वयं परिज्ञानादिति चेत् । न तर्हि तदुपदेशादुपायोपेयभावपरिज्ञानम् , वर्तमानवयोपदिष्टानां तद्भावाभावात् । ५ नहि वर्तमाना एव भावाः केचित्केपाञ्चिदुपायत्वमुपेयत्वं वा प्रतिपद्यन्ते "प्राग्भावः सर्वहेतूनाम्" [प्र० वा० २।२४६ ] इत्यस्य व्याघातात् । अतो व्यर्थमेव तदन्वेपणम् , सोपायहेयोपा- देयतेत्त्वपरिज्ञानस्य तदन्वेपणादिष्टत्वात् , 'वस्य च ततोऽसम्भवात् । यतो न सुभापितमेतत्- "ज्ञानवान् मृग्यते कश्चित्तदुक्तप्रतिपत्तये ।" [प्र. वा० १॥३२ ] इति । तस्मादतीतादितया प्रतिपन्नत्वादेव भावानां योगिना सथोपदेश इत्यगीकर्तव्यम्, अन्यथा १० योगिन एवाभावापत्तो-यद्यसी वर्तमानतयैव सर्व पश्यति; स्वसन्तानभाविनः पूर्वोत्तरसमय. भाविनिरवशेपक्षणानपि तथैव पश्यतीति नासो कस्यचित्कार्य पूर्वाभावात् , नापि कस्यचित्का- रणमुत्तराभायादित्यसभेव खरविपाणवत् । ततस्तंदभावमनभ्युपगच्छता यथास्वकालभाविन एव तान स पश्यतीति वक्तव्यम् । तथा च "तैरेव व्यभिचारादयुक्तमेतत्-'अतीतादिकमपि वर्तमान प्रत्यक्षविपयत्वात् प्रसिद्धवर्तमानवत्' इति । तस्माचत्तत्कालभावितयैव अतीतादेरस्म. १५ दादिप्रत्यक्षव्यक्त्यापि प्रतिपत्तिः, न तस्याः कालव्यत्ययलक्षणो व्यभिचारोऽस्ति । तदेवाह- व्यक्तिरव्यभिचारिणी। साकारमेव तु विज्ञान व्यभिवारि द्विचन्द्रादेहिरभावेऽपि तदाकारस्य ज्ञानस्योपल. म्भात् । न "तन्मात्रात्तद्वस्तुप्रतिपत्तिर्विशिष्टादेव" बहिर्भावोपनीताततस्तत्परिक्षानोपगमात्, तस्य पाव्यभिचारादिति चेत् ; स्यादेतदेवं यदि यहिर्भावस्य पृथग्दर्शनं भवेत्-'इदं वहिर्भावोपनीत. २० माकारयद्विज्ञानम् इदमन्यथा' इति । न चैवम् , सर्वदा ज्ञानाकारादेव तत्प्रतिपत्तः, तस्य च सत्यसति चार्थे विशेषाभावात् । नन्वेवं निराकारापि व्यक्तिर्व्यभिचारिण्येय "द्विचन्द्रादौ पहिरसत्यपि तदर्शनात् । निर्याधात् तद्व्यक्तिरव्यभिचारिण्येक, द्विचन्द्रादिव्यक्तिस्तु वाधावतीति चेत् ; न; बाधकस्यास- म्भवात् । तथा हि- "पाधकः किं तदुच्छेदी कि या ग्राह्यस्य हानिकृत् । ग्राह्याभावज्ञापको वा नयः पक्षाः परः कुतः ॥ यदि याधको माध्यप्रत्ययस्थामावं करोति वदालम्बनस्य चा; तदा "नव जातम् , अजावं वा? वस्तुनः । र सतातादीनाम् 1 ३ कार्यकारणभाप। " योग्यन्वेषणम् । ५-पतपरि-भा,प०,१० । ६ तरखपरिज्ञानस्य । - योगितः। ततो न संभ-भा०, २०, ५०।८ स्यते भा०, २०, ५०। ९ योग्यभाषम् । १.अतीतादिभिरेव । ॥ दायरानमात्रोपलम्मात् । १२-तिविशेगदेव भा०, ..!-सद्धि- चन्द्रा-भा०,५.1- तद्धि चन्द्रा-प.शाध्यम् ।
प १० . न्यायचिनिश्चयविवरणे 1 ११३४ अजातस्य कथं तेनं तस्याभायो विधीयताम् । न जातु खरङ्गस्य ध्वंसः केनचिदर्पितः ।। जातस्यापि न भावस्य ततोऽभायो विधीयते । "तदस्ति हेतोस्तन्नास्ति बाधकादिति साहसम् ।। यद्यजातोऽसौ भावः केन तस्याभावः क्रियते ? देवरक्ताः किंशुकाः कस्तान पुना रजयति ? अथ जातः कारणात् ; तथा सति यथा जातस्तथास्ति, कथं तत्र विनाशावेशः ? तथा सति तदेव नष्टं तदेव सदिति महदसमजमम् । अथ ,यथा न जातस्तथा विनाश्यते तथा सति- अन्यरूपेण जातस्य यद्यन्येन विनाश्यता । नीलादेरन्यपीतादिरूपेणास्तु विनाश्यता ॥ न च तस्य तपमिति सैव देवरक्तता । तेन च रूपेणासी पथाद्विनाश्यते । अथ सर्वदा यदि पश्चाद्विनाश्येत पूर्व तद्रूपता भवेत् । तेन रूपेण जातस्य कथं पवाद्विनाशनम् ? ।। तदेव तेन रूपेण जातः पश्चाद्विनाश्यते । पश्चात्तद्रूपता नास्ति देवरक्तः म किंशुकः ॥ पूर्वमेवारस नाशवेत्कारंणादेव तत्तथा । नाशकेन परं कार्य किमस्येति निरूप्यताम् ? ॥ एतदालम्बनविनाशेऽपि समानम् । तथा हि- यथा स जातस्तेनास्य रूपेण न विनाशनम् । यथा न जातस्तेनापि न रूपेण विनाशनम् ।। व्यर्थकत्वादशक्यत्वात् प्रमाणेनाप्रतीतः अर्थस्यास्य"कथं नु स्यात्कल्पनायि सचेतसाम् ॥ "अब आलम्भनामावं ज्ञापयति बाधकः तदप्यसत्- यदा स दृश्यते भाषस्तदाऽभागो न ोध्यते । "यदा न दृश्यते भावो [5] दर्शनं तस्य वोधकम् ।। "तदा भावप्रसिद्धी च नाभावः "सविशेषणः । २० बाधकेन । २ बाध्यप्रययस्य तदालम्बनस्य वा । ३ न जातखा-भा०,१०,१०४ वाध्यम् । ५स्वकारणात्६अन्यरूपम् । सर्वधा श्रा, ३० । सर्वथा ५०। ८ पचाटूपनास्तित्वे दै-भा०, २०, १०, प्रजातिकाल । ९ उत्पादकदेतोरेव । १० वेनाइयरूपेण आग, २०,क्य न स्यात् ब०। क्थन स्यात्-प्र० यातिकाल । १२ अयनालम्ब आ., ०,१०।१३ यथा न मा०,46, प.11४ तदभावप्र- ५.। भावादर्शनकाले । १५ यस्य अर्थस्य अभावः क्रियते तेन विशेषणीभूतेन अर्थेन भवितव्यम् , तदमारे च कथमभावः सविशेषण ।
५ २३४] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव २६१ विशेषणाप्रसिद्धौ च बोधशक्तिः कथं तय ? ॥ विशेषणमथान्यत्र सिद्धमत्रानुवादवत् । भावरूपं हि तत्तत्र नाभावस्य विशेषणम् ॥ तदेवान्यत्र नास्तीति यद्येवं प्रतिपद्यते । तथैव प्रतिपत्रस्य निधोऽयं किमर्थका १ ॥ अन्यथा प्रतिपन्नस्य तथापि न निषेधनम् । प्रागुक्तमेतदेवेति न पुनः पुनरुच्यते । न दृश्यते यदा भावस्तदा न स्यानिपेधनम् ॥ स्मृत्याध्याहृत्य तवास्थ क्रियते चेन्निपेधनम् । स्मृत्या स्वरूपग्रहणे न कथञ्चिनिषेधनम् । स्मृत्या स्वरूपग्रहणे नाभावस्य विशेषणम् ॥" [प्र०वार्तिकाल० ३।३३० ] इति चेत् ; किमयं विचारस्य प्रयोजनम् ? न किश्चिदिति चेत् ; न; निष्प्रयोजन- वचनस्य असाधनाङ्गवचनत्वेन निमहावाप्तः । बाधकसद्भायपरिज्ञानस्य नाशः प्रयोजनमिति घेत; न; तस्याजातस्य तद्योगात्, तत्र 'यद्यजातोऽसौ भावः' इत्यादेदीपात् । नापि जातस्य; तत्रापि 'अथ जातः कारणात्तथा सति' इत्यादेः प्रसद्गस्यापि विशेषात् । अथ येन १५ रूपेण न जातस्तेनास्य नाशः मियते; तन्न; तत्रापि 'अन्यरूपेण जातस्य' इत्यादेरविकलस्या- विशेपात् । वन तत्परिज्ञानस्य विचारानार्शः तद्विपयस्य वाधकस्येति चेत् ; न; तत्राप्यस्य प्रसङ्गस्य तुल्यत्वात् । तस्यापि 'यथा स जातः तेनास्य रूपेण न विनाशनम्' इत्यादिनय प्रतिपादनात् । तन्न तद्विपयस्यापि ततो नाशः । तहिं तत्परिज्ञानस्य निर्विपयत्वं तेन ज्ञाप्यते इति चेत् ; किमिदं निर्विपत्वन्नाम ? तद्विपयस्य बाधकरयासत्त्वमेवेति चेत् । न ; तत्रापि 'यदा स २० दृश्यते भावः' इत्यादेरुपसर्पणात् । अपि च, नाप्रसिद्ध थाधके तद्विशिष्टत्वमभावस्य, न च तथा प्रतिपतिः 'तदा भावा- प्रसिद्धौ च' इत्यादेायात् । प्रसिद्ध प तस्मिन् भाव एव नाभायः, भावाभावयोनि पर्याय - मेकत्र विरोधात् । अन्यत्र प्रसिद्धमन्यमानुवादोपनीतं निषिध्यत इति चेत् ; न; तत्रापि 'भावरूपं हि तत्तत्र' इत्यादेपणस्यानुपात् । न चापरिक्षातस्यानुवादोऽपि । परिज्ञानच न २५ दर्शनमेव, निषेधसमये तदभावात् । स्मरणमिति चेत् । तेनापि यदि तत्स्वरूपमहणं सम्भवत्य- नुयादो न निषेधः, स्वरूपतः प्रतीयमानस्य तदयोगात् । अथ न स्वरूपप्रहणम् ; न तर्हि तस्याभावविशेषणत्वम् , 'स्मृत्या स्वरूपग्रहणे' इसादिना स्वयमप्येवमभिधानात् । ततो न विपयाभावस्यापि परिक्षानं तत्कथमुको बाधकामावनिर्णयः ? यतो निधेिय १ तमः भा०, य०,५०। २ तदैवान्य-आ., २०, ५० । विशेषणीभूत वस्तु। ३ नास्तीति रूपेण । ४ प्रतिपाद्यते भा०, २०, ५, चिंकाल ! ५ स्थाभावः भा०, २०, ५०६ -मस्य प्रयो-भार, व ... बाघकसद्भावपरिशानस्य । ८-मासः प्रयोजनमिति चेन्न तनाप्यस्य माo, बा२०१९-चरस. स्सास-भा०, २०, ५.11.युगपत् । .
२६२ म्यायविनिश्चय विवरणे [११३४ द्विचन्द्रादिव्य (दिव्य) तिर्भवेत् । ततो विचाराद्वाधकं निपेत्ता वस्य तदभानज्ञापरत्वमनुमन्त. व्यम् । तथा च द्विचन्द्रादेरपि किश्चिदभावमयनोधयत् किन्न बाधकं भवेत् ? वस्य प्रतिभासे कथमभाववोधनमिति चेत् , कथं वाधकस्य ? तदपि मदीयमेव घोद्यमिति चेत् , उच्यते- भैदिदं चोद्यम् , यदि प्रतिभासनादेव सत्त्वम् , सति तस्मिन् कथमभाक्योधनं विरोधादिति न ५ चैवम् , अर्थरियासामर्थ्यादेव सत्त्वोपपत्तेः । प्रतिगासनमानादेव तु सत्त्वे नित्यादेरप्रतिपेध. प्रसङ्गात् , तस्यापि स्वग्राहिणि विज्ञाने प्रत्यवभासनात् । नास्त्येव तादृशं ज्ञानं लोक इति चेत , कीदृशमस्ति ? सौगतकल्पित्तमनित्यादिविषयमेवेति चेत् ; न; विप्रतिपत्त्यभावप्रसङ्गात् । तथा च व्यर्थमेव प्रमाणशास्त्रप्रणयनं तस्य प्रमाणविषयविप्रतिपत्तिनिराकरणार्थत्वात् । स्वत एव च तेंदभाये किं तदर्थेन तत्प्रणयनप्रयासेन किंशुके पाटलिमापाटनप्रयासवत् । सोऽपि नास्त्येवेति १० चेत् ; न, दृष्टत्वात् । भ्रम एवायं तवेति चेत् , किमिदं भ्रम इति ? असत्यपि "तत्प्रयासे तत्परिज्ञानमिति चेत् , अस्ति तर्हि प्रतिभासनमसतोऽपि इति कथमुपलभ्यमान. स्याभावज्ञापनमनुपपन्नम् ? यतः किञ्चित्कस्यचित् वाधकं न भवेत् । ततो वाघयत्त्यादुपपन्नं द्विपन्द्रादिव्यक्तय॑भिचारिलं नार्थव्यत्तविपर्ययात् । विपर्ययप्रतिपत्तिश्चाभ्यासे स्वतः, अन. भ्यासे च परतः । न चैवमनवस्थानम् , पर्यन्ते कस्यचिदभ्यासयतो ज्ञानस्यावश्यम्भावात् । १५ वदाह-व्यक्तिः निराकारबुद्धिः अव्यभिचारिणी व्यभिचारशीरा न भवति, ततो बहिरर्थ- प्रतिपत्तिस्तत एपेति भावः । 'निराकारख्यतिरेव नास्ति नीलादिसुसादिव्यतिरेकेण तदसम्प्रतिपत्तरतत्काथ क्वधि- व्यभिचारित्वं तस्या इति चेत् । न, स्वसंवेदनतस्तत्प्रतिपत्तेनिवेदितत्वात् । निराकारैव बहिरर्थव्यक्तिः, “भिन्नकालम्" [प्र. वा० २।२४७ ] २० इत्यादिप्रश्नस्यान्यथानुपपत्तेः । न हापरिज्ञातविषयः प्रेक्षावना प्रश्नः । परिज्ञानञ्च भिन्न काल- स्यार्थस्य न प्रत्यक्षात् , तेन "पृथक् तस्याप्रविवेदनात् । पृथक् प्रतिवेदने हि सस्य भिमकालव. मन्यद्वा "तत्त्वं शक्यमवगन्तुम् । न चैवम् , तदाकारस्यैर तेन प्रतिपत्तेः, तस्य च तदनुप्रविष्टरय तात्कालिकत्वात् । नापि तत्कादाचित्कत्वलिगोपजनितादनुमानात्तत्परिज्ञानम् ,"तस्यापि प्रत्यक्ष- चनिराकारस्याभावात् । आकारवत्त्वे तु तेनापि स्वरूपस्यैव परिज्ञानं न पृथगर्थस्येति न ततोऽपि २५ तत्परिज्ञानम् । पुनरपि तदाकारकादाचित्कत्वलिगोपजनितादनुमानात्तत्परिज्ञानपरिकल्पनायाम् अनपस्थानमसमञ्जसमासज्येत । न चापरं तत्परिक्षानकारणमिति कथमय प्रश्नः "मिन्नकालं कथं ग्राह्यम्" इति ? प्रश्नोपनिवन्धनस्य भिनकाल्यस्तुपरिज्ञानस्याभावे तदनुपपत्तेः । क्यं वा तत्रेदमुत्त- रम्-"हेतुत्वमेन" इत्यादि । तस्यापि भिनकालपस्तुविषयत्वेन वज्ञानाभावेऽनुपपत्तेः। तदेवाह- अतीतस्यानभिव्यक्तौ फथमात्मसमर्पणम् । इति । अपि च, . विचारस्य । २-भावमेवयो-मा०, ०,१०। ३ भवदिद भा०, २०, ५.५ नित्यादेरपि । ५ विवादाभावे । चामप्रगयनप्रयास । शास्त्रप्रणयनप्रयाये। -त् सा बाघ-मा०, ५०,५०।९-राव्य- भा.प.प.11. प्रसकाया-भा०,३०,५०11-तत्कथमश-पा०,५०,प.!३ भित्रकालस्य अस्य ।
- १३५] प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्ताव: अभिमुखी विषयं प्रति न पुनस्तदाकारा व्यक्तिः बुद्धिः अभिव्यक्तिः तदन्या अनभिव्यक्तिः आकारवती व्यक्तिः तस्याम् , आत्मसमर्पणं स्वाकारनिवेशनम् अतीतस्य तज्ज्ञानात्प्राच्यविषयस्य । कथम् न कथञ्चित् अवगम्यत इति शेषः । ततो भिन्नकालविपयं प्रभमुत्तरच प्रतिपादयता तत्परिज्ञानमभ्यनुज्ञातव्यम् । तच निराकारयैव व्यतया उपपद्यत इति उपपन्नं वदन्यथानुपपत्त्या तव्यक्तिव्यवस्थापनम् । तदेवाह- असतो ज्ञानहेतुत्वे व्यक्तिरव्यभिचारिणी । इति असतः अतीतस्य तस्य ज्ञानकाले व्यतिक्रमात् ज्ञानहेतुत्वे स्थाकारज्ञानजनकत्वे व्यक्ति निराकारा वित्तिः, अन्यतस्तत्परिज्ञानयोगात् अव्यभिचारिणी प्रमाणमिति यावत् । यदि निराकारैव व्यक्तिः कथं ततः प्रकाशननियमः-'नीलस्येवायं प्रकाशो न पीता- दे।' इत्येवं रूप चेत् १ अत्राह- प्रकाशनियमो हेतोवुद्धर्न प्रतिविम्यतः ॥३४॥ अन्तरेणापि तादूप्यं ग्राह्यग्राहकयोः सतोः । इति प्रकाशोऽधिगमः तस्य नियमोऽवधारणमुक्तरूपम् , स कस्याः सम्बन्धी ? युद्धेः प्रत्यक्षलक्षणायाः ततस्तस्य भावात् । स कुतः ? इत्याह-हेतोः युद्धों हेतुरिन्द्रियादिलक्षणः प्रकाशावरणक्षयोपशमादिसव्यपेक्षस्तत इति । एतदुक्तं भवति-स्वहेतोरेव बुद्धिः नियतप्रकाश• १५ शक्तिकत्येनोत्पन्ना यतो नियत एव ततो विषयप्रकाश इति । अवश्याभ्युगमनीयश्चायं स्वहेतु- नियन्धनः शक्तिनियमो भावानाम् , अन्यथा 'नीलज्ञानस्य नीलवत्पीतादयोऽपि किन्न सर्वे हेतयः सम्झानं या नीलपस्किन सर्वेपी कार्यम् ? कारणत्वेन च नीलस्य आकारयितृत्वे तदविशेषात् चक्षुरादयोऽपि ज्ञानस्य कुतो नाफारयितारः ? कुतो या स्वलक्षणदर्शनं नीलवरक्षणभशा. दावपि न निश्चयमुपजनयति यतस्तत्र समारोपः तद्व्यवच्छेदार्थमनुमानञ्च परिकल्प्येत' इत्या. २० धतिप्रसङ्गपर्यनुयोगे कः परः परिहारः । ततो यथा शत्तिनियमादेव अन्न कारणत्वादिनियमः तथा प्रकाशनियमोऽपि बुद्धरिति व्यथं तदर्थमाकारपरिकल्पनम् । न पातीसपरिक्षानार्थम् ; तस्यापि शक्तित एवोपपत्तेः । ततो यदत्र वार्तिकम्- "ज्ञानशब्दप्रदीपानां प्रत्यक्षस्येतरस्य च । जनकत्वेन पूर्वेषां क्षणिकानां विनाशतः ॥ शक्तिः कुतोऽसतां ज्ञानात्" [प्र०या०२१४१७] इति; सत्प्रतिविहितम् ; सनिधानं यदि प्रहनिबन्धनं भवेदतीतस्य शब्दादेरग्रहणम् असग्नि- धानात् । न चैवम् । शक्तस्तनिवन्धनत्वात् , सस्याश्च मिन्नकालभावापेक्षयापि भावात् , अन्यथा सदपरिमानमेवेति निवेदितत्वात् । यदपि समानकाले परिक्षानेऽतिप्रसद्गपरं यार्तिकम् - . अभिमुशिवि-आ०, २० । २-दयसि त- प्रा०, २०, २.1 -स्य शन-पा०, २०, ५०। नीलसन या । ५ कारणाविशेषात् । ६ यतिः पुतोऽमनाम'-३० पा० । ७ प्रहनिबन्धनावात् ।
- न्याययिनिश्चयविवरण [१३५ "अन्यस्यानुपकारिणः ।। व्यक्ती व्यज्येत सर्वोऽथ:" [प्र०या०२।४१८] इति । यच्चार निबन्धनम्-"न समानकालस्य हेतुता; तथाऽप्रतीतेः । 'असम्बन्ध(द्ध)ग्रहणे च सर्वमेव गृह्येत" [प्र०वार्तिकाल०] इति ; तदपि प्रत्याख्यातम् ; न हि कालसाम्याद्विषयपरि- ५ ज्ञानं यदयमतिप्रसङ्गः, किन्तु शक्तः, तस्याश्च स्वहेतुबलभाविनो नियमात नियतस्यैव समसमयस्यान्यस्य या परिशानमिति किमेतावता न पर्याप्तम् ? यत इदं वालविप्रलम्भनमाका. रपरिकल्पनया कल्प्यते । कथञ्चार्यम् "स्पर्शस्य रूपहेतुत्वात्" [प्र०या०१।१८४] इत्यादिश्याख्याने "परस्परवियोगेन समानकालयोरपि हेतुत्वात्" [१० वार्तिकाल० ] इत्यनेन समसमयस्यापि स्पर्शस्य रूपहेतुत्वं प्रतिपादयन्नेय निबन्धनकारः तादशस्यैवार्थस्य १० ज्ञानहेतुतां प्रसाचक्षीत ? यत इम् "न समानकालस्य" इत्यादि सूक्तं भवेत् ? तदर्य प्रज्ञाकरोऽपि विस्मरणशील इति सविस्मयमस्मच्चित्तमावर्तते । यदपि हेतोः प्रकाश्यप्रकाशनियम एव "तद्धेतोनियमो यदि"[प्र०वा०२१४१८] इत्यमेन पूर्वपक्षयित्वा समाधानमुक्तम्-'नेपापि कल्पना ज्ञाने" [प्र०वा०२१४१९] इति । नियन्ध. नमा-"[न] प्रतिनियतग्रहणमनया कल्पनया । हेतुनियमो हि पदार्थानां स्वरूपे, १५ कार्यकरण वा ? न तावत्स्वरूपे ; स्वरूपप्रतिनियमे हि कारणतः स्वरूपमेन तयोस्तथाभूतं यदवभासते ततः स्वरूपावभासनमेव प्रसक्त तत्पूर्वकारणाधीनं न परस्पराधीन मिति न परस्परं ग्राह्यग्राहकमानः समानकालवयोदयात् । यदधीना हि तयोर्माह्यग्राहकता तस्य हि तो ग्राखग्राहकाविति युक्तम् । न च संविदितात् स्वरूपादपरा ग्राह्यणायकता । कथं तर्हि 'ग्राहकोऽहं ग्राह्यं ममेदम्' इति प्रतीतिः ? न; तदपरस्य सम्बन्धस्याप्रति- २० भासनात् । कल्पनामात्रमेव अनादिवासनाधीनमेतत् । तथा चोत्तम्-"सव्या- पारमिवाभाति" [प्र०वा०२।३०८] इति । तस्मात्सरूपे स्वहेतुनियमान्न ग्राह्यग्राहक- भावः । अथ कार्यकरणे हेतुनियमः; तदापि यदि ताभ्यां प्रतिनियतस्य कार्यात्मनो जननम्। कमिन ग्राह्यग्राहकभावः सहकारिभाव एव भवेत् ? न च तावता ग्राह्यग्राहक- भाषः, तस्मान हेतुतो ग्राह्यग्राहकभावः" [प्र०वार्तिकाल०] इति । तत्र स्वरूप एव हेतुनियमः, २५ न तावता स्वरूपप्रतिभासनमेव नीलतवेदनयोः । नीलस्य हि स्यहेतुनियतं माहात्यं नियतबेदना- पेक्षमेव न तु निरपेक्षं तत्कथं तस्य स्वतोऽभासनम् ? तदनस्यापि तन्नियतप्राहकत्वं नियत- नीलापेक्षं स्वापेमञ्च, नत्कथं तस्य स्वावभासनमेव । न चैवं सति 'कारणमेव नीलस्य ग्राहक प्राद्यञ्च तद्वदनस्य' इति चोद्यम् ; नीलतद्वेदनयोः परस्परापेक्षस्यैव पाहणाहकभाषस्य कारणेन 'असम्बद्धग्रहणे'-प्र. वार्तिकाल । २ प्रहाकरगुष्ठ । ३ सशस्यापि रूप-भा०, ५०, ५० ४ कार्य कारणे वा भा०, ३० । कार्यकारणे वा प० । ५ तस्य हेनो आ०, २०, ५०। ६ संविदितस्वरू- भा०,०, प० । 'संविदितस्वस्वरूप'-प्र. वार्तिकाल । ७ -पस्यस्वहे- भा०, ०,१०। ८ स्वहे मुनि पतप्राइकरवम् ।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावा २६५ , . नियमात् न स्वापेक्षस्य । अवश्यञ्चैतदेवमङ्गीकर्चव्यम्, अन्यथा नीलनद्वेदनयोहे तुफलभावेऽपि वत्प्रसङ्गात् । नवेदनं हि कारणमेव कस्यचित् , अन्यथा तदवस्तुत्वापत्तेः । कारणत्वम् तस्य कार्योपजननशक्लिक्षणं स्वकारणादेवेति तदेव वस्य नीलं कार्य ने पुनस्तत्तस्येति प्राप्तम् । तथा वन तत्तस्य ग्राह्यमेव अहेतोस्तदनभ्युपगमात् । ततो निराकृतमेतत्- "ज्ञानं सर्थावभासतः। तं व्यनक्तीति कथ्येत तदभावेऽपि तत्कृतम् ॥" [प्र०या०२।४२०] इति । नीलज्ञाने नीलकृतत्वस्य तदवमासस्य च तदाकारतालक्षणस्यानन्तरनीत्या निपेधात् । वस्मादन कारणेन कार्यान्तरापेक्षमेव वस्य कारणत्वमापायेत नात्मापेक्षमित्येतदेवोत्तरम् । एतच्च माहपाईकभावेऽपि समानम्-नीलतवेदनयोः परस्परसम्यपेक्षस्यैव तद्भावस्य तत्का. . रणेनोपसर्पणात् । ततो दुव्र्याहृतमेतत्-"यदधीना हि तयोः" इत्यादि । नीलतन्तानस्वरूपः १० व्यतिरिक्तः तद्भाव एव नास्ति तत्कथं तभिन्तेति चेत् ? न; कार्यकारणभावस्यापि तम्ति. रिक्तस्याभावात् तचिन्वनस्याभावापतेः। कार्य ज्ञानं तस्य कारणच नीलमिति प्रतीत अस्त्येव तद्भाव इति चेत् ; न माझं नीलं तस्य माहक व ज्ञानमित्यपि मतीतः । 'कल्पनामात्रमेवैतदनादिवासनाधीनम्' इत्यपि न युपम् । कार्यकारणभावप्रतीवा- पप्येवंप्रसङ्गात् । कल्पित एव तद्भावोऽपि परमार्थतो बहिरर्थस्याप्रतिवेदनात् । न हि प्रत्यक्षेण १५ तत्मतिवेदनम् ; आकारवतो ज्ञानस्यैव ततः प्रतिवेदनात् । नाप्यनुमानेन सस्य प्रत्यक्षपूर्वकत्वेन तदभावेऽनघतरणात् । "प्रत्यापूर्वक सर्वमनुमान प्रवर्तते । प्रत्यत्तस्यानुमापेक्षा यद्यन्योन्यसमाश्रयः ।। न यावदनुमानं प्रमाणं तापन्न प्रत्यक्षं प्रमाणीभवत्ति बाह्येऽर्थे । न च प्रत्यक्ष- २० स्य प्रामाण्यासम्मयेऽनुमानम् , तत्पूर्वकत्यात्, अन्यथा अन्धपरम्परा भवेत् । तसात्पर- मार्थतः स्वरूपमेव संवेदनस्य संविदितं नार्थः।" प्र०यातिकाल० २१४२०] इति नास्त्येव यस्तुतस्तस्य कारणत्वं तत्कार्यस्यञ्च ज्ञानस्य, कल्पनैव फेवलं नद्भावमुपदशयतीति चेत् ;न; यहिरर्यवेदनस्य सविकल्पकत्वेन प्रत्यक्षत्वाभायप्रसगात् । न हि कल्पनारोपितगोचरस्य निर्वि. कल्पकत्वमुपपन्नम् । सत्यम् , मिथ्याभिनिवेशरूपेण विकल्पेन सविकल्पकत्यम् अपरामर्शरूप. फत्वातनिर्विकल्पफत्यमुच्यत इति येत्, फयं तथापि प्रत्यक्षत्वं भ्रान्तस्वात् १ न हि मिप्या- विषयमभ्रान्तमुपपनम् ; अतिप्रसमात् । इदमपि सत्यमेव वस्तुवृत्या सर्वस्यालम्पने प्रान्तत्यात्, अभिनिवेशकभावाभावाभ्यां तु सम्यभिप्याज्ञानायभागः, यत्र हि व्याह राभिनिवेशा नातवेदनस्य । १ न पुनः नौतवेदन नीलस्य घर नीतामादिति भारः। शरणस्य । •पहरूमावस्य। ५ प्रमप्रभावः । (-पैर तदना-मा.,.,.10वेदनम् मा.,...।
। न्यायविनिश्चयविधरणे [२३५ [व] सम्यग्ज्ञानं "प्रामाण्यं व्यवहारेण' [प्र०या०१७] इति वचनात् । यत्र तु पदभाव तैमिरिककेशादी मिध्येव ज्ञानम् "केशादिर्नार्थोऽनाधिमोततः" [प्र०या०२।१] इति वचनादिति चेत्, अनाकारमेव वर्हि विज्ञानमभ्यनुज्ञातव्यम्, व्यवहारस्य तथैव भावात् । न हि व्यवहारी नीलमेव विज्ञानमनुमन्यते 'नीलमहं वेद्मि' इति नीलादन्यत्रैव तज्ञाने ५ तदभिनिवेशदर्शनात् । न चासो क्वचिदनुगम्यते क्वचिन्नेवि निर्निमित्तमुपपन्नम् । सत्यपि तथा व्यवहारे प्रकाशनियमाय साकारवाद इति चेत् ;न; हेतुबलादेव वनियमान विपयाकायत् । एतदेवाह-न प्रतिषिम्वतः । प्रतिविम्ब विपयसारूप्यं न ततः प्रकाशनियम इति । फदैतत् ? इत्याह-अन्तरेणापि विनापि । किम् ? ताद्रूप्यं विपयाकारत्वं ग्राह्यग्राह- कयोनौलतद्वेदनयोः सतोर्व्यवहारतो विद्यमानयोरिति । विद्यत एव व्यवहारतो नीलतद्वे. १० दनयोरन्यत्वम् । न चैवमनुभव इति चेत् ; न; अन्वयम्यतिरेकानुभवस्यैव भेदानुभवत्वात् , अन्वययद्विज्ञानमनुभूयते व्यतिरेकवच नीलादिकम् । तथा हि- पीते प्रवृत्तं प्रत्यक्षं यदान्यत्र प्रवर्तते । तदा तदन्वितं पीतं व्यतिरेकि च दृश्यते ॥६८८॥ पीताव्यतिरेके तु तद्वत्तस्यान्वयः कथम् ? । अन्वितस्य च तस्यास्ति दर्शनं सावलौकिकम् ॥६८९॥ पीतं मया पुरा दृष्टमधुना दृश्यते परम् । इत्यन्वितस्य योधस्य स्वतोऽनुभवनिर्णयात् ॥६९०॥ अभेदे त्वन्वितज्ञानात्पीतमप्यन्वितं भवेत् । न ह्यन्वितादभिन्नं तदुपपन्नमनन्वितम् ।।६९१॥ विषयान्तरसञ्चारः प्रत्यक्षस्य तदा कथम् । पीतस्यैव सदा वित्तेस्तज्ञानाव्यतिरेकिणः ? ॥६९२|| अन्वयव्यतिरेकेऽपि यद्यभेदप्रकल्पनम् । पीततज्ज्ञानयोलोंके न किञ्चिद्भिन्नतो व्रजेत् ।।६९३॥ विरुद्धधर्माध्यासाद्धि भेदोऽन्यत्रापि नापरः । अभेदश्चेदसावन कथमन्यत्र भिवेत् ॥६९४॥ नन्विदं बालोपलालनमेय यदन्ययव्यतिरेकाभ्यां भेदप्रकल्पनम् , प्रमाणाभाषात् । न हि किञ्चित्क्वचिदन्वितं फुतश्चिव्यावृत्तमित्यपि प्रमाणमस्ति, प्रत्यक्षस्य वाप्रवृत्तेः । प्रत्यक्षेण हि तात्कालिकत्वमेव भावानां प्रतिपत्तव्यं तथा तद्धतोनियमान पौर्यापर्यम्, अतिप्रसङ्गात् । न च तंदप्रतिपत्तो सतस्तदन्वयव्यतिरेकपरिक्षानम् । तस्य तदविनाभावात् । असति प २० २५ + , अन मा०, १०.३० । २ भयुध्यमावात् । ३ ज्ञानाभिप्राय । प्रत्यक्षम् अन्वितम् । ५ पीतवम् शानस्य । ६ शानस्य । ७ पोळपर्यापतिपत्तौ ।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव: २६७ ८- प्रमाणान्तरस्य प्रत्यक्षे नानुमानम् ; तत्पूर्वकत्वात् । प्रमाणान्तरं तु नास्त्येव यतस्तत्प्रतिपत्तिः । अतोऽनादि- तद्वासनाविकासोल्लासिता विकल्पिकैच बुद्धिरन्वयव्यतिरेकावुपदर्शयति । तदभिप्रायेण च पीततज्ज्ञानयो दकल्पनमनुमन्यत एव, परमार्थत एवं तदनभ्युपगमात्, "परमार्थतस्तु तदतदाकार परापरं विज्ञानमेव" [प्र. वार्तिकाल० २।३०७ ] इति वचनादिति चेत् । कुतः पुनरिदमपरापरत्वं विज्ञानानामवागन्तव्यम् ? नेपामेव फुतश्विदन्यतमादिति चेत् ;न : तस्य स्वाकारमात्रपर्यवसायित्वेनान्यत्राप्रवृत्तेः। न हि तदन्यत्राप्रवत्र्तमानं सद्गतमपरापरत्वं प्रत्येतुमर्हति; धर्मपरिज्ञानस्य तदधिकरणपरिज्ञानाविनाभावनियमात् । तन्नैकस्मात्तत्परिज्ञानम् । भवतु बहुभिरेव तत्परिज्ञानम् , तानि हि परस्परमनुप्रवेशरहितमात्मानमात्मानुभवस्वभावतया प्रतिपद्यन्ते, तदेव च तेषामपरापरत्वपरिज्ञानमिति चेत् ; नन्धिदमेव दुरवयोधं यद्येकं तद्गोचर 'विज्ञानं न भवेत् । भवतु तदिति चेत् ; न; वक्ष्यमाणोत्तरत्वात् । तन्न प्रत्यक्षात्तदपरापरत्व- १० परिझानम् । नाप्यनुमानात् ; प्रत्यक्षाभावे तदनुत्पत्तेस्तत्पूर्वकत्वात् । चानभ्युपगमात् । तदुपरापरत्वमपि तद्वासनोपनीतेन विकल्पेनैव कल्प्यत इति चेत् ;न; "परमार्थतः" इत्यस्य विरोधात् , कल्पितस्यापरमार्थत्वात् । अस्ति वस्तुतस्तदपरमार्थत्वम् , तत्परमार्थत्यकथन तत्र लोकाभिप्रायानुरोधादिति चेत् ; न; अन्वित एव ज्ञाने तत्कथनप्रसङ्गात् । तत्तैव (वत्रैव) १५ लोकस्य परमार्थत्वाभिप्रायात् । फस्य या वस्तुतः परमार्थत्वम् ? पीतवेदनाकारमानस्याद्वैतवेदनस्येति चेत् ; पीतमपि कीदृशम् ? स्थूलमिति चेत् ; न; तस्यानभ्युपगमात् । "तस्मानार्थेषु न ज्ञाने स्थूलाब- भा(लामा)स:" [प्र० वा० २।२११] इति वचनात् । परापरपरमाणुरूपमिति चेत् ; तत्परमाणुपु सर्हि वेदनमेकं प्रवर्त्तमानमारमानमपरापरतदाकागनुगतं तदाकाराश्च (कारांच) २० परस्परत्यतिरेकिणः प्रतिपद्यत इति कथं प्रत्यक्षसिद्धायेवान्वयव्यतिरेकी न भवेतां यतः पीततवेदनयोः पारमार्थिक एव भेदो न भवेत् ? प्रतिपरमाणु भिद्यत एव तद्वदनं सदयमदोप इति चेत् । कथमद्वैतं कथं वा सदनानां पहुत्यस्य परिज्ञान स्वरूपवेदन नियमेन परस्परमवि. पयीकरणात् ? अन्यस्य चैकस्य तत्परिज्ञातुरभावात् । भवत्येकपरमाणुरूपमेव पीतमिति चेत् ; न तस्यानवभासनात् । न हि निर्भेदस्य संवेदनात्यावभासनं प्राहाप्राहकादिभेदप्रतिभासवत २५ एव तस्य प्रतिवेदनात् । स्वतो निर्भेदमेव तत् , तद्भेदप्रतिमासस्तु तस्योपप्लव एव "ज्ञानसामे. दिनो भेदप्रतिभासो छुपालबा" [अ० या० २।२१२ ] इति वचनादिति चेत् ; सदुपयो यदि तस्य स्वत एय; कथं निर्भेदत्वम् ? न हि स्वत एव भेदेन प्रत्यवभासमानं निभेदमित्युप- पन्नम् , पीततयाऽवभासमानस्याप्यपीतत्यप्रसगात् । अन्यत एव तस्य तदुपप्लयः स्वतस्तु वन्निर्भेद- मेवावभासत इति चेत् ; फर्थ सहि तस्यासत्त्वोपपादनम् , यथावत्त्वं प्रतिमासमानस्य तद. ३० - 1-मान सद्भ-मा०,०प० २ त एव प० । श्रम ताइपग्रं त्रुटितम् । ३-स्यापरमा-भा०,१०,१० सन ताडपनं त्रुटितम् ।
न्यायविनिश्चयपियरणे [११३५ योगात्। तदपि नेति चेत्, किं पुनरिदमुन्मत्तभाषितम्-"ज्ञानमपि स्वरूपेणाप्रतिपनमस- देवेति शून्यतेवावविशप्यते" [प्र० वार्तिकाल ० २।२१२] इति ? शून्यवादिन एवंदं वचनं न ज्ञानवादिनः, तेन निर्भदतयैव तनि सस्य वत्सत्तस्य चाभ्युपगमात् । तथा च तस्य वचः नम्-"अविभागोऽपि युद्ध्यात्मा" [प्र०या०२।३४५] इति, "स्वसंवेदनप्रसिद्धमेतत्" ५ प्रवार्तिकाल० २६३५४] इति च । इति चेत्, उच्यते- निर्भेद एव बुद्ध्यात्मा सतश्चेदयभासते। प्राह्मादिभेदनि सन्तत्र कस्मादुपल्लवः १ ॥६९५।। अन्यतस्तस्य भावस्तु नेवाद्वैतनिपीडनात् । न स्वतो नान्यतधेप यदि निर्भासते कथम् ? ॥६९६॥ मायामरीचिप्रभृतिरिव चेन्नेदमुत्तरम् । न हि तस्यापि निर्भासः स्वपथपेक्षया विना ॥६९७] तथापि तस्य निर्भासे तद्रुद्वात्मनो न किम् । स्ववेदनप्रसिद्धत्वं यतस्तत्रोपवर्ण्यते १ ॥६९८|| नास्त्येय तस्य निर्भास इत्यप्यश्लीलभाषितम् । प्राहामाहक्सवित्तीत्यादे. स्त्रोक्तस्य वाधनात् ॥६९९॥ "दृष्टश्चाय न दृष्टस्य लोपो बुद्धौ प्रसङ्गतः । शून्यतेव भवेत्तत्त्वं बुद्धरुफञ्च केश्चन ||७००॥ "तकस्याप्यभावेन द्वयमप्यवहीयते । " तस्मात्तदेव तस्यापितत्त्वंयो द्वयशू-यता ।।" [प्र०या०२।२१३] इति । शून्यता परमार्थश्चत्केदभाकारकल्पनम् । यतः प्रयास. सर्वोऽयं तव साफल्यमुद्देत् ११७०२॥ प्रमाणविरहाचाय परमार्थः कथं भवेत् । अशून्यमेव तत्त्व स्यादन्यथा सफल जगत् ॥७०३॥ प्रमाण चेन्न शून्यर' प्रमाणस्यैव भावतः । शून्यत्व चेप्रमाणं नेत्येतत्पूर्व निवेदितम् ।।७०४॥ . २५ -पप्रति-मा०, ब.,.1 २ ज्ञानदादिना। -मैतदिति चेत् भा०, २०, ५०1४-नि-आ., २०.1 ५"मायामरीचिप्रमृतिप्रतिभा सदसत्वेऽपि न दोष ।"-प्र०पातिकाल ०१. " प्राहक * वित्तिभदवानिव लक्ष्यते" -पा० १३५४॥ ० दृप्टेयाय न दृष्टस्य लोपे दु-भा०, २०, ५०1. "त्र एक ज्ञानात्मनि विरुद्ध द्वयं न युक्किमित्येकस्य माधवस्य माहकत्वस्य पावश्याभ्युपगन्तव्यत्वेनामावेन द्वयमप्यवहीयते । अयोन्यसापेक्षयोरेकामावेऽपरामावाय न्यायमानत्वात् । तस्मात्तस्य ज्ञानस्यापि तत्वं तदेव पायेन प्राधारा कारण एयता नाम"-:. याम.. २११९ यदयशू-ता। .
१२३५] प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्ताव २६९ - ततो नाद्वैतवानं तच्छून्यत्वं वा' परमार्थतः; तव्यवस्थापनोपायाभावात् । भवतु बुद्ध्यात्मयाऽविभागः परमार्थः, तस्य स्वसंवेदनप्रसिद्धत्वात् । न चैवं प्राह्मा- दिभेदनि सस्योपप्लवस्याभावात्-"ग्राह्यग्राहकसवित्तिभेदवानिव लक्ष्यते" प्र०वा० २१३५४] इति वचनव्यापत्तिः, तदुपलवस्य बुध्यन्तरेणोपकल्पनात् , बुद्धिभेदस्यानिराकरणात्, वहिरर्थस्यैव प्रमाणाभावेन प्रतिक्षेपादिति चेत् ;न; बुद्धयन्तरस्याप्यविभागितयेव स्वतः प्रसिद्धः ५ वतोऽपि उदुपकल्पनानुपपत्तेः । तत्रापि तदन्तरात्तदुपकल्पनपरिकल्पनायामव्यवस्थापते । अपरापस्थ बुद्धिभावो न तद्विपयमेकज्ञानमन्तरेण शक्यः प्रविपतुम् , तदभ्युपगमे च पीतादेरेया. परापरस्य वदभ्युपगन्तव्यम् अविशेषात् । तथा च तदेव पीवादी क्रमेणानुवृत्तिमात्मनः पीता- देव परस्परतो व्यावृत्ति प्रतिपद्यत इति प्रत्यक्षसिद्धावेव संवेदनाद्वधगतावन्धयत्यविरेको न कल्पनामानविरचिती । ततः प्रतिषिद्धमेवत्- १. "अन्वयव्यतिरेकाम्यां भेदव्यापारकल्पना । अनादिवासनासङ्गान तावध्यक्षपूर्वको ।। सजातिपूर्वविज्ञानाऽनुभवाहितासना । व्यतिरेककल्पनाचीजं केवलान्धपरम्परा प्रषार्तिकाल० २।३०८] इति । प्रत्यक्षतश्चान्वयव्यतिरेकयोः प्रतिपत्तो प्रतिपन्न एव पीतवद्वेदनयोर्भेदः, तस्य तद्रूपत्वात्। १५ तंदूपत्वेऽध्यभेदे नीलधवलादावपि न भवेत् । न हि विरुद्धधर्माध्यासादपरस्तत्रापि भेदः । से पेत् पीततद्वेनयोर्भवन्नपि न भेदः परत्रापि न भवेत् । तस्मादनुभवोपारूटमेव ज्ञानतद्विपययो. नानात्वं न व्यवहारमात्रप्रसिद्धम् । तदेवाह-'अन्तरेणापि' इत्यादि । सतोपलम्मविषय- योस्तद्विषेयतयैव परेण सत्त्वोपगमात् "उपलम्भः सत्ता" [प्र० वार्विकाल० ४।२६३] इति वचनात् । शेपं पूर्ववत् । ततो यदेतद्वात्र्तिकं तन्निबन्धनल्च- "नार्थोऽसंवेदनः कश्चिदनथं वापि वेदनम् । दृष्टं संवेद्यमानं तयोर्नास्ति विवेकिता ॥" [प्र० वा० २।३८८] "अनन्वयव्यतिरेकित्वात् एकमेव नीलसंवेदनमन्योन्यव्यतिरेकेणादर्शनात् । तथाहि- नार्थोऽसंवेदनो दृष्टोऽनर्धञ्च न घेदनम् । सदापि योगादेकं तदर्थसंवेदनं ततः ॥ भेदेन विनियोगार्थ भेदवि दमिच्छति । स चेत्रास्ति ततो भेदाभेदयोः कैर भिन्नता ॥ तस्मादत्र मेद इति नायमात्रमेव परेण विधातव्यम् न परस्य काचित् नतिः । हेयो- 1 पानापर-बा०प०प० । २- मार्यतस्वस्य मा०, १०, १.। मेदस्य । मन्वपम्पतिरेका रिस्पांप्पासात्मस्लाद । ५ विरुधर्मासात्मकतेऽसि पिधर्माप्पामः । . टपरम्मविषयतरीय । २० २५ २७० न्यायविनिश्चयविवरणे - ] पादेयविभागयेत्तत्र नास्ति किमीशा भेदेन" [प्र०वार्तिकाल० २।३८८] इति, उत्प्रतिविहि. सम् , 'अनन्वयव्यतिरेकित्वात्' इत्यस्यासिद्धः, वस्तुतस्तद्भावस्य प्रतिपादनात् । अन्योन्यन्यविरे. णार्थतवेदनयोर्दर्शनस्योपपत्तेः, अन्वितानन्वितरूपत्वेन ज्ञानार्थयोर्दर्शनस्यैव तंव्यतिरेकदर्शन- त्वात् । न च तव्यतिरेफ्स्य निष्फलत्वम् ; व्यतिरेकेणेव विनियोगान् । नीलमेव हि वस्त्रादिक- ५ माच्छादनादो विनियुज्यते न वज्ञानम्, वेन कस्यचिदाच्छादनाभावान् , वदेव चवज्ञानं विषया- न्तरपरिच्छित्तावुपयुज्यते न नीलं तेन कस्यचित्परिच्छेदायोगात् । यथा च वज्ञानस्य विपया- न्तरपरिच्छित्ती विनियोगस्तथा प्रतिपादितमेव । ततो 'भेदेन' इत्यादि प्रज्ञावलविकल्तयैव प्रज्ञाकरेण प्रतिपादितम् । यत्पुनरुतम्- "दधानं तच तामात्मन्यर्थाधिगमनात्मना । सव्यापारमिवाभाति व्यापारेण स्वकर्मणि ।। तद्वशानद्यवस्थानादकारकमपि स्वयम् ॥" [प्र०या० २१३०७-८ ] इति, तदपि महत्तस्तमसो विलसितमेव, “सवेदनमात्मनि विपयाकारतां धत्ते" [ इत्यस्य प्रतिक्षेपात् , तद्वशादधिगमव्यवस्थानस्यासम्भवात् । तदसम्भवे तनिनन्धनस्य 'स. व्यापारमिवाभाति' इत्यस्यानुपपत्तः , वस्तुत एव तस्य सन्यापारत्वाच । न हि तस्मिन्नेव १५ तदिति व्यपदेशो नील एव नीलमिवेति तत्प्रसद्गान् । वस्तुतः सव्यापारत्वन्च तस्य परा- परविषयाभिमुख्यलक्षणस्याधिगमव्यापारस्य तत्र प्रतीतेः । नापि सँस्याकारकत्वम् , वस्तुसति व्यापारे वदपेक्षया कारकत्वस्यगेपपत्तेः । ततो हेतोरेव प्रकाशनियमो बुद्धर्नाकारनियमादिति सूक्तम्-'प्रकाशनियम.' इत्यादि । भवतु नाम सत्यर्थे हेवोरेव तत्प्रकाशनियमो न वाप्यात् , यत्र तु नैमिरिकज्ञाना- २० दावर्थ एव नास्ति तर क्यम् ? न हि तब प्रकाश एव सम्भवति वस्य प्रकाश्यनिष्ठत्वेन तदभा. वेऽनुपपत्तेः । सम्भवतश्च पुतश्चिनियमो नान्यस्य । तनापि विद्यत एव फेशादिः प्रकाश्य इति चेत्, न, तस्यानर्थत्वात् । न हासापर्थः, अर्थनियाविरक्षात्। अर्थ एवार्य अलौकिका, लौकिक- फस्येवायं नियमो यर्धक्रियया भवितव्यमिति चेन् , न, तस्य "अभिन्न देशकालानाम्" इत्यादी स्वयमेव निराकरणात् । तस्मादसा ज्ञानस्यैवाकाये न वाद्यस्य प्रकाशविपयस्य २५ सवो गत्यन्तराभावात् । प्रकाशविषयेण धन वा भवितव्यं ज्ञानेन वा । तमार्थत्वाभावे अवश्यम्भावि ज्ञानत्वम् , अर्थज्ञानाभ्या राश्यन्तरस्याभावादिवि सिद्धं तत्वेशादेस्तादूप्यादेव प्रतिवेदनम् , ततस्तत्र विपर्ययस्यत्येव भवदुत्तो न्यायः । तदेवाह- अनाकारशङ्कपु युट्यत्येप नयो यदि ॥३५॥ इति । अर्थस्य वाह्यस्याकारः स्वरूपं तस्य शङ्का 'किमयमाकारो भवति न या' इति किमीशेनेति भार, ३०, ५.। २ शनार्थव्यतिरेक । । विषयाकारतावशात् । । संवेदनस्य । ५ तहि प्र-मा,०, प. प्राशस्य । • न्यायविक रको.१८-ौ ज्ञान-भा.,.,.)
1 १३३६] प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्तावा प्रत्यवमर्शनम् अर्थाकारशङ्का, न विद्यते सा येषु तैमिरादिज्ञानविषयेषु ते अनर्थाकारशङ्का: शङ्कामावनिवेदनेन तर निर्णयस्यात्यन्ताभायमावेदयति । तेषु घुट्यति शिथिलीभवति एषः अनन्तरीका 'प्रकाशनियमो हेतोः' इत्ययं नयो न्यायः तादूप्यादेव तत्प्रकाशनियमात् । सिद्ध क्यचित्ततरवनियमे अन्यत्रापि तदेव नियामकम् । तथा हि-'विवादापनस्तत्प्रकाशनियमो विष- याफारादेव, तत्प्रकाशनियमत्वात् , मिरकेशादिप्रकाशनियमवत्' इति परस्यातम् । यदि ५ इति-तदाफूतद्योतने । वनोत्तरमाह- सर्व समानमर्थात्मासम्भाव्याकारडम्वरम् । इति । अर्थश्च आत्मा च ज्ञानस्वभावस्तदन्यस्य तस्याभावात् , तयोः असम्भाव्य- स्तद्रूपत्वेनाभावात् तस्याकारस्य केशादिलक्षणस्य डम्बरं तज्ञाने प्रतिभासनम् । तदय- मर्थ:-नायमर्थरूपः केशादिर्नापि ज्ञानरूपः 'फिन्स्यविद्यमान एव वज्ञाने प्रतिभासते तत्कथं १० तत्रानन्तरनयस्य त्रोटनम् ? कथं वा तन्निदर्शननलाद्विवादापन्नेऽपि विषयाफारसाधनम् ? सत्येव तस्य ज्ञानरूपत्वे तदुपपत्तेः । असतः प्रतिभासमानमेव न सम्भवति प्रतिभात्याभावादिति चेत्, न; तस्यैव प्रतिभास्यत्वात् । कथं तस्य प्रतिभास्यत्वमिति चेत् ? करिमन प्रकारे प्रश्न: ? विषयगत इति चेत्, 'फेशादिरूपेण' इति घूमः । कथमसतस्तद्रूपत्वमिति चेत् ? सतोऽपि कथम् ? तथा दर्शनात् समानमन्यत्र-असतोऽपि फेशादिरूपत्त्योपलम्भात् । असोऽ. सत्त्वेनैवोपलम्भनमुपपन्नं न तद्रूपतयेति चेत् ; न; सतोऽपि सत्त्वेनैव तदुपपनै न तद्रूपतये- त्यपि प्रसङ्गात् । तपतैव तस्य सत्यमिति चेत्, असत्त्वमपि तद्रूपतयैवेति किन्नानुमन्यते ? सदसतोर विशेषापत्तेरिति चेत् ; न शक्तिभावाभावाभ्यां तत्परिहारात्-यस्य हि वदर्थनियायो शक्तिः स साक्षात्केशादिः अन्यस्तु तदाभास इति । तन्नायं विषयगते प्रकारे प्रश्नः । तान. गत इति चेत् ; न, तत्रापि शक्तिरूपेणोत्तरवचनात् । अंसदपि केशादिकं ज्ञानेन प्रतिभास्यते २० इच्छफिमत्यादिति । उदेव कथमसद्विपयमिति चेत् ? आह- 'सर्व समानम्' इति । चोद्यं तत्समाधानं च सर्व समानं सदृशम् तद्ब्रहणे सदनुकरणे च । तथा हि यद्यसतो न ग्रहणम् अनुकरणमपि कथं यतो झागं तदाकारम् ? न तदनुफरणात् सस्य सदाकारत्वमपि तु पूर्वज्ञानादिति चेत् ; न, तस्यापि तदाकारत्वं यदि पूर्वज्ञानात्तस्यापि तत्पूर्वज्ञानादित्यनादेः केशनिर्भासस्य प्रसद्गात् । न चैवम् , विपयान्तरनिर्भास य॑वधानस्य दर्शनात् । व्यवहितरयेवाकारार्पयत्वमिति चेत्, ताशस्यैवार्थस्य प्रतिभासन किन्न भवेयतः शादिशामर्थवन्न भवेत् ? भवत्येवमतिप्रसङ्गो जन्मान्तरायगवस्यापि प्रतिमा. सोपपत्तरिति पेत् न, आकाराणेऽपि तत्प्रसङ्गात् । गरिनियमनस्तत्परिहारस्यान्यत्रापि प्रत्यवा- याभावात् । यतमानतया प्रतिमासमानस्य कथं व्याहितत्वं फेशादेरिवि घेत् ? पहिमायेन -- न्यायतास्ता- भा०प०प० । यि दि-मा०.प.प. ३ तानन्तरस्य प्रो-प. पागन्तु- नमस्य मा. खान एष । ५ सया तदर्श-भा, प... । (रेशादिस्पदया। रि-6, घ, १० । ८ सहि पयसनोप मा., ०,०1९-भारमशन मास, प.।
२७२ न्यायधिनिश्चयविवरण [१॥३६ प्रतिभासमानस्य कथं तस्य ज्ञानान्तर्गतत्वम् ? तंभावस्य मिथ्यात्वादिति चेत्, न, वर्तमानत्वस्यापि तत्वाविशेपात् । मिथ्याकारस्य कथमर्थत्वमिति चेत् ? ज्ञानत्वमपि कथम् ? न बहिर्भावेन ज्ञानत्वं केशादितयैव तत्त्वादिति चेत्, अर्थत्वमपि तयैव किन्न स्यादविशेषात् ? वतो न पूर्यज्ञानेनापि तदाकारेण तदर्पणम् । अतदासरेण तु तद्रहणवन्न वदर्पणमप्युपपन्नम् ५ अतिप्रसङ्गाद् दोषादिति सूक्तम्-सर्व समानम् इति । शक्तिनियमानियतस्यैव तदाकारस्यार्पणे तत एव ग्रहणमपि नियतस्यैव भने । तन्नियमश्च वस्तुसत्केशादिविपर्यदर्शनाहिततद्वासनापरिपाकवशात् , भयन्मनेन वस्तुसत्तदाकार- दर्शनार्पिततद्वासनापरिपाकयशासनियमवत् । एतदेवाह- तद्धान्तेराधिपत्येन [सान्तरप्रतिभासवत् ॥३६।। । तत् अनन्तरोत्तम् अर्थात्मासम्भाव्याकारडम्बरं भ्रान्तः मिथ्याज्ञानस्य आधिपत्येन सामर्थेन । दृष्टान्तमाह-सान्तरप्रतिभासवत् इति । अन्तरं व्यवधानं तेन सह वर्चमानं सान्तरं केशादि तस्य ज्ञानात् वहिर्व्यवधानेवत्वेनैव प्रतिभासनात् तत्प्रतिमासः स इव तद्वदिति । तात्पर्यमत्र-फेशादिप्रतिभासोऽयम् अवस्तुविषयः बाध्यमानत्वात् सान्तरप्रतिभास- वदिति । साध्यविकलं निदर्शनम्, तत्प्रति भासस्यापि वस्तुविषयत्वात् । अन्तरस्यापि ज्ञाना- १५ कारत्यैन वस्तुत्वादिति चेत् , न तर्हि पेशादेस्तदाकारत्वम् अन्तरितस्य तदयोगात् , सर्वस्यापि सदाकारत्वापत्तेः । अतोऽवस्त्येव केशादिकम् अज्ञानरचे गत्यन्तराभावात् , अर्थत्वस्य स्वयमनभ्यु- पगमात् । तदयं शमनप्रयोगादेव प्रकोपो दोपस्य केशादिप्रतिभासस्यावस्तुविषयत्वमुपशम- यितुमुद्भावितादेव निदर्शनेस्य साध्यवैकल्यात् "तत्प्रतिभासस्य तद्विपयत्वोपनिपातात् । तदि. दं दोपमपसिसारयिपता नान्तरस्य ज्ञानाकारत्वमुररीकर्तव्यमिति"सिद्धं तस्यावस्तुत्वेन तत्प्रतिभा. २० सस्थावस्तुप्रतिभासित्वमिति न साध्यवैकल्यं निदर्शनस्य । संवृतिरेवायमन्तरप्रतिभासो नाम । दर्शनं हि केशादेस्तद्रूपमेव नापरमसम्प्रतिपत्तेः । न च तदेव स्वतः स्वस्य व्यवधानमुपदर्शयति विरोधात् । संवृतिस्तु व्यवधानवासनापरिप- कादुत्पद्यमाना व्यवधानस्य तद्गतत्वेनोपदर्शनात् अन्तरप्रतिभास इत्युच्यते । न च तस्यावस्तु- विषयत्वेनान्यथा चा विचारसह्त्वम्, "तदसहत्वत्यैव "तद्रूपत्वात् , ततः सन्दिग्धसाध्यमेव २५ निदर्शनम् ; अवस्तुविषयत्वस्य साध्यस्य तत्रानिश्चयनादिति चेत् ;न, केशादिप्रतिभासस्यापि संवृतित्यप्रसङ्गात् तम्यापि तद्वासनापरिपाकाभावेऽनुत्पत्तेः । अतस्तस्यापि तद्विषयादन्यत्वानन्य. त्वाभ्यां विचार(ग)क्षमत्वात् कथं निश्चितं तस्य तदाकारत्वं यतस्तदवष्टम्भेनान्यस्यापि घेदनस्य तदभावस्य मि-भा०, ५०, प० । बर्भािवस्य । २-नमतिप्रमादिदोषा इति भा०, २०, ५०१ यमनिश्चयव-पा, प.प.) -यहेतुत्वादास-मा., 2०, १०। ५-धानत्वेनैव प्रा०, २०, प .. हादिप्रतिभासस्यापि । ७ ज्ञानाराराभावे । -समुपदर्शयितु-पा०, २०, ५०१९ सान्तरप्रतिभासस्य । "शादिप्रतिमासस्य | 11 मिहान्तस्य भा., ३०, प .१३ विचारामहत्वस्यैव । १३ मंनिसलावात् । * प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः २७३ विपयाकारानुमानमुपपन्नं भवेत् ? स्पष्टप्रतिभासमान केशादिप्रतिभासस्य संमृतित्वम् । न हि संवृतेः स्पष्टत्वम् । “न विकल्पानुविद्धस्य स्पष्टार्थप्रतिभामिता ।" [३० वा० २।२८३] इति वचनादिति चेत् ; न; अन्तरप्रतिभासस्यापि स्पष्टस्यैवोपलम्मात् तस्य चावस्तुविषयतया निश्चयान्न सन्दिग्धसाध्यत्वं निदर्शनस्य । । , नापि वाध्यमानत्वस्य हेतोरसिद्धत्वम् , 'नायमित्यमेव केशादिः' इति वाधकप्रत्ययस्य ५ तत्रोपनिपातात् । पाध्ययाधकभावस्य च सात्त्विकस्यैव व्यवस्थापनात् । यदि तज्ज्ञानादन्य एव केशादिन्येनापि कस्मानोपलभ्यते नानाप्रतिपत्तृसाधारणत्वावहिविषयस्य सत्यकेशादिवत् ? तिमिरादेस्तदुपलब्धिनिवन्धनस्याभावादित्यपि न युक्तम् ; परस्यापि तिमिरादिसम्भवात् । तःसम्भये भवत्येय तस्यापि तदुपरम्भ इति चेत् ; अन्यस्यैव वेशादेस्तेनोपलम्भात् । कथं तहि तैमिरिकयोरेकवाक्यत्वम् 'आकाशे केशस्तबकोऽयमास्ते' इति ? न; सादृश्यनिवन्धनत्वा. १०, त्तरेकवाक्यत्वस्य, एकस्यैवोपलम्भे तयोरन्यतरस्यान्यत्रोपलम्भो न भवेत्तस्यैवान्यन्त्र सम्भवात् । भवति च भिन्नदिग्देशतया तदुपलम्भनं तैमिरिकस्य, तस्मात्तादृशोऽन्य एवासी केशदिरिति तज्ज्ञानानुप्रविष्ट एवायम् अनन्योपलभ्यत्वान तज्ज्ञानस्वरूपवदिति चेत् ; न; पक्षस्य प्रत्यक्षवाधित- त्वात् , तदननुप्रविष्टस्यैव तस्य प्रत्यक्षेण प्रतिपत्तेः, पहिस्तस्यअन्तस्तज्ज्ञानस्यं च प्रतिभासनात् । न च तज्ज्ञानस्वरूपे तदनुप्रविष्टत्वे सति अनन्योपलभ्यत्वमुपलब्धम्' इत्येय "तस्य गमकत्वं यावद्विपक्षे विरोधो न गम्यते । गम्यत एव सहानवयानं "तद्विरोध इति चेत् ;न; "सहावस्थानस्यैव प्रतिपत्तेः "तदननुप्रवेशसहितस्यैवानन्योपलभ्यत्वस्य प्रतिवेदनात् । परस्पर- परिहारस्तद्विरोध इति चेत् ; न; अन्योपलभ्यत्वापेक्षयैव "तस्य भावात, हेविरुद्धेन अन्योप. लभ्यत्वेन साध्यविपक्षस्य व्याप्तत्वात् । अरत्येव तेनापि तस्य विरोध इति चेत् ; क्य पुन- स्तव्यातिप्रतिपत्तिः ? सत्यकेशादाविति चेत् ; न तत्राप्यन्योपलभ्यत्वस्य वस्तुतः स्वयमनभ्यु-२, पगमात् । पठति च प्रज्ञाकर:-"परेण तदभावेऽपि दृश्यते इति विपर्यासमारोप्य तथा व्यवहारः" [ ] इति । न च चैपर्यासिको धर्मस्वात्त्विकस्य बाधको माणयफे सिंहत्ववन्मनुप्यत्वस्य । ततो व्यभिचारी हेतुः, सत्यशादावतज्ञानानुप्रविष्टेऽपि भावात् । नायं दोपः, तत्रापि तदनुप्रवेशस्यैव भावादिति चेत् ; यच पुनरिदानी हेतुपिरोधिना साध्य. विपक्षस्य व्याप्तिपरिझानं यतो विपक्षव्यावृत्त्या हेतोर्गमकत्वम् ? क्वचित्साहचर्यदर्शनमात्रेण गमकत्वे तयुनत्येऽपि प्रसङ्गः श्यामेऽपि क्यरितस्य दर्शनात् । नेवमिति पेस् , न; प्रकृतेऽपि समानत्वात् अनन्योपलभ्यत्वस्यापि साध्यविपर्यये दर्शनात् । तद्यथा-सान्तरत्येन हि " . पुष्पेग । २ पुरुषस्य । -न्यत्र तदुप-श्रा०, २०,०। मादेः। ५ शानभिनायव ।। केशादेः। शादैः। ८ केशादिज्ञानस्य । ९ इत्यन्वयमाग्रेश। • वस्मगमत्वं यः । तस्य गमगत्व मा । "विपाविशेषः । सहानवस्था-मा., प, ३ तदप्रदेश-आ•, य... "रोिषस्य । १५ सदनुप्रदेशेनापि । सत्यशादावपि । ३५ ५ ११३६ प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्ताचा विवेकविकलस्यायमस्त्येवोपप्लवो यदि । तस्यैवार्थोऽपि मन्दावभासः किनोपपत्तिमान् ? ॥७१०।। सत्यपि बुद्ध्यात्मनो ग्राह्यादिविकल्पस्य चान्योन्यव्यावृत्ततया प्रतिभासने द्विवेकश. किविकलस्य भवत्येव बुद्ध्यात्मनि प्राधादिभेदप्रतिभासोपप्लव इति चेत् ; नैवम् ; मन्दावमा- सस्याप्युपप्लवस्य सम्भवात् । मन्दालोकरूपयोरपि विविस्तया प्रत्यवभासनस्य तद्विवेकयैकल्यस्य व कविताविपत्तिरिति सम्मवानिवारणात् । तस्मात्-"मन्दालोकसाहित्येन रूपेऽपि मन्दप्रतिभासोपपत्तेरथस्य प्रतिभासः स्यात् ।" [ ] इत्यादिफैमपालोचितवचनमेव निवन्धनकारस्य । धर्मकीर्तिस्तु "मनसो युगपद्वृत्तेः" [५० वा० २।१३३ ] इत्यादिना दर्शनविकल्पयोरन्यतरधर्मस्यान्यत्र प्रत्यासत्तिवशादध्यारोपं युवाण एव आलोकमान्यस्य उत्पाटवस्य वा रूपेऽपि कथमध्यारोपमपाकुर्वीत ? यतरतध्यारोपवशादेकाकारस्यापि रूपस्य १० स्पष्टेतरात्मना भेदेन प्रतिभासो न भवेत् । ततस्तस्यापीदमपर्यालोचितमेवाभिधानम्- "मान्धपाटवभेदेन भासो घुद्धिमिदा यदि । मिन्नऽन्यस्मिन्नभिन्नस्य कथं भेदेन भासनम् ? ॥"[प्र०वा०२।४११]इति । न च वयमालोकमान्यनिवन्धनत्वं मन्दायभासस्य धूमः, सत्यपि तस्मिन् पालके परि- स्फुटस्यैव रूपदर्शनस्य भावात, असत्यपि यस्मिन् परिणतवयसि मन्दस्यैव रूपप्रतिभासरयो. ११ पलम्भात् , अपि तु तज्ज्ञानाशक्तिनिवन्धनत्यमेव । यदुक्तम्-'तान्तराधिपत्येन' इति । ननु यावत्तदाधिपत्येन वहिरसत एव मन्दाकारस्य प्रतिभासनं तावत् ज्ञानाकारस्यैव फरमान भवति ? प्रतीतिऔषमनुगृहीता भवति । तथा हि प्रतीतिरेव मम ध्यामस्तिरूपोदिवा' इति जनः प्रतिपत्तिमानिति चेत् ; न; तदर्भािवेन प्रतिभासमानस्य तदाकारत्यानुपपत्तेः । 'प्रतीतिरेवं मम ध्यामलितपोदिता' इति तु प्रतिपत्तिहिास्यस्यान्तरुपचारात् । ननु कार्यधर्मस्य २० फारणे भवत्युपचारो यथा चक्षुपि दर्शनमान्यस्याध्यासात् मन्दं चक्षुः' इति । दर्शनस्यं तुन विषयः कार्य नाप्यन्यत् यतस्तन्मान्यस्य तत्राभ्यासात् 'मन्दं दर्शनम्' इत्युच्यते । विषयत्वादेव तद्ध- मस्य विषयिण्युपचार इति चेत् ; न; मान्द्यवत् धर्मान्तरस्यापि तद्गतस्य तत्राध्यासप्तसङ्गात् । तथा च कुड्यादित्वेनापि दर्शनस्य व्यपदेशः स्यात् न चैवमनुमतिः भवतः । तस्मादस्पष्टत्वं नाम रष्टेरेव रूपं सर्वजनप्रसिद्धत्वात् । न प सार्वजनिरस्य निश्चयाय निनियन्धनमेव विधमत्वव्यय- २५ स्थापनत्वमुपपन्नम् । सदुकम्- "मम ध्यामलितं चतुस्ताटग्दर्शनसनमात् । तत्कार्यदर्शनादेव व्यपदेशस्तथास्तु मः ॥ , मन्दाक्लोक-मा...10-दिव्यम-मा०,५००।३ पालोकमान्ये ।।५-रेव. मण्या-भा०, ५०, ५०।६-स्य तु विपिः अ-मा०, २०, ५.। . दर्शने । ८ -मनभवतिर्म- मा०,प. .
न्यायविनिश्चय विवरण [२३६ 'सदपि स्वयमुपलभ्यमानमन्येन शक्यमुपलब्धुं फेशादिवत् । न च तस्य तज्ज्ञानानुप्रवेश इति प्रतिपादितमनन्तरमेव । ततो नातस्तैमिरवेशादेतज्ज्ञानानुप्रवेशः सिद्ध्यति यतस्तत्र प्रकाशनि. यमस्य ताप्यनियन्धनत्वनिर्णयात अन्यत्रापि तस्यैव तन्निबन्धनत्वसाधनमुपपद्यत । तो बोधशक्तित एव तत्केशादावपि तन्नियमस्य भावादन्यत्रापि तत एव तनियमः प्रतिपचव्य इत्य. ५ लमभिनिवेशेन। स्यान्मतम्-यदि संविदनुप्रवेशो नार्थस्य कथमवभासनम् १ स्वरूपेणैव पुरोवर्तिनेति चेत् ; कथं दूरेऽपि न तथैव दर्शनम् ? कथं ध्यामलितत्वेन प्रहणम् ? न हन्यरूपेण तद्रहणम् । अथ तद्रूपमेव मन्दालोकसम्पन्मिन्दतया प्रकाशते; तदनुपपन्नम् ; यतः- अर्थस्य प्रतिभासः स्याद्यदि मासा समन्वितः । अन्येन सहितामासे ने स्यान्मन्दावभासिता ॥७०५॥ १० परस्परव्यावृत्तालोकरूपप्रतिभासे हि तयोरेव तथावभासनमिति नाऽस्पष्टरूपप्रतिभास: । न खल्वन्यस्मिन् स्वरूपावभासवति तदपरस्तथा भवति । भवत्येव कुसुम्भरागवतान्तरितवस्तुप्रति- भासवदिति चेत् । न, तत्रापि समानत्वात् । वरूपेण प्रतिभासने "नेरताव(न रक्तताव )भासः । वदेव तस्य रूपमिति तथावभासनाभ्युपगमे प्रकृतस्याप्यालोकमन्दतया तदेव रूपमिति सक्लस्य १५ तथावभासनात् कुतो चुद्धिभेदः ? तस्मादालोकभेदेऽपि न भेदावभासः।"तस्माद्बुद्धेरेवायमाकारो मन्दरूपः तथा व्यवस्पश्चेति, तन्न समीचीनम् ; मन्दरूपस्यापि याह्यत्वात् । ननु अर्थस्यात. दूपत्वात्कथं तथा प्रतिभासनम् , मन्दालोकबलात्तत्मतिभासनस्य प्रतिविहितत्वादिति चेत् ? यस्मात- २० मन्दालोकान्वयादर्थो मन्दश्चेवायभासते । "बुद्ध्यात्मारोपसम्पत्तिपो भासते फ्थम् ? ॥७०६॥ मिथोव्यावृत्तयोर्योधभेदोपप्लवयोस्ततः । प्रतिभासे कथं योधरूपे स्यात्तदुपप्लवः ॥७०७॥ निरुपप्लक्साभावे तनेदं कथमुच्यते । "ज्ञानस्यामेदिनो भेदप्रतिभासो ह्युपप्ठयः ॥" [प्र०या० २।२१२ ] मोहाभावे कथं च स्यात् "शास्त्र मोहनिवर्तनम् ।" [प्र० वा० ११७] असतः खरगस्य किं विशिरस्यानिवर्तनम् ॥७०९।। २५ शादि। २ सत्यशादावपि । ३ रेय -आ०, प., प.! ५ अतद्रूप-आ०, ब., ५०॥ ५ तुलना-प्र.पातिकाल. २०४१६। ६ अनेन स-आ.,.,.. न मन्मन्दा-आ., २०५०। -तिस-भा.व.,प० ।९ रूपेण भा०,०,१०।१०-नेन न रताव-भा.द.1-नेन रक्ततावभास.- म. पालिका करमा-मार, ०,१०।१२ दुधारमालोकस-मा०, ब..।
प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्ताव ११३६] विवेकविकलस्यायमस्त्येवोपलवो यदि । तस्यैवार्थोऽपि मन्दावभासः किन्नोपपत्तिमान १ ॥७१०॥ सत्यपि बुद्ध्यात्मनो पारादिविकल्पस्य चान्योन्यव्यावृत्ततया प्रतिभासने तद्विवेकश. किविकलस्य भवत्येव बुद्ध्यात्मनि माशादिभेदप्रतिमासोपप्लव इति चेत् ; नैवम् ; मन्दावमा- सस्याप्युपलवस्य सम्भवात् । 'मन्दालोकरूपयोरपि विविक्ततया प्रत्यवभासनस्य सद्विवेकवैकल्यस्य ५, च फचित्प्रतिपत्तिरिति सम्भवानिवारणात् । तस्मात्-"मन्दालोकसाहित्येन रूपेऽपि मन्दप्रतिभासोपपत्तेरर्थस्य प्रतिमासः स्यात् ।" [ ] इत्यादिकमपर्यालोचितवचनमेव निबन्धनकारस्य । धर्मकीर्तिस्तु "मनसो युगपत्तेः" [प्र० वा० २११३३ ] इत्यादिना दर्शनविकल्पयोरन्यतरधर्मस्यान्यत्र प्रत्यासत्तिवशादध्यारोपं वाण एव आलोकमान्यस्य तस्पाटवस्य वा रूपेऽपि कथमध्यारोपमपाकुर्वीत ? यतस्वध्यारोपवशादेकाकारस्यापि रूपस्य १० पटेतरात्मना भेदेन प्रतिभासो न भवेत् । ततस्तस्थापीदमपर्यालोचितमेवाभिधानम्- "मान्धपाटवभेदेन भासो बुद्धिभिदा यदि । मिन्नन्यस्मिन्नभिन्नस्य कथं भेदेन भासनम् ? ॥"[प्र०या०२।४११] इति । न च ययमालोकमान्यनिवन्धनत्यं मन्दायभासस्य धूमः, सत्यपि तस्मिन् पालके परि- स्फुटस्येव रूपदर्शनस्य भावात, असत्यपि तस्मिन् परिणतवयसि मन्दस्यैव रूपप्रतिभासरयो- १५. पलम्भात् , अपि तु तज्ज्ञानाशक्तिनिबन्धनत्यमेव । यदुक्तम्-'तान्तराधिपत्येन' इति । ननु यावत्तदाधिपत्येन पहिरसत एव मन्दाकारस्य प्रतिभासनं तावत् ज्ञानाकारस्येव फरमान भवति ? प्रतीतिश्चैवमनुगृहीता भवति । तथा हि 'प्रतीतिरेव मम ध्यामलितरूपोदिवा' इति जना प्रतिपत्तिमानिति चेत् ; न; तद्वहिर्भावेन प्रतिभासमानस्य तदाकारत्वानुपपत्तेः । 'प्रतीतिरेवं मम ध्यामलितरूपोदिता' इति तु प्रतिपत्तिर्बहिःस्थस्यान्तरुपचारात् । ननु कार्यधर्मस्य २० फारणे भवत्युपचारो यथा चक्षुपि दर्शनमान्द्यस्याध्यासात्'मन्दं चक्षुः' इति । दर्शनस्य हुन विपयः कार्य नाप्यन्यत् यतस्तन्मान्यस्य तत्राभ्यासात् 'मन्दं दर्शनम्' इत्युच्यते । विषयत्वादेव तद्ध. मस्य विपयिण्युपचार इति चेत् ; न; मान्यवत् धर्मान्तरस्यापि तद्गतस्य वाध्यासप्रसङ्गात् । तथा च फुड्यादित्वेनापि दर्शनस्य व्यपदेशः स्यात् न चैवमनुमतिः भवतः । तस्मादस्पष्टत्वं नाम रटेरेव रूपं सर्धजनप्रसिद्धस्यात् । न च सार्वजनिफ्स्य निश्चयाय निनियन्धनमेव विनमत्वम्यव. २५ स्थापनत्वमुपपन्नम् । तदुक्तम्- "मम ध्यामलितं चतुस्तादग्दर्शनसद्मात् । तत्कार्यदर्शनादेव व्यपदेशस्तथास्तु मः ।। मन्दायलोक-बा.,.,..।२-दिपम-भा०,३०,प.। ३ मालोक्माग्थे। वृदे।५-क. मन्या-मा०, २०, ५०।६ -स्य तु विषयिः का-मा, य., .1 • दर्शने। ८-मनमयतिर्भ- मा०प०, प.
न्याययिनिधयपिपरणे (११६ 1 दृष्टस्तु कार्य नास्त्यन्यन्नाथ' कार्यतया स्थितः । तथा समागमादेव यदि नीलापि सोच्यताम् ।। युटर ममेयं दृष्टिदिन कदाचिचयेप्यते । तस्मादस्पष्टता दृष्टः सर्वलोकमतीतितः ।। निथयो न हि सर्वेपामझमाझान्त उच्यते ॥" [३० वार्तिकाल० २।४१०] इति चेत् न, तन्निश्ययस्योपचारेण भावात्, उपचारस्य विषयमायेनोपपत्तेः । न यं धर्मान्द- रस्याप्युपचारः। या (या) होके गोत्ययत्तिष्ठन्मूत्वस्यापि तत्प्रसद्गात् । कदाचिदस्त्येयायमपीति पेत् । न, दर्शनेऽपि पदाचिद्विपयव्यपदेशस्य भावात् , 'पापकोऽवधूमात्' इत्यत्र धूमदर्शनस्यैव धूमयेन व्यपदेशात् । ततः 'पुष्यं ममेयम्' इत्यादि पराभिप्रायानभिज्ञतयेय प्रतिपादितम् , १. फादादित्यस्य विषयव्यपदेशस्य विपयिणि परेणाभिप्रेतत्वात् । न च तनिधयस्याकस्मादेव भ्रान्तत्वमुच्यते, वाधकादेव तदभिधानात् । तर्थ यहि वेन प्रतिमासनमेव । ननु न संवेदनात्तस्य वहिर्भागः, तस्य तव्यतिरिक्तस्यामानादनुपलम्भात् , अस. 'तश्चानपादानवात् । न प सदात्मन एव ताय यहि वो विरोधात् । 'ममार्य बहिरेव ध्यामलाकार' इति व्यवहारस्तु शीरापेक्षयर, ममत्वेन शरीरस्य व्यपदेशात् । स्वरूपविभासे" हि न तट. १५ स्थातटस्थते "व्यवहारमानमिदम् . आश्रयापेक्षया परम्" [ ] इति वचनादिति पेत् ; न, शरीरस्यापरिक्षाने ममत्वेन निदेशानुपपत्तेः मुमशरीरयत् । न प वस्य परतः परिक्षानम् अनभ्युपगमान । स्वतातु परिक्षाने भवतु 'मम' इति न पुनामलाकार इति तस्य तेनापरिज्ञानात् । “न हि समयेइने परसंवेदनम्" [ ] इति वचनात् । मा भूच्छरीरापेक्षयापि "तस्य 'तटस्थत्वमिति चेत् , कथ तद्व्यवहारः १ संवृतिमात्रादिति चेत् । २० "कुनलयोहंतुफलभावप्रतिपत्तिः ? न कुतश्चिदिति चेत् , कथमभ्युपगमस्तद्विपर्ययवत् ? न घ संवृतिमानात्तद्भावप्रतिपत्तिः वेन व्यवहारस्यापरिक्षानात् । नापि व्यवहारात ; तेनापि तन्मात्रस्या. प्रतिवेदनात् । न च "तयोरेन परिझानाभावे तहेतुफ्लभावस्य परिज्ञानम । भवतु तदुभय. विषयमेकमेव किनिद्विज्ञानमिति चेत् ; न, यतस्त्रापि तयोग्नुप्रवेशे न हेतुफलभावः तस्य भेदनिष्ठत्वनेत्रासम्भवात् । अननुशे सिद्ध "तयास्तदपेक्षया तटस्थत्वम् । सवृत्या वयव. . - . - , -का-मा०, २०, ५० । २ दृष्टि । ३ चैत् दर्श-भा, घ०, ५० । ४ मिज्ञातयप्र-मा०,०, प.। ५ भ्रान्त वकथनात्। ६२धकच । ध्यामलाकारस्य। ८ यत ध्यामलाकारसंवेदनशैरभेद भत तस्यैव सवेदनम्वरूपस्यैव शामराकारस्य कथ तस्माद् व्यतिरिक्त्वमिति भाव । ९पृथगनुालयस्य सवेदनस्य 'सवेदनात्तस्य बहिभावइत्यत्र न अपादानत्व युज्यते । तश्चानुगदान-५० 1 -तश्चानुराधान-भात, या ..तरवहादेव सवेदनात् तस्य धामलाकारस्य । 11-तटस्था तटस्थवरले ५.1-सन तटस्थातटस्थते मार, R-मायापेक्ष-मा., २० ।-मात्र पच्छ-प.।। ध्यामलाकारस्य । १४ तदवस्थत्वमिति मा..., १०।१५ सति व्यवहारयो । १६-कापरि-आय.प. उभयविषयकशानेऽपि । सतिन्यव. हारयो.। १९भयविषयतज्ञानापेक्षया ।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावा . हार इत्यपि संयत्यैव न वस्तुतः । ततो यदि तस्य विचार्यमाणस्यायोगो न कश्चिहोपो विचाराक्ष. मत्वस्यैव तद्रूपत्वादिति चेत् ; न; वास्तवस्यैव तयवहारस्य प्रसङ्गात् । तन्मिथ्यात्यस्य मिथ्यात्वे गत्यन्तराभावात् ।। अपि च, द्वितीयस्यामपि संपतो पूर्ववत्प्रसङ्गः तस्यास्तत्फलस्य पापरिक्षाने न सद्भाव. स्याभ्युपगमः । परिज्ञानश्च यदि क्वचिदननुपनिष्टतयैव किन 'वस्तुतः तटस्थतयैव प्रतिभास. ५ नम् १ तयोरपि संवृत्यैव तद्भावः परिकल्प्यते तस्य च विचारपरिशिथिलत्वं न दोपायेति "चेत् । तत्र; अव्यवस्थापत्तेः । ततो दूग्मनुसत्यापि कयोश्चित्संवृवितत्फलयोः पारमार्थिक एव तद्भावोऽभ्युपगन्तव्यः । स च तयोः क्वचिदहिभूतयोरेव प्रविभासते(ने) सम्भवति नान्यथा । तथा च ध्यामलाकारस्यापि तज्ज्ञानबहिर्भूतस्यैव प्रतिभासनमिति सिद्धं तदेकत्यनिश्चयस्य तेन बाधनाद्विभ्रमत्वम् । यदि पन (पुन) रसत एवं तदाकारस्य धान्तिसामध्येन पहिरवभासनं कथं तज्ज्ञान- सास्पष्टत्वं यतः परोक्षतया प्रमाणत्वम् ? कथं वा पहिरभिव्यक्तेन रूपेण तज्ज्ञानस्य स्पष्टत्यं यतः प्रत्यक्षतया प्रमाणत्यमिति चेत् ? न; अभिप्रायापरिज्ञानात् । न ह्यालोकालिङ्गि तयस्तुविषयतया स्पष्ठत्वं प्रत्यक्षस्य श्रोत्रादिप्रत्यक्षस्य तद्भावा (तभावा)पत्तेः, अपि तु क्षयोपशमादिनिमित्तो शानस्य विशुद्धिविशेप एव । अस्पष्टत्वमप्यपकृष्टस्तद्विशेष एव न ध्यामलाकारकवलितवस्तु. १५ प्रतिभासित्वमेव, स्मरणादौ सदभावापत्तेः । प्रतिपादितं चैतत्पूर्वम् । ततो नानकारशकेऽपि मिरविषयादो प्रकाशनियमस्य हेतुनिवन्धनत्व बुट्यति यतोऽन्यत्रापि तन्निदर्शगेन तनुश्यत्ता व्यवस्थाप्यतेवि स्थितम् । इदानीं 'प्रकाशनियमो हेतोः' इत्यादिकमेव व्याविख्यासुरवसरप्राप्तं चोयमु- स्थापयति-- यौवात्मायाकारमभूनमवलम्यते । तथैवात्मानमात्मा चेदभूतमवलम्बते ॥३७॥ इति । यव येनेव भ्रान्तेराधिपत्येन प्रपारेण नापरेण आत्मा स्वभायो ज्ञानस्य तस्येया- सम्बकत्वोपपत्तेः अयं प्रत्यात्मवेदनीय आकारं मिरवशादिकम् अभूतम् अविद्यमानम् अवलम्पते जानाति तथैव सेनैव प्रकारेण आत्मानं स्वरूपम् आत्मा अभूतम् २५ असन्तम् अवलम्यते चेत् यदि । तथा हि, यद् घोधाधिपत्येनायलम्यते वदभूतम् यथा :- मिरफेशादि, योधाधिपत्येनावलम्टयते च योधात्मेति । तत्रोत्तरमाह- न स्वसंवेदनात् [तुल्यं भ्रान्तेरन्यत्र चेन्मतम् । ] इति । । सातेस्वरूपात । पम्-T• 1४R. 'साया व्यवहारः' इत्यस्य मिन्मारूपले। ३ हेतुफलमावस्म । तापस्याप्युपप-मा...,... यानुट-प्रा. प. प. शाश्व-मा, य, प.। पनस्तन प. arr त्रुटितम् । -सानं न-मा०, २०, ५०। ८ सद्भावीपपणेः १० । तना. २०।-रामनादि-आ....। बोपमा - मतम् ।। १० न्यायविनिश्चयविपरणे [११३८ आरमानमारमा अभूतमवलम्बते इत्येतत् न । एत: ? स्वेन आत्मना संवेशनात प्रतिपरोस्तदात्मनः । वात्पर्यमत्र-यद्याधिपत्यं तस्याभूतमेव फुतस्तेनात्मनस्तत्पशादेवावलम्बनम् ? इत्यसिद्ध साधनं तद्विकलता च दृष्टान्तस्य । भूवमेवेति चेत् , कुव एतत् । तथैव स्वसंवेदना- प्रत्यक्षारप्रतिपत्तेरिति चेत् , प्रत्यक्षबाधितस्तहि भवदीयः पक्षस्तस्य फथं हेतुपलेन व्यवस्था. ५ पनम् ! "न तस्य हेतुभित्राणमुत्पतन्नेर यो हतः" । इति न्यायात् । न भूर्व नाप्यभूतं तत् , वस्य तदुभयविकल्पावीतत्वादिति चेत् , तन्न, यस्मात्- तद्विकल्पव्यतीतत्वं यद्यभूतमुदीर्यते । तयोरन्यतरः कल्पो भवेदुक्तंप्रतिक्रियः ॥७११॥ भूत चेदाधिपत्यञ्च तद्वद्भूतं न भूताभूतविकल्पाभ्यां निर्मुक्तं तदपीति चेत् ॥७१२॥ अनवस्थानदोपेण तदेतत्पीडित वचः। यक्तश्चित्तपरिछशमावहत्यतिदुःसहम् ॥७१३॥ सरमाहूरमुपेत्यापि तद्भूतमभिवाञ्छता । बोधात्मा भूत एवायमभ्युपेतो भवत्यलम् ॥७१४॥ तम्मादालम्बनं तस्य नाभूतस्योरपद्यते । 'इति सूक्तमिदं देवैः 'न स्वसंवेदनात्' इति ॥७१५॥ पर आह-तुल्यं सदृशम् आत्मनीवाकारेऽपि तत्केशादी स्वसंवेदनं तस्यापि तदन- र्थान्तरत्वेनैव प्रतिवेदनात् । न हि तनापरं तद्वेदनमुपलभ्यते । इदमेव च स्वसंवेदनं यदन्य. निरपेक्षमुपलम्भनमिति भाव. परस्य । ननु इदं प्रागेव प्रतिविहितम् अन्योपलम्भस्य व्यवस्थापनात् , तकि पुनरुपक्षेपेणेति घेत १ न, अन्यथा दूपणप्रतिपादनार्थत्वात् । तदेवाह-भ्रान्तरिति । 'न' इत्यनुवृत्तम् । यदुक्तं 'तुल्यम्' इति । तन्न, कुतः ' भ्रान्तविभ्रमात् मिथ्यात्वात्तदाकारस्य । न हि ज्ञानाकारस्य मिथ्यात्वमुपपन्नं ज्ञानस्यैव तत्प्रसगात् । प्रसिद्धश्च भ्रान्तितया तदाकारः । ततो न स्वतस्तस्य, सवेदनम् । अभ्रान्तिरेवासी ज्ञानरूपतया भ्रातिस्तु बहीरूपत्वेनैवासतेति चेत्, न, तस्य तथाs. २५ नम्भासनात् , अन्तारूपतयैव प्रतिपत्तेः, अप्रतिभासने घन भ्रान्तिः, अतिप्रसङ्गान् । प्रतिभा. सत एव ज्ञानान्तरे तद्रूपतया । तदाह 'अन्यत्र चेत्' इति । अन्यत्र ज्ञानान्तरे तत्प्रतिभास इति भ्रान्ति. तदाकार. चेत् यदि इति । तत्रोत्तरमाह-'मतम्' इति । 'न' इत्यधिकृतम् । इदमभिमतं न सम्भवतीत्यर्थः । न हि ज्ञानाकारस्य ज्ञानान्तरे प्रतिभासनम् अनन्यतया . २० 1-कप्रतीतित था...।२-तमपि वा-आ.ब.प.। एतत सूफ-भा., ०.५० तदर्या-मा०, २०, ५० ५'एतदेव खसम्वेदन यदम्यागोचरले सति प्रकाशन नाम !"-प्र० कार्तिकाल. ३५युक्त मा०, ब०, प.1 -सुवति भा०, ५०, प० ।
२७१ ५ १० ११३८ प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्ताव वदभ्युपगमात् । अन्यस्यैव तत्र प्रतिभासनमिति चेत् । कथं तत्केशादेचन्तित्वम् ? अन्यस्यैव तदुपपत्तेः । तत्सादृश्यादिति चेत् ; तस्यापि कथं तत्त्वं येनैवमुच्येत । तत्र बहिरसतः केशादेः प्रतिभासनादिति चेत् ; न; प्राच्येऽपि तज्ज्ञाने तथैव तत्प्रसङ्गात् । इति सिद्धं मुख्यत. यैव तस्य भ्रान्तित्वं ततश्चाऽत्यसंवेदनमिति द्वितीयेऽपि ज्ञाने तदनुप्रविष्टस्यैव तस्य प्रतिभास- नम् । यहीरूपत्वं तु ज्ञानान्तरोपदर्शितमेवेति चेत; न, तत्रापि न हि' इसार्दोषस्य परिभ्र. मादव्यवस्थापत्तेः। एतनैव तदपि प्रत्युक्त यदुक्कमलकारे-"विकल्पो ग्राह्यग्राहकोल्लेखेनोत्पत्तिमान सोऽपि स्वरूपे ग्राह्यग्राहकरूपरहित एव परेण तथा व्यवस्थाप्यते न तस्यापि स्वतो व्यवस्था" [प्र. वार्तिकाल० ३।३३०] इति । कथम् ? 'विकल्प एव नैवं स्यादनवस्थानदोपतः । सद्भावे कथं नाम वचोऽप्येतत्प्रवर्तताम् ॥७१६॥ "वाच्यवाचकसम्बन्धज्ञाने हि वचनं भवेत् । नापरं तच विज्ञानमन्यत्र सविकल्पकात् ॥" [ ] तत्संस्काराद्वयोवृत्तिरित्यप्येतेन दूषितम् । विकल्पमादिसंस्कारस्तभावे न यद्भवेत् ।।७१८॥ १५ तदचोऽपि न चेन्नास्य "निवद्धस्यावलोकनात् । भ्रान्तिरेव तवेयं चेत्केयं भ्रान्तिर्निगद्यताम् ॥७१९॥ चचस्यविद्यमानेऽपि तत्सत्त्वारोपणं यदि । विकल्पादेव नन्वेतचदभावस्ततः कथम् १ ॥२०॥ मिध्याक्षानं ततः किश्चिद्वस्तुवृत्त्यैव कप्यताम् । बाहामेव च वगाहां तन्मिच्यारूपमियपि ॥२१॥ तज्ज्ञानस्य स्वरूपम्य तद्वन्मिध्या भरेपदि । तदेव न तस्य स्यात्मसंवेदनमाञ्जसम् ॥७२२॥ अस्ति चेतत्ततस्तन्नासत्यं सूक्तमिदं ततः । 'न स्वसंवेदनात्तुल्यं भ्रान्तेरन्यत्र चेन्मतम् ॥७२३॥ इति । कथं पुनर्याहास्य ग्रहणम् ? कथञ्च न स्यात् ? स्वाभिमुसेन रूपेण तदयोगात् । खरूपस्यैव हि तेन ग्रहणमुपपन्नं न थाहस्य, बदभिमुखेनैव रूपेण प्रहणं न स्वाभिमुसेनेति पेत् । किमेवं रूपेस्तः क्या चेत् ; कुतस्तयोः प्रतिपत्तिः ? परस्पराभ्यामिति चेत् ; क्या , २० २५ ततच स्व-प्रा., प., प. द्वितीय वि-भा, ३०, ६०।३ एवं ने तदपि मा, .. एवं भा., प. प.1 ५निराधा-मा०,०, २०॥ ६ पारस्य वि-मा..., .-4 सदेत-सा., ०५०।
१० न्यायविनिश्चयविपरणे [११३८ आत्मानमारमा अभूतमवलम्बते इत्येतत् न । कुतः ? स्वेन आत्मना संवेवनार प्रतिपरोस्तदात्मनः । तात्पर्यमान्यद्याविपत्यं वस्याभूतमेव धुतस्तेनात्मनस्तत्वेशादेवावलम्बन इत्यसिद्ध साधनं तद्विक्लता च दृष्टान्तस्य । भूतमेवेति चेत् ; युत एतत् ? तथैव स्वसंवे प्रत्यक्षात्प्रतिपत्तेरिति चेत् । प्रत्यक्षयाधितस्तर्हि भवदीयः पक्षस्तस्य कथं हेतुनलेन कर ५ पनम् ? "न तस्य हेतुभित्राणमुत्पतन्नेर यो देत" [ ] इति न्या भूतं नाप्यभूतं तत् , वस्य तदुभयविकल्पातीतत्वादिति चेत् , वन्न, यस्मात्-- तद्विकल्पव्यतीतत्वं यद्यभूतमुदीर्यते । तयोरन्यतरः कल्पो भवेदुक्तंप्रतिक्रियः ॥७११॥ भूतं चेदाधिपत्यञ्च तद्वद्भूत न किं मतम् १ । भूताभूतविकल्पाभ्यां निर्मुक्तं तदपीति चेत् ॥७१२॥ अनवस्थानदोपेण तदेतत्पीडितं वचः । वक्तश्चित्तपरिक्लेशमावहत्यत्तिदुःसहम् ॥७१३॥ सस्मादूरमुपेत्यापि सतर्ममिवान्छता । योधारमा भूत पवायमभ्युपेतो भवत्यला ॥७१४॥ तामादालम्बनं वस्य नाभूनस्योरपद्यते । 'इति सूक्तमिदं देवैः 'न स्वसंवेदनात्' इति । पर आह-तुल्यं सदृशम् आत्मनीवाकारेऽपि तत् न्तरत्वेने प्रतिवेदनात् । न हि तनापरं तद्वेदनमुपलभ्य निरपेक्षमुपलम्भनमिति भाव. परस्य मनु इदं मागेव प्रतिविहितम् अन्योपलम्भरय घेत् ? न, अन्यथा दूपणप्रतिपादनार्थत्वात् । तदेवा। 'तुल्यम्' इति । तन्न, पुतः १ भ्रान्तर्विभ्रमात मिथ्यात्यमुपपर्न ज्ञानस्यैव तत्प्रसङ्गात् । प्रसिद्ध सवेदनम् । अभ्रान्तिरेवासी ज्ञानरूपतया भ्रानि २५ नवमासनात् , अन्तारूपतयेव प्रतिपत्तेः, . सत एव ज्ञानान्तरे तद्रूपतया । वदाह 'अन्य इति भ्रान्ति. तदाकार चेत् यदि इति । तत्रोत्तरमा इदमभिमतं न सम्भरतीत्यर्थः । न हि ज्ञानाकारस्य ज्ञान . । २० 1-प्रतीतित- मा०,०प०१२-तमपि घा-आ.,.,.। तर वर्या-पा०, प०, ५०। ५ "एतदेव खसम्वेदन यदन्यागोचर सति प्रकाशन • । युक्त भा०, ६०प.1 0 -सति बा०, ५,५०।
२७२ ११३८] प्रथमः सत्यक्षप्रस्तावः तदभ्युपगमात् । अन्यस्यैव तत्र प्रतिभासनमिति चेत् ; कथं सत्यशादेात्तित्वम् । अन्यस्यैव तदुपपत्तेः । तत्सादृश्यादिति चेत् । तस्यापि कथं तत्त्वं येनैवमुच्येत । तत्र बहिरसतः केशादेः प्रतिभासनादिति चेत् ; न प्राच्येऽपि तज्ज्ञाने तथैव तत्प्रसङ्गात् । इति सिद्धं मुस्यत- थैव तस्य भ्रान्तित्व ततश्चाऽस्वसंवेदनमिति 'द्वितीयेऽपि ज्ञाने तदनुप्रविष्टस्यैव तस्य प्रतिभास- नम् । वहीरूपत्यं तु ज्ञानान्तरोपदर्शितमेवेति चेत; न, तत्रापि 'म हि' इत्यादेर्दोषस्य परिभ्र. मावळ्यवस्थापत्तेः । एतनैव तदपि प्रत्युक्त यदुक्तमलकारे-"विकल्पो ग्राह्यग्राहकोल्लेखनोत्पत्तिमान् सोऽपि स्वरूपे ग्राह्यग्राहकरूपरहित एव परेण तथा व्यवस्थाप्यते न तस्यापि स्वतो व्यवस्था" [प्र. वार्तिकाल० ३१३३० ] इति । कथम् ? "विकल्प एव नैवं स्यादनवाथानदोपतः । तदभावे कथं नाम वचोऽप्येतत्प्रवर्शताम् ॥७१६॥ "याच्यवाचकसम्बन्धज्ञाने हि वचनं भवेत् । नापरं तच विज्ञानमन्यत्र सविकल्पकात् ॥" [ तत्संस्काराद्वयोवृत्तिरित्यप्येतेन दूपितम् । विकल्पभारिसंस्कारस्तदभावे न यद्भवेत् ।।७१८॥ तद्वयोऽपि न चेन्नास्य "नियद्धस्यायलोकनात् । धान्तिरेव तवेयं चेत्केयं भ्रान्तिनिंगद्यताम् ॥७१९॥ वचस्यविद्यमानेऽपि तत्सत्त्वारोपणं यदि । विकल्पादेव नन्वेतत्तदभावस्ततः कथम् ? ॥२०॥ मिथ्याज्ञानं ततः किश्चिद्वस्तुवृत्त्यैव कथ्यताम् । बाह्यमेव ध नद्रा तन्मिथ्यारूपमित्यपि ॥२१॥ तज्ञानस्य स्वरूपञ्च तद्वन्मिध्या मवेधदि। तद्वदेव न तस्य स्यात्स्यसंवेदनमाजसम् ।।७२२॥ अस्ति चेतत्ततस्तन्नासत्य सूक्तमिदं ततः । 'न स्वसंवेदनात्तुल्यं भ्रान्तेरन्यन्न चेन्मतम्' १७२३॥ इति । कथं पुनर्याहस्य प्रणम् ? कथञ्च न स्यात् ? स्वाभिमुसेन रूपेण तद्योगात् । स्वरूपत्यैव हि तेन महणगुपपनं न याहस्य, वदभिमुखेनैव रूपेण प्रहणं न स्याभिमुसेनेति किमेव रूपेतः १ तथा चेत् ; पुतस्तयोः प्रतिपत्तिः ? परस्पराभ्यामिवि घेत् । तथा २० २५ पेत् ततय स-पा, २. प.। ३ द्वितीय वि-बा०, २०, ९.३ एरेनेदाप मा०, २०, पहिले एस म य०,०। ५ निबन्यवा-आ, २०, ५०। ६ पायस्य वि-मा०, ब., --लेत-मा., २०, प.।
२८. न्यायविनिश्चयविवरण [1136 सति देवदायज्ञदत्तपरिच्छिन्नमिव न द्वयमिति वैयेत, 'मया विदितमेतत्' इति च न स्यात् कर्तुरसंवेदनत्वेनामवमामनात् । ततश्च ते एव स्वसंवेदने स्यानाम् । तथा प सन्तानान्तरप्रतिपन्नक्दप्रतिपत्तियोः । अत एवात्मा द्वयोः प्रतिपत्तेप्यते, अन्यथायं प्रसङ्ग इति परः, अत्रोच्यते- ५ - स्ववेदनेतरत्वेन पूर्वन्यायानतिक्रमात् । सोऽपि पर्यनुयोगेन नैवानेन विमुच्यते ॥७२४॥ यदि स्वसंवेदनरूप आत्मा तस्य स्वात्मनि निमग्नत्वात् न परवेदनम् । परस्यापि वेदने को विरोध इति चेत् ? 'तेन रूपेण परं वेत्ति परेण वा' इति विकल्पयोरेकन स्था. तव्यम् । 'स्वरूपेण वेत्ति' इति न युक्तम् , 'स्वरूपस्य स्वात्मनि व्यवस्थानात् । स्वरूपे 'निविष्टं १० ययूपं ग्वाभिमुखमेव, तत्कथं परं वेत्ति ? अन्यमुसञ्चेत् ; तेन तर्हि स्वात्मा न प्रतीयते । ततः सन्तानान्तरवेदनवन्न द्वयप्रतीतिः । यस्य तदाभिमुख्यद्वयं स एक एवेति चेत् ; 'द्वयमेतत्' इति का प्रतिपतिमान ? स एव इति चेत् । पुनराभिमुख्यद्वयेन प्रयोजनमित्यनवस्थानं स्यात् । ततः स्वसंवेदनरूपत्रयम् , वतस्तद्वेदने पर आत्मोपगन्तव्यः पुनरपर इति महत्यनर्थपरम्परा ! ततः स्वविषयमेव ज्ञानं न बहिर्विपयामिति चेत् ; कथमेवं कवित्कस्यचिद्विभ्रमः स्यात ? १५ असदवभासित्वं हि विभ्रमः, तच बहिर्विषयस्यैर सम्भवति न स्वरूपविषयस्य, स्वरूपस्य विद्यमानत्वात् । विभ्रम एव मा भूदिति चेत् ; न; तस्य प्रसिद्धत्वान् । विचारासहव तत्प्रसिद्धिरिति चेत् ; कोऽसो विचारो यदसहत्वं तत्प्रसिद्धः १ 'कथं पुनः वाह्यस्य प्रहणम्' इत्यादिरेवेति चेत् ; न; सस्य जडत्वे स्वयमेवासम्भवादप्रतिपत्तेः । न हि तस्य स्वतः प्रतिपत्तिाड्यात् । परतः इति चेत् ; न; वनोऽपि स्वरूपमात्राभिमुसात्तदयोगात् 'स्वरूपस्य स्वा. २. स्मनि' इत्यादिवचनात् । विचारेऽप्यभिमुसमेव तदिति चेत् ; न; तगापि 'किमेवं द्वे रूपे स्तः' इत्यादेर्निरवशेषस्य प्रसङ्गस्योपनिपातात् । तन्न जैडो विचारः । चेतन एवेति चेत् , तस्याप्येका. फारत्वे कथं तत्र परापरस्य पूर्वपक्षोल्लेसस्य तदुत्तरोल्लेखत्य चोपदर्शनं विरोधात् ? अनेकाकार. त्वेऽपि यदि प्रत्युस्लेसं तभेदरलदा फुत 'इदमत्रोत्तरम्' इति पूर्वपक्षवदुत्तरयोपियविषयि. भावज्ञानम् १ पूर्वपक्षोल्लेयस्य तदुत्तरे तदुल्लेयस्य च पूर्वपक्षे प्रतीत्यभागत् । न च तदा- २५ वापरिमाने विचारस, तस्य तादूप्यान् । सन्तानरूपेण भेदो विद्यत इति चेत् ; म; तस्यावस्तुसरवे विचारस्यापि तत्त्वापत्तेः तादूप्यान् । तर च दोपस्य वक्ष्यमाणत्वात् । यस्तुसदेव तद्रूपमिति घेत् ; न; "आत्मसिद्धिप्रसङ्गात् , परापरवानपर्यायाविष्यम्भावस्यैवात्मत्वात् , सति तस्मिन् निर्याधमेव थाह्यमहणं स्वपररूपगोचरस्याभिमुख्यद्वयस्य तत्र भावात् । सवयप्रतिपत्तावप्यपरे- स्वरूप सा-मा..। स्वरूपाया-प .१ विशिष्टं प.। तस्याविनावात् था। "विश्रमप्रसिद्धिः। ५ जातो वि-मा०,.,.1 विषयविधिमावापरिक्षाने । नाधिदि-सा., .., प.सरूपगो-मा...,प..
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावा , -- २॥३.1 २८१ णाभिमुख्यद्वयेन प्रयोजनं तत्प्रतिपत्तावपि तदन्येनेत्यनवस्थानमिति चेत् ; न; विचारोल्लेसभेद- प्रतिपत्तायपि एवंप्रसङ्गात् तत्रापि तदाभिमुख्यभेदेन प्रयोजनं तत्प्रतिपत्तावपि तदन्येन तत्प्रति- भेदेनेत्यनवस्थानस्याविशेपात् । नास्त्यनवस्थानम् , परतस्तदुल्लेखानामपरिज्ञानात् । 'परतो हि तत्परिक्षाने तत्राभिमुख्यभेदापेक्षणात्तद्भवत्यनवस्थानं तत्परिज्ञानेऽपि तदपराभिमुख्यभेदस्यावश्यापे. क्षणीयत्वात् , न चैवम् , स्वत एव तेषां परिज्ञानात् । स्वतः परिज्ञाने परस्परस्वरूपापरिज्ञानात् ५ कथं तन्नानात्वपरिज्ञानम् ? इत्यपि न मन्तव्यम् ; तत्परिज्ञानस्य तदविण्वग्भावात्मना विचारे- व भावात, तस्य निरवशेषतदुल्लेखविषयत्वादिति चेत् , सिद्ध नः समीहितम् , आत्मरूपयोरपि स्वपराभिमुखयोरेवमात्मनैव तदभेदिना प्रतिपत्तेरनवस्थानोपानवतारात् । पराभिमुख्यस्यामि स्वतः परिज्ञाने तदपि स्वाभिमुखमेव भवेत् , अन्यथा ततस्तत्परिज्ञानायोगादित्यन्यदेव पराभि- मुखं तदभ्युपगन्तव्यम् , तस्यापि स्वतः परिज्ञानेऽपि ततोऽपि परं पराभिमुखमभ्युपगन्तव्य. १० मिति कथं तद्दोपानयतार इति चेत् ? न परापरस्य स्वाभिमुख्यस्याभावात् । कुतस्तर्हि परा. भिमु ख्यस्य परिज्ञानमिति चेत् १ प्रथमादेव स्वाभिमुसता, तस्मातस्य कथञ्चिदव्यतिरेकात , आत्मन स्तद्विवर्तज्ञानस्यपराभिमुख्ययोरप्येकमेय स्वसंवेदनमिति न स्वसंवेदनरूपत्रयं सम्भयति । व्यतिरेकनयार्पणया सम्भवत्येवेति चेत् ; न; तथापि तत्परिक्षानार्थमात्मान्तरपरिकल्पनं नय- तोऽये कान ततस्त तिरेकस्याभावात् , अन्यथा विचारारादुल्लेखानामपि ततस्तथा व्यतिरेके १५ तत्प्रतिपत्यर्थ विवारान्तरपरिकल्पनस्यापि प्रसङ्गात् । तत इदमविचारजतयैव प्रतिपादितम्- 'शतः खसंवेदनरूपत्रयम्' इत्यादि । कथं पुनः स्वपराभिमुसयो रूपयोरात्मनश्चान्वयिव्यतिरेकितया विरुद्धधर्माध्यासे सति परस्परमविध्वग्भाव इति चेत् ? न विचारतदुल्लेखानामपि तत एव तदभावापतेः। विचा. रोऽपि मा भूदिति चेत् ; क पुनरिदानी भवतः "स्थित्तः (सा) प्रशता ? संवेदनाद्वैत २० इति चेत् ; भेदे नीववि कथं तद्वैतम् ? निराहते तस्मिन् तदिति चेत् । न विचारादेव तनिकरणात, तम्य चाभावात् । अविद्योपप्लुतानामस्त्येव विचारः, तत्सरिशुद्धावैव तदभावादिति चेत् । कुतः पुनस्तदुपलवापेक्षणं विचारस्य ? स्वयमप्युपारवत्वादिति चेत् ; फर्थ तवस्तात्विक भेदनिराकरणं तद्विधिवत् ? कथं या सति तस्मिनिरपल उदद्वैतम् ? तस्याप्यन्यनो विचा. रानिराकरणादिति चेत् ; न, अनवस्थाप्रसङ्गात् । नायं दोपः प्रदीपकल्पत्याद्विचारस्य । २५ प्रदीपो हि तेलयादिकं निदा स्वत एयोपशाम्यति न तर निमित्तान्तरमपेक्षते सद्विचा- रोऽपि भेदनाले निराकृत्य स्वत एव निराक्रियते न तब विचारान्तरमपेक्षते इति पेट; वतस्त- निराकरणं "नाम तदभायवेदनमेव । तय न सयम् ; तद्रूपत्वेन विरोधात्-'अभावशेन वेदनम् , तत् नाभावः' इति । अविरोधे या तदद्वैतस्याप्यभावस्येव वेदनत्यमिति नोपलयात्तस्य विशेषः । परतोऽपि तस्प-भा०,०,११२-शानरसहनाभि-मा., २०,०1। भेदविवक्षया । भेद- प्राहिनयेनापि सर्वथा भेदस्य सियभावात् । ५ -विचारितयेव भा०, ५०, प० । ६ विचाराततुलसनमपि प. रियालकुल्लेसनमपि । भाग, या। • पिन: प्रसा-मा०, २०,०1८ तदद्वैतसाप्य- .....-विकदि-आय., .11 नाम निवे-१० । नाम सदमोनि-, ।
૨૮૨ न्यायचिनिश्चययिधरण 1१२३९ नापि तद्धतुत्वेन ; अभावस्य 'तयोगात् । ततो नोपष्टयम्पाद्विचारात भेदनिराकरणम् । अनु- पप्लवरूपत्वे तु तस्य तदेकयोगक्षेमन आत्माप्यनुपाय एव स्परपरिन्छेदरममावावपि तस्येति कथन बाह्यप्रणम् । तदेवाह- सत्यं तमाहुराचार्या विद्यया विभ्रमैश्च यः ॥३८॥ यथार्थमयधार्थ वा प्रभुरेपोऽवलोकते । इति । सत्यम् अवितयम् । तम् आत्मानम् । आत्मन एव विचारविषयतया प्रस्तुतत्वात् । आहुः आवेदयन्ति । के ? आचार्या विचारज्ञानप्रवर्तका इति । अनेन सत्यात्मवादित्वाभावे तेपां तत्प्रवर्तकत्वाभावं पूर्वोक्तन्यायमावेदयन् अनुमानसिद्ध तत्सत्यसमानेदयति-कीदृशं तम् ? इत्याह-योऽवलोकते पश्यति । कया ? विद्यया यथारस्थितवस्तुरूपावलोकनशतया । तद- १० नेन 'मारूप्यमवलोकननिमित्तम्' इति प्रत्युक्तम् , शक्तरेव तन्निमित्तत्वोपपत्तेनिरेदितत्वात् । कमवलोकते ? यथार्थ यो येन स्वभावेन स्थितोऽर्थः स यथार्थस्तमिति, मुंप्सुपेति समासः । तदनेन 'सर्वमुपटव एय' इत्येकान्तः प्रतिविहितः । तथा हि - तदेशान्तस्य नाप्रतिपन्नस्येवा- भ्युपगमः अनुपप्त यवत् । नापि कुतश्चिदुपावादेव तत्प्रतिपत्तिः तद्वदेव, अनुपल्लवात्तु तत्प्र. तिपत्तौ कथं तदेकान्त इति ? न विधिमुखेन कुनश्चित्तत्प्रतिपत्तिर्यदयं प्रसङ्गः स्यात् , अपि त्व- १५ नुपल्लव एवं प्रतिक्षिप्यते तत्प्रमाणस्य प्रत्यक्षादेरसम्भवादिति, तल्लक्षणदोपोद्दावनेन प्रतिक्षे. "पात् । प्रतिक्षिप्ते चानुपप्लवे पारिशेप्यादुपप्लवस्येवावस्थान गत्यन्तराभावादिति चेत् , न, तत्रापि प्राच्यादेय दोपात् पारिशेप्यस्याप्युपश्यत्वे ततोऽप्युपप्लवस्य तद्विपर्ययपदव्यवस्थितेः । अनुपालवत्वे तदेकान्तपरिहाणेः । उपतपस्यापि यदि स्वरूपं व्यभिचरति कथमुपास्यत्वम् ? न व्यभिचरति" चेत् , तथापि कथ तत्त्वम् । अव्यभिचारिस्वरूपस्येवानुपप्त वत्वात् , "तदवलो- २० कनस्य यथार्थावलोकनत्वादिति सूकं यथार्थमवलोकत इति । पुनरपि तत्स्वरूपमाह-विभ्रमैश्च मिथ्याकारमहणशक्तिविशेपैश्च । चशब्दः पूर्व- समुच्चयार्थः 'अयथार्थ मिथ्याकारं योऽवलोकते' इत्यनेनापि मिथ्याज्ञान सद्भावमावेदयता ज्ञानाना स्वत एव प्रामाण्यमिति प्रतिविहितम् , तर मिध्याज्ञानाभावप्रसगात् । तथा हि- स्वशब्देन ज्ञानस्वरूपमेवोच्यते । तद्यदि प्रामाण्यस्य प्रयोजक मिथ्याज्ञानेष्यपि भवेदविशेषात् २५ इत्यभाव एव तेषां भवेत् , सति प्रामाण्ये मिथ्यात्वविरोधात । अभावे च मिध्यानानानां चोद. नावत् प्रत्यागमस्यापि धर्मे तज्ज्ञानजननद्वारेण प्रामाण्यात् "धर्मे चोदनैर प्रमाणम्" ] इत्यपर्यालोचितमेव वचनं भवेत् , "अन्ययोगव्यवच्छेदाभावेनारधारणानुपपतेः । । १२ [ 1 हेतुत्वायोगात् । २ योद्धमतम् । स धन मेयरूपता"-म०पातिकाल २।३०६ । ३ मुबन्तं सुबन्तेन सह समस्यते । ४ उपप्लवैकान्तप्रतिफ्तौ । ५ इति स्थान वि-भा० ५०,५०। ६ अनुपश्यत्वप्राहकप्रमाणस्य । . -पात्तत्प्रति-आ०,०,०1८ अनुपप्लववत् । ९ पारिशेष्यस्य अनुपलवरूपचे।.-पि तयादि-आ०,०प०) "-वरतीति भा.,१०,५०।१२ तददलोकस्य था.,य०,५०।१३-न स्व-भा०,१०,१० । १४ "चोदनैव प्रमाणच त्यैतद्धमै ऽवधारितम्"-मी. श्लो. घो. सू० श्लो४।५-द्रष्टव्यम्-पृ. २५ टि १५ ।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तायः २८३ .. २३९] मिध्याज्ञानेषु प्राप्तमपि प्रामाण्यं 'वाधकप्रत्ययेनापोगत इति चेत् तद्यदि तेषामेव स्वरूपम- विशिष्टं कथमपवादा ? तेषामेव तत्प्रसङ्गात् । न चैवम् , सत्यपि बाधकमत्ययोपनिपाते तैमिरि- फस्य द्विचन्द्रप्रतिभासानिवृत्तेः । तत्स्वरूपादन्यदेव अप्रामाण्यमिति चेत् । तत्रापि यदि ज्ञान- स्वरूपस्य निरपेक्षं प्रयोजकत्वं स एव दोपो मिध्याशानेष्यपि तत्पसग इति । बाधकप्रत्यय- विरहठ्यपेक्षस्यैव तस्य तंत्र प्रयोजकत्वमिति चेत् ; न तर्हि स्वतः प्रामाण्यम् , परसव्य. ५ पेक्षत्वे परत एव तदुपपतेः। हॉनरूपमेव तद्विरहः भावान्तरस्वरूपत्वादभावस्य, तस्मादयाम- प्रसङ्ग इति चेत् । न मिध्याज्ञानेष्वपि तपसद्भावेन तद्विरहप्रसङ्गात् । भवतोऽपि भूतल. मेव घदाभावं ब्रुवतः संघटमपि भूतलं तदभावा करमान्न भवतीति चेत् ? न भूतलस्य तद- भावत्वम् अपि तु तत्कैवल्यस्यैव "एकस्य कैवल्यमेव परस्य वैकल्यम्" हेतुथि० पृ० १८८] इति वचनात् । न च भूतलोव; "तझेदस्यापि तत्र प्रतिभासनात् । बाधाविरहस्यापि १० "ज्ञानात् कथञ्चिदर्थान्तरत्वे नैकान्ततः स्वतः प्रामाण्यम् , निरपेक्षतया ज्ञानमात्रादेव भावे तदे- कान्तोपपत्तेः । न हि तद्विरहापेक्ष्या भवतो निरपेक्षत्वम् । "तद्विरहोऽपि ज्ञानमेव, कथञ्चित् "तव्यतिरेकात्, अज्ञानस्यैतदनुपपत्तेः । न ह्यज्ञानस्य ज्ञानात "कथश्विदायव्यतिरेकः । ततस्तद्- पेक्षत्वेऽपि तत्प्रामाण्यस्य न स्वतस्तद्भावविरोधः, स्वतःशब्देन" अज्ञानस्यैवापेक्ष्यतया प्रत्या- ख्यानादिति चेत् ; न; सत्यपि ज्ञानत्वे तेन" "तद्व्यतिरेकानपहवात् । तदनपहवे च कथं १५ तदपेक्षस्य स्वतो भायः ? परत एव भावोपपतेः, परनिरपेक्षस्यैत्र भावस्य स्वतो भावत्यात् । परिच्छेदकत्वमेव प्रामाण्यम् , तच स्वत एव ज्ञानानाम् , तत्किं तत्र पाधाविरहस्य व्यपेक्षयेति चेत् ? न; "तन्मात्रस्य मिथ्याज्ञानेष्वपि भावात् । न तन्मात्रं प्रामाण्यम् , अपि तु यथार्थप्रतिभासरूपस्तद्विशेष इति "चेत् ;"तस्य तर्हि किमन्यत्प्रयोजयम् अन्यत्र याधाविर- हात् ? तद्विशेषोऽपि स्वतः एव", बाधाविरहात् तस्य ज्ञप्तिरेवेति चेत्त ; न; स्वतस्तद्भावे अति. २० प्रसङ्गस्याभिहितत्वात् । स्वतोऽपि शक्तिविशेपाधिष्टानादेव तद्विशेषो न तन्मात्रादिति पेत् ; न; शचि विशेपत्यैव प्रयोजकत्ये परतः प्रामाण्यापत्तेः । एतदर्थमेव शत्तिविशेषवाचिनो विद्यापदस्यात्रोपादानम् । ततो यदि निर्बन्धः स्वतः प्रामाण्ये निर्विशेपमेव ज्ञानं "तत्र प्रयोजक- मभ्युपगन्तव्यम् । तत्र व न मिध्याज्ञानसम्गया, शानमात्रस्य तत्प्रयोजकस्य तत्रापि भावेन प्रामाण्यस्यैव प्राप्तः । न च मिथ्याज्ञानाभायः, दत्तोत्तरत्वात् । तस्मादुपपन्नं मिध्याज्ञानसद्भावेन २५ "स्वतः प्रामाण्यप्रत्याख्यानम् । . २७ योधकप्र-म०,५०,०। २ सप्रमाणमि-भा०प० । ३ प्रामाण्यप्रसरः । . ज्ञानस्वस्पस्य । ५ भमागाण्ये । ६ ज्ञानस्वरूप-२०१७ वाधकविरहः । ८ यापविरह । ९ पटाभावः । १. येवल्यभूतलयोभदस्य। 1-नार्थश्चिद-भा०, प. प. 11२ पाधाविरहोऽपि । १३ -तद्ध्यति-भा०, २०, ५० रुपघिदव्य- मा०, प..। १५ -नशा-मार, ... पाशाविरहेण। ७ शानभेदाविलोपात् । 10 परिच्छेदमात्रस्य । १९ चेत् न स तस्य भा., २०, ५०। २. परिच्छेदविशेषस्य । २१ उत्पद्यते इति शेषः। २१ परिच्छेदवियोपः। २३न शानसामान्यसामग्रीतः। २५ इलोके ।-त्रोपादानार मा.,.,.॥ २५ प्रामाध्ये । २१ मिध्याशनेऽपि। १५-वे स्वतः प्रामानं प्र-वा, प., प.1 २८४ । न्यायविनिश्चयधिवरणे [१।३९ कः पुनरसो यो विद्यया यथार्थ विभ्रमैश्वायथार्थमवलोकते ? इत्याह-एपः प्रत्या- त्मवेदनीयः इति । अनेन प्रत्यअवेद्यत्वमात्मनः प्रविषादयता तन्निपेधवादिनः प्रत्यक्षवाधनं प्रति. पादितम् । कीरशः पुनरेपोऽपि ? इत्याह-प्रभुः इति । प्रभुत्वं पुनरतस्य यथार्थायवलोकने विषयाकारस्य व्यतिरिक्त विज्ञानस्य चानपेक्षणात् । एतदपि कुत इति चेत् । तथैव तस्य स्वतो ५ ऽनुभवात् । निरूपितञ्चतत् । पुतः 'पुनर्यथार्थत्वमवलोकनस्य परिक्षायत इति चेत् ? पुतश्च न परिज्ञायते ? तदुपायस्याभावादिति चेत् ; कथं तदपरिज्ञाने तद्वचनम् ? परिज्ञानपूर्वक्त्याने क्षावतां यवनप्रवृत्तेः । आत्येव तस्य परिज्ञानमिति चेत्, वस्य तर्हि यथार्थत्वं कुतश्चित्परि- ज्ञातव्यम् अन्यथा तदुपायाभावस्य ततः परिज्ञानायोगात् । न तस्य यथार्थत्वं नापि तद्विपर्ययः तदुभयविकल्पनिर्मुक्तत्वादिति चेत् ; न; तस्याप्यपरिज्ञाने वचनायोगात् । परिझाने च यथार्थत्वं १० तस्य कुतचिदवान्तव्यम् , अन्यथा ततस्तनिर्मुकत्वाप्रसिद्धेः। तत्परिज्ञानस्यापि तदुभयधि- कल्पनिमुत्तिरेयेति चेत् ; न, प्रान्यादेव प्रसङ्गात्,अव्यवस्थापत्तश्च । ततो दूरमनुसृत्यापि यथा- र्थादेव पुतश्चिद्वेदनात्कचित्तन्नि मुक्तत्वपरिज्ञानम् । तस्य च यथा यथार्थत्वपरिझाने कश्चिदु- पायस्तथा विषयावलोकनस्यापीति नोपायाभावात्तत्परिज्ञानप्रतिक्षेपः । तदनेन अयथार्थत्वपरि- ज्ञानस्याप्यप्रतिक्षेपो निरूपितः । तत्रापि वाधकस्योपायस्याभावात् तस्यापि प्रतिक्षेप इति चेत्, १५ "अस्ति तर्हि वाधकः बाधकादेवास्यापि तदुपपत्तेः । न मया कुतश्चित्तत्परिज्ञानं प्रतिक्षिप्यते यतोऽयं प्रसङ्गः, अपि तु परप्रतिपादितस्य तत्परिज्ञानोपायस्य बाधावैधुर्यादेनुपायत्वमेवापाद्यत इति चेत् ; न; अनुपायस्य तदापादनस्याप्ययोगात् । व्यभिचारादिदोषोद्भावनं तत्रोपाय इति पेत् ; न ततोऽप्ययधार्थात् तदयोगात् । यथार्थमेव चदिति चेत् ; सिद्धं तर्हि यथार्थत्वमव. लोकनस्यापि तदोपोद्भावनवत्तस्यापि कुतश्चित् तत्त्वपरिज्ञानोपपत्तेः । ततः सूक्तम्-'सत्यम्' २० इत्यादि । यदि पुनर्नालज्ञानं न नीलाकारम् अपि तु बोधरूपमेव कथं नीलस्यैवेदमिति विशेपो योधरूपतया विषयान्तरं प्रत्यपि तस्याविशेपात् ? नील एव व्यापारात्तस्यैव तन पीतादेरिति "चेत् ; न; निराकारत्वे व्यापारस्यैव तारशस्याप्रतिवेदनात् । अस्ति चायं विशेषो विषया. न्तरत्र्यावृत्तिलक्षणः, तनो नीलबोधरूपतया द्विरुपमेव नीलज्ञानम्, तथैवानुस्मरणाच्च । अनुरम. २५ रणं हि तस्य द्विरूपतयैव 'नीलज्ञानमासीत्' इति मोल्वोधरूपद्वयोल्लेखेन तदुत्पत्तेः प्रतिवेद. नात् । न हि स्वयमनुभयरूपस्य उभयरूपतया स्मरणे अधिरोहणमा"त्मसमर्पणमुपपन्नम् । अवश्यं चेदमुपगन्तव्यम् , अन्यथा "ततस्तत्मरणस्य","ततोऽपि "तत्स्मरणादेरेकाकारादिकत्या- 1 पुनरप्यययात्वं भा०, २०, ५० । २ तदुपायवि-प० । ३ उस्य यथार्थत्वं प-आ०, ५०, प० । ५ अयपाधवपरिज्ञान । ५ यत. अप्रसिद्धप्रतियोगिकोऽभावो नास्ति अत बाधकामावस्य प्रतियोगिभूतो बाधकीड- प्यरत्येव । ६ अयथार्थत्वपरिज्ञानस्यापि । ७ अप्रतिक्षेपोपपत्रोः । ८ प्रमशादपि तु भा०, ५०,०।९न तमीला- आ.,., । १. चैमिरा-आ०, २०, ५०।११-मसर्पणमु-भा०, प.! १२ प्रथमज्ञानात् । १३ विषयस्मरणस्य । १४ द्वितीयज्ञानात् । १५ प्रथमशनस्मरणाद. ।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः २८५ . १३३९] नुपपत्तेः । एकाकारादिकञ्च ततस्तस्मरणम् , ततोऽपि तस्मरणादिकमुपलभ्यते । तथा च वा- विकं सन्निधन्धनच- "अन्यथा ह्यतदाकारं कथं ज्ञानेऽधिरोहति ।" [ प्र०वा० २१३८०] इति । "यदि तत्तदाकारमात्मानं स्वसंवेदनेन नानुभवेत् कथं तदाकारतया ज्ञाने स्मरणे अधिरो- हेत् । अधिरोहणं तदाकारजननम्, तदधिरोहतीति कुतः । तथैव प्रतिपत्तेः । एकाकारोत्तरं ज्ञानं तथा धुत्तरमुत्तरम् । अवश्यमेतदुपगन्तव्यम् । तथा हि-उत्तरमेकैकेनाकारेणाधिकमधिकं भवति नान्यथा । तथा हि-पूर्वेण नीलं गृहीतं तदुत्तरेण नीलज्ञानम् , तदुत्तरेण नीलज्ञानज्ञानम् , तदु- नरेणापि तदधिकमिति निश्चिनोति । तदेतदन्यथा न स्यान् , एतदेवोदाहरणेन प्रति- पिदयति- तस्यार्थरूपेणाकारावात्माकारश्च कश्चन । द्वितीयस्य तृतीयेन ज्ञानेन हि विभाव्यते । द्वितीयज्ञानं पूर्वज्ञानद्वयाकारं स्त्राकारञ्च विभाव्यते तृतीयेन, चतुर्थेन तदेव त्रयमेका- काराधिकमिति यावद् गणयितुं स्पत्तुं या शक्नोति ।" [प्र० चार्तिकाल० ] इति । ततो विपयज्ञानस्य विषयान्तरल्यावृत्तिलक्षणात् । तज्ज्ञानस्य चाकाराधिक्यलक्षणाद्विशेषादाकारवत्त्वमेव १५ अर्थज्ञानस्योपेपन्नम् । तत्कथं विपयाकारनिरपेक्षत्वं तदवलोकने प्रभुत्वगुच्यत इति चेत् ? अब पूर्वोक्तमेवोचरं विस्मरणशीलानुमहाय प्रतिनिर्दिशन्नाह- विषयज्ञानतज्ज्ञानविशेपोऽनेन वेदितः ॥३९॥ इति । विषयज्ञानं नीलादिज्ञानं तज्ज्ञानं तद्विपयमनुस्मरणम् , त्योर्विशेषो व्याख्यातः । अनेन 'प्रकाशनियमः' इत्यादिना । वेदितो निरूपितः । तथा हि-यद्यन्यथानुपपन्नत्यं २० तहिशेपश्य भवत्येव ततो विषयाकारव्यवस्थापनम् । न चैवम् ; तस्यासम्भवात् । वथा हि- स्वहेतूपतिवद्धादेव शक्तिविशेषाद्विपयान्तरख्यावृत्तिनियमे किं तदर्थेन तदाकारनियमकल्पनेन ? कल्पयतोऽपि तन्नियमं तच्छतिविशेपस्यावश्याभ्युपगमनीयत्वात् , अन्यथा तन्नियमस्येवासम्भ- वादिति प्रतिपादितत्वात् । सति च तद्विशेपे किमनेन परिश्रमहेतुना पारम्पर्येण-'तद्विशेषान ज्ञानाकारस्याकार विशेपः, ततोऽपि विपयनियगः' इति ? तहिशेपादेव तन्नियमोपपत्तेः। ततो न २५ तनियमलक्षणात् विषयज्ञानविशेषात् आकारवत्यव्यवस्थापनमुपपन्नम्, अन्यथैव तस्योपपत्तेः। नापि बदनुस्मरणगतादाकारत्रयलक्षणाद्विशेषात ; तस्यैवासिद्धेः । सिद्ध एवासी विषयानो. पसमर्मिताभ्यां नीलबोधाकाराभ्यां साकारेण च, तत्र तल्लमणस्य विशेषस्य विभावनादिति पा। 1-कनप्रभु-भा०, २०, ५। २ यदन्यथा-भा०, १०, प.। ३-पनियन्मादेन भा०,०, शातिविशे। ५ ततो वि-पा०, २०, प० । ६ शक्तिविशेषादेव । -वादिः भा०, ५०, १०८ स्वारी चभा.प. प.।
न्यायविनिश्चयचिवरणे [२३९ चेत्, न, विषयज्ञाने विषयाकारस्यानन्तरन्यायेनाभावात् , तेन तरसमर्पणानुपपत्तेः । क्थमेयं तस्य तदाकारत्वेन स्मरणम्-'नीलज्ञानमासीत्' इत्युल्लेसरूपमिति चेत् । भयेदेवेदं यदि नील. मेव ज्ञानं नीलज्ञानम्' इति तदुल्लेखार्थः स्यात् । न चैवम्, 'नीलस्य ज्ञानं नीलझानम्' इति तदर्थत्वात् देवदत्तम्म्बलगन् । एवमपि कथ नीलस्य स्मरणमिति चेत् ? तज्ज्ञानस्य कथम् ? ५ तदाकारस्यानुकरणादिति चेत्, न, तस्यैव स्मरणापत्तेः । तर च 'आसीत्' इत्युल्लेखानुपप. तिः,वदाकारस्य स्मरणगतस्यातीतत्वाभावात् । तात्कालिकस्यापि अतीततज्ज्ञानरूपतयाऽभ्यारोपा. त्तदुपपत्तिरिति चेत; कोऽसौ तदध्यारोपः । तदेव स्मरणमिति चेत् , कुत्तर्हि तत्र तदाकार- स्य परिज्ञानम् ? न स्वतः, तेन तस्य पहिर्भूतस्यैव परिज्ञानात् । अन्यतस्तत्स्मरणादिति चेत् , न, अनुभवाभावे तदनुपपत्तेः । न च स्वसवेदनादपरस्तनानुभव इत्यपरिज्ञानमेव तस्य प्राप्तम् । १० वन्न तदेवाध्यारोपः । नापि पर , 'तवासीत्' इत्युलेखप्रसङ्गात्। न चैवम्, 'नीलज्ञानमा- सीत्' इति विपयज्ञानस्मरण एव तदुपरम्भात् । तदपरव्यापारस्य तगारोपात्तथा तदुपलम्भ इति चेत्, करवर्हि तस्य तात्त्विको व्यापारः ? निर्यापारस्य व्योमकुसुमाविशेषेणाभावापत्तेः । आत्मन्येव विपयज्ञानाकारस्य स्मरणमिति चेत् , न तर्हि तनातीतत्वारोपः, तत्कालतया स्मरणेन निश्चयात् , निश्चिते च विपर्ययानुत्परोः । अनिश्चयात्मना तत्रैव तज्ज्ञानं तद्व्यापार इति चेत् , न, विरोधात 'स्मरणं च, अनिश्चयात्मक च' इति 'माता च बन्ध्या च' इतिवत् । ततो नापरस्तव्यापार इत्यतीतपरामर्श एव नव्यापारोऽनुमन्तव्यः । स च तदनुपविष्ट तद्विप- याकारस्य न सम्भवतीत्येननुप्रवेश एव तर तस्य वक्तव्य इत्यसिद्ध एवाकारयात्मा विशेषः, स्मरणस्य स्वाकारस्यैकस्यैर्य भावात् । न च तस्यान्यथानुपपनत्वम् । २० "अन्यथानुपपन्नत्यमसिद्धस्य न सिद्धयति ।" [न्यायवि० श्लो० ११] इति न्यायात् । तत्कथं ततो विषयज्ञानस्याकारयत्त्वमनुमानपदवीमुपनीयते । कथं पुन. रतदाकारेण स्मरणेन नीलस्य तज्ज्ञानस्य या परिज्ञानमिति चेत् । न, 'स्वहेतूपनिषद्धादेव शक्ति- विशेषात्' इति दत्तोत्तरत्वात् । अयमेव विपयज्ञानतज्ज्ञानयोर्विशेषो यद्विपयज्ञानस्य नीले स्वात्मनि शक्तिः स्मरणस्य तु "नीले तज्ज्ञाने स्वात्मनि चेति । तस्मादप्रातात्तिकमेवेदम्- 'तस्यार्थरूपेणाकारों' इत्यादि । कस्मात्पुनः शक्तिविशेषाद्विपयज्ञानत नानयोचिशेष उच्यते, न माह्यभेदादेव तद्भदो ग्राह्यभेदस्य नीलपीतादिलक्षणस्य परिस्फुटप्रतिभासविषयतया फ्लभेदात् , अनुमेय. शक्तिविशेषापेक्षया चातिप्रसिद्धत्वात् । अत एव च भहेन प्रतिपादिवम्- : २५ वकव्यः १ १ ज्ञानमिति त-भात, या, ५० र तस्य ज्ञानस्य आ०, २०, ५०। ३ आकारस्यैव । ४-नायत भा०, प. प.। ५-त्यनु-भा०, ब., प.1 ६ च वा भा-भा०, २०, प.1 ७ नोलनमानस्वा स्मनि च भा०, ५०,५०।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः २८७ با -- . १२ २३९] "विषयव्यपदेशाच्च नर्ते ज्ञाननिरूपणम् । तज्ज्ञानात्मन्यनेकरवे ग्राबभेदनिबन्धनः ।। संवित्तिभेदः सिद्धोऽत्र किमाकारान्तरेण नः।" [ इति चेत् ; उच्यते-प्रायभेदः संवित्ति भिन्दन् यदि तदनुप्रवेशेन भिनत्ति; कथन्नाकारवत्वं यत इँदै शोभेत-'किमाकारान्तरेण नः' इति । नात्स्येवर्तस्य तदनुप्रवेश इति चेत् ; कथं ततः संवित्ति- ५ भेदो गगनस्यापि तत एव तत्प्रसङ्गात् । तस्य तेनानवष्टम्भान्नेति चेत :संवित्तः फस्तेनावष्टम्भः ? विषयत्वमेवेति चेत् ; तदपि नीलसंवित्ती नीलवत् पीतादेरपि कस्मान्न भवति ? अशक्तेरिति चेत् ; कस्याशक्तिः ? विषयस्यैव पीतादेरिति चेत् ; न; तदश बिपि संवित्तिसामर्थ्य तद्वि- पयभावस्यावश्यम्भावात , अन्यथा शुक्तिरूप्यादेरविषयत्वापत्तेरिति निवेदनात् । संवित्तरेवाशक्तिः, नीलादी नियत एवं विषये तस्याः शक्तिभावात् विषयान्तरे विपर्ययादिति चेत् ; सिद्धस्तहि १० शक्तिभेदादेव संवित्तिभेदो न माह्यभेदात् , "तद्भेदस्यापि संवित्तिभेदादेवोपपत्तेः । स्वहेतोरेव "तभेदो न संवित्तिभेदादिति चेत् ; न; ततो नीलधवलादिरूपस्यैव भेदात् । ग्राह्यरूपमपि सदेवेति चेत् ; भवत्येवम् , तथापि फुतस्तद्वगमो यतस्तन्निबन्धनं संवित्तिभेदं ब्रूयात् ? संवित्ति. भेदादेव , न चैवं परस्परामयः; संवित्तिभेदस्य तद्भेदादनवगमात । "तभेदोऽपि हि संवित्ति भिनत्येव, न पुनस्तभेदमवगमयति तस्यान्यत एवावगमादिति चेत ; कुतस्वहि विभ्रमसंवित्तीनां १५ भेदः ? वद्विपयात् केशोण्डुकादेरेव भेदादिति चेत् ; न; तस्यासत्वात । न चासतो भेदकत्वम् तस्य" वस्तुधर्मत्वेन तत्रासम्भवात् । विषयत्वमसतः कथमिति चेत् ? न तस्यापि तहलेना. भावात् , संवित्तिवलादेव सदुपपत्तेः । ततो न ग्राह्यभेदस्य भेदकत्वम् अव्यापकत्वात् । शरित- भेदस्य तु भेदकत्ये नायं दोपः, सर्वसंवित्तिषु तद्भावात् । "तभेदस्यापि फुतोऽवगमो यत. स्तनियन्धनः संवित्तिभेदस्त्वयापि निरूप्यत इति चेत् ; 'संवित्तिभेदादेव वन्निबन्धनात्' इति २० घूमः । ततो न ग्राह्यभेदान्नाप्याकारभेदात् संवित्तिभेदः शक्तिभेदादेव तदुपपत्तेरित्त्युपपन्नमुक्तम्- 'विपय' इत्यादि। यदि ज्ञानमर्थाकारं न भवति कथं तस्मरणे अर्थस्यापि नियमेन स्मरणम् 'नीलज्ञानगा- सीत्' इति ? सति भेदे घटस्मरणे"पटस्येव तदयोगात् , तदाकारत्वे तु तस्य भवत्येव तथा स्मरणं तब्यतिरेकेण ज्ञानस्यैव स्मर्तुमशक्यस्यात् । सत्यप्यर्थात्तज्ञानस्य व्यतिरेके तत्सकलित. २५ स्यैव स्मरणं विभ्रमात् । विभ्रमस्य च निमित्तं तस्य तंत्र तद्व्यापारः, वत्कार्यत्वं वा । ततो विषयसङ्कलिततज्ज्ञानरमरणस्य अन्यथैव भावात् न ततो विपयाकारव्यवस्थापनं विज्ञानस्योपपन्न- उच्यते- . . मिति घेत्; विषयस्योपदेशाचानर्थे प० । विषयस्यपदेशायनर्थे मा०प०१२ रमनको भा०प०,१०१ ३ इतौर भा०,५०,०1४ माअभेस्य । ५ सविस्यनुप्रदेशः। प्राधादेव । . भेदान् । विश्वमपि । शुफिम्पादेः मा०,१०० रजतस्य ।। ग्रामभेदस्यामि । प्रायः । १२ प्रायरूपमेव तदेवेति मा.. प.अयमेदोऽपि भेसरमा शक्तिभेदस्थापित पटव तमाम्यापा-भा...।
२८८ न्यायविनिश्चयविवरणे "अर्थकार्यतया ज्ञानस्मृतार्थस्मृतेर्यदि । भ्रान्त्या सङ्कलनं ज्योतिर्मनस्कारेऽपि सा भनेत् ।। श्रान्तिरिति सम्बन्धः। यद्यर्थस्य कार्य विज्ञानम् अथाप्यर्थे कार्य व्यापागे यस्येति ज्ञान स्मृतौ नियमेनार्थस्मरणम् अतस्तदवमूढमतिसन्तानस्य तथा भाति प्रतिपत्तिः, एवं तर्हि ५ ज्योतिर्मनस्कारेऽपि तथा प्रतीतिः स्यात् । यथा विषयकार्यता विज्ञानस्य तथा आलोककार्यता पनस्वारकार्यतापि तेन द्वयसङ्कलनेनापि प्रतीयेत । न हि कार्यत्ने कश्चिद्विशेषः । अथ पिपये व्यापतत्वात्तत्सड कलनम् , मनस्कारे तनाव्यापृतत्वात् तदा तस्यालोकेऽपि समान एव व्यापारः। न ह्यालोकमपहाय रूपे व्याप्रियते । तदसदेतत्-तसाधथा आलोकप्रतिभासमिति न भरति तथा रूपप्रतिभासमिति न स्यात् । अथालोकोऽपि विषय १० एपान्तर्गतत्वात् 'रूपप्रतिभासम्' इति निश्चयेने गत; न; आलोगस्य प्रकाशकत्वेन विपयत्वामागत् क्थ तर व्यापारः १ अथ प्रकाशकोऽप्यालोको रूपनिपतितत्यादृप मेव सम्पद्यत इति विषय., तथा सति ज्ञानमपि प्रकाशक रूपनिपतितत्यादृपमेति साका- रालोक्मत् विनानपपि साकारम् । यथा न रूपेण विनोऽऽलोको न ग्रहीतु (को ग्रहीतु) शक्यस्तथा विज्ञानमपि, न हि रूपादिक प्रकाश्यं गिना विज्ञान ममास्तीति कश्चिद्विजा. १५ नाति । तम्मापाद्याकारमेर विज्ञानम् एवमन्यथा तदनुस्मृती रूपादिसरणायोगादति. प्रसङ्गात" [ प्र० वार्तिकाल. २१३८. ] इति चेत् , नायमपि दुष्परिहरी दोपो यस्मान्न विषय इत्येव सत्र स्मरणम् , या शतिस्तत्रैव तद्भावात् । न प शतिरपि विपयनिबन्धना यवो नीलबदालोकेऽपि भवेत् , अपि तु वत्कारणादेव साकारान् । तस्याप्य. नुभयाद् भारे नीलपदालोके किन भावस्तस्यापि तद्वत्तद्विपयत्वात् , न ह्यसौ विपयेऽपि २० क्वचिदेव सरकारकारी नान्यरत्युपपन्नम् , एकरूपत्वादिति चेत् , न, एकरूपत्वस्यासिद्धत्वास, वहेनूपनिबन्धस्य प्रतिविषय शत्तिविशेषस्य भावात् । अवश्य चैतदेवमगीकर्त्तव्यम् , अन्यथा विपयाफारेऽपि झाने दोपोपपत्चे । तथा हि- यदि नीलस्य तमानाकारस्वात्तस्मृती स्मृतिः। आरोकोऽपि तदाकारतस्याप्येपा न किं भवेत् ॥५२५॥ नीलझानमनारोकाकार येत्तदृशि कथम् ? तथापि तशी व्यथं नालेऽप्याकारक्ल्पनम् ।।७२६॥ लोकादर्शने नीलमावस्येव रशिः क्यम् ? अन्यथा हि वयो न हालोकमित्यादि दुप्यति ॥२७॥ म्ये निपतनात्तस्य तदमेव शियदि । नीलस्यापि भवेदेवा दमिपाताविशेषतः ॥७२८॥ ३० १. विनायक महौतुम्"-.यातिकाल. १-नाना। ३ दुष्परिहारी भा, प. प.. सरकारस्थापि।५-सेम्यापा-बाय...मानोबत्य ।
रा३९ ] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावा २८९ रूपमात्रावभासं तदर्थज्ञानं ततो भवेत् । न वालोकावभासं तन्न व नीलावभासनम् ॥७२९।। विज्ञानं नीलनिर्भासमासीदिति ततः स्मृतिः । कथं यतोऽर्थज्ञानस्य नीलाकारस्य कल्पनम् ।।७३०॥ विशेषापेक्षया नीले रूपडप्ट्या न चेदृशिः। आलोकेऽपि विशेषः किन्नैव यन्नैवमुच्यते ॥७३१॥ यदर्थज्ञानमालोकाकारं प्राप्त विशेषतः । ततः सङ्कलितालोकं तज्ञानस्मरणं भवेत् ॥७३२॥ विपयाफारवादेऽपि तद्विपर्ययवादयत् । स्मरणातिप्रसङ्गस्य हन्त हन्ता कथं भवान् ? ॥७३३॥ एतेन क्षणभङ्गाद्याकारत्वादर्थसंविदः । तत्सङ्कलनतस्तत्र स्मृतिः स्यादिति दर्शितम् ॥७३४॥ स्मृत्या च क्षणभङ्गादौ नीलादाविव निश्रिते। प्रयासमात्रं तंत्र स्यादनुमानोपकल्पनम् ।।७३५।। तस्माद्विषयाकारेऽपि विज्ञाने 'नीलसङ्कलितस्यैव तस्य स्मरणं नालोकादिसङ्कलि. १५ तस्य' इत्यत्र नापरमस्ति निबन्धनमन्यत्र तादृशाच्छक्तिविशेपादित्ययुक्तं तदर्शनाद्विपयाकार- विज्ञानकल्पनं शक्तिविशेषादेव तस्य भावात् । न चान्यथैव भवतस्ततस्तत्कल्पनं धूमादेर्जलादि- कल्पनस्यापि प्रसङ्गात् । यत्पुनर्विपयकार्यतया विज्ञानस्य विषयसङ्कलितत्वेन स्मरणेऽतिप्रसङ्गाय प्रविपादित 'यथा' इत्यादि, योदमपरम्- "सर्वेषामपि कार्याणां कारणैः स्यात्तथा ग्रहः । कुलालादिविवेकेन न स्मर्यंत घटस्ततः ॥" [प्र० पा० २।३८१ ] इति । तदपि न शोभनम् ; शक्तिकल्पनयैव सस्यापि परिहारात , अन्यथा इदमपि शोभनं भवेत्त्- 'यदि विषयकार्यत्वात्तदाकारं तज्ज्ञानं मनस्कारकार्यत्वात्तदाकारमपि भवेत् , न हि फार्यत्वे कश्चिद्विशेषः' इति । तथेदमपि'- २५ सर्वेषामपि कार्याणां कारणः स्यात्समाकृतिः । फुलालाकारशून्यस्य न घटस्योद्यस्ततः ॥७३६।। इति तदिदमतिप्रसङ्गापादनं चपलकपिशाबकस्य सुप्तभुजगोत्थापनमिव परस्यैव विपत्तिमापादयति न निराकारमानवादिनः, शक्तिप्रतिनियमादेव तेन तत्परिहारस्याभिधानात् । तदेवाह- • यथार्थज्ञा-भा०, प०, १० । २ क्षणमामिद्धौ । ३ -कारकपनं मा०, व०, ५०। ५ शोभन भवेदिति शेषः। २० - . १७ न्यायविनिश्चयविवरण [१ अर्धज्ञानस्मृतावस्मृतौ नातिप्रसज्यते । इति । अधी नीलादिस्तस्य ज्ञानं तस्य स्मृती येयमर्थस्यापि तज्ज्ञानसंसर्गित्वेन स्मृतिस्तस्यां निराकारमानवादिसम्मतायां नातिप्रसज्यते सैवार्थस्मृतिः 'ज्योतिर्मनस्कारादिभिः' इति शेपः। क्थं पुनर्नातिप्रसज्यते यावता निराकारज्ञानस्य साधारणतया सर्व विषयत्वं तत्स्मरण- ५ स्यैवं च सर्वयानुभवविपये प्रवर्तनमापद्यत एवेति चेत् ; अत्र पूर्वोकमेव शक्तिनियममुत्तरी. फुर्वन्नाह- सरूपमसरूपं या यत्परिच्छेदशक्तिमत् ॥४०॥ तद्वयनक्ति ततो नान्यत् व्यक्तिश्चेदसतः कथम् ? इति । यस्य नीलादेः परिच्छेदो व्यवसायो यत्परिच्छेदस्तस्य शक्तिः सा विद्यतेऽस्येति यत्प- १० रिच्छेदशक्तिमत् अर्थज्ञानं तज्ज्ञानं च तद्यदित्युक्तं व्यनक्ति प्रकाशयति ततोऽन्यत् क्षणपरिणामादिकमालोकादिकं पन व्यनक्ति तत्परिच्छेदशक्तिमरवाभावात् । फीशं तत् यत्तच्छन्देन निर्दिश्यत इत्याह-सरूपं सस्वभावं रूपशब्दस्य स्वभाववाचित्वात् नीरूपः प्रयंस इतियत् । कुतः पुनरिदमवगतं यद्विज्ञानशक्ति एव विषयव्यतिनियमो न पुनरतदुत्पत्ति. सारूप्याभ्यामन्यतो येति पेत् । तदिदं निदर्शनेन प्रत्यादिशनाह-असरूपम् अविद्यमान १५ नदिप याशदस्येवार्थत्वात् । नात्पर्यमत्र-यदि तदुत्पत्यादेरेव "तनियमः मिरिकफेशादोन भवेत् तस्य नीरूपत्वेनाकारार्पणामस्य हेतुत्वस्य योग्यत्वादेश्वाभावात् । ज्ञानस्वरूपतया सरूप एव सत्केशादिरपीति चेन्, न, तस्य ज्ञानाद् यहिट्वेनैव प्रतिभासनात् । भ्रान्तमेव घहिष्वमिति पेन् , किमिदं भ्रान्तमिति ? अविनमानमिति चेत् , तस्य तर्हि कथं व्यक्ति तदा- कारार्पणक्षमस्य हेतुत्वस्य तत्राप्यभावात् । तदपि ज्ञानरूपतया सरूपमेति चेत् ; न, तस्यापि २० तत्केशायधिधानतयैव प्रतिभासनात् । भ्रान्तमेव तदधिमानत्यमिति चेत् , तत्रापि 'किमिदं भ्रान्तम्' इत्याद्यनुसन्धादव्यवस्थापत्तेश्च । बुतो या ज्ञानस्य तदाकारत्वम् ? अहेतुकत्वे नित्यत्वादिदोपात् । अनन्तरमानादिति चेत्, न, तस्मिनताशेऽपि तदर्शनात् । अतादृशादपि उदावे सन्मानमेव तत्तं भवेत् । तत एव मफलस्यापि विज्ञानवाप्यस्य सम्भयात् । चार- शादेव व्यवहितादिति चेत् ; न, पू तिमिरादिरहितस्य तदभावात् । प्राग्जन्मभाविन इति २५ चेत् ; प्रागपि तदभापे कमिदानी तिगिरादिभावेऽपि तस्य तदापारत्वम् १ अत एव तदार. स्यानुमानमिति चेत् : क्यमेवं विधवागर्भादपि पिरच्यवहितस्य पतिसम्पर्कस्यैव नानुमानं यतो जारसम्पर्कदोषेण विधवा दूप्येत । सन्निहितादेव सत्सम्पादन्यत्र गर्भाधानदर्शनादिति चेत् । न, कथं तर्हि चिरव्यवहितस्य येशादिशानस्यापि तदाकारापरत्वम् ? सन्निहित एवं नीलादी । इति विशेष भा., २०,०।२ -दानुभव-प. अशानद सदियु-मा...। .-दसलमा-मा०, २०,०। ५ विसनियम । स्वरुप मा...। दिसलेनैव .. प्रतिभासान् भा... -नमिति मा०,०, प.। •r ..
प्रथमःमत्यक्षपस्ताम: १५४१] २९१ तस्यापि' दर्शनात् । चिरापकान्तादपि लाक्षासंस्कारात् कासिफलादी रागदर्शनादिति चेत् ; न; तद्वद्विधवागर्भस्यापि तादृशात्पतिसम्पर्कादेव प्रसङ्गात् । न च कासरागस्यापि व्यवहितादेव तत्संस्काराद्भावः, तदुपहिताद्वीजशक्तिप्रबन्धादेव सन्निधिमतस्तद्भावात् । भवतु केशाद्याकारमपि ज्ञानं सन्निहितादेव तज्ज्ञानशक्तिप्रवन्धादिति चेत् । तत्पबन्धो यदि तदाकारः कथन मेबन्यतस्त- दर्शनम् ? अतदाकारत्वे तु कथं ततस्तैमिरिकज्ञानस्य तदाकारत्वम् ? तत्प्रवन्धस्य तत्करण- ५ स्वभावत्वादिति चेत् ; तळ्यक्तिस्वभावत्वमेव कस्मान भवति ? असतो व्यक्तिविपयत्वायोगा. दिति चेत् ; फरणविषयत्वं कथम् १ दृश्यत इति चेत् ; व्यक्तिरपि दृश्यत एव । ज्ञानाकारत्वेन सत एव सादृश्यत्वेनासत इति चेत् ; न तज्ज्ञानरूपत्वपरिज्ञानामावस्य पूर्व निवेदितत्वात् । तस्मादसत एव तदाकारस्यापि ज्ञानशक्तितो व्यक्तिः । अत इदमुच्यते सरूपकेशादिव्यक्तिरपि' विज्ञानशक्तित एव व्यक्तित्वात् असरूपतव्यक्तिवदिति । भवतु नास वर्तमानस्य तच्छक्तितो व्यक्तिः सति तब शैक्तिसम्भवात् , अतीतादेस्तु कथम् ? असति तत्र तदसम्भवादिति मन्यमानधोदयति- 'व्यक्तिश्चेदसतः कथम्' १ इति । सत् वर्तमानम् असत् अतीतादि तस्य, कथम्? न कथचियक्तिः। चेच्छन्दः पराभिप्राय द्योतयति । तदिदमपि निदर्शनबलेन तत्रापि शक्तिमयस्थापयन् परिहरति- आरादपि यथा चक्षुरचिन्या भावशक्तयः ॥४१॥ इति । आरादपि दूरादपि न केवलमासन्न एवेत्यपिशब्दः । यथा येन शक्ति चक्षुः तजनितं ज्ञानं कार्य कारणोपचारात् , तथैव अतीवादेरसतोऽपि व्यक्तिरिति । अयमत्र भावा-यदि ज्ञानसमये अतीतादेरभावान तन तच्छक्तिर्व्यक्तिर्वा दूरचन्द्रादावपि न भवेत् २० तस्यापि शानदेश[s] भावात् , अन्यथा नयनगोलक एघ तत्प्रतिभासप्रसङ्गान , तस्यैव तदेश- त्वात् । न चैवम् , दुवीयसि गगनतल एव तदुपलम्भात् । तदाकारार्पकस्य तद्देशत्वात्तस्यापि तद्देशतयोपलम्भ इति चेत् ; न; पितरि विप्रकृष्टे पुत्रस्यापि तस्वरूपस्य विप्रकृष्टतयोपलम्भ. प्रसङ्गात् । ज्ञानस्यापि स एव देशो यत्र चन्द्रादिरिति चेत् ; तथापि कथं तत्र दूरपतिभासनं ना(शाना)पेक्षया तदैव प्रत्यासन्नप्रतिमासनप्रसद्गात् । न चैवम् , सर्वदा पन्द्रादी दूरप्रतिभासन. २५ स्यैव भाषात् । शरीरस्थस्यापि ज्ञानस्यातद्विषयत्वे न वदपेक्षमपि दूरप्रविभासनम् । इन्द्रियान्तर- ज्ञानापेक्षयापि तत्प्रसङ्गात् । तद्विपयत्वे तदपि प्रथमज्ञानवचन्द्रादिदेशमेवेति कथं तदशापि .-पि तद्-श्रा, प. प.। ३ प्रतिबन्धम्तह-आ०, २०, प० । ३-पिशान-पा०, प.प.11 पाकिमद्भावात् भा०,व०प० । ५ चोदति भा०, वा, प०। ६-पिद-मा०, २०, प.1 तस्वरूपवि- भा०,०, प० । ८ ताहि भा०, २०, २० । ९ तदेव भा०, य०, ५०१०-त् वि-भा०,१०,१०॥
- - २९२ न्यायचिनिधय विवरणे ११४२] दूरप्रतिभासनम् ? पुनरपि शरीरस्थापरज्ञानापेश्या तत्परिकल्पनायाम् अव्यवस्थापत्तिः । विषयदेशज्ञानक्ल्पनायाश्च योगिज्ञानस्य प्रतिविषयदेशं भेदापत्तेन योगी नाम रश्चिदेको भवेन् । सत्यपि भेदे तदेकमेव मेचकक्षानश्याभ्युपगमादिति चेत , न, व्यापपात्मवादस्य व्यवस्था- प्रसङ्गात् । नापि तात्त्विके तद्भेदे तदेकमुपपन्नम् ; भेदेतगत्मवादस्यानभ्युपगमात , नीलयोध. ५ रूपतया तात्विक एव भेदे तदुपपत्तिप्रसङ्गाय । तथा च यत्तस्य पल्पितत्वतिपादकमलकार- धचनम्- "नीलान व्यतिरेकेण विपयिज्ञानमीक्ष्यते । "ज्ञानपृष्ठेन भेदस्तु कल्पनाशिल्पिनिर्मितः ।।"[प्र०वार्तिकाल० ३६३७७] इति । 'तदश्लीलभाषितं भवेत् । अतात्त्विके तु बदे कथ तस्य विषयग्रहणम् ? आकारबलामावात् । १० स्वशक्ति एवेति चेत् , उपपत्तिमदेतत् , अन्यथा कालदेशविप्रमटतया भावोपदेशस्याभावप्रस- जात , किन्तु नयनज्ञानादपि स्वविषये भिन्नदेशेऽपि व्यक्तिः स्वशक्ति एव भवेत तथैव निरपद्यानुभवात् । तथा च कथं भिन्नदेशवत् भितकालस्यापि स्मरणादेन व्यक्तिः । तो तत्रापि ज्ञानशनिवारणात् । भिन्न कालरस्तुज्ञानं निर्विपयमेव तत्काले तद्विपयस्याभावादिति घेत् ; भिन्नदेशवस्तुज्ञानमपि कथं सविपयं तदेशे" तद्विपयस्याप्यभावात् ? तस्य देशान्तरे १५ विद्यमानत्वादिति चेत् , इतरस्यापि कालान्तरे विद्यमानत्वादिति समः समाधिः । सर्वस्यापि फालान्तरवर्तिनः किन्न व्यतिरिति चेत् ? देशान्तरवर्तिनोऽपि किन्न स्यात् ? स्वहेतुनियद्धा- च्छक्तिनियमादिति चेत्", न, अन्यताप्यस्येव परिहारत्वात् । कथं पुनः शक्तयोऽपि देशाल. विप्रकृष्टभावापेक्षप्रादुर्भावा" इति चेत् , न, तथा तासामचिन्यत्वात् । न हि शक्तयः 'कमित्थमेवोत्पन्ना नान्यथापि' इति विचारयितुं प्रार्यन्ते । प्रमाणलोपनीवास्तु परमभ्यनु- २० ज्ञायन्त एच, अन्यथा न किधिद्भवेत् अपहस्तिततद्वावलम्बनस्यान्यनापि वस्तु पिन स्यासम्भवात् । तदेवाह-'अचिन्त्या भावशक्तयः' इति । स्वपदव्याख्यातमेतत" । चोद्यमा- वियुर्वनाह- विपमोऽयमुपन्यासस्तयोश्चेत्सदसत्त्वतः । इति । अयमनन्तरः आरादित्यादिः उपन्यासो दृष्टान्तो विषमो दार्शनिकसदृशो न भवति । ५५ सरशेन च दृष्टान्तेन भवितव्यम् । तद्वैपम्यञ्च तयोर्देशकालविप्रकृष्टयोः सदसत्त्वतः देश. न्यवहितस्य" हि तज्ज्ञानदेशे असत्त्वेऽपि व्यक्तिरुपपन्नैव न ज्ञानकाले भावात् , न कालव्यब- 1-परविज्ञा-N०, २०, ५०। २ प्रतिविषय देश मेदा-मा०, ब., ५० । ३ वादप्रसमाम युप- MO, २०, ५०। ५-प्रतिपादितम-मार, २०, ५०। ५ विज्ञानलेन भेद-२० । ६ तहकमलभा-भा०, .. २० कालदेशे पि प्रकृ-आ०,०। कालदेशेऽपि विप्रक-५.। ८ तव भा., यम, २० मिमदेश इवभिनकालेऽपि . नदेशे। " चेदन्य-भा०, ३०, ५। १२-पादिति श्रा०, २०, ५० । ५-यानमैतत् श्रा., य०, प.110-हि.तस्य हितस्य शानप्रदेश प.1-हितस्य ज्ञानदेशे भा, ..
१० १२४३] प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्तावा २१३ हितस्य, देशवतत्कालेऽप्यभावात । चेत् शब्दः पराकूतमपयोतयति । तदिदं परिहरनाइ- यदा यत्र यथा वस्तु तदा तत्र तथा नयेत् ॥४२॥ अतत्कालादिरण्यात्मा न चेन व्यवतिष्ठते । इति । यदा यस्मिन् काले यत्र यस्मिन् देशे यथा येन प्रकारेण वस्तु नीलधवलादि 'स्थितम्' इति शेषः । तद्वस्तु तदा तस्मिन् काले तन गस्मिन् देशे तथा तेन प्रकारेण ५ नयेत् प्रापयेत् व्यक्तिम् 'व्यक्तिः' इत्यनुवर्तमानस्ल विभक्तिपरिणामेन सम्बन्धात । क इत्याह-आत्मा जीवः । अतत्कालादिः न विद्यन्ते तस्य वस्तुनः फालादयः काल- देशप्रकारा यस्यासावतत्कालादिः । अपिशब्दात् तत्कालादिरपि । यद्येवं तत्प्रकारत्वाद्विपया फारत्वं तस्यापद्यत इति चेत् ; सत्यम् ; सत्त्वप्रमेयत्वादिना नदभ्यनुज्ञानात् , अन्यथा नीरू- पत्वापत्तेः । असत्कारत्वं तु नीलाद्याकाराभावादिति निरवद्यम् । विपक्षे दोपमाह-न चेत् एवमात्मा व्यक्ति न नयति चेत् ; न व्यवतिष्ठते न यस्तुव्यवस्था प्रतिलभते । तत्खलु व्यवस्था प्रतिलभमानं कालदेशाकारभेदेनेय प्रतिलमते । तथा तत्पतिलम्भश्च कथं भवेत् आत्मा चेदतत्कालादिरपि तत्कालादिकं वस्तु न व्यज्यात् १ तदाकारज्ञानादेवेति चेत् ; न; ततः स्वरूपमात्रपर्यवसायिनो मिन्नदेशादितया सस्य तत्पति- लम्भानुपपत्तेः । न हि तात्कालिकनिरंशनानानुप्रविष्टस्यैव विषयाकारमय भित्रदेशादित्यम् । १५ सदाकारजनकस्य भिन्नदेशादित्वात्तस्यापि भिन्नदेशादित्वमिति चेत् ; फुतस्तदा कारजनकस्य भिन्नदेशादित्यमवगतम् ? अन्यतस्तदाकारज्ञानादिति चेत्, न; तत्रापि 'ततः' इत्यादेरनवस्थान- दुस्तरदोरध्यप्रतिबन्धनिबन्धनस्य प्रसङ्गस्योपनिपातात् । तदर्पितस्याकारस्य भिन्नदेशादित्वा- दिति चेत् । तदपि कुतोऽवगतम् ! तज्जनकरय भिन्नदेशादित्वादिति चेत् ; न; परस्पराश्रयः दोपस्य परिरफुटत्यात् । स्वत एव संविदनन्यत्वादिति चेत् ; न, तस्यापेक्षिकत्वात् । आपेक्षिक ३० हि भिन्नदेशत्वादिकम् ; किब्धिदपेक्ष्यैव तस्य भावात् । सच्चापेक्ष्यं नात्मैव, तन तव्यापा- तात् । नाप्यन्यत् ; तस्य स्वाकारमात्रपर्यवसितेनीऽपरिज्ञानात् । न चापरिज्ञाते तस्मिस्तदपेक्षं भिन्न देशत्वादिकं सुपरिज्ञानम् , परिक्षात एय प्रामादौ सदपेक्षया पर्वतादी भिन्नदेशत्वादिपरि. ज्ञानस्योपलम्भात् । तन्न किञ्चिदेतत् । भवतु तर्हि तत्त्वं संविदद्वैतमेव, देशादिभेदस्तु कल्पनारोपित एवेति चेत् , तदपि २५ कल्पनं कस्मात् ? अहेतुकरयायोगात् । प्राच्यादेव तकल्पनादिति चेत् । तत्र भिग्नदेशत्वादिकं तत्परिज्ञानम्व यदि परमार्थत एव किमन्यनापि न भवेत् ? कल्पनारोपितमेवेति चेत् , न, 'तदपि' इत्याद्यनुगमनाइद(नाद) नवस्योपनिपातात् । तदाह-यदा यत्र यथा यस्तु देशादि. , -- यदेवं भा०, ज्ञानदेशवत् ज्ञानालेऽपि । २ यदिदं प-आ०, २०, ५०। ३ व्यतितिश-ता। १.प.५ सय वि-०,.,.1६-तेन परि-भार, १९, २९२ न्यायचिनिश्चयविवरणे २१४२ ] दूरप्रतिभासनम् १ पुनरपि शरीरस्थापरज्ञानापेक्षया तत्परिकल्पनायाम् अव्यवस्थापत्तिः । विपयदेशज्ञानकल्पनायाश्च योगिज्ञानस्य प्रतिविषयदेशं भेदापत्तेने योगी नाम पश्चिदेको भवेत् । सत्यपि भेदे तदेकमेव मेचक्ज्ञानस्याभ्युपगमादिति चेत् , न, व्यापकात्मवादस्य व्यवस्था. प्रसङ्गात् । नापि तात्त्विके तद्भेदे वदेकमुपपन्नम् , भेदेतरात्मवादस्यानभ्युपगमात , नीलबोध. ५ रूपतया तात्विक एव भेदे तदुपपत्तिप्रसङ्गाच । तथा च यत्तस्य कल्पितत्यतिपादकमलकार- वचनम्- "नीलान्न व्यतिरेकेण विपयिज्ञानमीक्ष्यते । 'ज्ञानपृष्ठेन भेदस्तु कल्पनाशिल्पिनिर्मितः ॥"[प्र.वार्तिकाल०३।३७७] इति । 'सदश्लीलभाषितं भवेत् । अतात्त्विके तु बढ्दै कथं तस्य विषयग्रहणम् १ आकारनलाभावात् । १० स्वशक्तित एवेति चेत् , उपपत्तिमदेतत् , अन्यथा कालदेशविप्रष्टतया भावोपदेशस्याभावप्रस. प्रात् , किन्तु नयनज्ञानादपि स्वविपये भिन्नदेशेऽपि व्यक्तिः स्वशक्ति एव भवेत तथैव निरवद्यानुभवात् । तथा च कथं भिन्नदेशयत् भिन्नकालस्यापि स्मरणादेर्ने व्यक्तिः १ तो तत्रापि ज्ञानशनिवारणात् । भिन्न कालवस्तुज्ञानं निर्विपयमेव तत्काले तद्विपयस्याभावादिति घेत् ; भिन्नदेशवस्तुज्ञानमपि कथ सविषयं तद्देशे तद्विपयस्याप्यभावात् । तस्य देशान्तरे १५ विद्यमानत्यादिति चेत् , इतरस्यापि कालान्तरे विद्यमानत्वादिति समः समाधिः । सर्वस्यापि फालान्तरवर्तिनः किन्न व्यतिरिति चेत् १ देशान्तरवर्तिनोऽपि किन्न स्यात् ? स्वहेतुनियद्धा. छक्तिनियमादिति चेत्", न, अन्यत्राप्यस्यैव परिहारत्वात् । कथं पुनः शक्तयोऽपि देशकाल. विप्रकृष्टभावापेक्षप्रादुर्भावा" इति चेत् , न, तथा तासामचिन्त्यत्वात् । न हि शक्तया 'कथमित्यमेयोत्पन्ना नान्यथापि' इति विचारयितुं प्रार्यन्ते । प्रमाणबलोपनीतास्तु परमभ्यनु. ५० झायन्त एव, अन्यथा न किन्निद्भवेत् अपहस्तिततदलावलम्यनस्यान्यत्रापि वस्तुव्यवस्थापन स्यासम्भवात् । तदेवाह-'अचिन्त्या भावशक्तयः' इति । स्वपदव्याख्यातमेतत्"। योद्यमा- विष्युर्वन्नाह- विषमोऽयमुपन्यासस्तयोश्चेत्सदसत्त्वतः । इति । अयमनन्तरः आरादित्यादिः उपन्यासो दृष्टान्तो विपमो दार्शनिकसदृशो न भवति । २५ सदशेन च दृष्टान्तेन भवितव्यम् । तद्वैषम्यश्च तयोर्देशकारविप्रकृष्टयोः सदसत्वतः देश. म्यवहितस्य" हि तज्ज्ञानदेशे असत्त्वेऽपि व्यक्तिरुपपन्नव तज्ञानकाले भावात् , न कालव्यव- . -परविज्ञा-भा०, प.प.। २ प्रतिविषय देशभेदा-भा., .. १० । ३ वादप्रसाल खुप- भा०,२०,०। ४-प्रतिपादितम-भा०,०, प० । ५ विज्ञानवेन भेद-4.1 तदकरमलगा-मा.,.. ५०. कालदेदो पि प्रह-०, ०। कालदेशेऽपि विप्रकृ-प.। ८ तव मा., या, प० । भिमदेव ब। ९भिनकालेऽपि.मानदेशे। " चैन्य-भा, २०, प.। १२-वादिति श्रा०,०, प.. १५-यानमैतत् भा., . प.। -हि तस्य हितस्य शानप्रदेशे प० ।-हितस्य शानदेशे मा., प.।
११४३] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताया हितस्य, तेदेशवतत्कालेऽप्यभावात् । चेत् शब्दः पराकूतमवद्योतयति । तदिदं परिहरनाह- यदा यत्र यथा वस्तु तवा तत्र तथा नयेत् ॥४२॥ अतत्कालादिरप्यात्मा न चेन्न व्यवतिष्ठते । इति । यदा यस्मिन् काले यत्र यस्मिन् देशे यथा येन प्रकारेण वस्तु नीलधवलादि 'स्थितम्' इति शेपः । तद्वस्तु तदा वस्मिन् काले तत्र तस्मिन् देशे तथा तेन प्रकारेण ५ नयेत् प्रापयेत् व्यक्तिम् 'व्यक्तिः' इत्यनुवर्तमानस्य विभक्तिपरिणामेन सम्बन्धात् । क इत्याह-आत्मा जीवः । अतत्कालादिः न विद्यन्ते तस्य वस्तुनः कालादयः काल- देशप्रकारा यस्यासायतत्कालादिः । अपिशब्दात् तत्कालादिरपि । यद्येवं तत्प्रकारत्वाद्विपया फारत्वं तस्यापद्यत इति चेत् ; सत्यम् ; सत्त्वप्रमेयत्वादिना तदभ्यनुज्ञानात् , अन्यथा नीरू- पत्वापत्तेः । अतत्प्रकारत्वं तु नीलाद्याकाराभावादिति निरवशम् । विपक्षे दोपमाह-न चेत् एवमात्मा व्यक्ति न नयति चेत् ; न व्यवतिष्ठते न वस्तुव्यवस्था प्रतिलभते । तत्खलु व्यवस्था प्रतिलभमानं कालदेशाकारभेदेनेव प्रतिलभते । तथा तत्सतिलम्भश्च कथं भवेत् आत्मा चेदतत्कालाविरपि तत्कालादिकं वस्तु न व्यज्यात १ सदाफारज्ञानादेवेति चेत् । न ततः स्वरूपमात्रपर्यवसायिनो भिन्नदेशादितया तस्य तत्प्रति. लम्भानुपपत्तेः । न हि तात्कालिकनिरंशज्ञानानुप्रविष्टस्यैव विषयाकारस्य मिन्नदेशादित्वम् । १५ तदाकारजनकस्य भिन्मदेशादित्वात्तस्यापि भिन्नदेशादित्वमिति चेत् ; फुत्तस्तदाकारजनकस्य मिन्नदेशादित्यमवगतम् ? अन्यतस्तदाकारज्ञानादिति चेत्, न तत्रापि 'ततः' इत्यादेरनवस्थान- दुस्तरदौरध्यपतिबन्धनिबन्धनस्य प्रसङ्गस्योपनिपातात् । तदप्तिस्याकारस्य मिन्नदेशादित्वा- दिति चेत् । तदपि कुतोऽवगतम् ? तज्जनकस्य भिन्नदेशादित्वादिति चेत् ; न; परस्पराश्रय. दोपस्य परिस्फुटत्वात् । स्वत एव संविदनन्यत्वादिति चेत् । न, तस्यापेक्षिकत्वात् । आपेक्षिकं २० हि भिन्नदेशत्वादिकम् ; किञ्चिदपेक्ष्यैय तस्य भावात् । तच्चापेक्ष्यं नात्मैव, तम तव्यापा- तात् । नाप्यन्यत् ; तस्य स्वाकारमानपर्यवसितेनीऽपरिज्ञानात् । न चापरिक्षाने तरिमस्तदपेक्ष भिन्नदेशत्वादिक सुपरिज्ञानम् , परिजात एव प्रामादौ तदपेक्षया पर्वतादौ भिन्नदेशत्वादिपरि- ज्ञानस्योपलम्भात् । तन्न किञ्चिदेतत् । भवतु तर्हि तत्त्वं संविद्वैतमेव, देशादिभेदस्तु कल्पनारोपित एवेति चेत् ; तदपि २५ फल्पनं कस्मात् ? अहेतुकत्यायोगात् । प्राच्यादेव तत्कल्पनादिति चेत् । तत्र भिन्नदेशत्वादिक तत्परिझानञ्च यदि परमार्थत एव किमन्यत्रापि न भवेत् ? कल्पनारोपितमेवेति चेत् , न, 'तदपि इत्यायनुगमनायद(नाद) नवस्थोपनिपातात् । तदाह-यदा यत्र यथा वस्तु देशादि. -- १ ज्ञानदेशवत् शानशाले पे। ३ यदिदं प-मा०,०, प० । ३ व्यनितिए-ता. । ५ यदेवं भा., प..-। तस्य वि-भा०,०प०।६-तेन परि-आ., ०,१०।
२९४ ग्यायविनिश्चययिधरणे [१४५ . . भेदकल्पने कार्यकारणरूपेण स्थितं तद्वस्तु तदा तत्र तथा नयेत् व्यपिम् । अतत्का- लादिरप्यात्मा सम्यग्नोधस्वभावो न चेन्न व्यवतिष्ठते तरतु व्यवस्थाविक भरतीत्यर्थः । विपल्पनमपि मा भूत् निर्विकल्पस्याद्वैतस्येव भावादिति चेत् , तदपि युतः अनवगतम्या. ५ व्यवस्थितः १ "स्वरूपस्य स्वतो गति:" [प्र० पा० ११६ ] इति चेत्, तपथमद्वैतम् , वेद्यवेदकावगमभेदस्यैवमभिधानात् १ तेभेदेऽपि तदेक्मेवेति चेत् , न, प्रमेणावप्रहादि- भेदेऽपि तदेकत्यप्रसङ्गात् । तथा च निर्व्याकुल देशादिभेदेन वस्तुव्यक्नियनम् , सन्नयनविघातुरा. त्मनो निर्व्याकुलत्वात् । व्याकुल एवासी भेदे सत्येक्त्यस्य व्याघातादिति चेत् , अनाह-न चेदात्मा न व्यवतिष्ठते वेद्यादिभेदाकान्ताद्वैतवास्तवव्याघातस्याविशेपादिति भावः । १० कल्पित एव तर वेद्यादिभेदो वस्तुतो निभेदत्वादद्वैतस्येति चेत् , न, कल्पगे यदा यत्र इत्यादेनिया लत्वस्याभिहितत्वात् । पुनरपि विपक्षे दोपमाह- व्यवहार विलोपो वा [ मोराच्चेदयथार्थता ] ॥४३॥ इति । 'न चेत्' इति, व न घेत् 'यदा' इत्यादिप्रकारेण वस्तु व्यक्ति नयत्यात्मा व्यवहारः प्रवृत्त्यादिलणस्तस्य विलोपो विल्यः स्यात् । तथा हि-व्यवहारः पचिद्वि. १५ पये वदनुभवार्थिनो भवन भिन्न एव भावि नात्मनि, वस्यानुभूयमानत्वेन तद्विपय यानुपपत्तेः । भिनेऽपि नाऽप्रतिपन्ने सर्वत्र तत्प्रसङ्गात् । न चाकारवादिनी भिन्नप्रतिपत्तिरस्तीति निवेदितम् । अतो विलुप्यत एव व्यवहारः । वाशब्द. पूर्वदोपसमुच्ये । नास्त्येव देशादिभेदः प्रवृत्यादिरूपो व्यवहारो वा कचित्तदाश्रयस्य बहिर्भावस्यैवा. भावात् । तत्प्रनिभासम्तु विपर्यासोपनीत एव "प्रतिभासः समस्तोऽपि वासनालिनिर्मितः।" २० [प्र. वार्तिकाल० ३।३६५ ] इति वचनात् । तस्मादयमयथार्थ एव । तदेवाह-'मोहा- चेदयथार्थता' इति । देशादिभेदव्यवहारयोरयथार्थत्वमविद्यमानत्वम् । कुतः । मोहात् तत्प्रत्ययस्य विपर्यासरूपत्वात् चेत् शब्द. पराक्तद्योतने । तमोत्तरमाह- अत्यन्तमसदात्मानं सन्तं पश्यन् स किं पुनः । प्रस्फुटं विपरीतं वा न्यूनाधिकतयापि वा ॥४४॥ प्रदेशादिव्यपायेऽपि प्रतियन प्रतिरुध्यते । इति । न तावदयमारोपितोऽपि देशादिभेदो व्यवहारो वा तद्विकल्पमनुप्रविशति तावन्मात्रस्यैव प्रसङ्गात् । न च तावन्मान तभेदो व्यवहापे वा रोकस्यैवमनभिनिवेशादप्रतिपत्तेश्च । बहिर्ग- २५ , चेत्कथ-भा०, २०, ५.१२ सदभेदे-आ०, २०, ५०।३-नच वस्तु-भा०, २०, ५.1 * -तवस्तुल्या-भा, प०, ५०१५ एव न चेत् मा०, २०, २०१६ मिन्नेन विना :-मा०, य०, १०५ भावनाभावनिर्मित"-प्रदातिकाल । ८-व्यवाये-भा.प.प.1९ बहिर्यतस्य तस्यैव ते-भा.प.प.।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव २२५ तस्येव तस्य तेनोपदर्शने पुनः अत्यन्तं पररूपवत् 'स्वरूपेणापि असदात्मानम् अविद्य- मानस्वभाव विषयविषयिणोदेशादिभेदं प्रवृत्तिप्राप्त्यादिरूपं व्यवहारञ्च पश्यन् अवलोकयन् । कथम् ? सन्तं विद्यमानमिय, असति सच्छब्दप्रयोगात् इवार्थप्रतिपत्तिः 'अग्निर्माणवकः' इति- वत् । सः अनन्तरीक्त आत्मा तस्यैव तथादर्शित्वोपपत्तेः। किम् ? करमात् । पुनरिति शिर:- कम्प प्रतिरुध्यते निपिध्यते, नैव निपिध्यत इति यावत् । किं कुर्वन् ? प्रतियन् प्रतिपद्य- ५ मानः । किम् ? सन्तं विद्यमानमपि सन्तमित्यस्यावृत्त्या सम्बन्धाक्ष्यमाणस्य अपिशब्दस्य च भिन्न प्रक्रमेण योजनात् । कस्मिन् सतिप्रतियन् प्रदेशादिव्यपायऽपि | प्रदेशव्यपाये चन्द्रादिकम् कालव्यपाये अतीतादिकम् , द्रव्यव्यपाये फाचादिव्यवहितमिति । एतदुक्तं भवति-यथाऽयम् अतत्कालादिरेव आरोपिताकारं पश्यन्न प्रतिरुध्यते तथा अनारोपितमपि । इत्यारोपितवदना- रोक्तिस्यापि आत्मदाक्तित एव परिज्ञानोपपत्तेः । कथं सः प्रतियन् ? प्रस्फुट प्रकर्ण स्पष्टम् १० अनेन प्रत्यक्षपर्यायरूपतया सन्तं प्रत्येतीति प्रतिपादयति । यथा चेदमुपपन्न तथा प्रति- पादितं प्रागिति न पुनरुच्यते । पुनरपि कथं प्रतियन् विपरीतं वा पाप्ट्यविकलं या तद- नेनापि स्मरणादिपरोक्षपर्यायरूपेण सन्तं प्रत्येतीति निवेदयति । ननु यदि प्रत्यक्षवत्स्मरणादावपि वस्तुनः स्वरूपेण प्रतिभासनम् । कथमस्पष्टस्यम् तत्स्वरूपप्रतिभासे स्पष्टत्वस्यैवोपपत्तेः। न हि तत्त्वरूपप्रतिभासादपरमध्यक्षेऽपि स्पष्टत्वम् । १५ ततो यदि स्वरूपतस्तेन "वस्तु प्रतिपन्नं स्पष्टरूपमेव तत् । यदि स्वरूपतो न प्रतिपन्नम् ; अप्र- तिपन्नमेव सर्वथा तद्भवेत् । स्वरूपप्रतिपत्तावपि पदस्पष्टमेवेति चेत् ; तर्हि नीलादेस्तद्वेदनात. कथं भेदः ? कथञ्च न स्यात् ? अविवेचनात् । यदि हि नीलादिस्ततो वेदनान्तरेऽपि प्रतिभा- सेत भवेद्विवेचनं ततश्च भेदः । न चैवम् , प्रत्यक्षप्रतिभासिनः स्पष्टात्मनस्तस्य" स्मरणादावन्य. "बाप्रतिभासनात् , तत्रास्पष्टात्मन यैव प्रतिभासोपलब्धेः । नीलादिरभयत्रैकरूप एव न २० तस्य स्पष्टत्वमस्पष्टत्वं वा, तयोविज्ञानधर्मत्वादिति चेत् । कथं तर्हि 'स्पष्टो नीलादिरस्पष्टो वा' इति तत्र व्यपदेशः अन्यधर्मणान्यन तदनुपपत्तेः ? स्पष्टादिक्षानसंसर्गादिति चेत ; ननु संसर्गस्तदभेद एव 'स्पष्टो नीलादिः' इत्यभेदेनैव प्रत्यवभासनात् , तथा च ज्ञानान्तर्गत एवासौ इति कथं तदपरतया व्यवस्थाप्येत ? तदेकतां प्राप्तस्यैव तस्माझेदानुपपत्तेः । तथा च परस्य वचनम्- २५ "स्वरूपेण प्रतीतं चेत्साक्षात्करणमेव तत् । स्वरूपेणाप्रतीतं चेत्सर्वथास्याप्रतीतता। 7 । सरू-मा०,५०,०। २-गादेवार्थ-भा०,०,५०1३ निषेध्यते मा०, ५०, ५०। -दिव्यवाये- भा०,५०,०।५-बदनाकारोपि तस्यात्मशकि-आ., ०,१०। ६-ण स्फुटम् भा०, २०, ५० । • यथा प्र-मा०, ३०, प० । ८ स्फाट्यविरलं तदनेनापि स्मरणेनापि परोक्षव्यवायह-मा०, २०, ५०। ९-सनमः स्पष्ट-भा०, य०, प.11. प्रतिभिन स्प-भा०प०प०111 नीलादेः । १२-प्र-मा०,५०, प० । व्यपदेशानुपपत्ते ।
. म्यायविनिश्चयविवरणे [१४५. स्वरूपेण प्रतीतेऽपि तदसाक्षात्कृतं यदि । नीलरूपस्य संविचेर्भेदस्तहिं कथं भवेत् १॥ प्रतीतिमेदाढ़ेदो हि नीलादरेकरूपता । भिन्नेऽन्यस्मिन्कथं मेदस्तदन्यस्य प्रमान्वितः ॥ तत्संसर्गात्तथात्वं चेदपरोऽर्थः कुतो भवेत् ? तदेकतां प्रपन्नस्य ततो भेदः कुतो मतः " [प्रत्यात्र्तिकाल० २१३२९ ] सतो न ज्ञानसंसर्गान्नीलादेः स्पष्टात्मत्वम्, तस्यैव बहिर्भूतस्याभावप्रसगान , अपि तु स्वत एव तस्य प प्रत्यक्षवत्स्मरणादावपि प्रतिभासने तदपिस्पष्टमेवेति न युक्तमुक्तम्-"विपरीतंचा प्रति- यन्' इति चेत् ; 'तदिदमपि प्रज्ञापरिपाकवैकल्यमेव प्रज्ञाकरस्य ज्ञापयति-स्वरूपप्रतीत्या १० वैशद्यानुपपत्तेः, प्लुतज्ञाने तदभावप्रसङ्गात् । अस्ति च कामिन्यादिविषयस्योपटुतज्ञानस्या- पि वैशद्यम् । न च तत्र स्वरूपपरिज्ञानं कामिन्यादीनामभावात् । ज्ञानाकारनया विद्यन्त एव त इति चेत् , न, "अभूतानपि पश्यन्ति" 'इत्यस्य विरोधात् विद्यमानानामेवाऽभूतत्वायोगात् । "पुरतोऽवस्थितानिव" इत्यपि न युक्तम् ; ज्ञानापेक्षया तदाकाराणामेव पुरतो भावानुपपत्तेः, एकत्र निष्पर्याय भिन्न देशत्यासम्भवात् । कल्पितस्तद्धार्य इति चेत् । न, "पश्यन्ति" इत्यस्या- १५ योगात् कल्पनस्य दर्शनरूपत्वासम्भवात् । दर्शनसाहचर्यात्तदपि दर्शनमेवेति चेत् ; न तत्रापि दर्शनयद् अन्तःप्रविष्टतयैव तलतिभासप्रसङ्गात् । पुनरपि कल्पिवस्य पुरवोभावस्यावस्थापने व्यवस्थावैकल्यापत्तेः । अतो दूर गत्वापि वस्तुत एव तेषां कचित्पुरतो भावो वक्तव्य इति कथ ज्ञानाकारत्यम् ' तन्दिनदेशानां तदाकारत्यानुपपत्तेः अतिप्रसङ्गादित्यसतामेव तेषां दर्शनमिति कथं तत्र वैशद्यम् ? असतां स्वरूपेण प्रहणायोगात् । नीलादिना स्वरूपेणेच तेपामपि ग्रहणमिति २० चेत्, कथमिदानी नीरूपत्वमिति सति स्वरूपे तदनुपपत्ते: ? बाध्यमानत्वादिति चेत् ; न; तनी- रूपत्वे तत्प्रयुक्तस्य वैशद्यस्यापि तत्त्यप्रसगात् । नीरूपमेव तदपीति चेत् ; न; दर्शनस्यापि सद. नान्तरत्वेन नीरूपत्वापत्तेः । तस्मादर्थान्तरमेव दर्शन मिति चेत्, पुतस्तहिं तस्य वेदनम् ? स्थत एवेति चेत् ; न, व्याघातात् । व्याहत सल्विदं यत्-'नीरूपम्, स्वतश्च वेद्यते' इति व्योमकुसुमादिवत् । तत एव दर्शनादिति चेत् ; न, तम्याविशदत्ये दर्शन वायोगात् । विशदमेद २५ तदिति चेत्, न, विपयविपयितया वैशयस्य तत्रानवमासनात् । सदपि नशधं नीरूपमेय, तत्प्रयोजक्स्य विषयवैशद्यस्य नीरूपत्वान् । भवतु नीरूपमेव तदपीति चेत् ; न, तत्रापि 'दर्श. नस्यापि' इत्यादेरनुगमादनवस्थानोपोपनिपातात् । ततो न विपयस्वरूपप्रहणप्रयुक्तं पैशद्यम् , निर्विपयकामिन्यादिदर्शने उदभावानुपहार । भाषनापरिपाकपयुक्त तन वैशयमिति चेत् । । चाबहि-मा० ५० ५.। २ देवमपि आ., २०, २०११-यस्योपरतज्ञा-मा०, २०, २० । ५ "कामशोकमयोन्मादपौरस्वप्नायुपालुता । भभूतानपि पदान्ति पुरतोऽवस्थिनानिव ।"-प्र. वार्तिकाल. २१८३१५ युगपत् ।। पुरतो भाव 1 0 -लादीनो स-भा.,.,प०। ८ नीलरूप-भा., प., प। नीलकप-आम०प० । १. कामिन्यादौ ।
प्रयमा प्रत्यक्षप्रस्ताचा १० , ११४५] न; सत्यपि विपये 'तत्प्रयुक्तस्येव तस्य प्रसङ्गात् । भवत्विति चेत्, यत्र तर्हि तत्परिपाको नास्ति सत्र सत्यपि विपयग्रणे न वैशद्यम् । नार्य दोपः, सत्येय तत्परिपाके विषयग्रहणस्यापि भावादिति चेत् ; न; भावितस्यापि विषयस्य ग्रहणप्रतीतेः । अन्यथा अनभ्यासैदशायां जला- देरदर्शने लिङ्गाभावात् कथमर्थक्रियानुमानं यतः स्नानपानार्थिनः प्रवृत्तिवेदिति न विषय- स्वरूपवेदनादेव वैशयम् , सत्यपि तस्मिन्नन्तरङ्गमलविशेषमलीमसत्वेनावैशयस्यापि सम्भवात् । ५ ततो न सूक्तमिदम्-'स्वरूपेण प्रतीतं चेत् ' इत्यादि । नन्येवम् अन्तरगमलविंगमाविगमप्रयुक्तत्वे वैशोतरयोनिधर्मत्वमेवेति कथमन्य- स्ताभ्यां व्यपदिश्यते 'स्पष्टो नीलादिः अस्पष्टो वा' इति? इति चेत् ; न; तथाविधज्ञानविषय- तयैव तथा व्यपदेशोपपत्ते तादात्म्यरूपात्तसंसर्गात् । तत इदमपि न सुभाषितम्-'तत्संस- र्गानथात्वं चेत्' इत्यादि, तव्यपदेशस्य तत्संसर्गाभावेऽप्युपपत्तेः । पुनरपि कथं प्रतियन्नित्यत्राह-न्यूनाधिकतयापि वा । न्यूनतयां पूर्व गृही. तस्याल्पस्येव स्मरणात् अधिकतया तस्यैव कालाधिफस्यानुस्मरणात् । अथवा पर्वताः गण्डी. लस्य न्यूनतया ततः पर्वतस्याधिकतया प्रतिवेदनात् । स्यान्मतम्-विपयागारवैकल्यमेवात्र व्यवस्थापयितुमभिप्रेतम्, तय 'प्रदेशादि' इत्यादिनैव प्रतिपादितम्, तत्किमनेन 'प्रस्फुटम्' इत्यादिना 'न्यून' इत्यादिना च प्रयो- १५ जनाभावादिति ? तन्न; आत्मव्ययस्थापनस्य तत्प्रयोजनत्वात् । किं पुनरात्मा "प्रतिसभ्यत इति ? अग्र पगे धूयात-'प्रमाणाभावात्' इति ; तत्रेदमुत्तरम्-'प्रस्फुटम्' इत्यादि । व्यवस्थापित एव पूर्वमात्मेति चेत् न, प्रकारान्तरेणेदानी तब्यवस्थापनात् । तथा हि यद्यात्मा नाम न भवेत् पुतस्तदा प्रफुटेतररूपतया विज्ञानेषु न्यूनाधिकस्वभावतया च विपयेषु राशिद्वयप्रतिपत्तिः । "एफराशिविषयस्य शानस्य राश्यन्तरं प्रत्यनुपक्रमे तत्प्रतिपत्तेरनुपपत्तेः, प्रतियोगिपरिमान- २० मन्तरणकराशिपरिझानमात्रादेव "वत्प्रतिपत्तरनुपलम्भात् । तत्र तदुपक्रमे प न सम्भयत्येवात्म- प्रतिषेधः परापरविषयमहणोपम्माधिष्ठानस्य ज्ञानस्यैव आत्मत्येन आत्मतत्त्ववदिभिरभ्यनुज्ञानात् । न प शिद्वयपरिक्षानमसिद्धम् ; प्रसिद्धत्वात् । प्रसिद्धिरप्येकराशिपरिज्ञानस्येवेति पेत् । कुत एतत् १ तथानुभवादिति चेत् ; न; राश्यन्तरझानेऽपि वदविशेषात् । तथापि तस्य प्रसिद्धपपलापे तदपरस्यापि भवेदित्यभाव एव यहिस्तश्च भावानामापोत । न चासौ शक्यव्य. २५ यस्थापनः प्रमाणवैकल्यान । सवोऽनुभवालादेकराशिपरिशानमभ्यनुजानदो राश्यन्तरपरिक्षान- मभ्युपगमविषय एय । एतदर्थमेवेदमुकम्-'प्रतियन्' इति । तस्मादुपपन्नं राशिदयपरिक्षानादा- स्मन्यवस्थापन तत्मविपादनार्थ 'प्रस्फुटम्' इत्यादिकं 'न्यून' इत्यादिकम्य वचनम् । - 1 भापनापरिपाक प्रयुतसर । २ पेशयस्य । ३ पेरला भा०, २०, प.1 - परि-भा, प.प.। ५-राभूतपणा-या. प.। १ इति तम मा., ५०, ५ .. -स्य संग-मा, प., ५.। ८-या गू-भा०, २०, प.! १-ताइय अस्य न्यून-मा०, २०, ५ .. प्रतिनिधो भा.प., 1.11 एकदि-आ०,८०, ५०1१२ ततिरसेमर-भा, य.,१०।१-गुरानो मा०, २०, प.।
न्यायविनिश्चयविधरणे साम्प्रतं 'विपरीतं वा प्रतियन्' इत्येतत् स्मरणपर्यायेणेवे प्रत्यभिज्ञानादिना पर्यायेणापि दमयन्नाह- एतेन प्रत्यभिज्ञानाद्यतीतानुमितिर्गता ॥४५॥ इति । प्रत्यभिज्ञानं तदेवेदं सादृशमिदमिति वा ज्ञानम् , तदादिर्येषां तर्कानुमानश्रुतानां तानि ६प्रत्यभिज्ञानादीनि ः अतीतस्य उपलक्षणमिदं वर्तमानस्यानागतस्य च अनु पश्चात् पूर्वपूर्वस्मादूर्ध्वमुत्तरोतरैः मितिः परिज्ञानं गता निश्चिता । केनेति चेत् ' एतेन 'यदा यन्त्र' इत्यादिना। तथा हि स्मरणं यद्वदतत्कालाद्यपि स्वयम् । नियतप्राहि तद्वत्स्यात् प्रत्यभिज्ञाद्यपि स्फुटम् ॥७३७॥ सामर्थ्यात्तारशात्तस्य तलियातों विनिश्चयात् । जडचेष्टितमेवातस्तत्कालादित्वपल्पनम् ॥७३८॥ प्रतिपन्नविषयमेव प्रत्यभिज्ञानम् 'अनु' इति वचनात् । न च पूर्वापरयोरेकत्वं सादृश्यं वा कुतश्चित्प्रतिपन्नं तत्कथं तस्य प्रत्यभिज्ञानेन प्रमितिरिति चेत् ? न, प्रत्यक्षतोऽपि तत्प्रतिपत्तेः। सन्निहितस्येव पर्यायस्य तेन प्रतिपत्तिर्न पूर्वस्य तत्कथं तदेकत्वस्य तत्सादृश्यस्य वा तेन ६ परिज्ञानमिति चेत् ? किमपेश्य तस्य सन्निधानम् ? प्रत्यक्षमेवेति चेत् , न, विषयस्य तज्ज्ञा- नापेक्षया समकालत्वानभ्युपगमात् “नातोऽर्थः स्वधिया सह" [० वा० २।२४६ ] इति वचनात । तदर्थजातस्याकारस्य तत्समकालत्वमेव तस्यापि तत्समकालत्वम् , तत्परिज्ञान- स्यैव विषयपरिझानतयाऽभ्यनुज्ञानादिति चेत् , अनुपकारे तदाकारस्यापि परिक्षानं कथम् ? "नाकारणं विषयः” । ]"इत्यस्य विरोधात् । व्यतिरिक एवायं विपये २० न्यायः, न चाकारस्य ज्ञानाव्यतिरेक इति चेत् , कस्तईि वन न्यायो यतस्तत्परिज्ञानम् १ स्वहेतोस्तत्स्वभावतयोत्पत्तिरेवेति चेत् , व्यतिरिकेऽप्ययमेव करमान भवति यतस्तर निष्प्र- योजनमेव हेतुभावपरिकल्पनं न भवेत् ? अहेतोरपि परिज्ञाने किन्न सर्वस्य परिज्ञानम् अहे. तुत्वाविशेषादिति चेत् ? न, आकारण्याप्यहेतोरेव वेदनात् , तत्राप्येवमतिप्रसहस्योपनिपातात् । स्वहेतुनिबद्धन" शतिनियमेनाहेतुत्वेऽपि तस्यैव ततः परिज्ञान न सर्वस्येति चेत् ; न, व्यति- रिक्तपरिक्षानेऽप्येवमेव समाधानोपपत्तेः, व्यतिरिक्तस्यापि तादृशादेव सन्नियमात् नियतस्यैव परिज्ञानं न सर्वस्येति । शक्तितश्च विषयपरिज्ञाने कथं सन्निहितस्यैव प्रत्यक्षेण दर्शनं नातीता- देरपि तत्रापि तस्य शक्तिसम्भवात् । भयतु पूर्वापरयोस्तस्य प्रवृत्तिस्तथापि न - ततस्तत्रैकत्वं प्रतीयते, भेदस्यैवैकान्ततः " , -णेव भा०, २०, ५०। २"निवेदयन्नाह इति पाठेन भाष्यम्"-ता. दि.1 प्रत्यारशाण पाह इत्यर्थ । ३ "श्लोकानोक्षार्थ इलोक्येन विशोति"-ता. टि.। -तोरि नि-मा०,५०,१०१५ पूर्वपरयो- भा०, ५०, ५०। ६ प्रत्यक्षेण । - ज्ञानसमकालत्वमेव । ८ अर्थस्यापि । ९ आकारपरिज्ञानस्य 11. "नाऽहेतु- विपर"-प्र०वातिकाल०३१५०।11-तुनियमन श-पाप-तु नियमेनाहेतु-प. 1१२ प्रयभिज्ञानस्य ।
१४५] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव २९९ 'प्रतिपत्तेरिति चेत् ; एकसमवायात् , अनेकसमवायाद्वा ? न तावेदकसमवायात् । तत एकस्व- भावादेफेस्यैव पर्यायस्य परिज्ञानप्रसङ्गात् । पर्यायान्तरस्यापि तव एव परिज्ञानमिति चेत् ; न; परत्याभावापत्तेः। न हि तत्पर्यायाभिमुख्यैकस्वभावसंवेदनवेद्यस्य तदर्थान्तरत्वं तत्स्वरूपवदु- पपन्नम् ; एकस्वभावनित्यनिवन्धनत्वेऽपि कार्याणामपरापरत्वस्यानिवारणप्रसङ्गात् । भवतु ततस्तस्यैकस्यैव परिज्ञानं न परस्येति चेत् ; कथं तस्य ततो भेदपरिक्षानम् ? अपरिज्ञाते ५ तस्मिन् तदनुपपत्तेः । तस्य तत्स्वभावत्वादपरिज्ञातेऽपि तस्मिन् भवत्येव परिज्ञानम् अन्यथा "तत्स्वभावत्वस्यैवाभावप्रसङ्गादिति चेत् ; न; तत्स्वभावत्वस्यासिद्धत्वात् । भेदो हि पूर्वस्योत्तर- स्मात् , तंत्राभाव एव, स च तदधिकरणतया पश्चादेव भवन् कथं पूर्यस्य स्वभाव: स्यात् ? पूर्वस्यैव तद्रूपतयाऽवस्थितिमत्त्वेनाक्षणिकत्वापत्तेः । "पूर्वमेवायमभावो" न पश्चादिति चेत् ; भायस्वर्हि "पश्चादिति कार्यासमकालत्वं कारणस्य पूर्वमेव "गतं सन्तानव्यवस्था कथन १० विधुरीकुर्यात् ? कथम्चेदमपि सुभापितम्- "न तस्य किञ्चिद्भवति न भवत्येव केवलम्" [प्र. वा० ३।२७७ ] इति ? सति "पश्चाद्भावे "न भवत्येव" इति वचनानुपपतेः । भावोऽपि तस्य" बलादापतितः प्रागेव "सत इति चेत् ; पश्चात्तर्हि कि" स्यात् ? न किञ्चिदिति चेत् ; नन्वेवमभाव एवोकः स्यात् , तदपरस्य न “किश्चिदर्थस्याभावात् ।"भवत्वेवमिति चेत् ; न; 'स च तदधिकरणतया' इत्यादे- १५ दोपस्याभिहितत्वात् । पुनरपि प्राग्भावपरिकल्पने प्रसङ्गः 'भावस्तहि' इत्यादि: अनवस्थादोप- मन्वाकर्पन्नापद्येव । 'न तस्य पश्चाद्भावो नाप्यभावः इत्यपि न युक्तम् ; उभयाभावस्य न किञ्चि. दर्थत्वापत्तेः तस्य च पश्चाद्भावपूर्वभावयोः प्राच्यदोपानतिप्रमात् । तत्रापि 'न तस्य' इत्यादिव- चने परस्यानवस्थादोपस्योपनिपातात् ततः पश्चाद्भाव्येवाभाव" इति नासो पूर्वस्य स्वभावः । यद्येवम् , अस्वभावात्ततोऽपि तस्य भेदो वक्तव्यः तदस्वभावत्वस्यान्यथानुपपत्तेः । तस्य २० च यदि "तत्स्वभावत्वं पूर्वस्यापि स्यादविशेपात् । "तस्यापि पश्चाद्भाव्यभावत्वेन नास्त्येव तत्स्वभावरवमिति चेत् । न; सत्रापि 'यद्येवम्' इत्यादेरनुबन्धादनवस्थानमुद्वहतश्चक्रकस्यानुप. जादिति चेत् ; न; तस्मात्त दस्याभावान्तरनियन्धनत्यानभ्युपगमात्, तत एवाभावात्तदुपपत्तेः। स एव हाभावः प्राच्यस्य स्वतो “भेदनियन्धनम् , न तदन्तरं तदप्रतिपत्तेः तत्कथमयं प्रसङ्गः ? 1-पत्तिरि-भा०, ५०, ५०। २-वादेवैक-आ०, २०, ५०। ३ तवभेद-आ०, २०, ५० ५ परभेदखभावत्वात् । ५ तरस्वभावाभावप्र-आ०, २०, ५०। ६ उत्तरे। - अमानः । ८ उत्तराधिकरण- तया। ९ उत्तररूरतया । १० पूर्व एव भा०, २०, ५०1 1१ उतराधिकरणका पूर्वाभाषः । १२ यदि उत्तर. काले पूर्वामावः नास्ति किन्तु पूर्वमेव तदि पूर्वरय सद्भाव एव प्राप्तः। 1 नष्टम् । तया च कार्यकारणयौरैककालवे कथं सन्तान पवग्या स्यादिति भावः । १५ पूर्वक्षणस्य । १५ पूर्वक्षणात्य । । उत्तरक्षणतः । १. किन्न स्यात मा०, २०, ५०। १८ कश्चिदर्थ-आ०, २०, ५०।१भवत्यैव-भा०, ५०, प० । २० पूर्वमावस्य पूर्वक्षणत्तित्वकल्पने। २. इत्यादैरन-मा०, २०, ५० | २९ पूर्वाय । १३ तस्य प-भा०, ५०, ५० । २५ पश्चादभाव एवा-आ०, २०, ५०। २५ पूर्वामावः । २६ पूर्वाभावादपि । २७ पूर्वस्य । २८ पूर्वामागद् पूर्वभेदस्य । १९ पूर्वक्षणस्वभावत्वम् । ३. पूर्वमुतस्य पूर्वा मावस्यापि । ३१ पूर्वमेदस्यापि । ३२ पूर्वक्षण- स्वभावलम् । ३३ पूर्वाभावात् पूर्वभेदत्य । ३४ भेोपपत्रः। ३५ स्वरमात् । ३६ भेदे निय-ता।
[१४ - १० ३०० न्यायविनिश्चयविचरणे पश्वादायी भाव एव 'किन्न तमिवन्धनं ततोऽपि 'परस्याभावत्यापरिज्ञानादिति चेत् । उच्यते-- सर्वथाऽर्थान्तरं भावादभावश्चेन्निषिध्यते । निषिध्यतां न किञ्चिन्न सूर्ण स्याद्वादवेदिनाम् ।।७३९॥ फञ्चिद्यस्तु तद्भ दो नासौ शक्यनिपीडनः । प्रतीशिदयिवाश्लेपलब्धस्वास्थ्यसुखो ह्ययम् ॥७४०॥ पश्यन्तः फलशं यस्माज्जायमानं स्वहेतुतः । नष्टो मृत्मिण्ड इत्येवं निश्चिन्वन्ति विपश्चितः ॥७४१॥ एकान्तभावरूपे तु कलशे नाशनिर्णयः । कथं तनोपजायेत तन्मिध्यात्वप्रसञ्जनात् ॥७४२॥ निश्चयो न च मिथ्यासो निर्मासस्य समुद्भयात् । तस्माद्भावाति रित्तोऽयमभारोऽस्ति कथश्चन ॥७४३॥ स एव नाशः प्राच्यस्य प्रतीत्या सुहृदोच्यते । कश्चित्तभेदेन नाशोक्तिम् (स्तू) तरोदये १७४४॥ "तन्नोत्तरस्यासंविचौ तद्भावाभावयेदनम् । एक्स्वभावमध्यक्षं न च तद्वेदनक्षमम् १७४५॥ यधनेक्स्वभावं"तदक्रमेणोपगम्यते । एकानेकस्यमा तलमेणापि न किं मतम् १ ॥७४६॥ अनेकसमयं तच्चन्यायादागतमुच्यते । तेन पूर्वापराभेदः सुयोधो भेदवन्न किम् ॥७४७॥ तदन्तर्वहिरप्येवमेकत्वेऽध्यक्षतो गते । निरयमहमेवान प्रत्यभिज्ञाप्रवर्तनम् ।।७४८॥ सादृश्ये प्रत्याभिज्ञानमेतेन प्रविवर्णितम् । प्रत्यक्षादेव तस्यापि" ग्रहणस्योपदर्शनात् ॥७४९॥ एतदेवाह- प्रायशोऽन्यव्यवच्छेदे प्रत्यग्रानवयोधतः । इति । प्रत्यग्रं च तद्वर्तमानत्वात् प्रतिनवम् अनवं च तदतीतत्वाचिरतने वस्य योधः "परिक्षानं प्रत्यभिज्ञानादेः स प्रत्ययानवयोधः तस्मात्तत इति । उपलक्षणमेतन्-'सदृशोधता' २० उत्तरक्षण एवं ।। कि तमिर-आफ, प., प. उत्तरक्षणातु । ४ मिन्जस्य । ५ निषेध्यते भाग, प०,१०। ६ निषेध्यताम् भा०, ५०, प.10 -तिरेकोऽयम-पा०, २०, ५०1८न भा०, ब., प... प्रतीच्या भा०,१०,५.11.-स्तरोध-प्रा०, २०, ५.121-किस्तू "तु. २ तशेत्तर-प० । १५अध्यक्षम् 11४-पि प्रत्यग्रस्योप-भा० ,२०,०।१५ परिशन प्रत्यभिज्ञान प्रत्यमि-मा० ..! - .
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः १२४६] इत्यपि द्रष्टव्यम् । इदमभिहितं भवति-अतत्कालादित एव प्रत्यभिज्ञादेर्यंत एकत्वसारश्यपरिक्षानं भावेपु प्रतीयते तत 'एतेन' इत्याद्युपपन्नमिति । कथमेवं प्रत्यभिज्ञादेः प्रामाण्य प्रत्यक्षप्रतिपन्नविषयत्वेनापूर्वार्थत्वाभावात् , अ. पूर्वार्थब्च भवतां प्रमाणम् "प्रमाणमनधिगतार्थाधिगमज्ञानम्" । ] इति वचना- दिति चेत्? अत्राह-अन्यव्यवच्छेदे इति। अन्यत् एकत्वादेकान्तिकं नानात्वं सादृश्याच्च ५ वैलक्षण्यमध्यारोपितं तस्य व्यवच्छेदो निरासस्तसिगन् , तन्निमित्तं यः प्रत्यमानवबोधस्तत इति । एतदुक्तं भवति-प्रत्यक्षप्रतिपन्नस्यापि समारोपव्यवच्छेदविशिष्टतया प्रत्यभिज्ञानादिना प्रतिपत्तेः कथञ्चिदपूर्वार्थमेव तत् ततश्च प्रमाणमनुमानवदिति । तथा च सूक्तं चूर्णो देवस्य वचनम्- "समारोपव्यवच्छेदात् प्रमाणमनुमानवत् । स्मृत्यादितर्कपर्यन्तं लिभिज्ञाननियन्धनम् ।।" [ ] इति । कथमे प्रत्यक्षविषये सर्वत्रापि न प्रत्यभिज्ञादिकं यतः प्रघट्टकादेरप्रत्यभिज्ञानात्कस्य- चिदमुवादभङ्गो भवेदिति चेत् ? न; स्मर्यमाण एव तन तदुपपत्तेः । न च स्मरणस्यापि तत्र सर्वत्रापि भावः; संस्कारगोचर एव तस्य भावात् तथैव प्रतिपत्तेः । एतदेवाह-'प्रायशः' इति । प्रायशो बाहुल्येन यः प्रत्यभिज्ञादेः प्रत्यग्रानवयोधस्तत इति । यावत् नित्येतरात्मकं १५ वस्तु सादृश्येतरात्मकं चाभ्युपेयते तावत्तद्विपरीतमेव दुतो नाभ्युपेयत इति चेत् ? अत्राह- अविज्ञाततथाभावस्याभ्युपायविरोधतः ॥४८॥ इति । अविज्ञातः अपरिशातः तधा तेन परोक्तनैकान्वक्षणक्षयादिप्रकारेण भाव: सत्ता यस्य चेतनस्येतरस्य वा तस्य योऽभ्युपाय अगीकारः तस्य विरोधतो याधनादविप्रसङ्ग.. नेति भावः । तथा हि-- एकान्तक्षणभङ्गादि यद्यज्ञातमुपेयते । तद्वदेकान्तनित्यत्वाद्युपेयं किन्न ते मतम् ॥७५०॥ सर्वप्रवादिनामेवमभिप्रेतव्यवस्थिते । पराजयः फ सम्भाव्यरतदभाये जयोऽपि वा ।।७५१॥ तस्याभ्युपगमस्तस्माज्ञातस्यैवोपपत्तिमान् । न च तस्य परिज्ञानमिति पूर्व निवेदितम् ॥७५२॥ त इमे 'यथैवात्मायम्' इत्यादयोऽन्तरश्लोकाः 'प्रकाशनियमः' इत्यादेग्ता- स्यानात् । स्यान्मतम्-यदुत्तम् असन्नेय केशादिः तैमिरिकस्य प्रतिभासते भ्रान्तेराधिपत्येन इति; 1- प्रमाणप्रत्यक्ष-मा०, २०, ५०। २ "प्रमाणमविसंवादिक्षानमनधिगदार्थ पिगमलपम्दान्'- भा०, मटसा• पृ०1०५१३ प्रसुटकाई-भा.प.अनुवादमोपपतः|५०-मा...। २० २५ ३०२ न्यायविनिश्चयचिवरणे तदयुतम् ; असतः प्रतिभासेऽतिप्रसङ्गात , व्योमकुसुमादेरपि सदापत्तेः । अत्तो वस्तुसनेव तत्केशादि [:] स्वप्नविषयश्चेति ; तन ; शक्तिवैकल्यात् । यदि वस्तुसन्नेव स्वप्नादिविषयः, कथं तस्य शक्तिवैकल्यम् ? वस्तुसति तदयोगात् । न चायं शक्तिमानेव तत्कार्यादर्शनात् । न हि स्वप्नोपलब्धादहनादेदाहादिकार्यम् । तदपि कदाचिदुपलभ्यत एवेति चेत् । न ; तस्या- .५ प्यसन एव भ्रान्तिसामध्येनोपलम्भात् , कथमन्यथा तदादग्धतया दृष्टस्येव पश्चादन्यथोपलम्भ- नम् ? न घेदमन्यदेव, दृढप्रत्यभिज्ञानविषयत्वात्। असत्यपि कार्ये शकिमानेवायम् , अलौकिक- त्वात् । लौकिकस्यैवायं धर्मों यच्छक्तिमत्त्वेऽवश्यम्भाविकार्यदर्शन मिति चेत् ; तन्न; असति कार्ये शक्तिमत्वस्यैव दुरुपपादत्वात् , तदुपपादनस्य कार्योपाध्यायत्वात् । तझानमेव तस्य कार्यम्, अकारणस्याविषयत्वात् ततस्तत एव तदुपपादन मिति चेत्, न, स्वर्गचैत्यवन्दनाधिष्ठानस्य' साध्य. ११० साधनभावस्यापिर्तत एव तदुपपादनापत्तेः । भवतु को दोप इति चेत्? चैत्यवन्दनादेरपि धर्मत्वमेवेति ब्रूमः। तथा च न युक्तमेतत्-"धर्मे चोदनैव प्रमाणम्" [ ] इति प्रत्यागमस्यापि तत्र प्रामाण्यात् । अथ तज्ज्ञान" "तदागमादेव केवलान्न तद्विपयात् कथमिदानीं तस्य शक्तिमत्त्वम् ? "कार्यलेशमप्यनुपजनयतस्तदनुपपत्तेः । तदपि मा भूदिति चेत् ; सिद्धं सहि 'तस्यावस्तुसत एव प्रतिमासनम् , सक्लशक्तिविरहस्यैव वद्रूपत्वात , तथा स्वप्नादिविषयस्यापि स्यादविशेपात् । यदि चाय विश्वविपयो भावो भाविक एव क्थं तस्येच्छानुवर्तनम् अन्यत्र "ताशे तदर्शनात् । अस्ति वेच्छानुवर्तनं विप्लवविषयस्य कामिन्यादेरिच्छया पुरतः पार्वतश्वोपल. म्मान। अनियतदेशगतत्वात तथा "तस्योपलम्भो नेच्छात इति चेत् ; न,"अन्यस्यापि तदुपलम्भ- प्रसङ्गात् । सामग्रीवैकल्यान्नैवमिति चेत् ; सति चक्षुरादो कथं "तवैकल्यम् ? विश्वापेक्षमेय "तदपि सामग्री न केवलमिति चेत् , न ; वस्तुसति "विपये विलयस्यानुपयोगात्", अन्यथा २० अन्यत्रापि तदपेक्षणप्रसङ्गात् । वस्तुसत्यपि अलौकिक एव "तदपेक्षणं नान्यति चेत्, फयमेवं तस्य विप्लवत्वं वस्तुसद्विपयोपलब्धिनिरन्धनस्य “तत्त्वायोगान् अतिप्रसङ्गात् । अनिष्टत्वात् "तद्विषयस्येति चेत् ; न, विषादिविपयस्य चक्षुरादेरपि “तत्त्वापत्तेः । न चानिष्ट एव "तस्य विषयः कामिन्यादेरियस्यापि तद्विपयत्वात् । अर्थक्रियाविरहादनिष्ट एवायमपीति चेत् ; न, तदर्शनस्यैवार्थिनस्तदर्थक्रियात्यान, गेयस्य श्रवणयत् । न हि गेयस्य श्रवणादन्यदेव फलम् । . . , -- . . . १ ततो भा०प०, ५० । २ मिरिकरेशादि । ३-दा तद्तयाद मा०, ५०, ५० । स्वप्ने । ४ कार्यम् उपाध्याय झापको यस्य । ५ शक्तिमत्वस्य । ६ शत्तिमरवशनादेव। -नस्य साधन-आ०, २०, ५०1८ चैत्यवन्दनज्ञानादेव चैत्यवन्दननिष्टस्वगंप्रापणशक्तिमरवस्य उपपादनापत्ते । ९ "तस्मात् चौदनैव प्रमाणं धर्मस्य इति स्थितः प्रतिज्ञार्थ ।"-वृद. 11. चैत्यवन्दननिष्ठस्वर्गप्रापणशकिज्ञानम् । ११ बौद्धागम देव । १२ चैत्य चन्दनार यविषयात् । १३ चैत्यवन्दनस्य । १४ का रेश-०,१०,१०।१५ चैत्यवन्दनस्य । १६ भावि कथ भा०, ५.. प.। परमार्थसन्नेव । 10 परमार्थसारस्तुनि । १८ विश्वविषयस्य । १९ "प्रतिपत्त, " ता. दि० । २.-कल्यात्ममिति भा०, २०, ५० । २. सामग्रीवेश्यम् । २१ घरायपि । २३ विषयविद्ध-भा., व., ५०।२४ –मादन्यत्रापि-प्रा०, २०, ५० १२५ विश्वापेक्षणम् । २६ विरक्त्वायोगात् । २० विश्वविश्यस्य । १० विलवत्वापत्तः । २९ विश्वस्य । ३० कामिन्यादिरपि । ३. गेयश्रवण-मा०, २०, । गेयश्च श्रवण प० ।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः ३०३ . ४७] सस्यैव प्रीतिरूपस्य तत्फलत्वेन प्रसिद्धत्वात् , तद्वत्कामिन्यादेरपि तदर्शनस्यैव 'प्रीतिरूपस्य फलत्योपपत्तेः नार्थक्रियाविरहादनिष्टत्वमुपपन्नम् । तथा च कस्यचिद्वचनम्- "शेयस्वरूपसंवित्तिरेव तत्र क्रिया मता। चित्रेऽपि दृष्टिमात्रेण फलं परिसमाप्तिवत् ॥ [अ० वार्तिकाल० १।१] इति । तदपि दर्शनं न कामिन्यादेः अपि विन्द्रियादेरेवेति चेत् ; कथमतत्कार्यस्य "तद्विपयत्वम् ? स्वशक्तित इति चेत् ; न; असद्विपयत्यस्यापि प्रसङ्गात् , तत्कधं कामिन्यादेरलौकिकत्वेन सत्त्वम् ? तनिर्वन्धे वा तत्कायमेव तदर्शनमिति कथमर्थक्रियाविर्रहात्तस्यानिष्टत्वम् , यतस्तदुपल- ब्धिहेतोः "कापोन्मादादेविप्लवत्वम् ? अविप्लवत्ये च कथं तदपनयने लोकस्य प्रयासश्चक्षुगद्य- पनयनवत् ? ततो न वस्तुसद्दर्शने विप्लवापेक्षणं विप्लवस्वैव तत्रानुपपत्तेः । अतश्चक्षुरादिरेव तत्र सामग्रीति वत्सामग्रीतः परस्यापि समानदेशकालस्य तद्विपरीतस्य च तदर्शनं भवेत, अनि. यतदेशादेरर्थस्य नियतप्रतिपत्तृवेद्यत्वाप्रतिवेदनात् । ततो न स्वत एव तस्यानियतदेशादित्वम् , अपि विच्छानुवर्तनादेव, इच्छयैव तद्भावनालक्षणया परितः कामिन्यादेरुपलम्भात् । अतो न तस्य' पारमार्थिक यहिरर्थत्वम् । एतदेवाह- अभिन्नदेशकालानामन्येपामप्यगोधराः । १५ विप्लुताक्षमनस्कारविपयाः किं बहिः स्थिताः ॥४७॥ इति । किं नैव बहिः स्थिता:? के ? विप्लुताक्षमनस्कारविषयाः। विलुसाक्ष- विपयाः केशादयः विप्लुतमनस्कारविपयाः कामिन्यादयः । कोशास्ते न पहिः स्थिताः ? अभिन्नदेशकालानाम् विष्णुतेन सहाभिन्नो समानो देशकालो येषां तेपाम् , इदं कामिन्यादीनां नियतदेशादित्यापेक्षयोक्म्, अन्येपामपि भिन्नदेशकालानामपि, एतदनियतदेशत्वायपेक्षया प्रति. २० पादितम् । तेपामगोचरा अविषयाः इति । तात्पर्यमत्र-यदि परमार्थसन्तोऽपि नियतदेशाद- यस्तदा तेन विलुतेन अभिन्न देशकालानां विपया एव भवेयुः । षनियतदेशादयः पुनरन्येपामपि, तथैव परन परमार्थसति दर्शनात् । न चैवम् , अतो न ते पहिर्वियन्त इति । तदनेन "स्वप्नान्तिकशरीरं वस्तुसत्' इति प्रत्युक्तम् ; परतुत्ये तस्य यथा सेनान्येषा दर्शनं तथाऽन्येरम्यभिन्नदेशकालेस्तरय' दर्शनं भवेत् , अस्वप्नान्तिकशरीरवत् , अन्यथा "वस्यापि २५ परैरमणापचेः कथं सन्तानान्वरव्यवस्थापनं यत इदं सूक्तं भवेत्- "थुद्धिपूर्ण क्रियां दृष्ट्वा स्वदेहेऽन्यत्र तदहात् ।" [ सन्ताना० श्लो० १ ] । प्रतीतिरूपत्वस्य भा०प० । २ एटमा-बाप.प.। ३ दर्शनं तु का-मा०,०प० मि. म्यायामेरस । ५ कामिन्यादिविषयसम् ।। -विरहार्यस मा.,१०,१०। . वाचोमान्दारे-01-4.प.10 कादायपनयने । ९ कामिन्यादेः । १. सपान्तिकस-आ...,"प्पा स्वप्रान्तिरः हायः प्रासपनपाने.। पाप्रति तपा जन्मान्तरेपषि"-प्रशामिल मानिन्धरोशरमापि।
३०४ न्यायविनिश्चयपियरणे [१४८ , . इत्यादि। न तंत्रापि परमार्थतः परस्परतो दर्शनम् , व्यवहारमात्रेण तु तदभ्यनुज्ञानमिति चेत् ; तस्य स्वप्नान्तिकेऽपि भावात् । अस्ति हि तनाप्येवं व्यवहारः 'परमहं पश्यामि परोऽपि माम्' इति । तथा च सुप्तोत्थित्तो यथा परं कथयनि 'मया त्वं स्वप्ने दृष्टः' इति ५ तथा परोऽपि ब्रूयात् 'मयापि त्वं दृष्टः' इति । व्यवहारप्रसिद्धमपि तत्रै परस्परदर्शनं मिध्ये- वेति चेत् ; तच्छरीरदर्शनगपि तथा स्यादविशेषात् । किञ्च तच्छरीरस्योपादानम् ? अनुपादानस्य वस्तुसत्तानुपपत्तेः, अन्यथा आदिजन्म. नोऽपि तथैव तदापत्तेर्न परलोकसिद्धिर्भवेत् । भवतु स्वप्नान्तिकमेव परं तस्योपादानमिति चेत् । तर्हि सन्तानान्तरमेव तदिति कथं तस्य ताडनादो मुप्तशरीरस्योत्वासनादिकम् ।न १० हान्यस्य "वटकभक्षणे परस्य पिपासया मरणमुपलब्धम् । सुनशरीरमेव तस्योपादानमिति चेत्, 'तत्तहि निःसन्तानं भवेत् , एकस्य सन्तानद्वयोपादानत्वानुपपत्तेः। तदुपपत्तो वा यथा ततः स्वप्नान्तिके युद्धीन्द्रियादेः सन्तननं तथोत्तरसुप्तशरीरेऽपीति कथं तस्य मुप्तत्वम् "बुद्धयमानत्वात् स्वप्नान्तिकवत् । कथा व मात्रादिशरीरमेवापत्यसन्तानस्य स्वसन्तानस्य" चोपादानं न भवेद्यतः परलोकसिद्धिरिति दुस्तरोऽयं दोषापावः । तन्न तस्य" परमार्थसत्त्वम् , १५ अर्थरूपतया च तत्सत्त्वे कथं निश्छिद्रपिहितेऽपि गर्भगृहादो तस्य प्रवेश: तदन्यत्र "तददर्शनात् । "अप्रविधत्वेनान्यविलक्षणत्वात्तस्येति चेत् ; न; अलौकिकार्थवादप्रत्युजीवनापत्तेः, अलौकिकस्यैव अप्रतिघ इति नामान्तरप्रतिपादनात् , ततो विजयी मीमांसफः स्यान्न ताथागतः । योधरूपतया तु तस्य परमार्थत्वमाकारवादप्रतिक्षेपादेव प्रतिक्षिप्तमिति न पुनः प्रतिक्षिप्यते । ततो न बहिर. र्थतया स्वप्नान्तिकस्य कामिन्यादेर्वा सत्त्वं यहिरवस्थितस्य नानाप्रतिपत्तृसाधारणत्वप्रसङ्गात् । नायं दोषः, "तस्यान्तदेहवृत्तित्वादिति चेत् । इदमेवोल्लिख्य "परिहरनाह- अन्तःशरीरवृत्तश्चेददोषोऽयं न तादृशः। तत्रैव ग्रहणात्किं वा रचितोऽयं शिलालः ॥४८॥ इति । शरीरस्यान्तः अन्तःशरीरम् , अन्तःशब्दस्य "पारे मध्येऽन्तः" [ शाकटा० २।११९ ] इति सूक्तत्वात् पूर्वनिपातः । तत्र वृत्तिर्वर्तनं कामिन्यादेस्तस्याः चेत् यदि २५ अदोषो दोपो न भवति अयम् 'अभिन्नदेशकालानाम्' इत्यादिः । तत्रोत्तरमाह-न इति । नास्त्यन्तःशरीरवृत्तिः । अत्रोपपत्तिमाह-ताशः कामिन्यादिप्रकारस्य तत्रैव घहिरेष, पहिरित्यस्य प्रस्तुतत्वात् , ग्रहणात् परिज्ञानात् । न हन्तःशरीरकृती बहिर्षहणमुपपन्नमिति , "मन्यते बुद्धिसभा सा न येषु न तेषु धाः ।" इत्युत्तरार्धम् ।-सिद्धिवि० द्वि. परि० । उद्धृत. मिदम्-राजा. १. १।२ जामच्छरीरे। ३ समात्तिके। "-यादिजन्म-आ.... ५भनु पादानतयैव । ६ वस्तुसत्तापरी । 'दहीवड़ा' इति भाषायाम् । ८ काहि भा०, ५०, ५०1९ सुप्तशरीरम् । १० मुतस्य कामिन्यादेवा शरीरात् ।। पुयायमानत्वात् भा०, २०, ११ मसन्तानस्य आग, व., ए.। १३ स्वप्नान्तिकशरीरस्य ! १४ तदर्श-मा...। १५ प्रतिघातरहितत्वेन । स्वप्नान्तिकस्य कामि. ज्यादेशे), परिहारयलाइ भा. ५० ५०। २० २१४८] प्रथमःप्रत्यक्षप्रस्तावा भावः । विभ्रमवलादन्तःशरीरवचिनोऽपि वहिर्भायेन ग्रहणमविरुद्धमिति चेदवाह-किं वा किमिव, रचितो निर्मितः अयं परेणोच्यमानः शिलाप्लवः अश्रद्धेयतया शिलाप्लवसमानत्वा- च्छिलाप्लव इति । शरीरान्तर्वतिनो बहिः प्रतिमास उच्यते । एतदुक्तं भवति-यथा शिलायां निमजनमेव श्रद्धेयं गुरुत्वान्न प्लवनं लघुत्वाभावात् तथा कामिन्यादेरन्तरेव प्रतिभासनं श्रद्धेयम् अन्तर्भवनस्य तत्र भावात् , न बहिः अहिवनस्याभावात् । असदपि पहिर्भवनं भ्रान्तिबला- ५ प्रतिभासत इति चेत् ; कथमेवं कामिन्यादिरेव असन्न प्रतिभासेत भ्रान्तिवलस्य सम्भवात् ? घाध्यमानतया बहिर्भावासश्ववत् तदसत्त्वस्यापि परिज्ञानात । तस्मादसन्नेव कामिन्यादिर्नाली- किकोऽर्थो नापि ज्ञानाकार इति । स्यान्मतम्-भ्रान्तमपि ज्ञानं न कामिन्यादेर्व्यतिरिकमरित वदप्रतिवेदनात् , उत्कथं तद्वलादसत एव तस्य परिज्ञानमिति ? बर्भािवस्य कथम् ? मा भूदिति चेत् । न हष्ट- १० त्वात् । दृष्टं हि पहिर्भावस्य परिझागम् , 'घहिरयं कामिन्यादिः' इति । न प स्यापहवः कामिन्यादितानेऽपि प्रसङ्गात् । गनु न ज्ञानादेव तस्य पहिर्भायो न च तस्य सत्माव्यतिरेकः तदप्रतिवेदनात् । न चाव्यतिरिक्तादेव पहिर्भावो विरोधादिति चेत् ; न ; कामिन्यादेानमिति व्यतिरेफरयापि परिझानात् । मिथ्यैव तत्परिज्ञानं 'शिलापुत्रकस्य शरीरम्' इत्यादिवदिति चेत् ; फुतस्तस्य १५ मिथ्यात्वम् १ तद्विपयस्य व्यतिरेकस्यासत्त्वादिति चेत् ; किं पुनरसतोऽपि प्रतिमासनम् ? तथा चेत् किन कामिन्यादेरेवासतः प्रतिभासनं यंतस्तस्य ज्ञानाकारत्वकल्पनम् । सतो वस्तुसनेव फामिन्यादेतज्ज्ञानाव्यतिरेक इति बहिरेवासी न तदाकारः । बहिरपि न सन्नेव पाधावत्त्वात् । . तको यदुक्तम्- २० "आत्मा स तस्यानुभवः स च नान्यस्य कस्यचित् । प्रत्यक्षप्रतिवेद्यत्वमपि तस्य तदात्मना ।" [R०या० २१३२६] इति; तत्प्रतिविहितम् ; तदनुभवस्य तदर्थान्तरत्वेन 'आत्मा' इत्यादेरयोगात, पर्या- "न्तरस्येवानुमवस्यासी वेद्यतया "सम्बन्धी इवि 'सच' इत्यादेरसम्भवात् । प्रत्यक्षप्रतिवेधत्व- मपि तरयार्थान्तरादेवानुभदान पुनः स्वयमनुभवात्मत्वादिवि 'प्रत्यक्ष' इत्यादेरप्यनुपपत्तेः । यदप्युक्तम्- "नीलादिरूपस्तस्यासौ स्वभावोऽनुभवय सः । नीलाघनुभयः ख्यातः स्वभावानुभवोऽपि सन् ॥"[प्र०या० २।३२८] इति; तदपि न सुभापितम् ; नीलादेरपि कामिन्यादिघवदाकारेणैव मानेन परिमानात्, यस्य वामिन्सादरेव मा०, यक्ष, ५०१ मिन्यायसत्वस्यापि । ३ प्रान्तिालाद। कामिन्यादेः। ५ पहि-मा... शमिन्याः। - मेदस्यापि । ८ यत्तस्य मा०, २०, ५.। शारागः । १.तरस्पैशापानमा०, २०, ५० बाधेति सपेशिया-मा...।
.- ग्यायविनिश्चयविधरणे [१४८ तस्वभावत्यानुपपत्तेः । कथमतदाकारेण तद्हणम् ? प्रतिबन्धाभावेन सर्वप्रहणप्रसङ्गादिति चेत् ; न प्रतिबन्धस्य शक्तिनियमलक्षणस्य प्रतिपादितत्वात् , कथमन्यथा विप्लुनाकारग्रहणम् ? न हि सत्र तादात्म्यम् , विप्लुनेनाऽविप्लुतस्य तदयोगात् । नापि तस्मादुत्पत्तिः, तस्याशक्त. त्वात् समकालत्याच । ततः शक्तिनियमादेव तत्परिज्ञानम्, तद्वन्नीलादेरपि इति । न च विप्लु- ५ ताकारज्ञानं नास्त्येव; स्वयमेव तदभ्युपगमात । अत एयोगम्- "अवेद्यवेदकाकोरा यथा भ्रान्तिनिरीक्ष्यते । विभक्तलक्षणग्राह्यग्राहकाकारविप्लवा ॥" [प्रश्वा० २।३३० ] इति । थतोऽपि प्राहादिभेदविफलवन्नि (विप्लवनि) रीक्षणं ततोऽपि न यस्तुतस्तनिरीक्षणम् ; स्वरूप. मानविषयत्वात् । अन्येन तु तद्विषयत्वं तत्रोपकल्प्यत इति चेत् ; सिद्धं तर्हि तदन्यस्य तद्वि. १० पयत्वम् अतद्विपयेण तदुपकल्पनायोगात् । तत्राप्यन्यतस्तदुपकल्पनायामनवस्थानदोपात् । ततो दूरं प्रपलायितेनापि स्वत एव फुतश्चित तद्विप्लवस्य परिक्षानमभ्युपगन्तव्यम् , तदहिभूव. स्येव तच्छतिनियमादिति च । ततो यदुक्तम्- "संवेदनेन बाह्यत्वमतोऽर्थस्य न सिद्ध्यति । संवेदनादहि वे स एव तु न सिद्ध्यति । यदि संवेद्यते नीलं कथं बाह्यं तदुच्यते ? । न चेत्संवेद्यते नीलं कथं वाद्यं तदुच्यते ? ॥"[१० वार्तिकाल० ३६३३१] इति; तत्मविक्षिप्तम् । विप्लवेऽपि समानत्वान् । तथा हि- संवेदनेन वाद्यत्वं विप्लवस्य न सिद्ध्यति । संवेदनाद्वदि वे स एव तु न सिद्धयति ॥ ७५३ ॥ विटयो यदि वेद्येत कथं वायः स उच्यते । विप्लवश्चेन्न वेद्यत कथं बाह्यः उच्यते ॥ ७५४ ॥ इति । ततो यदि सत्यपि वेदने विप्लवस्य वाह्यत्वमविरद्धं नीलादेरपि स्यादविशेपात् । यद्येवं नीलादिज्ञानमपि वितथावभासं ज्ञानत्वात् कामिन्यादिज्ञानवदिति चेत् ; कथं पुनः साधर्म्यमात्रस्य २५ गमकत्वम् , तत्पुरत्वादावपि प्रसङ्गात् । विपक्षऽपि भावानेवं चेत् ; ज्ञानत्वस्य विपशव्यावृत्तिः फुतोऽवगता ? अनुपलम्भादिति चेत् ; न ; वस्तदयामायोगात् , वक्तृत्वादावपि तत एव तेद- वगमप्रसङ्गात् । न हि तस्यापि विपक्षे सर्वज्ञादावुपलम्भोऽस्ति । तथा च 'सुगवो न सर्वज्ञो वीत- रागोवा वकृत्वादे रथ्यापुरुपवत्, इत्यस्यापि गमकत्वं भवेत् । अनुपलम्भेऽपि विरोधाभावात्स- न्दिग्धैव तस्य विपक्षेच्यावृत्तिरिति चेत्, किं पुननित्वस्य विपक्षेण विरोधः १ तथा चेत् ; कोऽसौ २० । .. विप्लुतपरिज्ञानम्। २-भेदफल-आ०,०प०१३ अनुपलम्मात् । ४-तदपगमा-ता। विपक्षव्या. तिज्ञानामावान् । ५ तदपगम-पान वक्तृत्वस्य । विपक्षविरोधाभावात् । ८ वातृत्वस्य । ९-हाव्याव-ता।
. D १४८ प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव: विपक्षः ? वितथावभासनिवृत्तिमात्रमिति चेत् ; न, तस्य तुच्छेत्याप्रतिपत्तेः । अवितथावभासि- स्वमिति चेत् । तदपि यदि वस्तुसदेव कथं तेनं तस्य विरोधः ? न ह्यज्ञानस्य तदवमासित्व- मुपपन्नम् , [ज्ञान] कल्पनायैफल्यापतेः । अंसदेव कल्पनारोपितत्वादिति चेत् ; तेनापि कस्तस्य विरोधः ? सहानवस्थानमिति चेत् ; न; सहैव तदवस्थानात् । सत्येव तज्ज्ञाने सत्कफ्नस्यो- पपत्तेः,निरधिष्ठानस्य तस्यायोगात् । परस्परपरिहार इति चेत् ;न; ज्ञानत्वस्याज्ञानत्वेनैव तंद्रावात् । न सम्यगयभासित्वेन । तद्विरुद्धव्याप्तस्वात्तेनापि तस्य तद्भावः', सम्यगवभासित्वविरुद्धं हि मिथ्यावभासित्वं तस्य परिहारेणावस्थानात , तेन प व्याप्त ज्ञानत्वम् , अतस्तस्यापि नैतद्भाव इति चेत कुतस्तस्यै तव्याप्तस्वम्" ? वद्विपर्ययविरोधादिति चेत् ; न, परस्पराश्रयान-तद्विपर्ययविरो. धात्तस्य तव्याप्तत्यम् , ततश्च तद्विपर्ययविरोध इति । कामिन्यादिज्ञानेपु सत्येव तस्मिन् वस्य दर्शनातव्याप्तत्वनिश्चय इति चेत; न रथ्यापुरुपादौ सत्येय किञ्चिज्ञत्वादो वक्तृत्वादेरपि । दर्शनात् तस्यापि तब्याप्तत्वनिश्चयापत्तेः। अवस्तस्यापि विरोधवलादेव विपक्षश्यावृत्ति सम्भवाकथं सन्दिग्धविपक्षव्यावृत्तिकत्वं यन्न गमकत्वं भवेत् । तथा चासङ्गतमेतद्- "उक्त्यादे॰पसंक्षयः। नेत्युक्ते व्यतिरेकोऽस्य सन्दिग्धो व्यभिचार्यतः॥" [५० वा १११४४] इति । विरोधवलादेव विपक्षव्यावृत्तिनिर्णये तत्र सन्देहानुपपत्तेरव्यभिचारित्वस्येव सम्भवात् । । ज्ञानप्रकर्पतारतम्येऽपि वकृत्वादेरपकर्पतारतम्यानवलोकनात् । अत्यन्तप्रकर्षप्राऽपि" ज्ञानेतत्स- म्भावनादविरोध एय तेने तस्य तदयमदोप इति चेत् । न तर्हि सत्येव तस्मिन् तदर्शनाव्याप्तत्य. निर्णयः, सत्येव किञ्चिज्जत्यादी दृष्टस्यापि वक्तृत्वादेस्त द्विपक्षेऽपि सम्भावनात् । तथा प फथं ज्ञानत्यस्यापि वितधावभासित्वेन व्याप्तिर्यतरतद्वलात्तद्विपर्ययेणं तस्य विरोधः स्यादिति तदवस्थ तस्यापि सन्दिग्धविपक्षव्यावृत्तिकत्वेनागमकत्वम् । नन्वन सम्यगवभासित्वमेव विपक्षः; तच न ज्ञायते किमिदमवभासस्य सम्यक्तमिति ? यस्तुसद्विपयत्यमिति चेत्, विपयस्यापि पुतो वस्तुसत्त्वम् ? न प्रतिभासनात् ; तस्यावस्तुसत्यपि कामिन्यादी भावात् । याधविरह विशिष्टादिति चेत् । तशिष्टयस्येव पुतोऽवगमः ? वाघानुप. जननादिति चेत् न, तदनुपजननस्योत्पत्तिसमये कामिन्यादिज्ञानेऽपि भावात् । पश्चादपि भाविनः ततस्तदवाम इति चेत् ; न; पामिन्यादिक्षानेऽपि पश्चादपि तत्सम्भवात् । न सर्वदा पश्चा. २ तत्र तत्सम्भय इति चेत् ; न; नीलादिशानेऽपि समानत्वात् । न हि तत्रापि सर्वथा पश्चात. सम्भवः ; चिरकालानुपजातनावस्यापि पुनः पुतश्विद्वाधोपदर्शनात् शास्त्रार्यविपर्ययज्ञानयन् । १-स्याप्रतिपतितो वि-भा., २०, ५०1 २ अविटयाउमासिवेन । ३शनरवस्य । १ यदि मपितमाद भासिबमदेव । ५० ने मा०, ५०, प.1 नोपप-आ., प.,.। . पररपरिवारमदावाद । सम्यगवभामित्वेनापि! शनारस। १. परस्परपरिवारलामो विरोध.1"शनत्वस्य । १२मिप्या- यभाराम्याप्सत्वम् । ३मिप्यावमासिये । १४ शानदाय । १५ असर्वव्याप्त प। १६ वरमादरम। 10-1 विज्ञा-.,.,. रूपविषयक्तृशः। २० भविषधारमाधिरेन । २१ सपा २२ बाप नुनना यशामागमः । २५ पाधानुजननसम्भवः । .
- - न्यायचिनिश्चयविवरणे [११५९ तथा तत्सम्भवेऽपि न तस्य कुतश्चित्परिज्ञानम् । तत्परिज्ञानवतः सर्वज्ञत्वापत्तेः । न हि निरव. 'शेपानागतकालपर्यायपरिज्ञानाभावे तदधिष्ठानस्य वाधानुत्पादस्य परिज्ञानं सम्भवति । किञ्चिज्ज्ञा. 'नस्यापि भवत्येव क्रमेण तत्परिज्ञानमिति चेत् । न वर्हि कदाचिदपि तद्वशिष्ट्यस्य निश्चयः, परापरसमयभावियाघानुत्पादप्रतीक्षायामेवासंसारं व्यापारात् । तन्न बाधाविरहविशिष्टादपि । प्रतिमासाद्विषयस्य वस्तुसत्त्वव्यवस्थापनम् । अस्सलितप्रत्ययविषयत्वादिस्यपि न युक्तम् ; बाधा. विरहादपरस्य तदस्सलनस्यैवासम्भवात् । तस्य च प्रतिविहितत्वात् । यस्तु लोकस्य तत्रास्सल- नाभिमानः स वासनादायादेव न विषयस्य वस्तुस वात् । तन्न तद्विपयतया कस्यचित् सम्यग. वभासित्वमिति कथं तन साधनस्य सम्भावनम् , असत्ति तदयोगादिति न सन्दिग्धविपक्षव्यावृत्ति. कत्वेनानैकान्तिकरवं तस्येति चेत् ; तन्न समीचीनम् ; वाधावैकल्यस्य कचिदन्तरणसामध्ये स्वत • एव परिज्ञानसम्भवात् । नियतदेशापेक्षयेव तत्सम्भवो न देशादिसाकल्यापेक्षयेति चेत् ; न; तदपेक्ष्यापि तदविरोधात् । तत्साकल्यापरिक्षाने कथं तदपेक्षयापि तदविरोध इति चेत्न; क्या शक्तत्वात् तस्य फलतोऽवगमात् । सम्भवति च तत्फलमेवम् , एवमिदं देशकालनरान्तयपेक्षयापीति परिक्षानम् एवं प्रतीतिभावात् । अवश्यं चैतदेवमभ्यनुज्ञातव्यम् । अन्यथा भवद्विचारेऽपि तवैकल्यस्यापरिज्ञानप्रसङ्गात् । तथा च ततोऽपि कथं बाधावैकल्यस्याभायो भावतः सिद्ध्येत् ? न मया कुतश्चिचकल्यस्याभावः साध्यते यदर्य प्रसङ्गः, केवलं तन्त्र परोक्तमेव प्रमाणं प्रतिक्षि. प्यत इति चेत् । तत्प्रतिक्षेपस्वहि विचाराद्वस्तुसन्नेव सिद्ध्यतीति वक्तव्यम् । अन्यथा तस्यैव वैयापत्तेः । न च बाधावैकल्यमन्तरेण ततस्तत्सिद्धिः, प्रतिमासमात्रस्यासत्यपि विपये भावा- दिति स्वत एव तस्यापि तद्वैकव्यम् , संकलदेशकालनरापेक्षयापि सुपरिजातमभ्यनुज्ञातव्यम् । तत्प्रतिक्षेपोऽपि न मया ततः क्रियते परख्यामोहनस्यैव करणादिति चेत्; तद्धतुत्वं तर्हि तस्य २० निश्चेतव्यम् , अन्यथाक्दथं तस्यैवोपादानानुपपत्तेः । न चानिश्चिवबाधाकल्याकुतश्चितनिश्चयो घाह्यनिश्चयवत् । न प तत्र तन्निश्चयोऽन्यतः अनवस्थादोपात्। पर्यन्ते यदि स्वत एवोकरूपरत. निश्चयः ; तर्हि बहिर्चेदनेऽपि भवेदिति सम्भवत्येव तत्र वस्तुसद्विषयत्वेन सम्यगवभासित्वमिति तघ्र सम्भाव्यमानमनेकान्तिकमेव ज्ञानत्वं विपक्षश्यावृत्तेः संशयात्। तदिदमतिसुकुमारप्रज्ञगोचर. मपि हेतुदोषमन्तरगतमोबाहुलकावप्रतिपयमानैरेव परैः प्रकृतमनुमानमुपदर्शितमित्यावेद्यन्नाह- विप्लुताक्षा यथावुद्धिपितधप्रतिभासिनी । तथा सर्वत्र किन्नेति जडाः सम्प्रतिपेदिरे ॥४२॥ इति । विप्लुतानि फामोन्मादकाचादिभिरुपहतानि अक्षाणि मनाप्रभृतीनिन्द्रियाणि यस्यां तत्र फर्तव्यायां सा विलुताक्षा युद्धिः प्रीतिः, सा यथा येन बुद्धित्यादिप्रकारेण चितयप्रति- भासिनी मिथ्याकामिन्याद्युपदर्शिनो तथा तेन प्रकारेण सर्वत्र सर्वा बुद्धिः 'सर्वत्र' इत्यः . -पर्ययपरि-आ.,.,.। २ बाधाविरहस्य । ३ देशादिसात्याज्ञाने । ४ बापावैकल्यस्य । ५-प्रत्यविषये भा. भ., १०, ६ सालमा-मा०, प. प.10-त्वं हि तर भा.प. ८-तर्यस्येवो-पा०, २०, ५०। , ११४९] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव: स्य सप्तम्यन्तप्रतिरूपकस्य प्रथमान्तस्य भावात् । किन्न वितथप्रतिभासिनी भवत्येव इति एवं जडाः व्यभिचारदोषपरिज्ञानविकलास्ताथागताः सम्प्रतिपेदिरे सम्भूय प्रतिपन्ना इति । यत्पुनरेतन्मण्डनस्य- "प्रत्येकमनुविद्धत्वादभेदेन मृपा मतः । भेदो जलतरङ्गाणां भेदाझेदः कलावतः॥" [ग्रहासि० का ३१] "अभेदानुविद्धत्वात्प्रत्येक विश्वस्य भेदो मृपा यथा जलतरङ्गेषु चन्द्रमसः, तंत्र हि प्रत्येकं चन्द्रमा इत्यन्वयः । तथा विश्वस्य भेदेऽपि प्रत्येकमिदं 'तत् अर्थो वस्तु' इत्यभेदान्ययः, तरुभेदस्तु यद्यपि न मृपा चनमित्यभेदाऽनुगम]श्व न तु प्रत्येकम् । न हि प्रत्येक तरुपु वनमिति बुद्धिरतो न तेन व्यभिचारः । एतदर्थञ्च प्रत्येकमित्यु- क्तम्" [ ब्रह्मसि० व्या०] इति; तदपि तस्य यलवतस्तमसो विलसितमेव ; तथा हि- १० किमिदं भेदस्याभेदानुविद्धत्वम् ? एकस्वभावान्वय इति चेत् ; न; जलतरन चन्द्रप्वपि तदमा- यात्, तत्प्रतिपत्तिवेफल्यात् । न हि तत्राप्येकरारनचन्द्र एय परापरप्रतिपत्तिरस्ति युगपन्नानारू- पतयैव "तेषां प्रत्यवमासनात् । 'चन्द्रश्चन्द्रः' इत्यनुगमव्यवहारस्तु सन्न सादृश्यनियन्धन एव नेकत्वायत्तः, तेषां परस्परं सदृशस्येव प्रतिपत्तेः । भवतु सारश्यमेव तत्राभेदानुगम इति चेत् ; म सस्यापि गमकत्वम्, धमिहेत्वादिज्ञानैर्व्यभिचारात् । न हि तेपु 'इदं शानमिदं ज्ञानम्' इति १५ प्रत्येकमनुगमो नास्ति, सुप्रसिद्धत्वात् । न च तेषां मृपात्वम् , तत्कथन व्यभिचारी हेतुः ? तान्यपि मृपेति चेत् ; कथं तेभ्यस्तायिकं भेदमृपात्वानुमानम् ? अमृपात्वेन कल्पनादिति चेत् । न माणवकादप्यमृपापावकराया कल्पिनात्तात्त्विकस्यैव दाहादेः प्रसङ्गात् । ननु कल्पितोऽपि प अहिदंशो मरणकार्याय कल्पते प्रतिसूर्यकश्च प्रकाशकार्याय, तद्वत्कल्पितरूपेभ्य एव तज्ज्ञानेभ्यः किन्न तात्त्विकं तदनुमानमिति चेत् ? तेस्तहिं मरणादि- २० भिव्यभिचारः साधनस्य । तेषाम् 'इदं मरणकार्यम् , इदं प्रकाशकार्यम्' इति प्रत्येकमभेदानु- गमे सत्यपि मृपावाभावात् । मृपेव तान्यपीति चेत्, न; यस्मात्- अमृपाकार्यनिप्पत्ती मृपारूपानिमित्ततः । दृष्टान्तत्वं कथं तेषां मृपय यदि तान्यपि || ७५५ ॥ लोकप्रसिद्धितस्तेपाममृपात्वेन तंद्यदि । तेनैव व्यभिचारित्वमपि फरमान्न मृप्यते ।। ७५६ ।। वस्तुतो व्यभिचारित्वं ततधेन प्रसिद्धयति । रप्टान्तत्यं पथं तरमावस्तुभूतं प्रसिध्यति ।। ७५७ ॥ - २५ सत्र सहि बा, ५०, प० । र तदर्थोऽवस्थिायगे-भा०, २०, २०११-पशे-गुग-मा., प., प.। "वनमित्यभेदानुगमरच"-मझसिक प्या-1 ४ या तप्रायव-मा, यप०१५ पमिदेवाविहानानि । पूर... मिहेशादिशानेभ्यः १ . मागावी म्।
म्यायविनिश्चयवियरणे [२१९ वस्तुवृत्त्या तदप्येतदवस्तु यदि वर्ण्यते । अनुमानं कथं वस्तु तद्वलेनोपकल्पितम् ।। ७५८ ।। विश्वभेदमृपात्वस्य यतस्तस्माट्यवस्थितिः । न वस्तुवशात्किञ्चिन्मेयं शक्यनिरूपणम् ॥ ७५९ ॥ वत एवान्यथा विश्वभेदयाथात्म्यनिर्णयात् । कुतश्चित्तन्मृपावादः क्वास्पदं प्रतिपद्यताम् ? ॥७६०॥ अवस्तु न हि नामेह त्वयैव सुलभं मुवि । तकृता वत्त्वनितिर्यत्तवैवेति कल्प्यताम् ।। ७६१ ।। तस्माद्वस्त्येवानुमानम् अन्यथा ततोऽन्ययोगव्यवच्छेदेन साध्यव्यवस्थापनानुपपत्तेः । १० अंतस्तत्सत्यावनिदर्शनं मरणादिकमपि वस्त्येवेत्युपपनस्तेन व्यभिचारः साधनस्य । विद्याऽविद्याभेदेन च । न हि विद्याविद्ययोरभेदः । न च विद्याविषयोरियमियध्वेत्यादिः प्रत्येकमनुगमो नास्ति मृपात्वाभावेऽपि इति । तद्भेदस्यापि मृषात्वमेवेति चेत् ; कुत इदानीं संसारः ? तन्निमन्धनस्य पृथगविद्यारूपस्याभावात् ? कल्पितादिति चेत् ; कुतस्तकल्पनम् ? प्राच्यादेव तेंद्रपादिति चेत् ; न; तस्यापि वस्तुतो विद्यापृथग्भूतस्याभावात् । तदपि कल्पित- १५ मेवेति चेत् ; न; 'कुतः' इत्यादेः प्रसङ्गादनवस्थानात् । नायं दोपः, अनादित्वातंत्रबन्ध स्येति चेत् ; तस्य तर्हि वस्तुत एव विद्याप्टथग्भाव पैदवस्थ व्यभिचारित्वम् | अपृथग्भावे तु स एवं प्रसङ्गः 'कुत इदानीं संसारः' इत्यादि । पुनरपि 'कल्पितात्' इत्यादिवचने 'कुतरतत्कल्प- नम्' इत्यादिप्रसङ्ग आवर्तमानो महान्तमनवस्थादोपमुपनिपातयेत् । तस्मादतिदूरमभिलप्यापि तस्य॑ पृथग्भावरतात्त्विक एव वचव्यः । कयमन्यया अयमाम्नाय:- "विद्यां चाविद्याश्च यस्तद्वेदोभयं सह" ॥ [ईशा०श्लो० ११] इति । "विद्याविद्ये न्ये (द्वे ) अप्युपायोपेयभावात् सहिते" [ब्रह्मसि० व्या० पृ० १३] इति च तद्वियरणं "मण्डनं (नस्य); निरवकाशस्यात् । तथा हि- यदि विद्यापृथग्भावो वस्तुनः कल्पिवस्य या। 'तत्प्रयन्धस्य नास्त्येव व प्रतिष्ठा "सह श्रुतेः ॥ ७६२ ॥ सत्येव यत्पृथग्भावे "तत्प्रयोगस्य दर्शनम् । "सह चैत्रेण मैत्रोऽयं स्थूल इत्यादिपु स्फुटम् ॥ ७६३ ।। . अतस्तत्वनि-मा०, २०, ५०1३ वियाऽविद्याभेदण्यापि । ३ अविद्यारूपकपनम् । ४ अविद्यारूपान् । ५ मवियासन्तानस्य । अविद्यारूपस्य । विद्यापृथग्भावः । ८ मैग्रा००९। मवसन्त । विद्यावि. देवे प० । विद्याविद्येन्वे मा०, ०६ १० मण्डनस्तुनि-पा०, ब०, २० । 'मण्डनम्' इति पाठे 'मण्डनकृतम्' इस्यों प्रायः मविद्याप्रवन्धस्य । 'यस्तदेदोभयं सद' इत्यत्रोकस्य सहशब्दस्य । १३ पशब्दप्रयोगस्य । ११ समाच-स० Sr 1 , ५ १० १६४९ ] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव उपायोपेयभावश्च (श्वाs) पृथग्भावे कथं भवेत् । तद्विद्याविद्यायोर्येन 'सुमण्डं मण्डनोदितम् ॥ ७६४ ॥ स्यान्मतम्-न तस्य विद्यापेक्षं पृथक्त्वं नाप्यपृथक्त्वम् , अवस्तुत्वात् । वस्तुन एव दि कस्यचित्कुतश्चित्पृथक्त्वापृथक्रवाभ्यां व्यपदेशो नावस्तुनः । तदयं ताभ्यामनिर्वचनीय एवेति; तदपि न सङ्गतम् ; यस्मात्- अयमेव च विद्यायाः स्वभावो यदि कल्प्यते | साप्यविद्यैव विद्याया वार्तापि क्योपलभ्यताम् ? ॥ ७६५ ॥ विद्यायाश्येत्स्वभावोऽन्यो वास्तवः परिपठ्यते । अविद्यातः पृथग्भावः कथमेवं निषिध्यताम् ॥७६६॥ स्वभावभेद एवायं पृथग्भावः प्रसिद्धिमान् । भावेषु यस्मात्तन्नेयं चर्चितार्था वचोगतिः ॥७६७॥ कथं चैवं पृथग्भावस्तस्याविद्यान्तरादपि । संदपेक्ष्यापि यत्तस्या वस्तुत्वं तदवस्थितम् ।।७६८॥ मा भूदिति चेत् ; कथमिदानों तस्याम्नायोपजनितात्मकत्वादिज्ञानलक्षणस्य प्रपञ्चरूपमृत्यु प्रति प्रत्पनीकतया तनिस्तरणत्वम् ? यतं इदं स्वाम्नातं भवेत्- "अविद्यया मृत्युं तीर्त्या विद्ययाऽमृतमश्नुते" [ईशा० श्लो० ११] इति । सत्येव मिथः पृथग्भावे विषादेविपान्तरोपशमनादेरुपलम्भात् । अवस्तुसतोऽपि अवि- धान्तरात्पृथग्भावे तद्वदेय विद्यातोऽपि भवेत् अविशेपादित्युपपन्नो व्यभिचारः साधनस्य, वि. द्याविद्याभेदस्यामृपात्वेऽपि तद्भावात् । ततो मण्डनादिभिरपि व्यभिचारदोषमजानानैरेव प्रकृतम- नुमानमुपदर्शितमित्यावेदयति 'विप्लुताक्षा' इत्यादिना । २० विविधं प्लुतं प्लवनं तरङ्गादिपु यस्य स विप्लुतो जलचन्द्रादिः, तमक्ष्णोति विपथत्वेन व्याप्नोतीति विप्लुताक्षा बुद्धिः यथा येन तद्विषयस्याभेदानुविद्धत्वादिना प्रकारेण वितथ. प्रतिभासिनी मृपाचन्द्रादिभेदोपदर्शिनी, तथा तेनैव प्रकारेण सर्वत्र बुद्धिः किन्नेति जडाः ब्रह्मविदः सम्प्रतिपेदिरे। जाध्यं तु तेषां व्यभिचारदोपापरिज्ञानात् अविद्यापरिकल्पि- तात्मत्वाचा प्रतिपत्तव्यम् । २५ यत्पुनरेतत् कामिन्यादिबुद्धिवत् तरङ्गचन्दादिवच्चेति निदर्शनम्-तत्रापि वितथप्रति- १ -वश्चैत् प्र-स. । २ मुष्ठ मण्डनं समर्थनं यस्य तत् मुमण्डम् । ३ अविद्याप्रबन्धस्य । १ "ना- चिया ब्रह्मण स्वभाव , नार्थान्तरम्, गात्यन्तमसती, नापि सती, एवमेवेयमविद्या माया मिथ्या प्रतिभाष इत्युच्यते । स्वभावश्चेत् कस्यचित् , अन्योऽनन्यो वा परमार्थ एवेति नाविद्या; अत्यन्तासस्पे खपुष्पसदृशी, न दारा तस्मा- दनिर्वचनीया"-प्रमसि पृ०९।५ परिषथ्यते ता. १६ तेदयेतायत्तस्य प० । तदोवापि यत्तस्य मा०, २० । इदं साम्नात माप,40 - ५ अपि च, न्यायविनिश्चयविवरण [ ११५१ भासित्यस्य मृपात्वस्य च यतः प्रतिपचिः, तस्य चेत् अविनथप्रतिभासित्वं कथन्न व्यभिचारः ? सत्यपि ज्ञानत्वे वितथप्रतिभासित्वस्य, तद्विपये घ मृपात्वे सत्यपि इदमिदमित्यभेदानुगमे मृपात्वस्याभावात् । वितथप्रतिभासिल्वे तु ततः कथं तसिद्धिः तद्विपर्ययवत् । अतो निदर्शनस्य साध्ययैकल्यमित्यावेदयन्नाह- प्रमाणामात्मसात्कुर्वन् प्रतीतिमतिलवयेत् । वितथज्ञानसन्तानविशेपेषु न केवलम् ॥५०॥ इति । प्रमाणम् अवितथनिर्भासं झानम् आत्मसाकुर्वन प्रतीति यथार्थपरिच्छित्तिम् अतिलवयेत् प्रत्याचक्षीव । सोगतो ब्रह्मवादी वा । फ वामतिलधयेत् ? वितथा मिध्यामि. मता ये ज्ञानानां सन्तानविशेषाः कामिन्यादिविषयाः तरगचन्द्रादिविषयाश्च प्रवाहभेदाः १० तेपु, न केवलं न प्रमाणमन्तरेण, तदनतिर घनस्यापि तथा प्राप्तः । न च तदात्मसात्करणं परस्योपपन्नम् , व्यभिचारदोपस्य तत्रोपदर्शितत्यात । ततो निदर्शनस्य साध्यवैकल्यादपि न प्रकृ. वानुमानयोर्गमकत्यमित्यभिप्रायो देवस्य । यदि मिथ्यावभासनमेव ज्ञानम् , पुतः सन्तानान्तराणां प्रतिपत्तियंतस्तेषा. मनित्यवादिर्धर्मोऽवबुध्येत ? कुतो या जीवावराणां यतस्लेपामप्यात्मा विभिन्नत्वादिस्वभावो १५ विभाव्येत, धर्मपरिज्ञानस्य धर्मिपरिक्षाननान्तरीयक्त्वात् । मिथ्याज्ञानाच न यथावत्तत्प्रतिपत्तिः, बहिरर्थतत्प्रपञ्चयोरपि तत एव तथा तत्प्राप्तेः अयथावदेवं तत्प्रतिपत्तिः, तेपामपि बाह्यभेदव. दपरमार्थत्वात् , प्रासादिसन्तानान्तरजीवान्तरभेदप्रतिभासस्तु विपरीतवासनायलादविद्याबलाद्वा परिकल्पित एव । तदुत्तम्,- "अविभागोऽपि बुद्ध्यात्मा विपर्यासितदर्शनः । ग्राह्यग्राहकसंवित्तिभेदवानिव लक्ष्यते ॥ मन्त्राद्युपप्लुताक्षाणां यथा मृच्छकलादयः । अन्यथैवापभासन्ते तद्रूपरहिता अपि ॥" [प्र० वा. २३३५४, ५५] इति । "यथा विशुद्धमाकाशं तिमिरोपप्लुतो जनः । सकीणमित्र मात्राभिभिन्नाभिरपि पश्यति ।। तथेदममलं ब्रह्म निर्विकल्पमविद्यया । कलुपत्वमिवापन्नं भेदरूपं प्रतीयते।" [हदा०मा०वा०३।११४३,४४]इति च । वदेवाह-- अद्वयं द्वयनिर्भासं सदा चेदवभासते। इति । २० ज्ञानात् । २ शानदैन दि-आ०, ब०, प.। ३ वितथप्रतिभासित्वसिद्धिः। मिध्याज्ञानादेव । ५ अयथावरततर-मा०, २०, प. अयथावदेतत्य-स०। ६-त एतदु-भा०, ५०, प.।
प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्तावः अद्वयं संवेदनतत्त्वम् आत्मतत्त्वञ्च द्वयनि संग्राह्यादिभेदनि सम् । इव शब्दोऽत्र द्राव्यः । तदनिर्भासे तनिर्भासवचनादग्निर्माणवक इत्यादिवत् । कदा सवयम् ? सदा सर्वकालं भेदप्रतिभासदशायां तदुपसंहारदशायाश्चेति चेत् शब्दः पराकूनद्योतने । तत्रोत्तरमाह- न खतो नापि परतो भेदपर्यनुयोगतः ॥५१॥ इति । तस्य सलु संविदद्वैतस्य खतो वाऽवभासनं परतो या गत्यन्तराभावात ? खत एव ५ "स्वयं सैव प्रकाशते" [प्र०वा ०२१३२७] इति वचनादिति चेत् ; कथमेवमात्मतत्वस्यापि स्वतोऽनवभासनम् ? "अत्रायं पुरुपः स्वयं ज्योतिर्भवति" [बृहदा० ४।३।९,१४] इत्या. देवचनात् । ननु आत्मा नाम नित्यः। नित्यत्वञ्च कालत्रयानुपातात् । तत्र मध्यकालानुपातिनो रूपात् कालान्तरानुपातिनो रूपस्य यद्यभेदः, तायन्मानमेव तदिति कथं नित्यत्यम् ? भेदे त्यप- १ रापरं संवेदनमेव तदिति नासावात्मा नाम । न चात्मन्यद्वैते कालसम्भवो यतस्तत्त्रयानुपातानित्य. त्वम् । तन्न तस्य स्वतोऽवभासनम् । अवभासनाच्च तदस्तित्वे भेदस्यापि स्यात् सदविशेपादिति चैत । न ; संविदद्वैतेऽपि समानत्वात् । न हि तस्यापि क्षणमात्रमग्नस्य निरंशस्यावभासनम् । न च तदद्वैत कालसम्भवो यतस्तनमानुपाताभावादनित्यत्वं भवेत् ? अवमासनाच्च तदस्तित्वे ग्राह्यादेरपि स्यात्तदविशेषात् । बाधकाभावाभावाभ्यां विशेष इति चेत् ;न; आत्मप्रपञ्च-१६ प्रतिभासयोरपि तत एव सदुपपत्तेः । फयं पुनः पश्वप्रतिभासस्य याधनम् ? कथं च न स्यात् ? सत्प्रतिभासस्यात्मप्रतिभासादभिन्नत्वात् "आत्मनि विज्ञाते सर्पमिदं विज्ञातं भवति" ] इत्याम्नायादिति चेत् ; ग्राह्यादिभेदप्रतिभासस्यापि कथम् ? तत्प्रतिभासस्यापि संवित्प्रतिभासादन्यत्वस्थानभ्युपगमात् । वस्तुतो नास्त्येव तत्प्रतिभासो विचारासहत्वात केवलं कल्पनामात्रतस्तदभ्युपगमा तत एव तस्य बाधोपपत्तिरपीति चेत् ; न ; प्रपञ्चप्रतिभासेऽपि २०- समानत्वात । न हि प्रपञ्चस्यापि वस्तुतः प्रतिभासनम् , प्रमाणविरहात् । केवलं मायानिबन्धन एव तेदभ्युपगमः, "इन्द्रो मायामिः पुरुरूप ईयते" [पृहदा० २।५।१९] इत्यादि वचनात् । तत एव तस्यापि वाघोपपत्तिरिति । तन्न संविदव तस्य स्वतोऽयभासनं पुरुपाद्वैतेऽपि 'ततस्तदनुपङ्गात् । न चेदमुचितम् , उभयप्रतिभाससद्भावे वस्तुसति" अद्वैतव्यापत्तेरिदमेवाह- न खतः इति । न खतोऽद्वयस्यायभासनम् । कुतः ? भेदेन "तदुभयाद्वयरूपेण २५. पर्यनुयोगतः अद्वयस्य प्रतिविधानत इति । परतस्तदवभासनेऽप्याह-'नापि परतः' इति । कुतः ? भेदपर्यनुयोगतः सति परस्मिन् भेदस्यावश्यम्भावात् तेन चा तप्रतिविधानादिति । [ १ सौगतः । २ आत्मनित्यत्वास्तित्वे । ३ अवभासनाविशेषात् । ४ तस्यापीक्षण-भा०, २०, ५०, स.। ५ संवेदनाद्वैते। ६ यायचटपटादिप्राचप्रतिभासस्य । ७ "आरमनि खल्वरे दृष्टे युते मते विहात इदं सर्व विदितम्"-वृहदा० ४।५। ६ । उ तमिदम्-ब्रह्म स० पृ.८।८ प्रवादिभेदप्रतिमास । ९ प्रपञ्चा. भ्युपगमः । १. -ति चैन्न आ०, २०, प, सतत प्रतिमास सात् । १२ सति सत्यसत्यद्वै-भा., प०,५०,० १३ तदुभयद्वयर-आ०, ब०, प० । १४-भावापत्तेनचाद्वै-मा०, २०, ५०, स.। ४० । ३१४ न्यायविनिश्चय विवरणे [१३५१ स्यान्मतम्-न 'तेन तस्य प्रतिविधानं तस्यावस्तुत्वात् । न हायस्तु वस्तुरूपप्रतिविधा. नाय समर्थ तरणचन्द्रादिवचन्द्रादेरिति ; तदसङ्गतम; आत्मावतस्याप्येवं परत: प्रतिभास. प्रसङ्गात् , परस्याप्युक्तन्यायेन तव्यापत्तिनियन्धनस्वाभावात् 1 फथं पुन: - परतस्तस्य प्रतिभास: १ कथं च न स्यात् ? परस्याविद्यामयत्वात् , अविद्यायाश्च मिथ्याज्ञानत्वार- ५ "अविद्या माया मिथ्यावभासः" [ब्रह्मासि० पृ० ९] इति मण्डनेन तदर्थाभिधानात् । न च मिथ्याज्ञाने तत्वप्रतिभासनं विज्ञानत्वविरोधात् । तत्त्वं च तद्वतं तस्येव परमनि- श्रेयसत्वेन परैरभ्युपगमात् । तदेतत्प्रेयः पुवात् प्रेयो मित्रात् प्रेयोऽन्यसात्सर्वमात्" [हदा० ११४१८] इत्याम्नायादिति चेत् ; न ; संविदद्वतस्यापि तद्वत्परतोऽनवभासनापत्तेः परस्य विकल्पत्वेनावस्तुप्रतिभासित्वात् "विकल्पोऽवस्तुनिर्मासः" [ ] इति १० वचनात् । न पावस्तुवेदने वस्तुप्रतिभासनं तवेदनत्वविरोधात् । यस्तु चितवीतं तस्येव काष्ठाग- तनिःश्रेयसत्वेन भवद्भिः प्रतिष्ठापनात्, “यद्यद्वैते न तोपोऽस्ति मुक्त एवासि सर्वथा" [प्र. वार्तिकाल० १६३६] इति वचनात् । सत्यम् ; न परतस्तत्प्रतिमासनं ग्राह्यादिभेदसमारोपव्यव- च्छेदस्यैव ततो भावात् । सति हि तव्यवच्छेदे नियाकुलं स्वत एव तवभासनं तद्व्याकुलत्व. हेतोस्तदारोपस्याभागादिति चेत; न; आत्मन्यपि समानत्वात् । न हि तस्यापि परतः प्रतिभासन- १५. म् । तत्रापि परस्याम्नायादेः प्रपञ्यारोपनिवारण एव व्यापारात् , तन्निवारणे च स्वत एव तस्य निर्व्याकुलमवभासनं तब्याकुलत्वनियन्धनस्य तदारोपस्याभावात् । तदुक्तम्- "आम्नायतः प्रसिद्धिश्च कवयोऽस्य प्रचक्षते । भेदप्रपञ्चविलयद्वारेण च निरूपणम् ॥" [ ब्रह्मसि० १।२] इति । "कः पुनस्तरमपञ्चस्य विलयो नाम ? नीरूपं निवृत्तिमात्रमिति चेत् ;न, "तस्यानिरूपित- २० रूपस्य कार्यत्वानुपपत्तेः कारणत्ववत् , अन्यथा तस्यैव सकलप्रपञ्चकारणत्वेन ब्रह्मभावोपपत्तेः तदपरस्य निरतिशयानन्दादिरूपस्य ब्रह्मणः परिकल्पनमप्रयोजनमेव , तत्प्रयोजनस्यान्यनेय परिसमाप्तत्वात् । तन्न तन्निवृत्तिमात्रं तद्विलयः। नापि भेदप्रतिभासकालुप्यपरिशुद्धो जीवस्वभावः, तस्य ब्रह्मणो भेदे "तस्यैव तद्वारेण निरूपणापत्तेर्न ब्रह्मणः । ब्रह्मणश्च तथा निरूपणमभिप्रेतम् "नमस्यामः प्रजापतिरित्य- "नन्तमाम्नायते" [ ] इत्यादेवचनात् । नास्त्येव "तस्य तस्माद्भेदः "अनेन जीवनात्मना" [छान्दो० ६।३।२] इति जीवनह्मणोरभेदस्याम्नायादिति चेत् ; न, ब्रह्मवत्तस्यापि" नित्यपरिशुद्धिप्रसगात् , अभेदस्येवलक्षणत्वात् । अभेदेऽपि मुसतत्प्रति- १ भेदेन । २ भेदस्य। ३ परो यतोऽवस्तु अत. न तेन अद्वैतबाधेत्यादिन्यायेन । ४ भद्वैतम्या. घात ! ५ भद्वैतस्य । ६ मिथ्याज्ञानत्व । - अवस्तुवेदनत्व । ८ द्वैतं प्रा०,१०,५०,०। ९-बंदा इति घेन परत.स.:-पंथा इति चेन परतः भा०,५०,५०० सौगत प्राह नितिमानस्य। १२-परिदि- शुद्धो मा०,५०,५०,०11३ जीवस्वभावश्यैव । १४ -त्यनन्तरमामा-भा०,५०,५०,स. । १५ जीवस्य । "ब्रह्मण, १७ जीवस्यापि।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावा विन्धयो सत्यैव परिशुद्धिर्न तत्प्रतिबिम्घस्य तस्य मणिकपाणादेः रागादिना कालुष्य. स्योपलम्भात् । तद्वदभेदेऽपि ब्रहाण एव नित्या परिशुद्धिर्न जीवस्य तत्राविद्याकालुप्यस्योप- लम्भादिति चेत् , न, प्रतिबिम्बस्य भ्रान्त्युपदर्शितत्वेनावस्तुसतोऽपि मुखादभेदानुपपत्तेः, सद्वन्मु- सस्याप्यवस्तुसत्यप्रसङ्गात् । 'ममेदं मुसम्' इत्यभेदपरामर्शोऽपि तत्र सादृश्यातिशयादेव 'चित्रार्पितात्माकारवत् , नाभेदात् । अभेदे तु वस्तुनस्तनापि मुखप्रयोजनेन भवितव्यम् , न ५ चैवम् , आलापकवलप्रसनादेस्तत्रानुपलम्भात् । अवस्तुसतः कथं प्रतिभासनमिति चेत् ? 'मुस- तव्यतिरेकवत्' इति धूमः । जीवोऽपि भ्रान्त्युपदर्शितत्वादयस्तुसनेवेति चेत् ; व्याहतमेतत्- 'अवस्तुसंश्च ब्राणम्य न भिद्यते' इति, ब्रह्मणोऽप्यवस्तुसत्त्वापत्तेः । ब्रह्म तस्माद्भिद्यत एव स एव तु ब्रह्मणो न भिद्यते तस्मादयमदोप इति चेत् ; न; जीवस्य तद्भेदमन्तरेण ब्रह्मणोऽपि तद्भेदानुपपत्तेः भेदस्योभयनिष्टत्वात् । तस्मादश्रद्धेयमेवेदं मौतोपाख्यानवत् । तद्यथा-कूपो मा- १० मस्य समीपो प्रामस्तस्कूपस्य नितरां दूर इति । तस्माजीवस्य ब्रह्माभेदे ब्रह्मणोऽपि"तदभेदस्याव- श्यम्भावात् । यदविधाकालुष्यं जीवस्य या घ तत्परिशुद्धिरागन्तुकी "तदुभयं प्रमापि (ब्रहादि) "परिस्पृशन्त्ये (शत्ये)वेति न सुभाषितमेवत्-"सद्धि सदा विशुद्ध नित्यप्रकाशमना- गन्तुकार्थम् [ब्रह्मसि० पू० ३२] इति । "तथेदमपि-"तस्मादविद्यया जीवाः संसारिणो वियया विमुच्यन्ते" [बहासि० पृ० १२] इति । ब्राधिष्ठानस्य सदाविशुद्धत्वादेरभेदे सति १५ जीवेऽप्यनुपातात् । भिद्यत एव जीवो ब्रह्मणः कल्पनारोपितत्वात् , ब्रह्मणश्च तद्विपर्ययादिति चेत् ; का तर्हि तस्य" परिशुद्धिः "स्यात् यदन्वितो जीवस्वमायः प्रपञ्चविलयत्वेन व्यपदि- श्येत ! अविद्याकालुप्यनिमुक्तिरेवेति चेत् ; न, स्वतोऽपि निर्मुक्तिप्रसङ्गात् , रोपितस्याविद्यामयत्यात् । भवस्विति चेत् ; न; नीरूपस्य तन्निर्मुक्तिमानस्यासम्भवादिति प्रतिपादनात् । तन्न परिशुद्धो जीवस्वभाव एव तत्प्रपञ्चविलयः तत्परिशुद्धरेवापरिज्ञानात् । भातु नित्यपरिशुद्ध "ग्रीव "तद्विलय इति चेत् ; न; नित्यस्य विलयस्य प्रसङ्गात् । तथा च किं तत्र परापेक्षया नित्यस्य निरपेक्षत्वात् , नित्ये तद्विलये "परस्याभावाच्च । ततो यदुक्तम्-"अविद्यया श्रवणादिलक्षणया अविद्यैव निवर्त्यते मृत्युरित्यविद्येयोच्यते" [ब्रहासि०पू० १३] इति । वत्पतिविहितम् ; नित्ये भेदप्रपञ्चविलये निवत्यनिवर्तकयोवि. घयोरेवासम्भवे तद्वचनस्यासम्भवविषयत्वात् । तन्न तत्प्रपञ्चविलयः कश्चिदपि शक्यनिरूपणो २५ यद्वारेण परतः प्रजापतेर्निरूपणमिति चेत् ; । स्वरूपस्याध्या- प्रतिबिम्पस्य । २ चित्राप्तिाकारवत् भा०, २०, ५०, स० । चिनातिनारमा कारवत् पा(6) प्रतिबिम्बेऽपि । ४ प्रतिबिम्बस्य । ५ अवस्तुमती जीवात् । ६ तदभेद-भा०, २०, ५०, स० प्राभेद । जीवभेवानुपपत्ते । ८ भौतापा-आ०, २०, ५०, ०९ तस्य कूपस्य मा०, ब०, ५०. स. १०. दस्य भा०, ब०, ५०, स० । ११ तदुनयं ता० । १२ परस्पृशन्त्येवे-ता० । १३-कार्धकाम् भा०, १०, प०,०।१४ तथापि भा०, २०, ५०, १० 14 जीवस्य । ।। स्याद् भेदनीवेप्यनुक्लिय-भा०, १०, प. स. 1१७ ब्रह्म इस भा०, २०, ५०, १०।१८ प्रपञ्चविलयः। १९ आम्नायादो।
.. म्यायविनिश्चयचियरणे भवन्मतेऽपि फोऽयमारोपस्य व्यवच्छेदो नाम ? नाश एवेति चेत् । न तस्य निहेतुकत्येन परतोऽनुपपत्तेः । तस्यैवाशक्तिकरणमिति चेतन ; सस्य निपेत्स्यमानत्वात् । तदेव संविदद्व चमिति चेत् ; न तस्यापि कार्यवापत्तेः । न चेदमुचितम्-"न कारणं न कार्य च तत्" [ ] इति स्वयमभ्युपगमात् । फीर व तत् ? निरंशं परमाणु- मात्रमिति चेत् ; न; तस्याप्रतिवेदनात् नीरूपाभाववत् । 'चित्रमेव तत् "चित्रमतिमासाप्ये- कैर बुद्धिः" [१० पार्विकाल० २१२१९] इति वचनादिति चेत् ; किमिदं चित्रमिति ? नानानीलाद्याकारमिति घेत ; न ; तथा नानाशक्तिकत्यस्यापि प्रसङ्गात् । को दोप इति चेत् ? न; एकया शक्त्या आत्मनः तदन्यया च तदपरस्य परिज्ञानापत्तेः, तथा च परमार्थत एव ग्राह्य- ग्राहकमावस्य भावात्कथं तस्यारोपितत्वं यतस्तव्यवच्छेपद्वारेण तद वनिरूपणम् ? यदि मार्थत एव तद्गारः; कथं वद्विकलतया संवेदनस्य विक्ल्पप्रतिसंहारवेलायामनुभयो नारो. पितस्य ? वैकल्यानुपपत्तेरिति चेत् । न ; निप्प्रपञ्चस्यात्मन एव तदानीमनुभवात् । प्रपञ्च. ज्ञानस्यारोपितविपयत्वोपपत्तेः । वदुक्तं कश्चित्- "सत्यमाकृतिसंहारे स्वयं तद्व्यवतिष्ठते ॥" [वाक्यप० ३।२।११] इति । , तथा पर:- . । "अध्यारोपापवादाम्यां निष्प्रपञ्चं प्रपञ्च्यते ॥" [सर्ववेदान्त० २५] इति । वचनमात्रमेवैतत् , निष्प्रपञ्चस्यात्मनः क्वचिदम्यननुभवादिति चेत् ; न ; माह्यादिभेदविफलस्य संवेदनस्याप्यननुभवात् । अननुभवमपि तद्विचारादवगम्यते विचारणेव तदभेदारोपं व्यवच्छि. न्दता तदस्तित्वस्यापि प्रत्यायनादिति चेत् ; न ; एयम् "आम्नायादेवात्मनोऽप्यनगमप्रसङ्गात् । तेने "प्रपञ्चारोप प्रत्याचक्षाणेनात्मनोऽपि चूद्धावुपस्थापनात् । वत्प्रपञ्चप्रत्याख्याने किमवशिष्यते २० यस्यात्मत्वेन युद्धावुपस्थापनम्" १ प्रायादिभेदप्रत्याख्याने फस्यावशेपो यस्य संवेदनत्वेन बुद्धी समर्पणम् ? 'तद्भेदसाधारणस्य प्रतिभासमात्रस्येति चेत् ; अन्यत्रापि तत्यैव किन्न स्यात् ? कथमेवमात्मसंवेदनयो द इति चेत् ? आत्मनो नित्यत्वाद् अन्यस्य तद्विपर्ययात् । कथं पुनरात्मनः शब्दज्ञाने प्रकाशनं "तस्याविद्याभेदत्वेन मिध्याज्ञानत्वात् ? नहि मिथ्याज्ञाने तत्त्वप्रकाशनम् ; तन्मिध्यात्वस्यैवाभावापत्तेः । एवं हि प्रत्युत्पन्नशब्दज्ञानमानस्येक २५ सकलभेदमपञ्चप्रलयोपनिपातेन प्रवृत्यादिः सर्वोऽपि संसारख्यापारोन भवेत् , आत्ममननध्याना. द्युपदेशश्वापार्थकतां प्राप्नुयात् तस्यापि तत्प्रपञ्चप्रलयार्थत्वात् , तत्प्रलयस्य च शब्दज्ञानमात्रादेव सौगतमते। ३ ग्राम्य दिभेदसमारोपस्य । ३ नाशस्य । चित्रमात्रमेव भा, ब., प., स.1 ५-स्यामा-भा०, ५०, ५०, स० । ६ संवेदनाद्वैत । ७ मायग्राहाकाराकान्तस्य । ८ -वानिरुपितवि-मा, घ०, ५०, स. । ९ अनुभवागम्यमपि सवेदनम् । १० अम्नायादेवाप्यारम-भा, प., प० । आम्नायनेर । १२ प्रचारीय प्र-भा०, ब०,५०.स.१३ धुद्धा उप-भा०,२०, ५०, सनस्य मान्य'दि-भा०,५०, प, स.11५ ग्राह्यग्राहकादिभेद । १६ पाब्दमानस्य ।
११५२] प्रथमः प्रत्यक्षमस्तायः भावात् । न तन्मात्रादेव तद्भावः किन्तु तन्मननायुसंस्कृतादेव, तदुपसंस्कृतं हि तज्ज्ञानम् , श्तरनिरवशेपाविद्यापिलासानुपरमयत् आत्मानमप्युपरमयति 'यथा पयः पयो जरयति स्वयमपि जीर्यति, विपञ्च विपान्तरमुपशमयति स्वयमपि उपशाम्यति, उपरतसकलत द्विलास- घेलायाञ्च स्वत एव निष्प्रपञ्चमात्मतत्वं प्रकाशत इत्येवम्प्रकारं शब्दज्ञानस्य तत्प्रकाशनिबन्ध- नत्वमिति चेत् ; ननु अयमप्यर्थः कुतश्चिदाग्नायज्ञानादेव ज्ञातव्यः । तस्यैव मिथ्यात्ये ५ तज्ज्ञानात्कथं तत्प्रतिपत्तिः ? न चापरमुपायान्तरं यतस्तत्परिज्ञानमित्यातीतिकमेवेदम्- "संहृताखिलभेदोऽतः सामान्यात्मा स वर्णितः । हेमेव परिहार्यादिभेदसंहारसूचितम् ॥" [ब्रह्मसि० १।३] इति । तन्न भेदप्रपञ्चसंहारवती बेला नाम काचिच्छक्यनिरूपणा यस्यामात्मतत्वात्य निष्प- पञ्चस्य प्रकाशनमिति चेत् ; संविदवतस्यापि कथं विचारताने प्रकाशनम् ? तस्यापि' विकल्प त्वेनावस्तुगोचरत्वाद् अन्यथा तस्य तद्गोपरत्वविरोधात् । एकच प्रत्युत्पन्नविचारज्ञानस्येय सकलपाह्यभेदारोपप्रलयोपनिपातेन तदद्वतप्रकाशनात् निष्फलमेव तदभ्यासोपकल्पनं भवेत् , "तस्यापि तत्प्रकाशनादन्यस्य फलस्याभावात् , तस्य च प्राथमिकादेव विचारज्ञानादुपपत्तेः । अभ्यासपरिपाकाधिष्ठितमेव "तत् प्रकाशनिबन्धनं न केवलम् , "तत्सलु निखिलमप्यपरमध्या- रोपमपाकुर्वत आत्मानमप्यपाकरोति यावदारोपभावित्वात्तस्य', यथा प्रदीपस्तैलवोदिकं प्रति- १५ संहरन्नात्मानमपि प्रतिसंहरति । संहतसकलभेदारोपवेलायां तु तव तस्य स्वतः प्रकाशन मिति घेत् ; न ; अस्याप्यर्थस्य कुतश्चिद्विकल्पादेवावगमात् । तस्य च मिथ्याज्ञानत्वेन तदवगमानु. पायत्वात् , उपायान्तरस्य चाभावात् । तस्मादिदमप्यप्रातीतिकमेव- "ग्राह्यग्राहकवैधुर्यात् स्वयं सैव प्रकाशते ।" [१०वा० २।३२७] इति । तन्नानापि विकल्पप्रतिसंहारवती नाम काचिच्छक्यनिरूपणा यस्यां तदव तस्य स्वतः प्रकाशनमुपकल्येत । तदेवाह- प्रतिसंहारवेलायां न संवेदनमन्यथा । इति । व्यक्तमेतत् । इदमपरं व्याख्यानम्-यदुक्तम्-'अद्वयं द्वयनि सम्' इति । फुतस्तस्य" तन्नि सत्वम् ? स्वत वेति चेत् ; अवाहन स्वतः' इति । उपपत्तिमत्राह-'भेदपर्य- नुयोगतः' इति । भेदः संवेदनस्याविभागलक्षणो विशेषस्तस्य पर्यनुयोगः 'स कथ २० . शन्दगाबादेव । ३ -युपस्कृतादेव । ३ शब्दज्ञानम् । ४ "यथा पयः पपो जस्यति स्वयं च जायति यथा च विषं विपान्तरं शमयति सत्यं च शाम्यति"-प्रझसि० पृ. १२ । ५ आग्नायस्यैव । ।-त्यप्रती तिक-०, ब०, प०, स.1 ७ परिहार्य कटकम् । ८ नन्दभेदै प्रपञ्चसंहारवति बेला मा०, २०, ५०, स. । ९-पिकत्पितत्वेन आ०, २०, ५०, ०। १० अभ्यासस्यापि विचारशानम् । १२ विचारशानस्य । १३- यो तद-मा), ०, ५०, स० | १४ विकल्पस्य । १५ "तस्यापि तुलाचौद्यत्वात् स्वयं सेव प्रकाशते"-प्रचार १६-णा यत्तदव-आ. ०,१०, स.16-स्य नि-मा०, ०,१०, स.।
. ५ । -- न्यायविनिश्चयविवरणे (१२५२ सम्भयति' इति प्रश्नः, तस्मात्तत इति । कथं सलु स्वत एव विभागरूपतया प्रतिभासमान. मविभागमुपपन्नम् ? विभागस्यासत एवं प्रतिभासनादिति चेत् ; कथमिदानीमसदवमासि. नरवस्य सम्यग्ज्ञानत्वम् ? यतस्तरमात् दुःसहेतुहाणं प्राप्येत, मिथ्याज्ञानातदयोगात नित्यादिज्ञानयत् । अभिमतञ्च ततस्तत्प्रहाणं परस्य, "नरात्म्पदृष्टेस्तद्युक्तितोऽपि चा" [प्र०वा० १११३९ ] इत्यत्र युविशब्देनाद्वैतवेदनस्यापि तत्प्रहाणकारणतया प्रक्षाकरण व्याख्यानात् । तदेवाह-भेदपर्यनुयोगतः । भेदस्तत्प्रहाणकारणस्वविशेषः तत्पर्यनुयोगः 'स कथम्' इति प्रश्नः तत इति । तन्न स्वतस्तस्य द्वयनि सत्वम् । परतोऽपि नेसाह-मापि' इत्यादि । उपपत्तिमाह-भेद' इत्यादि । परमेव भेद- रतस्य पर्यनुयोगः 'तत्कथम्' इति प्रश्नः, उत्त इति । अते परस्यैवासत्त्वादिति मन्यते । १० कल्पितं तत्सत्त्वमिति चेत ; न; तत एव तत्कल्पनायोगादसत्त्वात् । कल्पनया सत्त्ववेत् ; न; परस्पराश्रयात्-'कल्पनया सत्त्वम्, ततश्च कल्पना' इति । अन्यत इति चेत् । न तत्राप्येवं प्रसङ्गात् । तस्याप्यन्यतः कल्पनायामनवानात् । नानवस्थानम् : अनादित्यात्तत्प्रन्यस्येति चेत् ; कुतस्तसिद्धिः ? स्वत इति चेत् ; न; स्ववेदनस्य वस्तुसत्संवेदनधर्मत्वेन तत्रायोगात् । 'तदपि विकल्पितमेवेति चेत् ; कथं ततः कचिदित्यम्भावस्य सिद्धिः अनित्यम्भाववत् ? १५ कुतो या परमार्थसन्नेव तत्प्रबन्धो न भवेत् ? प्रविसंहततत्प्रवन्धस्यैव संवेदनस्य सत्यभ्या- सपाटचे प्रतिवेदनादिति चेत् ; न; कदाचिदपि तदनुभवाभावात् । तदाह-'भतिसंहार" इत्यादि । सुयोधम् । एतेन पुरुपाद्वैतस्यापि द्वयनि सत्वं प्रत्युक्तम् । न हि तस्यापि स्ववस्तनि सत्य भेदपर्यनुयोगतः। भेदस्य 'एकमेवेदमद्वितीयम्' इति विशेषस्य पर्यनुयोगात् ‘स कथम्' इति २० प्रश्नात् । न हि स्वत एव भेदेनायभासमानस्य तद्विशेपसम्भवः । भेदस्यासत एव प्रतिभासनात्त- सम्भव इति चेत् ; कथमसद्वभासिनस्तस्य सत्यज्ञानत्वम् । यतः "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" [ तैत्ति० २।१।१ ] इत्याम्नायेत । मिथ्याज्ञानत्वे तु कथं तदर्शनात्सकलदुःपनिवर्हणम् ? यत इदं स्वाम्नातं भवति- "भियते हृदयग्रन्थिरिछद्यन्ते सर्वसंशयाः । तीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरै"।"[मुण्डको० २।२८] इति । तन्न तस्य स्वतोद्वयनि सत्यम् नापि परतो भेदपर्यनुयोगतः तदद्वैते परमेव भेदस्तस्य पर्यनुयोगतः तत्संभवप्रश्न: क्थमसावद्वैतव्यापत्तेः' इति ततस्तस्मादिति । परस्य :-प्रमाणं भा०, २०, ५०,०। २-तशब्दवेद-भा०, ०,१०, स.। ३ "अथवा युक्तियोगः परस्परसङ्गताद्वैतम् , भतराष्टिोऽपि ।" --० वार्विकाळ० २११३९ । । -स्य स्वयंनि मा०, ब०, १०, स.। ५ तनाप्यन्यतः भा०, २०, प०, स.। ६-स्थानम् ना-भा०, ब०, प०,०। ७ वस्तु सत्वं संवे मा०, २०, प., स.1 वेदनमपि । ९ संवेदनानुमवाभावात् । १० एकमेवाद्वितीयमिति विशेषस्य । " परापर भा.प. प., स०,। २५ ܫܪ ५ १० १२५३] प्रथमः प्रत्यक्षपस्ताव: कल्पनया सत्वान दोप इति चेत् ; न; 'तत एध' इत्यादेः 'अनित्थम्भाववत्' इति पर्यन्तस्या- नापि समानत्वात् । यदि घा, भेदः "तमेव भ्रा(भा)न्तमनुभाति सर्वम् , तस्यैव भासा भाति" [कठोप० ५।१५ ] 'इत्याग्नातः पुरुषाधीनो भेदप्रतिभासस्तत्पर्यनुयोगः 'कथमयम्' इति प्रश्नः, तस्मादिति । परतो भेदप्रतिभासे पुरुपायत्ततया तदाम्नायो विरुद्ध्येतेति मन्यते । परतो द्वयनिर्भासं त्रुवाणः प्रतिपीठयेत् । पुरुषायत्ततावमामनन्तं निजागमम् ॥७६९॥ 'विवेकाशक्तमुद्दिश्य प्रतिपत्तारमाग पुरुपाड्दनि समन्वाहेति मतं यदि ॥७७०॥ परतो भेदनिर्भासः कस्येदानी विवेकिनः । न विवेकेऽनुपायत्वात्परस्यैवानवस्थितेः ॥७७१॥ कल्पनातः परं स्याच्चेसैव करमाद्विवेकिनः । विभ्रमाद् वलिनस्तर्हि विवेकी सुमहानयम् ॥७७२॥ विभ्रमप्रतिरोधी हि वियेकः सावलौकिकः । स चास्ति विभ्रमश्चेति न श्रद्धेयमिदं वचः ॥७७३।। सत्येव पाटवे तस्य तद्विरोधोपकल्पने । पाटवं किमिदं पुंसः स्वरूपप्रणं यदि ।।७७४॥ वकिमुत्पन्नमात्रस्य विवेकरय न विद्यते । तथा चेत्तस्य यां स्यादविद्याकल्पितं परम् ॥७७५।। न विवेकस्तथा चासो मिथ्यार्थत्वात्तदन्यवत् । न वियेकालयं तस्मात्परतो भेदभासनम् ॥७७६॥ ततः सूक्तम्-'भेदपर्यनुयोगतः' इति । कुतश्च भेदप्रपञ्चः परमार्थसन्नेव न भवेद्यतस्तस्य कुतश्चिदापेपितत्वं परिकल्प्येत ? प्रतिसंहावत्प्रपञ्चस्यैव परमात्मनः कदाचित्प्रतिवेदनादिति चेत् ; न ; ताशस्य कदाचिद- प्यनुभवाभावात् । तदाह-'प्रतिसंहार' इत्यादि । तन्नाद्वैतवादः श्रेयान् । विभ्रमवाद पवारिस्वति चेत् ; न ; तस्य 'विप्लुत' इत्यादिन प्रतिश्पात् । तदेव ब्याचक्षाणस्तत्प्रतिक्षेपमेव दर्शयति- इन्द्रजालादिषु भ्रान्तमीरयन्ति न चापरम् ॥५२॥ अपि चाण्डालगोपालवाललोलविलोचनाः । इति । । श्वेता. १५ मुण्डको ०२।२।१०। २ -सतथायावतदा-मा०, २०, ५०, स०, ३ विवेका- शारिमु-मा०, २०, ५०, स. । . विवेकस्य । ५ चित्राविरोधकल्पनायाम् । - धियः मा०, २०, ५०। ७-परिभा०, ०,१०, सः।
- - । . न भाये सदुपपन्नम् . . રર૦ 'न्यायविनिश्चयविधरणे [१४ व्यक्तः शब्दार्थः । तात्पर्यार्थस्तूंच्यते-यदिन्द्रजालस्वप्नादिविपयेपु . विप्लवव्याप्वं प्रत्ययत्वमन्यद्वा न तन्नारदर्थविषयेप्पस्ति, स्वयमेव प्राणिनां तत्र विप्लयप्रतिपत्तिप्रसङ्ग अनु- मानस्य येफल्यापतेः । अनुमानान्तरेऽप्येवं प्रसङ्गः, कृतफरयादेरपि घटादायनित्यत्वव्याप्ततया प्रतिपन्नस्य शब्दे धर्मिण्यभायात् । भावे स्वत एव पुंसां तत्राप्यनित्यत्वप्रतिपत्तो, अनुमान ५ वैफल्याविशेषादिति चेत् ; सत्यम् । तत्र यालायलागोपालादीनां स्वत एवानित्यत्वप्रतिपत्तिः । न चैतावता तदनुमानवैफल्यम् ; आगमाहितसंहकारस्य तत्र नित्यत्गध्यारोपे तस्य तव्यवच्छे. दार्थत्वात् । जामत्प्रत्ययेपु त्यागमवतामेवं विप्लवप्रतिपतिर्न बालादीनां "प्रामाण्यं व्यवहारेण" [प्र०या० १७ ] इत्यस्य विरोधात् , यालादिपरिज्ञानादन्यस्य व्यवहारस्याभावात् । तस्य च विप्लवगोचरत्वे "कथं ततः प्रामाण्यव्यवस्थापन विप्लवव्यवस्थापनस्येवोपपत्तेः ? १०. तस्मादविप्लवज्ञानमेव 'तत्र 'तेपाम् । च विप्लवात्मन एव "प्रत्ययत्वस्य तन सत्यपि "तस्मिन्नविप्लवसंसारादुपपन्नमेति चेत् ; न तेषामिदानी तत्संस्कारहेतोरनुपलम्भात् । न चाहेतुकस्तत्संस्कारो नित्यत्वापत्तेः । प्राकनासत्संस्कारादिति चेत् ; न ; "स्वरूपसत्यत्वेऽपि प्रसङ्गात् , तस्यापि संस्कारवलादेव सत्यतया परिज्ञानसम्भवात् वस्तुतो विप्लवस्येयोपपत्तेः । कथं पुनः स्वरूपविप्लवे बहिर्विष्ठवपरिज्ञानं सत्येव "तदविप्लवे १५ "तदुपपत्तेस्तस्य तदपेशत्वादिति चेत् ? कथमिदानीमेकचन्द्रादिविप्लवे द्विचन्द्रादिविप्लवपरि. ज्ञानम् ? सत्येवेकचन्द्रादेरविप्लवत्वे द्विचन्द्रादिविप्लयस्यापि परिज्ञानसम्भवात् । परिकल्पितेन 'तदविप्लयेन तदपरविप्लवपरिज्ञानमिति चेत् ; स्वरूपाविप्लवेनापि ताशेनैव बहिविप्लवपरिज्ञान भवतु विशेषाभावात् । ततः स्वरूपपदसंस्कारवलोपनीतमेव बहिरर्थसत्यत्वमिति न विप्लवात्मकं "तत्प्रत्ययेषु प्रत्ययत्वम् , बालादीनामपि तत्र विप्लवप्रतिपत्तिप्रसङ्गात् । स चैवम् , अविप्लवपरि- २० मानस्य तत्र तेषां भावादित्यसिद्धो हेतुः, अतश्च तद्वादिना जडत्वमिति । तथा च "यन्नातश्चदर्भ ( यज्ञातमाश्वयं) तदाह- तत्र शौद्धोदनेरेव कथं प्रज्ञापराधिनी ॥५३॥ बभूवेति वयं लापत् पहुविस्मश्मास्महे । इति तत्र जामत्प्रत्ययाविप्लव शौद्धोदनेरेव सकलज्ञानधन्यम्मन्यस्य बुद्धस्यैव न घाण्डा- २५ लादीनामल्पप्रज्ञानां कथं प्रज्ञा बुद्धिः अपराधिनी स्खलनवती "सर्वमालम्बने भ्रान्तम्" [प्र०यार्तिकाल० २।१९६] इत्युपदेशात् बभूव इति एवं वयं परीक्षाचक्षुपः तावत् कमेण १-थः सूच्य-भा०,०,१०स०१२ शब्दे । ३ मीमांसकागम। ५ -रोस्तिस्य -मा०,१०,१०, स.। अनुमानस्य । ५ वौद्धानाम् । ६ माल दिव्यवहारस्य । . कथन तता, घ, १०, स.। ८ जानत्प्रत्यये । ९ वालारलादीनाम् ।। प्रत्ययस्य भा०, ०,१०, स.111 विश्वात्मनि । २रावेदन- स्वरमसत्यत्वेऽपि । १३ वरूपाविश्खे। १४ बहिविप्लवोपपत्तः । १५ एकचन्द्राविहवेन । १६ द्विवन्द्र । १० परिक- लियतेनैव । १८आपरप्रत्ययेपु। १९ यज्ञाश्चतदम तदाह भा. यशश्वदर्म तदाह स. । थाय तदर्ग ताद । यज्ञाश्च तदयं तदाह प० । २०-शानदन्यामन्च आ०, २०, स.!
प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्तावः . । - । बहुविस्मयम् अनल्पाश्चर्यम् आस्महे । भवति हि प्रेक्षावतामाश्चर्यवहुलमासनं मनोऽवस्थान यदि मन्दबुद्धिगोचरे महामतेरेव परिस्सलनम् । अस्ति चेदं शौद्धोदने। अविशेपेऽपि स्वरूपार्थ. ज्ञानानाम् अर्थज्ञानेष्वेव विप्लवोपगमात् । परमपि तदाह- तत्राद्यापि जनाः सक्ताः [तमसो नापरं परम् 1 ] इति । तत्र तस्मिन् प्राकृतजनप्रज्ञाविपयेऽपि परिस्खलनवति शौद्धोदनों अद्यापि स्खलनव- ५ तया परिज्ञानसमयेऽपि जना दिग्नागादयः सत्ताः तत्प्रामाण्ये कृतामहाः "प्रमाणभूताय" [प्रमा०स० श्लो० १] इति वचनादिति च वयं बहुविस्मयमास्महे । भवति हि विचारशूरचेतसा साचर्यमवस्थानं यदि प्रज्ञावलोपपन्नोऽपि लोकः परिज्ञान(त)दोपेऽपि' आप्तबुद्धिमकु(बुद्धिं कु)- वति । तद्दलोपपन्नाथ दिग्नागादयः "स श्रीमानकलकधीः" । ] इत्यादेः "न्यायमार्गतुलारूढम्" [ हेतुवि० टी० पृ० १ ] इत्यादेश्व श्रवणात् । भवदपि कदाचि- १० त्प्रज्ञाबलम् अध्यारोपेण तमसा प्रतिरुध्यते तदयमदोप इति चेत् ; न, तमस एव तेन प्रतिरोधसम्भवात् तस्य वस्तुबलप्रवृत्तत्यात , तमसश्च विपर्ययात् । कदाचिदेवमपि स्यादिति चेत् । अवाह- तमसो नापरं परम् ॥५४॥ इति तमसः अध्यारोपाद् अपरं प्रज्ञायलं परन्न किन्तु तम एव परम्, तस्यैव सदलप्रति. रोधित्वेन प्रष्टत्वादिति च वयं यहुविस्मयमास्महे । भवति ह्येतत् बहुविस्मयापादानं यदन्ध. १५ कारेणापि प्रदीपः प्रतिरुध्यते इति । भयतु पहिरिवान्तरपि विप्लवो बुद्धवेदनेऽपि तदभ्युपगमात् । "मित्तयोऽहमपि मायोपपः स्वमोपमः" [ ] इत्यादिवचनादिति चेत् ; न ; अनापि तत्र' इत्यादेर्दोपस्याविशेषात् । अपि च, यद्यपरिज्ञानं तद्विप्लवस्य कथमवस्थापनम् अविप्लववत् ? परिज्ञानश्च यद्यविप्लवम् ; कथं तदेकान्तः ? सविप्लवं चेत् ; कथं ततस्तसिद्धिस्तद्विपर्ययवत् १ हदेवाह- २० विश्रमे विभ्रमे तेषां विभ्रमोऽपि न सिद्ध्यति । इति । विभ्रमे बहिरन्तः सकलज्ञानविप्लवविपये यस्तद्विपयस्य॑ ज्ञानस्य विभ्रमो विप्लव- स्तस्मिन् तेषां ज्ञानानां विभ्रमोऽपि न केवलमविभ्रम इत्यपि शब्दार्थः, न सिद्ध्यति । अविभ्रमो यथा सर्ववेदनेषु न सि ति । विभ्रमाविभ्रमोऽप्येवं विभ्रमान्न प्रसिद्ध्यति ॥७७७|| ततः सूक्तमिदम्- तत्राद्यापि जना सक्तास्तमसा नापरं परम् । विभ्रमे विनमे तेषां विनमोऽपि न सिद्ध्यति ॥ इति । - व्याप्त आ०, ब०, प०, सः। २ प्रज्ञावलेन । ३ -मवस्था-आ०, ५०, ५०, ०५ विसवे. कान्तः । ५ 'वं विप्लवम्' इति सिद्धिः । ६ विभ्रमविषयस्य । " r ४१ ३२२ म्यायविनिश्चयविवरणे (११५७ तेदसिद्धौ दूपणान्तरमप्याह- कथमेवार्थ आकावानिवृत्तेरपि कस्यचित् ॥५५॥ व्यवहारो भवेजातिमूकलोहितपीतवत् । इति । अर्थे जलादौ व्यवहारस्तदभिदानादिः स च आकाङ्कायो विभ्रमाभिप्रायस्य ५ निवृत्तिः अर्थ इत्यधिमुक्तिरेव तस्यास्तद्रूपत्वात् । तस्या एव एवकारस्यात्र दर्शनात् न वस्तुतोऽर्थस्य भावात् । विभ्रमैकान्वें सदसम्भवात् । तन्निवृत्तिश्च कस्यचिदेव दृढ़वासनावतो नापरस्य तस्य तत्र तदाकाया अनर्थव्यवहारस्यैव भावात् । अपिशब्दः 'च' इति शब्दार्थः, 'व्यवहारः' इत्यस्यानन्तरं द्रष्टव्यः इति । परमतं कथं नैव भवेत् ? दृष्टान्तमाह-'जाति' इत्यादि । जातिमूकेन जातिबधिरमुपलक्षयति नान्तरीयकत्वात् , लोहितादिशब्देनापि ० तद्विपयं व्यवहारम् । तदयमर्थः-यथा जातियधिरः शब्दार्थसम्बन्धमज्ञानानः तनियन्धनं 'लोहितं पीतम्' इति च शब्दविकल्पात्मक व्यवहारं न प्रतिपद्यते तथा विभ्रमकान्तमप्रति. पद्यमानोऽपि तत्रवाधिमुक्तिभावाभावाभ्याम् अर्थानर्थव्यवहार इत्यपि न प्रतिपत्तुमर्हतीति । परस्य मतम्-न ग्राह्याकारेऽपि संवेदनानां विभ्रमः, तत्र तेपामप्रवृत्तेः "नान्योऽनु. भाग्यो युद्ध्यास्ति' [अ० वा० २।३२७] इति वचनात् । न चाविषये विभ्रमः नीलज्ञानस्य १५ पीते तत्प्रसङ्गात् । तन्न तद्वत् स्वरूपे तत्कल्पनम् , स्वरूपस्यानुभवाधिष्ठितत्वेन परमार्थसत एयोपपतेः, अन्यथा अकलव्यवस्थावैफल्योपपत्तेरिति । तबाह- अनर्थानेकसन्तानानस्थिरानविसंविदः ॥५६॥ अन्यानपि स्वयं प्राहुः प्रतीतेरपलापकाः । इति । अनर्थान् अविद्यमानवियाम् प्रत्ययान् माहुः प्रतिपादयन्ति 'प्रत्ययाम्' इत्यध्याहा- २० रात् । कीदृशान् ? एकसन्तानान् अभिन्नसन्तानान् । पुनस्तद्विशेषणम् अस्थिरान् क्षणिकान् अन्यानपि भिन्नसन्तानानपि तादृशान् प्राहुः स्वयं यौद्धाः । सद्विशेषणम् अविसंविद इति । न विद्यते स्वपरविषयतया विविधा संवित् सम्यग्ज्ञानं येयां ते तथोकाः । कुतस्ते तथेति चेत् ? आह-प्रतीतेरपलापका यत इति । प्रतीते; स्वपरविपयतया लोकप्र. सिद्धाया अपलपनादेव तेपाम् अविसंवित्त्वं न पुनर्वस्तुतस्वभावादेष, अन्यथा सन्तानसन्ता. नान्तरतद्गतानेकत्वक्षणभङ्गादीनामप्रतिपत्तिप्रसङ्गात् । तदनेन प्रतीत्यपलापादनवधेयवचनस्त्वं तेपामुपदर्शयति । भवतु तस्यं संविदद्वैतमेयेति चेत् ; इत्तमोत्तरम्-'अद्वयं द्वयनिर्भासम्' इत्यादिना । तदेव विस्तारयन्नाह- विभ्रमासिनो। २-या वावि-आ, १०, ५०, स. इत्यादिपु-भा०,ब.प.स.11 -हाम्ते. न तस्व-मा०,०, ५०, स०। ५ शब्दादिति मा., ब ...। विधमप्रबा, य०,५०, स. ७-पयस्वारप्र-मा०,०, प०,०1८विस्तरयना-RI.,.,.,..
प्रथमः प्रत्यक्षनस्तापा स्वतस्तत्वं कृतस्तत्र वितधप्रतिभासतः ॥५७॥ निधस्तत्वं कुतस्तत्र वितथप्रतिभासतः । इति । स्वतः स्वस्मात् तत्वम् अन्यरूपं 'कुतो' नैव 'सिद्धयेत्' इत्यथ्याहारः । हेतुमाह-'वितध' इत्यादि । वितथो माह्यादिनीलादिरूपो भेदस्तस्य प्रतिभासनं वितथप्रति- भासः तस्मात् इति । एतदुक्तं भवति-सकलभेदप्रतिभासविकलं हि संविन्मानं परस्यावतं ५ न चित्राकारम् , सति तस्मिन् वहिरर्थसन्तानान्तरप्रत्युजीवनापत्तेः । तस्यै च न स्वतः सिद्धिः; स्वतोऽपि भेदाधिष्ठानस्यैव संवेदनस्य प्रतिमासनात् , तस्य च मिथ्यात्वादिति । परतस्तरिसद्धि प्रत्याचक्षाण आह-'मिथ' इत्यादि मिथ इति 'अन्यतः' इत्यर्थो निपातत्वात् , निपातानाश्चानेकार्थत्वात् । 'मिथ' परतश्च तत्त्वम् अद्वयं फुतो नैव सिद्ध्यति । कुत एतत् ?, वितधप्रतिभासतः न हि परतोऽपि निरंशस्य प्रतिभासनं भेदवत एव तत्रापि तद्विपयस्य १० प्रतिभासनात् । तत्रास्य च मिध्यात्वादिति भावः । ननु च स्वतः प्रतिभासने निरस्ते निरस्तमेवाद्वयम्, परतस्तु तत्प्रतिभासन पर- स्याप्यनभिप्रेतमेव "तस्या नानुभवोऽपरः" [प्र०वा० २।३२७] इति वचनात् तत्कथं तस्यो- पक्षेपः परप्रसिद्धस्यैवोपक्षेपोपपत्तेरिति चेत् ? किमिदानीम्-"आत्मा स तस्यानुभवः" [प्र०या० २।३२६] इत्यादेविचारस्य फलम् ? न किनिदिति चेत् ; न ; असाधनाङ्गवचन- १५ स्वेन तद्वादिनो निग्रहावाप्तेः । तस्माद तपरिज्ञानमेव तत्फलं भेदसमारोपव्यवच्छेदस्यापि वत्परिज्ञानरूपत्वात् , अन्यथा वैफल्यापत्तेः । अतो विद्यत एव परस्यापि परतरसत्प्रतिभासन- मित्युपपन्न एव तदुपक्षेपः । तदेवाह- यतस्तत्त्वं पृथक् तत्र मतः कश्चिदुधः परः ॥५८॥ इति । बुधः प्रदिपना कश्चिद विचारात्मा पर प्रकृष्टः पृथम् भिन्नः तत्र असे मत्तः अभिप्रेत: परस्य । कीदृशोऽसौ ? यतो यस्माद् बुधात् तत्त्वम् द्वियं प्रतिभाचीति शेषः । तत एव तर्हि विचारात्मनो बुधात्तत्त्वं प्रतीयतामिति चेत् ; आह- ततस्तत्त्वं गतं केन [कुतस्तत्त्वमतत्वतः] इति । ततो बुधात् तत्त्वमद्वयं गतं प्रतिपन्नम् । केन ? न केनचित् । तथाहि-विचारों नाम विकल्पज्ञानविशेष एव । विकल्पकञ्च विज्ञानममिलाप्येतरात्मकम् । तत्त्वेन सम्भवत्येव निरंशज्ञानवादिनः ।।७७८।। कल्पितं सम्भवत्येय तच्वेत्तत्कल्पनं कुतः ? परतश्चेद्विकल्पान्न तस्याप्यन्येन कल्पनात् ।।७७९॥ २५ सिध्यतीत्य-भा०, १०, १०, स. १३ चिनाबारे । ३ अद्वैतस्य । ४ -ने निरस्तमे-आ., म., ., स०१५ अद्वैतपरिज्ञान । ६ अन्वयं मा, २०, ५०,सक ५ दिकापश्च-मा०,८०,१०,१० १० न्यायविनिश्चयविवरणे [२६० अनवस्थानदोपोऽयमनिवार्यः प्रसज्यते । तस्मान सम्भवत्येव विज्ञानं ते विकल्पकम् ॥७८०॥ न चासम्भवतस्तस्मात्तत्त्वस्य प्रतिवेदनम् । व्योमाम्भोरुहसौरभ्यादपि तस्य प्रसञ्जनात् ॥६८१॥ तदेवाह-'कुतस्तत्त्वमतत्वतः' इति । कुतो नैव तत्त्वम् अद्वयम अतयत: अविद्यमानसद्भावाद्विचायत् गतमिति । एतेनानुमानं विचार इति प्रत्युक्तम् । अपि च, अनुमानं भवेट्याप्ती साध्यवित्त्या च तेंद्गतिः । तद्वित्तियदि चाध्यक्षा प्राप्त नि.श्रेयसं भवेत् ॥७८२॥ न च नि.श्रेयसप्राप्तस्यानुमान प्रकल्प्यते । विधूतकल्पनाजालं यत्ते निःश्रेयसं मतम् ॥७८३।। विकल्पः साध्यधीन तस्य स्वांटो व्यवस्थितः । साध्यैकत्वावसायान्चेत्तदशस्यैवमुच्यते ॥७८४॥ वस्तुतो न तथाप्यस्ति साभ्यवित्तिस्ततः कथम् । व्याप्तिधीनुरमानं यदव तविषयं भवेत् ।।७८५॥ यादृशं व्याप्तिविज्ञानमयथार्थ भवेत्ततः । तागेवानुमानं पेत्ततस्तत्त्वगतिः कथम् ॥७८६॥ तदाह-'कुतस्तत्वमतत्वतः' इति । न विद्यते तत्त्वम् अद्वयं विषयत्वेन यस्मिन् तद् अतत्वम् अनुमानं तस्मात् कुतस्तत्वं गतमिति यदि निरंशस्य स्वतः परतश्च न प्रतिभासनम् । तदपि मा भूत्, सर्वाभावस्यापि बौद्धः सिद्धान्तीकरणादिति कश्चित् । निरशेवरनित्ये. तरादिविकल्पैनिर्विकल्पस्यैव तत्वस्य परिकल्पनादिति परः । तत्राह- यथा सत्त्वं सतवं वा प्रमासत्त्वसतत्वतः ॥५॥ तथाऽसत्त्वमतत्त्वं वा प्रमासवसतत्त्वतः । इति । यथा येन गत्यन्तराभावप्रकारेण सत्वं शानशेयरूपस्यार्थस्य विद्यमानत्वं प्रमास. त्त्वतः प्रमाणभावात् । तथा तेन प्रकारेण तस्य असत्यमपि प्रमासस्वतः प्रमाणभावा. देष । सात्पर्यम्- प्रमाणनिरपेक्षस्य सर्वाभावस्य कल्पनम् । नयुषम्, चद्विपक्षस्य तथास्लुप्तिप्रसज्जनात् १७८॥ १५ २० २५ । . तत्पतिवेदनरय । २-या विचा-ता। व्याक्षिकानम् ] . साध्यानम् । ५ पोरस्य । (सरवमन्वयं-मा.,.,.,.. भर्यस्य । प्रमाणनिरपेक्षतया ।
॥६०] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावा ३२५ १. प्रमाणातत्मक्लप्तिस्तु न भवत्येव सर्वथा । प्रमाणस्यैव सद्भावात्तक्लप्तिविघातिनः ॥७८८॥ इति । तत्र शून्यवादः श्रेयान् । निर्विकल्पकवस्तुवादिनोऽपि सतत्त्वं विकल्पत्वम्, 'सह तैर्निरंशादिभिर्विकल्पैर्वर्तत इति सतत् तस्य भावः सतत्यम्' इति व्युत्पादनात् । तत् यथा प्रमासतत्वतो भावस्य ५ तथा अतत्त्वम् अविकल्पत्यम् न विद्यन्ते ते विकल्पा यस्य तदतत्तस्य भावोऽतत्वमिति ज्यु. त्पादनात् । तदपि प्रमासतत्त्वतः प्रमाणस्य सविकल्पत्वात् । वाशब्द उभयत्नापि पक्षान्तर- द्योतने । तात्पर्यमत्रापि- सर्वविकल्पातीतं तत्त्वं न विना प्रमाणत: सिद्धयेत् । तद्विपरीतस्यापि च तत्वत्यैवं प्रसिद्धिमयात् ।।७८९॥ तत्र सदपि प्रमाणं सर्वविकल्पव्यतीतमेव मतम् । यदि तस्य न प्रसिद्धिः स्वतोऽस्ति निश्चयाभावात् ||७९०॥ अविनिश्चितमपि तच्चेत् ; स्वतः प्रसिद्धं प्रमाणमक्किल्पम् । सविकल्पमेव न तथा किमित्यवस्था कुतस्तत्त्वे ।।७९१॥ परतस्तत्प्रतिपत्तौ तदपि परं निर्विकल्पमेव यदि । तत्राप्ययं प्रसङ्गो भवनशक्यो निवारयितुम् ॥७९२।। पुनरपरनिर्विकल्पप्रकल्पनायामवस्थितिर्न स्यात् । तस्मात्प्रमाणमन्ते सविकल्पकमेव वक्तव्यम् ॥७९३॥ तस्य स्वनोऽनुभवनात् युगपत्स्वपरार्थनिर्णयप्रकृतेः । एकान्तनिर्विकल्प प्रभवति तस्मिन् कथं तत्त्वम् ।।७९४॥ इति । भवतु प्रमाणादेव सविकल्पकादेव च भावेष्वसत्त्वमतत्त्वच, तत्तु न परमार्थतः, विचाराक्षमत्वात् , अपि तु व्यवहारेणैव संसृतिरूपेणेति चेत्, न; ततोऽसत्त्वातत्त्वयोरिय सत्त्वसतत्त्वयोरपि भावेषु फल्पनापत्तेः व्यवहाररय तत्राप्यविशेषात् । न चेदमुचिवम् ; विरो. धात् । यदि तेषु सत्त्वसतत्वे तदा कथमसत्यासतत्त्वे । ते चेत् ; कथं सत्त्वसतत्वे इति ? तदेवाह- तदसत्वमतत्वं वा परसवसतत्त्वयोः ॥६०॥ न हि सत्त्वं सतत्त्वं वा तदसत्वासातत्त्वयोः । इति । तद् अनन्तरोक्कम् असच्चमतत्त्वं च वाशब्देन समुश्यात् । न हि नैव सम्भवति। कदा १ परयोस्वतिरोधिनोः सत्त्वसतत्वयोः सतोः तथाऽसत्त्वं सतत्त्वं च । वाशब्देना- २० 1-णात्तत्र क्लृप्ति-भा०, य., प०,स०। २ अर्वाभावकल्पनाप्रतिपक्षमतस्य । ३ प्रकल्पत्वम् ।
३२६ १० म्यायविनिश्चयविवरणे [१६३ त्रापि समुच्चयात् । तत् अनन्तरोचम् 'न हि' इति सम्बन्धः । फदा ?'असत्वासातत्वयोः सत्त्वसतत्त्वमत्यनीकयोरसचासतत्वयोः सतोरिति । स्यान्मतम्-सांवृतमपि विज्ञानमसत्त्वादिविषयमेव तत्वसिद्धिनिबन्धन न सत्त्वादिवि. पयमिति; तन्ना मिथ्यावाविशेषात् । मिथ्याज्ञानमपि मणिप्रभामणिशानमेव तन्नियन्धन सत्र ५ मणिप्रापया परितोपदर्शनात न प्रदीपप्रभामणिज्ञानं विपर्ययात् , तद्वदनापीति चेत्, न तत्रापि विभ्रमे तदनुपपत्तेः । तथा हि-न मणिप्रभामणिज्ञानं तनिवन्धनं भ्रान्तत्वात् प्रदीपप्रभामणि- ज्ञानवत् । कथमेवं सतः प्रवृत्तस्य मणिप्राप्तिरिति चेत् ? ना सन्निहितस्यान्यत एव सत्यज्ञाना- तत्प्राप्तः । तदेवाह- परितुष्यति नामैका प्रभयोः परिधावतो ॥६॥ मणिभ्रान्तरपि भ्रान्तो मणिरत्र दुरन्वयः ॥ इति । परिधावतोः प्रवर्तमानयोर्मध्ये एकः परितुष्यति मणिप्राप्त्या नापरो विपर्य- यात् । फुतः परिधावतोः ? मणिभ्रान्तेरपि न फेवलं तदभ्रान्तेः । क्य सद्घान्तेः ? प्रभयोः द्विवचनान्मणिप्रदीपप्रभयोरिति । नामशब्देनानारुविमावेदयम् तत्रोपपत्तिमाह- भ्रान्ती अन मणिशाने मणिर्दुरन्वयो दुरनुगमो दुरवायो वेति । तदनेन साध्यसमत्वं १९ दृष्टान्तस्य दर्शितम् । परो दृष्टान्तसमर्थनमाह- सति भ्रान्तेरयोपश्चेत् [तत्कुतो यदि यस्तु न J॥३२॥ इति । सतिहि मणौ तत्प्रभामणिज्ञानारमा भ्रान्ति सति, तस्माददापः मणिरत्र दुरन्वयः इति दोपो नास्ति, सत्येव मणी भवन्यास्ततस्तदन्वयस्यावश्यम्भाषादिति भावः । तदुक्तम्- "मणिप्रदीपप्रभयोमणिबुधाऽभिधावतोः । मिथ्याज्ञानाविशेपेऽपि विशेपोर्थ क्रियां प्रति ॥" [प्र० वा० २६५५] इति । चेच्छब्दः पराभिप्राये । तत्रोत्तरमाह-'तत्कुतो यदि वस्तु न' इति । वस्ख मणिरूपं पदिन विद्यते तत् 'सति' इत्यादि कुतो न कुतश्चिदपि । तथा हि -कीदृशं तद्वस्तु १ शून्यमिति चेत् ; सुस्थितं तस्यास्तत्प्रापकत्वम् । सकलविकल्पविकलमिति चेत्, न; तस्याप्यन- नुभवात् । निरंशपरमाणुरूपमित्यपि श्रद्धानमात्रम् ; अनुभवप्रत्यनीकत्वात् । नानावयवसाधारणं स्थूलमिति चेत् ; अत्राह- २० कामं सति तदाकारे तद्धान्तं साधु गम्यते । 1 सतत्वयोः-आ०,००, स.। २ सतपादिवि-मा., १०, ५०, १०।३ तन्मि-भा०, घ.,५०,०। ४ तरवसिद्धिनिबन्धनम् । ५ सत्ये मणी भा०, वा, प., स.। ६ प्रान्तः। भवन्त्या. स्वदन्य-भा०,०, प., स. १७ मनिप्राप्तः । ८ मणिभ्रन्नः। ९ मणिप्रापरत्वम् ।
३२७ ५ १।६४] प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्ताव प्रसिद्धः सांशस्थूल आकारो यस्य तस्मिन् वस्तुनि सति भ्रान्तं मणिभ्रमणं यदि- त्यधिकृत्य सम्बन्ध; तदा कामम् अतीय तभ्रान्तं साधु शोभनं मणिप्राप्त्याऽवगम्यते । ने चैवम् ; अनेकान्तविद्वपिणस्तदाकारस्य वस्तुनोऽसम्भवादिति भावः । संवृत्या तदाकारमेव वस्तु परस्यापि प्रसिद्धमिति चेत्, न; दृष्टान्तवद्दार्शन्तिकेऽपि सांवृतस्यैव वस्तुनो मिथ्याज्ञानतः प्रसिद्धिप्रसङ्गात् । भवत्येवमिति चेत् ; न परमतानतिशायनात् । "सत्त्वादिवदसत्त्वादि संवृत्यैव यदीप्यते । परपक्षाद्विशेपस्ते करतदा वस्तुतो भवेत् ? ॥७९५॥ संवृत्या च वरं तत्त्वं सत्त्वाद्येवोपकल्पितम् । तत्र स्वर्गापवर्गादिसुरनसम्प्राप्तिसम्भवात् ॥७९६॥ न सर्ववातुनैराम्यनिर्विकल्पादि तत्रवत् । न हालौकिकमन्यता किञ्चिदिष्टमवाप्यते ॥७९७॥ प्रयोजनवदुन्मुच्य निष्प्रयोजनमाश्रयन् । प्रेक्षावत्तां कथं नाम कक्षीकर्तु क्षमो भवान् ॥७९८॥ सन्न सांवृतं तत्त्वमित्युपपन्नम् । भवतु वास्तवमेवेति चेत्, न तस्य मिध्याज्ञानादसिद्धः। सर्वेपामपि तत एवाभि. १५ मतसिद्धिप्रसङ्गात् । तदाह- अयमेवं न वेत्येवमविचारितगोचराः ॥३३॥ जायेरन संविदात्मानः सर्वेषामविशेषतः॥ तावता यदि किश्चित्स्यात् सर्वेऽमी तत्वदर्शिनः ॥६४॥ इति । अयं पहिरन्तश्च प्रतीयमानो भावः एवं शुन्यतादिरूपेण न था नैव एवं सत्यादि. २० रूपेण एवभित्यस्य इति शब्दव्ययहितस्यात्र सम्बन्धात् । इत्येवमविचारितगोचरा अनानाविषया जायेरन उत्पद्य रन् संविदात्मानो विज्ञानस्वभावाः सर्वेषां प्रवादिनाम् अविशेषतो विशेपमन्तरेण । ततः किम् ? इत्याह-तावता तजननमात्रेण यदि चेत् किञ्चित् शून्यादिकं स्यात् भवेत् सर्वे निरवोपा अमी वैशेषिकादयस्तत्त्वदर्शिनः स्वाभिमतद्रव्यादिपदार्थतत्वदर्शनशीलाः स्युरिति वचनपरिणामेन सम्बन्धः । द्रव्यादीनां विचारासहत्यादयथार्थत्वमेवेति चेत् ; न: शुन्यादावपि तदसहत्वाविशे- पात् । कथं वा द्रव्यादेविचारासहत्वम् ? कथक न स्यात ? शून्यनिर्विकल्पवादिनोविचार- स्यैवासम्भवात् , सतोऽपि तस्य स्वांशमात्रपर्यवसानात् । तदाह- १ तयाकारमतीय तद्रान्त-आ, य०, २०,०। तच्छन्देन । ३ न पैशान्त-आ०,०, प., सन ३ संविरया ५ मातवमि-भा०, ५०, ५०स०। ५ सत्तादि-आग, 4०, १०, स० | मिथ्या हानादेव । ७-यश्वा जा-आ०,०प० स० ।
- न्यायविनिश्चयविवरणे [१६६ पर्वतादिविभागेषु स्यांशमानाविलम्पिभिः ॥६५॥ विकल्पैरुत्तरैवेत्ति तत्वमित्यतियुक्तिमत् । इति । पर्वतग्रहणं सर्वद्रव्योपलक्षणं पर्वतस्य द्रव्यत्वेन ततः तज्ज्ञातीयोपलक्षणोपपत्तेः । आदिशब्देन गुणादिपरिप्रहः । पर्वत आदियेषां ते पर्वतादयः, त एव परस्परतो विभज्य- ५ मानतया विभागाः विशेषास्तेषु । तत्वम् अयथार्थत्वम्, 'तेषामयथार्थानां भावस्तत्वम्' इति व्युत्पादनात् । तत् वेत्तितज्जानाति सौगत इत्यतियुक्तिमद् अतिशयेन सयुक्तिकम्, उपहसनमेवत् अयुक्तिमत्येवमभिधानात् । कैः १ विकल्पैः विचारज्ञानैः । कीदृशैः १ उत्तरैः उत्तरन्ति व्यवस्थायेकल्यादुल्लवन्त इत्युत्तरास्तैः, इत्यनेनोपहासे कारणमुक्तम् । तदाद- शून्याविकल्पवादेषु विकल्पानामसम्भवात् । तैः क्वचित्तावविज्ञानमुपहासास्पदं न किम् ? ।। ७९९।। अनुपायं हि किश्चिन्न कस्यचित्सिद्वि च्छति । अनुपायेधसिद्धौ हि फस्य केन दरिद्रता ।।८००॥ भवन्तु वा विकल्ला, तथापि तैः स्वांशमाने वा नारोपितामिलायाकारणे पर्यवसितः क्वचिदन्या तत्त्वपरिज्ञानमतियुक्तिमदेवत्यावेदयन्नाह-स्वांशमात्रावलम्पिभिः १५ इति । तथा हि- १० २० स्वरूपमारनिर्मग्नविकल्पैस्तत्त्वयेदनम् । फथमन्या यव्याद्ययथार्थ प्रकल्प्यते ॥८०१॥ अनुमानादिवान्यन तदाभासादपि स्वयम् । तत्त्वज्ञानं कुतो न स्यादविशपाद्विदोस्तयोः ॥८.२॥ अनुमानस्य साध्येन सम्बन्धान्चें विशिष्टता । सम्बन्धोऽपि विकल्पान परतः शक्यवेदनः ।।८०३।। वतोऽपि स्वात्मनिर्मग्नात्सम्बन्धप्रतिपत्कथम् । सम्बन्धे तस्य सम्बन्धादेव सत्यनवस्थितिः ॥८०४॥ विकल्पजननान्मानं येन प्रत्यक्षमुच्यते । अनयेव च पद्धत्या निषिद्धा सोऽपि युद्धते ।।८०५॥ शुक्लस्य दर्शनं यद्वन्मानं शुक्लविकल्पतः । स्यात्पीतादिपिकल्लादप्यविशेषात् पुरोदितात् ॥८०६॥ 1-मात्रविलम्बि-ता-२ वर्षम-मा०,०, प., स.1 तत समाती-NI., . प., स.। "नव संभ-., R., प...। ५-णर्य-स। -मानलिमि-सा. विशिभ्यता .. ०,०,810 विपादन।
प्रथमा मत्यक्षप्रस्ताव . शुक्ले शुक्लविकल्पस्य सम्बन्धाच्चेद्विशिष्टता। न तस्यापि प्रमाणत्यप्रसङ्गादनुमानयत् ।।८०७॥ गृहीतविषयत्वं तु स्वाशमानावलम्बिनः । न तस्य शक्यते व यतः स्यादप्रमाणता ।।८०८।। 'एकत्वाध्यवसायेन स्वय दृश्यविकल्प्ययोः । गृहीतग्रहण तत्र कल्प्यते यदि सौगतैः ॥८०९॥ एकत्वं व्यवसायस्यैवाशो दृश्यविकल्ययोः । कथं यतो विकल्पस्य गृहीतग्रहणं भवेत् ।।८१०॥ एकत्वाध्ययसायेनेत्यादेः पुनरुदीरणे । तदेवोत्तरमेव स्यादनवस्था महीयसी ॥८११॥ गृहीतार्थत्वमीक्षमनुमानेऽपि विद्यते । तत्कथं स्यात्प्रमाणं य-प्रमाणद्वयमाससम् ॥८१२॥ प्रयोजनविशेपाश्चेत्तन्मानं कः स कथ्यताम् । निश्चयश्वेन शुक्लादिविकल्पेष्वपि तद्गतेः ।।८१३॥ प्रवृत्तिरिति चेन्नौरया अपि तत्रोपलम्भनात् । निश्चयादेव नीलादो यतो लोकः प्रवर्तते ॥ ८१४॥ समारोपनिषेधश्चेत्सोऽपि तेष्वस्ति येन तैः । अप्रामाण्यसमारोपो दर्शनेषु निषिध्यते ॥८१५॥ न तंत्र तत्समारोपो यस्य तैः स्यान्निषेधनम् । इति चेकिमिदानी तद्विकल्पानामपेक्षया ।। ८१६॥ अपेक्ष्येत परः कार्य यदि विद्यत किश्चन । यदकिञ्चित्करं वस्तु किं केनचिदपेक्ष्यते ॥८१७॥ ततस्तेषु तदारोपो गम्यता तदपेक्षया । तनिषेधात्प्रमाणत्व तद्विकल्पेष्वपि स्फुटम् ॥८१८॥ तस्मानासो" विशेषः सः, वस्तुलेशाहो यदि । विकल्पेषु स कि नास्ति "शुलतादेरुपमहात् ॥८१९॥ स्थांशमागवलम्बित्वात्त शाहणं कथम् । तेपु" चेनुमानं किं स्वाशादन्यन वृत्तिमत् ॥८२०॥ . २५ सम्बन्धश्चेद्विशिष्टत मा०, ब०, प०, सः । २ एकखाद्यवसा-भा०, ०,१०, स.।३ प्रयोजन- विशेष । तिनत-भाग, प., , स। ५ चेत्तस्या अपि भा०,०,०, स०। ६ विकल्पेषु । ७ दर्शने । सामाण्यसमारोप । ९० वा. १२५९ । १. समायोपनिषेधः । शुक्रत्वादे-आ०,.., १०, स.1 ११ विकल्पेषु ।
न्यायविनिश्चयविवरणे [१६६ अभिन्नयोगक्षेमत्वे सत्येषमनुमानवत् । मानत्वं चेद्विकल्पानां मानद्वित्वं विलुप्यते ॥८२१॥ अमानत्वेऽप्यमानत्वादनुमानस्य किं च ते । कथं प्रत्यक्षमानत्वं स्वांशमग्नः प्रदीयताम् ॥८२२॥ इति । तदाह-'पर्वतादि' इत्यादि । पर्वत आदियेषां समुद्रादीनां ते पर्वतादयः। विम- ज्यन्ते विशेपेण परिच्छिद्यन्ते यैस्ते विभागाः पर्वतादीनां विभागा पर्वतादिविभागास्तेषु संविदात्मसु । 'संविदात्मानः''इत्ययेह विभकिपरिणामेन सम्बन्धात् । तत्वंप्रमाणत्वम् , तच्छब्देन 'प्रमाणमात्मसात्कुर्वन्' इत्यत' इहोपस्थितस्य प्रमाणस्य परामर्शः । वेत्ति जानाति । कः ? सोगतः । कैः ? विकल्पैः व्यवसायैः । कीटशः ? उत्तरः प्रत्यक्षोत्तर. १० कालभाविभिः इत्यतियुक्तिमत् । अग्रोपपत्तिमाह-'स्वांश' इत्यादि । सुगमम् । यापुनरैतत्-"आवरणं तर्हि परमाणूनामसंसर्गात्कथम् १ इति न युक्तम् । न ह्यययविप्रतियद्धपावरणं काप्युपलब्धं येन तत्वाभावे परमाणुपु न स्यात् , तथा प्रति. घातादयः । अथैवमुच्यते- छिद्रत्वात्परमाणूनां संइतेः स्यात्पटादिकम् । कथमावरणं वातस्यातपस्य जलस्य च ।। अवयविसंयोगमन्तरेण परमाणव एव केवलाः अव्याहतपरस्परान्तरानुप्रवेशाः कथमावरणभाजः ? अनोच्यते-असंसृष्टाः कथमवयविनं जनयन्ति ? संसर्गच नकदे- शेन ; तदभावात् । न सर्वात्मना ; अणु पात्रपिण्डप्रसङ्गात् । संयोगस्य पदार्थान्तरस्य जननेनेति चेत् । तमेव संयोग सान्तराः कथं जनयन्तीति समानः प्रसङ्गः। संसर्गे २० परमाणुमात्रपिण्डप्रसङ्गः । संसर्गचेत् ; कि संयोगेनापरेण तथा अवयविना ? अथ सान्तरा एव संयोगपश्यविनच जनयन्ति तथा सत्यावरणादिकार्यमपि किन्न जन- यन्ति ? (प्र० वार्तिकाल० १९९१] इति । तबाह-पर्वत' इत्यादि । विभग्यन्त इति विभागा विशेषाः स्वलक्षणपर. माणवः तेषु तत्वम् । किं तत् १ इत्याह-पर्वतादि। पर्वणो भावः पर्वता सा च आवेष्ट. कत्वमेव वंशादिपर्ववत् । अनेनावरणमुक्तम् । पर्वता आदिर्यस्य प्रतिघातादेः क्रियान्तरस्य वत् पर्वतादि । तत्किम् ? वेत्ति जानाति प्रज्ञाकरः । के विकल्पैः अनन्तरविचारः । कीदृशैः ? उत्तरः । नैयायिकादि प्रति उत्तरीकृतैः इति अतियुक्तिमत् । अनोपपति- माह-वांशमात्र' इत्यादि । । 1श्लो.६४। २६.० ५। ३ संसर्गभावप्रयुक्त अवयविवाभावे । ४ तथा हि प्रति-भा, ब०,०,1५साद्धटा-भा०,०,५०, स.११-सानुप्र-मा०,०, प.स."
२२६६] प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्ताव स्ववित्तिनियतैत्ति विचारैः परमाणुषु । कार्यमावरणादीति नोपहास्यमिदं कथम् ? ॥८२३॥ अन्यथा नीलविज्ञानात्तत्त्वं त्रैलोक्यगोचरम् । जन: सर्वोऽपि जानीयात् सर्वज्ञोऽपि स्फुट भवेत् ।।८२४॥ तेपीमणुपु सम्बन्धात्स्त्रांशमात्र विदामपि । तेभ्यस्तत्तत्वसंवित्चिरित्यप्यज्ञानकल्पितम् ॥८२५॥ तज्ज्ञत्वं न हि तेषां यत्तत्सम्बन्धेऽपि विद्यते । अन्यथा साध्यसम्बन्धालिहं साध्यज्ञतां ब्रजेत् ॥८२६॥ लिङ्गाल्लिङ्गिनि विज्ञानमनुमानं यदुच्यते । तत्त्रुट्यतां क्यचिन्नीत्या ततो निष्फलकल्पनम् ॥८२७॥ तेभ्योऽप्यन्ये विकल्पाश्चेदणुतत्त्वग्रहक्षमाः । तत्राप्ययं प्रसङ्गः स्यात्स्यांशमात्रावलम्बनात् ॥८२८|| तेभ्योऽप्यन्यविकल्पानां प्रक्लुमावनवस्थितः । अणुतत्त्वपरिज्ञानं न युगेनापि सिद्ध्यति ।। ८२९॥ अवश्वकल्यान्मानत्वं विचाराणां यदीष्यते । अवश्चकत्वमेवेदमतज्जत्ने कथं भवेत् ॥८३०॥ सम्बन्धाच्चेन्न लिङ्गवत्येवमेव प्रसन्जनात् । लिङ्गानामेव मानत्ये व्यर्थिकवानुमा भवेत् ॥८३१।। तन्नार्थानसभासिने युक्तमर्थेष्वत्रन्चनम् । विकल्पानामतश्चेदं कोर्तेरजानकीर्तितम् ॥ ८३२॥ "लिङ्गलिगिधियोरेवं पारम्पर्येण वस्तुनि । प्रतिबन्धात्तदाभासशून्ययोरप्ययञ्चनम् ॥" [प्र०या० २१८२] इति । कथं वा सम्बन्धादपरिज्ञानादेव क्वचिदकचनम् ; सर्वस्य प्रसङ्गात् । परिज्ञाता- देवेति चेत ; न ; परमाणूनामदर्शने तत्परिज्ञानानुपपत्तेः । भवतु तदर्शनमपीति चेत् ; न ; अमदादो तस्याभावात् । भाने तदेव तेष्वययव्यादिकल्पनस्य बाधकं स्यात् । तथा च यदुक्तम्- २५ "अत्राप्यतीन्द्रियदर्शियोगिप्रत्ययो भवति बाधकः, यदि योगी भवेत्" [प्र०वार्तिकाल २९१] इति ; सदत्यन्तफल्गुल्पितम् ; सन्निहितादस्मदादिदर्शनादेव तदाधने विप्रकृष्टपुर- पप्रत्ययात् तत्कल्पनानुपपत्तेः । योगिशब्देनारमदादिरेवोच्यते तस्यापि देशतोऽतीन्द्रियार्थदर्शि. त्वादिति चेत् , न ; 'यदि' इत्यादिविरोधात् । प्रत्यात्मवेदनीयस्यास्मदादिभावस्य अनाश- १ विचाराणम् । र परमाणुसम्बन्धेऽपि । ३ अविसंवादित्वात् । ४ कीर्तनम् मा०, ५०, ५०, स० । ५ परमाणुदर्शनस्या ६ परमाणुए। -स्तापजलिप-मा०, २०, ५०, स०। ८ -दिविधानाद, भा०, ५०, प ... २० - - १० ३३२ न्याययिनिश्चयचियरणे [११६ भास्पदत्वात् । आशक्यने धानेने योगिभावो यदिशब्दोपादानात् । भवतु योगिनेव तेषा' दर्शनमिति पेत् । इदमपि कस्मात् ? तैपामेव विचारक्षमत्वान्नावयव्यादीनां विपर्ययादिति चेत् ; किमिदं तेषां तलमत्वम् ? न सावत्तद्विषयत्वम् ; अनभ्युपगमात् । तत्प्रविबद्ध- विषयत्वमिति चेत् ; बदपि फुतः ! तेपामेव तेन दर्शनादिति चेतन; परस्पराभयात्- ५ सेपाम्' इत्यादिना तत्प्रतिबद्ध इत्यादेस्तेन च 'तेपाम्' इत्यादेर्यवस्थापनात् । भवतु षा सति योगिनि तेन तेषामेव दर्शनम् , असति तु कथम् ? न चैकान्तेन सन्नेवासी यदीत्या- शङ्कावचनानुपपत्तेः तस्य पाक्षिकामापसव्यपेक्षत्वात् । तत्र किञ्चिदेतत् । ततो विचारसा- फल्यमभ्युपगच्छता वक्तव्यं पहिरर्थविषयत्वं विकल्पानाम् , अन्यथोपहासास्पदत्वेन तरसा- फल्यानुपपत्तेः। प्रकारान्तरेणापि "तेपां तद्विपयत्वं दर्शयन्नाह- सन्तानान्तरसद्भुतेश्चान्यवानुपपत्तितः ॥२७॥ विकल्पोऽर्थक्रियाकारविपयत्येन तत्परैः । ज्ञायते न पुनश्चित्तमात्रेऽप्येष नयः समः ॥६८॥ इति । धर्मकीत:" सन्तानादन्यस्तच्छिप्यादिसन्तानः सन्तानान्तरं तस्य सद्भूतिः १५ सद्भावः । सैव फरमादिति चेत् ? शास्त्रकरणात् । न हि "तत् स्वार्थम् ; निश्चिततदर्थत्वात् , अन्यथा करणायोगात् । कालान्तरतनिश्चयार्थत्वात्स्वार्थमेवेति चेत् ; न ; तन्निश्चयस्यापि पूर्वतभि- श्चयादेव भावात् । कदाचिद्विच्छिद्येतापि तत्प्रवन्ध इति चेत् ; तर्हि पर एव विच्छिन्नतत्प्रवन्ध. प्रतिपत्ता तद्विपरीतत्वादिति परार्थमेव "तत्करणम् , तश्च पराभावे न सम्भवति । मा भूदिति चेत् ; न ; उपलम्भात् । सोऽपि सप्नादिवत् भ्रम एवेति चेत् ; किमस्य वचनस्य फलम् ? २० तद्धमज्ञानमिति चेत् ; अस्ति परः, तदभावे तज्ञापनानुपपत्तेः । इदमपि नास्त्येव वचनमिति चेत् । न ; 'उपलम्भात्' इत्यादेरनुबन्धादव्ययस्थापत्तेश्च । ततः पर्यन्ते फिश्विद्वचनं पार. मार्थिक परार्थश्च वकव्यम् , वद्वच्छात्रं चेति सिद्धा सन्तानान्तरसद्भूतिः, तस्या अन्पथा. नुपपत्तितः, ज्ञायते प्रतीयते । कः ? विकल्पो व्यवसायः । केनात्मना १ अर्थकि- याकारविपयत्वेन अर्थक्रिया स्नानपानादिः तां करोतीत्यर्थक्रियाकारो जलादिः स विषयो २५ गोचये यस्य तस्य भाषस्तत्त्वं तेन । कैायने ? तत्परैः स; अर्थक्रियाकारः परः प्रधानो येषां तैजनैः। कथं पुनर्विकल्पैर्जलादेर्महणम् १ कथं च न स्यान् ! स्वग्रहणस्वभावेन तदयोगात् । परमाणस्वभावेनेति चेत् ;न स्वभावभेदे विकल्पत्यापि भेदात्मनो भेदापत्तेः। भवत्वन्य : प्रज्ञावरेण । २ परमाणूपम् । ३ परमाणूनामेव । ४ विचारक्षमत्वम् । ५ तत्प्रतिबन्धवि-मा, २०,५०,स. । ६ योगिना । -बन्ध-आ०, २०, ५०, स.1 ८ योगी । ९-ता बद वर-भा, १०,५०० विकरपाना बहिरर्थविषयलम् । ११ धर्मकीर्तिम्-भा०, २०, ५०, स.। १२ शास्त्रकरणम् । १३ शास्मानिश्चयप्रबन्धः । १४ शास्त्रहरणम् । १५ भ्रमस्य । ।। जलादिग्रहणायोगात् ।
प्रथमा प्रत्यक्षपस्तावा . १४६८ एवार्थविकल्प इति चेरा ; न ; तस्याप्यस्ववेदिगोऽर्थविषयत्वासम्भवात् घटादिवत् । स्ववेदने तु ततोऽप्यन्य एवार्थविकल्पः स्यात् । न चेदमुचितम् । तत्राप्येवं विचारे अनवायापैत्तेरिति चेत्ने; स्वपरविषयस्वभावभेदाधिष्ठानस्यैकस्यैव विकल्पस्य भावात् । कथमेकस्यानेक स्वभावत्वं विरोधादिति चेत् ? कथमन्तविचारस्य अनेरुपरामर्माधिष्ठानत्यम् ? प्रति परामर्श भिन्न एव विचारोऽपीति चेत ; कि बरेदकल्पनया बहिरर्थवेदनस्यैकेनैव प्रतिक्षेपसम्भवात् । ५ बहुभिरेव तत्प्रतिक्षेप इति चेत ; न बहूनां युगपदसम्भवात् विकल्पानां तदनभ्युपगमात् । क्रमेण सम्भव इति चेत् । न ; क्रमवतामेकत्र कार्ये व्यापारानुपपत्तेः, अन्यथा कन्यामा- विवराभ्यामपि गर्भनिष्पत्तेर्न कन्या गर्भवती दूष्या भवेत् । तस्मादेक एव परामर्शभेदेपि विचारो वक्तव्या, तथा स्वपरग्रहणस्वभावभेदेऽपि विकल्प इत्युपपन्नं तस्यार्थक्रियाकारविपयत्वम्। अवश्यं चैतदेवमङ्गीकर्तव्यम् , कथमन्यथा सन्तानान्तरस्य परिक्षानम् तत्राप्यस्य विचारस्याप्रति- १० रोधात् । न चापरिज्ञातस्यैव तस्य सत्यं नित्यादिवत् । न च तन्नास्त्येव ; विधारकरणात् । परार्थ हि "तत्करणं कथं पराभावे भवेत् । संशयितेऽपि परे भवत्येव तस्करणम्-'यदि स्यात्परस्तदर्थमिदम् , न चेत् न' इति बुद्ध्येति चेत् ; न ; अनेकान्तविद्रुपे संशयस्यैवा. सम्भवात् , तस्य 'इमिस्थमन्यथा वा' इति परामर्शद्वयात्मकत्वे सत्येवोपपत्तेः । तद्वयात्म- नस्तस्यै सम्भवे या विकल्पेन कोऽपराधः कृतो येन स एव स्वपरवेदनस्वभावद्वयात्मा न १५ भवेदित्युपपन्नं तेने बहिरर्थस्य वेदनम् , अन्यथा "तद्वलेन सन्तानान्तरस्याप्यव्यवस्थितेः । गनु यावदर्थान्तरस्यैव जलादेविकल्पवेद्यत्वमनुमानादुच्यते तावदनर्थान्तरस्य करमान कथ्यते तदनुमानस्यापि भावात् १ तथा हि-जलादिस्तहिकल्पादनन्तरम् , तद्वद्यत्वात् , तत्स्थ. रूपवदिति चेत् ; न, सन्तानान्तरेण व्यभिचारात् , वस्य तद्वेयत्वेऽपि तदर्थान्तरत्वात् । न च व्यभिचारिणो गमकत्वम् अन्यथानुपपत्तिवैकल्यात् । इदमेवाह-न पुनः नैव तद्विकल्पानर्थान्त- रतया चित्तमेव न जडमिति चित्तमानं जलादि तस्मिन् साध्ये, न केवलं जडरूप इत्यपिशब्दः, एषोऽनन्तरोक्तो नयः न्यायोऽन्यथानुपपत्तिरूपः समः सदृशः तत्र तदभावात् । ननु सन्तानान्तरस्य विकल्पो न तावत्प्रत्यक्षम्; परचेतसां साक्षादप्रतिभासनात् । अनुमानमिति चेत् ; न; लिङ्गाभावात् । व्याहारादेस्तु न लिगत्वम् ; गाढमूर्छावी तदभावेऽपि भावात् । तद्विशेफ्स्य "वत्त्वमित्यपि न युक्तम् ; असिद्धे साध्ये वस्त्यैव दुरवबोधत्वात् । सिद्ध २५ तस्मिन् तद्बुद्धिरिति चेत् ; न; परस्पराश्नयात्-साध्यसिद्धया सद्विशेषस्य तत्सिध्या च साध्यस्य व्यवस्थापनात् । तदेवाह- . . २० . 1-प्यस्वरांव-आग, च०, ५०, १०।२ -संवेदने-बा०, २०, २०, स० । ३ -पत्तिरिति भा०, २०, प०, स.। न पर-मा०, २०, ५०, स०। ५ "कथं पुनर्विकल्पैर्नमदेहमित्यादिहस्य"-ता टि।। सन्तानान्तरस्य । विचारकरणम् । ८ इदमित्यर्थमन्य-मा०, ०,१०, स०। ९ संशयस्य । १. विकल्पेन । विकरुपयलेन । १२ व्यवहारे व० । १३ सन्तानान्तराविनामाविना व्याहारादिविशेषस्य । लिलम् । १५ सन्तानान्तरे साध्ये।
न्यायविनिश्चययिधरणे 11० अन्योन्यसंश्रयान्नो चेत् [तत्किमज्ञानमेव तत् । ] इति । उक्तरूपात् परस्पराश्रयात् नो चेत् न यदि सन्तानान्तरसनिरिति सम्बन्धः । ननु अयमन्यत्रापि प्रसङ्गः-पायकादी धूमादेरपि न लिगत्वम् गोपालकलशादो तदभावेऽपि भावात् । तद्विशेषस्य सत्त्वमित्यपि न सुन्दरम् ; पावकासिद्धी तस्यैयापरिज्ञानात् । तसिद्धी ५ तत्परिक्षाने पूर्ववत्सरस्पराश्रयात् । तद्विशेषस्य स्वसाध्यनियमलक्षणस्य धूमादिस्वरूपत्वात्, अपरिझातेऽपि पावकादौ भवत्येव परिज्ञानमित्यपि न शोभनम् ; व्याहारादिविशेषस्याप्येवं परि- ज्ञानप्रसङ्गादिति चेत् ; सत्यम्; अस्तीदं समाधान सुबोधत्वात् , तन गजनिमीलनं कृत्वा समाधानान्तराभिधित्सया परं पृच्छन्नाह-तत्किम्' इति । तत् तस्मात् सन्तानान्तरं नो चेदित्यरमात्, किं तव सिद्धम् ? पर आह 'अज्ञानमेव तत्' इति । तद्विकल्पस्यार्थक्रि- याकारविषयत्वम् अज्ञानम् अप्रतिपत्तिकं सन्तानान्तरसद्धावलिङ्गस्य वज्ञानस्य तलिङ्गाभावेऽ- सम्भवादिति भावः परस्य । तत्रोत्तरमाह--- 7 17 २० अद्वयं परचित्ताधिपतिप्रत्ययमेव वा ॥६९॥ वीक्षते किं तमेवायं विपमज्ञ इवान्यथा । इति । न तावद्ध्याहारादिरप्रतिपन्न एव व्यभिचारोद्भावनस्य तत्रामम्भवात्। प्रतिपत्तिरपिन निर्वि- १५ कल्पात्। ततस्तस्यानिश्चयात् , अनिश्चिते च व्यभिचारोद्भावनस्यासम्भवान् । नापि विकल्पात; तस्याप्यनुभयस्वभावत्वे तदसम्भवात् । तथा हि-तमेव प्रसिद्धमेव । कमेव ? परचित्ताधि. पतिप्रत्ययं परचित सन्तानान्तरज्ञानम् अधिपतिप्रत्ययो निमित्तकारणं यस्य सः परविचा. धिपतिप्रत्ययो व्याहारादिः तमेव, 'असहायं न तद्व्यभिचारादिकम्' इत्येवकारार्थः, किम् ? इत्याह-वीक्षते प्रतिपद्यते किं नैव । कः ? अयम् अनन्तरोत्तो विकल्पः । कुत इत्याह- 'अद्वयम्' इति । एवकारः प्रथमोऽत्र सम्बध्यते । द्वौ अवयवो यस्य तवयं द्विरूपं वस्तु तस्मा- दन्यद् अद्वयं तदेव यत इति, विकल्पविशेषणमपि अद्वयमिति नपुसंकमेव, परवल्लिङ्ग स्यात्तत्पु- रूपस्य । तदिदमभिभिहितं भवति- स्वग्रह कस्वभावोऽयं विकल्पस्त्वन्मते स्थितः ।, व्याहारादेः कथं तेने पहिरर्थस्य वीक्षणम् ॥ ८३३॥ अवीक्षणे क्थं तस्य व्यभिचारः प्रकल्प्यताम् । सन्तानान्तरसद्भावनानं तस्मान्न यद्भवेत् ।। ८३४॥ तस्माद्धेतोरनेकान्ते विकल्पो दर्शयन्नयम् । युक्रवद्विषयो न स्यादन्यथा तद्गतिस्ततः ॥८३५॥ , पावागावेऽपि । २ गावाविनाभाविनी धूमस्य । ३ पावकसिमौ । ४ विकल्पैन । ५ व्याहारा ! १ म्याहारादिष्यभिचारपरिज्ञानम् ।
१७०] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताया सन्तानान्तरलिङ्गस्यासम्भवेऽपि ततः स्थितम् । विकल्पो बहिरर्थस्य वेदितेत्युदितान्नयात् ॥८३६॥ उक्तसमर्थनं दृष्टान्तमाह-विपमं स्थपुटितप्रदेशं जानातीति विषमज्ञः स इव यद्वत् अयम् अन्यथा अन्येन समप्रकारेण । किम् ? वीक्षते । तद्वत्स्वरूपमात्रविपयोऽपि विकल्पो व्याहारादिकमपरम् । किम् ? वीक्षत इति । वाशब्दो वितर्के । 'किम्' इत्यस्यानन्तरं ५ द्रष्टव्यः । प्रयोगश्चान-यद्यस्मादन्यविपर्य न ततस्तस्य धीक्षणं यथा विपमज्ञानात् समभावस्य 'व्याहारादेरन्यविषयश्च विकल्पः स्वरूपमात्रगोचरत्वात् तन्मात्रस्य व्याहारादेविभिन्नत्वात् । बतो न ततस्तस्य व्यभिचारोद्भावनमुपपन्नम् तदुद्भावने वा तस्य बहिर्विषयत्वमगीकर्तव्य. मिति भावः । व्याहारादेव्यभिचारान्न ततः सन्तानान्तरप्रतिपत्ति तदभावाच न तद्वलेनार्थक्रियाकार- १० विपयत्वपरिज्ञानम् । विकल्पस्य किमिदानी तत्त्वं भवेत् यत्र भवतः स्थिरप्रज्ञत्वम् । सर्वव- स्तुनरात्म्यं सर्वविकल्पातीतं संवि-मानं वेति चेत् ; कुत एतत् ? तस्यैव विचारसहत्वादिति चेत्। अत्राह-'अद्वयम्' इत्यादि । 'नो' इत्यनुवर्तमान वाशब्दवत् किमः परं द्रष्टव्यम् । किं वा नो वीक्षते ? किन्तु वीक्षत एव । कः ? अयम् अद्वैतादिविचारः । कम् ? तमेव प्रसिद्धमेव । कीदृशम् ? अन्यथैव इति । प्रथमस्यैवकारस्यात्र सम्बन्धः । 'भूतम्' १५ इत्यध्याहारश्च कर्त्तव्यः । तदयमर्थ:-अन्यथैव परपरिकल्पिताद्वैतादिप्रकारादन्येनैव प्रकारेण भूतमिति । तं किरूपं वीक्षते ? अद्वयम् उपलक्षणमिदम्, तेन शून्यमपीति । दृष्टान्तमाह- 'विषमज्ञ इव 'इति । यद्वदन्यथाभूतमेवाज्ञो जगो विपं वीक्षत इति । कुतः पुनरेतत्- द्वैतमेवाढवम् अशून्यमेव शून्यं तद्विचारो चीक्षते' द्वैतादेरेवाविद्यमानत्वात् अविद्यमानस्य घान्यथा वीक्षणायोगादिति चेत् ; न, तस्य प्रमाणविषयतया विद्यमानत्वात् । सदाह – 'परचि. २० त्ताधिपतिप्रत्ययम्' इति । परं प्रकृष्टमविचलितत्वेन चित्तं ज्ञानं यस्य सः परचित्तः निर्वाधप्रतिपत्तिक इत्यर्थः । अधिपत्यतेऽधिगम्यतेऽनयेत्यधिपतिः अधिगतिस्तस्याः प्रत्ययो विश्वा. सः संवादो यस्मिन्नसौ अधिपतिप्रत्ययः संवादिज्ञानविषय इत्यर्थः । परचित्तधासावधि- पतिप्रत्ययश्चेति परचित्ताधिपतिप्रत्ययः समिति । परचित्तपदेन "स्वप्रसिद्ध्या अधिपति- प्रत्ययपदेन "परप्रसिद्ध्या द्वैतादेविद्यमानत्वमादयति । तथा हि- अस्खलप्रतिमासं यत् ज्ञानं संवादद्वत्तथा । द्वैतादि तस्य संवेद्यं विद्यमानं कथं न तत् ? ॥८३७|| ततो नातादेविचारादयस्थापनम् ,"आत्मादिविचारवत्तद्विचारस्यापि विपर्यासरूप. २५ 1सव द्वयम-आ०, ५०, १०,१२ व्यवहारादे-भा०, २०, ५०, स०।३ व्याहारादे। विका ल्पस्य । ५ विकल्पस्य । ६-नौ तत्सरचं भवतः स्थितप्त-आ०,व०, ५०1७ ६९ श्लोकवः। किशब्दात् । ९ ते तदद्वैता-800, 40, प० । १० जैन। १ सौगत । १२ भात्मशन्देनार वेदान्तिभिरभ्युपगतं ग्रा पालन साटिए अद्वेतविवारस्यापि ।
३ . B न्यायधिनिश्चयविवरणे [११७१ त्वेन विशेपाभावादिति निरूपितत्वात् । विशेपे वा तद्वत् याह्यविकल्पस्यापि स्वप्नविकल्पा- त्तदुपपत्तौ नार्थक्रियाकारविषयत्वं तस्य ने स्यात् । न विचारविकल्पैरप्यद्वैतादेर्महणं येनार्य दोपः । न घेतावता वैफल्यमेव पाम् ; समारोपन्यवच्छेदेन फलेन फलवत्त्वात् । तदेवाह- समारोपव्यवच्छेदः साध्यश्चेत्सविकल्पर्कः ॥७०॥ इति । ६ सुयोधमेतत् । अनोत्तरमाह- नेपापि कल्पना साम्याद्दोपाणामनिवृत्तितः । इति । एपापि अनन्तरपि कल्पना न । कुत एतत् ? साम्यात् पूर्वन्यायस्यात्रापि सदृशत्वात् । तथा हि-यथा ते: "स्वांशमात्रालम्भिभिर्न वैतादेः परिच्छेदस्तया तब्यवच्छेदोऽपि । न ह्मपरि- शाते तस्मिन् तद्गतविपरीतारोपनिवर्तनम् । परिक्षाव एव मरीचिकादौ तद्गतजलाधारोपनियतन- १० स्योपलम्भात्। हेत्वन्तरमाह-दोषाणाम् अनुक्तानामपि उत्तानां साम्यात् इत्यनेन गतत्वात अनिवृत्तितो निवर्तनाभावात् । तथा हि- कोऽयं समारोपरय व्यवच्छेदो नाम ? "तत्त्वज्ञापनमिति चेत् , कि "तस्य तत्त्वम् ? अवस्मिन् "सद्हत्वमिति चेत् । न ; तस्य तत्स्यसंवेदनादेव परिज्ञानात् । वस्य" निर्षिक- त्पत्वात्तदपरिज्ञावमेवेति चेत् ; न अज्ञाताविषयतया विकस्पानां प्रमाण्यप्रसङ्गात् । २५ तेऽपि तत्र समारोपमेव व्यवच्छिन्दन्ति न "तत्त्वं प्रतिपद्यन्त इति चेत् ; न, वनापि 'कोऽयम्' इत्याद्यनुबन्धादव्यवस्थापत्तेश्च । तन्न तत्त्वज्ञापनं तब्यवच्छेदः । तन्नाश इति चेत् ; कस्तदनाशे दोप: ? तत्त्वज्ञान प्रतिबन्ध इति चेत् ; कुत "एतत् ? तस्य विभ्रमत्वादिति चेत् ; न; स्वतस्तत्परिज्ञाने तदनुपपत्त । न हि गुडे विपज्ञानं विभ्रमरूपतया प्रतिपन्नमेव गुडतत्त्वपरिज्ञान प्रतिवन्धुम (बलु) हति । स्वतस्तत्परिज्ञानमपरि- ज्ञानमेव निर्विकल्पत्वादिति चेत् ; फयमिदानी वस्य तत्त्वज्ञानप्रतिवन्धित्वम् अनुपदर्शित "स्वरूपस्य सदसम्भवादतिप्रसङ्गात् । कथं वा तन्नाशाय विकल्पान्वेषणम् ? अज्ञाते तस्मिन् तदनुपपत्त । न च "विकल्पात्तन्नाशः "तस्याऽहेतुकत्वेनाभ्युपगमात् । तन्नाशोऽपि न तावच्छेदः । तदुत्पत्तिपतिवन्ध इति चेत् ; फरतदप्रतिबन्धे दोपः ? तत्त्वज्ञानप्रतिवन्ध इति चेत् । न उक्कोत्तरत्वात् । कथं या सति समर्थकारणे "तत्प्रतिबन्धः कुतश्चित् ? असमर्थे तुन । तद्बाश्यवि-भा०, व०, प०, ! १-वं तस्यान्यान्यविचा-800, 40, | ३ 'म' इति निरर्थक भाति विकल्पानाम् । ५ नैका विष-पा०,०, ५०६ -राविकल्प आ०,०,०1 Bांशमात्रावक- रिमभिर्न-भा०, २०, ५० 16-मात्रविल-ता०।९-स्वादित्यनुवृत्ति-या० ५०, प.11. "समारोपव"- ता. समारोपस्य! १२ समि-भा... चेतस्य आग,..प्र.।" स्वसंवेद मस्य । १५ समारोपवम् । १६ समारोपनाशः । १. एव तत्तस्य धा.,.,.1-14 प्रतिबन्धमई-आOAD, प। १९वमावस्य भा०,.,.२० समारोपे। २. विहल्पस्थास्समा-भा.प.प.। २२ नाराय। २५ सततरमात् भरणात् नाशोऽपि । २४-पि सध-मा०, २०, प.। २५ तस्वशानपतिबन्धः । २० १ २५ .. .
न तस्या- , १७२] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव: किञ्चिद्विकल्पैदयसिद्धत्वात् 'तत्प्रतिबन्धस्य । कारणस्यैव सामर्थ्य तै प्रतिरुध्यत इति चेत् ; न ; असतः प्रतिरोधासम्भवात् । स्वहेतुवलोपनीतत्वेन सत एवेति चेत् । प्युत्पत्त्यवस्थायां तदयोगात् , अन्यथा तदुत्पत्तेरेव प्रतिरोधप्रसङ्गात् । न घेदमुचितम् , सति "समर्थे कारणे तत्प्रतिरोधस्याप्यनुपपत्तेः । तत्रापि कारणस्यैव सामर्थ्य सेः प्रतिरुध्यत इति चेत् ;न; 'असतः' इत्याद्यनुबन्धादव्यवस्थानुपगाच्च । पश्चात्तत्प्रतिरोध इति चेत् ; न; ५ तदा तस्य स्वयमेव नाशात् , विकल्पानां मृतमारणत्वापत्तेः। समर्थमपि फारणं विकल्पाभावे सत्येष समारोपमुपजनयति न पुनस्तावे तादृशत्वात्तत्सामर्थ्यस्येति चेत् ; नैवम् , नियत्या. प्यनिषेधासगात् । तदपि हि सत्येव सहकारिणि कार्यकारि न तदभावे तच्छत्तरपि तार- शत्वात् सहकारिणा तदनुपकारस्यान्यत्रापि समानत्वात् । सतो नैवं वैस्तदुत्पत्ति. प्रतिबन्धः। स्यान्मतिरेपा भवतः-विकल्पसहायः 'समारोपक्षणस्तदुत्तरक्षणमसमर्थं जनयति सोऽप्यसमर्थतरमसमर्थतमं च सोऽपि, ततश्च कार्यानुत्पत्तिरित्येवं प्रकारः, "तैस्तदुत्पत्तिप्रति. वन्ध इति ; साऽपि न ज्यायसी ; यस्मात्तत्क्षणस्यं समर्थस्यैवोत्तरक्षणस्य जनने यदि शक्तिः कथं 'विकल्पसाहाय्येऽपि "अन्यथा तज्जननम् ? "अथासमर्थस्यैव ; तथापि किं विकल्पै- स्ततएव तदुत्पत्तेः ? कथं वा सदन्यक्षणस्य वस्तुत्वम् , सजातीयमतन्वतस्तदयोगात् ? १५ विजातीयतननादिति चेत् ; न ; अशली तस्याप्ययोगात् । शताविति चेत् । न ; सजाती. यस्यापि तत्प्रसङ्गात् । अशक्तिरेव "तत्रेति चेत् ; न शक्ताशक्ततया "तद्भेदापत्तेः । विजातीय- सनने शतिरेवेतरत्राशक्तिरिति चेत् ; न3; "इतरस्यापि विषयः तन्न प्रसङ्गात् (इतरस्थापि सननप्रसद्भात) अशक्तिरिति "शक्तरेषाभिधानात् । भवसपि शक्तिस्तन्न तनोतीति चेत् ; विजा- तीयमपि न तनुयात् अविशेषात् इत्यवस्तुत्वमेव वस्य । भवत्विति चेत् ; कथं तस्य कुतश्चिदु- २० स्पत्तिः अवस्तुनस्तदयोगात् व्योमारविन्दवदिति ? ततोरप्यवस्तुत्यमजनकत्वात् , एवं तद्धे. तोरपीति सर्वस्यापि तत्प्रपन्धस्यावस्तुत्वमापतितम् । ततः समारोपस्यैवाभावान्न तळ्यवच्छेदेनापि विकल्पानां साफल्यमतो वस्तुविषयत्वेनैव तदुपपत्तिः । एवं विकल्पानामर्थक्रियाकारविषयत्वज्यवस्थापनेन बहिरर्थमवस्थाप्य प्रकारान्तरे. णापि तमवस्थापयन्नाह- न हि जातु विषज्ञानं मरणं प्रति धावति ॥७१।। असंश्चेद्वहिरर्थात्मा प्रसिद्धोऽप्रतिपेषकः । इति । २५ 1 तत्वज्ञान प्रतिबन्धस्य । २ विकल्पैः । ३ प्रतिरोधायोगात् । ४ समर्थका-आ०,०प०।५ नैव तै-ता। ५ विकल्पैः। ६ समारोपलक्ष-श्रा०,०प० । विकल्पै । 4 रामारोपक्षणरय । ९ विकापसाहाय्यस्यान्य-आ., ०प०11०:असमर्थक्षण जननम् । अथासामर्थ्यस्यै-आ०,०प० । १२ तत एतद्ध-आ.व.,प० । अस. मर्यसमारोपक्षणादेव। १३ -यतानना-पा०, २०, प० । १५ जातीयोपसौ । १५ समारोपक्षणे मेदः स्यात् । १६ सजातीयऽशक्तिः । १७ सजातीयस्यापि । १८ शक्तिरेवा-मा०,०प० । १९ समारोरक्षणस्य ।
. न्यायविनिश्चयविवरणे [९७१ त्वेन विशेषाभावादिति निरूपितत्वात् । विशेपे वा तद्वत् यााविकल्पस्यापि स्वप्नविकल्पा- त्तदुपपत्तो नार्थक्रियाकारविषयत्वं तस्य ने स्यात् । न विचारविकल्पैरप्यतादेहणं येनायं दोपः । न चैतावता वैफल्यमेव तेपाम् ; समारोपव्यवच्छेदेन फलेन फरवत्त्वात् । तदेवाह- समारोपव्यवच्छेदः साध्यश्चेत्सविकल्पकैः ॥७०॥ इति । ५ सुयोधमेतत् । अत्रोचरमाह- नेपापि कल्पना साम्याहोपाणामनिवृत्तितः । इति । एपापि अनन्तपि कल्पना न । कुन एतत् ! साभ्यात् पूर्वन्यायस्यात्रापि सदृशत्वात् । तथा हि-यथा ते: "स्वांशमात्रालम्बिभिन द्वैतादेः परिच्छेदस्तथा तद्यवच्छेदोऽपि । न हापरि. ,' ज्ञाते तस्मिन् तद्गतविपरीतारोपनिवर्तनम् । परिझात एव मरीचिकादो तद्गतजलाधारोपनिवर्तन. १० स्योपलम्भात्। हेत्वन्तरमाह-दोपाणाम् अनुक्तानामपि उक्तानां साम्यात् इत्यनेन गतत्वात् अनिवृत्तितो नियतनाभावात् । तथा हि- कोऽयं समारोपस्य व्यवच्छेदो नाम ? "तत्त्वज्ञापन मिति चेत् , कि "तस्य तत्त्वम् ? अवस्मिन् "तहत्वमिति चेत्न ; तस्य तत्त्वसंवेदनादेव परिक्षानात् । वस्य" निर्विक- स्पत्यात्तदपरिक्षावमेवेति चेत् ; न अज्ञातार्थविपयतया विकल्पानां प्रमाण्यप्रसङ्गात् । १५ तेऽपि तत्र समारोपमेव व्यवच्छिन्दन्ति न "तत्त्वं प्रतिपद्यन्त इति चेत् ; न, तत्रापि 'कोऽयम्' श्त्याद्यनुबन्धादव्यवस्थापत्तैश्च । तन्न तत्त्वज्ञापनं तब्यवच्छेदः । तन्नाश" इति चेत् ; कस्तदनाशे दोपः १ तत्वज्ञानप्रतिबन्ध इति चेत् ; कुत "एतत् ? सस्य विधमत्यादिति चेत् । न ; स्वतस्तत्परिक्षाने सदनुपपत्त । न हि गुडे विपक्षानं विभ्रमरूपतया प्रतिपन्नमेव गुडलवपरिज्ञानं "प्रतिवन्धुम (वा) इति । स्वतस्तत्परिज्ञानमपरि- २० शानमेव निर्विकल्पत्यादिति चेत् ; फथमिदानीं तस्य तत्वज्ञानप्रतिवन्धित्यम् अनुपदर्शित "स्वरूपस्य सदसम्भवादविप्रसङ्गात् । कथं पा तन्नाशाय विकल्पान्वेपणम् ? परिम" सदनुपपत्र नप "विकरूपातलाश: "तस्याऽहेतुकत्वेनाभ्युपगमात् । ततोऽपि "न तम्यवच्छेदः । तदुत्पत्तिपतियन्ध इति घेत ; कस्तदप्रतियन्धे दोपः १ तत्त्वज्ञान प्रतियन्ध इति पेत् । न । उकोत्तरस्यात् । क्थं या सति समर्थकारणे "तत्प्रतियन्धः युत्तचिन् ? असमर्थे तु न तबाह्यवि-भा०,०, प., । १ - सस्यान्यायविचा-भा०, ६०, '' इति निरप भाति । । विकल्पानाम् । ५ नेपा पिल-मा०, ०.१.१६-राविकप भा०, ६०,५.1 शमात्रा सिभिर्न -४०, ०,५०16-मात्रपिल-पा०1९ -स्वादित्यनुति-मा० .०,०11. "समारोपस"- a.mमारोपातहमि-मा...॥ तस्य वा०,०,प्र. 11 खसीर माय ! १५ समापस्तम् । १६ समारोपनाशः । एष तत्तस्य भा.द...१ प्रतिबन्धमई-te., R.RRIER ID....१. समागरे। २. शिकल्लापातमा-मा... २५ नाराय। २५ तर तरमा पारणात् नाशोऽपि । २४ -पितष-मा... प.१५ तवानप्रतिबन्धः । -- -- तस्या- सति -- शत्वात्, १।७२] प्रथमः प्रत्यक्षमस्ताव: किञ्चिद्विकल्पैदैयसिद्धत्वात् 'तत्प्रतिबन्धस्य । कारणस्यैव सामयं तैः प्रतिरुध्यत इति चेत् ; न ; असतः प्रतिरोधासम्भवात् । स्वहेतुबलोपनीतत्वेन सत एवेति चेत् । प्युत्पत्त्यवस्थायां तदयोगात् , अन्यथा तदुसत्तेरेव प्रतिरोधप्रसङ्गात् । न चेदमुचितम् , *समर्थे फारणे सत्प्रतिरोधस्याप्यनुपपत्तेः। तत्रापि कारणस्यैव सामध्ये तैः प्रतिरुध्यत इति चेत् ; न 3; 'असतः' इत्याद्यनुबन्धादव्यवस्थानुषशाच्च । पश्वाचस्पतिरोध इति चेत् ; न ; ५ तदा तस्य स्वयमेव नाशात् , विकल्पानां मृतमारणत्वापत्तेः। समर्थमपि कारणं विकल्पाभावे सत्येव समारोपमुपजनयति न पुनस्तद्भावे तादृशत्वात्तत्सामर्थ्यस्येति चेत् ; नैवम् , नित्यस्या- प्यनिषेधप्रसङ्गात् । तदपि हि सत्येव सहकारिणि कार्यकारि न सदभावे तच्छत्तरपि ताह- सहकारिणा तदनुपकारस्यान्यनापि समानत्वात् । ततो नैव "तैस्तदुत्पत्ति- प्रतिबन्धः। स्यान्मतिरेपा भवतः-विकल्पसहायः 'समारोपक्षणस्तदुत्तरक्षणमसमथं जनयति सोऽप्यसमर्थवरमसमर्थतमं च सोऽपि, ततश्च कार्यानुत्पत्तिरित्येवं प्रकारः, "तैस्तदुत्पत्तिप्रति- पन्ध इति ; साऽपि न ज्यायसी ; यस्मात्तत्क्षणस्यं समर्थस्यैवोत्तरक्षणस्य जनने यदि शक्तिः कथं 'विकल्पसाहाय्येऽपि "अन्यथा सज्जननम् ? "अथासमर्थस्यैव ; तथापि किं विकल्पै- स्तत" एव तदुत्पत्तेः ? कथं वा तदन्यक्षणस्य वस्तुत्वम् , सजातीयमतन्यतस्तदयोगात् ? १५ विजातीयतननादिति चेत् ; न ; अशक्तो तस्याप्ययोगात् । शक्ताविति चेत् ; न ; सजाती. यस्यापि तत्प्रसङ्गात् । अशक्तिरेव "तत्रेति चेत् ; न शक्ताशक्ततया "तद्भेदापत्तः । विजातीय- तनने "शक्तिरेवेतरत्राशक्तिरिति चेत् , न; "इतरस्यापि विषयः तन्न प्रसङ्गात् (इतरस्यापि तननप्रसगात्) अशक्तिरिति "शक्तरेवाभिधानात् । भवत्यपि शक्तिस्तन्न तनोतीति चेत् ; विजा- तीयमपि न सनुयात् अविशेषात् इत्यवस्तुत्वमेव"तस्य । भवत्विति चेत् ; कथं तस्य कुतश्चिदु- २० सत्तिः अवस्तुनस्तयोगात् व्योमारविन्दवदिति १ तद्धेतोरप्यवस्तुत्वगजनकत्वात् , एवं तद्धे. तोरपीति सर्वस्यापि तत्प्रमन्धस्यावस्तुत्वमापतितम् । ततः समारोपस्येवाभाषान्न तव्यवच्छेदेनापि विकल्पानां साफल्यमतो वस्तुविषयत्येनैव तदुपपत्तिः । एवं विकल्पानामर्थक्रियाकारविषयत्वव्यवस्थापन पहिरर्थमवस्थाप्य प्रकारान्तरे. णापि तमवस्थापयन्नाह- न हि जातु विपज्ञानं मरणं प्रति धावति ॥७॥ असंश्चेद्वहिरर्थात्मा प्रसिद्धोऽप्रतिषेधः । इति । , तत्वज्ञान प्रतिबन्धस्य । २ विकल्पैः । ३ प्रतिरोधायोगात् । ४ समर्थका-आ०,०प०१५ नैव ते-ता। ५ विकल्पः। ६ समारोपलन-भा०,१०,१०। ७ विकल्पै. । ८ समारोपक्षणस्य । ९ विकापसाहाय्यस्यान्य-आ०, १०.१०11० असमर्थक्षणजननम् । ११ अथासामर्थ्यस्यै-भा०,१०,१० । १९ तत एतद्ध-मा०,०,०। यस. मर्यसमारोपक्षणादेव । ।३ -यतानना-भा०, 4०, प० । १५ सजातीयोपत्तो । १५ समारोपसणे स्यात् । १५ सजातीय शक्ति१७ सणानीयस्यापि । १८ शक्तिरेवा-मा०,२०प० । १९ समारोपक्षणस्य, ३३८ . . .. न्यायविनिश्चयविवरणे [७३ न हि नैव जातु कदाचिदपि विपज्ञानं विपाकारं चेदनं मरणं प्रति धावति कारणत्वेनोपसर्पति सर्वस्यापि तज्ञानवतो मरणप्रसगात् । न चैवम् , नियतस्यैव तदर्शनात् । न रूपमात्र विज्ञानं येनार्य प्रसङ्गः किन्तु रसविशेषज्ञानमेव । न चेदं सर्वस्यास्ति; यस्य त्वस्ति पस्य भवत्येव मरणमिति चेत् ; कुचोऽस्यास्तित्वम् ? तद्वासनात इति चेत् । न ; ५ तस्या अपि सर्वत्र भावात् । तत्प्रबोधादिति चेत् ; न ; 'तस्यापि स्वरसतो भावे नियमा. योगात् । अन्यतः प्रयोधकादिति चेत् ; तदपि यदि वासनान्तरम् , स एव प्रसङ्गः, वस्यापि सर्वर भावात् । वत्प्रयोधस्यापि तदन्तरापेक्षायाम् अनवस्थादोपात् । ततो न 'विपशाना. न्मरणमिति सूकम्-'न हि' इत्यादि । कदैतत् ? इत्याह-असन् अविद्यमानः चेत् यदि यहिरर्थात्मा यहिरर्थस्वभावो १० विपाख्य इति शेपः । सति तु पहिरर्थात्मनि विपतदास्यादनादेर्भवति मरणमिति यावत् । तदयं प्रयोग:-अहिरर्थरूपमेव विपं ततो मरणस्यान्यथानुपपत्तेः । कुतः पुनर्विषान्मरणमिति परिज्ञानम् ? न तायद्विपज्ञानात् ; तस्य "मरणे भाविन्यप्रवृत्त । न हि तदानीमविद्यमानं तत्र प्रवृत्तिमदुपपन्नम् । नापि मरणशानात् । तस्यापि प्रागसतो विपविपयस्वानुपपत्तेः । न चोभयसमयव्यापकमेकज्ञान सम्भवति ; तस्यापि स्वतः १५ पूर्वसमयव्यापिना रूपेणोत्तरसमयव्यापिनः तेन च पूर्वसमयन्यापिनः परिज्ञानाभाये रूपद्वया. धिष्ठानतया दुरवगमत्वात् । "अन्यतस्तदवगम इति चेत् ; न ; तत्राप्येकसमये समयद्वयवति च पूर्ववहोपात् । पुनस्तदन्यपरिकल्पनायाम् अनवस्थानात् । नच विपमरणयोरपरिज्ञाने "सुपरि. बोधस्तद्गतो हेतुफलभावः, इत्यसिद्धमेतत्-'विपान्मरणम्' इति यदन्यथानुपपरया बहिरर्थविप. साधनमिति चेत् ; अबाह-प्रसिद्धः प्रमाणनिश्चितो बहिरर्थात्मा। कीदृशः' इत्यपेशायां २० मरणं प्रति धावन्' इति प्रत्ययपरिणामेन सम्बन्धः । तर हेतु:-अप्रतिषेधकः न विद्यते प्रतिषेधको यस्येत्यप्रतिषेधको यतस्ततः प्रसिद्ध इति । यदप्रतिपेधकं तत्प्रसिद्धं यथा परस्य संविद्वैतम् , अप्रतिषेधकश्च बहिरारमा उक्तविशेषण इति । मनु या तस्य न प्रतिपेध तथा न साधकमपि ततः साधक-सरकममाणाभावा- सन्देह एव । न च सन्दिग्धस्य प्रसिद्धत्वमिति चेत् ; अनाह- सन्देहलक्षणाभावान्मोहश्चेव्यवसायकृत् ॥७२॥ "बाधकासिद्धेः "स्पष्टाभात्कथमेप विनिश्चयः । इति । १ -चिद्वि-आ०,०प० विषरसहानम् । ३ यस्यास्ति भा०, २०,.11 वासनाप्रशेषस्य । ५ वासनान्तरापेक्षायाम् । ६ विक्षना-भा०, २०, ५० ।। इति तु शेषः भा०, २०, ५०1८ -नि विशेष-भा., प.प० । ९ सौगतः प्राह । 10-मानान मा०, २०, ५०1"मरणभा-मा०,१०,५०।१२-मेव ज्ञानम् भा., 4०, प० । १३ उत्तरसमयभ्यरिना पेश । १४ भन्यज्ञानात् 'विषान्मरणम्' इति ज्ञानम् । १५ "उप- सिवनन मात्"-ता. टि. १६ "पर्म लघु सर्वत्र' इति नियमस्यामादेवप्रयोग । स्वामिभिषि देवागम: स्तोत्र तथा प्रयुक्तम् । अवाच्यतैकान्तेऽयुतिरिति ।"-ala टि१७ स्पाभावात् भा०, य., प० ।
१७३] मथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव सन्देहेन लक्षणं सन्देहलक्षणं यथोक्तस्य बहिरात्मनः तस्याभावात् , निश्चये. नैव तहमणस्य भावात् प्रसिद्ध इति । विपापे हि याह्यार्थे मरणं प्रति धावति । सन्देहो नास्ति लोकस्य निश्चयस्यैव दर्शनात् ।।८३८॥ अस्त्ययं निश्चयः किन्नु प्रमाणान्नैप साधकात् । उक्नीत्या प्रमाणस्य तनाभावनिरूपणात् ॥ ८३९।। जनादिवासनोल्लासरूपाढ्यामोहतः परम् । ईशो निश्चयः पुंसां न्यायाघातक्रियानमः ॥८४०॥ तदाह-'मोहश्वेययसायकृत्' इति । नत्रोत्तरम् 'बाधकासिद्धेः' इति । वक्ष्यमाणमत्र 'कथम्' इति सम्बन्धनीयम् । बाधकम् उक्तविषयस्य प्रमाणस्य निषेधकम् , तस्यासिद्धेः १० कारणात् । कथम् ? न कश्चित् , मोहो व्यवसायकृत् इति । प्रमाणस्य निषेधश्चेद्विपतरकार्यवेदिनः । मुतश्विनिश्चयस्तादृक् व्यामोहादिति युक्तिमत् ॥८४१॥ न चैवं बाधकस्यैवाप्रसिद्धेर्ननु चोदितः । विचारो बाधकश्चेत् प्राक् कुतस्तस्यापि सम्भवः ॥८४२|| १५ व्यामोहाच्चेत् कथं तेन तन्निपेधस्य साधनम् । निश्चयादपि तादृक्षादुरतसिद्धिप्रसञ्जनात् ||८४३॥ प्रत्यक्षाच्चेन्न सत्रैवं परामृप्टेरसम्भवात । विकल्पात्मा परागृष्टि विकल्प हि युज्यते ॥ ८४४॥ तदाह-स्पष्टाभात् प्रत्यक्षात् । कथम् न कश्चित् । एप पूर्वोचो विचारात्मा निश्चय २० यदि च विपप्रत्यक्षमेयात्मनो मरणे तत्प्रत्यक्षमेव वा चिपे प्रवृत्यभावं परामशति तेद्धावमेव किन्न परामृशति विशेपाभावात् । एतदेवाह- 'विपर्यासोऽपि किन्नेष्टः [आत्मनि भ्रान्त्यसिद्धितः] ॥७३॥ इति । कथं पुनरतद्विपयस्य तत्परामर्शित्वमिति चेत् ? कथमतद्विपयत्वम् ? अतत्का- २५ लत्वादिति चेत् ; न; तत्कालेऽपि तस्य कथञ्चिदन्वयात् अन्यस्यापि प्रतिपत्तेः । वक्ष्यति चैतत्- 'भेदज्ञानात्' इत्यादिना । भ्रान्तिरेव तत्प्रतिपत्तिरिति चेत ; न ; पाधकाभावात् । न भेदज्ञानं बाधकम् ; तस्यैवात्यन्तभेदविपयस्याप्रतिभासनात् । कश्चिद्भदेविषयस्य तु न बाधकत्वम् ; अविरोधात् । १ थाहोऽय भा०, २०, ५०।२ तथाह आ०, २०, ५०।३ -कल्पी हि भा.प., प.1 ४ मरण- प्रत्यक्षमैव । ५ "हिं"-ता-टि।
२४० म्यायविनिश्चयविवरणे 1१७४ तदेवाह-'आत्मनि भ्रान्त्यसिद्धितः' इति । ज्ञानानामन्वय आत्मा तत्र भ्रान्तेरसि. द्धिती निर्वाधप्रतिपत्तेरेव सिद्धितो विपर्यासोऽपि किन्नेष्ट इति । अवश्यम्वैतदेवमभ्युपर्णः न्तव्यम् , अन्यथा तत्र प्रवृत्तेरिव वदभावस्याप्यपरामर्शप्रसङ्गात् । न हातद्विषयं तत्रात्मनः प्रवृत्त्यभावं पराम्रष्टुमर्हति । मा भूदुभयथापि परामर्शः तदुपायस्यान्वयस्यैव दुरवयो- ५ धत्वादिति चेत् ; कस्येदानी सुपावबोधत्वम् ?, अद्वयवेदनस्यैव, "स्वरूपस्य स्वतो गते" [प्र०वा० ११६] इति चेत् ; न ; तस्यापि यथाकल्पनमप्रतिभासनात् । न हि यथा तेत् परैः परिकल्प्यने व्यपगलितसलफल्पनाजालकल्मापं तथा तस्य प्रतिभासनमस्ति, प्राह्मादिभेद- कल्पनाकलुषीकृतवपुप एव प्रत्सवलोकनात् । अन्यैव तत्कल्पनेति चेत् ; न ; अद्वैतक्षनेः, अन्यत्वस्यानवलोकनाच्च । विभ्रमात्तदनवलोकनमिति चेत् ; कस्य विभ्रमः ? तत्कल्पनाया १० एवेति चेत् । यदि नाम तस्या विभ्रमः किमद्वैतस्यागवं यतस्तत् यथापरिकल्पनमेव ,आत्मानं नोपदर्शयति ? उन्मत्तो यदि नामैको लोप्टं पश्यति हेमवत् । अनुन्मत्तोऽपि लोकः किं तथा तत्प्रतिवीक्षते ? ॥८४५|| यथाकल्पनमस्त्येव स्वतस्तस्योपदर्शनम् । बलिना सदिकल्पेन छादानिश्चीयते न चेत् ॥८४६॥ दर्शनानिर्विवाद चेत् का दोपो निश्चयाहते। निर्विवाद ततश्चेन्न तदुष्टं व स्वतः कथम् ॥८४७॥ तदेव तेन हप्टं यत् "विवादायेनमुच्यते । सविवादं च दृष्टं घेत्येतनातिप्रसजनात ॥८४८॥ तत्कल्प न भ्रान्तिरदूत निर्भेदं भेदवत्वेन स्वरूपं पश्यतीति चेत् ।।८४९।। सनै तत्स्वरूपस्य स्वतो दृष्टेविलोपनात् । विनमस्तत्ववित्तिय तत इत्यतिसाहसम् ॥८५०] भेद् एष भ्रमस्तस्य चिदादी नात्मनीति पेत् । विभ्रमेतररूपं तदेकं संवेदनं कथम् ॥८५१॥ तथैव प्रतिभासाचेदेतदेवाह सोगत:- अद्वयं द्वयनि समात्मन्पप्यवभासते । इति । संवेदनं पेलु अद्वयम् अभिन्नम् । कीदृशमपि ? द्वयनि समपि विभ्रमेतये. भयाकारमपि । अपिशब्दस्य मिनाक्रमत्वात् । तस्य वाटशवं करिस्मन् ? आत्मनि २० तद्यतः। २५ १-यं हि प-भा०, २०, ५० । २ दुर्योध-भा०प०प० । अद्वयवेदनम् । ४-लकल्मा-मा ५०, प० । ५ कल्पनायाः। ६ न चित् मा०, प.,.। . दर्शनात् । विवादाऽनेन मु-प। पिनादा. 'वसु -१ खल्बन्वय मार, ०५.।
८- १७६ ) प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताया ३४१ स्वरूपे । तादृशमपि तदद्वयं कुत इति चेत् ? अवभासने यत इति । न हि प्रतिभासमान. मन्यधाकल्पनमर्हति, अतिप्रसङ्गादित्येवमकमानेकान्ते परेण निरूपिते सत्याह- इतरत्र विरोधः क एक एव स्वहेतुतः ॥७॥ तथा चेत्स्वपरात्मानौ सदसन्तौ समश्नुते । इति । इतरत्र कमानेकान्ते, कः न कश्चिद् विरोधः । कदाचिद्यदि समश्नुते सम्यक् बुञ्चन्तरपरिहारेणानुते व्याप्नोति । क ? एक एव पोधात्मा न द्वौ ! को ? सदसन्नी सन् वर्तमानो विषपाही पर्यायः, असन् अनागतो मरणमाही तौ । कीदृशौ ? स्वपरात्मानौ स्वात्मानौ स्वस्वभावौ कथश्चित्तयोस्तरमाव्यतिरेकात् , परात्मानौ च कथञ्चिद्विपर्ययात् । कुतः पुनरित्थम्भाव इत्याह-स्वहेतुतः स्वकारणादिति । अपरापरपर्यायव्यापी बोधः स्वहेतुतः । तादृशादुपजातो यन्न विरोधेन दुष्यति ॥८५२॥ सत्रोपपत्तिमाह-'तथा' इति । तेन प्रतिभासनप्रकारेणेति । तथा हि- यथेक एव घोधारमा विभ्रमाविभ्रमात्मकः । निर्वाधप्रतिभासत्वाशुगपरपरिकल्प्यते ॥८५३।। क्रमेणापि तथा किन्न परापरविवर्त्तभूः । बोधात्मक प्रकल्प्येत निर्भासादनुपप्लवात् ॥८५४॥ न विभ्रमः संवेदनस्य स्वभाव तद्विवेकस्यैव तत्स्वभावत्वात् । न चैतावता तत्र निर्विवाद तद्विवेकस्य 'सतोऽप्यायोधिमार्गमनवमासनात् , सचेतनादिस्वभावतयैव तस्य प्रत्यवलोकनात् । तन्न विभ्रमेतराकारतयोभयाकारं संवेदनं यत्तावष्टम्भेन क्रमानेकान्तव्यवस्थापन मिति चेत् ? अत्राह- तत्प्रत्यक्षपरोक्षाक्षक्षममात्मसमात्मनोः ॥७॥ तथा हेतुसमुद्भूतमेकं किन्नोपगम्यते । इति । तत् संवेदनम् उपगम्यते सौगतेः । कीदृशम् ? प्रत्यक्षः सदादि परोक्षो विभ्रमविवेकस्तयोः अक्षणं व्यापनम् अक्षा क्षमत इति क्षमं तदात्मकम् । पुनरपि तद्धि। शेषणम् आत्मानम् सजातीयाद्विजातीयाच्च स्यति ध्यावर्त्तयति इति आत्मसम् , निरंशक्ष. २५ णिकरूपमिति । तस्योपगमने किम् ? इत्याह-'एकम्' इत्यादि । 'त' इत्यनुवर्तनीयम् । तत् संवेदनं किन्नोपगम्यते अगम्यत एव । कोदशम् ? एकमभिन्नम् । फयोः ? आत्मनोः क्रमस्वभावयो । अक्रमस्वभावयोः एकस्य परेणैवोपगमात् । कुतस्तत्तादृशम् ? 1- प्रन-भा०, ब०, प० । २ तेन प्र-आ, य०, प० । ३ यनैक मा०, घ०, पवित्रमा विवेकस्यैव । ५ सतोऽयवाधि-भाग, प., १०।६-ते सौ-भा०,व०प० ।-यो.कस्य परे-मा०प०। ० 7 - ग्यायविनिश्चयविवरये १७६ इत्याइ-तथा तेन तारशात्मना हेतोः स्वकारणात् समुद्भूतं समुत्पन्नं यत इति । इदमत्र तात्पर्यम्- अनेकान्तभयाज्ज्ञानं विनमाविभ्रमात्मकम् । मुन्नतोऽप्यपरित्याज्यं तत्प्रत्यक्षेतगत्मकम् ॥८५५॥ विरुद्वधर्माध्यासेऽपि कथञ्चित्तद्यथा मतम् । एक वद्वत्क्रमेणापि फिमेकं नोपगम्यते ॥५६॥ दृष्टान्तः प्राच्य एवान्यो नेवि नास्माकमामहः । पलं हि फेनाप्यस्माकमुपायेनाभिवान्छितम् ॥८५७॥ यदि प्राच्या प्रसिद्धस्ते तेन नः साध्यनिश्चयः । परश्वतः सिद्धरतेन नः साध्यनिश्चयः १८५८॥ न च तद्वितयत्यागे निर्विवाद मतान्तरम् । यत्र ते भवति प्रज्ञाऽनेकान्तमयवर्जिता ॥८५॥ इति । वर्तमानपर्यायादभेदे पूर्वापरयोः । तयोरपि वर्तमानत्वमेव तदभेदात् वत्स्वरूपवदिति न्मानमेवावशिष्यते, तस्य चानभ्युपगमात् कथन नैयाम्यवादः ? कथं वा सत्प्रत्यक्षत्वे तयो. १५ रपि न प्रत्यक्षयं यतरता प्रमाणान्तरप्रवृत्तिः फलपती भवेत् ? तथापि तत्परोक्षत्वे न सन्तान भेदः सन्तानान्तराणामपि तदनन्तराणामेव तद्वत् परोक्षत्वोपपत्तेरिति कयन्नैकात्मवाद इति चेत् ? अत्राह- सवैकत्वप्रसङ्गादिदोपोऽप्येष समो न किम् ॥७६॥ इति । सर्वेषां पूर्वापरपर्यायाणाम् एकत्वं वर्तमानादभेदस्तस्य प्रसङ्गः स आदिर्यस्य नैरात्म्यवादसन्तानभेदाभावादेः स चासो दोपश्च न केवलमन्य एप त्वयोच्यमानः समः सदृशो न किं सम एव भवेत् । 'संदनेऽपि' इति शेषः । तथा हि- अभ्रमाच्चेदमिन्नः स्यात् भ्रमः सोऽप्यभ्रमो भवेत् । भ्रमाभावे कथं सूक्तं 'शाख मोहनियनम् ॥८६०॥ भ्रमादप्यभ्रमामेदे भ्रम एवावशिष्यते । अविभ्रमव्यपोहे घ फुतः किमवगम्यताम् । १८६१॥ अध्यादपि सत्वादेाद्याकारच्यवो यदि। अभिन्नोऽध्यक्ष एवायमपि तत्त्वात्तदात्मवत् ।।८६२॥ १ एक प्रत्यक्षतरात्ममिति। २-धान्ते भय-आ०, व., ए.वर्तमानाऽभेदात् वर्तमानस्वरूपाद । । वर्तमानमात्रमैव । ५ वर्तमानप्रत्यक्षन्वे । ६ पूर्वापरयो । . प्रत्यत्वेऽपि। ८ सपर्या-भाग, ब., प.। ९ पूर्वापरल ।।.म.वा. १७॥ २५ fisc) प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावा अध्यक्षे तद्विवेके च माहाकारगतिः कथम् ।। अविभागोऽपि युद्ध्यात्मेत्यादि' सूक्तं यतो भवेत् ॥ ८६३॥ परोक्षात्तद्विवेकाध सत्त्वादेरप्यभेदिनः । परोक्षभाव एव स्यात्तास्वरूपवदलसा ॥८६४॥ ततश्चैतन्यगन्धस्याप्यभावस्तस्य चाभये । त्वमपूर्वोऽसि चार्वाकश्चिन्मात्रस्यापि लोपनात् ॥८६५।। नायं प्रसङ्ग एकान्ताभेदस्याभावतो यदि । अयमेव परत्रापि समाधिः किन्न मृष्यते ? ॥८६६॥ फञ्चिदेवाभेदोऽयं पूर्वापरविवर्तयोः । वर्तमानाद्यतो लोकस्तथैव परिपश्यति ।।८६७।। लोकप्टिमनारत्य यद्गत्यन्तरकल्पनम् । तद्वन्ध्यासुतसौन्दर्यकल्पनकोदरोद्भवम् ।।८६८।। अप्राप्तानुभवास्वादं स्वबुद्धिपरिकल्पितम् । मानं चेत्क्वचिदिप्टेऽर्थे किन्न कायेह सिद्ध्यति ? १८६९।। तस्माल्लोकशा मान तथा च स्वपरं जगत् । सर्व भेदेतरात्मैवासाकर्येण प्रतीयते ||८७०॥ तदेवाह- भेदाभेदव्यवस्यैवं प्रतीता लोकचक्षुषः । इति । सुयोधम् । ततो यदुक्तम्-'कुतो धिपान्मरणमिसि परिज्ञानम् ? न सायद्विपशानात्' इत्यादि । तत्प्रतिविहितम् ; विपज्ञानस्यैव कथञ्चिन्मरणग्राहितया परिवर्तनात् , तेनैव विप. मरणयोहे तुफलभायस्यापि सुबोधत्वात् । तत: सूक्तम्-'बाह्यमेव विपं ततो मरणान्यथानुपपत्तेः' इति । ने किचिच्चेतनात्मकं यस्तु यतः सम्भधामाभ्यामनेकान्तात्मनो यहि वहेतुफल. भावाः परिझानम् , तत्परिज्ञानोपायाभावात् । "विज्ञप्तिः स्वसंवेदनामिका तदुपाय इति चेत्, न । तस्या पहिरिवान्तरपि विभ्रमत्वात् । न हि विभ्रमाद्वस्तुपरिक्षानम् अतिप्रसङ्गादिति चेत् । २५ एतदेवाशक्य परिहरनाह- विज्ञप्तिर्वितथाकारा यदि वस्तु न किञ्चन ।।७७॥ भासते केवलं नो सिद्धान्तविपमग्रहः । इति । १ प्रधा० २।३५४ । २ भेदनः बार, य०, १० । ३ ततश्चंदन्यगन्ध-भा०, 4 प० । ४. ५ "सर्वविघ्रमवादी प्राह"-ता. टि। ६ योगपध। वित्तिः स- २० - सत्य भाव-भा., ०, ५०॥ भाब,प..
, ६ भ्यायविनिश्चयविधरणे [१७९ विज्ञप्तिधुद्धिः विवथोऽसत्य आकार: प्रतिभासो यस्यां सा वितधाकारा । ततः किम् । वस्तु कार्यभमं किञ्चन चेतनमचेतनं या न भासते न प्रतिमासते न सम्यग- वगतिमुपसर्पति, तस्या एवाभावात् यदि चेत् ; अग्रोनरम् केवलं प्रमाणसहायरहितं विज्ञप्ति- वितथाकारेति , ततश्चासिद्धम् । न हि प्रमाणसम्बन्धशून्यस्यास्तित्वनिर्णयः । बुद्धरविभ्रमस्यैव विभ्रमस्योपपद्यते ।। ८७१।। कैदेतत् ? केवलं नो चेत् न यदि सिद्धान्त एव विपमो दुप्परिहरी महः सिद्धान्त. विषमग्रहः, तदा तत्केवलम् , यदा तु स विद्यते न तदा तेंद्रहस्यैव "भिक्षयोऽहमपि मायोपमः" [ J इत्यादेस्तर प्रमाणत्वात् । भवतु तत एव निर्णय इति चेत् ; १० न ; ततोऽपि विभ्रमरूपात्तदयोगात् अन्यथा तारशादेव प्रतिसिद्धान्तादपि तद्विपयस्य तत्प्रसङ्गात् । तदेवाह- अनादिनिधनं तत्वमलमेकमलं परैः ॥७८॥ सम्प्रीतिपरितापादिभेदात्तत्कि द्वयात्मकम् । इति । तत्त्वं ब्रह्मरूपम् , अलं समर्थ पुरुपार्थाय "तरति शोकमात्मवित्" [छान्दो० १५ १११३] इत्यादिना तदनस्य शोकनिरस्तर(निस्वर)गकारणतया श्रवणात् । कीदृशम् ? अनादिनिधनम् अविद्यमानपूर्वापरपर्यवसानम् । "तदेतत् बदापूर्वमनपरमनन्तरमवायम्" [पृहदा० २।५।१९] इति चयनात् । एकम् असहायम् "एक एयायपद्वितीयः" [मना० २।४] इति श्रुतेः अलं पर्याप्त परैः पहिरन्तश्च भेदैः । श्रूयत एव केवलं तादृश तत्त्वं न कदाचिदपि प्रत्यवभासत इति चेत् ; न ; विश्रममात्रेऽपि समानत्वात् , तत्मतिमासनस्यापि निरूपितत्वात् । २० प्रत्युत प्रतिभासत एव ब्रह्मतत्त्वं सकलभेदानुयायिनः प्रतिभासमात्रस्योपलम्भात् , तस्यैव च हात्वेन तद्वादिभिर्व्यावर्णनात् । कथं तद्वितीय भेदस्यापि प्रतिभासनात् । सति तस्मिन् द्वयरूपताया एवोपपनेः १ तदाह-तत् अद्वयं किम् ? नैवे, किं तर्हि स्यात् ? द्वयात्मकम् उभयरूपं तत्त्वं भवेत् । कुतः ? इत्साह सम्प्रीतिः सुखं परितापो दुःख तारादी येपो भयशोक- नीलधवलादीनां तेषां सम्प्रीतिपरितापादीनां भेदात् नानात्वात् , तस्य अद्वयवस्वे अत्य- २५ न्वमसम्भवादिति भावः। एवं पातनिकायां प्रतिविधानमाह- प्राधग्राहकवद्धान्तिस्तत्र किनानुपज्यते ॥७९॥ इति । तत्र तेषु सम्प्रीत्यादिषु भ्रान्तिर्मिध्यावभासनं किं कस्मात् नानुपज्यते न प्रसज्यते - , तदेतत् सा., व., ५०। २ दुष्पपिहारो भा०, १०,५०।। तदरणस्यैव मा०,०,.। निर्णयप्रसमात् । ५ नैवं भार,२०, प, स.अन्यले मा०, ०,५०।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव ३४५ ११८०] प्रसज्यत एवेति । निदर्शनगाह-ग्राह्यग्राहकयोः नीलतद्वदनयोः इव तद्वदिति । हेतुरत्र भेदत्वात्' इत्यवगम्यते इष्टान्ते तस्यैव भ्रान्त्यतुपञ्जनेन व्याप्तिपरिज्ञानात् । तदयं प्रयोगः- सम्प्रीत्यादिः भ्रान्त्यनुपङ्गी भेदत्वात् ग्राह्यादिवदिति । भ्रान्त्यनुपक्तिकथनेन सम्प्रीत्यादेर्भदस्य वस्तुतोऽसत्त्वं कथयन् तस्याहतप्रत्यनीकत्वं प्रतिषेधति । न हि भ्रान्त्यनुपक्तं द्वित्वं चन्द्रस्यै- कत्वप्रत्यनीकमुपलब्धमिति । तदेवमगीकृत्य सम्प्रीत्यादिभेदं तस्य तत्प्रत्यनीकत्वमपाकृतम् । इदानी स एवो. पायान्नास्तीति निवेदयन्नाह- भेदो वा सम्मतः केन [हेतुसाम्येऽपि भेदतः] । इति । भेदः सम्प्रीत्यादेर्नानात्वम् । 'वा' इति पक्षान्तरयोतने, सम्मतःसम्यक् प्रतिपन्नः । केन ? न फेनचिज्ज्ञानेन ततो न तस्य तत्प्रत्यनीकत्वम् अज्ञातस्य व्योमकुसुमवत् तदयोगा• १० दिति भावः । कथं पुनः केनेति ? यावता प्रत्यक्षत एव से परिज्ञायते सम्प्रीत्यादेभेदाधिष्ठानस्येव तंत्र परिस्फुटमवमासनात् । ततो नागमादप्यभेदप्रतिपत्तिः, भेदप्रत्यक्षेण विरोधात् । भ्रान्ति- प्रविपत्तिस्तु तंतो भवत्येव, तदविरोधिन्या एव तस्यास्ततः परिज्ञानादिति चेत् ; न ; प्रत्यक्षस्य विधिमावविपयत्वेन भेदगोचरत्वानुपपत्तेः । "व्यवच्छेदनिष्ठो हि भेदः, व्यवच्छेदश्च न विधि. १५ परस्य प्रत्यक्षस्य विषयः । तत्कथं तेन" भेदग्रहणम् ? व्यवच्छेदपरत्वमप्यस्त्येव प्रत्यक्षस्य तदयमदोप इति चेत् ; न; युगपत्तदसम्भवात् । न हि किञ्चित्क्यचिद् विधदेव प्रत्यक्षं तदेव तत्र तव्यवच्छेत्तुमर्हति, "निप्पर्यायकमेकत्र विधिव्यवच्छेदयोरप्रतिपत्तेः । पर्यायेण तस्य तत्प- रत्वमिति चेत् ; विधिपूर्वस्तर्हि व्यवच्छेदो वक्तव्यो विहितस्यैव 'अयमत्र नास्ति नासावयम्' इति व्यवच्छेदप्रतिपत्तेः" । उक्तम्च- "लब्धरूपे क्वचित्किञ्चित्ताहगेव निषिध्यते । विधानमन्तरेणातो न निषेधस्य सम्भवः ॥" ब्रह्मसि० २२] इति । भवत्वेवमिति चेत् । “न ; एकव्यापारत्वेन ऋगयत्त्वानुपपरेः । प्रत्यक्षं हि ज्ञानं क्षणिकम् , तव्यापारी विधिव्यवच्छेदी क्रमवन्तो भवेताम् , क्रमवतोहि व्यापारयोः पश्चात्तनो न तहापारः स्यात् । अपि च, जन्मैव बुद्धापारोऽर्थावग्रहरूपायाः, सा चेदर्थविधानरूपोदया विधिरेवास्या व्यापारः, न व्यवच्छेदो योगपद्यनिषेधास् , उत्पन्नायाश्चानुत्पत्तेः । । २० २५ , एवेति दर्श-आ०, ५०,३०२ भेदस्य । ३ अद्वैतप्रत्यनीकत्वाम् । ४ भेद एव । ५ मेदस्य। ६ अद्वैतप्रत्यनीकलम् । ७ भेद । ८ प्रत्यक्ष । ९ आगमात् । १० व्यवच्छेद रूपो हि ।। प्रत्यक्षेण । १२ युगपत् । १३ प्रत्यक्षस्य । १४-पत्तिः भा०, ०.प.। १४ "न खुल्वेप्रमाणशानव्यापारी सन्तो विधि- व्यवच्छेदी कमवन्ती युज्येते, क्षणिकत्वात् ; क्रमवतोहि व्यापारयोः पश्चात्तनो न तद्यापारः स्यात्, व्यवधानात् । थपि च जन्मैव बुद्धेपारो अर्यावमहरूपायाः; सा चेदर्थविधानरूपोदया, विपिरेवास्या व्यापारः योगपद्यस्य निषेधात् , उत्पनायाश्च पुनर नुत्पत।"-ग्रहसि पृ४५।
न - प्येवं प्रसङ्गात्, ग्यायविनिश्चयविवरणे [१५८० 'अपि च, सन्निहितावलम्बनं प्रत्यक्षं नासन्निहितमर्थमवभासयितुमर्हति । न चानव- भासमानं व्यवच्छेत्तुं पर्याप्नोति । अनवभासे हि तत्र व्यवच्छेचे व्यवच्छेदमा स्यात्, व्याच्छेद: कस्यचित् । तस्मानावभा(मानवभा) समाने विषये अन्यव्यपच्छेदः, अन्यस्य घटादेशसन्निहितत्वेन तज्ञानेऽनवभासनात् । ज्ञानान्तरेऽवभासनाब्यवच्छेद इति चेत् , न, ५ स्वयं व्यवच्छेदकृता तद्रूपासंस्पर्श 'अस्याय व्यवच्छेदः' इति प्रतिपत्त्यसम्भवात् । इदमप्युक्तम्- "क्रमः सङ्गच्छते युक्त्या नैकविज्ञानकर्मणोः । न) सन्निहित तच तदन्यासहि जायते ॥" [ब्रह्मासि० २१३] इति । ननु इदमेव दर्शनस्यान्यव्यवच्छेदकारित्वं यनियतविषयत्वम् । तद्धि यथा नील तला. फारनियमाद् विधत्ते तथा तदन्यन भरतीति व्यवच्छिनत्यपि, अन्यथा नियतनीलविधाना- १. नुपपत्तेः । तद्विधानादन्यस्य च अन्यव्यवच्छेदस्याभावात् । 'इदमस्ति, इदमत्र नास्ति' विधिन्यवच्छेदव्यवहारः दर्शनबलभाविकल्पविकल्पित एवेति चेत् , नीलदर्शनात् पीतादिवत् रसादेरपि व्यवच्छेदप्रसङ्गात् उत्प्रतिनियमस्याविशेपात् । भव- त्येव तद्रूपतया तस्यापि व्यवच्छेदः, तद्देशादितयैवं अनभ्युपगमादिति चेत् , न, पीतादाव- पीतादेस्तद्देशादित्वे भवत्युपलम्भो नीलबत्तुल्योपलम्भयोग्यत्वात् । न चोप- १५ लब्धिः, ततस्तद्देशादितया पीतस्य व्यवच्छेदः, रसादेस्तु न तद्योग्यत्वम् अतो न "तथा "तय वच्छेद इति चेत् , ताप्येणापि न भवेत् , तद्देशादित्ववदनुपलभ्यस्यैव तस्य तद्रूपतोपपत्तेः । उपलभ्यस्यानुपलभ्यत्वं कथ विरोधादिति चेत् ? अन्यतस्तहि विरोधाद् व्यरच्छेदो न दर्शन. नियमात् १ असति च व्यवच्छेदे कुतो पिरोधः १ इतरेतराश्रयो वा-विरोधात् व्यवच्छेदस्य, ततोऽपि विरोधस्य व्यवस्थितः । तस्मान्नै कविधिरन्याच्छेदः । "अपि च, एनियमादन्यव्यवच्छेदे चित्रादिपु नीलादीनामेकदर्शनभाजा भेदो न सिद्धयेत् , एकज्ञानससर्गात् एकन च ज्ञानस्यानियमात् । इदमप्युक्तम्- "विधानमेन नकस्य व्यवच्छेदोऽन्यगोचरः। मा स भूदविशेषणमा न भूदेकधीजुपाम् ॥" [ ब्रहासि० २।४ ] इति । तन व्यवच्छेदव्यापार प्रत्यक्षमिति न भेदविपयम् , तवो न तेनेकत्याम्नायस्य विरोधः । २५ तप्यभिहितम्-- १ "अपि च सन्निहितार्थानम्मान प्रत्यक्ष मासन्निहितममवमासयिनुमईति , न मानवभाधमानरूप एवं उत्त, पर्याप्नोति,अनवभाममाने हि तत्र वो पाच्छदमान स्पाइ, पबच्छेद कञ्चित् , सर्वस्या स्यात् । तमामानवभासमाने व्यवच्छे व्यवच्छेद । न च सन्निहितार्थावलापने प्रयोऽमनिहिनावभासो युक्त ।" -प्रशसि पृ०१५ १२ तस्मानावभासने आ०,०, ५०३ -यो सन्नि-भा, प., प०१४ "न सनिहित तच तदभ्यामर्शि जायते ।"-ब्रह्मसि.। ५ नील पीनादिक न भवति । ६ -तयास्या-भा, प.,.। नीर रूपतया 10 रयादेरपि । ८ नीलदेशतव रसादिव्य वेदानन्युगिमात् । ९ तुल्यापनभयोग्य वम् । १० नो२६ शादितया। रसादिव्यवच्छेद । १२ तुलना-महासिक . ४011 मा भूदेवियामिति मा० .प | - १ २० .
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावा १२.०] "आहुर्विधात प्रत्यक्षं न निपेध विपश्चितः । नैकत्व आगमस्तेन प्रत्यक्षेण विरुध्यते ।।" [ ब्रह्मसि० २।१] इति । ततः स्थितम् 'भेदो वा' इत्यादि । कदैतत् ? इत्साह-हेतुसाम्येऽपि' इति । हेतूनां प्रत्यक्षादिन्यायानां साम्यं विधिमानविषयत्वेनागमसादृश्यं तस्मिन् । 'अपि' इति सौष्ठवे, कुतश्चायं नियमः सुखादिः ५ सुखादिरेव न दुःखादिः, सोऽपि स एव न मुखादिरिति यतस्तस्याद्वैतप्रत्यनीकत्वं भवेत् ? एतेनैव स्वहेतुसामर्थ्यादुत्पत्चेरिति चेत् ; अनाह- भेदतः। .. तेषामेव मुखादीनां नियमश्व निरन्वयः ॥८०॥ इति । भेदतः भेदमानित्य योऽपि नियमः परस्परामिश्रणात्मा । फेपाम् ? तेषाम् १० अनन्तरोक्तानां सुखादीनाम् । स किम् ? निरन्वय एव अशक्यसाधन एव, भिन्नप्रक्रम- तया एवकारस्यात्र सम्बन्धात् । तथा हि-भेदो' नाम व्यावृत्तिः, सा चानेकाधिष्ठाना प्रति- ज्ञायते प्रज्ञायते च । तथा च तस्या' एकस्याः अनेकवृत्तेर्वस्तुस्वभावत्वेन वस्तूनामपि सुखा- दीनां भेदो न स्यात् । नैकस्मादभिन्नमभिन्नस्वभाव भिन्नं युज्यते तद्वदेव । "मपि च, भेदो नाम परस्परानात्मा स्वभावविशेषः । स चेद्वस्तुनः स्वभावः ; वस्तूनामभावप्रसङ्गः अभावात्म- प्रतिज्ञानात् । प्रकारान्तरम् भेदश्चेद्वस्तुनः स्वभावो नैक किश्चन वस्तु स्यात् , भेदेन एकत्वस्य विरोधात् परमाणुरपि भेदादनेकात्मक इति नैकः । तथा च तत्समुच्चयरूपो नैकोऽप्यस्यात्मा नावकल्प्येत तत्रैकत्वानेकत्वयोरनुपपत्तेः, तृतीयप्रकारासम्भवाच्च वस्तुनो नि:स्वभावताप्रसङ्गः। "अथ मा भूदेष दोप इत्यर्थान्तरमेव व्यावृत्तिराधीयते तथापि व्यावृत्तेरस्वरूपत्वात् स्वरूपेण भावान व्यावृत्ताः स्युः। 'स्यान्मतम्- वस्तुन्ययं विकल्प: तत्त्वमन्यत्वं वेति नावस्तुनि । अवन्तु चायं भेदो विकल्पोपनीतत्वात् मायातोयवत् तत्कथमत्रायं विचार इति ? तन्न ; एवमपि नि:स्थमायेन वस्तूनां वस्तुतो भेदाभावापत्तेः। कल्पितस्तु तद्भदो न वार्यत एव ब्रह्मवादिनाप्यनाद्यविद्या- विलसितस्य तद्भदस्याभ्यनुज्ञानात् । तन्न सुसादीनां भेदतो नियमः, तस्यैव विचाराक्षमत्वेना. सम्भवात् । तदुक्तम्- २५ "न मेदो वस्तुनो रूपं तदभावग्रसङ्गतः। अरूपेण च मिन्नत्वं वस्तुनो नायकल्प्यते ॥" [बहासि० २।५] इति । 1 तुलना-मह्मसि० पृ० ४७ । २-वे ज्ञा-ना., ब०,०।३ व्यारत्तः । ४ तुलना-"भेदः परस्परानात्मस्वभावः""-व्रह्मसिक पृ० ४७ । ५ "अपरः प्रकारः भेदश्चद्वस्तुनः स्लमाव."-ब्रह्मसि. पृ. ४८१६ गावकल्प्यते भा०,०। नावकल्पते १०॥ ७ ब्रह्मासि पृ० १७.८ प्रसि.पू.५८ । ९ वस्तुभेदा-भा०, च०, ५० , -- - ૪૮ न्यायचिनिधयविवरणे [२१८२ तन्न विभ्रमकान्तवादः, तद्वदाम्नायात् ब्रह्मवादस्याप्यवस्थितः । भवतु तर्हि विज्ञानवाद एव, तस्य प्रत्यक्षवलादेवोपपत्तेः, न ब्रह्मवादो विपर्ययादिति चेत् । अत्राह- प्रत्यक्षलक्षणं ज्ञानं मूछितादौ कथं ततः ॥ इति । प्रत्यक्ष निर्विकल्पमनुभवनं तल्लक्षणं प्रमाणं यस्मिन् तत् प्रत्यक्षलक्षणं ज्ञानम् । कथम् ? न कश्चित् । कुन एतत् ? मूञ्छितो मोहाक्रान्त आदिर्यस्य 'मुषुप्तादेः तत्र ततस्तल्लक्षणज्ञानप्रसगात् । ननु तत्र वझणं प्रत्यक्षमेव नास्ति कथं तत्प्रसङ्ग इति चेत् १ कुतस्तन्नास्ति ? अनुपलम्भादिति चेत् ; न ; अन्यत्रापि समानत्वात् , असण्डवेदनस्य जामदा- दावष्यप्रतिपत्तेः। अपि च, मूञ्छितादी ज्ञानाभावे प्रबोधस्य कदाविकत्वेनाहेतुत्वायोगात् शरीरोश. १० दानत्वप्रेसगः । तदाह- २० अज्ञानरूपहेतुस्तदहेतुत्वप्रसङ्गतः ॥८२॥ प्रवाह [ एकः किन्नेप्टस्तदभावाविभावनात् ] । इति । प्रवाह प्रबन्धो ज्ञानस्य, 'ज्ञानम्' इत्यस्य विभक्तिपरिणामेन सम्बन्धात् । कदा भवतः ? मूर्छितादेयम् । 'भूञ्छितादी' इत्यस्यापि पञ्चमीपरिणामेन योजनात् । किम् , अज्ञानम् अचेतनं रूपं स्वभावो यस्य शरीरस्य स एव हेतुः कारणं यस्य सः अज्ञान- रूपहेतुस्तत्प्रवाहः भवति' इति शेषः । कुच एतत् ? तस्य तत्प्रवाहस्य अहेतुत्वम् अकारणकत्वं तस्य प्रसङ्गतः प्रसञ्जनात् । तात्पर्यम्- गाढामूच्छाद्यवस्थायां ज्ञानस्याभावकल्पने । तस्य प्रयोघहेतुत्वमसतो न भवेत्ततः ॥८७२॥ शरीरमेव तस्येदं कारणं परिकल्प्यताम् । अन्यथाऽहेतुतैव स्याद् गत्यन्तरपरिक्षयात् ॥८७३|| अनित्यत्वमहतोश्च कथं नामोपपत्तिमत् ? "नित्यं सत्वमसत्त्वं वा" इत्यादेः स्वोक्तस्य पीडनात् ॥८७४॥ जाप्रज्ज्ञानस्य हेतुत्वाद् दोपो नैप भवेद्यदि । चिरनदृस्य हेतुत्वं कथं तस्योपकल्प्यताम् ।।८७५॥ स्वकाले तस्य भावाञ्चेदात्मनः किन्न कल्प्यते ? नित्यैकव्यापिनस्तस्याप्यभावाप्रतिवेदनान् | ८७६।। २५ सुप्रादे-आ.,.,.1 २ प्र. वा. ३॥३५३ गादगुमाप विज्ञान प्रयोथै पूर्ववचनान् । जायते व्यवधानेन कालेनेति विनिश्चितम् ।"-:. वार्तिकाल ११९ ।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः श८२] ३५९ तदेवाह- एका किन्नेष्टस्तदभावाविभावनात् । इति | एकः द्वितीयरहित आत्मा इति यावत । किम् ? कस्मात् । नेष्टः ? इष्ट एव प्रबोधहेतुः । कुत एतत् ? तदभावस्य एकाभावस्य अविभावनाद् अनिश्चयात् । गनु यद्यसो प्रामारामादेस्य एव, कथमस्ति ? अप्रतिभासनात् । अस्तित्वेऽपि ५ प्रामारामादिः किं भवति ? असन्नेवेति चेत् ; न; प्रतिभासनात् । प्रतिभासवतोऽप्यसत्त्वे तदा. स्मन्यपि प्रसङ्गात् । सन्नेवेति चेत् ; न; अततदात्मवादव्यापादनात् । भवतु प्रामारामादि- रेवायमिति चेत् ; न; चित्राकारकज्ञानाभ्युपगमेन चौद्धदर्शनस्यैवैवं प्रतिष्ठानात् न ब्रह्मवादस्य, तन्न निराकारस्यैवात्मनः प्रसिद्धः । “अस्थूलमनवै( मनणु )अहस्यमदीर्घमलोहितमस्ने- हमच्छायमतदो( मो)वायुअनाकाशम्" [ वृहदा० ३६८।८ ] इत्यादि वचनात् तत्कथं सदभावाविभावनं तदभावस्यैव विभावनादिति चेत्, ने, जामज्ञानेऽप्येवं प्रसगात् । तदपि च यदेतत् 'नीलमहं वेनि' इति स्वपरव्यवसायात्मकं ज्ञानं न ततो भिन्नमस्ति अप्रति- वेदनात् । अस्तित्वेऽपि 'प्रकृतं किं भविष्यति ? असदेवेति चेत् ; न प्रसिद्धस्यासत्त्वे अन्यत्रा. प्यनाश्वासात् । सदेवेति चेत् ; न; उभयाप्रतिवेदनात् । "मनसोर्युगयवृत्तेः" [प्र० वा० २११३३ ] इत्यादेर्निपिद्धत्वात् । भवतु तय तदिति चेत् ; म; अप्रतिवेदने तदेवेत्ययोगात् । १५ अस्त्येव स्वतस्तस्य प्रतिवेदनमिति चेत् ; तत्किन्नाम प्रमाणम् ? अप्रमाणात्तत्प्रतिवेदनायोगात् । प्रत्यक्षमिति चेत् ; न तस्य निर्विकल्पकत्वात् । निर्विकल्पं हि प्रत्यक्षं तत्कथं तत्स्वभाव. शून्यस्य व्यवसायस्य स्यात् ? अरत्येव तस्यापि तत्स्वभाव इति चेत् ; न; 'व्यवसायध निर्विकल्पश्च' इति व्याघातात् । नाय दोपः ऐकान्तिकस्य व्यवसायस्यानभ्युपगमादिति चेत; एवमपि स्वतो निर्विकल्पकस्वभावस्यैव प्रतिवेदनं प्रत्यक्षं न व्यवसायात्मनः । पुनरत- २० स्यापि निर्विकल्पस्वभावकल्पनायामनवस्थानम् , 'व्यवसायश्च निर्विकल्पश्च' इत्यादेनु- बन्धात । तन्न तत्प्रत्यक्षम् । नाप्यनुमानम् अलिङ्गजत्वात् । नापि प्रमाणान्तरम् अनभ्युपगमात् । ततो न स्वतस्तत्प्रतिवेदनम् । नापि परत: "तस्या नानुभवोऽपरः" [प्र. वा० २ । ३१७] इति व्याघातात ,तद्वदर्थस्यापि प्रतिवेदनप्रसद्भाच । ततो न जाप्रज्ञानं नाम किञ्चित्पति- विदितमस्ति यस्य प्रबोधहेतुत्वकल्पनम् । अप्रतिविदितस्यापि तर्कल्पने परब्रह्मण एव तदस्तु । ततः सूक्तम् 'एक' इत्यादि । योक आत्मा कथं प्रतिशवरं जीवभेदः 'देवदत्तजीवो यज्ञदत्तजीवः' इति ? अभिन्ना एव खल्वात्मनो जीवाः । तदेकत्वे च तेषामप्येकत्वमेव स्यान्न नानात्वम् , न चैवम् , स्वस्यैव तेषु दर्शनादिति चेत् ; न ; सम्यगेतत् ; उपाधिकल्पितेभ्यस्तेभ्यः परमात्मनोऽन्य- त्वात् । तद्यथा-घटाकाशानुपाधिपरिच्छिन्नात् अन्योऽनुपाघिरपरिच्छन्न आकाश इति । तद. ३० . २५ नाना -- , -सोत-आग, २०, २०११'नीलमहं वेधि' इति ज्ञानम् । ३ जाग्रज्ञानेऽपि । १ जायग्ज्ञानमेव । ५ निर्विकल्पकस्वभाव । ६ हेतुतकररने । • ब्रह्मणः । ८ - तन्नाना-आ०, ५०, प० । १ जाये-मः । - प्यायविनियमविपरणे [18 १ भेदवचनं तु तेपामुपाध्युपरमे पृथगवस्थानाप्रतिवेदनार , सद्विकारत्वाच्च । तस्यैव परमात्मनः सस्वेते विकारा य इमे जीवा अन्ये च भेदाः। तदुक्तम्-"यथाग्नचलतः सर्या दिशो विस्फुलिङ्गा विप्रतिष्ठेरन् एवमेव एतस्मादात्मनः प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यः लोकः (का)।" [कोपीत. ३१३] इति । तदेवाह- अविप्रकृष्टदेशादिरनपेक्षितसाधनः ||८३॥ दीपयेत् किन्न सन्तानः सन्तानान्तरमञ्जसा । इति । दीपयेत् दीप्यमानं प्रकाशमानं कुर्यात् , किन कुर्यादेव । किम् ? सन्तानान्तरं जीयादिलक्षणं सन्तानभेदम् । को दीपयेत् । सन्तानः सम् मोहन्यूनाधिकभावरहितस्तानो विस्तारो यस्य सः परमात्मा, तस्यैव वृद्धिपरिक्षयरहितविस्तारमूर्तिकतया ब्रह्मविद्भिरभ्यनु- ज्ञानात् । कथं दीपयेत् । अन्नसा परमार्थेन । परमार्थत्वं बलपदविद्याभिप्रायवशात् वस्तुतः सन्तानान्तरस्यापरमार्थत्वात् । सः कीदृशः ? अविपकृष्टः सन्तानान्तरेण सह प्रत्यासन्नो देशादिर्यस्य स तथोक्तः। तदनेन देशकालाभ्यां प्रत्यासन्नत्वात्प्रबोधादी तस्येव हेतुत्वं न जामज्ज्ञानादेः विपर्ययादित्यायेदयति । पुनस्तद्विशेषणम्-अनपेक्षितं स्वोत्पत्तिं प्रति साधनं निमित्तं येन स तथोक्तः । तदनेनापि तस्य नित्यत्वमावेदयति । अनित्यत्वे अनपेक्षितसाध. नत्वानुपपत्तेः । प्रसिद्ध चैतत् ब्रह्मविदाम्-"न वस्य कधिज्जनको न चाधिपः" [श्वेता० ६।९] इत्यागमात् । तदेतदसहमानः सोगत आह- अन्यवेद्यविरोधात् [ किमचिन्त्या योगिनां गतिः ||८४॥ इति । अन्ये भिन्नाः परस्परतः परमात्मनश्च जीवादयस्ते च ते वेद्याश्च वेदनविषयाः तेषां विरोधात् । 'न दीपयेत्' इति योजनम् । इदमनेनावेदयति-प्रतिविदितानामेव तेषा स दीपकः परिकल्पयितव्यो नान्येषां व्योमकुसुमादिवत् , वेद्यवा च तेपामनुपायत्याविरुद्धति । न विरुद्धा, तेषां स्वत एव वेद्यत्वादिति चेत् , न, वेदनस्य परमात्मधर्मत्वेन तेष्वसम्भवात् । "नान्यदस्ति द्रष्ट्ट नान्यदस्ति श्रोत नान्यदस्ति मन्त नान्यदस्ति विज्ञाव" वृहदा० ३२८१] इति वचनात् । नायं दोपः, तेषामपि तव्यतिरेकात्तद्धमत्त्वोपपत्तेरिति चेत् ;न; तेभ्यस्ताय "ध्यतिरेके तेपामपि" बो" व्यतिरेकस्यैव न्याग(थ्योत्यात् , "तस्योभयनिष्ट- तयेव प्रत्यवलोक्नात् । प्रसिद्धच "तेभ्यस्तस्य व्यतिरेको ब्रह्मविदाम् , "परमेश्वरस्तु अ- विद्याकल्पिताच्छारीरात्क र्मोक्तु विज्ञानात्माख्यादन्यः, यथा मायाविनश्चमखड्गधरान सूत्रेणाकाशमधिरोहतः स एव मायाची परमार्थरूपो भूमिष्ठोऽन्यः" [५० भा० १।२।१७] इत्यादिभाष्यश्रवणात् । ५ . 1 तवाह आ०, २०, ५०। २ समो न्यूना-आ०, २०, ५०।३ "अस्थूलमनावहास्व चुदवा. ३१४१८।५-१ स्यादनेन प्रा०, २, ५.! ५ श्रीवानाम् । ६ परमार्थध-, ब, १० ॥ . औवानामपि। परमात्माऽव्यतिरेकात् । ९ जीवेभ्य ।१० परमात्मन ।जीवानामपि । ११ ब्रह्म । १३ व्यतिरेकस्य । १४ नोवेभ्य । १५ परमात्मन । तेभ्यम्स पति-आ.,.,..
२२८४] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव सुवर्णस्य रुचकादिव्यतिरेऽपि रुचकादयस्तदन्यतिरिक्ता एव तद्वत्परमात्मनो जीवादि- व्यतिरेकेऽपि जीवादयस्तद्व्यतिरिक्ताः किन्न भवन्तीति चेत् ? कुतः पुनः सुवर्णस्य रुचका- दिव्यतिरेकः ? 'तदमावेऽप्यवस्थान्तरे भावादिति चेत् ; रुचकादीनामपि तर्हि तव्यतिरेका, तदभावेऽपि द्रव्यान्तरे भावात् । अन्य एव ते रुचकादय इति चेत् ; सुवर्णमध्यवस्थान्तरगतमन्यदेव किन स्यात् ? प्रत्यभिज्ञानादिति चेत् ;न; 'अमी च रुचकादयः अमी च रुचकादयः' इति तत्रापि ५ 'तत्प्रवृत्तेरवलोकनात् । तादृश्यात्तत्प्रवर्तन नैकत्वादित्यपि समान स्वर्णेऽपि । ननु अस्ति तावद् द्रव्याद- व्यतिरेकः रुचकादीनाम् , तत्तु द्रव्यं स्वर्णमन्यद्वेति किमनेन ? तव्यतिरेकमानावे निदर्शनात् परमात्माव्यतिरेकस्य जीवादिपूपकल्पनादिति चेत् ; न; अस्ति तावत्पर्यायतादात्म्य सुवर्णस्य, तेच पर्याया रुचकादयोऽन्ये वेति किमनेन, तत्तादाम्यादेव निदर्शनाज्जीवादव्यतिरेकस्य च परमात्मन्युपपादनात् । एकैकपर्यायपरिहारेणेव सकलपर्यायोपसंहारेणापि सम्भवति सुर्वणं १० तत्कथं तस्य तन्मात्रेणापि तादात्म्यं यदेवमुच्यत इति चेत् ; न; एकैकद्रव्यपरित्यागेनेवं सकलद्र- व्यपरित्यागेनापि रुचकादीनां सम्भवाद्, अन्यथा अपिवचनानुपपत्तेः, कल्पनामात्रस्योभय- त्रापि समानत्वात् । तत्र व्यतिरिक्तादेव सुवर्णात् स्वस्तिकादीनामव्यतिरेको यतस्तव्यतिरेकिण एवात्मनो जीवादीनामव्यतिरेकात् तद्वच्चेतनधर्मत्वं तेपूपपाद्यत । तन्न "तेपा तास्थिक ज्ञानधर्मत्वम् । कल्पितमेव भवस्विति चेत्, केन तत्कल्पनम् ? अविद्याविलासेनेति चेन, न; जीयादिभेदव्यतिरेकिणस्तस्यैवाभावात् । प्राम्भवीयस्तदै एव तद्विलास इति चेत् ; न; तस्यापि वस्तुतो ज्ञानरूपत्वाभावात् । कल्पितमेव तत्रापि तद्रूपत्यं प्राग्भवीयेन तद्भदेन । न चैवमन- वस्थानं दोपः, अनादित्वात, प्रबन्धस्येति चेत् ; तद्वत्तदज्ञानरूपत्वस्याप्यनादित्वात् । न चातद्रूपा- देव क्वचित्तपकल्पनम् ; अचेतने घटादिप्रवन्धेऽपि प्रसङ्गात् । तन्नाविद्याविलासेन तत्काल्पनम् । अस्तु, परमात्मनेव तत्कल्पनम् ; तस्य "तत्त्वत एव ज्ञानरूपत्वात् "सत्यं ज्ञान- मनन्तं ब्रह्म' [तैत्ति० २।१।१] इति वचनादिति चेत् ; भवत्वेवम् ; तथापि कथं कल्पितस्य तपस्य क्वचित्प्रतिपत्त्यनत्यम् ? कल्पितस्य" पावफस्य पावकाङ्गत्वादर्शनात् । कस्पितोऽप्य. हिंदंशो भवत्येव मरणाहमिति चेत् ; न , वस्तुसतस्तदंशकल्पिनो" ज्ञानस्यैव "तदङ्गत्वात् । तद्देशस्य तदद्गत्वे अतिप्रसङ्गात् । भवत्वत्रापि वस्तुसतः परमात्मन एव "तत्कल्पनाकृतस्तत्प्रति. २५ पत्त्यङ्गत्वम् , "तमेव भान्तमनुभाति सर्व तस्यैव भासा सर्वमिदं विभाति" [कठो०५।१५] इति वचनादिति चेत् ; किमिदानी जीवेषु चेतनत्वकल्पनेन कल्पितेऽपि तस्मिन् पुरुपादेव -- - , स्कायमावेऽपि । २ सुवर्णव्यतिरेकः । ३ लौहादौ। । प्रत्यभिज्ञानप्रातः । ५ सादृश्यात् । १-द्रव्यादिव्यति-भा०, २०, ५०। ४ च दर्श-आ०, २०, प.। ८ पर्याय मात्रेणापि। ९ -गेनैव स- मा., 1.1 -गेनापि स-प०।१. जीवानाम् । ११ अविद्या विलासस्यैव । १२ प्रारमाधीय-आ०, घ, प० । जीवादिभेद । १३ तद्रूपं प्रारभावी-आ०, ५०, १० । १४ तात एव आ०, २०,५०। १५-स्सवा पावकस्य पावकाग-आय., ५०६-तदंश-मार, २० । १७मरणासवान् । १८-नाकुन्ता-आ०,५०, प.१९ पुरुषा-भा०, ०.प.!
ग्पायविनिश्चयचिपरणे [१ भेदवचनं तु तेपामुपाध्युपरमे पृथगवस्थानाप्रतिवेदनात् , द्विकारत्वाच्च । तस्यैव परमात्मनः सल्वेते विकारा य इमे जीवा अन्ये च भेदाः । तदुत्तम्-"यथाग्नेचलतः सर्या दिशो विस्फुलिङ्गा विप्रतिष्ठेरन् एवमेव एतस्मादात्मनः ग्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यः लोकः (काः)।" [कौपीत० ३।३] इति । तदेवाह- अविपकृष्टदेशादिरनपेक्षितसाधनः ||८३|| दीपयेत् किन्न सन्तानः सन्तानान्तरमजसा । इति । दीपयेत् दीप्यमानं प्रकाशमानं कुर्यात् , किन्न कुर्यादेव । किम् ? सन्तानान्तरं जीवादिलक्षणं सन्तानभेदम् । को दीपयेत् ? सन्तानः सम् मोहन्यूनाधिकभावरहितस्तानो विस्तारो यस्य सः परमात्मा, तस्यैव वृद्धिपरिक्षयरहितविस्तारमूर्तिकतया ब्रह्मविद्भिरभ्यनु. ज्ञानात् । कथं दीपयेत् ? अअसा परमार्थेन । परमार्थत्वं बलववविद्याभिप्रायवशात् वस्तुतः सन्तानान्तरस्यापरमार्थत्वात । सः कीदृशः ? अविप्रकृष्टः सन्तानान्तरेण सह प्रत्यासन्नो देशादिर्यस्य स तथोक्तः । तदनेन देशकालाभ्यां प्रत्यासन्नत्वात्प्रबोधादी वस्यैव हेतुत्वं न जाप्रज्ञानादेः विपर्ययादित्यावेदयति । पुनस्तद्विशेपणम्-अनपेक्षितं स्वोत्पत्ति प्रति साधनं निमित्तं येन स तथोक्तः । तदनेनापि तस्य नित्यत्वमावेदयति । अनित्यत्वे अनपेक्षितसाध. नत्यानुपपरोः । प्रसिद्ध चैतत् ब्रह्मविदाम्-"न तस्य कश्चिज्जनको न चाधिपः" [श्वेता ६.९] इत्यागमात् । तदेतदसहमानः सोगत आह- अन्यवेद्यविरोधात् । किमचिन्त्या योगिनां गतिः ]॥४४॥ इति । अन्ये भिन्नाः परस्परतः परमात्मनश्च जीवादयस्ते च ते धाव वेदनविषया तेषां विरोधात् । 'न दीपयेत्' इति योजनम् । इदमनेनायेदयति-प्रतिविदितानामेव तेपों स दीपकः परिकल्पयितव्यो नान्येषां व्योमकुमुमादिवत् , वेद्यता च तेपामनुपायत्वाद्विरुद्धति । न विरुद्धा, नेपा' स्वत एव वेद्यत्वादिति चेत् ; न वेदनस्य परमात्मधर्मत्वेन तेष्वसम्भवात् । "नान्यदस्ति द्रष्टु नान्यदस्ति श्रोत नान्यदस्ति मन्त नान्यदस्ति विज्ञात" [हदा० ३१८१] इति वचनात् । नायं दोपः, तेषामपि तदव्यतिरेकानद्धमत्त्वोपपत्तेरिति चेत् न ; तेभ्यस्तस्य "व्यतिरेके तेषामपि" ततो" व्यतिरेफ्स्येव न्याय(प्योत्वात् , "सस्योभयनिष्ठ- तयैव प्रत्यवलोकनात् । प्रसिद्धश्च "तेभ्यस्तस्य व्यतिरेको ब्रह्मविदाम् , “परमेश्वरस्तु अ. विद्याकल्पिताच्यारीरात्कषुर्भाक्तु विज्ञानात्माख्यादन्यः, यथा मायाविनश्चर्मखड्गधरात स्त्रेणाकाशमधिरोहतः स एव पायापी परमार्थरूपो भूमिष्ठोऽन्यः" [५० भा० १।१।१७) इत्यादिभाष्यश्रवणात् । २० . 1 तयवाद भा०, २०, ५०। २ समो न्यूना-भा०, २०, ५०1३ "अस्थूलमानण्यहास्त्र" यादा ३८ | - शादनेन आ०, य, ५०। ५ श्रीवानाम् । ६ परमार्थध-मा०, २०, ५० । ७ औवानामपि । ८ परमात्माऽव्यतिरेकात् । ९जीवभ्या । १० परमात्मन 11जीवानामपि । १२ ब्रह्मगा। १६ व्यतिरेवस्य । ११ जोवेभ्य । १५ परमात्मन । तेभ्यम्त रहि-मा.,.,.।
१२८४ ] प्रथमः प्रत्यक्षाप्रस्तावा सुवर्णस्य रुचकादिव्यतिरेकेऽपि रुचकादयस्तव्यतिरिक्ता एव तद्वत्परमात्मनो जीवादि- व्यतिरेकेऽपि जीवादयस्तदव्यतिरिक्ताः किन्न भवन्तीति चेत ? कुतः पुनः सुवर्णस्य रुचका. दिव्यतिरेकः ? 'तदभावेऽज्यवस्थान्तरे भावादिति चेत् ; रुचकादीनामपि तर्हि वढ्यतिरेका, तदभावेऽपि द्रव्यान्तरे भावात् । अन्य एव ते रुवकादय इति चेत् ; सुवर्णमप्यवस्थान्तरगतमन्यदेव किन्न स्यात् ? प्रत्यभिज्ञानादिति चेत् ; न; 'अमी घ रुचकादयः अमी च रुचकादयः' इति तत्रापि ५ 'तत्प्रवृत्तेरवलोकनात् । तारश्यात्तत्प्रवर्तन नैकत्वादित्यपि समान स्वर्णेऽपि । ननु अस्ति तावद् द्रव्याद- व्यतिरेकः रुचकादीनाम् , तत्तु द्रव्यं स्वर्णमन्यद्वेति किमनेन ? तव्यतिरेकमात्रादेयं निदर्शनात् परमात्माव्यतिरेकस्य जीवादिपूपकल्पनादिति चेत् ; न; अस्ति तावत्पर्यायतादात्म्य सुवर्णस्य, ते च पर्याया रुपकादयोऽन्ये वेति किमनेन, तत्तादाल्यादेव निदर्शनाजीवादव्यतिरेकस्य च परमात्मन्युपपादनात् । एकैकपर्यायपरिहारेणेव सकलपर्यायोपसंहारेणापि सम्भवति सुर्वणं १० तत्कथं तस्य तन्मात्रेणापि तादात्म्यं यदेवमुच्यत इति चेत् ;न; एकैकद्रव्यपरित्यागेनेवं सकलद- व्यपरित्यागेनापि रुचकादीनां सम्मवाद, अन्यथा अपिवचनानुपपत्तेः, कल्पनामात्रस्योभय- नापि समानत्वात् । तन्न व्यतिरिक्तादेव सुवर्णात् स्वस्तिकादीनामव्यतिरेको यतस्तव्यतिरेकिण एवात्मनो जीवादीनामव्यतिरेकात् तद्वच्चेतनधर्मत्वं तेपूपपाद्येत । तन्न "तेषां तात्त्विकं मानधर्मत्वम् । कल्पितमेव भवस्विति चेत; केन तत्कल्पनम् ? अविद्याक्लिासेनेति चेन; न; जीवादिभेव्यतिरेकिणस्तस्यैवाभावात् । प्राग्भवीयस्तइँदै एव तद्विलास इति चेत् ; न; तस्यापि वस्तुतो ज्ञानरूपत्वाभावात् । कल्पितमेव तत्रापि तद्रूपत्वं प्राग्भवीयेन तद्देन । न चैवमन- वस्थानं दोपः, अनादित्वात् प्रबन्धस्येति चेत् , तद्वत्तदज्ञानरूपत्वस्याप्यनादित्वात् । न चातद्रूपा- देव क्वचित्तपकल्पनम् ; अचेतने घटादिप्रयन्धेऽपि प्रसङ्गात् । तन्नाविद्याक्लिासेन तत्कल्पनम् । अस्तु, परमात्मनेर तरकल्पनम् ; तस्य "तत्वत एव ज्ञानरूपत्वात् "सत्यं ज्ञान- मनन्तं ब्रह्म' [तैत्ति० २।१।१] इति वचनादिति चेत् ; भवत्वेवम् ; तथापि कथं कल्पितस्य तपस्य क्वचित्प्रतिपत्त्यतत्वम् ? कल्पितस्य" पावफस्य पाषकाइत्यादर्शनात् । कल्पितोऽग्य. हिंदशो भवत्येव मरणामिति चेत् ; न ; वस्तुसनस्तदंशकस्पिनो" ज्ञानस्येव "तदकत्वात् । तदेशस्य तदङ्गत्ये अतिप्रसङ्गात् । भवत्वत्रापि वस्तुसतः परमात्मग एव "तत्कल्पनाकृतस्तत्प्रति. २५ पत्त्यद्गत्वम् , "तमेव भान्तमनुभाति सर्व तस्यैय भासा सर्वमिदं विभाति" [कठो०५।१५] इति वचनादिति चेत् ; किमिदानी जीवेषु चेतनत्वकल्पनेन कल्पितेऽपि वस्मिन् पुरुषादेव १ रुचकाद्यभावेऽपि । २ सुवर्णव्यतिरे: । ३ लौहादो। ४ प्रत्यभिज्ञानप्रवृत्तः । ५ सादृश्यात् । -न्यादिव्यति-भा०, २०, ५०। ५-न दर्श-आ०, २०, ५० ! ८ पर्याय मानेणापि। १ -गेनैव स- भा०, 4.1 -नापि स-५०11०त्रीकानाम् । १३ अविद्यापिलायस्यैव । १२ प्राम्भावीय-80०, २०, ५० । जीवादिभेद । १३ तरूपं प्राग्भावी-आ०, २०, ५० । १४ तात एव बा०, २०, प.। १५-स्यवा पारकस्य पावकाश-आ०, २०, ५०1१६ -तदंश-०, २०५०। 10 मरणावात 1 १८-नात्तस-आ०, घ०, प०।१९ पुरुषा-मा.प.प.। २० न्यायविनिश्चयविवरण [११८४ तत्प्रतिपत्तेः 'ततस्तत्प्रतिपत्तिरेव तेपु तत्कल्पनमिति चेत् , न , घटादावपि प्रसङ्गात् । एवञ्च चेतन एव सर्वभेदो नाचेतन इति 'प्रतीतिविरुद्धमापयेत । पुरुषोऽपि तान् प्रतिपद्यमान: प्रतिपन्नः, तद्विपरीतो वा प्रतिपद्येत ? तद्विपरीत एव, "तद्वा एतदक्षरं गार्यदृष्टं द्रष्ट अश्रुतं श्रोत अमतं मन्तु अविज्ञातं विज्ञान वृहदा ३१८१११]इति वचनादिति चेत् ; कमिदानी ५ तस्य सर्वज्ञत्वम्, आत्मापरिक्षाने तद्नुपपत्तेः । न चासर्पज्ञ एवासी "सर्वज्ञ ब्रह्म जगत्कारणम्" [७० मा० १।१।१० इति भाष्यात् । “स वेत्ति विश्वम्" [ श्वेता० ३।१९ ] इत्याम्नायाच्च । भवतु प्रतिपन्न एवेति चेत्, स भूमा, अस्पो वा भवेत् ? भूमा चेत्, तथापि कथं तस्य सर्वज्ञत्वं स्वरूपादन्यस्याप्रतिवेदनात् ? “यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्य- १० द्विजानाति स भूमा" [छान्दो० ७/२४.१] इति वचनात् । तदवस्थायोमन्यदेव नास्ति सर्वस्य भूमन्यनुप्रवेशात् । न चासतोऽपरिज्ञानादसर्वतस्वम्, अपि तु सत एव सविशेषात्परि. ज्ञानात् । न चेदं भूमन्यस्ति, सतो भूम्नः सर्वात्मना परिज्ञानात् । ततः सपरिज्ञानमेव तस्य सर्वज्ञत्वमिति चेत् , कथं तहिं तस्यं जगत्कारणत्वं तदन्यस्य जगत एवाभावात् । स एव जग- दिति चेत्, न, तस्य तत एवानुत्पत्तेः। यद्यसी सन् किमुत्पत्त्या ? यद्यसन , युत उत्पत्ति- १५ रिति ? कथ वा ततो जीवादेर्भेदस्य प्रतिपत्तिः तदानीमसतरततोऽपि तदनुपपत्तेः। तन्न भूमा जगत उत्पत्त प्रतिपत्ती निमित्तमुपपन्नम् । भवत्यल्प एव स इति चेत्, तेनापि यदि भूम्नोऽपरिज्ञान क्थं सर्वज्ञत्वम् ? परिज्ञाने स एव भूमा "ब्रह्मवद ग्रीव भाति[मुण्ड० ३।२।९] इति क्यमरूपत्वम् उपाधिपरिच्छिन्नतया परिज्ञानादिति चेत्, न, वत्परिच्छेदस्यादूपत्वात् । न च अतपपरि. २० जाने तत्परिज्ञानम् अन्यत्र विभ्रमात् । विभ्रमे च कथ तस्य ब्रह्मत्वं यतो द्विविधं ब्रह्मकल्पन शोभेत?"अपहतपाप्मत्वादिभिनाधरिति चेत् , न, विघ्नमस्यैव पाप्मत्वात् । नाय" पाप्मा अदु:- खहेतुत्वादिति चेत् , न, अस्मदादिविध्रमस्याप्यतद्धेतुत्वापत्त । तथा चासङ्गतमेतत् -"मृत्योःस मृत्युमानोति य इह नानेव पश्यति" [कठो० ४११०] इति । "ब्रह्मज्ञानिध्रमस्येयापाप्मत्वं नामज्ञानज्वलनोपहतशक्तिमत्वान्नेतरविभ्रमस्य विपर्ययादिति चेत् , ग, ब्रह्मज्ञानी प विभ्रमी चेति व्याघातात् । "अथ तस्यापि इच्छया भवत्येर विध्रम इति चेत्, न, इच्छाविषयस्य विभ्रमात्मागदर्शनात् अदृष्टतद्विपयस्य चेच्छानुपपत्त': । प्राक्तदर्शनभावे च नेच्छावो विभ्रमः विभ्रमादेव तद्भावात् । तथा च अनादिविभ्रममलोपहतस्य कथं तस्यापहतपाप्मत्वादिक" यतो - २५ ३ पुरुषान् । २ प्रतीतिरुद्ध-आ०, य०, प. ३ "अगणिपादो अवनो गृहोना पश्यायवा स भृणोत्यकर्ण । स वेति विश्व न हि तस्य वेसा तमाहुरम्य पुरुप महान्सम् ॥"-ar• दि. 1 "सवेत्ति वेद्यम्'- श्रेता) ४ यतु ता । ५ भूमावस्थायाम् । ६ ब्रह्मण । ७ ब्राव आ., म०, ५.10 प्रास्वरूर वाभावात् । ९"दे ब्रह्मणो वेदितव्ये शब्दब्रह्म परश्च यत् ।"-मैत्रा०२२ 11. "अपामा होष प्रद्मशोक ।"-छान्दो. ११ विभ्रम । ३ विभ्रमावा-आ०,०,५०।१३ भवस्यापि छाया-आ.,4०प० । ४ चेछा- मा०, ५०,०।५-न यतो-भा०, २०, ५०।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः [ गमार, ब्रह्मत्वमल्पस्य । तत्त्वेऽपि न तस्य स्ववेदने परवेदनम्, विभ्रमाभावात् "अविज्ञातं विज्ञात्" [ बृहदा०३।८।११] इति वचनाच्च । परतस्तस्याविज्ञानादविज्ञानत्वं तेनोच्यते स्वतस्तु विज्ञात एवाल्पोऽपीति चेत् ; न तर्हि परविज्ञानम् "विज्ञातं द्रुतं विज्ञेयं न विजानाति" ] इत्यादिना आत्मज्ञस्य 'परविज्ञानप्रतिषेधात् । भूमन्येव तेनापि तत्प्रतिषेधो नाल्पे तत्रात्मज्ञानवत् परज्ञानस्यापि भावादिति चेत् ; न; "तस्यापि भूमाभेदात्, तत्रापि तनिषेधात् । ५ उपाधिमत्तया भेद एव ततस्तस्येति चेत्, कथं तर्हि ज्ञत्वं तात्त्विकस्य ज्ञानन्तरस्यानभ्युप. कल्पितेन च झत्वेन ब्रह्मत्वानुपपत्तः ? ततस्तस्याप्यात्मज्ञत्वे न परवेदनमिति न सन्त्येवं जीयाः स्दतः , परतश्चाप्रतिपत्त । तन्न पामेकेन दीपनमिति सूक्तम्-'अन्यवेद्य- विरोधान्न दीपयेत्' इति । तत्रोत्तरमाइ-'किमचिन्त्या योगिनां गतिः' इति । किमचिन्त्या ? चिन्त्यैव १० गतिः प्रवृत्तिः योगिनां सम्बन्धवताम् । तथा हि-पूर्वोत्तरज्ञानानां कार्यकारणभावः सम्पन्धस्तेषां सत्येव भेदे भवति, भेदश्च न तेषां कुतश्चिच्छक्यपरिज्ञानः, सर्वज्ञानानां स्वरूप- मात्रनिष्ठत्वेन प्रतियोगिन्यप्रवृत्त: । अप्रतिपन्ने च प्रतियोगिनि 'अहं कारणमस्य अहं कार्यमस्य' इति व्यवस्थापयितुमशक्यम् । तत्कथं ब्रह्मवजापज्ञानस्यापि कचित्कारणत्वम् ? मा भूदिति चेत् ; तबाह 'आयातम्' [अन्यथाऽद्वैतमपि चेत्थमयुक्तिमत् ] । इति । जाप्रज्ञानं प्रयोधस्यानुपलब्धमपि कारणं अवाणस्यैकं दूपणमुक्तम् 'एक किन्नेष्ट' इत्यादिना । दूपणान्तरमिदानी वक्तव्यम् । तथा [हि ] जामज्ञान प्रबोधादुत्पन्न यदि तस्य जनकम्"; परस्पराश्रयः-'उत्पनेने तस्य जननम् , जनिताच्चोत्पत्तिः' इति । अनुत्पन्नं चेत् ; न; सर्वजननप्रसङ्गात् । तथा हि- अनर्थजं चेद्विज्ञानमर्थवित् "सर्वविद्भवेत् । ज्ञानान्तरं पृथा प्राप्तमिति यद्वन्निगाते ॥८७७।। तथेदमपि वक्तव्यं जाग्रज्ञान प्रबोधतः । अजातं तस्य हेतुश्चेत्सर्वहेतुः प्रसज्यते ।।८७८।। हेत्वन्तरं ततः प्राप्तं त्यन्मतेऽपि वृथेहितम् । एकहेतुप्रवादश्च ब्रह्मवादं प्रकल्पयेत् ।। ८७९॥ प्रत्यासत्त्या स तस्यैव हेतुर्नान्यस्य चेन्मतः । तस्या" एवार्थनियमो ज्ञानस्याप्यनुमन्यताम् ।।८८०॥ २० १-ज्ञानव-आ०, १०, प० । २ अविज्ञातमिति वचनेन । ३ विज्ञानद्वैत-आ०, २०, ५०।४ पो वि-भा०, २०, ५०। ५ अल्पस्यापि । ६ अल्पेऽपि । भूम्नः अल्पस्य । प्रोषस्य! : "जनके तर्हि"-ता. टि.। . जान मानेन । ११ प्रबोधस्य । १२ "अर्थवित् तहि"-ता. टि०1१३ "भवेत् तथा "-तारि०। १४ अज्ञातं भा०,३०, प० । १५ प्रत्यासत्तेः ।
- म्यायविनिश्चयविवरणे [१८४ तत्प्रतिपत्तेः 'सस्तत्प्रतिपत्तिरेय तेषु तत्कल्पनामिति घेत , न; घटादारपि प्रसङ्गात् । एवश्व चेतन एव सर्वभेदो नाचेसन इति 'प्रतीतिविरुद्धमापटोत । पुरुषोऽपि वान् प्रतिपद्यमान: प्रतिपनः, तद्विपरीतो वा प्रतिपद्येत ? तद्विपरीत एव, "तद्वा एतदक्षरं गार्यदृष्टं द्रष्ट्ट अश्रुतं श्रोत अमतं मन्त अनितातं विज्ञाद"[इदा०३1८1११]इति वचनादिति चेत् , कथमिदानी तस्य सर्वशत्यम्, आत्मापरिझाने तदनुपपत्तेः । न चासर्वज्ञ एघासो "सज्ञ ब्रह्म जगत्कारणम्" [७० भा० १३१११०] इति भाप्यात् । “स वेति विश्यम्" [ श्वेता० ३११९ ] इत्याम्नायाच्च । भवतु प्रतिपन्न एवेति चेत्, स भूमा, अल्पो या भवेत् ? भूमा चेत्, तथापि कथं तस्य सर्वज्ञत्वं स्वरूपादन्यस्याप्रतिवेदनात् १ "यत्र नान्यत्पश्यति नान्यवृणोति नान्य- .० द्विजानाति स भूमा" {छान्दो० ४२४११ ] इति वचनात् । वदवस्थायामन्यदेव नास्ति सर्वस्य भूमन्यनुप्रवेशात् । न चासतोऽपरिज्ञानादसर्वज्ञत्वम्, अपि तु सत एव सविशेषात्परि- ज्ञानात् । न चे भूमन्यस्ति, सतो भूम्नः सर्वात्मना परिवानात् । ततः स्वपरिक्षानमेव तस्य सर्वज्ञत्वमिति चेत्, कथं तहि तस्यं जगत्कारणत्वं तदन्यस्य जगत एवाभावात् । स एव जग. दिति चेत्, न, तस्य तत एवानुत्पत्तेः। यद्यसौ सन् किमुत्पत्त्या ? यद्यसन् , कुत उत्पत्ति- १५ रिति १ कथ वा ततो जीवादेर्भदस्य प्रतिपत्तिः वदानीमसतस्ततोऽपि वदनुपपत्तेः । तन्न भूमा जगत उत्पत्त प्रतिपत्ती निमित्तमुपपन्नम् । भवत्वस्य एव स इति चेत्, तेनापि यदि भूम्नोऽपरिज्ञानं कथं सर्वज्ञत्वम् ? परिज्ञाने स एव भूमा "ब्रह्मवद ग्रीव भवति" [मुण्ड०३१२१९] इति क्यमरूपत्वम् ? उपाधिपरिच्छिनतया परिवानादिति चेत्, न, तत्परिच्छेदस्यातदपत्वात् । न च अतद्रपपरि- २० झान सत्परिज्ञानम् अन्यत्र विभ्रमात् । विभ्रमे च कथ तस्य ब्रह्मत्वं यतो द्विविधं ब्रह्मकल्पनं शोभेव? "अपह्तपाप्मत्वादिभिर्नह्मधर्मेरिति चेत् , ग, विभ्रमस्येव पाप्मत्वात् । नाय" पाप्मा अदु:- सहेतुत्वादिति चेत् , न, अस्मदादिविभ्रमस्याप्यतखेतुत्वापत्त । तथा चासङ्गतमेतत्-"मृत्योःस मृत्युमामोति य इह नानेर पश्यति" [कठो० ४११०] इति । "ब्रह्मज्ञानिध्रमस्यैवापाप्मत्व ब्रह्मज्ञानज्वलनोपहतशक्तिकत्वान्नेतरविभ्रमस्य विपर्ययादिति चेत् , न, ब्रह्मज्ञानी च विभ्रमी चेति व्याघातात् । "अथ तस्यापि इच्छया भवत्येर विभ्रम इति "चेत्, न, इच्छाविषयस्य विभ्रमात्मागदर्शनात् अदृष्टतद्विपयस्य घेच्छानुपपत्त: । प्राक्तदर्शनभावे च नेच्छावो विभ्रमः विभ्रमादेव तद्भावात् । तथा च अनादिविभ्रममोपहतस्य कथ तस्यापहतपासात्वादिक" यतो १ - १ पुरुषाद । २ प्रतीतिरुद्ध-आ०, २०, प.। "भराणिपादो जवनो गृहीता पश्यरयचधु स भणोत्यकर्ण । स वेत्ति विध न हि तस्य वेता दमाहुण्य पुष्प महान्सम् ॥"-डा. टि. सति वैयम्"- ता. ४ यत्तु ता- 1 ५ भूमावस्थायाम् । ६ ब्रह्मण । ७ ब्रह्मय भा०, २०, प.1 प्रहारसहावाभावात् । २ " ब्रह्मणो वेदित शब्दमान परश यत्।"-मैत्रा०६।२२ ! १० "अहतगामा होष पद्मलोक ।"-डान्दो. 11131११ विभ्रम । १२ विभ्रमस्र्यवा- 880,०,१०।१३ स्थापि छाया-आ.व.०१४ चेक्षा- भा, प०, प० । १५ - न यतो-आ०, २०, ५०॥
-- ११८५] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताचः ब्रह्मत्वमल्पस्य । तत्त्वेऽपि न तस्य स्ववेदने परवेदनम्, विभ्रमाभावात् "अविज्ञातं विज्ञात्" [ बृहदा०३।८।११] इति वचनाच्च । परतस्तस्याविज्ञानादविज्ञातत्वं नोच्यते स्वतस्तु विज्ञात एवाल्पोऽपीति चेत् ; न तर्हि परविज्ञानम् “ विज्ञातं द्वैतं विज्ञेयं न विजानाति" ] इत्यादिना आत्मज्ञस्य परविज्ञानप्रतिषेधात् । भूमन्येव तेनापि तत्प्रतिपेधो नाल्पे तत्रात्मज्ञानवत् परज्ञानस्यापि भावादिति चेत् ; न; तस्यापि भूमाभेदात्, तनापि तनिषेधात् । ५ उपाधिमत्तया भेद एव ततस्तस्येति चेत्, कथं तर्हि ज्ञत्वं तात्त्विकस्य ज्ञानन्तरस्यानभ्युप- गमात् , कल्पितेन च त्वेन ब्रह्मत्वानुपपत्त ? ततस्तस्याप्यात्मज्ञत्वे न परवेदनमिति न सन्त्येषं जीवाः स्वतः , परतवाप्रतिपत्त: । तन्न तेषामेकेन दीपनमिति सूक्तम्-'अन्यवेद्य- विरोधान्न दीपयेत्' इति । तत्रोत्तरमाह- किमचिन्त्या योगिनां गतिः' इति । किमचिन्त्या ? चिन्त्यैव १० गतिः प्रवृत्तिः योगिनां सम्बन्धयताम् । तथा हि-पूर्वोत्तरज्ञानानां कार्यकारणभावः सम्पन्धस्तेषां सत्येव भेदे भवति, भेदश्च न तेषां कुतश्चिच्छक्यपरिज्ञानः, सर्वज्ञानानां स्वरूप- मात्रनिष्ठत्वेन प्रतियोगिन्यप्रवृत्त । अप्रतिपन्ने च प्रतियोगिनि 'अहं कारणमस्य अहं कार्यमस्य' इति व्यवस्थापयितुमशक्यम् । तत्कथं ब्रह्मयज्जाप्रज्ज्ञानस्यापि कचित्कारणत्वम् १ मा भूदिति चेत् तत्राह- १५ 'आयातम्' [अन्यथाद्वैतमपि चैत्यमयुक्तिमत् ] । इति । जामज्ज्ञानं प्रयोधस्यानुपलब्धमपि कारणं युवाणस्यैकं दूषणमुक्तम् ‘एका किन्नेष्टः' इत्यादिना । दूपणान्तरमिदानीं वक्तव्यम् । तथा [ हि ] जाप्रज्ञानं प्रबोधादुत्पन्न यदि तस्य जनकम्"; परस्पराश्रय:-'उत्पन्नेनै वस्य जननम् , जनिताच्चोत्पत्तिः' इति । अनुत्पन्नं चेत् ; न; सर्वजननप्रसङ्गात् । तथा हि- अनर्थ द्विज्ञानमर्थवित् "सर्वविद्भवेत् । ज्ञानान्तरं वृथा प्राप्तमिति यनिगद्यते ॥८७७॥ तथेदमपि वक्तव्य जाग्रज्ज्ञानं प्रबोधतः । अजातं तस्य हेतुश्चेत्सर्वहेतुःप्रसज्यते ।।८७८॥ हेत्वन्तरं ततः प्राप्तं त्वन्मतेऽपि वृथेहितम् । एकहेतुप्रवादश्च ब्रह्मवादं प्रकल्पयेत् ॥ ८७९॥ प्रत्यासत्त्या स तस्यैव हेतुर्नान्यस्य चेन्मतः । तस्या" एवार्थनियमो ज्ञानस्याप्यनुमन्यताम् ।।८८०।। 1-ज्ञानव-आ०, २०, ५०। २ मविज्ञातमिति वचन । ३ विज्ञानद्वैत-आ०, ब०, ५०। १ परे वि-भा०, १०, १०। ५ बलस्थापि। ६ अल्पेऽपि । ७ भूम्नः अल्पस। ८ प्रबोधस्य । ९ "जनक तहि"-ता. टि.। १. आप्रदानेन । 11 प्रबोधस्य । १२ "अर्धवित् तहि"-ता. टि. 1 १३ "भवेत् तथा "-तारि०।१४ अज्ञातं आ०, ब०, २०१५ प्रत्यासत्तेः ।
न्यायविनिश्चयविवरणे तदेवाह-'अविप्रकृष्ट' इत्यादिना । सन्तानः ज्ञानात्मा सन्तानान्तरम् अर्थास्यं किं न दीपयेत् किं न प्रकाशयेत् ? कथम् ? असा । कीदृशः १ अनपेक्षित- सोधनः। अनपेक्षितम् अनाफाइक्षित साधनं विपकृतमुपकारलक्षणं येन स गथोक्तः । तदनपेक्षस्य तत्प्रदीपनेऽतिप्रसङ्गं परिहरति-अविप्रष्ट प्रत्यासन्नो देश आदिर्यस्य फालादेः स ५ यस्य सः अविमकृष्टदेशादिः अविप्रकृष्टत्यं च देशादेर्योग्यतयेव न संसर्गितया व्यवहितदेशा- देरपि प्रदीपकत्वात् । उक्तं चैतत्पूर्व 'यदा यत्र' इत्यादिना । ततो निपकुलतया वहिरयं- सिद्धेः फयं विज्ञानवाद इति भावः । ननु च योग्यतायगमः कार्यदर्शनादेव, तब कार्य व्यतिरिकविपयदर्शनमेव, तच्च न, स्वरूपादन्यन्न ज्ञानप्रवृत्तेरनवलोकनात् , मीलादेशपि ज्ञानानुप्रविष्टस्यैव प्रत्यवभासनात् , न बहि- १० भूतस्येति चेत् । तदेवाह-'अन्यवेद्यविरोधात्' इति । अन्यच्च तज्ज्ञाना व्यतिरेकात वेद्यञ्च तद्विषयत्वात् तस्य विरोधात्। तथा हि-यदि नीलादिः संवेदनमननुपविष्टः कथं तत्स- मानाधिकरणतया परिज्ञानम् 'नीलादिः संवेद्यते' इति, वदनुप्रविष्टस्यैव तथा तदर्शनात् नील- मुत्पलमितिवत् । अनुप्रविष्टश्चेत् कथं तदाहात्वम् अनुप्रवेशविरोधात् ? तदुक्तम्- "यदि संवेद्यते नीलं कथं वाद्यं तदुच्यते ? न चेत्संवेद्यते नीलं कथं पाह्यं वदुच्यते ११ [प्र०यार्तिकाल० ३।३३१]इति । ततो 'अन्यवेद्यविरोधान्न सन्तानः सन्तानान्तरं दीपयेत्' इति । तत्रो. तरमाह-'किमचिन्त्या योगिनां गतिः' इति । किं कुतो योगिनां परिशुद्धज्ञान- सम्पन्नानां युद्धानां गतिः बुद्धिः अचिन्त्या अविचारयितव्या ? साप्येवं विचारयितव्यैव । राथा हि-यदि सा स्वरूपादन्यत्र न प्रवर्तते कथं तया तेषां योगित्वम् अतिप्रसङ्गात् । प्रवर्तते चेरा, कथमन्यत्रापि अन्ययेविरोधो यतःसन्तानः सन्तानान्तरं न दीपयेत् । दीपयेत्, तत्कृतमुपकारमपेक्षमाण एय उपकारित्वस्यैव ग्राहालक्ष्णत्वादिति चेत् ; न ; योगिझानापेक्षयापि तस्यैव तलमणत्यापत्तेः । तथा च यदुक्तम्- "रूपादेयतसर्थश्मविशुद्धधियां प्रति । ग्राह्यलक्षणचिन्तेयमचिन्त्या योगिनां गतिः ॥' [प्र०या० २१५३२] इति । वदपालोचितवचनं भवेत् । तदपेक्षयाऽन्यदेव पाहालझणं तत्तु नास्मदादिभिरित्यन्तया शक्यनिरूपणमतो नोच्यते । अस्मदादिशानापेक्षमेव तु तयणं शक्यनिरूपणत्वादुच्यते इति चेत् ;न; अनिरुपितेन तहक्षणेने तेषां तज्ञत्वे कणादादीनामपि वत एव तत्प्रप्सहात् । तथा घ फर्थ तपरिहारेण तथागतानामेव प्रामाण्यपरिकल्पनमुफ्पयेत । तदुपपादयता पदपेक्षस्य भा०, 40, प० । २ भवादित्युक्त-भा-, ०।-स्वादिस्ययुक-प० । प्रगलवणेन । ४ कणादादिपरिहारेण । ५ "प्रमाणभूताय अगद्धिनेपिणे प्रणम्य शास्त्र मुगताय तायिने । (प्रमाणसमु. लोक "ता दि.1 २० - ११८५] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तायः ३५५ शक्यनिरूपणमेव तदपेक्षमपि तहक्षणमभ्युपगन्तव्यम् । तदाह-'अन्य' इत्यादि । अन्ये च ते कणादादयो चेदिनश्च विश्वस्य तेपाम् 'अविरोधात् अविरोधप्रसङ्गात् । किमचिन्त्या ? शक्यचिन्तैव योगिनां बुद्धानां गतिर्बुद्धिरित्यविषयवतीति । तच्च तदपेक्ष्या तल्लक्षणं निरूप्यमाणं न योग्यताया अपरम् अतस्तदेवारमदादिज्ञानापेक्षयापि भवतीति व्यर्थ तदुत्पत्त्यादिकल्पनम् । अतदुत्पन्नादिना सत्प्रकाशनेऽतिप्रसङ्ग इति चेत् ; न, ५ योग्यवानियमेन प्रकाशनियमस्याभिहितत्वात् । ततः सूक्तम्-'अविप्रकृष्ट' इत्यादि । योगिन एव मा भूवन न काचित्क्षतिः संवृतिमानेणवदभ्युपगमादिति चेत् ; अत्राह- आयातमन्यथाद्भुतम् [अपि चेत्थमयुक्तिमत् ।] इति । न्यथा अन्येन 'ज्ञानमपिज्ञानान्तरस्य न हेतुः,नापि योगिनो विद्यन्ते' इति प्रकारेण आयातम् उपनतम् अद्वैतं निरंशसंवेदनैकव्यक्तितत्त्वम् । तदपि सौगतस्यामिमतमेवेति चेत्। १० आह-'अपि चेत्थमयुक्तिमत्त्' इति । 'इत्यम्' इत्यनन्तरम् 'अपिच' इति द्रष्टव्यम् । इत्थमनेनाद्वैतप्रकारेण। अपि च न केवलम् अन्यथैव अयुक्तिमत्तत्त्वं संविदद्वैतस्य ब्रहाद्वैतय. दनुपपत्तिमत्तया प्रतिपादितत्वात् । ततः क्वचित् प्रज्ञास्थैर्यमन्विच्छता न वहिरर्थः प्रतिक्षेप्तव्यः तत्प्रतिक्षेपे तदनुपपत्तेः। कथं पुनर्थहिरर्थस्य यस्तुसतः परिज्ञानम् ? न प्रतिमासान् ; तस्यासत्यपि तस्मिन् १५ विप्लवावस्थायां भावात् । तद्विशेषादित्यपि न युक्तम् ; अबाधितत्वादेः तद्विशेषस्य निरा- करणादिति चेत् ; न ; तरसन्तानान्तरस्यापरिझानापत्तेः । प्रत्यक्षतस्तदप्रतिवेदनात् , बल्लि- गस्य च व्याहायदेरसत्यपि तस्मिन् विप्लवदशायां भावात् । तदाह- व्याहारादिविनि सो विप्लुताक्षेऽपि भावतः ॥४५॥ इति । व्याहारो वाग्व्यापारः आदिर्यस्य गमनादेः कायपरिस्पन्दस्य तस्य विनि सन २० व्याहारादिविनिर्भासः सन्तानान्तरं किन्न दीपयेत् इति नकारवर्जमधिकृत्य सम्ब- न्धनीयम् । अत्र हेतुमाह-विप्लुताक्षेऽपि स्वापाशुपहतेन्द्रियेऽपि प्रतिपत्तरि तद्विनि सत्य भावतो विद्यमानत्वात् , न व्यभिचारिणो गमकत्वमिति भावः । परः परिहारमाह- अनाधिपत्यशन्यं तत्पारम्पर्येण चेत् [असत् । इति । अधिपतिः निमित्तं सन्तानान्तरं व्याहारादेः स एवाधिपत्यं तेन शून्यं आधिपत्य. २५ न आधिपत्यशून्यम् अनाधिपत्यशून्यम् आधिपत्य॑सहितमिति यावत् । किं तदिति घेत् ? आह-तत् व्याहारादिकम् । कथं तत्तादृशम् ? इत्याह-पारम्पर्यण परम्परतया विप्लुताक्षभावि व्याहारादिकं यद्यपि साक्षादाधिपत्यसहितं न भवति, परम्परया तु भवत्येव । शून्यम् । । अविरोधात् मस-वा० । २ प्रज्ञास्थैर्यानुपपतः। ३ अ। ४ प्रतिमासविशेषात् । ५-तन्तवेद- मा०, २०,२०१६ सन्तानान्तरे । ७ नासर-मा०, २०, ५०1८-य सन्निहित-मा० ब०, ५०॥
न्यायविनिश्चयविवरणे [११८७ आधिपत्यसहिताब्याहारादित एव तयाहारादेरुत्पन्नत्वात् ततस्तस्यापि परम्परया गमकत्वान्न व्यभिचार इवि परस्य भावः । चेतशब्दस्वमेव द्योतयति । तत्रोत्तरम्-'असत्' इति । असत् अप्रशस्तम् अनाधिपत्येत्यादि । हेतुमाह- 'अर्थेष्वपि प्रसङ्गश्च' [इत्यहेतुमपरे विदुः] ॥८६॥ इति । च शब्दो यस्मादर्थे । यस्मात् अर्थेष्वपि अर्थप्रतिभासेप्वपि विपयशब्देन विषयि. प्रतिवेदनात् , न केवलं ध्याहारादिपु इत्यपिशब्दः । प्रसङ्ग: पारम्पर्येणार्थसाहित्यस्य । तया चार्थप्रतिभासानामपि विप्लुताक्षभाविनाम् अर्थप्रत्यायनोपपत्तेर्ने व्यभिचार इति शास्त्रका- रस्याभिप्रायः । ततश्च यदुक्तम्-"ग्राह्यप्रतिभासः परमार्थसद्विपयो न भवति तत्प्रतिभास- स्वात् विप्नुताततत्प्रतिभासवत" ] इति ; वत्प्रतिविहितम् ; निदर्शनस्य १० साध्यबोकल्यात् । तदेवाह-'इत्यहेतुपपरे विदुः' इति । इति एवम् अनन्तरहेतुम् अहेतुम् आगमकम् अपरे अर्थवादिनो विदुर्विजानन्ति । त इमे 'इन्द्रजाल' इत्यादयो 'विप्लुताक्ष' इत्यादेरेव व्याख्यानश्लोकाः । कुतः पुनः सत्तोऽपि ग्राह्याकारस्य बहिरर्थत्वम् ? कुतश्च न स्यात् ? अर्थज्ञानाव्यति- रेकात् , तस्याप्यनुमानादवगमात् । तञ्चेदम्-'यत्र 'सहोपलम्भनियमः तत्र भेदः यथा चन्द्रद्वये १५ सहोपलम्भनियमश्च नीलतज्ज्ञानयोः, इति । नीलस्येव केवलस्यानुभयो न तज्ज्ञानस्य तस्य "परोक्षत्वात् , तत्कथं तत्र तन्नियम इति चेत् ; न ; अननुभवविषयाचन: सन्तानान्तरज्ञाना. दिवाऽर्थपरिच्छेदानुपपत्तः । ज्ञानान्तरानुभूतात्तु ततः तत्परिच्छित्तौ अनवस्थानस्याभिधानात् । तनासिद्धो हेतुः । नापि रूपालोकाभ्यां व्यभिचारी ; तर तदभावात्-निरालोकस्यापि रूप. स्याञ्जनादिसंस्कृवलोचनेनोपलम्भात् , नीरूपस्याप्यालोकस्य गगनतले विलोकनात् । तस्मान तनियमो भेदे सति गवाश्ववदुपपत्तिमान् । ततो भवत्येव नीलतज्ज्ञानयोस्तस्मादभेदप्रतिपत्तिरिति चेत् ; अत्राह- सहोपलम्भनियमानाभेदो नीलतद्धियोः । इति । तत्य घीस्तद्धी, नीलं च तद्वीश्च नीलतद्धियो । वत्येत्यत्र नीलस्येत्यपेक्षायामप्रवृत्तिः २० ! "सरसंवेद्यमानस्य नियमन धिया सह । विषयस्य ततोऽन्यत्वं केनाकारेण सिद्ध्यति ॥ विषयस्य हि नीलादेर्षिया सह सकृदेव संवेदनम् । धिया सह न पृथक् । ततः संवेदनादपसे विषय इति कथम् ?"-०पातिकाल. पृ.९१। “यद् यस्मादपृथक् सवेदनमेव तत्तस्मादभिन्न यथा नीलधीः स्वस्वभावात् । यथा वा तैमिरिकज्ञान- प्रतिमासी द्वितीय उडुप. चन्द्रमाः मोलधोवेदनम्वेदम् इति पक्षधोपसंहारः। धर्यत्र नीलाकारतद्धियो, तयो. रभिन्नत्वं साध्यधर्मः, योक' सहोपलम्भनियमो हेतुः । ईदृश एवाचार्याय प्रयोगे हेत्वर्थोऽभिप्रेत: "-तावसं. पं.पू. ५६।२ मीमांसका"-ता-टि.। ३ पीछज्ञानस्य । ५ "सञ्च पर. जैमिनेशनमिति, सात वर्षे. ऽनुमानादवगच्छति बुद्धिमिति च।"-alo टि०। ५ पोचज्ञानात् । । "योगाभ्युपगतात्-ता. टि.। . सदोषलामनियमाभावात् । ८ सहोपलम्भनियमात् । ९ "सपेक्षमसमर्थ भवतीति" (पा. महा. २१1१) न्यायाद एमासाभावः।"-ता.टि.। .
२१८७] प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्तावः ३५७ - । .. अगमकत्वात् , अनपेक्षायां तु न नीलधिय एवं प्रतिपत्तिः, अन्यधियोऽपि ततः सम्भवात् । तथा च न सहोपलम्भनियमः अन्यधीव्यपेक्षया नीलस्य तदप्रतिवेदनादिति चेत् । न; प्रकरणा- दिवशात् तच्छन्दस्य नीलार्थनिर्णये बहिरपेक्षाविरहाट्मकत्वोपपत्तेः वृत्तिविधानस्याविरोधात् । तयोरभेदः तादात्म्यं 'भेदाभावो वा । कुत एतत् ? सहोपलम्भनियमात् । अस्यार्थः पश्चा द्विवरिप्यते । द्विचन्द्रादिवदिति निदर्शनमत्र द्रष्टव्यम् , शास्त्रे परेणाभिधानात् । सदिदं निषेधन्नाह-'न' इति । कुत एतदिवि चेत् ? पक्षम्य प्रत्यक्षबाधनात् । प्रत्यक्षं हि नीलं तज्ज्ञानात् नीलाम तज्ज्ञानम् अर्थान्तरतया जडेतररूपतया भिन्नजातीयत्वेन सकलप्रेक्षावत्साक्षिकतया प्रतिपद्यमानं तदभेदपलं प्रतिक्षिपत्येक, पावकानुष्णपक्षमिव दहनोष्ण- प्रत्यक्षम् । तन्न तस्य हेतुबलात्परिपालनम् । "न तस हेतुभिस्त्राणमुत्पतन्नेव यो हतः।। ] इति न्यायात् । १० तद्भदप्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्वान्न तेन तस्य प्रतिक्षेपः चन्द्रार्कादिस्थिरप्रत्यक्षेणेव तद्गतिपक्षस्येति चेत ; न ; बाधकाभावात् । अन्यतस्तद्वाधने तत एव तदभेदपरिज्ञानाब्यर्थस्तन्नियमः स्यात् । तन्नियमादेव तद्वाधनं देशान्तरप्राप्तेरिव स्थिरप्रत्यक्षस्येति चेत् ; भवेदेवं यदि तत्प्राप्तेरिव "तनियमस्याप्यविनाभावनिश्चयः मुलभः स्यात् । न चैवम् , तदलाभस्य वक्ष्यमाणत्वात् । ततो न नीलतद्धियोरभेदः, तत्पक्षस्य प्रत्यक्षेण बाधनात् । कथमिदं कारिफायामनुक्तमभिधीयत इति चेत् ? न ; सामर्थ्यप्रापिवस्याभिधाने दोपा. भावात् । परेणैव हि नीलतद्धियोरिति भेदं निर्दिशता, तत्प्रत्यक्षमुपस्थापितं तनिर्देशस्य "तन्मूलत्वात् । "तच्योपस्थाप्यमानमभेदप्रतिक्षेपकमेव तत्प्रत्यनीकविपयत्यादिति न किञ्चिद- सामञ्जस्यम् , अतश्च न तयोरभेदः । इत्याह- विरुद्धासिद्धसन्दिग्धव्यतिरेकान्वयत्वतः ॥८॥ इति । व्यतिरेकश्चान्वयश्च व्यतिरेकान्वयौ । अन्वयशब्दस्य अजाद्यदन्ततया पूर्वनि. पातेन भवितव्यं तत्कथमयं निर्देश इति चेत् ? न; धर्मार्थादिपु दर्शनात व्यतिरेकशब्दस्यापि पूर्वनिपातोपपत्तः । सन्दिग्धी संशयिती व्यतिरेकान्वयो" यस्य सन्दिग्धव्यतिरेकान्वयः। पुनर्विरुद्धादीनां द्वन्द्वं कृत्वा भावप्रत्ययः, तस्य प्रत्येकममिसम्बन्धश्च कर्त्तव्य इति । इदमुच्यते- न नीलतखियोरभेदस्तादात्म्यं सहोपलम्भनियमान् । कुतः ? तस्य विपक्ष एवं मायेन विरुद्धत्वात् । २५ १ सदोपलम्भनियमाप्रतिवेदनात् । २ "वक्ष्यमाणप्रकारेगोमयोरपि चेतनत्वेनाविशिष्टत्वम्"-तादि । ३ बौद्धन । “भेदश्च भ्रान्तविज्ञान येतेन्दाविवाद्वये ।"-प्रधा० २१३८९ ४ निषेधयन्ना-मा०, २०,५०। ५ पक्षस्य । ६ देशान्तरप्राप्तेरिव । ७ सहोपलम्भनियमस्यापि । ८ पठौद्विवचनमयोगेण। ९ तन्निदर्शनस्य मा०, ब०, ५० । षष्टीविभवस्या भेदनिर्देशस्य ! १० भेदप्रत्यक्षमलत्वात् । १ भेदप्रत्यक्षम् । १२ अभेद । १३ "लघध्यभायदपाजय॑मेकम् (शा० २११११९) इतिसूत्रोकप्रकारेण"-ता. टि. १४-यौ च यस्य मा०, प., १०।१५ "भेद एव"-ता-टि।
न्यायधिनिश्चयविवरणे [११८७ 'नया हि- १० 'तादात्म्ये योगपद्यं न सहाा नील द्वियोः ! योगपद्यं यतो लोके भेदाधार प्रनीतिमत् ।।८८१॥ योगपद्ये च सत्यस्मिन् वालिकाकुचयोरिव । तयोः परस्परैकत्वं कविभिः कल्प्यतो कथम् ? ॥८८२॥ तदनियतो हेतुनिषेधत्येव ते मतम् । तत्कथं विषमश्नासि सजीवन धिया स्थितः ॥८८३॥ भेदे गवाश्ववन्नो चेत् सहनियमस्तयोः । अभेदेऽपि कथं चन्द्रतवरुप्यविवेकवात् ॥८८४॥ चन्द्रदृष्टयव दृश्यश्चेत्तद्विवेकोऽपि ते मतः । तद्विवेकानुमानस्य फैमर्थ्यक्येन कल्पनम् ॥ ८८५) तस्यैव निश्चयाथं घेतत्कल्पनमुदीर्यते । पन्द्रऽपि निश्चयायैवं मानमन्यत्प्रकल्प्यताम् ।।८८६॥ प्रत्यक्षादेव निश्चयश्चन्दश्चेत्तदभेदतः । तद्विवेकोऽपि तत्प्राप्तमनुमानं पुनर्वृथा ॥८८७॥ अभेदेऽपि न पेशन्द्रनिश्चये तद्विनिश्चयः । तदृष्टावपि दृष्टिनेंति "सिद्ध निदर्शनम् ॥८८८॥ स्वसामग्यास्तथोलत्तेः सहड्डियमो यदि । नीलतज्ज्ञानयोरेव नाभेदेऽपि त्वदुपयोः ।।८८९॥ भेदेऽप्यप नयः कस्माद् भवता भद्र नेष्यते । सहनियमरतत्र यत्तयोर्न गवाश्ववत् ।।८९०॥ व्यवसायोऽपि लोकस्य नीलतज्ज्ञानयोग्यम् । भेद एवास्ति भेदेत्यनज (एवास्ति नाभेदे त्यज) निन्धवेशसम् ॥८९१॥ ततः स्थितं सहोपलम्भनियमस्य विरुद्धत्वान्न ततो नीलतज्ज्ञानयोरभेद इति । २० अपिध, एवं विकल्पाविकल्पयोरपि मनसोरेकरवरागः सहोपलम्मनियमात् । अस्ति दि. वत्रापि तनियमः "मनसो युगपट्टत्तेः" [५० वा० २११३३] इति वचनात् । अनियतैव तत्र लना-"तन भदन्तशुमगुप्तस्त्याह-विरुद्धोऽयं हेतुः, रत्मात्-सदराब्दच लोके स्या-नान्येन विना रित । विदोऽयं तो हेतुर्यसि सहवेदनम् ॥"-ससं०. पृ. ५६७ । भ• 120 पृ. ५.. २ मलितमियोः तादाम्ये सहायः योगपयन' इत्यन्वयः । ३ ता तस्मात् । ४ नीतलियोः । ५ पन्द्र दृष्टेव मा... प०, "प्रन्यशादेव नित्य इति सम्बन्धनीयम्"-साहि. सिद्धिनिद-भा०, १०,५०1निर्विवपकविकरस्यो।
११ १३ ११८७ ] प्रथमःमत्यक्षप्रस्ताव तदृत्तिः केवलस्यैव निर्विकल्पस्य प्रतिसंहारे विकल्पत्य चेन्द्रियव्यापारोपरमें दर्शनादिति चेत् ; न, नर्हि नोलतज्ज्ञानयोरपि तनियमः वे वलस्यैव तज्ज्ञानस्य विषयान्तरे नीलस्यापि ज्ञानान्तरे दर्शनात् । तदन्यदेव ज्ञानं नीलं च. पूर्वापरैकल्ले प्रमाणाभावस्य निवेदनात् । ततो यन्त्रील. सहितं ज्ञानं ज्ञानसहितश्च नीलं तदन्यदेवेत्यस्त्येव तन्न तन्नियम इति चेत् ; कथमेवं विकल्पे- तरयोरप्यसहभाविनोन्यत्वात सहप्रतिपन्नयोस्तनियमों न भवेत् ? तथा च वस्तुवृत्त्यैव तर्दमेदव्यवस्थिते । कथमुक्तमिदम् "मूहः तयोरैक्यं व्यवस्यति" ॥ [प्र० वा०२।१३३] दर्शनाभेदतः स्पाप्ट्यं विकल्पे तत्त्वतो भवेत् । "न "विकल्पानुविद्धस्य” इत्यादि "तजडफल्पितम् ॥८९३॥ "तद्वद्यमपि सामान्य वस्तु सत्स्यात्स्वलक्ष्मवत् । "तदवस्त्वमिधेयत्वात्" इति तन्मुग्धभाषितम् ॥८९४॥ विकल्पधर्मयोरेवमभिलाप्येतरात्मनोः । सहोपलम्भादेकत्वे विकल्पो नाय कल्पते ॥८९५॥ तथा हि- "तस्याभिलायकस्वभावस्य स्वतो वेदनम्, "तस्यानभिलाप्यस्य तत्रा सम्भवात्, अभिलाप्यस्यानभिलाप्यरूपानुपपत्तेः । अभिलाप्यमेव "तदपीति चेत् ; न तर्हि १५ प्रत्यक्षम् , "तस्यानभिलाप्यस्यैवाभ्यनुज्ञानात् । तृतीयं तु प्रमाणं भवेत् अलिङ्गजस्वेनानुमा- नेऽप्यनन्तर्भावात् । ततश्च 'प्रमेयद्वैविध्यात्" इति व्यभिचारी हेतुर्भवेत्, प्रमाणद्वैविध्याति. कमेणापि भावात् । “नाप्ययमनभिलाप्यस्वभाव एव ; "अभिलापसंसर्ग" [ न्यायबि. पृ० १३] इत्यादेनिर्विषयत्वापचे। अभिलान्याकारविपर्य खल्वेतत् कथं तदभावे निविषय न भवेत् ? "आरोपिततदाकारविषयत्त्वान्न दोप इति चेत् ; न ; आरोपकस्याभावात् । विकल्प एव हि आरोपकारी, तस्य चोक्तन्यायाद्सम्भवे कुतः क्वचित्कस्यचिदारोपणमिति विकल्पविकलं सकलं जगद्भवेदिति कथमनुमानं यतः सहोपलम्भनियमादित्यसाधनाङ्गतया निमहाधिकरणं न भवेत् ? यदि पुनर्विकल्पाविकल्पयोर्विकल्पधर्मयोः अभिलाप्येतराकारयोर्क सत्यपि सहोपलम्भनियमे नाभेदा , कथं तदा तस्य गमकत्वं व्यभिचारात ? तदेवाह-विरुद्ध- त्वात्' इति । विरुद्धत्वं विपक्षस्वीकृतत्वं तस्मादिति । १ युगपवृत्तिः । २ "कलविकल्पसंहारे सुगतावस्थायामित्यर्थ "-वाटि· । ३ "केवलस्यति अनापि सम्बन्धनीयम्"-ता०टि । ४ "पति कारागारे"-ता०वि० । ५सहोपलम्मनियमः । ६ वेवस्य वि-भा०प०, प०। ७ ग्रहोपलम्भनियमः। ८ तदभेदे व्यवस्थिते मा०,५०, प। निर्विकल्पसविकल्पयोरभदव्यवस्थितेः। ९ प्र०या १८३ । १. "सविकसकस्य विकल्पज्ञानस्येत्यर्थः"-ता-टि.। ११ तजल्पि-भा०,१०,५०1 १२ विकल्पज्ञानवेधा । १३ तत् सामान्यमवस्तु । प्र०वा०२।११११४ विकल्पस्य । १५ स्वसंवेदनस्य । १६-रूप- खानुपपते:-मा०,१०,५०1१७ स्वतो वेदनमपि । १८ प्रत्यक्षस्य । १९ "प्रमेयद्वैविध्यात् प्रमाणवैविध्यम्"-ता. टि.1 २. विकल्मः । २१ "अमिलापसंसर्गयोग्यप्रतिमासप्रतीतिः कल्पना."-न्यायबि० २२ कल्पित-अभिला. प्याकार । २३ एव व्यवहारोप-भा०, ब०, ५० । २० २५ ३६० न्यायविनिश्चयविवरणे [११८७ एतेन यत्परस्य मतम्-"न नीलतज्ज्ञानयोरेकत्वं तन्नियमेन साध्यते अपितु उभ. योरपि चेतनत्वेनाविशिष्टत्वम् [ ] इति । तदपि प्रत्याख्यातम् । तथा हि- यथैव तन्नियामेऽपि मनसोरविकल्पता। एकस्यैव विकल्पत्वं परस्यैव न तूभयोः ।।८९६।। नीलतन्क्षानयोरेवं सज्ञानं चेन नीलकम् । तदभिन्नं तु तज्ज्ञानमिति भेदो दुरुचरः ॥८९७॥ अचेतनत्वात्सवित्तेलिं चेतनमेव चेत् । अन्यतस्तर्हि तचित्त्वं साध्यं तन्नियमो वृथा ॥८९८॥ यथा पाचेतनस्यापि वित्तिः सम्भवति स्फुटम् । तथा निवेदितं पूर्व तस्किमन 'प्रयस्यते ॥८९९॥ किञ्चेदं नीलं तज्ज्ञानच, ययोस्तनियमादभेदसाधनम् ? निरंशपरमाणुरूपमिति चेत् । न ; वक्ष्यमाणोत्तरत्वात् । यदेव प्रसिद्धमिति चेत् ; न ; तस्य नानावयवसाधारणस्या- वयविसिद्धिभयेनानभ्युपगमात् । अभ्युपगमेऽपि न सिद्धो हेतु ; नर्तकी पश्यतस्तद्विपयस्य" परेण परिनानेऽपि तज्ज्ञानस्यापरिज्ञानात् । तद्विपयस्यापि परेण कथं परिज्ञानमवगतम् ? रोमहर्षादेखत्कार्यस्य दर्शनादिति चेत् । न ; तस्य" तदेकविषयकार्यत्वस्यानुपायत्वेनासिद्धेः, अनुमानाच्च उत्समानस्यैव परेण परिझानं शक्यपरिकल्पनं न तस्यैव, तस्य सामान्यविषयत्वात । बपि प, रोमहर्षादिकार्यदर्शनात् स्वपरयोरेकविषयत्ववदेकसुग्यादित्यमपि भवेत , भिन्न- सुसादित्वे भिन्नविषयत्वस्याप्यनिवारणात् । देशभेदात् कथं सुखादेरेकत्वमिति चेत् ? न; "एकावे सदेशभेदस्येवासम्भवात्। 'ततः कथं मिनदेशो रोमहर्षा तिरिति चेत् ? न ; अविरोधात् । २० अन्यया एकरमाद्विपयाइपि "वदभावप्रसङ्गात् । पेमहर्षादिभेदाच मुरादे दे मासस्यापि स" किन्न स्यादविशेषात् १ ततो यथा भिन्नादेव मुपादेः स्वपरयोः रोमहर्षादिः तथा माहगदपीति न तदर्शनात् स्वविषयस्य परवेशत्वं शक्यविधानं यतो हेतोरसिद्धत्वमिति"। तदुक्तम्-- "अन्येन वेदनं चैतत्कृतोऽसितमात्मना । तत्कार्यदर्शनानतत्कार्यत्वस्याप्रसिद्धितः ॥ अनुमानस्य सामान्यविषयत्वस्य वर्णनात् । स एव दृश्यतेऽन्येनेत्येतदेव न सिद्धाति । -- .. ११ २५ सहोपलम्मनिययेन । २ सहोपलम्मनिपमेऽपि । ३ परस्य न तूम-आ.....! ४ नीले चैतन. (वम् । ५ सहोपतम्भनियमः । प्रसम्यते प्रा०, ५०,०। ७ नीलच शानञ्च मा.,.,.१८ सहोप- सम्भनियमात् । १ मवहारप्रसिसम् । १. नर्तकीक्षणस्य ।। रोमहर्षदः । १२ अनुमानस्य । १५ प्रतिपत्रो । सपरप्रतिपत्रोभिनिदेशस्तिवात् । १५ एस्तोश-भा.,.,.11 अभिन्न देशात् मुसादः। " मिन्नदेशायरोमाभाव । १८ मे १९-समुष्मिति भा., ...।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावा ५ , न १।८७ ] यथा च रोमहर्षादिकार्यदृष्टेस्तदेकता। तथा सुसादेरेकत्वं तत एव प्रसिद्ध्यति ।। अन्यदेव सुखं तस्य ग्राहमप्यन्यदस्तु तत् । देशभेदात्सुसादीनामन्यत्वमिति चेन्मतिः ।। एकत्वे देशभेदोऽपि कथ सिद्ध्यति तत्त्वतः १ । तत एर सुसादन्ये रोमहर्षादयो न किम् १ ॥ अन्यत्वाद्रोमहादेः सुखस्य यदि भिन्नता । अन्यत्ने ग्राह्यमप्यन्यदिति क्सान गृह्यते ॥" [प्र०वार्तिकाल० ३१३२१] इति चेत् , असारमेतत् , एवं परानुमानस्य व्यापत्तेः । वत्सल स्वप्टार्थ- प्रकाशनम् । स्वदृष्टम्य वादिप्रतिपन्नस्य निरूपलिङ्गस्य परेणापरिज्ञाने कथं तं प्रति तत्प्रकाशन- १० गर्थवत् , जात्यन्धं प्रति रूपप्रकाशनवत् ? तदयमन्यतरासिद्धः सहोपलम्भनियमः प्रकाशित- स्थापि परेणापरिज्ञानात् । तत्समानस्य परिज्ञानादोप इति चेत् , स्वतस्तत्परिज्ञाने तत्प्रकाशनवैकल्यात् । ततस्तत्परिज्ञानमिति चेत् , न , अपरिज्ञातस्य प्रकाशनासम्भवात् । परिज्ञानेऽपि तदयस्थ तव फल्यम् । वादिपरिज्ञातस्येति चेत् , न , दत्तोत्तरत्वात् , तत्रापि परेणापरिज्ञानात् । पुनरपि तत्समानस्य तेन परिज्ञानमिति चेत् , न ; 'स्वत:' इत्यादेतु- १५ वृत्तेरव्यवस्थापत्तेश्च । न च तव धर्मिण्यपरस्तन्नियमोऽस्ति तदप्रतिवेदनात् , अप्रतिवेदितस्य च ज्ञानस्वभावत्वानुपपत्तेः । धर्म्यन्तरे विद्यत एवेति चेत् , तस्याप्यप्रतिपन्नस्य कथं प्रकाश- नम् ' स्वयं दृष्टार्थग्रहणविरोधात् । प्रतिपन्नस्येति चेत् , न , दत्तोत्तरत्वात् । तापि तदपरस्य तत्समानस्य तेन परिक्षानमिति चेत् , न , 'खत.' इत्यादेर्दोपात् । एकन प धर्मिणि तन्नियग- भेदाभायात् । पुनरपि धर्म्यन्तरे तद्भेदकल्पनायां स एव प्रसङ्गः तस्यापीत्यादिव्यवस्था च । २० तद्धर्मिगतस्तनियमो व्यवहारादेक एव ततस्तस्यैकत्र प्रकाशनमेर अन्यत्रापि प्रकाशनमिति चेत् , न , एकर परिज्ञानस्यैवान्यत्रापि परिज्ञानत्वप्रसङ्गात् । ततः किम् ? अन्यतोऽपि किम् ? साध्यप्रतिपत्तिरिति चेत् १ ततोऽप्येकार्थपरिज्ञानमेव । ततस्तत्परिक्षानमपरिज्ञानमेवेति चेत् ; न , ततः साध्यातिपत्तरपि तदप्रतिपत्ति वापत्तेः। भवत्येवं परस्यैव तत्प्रतिपत्तिमतोऽभाचा. दिति चेत् , न , तदभाऽस्यापि वचनस्य चैयर्थ्यात् । इदमपि मा भूदिति चेत , न , २५ अवाप्येवं प्रसङ्गात् । पुनरेवममिधाने अनयादोपात् । ततो दूरप्रसारितस्यापि शब्दस्य परार्थत्वनियमान् कथं तदभावः ? सतोऽपि परस्य प्रत्यक्षादेव तत्प्रतिपत्तिः न प्रकाशिताल्लिङ्गा- दिति चेत् , कुत "एतत् ? परस्य प्रत्यक्षं नीलत-ज्ञानाभेदविपर्य प्रत्यक्षत्वात् अस्मत्प्रत्यक्ष- , . - - . , . १ विषयस्य एकता । २ अभिनदेशात् । ३ “तम परार्थानुमान स्वदृष्टार्थप्रकारानमित्याचार्यापलक्षणम्"- • पा• म०१४ निरूपलिङ्गप्रकाशनम् । ५ अपरस्य सहोपलम्भनियमस्यानुफ्लम्मात् । ६ -दिरनवस्था च मा०, ब०, ५०।-प्रतिपत्तितो न भा-आ०, व., प० । ८ -स्थानदो-पा०,२०प० । ९ नौलतज्ञा नाभेदप्रतिपत्ति ।१० एव तत् भा०,१०,२० ।
३६२ - ग्यायविनिश्चयविवरणे [१२८७ वदिति चेत , कथमिदं द्विष्टकामित्वं स्वपरयोरेकविषयत्वभयान परार्थानुमानमिप्यते, तदेव च पोप्यते इति । ततो दुरतिक्ममेव परविषयस्य परेण परिज्ञान 'तदर्शनस्य च । दृश्यते हि सामग्रीवशात् परदर्शनस्य प्रतिपत्तिर्न तद्विपयाय 'पश्यन्नयमास्ते स तु न ज्ञायते यं पश्यति' इति व्यवहारदर्शनात् । कथं पुनदर्शनस्यैव परिज्ञानं न तद्विषयस्येति चेत् ? न , त ५ तत्सामग्याः प्रतिबन्धात् । सामप्रीतस्तदपरिज्ञानेऽपि तदनुमितादर्शनात्तत्परिज्ञान' "तस्य दृश्य- शून्यस्यासम्भवात् , भ्रान्तस्यापि केशोण्डुकादी सत्येन दृश्ये भावात् फेवलं स तन मिथ्या, सत्यज्ञाने तु तथ्य इति विभाग इति चेत् , भवतु नामेवम् , तथापि तव परितोप: । तथापि सहोपरम्भनियमस्याप्रसिद्धः। न हि सामग्रीको दर्शनस्यैव ततोऽपि चिपयायेव प्रतिपत्तो तन्नि- यमः । ततो दुरालाप एवायम् अन्येन वेदनं चैतत् इत्यादिः । असाधारणत्वे विषयस्य १० वयनमरन्धस्याप्यस्य वैयर्थापत्तः, प्रकाशितस्यापि परेणापरिक्षानरत् , अपरिज्ञातस्य च पाय. ानुपपत्तेः । 'लिङ्गवत्तत्समानपरिक्षानाददोप इति चेत् , न , तस्यातद्वचनत्वेन सत्यपि तद्दोपे तन्निग्रहाभावप्रसगात् । तद्वचनमेवेति चेत् , न , "तदपरिझाने तत्प्रभवत्वापरिज्ञानात् । तत्परिज्ञाने तु कथमसाधारणत्व विषयस्य स्वपरप्रतिपत्तिविषयस्य "तत्त्वानुपपत्तेः । तदयं साधारणतां वचनस्य प्रतिपद्यमानो नीलादेरेव किन प्रतिपद्यत ? यत्पुनरत चोद्यम्-"यदि च साधारणत्वं प्रतिभाति त्वया दृष्टं न वेति किमिति प्रश्नः १ प्रमाणान्तरसंवादार्थः । यदि प्रत्यक्षान्न प्रत्येति वचनादपि नैव प्रत्येप्यति । तदपि स्वप्रतिभासमेर सूचयति त्वं प्रति ( त्वत्प्रति ) भासितं मम प्रतिभाति इति । "तेनापि पृष्ट्वैव ज्ञातव्यं तत इतरेतराश्रयदोपः । यच्च प्रत्यक्षेण न प्रतिपन्नं तत्कथं घचनात्प्रत्येतव्यम् ' न हि प्रत्यक्षऽर्थे परोपदेशो गरीयान्" [प्र० कार्तिकाल० ३१३३१] २० इति , तदपि व्याकुलचित्ततामलङ्कारक रावेदयति , वचनसाधारणस्वेऽपि प्रसङ्गात् । तस्यापि प्रत्यक्षतः प्रतिभासे किमित्ययं प्रश्नः वयापि "श्रुतं न वेति ? कदाविददर्शनस्यापि भावात् । तददर्शने क्थ तत्साधारणत्वं दर्शनापेक्षत्यात्तस्येति चेत् , पथं वचनस्याप्यभरणे "तत्त्वं तस्यापि श्रवणापेक्षत्वात् । श्रवणयोग्यतयेति चेत् , न, परनापि दर्शनयोग्यतया भवेत् । दर्शनाभावे सैव कथं कार्यानुमेयत्वात्तस्या" इति चेत्, न, कदाचिद्दर्शनस्यापि भावात् , इस्थमेव वचनेऽपि तब्यब- स्थापनोपपत्तेः। ततो न प्रत्यक्षप्रतिपन एव साधारणाकारे प्रमाणान्तरसवादार्थः प्रश्न , किन्तु तस्येव परदर्शनविशिष्टस्य प्रतिपत्तये । ततो न युक्तमुक्तम्-'यदि प्रत्यक्षात्' इत्यादि तथा 'तेनापि इत्यापि । परस्परप्रश्नमात्रात्तत्प्रतिपोरनभ्युपगमात्। न च प्रत्यक्षादप्रविपन्नस्यैव १३ परदर्शनस्य । २ पादर्शन एर। ३ सामध्यनुमितात् । ४ दर्शनविपरपरिशनम् । ५ दर्शनस्य । दर्शनस्य । ७ विषयः । “ सोपसम्मनियमः। ९रिवाशमानेन परि-भा, २०, ५.11 बचनस्य विषाप्रविवादकवाभावेन । पिण्यापरिझाने । ११ असाधारणत्वानुम्परो । १ नमपि । १४ तव - मा०, ५०, १० । १५ श्रुतं तदेवेति भा०, ५०, ५०1१1 सधारणलस्य ! " तत्वस्यापि भा०, २०, ५.) साधारण वम् । १८ योग्यतामा । १९ -रसभवादयार्थ आ., १०, प.।
प्रथमःप्रत्यक्षप्रस्तावा . . -- वचनाप्रतिपत्तिः, न च नन वचनस्यागरीयस्त्वं विशिष्टरूपप्रतिपत्यर्थतया तत्वोपपतः। अत इदमप्य सङ्गतम् ; 'यच' इत्यादि । यच्चेदमन्यत्- "प्रत्यत्तस्य प्रमाणत्वे वचनस्य प्रमाणत्वं (ता)। वचनस्य प्रमाणत्वे प्रत्यक्षस्येत्यसाध्यदः ॥" [प्रवार्तिकाल० ३१३३१]इति; तन्न युक्तं 'प्रत्यक्षस्य' इत्यादि , सवि प्रत्यक्षसंवादे वचनप्रामाण्यस्य लीलागन्यत्वात् ५ 'वचनस्य' इत्यादिकं तु अयुक्तम् ; तत्संवादनिरपेक्षस्यैव प्रत्यक्षस्य सा(असा)धारणाकारे प्रामाण्यात् । तस्य च भवतोऽपि प्रसिद्धत्वात् , अन्यथा वाग्ल्यापारयैयर्थ्यांपत्तेरिति निवेदनात्। ततः स्थित विषयविपयिणोरेकस्य अन्यवरस्यापरिक्षानेऽपि परिज्ञानादसिद्ध सहोपलम्भनियमः, ततश्च न नीलतद्धियोरभेद इति । स्यादाकृतम्-भवत्ययं प्रसङ्गो यदि योगपर्य सहशब्दस्यार्थः, न चैवम् , तस्यैकार्थत्वात् । १० दृश्यते च तस्य तदर्थत्यम् , यथा सहोदर इति । तदयमर्थः-सह एकस्य उपलम्भः , तस्य नियमः 'ज्ञानस्येय नार्थस्य' इत्यवधारणं तस्मादिति ; तन्न ; ज्ञानवन्नीलादेरप्युपलम्भात् । तदेव ज्ञानमिति चेत् ; न ; तदन्यस्यैव "तस्य 'महम्' इति प्रतिवेदनात् । अहमित्यपि नीला. धेय प्रतिवेद्यत इति चेत् ; न ; तस्यं पीतादावभावप्रसमात । गोलवदन्येदव तन नदिति चेत् ; कुल एतत् ? 'पौर्वापर्य प्रमाणाभावादिति चेत् ; न ; अन्यत्वस्याप्यपरिज्ञानप्रसङ्गात् । १९ न हि पूर्वापरयोरेकेनाऽग्रहणे 'पूर्वस्मादिदगन्यत्' इति सुपरिझानम् । कुतश्चित्परिज्ञाने वा तदेकत्यपरिशानमपि स्यादविशेषात् । ततो न नीलादोव ज्ञानमित्यसिद्ध एकोपलम्भनियमः । 'सिद्धस्यापि किं तस्य साध्यम् ? मीलतद्धियोरेकत्वमिति चेत् । न ; तदर्शनस्येव" हेतुत्यात् । तदेकत्वव्यवहार इति चेत् ; फरतहि "राध्यवहारो नाम ? तन्निश्चयस्तदभिधानञ्चेति चेत् ; न ; निश्चयाभिधानविपयस्येव हेतुत्वात्" नेकोपलम्भनियमो हेतुः । २० पृथगुपलम्मामाय इति चेत् ; कुतस्तत्मतिपत्तिः प्रत्यक्षादिति चेत् ; न: प्रति- वन्धाभावात् । तादात्म्यं प्रतिबन्ध इति चेत् ; न ; प्रत्यक्षस्य "वद्वदभावत्वापत्तेः, हेतोर्या प्रत्यक्षवत् भावरूपत्योपनिपातात् । तदुत्पत्तिरिति चेत् ; न ; अभावस्य सकलशक्तिविकल- तया कारणत्वानुपपत्तेः । न चाकारणस्य प्रतिपत्तिः, "नाकारणं विषयः" [ "इत्यस्य विरोधात् । नाप्यनुमानात्तत्परिज्ञानम् ; प्रत्यक्षाभाचे वदनवतारात् , लिगामावाघ । तद्धि लिङ्गं न भावरूपम् ; तस्य प्रत्यक्षवत् तत्रामतिबन्धात् । न चाप्रतिबन्धस्य लिङ्गत्वम् ; तादात्म्यादिलिङ्गप्रतिवन्धकल्पनाचेफल्यापत्तेः। नाप्यभावरूपम् ; तत्रापि 'कुतस्तत्प्रतिपत्तिः' १ 'प्रत्यक्षस्यत्यसंविदः"-4. वार्तिकाल । २ सहशब्दस्य । ३ एकार्थत्वम् । १ नोलायपि। ५ ज्ञानस्य । समिति प्रतिवेदनस्य । ७ अहमिति प्रतिवेदनम् । ८ एकस्यैर प्रतिवेदनस्य क्रमशः नीलवत् पीतादौ सम्म। १ "पुनः स ( मदन्तशुभगुप्तः ) एवाइ-यदि सहशब्द एकार्थस्तदा हेतुरसिद्धः."- तश्वस०० पृ.५६८ । भक-दि.१५९ । १० एकत्वोपलम्मस्वैव हेतुत्वे असिद्धसमिति भावः। व्यवहा- मा०प०11-वात् तन्नेको-आप.प० ३३ पृथगुप्लम्भाभाववत् । १४ द्रष्टव्यम्-पृ०२९८/2011 .. , ] १४ । म्याययिनिश्चयविपरण રાટ इत्यादेः तादात्म्यादिपर्यन्तस्योपनिपातात् । पुनरमायस्पतलिमपरिकल्पनायां घरपदोपाद- नवस्थापत्तेा । तनानुमानादपि तत्परिमानमित्यमावासिद्धत्वाददेतुरेवायम् । पथं पारयानवस्य हेतुत्वम्, "अर्थी स्वयं गमयति" [ J इत्यस्य विरोधात्। संवृत्यार्थ एवाय परमार्थतः पृतपत्यादेरप्यर्थाभावात् । न हि निरंशे परमार्थतः पृतकत्वमा ५ नित्यत्वमित्यादिसाध्यसाधनभूतमद्वयं सम्भवतीति पेत् ; पारवा वायदेवत । तनायमपि हेतुरसिद्धनात। युगपदुपलम्भ एवास्तु हेतुरिति पेत् ; न, वस्यापि विक्षेणाविरोधात् । अविरोधे गयावादी पिन्न दुपलम्भ इति पेत् ? अभेदेऽप्येषाणुमाने किन्न स्यात ? यहेतुतस्तथानु- स्पत्तरिति चेत्, न, इनरनापि समानत्वात् , गयाश्वादेरपि ततस्तथानुत्पत्तः । सतो या स्वहेतु- १. सामध्यं तत्र भवत्येव भेदेऽपि तदुपलम्भ रवि सिद्धं सन्दिग्धव्यतिरेफत्वम् । ततः सूक्तम्- सन्दिग्धव्यतिरेकत्यत इति , तथा सन्दिग्धान्चयत्वत विध, व्यतिरेफसन्देहे अन्वयसन्देहस्याप्यायश्ययात् (क्रवात)। यत्पुनर्द्विचन्द्राद्विदिति निदर्शनम् , तदपि न शोभनम् , साध्यविफ्टत्वात् । न हि. द्विचन्द्रादेतज्ज्ञानादभेदः, साकारयादप्रतिविधानात् । परस्परं तदाकारद्वयस्याभेद इति चेत्, १५ न, तत्रापि यथाप्रतिमास भेदस्येव भायात् । यथावत्यमभेद एव एक्स्यैर चन्द्रमसो द्विरुप तयोपरम्भादिति चेत्, न, अन्यथारयातेरपि प्रतिविधानात् । तत इदं कारणदोपयशादापार- द्वयमसदेवावभासगानं यथामतिमान भिनमेवेति सिद्ध' साध्यवैवल्यम्, अवश्चानुदाहरणमिति । [यत्] पुनरेतत् परमाणुमानमेव "नीलतनानादिक तप पल्पित एव साध्यसाधनभेदः परमार्थतो नित्यत्वाद्यनुमानेऽपि तदभावात् इति, तदपि न साधीयः, परिकल्पिताखेतोरवस्यवः २० साध्यसिद्धरसम्भवात् , अन्यथा तत एव भेदस्यापि तादृशंस्य सिद्धिप्रसङ्गात् । तथा हि- ययोः सहोपलम्भनियमस्तयोर्भेदो यथा सुगवेत्तरयोः वनियमच नीलस-ज्ञानयोरिति । मुगतोपलम्भसमये हि तदन्यस्यानुपर-धावभाव एव स्यात् सुगतस्यात्यन्तिकत्वात् । "तिष्ट- न्त्येव पराधीना:" [प्र०या० १२०१ ] "इत्यादिवचनात् । न च तदन्याभारे "तस्यापि सम्भवः, तस्य जगद्धितैपिणो जगदभारोऽनुपपत्तः, अन्योपलम्भे च सुगतस्यानुपलब्धी "तद्वि- २५ फलं जगद्भवेत् , ससारिप्रवाहस्याप्यपर्यन्तत्वात् । न घेद पध्यं भवताम् अनुमानमुद्राभेदापत्तः, व्याप्तिपरिज्ञानस्य तदायत्तत्वात् , “न च सम्बन्धो व्याप्यसर्वविदा ग्रहीतुं शक्यः" [प्र० वार्तिकाल. १२] इत्यलवारवचनात् । सर्वविदस्तज्ज्ञाने पथमितरस्यानुमानमिति चेत् ? इदमपि भगनेय प्रष्टव्यो य एव द्यूते । वदस्ति " तयोस्तनियम इति न साधनवैकल्य- तत्प्रतिज्ञा-आ, या, प.।। पृथगुपचम्भाभाव । ३ -त्वाद् युगपदुपलम्भवदुपलम्भ-प० । -त्वाद् युगपातम्भवत् युगपदु-भा०, ५०1४ भेदेन । ५ युगपदुल्लम्म । -मसदिवावमा-भाव... नौलपीतज्ञ'ना-आ०,५०,०। ८ साध्यसाधनभेझमावत् । ९ तारिखस्य। 1. "अाल्पासइयेयमावना- परिवर्द्धिता । तिष्ठन्त्येव पराधीना येषा तु महतो कृपा-अभिम पृ० १३ ।। सुगतस्यापि । १२ मुगत- शुन्यम् । १३ गतेतरयो बहोलम्मनियम ।
प्रथमः प्रत्यक्षपस्तायः १० ११८१] ३६५ मुदाहरणस्य । नापि साध्यवैकल्यम् अभेदे संसारिणि सुगतत्वस्य मुगते च संसारित्वस्यान- भिमतस्य प्रसङ्गात् । संसारीतरविभाग एप नास्ति संविदद्वतस्यैव तत्वतो भावात् तत्कथं तस्योदाहरणत्वमिति चेत् ? कथमिदानीं तदभेदानुमानं वदेते धर्मिहेतृदाहरणविभागाभावात् , अनुमानस्य च तन्मूलत्वात् । तदपि मा भूदिति चेत् ; न तहिं भवानस्मा प्रतिवादो तद. नुमानवादिन एव तत्त्वात् , तेन चास्यातिप्रसङ्गस्य दुष्परिहरत्वादिति कथमतो न भेदसिद्धिः ? उदयं प्रतिपक्षमनपाकुर्वत एव कल्पिताद्धेतोः साध्यसिद्धि तात्त्विकीमन्विच्छन् कथ. मिव प्रज्ञावन्तमात्मानं प्रेक्षावयः प्रकटीकुर्यात, यदि केनापि निष्ठुरहृदयेन विप्रलब्धो न भवेत् । तदेवाह- साध्यसाधनसङ्कल्पस्तत्वतो न निरूपितः । परमार्थावताराय कुतश्चित्परिकल्पितः ॥८॥ अनपायीति विद्वत्तामात्मन्याशंसमानकः । केनापि विपलब्धोऽयं हा! कष्टमकृपालना ॥८९॥ इति । साध्यं नीलतज्ज्ञानयोरभेदः साधनं सहोपलम्भनियमः , वयोः सङ्कल्पः समर्थन स तत्त्वतः निरंशवस्तु समाश्रित्य न निरूपितः न स्थापितः, निरंशत्वे साध्यादिधर्म- भेदस्य, तस्मिंश्च निरंशत्वस्यासम्भवादिवि भावः । कीरशस्तर्हि स इत्याह-परिकल्पितः १५ अध्यारोपितः । पुतः परिकल्पितः ? कुतश्चिद्विकल्पबुद्धिवलात् । किमर्थम् ? परमार्थाव- ताराय परगार्थस्य नीलतज्ज्ञानाभेदस्यावतारः प्रतिपाद्यचेतसि प्रवेशनं तस्मै इति । कुवः पुनः परिकल्पितस्य तद्यतारार्थत्व (त्वम् ?) इति चेत् ? अनपायी अव्यभिचारी यत इति । न हपरिकल्पितस्यापि तदर्थत्वम् अव्यभिचारादन्यतः तस्य । परिकल्पितेऽपि भावे कथं तस्यापि न तदर्थत्वमिति मन्यते । अत्र दूषणम्-इति एवं विद्वत्ता प्रज्ञावलशालिताम् आत्मनि २० स्वरूपे आशंसमानकः "न्यायमार्गतुलारूढं जगदेकत्र मन्मतिः" [ ] इत्या- दिनी कुत्सितमाशंसमानः अयं प्रसिद्धो धर्मकीर्तिः केनापि दिङ्नागादिना विपलब्धो वञ्चितः । कीदृशेन ? अकृपालुना निष्कृपेण | सकृपस्य परपञ्चकत्वासम्भवात् । कञ्च- कत्वञ्च तस्यासत एव तत्सङ्कल्पस्योपदेशात् । कल्पनया सन्नेवासाविति चेत् ; न तस्या" एव साध्यसाधनोभयधर्मपरामर्शद्वयात्मनो निरंशवस्तुवादेऽनुपपत्तेः । तस्या अपि कल्पनयोपपत्ता- कव्यवस्थापत्तः । ततो न तात्त्विकस्तत्सइल्पो नापि सांवृत इति कथं तदुपदेशी न वञ्चको ८ नीलतद्धियोरभेदानुमानम् । २ प्रतिवादित्वात् । ३ दुपरिहार-आ०, २०, ५०। ४ -यदिपिच यदि-मा, ब०, प० । ५ निरंशं वस्तु मा०, २०, प० । ६ परमार्यावतारार्थत्वम् । ७ अय्यभिचारस्य । "न्यायमार्गतुलारूढ़ जगदेकत्र यन्मतिः । (हतु• बि०५.१) इत्यनेन पर्वटैन धर्मकीर्तिस्तवनं कृतम् । अनेन ज्ञायते यत् धर्मकीर्तिनापि कस्मिभिदन्ये 'न्यायमार्गतुलारूढम्' इत्यादिभिरेव स्वसन पृतम् । ९ सकरपः।.. कल्पनाया एवं शास्त्रार: म्यायविनिश्चयशियरणे [ १९० दिङ्नागादिः' ? कथं या तत्प्रामाण्यादसन्वमेव समनपायिनं प्रविपद्यमानो न विप्रलब्धो धर्म- कीर्तिः ? काल्पनिकस्य च तत्सत्वस्य प्रतिक्षेपात । अप्रतिक्षेपेऽपि कुतस्तस्य तदनपायित्वं प्रवि- बन्धस्य तात्विकस्याभावात् , कल्पितस्य विपक्षेऽयविशेपात् । तस्मादसन्तमसाध्यप्रतिबन्धञ्च तमनपायिनं प्रतिपद्यमानो वञ्चित एवायम् , अतश्च यदस्य विद्वत्तागमनं तदपि कुत्सितामिति । साध्यसाधनसङ्कल्पवस्तुतत्त्वं न वेत्त्ययम् । वर्णयत्यपि तद्वित्वं मूढत्वं किमनः परम् ।।९००॥ पुनरत्र विपादमावेदयन्नात्मनि कारणिकत्वं प्रदर्शयति-'हा कष्टम्' इति- अविद्योल्लासमुत्पश्यन् दिड्नागादो सुदुःसदम् । हा कष्टमिति देवोऽयं कृपालुत्वाद्विपीदति ॥९०१॥ तस्मान्न कल्पितस्य तन्नियमस्य सम्यग्हेतुत्वं यतो नौलतज्ज्ञानयोरभेदः सिद्धयत् । का पुनरयं नीलादिनाम यस्य तरज्ञानभेदिनो बहिरर्थत्वं परिकल्प्येत ? परमाणु. सन्दोह इति चेत् ; न, तत्र छायावरणादेरर्थप्रयोजनस्थासम्भवात् । न हि परमाणवः छाया• विधायिनो विरलपरिमण्डलात्मनां छनादिरूपतानुपपत्तेः । अत एव न पततो जलादेराधार• कारिणः । कथं वा तत्रैकाकर्षणे नियममेनान्याकर्षण भेदे तदनुपलम्भात् । नायं दोषो योग्यता- १५ विशेषात् । दृश्यते हि भेदेऽपि तद्विशेषादयस्कान्ताकर्षणे लोहाकर्पणं तद्वत्परमाणुष्वपि भवेत् । नापि तत्र छायावरणादेरप्यसम्भवः, योग्यतायलादेव तस्याप्युपपरोः, दृश्यते हि तद्वलाद् यहुछिद्राणामपि धपकादीनां पतमा प्रतिबन्धित्वमिति चेत् ; स्यादेतदेवम् ; यदि परमाणवः प्रतीयेरन् , न चैवम् , एफैकशः समुदायेन वा तत्प्रतिपत्तेरप्रतिवेदनात् । न तपन्नपु २. रष्टान्तमात्राद् इदन्त्वम् अनिदन्त्वं वा शक्यव्यवस्थापनम् अतिप्रसङ्गात् । तन्न तत्सन्दोहो नीलादिः । तदारयोऽवयवीति चेत् ; न; परमाणूनां निरपेक्षतया तदारम्भकत्ये पृथग्दशाया- मपि प्रसङ्गात् । संयोगसव्येपक्षाणां तत्त्वे संयोगो यद्येकदेशेन, अव्यवस्थापतिः । तदाह- तत्र दिग्भागभेदेन पडंशाः परमाणयः। इति । तब तस्मिन् संयोगे दिश एव भागा दिग्भागाः ते दस्तेन पडशाः पडवयवाः परमाणयो भवेयुरिति शेषः। तथा हि-पाचदिग्भागेपु चतुपु उपर्यधस्ताच व्यवस्थितैः परमाणुभिरभिसम्यद्ध्यमानस्य मध्यपरमाणोरवश्यम्भाविना पडेकदेशाः तदभावे प्रत्येक वत्स- पन्धानुपपत्तेः । वथा च सुव्यवस्थित नियत्वम् , सावयवत्वे विनाशस्त्यावश्यम्भायात् ! कथं वा परमाणुत्वम्, सावयवस्य कार्यद्रव्यवत् स्थूलस्यात् । तदषयवानां तव्यतिरेकादिति चेत 1-दिकः इ-आ०,०,१०।२-स्य च प्र-मा०,०,१०३ तदनुमायत्वं प्रा. व. प.! १ सहोपलम्भनियमस्य । ५ योग्यताविशेषात् । ६ परमाणु समुदायः । ५ "पट्दैन युगपद्योगात् परमाणोः पहे. शताषण समानदेशत्वात पिण्डः स्यादणुमात्रका "-विज्ञप्ति. वि.प. चतु-श० पृ. ४८ 1 तस्वसं.२०३ २२९१] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताया कथमेवं 'तैस्तस्य सावयवत्वम् ? सम्यन्धादिति चेत् , न, तैरपि दिग्भागभेदिभिरभिसम्बङ्ख्य. मानस्य तस्य पुनः पडशतापत्तेः । पुनः तदंशाना तव्यतिरेकपरिकल्पनायामनवस्थान प्राच्य- दोषानतिवृत्तेः । न चापर्यवसायिनस्तदशाः प्रतीतिविपयाः । तन्नैकदेशेन तेपा संयोगः । सर्वा- स्मनेति चेत् ; आह- . नो चेत्पिण्डोऽणुमात्रः स्यात् [न च ते वुद्धिगोचराः ॥९॥ इति । ५ नो चेत् न यदि घडशाः परमाणव एक्देशेन संयोगस्याभावात् सर्वात्मनेव तद्- भ्युगमात, तथा च पिण्डः परमाणुप्रचयः अणुरेव अणुमात्रः स्यात् भवेत् । दिग्भागभेदिनां हि परमाणूना सर्वात्मना मध्यपरमाणुना सम्बन्धे तदनुप्रवेशस्यावश्यम्भावात् । स एकोऽव- शिष्यत इति मन्यते । तथा च न कायं तस्येकद्र यस्यासम्भवात् , "[अ] द्रव्यमनेकद्रव्यं च द्रव्यम्"[ ] इत्यभ्युपगमात् । १० भवतु या कथमपि संयोगः, स तु कथमप्रतिपन्नानाम् , अतिप्रसङ्गात् , अप्रतिपन्नाथ परमाणवः प्रत्यक्षतस्तदप्रतिभासनात् । तदाह-न च ते बुद्धिगोचराः इति । न च नैव ते परमाणवो बुद्धेः अध्यक्षसंविदो गोचरा विपयाः स्थूलस्यैव स्तम्भा देस्तत्र प्रतिभासनात् । तथापि तत्कल्पनायाम् अव्यवस्थापत्तेः । अनुमानात्तर्हि तत्प्रतिपत्तिः, तच्चेवम्-विवादापन तद्व्यणुकं स्वतोऽल्पपरिमाणावयंवाररुधं कार्यत्वात् पटादिवत् । ये च १५ ततोऽल्पपरिमाणाः ते परमाणय इति चेत् , न पटादेरेव "परकल्पितस्याभावात् , निदर्शनत्वानु- पत्तेः । अभावश्च तस्य परिस्फुटमनवभासनात् । तदाह- न चैकम् [एकरागादी समरागादिदोपतः।] इति । न च नैव एकम् असण्डप अवयवनिष्का-तं 'पटादि इति । 'कुतः' इति प्रश्ने 'नच ते' इत्यादि । न च तद्बुद्धिगोचर इति वचनपरिणामेन हेतुपदमभिधातव्यम् । २० हेत्यन्तरमाह-एकरागादौ समरागादिदोषतः इति । राग आदिर्यस्य चलनावरणादेः स तथोक्ता एक्स्य प्रदेशस्य रागादिरेकरागादिस्तस्मिन् समः साधा. 'रणः प्रदेशान्तरस्य रागादिः स एव दोपस्तस्मात्तत इति । एकत्वे हि शरीरादेः क्वचिद्रागादी सर्वत्र तेन भवितव्यं रागादिमतः प्रदेशात्तदपरस्यानर्थान्तरत्वात् । न हि .. पृथरभूतावयवे परमाणो । २ स्वावयवै । ३ अनन्ता ! ५ सम्बद्ध स्तनदनी-श्रा, ३०, २.। ५-विशेषत इति भा०,०,५०। ६ कार्यस्य । ० "तथा अद्रव्य द्रव्यमनेकद्रव्यं च व्यमिति वचनव्याघात । सया दिन विद्यते जन्य जनक व द्रव्यमित्यद्रव्यम् । परमाणूनी जनक नास्त्याकाशादीनां जन्य नापि बनकमित्य- द्रश्यम्, नित्यद्रव्यगिति यावत् । अनेकद्रव्य खनेकदव्य जनसमस्येत्यनेन स्वरूण द्विविधमेष द्रष्यमद्रव्य नित्य मनेक. द्रव्यजन्य कार्यमिति । एकदन्यस्य च कार्यदन्यस्याभ्युपगमे व्याहतमेतद् भवतीति ।"-प्रा. यो. पृ. २३३ । -नघ-भा, २०, ५०1"तथा कार्यादपपरिमाणे समचायिकरणम् । तस्याप्य यदल्पपरिमाणमित्याद्य कार्य निरतिशयाणुपरिमाण रारब्धमिति शायते ।"-प्रा० प्यो• पृ. २२५ । "कार्यपरिमाणापेक्षया तदवयवपरिमाणात्य लोकेऽल्पीयस्त्वप्रतीते यश्च तस्यान्यव स परमाणुर्भविष्यति ।"-प्रशल फन्द• पृ. ३ । रब्ध का.ब.प.। १० वरपरिक-आ०,३०, प० । ११ घटादिति आ., २०, ५०। ९-वयवधारणा - ३६८ न्यायविनिश्चयविवरणे [११९१ 'निष्पर्यायं तत्रैव रागादिस्तदभावश्चोपपन्नो विरोधात् । ततः पाण्यादी रागे पलने चावरणे च प्रदेशान्तरेऽपि तत्प्रतिपत्तिः स्यात् , न चैवम् , तत्र तदभावस्यैव परिज्ञानात् । प्रदेशान्तर वद्वा पाण्यादावपि न तत्प्रतीतिः स्यात् ततः तस्येकान्तेनाभेदात् । न चैवम् , पाण्यादी उद्धावस्य प्रदेशान्तरे च तदभावस्य निर्विवाद प्रतिपत्तेः । भिन्न एव परस्परं प्रदेशाः प्रदेश्येव ५ तु तद्गतो न भिद्यते तदयमप्रसङ्ग इति चेत् ; एवमपि प्रदेशगतश्चलनादिः प्रदेशिनं यदि नोपसर्पति तत्रैव चलतः प्रदेशादचलतस्तस्यै पृथक्सिद्धिः स्यात् । एवं रागादावपि, । उपसर्प. तीति चेत् ; न ; तत्रैव इतरेप्नपि वलत एय तस्य परिज्ञानापत्तेः । एवं रागादावपि । न चैवम् । तन्न "चलाचलादिः कश्चिदेकोऽवयवीति । तदुक्तम्-- "पाण्यादिकम्पे सर्वस्य कम्पप्राप्तेविरोधिनः । एकत्र कर्मणोऽयोगात्स्यारपृथक्सिद्धिन्यथा ॥ एकस्य चावृतौ सर्वस्यावृतिः स्यादनावृतौ। दृश्येत रक्त चैकसिन् रागो[ऽरक्तस्य वा[गतिः ॥ नास्त्येकः समुदायोऽसात्" [२०२० ११८६-८८] इति । . अन यदासर्वज्ञस्य प्रत्यवस्थानम्- "यत्तावन्नास्त्येकोऽवयवी तस्य पाण्यादिकम्पे सर्वकम्पप्राप्तेरिति । तदयुक्तम् । व्याप्तेरप्रसिद्धत्वात् । न हि यस्य पाप्यादिकम्प सर्व- कम्पप्राप्तिः तस्याभावः इत्येवं व्याप्तिः क्वचिद्वहीता । नापि यस्य सत्यं तस्य न पाण्या दिकम्पे सर्पकम्पप्राप्तिः इत्येवं व्याप्तिः परेण दृश। न च दृष्टान्ताभावे स्वपत्तसिद्धौ पर- पक्षनिराकरणे वा कचिद्धेतोः सामर्थ्य दृष्टम् " [ ] इति ; तन्न युक्तम् , बौद्धमतानभिज्ञानात् । न घर योद्धेन विशेष्यस्यैवायवयिनो निषेधः साध्यत्वेनाभिप्रेतः , स्वय. २० मपि व्यवहारप्रसिद्ध्या तस्याभ्युपगमात् , अपि तु तद्विशेषणस्यैकत्यस्यैव तत्रैव विप्रतिपत्तेः । अत एव 'नास्त्येक समुदायः' इत्युक्तम् , अन्यथा 'नास्ति समुदायः' इत्येवोच्यते। हेतुरन चलाचलादिरूपो विरुद्धधर्माध्यास एव, तस्यैव साध्यविपक्षे "तद्विरुद्धधर्मप्रसङ्गापादन- , १ युगपन् । २ चरनादिप्रतीति । ३ प्रदेशिन । 'म चेदमिष्टापादन योग नाम् तैरयुतसिद्धयोः पृथ- सिद्धपनङ्गीकारात्' -ता-टि०५ चलादि भा.ब.प.1६ "पाण्यादिकमे सर्वस्य कम्पप्राप्ते । यदि पाण्या- दयोऽत्रया एवावयव्येकरूपस्तदा पाण्यादै कम्पे सति सर्वस्य पादादेरपि दम्प प्रजोति । एकलितस्मिन् कर्मणः कम्पस्य विरोधिनोऽकम्पत्यायोगात् ।... " अथावयवेभ्यो मिनोऽवयवी । अत एकस्मिनश्यवे कम्पमाने नावयवान्तरम्य कम्प तदापि स्यात्पृथविसतिरन्दया अवयवावयविनोदे पृथकम्पमानादवयवादकम्पमानस्यावयविनः समवेतस्य भेदेन तवावयचे सिदि स्यात् वस्त्रोदकवत् ।"" अथाभेदपक्षे एकस्यावयवस्यारती सर्वस्यावृतिश्व स्यादिति प्रसा. भेदपक्षमाश्रित्यानारती चावयविन स्वीक्रियमाणायामात एवावयवैऽनागतोऽसौ होतेति प्रसन.। भषाभेदपले रके चैकस्मिवयवे सर्वत्रावयये रागो दृश्यतेति प्रसङ्ग । भेदपझे तु रफ एवावयवैरकम्य चावय- रिनो वाऽगति स्यादिति प्र.।"-प्र. वा०म० कृति ८६-८७ । भवयिनि .. ८५। ७-क्षनिवारणे- आ०,०,401८ बौदस्य वि-मा.य,९० । १-च्यते भाजय०,१०11 तविरुद्धधर्मामस-मार,.,.॥
प्रथम प्रत्यक्षप्रस्ताव: . - वायात् ११९१] व्याजेन कथनात् । तत्र चास्त्येव व्याप्तिप्रसिद्धि यस्मिन् चलयपि यन्न चलति न तरोनैक यथा पर्णेन पाषाण:, चस्त्यपि पाणिशरीरे न चलति प्रदेशान्तरशरीरमिति । तत्कथन दृष्टान्तो "न च' इत्यादि सूक्त भवेत् ' सूक्तमेवेदम् , अवयविनमनभ्युपगच्छतः पर्णपापाणयोरप्य- भावादिति चेत् , न , व्यवहारप्रसिद्ध्या तदभ्युपगमस्योत्तत्वात् । यदप्येतदपर तस्यैव-"न ह्येवं कश्चिदनुन्मत्त प्रत्यवतिष्ठते नास्त्येको वन्ध्यापुन. ५ तस्य पाण्यादिकम्पे सनकम्पप्राप्ते , अकम्पने या चलाचलयो. पृथक्सिद्धिप्रमङ्गः खपु. प्पपरभृङ्गवत्" [ ] इति , तदपि न सुभापितम् , वन्ध्यामुतविलक्षणस्या वयविन• सपुष्पादिविलक्षणयोश्च पर्णपाषाणयोबौद्धमतेऽपि प्रसिद्धत्वात् । तवष्टम्भेन प्रत्य वतिष्ठमानस्योन्मत्तत्यानुपपत्तेः । तन्नागृहीतव्यापको हेतु । नाप्रसिद्ध , तत्प्रतीतिभावात् । ननु चलप्रतीतिरचरत्यपि रूपादिवच्चलावयवसम. १० तथा चलत्यपि अचलप्रतीति अवलाययवसमपायानिमित्तात् सम्भवति तत्कथं तन्मात्रात क्वचिचलाचलत्व तत्त्वतः सिध्यति ? विभ्रमस्य असत्यपि सस्मिन् सम्भवात् , वत: सन्दिग्धासिनो हेतुरिति चेत् , कथ ततः शरीरस्यापि सिद्धिः, विभ्रमस्तदयोगात् १ पलादि रूप एव तद्विभ्रमो न शरीर इति चेत् , न , विभ्रमेतररूपतया प्रत्ययभेदप्रसङ्गात् । न च भिन्न एव तत्प्रत्यय 'चलति शरीरम्' इति विशेषणविशेष्यविषयस्यैकस्यैर तस्यानुभवात् । १५ भ्रान्तस्तदनुभव इति चेत् , कथ तत प्रत्ययस्यापि सिद्धिः विभ्रमात्तद्योगात् ? तदेकत्व एव स विभ्रमो न प्रत्यये इति चेत् , न विनमेतररूपतया तद्भेदप्रसङ्गात् । न च भिन एवानुभव 'एक एयायम्' इमि विशेष्यविशेषणविषयस्यैकस्यैर तस्यानुभवात् । भ्रान्तस्तदनुभव इति चेत , न , प्राच्यप्रसङ्गानुबन्धादनवस्थानोपनिपातात । तत शरीरवचलाचलवादापायनान्त एव प्रत्यय इति वस्तुत एव तत्सिद्धे कथ सन्दिग्धासिद्धत्व साधनस्य ? मा भूत्सन्दिग्धासिद्धत्वं सन्दिग्धव्यतिरेकत्व तु स्यात् , सयोगवच्चलनस्यापि घंदेशवृत्तित्वेनैक्स्यापि चलावरप्रत्ययविषयत्वाविरोधादिति चेत् , न , प्रदेशाभावे प्रदेशवृत्ति स्वानुपपते । अव्यापकत्यमेव तस्य तद्वृत्तित्वमिति चेत् , प्रदेशाभावे तस्यैवानुपपत्ते । संदधिष्ठितेतरप्रदेशसद्भावे हि तंत्र तस्याव्यापकत्व नान्यथा । सयोगस्य कथमित्यपि न युकम् , तत्रापि समानत्वात् तत्पर्यनुयोगस्य, तस्याप्येकावयपिनि अध्यापकत्वानुपपत्तेरिति । व्याप्यस्य 'प्रेदेशवत्वान्न सयोगस्याव्यापकत्वम् , अपि तु 'तद्धमत्वात् । तथा च परस्य वचनम्- "सयोगस्यैर ह्येव धर्मो येन यत्र यत्रापयवे सम्बद्वोऽधयनी दृश्यते तत्र तत्र रूपादिव. २० न १ सन 'यत 'इत्याध्याहार्यम् । २ भासर्वज्ञस्यैत्र । ३ न चल-आ०, ५०, १०। ४ प्रतीतिमात्रात् । ५ अनुभवात् । ६ एलायमनु-आ• २०, य० । ७ अव्याप्यवृत्तिवेन । ८ अव्याप३वस्शनुपपत्त । ९ तदधिष्ठित प्रदेशाद् भिन्न प्रदेशसद्भावे । १० इतरप्रदेशे।" अश्यविन । १२ प्रदेशवा-आ०, व., प० । १५ व्या पकल हि सयोगस्यैव धर्म इति भाव ।
३७० ] इति न्यायविनिश्चयविवरण त्तदुपलम्भकारणावैगुपयेऽपि संयोगो नोपलभ्यते" [ ] इति । तस्मादेव धर्मत्वादेव संयोगादेः प्रदेशवृत्तित्वं न 'व्याप्यस्य प्रदेशवत्त्वात् । तद्वच्चलनस्यापीति चेत् ; न; तद्धर्मणः संयोगस्यैव चौद्धं प्रत्यसिद्धत्वेन दृष्टान्तत्वानुपपत्तेः । अप्रसिद्धोऽपि परंप्रसिद्धेन दृष्टान्तेन समर्थ्यते । तथा च वचनं परस्य-"यथा सन्मते निर्विकल्पकन ज्ञानेन तदेव सविकल्पकं ज्ञानमात्मसदृशं कथञ्चिदुत्पादितं कश्चिन्नेत्यभिन्नस्यैवांशः परिकल्प्यते तथा संयोगावाधारस्यापी स्पष्ट संयोगादेः प्रदेशत्तित्वम्" [ चेत् ; न ; चैप यादुपन्यासस्य । न हि विकल्पज्ञानम् एकान्तेनाभिन्नमेव, सदृशेतरस्वभावयोः तदर्थान्तरत्वाभावानभ्युपगमात् । तदनन्तरत्वे तु कथं ताभ्यामन्योन्यभेदिभ्यामभिन्नस्य एकान्ताभेदित्वम् ? येनोच्यते-अभिन्नस्यैय' इति । न चाययविन्यपि कथञ्चिद् भेद्वत्येव १० संयोगादेः प्रदेशवृत्तित्वम् , 'संयोगस्यैव' इत्यादिविरोधाद्, अनेकान्तवादोपाश्रयप्रसगाच्च । बौद्ध- स्यापि करमान्न तत्प्रसङ्ग इति चेत् ? क एवमाह-'न' इति ? "चित्रप्रतिभासाप्येकर बुद्धिः" [५० वार्तिकाल० २।२१९] इति वचनात् । क इदानी जैनात्तस्य विशेष इति चेत् ? न ; पर्यन्ते तस्यापि तेन निराकरणात् "अविभागोऽयि बुद्ध्यात्मा" [अ० वा० २।३५४) इत्यादिवचनान् । तन्न संयोगान्तेन स्वभाव्यादेव प्रदेशत्तित्वं चलनस्य, अपि तुं व्याप्य. १५ भेदादेव इति न सन्दिग्धो व्यतिरेकः, तनिश्चयत्यैव भावात् । वस्मादुपपन्नमेतत-नकोऽवयवी चलाचलल्यात् , अन्यथा तदद्योगादिति । "तथा, 'आवृताऽनावृतत्वात्' इति च । नन्धिदम् अवयोवेव भिन्नेषु नावयविनि तस्मादसिद्धमिति चेत् ; अवयविनि तर्हि किम् ? आवरणमेवेति चेत् ;न; मनागप्यदर्शन- प्रसङ्गात् । 'अनावरणमेव' इत्यपि न युक्तम् ; अविकलस्य दर्शनापत्तेः । अविक्ल एव स दृश्यत २० इति चेत् । न वयानुभवाभावात् , सन्देहानुपपत्तेश्च । न हि अविकलष्ट एय सन्देहः । भवति पायम् अर्धावृतं पश्यतः 'किमयं देवदत्तः किं वा तदपरः' इति च । अवयवामहणात् सन्देह इति चेन् ; सदग्रहणेन तदर्शनस्य प्रतिबन्धे कथमविकलदर्शनकल्पनम् ? अप्रतिबन्धे तु फयं जा सन्देहो निशिते हेतुपपने निरस्य सहिरोधित्यात । निश्वररूपं दर्शनम् , "व्यवमायात्मकं ज्ञानं प्रत्यक्षम्" । इति वचनात् । कथं चायमवयपाहण. २५ मन्तरेण दृश्येत ? 'द्वणस्य सद्दर्शनं प्रत्यनङ्गत्वादिति चेत् ; न, कतिपयाययवमहणाभावेऽपि 'तत्प्रसङ्गात् । सकलावयवमहणमेव तदनङ्गमिति चेत् ; कयमिदानां सरलारयानिष्ठतया तस्य 1 अवयक्तिः। २ (निर्विल्पशानेन । ३ -भावादनभ्यु-ता० । विन्पहानात् तसभ वयोभिंत स्वाभ्रगमान् । ४ विम्यहानस्य । ५ चौरस । ६ चित्रतिमासाप्येव बुद्दपिरिति वचनस्यापि। ७ प्रति- देश-आ०, ५० श्ययाप्य-मा०, २०, ५.९ शाक्यको १०, २०, ५० • तथा पथा नार-मा०,५०,५०। "अथवा अन्यथाऽयं विदधर्मसंपर्गः । तथा हि-आवृने एकस्मिन् पाण्यादौ स्थूल. स्यास्य मारतानातुरूप युगपद्यन्ती विरुद्धधर्मव्यसयोगमस्य आवेदशतः।"-अधिनिरा. पृ. ८५।।। सन्देहानुपपत्ते. । १२ अश्यत्री ! १३ भवयवाहणारय । १४ अवविदर्शनप्रशान् । १५ अक्यविदर्शनानाम् ।
१२९१] प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्तावः ३७१ दर्शनम् , सत्येव तद्ग्रहणे तदुपपत्तेः । मा भूदिति चेत् ; कथमविकलंदर्शन तनिष्टस्वभाव- विकलस्यैव दर्शनात् । तनिष्ठत्वं नाम तत्समवायः, तस्य च ततो भेदात् न तस्यादृष्टावाय. क्यविदर्शनत्य वैकल्यमिति चेत् । कथमर्थान्तरत्वे तस्य तेनं तनिष्ठोऽवयवीति व्यपदेशः १ सम्बन्धादिति चेत् ; तर्हि तत्स्वभावः कथं तददर्शने दृश्येत ? तत्स्वभावतया मादीति चेत् ;न; दर्शनकल्यस्योक्वात् । तस्यापि ततो भेदायमदोप इति चेत् । कथं तेन संम्बद्धोऽवयवीति व्यपदेशः ? सम्बन्धादिति चेत् ; न ; 'ताई' इत्यादेरावृत्त्या चक्रकापत्तेर- नवस्थानाच्च । ततो दूरमनुस्मृयापि कस्यचित्सम्बन्धस्य तत्स्वभावत्वं चेदभ्यनुज्ञायेत प्राच्यस्य तनिष्ठत्वस्यैव तदभ्यनुज्ञातव्यम् । न च तस्य सकलावयवाहणमन्तरेण दर्शनम् , आधेयदर्श- नस्याधारग्रहणसव्यपेक्षत्वात् । दृश्यावयवनिष्ठतयैव तु दर्शनेऽपि सिद्धे विकलदर्शनम् । न च "तत् अनावृतस्योपपन्नमित्यवयविन्येव अर्धावरणभावान्नासिद्धत्वं साधनस्य । सन्दिग्धव्यति- रेकत्वं तु पूर्ववदुःझाव्य समाधातव्यम् । ततो भवत्येवास्मादपि हेतो कोऽवयवीति । तथा "रक्तारक्तवादित्यतोऽपि । रक्तारतहि तन्तुभिरारब्धे पटे अवश्यम्भवत्येव रक्तारक्तता तया रूपमेदो न भवत्येव तत्रैकस्यैव रूपस्य चित्रस्य भावात् । तथा च प्रतिपत्तिः चित्रमिदं रूपमिति चेत् ; न, 'चित्रं चैकं च' इति व्याघातात्-भेदस्य चित्रार्थत्वात् अभेदस्य चैकार्थत्वात् , भेदाभेदयोश्च परस्परपरिहारस्वरूपाधिकरणतया विरोधस्य सुप्रसिद्धत्वात् । उत्तश्व- "चित्रं तदेकमिति चेदिदं चित्रतरं ततः।" [५० वा० २।२००] भवतु तदेकमेव न चित्रं नीलपीतादिविशेपैरनिर्देश्यत्वादिति चेत् ; न; तादशस्याप्रति. भासनात् । अप्रतिभासितस्यापि द्रव्यग्रहणादनुगमः, नीरूपस्य द्रव्यस्य दर्शनायोगादिति चेत् । कथमनुपलब्धस्य द्रव्यपतिपत्त्यङ्गत्वम् अन्यत्रैवमदर्शनात् । तथापि तत्कल्पने किमरूपस्यैय द्रव्यस्य न दर्शनकल्पनम् , अविशेषात् ? भवत्येकं सदूपं प्रतिभासवश, वथापि कथं तत्र चित्र. २० प्रतिभासः ? चित्ररूपावयवसम्बन्धादिति चेत् ; न; उपाधिकृतत्वेन विभ्रमत्वापत्तेः । न चासी विभ्रम एव, चित्राकारवत्तपस्यापि ततोऽसिद्धिप्रसङ्गात् । चित्रत्य एयासो विभ्रमो न तद्रूप इति चेत् न; विनमेतरात्मना 'तस्यैव चित्रत्वापत्तेः, तस्य च वस्तुतस्तत्वे 'तंदूपस्यैव किन्न स्यात् ? तदप्युपाधिनिबन्धनमेव न वास्तवमिति चेत् । न तत्प्रतिभासस्यापि विधमत्वापत्तेः । न चासो विभ्रम एव । तलचित्रत्ववामाच्यप्रतिभासस्यापि असिद्धिप्रसङ्गात् । चित्राकार एवासी विभ्रमो -- 1-विकल्पद-आ०, १०, प० । २ स्वयनिष्छ । ३समायस्थ । ४ अवयवात् । ५ सम- वायेन। ६ सम्पन्धिस्वभाव. । ७ नदर्शने भा०, २०, प० । सम्बन्ध्यदर्शने । ८ मा न दी-भा०, घ. प०। ९ सम्बन्धोऽव-०, २०,०। १० विकलदर्शनम् । " "स्थूलस्यैकरवभावले मक्षिकापद- मानत. 1.पिधाने विदितं सर्वमासज्येताविभागतः ।। रके च राग एकस्मिन् सर्व ज्येत रक्तवत् । विरुदधर्मभावे वा मानात्वमनुषज्यते "-तत्वसं. २ ५.३, ५८४ । 'तथा रागारागा-या विरोध. सम्भावनीयः।"-अवयवि. नि:पृ०४५। १२ तद्रूपात्प्रतिमास इति श्रा०,१०,५०11३ अवयवस्यैव विभ्रमाविभ्रमविषयत्वात् चित्रय स्यादिति भावः । १४ अवयवस्य वस्तुतश्चित्रावे । १५ अवयवरूपस्यैव ।
] ज्यायविनिश्चयविवरण [ १९१ ने तत्प्रतिभास इति चेत् ; न तत्रापि 'विधमेतरात्मना' इत्यादेः पौन:पुन्यादन्यस्थापत्तेश्च । ततो दूरं गत्यापि पर्यन्ते तत्प्रतिमासचित्रत्वं तात्त्विक् मेव वक्तव्यम , सद्वत्तद्रूपचित्रत्वमप्यविशे- पात् । ततो यदुक्तं भासर्वज्ञेन-"तस्माद्विशेषतोऽनिर्देश्यरूपमात्रमेव तत्रोत्पन्नम् , चित्र- प्रतिभामस्तु रात्र चित्रावयवसम्बन्धात् स्फटिके नीलादिप्रतिभासवत्" [ ५ इति; सत्प्रतिविहितम् । तत्वत एव तत्र चित्रत्वस्य भावात् । भवतु तत्त्वत एव तंत्र चित्रत्वम् , तत्तु न रूपस्य स्वरूपभेदात् , अपितु नीलत्वपीत. त्यादिनानाजातिसम्बन्धादेव। न चैकत्र नानाजातिसम्पन्धानुपपत्तिः, कुसुमत्योत्पलादित्वादिनाना. जातिसम्बन्धस्यैकत्रापि द्रव्ये दर्शनादिति चेत् ; जावयस्तद्वति व्याप्त्या वर्तेरन् , अध्यात्या वा ? व्याप्त्या घेत ; न; तथाननुभवात् । न हि नीलस्वव्याममेव तद्रूपं प्रतीयते पीतत्वादेत. १० नापतिपत्तिप्रसङ्गात् । न हि नीलत्वमात्रेण व्याप्ते वस्तुनि युक्तिमत् । पीतत्वादिपरिज्ञानमन्यत्रैवदर्शनात ॥९०२॥ नव नीलत्वमात्रेण तचित्रमुपपत्तिमत् । अभावासजनादेवमचित्रस्यैव कस्यचित् ॥९.३॥ अव्याप्त्या तु न जातीनां जातिमत्यस्ति वर्तनम् । गोलागृलत्यगोत्वादिजातिप्येवमदर्शनात् ॥९०४|| नृत्यसिंहत्ययोरेकप्राणिन्यव्याप्य वर्तनम् । दृश्यते चेन्न तत्रापि जातिद्वित्वानपेक्षणात् ॥९०५|| एक हि तन्नृसिंहत्वं स्वाश्रयव्यापि दृश्यते । न नरत्वं ततश्चान्यत् सिहत्वं चैकदेशिकम् ॥९०६॥ एवं चिमत्वमप्येकं सामान्यमिति चेदम्मत् । नानासामान्यसम्बन्धाभित्रमित्यस्य दूपणात् ॥९०७॥ यथैव नरसिंहत्वपुरुपमृगत्वादिकं नरत्वादेत्यिन्तरमेकमेव स्वायत्र्यापिध, तश्चित त्वमपि नीलत्वादेरर्थान्तरमेकमेव स्वाभयव्यापीति चेत् ; न; "एकस्याप्यनेकनीलादिधर्याधि. २५ करणत्वेन चित्रप्रतिभामविपयत्वसम्भवात्" [ ] इत्यस्योपद्रवात् , एकस्यानेक. स्वायोगाद , नीलत्वादिव्यपदेशानुपपत्तेश्च । कुतश्च तजातिमतो रूपस्योलात्तिः ? पटादेवेति चेत् ; न; सर्वस्मादपि ततस्तत्प्रसवान्न कश्चिदचित्रः पटः स्यात् । प्राक्तनाचित्ररूपादेवेति पेत् ; न प्रथमनिप्पन्न पटे तद्रूपाभावापतेः पूर्व तदभावात् । पटावयवरूपादिति चेत् ; न ततोऽपि चित्रात ; अवयवेषु सदभावात् । अधिप्रादेवेति चेत् ; न; तस्य जात्यन्तरत्वेन २० -- १न तद्रूप इति भा०, २०, ५० र तत एव भाग,०,०1३ स्पे।४ पटावयवत्पादपि ।
प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्तावः ३७३ न युक्तम् । । .. वतस्तदुत्पत्शेरयोगात नीलादेः पीतादिवत् । रूपत्वमात्रेणेकजातित्यमेव न जायन्तरत्वमित्यपि नीलादेरपि पीतादिजन्मापत्तेः । ततोऽवयवरूपात्तदुत्पत्तौ तस्यापि तजातित्वमेव, तच्च न रूपत्वेनैव, तत्र चित्ररूपस्याभावापत्तेः । नाप्येकेन चित्रत्वेन ; तत्र तदभावस्याभिधा- नात् । नाप्यनेकनीलत्यादिना, तस्य स्थानयव्याप्त्यभावात् । न च तदव्यापि सामान्यम् ; सर्व- गतस्यैव तस्योपगमात् , तदव्यापिनश्च सर्वगतत्वानुपपत्तेः। ततो न नानाजातिसम्बन्धा. ५ द्रूपस्य चित्रप्रतीतिगोचरत्वम् , अपि तु स्वरूपभेदादेव । न च तस्यैकत्रावयविनि सम्भवः इत्युपपन्नं तदन्यथानुपपत्त्या तभावसाधनम् । भवन्या कश्चिदवयत्री फुत उत्पद्यताम् ? समवाय्यादेः कारणादिति चेत् ; कि पुनय- गुकस्य समवायिकारणम् ? अणुद्वयमिति चेत् ; न; परमाणूनामनुपलम्भेनासत्वात् , तत्र समयायिकारणत्वस्य तत्संयोगे चासमवायिकारणत्वस्यासम्भवात् । निमित्तमात्राच्च न तदुत्पत्तिः अनभ्युपगमात् , इत्यसत्यमेव ह्मणुकस्य प्राप्तम् । तदभावे च न तदुत्तरं द्रव्यम् , ततोऽपि न सदुत्तरमित्यन्त्यावयविपर्यन्तस्याभाव एंव तद्र्व्यस्य स्यात् । नार्य दोपः, तस्याहेतुकस्यैव भावा- दिति चेत् ; अत्राह- खतः सिद्धेरयोगाच [ तवृत्तेः सर्वधेति चेत् ; ] ॥९१॥ इति स्वतो हेतुमन्तरेण सिद्धेर्निष्पत्तेः अयोगाद् अघटनात् । 'न चैकम्' इति २५ सम्बन्धः। च शब्दः पूर्वहेतुसमुच्चये । परमप्यन हेतुमाह-'तद्वृत्तः सर्वथा' इति । तस्य अवयविनः स्वावयवेपुवृत्तिर्वर्त्तनं तस्याऽयोगाच | 'न चैकम्' इति । कथं तदयोगः ? सर्वथा सर्वेण एकदेशेन सर्वात्मना वा इति प्रकारेण । तथा हि-सर्वात्मना तस्य तंत्र वृत्ती; बहुत्वम् प्रत्यवयवं भेदात् , एकावयवत्वं वा । देशतो वृत्तौ; "तेषां तदन्यत्वं प्राच्यावयव- वत् , तत्कथं ते तस्य ? तेष्वपि वृत्तेरिति चेत् : न, सर्वात्मना सन्निपेधात् । देशतश्चेत् ; २० न ; पूर्वपदोपादनवस्थानाच्च । ननु "बहुम्वन्यतमो देशः, तत्साकल्यं च सर्वम् , न चावयविनो निरंशस्य बहुत्वम् , अतो न सर्वात्मना देशतो या तस्य वृत्तिः प्रकारान्तरेणैव तद्भावात् तस्य च विशेषप्रतिपेधा- देवाभ्यनुज्ञानात् , यथैव हि वामेन चक्षुपा दर्शननिषेधो दक्षिणेन दर्शनमभ्यनुज्ञापयति, .. - चित्ररूपोत्पत्ते. 1 २ जारयन्तरमि-भा०, २०, ५० 1 ३ अवयवरूपत्यापि । ४ -प्याभा-आ०, ब०, ५०। ५ स्वाथय व्यापि । ६ स्वरूपभेदान्यधानुपपत्त्या । ७ एवं तद्रूपस्य मा०, २०, ५० 1 अवय. विन। ९ अवयवेषु। १० देशानाम् । ११ “एकस्मिन् भेदाभावादशब्दप्रयोगानुपपत्तरप्रश्न.-कि प्रत्यवयव कृस्नोऽवयवी वर्तते अवै देशेनेति नोपपद्यते प्रश्नः । कसात ? एकस्मिन् भेदामावादशब्दप्रयोगानुपपत्तेः । 'स्तम्' श्यनेकस्याशेषाभिधानम् , 'एक देशः' इति नानात्वे कस्यचिदभिधानम् , ताविमौ कृत्स्नैकदेशशब्दी. भेदविषयो नैकम्मिश्वयविन्युपपद्यते भेजाभावादिति ।"-न्याय सू०, भा० ४।१।। "तथा हि पहनाम- न्यतमाभिधानमैकदेशः। निरवशेषता च सर्वशब्दस्यार्यः । तथा विशेषप्रतिपेधस्य शेषाभ्यनुज्ञाविषयात् प्रकारान्तरेण वृत्तिः प्राप्नोति । अन्यथा हिन वर्तत इति वान्यम् ।"-प्रश. व्यो. पृ. ४६ । .
न्यायविनिश्चयविवरण [ ११९ अन्यथा सदनुपपत्तेः, तथा सर्वात्मैकदेशाभ्यां वृत्तिनिपेयोऽपि प्रकारान्तरेण वृत्तिमभ्यनुज्ञाप- यत्येव, अन्यथा 'न वर्तते' इति अविशेषेणैव वचनप्रसङ्गादिति चेत् । तत्प्रकारान्तरं तस्य स्वरूपम् , अन्यद्वा गत्यन्तराभावात् १ १. १५ स्वरूपं तस्य वृत्तित्पटो वर्तत इत्ययम् । विशिष्टप्रत्ययस्तत्र क्थं नामोपपचिमान् ॥९०८॥ भेदे सत्येव यलोके विशेषणविशेष्ययोः । दण्डी मनुष्य इत्येस प्रतीतिपथं गतः ॥९.९॥ भेदकल्पनयाऽसौ चेत्तत्कृना तास्विकी कथम् । तद्वृत्तिर्भागवान् येन कात्त्विकः परिकल्प्यताम् ॥९१०॥ अतात्त्विकं तु तत्सत्यं न यौद्धोद्वेगकारणम् । व्यवहारशा तस्य तेनापि स्थितिसाधनात ॥९११॥ अन्यैव तस्य वृत्तिवेत् समवायारिमका मता। तयापि तस्यासम्बन्धे विशिष्टः प्रत्ययः कथम् १ ॥९१०॥ सम्बन्धादेव दण्डादेयतोऽय' 'दृश्यते नरे। क्थं वा तस्य सा गृत्तिः परस्सन्तुपु यद्भवेत् ॥९१३॥ गर्दमोऽपि तया तेषु न भनत्यन्यथा कथम् । लोकः कथं नतो वस्तां पटमेव न गर्दभम् ॥९१४॥ सम्पन्धोऽपि तया तस्य सतश्चेत् किन्न तन्तुभिः । इति व्यव सैव चेन्नास्य पूर्व निधनात् ॥९१५॥ अन्यवश तेनापि तस्याः सम्बन्धकल्पने। फथ तेन विशिष्टत्वं तस्य यत्तन्मतिर्भवेत् ॥९१६॥ क्यं वा स्यात्प्रतिभिप्त गर्दभाविप्रसञ्जनम् । तेनापि तस्य सम्बन्धे सतोऽन्यत इति द्वयोः ॥९१७॥ पभयोरनपस्थान प्रान्यदोपानिर्वनात् । जम्नान्याप्यस्ति तद्वृत्तिरित्यत्तिक एव सः ॥९१८॥ ततो यदुत्तं प्योमवता-"वृत्पनुपपत्तिरिति हेतुः स्वरूपासिद्धश्च वृत्तेः समवायरस सिद्धसान्" [प्र. यो० १० ४६] इति , तत्प्रतिविहितम् , उन न्यायेन सगवायरयापि पृत्तिवासिद्धः। मा भूचिः, तथापि पथमसत्त्वम् ? कथन न स्यात् ? पृत्या सत्यस्या याप्ने । २० प्रतीनिक गर मा.,.,.। १ कल्पना विशिष्टप्राय ।५-नेताम् पा.,... पारयेत् । पवनम् मा., ०,१०।
प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्ताव - . । ३७५ न हि वृत्तावेव सत्तमाकाशादी परोपगते रूपादौ च तदभावेऽपि भानादिति चेत् ; सत्यम् ; सत्यमानस्य न तद्व्याप्तिः , अवयव्यादिसत्वस्य तु विद्यत एव । कुत एतत् १ स्वबुद्धित इति चेत् ; न ; तदनिषेधप्रसङ्गात् । न हि स्वयं वृत्तिव्याप्ततया बुद्धपमानस्यैव तत्सत्वस्य निपेधनम् । परवुद्धितः इति चेत् , परस्यापि यदि तन प्रमाणमस्ति न वनिधनम् , तदनु- मानस्य तेन प्रतिक्षेपात् । तस्यैव तदनुमानेन प्रैविक्षेप इति चेत् ;न, तत्प्रतिक्षेपे तस्यैवानुत्पत्ति- ५ प्रसङ्गात् , त-मूलत्वात् , तेन तद्व्याप्तिपरिक्षाने सत्येव तदुत्पत्तेः । अथ नास्ति प्रमाणम् ; न तर्हि व्याप्तिनिश्चयः, तदभाने च न तनिषेधः । सत्येय तन्निभये व्यापकाभावात् व्याप्य. निपेधोपपत्तरिति चेत् , न, 'प्रमाणादन्यतो वा' इत्यकृतविचारस्यैव परबुद्धिमानस्योपाश्रयात् कथं तदाश्रयणेन कस्यचिन्निपेर्धनम् , अतिप्रसङ्गात् । क्यमद्वैताद्यपान्तस्य ? न हि तस्या प्यपरिज्ञातस्यैर निषेधः तन्निपेधानुमानस्याश्रयासिद्धिदोपात् । स्वयं परिक्षाने पूर्वयत्तदनुपपत्तेः। १० परबुद्ध्या तत्परिज्ञानस्य प्रमाणभावाभावाभ्यां विचारे प्रागिव दोपात , अकृतविचाररस्येव परबुद्धिमानस्योपाश्रयणं तीथागतस्यापि तदभीष्टमुद्वहेदविशेषात् । ततः स्थितम्-'न चैकं सर्वधा तद्वत्तेरयोगात्' इति । साम्प्रतं पूर्वपक्षसमाप्तिम् इतिशब्देन चेच्छन्देन च पराभिप्राय द्योतयन्नाह 'इति चेत्' इति । अत्रोत्तरमाह- एतत्समानमन्यत्र भेदाः संविदसंविदोः । न विकल्पानपाकुर्युरन्तर्यानुवन्धिनः ॥९२॥ इति । एतदनन्तरोक्तं 'तत्र' इत्यादि, समानं सहशम् । क अन्यत्र । अपि शदोन द्रष्टव्यः । तदयमों न केवलं यहिरर्थे अपि तु अन्यत्रापि विज्ञानेऽपि तस्येव वदपेक्षया अन्यत्वात् । तथा हि-विज्ञानमपि सशिरवादिना थोपेण दोपवत् निरन्तरत्यात् पहिरर्थयदिति । न चेदं स्वतन्त्रं साधनम् , यहिर) सत्यतस्तद्वत्वोपगमनानिष्टापत्तः, २० अन्यथा तनिदर्शनोपन्यासायोगात् , अपि तु प्रसङ्गापादनम् । तदपि न तत्वतरता तद्वत्व- व्यवस्थापनार्थम् अतन स्वयमपि तदनभ्युपगमात् , अपि तु च्यातियिपटनार्थमेव । यदि निरन्तरत्वं दोपयत्त्वेन व्याप्तं विज्ञाने िसद्भवेत् तत्रापि तस्य विद्यमानत्यादिति । हस्यापि पाशवत् परित्यागे किमालम्ननो यहि वं दूपयेत् ? निरवलम्चनाय सरपोषणस्याप्यनिवारणाम् । ततो नास्ति तस्य "तेन व्यातिः, यतिरलेऽपि विज्ञाने तस्य भागत् । योऽनेशान्तिकरयानातो" २५ पहिर| सद्वत्वसाधनमुपपन्नम् । ततो यदुक्तं न्यायवार्तिके- "यः परेण "चोदित दोपमनु. १ सदभावादि-भा०प०, प. निषेधातुमानस्सा प्रतिपेप भा०,००४-पीति- भा., य०, प.! ५ निषेधानुम । ६ तथाग-आ., ., .। दोपद 11., . प.। सामा-भा०, २०, ५०।१ निम्तरतरप! 1. दोसवेन । " निरन्टरन् । १२ पितम् भा.,.,प.॥ १ ।
-. न्यायविनिश्चयविधरणे [१३९२ नृत्य 'भवतोऽप्ययं दोषः' इति ब्रवीति स निगृहोतो वेदितव्यः" न्यायवा० ५।२।२१] इति । तत्प्रतिविहितम् ; 'दोपमनुदृत्य' इत्यस्यासिद्धः, व्यभिचारोद्भावनादेव तदुद्धरणात् । 'भवतोऽपि' इत्यस्य च, व्याप्तिविघटनवलेन तदुद्भावनोपायत्यात् । एतदप्यन्यत्तत्रैव- "यत एवासायुत्तरे वक्तव्यप्रसङ्गं करोति अत उत्तरापरिज्ञानान्निगृह्यते" [ न्यायवा० ५ ५।२।२१ ] इति । तदपि दुर्भाषितम् ; प्रसङ्गकरणस्यैवोक्तनीत्या सदुनरत्येन तदपरिज्ञानस्या- भावात् । अन्यदप्युत्तरमेवंविधे विपये सम्भवति, तस्यापरिज्ञानानिगृह्यत इति चेत् ; न ; प्रकृतस्य परिज्ञानाजयस्यापि प्राप्तः । न चैतढभय योगपद्येन ; विरोधात् । निग्रहश्चेजयो नारित जयश्चेन्नारित निग्रहः । निग्रहश्च जयश्चेति व्याहतं युगपद् द्वयम् ॥९१९॥ अपरिक्षानमप्यस्य करमादप्रतिपादनात् । ननिग्रहभयात्तस्य परिज्ञानेऽपि सम्भवात् ॥९२०॥ एकदोषाभिधानेन परपले हि दूपिते । दोपान्तरप्रवादो हि निग्रहायैव कल्पते ॥९२१॥ *सतो दोपान्तरस्यापि निग्रहो यद्यकीर्तनम् । सतो हेत्वन्तरस्यापि निग्रहः स्यादकीर्तनम् ॥९२२॥ ततस्तकीर्तनं योगैर्निग्रहः कल्प्यते कथम् । इदमेव स्वयं देवैरन्यत्र प्रतिपादितम् ।।९२३॥ "वादिनोऽनेकहेतूक्तौ निगृहीतिः किलेप्यते । नानेकदूपणस्योक्ती वैतण्डिकविनिग्रहः ॥" [सिद्धिवि० परि० ५] इति ; ततो न युक्तम्-'उत्तरापरिज्ञानान्निगृह्यते' इति । तदपरिज्ञानरययासिद्धः । एवमन्य. दपि समानदोपापादनं निदोष प्रतिपत्तव्यम् । तन्न मनानुज्ञा नाम निग्रहस्थानं सम्भवति । मा भूत् 'चौरसवं पुरुपत्यान्' इत्युक्ते 'भवानपि चौरः तत एव' इति प्रसङ्गकरण- बुद्ध्या प्रनिनुवाणस्य तन्निग्रहस्थानम् , चौर्यापादनबुद्धा तु प्रतिवदतो भवत्येव', परापादितस्य चौर्यस्यात्मन्य युगमात् , अनभ्युपगमे हि न धुरुपत्वं तत्र हेतुर्वक्तव्या पिन्तु पदयेणा- नतिसृष्टन सम्बन्धः, न चोक्तः "सः, इ..त्तरस्यापरिज्ञानेन परमनमनुजानतो भवत्येव तन्निग्रहस्थानमिति चेत् ; कस्तेन तं निगृहीयात् ? पायेव ; परिपलादिपरिग्रहवैफल्यापत्तेः । परिपहलादय एवेति चेत् ; तेनापि वादिनो गुणाभावात् जयमपश्यन्तः कथमितरं निगृहीयुः । जयाभावे निग्रहानुपपत्तः । न च तस्य स्वपक्षसाधनं गुणः, चौर्य प्रति पुरुपत्वस्यानेकान्ति- फत्येनासाधनत्वात् । परन तदभ्युपगमकरणं स इति चेत् ; न ; तस्याप्यन्यायनिवन्धनत्वेन .यायवार्तिके उक्तम् । २ जयपराजयो । ३ स्वतो आ०, ५०, प० । ४ निग्रहस्थानम् । ५ अनतिबाट परद्रव्यसम्बन्धबर दिनि हेतुः । ६ गुण । २० . -- ..
मथमः प्रत्यक्षप्रस्ताया -- दोपत्वात् । विजिगीपोः कथमपि पत्करणं गुण एवेति चेत् ; न ; चपेटादिनापि तकरणस्य गुणत्वासद्गात् । 'तेन तत्करणं परिपत्पतिर्न सहवे धर्मच्युतेरिति घेत् ; व्यभिचारिहेतुना तत्करणं कथं सहेत अविशेषात् ? स्वयमपरिवानादिति चेत् ; न ; स्वतस्तस्यापरिझानेऽपि प्राचिनकवचनात परिज्ञानोपपत्ते, प्राश्निकैश्च तद्वचनस्यावश्यम्भावात् , अन्यथा तद्वैफल्यात् । परियातमपि सहते न्यायशास्त्रे तस्य गुणत्वेनाभिधानादिति चेत् ; शास्त्रान्तरे तस्य दोपत्वेना. ५ भिधानात् न सहेतापि । तत्कथं तस्मादेकान्तेन वादिनो जयो यत 'इतरस्य निग्रहः स्यात् ? बन्न कश्चिदपि मतानुज्ञानं निग्रहायेत्यलं प्रसङ्गेन । कथं पुनरचेतनार्थदोपेण चेतनत्य दूपणं तस्करदोपेण साधोरपि तत्प्रसङ्गादिति चेत् ; स्यादेवम् ; यद्यर्थेऽप्यचेतनत्वं तस्यावलम्वनम् , तदभावाच्चेवने न भवेदिति। न चैवम् , अर्थेऽपि नैरन्तर्यस्य तदयेलम्यनत्यात् , तस्यं च चेतनेऽप्यविशेषात्। न च तदयलम्मनस्य चेतनभेदैः प्रतिक्षेपः; १० तस्यापि प्रतिक्षेपापत्तेः । तच्च दोपस्याभिधायिष्यमाणत्वात् । तदाह-भेदाः चेतनेतरत्यलक्षणाः, व्यक्तिभेदाबहुवचनम् । कयोरते ? संविधसंविदोः ज्ञानार्थयोः, विकल्पान सांशत्यादिदोप- परामर्शान न अपाकुयुः, न प्रतिक्षिपेयुः । असंविद्हणं किमर्थम् १ तद्भेदैस्तदनपाकरणस्य परं प्रत्यपि प्रसिद्धत्वादिति चेत् ; न ; सस्य निदर्शनार्थत्वाद् असंविझेदयत् संबिनेदा अपि तानापाकुर्युरिति । तत्र हेतुमाह-नैरन्तर्यानुबन्धिन इति । नैरन्तयं प्रत्यासत्तिः, तदनु. १५ पन्धिनस्तदवलम्बिन इति । नरन्तयं मनस्यं ते दोपोत्पत्तिनिवन्धनम् । चिद्भेदास्तत्प्रयुक्तस्र्य दोपस्य क्षेपकाः कथम् ? ॥९२४॥ 'तस्यापि ते प्रतिक्षेपे सान्तरत्वमनाधितम् । चेतनेषु भवेत्तस्य तदभावत्वनिश्चयात् ।।९२५॥ निरन्तरतरत्याभ्यां निर्मुक्ता यदि संयिदः । स्थूलस्तम्भावभासोऽयं कथं तासूपपद्यताम् ॥९२६॥ अन्यथा ताशेरेव पाहोरप्यणुभिः स्वयम् । द्रव्यनिष्पादनादिकन्नु नैरन्तर्येण नः फलम ॥९२५॥ यत्सांशत्वादिदोपस्य तत्राप्युद्भायनं भवेत् । निरन्तरत्वस्याभावः सान्तरत्वं तदुच्यताम् ।।९२८॥ भवतु सान्तरत्वमेष संवेदनानामिति चेत् ; न ; व्यरधानाभाये तरतुपपत्तो। व्यवधान न सजातीयेरव्यवहितैरेव ; नरन्दर्यदीपात् । व्याहितरेवेवि घेत् । न ; यमः २० . 1 पपेटादिना।२ उत्तर भा.,.,.11-यमाप-श्रा, 4,011 सतनामावाद । ५दोगावलमनतात् । तस्य । तोगतम् (!)। ८ नन्तप्रकार। . नैरसरकार। १.रिन्तु ने-आ.,.,.। ४८ ५ १० ग्यायविनिश्चयविवरणे (११९३ धानस्यापि सजातीयैरव्यवहितैरनुपपत्तेः । व्यवहितैरेवेति चेत् ;न; अनवस्थापत्तेः । तथा च नीलमणिसम्मतानां संवेदनपरमाणूनां परापरैरपरिमाणैः तत्परमाणुभिर्व्यवधानात् नीलव्याप्त सकलं जगद्भवेत् । नीलव्याप्तं जगत्प्राप्तं पीतादिपरिवर्जितम् । तश्च प्रतीतिसौभाग्यमत्यनीकं प्रकल्प नम् ।।९२९॥ व्यवधान विजातीयैर्यदापि स्यात्परापरैः । तदा नीलमणिनाम न फश्चिदवतिष्ठते ॥९३०॥ न मेचकमणिज्ञानमपि तत्रोपपत्तिमत् । तेषु पर्यन्तवत्स्वेव तथा ज्ञानप्रवर्तनात् ॥९३१॥ उपदानान्ययोरेवं व्यवधानप्रकल्पने । अतीय कालदूरत्वं संवित्त्योः सम्प्रसज्यते ॥९३२॥ ततश्चान्यवधानेन नीलज्ञाने क्रमः कचित् । प्रतीतिपथमापनो भ्रश्यत्येव भवन्मवे ॥९३३॥ सजातिव्यवधानेऽपि नीलसंवित्तिसन्वते । अनादिनिधनत्याप्तिः प्रतीति प्रतिपीडयेत् ।।९३४॥ तस्मानिरन्तरत्वं तद्वक्तव्यं वेदनेप्वपि । सांशत्वप्रथयाभावदोपं तञ्च प्रकल्पयेत् ॥९३५) तथा हि-नीलमणिसंवेदनपरमाणूनां देशवो नैरन्तये' मध्यवर्तिनः पडशाः प्राप्नुवन्ति पद्दभिर्दिग्भागभिन्नै रन्तर्यादिति । 'तैरपि व्यतिरितस्तस्य नैरन्तर्ये पुनरन्ये पडशा इति, तैरेव २० सकलस्यापि गगनवलस्य व्याप्तेरनवकाशास्तदन्ये भवेयुः । तथा क्रमवामपि तत्परमाणूनां देशवो नैरन्तये मध्यवर्तिनो द्वौ देशी पूर्वापराभ्यां द्वाभ्यां नैरन्तर्यात् , साभ्यामपि तथा नरन्तर्ये परी भी देशाविति तैरेवानाद्यनन्तकालव्याप्तः कालः कीदृगुपादानादिप्रबन्धस्य भवेत् ? सर्वात्मना तु नन्तयें परमाणुमानत्वं 'प्रचयस्य, मणिपरमाणूनामेकत्रैवानुप्रवेशात् । सन्ता• नस्याप्येकक्षणत्वम् , एकत्रेव परापरतरक्षणाना प्रत्यस्तमयात् । न च प्रकारान्तरं नन्तर्यस्यास्ति यत्रायं दोपो न भवेत् । कथं नास्ति ? वेपामक्रमाणामन्योन्यात्मकतया स्थूलीभावेन क्रमवताच दीर्घाभावेन नरन्तर्यस्योपेपत्तेरिति चेत् ; न ; कालदेध्ये क्षणभङ्गवादन्यापत्तेः, देशदेऽप्येव. यविषत् । एका चलनादौ सर्वत्र तत्प्रसङ्गात् भचयवतामेव चलनादिः, न प्रययस्येति घेत् । न ; तेपो प्रवयेकरूपत्वेन रूपान्तराभावात् । भावे वा यत्रैव तेषां चलनादिस्तत्रैव प्रघयस्य तद्विकलस्य प्रतीतिप्रसङ्गात् । . -- १ समान्धे । २ परमाणोः । ३ शैः। ४ प्रत्रयस्य ता. मा०, १५ -पपत्तिरिति मा०,468.1 चाना मा०.,प.।
i न -- ९२ प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताया तर्हि मा भूपन् तस्परमाणवः तत्सतानाच, तेषामपि वालवप्रतिभासनात् , अद्वैतं तु संवेदनमस्त्विति चेत् ; न तस्य निरंशाणुरूपस्य निपेल्यमानत्वात् । नीलादिभेदा. धिष्ठानमेव तदिति चेत् ; किमिदं तेषां तेनाधिष्ठानम् । तत्र वर्तनमिति चेत् ; न ; अवयवि. वहत्तिविकल्पाविदोपानुपङ्गात् । तदात्मत्वमिति चेत् । अषयविनोऽपि स्वावयवापेक्षया तत्प्रसङ्गात् । स एव नास्ति, कपालव्यतिरेकेणाऽप्रतिभासनादिति चेत् ; ज्ञानमपि नास्ति ५ नीलादिव्यतिरेकेणाप्रतिमासनात् । नौलादीनामेकत्वमेव 'वदिति चेत् ; अवयव्यपि कपाला- नामेकत्वमेव किन स्यात् ? विरुद्धधर्माध्यासादिति चेत् ; नीलादीनां फथम् ? अशक्यविवेच- नत्यादिति चेत् ;न; तेनापि तदध्यासस्याप्रतिरोधात् चित्रप्रतिभासाभावापत्तेः । किश्चेद्मशक्यविवेचनत्वम् ? युगपत्प्रतिभासनमिति चेत् । न ; तथापि भेदस्य- वोपपतेः योगपद्यस्य 'वनिष्टत्वात् । अपृथग्वेद्यत्वमिति चेत् । तदपि कुतः प्रतिपत्तव्यम् ? तदेकत्वादिति चेत् । न ; परस्पराश्रयात्-अपृथग्वेद्यत्वेन तस्य, ततश्चापृथग्येद्यत्वस्य सिद्धः । नीलादिभ्य एवेति चेत् ; न तैरपि परस्परस्यापरिक्षाने तदपेक्षस्य तद्वद्यत्वस्यापरिझानात् । परिज्ञाने तु नार्थनिषेधनम् अर्थस्याप्यन्यतस्तदुपपत्तेः । अत एव नानुमानादपि तत्परिक्षानम् । न चानुमानमद्वैते सम्भवति विरोधात् , अतेन वस्य नरन्तर्येतरचिन्तायां पूर्ववदोपाय । तना- पृथग्वेद्यत्वमशक्यविषेचनत्वम् । एकत्वेन प्रतिभासनमिति चेत् ; कपालेप्पपि वदावेना- १५ वयविसिद्धेरपतिपघात् । तदेवाह-'एतत्समानमन्यत्र' इति । एतत् परचित्तस्यम् "अभेदप्रतिमासरूपमशस्यविवेचनत्व समानमन्यत्रापि पहिरावययेवपि । भवतु समानम् , तथापि "नातस्तत्र वसिद्धिः, दूरविरलकेशेषु "वदभावेऽपि भावादिति घेत; सेप्पपि फुतस्सदभावे तगायः सन्निवेशविशेषादेकार्थकरणात् तद्वासनाप्रयोधाच्येति चेत् ; न ; संवेदनभेदेष्वपि तत एव तत्प्रसङ्गात् । न च "तबेकार्यकरणं नास्त्येव ; सरविषाणवद. २० पस्तुत्वापत्तेः । कार्यकारणभेदे कथमद्वैतमित्यपि न सारम् ; परस्येय होपात् । न प वढ्दा एव 'सन्निवेशनिबन्धनं तत्मतिभासनम्' इत्यादिविकल्पानपाकुर्वन्ति, भेदत्वेन याहभेदाविशे- पात् । तदाह-संविसंविदोः । असंविद्रहणमत्रापि निदर्शनार्थम्, असंविद इस संविदोऽपि भेदा नीलादयो विकल्पान परामर्शान् नाऽपाकुयुः। फीरशान् ? नैरन्तर्यानुपन्धिनः नैरन्तयं सन्निवेशविशेषम् उपलक्षणमिदम्-तेनेकार्थकरणादिकमपि अनुपध्नन्ति अनुपस्था- पयन्ति एफप्रतिभासनमिति शीलान् इति । तत्त्वतश्चित्रमे से विज्ञानं तत्कथं भवेत् । निर्याधात्प्रतिभासाच्चेद् पाहोऽप्यर्थस्थेप्यताम् ॥९३६॥ न 1 नीलादिभेदानम्। भदेवविदनेन । ३ वदामसभामयी! ५ानम्। (रिपप्पा. स्य । - अन्यथा-विष्यामारे। भैनिटरवाद । ९ एरवस्य।.भभेदप्रतिमासा-मा...... "भापरदिवेवनखतः अवय भरपालिदि। परमादेश। 11-MAIसनाप्रतिरोपना- मा.....11 रन दें। 1दनभेदा एक हि-माय., ए.
३८० . - .. न्यायधिनिश्चयविवरणे [ १३९३ नन्वेषमपि अवयवाधिध्वग्भागलक्षण एवावयत्री सिद्धयति । न चायं योगस्याभिप्रेत: अवयवभिन्न एव तत्र तस्याभिप्रायात् । तस्य च न सिद्धिः, तदूपणस्य तदवस्थत्वादिति चेत् । भवतोऽपि चित्रेकरूपमेव संवेदनं सिद्धयति । न प तत्तवाभिप्रेतम् "अविभागोऽपि बुद्ध्या- स्मा[प्र० वा० २।३.५४ ] इति विरोधात् । यत्त्वभिप्रेत निरंशवेदनं तन्नाद्यापि सिद्धम् , ५ तदप्रतिपत्तिदूपणस्याप्रतिक्षेपात् । अथ कदाचिदिदमपि संयाभिप्रेतम् , योगस्याप्यषयवाविप्वम्भाव: किन्नाभिप्रेतः स्यात् ? प्रयोजनाभावादिति चेत ; न ; पहिरर्थस्थापनस्यैव प्रयोजनत्वात् । स्थाद्वादानुप्रवेशस्तु भवतोऽपि, 'चित्रैकचित्तवादस्यापि स्याद्वादत्वात् । अनुप्रविष्टस्यापि परित्यागा- दोषो योगस्यापि, तदविष्वम्भावस्य परित्यागात् । तत्परित्यागे न कश्चिदवयवी, प्रकारान्तरस्य प्रतिक्षेपादिति चेत् ; चिकचित्तपरित्यागेऽपि न किञ्चिहिज्ञानं निर्भागतद्रूपस्य प्रतिक्षितत्वात् । १० ततो न यदिन्तिः किचिदिति सर्वनैरास्यम् । न तस्यापि 'निष्प्रमाणा सिद्धिरतिप्रसङ्गात् । प्रमाणश्च न तत्र वास्तवमस्ति द्विये- धात् । अवास्तवमिति चेत् ; न ततस्तस्य तत्त्वतोऽप्रतिपत्तेस्त द्विपर्ययवत । नापि तदप्रतिपन्नमेव प्रमागम् ; अनभ्युपगमात् । तत्प्रतिपत्तिश्च न चातुभूतात्प्रमाणात ; तस्यैवाभावात् । अवस्तु. भूतादिति चेत् ;न, वस्यापि ता शात्प्रतिपत्तावनवस्थानात् । अपि च, किमिदमवस्तुभूतमिति ? अविद्यमानमिति चेत् ; नः तस्याऽकिश्चित्करत्वेन प्रमाणत्यायोगात् । विद्यमानत्वेन कल्पनात्तस्वमिति चेत् ; कुतस्तत्कल्पनम् ? संवृतेरिति चेत् । न, तस्या अपि मिध्याज्ञानव्यतिरेकेणाभावात् , सस्य चोक्तनीत्या निषेधात् । संघृतेरपि संवृत्या परिकल्पनायाम् अनवस्थादोपात् । तन्न सर्वनराम्यमपि तत्वम् ; तंत्र प्रमाणस्याभावात् । भावेऽपि न तेनं तस्य परिच्छेदः, प्रतिबन्धाभावात् । न हि तन्नराम्येन तस्य तादात्म्यम् । २० स्वयं नैरात्म्यप्रसङ्गात् । नापि तदुत्पत्तिः, तस्य' सर्वशक्तिवैकल्यात् । न च योग्यत्वम् । तस्य कार्यावसेयत्वात् । न च कार्य तत्परिच्छेदरूपमुपलब्धम् ; तत्रैव विप्रतिपत्तेः । ततो न तस्य प्रमाणोपपनत्वं विचारचतुराः प्रयत्तुमर्हन्ति । ये तु युवन्ति ते "विचारविकला इत्यावेदयति- आहुरर्धपलायातमनर्थमविकल्पका: । इति । आहुः प्रतिपादयन्ति । किम् ? अनर्धम् अर्थस्य ज्ञानज्ञेयलक्षणस्याभावम् , अर्थाभायेऽव्ययीभावविधानात् । की शम् १ अर्थपलग्यातम् अर्ध्यते तत्त्वनिरूपणार्थि मिरित्यर्थः प्रमाणम् , तस्य यलं विषयप्रतिबन्धस्तनागतम् अर्धघलायातम् । "कयाहुः । अविकल्पका न विद्यते विकल्पो निवेदितन्यायेन वस्य प्रमाणविषयत्वामावनिर्णयो येषां वे तथोपारलाथागता इति । ? २५ भवपरिमि-भा०,१०,२०१२ -सौगतस्य । ३ विचित्रवा-मा०प० । निष्प्रमाणसि-भा, 4. प. 1५सर्वनेशल्यविरोधात् । अवालाप्रमाणात । नरप्रमा-आ०, १०,५०। प्रमाणेन । रस्यस्य । १. प्रमाणस्य ।। सर्वनराम्यस्य । १२ निराचा-भाक, 40, 4-11 के आधु । नेरा- मथमा प्रत्यक्षमस्तापा ११९३] ३८१ एतेन 'सकलविकल्पविकलसंवित्तिमानं तत्त्वमित्यपि प्रत्युषम् । तद्वैफल्यस्य नीरू- पनिषेधात्मत्वे प्रमाणविषयत्वासम्भवात् , तस्य तद्वलायातत्वं ब्रुवतामप्यविकल्पकत्वाविशेषान् । पर्युदासमेव, तत् पर्युदस्तसकलविल्परय संवेदनस्यैव तवैकल्यार्थत्वादिति चेत् ; इवमप्य- सङ्गतम् । यस्मात्- ५ धिकल्पा यदि वेद्येरन् निषेध्येरन सर्वथा । विकल्पाश्चेन्न वेधरन्निध्येरन ते फचिन् १९३७॥ न ह्यविज्ञाय तद्रूपं तदुल्सेन तान् क्वचित् । तवामी नेति निश्चेतुं निर्यकुञ्च प्रमुर्जनः ।।९३८॥ वस्तुनस्तदवित्तावप्यारोपेण प्रवेदनात् । घंहुधामकयत्तेषां निषेधः सम्मतो यदि ॥ ९३९।। तन्न सारं विकल्पादेवारोपस्यावफल्पनात् । आरोपात्तस्य क्लृप्तौ तु भवसन्योन्यसंश्रयः ।।९४ ० ।। अन्यारोपाद्विकल्पश्चेत्सोऽप्यन्यस्माद्विकल्पकात् । सोऽप्यारोपात्तदन्यस्मादित्य स्यादनवस्थितिः ॥९४१॥ परकल्पनया चेत्स्युर्विकल्पास्तम्न सङ्गतम् । आत्मेतरचिवसे यत् विकल्पविरहात्ययः ॥९४२॥ आरोपातद्विकल्पश्चन्नेदानीं तनिषेधनात् । तस्माद्विकल्पासंवित्तेः तनिषेधः क्वचित्कथम् ।।९४३।। किश्च तवेदन पत्र विकल्प: एयुदस्यते । नीलादिरूपं सच्चेस्यात् सावकल्पकमेव सत् ॥९५४॥ नानाभागस्वभावस्य तस्य स्थूलस्य दर्शनात् । एकानेफविकल्पस्य वनावश्यमवस्थितः ।।९४५॥ बद्विकल्पव्यपेतस्य न तस्यास्ति स्वतो गतिः । अविवादः स्वसंवित विवादविषयेऽत्ययात् ।।९४६॥ अन्यवोऽपि न वाक्षात्तस्याप्यन्येन 'तारशात् । प्रतिपत्ती यतो दूरं प्रसरत्यनवस्थितिः ॥९४७॥ अताशाच्च प्रविचिस्ताविकी कल्पितात्कथम् ? । अकल्पिताश्चेमन्वेवं नदेव स्याद्विकल्पकम् ॥९४८॥ २० असल संवि-मा-, ., प.। २ पविय-मा., . .। ३ प्रधानता ३८२ ग्याययिनिश्चयविधरणे ( १६९३ ? ताच सर्वविकल्पानामभावे दत्तयुद्धयः । घोडाः कथमिव ब्रूयुः विरोधापसिभीरयः ।।९४९॥ तदेवाह- 'आहुः' इत्यादि । 'न' इत्यनुवर्तनीयम् । नाहुः बौद्धाः । पम् ? अनर्थम् अर्थ्यत इत्यर्थः सकलविकल्पाभावः तस्मादन्यं विक्रूपभावम् । योदशम् ? ५ अर्थवलायातम् , अर्यमानं निर्षिफ्ल्पवेदनमर्थः तं बल्यति स्थापयतीति बहरतधिगमः, तस्मै तदर्थम् आयातम् । कस्मानाः ? अविकल्पकाः विकल्पानामभावं कायन्ति कथयन्ति यत इति । ततो न सकलविकल्पातीतमपि तत्त्वम् , प्रमाणप्रणयनवैकल्यात् । आतु वर्हि विध्रममानं तत्त्वम् , अन्तहिश्च यथाकल्पनप्रतिपत्तेः, यथाप्रतिभासनश्च नानेकत्वादिधर्मविचारायोगात् । तस्मादविद्यमानमेव सुखनीरादि सर्वमवभासते "मायामरी- १० चिप्रतिभासवदसत्त्वेऽप्यदोपः" [प्र० वार्तिकाल० २१२१०] इति वचनादिति कश्चित् । सोऽपि न विपश्चिदेव । यस्मात्- सत्यश्चेद्विभ्रमात्मासो सर्वथा विभ्रमः कथम् मिध्या चेत् , सुखनीलादि सत्यमेव प्रसयते ।।९५०॥ यतोऽपि विभ्रमज्ञानं विचारात्परिकल्प्यते । तद्विभ्रमे कथं तस्मादन्यविभ्रमवेदनम् ? ॥९५१॥ अन्यथा तत एवान्यसर्वाविभ्रमकल्पनात् । विभ्रमकान्तवादोऽयं नश्येत्पर्यन्त एव १९५२॥ तविभ्रमपक्षे तु तवलात्सर्वविभ्रमम् । न प्राज्ञा चुक्ते चूयर्मेपकल्पाः पर परे । ९५३॥ तदाह-'आहुः' इत्यादि । कम् आहुः १ अनर्थम्-न विद्यतेऽर्थोऽस्मिन् इत्यनों विभ्रमः तम् । की शम् ? अर्थयलायातम् , अर्थो विचारः तस्य तत्वतो भावात् अन्यथा ततो विभ्रमव्यवस्खानुपपत्ते, तस्य वलं सामध्यं तेनायातम् । क आहुः १ अविकल्पकार इति । अवयो मेपाः 'ईपदसमाप्ता (कल्पप्') अवयः अधिक ल्पा अनुक पिताः त एवावि- कल्पका विभ्रमवादिन इति । न मया तत्ततो भावनैरास्यादिकं कुतश्चित्तलादागत परिक्लप्यते यदयं प्रसङ्गः, किन्तु परपर्यनुयोगेन द्विपर्यय एव निषिध्यते । निपिद्धे च तस्मिन् तदेव तत्वमवशिष्यते गत्यन्तराभावादिति चेत् , न , तत्पर्यनुयोगादनत्तनिषेधे अतिप्रसगात् । अर्थादिति चेत् , न , तस्यैव तद्वादिनामभावात् । भारे सिद्ध स्वत एव सस्यार्थयायातस्य परिकल्पनं तर चाय दोषश्चेति सूकम्-'आहुः' इत्यादि । 1-चिप्रतिभासदत्वमप्प-शा । "प्रतिभासवदसत्वेप्योर "-. वाति हाल । २ प्रतिषु उप लभ्यमान कोष्टकानांत 'कल्प' इति शब्द ईषदसमाप्ती क पपप ययस्य सूनक । ३ हिरोदिसद्भाव । ४-गासदन-मा०,५०, ५०।
१९४ प्रथमः प्रत्यक्षाप्रस्ताषा ३८३ - इदगेबानेकान्सवादिनमुपहसतः सौगतस्य प्रत्युपहास दर्शयन् व्याचष्टे- चित्रं तदेकमिति चेदिदं चित्रतरं ततः ॥९३॥ इति चित्रं नानारूपं तद्वाह्य चित्रपतगादि, एकम् अभिन्नम् इति एवं चेत् यदि मन्यते जैनः इदम् अनन्तरोक्तं ततश्चित्रात् अतिशयेन चित्रं चित्रतरं विस्मयनीयतरम् । तथा हि-यदि नानाररूपं नैक विरोधात् , इत्यसदेव एकत्वम् , तद्भावे च न नानारूपम् , 'तस्यापि ५ परमाणुरूपस्यायुद्धिगोचरत्वादित्यसन्नेव चादृशो बहिरर्थ इति भवत्येव तद्वादिनामुपहास इति भावः । परस्य तन्न प्रत्यपहासमाह- चित्रं शून्यमिदं सर्व वेत्ति चित्रतमं ततः । इति 'चित्रं नानारूपं बाह्यं मयूरादि। कीदृशम् ? इदं प्रत्यक्षवेद्यं सर्व निरवशेषं वेत्ति जानासि। कीदृशम् । शुन्यं नीरूपम् । 'इदम्' इत्यत्रापि सम्बन्धनीयम् । इदं परस्य वचनं १० सतश्चित्रतरात् अतिशयेन चित्रं चित्रतमम् , अनुपायस्यैव तदभाववेदनस्य प्रतिपादनात् । उत्प्रत्यक्षमेव तत्रोपाय इति चेत् ; न तेन तदस्तित्वस्यैव प्रतिवेदनात् । अत एवोक्तम् 'इदम्' इति । सत्यम् ; तेन सद्भावस्य वेदनम् , तत्तु तदन्तर्गतस्येवेति चेत् ; न ; बहिर्भूतस्यै- यानुभवात् । भ्रान्तस्तदनुभव इति चेत् ; न ; सर्वदा तथैव भावात् । न च तादृशस्य १५ विभ्रमः ; स्वरूपेऽपि प्रसङ्गात् । तन्न प्रत्यक्षं तत्रोपाय: । विरोध इति चेत् ; न तस्याप्यप्रति पन्नस्यानुपायत्वात् । न प्रत्यक्षात्तत्प्रतिपत्तिः', तेनैकत्वाधिष्ठानस्येव नानारूपस्योपलम्मात । न हि तत्रैकत्वविकलस्य नानारूपस्य तद्विकलस्य चैकत्वस्य प्रत्यवभासनम् तथा कदाचि- -- दप्यसंवित्तः । तदुक्तम्- "न पश्यामः क्वचित्किञ्चित्सामान्यं वास्खलक्षणम् ॥" [सिद्धिवि०१०२]इति। २० मा भूत्ततस्तत्प्रतिपत्तिर्विचारादेव तदभ्युपगमात् । तथा हि-यदि चित्रपतन्नादो नीलपीतादिकमेको ग तईि 'नाना' इति कथं चित्रत्वम् ? कथविवेक न सर्वथेति चत् ; तत्रापि येन स्वमावेने येन च नाना तयो दे ; यदेकं तदेकमेव यन्नाना तदपि नानयति न चित्रमेकम् , नैकं चित्रमिति फथमनेकान्तयादः । तत्रापि फञ्चिदेव भेदादयमदोष इति चेत् । न ; नापि तत्रापि' इत्यादिप्रसङ्गानिवृत्तेरनवस्थोपनिपाताच्च । न चापर्यवसितानामेव भेदा. भेदस्वभावानाम् एकन्न परिकल्पनमुपपन्नं प्रतीतिप्रत्यनीकत्वात् । ततो यदि किश्चित्पर्यवसाने नानारत्पमेकं न भवति प्रथममपि न भवेदविशेषात् , इति सिद्धस्तस्य तत्सरिहारलक्षणो . 1 तस्यापर-ता. । २ निममिति ना-भा०, ५०,५०३ भरपझेग । ४ सर्वदा भवतः । प्रतिपतिः। । -काधिष्ठा-आ०, ०, प.। . प्रयो। ८ "प्रायन्ना तु सामः सोऽनेकागतगाधनम्" युगरार्धम् । ९ प्रत्यशाम् ।
. .. न्यायविनिश्चयविवरणे [१२९५ विरोधः, तस्य बहिरर्थाभावप्रतिपत्तावुपायत्वञ्च । तेनेकस्यानेकत्वे अनेकस्य चकत्ये निषिद्धे परिशिष्टस्याप्रतिवेदनादभावोपपत्तेरिति चेत् ; ना विचारस्याप्रमाणचे ततो विरोधस्याप्रविपत्तः । प्रामाण्यवन प्रत्यक्षत्वेन; ततो विरोधपरिज्ञानाभावस्य निवेदितत्वात् । अनुमान. त्वेनेति चेत् । तत्र तर्हि विरोधप्रतिबद्धं किञ्चिल्लिङ्गमगीकर्तव्यम् अन्यथा अनुमानस्यानुत्पत्तेः। ५ तत्प्रतिबन्धस्य च न प्रत्यक्षात्परिज्ञानम् ; तस्य विरोधाविषयत्वात् । न च विरोधमजानता कस्यचित्प्रतिवन्धः शक्यपरिज्ञानः, तनिष्टस्य तस्य सत्येव तत्परिज्ञाने परिज्ञानोपपत्ते ।। विचारादेव तस्यापि परिज्ञानं तेन विरोधस्यापि प्रतिपत्तेरिति चेत् । न ; परस्पराश्रयात-प्रति. बन्धपरिज्ञानाद्विचारः, ततश्च तत्परिज्ञानमिति । विचारान्तरात्तत्परिज्ञानमिति चेत् । न3 तेनापि विरोधस्याग्रहणे सद्योगात्। प्रहणे तु प्रकृतविचारवैयर्थ्यम् । अनुमानत्वे च विचारान्तरस्य १० तद्धेतोरपि प्रतिबन्धपरिज्ञानमन्यतो विचारादित्यव्यवस्थितो विचारः, स कथं नाम विरोधमु- पहयेत् ? "स्वयं पतन्नोद्धरते पतन्तम्" [ ] इति न्यायात् । ततो नानु. मानत्वेनापि विचारस्य प्रामाण्यम् । अतो विकल्पमात्रमेवेदमवस्तुसंस्पर्शिदुरागमानुरक्तानां रक्तपटानाम् । न चातः क्वचिद्विरोधस्यान्यस्य वा प्रतिपत्तिः । न चैकानेकस्वभावयोरप- रावपि तत्स्वभावो, अपि तु चित्रपत) य एव नीलादीनां परस्परमेकस्वभावः स एव तयोरपि १५ तत्वभावः, य एव च तेपामन्योन्यं नानास्वभावः स एव तयोरपि तत्स्वभावः, वथैव परि. स्फुटज्ञानवपुपि निरुपप्लवतया प्रत्यवभासनात् , सत्कथं वदवलम्बनेनानवस्थापरिकल्पनमुप- पन्नम् । तन्न विरोधादप्येकानेकात्मनो बहिर्भावस्याभावपरिज्ञानं तस्यैवाप्रतिपत्तेः । नापि वैयधिकरण्यात् ; तस्यापि विरोधासिद्धावसिद्धः तन्मूलत्वात् । नाप्युभयदो. पादपरिज्ञानलक्षणात् ; वत्परिज्ञानस्य प्रत्यक्षन एवं प्रतिपादनात् । नापि साङ्कर्यसंशयाभ्याम् । २० कब्विदसाकणेव निःसंशयं तत्प्रतिपत्तेः। अतो निधिप्रतिपत्तिविषयस्याभावमनुपायमान क्षाणो भवत्येवातीवोपहासविषय इति युक्तमुक्तम्-'चित्रं शून्यम्' इत्यादि । ततो न योकं बालमसत् , नापि विभ्रममात्रम् , सकलविकल्पविकलं वा, सत्मति- येघस्याभिहितत्वात् । नापि संवृतिमात्रम् , स्पष्टप्रतीतिविपयस्य तत्त्वानुपपत्तेः । तदेवाह- तस्मान्नैकान्ततो भ्रान्ति सत्संवृतिरेव वा ।।९४॥ इति । मुयोधमेतत् । वाशब्दादनुसमुच्चयः, तेन 'न सकलविकल्पविकलम्' इत्यपि प्रतिपत्तव्यम् । भवतु वहिं तदेकव्यक्तिसंविन्मात्रमद्वैतमिति चेत् । तद्यदि चित्रैकरूपम्, "चित्रप्रति. मासाप्येकैव बुद्धिः" [प्र० वार्तिकाल० २१२१९] इति वचनात् ; नदाऽनुकूलमागतम् । बाह्यस्यापि तपस्यानिवारणात् । न च बाह्यमपरिझानान्नास्त्येव स्वतस्तस्यापरिक्षानेऽपि परता -- १ सम्बन्धस्य । ३ -म्यवस्थाविवारस्य भा०,५०,५०।३ पौद्धानाम् । ४ -साने तस्य भा., प.14 तदा भा., १०, ५०11- मुच्चीयते तेन सहल-भाबप २।२४] प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्तायः परिज्ञानात् । तस्य' च स्वपरविषयस्वभावद्वयाधारस्याभ्युपगमात् । 'तत्स्वभावद्वयस्थाप्यपरेण तवयेन तस्याप्यपरेण तेन परिज्ञानमित्यनवस्थानम्' इत्यपि चोद्यं न चित्रैकवादिनः सम्भवति तत्रापि प्रसङ्गात् । भवतु बाह्यस्य परिज्ञानम् , तथापि कथं चित्रस्येकत्वम् ? कथं ज्ञानस्य ? अशक्य- विवेचनत्वादिति चेत् ; न ; बहिरपि तद्भावस्य निवेदितत्वात् । अभिन्नयोगक्षेमत्यादिति ५ चेत् ; किमिदं तत्वादिति ? सहोत्पत्तिविनाशत्वात् , सहोत्पत्तिसंवेदनत्वावति चेत् ;न; तस्य सन्तानान्तरज्ञानेश्र्यभिचारित्वेनागमकत्वात् । अस्ति हि वेपा तत्त्वं न कत्रमिति । तान्येव न सन्ति अपरिज्ञानात् तत्कथं तेषु तत्त्वम् ? न हि तेषां प्रत्यक्षवः परिज्ञानम् शरीरवतत्रापि संशयाद्यभावापत्तेः । नाप्यनुमानात् ; लिङ्गाभावात् । व्यादारादि लिङ्गमिति चेत् ; कुत एतत् ? वस्य संवेदनकार्यत्वेनात्मनि प्रतिपत्तेरिति चेत् ; तर्हि तस्य संवेदनस्य चकमेव ज्ञानमभ्युपगन्तव्यम् - अन्यथा 'संघेदनस्य व्याहारादिः कार्यम् , तस्य संवेदन कारणम्' इति परिज्ञानासम्भवात् । भवत्विति चेत् ; न तस्यापि संवेदनसमयस्य व्याहारादी तत्समयस्य च संवेदने प्रवृत्त्यभावात् , 'तत्काले भाविनि भूते' वा स्वयमभायात् । अतत्कालेन च तत्प्रतिपत्ती अतिप्रसगात् । न चोभयकालत्वमेकस्य ; क्षणिकत्वात् । भवतु वा "तस्य "तत्कार्यत्वम् , तथापि न गमकत्वम् ; गाढस्वापादो साध्याभायेऽपि भावात् । अन्य एव स व्याहारादिः, न च तब्यभिचारात्तद्विलक्षणस्यापि तत्रागमकत्वम् ; गोपालघटिकाधूमव्यभि. चारात् पर्वतघूमस्यापि पावकं प्रत्यगमकत्वापत्तरिति चेत् ; भवत्येवं तथापि कथं तस्य सर्वत्र तरकार्यत्वम् ? कचित्तथा दर्शनादिति चेत् ; न ; तेन तत्रैव तत्प्रतिपत्तिसम्भवान्न सर्वत्र तस्य तत्राऽपवृत्तः । व्यातिज्ञानादिति चेत् ; कुतस्तस्योत्पत्तिः ? फचित्तथा दर्शनादिति चेत् । न; "शालू कस्यापि सर्वत्र "गोमयकार्यत्वपरिक्षानापत्तेः क्वचित्तथादर्शस्याऽविशेषात् । न २० चैवम् , "अन्यत्रान्यतोऽपि तस्योत्पत्तेः । तज्ज्ञानयतः सर्वशत्यापत्तेश्च । तस्मादप्रतिपन्नव्याप्ति- कस्वान्न व्याहारादेस्तेपामनुमानम् , इत्यनुपलम्भात् न सन्त्येव सन्तानान्तरज्ञानानीति न तरमिन्नयोगमत्वस्य व्यभिचार इति चेत् ; कोऽयमनुपलम्भो नाम ? उपलम्भनिवृत्ति. मानमिति चेत् ; ग ततो गगनकुसुमादिव कस्यचिदप्याविपत्तेः । अन्योपलम्भ इति चेत् ; तेनापि कथं भवेत्प्रविपत्तिः ? तनिविकतया तद्विपयत्योपलम्भादिति चेत् । अस्तु तईि २५ तत्रैव तदभायो न सर्वत्र, अन्यथा प्रसादेव स्वर्गादिविविफभूतलादिविषयान् सर्वत्र ११ -- .. . ज्ञानस्य । २ चित्रज्ञानेऽपि । ३ "योग: अप्राप्तस्य विश्वाय परिच्छेदलक्षगा प्राप्तिः, क्षेमः तदर्थरिया. नुष्ठानलक्षण परिपालनम् ।"-हेतुमिरी.पृ.३६ | "अनन्धधर्मानुत्तिः योग, सम्पधर्मावतिः समः।"- प्र० या ..। ४ सन्तानान्तरज्ञानानाम् । ५सन्तानान्तरज्ञानानि । ६ म्याहारादेः । शानस्यामि। ८ व्याहारादिकाले भाविनि । ९ संवेनशले भूने। • माहारादेः। "सदनचर्य वम् । १२ यत्र हरपते तनैन । १३ इन्दीवरकन्दस्थापि । १४ "पतामरस शशार उदधन्दौरं गोम्या घाटादग्निरहे.फगादपि मगिगापितमोरोपनाः । इनि पुरातनवचनम्"-वा. टि.। १५ तहमादी। पादपि ।
3 ३८६ न्यायचिनिश्चयविवरणे [१९४ स्वर्गाद्यभावप्रतिपत्त चार्वाकस्यापि किं तत्र प्रमाणान्तरपरिकल्पनया ! यत इदं शोभेत- "प्रमाणान्तरसद्भावः प्रतिपेधाच कस्यचित् ॥" [ ] इति । कथं वा क्वचिदपि तेपामदृश्यानां तस्मादभावप्रतिपत्तिः ? 'दृश्यानुपलम्भस्यैव गमकत्वम्' इति स्वमतव्याघातात् । इदमपि भेवादिन एव मतं नाद्वैतवादिनः तेनानुपलम्भ. ५ मात्रादभावप्रतिपत्तेरभ्युपगमादिति चेत् ; न ; एवं नीलेनान्याकारस्य तेन नीलस्यानुपलम्भात्, अभावप्रतिपत्तायभिन्नयोगक्षेमत्वस्याश्रयासिद्धिप्रसङ्गात् । नीलेवरयोरन्योन्यमनुपलम्भेऽपि स्वय. मुपलम्भान्नाभाव इति चेत् । न ; सन्तानान्तरेष्वपि स्वयमुलम्भस्य भावात् । सोऽपि परेणानुपलभ्यमानो नास्त्येवेति चेत् ; न नोलेतरयोरपि स्वयमुपलम्भस्य परस्परानुपलम्भे- नाभावापत्तः । तन्नानुपलम्भमात्रादपि तदभावज्ञानम् । कथं वा तन्मात्रात्तभावज्ञानज्ञानम् ? कथं च न स्यान् ? तन्मात्रज्ञानेन तदभाव- ज्ञानस्य तज्ज्ञानेन च तन्मात्रस्याप्रतिपत्तेः, तत्काले तस्याभावात् , उभयसमयव्यापिनश्च ज्ञानस्यानभ्युपगमात् । उभयोश्च फुतश्चिदपरिज्ञाने तद्धेतुफलभावस्याशक्यपरिझानत्वात् । सत्यम् ; न वस्तुतोऽनुपलम्भस्य तज्ज्ञानहेतुत्वम् “अशक्तं सर्वम्" [प्र० वा० २।४] इति वचनात् , संवृत्या तु तद्भ्युपगम्यते "संघृत्यास्तु यथा तथा' [प्र. का० २१४] इति वचनादिति चेत् ; न ; व्याहारादेरपि तयैव सन्तानान्तरपरिज्ञानहेतुत्वापत्तो । संयति. चलेन तत्परिज्ञानमपरिज्ञानमेवेति चेत् । न ; तेन तनिषेधस्याप्यनिषेधत्वप्रसङ्गात् । अपि च, केयं संवृतिर्नाम ? तत्र हेतुफलभावमध्यारोपयन् कश्चिनिमध्याविकल्प इति चेत् ;न; तस्यापि हेतुसमसमयस्य तत्फले तत्फलसमसमयस्य च हेतो अप्रत्ते, उभयसमसमयस्य च तस्यानभ्युपगमात , कथं ततोऽप्यनुपलम्भस्य तद्धेतुत्वम् ? सत्यम्। न तस्याप्युभयविषयत्वं वस्तुतः संवृत्यन्तरेणैव परिकल्पनादिति चेत् ; न ; तेनापि हेतु तत्फलयोरपरिज्ञाने विकल्पतद्विपयत्वस्याशक्यारोपणस्यात् । तस्यापि तदन्तरेण तद्विषयत्व परिकल्पनान्न दोप इति चेत् ; न ; तत्रापि 'तेनापि' इत्यायनुबन्धादावृत्तिमतोऽनवस्था- दोपस्यापत्तेः । विचाराधिष्ठिता न सम्भवत्येव 'संवृतिः, लोकबुद्ध्यैव केवलमभ्युपगम्यत इति चेत् । न सम्यगेतत् ; लोकस्यैव सन्तानान्तरस्वभावस्याभावान् । तदयं लोकमेवानभ्यु- पगच्छन् तदुद्धया संवृतिमङ्गीकरोतीति कथमनुन्मत्तमज्ञः ? भवतु वा संवृतिः, तथापि तया तदभावज्ञानस्य किमारोपयितव्यम् ? अनुपलम्भ- , तम धर्मकीतिना-प्रमाणेतरसामान्यस्थितेरम्यधियो गते । प्रमाणान्तरपदावः प्रतिषेधान करय- चित् ॥" : पit० पृ. ६४। प्रशः कन्द.पू. २५५ । ममाणमी. पृ .२ "प्रतिषेधसिदिपि यथोक्षाया एवानुपलब्धेः पयोमाया ध्यनुपलब्धिसत एव ।"--यापवि०, पृ. ४३ । प्रमाणवा स्वर १५ | प्रमाणातिकाल• भर१२ । ३ -दमावशन 6-U०, २०, ५० "अनुपलम्ममामात् सन्तानान्तरा• भावानमभूषिविज्ञानम्"-ता.रि. सत्येव ।। ५ संदिग्लेन । ६ "सत्याभाट पन्तत्र न तवं पर. मार्यतः । विचार्यमाणशून्यचे सीति. सेति गीयते ।"-३वातिकाहगृ.१८ । , २० २५ प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव. - . कार्यत्वमिति चेत् । असति तस्मिन' तदारोपणे तस्य निर्विपयत्वप्रसङ्गात् । सत्येति चेत् ; वदापि किं तस्य प्रयोजनम् ? सदभावप्रतिपत्तिरिति चेत् ; न, तस्यास्तसत्तामानेणैव भावात् तदभेदात् । तत्रै नित्यत्वस्य निपेधः, तस्य निर्हेतुकत्वे अवश्यं तत्प्रसङ्गादिति चेत् ; न सम्यगेतदपि, यस्मात्- नित्यत्वं तत्स्वभावचेन कुवश्चिन्निपिध्यने । तदेव तनिषेधे हि निषिद्ध स्यादभेदतः ॥९५४॥ तयं लाममन्विच्छोर्मूलच्छेदत्तवागतः । नित्यत्यहानिकामस्य ज्ञाने तद्धान्युपस्थितेः ॥९५५।। तद्रूपं चेदनित्यत्वं नित्यत्वं दैवतो गैतम् । तन्निपेधाय तब्यर्थ तत्कार्यत्वापिरोपणम् ॥९५६॥ आरोपितञ्च नित्यत्वं तन नास्त्येव निश्चयात् । निश्चयात्मानुमानश्च प्रसिद्धं बोद्धशासने ॥९५७॥ स्वरूपे निश्चयस्तस्य नास्तीत्यपि न युक्तिमत् । विना तेनार्थनिर्णीतिनेंति पूर्व निरूपणात् ॥९५८॥ वदयुक्तस्तदारोपो वैफल्यात्संवृतेरयम् । दोपो न सौगतस्यास्ति तद्वृत्तान्तानुयादिनः ॥९५९।। न चासो संपतिः शक्या निपेटु हेतुसम्भवात् । तत्सम्भवोऽपि पद्धेतोस्तदनादिकगागतात् ।।९६०॥ इति चेद्युक्तमेवेदं कार्यकारणतास्थितौ । सा तु नास्ति तवाशक्तं सर्वमित्यभिधायिनः ॥९६१॥ संतीनां प्रवाहेऽपि संवृत्या" यदि तरिस्थतिः । कथमेवमवस्थानं यतस्वनिर्णयो भवेत् ॥९६२॥ तस्मादयुक्तमेवेदं कीर्तितं धर्मकीर्तिना । "निष्पत्तेरपराधीनमपि कार्य स्वहेतुना ॥९६३|| सम्बध्यते कल्पनया किमकार्य कयञ्चन ॥ [प्र. वा० २।२६] २५ इवि फल्पनया तत्सम्बन्धस्यैवमसम्भवात् ॥९६४॥ भवतु स्वरूपमेव तस्य "क्याऽऽप्यमिति चेत् ;न, अनुपलम्भस्य येकल्यापत्तेः । संपतित पष तत्स्वरूपस्य भावात् । भवत्विति चेत् ; न, अनुपलम्भवादिनोऽसाधनाइयादित्वेन निमहोपनिपा- १ सन्तानान्तराभावे । २ सन्तानान्तरामावप्रतिपत्ति । ३ सन्तानान्तराभावगतामा । “सरमाव. शने । ५:तदभावशानस्य । तस्माशानमेव । ७ गते. भा०, २०, ५०। ८ अनुष अभावधिरोगम् । स्वरूपनिधयेन। 1.प्र.पा.२४संत्यादि तन. स्थिते. भा०,५०,०11३ संगया।३-स्या. मावा-भा०,.,.1 २० न्यायचिनिश्चयचिधरणे [१३२५ तात् । कथं वा ततस्तत्त्वत: सन्तानान्तराभावस्य परिज्ञानम् ? आरोपितस्वस्परय तात्त्विा प्रयोजननिरन्धनलानुपपत्तेः तोयादिवत् । तदप्यताविकमैयेति चेत् ; न तर्हि वितस्तदभाव इति कथन 'रभिन्नयोगक्षेमास्य व्यभिचार: ? नायं दोपः, 'नेपामप्येकलेन पत्रीकरणादिति चेत्न; व्यभिचारविषयस्य सदयोगात्, अन्यथा न किश्चित्तत्पुरत्यादिपमपि व्यभिचारि ५ भवेत् , सापि व्यभिचारविपयस्य पक्षीकरणात् । यो वा विरोधो यनानात्व एव तेषामभिन्न योगक्षेमत्वं न भवेत् , अदृश्यात्मना वेन सामाद्विरोधद्वयस्यापि सर्वशत्येन वचनादेरियासिद्धः? नानात्यविरुद्धेनेकत्वेन तस्य व्याप्तत्वात् पारम्पर्येण तेनापि विरोध इति चेत् ; कर पुनरेफ. न तयाप्तिः प्रतिपना ? प्रत एर चिनशान इति चेत् ; तत्र योकत्वप्रतिपत्तिर-यतः, व्यर्थमभिन्नयोगक्षेमत्वम् , तस्यापि तदर्थत्वात् तस्याश्चान्यत एर भावात् । अत एव वसवि. १० पत्तो परस्पराश्रयः -निश्चिते नानात्वविरोधे वतस्तत्प्रतिपत्ता तेन तव्याप्तिनिश्चयः, ततश्च मद्वि. रोधनिश्चय इति । तन्नाभिन्नयोगक्षेमत्वं हेतुः, संशयितविपक्षव्यतिरेक्त्वात् , तदपि नानात्वेन साक्षात्परम्परया च "विरोधासिद्धः व्यभिचारनिश्चयाद्वा, निश्चितो छान व्यभिचारः सन्तानान्त- रज्ञानेपु ब्याहारादिभेदाद भिन्नतयेर प्रतिपन्नेषु हेतुभावात् । यत्पुनरोलम्-'तद्वेदस्य साकल्येन व्यामिपरिक्षाने तत्परिक्षानरतः सर्वज्ञत्वम् , १५ देशतस्तत्परिज्ञाने न गमकत्वं व्यभिचारसम्भवात्' इति । तदपि न युक्तम् ; अभिन्नयोगक्षेम- त्वेऽपि तथा प्रसङ्गात् । नायं दोपः, तर पक्ष एव व्यातिप्रणादिति चेत् ;नव्याहा. रादिभेदस्यापि "तत्रैव तद्हणात् गमक्त्योपपत्तेः व्यभिचारदोपस्य परिहरणात् । तन्नाभिन्नयोग- क्षेमत्वादेकत्वं सवेदनाकाराणाम् । यत्पुन:-अभेदप्रतिभासादेव निर्गधात् तयाँ चेत; अर्थावयवानामग्येक्त्वंतविशेषात् । २० प्रतिपादिवब्वत्-'एतत्समानमन्यन्त्र' इदि । तदेव विस्मरणशीलानामनुग्रहार्थमावेदयताह- अतश्चार्थचलायातमनेकात्मप्रशंसनम् । इति । अन व दो भागमायाम् । अतः अस्मन एकान्समिश्रमादित्यत् 'अन्यत्र' इत्यनुवर्तमानस्य विमतिपरिणामेन सम्बन्धात् । किं तद् ? अनेकात्मप्रशंसनम् , अने. कात्मनः अनेकस्यभावस्य ज्ञानस्यैव नार्थस्यानभ्युपगमात् , प्रशंसनं प्रतीतिवलेन स्तवनम् । २५ तलिम् ? अर्थस्य घाघस्य पटादेवले स्वरूपादप्रच्यवनं तस्मै तदर्थम् आयातम् आगतम् अर्थवलायातम् । तथा हि- चिनमेकं यथा ज्ञान प्रतीतिबलतो मतम् । मन्यतां तद्वदर्थोऽपि तत एवानुपप्लवात् ।।९६५॥ , सन्तानान्तरमनै 1 २ सन्नानाज्ञानानामपि । ३ सन्तानान्तरज्ञानानाम् । ४ सहानवस्थापरस्परपरि हारस्थितिलक्षणविरोधद्वयस्यापि। ५ अभिपयोगक्षेमत्वस्य । ६ नानात्वेनापि । ७ एकत्वप्रलिपत्यर्थत्वात् । ८ एकरव. प्रतिपत्तो। ९एरवपासवात् । १.विरोधसिद्ध भा०,०,०।" पक्ष एव व्याप्तिगहणात् । १० एपर्व सवेदनाश्चराणाम्।
१।२६] प्रथमा मत्यक्षप्रस्तावा १० न चैऋमेकरागादावित्यादिरपि बोधवत् । एकानेकस्वभावेऽर्थे विप्लवाय न कल्पते ॥९६६॥ कल्पते यत्र योगोक्त सोऽस्माभिरपि नेष्यते । तं दूपयनतोऽस्माकं प्रतिहस्तायते भवान् ॥९६७॥ चिकज्ञानयत्तन संशयाद्यपि दूपणम् । प्रवर्तते न निर्बाधनिर्णयोरलेपभूपिते ॥९६८॥ अद्वैतवेदनं तस्मादेकानेकारमकं ब्रुवन् । न प्रभुर्य हिरर्थस्य तादृशः प्रतिपीडने ।।९६९।। भवतु तर्हि तदेकमेप न चित्रम् ; कि स्यात्सा चित्रतैकस्यां न स्यात्तस्यां मतावपि । यदीदं स्वयमर्थे यो रोचते तत्र के वयम् ॥" [प्र०वा०२।२१० इति वचनादिति चेत् , न; ताशस्य कदाचिदपि तस्याननुभवात् । अननुभाव्यमपि लिङ्गा- दयगम्यत इति चेत् ; न ; तदप्रतिवेदने तत्कार्यस्वभावतया कस्यचिदपि परिज्ञानायोगान् , अतत्कार्यस्वभावस्य लिङ्गत्वानभ्युपगमात् । सुगतसन्निधानातवगम्यत इति चेत् ;न; अद्वैतवादे सुगतस्यैवाभावात् । भावेऽप्युत्तरमाह- न ज्ञायते न जानाति न च किश्चन भापते ॥१५॥ बुद्धः शुद्धः प्रवक्तेति तकिलैपां सुभापितम् । इति । बुद्धः सुगतो न ज्ञायते न विनेयः प्रतीयते तस्य वुद्धिरूपतयाऽनन्यवेद्यत्वात् "तस्या नानुभवोऽपरः" [प्र० या० २।३२७] इति वचनात् । अपयनुभवभाधे वा सद. तोऽपि सर्वदर्शित्वं सकलविषयाकारगर्मस्य तेन परिज्ञानात् । तस्याप्यपरानुभवभावे तद्वतोऽपि २० सर्वदर्शित्वम् । तत्राप्येवमिति सर्वस्यापि युद्धमनुभवतो विनेयवर्गस्य सदनुभवाधिष्ठानस्यापि सर्वदर्शित्वान्न किश्चिद् वुद्धेन ? बुद्धवदेव तस्यापि स्वत एव तत्वपरिज्ञानात् । तन्न तस्यापर- स्मादनुभवात्परिज्ञानम् । अनुमानादिति चेत् , न ; सतोऽपि तस्य स्वरूपप्रतिवेदने पूर्ववदो- पात् , अन्यथा तद्वैयर्थ्यात् । समारोपव्यवच्छेदान्न तद्वैयर्यमिति चेत् ; किं तव्यवच्छेदेन ? .. न्यायवि० श्लो. ९।। २ -गाशेपदूषणे बा०, २०, प० । । "नन यदि रा] चिन्नता युद्धावे. कल्या स्यात् तया च चिनमक द्रव्य व्यवस्थाप्यन तदा किं दूषण स्यात् ! शाह-म स्यात्तस्यो मतापति। न केवल द्रव्ये तस्या मतावप्येवस्या न स्याचित्रता। आकारनानात्वलशणवाददस्य । नानात्वेऽपि चित्रता कथम् १ अनेक पुरुषप्रतीतियत् । वथ तईि प्रतीतिरित्याह-यदीदं वयमर्थानां रोचते तन के वयम् । यदीदम. ताप्येऽपि ताप्यप्रथनमाना भासमानाना नीलादीमा स्वयमपरप्रेरणया रोचते तत्र सधाप्रतिमासे के यमनमाना अपि निपेखुम् ? अरस्तु च प्रतिभासवे नेति गफमालीश्यम् ।"-प्र० पा० म. वृत्ति० २२१७। ४ तत्परि-आ., य., प.५ अनुमानवैयर्थ्यात् ।
न्यायविनिश्चयविवरणे [१२९६ सत्यपि तस्मिन् सरस्वरूपस्याप्रतिवेदनात् । प्रतिवेदने तु सिद्धं तद्वतोऽपि सर्वदर्सित्यं सकला- कारप्रतिबद्धस्य युद्धस्वरूपस्य तेन प्रत्यक्लोक्नात् । तदुतम्- "समारोपव्ययच्देदात्तचसिद्धिमनिच्छताम् । अनुपानमनथं स्यादन्यथा सफलग्रहः ।।" [ ] इति । ततश्च तदवाथ पूर्यचद्रुद्धवैयय॑म् , ततो न धुतश्चिदपि तस्य परिज्ञानमित्युपपन्नमिदं 'बुद्धो न ज्ञायते' इति । वदनेन सुगतसन्निधानात्तत्त्वज्ञानमिति प्रत्युक्तम् , सुगतस्यापरिक्षाने तत्सन्निधानस्यापि दुष्परिज्ञानत्वात् । अपरिज्ञातमेव तत् तत्परिज्ञानस्य निबन्धनम् चक्षुरादिवद्रूपादिपरिक्षानस्येति चेत् , भवेदेव यदि रूपादिनानवत् निरशवेदनविषयं 'किश्चिद्विज्ञानं विप्रतिपत्तिमलोपले. १. पविकलेन प्रज्ञाप्रकाशेनोपदर्शितं भवेत् । न चैवम् , सर्वदा ग्राह्यादिभेदमलाधिष्ठानस्यैव तस्य परिज्ञानावलोकनात् । प्रतिपादितं चैतत, प्राक-'प्रतिसंहारवेलायां न संवेदनमन्यथा' इति । तदनेन तत्त्वज्ञानात्तत्सन्निधानपरिज्ञान प्रत्युक्तम् , उक्तनीत्या तत्त्वज्ञानस्यैवाप्रतिपत्तेः । तन्न तत्सन्निधानात्तदवगतिः । तद्वचनाद् "अद्वयं यानमुत्तमम्" ] इत्यादेसादवगतिरित्यययुतम्, १५ तदपरिज्ञाने तद्वचनस्याप्यशक्यपरिज्ञानत्वात् । कथं था तस्यैव बबन प्रमाणं न रथ्या- पुरुपादेरपि १ तस्यैव परिशुद्धज्ञानत्वादिति चेत् , स्वरूपापेझया रयापुरुपादेरपि तरवात् । न सकलविपयापेक्षयेति चेत् , न , बुद्धेऽपि तद्भावात् । न हि तस्यापि सर्वत्र परिशुद्धज्ञानं समकालभाविन्यभावात् , "तस्याकारणत्वेन तदविषयत्वात् । तदपि कार- णमेव अविनाभावादिति चेत् , न , तस्यापि विषयत्वे "नातोऽर्थः स्वधिया सह" २० प्र०वा०२।२४६] इत्यस्य विरोधात् । भवदपि तस्य सर्वार्थज्ञानं निराकार चेत्, न तस्यैक- स्वभावस्य देशकालस्वभावभिन्नानेकवस्तुविषयत्वम् एकस्वभावज्ञानविषयत्वेन सर्वस्याप्येकत्वापत्तेः, अन्यथैकस्वभावहेतुकत्वेऽपि कार्याभेदप्रसङ्गाभावात् न नित्ये नानाकार्यविरोधः स्यात् । अनेकरवभावमेव भवतु तदिति चेत् , कथं तदेकम् , प्रतिस्वभाव विरुद्धधर्माभ्यासेन भेदोपनि- पातान् ? अन्यथा प्रमेणापि तदेकमेवानेकस्वभाव प्राप्नुयात् । शक्यविवेचनत्वान्नेति चेत् , २५ किमिदं विवेचन यच्छक्यमुच्यते ? कालकृवस्तरस्वभावाना बम इति चेत् , न , युगपदपि देशकृतस्य "तस्य भावात् । ततो" नात्यन्ताय भेदः, तेषामभेदस्यापि प्रतिभासनादिति चेत् , न , कालभिन्नानामप्यभेदानुगमस्यावलोकनात् । मिथ्यैव तेपा'तदनुगमो विकल्पोपनीतत्वादि- त्यपि नोत्तरम् , देशभिन्नाना 'तदनुगमस्यापि [विकल्पोपनीतत्वात् , स्पष्टप्रत्ययविषयत्वान्नेति न - !-ज्ञातवा-आ०,५०२ युगइसनिधानम् । ३ -ज्ञाननिए-पा०, ५०, प.1 किश्चिज्ज्ञान मा., १०.५ पृ.11. पं०२३ । ६ युगतापरिज्ञाने । ७ समकाल माविनोयय । ८ मुगतज्ञानस्य । ९ अमयुगप- भा०,०प०110 श्रमस्य । ।। देशहदकमात् । १२ बभेदानुगम । १३ अभेदानुगमस्यापि ।
घेत १९६] प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्ताव अस्ति कालभिन्नानामपि] स्पष्टप्रत्ययविपयत्वम् । निरूपयिष्यते च तत् । अनेन एकान्त- भेदप्रतिवेदनं विवेचनमिति प्रत्युक्तम् ; प्रत्यक्षतस्तदभावात् । अनुमानस्य च तत्पूर्वकतया तत्रा- प्रवृत्तः । नापि सन्तानान्तरं प्रति नयनं विवेचनम् ; तस्याप्रतीतेः अनभ्युपगमाव । नाप्यन्य- वेद्यत्वम् ; युगपदाविनामिव क्रमभुवामपि तेषां परेण प्रत्यक्षेणाग्रहणात् । अनुमानेन ग्रहणस्य चोभयत्राविशेषात् । ततो भयत्येव क्रमवतामपि तेषामभेदः, तद्भेदस्याभेदप्रत्यनीकत्याभाव. ५ खात् । तदुक्तम्- अन्तर्वहिर्मुखाभादि संविदं न भिनति चेत् । अक्रमं न क्रमाधीनं भिन्द्यादेव सुखादिकम् ।।" [सिद्धिवि०प्र०परि०] इति । न चेदमुचितं भवताम् ; बुद्धस्यैकान्ततः प्रतिसमयभगुरत्वेन तदात्मत्यानुपपत्ते। तन्न तज्ज्ञानस्य क्रमवदक्रमेणाप्यनेकस्वभावत्वमिति न तेन तस्याशेपवेदित्वं निराकारेण । नापि साकारेण ; तस्याप्याकारार्पकमात्रविषयत्वेनान्यत्राप्रवृत्तेः । सर्वमपि संत्राका- राकमेवेति चेत् ; उच्यते-पूर्वापरसमयभाविनी भावा नीलादिरूपगिय कालक्रममध्यात्म नो यदि न तत्र समर्पयन्ति कथं तस्यं तद्विपयत्वं यतस्तेनाशेषज्ञत्वं बुद्धस्य ? कथं वा क्वचिदु- पायोपेयभावस्य परिज्ञानम् । तस्य कालक्रमालिहि तत्वेन तदनवबोधे दुरवबोधत्वात् । योगपद्या- लिगितल्ये तु तद्भाव एव न भवेत् कस्यचिदनिष्पन्नस्यानुपायस्वात् , निष्पन्नस्यापि पुनरनुपयो- स्वनिष्पत्तिसमय एंयोपेयस्यापि निप्पत्तेः। अव्यभिचारादुपायत्वं न निष्पादकत्वादिति चेत् ; कुत्तस्तहि तनिष्पत्तिः ? न फुतश्चिदिति चेत् ; न ; नित्यसत्त्वादिप्रसङ्गात् । अन्यत इति चेत् ; न तस्येवोपायत्वापत्तेः , न प्रकृतस्य । भवस्विति चेत् ; न; तस्याप्युपेयसमसम. यत्वे पूर्ववहोपात् । पुनरन्यतस्तनिष्पत्तिकल्पनायाम् अनवस्थानात् । तद्भिनसमयत्वे तु सिद्धः फालक्रमालिङ्गितस्तद्भावः । स च न बुद्धज्ञानस्य विपया, अनर्पिताकारत्वादिति फथं वस्य प्रामाण्यम् ? यत इदं सूक्तं भवेत्- "हेयोपादेयतत्वस्य साभ्युपायस्य वेदकः । यः प्रमाणमसाविष्टो न तु सर्वस्य वेदकः ॥" [प्र. वा० ११३४] इति । "तमपि ते सत्र समर्पयन्ति पूर्वापरभायेनैव तदर्पिताकाराणां बुद्धवेदने "व्यवस्थाना- दिति चेत् ; उच्यते- प्रत्याकारं यदि ज्ञानं तौकान्तेन भिद्यते । प्रत्यर्थनियतत्वेन कथं सर्वार्थ विद्भवेत् ॥९७०॥ - गात, २० २५ १ प्रयशपूर्वकतया । २ प्रममावेऽपि प० । मभाव्यपि भार, १० । ३ परमं ते झमादीना आ.,५०, प. । ५ युद्धस्यने । ५ भावानीलादि-भा०,, ५०। ६ पालकमस्य आ०, २०, ५०। ७ उपायोपेयभाव । ८ एवोपाय-आ०,५०प०९ नित्यं सरवा-मा०,००। "नित्यं सत्त्वमसत्त्वं वा हेतोरन्पानपेक्षणात् ।"-प्र. वा. ३३३ ।।.-स्थानं वद्भि-मा०प०,प. कालकममपि भावाः । १२ व्यवस्थापना-मा०प०प० ।
३९२ ग्यायविनिश्चय विवरणे [९६ १० तदाकारक्रमस्यापि परेण प्रतिवेदनम् । तदाकारण तत्रापि तत्कमस्यान्यतो गती ॥९७१॥ अनवस्थानदोप: स्याननकान्तेन तद्भिदा। प्रत्याकारे कथचिच्चेदनेकान्तः प्रशस्यताम् ॥९७२।। आत्मानमेव जानानः क्रमाऽनेकान्तगोचरम् । बुद्धः कथं ततो यादेकान्तक्षणिकं जगत् ॥९७३॥ तदन्वयस्य मिथ्यात्वे मिथ्यैव स्यात्तथागतः । मिथ्या व सर्ववेदी च प्रमाणञ्चेति साहसम् ॥९७४॥ वन्न कालकनज्ञानं तस्य स्याद्वादविद्विपः। सोपायोपेयविज्ञानं नास्ति तस्य तदत्यये ।।९७५॥ तदाह-न जानाति न वेत्ति युद्धः किम् ? किश्चन उपेयादि इति तत्त्वम् । भवतु तस्याज्ञेयत्वं तत्त्वापरिक्षानब्ध तथापि शुद्ध इति चेत् ; आह-शुद्धः निर्मल:। कः ? बुद्धः। इति एवम् , तत् कमायातवचनम् , केपाम् ? एप बौद्धानाम् । 'किल' इयरुचिद्योतने । सुभाषितम् अरुचिद्योतनाद् दुर्भापितमिति यावत् । तथा हि-अपरिज्ञाने तस्मिन् कथं १५ तच्छुद्धेः परिक्षानम् । कथं वा तत्वापरिज्ञानगलदायलितस्य शुद्धः सम्भवोऽपि यतस्तवचनमतेपी सुभाषितं भवेत् ? भवतु वा परिशुद्धो बुद्धस्तथापि कथं तस्य वचनम् ? कथञ्च न स्यात् ? कारणाभावात्। तस्य हि कारणं विकल्पः,"विकल्पयोनयः शब्दाःण ] इत्यभिधानात् । न चासो बुद्धस्य; विधूतकल्पनाजालस्यात् । तदभावेऽपि तत्कृतात्सत्काराद्वयनमिति चेत् ; न, तस्यापि विकल्पत्वे तत्रासम्भवात् । अविकल्पत्ये तदुभयस्वभावविकलत्वे च "सतो वचनस्यानुत्पत्तेः, अन्यथा विकल्पयोनित्वनियमव्याघातात् । विकल्पादेव घिरापकान्तात्तस्प" वचनमिति चेत्, न; तस्य” हेतुत्वे सन्तानान्तरासिद्धः । "व्याहारादेस्तसिद्धिरिति चेत् ; न, तस्यापि चिराप- मान्तपुद्धिप्रभवत्वशङ्कायो ततस्तत्परिज्ञानायोगात् । तथा चन चार्वावस्येव बौद्धस्यापि "पराधं शास्त्रप्रणयनम् । बुद्धिरनुसन्धानवत्येव व्याहारादिकं जनयति आत्मनि तथैव दर्शनान चिराप- प्रान्तेति चेत् ; विकल्पोऽपि तथाविध एवं वचनमुत्पादयति, अस्मदादी तथा दर्शनान्न चिराप- प्रान्त इति किन्नेप्यते ? स्वापादो विकल्पविकलस्यापि यचनस्योपलम्भादिति चेत् ;न; तदा मेनका-भा०, २०, ५०।२ उपायादिकत्वं मा०, २०, २०१३ तच्छुद्धिप-प्रा०, प. प.1 ४-नमेषा-आ०, २०, ५.१५ वचनस्य । ६ "विरूपाः शब्दयोनयः । शमन्योन्यवरपन्यो नार्थान् शब्दाः पृशन्स्यमी ॥' इति शेषांशः। द्रष्टव्यम्-न्यायमु. पृ. ५३७ टि.७। ७विश्लप.। ८ शुद्धस्थ-आ०, १०,९.1 विकल्पाभावेऽपि। .. वेत् त-भा०, २०, ५०111 संस्काराए । ११ वुद्धस्य । ५ चिरा- पान्तस्य । ११ ज्यादारादेतदिति भा०, २०, ५०1१५ परार्थशा-मा०, २०, ५.६ खापाती।
९९६) प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव ३९३ .. N १० बुद्धिविकलस्यापि व्यापायदेः प्रतिपचेः। ततश्विरापक्रान्ताद्विज्ञानाव्यापारादिवत्' न विकल्पादपि वचनमिति न कुतश्चिदपि बुद्धस्य वचनम् । तदाह-न च नैव किचन किमपि उपायोपेयतत्वं भापते कथयति बुद्ध इति । यद्यपि नाम स्वमुखेन न च किचन भापते बुद्धस्वथापि प्रवक्तव 'कुड्यादिभ्योऽपि तत्प्रभावोपजनितस्य तत्त्वोपदेशस्य तद्वचनत्वादिवि चत् ; कथं तेपामप्यविकल्पत्ये पचनम् ? विकल्पयोनित्वनियमव्याघातात् । अस्गदादियचनस्यैव ५ तनियमो न बुद्धवचनस्येति चेत् ; किमिदानी कुड्यादिभ्यरतत्कल्पनया युद्धादेव तदुपपत्त ? तथा च दुर्याहतमेतत्- "ये कल्पयन्ति कवयः सुगतस्य पाच- स्ते कल्पनामपि मुनेः परिकल्पयन्ति ।" [ ] इति ; पाचां कल्पनाव्याप्तिवैकल्यात् । भवतु विकल्पत्वमेव कुड्यादीनामिति चेत् ; किमिदानी 'तत्र युद्धप्रभावेन ? स्वयं "विकल्पत्वादेव तेषां वचनोपपत्तेः । तद्विकल्पत्यं तत्प्रभावादिति चेत् ; न; तस्य तदुपादा- नत्वे "तेपां घुबैकसन्तानत्वेन बुद्धस्यैव विकल्पकत्यप्रसङ्गात् । तत्सहकारित्वे तु तत्र किमुपादानम् ? कुड्यादिकमेवेति चेत् ; न ; तस्याचेतनत्वे तत्वायोगात् शरीरवत् प्रागपि विकल्पत्वेन चेतनमेव "तदिति चेत् ; न ; तथाप्रतीत्यभावात् । विकल्पाच विकल्पे किं १५ वा तत्सहकारित्वेनास्मदादिविकल्पवत्। "तत्त्वविषयत्वं तस्य सत" इति चेत; न तर्हि तदप्रमाणम् । प्रमाणश्च न प्रत्यक्षम् ; विकल्पत्वात् । नानुमानम् ; अलिङ्गज- त्वादित्यन्यदेव प्रमाणमनिष्टं भवेत् । कथं वा कुड्यादिविकल्पवद्विनेयविकल्पत्यैव "ततस्त- स्वविषयत्वं न भवेत् ? एवं हि पारम्पर्य परिहतं भवति-कुछयादिविकल्पस्य ततस्तत्त्वविप. यत्वम् , ततो धचनम् , ततश्च विनेयानां तत्त्वज्ञानम्' इति । एवम्भूतस्तस्य' प्रभाव एष २० नास्तीति चेत् ; कथं चिन्तामणिकल्पत्यम् ? यस इदं सुभाषितम्- "चिन्तारत्नोपमानो जगति विजयते विश्वरूपोऽप्यरूपः॥"[ इति; चिन्तितप्रकारप्रदानसमर्थप्रभावे सत्येव विन्तारनोपमत्वोपपत्तेः । ततो व कुड्या- दिभ्योऽपि तत्प्रभावात्तत्त्ववचनमिति न ततोऽपि तस्य वक्तृत्वम् । ततस्तद्भापणं परस्य दुर्भापणमेव । तदाह 'प्रवक्ता इत्यादि । व्याख्यातमेतत् । .. - 1 १ -वन्निविक-आ०, २०, ५०1 ३ "सम्भारावैधतस्तस्य घुमश्चिन्तामणेरिव । निस्सरन्ति यथाकाम कुज्यादिभ्योऽपि देशना ॥"-तत्वसं० श्लो. ३६०८ । ३ घुड्यादीना विकत्परहित्थे । ४ कुयादी। ५ विकर पादेव आ०, ब०, प० । ६ कुत्यादीनी विकल्पवम् । ७ वुद्धस्य कुझ्यादिवियोपादानवे । कुयादीनाम् । ९ विकल्पोपादानत्वायोगात । वुझ्यादि । ११ तत्सस्ववि-आ०, २०, प.11१ विकल्पस्य । १३ पुग्दकारिलेन । १४ युद्धसहकारतः । १५ वुद्धस्य । ८ ३९४ ग्यायविनिश्चयविवरणे [ १२९७ वन बुद्धवचनादपि निरंशस्य संविदद्वयस्य प्रतिपनियतः सत्यम् । सतोऽपि भूतभवद्भ- व्यानां यधन्यतमेन कालेनावच्छेदः ; कालान्तरं तत्त्वशून्यं भवेत् । तथा कार्यस्यापि कस्य- चिदभावे व्योमकुसुमादिवदवस्तुत्वम् । 'भावे त्वद्वतच्यापत्तिः । नैप दोपः ; कालस्यैवापरम्याभावात् , असता च तस्यापच्छेदानुपपत्तेः । न च कार्याभावादसत्त्वम् ; कार्येण सत्त्वव्याप्तेरभावात् । भावे कार्यसमसमयमेव कारणं स्यान्न पूर्व कार्यस्यामावात् । तादृशस्य च न तत्कारणत्वम् अपि तु तदेककारणप्रभवत्वमेव । तत्कारणस्यापि कार्यव्यातसत्ताकत्ये कार्यसमसमयत्वेन तदेककारणप्रभवत्वम् , तत्कारणेऽपि तथा चिन्तायामसम्भाव्येव तक्रमो भवेत्। तथा कार्यक्रमोऽपि, कार्यस्यापि कार्यान्तरेण सत्त्व- व्याप्ती तत्समसमयत्वस्यावश्यम्भावात् । तत्सम्भवमिन्टता च न कार्यव्याप्तं कस्यचित्सत्त्वम- १० भ्युपगन्तव्यमिति न कार्याभावातवयस्याभायः । एतदेवाह- न जातं न भवत्येव न च किश्चित्करोति सत् ॥ ९६॥ इति ।। अत्रैवकारो भिन्ननमो नकाराभ्यां परो द्रष्टव्यः । नैव जातं नैव भवति इति 'चित्रं तदेकम्' इति 'ततः' 'तदेकम्' इति च अनुवर्तयितव्यम् । तदयमर्थः तत् संवेदनम् एकम् अयं नैव जातं नैवोत्पन्नम् , अनेन वस्यातीतत्वं प्रतिक्षिप्तम् । नैव १५ भवति नैव निप्पद्यते अनेनापि वर्तमानत्वम् । 'नैव भविष्यति' इत्यपि भावित्व- प्रतिक्षेपाय द्रष्टव्यम्-उक्तस्योपलक्षणत्वान् । उपपद्येव च तत्रातीतत्वादिप्रतिक्षेपः काल. स्यैव निबन्धनरयाभावात् । न च नैव किश्चित्सजातीयमन्यद्वा कार्य करोति जनयति तथापि सत् कार्येण सत्त्यव्याप्तेरभावात् । “हेतुद्वयं चैतत् परस्याभिप्रायगतम् । अन पूर्वपक्ष- द्योतनं 'चेत्' इति द्रष्टव्यम् । उत्तरमाह- तीक्ष्णं शौद्धोदने शृङ्गमिति किन्न प्रकल्प्यते ? इति । सुबोधमेव । तात्पर्यमत्र- निरंशं चेत्तवत' मुत्तोपाधि कुतश्चन । प्रमाणादुपलभ्येत शोभेतवं भवद्वचः ॥९७६॥ प्रमाणं तुं न तगास्ति प्रत्यक्षादीति भापितम् । केवलं कल्पनय स्यात्तदस्तित्वे निबन्धनम् ॥९७७॥ न च तद्वास्तवं युक्तमन्यथा तन्निबन्धनम् । विपाणमपि किन्न स्याग्निशितं युद्धमस्तके ॥९५८॥ १ भवत्वद्व-भा, य०, प० । ३ कार्यसमकालवर्तिनः । ३ कारणम् । ४ -तद्दय-आ, ०, प० ।५ श्लोकात । तस्मारि तत्व आ०, २०, २०। ७ "लोके अविद्यमानं हेतुद्वयं कथमुच्यत इत्याश. सायामाह"-ता-टि."सौगतस्य"-ता. टि.1९-तमुक्तो-बा.,०प० । १० साल भा.,०, प० । " "कम्पनानिबन्धन निरशमद्वैतम्"-चा. टि.। २० मथमा प्रत्यक्षप्रस्तावा १ ११९८) अद्वये नास्ति युद्धोऽपि यत्र शृङ्गस्य कल्पनम् । इति चेत्कल्पना तस्य किन सत्त्वाय कल्पते ॥९७९॥ तदद्वयञ्च बुद्धश्च तच्छृ चेति तत्त्वतः । त्रितयस्याप्यवस्थाने न भेदरतात्त्विकः कथम् ॥९८०॥ तस्मात्कल्पितमद्वैतमवस्त्येव यथोदितम् । तदयष्टम्भतस्तन्न पहिरर्थनिधनम् ।।९८१॥ इति । तस्मादेकव्यक्तिकमनेकव्यक्तिक वा चित्रमेव संवेदनमनुमन्तव्यम् । तय बहिरर्थमपि तादृशं प्रत्यवस्थापपति एकरागादौ सर्वरागादेः सांशत्वादेश्व दोपस्य तद्वत्तदाकारवञ्च पहिरर्थे तदवयवेषु चाप्रयः। यत्र तु प्रवृत्तियोगकल्पिते अवयविनि वदवयवेषु च तवारमार्कमभिरविरेव, ततोऽत्र तत्प्रवृत्त्या[न] काचिदप्यस्माकं परिग्लानिः । यद्येवं कुतस्तन सद्दोपस्य 'एतत्समान- १० मन्यत्र' इत्यादिना समाधानम् ? आहितविपयस्याभ्युपगमनीयत्वादिति चेत् ; न हीदृशम् अकलकदेवस्य चेष्टितं यदयमन्यायेनापि दोपेण परपक्षं प्रतिक्षिपतीति । ततो युक्तं विज्ञानवदर्थ- स्यापि प्रतीतिवलादवस्थापनम् । इदानीं वक्तव्यशेपं दर्शयित्वा परिहत्तु माह- एकेन चरितार्थत्वात्तत्राऽविप्रतिपत्तितः ॥ ९७ ॥ १५ अलमर्थेन चेन्नैचमतिरूढानुवादतः । इति । अलं पर्याप्तम् अर्थन वटादिना प्रयोजनाभावात् । उदकाहरणादिकमस्ति तस्य प्रयो- जनमिति चेत् ; कुतस्तदस्तित्वम् ? प्रतिभासाच्चेत् ; प्रतिभासरूपमेव तर्हि तत् तद्व्यतिरिक्तस्य तदयोगात् । तच तद्रूपादेव घटादेरिति किं तत्रार्थस्य कारणत्वेन ? तदाह-एकेन नानाकारसाधार- न ज्ञानेन नार्थेन तस्य 'अलम्' इति पर्यंदासात्। चरितो निष्पादितोऽर्थः प्रयोजनं यस्य २० तस्य भावात् चरितार्थत्वात् अर्थस्य । 'एकेन' इत्यपेक्षायामपि चरितशब्दस्य वृत्तिर्गमकत्वात् । तर्हि ज्ञानेनाप्यलम् अन्येन चरितार्थत्वादिति चेत् ; किं तदन्यत् ? अर्थश्चेत् ; न; "ततो जडल्वेन "ज्ञानार्थस्याधिगमस्यासम्भवात् । ज्ञानमेवेति चेत् ; न तर्हि तेनालमिति शक्यम् , अभ्युपगमात् । तदाह-तत्र ज्ञाने अविप्रतिपत्तितो बौद्धवदर्थवादिनोऽपि विप्रतिपत्तेरभावात् , अन्यथा नार्थसिद्धिः स्वतस्तदयोगादिति मन्यते । 'चेत्' इति परमते द्योतयनुत्तरमाह-नैवम् । एवम् २५ 'अलमर्थेन' इति प्रकारेण । कुत एतत् ? अतिरुढस्य प्रमाणवलतोऽतिप्रसिद्धस्य अनु- वादतोऽनुकथनात्" 'अर्थस्येति । तात्पर्यमत्र- - चित्रज्ञानवत् । २ -कमनभिर-ता० । ३ तत्प्रस्तौ आ० ब०, प.। ४ यदन्यायेन भा०,०, प० ।५ उदकाहरणादि । ६ प्रतिभासरूपादेव । ७ अर्थस्य 1 ८ अलंशब्दैन । ९ समासः । १० अर्थात् । " शानस्यार्थस्य भा., ब०, ५० 1 ज्ञानरूपप्रयोजनमाः । १२ -गार्थस्येति आ०, ब., प।
न्यायविनिश्चयचिवरणे [ ११९८ १० प्रयोजनवशादर्थः कल्पितो यदि कथ्यते । युज्येत तत्प्रतिक्षेपस्तदर्थस्यान्यतो' भवात् ॥९८२॥ न चैयं मानसागात् ज्ञानवत्ताय वर्णनात् । निषेधे मानसिद्धस्य ज्ञानं जीवति तत्कथम् ? ॥९८३॥ किं पुनस्तत्प्रमाणं यतोऽतिरूढत्वमर्थस्येति चेत् १ तावत् 'प्रत्यक्षम्' इति ब्रूमः । "तत्रापि प्रतिभासान्तगर्तमेव नीलमवभासते नापरम् , ततः प्रतिभासव्यतिरेके न प्रमाणं ततो नाभ्युपगमः । अथ प्रतिभासान्तर्गतं तन्न प्रतिभासते प्रतिभासस्यान्तरत्वात् , नीलादेश्च पहिरवमासनात् ; न व्यतिरिक्तस्य सद्भावे तस्य प्रतिभासनं स्वरूपेणा- परोक्षण तस्य प्रतिमासनात् । यथा हि- "व्यतिरिक्तस्य सद्भावे न नीलस्यापरोक्षता । स्वरूपेणापरोक्षत्वान्न तस्यान्यापरोक्षता ॥" [प्र० वार्तिकाल० ३३३३३ ] इति प्रज्ञाकरः । तत्र किं तत्प्रत्यक्षम् , यत्र प्रतिभासान्तगर्तमेव नीलमवभासेत ? नीलादन्यदेवेति चेत् ; न, 'न व्यतिरिक्तस्य' इत्यादेविरोधात् । स एव प्रतिभासो यत्रान्तर्गमो नीलस्येति चेत् ; तेन तर्हि पूर्वापरीभूतेन भवितव्यम् , अन्यथा पूर्व विशेषणतया आत्मनः, पश्चाचद्वि. शिष्टतया नीलम्य ततः परिज्ञानायोगात् । सत्येव हि प्रागुपाधिपरिज्ञाने भवत्युपाधिमत्प्रति. पत्तिः, "विशेषणं विशेष्यं च" [५० वा० २३१४५] इत्यादि वचनात् । प्रागधिगम्यं च तद्रूपं येधन्तर्गतनीलं तन्नीलस्यापि तदन्तर्गमस्तत्रैवावभासत इति तेनापि पूर्वापरीभूतेन भवितव्यम् अन्यथा तत्रापि 'अन्यथा' इत्यादिदोपात् । तद्रूपस्यापि प्रागधिगम्यस्यान्तर्गतनीलत्वे पुनरयमेव २७ प्रसङ्ग इति अधस्ताद्विस्तारवतो नीलज्ञानस्य कथं क्षणभनित्वम् ? कथं वा निर्विकल्पत्वं अविभासोपाधिकतया नीलं परिच्छिन्दतो विकल्पकत्वस्यैवोपपत्तेः । एतेन 'अन्तर्गतपीतं तत्' इति प्रत्युक्तम् ; तुल्यदोपत्वात् । कथं वा तत् पश्चान्नीलस्य विशेषणम् ; विरोधात् । पीतस्य परित्यागादिति चेत् ; न तर्हि पीतमेव तत् , तत्परित्यागेन नीले तत्यागेनापि पुना रूपान्तरे प्रवृत्तः, व्यावृत्तादनुवृत्तस्य विरुद्धधर्माध्यासेन भेदस्येवोपपत्तः। यदि पुनस्तत्र न किश्चिदप्यन्तर्गतम् ; कथं त ज्ञानम् ? अनाकारस्यानभ्युपगमात । अन्यथा पश्चादप्यताकारमेव तत् नीलविषयं भवेत् । कथं तस्य तद्विषयत्वम् ? कथं तदाकारस्य ? स्वहेतुबलात्तथैवोत्पत्तेः ; समानमन्यत्र । ततो न युक्तम्-'प्रतिभासव्यतिरेके न प्रमाणम्' इति ; नीलस्य तज्ञानाध्यतिरेके तस्यैव प्रामाणगात् । ज्ञानात् । २ उत्पत्तेः । ३ प्रत्यक्षेऽपि । ४"."सम्बन्धं गोककी स्थितिम् | गृहौवा सङ्कलम्यैतत्तथा प्रत्येति नान्यथा।" इति शेषांश. 1 ५ यधनन्तगतं नो-आ०, ०,१०। ६ -मप-मा०, २०, ५०। .ल्पकत्वं भा., 4.! ८ कूध वा तदा-आ०, 4०, ५० , प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताया -- १२९८ ] एतेनैतदपि प्रत्युक्तम्-"यथैव ग्राहकाकारः स्वरूपेणापरोक्षोन ग्राहकान्तरभावात् । तथा तेन समानकालोऽपि नीलादिः" [प्र. वार्तिकाल, ३६३३०] इति ; कथम् ? ग्राहके स्वत एव ग्राह्ये च परत एवापरोक्षत्वस्य दर्शनात् । दर्शनानुसारित्वाचाभ्यपगमस्य । अन्यथा "यदेव दृश्यते तदेवाभ्युपगम्यते" [प्र. वार्तिकाल, ३६३३० ] इत्यसङ्गतं स्यात् । ग्राहकसमकालराया च प्राधस्य स्वयं प्रकाशत्वेऽपि इदमपि नीलं तत्समकालत्वाद्भवेत् । प्रत्यक्ष- ५ वाधनस्य इतस्त्रापि तुल्यत्वात् । न 'तत्समसमयस्वमात्रेण तस्य तत्वम् ; अपि तु तद्वत्तद्रूपतया चक्षुरादेवोत्पत्तेरिति चेत् ; न ; सब्यापारात्पूर्व पश्चादपि तद्भावात् । पौर्वापर्ये तस्य प्रमाणं नास्तीति चेत् ; चक्षुरादिकार्यत्वमपि कथम् ? पौर्वापर्यप्रमाणवलादेव तस्यापि परिज्ञानोपपत्तेः । तथा च दुर्भापितमेतत्-"यथा चक्षुरादिकाद्राहकाकारस्तथा तत्समानकालो ग्राह्याकारोऽपि" [प्र. वार्तिकाल० ३।३३०] इति ; कल्पिते तु तस्य तत्कार्यत्वे तन्निवन्धनं स्वयं प्रकाशत्व- १० मपि कस्पितमेव न तात्त्विकम् । तत्र च न विप्रतिपत्तिः । 'तन्न नीलादेस्तत्प्रतिभासादेष तदन्तर्गतत्वपरिज्ञानम् । भवत्वन्यत एवेति चेत् ; न ; तत्रापि विषयान्तर्गमस्यान्येन परिक्षाने अनवस्था. दोपात् । अनन्तर्गामिन एव विषयस्य तेन प्रतिपत्तौ प्राच्येनापि स्यादित्ययुक्तमुक्तम्-- 'प्रतिभासान्तर्गतमेव नीलपवभासते नापरम्' इति । अनन्तर्गतप्रतिभासे कथम् 'नील प्रतिभासते' इत्यभेदावगम इति चेत् । न; एवमपि भेदस्यैवावगमात् । अभेदे हि 'नीलम्' इत्येष 'प्रतिभासते' इत्येव वा स्यात् न चोभयम् ? अभेदेऽध्यपोद्धारपरिकल्पनया द्वैरूप्यादेवमवगम इति चेत् ; स्यादेतदेवं यद्यभेदस्य कुतश्चिदवगमः, स तु ततोऽन्यतश्च न प्रत्यक्षात , उक्तनीत्या तो भेदस्यैवावगमात् । तलमाविनो "विकल्पादित्यप्ययुक्तम् ; ततोऽपि यथानुभवं प्रवृत्ताझेदावगमस्येवोपपत्तेः । अनुभवातिकमप्रवृत्तातु न "ततः कस्यचिदपिप्रधानादि- विकल्पादिवावगमः सम्भवति । विकल्पाचाभेदावगमे कथं ततो हत्यम् ' कथं वा काल्पनि- कस्यानुभवविषयत्वमुच्यते ? यत इदं सूक्तम्- "तस्माद्विरूपमस्त्येकं यदेवमनुभूयते । स्मयते च" [१० वा० २१३३७ ] इति । अत्रापि 'एकम्' इस 'अनुभूयते' इति 'न द्विरूपम्' इत्यत्र 'स्मयते' इत्यस्येय सम्बन्धाद- २५ दोप इति चेत् ; न; अनुभवाभावे स्मरणानुपपत्तः। उपपत्तावपि कुतो द्विरूपस्यैकस्य वेदनम् ? यत इदं शोभेत- "उभयाकारस्यास्य संवेदनं फलम् ।" [प्र. वा० २१३३७ ] इति । - - .. .. . १ ग्राहकसमकालखमाण । तत्समयमाने-मा०, ब०, प० । २ प्रद्यस्य । ३ स्वरूोगापरोक्षत्वम् । ४ प्राहकवरप्रकाशरूपतया । ५ प्राह्यस्य भाचात् । ६ तन्नीला-आ०. ब०, प० । ७-गतस्यान्येन भा.,., 4.1 भेदरूपनया। १ प्रत्यनबलभाविन । ल्ययु-आ०, ब., प.! " विकल्पात् । १२ मनु-भा०, २०, ५० म्यायविनिश्चय विवरणे [१९९ अनुभवादेव स्मरणकत्येनाध्यवसितादिति चेत् ; न ततोऽपि द्विरूपस्त्येवावगमोपपत्ते कस्य । तद्विपयस्यमपरित्यजत एव तस्य तदेकत्वाध्यवसाय इति चेत् ; 'अपरित्यजतः' इति कुतः? तथा निश्चयात् ; न तहि तद्विपये द्विरूपकल्पनं निश्चयेन तद्विरोधात् । ततो न तदेकत्वाध्यत्र. सायादनुभवस्य द्विरूपविश्यत्वमपि तु तत्वत एवेति वार्तिकतात्पर्यम् । अतस्तदपरिज्ञानादेवं इदं निवन्धनकारस्य वचनम्-"अपोद्धारपरिकल्पनया द्विरूपम्" [प्र. वार्तिकाल०] इति । भवतु द्विरूपमनुभरात् , तथापि न नीले बहिरर्थः, प्रतिभासैकत्वस्यापि बत्रानु- भवादिति चेत् ; न ; तदभावस्य निवेदितत्वात् । भेदमाने नीलतत्प्रतिभासयोरसतिरिति चेत् ;न; विपयविपयिभावस्यैव तत्र सङ्गतिस्वात् । 'नीलं प्रतिभासते' इत्यत्र 'नीलं प्रति- भासस्य विषयो भवति' इत्यवगमात् । कः पुनर्विषयार्थ इति चेत् ? नीलार्थोऽपि कः ? स्वरूप. मेवेति चेत् ; अपरोऽपि तदेव सर्वस्य विषयत्वमविशेषान् । स्वरूपस्येति चेत्, नीलत्वमपि स्यात् । तत्त्रं यस्यैव कारणं तदेव नीलमिति चेत् ; विपयोऽपि यस्यैव शानं स एव स्यात् । किं वस्य ज्ञानेन ? कारणेनापि किम् ? कारणमेव इतरेणापि महणमेव । ततो युक्तं प्रत्यक्षाद् अविरूढत्वमर्थस्य । तथाऽनुमानादपि । ततः पर्वतशिरसि पावकस्य परोक्षस्यैव प्रतिपतः। परोक्षश्वार्थ एव अपरोक्षस्यैव ज्ञानस्या युपगमात । 'सोऽप्यपरोक्ष एव महानसपायकस्यैव मतः १५ प्रतिपत्तेः, महानसपावकश्च अपरोक्ष एवं प्रतिपन्न इति चेत्, न ; तथा सति सन्निहितिवदनु' मानवैफल्यप्रसन्नात् । अध्यारोपादेव 'तस्यापरोक्षवं अध्यारोपश्चानुमानादेवेति चेत् ; अध्या. रोपितं तर्हि तस्य ज्ञानत्यमर्थत्वं तु प्राकृतमिति प्राप्तम् । अभ्यारोपितमेव तत्र रूपं नापरं यस्य परोक्षत्वेनार्थत्वमिति चेत्, कुतस्तदध्यारोपणम् ? अनुमानामादिति चेत् ; न; 'तंदभावे "तस्यैवाभावात् । तद्भावे भाव इति चेत् न, परस्पराश्रयात्- तदध्यायेपणात धूमः, धूमाघ तद्ध्यारोपणमिति । अन्यतस्तदध्यारोपणं चेत्, न; तस्यापि लिङ्गत्वे पूर्ववदोपात् । तत्रापि लिङ्गान्तरात्तदध्यारोपेण अनवस्थादोपात् । अनुभवात्तध्यारोपणं तु न पर्यवे स्यात् तत्र पावकानुभवस्य प्रागप्रवृत्तेरिति न तत्र पावकार्थिनः प्रवर्तेरन् । अपरोक्षत्वे च तत्पावकस्य कथं वदनुमानस्य परोक्षविपयत्यम् ? अतीवस्यैव तत्र 'स्याध्यागपादिति चेन्; भवत्वेवम् , 'तथापि तत्र वस्य प्रतिभासे न परोक्षत्वम् । न हि प्रतिभासवरने च परोक्षत्वमुपपन्नम् ; २५ अतिप्रसगान् । अप्रतिभासे तु नाध्यारोपः, प्रतिमासव्यतिरेकेण तदप्रतिपत्तः। प्रति- भासोऽपि-तस्यान्यनैव नानुमान इनि चेत्, न, तस्य निपिद्धत्वात् । कथञ्चैवं प्रमाण- मनुमानम् १ अदर्शनसमारोपव्यवच्छेदादिति चेत; न, 'तस्य तुच्छस्याप्रतिपत्ते: अनभ्युपगमाञ्च । दर्शनोपनयनमेव पावके 'तावच्छेद इति चेत् । ननु दर्शनमपरोक्षत्वमेव, तच्च विनाप्यनुमानेन २० .. . .. -देव तमि-भा०, २०, ५०।२ प्रजाकरस्य । ३ असम्बन्ध। ४ नौलन्वे । ५ विषयस्य । ६ कृतमिति शेष । ज्ञानेनापि । ८ अनुमानात् । ९ पर्वतीयपावकः । १० पर्वतपावकस्य । धूमामा । र अन्यारोपस्यैवामावात् । १३ तदध्यारोपेण धू-आ.,.,.१४ पावकस्य । १५ तथा हि तन प्रति- भा०, ५०, ५.1 १६ व्यवच्छेदस्य । १७ अदर्शनषगारोपपत्रच्छेदः ।
" १२९९] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव ३९९ तस्यास्त्येवेति न तव्यवच्छेदात्तस्य' प्रामाण्यम्, अपि तु पावकविषयत्वादेव । तदप्यपरोक्ष- ताव्यतिरेकेणैव, अन्यथा तत्परोक्षविषयत्वप्रतिज्ञाव्याघातात् । ततो यदुक्तम्-"अनुमानमपि नापरोक्षताव्यतिरेकं साधयति" [प्र० वार्तिकाल. ३।३३३] इति; तत्प्रतिव्यूढम् ; तेन तन्यतिरिक्तस्यैव पावकस्य व्यवस्थापनात् । यचापरमुक्तम्-"यदि च दृश्यमानताव्यतिरेकेण 'विकल्पे तदर्शनार्थं न प्रवर्तेत ५ दर्शनार्थिनो वा नोपदिशेत् , न हि दृश्यमानतामप्रतियन् दर्शनार्थी भवति" [प्र० चार्ति- काल० ३।३३३] इति । तत्र किमिर्य रश्यमानता पावकस्य यदप्रविपत्तौ तदर्शनार्थी न भवेत् ? स्वयं दर्शनात्मकत्वमिति चेत् ; सत्यम् ; न तस्य प्रतिपत्तिः, नापि तेनार्थित्वं लोकस्य, अर्थान्तरेणेव दर्शनेन तस्य तद्भावात् । दर्शनसम्बन्ध इति चेत् ; न; सनि दर्शनेऽनुमानवै. फल्याद्' अर्थित्वायोगाघ । न छुपनतेनैव कस्यचिदर्थित्वम् अनुपनत एव तदर्शनात् । दर्शनयोग्यत्व- १० मिति चेत् ; अस्त्येव तस्य प्रतिपत्तिः, परोक्षस्यापि पावकस्य तद्योग्यस्यैवानुमितेः, व्याप्तेस्तथैव निश्चयात् । योग्यताप्रतिपत्तौ दर्शनेन कथमर्थित्वमिति चेत् ? न; अन्यत्रापि शक्तिपरिज्ञानादेव फलार्थित्योपलम्भात् । तन्न स्वयं दर्शनार्थनात् , दर्शनार्थिनः कथनाद्वा पावकानुमानस्यापरोक्षवि- पयत्वं शक्योपपादनं परोक्षविपयत्वेऽपि तद्योग्यतापरिज्ञानात्तदुपपत्तेः । स्वरूपप्रतिपत्तो पावकरय कथं परोक्षत्वमिति चेत् ? तत्प्रतिपत्तेरस्पष्टत्वादेव । तदपि तस्या कथमिति चेत् ? न; कारणबला- १५ दिति निवेदितत्वात् । ततो युक्तम् अनुमानादप्यविरूदत्यमर्थस्य । तत इदमकीर्तिकरमेव धर्मकीर्त:- "दर्शनोपाधिरहितस्याग्रहाचद्हे ग्रहात् । दर्शनं नीलनि सो नार्थो बाह्योऽस्ति केवलः ॥" [प्र०या० २।३३५] इति । प्रत्यक्षानुमानाभ्यां दर्शनोपाधिरहितस्यैव पावकादेः प्रतिपत्तेः तत्र बाह्यतयार्थत्वस्यो. पपतेः। ततः प्रतीतिबलाद्विवानस्य यदस्तित्वं तदर्थस्यापि, यच्च अर्थस्यापरमार्थत्वम् अविसरदर्शनपशाखाविस्मात् मिरिकशादिस्त , उ विज्ञानस्यापि स्यादविशेषणात् । तदाह- कल्पना सदसत्त्वेन समा। इति । ज्ञानस्य सत्येनार्थस्यासत्त्वेन कल्पना अर्थे ज्ञाने च सदृशीति यावत् । ननु एवमपि ज्ञानकल्पनेवास्तु, तत्र सकलसमीहितसिद्धः, अन्यकल्पना तु सिद्धोप- पस्थायिनी कुतः पोप्यत इति ? तत्राह- किन्तु गरीयसी ॥९८॥ प्रतीतिप्रतिपक्षण तत्रैका यदि नापरा । इति । किन्तु इति अविवर्कपदं तत्र तस्मिन् ' कल्पनासाम्ये सति एका ज्ञानकल्पना १ अनुमानस्य । २ विकरुप्येत प० । विकल्पैतद्दर्शनार्ये आ०, ब० ॥ ३ लोकस्य । ४ दर्शनार्थित्वात् । ५ स्वरूपप्रतिपत्तौ । ६ चेत् कार-मा०, २०, ५०1७-ति वि-भा०, २०, ५०।
४०० म्यायविनिश्चयविवरणे ( १९९९ . ] इति यदि स्याद् अपरा अर्थकल्पना यदि न स्यात् , 'स्यात्' इत्युपकारस्य यदि शब्दस्य चोभयत्र सम्बन्धात् । तत्र दूषणम्-गरीयसी गुर्वी नितरां ज्ञानकल्पना | तर निमित्तमाह- प्रतीतिप्रतिपक्षेण प्रतीतिज्ञानस्य प्रतिपत्तिः तस्याः प्रतिपक्षः वदभाषस्वेन । तथा हि-ज्ञानं नाम विषयग्रहणस्वभावमेव, प्रवीतेः "विषयग्रहणधर्मों विज्ञानस्य" [ ५ वार्तिकाच्च । विषयभावे च ताप्याभावास्किं तस्यावशिष्येत ? यस्य 'प्रतीतिः स्वरूपमेव तस्य विषयो न बाह्यमिति चेत; किं पुनस्तस्य विषयत्वम् १ ग्राहात्वमिति चेत् । कथं प्रह. णत्वम् १ ग्राह्यस्यैव तदनुपपत्तेः। स्वभावभेदादेकस्यैव तदुभयधर्मकल्पनायामपि अनेकान्त- दोपात् । संवृत्या 'निर्दोपत्वमनेकान्तस्येति चेत् ; न ; वाह्यवज्ञानस्याप्यपरमार्थत्वापत्तः, निरंशस्यापि तस्य विषयविषयिभायायोगेनासम्प्रतिपत्तेः । तत इदमप्रातीतिकमेव "स्वरूपस्य १. स्वतो गतिः" [प्र०या० १२६] इति । इयमेव तस्य स्वतो गतिः यन्निरपेक्षं प्रकाशनम् , भेदव्याहारस्तु तन काल्पनिक इति चेत् ; किमिदं प्रकाशनं नाम ? जडप्रतिद्वन्द्वी धर्म इति चेत् ; न , अपरिज्ञाने जइस्य क्वचि- त्तत्प्रतिद्वन्द्वित्वस्यापरिक्षानात् । परिक्षाने तु नार्थनिषेधो जडस्यैवार्थत्यात् । कल्पितमेव तन्न तात्तिमिति चेत् ; ननु कल्पितत्वं कल्पनाबुद्धिविपयत्वमेव । तच्च नान्तर्गमेण ; तद्बुद्धेड- १५ वापत्त्या स्वप्रकाशाच्युते । बुद्धयन्तरेण प्रकाशे चानवस्थानप्रसङ्गात् । अनन्तर्गमेण चेत् । कथं स्वसंवेदनमेव बुद्धिफलम् ? पाशसंवेदनस्यापि भावात् । तस्मादिदमप्यनुभवप्रत्यनीकमेव- "तस्मात्प्रमेये याह्येऽपि युक्तं स्वानुभवः फलम् ॥" [प्रश्वा० २।३४६] इति "यतः सभागोऽस्य यथा तथैवार्थविनिययः ।।" [प्र०वा० २६३४६] इति प। अजडस्वभावयाऽपि युद्ध्या जडस्य निर्णयात् । तन्न जडमत्यनोकत्वेन प्रकाशनम् । चिद्पत्येनेति चेत् ;ने , चितेरपि प्रकाशपर्यायत्वात् । अपि च, अस्या यदि न काचिदपि शक्तिः कथं "स्यं सैव प्रकाश" [प्रका० २१३२५] सत्यामेव कर्तुशतो 'प्रकाश' इत्युपपत्तेः । अध्यारोपितया 'तया प्रकाशत इति चेत् , न , तयैव तदनुपपनेः । न हि तच्छतिविश्लतयैव संविदाना तामात्मन्यारोपयितुमर्हति । तद्विकलतया न संविते सदादिनैव संवेदनादिति चेत् , फथमुभयात्मा सती केनचित्संवित्त फेनचिनेति १ पुतश्चिद. दृप्राकारणादिति चेत् ; न , यहि यस्यापि इष्टानिष्टस्वरूपस्यैव केनविदिष्वात्मना परेणा- २५ निष्टात्मना च प्रतिपत्तिप्रसङ्गात् । एकरूपदिना रूपान्तरस्याप्रतिपत्ती सुवस्तस्योभयात्मकत्व. प्रतिपत्तिरिति १ अनेकात्मकं चार्थमेवरूपतया दर्शयतश्चादृष्टाक्थमर्थवेदनम् १ 'ततस्तिमिया देरिवानर्थवेदनस्यैवोपपत्तेः' इति घन पर्यनुयोगः, परनापि तुल्यत्वात् । तथा प यधेदमुच्यते- 1- स्वर-मा...। २ निर्दोषत्वेऽने-मा.,.,.1 जलस्यै-०, २०,प.। ५-कमेवेति मा०,०, २०१५-शप्रतीत भा०, २०, ५०६चिकौ । -तथा प्र-मा., १०,०। २० - -- %3 .. १२२९) प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तापः "तमनेकात्मकं भावमकात्मत्वेन दर्शयत् । तददृष्टं कथन्नाम भवेदर्थस वेदनम् ॥" [प्र०वा० २।३४४] इति ; तथेदमपि वक्तव्यम्- सामनेकात्मिका बुद्धिमेकात्मत्वेन दर्शयत् । तदष्टं कथन्नाम भवेद्बुद्धेः प्रवेदनम् ॥९८४॥ इति । ततः सर्वात्मनैव सा 'संवित्ते इति न तयेव तदायेपः । नापि युद्धयन्तरेण ; तत्रापि तच्छक्तिः विकलतया संविदाने तत्प्रतिभासायोगात् । तत्रापि बुद्धयन्तरेण तदारोपकल्पनायाम् अनवस्था- दोषीत् । तच्छक्तिमत्त्वे तु वुद्धः कथं तदपेक्षं तत्प्रकाशनं निरपेक्षं नाम शक्तवव्यतिरेकादिति चेत् ? कि पुनस्त्रया न व्यतिरिक्तप्रकाशनम् ! तथा चेत् ; कथं तया परबुद्धिपरिज्ञानम् ? यत इदं सूक्तं स्यात्-"स्वरूपेण हि संवित्तीनां भिन्नत्वात्प्रतिपुरुपं नानाकारवेदनं युक्तम् " [प्र. वार्तिकाल० ३।३३९] इति । तासामपि फुतश्चिदाकारमुखेणैव वेदनं नान्यथेति चेत् । न ; सुप्त-प्रबुद्ध जीवन-मृतेष्टानिष्टादिरूपाणां तदाकाराणां युगपदेकत्र समर्पण- स्याप्रतिपत्तेः। नोकदेकं विज्ञानं साकारं परखुद्धिभिः । सुप्तं बुद्धं मृतं जीवदिष्टमन्यच्च दृश्यते ॥९८५॥ वत: शक्तिवशात्तासां वित्तिर्नाकारकल्पिता । तथार्थस्यापि तेनेदमयुक्तं कीर्तिवात्तिकम् ।।९८६॥ "तदर्थाभासतैवास प्रमाणं न तु सन्नपि । ग्राहकात्मा परार्थत्वात् बाहोप्वर्थेष्वपेक्ष्यते ॥" [अ० वा० २१३४७] इति । प्राहकात्मन एव शक्तिरूपस्य परबुद्धिप्रतिपत्तिवदर्थप्रतिपत्तावप्यपेक्षणात् । संविभेदानभीष्टौ प नापरं तत्वमस्ति यः । संविदद्वयवादस्य प्रतिक्षेपात्सविस्तरम् ॥९८७}] तस्मादर्थोऽध्यङ्गीकर्तव्य अन्यथा ज्ञानभेदस्यानिर्वाहत्वापत्तेः। भवतु बासस्यापि ज्ञानम्, वस्य तु कुतः सत्यत्वम् ? कुतस्तद्विपयः कश्चिदेव सत्यो न सर्वः १ प्राप्स्यादिविशेषादिति चेत् ; न तत्रानवस्थादिदोषात् । तदुक्तम् - "यथैव प्रथमं ज्ञानं तस्य प्राप्तिमपेक्षते । तत्प्राप्त्यापि पुनः प्रामेरपेक्षेत्यनवस्थितिः ।। १ संविरिति मा०, ५०, ५०१ जानातीत्यर्थः । २ --दोष त-मा०, ३०, ५० । ३ --या तदर-भार, ५०, ५०1१-हकापा-आ.ब०,१० । २० एव, ४०२ न्यायविनिश्चयविवरणे [१११०० कस्यचित्तु यदीप्येत स्वत एवाप्तिरूपता । प्रथमस्यापि तद्भाव इति सर्वसमानता || प्राप्तस्थापि पूर्वेण प्राप्तिरूपेण सत्यता । अन्योन्याश्रय इत्येकासत्यत्वेनोभयस्य तत् ।। अथ कारणशुद्धत्लात्तज्ज्ञानस्यास्ति सत्यता । तज्ज्ञानस्यापि सत्यत्वं तत्कारणविशुद्धितः ।। एवं परापरापेक्षादनवस्था प्रसज्यते।" [अ० वार्तिकाल० ३१३५१] इति चेत् ; न, अभ्यासे स्वतः अन्यदा परतस्तत्सत्यत्वस्य निश्चयात् । न चानवस्थानम् ; पर्यन्ते कस्यचिभ्यासवतो भावात् । अवश्यं चेदमसीकर्त्तव्यम् , अन्यथा अर्थज्ञानवत् सन्तान- १० भेदज्ञानस्यापि सत्यत्वानिश्चयात् , तद्विषयस्याप्यसिद्धिप्रसद्गात् । न चैवं केशादेरपि तज्ज्ञाना. सिद्धिः । तत्र स्वतः परतश्वासत्यत्वस्यैव निश्चयात् । तदाह- न हि केशादिनिर्भासो व्यवहारप्रसाधकः ॥९९॥ इति । केश आदिर्यस्य माकादेस्तस्य निर्भासः प्रत्ययो न हि फुटं व्यवहार प्रसाधको व्यवहारः स्वतोऽन्यतो वा सत्योऽयमिति निश्चयः, प्रसाधक: सद्विपयत्वेन १५ अलकारको यस्य स तथोकः तस्माद् असन्नेव तद्विषय इति भावः । कथमसतः मतिमासनम् ? आस्तामेतदनन्तरं निरूपणात् । पर आह- वासनाभेदाङ्गेदोऽयम् [सिद्धस्तत्र न सिद्धयति ] । इति । पूर्वपूर्वविकल्पोपनीत: संस्कारो वासना, त दो दार्शथिल्यलक्षणस्तस्मात् तमाश्रित्य अयं प्रतीयमानो घटादिज्ञानं तप्यं मिथ्या च केशादिज्ञानमिति भेदो निर्णय: २० भिद्यते भिन्नतया व्यवस्थाप्येने परस्परतः तथ्यमिध्याज्ञाने येन स भेदः' इति व्युत्पत्तेः । संस्कारवादशैथिल्याभ्यामेव हि स्यचिज्ञाने तथ्यमिथ्यात्वविभागविनिश्चयो ग विषयभाग- भावा-यामिति कथं तन्निश्चयात्तत्सिद्धिरिति मन्यते ? तत्रोत्तरम्-'सिद्धस्तन' इति । अपिशब्दः द्रष्टव्यः । तत्रापि सन्तानभेदलानेऽपि सिद्धो निश्चितो चासनाभेदाद् भेदोऽयम् । तथा च ततोऽपि कथं तदिसिद्धिः १ मा २५ भूत, तद्भेदस्य वज्ञानसत्यत्वनिश्चयस्य च यासनाभेदादेव भावात् । "कार्यसात्सकलं कार्य वासनाभेदसम्भवम् । कुम्भकारादिकार्य चा स्वमदर्शनकार्यवत् ।।" [प्र०पार्शिकाल. ३१३५१] . अन्यथा मा.....! भनभ्यायदशायाम् । २-या तशा-०,२०,प.1-नीतस-RTO, घ., प० । " "वासना पूर्वविज्ञानकृतिका शविन्यते।"-प्रवातिकाल. पु.१०। ५-मैदादज्ञा-मा., ०५.१६ तथा १ कयं ततोऽपि भा०, प.,.1 प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्तावा ४०३ .. ។ , . इति वचनादिति चेत् ; फुतः स्वप्नदर्शनस्य तद्वलभावः ? कुतश्विनिश्चयादिति चेत् ; ग; तस्य वासनावलभावित्वे ततोऽर्थस्येव तस्याप्यसिद्धः। वस्तुतथाभावभावित्वे तु हेतो. व्यभिचारः, तस्य कार्यत्वेऽपि तद्वलभावित्वाभायात् । लोकाभिप्रायादेव वस्य तद्बलभावित्वं न स्वतः मया कुतश्चिनिश्चीयत इति चेत् ; न लोकस्यापि तन तन्मानभावाभिप्राया- भावात् । तदाह- न सिद्ध्यति। तन्मात्रभावो दृष्टान्ते सर्वत्रार्थोपकारतः ॥१०॥ पारम्पर्येण साक्षाद्वा परापेक्षाः सहेतयः । इति । नसिद्धयति । स एवं वासनाभेद एव तन्मानं तस्मात् भावो जन्म । क्व? दृष्टान्ते निदर्शने । कियति १ सर्वत्र सस्मिन् स्वप्नविप्लवभाविनि विप्लवान्तरभाविनि च । करमात् १ १० अर्थस्य नीलादेर्जनकत्वेन व्यापार उपकारो न विषयत्वेन असत एव तदा तस्य प्रति- भारानात , तस्मात् । कथम् ? पारम्पर्येण अविप्लचे दर्शनमर्थात् ततः संस्कारस्वतश्च विप्लवे नारीचौरादिदर्शन मिति परिपाटिः पारम्पर्य तेन । दृष्टान्तमाह-'साक्षाद्वा' इति । 'वा' इति इवार्थः, साक्षाद् अव्यवधानेन वा[अ] विप्लये यथा तदुपकारस्तथा पारम्पर्येणान्यदेवि । सौत्रान्तिकाद्यनुगमेन घेदमुक्तम् , स्वतः साक्षादपि तत्र तदुपकाराभावात् । १५ कीरशास्ते दृष्टान्ता यत्र साक्षादिय पारम्पर्येण तदुपकार इति प्रश्नयन्तं प्रत्याह- परापेक्षाः सहेतवः। विच्छिन्नप्रतिभासिन्यो व्याहारादिधियो यथा ।। १०१।। इति । ध्याहारो घचनमादिर्यस्य व्यापारस्य तस्य धियो युद्धयः । कथम्भूताः ? परं चाह 'च्याहापादिकम् उपकारकमविप्लवे साक्षादिवाल्या पारम्पयापेक्षस्तु इति परापेक्षाः, २० तत्र हेतुः सहेतवः सकारणिका यत इति । न हि परानपेक्षत्वे सहेतुत्वं परस्येव हेतुत्वात् । एवमपि वासनैव परमस्तु किं व्याहारादिनेति चेत् ; आह-'विच्छिन्नप्रति- भासिन्यः' इति । विच्छिन्नं विच्छेदः देशादिनियमस्तेन प्रतिभासन्ते इति शीलास्तथोक्ताः । न हि व्याहारादिधियां वासनामात्रकारणत्वे देशादिनियगः सम्भवति । तथा हि-पूर्व ज्ञानं वासना, तच्च न सदृशमेव, विसदृशादपि तद्धियां भावात् । सा(ता)दशादेव व्यवहितात्तद्भावः, २५ तस्यापि तादृशावहितादेव भाव इति चेत् । कथं तेषां विसशेरनुपादानोपादेयैरेकसन्तानत्वं यत इदं सङ्कलनम्-"नीलमवलोक्य चोख्यापारं पश्यामि' इति | भवतु विस शादपि द्वाप 1 निश्चयस्य । २ स्वप्नदर्शनस्य वासनाबलभावित्वस्य । ३ वासनाइल । ३ स्वप्नदर्शने । ५-च साय- नामे-मा०, ब०, प०। ६ विद्धवेनारि चौरा-भा०, २०, ५०। ७ संवेदनाद्वैतवादिमतेन । ८ व्यवहारा-आ., ब०, प.१९-न्यथा पा-भा०, २०, ५०1१० नीरमव-आ०, प० । घ०१ ४०४ . न्यायविनिधयविवरणे [१११.३ इति चेत् ; कथं तर्हि नासां विच्छेदो पिसहशस्यादिच्छेदात् । तच्छक्तिप्रबोधस्य विच्छेदादिति चेत् ; न ; तस्यापि विसशकार्यत्वे उदयोगात् । तद्धेतुशक्तिप्रयोधविच्छेदात्तद्विच्छेदकल्पनायाम् अनवस्थादोपात् । बन्न सन्मात्रभावित्वे तासां देशादिनियमात्मा विच्छेदः । नाप्याकारनियमात्मा; व्याहारादिनेवाकारान्तरेणापि विस शादपश्यन्तया तदुत्पत्तेः । याह्यापेक्षायां तूपपद्यते । ५ बाह्याद् व्याहारादेरेव देशादिनियतहेतुबलान्नियमोत्पत्तेः साक्षात् , पारम्पर्येणापि तदाहितादेव संस्कारादन्तरगनियमोपनीतप्रयोधात्तदुत्पत्तेः । ततो दुर्भापितमेतत- "कस्यनिरिकश्चिदेवान्तर्वासनायाः प्रयोधकम् । ततो धियां विनियमो न बाह्यार्थव्यपेक्षया ॥" [प्र०वा० २।३३६] इति । यदि याहानियमः कथं स्वप्ने स्वशिरोडारणादेहानम् , ताय साधाभावात् , प्राग. १० प्परटेरिति चेत् ; न ततोऽपि । जन्मान्तरदृष्टादेव संस्कारवाहिनस्तज्ज्ञानात् कुतो न सर्वदा? कुतो वा रागादीनां नियमः ? न हि तवालम्बनमुपयोगि, ततो रागहेतोरेव विरागस्यापि दर्शनादिति चेत् ; न, अन्तरङ्गसहायस्यैव तस्यं तन्नियामकत्वात् । ततो यंदा अन्तरङ्गं यनिमित्तं च तदेव तदेव नान्यदा नान्यच्च ज्ञानरागादिकार्यमुपजायते । वासनैवान्तरई तस्या एव तद्वता स्वतः सकलप्रतिभासनियामकत्वेन संवेदनादिति चेत् ; कुतो विप्रतिपत्तिर्यतस्त्रानुमानम् ? अनिश्चया- १५ दिति चेत्, निश्चयादप्यनिश्चितात्कुतस्तदभावः" ? न हि स्वतस्तस्य निश्चयो वासनावत् नाय. न्यतः ; अनवस्थादोपात् । अनिश्चितादपि स्ववेदनात्त "तनिवृत्ती वासनायामपि स्यादिति व्यर्थमेव तत्रानुमानम् । तस्मादचेरानमेवान्तरई तस्यैव दृष्टकारणव्यभिचारयतः कार्यात्प्रति. पत्तेः । तदेव च क्षयोपशमविशेषवशाबाह्यनत्संस्कारसाहाय्येन पचिद्यथार्थमयथार्थश्च प्रत्यय. मुपजनयतीति सूक्तमेतत्-'परापेक्षा व्याहारादिधियो विच्छिन्नप्रतिभासिन्यो २० यतः' इति । 'यथा' इति सादृश्ये यथैताः परापेक्षारतथाऽन्येऽपि दृष्टान्ता इत्येवं साध्यवैकल्यं सृष्टान्तस्य "प्रतिपायेदानां तत्र सत्यपि "तन्मात्रभारे साध्यासिद्धिमावेदयन्नाह- सन्निवेशादिभिप्टैगोपुराहालकादिपु । बुद्धिपूर्वयंधा तत्त्वं नेप्यते भूपरादिषु ॥१०२॥ तथा गोचरनिर्भासप्टैरेच भयादिषु । अयाघभावनाजन्यैरन्यत्रेत्यवगम्यताम् ॥ १०३ ।। इति । , सन्निवेशः संस्थानविशेष आदिउँपामचेतनोपादानत्यादीनां ते हटैरुपलब्धः। . १ वासनामानमावित्वे ! २ पियाम् । ३ थाहानियमामा विरदः । शनादपि 1 ५ बाधालानात् । ५ शानस्य । ७ यथा भा०, २०, ५०। ८ तथैव भा०,५०, १०। ९ वासनावता पुरुपेग । १. घासनायाम् । "वितिपयमा १२ निधयस्य । निधयसवेदनात् । १५ निधी।५ विप्रतिपत्तिनिवृत्ती । वि. पये-भा, २०, प.110 वासनामात्रजन्यले।
मथमा प्रत्यक्षप्रस्तावः . १११०४] क्व ? गोपुराहालकादिषु । कीदृशैः ? बुद्धिपू., बुद्ध बुद्धिर्विद्यते अस्येति' बुद्धी, बुद्धिमान् पूर्वो हेतुर्येषां तैः । यथा येनासिद्धादिप्रकारेण तत्त्वं बुद्धिपूर्वत्वं नेष्य- ते। क्व ? भूधरादिषु चौद्धः तथा तेन प्रकारेण गोचरनिर्भासैः विषयप्रतिमासै: दृष्ट- रेव भयादिषु, आदिशब्दादुन्मादादिषु । कीदृशैः ? अवाहाभावनाजन्यैः, अविद्यमान- बाह्यया वासनयैव जन्यैः, अन्यत्र जाग्रद्विपये तत्त्वम् अवाह्यभावनाजन्यत्वं 'नेप्यते' इति ५ गतेन सम्बन्धः इत्यवगम्यताम् । तथा हि-युक्तं तादृशादेव विपयप्रतिभासित्वप्रत्ययत्वादेः अन्यत्रापि भावनाजन्यत्वसाधनं यादृशस्य भयादो तव्याग्निपरिज्ञानं नान्यादृशात् । अन्याशय तत् जामत्प्रत्ययेषु पर्वतादिपु सन्निवेशादिवत् । कुन एतत् १ अन्यत्र कुतः ? स्वयं तत्र लोकस्य बुद्धिपूर्वस्वबुद्धेरभावात् ; प्रकृतेऽपि भावनाजन्यत्वबुद्धेरभावात् । अपरामृप्ट विशेष सामान्यमेवान हेतुरिति चेत् ; न ; बुद्धिपूर्वत्वेऽपि तस्यैव तत्त्वापत्त। क्थं पुनः सन्नि- १० वेशादिवस्तुविशेषे सति दृष्टस्य सन्मानादनुमानम् , पाण्डुद्रव्यविशेष एव धूमे दृष्टस्यानलस्य पाण्डुद्रव्यमात्रादपि तत्प्रसङ्गात् । तदुक्तम्- "वस्तुभेदे प्रसिद्धस्य शब्दसाम्याद दिनः । न युक्तानुमितिः पाण्डद्न्यादिव हुताशने ॥" [प्र०वा० १।१४) इत्यपि न समाधानम् ; भावनाजन्यत्वस्यापि तन्मात्रात्तदभावापत्तेः । ततो विषयनिर्भासादि- १५ विशेषस्यैव साध्यव्याप्तिः, तस्य च सन्निवेशादिवत्प्रकृते' धर्मिण्यभावात् न ततः साध्यसिद्धिः। नन्वेवं कृतकत्यादनित्यमपि न सिकोत् तस्यापि घटादौ साध्यव्याप्ततया प्रतिपन्नस्य शब्दे धर्मिण्यभावादिति चेत् ; अत्राह- अत्र मिथ्याविकल्पौधेरमतिष्ठानकैरलम् । इति । अनास्मिन् न्याये सति मिथ्याविकल्पौधैः असत्यविकल्पप्रबन्धैः अलं पर्याप्तम् । २० कीरशै? अप्रतिष्ठानकैः न विद्यते परपक्ष एव दोयतया प्रतिष्ठान प्रतिष्ठा येषां तैरिति । सन्निवेशाद्यसिद्धतोद्भावनपक्षेऽपि तेपां भावादिति भावः । यदि वा, भवतु सन्निवेशादेवुद्धिगतोऽपि सिद्धिः, स तु चिप एव अन्यस्य बुद्धि- मत्स्वासम्भवात् , अनित्यश्च "अन्यत्रार्थक्रियाविरहात , अविभुश्च निरंशस्य व्यापित्वायोगात् । ताशश्च वासनारूप एवः। ततो न तसिद्धो काचिदस्माकं परिपीडा, परितोपस्यैव भावात् । २५ अत एवोक्तम्- "प्रधानानां प्रधानं तदीश्वराणां तथेश्वरः । सर्वस्य जगतः की बासना देवता परा ॥" [प्र०वार्तिकाल० ३।३५१] इति। - 1-ति बुद्धिमान भा०, २०, प० । "ब्रीह्याद्यतोऽनेकाकः (शाकटा० ३।३।१५३) इति स्लेग युद्धशब्दा- मित्वर्थे इन" टिक1२ विषयप्रतिभासित्यादि । ३ विपथप्रतिभासित्वसामान्यम् । ४ सामान्यमात्रस्य हेतुत्वा. पत्त: । ५ बुद्धिपूर्ववस्य । ६ सन्निवेशमानात् । ७ अनुमान प्रसनात् । ८ विषयप्रतिभासमानात् । ९ जान प्रत्यये । 1. नित्ये।
४०६ १. न्यायविनिश्चयविवरणे [१११०५ वन्न सन्निवेशादेरगमफत्वं यतस्तद्विपयनिर्भासादेरपि तत्त्वमापद्यत इति । अत्रेदमाह- 'अत्र' इत्यादि । अत्र सन्निवेशादिसाध्ये बुद्धिमति हेतो ये विकल्पौघाः चेतनत्वं न विभुत्वं नार्थक्रियेति परामर्शष्ठवास्ते मिध्यैव अवरतुविषयत्वात् । अत एव न तेभ्यः कस्य- चित्प्रतिष्ठानमित्यलं तेः कल्पितैरिति । न हि मिध्याविकल्पेभ्यो हेती बुद्धिमति स्वयम् । चेतनत्यादिभावस्य प्रतिष्ठान समञ्जसम् ॥९८८॥ वासनारूपता तस्य यतस्तैरुपकल्प्यताम् । अन्यथा वासनाधर्मसर्वस्वप्रतिषेधनात् ॥९८९।। तैरेवेशादिरूपत्वं तस्याः' किन्न प्रकल्प्यते । न हि तादपिकल्पौधेर्दारिद्यं करयचिरक्वचित् ॥९९०॥ तथा च वासनाहेतुवादिना' यद्वदुच्यते । "प्रधानमीश्वरः कर्म यदन्यदपि कल्प्यते ।।९९१॥ चासनासङ्गसम्मूढचेतस्पन्द एव सः।" इति तद्वत्परेणापि वाच्यमीशादिवादिना ॥९९२।। वासनैव जगद्धेतुर्नान्य इत्यपि कल्पनम् । प्रधानेशादिसम्बन्धमूढारपन्द् एव सः ॥९९३ ॥ तत इदमनिच्छता सन्निवेशादेरगमक स्व] मेव वक्तव्यम् । तद्वद्विषयप्रतिभासत्वा- देरपीति न वासनाभेदात्प्रत्ययनियमः, अपि तु बाह्यभेदादेव तथैव प्रमाणवः प्रसिद्धेरिवि स्थितम् । भवतु यहिरर्थः, स तु परमाणरूप एव तस्यैव प्रत्यक्षत्वान्नारो विपर्ययादित्युपक्षिप्य २० प्रत्याराण आह- अत्यासन्नानसंसृष्टानाणूनेवाक्षगोचरान ॥१०४॥ अपरः प्राह तत्रापि तुल्यमित्यनवस्थितिः । इति । अत्यासन्नान अविशयेन निकटवर्तिनः, इत्यनेनाणूनां प्रत्यक्षन्ने निमित्तमुक्तम् । यद्येवं रूपस्य रूपनैक्टयाद् यथैक्प्रत्यक्षविषयत्वमेवं रसादेरपि स्यादिति चेत् , २५ देशतस्तने कट्येऽपि एकप्रत्यक्षकार्यशक्तितस्तदभावात् रूपस्यैव हि रूपान्तरेण तत् न रसाः । कार्यान्वरापेक्षायां तु तस्यापि "तदस्त्येव, रूपादिसाधारणस्येवोदकाहरणादेर्दशनात् । असंच. टान् संसर्गरहितान् अणनेव नावयविनम् अक्षगोधरान् इन्द्रियज्ञानविषयान् , अपरो योगाचारात् अन्यः सौगान्तिकः प्राह-तत्रोत्तरम् । तत्रापि प्रत्यासत्तायपि न पूर्वमेव तुल्यं . रामाया । २ हेतुनासना यद -०,५०,०प्रज्ञाकरेण । प्राधातिहाल.३३५१।३ प्ररपर एवं भा.,.,०। ४-भागनादे-मा०,०,१०। ५-३ पो भा०, ००1रसादः। नेकण्या- भानान ८ एक प्रकार्य रायरेश्या नेस्यम् । ९ रसादेरपि । १० नव्यम् । ने , तस्य प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्तावा सदृशं दूषणमिति शेषः । किं तत् ? इत्यनवस्थितिः इति । इति अत: प्रत्यक्षप्रतीनेः अणुविषयत्वेनानवस्थानम् । भवतु पूर्व प्रत्यासत्तेरभावात्तदनवस्थानं न पश्चाद्विपर्ययादिति चेत् ; न ; पश्चादप्य- संसर्गात् । असंसर्गेऽप्येकदेशतया तदुपपत्तिरिति चेत् ; फ: पुनरेकदेश: ?- ५ १० २५ अणुश्चेत्तन्निलीनानां स्वरूपामिश्रणं कथम् ? तस्य प्रत्यणु भेदाच्चेदेको देशः कथं मतः ? ॥९९४॥ एकदेशतया तस्याप्येकत्वमिति चेदसत् । तत्राप्येवं प्रचिन्तायामनवस्थानुपचनात् ॥९९५।। स्थूलवेत्कल्पितस्तेन प्रत्यासत्तिर्न तात्त्विकी । इन्द्रियज्ञानवेद्यत्वं तेषां तदलतः कथम् ? ॥९९६॥ अकल्पितम्चेन्निधिो भवेदवयवी ततः दृश्यन्तेऽणव एवेतिक भवद्वचनस्थितिः ॥९९७॥ शक्तिसादृश्यतस्तेषां प्रत्यासत्तेशियदि । संसर्गेण विना तेषु व्यूहबुद्धिः कुतो भवेत् ? ॥९९८॥ घटोऽयमिति तत्साम्यादेव चेयूहभित्कथम् ।। सर्वन शक्तिसारश्याजगदेकघटं भवेत् ॥९९९॥ कार्यभेदेन भेदश्चेव्यूहस्य परिकल्प्यते । स एव शक्तिसादृश्ये कार्यभेदः कथं मतः १ ॥१०००। अन्यथेष्टेऽपि चैकस्मिन् नद्भेदाद् व्यूहभेदवः । न घटो नाम कश्चित्याच्चेटी केनोदकं हरेत् १ ॥१००१॥ एककार्यतया तेषु व्यूहधीर्यदि तच्च नो । निरंशवेदनं तस्य स्वपराभ्यामवेदनात् ॥१००२।। अनेकनीलाद्याकारमेकं चेकिन तादृश' । घहिरों यतस्तस्मिन् अणुव्यूहप्रकल्पनम् ।। १००३।। वेदनं व्यूहरूपं चेत्कार्य तत्कल्पनं कुतः ? तत्कार्यादन्यतस्तस्मादिति चेन्नानवस्थितः ॥१००४॥ जलाधाहरणं सच्चेन्न जलादेरवेदनात् । अणुस्तोमो जलादिश्चेन्न तस्याद्याप्यसिद्धितः ॥१००५।। २० २५ । तभपतेरि-मा०, २०, प• 1 २ आणूनाम् । ३ भवेद-आ०, २०, ५० ! ४ च्चेटिका नो-भा', ५.।५ तादृशम् भा०, ब.,१०,६वस्थितिः मा०, ब०, प.। ब.
न्यायविनिध्यविवरणे - ५ व्यूहादुत्पत्तितस्तत्र व्यूहज्ञानं मतं यदि । तन्न व्यूहानवस्थाने तदुत्पत्तेरसम्भवात् ॥१००६॥ ततस्तु तव्यवस्थायामन्योन्याश्रयदूपणात् । तन्न संसर्गवैधुर्ये व्यूहो नामोपपद्यते ।। १००७॥ भवतु संसर्गादेव 'तेपो दर्शनमिति चेत् ; न ; सर्वदा स्थूलस्य दर्शनात् । दर्शन- जन्मा विकल्प एव स्थूलज्ञानं न दर्शनम् । न हि दर्शनमसद्विपयं युक्तम् । असंश्च स्थूलाकारो वहिरवयवभेदेनादर्शनादिति चेत् ; भवतु कश्चित्तदभेदेनैव दर्शनम् । कथं भिन्नानामभिन्नं रूपं विरोधादिति चेत् ? "नेदानी विकल्पविषयत्वमपि स्थूलस्य, अनेकान्तविद्वपे विकल्पस्याप्य. मिलाप्यानमिलाप्यभेदाधिष्ठानस्यासम्भवादिति सर्व निर्विकल्पमेय जगत्माप्तम् । ततः कुतो १० नीलादेरपि प्रतिपत्तिः निर्विकल्पस्य क्षणभङ्गादिवत् तत्रापि असत्कल्पत्वात् । विकल्पमेकाने. फात्मकमनभिद्रुह्यतो बाह्यन किमपराद्धं यतस्तमेव तादृशमभिद्रुह्यत । कुतस्तस्य तादृशत्वमिति चेत् ? विकल्पस्येय पूर्वपूर्वस्मात्तादृशादेवोपादानाद् अवयवसंसर्गाद्वा । संसृज्यमानाः सत्ववयया एवं कथश्चित्स्थूलीभवन्ति । कास्न्यैकदेशाभ्यां पर्यनुयुज्यमानो न सम्भवत्येव संसर्गः तत्कथं सद्वशात् "तेषां स्थूलीभाव इति चेत् १ कथं दर्शनमपि 'तत एच "तस्याप्युपपत्तेः । कुतो वा १५ ताभ्यो तत्पर्यनुयोगो"व्याप्त्यभाये येन केनचित्तत्प्रसङ्गात् । सत्यपि ताभ्यां तस्य तद्भावे" नैकदेशेन संसर्गेऽनवस्थानम् , नापि सर्वात्मना तस्मिन्प्रचयहानिः, परस्परानुप्रवेशस्य संसर्गस्या- नभ्युपगमात् । वियोगपर्युदास एव हि संसृज्यमानपदार्थात्मा संसर्गः प्रतीयते नापरः। स च तन्तोः “तदन्तरेण पार्श्वदेशात्मा परमाणोस्तदन्तरेण "सर्वात्मेति न किञ्चिदसमञ्जस. मुत्पश्यामः "यतो न तद्वशादणव एव स्थूलीभवेयुः । तद्वशा भ्य एव स्थूलकार्यस्य तत्प्रत्यया. २० देर्भायात् कि स्थूलेन ? पारम्पर्यपरिश्रमो होयं स्यात्-तेभ्यः स्थूलस्ततश्च तत्कार्यमिति चेत् ; न तहि नीलादिनापि किञ्चित् , तत्कार्यस्यापि तत्प्रत्ययादेस्तेभ्य एव सम्भवात् । तदुक्तम्- "स्वीकुर्वन्ति गुणानां यया शक्त्याऽगुणा न किम् । तया तत्संविदं कुयुर्भिन्नाथेदेकसंचिदम् ॥" सिद्धिवि० परि• ] इति । नीलादिव्यतिरेकेण नापरस्तत्स्वभावो यतस्तस्कार्य स्यादिति चेत् ; न ; निराकारा. वस्थस्य प्रधानस्यैव तत्स्वभावत्वात् । न तथा कदाचिदपि तेयां प्रतिपत्तिरिति चेत् ;न; १ परमाणनाम् । २ सर्वथा आ०, ६०, प० । ३ अमश्रधू-आप.प. | ४ -मैदे वा दर्श-आरु, प.प.1५न तदानी भा०,०प०१६ नीलारावपि । अनिश्रायकत्वेन अविद्यमानवद्भावात् 1 ८ कुतस्तत्रता- भा०,५०,ए.१९ एनेकारमरयम् । १. परमाणनाम् ! संसर्गवशदेव । १२ दर्शनस्यापि र भारयड देशाभ्याम् संमर्गपर्यनुयोग. 1 1४ व्यायभावात् ये-भा, प., प० । १५ पर्यनुयोगप्रसवात् । ११ संसर्गस्य । . ज्याप्तिपसावे । १८ तन्वन्तरेण । १९ परमाण्वन्तरेण । २० सर्वात्मनेति ०,१०, प० । २१ सन्तानतर- शादण- भा.प.,.। २२ परमाणभ्य एव । २३ निराकारावस्थानस्य भा०, १०, प., १११०६) प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव: ४०१ निरंशतयापि तदभावात् । यद्यामलक वस्तुवृत्तेनैव स्थूलं किमिति पदरापेक्षयेव कपित्यापेक्षा यापि न 'तथेति चेत ? स्वहेतोस्तथैवोत्पन्नत्वात् । न हि भावः स्वहेतुप्रकृतेस्तथाऽन्यथा वा भवन्तः पर्यनुयोगमर्हन्ति, अन्यथा पावकोऽपि धूमस्येव (स्येव)किन्न सर्वस्य जनकः ? धूमोऽपि पावकस्यैव (स्येव)किन्न सर्वस्य गमक इति पर्यनुयोगात् न कश्चिदित्यम्भावे नावविष्ठेत । आपेक्षि- कत्वाच स्थूलस्यावस्तुरूपत्वे कारकज्ञापकयोरपि तत्त्वापत्तेः । ततो निरक्यप्रतिपत्तिविषयत्वात् ५ एव च वहिर्भावो न परमाणवो विपर्ययादित्युपपन्नमुक्तम्-'इत्यनवस्थितिः' इति । तदेवं परमाणूनां प्रत्यक्षत्वं प्रत्याख्याय अवयविनस्तत्प्रत्याख्यानाय योगमतमुपक्षिपति- तत्रापि तुल्यजातीयसंयोगसमवायिषु ॥१०॥ अत्यक्षेषु भ्रवेप्वन्यदध्यक्षमपरे विदुः । इति । तत्र तेषु अनन्तरोक्तप्वणुपु अन्यद् अर्थान्तरमवयविद्रव्यम्-अध्यक्षम् । अपि- शब्देनानावनों द्योतयति -परमाणव एव तावन्न सम्भाव्याः कथं तन्नान्यदध्यक्षमिति । दृश्यते च अपिशब्दादवज्ञाद्योतनं यथा-"ब्रह्माण्डं यदेचैतत् तत्रापि क्षितिमण्डलम्" [ ] इति । कि पुनरवययिना परिकल्पितेन, तत्प्रयोजनस्य परमाणुष्वेव परिसमाप्तेरिति चेत् ? न; 'तेपामदर्शनात् । न चादृष्टेषु तत्समाप्तिकल्पनम् , अव्यवस्थापत्तेः । सदाह-'अत्यक्षेषु' इति अझज्ञानमतिकान्तेष्विति । प्रत्येकदशायामत्यशत्वेऽपि सङ्घातावस्थायां कुतो न सेषां प्रत्यक्षत्वमिति चेत् ? न तदापि नित्यत्वेन प्राच्यस्वभावापरित्यागात् । तदाद-'ध्रुवेषु' इति । अपरित्यक्ततत्स्वभावानामेव यथा द्रव्यारम्भकत्वमेवमध्यक्षत्वमपि तदा किन्न भवेदिति चेत् ? भवेदेवम् , यदि तदापि तत्प्रतिभासनम् । न चेदमस्ति, स्थूलस्यैय प्रतिभासनात् । तदपि परमाणुष्वेव नावयविनीति चेत् ; कथमस्थूलेपु स्थूलदर्शनम् ? फुतश्चिद्विभ्रमनिमित्तात् दूर- विरलकेशवदिति चेत् ; किंरूपास्ते केशा यत्र तद्दर्शनं निदर्शनमुच्येत ? परमाणुरूपा इति २० चेत् ; न ; तत्र दर्शनस्य विवादाधिष्ठितत्वेन दृष्टान्तस्वानुषपत्तेः । स्थूलरूपा व "या व यावती च मात्रा"[प्र०वार्तिकाल द्वि०प००३१०] इति न्यायादिति चेत् ; न; अवयविनमन- भ्युपगच्छतस्तद्रूपास्ते इत्यनुपपत्तेः । परबु । ते तद्पा न स्वबुद्ध्येति चेत् ; स्वबुद्धया तर्हि किं निदर्शनं यतस्तदर्शनस्याणुविषयतामाचक्षीत इति न किश्चिदेतत् । ततः स्वयुद्धया अपि तद्रूपा" एव ते वक्तव्या इति "सिद्धं सेषु प्रत्येकं तदर्शनस्यावयविविषयत्यं तद्वद् घटादावपि । न २५ च दूरविरलकेशेषु तदर्शनस्य विभ्रमाद्भूटादायपि विभ्रमः : नीलादावपि कचित्तदर्शनस्य विभ्रमात् सत्यनीलादावपि तत्प्राप्तेः । ततो युक्तम् 'अन्यदध्यक्षम्' इति । भवत्यन्यध्यक्षम् , तत्तु स्थूलावयवारब्धमेव, तस्यैव महत्त्वेनाध्यक्षयोपपत्तेर्न परमा. । . . १ स्थूलम् । २ एवं २ मा०, २०, ५०१ ३ -शानं द्यो-भा०, २०, ५०। ४-व्दादेवाव-भा., १०,५०। ५-माप्तिरि-आ०, प., प० । ६ परमाणूनाम् । ७ स्थूलप्रतिभासनम् । ८ स्थूलदर्शनम् । तत्र स्वबु-भा०,०,०11. स्थूलरूपाः। 11 सिद्धान्तेषु आ., म.,५०। ५२ म्यायचिनिश्चयविवरणे [११०६ पवारब्धं विपर्ययात्, नतो न युक्तं तत्र ग्रहणमिति चेत्, न, महतोऽपि परमाण्वारब्धयणुकादि- ममेण प्रादुर्भावात् पारम्पर्येण परमाणुनिष्ठत्वेन तत्र ग्रहणोपपत्तेः । तच तेषु अन्यदध्यक्षम् अपरे योगा विदुःजानन्ति । कीदोष्वित्याह-'तुल्य' इत्यादि। संमायो वृत्तिः कार्यस्य स येपामस्तीति समवायिनः कार्योपादानहेतय संयोगेन सहिताः समरायिनः संयोगसमवायिनः 'शाकपा- ५ र्थिवादियदुत्तरपदलोपी समासः । सयोगप्रहणमुपलभणम्-निमित्तान्तरस्यापि । साहित्यश संयोगस्य तेषु समनायात, काल्देशादेश्व संयोगादिति प्रतिपत्तन्यम् । तुल्यजातीयाच ते संयोग- समवायिनश्च तुल्यजातीयसंयोगसमवायिनः तुल्यजातीयत्वं कार्यद्रव्यापेक्षम्। कार्यस्य द्रव्यस्य हि पार्थिवस्य पार्थिवा एव, आप्यस्य चाध्या पर समरायिगे नान्य इति । एवमन्य- त्रापि । तेषु तुल्यजातीयसंयोगसमवायिपु इति । अन प्रतिविधानमाह- कारणस्याक्षये तेपां कार्यस्योपरमः कथम् ॥१०६॥ इति । तेषां वैशेपिकादीना कथम् ? न कथञ्चित् । कार्यस्य अययविनोऽन्यस्य उपरमः कादाचित्कत्वम् । कदा ? कारणस्य परमाणुलक्षणस्य अक्षये नित्यत्वेन स्वरूपायैकल्ये इति । तात्पर्यमत्र-कार्यस्य हि कात्य सत्तासम्बन्धात् । न चासो सतः, एतद् वैयर्थ्यात् । नाप्यसतः, सरङ्गादेरपि प्राप्तः। अपि तु प्रागसत: कारणसामग्याः "प्रागसतः सत्ता- १५ सम्बन्धः कार्यत्वम्। ] इति वचनात् । न च कारणस्याक्षये प्रागपि कार्यस्यासत्वं सत्त्वस्यैवोपपत्तेः, तत्परतन्त्रस्य तस्य सति तस्मिन्नयश्यम्भावात् । असति तस्मिनभावादेव तस्य तत्परतन्त्रत्वं न तु सति भावनियमादिति चेत्, सत्यप्यभावे किं निरन्धनम् ? सभावनिबन्ध- नत्वे भवनस्यापि तन्निरन्धनत्वापत्ते:, नित्यत्वप्रसङ्गस्य चोभयत्राप्यविशेषात् । शक्तिवैकल्यमिति चेत्, न, पश्चादायभवनप्रसङ्गात् । न हि नित्यस्य पश्चादपि तवैकल्यप्रच्युतिः, अनित्यत्वापत्तेः। २० एतदर्थमेव च 'अक्षये' इत्युक्तम् । कथं वा शक्तिविकलस्य वस्तुत्व व्योमकुसुमवत् ? अर्थान्तरशक्तिसम्पन्धादिति चेत्, न, अनुपकारिपरतत्सम्बन्धारोगान् अविस्मशाल ! न शिविकलस्योपकारित्या भवतु त्वात् । पुनरप्यान्तरशक्तिसम्बन्धाद्वस्तुत्वकल्पनायाम् अनवस्थापत्तेः । न च शक्तः कुतश्चि. दुपकाये नित्यत्वात् । नित्यत्वे कथं तत्कार्यस्य प्रागभाव इति चेत् , न, एवमपि परस्यैव पर्यनुयोगात् । अनित्यैव शक्तिः, प्रागमाविन्यास्तस्याः कारणादुत्पत्तरिति चेत्, न, सत्यविकले कारणे तत्प्रागभावस्याप्यनुपपरो। सतोऽपि कारणस्य स्वशक्तिवैक्ल्यात्तस्याः प्रागभवनमिति चेत्, न, 'पश्चादप्यभवनप्रसगात्' इत्यादेराम्नायात् अनवस्थोपनिपाताच । . , समवाया -आ०, ५०, ५० । २ सत एव वे -मा.,५०, प.। ३ "स्वकारणमत्तासम्बन्ध कार्यस्वम्"-प्रश० ज्योपृ. १२९ । "प्रागसत सत्तासमवायो पा कार्यन्वमित्ये"-प्रश० क. पृ० १८। ४ कारणाधीनस्य । ५ कार्यस्य । ६ शक्वैिकल्यप्रच्युति । . परस्य पर्व -आ०, ५०, ५०। ८ शत ।। चेत् तम भा.,.,..
प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्तावा , 1 ] १।१०६ ] किं वा शक्तिकरणे कारणस्य प्रयोजनम् ? कार्यकरणमिति चेत; शक्तिकरणेऽपि तदन्तरकरणापेक्षायाम् अनवस्थादोपेण कार्यानिप्पत्तेः । स्वतस्तस्करणे तु कार्यकरणमेवास्तु विशेषाभावात् । भवतु स्वतस्तस्करणम् , तथापि न कार्यस्यानुपरमः संयोगस्यापेक्षणीयस्याभावे तदुपरमात् । संयोगापेक्षा एव हि परमाणवः कार्यारम्भिण इति चेत् । स एव तेषां कथं ५ संयोगः १ तदुत्पत्तेरिति चेत् ; अनिवृत्तः पर्यनुयोगः 'सेपामक्षये कथं तदुपरमः' इति । संयोगोऽपि तेषां कर्मणः, तदपि संस्कारात् , सोऽपि कर्मणः पूर्वस्मात् , तदपि पूर्वरमादेव संस्कारात् , तावदेवं यावदाद्यं कर्म, तत्तु तेपामात्मसंयोगात् , तदनित्यत्वेन कर्माद्यनित्यत्वादु- पपन्नः संयोगस्योपरम इति चेत् । न; आत्मनः परमाणूनाच नियत्वे तत्संयोगस्याप्यनित्यत्वानु- पपत्तेः । अपेक्ष्यस्याप्यदृष्टस्यात्मकार्यत्वेन सर्वदा सनिधानात् । अपेक्ष्यासभिधानात्तदसन्निधान- १० मिति चेत्, नतु तत्रापेक्ष्यं द्रव्यादिकमेव "द्रव्यगुणकर्माणि धर्मसाधनम्" इति भावत्कसूत्रात् । तदपि न तदेव येस्याहष्टापेक्षादात्मपरमाणुसंयोगादिक्रमादुत्पत्तिः । परस्पराश्रयात्-सत्यष्टे तदपेक्षा तत्क्रमात्तदुत्पत्तिः", उत्पन्नश्च तदपेक्ष्य अदृष्टस्योत्पत्चिरिति । भवतु "अन्यदेवेति चेत् ; न ; तस्यापि परमाणनामक्षये तत्कार्यत्वेनोपरमायोगात् तन्निबन्ध- नस्यादृष्टस्यासन्निधानानुपपत्तेः । अक्षयेऽपि तेषाम् आत्मसंयोगादिक्रमस्य तखेतोरदृष्टानित्यत्वेना- १५ नित्यत्वादुपपनैवोपरतिः । अदृष्टानित्यत्वं चापेक्ष्यस्य द्रव्यादेरनित्यत्वादिति चेत् ; न ; तत्रापि तदपि न तदेव' इत्यादेरनुगमात् आवृत्तिदोपादनवस्थानुपशाच । तन्न तत्संयोगकादाचित्कत्वेन कार्योपरमः। कुतो वा तेषां संयोगादि सहकारि ? प्रतिक्षणं तत्कृतादुपकारादिति चेत् । न ; 'तैस्य तेभ्यो भेदे तेयामिति व्यपदेशानुपपत्तेः । ततोऽपि भिन्नस्योपकारस्य भावात्तदुपपत्ती २० अनवस्थानदोस्थ्योपनिपातात् । “अभेदे पामनित्यत्वापत्तेः । एककार्यकरणमेवोपकार इति चेत्, कुतस्तेन तत्करणम् ? शकत्वात । तदपि कुतः ? सति तस्मिन्नवश्यम्भावात् कार्यस्येति चेत् ; न तर्हि परमाणूनां शक्तत्वं सत्स्वपि तेषु कार्यानुत्पत्तेः । सहकारिसन्निधायेव तेपां शक्तत्वमिति चेत् ; ने ; अनित्यदोपस्योक्तत्वात् । तत्सन्निधिरेव पां शक्तिरिति चेत् ; कथमन्या अन्यस्य शक्तिः ? तेन तत्कार्यस्य करणादिति चेत् ; तदपि ""कथम् ? कथं राज. २५ - । । -- १ कार्यकार-भा०, प.,५०। २ तदनन्तरेणापे-आ०, ब०, प. 1 ३ क्रियायाः । ४ आरमसंयो. गस्यानित्यवेन । ५ अष्टासन्निधानम् । ६ -साधनानीति भावः सूत्रात् भा०, २०, ५०। ७ "तस्य तु साधनानि श्रुतिस्मृतिविहितानि वर्णाश्रमिणां सामान्यविशेषभावेनावस्थितानि द्रव्यगुणकर्माणि"-प्रश० भा० पृ. 1३८1८ द्रव्यादिकमपि । ९ व्यादेः । । आरमाणुसंयोगात् परमाणुषु क्रिया, क्रियातो विभागः, विभागात्, पूर्व देशासंयोगनाशः ततः परमाणुष्वयसंयोगः तेन च घणुकोत्पत्तिः, निमिणुकैः व्यगुवमित्यादिम्मान । म्या- शुरपत्तिः । १२ व्यादिकम् । १३ उपकारस्य। १४ उपकारासंयोगादेरभेदै । १५ -त्वोपपत्तेः भा०, २०, प० । ११ "संयोगादिसहकारिणा"-ता०, टि.1 ३७ कथं राज-भा०, ब०, ५०। , ४१२ . न्यायधिनिश्चयधिवरणे [१११०६ कार्यस्य प्रतिव्यूहेन करणमिति चेत् ; न; तत्र वस्तुतस्तद्व्यूहस्यैव हेतुत्वात् , तत्पोपकत्येन राक्ष 'भत्या तद्धेतुत्योपकल्पनात् । परमाणूनामपि भाक्तमेव हेतुत्वं सहकारिपोपणादिति चेत् ; न ; तत्पोपणेऽपि तदपरसहकारिपोपणेन हेतुत्वे अनवस्थापोः। स्वतस्तत्पोपणे तु व्यर्थमेव तत् कार्यस्यैव स्वतस्तदुपपत्तेः । एवं हि तात्त्विकं तद्धेतुत्वं भवेत् । भवतु स्वत एवं तैत्योपणं तत्तु, सहकारिसनिधिविशिष्टानामेव तेषां न केवलानामिति चेत् । न ; तद्विशिष्ट. रूपस्य प्रागपि भावे ततोऽपि तत्पोपणप्रसवात् , अभावे चानित्यत्वस्याभिधानात् । तदा तत्स. निध्यभाव एव तेषां तद्रूपाभावो न स्वरूपाभावो यदयं प्रसङ्ग इति चेत् ; न पश्चादपि तत्सन्नि. विभाव एव तद्रूपभावो न स्वरूपभाव इत्यपि प्रसङ्गात् । एवञ्च तद्रूपं कारणं ब्रुवता तत्सन्निधे- रेख कारणत्वमभिहितं न तेपाम् । तेपामेव विशिष्टप्रत्ययवेद्यस्वभावो विशिष्टरूपं न मन्निधिरेव, १० तर्हि तद्भावोऽपि पूर्व तद्वेद्यस्वभाशभाव एव तत्सन्निधिमात्राभाव इति क्थन्न अनित्यतादो- पोपनिपातः । एतेन एतदपि प्रत्युक्तं यदुन्यते परैः "न तेपामेव कारणत्वं नापि तत्सन्निधेरेव, अपि तु तदुभयमामस्याः।" [ ] इति, कथम् ? यथा सामग्रीभावे तदन्तर्गतसत्तात्मकत्वेन कार्योत्पत्ती तेपामुपयोगः, तथा तद्भावेऽपि तदन्तर्गतामायत्वेनैव तदनुत्पत्ती तेपामुपयोग इत्य- १५ नित्यनादोपस्याप्रतिक्षेपात् । सामय्यभावस्य तदभावमन्तरेणापि तदनुत्पत्ति प्रत्युपयोगे सामग्री- भावस्यापि तद्भावमन्तरेणेव किन्न तदुत्पत्ति प्रत्युपयोगः स्यात् ? सामग्रीभावे तझावस्यावश्य. म्भावादिति चेत् ; भवत्ववश्यम्भावः, अन्यथा नित्यत्वहानेः, तस्य तु कुतस्तदङ्गत्वम् ? न हब- श्यम्भावादेय तत्त्वम् , आकाशादिभावस्यापि सत्त्वप्रसगान नियमवती सामग्री स्यात् । अननुकृत. व्यतिरेकत्वान्न तस्य तदङ्गत्वमिति चेत् ; तत एव परमाणुभावस्यापि न स्यादिति कथन्न तन्निर- २० पेचस्यैव सामग्रीभावस्य तदुत्पत्तावुपयोगः १ सामग्रीकारणत्वे च प्रत्येकं तत्कारणत्याभावात् क्थं परमाणवः समवायिकारणम् संयोगोऽसमवायिकारणं निमित्तकारणमन्यदिति व्यपदेशः ? सामग्रीकारणत्वस्य तत्रोपचारादिति पेत् ; न, मुख्यकारणत्वाभावेनावस्तुत्वापत्तेः । कथं सामन्या अपि कारणत्वम् अवस्तूनां सामया अप्यवस्तुस्यात् ? सामन्यास्तदभेदान्मुख्यमेव प्रत्येकमपि कारंणत्वमिति चेत् । ने, प्रत्येकपरिस- २५ माध्त्या तस्यास्तदभेदे सामग्रीबहुत्येन कार्यबहुत्वापत्तः, कार्यानुपरमदोषाच परमाणूनां समग्ररूपा- गामभयात् । यहुपरिसमाप्ती तु कथं प्रत्येकं कारणत्वं तत्परिसमाप्त्या बहुप्यं तत्त्वोपपत्तः । तथा च नैक्शो वस्तुत्वमकारणत्वात् । बहुशो वस्तुत्वमेव एक्शोऽपि वस्तुत्वमिति चेत् ;न; एकशस्तदभावस्यैव बहुशोऽपि तदभावत्वापत्ते । बहुशस्तद्भाव एव दृश्यते कारणत्वादिति चेत् । न; एक्शोऽपि विपर्ययात् तदभावस्यैव दर्शनात् । - .. "उपच रे"-ता. टि.1 २ सहकारिपोषणम् । ३ सहक रिपोषणम् । ४ सहकारिमशिष्यभाव । ५ परमाणूनाम् । ६ तपोषणामाः । परमाणनिरपेक्षस्यैव । ८ कारणवोपपत्ते ।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव ४१३ गौणः" [ .. १।१०६ एकशश्वावस्तुत्वे न परमाण्वादेनित्यत्वम, अकारणवत्त्वेऽपिसवाभावात्। न ह्यवस्तुनः स्वतः सत्तासम्बन्धाद्वा तत्त्वं व्योमकुसुमादावपि प्रसङ्गात् । सतश्चाकारणवतो नित्यत्वम् "सद- कारणवन्नित्यम्।" [वै०सू० ४।१।१] इति वचनात् । एकशश्व कारणत्वेन वस्तुत्वे सामण्या: प्रागपि ततः कार्यस्यावश्यम्भावात् कथन मुख्यः कारणभावो यत इदं विश्वरूपस्य सूक्तम् - "तथा च मुख्यः कारकन्यपदेशो यदा सहकारिसहितं स्वरूपं कार्य जनयति अन्यदा ५ ] इति । तन्न "द्रव्याणि द्रव्यान्तरमारम्भन्ते" [वै०सू० १।१।१०] इत्युपपन्नम् ; आरम्भकाणामिवारभ्यस्यापि प्रागसत्त्वाभावेनारभ्यत्वानुपपत्तेः । अथ वा, कारणस्याक्षये तेषां कार्यस्य परापरतया तस्यैवानुत्पत्तिः उपरमः कथम् ? न कथञ्चित् । तत एव कारणादेकस्य परस्य पुनरप्यपरस्योत्पत्तेः । सहकारिवैकल्या. दनुत्पत्तिरित्यप्ययुक्तम् । सहकारिप्रतीक्षणस्य प्रविक्षिप्तत्वात् । न च द्वैकल्यम् ; प्रागिव १० पश्चादप्यवयवसंयोगस्य भावात् , तस्य च द्रव्यारम्भे निरपेक्षत्वात् । "संयोगस्य द्रव्यारम्भ निरपेक्षकारणत्वात्" । ] इत्यात्रेयवचनात् । तदवैकल्येऽपि कारणप्रतिबन्धादनु- त्पत्तिरिति चेत् ; न ; सति शक्ते हेतो तदयोगात् । कार्यमपि प्रतिबन्धे शक्तमेवेति चेत् ; कावपच्योपनिपातात् हेतोरुत्पत्तिस्तत्र- बन्धश्च कार्यादिति । हेतोः हेतुत्यमेव तेन प्रतिवध्यत इति चेत् ; किं तस्य हेतुत्यम् ? १५ स्वरूपमेवेति चेत् ; न ; 'तस्योत्पन्नेऽपि कार्ये भावात् । शक्तिरिति चेत् , न ; तस्या अर्था- न्तरस्यानभ्युपगमात् । तत्साहित्यमेव तेन तत्प्रतिवन्धः , सति तस्मिन् कार्योपजननस्याप्रति- पत्तेरिति चेत् ; न ; वदनुत्पत्तेस्तन्मात्राधीनत्वप्रसङ्गात् । न चैतत्पण्यं भवताम् , तदुत्पत्तरपि "तदभावमानाधीनत्वेन हेतोर किचित्करत्वापत्तेः । तदभावसहिताद्धेतुभावादेव तदुत्पत्तिरिति तदनुत्पत्तेरपि "तद्भावसहितात्विभावादेव प्राप्तेः । तदावे हेतुभावोऽपि प्रतीयत २० इति चेत् । न ; "तस्य शक्तिरूपस्य कार्यानुमेयतया कार्यानुत्पत्तावप्रतिपत्तेः । स्वरूपमेय तस्य शक्तिः, नैनस्याप्रतिपत्तिरिति चेत् ; न तर्हि तस्य प्रतिबन्ध इति "कथमनुत्पत्तिः अपरा. परस्य कार्यस्य अहीणशक्तिके हेनो "तदयोगात् इत्युपपन्नमेतत्-'कारणस्य' इत्यादि । न घार्य पक्षान्तरे दोपः ; प्रारब्धैकस्थूलपरिणामानां तत्परिणामापरिक्षये तदपरपरि- णामारम्भे शक्तिपरिक्षयात् । शक्तेश्च कथञ्चिच्छक्तिमान्तरत्वेन व्यवस्थापनात् । अपि च, कुत इदं परमाणनामाधारत्वं यतः कार्य तेषु व्यपदिश्येत ? उत्पादनादिति चेत; न ; सहकारिणामपि 'नत्प्रसङ्गात् । स्थापनादिति चेत् ; न ; स्वयमस्थास्नुतयोत्प- चेतन , अन्यथा भा०, २०, ५०। २-य पुन -भा०,२०,५०। ३ संयोगस्य । १ "सच द्रव्यगुण- कर्महेतुः द्रव्यारम्भ निरपेक्षः।"-प्रश• भा० पृ. ६३१५ कार्येण । ६ तस्योत्पत्तेर्नापि कार्ये भा०, २०, ५० ॥ स्वरूपस्य । ७ कारणसादित्य । ८ कारणमाहित्यप्रतिबन्धे । ९ कारण साहित्यप्रतिबन्धमान। १. कारणसाहित्य- प्रतिबन्धाभाव । !! कारणसाहित्यप्रतिधसद्भाव । तदभाषादसिताद्ध-आ., २०, ५०। १२ फारणसाहित्यप्रति- मन्पसद्भावे । १३ देतुभावस्य । १४ यमुत्प-भा०,९०,०1१५ अनुत्पत्ययोगात् । १६ थाधारस्वरसंशात् ।
४१४ ग्यायविनिश्चयविधरणे [ १११०६ . नस्य तदयोगात् । न हि तम्य तेभ्यः स्थितिरव्यतिरेकेण विरोधात , स्वयमस्थाग्नु च स्थितिश्च वस्येति । व्यतिरेकेऽपि कथं तया तैत्तिष्ठेन्नाम ? सम्बन्यादिति चेत् ; न, अनुपकारे तदयोगा- दविप्रसङ्गात् । स्थित्यापि तदन्तरस्योपकार इति चेत् ; न, तस्यापि व्यतिरेके पूर्ववत्प्रसङ्गात् । तेनापि तदन्तरकल्पनायाम् अनरस्थापत्त । स्थितिरेव कार्येणोपकार इति चेत् , न; ५ तत्स्वरूपस्य परमाणुभ्य एर भावात् । अस्वरूपमुपकार इति चेत् , तेनाप्यनुपकारे सम्यन्या. योगात् । ततोऽप्यस्वरूपोपकारान्तरपरिकल्पनायाम् अनवस्थोपनिपातात् । तन्नास्थास्नुवयो. त्पन्नस्य कुतश्विदयस्थापनम् । नापि विपरीतस्य वैयर्थ्यात् । सत्यपि स्थापकत्वे परमाणूना कथं स्थाप्यस्य कुतश्चिदुपरमः ? स्थापकेपवक्षीणेषु तदयोगात् । उपरमहेतुसन्निधानात्प्रागेव तेपा स्थापनत्वं न पश्चादिति चेत् , न, अनित्यत्वापत्तरावेदनात् । कार्यस्थैवाय धर्मो यस्था- १० पकेषु सरस्वपि उपरमहेतुसन्निधानादुपरमतीति चेत्, तदुपरमे कथं स्थापत्यं तस्य स्थाप्यापे. क्षत्वात् ? चित्रोपरमे कथं कुड्यस्य स्थापकत्वमिति चेत् 'न, असिद्धत्वात् । न हि सत्येव स्थाप. कले कुड्यस्य चित्रोपरम , तदस्थापत्यपरिणामभाव एव तेंदुपपत्त: । किमिदानी वृष्ट्यादिना तदुपरमहेतुनेति चेत् ? न , तत्सन्निधान एव तस्य स्वहेतुतस्तत्परिणामात् । उकञ्चैतत्- "स्वतोऽन्यतो विवर्तेत क्रमाद्ध तुफलात्मना"[ सिद्धिवि. परि० ३] इति । तन्न कुड्यमत्र दृष्टान्तो वैपम्यात् । तस्मादनुपरतिरेव सत्सु स्थापकेषु कार्यस्येति व्यर्था एवोपरतिहेतयो नित्यकारणवादिनाम् । तदाह-कारणस्य इत्यादि । कारणस्य परमाणुरूपस्य जातावेकवचनम् । अक्षये स्थापकस्वभावापरिक्षये कार्यस्य स्थाप्यस्योपरमः प्रध्वंसः । कथम् ? न कथञ्चित् । किच तस्य तैः स्थाप्यत्वम् १ सम्बन्ध इति चेत् ? सोऽपि यदि सर्वात्मना २० तदनुप्रवेशः , तदा परमाणव एव नापर द्रव्यमिति कथन "सर्वाग्रहणम् अवयव्य- सिद्धेः" [ न्यायसू० २।११३४ ] इति भैरतोऽपि दोपः । एकदेशेनेति चेत् , कारणव्यतिरेकेण तदभावात् । भावे तत्रापि सर्वात्मना तदनुप्रवेशे स एव अवयव्य. भासन तस्य नापि पासणूनामातीन्द्रियवाहामिनि सहपोषः । हलाप्यरुक्षेत्र तदनुप्रवेशकल्पनायाम् अनवस्थानम् । न सर्वात्मनैकदेशेन वा सम्बन्धः, "तस्य भेदाभावात् , २५ सत्येव च भेदे तन्निाशेपतायां सर्वात्मनेनि, उत्सशेपतायामेक् देशेनेति चोपपत्तेः, अपि तु स्वरूपेणैव इत्यपि न युक्तम् , तेनापि तदनुप्रवेशे तन्मानावशेपात् "पूर्व- दोपानतिवृत्तेः । न तदनुप्रवेशः सम्बन्धः, अपि तु अजहद्रूपतया "प्राप्तिरेवेवि चेत् , तत्रापि न मेण प्रत्यवयम् तस्य सम्बन्धः एक्द्रव्यस्य प्रसङ्गात् , तस्य चानभ्युपगमात्, १ कार्यस्य । २ कार्यस्य । ३ कार्यम् । १ मित्रोपरमोपपत्ते । ५ निनोपरम । ६ जुन्यस्य । • कार्यस्य । ८ योगस्यापि । "अवयविदव्यमनभ्युपगच्छन्त सौगत प्रति भवता आपायमानो दोषो भवतोऽकि योगस्यापि स्यादित्यर्थ ।"-ता टि.। ९ एम्देशाभावात् । १, अश्यविन । " सर्वाग्रहणप्रसा। प्राप्ते रेवे- भा.प.. . अवय- .
. ५ १० - १२१०६] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताय. यान्तराणाञ्च अवयविशून्यत्वापत्तेः । नापि युगपत् , अप्रतिपत्तेः । न हि यदा तदेकावयव. सम्बद्धतया विशिष्टप्रत्ययोपारुढं वदैव तदन्यावयवसम्बद्धतया शक्यं प्रतिपत्त विरोधात् । न हि नील नीलतया प्रतीयमानमेव पीतवया बुद्धिशिखरमध्यारोहति, 'ततो यथा नीलबुद्धिवेद्यं नीलमेय न पीतं तथैकावयवसम्बद्धमेव तत् बुद्धिवेद्यं नावयवान्तरसम्बद्धम् । यत्तु तत्सम्बद्धं बद्र्व्यान्तरमेव भवितुमर्हतीति कथमवयविनोऽपि एकत्वम् ? तद्वहुत्वस्यैवोपपत्ते । न चैका- वयवसम्बद्धं तत्प्रत्ययवेद्यं च तन्न भवति, अवयवान्तरापेक्षयापि तथा प्रसङ्गात् । तदन्तरस्यापि खत एकैकत्वात् । न चैकैकसम्बन्धादन्यः तत्कलापसम्यन्ध।। सस्येव वीप्यमानस्य कलापगोचर- त्या व्यवहारोपरूढत्वात् से रुवत् । सेकस्य हि प्रतितरु सम्भवत एव प्रसिद्धं चीप्सया तत्कलापगोवरत्वम् । ततः प्रत्येकमसम्बन्धे सम्बन्धवैकल्यमेवावयावनः प्राप्तम् । सन्मा भूदिति प्रत्येकमेव सम्बन्धः, तर च प्रत्ययययं बहुत्वमेव अवयविनो नैकत्वम् । म येनात्मना तदेकावयवसम्बद्धं तेनैवावयवान्तरसम्बद्धतया वेदां यदयं प्रसङ्गः स्यात् , अपि तु आत्मान्त- रेणैवेति चेत् , न , स्वभावभेदाभावात् । तदावे निरंशवादव्यापत्तो, भिन्नावयवकल्पना. वैफल्याच । तदुत्तम्- "एकस्यानेत्तिर्न भागाभावादहूनि वा । भागित्वाद्वास्य नैकत्वं दोपो वृत्तेरनाहते ॥" [आप्तमी० श्लो० ६२] इति । ननु यद्यवयविनो न प्रतिपत्तिः क्व तदा ममयोगपद्याभ्या वृत्तिपर्यनुयोगः १ धर्मपर्यनु. योगस्य सत्येव धर्मिण्युपपत्तेः, प्रतिपत्तावपि किं तत्पर्यनुयोगेन ' युगपदनेकावयवत्तिमत एच तस्य प्रतिपत्तेः, तथा प्रविपन्नस्य चाशस्यप्रतिक्षेपत्यादिति चेत् , सत्यम् , अस्ति प्रतिपत्तिः , न तु सा प्रमाणम् , तत्प्रामाण्यस्यैव वृत्तिपर्यनुयोगेन प्रतिक्षेपात् । स एवं तत्प्रतिपत्त्या किन्न प्रतिक्षिप्यत इति चेत्, नीलं तदेव कथमनीलम्' इत्यपि पर्यनुयोगः 'सर्व २० सर्वात्मकम्' ति प्रतिपत्त्या किन्न प्रतिक्षिप्यते । तस्या प्रत्यक्षप्रत्यनीकत्वात्, न हि नीलमेव भवदनीलं प्रतिभासत इति चेत्, समानमन्यत्र, अवयविप्रतिपत्त रपि तत्प्रत्यनीकत्वात् । न हि निरंशस्यावयविनोऽपि प्रत्यक्षे प्रतिभासनमस्ति । यद्येव निर्विषयमेव तत्स्यात् , परमाणूनामतीन्द्रियत्वेन तद्विषयत्यायोगादिति चेत् , न, फथपिदवयवादिनस्तस्य तद्विपयत्वात् , अवयविवत् तदधयवाभेदस्यापि तत्र प्रतिभासनात् । २५५ अत एष तन्तवः पटीकृता इति व्यवहारः । न ह्ययम् अपटात्मना पटभायापत्तिमन्तरेण घटा. मटति । अभूततद्भावे सत्येव च्चिप्रत्ययोपपत्ते । अवयपतद्वतोः पृथक्त्वाग्रहणादयमभेदप्रतिभासो न वस्तुवृत्तेन अभेदभावात् , "सेनावनप्रतिभासवत् । न हि "सेनावनप्रतिरूपस्याभेदस्य भावात्त. . . - 1-सम्बन्धतया भा०, २०, ५० २ तथा यथा भा०, २०, प० ।३ यवयविदन्यम् । ४-चरत्वं कर्य तसा मा०, ब, प० ।५-क सम्ब-आ.ब.प.। स्वभाषभेदे । ७ अवयविन । ८ वृतिपर्यनुपोग. एव । ९ प्रत्यक्षम् । १० अवयविन । ""कर्मकर्तृ-या प्रागतरपे वि (शाकटा. ३४५५)" ताटि -बनादिप्रति मा०, ०,१०।१३ -भावनं प्रति-आ०,०, प० । सेनावनात्मरस्य अभेदस्य ।
४१६ - ५ भ्यायधिनिश्चयविधरणे [२१०६ प्रतिभासः, प्रत्यासत्तायपि प्रसङ्गात् , अपि तु दूरात् पृथक्त्वापरिक्षानादेय, तद्वत् अवयवतद्वतो रपीति घेत , न, स्थूलपविभासस्याप्येषं परमाणुप्मेव प्रसङ्गात् ! भवत्ययं प्रसङ्गो यदि परमाणका पृथक्त्वेनापि कदाचिदुपलभ्येरन् तदा कुतश्चिदगृहीतपृथक्त्यानां तेपामेव स्थूलघुद्धिविषयल. मिति । न चैवम्, सर्वदा तेपामतीन्द्रियत्वेनासाक्षात्करणात् । न चातीन्द्रियाणामेव करितुर- गादीनां धवरसदिरादीनाञ्च पृथक्त्यापरिज्ञानात् सेनावनथुद्धिविषयत्वमुपलब्धम् , प्रत्यासत्तो पृथक्त्या दृष्टानामेव तेषां दूरतः पृथक्त्वापरिनाने तद्बुद्धिगोचरत्वप्रतिपत्ते:। अतो न सेनावनादि. प्रतिभासदृष्टान्तात् परमाणुपु स्थलप्रतिमासोपकल्पनमुपपन्नं वैपन्यादिति चेत् । नेदानीमययरतद्व- चोरपि पृथक्त्यापरिज्ञानादभेदबुद्धिः तयोरपि पृथक् कदाचिदप्यप्रतिपत्तेः । न हि निरंशमेवावय- पिनं तदवयनकलापं च क्वचिदपि सम्पश्यामो यतस्तयोरेव कुतत्रिपृथक्त्वापरिज्ञानादभेद- १० धुद्धिगोचरत्वं परिकल्पयेम । यत्पुनरेतत्-अणुपु स्थूलप्रत्ययस्य अतस्मिस्तत्प्रत्ययत्वम् ; न, प्रधानापेक्षित्वात । भवि. तव्यं स्थूल एव तत्प्रत्ययेन प्रधानभूतेन । न हसति पुरुष एव पुरुषप्रत्यये स्थाणी तत्प्रत्ययो दृष्टः । न चाययविनः सम्भवति प्रधानस्त प्रत्ययः, तदभावात् । तत्कथं परमाणुष्वप्रधानरत- त्प्रत्यय इति ? तदपि न युक्तम् , अवयवतद्वतोरभेदप्रत्ययस्याप्येवमभावप्रसङ्गात् । न हि तस्याप्यतस्मितत्प्रत्ययत्वेन प्रधाननिरपेक्षस्योत्पत्तिः । न च कथञ्चिद्वादमनिच्छतः पश्चिदपि मुख्यः कथञ्चिदभेदप्रत्ययः सम्भवति, तदभावे च क्थं तदपेक्षी परस्परैकान्तभिन्नयोरवयवतद्व. नोस्तत्प्रत्ययः सम्भवेत् । यतो यदि पृथापरिज्ञातयोरप्यवयवतद्वतोः पृथक्त्तापरिज्ञानादभेदप्रत्ययः परमाणुप्रेर 'तादृशेषु ततः स्थूलप्रतिभासो भवेत् । तदाह-'कारणस्य' इत्यादि । कारणस्य पृथक्त्वापरिज्ञानलक्षणस्य अक्षये अवयवतद्वतोरिय परमाणुष्वपि भावे कार्यस्य अभेदप्रत्ययवत् स्थूलप्रतिभासनस्य उपरमो निवृत्तिः कथम् ? न कथश्चिदिति । अस्तु समवायात्तयोरभेदप्रत्यय इति चेत् , न, तस्मात् 'इहेदम्' इति भेदप्रत्ययस्यो- पगमात् , तद्धेतोश्चाभेदप्रत्ययहेतुत्वानुपपत्तेः । कथं वा ततस्तयोस्तत्प्रत्ययः १ सम्बन्धादिति चेत् , केन सम्बन्धः १ तादात्म्येनेति चेन् , न , परमतानुप्रवेशापतेः । सम्बन्धान्तरेणेति चेत , न , तेनाप्यसम्बद्धन तंदयोगात् । तस्यापि सम्बन्धान्तरेण सम्बन्धे अनवस्थोपनिपा- २५ गात् । स्वा एव समवायस्य सम्पन्ध इति चेत् , न , अवयवततोरेव स्वतस्तत्मसङ्गात् । असम्बन्धत्वान्नेत्ति चेत् , समयायस्य कुतः सम्बन्धवम १ स्वतः सम्बन्धाच्चेत् ; सोऽपि कस्मात् ? सम्पन्धत्वाचेत् ;न; परस्पराश्रयात्-स्वतः सम्बन्धात् सम्बन्धत्वम् , स इति । २० . - . ततश्व : सामीप्येऽपि । २ अणुरधू-आ०, ०, ५० स्थूलप्रत्ययेन । ४ स्थूलप्रत्यय । ५-वार भाग, म., प० । ६ पृधावेनापरिज्ञानेषु । • समवायात् । ८ सम्भन्धान्तरेणापि । ९ -प्यसम्पन्धेन भा., ६०, प.।
१११०६] मथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव अथायं तस्य स्वभावो यदयमसम्यद्धोऽपि तयोरभेदप्रत्ययमुपजनयतीति ; तन्न; तन्तु- पंटयोरिव कपालपटयोरपि ततस्तत्प्रसङ्गात् । तन्तुपटयोरेव तस्य तज्जननस्वभावो न कपालपट. योरिति चेत् ; कपालघटयोस्तर्हि कुतस्तत्प्रत्ययः ? समयायान्तरादिति चेत्, न, "तत्वं मावेन व्याख्यातम्" [वै० सू० ७।२।२८] इति तदेकत्यकथाविरोधात् । एकस्यापि तत्र तत्र स्वभावभेदान्नायं दोप इति चेत्, न; स्वभावभेदस्य कथश्चित्तदर्थान्तरत्वे अनेकान्तवादप्रत्युजी. ५ वनापत्तेः । सर्वथाऽर्थान्तरत्वे तु कथं स तस्येति व्यपदेशः ? सम्बन्धादिति चेत्, न ; तत्रापि प्रतिस्वभाव तत्स्वभावभेदकल्पनायाम् अव्यवस्थिविप्रसङ्गात् । ततो निर्विभाग एव समवायः, ततः कथं तन्तुपटयोरेवाभेदप्रत्ययो न कपालंपटयोरप्यविशेषात् । तदाह-'कारणस्य' इत्यादि । कारणस्य समवायस्य अक्षये तन्तुपटवत्कपालपटादावपि भावे कार्यस्य पूर्ववोत्तरत्राप्य- भेदप्रत्ययस्य उपरमो निवृत्तिः कथम् ? न कथचिदिति । समवायरयाविशेपेऽपि समवायिनामरित विशेषो यतस्तन्तुष्वेव पटस्याभेदप्रत्ययो न फपालादिप्विति ततोऽयमदोष इति चेत् ; किमिदानी समवायेन ? अविष्वग्भावज्ञानस्य तत्फलत- येष्टस्य समवायिविशेषादेव भावात् । कथं चाविष्वाभावप्रत्ययस्य मिथ्याचे ततः घंटादेरपि प्रतिपत्तिः ? मिथ्याप्रत्ययातदयोगात् । अन्यत एव तत्प्रतिपत्तिरिति चेत् ; न ; युगपत्प्रत्यय- द्वयस्याप्रतिवेदनात् । क्रमेण प्रतिवेदन मिति चेत् ; न ; तथाननुभवात् । न हि पटादितदभेद- १५ प्रत्यययोः पौर्वापर्यस्यानुभवः ; स्थानिश्वयाभावात् । निश्चयात्मा च भवतामनुभवः, स कथं सदभावे भवेत् ? कथं वा पटादेरभेदप्रत्ययेनाप्रतिपत्ती तदधिष्ठानत्वेनाभेदप्रतिपत्तिः 'तन्तवः पटोभवन्ति' इति ? विद्यते चेयम् , तस्मादेक एवायं प्रत्ययो मिथ्यात्मेति कथमतः पदादितत्त्वं प्रसियो ? यतोऽवयविव्यवस्थापनेन योगाः सौगवमतिशयीरम् । अभेदभाग एवायं प्रत्ययो मिथ्या बाध्यमानत्वात् न पटादौ विपर्ययादिति चेत् । २० कथमेक एवायं मिथ्या च अमि च विरोधात् १ अन्यथा प्रतिपत्त्यभावान विरोध इति चेत् ; अनुकूलमाचरितम् , अत एव वहिरर्थस्याप्यवयविरूपतया नानकस्वभावस्य सिद्धः । ततो न निरंशावयव्यभावेऽपि प्रत्यक्षस्य निर्विपयत्वम् , जात्यन्तरविषयत्येन सविपयत्वात् । तदुकम्-"जात्यन्तरं तु पश्यामः" [सिद्धिविपरि० २] इति । तन निर्विषयत्वप्रसङ्गमयात् प्रत्यक्षस्य निरंशावयविनः कल्पनमुपपन्नम् , तस्मिन् तद्भयाभावात् । न चैवम् , अप्रतीव एव तस्मिन् वृत्तिपर्यनुयोगः, पोपगमतस्तस्य प्रतीते। प्रतीयमानस्य वृत्तिमत एव प्रतीतेर्निरवसर एव तब "तत्पर्यनुयोग इति चेत् ; कथमिदानी सर्वेकभावभावनैरारम्यादावपि पर्यनुयोगः ? तस्यापि यथाकल्पनं तद्रूपस्यैव प्रतीतेः । कल्यात .. - असत्यपि २५ - , १ अवयवाक्यविनो । २ -पटयौरव कगलघट-आ०, य०, प० । ३ तत्वमकावं भावेन सत्तया इन, यथा स्खलिझारिशेषान् विशेषलिजाभावाच्चैकत्वं सत्ताया तथा समवायस्यापि इति भाव । ४ स्वभावभेदः । ५-पट- आ०,व०प०। ६ पटा-आ०, ब०,१०। ७-भाव ए-आ०, ब०, प.1 ८ अवयविनि.। १ -सरसन आ०,०, प० । १० वृत्तिपर्यनुयोग ।
५ ग्याययिनिश्श्यविधरणे [१९०६ प्रतिभासः, प्रत्यासचायपि प्रसङ्गात् , अपि तु रात्पृथक्त्वापरिक्षानादेव, तद्वत् अवयक्तद्वतो पीति चेत्, न, स्थूलप्रतिभासस्याप्येवं परमाणुप्पेव प्रसङ्गात् । भवत्ययं प्रसङ्गो यदि परमाणयः पृथक्त्वेनापि कदाचिदुपलभ्येरन् तदा कुतश्चिदगृहीतपृथक्त्याना तेषामेव स्थूलयुद्धिविषयत्व. मिति । न चैवम् , सर्वदा वेपामतीन्द्रियत्वेनासाक्षात्करणात् । न चातीन्द्रियाणामेर करितुर. गादीना धवसदिरादीनाञ्च पृथक्त्वापरिज्ञानात् सेनावनवुद्धिविषयत्वमुपलब्धम् , प्रत्यासत्ती पृथक्त या दृष्टानामेव तेपा दूरतः पृथक्त्वापरिज्ञाने तबुद्धिगोचरत्वप्रतिपत्ते । अतो न सेनावनादि- प्रतिभासपान्तात परमाणुपु स्थूलप्रतिभासोपकल्पनमुपपन्नं वैपम्यादिति चेत् , नेदानीमरयवतद्ध- तोरपि पृथक्त्वापरिझानादभेदबुद्धिः तयोरपि पृथक् कदाचिदप्यप्रतिपत्तेः । न हि निरशमेवावय. विनं तदवयवकलापं च क्वचिदपि सम्पश्यामो यतस्तयोरेव कुतचित्पृथक्त्वापरिज्ञानादभेद- १० वुद्धिगोचरत्वं परिकल्पयेम । यत्पुनरेतत्-अणुपु स्थूलप्रत्ययस्य अतस्मिस्तत्प्रत्ययत्वम्, न, प्रधानापेक्षित्वात् । भवि. तव्यं स्थूल एव तत्प्रत्ययेन प्रधानभूतेन । न ह्यसति पुरुप एर पुरुपप्रत्यये स्थाणी सत्प्रत्ययो दृष्ट. ! न चापयविनः सम्भवति प्रधानस्त मेंत्ययः, तदभावात् । तस्थ परमाणुष्वप्रधानस्त- प्रत्यय इति । तदपि न युक्तम् , अवयवतद्वतोरभेदप्रत्ययस्याप्येवमभावप्रसङ्गात् । न हि तस्याप्यतस्मिस्तत्प्रत्ययत्वेन प्रधाननिरपेक्षस्योत्पत्तिः । न १ कथञ्चिद्वादमनिच्छतः पश्चिदपि मुख्यः कथञ्चिदभेदप्रत्ययः सम्भवति, तदभावे च क्थं तदपेक्षी परस्परफान्तभिन्नयोरवययतद्व तोस्तत्प्रत्ययः सम्भवेत् । ततो यदि पृथगपरिज्ञातयोरयवयक्तद्वतोः पृथक्त्वापरिक्षानादभेदप्रत्ययः परमाणुप्पेर ताशेपु ततः स्थूलप्रतिभासो भवेत् । तदाह-'कारणस्य' इत्यादि । कारणस्य पृथक्त्यापरिज्ञानलक्षणस्य अक्षये अवयक्तद्वतोरिव परमाणुष्वपि भावे कार्यस्य अभेदप्रत्ययमत स्थूलप्रतिभासनस्य उपरमो निवृत्तिः कथम् ? न कथञ्चिदिति । अस्तु समवायात्तयोरभेदप्रत्यय इति चेन् , न, तरमात् 'इहेदम्' इति भेदप्रत्ययस्यो- पगमात् , तद्धेतोश्चाभेदप्रत्ययहेतुत्यानुपपत्तेः । कथं या तत्तस्तयोस्तत्प्रत्ययः ? सम्बन्धादिति चेत् , केन सम्बन्धः १ तादाम्येनेति चेन , न , परमतानुप्रवेशपत्तेः । सम्बन्धान्तरेणेति घेत ,न , तेनाप्यसम्बद्धन संदयोगात् । तस्यापि सम्बन्धान्तरेण सम्बन्धे अनवरथोपनिप - तात् । स्वत एष समवायस्य सम्बन्ध इति चेत् , न , अवयनसद्वतोरेर स्वतस्तत्प्रसङ्गात् । असम्बन्ध त्यानेति चेत् , समगायरय फुतः सम्बन्धस्त्वम १ स्वतः सम्बन्धाच्चेत् , सोऽपि फरमात् ? सम्बन्धत्वाच्चेत् , न ; परस्पराश्रयात्-स्वतः सम्बन्धात् सम्बन्धत्वम् स इति । २० . . - ततश्व , । सामीम्येऽपि । २ अगुस्थू-आ०, ६०, १०। स्थूलप्रत्ययेन । । स्थूलप्रत्यय । ५ -वाक्य भा०,०, प० । ६ पृथाखेनापरिझानेषु । . समदायात् । ८ सम्बधा तरेणापि । ९ -प्यसम्बन्धेन भा., 4 ...
-- १० १६१०६] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः अथायं तस्य स्वभावो यद्यमसम्बद्धोऽपि तयोरभेदप्रत्ययमुपजनयतीति ; तन्नः तन्तु- पंटयोरिव कपालपटयोरपि ततस्तत्प्रसङ्गात् । तन्तुपटयोरेव तस्य तन्जननस्वभावो न फपालपट. योरिति चेत्, कपालघटयोस्वर्हि कुतस्तत्प्रत्ययः ? समवायान्तरादिति चेत्, न, "तत्त्वं भावन व्याख्यातम्" [२० सू० ७।२।२८] इति तदेकत्वकथनविरोधात् । एकस्यापि तत्र तत्र स्वभावभेदान्नायं दोप इति चेत् ; न, स्वभावभेदस्य कथश्चित्तदर्थान्तरत्वे अनेकान्तवादप्रत्युजी. ५ वनापत्तेः । सर्वथाऽर्थान्तरत्वे तु कथं स तस्येति व्यपदेशः ? सम्बन्धादिति चेत्न ; तत्रापि प्रतिस्वभावं तत्स्वभावभेदकल्पनायाम् अव्यवस्थितिप्रसङ्गात् । ततो निर्विभाग एष समवायः, ततः कथं तन्तुपटयोरेवाभेदप्रत्ययो न कपालंपटयोरप्यविशेषात् । तदाह-कारणस्य' इत्यादि । कारणस्य समवायरय अक्षये तन्तुपटयरकपालपटादावपि भावे कार्यस्य पूर्वत्रेवोत्तरत्राप्य. भेदप्रत्ययस्य उपरमो निवृत्तिः कथम् ? न कथचिदिति । समवायरयाविशेपेऽपि समवायिनामस्ति विशेपो यतस्तन्तुष्वेव पटस्याभेदप्रत्ययो न फपालादिप्विति ततोऽयमदोप इति चेत् ; किमिदानी समवायेन ? अविध्वम्भावज्ञानस्य तत्फलत- येप्टस्य समवायिविशेषादेव भावात् । कथं चाविष्वग्भावप्रत्ययस्य मिथ्यात्वे ततः घंटादेरपि प्रतिपत्तिः ? मिथ्याप्रत्ययात्तदयोगात् । अन्यत एव तत्प्रतिपत्तिरिति चेत् ; न ; युगपत्प्रत्यय. द्वयस्याप्रतिवेदनात् । क्रमेण प्रतिवेदनमिति चेत् ; न ; तथाननुभवात् । न हि पटादिसदभेद- १५ प्रत्यययोः पौर्वापर्यस्यानुभवः ; तथानिश्चयाभावात् । निश्चयात्मा च भवतामनुभवः, स कथं तदभावे भवेत् ? कथं वा पटादेरभेदप्रत्ययेनाप्रतिपत्तौ तदधिष्ठानत्वेनाभेदप्रतिपत्तिः 'तन्तवः पटोभवन्ति' इति ? विद्यते चेयम् , तस्मादेक एवायं प्रत्ययो मिथ्यात्मेति कथमतः पदादितत्त्वं प्रसिद्ध्यत् ? यतोऽवयविव्यवस्थापनेन यौगाः सौगतमतिशयीरन् । अभेदभांग एवायं प्रत्ययो मिध्या याध्यमानत्वात् न पटादौ विपर्ययादिति चेत् । २० कथमेक एवायं मिथ्या घ अमिध्या च विरोधात् ? अन्यथा प्रतिपत्त्यभावान विरोध इति चेत् ; अनुकूलमाचरितम् , अत एय पहिरर्थस्याप्यवयविरूपतया नानकस्यभायस्य सिद्धः। चवो न निरंशावयन्यभावेऽपि प्रत्यक्षस्य निर्विपयस्वम् , जात्य-तरविषयत्वेन सविषयत्वात् । तदुक्तम्-"जात्यन्तरं तु पश्याम:" [सिद्धिवि०परि० २] इति । सन्न निर्विपयत्वप्रसङ्ग भयात् प्रत्यक्षस्य निरंशावयविनः कल्पनमुपपन्नम् , तस्मिन् तद्भयाभावात् । न चैवम् , अप्रतीत एव तस्मिन् वृत्तिपर्यनुयोगः, परोपगमतस्तस्य प्रतीतेः । प्रतीयमानस्य वृत्तिमत एव प्रतीतेर्निरवसर एव तत्र "तस्पर्यनुयोग इति चेत् ; कथमिदानी • सर्वेकभावभावनैरारम्यादावपि पर्यनुयोगः ? तस्यापि यथाकल्पनं तद्रूपस्यैव प्रतीतेः । कल्प्यात १ अवययावयविनो । २ -पश्योरेव कपालघट-आ०, ५०, प० । ३ तवमैकाव भात सातवा इद, यया खलिहाविशेषात् विशेषलिशाभावान्चैकल सत्ताया तथा समवायस्यापि इति भाव । ४ स्वभाव ७ -भाव ए-आ०, २०, ५०। ८ अवयावी, आ०,१०,५०० तिपर्यनुयोग । - असत्यपि आ०,०, प। ६ पा-आ०,ब०,१०॥ १सरतन ५ ४१६ न्यायविनिश्चयविधरणे [ २००६ प्रतिभासः, प्रत्यासत्तायपि प्रसङ्गात् , अपि तु दूरात् पृथक्त्वापरिज्ञानादेव, वद्वत् अवयवतद्वतो रपीति चेत, न, स्थूलप्रतिभासस्याप्येवं परमाणुप्रेव प्रसङ्गात् । भवत्ययं प्रसङ्गो यदि परगाणय: पृथक्त्वेनापि कदाचिदुपलभ्येरन् तदा कुतश्चिदगृहीतपृथक्त्याना तेपामेव स्थूलबुद्धिविपयत्व. मिति । न चैवम्, सर्वदा पामतीन्द्रियत्वेनासाक्षात्करणात् । न चातीन्द्रियाणागेर करितुर. गादीना धवपदिरादीनाञ्च पृथक्त्वापरिज्ञानात् सेनावनबुद्धिविषयत्वमुपल-धम् , प्रत्यासत्ती पृथक्त या दृष्टानामेवतेपा दूरतः पृथक्त्वापरिझाने तद्बुद्धिगोचरत्वप्रविपत्ते । अतो न सेनावनादि- प्रतिभासदृष्टान्तात् परमाणुपु स्थलप्रतिभासोपकल्पनमुपपन्नं वैपम्यादिति चेत् , नेदानीमरयस्त- तोरपि पृथक्त्यापरिज्ञानादभेदबुद्धिः तयोरपि पृथक् कदाचिदप्यप्रतिपत्तेः । न हि निरशमेवावय. चिन सदस्यकलापं च क्यचिदपि सम्पश्यामो यतस्तयोरेव कुतश्विरपृथक्त्वापरिज्ञानादभेद- १० बुद्धिगोचरत्व परिकल्पयेम । यत्पुनरेतत्-अणुपु स्थूलप्रत्ययस्य अतरिमरतत्प्रत्ययत्वम्, न, प्रधानापेक्षिल्यात । भवि. तव्यं स्थूल एव तत्प्रत्ययेन प्रधानभूतेन । न हासति पुरुष एव पुरुषप्रत्यये स्थाणी तप्रत्ययो दृष्ट, । न चावयविन• सम्भरति प्रधानस्त प्रत्ययः, "तभावात् । तत्कथ परमाणुष्वप्रधानरत- त्प्रत्यय इति ? तदपि न युक्तम् , अवयवतद्वतोरमेदप्रत्ययस्याप्येवमभावप्रसङ्गात् । न हि तस्याप्यतस्मिस्तत्प्रत्ययत्वेन प्रधाननिरपेक्षस्योत्पत्तिः । न च कथञ्चिद्वादमनिच्छतः पश्चिदपि मुख्यः कश्चिदभेदप्रत्ययः सम्भवति, तदभावे च क्थ तदपेक्षा परस्परैकान्तभिन्नयोरवयक्तद तोस्तत्प्रत्यय सम्भवेत् । ततो यदि पृथगपरिज्ञातयोरप्यवयवतद्वतोः पृथक्त्यापरिज्ञानादभेदप्रत्ययः परमाणुप्पेर तादृशेषु ततः स्थूलप्रतिभासो भवेत् । तदाह-'कारणस्य' इत्यादि । कारणस्य पृथक्त्वापरिज्ञानलक्षणस्य अक्षये अवयवतद्वतोरिव परमाणुष्वपि भाचे कार्यस्य अभेदप्रत्ययात् स्थूलप्रतिभासनस्य उपरमो निवृत्तिः कथम् ? न कथश्चिदिति । आस्तु समवायात्तयोरभेदप्रत्यय इति चेत् , न , तस्मात् 'इहेदम्' इति भेदप्रत्ययस्यो- पगमात् , तद्धेतोश्वाभेदप्रत्ययहेतुत्वानुपपत्तेः । कथं वा तत्तस्तयोस्तत्प्रत्यय. ? सम्बन्धादिति चेत् , केन सम्बन्धः १ तादात्म्येनेति चेन् , म , परमतानुभवेशपत्ते. । सम्बन्धान्तरेणेति चेत , न , तेनाप्यसम्बद्धन तंदयोगान् । तस्यापि सम्पन्धान्तरेण सम्बन्धे अनवस्थोपनिप - तात् । स्वत एवं समवायस्य सम्बन्ध इति चेत् , न , अवयवतद्वतोरेख स्वतस्तत्प्रसङ्गात् । असम्बन्धत्वान्नेति चेत् , समवायस्य कुतः सम्बन्धत्वम् ' स्वतः सम्यन्धाच्चेत् , सोऽपि फरमात् ? सम्बन्धत्वान्चेत् , परस्पराश्रयात्-स्वतः सम्बन्धात् सम्बन्धत्वम् , ततश्च स इति । : सामीप्येऽपि । २ अणुस्थू-भा०, प., प.। ३ स्थूलप्रत्ययेन । ४ स्थूलप्रत्यय । ५-वारक मा०,५०,०1 पृथरत्वेनापरिज्ञानेषु । • समवायात् । ८ समधातरेणापि । ९ -प्यसम्मधेन भा, प्रथमः प्रत्यक्षमस्तायः २११०६] अथायं तस्य स्वभावो यदयमसम्बद्धोऽपि तयोरभेदप्रत्ययमुपजनयतीति ; तन्न; तन्तु- पंटयोरिव कपालपटयोरपि ततस्तस्मसङ्गात् । तन्तुपटयोरेव तस्य तजननस्वभावो न कपालपट. योरिति चेत् ; कपालघटयोस्तर्हि कुतस्तत्प्रत्ययः ? समवायान्तरादिति चेत्, न, "तत्वं भावेन व्याख्यातम्" [वै० सू० ७।२।२८] इति तदेकत्वकथनविरोधात् । एकस्यापि तत्र तत्र स्वभावभेदानाय दोप इति चेत् ; न, स्वभावभेदस्य कथञ्चित्तदर्थान्तरत्वे अनेकान्तवादप्रत्युनी. ५ वनापत्तेः । सर्वथाऽर्थान्तरत्वे तु कथं स तस्येति व्यपदेशः ? सम्बन्धादिति चेत् ;न ; तत्रापि प्रतिस्वभाव तत्स्वभावभेदकल्पनायाम् अव्यवस्थितिप्रसङ्गात् । ततो निर्विभाग एवं समवायः, ततः कथं तन्तुपटयोरेवाभेदप्रत्ययो न कपालंपटयोरप्यविशेपात् । तदाह-'कारणस्थ' इत्यादि । कारणस्य समवायस्य अक्षये तन्तुपटवत्कपालपटादायपि भावे कार्यस्य पूर्वत्रेवोत्तरत्राप्य- भेदप्रत्ययस्य उपरमो निवृत्तिः कथम् ? न कथचिदिति । समवायरयाविशेपेऽपि सगवायिनामस्ति विशेषो यतस्तन्तुष्वेय पदस्याभेदप्रत्ययो न फपालादिप्विति ततोऽयमदोप इति चेत् ; किमिदानी समवायेन ? अविष्यग्भावज्ञानस्य तत्फलत- येष्टस्य समवायिविशेषादेव भावात् । कथं चाविष्वम्भावप्रत्ययस्य मिथ्यात्वे ततः घंटादेरपि प्रतिपत्तिः ? मिथ्याप्रत्ययात्तदयोगात् । अन्यत एव तत्प्रतिपत्तिरिति चेत् ; न; युगपत्प्रत्यय द्वयस्याप्रतिवेदनात् । क्रमेण प्रतिवेदनमिति चेत् ; न ; तथाननुभवात् । न हि पटादितभेद- १५ प्रत्यययोः पौर्वापर्यस्यानुभवः ; तथानिश्वयाभावात् । निश्चयात्मा च भवतामनुभवः, स कथं तदभावे भवेत् ? कथं वा पटादेरभेदप्रत्ययेनापतिपत्ती तदधिष्ठानत्वेनाभेदप्रतिपत्तिः 'तन्तवः पटोभवन्ति' इति ? विद्यते चेयम् , तस्मादेक एवायं प्रत्ययो मिथ्यात्मेति कथमतः पटादितत्त्वं प्रसिद्ध्यत् ? यतोऽवयविव्यवस्थापनेन योगाः सौगतमविशयीरन् । अभेदभाग एवायं प्रत्ययो मिथ्या वाध्यमानत्वात् न पटादौ विपर्ययादिति चेत् ; २० कथमेक एवायं मिथ्या च अमिथ्या च विरोधात् ? अन्यथा प्रतिपत्त्यभावान्न विरोध इति चेत् ; अनुकूलमाचरितम् , अत एव घहिरर्थस्याप्यवयविरूपतया नानकस्वभावस्य सिद्धः । तवो न निरंशावयव्यभावेऽपि प्रत्यक्षस्य निर्विपयत्वम् , जात्यातरविषयत्वेन सविषयत्वात् । तदुक्तम्-"जात्यन्तरं तु पश्यामः" सिद्धिविपरि० २] इति । तन्न निर्विपयत्वप्रसङ्गभयात् प्रत्यक्षस्य निरंशावयविनः कल्पनमुपपन्नम् , असत्यपि तस्मिन् सद्भयाभावात् । न चैवम् , अप्रतीत एव तस्मिन् वृत्तिपर्यनुयोगः, परोपगमतस्तस्य प्रतीतेः । प्रतीयमानस्य वृत्तिमत एव प्रतीनिरपर्सर एव तत्र "तस्पर्यनुयोग इति चेत् ; कथमिदानी सबैंकभावभावनैरारम्यादावपि पर्यनुयोगः ? तस्यापि यथाकल्पनं तद्रूपस्यैव प्रतीतः । कलप्यत १ अवयवावयविनी- 1 २ -पट्यारेच कपालघट-आ०, ब०, ५० । ३ तत्वमेस्त्वं भावेन सत्तया इव, यथा खलिहाविशेषात् विशेषलिझाभावाच्चैवत्वं सत्ताया तथा समवायस्यापि इति भाव । ४ स्वभावभेदः । ५-लपट- भा०, २०,५०। ६ पटा-आ०, ब०,१०1 ७ -भाव ए-आ०, य०, ५०। ८ अवयविनि । ९ -सरसन आ०,०, ५०।१त्तिपर्यनुयोग । 4B - म्यायविनिश्चयविवरणे [१६१०६ एव परमपरस्तद्रूपं न परिस्फुटज्ञानप्रकाशमुपश्लिप्यतीति चेत् , समानं वृचायपि, सापि परि- कल्प्यतु एव भवद्भिर्न तस्या अपि तत्प्रकाशोपश्लेपः क्वचिदपि दृश्यते । न हि निरश किाश्चत क्वचित्रमेण योगपद्येन वा वर्तमानमुपलभेमहि । यद्येवमनुपलम्भादेव वृत्तिवत् वृत्तिमवोऽध्यभावः साधयितव्यः किं वृत्तिपर्यनुयोगेनेति ५ चेत् सत्यम् , अस्ति ततोऽपि तदभाव साधनम् । "न पश्यामः क्वचित्किञ्चित्सामान्यं वा स्खलक्षणम्" [सिद्धिवि०परि० २] इति वचनात् । वृत्तिपर्यनुयोगस्तु व्यापकाभावादपि तदभाव. निरूणार्थः,अनेकप्रकारत्वात्तत्त्वनिरूपणस्य । व्यापिका हि वृत्तितिमतः परेरतथैव प्रतिपत्तः । वृत्तवृत्तिमद्रूपत्वे 'कथं तस्यानेकत्र वर्तन युगपन्निरंशस्य' इति भवति पर्यनुयोगः १ न चैवम् , पदार्थान्तरस्य समवायस्येव वृत्तित्वात् , तस्य चानेकर भावो विभुत्वात् । तदनेकन १० भाव एर वृत्तिमतोऽप्यनेकरभाव इति चेस् , क्थ तस्य तद्धर्मो वृत्तिमतः १ तस्य तत्सम्बन्धत्वा- दिति चेत्, न, पटश्य तन्तुयत् कपालादिष्यपि सर्वत्र वृत्तिप्रसगात् समायस्य सार्वत्रिकत्वात् । तस्याविशेपेऽपि समवायिन• पटादेविशेषान्नियम इति चेत् , रय नियमः १ समायस्येति चेत् , न, 'सार्वत्रिकश्च नियतश्च' इति व्याघातात् । पटादेरेवेति चेत्, किमिदानी समवायेन ? इति न तद्रूपा वृत्ति., समनायिविशेषस्यैव वृत्तित्वात् । वन चोक्तमेव दूपणम् । १५ न च समवायो नाम कश्चित् , प्रमाणामावात् । न हि तस्य प्रत्यक्षात्प्रतिपत्तिः, पट- तन्तुव्यतिरेकेण तदनिर्णयात् , सन्निकर्पाभावाच । न तावदसी संयोग'; द्रय एव तेंदुपगमात् । नापि समयाय , तस्यान्यस्यानभ्युपगमान । गपि सयुत्समवायादिः, तस्यापि कचित्समवाया भाये समवायस्य, असम्भवात् । भवतु सम्बद्धविशेषणभाव इति चेत्, कथं समनायस्यानानि- वस्यम् ? सति तस्मिनाश्रितत्वस्यैवोपपत्तेः । समवायापेक्षस्येव तत्राश्रितत्वस्य निषेध इति चेत्, २२० फुतो दोपात् १ अनवस्थानादिति चेत्, कुन: सम्बद्धविशेपणभावे स न भवति । तस्य समवा. यादनन्तरत्वात् । अर्थान्तर एव तत्प्रसङ्गादिति चेत् , न, एव समवायस्यापि पटादेरनन्तरत्व. प्रसगात्-"अविशेषणात् विशेषणत्वस्येव" असम्बन्धादपि सम्बन्धस्यानन्तरत्याविरोधात् । तथा च स्वरूपवृत्तिरेवोक्तदोषा" स्यात् । तन्न अनाश्रितत्वे समवायस्य समयायान्तरवत्तद्विशेषण- भावोऽपि सम्भवतीति कथ "ततोऽपि दर्शन तस्य न चासनिक दर्शनम् , सन्निकर्षवादव- फ्ल्यापत्तेः । तस्मान युक्तमुक्तम्-"समवायस्य प्रत्यक्षेणैव प्रतिभासनात्" [ इति" । "अत एव यातीन्द्रियः' [प्रश० भा० पृ० १७४] इति प्रशस्तकरवचनविरोधाच । . . १ २५ ] . १ रामवायस्यानेन । २ समवायस्य । ३ अनेकत्तिवरूपो धर्म 1 ४ समवायस्य ! ५ सयोगाभ्युपग मात् । ६-यादि त-ता. 1 सम्बद्धविशेषणीभावस्य । ८ अनवस्थादोष । ९ पग-आ०, २०, ५०।१० विशे पणानाममा समयायान् था विशेषणवस्य-सम्बद्धविरोषणभावस्य अनयान्तरत्व तथा सम्बधानामकात् पगदेरपि गमवायस्य अनर्थान्तरव स्यात् विशेषाभारारिति भाव । १५-वस्यैव आ०, २०, ५० । १२ -वृत्तरेवोक्त- आ०,२०,५०। १३ सम्बद्धविशेषणीभावादरि।१४ समवाय अमारे च विशेषगविशेभ्यभावात्"-न्याय. १४ । 'तदेतत् पदविधराम्ब धमधिविशेषणपिशेयभावार दृश्याभाव समवाययोर्ग्रहणम् । समवायतु वाचदेव प्रणम्-यथा रूपसमायवान् घर घरे सगमवाय इनि-न्यायसा० पृ.३। .
, . - १।१०६] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव इह प्रत्ययापेक्षमेव तेन तस्यातीन्द्रियत्वमुच्यते तस्य तत्राप्रतिमासनात्, आधारस्यैव हि तत्र प्रतिभासनं न समवायस्य निर्विकल्पे प्रत्यक्षान्तर एव तस्य प्रतिभासनादिति चेत्, न, तस्यावि. भावनात् । अवयवावयविनो; सशेषज्ञानमेव तदिति चेत्, न, वन कथञ्चित्तादाम्यस्यैव प्रतिभास- नादिति निरूपणात् । ततो न युक्तमेतदपि व्योमशिवस्य-"निर्विकल्पके त्ववयवावयविनोः संश्लेषज्ञाने समवायः प्रत्यक्ष एवं प्रश० व्यो, पृ० ६९९] इति । तन्न तर प्रत्यक्षं प्रमाणम् । ५ नाप्यनुमानम् । तदभावात् । ननु इदमस्ति-इह शासामु वृक्ष इति प्रत्ययः सम्बन्ध- पूर्वकः, निधिले सवि इह प्रत्ययत्वात् , कुण्डे दधीति प्रत्ययवदिति चेत् , न , अतोऽपि तादात्यायैव सम्बन्धस्योपपत्तेः । ननु तादात्म्यं नाम वृक्षस्य शासाभिस्तासा पा वृक्षणेकत्व- मेव, तत्कथं सम्बन्धः ? सम्बन्धस्य द्विष्टतयैवोपपत्तरिति चेत् , न , एकान्तेनैकत्वाभावात् द्विष्ठवाया अप्युपपत्तेः । कथं पुनर्भेदाभेदयोरेकविधेरन्यतरप्रतिपेधरूपत्वात् एकर धर्मिणि सम्भव १ इति चेत् । कथं विभ्रमेतरयोरेकन ज्ञाने सम्भवः तदविशेषात् १ मा भूदिति चेत् , किं पुन- रिदानीम् इह प्रामे वृक्षाः' इति ज्ञानमभ्रान्तमेव ' तथा चेत् , कि तव्यवच्छेदार्थेन निर्याधता- विशेषणेन ? भ्रान्तमेव, सम्बन्धाभावेऽपि ग्रामारामव्यवधानादर्शनादुत्पत्तेरिति चेत् , कथं ततो मागादेरपि प्रतिपत्तिः मिध्याज्ञानस्य वस्तुविषयत्वायोगात् । न च प्रामादिरवरत्वेव बाधाविर- हात् । न च तद्विरविषयस्यावस्तुत्वम् , अतिप्रसङ्गात् । अभ्रान्तमेव प्रामादो तदिति चेत; १८ कथमेकमेर भ्रान्तमभ्रान्तञ्च, विभ्रमेतरयोरप्येकविधानस्य इतरप्रतिषेधरूपत्वेन एकत्रायोगात् ? प्रतिमासभेदेन च भेदस्यैवोपपत्तेः। विलक्षणो हि विभ्रमप्रतिभासादितरप्रतिभासः , तत्कथं तस्य तदेकविपय यम् ? प्रतिभासस्यापि न सर्वथा भेदः, कथञ्चिदभेदस्यापि प्रतिभासनादिति चेत् , अनुकूलमाचरसि , अवयवतद्ववोरप्येवं कथश्चिदभेदोपपत्तेः अभेदप्रतिभासाविशेषात् । अस्ति हि तत्रापि भेदवदभेदस्यापि प्रतिभासः, शाखाचलने वृक्षश्चलतीति प्रत्ययात् । न हत्यन्तव्यतिरेके शासाचलनं वृक्षे शक्यं प्रतिपत्तुम् । समवायाच्छक्यमेवेति चेत् , कथं ततोऽपि शाखाया वृक्षत्वेन प्रतिपत्तिः , इहेतिप्रत्ययाभावप्रसङ्गात् । न हि तद्रूपप्रतिपत्ति. हेतोरेव तदधिकरणत्वप्रतिपत्तिः, विरोधात् । न हि नील नीलतया प्रत्याययदेव तदधिकरण- तया प्रत्याययदुपलब्धम् । न च शाखापत् यस्यापि चलनादेव तत्र चलनप्रत्ययः , परनव- यस्यानुपलम्भात् व्याप्त्या तत्प्रसङ्गाच । न हि निरशस्याव्याप्त्या तत्सम्भवः , निरंशत्वव्या- पत्तेः। ततः शासाचलनमेव वृक्षस्यापि चल्नमिति कथं शासातादात्म्य वृक्षस्य प्रतीतिसिद्धं न भवेत् , यतस्तवार्थान्तरसम्बन्धप्रतिज्ञा प्रतीतिप्रतिक्षिप्ता हेतवश्न विरुद्धान भवेयुः। तदेवाह- . २० २५ १ प्रशस्तारण । २ इहायो। ३ समवायस्य । ४ "इह तन्तुषु पट इत्यादीहमन्यय सम्बन्ध- वार्य अवाभ्यमानेहप्रत्ययत्वात् । यो योऽयाध्यमानेहप्रत्यय स सम्बन्धमार्य यह कुण्डे दधोति तथा चायम- वाध्यमानेहप्नन्यय तम्मासम्बधार्य इति ।"-प्रशन्यो. पृ० १०९ । प्रश कन्द० पृ. ३२५ । ५ -पपत्तिरि- भा, व०, प.. ६ चलन तत्र प्रयय-आ०, य०, ५०। ७ सर्वदेशावच्छेदेन। ८-शस्य भ्या- आ.,ब०,५०1 1 ४२० न्यायविनिश्चयरिधरणे [११.७ . . - समवायस्य वृक्षोऽत्र शाग्वास्वित्यादिसाधनः । अनन्यसाधनैः सिद्धिरहो लोकोत्तरास्थितिः ॥१०७॥ इति । समवापस्य वृक्षाशाग्यादीनामयुतसिद्धानाम् अत्यातव्यतिरेकिणः सम्बन्धस्य आस्थिति: आस्था प्रतिज्ञा लोकोत्तरा लोकं दर्शनप्रत्ययम् उत्तरति उइघयतीति । लोकोत्तरा प्रत्यक्षनिराकनेति यावत् । प्रत्यक्षेण हि वादात्म्यं गृहता वृक्षशासयो। भिन्नसम्बन्धसन्धेय कथन्न प्रतिपिध्यते १ ॥१००८॥ ततः प्रत्यक्षनिलप्तपक्षानन्तरभावतः । कालात्ययापदिष्टत्वं हेतूनामिति मन्यते ॥१००९॥ सिदिप्तिस्तस्या रहस्त्यागः सिद्विरहः सिद्धाभाव इति यावत् । कस्य ? समवायस्य । कैः ? 'वृक्षोऽत्र शाखासु' इति एवं रूपं ज्ञानमभिवानच आदिये. पाम् इह तन्तुपु पटः' इत्यादिज्ञानाभिधानानां तान्येव साधनानि तैरिति । न सानि साधनानि, तद्धर्माणाम् इहप्रत्ययत्वादीनां साधनत्वादिति चेत् ; न धर्मततामविप्वम्भा- वापेक्षयेवमभिधानात् । 'यो य इप्रत्ययः स सम्बन्धपूर्वको यथा कुण्डे पदराणीति प्रत्ययः' १५ इति व्याप्तिदर्शनस्याप्येवमेवोपपत्तेः, अन्यथा हेतोर्याप्तिदर्शने कर्तव्ये धर्मिणस्तदुपदर्शनम- सम्बद्धं भवेत् । कथं पुनरितिशब्दस्य आदिशब्देन समासः 'वृक्षः' इत्यादेस्तनापेक्षणात् ? अनपेक्षणे तु न वटूपस्य बुद्धयादेस्तेनोपदर्शनमिति चेत् । न ; तदनपेक्षतयैव प्रकृतस्य तेनोप- दर्शनात् । वृक्ष इत्यादिकं तद्बुद्धी तत्प्रकरणार्यमुक्तम् । कुतस्तैस्तस्य सिद्धिरहः ? इत्यनाह- अनन्यसाधनैः यत इति । अन्यः समवायस्तस्य समवायिभ्योऽर्थान्तरत्वात् , तस्मादन्यः २० तादाम्यपरिणामः तस्य साधनैः विरुद्धरिति यावत् । समवायविरुद्धस्य तादात्म्यस्येह साधनैः । समवायस्य संसिद्धिः कथनामोपपद्यते ? ११०१०॥ तादात्म्यसाधनत्वश्च तेषां तद्व्याप्तिनिर्णयात् । विभ्रमाविभ्रमाकारप्रत्यये सुपरिस्फुटम् ॥१०१२॥ न हि इह विभ्रमेनराकारयोः ज्ञानमिति' प्रत्ययस्य सादाम्यसम्बन्धपूर्वकत्वनिर्णयेऽपि शासादो इहेदम्प्रत्ययस्य तदन्यसम्बन्धपूर्वकत्वसाधनमुपपन्नम् , यथाव्यालिनिर्णयमेव अनुमानो. पपत्तेः, अन्यथा अतिप्रसङ्गात् । 'कुण्डे दधि' इति प्रत्ययस्य तदन्यसम्बन्धपूर्वकत्वमेव प्रविपन्नम्, तत्संयोगस्य ताभ्यामन्यत्वादिति चेत् ; न; प्रत्यासत्तिपरिणामस्यैव संयोगस्यापि प्रत्यक्षेण प्रतिपत्तेः, अन्यत्र विवादात् । न विवादः, अन्वयव्यतिरेकितया प्रतिभासभेदात् भिन्नस्यैव . -सन्देह क-आ०, २०, ५० ज्ञान-, २०,०।
१।१०८] प्रथमः प्रत्यक्षपस्तावा संयोगस्य परिज्ञानात | अन्वयी हि संयोगी सत्यसति च संयोगे तस्योपलम्भात , व्यतिरेकी च संयोगः सत्यति संयोगिनि तस्याप्रतिपत्तेः ; इत्यपि न युक्तम् , त-हेदादपि विभ्रमेताराका- राभ्यां ज्ञानस्येव कथनिदेव तद्धेदपरिज्ञानात् । आत्यन्तिफभेदस्य अभेदप्रतिभासेन प्रतिक्षेपात् । संयोगस्यैकत्ये तव्यतिरेकात संयोगिनोरप्येकत्वमिति चेत् , न, प्रतिसंयोगि भिन्नस्यैव तस्य प्रतिपत्तेः । कथमनुगतरूपागावे 'कुण्डं संयोगि दधि संयोगि' इत्यनुगतप्रत्यय इति चेत् । ५ कथम् 'संयोगः सम्बन्ध, समवायः सम्बन्धः' इत्यनुगतप्रत्ययः, सम्बन्धरुपस्याप्यनुगतस्याs. भावात् ? भावे तस्य सप्तमपदार्थत्वापत्तेः । न हि तस्य द्रव्यादीनां पञ्चानामन्यतमत्वम् । समवायाधारतया तदनभ्युपगमात् । अत एव न समवायत्वम् , समवायनानाले अनवस्थानाच्च । तस्मात्संयोगसमवाययोः स्वरूपमेव परस्परसादृश्यात् अनुगतप्रत्ययकारणमगीकर्तव्यम् , तद्वत् दधिकुण्डयोरपि । ततो निपिद्धमेतत् व्योमशिवस्य-"भिन्नेभ्योऽनुगतनत्ययस्याऽदशनात्" १० [प्रश० व्यो० पृ० ] इति भिन्नाभ्यामेव संयोगसमवायाभ्यां सम्बन्धप्रत्ययस्यानुगतस्योपल. म्मात् । तन्न संयोगोऽपि तव्यतिरेकी यत्पूर्वकत्वं 'कुण्डे दधि' इति प्रत्ययस्योपकल्प्येत् ? कुतः पुनः समवायाभावे 'शाखासु वृक्षः' इति प्रत्ययः ' इति चेदाह- अध ऊर्ध्वविभागादिपरिणामविशेषतः। इति । अध ऊर्ध्वं च ये विभागा मूलशासारूपा अवयवास्ते आदयो येपा पार्श्वमध्य- विभागानां तै: सह परिणामविशेषः कथञ्चिदभेदपरिणामस्तत इति । अभेदपरिणामाद्धि शाखाभिरिह शासिनः । शाखासु वृक्ष इत्येप प्रत्ययः परिदृश्यते ॥१०१२॥ तत्कथं तदृशेरन्यसम्बन्धपरिकल्पनम् । दृष्टान्यहेतुक्लुप्तौ हि न क्वचित्स्यादधस्थितिः ॥१०१३॥ यदि प शाखासु वृक्षः' इति प्रत्ययात्तत्र वृक्षस्य कार्यत्वेन वृत्तिः ; 'वृक्षे शासा' इत्यपि प्रत्ययातासामपि तत्र तथावृत्तिः प्राप्नुयात् । एवञ्च 'न यावच्छासा न तावदृक्षा, न यावच्च युक्षो न तावच्छाखा' इति परस्पराश्रयात् उभयाभावः परस्यापतेदित्यावेदयन्नाह- तानेच पश्यन् प्रत्येति शाखा वृक्षेऽपि "लौकिकः ॥१०८॥ इति । तानेव प्रकृतानवयवानवयविनञ्च पश्यत् मत्येति प्रतिपद्यते शाखा आधे. २७ -यो च सं-आ०, २०, प० । २-रेकवात् ता० । ३ तदभ्युप--आ०, घ०, प० । द्रव्यादिपञ्चान्य- तमतमत्वानभ्युपगमात् । ४ समवायाधारलादेव । ५ वृक्षे कार्यत्वेन वृत्ति । ६ -पत्तेरिल्या-आ०, घ०, प० । ७ "पटसन्तुष्विवेत्यादिशब्दाश्चमे स्वयं कृता । मनं गीति लेके स्यान् गौरित्यलौकिम् ।"-प्र०, मा. पा३५० । “वृझे शाखा शिलाश्चागे इत्येपा लौकिमा मनि । शिल्लख्यपरिगिटारनेरन्तर्योपसम्भनात ॥ तो पुनस्ता- खिति ज्ञान लोकातिनान्तमुच्यते ।" तत्त्व सं० पृ. २६७ ।
४०२ न्यायविनिश्चयपिवरणे [१११०८ यभूता वृक्षे आधारभूने, न 'वैवलं ताम वृक्षम , अपि तु तत्रापि ताः प्रत्येतीत्यपि. शब्दार्थः । यः प्रत्येति । लौकिमः। लोकेन तदारहारेण चरनीति लॉषिको व्यवहारीति यारा । अनेन व्यवहारप्रसिद्धस्यात् 'पृने शासाः' इति प्रत्ययस्याशक्यापहवरनमावेदयति । तदेवं समवायत्याभागत नाक्यविनः तद्पा परमाणुपु वृत्तिरित्यसनेवासो' कथं तस्य दर्शन ५ कथं वा ततश्लायातपनिवारणादिकम ? सतोऽपि न तस्य दर्शनम् ? नित्येनारमनेति चेत्, न , तत्रापि 'कारणस्य' "इत्यादिदोपात् । तथा हि- . दर्शनं यदि नित्येन पुरसाऽर्थस्य प्रकल्प्यते । नित्यं तदर्शनं पिन नित्यकारणसम्भने १ ॥१०१४॥ अन्त:करणसंयोगायपेक्ष्यविरहाद्यपि । संयोगो यः कथं क्यापि समाये निराहते ॥१०१५॥ तवयाभावतो न स्यानिमित्तमपि फिञ्चन । "समयायादिनासन्ननिमित्तं यत्परैर्मतम् ॥१०१६॥ ततोऽपेक्ष्यात्ययान्न स्यात्वदाचिदपि तवशिः । सर्वाग्रहप्रतिश्पः सति स्थूलेऽपि तत्कथम् ? १०१७॥ ततोऽनपेक्ष एवारमा दर्शनादि करोत्ययम् । तत्र तत्कार्यनित्य॑त्वदोषोऽयं दुरुपनमः ॥१०१८॥ सकृदेव च तत्कार्य सर्व स्यादनपेक्षणात् । क्षणान्तरे त्ववस्तुत्वमहेतुत्वात्प्रसज्यते ॥१०१९।। हेतुत्वेऽपि तदा स तत्कार्य स्यात्तथा पुनः । न च दृश्यते तस्मान्न नित्येप्रति हेतुता ।।१०२०॥ २० ततो विषयज्ञानहरिपादादिकार्यस्य फादाचित्रत्वं प्रमभावन्याभ्युपगच्छता कादा. चित्की शक्तिरात्मनः प्रमभाविनी चाभ्युपगन्तव्येति कथं तस्य नित्यत्वम् ! शक्तीनां सहका- रिरूपतया ततोऽत्यन्तव्यतिरेकादिति चेत् , न, व्यतिरेके शक्तित्वामावस्य निदितत्वात् । यथा पूर्वपूर्वशक्तिपरिहारेण क्थञ्चिदुत्तरोत्तरशक्त्युपादानमात्मनः तथा कश्चित् नानात्वपारि- माण्डल्यादिपरिहारेणैक्स्थूलाद्याकारोपादानं परमाणूनामप्यविरुद्धमिति 'नावयवेभ्यः स्थूल- मर्थान्तरम् । १- या ता-आ०,३०,५०।२-शब्द क आ०,य०प० १३ अश्यवी । ४ सवयविन । ५ "कार- णम्याश्ये नेश चार्यस्योपरम कथम्"-ता. टि०। ६ सयोगममवायाभारत समवायसमवायिकारणाभावात् । ७ समवायाद्विना तन्न नि-आ०, २०, ५०1८ -व दो-आ०, २०, ५० ॥ ९ सहकारिमानिध्य शत्तिरित्युद्योत- कर ।"-ता. टि०।१० नावविभ्य आ०, ब०, प० ।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव ५ - १।११.] अर्थान्तरत्वे पुनरपि तदाशङ्कापूर्व दूपणमाह- तुलितद्रव्यसंयोगे स्थूलमर्थान्तरं यदि । तन्न रूपादिरन्यश्च साक्षरीक्ष्येत सादरैः ॥१०॥ इति । तुलितानाम् उन्मानपरिच्छिन्नानां द्रव्याणां तन्तुवीरंणादीनां संयोगे स्थूलम् अवयविद्रव्यम् अर्थान्तरं तुलिनद्रव्येभ्यो भिन्नं यदि चेत् ; तत्र स्थूले रूपादिः, आदि- शब्दात् रसादिश्च अन्यः अवयवरूपादिभ्योऽर्थान्तरभूतो न कोवलम् अवयवरूपादिरेवेति च शब्दः । 'भवेत्' इत्यध्याहारः । भवत्येव अवयवरूपादेस्तद्रूपादिप्रादुर्भावस्य' "गुणाश्च गुणान्तरमारभन्ते" [वैशे०सू० १।१।१०] इति वचनेनाभ्यनुज्ञानादिति चेत् ; आह- ईक्ष्येत दृश्येत तत्र रूपादिन्यः । न च धीयते । न हि तन्तुरूपादिरन्यः, अन्यश्च पटरूपादिरुपलभ्यते, तथैवासम्प्रतिपत्ते । तथापि तदुपलब्धिकल्पनायां न किञ्चित्क्वचिदेक. मुपलब्धं भवेत् । उपलम्मत्याभिधानस्य जातिविशेपस्य उवाभावादनुपलब्धिरिति चेत् ; क्थेदानी तद्विशेषस्य भावः ? तन्तुरूपादाविति चेत् । पश्यत आश्चर्य यन्महति पटरूपादी से नास्ति अमहति तन्तुरूपादौ विद्यत इति । 'कुतो यावत्र तस्यास्तित्वम् ? तपादेरुपलब्धे. रित्ति चेत् ; न ; तस्यापि तदवयवरूपादेर्भिन्नस्यानुपलम्भात् । पुनस्तदवयवरूपादौ तदस्तित्व परिकल्पनायामनवस्थापत्तेः । ततः क्वचिदपि कार्यद्रव्ये रूपादेः कारणरूपादिव्यतिरेकेणानुपलब्धेः निर्विपयमेवेदं अद्वयम्-"अनेकद्रव्येण समवायाद्रूपविशेपाच रूपोपलब्धिः । एतेन रस- गन्धस्पर्शेपु ज्ञानं व्याख्यातम्" [वै० सू० ४।१।८,९] इति । तन्न जातिविशेषाभावात्तस्या- नीक्ष्यत्वम् । इन्द्रियाभावादिति चेत् ; न; इन्द्रियवद्भिरुपलब्धिप्रसगात् । तदाह- -'साक्षः इति । सहारिन्द्रियैर्यर्तन्त इति साक्षास्तैः से ई येत । आदरभावानेति चेत् ; न; आदर- वद्भिस्तदीक्षणापत्तेस्तदाह-सादरी आदरवद्भिः स ईक्ष्येतेति । तत्रैव दूषणान्तरमाद- गौरवाधिक्यतत्कार्यभेदाश्च [आसूक्ष्मतः किल] । इति गुरो वो गौरवं तस्याधिक्यमतिरेकः, तच्च तस्य गौरवस्य कार्यभेदाः फलविशेषाः तुलानतिविशेषलक्षणा: ते च गौरवाधिक्यतत्कार्यभेदाः । पशब्दान्न केवलं रूपादिरेव तत्र स्थूले 'ईक्ष्येरन्' इति वचनपरिणामेन सम्बन्धः । द्वितन्तुके गुरुत्वं हि तन्तुगोरवतोऽधिकम् । ततोऽपि च तदारब्धे द्रव्ये तदभिवृद्धिमत् ॥१०२१॥ । २० , .. १ "वीरणशब्दः कटसमवायिकारणवाचक इह तन्तु पट. इह वीरणेषु कद इनि वश्यमाणत्वात् ।"- ता. टि२-वस्तस्य मा०, ब०, प० । ३ पश्चात्तात्पर्य य-आ०, २०, प० । ४ जातिविशेप. 1,५ -स्ति स्वाप त-आ०, ब०, ५० । .६ तन्नुरूपादौ । ७ जातिविशेषस्य । ८ "तेरा तन्दनामवयवा अंगवस्तेषां स्पादिस्त- सात"-ता. टि०। ९ -नीशवम् आ०, २०, ५० । १० सह ई-आ०, ३०, प० ।'
न्यायविनिश्चयविवरणे [ ११.०८ यभूता वृक्षे आधारभूते, न केवलं तासु वृक्षम , अपि तु तत्रापि ताः प्रत्येतीत्यपि- शब्दार्थ. । यः प्रत्येति ? लौकिकः। राकेन तद्व्यवहारेण चरतीति रोकिको व्यवहारीति याना । अनेन याहारपमिद्धत्वात् 'युधे शासा' इति प्रत्ययस्याशक्यापरवत्यमावेदयति । तदेय समयायस्याभारात् नारयविनः तद्रूपा परमाणुपु वृत्तिरित्यसन्नेवासा' कथं तस्य दर्शन ५ फथ या ततश्शायातपनिवारणादिक्म ? सतोऽपि केन तस्य दर्शनम् ? नित्येनात्मनेति चेत् , न , सनापि 'कारणस्य' "इत्यादिदोषात् । तथा हि- दर्शनं यदि नित्येन पुरसाऽर्थस्य प्रकल्प्यते । नित्यं तद्दशन रिन नित्यसरणसम्भो ? ॥१०१४॥ अन्तःकरणसयोगाद्यपेक्ष्यविरहाद्यपि । संयोगो वः कथं क्वापि समवाये निपटने ॥१०१५॥ 'तद्वयाभावतो न स्यानिमित्तमपि किञ्चन । "समायादिनासन्ननिमित्त यत्परैर्मतम् ॥१०१६॥ ततोऽपश्यात्ययान्न स्यात्कदाचिदपि तशि. । सर्वाग्रहप्रतिश्पः सति स्यूलेऽपि तत्कथम् १ १०१७|| ततोऽनपेक्ष एवात्मा दर्शनादि करोत्ययम् । तत्र तत्कार्यनियंत्वदोपोऽयं दुरुपनमः ॥१०१८॥ सकृदेव च तत्कार्य सर्व स्यादनपेक्षणात् । क्षणान्तरे त्यस्तुत्वमहेतुत्वात्प्रसज्यते ॥१०१९।। हेतुत्वेऽपि तदा स तत्कायं स्यात्तथा पुनः । न चैनं दृश्यते पस्मान्न नित्येप्पस्ति हेतुना ॥१०२०॥ २० ततो विषयज्ञानहर्पविषादादिकार्यस्य कादाचित्कत्व समभावञ्चाभ्युपगच्छठा काटा. चिक्की शक्तिरात्मन. मभाविनी चाभ्युपगन्तव्येति क्थ तस्य नित्यत्वम् । शक्तीना संहका- रिरूपतया सतोऽत्यन्तव्यतिरेकादिति चेत् , न, व्यतिरेके शक्तित्वाभावस्य निवेदितत्वात् । यथा पूर्वपूर्वशतिपरिहारेण कथञ्चिदुत्तरोत्तरशक्त्युपादानमात्मनः तया कथञ्चित् नानात्वपारि- माण्डल्यादिपरिहारेणैकस्थूलाद्याकारोपादान परमाणूनामग्यविरुद्धमिति 'नावयवेभ्यः स्थूल- मर्थान्तरम् । २५ १-१ का ता-भा०,२०,५०१२-गब्द र आ०,५०प० । अवश्यी । ४ अवयविन । ५ “वार- णस्था ये तेषा कार्यम्योपरम- क्यम्"-ता. टि० । ६ सयोगममवायाभावतः समवाय्यसमवायिकारणाभावान् । ७ समवायाद्विना तन नि-आ०, २०, ५० 1 ८ व दो-आ०, य०, प० । ९ सहकारिसादिभ्य शक्तिरित्युद्योत कर । -ता. टिक। १० नावरिभ्य आ०, ब०, प० ।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव. ४२३ ५ अन्यश्च २११.] अर्थान्तरत्वे पुनरपि तदाशकापूर्व दूपणमाह- तुलितद्व्यसंयोगे स्थूलमर्थान्तरं यदि । तत्र रूपादिरन्यश्च साक्षरीक्ष्येत सादरैः ॥१०९॥ इति । तुलितानाम् उन्मानपरिच्छिनानां द्रव्याणां तन्तुवीरणादीनां संयोगे स्थूलम् अवयविद्रव्यम् अर्धान्तरं तुलितद्रव्येभ्यो भिन्नं यदि चेत् । तत्र स्थूले रूपादिः, आदि- शब्दात् रसादिन अन्यः अवयवरूपादिभ्योऽर्थान्तरभूतो न केवलम् अवयवरूपादिरेवेति च शब्दः । 'भवेत्' इत्यध्याहारः । भवत्येव अवयवरूपादेस्तद्रूपादिप्रादुर्भावस्य "गुणाश्च गुणान्तरमारभन्ते" येशे सू० १३१४१०] इति वचनेनाभ्यनुज्ञानादिति चेत् ; आह- ईक्ष्येत दृश्येत तत्र रूपादिरन्यः । न च वीक्ष्यते । न हि तन्तुरूपादिरन्यः, पटरूपादिरुपलभ्यते, तथैवासम्मतिपत्तेः । तथापि तदुपलविकल्पनायां न किञ्चित्क्वचिदेक- मुपलब्धं भवेत् । उपलम्भत्वाभिधानस्य जातिविशेपस्य तयाभावादनुपलब्धिरिति चेत् । क्चेदानी तद्विशेषस्य भावः तन्तुरूपादाविति चेत् ; पश्यत आश्रयं यन्महति पटरूपादी से नास्ति अमहति तन्तुरूपादौ विद्यत इति । 'कुतो वा तत्र तस्यास्तित्वम् ? तपादेरुपलब्धे- रिति चेत् ; न ; तस्यापि तदवयवरूपादेर्भिन्नस्यानुपलम्भात् । पुनस्तदवयवरूपादौ तदस्तित्व. परिकल्पनायामनवस्थापत्तेः । ततः क्वचिदपि कार्यद्रव्ये रूपादेः कारणरूपादिव्यतिरेकेणानुपलब्धेः निर्विषयमेवेदं वद्वयम्-"अनेकद्रव्येण समवायापविशेपाच रूपोपलब्धिः । एतेन रस- गन्धस्पर्शेषु ज्ञानं व्याख्यातम्" [वै० सू० ४।११८,९] इति । सन्न जातिविशेपाभावात्तस्या- नीश्यत्वम् । इन्द्रियाभावादिति चेत्, न, इन्द्रियवद्भिरुपलब्धिप्रसङ्गात् । तदाह-'साक्षः' इति । सहारिन्द्रियैर्वर्तन्त इति साक्षास्तैः संई येव । आदराभावान्नेति चेत् ; न; आदर. वद्भिस्तदीक्षणापत्तेस्तदाह-सादरैः आदरवद्भिः स ईक्ष्यतेति । तत्रैव दूपणान्तरमाह- गौरवाधिक्यतत्कार्यभेदाश्च [आसूक्ष्मतः किल] । इति गुरोभीवो गौरवं तस्याधिक्यमतिरेकः, सच्च तस्य गौरवस्य कार्यभेदाः फलविशेषाः तुलानतिविशेषलक्षणा; ते च गौरवाधिक्यतत्कार्यभेदाः । पशब्दान्न केवलं रूपादिरेव तत्र स्थूले 'ईश्न्येरन्' इति वचनपरिणामेन सम्बन्धः । द्वितन्तुके गुरुत्वं हि तन्तुगौरवतोऽधिकम् । ततोऽपि च तदारब्धे द्रव्ये तदभिवृद्धिमत् ॥१०२१॥ १ "वीरणशब्द क्टसमवायिकारणवाचक यह तन्तु पट इह वीरणेषु द इति वक्ष्यमाणत्वात् ।" ता. टि । ३ -नस्तस्य आ०, ब०, प० । ३ पश्चात्तात्पर्य य-आ०, २०, २० । ४ जातिविशेषः । ५ स्ति वापे त--आ०, ५०, प० । ६ तन्नुरूपादौ । ७ जातिविशेषम्य ! ८ "तेपा रान्तूनामवयवा अंगवस्लेषा रूपादिस्तु- स्मान्"-ता. टि. १ ९ -नीमत्वम् आ०, २०, प० । १० सह ई-आ०, २०, ५०। .
४२४ न्यायविनिश्चयविवरणे [१११११ वापदेवं पटद्रव्यं यावत्परिणामक्न् । तत्तथा किन्न वीक्ष्येत सादरैः प्रतिपत्तभिः ॥१०२२॥ इन्द्रियागोचरत्वाचेद्भवत्येवं तथापि तत् । तुलानतिविशेषैस्तत्कायः करमान्न दृश्यते ॥१०२३॥ . तेषामपि न चाटिर्भवतां हेतुसम्भवात् । अंत एयाह तत्कार्यभेदाश्चेति विदांवरः ॥१०२४|| अत्र परस्य परिहारं दर्शयन्नाह- आसूक्ष्मतः किल । अतौल्यादर्थराशेस्तद्विशेपानवधारणम् ॥११॥ इति । तद्विशेपस्य कार्यद्रव्यगतस्य गौरवाधिस्यविशेषस्य तत्कार्यविशेपस्य च अनवधा. रणम् अनिश्चयः। कस्मात् ? अतौल्यात् तोल्यत इति तोला, कर्मणि धम् , तस्य भावस्ती- त्यम् , न तोल्यम् अताल्यं तुलया परिच्छेत्तुमशक्यत्वं तरमात्। कस्य ? अर्थराशेः अर्थानां परमाणुटाणुकत्र्यणुकपडणुकाष्टाणुकाल्पांशुतन्तुपटानां राशेः । आ कुतः आसूक्ष्मतः आ परमाणुभ्यः परमाणूनभिविधीकृत्येति यावत् । न हि महत्यनेकद्रव्ययशी तोल्यमाने १५ तन्मध्यपातिनो गोरवादेः तत्कार्यस्य च प्रतिद्रव्यमियत्तयोपलक्षणम् कार्पासमारतोलने तत्पातिनोऽशुकस्येव सम्भवतीति परस्य भावः । शास्त्रकारस्तबारुवि फिलशब्देन द्योतयति । फरमात् ? अनुपलक्षितस्य भावासम्प्रसिद्धः । तथा हि- गौरवादि पृथक् वत्र यदि नैवोपलक्ष्यते । कथं तस्यास्तितां नमो व्योमाम्भोजवदासा ॥१०२५॥ गौरवादेः क्रियायाध तस्कृताया असम्भवे । सदपेक्षं कथं तस्यात् समवाय्यपि कारणम् ॥१०२६॥ द्वितन्तुकादि तार च कथं तद्रव्यमुच्यताम् ।। कियावत्यादिकं यस्मास्त्रितयं द्रव्यलक्षणम् ॥१०२७॥ तन्नातोल्याद्गुरुत्वादेस्तनास्त्यनवधारणम् । आहासिद्धत्वमप्यस्य हेनोः सम्प्रति शाम्बकृत् ॥१०२८॥ ताम्रादिरक्तिकादीनां समितकर्मयोगिणाम् । फथमातिलकात् स्थूिलप्रमाणानवधारणे] ॥१११॥ इति । नहि सम्भवत इयरवेनातोलनम् , अन्यथा अर्धगुखापरिमाणं रक्तिका आदिपा मापकादीनां ते रक्तिकादयः, हा शुल्लमादिर्यस्य मुवर्णादेः तस्य रफिफादयः ताम्रादिरक्ति- १ तन एवाह न त-आ०, २०, ५०। २ "वियागुणवममवायिरगभिनि द्रव्यलक्षणम् ।"-१० म० 111५:३-मायनव-आ०, ५०, ५०१ योगिनाम् मा०, २०, ५० । २० २५ . २१११२] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः कादयः तेपाम् , कथं 'मानम्' इनि वक्ष्यमाणेन सम्बन्धः मानं तोलनम् । कीदृशानाम् ? समितकमयोगिणां पृथगवधारिताः समिताः, तेच ते पुनः कमेण तुलीयोगिनश्च समित- कर्मयोगिणः नेपाम् , आ कुतः तेषां तोलनम् ? आ कुतश्च समितक्रमयोगिणस्ते ? इत्याह- आतिलकात् । तिलपरिमाणं तिलकं तद्वधीकृत्य ततः प्रभृति वा । दृश्यते हि तिलकस्यै- कस्येयत्तया तोलनं पुनस्तदपरन्यासे तदधिकस्य तावदेवं यावद् रक्तिकायाः, तत्रापि तावदेवं ५ यावन्मापकादेस्तोलनम् । एवम् अल्पस्यांशुकस्य प्रथममियत्तया पुनस्तदवयविनः क्षेपे तदधिकस्य तत्रापि तावदेवं यावत्तन्तोः, तत्रापि तावदेवं यावदन्त्यावयविनः पटादेर्भवति तोलनम् । तन्न वस्तुराशिगतस्यापि सम्भवतः सम्भवत्यतोलनम् । यत्तु कार्पासभारमध्यपातिनोंऽशु. कस्येवेति ; तदपि न सारम् ; निपुणवणिज्ञां तत्रापि नोलनस्यैव प्रतीतेः । अतो यद्यतोलनम् असम्भव एव तद्विपयस्येति भावः । महति चाराशी तोल्यमाने या कस्य प्रमाणानवधारणम् ? अपयविनामिति - चेत् ; आह- २० स्थूलप्रमाणानवधारणे ॥११॥ अल्पभेदाग्रहान्मानमणूनामनुपज्यते । इति । स्थलस्य अवयविनः प्रमाणमियत्ता तस्यानवधारणमनिश्चयः तस्मिन्नभ्युपगम्यमाने १५ मानं परिच्छेदः 'पटोऽयं पटोऽयम्' इत्यादिना रूपेण परमाणूनामनुपज्यते प्राप्नोति । तथा प यतो भयं तदेवापतितं परमाणुदर्शनाद्विभ्यतस्तस्यैव प्राप्तेः । वन हेतुमाह-अल्प- भेदाग्रहात्' इति । पटापेक्षया तन्तवस्तदपेक्षया वदवयवास्तदपेक्षयापि तदवयया यावत्पर- माणवः अल्पभेदा अवयविन एप पामर्थराशौ तोल्यमाने प्रत्येकमियतया तपग्रहाद- प्रतिपत्तेः । अंशित्वेन पटस्पेव तन्वादीनामियत्तया । अमक्षात्परमाणूनां परिज्ञानं प्रसज्यते ॥१०२९॥ तेपामध्यपरिक्षाने वहिनिविवर्जितम् । जगत्प्राप्नोति योगाना दोषोऽयं दुरुपक्रमः ॥१०३०॥ तनावयविनां तदा तदनवधारणम् । अवयवानामिति चेत् ; भाइ- अंशुपातानुमादृष्टेरन्यथा तु प्रसज्यते ॥११२॥ इति । अन्यथा परपरिकल्पिताद्वयविनां ववधारणं नावयवानामिति प्रकारदन्येन अवयवानामपि तदवधारणमिति प्रकारेण प्रसज्यते प्रसक्तिर्मवति । अवयविनामेव केपाठिच. 1 -योगिणश्च ता०।२-योगिनः मा०, २०, ५०१३अपभेदादिति मा०,९०,५०१-वादीना- आ., या, प० ।
-- ग्यायविनिश्चयविवरणे [११११३ दल्पपरिमाणानामितरापेक्षया, अवयवत्वादिति भावहेतुः हेत्वन्तरगाह-'अंशुपातानुमादृष्टे।' इति । महति कार्पासभारे तोल्यमाने यस्तत्रांशोः पातस्तस्य याऽनुमा तुलानतिविशेपालिङ्गात् , तस्याः दृप्टेदर्शनाच अन्यथा तु प्रसज्यत इति । अपि च, परमाणुपर्यन्तंमध्यपातिनामवयव- विशेषाणामशक्येयत्तातोलनानां यद्यमावः पर्यन्तोऽष्यवयवी न भवेत् तस्याप्यवयवाधीनम्यवाभ्यु- ५ पगमात् । भावश्चेत् ; तबाह- क्षीराद्यैरविजातीयैः प्रक्षिप्तः कमशो घटः । तावद्भिरेव पूर्येत यावदिन विपर्ययैः ॥११३॥ इति । आदी भवमा क्षीरमाचं येषां नीरादीनां तः, अविजानीयैः एकजात्यधिष्ठान: प्रक्षिप्तैः घटे निवेशितैः । कथम् प्रामशः परिपाट्या स घटस्तावद्भिरेव तत्परिमाण १० पूर्यंत पूर्णः क्रियेत यावद्भिः यत्परिमाणैर्न पूर्यत विपर्ययैः युगपनिवेशिनः विजातीयैर्वा युगपनिवेशितैः, द्रव्यस्यैकस्यैवारम्भाद्विजातीयेस्तु तस्याप्यनारम्भात् । ततो युगपत्क्रमाभ्यां तावद्भिरेव प्रक्षेपविषयैरेकानकद्रव्योत्पादनैर्घटस्यापरिपूर्णेतरतया भेदोपलब्धिर्भवेदिति भावः । एतच्छायमेव धर्मकीर्तिनापि प्रतिपादितम्-- "तस्य क्रमेण संयुक्त पांशुराशौ सकृयुते । भेदः स्याद्गौरवादीनां पृथक् सह च तोलिते ॥” [अ० वा० ४.१५७] इति । ननु युगपनिवेशितेरपि द्विथुलुकाद्यपरापरद्रव्यारम्भकमेणैव अन्त्यावयविन आरम्भ. स्ततः कथं तैरप्यपरिपूर्तिः? द्रव्यबहुत्वे परिपूर्तेरेवोपपत्तेरिति चेत् ; न; सर्वैरपि क्षीरादिचुलुकै। युगपत्प्रवृत्तसंयोगैरेकस्यैव द्रव्यस्य कैश्विदारम्भोपगमात् । येषां तु नैवमभ्युपगमः, तेषां कथं तन्तुषु पटः ? न हि तैस्तस्यानारम्भे मन भावः । तदारम्भकाणां खण्डावयविनां तब भावात् २० तस्यापि तत्र भाव इति चेत् ; न, उपचारापनेः । तथा च कथं तद्विपयात् 'तन्तुपु पटः' इति प्रत्ययात् सम्बन्धसिद्धि ? मुख्यस्यैव 'कुण्डे दधि' इत्यादेः प्रत्ययस्य सम्बन्धपूर्वकस्योपल. म्भात् । न हि मुख्य दृष्टो धर्मोऽन्यत्र योजनमर्हति, पावकधर्मस्य काष्ठजन्मादे माणवकेऽपि योजनप्रसङ्गात् । सम्बन्धोऽपि त्र उपचरित एवेति चेत्, कुनस्तर्हि मुख्यतस्तसिद्धिः ! कर्पटपण्डेषु पट इति प्रत्ययादिति चेत् ; न, रूढिवस्तदभावात् । भावेऽपि तमेव तत्साधनमनुत्ता २५ कुतः पदार्थप्रवेशादी 'इह तन्तुषु पटः, इह वीरणेषु कट' [प्रश० भा० पृ० १७१] इत्युपचरितस्य तस्योपन्यासः ? सति मुख्ये गौणोपन्यासायोगात् , तस्मादिष्टसिद्धरसम्भवात् । ततः साक्षादपि तन्तुभिः पटस्यारम्भो वक्तव्यः। तद्वन् क्षीरादिचुलुकैरप्यन्त्यस्य तद्रव्यस्येति न तैर्युगपनिवेशितैर्नानाद्रव्यारम्भ इत्यपरिपूर्तिरेव तैर्घटस्य । ततः सूकम्-'यावद्भिर्न विपर्ययैः' इति । १“पर्यन्तशब्देन अन्यावयवी प्राच."-ता०रि । २ -वाधारस्य-आ०, ब०, प० । ३ सम्बन्धम्य सि-मा., ०, २०१५ प्रशस्तपादभाष्यादी । ५ गुणोप-आ०, २०, प० । ६ -प्यन्यस्य मा०, घ०, ५०। - १।११४॥ प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावा ४२७ ननु यद्यवयवी नाम न कश्चित् तर्हि परमाणव एवावशिष्येरन् , तेषां चानुपलम्भात् अहिर्वस्तुदर्शनशून्यं जगत्प्राप्तमिति चेत् ; न ; तेषामेव कुतश्चित्कथञ्चिदेकीभूतानामुपलम्भविष- यत्वात् । पटावयवानां परस्परमिव किन्न घटाययवैरप्येकीभावःभेदाविशेषादिति चेत् ? भवतोऽपि किन्न तदवयवाः पटमिव घटमध्यात्मन्यवस्थापयन्ति तदविशेषात् ? तस्यैव तत्र समवायादिति चेत् ; न; तत्रैव प्रश्नात् 'कुतः स तस्यैव न घटस्यापि' इति ? समवायस्यैवेयं शक्तिर्यस्पटमेव ५ तत्र योजयति नापरमिति चेत् ;न; स्वरूपव्यतिरेफेण शक्तरभावात् , स्वरूपस्य च सर्वत्राविशेषात् । प्रत्यवयवि नविशेषकल्पनायां तु समवायस्यापि तदनन्तरत्वेन प्रत्यवयवि भेदः स्यात् । तदर्था- न्सरत्वे तु कथं से तस्य' इति व्यपदिश्येरन् ? न समवायान्तरात् ; तदभावात् । स्वत एवेति चेत् ; पटोऽपि स्वत एव तन्तूनामिति किं समवायेन ? कयश्चित्तस्य तदर्थान्तरत्वकल्पनं तु तेषामेवैकीभावं पुष्णातीति कथन्न परोपालम्भस्तत्रापि भवेत्-समवायविशेषाणामपि परस्परमिव १० पदार्थान्तरमागैरपि न कस्मादेकीभावो भेदाविशेषात् ? स्वहेतुनियताच्छक्तिविशेषादिति चेत् ; समानं पटावयवध्वपीति न किञ्चिदेतत् । तनावयवी परपरिकल्पित इति कुतस्तत्र गुणकर्म- सामान्यादीनां सम्भवः ? तेषां तदानितत्वेन तदभावे सम्भवानुपपत्तेः । साम्प्रतं परमताक्षेपपुरस्सरं स्वमतमाह- नांशेवंशी न तेऽवान्ये वीक्ष्या न परमाणवः । आलोक्यार्थान्तरं कुर्यादत्रापोद्धारकल्पनाम् ॥११४।। इति । अंशेषु भागेषु अंशी भागी न वीक्ष्यो न दृश्यो 'वीक्ष्याः' इत्यनेन वचन- परिणामेन सम्बन्धात् । न ते अंशा अत्र अशिनि वीक्ष्याः। कीदृशाः स प ते च इति चेत् । अन्ये परस्परमेकान्तेन निर्भिन्नाः । परमाणवः तर्हि वीक्ष्या इति चेत् ; आह- न परमाणवी वीक्ष्या इति च सम्बन्धः । न हि तेऽप्यन्योन्यमेकान्तेन भिन्नाः प्रत्यव- भासन्ते । ततो न सन्त्येव परपरिकल्पिता बहिर्भावा दृश्यतयाऽभ्युपगतानां तेषामदर्शनादिति . मन्यते । कीदृशरतहि पहिर्भाव इति चेत् ? एकानेकरूपं जात्यन्तरमेवेति मा, तस्यैव प्रत्यक्षतः प्रतिपत्तेः । कथं तर्हि लोकस्य 'तन्तवोऽवयवाः पटश्चावयवी' इति व्यवहार इति चेत् ? आह-आलोक्य प्रत्यक्षतः प्रतिपद्य । किम् ? अर्थान्तरं जात्यन्तरम् । कुर्यालोकः । २५ क्य काम् ? अत्र अर्थान्तरे अपोद्धारस्य अवयवादिपृथकरणस्य कल्पनाम् अभिसन्धिम् । ततोऽभिसन्धिनिबन्धन एवायं व्यवहागे न प्रत्यक्षनिबन्धन इति भावः । १ योगस्यापि । २ घटावयवा. । ३ तदना-आ०, ५०, ५०। ४ "शत्तिविशेषा स्वम्पविशेषा इत्यय "- ता. टि.। “समवायस्तु सम्बन्धो नित्य, स्यादेक एव स इगते ताकिचरझायामुत्तम्"-ता०टि.। "म्यशब्देन समघायस्वरूपविशेषा बाच्याः" ता०टिक।५-पागांप-आ०, २०,५०।
4 in ग्यायचिनिश्चयपियरण [१९९३ दल्पपरिमाणानामितरापेक्षया, अपयवत्वादिति भावहेतु: । हेवन्तरमाइ-'अंशुपातानुमादृष्टेः' इति । महति कार्यासमारे तोल्यमाने यस्तनांशः पातस्तस्य याऽनुमा तुलानतिविशेपालिहात् तस्याः रप्टेदर्शनाच अन्यथा तु प्रसज्यत इति । अपि च, परमाणुपर्यन्तमध्यपातिनामवर विशेषाणामशक्येयत्तातोलनानां यद्यभावः पर्यन्तोऽयवयषी न भवेत् तस्याप्यायाधीनस्यैया ५ पगमात् । भानश्चेत् ; तबाह- क्षीराचैरविजातीयैः प्रक्षिप्तः क्रमशो घटः। तावद्भिरेव पूर्येत यावद्भिर्न विपर्ययः ॥११३॥ इति । आदो भवमाद्यं क्षीरमाचं येषां नीरादीना तैः, अविज्ञानीयैः एकज्ञा प्रक्षिप्तः घटे निशिनः । कथम् क्रमशः परिपाट्या स घटस्तावद्भिरेव त १० पूर्यत पूर्णः क्रियेत यावद्भिः यत्परिमाणैर्न पूर्येन विपर्ययैः युगपनिवेशितः युगपनिवेशिता, द्रव्यस्यैकस्यैवारम्भाद्विजातीयन्तु तस्याप्यनारम्मात् । ततो तावन्द्विरेव प्रक्षेपविपयेरेकानेकद्रव्योत्पादनघटस्यापरिपूर्णेतरतया भेदोपलब्धि एतच्छायमेव धर्मकीर्तिनापि प्रतिपादितम्- "तस्य क्रमेण संयुक्ते पांशराशी सकृद्युते । भेदः स्याद्गौरवादीनां पृथक् सह च तोलिते ॥" [अ० वा प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्ताया ४२२ . १२११५] द्रव्यग्रहणेन च गुणादिमात्रस्य प्रतिक्षपः तत्र प्रमाणाभावात् , निवेदययिष्यते चैतत् । मैतुष्प्रत्य. येन तु तदुभयमेदैकान्तस्य 1 दृश्यत एव भेदेकान्तेऽपि तत्प्रत्ययः 'गोमान् देवदत्तः' इति सम्बन्धमात्रात्तत्कथं तेन तत्प्रतिक्षेप इति चेत् ? 13 द्रव्यतलक्षणयोः कथम्बिदभेदादन्यस्य सम्पन्धस्याभावात् , समवायस्य प्रतिक्षेपात् । एकान्तभेदे कार्यकारणभावस्याप्यनुपपत्तेः । गुणपर्ययाणां व्याख्यानं 'ते' इत्यादि । 'ते' इति गुणपर्ययाः । कथं पुनद्रव्ये गुणी- ५ भूतानां तेषां तच्छब्देन परामर्शः द्रव्यस्यैव मुख्यतया तदुपपसे बहुवचनात् द्रव्यस्य बहुत्वेना. प्रक्रमादिति चेत् ;न; गुणादीनामपि तथा तदभावात् , समासात्तद्वहुत्वस्याप्रतिपत्तेः । अप्रतिपन्नमपि सम्भवति तत्र तदिति चेत् ; न; द्रव्येऽपि जीवादिभेदेन तदविशेषात् , पुलिङ्गवत्त्वस्यापि न विरोधः जीवादीनां पुल्लिङ्गत्वादिति चेत्, न शब्दोपक्रमेण गुणादीनामप्रधानत्वेऽपि बुद्ध्युप- क्रमेण प्राधान्यात् । बुद्धयुपक्रमस्य च शब्दोपक्रमादेव प्रतिपत्तेस्तस्य तदविनाभावात् , बुद्धावाय- प्रधानतयैव तेपामुंपक्रम इति चेत् ; न, प्रथमं स्वरूप एवोपक्रमात् विशेष्यापेक्ष्या पश्चादेव प्राधान्यप्रक्लुप्तः । द्रव्यपरामर्शोऽपि कस्मान्न भवति प्राधान्याविशेषादिति चेत् १ न; प्रयोजना- भावात् । द्रव्यलक्षणस्य 'गुणपर्ययवत्' इत्यनेनैव प्रतिपादनात् । ततो गुणपर्यया एव ते। सह च कमश्च सहकमी, ताभ्या तत्र द्रव्ये वृत्तिरात्मलाभपरिणतिर्येपा ते सहकम- वृत्तयः सहयूत्तयो गुणाः क्रमवृत्त्या पर्ययाः । के पुनस्तद्गुणादय इत्याह-विज्ञानव्यक्ति- १५ शक्त्यायाः इति । विज्ञानं दानादिचितम् , उपलक्षणमिदं मन्त्रादेरपि, तस्य व्यक्तिश्व दृश्य- मान रूपं 'व्यज्यत इति व्यक्तिः' इति व्युत्पत्तेः । शक्तिय कार्योपजननसामर्थ्यम् , विज्ञान व्यक्तिशक्ती ते आये येषां ते विज्ञानव्यक्तिशक्त्याद्या इति । आयशव्दाद् अन्येऽपि सहवृत्तयः सुखज्ञानवीर्यपरिस्पन्दादयः क्रमवृत्तयश्च सुखदुःसहर्षविपादादयः परिगृह्यन्ते । कथं पुनर्व्यतिशयोः सहभावः ? तस्य भेदनिष्ठत्वात् , तयोश्च भेदाभावादिति २० चेन्न; अभेदे व्यक्तिवच्छतेरपि प्रत्यक्षायसहान तथा वकिलहनुमानेन ? विप्रति- पत्तिनिवारणमिति चेत् ; सैव पुतः प्रत्यक्षविषये विप्रतिपत्तिः १ अनन्तरं "तत्फलस्य स्वर्गा देरदर्शनादिति चेत् ; न ; व्यक्तावपि "तदभेदेन "तत्प्रसङ्गात् । तथा च कथं तदनुमान धर्मिण्यसिद्धे तदनुपपत्तेः ? निश्चयात्तत्र" विप्रतिपत्तिनिवृत्तौ शतावपि स्यात् । तन्न शक्तव्यक्त्य- भेदः, व्यक्तिदर्शननिश्चयाभ्यां तद्दननिश्चयाभावात् । एतेन "सामग्री शक्तिरिति प्रत्युक्तम् । तथा हि- .. १ मतुप्रत्य-भा०, २०, ५०।२ तरप्रयागो गो-प० । तत्ययोगी मनिमान देव-आ०, ब० । ३-बारक , प० । ५ मतुष्प्रत्ययेन । ५ पत्वेन । ६ तद्विगे-आ०, २०, ५० 1 ७ गुणा- दीनाम् । ८ -पर्याया आर, य०, ५०। ९ शक्यतुमानेन । १० दानादिकालस्य । ११ शात्यभेदैन । १२ विप्रतिपत्तिप्रसनार । १३ व्यको । ११ "न तावन्मीमासक्नदनान्द्रिमा शक्तिरस्माभिरन्युपैयते किन्तु कारणाना सरूम वा सहकारिमामयं वा !"-न्यायवा. ता. री० पृ. १०३ । “म्पपादुद्भवताय मह- कार्युपहितात् । न हि कल्पयितुं शकं शक्तिमन्यामतान्द्रियाम् ॥" न्यायम. पृ. ४१ । “किन्तु योग्य १० म्यायविनिश्चयविधरणे [१।११५ सामग्री यदि शक्ति स्यात्फलात्प्रागेव पश्यतः । इयं शक्तिरिहत्येवं निश्चयः स्यात्तदर्थिनः ॥१०३२॥ न चैवं कार्यदृष्ट्यैव तत्र निश्चयदर्शनात् । न पानिश्चितमध्यक्ष सामग्रीशक्तिवादिनाम् ॥१०३३॥ सत्यामेव च सामध्यां मत्रतत्रादिना कथम् । दाहस्यानलकार्यस्य प्रतिबन्धो भवेदयम् ? ॥१०३४॥ विना मवाद्यभावेन सामग्री विकलैव चेत् । ततस्तदा कथं दाहः काष्ठादेरपि मर्त्यवत् ॥१०३५|| सामध्येव न शक्तिस्तन्नापि जात्यादिरेव सा! दृश्यमानेऽपि जात्यादी शविष्टेरसम्मयात् ॥९०३६॥ तत्सम्भवेऽपि मन्त्रादी स्वतः शक्तिविनिश्चयात् । गुरूपदेशवैयध्य प्राप्तमेकान्तवादिनाम् ॥१०३७॥ सन्न व्यक्तिरेव शक्तिः, तद्वत्प्रत्यक्षवप्रसङ्गात् । नापि शक्तिरेव व्यक्तिः, तद्वदप्रत्यक्षत्वापतेः । नाप्येकान्तेन भेदः ; शक्तिशक्तिमद्भा- १५ वाभायोपनिपातात् । शक्तय॑क्तो समवायात्तद्भाव इति चेत् ; न ; "अशक्तिमत्त्वे तदनुपपत्तेः खरहवात् । शक्तिमत्त्वञ्च न तयैव शतया ; परस्पयनयात्-'तया शक्तिमत्त्वे तत्र तत्सम- वायः, ततश्च तया शकिमत्त्वम्' इति । नाप्यन्यया ; अनवस्थापत्तेः । तन्नैकान्तेन अभेदो भेदो या तत्रोपपन्ना, कनिदेव तयोरुपपत्तेः। तदाह-'भेदाभेदो' इति । केपामित्य- पेक्षायां विज्ञानव्यक्तिशतवाद्यानामिति विभक्तिपरिणामेन सम्बन्धः कर्तव्यः । निदर्शनमत्राह- २. 'रसादिवत्' इति । रस आदिउँपां गन्धादीनां तेपामिव तदिति। निरुपितञ्च रसादीनां भेदाभेदारमकस्वमिनि निदर्शनस्वेनोपन्यासः । यदि था, रसादयो ज्ञाननिर्भासाः तेपामिय तद्वदिति । प्रसिद्धच कर्कटीभक्षणकालभावियोधनिर्भासाना रसरूपादीनां भेदाभेदात्मकत्वं "योद्धम्य "नीलादिचित्र निर्मासः" [प्र. २० २१२२०] इत्यादावलधारकता तथैव निरूपणात् । "गुणपर्ययवद्र्व्यम्" ति०सू० ५।३८] इति सूत्रमिदं तत्वार्थस्य, इदमेव घ स्वया व्याविस्यासया कारिकायामुपक्षिप्तम् , तर किं गुणप्रहणेन 'पर्ययवद्र्व्यम्' इत्येवास्तु गुणानामपि परिच्छिन्नायनरूपतया पर्ययेष्वेवान्तर्भावादिति चेत् ? अनाह- । - - तावरिधनस्वरूपसहकारिसमिधानमेव पतिः । मवेयं द्विविधा शतिरुच्यते-अवस्थिता आगन्तुम च । मावाचन्छिको म्वरूपमवस्थिता शक्ति , आगन्तुका तु दण्डवादिसंयोगा।"-न्यायमं० पृ. ४९५ । "न हि नो दर्शने शक्तिपदार्थ एव नालि, कोऽमी ताई 1 कारणथम् । तिन् । पूर्वमनियनजानीय वम् , पटवारिवैवन्य- प्रयुकार्याभाववरवं वीि अनुमाहरखगाम्यात् सहकारिवपि शक्तिपदप्रयोगान्""-न्यायकुमु. ॥१३ । मन्यत आ०, २०, प० । २ मन्त्रादिना रश्चिन् व्यक्तिविशेष प्रति दाहशाक्तियनिरोधमले। ३ अप्रि- स्वादिजानिपा । व्यस पारिसरहिनन्वे । ५ बोधस्य आ०, २०, प.।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावा तन्त्रस्य व्याख्यान- सदापि सविकल्पाख्यासाधनाय क्रमस्थिते । गुणपर्यययोर्ने क्यमिति सूने द्वयग्रहः ॥११६।। इति । सूत्रे 'गुणपर्ययवद्र्व्यम्' इत्यत्र द्वयस्य गुणपर्ययद्वितयस्य ग्रह उपादानम् । कस्मात् ? गुणपर्यययो क्यामति । गुणश्च पर्ययश्च गुणपर्ययो, जातावेकवचनम् , तयोरैक्यमभेदो न, मानमभावरूपाविरुद्धधर्माध्यासादिति मन्यते इति हेतोः । यद्येवं गुणार्थिकोऽपि नयो वक्तव्या ; सति विषये 'तदवचनानुपपत्तेः, तत्कथं द्रव्यार्थपर्यायार्थतया द्विविधत्वमेव मूलनयस्य ? पर्ययार्थ एव गुणार्थोऽपि, पर्ययशब्दस्य सहकमभाविधर्मसामान्यकाचित्वादिति चेत् ; न तर्हि सूत्रेऽपि गुणग्रहणमर्थवत् , पर्ययशब्देनेव सामान्ययाचिना गुणानामपि प्रतिपत्तेरिति चेत् । न , ततः पर्ययप्रतिपत्तिसमय एव गुणानां तदनुपपत्तेः । न हि सामान्यशब्दायुगपदेव सकलतदर्थप्रतिपत्तिः, गोशब्दस्य 'नवार्थत्वेऽपि कदाधिकस्यचिदेव ततः प्रतिपत्तेः । तन्त्रेणानेकप्रतिपचिरपीति चेत् ; न ; गम्यत्वात् , व्याख्यानाच्य प्रतिपत्तेगरीयस्त्वात् । भवतु 'समयान्तरे ततस्तत्प्रतिपत्तिः तरिक गुणग्रहणेन ? सत्यम् । प्रयोजनक्शेन तद्गात् । तहिं तदेव तन्निमित्तं वक्तव्यं न भेद इति चेत् ; न ; प्रयोजनस्यापि भेदायत्तत्वेन भेदस्यैव मूलनिमित्तत्वोपपत्तेः । किमर्थ स्तर्हि भेदनह इत्यत्राह-सविकल्पाख्यासाधनाय । सह विकल्पैदेर्शत इति सविकल्पं युगपद्भाविनानाभेदमित्ति यावत तस्याख्या प्रतिपत्तिस्तया साधनं प्रति. पत्तिरेव तस्मै सविकल्पाख्यासाधनाय । कस्याः तदित्यत्राह-क्रमस्थितः क्रमेण परिपाट्या स्थितिः परापरपर्ययेप्यवस्थानं तस्याः । किंकालायाः ? सदा सर्वकालभाविन्याः । अपि. शब्दः मस्थितेः इत्यत्र द्रष्टव्यः । तात्पर्यमत्र- युगपद्वस्तु वक्तव्यं नानाधर्मसमाश्रयम् । बहिरन्तरनंशस्य तस्यानत्यवभासनात् ॥१०३८॥ क्रमानेकस्वभावं तत्तद्वदेवानुमन्यताम् । विरोधादिभयोन्मुक्तरुभयत्रापि सम्भवात् ॥१०३९॥ प्रतीतिश्च यथा तस्य प्रत्यक्षादन्यतोऽपि वा । प्रतीयता तथा किन्न क्रमानेकस्वभावभृत् ॥१०४०॥ २० २५ ५ गुणार्थिकनुयावचन । २ पर्याया-आ०, २०, ५०। तत्त्वार्थवार्तिके (५.३८)तु गुणार्थनयस्य द्रन्या- वेिन्तर्भाव कृत । तथाहि-"मनु चोचम्-तद्विषयस्तीयो मूलनय प्राप्नोति, नैष दोष , द्रव्यस्य दावात्मानौ सामान्य विशेषश्चेनि । तत्र सामान्यमुत्सऽन्वय गुण इत्यान्तरम् । विशेषो भेद पर्याय इति पर्यायशब्द । तर सामान्य- विषयो नयो द्रव्याथिक । विशेषविषय पर्यायार्थिक तदुभयं समुदितमयुतसिद्धरूपं द्रव्यामित्युच्यते । न तद्विषयस्तृतीयो नयो भवितुमर्हति विक्रादेशत्वाचयानाम् ।"-राजवा०५।३८ । ३ "खर्गे पशुवाग्वदिड्नेवणिभूजले" इत्यमर । समवायान्तरे भा०, म०, प० । कारान्तरे । ५ पर्यय शब्दत । ६ -ते. परीत्या प्रष्ट-आ०, 4, प.।
४३२ भ्याययिनिश्चयपिवरणे प्रत्यक्षादपि नद्वित्तेः शक्तिमाचिव्यकाणात् । नानाद्यनन्तसमारवित्तिदोपः प्रसन्यते ॥१०४१॥ अन्यथा फल्पनातोऽपि सर्वकालस्थितेहात् ! फ्ल्पनान्तरवैयध्य प्रमाणान्तरवद्भवेत् ॥१०४२॥ फ्ल्पनातोऽपि तद्वित्तिर्यदि नेप्येत सौगतेः। समारोपव्यवच्छित्तिरनुमानफलं कथम् ॥१०४३॥ नासतोऽस्ति व्यवच्छित्तिः समारोपस्य तत्कृता । कल्पनाकृततद्विरोरारोपोऽप्यस्ति नापरः ॥१०४४॥ अनुमानमनिच्छन्तस्तद्व्यापारप्ररूपणे । गौरवाः स्युरतस्तेपां नाधिकारी विचारणे ॥१०४५॥ ततोऽनुमानमन्विच्छन्नेकत्वप्रतिवेदनम् । विकल्पाच्छचितो ब्रूयात्तद्वदध्यक्षतो वयम् ॥ १०४६॥ विकल्पकात् क्षणक्षीणादेकत्वप्रतिवेदनम् । इच्छन् कथं नु वादक्षाध्यक्षात्तन्न वाञ्छति ॥१०११] विकल्पादपि तद्वित्तिर्विकल्पान्तरतो यदि । अनवस्थानतो न स्यादारोपस्य व्यवस्थितिः ॥१०४८|| कथं वा वेदने जीवत्यभिलाप्येतरात्मके। प्रमानेकान्तरूपत्वं प्रत्यक्षस्य निषिध्यते ॥१०४९।। स्थायिना तेन यन्न स्यात्स्वपरस्थायितामहः । देवनिवेदितं चैतत्स्वयमन्यत्र तथा ॥१०५०॥ "द्रव्यात्स्वस्मादभिन्नाथ व्यावृत्ताश्च परस्परम् । लक्ष्यन्ते गुणपर्याया धीविकल्पाविकल्पवत् ॥" [सिद्धि० परि० ३ ] इति । अक्षव्यापारत: प्राच्यात् स्थायिप्रत्यक्षसम्भवे । परापराक्षव्यापारवैययं चेत्तदप्यसत् ॥१०५२॥ परापरोपकारस्य तेनादानात्तदात्मना । विकल्प इव केनापि निश्चयानिश्चयात्मनः ॥१०५३।। रातो युक्तं यथा गुणवद्रव्य तथा पर्ययवदपीति । अथवा, यस एवं गुणवद्रव्यमात्मादि सत्त एवं पर्ययवदिति सूत्रार्थः । गुणवत्त्व हि प्रसिद्धमेव, बुद्धयादिभिरात्मादेः, तच्च पर्ययवत्त्वाभावेऽनुपपन्नम् । तथा हि-बुद्ध्यादेश्नुत्पत्ती प्रयदात्मादे रूप तदेव तदुत्पत्तावपि क्थ प्रागिर पश्चादपि बुद्ध्यादिमत्त्वम् ' बुद्ध्यादे वादेवेति २० २५ ३० १ अगुमानना । १ -पणम् ता. १३ शास्त्रज्ञेमुरन आ., प०, ५० । केवल शास्त्रव्याख्यातर स्युन तु विचारका । चौद्ध 1 ५ प्रत्यक्षेण । ६ यहात्मादिरूप आ०, २०, प.1 ५३३ . . २११ ] प्रथमः प्रत्यक्षमस्तायः घेत् ; किन्न सर्वस्यापि तद्वत्त्वं व्यतिरेकाविशेषात् । आत्मादावेव भावादिति चेत् ; कः सप्तम्यर्थः १ स्वरूपमेवेति चेत् । न ; प्रागिव तस्य तदर्थत्वानुपपत्तः । समवाय इत्यप्यनेना- पास्तम् । प्रागभावी स्वभावस्तस्य पश्चादिति चेत् ; कुतस्तस्येति ? समवायान्तरादिति चेत् ; न; तस्याभावात् । भावेऽपि प्रागिव पश्चादपि ततस्तदनुपपत्तेः। तत्रापि प्रागभाविनः स्वभावस्य पश्चाद्भावे अनवस्थादोपात् । तादात्म्यादिति चेत् ; आत्मादेरेव स तादृशः कस्मा. ५ न भवति ? अनित्यत्वापत्तेः समवायेऽप्यविशेषात् । एवं हि समवायपरिकल्पनमदृष्टकल्पनत्वेन पापीया परिहतं भवति । ततः सिद्धं गुणवत्वात् पर्ययवस्वमात्मादेः, पूर्वापरस्खभावलक्षण्यस्यैव पर्यायार्थत्वात् । ननु एवं बुद्ध्यादिनाप्यात्मादेः तादात्म्यादेव तद्वद्भायोपपत्तेः किं तदर्थेन पर्ययवत्व. कल्पनेन १ अन्यथा तदर्थेनाप्यपरपर्ययवत्त्वकल्पनेन भवितव्यं तदर्थेनाप्यपरेण तत्कल्पनेनेत्य. १० भवस्थापत्तेरिति चेत् ; सत्यमेवेदं गदि परोऽप्येवं प्रतिबुद्ध्येत । न च प्रतियुष्यते अनेकान्त- वादापत्तिभयात , अतस्तं प्रति सैव तदापत्तिर्गुणवत्त्वेन व्यवस्थाप्यते । तच्च गुणवत्वं न गुणसमवायो नापि गुणतादात्म्यं यदन्यतरासिद्धं भवेत् , अपि तु गुणसम्बन्धमात्रम् । तस्य चोभयसिद्धस्य भवत्येव गमकत्वम् , अन्यथानुपपत्त्युपपत्तेः । ननु इह गुणा बुद्धयादयः, ते च पर्याया एव क्रमभावात् , ततत्त्वं च पर्यययत्त्वमेव । १५ सच्चेरिसद्धम् ; न साध्यम् । असिद्धश्चेत् ; न साधनम् । अन्यदेव पर्ययवस्वं ततः साध्यमिति चेत् । न ; ततोऽप्यन्यस्य तद्वत्त्वस्य साधने अनवस्थापत्तेः, असाधने साधनस्य व्यभिचारा- दिति चेत् ; न ; शक्तिल्यक्तिरूपतया साध्यसाधनयोर्भेदात् । व्यत्कयो हि बुद्धपादयः पर्यायाः; तद्वत्वेन प्रतिबुद्धयादिव्यक्ति भिद्यमानः शक्तिपर्ययेस्तद्वत्वं द्रव्यस्योपकलप्यते । शक्तिपर्यायाणा- मपरशक्तिपर्ययोपनिबन्धनत्वं यदि नास्ति व्यक्तिपर्यायाणामपि न भवेत् । अस्ति चेत् ; वस्थानमिति चेत् ; सत्यम् ; अनवस्थिता एव तत्पर्यया अनन्तशक्तित्वात् भावस्य । तदेव फुतोऽवगन्तव्यम् ? व्यक्तिपर्ययात् । शक्तिपर्ययस्य ततोऽपि परस्य 'तत्पर्यायस्यानुमानेऽनवस्था. पत्तेः । इत्यपि न युक्तम् ; कतिपयतदनुमानपर्यवसाने तद्वलभाविन 'उहादेव निरवधिशक्ति- पर्ययपरिच्छेदोपपत्तेः अनवस्थोपनिपाताभावात् । उहस्य चावश्याभ्युपगमनीयत्वात् , अनाद्यनन्तकालकलापस्याप्रतिपत्तः, आत्मादौ तत्सम्बन्धात्मनो नित्यत्वस्य अव्यवस्थापनप्रसङ्गात् । ततो युक्तं गुणवत्त्वेन पर्ययवत्वोपकल्पनम् । सम्प्रतिपत्चिविपये गुणवत्वे विप्रतिपत्तिविषय- पर्ययवत्वाविनाभानिश्चयसद्भावात् । अत एव च साध्यसाधनभावेन भेदात् सूने गुणपर्यययोः पृथगुपादानमित्यावेदयति 'सदापि' इत्यादिना-गुणपर्यययो क्यम् । इति एवं सूत्रे द्वयग्रहः भेदः । कुतः ? . अन- २० अन्यथा प्रतीतस्यैव आ०, य०, प.। २ तदेव न कु-आ०, ब०, प० । ३ व्यक्तिपर्यसाव, शक्तिपर्ययस्य । ५ शक्तिपर्यायस्य । ५ इत्यययुक्तम् आ, २०, ५०। ६ तदेव । ७-शतिपरि-आर, २०, २०१८ -निय- मतदाभा-भा०,५०, प।
५ १० न्यायविनिश्चयविवरणे [११११७ इत्याह-'सत् द्रव्यम् आपिसन्त्याश्रयत्वेनागच्छती(न्ती)ति 'सदापिसाः,विकल्पा गुणात्मानो भेदा यस्य तस्याख्या निर्णयः साधनाय निश्चयाय । कस्य ? क्रमस्थिते, फमभावित्वात क्रमा: पर्यायास्तेषां स्थितियस्मिन् तस्य क्रमस्थितेः पर्ययवतो यत इति । ततः स्थितं गुण- पर्यययोलिनलिभिभावप्रतिपादनार्थमुभयोपादानं सूने इति । अनिष्टप्रसङ्गपरिहाराय करमान भवति ? भवति हि गुण एव द्रव्यमित्युक्ते तत्प्रसनः सत्वचेतनत्यादिगुणाधारतया यौद्धविज्ञानस्य बुद्धिसुखादिगुणाधिष्ठानतया महेश्वरादेव अझमस्य द्रव्यत्वप्राप्तेरिति चेत् ; न, गुणवद्व्यमित्युक्तेऽपि तदप्राप्तेरित्यावेदयन्नाह- गुणवद्व्यमुत्पादव्ययध्रौव्यादयो गुणाः । दुद्राय द्रवति द्रोप्यत्येकानेक स्वपर्ययम् ॥११७॥ इति । गुणवद्रव्यमिति हि सून संक्षेतव्यम् । न चैवम् अक्रमस्यापि विज्ञानेश्वरादेव्यत्वा- पत्तिः । तत्र गुणवत्वस्यैव गुणव्यापकानामुपादादीनामभावन अभावात् । उत्पादादिव्याप्ता हि गुणाः कथं तदभावे भवेयुः वृक्षाभावे शिशपावत् ? तदिदमाह-'उत्पायव्ययध्रौव्यादयो गुणाः' इति । प्रागसत आत्मलाभ उत्पादः, सतो विनाश व्ययः, पथश्चिदवस्थानं धोव्यम् । तान्यादयो व्यापकत्वेन प्रधानभूता येपां ते तथोक्ताः । अर्थरियाकर्तृत्वेनैव व्याप्तिर्गुणानां १५ नोत्पादादिभिरिति चेत् , न ; "तस्यापि उत्पादादिस्वभावत्वात् । न हि कस्यचित्प्रागिष कार्यकालेप्यसमर्थस्य तत्कर्तृत्वम् , प्रागपि तत्प्रसङ्गेन कार्यानुपरमापत्तेः । समर्थस्येति चेत् । पदा सहि समर्थीभवतः प्राच्यासमर्थस्वभावपरिहारेणावस्थायित्वमवश्यमिति क्थं नोत्पादाद्यात्म- कमेव तत्कर्तृत्वं भवेत् ? तच्चाक्रमाद्विज्ञानादेर्यावर्त्तमानं गुणवत्त्वमपि व्यावर्तयतीति कथं तस्य द्रव्यत्वापत्तिर्यदनिटमापद्यत। नन्वेवं सभिप्तादपि सूत्रात् ममवत्त्वस्यापि प्रतिपत्ते: "गुणपर्यय- २० पद्व्यम्" इति किं विस्तीर्णेनेति चेत् ? सत्यमेव यदा उत्पादादिप्राधान्य गुणानां व्याख्यायते । यदा तु न , तदा गुणवत्वेन पर्ययवस्कव्यवस्थापनार्थ विस्तीर्ण सूत्रम् । किं पुनः सूत्रकारस्य संक्षिप्तमपि सूत्रमस्ति ? बाढम् , बुत एतत् ? निर्बन्धनकारेणोपक्षेपात । स्वबुद्धिक्लृप्तस्योपक्षेप इति चेत् , महदिदमद्भुतम्-यत्सूत्रकारस्यासती बुद्धिः निबन्धनकारस्येति । कस्यचिच्चोयम्-भवतु नाम तत्रोत्सदादिवयं यत्र पूर्वापरी पर्ययो, विनाशोत्यादयोः फथनिदवस्थानस्य च तत्र सम्भवात् । “यर वर्तमान" एवास्ति न पूर्वापरी अनुपलम्भात् , वत्र कथम् १ यतो द्रव्यलक्षणमव्यापक न भवेदिति ? तत्राह-'दुद्राय' इति । दुद्राय द्रुतवद्वियुदादि द्रव्यम् । कम् ? स्वपर्ययं न द्रव्यान्तरपर्यायम् असङ्कीर्णतयैव प्रतिपत्तेः । अनेन .. २५ सनव्यमपि स-आ०, ५०, प० । २ सदापि सवि-आ०,५०,प० । ३ अनिष्टपसमाप्राप्ते । । गुणवस्यैव भा०, ब०,१०१५ अर्थक्रियाकर्तृत्वस्यापि । ६-पृत्वमा-भा०, ५०, ५०१७ पर्यायत्व-आ०,१०, १०। ८ अम्लदेवेन। १ सूत्रकारस्य अविद्यमाना बुद्धि निवन्धकारस्य वागता। १० "विद्यदादिद्रव्ये"-ता. टिका "पर्यय "-तारि।
२११८] भथमा प्रत्यक्षप्रस्ताव: ४३५ १० पूर्वपर्ययवत्वं तस्योक्तम् । द्रोप्यति स्वपर्ययम् , अनेनापि परपर्यययत्त्वम् । अन्न हेतुः द्रवति स्वपर्ययं यत इति । शब्दादि वस्तु दुद्राव द्रोष्यत्ययात्मपर्ययान् । 'यतस्तद् द्रवति व्यक्तं घटादिरिव तत्वतः ।।१०५४॥ पूर्वाभावे कथं तस्यानुपादाना भवेज्जनिः। वस्तुत्वगुत्तराभावे कथं यानर्थकारिणः ॥१०५५।। सजातिकरणाभावे विजातीयकृतेरपि । असम्भवादिति व्यक्तं पूर्वमेतन्निवेदितम् ॥१०५६॥ अवस्तुत्वे च तद्धतुप्रयन्धे स्यादवस्तुता । असम्पादयतो वस्तु यदवस्तुत्वमिष्यते ॥१०५७।। उत्पादादिवयं तस्माच्छब्दादावपि तत्त्वतः । तद्वस्तुवादिभिर्वाच्यमन्यथा तदसङ्गतः ॥१०५८॥ शब्दादिद्रव्यमेवेदमुत्पादादित्रयस्थितेः। एकानेकात्मकं यत्तनिश्चिन्वन्ति विपश्चितः ॥१०५९॥ नातो लक्षणमव्यापि सूत्रसंक्षेपदर्शितम् । द्रव्ये सर्वत्र भावान्नाप्यतिव्याप्यन्यतोऽगतेः ॥१०६०॥ भवतु नाम विद्युदादेरुत्पादन्ययवत्त्वम्, प्रौव्यवत्वं तु कधमिति चेत् ? न; ध्रौव्यवद् विद्युदादिकम् उत्पादव्ययवत्त्वात् घटादिवदिति तनिश्चयात् । पदादावपि धोव्ययत्वस्यासिद्धो साध्यवैकल्यमुदाहरणस्येसि घेत ; अत्राह- भेदज्ञानात् प्रतीयते प्रादुर्भावात्ययौ यदि । अभेदज्ञानतः सिद्धा स्थितिरंशेन केनचित् ॥११८॥ इति । घटादौ हि धोव्यवत्त्वमनन्विच्छन्तः किमन्यत्तत्रान्विच्छेयुः? न फिश्चिदिति चेत् ; न; प्रतीतिविरोधात् । उत्पादव्ययाधिष्ठानं प्रतिक्षणं भेदमिति पेत् ; नमपि कस्मादन्विच्छन्ति ? तज्ज्ञानादिति चेत् ; न ; तस्य तैमिरिककेशादिभेदज्ञानवदप्रामाण्ये ततस्तदन्विच्छायो- गात् । न भेदज्ञानमित्येव सर्वमप्रमाणम् , बाघाविफलतया प्रामाण्यस्यापि प्रतिपत्तेरिति २५ त् तदि भेदस्य घटादिप्रतिक्षणनानात्वस्य ज्ञानात् प्रत्ययात् प्रतीयते प्रादुर्भावश्चोत्तरस्य सत्क्षणस्य अत्ययश्च पूर्वस्य प्रादुर्भावात्ययौ यदि चेत् ; अभे- दस्य तयोरेफरवस्य ज्ञानम् ततः सिद्धा निश्चिता स्थितिः अवस्थानम् । तज्ज्ञा- नस्यापि लूनपुनर्जातनखादावप्रामाण्येऽपि घटादिपरापरपर्ययेपु याधावैकल्येन प्रामाण्यादिति २० .. यतस्तन्द्र-आ०, य०, ५०। उत्पत्ति, । ३ अर्थवि यानुपादयस्य । ४ चेत् न तर्हि आ०, ब०, प० ।५ अभेदज्ञानस्यापि ।
न्यायविनिधयविधरणे [१।११८ भावः । भेदाभेदात्मकं हि भवन्मते वस्तु, तस्य च तदात्मना स्थितावभेद एष, न भेदः स्यात् । अस्थितावपि भेद एव नाभेदः स्यात् तत्कथमुभयात्मकत्वं तस्येति चेति । अत्राह- 'अंशेन केनचित्' इति । न द्युत्पादव्ययो म्धिनिर्वा वस्तुनः सर्वात्मना यदयं प्रमशः किन्तु केनचिदागेनैव । भागभावे न प्रमाणमालम्बनम् , तत्र भेदाभेदात्मनो जात्यन्तरस्येव नर- ५ सिंहवत् प्रतिपत्तने नरसिंहयोरिव भेदेतरभागयोः । नय एव संत्रालम्बनं "कुर्यात् अनापोद्धा. रकल्पनाम्" [न्यायवि० श्लो० १११ ] इति वचनादिति । चेन्न कल्पनाविपयस्यावस्तु. सत्येन तन्निवन्धनस्योत्पादादेरप्यवस्तुत्वापत्तेरिति चेत् ; न, बाधाभावात् । न हि कल्पनावि. पय इत्येव सर्वमवस्तुसत ; याधावैकल्ये वस्तुसतोऽप्युपपत्तेः । न तवैकल्यं प्रमाणेनैव जात्यन्तरविषयेण वाधनादिति चेत् ; न; अनुप्रविष्टकल्पनाविषयस्यैव जासन्तरस तेनापि १० प्रतिपत्तेः । न हि सकलकल्पनाविपयप्रतिक्षेपे जात्यन्तरं नाम सम्भवति ; "तद्विपयसमाहार- स्यैव परस्परसम्मूर्च्छनात्मनस्तत्त्वेन' प्रतिपत्तेः । प्रमाणं तर्हि क्ल्पनया बाध्येत अननुप्रविष्ट- स्यैव जात्यन्तरे स्वविषयस्य तया ग्रहणादिति चेत् ; न ; अनुप्रवेशवदननुप्रवेशेऽपि तस्या औदासीन्यात् । अतो न कल्पनया प्रमाणस्य नापि तेन तस्या याधनमिति यथास्वं वस्तुसन्ता- वेव तद्विपयो । अतो युक्म्-अंशेनैवोत्पादव्ययो स्थितिश्चेति । ततो यदुक्तं सण्डनेन- "उत्पादस्थितिभङ्गानामेकत्र समवायतः । प्रीतिमध्यस्थताशोकाः स्युन स्युरिति दुर्घटम् ॥ यस्य खलु द्रव्यात्पर्याया मिद्यन्ते तस्य द्रव्यमानार्थिनो द्रव्यस्थितेविनाशा- भावात् अपूर्वस्य चानुत्पादात् मध्यस्थता, रुचकार्थिनस्तस्यापूर्वस्योत्पतेः प्रीतिः, बर्द्धमानकार्थिनस्तस्य विनाशाच्छोक इति व्यवस्था प्रकल्प्यते । यस्स तु न "पर्य- २० येन्योऽन्यद्रव्यं न द्रव्यादन्ये पर्ययास्तस्योत्पत्तिस्थितिभङ्गानामेका समवाये द्रन्यार्थिनी मध्यस्थता भवेन्न भवेच्च प्रीतिशोक स्याताम् , न हि तद्रव्यमवतिष्ठत एव विनश्यति अपूर्वश्चोत्पद्यते तत्र विनाशादपूर्वोत्पत्तेश्च प्रीतिशोको स्यातां न मध्यस्थता, मध्यस्थता च स्थितेः स्यादिति दुघटमापद्यते । तथा वर्द्धमानकार्थिनस्तन्नाशाच्छोक इति स्यात् न च स्यात् स्थितेः । प्रीतिश्च तस्यापूर्वस्योदयात् स्यात् । तथा रुचकार्थिनस्तस्यापूर्वस्यो- २५ दयात् प्रीतिः स्यात् , न च भवेत् पूर्वस्यैव स्थितेः, विनाशाच्च शोकः स्यात् ।" ब्रह्मसि २०२४] इति । तदिदं प्रमाणाभिप्रायेण, नयाभिप्रायेण या दूपणम् ? आद्य विकल्पे युक्तम् उत्पत्ति- स्थितिभङ्गानाकर सगवाय इति, परस्पराविष्वाभूतानामुत्पादादीनां प्रमाणतः प्रतिपत्तेः । न - . १-मवलम्ब-आ०, २०, ५० २ तनावलम्ब-आ०, २०, ५० 1 ३ 'चैत्र' इनिपदद्वयमत्र सम्पाता- दायामिति भाति । ५ तद्विषये समा-आ०,०,५०1 कापनाविषय । ५ जान्यन्तरलेन । ६ कपनया । . कापनाया। "शराबो वर्धमानक इत्यमर "-ता. दि. । भन्न गुवर्णशराबो प्राय । ९ मापते ता० । १. पर्याये-आ०, २०,५०॥
१।११८] प्रथमः प्रत्यक्षपस्तावा - - पुन व्यार्थिन इति वर्धमानकायर्थिन इति चपर्यायात् द्रव्यस्य ततोऽपि पर्ययस्यापोद्वारेण ततोs. प्रतिपत्तेः । न च तथा तदप्रतिपत्तौ वदर्धिनाम् , अनपोद्धारेण तु प्रतिपत्तौ जात्यन्तरमेव प्रती- यत इति कथं द्रव्याधर्थित्वं जात्यन्तरार्थित्वस्यैव सम्भवात् । तदर्थनश्च मध्यस्थतैव सर्वदा तदूपाप्रन्युतेः न तदभावः । नापि प्रीतिशोको तन्निमित्ताभावात् । तन्नेर्दै प्रमाणाभिप्रायेण । नयाभिप्रायेणैवेति चेत् तत्रापि युक्त द्रव्यार्थिनो मध्यस्थता,भवेदिति न तु न भवेञ्चति ५ सत्यभिसन्धितो द्रव्ये मध्यस्थताया एवोपपत्तेनं तदभावस्य यतो दुर्घटत्वम्। प्रीतिशोको स्याता- मित्यप्यपेशलम् , द्रव्ये तन्निमित्तयोरुत्पादविनाशयोरभावात् "न सामान्यात्मनोदेति न व्येति व्यक्तमन्वयात्" [आप्तमी० ० ५७] इति वचनात् । ततः परमतानभिज्ञानादेवोक्तम्-न हि तदित्यादि आपद्यत इति पर्यन्तम् । तथा वर्द्धमानकार्थिनस्तन्नाशाच्छोक एव न तदभावः, तन्निमित्तस्य स्थितेस्तनाऽभावात् । उदयव्ययाधिष्ठानत्वमेव हि पर्यायाणां न स्थितिमत्त्वम् १० "व्येत्युदेति विशेषात्त" [आप्तमी ० श्लो० ५५] इति वचनात् । नापि प्रीतिः , तस्यैव पुनरुदयाभावात् । एवं रुचकार्थिनस्तदुत्पादात् प्रीतिरेव न सदभावः, तस्यैव पूर्वमभावात् । नापि शोका; उत्पद्यमानस्यैव नाशाभावात् । ततो बर्द्धमानकार्थिन इत्यादि शोकः स्यादिति पर्यन्तमपि परमतापरिशानमेव परस्यावेदयति । यदप्यपरं तस्यैव- "नैकान्तः सर्वभावानां यदि सर्वविधागतः । अप्रवृत्तिनिवृत्तीदं प्राप्तं सर्वत्र ही जगत् ॥ इति । यदा हि सर्वप्रकारष्वनैकान्तिकत्वं भावानां तथा सति नायं लौकिकः कचि- दभिमतसाधनप्रकारमवधार्य प्रवर्तेत यतो नासो तथैव, नापि निवर्तेत यतो नासाव- तथैव, तथा दुःखहेतोन निवर्तेत यतो नासौ तथैव नापि न निवर्तेत यतो नासावत. वेति कष्टा वत दशामापयेत ।" [ब्रह्मसि. २०२५] इति , तत्रापि न परिदरतः किमपि कष्ट नयाभिप्रायेण सर्वत्रैवान्तस्यैवोपपादनात् "तदे- कान्तोऽर्पितान्नयात्" [बृहत्स्व० श्लो० १०३] इति वचनात् । तथा च यत्सुखसाधनं तत्तथैव नाऽतथापि यतो न प्रवत्तेत । दुःखहेतुरपि तथैव नाऽतथापि यतो न निवर्तेत । प्रमाणार्पणेन तथाऽतथात्वयोर्भावात् भवत्येवार्य प्रसङ्ग इति चेत् , न, प्रमाणतस्त पप्रतिपत्तावप्यभिसन्धिः विषय एव व्यवहारोपपत्तः, अभिसन्धेश्वैकमावात् , प्रत्युत ऐकान्तिकत्व एव सुखसाधनत्वादेर. प्रवृत्तिनिवृत्तिकत्वं जगतः। तथा हि स्रक्चन्दनादिकमहिविपादिकं च सन्निहितस्येवान्यस्यापि तत्कालस्येवान्यकालस्यापि यदि सुखसाधनमेव दुःखसाधनमेव वा कि प्रवृत्त्या नियू या वा ? ततो नैकान्त इत्यादि नकारवर्ड परपक्षेऽपि वक्तव्यम् । अथानेकान्तवदेकान्तोऽपि चिन्नेष्यते ब्रह्मविदा,भेदस्याविद्याविलसिवस्येदन्तया नियंत. १५ २० । . २५ । भेदरूपेण । २ अभेदेन । ३ -गाभिदूषणम् नया-आ०, ब०, प० । ५ विद्यमानाभिप्रायतया । ५ शोकाभावनिमित्तस्य । ६ “ही शब्द क्वार्थ "-प्रझसिध्दया । ७-मेव वाऽमुखसाधन-आ०, ५०।
. . ४३८ न्यायविनिश्चयविधरणे [११११८ मशक्यत्वादिति चेत् ; मा नाम भूत् भेदे तदिष्टिः परमात्मनि तु भवेत्, ततो हि लोकानां सृष्टिः "स इमांल्लोकानस्जत" [ ऐत. १२ ] इत्यादि अत्रणात् । तस्य चैकान्तवस्तत्सृष्टिहेतुत्वे कार्य किश्चिद्विवभितदेशदितयेव निःशेपापरदेशादितथाप्युपज्ञायेत इति तत्साइयं तदसार्यप्रति. पत्तिविरुद्धमापद्येत अप्रवृत्तिनिवृत्तिकं च जगद्भवेत् । अथ न तथा तस्य तदेतुत्वं कथं कार्य ५ जगत् ? कथश्चित्तभावादिति चेत् ; कथं तर्हि 'जगदुत्पत्ती सन प्रवर्तत यतो न हेतुरेव, नापिन प्रवत्तेत यतो नाहेतुरेव' इति कष्टदशापत्तिर्भवतोऽपि न भवेत् ? न भवत्येव विषयभेदात, यस्य तद्देशादित्वे स हेतुरहेतुरपि तत्रैव, अपि त्वन्यदेशादित्ये, तंत्र चाप्रवृत्तिः', इतरत्र वृत्तावप्यु- पपरात एवेति कथं फष्टता ? तदापत्तेरनुपपत्तेरेव कष्टार्थत्वादिति चेत् ; वर्हि चन्दनादिरपि येनात्मना हेतुः सुखस्य न तेनैवाहेतुः अपि त्वन्येनैव, तेन च तत्राप्रवृत्तिः, इवरेण प्रवर्तमान- १० स्यापि नानुपपत्त्या पीडयत इति कथं परोऽपि कनां शामापयेत ? । जगद्धेतुत्वमपि परमात्मनो नेष्यते जगत एव विचारपरिशोधितस्याव्यवस्थितेरिति चेत् ; कुत इदानी तत्प्रतिपत्तिः ? न स्वतः ; असम्प्रत्ययात् संविदद्वैतवत् । स्वतश्चेत्परमात्मायं प्रविपन्नः समिप्यते । संविदद्वयमप्येवं स्वतः सिद्धं समिप्यताम् ॥१०६१।। आत्मसंविवयस्यैवं तस्वतः सम्भवे ; कथम् । वस्तुभेदप्रतिक्षेपः ? "नेह नानास्ति किश्चन" ॥१०६२।। श्रुतिभ्यस्तत्प्रतीतिश्चेत् ; जगतोऽसम्भवे कथम् । श्रुतयोऽप्युपपद्यन्तां जगदन्तर्गता हि ताः ॥१०६३॥ अवाध्यमेव हेतुत्वं ताभ्यस्तस्य गतावपि । श्रावयन्ति यतस्तास्तं कारणात्मतयोदितम् ॥१०६४॥ १५ . २० “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते" [तैत्ति. ३।१] इत्यादिका हि श्रुतयो जग. द्वेतुत्वप्रतिपादनमुखेनैव परमात्मभावं आवयन्ति तत्कथं तस्य न हेतुत्वं कल्पितं वा श्रुति. प्रसिद्धस्य कल्पितत्यानुपपत्तेः ? परमात्मन्यपि "तदुपनिपातात् । ततः कारणमेव जगतः पर- मात्माऽनेकान्तश्चेति कथन्न तत्रापि" प्रवृत्तिनिवृत्तिवैकल्यम् ? विषयमेदात्तु "तदभावे चन्दन- फण्टकादावपि न भवेदित्ययुक्तम्-'अप्रवृत्तिनिवृत्तीदम्' इति पर्याप्तं प्रसद्गुन । तत उत्पादादीनां नयविपयाधिष्ठानतया सार्याभावातन्निबन्यनाः प्रीत्यादयो भवन्त्येव न न भवन्ति इत्युपपन्नमुक्तं स्वामिसमन्तभद्रः तन्मतोपजीविना भट्टनापि- नि शेपदेशादितया । २ अन्यदेशादौ । ३ -तिरन ता-प० । ४ कष्टदशापत्तेरनुपए-आ०,०,१० । ५ जैनोऽपि । ६ ब्रह्माद्वैतप्रतिपत्ति । ७ कठोप० । वृहत १४.९ब्रह्मा । १ प्रतिपत्तावपि । 1. कल्पितत्वोपनिपानात् ।। परमारमन्यपि । १२ प्रवृत्तिनिवृत्तिवैकल्याभावे ।
-- .. १।११८ प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्ताव: "घटमौलिसुवर्णार्थी नाशोत्पादस्थितिष्वयम् । शोकामोदमाध्यस्थ्यं जनो याति सहेतुकम् ।।" [आप्त०मी श्लो० ५९]इति । "वधमानकमङ्गेन रुचकः क्रियते यदा । तदा पूर्वार्थिनः शोकः प्रीतिचाप्युत्तरार्थिनः ॥ हेमार्थिनस्तु माध्यस्थ्यं तस्माद्वस्तुन्नयात्मकम् ।" [मी०उलो००६१३] इति । ५ व्रतो घटादेरभेदज्ञानेन धोव्योपपत्तेर्न साध्यवैकल्यम् । नापि साधनवैकल्यम् ; उत्पादादेरपि तत्र तज्ज्ञानादेव प्रतिपत्ते । 'उत्पादो नाम अभूत्वा भवनम् , अभूतस्य च न भवनम् , व्योमकुसुमादिवत् , अतः कथमुत्पाद इति चेत् ? न ; चक्रचीवरादिन्यापारवैफल्यापत्तेः । अभिव्यक्तिकरणात्तत्सा. फल्यमिति चेत् ; न ; अभिव्यक्तेरप्यभूतायाः करणायोगात् । अभिव्यक्त्यभिव्यक्तिकरणा- १० दिति चेत् ; न ; अनवस्थापत्तेः । अभिव्यक्तेरभूतायाः अपि करणं न घटादेरिति किंकृतो विभाग: ' कुतो वा प्रागपि भवतोऽनुपलब्धिः ? तिरोभावादिति चेत् ; स यदि तस्मादन्यः कपन घटादिकस्येव संतः सर्वस्यानुपलब्धिः । तत्रैवे तस्य भावादिति चेत् न, 'सर्वसर्वत्र विद्यते' इति दर्शनात् । तदभिव्यक्तेस्तत्रैव भावादित्यपि न युक्तम् । अत एव तदभिव्यक्त्यभिव्यक्तेस्त- व भावादित्यर्पि, अनवस्थापत्ते । तन्न तस्मादन्यस्तिरोभावः । अनन्य एवेति चेत् ; कथं १५ पश्चादुपलब्धिः ? कुतश्चित्तिरोभावापगमादिति चेत् ; सिद्धमुत्पत्तिमत्ववत् व्ययवस्वमपीवि न साधनवैकल्यं निदर्शनस्य । नाप्यपक्षधर्मस्य हेतोः ; शब्दविद्युदादावप्युत्पादव्ययवत्वस्याऽवि. प्रतिपत्त': । अतो भवत्येव शब्दविद्युदादेवस्थानवत्त्वप्रतिपत्तिरन्यथानुपपत्तिनियमनिश्चयात् । "यत्पुनरेवत-यद्यद्भाव प्रत्यनपेक्षं तत्तद्भावनियतं यथा अन्त्या कारणसामग्री कार्योत्पाद प्रत्यनपेक्षा तद्भावनियता, विनाशं प्रत्यनपेक्षश्च भावा, तस्मानश्यत्येव न तिष्ठतीति ; तर २० कदाऽसौ नाश: १ भावस्योत्पत्तिसमय एघेति चेत् , न, हेसोधर्मिविपर्ययसाधनेन "विरुद्धस्यो- पपत्तः । उत्पत्तिसमयभावी हि भावो धर्मी, तस्य च तदेव नाशे कथं न विपर्ययो यतस्त साधयन् हेतुर्विरुद्धो न भवेत् ? उत्पत्ते रु_मिति चेत् , सोऽपि यदि भावाभिन्नः ; कथं भावस्तद्रूपतया व्यपदिश्येत भाषो नश्यतीति ? न ह्यन्यः अन्यरूपतया व्यपदेशमहत्यति. . 1 १ साख्य आशइते । २ "कार्यत्वमभूत्वाभाविवम्"-किरणा. पृ. २२ । ३ तिरोभाव । भाषत । ५ घटादावेव । ६ "सर्व सर्वन विद्यत इति दर्शनाङ्गोकारात् तिरोभावोऽपि सर्वत्र विद्यते तत सर्वत्यानुपलब्धिर्भववित्यर्थ ।"-सा. टि. । ७ सर्व सर्वत्र विद्यते इति दर्शनादेव । ८ 'म युक्तम्' इति सम्बन्ध । ९ घटादे । १० -वोपगमादिति आ०, २०, ५०1 11 बौद्धस्य मतम् । “तदय भावोऽनपेक्षस्वभाव प्रति तदावनियत तद्यथा सकलकारणसामग्रोकार्योत्पादनेऽसम्भवत्प्रतिबन्धा!"-प्र० का० स्व० ० ३११२७ । "ये यद्भाव प्रत्यनपेक्षास्ते तद्भावनियता यथासमनन्तरफला सामग्री स्वकार्योत्पादने नियता। विनाशं प्रत्यन- पेक्षाश्च सर्व जन्मिन कृतका भावा इति स्वभावहेतु ।"-तावसं०प० श्लो० ३५३ । १२ विरुद्धौप-आ०, य०, प० । ११ "सर्वत्य सर्वरूपतया व्यपदेशप्रसङ्गात्"-ता०शि०। - ४४० .. , - । न्यायचिनिश्चयविवरणे [११११९ प्रसगात् । नायं दोपः ; भावस्येव 'नद्धेतुतया तद्रूपत्वेन व्यपदेशोपपत्ते, सर्वस्य सर्वरूपतया विपर्ययादिति चेत् ; न ; अनश्वरस्यैव भावस्य तद्धेतुत्वापत्तेः, नाशात् पूर्व नवरत्वानुपपत्तेः । ततो नवरत्वेनाकियाकारित्वस्य ज्यातिव्यवस्थापन परस्यापरिज्ञानविजृम्भितमेव । अन्यतो नाशानश्वरस्यैव तस्य तद्धेतुत्वमिति चेत् ; न; तन्नाशस्यापि पश्चाद्भावित्वे तत्रापि 'सोऽपि यदि ५ भाषाभिन्नः' इत्यादेरनुबन्धात् । तन्नाशेऽपि नाशान्तरानश्वरस्यैव भावस्य हेतुत्यपरिकल्पनाया. मपरिनिष्ठापत्त । 'तन्नायं भिन्न एव भावात् । अभिन्न एवास्त्यिति चेत् ; न ; 'तस्यापि तद्वद्भावरूपत्यप्रसङ्गात । कयचिद्भदस्यापि भाषान्न तद्रूपत्वापत्तिरिति चेत् ; फथमेवमवस्थितस्य कथञ्चिदन्यथा भाव एव नाशो न भवेत्तत्रैव लोकस्यापि नाशव्यवहारप्रतिपत्त । तत्र च विरुद्धो हेतुः निरन्वयविनाशसाधनाय प्रयुक्तेन तद्विरुखस्य सान्वयत्यैव विनाशस्य तेन साधनात् । १० ततः सर्व सदुत्पादादित्रयात्मकमेव नोत्पादाद्यन्यतमैकान्तात्मकं तदप्रतिपत्त । एतदेवाह- सदोत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त 'सदसतोऽगतेः । इति 'सत्' इति धर्मिणो निर्देशः प्रसिद्धत्वात, उत्पादव्ययधौव्ययुक्तम् इति साध्य स्य अप्रसिद्धत्वान् "अप्रसिद्ध साध्यम्" न्यायवि० श्लो० १७२] इत्यभिधानात् । हेतुत्वमत्र सत एव द्रष्टव्यम् । धमित्वं प्रत्युपक्षीणस्य कथं तस्य हेतुत्वमिति चेत् ; साध्यं १५ प्रत्यधिकरणभायेन तस्य तत्प्रत्युपक्षयेऽपि अन्यथानुपपन्नत्वेनानुपक्षयात् , तस्य धर्मिभावं प्रत्यनुपयोगात् । प्रतिज्ञार्थंकदेशत्वेनासिद्धस्य कथमन्यथानुपपन्नत्वमपि साध्यवदिति चेत् ? न साध्य. स्यापि तदेकदेशत्वेनासिद्धत्यम्, अपि तु स्वरूपेणाप्रतिपत्तेः । न चैवं सतोऽप्रतिपत्तिः धर्मित्व. स्याप्यभावप्रसगात् । तदयमा प्रयोग:-यत्किश्चित् सत् तत्सर्वमुत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तम् २० अन्यथा सत्त्यानुपपत्तेः। असिद्धिरन्यथानुपपत्तेः साध्यस्यासम्भवात् न हि असम्भवत्साध्यापेक्ष क्वचिदन्यथानुपपन्नत्यमुपपत्तिमत्तामुद्वहति । तस्यासम्भवश्व विचारसूक्ष्मसूचीमुखनिभेदभी- रुत्वात् । तथा हि यदि भावस्य स्वतो न सत्त्वम् ; उत्पादादियोगेऽपि न स्यात व्योमकुसुमवत् । उत्पादादिना चासता न योगः, योगेऽपि न सत्त्वम् ; कूर्मरोमयोगेणापि तत्प्रसगात् । सन्नेवोत्पादा. २५ दिरिति चेत् ; यदि स्वतः भागोऽपि तथैव सन्निति किं तद्योगेन ? अपरोत्सादादियोगादिति चेत्, न , तदुत्पादादेव्यपरोत्यादादियोगेन सत्त्वपरिकल्पनायाम् अपरिनिष्ठापत्तेः । तन्न तद्योगो नाम साध्यं सम्भवति तत्कथं तदपेशमन्यथानुपपन्नत्वं सत्वस्येति चेन, न, उत्पादादेस्तद्वतो भेदेकान्त एवैवं दोपोपनिपातात्, नाभेदभावे, "तत्रोत्पादाद्यात्मकस्यैव "सत्स्वरूपतया निर्णयात् । न: - १ नाशहेनुनया । २ नाश । ३ नाशत्यापि । ५ द्रष्टव्यम्-अ.दि.१.१४२ १०२३।५द्रष्टव्यम्- भक. टि. पृ. १६२ १०३२। ६ माध्यल प्रत्य-आ०, २०, प० । अन्यथानुषपणवस्य । ८ प्रतिज्ञार्थंक- देशस्थेन । ९ यदि स्वभाव-आ०, २०, ५०।१. तनोत्पादात्मक-ता-11 मवरूप-आ०, ५०, प० ।
प्रथमः प्रत्यक्षपस्ताधा १० २११९] ४४१ सतः किमिदं सरवम् ? उत्पादाक्षात्मकत्वमेव नापरम् , इति । "उत्पादव्ययधौव्ययुक्त सत्" ति० सू० ५।३०] इति युक्तशब्दस्य चाभेदवाचिन एवोपादानात् । अपि च, कथमिदानीमर्थक्रियासामर्थ्यस्यापि सशक्षणत्वं यत इदं सूक्तं स्यात्- "अर्थक्रियासमर्थ यत्तदत्र परमार्थसत् ।" [प्र० वा० २।३] इति । स्वयमसतस्तत्सामर्थेन सम्बन्धेऽपिव्योमकुसुमवत्सत्वानुपपत्तेः । असता च ते तद्वदेव सम्बन्धा-५ सम्भवात् । स्वतस्तस्य सत्त्वे भावस्यापि तंत पय तदुपपत्तेः तत्सम्बन्धवैफल्यात् । अपरतस्सा- मर्थ्यसम्बन्धात्सत्त्वे पानवस्थादोपस्याविशेषात् । एवम् "उपलम्मा सत्ता" [प्र०कार्विकाल. २१५४] इत्यादावपि वक्तव्यम् । 'भावादभिन्नमेव तत्सामादिकं तदेव धभावस्य सत्त्वं नापरम् । न च तस्यापरं तत्सामादिरूपं सत्वमपेक्षणीय स्वत एव तद्रूपत्वात्' इति समाधानं तु उत्पादा- घात्मन्यपि सत्वे न चैमुख्यमुद्वहति । ननु उत्पादादेरपि उत्पादादिस्वभावत्वात् अस्तु उत्पादस्योत्पादात्मकत्वं स्वतो व्ययधी व्यात्मकत्यं तु कथमिति चेत् ? न ; व्ययधीव्याभ्यामपि तस्य कश्चिदभेदात् स्वत एव तदात्मकत्वस्याप्युपपत्तेः । भावादेव उत्पादादेरभेदो न परस्परत इति चेत्, न; भावाभेदस्यैव परम्परतोऽप्यभेदत्वात् । "व्यावृत्ताश्च परस्परम्" [सिद्धिवि. परि० ३] इत्यप्यकान्तिक. व्यावृत्तेरनभिधानात् । एवं व्ययस्योत्पादध्रौव्यात्मकत्वं प्रौव्यस्य च उत्पादव्ययात्मकत्वं स्वतः प्रतिपत्तव्यम् । तन्न साध्यस्य विचारबमुख्याभावादित्युपपन्नमेव तदपेक्षमन्यथानुपपन्नत्वं साधनस्य । व्यभिचारादनुपपन्नमेव तस्यान्यशानुपपन्नत्वम् , व्यभिचारश्चोत्पादादीनामन्यतमैका. त्मनि अन्यतमद्वयात्मनि वा भावेऽपि भावादिति चेत् ; न, असतोऽगतेः । सदुसादादिनयं व्याप्यपदेन व्यापकस्याभिधानात् । न विद्यते सद्यस्मिंस्तद् असत् , तदन्यतमैकात्मकम्', २० अन्यतमद्वयात्मकं या तस्य प्रत्यक्षादिप्रमाणेन अगतेः अप्रतिपत्तेः। विनेतराभ्यां नोत्पादो न व्ययो वाप्यवेदनात् । प्रमाणेन विरोधाच न चोत्पादव्ययौ कचित् ।।१०६॥ विरुद्धं हि निरंशार्थस्योसाइविगमद्वयम् । तत्सांशत्ये समाधान पुरस्तादभिधास्यते ।। १०६६॥ उत्पादध्रौव्यरूपश्च मावो हि व्ययवर्जितः । म प्रतीतिविदग्धस्त्रीपरिष्वगसुसावहः ॥१०६७॥ व्ययवानेव मिन्नेन व्ययेन स मतो यदि । तदा तेनैव सर्वोऽपि भावो व्येवीह किन्न वः १ ॥१०६८। तस्यासम्भवः . + १ अर्थनियासामर्थेन । २ खत एव । ३ -लं तस्य व आ०, २०, ५० ४ पदार्थेऽपि । ५ -कम् तदन्यः -आ.ब.२०१६ नाप्यवे-आ०, २०, ५० [११११५ ४४२ भ्यायपिनिश्चयविधरणे तद्विशिष्टतयार्थस्य नियतस्यैव वेदनात् । इति चेययकालेऽपि भावस्य स्यादवस्थितिः ॥१०६९|| अनवस्थायिनो यस्मान्न चैशिष्ट्येन वेदनम् । तथा च न विपादः स्यादिष्टनारोऽपि देहिनाम् ॥१०७०॥ अस्थित्तस्यापि वैशिष्ट्य बुद्ध्यु पस्थापितस्य चेत् । बुद्धा पस्थापनं तस्य सत्तश्चेत्कथमस्थितिः १ ॥१०७१।। असतश्चेत्कथं तस्य व्ययवैशिष्ट्यवेदनम् १ । दृष्टं हि नीलवैशिष्ट्यं सत एवोत्पलात्मनः ॥ १०७२।। आरोपितेन रूपेण वैशिष्ठ्यं तस्य चेत्सतः । व्ययस्तस्यापि रूपस्य भायस्यैव भवेत्तदा ॥१०७३॥ ततस्तस्यापि वैशिष्ट्यमसतः कथमुच्यवाम् । आरोपितेन रूपेण सस्याप्यस्तित्वकल्पने ॥१०७४॥ पूर्वदोपानिवृत्तिः स्यादनवस्थानवाहिनी । विशेपणत्वमप्यस्य नाशक्तस्योपपद्यते ॥१०७५॥ १० विशिष्टप्रत्ययहेतोरेव हि नीलादेविशेषणत्वं दृष्टम् । न च व्ययस्य तहेतुत्वं शक्तिवैकल्यात्, शक्तिमत्वे तु भाव एव स्यात् तस्य तल्लक्षणत्वात् द्रव्यादिवत् । द्रव्यादेरपि न शक्तिमत्त्वात् भावत्वम् अपि तु भावेन समापरव्यपदेशेन सम्बन्धात् । न च व्ययस्य वासम्बन्धो यतो भावत्वमिति चेत् । कथं तर्हि भावस्य भावत्वम् ? तत्सम्बन्धाभावादनवस्थापत्तेः। स्वत एव भावप्रत्यर्यकरणादिति चेत् ; द्रव्यत्वादेस्तर्हि कथम् । न हि ततस्तत्प्रत्ययः; द्रव्यादिप्रत्ययस्यैव २० भावात् , इत्यभावत्वमेव तस्य स्यात् । तदपि नास्ति; अभावप्रत्ययकरणाभावादिति चेत् । तचाई भावाभावस्वभावविनिर्मुक्तं तत्त्वान्तरं प्राप्नुयात् । तचानुपपन्नम् ; "सतय सद्भायोऽ. सतश्वासद्भावस्तत्वम्" न्यायभा० १११११) इति तत्त्वनियमप्रतिपादनमाध्यव्याघातापत्तेः। नायं 'प्रसङ्गः स्वप्रत्ययोपजननसमर्थव या द्रव्यत्वादावपि भावत्वस्येवोपपत्तेरिति चेत् । अनुकूलमाचरसि, शक्मित्त्वस्यैव भावलक्षणत्वेनैवं प्रतिष्ठानात् । तथा च व्ययोऽपि कथन २५ भावः स्वप्रत्ययशरविशेषात् ? इत्यशक्त एवासो सर्वथा वक्तव्य इति नासो कस्यचिद्वि. शेपणम् , खानुरक्तप्रत्ययमकुर्वतस्तत्त्वानुपपत्त । ततो न विशिष्टप्रत्ययनियमात्तनियमः । सत्कार्यव्ययनियमादिति चेत् ; किं पुनर्व्ययादपि व्ययः ? तथा चेत्, न; तस्यापि भावादर्थान्तरत्वे प्राच्यप्रसङ्गस्यानिवृत्तः, अनवस्थापत्तेश्च । अनर्थान्तरत्वे तु तद्वत्प्रथमस्यापि . , अपि तस्यापि आ०,०प० २ भावस्येव मा०,401 भावस्यैह प०१३ नाशस्तस्यौ-मा.व.,प.। -कार-आ०, २०, प.! ५दव्यत्वादे. भावप्रत्ययः । ६अभावलमपि । ७ बेत्तर्हि -आ०, ५०, १०॥ वक्तव्यमिति आ०,०प०। ९विशेषणवानुपपत्ते ।
-- ५ . १।१९९] प्रथमः प्रत्यक्षाप्रस्तावः तत्त्वोपपत्तेः सिद्धमुत्पादध्रौव्यात्मनो भावस्य व्ययात्मकत्वमपि, अन्यथा तदप्रतीतेः । एवम् उत्पादवानेव ध्रौव्यव्ययात्मा भावो नान्यथा प्रतीत्यभावात् । भवतु व्यतिरिक्तनोत्पादेन तद्वत्त्वं नात्मभूतेनेति चेत् ; के पुनस्तादश उत्पादः १ प्रागसता : सत्तासम्बन्धः, कारणसम्बन्धो वेति चेत् ; न ; तन कारणवैफल्यापत्तः, तत्सम्बन्धस्य नित्यत्वेन कारणनिरपेक्षत्वात् । तदुक्तम्- "सत्ता स्त्रकारणाश्लेपकारणात्कारणं किल । सा सत्ता स च सम्बन्धो नित्ये कार्यमथेह किम् १ ॥"[ J इति तन्न तत्सम्बन्धः उत्पादः । प्रागसत आत्मलाभ इति चेत् । नर्हि तस्य व्यतिरेक इति आत्मभूतेनेवोत्पादेनो. त्पादवान् धौव्यव्ययात्मा भावः, अन्यथा तवगमाभावात् । उत्पादव्ययस्वभावमेव च १० धौव्यम् , अन्यथा कस्याप्यपरिज्ञानात् । ध्रुवमेवात्मादि परिज्ञायत इति चेत् ; कुतस्तत्परिज्ञानम् ? स्वशक्तित इति चेत्, न; सर्वदा सर्वेणापि तत्प्रसङ्गादविवादापत्त:। सामग्रीतस्तत्परिज्ञानम् , न प सा सर्वदा सर्वस्यापीति चेत् ; तद्दशायां यदि तस्य प्राच्यं तदविपयत्वं न परिक्षीयेत कथं तद्विपयत्व' विरोधात् १ परिक्षीयते चेत; फथन्न व्ययः तस्यं तस्मादर्थान्तरत्वात् , न हि अर्थान्तरस्य परिक्षये तत्परिक्षयः, अतिप्रसङ्गात्। कथं तादृशेन तेन तद्विपय इति व्यप- १५ देशः अतिप्रसङ्गस्याविशेषात् ? सम्बन्धात्कुतश्चिदिति चेत् ; न; ततोऽयर्थान्तरात्तदनुपपत्तः। तत्राप्यपरसम्बन्धकल्पनायाम् अनवस्थापत्तेः" । तस्य तस्मादनन्तरत्वे तु सिद्ध तदपरिक्षये पश्चादप्यपरिक्षानम् । न ह्यपरित्यक्ततदविपयत्वसम्बन्धस्वभावं तद्विपयभावमनुभवति । अनु- भवद्वा परित्यक्त्तत्स्वभावमेवेति कथन्न व्ययः ? कथं वा नोत्पादः १ पूर्वस्वभावपरित्यागस्योत्तरस्वभावोपादानात्मन एवोपपतः । २० अनुत्तरोपादानस्य चावस्थानायोगेन निःशेषपरिक्षये तत्परिज्ञानस्योत्पन्नस्यापि निर्षिपयत्वापत्त। तन्नैकशी द्विशो वा सम्भवन्त्युत्पादादयः, यतस्तत्रापि भावाव्यभिचारी हेतुर्भवेत् । ननु धौव्यं नाम पूर्वस्य दधिपर्यायस्योत्तरतत्पर्यायेणैकत्वम्, तश तेनैव कुतो न करभ- पर्यायेणापि देशादिभेदस्य प्रकृतेऽप्यविशेषादिति चेत् । अन्नाह- तादात्म्यनियमो हेतुफलसन्तानवद्भवेत् ॥११९।। इति । तादात्म्यम् एकत्वं तस्य नियमो दविपर्यायस्य तत्पर्यायेणेव न करभपर्यायेणेत्यय- तद्वनात्म -आ०, २०, प० । २ कथं पुन-आ, २०, ५०।३ "अप किमिदं वार्यत्वं नामेति- खकारणसत्तासम्बन्ध."-प्रश० च्यो० पृ. १२९ । ४-लाभस्तहि इति भा०, २०, ५०। ५-पादनात् धौ -भा०, २०, ५०।६ प्राच्यं यत्तद्वि-आ०, २०,५०। ७ परिज्ञानविषयत्वम् । ८ तदविषयत्वस्य आत्मादेः । अन 'न व्ययः' इत्यनुवर्तनीयम् । ९ अर्थान्तरभूतेन । १० तदविषयत्वपरिक्षयेण। 11 -पत्तेश्च तस्य -आ०,य०, प०।१२ तदविषयत्वस्य । १३ तदविषयत्वापरिक्षये। 1 -वलं तद्वि-मा०, य., प० । १५ सच्चादिति । .. १३ २५ ग्यायविनिश्चयविधरणे . धारणं भवेदिति तद्नावं विधानस्तभावं व्यवच्छिनत्ति, सदश्यवच्छेदे तद्विधानानुपपत्तेः । अत्र हेतुः 'असतो गतः इति असतः करमपर्यायेप्वविद्यमानस्य तादात्म्यस्य दन्नो दधिः पर्यायेष्वेव गतेः प्रतिपत्त । तत्र दृष्टान्तः हेतुफलसन्तानवत् । हेतवश्च फलानि च पूर्षापरदधिक्षणरूपाणि, तेषां सन्ताना, तद्वत् । यथा तेषां भेदेऽपि परस्परमेवैकः सन्तानो ५ न करभक्षण तव्यावृत्तस्य तस्य तत्रैव गतेः, अन्यथा "चोदितो दधि खाद" [१० वा. ३११८२] इत्यादेस्तत्रापि प्रसगात् । तथा तत एव तेपां परस्परमेव तादात्म्यं न तत्क्षणैः । अथवा हेतुफले हेतुत्वफलत्वे भावप्रधानत्वान् निर्देशस्य । यदिवा, न विद्यते हेतुर्यस्य स: अहेतुः प्रध्वंस: फलं विधिः अन्यस्य फलत्वानुपपत्ते: तयोः सन्तन्यते तादाम्येन विस्तीर्यते इति हेतुफलसन्तानो अहेतुफलसन्तानो वा मध्यक्षणः तस्यैव । न हि तस्य हेतुत्वमेव, १० स्वयमफलस्य सामान्यादिवदवस्तुत्वापत्त । पूर्वपूर्वापेक्षयाऽपि तस्य तत्त्वेन तत्तत्पूर्वकालभावित्वेन चिरापक्रमदोपाध । नापि फलत्वमेव स्वयमदेतोयोगकुसुमसमत्वोपनिपातात् । उत्तरोत्तरापेक्ष- यापि तस्य तत्त्वेन' तत्तदुत्तरकालमावित्वेनातिचिरभावित्वप्रसद्गाच। तथा न वस्य विधिरेव स्वभावः, तत्क्षणवत् क्षणान्तरेऽपि तत्स्वभावतेनाक्षणिकत्वप्रसद्गात् । नापि नाश एव; क्षणा. न्तरवत् तत्क्षणेऽपि तदात्मत्वेन शून्यवादोपनिपातात् । ततः पूर्व प्रति फलत्वमुचरं प्रति हेतुत्वं १५ तत्क्षणं प्रति विधित्यं क्षणान्तरं प्रति नाशत्वमिति परस्परं भिन्नायेव हेतुफलभावो विधिविना. शौ च । न च तोच तोच तादात्म्येन व्याप्नुवर्ति वस्मिन्नतिप्रसङ्गः, वस्तुसापितः । ततो यथा नियतप्रतीतिसामात् नियतमेव हेतुफलवादात्म्यं विधिविनाशतादात्म्यञ्च तत्क्षणस्य वया ध्यादेः पर्यायतादात्म्यमपीति न कश्चिदुपालम्मः । मा भूतत्क्षणस्यापि तत्तादात्म्यं हेतुफलभावस्य विधिविनाशभावस्य च क्वचिदनिप्टः। २० अद्वैतं हि तत्त्वं तस्य निरवद्यप्रमाणविषयत्वात् , न हेतुफलभावादि विपर्ययात् । कल्पिवस्य तु न धान्तत्वम् , साध्यस्यापि कल्पितस्यैव प्रसिद्धिप्रसङ्गादिति चेत् ; न ; अद्वैतस्यापि निर्भागपरमाणुरूपस्याप्रमाणत्वात् ! नानेकस्यभाषत्वे तु नातं तद्वदर्थ स्यापि वारशस्याऽनिषे- घोपपादनात् । भवतु सदुभयमपि क्षणिकमेवेति चेत् ; अत्राह- भिन्नमन्तयहिः सर्व युगपत्क्रममावि नः । प्रत्यक्षं न तु साकारं मामयुमयुक्तिमत् ॥१२०॥ इति । सर्व निरवशेपम् अन्तधेतन भिन्नं पहियातनं भिन्नम् अनेकस्वभाव युगपत् अमेण 'यत्' इति शेपः । तत्रोत्तरम्-फमभावि प्रमेण भवनशीलम् धन्वहिः १-येष्विव बा., प.,.। २"हेतुन्वेन"-वाटि.। ३ चिरविनदोषान् । . फलस्वेन । ५ तपात्म-आ०, ५०, ५०। ६ ध्यानौनि त-आ०, २०, ५०1 • “विदधंद्वयम्-ता०शि०। ८-समयुषवत् मा.प.प.॥
१११२१ ] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताचा सर्व भिन्नमिति सम्बन्धः । फुत एतत् ? प्रत्यक्ष प्रत्यक्षवेद्यं यत इति । निरूपितं चैतत् । ननु यदि प्रत्यक्षमक्रमं न तेनापरक्रमप्रतिपत्तिः । सामं चेत् ;न तत्क्रमेणाप्य- परिझातेन तद्नुपपत्तेः, तत्परिज्ञानस्याप्यपरतत्नमेण परिकल्पनायामनवस्थापत्तेरिति चेत् । अनोत्तरम् 'न तु' इत्यादि । प्रत्यक्षमित्यत्रापि सम्बन्धनीयम् । प्रत्यक्षं प्रत्यक्षप्रमाणं साकारं स्वपरनिर्णयात्मर्फ न तु नैव अयुक्तिमत् अपि तु युक्तिमदेव । कीटशं तत् ५ अयुक्तिमन्न भवति ? क्रमयुक्तं प्रमेण अपरापरशक्तिपर्यायरूपेण युक्तमुपपन्नम् । प्रत्यक्षक्रमस्या परतरक्रमेण परिझानानभ्युपगमात् । न च तावता तस्यापरिज्ञानमेव प्रत्यक्षपरिज्ञानस्यैव तत्कमपरिज्ञानत्वात् , प्रत्यक्षतत्कमयोः कथश्चिदेकत्वात् । अवश्यं चैवमभ्युपगन्तव्यम् , अन्यथा युगपदाविवदपरापरस्वभावपरिज्ञानस्याप्येवमयुक्तिमत्त्वापत्तेः । ततो युक्तं युगपदिय क्रमेणाप्यनेकस्वभावं सर्वम् , प्रत्यक्षतस्तथैव प्रतिपत्तेः । एतदेव लोकप्रसिद्धनोदाहरणेन दर्शयन्नाद- प्रत्यक्षपतिसंवेयः कुण्डलादिषु सर्पवत् । इति । प्रत्यक्षं विशदं व्यवसायात्मकं ज्ञानं तेन प्रतिपुरुषं सम्यगयाधितत्वेन वेद्यो ज्ञातव्यो 'विशेषः' इति वक्ष्यमाणमिहाकृष्य सम्बन्धनीयम् । विशेषश्च द्रव्यपर्यायात्मा भावः, तस्यैकान्तव्यतिभिन्नद्रव्यपर्यायाभ्यां भिद्यमानतया विशेषाभिधानोपपत्ते । अत्रोदाहरणम्- १५. कुण्डलमादिर्येषां प्रसारणोत्फणविफणाद्यवस्थाभेदानों तेषु सर्प इव तद्वत् । सर्पस्तावदनुस्यूतः कुण्डलायमनादिषु । प्रत्यक्षेणैव संवेद्यो विवादस्तत्र ते कथम् १ ॥१०७६॥ प्रत्यक्षेऽपि विवादश्वेदविवादः क्व कल्प्यताम् । कल्पनैवान्वयज्ञानं प्रत्यक्षन्नेति चेन्मृपा ॥१०७७॥ अन्वयज्ञानतोऽन्यस्य प्रत्यक्षस्याप्रवेदनात् । अवेदनाभिमानस्ते निश्चयाभावतो यदि ॥१०७८॥ सनिश्चयं दध्यक्षं कथं नाम न निश्चयः । अनिश्चयं चेत्सर्वत्र सर्व प्रत्यक्षमुच्यताम् ॥१०७९॥ तत्तोऽनुवृत्तासादिज्ञानं प्रत्यक्षमेव तत् । विशदत्वेन निर्भासात् सुखनीलादिबोधवत् ॥१०८०॥ वैशयं च यथा तस मुख्यमेव न कल्पितम् । निरूपितं तथा पूर्वमिति नेह निरूप्यते ॥१०८१॥ २० २५ १ परपर्या-शा०, २०, ५० । २ तुलना-"तस्मादुभयहानेन व्यावस्यनुगमात्मकः । पुरुषोऽभ्युपगन्तव्यः चुण्ड स्वादिषु सर्पवत् ॥"-मी० श्लो० ए० १९५१ प्रमाणसं० ११२। न्यं चिद -आ०, प०५०।१-त रा-आ०,व०, ५.1 न्यायविनिश्चयविवरणे [१।१२१ १० . ततो द्रव्यादिरूपत्वं परतुनोऽध्यक्षतोऽधुना । पश्यननाद्यनन्तेऽपि काले तत्त्वं प्रपद्यते ॥१०८२।। पश्यतोऽपि तथा व्याप्तिं यदि नानुमितिस्तदा । क्षणभङ्गानुमानादेरपि देयो जलाञ्जलिः ॥१०७३।। तस्मान्मध्यवदेवान्यकालेऽप्यर्थस्तदात्मकः । प्रपत्तव्योऽत एवोक्ता पूर्वश्लोके 'सदाभुतिः ॥१०८४॥ ततो द्रव्यपर्यायात्मैव भावः प्रत्यक्षेण तथा प्रतिपत्तेः । यत्पुनरत्रोक्तमतेन- "अविनाशोऽनुवृत्तिश्च व्यावृत्तिर्नाश उच्यते । द्रव्याविनाशं पर्याया नाशिनः किं तदात्मका १॥ नयाः पर्यायरूपेण नो चेद्र्व्यस्वभावतः । किमन्यरूपता तेषां न चेन्नाशस्तथा कथम् ॥" [हेतु टी० पृ० १०५] इति । तयुक्तम ; द्रव्याविनाशे पर्यायनाशस्थानभ्यपामात , सर्पोदेरेव नश्यतः पर्योयत्वात् अनश्यतश्च द्रव्यत्वात् । कथमेकरयैव नाशश्च अनामश्चेति चेत् ? प्रतीतिरेव प्रष्टव्या यैवमुप- दर्शयति न वयं तदुपाध्यायतया तदुपदर्शितमनुमन्यमानाः । प्रतीविरेव पृच्छपत इति चेत् । १५ कुतो घस्तुव्यवस्था प्रतीतिरेव वस्तूनां व्यवस्थाया निमन्धनम् । तत्र चेन्नास्ति विश्वासो विनष्टा तव्यवस्थितिः ॥१०८५॥ निर्विकल्पप्रतीतेस्तु तव्ययस्योपकल्पनम् । कुर्वन्तः फामयन्तेऽमी पन्ध्ययाऽपि सुतोद्भवम् ॥१०८६॥ ततः प्रतीतिबलावस्थापितस्यादुपपन्नमेकस्येव नाशश्चानाशश्चेति । तथा जोविश्या- जातिश्चेति । तथा प- "एक जात्मजातं च नानाएं प्रसज्यते । द्रव्यपर्याययोरेफस्वभागोपगमे सति ॥"[हेतु० टी० पृ० १०५] इत्ययमनुपालम्भ एव, स्याद्वादिनामभिमतत्वात् । यद्येवं द्रव्यपर्याययोः कथं स्यालक्षण्यभेदो २५ यतस्तमानात्वप्रकल्पनमिति पेस् ? विनाशाविनाशरूपतया भेदस्यापोद्धरणात् । तदपि फल्पनयैव नयनामधेयया न प्रत्यक्षादिप्रतीत्या, वर जात्यन्वरस्यैव भेदाभेदैवान्तविलक्षणस्य प्रति- भासनादिवि निवेदितमसकृत् । ततो यदुषम्-"ववो लक्षणभेदेन तयो व विभिन्नता।" हेतुष्टी० पृ० १०५] इति; तत्तय प्रत्यक्षादिप्रतीत्यपेक्षया । फल्पनापेक्षया तु न तया, तत्र सहमणभेदस्य प्रतीतः । २. सदाशदः । २ "उत्पत्तिथानु तिष"-ता. टि.
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावा - १।१२१ कथं पुनद्रव्यपर्याययोः तदात्मकमेकं वस्तु द्वयस्योपपत्तेः, अभेदेऽप्यन्यतरस्यैव सम्भवात् । कथञ्चि- दभेदे तु ताभ्यामभेदरूपस्याभेदे नद्रेद एव स्यात् । भेदे तु परस्परविविक्ताः अयः स्वभावा भैकस्तदात्मार्थः,नेपामध्यभेदरूपस्यापरस्य कल्पनायामनन्तस्वभावत्वमेकस्यापतितः (तम्)परापरत- स्वभावपरिकल्पनस्यापरिनिष्ठानात् । न च तदभ्युपगमो यस्तुवलभाविज्ञाने तदनवमासनादिति घेत् । न; एकान्ततस्तद्भेदाभेदयोः प्रत्यक्षादावप्रतिभासनात् । न च कथचिदभेदेऽपि ताभ्यामन्य. ५ सदभेदरूपम् , यदयं प्रसङ्गः किन्तु स्वरूपमेव, द्रव्यस्य पर्यायेण पर्यायस्य द्रव्येणाभेदः, तथैव प्रत्यक्षादितः प्रतिपत्तेः । अवश्यं चैतदेवमभ्युपगन्तव्यम् , अन्यथा विकल्पस्यापि स्वविष- यापेक्षया निर्विकल्पेतरात्मनो ज्ञानस्याभावप्रसङ्गात् । शक्यं हि तत्रापि वक्तुम्-तदात्मनो दे ज्ञानद्वयम् , अभेदेऽन्यतरत्वम् , कथञ्चिदभेदे प्राच्यप्रसङ्ग इति । ततस्तत्राप्ययमेव परिहारः, स्वरूपमेव वाय ताभ्यां तयोश्च तेनाभेदः तथैव निरपद्यस्ववेदनाध्यमतोऽधिगमादिति । ततः १० प्रमाणवृत्तमजानतैवेदमपि तेनाभिहितम्- "एकान्तेन विभिन्ने च ते स्यातां वस्तुनी स च । तयोः केन विभिन्नाभ्यामभिन्नस्य विभेदतः ॥ तेपामभेदसिद्ध्यर्थमभिन्नो' यदि कल्प्यते । अन्यस्वभावस्तस्यापि तदभेदप्रसिद्धये ॥ कल्पनीयः स्वभावोऽन्यः तथा स्यादनपस्थितिः। न चानन्तस्वभावत्वमर्थसामर्थ्यभाविनि ।। "ज्ञानेऽवभासते तेन तथैवोपगमो भवेत् ।" [हेतु० टी० पृ० १०५] इति । तथेदमपि- "ऐकान्तिकस्त्वभेदः स्यादमिन्नाद् भिन्नयोर्यदि । भेद एवं विशीर्येत तदेकाव्यतिरेकतः ॥" [हेतु०टी० पृ० १०५] इति । द्रव्यपर्यायाभ्याम् अन्यस्याभेदरूपस्याभाये तस्मात्योर्विकल्पत्तदाकारयोरिवाभेदपरि. शमस्यैवानुपपत्तेः । यदप्युक्तम्- "अभेदस्यापरित्यागे भेदः स्यात्कल्पनाकृतः। "तस्यावितथभावे वा स्यादभेदे मृपार्थता ।। अन्योन्याभावरूपाणायपराभावहेतुकः । एकमायो यतस्तस्मान्नैकस्य स्याद् द्विरूपता ॥"हेतुटी०५० १०६] इति, वदपि सादेरिव विकल्पज्ञानस्यापि द्वैरूप्य प्रतिविदध्यात् अविशेषात् । एकरूपमेव १५ २० २५ १-ता ख-आ.ब.प० । २ भेद यू-आ०,५०,५०।३ स्वञ्च विषयश्चेति द्वन्द । ५ विकल्पेऽपि । ५ विकल्पस्य । ६ निर्विकल्पेतराभ्याम् । ७ अर्चदैन । “पूर्व स्वभाव यश्च कार्यभेदानुमित ते = वस्तुनी स्यातामिति चार्थ "-हेतु० टी. टि. पृ० १०५। ९ “तयोरेको न भिन्नाभ्याम् इति वा पाठ "-ता० टि।" ज्ञानेन भास-आ०, २०, ५०१ तस्यापि वदभावे आ०, १०, २० । भेदस्य ।
४८ भ्यायविनिम्धयविधरणे (११२१ वस्तुतस्तज्ञानम् अमिलाप्याफारस्य तत्र कल्पितत्वादिति चेत् ; न ; स्वतस्तत्कल्पनस्य प्रत्यक्ष- वसम्भवात्, अन्यतश्चानवस्थापतेः कुतो वा परस्पराभावरूपत्वं भेदाभेद्योः ? प्रत्यक्षादिप्रमाणादिति चेत् । न सम्मूञ्छिततदुभयस्वभावस्यैव सादेर्भावस्य प्रतिभासनात् । नयादिति चेत् ; न ; वापि ५ सम्यगमिसन्धिरूपे प्रतिभासमानस्याप्येकस्य अपराभावत्वेनाप्रतिमासनात् , अपरत्र विधिवत् प्रतिषेधस्याप्यनभिसन्धेः । एकावधारणाभिसन्धिस्तु मिथ्येव प्रमाणव्यापारप्रतिद्वन्द्वित्वादिति न तदलेनान्योन्याऽभावरूपरवं द्रव्यपर्याययोः, यतो द्रव्यायैव पर्यायरूपराया पर्यायस्यैव प द्रव्यरूपतया एकस्यैव द्वैरुप्यं न भवेत् । यदप्युक्तम्- "अन्योन्याभावरूपाच पर्यायाः स्युन भेदिनः । तद्विनाशे[]विनाशि स्याद् द्रव्यंचा कथमन्यथा॥"हेतु०टी०पृ० १०६]इति; तत्रापि पर्यायाणाममेदित्वं नाशिस्यश्च द्रव्यस्य यदि कथञ्चित् ; अनुमतमेव, द्रव्यमेव नश्यति पर्यायनाशात , पयांया एच तिष्ठन्ति द्रव्याविनाशादिति प्रतीतिबलेनाभ्यनुज्ञानान् । एकान्तेन तु तत्कल्पनमनुपपन्नं तद्बलेन प्रतिक्षेपात्; अन्यथा विकल्पज्ञानमपि तदाकारववेकान्तेन व्यावृत्तमेव नानुवृत्तमिति प्रत्याकारं वझेदान्नोभयात्मकमेकं तद्भवेत् । तथा तदाकारयोरप्येका. १५ न्तेनाभेद एवेति निर्विकल्पकमेव तत् न कश्चिदपि विकल्प इति सनिबन्धनस्य वाड्मयव्यवहारस्या- भावात कथमने कान्तदोषोद्घोपणम् । विकल्पकमेव वा तदिति कथं तत्स्ववेदनस्य प्रत्यक्षत्वं कल्पनापोवस्यैव दुपपचे। नायव्यतिरिक्तस्यानुमानत्यमिति अन्यदेव तत्प्रमाणं प्रमाणद्वयनियम. व्याधाताय कल्प्येत । न चाऽस्वसंवि दतमेन तत् "सर्वचित्तचैत्तानाम्" [न्यायवि० पृ० १९] इत्यादेविरोधात् । ततः कथञ्चिदेव तज्ज्ञानस्य व्यावृत्तत्वमभिन्नत्वञ्च तदाकारयोरिति प्रतीति- २० षशात् प्रतिपत्तव्यम् । तथा द्रव्यस्य नाशित्वमभिन्नत्वञ्च पर्यायाणामिति न कश्चिद्याधातः । ततो यथा नेदं विकल्पे दूपणम्-'तद्धर्मयोराकारयोःतस्य तंत्र वा तयोरनुप्रवेशे ऐकान्तिको भेदाभेदो, अननुवंशे धर्मधमिर्णाः भेद एव नापरः । तथाहि-यनात्मना ज्ञानं तदाकायविति च यदि तेन भेदः, तदा भेद एव नैकस्य द्वैरूप्यम् । न च ज्ञानवदाकाराभ्यामपरस्वभावो यन्निमित्त. स्तयोरभेदः । सतोऽपि"तस्माद्यदि ज्ञानतदाकारयोरभेदः तदा "स एव न ताविति तयोः स्वभा. घहानिः "तस्मात्तयोर्भेदोऽप्यस्तीति चेत् ; तत्रापि येनात्मना ज्ञानं तदाकारी तदन्यश्चेति यदि तेन भेदः, तदा भेद एष तेपामप्यभेदसिद्धये "परस्वभावकल्पनायां पूर्वप्रसङ्गाऽनिवृत्तिः, धर्मित्वत्र सस्यैव स्यात्तदायत्तत्वात् ज्ञानतदाकारयोः । न चापरिनिष्ठितापरापरम्वभावं तज्ज्ञानं प्रतीयते इति । करमात् ? एकान्ततोऽनुप्रवेशस्य, ज्ञानतदाकारव्यतिरिक्तस्य तदभेदरूपस्य पानभ्युपगमात् । न चैयं भेद एव तयोः; स्वत एव कथञ्चित्परस्पराभिन्नतया निधिप्रतीत्युपारूढत्यात् । तथा - " विकल्पज्ञानम् । २-माणभेदादिति आ०,०ए०३ -कमतन्न पथितिक-आ०,ब०,१०।४प्रत्य- क्षत्वोपपत्ते । ५ तदा आ०,०प० । ६ यदा आ०,५०प०। सप्तमौद्विवचनम् । ८ विक्यस्य । ९ विकल्प। 1. अपरस्वभावात् । १ अभेद एव । १२ सपरसभावात् ।। -पर-आ०,१०,१०।
२२१२१] प्रथमः प्रत्यक्षमस्ताघः द्रव्यपर्यायात्मकेऽपि वस्तुनि । अत इदमपि प्रतीतिबलानभिज्ञतयैव तेनोक्म्- "ऐकान्तिकायनन्यत्वाद्भेदाभेदी तयोर्बुवम् । अन्योन्यं वा त्योभदो नियतो धर्मधर्मिणोः ।। तयोरपि भवेद् भेदो यदि येनात्मना तयोः । पर्यायो द्रव्यमित्येतद्यदि भेदस्तदात्मना । भेद एव तथा च स्यान्न चैकस्य द्विरूपता । द्रव्यपर्यायरूपाम्पां न चान्योऽस्तीह कश्चन ॥ स्वभागो यन्निमित्वा स्यात्तयोरेकत्वकल्पना । ततस्तयोरभेदे हि स्वात्महानिः प्रसज्यते ॥ तस्य भेदोऽपि ताम्याश्चेद् यदि येनात्मना च ते । धर्मी धर्मस्तदन्यश्च यदि भेदस्तदात्मना । भेद एवाथ तत्रापि तेभ्योऽन्यः परिकल्प्यते । तेपामभेदसिध्यर्थ प्रसङ्गः पूर्वपद्भवेत् ।। न चैवं गम्यते तस्माद्वादोऽयं जात्मकल्पितः।" [हेतु० टी० पृ० १०५] इति । नन्विदं प्रागेव प्रतिपादितम् 'एकान्तेन विभिन्ने च' इत्यादिना । न चातिव्यवधान १५ यदनुस्मरणाय पुनरपि प्रतिपाद्यत तस्माद्विस्मरणशील इवायं प्रतिभातीति चेत् ; किम् इवशब्दो. पादानेन १ साक्षादेव क्षणिकप्रज्ञस्य तच्छीलत्योपपत्तेः । ततो निर्दोषत्वादनेकान्तस्य न तद्वादी जाल्मः, तत्र अभूतं दोपं घोपयतोऽर्चस्यैव (र्घटस्यैव) जालमत्वात् । विकल्पस्योभयरूपत्वं निर्विकल्प-सविकल्पव्यावृत्तिभ्यामेव न वस्तुतः तत्कथं तद्वदन्य- नापि वास्तवत्वमनेकान्तस्येति चेत् । तस्य स्वरूपमपि अस्वरूपव्यावृत्तिरेवेति अभाव एव विक- २० स्पस्य । तथा च अनुमानस्यापि तद्रूपस्यामावात् निष्प्रयोजनवं सर्वहेतूनामिति किं तत्पूर्वपाद- नाय (वत्प्रतिपादनाय) हेतुविन्दुः तद्विवरणं चार्च (चार्चट) स्य ? ततो वस्तुत एवोभयरूपत्व- मनुमानविकल्पस्येति कथं तद्वदन्यत्रापि निर्दोपत्वमनेकान्तस्य न भवेत् ? एतदेव पूर्वमुक्तम्- "तादात्म्यनियमो हेतुफलसन्तानवद्भवेत्” [न्यायवि० श्लो० ११९] इति । स: अनेकान्तः आत्मा यस्येति तस्य भावः तादात्म्यम् , तस्य नियमः निर्दोपत्वेन २५ अवश्यम्भावः । संच, हेतुफलम् अनुमानचिकल्पः, स एव स्वीकारयोः सन्तन्यमानत्वात् सन्तानः, तस्येव तद्वदिति । तस्मादचाल्य एव अनेकान्तवादः इत्यर्च (त्यर्घट) प्रत्येवमुच्यताम्- अर्चतचटक, तदस्मादुपरम दुस्तकपक्षालचलनात् । स्याद्वादाचलविदलनचुञ्चुर्न तयास्ति नयचक्षुः ॥१०८७।। इति । । १ "जाल्मोऽसमीक्ष्यकारी स्थान्"-ता. टि। २ विकरपरूपस्य । ३ नियम.1 १ साकार-आ०, ब०, प०। ५-दवाल्य आo,ब०,५०।
न्यायविनिश्चयरियरणे [१२१२१ तदेवं मूल्फारिकानिर्दिष्टयोः द्रव्य पर्यायपदयोः व्याग्यान वृत्वा सामान्यविशेषपद- योस्तदर्शयति- समानभावः सामान्य विशेपोऽन्यो व्यपेक्षया ॥१२१॥ इति । समानः सदृश स चासो भावश्च आत्मलाभः स ण्य सामान्यम्, 'क ५ सकलव्यक्तिगतम्' इति समानशब्देन, 'नापि तद्वतोऽर्थान्तरम्' इति च भावपदेन प्रदर्शयति । न हि सामान्य तदाधारसमस्तव्यक्तिगतमेक सम्भवति, व्यरत्यन्नरालेऽपि तदुपल- म्भप्रसङ्गात् । व्यक्तावेव तदुपलम्भो व्यक्तस्तनिमित्तत्वात् नान्योति चेत् , न, उपलभ्येत रस्वभावतया तस्य भेदापत्तेः । तनो व्यापि सामान्य तथेयोपरभ्यत इनि क्थन्नान्तरालेऽपि १० तदुपलब्धिः । व्यक्तिप्पेव भावादिति चेत् , तदन्तरालेवसत कथमेकत्यम् ? अनुगतप्रत्ययात् , फ प्रत्ययस्यानुगम ? एकत्त्रमिति चेत् , न, प्रति यक्ति 'पण्डो गोः मुण्डो गो.' इति तद्भेदस्यैवोपरम्भात् । प्रत्ययत्वं सामान्यमिति चेत् , तस्याप्येकत्व तव्यक्षुि कुतः ? तदन्यस्मादनुगतप्रत्ययादिति चेत् , न, तत्रापि 'क: प्रत्ययस्यानुगम' इत्यादेरावृत्तेरनवस्था पत्तेश्च । तनैक सत्त्वमन्यद्वा सामान्यम् । नापि भावादर्थान्तरम् , भावस्यासत्त्वापने । सत्त्वेन सम्बन्धानेति चेत्, न, सम्बन्ध. स्य द्विष्ठत्यात् , असतश्च वदधिकरणत्वानुपपत्ते. कायद-ववत् । प्रागेवाऽसत्त्व तत्सम्बन्धात् न तत्समये इति चेत् , न , किं पुनस्तत्सम्बन्ध कादाचिरको यत एवम् ? तथा चेत् , कुतस्त- 'स्यापि सत्त्वम् १ अन्यस्मात् तत्सम्बन्धादिति चेत् , सोऽपि कथमसतः व्योमकुसुमयत् ? तस्यापि प्रागेव तत्सम्बन्धादसत्त्व न तत्समय इति चेत्, न, तत्रापि 'किं पुनः' इत्यादेर्दोपा- २० दपरिनिष्ठानाच्च । अकादाचित्कस्तु नित्य एयेति न तदपेन भारस्य प्रागसत्त्वम् । भवतु स्वरूप. सत्यापेक्षमेवेति चेत्, सवि तस्मिन् किमन्यसत्यसम्बन्धेन ? कारणेन तत्सम्बद्ध प्रयोत्पाद्यव इति चेत्, भवेदेयं यदि सत्त्वद्वयमुपलभ्येत । न चैवम् , 'घटोऽस्ति, पटोऽस्ति' इत्यादावेकस्यैव आत्मभूतस्य तस्योपलम्भात् । घटोऽस्तीतिप्रत्ययः विशेषणापेक्ष , विशिष्टप्रत्ययत्वात् , दण्डीतिप्रत्ययवत् , यच्चापेक्ष्य २५ विशेषणं तद् अर्थान्तर सत्त्वम् , तत्कथं तस्याऽप्रतिपत्तिरिति चेत् ? न, स्वरूपसत्यस्यैव कल्पना- पृथकृतस्य विशेषणत्वोपपत्तेः । दण्डीत्यत्र वस्तु भिन्नमेव विशेषण दृष्टमिति चेत् , किं तत्ता. दृशम् ? दण्ड इति चेत्, तर्हि 'देवदत्ते दण्डः' इत्येव प्रत्ययः स्यात् 'उत्पले नीलम्' इविवत्, न 'दण्डी' इति । दण्डसम्बन्ध एव, तस्यैव मत्वर्थायेनाभिधानादिति चेत्, न, तस्यापि स्वरूप- प्रत्यासत्तेरन्यस्याऽप्रतिपत्तः, अकारणाच्च ततो दण्डीत्यन तत्प्रत्यासत्तेरिव सद्व्यमित्यादी . १ -पोऽयव्यपे-आ०, य०, २० । २ सम्म स्यापि । ३ तासन्य ध-ना०, ब०, ५०।४ -त्यापते- आ०, २०, २०॥
प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्तावा . स्वरूपसत्वस्यैव अभिसन्धिपृथक्तस्य विशेषणत्वोपपत्तेः नातोऽर्थान्तरस्य सत्त्वस्य प्रतिपत्तिः । अर्थान्तरमेव द्रव्यादेः सत्यम् , तस्मिन् भिद्यमानेऽप्यभिद्यमानत्वात् , प्रदीपादेः पर्वत- बत्। न चाभिद्यमानत्वमसिद्धम्। 'सत् द्रव्यम् , सन गुणा, सत्कर्म' इति सर्वत्र द्रव्यादौ सल्लि- गस्य सत्प्रत्ययस्याविशेषादिति चेत् ; कस्तस्याऽविशेष: ? न तावदेकत्वम् । प्रतिद्रव्यादि तद्भेद. स्यैव प्रतिपत्तेः । नापि सादृश्यम् ; सदृशात्ततो विषयस्यापि सहशस्यैव प्रसिद्ध, तस्य च ५ प्रतिद्रव्यादि भिद्यमानत्वात् । यत्पुनः तदभेदे साधनान्तरम्-"विशेषलिङ्गाभावाच" [वैशे०सू० १।२।१७] इति; तदपि न द्रव्याद्यभेदज्ञानस्यैव तल्लिङ्गत्वात् । अभिन्नं हि द्रव्यादिभ्यः सत्त्वं प्रतीयते 'सद्व्या- दिकम् इति द्रव्यादिसामानाधिकरण्येन प्रतीतः । समवायाचथा प्रतीतिः नाऽभेदादिति चेत्, न; अभेदादेव 'एको भावः' इत्यादी तत्प्रतीतेर्दर्शनात् । न हि भावाद् अर्थान्तरात्मकमेकत्वं तत्सम- १० धायि सम्भवति; संख्याया गुणत्वेन द्रव्यसमवायित्वात् भावस्य च परसामान्यस्य अद्रव्यस्यात् । तस्मादभेद एव तस्य तस्मादिति तन्निबन्धनैव तत्सामानाधिकरण्यप्रतीतिः, तद्वत् सद्व्यादिक- मित्यपि, अन्यथा हेतुफलभावस्याव्यवस्थितिप्रसङ्गात् । ततो 'द्रव्यादिवत् तदभेदेन प्रतीयमानं भिन्नमेव सत्त्वम् । यद्येवं कथं तदात्मना सर्वैकत्वप्रतिज्ञानं जैनस्येति चेत् ? साहनयेन तन्मात्रस्यैवापोद्धारादिति ब्रूमः । वन्न एकमर्थान्तरञ्च द्रव्यादेः सत्वं सम्भवति । तद्वत् १५ द्रव्यत्वादिकमपि, तस्यापि 'पृथिव्यादि द्रव्यम्, रूपादिर्गुणः, उरक्षेपणादि कर्म' इति पृथिव्या- दिसमानाधिकरणतया प्रतीतः, तदनन्तरभावस्य तद्वद्भेदस्य च उपपत्तिबलायातत्वात् । ततः सूक्तम्- 'समानभावः सामान्यम्' इति । अन्यो विसमानभावः विशेषा, विसशपरिणामादेव भावेषु व्यावृत्तप्रत्ययस्यो. पपत्तेः । नित्यद्रव्ये' अन्त्यविशेषेभ्यो मिन्नेभ्य एव तदुपपत्तिरिति चेत् ; कथमव्यावृत्तेषु २० "तेभ्यस्तदुपपत्तिा ? तेषां तत्र समवायादिवि चेन्"; स किम् अव्यावृत्तानि" व्यावर्त्तयति ? तथा चेत् ; न 3 व्यावृत्तेस्तद्रूपत्वे विसदृशपरिणामसिद्धेः । अतद्रूपत्वे कथं तया तानि न्यावृत्तानि ? व्यावृत्त्यन्तरकरणादिति चेत् ; न; अनवस्थापत्तेः । न व्यावर्तयति व्यावृत्ति- प्रत्ययं तूपजनयतीति चेत् ; न ; अव्यावृत्तेषु तत्प्रत्ययस्य भ्रान्तत्यप्रसङ्गात् अलोहिते लोहितप्रत्ययवत् । न चायं भ्रान्तः ; योगिनां भावात् । न हि तेषां भ्रान्ति:, निरुपप्लवज्ञान- २५ वतामेव "तत्वोपपत्तेः । ततः तुल्याकृतिगुणक्रियेष्वपि परमाणुपु परस्परासम्भवी पंश्चिदा. कृत्यादिव्यतिरेकी परिणविविशेपो वक्तव्यः यो योगनामयं प्रत्यय इति सिद्धो विसदृश- -- , सादृश्यस्य । २ द्रव्याभेद-आ०, ५०, १०। ३ सामानाधिकरण्यप्रतीते । ४ भावसमवायि । ५ एकत्वस्य। ६ भावात् सामान्यान् । ७-स्याप्यव-ता. 1 ८ द्रव्यादेव तद-आ०, २०, प०। ९ "अन्तेयु भवा अन्त्याः खाश्रयविशेषकत्वाद्विरोपा । विनाशारम्भरहितैषु निलदव्यप्वागरापालदिगान्ममनरम प्रतिद्रव्यमे. कैकशी वर्तमाना. अत्यन्तव्यात्तिद्धितव. ॥"-प्रा० मा० पृ. १६८ 1 1. विशेषेभ्यः । ३१ चेत् कि-आ०, २०, ५० 112 -वृत्तो भ्या-आ०,१०,६०1१३ नित्यद्रव्यरूपले । १४ व्यातिप्रत्ययस्य । १५ यौगित्वोपपत्ते. ।
४५२ न्यायविनिश्चयविवरणे [१११२१ परिणामः । ततो यदुक्तम्-“योगिनां नित्येपु तुल्याकतिगुणक्रियेपु परमाणुए मुक्तात्ममन:- सु चान्यनिमित्तासम्भव एभ्यो निमित्तेभ्यः प्रत्याधारं विलक्षणोऽयमिति प्रत्ययव्यावृत्तिः तेऽन्त्या विशेपाः ।" [प्रश० भा० पृ० १६८] इति , तदयुक्तम् , अन्यनिमित्तसम्भवस्य निर्वाधात् , व्यावृत्तिप्रत्ययादेव अवगमात् । अन्त्यविशेषनिवन्धनत्वे तनिधित्वानुपपत्तेः । ५ ततो निष्प्रयोजनमेव तस्कल्पन पैशेषिकस्य । ततः स्थितम्-'समानभावः सामान्य विशेपोऽन्यः' इति । सामान्यविशेपयोः अपेक्षाकृतत्वान्न वस्तुस्वभावत्वम् । न हि वस्तुस्वभावाः 'पुरुषेच्छया भवन्ति, तदनियमेन तेपामप्यनियमप्रसङ्गादिति चेत् , अवाह-व्यपेक्षया इति । अपेक्षा पुरुपेच्छा, तदभावो व्यपेक्षा, तया सामान्य विशेषश्च, ततो वस्तुस्वभावी १० च । न हि सामान्यविशेपस्वभावत्वे भावः पुरुपेच्छामपेक्षते, स्वहेतोरेव तथोत्पत्तेः । तर्हि कथं खण्डापेक्षया 'समानः' इति, कर्यापेक्षया च 'विलक्षणः' इति मुण्डे प्रत्यय इति चेत् ? एवमपि प्रत्ययस्यैव तत्कृतत्व न सामान्यविशेषयोः । प्रत्ययोऽपि नीलादिप्रत्ययवस् तन्मात्रादेव कस्मादभवन् अपेक्षामनुसरतीति चेत् ? सत्यम् , नानुसरत्येर प्रत्यक्षप्रत्ययः प्रत्यभिज्ञानस्य तु सैव सामप्रीति तदेवं तामनुसरति । न हि प्रतियोगिप्रतीक्षामन्तरेण एकत्ववत् सादृश्य- १५ वैसदृश्ययोरपि प्रत्यभिज्ञान सम्भवति । तदेवं द्रव्यपर्याययोरिव सामान्यविशेषयोरपि लक्षणोपपत्तेः उपपन तदात्मकत्वमर्थानाम् । अनुपपन्नमेव 'एक च व्यात्मकञ्च' इति विरोधादिति चेत् , कुतो विरोधः १ एव. मेवेति चेत् , न किश्चित्तत्व भवेत स्वेच्छाविरोधस्य सर्वन सम्भवात् । प्रमाणत इति चेत् , क्व तेनासौ प्रतिपनः १ घटे घटयोश्च, वर एकत्वद्वित्वयोः द्वित्वकत्वविरुद्धयोरेव प्रतिपत्तेरिति २० चेत् , कीडशो घटो यत्र तत्प्रतिपत्तिः ? सामान्यमानं विशेपमा वेति चेत , न किञ्चित्तत्त्वं तथाप्रतीत्यभावात् । सामान्यविशेषात्मा चेत् , न तर्हि विरुद्धमेकस्य द्वैरूप्यम् विरोधव्यापारि. तेनापि प्रमाणेन तदविरोधस्योपदर्शनात् । सामान्यविशेपाभ्यामिव पटकुटीभ्यामपि घटस्य व्यात्मकत्व किन्न भवतीति चेत् ? भवत्येव यदि प्रमाणमुपदर्शयति । न चैवम् , अतो न भवति । ततो यदुक्त मण्डनेन-"नेदृशानां विप्रतिषिद्धार्थानां ज्ञानानां प्रामाण्यमेन युज्यते २५ संशयशनवत्" [ब्रह्मसि० १० ६३] इति , तदसम्बद्धम् , तदर्थविप्रतिषेधस्यैव कुतश्चिद. प्रसिद्ध । तदप्रामाण्यात्तत्सिद्धौ परस्पराश्रया-तत्प्रसिया तदप्रामाण्यम् सिद्धिः' इति । यधापरम्-"संशयविषयोऽपि द्वयात्मा सात् द्वयाभासत्वाचस" [ ब्रह्मासि० १ "पौरुपेयीमपेक्षाच न हि वस्त्वनुवर्तते"-ब्रह्मसि. २१६ । २ अपेक्षाकृतत्वम् । ३ प्रत्यभिज्ञानम् । "एक्स्य या मकता विरोधक्ती, एकच्च यामशति विनिषिद्धम् ।"-मासिक पृ० ६३ । परस्परसभावत्वे स्यात्सामा चविशेषयो । सायं तस्वती नेदं द्वरूप्यमुपपद्यते ॥"-तत्त्वसं० श्लो१७२२ । हेतु टोप०:०५। प्रघातिकाल. १२५। ५. सू. शा. भा० ॥२॥३३ । ४ -त्व न आ०, २०,५०। ५'द्वयोराभास प्रकाशो यस्यासौ धाभास तस्य भावस्तव तस्मात्"-ता. टि.। ' . . ततश्च तत्प्र- भ्रथमा प्रत्यक्षप्रस्तावः . १२१२२] पृ०६३ ] इति । तदपि भवत्येव ; यदि संशयः प्रमाणम् , प्रमाणोपदर्शितस्यैव वस्तुरूपत्वो- पपत्तेः । अन्यथा सर्वस्य सर्वार्थसिद्धेः नाभेदवादी' 'तमतिशयीत । यदि च विरोधात् न व्यात्मक वस्तु कथं ब्रह्मणः प्रविपन्नेतरस्वभावत्वम् ? प्रतिपन्नमेव ब्रह्म तत्प्रमाणात् नाप्रतिपन्न- मिति चेत् ; न ; भेदविवेकेनाऽप्रतिपत्तेः । तेनापि प्रतिपत्तो न तन भेदविभ्रमः स्यात् , न हि शो पीतविवेकेन प्रतिपन्ने पीतविनमः । विवेकस्याऽनिश्चयाद्विभ्रम इति चेत् ; न ; ५ प्रतिपत्तेरेप निश्चयत्वात् , अन्यथा आनन्दादेरप्यनिश्चयेन विभ्रमविपयत्वे प्रमाणवेद्यमेव ब्रह्म न भवेत्-'विभ्रमाकान्तन तद्वेयञ्च' इति विरोधात् । प्रतिपत्तेरपि आनन्दादावेव निश्चयो न तद्विक इति चेत् ; न ; प्रतिपचरपि निश्चयेतरात्मत्वानुपपत्तेः विरोधात् । अन्यथा ब्रह्मण एव प्रतिपन्नेतरस्वभावत्वमविरुद्धं साधयति ततो नेदमत्र दूपणम्- "एकलमविरोधेन भेदसामान्ययोर्यदि । न यात्मता भवेत्तसादेकनिर्भक्तभागवत् ॥'' [ ब्रह्मसि० २।१८ ] इति । अन्यथा ब्रह्मण्यप्येवं भवेत- एकत्वमविरोधेन प्रतीतेतरयोयदि । न यात्मता भवेत्तस्मादेकनिर्भक्तभागवत् ॥१०८८॥ इति । तदेवं द्रव्यपर्यायसामान्यविशेषात्मकत्वं भावस्य प्रपञ्चोक्तमुपसंहत्य दर्शयन्नाह- स्खलक्षणमसङ्कीर्ण समान सविकल्पकम् । समर्थ स्वगुणैरेकं सहमचिवर्तिभिः ॥१२२।। इति । वक्ष्यते इस्थम्भावेन गृह्यते येन तहक्षणम् , स्वं स्वरूप लक्षणं यस्य तत् स्वलक्षणम् । न हि तस्यान्येन लक्षणम् । अन्येनेव क्रियावत्यादिना दन्यस्य लक्षण- मिति चेत् ; गुणादेरपि तेन कस्मान्न लक्षणम् ! द्रव्य एव तस्य भावादिति चेत् ; अलक्षिते सस्मिन् वय' इति फुतः ? लक्षितमेव तत् 'अन्येनेति चेत् । न ; क्रियावत्त्वादेः लक्षित. लक्षणत्वेन वैयोपत्तेः । अन्यस्यापि तस्मादर्थान्तरत्वं चेत् ; तेनापि युतस्तस्ये लक्षणं न गुणादेरपि । द्रव्य एव तस्यापि भावादिति चेत् ; न ; 'अलक्षिते तस्मिन्' इत्यादेरावृत्त्या पक्रकादव्यवस्थिरोध । अनर्थान्तरत्ववेत् ;न; क्रियायत्वादेरेव तत्त्वापतेः । तन्न अन्येन वल्लक्षितम् । मियावरवादिनैवेति चेत् ;न; परस्पराभयात्- 'लक्षिते तस्मिंस्तत्रैव किया- पत्वादिः, वेन तल्लक्षणम्' इति । १५ - चेतनमन्यता वस्तु २० . , -यादिनमति- सावादीनमति-आ०, २०, प.यादी तमनि-ता. टि.। २ भदनादिनम् । प्रतिपत्तिरपि आ०, २०, ५.! "भादेशतरनिर्भपभाग"-महति । ५ "निसरगुणासमानिसल दम्यम् (ो सू० 111१५) नि पचनान्"-शा.२०१६"लक्षगानरे"-तारित -., य.,प.
४५४ . १० न्यायविनिश्चयविवरणे [१११२२ अपि च, तेनं वक्ष्यमाण रूपं यदि द्रव्याद्भिन्नमेव कुतस्तल्लक्षित स्यात् ? चेनापि तस्य लक्षणादिति चेत्, न, तनाप्येव प्रसङ्गाद् अपरिनिष्ठापत्ते । अभिनश्चीत , तदपिस्वतो गुणादे- ावृत्तम् , अयावृत्त वा व्यावृत्त सन्न चेद् द्रव्य स्वत एव गुणादिकात् । लियावत्यादिनान्येन तो व्यावर्तते कथम् ॥१०८९॥ न हि स्वरूपमन्येन शक्यते कमन्यथा । अन्यथाऽऽत्माद्यनित्य स्यात् परिणामप्रकल्पनात् ॥१०९०।। व्यावृत्तवुद्धिहेतुत्वात् स तव्यावर्गको यदि । अव्यावृत्ते कथ तस्मिन् वद्बुद्धिर्न मृपा भवेत् ॥१०९१॥ मृपावुद्धिकपद् द्रव्य व्यावृत्तश्चेद् गुणादिकात् । चन्द्रश्चन्द्रान्तरादेव व्यावृत्तस्तद्वतो भवेत् ।।१०९२॥ व्यावृत्तमेव तत्तस्मात् स्वभावेनोपगम्यताम् । तथा सति तदेव स्यात्, नच तयोरेकान्तस्य लक्षणम् । यमात्मानमाश्रित्य 'बाढमिद- मरमाद् व्यावृत्तम्' इति प्रतिपत्ति स एव असाधारणत्वात् तस्य लक्षणमुपपन्नं नापर विपर्ययात् । १५ ततः सूक्तम्-'स्वलक्षणम्' इति । कथ पुनरभेदे लक्ष्यरक्षणभायः १ सत्र हि रक्ष्यमेव लक्षणमेव वा स्यात् । न च तयोरेकामावे अन्यतरस्य सम्भव परस्परापेक्षित्वादिति चेत्, न, प्रवृत्ति व्यावृत्तिरूपतया तद्- पपरो । न हि वस्तुन प्रवृत्तिरेव रूपम् , पररूपादिनापि तत्प्रसगात । नापि व्यावृत्तिरेव, स्व रूपादिनापि तदापत्तेः । अपि तु प्रवृत्ति-व्यावृत्ती वे अपि, तत्र प्रवृत्तिरूपेण लक्ष्यम् , लक्षणञ्च २० तदेव व्यावृत्तिरूपेण । वस्तु हि प्रवर्त्तमानम् अन्यासाधारणेन आत्मनैव शक्य रक्षयितु नान्यथा । तथा च सत्प्रत्ययहेतुत्वेन सत्त्वस्य द्रव्यादिप्रत्ययहेतुत्वेन च 'द्रव्यत्वादेरसाधारणात्मनेव' परे. रपि लक्षणमभ्युपेतम् ततो नाभेदे लक्ष्यलक्षणभावानुपपत्ति । भवतु स्वलक्षणम् , तत्तु विजायीयादिव सनातीयादपि विलक्षणमेवेत्यवाह-समान सदृश केनचित् स्वलक्षण नैका-तेन विलक्षणमेव तथा प्रतीते 1 कल्पनयैव तथेति चेत् , न, २५ प्रत्यक्षतः प्रतीतेः । न हि तत्प्रतीत कल्पनया, वैवदृश्येऽपि प्रसगान् । सण्डप्रत्यक्ष मुण्डे नास्ति तत्कथ तत्सार प्रत्यक्षप्रतीतमिति चेत् ? वैसदृश्यमपि कथ "तत्प्रत्यक्षस्य कर्कादावष्य भावा । कर्यादिविशिष्टतयैव तस्याऽप्रतिपत्ति स्वरूपतस्तु प्रतिपत्तिरेवेति चेत्, न, सादृश्यस्या तैन रम्य -आ.,.,५०।२-यत्तिबुद्धि-आ०, य०, प.३ मियावत्वादि । श्यलपण भावोपपने । ५ परमामान्यस्य -सा. टि०। ६ अपरमामान्यस्य -ता टि-10-णामन्येव आ०,०, प.1८ नैयाविरदिभिरपि । - णमसाधारणो धर्म -प्रा. व्योः गृ. १८५। ९ वैसा-येऽपि भा०, २०, ५०.प्रतीयते गति "सण्डप्रत्यभस्म।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव: , ५ २२१२२] प्येवं प्रतिपत्तेः । भवतु वैसदृश्यापि कल्पनयैवेति चेत्, नेदानी स्वलक्षणं नाम किञ्चित् , सदृशेतराकारव्यतिरेकेण तस्याऽप्रतिभासनात् । तस्माद्वस्तुसदेव सादृश्यम् । अपि च, पूर्वानुभूतसादृश्यं जलादेदृश्यते न चेत् । स्नानपानादिसामध्यं कुतस्तस्यावगम्यताम् ? ||१०९३॥ कल्पनासिद्धसादृश्याद् वस्तुसामर्थ्यवित् कथम् ? अनुमानादनभ्यासे स्नानार्थी यत्प्रवर्तताम् ॥१०९४ ॥ तत्समर्थतया वेद्यं 'वस्तु तोयादि वाञ्छता । समं तोयादिनान्येन तद्वक्तव्यं मनीषिणा ॥१०९५॥ तदाह 'समर्थम्' इति । अर्थक्रियायां शक्तं यतः ततः 'समानम्' इति । 'यदि गोत्वं नाम सामान्यमन्यत् सादृश्यान्नास्ति कुतो बाहुलेयादी गोबुद्धिः १ १० शाबलेयसादृश्यादेवेति चेत् । ननु ततः 'शावलेय इव' इति, भेदविभ्रमे 'शायलेयोऽयम्' इति वा प्रत्ययः स्यात् न 'गोः' इति, शावलेयस्य अगोत्वात् । गोत्वे 'तस्यैव कथमन्येपु अत्यन्त- सोष्वपि तद्बुद्धिः गोरूपस्यामावात् । शापलेयस्वभावं हि गोरूपम् , तत्कथं तदन्येषु ? व्यक्तिसङ्करापत्तेः । वन तत्सादृश्यादन्यत्र वद्बुद्धिः । अन्यसादृश्यादिति चेत् ; न ; अन्य. स्यापि प्रसिद्धस्य गोरभावात् । तस्मात् तद्बुद्धिरन्यत एव अन्वितैकरूपात सामान्यादिति १५ चेत् । न ; शाबलेयसादृश्यादेव तदुपपत्तेः। भवतु ततः शाबलेयबुद्धिः, गोबुद्धिस्तु कथमिति चेत् ; न ; गवानभिज्ञस्य शायलेय एव गौरिति सङ्केवात् । "कर्कादावपि तत्सङ्केताद्बुद्धिरिति चेत् ; भवतोऽपि किन्न ? सामान्यस्य तद्विपयस्याभावादिति चेत् ; परस्यापि सादृश्यस्या- भावात् । सादृश्यात्तद्बुद्धिः गवयेऽपि करमान्नेति चेत् ; सामान्यादपि कस्मान्न ? सत्त्वादेस्तत्रापि भावात् । तद्विशेषादेव समानं न तन्मात्रादिति चेत् ; समानमन्यत्र, सादृश्यमात्रादपि २० तदनभ्युपगमात् । 'सादृश्यार(द)गोत्ये शावलेयत्वं कथमिति चेत् १ सामान्यादपि बत्ने कथम् । अन्यतः सामान्यादिति चेत् ; सादृश्यादृप्यन्यत एवास्तु, सामान्यवत् सादृश्यस्यापि अनेकधा वस्तुपु भाषात् । ततो न सूकमेतत् कुमारिलस्य- "सारूप्यमथ सादृश्यं कस्य केनेति कथ्यताम् । न तावच्छापलेयेन याहुलेयादयः समाः ॥ विशेषरूपतो येऽपि तत्संस्थानादिभिः समाः । शावलेय इवेति स्यात् तत्र घुद्धिन गौरिति ॥ । वस्तुतो यदि भा०, ५०, प० । २ "भार आह"-ता. टि.। ३ शायलेयस्यैव । * "भ्यक्तिभिस्ता- रात्म्याशिन्यं सामान्य मीमासौरिष्यते तर दूपर्ण शास्त्रान्तरे उत्तम्-तादात्म्यं चेन्मतं जातेयंत्तिजन्मन्यजातता। नाशेऽनाशच नेष्टतद्वयानन्वयो न विम्"-ता. टि.। ५ श्वेतादादौ । ६ "शालेय एव गारिति सदेतात्" यन्वितद्ध्यनभ्युपगमात् । ८ अनेाशायन्यत्तिगतसादृश्यान् । ५ "रिव"-मी० हो । " २५ -ता.टि.७ न्यायविनिश्चयविवरणे (१२१२२ शालेयोध्यमिति या प्रान्त्या गौरिनि नास्ति तु । शावलेयस्वरूपश्च न गौरित्ययविष्ठते ।। तदन्येषु हि गोवुद्धिन स्यात् सुसदृशेष्वपि । दृश्यते सा न चान्यत्वे गोरूपं तत्र विद्यते ।। न चान्यो गौः प्रसिद्धोऽस्ति यत्सादृश्येन गोमवेत् ।" [ मी० श्लो. आकृति० श्लो० ६७-७१ ] इति । प्रतिपादितन्यायेन शायलेयस्येव गोरूपतया व्यवस्थिती तन गृहीतस तस्य याहुले. यादायपि उत्सरशे गोबुद्धः तद्व्यवहारस्य च सम्भवात् । सादृश्यमेव वत्र नास्तीति चेत् । कथम् 'अयमनेन सदृशः' इति प्रत्ययः ? तदययवसाटश्यादिति चेत् ; न; अवयवानां तद्वतो भेदे योगमवानप्रवेशात् । अभेदे कथं 'तत्सा श्यम् अवयविसादृश्यमेव न भवेत् ? यतो 'न तावत्' इत्यादि सुभाषितम् । यदि सादृश्यात् बाहुलेयादी गोधुद्धिः कदाचित् कस्यचित् कविच्च स्यात् मैने चैत्रबुद्धिवत , भ्रान्तिश्च तद्वदेव । न चैवम् , सर्वदा सर्वेपाञ्च भावात्, निधित्वनाभ्रान्तत्वाच्च । निर्वाघभ्रान्तिकल्पने सर्वज्ञान मिथ्यात्वापान कोऽपि कश्चिद्गीः सद्विशेपस्य क्वचिदपरिज्ञानात् । बभूव पूर्वमिति चेत् ; न; वस्य अस्मदादिमिरप्रतिपत्तेः । १५५ तन्न तत्सादृश्यात् कचिट् गोबुद्धिः। भवन्ती या बाह्रलेयवत् महिप्यादावपि भवेत् उत्सादृश्यस्य तत्रापि भावात् । न हि तस्यै क्यचिरपरिसमाप्तिः अनवधित्वात् , ततो न तद्वशाल्लभ्यते गोबुद्धि- रिति चेत् ; तन्न; यस्माद् भवत्येव बाहुलेयादी गोयुद्धिः विभ्रमो यदि तद्विपयास्तत्र न स्यात् मैत्रे घेत्रयुद्धिवत् । अस्ति च तंत्र तद्विपयः सारश्यविशेषः तत्रैव तद्रुद्धः सङ्केतात् । अत एव सर्वदा सर्वेषामपि तदुपंपत्तिः । एकगोत्वनिबन्धनत्वे तु भवत्येव विभ्रमः प्रत्यक्षेणैव तनोत्व २. विविक्तवस्तुविपयेणे पाधनात् । न च पद्विभ्रमे सर्वज्ञानमिध्यात्वम् ; वाघावत एव तदुपपत्तेः । +को गौः कश्चिनास्ति प्रथमसचेतविषयस्येव तत्त्वात् । न पत्र विशेषामहणम् ; सादृश्य- विशेषस्योपसम्भात् । न च तन्निवन्धना पुद्धिः महियादावपि; तत्र "तदभावात् । अन्यतस्तु सादृश्यान्न भवत्येव, सामान्यान्तरादपि प्रसद्गात् , तस्यापि निरवधित्यात् । ततः सुळभैव सारश्यविशेषाद् गोबुद्धिः । इति दुर्भापितमेवेदमपि "तस्य- "न चापि स इति ज्ञानं सशेष्यास्ति सर्वदा । सर्वपुंसामतो भ्रान्ति पा बाधकवर्जनात् । सर्वज्ञानानि मिथ्या च प्रसज्यन्तेऽत्र कल्पने । विशेषग्रहणाभावादेको गौः कश्व कल्प्यताम् ।। १"न चान्यत्र"-मी. लो० । २ अवयवसादृश्यम् । ३ भ्रान्तिश्चेत्तद्वदेव ता.। ४ पश्चिदेव गौ आ०, ब०, ५०१५ सादृदयस्य । ६ -मातेरनवधि-०, २०५०1७ सादृश्यवशात् । ८ चाहुलेयादौ । ९.-पपत्तेः आ०, २०, ५०।10 -पये बाध-आ०,५०,५०।११चैश गौ आ०, २०, ५०।१२ तदावा -आ०, २०, ५०1१३ सन्यवस्तु आ०, २०, ५०।१४ कुमारिरस्य । ..
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताघा २१२२] बभूव यद्यसौ पूर्व नास्मदादेस्तद्ग्रहात् । सादृश्यस्यावधिर्नास्ति ततो गोधीन लभ्यते ॥" [मी० श्लो० आकृति० श्लो०७१-७४] इति । तन्न सामान्यात्मना स्वलक्षणस्य सङ्करोऽपि । नापि शक्त्यात्मना; तस्यापि प्रतिव्यक्ति भिन्नस्यैव भावात् । अभिन्न एवासी मृरिष- ५ ण्डादीनाम् । न हि मृत्पिण्डशक्तरेव दण्डादिप्वभावे तेषां तत्कायें व्यापार: तदन्यकारणवदिति चेत्, न; सर्वशक्तिसाकल्येऽपि तदुपपत्तेः । यथा मृत्पिण्डस्तत्र शक्तः तथा दण्डादिरपीति शकिसाङ्क तूपादान एव सहकारिण्येव चैकस्मिन् सर्वशक्तीनां भावात् तदन्यतमस्यैव तत्कार्य स्यान सर्वेपाम् , वैयया॑त् । एवमपि सामथ्या एव जनकत्वं नैकस्येति चेत् ;न; सर्वशक्ति- साकल्ये तद्विरोधात् । न तद्विरोधः प्रत्येकदशायां तत्साकल्यस्य तिरोधानादिति चेत्, इतर- दशायां फुतस्तदभिव्यक्ति: ? सामग्रीशक्तरिति चेत्, न; शक्तिसाङ्कर्यवादिनः तच्छक्केरपि प्रत्येक भावात् , तदापि तदभिव्यक्तः। तथापि तस्याजनकत्वे समुदायस्यापि न स्यात् तत्रापि अभिव्यक्तशक्तिसाकल्यादन्यस्य तज्जनननिमित्तस्याभावात् । सामग्रीशक्त्या चाऽनभि. व्यक्तया न तदभिव्यक्तिः कार्यवत् । न च स्ववस्तब्यक्तिः प्रत्येकशत्तिवत् । सामन्यन्तरशतया तव्यक्तावनवस्थानम् । सामग्री च यावदेकशक्तिमभिव्यक्ति तावत् कार्यमेव कुर्वीत कि पारम्प- १५ येंगी तन्न शक्तिसातादेककार्यत्वम् उपादानादीनाम् , अपि तु तत्साम्यादेव । अत एव बहुप्वेव कार्य नैकस्मिन् । तत्साङ्क वितरनिपेक्षमेकस्मिन्नेव स्यात् उपादानेतरशक्तीनां तत्रैव भावात् । तन्न शक्तिरूपेणापि सङ्कीर्ण यस्तु । तदाह- 'असङ्कीर्णम्' इति । नन्वसरो नाम स्वलक्षणानामितरेतराभावात्मा भेद एव । तस्माच तेषामनर्थान्तरत्वे तद्वदभावरूपत्वात् किन्नाम स्वलक्षणम् ? एकरूपत्वाच केन वा किमसङ्कीर्ण भवेत् ? अपि च, भेदस्य वस्तुरूपत्वे न क्वचिदेकत्वं भेदेन तस्य विरोधात् । 'ततः पर- माणुरपि भिन्ना (त्र) एव । न चैकाभाव तत्समुच्चयरूपमनेकमपि । न च तृतीयः कश्चित्प्रकार इति नि:स्वभावत्वमेव स्वलक्षणस्य स्यात् । तदुक्तम्- "न भेदो वस्तुनो रूपं तदभावप्रसङ्गतः।" [ब्रह्मसि० २।५] इति । अथ मा भूदयं दोप इति तस्य तेभ्योऽर्थान्तरत्वमिप्यते “स तर्हि नीरूप एव स्यात् २६ वस्तुध्यतिरेकिणः प्रकारान्तरासम्भवादिति न तबलेन तेपामसाङ्कर्यम् , नीरूपस्य क्वचिदनु. पयोगादिति सार्यमेव प्राप्तम् । इदमप्युक्तम्- २० १ दण्डादीनाम् । २ ततायें व्यापारोपपत्ते । ३ येन रूपेण । १ प्रत्येकदशायामपि । तथापि भा, 2०, ५०। ५ प्रयेवस्य । ६ खलक्षणानाम् । ७ एकत्वस्य। ८ "परमाणुरपि भेदादनेशमा इति नैक तथा च नागमुबयापोऽनेगेऽन्यग्गामा नारयते"-प्रहामि ० ४८ । ९ -यः प्र-आ०, २०, ५०१ १०इनरेनराभायान्मा।
म्यायविनिश्चयपियरणे । ११२२ ५ . "अरुपेण च भिन्नत्वं वस्तुनो नायकल्पते।" [प्रक्षसि०११५]इति चेत् ; उच्यते- यतावदुरुम्-'भेदात् स्खलक्षणानामनन्तरत्वे तद्वदेकत्वम्' इति ; तन ; भेदस्य. फस्याभावात् , प्रतिस्वलक्षणं परिसमाप्तिमत एव तस्योपगमात् । नापि तद्वदभावरूपत्वम् । एकान्ततस्तेषां 'तदनन्तरत्वस्याभावात् । कथञ्चिदभावरूपत्वं तु न दोपाय , इष्टत्वात् । यदन्यदप्युक्तम्- 'मा भूदयम्' इत्यादि ; तदपि न सुन्दरम् ; अर्थान्तरत्वस्यापि एकान्तेनाऽविभावनात् । भोकान्तव्यतिरेकातु न नीरूपत्यमेव विपर्ययस्यापि भावादिति 'कथं सति तस्मिन् सायं तेपाम् , "वस्य तद्रूपत्वात् । उक्तव्य- "नात्यन्तमन्यत्व- मनन्यता च विधेर्निपेयस्य च" [वृहत्स्व० श्लो० ४२] इति । यदप्यभिहितम्- 'भेदस्य वस्तुरूपत्वे' इत्यादि ; तदपि न मनोझं प्राज्ञानाम् ; गया १० हि- "योकत्ववत् स्वरूपत एव भेदः स्यात् तदा तेनेकत्वं परिपीढयत विरोधात् । न चैवम् , तस्य परोपाधित्वात् । परतो हि स्वलक्षणानि भिद्यन्ते न स्वतः । न चोपाधिभेदे विरोध: यतस्ततस्तस्य' परिपीडनात् एकसमुच्चयात्मनोऽनेकस्याप्यनुपपत्ते, प्रकारान्तरापरिझानाच निःस्वभावत्वं तेषामनुपज्येत । कथम् यादिना ब्रह्मणोऽपि निःस्वभावत्वं न भवेत् १ शक्यं हि वक्तुम्- अपञ्च- १५ विवेकस्य "तत्स्वभावत्वे न तस्यैकत्वं विवेफेन तद्विरोधिना परिपीडनात् , तदभाये च नानेकत्वं वस्य तत्समुच्चयरूपत्वात् , न च प्रकारान्तरम् , ततो निःस्वभावमेव तदिति । नास्त्येव तस्य तस्माद्विवेकः, "सर्वगन्धः सर्वरसः" छान्दो० ३ १४१४] इत्यादिना तस्य सर्वात्मत्वप्रवणा- दिति नेत् ; न ; निर्मुक्यभावप्रसङ्गात् । प्रपञ्च एव हि अशनायापिपासादिरूपः संसारः, तस्माच्च "तस्याविवेके कथमुपायेनापि निर्मुक्तिः ? न हि तेन तस्य" स्वभावाद्वियोगः २० पावकत्येव ओण्यात् । स्वभावतश्चाधिवेके" तस्य संसार: । भग्नपि वियोगः कुतश्चिदेव स्यात् न सर्वस्मात् , तत्पन्धस्य अनन्तत्वेन अनुच्छेदत्वात् । ततो नित्यनिर्मुक्तं "तदिच्छता तद्विविक्तमेव एटव्यम् । अथ नास्त्येव प्रपश्च: "नेह नानास्ति किञ्चन" [वृहदा कठो० ४।११] इत्यादि श्रुतेः तत्कयं तस्य तस्माद्विवेकः ? असतः प्रतियोगित्वानुपपत्तेरिति चेत् । किंमपेक्षं नहींदम्-"अस्थूलमनवैहस्यम् (मनण्यास्वम्)" हिदा० ३१८०८] इति, २५ "स एप नेति नेत्यात्माहदा० ३।९।२६] इति च ? अविद्याकल्पितप्रपश्चापेक्षमिति चेत् तत्प्रपञ्चात्तहि तद्वियको वक्तव्यः, अन्यथोकादापात् । न तस्य तस्माद्विवेको नाप्यविवेका तदुभयं प्रति तस्यावस्तुत्नेन अपादानत्वायोगादिति चेत् ; न, नेति नेति निषेधानुपपत्तेः, विवे. फस्यैव निषेधार्थखात् । अपि च, , १ अभावाभिन्नत्वस्याभावात् । २-खं ने मा०, य०,१०।३-तेनामावात् आ०, २०, ५०। ५ स्थ तत्र सति त-आ०,०प०। ५ स्वरूपावस्थाने । ६ सार्थस्य । ७ नीरूपत्वरूपत्वात् । यदैवत्व- मा०, ३०, प०1९एकत्वस्य । १० ब्रह्मन्वभावखे । १७ ब्रह्मण । १२ अपवादभेदे। १३ ब्रह्म तत्तथेच्छ भाय... १४अपयस्य ।
१।१२२ प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव ४५९ १० स्वभावस्ताहशस्तस्य यदि संसार उच्यते । न भवत्येव निर्मुक्तिस्तत्स्वभावापरिक्षयात ॥१०९६॥ निर्मुक्तिर्यदि सध्यैव संसारः कथ्यता परः। संसारेण विना यस्मान्निर्मुक्ति वकल्प्यते ॥१०९७॥ जीवानामेव संसारनिमुक्तिनैव तस्य चेत् । जीवेभ्यस्तदभिन्नम्चेत् न तस्येत्युच्यतां कथम् ॥१०९८॥ मुखात्तत्प्रतिविम्यानामनन्यत्वेऽपि तद्गतः । नाऽशुध्यादिर्यथा तस्य तथेहापीति चेन्मृपा ॥१०९९॥ पां तस्मादभेदेऽपि तेभ्यस्तद्भदवर्णनात् । स्वयमेव तथा ब्रह्म जीवेभ्यो यदि भिद्यताम् ॥११००॥ अविविकं कथनाम कध्यता तत्प्रपञ्चतः । यन्न तत्र प्रवर्तेत नि:स्वभावत्वकल्पनम् ॥११०१॥ तस्मात्तत्राप्ययमेव परिहार:-स्योपाधेरेकस्वस्य न परोपाधिना भेदेन बाधनमिति, तथा स्खलक्षणेऽपि । कुतः पुनः परोपाधित्वं भेदस्य ? तेदपेक्षणात् । तदपि किमर्थम् ? स्वरूपला- भार्थमिति चेत् ; न, तस्य वस्तुस्वभावत्वेन वद्धतोरेव भावात् । न हि वस्तुमा स्वहेवोरुत्पत्तिा १५ भेदविकलस्यैव । परतोऽपि ; परस्पराभयतया तदभावप्रसगात्- 'सति वस्तुभेदे परम् , परतश्च तद्वेदः' इति । पश्चाच्च हेत्वन्तरादुत्पद्यमानः कथं वा यस्तुनः स्वभावः स्यात् कार्यान्तरवत् ? वस्तुहेतोरुत्पत्तौ च किं तस्य परापेक्षया प्रयोजनं स्वरूपस्य वस्तुकारणादेव भावात् ? नार्थक्रिया" परासन्निधानेऽपि तदर्थ क्रियादर्शनात् । "प्रतीतिश्चेत्, न वर्हि भेदः परापेक्षः, तद्विपयायाः प्रतीतेरेव तदपेक्षत्वात् । न हि तस्याः तदपेक्षत्वं तद्विपय- २० स्यापि; रूपादिप्रतीतेः चक्षुराद्यपेक्षत्वेन रूपादावपि तत्प्रसङ्गात् । न च प्रतीतेरपि तदपेक्षत्वम् ; परस्पराश्रयात्--'प्रसिद्धं हि परमपेक्ष्य वस्तुभेदप्रतिपत्तिः, तत्प्रतिपत्त्या च परप्रसिद्धिः' इति । न प वस्तुमात्रादनवगृहीतभेदाद् भेदसिद्धिः; एकस्मिन्नपि तत्प्रसङ्गात । तन्न अपेक्षा नाम काचिद् वस्तुधर्मः । पुरुपधर्म एवास्तु, पुरुषेणैव कस्यचित कुतश्चित् भेदस्यापेक्षणादिति चेत् , न; वस्तुनि २५ तदपेक्षानुवर्तनस्यासम्भवात् । न हि पुरुपस्य भेदापेक्षया वस्तु भिन्नं भवति, अन्यथा सह- कार: कोविदारोऽपि स्यात् "तथापि तदपेक्षासम्भवात् । तदुक्तम्- "पौरुपेयीमपेक्षाञ्च नै हि वस्त्वनुवर्तते" [ब्रह्मसि० २।६ ] इति । 1 ब्रह्मणः । २ प्रतिविम्वगतः । ३ प्रतिबिम्बानाम् । १ मुसभेद । ५ परापेक्षणात् । ६ -वावे त-आ०, 'न हि' इत्यन्वयः । ८ भेदः । ९ भेदस्य । १० प्रयोजनम् । १३ प्रतीते परापेक्षत्वम् । १२ तेन रूपेणापि, सहकारस्य कोविदाररूपेणापि । १३ न हि खम-भा०, २०, ५०।। " २०, प ४६० 1 . भ्यायविनिश्चयवियरणे [१।१२२ तन्न भेदो नाम विधारसहः, येनासकीर्णत्वं स्वलक्षणस्येति चेत् ;नअन्यथा अपेक्षार्थत्वात् । न हि परतः स्वरूपादेर्भावात् भावस्य तदपेक्षत्वम् अपि तु तदपादानत्वात् । तदपादानो हि भावभेदः स्वहेतोरुत्पन्नः तथैव प्रतीतेः । न च स्वहेतुपलायातो मावस्वभावः पर्यनुयोगविषयः 'फस्मादेवम्' इति, सर्वत्र प्रसङ्गात् वस्तुविलोपापत्तेः । तस्मादपादानत्वमेव अपेक्षार्थः । तथैव ५ प्रपञ्चविवेकस्यापि ब्रह्मण्युपपत्तेः । पुरुषापेक्षानुवर्तनस्य त्यनभ्युपगम एव परिहारः । भवतु भेदः, तस्य तु कुतः प्रतिपत्तिरिति घेत् ? प्रत्यक्षादेव, विधिवत् निषेधेऽपि तळ्यापारात् । निपेध्यापरिज्ञाने कथं क्वचित्ततः तनिषेधः । न च निषेध्यस्य तेन परिक्षानम् , असन्निधानाद , असन्निहितार्थत्वे च तस्य अमिप्रसङ्गादिति चेत् ; न; विधिवत् वस्तुस्वभा वतया तैदपरिज्ञानेऽपि तस्य प्रतिप : अन्यथा विधेरपि न स्यात् तस्याप्यनुपश्लिष्टनिपे- १० धस्यासम्भवात, उपश्लिष्टपीतादिनिषेधस्यैव नीलविधेः लोकप्रसिद्धादध्यभादवयुद्धः । अध्यक्षा- न्तरं तु न वयमेवं वृद्धा अपि युद्ध्यामहे यस्य विधिमानविपयत्वं प्रतिपद्येमहि । तत्प्रसिद्धस्यैव तन्मात्रविषयत्वे वा कथमानायम्यापि निपेघविशेषात्मनः ततः प्रतिपत्तिः । न हि विधिमात्रेण आम्नायस्य आम्नायत्वम् अनाम्नायेऽपि तद्भावात्, अपितु तदन्यनिषेधरूपतयेवेति कथं तस्य विधिनियताध्यक्षात् प्रतिपत्ति:१ मा भूदिति चेत; कथं तम्माद् ब्रह्मणः प्रसिद्धिः “आम्नायतः १५ प्रसिद्धिश्च कवयोऽस्य प्रचक्षते" ब्रह्मसि. १।२ ] इत्युक्ता शोभेत ? अप्रतिपनादेष ततस्तत्प्रसिद्धी अतिप्रसङ्गात् । प्रमाणान्तरादेव तस्ये प्रतिपत्तिः न प्रत्यक्षादिति चेत् ;न; "प्रत्यक्षादिभ्यः मिद्धादाम्नायात् तत्त्वदर्शनम्" [ब्रह्मसि० पृ० ४१] इत्यस्य विरोधात् । विधिनियमे च "तस्य माम्नायवत् व पावेदनादेष प्रामाण्यं न 'व्यवहारविपर्यासाभा. वादिति कथमुक्तम् -"प्रत्यक्षादीनां तु व्यावहारिक प्रामाण्यम्" [ब्रह्मासि० पृ० ४०] २० इति ? 'तंत्र भेदप्रतिभासमपेक्ष्य "तदुक्तम् , अस्ति च तत्प्रतिमासो व्यवहर्तृवृद्धवा, विधार• बुद्ध्यैव तस्य विभिमात्रनियमः, तया च तत्त्यावेदनलक्षणं प्रामाण्यमभ्यनुशायत एवेति चेत्न; भेप्रतिभासस्य 'तत्स्वभावत्वे विचारबुद्ध्यापि अनपवर्तनात् , अन्यथा स्वरूपस्यापि"अपवर्तनात् कस्य "तया तन्मात्रनियमः सम्पायेव ? अतत्स्वभावस्ये व्यवहापि कथं तब तमनुमन्यताम् ? विभ्रमादिति चेत. स ए३ तद्विवेकप्रतिभासे कथम् ? अनिश्चयादिति चेन्; न ; प्रतिभासस्यैव २५ निश्चयत्वात, अन्यथा स्वरूपस्यापिन निश्चयः स्यात् , प्रतिभासादन्यस्य तनिश्चयस्याप्रतिवेद. नात् । सोऽपि तत्रै निश्चयो न विवेक" इति चेत् ; न ; निश्चयेतरयोरेकत्वानुपपसे, सा. मान्यविशेषयोरपि तत्त्वापते: "एकत्वमविरोधेन" [ब्रह्मसि० २११८] इत्यादिना वत्र दूषण . १“आदिशब्देन अर्थकिया प्रतीनिध प्राद्या"-ता०टि०।२“उत्पत्ते "-ता. टि.1 प्रत्यक्षस्य । १ निपे यापरिज्ञानेऽपि । ५ प्रतिपत्तिः । ६ "वेदान्तिप्रमिद्धस्यैव"-ता.दि. 1 "प्रोग्रेन्द्रियप्रत्यक्षात्"-ता-टिका ८ माम्नायत १९ आम्नायस्य । ३. प्रत्यक्षस्य | : "पदहारादिगंवादादित्यर्थ "-ता. दि १२ प्रत्यक्षे । १३ व्यावहारिक प्रामाण्यमुकम् । ११ "प्रत्यक्षस्य" मा टि.। १५ "प्रत्यशसभावत्वे"-तारिन पय-आ०, २०, ५०।१७ तया यावन्मान-आ०,०१० । १८ सरूपे । १"भेदप्रतिभागविने"-ना-दि।
- . । १५ १११२२ ] प्रथम प्रत्यक्षप्रस्तावा ४६१ स्यावचनप्रसनात् । निवेदितम्चेतत । वन विभ्रभे तद्विवेकप्रतिमासः । मा भूत् स्वरूपस्यैव स्वतः प्रतिभासात् , तद्विवेकस्तु तत्र विचारबुद्धप वावगम्यत इति चेन् , न, तथापि प्रत्यक्षाविधाने तत्र तद्विरेकस्य दुरववोधत्वात् । विधानञ्च विवेचनात. प्रागेव न युगपत् । नापि पश्चात् , तस्याऽसिद्धत्वेन अनुवादायोगे तदनुवादेन तत्र तद्वि- वेचनात्याऽयोगात् । ' ह भेदप्रतिभासो नास्ति' इति विधिपूर्वञ्च विवेचनम्, 'न च तद् घु- ५ खेापारः स्यात् विधिसमय एव तस्याः क्षणिकत्येन नाशात् । अक्षणिकत्वे तु प्रत्यक्षस्यापि तत्त्वात जिनसे व्यापारः स्यात् यनो विधायकमेव तत् न निषेधकमिति नियम्येत । भवतु अन्यत दुद्धरेव विवेचनं व्यापार इति चेत्, न, तैयापि तस्याविधाने कथं तद्विवेचनम् ? तद्विधाने त. देव तव्यापारः तदैव वस्या अपि भावान्न विवेचन विपर्ययात् । पुनरपि भवतु' इत्यादिवचने न परिनिष्ठानम् | तन्न तर भेदप्रतिभासा,विभ्रमात स्वत: परतश्च तद्विवेकस्याऽप्रतिपोरिति सिर्द्ध. १० प्रत्यक्षस्य दविषयत्व निर्याधरवेनागोपालमपि प्रतिपरोः। कथं पुनः प्रत्यक्षं विधिव्यवच्छेदयोः युगपदेव प्रवर्तमान विध्यनुवादेन व्यवच्छिनत्ति 'भूतले न घटः' इति ? विधेरैपूर्वसिद्धत्वेन अनुवादायोगादिति चेत् , न , "तस्यैवमप्रवृत्तेः । न हि विधिव्यवच्छेदयोः तस्य गुणप्रधानभावेन वृत्तिः यदेवमुच्येत अपि तु परस्परस्वभावतया प्रधानयोरेव । नापि व्यवच्छेद्ये तत्प्रवृत्तिः यतो व्यवच्छेद्यस्य देशकालव्यवहितस्य 'तेनाऽमहणात् 'कथं तम्यवच्छेदस्य ततः प्रतिपत्तिः' इति पर्यनुयुज्येत विधिवत स्वरूपत एव तत्प्रतिपरित्यु. कत्वात् । ततो यदुक्तम्- "अनवभासे हि तत्र व्यवच्छेचे व्यवच्छेदमात्रं "स्यात् न व्यवच्छेदः]कस्यचित्' ब्रह्मासि० पृ० ४५] इति , तदुपपन्नम् , "सर्वस्य वा स्यात्" ब्रह्मसि० पृ० ४५] इत्येतत्तु नोपपन्नम् , निषेध्यविशिष्टतया ततस्तत्प्रतिपत्तेरनभ्युपगमात् । कुतस्तहि 'भूतले ने घटः इति' इति चेत् , न , भवतोऽपि 'न घटे" घटाभावः' इति कुतः २० प्रतिपत्तिः १ प्रत्यक्षादेवेति चेत् , न , विधिमानस्यैव वव्यापारस्यात् । तदसत्यनिषेधोऽपि वस्यैव व्यापार इति चेत् , स यदि पूर्व स एव सब्यापारो न पश्चादायी विधिः, तदा प्रत्यक्षस्यापरमात् । ततो यथेदं विधिवादिनोच्यते- "आहुर्विधार प्रत्यक्ष न निपेद्ध विपश्चितः । नैकत्व आगमस्तेन प्रत्यक्षेण विरुद्धयते ।।" [ ब्रह्मसि० २१] सि , २५ तथा निषेधवादिनापि वक्तव्यम्- आहुर्निपे प्रत्यक्षं न विधा विपश्चितः । न शून्यत्व भागमस्तेन प्रत्यक्षेण विरुद्धयते ॥११०२॥ १-त'नैव सत् मा०,५०, १० । २ न च तन तयुद्वैया-आ०, २०, ५० 1 ३ विवेचनम् । - विवेचनात्मक । ५ तस्यापि वि-पा०, १०, १०। ६ प्रत्यक्षस्य । ७ भेदप्रतिमासविवेचनम् । ८ तदैव मा०, प., प०। प्रत्यक्षमेव । १ -रपूर्वलेऽसिदत्वेन ता० । १० प्रत्यक्षस्य । प्रत्यक्षेण । १२ "न व्यवच्छेद कस्यचित्"-महासि०। १३ न पट इति चेन बा०, २०,१०।१५ घरोप-आ०, २०,०।
- न्यायविनिश्चयविधरणे {१।१२२ सर्वनिषेधे के आगम:, कि या प्रत्यक्षं यो येन विरुद्धयत इति चेत् । न ; सर्वा- भेदेऽपि तुल्यत्वात । सत्यम् ; न वस्तुतः तन्नापि तदुभयम् , अविद्यानिबन्धनं तु विद्यत इति चत; न ; अन्यगापि संवृतिनिबन्धनस्य भावात् । सैव क्थं तन्नेति चेत् ? अविद्या कथमितरन ? अथाविद्या विद्याऽद्वैतप्रतिवन्धिनी न भवति तस्याः सर्वाकारर्वतुमशक्यत्वा- ५ दिवि चेत् : न ; संघृतेरपि 'तयावेन नैरात्म्यवादप्रवियन्धित्यानुपपत्तेः । अथ विधिसमय एव तस्य से व्यापारः कथं विध्यनुयादेन भवेत् ? अपूर्व- प्रसिद्धतया विधेरनुवादायोगात् । नापि तत्पश्चाद्भापी से तस्य व्यापारः तदा प्रत्यक्षस्यै. वाऽभावात् इति न प्रत्यक्षात् "विधेयासत्यव्यवच्छेदः। मा भूदिति चेत् ; विधिरपि न भवेत् , तस्य तद्रूपत्वात् "विधेर्विधेयासत्यव्यवच्छेदरूपत्वात्" ब्रह्मसि० पृ० ४७] इति १. मण्डनवचनात् । मा भूदु विध्यनुवादेन सदसनव्यवच्छेदः प्रत्यक्षात् तद्रूपतयेव तदुपगमात् , मदनुवादेन तु तथ्यवच्छेदः प्रत्यभिज्ञानादेव प्रत्यक्षविहिते घटे तदनुवादेन न स्मरणोपनीवस्य तदभावस्य 'नायमिह' इति प्रत्यभिज्ञया प्रतिपत्तेरिति चेत्, 'भूतले न घटः' इत्यपि प्रतिपत्तिस्ततं एवेत्यलमभिनिवेशेन । यदि विधिप्नत्यक्षन एव अन्यव्ययच्छेदः । स तर्हि भूतले घटादेरिव प्रतिक्षणपरिणामादेरपि स्यात् 'तद्विविक्त्तयापि तस्य प्रतिपत्तेरिति चेत् ; अस्ति प्रतिपत्तिः न तु १५ प्रमाणम् , अर्थक्रियाकारित्वादिलिङ्गोपनीतेन तत्परिणामानुमानेन वाध्यमानत्वात् , न तर्हि घटादिष्यवच्छेदेऽपि प्रमाणम् , आम्नायेनैव अभेदविपयेणयाधनादिति चेत्, न, तस्य प्रतिविधास्य. मानत्वात् । ततो भेदस्य प्रत्यक्षत एवं प्रतिपरोरुपपन्नमुक्तम्-'स्वलक्षणमसङ्कीर्णम्' इति । असङ्कीर्णपदेन सलक्षणश्य विशेषात्मकत्वं समानपदेन च सामान्यात्मकत्वमुक्तम् । अतः सामान्यविशेषात्मकत्वात् सर्व वस्तु सविकल्पकमेव नाऽमहायस्वभावम् । अत एवाह- २० 'सविकल्पकम्' इति । सत्यम् ; अस्ति भेदस्य प्रत्यक्षादिना प्रतिपत्तिः, न तु वस्तुसत्त्वम् , आम्नायेनेव अभेदविषयेण वाधनात् । न चैवम् आम्नायस्यापि भेदविशेपत्य "तस्मादसिद्धिः-याध्यमानत्वेन अप्रमाणत्वादिति मन्तव्यम् ; तत्वावेदनलक्षणस्यैव प्रामाण्यस्य तंत्र तेने घाधनान व्यवहारावि. संशदलक्षणस्य, अवस्तुविषयत्वेऽपि अविद्यासंस्कारस्थैर्येण सम्भवात्", अस्य च न तेन वाधनम् अविरोधात् । कथमेव प्रत्यक्षादेः तदपेक्षेणैव नेन याधनमिति चेत् ? न, स्वरूपप्रतीति प्रत्येव 'सस्य तदपेनत्वात् न स्वार्थप्रतीति प्रति लम्धस्वरूपस्य स्वत एव तदुपपत्ते, अन्यथा प्रामाण्यमेव न स्यात् स्वकार्य प्रति निरपेक्षतयैव तदुपपत्तेः । स्वरूपप्रवीतिहेतुत्वस्य तुन तेन बाधनं तत्वा. १ वक्त मशक्यत्वेन । २ यसत्त्वनिपेध.। ३ पूर्वमप्रसिद्तया । ४ असत्यनिषेध । ५ विधेयासस्वस्य प्य-भा०,५०, प० । प्रत्यक्षवान् आ०, य०, प०। ७ प्रत्यभिज्ञात । ८ प्रतिक्षणपरिणामविवित्ततया। ९ प्रत्यक्ष एव ता.। १. प्रत्यक्षात् प्रयो। १२ आम्नायेन । १३ स्य वस्तु-आ०, २०, ५.।" "प्रत्यक्षादीनां । व्यावहारिक प्रामाण्यम् , अविद्या स्वारस्य स्पैम्ना व्यवहारविपर्ययाभावात् ।"-ब्रह्मसि. पृ.१.१.५ प्रत्यक्षापेक्षेशेर । १६ याम्नायस्य प्रत्यशपेशत्वात् । १७ प्रामाण्योररहे ।
प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्ताव -- १।१२२ ४३ वेदनमागस्यैव बाधनात् तत्रैव विरोधात् । तदविशेषादाम्नायस्यैव किन्न प्रत्यक्षादिना बाधन- मिति चेत् ? न; प्रत्यक्षादितः तदपेक्षतया परत्वेन आम्नायस्यैव बलीयस्त्वात् । बलीयसाहि दुर्वलस्य बाधनं लोकवत् न तेन तस्य । दृश्यते च पूर्वापवादेन परस्य बलीयस्त्वम् , यधैकत्व. ज्ञानात् द्वित्वज्ञानस्य ततोऽपि त्रित्वज्ञानस्य नस्य तदुपमर्दैनोपपः। ततो न भेदस्य वस्तुसत्त्वम् "सत्प्रत्यक्षादौ तत्त्वावेदनस्य "इदं सर्व यदयमात्मा" [हदा० २।४।६] इति, "आत्मैवेदं ५ सर्वम्" [छान्दो० ७।२५।२] इति, "सर्च वै खल्विदं ब्रह्म" [छान्दो० ३।१४।१] इति चाम्नायेन सर्वाभेदमवद्योतयता बाधनात् । तन्न वस्तुतः स्वलक्षणस्यासङ्कीर्णत्वं प्रतिभास- मानादेव व्यवहारप्रसिद्धप्रामाण्यात् तदुपपत्तेरिति चेत् ; किमिदम् आम्नायस्य अभेद- विषयत्वम् ? तत्परिज्ञानत्वमिति चेत् ; न ; अचेतनत्वात् । तत्परिझानं प्रति हेतुत्वमिति चेत् । तत्परिज्ञानमपि यदि विपयाव्यतिरिक्तं तर्हि तस्य स्वतस्तयां प्रतिपत्ती भेद एव १० तदर्थः स्यान्नाभेद इति कथं तेन प्रत्यक्षादेः भेदविषयस्य चाधनम् ? एकवाक्यतया तदुपोद्धलनस्यैवोपपत्तेः । अप्रतिपत्तौ च व्यतिरेकस्य तव्यतिरेकात् तत्परिज्ञानस्यापि न प्रतिपत्तिरिति कथं ततः सर्वाभेदस्याधिगतिः ? प्रतिपत्रन्तरगतादपि ततस्तत्प्रसङ्गात् । व्यतिरेकेणैव तस्याप्रतिपत्तिन रूपान्तरेणेति चेत् ; न; प्रतिपन्नेतरयोरेका विरोधात् । अविरोधे वा भेदाभेदयोरपि तत्र तदुपपत्तेः कुतो न तत्वावेदनमेव प्रामाण्यम् आम्नायवत् प्रत्यक्षादेरपि १५ भवेत् ? अव्यतिरिक्तमेव ततस्तदिति चेत् ; न, नित्यत्वेन अकार्यत्वापत्तेः । नित्यो हि तद्विपयः सर्वाभेदलक्षणः परमात्मा “स वा एप महानज आत्माऽजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्म" बृहदा० ४।४।२५] इति श्रवणात् । कथं तदन्यतिरेके तत्परिज्ञानस्यानित्यत्वं यत आम्नाया- दुत्पत्तिः । तन्न तस्माद्यतिरितम् । नाप्यव्यतिरिक्तम् ; मायामयत्वेनावस्तुत्वात् , वस्तुनैव (न्येव) व्यतिरेकेतरविकल्पोपपत्तिरिति चेत् ; न तर्हि तस्य कार्यतापि, अधस्तुनि तस्या' २० अप्यप्रसिद्धः है । तन्न आम्नायस्य स्वतः तत्परिज्ञानहेतुत्वेन वा तद्विपयत्वम् , देर्भेदविषयस्य प्रतिपीडनमुपपद्येत । सत्यप्याम्नायाद् ब्रह्मणः परिक्षाने- ब्रह्म तच्चेत् समर्थं न सपुष्पाद् भिद्यते कथम् ? । प्रतिभासवलाचेन्न वस्यासत्यपि दर्शनात् ॥११०३॥ विना कार्येण सामर्थ्यमपि तस्य न युज्यते । कार्यार्थमेव यल्लोके तत्प्रसिद्धिपदं गतम् ॥११०४॥ कार्यमस्ति प्रपञ्चश्वेत मिथस्तस्माच 'यदि । भिन्नमेव कया स्यादसवीर्ण स्वलक्षणम् ॥११०५॥ । यतस्तेन प्रत्यक्षा- पिरोधानिशेषात् । २ प्रत्यशापेक्षतया ! ३,"पौर्वापर्ये पूर्वदौर्बल्यं प्रकृतिवत्"-मी०म० ६५५५ । ५ भेदप्रत्यक्षादी ! ५ -नमिति-ता०) ६ विषयव्यतिरिक्तन । ७ विषयान् परिक्षानम् 1 ८ एष-आ०,१०,१०। ९ सत्यस्याम्ना-आ०, ५०, ५०1० प्रपद्यात्मक कार्यम् ।
, १।१२२] प्रथम.प्रत्यक्षप्रस्ताव ४६५ कथं वाऽनुच्छित्तिधर्मत्वम् ? "अविनाशी वा अरे अयमात्माऽनुच्छित्तिधर्मा" [पृहदा० ४।५।१४] इत्याम्नायंते ? कुतश्चिदसिद्धः, तदनन्तरस्योच्छित्तो तस्याप्युच्छित्त: । अर्थान्तरं तु कथं सौ तस्य परिणामो घटवत् पटस्य । विभ्रगादिति चेत् , न चर्हि तत्र परमात्मनी वस्तुवृत्तेनोपादानवगिवि कथं तथा तस्य सामध्ये तर ? भवतु निमित्तवेनैव कुलालादिवत् घटाराविति चेत् ; कथमिदानीम "आत्मनि ५ विज्ञाते सर्व विज्ञातम्" [ ] इति आत्मविज्ञानेनैव सर्वविज्ञानं प्रतिज्ञायेत ? उपपन्नं सल्वात्मनः तदुपादानत्ये तज्ज्ञानादेव प्रपञ्चस्यापि ज्ञानं तस्य सदव्यतिरेकात् न 'निमित्तत्वे, फुलालज्ञानादेव घटादेरपि ज्ञानप्रसङ्गात् । श्रुतिविरोधश्चैवम् , श्रुतिभिः "सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि आकौशादेव समुत्पद्य आकाशं प्रत्यस्तम(स्तीयन्ति" [छान्दो० १।९।१] इत्यादिभिः आत्मन्युपादानत्वस्यैव निवेदनात् । अनुपादाने "तेगं तत्र प्रलयानुपपत्तेः । कथं १० वा निरुपादानस्य निमित्तादेवोत्पत्तिः ? अस्त्येवोपादानं प्राच्यः प्रपञ्च इति चेत् ; न तर्हि सर्गादौ तस्य तं प्रत्युपादानत्वम् अभावात् १ "सदेव सौम्य इदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्" [छान्दो० ६।२।१] इत्यात्मन एव सद्रूपस्य तदा सत्वश्रवणात् । अथास्त्येव तदापि तत्मपश्च: 'आत्मैव एकमेव' इत्यवधारणं तु नागरूपाभ्यां व्याकृतस्य तस्याभावादिति चेत् ; किमेव तदा तथाविधस्य "प्रधानस्यैव वदुपादानत्पन्न भवति ? तस्याऽचेतनत्वेन ईक्षावत्त्वायोगात् , १५ ईशावच तदुपादानं भूयते "स ईक्षाञ्चक्रे स प्राणमसृजत" [प्रश्नो० ६।३।४] इत्यादे- राम्नायात्, चाम्नायानास्टस्य तत्वम् प्रमाणाभावात् अनुमानादेवाद्विपयस्य "परेस्तदाभासीकरणादिति चेत् ; न , अविद्यात्मनः "प्रपञ्चस्याप्यचेतनत्वाविशेषात् । विद्या- साहचर्यात्तस्य चेतनत्वे चितिशक्तिसाहचर्यात् प्रधानस्यापि तत्वमिति फथन्नेक्षावत्त्वम् , यत ईशापूर्व जगद्धेतुत्वं तस्यापि न भवेत् आम्नायार्थत्व ? यतस्तत्र" तत्र तनिषेधे निधो २० भाष्यकारस्य' । तन्न प्रपञ्चस्योपादानत्वेन आगनो निमित्तत्वम् ? पुतो वा तत्र तस्योपादानस्वमन्यद्वा? शतरिति चेत् ;न; पार्यस्य प्रपन्नास्यावस्तुसत्त्वे" पातुतस्तद्विपयायाः शफरसम्भवात् । निप्पत्तये हि शतिः । न पाऽवस्तुसतो निष्पत्तिः । पत्कथं तदर्धा शक्ति ? साप्यास्तुभूतैय कार्यपदिति चेत् ; कथं परमात्मनो बस्तुगूतस्यैय ? सम्पन्धादिति चेन ; न "सोऽऽप्यन्यतिरेकः ; विरोधात् । तदुत्पत्तिरिति चेत् ; न ; २५ तत्रापि तादृशशतपारपरिपत्पनायामपरिनिशानात् । अपना प्रराशनमेष निष्पादनम् : न . - .. -त्याम्नायत यु- भा०,१०,५०१२ प्रपयापाराप्ति । ३ पानुसतेपिा-आ०, २०,प. "भाम- निरापरे हटे भुते मते विजन इदगा पिदिनम्"-वृहदा. १५५1५ यासदेनामामा प्रतिपायरे"-मा. शि. "गमुपपन्ते पारादा प्रयत्न यन्ति"-आन्दो• 1 0 भूतानाम् । ८ "उशदानरहिमपाभ्य"-oft.। ५ मार्गारे । १० गारदाभिामर ।" "वेदान्निभि "-TIOfRO1Rच्यापार"-ता-रि-1, "नोन भवैदिी सम्प"-मा.1ि माम० भा• IRI मारामार मारे मा.....। 1०तादाम्याप ।
. १० न न्यायविनिश्चयरिधरणे [१११२३ तच्छक्तिरवस्तुभूतैव, असदपि चन्द्रद्वित्वादिक प्रकाशयतश्चक्षुरादेः वस्तुत एव शक्तेरिति घेत् , न , चक्षुरादी दोपतः तच्छत्तिभावात् । न चात्मनि कश्चिदोपः, "निष्कलं निनियं शान्तं निरवयं निरञ्जनम्" [श्वेता० ६।१९] इति तत्र निर्दोपताया एव श्रवणात् । ततः शक्तिोक्ल्यातू अवस्तुसनेवासाविति कथं तदाम्नायस्य प्रामाण्यं यतस्तेन प्रत्यवादेर्भेदविषयस्य ५ वाधनम १ शक्तिमत्त्वे तु वास्तवमेतत्कार्य तव्यतिमिन्नश्चाभ्युपगन्तव्यम् , अन्यथा तत्वानुपपत्तेः। ततो यथा समर्थत्वादारमा कार्याद्विभिद्यते । असमर्थात्प्रधानादेरपि तत्कार्यजन्मनि ।।११०९॥ न च तद्भेदविज्ञानमाम्नायेनोपपीड्यने । वथैव स्तम्भकुम्भादिर्ययावं कार्यजन्मनि ॥१११०॥ समर्थो भिद्यते तनासमर्थादन्यतः स्वयम् । भक्त्वाम्नायतो पाधा तज्ज्ञानस्यापि युज्यते ॥११११॥ ह्यसो 'ब्रह्म तत्कार्यभेदनानमपीडयन् । स्तम्भादिभेदनिर्भासयाधाय भवति प्रभुः ।।१११२॥ तस्मात सामर्थ्यलिगोत्थमनुमानमाधितम् । परस्परमसङ्घीण घस्तु वक्त्येव निश्चयात् ॥१११३॥ इदमेवाह 'समर्थम्' इति । यम्मात् स्वकार्ये समर्थ शक्तं स्खलक्षणम् तस्मात् असङ्कीर्णम् इति । स्वरक्षणस्य स्वरूपमाह- 'स्वगुणैरेफम्' इति । स्वाहणेन परगुणै. रेकत्वाभावमादयन् "चोदितो दधि साद" [प्र० वा० ३।१८२] इत्यादेरनवकाशत्व दर्शयति । गुणशब्देन , वस्य सामान्यबाचित्यात् गुणपर्यययोरभयोरपि ग्रहणम , २० एवाह- 'सहक्रमविवर्तिभिः' इति । सूत्रे तु पृथक्पर्ययोपादानस्य प्रतिपादितमेत्र प्रयोजनम् । कुतः पुनरेवं सरक्षणमिति चेत् ? आह- 'समर्थम्' इति । अर्थक्रियासमर्थ यन् स्वलक्षणमुदीरितम् । तद्र्व्यपर्ययात्मैव बुद्धिमद्भिर्नियुद्धयते ॥ १११४॥ न द्रव्य न च पर्यायो नोभयं व्यतिभेदवत् । शक्तमर्थक्रियाया यत् तत्प्रतीसिन विद्यते ।।१११५॥ निवेदयिष्यते तर यथास्थान सविस्तरम् । विस्रब्धं स्वीयता तस्मादिदानीमुच्यते परम् ॥ १११६॥ 'सहक्वितिभिरेक्म' इत्येतदसहमानस्य मतमाशङ्कते- यदि शेषपरावृत्तरेकजानमनेकतः । इति । अत १-दिय-आ०, २०, प० । २ एक वाम्नाय ३ -या आ व.प. प्र. पा. २५ ।५पर स्परानपेमम् ।
१२१२३ ] भयमा प्रत्यक्षप्रस्ताव ४७ एकज्ञानाद्धि तदेकसिद्धि, तच्चैकस्य नानावयवसाधारण्य(ग)स्थूलस्य ज्ञानमतीन्द्रि- यम् एकज्ञानम् न तस्मादेवैकस्मात् , अपि तु अनेकतः अनेकस्मात् परमाणोः। कीदृशात्? शेषपरावृत्तः शेषाः तज्ज्ञानं प्रत्यहेतवः प्रत्येकावस्थाः परमाणवः तेभ्यः परारत्तिः सञ्चय. लक्षणा यस्मिन् तस्मादिति । तथा हि-पटादावेकज्ञानं सञ्चितानेकनिरन्धनम् एकज्ञानत्वात दूरविरलकेशेषु तज्ज्ञानवत् । ततो न तद्वलात् अक्रमादनेकखभावस्यैकस्य सिद्धिरिति परस्या- ५ कूतम् । 'यदि' इति तदवद्योतनार्थम् । अत्रोत्तरमाह- अनर्धमन्यथाभासम् [ अनंशानां न राशयः ] ॥१२३।। इति । 'एकज्ञानम्' इत्यनुवर्तते । तत् न विद्यते अर्थः अर्थक्रियासमर्यः यस्मिंस्तत् अन- र्थम् , 'नमोऽर्थात्' [ शाकटा० २।१।२२८ ] इति कभावः, समासा-तस्यानित्यत्वात् । अथवा अर्थो न भवतीत्यनर्थः स्थूलाकार, सोऽस्यास्तीत्यनर्थम् , अंध्रादिपु दर्शनादकार- १० प्रत्ययात् । अनर्थ ये निमित्तम् 'अन्यथाभासम्' इति । अर्थो येन व्यास्थितोऽनेकाऽस्थूल- प्रकारेण तस्मादन्येन एकस्थूलप्रकारेण भासः परिच्छेदो यस्मिन् तद् अन्यथाभासम् । यद- न्यथाभासं तदनर्थम् यथा दूरविरलकेशेषु स्थूलै कहानम , तथा च घटादावपि तज्ज्ञानम् , तथा च कथ तस्य प्रत्यक्षत्वं भ्रान्वयात् ? स्थलाकार एव तस्य तत्त्व न नीलादाविति चेत् , कथमेकस्यैव वत्वमतत्वञ्चापि रूपम् १ अन्यथा घटादेरपि नानैकरूपत्वस्याविरोधात् न स्थूला. १५ कारेऽपि तस्य विभ्रम इति कथ तनापि तत्प्रत्यक्ष न भवेत् ? पूरे तदाकारस्य असत एव दर्श- नान्नैवमिति चेत् ; नीलादावपि नैवम् , तस्यापि क्वचिदसत एवोपरम्भात् । यत्र बाधोप. निपातः तव तस्यासत्त्वं न सर्वनेति चेत् , न, स्थूलाकारेऽपि तुल्यत्वात् । कथं वा दूरोपलभ्यस्य तदाकारस्यासत्त्वम् ? प्रत्यासत्तो तद्विवितानामेव केशानामुपल. म्भादिति चेत् , कीदृशास्ते केशाः ? स्वावयापेक्षया स्थूला एवेति चेत् , असन्त एव वस्तुत: २० तहि तेऽपीति कथं तेषां सञ्चय.? कथ वा स्थूलधनझानहेतुत्यम् असतो तदयोगात् । निरंश- परमाणुस्वभावा एवेति चेत् , न तेषा प्रत्यासत्तावप्युपरम्भ इति रथ ततस्तदाकारस्यासत्त्वं यतस्तनिदर्शनात् घटादावपि तदसत्त्वम् भवतु स्थूलवत् नीलादावपि तस्य नानावयवसाधारणतया सविपत्पवन विभ्रम एव "सरमालम्बने भ्रान्तम्" [ ] इति वचनात् । प्रत्यक्षावं तु तत्य व्यवहह. २५ प्रसिद्धादविभ्रमादिति चेत् , न तर्हि ततो बहिनिरशार्थसिद्धिः अतदाकारत्वात , अन्यथा आकारयादव्याघातात् । ततः स्थूलार्थस्यैर सिविश्वेन , न तईि वस्य निर्विकल्पकत्वम्, तद्विषयस्य साधारणतया सविकल्पकत्वेन तत्सामध्येजन्मनि तरिमनपि तत्त्वस्येवोपपत्तेः। ? - इतिसूत्रंण विहितस्य कच प्रत्ययस्याभाव । २ जनादिभ्य"-गारग, ३४२ । ३ अन्त "परमार्थतस्तु सलनालम्बने भ्रान्तमा ।"-. यातिकार. १९६ । ५ तदाकारानम्म । शानेऽपि -. न्यायविनिश्चयविवरण [२१२३ ततो यदुक्तम्-"प्रत्यक्ष कल्पनापोढमर्थसामर्थ्यादुत्पत्तेः" [ ] इति; तत्र अर्थों यदि परमाणुः ; असिद्धो हेतुः । स्थूलश्चेत् ; उक्नीत्या विरुद्धः । ततो यदि भ्रान्तम् ; न निर्विकल्पम् , तच्चेत् ; न भ्रान्तम् , इति महानयं सङ्कटप्रवेशः परस्य । ततः सिद्धं प्रत्यक्षत एव सहविवर्तिभिरेकं स्वलक्षणम् । व्यावहारिकमेय तत्तथान तात्त्विक मिति चेत; न; ५ व्यवहारादन्यस्य तत्वस्याभायात् , अप्रतिपत्तेः । तन्न सञ्चितपरमाणुनिबन्धनत्वं प्रत्यक्षस्य । निरस्तश्च तत्सञ्चयः सान्तरनिरन्तरचिन्तया । नदेवाह- अनंशानां न राशयः । राशि. बहुत्यापेक्षया बहुवचनम् । ततो निपिद्धमेतत् अस्य- "भागा एवावभासन्ते सन्निविष्टास्तथा तथा हेतु० टी० पृ० १०६] इति ; सन्निवेशस्यैव अनशेवभावात , स्थूलप्रतिभासस्येव च भागप्रतिभासविरोधिनोऽनुभवात् । पुतः पुनरिदमगवन्तव्यम्-'क्रमविवर्तिभिरेकम्' इति ? प्रत्यक्षत इति चेत् ; न ; तेन क्षणभगिना सन्निहितस्यैव गुणस्य' प्रहणात् न पपपरसमयभाविनां तदा तस्या. भावात् । तथापि प्रणे देशकालव्यवहितस्य सर्वस्यापि ग्रहणात् सर्वस्य सर्वदर्शित्वं प्रमाणान्तर. वैयर्यञ्च प्राप्नुयात् । न च तेपामग्रणे तदेकत्वं स्वलक्षणस्य शक्यमवगन्तुम् , व्यापक. प्रतिपत्ताप्यप्रतिपत्तिनान्तरीयस्त्यादिति चेत् , भवेदेवम् , यदि तस्य क्षणभद्गः सिद्धो १५ भवेत् , न चैवम् । तथा हि- 'न तस्य स्वत एय तत्सिद्धिः, तेन पूर्वापरयोरग्रहणे तव्या- पृत्तिरूपस्य तस्य दुरवयोधत्वात् व्यावृत्तिप्रतिपत्ते, व्याव_प्रतिपत्तिनान्तरीयकत्वात् । प्रहणञ्च यद्यतत्कालेन, यहिर्विवर्तानामपि भवेत् । तत्कालेन चेत् ; व्याहतमेतत्- "तत्कालेनर तत्कालव्यावृत्तिरात्मनो गृह्यते" ] इति । नाप्यन्यता प्रत्यक्षात् ; "अत एव, अनभ्युपगमाच 'तद्भहस्य सरस्वभावत्वात् । पूर्वापरापरिमानेऽपि भवत्येव स्वतः प्रतिपत्तिरिति पेत् । तद्विपर्ययस्यापि किन्न तथा पहिरन्तश्च प्रतिपत्तिः तस्यापि फायश्चित्तत्स्वमार्यत्वस्याविशेषात् ? क्षणिकतयेय उभयनापि वस्तूनां प्रतिभासनादिति चेत् ; न; एकसयापि प्रतिपत्तदर्शनात् । अध्यारोपितमेवैकरवं तत्र विकल्पेन प्रतीयते न यास्तवमिति पेस् विकल्पेनापि पथमतदाकारेण तस्य ग्रहणम् आकारवादवैफल्यप्रसगात् १ तदाकारत्वच न सर्वथा तद्वदवस्तुत्वापत्ते । न घावस्तुना तत्प्रतिपतिः ; अन्यत्रापि मानवैयांपत्तेः। 1 , "अबस्य सामर्थन समुद्भवादिगाह । तद्धि अर्थग सामनी पवमान तपमेवानुार्यात् ।"-म. पातिकाल. २११९२ । २ गुगप्रह-आ., २०, ५०1३ "न तस्य मन एवं तन्सिद्धिरि यत्र न तस्य प्रयक्षा- स्तरातमिद्धिरिति पमध्यम् । तत्कालेनैव ताभ्यात्तिरामनी गृपन इत्यत्र आमसदन प्रथमप्रत्यक्ष प्रायम् .. ....... "मनु नालेन विशयनुयायिना प्रत्यक्षान्तरण प्रथम यशस्य सवालण्यारतियत इयत्र ज्या- स्वभावात् व्याहतमेतदि-युष पर्य युकं स्यादिति न रानीपम् , प्ररक्षस्य यथा वाग्यातिनाक्षणिक तथा प्रश्नमत्यक्षस्यापि यक्षणिक सम्भवत्यविसंवादा, तथा परस्व क्षगभगो न सिपती अभिप्रायगोच वात् ।"-ता. दि। यतान भा.,.,प.। ५ "तथा हो यादि प्रतिरादिनानिधान एन ।"-नाटि६ ता. गस्य भा०, २०, ५० 10-वस्यादि-आ०, २०, ५०1८ सक्षणितया ।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताय। ४६९ 'वरतुनव विकल्पान्तरेण ग्रहणमिति चेत् ; न ; समापि 'कथमतदाकारेण' इत्यादेर्भमणाद. परिनिष्टानाच्च । कञ्चित्तदाकारत्वं तु नानेकान्तविद्विपामुपपन्नम् । तदुक्तम्- "विरोधान्नोभयेकात्म्पं साद्वादन्यायविद्विपाम्"[आप्तमी०लो० ३] इति । वस्तुतो विवित एव विकल्पस्तदाकारात , अविवेकस्तु विभ्रमादिति चेत् । विवेकस्य प्रतिपत्तो कथं विभ्रमः ? निश्चयाभावादिति चेत् । न ; प्रत्यक्षेऽपि तदापत्तेः । तथा च कथमेतत्- "प्रत्यक्षं कल्पनापोर्ट प्रत्यक्षेणैव सिद्ध्यति ।" [अ० वा० २।१२३] इति , तद्विभ्रमाक्रान्तादेव तदभावप्रसिद्धरयोगात् । तन तदाकारस्यासन्निधानान विभ्रम इति चेत् । इतरत्र कुतस्तत्सन्निधानम् ? वासनात इति चेत् ; न ; तस्याः प्रत्यक्षसमयेऽपि भावात् । सत्या' अपि नै प्रयोधनखेतोरभावात् पश्चात्तु प्रत्यक्षादेव सदापरापरविपयात् तत्प्रमोधे युक्तं ततस्तत्सन्निधानं तदविवेकविभ्रमच 'विकल्प इति चेत; कुतस्तहिं प्रधानादिवासनाप्रयोधः यतस्तद्विकल्पः । न चायं नास्त्येव ; बहुलमुपलम्भात । अदृष्टयलातु प्रत्योऽपि स्यात् । तनवविवेकप्रतिपत्तो तद्विनमः । सत्यमिदम् , न हि विकल्पस्यापि स्वतस्तविभ्रमः, विकलान्तरादेव सद्भावादिति पेत् ; न ततोऽपि , तदविपयात ; उदयोगात् । तद्विपयत्वे च पूर्ववत्प्रमशात । तत्रापि 'तदन्तरात्तत्कल्पनायाम् अनवस्थापत्तेः । मा भूद्विकल्प एवेति चेत् ; किमिदानी कल्पनापोढग्रहणेन व्यावाभावात् ? कि वाऽआन्तग्रहणेन मानसक्देन्द्रियस्यापि विभ्रमत्य तुल्यन्यायवयाऽनुपपत्तेः । ततः सति विभ्रमे सद्विवेक तज्ज्ञानस्याऽप्रतिपन्न एव वक्तव्यः । न च वावता बोधरूपतयाऽपि तस्याऽप्रतिपत्तिरेख विभ्रमासिद्धिप्रसङ्गात् "अप्रत्यक्षोपलम्मस्य नार्थदृष्टिः प्रसिद्ध्यति" [ ] इति वचनात् । भवत्वेवमिति चेत ; सिद्धा तहि क्षणभङ्गस्यापि प्रत्यक्षे तद्वदप्रतिपत्तिा । एतदेवाह- तथाऽयं क्षणभनी न ज्ञानाशः सम्प्रतीयते। अर्थाकारविको न विज्ञानांशो यथा कचित् ॥१२४॥ इति । तथा तेन प्रकारेण अयं परप्रसिद्धः क्षणभगः न सम्प्रतीयते। कीदृशः? ज्ञानांशः ज्ञानस्य प्रत्यक्षादेः अंशो भागः । क्य क इव ? इत्याह कचित् विकल्पादौ विभ्रमझाने यथा २५ येन सदनुभवाभावप्रकारेण अर्धाकारात् स्थूलादिलक्षणात् विवेको नानात्वं न सम्प्रती. यते । कीरशः विज्ञानांश इति । तदंशत्वच तस्मात् प्रतिपन्नात अप्रविपन्नत्येन फब्धि- भेदात् । प्रत्यक्षे यदि क्षणभद्गस्य न स्वतः प्रविपत्तिः, मा भूत् अनुमानातु भवत्येय । तया हि २० . परतुन्येव-भा०, २०, ५० । २ वासनायाः । ३ न चोपः आ., म.प. । ५ ""- ता. सिममीत्यर्थः । ५ ततोप्यतद्विप-बा०, २०, ५०।६ सदनन्तरा-भा०, २०, प० । ७ सारस. १. पृ. ४.11 तुलना-सारसंग.२०७४।
- , . ग्याययिनिश्चययियाण [१११२५ यदेव हेतुः तदेव फलं यथा प्रदीपकाल व प्रकाशः, वर्तमानसमय एव च प्रत्यनहेतुश्चरा. दिव्यापारः ततः प्रत्यक्षमपि तदेव न पूर्व नापि पश्चात् वदा तनियम एव च तस्य क्षणमग इति घेत् ; पुतस्तत्समयनियमः तयापारम्य ? प्रत्यमस्य तत्समयनियमादिति घेत्, न , परस्परा• श्रया पूर्वणोत्तरम्य तेन च पूर्वस्य सिद्धः। तद्विपयात्प्रत्यक्षादिति चे, ततोऽपि करमाचरय ५ तनियम एवावगम्यते न पूर्वापरसमयव्यापित्वमपि ? तस्यापि क्षणभङ्गादिति चेन् , न तस्यापि स्वतः प्रतिपत्तिः पूर्वरहोपात् । अनुमानादनन्तरोगादिति चेतू ; न , तनापि 'युतस्तत्समय. नियम.' इत्यादेपस्यानादनवस्थितेश्च । सप्नातोऽनुमानात् तत्प्रतिपत्तिः । नापि वस्तुलादि. लिहोत्थात् , ततः परिणामस्यैव सिद्धेरिति निवेदनान । तन्न क्षणभङ्गात प्रत्यक्षम्य ततः एकत्वस्यापरिज्ञानम्', सद्गस्येवासिद्धः। कवि तविपर्ययस्य तु प्रतीतः भवत्येर ततस्तस्परिझानमित्यनयेत्र कारिक्या निवेदयति-तथा अयं लोकप्रसिद्धः क्षणभङ्गोनः कथश्चिदक्षणिकारमा ज्ञानांशः प्रत्यक्षादिनानभागो द्रव्यापर- नामा सम्यग् अकल्पितत्वेन प्रतीयते। क्यं पुनरवाहादिपरापरपर्यायाणां भेदे सति तदात्मनः प्रत्यक्षस्य क्षणभगोनत्यमिति चेत् ? न , भेदयदभेदेनापि प्रतीते । प्रतीते च पर्यनु. योगानुपपत्तेः । प्रतीतिरेव युतस्तथेति चेत् ? वन एव चित्रज्ञानयत् । अस्ति हि नील. पीवादिनानाकारण्यापिनो झानस्य स्वतः प्रतिपत्तिः । एतदेवाह- 'अर्थ' इत्यादिना । अर्थान नीलपीतादिश्वलक्षणपरमाणून् आकारयन्ति अनुकुन्तीत्यर्थाकारागि, तानि च तानि विवेकोनानि च अनेन तदेक्त्वसाधनं परकीयमशक्यविवेचनत्व सूचितम् । अर्थाकार- विवेकोनानि च तानि पिज्ञानानि च नीलाद्यवभासरूपाणि तेपाम् अंशो व्यापकभागः स यथा अनुभरगतत्येन कचित् चिनेकज्ञानवादिमने सम्मतीयते वथा प्रागुत्तोऽपि इत्येवं २० व्याख्यानार्थमेव चोभयत्रापि अशप्रहणम , "अन्यथेयमेव भूयात्- तथा क्षणभड्रोन विज्ञानस्य प्रतीयते । अर्थाकारवियेकोनविज्ञानस्य यथा क्वचित् ॥१११७|| इति । चित्रश्च विज्ञानमवश्याभ्युपगमनीयमेव क्षणभरे कान्तवादिनोऽपि इति, अन्यथा सर्वभावनि:स्वभावतापत्तेः । निरूपितञ्चतत्- "चित्रमेकमनिच्छडि" [पृ० २५६ । ] २५ इत्यादी । ततः प्रत्यक्षत एव निर्व्याकुलतया पहिरन्तश्च स्वगुणपर्यायतादात्म्यस्य प्रतिपत्त: सूक्तमुक्तम्- 'स्वगुणैरेकं सहमविवत्तिभिः' इति । एव स्थिते परिणामस्य निर्णाकुलत्यात् तमेव वस्तुलमणमागमाविरोधेन कथयन् तल्लक्षणं तत्त्वार्थसूनेणं दर्शयति- ताका परिणाम: स्यात्सविकल्पस्थ लक्षणम्) | इति । , मयस्सद्या-भा०, ५०, १०॥ २ इत्युक्त घटते इत्यन्वय 1 ३ -पर्यस्तु प्रतीने आ,व०।१ मतीनी च आ०,०, २०१५ अवमेव व्र-आ०, २०, ५०६० सू० ५।
१।१२५] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः ४७१ J ~ पन्नत्वात्। .. . अतश्च समानश्रुतिकत्वेन एकोच्चारणगम्यमनेकं वाक्यमुन्मन्नति-'तैः स्वरूपादिमिः भवनम् आत्मलाभः तद्भावः स परिणामः' इत्येकम् ! अनेन च पररूपादिना भवनं प्रत्याचक्षाण: साइख़्यम प्रत्याचप्टे । सर्वभेदरूपेण आत्मानं प्रतिलभमानस्य प्रधानस्य प्रतीती कथं तत्प्रत्याख्यानम् ? अस्ति हि प्रधानस्य प्रतीतिरानुमानिकी ! तथा हि- 'ये यदन्वितास्ते सहेतुका यथा मृदन्विताः शिवकादयो मृद्धेतुकाः, सुखाद्यन्विताश्च भेदा महदादयः, ५ तस्मात्त तुकाः । यश्च सुखदुःखमोहात्मकस्तदन्बयी सद्धेतुः तत्प्रधानमिति चेत् ; न; सुसाद्यन्वयस्य भेदेष्वप्रतिमासनात् । नहि यथा शिवकादिपु मृदन्धयः तथाभेदेषु सुखाद्यन्वयः प्रतिभासते, अन्यथा प्रधानमेष प्रतिभासितं भवेत् तदन्वयस्यैव तत्वात् । तथा च किं तत्रानुमानेन प्रत्यक्षप्रतिपन्ने तद्वैयर्थ्यात् मृदादिवत् , अन्यथा मृदादावपि तत्कल्पनायां निदर्शनान्तरं तत्रापि तकल्पनायां तदन्तरमित्यनवस्थापत्तेः; सत्यम् ; न तस्य भेदेषु अन्वितस्यैवानुमानं प्रति. अपि तु सर्गप्राग्भाविनो निर्भेदस्य | तस्य चातिसूक्ष्मत्वेनानुपलब्धेर्न वैयर्थ्यमनुमा- नस्येति चेत् ; मा भूद्वैयय॑म् , असम्भवस्तु स्यात् निदर्शनाभावात् । शिवकादिरेव निदर्शनमिति चेत् ; भवत्येव निदर्शनं यदि तत्रापि मृद्रमं नि दमेव कारणमिति प्रसिद्धम् । न चैवम् , तद- प्रतिपत्तः। न हि निर्भेदस्य सामान्यस्य प्रतिपत्तिः । भेदान्वितस्य तुप्रतिपत्ती कथं निमेंदरय प्रधा- नस्य ? 'अग्नेः प्रतिपत्ती तद्विपरीतस्यापि कल्पनमिति चेत् ; किमिदं विपरीतत्वम् ? अनाधारत्व- मिति चेत् ; न वदकल्पनात् । अनियताधारस्वमिति चेत; न तर्हि प्रधानस्यापि निर्भेदत्वम, अनियतभेदत्वस्यैवोपंप : । तन्न निर्भेदस्य प्रधानस्य हेतुत्वं यस्य सर्गप्राग्भाविनः सूक्ष्मत्वे- नानुपलभ्यस्य महदादेस्तकार्यात् प्रतिपत्तिः । ततो न युक्तमुत्तम्- "सौम्यात्तदनुपलब्धि भावात् कार्यतस्तदुपलब्धेः । महदादि तय कार्य प्रकृतिविरूपं "सरूपञ्च ॥" [सां० वा० ८] इति । २० मवतु सभेदमेव सर्वदा तदिति चेत् ; न तहदिमुपपन्नम्- "प्रकृतेर्महान्" [सां०का० २२] इति ; तझेदात् 'महान' इत्युपपत्तेः । तद्भेदस्य सतोऽपि महदुत्पत्ताव. नन्वयात् प्रकृतेस्तु विपर्ययादेवं ययनमिति घेत ; न तर्हि महदादरहकारादिरपि तस्यापि भेदत्वेन तदुत्पत्तावनन्वयात् , इत्यमहतमेतत् "महादाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त" [सां० का. ३] इति । विकृतित्वस्यैव तन सम्भवान्न प्रकृतित्वस्य । "मूलप्रकृतिः" [सां० का० ३] १५ इत्यपि न बन्धुरम् ; भेदानुगतायाः प्रकृतेरपि भेदान्तर कार्यत्वस्यावश्यम्भावात् मूलत्वस्य .. 1 "मुस? रामोहममन्विना हि युद्धादयोऽध्यवमायादिलक्षणा. मीयन्ते । यानि च यद्पगमनुगनानि तानि तवभावाव्यचकारणकानि, यथा मृद्धेमपिण्टममनुगला घटमुटादयो मुद्धेमपिटाव्यत्तसारणका ति कारण- मस्त्यध्यता भैदानामिति सिद्धम् ।"-सॉ० त० पी० पृ. १०८ । मां• का. अयम० १५॥ २ प्रधानन्वार । ३ वर्गा-भा०, २०, प० । ३ -स्याग्निानि-भा०, २०, ५०। ५ यथा मदानगे घरसदिरादि शाग्निशि. पत्तावपि धनुमानात्तद्विपरीतस्य तापार्याम्गेः पयनं भवनि तानि भाषः। ६-भेदस्वोपपत्तेने नि-भा०, २., प.। "मएनिमरूप विरुपय"-मांका। ७ ४७२ - न्यायधिनिश्यविपरणे अवितित्वस्यासम्भवात् । वन्न एकप्रधानहेतुपत्य जगतः प्रातीविकम् , तद्देदस्य मिन्नोपादान. सायामेर प्रतीतिभागादित्युपपन्नं स्वरूपादिभिरेय तस्य मानम् । तथा, 'तस्यैवस्य भावः उदायः स परिणामः' इत्यन्यत'; अनेनापि 'अययया एव नारयी' इति प्रतिक्षितम , नेपामेर पथन्धिदेषभारस्य अषयविनोऽपि प्रतीतेः । अन्यथा ५ शून्यवादापतेर्निरूपिगत्वात् । पथं पुनरनेरमावस्यापरित्यागे 'तेपामेकभारः । प्राच्याकार. परित्यागाजत्तिकस्येय उत्तराकारोपादानस्य परिणागस्योपगमान् । तत्परित्यागे व कथं वस्य स्थवीयात्वम् अनेकावयवसाधारणत्वाभावादिति ? पल्पयतोऽव्यवयविनं न परमाणुवादाग्नि- मुक्तिरिति चेत , न , पथञ्चिदेव सस्य परित्यागात् । बनेक्मानस्य हि बनेकमावापत्ति- योग्यतया प्रत्येक्दशाभाचिन्या परित्यागः न पुनरेफमावापत्तियोग्यतया परस्परसमवायसमय. १. भाविन्या। तयापि तत्परित्यागे तदेकभास्यैवानुवनिप्रसमात । ततः सत्यप्येषभावे फब्धिदनेकमावस्यापरित्यागान परमाणुवादापत्तिः । एपमपि अपयस्य अययनान्तरणकमाये पररूपेणापि भावः प्रतिपन्नो भवति, तथा प तैः स्वरूपादिभिरेव भावः तद्भावः' इति व्याख्यानं व्याकुलीभूतं मपति । न चैवं दधिभक्षणे चोदिवस्य करभेऽपि निवृत्तिः दध्नस्ते: नाप्येकमावसम्भवादिति चेत् , न , तदेकभावस्य तत्तद्रूपतया चित्रैक्सवेदनवनियमेन वतस्तस्य १५ पररूपत्याभावान तथा प्रतीतेः । न घेवं दन्नोऽपि करभेणेकमायः प्रतीत्यभावात् । सम्भावनया तु तनाने अतिप्राङ्गात् । दधिमणस्य उत्तरतमणेनेच करभक्षणेनापि एरसन्नत्वापत्ती भान्मतेऽपि दधिखादने चोदितस्य करभेऽपि प्रवृत्तिप्राप्तेः । ततः प्रातीतिकमिदम्- 'वस्यैक्रय भारः तद्धारः' इति । तथा, 'तेन परस्परकत्वेन द्रव्यपर्यायाणा भावः तदारः परिणाम:' इत्यपरम् , २० अनेनापि द्रव्यात पर्यायाणां तेभ्यश्च तस्य आत्यन्तिकं भेद प्रत्याचष्टे, कथञ्चिदभेदस्यापि प्रतिपत्तेः। मिध्यवेयम्', भेदप्रतिपत्त्या वाध्यमानत्वादिति चेत् ; पुतस्तत्प्रतिपत्तिः ? प्रत्यनादिति चेत् , न , अभेदप्रतिपत्तेरपि तत ५ भागेन वाध्यत्वायोगात् । कथमुभयोरेकतो भावो विरोधा. दिति चेत् ? रिमिदानी भेदप्रतिपत्तिरेव ' तथा चेत , "वस्या: "तया बाधनम् ? अभेदसंस्कार- परिपाकोपनीताया अभेदप्रतिपत्रेवेति चेत् , न तस्याः सहभावो ज्ञानोत्पत्तियोगपद्यस्या- २५ निष्टस्य प्रसङ्गात् । नाऽपि पश्चात् ; प्रतिपत्तिभेदस्याप्रतिवेदनात । अप्रतिवेदन रघुवृत्तेरिति चेत् , न , प्रतिपत्त्योरपि "तदव्यतिरेकेण तत्प्रसङ्गात् । प्रतिविदितेतरात्मकत्वे तु तयोः , भेदाभेदात्मकरसेन किमपराद्धं भपतो यत्तदेव द्रव्यपर्याययोर्न क्षम्यते ? तन्न इयमन्यैव अभेद- प्रत्यक्षादेवकस्मात् भेदयदभेदस्याऽपि प्रतिपत्तेः । एवमपि भेद एव ताय' - . प्रतिपत्तिः प्रत्यक्षात्, १ वायमित्य वय । २ अवयवानाम् । ३ “पूर्वापारपरि यागानहात्तोतराकारान्वयप्रत्ययविषयस्यो पादानन्दप्रतीते ।"-आग्मह. पृ. ६५। ५ नित्यत्वम् । ५-भागम्य-आ०, व०, ५०।६ -रेणैव भावे भा०, घ०,०तदनपनया ना० 1 ८ वास्यमित्यन्वये । ९ अभेदमतिपत्ति । १० तस्यास्वथा ग-भाग, म०, ५०१ भेदरनिपस्या । ३२ रघुवरयभेदेन । १३ प्रत्यक्षस्य ।
मथमा प्रत्यक्षप्रस्ताव ५ २० प्रामाण्यम् नाभेदे, तस्यासत एव समवायोपनीतस्य तन्त्र प्रतिभासादिति चेत् ; कथं तदेवं प्रमाणतदाभासत्वाभ्यां भिन्नम् ? अभिन्नं तथैव दर्शनादिति चेत् ; न ; तद्दर्शनस्य तदभेदवत् द्रव्यपर्यायाभेदेऽपि तद्दर्शनस्य प्रामाण्योपनिपातात् । अथ तस्याऽपि तेत्र तन्नेष्यते समवायोपनीतस्य असत एव तस्य तन प्रतिभासनादिति ; तन्न ; तत्राऽपि 'कथं सदेव' इत्यादेरनुषन्नात् अनवस्थितेश्च । तस्माद् दूरं गतेनाऽपि प्रमाणेतरभागयोः । एकत्वं सात्त्विकं वाच्यमनवस्थानभीरुणा ॥१११८॥ द्रव्यपर्यायतादात्म्यं निधिज्ञानयोधितम् । तद्वदेवानुमन्तव्यं न्यायमार्गानुवर्तिना ॥१११९॥ नघनारत्येव तज्ञानमारते शेनेच माश्वः । इत्यासनाद्यभेदेन माणवस्यावयोधनात् ॥११२०॥ अपहवे तु तस्य स्याद् भेदज्ञानमपहृतम् । निद्रायितं जगत्प्राप्त ततश्चैतन्यवर्जनात् ॥११२१॥ समवायादभेदश्चेत् असन्नेयावभासते । भेदः सोऽप्यसन्नेव किन्लैकस्मात्प्रकाशताम् ? ॥११२२॥ यहोव परं तत्त्वं न भवेत् सर्वशक्तिमत् । पालोच्येदगेवोक्तं मण्डनेन मनीषिणा ॥११२३॥ "समवायसामर्थ्याच्चेत् भेदवतोरभेदावभासः, हन्तैकस्यैव वस्तुनः सामध्य विशेषात् नानावभासोऽभ्युपेयताम् व्यर्था वस्तुभेदकल्पना" [ब्रह्मसि०पृ० ६१] इति । सन सत्राभेदप्रतीतिः असती मिथ्या वा, इत्युपपन्नमेतत्-'तेन अन्योन्यात्मकत्वेन भावस्तद्भावः २० परिणामः' इति । स किमित्याह-स्यात् स विकल्पस्य लक्षणम् इति । स परिणामो विकल्पस्य विविधं स्वमतानुरूपेण तीयः कल्प्यत इति विकल्पः, चेतनेतरलक्षणो भावः तस्य लक्षणं स्वरूपं स्यात् भवेत् , प्रत्यक्षेणे विषयस्य तयैव प्रतिपोरिति भावः । तषानुमानमाह- तदेव वस्तु साकारमनाकारमपोद्धृतम् ॥१२०।। इति । वस्तु चेतनमन्यच्च धर्मि तदेव परिणामलक्षणमेव नैकान्ततः क्षणिक कूटस्थं घा इत्येवफारः । कुत इत्याह साकारम् इति । आ समन्तात् कियन्ने कार्याणि येस्त आकाराः शकिपर्यायाः तैः सह पर्चत इति साकारं सशक्तिकं यत इति । प्रयस्मैव । २ प्रत्यक्षभेददर्शनस्य । ३ पर्यायाभददर्शनम् । प्रशनेददर्शनम्यापि ५ पक्षाभेदे। अभेदत्य । चेद्द एव तत्तार-ता। तार्य. भाऊ, २०, ५०। ९- सारिप- भा., प,.401 ६० भाये स न्यायविनिमयवियरणे (२१२५ सशक्तिकमपि क्षणिकमेव किन्न भवतीति चेत् ? उच्यते-ततो यदि स्वकाल एव कार्य तत्कार्यमपि सदैव तदैव तत्कार्यमपि इति निरवकाशेः सन्तानः तन्निवन्धनो व्यवहारध । पश्चादिति चेत् ; कः पश्चादर्थः । तद्विनाशश्चेत् ; सोऽपि यदि कार्यमेव तदा 'कार्ये कार्यम् इत्युकं भवेत् , तच्चानुपपन्नम्। भेदाभावात् । भेदे तु नाचं कार्य तदन्यस्याभावात् , ५ एव दोपः तद्योगपद्यात् सन्तानवादी निरवकाश इति । कार्यादन्य एव नाशश्चेत् ; न सोऽपि फारणसमसमयः पूर्ववदोपात् । पश्चादेवेति चेत्, न; 'तत्राऽपि कः पश्चादर्थः' इत्याधनु- गमादव्यवस्थितिदोपानुपद्गात् । तन्न नाशः पश्चादर्थः । दर्शननिवृत्तिस्वहिं तदर्थः, कारण- दर्शननिवृत्तो कार्योदयादिति चेत् ; न ; अवृत्तदर्शनस्य अकारणस्वासद्गात् । न च सर्व वृत्त. दर्शनमेव संसारिणः; सर्वदर्शित्वापत्तेः । सर्वदर्शिनोऽपि न तत्र तन्निवृत्तिः तदशायामसर्व. १० दर्शित्वापतः । एतेन दर्शनविषयत्वमेव 'वर्तमानत्वमिति प्रत्युतम् ; देशादिव्यवहितत्वेन अवृत्तदर्शनस्य अवर्तमानत्वप्रसङ्गात् । योग्यपेक्षया च सर्वस्य वर्तमानत्वे कथमुपायोपेय. भावेन तत्वदेशना ? सहभाविना "तद्भावस्यानभ्युपगमात् । तन्न निवृत्तिरपि तदर्थः । नाऽपि कालविशेपः तस्यानिप्टः। भवतु कार्यमेव तदर्थः । न चोक्तो दोपः ; वदर्थस्य आधारस्वानवक्लप्तेः", १५ नीलादिनेव पश्चात्त्वेनाऽपि स्वरूपेण भवति कार्यम्' इत्येवायकल्पनात् , कालविशेपस्या- प्येवमेव पश्चात्त्वोपपत्तेः, "वदन्तरापेक्षया तत्वावक्लप्तो अनवस्थानस्याप्यवकल्पनादिति येत् ; फुतस्तस्य तत्त्वप्रतिपतिः ? प्रत्यक्षादिति चेत् ; न ; ततः कारणस्याप्रतिपत्तो 'अत इदं पश्चात्' इत्यप्रतिपरोः । न च ततः कार्यसहचरात् कारणस्य तत्सहचराद्वा कार्यस्य प्रतिपत्तिः असग्निधानात् । असन्निहितविपयत्वे च अतिप्रसङ्गात् । उभयसहचरत्वे व २० क्षणभद्गभगप्रसद्गात् । वन प्रत्यक्षात् तत्प्रविपत्तिः । तजन्मनो विकल्पादिति चेत् । न; वस्यावस्तुविषयत्वेनाऽप्रमाणत्वात् । न घाप्रमाणिव 'तत्त्वप्रतिपत्तिः ; प्रमाणव्युत्पादनप्रयास- वैफल्योपनिपावात् । सन्न कश्चिदपि पश्चादयों निश्चयविषयः । भवतु वा, तथाऽपि फुतस्तदा कार्यम् ? कारणसामध्यांच्चेत् ; न ; तदभावात् । भाच्यादेवेति चेत् ; अक्षणिकादपि ततस्तथा किन्न कार्य यतः सत्वं ततो व्यावत ? २५ कार्यकालेऽपि तस्य भावादिति चेत् ; भवतु, न विरोधः । न हि कारणभावेन कार्यविरोधः, तदभावेनेव विरोधस्य सम्भवात् , अन्यथा मृतादपि शिसिनः केकायितं स्यात् । कथं । कार्यकार्यमपि । २ कारगकारणले । कार्यकार्यस्य कार्यमपि । ४ सालोतरोत्तरमणानामेकस्मिन्नेव क्षणे निपतनात द्वितीय च निरनयविनाशात् समान सन्तानव्यवहार इति भाव । ५ तु साध्य का-मा०, प., ५०१६ तमाश आ०, य०,५०1७ दर्शननिवृत्ति । ८ "एताजीतवालल दृश्यता वर्तमानामा । भादिता श्य- माणस्वमिति कालव्यवस्थिति ॥"-प्र.पार्तिकार. ११३७ । ९ दशादि-आ०, २०, ५०1१० उपायोपेयभाषस्य । "-परति आ०,३०,१०१ पश्चात्तेनापि आ०,१०,१०) १३ कार्यमेवेत्येवा- आ०,१०,५०1१४ तह- नम्तरा-आ०, २०, २०१५मयक्षान् । १६ -सत्यनि- आ०, २०, ५०1" तत्प्रवि- मा, १०.। १८ चेदामणिसादावपि भा०, २०, ५० ।
१।१२५ ] प्रथमःप्रत्यक्षपस्ताया पुनः नित्यादेकस्वभावात् कालभिन्नमने कार्यम् ? तत्स्वभावभेदादेव तदुपपत्तः, तदभ्युपगमे च कथं तदेकम् ? तदनन्तरत्वेन तवाऽपि भेदस्यैवोपपत्तेरिति चेत् ; कथमिदानी प्रदीपा- देरपि क्षणिकादेवस्वभावादेव देशभिन्नस्य कार्यस्य कजलादेरुत्पत्तिः ? स्वभावभेदावक्लसो निरंशवादव्यापतेः । 'एकोऽपि स्वभावरतस्य तादृश एव यतो नानादेशमनेक कार्यम्' इति प्रतिवचनं न नित्यपक्षेपि वैमुख्यमद्वहति, नित्यादप्येकखभावादेव कालभिन्नस्य कार्यस्योत्पत्तः, ५ न तद्भेदेन भेदः क्षणिकवत् । सदुरम्- "पाक शक्तानश्वरा कार्य पथात् किन्नाविनश्वराद । कार्योत्पत्तिर्विरुध्येत न वै कारणसत्तया । यद्यदा कार्यमुत्पित्सु तचदोत्पादनात्मकम् । कारणं कार्यभेदेऽपि न भिन्न क्षणिकं यथा ॥" [सिद्धिवि०परि० ३] इति । १० तन्न क्षणिकात् कार्यम् । नाध्यक्षणिकात, ततो यद्यकस्वभावादेव देशादिभिन्न कार्यम् ; क्षणिकादपि किन स्यात्? तस्य कार्यकालमाप्त्यभावात् तत्प्राप्तस्यैव कारणत्यादिति चेत् ; अनुत्पन्नस्य कार्यस्य कः कालो यस्य प्राप्तिः ? उत्पन्नस्येति चेत् । न परस्पराश्रयात्-तत्प्रामात् उत्पत्तिः , उत्पन्नस्य च काल- भावात् तत्प्राप्तिरिति । तत्प्राप्त्या च कारणत्ये अतिप्रसङ्गः-सर्वस्य नित्यस्य एकत्र कार्ये १५ तत्त्वापोः । प्राप्तमपि तन्त्र यदेव समथं तदेव कारणं न सर्यमिति चेत्, पर्याप्तं प्राप्त्या, रति- फलस्यापि सति सामध्ये तक्ष्याविरोधात् । प्राप्त्यभाये तदेव कथमवगम्यत इति पत्न; अन्वयव्यतिरेकाम्यां तदयगमात् । तावपि प्राप्तिभावाभावावेति चेत् ; पुत एतत् १ तथा प्रतीते- रिति चेत् ; फ प्रतीतिः ? नित्य एवेति चेत् ; न; क्षणिकयनिरंशस्य तस्याप्रतिपत्तेः । तन्न एक- स्वभावं तत्कारणम् । स्वभावभेदस्य तु तदनर्धान्तरस्यावश्लृप्तो तन्निरंशवादस्य व्याधातः, अर्थान्तरस्य तु सहकारिसन्निधिरूपस्यावकल्पनं प्रागेव निपारितम् । तन्न नित्यादपि कार्य क्षणिकयत् । 'प्राक् शकात्' इत्यादिकन्तु देवैः" सान्यापादनबुझ्य वाभिहितं न पस्तुतः वत्कारणत्वनिवेदनयुद्धया । कथमन्यथा "मिथ्यकान्ते विशेपो वा का स्वपक्षविपक्षयोः" [लपी० श्लो० ४१] इति तद्वचनं न विरुध्येत १ ततः क्षणिकादिलक्षणात् विपक्षान पाधक- प्रमाणवलेन व्यावर्तितस्य साकारत्वस्य निश्चितान्यथानुपपत्तिरुत्वेन गमरत्वोपपत्तेः अवि. २५ रद्धम् ततो वस्तुनः परिणामलक्षणत्वसाधनमिति" सूतमेतत्-'तदेव वस्तु साकारम्' इति । नन्वेवं यातुवत् वद्धर्माणामपि शक्तिमत्त्वेन तस्लक्षणचे प्रमाक्रमाभ्यामनेकान्तामफ. स्वम् । पुनस्तद्धर्माणामपि वथा तत्वमिति एफवन्तुघभैरेव सफलरयापि जगतोऽभिव्याप्तत्यान्न । क्षणिवादिस-भा०,२०,५०।२ कार्यभेदेन नित्यस सभावभेः। ३ नवरं का- भा०, २०, ५०॥ दत्यौहा- मा., ०,१.५ शिकाय। कार्यगरपाया। • पारण आपसे 14 सामर्वमेय ।। मन्वयम्यतिरेकापि । थारादेवः । 11-धनतामिनि भा०,१०,१० । १२ घमास्मान्माननेयन्यानम्यम् । २० ..
४७६ न्यायविनिश्चयविवरणे [१११२६ वस्त्वन्तरतद्धर्माणामवकाश: स्यादिति चेत् ; आह अनाकारमपोद्धृतम् इति । न विद्यते आकारोऽनेकान्तरूपस्वभावो यस्य वत्-अनाकारं परिस्पति सम्बन्धः । कीरशं तथा ? अपोदधृतं द्रव्यरूपतया पर्यायेभ्यः सदूपतया द्रव्यात परस्परतश्व नययुद्धपा पृथक्- कृतम् , अपृथक्कृतस्यैव अनेकान्तात्मत्वोपगमादिति भावः । यद्येवं व्यभिचारी हेतुः साका. ५ रत्वाविति, तेषां शक्तिमत्त्व'ऽपि परिणामलक्षणत्वाभावादिति घेत ; न ; तेषां पृथक्शक्तिमस्था. भावात् । न चैवमवस्तुत्वमेव नयबुद्ध्याऽपि यस्तुतादात्म्यस्याप्रतिक्षेपात् दुर्नयत्वानुपात् । ततो नयार्पणया एकान्तारमक्त्वं प्रमाणार्पणया खनेकान्तात्मकत्वं वस्तुन इति व्यवस्थितम् । यत्पुनरिदम् अनेकान्तनिराकरणाय व्यासस्य सूत्रम्-"नेकस्मिन्नमम्भवात्" {ब्रह्म- सू० २।२।३३] इति । अस्यार्थः-नानेकान्तवादो युक्तः । कुत एतत् १ एकस्मिन् धर्मिणि १० सदसवनित्यानित्यत्वनानैकत्वादीनां विरुद्धधर्माणामसम्भवादिति, तनाह- भेदानां बहुभेदानां तत्रैकत्रापि सम्भवात् । इति । परिणामलक्षणमेव वस्तु । कुतः १ मेदानां सदसत्त्वादीनाम् । कीदृशानाम् ? पहुभेदानाम् अनेकप्रकाराणां तत्र तस्मिन् परप्रसिद्ध एकत्रापि "एकमेवाद्वितीयम्" [छान्दो०६।२।१] इत्याम्नातेऽपि न केवलं स्याहादिप्रसिद्ध जीवादावेव इत्यपिशब्दः सम्म- २५ वात् । तथा हि- व्यावृत्तं चेन तद्ब्रह्म प्रपश्चादवकल्प्यते । तस्याप्यवस्तुरूपत्वं तद्वदेव प्रसन्यते ॥ ११२४ ।। तस्मादिय स्वरूपाच तच्चेद् व्यावृत्तमुच्यते । मेराम्यबादनिर्मुतिः कथं ते मह्मवादिनः ? ॥ ११२५ ॥ स्वरूपादनिवृत्त तत् व्यावृत्तं चेत् प्रपञ्चतः । सदसद्धर्मभेदोऽयं क्थं तत्र न सम्भवी १ ॥ ११२६ ॥ प्रपञ्चात्तद्विवेकश्वेत् फुतश्चिदवगम्यते । प्रपञ्चाधिगमस्तन न भवत्येव सर्वथा ॥ ११२७ ।। तद्विरेकवदन्याच तद्रपञ्चेन वेद्यो । सर्वथा तदनिर्मासं न प्रधानाद्विभिद्यते ॥ ११२८॥ सत्यज्ञानात्मना वित्तिः तस्य नो चेद्विवेषसः । विदिताविदितात्माऽयं तत्र भेदोऽरतु सम्भवी ॥ ११२९ ।। अमृतस्वञ्च नित्यम्चेत तस्य ब्रह्माविवेश्तः। मुमुक्षूणा प्रयासस्य किमन्यत्पलमुच्यताम् ॥ ११३० ॥ २० २५ 1-मरचे परि-आवर,प.1२- स्वाद एवे- भा०, २०, प० । ३ प्रामदेव प्रथमः प्रत्यशप्रस्ताव: ४७७ २१२६ ) संसारस्य निवृत्तिश्चेत् मुक्ती संसारिता कथम् ? विभ्रमाच्येत् स एवायं सत्यां गुतो कथं भवेत् ॥११३१॥ कथञ्चिदेव तनित्यममृतत्वं यदीप्यते । नित्यानित्यस्वभावोऽयं भेदो ब्राणि सम्भवेत् ॥११३२॥ एवं बहुप्रभेदस्य तन्निर्भेदस्य सम्भरे । परिणामस्वरूपत्वं तस्य केन निवार्यते ॥११३३॥ तदनेकान्तविद्वेपे न ब्रह्म व्यवतिष्ठते । तस्माद्ब्रह्मविलोपीदं सूत्रं व्यासोपवर्णितम् ॥११३४॥ यत्पुनः सर्वमनेकान्तात्मकमेव इति निर्धारणे भाष्यकारस्य दूपणम्-"नेति नमः, निरङ्कुशं घनेकान्तं सर्ववस्तुपु प्रनिजानानस्य निर्धारणस्यापि यस्तुलाविशेषात् स्यादस्ति स्या- १० नास्ति इत्यादि विकल्पोपनिपातादनिर्धारणात्मकतैव सात् ।” [ब्रह्मशां० २।२।३३] इति ; तदपि भवत्येव यदि धर्मिण्येव तस्य निर्धारणवदनिर्धारणमपि । न चैवम, क्षेत्र निर्धारणस्यैव भावात् , अनिर्धारणं तु धर्मापेक्षया तदभावात् , धर्माणाञ्च सेंद्विकलानां प्राण्यपि निवेदनात् । यश्च तस्येदमपरम् - "एवं सति कथं प्रमाणभृतः सन् तीर्थकरः प्रमाणप्रमेय. १५ प्रमाप्रमितिपु अनिर्धारितासु उपदेष्टुं शक्नुयात् ?" [ब्रह्म० शां० २।२।३३] इति ; तदपि न सुन्दरम् ; स्वरूपादिना प्रमाणादीनां सत्तयैव निर्धारणात् , तया तदनिर्धारणं तु पररूपादिना तदभावात् । एवमन्यदपि तस्य दुर्विलसितमपासितव्यम् । ततो यदुक्तम्- "अनिर्धारितार्थ शास्त्रं प्रणयन् मत्तोन्मत्तवदनुपादेयवचनः स्यात्' [ब्रह्म शां० २।२।३३] इति ; तत्र कथमनिर्धारिसार्थ शास्त्रम् १ प्रकारान्तरेण चेत ; न ; तस्याभावात् । उत्तम- २० कारेण चेत् ; क्थं तत्प्रणयतो मत्तादिसादृश्यम् ? प्रमाणोपपन्नवस्तुवादिनः तदनुपपत्ते, अन्यथा वेदोऽपि मत्तादिवदनुपादेयवचनः स्यात , तेनापि सदसदादिस्यभावं ब्रह्मोपदिशता सदेव तत् असदेव वा' इत्यनिर्धारितस्यैव तस्य प्रणायनात् । अथ ब्रह्माणि परमार्थसति न प्रपत्रो नाम कश्चिदस्ति यद्विवेकस्य तत्र स्पान्तरत्वात् सदेव इनिर्धारित' तद्भवेदिति न तहदानीमनेकान्तदोपोऽपि, तस्यापि प्रपश्चान्तर्गतत्वेन वदभावे सम्भवामावादि- २५ त्यलमतिनिन्धेिन । - .. . वेत ग्रमा आ०,०प० । २ धर्मिणि । ३ निर्धारणाभावात् । निधारणशयानाम् । ५ गत्तया । ६ सत्ता- ऽभावात् । ७ "सच त्याभवत् । निरम चानि च । निलयन पानिरयन च । विगन नारिशनं च। मन्य यान च सर्वनभया । "-10 3. २ ॥ ६ "राय गर्न वनभर निरा नाम निरभ्य समानागमान- जातीयेभ्यो देशमा विशिष्टन येई तदिन्युत्तमनिह सद्विपरीत निलपने नीउमाधी अनिग्यन तद्विपरीन... विशन चेतनविज्ञान ताहितमननं पापयादि गय . भरतं च गद्विपरीनम् । "-त. 3. मा०३।। "सदमचाहमर्नुन"-भ० गी० ९॥ १९ । ८ रूपान्तर्गत शन् भा०, ८०। १-तं न नद्- भा०, २०, ५०।
४७८ ग्यायविनिश्चयधिधरणे (૨૨૨૭ १६ स्यान्मनम्-सति सामान्ये सम्भवत्येकन भेदः तस्यैव एकार्थत्वात् । न च तदस्ति; व्यक्तिभ्योऽर्थान्तरत्वेन अप्रतिपत्तेः । न च ता एव सामान्यम् ; अनन्वितत्यान्तु | कथन्चि. दन्वयकल्पनायाम, अनवस्थोपनिपातात् । तदभावे कथं धर्मिधर्मादिव्यवस्था ? सामान्यरूप एव हि शब्दो धर्मी तस्य साध्यसाधनधर्मसाधारणत्वात् । धर्मोऽपि साध्यमनित्यत्वं तद्रूप- ५ मेव, तस्य परसपक्षसाधारणत्वात् । अन्यथा तदंशव्याप्तेरभावप्रसङ्गात । हेतुधर्मोऽपि फुत- फत्वादिः तत्साधारण एव, अन्यथा अनेकान्तिकरवप्रसङ्गात, इत्यपि न मन्तव्यम्, व्यावृत्ति. भेदतस्तदुपपत्तेः । अशब्दव्यावृत्तिः शब्दो धर्मी, धर्मश्च अकृतकवादिव्यावृत्तिः कृतकत्वादि. रिति पर्याप्तमेतावता किं वदर्थेन वातुभूवसामान्यपरिकल्पनेन ? परिकल्पितेऽपि तस्मिन् तद्ध- दस्य अवश्याभ्युपगमनीयत्वात् , अन्यथा भेदव्यवहारपच्युतेः । सामानाधिकरण्यादिव्यव. १. हारस्यापि तत एवोपपत्तेः । तद्देदर्य वस्तुसत्त्वेऽन्त्रितत्वे च सामान्यस्यैव शब्दान्तरगिदमि- त्यपि न मन्तव्यम्; कल्पनयैव तस्य तद्रूपत्वात् न वस्तुतः । कल्पनैवे होयम् अवस्तुसन्तमपि वस्तुसन्तमिव अनन्वितमप्यन्वितमिक अभिन्नमपि भिन्नमिव स्ववासनाप्रकृतेरुपदर्शयन्ती धर्मि- धर्मभावादिसामान्यप्रयोजनमुपकल्पयति । तदुक्तम्- "संसृज्यन्ते न मिद्यन्ते स्वतोऽर्थाः पारमार्थिकाः । रूपमेकमनेकञ्च तेपु बुद्धरुपप्लनः ॥" [प्रवा० ३३८६] इति । तनकत्र भेदसम्भवः तस्यैवैकस्याभावादिति, तत्राह- अन्वयोऽन्यव्यवच्छेदो व्यतिरेकः स्वलक्षणम् ॥१२६॥ ततः सर्वा व्यवस्थेति नृत्येकाको मयूरवत् । इति । अन्वयः अनुगमः खण्डादिषु गोरिति तन्तुषु अयं पट इति रुचकादौ तदेवेदं सुव- २. मिति रूपः, सोऽन्यस्य कोदेः वीरणादेः मृदादेव व्यवच्छेद एष नापरः। तथा सर्व- स्मात् सजातीयात् विजातीयाच्च व्यतिरिच्यते भियते इति व्यतिरेकः स एव स्वलक्षणम् न पूर्वोक्तम् । ततः तस्मादन्वयात् स्वलक्षणाच्च सर्वा निरवशेषा व्यवस्था स्वाभिमतवस्तु- व्यवस्थितिः इति एवं नृत्येत् "नृत्तं कुर्यात् काम इव काकः सौगतः तद्व्यवस्थात्मनि मृत्यक्रियायामुपायात्मनः पिच्छभारत्याभावात् मयूर इव मयूरो जैन: तन तस्य "तद्धारस्य २५ निवेदनात् स इव तद्वदिति । सौगतस्यापि उक्त एव तत्रोपाय; अन्वयः स्वलक्षणच तत्कथमेतदिति चेत् ? न तावत् स्वलक्षणं तत्रोपायः तस्य- १ बौद्धस्य । २ "सौगत एव परेणापाद्यमानं दूषणमनुवदति"-ता० टी० । ३ सामान्याभावे । ४ सपक्ष- साधारण एव । ५ "पक्षमाने वृतर वास्याङ्कीगारमशरण अमाधरणानैशन्तिक सम्"-ता. टि. । - त्वाम्यारते. कृ-०, ब०,५०1७ "अनित्य शब्द इति"-ता. टि.1 ८ अनदस्य । ९- नैव यवस्तु आय.ए.। द्रष्टव्यम्- प्रवासवृ. ३१४९३ । १० "भेदाना बहुभेदाना तोकस्मिन्नयोगत ।" -प्र० पा० ३३८५। नृत्य - भा०, प. प. २ तद्भावस्य आ०,व., प० । १ १।१२७] प्रथमः प्रत्यक्षमस्ताधा ४७९ व्यतिरेकैकरूपं तंद्यधान्यस्माद् विविच्यते । तथा स्वतोऽपि नीरूपं तदुपायः कचित्कथम् ॥११३५॥ अन्यस्मादेव तस्यास्ति विवेको न तो यदि । कथं तथैकरूपत्वमविवेकविवेकयोः ॥११३६।। अविवेकविवेकाभ्यां तदभेदस्य सम्भवे । तदेव वस्तु सामान्य तत्कय तन्निषिध्यताम् ॥११३७॥ न च तत्कल्पितं रूपं सालझण्यविरोधतः । अस्पृश्यं कल्पनाभिर्यक्ष्यतेऽन्यः स्वलक्षणम् ||११३८।। वस्तुसामान्यसंसिद्धः द्वौद्धनेह विभ्यता । स्वरूपोऽपि व्यावृत्तमेकान्तेन तदिष्यताम् ॥११३९॥ स्वलक्षणे चासत्येनमन्यव्यावृत्तयः फ ताः । न हि व्यावृत्तकाभाने सन्ति तास्तदुपाश्रयाः ॥११३०॥ तदभावे कथनाम कल्प्यन्तां तन्निवन्धनाः । जातयो बहुधा भिन्ना यत: सूक्तमिदं वचः ॥११४१॥ "ततो यतो यतोऽर्थानां व्यावृत्तिस्तनिवन्धनाः । जातिभेदाः प्रकल्प्यन्ते तद्विशेपानगाहिनः ॥" [प्र०या० ३।४०] इति । जात्यभावे कथच स्यात् धर्मिधर्मादिसम्भवः । अनुमानव्यवस्था ते यतस्तेनायकलयताम् ॥११४३॥ सत्यपि स्वलक्षणस्य व्यावृत्तिभेदे कथं तनियन्धनस्य सामान्याफारस्य विकल्पादपि प्रति. पत्ति: कथञ्च न स्यात् । तस्याग्रस्तुत्वेन तर्दकारणत्वात् । अकारणस्यपि स्वहेतुजनितात् शक्ति. विशेषात् प्रतिपत्ती कैमर्थक्याद् यातुन्यपि स्वज्ञान प्रति कारणत्वपरिकल्पनम् , सस्यापि ततः शक्तिविशेषादेव ताशात् प्रतिपत्तिसम्भवात् ? सर्वस्यापि वस्तुनः तत एव प्रतिपत्तिः स्याद. फारणत्याविशेपादिति चेत् , अपस्तुनोऽपि स्यात तथा प शब्दविक्स्पेनेव 'शब्दयात् फूतकत्वादिकमपि प्रतीयता निरयशेषज्ञातिविशेषाधिष्ठानतया शब्दधर्मिणः प्रतिपत्तेः हेतुमाध्य. विकल्पानां कथन कैमर्धक्यम् ? यत इदं सुभाषितम्- "ततो यो येन धर्मेण विशेषः सम्प्रतीयते । नस शक्यस्ततोऽन्येन तेन मिना व्यरस्थितिः।" [प्रा० ३१४१] इति । रतिनियमादकारणस्यापि तस्य नियतम्यैव प्रतिपत्तिः न सर्वस्येत्यपि समाधान न यातुप्रति. । सलक्षणम् । २ मणव । ३ तदाधनेह आ०, २०,५०) मारत एतारता । ५ मा कप्पना तक्षि- भा०, म., प.निाश्मरगन् सदाभा, प०, .1 - पतनुमा- भा०, २०, ५०मायमिनि प्रश्न ।
४८० १० म्याय विनिश्चयविवरणे [ १२१२७ पत्तावपि पक्षपातं परित्यजति । ततो विज्ञानशक्तिपरिज्ञानवैकल्यादेवेदं धर्मकीर्वचनम्- "नाकारणं विषयः" । ] इति । न फारणत्वाचस्य ततः प्रतिपत्तिः अपि तु तव्यतिरेकादिति चेत् ; न ; तद्वत्तस्यापि स्वालमण्यप्रसङ्गात् । स्वलक्षणं हि विकल्पः स्वसंवे- दनाध्यक्षविषयत्वात् तत्कथं तव्यतिरेकिणः सामान्यरूपत्वम् ? विभ्रमादिति चेत् ; कस्य ५ विभ्रमः ? तस्यैव विकल्पस्येति चेत् । न ; तत: स्वलक्षणतयैव तदाकारस्य स्नतः प्रतिपत्तेः । विकल्पान्तरात् सामान्याकारतया प्रतिपत्तिरिति चेत् , न , ततोऽपि सदाकारस्याव्यतिरेके स्वलक्षणतायाँ एवोपपत्तेः । पुनः विकल्पान्तरात् सामान्याकारतया प्रतिपत्ती अप्रतिपत्तिरेव अनवस्थोपनिपातात् । तन्न सविकल्पबुद्धेः अव्यतिरेकी सामान्याकारः सम्भवति, यत्प्रच्छा- दिवभेदत्वात् भावा अभेदिन इव प्रयवभासेरन् । ततो दुर्भापितमेतत् अँसम्भवद्विषयत्नात- "पररूपं स्वरूपेण यया संन्ध्रि(सबि)यते धिया । एकाथप्रतिभासिन्या भावानाश्रित्य भेदिनः ॥ तया संवृतनानात्वाः संवृत्या भेदिनः स्वयम् । अभेदिन इवाभान्ति भाषा रूपेण केनचित्॥"[प्र०या०व० ३।७०.७१] इति । कुतञ्चायम् अभेदप्रत्यवमर्शी 'गोरयम्, अयमपि गौः' इति विकल्पः खण्डमुण्डा- १५ दिप्येव न कर्कशोणवरादिष्वपि भेदाविशेषात् ? तेप्येय तद्धेतोः स्वभावस्य नियमात्, दृश्यन्ते हि सत्यपि भेदे केपिदेन कचित् स्वभावतो नियताः यथा रूपदर्शने पक्षुरादय एव ज्वरादि- शमने च गुडूच्यादय एव नापरे, तद्वारा गवाद्यभेदपरामरोंऽपि सण्डादय एव ततो नियता न कादयः । तदुक्तम्- "एकप्रत्यवमर्थिज्ञानाशार्थसाधने । भेदेऽपि नियताः केचित् स्वभानेनेन्द्रियादिवत् ।। घरादिशमने काचित् सह प्रत्येकमेन या । दृष्टा यथा चौपधयो नानात्वेऽपि न चापराः ॥" [प्र. वा० ३१७२-७३] इति चेत् , उच्यते- कादिव्यतिरेकेण सण्डादिप्पेष नियम्यमानस्तत्स्वभावः कल्पितः, तात्विको वा ? कल्पितश्चेत्, कुतस्तत्रैव तत्तत्पनं न फर्कादिपि तनियन्धन २५ स्यापि स्वभावस्य नव नियमादिति चेत्, न, तस्यापि कल्पितत्वे 'कुतस्तत्रै' इत्यादेर्योपान्, अनवस्थानुपङ्गान्य । तन्नासौ कल्पित । तात्तिकश्येत्, सिद्धं तात्विामेर सामान्यम् , तस्यैव सण्डादिसाधारणस्य स्वभावस्य तत्त्वात । नयनादेरपि दर्शनहेतोः सभारस्य सामान्यस्येप्टी अनिष्टानुपहाभावात् । तथा च तत्स्वभावग्राहिणी घुद्धिः अर्थवत्येर नानथिका, वस्तुनिव २० "सामान्यामारस्य निकल्यात्"-सा. टि०। २ सामान्यापारस्यापि । ३-तया एखो- आ०, प., १०। ४ असम्भवादिष- आर, य०, प० । ५ "धन्यन्याश्यामरसामान्यम्"-ता.टि.1 ६ साहेपने भा०, प०,५०10 विशिशुपा"-ता०टि।
भधमा प्रत्यक्षप्रस्ताच. ४८१ १११२८ ] नातत्कार्यकर्कादिव्यपोहनिष्ठा । तस्याञ्च यहा सण्डादिष्वक कर्कादिभ्यश्च व्यावृत्तं रूपमव- भाति तत्सतत्त्वमेव न निस्तत्त्वं परीक्ष्यमाणस्योपपत्तेः । तन्नेदमपि परीक्षासहं परस्य वचनम्- "तत्स्वभावग्रहाद्या धीस्तदर्थे वाप्यनार्थका । विकल्पिकाऽतत्कार्यार्थभेदनिष्ठा प्रजायते ॥ तस्या यद्रूपमाभाति बाह्यमेकमिवान्यतः । व्यावृत्तमिव निस्तत्वं परीक्षानङ्गभावतः॥"० वा० ३।७५-७६] इति । यदि पुनः स्वभावनियमोऽपि नेष्यते , न तर्हि अभेदप्रत्यवगः तन्निमित्तः । तद्- भावान्न कल्पितमपि सामान्यमिति कथं ततो धर्मिधर्मसामानाधिकरण्यादिव्यवस्थानर्तन बौद्धस्य ? ततो वस्तुसामान्योपायेन तन्नर्तनप्रवृत्तं जैनमभिसमीक्ष्य निरुपायतयैव प्रवर्तमान ताथागतमुपहसद्भिः देवैरुचितमेवेदमुक्तम्- १० "अखण्डताण्डवारम्भविकटाटोपभूपणम् । शिखण्डिमण्डलं वीक्ष्य काकोऽपि किल नृत्यति ॥"[ ] इति । कुतश्च स्वलक्षणस्य अन्वयस्य वा प्रतिपत्तिः ? अप्रतिपत्ती ताभ्यामेव सर्वव्यवस्थेति प्रविज्ञानुपपत्तेः । याथासयेन प्रत्यक्षादनुमानाच्चेति चेत् ; न, प्रत्यक्षस्य यथाकल्पनमप्रतिपत्तेः । न हि परफल्पितम् एकान्तनिरंशक्षणक्षीणनीलादिस्वलक्षणाकारं प्रत्यक्षं दिदृक्षवोऽपि वीक्षामहे, १५ यतस्तेन स्वलक्षणप्रतिपतिं प्रतिलभेमहि । अनुमानस्य च यथा नाभिजल्पसम्पर्कयोग्याकारस्य प्रतिपत्तिः तथा निवेदितमेव 1 अप्रतिपन्नादपि तत एव तत्प्रतिपत्तिरिति चेत, अत्राह- प्रामाण्यं नागृहीतेऽर्थे प्रत्यक्षतरगोचरौ ॥१२७॥ [भेदाभेदी प्रकल्प्येते कथमात्मविकल्पकैः ।] इति । प्रमाणकर्म प्रामाण्यं परिच्छित्तिलक्षणं तत् न सम्भवति | कस्मिन् ? अगृ. २० होते स्वयमप्रतिपन्ने प्रत्यक्षादौ "अप्रत्यक्षोपलम्भस्य" [ ] इत्यादि वय- नात् । कस्मिन् परिच्छेद्ये तसत्र न सम्भवति ' अर्थे स्वलक्षणे सामान्ये च । सामान्यस्यार्थ. त्वम् अर्धेकत्वाध्यवसायेन परैरभ्युपगमात् । ततः किम् ? इत्याह-'प्रत्यक्षतरगोचरौ भेदाभेदी प्रकल्प्येते कथम्' इति । प्रत्यक्षतरगोचरौ प्रत्यक्षानुमानविषयौ भेदा. भेदी स्वलक्षणसामान्यलक्षणी प्रकल्प्येते प्रकर्षण स्थाप्यते । कथम् ? न कथञ्चित् । २५ क १ आत्मधिकल्पकैः आत्मानं वातुस्वभावं विकल्पयन्ति भिन्दन्ति इत्यात्मविकल्पकाः भेदेकान्तवादिनः सोगताः तरिति । न हि तदप्रतिपन्नयोरतयोस्तद्विपयत्वम् , अतद्विपयस्येवा- भावप्रसद्गादिति मन्यते । भवतु यथाप्रतिभासमेय प्रत्यक्षं तत्पूर्वकचानुमानं स्वलक्षणे सामान्य- १व्यारत्तिमिव मा०, २०, ५०१२-त चैवमभि-आ।, य०, ८०।३- ये तन भा०, २०, ५०। " तान्यो प्रत्यक्षानुमानाभ्यामप्रतीतयो । "-ता.दि। ४ न्यायचिनिश्चयवियरणे [१।१२८ लक्षणे च प्रमाणमिति चेत् , न, तनापि सम्भवनमाभ्यां वस्तुभूतानेकधर्माविष्टानस्यैव भावस्य प्रत्यवभासनात् न निरंशक्षणिकपरमाणुरूपम्य नाप्यपस्तुसामान्यात्मनः । भवत्येवम्, तथापि तदेव तर प्रमाणमिति चेत् आह-'प्रामाण्यं नागृहीतेऽर्थे' इति । प्रमाणभावः प्रामाण्यम् अविसंवादित्वम्,'अन्यद्वा प्रत्यक्षादेः न सम्भवति । कस्मिन् ? ५ अर्थे स्वलक्षणादी । कथम्भूते १ अगृहीते अप्रतिपन्ने । अँसम्बन्धेन प्रामाण्यस्य अप्रैव निराकरणादिति भावः । ततः किम् ? इत्याह-'प्रत्यक्ष' इत्यादि । व्याख्यानमत्र पूर्ववत् । भवेदपि प्रत्यक्षस्य प्रामाण्यं तत्रार्थप्रतिभासात्, नानुमानस्य तनावस्तुविषयत्वेन तदभायात् । तगापि सण्डादयोऽर्था एव अतत्कार्यकारिफर्कादिव्यावृत्तिविशिष्टाः प्रतिभासन्ते, त एव च तेषा सामान्यं नापरमेक गोत्यादि तयवहारस्य तारगर्थगोचरैरेव ज्ञानाभिधानः १० प्रवर्तमानत्वेन सिध्यार्थत्वात् । तदुक्तम्- "अर्थज्ञाने निविष्टास्ते ( अर्था ज्ञाननिविष्टास्ते ) यतो व्यावृत्तिरूपिणः । तेनाभिन्ना इवाभान्ति व्यावृत्ताः पुनरन्यतः।। त एव तेषां सामान्य समानाकारगोचरैः । ज्ञानाभिधानैमिथ्यार्थो व्यवहारः प्रतायते ।।" [प्र० वा० ३। ७७.७८ ] इनि चेत् , कथं पुनर्भेदस्य तत्स्वभावस्यापरामर्श तेपा प्रतिभासनम् ? 'व एव प्रतिभासन्ते न प्रतिभासन्ते च' इति व्याघातास । भेदरूपेणेवाप्रतिभासनं न रूपान्तरेणेति चेत् , न , निरंश- वस्तुवादिनामेकत्र रूपभेदाभावात् । कल्पनया तद्दे कल्पितमेव रूपान्तरं तत्प्रतिभासिसामान्य नार्थस्वरूपम् , इत्ययुक्तमुक्म-'त एव तेषां सामान्यम्' इति । कथञ्चैवं "पररूपं स्वरूपेण" [प्र०वा० ३१७०] इत्यादिना संवृतिस्वरूपमेव सामान्यम् भावनानात्वाच्छादनमिति पूर्व प्रतिपाद्य इदानीमन्ययावचनमुपपन्नं विस्मरणशीलवापतेः ? तन्न ततोऽर्थप्रतिभासनम् , अप्रतिभासिते चन तस्य प्रामाण्यम् । तदाह-'प्रामाण्यम् नागृहीतेऽर्थे' इति । यदि स्यात् , नित्यत्वानुमानस्यापि किन्न स्यात् १ तस्ये तर्न प्रतिबन्धस्याप्यभावादिति चेत् ; क्षणक्षयाच- नुमानस्य कुतस्तन प्रतिवन्धः १ प्रत्यक्षादिति चेत् , न ; परकल्पितस्य तस्यैवाप्रतिपत्तेः । प्रतिपत्तावपि सतो नार्थवत् तत्कार्यस्यानुमानस्य परिक्षानम् , स्वयं वदाकारत्वेन सविकल्पकापत्तेः । न च उमयोरपरिज्ञाने तत्सम्बन्धस्य परिक्षानम्, "द्विष्ठसम्बन्धसंगित्ति- नैकरूपप्रवेदनात्" [प्र. वार्तिकाल०१।१ ] इति स्वयमेवाभिधानात् । विकल्पादपि न तत एव तस्य प्रतिपत्तिः , तेन स्वग्रहणेऽपि अर्थस्याग्रहणात् । विकल्पान्तरेणापि स्वांशमात्र- पर्यवसायित्वेन तद्व्यतिरिक्तस्य तस्याग्रहणान् । न च तद् अनुमानादन्यदेव, तृतीयस्यापि २० . २५ - १"विषयविपयिभावसम्बन्धाभावेन" -ता०टि०।२"न हीतरपनिपनियोस्लयोस्तद्विपयत्वमित्यादिना"- ता. टि० 1 ३ "अर्था ज्ञाननिविष्टास्ते यतो व्यायत्तस्पा"-प्र. वा० । ४ 'अनुमानात्"-ता०रि० ।५ नित्य- त्वानुमानस्य । ६ नित्यवादी । ७ क्षणक्षयादी। ८ क्षणक्षयायनुमानत एव । ९ प्रतियन्धस्य । १० विकल्पान्तरम् ।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः १।१२८] प्रमाणस्य प्रसद्गात् । अनुमानमेव अर्थक्रियामाप्तिलिङ्गाजमिति चेत् न; तस्यापि तत्रागृहीते प्रतिबन्धात् प्रामाण्ये 'कुतस्तत्र प्रतिवन्धः' इत्यनुपङ्गात् अनवस्थापत्तेश्च । तदनेन 'मणिप्रभामणिज्ञानत्यापि मणौ प्रतिबन्धश्चिन्तयितव्यः । तत इदमपि निर्विपयमेव परस्य भाषितम्- "लिङ्गलिङ्गिधियोरेवं पारम्पर्येण वस्तुनि | प्रतिबन्धात्तदाभासशून्ययोरप्यवञ्चनम् ॥" [प्र. वा. २१८२] इति । कीशो वा सोऽर्थो यत्र तस्य प्रतिबन्धः, यतोऽप्यर्थक्रियावाप्तिः ? एकान्तनिरंशक्षणि- कपरमाणुलक्षण इति चेत् ; न; ताशस्य मणेरप्यप्रतिपत्तेः । तत इदमशक्योपपादनमेव- "मणिप्रदीपप्रभयोमणिपुयाभिधावतोः । मिथ्याज्ञानाविशेपेऽपि विशेषोऽर्थक्रियां प्रति ॥ यथा तथा यथार्थत्वेऽप्यनुमानतदामयोः । अर्थक्रियानुरोधेन प्रमाणत्वं व्यवस्थितम् ।।" [प्र०वा० २।५७-५८]इति । दृष्टान्ते दान्तिके च परकल्पितस्यार्थस्याभावे तदर्थक्रियाया एवासम्भवात् 'विशेषोऽर्थ- क्रियां प्रति' इति, 'अर्थक्रियानुरोधेन' इति च वक्तुमशक्यत्वात् । नन्वेवंविचारे नानुमानं न च तदभ्यास प्रत्यक्षमिति सफलज्यवहारविलोपः, ततो १५ व्यवहारं परिपालयता तत्प्रामाण्यमकृतविचारमेवाभ्युपगन्तव्यमिति चेत् ; न : नित्यत्वाद्य- नुमानस्यापि तथा तदभ्युपगमप्रसङ्गात् व्यवहारस्य प्रायशः सद्विपयादेवोपपत्तेः। तदाह- 'प्रत्यक्षतरगोचरौं' प्रत्यक्षादितरदनुमानं तस्य गोचरौ विषयो कथं न प्रकल्प्येते? प्रकल्प्येते एव, कथमित्यस्य प्रक्रान्तेन नना सम्बन्धात् । को ? तद्गौचरी कथं न प्रकल्प्येते भेदाभेदी । भेदश्च, उपलक्षणमिदं निरंशत्वादेः, अभेदश्च, इदमप्युपलक्षणं व्यापित्वादेः, तो इति । अभेदस्यैव तद्गोचरत्वप्रकल्पना वक्तव्या न भेदस्य तत्र सौगतस्यापि (स्यावि-) प्रतिपत्तेरिति चेत् ; न ; दृष्ट्वान्तार्थत्वात् तद्वचनस्य । यथा भेदश्याकृतविचारमेव सद्गोचरत्वं तद्वदभेदस्यापि वक्तव्यमिति । कैः पुनस्ती तथा कथन्न प्रकल्प्येते ? इत्याह-- आत्मवि- कल्पकैः । आत्मानं फूटरथनित्यमीश्वरादिकं ये विशेपेण कल्पयन्ति नेयायिकादयः तैरिति । ततो नित्यत्वाचनुमानज्युदासेन क्षणिकत्वाचनुमानस्यैव प्रामाण्यं व्यवस्थापयता २५ वस्तुमाहित्वं सत्याभ्युपान्तव्यम् । मथा च सिद्धं तद्वदेव सम्भवक्रमानेकधर्माधिष्ठान- भावविकल्पस्यापि वस्तुविषयत्वं निधित्वात् , अन्यथाऽर्थवेदिनः संवेदनस्येवाप्रतिपत्तेरिति स्थितं सामान्यविशेषात्मकत्वं प्रत्यक्षविषयस्य । साम्प्रतमुक्तमेवार्थमनुग्रहह्मरत्वात् शिष्याणामनुस्मरणाय श्लोफानां विंशत्या २० 1-लिमिति आ., २०,०।२-भामगेर्ना -ता० ।
४८४ न्यायविनिश्चयवियरणे [११२८-१३१ तथ १० सगुह्य कथयन्नाह- उत्पादविगमध्रौव्यद्रव्यपर्यायसङ्ग्रहम् ॥१२८॥ सद्भिन्नप्रनिभासेन स्थाङ्गिन्नं सविकल्पकम् । इति । सद् अर्थक्रियासमर्थमिदं धर्मि, तत्रेदं साध्यम्-उत्पादविगमनौव्याण्येव द्रव्यम ५ "उप्पायद्विदिभंगा हवंति दब्बियलक्षणं एयं ।” [सन्मति०१।१२] इति वचनात् , पर्यायाश्च तेषां सङ्ग्रहः परस्सरनादात्म्येन स्वीकारो यस्मिन् तत्तथोक्तम् । कुत एतत् ? इत्यत्राह-सविकल्पका सांशं यनः । निरंशत्वे हि तत्सड्महत्वं सतो न स्यान् । सविक. ल्पकत्वे हेतुमाह-स्थात् कथञ्चिद् भिन्न भिन्नतया प्रतिपन्नम्। केन ? भिन्नप्रतिभासेन। यद्येवं भिन्नमेव तदस्तु नाभिन्नमित्यत्राह- अभिन्नप्रतिभासेन स्यादभिन्नम् [ स्वलक्षणम् ] ॥१२९॥ इति । मुबोधमिदम् । सामान्यमेव तादृशमिति चेत् ; आह-'स्वलक्षणम्' इति । कथं पुनः परस्परविरुद्धभेदाभेदधर्माधिष्ठानमेकं वस्त्रिति चेत् ? आह- विदधर्माध्यासेन स्याविरुद्धं न सर्वथा । इति । एतदेव कुत इत्याह- असम्भवदतादात्म्यपरिणामप्रतिष्ठितम् ॥१३०॥ असम्भवंश्वासावतादात्म्यपरिणामश्च असम्भवदतादात्म्यपरिणामः सम्भव. तादात्म्यपरिणाम इत्यर्थः । तत्र प्रतिष्ठितं प्रमाणेन पूर्व स्थापितं यत ति । अनेने भेदाभेद- योरेका समवाय एव न तादात्म्यमिति प्रतिक्षिप्तम् । पुनरपि तद्विशेषणमाह- समानार्थपरावृत्तमसमानसमन्वितम् । इति । समानार्थाः शत्तिसादृदयेन तुल्याः मृत्पिण्डस्य दण्डादयः तेभ्यः परावृत्तमपसृतम् । अनेनसाहरकल्पितं वस्तुमाहूर्य प्रतिक्षिप्तम! असमानो विसदशपरिणामः तेन समन्वितं सग. तम् । अनेनापि 'सर्वमेकान्तेनाभिन्नम्' इति ब्रह्मवादिमतं प्रतिध्वस्तम् । कुतः पुनः तदित्यमित्याह- [प्रत्यक्ष यहिरन्तश्च परोक्षं स्वप्रदेशतः 1] 10१३०॥ प्रत्यक्ष प्रत्यक्षवेद्यं यतः । क ? 'बहिरन्तश्च' इति । यद्येवं प्रत्यक्षत एव तथा तस्य प्रतिपत्तः, प्रमाणान्तरस्य वैफल्यमिति चेत् ; आह-'परोक्ष स्वप्रदेशतः' इति । ततो न तद्वैफल्यमिति भावः । कथं पुनरेकमेव स्वलक्षणं तथा प्रत्यक्षं परोक्षश्चेति चेत् १ अाह- सुनिश्चितमनेकान्तमनिश्चितपरापरैः । इति । -मंगा भवन्तिद-ता०१२ अनेकभेदा-आ०, २०, ५०।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः ५ " १११३२] अनेकान्तम् अनेकस्वमाव वस्तु सुनिश्चितं मुविवेचितं पूर्वमेव न पुनर्वि. विच्यते । कैस्तदनेकान्तम् । अनिश्चितैः अप्रत्यक्षविपयैः परैरुत्तरकालभाविभिः अपरैश्च पूर्वकालभाविभिः प्रदेशः। ततः प्रत्यक्षं परोक्षश्च तचैरिति । स्यान्मतम्-उपादानोपादेयलक्षणसन्तानादन्यत् नमानेकान्त परमाणुसमुदायादवय. व्यादेश्चार्थान्तरमनमानेकान्तमपि दुर्विवेचनमेवेति तगाह- सन्तानसमुदायादिशन्दमानविशेषतः ॥१३१॥ इति । सन्तानसमुदाययोः आदिशब्दादवयव्यादेश्च योगकल्पितस्य शब्द एव तन्मात्रम् तेनैव विशेषोऽनेकान्तात् नार्थतः, अनेकान्तस्यैव सन्तानादित्यात ततः । [ तथा सुनिश्चितस्तैः [तु] तत्वतो विप्रशंसतः।। तैः तथा सुनिश्चितः तत्त्वतो वस्तुतः विप्रशंसतः प्रशंसनमुपपादनं प्रशंसा १० तदभावो विप्रशंसम् , अर्थाभावेऽव्ययीभावात् ततः इति । एतदुक्तं भवति-एकस्वाभाव यथा दधिक्षणस्य तदुत्तरक्षणेनैका सन्तानः तथा किन्न करभक्षणेनापि, यतो दधिमक्षणे चोदितः करभेऽपि न प्रवर्तेत १ तस्यावत्कार्यत्वाति चेत, इतरस्य छुतस्तत्त्वम् । तदनन्तरं नियमेन भावादिति चेत्, न, तस्यापि तथैव भावात् । अनु- पादेयत्वान्नेति चेत्, इतरस्य कुतस्तदुपादेयत्वम् ' सादृश्यादिति चेत्, न, योगीतरज्ञानयोर- प्येकसन्तानत्वापचेः, वस्तुतस्तस्याभावाच्च । क्ल्पनारोपितस्य करभक्षणेऽप्यनिधारणात् । तन्नैकत्वाभावे सन्तानः । नाप्यवयवी ; तस्याप्यवयवानामन्योन्याभेदरूपत्वेन तदभावेऽनुपपत्तेः । वेप समु. दाय एवावयवी नाभेद इति चेत्, सोऽपि यवैकव्यूहगतानामन्योन्यं तथा किन्न व्यूहान्तर- गतैरपि, यतो घटमानयेत्युत्ते पटेऽपि न प्रवर्तेत ! शक्तिसाधाभावादिति चेत्, विवक्षिता. नामपि तदेकरूपत्वे कथं भेदः तदन्यतमवत् ? धर्म्यस्यापि भावादिति पेत् , साधयवैवर्म्य- योरिव किन्नावयवानामेव कश्चिदभेदो यतः स एवावयवी न भवेत् ? तन्नाभेदमनिच्छतो भिन्नेपु साधर्म्यस्यापि सम्भवो यतो व्यूहनियमः । तदुक्तम्- "सन्तानः समुदायश्च साधर्म्यञ्च निरङ्कुशः । प्रेत्यभावश्च तत्सरं न स्यादेखनिहवे ॥" [आप्नमी० श्लो० २५] इति । यच मतम्-उपादेयेनेवोपादानस्येफसन्तानल मान्येनेति तोपादानमपि न प्रत्यभिज्ञानादन्यत: शस्यसमर्थनम् । ततोऽपि न मिध्यार्थात् नापि सादृदयार्थात , अति. अपि तु कश्चिदस्तुभूताभेदविषयादेव । ततः तत्समर्थनादप्यनेकान्त मेव सुनिश्चितमित्यावेदयन्नाह-- -तदि-आ०,२०,५०२ करमणम्य । ३ "परमार्थत गारयम्य गोगनरनहीकारादेव धनम्" ना. दिनानगरवामन्ये आ.,.,०। . २० २९ . प्रसङ्गात् ।
म्यायविनिधयविवरणे [२१३२.१३४ प्रत्यभिज्ञाविशंपात्तदुपादानं प्रकल्पयेत् ॥१२॥ अन्योन्यात्मपरावृत्तभेदाभेदावधारणांत् । मिथ्याप्रत्यवमर्शेभ्यो विशिष्टात् परमार्थतः ॥१३३॥ इति । तत् विवक्षितं वस्तु उपादानम् उत्तरस्य कार्यस्य सजातीयं कारणं प्रकल्पयेत् ५ समर्थयेन् सौगतो यतः, तस्माच सुनिश्चितमनेकान्तमिति। कुतस्तत्प्रकल्पयेत् ? प्रत्यभिज्ञेवान्यस्मात् विशिष्यमाणत्वात् विशेषरतस्मात् प्रत्यभिज्ञाविशेषात् । इदमेबाह-मिथ्यापत्यवम. शेभ्यो लनपुनर्जातनसकेशायेकत्वात्यभिज्ञानेभ्यः , उपलक्षणमिदम् , तेन सादृश्यप्रत्य. भिज्ञानेभ्यश्च विशिष्टात् तत्त्वतः परमार्थतः । कुतस्तदित्थम् ? अन्योन्यमात्मानी परावृत्तौ च यो भेदाभेदी तयोरवधारणात् निश्चयनात् । तदिति स्मरणम् इदमिति च प्रत्यक्षम, न ताभ्यामन्यत् प्रत्यभिज्ञानं यतस्तयोरवधार. णमिति चेत् ? अनाह- तथा प्रतीतिमुल्लङ्य यथास्वं स्वयमस्थितेः । नानकान्तग्रहग्रस्ता नान्योन्यमतिशेरते ॥१३४॥ इति । नानाऽनेकरूपाः क्षणिकायेकान्ता नानकान्ताः त एव ग्रहाः व्यामोहनिबन्धनत्वात् तैस्ता वशीकृताः सौगतादयो नान्योन्यं न परस्परम् अतिशेरते अतिशयं लभन्ते । कस्मात् ? यथास्वं स्यमतानतिक्रमेण स्वयम् आत्मना अस्थितेः अवस्थानाभावात् । किं कृत्वा अस्थितेः १ तथा तेन तदिदमित्युभयोल्लेसाभेदप्रकारेण वा या प्रतीनिस्तामुल्लवय प्रतिक्षिप्य । तथा हि- यथा न प्रत्यभिज्ञानं प्रत्याकारं विभेदनात् । तद्वत् प्रत्यणु निर्भेदात् प्रत्यक्षमपि नो भवेत् ॥ ११४३॥ अनुमानञ्च तत्पूर्व प्रत्यक्षासम्भवे कथम् ? । तदत्यये कुतस्तत्वं सौगताः साधयन्त्यमी ।। ११४४॥ अद्वैतशून्यवादौ तु प्रागेव प्रतिभापितौ । अनेकाकारमेकं तत् प्रत्यक्षं युक्तकल्पनम् ॥११४५।। तदिदं द्वितयोडेख तद्वत् प्रत्यवमर्शनम् । भेदेतरात्मनोऽर्थस्य ततः किन्नावधारणम् ॥ ११४६ ।। तत्प्रतीत्यपलापे तु तदन्यार्थाप्रवेदनात् । एकान्तवादिनः सर्वे नान्योन्यमतिशेरते ॥ ११४७ ॥ भवतु जन सुनिश्चितमनेकान्तं यत्र पूर्ववदुत्तरस्यापि दर्शनम् , प्रत्यभिज्ञानस्य १५ २० -भयोलेसाम-आ०, ५०, प० । २ विभेदत आ०, ब०, प० ।
४८७ १३१३५.१३६] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः तन्निश्चयहतोस्तत्र सम्भवात् , यत्र तु पूर्वस्यैव दर्शनं न परस्य तन क्थ २ वेत् ? न ह्यप्रति- पन्नस्य पूर्वाभेदेनान्यथा वा प्रत्यभिज्ञानं सम्भवतीति चेत् ; अनाह- शब्दादेम्पलब्धस्य विरुद्ध परिणामिनः । पश्चादनुपलम्भेऽपि युक्तोपादानवहतिः ॥१३५॥ इति । शब्दस्य आदिशब्दाद् विद्युादेश्च उपलब्धस्य मध्यावस्थायां प्रत्यक्षस्य विरुद्ध- ५ परिणामिनो विरुद्धो दृश्याददृश्यः स एव परिणामः स विद्यतेऽम्येति विरुद्धपरिणामी तस्य । पश्चाद् उत्तरकालम् अनुपलम्भेऽपि अदर्शनेऽपि युक्ता उपपन्ना गतियनुमानिकौति । निदर्शनमुपादानस्येव उपादानवदिति । एतदुक्तं भवति शब्दादेरुतरपरिणामस्यायोग्यत्वेनादर्शनेऽपि अनुमानतोऽवगमात् कथन्न प्रत्यभिज्ञानं यतस्तत्रापि सुनिश्चितमनेकान्तं न भवेदिति युक्तम्-उपादानस्योपलब्धाच्छन्दादेरनु. मानम् तस्य निरुपादानस्यायोगात,नोपादेयस्य कारणस्य कार्यवत्त्वनियमाभावादिति चेत् अत्राह- तस्थाष्टमुपादानमहष्टस्य न तत्पुनः। अवश्यं सहकारीति विपर्यस्तमशारणम् ॥१३६॥ इति । तस्य उपलब्धस्य शब्दादेः अदृष्टम् अनुपलब्धम् उपादानं पूर्वशब्दाशुपादानम् अदृष्टस्य उत्तरतत्परिणामस्य तत् शब्दादि पुनरिति वितः न उपादानम् इति एवं सौगतेन १५ विपर्यस्तं चैपरीत्यं नीतम् शब्दादिकमवस्तुकृतमिति यावत् । अत्र निमित्तम्-अकारणमजनक यत इति । न हि अकारणस्य वस्तुत्वं व्योमकमलवत् । सजातीयमकुर्वतोऽपि विजातीयस्य योगिज्ञानादेः करणात् कथमकारणत्वं तस्येति चेत् ? आह-अवश्यं नियमेन सहकारि योगिज्ञानादिकार्यसचिवं नेति सम्बन्धः, सजातीयमतन्वतो रूपादेरिव तदयोगात, अन्यथा तस्यापि कदाचित् वदेव स्यात् न सजातीयोपादानत्वमित्यसङ्गवमिदं भवेत्--"रूपादे रसतो २० गतिः"[प्रवा०३।८] इति, तस्यासन्तानिवस्य रसकाले सम्भवाभावात् । ततः सजातीयवद् विजातीयेऽपि तस्याकारणत्वादवस्तुत्वमापतत् सत्कारणपरम्परामप्यवस्तुभूतामुपकल्पयेत् । न चैवम् , अतस्तस्योभयत्रापि कारणत्वादुपपन्ना तस्मादुपादानवदुपादेयस्यापि प्रतिपत्तिः । कयमेवं कार्यस्वभावानुपलब्धिभेदेन त्रिविधमेव लिङ्गं कारणस्यापि लिगत्वात् ? तस्य स्वभावहेतायत- र्भावादिति चेत्, न; साध्यादन्तरत्वेन स्वभावहेतुत्वानुपपत्तेः । तथाविधस्यापि तत्साधर्म्यात् २५ तत्त्वमविरुद्धमेव । नरपेक्ष्यञ्च तस्य सत्साधर्म्यम् । प्रसिद्धं हि कृतकत्वादेरतद्धवोरनित्यत्वादो नरपेक्ष्यम्, तस्य तन्मात्रानुबन्धित्वात् , तथा फारणस्याप्यसक्षणप्राप्तस्य काये तस्यापि सन्माना- . । १ कथं संभवामय-आ., ५०, प० । २ "मुनिश्चितमनेकान्तमिन्यत्रापि सम्बन्धः।"-गा. टि.। ३ पदुम भवति भा०, २०, प० । अनुमानमिति सम्बन्धः । ५-सन्धं पूर्व-भा०, २०,०ममरण. जन-आ०.५०, ५० । ७ सहारिलायोगान् । ८ -चन्ताव इति भा०, २०, ५०। ९ तस्वमा चिर-आ०, २००। 'नरपेक्ष्यम्'त्पन्चयः ।
५ पात्, १० . न्यायविनिश्वयविवरणे [१११३८ नुवन्धित्वाविशेपादिति चेत् ; किमिदं वस्य तन्मानानुवन्धित्वम् ' न सहभावनियमः; पश्चादेव भावात् । स्वकालेऽवश्यम्भाव इति चेत्, न, कार्यहेतोरपि तद्वेतुत्वप्रसङ्गात् । न हि तस्मिन्नपि सति स्वकालेनावश्यम्भावः कारणस्य, कार्यहेतोरेवाभावप्रसङ्गात् । तदायतेः स तस्य नेति चेत् ; माभूत तथापि तन्मात्रानुबन्धिनस्तस्य प्रत्यायने नैरपेक्ष्यम्य मृतकत्वादिसाधर्म्यस्याविशे- वथा चैकः स्वभावहेतुः स्यान्नापरः, अनुपलब्धेरपि तहिशेपत्वेनाभ्यनुज्ञानात् । ततो यथा तत्साधम्येऽपि कार्यस्य ततो भेद एव साध्यादर्थान्तरत्वात् तथा कारणस्यापि । ततो निराकृतमेतत-- "हेतुना यः समर्थन कार्योत्पादोऽनुमीयते । अर्थान्तरानपेक्षत्वात् स स्वभावोऽनुवर्णितः ।।" [प्र०वा०३।६] इति । एवं सति सयाव्याघात इति चेत् ; भवतु परस्येवायं दोपः । न दोपः,तस्य स्वभा- वान्तीवाभावेऽपि कार्यहेतावन्तर्भावात् , कारणमप्यवश्यम्भावि कार्य कार्यान्न विशिष्यते इत्यभ्युपगमादिति चेत् , एवमपि कार्यमेवैको हेतुर्भवेत् स्वभावस्यावश्यम्भाविसाध्यस्येव तत्कार्य- तापत्तेः । तदभेदे कथं तत्कार्यतेति चेत् साधनता कथम् भेदकल्पनाचेत् ,न; तत एव तत्का यत्वायाप्युपपचेः । तादात्म्यादेव गमकत्वे किं तत्कार्यत्वेनेति चेत् । न, तत एव गमकत्वे किं १५ वादात्म्येनेत्यप्युपनिपातात् , प्रत्युत तत्कार्यत्वमेवानोपपन्नकल्पनम् , साध्यसाधनभावभेदानुकूल. त्वात्, न तादात्म्यं विपर्ययात् । तन्नायमन परिहार इति लिङ्गसाविरोधि चतुर्थमेव तल्लिग- मिति कथं न परस्यायं दोप: ? निगमयन्नाह- तदेवं सकलाकारं तत्स्वभावैरपोद्धृतः। निर्विकल्पं विकल्पेन नीतं तत्त्वानुसारिणा !,१३७॥ समानरधारसामान्यविशेषणविशेष्यताम् । इति । तत् उक्तलक्षणं स्वरक्षणम् एवम् अनेन प्रकारेण सक्लाः सम्पूर्णाः आकाराः गुण. पर्याय लक्षणा यस्य सत् सकलाकारम् । पेस्तत्तथेत्याह--तस्यैव बभावाः वधर्माः तेरेव नान्यदीयः । अस्तु तस्तत्र समतेस्तत्तरेति चेत् , आह.. निर्विकल्पम् तेभ्यस्तस्य पृथक्त्वं विकल्पः तस्मानितान्तम् । स्थश्चित्तव्यतिरिक्तं तथैव प्रीतिभावादिवि भावः । यदि वा येमात्मानमानित्य भेदो यच्चारित्याभेद इति यो विकल्पः सोगतादेः तस्मानियान्तम् । प्रत्यक्षतः तात्मभेदस्याप्रविपत्ती तथा विकल्पस्यानुपपत्तेः। यदे स्थं पर सामानाधि. करण्यादिकं तस्य भेदोपाश्रयत्वादिति चेत् ? न ; तैरेव तत्स्वभावः नययुद्धया पृथक्यतः तदुपपत्तेः । तदाह-तत्स्वभावैरपोधृतैः परस्परतो निकृष्टः । केन ? विकल्पेन , तायत्ते मत-आ०, प०, प०१२ -र्याने आ", य०,५०१३ -एणमनेन आ, य०, ५० थे-आ०, २०,५०। ५ "यदि स भेद सामान्यविषयो यमात्मानमाधि गामान्य विशेष इति तैना- रमना भेदस्ता व्यतिरेक एन "-प्र. पा० स्थ०३। १८०। ६ वर्थ भा०, घर, ५०। २० १९३९ । प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव नयापरनामधेयेन नीतं प्रापितम्। काम् ? समानाधारश्च गौः शुक्लः इत्यादिशब्दप्रगृत्तिनिमित्त. भेदस्यैकमधिकरणम्', सामान्यच गया गोत्यमिति , विशेषणं च मेदकं नीलमिति , विशे. ध्यञ्च भेद्यमुत्पलमिति , तेषां भावं समानाधारसामान्यविशेषणविशेष्यताम् । विकल्पस्यावस्तुविषयत्येन मिध्येव वन्नियन्धनं तनयनमिति चेत् ? ने ; तरतुविषयत्वस्य व्यवस्थापितत्वात । अत एवोक्तम-तत्त्वानुसारिणा इति । कथं पुनस्तत्रासतां तेषां तेनाप्य- ५ पोद्वार इति चेत् ? न, प्रमाणतोऽनकधर्माधिष्टानतया वस्तुनः प्रतिपत्तौ तदसत्त्वायोगात् । अत एवाई- 'भेदानां पहुभेदानां तत्रैकत्रापि सम्भवात् ।' योयं प्रमाणत एव भेदविषयात् सामानाधिकरण्यादिव्यवहारोपपत्तेः किं तदर्थेन नयकल्पनेनेति चेत् ? न ; भेदस्याभेदोपश्लिष्टस्यैव तेन प्रतिपत्तेः अगुणप्रधानभावेन १० चोपेक्षिताभेदो गुणप्राधानभाषी च भेदः प्रस्तुतव्यवहारोपयोगी , न च तस्य नयादन्यतः प्रतिपत्तिः । न चैवं व्यवहारानगमेव प्रमाणम् ; आपोद्धारिकव्यवहारस्यातन्निवन्धनत्वेऽपि सकलधर्मकलापालङ्कृतजोवादिपदार्थव्यवहारस्य तत एवोपपत्तेः। तदेवं वस्तुभूतादेव धर्मभेदात् व्यवहारोपपत्तौ यत्तदर्थं व्यावृत्तिभेदेन जातिभेदोपक- ल्पनं तस्यायुस्त्वं तत्कल्पनकृताञ्चास्थानभीरुत्वं दर्शयन्नाह- अत्र दृष्टविपर्यस्तमयुक्त परिकल्पितम् ॥१३८॥ मिथ्याभयानकग्रस्तैमूगैरिव तपोवने । इति । अत्र एतस्मिन् वस्तुनि कथितव्यवहारनिमित्तं यजातिजातं परिकल्पितं स्वेच्छाविरचितम् । कीदृशम् ? दृष्टात् प्रत्यक्षप्रतिपन्नात् वस्तुभूताद् धर्मभेदात् विपर्यस्तं विपरीतम् अवस्तुरू- पमिति यावत् , वत् अयुक्तम् अवस्तुत्वेन व्यवहारपलेनासम्बन्धात् , अन्यत एव च सस्य २० भावाच प्रतिपत्तिफलेन वा । निवेदितं चैतत् । कैस्तत्परिकल्पितम् ? भयानकाः भयहेतवोड- नेकान्तविपया: संशयादयः, मिथ्या च ते भयानकाच मिथ्याभयानकारतेषां दोपामासत्वेन साक्षाद् भयानकत्वाभावान तैरता वशीकृता मिथ्याभयानकग्रस्तात: सौगतः। अत्र निदर्शनं मृगरिघ तपोवने । तथा मृगैः मिध्याभयानकप्रात: क्षेमस्थानेऽपि वैपरीत्य कल्यते तथा विवेकविक्लैः सौगतेरपि वस्तुनि वातुमूतानेकधर्माधारे निश्शेषनिश्रेयसाभ्यु- २५ दयनियन्धने संशयादिमिध्यादोपविभीषितावलोकन विहले व्यवहायर्थमवस्तुभूतभेदाधारस्वं परिकल्पितमिति । मिथ्याभयानकत्वमेव वेपो दर्शयन्नाह- . १-करमरमा , य०, २०१२ न्यायपि यो १२२ । ३ प्रमाणन। -पाभावन्येन मा०, ५०,०।५ परिपते आ०, ५०,५०। ६२ ४९० ग्यायषिनिधयविधरणे 1 १११४१ यस्यापि क्षणिकं ज्ञानं तस्यासन्नादिभेदतः ॥१३९॥ प्रतिभासभिदां धत्तेऽसकृत्सिई स्वलक्षणम् । इति । वापर्यमत्र-संशयादिभयादनेकान्त परित्यजतो ज्ञानम् आसन्नादिविषयमेकमनेकार्थम् , प्रत्यर्थनियतं वा भवेत् ? तत्रादाविदम्- अत्र च अपिशब्दो भिन्नप्रक्रमत्वात् तस्येत्यस्यानन्तरं ५ द्रष्टव्यः । पदयमर्थ:- यस्य सौगतम्य क्षणिकं ज्ञानं तस्यापि न केवलं जैनस्य प्रति. भासभिदा वस्तुभूतमाकारभेदं तज्ज्ञानं धत्ते । पुतः १ आसन्न आदिर्यस्यासन्नतरादेः तद्विषयस्य तस्य भेदस्तमाश्रित्य तत् इति । आसन्ने हि द्विशदं विशदतरमासन्नतरे 'विशदतमं चासन्नतमे इति । भवत्येवमिति चेदाह- असकृदनेकवारं सिद्धं यग्निश्चित प्राक स्वलक्ष. णम् अन्यत्रापि योज्यम् , तदपि प्रतिभासभिदा धत्ते, निर्दोपप्रतिपत्तिविषये तत्रापि संशयादेः १. तज्ज्ञानवदनवतारात् । द्वितीयेऽप्याह- विलक्षणार्थविज्ञाने स्थूलमेकं स्वलक्षणम् ॥१४०॥ तथा ज्ञानं तथाकारमनाकारनिरीक्षणे । इति । अर्थस्यासनादेः विज्ञानम् अर्थविज्ञानं विलक्षणं च तत्परीक्षावलेन प्रतिपरमाणु भिन्नमर्थविज्ञानं च तस्मिन्नपि, अपिशब्दस्यात्रापि योजनात् । स्थूलं नानावयवसाधारणम् १५ एकम् अवयवैः कश्चिदव्यतिरिक्त स्वलक्षणं चेतनाचेतनलक्षणं प्रतिभातीति शेषः । कुत एतत् १ तथा तेन स्थूलमेकमिति प्रकारेण ज्ञानमनुभवो यत इति । ततोऽनुभवविरुद्धं प्रत्यर्थ- नियतज्ञानकरूपनं परस्येति भावः । तथा ज्ञानेऽपि करमान्न तद्राह्यं विलक्षणमेव भवतीति चेत् ? आह- तथाssकारं विलक्षणाकारं स्खलक्षणं भवति । कदा ? अनाकारनिरीक्षणे सति निर्विकल्पदर्शनेन स्थूलेकविताने । न हि अतज्ञानात् तत्सिद्धिः। ततोऽपि तसिद्धी दूषणमाह- अन्यधात्मनोस्तत्त्वं मिथ्याकारैकलक्षणम् ॥१४१।। इति । अन्यथा अन्येन स्थूलज्ञानात् सूक्ष्मसिद्धिप्रकारेण अर्धात्मनोः विषयविषयिणोस्तत्त्वं क्षणक्ष्यनैरंश्यनानात्वादिकं मिश्या वितथं किं तर्हि स्यात् ? आकारेषु प्रामारामादिप्रपञ्च. रूपेवेकमनुगतं लक्षणं स्वरूपं यस्य तत् आकारैकलक्षणं "परब्रह्म तत्तत्त्वमिति सम्बन्धः । एवं मन्यते- वनादी स्थूलसंवित्तभेदा यत्तत्वतो यथा । घटादावपि तद्बुद्धिस्तदायत्तैव कल्प्यते ॥११४८॥ तथा तरङ्गचन्द्रपु भेदबुद्धरिख त्वया । परस्या अपि तद्बुद्धेरेकाधीनत्वमुच्यताम् ॥ ११४९।। इति । १ सद -आ०, ५०,५०। २ एकमवयवम् भा०, ५०, ५०।३-मनस्तत्वं भा., प०,५०। पर प्रक्ष मा., म., प०।
पथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव . . ५ . २१४३] ४९१ भवतु निर्विकल्पादेव दर्शनाद्विलक्षणं तत्त्वमिति चेत् , कथं तत्र स्थूलप्रतिभासः १ विभ्रमादिति चेत् ; न ; तद्विवेकस्य दर्शनेन तदयोगात् । सदादिरूपस्यैव तत्र दर्शनं न तद्विवेकस्येति चेत् , अवाह- विज्ञानप्रतिभासेऽर्थविवेकाप्रतिभासनात् । विरुद्धधर्माध्यासः स्याद् व्यतिरेकेण चमाकम् ॥१४२।। इति । विज्ञानस्य उपलक्षणमिदं तद्विपयस्य च प्रतिभासे सदादिरूपेण महणे यस्तस्यार्थात् स्थूलाद्याकाराद् विवेकस्तस्याप्रतिभासना विरुद्धयोदृश्यादृश्ययोः धर्मयोरध्यासः स्याद् भवेत , तथा सति सुनिश्चितमनेकान्तमनवमिति मन्यते । भवतु तर्हि तस्य तस्माद् व्यतिरेक एवेति घेत ; न ; तथा सत्यविवेकप्रसङ्गात् , व्यतिरेके तस्या- पश्यम्भावात् । एवञ्च सिद्धमिदम् - स्थूलमेकं स्खलक्षणं तथा ज्ञानं यत इति । पुनरपि तस्य १० तस्माद् विधेकपरिकल्पनायां वक्तव्यमिदम्-विज्ञानपतिभास इत्यादि । तत्रापि भवत्वित्यादि. धचने चाकम् तथेत्यादेनुषद्गात् । एतदेवाह- व्यतिरेकेण अर्थविवेकस्य विज्ञानाद् भेदेन फुत्वा चक्रवदावर्तमानमाक्षेपसमाधानं चक्रकं स्यादिवि सम्बन्धः। तन्न जीवति स्थूलक्षाने निर्भागझानसम्भवो यतः परमाणुसिद्धिः । तदसिद्धी यदन्यत् प्राप्तं तदप्याह- प्रतिक्षणं विशेषा न प्रत्यक्षाः परमाणुवत् । इति । क्षणं क्षणं प्रति प्रतिक्षणं परमाणूना ये विशेपाः निरन्ययविनाशलक्षणाः ते न प्रत्यक्षाः प्रत्यक्षविपया न भवन्ति । निदर्शनं परमाणव इव तद्वत् । ते च तद्विशेषाश्च फयोपपत्या न प्रत्यक्षाः इत्याह- अतवामतया युद्धः [अर्धाकार विवेकवत् ] ॥१४३॥इति । बुद्धेः प्रत्यक्षरूपायाः स्थूलावभासित्वेनान्यिताकारावभामित्वेन च' अतदाभतया २० परमाणुतद्विशेषावमासित्वाभावेन । स्यान्मतम्- प्रत्यक्ष परमाणुतत्प्रतिक्षणभद्गविषयमेव स्थूलादियुधिस्तु पल्पनेव केवलं निर्विपया न प्रत्यक्षमिति ; सन्न ; तद्विय केन प्रत्यनस्याप्रनिवेदनात् । अस्त्येव तया तस्य स्वतः प्रतिवेदनमविकविभ्रमन्नु विकल्पादेव कुथचिदिति चेत् । न तावदसौ दर्शनविस्ताभ्यां प्रागेव, निमित्ताभायात , तयोरेवैकत्तिकारणयोस्तग्निमित्तानेन पररभ्यनुगानान् । नापि २५ युगपन ; युगपद्विकल्पद्वयानभ्युपगमान । न पवादपि ; नविकल्पयोस्तदानीमतिप्रमेण सविभ्रमस्य निर्विषयत्वापत्तेः । पूर्वञ्च तत्र सपा विकाङ्गीकारायैव प्रसाद । सम्भयतोऽपि सस्य पुनः प्रतितिः ? म्बसवेदनादय प्रत्यक्षादिति पेत् ; न , वश्य विधमादन्यतिरेके । ? सारमा आ., २००१२-युरेख मा., य०, ६.11- दमिनी-मा...। 1-पवि-मा...।
४९२ म्यायचिनिश्चयविवरणे प्रत्यक्षत्वानुपपत्त: 1 व्यतिरेके च तस्य तद्वद् वेदने विभ्रमासम्भवात् । विकल्पान्तरात सत्सम्भवे चानवस्थानस्य निवेदितत्वात् । अवेदने तु यथा न तस्य प्रत्यक्षत्वं बुद्धरतदाभत्वादेव नान्यतो विभ्रमात् , त्या प्रतिक्षणविशेषाणां बद्धर्मिणां परमाणूनामपि । एतदेवाह- अर्थाकारविवेकवत् इति । अर्थो दर्शनविकल्पैकत्वरूपो विभ्रमाकारः तस्माद् विवेको ५ विकल्पस्वसंवेदनस्य स इव तद्वत् प्रतिक्षणं विशेपा न प्रत्यक्षाः परमाणवदचेति । एवञ्च यजातं परस्य तदर्शयन्नाह- अत्यन्ताभेदभेदी न तद्वतो न परस्परम् । दृश्याश्यात्मनोर्बुद्विनि सक्षणभलायोः ॥१४४॥ इति । बुद्धिनिर्भासश्च स्यसंवेदनात्मा क्षणभङ्गश्च तयोः उपलक्षणमिदम् । तेने नीलादि. १० क्षणभङ्गायोरित्यपि द्रष्टव्यम् । तयोः तद्वतः तदधिकरणात ज्ञानादर्थाच अत्यन्ती ऐकान्तिको अभेदभेदी तादात्म्यव्यतिरेको न नापि परस्परम् । कीदृशयोः ? दृश्यादृश्यात्मनोः दृश्यात्मा नीलादिषुद्धिनिर्भासश्च अदृश्यात्मा क्षणभद्गस्तयोरिति । कुत एतत् ? 'इत्यत्राह- सर्वधार्थक्रियायोगात् तिथा सुप्तप्रवुद्धयोः । इति । तथा हि'- यदि नीलादिक्षणभङ्गयोः बुद्धिनिभासक्षणभद्गयोश्च तद्वत एकान्ता- दव्यतिरेकः तदा पिण्डस्योपसंहारात् परमाणुरेवावशिष्येत् तस्य चाप्रतिपत्तेरभावो बायदिति । वतः सर्वथा सर्वेण योगपद्येन क्रमेण वेत्ति एकस्वभावेनानेकस्वभावेन वेति प्रकारेण अर्थस्य कार्यस्य क्रिया निष्पत्तिः तस्या अयोगात्, नीरूपात्तदनुपपत्तेः । एवं यदि नीलादेः क्षणभङ्गोऽव्यतिरिका तद्वदेव दृश्यः स्यात्, वथा च किं तदनुमानस्य २० फलम् ? निश्चय इति चेत् ; किं तदभावे न भवेत् ? व्यवहार इति चेत् ; न, नीलादिदर्शना. देव तदुपपत्तेः। तत्रापि निश्चयादेव स इति चेत् । स एव तर्हि क्षणमङ्गस्यापि निश्च यः स्याद. व्यतिरेकादिति न तत्फलं तदनुमानास्य । नापि समारोपज्यरच्छेदा निश्चिते समारोपामावात् । एतदेवाह-सर्वथा सर्वेण दर्शनहेतुत्वेन निश्चयनिमित्तत्वेन समारोपन्यवच्छेदकत्वेन घ प्रकारेण अर्थकिगायाः क्षणभद्नानुमितेः अयोगादिति । नीलादेः क्षणभद्नादन्यतिरेके तु साध्यान्त पानित्वेन धर्मिहेतुदृष्टान्तानामप्तम्भवादनुमानानुपपत्तेः सुव्यक्कमेतन्-'सर्वधार्थ- क्रियायोगात्' इति । तन्नैकान्वेन तयोः परस्परं तद्वतश्चाभेदो नापि भेदस्तद्वतः, नीलादे. युद्धिनिर्भासस्य च नित्यत्वापत्तो, नित्याच, क्रमयोगपद्यादिना सर्वप्रकारेण सर्वधार्थ- क्रियायोगात् । भवतु कपश्चिदेव तयोस्तद्वतः परस्परं पाभेदो भेदो वेति चेत् ; अत्राह- २५ तेन क्षण-आ०, २०,५०२ इत्याह मान, २०, य०१३ -हिनी-आय०१०। ४ तदापि वि- आ०, २०१०। ५ क्षणभज्ञानुमानस्य । निश्चयाभावे।
५ - + प्यायविनिश्चयविवरणे [२२१४६ अन्यः कल्पितरूपो विभ्रमनामा विषयो यस्य तदन्यत तस्मादन्यद्- अनन्यवत् वास्तव. तत्तादाम्यविषयं बाधकाभावादिति यावत् । इदानी तेन द्रव्यपर्यायादीनामन्योन्यात्मकत्वेन भाव इति परिणामलक्षणं सद्गृह्य दर्शयन्नाह- संयोगसमवायादिसम्पन्धाद्यदि वर्तते । अनेकत्रैकमेकत्रानेकं वा परिणामिनः ॥१४६|| इति । संयोगश्च समवायश्च संयोगसमवायावादी यस्य संयुक्त कार्थसमवायादेः स एव सम्बन्धः तस्मात् यदि चेत् वर्तते, के किम् ? अनेकत्र शरीरदेशेषु एकम् आत्मद्रव्यं संयोगेन शरीरं समवायेन, एकत्र शरीरे अनेक कटककुण्डलादि संयोगेन, क्दकत्वादि १० संयुक्तसमवायेन, रूपसंस्थानादि समकायेन वा, रूपत्वादि समवेवसमवायेन, शरीरसमवेते रूपादौ तस्य समवायात् । एवमन्यत्रापि योग्यम् । वेति समुपयार्थम् । तत्र समाधानम्- परिणामिन इति । परिणाम उक्तलक्षणो विद्यतेऽस्येति परिणामी भायः सस्य परिणामिनः संयोगसमवायादिसम्बन्ध इति विभक्तिपरिणामेन सम्बन्धः । तथा हि- अप्राप्तयोः प्राप्तिः संयोगः । प्राप्तिश्च यदि शरीरादर्थान्तरम् ; कथं प्राप्तं शरीरमिति तद्रूपतया तत्र प्रत्ययः ? १५ सम्धन्धादिति चेत; ततोऽपि ताप्यस्य सम्भवे सिद्धः परिणामः । शरीरस्यैव ततोऽनद्रूपस्य सदूपतयोत्पत्तेरसम्भवे कथं ततोऽपि तथा प्रत्ययः ? कथं वा तस्याभ्रान्तत्वम् अतस्मितहात् ? भान्साय कथं ततः तात्यवत् शरीरस्यापि प्रतिपत्तिः ? ताप्य एवासी भ्रान्तो न शरीर इति घेत् । कथमेफस्यैव भान्तिरध्रान्तिश्च स्वरूपं विरोधात् ? अविरोधे वा कथमेकायैव प्रमेणा- प्राप्तिः प्राप्तिश्च स्वरूपं न भवेत् १ इति सिद्धः परिणामिन एव संयोगसम्बन्धः । तथा समवायोऽपि शरीरस्य तदाधारे तदवयवक्लापे इहेति प्रत्ययहेतुः । तदा- धारस्वञ्च तस्कलापस्य यदि यावद्रव्यभावि ; सशरीरस्यैव तस्य प्रतिपत्तिः स्यात् आधेय. विरहितस्याधारस्यासम्भवान । अयावद्रव्यमाविनोऽपि तस्माद् व्यतिरेके 'तदाधारस्तफ्लाप:: इति न तदपतया तत्प्रतिपत्तिः । सम्बन्धात्तथा तत्प्रतिपत्ती : तद्विभ्रमेतरकल्पनायां च पूर्वक. प्रसङ्गात् । अव्यतिरेके सिंद्धरतत्य लाप: परिणामी प्रागतदाधारस्य तदाधारतया तदुत्पत्त्यव. २५ स्थायां परिवर्तनादिति समवायोऽपि परिणामिन एव । एवं संयुक्तसमवायादिरपि । मन्त्रमशक्यपरिहारत्वे परिणामस्य किमवयवगुणविशेपेभ्यो गुण्यवयविसामान्या. नामर्थान्तरत्वेन ? अवयवादीनां तद्रपेणापि परिणामोपपत्तेरिति चेत ; अभिमतमेवैतत् । अत एवेदमपि व्यारयानम् - अवयवादय एवावयन्यादिरूपेण परिणामिनः परिणामशीला इति । २० चिदने-आ०, २०, ५०१२-द्रव्यसंयो-आर, य०, ५०1३-वायादि स-भा०, ५०,०। ५ -मिन या भा०, २०, ५०।५ किमवमवीव गु-आ०, ५०, प० । ६ तत्पलेनापि भा०, २०, ५० । भवयन्यादिम्पेणापि।
- १।१४८ प्रथमः प्रत्यक्षाप्रस्तावा तदेवमवस्थितं योगपद्यक्रमाभ्यां सामान्यविशेषात्मकं स्वलक्षणम् । भरंतु सामान्यम्, तत्तु विजातीयव्यावृत्तिरूपमेव तस्य निर्याधत्वेन यस्तुपु भावात , अर्थक्रियायाश्च तदुपाभयतयैव तत्रोपपत्तेः । पावकादिव्यावृतिमत एव तोयादेः स्नानादितत्- क्रियादर्शनात् । सामान्यमादिभिरपि तस्यावश्याभ्युपगमनीयत्यात, अन्यथा कर्कादिपरिहारेण सण्डादायेय गोत्वमिति नियमायोगादिति चेत , अनाह- अतद्धेतुफलापोहमविकल्पोऽभिजल्पति । इति । सामान्यमिति वक्ष्यमाणमिहाकृष्य सम्बन्धनीयम् । तदयमर्थ:-न विद्यते तस्य सण्डा- दे: हेतुफले तत्कारणकायें येषां ते अतद्वैतुफलाः फर्कादयः तेभ्योऽपोहो घ्यावृत्तिः तं सामान्यमभिजल्पति क्थयति । अविकल्पो विकल्पज्ञानरहितः सौगतः । हि सामान्यमनिच्छतः तज्ज्ञानसम्भवः । तस्य हि न स्वालक्षण्यमेव रूपम्, अभिजल्पसम्बन्धा- १० भावापतेः । तदभिसम्बन्धिनोऽपि रूपस्य तवं भावे कथं सामान्यप्रतिक्षेपः तस्यैव साधारणा स्मनस्तत्त्वात् ? असाधारणत्वे शब्दसङ्केतादेस्तनाप्यसम्भवात् । भवदपि सामान्यं तदवास्तवमेवा. पोहत्वादिति चेत् कथमभिजल्पसम्बन्ध प्रति योग्यत्वम् ? तस्यं वस्तुधर्मत्वात् । तदपि कल्पित- मेवेवि चेत्, न, तेनैव तदयोगात् । सति तद्योग्यत्वे तस्य विकल्पक्त्वं विकल्पत्वे च तेन तत्कल्पनमिति परस्पराश्रयात् । विकल्पान्तरात् तन्न तत्कल्पनमिति चेत, न, तत्रापि तदन्तगत् १५ वकल्पनेऽनवस्थापत्तः । सन्मापोहवादिनो विकल्पसम्भवः । सदसम्भवे च कुवो च्याति. सामान्यप्रतिपत्तिः प्रत्यक्षस्यातद्विपयत्वात् कुतो पाभिजल्पः तस्य तद्योनित्येन तदभावे नोपपत्ते. रिति मन्यते । साम्प्रतं तस्य वस्तुपु भावादीनां वस्तुसामान्य साधनस्वेन विरुद्धत्वमावेदयन्नाद- समानाकारशून्येषु सर्वथानुपलम्भतः ॥१४७॥ तस्पवस्तुपुभावादि सासारस्यैव साधनम् । इति । तस्यवस्तुयुभाय आदिर्यस्याक्रियामयत्वादेः सत् तस्यवस्तुपुभावादि । कथं पुनः सुबन्तसमुदायस्य समासस्तस्यासुन्तत्वात ? सुपन्तस्य हि सुमन्तेन समास इति वैयाकरणन्यायः । समासेऽपि फथ सुपोऽलुग्भाय इति चेन ? तत्समुदा- यस्वाभावात् । न हि 'तस्यरस्तुपुभावः' इति सुरन्तसमुदायोऽयम् , अपि तु तदर्थ- २५ विपयं सत्प्रतिरूपकमसण्डमेय प्रातिपदिकम् , तस्य च सुबन्तत्यादुपपन्नः तद्विधायिनः सुपो लुम् । न च मुयन्तरमस्ति यंगालगभायः पर्यनुयुत्येत । तत् विमित्याह-साकारस्यैव । आफारयत एव न नीरूपाय सामान्यरय साधनं यस्तुपु परि- २० न ममास:, १ पाद प्राह । २ तत्राभावे भा०प०पन योग्य सम्प। नागिन्येन मा....।'विरुयपी. जय शदा सिया शब्दगोरा । त्यभिपनाना ५ "गुगुणा"-नन्द १३६३५ ६२म सुम्मा-मा०,an ४९६ म्यायधिनिश्चयषिवाणे [॥१४८ णामिभावलक्षणेषु भयनादेस्तत्रैव प्रतिपत्तः । क्षणक्षीणपरमाणुरूपाणि विलक्षणान्येव वस्तूनि ना च तेभ्येर भावादिः प्रतीयते न माफारस्येति चेन् ; न तेषामेव प्रमाणामावेनाप्रतिपः। न हि तदप्रतिपत्तो तत्र भावादेरल्यतरम्य वा प्रतिपत्तिः मम्भवति । तदेवाह-समानश्वासी मान- सहिन आकारश्च समानाकारः तेन शून्येषु व्यावर्णितस्वलक्षणेषु । कथं तच्छ्न्येषु ? ५ सर्वधा सर्वेण प्रत्यक्षविपयत्वेनानुमानविषयत्वेन च प्रकारेण अनुपलम्भतः तस्य वस्तुपु भावादेरिति विभक्तिपरिणामेन सम्बन्धः । कथं पुनस्तेषां समानाकारशून्यत्वम् , यावता प्रत्यक्षमेव तेपु प्रमाणमिति चेत् ? तदपि यथाकल्पनम् , यथाप्रतिभासं वा भवेत् ? न तावदाद्यम ; तस्याप्रतिपत्तेः । न हि निर्विकल्पं प्रत्यक्षं कचिदपि दृश्यते यत• तस्वलक्षणप्रनिपत्तिः । "प्रथममिन्द्रियज्ञानं तदेव १. दृश्यते केवलं तत्पृष्ठभाविनैकरयूलविकल्पेन प्रत्यूहान्न निश्चीयत इति चेत् ; कथमनिश्चित नदास्ति ? कथं वा प्रामाणम् ? अन्यथैवमपि स्यात्- सकलमपि प्रत्यक्षं व्याचवस्तु- विषयमेव केवलं भेदविकल्पेन प्रत्युहान निश्चीयत इति । भेदामा प्रत्यक्षादन्यो विकल्प एव न सम्भवतीति चेत ; न ; अनेकान्तामावेऽपि तदसम्भवस्य निवेदितत्वात् । अविचारि- तरम्यया तु कल्पनया तत्सम्भवस्योभयत्राविशेषात् , तथा च सर्वाभेदरूपस्य पुरुषस्य प्रसिद्धः १५ “य: सर्वेषु लोकेषु तिष्ठन् मयम्यो लोकेभ्योऽन्तरो यं सर्वे लोका न विदुर्यस्य सर्वे लोकाः शरीरं यः सर्वान् लोकानन्तरो यमयति स आत्मान्तर्याम्पमृतः" हिदा० ३१७१५] इत्याद्याः श्रुतयोऽर्थवत्यो भवेयः । न यं निर्विकल्या भ्रान्तिरपि । शक्यं हि वक्तुम्-'पश्यन्नयमेकमेव चन्द्रमसं पश्यति द्वित्वारोपविकल्पान पुनर्निचिनोति' इति । तथा च व्यर्थमभ्रान्तग्रहणं कल्पनापोढपदेनैव २० द्वित्वभ्रान्तेर्विनिवर्तनात् । निर्विकल्पैव तद्धान्तिः इन्द्रियभावाभावानुरोधित्वेनैन्द्रियत्वादर्थ- सन्निधिसापेक्षत्वात प्रतिसङ्गयया 'चानियेम्यत्वादिति चेत् । न, तत एव जातिप्रतिपत्तरप्यमान- सत्वापत्तः । तदुक्तम्- "न चेदं व्यवसायात्मप्रत्यक्षं पानसं मतम् । प्रतिसवथानिरोध्यत्वादर्थसन्निध्यपेक्षणात् ॥" सिद्धिवि०परि० १] इति । २५ तत्र तद्भावाभावानुरोधित्यादिकमध्यारोपितमेव न तात्त्विकमित्यपि नोत्तरम ; द्वित्वभ्रान्तावपि तथैव तत्प्रसङ्गात् । अपि च "विषयसरूपं तत्प्रत्यक्षम् अन्यथा वा तत्राचे विकल्पे वस्त्येव सामान्य सारू- -पादिस्व-आ०, प., प०। २ "नीरूपस्य सामान्यस्य"-वाटि.1 ३ भवनादिः भा०,३०, १०। ४ वा न भ-आ०, २०, ५० १ ० प्रथमेन्द्रिय-भा०. ०, ५० निर्विकल्पमेव । ७ "यः सर्वेषु भूतेषु तिष्टन् सर्वेभ्यो भूतभ्योऽन्तरी"."-बृहदा०1८ प्रत्यक्षलक्षणे । ९ चानुरोध्य-भा०,५०,५०। १० विषयस्वर- आ०, ब०, १०३ - १२१५८] भथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव त्यस्यैव तत्त्वात् । तदपि तत्रातात्विक्मेवेति चेत् , न , भ्रान्तत्वेनाप्रत्यक्षत्वप्रसङ्गात । एतेन कल्पितमिति प्रत्युक्तम् । फल्पिताकारस्यापि प्रत्यक्षत्वानुपपत्तेः । सर्वथा च विषयसारूप्ये विषयवत तस्यापि जडत्वापत्तेः न स्वतः प्रतिपत्तिः। अन्यतश्च सरूपात् प्रतिपत्तावनवस्थापत्तिः । असरूपात् प्रतिपत्ती विषयस्यापि तत एव प्रतिपत्तेः व्यर्थ तत्रापि सारूप्यकल्पनम् । असरू- पमपि नाप्रतिपन्नमेव तत्प्रमाणम् अनभ्युपगमात् । प्रतिपत्ती च प्रतिपत्तिफलस्य व्यापारस्य ५ स्वरूप एवोपक्षयात् कुतस्ततो विषयप्रतिपत्तिः १ व्यापारान्तरादिति चेत् , न , उभय- व्यापारात्मत्वे तस्य वस्तुतः सामान्यविशेषात्मत्वस्याप्यनिवारणापः । तन्न यथाकल्पन तत् । नापि यथाप्रतिभासम् , तर स्वपरव्यवसायात्मनि बहिरन्तश्च नानावयवसाधारणस्य स्थूल. स्यैव प्रतिपः । सन्न प्रत्यक्षतः स्वलक्षणप्रतिपत्तिः । नाप्यनुमानात, तस्य विकल्प निषेधेन निषेधात्, प्रत्यक्षाभावेऽनवताराध । ततो यस्त्वेव सामान्य तदन्यापोहात्मकत्वहेतूना विरुद्धत्वात् । स्यान्मतम् सण्डादीना कर्कादिभ्य इव परस्परतोऽपि भेदाविशेपेऽपि त एव सामान्य गोत्वं विभ्रति न कर्कादयः' इत्यत्र तन्नियता शक्तिरेवावलम्बनम्, तया च तद्भरणमकृत्वा किन्न सध्यावहारमेवानुगतप्रत्ययादिरूप ते कुरिन ? एव हि कल्पनागौरवं परिहतं भवति शक्तिः सामान्यं तद्व्यवहारश्रेति । तन्न सामान्यमर्थवदिति, तद्युक्तम् , एवं हि विशेषाणामप्यपरिकल्प. नप्रसङ्गात् । शक्यं हि वक्तुम्-यया प्रत्यासत्त्या गोत्यमेव सण्डादीन् विशेपार विभर्ति नाइवत्वं तया तद्विशेपव्यवहारमेर थुर्वातालं सद्विशेपैरिति । एवञ्च न कश्चिदपि विशेषो जीवितुमर्हति सर्वविशेषव्यवहाराणां सन्मानादेय महासामान्यादुपपत्तेः। विशेपाभाये कथ तव्यवहारः तस्यापि विशेषरूपत्वादिति चेत् ? सामान्याभावेऽपि तद्र्यवहारः कथं तस्याप्यनुगतप्रत्ययादेः सामान्यरूपत्वात् । कल्पित एव त्र्यवहारो विचारपीडा न सहत इति चेत, न, विशेफ्यवहार. २० स्यापि ताशत्वात् । पथ पुनरेयस्वभावात सामान्याद् देश कारादिभेदी तव्यवहारः, कारणभे. दादेव कार्यभेदस्योपपत्तेरिति चेत् १ न, दाहपाकादिकार्यभेदेऽपि तद्धेतोः पावकस्य भेदाभावात् । तनापि शक्तिभेदादेव तद्भेद इति चेत् , कुतस्तदन्यतिरेकात् शचिमतोऽपि न भेद ? सन्ना- नास्वेन सदेकरयस्याविरोधादिति चेत् , गहदिदम यत्-अनान्तरक्सिममायिना तन्न विरुद्धयते अर्थान्तरकार्यसमायिना तु विरुद्धयते इति । व्यतिरिक्त व शक्तिस्तद्वत इति पेत् ११ न, तत एव कार्यनिष्पत्तेः शक्तिमतो वैयपिरो । नाय दोपः, तेन त दस्य फरणादिति चेत्, न, तस्याप्यपरेण सद्भेदेन करणेऽनवस्थापः । स्वतस्तकरणे कार्यभेदेन किमपराद्धं यतस्तमेव न फुर्तीन ? तथा च पायकरदेव सदात्मनः मामान्यस्यैव सकलनगदैनिर्माणसामोपपत्ते व्यर्थमेव तदर्थ भावभेदपरिकल्पनम् । उकच मण्डनेन- सहाव्या-आ०, २०, ५.१२ -पेनि-भा०, २०, ५०३ -त् प्रसान् प्रम-आय. -रतो भेद-आ०, २०, । ५ शधिगा-भा०,२०,०। ६ पया मला आO, २०५०। .. परका-भा., ०1८- निसा-आ०, २०, ५० ।
न्यायविनिश्वयविधरणे [१११४९ "अर्थक्रियाकृते भेदे रूपमेदो न लक्ष्यते । दाहपाकादिभेदेन कृशानुन हि भेदवान् ।। यथैव भिन्नशक्तीनामभिन्न रूपमाश्रयः। तथा नानाक्रियाहेतूं रूपं किन्नाभ्युपेयते ।। एकस्यैवैप महिमा भेदसम्पादनासहः । वहेरिव यदा भावभेदकल्पस्तंदा मुधा ॥" [ब्रह्मासि० २१७-१०] इति । तदेव सामान्यं नोपलभ्यते भेदस्यैव पहिरन्तश्योपलम्भान्, तदुपलम्भे वा न भेद- व्यवहारः तस्य संहृतासिलभेदरूपत्वात् तत्कथं तत्र तस्य सामथ्र्यम् , असति तदनुपपत्तेरिति पत् ? न; विशेषाणामपि परपरिकल्पितानामप्रतिपः। प्रतिपत्ती चा न मामान्यव्यवहारः १० संहृवासिलसामान्यरूपत्वारोपाम्, तत्कथं तत्र तेषामपि सामर्थ्यम् असति तदनुपपत्तेः । फल्प- नया सत्त्वमिति चेत् ; न; तस्या एव भेदाप्रविपत्तावसम्भवात् । निवेदितम्चेतत् । एतदेवाह- न विशेपा न सामान्यं तान् वा शत्तया कयाचन ।।१४८।। तद्विभर्ति स्वभावोऽयं समानपरिणामिनाम् । इति । अत्र द्वितीयो नन् तदित्यनेन सम्बन्धनीयः । वाशब्दश्चैवार्थः । तदयमर्थः-तद्- १५ अनन्तरोक्तं सामान्यं ब्रह्मवादिपरिफल्पिठं कयाचन भिन्नयेतरया वा शक्त्या प्रत्यासत्त्य- परसज्ञया तान् विशेपान प्रामारामादिरूपान न बिभर्ति या न स्वीकरोति यथा । उप- लक्षणमिदम्-नापि तद्व्यवहारं करोति । तथा विशेषाः सौगवाभिमता: सामान्यं गोत्वादि न विभ्रति विभर्तीत्यस्य वचनपरिणामेन सम्बन्धात् । इदमप्युपलक्षणम्-तेन तब्यबहारमपि न कुर्वन्ति, तेपामपि तत्सामान्यवदप्रतिपत्तिविषयत्वेन सपुष्पतुल्यत्वात् । मा भूत् तत्कल्पि. २० तानां तेषां तद्भरणं त्वत्परिकल्पितानां भवेत् त्वया तत्प्रतिपत्तेरभ्युपगमादिति चेत् ; न, तत्रापि तदसम्भवात । न हि तेऽपि विशेषाः कयाचिदपि शक्त्या सामान्य विभ्रति, स्वयं तद्रूपत्वेन तदाधारत्वानुपपत्तेः । तत्र तत्रापीय प्रक्रियाऽयकल्पते । सदाह- स्वभावोऽयं सामान्यरूपः । केपाम् ? समानपरिणानिनां स्वहेतुसामग्रीत: सादृश्यपरिणामापत्तिमताम् । भिन्नमेव सामान्य विशेषेभ्यस्तदाधेयञ्च 'खण्डादिपु गोत्वम' इति प्रतिपत्तेः, सत्कथं ते सन्न बिभ्रतीति २५ चेत् ? अत्राह- अप्रसिद्धं पृथसिद्धम् [उभयात्मकमजसा) ॥१४९।। इति । प्रकर्षेण प्रत्यक्षलक्षणत्वेन सिद्धं निश्चितं प्रसिद्धं तदन्यद् अप्रसिद्धम् । किं तत् ? पृथसिद्ध विशेपेभ्योऽर्थान्तरत्वेन सिद्धं निष्पन्नं सामान्यम । न हि प्रत्यक्षे सामान्यस्य -हेतुरूप प्रा०, २०,५०।२-तथा मुदा भा०, २०, ५० । संतासि-पा०, ५०, ५०। भन्यो न तदि-आ., ०,१० । ५ योद्धपिताना विशेषणाम् ।
मधमा प्रत्यक्षप्रस्ताया १० १३१४१] विशेपभ्यो भेदस्तदाधेयत्वं वा प्रत्यवभासते, कश्चित तदव्यतिरेकस्यैव तस्य तत्रायभासनात् । वथापि सत्र नवभासकल्पनायां भवन्तु फुशलिनस्ताथागताः 'परस्परविश्लेषिणामणूनामेय वत्रावभासनम्' इति तेषामपि शक्यत्वात् परिकल्पनस्य । सण्डादिषु गोत्वमिति तु प्रतिपति- रापोद्धारिकी व्यवहारा न पावता वस्य तदाधेयत्वम् , अन्यथा तेपामपि सदाधेयत्वं भवेत् - "सामान्यनिष्ठा विविधा विशेषाः" [ युक्त्यनु० श्लो० ४१ ] इत्यपि प्रतीतेः । कोटर्श ५ सहि सत्यम् ? इत्याह- उभयात्मकमनसा इति । सागन्यविशेषोभयखभावं तत्वम् अञ्जसा परमार्थेनेति । तदात्मत्वेऽपि वस्तुनः सामान्यमेकमेव 'सर्वसर्वगतं न प्रतिव्यक्ति भिन्नं सदशपरिणाम- रक्षणम् । तदुकम्- “यथा च व्यक्तिरेकैव दृश्यमानः पुनः पुनः। कालभेदेऽप्यमिन्नै जातिमिन्नाश्रया सती ॥ कात्यावयवशो वृत्तिपृच्छा जाती न युज्यते । न हि भेदविनिमुक्ते मान्यभेदविकल्पनम् ॥[मी० श्लोवन० ३२.३३] व्यश्चित्तदन्तरालेऽपि वस्योपलम्भमसङ्गात् । अनभिव्यकोर्नेति चेत् ; व्यकापि न भवेत् , तदन्तरालगतान उद्तस्य तद्रूपत्याभेदात् । भेदे व्यक्गिवमेय वत्सा. १५ मान्यमस्तु सत एव तत्प्रयोजनपरिसमाप्तेः व्यर्थ तदन्तराले तत्कल्पनम् । प्रतिव्यक्ति तस्य भेदे कयमभेदप्रत्ययः 'पण्डो गोर्मुण्डो गोरिति' इति चेत् ? अभेदेऽपि कथं क्वचिदभिव्यक्तिर. नभिव्यक्तिधान्य व्यक्तैरतद्रूपत्वात् ? न हि व्यतिविपयस्वभावो येन तद्वत्वेतराभ्यां वस्य भेदः अपि त्वन्येय ततः, तत्प्रतिपत्तिरूपत्वादिति चेत् ; फथमेयं तदन्तराले तदप्रतिपत्ता. यनभिव्यक्तिरत्तरम् १ तेयाप्यप्रतिपत्तरेव प्रतिपादनात् । तत्पर्यनुयोगे तस्या एयोचरत्वानुपपत्तेः। २० कुतश्च तस्याभिव्यक्तिः १ यत्र "तत् तत इति चेत् ; न ; सर्वतः स्याप्त , सर्वसर्वगतत्येन सत्य सर्वत्र भावात् । यस्य सामयं तत इति घेत् ; "तदपि यदि सामान्यरूपं सर्वसर्वगतश्च स एव दोप:- तदन्तरालेऽपि ततस्तदभिव्यतिरिति । नायं दोषः, "वस्य तवानभिव्यरत्ये- नानभिव्यजकत्वात् । इतरत्र पुतस्तदभिव्यक्तिः ? अन्यस्मात् सामादिति चेत् । सदपीत्यादेः तत्राप्यनुपडादनयस्थापनश्च । असर्यगतमेव तदिति पत्; सर्वगतसामान्यप्रतिशताव्यापत्तः । सामान्यादन्येव मामयम् असर्वगतमनभिन्यत्तस्य, अन्यया पूर्ववद् दोपादिति पेस ; ततोऽपि यद्यमिन्यविस्तव्यापिनी ; सर्वस्य सर्वदर्शित्व- प्रसद्गः, सर्वगतसामान्यव्यापिन्या सदभिव्यतया "वदव्यतिरिक्तसफलवस्तुब्याप्रयश्य. इति चेत् , न . .. न.२५ . १ रा सर्व-भा०, २०, ५०१२ -वत्ततदन्त-भा., ०,१०११ -प्यपिगतस्य-मा०प०,१०। ४ गोरिति चेत् भा०, ५०,०।५ "समिध्य:"-ठा.रि. पात्यन्ताले। सामान्यामनिपतो । अनभियान सामान्यप्रतिपतिः उत्तरम् । १ सनभिन्यायापि । " गामान्यम् । गाममपि । १२ गामान्यस्य । १३ सगर्वगतसामप्यादपि । । ताभिम्पति-भा०, ५०, ५०॥
. १० ५०० न्यायविनिश्चयचियरणे [१९४९ म्मावात । वश्यति पतत- नित्यमित्यादिना'। यदि न तव्यापिनी क्थ तदभि यत्तम, अभिव्यक्तिव्यामस्वभावस्यवाभिव्यक्तत्वोपपत्तः । पण्डशोऽभि यामप्यभिव्यत्तमेवेति चेत् , तस्य सण्डाभावान् । तदारे वा क्थ तर फारावयवशो वृत्तिार्यनुयोगो नोपपद्यने यत इद सूक्तम्-'काराग्यशो मृत्ति ' टत्यादि । अपि च- ब्राह्मण्यमपि सामान्य यदि सर्वगत तदा । शुद्रादिप्यपि तद्भावाजातिसायमागतम् ॥११५०॥ व्यक्ताव्यक्त विभागस्तु निविभागे न युक्तिमान् । कुत्तो वा तदभि यत्तियक्तिभ्यस्तदसम्भवात् ।।११५१॥ कौण्डिन्यादेन हि यस्तेस्त व्यक्तिपलभ्यते । अन्यथानुपदेश स्यानिश्चयस्तत्र गोत्वरत ॥११५२॥ उपदेशसहायेर व्यक्तिस्तव्यञ्जिका यदि । केवलैव समर्था चत् सहायापेश्रणेन क्म् ि॥११५३॥ केवरी न समर्था चत सहायापेषणेन किम् । सहाय एव सामध्यं तस्यामित्यपि नोत्तरम् ।। ११५५।। म्वत सामर्थ्यशून्याचे तदयोगान सपुष्पवत् । स्थतोऽपि यदि सामध्य सहायो नैव कार्यरत् ॥११५५॥ सत्येव सचिव तच्चेत तत्कृत स्यात्तथा सति । वृथा तत्करण जाते.यक्तिरेवास्तु तस्कृता । ११५६॥ एव हि न प्रसज्येत पारम्पर्यपरिश्रम । सचिवेन विनाप्यस्ति तच्चेत् कुर्वीत किन्न तत् ॥११५७॥ कार्य कार्यकृतेऽप्यस्ति सामर्थ्यमिति साहमम् । अन्योन्यजन्यसामध्यं व्यक्तितत्सचिवद्वयम् ॥११५८॥ कार्यच्चैन्न शूद्रादावप्येव तत्प्रसानात । कोण्डिन्यादिवत सूरमागवादिरपि ग्रामण्यत्य व्यक्तिरेव, तनापि तस्य तदुपदेशस्य सप सर्वगतसामान्ययादिमतेन भावात् । ततस्तत्रापि तदभिव्यक्ती कथ याजनाध्यापनादयः कर्मविधयो न भवेयुः, आधारसायं न भवेत् । तदेव क्षत्रियत्वादयोऽपि 'चिन्या । तन्न सस्य सर्वसर्यगतस्य तद्वद् गोत्वादेरपि । व्यक्तिसर्वगतस्य तु प्रत्य-सगल विच्छेदे नानारयम् , अन्यथा सर्वसांगतातविशेप । तन्नताशेन सामान्येन तदात्मक भावस्य सादृश्यात्मनेय . । न्यायवि. इको. १५५। २-उत्त वापत्ते आ०, प. प. 1 ३ फेवल न-आ०,३०, प० । ४ जातव्यक्ति-ता० । ५ ब्राह्मण्या क्षत्रियानात सून । क्षत्रियाया वैश्यानातो मागध । ६ इष्टव्यम्-प्र० घाति काल २-या सर्वग-आ०, १०,५०। ८ मांगतन ।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावा , + , - ॥१४९] ५०१ 'तेन तदुपपत्तेः । कथं तस्यापि विशेषेणैक्त्वं विलक्षणत्वादिति चेत् । क्थं रूपेण संस्थानस्य तदविशेपात १ मा भून् , संस्थानम्यवाभावादिति चेत् , न दर्शनात । न हि पश्यन्नय दैर्ध्यस्थौल्यादिक न पश्यति, तदपहरे रूपदर्शनेऽपि तदापत्रधल्प जगद्भवेत् । रूपमेव संस्थानम् , सत्येव तदुपलम्भे तस्य दर्शनात् नापरमिति चेत् , न , तत एव रूपस्यापि संस्थानादन्यम्याभावप्रसङ्गात । दूरविरलक्शादी केयरम्यापि रूपस्य दर्शनमिति ऐन , न , ५ समन्धकारादो केवलस्यापि मयूरादिसंस्थानत्योपलम्भात् । संस्थानमेव तन्न भवति यथा- रष्टस्याप्राप्ते, तस्यैव संस्थानत्वे प्राप्तिरपि स्यात् , न चैवम् , स्पष्टस्यैव प्राप्तेः । न च सयोरेकत्वं प्रतिभासभेदेन भेदस्यैवोपपत्तेः, तस्माद् भ्रान्तमेव तद्दर्शनम् विसंवादादिति चेत् ; न; अस्पष्टतायामेव विसंवादात् , न संस्थाने । तव्यतिरेकात् तत्रापि विसंवाद एवेति चेत ; न, एकान्ततस्तदभावात् , अन्यथा घस्पष्टमित्येव म्यान प्रतिभासो न स्थर मिति । कथं १० वा तत्संस्थानस्यावस्तुत्वे लिङ्गत्वम् १ अविनाभायनियमादिति चेत , न तनियमस्यापि तदुत्पतितादात्म्ययोरेवाभ्यनुज्ञानात् । अत एवोक्तम्- "कार्यकारणभारावा खभावाद्वा नियामकात् । अविनामावनियमो दर्शनान्न न दर्शनात् ॥” [प्र० वा० ३।३०] इति । न चावस्तु कस्यचित्कार्यम् ; व्योमकुसुमादिवत् । नापि स्वभावः । स्वभाववत्वेऽपि साध्यस्य तस्मादेकान्तेनाभेदे तदप्यपरत्वेव स्यात् । न च तत्साधने प्रेक्षावता प्रवृत्तिः पुरपार्था. भावात् । साधितात् तनो वस्तुसाधनमिति चेत् , न, तस्यापि तस्मादेकान्तेनाभेदे पूर्ववद्दोपा- दनवस्थानुपगाच । क्थश्चित् तदव्यतिरेकपरिकल्पनया तत्साध्यवस्तुत्वपरिपाल्नं ध्यामलितो. पलब्धसंस्थानस्यापि वस्तुत्वमवस्थापयति, यस्यापि ध्यामलितत्वात् कश्चिदेवाव्यतिरेकात् । मा भूलिगत्वमपि तस्येति चेत् , कथं तर्हि तत्र प्रतिपन्नप्राप्तिव्यभिचाररयानुमानादविसंवादः यत इदं सूक्तम्- "ममैवं प्रतिभासोऽयं न संस्थानविवर्जितः। एवमन्यत्र दृष्टत्वादनुमानं तथा च तत् ॥" [प्र०वार्तिकाल० १११] इति । कथं पुनः अनुमानादयविसंवादः तद्विषयस्याप्यस्पष्टावभासित्वेगावरतुत्वाविशेपात , वनापि तत्प्रतिभासरिगोपजनितादनुमानाद् अविसवादपरिकल्पनायामनवस्थापत्तिरिति चेत् । २५ अयमपि परस्येव दोपः । न दोपः, व्यवहारभङ्गमयादकृतविचारस्येवानुमानप्रामाण्यम्याभ्यनु. सानादिति चेत , तथा दर्शनस्येव तदगीकारोपपत्तेः । एवमध्यवास्तवमेय संस्थान व्यावहारिकरयाध्यक्षस्थावस्तुविषयत्वात , ततः सांवृतमेव तन् अस्यूलदिव्यावृत्त्या स्थूलादे: संवृत्या परिकल्पनादिति चेत् , अाह- २० . , - सामान्येन । २-पचन्यातिभि-गा...।
। - भ्यापविनिधपपिपरणे [११५१ सनिवेशादियद् वस्तु सांवृतं किन्न करप्यते । इति । सन्निवेशो रचनाविशेषः संस्थानमिति यावत् । स आदिर्यस्य सदृशपरिणामादे: स इव तद्वत् "सुप इच" [गाकटा० ३।३।२] इति प्रथमान्तात् यत् प्रत्ययः । वस्तुरूपादिः सांवृतं संवृतेः कल्पनाया आगतम् किं कम्मात् न कल्प्यते ? कल्प्यत एव शक्यं हि ५ वक्तुम्-अरूपादिव्यावृत्त्या रूपादिरपि कल्पनौपदर्शिठ एव तात्त्विक इति । रूपाचमावे कस्याम्पादेः व्यावृत्तिरिति चेन् १ स्थूलादेरभावेऽपि फस्यास्थूलादेः व्याचिः १ रूपादेरेव, वस्यैव स्थूलादितया परिकल्पनादिति चेन् ; अन्यत्रापि स्थूलादेरेय, तस्यैव रूपादितया परि. कल्पनादिति समानश्चः। भवतु वस्त्वपि सांवृतमेवेति चेत् , कुतस्तस्य परिक्षानम ? अवस्तुत्वेन स्वतस्तद- १. योगात् । अन्यत इति चेत , न ; ततोऽप्यतदाकारात्तदसम्भवात् । तदाह- अप्रसिद्ध पृथसिद्धम् [उभयात्मकमञ्जसा ] अप्रसिद्धं प्रमाणनिश्चि न भवति । किम् ? पृथक् ज्ञानादर्थान्तरतयाऽनाकारार्प- कत्वेन सिद्धं निष्पन्न सन्निवेशादिरूपादिकम्, सर्वथा तदाकाराय न ततस्तत्य परिक्षानं तस्यापि तद्वदवरतुत्वात् । पुनस्तदन्यस्य सर्वथा तदाकारस्य कल्पनायामनवस्थापत्तेः । कथञ्चिचदा. १५ फारत्वे च सिद्धं तद्वास्तवेतरस्वभाव तदाह-'उभयात्मकम्' इति । भवतु ततः किम् ?- इत्यत्राह-अअसा इत्यादि । सन्निवेशादि वदन्तीति सन्निवेशादिवदो जैना: १ 'विच्येवं रूपात तेषां वस्तु रूपरथूलादिरूपतयाऽनेकान्तात्मकं सांवृतं भवभिप्रायेण किन्नेप्यते । इयत एव । क्यम् ' अजसा परमार्थेन | तात्पर्यमत्र- सत्येतरस्वभावं चेदेकं वस्तूपगम्यते । वस्तुनस्तहिं रूपादिसंस्थानाद्यात्मक तथा ॥ ११५९ ।। तथा च तद्वत्सामान्यविशेपारमापि तत्ततः । वकव्यं वस्तु तद्बुद्धिवेवताकोपभीरुभिः ।। ११६० ॥ अनेकान्तात्मके माये सत्येवमुपपादिते । खण्डशोऽपि परिज्ञानं न वस्तुपु विरुध्यते ॥ ११६१ ॥ निरशार्यप्रवादे हि वस्तुनः सर्वयाग्रहात् । न कचिद्विभ्रमो नाम भोदित्याह शास्त्रकृन् ॥ ११६२ ।। समग्रकरणादीनामन्यथा दर्शने सति ॥१५०॥ सर्वात्मनां निरंशत्वात् सर्वथा ग्रहणं भवेत् । इति । अन्यथा अनेकान्तादन्येन प्रकारेणेकरूपेण दर्शने अभ्युपगमे सति विद्यमाने ३० सौगताद नां सर्वथा सर्वेण चन्द्रादेवर्नुलत्वादिनेवैकादित्वादिनापि प्रकारेण ग्रहणं भवेत् । -पादिक मा-आ०, १०,५०२ विच् प्रत्यये सति । ३ तदा भा०, २०, ५० । २० २५ प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव: ५ ५०३ कुतः १ निरंशत्वात् निर्भागत्वात् । न हि निर्भागं वस्तु गृहीतमगृहीतचोपपन्नं विरोधात् । भवत्येव तथा ग्रहणं 'केपाञ्चिदिति चेत् ; आइ-सर्वात्मनाम् सर्वेषां भ्रान्तानामभ्रान्तानां चात्मनां पुरुषाणाम् । कीदृशानाम् ? समग्रकरणादीनां करणमिन्द्रियमादिर्थेपामालोकादीनां ते करणादयः, समग्राः सम्यगभिमुखाः कार्योत्पादने करणादयो येषां तेपामिति । यथा सामग्रीसद्भावात् चन्द्रादी वर्तुलवादेहणं नैमिरिकादिभिस्तथैकत्वादेरपि भवेदविशेषात् । तथा वन विभ्रमो नाम कचिदपीति व्यर्थस्तन्निवृत्त्यर्थः प्रयास इति मन्यते । भवतु तस्यैकत्वादिनैव वर्तुलत्यादिनाप्यग्रहणमेवेति चेत् । आह- नौयानादिषु विभ्रान्तो न न पश्यति बाह्यतः ॥१५२॥ इति । नौयानमादिः येषामाशुभ्रमणादीनां तेषु निमित्तेपु सत्सु विभ्रान्तः प्रति- पत्ता न न पश्यति पश्यत्येव । क ? याद्यतो हिस्तथाप्रतीतेरिति भावः । १० पश्यन्नप्यसदेव पश्यतीवि चेत् आह- न च नास्ति स आकारः ज्ञानाकारेनुपगतः । इति । से वर्तुलत्यादिः आकारोनच नैव नास्ति विद्यत एप बाह्यतस्तत्प्रतीतेरविसंवादा. दिति भावः । बाह्यस्यादर्शनमसत्त्वच ध्रुवतो दोपमाह-ज्ञानाकारेऽनुपातः ज्ञानस्याकारः स्वरूपं तत्रानुपङ्गः प्राप्ति: न पश्यतीत्यस्य नास्तीत्यस्य च तस्मात् । वाहतो न न पश्यति न १५ चनास्तीति सम्बन्ध:- यदा बाह्यवदेवायं न पश्यत्यन्तरप्यलम् । भ्रान्तश्चैतन्यशून्यत्वं तदा प्राप्नोति मानवः ।।११६३॥ चैतन्यरहितश्चासौ मृत एव कथं भ्रमी । मिथ्याज्ञान्येय यलोके भ्रमीवि प्रथितो बुधैः ॥११६४|| भ्रान्तिमा पहिवान्तश्चाभ्युपेतवतोऽपि ने स्वतोऽन्यतो या तद्वितिरिति पूर्व निरूपितम् ॥११६५॥ भ्रान्त याहस्ततो ज्ञानमभ्रान्त चान्तरिच्छतः । द्वित्वादिनेव चन्द्रादिविभ्रान्तोऽस्तु नान्यथा ॥११६६।। विवेको विप्लवाकाराद् यदि विज्ञानचन्द्रयोः । सदा विप्लयाफारः क्व वराकः प्रवर्तताम् ।।११६|| सदरहे कथं वित्तिरविभेदात्तयोरपि । तस्मात् दृश्येतरात्मत्वमने कान्वावलम्बनम् ॥११६८॥ २० २५ "अभ्रान्तानाम्"-ता. टिका रख-आ, प०, २०११ना आ, २००४-तिरपि भे- मा०,०,..
५०४ न्यायविनिश्चयविवरण [६१५४ .. .. १० इदमेवाह- तस्माद् दृष्टस्य मावस्य न दृष्टस्सकलो गुपः ॥१५३॥ इति । तस्मात् प्रागुक्तादनेकान्तात् तमाश्रित्य दृष्टस्य उपलब्धरय भावस्य चन्द्रादेः न दृष्टो नोपलब्धः सकल: समग्रो गुणः स्वभावः विष्टवाकारविवेकादिलक्षणो नेकान्तात् तत्र ५ दृष्टस्यादृष्टस्वभावविरोधात । भवतु दृष्ट एव तत्र सकलोऽपि गुण इति चेत् ; उत्तमत- कुतो विभ्रम इति । अन्यत इति चेत् ; न ; ततोऽप्यचन्द्रप्रतिगासात तत्र विभ्रमे अतिप्रसगात् । नापि चन्द्रप्रतिभासात् , तत्रापि सर्वगुणतयेव तस्य प्रतिभामात् । तत्राप्यन्यतो विभ्रमकल्पना- यामनवस्थापत्तेः । ततो यदुत्तम्- "तस्माद् दृष्टस्य मावस्य इष्ट एवासिलो गुणः ।" [प्र०या० ३।४४] इति, तदुपपद्यत एवैकान्तो यदि लभ्येत । इदं तु न युक्तम्- "भ्रान्तेनिश्चीयते नेति साधनं सम्प्रवर्तते।" [प्र०वा० ३।४४] इति ; मर्वात्मना वस्तुदर्शने भ्रान्त्यमावस्य निवेदितवान् । तदेवं रूपसंस्थानात्मकत्ववत् दृश्येतरात्मकत्ववच सामान्यविशेषात्मके वस्तुनि ज्यस्थित मति यत्परस्यापद्यते तदाह- प्रत्यक्ष कल्पनापोडं प्रत्यक्षादिनिराकृतम् । इति । प्रत्यक्ष प्रत्यक्षवेद्यं 'ज्ञानज्ञेयलक्षणं वस्तु कल्पनापोडं जात्यादिकल्पनारहितं यत्परत्येष्टं तत् प्रत्यक्षेण आदिशब्दादनुमानादिना च निराकृतम् । अनेन "प्रत्यक्ष कल्पनापोढम्" [ प्र० वा० २।१२३ ] इत्यस्य पक्षाभासत्यं त्रु बता न हेतुभिः परिमाण- मित्यावेदितं भवति । निगमयन्नाह- अध्यक्ष लिङ्गतस्सिद्धमनेकात्मकमस्तु सत् ॥१५४॥ इति । सत् विद्यमानम् अनेकात्मकम् अनेकस्वभावम् अस्तु भवतु । कुतः सिद्धं निश्चित यतः । कुतस्सिद्धम् । अध्यक्षलिड्गतः अध्यक्षश्च लिगश्च ताभ्यां ततः । न हि प्रमाणसिद्धे वस्तुन्यनस्तुङ्कारः प्रेमावतो युक्त इति भावः । भवतु नाम प्रत्यक्षात् तत् "सिद्धं सस्य निश्चितलक्षणत्वान् लिङ्गात्तु कथं तस्य निश्चेष्यमाणलक्षणत्वादिति चेत , न , तस्यापि विपयतः प्रत्यक्षनिश्चयादेव निश्चयान । न हि प्रत्यक्षविषयादन्यथा 'तस्य विषयः प्रत्यक्षबा- धित्वेनाप्रामाण्यप्रसङ्गात् । न चैवं पुनस्तनिश्चयकरणस्यापार्थकत्वम् ; तस्य लक्षणविपतिपत्ति. २० १ज्ञानं ज्ञे-आ०, य०, ५०।२" तस्य हेतुभिवागमुत्पतमेव यो हत ।"ता. टि। ३ वस्तुन्य- वस्तुका-श्रा, य०, प० । ४ अम्वीकार । ५ सिद्ध निधि-आ०, ब०, प० । दलिअस्य ।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव: - १११५५] निराकरणार्थत्वेन सार्थकत्वात् । स्वमतानुरागपरवशचेतसो मत्सरित्वादनेकात्मके वस्तुनि नास्तुङ्कारमनुमन्यत इति चेत् , न , प्रमाणालोकप्रकाशिते वस्तुनि सत्पुरुषाणां पुरुषार्थभन- भीरतया मत्सरानुपपत्तेः । एतदेवाह- सत्यालोकमतीतेऽर्थे सन्तः सन्तु विमत्सराः । इति । सुबोधमेतत् । साम्प्रतं सदृशपरिणाम सामान्यमनभ्युपगच्छतो वैशेपिकादेः तद्व्यवहार एव न सम्भवति, तत्परिकल्पितस्य सामान्यस्यानुपपत्तेरिति दर्शयितुं प्रथमं तावत परसामान्यं सत्त्वमेव प्रत्याचष्टे । समानन्यायतया तत्प्रत्याख्यानादेव द्रव्यत्वादेरपरसामान्यस्यापि प्रत्याख्यानोपनीतात् (पनिपात्तात् )- नित्यं सर्वगतं सत्त्वं निरंशं व्यक्तिभिर्यदि ॥१५४॥ व्यक्तं व्यक्तं सदा व्यक्तं त्रैलोक्यं सचराचरम् । इति । अत्र द्वितीयव्यक्तशब्दो व्यञ्जकपर्यायः व्यक्तं करोति व्यक्त यतीति वचनाधचि (पचाचि) व्यक्तमिति व्युत्पत्तेः । तदयमर्थः- सत्त्वं सामान्य व्यक्तिभिः द्रव्यादीना- मन्यतमैर्विशेषः व्यक्तं प्रकटीभूतं यदि चेत् , व्यक्तं च्यसकं द्रव्यादिपु सद्रव्यं सन् गुणः सत्कर्मेति च प्रत्ययस्योपजनकम् । अत्र दूपणम्-व्यक्तं प्रकटीभूतं भवेदित्युपस्कारः । १५ किम् ? त्रैलोक्यं त्रयो लोकास्त्रैलोक्यम् 'चातुर्वर्णादिवत् व्युत्पत्तिः । कदा तद् व्यक्तम् ? सदा सर्वकालम् । न चैवं सस्यसर्वज्ञः कश्चिदप्युपपद्यते । सरिकश्चित्पश्यता सर्येणाटोपार्थावलोकनात ॥११६९॥ यदा च यत्र च तदस्ति सदैव तत्रैव तव्यक्तिर्न सर्वदा सर्वत्रेति चेत् ; भयेदेवं यदि २० तदनित्यमसर्वगतन्च । न चैवम् , नित्यसर्वगतस्यैव तस्याभ्युपगमात् । तदाह- 'नित्यं सगतम्' इति । तादृशस्याप्यभिव्यक्तिसहायस्यैव तस्य तत्प्रत्ययहेतुत्वम् , न प सर्वत्र सर्वदा तदभिव्यक्तिः, तदयमदोप इति चेन ; न , द्रव्यादीनां तदभिव्यशकानां सर्वदा सर्वत्र च भायात् । तैरप्यभिव्यक्तैरेव तदभिव्यक्ति परेरिति चेत् ; न ; सत्वेन तदभि. व्यक्ती परस्पराश्रयात-"तेन तदभिव्यक्तिः, अभिव्यक्तश्च तरतस्याभिव्यक्तिरिति । २५ द्रव्यत्वादिभिरभिव्यक्तिरिति चेत् ; न ; तैरप्यनभिव्यक्तैरतदभिव्यक्ती सत्यनापि" स्यात् अविशेगात् । पृथिव्यादिरूपायुक्षेपणादिभिरभिव्यक्तरेवेति चेत् ; न तेरप्यन भिव्यक्ती, अनरस्थापत्तश्च । तन सामान्यधर्मेस्तदभिव्यक्तिः। स्वरूपेणेव निर्विकल्पकप्रत्यक्षविषयेणेति । पचापनि य०, ५०1"अन् पचादिभ्यध"-कात शश५८ । २ गद्गुण भा०,य. प. चतु- ६ एव चातुर्वर्षम् । ५ "सावम्"-ता०दि. 1 ५ सवाभिव्यक्तिः । दयाराभिव्यता गरबैन । प्रख्यादिभिः । ९ "म्यादीनाम्"-ता. टि.। अभियान थनिभ्यक्ति स्थान् ।
न . म्यायविनिश्चयविवरण [२१५५ घेत ; बदपि यदि 'नाभावविलक्षणम् , कथं तत एवाभिव्यक्तिः सत्त्वस्य नाभावादपि ? तत्रैव वस्य विद्यमानत्वादितरत्र विपर्ययादिति चेत् ; न ; तत्रेति सप्तम्यर्थस्य कारकविशेषत्वात् , चाभावादिनः कारकत्वम् ; अशक्तः। शक्तरेव कारपत्वेन न्यायविदा प्रसिद्धत्वात् । शक्तिभावे तु भवत्येवाभावविलक्षणं तत् , तथा च तत एव भावप्रत्ययोपपत्तेरलमर्थान्तरण ५ भावेन प्रयोजनाभावात् । शक्तेः शक्तिमदनन्तरत्वात् , तेषां च परस्परतो व्यावृत्तेः कथं सत्सदित्यनुवृत्तप्रत्ययहेतुत्वम् , अनुवृत्तरूपस्यैवानुवृत्तयुद्धिनिबन्धनत्योपपत्तेरिति चेत् ? कथमिदानी तेपामेवेदमभिव्यञ्जकमिदमभिव्यंजक तत्त्वस्येत्यनुगतप्रतिपत्तिनिमित्तत्वम् ? न हि तेषामनुगमः परस्परतः ; भावसार्यापत्तेः। अननुगमेऽपि शक्तिसाहश्यात् तेभ्य एव तत्प्रत्यय इति चेत् ; कथमेवं भावप्रत्यय एव तेभ्यो न भवेत् । तथा च प्रतिद्रव्यं भिद्यते भावः एकद्रव्येन्द्रियसनि. १. कर्पादुपलभ्यमानत्वात् , रूपादिवदिति । अत्र यदुक्तमात्रेयेण-"प्रतिद्रव्यं भिद्यते भावः' इति ब्रुवाणो भवान् भावं धर्मिणं प्रतिपद्यते चा, न वा ? यदि न प्रतिपद्यते ; हेतुराश्रयासिद्धो भवति । अथ प्रतिपद्यते येनैव प्रमाणेने सत्सदित्यनुवृत्तप्रत्ययेन भावं धर्मिणं प्रतिपद्यते तदेन प्रमाणं तस्याश्रर्य- भेदऽप्यभेदकलपनुशास्ति" [ ] इति ; तत्प्रतिविहितम् ; अनुवृत्ताभि- १५ व्याकप्रत्ययेनैव अनुवृत्तभावप्रत्ययेनाप्येकस्य भावस्याप्रतिवेदनात् । तन्नैव तस्य कुतश्विद्- भिव्यक्तिः सम्भवति स्वयमेवाभावात् । भवतोऽपि यद्यभिव्यक्तिग्नान्तरम् , वर्हि तद्वदेव तस्यासिद्धत्वात् , सतोऽपि विशेपलिङ्गात् न तस्य भेदः तदभेदप्रतिवेदिना सल्लिङ्गाविशेषण सत्सदित्यनुवृत्तप्रत्ययरूपेण वाध्यमानत्वादिति चेत , ततोऽपि न तस्यैकत्वं तद्भेदनिवेदन(ना). विधुरेण विशेपलिङ्गेन याध्यमानत्वात् । नेप दोपः ततोऽपि सर्वथा तद्भेदस्याप्रतिवेदनादिति २० चेत् ; किमिदानीमेकानेकरूपो भावः १ तथा चेत् , न ; सांशत्यापत्तेः । न चायमभ्युपगमो भवतां तदाह- निरंशमिति । ततो नानान्तरं ततोऽभिव्यक्तिः । भवत्वर्थान्तरमेव, तस्यास्तत्प्रतिपत्तिरूपत्वादिति चेत् ; तत्सहायमपि सत्त्वं किन्न सर्व सर्वदाऽभिव्यनक्ति ? सर्वस्य सर्वदाप्यग्रहणात् , गृहीतमेव हि द्रव्यादिकं तेन स्वविशिष्टतयाs. भिव्यज्यते दण्डनेय देवदत्तः, न चाग्दिर्शिनां सर्वदा सर्वप्रहणे कश्चिदुपाय इति चेत् । न २५ सत्त्वस्याप्यपहणप्रसगात् । न हि निरवशेपदेशकालकलाकलापावलोकन विकलस्य नित्यसर्वगतं सत्त्वं शक्यपरिज्ञानम् । न चापरिझातेन तेन तद्विशिष्टतया द्रव्यादिप्रतिपत्तिः "नागृहीतविशे- पणा विशेष्यधुद्धिः" [ ] इति "न्यायादविप्रसङ्गात् । तदनवलोकने तदपेक्षं । नाभावलक्षण-आ०, २०, ५० 1 2 "न हि भव्य काराम् , कि तहि शक्ति"-काशि०२०। 1 "सरलेन"-ता. टि.। ४ -व्यञक सर्वस्ये-आ०, ५०, १०। ५-गनेर स-आ०, य०,१० -प्रयभेदस्य भेद-आ०, २०, ५०० गलियाविहेपेण आ०, २०, ५०1८न यायमभ्यु-१०, २०, ५० । ९ "विशिरद्धिरियेह न चाशतविशेषणा ॥८८"-मो० लो. अपोहः । शैकिक तृ.। १० न्यायामिति प्र-आ.,५०, प.. .
प्रयमा प्रत्यक्षप्रस्तावा ५०७ .. नित्यसर्वगतस्वमेव न गृह्यते । न सत्त्वमपि तस्य तस्मादर्थान्तरत्वादिति चेत् ; कथमेवं तत्र तद्रूपव्यपदेश:- नित्यं सर्पगतञ्च सत्त्वम्' इति ? सम्वन्धादिति चेत् ; न ; तेनापि ताप्यस्यानवकल्पनात् । अवकल्पने तु स एव प्रसङ्ग:-तदनवलोकन तद्रूपं न शक्यपरिक्षान- मिति । न साप्यस्य 'तेनाव कल्पनम् , तद्रूपज्ञानस्यैवावकल्पनादिति चेत् ; न ; अतद्पे तद्रूपतानस्य मिथ्यात्वात् , वस्तुतस्तदनित्यमसर्वगतब्ध प्राप्तम् । तथा च कथमेतत् - 'एको भावः ५ इति , प्रतिदेशकालभेदं भिद्यमाने तस्मिन्नेकत्वानुपपत्तेः ? ततो वास्तवमेव तस्य नित्यसर्वग- तत्वमिति कथं सर्वदेशकालविशेपापरिज्ञाने तस्य परिज्ञानं यतः कचित् कदाचिदपि सत्प्रत्ययं कुर्वीत ? एनेनावयविज्ञानमपि प्रत्युक्तम् ; अवयविनोऽपि स्वारम्भकसकलावयवपरिज्ञानाभावे तयापिरूपस्य दुष्परिज्ञानत्वात् । तदपरिज्ञाने तब्यापित्वमेव तस्य न ज्ञायते न स्वरूपमिति १० चेत् ; न ; तस्य तस्मादनान्तरत्वात् । अर्थान्वरत्वे कथं तत्र तत्र्यपदेश:- स्वारम्भकावयव- व्याप्यवयवीति ? सम्बन्धादिति चेत् ; न ; तेनापि तादूप्यस्यानवकल्पनात् , अवकल्पने पूर्ववहोपात् । अतपे तद्रूपज्ञानरय तेनावकल्पने वस्तुतातव्याप्येवावयवीति कथमूर्ध्वाधः- पार्श्वभागादिप्येक एव स्तम्भो भवेत् ? यतः सौगतं तदभाववादिनमतिशयीत वैशेषिकः । तन्न स्वारम्भकनिरवशेपावयवापरिज्ञाने तत्परिज्ञानमुपपन्नम् । तथा च यदुक्तमात्रेयेण- १५ "यदुपलब्धिकारणोपपन्नं वस्तु तद्विशेषणत्वेनोपलभ्यते भायो न सर्वाधारविशेपणत्वेन । एतेनावयविद्रव्यमपि व्याख्यातम् , येपामक्यवानामुपलब्धिकारणमस्ति तैः सहोपल- भ्यतेऽपयवी येषां नास्ति न तैः सह" [ ] इति । तदतीव परीक्षापथपरि- भ्रष्टतामेय वस्याचप्टे ; निरवशेपाधारावयवव्यापिस्यमावयोर्भावावयविनोः कतिपयाधारावयव. गोचरतया परिज्ञानस्यासम्भयात् । सम्भवतोऽपि अतस्मितादूपतया भिध्यात्यापत्तेः । चत: २० कतिपयाभिरपि व्यक्तिभिरभिव्यज्यमानं सत्त्वं सर्वस्वाधारगतेनैव रूपेणाभिव्यज्यत इति सूक्तम्- 'सैदा व्यक्तं त्रैलोक्यम्' इति । नन्वेवमपि द्रव्यगुणकर्मणामेय ततोऽभिव्यक्तिः तत्रय तस्य भावात्-"सदिति यतो द्रव्यगुणकर्मसु स भावः" [ वैशे० १।२।७ ] इत्यभिधानात् , न सामान्यसमवाय- विशेषाणां विपर्ययात् । न च द्रव्यादित्रयमेव त्रैलोक्यम् , तस्य पदार्थसन्निवेशरूपत्यादिवि चेत्, २५ आह-'सचराचरम्' इति । चरत्यभिव्यञ्जयस्वेन परस्य बुद्धिं गच्छतीति चरं द्रव्यादित्रयम् , अचरं तद्विपरीतं सामान्यादिनयम् , ताभ्यां सह वर्तत इति सचराचरं त्रैलोक्यमिति । नैनूक्तम्-'सामान्यादौ सत्त्वामावान्न ततस्तदभिव्यक्तिः' इति, चेत्; द्रव्यादी कुत स्तद्भावः १ समवायादिति चेत् । न ; तस्य सामान्यादावपि भावात् , अन्यथा 'द्रव्यादिममवेतं सामान्यम्, नित्यद्रव्यसमवेता विशेषाः' इति च प्रत्ययाभावापत्तेः । समवाये सुनितरामुपपनैः, सम्बन्धेन । र अवयम्यचभाववादिनम् । ३ वदाव्य-आ०, २०, ५०1"." सा सत्ता"-वैशे०॥ ५न सूक्तं आ०, ०,१०।६ -व्यतिरिति चेत् आ०, २०, ५०1७ समवायः । .7 50 [ पायचिनियरियाले सस्नो यापन संझायो मिसरागात्मनि इनि न्यायाल । यदि पुन: मत्यपि ममगाये न सामा. न्यादी संझायो ज्यादापि न भवेदयिता। विपनाया गुनेक ममयाय: स्याम् । संदविवेऽपि न्यादीनां विशेष यतानोव मत्य नामान्यापिति पर तदि द्रव्यत्यादि. सामान्यविशेषाणामन्त्यविसराणाश्च सन एय सय भायोपपत: पेमक्या ममयायप. ५ नम् ? यदि पुन: ममायाग द्रयादियत् द्रव्यदायपि मत्यं पृष्यीत्यागयान्तरमामान्यमपि किन्न भवतीति पेत् १ अयमपि भयव पय पध्यनुयोगो यः ममगायन द्रव्यादी मस्यमन्याह, नारमाकं विपर्यया । यो यु द्रव्यादियद् व्यगदी सामान्य विशेपममगगयोश सरवोप. पतः सपराचरं लोक्यं ततो व्यर्फ मोदिति । यत्पुनरिवं मृत्रम्-"मदिति यतो द्रव्यगुणकर्ममुं म माः" [२०११२१५३] १० इति, तय भाप्यन "परस्परविशिष्टं द्रव्यगुणकपम्वविशिष्टं गदिति यतोऽभिधानं प्रत्ययश्च भवति स भार इनि । उपरक्षणार्थअनन् सूत्रम् , नया द्रव्यमिति यतः पृथि व्यादिपुनद्रव्यत्यं गुण नियनोस्पादिपु सद्गुणवं कर्मति यन उत्तेपणादिषु तस्कर्मत्वम्" ] इति । तत्र यदि मत्त्वादयो न मन्ति क्थं तेभ्यः क्यचिद् व्योमकुसुमेश्य श्य सदायभिधानस्य प्रत्ययस्य घ प्रतिः ? मन्त्ये रेपचारनम्न प्रति चेत् । न, नत्युमुमेष्वपि १५ तदनिवारणान । किं वा महिलेपो माधयं यनम्नान मरमुपचर्येत ? मद्विशेषणत्वमेव, यया र भाष्यम्-"यथा च मन्ति द्रव्यगुणकर्माणि मतामपि द्रव्यगुणकर्मणां विशेषणं तथा सामान्यनिशपममचाया इति सन्त र मन्त इत्युच्यन्ते ।। Jइवि पेत् । न; परस्पराश्रयापत्तः-मति द्रव्यादीनां सत्चे तद्विशेषणवेन मत्यादेः सरथम , सता प नेन सम्बन्धाद् द्रव्यादीनां सत्यम् पृथिव्यादीनाञ्च द्रव्यादित्वमिति । तमोपचारतस्तेषां सत्त्वम् । नापि सत्तासम्पन्धान, सत्तासम्बन्धे हि सामान्यादीनामपरजातित्यप्रसाद इति स्वयमेव तन्निराकरणात् । भन्तु तर्हि स्रत र ते मन्त इति चेन् , यधं वहौंदं भाप्यम्-"सामान्य- विशेषममयायानां तु सदित्यभिधानप्रत्ययावौपचारिको" [ सम्पमत्तानियन्धनयोस्तयोरीपचारिकत्यानुपपत्तेः । स्वतश्च तेषां मचे तद्वद् द्रव्यादीनामपि स्थादविशेषात् । एतदेवाह- सत्तायोगाद्विना सन्ति यथा सत्तादयस्तथा ॥१५॥ सर्वर्था देशकारराव सामान्यं सकलं मतम् । इति । सत्तया महासामान्येन योगः सम्बन्धः तस्माद् विना तमन्तरेण यथा येन २० ] इति १ वस्तुभूत- २५ १ समवेत वम् । २ मपभार ।३ गमवायाविशेषेपि । ४ ममान्यनत्रि-आ०, २०,१०१५-र्मम इनि आ०, २०, ५०। ६ "परस्परविशिष्टेषु द्रव्यगुणकर्मम्वविशिष्टा सत्मदिति प्रत्ययानुनि मा चार्थान्तरद्भवितुमर्हतीति यत्तदर्थान्तरं गा मनति सिद्धा।"-प्रश भा० पृ. १६५। नामधार प्रयच मतीति सम्बन्धनीयम्, एवं गुणवर्मत्स्योरपि ।"-ता. टिक । ८-न प्रयप्रा-आ०, २०, ५०१ ९ सामान्यादीनाम् ।
प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्ताधा पू०५ 1 सत्तदिप्वप्यपरमत्तासम्बन्धकल्पनायामनवखितिरिति प्रकारेण तेषु तत्प्रतीत्यभावप्रकारेण था, सन्ति विद्यन्ते सत्तादयः आदिशब्दाद् द्रश्यत्वादयश्च । तथा तेन प्रकारेण अर्थाः द्रव्यादयः "द्रव्यगुणकर्मस्यर्थः" [वैशे० ८।२।३] इति वचनात , सर्वे निरवशेषाः सन्तीति सम्बन्धः । न हि तत्राप्यर्थान्तरस्य सत्त्वस्य प्रतिपत्तिा, रूपभेदानवलोक नात् । सम्बन्धात् तदनवलोकनमिति चेत् ; न ; सर्वथाप्यनवलोकनप्रसङ्गात् । 'त दाटूपान्तरस्याप्य- नर्थान्तरस्वात् । तथापि तस्यावलोकने नानेकान्तप्रतिक्षेपः अवलोकितानवलोकितरूपत्वेन तस्यावश्यम्भावात् , तथा व सामान्यविशेषात्मकत्वेनैव किन्न स्यात् , यतः प्रतीतिमतिलहर सत्त्वमर्थान्तरं परिकल्प्येत ? कथं वानवस्थाननिर्मुक्तिः ? सत्तादिपु सत्त्वान्तरस्याभावादिति पेत् ; न ; जीवति सत्प्रत्यये तदभावस्यासम्भवात । औपचारिक एव स तत्र माणवके सिंहप्रत्ययवदिति चेत; न बाधकाभावे "तत्त्वानुपपत्तेः । तत्र तदन्तरानवलोकनमेव बाधकमिति चेत, यद्येवं प्रतिपद्यसे द्रव्यादिप्यपि तन्माभून् , अनवलोकनस्याविशेषात् । अनव- लोकितमपि" सत्प्रत्ययादवगम्यत इति चेत् । न तर्हि तत्प्रत्ययस्यानवलोकनं याधकमिति कथं सत्वादिष्वपि ततस्तदन्तरं नावगम्येत यतोऽनवस्थानं न प्राप्नुयात् १ तस्मात् स्वत एव द्रव्या- दयः सन्ति, पृथिव्यादीनि द्रव्याणि रूपादयो गुणाः उत्क्षेपणादीनि फर्माणोति वक्तव्यम् , प्रतीतिव्यापारस्यैवमेवानुभवात् । नन्वेवं सत्त्वादीनां "पृथगमावे कथं "दृष्टान्तत्वम् ? परप्रसिद्धयेति चेत् ; न; तस्याः प्रमाणत्वे तथा तदभावानुपपत्तेः । अभ्युपगममानत्वे तु तद्विपयनिदर्शनबलादेवस्थाप्यमान तद्रव्याद्यर्थसत्त्वमपि तादृशमेव भयेदिति चेत् ; सत्यम् ; न हि वयं दृष्टान्तबलात् तत्र तत्सत्त्वमवकल्पयामो निरपवादात्" सत्प्रतीतिवलादेव सदवकल्पनात् । सत्वादिनिदर्शनोपदर्शनं तु परस्य तद्वलातिला नमवस्थापयितुम्-'यदि द्रव्यादिपु तहलमतिलड्ययसि किन्न सत्यादिष्वपि २० लड्मयन्ननवस्थादोपमन्वाकर्षसि ?' इति । भवति चैवमवस्थापनम"-"स्ववाय"(पाग्य)न्त्रिता यादिनो न विचलिष्यन्ति" [ ] इति न्यायात् । कुतो वा सत्वादीनां सामान्य- रूपत्वं यतस्तत्र सामान्यान्तराभावः १ समानप्रत्ययहेतुत्वादिति चेत् ; न ; देशकालावस्था. संस्कारारेरपि तव्यत्वापत्तेः। अस्ति हि तस्यापि तत्प्रत्ययहेतुत्वम्-'दक्षिणात्योऽयम् अयमपि दाक्षिणात्य इवि देशात् , 'प्रापिजोऽयम् अयमपि प्रापिजः' इति कालान् , 'यालोऽयम् अयमपि याल' इत्यवस्थाः, 'पण्डितोऽयम् अयमपि पण्डितः' इति संस्कायम तत्पराय- - २५ भनवलोस्तिम्यरूपविशेषार । ३ भातुं योग्यस्व स्वरूपान्तरस्य । ३ बनवोदिस्यम्पादभेदेऽपि ।। पान्तरस्य ! ५ -कत्वेनेव भा०, ५०, ५०६ गत्तादिषु । ७ औपचारिस्तानुपपत्तः 16 मामान्यादिषु । सत्तान्तर। । सामान्यम् ।। पृथग्भावे भा०,५०,०।१२ मत्तायोगाद्विना रान्ति यथा मतादयः"इनि- ताटिक -बादाप्रति-भा०, २०, ५०।१ • पनं म्बयाधानियन्त्रिता का अस्मिन् पाठे म्यमतराधाम- नियन्त्रिता मादिनः' इत्यथा शेयः।१५"म्पपारयन्निता वादिनी न विचलिम्पन्नीनि"-प्रमेय ६६३१६- पिप्रन्य-भा.,.,०।
, १० ५१० न्यायविनिश्चयविवरणे प्रादुर्भावस्यावलोक्तात । अथ तत्रापि देशादेर्धर्मविशेषाणामुत्पत्ती तदधिष्ठानाः सामान्यविशेषा एच तत्प्रत्ययहेतयो न देशादय इति चेन् , न , तेभ्य एव तद्दर्शनात ! अन्यतस्तत्परिकल्पनायां सर्वत्र हेतुफलभावनियमनिलोपापत्तः । अतो देशादय एर तद्धतव इति भवत्येव तेषां सामान्य रूपत्वम् । तदेवाह-देशकालाध । च शब्दादवस्थादयश्च सामान्यं भवेयुरिति वाक्यशेपः । ५ तथा च यदुक्तम-“सामान्यादयो न सत्तासम्बन्धवन्तः, अवान्तरसामान्यपिकलत्वात् , ये तु तत्सम्बन्धवन्तो न ते तद्विकलाः यथा द्रव्यादयः नद्विकलाश्व सामान्यादयः, तस्मान्न तत्सम्बन्धवन्तः"[ ] इति ; तत्प्रतिव्यूढम् , देशादिवदन्येपामपि द्रव्यगुण. कर्मणां कचिन कथञ्चित् कदाचित सामानप्रत्ययहेतुत्वेन सामान्यरूपतोपपत्तो न सत्तासम्बन्धी नावान्तरसामान्यमित्युभयाव्यावृत्या वैधयोदाहरणत्वानुपपत्तः। समानप्रत्ययहेतुरेव सामान्य देशादयस्तु नैवम् , विशेषप्रत्ययस्यापि तत एर भारादिति चेत् , न तर्हि सनद्रव्यत्वादयोऽपि सामान्यं समानप्रत्ययवत् प्रागभावादिरूपादिव्यावृत्तिप्रत्ययस्यापि तत एव भावादिति न किञ्चिदेतत् । स्याद्वादिना तु नायं दोपः सर्वस्यापि विशेषात्मरत्ववत् सामान्यात्मरत्वस्यापि प्रतीतिवलेन तैरभ्युपामात् । तदाह- सकलं चेतनेतररूप वस्तु मतम् अङ्गीकृतं सामान्य. मिति सम्बन्धः। सफलमपि यदि सामान्य तर्हि सन्मात्रमेव जगत् प्राप्तम् , तस्माद्वधतिरेके सामान्यरूपत्वानुपपत्तेः, अभिमतञ्चैतद् ब्रह्मविदाम्-सकलभेदकलापमलविकरस्य तन्मात्रस्यैव ब्रह्मरूपतया तेरभ्युपगमादिति चेत् , कुतस्तदभ्युपगम: ? स्वेच्छानिवद्वादभ्युपगमात् तसिद्धावतिप्रसङ्गात् । प्रतिभासवलोपनिबद्धादिति चेत् , न , निभदस्याप्रतिभासनात् । न हि निर्भेदस्य सतः प्रतिभासनम् जीवपुद्गादिभेदतत्प्रभेदपरिकलितशरीरतया भेदरूपस्येव तस्य प्रत्यवभासनात् । कथमन्यथा संसारतत्कारणादिः तस्य भेदरूपत्वेन तदभावेऽनुपपत्तेः १ मा भूदिति चेत् न ; "मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति" [ फठ० ४.१० ] इत्यादेचनस्य निर्विपयत्वापत्तेः । भवतु भेदप्रनिभासः स तु अविद्यारूपवारवनितास्वरविलासपरिकल्पितत्नेनातत्वविषय एवेति चेत्, कथं तस्यार्थान्तरत्वे ब्रह्मणः तात्त्विक एव भेदो न भवेत् ? तस्यासत्त्वादिति चेत्, न; 'असंश्च प्रतिभासश्च' इति व्याघातात् । भावाभावाभ्यामनिर्वचनीयत्यादिति चेत ; न; तपस्याप्यसत्त्वे भेदप्रतिभासत्वा. नुपपत्तः। सत्चे भेदतात्विकत्वस्य तदवस्थत्वात् । तस्यापि ताभ्यामनिर्वचनीयत्वकल्पनायां प्राच्यप्रसंगानिध्नेरनवस्थापत्तेश्च । ततस्तस्यानान्तरत्वे तु ब्रह्मापि तद्वत् तद्विलासपरिकल्पितं भरेत् । न चैवम , तस्य मिरवयविद्यारूपतया परैः प्रतिज्ञानात् । नाय दोपः तस्य ततो भेदाभेदाभ्यामनिर्वाच्यत्वादिति चेत् , न , तद्रूपस्यासवे प्रतिभासत्यासम्भवात । सत्त्वेऽप्य. २० -- २१ 1 साध्यहेतूभय । २ प्राग्भावा-आ०, २०, ५० प्रागभावादिश्यावृत्तिप्रत्यय सरवात्, स्पादिन्यवृत्तिप्रत्यय द्रव्यत्वात् । ३- पवित- आ०, २०, ५०। ४ सन्मानस्यैव । ५-तारिवरस्त भा०, २०,५०। ६-प्रमझाननि- मा०,०, ५०। ७ परिज्ञा- भा०, २०, ५० । "विज्ञानमानन्दं प्रा"-पृहदा०३।१।३४ ।
१४१५६ प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावा ५ -- न्तरत्वेऽनान्तरत्वे च पूर्ववत्प्रसङ्गात् । तस्यापि ताभ्यामनिर्वचनीयत्वकल्पनायाम् अनवस्थानोपनिपातात् । स्यान्मतम्-अयमेव हविद्यामुग्धवविलासप्रपञ्चस्य स्वभावो यदुक्कविचारपरशुपरि- पातासहिष्णुत्वम् । तत्सहिष्णुत्वे तत्प्रपञ्चत्वपरित्यागापत्तेः । 'जंह्यादविद्याऽविद्यात्वं विचारं सहले यदि । न्यायघातासहिष्णत्वमविद्यालक्षणं यतः ॥"[ इति वचनादिति चेत् ; न; तत्स्वभावस्यापि सत्यासत्वयोस्ताभ्यामनिर्वचनीयत्येच भेदाभेदयोस्वाभ्यामनिवर्णनीयत्वे च पूर्ववत्प्रसङ्गात तस्यापि तत्प्रावधातासहिष्णुत्वव्यावर्णना- यामनवस्थितेरप्रतिक्षेपात् । ततो दूरं गत्वापि तात्त्विकं तदर्थान्तरञ्च तद्रूपमभ्युपगन्तव्यमिति कथं न भेदो वास्तवो यतस्तदात्मकमेव सत्वं न भवेत् ? सदाह- सर्वभेदमभेदं सत् सकलाङ्गशरीरवत् ।।१५६॥ इति । भेदाश्च जीवपुद्गलादयः प्रभेदाश्च तेपानवान्तर विशेषाः, जीवस्य संसारिणो मुक्ताः पंसस्थावराः सकलेन्द्रिया विकलेन्द्रियाः सम्झिनोऽसचिन इति, पुद्गलस्य प्रथिव्य आपस्ते. जोसि वायय इति भेदप्रभेदाः, सर्वे निरवशेषा भेदाभेदा यस्मिंस्तत् सर्वभेदप्रभेदं सत् सत्त्वं भावप्रधानत्वानिर्देशस्य । सकलेत्यादि तत्रैव निदर्शनम् । सकलान्यङ्गानि करप- रणादीनि यस्य तच तचचरीरंप दिव तदिति । तात्पर्यमत्र-यथा न पाणिपादादेरर्थान्तरं शरीरं तद्भाव एवोपलभ्यमानत्वात् । न हि तदर्थान्तरत्वे तस्य तद्भाव एयोपलब्धिः, गोर. भायेप्यश्वस्योपलम्भात् । न चैवम् अतोऽनान्तरमेव ततस्तत् । उक्तञ्चतत्-''भावे चोपलब्धेः" [ब्रह्मासू० २।१।१५] इति । अतश्च तस्य ततोऽनन्तरत्वं यत्प्रत्यक्षतस्तथैवोपलभ्यते । न हि गवाश्वयत् पाण्यादिशरीरयोर्भेदेनोपलब्धिः, परस्पराविष्यम्भायेनेवोपलव्धेः । न चोपलन्धे. लक्षणातरम् ; अतिप्रसङ्गात् । इदमप्युक्तम्-"मावाच्चोपलव्धे' [महामू० २।१।१५ ] लणान्तरं इति । वथा तत एव सदूपमपि भेदादार्थान्तरमभ्युपगन्तव्यम् । न हि तस्यापि भेदाभावेऽपि भेदादन्यावेनाप्युपलब्धिः; सत्येव द्रव्याशे भेदे तत्रभेदे च तदनन्तरत्वेन च सर्वर सर्वदापि प्रविपत्तेः । तदनन्तरत्ये तस्य भेदस्येव भेदान्तरं प्रति तस्याप्यनुगमन न भवेत् , तथा प"तदन्तरस्य सर्वस्याप्यमत्त्वादेकभेदमारमेव सद्रूपं प्राप्तम् । तम प्रतीनिविरुद्धमिति घेत; न; शरीरेऽप्ये प्रसङ्गात् । न हि तस्यापि पाण्यादेव्यतिरेके 'वद्वदेव तदन्तरं प्रत्यनुगमन- - २० २५ १ महुवरि-भा०, ५०, ५०१२ स्यादविद्या-आ०,१०,५०।३ न्यायाघााग-ता। "अघिद्याया अविधात्य इदमेवतु लक्षणम् । मानापानासहिष्णु चमगाधारणमिप्यते ॥"-पृ. सं० या. लो. १८१ । ५ पदसरायो-आ०, २०, ५०।६ प्रापा-आ०,०प० । पिधापन-मा २०, ५० ८ म्यानरम् । लक्षमान्तर नि पदं सम्मानादापानीमानि । १. “भारापालन्धरति या मूपम्"-मह शा. भा। भेदान्तरस्स। १२ फयादिवर । भरपरान्तरम् ।
म्यायविनिश्चयविधरणे . मिति तस्याशरीरत्वादेकावयवमानमव तदपि प्रतीतिविरुद्धं प्राप्नुयात् । स्वत एव पाण्यादेः शरीरत्वं नैकशरीरानुगमनादिति चे , द्रव्यादेः सत्त्वमपि तथैव किन्न स्यात् । सत्वबहुत्वापत्ते- रिति चेत् ; शरीरबहुत्वापत्तरितरदपि न भवेत् । ननु शरीरं नाम कणादस्य परम्परया परमाणुकार्यम् , परमाणुभ्यां हि संयोगसहा. ५ याभ्यां ब्यणुकम् , ब्यणुकाभ्याञ्च चतुरणुकमुत्पद्यते, यावदन्त्यावयवि शरीरमिति तन्मत. प्रसिद्धः। परमाणवश्च नित्याः ते च यदि प्रवृत्तिस्वभावाः, सर्वदा तत्कार्याणामुत्पत्तिरेव नोपरमः । निवृत्तिस्वभावत्वे नोत्पत्तिः । उभयस्वभावत्वं तु विरोधादसम्भाव्यम् । अनुभय. स्वभावत्वे तु निमित्ताशात् प्रवृत्तिनिवृत्त्योरभ्युपगम्यमानयोरदृष्टादेनिमित्तस्य नित्यसन्निधानात् नित्यप्रवृत्तिप्रसङ्गः । अतत्रत्वेऽप्यदृष्टादेः, नित्याप्रवृत्तिप्रसङ्गात् । तस्मादनुपपन्नः परमाणूना १० कारणभाव इति कथं तद्यणुकादिरन्त्यावयविपर्यन्तः कार्यप्रवन्धो यस्य स्वावयवभेदाभेद. परिचिन्तया परिक्लिइनीम इति चेत् ; न ; सदूपस्याप्योपनिषदस्येवमसम्भवात् । तदपि यदि प्रवृत्तिस्वभावम् , सृष्टिरेव सर्वदा जगत इति कथं प्रलयो महाप्रलयो वा १ निवृत्तिस्वभावं चेत, सर्गाभावात् कथं जगत्प्रपञ्चप्रतिभासः ? सदुभयस्वभावत्वं पुनस्तत्रापि निष्कलैकस्वभावे विरोधादेवासम्भाव्यम् । अनुभयस्वभावञ्चेत् ततोऽपि कथं जगदुत्पत्तिस्थितिविपत्तयो यत १५ इति १ निमित्तवशादेव तस्य प्रवृत्तिनिवृत्तिा न यत इति चेत; तदपि निमित्तं यदि नित्यमव्यतिरिक्तञ्च ततः फिमभ्यधिकमभिहितम् ? व्यतिरिक्तश्चत् ; क्यमद्वैतम् तत्त्वम्? अपि च प्रवृत्तिनित्योरन्यतरेव तस्यापि स्वभावो नोभयम , विरोधाविशेषादिति सम एव दोप:-प्रवृत्तिस्वभावत्वे सर्ग एव जगतः, निवृत्तिस्वभावरे च न प्रपञ्च प्रतिभास इति । तस्याप्यनुमयस्वभावस्य निमित्तवशात् प्रवृत्तिनिवृत्तिपरिकल्पनायाम् ; अयमेव प्रसङ्गोऽनवस्था- २० पत्तिश्च । तन्न तन्नित्यमनित्यमपि । ब्रह्मणश्चन्न सत्कार्य जगद्ब्रह्मकृतं कथम् ? कार्य चेत् नित्यकार्यस्य कदाचिद्भवनं कथम् १ ॥ ११७० ।। सर्गप्रलययोयन कादाचित्कत्वमुन्यताम् । कादाचित्कनिमित्ताश्चेत् तत्कादाचित्ककल्पनम् ।। ११७१ ॥ तत्राप्येवं प्रसङ्गे किन्नानवस्थितिरापतेत् । अनादेस्तत्प्रबन्धस्य न चेद्दोपोऽनवस्थितिः ॥११७२॥ क्रमे सति प्रबन्धः स्यादनमाच प्रमः कथम् ? | अनमं च मतं ब्रह्म फूटस्थं यत्तदिप्यने ।।११७३॥ , , .. शरीरमपि। २ परिक्षेम भा०,०,१०।३-यो नियन आ०, २०, ५०। प्रहत्तेर्निर- आ.,प, प.।
प्रथमः प्रत्यक्षपस्ताका प्रबन्धवन्निमित्ताश्चेन्निमित्त तत्प्रवध्यते । प्रबन्धवत्वं तस्यापि परस्मादेव तादशात् ॥११७४॥ तथा सत्यम (न) बस्थानादोणनिर्मुच्यसे कथम् । सन्नीपनिपदं सत्त्वमप्युत्पत्त्यादिकारणम् ॥ ११७५।। सत्यम्, अकारणमेव ब्रह्म तस्य नित्यनिरञ्जनरूपतया शान्तात्मनः कचित्प्रवृत्तिनिवृत्त्यो- ५ रसम्भवात, अविद्योल्लासस्य तु जगत्कारणस्य तन्नान्तरीयकत्वात् तदपि तत्कारणमावेदयन्ति श्रुतयः । नहि विद्यासम्पर्कविकलस्तदुल्लास: प्रतिभासरहितस्य तस्यासम्भवात्, प्रतिभासस्य च विद्यारूपत्वादिति चेत; कुतस्वथाभूतस्य परिज्ञानम् ? "सदेव सोम्येदमग्र आसीत् , एक- मेवाद्वितीयम्" [छान्दो० ६ । २ । १] इत्यादेरान्नायादिति चेत्, न तस्यापि निरंशपरमाणु- रूपस्याऽप्रतिवेदनात् । स्थूलत्वे तु नानावयवसाधारणत्वमवश्यम्भापि, तस्य तदन्तरेणानुपपत्तेः। तथा च तदेव स्वावयवेभ्योऽनर्थान्तरं भवत्प्रस्तुते वस्तुनि निदर्शनम्, शरीरमहणस्योपलक्षण. स्वादिति सिद्धो नः सिद्धान्तः । तस्याप्यविद्योल्लासनिवन्धनत्वेन न स्वावययेभ्यो भेदो नाप्य. भेदो वस्तुसद्विषयत्वात् तंद्विकल्पस्येति चेत् ; कथमिदानी तबलात् तत्वतो ब्रह्मासिद्धिः अवस्तु. सतस्तदनुपपत्तेरतिप्रसङ्गात् । माभूततस्तत्प्रतिपत्तिः तदुपकल्पितादन्यत एव ज्ञानात् तत्परिक्षा- नोपगमादिति चेत् ; न; तत्रापि तस्येत्यादेरनुगमादनवस्थापत्तश्च । ततो दूरमनुसृत्यापि किश्चि. १० तात्त्विकमेव तज्ज्ञानमनर्थान्तरश्च स्वावयवेभ्यो वक्तव्यं तथा च सिद्धं तद्वदेव सद्रूपस्यापि भेद- प्रभेदरूपतत्त्व(रूपत्यम् तथैव निर्वाधादवनोधादित्युपपन्नमुक्तं 'सकलाङ्गशरीरयत्' इति । यस्य तु मतम्-साध्यवैकल्पं निदर्शनस्य शरीरस्यापि तदेशेभ्यो नियमेनानान्तरस्वा- भावादिति, तदपि दुर्मतम् ; जीवत्यनान्तरत्वपरिक्षाने तदनुपपत्तेः । समवायादेव तत्परिहानं नानन्तरत्वादिति चेत् ; कः पुनः संयोगात् समयायस्य विशेपो यतस्तत एष सपरिज्ञानं न २० संयोगादपि । अयुतसिद्धसम्बन्धत्वमेवेति चेत् ; न तावदियमयुतसिद्धिरपृथग्देशत्वम् ; शरीर. सदद्गयोस्तभावेन समवायाभावापत्तेः । नहि तयोरपृथग्देशत्वम् ; शरीरस्य तदगदेशत्वात् सबङ्गानाश्च सदारम्भकदेशत्वात् । अश्वमहिपवन लौकिकस्य पृथग्देशत्वस्याभावादप्रथादेशत्वं तयोरिति चेत्न, फरवलगतयोः कुँवलामलकयोरपि तथात्वेन समायापत्तेः। नाप्यभिन्न- कालत्वम् अत एव । न च शरीरामिन्नकालत्वं तदगानाम्, प्रागपि भावात् , अन्यथा तदारम्भ- करवानुपपत्तेः । शरीरस्येव सम्बन्धापेझमभिन्नकालत्वम्, नहि शरीरमन्यदाऽन्यदा च सम्बन्धः । सम्मध्यमानस्यैव तस्योत्पत्तेरिति चेन् ; कुत एतत् ? सत्सम्यन्धस्य तदेकतामध्यधीनत्वादिति चेत् ; न; तस्य नित्यस्योपगमात् । तदुत्पत्तिसमये तस्य भावादिति चेत् ; तत एव कुवलमा प्यामलकेन ताशमेवोत्पोत । आमलकरयाकारणत्वाग्नेति चेत् न तेनापि तत्सम्बन्धविभुत्वा. .. साम्नायस्यापि । २ भेदाभेदविवन्यास । ३ आम्नायबलान् 1 ५ आम्नापती प्रणप्रतिपत्ति १५ सेरेबान- भा.प.। ६ पदरामलकयोप। एतन्गम्बन्ध-मार, २० प.1 ५१४ न्यायचिनिश्चय विधरणे देरनिवारणात् , तथा च सत्सम्बन्धोऽपि समवाय एवेति न संयोगस्यावकाशः कश्चित् । का चेयमुत्पत्तिर्यस्याः सम्बन्धाभिन्नकालत्वम् ? प्रागसतः शरीरस्यात्मलाभ एवाभाव. विलक्षण इति चेत्, न तस्य द्रव्यादिप्वनन्तर्भावे सप्तमस्य पदार्थस्य प्रसङ्गात् । अन्तर्मावोऽपि न सामान्यादित्रयतया; तस्य नित्यत्वेनानुत्पत्तिरूपत्वात् । नापि गुणकर्मत्वेन; शरीरस्य द्रव्य- ५ स्वोपगमात् । द्रव्यत्वेनैवेति चेत्, कुतस्तस्य तत्त्वम् ? स्वत एवेति चेत् ; न; द्रव्यत्वकल्पना. चेफल्योपनिपातात् द्रव्यत्वसम्बन्धादिति चेत्, न सम्बन्धाधीनस्य स्वभावस्यातास्विकत्वात् स्फटिकोपरागवत् । संयोगायत्तमेव स्वरूपमतात्त्विक न समवायाधीनमिति चेत्नतादात्म्या- भावस्योभयत्राविशेषात् । ववो वस्तुतः सप्तम एव पदार्थ इति दुस्वरो व्याघातः परस्य । वन्न प्रागसत आत्मलाभ उत्पादः। तर्हि भवतु सत्तासम्बन्धः कारणसम्बन्धो या स इति चेत् ; कथ. १० मेवमुत्पादसम्बन्धयोरभिन्नकालत्वं तस्य भेदनिष्टत्वात् ! सम्बन्धस्येवोत्पादत्वे च भेदासम्भवात् । तन्नाभिन्नकालत्वमयुतसिद्धिः । अभिन्नस्वभावत्वमिति चेत् ; सिद्धस्तहिं तादात्म्यपरिणाम एव समवायः, तत्रैव सति तत्स्वभावत्वोपपत्तेरिति न साध्यवैकल्यं निदर्शनस्य । नापि साधनवैकल्यम् ; निधितादाम्यप्रत्ययविषयत्वस्य शास्त्रकारहृदयगतस्य साधन स्य दान्तिकवत् तत्रापि भावात् । ततो युक्तमेव तत्-'सर्वभेदप्रभेदात्मकं सत्, निरवधता. १५ दात्म्यप्रत्ययविषयत्वात् , स्वाङ्गप्रत्यगात्मकशरीरयत्' इति । सद्पाव्यतिरेके कथं भेदप्रभेदी भावानामिति चेत् ? न थावेनापि प्रतिभासात् । नहि सद्रूपतयैव भावाः प्रत्यवभासन्ते सद्रूपेणेव समविपमपरिणामाधिष्ठानभेदप्रभेदरूपेणापि परिस्फुटशानवपुपि तेषां निरपवादतया प्रत्यवमासनात् , निरवद्यप्रतिभासोपाध्यायत्वाच्च भांवतत्त्वप्रतिष्ठाया। दाद- तत्र भावाः समाः केचिन्नापरे चरणादिवत् । इति । तत्र तस्मिन्नुच्छरूपसद्रूपे सति भावा जीवादयः समाः परस्परं समानपरिणामरूपा नाभेदिनः । तथा च दुरान्नातमेतत्- "एको देव सर्वभूतेषु गूढः सयव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा"[श्वसा०६।११]इति । जीवानां प्रविशरीरं सदृशपरिणामाधिष्ठानतया भेदिनामेव प्रविभासनानादिनाम् । उपा- धिभेदादेव तत्र भेदप्रतिभासो न स्वरूपभेदादिति चेत् ; न; सर्वाभेदवादिनामुपाधिभेद. २५ स्यापि वानुवृत्तेनाभावात् । सोऽपि पयेपाधिभेदोपनीतात् तन्प्रतिभासादेव न तस्वव इति चेत् । न; अनवस्थादोपात् । नचापरापरापरिमितोपाधिभेदप्रतिभासा युगपदनुभवपारिजातशीतल- च्छायामण्डलपिण्डीभूताः प्रत्यवलोक्यन्ते येनैवं तत्वस्थिति प्रति विन्धयुद्धयः मुखमध्या. सीमहि । वस्तुतश्चोपाधिभेदव्यवस्थापने न प्रतिभासभेदादन्यनिषन्धनम् । अतस्तत एष युग- २० १"सामान्य" -ता. टि। २ भेदप्रभेदरूपेणापि । ३ उपाधिमेदोऽपि । -वपरिक्षात-आ०,०, प०। ५ "विश्वस्तधियः, समो विना इत्यमरः। विपन्धविसम्भशब्दावधानुसमुत्पनी"-ता.टि.। १-दन्यनि-भा०, ५०,०।
१३१५८] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः पदनेककायगोचराणां जीवानामपि भेदोपपत्तेः समाना एव ते परस्परं नाभेदिन इत्युपपनमुक्तम्- 'समा भावा' इति । यद्येवमेकशरीराधिष्ठानानासपि पूर्वापर चित्तलक्षणानां सादृश्यमेव परस्परं नैकत्वमिति चेत् ; अत्रोत्तरम् - 'केचिन्नापरे' इति । केचित् नानादेहगहरपरिवर्तिन एव ते समा नापरे नेकवपुःसम्पणिस्तत्र भेदवदभेदस्यापि तत्स्वीतियलेनावस्थापनात् । अभिहितश्चैतत्-५ 'भेदज्ञानात्' इत्यादिना । यदि वा केचित् जीवा एव परस्परं समानापरे जीवपुद्गला- दयस्तेषां परस्परतो विसदृशपरिणामाधिष्ठानतया 'प्रतीतः । अनोदाहरणम-'चरणादिवत्' इति । चरण आदिको करशिरानोदरादीनां ते इव तद्वदिति । यथा चरणादीनामेक. शरीरात्मकत्वेऽसि भेदाभेदरूपत्वं परस्परतः समविषमात्मकतया भिन्नरूपतयैव प्रतीतेः । परणादयो हिपरणादिभिः समा न करादिभिः, सेऽपि तदन्तरः समा न परणादिभिरिति, तथा सङ्ग्रहनयार्पितैकसदूपत्वेऽपि जीवपुद्गलादीनामिति । साम्प्रतं प्रस्तुतप्रस्तावार्थविस्तारमुपसंहत्यां दर्शयन्नाह- एकानेकमनेकान्तं विपमश्च समं यथा ॥ १५७ ।। तथा प्रमाणतः सिद्धमन्यथाऽपरिणामतः । इति । सदित्यनुवर्तते सद्विपयविपयिरूपं वस्तु एकम् अनुगतरूपापेक्षया, अनेक १५ व्यावृत्ताकारापेक्षया । अनेन द्रव्यपर्यायरूपत्वमुक्तम् । तथा विपमं विसरारूपं 'च' शब्दः सममित्यन्न द्रष्टव्यः । समं च न केवलं विपमम् , अपि तु समं च सदृशपरिणामि च । इत्यनेन सामान्यविशेषात्मकत्वं निवेदितम् । अत एव अनेकान्तम् अनेकस्वभावम् । न चेदं वामात्रमपि, यथा येन प्रस्तुतप्रस्तावपश्चितप्रकारेणानेकान्तं वस्तु भवति तथा तेन प्रकारेण सिद्धं निश्चितम् । कुतः प्रमाणतः प्रत्यक्षादन्यतश्च, तस्यापि तद्विपयत्वेन निरूपयिष्यमाणावात् । योकं कथमनेक विरोधादिति चेत् ? अनोत्तरम्-'अन्यथा' इत्यादि। अन्यथा अन्येनैकान्तप्रकारेण विषयग्रहणव्यापार परिणामस्तदभावाद् अपरिणामतः प्रमाणस्येति विभक्तिपरिणामेन सम्बन्धः । तथा हि ययेकमनेकार , तदपि एकरूपादेकान्ततो व्यावृत्तं प्रमाणतोऽवगम्येत भवत्येव उदभेदस्य विरोधः प्रमाणप्रत्यनीकत्वात् । न च तस्य ताहशस्य प्रतिपत्तिः, अन्योन्यात्मन एवावगमात् । न च प्रमाणावगते विरोधः , वस्तुमात्रेऽपि २५ तत्प्रसङ्गेन नैरात्म्यवादोपनिपातात् । क्षणिकमेव वस्तु प्रत्यक्षतोऽवगम्यत इति चेत् ; तत्पुनः प्रत्यक्षं व्यावहारिक वा स्याग्रस्येदं लक्षणम्-"प्रमाणपविसंवादिज्ञानम्" [प्र०वा० ११३ ], पारमार्थिकं वा यस्यापीदं . , २. .. १ योक्मेव शारीरापिष्टानामपि मा०, २०, ५० 1 २ "भेदनानात् प्रतीयेते प्रादुर्भागक्यो यदि । अभेद- शानतः मिदा स्थितिरशेन केनचित् ॥"-ता० टिन्यायवि. टो०1८1३न पर नाते तनो-सान ५-पहलानामि-भा०, या, प०।६ -ल दर्स-आ०, वा, प.
न्यायविनिश्चयविधरणे [१११५८ लक्षणम् - "अज्ञातार्थप्रकाशो चा" [प्र०वा. १६३] १ व्यावहारिकमिति चेत् ; ननु तग्निश्चयात्मकमेव, तथैव व्यवहूपु प्रसिद्धः, अन्यथा "नसो" [प्रश्वा० .२।१३३] इत्यादिना तत्प्रसिद्धिप्रतिपादनस्यानुपपत्तेः। न च ततः क्षणिकस्य प्रतिपत्तिः, निर्विवादत्वे. नानुमानवैफल्यापत्तोः। द्वितीयविकल्पेऽपि फुतस्तदनुमानस्य प्रामाण्यम् १ समारोपव्यवच्छे. ५ दादिति चेत् ; कोयं समारोपो नाम ? श्रणिकेऽअणिकज्ञानमिति चेत् । उच्यते- कालत्रयानुयायिनमिह न क्षणिकं वदन्ति विद्वांसः । प्रत्यक्षादिव तन्न क्षणिकज्ञानात्सुबोधं यः ।।११७६|| न ह्यक्षणिकं ज्ञानं वस्तुबलादस्ति यौद्धसिद्धान्ते । कल्पितरूपं कथमिव तत्कस्यापि प्रतीतिकरम् ॥११७७॥ तस्याप्यक्षणिकत्वं क्षणिकज्ञानान्न शक्यकल्पनकम् । अक्षणिकश्च न किश्चिद्विज्ञानं वात्त्विकं भवताम् ॥११७८॥ कल्पितमक्षणिकं तद्यदि पुनरुच्येत पूर्ववद्दोपः । पुनरपि तद्वद्वचने कथमनवस्थानतो मुक्तिः ? ॥११७९॥ तन्न समारोपोऽयं शक्यपरीक्षस्ततः कथं युः । तद्विच्छित्तिविधानात् प्रमाणमनुमानमिति बौद्धाः १ ॥११८०॥ अपि चैवं कथं नीलादिविकल्पत्यापि न प्रामाण्यम् ? नीलादो विपरीतसमारोपामावा. दिति चेत् । क्षणिके कुतस्तद्भावः ? साधर्म्यदर्शनादिति चेत् ; न, नीलादेरपि पीतादिना कथ. वितदर्शनात् । सर्वथा क्षणिकेऽपि तदभावात । न तत्र समारोपः प्रतीयत इति चेत् ; इतरत्र कुतस्तत्प्रतीतिः ? स्वत इति चेत् ; न; अस्वलक्षणत्वे वदयोगात् । प्रत्यक्षं हि स्वसंवेदनम्, तत् कथमस्वलक्षणविषयं भवेत् ? स्वलक्षणात्मैव स इति चेत् ; न तर्हि समारोपाकारत्वं स्वलक्षण. स्यातद्रूपत्वात् । अन्यत एव तस्य तदाकारत्वं न स्वत इति चेन, क्थमन्यकृतस्य स्वतो वेद-' नम् ? तदप्यन्यत एवेति चेत् ; न, तस्याप्यतदाकारत्वे तदयोगात् । तदाकारत्वे तदपि न स्वलक्षणमिति तस्यापि न स्वसंवेदनादवगतिः । स्वलक्षणमेव तत् , तदाकारत्यन्तु तस्याप्यन्यत एवेति चेत् ; न; तत्रापि कथमित्यादेरनुपगादनवस्थानदोपपाषाणदूरपरिपाठनस्य दुरपाकरत्वात् । २९ तन्न समारोपस्यैवाप्रतिपत्तेः सत्यवच्छेदः फलमनुमानस्य । अनिश्चितार्थनिश्चय इति चेत्, किं पुनः प्रत्यक्षतः स नास्ति ? नास्त्येव तस्यानिश्चयरूपत्वादिति चेत् ; कथं प्रामाण्यम् ? प्रामाण्ये वा किमनुमानेन ? तत्कृतनिश्चयाभावेऽपि तत्मामाण्यस्याविघातात्, अस्ति च वत् । ततो न प्रत्यक्षात्प्रतिपत्तिः क्षणिकस्य । -- २० , “मनमोर्युगपत्ते सविरल्पाविकल्पयो । विमुटो लघुवृत्तेर्वा तयोरक्य व्यवस्यति ॥"-ता. टो। २ यायिनमिति न ५०।-यायिनमपि न आ, ब० ॥ ३ यात श्रा०, ३०, ५० 1 ४ साधाभावान् । ५ अनु- मानकृत २२१५८] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावा - नाप्यनुमानात ; प्रत्यक्षतः तदप्रतिपत्तौ ततस्तद्धेतुसम्बन्धस्योपरिज्ञानात् ! अनुमानात्तत्प- रिज्ञाने; तत एव परस्पराश्रयस्य, अन्यतश्चानवस्थानस्य प्रसङ्गात् । न च प्रमाणान्तरम् ; अन. भ्युपगमात् । तन्न क्षणिक प्रमाणवेद्यं यदनेकमेव भवदात्मनि क्रमत एकरूपतो विरुध्यात् । नापि नित्यम् । नहि तत्रापि प्रत्यक्षं प्रमाणम् ; तद्धि तहेतुकम् , अतद्धेतुकं वा ! तद्धे- तुफत्वे विषयस्य तत्करणकस्वभावस्य नित्यत्वात् कथं तज्ञानोपरमः ? सामनीवैकल्यादिति चेत् । न; विषयस्यैव तत्त्वे तदयोगात् । अन्यस्य तत्त्वे कथं विषयहेतुकं तज्ज्ञानम् ? विषयश्चान्यश्व सामग्रीति चेत्, न; प्रत्येकं तयोस्तत्त्वे ज्ञानानुपरमस्य तदवस्थत्वात् । सम्भूय तत्त्वे कथं प्रत्येक कारणत्वं यतः समवायि किञ्चिद् अन्यदसमवायि निमित्तञ्चापरं कारणमुच्यते । नहि साम- प्रया एव कारणत्वे तझेदः; तस्या एकत्वेन समवाय्यादीनामन्यतमत्वस्येवोपपत्तेः । न च सदन्यतममात्रात्कार्यम्; त्रिभ्यः कारणेभ्यः कार्यमिति भवतामभ्युपगमात् । कुतो वा प्रत्येक. १० मकारणत्वे वस्तुत्वं व्योमकुसुमादिवत् ? सत्तासम्बन्धादिति चेत् ; ननु सोऽग्याधार्याधारगाव एव । न पाकिन्चित्करत्वे तद्भावः, तत्कुसुमादिवदेव । सामग्रीकारणत्वस्य तत्रोपचारात् नाकिञ्चि. करत्वमिति चेत् । न तदायत्तस्य सत्तासम्बन्धस्याप्युपचरितस्यैव प्रसङ्गात् , संवृतिसत्ताया एवं प्राप्तः । नच संवृतिसत्तासंभवदशायामपि वस्तुतः कारणत्वमिति बवायं हेतुफलभावः तात्त्वि. कीमवस्थामास्तिध्नुवीत ? ततः प्रत्येकमेव कारणत्वात् कथमुपरमत्वज्ज्ञानस्य ? समप्रभाव• १५ दर्शायामेव सद्भावादिति चेत् ; न तर्हि तन्नित्यम्, प्रागकारणस्य तदशायां कारणतया परिणा- मात् । वन्न तहेतुकं प्रत्यक्षम् । नाप्यवद्धेतुकम्; नित्येश्वरहेतुकत्वे तत्राप्यनुपरमदोपस्य तदवस्थत्वात अन्यथा कार्यत्वादेः तेन व्यभिचारापत्तेः । नयानुपरतस्यैव तस्य भावः तद्वतो विपयान्तरपरिज्ञाना. भावानुपङ्गात, युगपत्तदुत्पादनस्यानभ्युपगमात् । तन्न प्रत्यक्षात्तत्परिज्ञानम् । नाप्यनुमानात ; तस्य प्रत्यक्षपूर्वकत्वेन तदभावेऽनयवारात् । किं वा तत्र लिङ्गम् ? कार्यमेव, कारणभावादेव तस्योपपत्तेरिति चेत् ; न ; अनुपरसस्यासिद्धः। उपरतिमतस्तु उपरतिमत एव तस्य सिद्धिर्न नित्यस्य । ततो न युक्तमुक्तम्- तस्य कार्य लिङ्ग मिति । अकारणवत्त्वमिति चेत् ; न ; प्रागभावेन व्यभिचारात , तस्य तत्त्वेप्यनित्यत्वात् । सोऽपि नित्य पवेति चेत् ; कुतो न कार्यकालेऽपि तस्य प्रतिपत्तिः । कार्येण प्रच्छादनादिति चेत्, प्रच्छादनप्रागभावेन वर्हि व्यभिचारः, तस्याऽकारणवत्वेऽप्यनित्यत्वात् । सोऽपि नित्य एवेति चेत् । तत्रापि 'कुतो न इत्यादेरावर्शनाद् अध्यवस्थापत्तेः । न चापरापरस्यापरिमितस्य प्रच्छादनस्य प्रतिपत्तिः । तस्मादनित्य एव स इति कथन्न व्यभिचारः। समवायित्वे सत्यकारणवत्त्वादिति हेतोर्विशेषणात् , प्रागभावस्य च समवायित्वादिति चेत् ; कुतो २० । २५ ८ ! -स्यासंज्ञानात् आ०, ब०, ५०। २ -व च तदा-प० । वचपदा-आ., य० । ३ -पगमः भा., प.प.। " "सामग्रीवे"-ता० दि०। ५-नुकं ज्ञानमा०, २०, प० । ६ -यामिव त-आ०,०,०। • भागभावत्वत्प।८-खे तस्य कारणवत्व-आ०, २० वै तप्त्य कारणला प.।
-- - । . भ्यायविनिश्चयविधरणे [१३१५८ 'धर्मिणोऽपि तत्यम् ? स्वयमन्यत्र समवायादिति चेत् ; न : परमाण्वात्मादेस्तदभावात् । स्वस्मिन्नन्यस्य समायादिति चेत् । न ; सचावदिति निदर्शनस्य साधनवैकल्यापत्तेः सत्ता. यामन्यस्य तदभावात् । समवायस्य तेन सम्बन्धादिति चत् ; न ; सम्बन्धान्तरात् तदमा. वान , अनवस्थापत्तः । स्वतस्तद्भावस्तु प्रागभावेनापि किन्न स्यात् ? तत्र सन्नपि सम्बन्धप्रत्ययं ५ न जनयतीति व्याघातात् । तन्न सविशेपणमध्यकारणवत्त्वम् तत्र लिङ्गम् , व्यभिचारात् । भवतु विनाशकारणापरिक्षानं नित्यत्वे लिङ्गम् । विनाशकारणं दि कस्यचित् समवायिकारणविनाशः घटादिनाशात् तद्रूपादिनाशोपलब्धेः, असमवायिकारणविनाशश्च कस्यचित् कपालादिसंयोगनाशात् घटादिनाशप्रतिपचे, नापरमनुफ्लम्भात् । न च परमावा. स्मादेः समवायिकारणम् ; निरवयवत्वात् । अत एव नाऽसमवायिकारणम् ; समवायिकारण. १० संयोगस्य तस्यात् । न चासतो विनाश इति सिद्धं विनाशकारणापरिक्षानम् । सून चैतत्- "अविद्या " [वैशे० ४।१।५] इत्यविद्यापदेन विनाशकारणापरिक्षनास्य प्रतिपादनात् । अत्र प्रयोगः नित्याः परमाण्यादयः अपरिज्ञातविनाशकारणत्वात् सत्तावदिति चेत् ; न अस्यापि प्रागभावेनेव व्यभिचारात् , न हि तत्रापि विनाशकारणं समवाय्यादिकारणविनाश:, तत्कारणस्यैवानुत्पत्तिमत्त्वेनासम्भवात् । समवायित्वविशेषणस्य च पूर्ववत् प्रतिक्षेपात् । नन्वेवं १५ यिनाशाभावात् कथं तस्यानित्यत्वमिति चेत् १ अयमपि परस्यैव दोपो य एयमिच्छति । न दोपो विनाशाभायेप्यन्तयत्येन तस्यानित्यत्वात् , अन्तयान हि प्रागभावः कार्यान्तरस्येव तस्य प्रतीतेरिति चेत; कथं कार्यस्य तदन्तत्वम् १ तदभावरूपत्वादिति चेत् । तदेव तर्हि तस्य नाश इति कथं 'पदमावः । तत्प्रच्छादनादिति चेत् ; न तस्य प्रतिपिद्धत्वात् । तन्नेदमपि तत्र लिगम् । लिङ्गान्तरमप्येवमुपन्यस्य प्रत्यसितव्यम् । तन्नानुमानादपि प्रतिपत्तिनित्यस्य । नाप्युपमानात , तस्य प्रमाणान्तरप्रतीते यातुनि संशासंक्षिसम्पन्धपतिपत्तित्वात् । प्रमाणान्तरेण च नित्यस्याप्रतिपन्नत्यात् , तदिदं नित्यम्' इति तत्सम्बन्धप्रतिपत्तेदुरुपपा. दत्यात । आगमस्य तु मात्र प्रामाण्यम् ; प्रत्यक्षादिप्रत्यनीकत्वान् । तन्न नित्यं नाम किश्चित, यदेकमेव प्रतीयमानमात्मन्यनेकरूपता प्रतिषुति । ततो "युक्त मेकानेकस्य प्रमाणसिद्धत्वा. दनेकान्तत्वमिति । तथा समविषमाकारस्यापि । नहि तत्रापि कश्चिद्विरोधः, प्रामाण्यस्य तहणपरि. णामस्याप्रतिवेदनात् । ततो व्यवस्थितम्-व्यवसायात्मकं विशदं द्रव्यपर्यायसामान्यविशेपार्थाः स्मवेदन प्रत्यक्षमिति । किमनेन तहक्षणेन "प्रत्यक्ष कल्पनापोढमभ्रान्तम्" [ न्यायमि० १ । ४ ] . २० २५ 1"परनाम्यात्मादयो नित्या समवायिरचे सत्यसरणदापाससावत्"-तारी•। रखतस्माद्राव-मा., २०५०।२ प्रगमाऽपि आ०, २०, ५०।--विरोषनाश: भा०, २०, ५०। ५-दयो न परि-मा, १०, प. "प्रागभावस्व"-ता. टि. कार्यमेव । प्रागमावविनाश क्यमभावारम-११-रमन्या- सा. युकनेशनेक-आ०, २०,..।
प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्ताव । १।१५८] इत्येवारतु निर्दोषत्वादिति चेत् ; उच्यते कीदृशं तज्ज्ञानं यदेवं प्रत्यक्षतया लक्ष्येत ? निरंशक्षण- क्षीणपरमाणुरूपमिति चेत् ; न; विकल्पद्शायां सदप्रतिपत्तेः । विकल्पस्यैव नीलमहं वेनि' इल्याकारस्यानुभवात् , न तद्व्यतिरिक्तस्य दर्शनस्य । अस्त्येव तस्याप्यनुभवः, केवलं विकल्पै- कत्वेनाव्यवसायान पृथनिश्चय इति चेत् ; कथमनिश्चितमनुभूतं नाम बुद्धिव्यतिरिक्तचैतन्य. वत् ? कथं वा तद्रूपं प्रतिभासनं भावानां क्षणिकतया व्यवहारहेतुः निश्चितस्य तत्वानुपपत्तेः, ५ असिद्धत्वात् । अनिश्चितस्यापि सिद्धत्ये हेतोरपि स्यादित्यसङ्गतमिदम्-"हेतोस्त्रिप्वपि" [प्र. वा० ३।१४ ] इत्यादि । विचारतो विद्यत एव निश्चयस्तस्य, अनिश्चयस्तु नीला- दिवत् प्रत्यक्षजन्मनो निश्चयस्याभावादिति चेद; किमप्येवमप्यनुमानेन ? व्यवहारस्य नीलादि- वत् क्षणक्षयेऽपि तन्निश्चयादेवोपपत्तेः अन्यथा नीलादावोर्प ततस्तदनुपपत्तेस्तस्य निदर्शनत्वा- भावप्रसद्गात् । तत्राप्यनुमानत एव सदुपयत्तिकल्पनायामनवस्थोपनियात:-परापरतनिदर्शनस्य १० तब्यवहारकारणानुमानप्रबन्धस्य चावश्यकल्पनीयत्वात् । वन विकल्पदशायां तत्प्रतिपत्तिः । विकल्पसंहारवेलायामिति चेत् ; न; तद्वैलाया एवानवलोकनात् । तदा तत्पतिपत्तौ वा कुतस्तत एव क्षणक्षयेऽपि व्यवहारो न भवेत् ? विपरीतारोपादिति चेत् ; न; विकल्पसंहारश्च विप- 'रोतारोपश्चेति व्याघातात् , तदारोपस्यैव विकल्पस्वात् । फचिन्नीलादावपि कुतस्ततो व्यव- हारः १ तदारोपाभावादिति चेत् । न निरंशे वस्तुनि भागतस्तदनुपपत्तेः । काल्पनिकस्य र १५ सांशत्वस्य तदशायामसम्भवात्। तन्न समारोपात् ततस्तव्यवहाराभावः । नापि पाटवाद्यभावात् । नीलादावपि तदापत्तेः। तत्र पाटवादिभावे या न प्रतिभासनमेव तव्यवहारहेतुः , अपि तु पाटवादिविशिष्टम् , तस्य च क्षणक्षयेऽभावादसिद्धो हेतुः । यच्च तत्र'वभाममात्रम् ; तस्य नीलादावभावात् साधनवैकल्यञ्च दृष्टान्तस्य । ततो दुर्भापितमिदम्-"यद्यथाऽवभासते तत्त- थैव व्यवहारमवतरति यथा नीलं नीलतयाऽवभासमानं तथैव तब्यवहारमवतरति, अब. २० भासन्ते च सर्वे भायाः क्षणिकतया" [ J इति । ततो निर्विशेषमेव समारोपवैक: ल्यादिकं चिदादिनीलादिक्षणक्षयादिविषयमन्वेपणीयम् । तथा च सति निःशेषधर्मभ्यवहतेस्ततः । प्रत्यक्षादेव सिद्धत्वात व्यर्थस्तत्साधनश्रमः ॥११८॥ अस्ति चार्य प्रयासस्ते सत्र छत्र तदुच्यते । क्षणक्षयनिरंशत्वाविकरूपत्वादिसाधनम् ॥११८२॥ तन ज्ञानं किमप्यस्ति क्षणक्षीणमनंशकम् । नापि चित्रं क्रमेणापि तचित्रत्वप्रसञ्जनात् ॥११८३॥ क्षणभङ्गाविकरूपत्ववा प्यत्र न यद्भवेत् । तस्मादसम्भवादोपायुक्तं नाध्यक्षलक्षणम् ॥११८४॥ १-रीतसमारो-आ०, १०, १०॥२-त्यागीला-आ०, २०, प० ।
५२० न्यायविनिश्चयविवरणे . १० इदमेवाह- अविकल्पकमभ्रान्तं प्रत्यक्षाभम् [पटीयसाम्] ॥१५८॥ इति । न विद्यते विकल्पो 'जात्यादियोजनरूपः प्रतिभासो यस्मिंस्तद् अविकल्पकम् अभ्रान्तं तिमिराशुभ्रमणायनाहितविभ्रम परोक्तमर्थज्ञानम् । तत्किम् ? प्रत्यक्षमिवाभाति न ५ प्रत्यक्षमेवेति प्रत्यक्षाभं तस्यैवासम्भवात् , असम्भवञ्च तत्र प्रमाणाभावात् । अव एवोकम्- अन्यथाऽपरिणामतः इति । सम्भवेऽपि क्व तस्य प्रत्यक्त्वम् ? दृश्ये जलादाविति चेत् ; न; तस्याप्यनुभवाधिष्ठितत्वेनाप्रवृत्तिविषयत्वात् । प्रवर्तकस्य प प्रत्यक्षत्वमनुमतं भवतां प्राप्ये भाविनीति चेत् ; न, तस्य तेनाप्रविपत्तेः । अप्रविपन्नेऽपि प्रत्यक्षत्वे अतिप्रसङ्गात् । दृश्यप्रति- पत्तिरेव तस्यापि प्रविपत्तिस्तयोरेकत्यादिति चेत् ; उच्यते-- यस्तुतो यदि नद्भावः क्षणभनि जगत्कथम् । सवृत्या यदि नग्न स्यात् प्रत्यक्षमविकल्परम् ॥११८५॥ न होकतोपसम्पृक्तटश्यप्राप्योपलम्भनम् । अविकल्पकमध्यक्षमावाणाः परीक्षकाः ॥११८६॥ भगक्षयित्वं प्रत्यक्षद्यमित्यपि 'वः कथम् । परमार्यपये तक्षेन सत्र सदसम्भवात् ॥११८७॥ नित्यानित्यादिनिःशेषविकल्परहितं यतः । अद्वैतमेव मनाः स्वसंवेदनगोधरः ॥११८८॥ भवतु वर्तमानविषयमेव प्रत्यक्षम् , न प तस्याप्रयसकत्वम् , उपलम्मपरितोष मायादेष सदुपपने:, भाविनितु तस्य तत्वं व्यवार्तजनामिप्रायादेव न सस्थत इति पेत् । २० नन्वेवं क्षणमादायपि तायव प्रामाण्यान् किमर्था तत्र प्रमाणान्तरप्रवृत्तिः ? समारोपण्य. घटेदाय विहितोत्तरस्यात् । निधयाति पेन ; नीलादारपि विन्न सरप्रवृत्तिः १ प्रत्यक्षादेव वस्य नियादिति चेत् ; फ्यमेवम् तस्यानित्रयरूपत्वाम् ? नियहेतुत्यादिति चेत् ;न3 निस्पित्वात् । निर्विकल्प हि प्रत्यक्षं फथ निश्चयहेतुः अर्थवत् ! निशयसंस्कारादेव विनिमयः प्रत्यक्षस्य हवेतुत्वं सरसंस्कारप्रयोधादिति पेम् ; म; सत्प्रयोपरयाप्यर्यादेवोपपत्तः। २५ उठतम्- "प्रभेदात्मदृशस्मृत्यापर्धाकन्पधियां न किम् । संस्कारा पिनियम्परन् पधास्वं सन्निकर्षिभिः ॥"[सिद्धिवि०परि० १] इति। सन्न प्रत्यक्षानिश्चयः । भवन्नपि यधं नीरावावेष न क्षणभयादावपि यतस्तव . . . "नकि मेगा परन । यातिगि पी साताबरण्या पक्षाकरम् ॥"- 6.टे.र-विमी-भा....O-मा... 1 नः ....!
११५९ प्रथमः प्रत्यक्षाप्रस्तावा । - ५ न, प्रमाणान्तरप्रवृत्तिः ? दर्शनपाटयादेउभयत्राविशेषादिति निरूपितत्वात् । अपेक्षणे च निश्चयस्य तस्यैव मुख्य प्रामाण्यं भवेत् स्वार्थव्यवसाय प्रत्यनपेक्षवेन साधकतमत्वात् , न प्रत्यक्षस्य विपर्ययात् । अविसंवादस्यापि तदायत्तत्त्वात् , सत्येव हि तस्मिनीलादो तदवलोकनान असति च क्षणश्यादौ सत्यपि प्रत्यक्षे विपर्ययात् । इदमेवाह- पटीयसाम् । अविसंवादनियमादक्षगोचरचेतसाम् । इति । अक्षेभ्यश्चक्षुरादिभ्यो यानि गोचरचेतांसि विषयज्ञानानि तेषा पटीयसा व्यवसायात्मनाम् अविसंवादस्य नियमः तेषामेवास्ति तेपामरत्येवेति चावधारणम् , तस्मात् । अविकल्पक प्रत्यक्षाभम् इति । न हि तेषामेवावधारितोऽविसंवादो निर्विकल्पस्य, विरोधात् । न च तमन्तरेण प्रामाण्यम् , तस्य तेन व्याप्तत्वात् अन्यथाऽतिप्रसङ्गात् । न १० चाप्रमाणस्य प्रत्यक्षत्वम् , इत्युपपन्नम् अविकल्पकमित्यादि। न च तेपामप्रामाण्यम् , अविसंवादस्य तनावश्यम्भावात् । द्विचन्द्रादिचेतसां तु व्यवसायत्वमेव नास्ति , विधूतबाधस्येयावसायस्य व्यवसायोपपत्तेः । कथं पुनः व्यवसायरूपत्वे तचेतसामविकल्पकत्वम् , विकल्पविशेषस्यैव व्यवसायत्वात् १ असति चाविकल्पे क्वेदं प्रत्यक्षाभत्वचिन्तनम् । स्वसंवेदनादाविति चेत् , तस्यापि भवन्मतेन ताप्यानिशेषास् , अन्यथा प्रामाण्यानुपपत्तेरिति चेत् , सत्यम् , तेषामविकल्पकत्वं तदप्रतीते, विकल्पानुत्पादाच । न ह्यविकल्पाद्विकल्पोत्पत्तिः । भवत्येव तत्संस्कारसहायादिति चेत् , न , बदाकारस्यापि तत्संस्कारसहायादनाकारादेव ततो भावमसगात् , तथा च कथं विकल्पयुद्धावाकारलेशदर्शनात् दर्शनेऽपि तत्कल्पनम् । तत्कल्पने वा विकल्पफल्पनमपि स्याददिशेपादिति न तेषामविकल्पकत्वम् । अविकल्पकस्य प्रत्यक्षाभत्यचिन्तनं तु पराऽभ्युपगमप्रसिद्धस्यैव न वस्तुबलप्रवृत्तस्य,तत्र तदनुपपत्तेः। अथ किमर्थमत्र बहुवचनम् ,एकवचन- २० मेवास्तु शास्त्रव्यवहारस्य तथैव वाहुल्यात्, यथा "व्यवसायात्मनो दृष्टेः" [सिद्धिवि०परि० १] इति, 'प्रमाणस्य फलम्" [सिद्धिवि० परि० १] इति च, छन्दोभङ्गस्याप्यभावादिति चेत् ? तस्य युगपद्भाविदर्शनबहुत्वनिवेदनेन तद्विकल्पबहुत्वनिवेदनार्थत्वात् । विकल्पजननादि प्रत्यक्षप्रामाण्ये शकुलीभक्षणादी युगपद्भाविरूपादिदर्शनजन्मनां विकल्पानामपि योगपद्यरसङ्गः, कारणयोगपद्ये कार्यम्मायोगात् "नाक्रमात् क्रमिणो भावाः" [प्र०वा० ११४५] इत्यस्य २० विरोधात् । न चैक एव तजन्मा विकल्पः, तद्वशाद्पादिदर्शनानामन्यतमस्यैव प्रामाण्यप्रसङ्गात् । एकस्याप्यनेकाकारत्वान्नेति चेत , न, युगपदेकस्यानेकाभिलाप्याकारत्वे अनेकविकल्पेन किंगपराद्धं यतः स एव युगपन्न भवेत् । तथा च कथम् अश्वविकल्पयोगपद्यात् गोदर्शनस्य निर्विकल्पत्वं विकल्पत्वेऽपि तदविरोधात् रूपादिविकल्पवत् । तम विकल्पजननात् प्रत्यक्षप्रामाण्यम् , विकल्पस्येव मुख्यतस्तदुपनिपातात् । विकल्पानामयथार्थत्वान्नेति चेत् , अाइ- नात्येष १५ न ३० 1 -मेर नास्ति ते-भा०, २०, ५० । २ -वनविक-आ०,१०, प० ।
- म्यायधिनिश्चयविवरण सर्वथा वितथार्थत्वं सर्वेपामभिलापिनाम् ॥१५॥ ततस्तत्त्वव्यवस्थानं प्रत्यक्षस्येति साहसम् । इति । सर्वथा सर्वेण स्वलक्षणाप्रकारेण सामान्यप्रकारेण च वितथार्थत्वं मिथ्यार्थत्वं सर्वेषां लिङ्गजानामन्येपाञ्च निरवशेषाणाम् अभिलापिनां विकल्पानाम् इति एवं साहसम् अनालो. ५ चितं चेष्टितं प्रमाणाभावादिति भावः । तथा हि-स्वतो वा तेषां मिध्यार्थत्वमवगम्येत , अन्यतो वा ? स्वतश्येत तेन यदि मिथ्यार्थत्वं सत्यार्थत्वमेव नीलादिना भवेत् गत्यन्वरा. सम्भवात् । सत्यार्थत्वं चेत् ; न ; सर्वथा वितयार्थत्वप्रतिज्ञाविरोधात् । अस्तु नीलादिनैव वितथार्थत्वम् , न वितथार्थत्वेनापि , कथञ्चिदेव तदद्गीकारादिति चेत् । कथमेवं प्रधा- नादिना वितथार्थत्वेऽपि नीलादिना सत्यार्थत्वन्न भवेत् ? यत इदं सूक्तं स्यात-"वितथार्थी १० नीलादिविकल्पा विकल्पत्वात् प्रधानादिविकल्पवत् ।" [ ] इति । स्वतोऽपि वितथार्थत्वावगमे च किमर्थमिदमनुमानम् ? समारोपव्यवच्छेदार्थम् , सत्यार्थसमायेपस्यानेन व्यवच्छेदादिति चेत् ; न ; तस्यैव तत्त्वानुपपत्तेः । न हि स्वयं वितथार्थत्वमवगच्छत एव विपरीतारोपत्वं विरोधात् । अन्यस्य तत्र तत्त्वमिति चेत् ; न; तस्यापि स्वत एवारोप्याकारण मिथ्यार्थत्वस्यावगमात् । अवगत तद्रुपस्याव्यवच्छेदेऽपि न दोषः, पुरुषार्थप्रवियन्धाभावात । १५ तत्राप्यन्यस्य सदारोपत्वकल्पनायामनवस्थापत्तिः । तन्न स्वतस्तेषां वितथार्थत्वावगमः । नापि परतः, प्रत्यक्षस्य तवाव्यापारात् । न हि तेन विकल्पानां प्रतिपचिः सामान्यविषयत्वापत्तेः, तेषां सामान्याकारत्वात् । तथा चेत ; व्याहतमेतत् -"प्रमाणं द्विविधं प्रमेयद्वैविध्यात् [प्र० वार्तिकाल० २१११२] इति । न च तदप्रतिपत्तो वद्धर्मस्य परिज्ञानम् ; तस्य वत्प्रतिपत्तिनान्त. रोयकत्वात् । नापि परतो विकल्पात ; तस्याप्रामाण्यात् । प्रमाणमेव लिङ्गलो विकल्प इति २० चेत् ; कुत एतत् ? साध्यप्रतिबन्धादिति चेत् ; न; साध्यस्येव व्यवस्थितस्याभायात् । भावेऽ. पि कुतः प्रतिबन्धात्य परिक्षानम् ? तत एव विकल्पादिति चेत् ; तथा साध्यस्यैव ततः किन्न परिक्षानम् ? तस्यावस्तुविषयत्वादिति चेत्, प्रतिबन्धस्यापि न स्यादविशेपान । अवस्त्येव प्रति. पन्ध इति चेत् ; न, अवस्तुतया वस्तुत्वात् , अन्यथा तथा निर्धारणायोगात् । प्रतिबन्धेऽपि प्रतिबन्धादेव तस्य प्रामाण्यं न परिज्ञानादिति चेत् ; न; तत्रापि फुत इत्यादेरावृत्तेरव्यवस्थि. २५ तेश्च । तन्न तत एव तत्परिज्ञानम् । नाप्यन्यतः वद्विकल्पान ; तस्यापि प्रतिबन्धादेव प्रामाण्यात् । तत एव च तत्परिक्षानस्यासम्भवात् । अन्यसस्तद्विकल्पात् तत्परिकल्पनायां चापरिनिष्ठानात । किं वा तद्वितथार्थत्वप्रतिबद्ध लिनं यतस्तदनुमानविकल्पः ? विकल्पत्वमेवेति चेत् । कुतस्तस्य सत्यार्यत्वाद् व्यावृत्तिः यतोऽनेकान्तिकत्वन्न भवेत् । प्रधानादिविफल्पे तद्विपर्ययेण माहपर्यदर्शनादिति चेन् । न; तन्मात्रात्तद्नुपपत्ते, कथमन्यथेन्द्रियज्ञानत्वस्यापि न तो १ अभिलाशना-आ०,०,२०१२ तथापि भा०, २०, ५० । ३ "मानं द्विविधं मेयवैविध्यान.."- प्र. घा०२।11 ४ विकल्पान्तरस्या-आ०, २०, ५०। ५ तदा आ., २०५०। ६ विकल्यस्य । ० साह. श्चर्यमावाद।
न २१६०] प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्तावा ૬૨૨ व्यावृत्तिः द्विचन्द्रादिज्ञाने तस्यापि तत्साहचर्यावलोकनात् १ तथा च विकल्पानामेव वस्तुविवेक- शक्तिवैकल्यं नेन्द्रियबुद्धेरिति फुतः प्रतिपद्येमहि १ यतस्तत्प्रभावात् क्षणभङ्गादिवस्तुयायास्य- मवयुद्धयमानाः पुरुषार्थसिद्धौ बुद्धिमवस्थापयेम'। निर्याधस्यैवेन्द्रियज्ञानस्य सत्यार्थत्वम् , च तस्य विपक्षेण साहचर्य तदयमदोप इति चेत् ; न ; विकल्पेऽपि समानलात् । न हि नस्यापि तन्मात्रस्य तदर्थत्वं बाधावैकल्यविनिश्चयाधिष्ठानस्यैव तदुपामात् , तस्य च ५. दुरवबोधविपक्षसाहचर्यरूपत्वात् । ततः सूक्तम्-'सर्वधा' इत्यादि । द्वितीयमपि विकल्पार्थवैवध्यवादिनः साहसमाह- तत इत्यादि । ततस्तेभ्यो वितथार्थेभ्यो विकल्पेभ्यः तत्वव्यवस्थानं तत्त्वेन प्रमाणत्वेन व्यवस्थानं निर्णयः । कस्य ? प्रत्यक्षस्य नीलादिदर्शनस्य “यत्रैव जनयेदेनाम्" [ ] इत्यादिवचनात् , इति साहसम् । तथा हि- निश्चयाद्वितथार्थाधेप्रमाणं नीलदर्शनम् । मरीचिदर्शनं किन्न तोयनिर्णयतो भवेत् ? ॥११८९॥ एकत्वाध्यवसायस्याभावाद् दृश्यविकल्प्ययोः । इति चेत्सोऽपि मिथ्यार्थस्तविशेषकरः कथम् ? ॥११९०॥ तदर्थस्यापि दृश्यैकत्वेन निश्चयतो यदि । नास्यापि वितथार्थस्य प्राच्यदोपानतिक्रमात् ॥११९१॥ एकत्वाध्यवसायस्य तत्राप्यन्यस्य कल्पनम् । अनवस्थालतानागपाशबन्धान मुच्यते ॥११९२।। स्यान्मतं व्यवहारेण प्रमाणं नीलदर्शनम् । व्यवहारे विचारश्च न कार्यस्तत्क्षयागमात् ॥११९३॥ केवल स यथा लोके तथैव घनुमन्यताम् । व्यवहारार्थिभिस्तत्वज्ञैरपीति तदप्यसत् ॥११९४॥ नीलदर्शननिर्णीसितदर्थैकत्वनिश्चयः । इत्यस्य व्यवहारस्य लौकिकेवायेदनात् ॥११९५॥ अस्त्येवायं विमोहात्तु भवन्तो ग वदन्ति चेत् । विमोहो निश्चयाधीने व्यवहारे कथं भवेत् ? ॥११९६॥ विमोहस्य बलीयस्त्वादाहायस्येति चेदयम् । शास्त्रेणापि निवर्तेत कथमेवं यदुच्यते ॥११९७॥ "प्रामाण्यं व्यवहारेण शास्त्रं मोहनिवर्तनम् ।” इति । २० २. १ -यैमहि नि-आ०, ब०,५०१२-प्रस्थानद्-आ०, २०, ५० । ३ प्र. या० १७।
म्यायविनिश्चयविवरण ] - तन्नायं लोक्रूटोऽस्ति व्यवहाये भवन्मतः । नसोपायेय चेष्टन्ते यतो व्यजिहीपंयः ॥ ११९८॥ ततो युझगुपम्-'ततः' इत्यादि । अथवा, प्रत्यक्षस्य तत्त्वं निर्विकल्पत्यं तस्य व्यवस्थानं तत इति साहसम् । न रायथार्थास्नुमानविकल्पानदयस्थापनमुपपन्नम् ; अस्ति ५ चैतत्परस्य- "प्रत्यक्ष निर्विकल्पम् अर्धसामादुत्पोरत्तरार्थक्षणवत्" [ इत्यादेः "न सन्ति प्रत्यते कल्पनाः, उपलब्धिक्षणप्राप्तानामनुपलम्मात् , भूतले घटयत्" ] इत्यादेश्व तावस्थापनयोगस्य दर्शनान् । भवत्येव वादनादपि 'चता सम्बन्धमलान तस्य व्यवस्थापनमिति चेत , न तदलस्य प्रत्यक्षादयगतिः , अद्यापि तम्या. व्यवस्थितत्वात् । व्यास्थितमेव तन स्वतोऽपि तस्य तान्यवस्थिते: "प्रत्यक्ष कल्पनापोडं • प्रत्यक्षेणैव सिध्यति ।" [प्र०या० २११२३] इति वपनादिति चेत् , विमिदानीमनुमानेन ? व्यामोहविच्छेद इति चेत् , मति व्यामोहे क्थं व्यास्थितत्वम अतिप्रमद्गात ? तन्न ततस्तदर. गमः । नापि तद्विकल्पात् । तस्य तदरगमात्पूर्व विकल्पान्यस्वदप्रमाणत्वात् । तदवामे प्रमाणत्यमिति चेत ; न , परस्पराश्यात्-तदयगमात्प्रामाण्यम् सति च तस्मिस्तदयगम इति । नापि तद्विकल्पान्तरात , तत्राप्येर प्रमद्गादव्यवस्थितिदीपाश्च । ततो विकल्परलादेव विकल्पानां ५ विवथार्थत्यं प्रत्यक्षतत्त्वञ्च व्यवस्थापयतां (HI) न सर्वथा पितथार्थत्वमभ्युपगन्तव्यम् । तथा च सिद्धं नीलादिविकल्पस्यापि सत्यार्थत्वं निरूपद्ररत्यादिनि तम्यैव तत्र प्रामाण्यं निरपेक्षतया तस्यवसायं प्रति साधकतमत्वात् , अविसंवादनियमाग, न निर्विकल्पस्य विपर्ययादिति प्रत्यक्षाभासमेव तत्, न प्रत्यक्षम , इत्ययुग परकीय तलक्षणमिति भागो देवस्य । प्रतिपिद्धमेव. मविकल्पकमिन्द्रियप्रत्यक्षम् । इदानीं मानसमपि तत्प्रत्यक्ष प्रतिपेढे, कारिकापादनयेण परप्रसिद्ध 'तरस्वरूपमुपदर्शयति- अक्षज्ञानानुजं स्पष्टं तदनन्तरगोचरम् ॥१६०॥ प्रत्यक्ष मानसं चाह [भेदस्तत्र न लक्ष्यते !] इति । आह धर्मकीर्तिः । किम् ? प्रत्यक्षम् । फीरशम् ? मानसं मनसः पूर्वज्ञानादा- गत न केवलमेन्द्रियमेवेति । चशब्दः मानसत्वमेव दर्शयति । अक्षज्ञानं चक्षुरादिकार्य २५ रूपादिप्रत्यक्षं वस्य कार्य यदनुज वत्सदृशतयोत्पन्नम् अनोः सादृश्यार्थत्वान तत् अक्षज्ञाना- नुजम् । अनुजपदेनाशज्ञानमानमयोरुपादानोपादेयभारमानेदयति, हेतुफलयोस्सादृश्यनिवन्ध. नस्य तद्भावस्य पौरभ्युपगमात् । स्पष्टंविशदम् अन्यथा प्रत्यक्षत्वानुपपत्तेः । प्रत्यक्षत्वे निमि- तमाह-तस्यामज्ञानार्थस्यानन्तरो द्वितीयो नीलादिक्षणोऽनशानसगसमयो गोचरो विषयो यस्य तत्तथोकम् । कथं पुनस्वच्छब्देनाक्षज्ञानार्थस्य परामर्शः ? कथञ्च न स्यात् ? अप्रक्रमात, १ अनुमानविक्ल्यात् । २ प्रत्यक्षम् । ३ स्वन एवं । ४ स्वविषयानन्तरविषयसवारिणेन्द्रियज्ञानेन सम- नन्तरप्रत्ययेन जनितं तत् मनोविज्ञानम् ।"-न्यायवि० पृ० १३० धा० २१ २४३ । २० १ श्थमा प्रत्यक्षप्रस्तावा ५२५ ५ 1 तच्छब्दस्य च प्रमान्तपरामर्शित्वादिति चेत् , न, विषयिप्रक्रमादेव नान्तरीयकतया विषयस्यापि प्रक्रमात् । एवमपि भुतस्यैव विषयिणः किमपरामर्श इति चेत् १ न, तद्विपयतया मानसस्य परे। रनभ्युपगमात । सदभ्युपगमस्य चानेन प्रतिपादनात् । तथा च परस्याभ्युपगम:-"इन्द्रियज्ञानेन समनन्तरप्रत्ययेन स्वपियानन्तररिपयसहकारिणा जनितं मानसम्" [प्र० वार्ति- काल० २।२४३] इति । सदिवानी निराकुर्वन्नाइ- भेदस्तत्र न लक्ष्यते । इति । भेदो व्यतिरेक इन्द्रि. यज्ञानात् तत्र मानसे न लक्ष्यते न दृश्यते । तथा हि संज्ञानात्पूर्वम, सह, पश्चाता स तत्र लक्ष्येत ? न तावत्पूर्वम , तहकार्यस्य ततः पूर्वमसम्भवात् । नापि सह, कार्यकारणयोः सहभावानुपपत्तो, युगप-प्रत्यक्षद्वयत्याप्रतिवेदनाच । न हि तदैव मानसमिन्द्रियञ्च प्रत्यक्षद्वयमनु. भवादर्शविशदवपुपि प्रतिफलितमवलोकयामो यतस्तथावकल्पयेम अनियमप्रसङ्गात् । न ह्यनव. १० लोकितापकल्पनस्य नियम:-'द्वयमेव तत् न तस्त्रयादिकम्' इति, स्वेच्छानिबन्धनस्य तत्राप्य निवारणात् । नापि पश्चात् , तदेन्द्रियव्यापारे तेत्प्रत्यक्षताया एव तत्रोपपत्तेः । अतयापारे न विशदप्रतिभासप्रतीतिः । न कल्पनया तदस्तित्वम् , अन्यादावप्यविशेपात् । नन्वयमेव तस्य तस्माद्देवो यनिश्चयरूपत्वम् । निश्चयरूप हि मानसमवलोक्यते 'इद नीलम् , इदं पीतम्' इत्यु- ल्लेग्यतस्तस्योपलम्भात् न तथेन्द्रियज्ञानस्येति चेत् , एवमिन्द्रियज्ञानस्यैव निश्चयरूपत्वे को १५ दोपः १ वद्विपये कथं संशयादिः निश्चयविरोधादिति चेत् ? मानसविषयेऽपि कथं तदविशे. पात् । न भवत्येवेति चेत् , किमिदानीमनुमानेन, संशयादेरनुत्पन्नस्य व्यवच्छेदासम्मवात् । यत्र मानसं तत्रोपात एव संशयादिरिति चेत्, न, सतीन्द्रियज्ञानादो तत्कारणे मानसस्यासम्भवानु. पप': । सम्भवोऽपि तस्य नीलादापेव न आणभङ्गादावतः तत्र संशयादिव्यवच्छेदात्सफलमेया- नुमाननिति चेत , न, निरंशवस्तुवादिनी भागशो वस्तुपरिच्छेदस्यासम्भवात् । न च २० निश्चयानिश्चयरूपतया व्यापृतेन्द्रियस्य प्रत्यक्षद्वयम् , अनुपलक्षणात् । यत्पुनरेतत्-समानकालमाकारद्वयमिदमैन्द्रियं मानसञ्च, तस्स चैकत्वाध्यवसायाद् वियेकेनानुपलक्षणमिति तत्र कुतस्तद्ध्ययसाय: ? न तावदैन्द्रियात् , सस्यानध्यवसायस्व. भावत्वात् । न बनध्यवसायोऽध्यवस्यवीत्युपपन्नम् , अलोचनो लोकयतीतिवत् । एकत्ववेदनमेव तदभ्यवसायो नेकत्वविकल्पन तथाविरुद्धमेन्द्रियस्याध्यक्षस्यापीति चेत् , उन्यते- . . । २५ तवेदन चेदभ्रान्त तथ्यमेकत्यमापतेत् । आकारद्वयमित्यादि तन्मिध्येव भवद्वयः ॥११९९।। भ्रान्तमेव पदिष्टं चेत्प्रत्यक्षं तत्कथं मतम् । अभ्रान्तत्वं यतो बोद्धेवुद्धमध्यक्षलक्षणम् ॥१२००॥ । इन्द्रियज्ञानाए । २ इन्द्रियप्रत्यक्षताया । ३ मानसप्रत्यक्षस्य । ४ समादी ।
५२६ म्यापविनिश्चयविधरणे ( १९६२ १० ب - एकत्वभागे प्रत्यक्ष तन्मा भूदिति कल्पने। "प्रत्यक्षवेद्यमेक्त्यम्" इत्युच्चैर्युष्यने कथम् १ ॥१२०१॥ अभिप्रेत्य चिदाद्यशं प्रत्यक्षं यदि तन्मतम् । वाच्यः स एव वद्वद्यः क्यमेकत्वमुच्यते ॥१२०२।। प्रत्यक्षाशात्स्यचिच्चेद् विनमस्याविभेदनात । प्रत्यक्षद्यमेकत्वमित्युक्त व्यत्या गिरा ||१२०३।। निर्णयादरिभेदोऽपि भदेव तथा सति । "इदमित्य क्षविज्ञान" न ततो मानस परम् ॥ १२०४॥ धुतश्वाय प्रत्यक्षस्य स्वरूपे विभ्रगः १ कारणदोपादिति चेत , न- "हेतुदोपान प्रमेये धीरतथापीति युक्तिमत् । स्वरूपेऽपि कथं युक्ता हेतुदोपशतादपि ॥" [ इत्यस्य विरोधात् । अनेन कारणदोपादपि स्वरूपविभ्रमाभावस्य प्रतिपादनात । ततो मेन्द्रियादेकत्वाध्यवसाय. । मा भून्मानसादेव तदभ्युपगमादिति चेत् , न, तस्यापि स्वरूपेऽप- वसायशून्यत्वात् , स्वरूपाय च प्रत्यक्षकत्वेनाभ्यवसेयतया प्रस्तुतत्वात् । अपि च, सध्ययसायो यर्थाध्यवसायसमसमय , तदा "नच युगपदनेक विकल्पमम्भः" ] इत्यस्य विरोधः । सद्भिन्नसमयश्चेत् , न , तदुभयारम पस्य मानसम्याक्षणिक्त्वप्रमद्गात् । तन्न मानसादपि तद्ध्यवसाय । नापि ज्ञानान्तयत् , तस्यापि तत्समयस्यानुपलक्षणान् । एकत्वाध्यवसायादनुपलभणमिति चेत् , न , तदन्यतोऽभ्य. वसायेऽनसरधोपपत्ते । भिन्नसमयत्वे तु तस्य ततस्तयोरेक्त्याध्यवसाय वत्समये २० तयोरेवाभारात, असतोधावियेकनिश्चयानुपपत्तेः। तन तयोरेवत्वाध्यवसायाद् भेदस्यानुपलक्षणम् अपि स्वभागदेवेत्युपपन्नम्-'भेदः' इत्यादि । शान्तभद्रस्त्वाह-यद्यपि प्रयवतस्तस्य तम्मा दोन रक्ष्यते कार्यतो रक्ष्यत एव । कार्य हि नीलादिविकल्परूप स्मरणापरव्यपदेश न कारणमन्तरेण, पादाचित्करवास । न पाक्ष- ज्ञानमेव तस्य कारणम् । सन्तानभेदात् प्रसिद्धमन्तानान्तरत ज्ञानव । ततोऽन्यदेवाक्षाना- २५ चैत्कारणम् , तहेव च मानस प्रत्यक्षमित्येतदेव दर्शयित्वा प्रत्यापित्यासुराह- अन्तरेणेदमक्षानुभूतं चेन्न विकल्पयेत् ॥१६॥ सन्तानान्तरपच्चेनः समनन्तरमेव किम् । इति । अन्तरेण विना অন্য মানঃ সংগদু অনুমুন নিবযান- विषयात नीलदिन विकल्पयेत् नीरादिषमिदमिति नानुस्मरेस्लोकः सौगतो वा । सत्यपि , 1-1-०,५०,५।२'दभि यदि यम्मानमभ्यागापुरत थिने । माशावरणातत्तु प्रय मानव मतम् ॥"-:. भाविकार. २१३३ -वर-मार,...।
. १० १२१६२] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्ताव मानसप्रत्यक्षे तदनुभूतमेव विकल्पयति नाक्षानुभूतं तत्किमक्षाहणेन ? तद्धि तदानीमर्थवत् यदि सति तस्मिस्तदनुभूतं विकल्पयेत् , न चैवम् , अतोऽनुभूतग्रहणमेव कर्तव्यमिति चेत् ; अन्यथा तर्हि व्याख्यास्यामः- अनुभवनमनुभूतम् , अक्षाणां कार्यगनुभूतम् अक्षानुभूतम् अक्षज्ञानमिति यावत् , तत्कर्तृ इदमन्तरेण न विकल्पयेत् न विकल्प नीलादिस्मरणं पुर्यान । अत्र चोपपत्ति:-सन्तानान्तरवत् इति । सन्तानस्यान्तरं भेदः स विद्यतेऽस्येति ५ सन्तानान्तरवत् अक्षानुभूतम् । एतच्च हेतुपदं द्रष्टव्यम्-सन्तानान्तरवत्वादिति, विपाणी गोरित्युक्ते विपाणित्यादितिवस । सद्वत्वच तस्य तेन योगपद्यात, “मनसोयुगपद्वृत्तेः [प्र. वा० २। १३३] इति वचनात् । न च युगपद्वत्ता उपादानोपादेयत्वं तन्निबन्धनं चैक- सन्तानत्वम् । उदाहरणस्यतु प्रसिद्धसन्तानान्तरतदनुभूतस्य सुगमत्यात् अनुपन्यासः। चेच्छब्दः राफूतचोदनः । तत्रोत्तरम्-'चेतः' इत्यादि । एक्कारः किमोऽनन्तरं द्रष्टव्यः । चेतो मानस प्रत्यक्षं समनन्तरम् उपादानं किमेव नैव, विकल्पस्येति शेप: । न हि मानसं विकल्पस्योपादानमुपपन्नम् । इन्द्रियज्ञानसमभाविनरतस्य ततः प्रागेव भावात् , तस्य चेन्द्रिय- ज्ञानकार्यतया पश्चादेवोत्पत्तेः । न च भाव्यपि समनन्तरमिति प्रज्ञाकरादन्यस्य मतम । तत्रापि चेत इन्द्रियज्ञानं समनन्तरम् उपादानं मानसस्य किमेव नैच, अपि तु विकस्पवदुपादेय- मेव स्यात् । तथा चेत् , न; मानसस्य निरुपादानसत्तापत्तेः । तदेवाह-चेत इति । एक्कार. १५ इचत शब्दात्परो द्रष्टव्यः । मानसस्य समनन्तरं चेत एवास्ताम् । अन्यदित्यवधारणम् , किंन फिश्चित् । उत्तरं मानसमेव वस्य समनन्तरमिति चेत् , न तहदिमुपपन्नम "इन्द्रियज्ञानेन" [प्र० वार्तिकाल० २। २४३] इत्यादि । इन्द्रियज्ञानं तस्योपादेयमुपादानं चेति चेत् ; क्मेिवं विकल्प एच न भवेदविशेपात् ? तदेवाह-चेत एव इन्द्रियज्ञानमेय समनन्तरं मानसस्य किं कस्मात् , विकल्पोऽपि स्यात् । एवञ्च 'विकल्पान्मानसं ततश्च विकल्प:' इत्यन्योन्यसंचय २० इति मन्यते । भवत्ययं प्रसङ्गो यदि तयोः परस्परत आत्मलाभाडेतुफलभावो भवेत, एका- निष्पत्तावन्यानिष्पत्तेः । न चैवम् , पुतश्चित् पस्यचिदात्मलाभस्यैव विचाराधिष्ठितस्याप्रति- छानात् , अत एवोक्तं "निष्यत्तेरपराधीनम्" [प्र० वा० २। २६ ] इत्यादि , अपि तु नान्तरोयकत्वात् । न हि स्वकालभाविनं विकल्पमन्तरेण मानसम् , नापि तादृशं तदन्तरेण विकरूपः, सतो न परस्पराश्रय इति चेत् ; न, नत एव सन्तानभिन्योः युगपद्वृत्तिचित्तयोरपि २५ राहावापत्तः । न हि विना देवदत्तचित्तेन यज्ञदत्तादेश्चित्तम , तदेकचित्तस्यैव जगतः प्रातः तत्प्रयन्ध- स्याविच्छेदात , न चैवम , अतोऽस्ति तयोरप्यविनाभावान्मियो हेतुफलभाव शत पथं सन्तानान्तर- चित्तपरिहारेण मरणचित्तादुत्तरभवाद्यचित्तस्यैवानुमानं यतो निश्चिता परलोक सिद्धियों द्वस्य ? तन्न भाविनो मानसाद्विकल्यः । भवतु पूर्वस्मादेव, पूर्वाह्मज्ञानजन्मन इति चेत् । तस्याक्षिानेन योफसन्तानत्वम् , सटुपादेयस्य विकल्पस्यापि स्यात , देवदत्तेनैव तत्पीत्रस्य । तथा चाक्षज्ञानादेव ३० - . -- १-वरकत आ०,40,401 २ विमनन्तरं आ०,५०,८०१३ -सहभा-०,३०प०। उपादानम् । ५-तरभाषाय-भा०,५०, ५-६-ज्ञाने य-आ०,०, पः।
५२८ म्यायविनिश्चयविवरणे ।११६३ विकल्प इति किमानसेन ? तदाह-चेत इति । चेत एव अक्षज्ञानमेव न मानसम् । कि कस्मात् न विकल्पयेत् इति सम्बन्धः । कीदृशम ? समनन्तरं परेण मानसस्योपादानमुक्त यदि भिन्नसन्तानत्वम् ; तर्हि यथा ततो न विकल्परतथा मानसमपि न भवेत् । न हि मण्डूकस्य पिता 'गण्डूपाद् भवति । तदाह-चेत इति । चेतः अक्षज्ञानं समनन्तरं मानसस्यो- ५ पादानं किमेवं नैव विकल्पवत् । तत्रैव दोपचयमाह- शकुलीभक्षणादौ चेतावन्त्येव मनांस्यपि ॥१६२॥ यावन्तीन्द्रियचेतांसि प्रतिसन्धिन युज्यते । शकुल्या भक्ष्यविशेपस्य भक्षणमादिर्यस्य तदा प्राणादेस्तस्मिन् , चेत् यदि तावन्त्येव तत्परिमाणान्येव न न्यूनान्यधिकानि वा मनांस्यपि मानसप्रत्यक्षाण्यपि, १. केवलमक्षज्ञानानीत्यपिशब्दः । यावन्ति यत्परिमाणानि इन्द्रियचेतांसि इन्द्रियप्रत्यक्षाणि पतिसन्धिः प्रत्यवमझे न युज्यते । तात्पर्यमत्र-यथेन्द्रियज्ञानपरिमितानि मनांसि तथा तजन्मानो विकल्पा अपि तत्परिमाणा एवेति क्थमयमेकः परामर्श:-'रूपादिकमहमेवानु- भवामि' इति । तदभावे च रूपादीनां कथमेकघटादिव्यवहारविषयत्वम् । एकात्यवमर्शवलादेव तदुपगमात् । "एकप्रत्यवमर्शस्य हेतुत्वाद्धीरमेदिनी। एकधीहेतुभावेन व्यक्तीनामप्यभिन्नता ॥" [प्र०या० ३।१०८ ] इति वचनात् । तम तावत्वं मनसामुपपन्नम् । अथैकमेव सकलरूपादिविषयं तेभ्यो मनस्तदाह- अर्थक सर्वविषयमस्तु इति । सुबोधमेतत् । अनोत्तरम्- किं वाक्षबुद्धिभिः ॥१६३॥ इति । अक्षघुद्धिभिः पक्षाने किंवा विमिव तदेवम् , न किचिदिह निदर्शनमस्ति । जलाहरणादिक मस्त्येव, तस्य घटादिव्यपदेशभाजोडनेकरमादेव रूपादेरेकस्य भावादिति चेत् । न, नस्य सत्रानुपादानत्वात् , एकान्ततस्तदनेक्त्वस्य चाप्रसिद्धः । एकोपादानमनेकमिव तंदुपा- २५ दानमेकमपि कम्मान भवति ? दृश्यने हि नीलेक्ज्ञानोपादानं पटीभक्षणादी रूपादिज्ञानपञ्चक. मिति चेत् ; न ; तस्याप्यसिद्धः, रूपादिविषयस्यैकस्यैव मेचकस्य प्रतीतः । 'यावन्तीन्द्रि- यचेतांसि' इति तु परप्रसिद्ध्यवाभिहितः । तन युक्तम्-एकम् इत्यादि । साम्प्रतं मनसामक्रमोत्पत्तायुक्तं प्रतिसन्ध्यभावं क्रमोत्पत्तावपि दर्शयन्नाह- ! गाडूपाद् भव-मा०, २०, ५० किबुलुक । 'देचुआ' इति भाषायाम् । २ "विकल्प "-साटि १ अनेकोपादानम् । १५ J .. , प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावा ५ - क्रमोत्पत्तौ सहोत्पत्तिविकल्पोऽयं विरुध्यते । इति । क्रमेण मनसाम् उत्पत्ती अभ्युपगम्यमानायां सहेवोत्पत्तिर्यस्य रूपादिपरा- मर्शस्य सोऽयं प्रतीयमानो विरुध्यते । सत्युपादानक्रमे 'तदनुपपत्तेः। ततो रूपे मना, पुनस्तद्विकल्पः, ततो रसे मनः, पुनस्तद्विकल्पः, तथान्यनापीति विकल्पैर्मनोव्यवहितैः मनोभिश्च विकल्पव्यवहितर्भवितव्यम् । न चैवम् , प्रतीत्यभावादिति भावः । स्यान्मतम्-पश्चादेक एव तेभ्यस्तद्विकल्प इति ; तन्न, इन्द्रियज्ञानक्रमोत्पत्तावप्येयं तद्भावप्रसङ्गात् । भवस्विति चेत् । अत्राह- 'क्रम' इत्यादि । कमोत्पत्ती इन्द्रिययेतसां सहोत्पत्तैरिन्द्रियज्ञानयुगपटुत्पादस्य विकल्पो निश्चयः "तसात् सन्तु सकृद्धियः ।" [प्र० वा० २।१३५] इत्ययं परस्य प्रसिद्धो विरुद्यते । कथं वा मनसां प्रत्यक्षत्वम् यदि न स्वसंवेदनम् ? तद्रूपस्यैव स्वयं तदभ्युपगमात् । खवेदने तु तत एष तत्प्रसिद्धः किं 'विकल्पतः ? तदनुमानेन निम्वयार्थम् , निश्चितस्यैव सिद्धत्वात , स्ववेदनस्य चाविकल्पत्वे. नानिश्चयत्वादिति चेत् ; न ; विकल्पस्याप्येवं खतोऽसिद्धिप्रसङ्गात् , सदनुभवस्याप्यनि- श्चयत्वात् । निश्चयान्तरात्तत्सिद्धिफल्पनायाम् अनवस्थोपनिपातात , असिद्धस्य चालिङ्गत्वात् । अनिश्चयेऽपि तत्प्रसिद्धी मनसामपि स्यादविशेषादिति व्यर्थमेव ततस्तदनुमानम् । इदमेवाह- अध्यक्षादिविरोधः स्यात्तेपामनुभवात्मनः ॥१६४॥ इति । आत्मनोऽनुभवः अनुभवात्मा, राजदन्तादिपु दर्शनात आत्मशब्दस्य परनिपातः, ततोऽनुभवात्मनः स्वानुभवस्य तेपां मनसा सम्बन्धिन 'उत्पत्तायपि' इति सम्बन्धः । तत्र दूषणम्-अध्यक्षमादिर्यस्य तद् अध्यक्षादि अनुमानमिति यावत तस्य विरोधो वैफल्येन परिपीडनं स्याद् भवेदिति । अथवा, नेपामिति सहोत्पत्तिविकल्पपरामर्शः प्रक्रमात् । बहुवचनं पुनर्व्यक्तिबहुत्यापेक्षम् , तेपाम् । कस्यां किम् ? अनुभवात्मनः २० अनुभव आत्मा स्वभावो यस्य तद् अनुभवात्म, प्रक्रमात् मानसं प्रत्यक्षम् , तस्मात् । उत्पत्तावधिकृत्याभ्युपगम्यमानायाम् अध्यक्षेण आदिग्रहणादनुमानेन च विरोधो बाधः स्यात् । प्रत्यक्षेण तावद्भवति ततस्तदुत्पत्तेर्वाधा, तेनेन्द्रियज्ञानादेव तदुरपत्तिप्रतीतेः, तथा हानुभव:- 'मया युगपञ्चक्षुरादिना रूपादिकमन्वभावि' इति । नवदनुमानेनापि , तेनापि तस्मादेव तदुत्पत्तेरध्यवसायात् । तथा हि- यद्यस्यान्वयव्यतिरेकाषनुविधो सत्तस्यैव कार्य २५ कुलालादेरेव (रिव)कुम्भादिः, अनुविदधते चेन्द्रियस्यान्वयव्यतिरेकी सद्विकल्पा इति । अनुकृतान्वयव्यतिरेकादन्यस्य च तद्धेतुत्वालानायां न क्वचित् कश्चिनियतो हेतुः फलं वा भवेत् । तन्न शान्तभद्रपक्षा' ज्यायान् । , १ सहोत्पत्यनुपपत्ते । २ विकलस्तद-आ०, ब०, ५० ।३-न तलि-आ०, य०,१०। ५ "राजदः न्तादिषु परम्"-पा. सू० २१ २२३३१५-कल्याना प-आ०, २०,२०१६ तस्या आ०, ५०, ५०1७-लो न्यायात् ता॥ :
५३० । १० ग्यायचिनिधयविवरणे [२१६५ धर्मोत्तरस्स्वाई-न प्रत्यक्षादिप्रसिद्धत्वात् मानसं प्रत्यक्षमिप्यते यतोऽयं दोपः किन्वा. गमाधोगत्वात् । तत्र च परे दोषमुद्गावयन्ति-यदि मानसमपि किश्चित्प्रत्यक्षं तहि नान्धो नाम कश्चित् लोचनविक्लस्यापि तत्सम्भवादिति तत्परिहाराय तहक्षणप्रणयनम् 'इन्द्रिय- ज्ञानेन' इत्यादि । न हीन्द्रियज्ञानमन्धस्य यतस्तदुपादानस्य मानसप्रत्यक्षस्य तर भावात्तन्यवहारो ५ न भवेदिति । तत्रोत्तरमाह- वेदनादिवदिष्टं चेत्कथं नातिप्रसज्यते । इति । वेदना सुसायनुभूतिरादिर्यस्य संज्ञादेस्तत्त इष्टम् अभिमतम् प्रत्यक्षं चेत् यदि । दूपणमत्र-'कथम्' इत्यादि सुनीधम् । तथा हि- अस्वसंवेदनं तच्चेन् प्रत्यक्षत्वेन गम्यते । ऐन्द्रियादिकमध्येवं तथा घातिप्रसञ्जनम् ॥१२०५॥ "अप्रत्यक्षोपलम्भस्य" इत्यादि निर्विषयं भवेत् । आगमादेव पसिद्धं कथमस्तु स्ववंदने ॥१२०६॥ बुद्धश्चैतन्यमप्यन्यन् प्रत्यागमनिरूपितम् । भवेदित्यपि बुद्धोक्तं कथन्नातिप्रसज्यते । ॥१२०७]] प्रमाणबाधस्तुल्योऽयमुभयनात एव हि । 'अध्यक्षादिविरोधः स्यात्' इत्यमाणि मनीपिणा ॥१२०८॥ यत्पुनरतम्-विप्रतिपत्तिनिराकरणाय तल्लक्षणमुच्यत इति , तत्राह- प्रोक्षितं भक्षयनेति दृष्टा विप्रतिपत्तयः । ॥१९५॥ इति । प्रोक्षितं मन्त्रिताभिरदिरभ्युक्षितं भक्षयेत् मांसमिति वैदिकाः । तदुक्तम्- "मोक्षितं भक्षयेन्मांसं ब्राह्मणानां तु काम्यया । यथा विधिनियुक्तस्तु प्राणानामेव चात्यये ।" [मनु० ५।२७] इति । न भक्षयेत्प्रोक्षितमपि तु 'पात्रपतितं त्रिकोटिशुद्धम' इति 'बौखाः, इति एवं दृष्टाः 'उपलब्धा विप्रतिपत्तयो बहुवचनमन्यासाम् अपि तासाम् 'योगात्स्वर्गः, चैत्यवन्दनात् "स्वर्ग:' इत्यादीनां परिग्रहार्थम् । तथा च तन्निवर्तनार्थमपि प्रमाणशास्त्रे तल्लक्षणमभिधातव्यमिति मावा, २५ यत्त्वपरिच्छेदं प्रत्युपयोगित्वेन "तं प्रत्यनुपयोगात् । तदेवाह- २० १ "एतच सिद्धान्तप्रसिद्ध मानरां प्रत्यक्षम् , न त्वस्य साधकमस्ति प्रमाणम् ,एव जातीय सद्यदि स्यात् न पश्चिद्दोष स्य दिति वएं लक्षणमास्यातमस्येति ।"-न्यायवि०टी०पृ०१९ । २ यदा चेन्द्रियज्ञानविषयोपदेयभूत क्षयो गृहीनस्तदा इन्द्रियज्ञाननागृहोतस्य विषयान्तरस्याग्रहणादन्यधिरावभावदोपप्रगलो निरस्त ।"-न्यायवि०सी० पृ० १९३ अन्धादिव्यवहार । ४-न क्षाम्यते आ०,१०,१० १५ द्रष्टव्यम्-पृ०४६९ टि०७१६ माझ्यागम । ७ युद्धोतं भा०,०प०१८ सोनि भा०,५०,५१९ "तहि खो भई जीवक यदि मंसं अपरिभोग ति पदामि दिहं मु परिशंक्ति सो भई जीवक यानेहि मंसं परिभोग ति पदामि अदि अमुनं भरिमकिन"- मशिम आवरसुस । १० वैदिकानाम् । " योद्धानाम् । १२ विपत्तिपत्तिनिराधरण प्रति। ...
५ १।१६७] प्रथामा प्रत्याप्रस्ताव लक्षणं तु न कर्तव्यं प्रस्तावानुपयोगिषु । इति । तुशब्दः कर्तव्यमित्यतः परो द्रष्टव्योऽवधारणार्थश्च । तस्यमर्थः-लक्षणं न कर्तव्यमेव , प्रस्तूयते प्रमाणकरत्वेनाधिनियते इति प्रस्तायो हेयोपादेयतत्वनिर्णयस्तन अनुपयोगीनि मानसमांसभक्षणादीनि तेषु । पहुवचनं मांसभक्षणादिनिदर्शनपरिहार्थम् । तन्न धर्मोत्तरमतमपि न्यायधर्मादनपेतम् । माम्प्रतम् 'अविकल्पकम्' इत्यादिना सामान्यतः प्रतिक्षिप्तमपि स्वसवेदनप्रत्यक्ष युक्त्यन्तरेण प्रतिभिपन्नाह- अध्यक्षमात्मवित्सर्वज्ञानानामभिधीयते ॥९६६॥ म्वापमूर्छाद्यवस्थोऽपि प्रत्यक्षी नाम किं भवेत् । अध्यक्ष कल्पनाविभ्रमविपल्वेन आत्मवित् आत्मवेदनम्, अभिधीयते १० सोगतः । तत सर्वज्ञानानां विकल्पेतरभेदाधिष्ठाननिरनशेपनोधानाम् , तदुक्म्-"सर्वचित्त- चैतानामात्मसंवेदनं प्रत्यक्षम्" [ न्यायरि० १० १९ ] इति । अनदूपणम्-सापश्य स्वप्नदर्शनविकलोऽवस्थाविशेषो न तदर्शनरान् , तवस्थस्य रसयमपि प्रत्यक्षत्वोपगमात् । मूर्छा प मर्ममहारादिनिमिचश्चित्तव्यामोहा, खापमूळे ते आदी यस्योन्मादादेः म वापमूर्छादिः स्वनिश्चयवैकल्याविशेषेण स्वार एघ मूर्छादेरन्तर्भायेऽपि पृथगुपादानम् , १५ 'निमित्तभेदतो भेदस्यापि भावात् । अन्यदेव हि प्रासादशयनादिक निमित्त स्वापस्यान्यदेव च विशेषोपयोगादि मूर्छादेः । तथा कार्यभेदादपि, मुतस्य 'निर्भपन्ति प्ठेपधु (१) च शरीरं तद्विपरीत मूर्चिछतादेरपि । स एवावस्था यस्य सोऽपि न केवलं तद्विपरीत इत्यपि शब्दा प्रत्यक्षी प्रत्यक्षवान् नाम पुटं किन्न भवेत् ? नकारस्य पूर्वश्लोकादनुवृत्तेः, भवेदेव । तत्राप्यात्मसंविदो भावात् , तथा च कथमस्थाचतुष्टयप्रतिष्ठेति भावः । रावस्थस्य ज्ञानमेव नास्ति, तद्भावे जामत इव तत्वविरोधाततः पथमात्मवेदनम् । यतोऽयं प्रसङ्ग इति प्रज्ञाकरो प्रशावादी च, तेनापि उदवस्थाया जीवस्य परमात्मरूपसम्पन्न सया विशेषविज्ञानोपरमस्योपगमात् । "प्राज्ञेनात्मना सम्परिपक्तो न चाहां किञ्चन वेद नान्तरम्" [ददा० ४।३।२१] इति श्रुतेः । तमोत्तरं दर्शयति- विच्छेदे हि चतु:सत्यभावानादिविध्यते ।।१९७॥ इति । २० २५ , नुग्ना-"मुग्ध यदाविचिरमपि नोच्यामिति, सवेरपुररर देहो भाति, भवानई प पदनम् , विश्परिने नेये। गुगुतस्तु प्रमालादनस्नु यच पुन पुनप यासिति निमामिने सय मेरे मन । निशि भेदय भाति मोहरपयो, मग एम्पातादिनिमितरा मोहस्य, अदिनिमियालय मर"-41. मा. २. | २-निर्भपन्ति रेग्यु पा. सा. । ३ जामसनमुशिनुरी र वरपा । 'योनमार र गुम मृतदो रग वि-"--. पाविसाल. 1५। ५ "गुमिनाम शनायो पालि । अाए शुति -'यत्र गुमो नसान पार्म काम न करन मन पति तन् मान्"- पृ. उ० ४।३ ।।
. . म्यायविनिश्चय विधरणे [१११६७ स्वापादौ विच्छेदे उपरमे विज्ञानानामिति सम्बन्ध, हि यस्मान चतु:सत्यं दुप. समुदयनिरोधमार्गलक्षण तस्य भावना प्रबुद्धेन मुहुर्मुहुश्चेतसि परिमलन सा आदिर्यस्य गुणादिप्रकाशस्य ब्रह्मलोकात प्रत्यागमस्य च स विरुध्यते । तस्मात् सन्ति तदा विज्ञाना नीति कथन कथितो दोप, १ तथा हि- यदि पापादो शानविच्छेद कुनः प्रयुद्धस्य तत्सत्य ५ भावन सनिहितस्य तदीनस्याभावार ? जापवस्थामारिन इति येत्, न , तस्य चिरनष्टत्वेन कारणत्वानुपपत्ते, अन्यथा आत्मदर्शनचीजादपि चिरग्रहीणादेव सुगतस्य जन्मदोपसमुद्भव. लक्षणाया पुनरामृत्ते सम्भवात् , असम्भवदर्थमेतद्भवेत्- "अपुनरावृत्या गवस्सुगत." ] इति । यदि पुनस्तस्य सम्यग्ज्ञाननिटुप्पशक्तिकत्वान्न कालान्तरेऽपि तत्फलम् , चा सत्यभावनाफलमपि तदीनान भवेत् , गस्यापि स्वापादिनिलप्सशक्तिकत्वात । दृश्यत इति १० चेत् सत्यम् , दृश्यते, चिरनगदिति तु न दृश्यने, मैनिहितादपि तदुपपत्तेः। यदि सनिहित- ज्ञान एव स्वापादि कथमस्थान्तराद्विशिष्यत इति चेत् ? आस्तामेतत् । अपि च, कथमेव प्रत्यक्षानुमानाच्या प्रवर्तमानस्य नियमेनाविसवादः । जाम ज्ञानात् प्रयोधचित्तवत् "चिरकाला पान्तादपि नलपायकादेतदुत्पत्तिपरिकल्पनाया नियमतस्तदर्थरियावाप्तेरसम्भवात् । तद्रु पत्याचाविसवादयं । ततो न सुभापितमेतत् "नं ह्याभ्यामर्थ परिच्छिद्य प्रतिमानोऽर्थ- १५ क्रियाया विसवाद्यते "[ ] इति । नव सन्निहितादेव ततस्तदुत्पत्तिमभ्युपग च्छता चतु सत्यभावनापि सन्निहितहेतुकै पाभ्युपग- तव्या । न च सद्भावना नेप्यत एव, तन्मूलत्वात् सकरगुणदोषप्रकाशरूपस्य योगिज्ञानस्य । तदुक्तम्-- बहुशो पहुधोपाय कालेन बहुनाऽपि च । गच्छन्त्यम्यस्यतस्तस्य गुणदोषा प्रकाशताम् ॥" [५० वा० १११३०] इति। तथा यदि स्वापादो परमात्मसम्पन्नतया विशेषविज्ञानविकलो जीव कथ तस्य पुन रुत्थानम् । तस्य तद्विज्ञानमूलवास, तस्य च तदानीमभावात् । लेशतस्तद्भावेऽपि तदात्मा पत्तेरनुपपत्ते निवृत्तनिश्शेषाविद्यासस्पर्श हि परमात्मरूपम् , तत्कथ तदापन्नस्य जीवस्यापि 'तल्लेशसस्पर्श सद्रूपस्यैव तत्प्रसङ्गात् । भवतु जामत्समयभाविन एव विशेषज्ञानात्तस्य पुन रस्थानमिति चेत्, न, ससारसमयमाविनस्ततो मुतस्यापि तत्प्रसङ्गात् । "तस्य विद्यावलोपर- २५ मितस्य न तद्वेतुत्वमिति चेत् , स्वापादिलोपरतस्य कथम् ? शास्त्रप्रामाण्यात, श्रावयत्ति हि शा त्रम्-"पुन प्रतिन्याय प्रतियोन्याद्राति" [हदा० ४।३।१७] इत्यादिक सुषुप्तादे पुनरुत्थानम् , ततो युक्तं तदनि प्रस्यापि तद्वेतुत्वम् , अन्यथा तदनुपपत्ते । न चैव मुक्तस्य २० १ परिमेलन आय०,०। २ प यम् १० ३६रि०६३ सन्निहितादेव । ४ चिखालप्रोतादपि -आ०,५०,०। ५ ज्ञानोपनि। ६ उत्तम मुगलेन-यमाणमावसंवारिपामिवियाथितिरविसवादनम् [प्रवा०11३]-ता टिक। • नान्यामय मा बा, प० । ८ पुनयानस्य । ९ वरमा गाने ।। अविद्यालेश। ।। ससारसमयमाविन । १२-परदितस्य पा०, २०, २० ।
२१६८] प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्ताषा ५३३ । पुनरुत्थानम, निरवधिनिर्मोक्षायैव श्रवणान् । तन्न विद्यावलपराहतम्य तत्कारणत्वनिर्वन्धोऽ- यमुपपत्तिबन्धुर इति चेत् ; नन्वेवं शास्त्रमेवाप्रमाणं स्यात् , निरवयवपरमात्मसमापनत्वेन शाचितयोः सुपुप्तनिर्मुक्तयोः पृथक्करणेन मिथ्याच्यापारत्वात् द्विचन्द्रादिबोधवत् । नास्त्येव तेन वयोः पृथककरणं तदाभासयोरेवोपाधिगतयोः पृथक्करणात् , तयोश्च जलसूर्यादिवद्धदस्यैव प्रसिद्धरिति चेत् ; भवत्वेवं तेन तयोः पृथक्करणम् , परमात्मापत्तिस्तु कथं श्राव्येत अवस्तुनो वस्तुरूपापतेविरोधात् वस्तुनस्तदन्यरूपापत्तियत् ? कथं तर्हि जलसूर्यादैर्जलाधुपरमे सूर्याद्या. पत्तिरिति चेत् । न तत्राप्याधारोपरतो उपरमस्यैवोपलम्भात् न तदापत्तेः । एवमन्नाप्युपाध्यु. परमे तदामासयोरुपरतिरेव स्यान्न तदापत्तिः अवस्तुत्वात् । ननूपाध्यनुप्रविष्टः परमात्मैव जीवो न तदाभास एव, "हन्ताऽहममिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्पनाऽनुप्रविश्य"[छान्दो० ६।३।२] इत्यादी जीवस्यात्मत्वेन निर्देशात् कथं तस्यावस्तुत्वम् ? यतो न तदापत्तिरिति १० चेत् ; न तदपि साधु; लौकिकादविवेकाभिप्रायान तथा निर्देशान आभासस्यैवात्मत्वेन । अत. एवात्रार्थे सूत्रं भाष्यं च-"आभास एव च" [ब्रह्मसू० २।३।५०] इति । "आभाम एवैप जीवः परस्यात्मनो जलसूर्यादिवत् प्रतिपत्तव्यो न स एव सातानापि वस्त्वन्तरम्" प्रशा० २।३।५०] इति । ततो न स्यापाद्यवस्थायां विशेषविज्ञानश्याविद्याव्यपदेशस्यान्य. रूपापत्तिः, उपरतो व न तस्योन्मन्ननम् , तारशस्योन्मनने प न प्रबुद्धस्यानुभूतस्मरणादिकं १५ जीवान्तरवत् । अस्ति चेदम् । तस्मादव्यवच्छिन्नज्ञान एव स्वापादिः नित्रयवैकल्यात जाम- स्वप्नदशाभ्याम , अपरित्यक्तशरीरत्वाञ्च चतुर्थावस्थातो विशिष्यते । स्वसंवेदनमात्रस्य तु प्रत्यक्षत्वमाचक्षाणानां न तस्य जाप्रदादेविशेषः, तदात्मवेद- नस्यापि प्रत्यक्षत्वात् । तन्न निश्चयधिकलसंवित्तिमात्रमेव प्रत्यक्षम। अत्रैवोपपत्यन्तरमाह- प्रायशो.योगेविज्ञानमेतेन प्रतिवर्णितम् । इति । योगिविज्ञानं चतुरार्यसत्यगोचरं बुद्धतानम, एतेन निर्विकल्पप्रत्यक्षवादेन प्रतियर्णितं प्रतिपादितं भवतीति शेषः । कीरशम् ? प्रायशः प्रकृष्टमयशोऽप्रामाण्यलक्षणं यस्य तादृशमिति। तदपि हि कल्पनापोढत्वादेव प्रत्यक्षम् , अन्यथा वलक्षणस्याव्यामिदोपात् । नच तत स्वसत्तामात्रेण विनेयानां प्रमाणम् , अपि तु सोपायहेयोपादेयतत्त्वोपदेशात् । २५ "ज्ञानवान् मृग्यते कश्चित्तदुक्तप्रतिपराये ।" [१० वा. १९३२] इति वचनात् । सोऽपि न निर्विकल्पान् , नाप्ययेवनात् कुश्या; "विकल्पयोनयः शन्दाः ] इति वचनात् । न विकल्पसंस्काराय; योगिनस्तद्भावे विधूत- कल्पनाजालरव विरोधात । ततः सविफल्पमेन तदभ्युपगन्तव्यम् । वया च सिद्धमिन्द्रियादि- २० धार-भा०,०प० । १ "सामनेति वचनान् या मनोऽप्यतिरिमेन तन्यस्वरमवाप्रीगिन।" आन्दो० शा. मा०1३ -मबनेन च भा०, २०,०। १ दमत्तामा-भा., प.प.।
- ग्यायविनिश्चय विवरण [१९६० प्रत्यक्षगपि सविकल्पं प्रत्यक्षत्वान् योगिप्रत्यक्षवदिति । कीदृशश्च तनिर्विकल्पकम् ? निराकार- मेकशक्तिकश्चेति चेत् ; न; सस्यानेकविषयत्वाभावानुपङ्गात् , अन्यथा नित्यस्यापि वाशो. ऽनेककार्याविरोधान् न तत्प्रतिषेधः तथा च- अशेषज्ञतयेष्टस्य किविज्ञस्वायशरिस्थते। प्रायशी योगिविज्ञानमेतेन प्रतिवर्णितम् ॥१२०९॥ माकारमेकाकारं तदेतेनैव निरूपितम् । अनेकशक्तिकं तच्चेदनेकाकारमप्यलम् ॥१२१०॥ नानाशक्तितदाकारसाधारणतया स्थितम् । निर्विकल्पं कथन्नाम तद्विभ्रजातिकल्पनाम् ॥१२११॥ अविकल्पतयेशस्य विकल्पस्वायश:स्थितः । प्रायगो योगिविज्ञानमेतन प्रतिवर्णितम् ॥१२१२॥ साम्प्रतं साहायस्य प्रत्यक्षलक्षणं प्रत्याचभाण आह- श्रोत्रादिवृत्तिः प्रत्यक्षं यदि तैमिरिकादिषु ॥१६॥ प्रसङ्गः किमतवृत्तिस्तद्विकारानुकारिणी । इति । श्रोत्रमादिर्यस्य चक्षुरादेस्तस्य वृत्तिर्विषयाकारपरिणतिः यदि चेत् प्रत्यक्षम् । ननु बुद्धिवृत्तिरेवाध्यवसायरूपा साहास्य प्रत्यक्ष "प्रतिविषयाध्यवसायो दृष्टम्" [सां०का० ५] इति वचनात् , तत्कथं श्रोत्रादिवृत्तिः प्रत्यक्षमाशयत इति चेत् । न तद्वत्तेरपि बहिरिन्द्रिय- प्रणालिकयैव भावात् तद्वृत्तरेव तत्वोपपत्तेः । सति हीन्द्रियाणामालोचने मनसि सवल्पा, २० ततोऽहकारेऽभिमानः, ततश्च बुद्धायध्ययसाय इति नसिद्धान्तप्रसिद्धः। अत्र दूषणम्-तैमिरिक आदिर्यपां कामलिकादीनां तेषु प्रसङ्गः श्रोत्रादिवृत्तिप्रत्यक्षत्वस्य । तथा च द्विचन्द्रादिरपि तात्त्विक एव भवेदिति भावः । तद्बनिरेव सा न भवति यतोऽयमतिप्रसङ्ग इति चेत् अनोत्तरम्-किं कस्मात् अतवृत्तिः चन्द्रद्वित्वालोचनादिः, तस्य श्रोत्रादेविकारमनुकरोतीत्येवं- शीला न भवेदेव । भवति च, विमिरादिमा विकृत एवं श्रोत्रादौ तद्वत्तेर्भावात् । आमादिता- २५ ध्यवसायनियन्धनमेव वृत्तिस्तद्वृत्तिन वृत्तिमात्रम् ; इत्यपि न युक्तम् ; "शब्दादिषु पञ्चा]- नामालोचनमामिप्यते वृत्तिः ।" [सां० फा० २८] इति तन्मात्रस्यैव तवृत्तित्ववचनात् । -- १ एक्शक्षिात् । २ "श्रीनादिवृत्ति. भ्रान्तैपि न हि नाम न विद्यते । न च ज्ञानं विना वृत्ति. योग्रादेशप परते ॥"-. वातिकाल : २।३०।-अकलङ्क० टि० पृ. १६२ । वागण्यस्य । ३ बुद्धिवृत्तेरपि । ४ "चक्ष रूपं पश्यति, मन गद पयति, महद्वारोऽभिमानयति दिरम्यवस्यति । '-सां. का. माटर० ३० । ५ श्रौत्रा- दता भा०, २०,०। ६ "शब्दादियुपशानामाचनमामिप्यते वृत्तिः"-मा का।
- २११७० ] प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्ताव साम्प्रतं नैयायिकस्य प्रत्यक्षलक्षणमुपदर्य निराकुर्वनाह- तथाक्षार्थमनस्कारसत्यसम्बन्धदर्शनम् ॥१९॥ व्यवसायात्मसंवाचव्यपदेश्यं विरुध्यते । इति । अक्षम् इन्द्रियम् अर्थः तद्विपयो मनस्कारोऽन्तःकरणं सत्त्व आत्मा वेषां सम्बन्धः आरमा मनसा युज्यते मन इन्द्रियेण तदप्यर्थनेति क्रमेण सन्निकर्पः। तस्य कार्य दर्शनं ५ विषयज्ञानम् अक्षार्थमनस्कारसत्त्वसम्बन्धदर्शनं प्रत्यश्नमिति प्रकृतेन सम्बन्धः । इह सस्वक्षादिग्रहणमैव कर्तव्यम्, न सम्बन्धप्रहणं तदर्थस्यार्थादेव प्रतिपत्तेः । न हि विषय. शानं फुदक्षादिकं परस्परमसनिकृष्टमेव कर्तुमर्हति, परस्परं सन्निकर्पवत एव दण्डादेर्घटादि. कर्मणि व्यापारात, तद्वदक्षादेरपि तादृशस्यैव विषयज्ञाने व्यापारोपपत्तेर्भवति तत्कार्यदर्शन- प्रतिपादनवलादेव तत्सम्बन्धप्रतिपत्तिः,अतो न कर्तव्यं सम्बन्धमणमिति चेत् ; सत्यम्; १० तथापि सक्रियते संयुक्तसंयोगादेः सम्यन्धान्तरस्य प्रतिक्षेपेणाभिमतस्यैव संयोगादिसम्बन्ध. पटकस्य परिप्रहार्थम् । एवमपि बन्धग्रहणमेवास्तु तेनैव प्रत्यासत्तिवाचिना तत्पकस्यावरोधात् संशब्दस्तु किमर्थ इति चेत् ? न; बस्य 'सम् निश्चितो बन्धः सम्बन्धः' इति व्यार यानार्थ- त्वात् । निश्चयश्च सम्बन्धस्य कचित् वास्यचित् नापरस्य । तथा हि-चक्षुपो घटादिना संयोगः सम्बन्धो निश्चितो द्वयोरपि द्रव्यत्वात् । तद्गतेन रूपादिना संयुक्तसमवायोऽन्यस्या- १५ सम्भवात । रूपत्वादिना तु तत्समवेतेन संयुक्तसमवेतसमवायः तस्यैव परिशेपात् । श्रोन्नस्य तु शब्देन समवायः । शब्दत्वेन समवेतममवायः। समवायाभावाभ्यां पुनरिन्द्रियस्य सम्बन्धि- विशेषणभावः, समवायिनो घटतदवयवा इति घटादिविशेषणत्वेन समवायस्य प्रतिपत्तेः, अघट भूतलगिति भूतलविशेषणत्वेन च पटाभावस्याधिगगात् । तदेवमयमत्र सम्बन्ध इति निश्चय. योतनार्थमुपसर्गोपादानम् । एवं विश्वरूपेणापि सन्निकर्षपदस्य व्याख्यानात् । लदेव प्रत्यक्षमनभिमन्यवच्छेदार्थ शिशिनधिव्यवसायात्मव्यवसायो निर्णय आत्मा स्वभावो यस्य तत् तथोक्तम् । अनेन संशयज्ञानस्य व्यवच्छेदः, तस्याक्षादिसम्बन्धदर्शनरूपत्वेऽपि व्यवसायभावाभावात् । संवादोऽव्यभिचारः सोऽस्यास्तीति संचादि अनेनापि विपर्ययज्ञानस्य । तस्योक्तरूपस्य व्यवसायात्मनोऽपि व्यभिचारभूमिस्वात् । व्यपदेशाई व्यपदेश्यम् तद. हत्त्वञ्च सत्कार्यत्वात् , न व्यपदेश्यम अव्यपदेश्यम् अशब्दजन्यमिति यावत् । अनेनापि २५ शब्दसन्निकर्पाभ्यामुपजनितस्य 'इदं रुपम् इत्यादिज्ञानरग तस्योभयजन्मनोऽपि शादत या लोकेऽधि(भि)रडत्वात् । तदनेन "इन्द्रियार्थमन्निकर्पोत्पन्न झानमन्यपर्दश्यमन्यभिचारि- व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्" [ न्यायसू० ११११४ ] इति सूत्रमुपदर्शितम् । यद्येवमक्षार्थमह- , "बच्चेदं प्रया चतुष्टयम्यायससिकार प्रवर्तते, तत्र बाये रूपादी विर्य चतुथ्यगशिरत - मुग्गधने सात्मा मनमा संयुज्यने मन इन्दिा इन्दियमर्थनति, पुसाश तु अयमशिनमुबी राम गारादिव्यापाराभावात् , सामान तु योगिनो योरानमनसोरेर गयोगामानगुषमायो नृतीयस्य प्रास्य प्राइक्रय तामावान।"-न्य प्र. ०१२वरोधनार भा०.३०५.३ किमर्थमिति आ... । ४ सम्धवि ०,१०,५०।५ व्यवच्छेद ही साकय."-ता०टित “व्यपरटेन"-ता21 . म्यायविनिश्चयविवरणे [१।१७० णमेव कर्तव्यम् तस्यैव प्रत्यक्षकारणतया सूने निर्देशात , न मनस्वारसत्वग्रहणं विपर्ययादिति चेत्, न तस्यापि तत्कारणत्वात् , सूत्रे तु तदवचनं साधारणकारणत्वात् । साधारणं हि कारणं मनस्कायदि; प्रत्यक्षवदनुमानादावपि भावात् । अक्षादेस्तु नगोपादानं प्रत्यक्षं प्रति तस्यासा. धारणहेतुत्वप्रतिपादनार्थ न तु कारणान्तरव्यवच्छेदार्थम् । तथा च न्यायभाष्यम्-"नेदं कार- ५ णावधारणमेतावत्प्रत्यक्षकारणमिति । किं तर्हि ? विशिष्टकारणवचनम् । यत्प्रत्यक्षज्ञानस्य विशिष्टकारणं तदुच्यते। यत्तु समानपनुपानादिज्ञानस्य न तन्नि पर्त्यते।" [न्यायमा० ११११४] इति । यद्येवं सूत्रबदनाप्यसाधारणमेव कारणं वक्तव्यं नेतरदिति चेत् ; न ; तत्रापि दूपगदर्शनार्थत्वात्तद्वचनध्य ततः कुचोद्यमेनन् । तर्हि मुनद्वमिदं प्रत्यक्षलक्षण. मिति चेत , आह-विरुध्यते विचारेण पीड्यत इत्यर्थः । कथमित्याह-'तथा' इति । १० वीपसागर्भमिदम् । सदयसर्थ:-तेन तेन विशेपणरूपेण विशेष्यरूपेण तत्समुदायरूपेण च प्रकारेणेति । वथा हि- विशेषणं तावडावसायात्मकमिति विरुध्यते , निवाभावात् । संशयज्ञानं निवर्त्यमिति चेत् ; न ; तस्य सन्निकर्षपदेनैव निवर्तनात् । सन्त्रिक पजमेव तदपीति चेत; कस्य सन्निकर्षः ? स्थाणुपुरुपयोज्यतरस्य, उभयस्य वा ? न तावत्तदुभयस्य; १५ एकत्रै कहेलया तस्यासम्भवात्। सम्भवे तज्ज्ञानस्य संशयत्वानुपपत्तेः । न हि वस्तुसवि संशयो नाम अतिप्रसङ्गात् । अन्यतरस्य तु सनिक तस्यैव तत्र प्रतिभासनं भवेत् कथमितरस्य ? असनिकृष्ट- स्यापि प्रतिभासने अन्यत्रापि सन्निकर्पकल्पनावैफल्यात् । सनिष्ट एवान्यतर इतरेणापि रूपेण प्रतिभासते नापरः कश्चिदसनिकृष्ट इति चेत् ;न, इतराफारस्य तत्राभाव तेन सन्निकर्णनुपपत्तः । रूपान्तरसन्निकर्पा नेतरप्रतिभासकारणम् अतिप्रसङ्गात् । तन्न संशयज्ञानस्य सन्निकर्पजत्वम् । २० नापि विपर्ययज्ञानस्य ; विपरीताकारस्य तनाविद्यमानत्वेन सन्निकर्षानुपपत्तेः । रूपान्तरस- निकर्याच न तत्प्रतिभासनमिति निवेदनात । तद्वदव्यभिचारीत्यपि विरुध्यते ; विपर्यय. ज्ञानस्यापि सन्निकर्षवचनेनैव निवर्तनात् । तद्वदव्यपदेश्यमित्यपि । ननु च व्यपदेश्यं ज्ञानं शब्दसहायादिन्द्रियसनिकदेव भवति, तत्कथं तस्य तत्पदेन भिवर्तनमिति चेत् ? कोऽसी शमस्तस्य सहाय: १ सङ्केत्यमान इति चेत् । प्रत्युत्पन्नविषयदर्शनस्य, तद्विपरीतस्य २५ वा ? न तावत्तद्विपरीतस्य ; अदृष्टे विषये 'अयमस्य वाचकः शब्दः' इति सङ्केतस्यासम्भवात् । स्मर्यमाणे सम्भव इति चेत् ; सत्यम् ; न चासौ सन्नियः | सनिकृष्टे चेयं चिन्ता । भवतु प्रत्युत्पन्नतदर्शनस्यैवासी सहाय इति चेत्, यो तदर्शनस्यैवासी सहायो न सन्निकर्पस्य, तत एव सहायायपदेश्यज्ञानस्योत्पतेः । तदभावे सत्यपि सन्निकर्षे पूर्वमनुत्पत्तेः । अथ तदप्यारिभ्रसनिकमेव वजनयति , जनयतु तथापि न सन्निकर्षस्य तत्कारणत्वम् । २० 'इमेवम्' इति चेत् , इदमेशदाभ्यं तदर्शनस्यैव तत्पुरस्सरतया प्रतिवेदनात् । न हि .. 1-मिति कि हि विशिष्धकारममिति तर्हि -ता० १ २ तdि -आ०,१०,१०३ -स्य वाचर शब्द इति का आ०, २०, ५० ४ तदर्शनादेष । ५ तदर्शगभाव।
१।१७० भथमा प्रत्यक्षप्रस्ताव: सनिहित इत्येव सन्निकर्षोऽपि कारणम् ; सन्निधानस्याकारणेऽपि सम्भवात् । अत एव वक्ष्यति- "सनिधानं हि सर्वस्मिन्नव्यापारेऽपि तत्समम्" न्यायविश्लो० ३०१] इति । यदि घ, 'इदं रूपम्' इत्यादिज्ञानं सन्निकर्पजम् , 'अयं स गवयः' इत्यपि स्यात् । सनिष्ट एव गवये तस्याप्युत्पते। तथा च तद्वयवच्छेदार्थ यनान्तरमास्थातव्यम् , अन्यथा तस्य प्रत्यक्षत्वेन प्रमाणान्तरत्वाभावानुषङ्गात् । तदन्तररुच तदिष्टं भवतामुपमानाख्यम् । तस्योप. ५ मानवचननिमित्तत्वेन व्यपदेश्यत्वादव्यपदेश्यपदेनैव व्यवच्छेद इति चेत् ; न; व्यपदेशसाधक. तमस्यैव व्यपदेश्यत्वोपगमात् । न चोपमानस्य व्यपदेशसाधकतमत्वम् ; साधर्म्यसाधकतमत्ये- नोपगमात् । अन्यथा तस्यापि 'इदं रूपम्' इत्यादिज्ञानवत् शाब्दत्वोपपत्तेर्न प्रमाणान्तरत्वं भवेत् । प्रमाणान्तरस्यापि तस्य व्यपदेशादुत्पत्तेयंपदेश्यत्वमिति चेत् ; रूपमित्यादि- ज्ञानस्यापि प्रमाणान्तरस्यैव तथा व्यपदेश्यत्वप्रसङ्गात् । तथा चानुपपन्नमिदं भाप्यम्-१० "नामधेयशब्देन च व्यपदिश्यमानं शान्दम्" [न्यायभा० १।१।४] इति । व्यपदेशस्यैव तत्र साधकतमत्वं लोको व्यपदिशति-रूपमिदमित्येतद्वचनात् मया प्रतिपन्नं न तु प्रत्यक्षादित इति तब्यवहारप्रतिपत्तेः, ततः शाब्दमेव तत्र प्रमाणान्तरमिति चेत् ; न; इतरत्रापि तुल्यत्वात्- गवयोऽयमित्याप्तवचनान्मया प्रविपन्नं न प्रत्यक्षादित इत्यपि लोकव्यवहारोपलम्भात् । तथापि तस्याशाब्दत्येनाव्यपदेश्यपदेन व्यवच्छेद इत्यास्थातव्यमेव यत्नान्तरम् | नास्थातव्यम् , १५ सन्निकर्षवचनेनैव तस्य व्यवच्छेदात । न हि तस्य सन्निकांदुत्पत्तिः ; गवयदर्शनादेयाप्त. वचनसहायात्तस्योत्पत्तेरिति चेत्, सिद्धस्तहिं 'इदं रूपम्' इत्यादिज्ञानस्यापि तत एव व्यवच्छेदः तस्यापि नीलादिदर्शनादेव शब्दसहायादुत्पत्तेर्न सन्निकर्षात् । अत एव विश्वरूपेणापि दर्शनमेव पुरस्कृत्य संकेतकरणमुपदर्शितम्- " यदेतत्पश्यसि तस्य गोशब्दो वाचकः ।' ] इति । तदर्शनं पुरोधाय शब्दः सङ्केतितः कथम् । तदन्यस्य सहायत्वं सभिकर्पस्य गच्छतु ॥१२१३॥ सन्निकर्षपदेनैव तस्याप्येवं व्यवच्छिदि । इयमव्यपदेश्योक्तिरव्यावां विरुध्यते ॥१२१४॥ नेदमव्यपदेश्यपदं विशेपणार्थ प्रत्यक्षस्य अपि तूत्तरपदद्वयनिषेधार्थम् अव्यपदेश्यम् २५ अवकव्यम् । किं तत् ? चिरन्तने यायिकस्तद्विशेषणत्वेनाभिहितमव्यभिचारीति व्यवसाया. समिति प पदद्वयम् । तत्प्रयोजनस्यान्यत एवं भाषादिवि व्याख्यानदर्शनात् । तत इन्द्रियार्थ- सन्निकर्षोत्पनं ज्ञानं प्रत्यक्षमित्येव लक्षणमस्तु निर्दोपत्वादिति ; सोऽपि न निदोपवादी सन्निकर्पस्यैवात्ममनसोरसम्भवान् , तस्य च यथास्थानं निवेदयिष्यमाणत्वात् । भावेऽपि कार्य सन्निकर्पस्य कादाचिरकल्वम् । न हि नित्यहेतुरुस्यानित्यत्वम् ; हेत्वनित्यत्वादेव वत्कार्या. ३० -- - 1 उपमानप्रमाण वाभावानुमात । २ "उक्तदोपरिहारार्थपर. कश्चिीयायिकः साई"-ता दिन ध्यादेश्यमव्यपदेश्यम् न क्यनीयमि यर्थः ।
- - तन्न न्यायविनिश्चयविवरणे [१११७० नित्यत्वोपपत्तेः । निरूपितब्वत्' 'कारणस्य' इत्यादिना । नापीन्द्रियार्थयोः सन्निकर्षः प्रमाणाभावात् । 'व्यवधाने सत्यमहणं दृश्यते, तत्र यदि मन्निकर्षनिरपेक्षमेवेन्द्रियज्ञानं व्यवधानेऽपि स्यात् , न चैवम् , अतोऽस्ति सन्निकर्पस्तयो; यदभावाडावधाने सवि नार्थज्ञान. मैन्द्रियमित्यनुमानतरनत्प्रतिपत्तः कथं प्रमाणाभाव इति चेत् ? कोऽसो सन्निकों नाम यस्य ५ ततः प्रतिपत्तिः ? प्रातिविशेष इति चेत् । तस्यापि प्राप्तिमतो न्यतिरेके तेन क्योस्तदपरस्त- हिशेपो वक्तव्यः । तदभाये तत्सहायतया प्रत्यक्षमानहेतुत्वानुपपत्तेः । अपरतविशेपस्यापि ततो व्यतिरेके तत एव पुनरपरस्तद्विशेपो वक्तव्य इत्यपर्यन्तास्तद्विशेपाः प्रसज्येरन् । न च तेषां प्रमाणत: प्रतिपत्तिः । अथ पर्यन्ते कश्चिदव्यतिरिक्त एप तद्विशेषो भवति योग्यतारूपस्त- दयमदोप इति । प्रथमत एव तदभ्युपगमप्रसद्गात । प्रथमतस्तारशस्य तद्विशेषस्य न १० प्रतिपत्तिरिति चेत् ; पश्चात् कुतः प्रतिपतिः ? प्रागुताल्लिङ्गादेवेति येत् ; न ; सस्य प्रागप्य- विशेषात् । भवतु तप एव प्रागपि सद्विशेष इति चेत् ; न सहि नयनघटयोः संयोग: श्रवणशब्दयो समवायो व्यतिरिक्तः, तदभावे च न तत्समुदायरूपसंयुक्तसमवायादिरपीति न युक्तं पोदात्वत्र्यावर्णनं सन्निकर्पस्य । योग्यतैव यदि प्राप्तिोलकादेव तादृशात् । रूपज्ञप्तेर्वृथा चक्षरश्मीनां परिकल्पनम् ॥ १२१५ ॥ तत इन्द्रियेत्याद्यपि विरुध्यते । न या विरुध्यताम् , तथापि ज्ञानमिति विशेष्यं पदं विरुध्यते; विनापि तेन ज्ञान- स्यैव प्रतिपत्तेः, तदन्यस्येन्द्रियार्थसन्निकोदनुत्पत्तेः । मुखादिरपि तत एवोत्पद्यत इति चेत्, न; तस्यापि ज्ञानत्वात् । विषयपरिच्छित्तिरूपमेव ज्ञानम् “अर्थग्रहणं घुद्धिः" न्यायभा० ३। २० २।४६] इति वचनात् । न च सुसादिस्तत्परिच्छित्तिरूपः, आहादादिरूपतयैव प्रति. भासनादिति चेत्, न, अज्ञानत्रे स्वतःप्रतिभासाभावप्रसङ्गात् । प्रतिभासोऽपि सस्य परत एव घटादिवत् , 'सुरादिः प्रतिभासते' इति प्रतिमाससामानाधिकरण्यं तु प्रतिभा- साभेदोपचारादेव 'घटः प्रतिभासते' इतिवत् न वस्तुतः प्रतिमासरूपत्वादिति चेत् । किमिदानी तस्य वस्तुसदूपम् ? आहादादित्वमिति चेत् , न ; तस्य सामान्यरूपत्वात् । १७. सदूप एव सुसादिरपीति चेत् ; यदि मुख्यतः ; न सर्हि तस्य सत्सन्निकर्षादुत्पत्तिः नित्यत्वात् । उपचारतश्चेत् , कथं वस्तुतरतस्य तद्रूपत्वम् ? उपचरितस्य वस्तुसत्वा- नुपपत्तेः । कुतश्चोपचार १ सम्बन्धात् ; संम्बद्धो हि सुखादिराहादादित्वेन ता,प्यवयोप. फलप्यत इति चेत्न; स्वयमनिर्धारितासाधारणरूपत्ये सम्बन्धस्यैव दुरवगमत्वात् । न हि G १ श्लो०१०६ । “कारणस्याशय तेषां कार्यस्योपरमः कथम् -ता. दि० २ "न च व्यवहितार्यो- पलब्धिरस्ति तस्माध प्राप्यकारीति।"-ज्यायवा० पृ. ३५ । न्यायकुमु० पृ. २८ टि०१३ | पृ०७७ दि०२ । १ "इन्द्रियार्थसन्निकोसनमित्यादि प्रागुक्त सूत्रम्"-ता. टि.। ५ मुखादे । ५ जात्यात्मकत्वात् । ६ सम्बन्धो हि मुसाइरा-ता। तदुपनया आ.व.,० . २११७०] प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः किञ्चिदित्यम्भावानवधारितं केनचित्सम्बद्धमिति शक्यमध्यवसातुम् । तन्नोपपारसोऽपि तस्य तदूपत्वमिति कथमिन्द्रियसन्निहितादर्यायोमकुसुमस्येवोत्पत्तिः १ भवन्ती' चेयं कुतोऽवगन्तव्या ? न तावत् स्वत एव; अयोधरूपत्वात् । नान्यतोऽपि सुखादिसन्निकर्पात संयुक्तसमवायादुतन्नास तन सुपादेरेव प्रहणात् । नाप्यर्थसन्निकर्षात् ; संयोगादेरुपजातेन तेनाप्यर्थस्यैव चन्दनदहनादेः परिज्ञानात् । न चोभययोरेक्ज्ञानाविषयत्वे तत्तत्कार्यकारणभावो निर्णयविपयतां नेतुं पार्यते । ५ पार्यत एव तदुभयज्ञानजन्मना सङ्कलनेनेति चेत् । तस्य प्रत्यक्षत्वे तदिन्द्रियं वक्तव्यं यतस्त- स्योत्पतिः १ मन एवेति चेत् ; कस्तस्यार्थेन सन्निकर्पः ? संयुक्तसंयोगादिरिति चेत् ; न; तस्य सन्निकर्पनियम व्यवस्थापयता विश्वरूपेण प्रतिक्षेपात् । नयनादिकमेवेति चेत् ; न; तरय सुसविषयत्वासम्भवात् , सुसादेर्घटादिपत् प्रैनिपत्रन्तरप्रत्याविषयत्यापत्तेश्च । तन्न तत्प्रत्यक्षम् । नाप्यनुमानम् ; लिङ्गाभावात् । तद्भावभाषित्वं लिङ्गमिति चेत् ; न तस्यापि १० सुखादियहिरर्थयोरेकज्ञानाविषयत्वे दुरवगमत्वादित्युत्तस्वात् । न चैतदुपमान शाब्दं वा सादृश्यशब्दानपेक्षणात् । न चाप्रमाणतस्तदवगमः । तन्न तस्य तस्मादुत्पत्तिः, इत्ययुक्त तब्यवच्छेदाय ज्ञानग्रहणम् । तन्नावयवशो विचार्यमाणमिदमविरुद्धम । नापि समुदितम् । असम्भवदोपात् । न हि परपरिकल्पितमम्बसंवेदन जान सम्भवति; "विमुख" इत्यादिनी तस्य [ निराकरणात् । अव्यापकरचाच, अव्यापकं हीदं लक्षणं सुखादिप्रत्यक्षेण । तदपीन्द्रियार्थसन्नि- कर्पोत्पन्नं प्रत्यक्षत्यात् नीलादिप्रत्यक्षवन् , ततः कथमव्याप्तिरिति चेत् ? उच्यते-तो यदि सुखादिरख्यतिरिक्तः, न तस्येन्द्रियसन्निकर्पः, तेदमाये तस्याप्यभावात् । तद्भावेऽपि न किन्चित्तेन, तस्य प्रत्यक्षार्थस्यात् , तस्य च निष्पन्नत्वात् । व्यतिरित्तश्चेत् । न; प्रमाणाभावात् । 'सुरादिस्त त्यभात् व्यतिरिक्त तद्विपयत्वात् कलशादिवत्' इत्यनुमानं २० प्रमाणमिति चेत; न; 'अनुष्णो दहनो द्रव्यवाचद्वत्' इत्यस्यापि प्रमाणत्वापः। पक्षस्यो- ष्णत्वप्रत्यक्षेण बाधनाढतोश्च कालातिपातापदिष्टत्वात् नेति चेत् ; प्रकृतस्यापि न भवेत् सुसादेस्तव्यतिरेकस्यापि तत एघावभासनात् । नव्यतिरिरश्च ततः पूर्व याननुभव एवास्ते सतोऽपि पूर्व तथैवास्त इति नित्य एवायमतः कथं चन्दनदहनादेस्पयेत ? यदि पुनस्तदापि सस्यानुभवो न तर्हि तस्य तस्मादिन्द्रियसन्निहितादुत्पत्तिः सहैव तेनोत्पतेरिति कथं न स २५ पस्याव्याप्तिः? राधा ज्ञानेनापि, न हि चापोऽपि पादिसन्निपा प्रमाणाभावात् । चक्षुर्घटा- दिक प्राप्त प्रकाशयति याहोन्द्रियत्वात् त्वगादिवत् , 'इत्यमुमानमा प्रमाणमिति चेत् ; न; . . , भवति चेयं प्रा०,५०, प.1२ शिपायन्तर-मा०, २०, ५०।३ लो. १९| मुगादिप्र. त्यक्षात् । ५ मनिषामा । इन्द्रियसनिर्वाभाये मुसादिमायभासदावेऽपि • सिरण। ८ प्रयास एव । ९ "ना:ोग्ने प्राप्यायं परिफिन्दाते पन्द्रियवागिन्द्रियवा।"-दायका मा पृ.१ न्याप. मु.१.०५०२॥
५५० भ्याययिनिश्चययिधरणे [११७० १ तमिरविषयस्य कोशमशकादेरप्रकाशनप्रसङ्गात् । न हि तस्य पशुपा प्राप्तिः, अविद्यमानत्वाट्योम. कुसुमादिवत् । प्राप्त एवाक्षिपक्ष्मादिग्तेन तथा प्रकाश्यत इति चेत् ; न, तत्रैव तस्य तत्प्रकाश- नापतेः न दूरपुरोवर्तिन्याकाशे। न हि चन्द्रमसः प्राप्तादन्यत्र तद्वित्वप्रकाशनम् । यदि च पक्ष्मादेः प्रामिर्मवतु तस्य प्रकाशनं फ्धं केशादेः ' मोऽपि तम्येव स्वभाव इति चेत्, ५ कथं तत्प्रकाशस्य मिथ्यात्वम् ? अविद्यमानत्वादिति चेत् , क्यमविद्यमानम्तत्स्वभावो व्याघा. तात् ? अविद्यमानस्याप्राप्तस्यापि प्रकाशनमिति चेत् , विद्यमानस्यापि स्यादविशेषात् । विद्या मानं सर्वमपि किन्न प्रकाश्यत इति चेत् । इतरदपि किन्न । योग्यतानियमादिन्द्रियस्येति समानमन्यत्रापि । तन्न तस्य घटादिना सन्निवर्पः संयोगः तत एंव न तद्गतेन रूपादिना संयु- उसमवायो न रूपत्वादिना संयुक्त समवेतसमवायो न समवायामानाभ्यां सम्बद्धविशेषणभाव १० इति सुश्लिष्टं चक्षुर्मानेनाध्यापकत्वं लक्षणस्य । यदपि म नेदं प्रत्यक्षम्य रक्षणम , अपि तु तत्परस्य प्रत्यक्ष प्रत्यनफलमिति व्याख्यानादिति, वदपि न सम्यड् मतम् , तत्राप्युक्त दोपाणामनपवर्तनात् । कुतश्चेदमेव न प्रत्य- क्षम् ? विपयाधिगमस्यानुपजननादिति चेत्, न, अव्यतिरिक्तस्योपजननात् । अव्यतिरिक्त हेतुरेव फलमेव वा स्यानोमयमिति चेत् , न, पूर्वापरतया व्यतिरेकस्यापि भावात् । पौर्वा. १५ पर्येणापि कथमेकरय दैत्यमिति चेत् ? अपौर्वापर्येण कथम् ? तथापि माभूदिति चेत् ; नेदानां सामान्यविशेपाकाराभ्यां निर्णयेतरस्वभावं सशयज्ञानम् , अव्यभिचारीतयत्मक विपर्ययज्ञानं वेति किं तद्व्यवच्छेदाय व्यवसायात्मकमव्यभिचारीतिवचनेन ? "योग- पद्येन द्वरूप्यस्याविरोधे क्रमेण किमपराद्धं यतस्तेनापि तदविरद्धन्न भवेत् । क्षपिकत्वात ज्ञानस्येति चेत , न, अहमेव नील दृष्ट्वा पीतं पश्यामीत्यनुगतरूपस्यापि तस्य सङ्कलनात् । आत्मन एवेदं सङ्कलनं न ज्ञानस्येति चेत् , न, ज्ञानादन्यस्य तस्य तंत्रानवमासमात् व्यपदेश. वत् , अन्यथा व्यपदेशस्यापि तत्र सर्वत्राभावसनमिति निष्फल मव्यपदेश्यमित्ति विशेषण. मसम्भवात् । अपरिज्ञातशब्दार्थसम्बन्धस्याव्यपदेश्यमेव प्रत्यक्षमिति चेत् ; अगृहीतभवत्स- तस्याव्यतिरिक्तात्मविण्यमेव प्रतमुपसङ्कलनमिति समानमुत्पश्यामः । यदि तदेवानुगम- रूपं किन्तत्रेन्द्रियव्यापारणेति चेत् । न , तेन तदात्मन एव विषयविशेपाधिगमस्य तत्रोपस्था- २५ पनात् । तन्नेदमेकान्ततः "फ्लमेव प्रत्यक्षस्य, प्रत्यक्षत्वस्यापि भावात् । किम्चेदानी प्रत्यक्षम् ? यत'ईदमुत्पद्यते तदिति चेत् , तदपि यदीदृशम्", नेदं तत्फलं परिकल्पयितव्यम् , उत्तन्यायेन प्रत्यक्षत्ववत्तस्यैव फलत्वस्याप्युपपत्तेः । भवतु अन्याशमप्यचेतनमिन्द्रियालोकादि, चेतनमपि . . २० . १ चभुपा । २ वैशादिरूपेण ! ३ पल्मादे । ४ एव सद्ग-ता० । ५ सम्बन्धविशेषणमात्रेनेति मा०, य, ५०। ६ "फलविशेषणपक्षमेव सम्मन्यामहे । वन च य यधिकरण्य चौदितं तदत शब्दाध्याहारण परिहरिष्याम यत एवं यद्विशेषणविशिष्टं शनारय पर भवति तम्प्रत्यमिति स्त्रार्थ ।"-न्यायम. पृ०६३। न्यायवा. ता. पृ. १०८। ७ योगपये है-आ०, ५०, ५०। ८ आत्मन । ९ सङ्कल्ने। १. फ्लत्व. मेव आ०, ब०,५०1१ज्ञानम् । १२ ज्ञानामकम् । , १११७० प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्तावा , १ संशयस्मरणादिकमिति चेत् ; न, रात्रोपचारतो मुख्यतश्च प्रामाण्यत्यैव प्रतिक्षिमत्वात् । न चाप्रमाणं प्रत्यक्षं तस्य वद्विशेषत्वात् । तन्न नैयायिकस्व प्रत्यक्षलक्षणमुपपन्नम् । यत्पुनरिद मीमांसकस्य-"सत्सम्प्रयोगे पुरुपस्येन्द्रियाणां बुद्धिजन्म प्रत्यक्षम् ।" [जै० सू० १।१२४] इति; तदप्येतेन प्रत्युक्तम् , सम्प्रयोगस्य सैनिकर्थित्वे नैयायिकव होपात् । यदं तस्यानुमानम्-प्राप्यकारि चक्षुरिन्द्रियत्वात् त्वगादिवदिति , तत्र किमिदं ५ चक्षुर्नाम ? गोलक एवेति चेत्र , न, तत्राप्राप्यकारित्वस्यैव प्रतीतेः । सन्निर्गतो रश्मिप्रसर इति चेत; तस्यापि किमिदं प्राप्यकारित्वम् ? प्राप्य सन्निपत्य विपयं तज्ज्ञानजननमिति चेत् ; क तजननम् ? आरमनीति चेत् , न, तत्रापि सन्निकर्पगते तदप्रतीतः । न हि विषय- सन्निकर्षसन्निहित आत्मनि ज्ञानमिति कस्यचिदपि प्रतिपत्तिः । तथापि तत्कल्पनायां तव्या. पित्वकल्पनमपि स्यान , अविशेषात् । नचास्मिन्पक्षे दूरग्रहणम् , ज्ञातुः सन्निहितत्वेन तद- १० पेक्षया तदसम्भवास । असन्निहिताधिष्ठानाऽपेक्षया तत्सम्भव इति चेत् ; किमेतदधिष्ठानम् गोलकरूपं शरीरमिति चेत , न, सस्यापरिज्ञानात् । यदि हि तदपि परिज्ञायेत भवेदितो दूर• नगरमिति प्रतिपत्तिर्नान्यथा । न च तस्ये नगरक्षानेन परिज्ञानम , असन्गिकपात् । असन्नि- कृष्टस्यापि ग्रहणे नगरेऽपि सन्निकर्पवैयोपनिपातात् । न च यावन्न तेन तज्ज्ञानं तावत्तद. पेक्षया नगरदूरत्वस्य ततः प्रतिपत्तिः । तन्न अधिष्टानापेक्षयापि तत्सम्भव इत्ययुक्तमुक्तम्- "विच्छिन्न इति बुद्धिः स्यादधिष्ठानमपेक्ष्य च।" [ मी० श्लो० १११।४ श्लोक ५७॥ ] इति । भवतु शरीरगत एवात्मनि तजननम् , दूरादिप्रतिपत्तेरपि तदपेक्षयेव भावादिति चेत् ; कथमिन्द्रियाप्रभार्गसन्निकर्षाद् दूरवर्तिनस्तन्मूलगते तत्र तजननम् इन्द्रियान्तरेष्वेव- मदर्शनात् ? तत्रादृष्टस्यापि चक्षुपि कल्पनाया परमप्राप्यकारित्वमेव फल्पयितव्यम् । सन्न २० रश्मिप्रसरेण वहिर्व|परनाम्ना प्रयोजनम् , सत्येव प्राप्यकारित्वे तत्साफल्यात् । कथञ्च तस्य चक्षुष्टम् ? कथश्च न स्याद् ? गोलकस्यैव तत्त्वात् । तदपि चक्षु. रुपकायय तर चिकित्साविधानात् । न हि सदुपकारायान्यत्र तद्विधानमुपपन्नम् ; अति- प्रसङ्गात् । अनैकान्तिको हेतु:-तर्थस्य पादयोरपि अद्विधानस्योपलम्भादिति चेत् ; न; पादमार्गेण तद्गतस्यैर वादात अापि गोलकमार्गेण रश्मिप्रसरगतस्यैव तस्य २५ तदर्थमिति चेत् ; न ; अजनादिरूपस्य वद्विधानस्य बहिःप्रसरतोऽनुपलम्भात्। अन्त:- प्रसग्नो घृतादिरूपस्यापि तद्विधानस्यानुपलम्भ एवेति चेत्, सत्यम् , स तु शरीरमहिभागेन व्यवधानात् । न चैवमा केनचिद् व्यवधानम् , अत उपलब्धिलमणप्राप्तस्याभावादेवानुपलम्मो १५ 4 , "सम्यगर्थे च गंशनी दुष्प्रयोगनिवारण । प्रयोग इन्द्रियाणा व्यापारोऽयु सभ्यते ॥"-मी०लो. आले. ३८10 "तपोध प्राप्यकारित्वमिन्द्रियत्वात् त्वगादिया।"-मी०लो० ॥४ो । ४ । ३ समिहिता मनि भा०, २०, ५०४ आग्मनो व्यापरखे। ५ गोलरस्य । ६ नगरसनेन। -मारस आ., १०,०! ८ रनिस्पस्य । ९ चक्षुत्वम् मा०, २०,५०110 गोलामपि।
भ्यायविनिधयविवरणे १११७१ ] घटादिवत् । ततो गोलकमेव चक्षुः, तव शरीर एव वृत्तिमन् न बहिरिति प्रतिषिद्धमेतत्- "केचित्तस्य शरीराच बहित्ति प्रचक्षते । चिकित्सादिप्रयोगश्च योऽधिष्ठाने प्रयुज्यते ।। मोऽपि तस्यैव संस्कार आधेयस्योपकारकः । तद्देशश्चापि संस्कारः सर्वव्याप्त्यर्थ इप्यते ॥ चक्षुराद्युपकारश्च पादादापि दृश्यते । नस्मानकान्ततः शक्यं संस्कारात्तत्र वर्तनम् ॥"। [ मी० श्लो० १११२४ श्लो०४४-४६ ] इति । यत्पुनः पक्षान्तरम-इन्द्रियाणामधे व्यापार: तत्प्रगुणतयाऽवस्थान वा कार्यावसेया १. शक्विा सम्प्रयोग इति तदपि न मारम् ; सत्यार्थस्य स्वप्नज्ञानस्य तदमावेऽपि भावेन क्षण- स्याव्याप्तिदोपात् । न हि तत्र मन्प्रयोगः; पिण्डीपिहितलोचनम्यापि तद्भावात् । अरत्येव शफ्लिक्षण इति चेत् ; न, तस्यापि विस्फारित एव अमणिय म (अक्षणि म ) म्भवान् न पिहिते अतिप्रसङ्गान् । प्रत्यक्षमेव तन्न भवाति केन्; किमिदानी भवेन्नाम प्रमाणं सत्यार्थ- स्वात् नानुमानाद्यन्यतमम् ; तरक्षणाऽनन्वयात् । सप्तमन्तु प्रमाणमनिष्टमापद्यते । ततः २५ प्रत्यक्षमेव तदभ्युपगन्तव्य निर्माधरपटनि सत्यात् जापत्प्रत्ययत् , लोकप्रसिद्धत्वाच । तन द्विपमानोपलम्भनमेव अविद्यमानोपलम्मनस्यापि तस्य यहुलमुपलग्मात् । तत्कथं तस्य धर्म प्रत्यनिमितत्वम् , यतरतत्र पोदनेव प्रमागमवसीयते ? मन्वय बोक पवाविद्यमानोपलम्भनरया. सत्सम्प्रयोगजस्य प सरप्रत्यक्षरय सम्भवे यांगित्यश्वमपि ताशमासि (मर्थात् सि) भ्यतीत्ययमेतत- "न लोकम्यतिरिक्तं हि प्रत्यक्षं योगिनामपि । प्रत्यक्षत्वेन तस्यापि विधमानोपलम्भनम् ।। मत्मम्प्रयोगलत्वचाऽप्यक्प्रित्यक्षवद् भवेत् ।।" [ मी० श्लो० ११११, इलो. २८.२९ ] इति पेन्; मत्यम् , अस्त्ययमपि परस्य टोपः । तन्नैवमपि प्रस्य शक्यलक्षणम् । पुनरपि नैयायिकस्य विरद्धं दर्शयति- नित्यः सर्वगतो सत् कस्यचित्समवायतः ॥१७॥ जाता ब्यादिकांधस्प (नेश्वरभानसंग्रहः । ] इति । । १ २० - "यदि याविरधानं गम्पयोगोऽय वर्दी । योग्यारो मान्य मयोगः पार्थसिन. " -मी. mvणे. ४. 1 -भावान बहिति :.-आ....प्रयम् । ५ धर्म। -भाग-.,.... -मधा मि आ.,., ए.1- माना। वागमीयवार -मि-परस-पा., मा...यानि भा.,.,.।
प्रथमा प्रत्यक्षप्रस्ताव ? -- . च स्वत एव १।१७१] नित्योऽनाधेयादिस्वभाव आत्मा सन् विदामानो विरुध्यत इति सम्बन्धः । तस्याकिञ्चित्करत्वेन व्योमकुमुमादविशेषादिति प्रतिपादनात् । अत एव सर्वगतः सर्वमूः सम्बद्ध इति । ज्ञो ज्ञातेति च विरुध्यते असतस्तदुभयाऽसम्भवात् । कुतश्च तस्य ज्ञत्वम् स्वत एवेति चेत् न शानकल्पनावैफल्यात् । ज्ञानसम्बन्धादिति चेत् ; न ; तत्सम्बन्धादपि ज्ञानवानित्येव स्यात न न इति । ज्ञशब्दादपि तद्वत्त्वं प्रवीयत इति चेत् । न ; ५ ताप्यस्य प्रतीते। अन्यथा न किञ्चित्ततः प्रतीयेत । ताप्यमपि तत्सम्बन्धादेव प्रतीयत इति चेत् ; कुतो न देवदत्ते दाण्डरूप्यप्रतिपत्तिः ? समवायस्यैव तत्प्रतिपत्तिहेतुस्यात् न संयोगस्येति चेत् ; मिध्यैव तर्हि तत्प्रतिपत्तिः, अतद्रूपे तादृप्यग्रहणात् । तथा च कथं ततः आत्मतत्त्वप्रतिपत्तिः ? आत्मन्यमिध्यात्वादिति चेत् किं पुनरेकमेव ज्ञानं मिथ्या चामिथ्या व ? तथा चेत; न; क्रमेणाप्यपरापररवभावस्य तस्याऽऽपत्तेः । एवन्य तत्रैवान्वितरूपे १० 'ज्ञातृप्रयोजनपरिनिष्ठानात् व्यर्थमात्मान्तरपरिकल्पनम् विभिन्नज्ञानकल्पनं ज्ञत्वात् । विभिन्नज्ञानसमवायाच्च जत्वे गगनादावपि प्रसङ्गः तत्रापि तदविशेपात् । तन्न समवायेन किञ्चित् । नापि ततो नत्वमात्मनस्तदाह-कस्यचित् अर्थान्तरज्ञानस्य समवा- यता इति विरुभ्यते , स्वत एवात्मनो ज्ञस्वेन तद्वयति । ततश्च 'द्रव्यादिकस्या- थस्य ज्ञाता इत्यपि विग्ध्यनेऽतिप्रसङ्गात् । ततो न तादृशं विज्ञानं प्रत्यक्षं तत्फलं १५ चोपपत्नमिति भावः । अव्यापकच प्रत्यक्षलक्षणं परस्य,तेनेश्वरज्ञानस्यासड्ग्रहादित्याह- 'नेश्वरज्ञानसंग्रहः।' इति । न हि तस्य नित्यस्य इन्द्रियार्थसन्निकर्पजत्वं विरोधात् । अथ सन्न प्रत्यक्षमपि, किमि दानी प्रमाणान्तरमिति चेत् ; न ; तस्यापि नित्यत्यासाधकतमत्वान । नापि तत् फलम् । अनुत्पत्तिमत्यात् । स्वविषयाव्यभिचारात्म केवलं प्रमाणमेवेति चेत् ; न तस्य प्रत्यक्षादि-२० ध्वनन्तर्भावे प्रमाणचतुष्टयनियमव्यापत्तेः । अन्तर्भावा प्रत्यक्ष एव नानुमानादी ; अस्मदा- धविशेपापत्तेः। भवतु तदप्यनित्यमेवेति केचित् ; तन्न, तस्यापि स्वयिपयस्यं तत्सन्निकर्पजवाभावात् । अस्वविषयत्वे सर्वविपयत्वायोगात् । अन्यस्य सद्विपयत्वेऽनवस्यापत्तिः, अन्यस्यापि नदन्य- विषयत्वात् । अथ एकेन सद्रातिरिक्तस्य सर्वस्य अन्येन न तस्य प्रहणादयमदोपो शानद्वय. २१५ भावादीश्वरस्येति चेत् । न ; एवमपि स्वसंवेदनस्यावश्यम्भावात् । न हिं तदेकं ज्ञानं स्वरूपमप्रवियत् तव्यतिरिक्सर्वान्तरगतस्वविषयज्ञानं प्रतिपत्तुमर्हति, विषयज्ञानस्य स्वविषयतया मतिपत्तेः स्वप्रतिपत्तिनान्तरीयकत्वात् । सन्न शानद्वयकल्पनमर्थयत् । प्रतिक्षिप्तश्चायं पक्ष: मागिति नेह प्रतन्यते । सतो नानिसस्यापि तम्बानस्य नेन संग्रह इति लागान्तरमेव तय . ताप्पप्रनिति । २ "शमादिनो न नाऽभिशी मितानिन कथा | शानं पूयोरीन गाडीमानि कार्तितः ॥"-ना: टि. धरणानस्प । ४ ईश्वरशानम् । ५-गानाविरी-भा०, ५०, १०. पारु, ता. । {-बेनि पेन् प्रा०,००1 . स्वमगीनाम्य ! नमो।
न्यायविनिश्चयविवरणे वक्तव्यमिति मन्यते । भवतापि स्मादतीन्द्रियप्रत्यक्षस्य लक्षणान्तरं नोच्यत इति मेत् ? अन्नाह- । - १ लक्षणं सममेतावान् विशेपोशंपगोचरम् । अक्रम करणातीतमकलई महीयसाम् ॥१७१॥ इति । सक्षणं स्पष्टं प्रत्यक्षम्' इत्येतत् समं सदृशं निप्वपि प्रत्यक्षेपु । कस्तहीन्द्रियादिप्रत्यक्षा. दतीन्द्रियप्रत्यक्षस्य विशेष इति चेत ? एतावान् विशेपोऽशेपगोचरम् । निःशेषद्रव्य- पर्यायपरिच्छेदरूपम् अतीन्द्रियप्रत्यक्षम् । क्रमेण तद्गोचरमितरदपि प्रत्यक्षमिति चेत् , आह-- 'अनमम्' इति । इन्द्रियायत्तत्वे कथमितरवत्तदप्यक्रमं सद्गोचरमिति चेत् ? आह- करणातीतम् । करणानीन्द्रियाण्यतीतमतिकान्तं निरपेक्षत्त्यात् । तस्यैव समर्थनम् 'अक- १० लङ्कम्' इति । अविद्यमानज्ञानावरणादिकल्मपमित्यर्थः । क्या हि-यज्ञानं स्खविषये निरा. वरणं तदक्रममकरणञ्च तं प्रत्येति यथा सत्यस्वप्नज्ञानम् , तथा चातीन्द्रियप्रत्यक्षम् । निरा. वरणत्यं तस्योत्तरन समर्थनात्। अनावरणमपि नियतगोचरमेव तत तत्स्वभाव्यादस्मद्रादि- शानवदिति चेत् ;न, अरमदादिज्ञानस्याप्यावरणवशादेव असर्वार्थत्वं न स्वाभाव्यादिति निरूप- णात् । नत्केपी प्रत्यक्षम् ? इत्याह-महीयसाम् । अर्हतामिति । भवतु तर्हि तत्सुगतस्यैव १५ तौर तलिङ्गस्य तत्त्वोपदेशस्य भावादिति चेत् , सत्यमिदं यदि तत्वोपदेश एव तत्र भवेत् । न चैवम् । अत एवाह- ज्ञात्वा विज्ञप्तिमात्रं परमपि च यहि सि भावप्रवाद चक्रे लोकानुरोधात्पुनरपि सकलं नेति तत्त्वं प्रपेदे । न जाता तस्य तस्मिन्न च फलमपरं ज्ञायते नापि किञ्चि- दित्यश्लीलं प्रमत्तःप्रलपति जडधीराकुलं व्याकुलाप्तः॥१७२।। इति । ज्ञात्वेत्यनन्तरम् अपि चेत्येतद् द्रष्टव्यम् । तदयमर्थो ज्ञात्वापि च प्रतिपद्यापि च । किम् ? विज्ञप्तिरेय न बहिरर्थ इति । यदि या, सैव सक्लविकल्पमलविक्ला न भेदो नाम कश्चिदिति तन्मात्रम् । कीदृशम् ? परंप्रकृष्टं तस्यैव नियसत्वेनोपगमात् । किं चकार ? घहि सिभावो पहिरः तस्य प्रवादं तदस्तित्वोपदेशं चके यकार । खुसः १ लोका- २५ नुरोधात् विनयाभिरुचेः । ननु यदि वहिर्भाव न प्रतिपद्यते कथं उत्प्रवादकरणं सुषुप्तवा? कथं चा विनेयानुरोधः ? वस्यापि विशप्तिपहिभूतत्वेन तेनाप्रतिपत्तेरिति चेत् ; न ; एवमपि परस्यैव दोषात् । यदि विज्ञप्तिमात्रमेव ज्ञातं सदेवोपदेष्टव्यं सत्यत्वात् नापरं विपर्ययात् । संवृत्या 'तदपि तत्त्वमेवेति चत् । न विकल्पस्वैर संवृतित्वात् । नस्य चैकान्ता निषिद्धत्वात् । तन्न संघृतिसत्योपानयः सत्वोपदेशः सुगतरयोपपन्न इति चेत् । - 1-सा महतामि-आ०,५०,१०१ विज्ञप्तिवहिर्भूतमपि । ३ -वादिनि भाग, ०,१०।
प्रथमः प्रत्यक्षप्रस्तावः २।१७२] सत्यम् । अत एवास्य ग्राम्यभापित्वमाह-इति उत्तन्यायान प्रलति यद्वजस्पति । का? व्याकुलाप्तः इति कर्तव्यबुद्धिविकलः आप्तः तथागतः, तद्विनेगमत्येनोपगमात । कथं प्रलपति इति ? अश्लीलं प्रान्यम् । कुतस्तस्य व्याकुलत्वम् ? जडधार्यतः। तस्वमपि कुतः १ प्रमत्तो दुर्वासनामदिरापरवशो यत इति । तर्हि विज्ञप्तिमात्रमेव वेन तत्त्वमुपदिष्टमस्तु "अद्वयं यानमुत्तमम्" इति वननादिति चेत् ; न ; तस्यापि विकरूपत्वे अनेकान्तवादप्रत्युजीवनात् । परस्परख्या- वृत्तानेकनीलादिरूपये च सन्तानभेदानिराकरणात् । न तंत्राप्यसो सिष्टति अपि तु पुनरपि उक्तदोपादूर्ध्वमपि सकलं चेतनमन्यच्च तत्वं नेति प्रपेदे प्रपन्नवान् । तदेव तहि तत्त्व तेनोपदिश्यतामिति चेत् ; न ; तत्राप्यश्लीलमियादेोपात् । कुत एतत् ? न ज्ञाता तस्य १० सर्वामावस्य यत इति । न हि सर्वामावे तज्ज्ञानमपि विरोधात् । तत एव न तत्परयापि परिज्ञानम् , इत्यरह-तस्मिन् समाये न च नैव फलं तत्साध्यम् अपरम् अर्थान्तरम अन्यस्य तत्फलत्वानुपपत्तेः, ज्ञायते ज्ञानस्यैव तद्वादे अनुपपत्तेः । वन्न तदभावतत्त्वमपि शक्योपदेशं न प फलमपि तस्य सम्भवतीत्याइ-नापि किञ्चित् । फलमिति सम्बन्धः । दुःखोपशमनादेस्तद्वादे स्वत एवाभावादिति देवस्यामिप्रायः । प्ररयाताम्मतिसागरान्मुनिपने पीहेमसेनादपि व्यक्त मन्मनसो यदीयहृदयं विद्वद्दयापालतः । तस्य न्यायविनिश्चयस्य विवृतः प्रस्ताव आयो मया प्रत्यक्षप्रतिपत्तये विवरतु श्रेयांसि भूयासि नः ॥ इत्याचार्यस्याद्वादविद्यापतिविरविते न्यायविनिश्चयकारिकाविवरणे प्रत्यक्षप्रस्तावः प्रथमः । १५ -मुत्तरम् आ०, ५०,०। "तथा चौपम्-अज्ञानमुत्तमम्"-:. पानिमट 11- मानि। भाववाद।
शुद्धयः अशुद्धय सिद्धपति शुदय मिथोदिति ८ ८ १२ प्र०वातिकाल. सर्वार्थमेघ १२ २८ ४ १० ९७ १२ १०४ १५७ २९ प्र०वा. सवार्थमेव अरमना पदाथतत्व विरोधन शन्दतादितत्वेन तस्प्रमाण्य सत्ययस्वमादि सर्वग्रभावा- कल्पनाया स्पपूर्वार्थी उत्तयनव सम्बोधन सुखदिक गत्त नातोऽय प्रतीत निविपवनाम ग्राह्यकता जना सका धीनुरमा विशेषाश्वेत् रात प्रतिक्षेपाय २१० आमना पदार्थतस्व विरोधन शदताडितन्यन तमामाण्य सत्यस्वमादि सनामावा- करपनया -त्वपूर्वार्थी -रुत्यानय सम्बोधन मुखादिक गर्त नातोऽर्थ प्रतीति निविषयवन्नाम प्राहकता जना मता धीरनुमा विशपाच्चे म्वत प्रतिपाय १ २५७ २१ २६१ २. १७ १२४ ३९४ निश्चित प्रस्तावना निश्चत पुष्टि घोसन अनन्य शाश्वत दोन द्योतक ५ अनन्त ८ शाधत और अशाश्वत दोनों