Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Shri Anutroppatikdsha Sutra
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भी खरतरगन्छीय ज्ञान मन्दिर, जयपुर
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* ॐ श्रीपञ्चपरमेष्ठिभ्यो नमः *
श्री अनुत्तरोपपातिकदशा सूत्र
(हिन्दी अनुवाद)
।
( अनुवादक)
पूज्यपाद प्रखरवक्ता विद्वद्वर्य मुनिवर्य वीरपुत्र श्री आनन्द सागरजी महाराज.
(प्रकाशक)
वीरपुत्र श्री आनन्दसागर ज्ञान भण्डार. कोटा-राजपूताना.
वीर सम्वत् २४६३
विक्रम सम्वत् १९९३
सन् १९३७.
द्वितीयावृत्ति ८०० ]
सर्व स्वाधीन
[ मूल्य-पठन-पाठन
28ktizzattis
हक
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
निवेदन
हिन्दी
अनुवाद
निवेदन
मुनिवर्य श्रीमान् मंगलसागर जी महाराज के उपदेश से रतलाम ( मालवा ) निवासी मुनिम साहब
श्री पन्नालाल जी दासोत की तर्फ से २०० प्रतियॉ भेट ।
श्रीमती प्रवर्तिनीजी साहबा श्री प्रतापश्रीजी सौभाग्यश्रीजी महाराज के उपदेश से फलोदी ( मारवाड)
निवासी लछमीलालजी जीवनचंदजी तथा चुन्निलालजी मिश्रीलालजी नाहटा की तर्फ से ६०० प्रतियाँ भेट.
इसकी प्रथमावृत्ति श्री हिंदी जैनागम प्रकाशक
सुमति कार्यालय-कोटा की ओर से छपी है.
विनीत,
शेरसिंह महेन्द्रसिंह कोठारी.
कोटा-राजपूताना.
॥२॥
30 प्राक्कथन अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र हिन्दी अनुवाद प्राकथन. मुमुक्षो ! अनासक्त योग की त्यागरूप अनेक पुष्पलताएँ हैं, जिसमें तपश्चर्या संज्ञिका कुसुमलता की परिमल (सुगन्ध) विशेप आनन्दप्रदा है-सब व्रतों में अस्वाद व्रत ( रूखा-सूखा आहार करना ) का पालन कठिन समस्या है; परन्तु इससे भी अधिक क्लिष्टतर व्रत तपश्चर्या (आहार त्याग) है; कारण कि अनाहारिक पद सर्वश्रेष्ठ पद है-यह अनुत्तरोपपातिक दशा सूत्र नामक नवा अंग तपश्चर्या की महक से महक रहा है। यह सूत्र तीन वर्ग के तेंतीस अध्ययनों से भूपित है, इसमें धन्य अनगार की कुछ विस्तृत जीवनी उपलब्ध होती है; इन महापुरुष ने तो संसार की तपश्चर्या का रेकार्ड ( पुराना इतिहास) तोड़ दिया है। इस तरह करीब २ तेंतीस ही महापुरुष समान कोटि के हैं; ये पुरुषोत्तम मात्र श्लाघा करने योग्य ही नहीं हैं; किन्तु वन्दनाय - स्तवनीय और आदरणीय हैं, इनके जीवन भव्यात्माओं को समाचरणीय हैं। मैं अपना बड़ा भारी सौभाग्य समझता हूँ कि इस उत्तमांग का राष्ट्रीय भाषा में (हिन्दी भाषा में) अनुवाद करने का मुझे अलभ्य लाभ प्राप्त हुआ है । महानुभावो! इस आदर्श ग्रंथ का अद्योपान्त मननपूर्वक अध्ययन करें; यह मेरा नम्र निवेदन है। सैलाना- सी. आई. शान्तिः विनीत- शरत्पूर्णिमा- १९९२ वीरपुत्र आनन्द सागर.
- 7 अनुत्तरो- पपातिक दशा सूत्र 3 श्री अनुत्तरोपपातिकदशा-हिन्दी अनुवाद हिन्दी- अनुवाद अनु- क्रमणिका. ॥४॥ A अनुक्रमणिका नम्बर विपय पृष्टाक नम्बर पृष्टाक विपय पहिला अध्ययन १ ४ जाली कुमार १ मङ्गलाचरण २ प्रारम्भ ३ पीठिका: पूज्य गुरुदेव से शिष्य रत्न की पृच्छा-गुरुवय्य का प्रत्युत्तर ॥प्रथम वर्ग ॥ २ जाली कुमार ने प्रभु की धर्म देशना सुनी- वैराग्य उत्पन्न और दीक्षा ग्रहण ६ गुणरन तपश्चर्या का विधान + --- अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ८ हिन्दी अनुवाद अनु- क्रमणिका क संक्षेप वृतान्त नम्बर विषय ७ जाली कुमार का अनुत्तर स्वर्गवास ८ स्वर्गवास के पीछे मुनियों का क्रिया कर्म-गौतम गणधर की प्रश्नावली-प्रभु का प्रत्युत्तर ९ जाली कुमार के लिये भावि पृच्छा-प्रभु का प्रत्युत्तर ११ 63 दूसरा अध्ययन यावत् दसवाँ अध्ययन १ १० मयाली कुमार यावत् अभय कुमार - नव कुमारों का मंक्षिप्त आख्यान ११ उपसंहार ॥ द्वितीय वर्ग ॥ १२ बीजक - पहिला अध्ययन नम्बर विषय पृष्टाङ्क - दूसरा अध्ययन यावत् तेरहवां अध्ययन - १४ महासेन यावत् पुण्यसेन- बारह कुमारों का १८ १५ उपसंहार ॥ तृतीय वर्ग ॥ १६ प्राग्वक्तव्य २० पहिला अध्ययन १५ १७. धन्यकुमार-धन्यकुमार का गृहस्थाश्रम २२ १८ प्रभु पदार्पण-धन्यकुमार वैराग्य रंगरंगित- भागवती दीक्षा का ग्रहण १९ तपश्चर्या के लिये उग्रपतिज्ञ धन्य अनगार की प्रार्थना- भगवन्त का आदेश २७ २० धन्य अनगार का घोर तप १३ दीर्घसेन १७ अनुत्तरोप- पपातिक दशा सूत्र. हिन्दी. अनवाद क्रमणिका. 30TCTom नम्बर विषय पृष्टाक २१ धन्य अनगार की आर्दश गौचरी २२ धन्य अनगार का शास्त्राभ्यास ३२ २३ दिव्य तपश्चर्या से धन्य अनगार के शरीर की अवर्णनीय शोभा २४ धन्य अनगार तपस्वी के शरीर का रूपांतर से वर्णन ४२ २५ श्रेणिक नृपेन्द्र का नमूनेदार प्रश्न-भगवन्त का स्पष्टीकरण ४५ २६ श्रेणिक नरेश से धन्य अनगार की स्तुति ४८ २७ धन्य अनगार का मनोरथ और उसका पूर्णपालन५० २८ धन्य अनगार के लिये गौतम गणधरका आखीरी प्रश्न - परमात्मा का खुलासा दूसरा अध्ययन नम्बर विषय पृटाक २९ सुनक्षत्र कुमार ३० सुनक्षत्र अनगार का तपोवर्णन ५४ ३१ सुनक्षत्र अनगार का सफल मनोरथ और अन्तिम अवस्था ५५ तीसरा अध्ययन यावत् दसवाँ अध्ययन ३२ प्रापीदास कुमार यावत् वेहल्ल कुमार - दस अनगारों की सामान्य व्यवस्था ३३ सुधर्म गणधर से परमात्मा का गुणानुवाद १९ ३४ उपसंहार ३५ टीकाकार महाराज का वक्तव्य ६१ ३६ ग्रंथ का उपसंहार ३७ प्रशस्तिका -SACRI- ६३
ॐनमः
अनुत्तरोप-
पपातिक
दशा सूत्र.
* खुश-खबर
हिन्दी
अनुवाद
खुशखबर.
२
सर्व सजनों से निवेदन है कि पूज्यपाद प्रखरवक्ता विद्वद्रत्न वीरपुत्र श्री आनन्दसागरजी
महाराज सा. की औजस्विनी लेखनी से संशोधित-अनुवादित और
संशोधित-अनुवादित और रचित निम्नाङ्कित अपूर्व ग्रन्थ
प्रकाशित हो चुके हैं:-
१ पंच प्रतिक्रमण सूत्र-रु. सवा
श्रीपाल चरित्र-रु. एक ३ जावाजविराशी प्रकाश-२ आना
१ आदर्श धर्म-एक आना. २ अहिंसा-एक आना. ३ सत्य-एक आना.
अस्तेय-एक आना.
५ ब्रह्मचर्य-एक आना. ६ अपरिग्रह-एक आना.
ग्रंथ मिलने का पताः-वीरपुत्र श्री आनन्दसागर ज्ञानभण्डार,
ठिः-शेरसिंह महेन्द्रसिंह कोठारी-कोटा (राजपूताना ).
४
डाक खर्च
अलग लगेगा.
॥ ७॥
ॐ
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सत्र
समर्पण
हिन्दी
अनुवाद
समर्पण
शान्ति के अवतार ! चारित्रचुडामणे ! शास्त्रवेत्ता ! उपकारकशिरोमणे !
गणाधीश्वर ! पूज्यपाद गुरुदेव श्रीमान् त्रैलोक्यसागर जी महाराज साहब !
आपके उच्चतम त्याग की स्मृतिमात्र से हृदय पवित्र बन जाता है और अनुपम उपकार के प्रति सहसा
शिर झुक जाता है - भगवन् ! इस ही लिए नतमस्तक होकर यह 'अनुत्तरोपपातिक सूत्रः हिन्दी
अनुवाद " सादर सविनय समर्पण करता हूँ.
शान्तिः
आपका चरणरज-
वीरपुत्र आनन्दसागर.
॥ ८॥
२० हिन्दी- अनुवाद अनुत्तरो- पपातिक दशा सूत्र श्री अनुत्तरोपपातिकदशा-हिन्दी अनुवाद * क्रमणिका. ॥४॥ अनुक्रमणिका- विषय पृष्टाङ्क नम्वर पृष्टाङ्क विषय पहिला अध्ययन M ४ जाली कुमार १ सङ्गलाचरण २ प्रारम्भ ३ पीठिका:- पूज्य गुरुदेव से शिष्य रत्न की पृच्छा-गुरुवर्य का प्रत्युत्तर ॥प्रथम वर्ग॥ 6 जाली कुमार ने प्रभु की धर्म देशना सुनी- वैराग्य उत्पन्न और दीक्षा ग्रहण ६ गुणरत्न तपश्चर्या का विधान 'ur 3
२
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥२॥
हिन्दी
अनुवाद
निवेदन
63
निवेदन
मुनिवर्य श्रीमान् मंगलसागर जी महाराज के उपदेश से रतलाम ( मालवा ) निवासी मुनिम साहब
श्री पन्नालाल जी दासोत की तर्फ से २०० प्रतियॉ भेट ।
,
श्रीमती प्रवर्तिनीजी साहबा श्री प्रतापश्रीजी सौभाग्यश्रीजी महाराज के उपदेश से फलोदी ( मारवाड़
निवासी लछमीलालजी जीवनचंदजी तथा चुन्निलालजी मिश्रीलालजी नाहटा की तर्फ से ६०० प्रतियाँ भेट.
इसकी प्रथमावृत्ति श्री हिंदी जैनागम प्रकाशक
सुमति कार्यालय-कोटा की ओर से छपी है.
विनीत,
शेरसिंह महेन्द्रसिंह कोठारी.
कोटा-राजपूताना.
॥ २॥
ॐ प्राक्कथन अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र हिन्दी अनुवाद प्राकथन. मुमुक्षो ! अनासक्त योग की त्यागरूप अनेक पुष्पलताएँ हैं, जिसमें तपश्चर्या संज्ञिका कुसुमलता की परिमल (सुगन्ध) विशेष आनन्दप्रदा है-सब व्रतों में अस्वाद व्रत (रूखा-सूखा आहार करना ) का पालन कठिन समस्या है; परन्तु इससे भी अधिक क्लिष्टतर व्रत तपश्चर्या (आहार त्याग) है; कारण कि अनाहारिक पद सर्वश्रेष्ठ पद है-यह अनुत्तरोपपातिक दशा सूत्र नामक नवॉ अंग तपश्चर्या की महक से महक रहा है। यह सूत्र तीन वर्ग के तेंतीस अध्ययनों से भूषित है, इसमें धन्य अनगार की कुछ विस्तृत जीवनी उपलब्ध होती है। इन महापुरुष ने तो संसार की तपश्चर्या का रेकार्ड ( पुराना इतिहास) तोड़ दिया है। इस तरह करीब २ तेंतीस ही महापुरुष समान कोटि के हैं; ये पुरुषोत्तम मात्र श्लाघा करने योग्य ही नहीं हैं; किन्तु वन्दनयि- स्तवनीय और आदरणीय हैं, इनके जीवन भव्यात्माओं को समाचरणीय हैं। मैं अपना बड़ा भारी सौभाग्य समझता हूँ कि इस उत्तमांग का राष्ट्रीय भाषा में (हिन्दी भाषा में) अनुवाद करने का मुझे अलभ्य लाभ प्राप्त हुआ है । महानुभावो! इस आदर्श ग्रंथ का अद्योपान्त मननपूर्वक अध्ययन करें; यह मेरा नम्र निवेदन है। सैलाना- सी. आई. शान्ति: विनीत- शरत्पूर्णिमा- १९९२ वीरपुत्र आनन्द सागर. -
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* ॐ श्रीपञ्चपरमेष्ठिभ्यो नमः 8
श्री अनुत्तरोपपातिकदशा सूत्र
(हिन्दी अनुवाद)
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( अनुवादक)
पूज्यपाद प्रखरवक्ता विद्वद्वयं मुनिवर्य वीरपुत्र श्री आनन्द सागरजी महाराज.
(प्रकाशक)
वीरपुत्र श्री आनन्दसागर ज्ञान भण्डार. कोटा-राजपूताना.
वीर मम्वत् २४६३
विक्रम सम्वत् १९९३
सन् १९३७.
द्वितीयावृत्ति ८०० ]
सर्व हक स्वाधीन
[ मूल्य-पठन-पाठन
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जाजता लाली-राजश्रीमा
8
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥४॥
हिन्दी
अनुवाद
पीठिका
भावार्थ- चतुर्थ काल के समय क्षेत्रस्पर्शना के अवसर में वीरमभु के पटोधर पंचम गणधर श्री आर्य
सुधभ स्वामी राजगृही नगरी के उद्यान में समवसरे यानी पधारे; वनपालक द्वारा खबर मिलने पर नगरी से
प्रजापर्षदा वन्दनार्थ निकली, धर्मदेशना श्रवण के पश्चात् पर्षदा के लोग अपने २ स्थान पर वापिस चले गये;
यावत् जम्बू स्वामी गुरु महाराज की सेवा करने लगे; तब वे विनयपूर्वक इस प्रकार बोले-हे पूज्यवर्य !
श्रमण भगवन्त महावीर देव यावत् मोक्ष को पधारेने आठवें अङ्ग अन्तगडदशा का यह अर्थ (जो आपने पूर्व में
फरमाया है) प्रकाशित किया है, तो हे स्वामिन् ! परमात्मा ने यावत् मोक्ष को पधारेने नौवें अङ्ग अणुत्तरोप-
पातिकदशा का क्या अर्थ फरमाया ? इस पर उन सुधर्म अनगार ने जम्बू अनगार को इस कदर कथन किया-
निश्चय इस प्रकार हे जम्बू ! श्रमण भगवन्त यावत् मोक्ष को पधारेने नौवें अङ्ग अणुरोपपातिकदशा के तीन
वर्ग यताये हैं. जम्बू स्वामी ने पुनः प्रश्न किया- हे भगवन्त ! श्रमण महावीर देव यावत् मोक्ष को पधारेने
नौवें अङ्ग अणुत्तरोपपातिकदशा के तीन वर्ग बताये तो हे पूज्यवर्य ! अणुत्तरोपपातिकदशान्तरगत प्रथम वर्ग
के कितने अध्ययन दिखलाये ? इस पर गुरु महाराज ने उत्तर दिया-इस तरह निश्चय हे जम्बू ! श्रमण भगवन्त
यावत् मोक्ष को पधारेने अणुत्तरोपपातिकदशान्तरगत पहिले वर्ग के दस अध्ययन फरमाये. वे ये हैं:-
१ जाली कुमार २ मयाली कुमार ३ उपजाली कुमार ४ पुरुषसेन कुमार ५ वारिसेन कुमार
॥४॥
अनुत्तरी- सूत्र” (अणुत्तरोववाइय सूत्र ) का भारतीय भाषा में (हिन्दी भापा में) मैं अनुवाद करता है; आत्मार्थी जन इसका लक्षपूर्वक अध्ययन कर आत्मश्रेय करे। हिन्दी अनुवाद प्रारम्भ पपातिक- दशा सूत्र * प्रारम्भ * carerana प्रारम्भ में ही हमें यह अभिलापा होती है कि " अनुत्तरोपपातिकदशा” का अर्थ क्या है ? टीकाकार महाराज भगवान् श्री अभयदेव सूरीश्वरजी इसका इस प्रकार खुलासा फरमाते हैं- अनुत्तर नाम के सर्वोत्तम विमानों में जिनका जन्म हुवा है ऐसे दस जीवो का बयान दस अध्ययनों द्वारा कथन करने वाला सूत्र “ अनु- त्तरोपपातिकदशा" कहा जाता है- यहां पर पहिले वर्ग मे दस अध्ययन कहे जायंगे; उनका सम्बन्धसूत्र तथा उसकी व्याख्या ज्ञाताधर्मकथा सूत्र के पहिले अध्ययन में बताये हुवे के समान है। शेष सूत्र प्रायः सुगम हैं। श्री पीठिका ॐ पूज्य गुरुदेव से शिष्यरत्न की पृच्छा- गुरुवर्य का प्रत्युत्तर 8 ॥ २॥ RELESTER
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥३॥
हिन्दी
अनुवाद
पीठिका
मूल- तेणं कालेणं तेणं समएणं रायागहे णगरे अजसुहम्मस्स समोसरणं परिसा णिग्गया जाव
जंवू पज्जुवासति, एवं वयासी- जतिणं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं
अयमढे पण्णत्ते, नवमस्स णं भंते! अंगस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं जाव संपतेणं के अटे पपणत्ते? ततेणं
से सुधम्मे अणगारे जंवू अणगारं एवं वयासी-एवं खल्लु जंबू! समणेणं जाव संपत्तेणं नवमस्स अंगस्स
अणुत्तरोववाइयदसाणं तिषिण वग्गा पण्णत्ता, जतिणं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं नवमस्स अंगस्स
अणुत्तरोववाइयदसाणं तिण्णि वग्गा पण्णत्ता, पढमस्सणं भंते ! वग्गस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं कइ अज्झ-
यणा पण्णत्ता ? एवं खलु जंबू! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुतरोववाइयदसाणं पढमस्स वग्गस्स दस अज्झ-
यणा पण्णत्ता. तजहा-
जाली १ मयाली २ उवयाली ३ । पुरिससेणे य ४ वारिसेणे य ५॥
दीहदंते य ६ लंठदंते य ७। वेहल्ले ८ वेहासे ९.अभये १० ति य कुमारे ॥१॥
॥३॥
३ नमः न्दि जी के उपरेशसे उप्रामसर उपाययों श्री अनुत्तरोपपातिकदशा सूत्र हिन्दी अनुवाद 50200507 अनुवादक- पूज्यपाद प्रखरवक्ता वीरपुत्र श्री आनन्दसागरजी महाराज. ( मङ्गलाचरण ) वीतराग को नमन कर । गुरुपुङ्गव आधार ॥ अनुत्तरोपपातिकदशा । हिन्दी रचना सार ॥ १॥ विश्चतारक, जगद्वन्ना, शासनपति, भगवन्त महावीर देव को अभिवन्दन कर एवं जैनशासन-धीपक, शासनसम्राट , श्री जिनदत्त कुशल सूरीश्वरादि गुरुदेवों को नमन कर नौवं अन " श्री अनुत्तरोपपातिकदशा *
-~-
६ दीर्घदन्त कुमार ७ लष्टदन्त कुमार ८ वेहल्ल कुमार ९ वेहास कुमार १० अभय कुमार
इस प्रकार दस अध्ययनों के नाम बताये गये.
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥५॥
हिन्दी
अनुवाद
१ वर्ग:
प्रथम वर्ग
* पहिला अध्ययन
(जाली कुमार)
मूल-जइणं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं पढमस्स वग्गस दस अज्झयणा पन्नत्ता, पढमस्सणं
भंते ! अज्झयणस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं समणेणं जाव संपत्तेणं के अटे पण्णते ?
भावार्थ-जंबू स्वामी ने पुनः प्रश्न किया-हे भदन्त ! श्रमण भगवन्त यावत् मोक्ष को पधारे ने पहिले
घर्ग के यदि दस अध्ययन जाहिर किये हैं तो हे पूज्य भगवन् ! अणुत्तरोपपातिक के पहिले अध्ययन का श्रमण
महावीर प्रभू यावत् मोक्ष को पधारे ने क्या अर्थ प्रकाशित किया? इस पर सुर्धमस्वामी गणधर महाराज ने
प्रकार बयान किया-
॥५॥
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६ दीर्घदन्त कुमार ७ लष्टदन्त कुमार ८ वेहल्ल कुमार ९ वेहास कुमार १० अभय कुमार
इस प्रकार दस अध्ययनों के नाम बताये गये.
हिन्दी
अनुवाद
१ वर्ग
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥५॥
प्रथम वर्ग
* पहिला अध्ययन
(जाली कुमार)
मूल-जइणं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं पढमस्स वग्गस्स दस अज्झयणा पन्नत्ता, पढमस्सणं
भंते ! अज्झयणस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं समणेणं जाव संपत्तेणं के अटे पण्णत्ते ?
भावार्थ-जंबू स्वामी ने पुनः प्रश्न किया-हे भदन्त ! श्रमण भगवन्त यावत् मोक्ष को पधारे ने पहिले
वर्ग के यदि दस अध्ययन जाहिर किये हैं तो हे पूज्य भगवन् ! अणुत्तरोपपातिक के पहिले अध्ययन का श्रमण
महावीर प्रभू यावत् मोक्ष को पधारे ने क्या अर्थ प्रकाशित किया? इस पर सुर्धमस्वामी गणधर महाराज ने इस
प्रकार बयान किया-
॥५॥
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशासून
॥८॥
हिन्दी
अनुवाद
१ वर्ग
चौथे मास में अन्तर रहित चोले २ पारणा करे; क्रिया पूर्ववत्-पांचवें मास में पंचोले २ पारणा करे; क्रिया
पूर्ववत्- इसही प्रकार प्रत्येक मास में एक २ उपवास की क्रमशः वृद्धि करते जाना, यावत् पन्द्रहवें मास में
अन्तर रहित पक्षक्षमण २ (पन्द्रह २ दिन ) में पारणा करे; दिन को उत्कट आसन से सूर्य के सामने रहकर
आतापना सहन करे और रात्री में वस्त्र रहित यानी नग्न होकर वीरासन से रहे- इस कदर का यह 'गुणरत तप
जाली कुमार ने किया था.
जाली कुमार का अनुत्तर स्वर्गवास
वर्गवास
मूल-एवं जा चेव खंदगवत्तव्बया सा चेव चिंतणा आपुच्छणा थेरेहिं सद्धिं विपुलं तहेव दुरुहति,
नवरं सोलस वासाइं सामन्नपरियागं पाउणित्ता कालमासे कालं किच्चा उड्ढं चंदिमाइ सोहम्मीसाण जाव
आरणच्चुए कप्पे नव य गेवेजे विमाणपत्थडे ऊड्ढं दूरं वीतीवतित्ता विजयविमाणे देवत्ताए उववण्णे ।
भावार्थ- इस प्रकार यावत् खंदक के वृतान्त में कहा गया है उसही तरह जानना, उसही मुआफिक
॥८॥
हिन्दी
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥९॥
अनुवाद
अनशन के लिये विचारना, भगवन्त को पूछना और स्थविर मुनियों के साथ विपुलगिरी पर चढकर अनशन
करना, इत्यादि समझना चाहिये, विशेप बात यह है कि अर्थात् अन्तर मात्र यह है कि सोलह वर्ष पर्यन्त चारित्र
पर्याय (संयम काल) पालकर काल समय यानी आयुष्य पूर्ण होने पर कालकर चन्द्रादि के विमानों से ऊपर
सौधर्म-इशानादि यावत् आरण्य-अच्युत कल्प को टपकर नवग्रैवेयक विमान के प्रतरों से भी ऊपर अति दूर
जाकर विजय नाम के अनुत्तर विमान में देवपने उत्पन्न हुवे.
१ वर्ग.
aapan
स्वर्गवास के पीछे मुनियों का क्रिया कर्म
गौतम गणधर की प्रश्नावली-प्रभुका प्रत्युत्तर
मूल-तते णं ते थेरा भगवंतो जाली अणगारं कालगयं जाणेत्ता परिनिव्वाणवत्तियं काउसग्गं
करेंति २ त्ता पत्तचिवराइं गेण्हति तहेव ओयरंति जाव इमे से आयार भंडए , भंते! त्ति भगवं गोयमे जाव
एवं वयासि- एवं खल्लु देवाणुप्पियाणं अंतवासी जाली नाम अणगारे पगति भद्दए से णं जाली अणगारे
॥ ९ ॥
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥ १० ॥
हिन्दी
अनुवाद
१ वर्ग:
कालगते कहिं गते ? कहिं उववज्जे ? एवं खलु गोयमा! ममं अंतेवासी तहेव जहा खंदयस्स जाव
कालगए उड्ढं चंदिम जाव विजए विमाणे देवत्ताए उववण्णे।
भावार्थ- तदन्तर उन स्थघिर ज्ञानियों ने जाली अनगार को कालधर्म प्राप्त हुवे जानकर कालधर्म सम्बंधी
काउसग्ग किया करके उनके वस्त्र-पान आदि (धर्मापगरण ) ग्रहण किये, तथैव (जिस तरह गये थे उसही
तरह ) पर्वत पर से नीचे उतरे, यावत् (भगवन्त के पास जाकर सर्व वृतान्त कहकर) कहा कि 'ये उनके
आचार भंड-यानी धर्मापगरण यह कहते हुवे सर्व धर्मागरण भगवन्त के सामने रकग्वे-इस समय गणधर
गौतम ने भगवन्त महावीर देव से पूछा-हे प्रभो ? निश्चय इस प्रकार देवों के वल्लभ ऐसे आपके शिष्य जाली-
कुमार नाम के अनगार प्रकृतिभद्र गुणवाले जाली अनगार काल करके कहां गये? कहां उत्पन्न हुवे? परमात्मा
8 इस से यह स्पष्ट है कि मुनि के कालधर्म के पश्चात् पासवाले मुनिजन मात्र " महापारिहावणिय का तथा असज्झाय उडायनार्थ
का काउसग्ग करते थे, यह उचित, इष्ट और पर्याप्त था, पिछले आचार्यों ने अन्तक्रिया इतनी लम्बी-चौडी कर दी है कि जो निवृत्ति मार्ग को
धका लगानेवाली और प्रवृत्ति मार्ग की वृद्धि करने वाली है, निवृत्ति मार्ग के उपासको को इसम सशोधन करने का प्रयास करना चाहिये ।
४ स्वाभाविक सरल को प्रकृतिभद्र' कहते हैं, अर्थात् स्वार्थवश वा भयवश, या मोहवशादि कारणो से कल्पित सरलता वाला सरल
नहीं कहा जाता.
॥१०॥
! ने उत्तर दिया-निश्चय इस प्रकार है गौतम ! मेरा शिष्य जाली अनगार उसही तरह थानी खंदक अनगार के मुआफिक यावत् कालधर्म माप्त कर चन्द्रचिमान के ऊपर यावत् विजय नाम विमान में देवपने उत्पन्न हुवा है. हिन्दी अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥ ११ ॥ अनुवाद १ वर्ग. BENERCENSECRETHERE BRTEREDEEMIERCTCHERE जाली कुमार के लिये भाविपृच्छा प्रभु का प्रत्युत्तर. ERITTER HEREMIEREDICTI मूल- जालिस गं. भंते ! देवस्स केवतियं कालं ठिती पण्णत्ता ? गोयमा ! बत्तीसं सांगरोवमाई ठिती पण्णत्ता, सेणं भंते ! ताओ देवलोयाओ आउक्खएणं ३ (भवक्खएणं ठिइक्खएणं) कहिं गच्छि- हिति ? कहिं उववन्जिहिति ? गोयमा ! महाविदेह वासे सिज्झिहिति, ता एवं जंबू ! समणेणं जाव संप- त्तेणं अणुत्तरोवबाइयदसाणं पढमवग्गस्स पढमज्झयणस्स अयमढे पपणत्ते--- पढममज्झयणं सम्मत्तं. ॥१॥ ॥११॥ ।
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥१२॥
हिन्दी
अनुवाद
१ वर्ग.
भावार्थ- गौतम स्वामी पूछते हैं- हे भगवन्त ! जाली देव की कितने काल की स्थिति घताई ? परमात्मा
ने उत्तर दिया-हे गौतम ! बत्तीस सागरोपम की स्थिति कही गई. गौतम गणधर ने पुनः प्रश्न किया-हे भग-
वन्त ! वह जाली नामक देव देवलोक की आयुप्य क्षय कर : (भव क्षय कर-स्थिति क्षयकर) कहां जावेगे ? कहां
उत्पन्न होंगे ? प्रभु ने फरमाया- गौतम ! यह जाली देव देवलोक से च्यवकर महाविदेह क्षेत्र में उच्चकुल में उत्पन्न
हो चारित्र ग्रहण कर मोक्षपद प्राप्त करेगा- सुधर्म स्वामी फरमाते हैं- हे जम्बू ! श्रमण भगवन्त महावीर
देव यावत् मोक्ष को पधारे ने अनुत्तरोपपातिकदशा के प्रथम वर्ग के पहिले अध्ययन का इस प्रकार अर्थ यानी
बयान फरमाया है-पहिले अध्ययन का भावार्थ पूर्ण
प्रथम वर्ग का पहिला अध्ययन मूल और भावार्थ सहित सम्पूर्ण.
RECENSE
॥१२॥
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
* दूसरा अध्ययन यावत् दसवाँ अध्ययन *
(मयाली कुमार यावत् अभय कुमार)
हिन्दी
अनुवाद
१ वर्ग
नौ कुमारों का संक्षिप्त आख्यान
मूल
एवं सेसाणवि अट्टण्हं भाणियव्वं, नवरं सत्त धारिणी सुआ वेहल्लवेहासा चेल्लणाए, आइ-
ल्लाणं पंचण्हं सोलस वातातिं सामनपरियातो तिण्हं बारस वासातिं दोण्हं पंच वासाति, आइल्लाणं पचण्हं
आणुपुबीए उववायो विजये वेजयंते जयंते अपराजिते सव्वट्ठसिद्धे, दिहदंते सव्वट्ठसिद्धे, उकमेणं सेसा
अभओ विजए, सेसं जहा पढमे, अभयस्स णाणत्तं, रायगिहे नगरे सेणिए राया नंदादेवी माया सेसं तहेव,
एवं खल्लु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरोबवाइयदसाणं पढमस्स वग्गस्स अयमढे पन्नत्ते. (सूत्र १)
॥१३॥
अनुत्तरो-
पपातिक
दशा सूत्र
॥ १४ ॥
हिन्दी
अनुवाद
१ वर्ग.
..
भावार्थ- इस ही प्रकार शेप आठ कुमारों के आठ अध्ययन कना; विशेप बात यह है कि-पहिले सात
कुमार (१ जाली २ मयाली ३ उपजाली ४ पुरुपसेन ५ वारिसेन ६ दीर्घदन्त ७ लप्टदन्त) धारिणी माता के थे
तथा चेहल्ल और वेहास; ये दो चेल्लणा रानी के पुत्र थे; आदि के पांच कुमारों का सोलह वर्प का चारित्र पर्याय
था, इनके याद के तीन कुमारों का बारह वर्प का चारित्र पर्याय था, और आखिरी दो का पाँच वर्ष का चारित्र
पर्याय था-सब जन यहां से कालधर्म पाकर अनुत्तर विमानों में उत्पन्न हुवे, उनमें से पहिले के पांच क्रमशः
विजय-विजयन्त-जयन्त-अपराजित और सर्वार्थसिद्ध में उत्पन्न हुवे; छट्टे दीर्घदन्त सर्वार्थसिद्ध में उत्पन्न
हुवे, बाकी तीन कुमार उत्क्रम से यानी अपराजित-जयन्त और वैजयंत में जन्म पाये, अभय कुमार यानी आखरी
दसवें कुमार की विजय विमान में उत्पत्ती हुई है; बाकी सब वृत्तान्त पहिले अध्ययन के समान जान लेना-
अभय कुमार के लिये इतना विशेप है कि-राजगृही नगर में श्रेणिक राजा की नन्दा नामकी रानी अभय की
माता थी शेप अधिकार पूर्ववत् जानना. सुधर्म स्वामी फरमाते हैं-हे जंबू ! इस प्रकार निश्चय श्रमण भगवन्त
महावीर देव यावत् मोक्ष को पधारे ने अनुत्तरोपपातिकदशा सूत्र के पहिले वर्ग का इस प्रकार अर्थ यानी बयान
फरमाया है. (सूत्र १) प्रथम वर्ग का भावार्थ सम्पूर्ण हुवा.
-<
II
॥१४॥
उपसंहार
हिन्दी
अनुवाद
२ वर्ग.
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥ १५ ॥
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इस प्रथम वर्ग में दस महा पुरुषों की तपश्चर्या का भव्य उल्लेख है, तप विना दैहिक और मानसिक शुद्धि
संभव नहीं; अतएव पतितपावनकर्व तपश्चर्या की अवश्य आचरणा करके आत्मोन्नति करें.
दूसरा अध्ययन यावत् दसवां अध्ययन मूल और भावार्थ सहित सम्पूर्ण
3 प्रथम वर्ग समाप्त है
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द्वितीय वर्ग
(वीजक)
मूल-जति णं भंते ! समणेणं जाव सपत्तेणं अणुत्तरोववाइयदसाणं पढमस्स वग्गस्स अयमठे पन्नत्ते
दोच्चणस्सं णं भंते ! वग्गस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं समणेणं जाव सपत्तेणं के अढे पन्नत्ते ? एवं खलु जम्बू!
॥१५॥
अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥१६॥ हिन्दी अनुवाद २ वर्ग: संमणेणं जाव संपत्तेणं दोच्चस्स वग्गस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं तेरस अज्झयणा पन्नत्ता. तंजहा- दीहसणे १ महासेणे २। लट्ठदंते य ३ गूढदंते य ४॥ लुद्धदंते ५ हल्ले ६ । दुमे ७ दुमसेणे ८ महादुमसेणे य ९॥१॥ आहिते सीहे य १०। सीहोणे य ११ माहासीहसेणे य १२॥आहिते पुन्नसेणे य १३ योधवे तेरसमे होति अज्झयणे॥२॥ भावार्थ- सुधर्म गणधर महाराज को जम्मू जनगार पूछते हैं-हे पूज्य ! अमण भगवन्त महावीर देव यावत् मोक्ष को पधारे ने यदि अणुत्तरोपपातिकदशा के पहिले वर्ग का इस तरह (ऊपर कहा गया) अर्थ ययान किया तो हे भदन्त ! अणुस्तरोपपातिकदशा के दूसरे वर्ग का श्रमण भगवन्त महावीर देव यावत् मोक्ष को पधारे ने क्या अर्थ फरमाया ? इस पर सुधर्म स्वामी फरमान करते हैं-इस प्रकार निश्चय हे जम्बू ! श्रमण भगवन्त यावत् मोक्ष को पधारे ने अनुत्तरोपपातिकदशा के दूसरे वर्ग के तेरह अध्ययन फरमाये हैं. वे इस तरह हैं:- दीर्घसेन २ महासेन ३ लष्टदन्त ४ गूढदन्त ५ शुद्धदन्त ६ हाल ७ द्रुम ८ द्रुमसेन ९ महाद्रुमसेन १० सिंह ११ सिंहसेन १२ महासिंहसेन तथा १३ पुण्यसेन इस तरह तरह कुमारों के नामसे १३ अध्ययन विख्यात हैं.
पहिला अध्ययन
[ दीर्घसेन ]
हिन्दी
अनुवाद
२ वर्ग:
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥ १७ ॥
मूल-जति णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरोववाइयदसाणं दोच्चस्स वग्गस्स तेरस अज्झ-
यणा पन्नत्ता, दोच्चस्स णं भंते ! वग्सस्स पढमज्झयणस्स समणेणं जाव संपत्तेणं के अढे पन्नत्ते ? एवं खलु
जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे णगरे गुणसिलते चेतिते सेणिए राया धारिणीदेवी सीहो सुमिणे जहा
जाली तहा जम्मं वालत्तणं कलातो, नवरं दीहसेणे कुमारे सच्चेव वत्तव्वया जहाजालिस्सजाव अंतं काहिती।
भावार्थ-जम्बू स्वामी ने पुनः प्रश्न किया-हे भगवन्त ! यदि श्रमण भगवन्त यावत् मोक्ष को पधारे ने
अनुत्तरोपपातिकदशा के दूसरे वर्ग के तेरह अध्ययन बताये हैं तो हे पूज्य ! दूसरे वर्ग के पहिले अध्ययन का
श्रमण भगवन्त महावीर देव यावत् मोक्ष को पधारे ने क्या बयान फरमाया है ? सुधर्म स्वामी उत्तर देते हैं-इस
कदर निश्चय करके हे जम्बू! उस काल उस समय में राजगृह नाम का नगर था, उसके बाहर गुणशील नामक
उद्यान था, वहां पर महाराजा श्रेणिक राज्य करते थे, उनकी धारिणी संज्ञिका पदरानी थी, उसने एक वख्त स्वम
॥.१७॥
.
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥१८॥
हिन्दी
अनुवाद
२ वर्ग
में सिंह देखा, जाली कुमार के समान जन्म- बाल्यावस्था-कलाग्रहणादि जानना, विशेषता यह थी कि उनका
नाम 'दीर्घसेन' था; दीक्षा वगैरः सर्व अधिकार जाली कुमारवत् समझना यावत् देवलोक से च्यवकर महा-
विदेह क्षेत्र में मोक्षपद प्राप्त करेंगे।
दूसरा अध्ययन यावत् तेरहवां अध्ययन ®
[ महासेन यावत् पुण्यसेन ]
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बारह कुमारों का संक्षेप वृत्तान्त
HAMMAMALINI
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मूल- एवं तेरस वि रायगिहे सेणिओ पिता धारिणी माता तेरसण्हवि सोलसवासा परियातो
आणुपुवीए विजए दोन्नि वेजयन्ते दोन्नी जयन्ते दोन्नी अपराजिते दोन्नी, सेसा महादुमसेणमाती पंच
॥१८॥
हिन्दी
अनुवाद
२ वर्ग
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥ १९॥
सव्वट्ठसिद्धे, एवं खलु जम्बू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरोववाइयदसाणं दोच्चस्स वग्गस्स अयमढे
पन्नत्ते, मासियाए सलेहणाए दोसुवि वग्गेसु. [ सूत्रं २]
भावार्थ- इस ही प्रकार तेरह कुमारों के अध्ययन कहना-राजगृही नगरी, श्रेणिक पिता, धारिणी माता
वगैरः सय कुमारों के लिये जानना. तेरह ही कुमारों ने सोलह २ वर्ष पर्यन्त चारित्र पर्याय पालन किया, अन्त में
अनशन तप धारण कर मरण-शरण होकर अनुक्रम से दो कुमार विजय विमान में-दो कुमार विजयंत
विमान में-दो कुमार जयन्त विमान में-दो कुमार अपराजित विमान में उत्पन्न हुवे; याकी के महाद्रुमसेन
आदि पाँच कुमार सर्वार्थसिद्ध विमान में उत्पन्न हुवे . सुधर्म खामी ने फरमाया-हे जम्बू ! निश्चय इस तरह
श्रमण भगवन्त महावीर देव ने अनुत्तरोपपातिकदशा के दूसरे वर्ग का यह बयान किया-दोनों वर्ग के उत्तम
पुरुषों का संलेखना तप एक २ मास का समझ लेना. ( सूत्र २) दुसरे वर्ग का भावार्थ सम्पूर्ण हुवा.
-
PROCCC
उपसंहार
karaayari
इस दूसरे वर्ग में तेरह उत्तम पुरुषों की उज्ज्वल सपर्या का संक्षिा पयान द, तप पिना मान-पानावि
॥१९॥
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥ २०॥
हिन्दी
अनुवाद
की आसक्ति मिट नहीं सकती और सबसे अधिक दुस्त्याज्य भोजनासक्ति ही है ; इस वास्ते आत्माहतार्थ तप-
श्चर्या
अवश्य करनी चाहिये.
दूसरा अध्ययन यावत् तेरहवां अध्ययन मूल और भावार्थ सहित सम्पूर्ण.
वर्ग
३ वर्ग
॥ दूसरा
समाप्त ॥
तृतीय वर्ग
GE
[प्राग्वक्तव्य]
मूल--जति णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरोववाइयदसाणं दोच्चस्स वग्गस्स अयमहे
पन्नत्ते, तच्चस्स णं भंते ! वग्गस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं समणेणं जाव संपत्तेणं के अटे पन्नत्ते ? एवं खलु
जम्बू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरोववाइयदसाणं तच्चस्स वग्गस्स दस अज्झयणा पन्नत्ता. तंजहा-
॥ २०॥
हिन्दी
अनुवाद
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥ २१ ॥
३ वर्ग.
धपणे य सुणक्खत्ते । इसिदासे अ आहिते ॥ पेल्लए रामपुत्ते य । चंदिमा पिट्ठिमाइया ॥ १॥
पेढालपुत्ते अणगारे । नवमे पुट्ठिले इ य ॥ वेहल्ले दसमे वुत्ते । इमे ते दस आहिते ॥ २॥
भावार्थ-भगवान् सुधर्म गणधर को जम्बू अनगार विनय पूर्वक पूछते हैं-हे पूज्य गुरुदेव ! श्रमण भग-
वन्त महावीर देव यावत् मोक्ष को पधारे ने अनुत्तरोपपातिकदशा के द्वीतीय वर्ग को यह (उपरोक्त) बयान
फरमाया तो हे प्रभो! अणुत्तरोपपातिकादशा के तीसरे वर्ग का श्रमण भगवन्त यावत् मोक्ष को पधारे ने क्या
अर्थ प्रकाशित किया ? इस पर सुधर्म स्वामी फरमाते हैं-निश्चय इस प्रकार हे जम्बू ! श्रमण भगवन्त यावत्
मोक्ष को पधारे ने अणुत्तरोपपातिकदशा के तीसरे वर्ग के दस अध्ययन जाहिर किये हैं. वे ये हैं:-
१ धन्यकुमार २ सुनक्षत्र कुमार ३ ऋषिदास कुमार ४ पेल्लक कुमार ५ रामपुत्र कुमार
६ चन्द्र कुमार ७ पृष्ट कुमार ८ पेढाल पुत्र अनगार ९ पोटिल कुमार १० वेहल्ल कुमार.
इन दस कुमारों के नाम से दस अध्ययन कहे जाते हैं.
॥२१॥
अनुत्तरो.
पपातिक-
दशा सूत्र
॥२२।।
* पहिला अध्ययन
(धन्य कुमार)
हिन्दी
अनुवाद
६राटसम्राटसम्रा680
धन्यकुमार का गृहस्थाश्रम
JASAEAEAEAEAEAEAEAEAEAEAEAEAEAEAEAEAEROS
मूल-जति णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरोववाइयदसाणं तच्चस्स वग्गस्स दस अज्झ-
यणा पन्नत्ता, पढमस्स णं भंते ! अज्झयणस्स समणेणं जाव संपत्तेणं के अटे पन्नते ? एवं खलु जम्बू
तेणं कालेणं तेणं समएणं कागंदी णामणगरी होत्थारिद्धस्थिमियसमिद्धा सहसंबणे उज्जाणे सव्वोदुए जिअसत्तु
राया, तत्थ णं कागंदीए णगरीए भद्दा णामं सत्थवाही परिवसइ अढा जाव अपरिभूआ, तीसे णं भद्दाए
सस्थवाहीए पुत्ते धन्ने नामं दारए होत्था अहीण जाव सुरुवे पंच धातीपरिग्गहिते तंजहा- खीरधाती जहा
॥२२॥
हिन्दी
अनुवाद
३ वर्ग
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥२३॥
महब्बले जाव वावत्तरि कलातो अहीए जाव अलं भोगसमत्थे जाते यावि होत्था, तते णं सा भद्दा सत्थ-
वाही धन्नं दारयं उम्मुक्कबालभावं जाव भोगसमत्थं यावि जाणेत्ता बत्तीसं पासायवडिंसते कारेति अब्भु-
ग्गतमूसिते जाव तेसिं मज्झे भवणं अणेगखंभसयसन्निविट्ठ जाव बत्तिसाए इब्भवरकन्नगाणं एगदिवसेणं
पाणिं गेण्हावेति २ त्ता बत्तीसओ दाओ जाव उप्पिंपासायवडिंसते फुटेतेहिं जाव विहरति ।
भावार्थ-जम्बू खामी गुरु महाराज से पूछते हैं-हे पूज्यवर्य ! श्रमण भगवन्त महावीर देव यावत्
मोक्ष को पधारे ने जो तीसरे वर्ग के दस अध्ययन प्रदर्शित किये हैं तो हे भगवन् ! पहिले अध्ययन का श्रमण भगवन्त
यावत् मोक्ष को पधारे ने क्या अर्थ प्रकाशित किया ? इस पर सुधर्म स्वामी फरमाते हैं-हे जम्बू ! निश्चय इस
प्रकार चतुर्थ काल में (चौथे आरे में ) आख्यान प्रसङ्ग के समय में काकंदी नामकी ऋद्धिपूर्णा-निर्भया और
समृद्धिशालिनी एक नगरी थी, उसके बाहर सहस्राम्रन ( हजार आम के वृक्षों वाला वन ) नामक उद्यान
(नगर के समीप का जंगल ) था, वह सर्व ऋतुओं में फल-फूल से सुशोभित था, उस काकंदी नगरी में जित-
शत्रु नामका राजा राज्य शासन पर विराजित था, उस काकंदी नगरी में भद्रा नामकी सार्थवाहिनी रहती थी,
वह ऋद्धिमति थी यावत् अन्य से अपरास्त (पराभव नहीं होने वाली) थी, उस भद्रा सार्थवाहिनी के धन्य-
॥२३॥
हिन्दी; अनुसरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥ २४ ॥ अनुवाद ३ वर्ग कुमार नामका पुत्र था, अहीन यानी पूर्ण पंचेन्द्री शरीर वाला यावत् स्वरूपवान् था, पाँच धाय माताओं से इस का पालन-पोषण' होता था, वे धाय माताएँ ये हैं-१ दूध पिलाने वाली यानी स्तन पान कराने वाली २ स्नान कराने वाली ३ वस्त्राभूषण पहनाने वाली ४ गोद में लेकर फिराने वाली ५ क्रीड़ा कराने वाली, इत्यादि महाबल कुमार के मुआफिक जानना, यावत् धन्यकुमार बहत्तर कला कुशल हुवा यावत् पूर्ण भोग समर्थ हुवा यानी युवा अवस्था को प्राप्त हुवा। तत्पश्चात् उस भद्रा सार्थवाहिनी ने धन्यकुमार को मुक्तयालभाव यावत् भोग समर्थ जानकर यत्तीस प्रासादावतंसक (सुन्दर महल') तैयार कराये, व बहुत ऊँचे थे, उनके बीचों बीच हजारों स्तम्भ से शोभित एक सुन्दर भवन 8 कराया; यावत् श्रीमन्तो की श्रेष्ठ यत्तीस कन्याओं के साथ एक दिनमें विवाह कराया, 'कराकर-बत्तीस २ दास-दासी बगैरः का दायजा दिया, यावत् वह धन्यकुमार बत्तीस ललनाओं के साथ महलों के ऊपर नाच-गान वाजिन्त्रो सहित, यावत् वैषयिक सुख (सांसारिक सुख ) में लीन होकर रहने लगा प्रासाद स्त्रियों के लिये और भुवन कुमार के लिये बनाया गया था, प्रासाद और भुवन की बिल्डिंग ( इमारत ) का अन्तर हमारा बनाया हुआ विपाक सूत्र का हिन्दी अनुवाद पृष्ठ ३३५ के टीकार्थ में खुलाशा किया है, वहा. से जान लेना. ॥ २४ ॥ 1995 E अनुत्तरी- पपातिक- दशा सूत्र ॥ २५ ॥ प्रभु का पदार्पण--धन्यकुमार वैराग्य रंग रंगित भागवती दीक्षा का ग्रहण हिन्दी अनुवाद ३ वर्ग - मूल तेणं कालेणं तेणं समएणं समणे भगवं महावीरे समोसढे, परिसा निग्गया राया जहा कोणितो तहा जियसनु णिग्गतो, तते णं तस्स धन्नस्स तं महता जहा जमाली तहा णिग्गतो, नवरं पाय- चारेणं जाव जं नवरं अम्मयं भदं सत्यवाहि आपुच्छामि, तते णं अहं देवाणुप्पियाणं अंतिते जाव पव्व- यामि जाव जहा जमाली तहा आपुच्छइ मुच्छिया वृत्तपडिवुत्तया जहा महब्बले जाव जाहे णो संचाएति जहा थापच्चापुत्तो जियसत्तुं आपुच्छति छत्तचामरातो सयमेव जियसत्तु णिक्खमणं करेति जहा थावच्चा पुतस्स कहो जाव पव्वतिते अणगारे जाते इरियासमिते जाव बंभयारी । भावार्थ- उस काल उस समय में श्रमण भगवन्त महावीर देव समवसरे, नगरी से प्रजा पर्षदा प्रभु के
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥२६॥
हिन्दी
अनुवाद
३ वर्ग
दर्शनार्थ निकली, कोणिक राजा की तरह ऋद्धिपूर्ण जितशत्रु राजा भी प्रभु के दर्शनार्थ घरसे निकला,
तदन्तर उस धन्यकुमार न नागरिकों के कोलाहल से प्रभु का पदार्पण जाना, तय यह जमाली की तरह
दर्शनार्थ रवाना हुवा, विशेषता यह थी कि कुमार पैर पैदल वंदनार्थ गया, यावत् परमात्मा की देशना
वैराग्य रंग रंगित हुआ, विशिष्ट बात यह है कि धन्यकुमार ने प्रभु से प्रार्थना की कि मैं मेरी माता भद्रा सार्थ-
वाहिनी से आज्ञा प्राप्त कर याद आप प्रभु के पास यावत् मैं भवतापहारिणी दीक्षा अंगीकार करूंगा ! ऐसा
निवेदन कर यावत् घर पर जाकर जमाली की तरह माता से आज्ञा मांगी, सुनते ही मोहमथिल माता मूर्छित
होगई, सावधान होने पर माता और पुत्र के परस्पर युक्ति-प्रत्युक्ति रूप सुन्दर संवाद हुवा; अर्थात् माता ने
दीक्षा निषेध का पक्ष सिद्ध करने का प्रयत्न किया और पुत्र ने दीक्षा समर्थन का पक्ष सिद्ध करने का प्रयास
किया, श्री भगवती सूत्र में कथित महायल की तरह माता-पुत्र के प्रश्नोत्तर जान लेना यावत् (आखीर ) जय
माता पुत्र को समझाने म असक्त हुई तय थावचा पुत्र के समान (ज्ञाताधर्मकथा के पाँचवें अध्ययन में कथित)
धन्यकुमार की माताने जितशत्रु राजा के पास से अपने पुत्र के दीक्षा महोत्सव के लिये छत्र-चामरादि की
याचना की, तब जिस तरह थावचा पुत्र का दीक्षा महोत्सव श्रीकृष्ण ने किया था उस ही तरह जितशत्रु राजा
ने धन्यकुमार का खयं दीक्षा महोत्सव किया, यावत् कुमार अनगार पद को प्राप्त हुवे, इर्यासमिति आदि में
॥२६॥
उपयोगवन्त होते हुवे यावत् गुप्तब्रह्मचारी यानी ब्रह्मचर्य की नौवाड़ * पालने वाले हुवे. अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥ २७॥ हिन्दी अनुवाद ३ वर्ग. तपश्चर्या के लिये उग्रप्रतिज्ञ धन्य अनगार की प्रार्थना भगवन्त का आदेश मूल-तते णं से धन्ने अणगारे जं चेव दिवसं मुंडे भवित्ता जाव पव्वतिते तं चेव दिवसं समणं भगवं महावीरं वंदति णमंसति वंदित्ता णमंसित्ता एवं वयासी-इच्छामि णं भंते ! तुन्भेणं अब्भणुपणाते समाणे जावज्जीवाए छठं छठेणं अणिक्खित्तेणं आयंविलपरिग्गहिएणं तवोकम्मेणं अप्पाणं भावेमाणे विह- रित्तते छहस्स वि य णं पारणयसि कप्पति आयंबिलं पडिग्गहित्तते नो चेव णं अणायंविलं तं पि य संसह णो चेव णं असंसटुं तं पि य णं उज्झिय धम्मियं नो चेव णं अणुज्झिय धम्मियं तं पि यजं अन्ने वहवे समणमाहणआतिहिकिवणवणीमगाणवकंखंति, अहासुहं देवाणुप्पिया ! मा पडिबंधं करेह । * मधाचर्य की नौवाद का बयान हमारे बनाये हुवे 'सुखचरित्र ' से जान लेना ॥२७॥ REC अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥ २८॥ हिन्दी अनुवाद ३ वर्ग. भावार्थ-पारमेश्वरी प्रव्रज्या ग्रहण करने के पश्चात् उस धन्य (धन्ना) अनगार ने जिस दिन मुंडित होकर दीक्षा ली उस ही दिन श्रमण भगवन्त महावीर देव को वंदन- नमस्कार किया, करके इस प्रकार प्रार्थना की-हे प्रभो ! आपकी आज्ञा प्राप्त करके जीवन पर्यन्त छट २ यानी येले २ की तपस्या कर पारणे में आयबिल तप द्वारा मैं आत्म भावना भाता हुवा विचरूं ! ऐसी मेरी इच्छा है; अर्थात् छट के पारणे भी आपॅबिल (शुद्ध चावलादि ) करना कल्पे; परन्तु आयक्लि बिना की कोई वस्तु लेना कल्पे नहीं, वह आयबिल की वस्तु भी संसृष्टं हो (खरड़े हुवे हाथ बगैर से जो वस्तु दी जाय) वही कल्पे, किन्तु असंसृष्ट कल्पे नहीं, व संरदृष्ट आहार भी उज्झित धर्मवाला (गृहस्थों के खाने याद वचा बचाया फैंक देने के लायक) आहार कल्पे, मगर अनुज्झित आहार कल्पे नहीं, उज्झित होने पर भी ज़िस आहार को अमण-माहण- अतिथि-कृपण-वनीपक (साधु ब्रात्मण-पाहुना-कंजूस-भिखारी ) इच्छते न हों वह आहार बहेरना कल्पे; इस कदर तपस्या करने की आज्ञा वक्षो ! ज्ञानवन्त प्रभु ने फरमाया-हे देवों के प्यारे ! तुझे सुख हो वैसा कर, इसमें विलम्ब मत कर, यह तेरे लिये श्रेयस्कर है. ६ आयविल में मात्र एक प्रकार का अनाज व दूमरा अचित्त जल, ये दो द्रव्य ग्रहण करना उचित है, कारण कि यह तप सर्व रसों से मुक्त रहने को ही किया जाता है. ॥२८॥ RE
-
7
हिन्दी
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
।। २९॥
धन्य अनगार का घोर तप
३ वर्ग
मूल-तते णं से धन्ने अणगारे समणेणं भगवता महावीरेणं अन्भणुन्नाते समाणे हह तुट्ठ जाव-
जीवाए छठं छटेणं अणिक्खित्तेणं तवोकम्मेणं अप्पाणं भावमाणे विहरति, तते णं से धन्ने अणगारे पढम
छट्ठक्खमणपारणगंसि पढमाए पोरसीए सज्झायं करेति जहा गोतम सामी तहेव आपुच्छति जाव जेणेव
काकंदीणगरी तेणेव उवागच्छति २त्ता काकंदीणगरीए उच्चनीय जाव अडमाणे आयंबिलं जाव णावकंखति ।
भावार्थ-तत्पश्चात् थे धन्य अनगार श्रमण भगवन्त महावीर देव की आज्ञा प्राप्त होने पर हर्षित-
तुष्टित होकर जीवन पर्यन्त निरन्तर छट २ की यानी बेले २ की तपस्या करते हुवे आत्म-भावना में विचरते हैं.
प्रारम्भ में धन्य अनगार ने पहिले छट क्षमण के पारणे गौतमस्वामी की तरह पहिली पोरसी में स्वाध्याय, दूसरी
पोरसी में ध्यान (सूत्रार्थ चिन्तन) तीसरी पोरसी में मुंहपत्ति - वस्त्र - पात्रादि का प्रतिलेखन करके पारणे के
लिये प्रभु की आशा लेकर यावत् जहां पर काकन्दी नगरी है वहां पर पधारते हैं, पधार कर क्षत्री बगैरः उँच
॥२९॥
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
कुल में कृपणादि नीच कुल में चणिकादि मध्यम कुल में यावत् भ्रमण करते हुये आपॅपिल के लिये रूक्ष और
नीरस आहार ग्रहण किया.
अनुवाद
३ वर्ग
धन्य अनगार की आदर्श गोचरी
मूल-तते णं से धन्ने अणगारे ताग अभुज्जताए पयययाए पयत्ताय पग्गहियाए एसणाए जति
भत्तं लभति तो पाणं ण लभति अह पाण तो भत्तं न लभति, तते णं से धन्ने अणगारे अदीणे अविमणे ।
अकल्लुसे अविसादि अपरितंतजोगी जयणघडणजोगचरित्ते अहा पज्जत्तं समुदाणं पडिगाहेति पडिगाहित्ता
काकंदीओ णगरीतो पणिणिक्खमति जहा गोतमे जाव पडिदंसेति, तते णं से धन्ने अणगारे समणेणं
भगवया महावीरेणं अब्भणुनाते समाणे अमुच्छिते जाव अणज्झोववन्ने विलमिवपण्णग्गभूतणं अप्पाणेणं
आहारं आहारेति आहारित्ता संजमेणं तवसा अपाणं भावेमाणे विहरति ।
॥३०॥
। अनुवाद ३ वर्ग. अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥३१॥ भावार्थ-धन्य अनगार की गौचरी की स्थिति बयान करते हुवे सुधर्म स्वामी फरमाते हैं-तदन्तर वह धन्य अनगार जिस तरह सुविहित साधु ऐषणा की गवेषणा करते हैं उस तरह की तथा प्रयत्नवाली, गुरु महाराज की आज्ञा वाली और खुदने अच्छी तरह ग्रहण की हुई ऐसी एषणा से (निर्दोषता से) यदि आहार मिले तो पानी नहीं मिले और पानी मिले तो आहार नहीं मिले ; अर्थात् कष्टपूर्वक आहार - पानी ग्रहण करके पश्चात् वह धन्य अनगार दीनता रहित यानी दीनाकृति रहित, शून्य मन रहित, क्रोधादिक की कलुषता रहित, विषाद (खेद ) रहित, अमरहित, समाधिवाले, प्राप्तयोग के अन्दर उद्यम और अप्राप्त योग में प्रयत्न; ऐसे यतन और घटन (उद्यम और प्रयत्न ) की मुख्यता वाले योग पूर्ण (विचार - वाणी- वर्तन पूर्ण) चारित्र वाले धन्य अनगार ने यथा प्राप्त आहार - पानी ग्रहण किया, करके काकंदी नगरी से बाहार निकले और यावत् गौतम स्वामी की तरह भगवन्त को आहार-पानी बताया; तदन्तर धन्य अनगार ने भगवन्त की आज्ञा प्राप्तकर अनासक्त (मूर्छा रहित ) होकर लुब्धता रहित होकर 'बिलपन्नगवत् ' यानी जैसे सर्प आसपास स्पर्श नहीं करता हुवा बिल में प्रवेश करता है वैसे ही मुख में आस पास नहीं फिराते हुवे आहार उतार जाते थे मतलब कि राग रहित होने से इस प्रकार आहार करते हैं, करके संयम-तप से आत्म भावना करते हुवे धन्य अनगार विचरते हैं-रहते हैं. * इसका विशेष खुलासा हमारा अनुवादित 'विपाक सूत्र' के पृष्ट २३३ के फुटनोट से जान लेना.
165EEEX205 अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥३२॥ हिन्दी अनुवाद ३ वर्ग धन्य अनगार का शास्त्राभ्यास मूल-समणे भगवं महावीरे अण्णया कयाइ काकंदीए णगरतो सहसंबवणातो उज्जाणातो पडि- णिक्णमति २ त्ता बहिया जणवयविहारं विहरति, तते णं से धन्ने अणगारे समणस्स भगवओ महावीरस्त तहारूवाणं थेराणं अंतिते सामाइयमाइयाइं एकारस अंगाई अहिज्जति संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणे विहरति । भावार्थ-कितनेक समय के याद श्रमण भगवान महावीर देव ने काकंदी नगरी के सहस्राम्रवन नामक उद्यान से विहार किया, करके बाहार देशों में विचरने लगे, तब वह धन्य अनगार श्रमण भगवन्त महावीर देख के तथारूप स्थविर मुनि के पास सामायिक आदि ग्यारह अग का अभ्यास किया और संयम-तप द्वारा आत्म भावना करते हुवे विचरते हैं. W इसका खुलासा हमारे हिन्दी अनुवादित 'विपाक सून' के पृष्ट ३५९ की टिप्पणी से मालूम कर लेना.
-
mamremiers
अनुत्तरा
पपातिक-
दशा सूत्र
॥३३॥
हिन्दी
अनुवाद
३ वर्ग
दिव्य तपश्चर्या से धन्य अनगार के शरीर की
अवर्णनीय शोभा
HEMr Mr H IS IN Here
मूल-तते ण से धन्ने अणगारे तेणं ओरालेणं जहा खंदतो जाव सुहुयहुयासणे इव तेयसा जलंते
उवसोभेमाणे चिट्ठति ।
भावार्थ-तत्पश्चात् वह धन्य अनगार उदार तप से स्कंदक मुनि के मुआफिक ४ यावत् अच्छी तरह धी
से होमी हुई अग्नि की तरह तप-तेज से दैदिप्यमान होकर अत्यंत शोभते हुवे विचरने लगे-अब क्रमशः तपोधन
धन्य अनगार की शारीरिक परिस्थिति दिखलाते है:-
मूल-धन्नस्स णं अणगारस्स पादाणं अयमेयारूवे तवरूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते सुक-
छल्लीति वा कट्टपाउयाति वा जरग्गओवाहणाति वा, एवामेव धन्नस्स अणगारस्स पाया सुक्का णिम्मंसा
अहिचम्मछिरत्ताए पण्णायंति णो चेव णं मंससोणियत्ताए, धन्नस्स णं अणगारस्स पायंगुलियाणं अयमेया-
स्कन्दक मुनि का बयान भगवती सूत्र शतक २ उद्देशा १ मे है ।
x
॥ ३३ ॥
हिन्दी अनुवाद अत्तनुरो- पपातिक- दशा सुन्न ॥ ३४ ॥ ३ वर्ग भावाथ - रूवे तवरूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते कलसंगलियाति वामुग्गसंगलियाति वा मांससंगलियातिवा तरुणिया छिन्ना उण्हे दिन्ना सुक्का समाणी मिलायमाणी मिलायमाणी चिट्ठति, एवामेव धन्नस्स पायंगलि- यातो सुक्कातो जाव सोणियत्ताते । तपस्या के प्रभाव से धन्य अनगार के पैर की आकृति का ऐसा सौन्दर्य था कि जिस सूखी हुई छाल वा काप्ट पादुका (पावडी) अथवा पुराना पाउंपोप हो उस तरह उन महात्मा के पैर शुष्क मांस रहित यानी मात्र हड्डियाँ- चमड़ी तथा नसें रहजाने से पैर हैं ऐसा मालूम होता था; परंतु मांस रुधिर की क्षाणता से इनका सद्भाव नहीं दिखाई देता था-तपस्या के प्रभाव से धन्य अनगार की पैर की अंगुलियों का सौन्दर्य इस प्रकार था कि जिस तरह तुवर की फली-मूंग की फली अथवा उड़द की फली कोमल अवस्था में छेदकर उसको सुखाई गई हो और वह सूख जाने पर करमा गई हो, अत्यंत करमा गई हो वैसी मांस-रुधिर रहित अति शुष्क सलवाली धन्य अनगार की अंगुलियां दिखाई देती थी. ॥ ३४ ॥ तपस्या से रूप की सुन्दरता तो हीनता को प्राप्त होगई थी, परन्तु यहा पर सर्वत्र भाव से सौदर्य माना गया है.
अनुत्तरा-
पपातिक
दगा मुत्र
हिन्दी
अनुवाद
३ वर्ग
मूल-धनस्स अणगारस्स जंघाणं अयमेयारूवे तवरूबलावण्णे होत्था, से जहा णामते काकजं-
घात्ति वा कंक जंघाति वा ढेणियालियाजंघाति वा जाव णो सोणियत्ताए-धनस्स अणगारस्स जाणूणं अय-
मेयारूवे तवरूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते कालीपोरेति वा मयूरपोरेति वा ढेणियालियापोरेति वा
एवं जाव सोणियत्ताए --धनस्स अणगारस्स उरुस्स अयमेयारूवे तवरूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते
सामकरेल्लेति वा बोरीकरील्लेति वा सल्लतिकरील्लेति वा सामलीकरील्लेति वा तरुणिते उण्हे जाव चिट्ठति,
एवामेव धन्नस्स अणगारस्स उरू जाव सोणियत्ताए - धन्नस अणगारस्स कडियत्तस्स इमेयारूवे तवरूव--
लावण्णे होत्था, से जहा णामते उट्ठपादेति वा जग्गपादेति वा (माहिलपादेति वा) जाव सोणियत्ताए।
भावार्थ-तपस्या के प्रताप से धन्य अनगार की पिंडियों का ऐसा सौंदर्य पना था जैसा काकजंघा नाम
की वनस्पति जिस की नसें दिखाती हों और संधी का भाग मोटा (जाडा) हो, अथवा कागले की जंघा (पिंडी)
कक पक्षी की जंघा,देणिकालिक नामक पक्षी की जंघा जो स्वाभाविक ही मांस-रुधिर रहित होती है,उसके समान
धन्य अनगार की पिंडियाँ मांस-मधिर रहित ज्ञात होती थीं-तपस्या के कारण धन्य अनगार के घुटनों का
(गोड़ों) सौंदर्य इस प्रकार था जैसे काकजंघा नामक वनस्पति की गांठ, मोर की जंघा का पर्व (घुटने की गांठ)
॥३५॥
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सत्र
हिन्दी
अनुवाद
३ वर्ग
डेणिकालिक पक्षी का पर्व अथवा ढोणकालिक यानी तीड़ की जंघा का पर्व हो उस मुआफिक उनके घुटने
शुष्क और कठिन होगये थे, यावत् मांस-रुधिर युक्त नज़र नहीं आते थे तपस्या के प्रभाव से धन्य अनगार
की सांथल ऐसी खूबसूरत थी कि जैसे प्रियंगु वृक्ष की नवीन शाखा, बोरड़ी की नवीन शाखा, शल्ल दरख्त की
नई डाली, शाल्मली रूख की नूतन शाखा हो और उसको धूप में रखकर सुखाई गई हो वह जैसी निसत्व हो जाती
है वैसी धन्य अनगार की सांथल मांस-रुधिर रहित शुष्क दिखाई देती थी-तपस्या के प्रताप से धन्य अनगार
का कटिप्रदेश ( कमर) की सुन्दरता ऐसी नज़र आती थी जैसे ऊँट का पग, बुढ्ढे बैल का पग, ( अथवा भैंस
का पग) हो वैसे मांस-रुधिर सहित उनकी कमर मालूम नहीं होती थी- " यहां पर पत्र शव से पतलापन
और सर्गादि वृक्ष के पत्ते दो दलपना जानना; पाठान्तर से कमररूप पट्ट भी कहा है एवं कमर को ऊँट वगैरः
के पग की उपमा दी गई है उसका मतलब यह है कि ऊँट आदि के पग के दो विभाग होते हैं और नीचे से
अति पतले होते हैं इससे उनके गुदा प्रदेश की समता होती है.
मूल-धन्नस्स अणगारस्स उदरभायणस्स इमेयारूवे तवरूवलावण्णे होत्था,से जहा नामते सुक्कदि-
एति वा भज्जणयकभल्लेति वा कट्ठकोलंबएति वा, एवामेव उदरं सुकं --धन्नस्स अणगारस्स पांसुलियकड--
याणं इमेयारूवे तवरूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते थासयाक्लीति वा पाणावलीति वा मुंडावलीति वा।
॥३६॥
अनुत्तरा-
पपातिक-
दशा मूत्र
॥ ३७॥
हिन्दी
अनुवाद
३ वर्ग
भावार्थ-तपस्या से धन्य अनगार क उदररूप भाजन (पेटरूप पात्र) का ऐसा सौंदर्य था, जैसे
सूखी हुई चमड़े की मसक (मसक के जस सल पड़े हुवे ) चने वगैरा भुंजने का ढीय (ढीच जैसा ऊंडा) वृक्ष
की शाखा का झुका हुआ अग्रभाग, अथवा काष्ट की कथरोट (लकड़ी की परात) हो इस मुआफिक उनका
उदर ऊंडा, सलवाला नमा हुआ और पतला शुष्क-रूक्ष मांस रहित दिखाई देता था तपस्या के हेतु से धन्य
अनगार की पांसलियों के मंडल का ऐसा सौंदर्य था कि जिस तरह स्थासकावली, पाणावली, मुडावली हो
(स्फुरकादि के विषे दर्पण की आकृति वाले स्थासक कहलाते हैं उसके ऊपराऊपरी जो श्रेणी वह स्थासकावली)
वदी जाती है; अर्थात् देव मंदिर के ऊपर स्थित आमलसार जैसी आकृति. गोलाकार भाजन की श्रेणी पाणावली
कहलाती है. भैसों के बाड़े में परिघ याने लोहे की लकड़ी रक्खी जाती है उसे मुंडावली कहते है. दब्बार्थ में
इनका ऐसा अर्थ है- बांस का करंडिया, बांस की टोकरी, वांस का टोकरा उस तरह पांसलियों की श्रेणी
दिखाई देती थी.
मूल-धन्नस्स अणगारस्स पिट्टिकरंडयाणं अयमेयारूवे तवरूव लावण्णे होत्था, से जहाणामते स्वे
कन्नावलीति वा गोलावलीति वा वट्टयावलीति वा, एवामेव०-धन्नस्सअणगारस्स उरकडयस्स अयमेयारूवे
तवरून लावण्णे होत्था, से जहा णामते चित्तकहरेति वा वियणपत्तेति वा तालियंटपत्तेति वा, एवामेव०
॥३७॥
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥ ३८ ॥
हिन्दी
अनुवाद
३ वर्ग
भावार्थ- तप के प्रभाव से धन्य अनगार के पीठ करंडक ( पीठ का उठा हुवा प्रदेश) ऐसा दिग्वनोटा
था जैसे कर्णावली, गोलावली और वर्तकावली हो (मुकुट की श्रेणी, गोल पत्थर की श्रेणी, लान्य वगैरः के
यनाये हुवे बालक के खिलोने हो) वैसा पीठ करंडक मालूम होता था-तपस्या से बना हुआ धन्य अनगार का
वक्षस्थल ( छाती) की ऐसी सुंदरता थी जैसे चित्त नामक वृक्ष की बनी हुई चटाई, पवन डालने को यांस का
बनाया हुवा पंग्वा, ताड़ के पत्तों का बनाया हुआ पंग्वा हो वैसा उनका वक्षस्थल पतला हो गया था.
मूल-- धन्नस्स अणगारस्स वाहाणं अयमेयारूबे तवरूबलावण्णे होत्या, से जहा णामते समिसं-
गलियाति वा वाहायासंगलियाति वा अगस्थियसंगलियाति वा एवामेव० - धन्नरस अणगारस्स हत्थाणं
अयमेयारूवे तवरूबलावण्णे होत्था,सेजहाणामते सुक्छगणियाति वावडपत्तेत्ति वा पलासपत्तेति वा, एवामेव०
भावार्थ-तप के प्रताप से धन्य अनगार के भुजा का इस प्रकार सौंदर्य था जिस तरह खेजड़े की फली
वाहाया वृक्ष की फली अथवा अगथिया वृक्ष की फली हो उसी तरह धन्य अनगार की भुजा पतली और
लंयी दिखाई देती थी - तपश्चर्या के प्रभाव से धन्य अनगार के हाथ [ पंजा] का सौंदर्य ऐसा था कि जैसे
सूखा हुवा कंडा [छानों] बड़ का पत्ता चा खांखरे का पत्र हो वैसा शुष्क हाथ नज़र आता था.
॥ ३८॥
-
हिन्दी
अनुवाद
३ वर्ग
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥३९॥
मूल-- धन्नस्स अणगारस्स हत्थंगुलियाणं अयमेयारूवे तवरूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते
कलायसंगलियाति वा मुग्गसंगलियाति वा माससंगलियाति वा तरुणियाछिन्ना आयवे दिनासुक्का समाणी,
एवामेव० - धन्नस्स अणगारस्स गीवाए अयमेयारूवे तवरूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते करगगीवाति
वा कुंडियागीवाति वा उच्चट्ठवणतेति वा, एवामेव ।
भावार्थ- तपश्चर्या के कारण धन्य अनगार की हस्तांगुलियों की मनोहरता इस प्रकार थी जैसे तुवर की
फली, मूंग की फली अथवा उड़द की कोमल फली काटकर धूप में सुखाई गई हो उस तरह धन्य अनगार के
हाथ की अंगुलियां मालूम होती थीं तप की वज़ह धन्य अनगार की ग्रीवा [ गरदन] की शोभा ऐसी थी
जैसे घड़े का गला कमण्डलु का गला अथवा ऊंचे मुँहवाली कोथली जैसी कमजोर हो वैसी उनकी ग्रीवा थी.
मूल धन्नस्स अणगारस्स हणुआए अयमेयारूवे तवरूवलावणे होत्था, से जहा णामते-लाउय
फलेति वा हकुवफलेति वा अवगठियाति वा, एवामेव० - धन्नस्स अणगारस्स उट्ठाणं अयमेयारूवे तव-
रूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते सुक्कज्जलोयाति वा सिलेसगुलियाति वा अलत्तगलियाति वा, एवामेव०
॥ ३९॥
Pाठी
थी
--
धन्य
अत्तनुरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥४०॥
हिन्दी
अनुवाद
३ वर्ग
भावाथ--धन्य अनगार की दाढी का तपश्चर्या के प्रभाव से ऐसा सौंदर्य था जैसे तुंये का फल, हकुवी
[ वनस्पति विशेष ] का फल अथवा आम की गुठली धूप में सूखी हुई हो वैसी उन की डाढी थी
अनगार के होठ का तप के प्रताप से ऐसा सौंदर्य था जैसे सूखी जलोख [जल का दो इंद्री वाला जीव ] कफ
की सूखी गोली अथवा लाख की सूखी गोली हो वैसा धन्य अनगार का सुकड़ा हुवा और निस्तेज होठ था.
मूल-धन्नस्स अणगारस्स जिब्भाए अयमेयारूवे तवरूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते वडपत्ते
इवा पलासपत्तेइ वा सागपत्तेइ वा, एवामेव० -- धन्नस्स अणगारस्स नासाए अयमेयारूवे तवरूवलावण्णे
होत्था, से जहा णामते अंबगपेसियाति वा अंबागडपोसियाति वा मातुलूंगपेसियाति वा तरुणिया, एवामेव०
भवार्थ--धन्य अनगार की जबान तपस्या के कारण ऐसी सुन्दर होगई थी जैसे यड़का पत्ता, खांखरे का
पत्ता या साग का पत्ता हो वैसी जयान मुंह में हिलहिलती थी-धन्य अनगार की नासिका (नाक ) का तप
के हेतु ऐसा मनोरम्य था जैसे केरी की पेशी (टुकड़ा) अंथालंक फल की पेशी हो अथवा बीजोरे की पेशी हो
वैसी उनकी कोमल (निःसत्व) नासिका थी.
मूल-~-धनस्स अणगारस्स अच्छीणं अयमेयारूवे तवरूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते वीणा-
॥४०॥
अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥४१॥ हिन्दी अनुवाद ३ वर्ग छिड्डेति वा वद्धीसगछिड्डेति वा पाभातियतारिगाइ वा, एवामेव० - धन्नस्स अणगारस्स कण्णाणं अयमे- थारूवे तवरूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते मूलाछल्लियाति वा वालुकच्छल्लियाति वा कारेल्लयच्छल्लिया- तिवा- एवामेव०॥ भावार्थ-धन्य अनगार के नेत्र की तपश्चर्या के प्रभाव से ऐसी सुन्दरता थी जैसे वीणा के छिद्र, वद्धी- सक (एक जाति का वाजिन्त्र ) के छिद्र वा प्रभात कालके सितारे हों वैसे ऊंडे और तेजोहीन नेत्र थे - धन्य 'अनगार के कान की तप के कारण ऐसी मनोरमता थी जैसे मूले की छाल, ककड़ी की छाल वा कारेले की छाल हो वैसे उस धन्य अनगार के पतले कान थे. मूल-धन्नस्स अणगारस्स सीसस्स अयमेयारूवे तवरूवलावण्णे होत्था, से जहा णामते तरुणग- लाउएति वा तरुणगएलालुयत्ति वा सिण्हालएति वा तरुणए जाव चिट्ठति, एवामेव० - धन्नस्स अणगा- रस्स सीसं सुकं लुक्खं णिम्मंसं अहिचम्मच्छिरत्ताए पन्नायति, नो चेवणं मंस सोणियत्ताए एवं सव्वत्थ, णवरं उदरभायणकन्नंजीहाउहा एपर्सि अडी ण भन्नति चम्मच्छिरत्ताए पपणाइति भन्नति । 11.४१॥
अत्तनुरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥ ४२ ॥
हिन्दी
अनुवाद
३ वर्ग
भावार्थ तपश्चर्या के प्रभाव से धन्य अनगाल के मस्तक का ऐसा सौंदर्य था जैसे कोमल
आलू का फल (कन्दविशेष- यह अनेक प्रकार का होता है मगर विशेष काम में आता हुवा जान कर इसका
नाम दिया ) अथवा कोमल सिस्तालक यानी सेफालक (संभवतः सीताफल) लोक प्रसिद्ध फल, यावत् शब्द से
इन कोमल फलों को काटकर धूप में सुखाये हों उससे शुष्क और सुकड़े हुवे हों वैसा धन्य अनगार का मस्तक
शुष्क, रूक्ष, मांस रहित था, मात्र हड्डियां, चमड़ी और नसों से मस्तक है ऐसा मालूम होता था; परन्तु " मांस
रुधिर उसमें नज़र नहीं आता था यह आलाप प्रत्येक अंग के वर्णन में जानना; विशेष यह है कि उदररूपी
भाजन, कान, जबान और होठ के वर्णन में 'अस्थि' यानी हड्डी शब्द नहीं कहना, मगर मात्र चर्म और नसों
से ही दिखाई देता है, ऐसा कहना चाहिये - इस तरह पैर से लेकर मस्तक तक धन्य अनगार के शरीर की
संदरता का वर्णन किया.
अब पुनः दूसरी तरह धन्य अनगार मुनिसत्तम के शरीर का वर्णन करते हैं-
.
.
धन्य अनगार तपस्वी के शरीर का रूपान्तर से वर्णन
॥ ४२ ॥
हिन्दी
अनुवाद
३ वग
अनुत्तरा-
पपातिक-
दशा सून
मूल-धन्ने णं अणगारे णं सुळेणं भुक्खेणं पातजंघोरुणा विगत तडिकरालेणं कडिकडाहेणं, पिट्ट-
मविस्सिएणं उदरभायणेणं, जोइज्जमाणोहिं पांसुलिकडएहिं अक्खसुत्तमालाति वा [गणिज्जमालाति वा]
गणेज्जमाणेहिं पिट्ठिकरंडगसंधीहिं गंगातरंगभूएणं उरकडगदेसभाएणं, सुक्सप्पसमाणाहिं वाहाहिं सिढि-
लकडाली विव चलंतेहि (लंबतेहि) य अग्गहत्थेहिं, कंपणवातिओ विव वेवमाणीए सीसघडीए, पव्वादव-
दणकमले, उब्भडघडामुहे, उब्युडणयणकोसे, जीवंजीवेणं गच्छति, जीवंजीवेणं चिट्ठति, भासं भासिस्सा-
मीति गिलाति, ३ से जहा णामते इंगालसगडियाति वा जहा खंदओ तहा जाव हुयासणे इव भासरासि-
पलिच्छते तवेणं तेएणं तवतेयसिरीए उवसोभेमाणे उवसोभेमाणे चिट्ठति.
भावाश-मागधी भाषा फ नियमानुसार 'ण' वाक्यालंकार के लिये सर्वत्र जानना - तपोधन धन्य
अनगार के पैर, विडियां और जंघाएँ गांरा रहित होने से शुष्क थीं और क्षुधा के कारण रुक्ष थीं, उनकी
फामर रूप कमाए (कडायला अथवा काग की पीठ) मांस के अभाव से और हड्डियां ऊंची निकली हुई
होने से अशोभनिक मालूम होती थीं - इसके आसपास का हिस्सा उँचा था, उनका उदररूप भाजन
,
॥४३॥
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥४४॥
"हिन्दी
अनुवाद
'३वर्ग
मध्य में दुर्वल होने से पीठ से लगा हुवा था, कारण कि पेट के अन्दर की 'यकृत और प्लीहा' नाम की गांठें
क्षय होगई थीं उनकी पांसलियों की श्रेणियां मांस रहित होनेसे स्पष्टतः वलयाकार (गोलाकार) दिखाई देती थीं
उनकी पीठ रूपी करंडिये की संधियां (सांधे) कमजोरी के कारण अति स्पष्ट होने से सूत की माला की तरह गिनी
जासकती थीं; उनका पेट गंगा नदी की तरंगों जैसा था; यानी तरंगों जैसे ऊपराऊपरी चढ़ती ह उस तरह
हाड्डयां ऊपराऊपरी चड़ी हुई नजर आती थीं उनके पीठ के दो भाग बांस के टुकड़े जैसे थे, उनकी दोनों भुजाएं
'सूखे सर्प जैसी मालूम होती थीं, उनके हाथके पंजे घोड़े के ढीले चोकडों की तरह लटकते थे, उनकी मस्तकरूपी
घड़ी कंपवायु के रोगी के समान कंपतीथी, उनका मुखकमल कुमलाया हुवा (मुरझाया हुआ)था - होठों की अत्यंत
क्षीणता होने से उनका मुख घडे के सदृश विकराल नज़र आता था उनके दोनों नेत्ररूपी कोस ऊंडे उतर गए थे.
शरीर की ऐसी गंभीर स्थिती में - वे महात्मा मात्र आत्मवल से ही चलते थे; कारण की शरीर बलसे चलने म
वे पूर्ण असक्त थे, आत्मबल से ही वे खड़े रह सकते थे, ' मैं कुछ बोलूं' ऐसा विचार होते ही ग्लानि (अशक्ति
का प्रभाव ) उप्तन्न हो जाती थी, उनके शरीर की ऐसी परिस्थिति हो गई थी कि चलते समय कोयलों की भरी
हुई गाड़ी के समान उनके हाड खड़खड़ आवाज़ करते थे-भगवती सूत्र में स्कन्दक मुनि के वर्णन के मुआफिक यहां
जानना-राख के ढगले से ढकी हुई अग्नि की तरह तप से, तेज से और तपतेज की समृद्धि से अत्यत शोभते
॥४४॥
हुवे वे उग्र तपस्वी धन्य अनगार रहते थे- " धन्य हो ! तपोधन महातपस्वी धन्य अनगार को कोटिशः नम-
स्कार हो - ऐसे महात्मा की पुनः २ जय हो.
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥४५॥
हिन्दी
अनुवाद
३ वर्ग
श्रेणिक नृपेन्द्र का नमूनेदार प्रश्न-भगवन्त का स्पष्टीकरण
मूल- तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे णगरे गुणसिलए चेतिते, सणिए राया; तेणं कालेणं तेणं
समएणं भगवं महावीरे समोसढे, परिसा णिग्गया, सेणिते निग्गए, धम्मकहा परिसा पडिगया, तते णं से
सेणिए राया समणस्स भगवओ महावीरस्स अंतिए धम्म सोच्चा निसम्म समणं भगवं महावीरं वंदति
णमंसति, वंदित्ता णमंसित्ता एवं वयासी-
भावार्थ- उस काल उस समय में राजग्रही नामकी नगरी थी, उसके याहार गुणशील नामका उद्यान
था, इस नगरी में महाराजा श्रेणिक राज्य करते थे, उस वक्त उस टाइम पर श्रमण भगवन्त महावीर देव
उद्यान में समवसरे, नगर से प्रजा पर्षदा दर्शनार्थ रवाना हुई, राजा श्रेणिक भी राजमहल से निकला, प्रभु ने
॥४५॥
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
हिन्दी
अनुवाद
३वर्ग.
धर्म देशना दी, पर्षदा थापिस चली गई - तदन्तर श्रेणिक नृपेन्द्र ने श्रमण भगवन्त महावीर देव के पास धर्म,
सुनकर हृदय में धारण करके प्रभु को (श्रमण भगवन्त महावीर को) वन्दन - नमस्कार किया, वन्दन, नम-
स्कार करके इस प्रकार प्रार्थना की-
मूल-इमासि णं भंते ! इंदभूतिपामोक्खाणं चोदस्सहं समणसाहस्सीणं कतिरे अणगारे महा-
दुक्करकारए चेव ? महाणिज्जरतराए चेव ? एवं खलू सेणिया! इमासिं इंदभूतिपामोक्खाणं चोदसण्हं
समणसाहस्सीणं धन्ने अणगारे महादुक्करकारए चेव महाणिज्जरतराए चेव, से केणटेणं भंते ! एवं वुच्चति
इमासिं जाव साहस्सीणं धन्ने अणगारे महादुक्करकारए चेव महाणिज्जरकारए चेव ?
भावार्थ-हे भगवन्त ! आपके इन्द्रभूति (गौतम गणधर) आदि १४ हजार मुनियों में दुष्कर
करने वाले और महा निर्जरा करने वाले कौनसे महात्मा हैं ? इस पर परमात्मा ने उत्तर यक्षा- निश्चय इस प्रकार
हे श्रेणिक ! इन इन्द्रभूति बगैरः चौदह हज़ार मुनियों में 'धन्य अनगार' महा दुष्कर कार्य करने वाला और
महा निर्जरा करने वाला है 3 श्रेणिक नरेन्द्र ने पुनः प्रार्थना की - हे प्रभो ! किस हेतु से आप का यह
* धन्य हो ! धन्य अनगार-- जिसके लिये परमात्मा महावीर देव श्रीमुख से गौरवपूर्ण प्रशंसा करते हैं.
कार्य
,
॥४६॥
हिन्दी
अनुवाद
३ वर्ग
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥४७॥
फरमाना है कि इन यावत् चौदह हज़ार साधुओं में धन्य अनगार महा दुष्कर कार्य करने वाले और महा निर्जरा
करने वाले हैं ?,इस पर देवाधिदेव ने जबाव बक्षा-
मूल- एवं खलु सेणिया ! तेणं कालेणं तेणं समएणं काकंदी नामं नगरी होत्था, उप्पिं पासाए-
वडिंसए विहरति, तते णं अहं अन्नया कदाति पुव्वाणुपुबीए चरमाणे गामाणुगामं दुत्तिज्जमाणे जेणेव
काकंदी णगरी जणेव सहसंबवणे उज्जाणे तेणेव उवागते अहापडिरूवं उग्गहं उगिणित्ता संजमेणं तवसा
जाव विहरामि, परिसा निग्गता, तहेव जाव पव्वइते जाव बिलमिव जाव आहारेति, धन्नस्स णं अणगारस्स
पादाणं सरीरवन्नओ सव्वो जाव उवसोभेमाणे उवसोभेमाणे चिट्ठति से तेणटेणं सेणिया ! एवं वुच्चति-
इमासिं चउद्दसण्हं साहस्सीणं धण्णे अणगारे महादुक्करकारए महानिज्जरतराए चेव ।
भावाथ-निश्चय करके इस प्रकार हे श्रेणिक ! उस काल उस समय में काकन्दी नामकी एक नगरी थी,
उसमें यावत् (पूर्ववत् सब हकीकृत कहकर ) धन्य कुमार भव्य महलों पर रहता था, उस समय हम किसी एक
वक्त अनुक्रम से विहार करते हुवे ग्रामानुग्राम विचरते हुवे जहां काकंदी नगरी है, जहां उसके बाहर सहस्राम्रवन
है, वहां प्राप्त हुवे, यथाप्रतिरूप (मुनियों के योग्य ) अवग्रह ( रहने का स्थान ) ग्रहण करके संयप - तप द्वारा
॥४७॥
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥४८॥
आत्म भावना करते हुवे रहे, पर्पदा देशना सुनने आई, उसही प्रकार (पूर्व कथानुसार ) यावत् धन्यकुमार
ने दीक्षा अंगीकार की; 'विल सर्पवत् ' यावत् आहार करता है, धन्य अनगार का पग से शरीर तक का सर्व
वर्णन यावत् अतिशय शोभता हुवा रहता है - ऐसा परमात्मा ने फरमाया- इसलिये हे श्रेणिक ! वह धन्य अन-
गार चौदह हज़ार साधुओं में महा दुष्कर कार्य करने वाला और महा निर्जरा करने वाला है। ऐसा कहा गया.
हिन्दी
अनुवाद
३ वर्ग
५ श्रेणिक नरेश से धन्य अनगार की स्तुति !
मूल-तते णं से सेणिये राया समणस्स भगवतो महावीरस्स तिए एयम सोचा णिसम्म हट्ठ
तुट्ठ (जाव) समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेति करित्ता वंदति नमंसति वंदित्ता
नमंसित्ता जेणेव धन्ने अणगारे तेणेव उवागच्छति उवागच्छित्ता धन्नं अणगारं तिक्खुत्तो आयाहिणपयाहिणं
करेति करिता वंदति णमंसति वंदित्ता णमंसित्ता एवं वयासी - धण्णेसिणं तुमं देवाण्णुप्पिया ! सुपुण्णे
सुकयत्थे कयलक्खणे सुलद्धणं देवाण्णुप्पिया! तव माणुस्सए जम्म जीवियफल्लेतिकटु वंदति णमंसति
॥४८॥
अनुत्तरो- वंदित्ता णमंसित्ता जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव उवगच्छति उवागच्छित्ता समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो वंदति णमंसति वंदित्ता णमंसित्ता जामेव दिसिं पाउब्भूते तामेव दिसिं पडिगए. ( सूत्रं ४) पपातिक- दशा सूत्र ॥ ४९ ॥ हिन्दी अनुवाद ३ वर्ग भावार्थ- तत्पश्चात् वे श्रेणिक राजा श्रमण भगवन्त महावीर देव के पास से यह वृतान्त सुनकर हृदय में धारण कर हर्षित हुवे, आनन्दित हुवे, श्रमण भगवन्त महावीर देव को तीन वार आदक्षिणा प्रदक्षिणा की करके वन्दन - नमस्कार किया, वन्दन नमस्कार करके जहां पर धन्य अनगार हैं वहां पर महाराजा श्रेणिक आते आकर तपोधन धन्य अनगार को तीन वार आदक्षिणा प्रदक्षिणा करते हैं, करके वन्दन नमस्कार किया, वन्दन - नमस्कार करके इस प्रकार निवेदन किया-हे देवों के वल्लभ ! आप धन्य हैं, कृत पुण्य हैं, सुकृतार्थ हैं, कृत लक्षण हैं; अहो देवों के प्यारे ! आपको सुप्राप्त मनुष्य - जीवन सफल है, ऐसा कहकर तपस्वी महात्मा को चंदन नमस्कार किया, वन्दन- नमस्कार करके जहां श्रमण भगवन्त महावीर येव हैं वहां नरेन्द्र श्रेणिक आता है, पाकर परमात्मा का तीन वार आदक्षिणा - प्रदक्षिणा करके वन्दन नमस्कार करता है, वंदन - नमरकार करके जिस दिशा से आया था उसही विशा में पापिस चला गया. ...-
अनुत्तरी
हिन्दी
अनुवाद
पपानिक
दगा सूत्र
॥५०॥
धन्य अनगार का मनोरथ और उसका पूर्णपालन
३ वर्ग
N
मूल-तएणं तस्स धण्णस्स अणगारस्स अन्नया कयाति पुवरत्तावरत्तकाले धम्मजागरियं जाग-
रमाणस्स इमेयारूवे अन्भस्थिते चिंतिते भणोगते संकप्पे समुप्पजित्था - एवं खलु अहं इमेणं ओरालेणं
जहा खंदओ तहेव चिन्ता, आपुच्छणं थेरेहिं सद्धिं विउलं दुरूहति मासिया संलेहणा नवमास परियातो
जाव कालमासे कालं किच्चा उड्ढं चंदिम जाव णव य गेविज्जविमाणपत्थडे उड्ढं दूरं वीतीवतित्ता सव्व-
ट्ठसिद्ध विमाणे देवत्ताए उववन्ने, थेरा तहेव उयरंति जाव इमे से आयार भंडए ।
भावार्थ- उसके बाद किसी एक दिन अर्धरात्री के समय धर्म जागरण में जगते हुवे उग्र तपस्वी धन्य
अनगार को इस प्रकार का प्रार्थित, चिन्तित, मनोगत विचार उत्पन्न हुवा-" निश्चय इस प्रकार मैं इस उदार
तप द्वारा" इत्यादि स्कन्दक मुनि की तरह विचार हुवा, पश्चात् प्रातः काल में भगवन्त महावीर की आज्ञा
॥५०॥
अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत हिन्दी अनुवाद ३ वर्ग प्राप्तकर स्थविर मुनियों को साथ में लेकर विपुलगिरि पर चढे, वहां एक मास की संलेखना (आत्म शोधक तप) कर नौ मास पर्यन्त उज्ज्वल चारित्र पालकर काल समय काल कर ऊँचे चन्द्रादि विमान को उल्लंघन कर यावत् नाग्रवायक प्रतरो को बटाकर बहुत ऊँचे दूर सर्वार्थसिद्ध विमान में देवपने उत्पन्न हुवे - तब स्थविर मुनि पूर्व कथनानुसार कायोत्सर्ग करके धन्य अनगार के उपगरण लेकर पर्वत से नीचे उतरे यावत् उनके भांडोपगरण भगवन्त के पास रक्खे. Ramcaene धन्य अनगार के लिये गौतम गणधर का आखीरी प्रश्न परमात्मा का खुलासा ވިހެރަނރަކީ ކިހައިހރ सात in .. तीति भगा गोतमे तहत पुच्छति जहा खंदयस्स, भगवं वागरेति जाव सबढसिने in amms of भते । स गतियं कालं ठिति पण्णत्ता ? गोयमा ! तेत्तीसं सागरोवमाई भारततोलोगाओगचित्रहिति ? कहिं उववज्जिहिति ? गोयमा ! महाविदेहे and idipalidit सितिति निति परिणि चारिति राज्यसाणगंत करेहिति - गवं खलु जंबू ! सग-
अनुत्तरो-
पपातिक
दशा सूत्र
॥ ५२ ।।
हिन्दी
अनुवाद
३वर्ग.
णेणं जाव सम्पत्तेणं पढमस्स अज्झयणस्स अयमढे पन्नत्ते। (सूत्र ५) पढमं अज्झयणं सम्मत्तं.
भावार्थ- परमात्मा महावीर देव को गौतम स्वामी ने खंदक की पृच्छा की तरह पृच्छा की-इस पर
प्रभु ने फरमाया
फरमाया - धन्य अनगार यावत् सर्वार्थसिद्ध विमान में उत्पन्न हुवा, गौतम गणधर ने पूछा- हे देवाधि-
! धन्य देव की कितने काल की स्थिति फरमाई ? उत्तरः-हे गौतम ! तेतीस सागरोपम की स्थिति कही गई
पुनः गौतम स्वामी ने पूछा-हे प्रभो ! वह धन्य अनगार देवलोक से च्यव कर कहां जायगा ? कहां उत्पन्न होगा?
प्रभु ने फरमाया - महाविदेह क्षेत्र में उत्पन्न होकर, चारित्र ग्रहण कर सिद्ध होगा, बुद्ध होगा, सर्व कर्म से मुक्त
होगा, निर्वाण पद प्राप्त करेगा, सर्व दुःखों का अन्त करेगा - सुधर्म स्वामी फरमाते हैं - हे जम्बू ! श्रमण
भगवन्त महावीर देव यावत् मोक्ष पधारे ने पहिले अध्ययन का इस प्रकार (ऊपर कहे मुजिब ) अर्थ फरमाया
पहिले अध्ययन का भावार्थ सम्पूर्ण हुवा.
तीसरे वर्ग का पहिला अध्ययन मूल और भावार्थ सहित सम्पूर्ण हुवा.
॥५२॥
अनुत्तरो- पपातिक- दशा मूत्र दूसरा अध्ययन (सुनक्षत्र कुमार) हिन्दी अनुवाद ३ वर्ग मूल-जति णं भंते ! उक्खेवओ - एवं खलु जम्बू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं काकंदीए णग- रीए भद्दा णामं सत्थवाही परिवसति अड्ढा, तीसेणं भद्दाए सत्थवाहीए पुत्ते सुणक्खत्ते णामं दारए होत्था अहीण जाव सुरूवे पंचधातिपरिक्खिते जहा धण्णो तहा बत्तीसदाओ जाव उप्पिं पासाएवडेंसए विहरति; तेणं कालेणं तेणं समएणं समोसरणं जहा धन्नो तहा सुणक्खत्ते वि णिग्गते जहा थावच्चा पुत्तस्स तहा णिक्खमणं जाव अणगारे जाते जाव बंभयारी । भावार्थ- जम्बू स्वामी सुधर्म स्वामी के प्रति प्रार्थना करते हैं - हे भगवन्त ! पहिले अध्ययन का अर्थ आपने जो इस प्रकार प्रकाशित किया तो हे पूज्य ! अब दूसरे अध्ययन का उत्क्षेप (मस्तावना - घयान) फर- माने की कृपा करो ! तब सुधर्म स्वामी ने फरमाया-निश्चय इस कदर हे जम्बू ! उस काल उस समय में अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥ ५४॥ हिन्दी अनुवाद ३ वर्ग. काकन्दी नाम की नगरी में भद्रा सार्थवाहिनी निवास करती थी, वह समृद्धिशालिनी थी, उस भद्रा सार्थवाहिनी के 'सुनक्षत्र कुमार' नाम का पुत्र था, उसके अङ्गोपाङ्ग अहीन पूर्ण पंचेन्द्रीय वाले थे, यावत् वह कुमार खरूप- वान् - कान्तिवान् और दिखनोटा था, पंच धायमाताओं से उसका सम्यक् पालन होता था, जब वह युवा अवस्था में प्रवेश हुआ तव धन्यकुमार के मुआफिक बत्तीस कन्याओं से विवाह कराकर यत्तीस महल बगैरः का प्रीतिदान दिया यावत् वह कुमार महल के ऊपर उन ललनाओं के साथ क्रीड़ा करता हुआ रहता था, उस काल उस समय के अन्दर श्रमण भगवन्त महावीर देव नगर के उद्यान में समवसरे, उस वक्त धन्यकुमार के सदृश सुनक्षत्र कुमार भी प्रभु को वन्दनार्थ घर से निकला, धर्मदेशना सुनकर प्रतिबोध को प्राप्त हुवा, थावचापुत्र की तरह दीक्षा महोत्सव हुवा यावत् मुनिपद को प्राप्त हुवा, इर्यासमिति आदि का यथार्थ पालन करता हुवा यावत् गुप्त ब्रह्मचारी यानी ब्रह्मचर्य की नौ गुप्ति (वाड़) का पालक हुवा. Recene सुनक्षत्र अनगार का तप वर्णन ॥ ५४॥ मूल-तते णं से सुणक्खते अणगारे जं चेव दिवसं समणस्स भगवतो महावीरस्स अंतिते मुंडे - अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥५५॥ हिन्दी अनुवाद ३ वर्ग जाव पव्वतिते तं चेव दिवसं अभिग्गहं तहेव जाव बिलमिव आहारेति संजमेण जाव विहरति, पहिया जणश्यविहारं विहरति, एकारस अंगाई अहिज्जति संजमेणं तवसा अप्पाणं भावमाणे विहरति, तते णं से सुणक्खत्ते अणगारे ओरालेणं जहा खंदतो। भावाथ- तत्पश्चात् उस सुनक्षत्र अनगार ने जिस दिन से श्रमण भगवन्त महावीर देव के पास मस्तक मुंडाकर दीक्षा अङ्गीकार की उसही दिन से (धन्य अनगार की तरह ) अभिग्रह धारण किया, यावत् ‘सर्प बिलवत्' पारणे के दिन आहार करने लगा यावत् संयम सहित विचरने लगा, याहार देशों में विहार करने लगा, ग्यारह अगों का अभ्यास किया, इस तरह संयम-तप द्वारा आत्म-भावना करता हुवा रहने लगा, तब वह सुन- क्षत्र अनगार खंदक मुनि के समान उदार तपश्चर्या करता हुवा आनंदपूर्वक निवास करने लगा. Swarharhdmriting सुनक्षत्र अनगार कासफल मनोरथ और अन्तिम अवस्था YVEINSxsxsx==& मुला-- तेणं कालेणं तेणं समएणं रायागहे णगरे गुणसिलए चतिए, सेणिए राया, सामी समोसढे
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥५६॥
हिन्दी
अनुवाद
३ वर्ग
परिसा णिग्गता, राया णिग्गतो धम्म कहा, राया पडिग्गओ परिसा पडिगता, तते णं तस्स सुणक्खत्तस्स
अन्नया कयाति पुव्वरत्तावरत्तकालसमयांस धम्मजागरियं जागरमाणस्स जहा खंदयस्स बहूवासा परियातो,
गोतम पुच्छा, तहेव कहति, जाव सव्वट्ठसिद्धे विमाणे देवे उववण्णे तेत्तीसं सागरोवमई ठिति पण्णता
से णं भंते ! माहाविदेहे सिज्झिहीति-बितियं अज्झयंण सम्मत्तं ॥ २ ॥
भावार्थ-चौथे आरे में भगवन्त पधारे उस समय राजगृह नाग का नगर था, उसके इशान कोण में
गुणशील संज्ञक उद्यान था, उस नगर में श्रेणिक नाम का राजा राज्य करता था, वहां पर किसी एक वक्त भग-
वन्त महावीर देव पधारे, प्रजापर्षदा और नृपेन्द्र अपने स्थान से प्रस्थान कर प्रभु को वन्दन करने आया, प्रभु
ने धर्म देशना दी, श्रवण कर राजा और पर्षदा वापिस चली गई - यहां पर महाराजा श्रेणिक ने दुष्कर कार्य कर्ता
कौन है इत्यादि भगवन्त से प्रश्न किया ? सर्व पूर्ववत् जानना - तदनन्तर किसी एक वक्त मध्यरात्री के
समय धर्मजागरण (धर्मध्यान) करता हुवा सुनक्षत्र अनगार ने खंदक अनगार की तरह अनशन करने का विचार
किया, यावत् परमात्मा की आज्ञा लेकर पूर्ववत् सर्व किया, बहुत वर्षों तक चारित्र पर्याय पाला;
गौतम गणधर ने इनके बारे में पूछा तब भगवन्त ने सर्व हकीकृत कही, यावत् सर्वार्थसिद्ध विमान में देव पने
॥५६॥
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥ ६० ॥
हिन्दी
अनुवाद
३ वर्ग
भावार्थ-इस प्रकार निश्चय हे जम्बू ! श्रमण भगवन्त महावीर देव जो कि धर्म के आदि कर्ता हैं (अपने
शासन में आदि कर्ता समझना) तीर्थ (साधु-साध्वी-श्रावक श्राविकारूप चतुर्विध संघ) के संस्थापक हैं, स्वयं
बोध को प्राप्त हुवे हैं यानी उनका कोई गुरु नहीं, लोक के नाथ हैं, कारण कि संसार के योग-क्षेम (हित सम्बंध-
कल्याण,)करने वाले हैं, लोकके अन्दर दीपक समान हैं अर्थात् मिथ्यात्व अंधकार को नाश कर सम्यत्वरूप प्रकाश
करने वाले हैं, लोक में उद्योत करने वाले हैं यानी अज्ञान को हटाकर ज्ञान का उद्योत करने वाले हैं, अभयदान
(निर्भयता) देनेवाले हैं, अशरण को शरण देनेवाले हैं, ज्ञानरूप चक्षु के दातार हैं, मार्ग देनेवाले यानी श्रेय
मार्ग दर्शक हैं धर्म को देनेवाले हैं यानी पापों से मुक्त कराने वाले हैं, धर्म देशना देने वाले हैं, धर्म के श्रेष्ठ चार
दिशाओं के अन्तपर्यन्त चक्रवर्ती हैं अर्थात् धर्मोपदेश से चारगतियों का अन्त कराने वाले हैं, किसी से प्रतिघात
न होसके ऐसे श्रेष्ट ज्ञान-दर्शन को धारण करने वाले हैं, खुद राग-द्वेष पर विजय किया है, दूसरे को राग-द्वेप
जिताने वाले हैं, स्वयं योध को प्राप्त हुवे, दूसरो को बोध प्राप्त कराते हैं, खुद कर्मों से मुक्त हुवे हैं, दूसरों को
कमा से मुक्त कराते हैं, स्वयं संसार समुद्र से तिरगये हैं, दूसरों को भवसागर से तिराते हैं तथा वे भगवन्त निरु-
पद्रव-अचल-रोगरहित-अनन्त-अक्षय-बाधा रहित-पुनरावृत्ति न हो ऐसे सिद्धिगति नाम स्थान को
प्राप्त किया हैं; उन परमात्माने अणुत्तरोपपातिकदशा के तीसरे वर्ग का यह अर्थ फरमाया है. तीसरे वर्ग का
भावार्थ पूर्ण हुवा-अणुत्तरोपपातिकदशा का भावार्थ सम्पूर्ण हुवा.
॥६०॥
-- अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र ॥ ५७॥ उत्पन्न हुवा, तेतीस सागरोपम की स्थिति फरमाई - गौतम स्वामी ने प्रभु से पुनः पूछा, हे भगवन्त ! सुनक्षत्र अनगार देवलोक से च्यवकर कहां उत्पन्न होंगे ? परमात्मा ने उत्तर पक्षा-हे गौतम! महाविदेह क्षेत्र में जन्म लेकर, चारित्र ग्रहण कर यावत् मोक्ष पद को प्राप्त करेगा- दूसरे अध्ययन का भावार्थ सम्पूर्ण हुवा. तीसरे वर्ग का दूसरा अध्ययन मूल और भावार्थ सहित सम्पूर्ण. हिन्दी अनुवाद ३ वर्ग * तीसरा अध्ययन यावत् दसवां अध्ययन * ( ऋषिदास कुमार यावत् वेहल्ल कुमार) SHALLERS दस अनगारों की सामान्य व्यवस्था मूल- एवं सुणक्खत्तगमेणं सेसावि अट्ठ भाणियव्वा णवरं-आणुपुबीए दोन्नी रायगिहे, दोन्नी RS
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥६१॥
* उपसंहार
इस तीसरे वर्ग में धन्यअनगार (धन्नाजी अनगार) बगैरः दस महामुनीश्वरों के आदर्श चरित्र तपश्चर्या
से मार्तण्ड (सूर्य) के समान संसार पर प्रकाश डाल रहे हैं -तपोधन के तपसे शरीर का मूल्य हीरों के मूल्य
से भी अधिक बन कर जगत के लिये प्रेरणात्मक एक दिव्य दृष्टान्त बन गया है; जगद्वंद्य उन महात्माओं का चरित्र
वंदनीय और स्तवनीय सीमा का उल्लंघन कर अनुकरणीय क्षेत्र में प्राप्त होगया है - महानुभावो ! इन उत्तम.
पुरुषों के चरित्रों पर पूर्ण मनन कर अखादबत-को अङ्गीकार करना और क्रमशः खाने का मोह छोड़कर श्रेयपद
प्राप्ति के लिये आदर्श तपस्वी बनने का पूर्ण प्रयत्न करना.
हिन्दी
अनुवाद
उपसहार
टी०व०
"टीकाकार महाराज का वक्तव्य
1
शब्दाः केचन नार्थताऽन विदिताः केचित्तु पर्यायतः। सूत्रार्थानुगतेः समूह्य भणतो यज्जातमागः पदम् ॥
वृत्तावत्र तज्जिनेश्वरवचोभाषाविधौ कोविदैः। संशोध्य विहितादरैर्जितमतोपेक्षा यतो न क्षमा ॥१॥
अनुत्तरो-
पपातिक-
दशा सूत्र
॥६२॥
हिन्दी
अनुवाद
प्रथका
उपसंहार
प्रत्यक्षरं निरूप्यास्य । ग्रन्थमानं विनिश्चितं ॥ द्वाविंशतिशतमिति । चतुर्णा वृत्तिसंख्यया ॥२॥
भावार्थ-भगवान् श्री अभयदेय सूरीश्वरजी महाराज अपनी लघुता प्रदर्शित करते हुवे फरमाते हैं-
संभव है कि इस सूत्र में कितनेक शब्दों का अर्थ मुझे ज्ञात नहीं हुवा हो तथा कितनेक शब्द के पर्याय मालूम
नहीं हुवे हो तथापि सूत्र और अर्थ के अनुसार जो मैंने अर्थ किया है यानी टीका रची है उसमें जो अपराधपद
(भूल का स्थान) यना हो उस को जिनेश्वर भगवन्त के वचन की भाषा में आदर करने वाले पांडतजन संशोधन कर लें;
कारण कि जिनेश्वर के मत की उपेक्षा करना योग्य नहीं-इस ग्रन्थ की टीका के प्रत्येक अक्षर गिनने से १२२ एक
सौ यावसि श्लोक जितना ग्रन्थ का (टीका का) प्रमाण है; ऐसा निश्चय किया है.
ग्रन्थ का उपसहार -
यह अनुत्तरोपपातिक दशा सूत्र तीन वर्ग में तेतसि अध्ययनों से भूपित है अर्थात् तेंतीस महापुरुषों के उद्दाम
जीवन से आदर्श यन गया है, इस सारे ग्रन्थ में तपश्चर्या की महेक छारही है, इससे अनहारिक पद का प्रकाश
जगत को आसक्ति तिमिर से मुक्त कराता है, इसमें महात्माओं की तपश्चर्या का विविध वर्णन अशक्तों को
शक्ति प्रदान करता है और सशक्तों को आगे यदाता है-महानुभावो! जीवन की सार्थकता खान-पान से
RS
॥६॥
नहीं होसकती, किन्तु तपार्या से ही सफलता होगी; अतएव आप अपनी कृतार्थता के लिये यथाशापम कर उन तपोधन महापुरुषो का अनुकरण करे ॐ शान्तिः ! अनुत्तरो- पपातिक- दशा सत्र সহানি शासनपति के पाठ पर। हमे पाणी पायाने II I rimitin: ॥ क्षमा करगा पाsunासनगागर मात ॥rily गाना-rig1||५|| वीरपुत्र भानन्द मे मा भारी मानना Harnitil (MIL HIR 141 4 || ॥ मालग पेशे पिताशाना सारनीutt 4 में | Hit " विकम नेप्राशन(१९९५) Unintentiti in min 01410 १४. Ma(mittilitar Amit मुनि श्री मगलसागरजी महाराज मुनि श्री कान्तिसागरजी महाराज Amrtyranny अनुत्तरो- पपातिक- दशा सूत्र हिन्दी। अनुवाद समाप्त. m USUMFALFASUMUSUNU PAMUUTUUAUFt श्री अनुत्तरोपपातिक दशा सूत्र हिन्दी अनुवादसह समाप्त BeneraenierenormsERESERERENERAREERPETERMEREPRENEReki Amcom Urmiu 1183810
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