Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Sahitya Hridhya Part-i
Front matter
साहित्य हृदय
प्रथम भाग
काने पृच्छाम सुधा स्वर्गे निवसामो वयं भुवि ।
किम्वा काम्प रसास्वादु किंवा स्वादीयसी सुधा ॥
रचयिता
उपाध्याय श्रीहरिश्चन्द्र शर्मा
सम्पादक
नर्मदेश्वर प्रसाद उपाध्याय
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हमारी मसहरी
VOAMAAVAA
मारी मसहरी कलियुग को तपोभूमि है, जहाँ
मसा ओर मक्षिका राक्षसियाँ बाहर ही सिर
पीटतो रह जाती है और हमारी भावनाओं की
वृहत् हाट में चा ध्यान के प्रशान्त लोक में कुछ
'भी बाधा नहीं पहुंचा सकतीं । श्रथवा यह
कृत्रिम हालेण्ड को भूम सी है जिसके बाहर
ही मसा मक्षिका समूह समुद्र की घनो लहरें
इसके आवरण वाध से टकराती हुई विचित्र सुहावने शब्दों को
सुनाती पर मजाल नहीं की उनकी मौजे भीतर प्रवेश पा सके,
पा यह मानन शरीर का द्वितिय पिञ्जर या फवच है वा चञ्चल
मन के एकाग्र करने का एक विचित्र योग यत है, या इस
श्रशान्त लोक में एक कृतिम शान्त स्थली है, जहाँ भक्त मकरा
चारा ओर से जालो को चद्दरतान, स्वस्थ मन बीच मयैठा मसा
मक्षिका रूपी माया से कहता है कि न तू मेरे जाल में फंस
शोर न मैं तेरे में फंसे, या यह हमारी झान कोठरी है या घन
का एक कृतिम गृहस्य योगी फाप्रशान्त गहर है या किसीराजर्पि
के तपोवन की शान्त कुटी है या किसी प्रतापी तिति पाल
का राज्य है जहाँ यशों में बाधा नहीं पड़ती या वायु को छान
कर पीने का उत्तम विधान है, या भारत के निकटस्थ नेपाल
- साहित्य-दृदय होगी ? काम क्रोध लोभ इत्यादि नरक ले जाने वाले चाण्डालों से तेरी प्रीति कैसे छूटेगी इस निर्मल भानन्द स्वरूप श्रात्मा के दिव्य गृह को छोड तू कैसे अन्यत्र रस सकता है ? इस क्षणिक भ्रान्तिमय सांसारिक सुख का उपभोग करतूने कितनी वराटिका उपलब्ध की, यदि उसके पीछे अनेक दुर्गतिनहीं भोगी है ? क्या तू नहीं समभता कि अहर्निश श्वानवत हर विषय गृह में भर- मने से सिवा लात खाने के और क्या परिणाम सम्भव है ? देवगणों को छोड तू राक्षसों के साथ सहवास कर भला कैसे मुखी और शान्त हो सकता है ? इसपर वह लजित हो कहता, कि स्वभाव का परिवर्तन धीरे धीरे सम्भव है, योंकि जो खच्छन्द वृषभ सा शहनिश विषय-क्षेत्र में चरता था यह शान के दुर्चल कच्चे सूत से एकाएक कैसे बाँधा जा सकता है कभी शानी कागभशुण्ड को बुलाते कि वे सप्रेम भगवान रामचन्द्रजी की कथा सुनाये, जिसमें कि वह मोह जिसने कि नारद कास्वरूप मरकट कर दिया, और भयङ्क को सदा के लिये लाञ्छित बना, नित्य घटने चढने के महादु ख का भागी किया और भग- वान् इन्द्र के कमल से शरीर को अनेक योनि चिह्नों से ऐसा फुरूप और कुत्सित कर डाला कि जिसे देख सब देवताओं ने खिलियाँ उडाई, जिसने गरुड को प्राकृतिक पक्षी चना, काक से नीच के समक्ष भी विनीत भाव से धान भिक्षा का प्रार्थी यनाया, मेरे हृदय से सदा के लिये दूर हो जाय , कभी गीत गोविन्द को अप्रपदी में भगवान कृष्ण की मुरली के सरस तान को अद्यावधि ग्रामोफोन सा यन्त्रीत देख श्री जयदेवजी को सहस्रों आशीर्वाद देता, कभी भकि सलिल से सम्पन हृदय भक्तों के मालि मुकुट सुर से ज्ञान को प्रिय निन्दा सुनते और मनहीमन हॅसते , भोर कभी कह बैठते किशानी ऊधो का ज्ञान
हमारी मसहरी
गोपिकाओं के समक्ष पेसा वा न हो जाता यदि ये जानते
होते कि भक्ति मान की उत्कृष्टावस्था है, और कौन जाने कि
भगवान कृष्ण ने उन्हें यही सीसने के हेतु वहाँ भेजा हो,
कभी लम्बी सफेद दाढी वाला शानी मग्गह का जुलाहा
से, सारे पुराणों को खिल्लिगा उडाते मिलना, कभी भगवान
ॐकार के सहनों तीर, भक्ति-धनुष पर रस उपासना विप में
पुझा, माया के सहस्रों पदातिओं पर अनवरत शर वर्षा
करते हुए देसते, कि तब भी वे रक्त-धीज राक्षस सा बढ़ते
ही चले जाते है, कभी असगशस्त्र से अन्ताकरण वाटिका
से विषय भावनाओं के वृक्षों को समूल उच्छेदन कर, सयम
और नियम की वृहत् खासिन, विवेक वैराग्य के अमृत फल
वाले वृक्ष आरोपण कर, जपजल से सीचते, कभी प्राण दोलना
पर इस चञ्चल मन वालक को सुलाते, कभी जब समझता कि
इतने दिन टेरते हो गये पर सरकार ने एक दिन भी दर्शन न
दिया, तो अन्त कररा में अग्नि भभक उठती और में श्राकाश को
अपनो सीरी उसासो से भर देना कमी यह जान कि ये सच
ठौर वतमान हे, सहस्रो मनमानी बातें करते करते अपने
को विस्मृत कर जाता, कभी उनको सहनों नाम से पुकारता।
निदान इसी भॉति इस छोटी सी मुसहरी म अनेक भावनाओं
की हाट लगती और उजडती।
किसी विपिन के मध्य में श्रापेट में भटकते हुए एक महागज
से किसी महात्मा से सम्मेलन हुआ । इनके अातिथ्य पर प्रसन्न
हो गजा ने महात्मा से कहा कि कृपा कर श्राप मुझसे कुछ
मागिए, हठ करने पर महात्मा ने कहा कि आप कृपा कर इस
जगल से मसा और मक्षिकाओं को सदा के लिये बाहर निकाल
दीजिये , इसपर राजा हँस फर कहने लगा कि यह मेरे सामर्थ्य
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से मसा और
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साहित्य इदय
के परे है, कोई दूसरो माँग माँगिये जो मैं दे सकूँ। उन्होंने
दूमरी माँग यह मॉगी कि श्राप यहाँ से शीघ्र चले जाइये । यदि
इस नृपति को मसहरी मध याद हाता तो वह ऐसा मफट न
लौटता। ऐसा ही एक धनी ने किसी
डाकर
मक्षिका से पीडित हो प्रतीफार पूछा । विचक्षण डाकर ने अपनी
उञ्चातिउच फीस को धीरे से वसूल कर अपने पाकेट में रख
लो, तब धनी के कानों में मसहरी मत्र फूक दिया, जिसे सुन
उक्त धनी कुछ काल पर्यन्त विमुग्धावस्था को प्राप्त हो गया।
मसहरी सांसारिक जनों को छिद्रमय निज शरीर से यह
दृष्टान्त दिखाती है कि यदि वे भी अपने हृदय को चोरघर न
बना रक्खेंगे तो उनमें भी मसा मक्षिका सी माया न प्रवेश पा
सकेगो, और यद्यपि यह जड और अशक्त है पर तब भी निज
शक्ति के अनुसार कार्य करती हुई लोगों को कर्म का प्राधान्य
दिखलाती है।
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हमारी दिनचर्थ्या
Doupovao samopost
कल लोक को तुल्य निवास देने वाली,बाद
शाह वा योगी, धनी या दरिद्र, दुःखी वा
सुखी, स्वच्छन्द चा पराधीन सभी को
अपने रूप को विस्मृत कराने वाली, प्रलय
के द्वितीय दृश्य सा दिखाने वाली, उस
सर्च साक्षी, सर्व चेता, फेवल निर्गुण स्वरूप
आत्मा के वैभव को प्रगट करनेवाली,
चिन्ता पूरित मनुष्य से
दूर भागनेवाली,
महीपतियो से फ्रीडा करने वाली, रूपको तथा मजदूरों को गले
से लिपटा कर सोने घाली, श्राख उझलने पर प्रेमियों के पलक
रूपी गृह को त्याग अनत वसनेवाली, व्याधि पीडित मनुष्यों
को दूर ही से खडी ललचानेवाली, निद्रा का हम उस समय
त्याग करते हैं जिसे ऊग वा सतयुग का समय वा ब्राह्म मुहूर्त
कहते हैं। इसी समय उस परम शुभ्र निर्मल, चैतन्य धाम का
कपाट खुला रहता है, और मुसलमान कहते है कि इसी वक्त
खुदा मियां अमन का सदावर्त बाटने को बैठते हैं। यह सच
है कि जैसे प्रथम सस्कार और प्रथम समागम मनुष्य को
आजन्म नहीं भूलते, वेसे ही यदि इस काल में ईश्वर का ध्यान
कीजिये तो वह मुख, जिसमें कि इतर माया प्रयच्छित सुनो
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साहित्य-हृदय फा तिरस्कार कर मनुष्य अपनी श्रात्मा में स्वस्थ भाव से बैठता है, दिन भर याद रहेगा। जब भुजगी ठाकुर जी के नाम को वारवार जपती और अप्सरा प्राची से कहती कि तुम अपने अखिल शृङ्गार से सुसजित हो मुस्कुरानो क्योंकि तुम्हारे प्राणप्रिय प्रभाकर पश्चिम समुद्र का वाणिज्य कर, अब फुल काल के लिये तुम्हारे अफ में विश्राम लेंगे। अथवा जगत जनों से यह कहती कि यदि हमारी तरह तुम भी नामरूपी-अमृत का सतत पान करोगे तो जैसे में प्रवल बाज और शिकरागों को चोंच से मार अपने सिवाने से बाहर निकाल देती है, वैसे ही तुम भी मृत्युरूपी सशय विकार को अन्तःकरण से बाहर निकाल सकोगे , वा यह कहती कि जप-यश तो एक प्रकार का कृत्रिम समीर है जो श्रद्धा अग्नि को जगाता है और नाम ही केवल इस कलियुग में भवसागर का महासेतु है , वा वैपयिकों से कहती कि अब अपनो प्यारी के वक्षस्थल स्वर्ग को छोड घर लौटो नही तो लजा के घेतलों का स्वाद चखोगे,जिसे सुन कर अभिलारिकाएँ एकाएक विछोहकारी ज्वाला-नल समुद्र सा अपर-दिवसका ध्यान पाते ही कॉपने लगती, स्वकीयाओं से कहतो कि वे अब अपने प्राण प्रिय पति की सेज को छोड गृह के अनेक कम्मों को सम्हाल सुगृहिणी के प्रिय विशेषण की भाजन हों, और व्याधि पीडित मनुप्यों को तो विधि के वैद्य सी मानो उपदेश देती। ऐसे समय में प्राची दिशा की अलौकिक शोभा को निरख- ता प्राय अपने तन पर बैठा सराहा करता हूँ। यह जो अरुण बादलों से घिरी स्वर्ण की नदी सी प्राची में दक्षिण से उत्तर को इस समय प्रवाहित सी हो रही है जान पडती है कि ईर्षी 1 .
हमारी दिनचर्या १४५ सूर्य ने भागीरथी के अद्वितीय श्रहकार को नष्ट करने के लिये यह रचना की है। अथवा युधिष्ठिर से भी किसी अधिक धारमा ने अपने तपोवल से किसी काञ्चन नगर को उद्धृय- मान कर स्वर्ग में जा बसाया हे वा पूर्व-श्राफाश-समुद्र के वरुण का यह सत्यत स्वर्ण का प्रकाण्ड स्टीमर है घा सूर्य लोक की आकाश गङ्गा है या भगवान सूर्य के भेजे हुए ये विजयी पदाती हैं जो समूह वद्ध हो अन्धकार को धीरे धीरे चिन्न भिन्न करते हुए अरुण शिवानों की तुरही को सुन, वेग से आगे बढ रहे है और विचारा अन्धकार चारो ओर छिपता भागता, काकों की कार्य कायँ के मिस प्राण भिक्षा मांग रहा है, जिसे सुन दयालु सूर्य, नाश करने के बदले उसे पहाडों के गहिरे खोहों और समुद्र के अन्त करण में रहने की आशा देते। इम दयामयन्याय को देख सारे पक्षीगण श्राई हृदय हो जय जय उचारने लगते जिसको सुन भगवान भास्करमारे प्रसपता के भरण हो जाते। ज्याही वेवानर विश्वरूप सहन्न-रश्मिनाले प्रजा के प्रति पालक सूर्य भगवान ने अपने अमल शुभ्र श्रानन को याहर निकाला, त्योही सव महर्पियो, नैष्टिक ब्रह्मचारियों तथा ब्राह्मणों ने अनेक श्रुतियों को पढ़, जगत् के प्राण सूर्य को श्रद्धा पूर्वक श्रय दिया और जव से अगरेजी विद्या का कुलुपित यशहदय से दूर हो गया है तब से में भी नियत काल से प्यारे भगवान सहन रश्मि को अर्घ्य देने, उपस्थान भोरप्रणाम करने लगा है। इस प्रकार जर मुझे अपने देवी कर्मो से नुट्टी मिलती तो कमी तो जगलों में अलक्ष विचरता और यहीं विहगावालियों की अनेक सगीत सुनता, श्रात्मा में स्वस्थ प्रानन्द पूर्वक घण्टों बैठा रह जाता और पत्तों के पतन से मनुष्य के भागमन फी शफा
साहित्य-हृदय
कर, कभी कभी आँमें भी खोल देता क्योंकि ऐसे समय में
जी नहीं चाहता कि अपवित्र शकामयाँसों से देखा जाऊँ।
सामा, दहिगल और दामा के मधुर राग को सुन, देखता कि
ईर्षी महोख महाशय भीमसेन सा मारे प्रसन्नता के अपनी
लम्बी पूंछ को हिला हिला कर, गाने लगते और सवनच्छे गाने
वाले इस दुष्ट विवादी सुर को मुन मौनावलम्बन कर लेते
जिस वेलुत्फी को देख विचक्षण शुक हँस कर कहने लगता
कि भ्राता महोख ! तुम्हारी सगीत को सुन तो हमें भी गाने की
इच्छा होती है और सत्यत विधि को उलहना देने में अव
लज्जा लगती है क्योंकि तुमसे तो उसने हमारा ही स्वर अच्छा
बनाया, जिसे सुन कौतुक-मिय कोइल कुहू कुह कर उसे चिढ़ाने
लगती । इस दिल्लगी को देख टिटिहरी खिलसिला कर हॅस
पड़ती और इस प्रकार अपमानित हो महास मारे लज्जा ओर
बोडा के कानन के किसी गूढ अन्तर में जा छिपता। यहाँ
किलेंहने उसे आश्वासन देते हुये कहते कि मित्र महोग्य ! तुम
क्यों ऐसे उदास हो गये हो ? चलो, हम अभी एक तान में
सव को चुप कर देते हैं और यह कह चे बगालीमाशाओं से
श्रापस में कार्य कायें करने लगते पोरसव चिडियायें यह कुचोद्य
सुन विविध दिशा में प्राण पूजा के अर्थ प्रस्थान कर जाती।
कमी उद्याना में टहलते, जहाँ कि मरकत मणि सम हरित
दूर्वा से सम्पन्न सम धरातल भूमि ओस से ऐसी क्लिन लख
पड़ती माना अप्सराओं के रात्रि के महफिल की चद्दर बिछ
रही है जिसे अद्यापि सूर्य के किरण फर्राश ने भाडू दे
नहा हटाया, वा यह कहे कि इन ऊँचे हिम शृङ्ग सरश वृक्षों
से यह निर्मल गगा की धवल धाग पृथ्वी तल पर गिरी है।
जर भगवान भास्कर की सहलो किरणे इस ,अपूर्व
.
हमारी दिनचर्या विस्तृत जलकण राशि पर गिरती तो ऐसा अनुमान होता कि इन्द्रदेव का विस्मित करने के अर्थ देवी घसुमति ने अपने वक्ष- थल पर इन्द्र धनुष धारण किया है या प्रकृति ताजमहल की दीवार दिखा रही है और कहती है कि यद्यपि चारों ने उसके दीवार के जटितरतों को अपहरण कर लिया तोभी आप इस ठौर उसका प्रतिरूप देख सकते हे यदि आप आँख वाले हैं। इस तौर पर देखते दिखाते गुलाव बाडी में जो पहुँचे तो देखते हैं. कि सबके सव अपने सौन्दर्य रूपी उपायन के सहित, पुष्प कोष में श्रोस जलाजी लिये सूर्य को देने के अर्थ खड़े है, या यह कहें कि सुन्दरियों के रूप की यहाँ प्रशसनीय प्रदर्शनी है, क्योंकि यदि मलिन मिसों सी मोहती तो. पालमिरल प्रशस्त प्रौढ़ पजाविन या प्रकाण्ड मोगलानी वा मोटी गोरीचिट्टी स्थूल काय वडी ऑपवाली बगालिन, सी, तो वम्बई गुलाब फशमी- रिन सा लख पडता ओर इन मुर्ख मखमती गुलावों की उत्पति तो ताम्बूल खाये हुई मुस्कुराती सुन्दरियों से जान पड़ता है क्योकि कधि ज्योतिषी यही बताते हैं। यहरेजी फूलों की पक्तियाँ तो किसी सम्पन्न नगर के जवहिरियों की वीथी सी है । क्योंकि फ्लाक्स यदि लाल की ढेर लगाये है तो लास्कस्पर ने नीलम की सानि ही खोल दी है जिसे देख पनरहिनम ने जवाहिर की दुकान लगा दी.और पेनजो तो इन्द्र सा सहनों चतु कर इन सबों की शोभा देंप रहा है। इस प्रकार अनेक कवितामयी भावनाओं से सम्पन्न उद्यान के किसी कोने में चुपचाप इनकी शोभा को निरयते बैठे रहते, और देखते है कि हमी इन पुप्पों के प्रेमी नहीं, घरञ्च पक्षी गण हम लोगों से भी कहीं बढ़े चढे इनके रूप के प्रेमी है। क्योंकि देखिये हर एक दस वा पन्द्रद पन्द्रह , साहित्य-हृदय मिनट के पश्चात् बुलबुल, दहियर, सामा और पिरोला इत्यादि का झुंड आता जाता देख पडता, जो अपने कोतुक भरे नेत्रों से इनके रूप सम्पत्ति को भली भॉति देखते और कुछ न कुछ उनके रूप की प्रशसा में मुहावने सगीत गाते, जिसे सुन सारा पुष्प समाज अपने इस अत्यन्त अल्प और अचिर जीवन को भी सफल मानता । भ्रमरों को देखिये तो वे पहिले वैषयि- को से प्रसूनों के रूप की प्रशसा करेंगे और यदि ईर्षी नायक वायू ने उन्हें निवारण किया तो वे हठात् उनके अन्तःकरण में प्रवेश कर, सारे रस को चूस, उसके हृदय को सन्तप्त करने के लिये सौत से दूसरे प्रसून पर जा बैठते हैं । इस व्यभिचारमयी प्रीति को देख, गन्धहीन पुप्प जिनमें भ्रमर अपना नेह नहीं रखता, अपने हिलने मिस कहते कि हम ऐसे प्रेमियों से पत्र- चपेटिका से बातें करते है, क्योंकि ऐसे प्रेमियों से तो कुमारी ही रहना भला है । कभी यदि मुझे समय मिलता तो पहाडों के शृङ्गों पर प्रिय प्राची के रूप सराहने और उसकीप्रात कालीन शोभा देखने के अर्थ चले जाते, जहाँ से देखते कि क्षण क्षण में अन्धकार समुद्र से पृथ्वी ऐसी निकली चली आ रही है जैसी श्रादि में एकाएक सर्व शक्तिमान जगदीश्वर की कृपा से यह रची गई थी, जिस अपूर्व शोभा को देख सुनते हैं कि बहुत से दुष्ट स्वर्गीय निवासी, इसके नाश करने के हेतु, स्वर्ग से अपना पतन समीचीन समझ, इसके निवासियों को निरन्तर दुष्ट मार्ग में प्रवृत करने को, घूमा करते हैं। या यह कहें कि सूर्य किरिण रूपी महावराह, इवी हुई इस पृथ्वी का अन्धकार मय समुद्र से उद्धार कर रहा है, या ऐसा समझे कि घसुमति देवी का आनन जो अन्धकार धुंघट से ढपा था, सूर्य दुलहा अपने हाथों से हर क्षण में खोल हमारी दिनचर्या १४४ रहा है, वो यह कहें कि राक्षस सा लुटेरू अन्धकार जो हम लोगों को दृष्टि रूपी महा सम्पत्ति को हठात् हर ले गया था, प्राणियों के प्राण महीपति सूर्या ने उदय होते ही सय, चोरों से छीन छीन कर जिसका जो था, उसे दे दिया। योही देखते दिखाते किसी प्रपात के निकट एक प्रशस्त शिला पर बैठ अपने भागवत कर्म को कर, भरनाओं की सेर करता। कहीं तो भरने की चिल्लाहट सुन समझता कि यह पागल सा है जिसे सारे तीर्यस्थ वृक्ष प्राणी मागने से अपरोध करते है और यह देस वह भोर मी झोधित हो आगे बढने की चेष्टा कर रहा है ; कहीं ऋपि कुमारी सदृश वन बेलरियों के बीच घूम धुमैया पेलता, कहीं जा वाग्मी पादरी सा अपने तटस्य वृत महाशयों को ऊँचे स्वर से पवित्र भगवान भूतनाथ के प्यारे हर हर शब्द का उत्कृष्ट आदेश करता, कहीं निकटवर्ती फूली लताओं से रसिकों सा ऑखे लडाता, खडा रह जाता, कहीं झगड़ालू लुगा. इओसा ऐसाभरझर शद कर झगडामचाता कि जितने उसके तटस वृक्ष है वे अपने हस्त पल्लयों से चुपचाप वुद्धिमान मनुष्य सा मानो कहते कि तू कृपा कर अपनी राह ले , कही चिकने चट्टानों पर धुडदौड की दौड लगाता, कहीं मध्य में जगली जामुन यादी वृक्षों के उपजने से सहस्रधा हो ऐसा चिल्लाता कि मानों अपना मार्ग भूल गया है, ओर चौकन्ना हो चारो ओर घूमता श्रोर चिल्लाता, मानो तटस्थ वृक्षों मे मार्ग पूछ रहा है, पही ऐसा घर घर शद करता जैसे किसी राक्षस महीपति के गृह विवाह हो और सैक्डो चुडइल और डाइनें चेगार में चना, मटर श्रादी अप्न दल रही हो, कहीं ऐसा साँय माँय शद करता मानो जिलातों का मेला है, जहाँ सैकडॉ हलवाई नछुन पूरियां छान रहे हैं। इस प्रकार देपते दिपाते उस टौर पर जा पहुँ- साहित्य-हृदय " चता जहाँ से वह सदा के लिये अपने पिता पहाड को छोड, मारे शोक के चिल्लाता हुश्रा, पृथ्वी तल पर बेहोश गिरता है, जैसे कोई महीपति इस लोक में बड़ी ऊँची पदवी और कोर्ति को प्राप्त कर, अत्यन्त लोभ और असतोप के कारण विधि के विधान से अध. पातित हुना हो और एकाएक उसकी ऑखें विपत्ति विद्या से खोल दी गई हो । क्योंकि अव देखिये, फेन पुल से धवलित इसका अन्तःकरण कैसा शुद्ध और शान्त हो गया है, या यह कहें कि यह झरना, पहाड ससार के झंझटों से वितृष्ण हो श्रव अलग भागा चला जा रहा है । इस प्रकार कवितामयी भावना-सम्पति से सम्पन्न हो गृह को लौटते और इस वैश्यानर रूपी अग्नि को रूखी सूखी पाहुति दें कुछ काल के लिए निद्रा देवी को आह्वान करते हैं। जव सन्ध्या पक्षी वकौल टोमसन के अपनी चोंच को बढ़ाती चली आती और हर एक क्षण में सैकडो दृश्य अपने उदर में गटकना प्रारम्भ करती है और जव सारे दिवस की यात्रा से थकित मात्र पूजनीय भगवान सहनरश्मि शयन के हेतु पश्चिम समुद्र को प्रस्थान करते और मातरिश्वा भृत्य सा धीरे धीरे व्यजन करता और सब पक्षीगण उनके सुलाने के लिये अनेक संगीत गाते हैं, मैं भी ऐसे समय में सन्ध्या की शोभा निरखने के हेतु चर्डसवर्थ सा पश्चिम देवी से ऑख लडाता, सकल विश्व को विस्मृत करता हुना, उस दिशा को प्रस्थान करता है।' सूर्यास्त के पश्चात् पश्चिम दिशा कुच ऐमी अपूर्व शोभा को धारण करती माना यह रात्रि देवी की विजय लक्ष्मी है, या भगवान सूर्य के भगे हुए किरिण पदातिगण शन्धकार वैरीसे चन्दी रुत है, जिस दुख को देय पक्षो हाहाकार शब्द मचा रहे है, और तपस्सी ब्राह्मण इन तृपित पदातियों को जल से संतुष्ट हमारी दिनचर्या १५१. कर रहे है, या यह कहे किभगवान् कुवेर ने पश्चिम अाकाश में मानो सोने को सानि खोल दी हे श्रोर देखो यह अनेक बादल रूपी देवगण अनेक वर्षा के मणियों को अपने शिरो पर, उनके परिपूरित कोप को ओर भी अपार कर देने को, लादे लिये जा रहे. हे वा यह कहें कि अब इन अवशिष्ठ फिरणों को जो पश्चिम में देख पड़ रही हे जान पडता है कि विजयी विश्वेश्वर ने विश्व की रक्षा हेतु इन्ही थोडे पदातियो को छोड दिया है जिसमें ये नक्षत्र वन सारे भाकाश में फैल, सावधानी से इसकी रक्षा करें । इन सव पदातियो के सेनापति ने पूर्व दिशा में जो अपने निर्मल प्रफुल्ल थानन को दिखलाया, तो धीरे धीरे सब नक्षत्र-पदाती आकाश मण्डल में फैल चले, और वह ऐरावत सा स्वयम् बादल जगल को चीडता फाडता उसमें घुसा चला जा रहा है, या यो कहें कि श्रापेट प्रिय कलानिधि बादल मृगों के हनन के हेतु अपने किरण तीरो को सन्धान किये लपका चला जा रहा है, या यह समझे कि श्वेत स्टीमर कलानिधि धीरे धीरे बादल बरफ को श्राफाश समुद्र में काटता चॉदता निकला चला जा रहा है, या हनुमान सा पहाड के एक शृङ्ग से दूसरे ग पर कूदता लखाई दे रहा है, या यादल अरण्य में पथिको सा ऐसा छिप जाता है जेसे हम सब की आत्मा अविद्या तिमिर में छिप जाती है। कभी कामिनियों सा अपने निर्मल श्रानन को दिखा फिर बीडा और लजा से घूघट हॅक लेता ओर पुन कुछ काल के लिये प्रगट हो मुसलमानी मासूवा सा सव के हदय को अपहरण कर, आशिग को विस्मित करने के लिये बादल कपाट फो बन्द कर, मुस्कुराता ललचाता भीतर चला जाता है। यदि यह जगत गन्धर्व लोक है तो चाँदनी रात्रि में यदि . . 6
પૂર્ણ
साहित्य-हदय
भी ऐसे ऐसे प्रसुन मिल सकते हैं, और ऐसी पथरीली भाषा में
भी इनकी कविता की धारा प्रवाह गङ्गासी पवित्र है,और लस.
नऊ की धारदनाओं के नाच केतोडा सरीखीमनोहर है।क्योकि
ये भी आपके हृदय को पेर फे हिलाने के साथ ले चलेगी और
फर्णा को अपने मधुर धुंधगे की झनकार से घश किये रहेंगी
जिससे श्रापका मन सिवाय उनकी ओर के और कहीं भटकता
न देख पड़ेगा। कभी चेकन और इमर्सन की गम्भीर गिरा फेभाव
समझने में मस्तिष्क बिघूर्णित करता, कहीं पडीसन के साथ
सिल्लियां उडाता, तो कभी वर्डसवर्थ के साथ जा देवी प्रकृति
को सराहता, कभी वाइरन के दुःप को देख, काऊपर के स्वस्थ
अन्त फरण को सराहता और कभी इन महाशय के साथ
चिमनी के सन्निकट बैठ इनके अनेक सहज सुख की कथा
सुनता। कभी जयदेव जी के साथ शृङ्गार कक्ष में जा भगवान
कृष्ण की सुरीली सरस चशी से कर्ण और अन्तःकरण को
पवित्र करता, तो कभी कालिदास के अद्भुत शृङ्गार रस के
अपूर्व वैलक्षण्य को देख शेक्सपियर से भी इनको उत्तम इस
रस में समझता, कभी वात्मीक के साथ भगवान रामचन्द्रजी
के दर्शन को जाता और वहाँ अनेक महर्पियो को प्रणाम
करता । इस भॉति इस अमूल्य जीवनी की दिनचर्या होती
और ईश्वर के कृया से बिना विपय देवी के किंकर हुए ही
नित्य नये उत्सव देखता है। -
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००००००००
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आनन्द
भानन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कदाचन् ।
तने प्राणी इस भूलोक में हे प्राय स्वी श्रा-
नन्द के भूसे और प्यासे पाये जाते हैं।
मनुष्य तो कहता है कि श्रानन्द वा मगल
जि
की घडी कृपण विधि बड़े भाग्य से देता है,
यद्यपि यह मन पपीहा सा स्वाती के चूद
समान पूर्ण आनन्द की प्रार्थना चा याचना
1 घनश्याम से अहर्निश किया करता है, और
यथाशक्य प्रयत्न करता है कि वह, श्रानन्द और उल्लास के
ऊँचे आसन पर सुमनस्क स्थित हो जाय और उससे च्युत होने
की विपत्ति को न देखे,अथवा सदाश्रानन्द नदी के पुनीत कूलों
ही पर विचरा करे। दिवाने दिल परमात्मा से प्रार्थना किया
करते हैं कि आँख जब देखें आनन्द ही को देखें, जब विचरें
तो सदा रूप ही के अपूर्व सुहावने फानन में, शब्द भी सुने तो
सदा मगल और श्रानन्द ही के । हम सब कुछ ऐसे ही श्रानन्द
के भिखारी है । बादशाह शहनशाह राजा बाबू छोटे बडे सवी
इस दर के आश्रित है। उस परात्पर परमेश्वर की कीर्ति
सगीत को गाने पालो भगवती उपनिपद देवी कहती हैं कि यह
मनुप्प यदि पती का पाणिग्रहण करता है तो अपने अनेक
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१५६ साहित्य-हृदय सुसों के अर्थ न कि उस स्त्री के सुख के लिये, यदि पुत्र की कामना करता तो वह अपने अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिए, न कि पुत्र के लिए, याही यावत् कुछ वह संग्रह करना चाहता वा व्यापार करता है वह उस वस्तु के अर्थ नहीं किन्तु अपने सुख और स्वार्थ के हेतु । निसन्देह यह श्रात्मा ऐसा ही अपने सुख और आनन्द का स्वार्थी है । यावत् मनुष्य है उन सेव के श्रानन्द और सुख के देश प्रायः निराले हुआ करते हैं, यानी विद्वानों के आनन्द और रमने का देश दूसरा है और मूर्यो का दूसरा, यती और मानी के टौर दूसरे हैं और विपयी वा सांसारिक मनुष्यों के दूसरे, प्रेमियों के आनन्द का देश दूसरा और श्वेत कुन्तल वाले बूढे वेदान्तियों का दूसरा । जहाँ विद्वान् शानी और भक्त रमते है यहाँ से विषयो दुखी और त्रस्त हो गीदड सा भागते हैं, और जहाँ विपयो और सांसारिक जन रमते और अपने को कृतकृत्य मानते हैं उस स्थान की घायु भी ज्ञानीजन सहन नहीं कर सकते । यदि उदार अपने उपकार और सद्व्यय से अपने को कृतकृत्य मान सन्तुष्ट और सुखी होता तो कृपण जन धन को व्यय से बचा अपनी बुद्धि और दाक्षिण्य पर अत्यन्त मग्न होता। सारांश यह फि जैसा जिसका संस्कार, और बुद्धि होती है उसी के अनुरूप ही उसके भानन्द का विषय भी हुश्रा करता है। भगवान श्रीकृष्ण ने आनन्द को तीन भागों में विभक किया है, अर्थात् सात्विक राजसी और तामसी । तामसी आनन्द के उपभोक्ता और प्रमाणे में शहाबुद्दीन, तेमूरलग, नादिर, औरगजेब, मैकवेथ, रिचर्ड थर्ड, जान, श्रादिक हुए हैं जिनके कार्य की कहानी को अय भी रोवा हुना उदास मन चूढा इतिहास मुनाता है। देखिये पुरातन प्रीस का यह - A आनन्द कैसा निर्दय नृपति था, जो नगर को फूंक कर हँसता, हथेली यजाता और दूसरे का सर्वनाश कर देने पर, अपने घर उत्सव मनाता था, जिसका नाम इसलिए कि कविता देवी की जिह्वा पर फफोले न पड जायें, न लेंगे। ऐसे ही बहुत से लोग इस दुष्ट तामसी श्रानन्द के उपभोक्ता हुए हैं। यह सेद का विषय है कि ऐसे पुरुप इस लोक के बडे महोदयगण ही हुए हैं, क्योंकि गरीव वेचारों को इस निरुष्ट श्रानन्द के देखने और भोग करने का दुष्ट अवसर विधि नहीं देता । इस अानन्द के उपभोक्ता लोग प्राय स्वयम् रोते और दूसरो को रुलाते हैं, और प्राणियों के अन्त करण को तपा कर स्वयम् तपते है। यद्यपि इस आनन्द के सादि में दुःख और अन्त में भी दुस है, किन्तु बहुतेरों की ऐमी तामसी और विपरीत बुद्धि होती है कि यद्यपि वे नित्य प्रति अनेक दुःख और कष्ट झेलते हैं, पर तो भी विराम न कर, मारे क्रोध के इस आनन्द पापण से अपना सिर टकराते ही चले जाते हैं, चाहे उनका मस्तक सहन्नधा भग्न क्यों न हो जाय । इस प्रानन्द के अधिष्ठाता प्राय फ्रोध और क्रौर्य ही हुश्रा करते हैं। विचक्षण विज्ञानी लोग ठीक ही कहते हैं कि तामसी श्रानन्द के उपभोक्तागण निधय उस जन्म में मेडिये, गोबड, व्याघ्र वा कोई हिंसक पशु रहे होंगे जिनका हिंसा धर्म मनुस्य के पवित्र शरीर पाने पर भी नहीं छूटा। समझा ने यहाँ तक भी कह डाला है कि हम तची मुखी और स्वस्थ होते हैं जब किसी विम्मिल काफिर का 1 सिर फडकता हुआ देखते हैं। कोई कहते कि यहुतेरो के श्रा नन पर मुस्कुराहट ती पाती हे जव कि भयकर शब्द उनके फों में सुन पडते हैं। कोई ऐसे हैं कि वे उस समय वडे प्रसन्न होते जघ उनसे कोई ऐसी बात कहते बन पडे कि जिसमें , . साहित्य-हृदय कोई व्यक्ति नख शिख तक भस्मीभूत हो जाय । कोई ऐसे है कि उजरे हरप विषाद वसेरे । ऐसे जन प्राय दुसी रहा करते, क्योंकि ईर्पा, द्वेप, क्रोध की हृदय दाही अग्नि, उनके हृदय को वस्त किया करती, इससे उनकी प्रॉखें भाग फेकती और देखने से ऐसा मालूम होता कि यदि इनमें जलाने की शक्ति होती तो सहस्रो प्राणियों को वे भस्म कर डालतीं, ऐसे तामसी मनुष्यों के दर्शन या उनके दुष्ट कीर्ति के पढने से श्रात्मा झुलसती और उनसे दूर भागती है। ऐसे पुरुप किसी के मित्र नहीं होते क्योकि मेत्री, करुणा, मुदिता का लेश भी • उनमें नहीं रहता इससे चे अपने को जगत में अकेले ही पाते हैं चाहे वे शाहशाह ही क्यों न हो और इतिहास लेखकों के अतिरिक्त कोई कवि उनके गुणे का गान नहीं करता, क्योकि वे उसके योग्य ही नहीं है। राजसो उस का श्रादि अमृत सा मीठा और परिणाम विष सा कटु होता है, परन्तु वह ऐसा मीठा है कि सारा लोक इसी मुख को परम सुख मानता और इसी की अनेक वीथिनों में बादशाह, शहशाह, राजा, चावू वणिक और यावत् ससार के मनुष्य है, विचरते रहते हैं । बूढा, ज्ञानी इतिहास कहता है कि राजसी पुरुषों की श्रॉखें तबो खुलती है जब उनका शरीर और धन लुट जाता है। राजसी भोगो के पश्चात् मनुष्य कुछ ऐसादीन हीन और दरिद सा हो जाता है कि उसमें फिर कोई सात्विक वा राजसी भावना उठती ही नहीं, जिसको कवियों ने अनेक उपमा और उत्प्रक्षाओं से समझाया है। कोई कहते कि राजसी सुख श्रादि में, सजी धजी राज- धानी सा देख पड़ता है कि जिसमें सारे ससार के आनन्द ।' की सामग्री उपस्थित है, जिसकी वीधियॉ मनुष्यों के कलवर से
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भानन्द
१५
सजीवित सी हो रही है, और चतुर्दिक उत्साह और मंगल के
सामान देख पडते हे परन्तु कलान्तर में नगर के उजाड और
धीरान हो जाने पर जैसे उसके कोटरों में चमगीदड और
गाल बसते हैं, वैसे ही राजसी सुप के उपयोग के अन्त में
इस शरीर रूपी नगर की दशा हो जाती है, क्योंकि जव
विषय भोग से जीर्ण हो जाता है तो इसमें केरल तृष्णा गाल
और हिरसचमगीदड रह जाते हैं।या राजसी पुरुप उस नादान
मुसाफिर सा है जो इस माया की सराय में या वसा और
माया की अनेक प्यारी दूतियों ने उसको ऐसी मोह की मीटी
मदिरा पिलाई कि जिसके पीते ही वह मूर्षित हो गया, और
घे खपरी में उसका सब धन हरण कर, प्रात काल घे उससे
सराय में बसने का किराया माँगती और न मिलने पर उसकी
अनेक दुर्गति करती है, अर्थात् शरीर के जीर्ण हो जाने पर वा
वित्त के नष्ट हो जाने पर मन की तृष्णा अठगुनी हो जाती,
क्योंकि पहिले के भोगों के न प्राप्त होने से चाह घा हिरस रूपी
निच्छू अहर्निश उसके हृदय पर डक मारा करते हैं।
राजसी नुस की यदि हम एक वेश्या से समता दे तो कोई
अनुचित नहीं है क्योंकि जब तक हम मुसी भार सम्पन रहते
वे हम पर कृपा कटाक्ष निक्षेप करतों और ऐसा जान पड़ता
कि हमारे पहलू से यह कहीं अनत न जायँगी, किन्तु दरिंद्र
१ होने पर यह लाव बुलाने शोर प्रार्थना करने पर भी एक बार
फिर कर नहा देसाती । मानो निचकेता जी ने ठीक ही कहा
हे कि भोग से तो इन्द्रियों का सफल तेज जर्जर और निस्तेज
हो जाता है । यूरुप के दाशनिको ने भोगियों की शरीर की
समता लद् वा भाड़े के एके के टों से यहुत ही उचित
दी है, क्योकि ये लाख विषय के चायुक लगाने पर भी आगे
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१६० साहित्य-हदय को नहीं चढते । इन सव की इन्द्रियाँ ऐसी कुछ शिथिल हो जाती हैं, किन वे यथेष्ट भोजन कर सकते, न हॅस बोल सकते न तो वायू को सह सकते, न जल की अनेक क्रीड़ानों को कर सकते और न कभी उन्हें सेज पर गाढ़ निद्रा अग लिपटा फर सोती है। वे तो विचारे बस मीरफरश बन जाते कि जिनका उठना बैठना भी दूसरों के हाथ रहता है। फिर ऐसे भोग में क्या सुख है १ भाडे वाले टट्टू ले सहरा इन्द्रियों को रखने में इस जगत का क्या सुख प्राप्त हो सकता है ? इसीसे सयमी जन युक्त आहार करते, चाहे लाख नेमतें रखीं हो और चाहे लोभ वा काम के अखिल सामान क्यों न उनके समक्ष प्रस्तुत कर दिये गये हो ? भ्रम से बादशाह समझता है कि यदि हम इस सारी चसुधा को अपनी विजय पताका के नीचे ला सकते तो निश्चय यह मन सदा के लिये सुखी हो जाता। सिकन्दर सीजर नेपोलियन, महमूद, नादिर, दुधिन, रावण इत्यादि ने देखा है कि सहस्रों विषय प्राप्त होने और लोक में सब से ऊँचा गिने जाने पर भी यह मन दुखी वा सन्तुष्ट न हो सका। प्रत्युत यह अत्यन्त दुखी और दीन हो गया, क्योंकि उसी के कारण मनुष्य शरीर के पवित्र रुधिर से कई बार वसुधा क्लिन हो गई । मला ऐसा मनुष्य शान्त सुमन श्रानन्द पूर्वक कैसे बैठ सकता है ? योही द्रव्य के सचय करने वाले समझते है कि जब हम इतना द्रव्य अपने कोप में सचय कर लेगे, यह लोभ और तृष्णा की श्रग्नि जो हृदय में जल रही है निश्चय शान्त हो जायगी। पर देखा गया है कि उससे भी अधिक प्राप्त कर चुकने पर मन दरिद का दरिद्र ही रह गया और तृष्णाग्नि और भी तीव्र हो गई है। इसी प्रकार कामी लोग यद्यपि नित्य ही कामिनी सग रूपी सग से सिर टकराते टकराते श्वेत कुन्तल और पापला h . आनन्द मुख कर लेते तथापि तुष्टि नहीं पाते । जैसे कि ययाति ने सममा था कि इतने भोग के पश्चात् निश्चय मन इससे उपराम ले सुखी होगा पर देखा कि आग से श्राग नहीं तुझती और मन कमी भी भोग से शान्त नहीं होता है। सारांश यह है कि जितने प्राणी इस लोक में है सबी चाहते हैं कि वे सदा के लिए मुखी हो जा, आनन्द और उत्साह का महागत अपने द्वार पर बाँध, मोछोपर ताव दिया करें या शान- न्द के श्रोत का तालाश कर तृप्तात्मा और मालोमाल हो जाय, पर जैसा कि वेद भगवान कहते हैं कि सत्य का मुख तो हिरण्य मय पात्र से ढंका हुआ है अर्थात् श्रानन्द का श्रोत अविद्या मेक पर्वत की श्रोट में यह रहा है जिसका तात्पर्य यह है कि वह पर्वत मुहावने और ललचावने दृश्यों से पूर्ण है कि मनुष्य उसी की शोभा देखता रह जाता और उस पुनीत श्रानन्द श्रोत के हॅढने की कभी जिज्ञासा भी नहीं करता । लोलुप मन वा यो कहिये सारा लोक चौबीस घटे माया की हाट में भटक रहा है कि आनन्द का सौदा करें और सुखी हो जायें। इस अवस्था को शास्त्रकारों ने कास्तूरी मृग से दृष्टान्त दे भली भाँति सम- झाया है। वे कहते है कि वह उन्मत्त मृग जिसके शरीर ही में कस्तूरी वसती और उसको सुगन्ध पाकर वह सारे जगल में खोजता है कि उसे प्राप्त करे। तात्पर्य यह है कि जो कुछ आनन्द इस लोक की वस्तुओं से होता है उसका मुख्य कारस यह आत्मा ही है, कि जिसे न जान, मूढ़ मनुष्य मृग सरश विपय कानन में भटकता घूमता है। याही दूसरी जगह कहते है कि वह सरस मुर जो वसी से निकल रहा है, उसे यदि कोई प्राप्त करना चाहे तो वसी को प्राप्त करे अर्थात् यदि हम किसी बंसी के सरस सुर को मुन, जो परोक्ष में बज रही है, उसका साहित्य-हदय कारण खोजने चलें, तो देखेंगे कि उन सब सरस सुरों का उत्पत्ति क्षेत्र एक छोटी सी बसी है। उसी प्रकार यावत् सुख इन इन्द्रियों द्वाप होते हे यदि चाप निशानी है तो अन्वेषण करने पर उक्त श्रानन्द का.मुख्य कारण अपनी आत्मा ही को पायेंगे । परन्तु यह आत्मा बसी अव्यक्त दुर्विशेय और सूक्ष्म तर है जिस कारण यद्यपि उसकी ध्वनि प्रतिक्षण 'निकलती रहनी है तथापि मूर्खजन नहीं जान सकते और न यह पहचान वा अनुमान कर सकते कि यावत् मुख और आनन्द है उसका मुख्य कारण उसकी आत्मा ही है न कि विपयं। वसी के सरस सुर से वेद भगवान का यह तात्पर्य है कि जो विषय से वा किसी कारण से, श्रानन्द की धारा निरन्तर आत्मा में उठ रही है उसका कारण विषय नहीं है, किन्तु वह आत्मा ही है जो कि श्रानन्द स्वरूप है, जिसे मूर्य न जान कर विषय की गुलामी करता और उसके सग्रह में चतुर्दिक दौडा करता है, और दिगदिगन्तर प्रसृत घसी के सरससुरों को इकट्ठा करने का परम असम्भव कार्य किया चाहता है। क्योंकि सारा धानन्द इस शरीर ही में बसता है और इस बारमाही में सब मुख अनन्त-सम्पत्ति के सामान भरें है, इसी को विद्वानों ने अनेक युक्ति और तर्क से सिद्ध किया है कि यदि श्राप सुखी तो जगत् सुखी अर्थात् जय कि हम सुसी हैं तो यह जा भी सुख स्वरूप दिखाई देगा और यदि हम दुखी है तो जगत भी दु.ख स्वरूप ही दीख पडेगा। तात्पर्य यह है कि नव हमारी श्रात्मा सुपी है तभी हम अनेक विपयों द्वारा मुखानुभव कर सकते हैं, क्योकि चित्त की उद्विग्नावस्था में तो देखा है कि लाख आनन्द के दृश्य वरच अखिल लोक की सामग्री भी फीकी लखाई पड़ती है। विषय में यह शक्ति निश्चय
आनन्द
नहीं है कि अस्वस्थ को स्वस्थ कर सके, घा दुखी को सुखी कर
सके। जैसे कि ज्वर से सतप्त पा चिन्ता से उद्विग्न मनुष्य के
समक्ष कोई लाख गाना और नाच दिसलाए वा शेक्सपियर
वा सादी के ललित वाक्य.सुनाये, पर उसको वे सुखी न कर
सकेंगे। इससे निश्चय हुआ कि आनन्द और उत्साह की
दीवानी माजें तभी आकाश की. छोर तक प्रलम्बापमान. हो.
सकती है जब कि यह आत्मा मुखी और सन्तुष्ट हो।
। अव सुसी कैसे हो यह विचारना चाहिये । इसके उत्तर
बूढा वेदान्त यह कहता है कि जब तक यह मन विषयो की.
अनेक ललचावनी पोथियों में रमता रहेगा तब तक इसे
शाश्वत् शान्ति नहीं प्राप्त हो सकती है, और जब तक शान्ति
न आयेगी तव तक आनन्द कदाचित् सम्भव नहीं है। क्योंकि
चञ्चल और उद्विग्न मन कभी शान्ति की सुसमयी शय्या पर
नहीं सो सका है।
आनन्द का श्रोत एक ऐसे ऊँचे दुर्गम पर्वत से निकलता
है जो साधारण श्रद्धा या परिथम वाले मनुष्यों के मान का नहीं:
कि वहाँ तक यह पढ़ेंच सके। बहुतेरे तो उसकी ऊँचाई को
देख चढने की हिम्मत ही छोड देते और कोई दो चार कदम
चले तो कुछ दूर जा, शक्तिहीन हो गिर जाते हैं। इसी से
मगवान कृष्ण कहते है कि सात्विक सुख पहिले विष सा कटुः
है। "जानवनियन" भी कहता है कि परमात्मा का धाम जहाँ
कि प्रानन्द और सुख का सदावर्त पॅटता है, जहाँ कि अमृत की
नदी बहती और सदा वसन्त भोग किया करता है, यह
स्थान जगल पहाड मरूस्थल और दलदलों से सुरक्षित है, इसी
से उस ज्ञानी पादरी के कथानानुसार केवल आर्त, जिज्ञास,
प्रेमी भक्त और धानी जन ही उस दुर्गम मार्ग को.पार कर वहाँ
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साहित्य-दृदय
तक पहुँच सकते हैं 1,यह ठीक है कि यदि आर्त वहाँ तीन मो.
घरकार पर जाता है तो ज्ञानी और विरक्त जोडी पर और भक्त
चौकडी पर उस देश को पहुँचता है। योही इतर जनों की
सवारी यदि खञ्चर और गदहे की कही जाय तो कुछ अनुचित
नहीं अर्थात् जैसी जिसकी श्रद्धा है वैसी उसकी सवारी है।
ससार में भी तीन चार ठौर सात्विक सुख का उदाहरण
देखने में आता है। प्रथम तो विद्या है जिसके दो चार घण्टे
पढ़ने के पश्चात् जो सात्विक हर्प का उद्गार हृदय में उठता है,
यद्यपि वह क्षणिक है तथापि सात्विक सुख का श्रादर्श है।
दूसरा, जय कि नाप किसी को दु,स दारिद्रय वा इवने से
घचाते है या विपत्ति के तूफान में पड़े हुए को लक्ष्मी गृह
श्रादि से सहायता दे उसे शरण देते है। ऐसी सहायता के
देने पर जो आत्मा को सुख वा सन्तोष होता है वह भी
परम सात्विक है । योही पुण्य जप, तप, यज्ञादि देवी
फों के पश्चात् जो साविक आह्वाद पाता है, मात्विक
धानन्द का परम उदाहरण है। वैसे ही जब हम किसी महात्मा
के प्राथम में प्रवेश करते है तो देखते हैं, कि प्रयास
हमारे कयो पर से मोह और प्रकार रूपी शानभक्षी राक्षस
क्षणैक के लिये इतर जाते और नास्तिक और वान्त हृदयो
के भी हदय को कुछ काल के लिए सात्विक भानन्द की
फिरणे उजेती कर देती है। वैसे ही भावारिपूर्ण उमडी हुई
चौडी नदियों के देखने, भरने वा दरियों के अनेक सुहाधने
कलकल शब्द को स्वस्थ मन सुनने, या पर्वतों के अनेक त्या-
मायमान Pों की हलायों के देखने यात्राकाश में अपूर्व इन्द्र
धनुप के दर्शन से जो प्रानन्द आता यह भी सात्विक ही है।
यादी दूर से आये मित्रों के सम्मिलत में मीसात्विक आनन्द का
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ܫܕ
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श्रानन्द
वैभवं देखा गया है। देखिये जर परम पराक्रमशाली पवन सुत
ने भगवती सीता को अशोक के नीचे उदास मन बैठे पायो और
जर उनसे भगवान रामचन्द्र का कुशल सदेश तथा लका में
ससैन्य आकर राक्षस कुल के नाश करने तथाच उनको छुडाने
की प्रतिज्ञा सुना और जलती हुई कृषि सी जनक नन्दिनी को
अपने अमृतमय वाक्यो से सींच कर ऐसे सुखी हुए कि अपने
साविक उत्साह में आकर सारी लंका को फूफ डाला । यही
सात्विक हर्ष में एक तामसी कर्म का उदाहरण है।
सात्विक सुख का अन्वेषण करने घाला नित्य उज्वल और
पुनीत लोक की ओर आगे बढ़ता है, यही राजसी और तामसी
जन नित्य अविद्या तिमिराच्छादित सर्प और विच्छुओं से
श्राकीर्ण लोक में गिरने को काल के वृहत् पाश में नित्य और
भी उलझते जाते है । यदि सात्विक सुख के देश में सुरत की
मनकार उठ रही है और भक्ति भावना के अनोये नूपुर मधुर
निनाद कर रहे ह, तो राजसी, और, तामसी के हृदयों में
फामना, फोध, यह कार रूपी भयकरी का भयावह चीत्कार
मच रहा है। यदि एक की इन्द्रियाँ सदा सतुष्ट और सुखी
रहती तो दूसरे और तीसरे की इन्द्रियाँ गरुड के यों या
राक्षसों की सतानों की भाँति सदा भोजन ही मॉगा करतीं,
यदि सात्विक के आदर्श स्वरूप श्री महाराज रामचन्द्र, युधिष्ठिर,
विक्रमादित्य अफवर इत्यादि हैं कि जिनके चरित्र की कथा
मनुष्यों को सदा सच्चरित्र और धार्मिक बनाएँगी, तो
सेक्मटस, जान, महमूद, दुर्योधन रावण इत्यादि वामसी
मउप्यों की कथाएँ सदा लोक को हानिप्रद हुआ परेंगी। यदि
एक अपने पीछे इन सी सत्कीर्ति रूपी खुश छोडती तो दूसरी
मोटरकार ली ऐसी दुर्गन्धित कर जाती कि जिसका सस्कार
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साहित्य-हृदय
समय नहीं मिटा सकता। यदि एक उस लोक में विचरता कि
जिसकी प्रशसा में श्रुति कहती है कि उस ऊर्धलोक में न कोई
देवता, न सर्वत्र गामी पचन ही जा सकता,जहाँ कि सात्विक
जन नित्य यसते और नित्य नये उत्सवों के समान देखते हैं।
राजसी जन जन्म और कर्म के जाल से जकडा यद्यपि
अकुलाता और फडफडाता पर मोहवश उसे छोड नहीं सकता,
याही तामसी तो सदा अधोलोक ही में रहता है। यदि एक
वर्ग का द्वार इसी लोक में खोलता है तो दूसरा उसे सोने
और चॉदी से ढक देता है। यदि एक चिरस्थायी तो दूसरा
विजली सा क्षणैक प्रकाश दिखा पीछे निविड अधकार में
छोडता है। भगवान् श्रीकृष्ण सात्विक सुख की प्रशसा में कहते
हैं कि इस सुख के प्राप्त करने के पश्चात् मनुष्य को किसी वस्तु
के प्राप्त करने की इच्छा नहीं रह जाती पर वह सुख जगलों में
धूमने वा तीर्थो के पर्यटन में अपने पैरों के तोड़ने से नहीं
प्राप्त हो सकता, वह तो केवल अपने घट ही में खोजने से
सुलभ है।
।
; इस मुख के अन्वेषण की इसलिये आवश्यकता पडी कि
जब पंडित कवि और दार्शनिकों ने देखा कि इस लोक में नित्य
क्षणिक सुख को चालू की दीवार उठानी पड़ती कि जो नित्य
गिरा करती है, यथा नित्य नई माशुकाएँ हूँढनी और नित्य
नये से प्रेम की ग्रन्थि जोडनी पड़ती है, जिससे नित्य नये
झंझट,और विघ्नों के तूफान का सामान करना, पडता क्योंकि
घे यदि श्राज हँस रही है, तो कल कोसने लगती, यदि आज
आप पर जान निछावर करती है तो कल सर्व भाव से विरक्त
हो बैठती, ऐसी हो प्रकृति की प्रायः सब माशूकाएँ हुना करती
हैं, जिनके भाव कमी स्थिर नहीं रहते। पण्डित बानी और
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1 . धानन्द विचक्षणजन जव माया की हाट में शानन्द और सुख का सौदा करने चले और इतिहास को अपना नेता बनाया और को साथ लिया तो देखा कि कोई ऐसा सौदा नहीं है कि जो इस बात्मा को सदा के लिये आनन्द मूर्ति बना दे, क्योकि ये कहते हैं कि देखो भूमि फतह करने वालो ने अन्त को सिर पीटा और कहा कि जो करना चाहता था यह न किया। मूषको सा द्रव्य सग्रह करने वाला देखता है कि नित्य यह लक्ष्मीवान होने के बदले असतोप के कारण दरिद्र होता जाता है और भोगी कुछ दिन के पश्चात् जिस भोग के लिये प्राण देता था अय उसे देखना भी नहीं चाहता । याही यावत् राजसी सुख है उनको यदि तत्वत, विचारिये तो यही समझ पडता है कि इनकी मैत्री कभी स्थिर नहीं हो सकती, क्योकिमायाचल प्रकृति वाली है, इसी मे उससे जनित यावत् सुखादि हैं वे भी चल हैं। राजसी सुख में सब से बडा कष्ट तो यह है कि विधि कभी पूर्ण रूप से उसका अनुभव नहीं करने देती, क्योंकि जब मनुष्य समझता है कि अब हमें पूरा आनन्द था चला या प्रय हम पूर्ण रूप से आनन्द पूर्वक इस सचित धन या राज्य का उपभोग करेंगे, तभी प्राय देखा गया है कि उसी समय अनेक विघ्न स्वरूप तूफानों के आने का अवसर मिलता है। अत उन महात्माओं ने स्थिर किया कि इस माया की हाट में कोई पेसा सोदा नहीं है जो स्थायी हो और निरन्तर सुख का देने वाला हो, क्योकि आनन्द के चाहाकी बाग जो अन्त करण में लगी हुई है, वह माया के बाहरी विषयों से कैसे घुझसपती है। अर्थात् आत्मा को अनात्मीय वस्तुओं से कैसे तुष्टि हो सकती है इसी घेसमझी को शानियों ने भ्रान्ति फहा है, अर्थात् पण किस ठौर पसता है और अगत उसे किस ठौर ढता है
साहित्य हृदय
इसी से कभी कभी माया के गुलामों को उन्होंने अन्धा और
वेसमझ कहा है। यह ठीक है कि माया की हाट में सैकड़ों
दलाल घूमते रहते है जो हाथ पकड और घसीट कर ले जाते
और सौदा पका फराक ही छोडते, पर उसी के विरद्ध सात्विक,
फी शान्त हाट में केवल आपकी प्रवल श्रद्धा और जिज्ञासा मात्र
सहायिका मिलती और माया के महा पराक्रमी सेनिक चौवीस
घटे लूटने और सौदा बिगाड़ने के लिये तैयार रहते हैं, सुतराम
यही सय दुःख और कठिनाइयों इस हाट में झेलनी पडती हैं।
हमने देखा, बडे से बडे श्रानन्द और मगल के अवसरो में
जब कि अपने ही घर में बडी सी वडी महफिले थी, और
घेश्याओं के रूप लावण्य मिस भगवान् कुसुमाकर मानो बसन्त
का प्रत्यक्ष समा ला रहे थे, सगीत सम्मिलितसारगी के सरस
सुर से दीवानमाना दीवाना बना वाह वाह कर रहा था, जड
होता हुआ भी सुरीला हो रहा था, वा सदसगति क्या २ नहीं
कर डालती इसका प्रत्यक्ष उदाहरण बन रहा था,अथवा और २
फई महोत्सवों पर जो इस जीवनी में देखने का अवसर मिला,
तव जब जव मेंने विज्ञान शास्त्री से कहा कि वे दिल के घटे को
यजाएँ और पूछे कि अब तो आप सतुष्ट हुए, तो देखा कि
मन किसी न किसी कोने से असतुष्टता या. न्यूनता ही का
उत्तर देता है।
परन्तु यदि आप सद्गुण निष्ठुर वैद्य की कटु पुडिया
किसी भॉति निगल जाइये,धा इस माया के विकट और अपार
जगल को विद्या भक्ति और तितितादि नेताओं की सहायता
से पार कर ले जाइये तो निश्चय चिल्ला कर कहियेगा कि जिसे
हम पाना चाहते थे, उसे हम पा चुके । हमें इस लोक में कुछ
कमी नहीं रह गई, सन्तोष ने खज़ाना पूरा कर दिया, अव मन
।
आनन्द । सदा श्रानन्द के ऊँचे सिंहासन पर स्थित रहता है और आनन्द को ऊँची मौजों को देख देख सदा प्रसन्न होता और बादशाह सा सारे लोक को अपनी प्रजा सरीखा देखता है क्योंकि तपो. धनी सचमुच ही धनी है ओर इतरजन उनके समक्ष पस्तुतः रक और दरिद है। सच तो यह है कि जय अन्तर राज्य का राजविद्रोह शमन हो जाय अर्थात् दुष्ट काम क्रोधादिक रजोगुण के महा सैनिक और उनके पदातिगण नष्ट हो जायें और जागता विवेक मत्री अपने नियत कर्म से स्थित हो जाय, तथा सतोष निग्रह पहरये पहरा देने लगें तभी तो यह देही थपने स्वरूप में स्थित हो शाश्वत आनन्द का भागी हो सकता है, वा ऐसा कहें कि जैसे तन्त्री से सरस सुर तभी उपज सकते है जय कि उसके सब तार परस्पर मिले हों वैसे ही इस शरीर रूपी तन्त्री की भी बस्था है कि जब मुर में है, अर्थात् मन शान्त है, तो अनेक कठिन से कठिन और गूढ घिपयो का भी विचार कर सकता है, किन्तु जब येसुरा है अर्थात् काम क्रोध लोभ-इत्यादि जय मन को अपने घश कर लेते हे तो यही विगडी तन्त्री के समान अपने सरस सुर को भूल जाता है भगवान् कहते हैं कि अशान्त को कहाँ सुख है अर्थात् कहीं नहीं। यह ठीक ही है, क्योंकि जब ई, द्वेष, लोभ, मोह, मान इत्यादि गरुड के बच्चो के सदृश हमारे अन्ताकरण पर चञ्चु का श्राघात कर रहे है, तब केसे किसी को सुप मिल सकता है । बलिहारी इस बुढिया मोहनी माया की जो इस घुढापे में भी हजारो माशूको की माशूका और जिसकी चुदाई जवानी को भी मात किए हुये है, जो ऐसी ललचावनी और सुहावनी है कि प्राणी मात्र जीवन पर्यन्त इसी के वश रहते और स्वप्न में भी फभी नहीं समझते ओर . साहित्य-हदप न उन्हें यह समझने का अवसर ही देती-कि इस अद्भुत सालों तार धाली पीणा का बजाने वाला कौन है ? या ऐहिक सुख के परे कोई और भी सुख है ? वा इस सारे विश्व का कोई रच. यिता भी है १ या इस परम दुर्लभ मानुषी तन को माया की गुलामी के अतिरिक्त और भी कोई काम है ? 'घा इस अखिल विश्व के रचयिता की भी परिचर्या कर्तव्य है या नहीं? जो ब्रह्म निष्ठ नहीं है, चा आत्मशानी नहीं है, जिसने कि अपने रूप को नहीं पहिचाना और जो मोह निद्रा से निद्रित कहे जाते हैं अर्थात् माया मद् से विधूर्णित स्वदेश वा स्वकेन्द्र त्यागी सदा थाहरी विषयों में रमते हुए, अपने घट से बेखबर रहते, उन्हें माया की इस अविद्या गाढ़ निद्रासे उनिद्रित करने के लिये, सब देशों के देवी वाक्यों ने प्रयत्न किया कि वे जगें और इस अविद्या निद्रा दु ख को त्याग विद्या व शान वा सूर्य वाले देश में रमे, पर देवी माया की दया से ऐसे सुखमय मंगलकारी प्रिय वचनो को वे सुनने के भीरवादार नहीं कारण यह है कि सात्विक आश्रमों में जाने से माया और उसके अनेक पदाति रोकते हैं कि वह इस ठौर न जाये और यदि जायें भी तो कर्ण और चच से शून्य होकर अर्थात् कोई बात न तो याद रक्ने, न समझे वा आचरण करें जो कि वहाँ के आचार्य उन्हें उपदेश करते हैं । सारे लोक में कुछ ऐसा हो माया का प्रभाव देखने में आता है। एक महात्मा कभी कभी अपनी मौज में संसारिक मनुष्यों की माया की गुलामी और मोह की समता लखनऊ के उन धृष्ट नायको से दिया करते थे जो किसी रूपवती फर स्वभाव वाली यवनी के प्रेम में पूर्ण रूप से ऐसे आशक्त होते कि सैकडों घेतले खाने पर भी अपने चेहरे पर शिकन नहीं लाते, सौ सौ कोड़े आनन्द खाने पर उफ नहीं करते, लाल मिडकियों सुनने और गई. नियाँ,देकर निकाले भी जाते तो भी उस प्रिय वीथी की धूखि उडाना नहीं छोडते ऐसे विचित्र प्रेमी जगत या पुस्तकों में दो हो चार ढूंढने से मिलेंगे पर हमारे इस बुढ़िया माया के तो सवी ऐसे ही धृष्ट प्रेमी हुश्रा करते है, जो जगत की लाख लाख लाते खाते पर तो भी येशर्मी से मुंह नहीं मोडते । यद्यपि यम- राज दिन रात मृत्यु के गोले घरसा रहा है, सहस्रो नित्य प्रस्थान कर रहे हैं, पर जो बचते अपने को अजर अमर समझते, और कभी नहीं विचारते कि ससार छोड उन्हें कहीं और टौर भी जाना है ? उनके अनेक कर्मों का कभी कोई पूछने घाला भी होगा. इस देह के अधिष्ठाता देही प्रभु की परिचा भी करने के योग्य है, चा यह जीवन जानने समझने या पूजने के योग्य है ? ऐसा कुछ अविद्या मोह का परदा पडा है कि जिससे इसके भीतर बेठे हुए अव्यक, सर्व प्राणियों के अन्तर्देश में रमने पाले पुरप का पता भी नहीं चलता, केवल इस शरीर रथ के सारथी मन और इन्द्रिय अश्व आदि का शान रहता है । कारण यह है कि अनेक जन्मों से इस माया की गुलामी करने से इस मन का ऐसा कुछ भ्रए सस्कार होगया है कि वह इमीमाया की गुलामी में अपने को कृत् कृत्य मानता, कभी नहीं अकुलाता। किसी कवि ने ठीक कहा है कि ज्यो ज्यो हम ऊपर चढ़े, त्यो त्यो वस्ती नज़र पडी अर्थात् ज्यों ज्यो ऊँचे सात्विक ऊद लोक को,चढ़ते जाते हैं त्यो त्यों इस ससार का सभा स्वरूप देखने में आता है। जैसे कि जब हम किसी ऊँचे पर्वत के दङ्ग पर चढ़ जाते हैं तो नीचे के रहने पाले मनुप्य आदि अति शुद्र दिखाई देते हैं। यहाँ बैठे हम अनेक मुहावने हश्य को देख सराइ सकते हैं पर में विचारे जो पृथ्वी पर है, चार हाथ
साहिब-इंदर्य
भी नहीं देख सकते। पानी यरसने से ससार में कौंच पैदा होती
है पर हमारे पैरो में छू भी नहीं जाती। शहर की दुर्गन्धि धूम्र
तथा धूलि से पित पचन के स्थान पर वहाँ सहस्रो वनस्पतियों
के पराग से पूरित प्राणप्रद मन्द मन्द वायु हमें पीने को मिलती
है। एके और गाडियो की खडखड़ाहट के स्थान पर भरने
और प्रपातों के मधुर घोप से सदा कर्ण पूरित रहता है। ऐसा
भेद जीवन और मुख में हो जाता है जव कि हम स्थूल पर्वत
पर चढ़ते हैं, फिर आप समझ सकते हैं कि जब हम उस उस
सात्विक निर्मल देश की ओर उन्मुख हो कुछ ऊपर आ उस
अशान्त पर्वत पर चढ जायँगे तो देख सकेंगे कि हम कैसे
सुसी हैं और ये ध प्रदेशवासी राजसी ओर तामसीजन कैसे
चिन्ता और दुःख में मग्न है। तय भला उन सबों की क्या कथा
कि जो अपनी सारी भावनायो के बाजार को ऊई लोक में जा
यसाते हैं और देखते है कि यही पृथ्वी दूसरी की दूसरी हो
जाती है । यावत् जगत के कार्य ह सुखमय और यायत् प्राणी
हैं सब मित्र हो गये हैं। भक्ति और ज्ञान का, अपूर्व समीर
उनके हृदय के सारे ताप सरकार को हर लेता और नित्य
सयम और नियम के अपूर्व निर्मरों के जल पान से वे शाश्वत
सुख के भागी हो गये है।
उक्त उत्प्रेक्षा को दूसरे महात्मा इस प्रकार से कहते थे कि
आनन्द और मुख तभी पा सकता है. अब हम वएवज खयम
नाचने के, नाच देखने पैठते है यानी जव इस सारे ससार को
नेपथ्य मान तीजिये, और मनुप्यों को नट समझिये एवम्
अपने को उस अभिनय का द्रष्टा बनाइये तभी आप इस विश्व
महा नेपथ्य के विविध नाट्य और प्रतिक्षण बदलते हुए प्रकृति
के परदे को सम्यक रूप से देख आनन्द का अनुभव कर सकते
।
आनन्द
हैं। एक दूसरे महात्मा कहते कि जगत धारात है उसमें यदि
आप पराती सटश इजिये तो महफिल और अनेक उत्सवों को
देखते हुए भी उससे विरक और हानि लाम से रहित रह, घर
लौटने पर सुखी रहेंगे। हमने इस जगत के सुखों को थोडे या
वृहत् रूप में अनुभव किया है, पर अब जो इससे अलग जा,
अपने एक छोटे से ग्राम में चैठे, अधिपति घा देही की
सुन ली तो देखते है कि कैसा यह अन्त करण सुसी हो गया
है। जो अहर्निश विषय घीथिओं में विचरता और अनेक दुखों
का भागी हुया करता था, अव सस्य है। चेतन्य, निर्मल,
देदीप्यमान, सारे विश्व को तेज देने वाला साहेब सतुए हे
और मारे प्रानन्द के उछला करता है। उन्ही साहेब के दर्शन
का सुख सारे विश्व के सुखो को गहित ठहराता है। इसी
चिरस्थायी, सदा नूतन, अविचल यानन्द को प्राप्त करने के
लिये ज्ञानीजन अनेक प्रयत्न करते है। क्योंकि इस लोक के
सणिक यानन्द उन्हें मतुष्ट नहा कर सकते।
यह सात्विक देश कुछ ऐसा लिए, दुर्गम, दुर्विजय है कि
उसकी ओर कोई जाना नहीं चाहता। इस निर्मल देश की
क्रथा और श्रानन्द की बातें यदि कहीं सांसारिक मनुण घा
विद्वान् पादरो मुनता तो कपट हास्य से कह चलता कि क्या
परी सी प्रियतमा पनी के पाव शयन से ब्रह्मचर्य में अधिक
सुख सम्भव है ? क्या सुखाद भोजन करने से मूनो मरने में
अधिक आनन्द हे १ समाज को छोड एकान्त में क्या अधिक
मन रम सफता अथवा उपति को प्राप्त कर सकता है ? यया
मुद्रा गिनने से माला फी मनियाँ गिनने में अधिक प्राप्ति है?
क्या शस्त्रों से सुसजित मनुष्य से दिगम्बर भी भला लग
सकता है ? ऐसी ही माय सिविध असम्भव और विपरीत
-
" साहित्य-बदम भावनायें सात्विक यानन्द के विषय में हुआ करती, और सब के हृदय को ऐसी कँपा देती हैं कि ये इस देश की इच्छा और कामना भूल से भी नहीं करते। इन सब प्रश्नों को यद्यपि वेदान्त और सांख्य ने भलीभाँति सिद्ध कर दिया है कि यह आत्मा विषयों के संग्रह बिना भी परम सुखी और ऐसा सन्तुष्ट रह सकती है जो पियों द्वारा कदापि सम्भव नहीं, पर उनकी बातों के सुनने.वा.समझने को. यह मन कभी नहीं चाहता । यद्यपि इन शास्त्रों ने उस सात्विक देश की प्रशसा कर चाहा किभूले हुए विनय जगल में भरमने से ध्वस्त और लान्त लोग इस आत्मा रूपी महातरु की छाया का आश्रय ले स्वस्थ हों। अपने भूले हुए घर यानी अपने चैतन्य रूप में स्थित हो शाश्वत सुख के भोक्ता हों। पर इस माया के. प्रत्यक्ष लुभादने दृश्य से मोहित सामान्यजन उनसे लान समः भाये और जगाये जाने पर भी कुछ शान लाभ नहीं कर सके । भगवान नारद ने जब देखा कि सकल शास्त्रों के अध्ययन कर जाने पर भी इस दरिद्र मन का दारिद्रय नहीं गया और न अपने स्वरूप को सम्यक् रूप ले जान सके तय परम पूज्य भग वान सनक सनन्दन के समीप गए और कहा कि हे भगवन् वह विद्या नहीं जानता जिससे कि मन का सम्पूर्ण दु ख मिट जाय, जिसके उत्तर में उन महात्मा ने उन्हें ब्रह्म विद्या का उपदेश किया। दुःख का मिटना ही आनन्द का उद्य होना है दुःख भीतर है न कि बाहर, अर्थात् यावत् दुख और दारिद्रय है वह मन ही में निवास करते हैं, जिसको कि शानियों ने देखा कि ये विषयों की प्रासि से नहीं जा सकते हैं । विना दुख के नाश हुए सुख कहाँ ? इससे शानियों ने ब्रह्म विद्या की पान वश्यकता देखी, क्योंकि यही एक विद्या है जिसको प्राप्त कर
आनन्द
-
यह मन सदा के लिए यावत् दुःखों से निर्मुक्त हो शाश्वत
आनन्द का भोका हो सकता है।
शानीजन उस सुप को सुख नहीं कहेंगे कि जिसका परि-
पाम दुखदाई हो। विषयों के सुप के पश्चात् तथाच अनेक
ऐहिक सपत्तियों के संग्रह के अनन्तर मनुष्य, शरीर और मन
से दुखी और चिन्तित हो जाता है और कभी कभी तो यह
अवस्था अनेक जन्म तक उसकासाथ नहीं छोडती, श्रत धानी-
जन कहते है कि थोडा सुख और बदले में उसके अधिक दुख
का सग्रह करना उचित नहीं है। हम ऐसा मुख नहीं भोगना
चाहते जिसके बदले में हमें मानसिक शारीरिक या अनेक
जन्म रूपी बन्धन के दुःख भोगने पडें ।
इसी से ज्ञानीजन जव इस ससार के सुख और उसके
परिणाम को विचारते है तो उसकी अवस्था उस दार्शनिक सी
हो जाती है जिसने जर देखा कि उसके समक्ष भोजन के
अखिल सामान चुन दिये गए और सब के मुंह में पानी आने
लगा कि-कब इस सुस्वादु' भोजन को हमारी रसना देवी
आस्वादन कर कृतार्थ होगी, रोने लगा और लोगों से पूछे जाने
पर-उत्तर दिया,कि जर इन अमीरी गरिष्ट विदाही खाद्यों को
आप लोग यथेष्ट भोजन कीजियेगा तो आप लोग सुखी होने
के बदले दुसी हो जाइयेगा, इन खानी में अनेक रोग छिपे हुए
हैं जो आपको दौड कर पकड लेंगे, क्योकि यदि एक खाने में
गठिया तो दूसरे में वायु शूल उपजाने घाला अश है, यदि यह
विशुचिका उपजाने वाला यश है, तो दूसरी घस्तु खासी और
जुकाम को जारी करने वाली है, अर्थात् अमीरी खाने से रूपा
सूना साना सदा निरोग और सुनी रपने वाला होता है । वैसे
ही स्पर्शज मुरत अर्थात् इन्द्रिय जनित भुप परम ललचायने
साहित्य-दृदय भावनायें सात्विक आनन्द के विषय में हुआ करतो, और सब के हृदय को ऐसी फंपा देती है कि वे इस देश की इच्छा और कामना भूल से भी नहीं करते। इन सब प्रश्नों को यद्यपि वेदान्त और सांप्य ने भलीभाँति सिद्ध कर दिया है कि यह श्रात्मा विषयों के संग्रह बिना भी परम सुखी और ऐसा सन्तुष्ट रह सकती है जो विपयों द्वारा कदापि सम्भव नहीं, पर उनकी बातों के सुनने वा समझने को. यह मन कभी नहीं चाहता। यद्यपि इन शास्त्रों ने उस सात्विक देश की प्रशसा कर चाहा किभूले हुए विप्रय जगल में भरमने से ध्वस्त और कान्त लोग इस श्रात्मा रूपी महातरु की छाया का आश्रय ले स्वस्थ हों। अपने भूले हुए घर यानी अपने चैतन्य रूप में स्थित हो शाश्वत सुख के भोक्ता हों। पर इस माया के. प्रत्यक्ष लुभादने दृश्य से मोहित सामान्यजन उनसे लाख सम- माये और जगाये जाने पर भी कुछ शान लाभ नहीं कर सके। भगवान नारद ने जब देखा कि सकल शास्त्रों के अध्ययन कर जाने पर भी इस दरिद्र मन का दारिद्रय नहीं गया और न अपने सरूप को सम्यक रूप से जान सके तब परम पूज्य भग- वान सनक सनन्दन के समीप गए और कहा कि हे भगवन् . यह विद्या नहीं जानता जिससे कि मन का सम्पूर्ण दुख मिट जाय, जिसके उत्तर में उन महात्मा ने उन्हें ब्रह्म विद्या का उपदेश किया। दुप का मिटना ही आनन्द का उदय होना है दुःख भीतर है न कि बाहर, अर्थात् यावत् दुःख और दारिद्रय है वह मन ही में निवास करते हैं, जिसको कि शानियों ने देखा कि ये विषयों की प्राप्ति से नहीं जा सकते हैं । विना दुख के नाश हुए सुख कहाँ ? इससे शानियों ने ब्रह्म विद्या की श्रा- वश्यकता देखी, क्योंकि यही एक विद्या है जिसको प्राप्त कर
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आनन्द
१७५
यह मन सदा के लिए यावत् दुःखों से निमुक्त हो शाश्वत
आनन्द का मोका हो सकता है
झानीजन उस सुप को सुप नहीं कहेंगे कि जिसकर परि-
पाम दुखदाई हो । विषयो के सुख के पश्चात् तथाच अनेक
पेदिक सपत्तियों के संग्रह के अनन्तर मनुष्य, शरीर और मन
से दुखी और चिन्तित हो जाता है और कभी कभी तो यह
अवस्था अनेक जन्म तक उसकासाथ नहीं छोडती, अतःधानी-
जन कहते है कि थोडा सुख और बदले में उसके अधिक दुःख
का सग्रह करना उचित नहीं है। हम ऐसा सुख नही भोगना
चाहते जिसके बदले में हमें मानसिक शारीरिक या अनेक
अन्न रूपी वन्धन के दुःख भोगने पड़ें।
इसी से ज्ञानीजन जब इस ससार के सुख और उसके
परिणाम को विचारते हैं तो उसकी अवस्था उस दार्शनिक सी
हो जाती है जिसने जर देखा कि उसके समक्ष भोजन के
अखिल सामान चुन दिये गए और सब के मुंह में पानी आने
लगा कि कब इस सुस्वादु' भोजन को हमारी रसना देवी
आस्वादन कर कृतार्थ होंगी, रोने लगा और लोगों से पूछे जाने
पर उत्तर दिया कि जब इन अमीरी गरिष्ट विदाही खाद्यों को
आप लोग यथेष्ट भोजन कीजियेगा तो आप लोग मुखी होने
के बदले दुसी हो जाइयेगा, इन खानों में अनेक रोग छिपे हुए
हैं जो आपको दौड कर पकड लेंगे, क्योकि यदि एक खाने में
गठिया तो दूसरे में वायु शूल उपजाने वाला अश है, यदि यह
विशूचिका उपजाने वाला अश है, तो दूसरी घस्तु खासी और
जुकाम को जारी करने वाली है, अर्थात् अमीरी खाने से रूखा
सूखा खाना सदा निरोग और सुपी रखने वाला होता है। वैसे
ही स्पर्शज सुन अर्थात् इन्द्रिय जनित मुख परम ललचायने
साहित्य-हृदय
रुप धारण करते, जिसके पा जाने पर हम सब कदाचित् परम
सुखी होने से अनुमित होते, परन्तु विवेक बुद्धि से देखने पर
उक्त दार्शनिक की सी श्रवथा हो जायगी जिसने तत्वत. मान
होने के कारण सय का परित्याग कर दिया। इसी से ज्ञानीजन
केवल उन सुखों का अनुभव करते हैं जो शास्त्र विहित दोनों
लोक में श्रानन्ददायक होते हैं, आदि में चाहे वे कुछ, कड़ए
और कष्टदायी क्यों न प्रतीत हों।
सारांश यह कि अविद्या और मोह से विक्षिप्त मनुष्य को
कृष्णा ई क्रोधादि की बटुल ज्वाला में जलने से कदापि
शाश्वत आनन्द लाभ नहीं सम्भव है। विपय तृष्णा में पडे पडे
मूढ मृग सदृश पिपासाकुलित इतस्ततः भ्रमण से कभी सतोष
नहीं आ सकता। क्या विपय माया वा ससार किसी को पूर्ण
आनन्द के सिंहासन पर सदा के लिए चैठा सका है? क्या
जड के संग्रह करने से चेतन को कुछ लामहो सकता है ? क्या
मोह के इस निविड अन्धकार में पड़े रहने से सत्य वस्तु का
मात हो सकता है ? कभी नहीं । इससे यदि आप सदा के लिये
सुखी और श्रानन्द के मासाद पर स्थित हुश्रा चाहे तो उस
परमात्मा जगदाधार ईश्वर के शरण जाइये । तभी आप उनके
दर्शन महोत्सव को प्रति दिन अनुभवकर कृत कृत्य हो इस
माया के अपार अन्धकार को सहज में पार कर अानन्दमय
उज्वल देश में निवास कर सकेंगे अन्यथा कदापि नहीं।
भगवद्वान्य है-
मरमसादात्परी शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ।
.
W
३ श्री शीतलगज की द्वितीय जन्माष्टमी ܀ ܢ न्तों के परित्राता, दीनों के दाता, अहकारियों के शात्ता, प्रमादियों को सद्य महा मागाजल में स इयो प्राण लेने वाले, भकों के पास प्रत्यक्ष पोडपकलावाले प्रम के साकार रूप, कुन्जा से सम्बन्ध कर गोपिका पृन्द के मन में देष दावानल मडका,- यसी की सुरीली धारा से शान्त कर पुनरपि प्रेम वीज धारोपण करनेवाले, राधिका चन्दन तरु का प्यारा कृष्ण नाग, उप- निषद् कामधेनुओं का एकमेव दोग्धा और उसके दुग्ध को अपने भक्तवत्सोको पिनानेवाले, प्रेम और भक्ति से अर्पण शिवे जाने पर.पाण्डेय जी के परिपक्व श्रम को स्वयम् ,साक्षात् रूप से भोजन कर यशोदा जी और पाण्डेय को विस्मित करने पाले अध्यक्त, शौर अकर्मा होते हुए भी व्यक्त हो अनेक लीलाबों के करने वाले, प्रेमी होते हुये भी यडे बडे राजाओं को चराने वाले, मनमाणी होते हुये भी वन देवता नहीं, फूर अकर के साथ रहते हुये भी अफर, चीर हरण-फरते हुये भोटु शासन तही, गिरिधर होते हुये भी शेष नहीं,- नाग को नचाते हुए भी संपर नहीं, बलवीर होते हुए भी प्रमादी नहीं, गोपाल होते हुएगो विश्वपाल, माला पूतना के स्तन फे दुग्ध को पीते इसे २ साहित्य-हृदय - भी परम पावन, श्रामीर नन्द नन्दन कहाते हुये भी क्षत्रिय कुमार, तेजस्वी होते हुए भी प्रिय दर्शन, चक्रधर होते हुए भी शिशुपाल हन्ता, घनश्याम होते हुए भी श्यामघन नहीं, कामोद्वेग कराने वाली सरस सुरीली घसी की तानों को सुना शान्तता के स्वरूप, योगिराज, त्रिपुरारि भगवान शकर की समाधि को छुडाने वाले, भगवान् नारद की मधुर वीणा को मौन करने वाले शोर सुरलोक के सुरों को अपने महा विरह के सन्ताप में छोड गोपिकाओं के हृदय को प्रफुल्ल करनेवाले, प्यारी राधा केतकी का प्यारा सुरीला मधुकर, पराक्रम में शिव से, ज्ञान में सनक- सनन्दन से, धैर्य में शेर से, दया में वरुण से, शानन्द जिनकी आत्मा में न कि विषय में, दरिद्रता दरिद्रता ही की, लाञ्छन भृगु लात में न कि चरित्र में, मोह प्रेम ले न कि अयुक्त कर्म से, भय चित्र में न कि चरित्र में, यदि ब्रज के लिये कलानिधि सा शीतल, तो कस के अर्थ धूम्र केतु सा कराल, यदि बरसाने का सहृदय दुलहा तो नन्दगांव का नटखट अहीर, यदि यशोदा के अर्थ प्रिय चालक तो राक्षस दल के लिये दावानल उपजाने घाला स्फुलिङ्ग, यदि गोपिका हृदय सरोवर का कलहस, तो भगवती राधिका के एक ही प्रिय अनुचर, कालीदह में कूदनेवाले, गोपिकाओं से प्रेम रार मचा ब्रज को सनाथ करने वाले, हम सब के जीवन दाता और प्रत्यक्ष प्राण,प्यारे श्रीकृष्ण- चन्द्र ने हम सबों के यहाँ पन्द्रह दिन के लिये अतिथि रूप से आकर इस परिवार और सारे घर को कृत कृत्य और संजीव कर, पुनरपि द्वापरयुग के सुखों का अनुभव कराया। अबकी बार यद्यपि घनश्याम आये पर काले धन न पाये । यद्यपि मुरलीधर ने वसी टेरी पर मेधों ने आकाश में स्निग्ध गम्भीर गर्जन के मिस अपने यहॉ मृदङ्ग नहीं यजाया । यद्यपि . । F
श्री शीतलगज की द्वितीय जन्माष्टमी
दामिनी सी दमकती भगवती राधिका पधारी परन्तु दुष्टा
दामिनी श्राकाश से उनके पैरों को चूमने नआई । ठाकुरजी से
यह उलहना इसलिये दिया गया कि यदि इन सब देवताओं
को बेरहमी या प्रजा की नादानी या चाहे जो कुछ हो-जिससे
कि अमर्पण रहा और नादान मेघ कलियुग के कहने में फंस
ठाकुरजी की सेवा में नहीं उपस्थित हुये, इसका उलहना
यदि इन से न दिया जाय तो किस से, वडों की शिकायत
यदि वडों सेन को जाय तो किस लें। पर शास्त्र कहता है कि
घर आये अतिथि से यो अनेक उलहने और झगटे की बातें
कहनी श्रातिथेय के विरुद्ध है। किन्तु अपने अतिथि भी ऐसे है
कि जिनसे कहना और न कहना दोनों तुल्य है, क्योकि वे
दोनों ही जानते हैं।
आज जन्माष्टमी है। बारह बज गये हैं । लम्बे लम्बे काले
बादलों से श्राकाश आच्छादित है । अधेरी राक्षसी ने सारे
जगत को अपने उदर में रख लिया है और मारे ईर्षा के एक
पत्ती भी दिखलाना नहीं चाहती । घायुयद्यपि देवता है, पर इस
समय वह भीमनादकारी राक्षससा लखाई पड़ता है। ऐसे समय
हम भक्ति भावना के तीन चञ्चल तुरन पर आरूढ हा कस के
द्वार पर खडे है। ज्योही देदीप्यमान श्रद्धन अपूर्व चालक ने
यसुमती के अखिल पुण्य, फस के दुर्भाग्य और देवताओं के
परम सौभाग्य से, इस मर्त्यलोक को स्वर्ग किया, मैंने देखा
कि जितने पहरुये थे वे ऐसी गाढ निद्रा में निद्रित से हो गये,
मानो ये निद्रा का स्वम देख रहे हैं । जो जहाँथा जड सा खडा
रह गया, पर काष्ठ और लौह के वृहत् कपाट ऐसे चैतन्य हो
गये कि अपने अन्तर कपाट को खोल दिया। मेघ ने अपनी
महती घोषणा से मानो इस महा पुरुष के आने की सलामी
.
१ . ठाकुर को तू अपनी गोद में लिये है, इन्हीं से तो समुद्र, नदी निधिन्त यमुना जो में घुसपड़े पर तोमी जैसी मनुष्य की बुद्धि १८० साहित्य ढदय पागो । विद्युल्लता मारे ग्रानोद क मीराबाई सी नम में नाचने । लगो।।दियों के मिस देवता लोग पुग्प वर्षा करने लगे। प्रकाण्ड बुड्) शरीर वाले दिगपाल और महर्षिगण मगल पाठ करने लगे और यह अशान्त मर्त्य लोक क्षण के लिय शान्त हो गया । बमुमती तो तृणों के मिस मारे आनन्द फे रोमाञ्चित' हो गई। अशाप्त झझट मचाने वाला, बकवादी वायु भी शान्त हो गया। ऐसे मगल में विस्मित वसुदेव ने देखा कि उनके हाय की हथकडी और पैर की वेडियाँ उन्हें छोड, सजन सो, जा अलग पृथ्वी पर पडी है जिससे उन्हें यह निश्चय प्रतीत हुआ कि मार्ग में हमको इस बालक को नन्द के घर पहुंचाने में कोई आपत्ति न पडेगी। यह समझ, दुखीदेवको से लउके को ले वे नन्द गाँव की ओर चले । यद्यपि रात अँधेरो थी.पर पसुदेव ने देखा कि जिस ओर वे जातेह उस बालक की कृपा से अधेरो भी उजेलो हुई जाती है। उधर लोमडी श्रागे भागे मार्ग दिखाती जाती है और अनुकुल पवन शीघ्र गमन की प्रेरणा करता।कारी पेपर बैठ येठेउन्हें मगल गीत सुनाती और टिटिहिरो मारे प्रसन्नता के खिलाखिलाती पर लजीली औरतों सा कुछ कह न समतो; इस भाँति जब वे उत्तुङ्ग तरङ्गो से लहराती फालिटी के तट पर पहुंचे तो प्राकृतिक मनुष्यों का सा उनका सव साहस छूट गग। जब उन्होंने अपनी आत्मा से सम्मति ली तो वह कहने लगी कि अरे नादान नहीं जानता कि सारे लोक के मद निकलते हैं। तुझे क्या चिन्ता है । फिर क्या था, और - - । है . श्री शीतलगज की हिनीय जम्माष्टमी यमुना जी रडी चाह से मोजें मारती, हर हर करती हुई यदती, पाती थीं ज्या ज्या उटात गये त्यो त्यो पह यढ़ती हो गई और उस पानिधान ने अपने चरणों को उनके भाई भोष्ठों को पवित्र करने के लिये बढ़ाया, जिन्हें चूम कर वह अपने को कृतार्थ और निहालमान, गेसी घट गई कि क्षण भर में चुद्र नदी सो पार करने याग्य हो गई। चकित यसुदेष इस लीला को देश, जान गये कि यमुना क्यों पढ़ती थी भोर मेमने से उचलते वे उस पार पहुँच ही तो गये। यहाँ देखा कि नन्द गाँव ऐसा सो रहा है कि कुत्ते भी कमा छोड़ दिये हैं और वरती उस नायिका सी हो रही थी कि जो सरे शाम से शराब पोते पीते शिथिलगात हो पर्यइ पर बेहोश पडी हो पा जैसे किसी जादूगर ने जादू की छडी अपनी महिला दिखाने के लिये इस गाँव पर फेरी होशोर उसके सारे जीव जज से हो गये हों। ऐसे प्रशान्त समग में धसुदेव, धामा नन्द के घर पहुंचे। वहाँ भी देखा कि नन्द के घर के कपाट खुले हुए थे, मनुष्य वेधडक सो रहे थे, कोई रोकने घाला. नहीं, शघ्र ही अपनी सकल सम्पत्ति को साभु यशोदा की गोद में साप और भगवती को काला कला को अपनी गाद में ले कस के द्वार पर सिंधारे । परन्तु मैं तो उनका साथन देकर नन्द गाँव ही में रह गया। थोडे ही काल के पश्चात् नन्द का गृद दिन सा जागृत हो गया घावा नन्द मारे उत्साह के कुदने लागे । यशोदा तो अपने घध्ये को शोमा देय प्रानन्दाधु से श्राप्तापित हो गई। नौरत, घहरने लगी, मानो सुरलोक की सम्पत्ति मत्यलोक में मा यसने का समाचार मारे अहकार के वसुमती नौषत मिस भरलोक को भेजती है, अथवा राक्षस कुलों को भव भी थैवम्ब .
साहित्य-हृदय - होने का प्रिय सन्देश देती, या यो कहिए कि नन्द गाँव स्वयम् नौवत के मिस गाने लगा। सुनते ही सुर लोक से सुर लोग भूलोक के महोत्सव को देखने चले । भक्तों के मौलिमुकुट, प्रेम की पवित्र नदी में सदा निमजन करने वाले, एक घर से दूसरे घर में बिना पूछे समाचार पहुंचाने वाले भगवान् नारद तो मारे आनन्द के सारी रात आकाश में घीणा बजाते, और नर्तन करते ही रह गये। इस पुण्य अवसर पर सप्त ऋषियों ने व्योम में वेद पाठ किया। जव योगियों की प्राणप्यारी, वर्ण में भगवती राधिका सी, शान्तता में भगवती पार्वती सी, सदा सतयुग में निनास करने वाली, शकुन्तलासी रसीली सुन्दरी ऊपा भग- वान् की अदृष्ट मगल आरती साज चुकी, तो कैलाश निवासी आशुतोष, योगिराज, भगवान् शकर आज प्रातः काल ही अपने प्रकाण्ड व्यान धर्म को लपेट, भयङ्कर तथापि रूपवान सौ से अपने जटाजूट को वॉध, इन सा सारे शरीर में बड़े शौक से भस्म लगाए, हाथ में शृङ्ग ले, कैलाश छोड, भगवान का दर्शन भिक्षा मांगने को नन्द के घर आ पडे हुए । यशोदानन्द के पैरों पर पड़ रही है कि ये ऐसे विकराल स्वरूपाचाले तपस्वी के समक्ष बच्चे को न ले जायें। जिसके उत्तर में नन्द कहते हैं कि ये तो प्रत्यक्ष शकर से दीयते हैं। अन्तत नन्द के बहुत हद करने पर उस देदीप्यमान, तेजस्वी बच्चे का दर्शन भगवान शकर को प्राप्त हुआ. लेकिन भगवान् शकर को गोपिकाओं ने सैकडों भिड़कियों और अनेक अनकहनी चाते मार्ग में सुनाई कि ऐसे समय पर ऐसा भव्य दर्शन देने का प्रात:काल ही पया प्रयोजन था। यदि शिव होते तो उन्हें कैलाश छोउने यो क्या आवश्यकता थी। 'भगवान शकर के जाने के पश्चात् मैने देखा कि हर गाँव , -- ॥
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श्री शीतलगज को द्वितीय जन्माष्टमी
से, हर घर से, हर कुटी से गोपिकायें भगवान को मगल
भारती साजे चली भा रही है मानों नूतन प्रभाकर को,
सोनहरी किरणे व्यक्त रूप में आकाश से पूजा करने चली या
रही हैं। वे अपनी सुहावनी मगलाचार की गीता द्वारा वायु से
कहती, कि तू खर्ग में यह सदेश कह दे, कि यदि देवता वर्ग
अपना जीवन सफल करना चाहे तो आज इस अपूर्व मग
लोत्सव का दर्शन करें। उनके पाजेब कडे और छडे की झनकार
से शान्त मन बैठा हुआ सारस भी तडाग में कुटो लगा। घोडे
काल के पश्चात् नन्द का घर गोपिका से भर गया। नन्दः
और यशोदा यह नहीं जानते थे कि कौनसी ऐसी प्रिय घस्तु हे
जो उन्हें न दे दें। अाज ऐसा उत्साह और मगलमय प्रात काल
की बज ने नहीं देता था। ऐसी पूर्व मगलमय लीला और
भगवान् के अपूर्व जन्मोत्सव को भगवती भक्ति देवी की कृपा
से देख, में प्रसन्न मन घर के ठाकुर जी की मगल आरती
साजने को लौट पड़ा।
अब की बार ठाकुर जी के पधारने से यह निधय हो
गया कि भक्ति योग से और अधिक सरल तथा प्यारा दूसरा
योग नहीं है। क्योंकि जिस दिन से घर में ठाकुर जी पधारे
छोटा बडा सर उनके आतिथ्य और मेहमानदारी में तत्पर
था। कोई अनेक प्रकार के पुप्पों के भॉति भाँति फेधाभूपण रचने
में अस्तव्यस्त रहता तो कोई चित्र विचित्र साखा मालायें
बनाने में मालकारों के भी कान काटते। यदि कोई उनके पालने
को नित्य नये धज से सजाने तथा च भृक्षार करने का काम
करता, तो फोरम ने उन्हें अनेक अद्भुत अभिनयो के दिखाने
का महामार अपने सिर पर लिया। इन दिनों जिस ओर आप
घर में जारये उस पोर ठाकुर जो ही को यात हा पडेगी। यह
'साहित्य उदय केसर की पौर ऐसी जान पडती माना सारे शास्त्रों का व्यक्त था अव्यक्त प्रवाह है। मकराहत्त कुण्डल झानों में ऐसा सोहता मानों दिशाओं की सफल सम्पत्ति यहीं लटक रही है। कविजन कहते हैं कि जब कामदेव ने देखा कि सारे रूप की सम्पत्ति और खानि इसी और श्रा वसी है तो लजित हो अपना मकर फेतु इन्हीं को दे दिया था गोप कामिनियॉजोभगवान् के हृदय मै निरन्तर वस रही है, मकराकृत फुण्डल के मिस अपने सारे श्राभरण को बाहर छोड भीतर प्रवेश कर गई है कि जिनकी रक्षा वाल रूपी व्याल सतत कर रहे है । माया केली उलझाने घाली है, पर तौभी फैसी प्रिय है, इसके प्रत्यक्ष दृष्टान्त भगवान् के घुघर वाले वाल है । कहते है कि जय प्रकृति भगवान के इस शुम शरीर को रच चुकी, तो देखकर अति प्रसन्न हो ठोढी पर एक अँगुली से मार दिया, जिससे कि वह ईपत् इव गई और रूप के सोने का ठौर और चतुत्रों की विश्राम स्थली हो गई । लाल और श्वेत गुखों के गुथे हुए मुकुट पर सहनाक्ष की समता फरने वाले मयूर के पख ऐसे सोहते हे मानों कविता देवी मोर की शॉो मिस शोभा निरखने आई, और गुखों के मिम हॅसती रह गई पर कुछ कहते न बन पडा । करिकलम के शुएड से लम्बे लम्बे हाथों पर मालानों के भुजबन्द ऐसे मले लगते हैं मानों वसुमती ने पुष्प मिस अपने हाथों से मारे प्यार के उन्हें पकड लिया हो। लाल, पीले, श्वेत और अनेक धर्ण के पुप्पो से सजा धजा वक्षस्थल श्राकाश में निकले हुये नक्षत्रों फी मॉति लप पडते या उससे भी अधिक मनोहर फ्योंकि ये पुष्प नाना वर्ण के है । हाथ में केवल वसी है जो किनार एक ही बार मूर्छित फरने में समर्थ है। कहते बंसी कभी बजी थी, न फिर यजेणी - श्री शीतलगज की द्वितीय जन्माष्टमी गोपिकागण और राधिका ऐसी उन्मत्त श्रवसा में हो जाया करती थी कि इस विष भरी चॉसुरी को कभी यजने नहीं देती थीं। और कौन जाने इसीलिये यसी प्राय चुरा ली जाती थी। ऐसे रूपवान् प्रतापवान् महिमावान् भगवान् कृष्ण हमारे नव घनस्पतियों के हिडोरे में विराजमान हैं जिनके वायें, दाक्षिण्य में लक्ष्मी सी, सत् चरित्रता में अनुसूया सी, नयनो की चपलता में चपला सी, रूप में गर्वीलो भगवती रति सी, वर्ण में योस से लिन गुलाब या कमल सरीखी, दारुण चरित्र वाले कृष्ण के साथ रहते हुए भी रसीली, वा कृपण हृदय सरोवर में विचरने घाली मृडालिनी सी, कृष्ण पक्ष में रहते हुए भी रानियों की रानी, जिसके रूप और दाक्षिण्य को देखकर फैलाश में बसने वाली हिमाद्री के शान्त हृदय में भी ईर्ष्या और द्वेप्यों की ऊर्मियों उठने लगी थी, श्याम की विद्युल्लता, यरसाने की द्वितीय चन्द्रिका सी भगनती श्री राधिका पधार कर, सारे विश्व के दुख को हरती है। देखिये सुम्वुल और पताल निम्ब भगवान को गोपिकाओं को भॉति चारों ओर से घेरे हुए हैं और प्रौढ़ा रतिप्रीता' गोपिका सदृश फन लम्बी लम्बी तन्तुओं से लजा और अपने गुरुजनों का भय छोड, सव के सामने ही गाढालिङ्गन कर रही है। मेडिन हेयर (मुम्नुल) मागे लजा के प्रमात यौनना सरीजी इस पृष्ट भाव को देप दुबली हो गई है। सेण्टोनिस विकटेरा घा नयन पत्री सहस्रान सी उनके पैरों को चूम रही है और पिलानियाँ पूतना सी पडी अपने प्राण का दान माँग रही है। इन्हीं वनस्पतियों के बीच में एक कृत्रिम पर्वत से, तम्ये लम्ये शीशों की चट्टानों पर से एक झरना झूमता मामता भगवान के दाहिने बगल में रहने के कारण बड़े अभिमान से झर झर कैसा धन - १८ साहित्य हदय शब्द करता बहता दर्शकों का मन हरता है। विविध शोमध विहार । तीसरे शृङ्गार में प्राचीन काल में दृन्दावन पेलरियों से आच्छादित था जिने नादान भक्तों ने साफ कर हाला इसकी समा दिखलाई जाती है। ऐखो श्राफाश से उतरो हुई मायवो माधव के चरणों को चूम रही है। कृष्ण के रग की समता करने वाली कृष्णकान्ती पुष्प और अपने तन्तुओं की सप्रेम भेट दे मागों यह कह रही है कि देखो तुम्हारे प्रेम में हम भी श्याम हो गई है। श्रावणी ने भगवान के पैरों में अपने रक पुप्पों के मिस इस शुभ अवसर पर महावर लगाया और मन्दार पुष्पो, भक्त रसपान सी, खेलने के लिये श्वेत 'पौर बैंगनी रग के छाटे छोटे प्याले समर्पण कर, अपने जीवन को सफल मान रही है। राधालता ने तो इतना पुष्प और पल्लव दिया कि केले के मन्दिर का पता ही नहीं चलता था क्योंकि उसफी हरियाली सारे मन्दिर को श्यामायमान कर रही थी। विरह सन्ताप से कातर ओर दुर्वल, जिसके पल्लव फेश विखरे हुए अलग अलग झूम रहे हैं, अधगसव के पान हेतु पुष्प मिल अपने श्रोष्ठ पट को खोले हुये, चन्द्रावली सी, श्कचा चुपचाप अनग खडी है, और हरी हरी लम्बी लम्बी शखॉों वालो वे झगडे के भगडनेवाली, कुम्जा प्रौढ़ा नायिका सरीखी, चेतस लता द्वार पर बिना बुलाये हंसती खडी है। अव आपको दिखाना चाहिये कि ठाकुरजी जङ्गल में महल कैसे करते है और यह देवी कोरम अपने असीम प्रेम ओर भक्ति से अभिनयों को कर किस रीति से ऐसे प्रिय पूज्य पाचन अतिथि को प्रसन्न करती है। और फिर भी वह सर्वथा अपने उदय से यही मनाती है कि इस जाल में ऐसे अभिनयों का
श्री शीतलगज की द्वितीय जन्माष्टमी
हो जाना ठाकुरजी की कृपा के अतिरिक और कौन कर
सकता है।
अरर्पण के हेतु दैवी फोरम ने भी, प्रार्थी हो, यही विचारा
कि पहिले दिन इन्द्र सभा की जाय जिसमें कि इन्द्र महाराज
प्रसन्न हो पर ये यह समझ कि यह उत्सव भगवान कृष्ण के
प्रमन्नार्थ हो रहा है, हमारी प्रसन्नता या पूजा के अर्थ नहीं,
इससे रूठे ही रह गये।
दूसरे दिन का अभिनय हिमाकत उल्लाह घेग नाम का था।
जिनको डाढ़ी यद्यपि लम्बी और सफेद थो पर कर्म कृष्ण थे,
शरीर जीर्ण हो गया था पर मन जवान ही था । धर्म करते
पर दम्भ से, न कि शान से । इस अवस्था श्रोर इस श्वेत कुन्तल
पर भी सीरी उसासें लेते न लजाते, और भगवान् कुसुमायुध
से एक पकड लड जाने का दावा रखते थे । यद्यपि उन्हें इश्क
माशूफ के रूप में नित्य झाडू ही मारता पर वे उसको गैल न
छोडते । लडके हिमाकत उल्लाह वेग से बडे प्रसार थे। वे उनकी
हर एक अदा पर हॅसते और खूब शोर मचाते, जब कि हजरते
शक उनकी फजीहत करते थे। और सच तो यह है कि
सारी सभा इस विचिन बुड्ढ़े रसीले नायक से अति प्रसन
हो हँसती रही और कौन जाने नाटक के पश्चात् स्वप्न में भी
द्रष्टागण हंसते ही रहे हो ? यद्यपि इन्होंने सभा को तो प्रसन्न
किया, पर धर्म महाराज रूठे ही रह गये, क्योंकि सत्
चरित्रता उनसे मॅमोड भागी थी। पर चूकि यह शाही दार
है और भगवत् जन्मोत्सव है इससे यह घुलाये गये थे, क्योंकि
इनसे अधिक रसोला और कोई भांड नहीं मिल सकता था।
तीसरे दिन कवियों के मौलिमुकुट, रसिकों को रसशता का
पाठ पढ़ाने वाले, ङ्गर रस के एक ही निपुण चिरफार था
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“साहित्य हृदय
अद्वितीय शुसार फर्ता, मेघ को दूत बनाते हुए भी सहनाद
वा यत नहीं, नाटक लोक रचयिता होते हुए भी, ब्रह्मा नहीं,
ऋगार रस के परमाचार्य होते हुये भी कुसुमायुध नहीं, जिस
की तपोवन में , विहरतो हुई कविता देवी वेश्या वीथी में भी
विचरती थी, ऐसे महानुभाव कालिदास का परम प्रिय नाटक
शकुन्तला खेला गया था। जिसकी नायिका सुकुमारता में
जूही सा, नखरे में उर्वशी सी, दिल लगाने में ज्यूलियट सी,
रसीली दमयन्ती सी, सत्चरित्रता में भगवती अरुन्धती सी,
प्रभा में लक्ष्मी सी, बिना अपराध पति से त्याग किये जाने पर
स्नेहमयी सीता सीथी । यदि गुलाब और कमल ने अपना रंग
सौपा तो मृगी ने वडी वडी श्रॉसों का उपायन दिया, यदि
मालती ने सरसता का पाठ पढाया तो विजातो ने मनोहरता
का, यदि सारसों ने मन्यर गमन सिखलाया था तो खरीटों
ने नैनों की चञ्चलता, यदि सुम्युल ने उसे नम्रता का उपदेश
दिया तो लजावती ने लज्जा और ब्रीडा सिखलाई थी। यह
शकुन्तला सारे वन की सम्पतिथी वा बादशाहजादी थी कि
जिसे सारे धन के जीव और, बनस्पतियों ने भी अपने अपने
श्रपूर्व रूप और गुण का उपायन दिया था कि जिससे.
अरण्य की पाली पोसी अप्सग की बेटी रूप और गुण में
अद्वितीया हो, एक महामहिम महाराजाधिराज के मन के हग्ने
में समर्थ थी।
ज्याही यवनिका उठी और दुष्यन्त हरिन के पोछे पीछे
दोडता हुया, सारथी से अनेक पाते, उस मृग की तीव्रता तथा
अपने रथ के वेग की प्रशसा करता और यह कहता हुआ कि
अब वह मृग को लेही लेना चाहता है, निकला कि दो तपस्वी
जिनके मस्तक जटाजूट से मुसजित और प्रशस्त भाल पर
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श्री शीतलगज की द्वितीय जन्माष्टमी
भस्म विराजमान थी, उस मृग के त्राण करने को दौड़े और
अधीर स्वर से कहा कि हे राजा यह आश्रम का मृग है इसे
मत मारो मत मारो। तुम्हारे बाण र शत्रु के वक्षस्थल को
विदीर्ण करने के योग्य हैं, न कि राई से भी मृदुल इस मृग के
शरीर को। जैसे कि कार रसके भाण्ड, प्रेम की प्रत्यक्ष पान
भूमि वा यावत् युवक जनों के मन को प्रेम की पुनीत नदी में
स्नान कराने वाले, प्रौढ जन के हृदय में पुनरपि प्रेम वीज को
हरित करने वाले, और श्वेत कुन्तलवाले बुड्ढ़ों को भूली प्रेम
को गति स्मरण करानेवाले रोमियो जूलियट का पढना प्रारम्भ
करते वैसे ही-एक परिडत समालोचक का कथन है-हमें
यह समझ पडता है कि मानों किसी दिव्य पुरुप
ने अपनी
कृपा से हमें एकाएक स्वर्ग के परम अद्भुत उद्यान में ले जाकर
बैठा दिया है, वैसे ही आज परदा खुलते ही यह जान पडा
कि मानो कालिदास की दया से इस छोटे से नेपथ्य में
सतयुग आ यसा है। जिसमें धर्मज्ञ राजा और तपस्विनों के
पुण्यप्रद दर्शन हुये, तपोवन के कन्याओं की प्रिय लीलाये
लखाई पटी, जिन लता और वृक्षों को उन्होंने लगाया था
उनमें उनका प्रेम निज परिवार के प्राणी सा झलकता था,
प्राचीन काल में घर आये अतिधि को कैसा चे जती थीं,
इत्यादि प्रत्यक्ष देप चित्त हर्ष से प्राप्तापित हो गया । भगवान्
की असीम दया और अनुराग कवि के परिश्रम से सहस्रों
वा का पुस्तक में बसने वाला विचित्र चित्र पुनरुज्जीधित
सा कर दिया गया था। क्योकि शकुन्तला को अनुराग जी ने
गीत नाट्य रच कर दिखाया। जिसे देख पडित जन कहते थे
कि कालिदासपन किसी कोर से नहीं गया है, पर हम यही
कहेंगे कि यह सब भगवान् कृष्ण की अपार माया है।
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साहित्य सदन
अस्तु, जैसी पुछ प्रिय जन्माष्टमी हमारे कन्हैयाजी श्री
शीतलगज में किया करते हैं और जिस भॉति इस छोटी सी
कोरम और इल परिवार को अपना दास बना डाला है, वह
कदाचित् श्रन्यत्र दुर्लभ है । जब यह परमात्मा चाहता है तब
योही जगल में मंगल किया करता है। पर हम सब सच्चे दास
और भक्त हो उसपर पूर्ण रूप से निर्भर नहीं करते नहीं तो वह
अवश्य नित्य हो नये मगल और उत्लव दिखाया करे।
लखनऊ
कल लोक को अपने पराक्रम से पराजय
करने वाला, अरस्तू के शिष्य विषयक मनो-
फामना का पूर्ण पादप, जिसका पताका
पराजय व्यभिचार की लजा से कुलवधू
सरीखा सिकुड फर कभी लोक में हास्या.
स्पद नहीं हुश्रा, ऐसा विश्व विजयी सि.
कन्दर का यह प्रयत कि सारा विश्व यथेन्स सा पण्डित,
विद्वान दार्शनिक, तथा सव फलाओं में कुशल हो जाय,
नहीं हो सका, परन्तु रसिको के मोलि मुकुट, कलियुग के
ययाति, काम के एक ही सुपुत्र, नारद से सङ्गीतप्रिय, द्रौपदी
से मृत्य में कुशल, पात्सायन से काम कला के विद्वान्, और
उनके सूरों के हाफिज, चेपरवाही जिनके दामनों में लटकती
घूमती, भगवान् फन्दपं जिनके हृदय देहली में वसते, श्राखें
"उन्मत्त भ्रमर सा सदा अमल कामनियो के कमलानन यन में
विहार करतीं, और जिनके कर्ण रात दिन अनेक सहीत सरि-
ताओं को समुद्र सा पीते हुए भी नहीं अघाते, रूप-राशि
समुद्र के सुप्रसिद्ध मकर, अगस्त्य सा रस समुद्र पीकर भी,
चाह बडवानल जिग्रमा शान्त हुआ, नल नील समान
साहित्य-हृदय - सुमुखियों का सेतु बांधने वाने, इन्द्र से मत्र्य लोक में इन सभा करनेवाले, सजनता और भक्ति के निधान, योगियों से ग्रीण में जलशयन करने वाले, कामिनी कमल धन के ब्रह्मा स्वैरिणी मधु मक्खियों के भृगराज, क्षमा में ईसा के तुल्य कामकला के त्रिभुवन विजयी, उदारता में समुद्रसे,क्रोध जिन कभी स्चम में भी नहीं हुश्रा , एपीक्यूरस और चार वाक के भी शिक्षा देनेवाले, नवाप घाजिदशालीशाह की यह मनोकामन कि सारा अवध और लखनऊ के मनुष्य सभ्य, सुशील और सङ्गीत प्रिय हो जायें, अइनिश प्रेम की विविध गूढ़ अन्धियं को सुरझाया करें, निश्चय एक एक कर सफलीभूत हुई। इंगलैंण्ड की गोर कुटियों में चाहे भगवान् कन्दन न विचरते हो, पर लखनऊ के तो हर गलियो में बह देख पडते हैं। दाक्षिण्य, चतुराई और नसरों में यहॉ की माशय स्वर्गीय माशको को भी लजा देती है क्योंकि इन विपयों का पाठ यदि अप्सरा भी प्रावें तो उन्हें भी ये पढा देने में समर्थ है । सकल लोक विमोहिनी भगवती सगीत देवी, यदि कहीं बसती ह तो यहीं। यदि 'मुर्ग विसमिल' की लीला निर- खना चाहते हो तो यहीं देख सकते हो, मजनू सा अपने प्रिय- तमा का नाम ले ले थाह भरते हुए, धूलि धूसरित केश किए दीवाने नाशिक यदि कहीं देख पडते हे तो लखनऊ में । यदि प्रेम ने मूर्छित टोवाने दिलों का भी सरकार मान वा पूजा कहीं होती तो इसी नगरी में, यदि मनुष्य कहीं भी बिना दाम कौडी के सारे जीवन के लिए गुलामी का पट्टा लिखाते है, तो लखनऊ में। माशूको की जूतियाँ, लात और डण्डे पाकर भी उनके शरीर के कल्याणार्थ मसजिद और मन्दिर में दोनाएँ और मन्नत मानते हैं तो यहां के लोग । यदि गम गलती की न लखनऊ १६५ , , गोल कहीं भी देख पडती है तो यहीं, और यदि पुराने जमाने के ऐतिहासिक अलहदी कहीं भी पाये जाते है तो यही । यदि प्रेम पादरों कहीं भी घर घर शिक्षा देता है तो लपनऊ में। अफीम खाने में चीन को मान करने वाले, विपय परायणता में पेरिस को भी लजाने वाले, मट्टी के खिलोने वना यूरप की कारीगरी को ट्रेप उत्पन्न कराने वाले, और सिर्फ मुहर्रम के मातम के मनाने में इगलेण्ड की साल भर की सजीदगी और शान्तता को भी हरानेवाले, जहाँ शास्त्रों के प्राचार्य स्वैरिणी और बार यधू मानी जाती, न कि पण्डित मोलवी वा प्रोफेसर, शास्त्रों के विविध गूढ अर्थ उनके कटाक्षो में, परिकार उनकी मन्दस्मित में, स्वर्ग और ब्रह्म लोक का सुन उनकी कृपा में और विज्ञान, फाम कला में, मानते।जहाँ कावा, मसजिद वा मन्दिर प्रियतमाओं का गृह माना जाता, जहाँ दिल का सौदा होता न कि अर्थ का, जहाँ नेन दलाली करते न कि दुलाल, विपत्ति वा दुख माशूकों के रूठने में माना जाता, भौहें फमान का काम करती , घरौनी माला सी चुमती और तीसी तिरछी निगाहों का सामना तेज तलवार का सामना समझा जाता , जहाँ कुसुमायुध की कथा सुनी जाती, न कि सत्यनाराण की , यदि किसी की पूजा अर्चना की जाती तो मासको की, जहाँ के लोगों की अहर्निश या अफीम के पीनक से उन्मीलित हुश्रा करतीं, न कि योग निद्रा से, अत्यन्त कृपित और दुर्वल तनु, विषय परायणता से, न कि नप से, मुख में बटेर घसती न कि राम चा रहीम, हाथ में सुमिरनी फेशन के लिए रहती न कि भजन के अर्थ, सभ्यता चित्रों में, अश्लील भापण भाड या शहदों में, तोडों की झनकार नृत्य में न फि द्रव्य में, अहयार और औदार्य मा.
साहित्य-हृदय तिथ्य में, देखे जाते । निदान-यह सुशबू जो हमारे रसीले नवाब ने फैलाना चाहा था वह अब तक विधि की दया से सारे श्रबध में वर्तमान है। बनुमतो को अपने वचन पवन की अद्भुत शक्ति से पुष्पों मिस स्मित कराने वाला प्यारा वसन्त, यदि कहीं अपने सारे समाज से आता देख पडता हे तो लक्ष्मणपुर में । कविजनो ने इसे मारे प्यार के पुष्पों की नगरी वा रानी फहा है । ऋतुराज कैसे इस प्यारी नगरी में घसन्तोत्सव मनाता है, यदि देखना चाहते हे तो बनारसी याग (विनफोल्ड पाक ) में जाइये। घसुमती को कवियों ने क्यों रक्षगर्मा कहा है, तथाच घह कैसे सब रूपवानों और विविध दणों को अपने प्रसून मिस खजाती है, इसका उदाहरण प्रत्यक्ष देखने में आ सकता है। पहा के संगमरमर की चारहदरी नव युवतियों सी मानो अपने रूप से समय देव को ऐसा मोहित कर दिये है कि वह अद्यापि इसके रूप को न लूट सफा या ऐसा कहें कि 'पुष्प सुन्दरियों के निरन्तर देखने से दिल जो जवान रहा तो शरीर भी जीर्ण न हुआ, इससे अब भी बीच पार्क में यूरपियन प्रौढ़ा कामिनी सी स्थित है, जिस पर आप यदि खस्य सुमनस्क मा चैठिये तो भगवान कुसुमायुध के अनेक कुसुम लीला महारास को सहज ही में देख सकते है । वा कौन जाने यही रसीले माननीय जनार वाजिद अली शाह की पान, भूमि ही रही हो। उक्त बारहदरी के चारो ओर फूलों के तख्ते, साने जाते है जो सत्यत. चार लोक वा पुप्पों की चित्रकारी हैं व फलों में माला- कार की कविता है वा समुसती की सांभी की सजावट है। इन विलायती घसन्त के पुष्पों को निरख के यद्यपि मैं इनके रूप का कुछ साधारण उपासक नहीं, पर जैसी मनुष्य की, प्रकृति , भ लखनऊ होती है कि यह अप्सर अपगुणों पर ध्यान देता है, जो यफोल ब्लाको के सदा ऊपर ही रहता है, किन्तु इन पसन्त के पुष्पों के महत रूप सम्मति का देव प्रायः विधि को उलहना दिया करता कि उसने ऐसे रूपवानों को गन्ध गुणों से वञ्चित कर मधुकरों से क्यों अपमान का भाजन कराया, कभी इन्हें अपठित' रूपवार धनाढ्य कहता, कभी रूपवती कुलटा कामिनी, जिनमें कि सत्चरित्रता काश्रामोद नहीं, कभी नवनीत ती कोमलाझी यवनीयो से समता देता जिन पर चाहे श्राप लाख दिल से निद्यावर इजिये पर उनमें प्रेमश्रामोद कीरसमजरीन पाइयेगा, कभी ज्ञान शून्य अन्त करण से, जिसमें भगवत् भक्ति की सुगन्धि नहीं है, उससे समता देता, कभी कभी हँसी में यह भी कह देते कि ये यूरप के मनुष्य सरीसे हैं जो रूपवान हैं धनी हे पर ईश्वर परिचर्या वा भक्ति प्रिय श्रामोद से नितान्त वंचित है। सिकन्दर बाग में यद्यपि बसन्त उस तैयारी से तो नहीं आता पर इससे कि यहाँ एक वृक्षों का फुज है जिसमें श्राप घटों टहलते रहिए पर सूर्य की किरणे श्राप को न सतायेंगो, इससे मिलटन की तरह यह प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं होती कि “हे भगवान् सहन रश्मि जर श्राप सुन्दरी प्राची के पार्श्व' को अनुग्अन करें तो सूबसूरत बादल रूमाल से मुंह ढापे हुए दिखाई पडें"। जिसमें मिलटन के प्रकृति अध्ययन में बाधा न पडे । इसके धामपार्श्व में हरित दूर्वा नदी परिखा से युक्त पामवृत रूपी पुत्र पोत्रों से भाग्यशाली शाहनजफ़ सेको घर्ष घाले फकीर की भाँति श्वेत कुन्तल सयुक्त, समय पर परिहास करता हुन्ना, स्थित है। चिमोरिया पार्फ जो चौक के सनिकट है एक हन्ति मागर साहित्य हृदय सरीखा है जिसके ऊँचे नीचे असमधरातल उसकी लहरों सा प्रतीत होता है और कहीं कहीं उसके वीच वृक्ष पालवन्द नौका से सुहाते । यह प्रशस्त लम्बा चौडा हरित दूर्वा का क्षेत्र पुनीत तपोवन सा है जिसके वीच वीच में चार चार छ. छः श्राठ पाठ डेट पाम के समूह मानें तपस्वियों के वृन्द से है जो विहङ्गमों के अनेक गाने मिस स्वाध्याय कर रहे हैं । वा यह कहिए कि मरकतमणि की भूमि है जिसकी रक्षा करने के हेतु, ये सब चाक चौवन्द पहरूदार सरीये चारो श्रोर खडे है और कोयल पपीहो के निरन्तर कूज ने मिस सब को उस पर चलने से मानो वारण से करते हैं। प्रकृति कैसी मुहावनी है, इसको विक्टोरिया पार्क प्रत्यक्ष सा करता है और यह भी प्रमाणित करता है कि चारचाक का चेला चौक कितना गहित और त्याज्य है। जितनी देर कि श्राप चौक में नजारेबाजी के लिए घूमते वा शौक से चहल- कदमी करते है या लखनऊ शाम को कैसा बना ठना है यह देखने उसकी वीथियों में विचर रहे हैं और हरेक श्वास में धूलि और धूम्र को छान के पीते पीते ध्वस्त हो गए, और आँखें कडुवाने लगी पर तृष्णा यही कहती कि कौन जाने कि किसी सुन्दरी का अपूर्व दर्शन हो जाय जिससे जीवन और चनु सफलीभूत हो जायँ, पर सन्तोष और विवेक के समझाने पर ज्योंही चौक से बाहर निकलते हैं तो सहस्रो वनस्पतियों से सुगधित पवन प्रत्यक्ष प्राण दान देने लगता, मन जो कृप माइक सा एक छोटी सी गली में वन्दी कृत था वह श्रय श्राकाश के चारों छोर का अधिपति हुआ, नाम परियों सा आकाश में मुस्कुराते देख पडते, भगवान कलानिधि तो मारे प्यार के उसके हरित लान ( Lorn) पर मानों सोना चाहते हैं । निदान रदि थोड़े में यह करें किचौक में यदि माया विषय
लखनऊ
और अविद्याप्रो की लोला है तो उक्त पार्क में शान्ति और
प्राति के सौन्दर्य का औदार्य है, और ऐसाही अनुभव मनुष्य
को उस समय भी होता है जब वह इस जगत के सुखों से
विरक्त हो, उस निर्मल देश की ओर चढता है तव हरक्षण
जैसे श्राप चौक के पश्चात् विकोरिया पार्क की प्रशान्त मर्मा
स्थली को प्राप्त कर कहते कि जान आ गई, प्राण बच गए,
ठीक वेसाही तो शानी और भक भी कहा करते कि ससार के
लोहे की चको में पिसने से बच गए नौर-विपय तृष्णादि की
गुलामी से छुटकारा मिला, शान्ति उज्वल और पवित्र लोक
में मन रमने लगा।
इसके पार्श्व में अजुमन हाल हे जो अवध के नवायों की
तसवीरों से सुसजित है। इन चिनों को ध्यान पूर्वक देखने
से यह प्रत्यक्ष हो जाता है कि कैसे एक राज्य उन्नति और
सम्पत्ति को प्राप्त कर, धीरे धीरे इन विषय अमीरी-डाइने उन्हें
प्रमादी और खबर चना, राज्य की पदयो से उतार पुन.
प्राकृतिक मनुष्य सा कर देती है । आसफुद्दौला इत्यादि ओ
फैजाबाद और लखनऊ के बसाने वाले है उनके नेत्रों को
देसने ही से त्रास, भय, मान, और प्रतिष्ठा उपजती है उनके
घपु पर ध्यान देने से उनके वीर्य पराक्रम और साहस का
पता चलता है, पर ज्यों ज्यों श्राप नीचे की पीढ़ी के नवायों
को देखिये त्यो त्यो मालूम होता है कि कैसे विषय भालस्य
तन्द्रा और अमीरी धीरे धीरे उन्हें पराजय करती चली गई
मोर जन अन्तिम नघाव घाजियली शाह साइव फोदेखिए, तो
अापका शोक से कहना पडेगा कि अमीरी रोग ने अय अपना
इनपर पूरा अधिकार जमा लिया और शय ये रणश्रम या
धूप में गश्त करने योग्य नहीं रह गए वो फिर यजमार का
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. २०० साहित्य-हदय गल्तर भार इन से कैसे सँमल सकता है । मुगल बादशाह जब तक कि अपने को सिपाही सा रखते थे, और इस शरीर को फेोडे के समान नहीं पालते थे, तब तक जगत को ललचाने वाली दिल्ली के महत् तन पर आरूढ़ थे। पर जव कि वह अपनी राज्य-रानी से न सन्तुष्ट हो आलस्य श्रमीरी और तास्सुब इत्यादि रानियों के चशवर्ती हुए तब से धीरे धीरे उनके हाथ से राज्य लक्ष्मी चली गई। इसके पश्चिम छोर पर हुसेनाधाद अपने हुस्न पर ओर शीशे आलाव रूपी दैवी अद्भुत सम्पत्ति पर उन्नत कन्धर, पर- मात्मा को धन्यवाद देते देते जिसका मस्तक नमाजियों सा काला हो गया है, स्थित है। वह देखिये विकोरिया टावर अपने चतुर्दिक देखता हुआ मानो मन ही मन कहता कि अब भी क्या कोई अँगरेज़ों में ऐसा प्रतापी कीर्तिवान् समृद्धिवान् और पुत्रवान् घादशाह होगा ? विकोरिया ऐसी शाहन्साह जादी अब कैसे पुन इगतेद देख सकती है और रानी मालती जो इसे अङ्ग में लिपटाए हुए है यह हलचल देख प्राय पूछा करती कि मैं कैसे सुरक्षित रहेगी। अथवा यह टावर लखनऊ के अइय्याओं सा है जो सब से ऊँचे खडा हो आँखो से परी जादो को घूरता धूरता प्रत्यक्ष जड सा हो रहा है। इन्हीं उद्यानों के एक कोने में उदास मन, समय के परिवर्तन से दुखी, प्रकाण्ड शरीरवाला पुण्यात्मा मच्छी भवन,शान्त, मन ही मन में नमाज सा पडता हुआ चुपचाप खडा है । फैसर धाग में हम कभी नहीं जाते क्योंकि इसके देखने से जी दुखी होता है। इससेकि जो अपसरा सरीखी यवनियों को विहार स्थली थी वहाँ पका और गाडी खड पडाते हे, जिन महलो में चन्द्र मुखियों के पूर्णचन्द्र शानन देख पडते यहाँ मुफेद दाढ़ी वाला 4 लखनऊ २०१ कोई कुत्सित मकान का रखवार भृत्य निष्कर्म मक्खी मारता हुश्रा दिखाई पड़ता है । जहाँ सङ्गीत के सरस सुर के आकाश सुरीला हो जाता था वहाँ श्रय साईप्रेस Cypres और सरो के वृक्ष पुरानी विस्मृत गीत को धीरे धीरे डर से सॉय साँय करते गा रहे हैं। जिस वारहदरी में प्रत्यक्ष अप्सरियों का अखाडा उतरा करताचा,वहाँ श्रय कपोतों का करहनाधा उनके पखों की फडफडाहट सुन पडती है । जहाँ बडे बडे से श्राद- मियों के जाते पैर थर्राते थे वहाँ मनुष्य की कौन कथा, अब खर और सञ्चड चरते दिखाई पड़ते हैं। कि बूढ़े वेली गारद की कथा प्रायः सभी ने गाई है इससे मैं गोलियों से छिन भिन्न जीर्ण दियालो की फथा जिसमें अब फेवल उरलू और भूत मात्र रहते है परा सुनाऊँ। "लखनऊ वाले अपने वजहदारी शऊर सलीका और अपने इल्म महफिल के कुछ ऐसे कायल हैं कि वे किसी ओर शहर को इन बातों में सनद ही नहीं देते। थपने नगर के अभिमान में प्राय कहा करते कि अल्लाह तआला ने दूसरा ऐमा खित्ता खल्क में पैदा ही नहीं किया है। कोई कहते कि दिल्ली के शाह- शाह लोग चाहते ही रह गए कि घुट्टी दिल्ली को भी यह हुस्न और जमाल दें, ताकि एक यार हुस्न से इतराती धीवी लखनऊ भी झेप जाय पर यह न हुआ और उन सय कर घर- मान दिल ही में रह गया, पयोंकि खुदा दाद हुस्न को बनावट कैसे पा सकती है ? कोई कहते कि हिन्दोस्तान में लखनऊ एक जाफरान का टुकडा है और इसकी खुशबू फो घिचारी युढ़िया दिल्ली कैसे पा सकती है। यदि आप कहीं भूल से कह दीजिए कि पेरिस कुछ लखनऊ से कम वैषयिक शहरदार सभ्य तथा शिए नहीं है तो ये सय एक दम ही पोल उठेगे कि
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साहित्य हठय
तोया. तोबा कभी आप ऐसी बातें- जबान शरीफ पर न
लाइए क्योंकि वाव में भी तो कभी जङ्गलो, चुडैल पेरिस
लसनऊ का मुकाविला नहीं कर सकती, और सच तो यह है
कि अभी बीसों बरस पेरिस आकर लखनऊ की जूतियाँ
उठाए पेस्तर की शऊरदारी का दम भर सकती है ! एक
साहब कहने लगे कि में तो यहाँ तक कायल है कि जो लोग
यूरप की सैर करने जाते है वे निरे भोंडे और वेशहर होकर
लौटते है हमारे यहाँ की दो तीन माशूक जो वास्तव मे परी
पैकर थीं पेरिस के हुस्न नुमाइश में तशरीफ ले गई थीं, और
वहाँ बुलडागों से श्रॉो लडा के जो आई तो नतीजा यह हुआ
कि वएवज श्राशिकों के बगल में बैठने के अच बदतमीज नाला-
यह उनके बगल में बैठते हैं । बएचज पेचवान लगाने के,
जिसकी खुशबू से दीवान खाना भी मुअत्तर होता था, अब
सिगरेट पोर चुरट की बदबू से वहाँ बैठना दुश्वार होता है।
दूसरे साहय कहते कि यहा जाने की कौन कहे जो सिर्फ
उनका इरम ही पढ लेते है उनमें ऐसी ऐसी नाजायज हरकतें
और वेशऊरी आ जाती है, मसलन खडे होकर पेशाब करना,
टोकरी सी सिर पर टोपी रखना, चलने में घोड़ों को मात
करना, वगैरह जो कि शराफ़त के वईद है।
लखनऊ बालों का यह अभिमान सर्वथा व्यर्थ नहीं है।
जो शऊरदारी, मेहमानदारी, सभ्यता, लखनऊ चली में है वह
और नगरों में प्राय दुर्लभ है । इसी से जब किसी और नगर
के मनुष्य यहाँ आते है तो उनकीचाल ढाल देप, यदि लखनऊ
घाले मजाक कर बैठते हैं तो कभी कभी वे लोग उन से रुए भी
हो जाया करते ह और मोध में कह बैठते है कि लखनऊ तो पक
मसतरों को यस्ती है। जो कुछ हो जज के पश्चाद, यदि प्यारी
लपनऊ
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भाषा कहीं की है तो लखनऊ की , यदि गोधी उर्दू हर गलियो
में किसी नगर की झाडू लगाती है तो यहीं, यदि कहीं बोलने
में शहद या फुल झडती है तो लखनऊ के माशूको ही की
जयान से। ऐमा कुछ प्यारा यह लखनऊ नगर है कि लोग
फहते है, फिनबार वाजिदअलीशाह ने मटियानुर्ज जाना कबूल
किया पर इसे गोली और तोपों से छिन्न भिन्न होने नहीं
दिया।
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-2 शरद घन घेरो छुटिगी हरसि , चलो बहदिसि राह । किया सुचेनी आय जग , शरद सूर नर ना६ ॥ फास के विकास मिप जटिल तपस्वी सा, नदियों के निर्मल और शान्तता से वहने के मिप जोगियों सा, जलपक्षियों को इस ताल से उस ताल में भेजने के मिप कप्तान सा, का प्रात काल वृक्षों से हिमाश्रु गिरा प्रिया से धिरहित प्रेमी सा, फरवना के सुस्वाद फल से सञ्चित कर पत्तियों को सदावर्त बॉटने मिप नृपति सा, कमलवन में मधुकरों के झकार मिय वेदपाठियों सा, खजरोटों को चतुर्दिक भेज कामिनियों को कटाक्ष निक्षेप की शिक्षा देनेवाला, प्रात काल सारे बनस्पतियों को हिमकणों से सुसज्जित कर मोतियों की खेती करने वाला, हिमालय राज- धानी से सहस्त्रों कडॉकुलों को भेज दीन भारत की व्यवस्था पूछने वाला, क्षेत्रों में किसानों के सहनों हाथा चलाने मिष ब्राह्मण सा मार्जन करने वाला, श्राद्रे होते हुए भी निष्ठुर, कमलो को पुष्पित करते हुए भी बसन्त नहीं, नीलाम्बर धारण करते हुए भी कृष्ण नहीं, खेतो के पानी भरे नालों के झरने चलाते हुए भी पावस नही, निर्मल चाँदनी को प्रकाशित कर, २०५ सकल समान साज भगवान् कृष्ण के महारास की अज्ञानता से प्रतीक्षा करने वाला, ग्राम के धूम्र राक्षसों को श्राफाश में भागते हुए पकड कर, काला मुं किये चुगुल सा यीच ही में लटकाने वाला, एक ताल के पक्षियों को दूसरे ताल में भेज पतियों में सम्मेलन कराने वाला, शाकाश में अनेक कन्दीले को टाग नक्षत्र लोक की विडम्बना करनेवाला, स्नान करने को जाती हुई अनेक गाती हुई अवलाओं के गाने मिप नारद सा भगवान का कीर्तन करने वाला, रात्रि में पानी के जलकुटों के कलरव मिप भीमसेन सा अनेक घेसुरी तान लगाने घाला, योस क्लिन्न वृक्षों को चॉदनी रात्रि में मणि से जटित करने पाला, प्यारा शरद श्राफर अाकाश को स्वच्छ, भूमि को पक- हीन और बसुमति को मुहर्पित कर दिया । इस हिमकाल के निर्मल गगन में कभी शरदधुनियाँ मुफैद बादलों के मई के लच्छे वायु से विधूनित कर देवगणों के शीत के कपड़े भरने का सामान करता है, कभी पराक्रमी महावीर सा शरद अपने वायु मस्तक पर सहस्रों हिम सिपरों के समान यादलों को लिए इधर उधर घूमता है। कभी शरद के श्वेत बलाहक ऐरावत के पुन प्रपौन सदृश किसी भॉति बन्धन से मुक्त हो, उत्कट मद से उन्मादित आकाश जङ्गल में भागते फिरते हैं ; कभी बादलों की फॉफी की लहरें यह जान पड़ती मानो हिम नदी स्वर्ग से चली पर पुण्य विशेष के कारण पृथ्वी पर नहीं गिर सकी घा यह जान पड़ता कि वरुण देवने सहयों रूप के द्वीप प्रकाश महोदधि में पसा दिये हैं। इस ऋतु में आकाश पेसा नीला हो जाता है कि यह भगवान् विष्णु के तन की शोमा धारण करता है और भगवान् मरुतदेव जी जादे के आगमन की कथा कहते और बनस्पति लोकको २०६ साहित्य हदय उपदेश देते हैं कि उनके गिरने का समय निकट है जो कुछ जप तप करना हो कर डालें । भगवती वसुन्धरा अपने जीर्ण परिच्छर को उतार इक्षुकाण्ड के मिप स्वर्णमय कुन्तलों का प्रसाधन कर, नूतन गेहूँ की हलकी धानी सारी पहन, हरे हरे अरहर का दुपट्टा श्रोट, पुन. नई दुलहिन सी हो जाती है । मैं ऐसे सुसमयी और पवित्र सरस समय में प्राय. ग्राम के खेतों में विचरा फरता हूँ, कभी घण्टों अरहर की छाया में बैठा मीलों तक फैले पलिहर की शोभा देवता, कभी मटर की धनी हरि- थाली को सराहता, और कभी चना को सोटाई के पास से काला होता देख, हॅसता। कभी सरोवरों को देखता कि सारे श्राफाश को उन्होंने अपने अन्तःकरण में प्रतिविम्ब मिय घसा दिया और तटस्थ वृक्षों की शोभा भी अपहरण करने 'लगे, जिसे देख चे ईया से कॉपने लगे, जिसमें कि उनका यथार्थ प्रतिविम्ब उसमें न पडे । कभी छोटी छोटी नदियों को नित्य प्रति घनश्याम के विरह से क्षीण तनु होते देख दुखी होता । कभी कुमुदिनी चन में सारस के बडे, विचार पूर्वक चलने पर कहता कि परिडत भी तो ऐसा ही चलेगा शानी भी इसी प्रकार और प्रेम से मूर्छित भी इन्हीं के सदृश । और जय चे गर्दन उठाकर गाने लगते तव तो शरद की सव- दिशाये उन्हीं के साथ गाने लगती। कभी दुपहर को चनों में फिली मधूक वृत के सघन छाया के तले बैठे देखते कि धन, परमहस सा, शान्त और सौम्य चुपचाप अनन्य ध्यान लगाये खड़ा है। कभी घास छीलती हुई धसियारिन के प्रेम की,गीत सुन कहते कि सरसता सवी के हदय में कुछ न कुछ रहती है। कभी चर- घाहों से भूत और पिशाचो की कथा सुन हॅसते और फिर कानन में अन्तर्लीन हो जाते । कभी सहनों लाल चुडके और ,
शरद
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घटेरों को, जो आनन्द पूर्वक अरहर में बैठे चुन रहे हैं,
एक ताली बजा कर उडाने का सुरा लेता। इस प्रकार अनेक
कुतूहलों के साथ शरद का श्रानन्द अनुभव करते है।
प्रावृट् और शरद में इतना ही भेद है जितना विषयी और
शानी मनुष्य में । यदि एक प्राणी मात्र को घर बैठने की शिक्षा
देता तो दूसरा देश देशान्तर जाने की प्राज्ञा देता । यदि एक
चञ्चल तो दूसरा शान्त का प्रत्यक्ष स्वरूप । यदि प्रावृट् गवहियों
सा गाढा रङ्ग पहिगता तो शरद नागरिकों सा हल्का रङ्ग पसन्द
करता । यदि घर्षा का मुख काला तो शरद का शुभ्र यदि एक
गरज कर सब को डराता तो दूसरा कृष्ण सा नीला श्राकाश
दिखा मन को लुभाता है।
मिरजापुर के अन्तर्गत अभीरटोला में मैं एक मित्र के यहाँ
गया था। एक दिन हम लवों की राय पडी कि मगन दिवाने
के पर्वत पर शारदीय छटा देखने चले, अतएव हम सब मगन
दिवाना को रवाना हुए।चलते चलते जर इस पर्वत की चोटी
पर पहुंचे तो देखा कि वह पारिजात (हरसिंगार) वृक्षों से
श्राच्छादित था और बीच में दोषी कहानी के राक्षस का खना
हुआ एक वृहत् तालाव हे जो ऐसा तृणों से आच्छादित है
कि जल देयता देख ही नहीं पड़ते थे। जय हम सय सन्ध्या के
नित्य कर्मों से छुट्टी पाए तो पश्चिम दिशा को भगवान् प्रभाकर
को सनाथ करते देखा। घसुमती को शोभा ऐसी विचित्र,
प्यारो ओर भली देप पडी, कि मै अचम्भित सा होगया,
ओर चाह पाह करने लगा। मैने कहा दुप्यन्त स्वर्ग से उतरते
हुये ऐसे ही प्यार भरे चतुओं से यमुमती को निरसे दोगे,
या जय भगरती सीता वर्ष भर के कारागार से छूट, भगवान्
रामचन्द्र के पाव में पुष्पक विमान पर पैठ ऊँचे श्राफाश से
जदहन से घिरा हुया बहुत हो भला लगता है। भगवान् साहित्य हुदय २०० नदी के सेतु है अथवा हरित समुद्र के द्वीप हे । अथवा पर्वतो राक्षस है । इस पर्वत के पूर्व की ओर एक विस्तीर्ण झील है जो कमल और कुमुदिनी से हरा भरा और चतुर्दिश हरे उमडते हुये महोदधि कानन और शैल को ऐसे ही प्रेम भरे नैनों से देखी होगी, रोडरिक की चमकती कटार के शाघात से मूच्छिंत हो पुनर्जीवित फिट्स जेम्स भी ऐसे ही प्यार भरे चक्षुओं से पृथ्वी और श्राकाश को प्रणाम किया होगा। ऐसी प्यारी पृथ्वी उस समय देख पडी कि जैसा कबिता देवी कदाचित् उन अनेक दृश्यों और रगों का वर्णन कर सकती, यदि स्काट के कथानानुसार प्रकृति चित्रकार अपने रगीन दावात में कलम को डुबोने देता। उस समय कहीं जोते हुये धवलित पलिहर के खेत चाँदी के पत्र सहश चमक रहे थे, कहीं निकले हुए गेहूं के खेत ऐसे हरे भरे देख पडते, मानो इरियाली,स्वयम् डेरा डाले उस खेत में पड़ी है। कहीं सूर्य की किरणों से चमकता घरहा चॉदी के शलाका सा जान पडता और हाथा के पानी से विखरे जलकरण इन्द्र धनुष की शोभा दिखाते । हम सब पश्चिम की ओर जब पुनः परिक्रमा करते पहुँचे तो देखा कि भगवान् प्रभाकर ने पश्चिम फे समुद्र के स्वर्ण मन्दिर को प्रस्थान किया, और सारी दिशा वर्णमयी हो गई। किन्तु प्रलम्यायमान हरितक्षेत्र जिनके बीच में छोटे पर्वतों की शृङ्खलायें ऐसी जान पड़तीं मानो हरित जल को हरित मैंखला प्रकृति ने पहिनाया है। कही हरित क्षेत्रों के बीच में अमराइयों की शोभा कुछ और ही दीख पडतीमानो हरी फर्श के ग्रामवृक्ष मीर फर्श हैं अथवा परीजादा के बीच में वे शरद अन्तलीन सी हो गई थी परन्तु कुमुदिनी तो प्रसन्नता से पुष्पित हो भगवान् निशानाथ की बाट जोह रही थी। चरवाहे अपने गौ और भेडो को बुलाते थे कि अव खच्छन्द घूम घूम कर तृण चरने का समय आ गया, पात्रो अब घर चलें। इस समय कहीं भेडो के उतरने से पर्वत का पर्वत श्याम हो रहा था। कहीं दिन भर के म छिपाये हिंसकजीव अपने गह्वर के बाहर निकल जॅभा रहे थे, कहीं हिरनों के गोल अपने नायक के पीछे धीरे धीरे हरित तृण को देख प्रसन्न होते चले जा रहे थे। फहा जङ्गल के बाहर शृगालों के गोल एकत्र हो भगवान् प्रभाकर के चले जाने पर शवनाद सा कर रहे थे जिस हर्प का दिशाएँ प्रतिवाद कर रही थीं। हरभरे क्षेत्र, नूतन पत्रावलियों से मुमजित कानन, नक्षत्रों से जटित श्राकाश, शुक्ल पक्ष की निशा, वाराक्षस सा चढा आता हुआ तूफान वा दूसरे समुद्र सी, विस्तृत झील, वा धुडदौड सी करती हुई नदी वा ऊँची लहरे लेकर, भगवान् चन्द्रमा के चरणों को चूमने का प्रयत करता हुआ महोदधि, इन सब अपूर्व दृश्यो में हमें उसी परमात्मा परमेश्वर की शोभा दिखाई पडती है और इसी से कौन जाने प्रकृति देवो इतनी हमें अपूर्व और विलक्षण देस पडती है । और सच भी है क्योंकि स्वामी से विना लगन के लगाये थाप कैसे उसकी कारीगरियो को सम्यकरूप से सराह सकते है । कहते है कि ऊँचे चढ़ जाने से प्रकृति को शोभा, अत्यन्त उत्तम और सराहनीय लख पड़ती परन्तु मेरी समझ में जब मनुष्य अपनी यात्मा में सम्यक स्थित हो, परमात्मा के प्रेम पासव को पूर्ण रूप से पान कर लेगा तभी तुओं की घटा दिसा पडेगी भोर तभी शारदीय प्रभात और मध्या का पूर्ण रूप से अनुभव मनुष्य कर सकेगा। है
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रघुनाथ महाग पार प्रवद मे निपम प्रेम, प्रयाग में I
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