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Vedanta Ramajanatirth

Gupt,ramsevakaram · 2012/08

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पास गया परन्तु हृदय में विश्वास होने योग्य कहीं से योग्य उत्तर न मिला अन्त में भाग्यवशात् श्री पं० विनायकशास्त्री वेतालजी मंत्री मनोरथ सहकारि मण्डली से मिला और मेरे मनोरथ पूर्ण हुएजैसा मैंने चाहा था वैसा संपूर्ण ब्रह्मज्ञानशास्त्र का भाषान्तर इन्होंने कर दिया और मूलअन्य का भी परि- शोधन कर दिया। अनन्तर वह पुस्तक लेके मैं श्री स्वामी विशुद्धानन्दजी के पास गया और उनको दिसाया। उन्होंने देखकर प्रसन्न होके कहा कि यह पुस्तक ब्रह्मज्ञान वेद उपनि- पद् सञों का सार है तुम इसको शीघ्र छपवाओ जिससे संसारी जीवों का कल्याण है। इसमें ईश्वर के मिलने का बहुत ही सीमा मार्ग दिखाया है इस एक ही पुस्तक से गृहस्थ, परिहत, सन्यासी, सर्व मनुष्यों का कल्याण हो सकता है। यह सुन के ॐ नमानारामणाय कहते हुए वहां से उठ के श्री स्वामी भास्करानन्दजी के पास में गया और पुस्तक उनके चरणों के पासारख के बोला कि धाप इस पुस्तक को दृष्टि से पवित्र कर दीजिये। स्वामीजी ने पुस्तक देख पार पढ़ कर प्रसन्न हो के कहा कि पुस्तक यहुत ही उत्तम है उपनिषदे का सार है तुम शीघ्र ही उपया कर इसका प्रचार करो तुम्हारा भी कल्याण होगा। श्री परिवत अयोध्यानाय वेदान्ती गाजीपुर, सरईयां ग्रामनियासी ने इस पुस्तक को देखकर यहुत ही प्रशंसा की। इसी कारण से में इस पुस्तक का उपया कर सर्वमान्पयर परमहंस साधु विद्वान् महात्माओं की सेवा में समर्पण करता हूं। श्रीसम्यस् १४ । भापमा मेयक-

मेरा निज पुत्र वाबू रामप्रसाद लाल ने इस पुस्तक में
बहुत कुछ सहायता दी इसके लिये अनेक आशिर्वाद देता हूं
और ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि इसकी बुद्धि ऐसीही हरी-
भजन में लगी रहे।
इस पुस्तक के प्रकाशित करने में बाबू रामचरण
लाल इलाहाबाद निवासी की सहायता के लिये अनेक
धन्यवाद है और बाबू श्रीकृष्ण दिल्दार नगर निवासी
को भी धन्यवाद है।
सापका शुभचिन्तक--
राजवैद्य रामसेवकलाम गुप्त
दिल्दारनगर।

६०
जातकमाला।
प्रियं श्वशुरयोः कुयाः पुत्रयोः परिपालनम् । .
धर्ममेवाप्रमादं च शोकं मद्विरहात्तु मा ॥३०॥

श्री स्वामी भास्करामन्द मरम्मतीनी- काशी

जातकमाला
प्रियं श्वशुरयोः कुयाः पुत्रयोः परिपालनम् । -
धर्ममेवाप्रमादं च शोकं मद्विरहात्तु मा ॥३०॥

॥3॥ तस्मतूपरमात्मनेनमः . ॐ तत्सत् सहनाववतु सहनी भुनक्तु सह वीर्य करवावहै । तेजस्विनावधीतमस्तु मारिदिपावहे ॥ शान्तिः शान्तिःशान्तिः ॥ ॐ शंनी मित्रः शंवरुणः शंनोमवत्वयंमा । शन इन्द्रावृहस्पतिःशंनी विष्णुकर- कमः ॥ ॐ नमो ब्रमणे नमस्ते वायोत्वमेव प्रत्यक्ष यमासि त्वमेव प्रत्यक्षब्रह्म यदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि तन्मामवतु तक्तारमवतुथैयतु माम् । अवतु वक्तारम् । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥ॐ॥ ॐ एकदा यज्ञशालायां रघुवंशशिरोमणी । श्रीरामे सुखमासीने सामन्तैः श्रेष्ठिभिवृते ॥१॥ वसिष्ठो वामदेवोऽनिर्वाल्मीकिर्नारदो भृगुः । पराशरो याज्ञवल्क्यो भरद्वाजोऽझिरास्तथा ॥२॥ महर्पयो घगस्त्यायाः समाजग्मुर्दिदृक्षवः । पितामहः शियो देवाः पुग्न्दम्परोगमाः ॥३॥ ..

(२) प्रत्युत्यायायपाद्याद्यैः सुसत्कृत्याभिवाद्य च । सुखासीनानमून् रामः प्रवक्तुमुपच क्रमे ॥१॥ अर्थ-श्रीरामचन्द्र जी ने उनके पातेही खड़े हो के अर्घ्य पाद्य प्रादि से उत्तम सरकार किया और नमस्कार करके, जब वे मुख से बैठ गमे, तब वोले। भवन्तः सर्वशास्त्रज्ञास्त्रिकालनाः कृपालवः । सन्देहमेकं मनसो ममापाकर्तुमर्हथ ॥५॥ अर्थ भाप सब लोग सर्वशास्त्र के और भूत, भविष्य, पतमान तीनों फालों के जानने वाले हैं और दयालु हैं। सेो एक मेरे मन में सन्देह है उसको श्राप लोग दूर करें। श्रुत्वा वसिष्ठस्तद्वाक्यमब्रवीद्रामपृच्छ्यताम् । महानुभावः सर्वं ते वाल्मीकिरभिधास्यति ॥६॥ थर्थ यह मुन फे यसिष्ठ जी बोले कि महाराज ! जो भापको सन्देह हो से पूछिये महानुभाव श्री याल्मीकि ऋषि सय सन्देह दूर करेंगे। वसिष्ठवचनं सर्वे साधुसाध्वित्यपूजयन् । रामचन्द्रोऽपि वाल्मीकेः पादयोः कृतमस्तकः॥७॥ उवाच भगवानस्ति त्रिकालोपु संमतः । कृपा यद्यस्ति मयि ते भज्येत मम संशयः ॥८॥ अर्ध-यमिष्ठ जी फा यवन मुन के सथ प्रापि लोग बोल सटे फिटीक है टीक है और प्रगंगा फरने लगे, रामचन्द्र जी भोसीयारमीकि जी के परों पर मिर राफे चोले कि आप

त्रिकालों में श्रेष्ठ है जो आपकी मुझपर कृपा है तो मेरा
सन्देह अवश्य दूर होजायगा।
अत्रवीदय वाल्मीकिमर्यादापुरुषो भवान् ।
तपोधनश्च सर्वज्ञो मां श्रेष्ठीकृत्य पृच्छसि ॥९॥
पृच्छाशु संशयो मा भूत् तव यद्यदभीप्सितम्।
अपृच्छ द्रामचन्द्रोऽथ वाल्मीकि विनयानतः॥१०॥
अर्थ-श्रीवाल्मीकि जी ने उत्तर दिया कि महाराज
श्राप मर्यादापुरुष हैं, तपोधन और सर्वत हैं जो साप मुझे
बड़ाई देकर पूछते हैं। अच्छा जो २ पापकी इच्छा हो सो २
पूलिये, पूरने में सन्देह न करना । इस पीछे रामचन्द्र जी
ममता के साथ बोले।
रामः क्षत्रकुलस्याभूजिघांसुर्भार्गवः कथम् ।
क्षत्रियैरपराद्धं हि पशुरामस्य किं मुनेः ॥११॥
अर्थ-परशुराम जी ने क्षत्रिय कुल के नाश की रक्षा
खें की। र उनका सत्रियों ने क्या अपराध किया था।
केचित् स्वधर्मामुत्सृज्य वैश्यतां भेजिरे नृपाः।
कातराश्च परेऽभूवन् वदन्तीत्यं महर्पयः ॥१२॥
अर्थ-कोर क्षत्रिय अपना धर्म लोड़कर वैरभाव को
माल हुए और कोई कापर होगये, ऐमा बड़े बड़े शपि लोग
नावाशिप्यत तद्दीजमितिह श्रूयते तदा ।
कुतोऽभूत क्षत्रियकुलं संशयं छिन्धि मे परम्॥१३॥

अर्थ ---इस प्रकार से क्षत्रियों का बीज भी शेष नहीं रहा, ऐसा मुनते हैं। तय यह क्षत्रिय वंश कहां से आपा, यह मेरा दूसरा सन्देह दूर कीजिये। इति श्रुत्वा वचः प्राह वाल्मीकिः पुरुपोत्तमम् । सावधानेन मनसा श्रूयतां कथयामि तत् ॥१४॥ अर्थ-श्रीवाल्मीकि ऋपि रामचन्द्र जी का ऐसा वचन सुन कर बोले कि सावधान चित्त से सुनिये जो आपने पूछा है सो में कहता हूं। यथा परशुरामस्य जन्म रोपश्च राजसु । जघान मातरं भ्रातृन कार्तवीर्यार्जुनं च सः॥१५॥ क्षत्रियान्तं तथा चके संवादं जनकेन च । पथा च वैश्य तां प्रापू राजन्या रक्षिताः पुनः।।१६॥ राजनीतिस्तथोङ्कारमाहात्म्यं कथितं यथा । वेदानां सारभूतं यत् तत् सर्व कथयाम्यहम् ॥१७॥ अर्थ-जैसे श्री परशुरामजी का जन्म हुआ और उनका सपियों पर फोध भया और जैसे उन्होंने अपनी मा भार भा- इयों को मारा तपा सहस्रार्जुन का वध किया। और जैसे सत्रियों का नाश फिपा और राजा जनक में याद किया और अमे क्षत्रिय लोग धेरपधम्म को प्राप्त हुए और फिर घय गये और मे राजनीति तथा आधार का माहात्म्य कहा यह पर घेदों का मारापं भी है, यह मय में कहता हूं। मुनो--- अत इतः सदसः शटनास्तिकान् विमुखगान श्रुतितोऽप बहिःकुरु ।

वदति चेति सपद्यभवत् तथा न खलु रामसभा सखला यथा ॥१८॥ अर्थ-इस लिये हे रामचन्द्र जी जो वेद से विमुख शठ और नास्तिक हो उनको इस सभा से अलग कर दीजिये। श्री. वाल्मीकि ऋषि ने ज्योंहीं ऐसी माझा दी त्योंहीं वैसा ही हुमा और श्रीरामचन्द्र जी की सभा निश्चय से सल सहित नहीं रही। * इति ब्रह्मज्ञानशास्त्र श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक परशुरामसंवादे राजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत भापाटीकायां प्रथमः सर्गः ॥२॥ वाल्मीफिरुवाच । वंशे पुरूरवोराज्ञो गाधिर्नाम नृपोऽभवत् । तस्य सत्यवती नाम'दुहिता तामयाचत ।।१।। ऋचीको मुनिरभ्येत्य न स मेने वरं वरम् । इत्यूचा नृपः प्राह पणमस्याः समाहर ॥२॥ अर्थ-वाल्मीफि प्रापि रामचन्द्र जी से कहने लगे कि पुखरया राजा के यंश में 'गाधि' गाधि नाम एक राजा हुश्रा उमको मत्यती नाम की एक कन्या पी। अधीक मुनि ने भाकर रामा से उमको मांगा परनु राजा ने उस पर को पाय न ममझ फर उनसे कहा कि आप पहले इसका (स्थपंफर फा) .

जो पण है उसको ले भाइये। दिव्याश्वानां सहस्बैकं पणोऽस्याश्चन्द्रवर्चसाम् । नृपाशयं स विज्ञाय समाराध्य प्रचेतसम् ॥३॥ ताहासहस्रमश्वानांलब्ध्वा राज्ञेन्यवेदयत्। ततो मुनी राजसुतामुदाह्य विजहार ह ॥४॥ अर्थ -चन्द्र के ममान कान्ति वाले हजार दिव्य घोड़े इसफा पण है। वह ऋचीक मुनि राजा के प्राशय को जान के वरुण की प्राराधना करके वैसेही हजार घोड़े पाकर उन्होंने (लाकर) राजा को दिये फिर ये कन्या से विवाह करके वि- हार करने लगे। कियत्यपि गते काले महिपी गाधिभूभुजः। सुतार्थिनी सुतामाह साप्यर्थं तमियेप च ॥५॥ अर्थ-कुछ समय बीतने पर गाधि राजा की पह रानी ने पुत्र की इच्छा से कन्या से बातचीत की वह भी कन्या उसी अर्थ को (पुत्र होने को) चाहती थी। उभे ऋचीकमेत्यार्थमर्थयामासतुः स्वकम् । ऋचीकस्तदभिज्ञाय संसाध्य द्वे चरू पृथक् ॥६॥ अर्थ- --मा येटी दोनों पायीक मुनि के पास प्राफर अपने २ अपंकी प्रार्थना करने लगी और उनका प्रर्य समझकर मुनि ने दो अलगर परतन में दोष (भात) बनाया। राजा मे पर विचार किया कि नकार करना योग्य नहीं है। मा मुनि जी पा को पूरा न फर मकेंगे शापही पाप कन्या के पाने में ज्योपदेशापंगे। ऐमा ममम कर पर लाने को कहा।

भार्यायै ब्राह्ममन्त्रेण राइयै राजन्यमन्त्रतः । अपमानार्थमगमत् कश्चित् कालस्तमन्वियात्।७१ अर्थ-अपने स्त्री के लिये ब्राह्मणयोग्य मन्त्र से और रानी के लिये राजा के योग्य मन्त्र से बनाया। इसके उपरान्त वे मुनि स्नान करने को गये जिसमें उनको कुछ समय लगा। स्वभावतोऽधिकः पल्यां स्नेहस्तस्माच मच्चरोः। श्रेष्ठः कन्याचरू राज्ञी विचार्यत्थं वुभोज तम् ॥८॥ अर्थ-स्वभाव से स्त्री में पति का स्नेह अधिक होता है, इसलिये मेरे चरू (हाही) से कन्या के घरू (हांडी) का भात श्रेष्ठ अवश्य है । ऐमा रानी ने विचार करके कन्या के चरू का भात भजन कर लिया। कन्या यै स्खं चरुं प्रादात् समायातो मुनिस्तदा। तपावलेन सोऽज्ञासीचाविनिमय तयोः ॥९॥ अर्थ-और कन्या को अपने धरू का भात दिया। उसी समय जब मुनि जी भाये और तपस्पा के बल से तम देनों के चरुओं के सात का बदलना मालम किया। रुपा प्राह निजां पत्नी किं त्वयानुचितं कृतम् । सुतश्वरोर्व्यत्ययातू ते क्रोधी शस्त्रधरो भवेत् ॥१०॥ अर्थः -तब क्रोध से अपनी मी से कहा कि तूने अनुचित काम किया। धरु का पलटा करने से तुझे क्रोधी और शस्त्र का धारण करने वाला पुत्र हेागा ॥ दयालुर्मुनिराहेत्यं सत्यवत्यार्थितः पुनः। पुत्रः शान्तोऽथ पौत्रस्ते चरोरनुगुणोभवेत्॥१०॥ ..

अर्थ-फिर सत्ययती के प्रार्थना करने पर दयालु मुनि ऐमा योले कि (खैर) पुत्र तो शान्त होगा परन्तु तेरा पात्र (पीता) घरु के गुण के अनुसार होगा। शृणु राम सुतस्तस्याः सत्यवत्या बभूव ह । जमदनिरितिख्यातःशान्तो ब्रह्मर्पिसंमतः ॥१२॥ अर्थ-वाल्मीकि ऋषि रामचन्द्रजी से कहते हैं कि हे राम उस सत्यवती के पुत्र हुआ,वह जमदग्नि नाम से विख्यात शान्तस्वभाव और ब्रह्मर्षि लोगों में मान्य हुभा ॥ सत्यवत्यप्यभूल्लोके पावनी कौशिकी नदी । जमदग्निः सुत्ता रेणो रणुकां परिणीय च ॥१३॥ तस्यामुत्पादयामास गुणानग्यानूसुतान् बहून् । अन्त्यः परशुरामोऽभूद्यागुणाग्योशधृग्घरेः॥१४॥ अर्थ-सत्मयती भी लोगों को पवित्र करनेहारी काशि की नाम फी नदी बन गई। उसके पुत्र जमदग्नि ने रेणु राजा फी कन्या रेणुफा से वियाह फरके उसमें जो गुशों में श्रेष्ठ नहीं मे अनेक पुत्र उत्पन्न किये। उन सभा में छोटा परशुराम हुन्ना जो गुगों में श्रेठ और श्री विष्णु भगयान् का अंशधारी था॥ हैहहयानां नृपाणां तु नाशक यं वदन्ति च । त्रिःसप्तकत्वस्तुमहीं निःक्षत्रामकरोच यः॥१५।। अर्थ-निको हेटय पंश के तपिपा के नाश करने याना फाइते सार जिधने हकीम पार पृथ्यो को निःक्षत्रिय किया।

अथ क्षत्रियवंशस्य नाशः कथमिति ब्रुवे । बभूव हैहयेप्वग्न्यः कार्तवीर्यार्जु नो नृपः॥१६॥ भगवन्तं समाराध्य दत्तात्रेयं महामुनिम् । सहस्रमाप वाहूनां जिग्ये चारीन् रणाजिरे ॥१७॥ अर्थः --अय क्षत्रिय वंश का नाश कैसे हुआ सा कहता हूँ। हैहयवंश में श्रेष्ठ कृतवीर्य का पुत्र अर्जुन नाम (कार्त वीर्यार्जुन) एक राजा हुना,उसने भगवान् महामुनि श्रीदत्ता- श्रेयजी की आराधना (सेवा) करके हज़ार हाथ पाये और संग्राम में शत्रुओं को भी जोता ॥ स एकदा सह स्त्रोभिर्जलकोड़ा समाचरत् । नर्मदायास्तटे रम्ये बाहुजातमदोद्वतः ॥१८॥ अर्थ-यह महस्रार्जुन एक समय रमणीय नर्मदा के तीर पर राशमद से उन्मत्त होकर स्त्रियों सहित जलक्रीड़ा फर रहा था। सहस्रबाहुभिः स्वीयैरुरुधे नर्मदाजलम् । तदानीमेव पौलस्त्यो रावणो राक्षसाधिपः ॥१९॥ कुर्वन् दिग्विजयं प्राप्तो रेवातीरं यदृच्छया । सन्ध्यामुपास्य गापत्री प्रजप्य च पठन यजुः॥२०॥ व्यस्तप्रवाहह्मद्राक्षादकस्मामिदं जलम् । पृष्टस्तत्कारणं प्राह मन्त्री कर्मार्जुनस्य तत् ।।२१॥ अर्थ-उमने अपनी हतार भुगाओं में नर्मदा के जल, को रोक दिया। उसी समय पुलस्त्य पि का पोता राक्षस का अधिपति रावण दिग्विजय करता हुमा अपनी इच्छा से नर्मदा के तीर पर माया। उसने सन्ध्या और गायत्री जप कर के यजुर्वेद का पाठ करते हुए अचानक देखा कि नर्मदा का जल उन्लटा यह रहा है। मत्री से पूछा कि इसका क्या कारण है तब मंत्री ने वह (जल रोक कर उलटी नदी यहाने का) कार्तवीर्या र्जुन का फर्म कहा॥ तमसहमहङ्कारी वचः श्रुत्वा दशाननः । समाप्य नैत्यकं तत्र यातो यत्र तु हैहयः॥२२।। अर्थ-अहङ्कारी रायण उस असह्य बचन को सुन के अपने नित्यकर्म को समाप्त करके जहा सहस्त्रबाहु था वहा गया। स दृष्ट्वा रावणं क्रोधात कोयमानन्दभङ्गकृत् । इत्युक्ता संनियम्याशुवध्वा निन्ये स्वकं पुरम् ॥२३॥ अर्थ-उसने (राजा ने) रावण को देख के क्रोध से कहा कि यह मानन्द का भग करने वाला कौन ऐ गार शीघ्रही रायण को फेद करके और याध फरके अपने नगर गे लेगया। कामं मुमोच तं पश्चात् पुलस्त्यतनयार्थितः । एवं प्रभावो नृपतिः स सहस्रार्जुनोऽभवत् ॥२४॥ अर्थ-पद्यपि इसके पीछे पलरत्य के पुन यिनया पि (रायण के पिता)मी,अपने पुत्र यो कोर दिये जाने की प्रार्थना भेग पाहते हुए भी साने,रायण को छोड़ दिया,ऐसा प्रतापी पारामा पहनामुंग हुमा ।।

एकदा जमदग्नेः स आश्रमं मृगयावशात् । जगाम मुनिना तेन ससैन्योऽप्यतिथीकृतः।।२५।। अर्थ-वह राजा एक समय मृगया (शिकार) के प्रसङ्ग से जमदग्नि ऋषि के आश्रम में गया, उस मुनि ने उसको सेना समेत अतिथि (मेहमान) बनाया। एवं सुसत्कृतो राजा पप्रच्छ निजमन्त्रिणम् । कुतो नृपार्हवस्तूनि सद्यः काननवासिनः ॥२६॥ अर्थ-ऐसा सत्कार करने पर राजाने अपने मंत्री (मधान) से पूछा कि राजाओं के योग्य वस्तु जगल में रहने वाले के पास, तत्कालही कहां से प्राई॥ मंत्री प्राह महाराज मुनेरस्ति निकेतने। कामधेनुसुता कामदोग्नीदं तद्विचेष्टितम् ॥२७॥ अर्थ-मंत्री ने उत्तर दिया कि महाराज, मुनि के घर में कामधेनु को फन्या है, मन चाहे अर्थ को देने वाली है, उसीका यह प्रभाव है। मन्त्री श्रुत्वैव माज्ञप्तो गवायें मुनिमेत्य च । राजयोग्यमिदं रत्नं मुनेस्तेऽनेन किं वद ॥२८॥ अर्थ-रोमा गुन के राजा ने मंत्री को माता दी किगी के लिये मुनि के पास जाकर कहा कि यह रव राजा के योग्य है तुम मुनि दो तुमको इससे क्या कॉम मन्त्री मुनि समुपगम्य तथा ययाचे नसोकृतं तदृपिणेति बलान्नृपाग्यः ।

( १२ ) मावं मुहुनिनदनैकपरां सवत्सां हत्त्वाभ्ययान्निजपुरं कलुपीकृतात्मा ॥२९॥ अर्थ-मंत्री ने मुनि के पास जाकर अज्ञानुसार गाय को मांगा पर ऋषि ने स्वीकार नहीं किया। तय राजा बलात्कार (जघरदस्ती से) थार २ चिलाती हुई बच्चे सहित गाय को हरण करके अपने को पापी बना के अपने नगर में गया। इति ब्रह्मज्ञानशास्त्रे श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक परशुरामसंवादे राजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत भापाठीकायां द्वितीयः सर्गः ॥२॥ श्रीवाल्मीफिरुवाच.- गोहतरि प्रतिगते तु सहस्रवाही गेहागतः परशुराम उदन्तमावेत् । संरब्धरक्तनयनः शरचापपर्यु धृग्वर्मितो हरिरिभेन्द्रमिवाभ्यधावत् ॥१॥ अर्थ-श्रीयाल्मीकि जी श्रीरामचन्द्र जी से कहते हैं कि जय यह महसयाहु गा हरण करके चला गया तय परशुरामजी ने पर ग्राफर मय गमावर मना और उनकी मां क्रोध के मारे लाख र होगई, धनुष याण, फरमा धारण करके, कयम पहिन के जमे सिंह कापी पर झपटे येमे झपटे। - माहिष्मती नाप सहस्रबाहुः सैन्येन तावजमदग्निसूनुः। कालोपमो मस्तकमारुरुक्षन् तत्पृष्ठगामीव लघु प्रयातः ॥२॥ अर्थ- -जयतक सेना के साथ सहस्रार्जुन अपनी माहिष्म- ती नगरी में नहीं पहुंचा था तब तक ही परशुरामजी,सिर पर घढ़ने को चाहते हुए काल के समान,जैसे पहिले से उसके पीछे ही जाते हों, ऐसा शीघ्रही वहां पहुंच गए। पशुरामविजयाय संयुगे- ऽक्षौहिणीर्दश च सप्त भूपतिः । प्रासशक्तिपरिधासितोमरे- प्वादिसजवपुपो न्ययूयुजत् ॥३॥ अर्थ-संग्राम में परशुरामजी को जीतने के लिये राजा ने प्रास (भाला), शक्ति (यरली), परिघ (लोहदगह), असि (तरवार), तोमर (गैंडासा), इषु (बारा) आदि से सजी हुई १७ प्रक्षोहिणी सेना भेजी। सैन्यं विलोक्य चागतमग्रेऽग्निस्तुलराशिमिव । संहृत्य क्षणमात्रात् परशुधरोऽनाकुलस्तस्थौ ॥४॥ अर्थ-आगे भाई हुई सेना को देख कर क्षणमात्र में सूई को अभि की नाई संहार करके परशुरामजी यिना घबराहट के स्वस्य रहे रहे।

संहृतं तु मुनिना निशम्य तत् खं वलं नरपतिस्तु शक्तिमान् । आनशस्त्रनिवहो रुपाहयन् संयुगे मुनिमनाकुलोऽभ्ययात् ॥५॥ अर्थ- परशुराम जी ने संपूर्ण सेना का संहार किया ऐसा मुन के,शत्तिमान् (पराक्रमी अथवा प्रभाव उत्साह विचार इम तीनो शक्ति वाला) राजा शस्त्रों का समूह धारण करके क्रोध से संग्राम में मुनि को ललकारता हुन्ना निर्भय होकर जाता भया। तपसः पुरतो वलं नु कि नृपतेः पशुभृता धनुप्मतः। सभुनं समकर्ति मस्तकं परलोक नृपतिः समाश्रयत् ॥६॥ अर्थ-परन्तु तप के आगे यल या ! परशुराम जी ने भनुपधारी राजा के हज़ारो भुजाएं और सिर काट दिया। राजा भी परलोक को प्राप्त हुआ। भृगुकुलभूपण एवं खां धेनुं स्वाश्रमं निन्ये । पित्रे न्यवेदयदपि प्रघनं नृपतेर्वधं धेनुम् ॥७॥ ए-तय भृगुकुणभूषण परशुराम जी अपनी गोको अपने याप्रम में ले गए। मार पिता जमदग्नि के पास संग्राम और राजा के ययका ममाचार कहा और गौ को भाप दिया।

( १५ ) जमदाग्नस्तु तच्छुत्वा धीमान सुतमशिक्षयत् । राजानं निघ्नता वत्स किं त्वया दुष्कृतं कृतम् ॥८॥ अर्थ-यह सुन कर बुद्धिमान जमदमि ऋपि ने पुत्र को शिक्षा दी कि हे बेटा राजा को मार कर तूने यह च्या पाप किया । राजा देवो मनुष्येषु तन्नाशान्नाशितं जगत् । विर्भाव्यं क्षमाशोलैः क्षमया पूज्यते जनः ॥९॥ गुणोऽसाधारणः सोऽयं ब्रह्मा लोकगुरुर्यतः । परमं पदमापासौ क्षमयार्कः प्रकाशते ॥१०॥ विष्णुः प्रसीदेत् क्षमया प्रसन्नं क्षमया जगत् । तया नाब्रह्ममूर्तिः स्यात् तस्मात् श्रेष्ठतमाक्षमा १९ अर्थ- -राजा मनुष्यो में देवता हे उराको मारने से तूने सब जगत को नए किया। ग्रामगो को क्षमाशील होना ग्रा. हिपे । क्षमाहो से लोक पूजा को प्राप्त होते है। यह गुण सा. पाररा नहीं है। इसीसे प्रमाजी लोक गुरु होके परमपद फेो मात हुए। क्षमा मे गूयं प्रकाशमान है । क्षमा से विष्णु भा' पान् प्रसन्न होते हैं। क्षमा से जगत् प्रसन्न है। तमामे मनुन मल मूर्ति होजाता है। इसलिये क्षमा मध से रेष्ठ है। कोथो मूलं हि पापस्य तपस्तेन विनश्यति । ब्रह्महत्याधिका हत्या बघोऽयं चक्रवर्तिनः ॥१२॥ अधोध पाप की गह है। क्रोध करने से तप नष्ट ( १६ ) हासा है । हे पुत्र चक्रवर्ती राजा का वध यही हत्या है जो ब्रह्म हत्या से भी अधिक है। तच्छमाय जप वेदमातरं गच्छ तात पठ वेदमादितः। निर्जने वस बने शमो रुपः स्यातू ततस्त्वमनघो भविष्यति ॥१३॥ अर्थ-हे पुत्र उस हत्या के मिटाने के लिये गायत्री जप करो। भारम्भ से सप बेर पढ़ी। जाओ एकान्त घर में बात करो। इससे क्रोध की शान्ति होगी और तुम पापरहित हे। जाओगे। इति ब्रामज्ञानशास्त्रे श्रीवाल्मोकिमुनिकृते जनक परशुरामसंवादे राजघरामसेवकलालगुप्तकृत भापादीकायां दितीयः सर्गः ॥३॥ याल्मीकिरुयाप- पशुरामः पितुर्वाश्यादायत्री वेदमासमम् । अभ्यस्यागत्य पितरं प्रणम्यालभताशियः॥२॥ अर्थ-रणरामजी ने पिता को यात्रा के पत्री बार ये का एक यपं तफसम्पाम (नय और पाठ) पिया और पिर माकर पिता की प्रशाम करके शागियदि पाया। मनुमार गा- किं करोमीति तेनोक्त जमदग्नि रुवाच तम् ॥६॥ एकदा रेणुका मातुं जलं चाहर्तुमभ्ययात् । गङ्गां ददर्श तत्रैव कीडन्तं चाप्सरोगणैः ॥२॥ सा पद्ममणिगन्धर्व मदनाकृष्टचेतसा । पश्यन्ती कौतुकं तं तु कंचित्कालं स्थिताभवत्॥३॥ अर्थ-एक समय परशुराम जी की माता रेणुका स्नान करने और जल लाने के लिये गङ्गाजी गई। वहां ही अप्सराओं के साथ क्रीड़ा करते हुए पद्ममणि नाम के गंधर्व को देखा। उस कौतुक को देखती हुई कामदेव के वश हो कुल काल तक “वहां खड़ी रहीं। तत्रातिसमयेऽतीते मुनेः शापभयात् सती । जलमाहृत्य सपदि कम्पन्ती मुनिमभ्ययात् ॥ अर्थ-वहां यहुत देर होजाने पर मुनि जी कहीं शाप म देदेवे इस भय से जल लेकर कांपती हुई तत्काल मुनि जी के पास लोट पाई॥ तन्मनोवैकृतं ज्ञात्वा मुनिः पुत्रानजिज्ञपत् । निजमातुः शिरग्छिन्त तैनाकारि पितुर्वचः ॥५॥ अर्ध-अपि ने अपनी स्त्री रेणुका के मन के विकार को जान कर पुत्रों को आशा दी फि अपनी माता का सिर काद लो, परन्तु पुत्रों ने पिता का वचन नहीं माना । क्रोधात् सस्मार स मुनिः पशुरामं स चागमत् । ३ ( १८ ) अर्थ -तब ऋषि ने क्रोध करके परशुराम जी का स्मरण किया और वे भाये। उन्होंने पिता से कहा कि क्या प्राज्ञा है। तव जमदग्नि ने उनसे कहा ।। निज मातुः शिरश्छिन्धि भ्रातृणां चाविलम्वितम्। अयुक्तमिदमत्यन्तमिति सोऽपि व्यचिन्तयत् ॥७॥ तथाप्यस्ति पितुःशक्तिस्तेषां प्रोज्जीवने पुनः । इत्यं विचार्य सुधिया क्षणादवजघान ताना॥ अर्थ-अपने माता और भाइयों का सिर शीघ्रही काट लो। परशुरामजी ने सोचा कि माता और भाइयों का मारना यहुतही अयोग्य है । तथापि पिताजी को फिर उनके जिलाने फा मामय है। ऐसा सद्बुद्धि से विचार करके एक क्षण में सभी को मार डाला॥ तुष्टः पिता तमभ्याह वरं वरय सुव्रत । जीवन्तु भ्रातरो माता स नत्वेत्थमयाचत ॥९॥ जानन्तु ते स्वहन्तारं नच मां कहिंचित् पुनः । तपेत्युक्त्वाथ मुनिना तुष्टेनोजीविताश्च ते ॥१०॥ राय पिता समदमि ने मंतुष्ठ हो फरके पुत्र परशु- रामशी गे कहा कि पुरन पर मांग, परशुरामगी ने प्रशाम फरफे यह पर मांगा कि मेरे भाई और मां ली जायें और ये प्रपा मारने यापा गुरु कभी न समझे। मुमिगी ने प्रमाण देकर 'गाणु' (ऐमाही क्षे) फर कर उनको मिला दिया। थर्य- + साल्मीकिरुवाच--- परशुधरस्य भयात् ते सहस्रवाहोः सुताः शरणम् । न कापिलेभिरे नृपमानित्वात् सेहिरेन पितृघातम्।११। अर्थ-वाल्मीकि ऋषि श्रीरामचन्द्रजी से कहते हैं कि परशुरामजी के भय से सहस्त्रार्जुन के पुत्र कहीं शरण न पाये और राजपन के घमण्ड से पिता का मारा जाना भी सहन सके क्षत्रियाणामयं धर्मों वैरनिर्यातनं पितुः। यथावलं कथमपि कार्यमित्यविचारयन् ॥१२॥ अर्थ-और उन्होंने विचार किया कि यह क्षत्रियों का धर्म है कि पिता के वैर का पलटा, किसी प्रकार से अपने सामय के अनुसार लेना चाहिये। विचायचं मिथस्ते तु निर्गते भ्रातृभिहात् । पशुरामे ययुस्तत्र ध्यानमीलितलोचनम् ॥१३॥ जमदग्निं न्यवधिभूदा रेणुकयार्थितम् ।, विनयाजीवनं पत्युर्न शुश्रुवुरनादरात् ॥११॥ अर्थ-येलोग भापम में ऐसा विचार करके भाइयों के साप परशुरामजी के घर पर प्राये जब यह घर से बाहर गए थे, उन्होंने ध्यान में प्राएँ मोचे हुए जमदग्नि ऋषि को अकेलापा कर मार डाला, उनकी स्त्री रेणुका मी ने नम्रता के साथ पति के जीवन दान की मिना बहुत चाही परनु उन दुष्टों ने अमा. दर से कुछ नहीं मुना।

( २० ) केशमाहं गृहीत्वा ते समकन्तन् शिरोऽसिना । रेणुका विललापोचैरस्ताडनपूर्वकम॥१५॥ अर्थ-उन्होंने मुनि के केश पमह के तरवार से उनका सिर काट लिया, और रेणु का छाती पीट कर जोर से चिन्ना कर विलाप करने लगी। हाराम राम हा तात कासि धावा विलम्वितम् । दुर्दण्ड्यनृपदोर्दण्डात् पितरं पाहि कातरम् ॥१६॥ अर्थ-हा। राम हा ! राम हा ! राम तात तू कहा है शीघ्र दाह । दुर्दण्ड क्षत्रियों के भुजदण्ड से भयभीत अपने पिता की रक्षा कर॥ पशुरामोऽपि रुदितं मातुः शुश्राव दूरतः। आगत्याश्रममद्राक्षीत् पितरं पञ्चतां गतम् ॥१७॥ अर्थ-परशुरामजी ने माता का रोना डर से भुना और आश्रम में प्राकर देखा कि पिता का परलोक वास हुभा ॥ विलप्य वहुशोऽनस्त्रमब्रवीद्भातृभिः सह । नोका किंचिन्नोपदिश्य स्वर्ग याताः कथं पितः।१०। अर्थ-भाइयों के साथ यहुत समय तक यतमा विलाप करके कहने लगे फि हे पिता । माप हमलोगो में म फुध काह गए और न फुलपानोपदेग किया, पाप स्वर्ग में फेमे चले गए। अप मातरम पत्य दीनामाश्वासयन्नैः । माशुचो हन्ति कं कोऽम्य जीवः किं म्रियतेऽमरः।१९।

( २१ ) नोचे को म्रियते ब्रूहि यथा जीर्णमिहांशुकम् । हित्त्वा नूतन माधते तथान्यदेहधारणम् ॥२०॥ अर्थ-इस पीले माता के सामने जाकर दीन माता को धीरे २ समझाने लगे कि हे माता ! तुम शोक मत करो। कौन किसको मारता है। जीव जो अमर है से क्या मरता है ? नहीं तो कहो कौन मरता है ? जैसे यहां पुराने कपड़े लोड़ नया कपहा लोग पहिनते हैं वैसे ही यह जीव एक को छोड़ दूसरे शरीर को धारण करता है। तथैव मानुपं देहं त्यत्का दिव्यशरीरिणः । स्वर्गे लोके विराजन्ते पितरो मे तपोधना।।२१।। अर्थ-वैरोही मनुष्य शरीर को छोड़ कर दिव्य शरीर धारण कर तपोधन, मेरे पिता स्वर्ग लोक में विराजमान हैं। शोकं जहीहि भगवत्प्रवणैव भूत्वा ज्ञाने यतस्व परिक्षितएव पत्युः । त्वं चापि मुक्तिपदमाप्स्यसएव धीरा पत्त्युः पयेतिच वदन विरराम रामः॥२२॥ अर्थ-हे माता! भगवान् के ओर झुक के शोक दोहो। अपने पति में सीसे हुए शान में हो यच करो। तुम भी वुद्धि- माम हो, पति के मार्ग से मौतपद को पायोगी । प्रेमा का के परशुरामजी नुप हुमत इति ब्रमशानशाने श्रीवात्मीकिमुनिकृने जनक परशरामसंपादे राजघराममषालालगुभकृत भापार्टीकायां पतुर्थः सर्गः ॥

( २२ ) वाल्मीफिरुवाच । रामो मातरमाभ्वास्य कोधात् कालाग्नितुल्यभाः। कम्पमानो जनन्यग्रे प्रतिज्ञामकरोदिति ॥१॥ अर्थ-श्री वाल्मीकि ऋषि रामचन्द्रजी से कहते हैं कि परशुरामजी माता को समझा के क्रोध से कालानि के समान धमझते हुए कांपने लगे और उन्होंने माता के भागे ऐसी प्रतिज्ञा की। जगति क्षत्रियकुलं संहरिप्ये पितुः कृते ।' एवं प्रतिज्ञाय पुरी स च माहिष्मती ययौ॥२॥ अर्थ-पिता के कारण जगत् के शय क्षत्रियों का संहार करूंगा ऐसी प्रतिज्ञा करके वे माहिष्मती पुरी में गए। गत्वार्जुनसुतान् हत्त्वा तत्रत्यान् क्षत्रियानपि । निघ्नन क्षत्रियवृन्दानि समभ्राम्यदितस्ततः ॥३॥ अर्थ-वे वहां जाकर सहस्रार्जुन के पुत्रों को मार कर और यहां के क्षत्रियों को भी मार कर फिर तत्रियों के मुंहों को मारते हुए इधर उधर घूमने लगे। क्षत्रियाः पशुरामस्य भयाद्याता दिशो दश। स्वस्वं देशं परित्यज्य केचित् पञ्चालमाश्रिताः॥४॥ केचिद्याता मरुस्थल्यां सिन्धुतीरं परे गताः । महेन्द्राद्रिं रमणकदीपं चानुगताः परे।।५ ॥ अर्प-सनिय ने परशुरामजी के भय मे दमा दिशा- ( २३ ) ओं में भागे, अपने २ देश को छोड़ कर कोई पंचाल देश में कोई मरुस्थल में, कोई समुद्र के किनारे, कोई महेन्द्राचल पर, और कोई रमणकद्वीप में जा रहे ॥ पशुभृच्च नृपान् निघ्नन् पञ्चालविपयं गतः। तं दृष्ट्वाभयसंत्रस्तास्तत्रत्याः क्षत्रिया भृशम् ॥६॥ खंखं धर्म परित्यज्य कातराः स्मेतिवादिनः। परित्यज्याहवं याताः प्राणान् रक्षेतिचाब्रुवन्॥७॥ अर्थ-परशुराम जी भी राजाओं को मारते हुए पच्चाल* देश में गए, उसको देखकर वहां के क्षत्रिय, भय से अत्यन पबहा कर अपने धर्म को छोड़ कर कहने लगे कि महाराज हमलोग फातर हैं। उंग्रान छोड़ कर चले जाते हैं, हमारे प्राणे को प्राप रक्षा करें। इति तेषां वचः श्रुत्वा पशुरामो विहस्य च । कातरा एव भवत क्षत्रसंबन्धवर्जिताः॥८॥ इत्युक्त्वा दक्षिणामाशां प्रतस्थे नावधीच तान् । पाञ्चालाः क्षत्रिया एवं तदा प्रभृति कातराः।।९।। श्रर्थ-ऐमा उनका यपन गुन कर परशुरामजी हम कर काने पगे कि तुम मोग फापर हो रहोगे, और तत्रियों मे तु. मारा संपन्ध नहीं होगा। ऐमा कहकर, (परामजी ने) • पाप देर-माणे गमर पातदेय स्य मारा गया। 1 श्रर्थ- ( २४ । सनको न मारा और दक्षिण दिशा की यात्रा की। इस प्रकार तभी से पञ्चाल देश के क्षत्रिय कायर होगए ॥ अथ दक्षिणतो भूत्वा विन्ध्यमुल्लङ्घय सत्वरम् । ययौ रमणकहीपं तत्रत्याःक्षत्रिया अपि ॥१०॥ सूर्यवंश्या भयोद्विनास्तं दृष्ट्वाभ्यवदन् मिथः । समायातोऽयमधुना जीवनं नः कथं भवेत् ॥११|| समेत्य निश्चितं सैवर्जीवनं वैश्यधर्मतः। इत्यापणेपु राजन्यास्ते चक्रुः क्रयविक्रयम् ॥१२॥ -इस उपरान्त परशुरामजी दक्षिण के और होकर शीघ्रही विन्ध्याचल पर्वत को लांघ कर रमणाकद्वीप में पहुंचे। यहां के क्षत्रिय मूर्यवंशी थे, वे परशुरामजी को देखकर, भय- भीत होकर, आपस में सोचने लगे कि परशुराम जी यहां भी भाये और अब अपने लोगों का जीवन कैसे होगा। फिर सां ने मिल फर यही निश्चय किया कि वैश्य धर्म में रहने से जीयन रहेगा। ऐसा सोच कर मय क्षत्रिय लोग बाज़ार लगा कर कुछ खरीदने और कुछ येघने लग गए। केचिद्वैश्यवदुप्णीपधृपः केचित् तुलाधराः। केचिल्लिखन्तः केचिच द्रव्यसंख्यानमाचरन्॥१३॥ वैश्यधर्मरता एवं ददृशुः पुरतो मुनिम् । 'वयं वैश्या वयं वैदया इति रुष्टं व्यजिज्ञपुः॥१४॥ अस्त्वस्मासु पत्येवं वदन्तो ददृशुः पुरः । मुनेरगारवनत्रे ते भीताः पाद्रवन दिशः ॥१५|| .

अर्थ-कोई वनियों के ऐसी पगड़ी पहिने हुए, कोई तराजू पकड़े हुए, कोई लिखते हुए, कोई हिसाब करते हुए वा द्रव्य गिनते हुए बैठ गए। इस प्रकार वैश्य धर्म में लगे हुए, उन सत्रियों ने परशुराम जी को सामने देखा और उन्हें क्रोधित देखकर बोले कि 'हम वैश्य हैं हम वैश्य हैं, ऐसी प्रार्थना करने लगे। हमारे ऊपर रुपा रहे ऐसा कहते हुए वे सामने देखते हैं कि परशुरान जी को प्रारों अंगारे की सी लाल लाल हो रही है तब डर के मारे चारों ओर भागने लगे। पशुरामोऽपि तद् दृष्ट्वा कपटं बुबुधेऽखिलम् । तानुवाचाथ धूर्ताः स्थ राजन्याः सूर्यवंशजाः ॥१६॥ स्वीकृत्य वैश्यतां क्षत्राद्धर्माजाता वहिः खयम्। भयाच्छस्त्राणि संत्यज्य संजाता वैश्यमानिनः॥१७॥ अस्तु वो न हनिप्यामि शामि श्रूयतामिदम् । वैश्या भवत राजत्वं न कदाचिदवाप्स्यथ ॥१८॥ वैश्या रवणहाराश्च वैश्यवर्गपु चोत्तमाः इमं देश परित्यज्य मगधान् यात मा चिरम् ॥१९॥ अर्थ-परशुरामजी भी ठनको मागते हुए देस कर उन का संपूर्ण कपट जान गए और उनमे कहा कि तुम लोग धृतं हो मृपयंगी क्षत्रिय हफा, पैश्य धर्म को म्यीकार करके गत्रिय पमं मे भापही साप यार हुप और भय के मारे गनों को दोष, पपने को येरप मागने मग गए। मनु घर तुम को नहीं माझगा परनु यह गार देना, मी मुनी, जय तुम नाग वाय - ( २६ ) हो जाओ और शत्रिय धर्म को कभी न प्राप्त हो। रवणहार नाम के वैश्य होकर, वैश्यों में उत्तम कहलाओ। अब इस देश को छोड़ कर मगध देश में चले जाओ, देर मत करो। व्युप्य तत्रोपवीतादिसंस्कारान् कुरुतानिशम्। काले जपत सावित्री तथा वो न त्यजेद्रमा ॥२०॥ धनिमः सुखिनः स्यात संस्काराँस्त्पजतां पुनः। सन्ध्याकर्मविहीनानां दारिद्रयं वो भविष्यति ॥२१॥ मिथ उदाहकर्माणि कुर्वन्तः स्थास्यथाञ्जसा । एवमुक्ता तु वचनं पशुरामोऽन्यतोऽगमत् ॥२२॥ अर्थ --मगध देश में रह के यज्ञोपवीत आदि संस्कार सर्वदा करते रहना । समय पर गायत्री का जप करना, ऐमा फरने से तुम लोगों को लक्ष्मीजी कभी न छोड़ेंगी तुमलोग धन- यान् और सुखी बने रहोगे। और संस्कार फर्म तथा संध्या वन्दन करना छोड़ दोगे तो तुम लोग दरिद्र होगाओगे। तुम लोगविवाह फर्म भापस में करके मुरा से रहोगे। ऐसा कहके परशुराम जी चार स्थान को चले गए। वैश्यभाव समासाद्य ततस्ते क्षत्रिया भुवि। न्यवात्सुर्मगधं देशं मुनिना निर्भया कृताः ॥२३॥ पर्य-उगळे पथात् ये सूर्य यंगी क्षत्रिय धेरयभाय को प्राप्त देफर मगध देश में नाफर यने फोकि परशुराम जी ने उन को निसंद कर दिया था।

इति नामज्ञानशास्त्रे श्रीवाल्मोकिमुनिकृते जनक
परशुराममंयादे राजवैद्यरामसेवकलालगुमकृन
( २७ )
श्रीमान् गोलकवंशजो नरपतिः खट्टाङ्गनामा जनात्
श्रुत्वेत्यं नृपपातो नरपतीस्तान् वैश्यभावं गतान् ।
शापादेव वहिश्चकार रुरुधे संवन्धमपां नृपे-
प्वेवं ते रविवंशजा नृपतयो वैश्या बभूवुर्भुवि ॥२४॥
अर्थ-इस वृतान्त को गोलक वंश के राजा सवाल
लोगों से मुन कर उन रमणकवीपवाले, वैश्यभावको प्राप्त हुए.
राजाओं को, परशुराम जी के शापही के कारण से क्षत्रिय
पंक्ति से बाहर कर दिया, और क्षत्रियों में उनका संबन्ध होना-
रोफ दिया । इस प्रकार से वे सूर्य वंशी राजा भूमि पर:
वैश्य बन गए।
विख्यातास्तत एव तेरवणहाराख्या विशो विष्टपे
श्रेष्ठाः सर्वविशांकुले घुच वणिग्वृत्याऽत्यगुर्जीवनम्।
दानेनाध्ययनेन यज्ञकरणैः पश्वादिसंरक्षणः
कृप्या वाघुपिकर्मणा परशुभृच्छापाद्ययुर्वैश्यताम्।२५
अर्थ-तभी से वे मूर्य वंशी राजा लोग रवणहार मलिक
नाम से जगत में प्रसिद्ध हुए, फिर सम्पूर्ण वैश्यों के कुल में
श्रेष्ठ कहलाये, दान देना, येद पढ़ना, यज्ञ करना पशु श्रादि की
रक्षा करना, रोती करना,व्याज लेना इत्यादिक वैश्य की वृति
मे जीयन यिता कर परशुराम जी के शाप से, वैश्यपन को
प्राप्त हुए।
भापारीफायां पञ्चमः सर्गः ॥५॥

( २८ ) वाल्मीफिरुवाच। श्रीराम केऽपि मुनयः कथामूचुः पुरातनीम् । भलन्दनो ब्रह्मपुत्रो भार्या तस्य मरुत्वती ॥१॥ अर्थ-श्रीवाल्मीकि ऋपि रामचन्द्र जी से कहते हैं कि हे रामचन्द्र कोई मुनि लोक ऐसी प्राचीन कथा कहते हैं । ब्रह्मा जी का पुत्र भलन्दन और उसकी स्त्री मरुत्यती हुई । तयोयशो जगद्याप्तमासीत् पञ्चम एनयोः । पुत्रः प्रमर्दनो नाम धर्मात्मा सत्यवाग् दृढम् ॥२॥ यजुर्वेदस्य वेचायं ब्रह्मविज ज्ञानिनां वरः। अस्य भार्याचन्द्रसेना साक्षाञ्चन्द्रमसः सुता ॥३॥ सौन्दर्ये रम्भया तुल्या सुशीला च प्रियंवदा । स्त्रीधर्मनिपुणा सोमो बुडैवमुदवाहयत् ॥१॥ पतिसेवा परापीयं चिरं नावाप सन्ततिम्। प्रणता प्रार्थयामास खपति पुत्रकाम्यया॥५॥ अर्थ-दोनो का यश जगत् में खा रहा है। इनका पांच- यां पुत्र प्रमर्दन हुआ। यह बड़ा धमात्मा और मत्य बोलने में हडपा। यह पशुर्पद का मानने वाला,ग्रामयेत और शानियों में श्रेष्ठ पा। मफे घी का नाम चन्द्र मेना था जो साक्षात् नान्तमा की पुत्री थी। यह सुन्दरता में रम्भा अमरा के समान भी, मुगोल र प्रिय थालने वाली पीमित्रयों के धर्म सामने में निपुण पी ऐमा चन्द्रमा ने विचार करके ही प्रमदम के भाप ( २९ ) इसका विवाह कर दिया। यह अपने पति की सेवा में तत्पर रहती थी तो भी वहुत समय तक इसको सन्तान नहीं हुआ तब उस चन्द्रसेनाने पुत्र की इच्छा से नम्र होके पति से प्रार्थना की। अथ प्रमर्दनः प्राह प्रिये पुत्रेण किं फलम् । सन्तत्या दुःखमेवाप्यं न सुखं प्राप्यते क्वचित् ॥६॥ अर्थ-इस उपरान्त प्रमर्दन ने अपने स्त्री से कहा कि है प्यारी पुत्र होने से क्या फल है सन्तति होने से दुःख ही प्राप्त होता है सुख कहीं नहीं मिलता। तस्मादाचां वदरिकाश्रमं यावस्तपोऽथिनौ। प्रणवस्मरणं तत्र कुर्वन्तौ सततं हाद।।७।। इदं शरीरमुत्सृज्य मुक्तो स्याव च संसृतेः । इत्थं पतिवचः श्रुत्वा चन्द्रसेनाब्रवीत् पुनः ||८|| -तस्मात् अपने दोनों तपस्या करने के लिये यद- रिकाश्रम में चले यहां चल के सर्वदा हदय में प्रणव का स्मरण करते हुए श्म शरीर को छोड़ के संसार से मुक्त होजायें। ऐमा पति का यधन सुन के चन्द्रसेना फिर कहने सगी॥ स्वामिस्तत्रैव यास्यावः स्मरावः प्रणवं परम् । परं भवतु मे पुत्रो धर्मात्मा कोपवर्जितः॥९॥ अर्थ हे सामी! यदरिकाश्रम ही में चलें और प्रणव का स्मरण करें परन्तु मुझे धर्मात्मा और क्रोध रहित पुत्र होना चाहिये। श्रय ( ३० ) वीक्ष्य पत्न्या हठं पूर्णं सोऽपि राजा प्रमर्दनः। तपश्चचार परमं स्त्रिया वदरिकाश्रमे ॥१०॥ महान् कालो व्यतीयाय प्रणवं स्मरतोस्तयोः। ब्रह्मा विष्णुः शिवः प्रादुर्भूत्वा प्रोचुःपुरस्तदा।।११॥ प्रमर्दन प्रसन्नाः स्मः सपत्नीकस्य ते वयम् । तपस्यतो वरं ब्रूतां दास्यामस्तमसंशयम् ॥१२॥ अर्थ-वह प्रमर्दन राजा अपने स्त्री का पूर्ण हठ देख के उसके साथ बदरिकाश्रम में जाके परम तपस्या करने लगा। उन दोनों को प्रणव का स्मरण करते हुए यहुत काल बीत गया तब ब्रह्मा विष्णु और शिव सामने प्रगट हो के बोले कि हे प्रमर्दन । तेरे सपत्नीक की तपस्या से हमलोग प्रसन्न हैं, तुम वर मांगो, निःसन्देह हम उसको देंगे। अथ प्रमर्दनः प्राह प्रसन्ना यदि मेऽनघाः। भवन्तस्तर्हि धर्मात्मा सुशीलस्तनयोस्तु मे ॥१३॥ शिवादयस्तदा प्रोचू राजन देवास्त्रयो वयम् । एकमेकं सुतं दद्मस्त्वं त्रिपुत्रो भवाधुना ॥१४॥ कुण्डं कृत्वा विधानेन त्वं वेदत्रयमन्त्रतः। हव्यद्रव्यैर्जुहधि ते त्रयः पुत्राभवन्त्यिति ॥१५॥ अर्य-प्रमर्दन योला कि हे पुपयरुप देयताओं ! मदि साप प्रगत है तो मुझे धर्मात्मा और मुशील पुत्र हो । तव गिय आदि देयता बोले कि हे राना! हम तीन देयता है, - ( ३१ ) अर्थ एक एक पुत्र दुमको देते हैं प्रध तुम तीन पुत्र वाले होजाओ तुम विधान से कुण्ड बनाओ उसमें होमद्रव्य लाकर तीनों वेद के मन्त्र से होम करो जिससे तुमको तीन पुत्र हो । • ततः प्रसन्नमनसा श्रीमान् राजा प्रमर्दनः। कुण्डं विधाय विधिवद्यजुर्मन्त्रैरथाजुहोत् ॥१६॥ तदाग्निकुण्डान्निष्कम्य सवालो भगवान शिवः । वालं प्रमर्दनायादात् सोऽग्रहीद्वपरितः॥१७॥ ---इस पीछे राजा प्रमर्दन ने प्रसन्न होके विधि पूर्वक कुण्ड बना के यजुर्वेद के मंत्र से होम किया तय भ्रग्नि कुण्ड से श्रीभगवान् शिव जी याला लेकर निकले और उन्होंने वह बालक प्रमर्दन को दिया राजा ने भी हर्ष पूर्वक उसको ले लिया ऋङ्मन्त्रहोमतश्चानेब्रह्मा निष्क्रम्य वालकम् । प्रायच्छचन्द्रसेना तं जगृहे हपपूरिता ॥१८॥ -~जय ऋग्येद के मन्त्र ने राजा ने होम किया तय अनिमुण्ड में मे ग्रामाजी ने निझन फर यालझ दिया उस पालक को प्रसन्न होके चन्द्रसेना ने ले लिया। अथ राजा साममन्द्र रारेभे हवनं पुनः । तदा रजस्वला चन्द्रसेनासीदय केशवः ॥१९॥ वन्दिण्डाद्विनिष्क्रान्तः कुरुपशिशुना सह । अथ राजाह भगवन्कुपो बालकः कथम् ॥२०॥ विष्णुराहाय पनी ते पुषिणीति कुरुपकः। . श्रधः- ( ३२ ) लोभी विश्वासघाती च भवितायं न संशयः॥२१॥ तदा राज्ञा च राड्या च प्रार्थितो भगवान हरिः। नायं पुत्रो रोचते नौ कस्म चिदेहि ते नमः।।२२।। अर्थ-फिर राजा ने सामदेव के मन्त्र से होम करने का प्रारम्भ किया उस समय धन्द्रसेना रजस्वला थी। श्रीविष्णु- भगवान् एक कुरूप वालक को लिये हुए कुण्ड में से निकले । राजा ने कहा कि भगवान् यह बालक कुरुप क्यों है। श्रीविष्णु भगवान् ने कहा कि तुम्हारी स्त्री रजस्वला है इसलिये वा- लक कुरूप हुश्रा फिर यह यालक लोभी और विश्वासघाती भी होगा इसमें भी कुछ सन्देह नहीं है। तब राजा रानी दोनों ने विष्णुभगवान् से प्रार्थना की कि ऐसा पुत्र हमको अच्छा नहीं लगता श्राप और किसीको दे दीजिये प्रायको नमस्कार करते हैं। तत्राग्रसेन नामकः शूद्र आसीदुपस्थितः । सतं जग्राह तनयं सोऽग्रनामा भवत्ततः ॥२३॥ अर्थ-यहां एक शूद्र अग्रसेन नाम फा उपस्थित था उस ने उम यालक को लिया इस कारण से ठस यालक का नाम माया॥ स वालको वणिग्वृत्या योगक्षेमं चकार ह । मरुभूमाववालोच ततो गजा प्रमर्दनः ॥२॥ पुत्राभ्यां भार्यया नन्द्रसेनया लधुरं ययौ। अयो कतिपयाहोभिः पशुरामोमहायशाः ॥२५|| चक्र प्रतिज्ञा क्षत्रान्तकारिणी कारणान्तरात् । 1 अर्थ-ग्रह बालक वैश्यवृत्ति से जीवन करने लगा और मारवाड़ में जाकर रहा । इस पीछे राजा समदन दो पुत्र और स्त्री के साय अपने नगर में बाया। इस पोछे कितने ही दिन बीतने पर श्रीपरशुराम जी ने किसी कारण से क्षत्रियों का संहार करने की प्रतिमा की। अथ सूर्यकुलोत्तंसः स च राजा प्रमर्दनः॥२६॥ भयाद्रमणकडोपे न्यवात्सीत् स्वकुलावृतः। चन्द्रसेना स्ववालेन देशं पश्चनद ययौ ॥२७॥ भयातू परशुरामस्य क्षत्रियाः खत्रिया इति । तद्दालवण्याः सर्वेऽपि वभुवुर्जीवनार्थिनः ॥२८॥. अर्थ-इस पीछे वह सूर्यवंशी राजा प्रमर्दन परशुरामजी के भय से अपने कुटुम्ब के साथ रमणक द्वीप में जाकर रहा। चन्द्र सेना अपने बालक के साथ परशुराम जी के भय से पंजाष देश में जाकर रहो और ये यालक भार उसके वंश वाले परशुराम जी से बचने की इच्छा से क्षत्रिय रहते सत्रिय कहलाये। अध च रमणकाख्यं द्वीपमेत्य न्यवात्मुः परशु घरभयाये क्षत्रियाः सूर्यवंन्याः। भुवि चरवणहाराश्चेतिविख्यातिमापुः खलु च रमणहारा रौनियाराश्च वैदया॥२२॥ अर्थ-जो मृपयंशी राजा परशुरामजी के भय से रमहरु द्वीप में जाकर रहे ये भूमि पर, रवणहार, रमणहार, रोमियार कहलाये और वैश्य हुए ॥ इति ब्रह्मज्ञानशास्त्र श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक परशुरामसंवादे राजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत भापाटीकायां पष्टः सर्गः ॥६॥ घाल्मीकिरुयाच। कुर्वन राजन्यसंहारं पशुंभन्मिधिलां ययौ । प्रविष्टस्तत्र समिति जनकस्य महात्मनः॥१॥ अर्थ-परशुरामजी क्षत्रियों का संहार करते हुए मि. थिला नगर में गए। वहां महात्मा जनक राजा की सभा में पहुंचे। तत्र हाहेति कुर्वन्तः सर्वे सभ्याः समुत्थिताः । प्रणम्य दण्डव भूमौ पुरः प्रांजलयःस्थिताः॥२॥ अर्थ-यहां सय मभासद लोग हाहाकार करते हुए उठ सोपचार दपयत् प्रणाम कर हाय मोड, गामने राहेएए । मिथस्ते प्रोचुरद्यास्य न राज्ञो जीवनं भवेत् । मुनिस्तु जनकं भूपं हनिप्यति न संशयः ॥३॥ अर्थ-येनोग मापग में कहने लगे कि साइम राजा का जीयन नहीं रह गकता। जनक राजा को परशुरामजी मा. निगमे गन्देशमी।

क्षत्रियाणां वधार्थीय प्रतिज्ञामकरोद्यतः। सबैनिश्चितमेवाद्य धर्मसूर्योऽस्तमेष्यति ॥१॥ अर्थ- क्योंकि तत्रियों के वध के निमित परशुरामती ने प्रतिज्ञा की है सभा ने यही निश्चय किया है कि नान धर्म का मूर्य अस्त होजायगा ॥ जनकोऽपि प्रणम्योचे रुपं शमय भागव । मुनिराह प्रतिज्ञा मे कुमिक्षत्रियां महीम् ॥५॥ एकविंशतिकृत्वोऽहमका भूभृतां वधम् । त्वामद्यतत्पुरस्थाश्च हत्वा मुज्ये पितॄणतः ॥६॥ अर्थ -जनक राजा ने भी उनको प्रणाम करके कहा। किहे परशुरामजी श्राप कोध को शान्त कीजिये। परशुराम -जी ने कहा कि हे राजा! मेरी प्रतिज्ञा है कि पृथ्वी को नि: क्षत्रिय करूंगा। इकोस वार में क्षत्रियों का वध करचुका हूं श्राम तुमको और इस नगर के क्षत्रियों को मार कर पिता शब से मुक्त होता हूं। तच्छुत्या जनकोऽप्याह भज शान्ति रुपं त्यज । क्रोधोऽयमूलं क्रोधेन नरा निरयगामिनः ॥७॥ अर्थ-मह मुन कर जनक राजा बोले कि क्रोध को दो- से शान्ति को भजी। क्रोध पाप का मूल है, क्रोध करने से मनुप्प नरफ में जाता है। मुस्तं नश्यति रुपा विमत्वं मुनिसन्ततिः । कोषहीनेन विप्रेण भाव्यं शान्तहदा सदा॥८॥ !

( ३६ ) अर्थ:-क्रोध से सुकृत नष्ट होता है। तुम ब्राह्मण है, ऋषियों के सन्तान हो, ब्राह्मण को क्रोध रहित और शान्त स्वभाव होना चाहिये। शृणु राम महाबुद्धे यत् सहस्रार्जुने हते। प्रायश्चितेन पित्रा ते ब्रह्महत्यापमोदिता ॥९॥ गां परिक्रमता चीण कर्म तत् पठता श्रुतीः। वदाधुना त्वया भूपाः कियन्तः क्षत्रिया हताः॥१०॥ तस्त्रियो विधवा भूत्वा यत्कुर्युवर्णसंकरम् । न संशयोऽत्र तत्पापं त्वय्येवानुपते दिह ॥११|| अर्थ:-हे परशुराम जी भाप धुद्धिमान हैं मुनिये । जो राजा सहस्त्रयाहु के मारने पर तुम्हारे पिताने तुमसे मायचित फरवा फर तुम्हारी ब्रह्माहत्या मिटाई । वह प्रायश्चित करें - पृथ्वी की परिक्रमा और घेद पाठ करते तुमने किया था। फहो भय तुमने फितने महाराणा और कितने क्षत्रिय मारे। (अय तुमको कितना पाप हुआ होगा से विचारलो)। और उनको खियें विधवा होकर जो वर्ण सदर पुत्र उत्तग्न करेंगी यह भय पाप तुम्हारे ही पर पड़ेगा इसमें कोई सन्देह नहीं । अथाब्रवीत् पशुरामो राजन श्रोप्ये बचोन ते । पितृणमुक्तये हन्यां त्वां प्रतिक्षेशी मम ॥१२॥ अर्थ-स उपरान्त परशुराम जी योले कि हे राजन् | सुम्सरा यथम मैं नहीं मुगा । पिता से ठरिण होने के लिये तुम मागा ऐमो मेरी मतिभा है ।

अर्थ-ऐसा अथाह जनको राम मा हनिष्यसि किं भवात् । कस्त्वं कतेन ते किंस्याज्जावोनित्योऽस्ति हतिकम्।१३ अर्थ- -~-इस पीछे जनकराजा परशुराम जी से कहने लगे कि तुम क्या मुझो मारोगे? तुम कौन हो? तुम्हारे किये क्या होगा ? तुम कि मारते हो जीवता नित्य (अमर) है ॥ श्रुत्वेत्यं जनकात् पशुरामो बुद्ध्वात्रवीद्वचः । पितुः श्रुतं पुरा जीवन्मुक्तोऽस्ति जनकोनृपः।११। त्रिकालज्ञोऽस्ति विज्ञानेऽहत्तमोऽस्ति महर्पिपु । पितुर्यद्यञ्छूतं राज॑स्त्वयि प्रत्यक्षमेव तत् ।।१५।। वचन जनक राका से मुनकर परशुराम जी भान पाकर बोले कि हे राजा पहिले पिता जी से मुना पा कि आप जीवन्मुक्त हैं । भूत भविष्य वर्तमान तीनों कालों को जामने वाले हैं। शान में बड़े यहे ऋषियों के बीच परम पूज- भीय हैं। हे राजन् औ जो पिताजी से मुना था वह तुम मैं प्रत्यक्ष ही देखता हूं। अशक्योऽयं मया जेतुं क्रोधस्त्वदुपदेशतः। सत्यज्ञानमयाच्छान्तिमेप्यत्युपदिशाद्य तत् ।।१३॥ ~स कोध को जीत लेना यह मेरा ग्रामय नहीं है सत्य मानरूपी तुम्हारे उपदरा से शान्त है। नायगा समाज इफे उपदेश फीजिये। एवं पशुधरेणोक्त जनकस्यमवोदितम् । मुने यो नदि शोकाहः कुतस्तमनुशोचसि ॥१७॥ भः ( ३८ ) भाषसे त्वं विवेकीव मरिष्यन्ति मृताश्च ये। सखायो वांधवा इष्टाःशाचन्ति सधियो न तान् ।१८। अर्थ-रशुराममी ने ऐसा कहा तब राजा जमकबोले कि हे परशुराम जी! जो शोर करने योग्य नहीं उसका तुम शॉक करते हे और विवेकियों की जैनीवात करते हो। जो इष्ट मिन्न धान्धय मरेंगे या मागए युद्धिमान् लोग उसका शेरक नहीं करते॥ नैवमस्ति नृपा एते जातु सन्ति न सन्ति वा । सर्वे वयं भविष्यामो नहि किं मरणोत्तरम् ॥१९॥ अर्थ-ऐसा नहीं है कि ये राजा लोग कभी हैं और कभी नहीं हैं। क्या हम सब लोग मरने के उपरान्त उत्पन्न नहीं होंगे। वाल्ययौचनवार्धक्यास्तिस्रोऽवस्थास्तु देहिनाम् । यथा क्रमाद्भवन्त्यङ्गे तथा देहान्तराप्तयः ॥२०॥ अर्थ-पालत्य यौवन और युद्धता ये तीनों भयस्या जैसे प्राणियों के देह में फ्रम से होती है, वैसेही एक देह से दूमरे देहों की प्राप्ति होती हैं। अत एव तु धीमन्तो देहत्यागात् समाप्यते । इत्यवुयैव संमोहं नाप्नुवन्ति कदाचन॥२१॥ अर्थ-मलिये बुद्धिमान् लोग देह छूटने से समाप्ति हो जाती है ऐमा न समझ कर मोह को नहीं प्राप्त होते ॥

यदाचेन्द्रियवृत्तीनां संवन्धो विषयैर्भवेत् । शोतोष्णसुखदुःखानांप्रतीतिःप्राणिनां तदा ॥२२॥ विषयन्द्रियसंवन्ध आगमापाय्ययं मतः । अनित्यश्चात एवैप सोढुं समुचितो नृणाम् ॥२३॥ -जब इन्द्रियों की वृत्तियों का विषयो के साथ संवन्ध होता है तब प्राणियों को शीत, उष्ण, मुस, दुःख, इनकी प्रतीति होती है यह विषय नौर इन्द्रियों का संबन्ध जिस कारण से भागमापायी अर्थात् उत्पति विनाशशील और अनित्य है। इसीलिये मनुष्यों को इसका सहन करना अर्थ- चाहिये। विषयैस्तु न पोड्यन्ते यस्य चेन्द्रियवृत्तयः । सुखदुःखानुभवयोः तमो धीरः स मुक्तिभाक् ॥२४॥ अप-जिस पुरुष की इन्द्रिय की दृतियां विषयों से पोहा नहीं पाती तथा जो मुरा पार दुःर के अनुभव में समान है यह पीर प्राणी मोक्ष पाने के योग्य है । शीतोष्णाद्यसतां भावो नात्मन्यस्ति सदात्मनः। नाभावो निर्णयोऽस्यैक्षि यथार्थनिर्विवकिभिः ॥२५॥ भी-गीत उपयादि गत् पस्तुभ फा सारमा में भाष (मसा) नहीं है और गहरतु मारमा सा अभावही है। न दोनों का निर्णय पपा गानने याने विलियों ने देगा है। पेन सबै जगद्व्याप्तं तन्जानीराविनाशि सत् । अनवरात्मनः कोऽपि नाश क्तुं न शक्यते ॥२६॥ .

(४० )
अर्थ-जिसे यह संपूर्ण जगत् व्याप्त है उसको अवि.
नाशी और सत् जानेर । कोई भी अनश्वर (नाशरहित)
मात्मा का नाश नहीं कर सकता ॥
नित्यश्चानश्चरो ह्यात्मा प्रमाणविषयो नच।
तस्य देहादिसंबन्धो विनाशी भार्गवोच्यते ॥२७॥
अर्थ-हे परशुराम ! श्रात्मा नित्य (सर्वदा एक रूप.)
और अविनाशी है। तथा प्रमाण विषय (प्रमाणे से प्रत्यक्ष)
नहीं है उसको देह प्रादि काजो संबन्ध है वह नाशयान् कहा
जाता है।
तस्मात् क्रोधं परित्यज्य भव शान्तो द्विजोत्तम।
हन्तारं हन्यमानं वात्मानं जानाति यो नरः॥२८॥
तावुभावापे विज्ञातुं न योग्याविति मे मतिः ।
नहन्त्यात्मा यतःकं चिदन्यते नच केनचित्॥२९॥
अर्थ-तस्मात् हे द्विजोतम! क्रोध शेड फर शान्त होओ।
जो पुरुप भात्मा को मारने याला या मारा जाने वाला जानता
है ये दोनों भी सान के योग्य नहीं हैं ऐसी बुद्धि ( समझ)
कि प्रात्मा न किसी को मारता है न किसी से मारा
जाता है।
आत्माानोत्पद्यते जातु न जातु म्रियतेऽपि च ।
नोत्पद्य वर्धते नैव खभावार्यतेतराम् ॥३०॥
अतोऽजःशाश्वतो नित्यो देह नाशान नर्यात ।
मुधियोऽमुंच पभायविकाररहितं विदुः ॥३१॥

मात्मा नकभी उत्पन्न होता है और कभी मरता है। उत्पन्न होकर बढ़ता है और न स्वभाव से बढ़ता है। इसलिये श्रास्मा मज (जिसकी उत्पत्ति नहीं) नित्य (सर्वदा एकरूप) शावत (सनातन) है वह शरीर मष्ट होने से भाप मष्ट नहीं होता । बुद्धिमान् लोग इसको षड्भाव विकार रहित जानते हैं। उत्पतिनाशहीनं य आत्मानं नित्यमव्ययम् । वेत्त्यसौ घातयति कं कथं कं विनिहन्ति वा ॥३२॥ সখ—লী স্মলি কা বুবদি ঈমায় হৃষ্টে বুলি नित्य तथा अध्यय (हानि रहित) जानता है वह पुरुष कैसे किसी दूसरे से नाश करावेगा। या कैसे नाश करावेगा। प्रथ- वा कितका पाप नाश करेगा। त्पका जीण यथा वासः परिधते नवं नरः। जोर्णम परित्यज्य तथात्माप्नोति नूतनम् ॥३३॥ अतो जीर्णशरीरादित्यागान्मा शोचथा वृथा। शस्त्रादीन्येवमात्मानं न च्छेनु प्रभवन्त्यथ ॥३४॥ न दग्धुमग्निः शक्रोति न च क्लेदयितुं जलम् । नापि शोपयितुं वायुः समयों जातु जायते ॥३५॥ अर्थ-मनुष्प जैसे पुराने बस्ता को त्याग कर नए वस्त्र • अस्ति जागते वर्धते विपरिणमते धपक्षीयते नायति इति पहभाविकाराः-सका उत्पा होना २ बड़गा। परिणाम होगा पटना माना।

" (१२) को पहिनता है वैसे ही शात्मा पुराने शरीर को छोड़ के नये शरीर को प्राप्त होता है। इसलिये जीर्ण देहादि के त्याग से वृथा शोक मत करो। ऐसे मामा को शस्त्र प्रादि काट नहीं सकते अग्नि जला नहीं सकता जल गला नहीं सकता और न कभी वायु सुखाने को समर्थ होता है। आत्मावयवहीनत्वाच्छिद्राभावान्न युज्यते। छेनुं दग्धुं क्लेदायितुं जातु शोपयितुं क्वचित् ॥३६॥ श्रर्थ- प्रात्मा नवयव रहित होने से तथा वात्मा में छेद न होने से काटने जलाने गलाने वा मुखाने के योग्य कदापि किसी स्थान में नहीं है। अचलः शाश्वतः स्थाणुरात्मा नित्यश्च सर्वगः । अचिन्त्यः सोऽयमव्यक्तो विकाररहितः स्मृतः॥३७॥ एवं महर्पयस्तत्त्ववादिनः प्रवदन्त्यमुम् । तस्मात् ज्ञात्वेत्यमात्मानं न भोक उचितस्तव ३०॥ अर्थ-मात्मा अचरा सनातन स्थिर नित्य (त्रिकाल- याद्य) सर्व जगत् में व्याप्त है। प्रचिन्त्य (चितवन से बाहर अव्यक्त (नेत्र प्रादि मानेन्द्रियों मे नग्राय) विकार रहित (फर्मेन्द्रियों से अप्रत्यक्ष) ऐसा कहा गया है । तत्य वादी महर्पि लोग इस नात्मा को ऐसा कहते हैं। इसतिये ऐसा सारमा को जान कर तुम को शोक करना उचित नहीं है ।। देहोत्पत्त्या जायमानं विनष्टं देहनाशतः । मन्य से चेत् त्वमात्मानं शोको नास्तिथापि ते॥३९॥ ..

नश्यत्येव यदुत्पन्नं नष्टं जायत एव हि । निश्चयादनिवार्यत्वाच्छोकः कर्तुं न युज्यते ॥४॥ अर्थ-मात्मादेह को उत्पन्न हेने से उत्पन्न हेरता है और देह के नाश से नष्ट होता है ऐसा जो तुम मानते हो तो भी शोक करना तुमको उचित नहीं । निश्चय है कि जो उत्पन्न हुमा उसका नाश होता ही है और जो नष्ठ भया वह उत्पना होता ही है। इसका निवारण नहीं कर सकते। इसलिये शोक करना दीफ नहीं। भूतनामादिरव्यक्तं मध्ये व्यक्तं प्रजायते । अव्यक्त एव निधनं याति खेदेन किं मुने ॥४॥ अर्थ-भौतिक देह आदि की प्रादि (उत्पत्तिस्थान) अध्यक्त अर्थात् अप्रत्यक्ष प्रकृति है। बीच में व्यक्त (प्रत्यक्ष संसार रूप)हता है। फिर उसी अव्यक्त (अप्रत्यक्ष प्रकृति), में नन्त ( लय) हो जाता है। तव हे परशु राम जी! खेद करने से क्या होता है । पशुरामैनमात्मानं गुरूणामुपदेशतः । पश्यत्याश्चर्यवत् कोऽपि वदत्याश्चर्यवत् परः। ४२॥ शृणोत्याश्चर्यवत् कश्चित् कश्चिच्छुत्वापि वेद न । देहातीतस्य तस्यैवं नाशः कर्तुं न शक्यते ॥४३॥ सर्वदा सर्व भूतानां देहेप्वात्मा व्यवस्थितः । अनाश्यः सर्वभूतानि तस्मान्नाहति शोचितुम्हा

(५४ )
अर्थ है परशुराम जी ! इस प्रात्माको गुरु के उपदेशले
कोई पाश्चर्यवत् देखता है कोई पाश्चर्यवत् कहता है कोई
माश्चर्यवत सुनता है और कोई सुन कर भी इस बात्मा को
नहीं जानता। इह लिये देह से अलग ऐसे आत्मा का नाश
कोई नहीं कर हकता। यह प्रात्मा संपूर्ण प्राणियों के शरीर में
अविनाशी स्थित है । इस लिये संपूर्ण माणियों का शोक
तुम्हें करना न चाहिये ।
द्वारं दिवः खलु रणे मरणान्नृपाणा-
मुद्भादितं वरमतोऽत्र मृतिर्न नान्यः।
धर्मोऽस्ति राम निजधर्ममृपिप्रजुष्टं
सेवस्व किं नृपतिधर्मसमाश्रयेण ॥१५॥
अर्य-निश्चय है कि रण में मरने से क्षत्रियों को स्वर्गका
द्वार भुल जाता है। इस लिये क्षत्रियों का संग्राम में मरना श्रेष्ठ
हे क्षत्रियों को दूसरा धर्म श्रेष्ठ नहीं है। हे परशुराम जी तुम.
वपियों कर के सेवितम्नाभपमा (ब्राह्मण का) धर्म है उसका
सेवन करो क्षत्रिय धर्मका प्राश्रय करने से तुमको क्या फल है।
इति ध्रप्रज्ञानशास्र श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक
परशुरामसंवादे राजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत
भापाटीकायां सप्तमः सर्गः ॥७॥

(४५ परशुराम तवाद- ज्ञानयोगस्त्वया राजन सम्यगुक्तो निशम्य तम् । विनष्टौ कोधमोहौ मे क्रियायोगाददाधुना ॥शा अर्थ- परशुराम जी कहते हैं कि हे राजा जनक ! मापने मुझे उत्तम प्रकार से मान योग कहा उसको सुन कर मेरे कोप और मोह शान्त हुए अब प्राव क्रियायोग से कहिये। लक्षणं निश्चलमतेः समाधिस्थस्य किं वद । भाषते सच किं भूप कथ मास्ते च वर्तते ॥२॥ अर्थ- जो पुरुष प्रचलघुद्धि समाधियोग में स्थित है उसका लक्षण क्या है ? सो कहो। हे राजन् वह या कहता है से रहता है, कैसे बरतता है सो भी कहो ॥ यदा मनोगतान सर्वान कामांस्त्यजति निःस्पृहः । हृदात्मन्येव सन्तुष्ट उच्यते स्थितधास्तदा ॥३॥ अर्थः -राजा जनक कहते हैं कि जिस समय पुरुष या रहित हो के मनोगत संपूर्ण कामों को त्याग करता है और मन से अपने प्रात्मा ही में प्रसन्न होता है तब स्थितबुद्धि (निबलबुद्धि) कहाता है। न खिन्नं यन्मनो दुःखात् सुखानि न य इच्छति। त्यजन् रागंभयं क्रोधं स्थितप्रज्ञो मुनिः स्मृतः॥४॥ -दुःश के कारण जिनका मन वेद नहीं पाता, तो सुख की इच्छा नहीं करता और जो राग (अनुराग) भय और क्रोध को त्याग देता है यह मुनि (गननशील) स्थितप्रज फहाता है॥ न स्निोत्सुतदाराचे ने शुभान्यभिनन्दते । प्राप्याशुभानि न द्वेष्टि स्थितबुद्धिः स उच्यते।।५॥ अर्थ-ओ मनुष्य स्त्री पुनादिकों से सेह नहीं रखता, जो शुभ विषयों को पा के प्रसन्न नहीं होता और अशुभ विपयों को पा के द्वेप नहीं करता वह स्थितबुद्धि कहाता है। विपयेभ्यो हपीकाणि यः संहृत्यावतिष्ठते । यदा कूर्म इवाङ्गानि बुद्धिस्तस्य प्रतिष्ठिता *६॥ अर्थ-जो पुरुप जय विषयों से इन्द्रियों को सींच पार स्थित होता है जैसा कामा नपने अगों को समेट लेता है, तय उरफी बुद्धि निचरा होती है। विपयेभ्यो निवर्तन्ते निराहारस्य रागिणः । इन्द्रियाणि न रागाद्या मुच्यन्ते वीक्ष्य ते परम् ॥७॥ अर्थ-रागी पुरुप जय निराहार रहता है तय उसके एन्द्रिय विषयों से मिथर होते हैं । परन्तु रागादिक निएत्त नहीं होते। ये (रागादिक) भी परमात्मा के दर्शन से छूट जाते हैं। •पुरि प्रतिष्टिग होने पह ऐमादी कशी है कि पियां में रन्द्रियों को शाने मादेश रलिप पुदिहारा (किंभांपो) पर क्या फदा प्राज का टारला (४७) अर्थ- मनोहरन्ति प्रसभं यततोऽपि विवेकिनः । इन्द्रियाणि यतस्तानि वलवन्ति स्वभावतः ॥८॥ अर्थ-विवेकी और प्रयत करनेवाले के भी मन को बलात्कार अर्थात् बल से इन्द्रिय खींच लेते हैं क्योकि इन्द्रिय स्वभाव से बलवान हैं। कृत्येन्द्रियाण्यधीनान्यातीत युजन् परे मनः । इन्द्रियाणि वशे यस्य प्रज्ञा तस्य प्रतिष्ठिता॥९॥ --तब इन्द्रियों को अपने अधीन करके परमात्मा में मन लगा कर रहे। सब इन्द्रिय जिसके वश में हैं उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है । सुखादिविषयध्याता सुखाद्याधिक्यमीप्सते । तयेप्सया भवेत् कामः कोष उत्पद्यते ततः ॥१०॥ अविवेको भवेत् क्रोधादविवेकात स्मृतिभ्रमः । शास्त्रेषु गुरुवाक्येपु न विश्वसिति येन तः ॥११॥ बुद्धि विनश्यति तथा पुरुपस्य स्मृतिभ्रमात् । चुद्धेविनाशतः सद्यः खयमेव विनश्यति ॥१२॥ अर्थ- जो पुरुष सुरामादि विषयों को ध्यान में रहता है वह विषय मुसादिको अधिसता को चाहता है। उन. धिक्षता की चाह मे काम (फामना) उत्पन्न होता है, काम से कोष तपस होता है, क्रोध से प्रवियेत होता है और अधि- • यह (माले) पद केसे रहना है इस प्रश्न का ठार मा।

वेक से स्मृति भ्रम होता है (जिससे शास्त्र और गुरुवायों में विश्वास नहीं रहता उसको स्मृतिभ्रम कहते हैं)। वैसे ही स्मृतिभ्रम से मनुष्य को बुद्धि नष्ट हो जाती है। बुद्धि माश होने से तत्काल प्रापही नष्ट हो जाता है। स्वाधीनरिन्द्रयै रागद्वेषोनै विषयांस्तु यः । वश्यचित्तोऽनुभवति स शान्ति लभते पुमान् ॥१३॥ अर्थ-रागद्वेष करके रहित अपने अधीन इन्द्रियों से मन को वश करके जो विषयों का अनुभव करता है यह पुरुष शान्ति को प्राप्त होता है। शान्तिलाभात् परं सर्वदुःखेभ्यो विप्रमुच्यते । प्रसीदति मनश्चातो धीचास्य प्रतितिष्ठति ॥११॥ अर्थ-यान्तिलाभ होने के पीछे सब दुःगों से मुक्त हे। जाता है और इससे इसका मन भी प्रसव होता है। मन प्रसा होने से इसकी बुद्धि भी स्थित निसल होती है। यस्थेन्द्रियाणि न वशे सब्दुद्धिस्तस्य नो भवेत् । शास्त्रं गुरूपदेशे च न ध्यानं कतुमर्हति ॥१५॥ नरस्य ध्यानहीनस्य शान्तिमाप्नोति नो ममः । शान्तिहीनो नलभते मोक्षानन्दं सुखं कचित्॥१६॥ अर्थ-जिम पुरुष के इन्द्रिय वरा में नहीं उसको शास्त्र और गुरु के उपदेश में मद्युति नहीं होती औरयह ध्यान भी नहीं कर सकता,पानहीन पुरुप का मन शान्ति कोमहीं पाताऔर गान्तिहीन पुरुप मोलानन्द बार इस फो कभी नहीं पाता ।।

(४९) इन्द्रियै विषयासक्तैः सह कार्यकरं मनः । आकर्षयति नुः प्रज्ञामन्मसीवानिलस्तरिम् ॥१७॥ अर्थ क्योकि विषयासक्त इन्द्रियों के साथ कर्म करने वाला जो मन है वह मनुष्य की बुद्धि को खींच लेता है। जैसे वायु जल में नाव को। तद्यस्य योगिनः कामं विषयेभ्यश्च सर्वशः। आकृष्टानोन्द्रियाणि स्युः प्रज्ञा तस्य प्रतिष्ठिता॥१८॥ अर्थ-तिससे जिस योगी के संपूर्ण इन्द्रिय विषयों से अत्यन्त खिंचे हुए हैं उनकी बुद्धि स्थित है। धोरज्ञानतमश्छन्ना येपां तेषां तु तनिशि। नात्मा प्रकाशते यत्र जाग्रत्यत्र जितेन्द्रियाः॥१९॥ आत्मतत्वं विमृशतां योगिनां विषयात्मनि । निशाकाले च भूतानि जाप्रतीन्द्रियविभ्रमात् ॥२०॥ अर्थ-ज्ञानरूप अन्धकार से जिनकी बुद्धि ढकी हुई है उनकी उस रात्रि में (जहां प्रात्मा प्रकाशित नहीं होता वहां) जितेन्द्रिय योगिजन जागते हैं। और प्रात्म तत्वविचारक योगि जनों का जो विषयरूप रात्रिसमय है उसमें संपूर्ण प्राणी इन्द्रियों के विभ्रम (मनमानीचाल) से जागते हैं। प्रविश्यन्त्याप आगत्य सर्वतः पूर्णमम्बुधिम् । अनतिकान्तमर्यादं तथा यस्य च योगिनः॥२१॥ मनसा निर्विकास्यान्तरेव प्रविशन्ति ते। कामाः स मोक्षमाप्नोति नैवं विश्यकामुकः ॥२२॥ .

( अर्थ-जैसे अपनी मर्यादा से चलायमान नहीं होनेवाले और सब ओर से भरे हुए समुद्र में चारों ओर से जल प्रा कर प्रवेश करता है वैसेही मन में विकार से रहित जिस योगी के भीतरही सब कामना प्रवेश करती हैं (लीन होती हैं बाहर नहीं पाती) वह मोक्ष को प्राप्त होता है। यस्त्यक्ता कामनाः सर्वाः कर्माचरति निस्पृहः। अहंकारममत्वाभ्यां हीनः शान्तिमुपैति सः ॥२३॥ अर्थ:-जो संपूर्ण कामनाओं को छोड़ कर निस्पृह होकर कर्म करता है । और अहंकार तथा ममता से रहित है वह शान्ति को प्राप्त होता है। एपा ब्रह्मज्ञाननिष्ठा तदेना- मन्ते काले संस्मरन्नति मोहम् । आदेहान्तं चाभ्यसन मोक्षमेति नो सन्देहो भार्गवात्रास्ति कश्चित् ॥२४॥ अर्थ-हे परशुराम जी ! यह व्रल शान की निष्ठा (अवधि) है। इसको जो अन्तकाल में स्मरण करता है वह मोह को नहीं प्राप्त होता। और जो जन्म से लेकर शरीर लूटने तक इसका प्रयास करता है यह मोक्ष को प्राप्त होता है इसमें कोई गन्देह नहीं॥ इंति ग्रामजानमाग्ने श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक परशुराममंगादे राजघराममेवकलाल गुप्तकृत भापाटीकापाष्टमः सर्गः ॥७॥ मर (पं घ) वारण प्रान का ठार है।

परशुरामदवाच ।
कर्मयोगो ज्ञानयोगो ब्रूपयोगमिति द्विधा।
तयोः श्रेष्ठतरं ब्रूहि राजन् यद्यस्त्यनुग्रहः ॥१॥
अर्थ-परशुरामजी कहते हैं कि हे राजन् ! कर्मयोग
और ज्ञानयोग ऐसादे प्रकार का योग कहते है।। जो भापकी
रुपा हो तो उन दोनों में जो एक श्रेष्ठ हो सो कहा।
जनक उवाच-
कर्माण्यकृत्वा पुरुपो न ज्ञानं लभते परम् ।
सन्यासधारणादेव तथा मोक्षो न लभ्यते॥२॥
श्रध-
'राजा जनक कहते हैं कि कर्म किये यिना पुरुप
जान को नहीं पाता। वैसेही (कर्म किये विना) केवल सन्यास
धारस से मोक्ष नहीं प्राप्त होता॥
विना कर्मक्षणमपि कोऽपि जातुन तिष्ठति।
सों जनः प्रकृतिजैर्गुणैः स्वाभाविकैरिह ॥३॥
रागाद्यैरवशोभूत्वा कर्मण्येव प्रवर्तते।
इन्द्रियाणि नियम्यापि मनसा विषयान स्मरन्॥४॥
कुर्वन् कर्मेन्द्रियैः कर्म स चौरः कपटी च सः।
यस्तु भार्गव संयम्य मनो ज्ञानेन्द्रियाणि च ॥५॥
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमारभेत परित्यजन्।
फलाशा कर्मणां नूनं ज्ञानवान स स्टतोबुधैः॥६॥

( ५२ ) । अर्थ-बिना वर्म के कोई क्षण भर भी कदापि नहीं रह सकता । सभी मनुष्य प्रकृतिजन्य स्वाभाविक रागादि गुणे करके विवश हेकर कर्मही में प्रवृत होजाते हैं। जो इन्द्रियों को रोक करके भी मन से विषयों का स्मरण करता हुआ करें- न्द्रियों से कर्म करता है वह चार और कपटी है। और हे परशुरामजी! जो पुरुष मन और ज्ञानेन्द्रियों को रोक कर कमी के फल की भाशा को शेड़ कर कर्मेन्द्रियों से कर्म योग को श्रारम्भ करता है उसको विद्वान् लोग ज्ञानवान् कहते हैं।। यवर्णाश्रम कर्म कार्यमेव नरेण तत् । यतोहकर्मणः कर्मकरणं श्रेष्ठमुव्यते, ॥७॥ न सिध्यति विना कर्म देहयात्रापि देहिनाम्। • यानीश्वरनिमित्तानि कर्माणिस्युस्ततोऽन्यतः॥८॥ कर्मणो वन्धनं लोके भवतीति सुनिश्चितम् । मुक्तसंगस्ततो भूत्वा स्वकर्माणि समाचरेत् ॥९॥ अर्थ-जो वर्ण और नाश्रम का फर्म है यह मनुष्य को फरना ही चाहिये । क्रांकि कर्मरहित होने से कर्म करना श्रेष्ठ है। मनुष्यों की देहयात्रा (निर्वाह वा गति) भी बिना फर्म के नहीं हो सकती। जो कर्म ईश्वर के निमित हैं उनसे अन्यत्र लोक में कर्म का यन्धन होता है यह नियम है। इसलिये मुक्त मग (विपदा मे रहित) होकर अपने अपने कमी को फरमा चाहिये। पुरा प्रजापति–हायज्ञकर्तीद्विजादिकाः। मजाः स्टष्ट्वानवादेतयूयं योन चामुना॥१०॥ . - . प्रसविष्यध्वमेपोऽस्तु भवदिष्टार्थदायकः । यज्ञेनानेन देवास्तु हविर्भोगादिपूजया ॥११॥ पोणयध्वं ततो देवा युष्मान् वृष्ट्याद्यनुग्रहैः । पास्यन्तोत्थं परं श्रेयो मिथो भावनयाप्स्यथ ॥१२॥ अर्थ-पहिले समय में प्रजापति ब्रह्माजी ने यज्ञ करने वाली ब्राह्मण आदि प्रजा उत्पन्न करके यह कहा कि तुम लोग इस यज से (अवभृय) स्नान करौं यह तुम्हारे इष्ट भर्य को देनेवाला होगा। इस यज्ञ से देवताओं को हविग प्रादि पूजा करके प्रसन्न करो। तब देवता लोग नुमको वृष्टि आदि की कृपा करके पालेंगे। इस प्रकार (देवता और तुम लोग) परस्पर भावना से परम कल्याण को प्राप्त होगे। प्रदास्यन्तीष्टभोगान् वो देवता यज्ञपूजिताः । देवलब्धान्नभुक् चौरः पञ्चयज्ञादिकं विना ॥१३॥ अर्थ -~याज में पूजित देवता तुम लोगों को इष्ट उपभोग के पदार्थ देंगे। इसलिये पंच महायज प्रादि कर्म किये बिना जो देवता से पाए हुए भन्न को भोजन करता है वह चोर है । वैश्वदेवादिशिष्टान्नभुक् पापेभ्यः प्रमुच्यते । खोदरार्थ दुराचाराः पचन्तः पापभोगिनः॥१४॥ अर्थ-वैश्वदेव आदि यों से बचे हुए अन्न को भोजन करनेवाले लोग मध पापों से मुक्त हो जाते हैं। और जो दुरा पारी अपने ही पेट के लिये अन्न पकाते हैं वे पापहा को ओगते हैं। - अन्नात् सर्वाणि भूतानि भवन्त्यनानि वृष्टितः । वृष्टिर्यज्ञात् स कर्मभ्यः कर्म संपद्यते श्रुतेः ॥१५॥ अक्षराद् ब्रह्मणो वेदास्तस्मात् सर्वगतं तु तत् । ब्रह्म प्रतिष्ठितं यज्ञे सर्वदा विद्धि भार्गव ॥१६॥ अर्थ -अन्न से संपूर्ण भूत उत्पन्न होते हैं, अन्न धष्ठि से, यष्टि या से, यज्ञ कर्म से, कर्म वेद से, और वेद अक्षररूप पर ब्रह्म से होते हैं । इसलिपे हे परशुरामजी । उस सर्वगत ब्रह्म को सर्वदा यज्ञ में प्रतिष्ठित (विराजमान) जाना॥ यश्चैतदनुसारेण नरो नेहानुवर्तते । स पापी विषयासक्तो निरर्थ तस्य जीवनम् ॥१७॥ अर्थ-जो पुरुप इह लोक में उनके अनुसार नहीं चलता वह पापी जीव विषयों में आ सकता है और उसका जीवन व्यर्थ है।" आत्मनैव रतिर्यस्य भोगेच्छारहितोऽपि च । खयमात्मनि संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥१८॥ अर्थ--प्रात्माही से जो प्रीति रखता है,भोग की इच्छा मे रहित है (तृप्त है) और लापही अपने में संतुष्ट है उसको (कुछ भी) करना शेष नहीं है। पुण्यः पापश्च तस्यार्थः कोऽपिनास्तीति निश्चितम् । सर्वभूतेषु तस्यास्ति कोप्यर्थानां न चाश्रयः ॥१९॥ अर्थ- 1-3म पुरुष को पुगप कर्म मे या पाप कर्म मे कुछ प्रयोजन नहीं है यह निश्चय है। और उसको संपूर्ण प्राणियों में कोई अर्थ का प्राश्रय (अर्थ का भासरा वा अर्थ की इच्छा) भी नहीं है। प्राप्त अतः फलेच्छया हीनः कर्म कर्तव्यमाचर । भोगेच्छारहितः कर्म कुर्वन् मोक्षं समभुते ॥२०॥ अर्थ--इसलिये फल की इच्छा से रहित होकर कर्तव्य कर्म करो। गादि इच्छा से रहित होकर जो कर्म करता है सो मोक्ष को प्राप्त होता है। कर्मणैवाप्नुवन् मोक्षं पशुराम महर्षयः । कर्तुं कर्मोचितं लोकसंग्रहार्थं च धीमतः ॥२१॥ अर्थ-हे परशुरामजी ! महर्षि लोग कर्म ही से मोक्ष को । हुए हैं इसलिये बुद्धिमान् को लोकसंग्रह के लिये तो भी कर्म करना उचित है। श्रेष्ठा यत् कर्म कुर्वन्ति तदेव च परे जनाः। प्रमाणं मन्यते यत् स तल्लोकोऽप्यनुवर्तते ॥२२॥ अर्थ-श्रेष्ठलोग जो काम करते हैं वही और लोग भी करते हैं। वे श्रेष्ठजन जिसको प्रमाण मागने हैं औरलोग भी उमी के अनुसार चलते हैं। कर्तव्यकर्मकरणं श्रेष्ठानामुचितं ततः अन्यथा कर्मलोपेन नश्येत् तदनगो जनः ॥२३॥ अर्थ-इसलिये श्रेष्ठजनों को कर्तव्य कर्म करना उचित । अन्यथा (वे कर्तव्य फर्म न करेंगे तो उनके अनुनारी चलने वाले सब लोग कम लोप से नष्ट हो जायंगे। F • मासमश्नन्ति मुनय इति दृष्ट्वा निशम्य च । सर्वेऽपि मांसमभीयुरिति श्रेष्ठः सदाचरेत् ॥२४॥ अर्थ-मुनि लोग मांस साते हैं ऐसा देख के वा सुनकर भी सय लोग मांस साने लगेंगे इसलिये श्रेष्ट मनुष्य अच्छा कर्म करे। कर्माः कारयेत् कुर्यात् स्वयं चेत्युचितं सताम् । आत्मानमिन्द्रियादिभ्यः कर्मभ्यश्च विवेकिनः ॥२५॥ पृथग ज्ञात्वैव कुर्वन्ति न चाहङ्कारमात्मनि । खयं प्रवृतानि विदुर्विपयेप्विन्द्रियाणि ते ॥२६॥ अर्थ-इसलिये सज्जनों को उचित है कि अज्ञानी लोगों से कर्म करावें और आप भी करें। वियेकी को इन्द्रियादिको से और कमी से अलग जान करके ही अपने अहङ्कार नहीं करते क्योंकि वे जानते हैं कि इन्द्रिय अपने अपने विपयों में प्रापही प्रवृत्त हैं। निन्दन्तो ये मम मतं नानुतिष्ठन्ति विद्धि तान् । संपूर्णज्ञानरहितान् नष्टाश्च मृतकोपमान ॥२७॥ अर्थ-जो लोग मेरे मत फी निन्दा फरते हैं और उसके अनुमार प्राचरण नहीं करते उनको जानो कि संपूर्ण ज्ञान से रहित नष्ट और मृतक के नुत्य हैं। खभावमनुवर्तन्ते प्राकाधीनमात्मनः। ज्ञानिनोऽज्ञाः प्रकृत्यैव किं स्यादिन्द्रियनिग्रहात् ।२८ पुरुष अपने . ( ५७ ). अर्थ-ज्ञानी लोग और अज्ञानी भी अपनी प्रकृतिही से प्राचीन कर्म के माधीन जो स्वभाव है उसीके अनुसार चलते हैं फिर इन्द्रिय रोकने से क्या फल होगा। प्रातिकूल्यानुकूल्याभ्यां विषयेषु प्रतीन्द्रियम् । दस्यू द्वौ द्वेपरागौस्तो न तिष्ठेत् तद्वशे बुधः ॥२९॥ अर्थ-विषयों में प्रति इन्द्रियों की प्रतिकूलता से द्वेष अनुकूलता से, राग (प्रेम) होता है। ये दोनों दस्यु (लुटेरे 'वा शत्रु) हैं बुद्धिमान् इनके वश में कभी न रहे। खाचरितात्परघमाद्विगुणत्वेऽपिखधर्म एव वरः। मरणं वरं स्वधर्मे परधर्मः किल भयानको नृणाम३० अर्थ-अच्छी भांति नाचरण किये गए हुए परं धर्म से सधर्म पदि निर्गुण (बुरा) भी हो तो भी श्रेष्ठ है। अपने धर्म में रह कर मरना श्रेष्ठ है, क्योंकि मनुष्यों को परधर्म निचय से, भयानक (भयदायक) है। यत् पृच्छलि तौभार्गव कामक्रोधोरजोगुणोद्भूतो। अत्यशदावधमूलौ मोक्षपणे तावरी विद्धि ॥३१॥ अर्थ-हे परशुरामजी ! जो तुम पूछते हो, से काम और क्रोध हैं। वे रजोगुण से उत्पन्न, विषयों का प्रतिसीजन करने वाले भार पाप की जड़ हैं । उनको मोक्षमार्ग में । झाना॥ धूमेन वह्निमुकुरो मलेन गर्भो यथा येष्टनचर्मणा च ।

इहावृतं सर्वत एव तद्वत् क्रोधेन कामेन जगत समग्रम् ॥३२॥ अर्थ-जैसे धुंए से भाग, मैल से दर्पण और वेष्ठनधर्म (गर्भ लपेटने के चर्म)से गर्भ, चारों ओर से यहां घिरा रहता है धैसेही काम, क्रोध से संपूर्ण जगत् घिरा हुआ है। नित्यं जानिद्विपा कामरूपेण ज्ञानमावृतम् । प्रदहत्यग्निवदसौ.न कदाचन तृप्यति ॥३३॥ अर्थ-सदा शानियों के शत्रु काम ने ज्ञान को घेर रक्षा है । यह प्रमि के ऐसा जलाता है और कभी हस नहीं होता। मनो वुद्धीन्द्रियाण्यत्र कामस्य स्थानमुच्यते । तत्रस्थो ज्ञानमावृत्य मोहयत्येव देहिनम् ॥३॥ अर्थ--मन, बुद्धि और धन्द्रिये ये काम के स्यान फहाते हैं। फाम यहां स्थित होके ज्ञान को घेर के प्राणी को मोहित फरता ही है। तदिन्द्रियाणि संयम्य कामं दुष्कृतिनं जय । गुरूपदेशसञ्छास्त्रज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥३५॥ अर्थ-इसलिमे इन्द्रियों को जीत पर पापी फाम को जीत । ओ गुरुपदेश, शाय, पान और विज्ञान इन सभी फा नाश करने वाला है। देहादिभ्यः पराण्याहुरिन्द्रियाणि ततो मनः । बुद्धिस्तु मनसः श्रेष्ठा युद्धेः श्रेष्ठः स ईश्वरः ॥३६॥ " अर्थ-देहादि से इन्द्रिय श्रेष्ठ हैं, इन्द्रियों में मन, मन से बुद्धि श्रेष्ठ है और बुद्धि से जो श्रेष्ठ है वह ईश्वर है। निश्चयात्मकधिया नियम्य तत् संशयात्मकमनो धियः परम् । साक्षिणं समवगत्य चेश्वर कामशत्रुमथ दुर्धरं जय ॥३७॥ अर्थ-निश्चयात्मक बुद्धि से उस मंशयात्मक मन को रोक कर बुद्धि से श्रेष्ट साक्षीपरमेश्वर को भी जान फर दुर्धर (अजेय) कामरूप शत्र को जोतो। इति ब्रह्मज्ञानशाने श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक 'परशुरामसंवादे राजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत भापाटीकायां नवमः सर्गः॥६॥ वाल्मीकिरुवाच- कप्टेनाप्तो मया योग इत्यूचे जनकोनृपः। कथं लब्धस्त्वया ब्रूहि कृपयेत्याह भार्गवः ॥१॥ अर्थ-श्रीवाल्मीकि, ऋषि रामचन्द्रगी से कहते हैं कि जनक राजा ने परशुरामजी से ऐसा कहा कि यह योग मैंने बड़े फट से पाया तव परशुरामजी ने यह कहा कि तुमने योग को पाया सौ कृपा करके कहो।

जनक उवाच- अथैकदा शिवमुदे वहुकालं तपोऽचरम् । भृत्वा प्रसन्न ईशानो दत्त्वा दर्शनमत्रवीत् ॥२॥ अर्थ जनक राजा परशुरामजी से कहते हैं कि भारंभ में एक समय शिव को प्रसन्न करने के लिये मैंने बहुत काल तक तपस्या की, शिवजी प्रसन्न होकर दर्शन देकर वाले ॥ राजन यदिच्छसि वृणीष्व वरं ततोऽहं नत्वाऽब्रवं समुपशिक्षय योगमार्गम् । श्रीयोगनाथ कृपया प्रणताय मा सोऽशिक्षयत् स्वयमनश्वरयोगमार्गम् ॥३॥ अर्थ-हे राजन् जो चाहता है सो घर मांग। उसके उपरान्त प्रणाम करके मैंने कहा कि हे श्रीयोगियों के नाथ! कृपा कर मुझ नम्र को योगमार्ग सिसलाओ। उपरान्त वे शिष जी भी स्वयं अविनाशी योगमार्ग को सिखलाते भए । शिव उवाच- नो नास्तिकाय खलु नो परनिन्दकाय देयस्त्वया नृप कदाप्यविनाशियोगः। उक्तो हि योगसुविधिः परमात्मना मे. ऽहं भास्कराय मनये स उपादेिश nen इक्ष्वाकये मनुरवेत्य स चाधिकार- हीनान सुंतानकथयन च तेभ्य एतम् । संगोपितोऽप्यभवदेव विनष्टमूल- स्तुभ्यं मया जनकराज स योग उक्तः॥५॥ अर्थ-शिव जी कहने लगे कि हे राजन् ! निश्चय रसो कि इम अविनाशी योग को कभी नास्तिक और परनिन्दक को मत कहना । मुझे इस योग का उत्तम विधि परमात्मा ने कहा मैंने मूर्य को कहा, सूर्य ने मनुजी को और मनुजी ने इक्ष्वाकु राजा को कहा। उस इक्ष्वाकु राजा ने अपने पुत्रों को अनधि- कारी जान के उनको यह योग नहीं कहा । इस प्रकार गुप्त होने पर भी इस योग का मूल नष्ट होगया। सो हे जनकराज यह योग मैंने तुमसे कहा॥ मुनिभिर्मोक्षमिच्छद्भिरित्यं ज्ञात्वा पुरातनैः । सत्वशुद्धयै कृतं कर्म पूर्वैरपि युगान्तरे ॥६॥ प्रवृत्तो भव भूपाल तस्मात् त्वमपि कर्माण। इत्युत्का व्यरमच्छम्भुर्योगं तं ते ब्रुवे मुने ॥७॥ अर्थमात की इच्छा करने वाले पुरातन (प्राचीन) मुनियों ने ऐसा जान कर सत्यशुद्धि के लिये कर्म किया है, सुगान्तर में भी पहिले लोगों ने फर्म किया है। इमलिये है राजन् ! तुम भी कर्म में प्रयुत होओ। ऐसा कहके शिवजी ने विराम किया (कहना बन्द किया)। जनक राजा कहते हैं कि है परशुराम जी ! उम योग को मैं तुम्हें कहता हूं। विवेकिनोऽपि किं कर्म किमकमतिमोहिताः।

.
तते वक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा संतारान्मुच्यसेऽशुभात्।।
अर्थ-विवेकी लोग भी कौनसा कर्म करने योग्य है
और कौनना योग्य है इसमें माह को प्राप्त होते हैं। मैं वह
तुमको कहता हूं जिसको जान कर तुम अशुभ संसार से मुक्त
हो जाओगे॥
कर्म यच्छास्त्रविहितं निपि कर्म यद् भवेत् ।
त्याज्यं कर्म च दोडव्यं दुईया कर्मणो गतिः ।।९।।
अर्थ-जो कर्म शास्त्र विहित हो, जो निषिद्ध हो और
जोत्याज्य हो वह जानना चाहिये। क्योंकि कर्म की गति कष्ट
से मी जानने के योग्य नहीं है।
विहिते कमणि कत्तै यदनुचितं यच कर्तव्यम् ।
वेतिनिपिढे कर्मणिलौकिकरागादिफलनिरिच्छोयः
सर्वशुभकर्मकर्तृपु नरेप्वसो पण्डितः प्रोक्तः ।
अतएव च सकलानां सुकर्मणामेप का स्यात्॥११॥
अर्ध-जो विहित कमों में करने योग्य नहीं और जो
निषिद्ध फों में करने योग्य है ठनको नौ पुरुष जानता है और
जो लोकित रागादि फल की इच्दा नहीं रसतां यह संपूर्ण
शुभ फर्म के करने वाले मनुप्पों में पण्डित फहाता है। इसलिये
या मंपूर्ण मत्कों का फत्तां हे मरता है।
काम संकल्पहीनानि सर्वकर्माणि यस्य तु ।
ज्ञानाग्निदग्धकमक्तिः पण्डितोऽपि विकिभिः॥१२॥

अर्थ-जिप्तके संपूर्ण कर्म, काम और संकल्प से रहित हैं
उसको विवेशी लोग ज्ञानरूप अग्नि में संपूर्ण कों को जलाने
वाला और पण्डित भी कहते हैं।
सदावानन्दतप्तो यो होनः कर्मफलेच्छया ।
निराश्रयः प्रवृतोऽपि कर्मरायेप न कर्मशत् ॥१३॥
अर्थ-जो निरामय होकार कर्म फल की इच्छा से रहित
है और सदा अपने प्रानन्द में वृप्त रहता है वह कर्मों में प्रवृत
होकर भी कुछ नहीं करता।
यः कामनादिरहित वशीकृताङ्ग-
चित्तस्त्यजनपि परिग्रहजातमत ।
शारीररक्षणनिमिनकमात्रकर्म
कुर्वश्च नैव लभते दुरितानि मर्त्यः ॥१४॥
अर्थ- जो कामनादि से रहित हो शरीर और चित्त को
स्वाधीन कर सब परिग्रह को छोड़ कर भी केवल शरीर रक्षण
के निमित्त कर्मों को करता है वह मनुप्प पापफल को कभी
नहीं प्राप्त होता॥
शीतोष्णादौ समस्तुष्टो यानावर्जितलाभतः ।
निरः सर्वभूतेषु समो हर्पविपादयोः ॥१५॥
यः स कमाणि कृत्वापि बन्छ नाप्नोति मानवः।
रागादिमुक्तो निष्कामो ज्ञाने यस्य स्थिरं मनः।१६।
ईश्वराराधनाथै तु कुर्वाणः कर्म यो नरः।
सवासनेभ्यः सर्वेभ्यः कर्मभ्यः स प्रमुच्यते ॥१७॥

( ६४ ).
अथ-जो मनुष्य शीत उष्ण आदि इंद्रों को समान
जानता है जो बिना मांगे हुए लाभ से संतुष्ट रहता है, और
संपूर्ण भूतों से निर्वैर रहता है, जो हर्ष और विपाद में ममान
रहता है वह कर्म करने पर भी यन्ध नहीं पाता। जो पुरुष
रागादि से मुक्त और कामना रहित है, जिसका चित्त ज्ञान
में स्थित है और जो ईश्वर की भाराधना के लिये कर्म करता
है वह वासनासहित सपूर्ण कों से मुक्त हो जाता है ।
घृतादि हव्यं पात्राणि होमिहवनक्रियाः।
ब्रह्मैव वेत्ति ब्रह्मान्यनाप्तव्यं तस्य शिप्यते ॥१८॥
अर्थ-घृत नादि हथ्य (होम की वस्तु ) होम के पात्र,
होम कर्ता, दान का अग्नि, पीर होम सी क्रिया इन सो को
जो ब्रह्म ही जानता है उसको ब्रह्म से अतिरिक्त पाने पोग्य
वस्तु कुछ शेष नहीं है।
होमादिकमुपासन्ते देवाथै कर्म योगिनः ।
ज्ञानयोगकराः कर्म ज्ञानानो हवनादिकम् ॥१९॥
लयं ब्रह्मार्पणधिया कुर्वन्ति ब्रह्मचारिणः ।
नैष्ठिकाः संयमानौ तु श्रोत्रादीनीन्द्रियाणि च ॥२०॥
गृहस्था इन्द्रियाद्यग्नो शब्दादीन विषयानपि ।
ध्यानावस्थितलोकास्तु चितैकाग्यविभावसो |२१||
स्वग्राहकेन्द्रियेप्वयित्या सन्द्रियक्रियाः।
आत्मज्ञानसमिदे तु कुर्वन्ति ध्यानतो लयम ॥२२॥

- . अर्थ-कर्मयोग करने वाले पुरुष देवताओं के अर्थ हो मादि की उपासना करते हैं। ज्ञानयोग करने वाले ज्ञानरूप अमि में ब्रह्मार्पण बुद्धि से हवनादि कर्म का लय करते हैं। नैष्ठिक ब्रह्मचारी पुरुष श्रोत्रादि ज्ञानेन्द्रियों को संयम रूपी अग्नि में लप करते हैं। गृहस्थाश्रमी लोग इन्द्रियादि अनि मैं शब्द सादि विषयों को लय करते हैं। ध्यानावस्थित लोक आत्मज्ञान से सुलगे हुए चित्त की एकाग्रता रूपी अग्नि में संपूर्ण इन्द्रियों के व्यवहार को अपने अपने ग्राहक इन्द्रियों में अर्पण करके ध्यान से लय करते हैं। द्रव्यैः केचिद्यज्ञकृतो योगेन तपसा परे । मनसाध्ययनेनान्ये ज्ञानेनान्ये यजन्ति च ॥२३॥ यतयः खखभावेन निश्चिन्तास्तदुपासते । कुर्वन्ति पूरकेणेके लयं प्राणमपानके ॥२४॥ माणेऽपानं रेचकन केचित् केचिञ्च कुम्भकात् । माणयामपरा रुडा स्वप्राणापानयोगती ॥२५॥ अर्थ-कोई द्रव्य से, कोई योगाभ्यास से और कोई तप से यज्ञ करते हैं। कोई मनरूपी यज से, कोई वेदाभ्यास से और कोई भानयन से यजन पारते हैं। और यती लोग अपने स्वभाव से निश्चिन्त है। उस परमल की उपासना करते हैं। कोई अमान में प्राण को पूरक मार्ग से लय करते हैं ! कोई माण में अपान को रेचक मार्ग से लए करते हैं। और कोई कुम्भक से मारा और धपान की गति को रोक फर प्राणायाम में तत्पर होते हैं। २ . केचित् क्षामीकृताहारा इन्द्रियेप्चिन्द्रियक्रियाः । जुहून्त्येते यज्ञविदो यज्ञैः कुर्वन्त्यघक्षयम् ॥२६॥ अर्थ-कोई पुरुष पाहार को घटा के इन्द्रियों के व्या- पारों को इन्द्रियों में हवन करते हैं। ये सब यज्ञ जानने वाले यज्ञ करके पायों का नाश कर देते हैं। यज्ञ समाप्य समयेऽवशिष्टेऽमृतसंज्ञकम् । अन्नमश्नन्ति ते ब्रह्म प्राप्नुवन्ति सनातनम् ॥२७॥ यज्ञकविहीनस्य नाय लोकः परः कथम् । श्रुतौ बहुविधा यज्ञा विस्तीर्यैवं प्रदर्शिताः ॥२८॥ अर्थ-यत्त समाप्त करके प्रवशिष्ट काल में अमृत संज्ञक अन्न को भोजन करते हैं वे सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। मजकर्म से हीन जे लोग हैं उनका यह लोकही सिद्ध नहीं तय परलोक कैसे सिद्ध होगा। इस प्रकार से अनेक प्रकार के यज वेद में विस्तार करके दिखलाये हैं। यज्ञानेतान् वाङ्मनःकर्मजातान् विद्धि ज्ञानकावगभ्यः परेशः। हन्छुळ्या ज्ञानोपयोगी च यज्ञो यज्ञं ज्ञात्वा मोक्ष्यसे संसृतेस्त्वम् ॥२९॥ अर्थ- :-उन यजों को याणी, मन और धर्म से उत्पन्न हुए जानो,परमेश्वर एकसानही से जाना जाता है चित- राहि मे शान का उपयोगी है सो : संमार से मुक्त होगे। १

ज्ञानयज्ञः परः श्रेयान् द्रव्ययज्ञाद्यतोऽखिलम् ।
फलेन सहितं कर्म ज्ञानएव समाप्यते ॥३०॥
अर्थ-द्रव्ययज्ञ से ज्ञानयज्ञ परम श्रेष्ठ है क्योंकि संपूर्ण
फल सहित कर्म ज्ञान ही में समास (पूरा) हो जाता है ।
प्रणामप्रसेवाभिस्तज्ज्ञानं ज्ञानिनस्तव ।
उपदेक्षन्ति ते तत्वविचारे निरताः सदा ॥३१॥
अर्थ-प्रणाम, प्रश्न और सेवा करने से वे ज्ञानी लोक
तुमको उस ज्ञान का उपदेश करेंगे जो जानी सर्वदा तत्त्व वि-
चार में निरत रहते हैं।
विज्ञायचं बन्धहेतुं मोहं न प्राप्स्यसे पुनः।
द्रक्ष्यस्यखिलभूतानि ज्ञानेन परमात्मनि ॥३२॥
अर्थ-पो ज्ञान को जान कर बन्धनिमित्त मोह को
फिर नहीं प्राप्त होंगे। इस ज्ञान से संपूर्ण भूतो को परमात्मा
मे देखोगे।
. यदि त्वमसि पापिभ्यः सर्वेभ्योऽधिकपापकृत् ।
तरिष्यसि तथापि त्वं पापाब्धेनिनौकया ॥३३॥
अर्थ-यद्यपि तुम संपूर्ण पापियो से अधिक पाप करने
वाले हो तथापि पापरूप समुद्र को ज्ञानरूपी नाव से तर
जाओगे।
करोति भस्मसात् काष्ठानोहोऽमिानपावकः ।
वन्ध हेताने कर्माणि कुरुते भस्मसात् तथा ॥३॥

.
अर्थ-जैसे सुलगा हुमा अग्नि संपूर्ण लड़कियों को मस्म
कर देता है धेसे ही ज्ञानरूपी अग्नि संपूर्ण बन्धहेतु कर्मों को
भस्म कर देता है।
इहान्यज्ञानसदृशं पवित्रं तपआदि न ।
योगाद्विन्दत्यनायासं तत् कालेनात्मनि स्वयम्॥३५॥
अर्थ-इहलोक में धानसदृश पवित्र पस्तु दूसरी तप
श्रादि नहीं है यह ज्ञान योगाभ्यास से आस्मा में अनायास कुछ
फाल में आप ही प्राप्त होता है ।
गुरुपदेशे श्रद्धावान् विवेकौन्द्रियनिग्रही।
ज्ञानमाप्नोति तस्माञ्च न चिरान्मोक्षमाप्नुयात्।।३६॥
अर्ध-गुरु के उपदेश किये हुए धामयों में श्रद्धा रसने
याला विचारशील और इन्द्रियनिग्रह करने वाला पुरुष ज्ञान
फोप्राप्त होता है। और शान प्राप्त होने से शीघ्रही मोक्ष को
प्राप्त होता है।
न वेद गुरुवाक्यं योऽश्रद्धवान संशयात्मधीः ।
स नश्यति सुखं तस्य परत्रह न लभ्यते ॥३७॥
अर्थ-जी गुरु धाक्यों को वस्तुतत्य से नहीं जानता,
पदारहित और संशयात्मकमुद्वियाला है सो नाय को प्राप्त
होता है। और उसको इहलोक या परलोक में मुरा नहीं
मिलता।
योगेन सर्वकर्माणि यः करोतीश्वरार्पणम् ।
येन ज्ञानेन संछिन्नाः संशयाः स विवेकयुक्॥३८॥

! वकर्मफलवन्धे तु न जातु पतति क्वचित् । अतः परशुराम त्वं संशया ये निजात्मनः ॥३९॥ अज्ञानसंभवा स्ताँस्तु हृदयस्थान विचार्य च । ज्ञानखङ्गेन संछिन्। योगसिा समाप्नुहि ॥४०|| अर्थ-जो योगाभ्यास से संपूर्ण कमों को ईश्वर ही के अर्पण करता है और जिसने ज्ञान से संशय को नाश किया है वह विवेकी पुरुष अपने कर्म फलों के बन्धन में कभी कहीं नहीं पड़ता इसलिये हे परशुराम जी ! जो अज्ञान से उत्पन्न हृदयस्थित अपने आत्मा के सन्देह हैं उनको विचार कर ज्ञानरूपी तरवार से काट के योगमिद्धि मोक्ष को प्राप्त होओ। परशुराम उवाच- संन्यासं कर्मणां योगमपि शंससि तद्वयोः। योग्य मेकं तु यच्छ्योः राजस्तन्मेऽधुना वद ॥४१॥ अर्थ-परशुराम जी कहते हैं कि हे राजन् कर्मसंन्यास और कर्मयोग अर्थात् कर्म के त्याग और ग्रहण दोनों की प्रशंसा करते हो सो इन दोनों में से एक जो कल्याण कारक और योग्य हो सो मुझे कहो। जनक उवाच-- संन्यासः कर्मणां योगोऽप्येतो हो मोक्षदायको। कर्मयोगस्तयोःश्रेष्ठः कर्मसंन्यासतः स्मृतः॥४२॥ अर्थ-जनकजी कहते हैं कि कर्मसंन्यास और कर्मयोग ( ७० ) ये दोनों भी मोक्ष देनेवाले हैं उन दोनों में कर्मसंन्यास से कर्म- योग श्रेष्ठ कहा है। रागहेपी समौ ज्ञात्वा निईन्हो योऽस्त्यसौ नरः।। मुच्यते नित्यसंन्यासी सुखं संसारवन्धतः॥४३॥ अर्थ-जो राग और द्वेप को समान जान कर निर्द्वन्द्व ही रहता है वह नित्य संन्यासी सुख से संसाररूपी बन्धन से मुक्त होजाता है। संन्यासयोगं त्वथ कर्मयोगं मूर्खः पृथग वेत्ति न पण्डितो हि । अप्येतयोरेकमिहानुतिष्ठे- द्योऽसौ समाप्नोति फलं द्वयोश्च ॥४४॥ अर्थ-संन्यासयोग और फर्मयोग को मूर्य पृथक् जानता है परिहत पृषा नहीं जानता। इन दोनों में जो एक कामी अनुष्ठान करता है वह दोनों का भी फर अच्छी भांति पाता है। कैवल्यं पदमाप्नोति संन्यासी कर्मयोग्यपि । संन्यासकर्मयोगी द्वावकं पश्यत् स पश्यति॥४५॥ अर्थ-मसंन्यामी केयल्यपद को पाता है, फर्म योगी भो पाता है। कर्मसंन्यास, कर्मयोग दोनों को जो एक देखता यही माना देगुप्ता है। संन्यासमाश्रयति यो हि विनैव कर्म- योगं स चेह लभते खलु दुःखमेव ।

: : यः कर्मयोगमनुतिष्ठति वा मुनिः सन् स ब्रह्म विन्दति परं न चिरेण मर्त्यः ॥४६॥ अर्थ-जो विना कर्मयोग के सन्यास का आश्रय करता है वह पुरुप यहां दुःख ही को प्राप्त होता है। और जो मुनि (मन नशील) होकर कमे येग का अनुष्ठान करता है वह मनुष्य थोड़े ही काल में परब्रह्म को प्राप्त होता है। इति ब्रह्मज्ञानशास्त्रे श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक परशुरामसंवादे राजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत भापाटीकायां दशमः सर्गः॥१०॥ परशुराम उवाच-~ राजर्षे जनकेदं मे संशयं छिन्धि योगयुक् । कुर्वन्नपीह कर्माणि कमभिर्वध्यते न किम् ॥१॥ अथ-परशुरामजी जनक राजा से पूछते हैं कि हे राजर्षि जतक । इम मेरे सन्दह को मिटाओ। योगी लेग इह लोक में कर्म करते रहते भी कम से बहु क्यों नहीं होते। जनउवाच। योगाभ्यासरतो मयों वशीकत्येन्द्रियाणि च । मनसा शुद्धवुद्धिय ईश्वरं सर्वभूतगम् ॥२॥ ज्ञात्वा करोति कर्माणि कर्मभिनं स बध्यते ।

( ७२ ) योगयुक्तो विवेकी तु नरो व्यापारमिन्द्रियैः ॥३॥ कुरुते यद्यपि तथाप्यात्मानं मन्यते न हि । कर्तारं नापि कर्तृत्वाभिनिवेशं तथात्मनि ॥४॥ जिघ्रनभैश्च पश्यंश्च स्पृशन् शृरावन् स्वपश्चलन् । श्वसनपि फलैर्नासौ कर्मणां विनिवध्यते ॥५॥ ग्रहणं त्यागमुच्चामिन्द्रियाणि निजां क्रियाम् । कर्माख्याप्राणसंकोचविकासादिं प्रकुर्वते ॥६॥ अर्थ- -जनक राजा परशुरामजी से कहते हैं कि हे पर. शुरामजी! जो पुरुष योगाभ्यासयुक्त हो वह मन से इन्द्रियों को वश करके शुद्धबुद्धि हो ईश्वर को सय प्राणियों में व्याप्त जान कर कर्म करता है वह कर्मों से वद्ध नहीं होता। योग युक्त विवेकी पुरुष यद्यपि इन्द्रियों से व्यापार करता है तथापि अपने को कर्ता नहीं मानता और अपने में कर्तृत्व का घमण्ड भी नहीं रखता सूंघता हुना, साता हुआ, देखता हुआ, छूता हुमा, सुनता हुमा, सेाता हुमा, चलता हुश्रा, श्वास लेता हुभा भी वह पुरुप फों के फलों से यह नहीं होता । ग्रहण, त्याग उच्चार, कारया और प्राण वायु के संकोच विकास आदि अपने २ व्यापार को इन्द्रिय करते हैं। समर्प्य सर्वकर्माणि पुरुषः परमेश्वरे । करोति कर्म सततं हीनः कर्मफलाशया ॥७॥ अम्भस्यलच्छदइव न स पापैचिलिप्यते । बुद्रोन्द्रिपमनःकायैः कर्म कुर्वन्ति योगिनः॥८॥ .

त्यक्ता कर्मफलापेक्षां केवलं चिनशुद्धये । त्यक्ता कर्मफलेच्छां य ईश्वराराधने रतः ॥९॥ युक्तः करोति कर्माणि शान्तिमाप्नोत्यतश्च सः। अयुक्तस्तु फले सक्तः कामाचारात्रिवध्यते ॥१०॥ अर्थ-जो पुरुष संपूर्ण फों को परमेश्वर में अर्पण करके कर्मफल की आशा से रहित होकर सर्वदा कर्म करता है वह पापों से लिप्स नहीं होता, जैसे जल में कमल का पत्ता रहता है परन्तु उससे लिप्त नहीं होता। योगी लोग फर्म के फल की अपेक्षा को छोड़ कर बुद्धि, इन्द्रिय, मन और शरीर से केवल चित्त शुद्धि के अर्थकर्म करते हैं। जो पुरुष कर्मफल की इच्छा को छोड़ करमेश्वर की भाराधना में तत्पर होके स्वस्थचित्त (युक्त) होकर कर्म करता है वह इसी से शान्ति को प्राप्त होता है। और जो (अयुक्त) अस्वस्यचित है वह फल में प्रासक्त हेकर कामाचार (मनमाने पाचरण) से बद्ध होता है । देही पुरे नवद्वारे न कुर्वन्नापि कारयन् । हृदा सन्त्यज्य कर्माणि स्वस्थ आस्ते सुखी नरः॥११॥ कर्तव्यं जगतः कर्म सर्वव्यापीश्वरो न हि । सृजत्यपि नियुड़े न न कर्मफलयोजनाम् ॥१२॥ क्वचित् कस्यापि कुरुते स्वभावातु प्रवर्तते । अनायविद्यासंवन्धान्नरः कामवशानुगः ॥१३॥ अर्थ-शरीरधारी पुरुष (नेत्र आदि) नौ द्वार वाले ।

( ७४ ) . । नगर में न कुछ करता है और न कुछ कराता है। वह सब कमी को मन से त्याग करके स्वस्थ होकर सुखी होता है। सर्व व्यापी ईश्वर जगत् का कर्तव्य कर्म भाप नहीं सुजता न किसी को कर्म करने में नियुक्त करता है और न कहीं किसी के कर्म फल को जोड़ता है। मनुष्य काम के वश होकर अनादि भ. विद्या के संबन्ध से कर्म करने में स्वभाव से प्रवृत्त होता है । प्रभुनाथं न सुकृतमादत्तेऽण्वपि कस्यचित् । ज्ञानमावृतमज्ञानान्मुह्यन्ति प्राणिनस्ततः ॥१४॥ ज्ञानप्रकाशादज्ञानं येपां नष्टं प्रकाशयेत् । तज्ज्ञानमीश्वरं सूर्यो वस्तुनीव तमोपहा ॥१५॥ अर्थ-परमेश्वर किसी के पाप वा पुण्य को थोड़ा भी नही लेता है। अज्ञान से ज्ञान घिरा हुन्ना है। इससे जीव भापही मोह को प्राप्त होता है। जिनका ज्ञान प्रान के प्रकाश से नए हुनो उनका वह ज्ञान परमेश्वर को भी दिखाता है, जैसा अन्धकार मिटाने वाला सूर्य सय वस्तुओं को.प्रका- शित करता है। येपा बुद्धिर्मनो निष्ठा प्रभो तत्स्थानमीश्वरः। स ज्ञानशुद्धो ब्रह्मेति पुनरावृत्तिवर्जितम् ॥१६॥ वेत्तीशं सर्वग ज्ञो यः समदृक् तस्य नो भिदा । विद्याविनययुग्विप्रे श्वपाकेभश्वगोपु च ॥१७॥ अर्प-गिनको युद्धि मन और निष्ठा (श्रद्धा) परमेश्वर ही में है उसका स्थान पररेशरही है वह सान से निर्मल हो .

जहां से फिर नहीं पलटे उस ब्रह्म को प्राप्त होता है जो बुद्धि- मान् परमेश्वर को सर्वव्यापी जानता है और जिसकी सर्वत्र दृष्टि है उसको विद्या और विनय से युक्त ब्राह्मण में, चण्डाल में, हाथी में, कुत्ते में और गा में भेद नहीं रहता। मानसे समता येषां संसार इह तैर्जितः। ते निर्दोपं समं ब्रह्म मत्वा तद्भावमाप्नुयुः ॥१८॥ नो मोदते प्रियं प्राप्य योऽप्रियान विपीदति । अमुग्धो निश्चलो बुध्या ब्रह्मस्थो ब्रह्मविश्च सः॥१९॥ अर्थ-जिनके मन में समता है उन्होंने इहलोक में संसार को जीत लिया है वेलोग ब्रह्म को सम और निर्दोष मान कर व्रक्ष्म भाव को प्राप्त होते हैं। जो लोग प्रिय वस्तु पाकर हर्पित नहीं होते हैं और अप्रिय वस्तु से जिनको खेद नहीं होता वे लोग बुद्धि से निश्चल और मोहरहित होने से ब्रह्म को जानते हैं और ब्रह्मभाव को प्राप्त होते हैं। असक्तचित्तः पुरुषो वाह्येपु विपयादिषु ।। यत्सुखं स्खेऽनुभवति समाधिस्थोऽक्षयं सुखम् ॥२०॥ प्राप्नोति तत् पशुराम भोगा इन्द्रियवृत्तिजाः। ते दुःखहेतवोऽनित्या विवेकी नान सज्जते ॥२१॥ अर्थ बाह्य विषपादिक में प्रसक्तचित्त पुरुष जो प्रात्मा में मुख का अनुभव करता है समाधिस्य पुरुष उसी मुख को अक्षय पाता है। हे परशुरामजी 1 इन्द्रियों के पतियों से ( ७६ ) उत्पन्न जो भोग हैं वे दुःस के कारण हैं और उत्पत्ति विनाश वान् हैं। इसलिये विवेकी पुरुप उनमें नासक्त नहीं होता। कामक्रोधजद्वेगं देहोत्सर्गात् पुरेह यः । सोढुं शक्रोति स सुखी योगयुक्तो हि मानवः॥२२॥ अर्थ -काम और क्रोध से उत्पन्न मन के वेग को जो शरीर छूटने से पहिले यहां सहन करता है वह योगयुक्त पुरुष निश्चय से मुसी है। समाधिस्थो हृदि सुखी कोड़ते यः प्रकाशते । ब्रह्मभावं स सम्प्राप्य नरो मोक्षमवाप्नुयात् ॥२३॥ ब्रह्मनिर्वाणमाता ये निष्पापा ऋपयो वशे । यन्मनस्ते भेदयुध्या हीनाः प्राणिहिते रताः ॥२४॥ ये कामक्रोधरहिता यतयो यतमानसाः। विदुर्यथार्थ ते ब्रह्म ब्रह्मभावोऽभितो यतः ॥२५|| अर्थी समाधि स्थित पुरुष मन में (अन्तःकरण में) मुसी रहता है, मन ही में कोटा करता है और मन ही में मकाशित रहता है यह पुरुप ग्रह माय फो पाके मोक्ष को प्राप्त होता है। जो ऋपि लोग ग्रंन भाय को प्राप्त हुए हैं और पाप रहित हैं जिनका मन भेद घुदि से रहित अपने या में होता है ये मय प्राणियों के हित को करते रहते हैं। सो पती मोग काम क्रोध मे रहित है और गिमका मन मंपत है वे परमेसर को पपापंप में जानते हैं क्योंकि ग्राममाय उनके गामने ॥ ..

(७७)
दृष्टिंभ्रूमध्यगां कृत्वा वाह्याच विषयान् बहिः ।
प्राणापानौ कुम्भकेन नासान्तश्चारिणौ समौ ॥२६॥
संयम्य धीन्द्रियवान्तानीच्छाभीक्रोधवर्जितः।
मौनमास्ते मुमुक्षुयों मुक्त एव स सर्वदा ॥२७॥
अर्थ-दृष्टि को भृकुटी के बीच में करके वाह्य विषयों को
बाहर करके और नासिका के भीतर फिरने वाले प्राण अपान
दोनों वायु को कुम्भक प्राणायाम से समतोल करके जो मुमुक्षु
बुद्धि इन्द्रिय और मन को संयत करके इच्छा,भय और क्रोध से
रहित होकर मौन धारण करता है वह सदा मुक्त ही है ।।
'यज्ञतपोऽनुभवं कुरुते यो ।
योऽखिललोकमहेश्वरवित्तः ।
योऽखिलभूतसुहृत् परमात्मा
वेद तमेप.हि शान्ति मुपैति ॥२८॥
अर्थ-जो यज्ञ और तप का अनुभव करता है जो
संपूर्ण जगत में महेश्वर फहाता है और जो संपूर्ण प्राणियों
का मित्र परमात्मा है उसको जो मानता है वह शान्ति को प्राप्त
होता है।
इति ब्रह्मज्ञानशास्त्रे श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक
परशुरामसंवादे राजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत
भापाटीकायां एकादशः सर्गः ॥११॥

हा.मकता र कर्मरहित मनुष्य संन्यासी नहीं हो सकता। (७) जनकउवाच- स एव योगी सन्यांसो त्यक्ता कर्मफलस्पृहाम् । करोति विहितं कमानामिहोत्री न नाक्रियः ॥१॥ अर्थ- -~~जनक राजा परशुरामजी से कहते हैं कि जो कमें के फलों को इच्छा को छोड़कर वेदविहित कम करता है वही योगी (कर्मफर्ता) और वही संन्यासी (कम त्यागी) है। श्वग्निहोत्रादि कर्म गहीं करनेवाला योगी (कर्मकर्ता) नहीं यः सन्यासः स वै योगः पशुराम निगद्यते । मनःसंकल्पमत्यक्ता न योगी कोऽपि जायते।।२।। अर्थ है परशुरामजी! जो संन्यास है उसी को योग कहते हैं । येकि मन के संकल्प को त्याग किये बिना कोई योगी नहीं हो मकता॥ आरुरुक्षोनियोग हन्छुद्ध्या कर्म कारणम् । समाधिस्थस्य नुहेतुरिन्द्रियाणां विनिग्रहः ॥३॥ अर्थ -पान योग में प्रारुद होने की इच्छा करने वाले पुरुप फेो बनाकरगुदि के द्वारा फर्म कारण है और समा• धिम्य (योगारद) पुश्प को इन्द्रियों का मिग्रह कारण होता है। यस्य प्रोतिन भोगेपु न तत्साधनकर्मसु । सर्वसंकल्पसन्यासात् स योगारुद उच्यते ॥४॥ ..

( ७९ ) अर्थ-जिस पुरुष को न भागों में और न भोग के सा- धन केमों में प्रीति है वह मन के सब संकल्प छोड़ने से योगा- रूढ़ (योग में भारुढ़) कहाता है। स्वयं विवेकेनात्मानं संसारादुद्धरेदुधः । नाधो नयेत्स्वस्य वन्धुः शत्रुरात्मैव केवलम् ॥५॥ विवेकाद् हृदशे यस्य वन्धुस्तदुपकारकः । आत्मैवारिश्चापकारी भवति घविवेकिनः ॥६॥ अर्थ-विवेक ज्ञान से आपही आत्मा का संसार से उद्धार करे प्रधा गति में न डाले क्योंकि प्रात्मा का शत्र और मित्र केवल आपही है। विवेक ज्ञान से मन जिसके वश में है उसका उपकार करने वाला बान्धव आत्मा ही है और अविवेकी का अपकार करने वाला शत्रु भी आत्मा ही है ॥ शीतोष्णे सुखदुःखे च समो मानापमानयोः । शान्तधीर्यतचितोऽस्य परेशः स्यात् समाहितः॥७॥ अर्थ- शीत उष्णा, मुख दुःख और मान अपमान को जो समान मानता है, शान्त बुद्धि वाला अर्थात् रागद्वेग रहित है, और मन जिसके स्वाधीन है परमेश्वर नसके समाधि में स्थित है। निराकाङ्क्षमना ज्ञानविज्ञाने यो जितेन्द्रियः । निर्विकारः समवर्णाश्मलोष्ठो युक्त उच्यते ॥८॥ अर्थ ---जान (तत्य ज्ञान) विज्ञान (शास्त्रीयज्ञान) से जिसका मन इच्छारहित जितेन्द्रिय है, विकाररहित है और ..

जो सोना पत्थर और मिट्टी के देले को समान मानता है वह युक्त (योगमाप्त ) कहाता है। बन्धूदासीनमध्यस्थसुल्हद्विमित्रशत्रुपु. पापेषु साधुपु समबुद्धिर्यः स विशिष्यते ॥९॥ अर्थ-और पुरुष बान्धव उदामीन (न शत्रु न मित्र मध्यस्थ (न्यायकर्ता ) महत (अच्छे मन वाला), ट्विट् (हे ॥ करने वाला मित्र नीर शत्रुओं में तथा पापी और सज्जना में रहस्यात्मानमेकाको स्थितो युञ्जीत सन्ततम् ॥१०॥ रामान बुद्धि रखने वाला है वह युक्त से भी बढ़ कर है शुद्धभूमौ च नात्युच्चनीचं दर्भाजिनाम्बरैः । उपयुपरि संस्थाप्यमात्मनः स्थिरमासनम् ॥१९॥ इन्द्रियाणां क्रियाश्चित्तं संयम्यैकापमानसः । मनःस्थैर्याय युञ्जीत योगमासीन आसने ॥१२॥ सममङ्गशिरःकण्ठं निश्चलं धारयन् दिशः । अपश्यनिजनासाग्रदृष्टिः स्यात स्थिर आसने॥१३॥ ब्रह्मचर्यव्रतस्यः सन भयेन रहितः पुमान् । प्रशान्तचेताः सततं प्रणवं संस्मरेजयेत् ॥१४॥ अनेनैव प्रकारेण योगरूढस्तु पूरुषः । मोक्ष प्राप्नोत्यतःश्रेयान्नोपायो विद्यते परः ॥१५॥ यतकायमना योगी निरिच्छो निष्परिग्रहः । , ( १ ) अर्थ-योगारूढ़ पुरुष शरीर और मन को स्वाधीन कर पच्छ्रा और परिग्रह (सामग्री संग्रह) छोड़ एकान्त में (अकेला) बैठ कर सर्वदा भामयोग का अभ्यास करे। पवित्र भूमि पर न बहुत ऊंचे न बहुत नीचे सबसे नीचे कुशासन उसके ऊपर मृगचर्म आदि उसके ऊपर वस्त्र का प्रामन हो ऐसा अपना प्रासन स्थिर करके रखे। इन्द्रियों के व्यापारों को रोक कर 'मन को वश में कर एकाग्रचित होके उक्त आसन पर बैठ के मन स्थिर होने के लिये योग का अभ्यास करे। शरीर सिर और कण्ठ को समान (सीधा) और निश्चल रख कर इधर उधर न देखते, अपने नासिका के अग्रभाग पर '(मुटी के बीच) दूष्टि रख फर प्रासन पर स्थिर होवे। ब्रह्मचर्यव्रत में रहकर पुरुष निर्भय होकर शान्त चित होकर सर्वदा प्रणय (0) का स्मरण र जप करे। इसी प्रकार से योगारुड़ पुरुप मुक्ति को पाता है । इससे दूसरा श्रेष्ठ उपाय नहीं है। आस्ते धनभनत्यश्चन सदा जाप्रन्नतिसपन् । एवंविधो नरो नैव समर्थों योगसाधने ॥१६॥ कर्मचेष्टा जागरणं निद्राहारो विहारयुक् । नियता यस्य योगोऽस्य भवेत् संसारदुःखहा ॥१७॥ यस्यावतिष्ठते चितं सदा संयतमात्मनि। सर्वभोगस्पृहाहीनं स युक्त इति कथ्यते ॥१८॥ अर्थ-होमिनाशीजन के ही रहता है,जो भतिभोजन करता है, जो सदा मागता है, अयया प्रति माता, ऐमा संपूर्ण भाग की इच्छा से रहित होता है वह युक्त (योगमात) मनुष्य योगसाधन में समर्थ नहीं है। फों में चेष्टा, जागरण निद्रा, माहार और विहार ये जिसके नियम से होते हैं इसको योगसाधन संसार रूपी दुःख का नाश करने वाला होता है। जिसका मन वश में होकर सदा आत्मा में स्थिर रहता है और का फहाता है। अचश्चलो यथा दीपो निर्वातंस्थानगस्त था। आत्मयोगं तु युञ्जानो योगी यतमना भवेत् ॥१९॥ अर्थ-जैसे मियांत स्यान में रखा हुआ दीप चंवत नहीं होता (इधर उधर नहीं सुखता) पैसे मामयोग, साधने वाला योगी मन को स्थिर करे। योगाभ्यासेन रुद्वं सद्रमते यत्र मानसम् । प्रसीदत्यात्मनि धिया पश्यन्नात्मानमग्रया ॥२०॥ अतीन्द्रियं घिया ज्ञेयं तदत्यतिशयं सुखम् । यत्र स्थितोऽनुभवति व्यवते नात्मतत्वतः ॥२१॥ कश्चिदप्यपरं लाभं नाधिक मन्यते यतः । महता दुःखभारेणापि यत्रस्यो न खियति ॥२२॥ योग जानीहि तं ब्रह्मन् दुःखात्यन्तषियोजकम् । इन्द्रियार्थविरतन सोऽभ्यस्यः किल चेतसा ॥२३॥ अर्थ-पोगाम्पाप | का हुमा मग हा रगता है, तो पुद्धि में माला को देखकर अपने में प्रम दाता ६, जो इन्द्रियों से ग्रहण करने योग्य नहीं, केवल बुद्धि के जानने योग्य है, ऐसे बढ़केसे बढ़ के सुख का जहां रह कर अनुभव करता है, और प्रात्मतत्व से घ्युत नहीं होता, कोई भी दूसरे लाभ को उससे बढ़कर नहीं मानता है, जहां रह कर बड़े दुःख के वाम से भी खेद नहीं प्राता, हे परशुरामजी! उस योग को दुःख से प्रत्यन्त अलग करनेवाला जानो। उस योगका अभ्यास विपयों से विरक्त हुए नग के द्वारा करना। त्यक्ता संकल्पजान् कामान् सर्वाननवशेष्य हि । परितो मनसा सवेन्द्रियवृन्दं नियम्य च ॥२४॥ धारणासंयतधिया भवेच्छान्तः शनैःशनैः। वाद्यार्थेभ्यः पृथग योगं स्वस्थः स्थिरहदाभ्यसेत् ॥२५॥ अर्थ-संकल्प से उत्पन्न सब कामों को निःशेप त्याग करके और पारी और से सब इन्द्रियों के समूह को मनसे रोक कर धारणा से घुद्धि को रोक कर बाह्यविषयों से अलग होकर स्वस्थ होके स्थिर मन से योग का अभ्यास करे और धीरे २ शान्त होवे॥ मनो यतोयतोयाति चञ्चलत्वाद्यदस्थिरम् । आत्मन्येव वशीकुर्यात्तं निगृह्य ततस्ततः ॥२६॥ एवं शान्तमना योगी लभतेऽनुत्तमं सुखम् । ऐनोहानि शान्तरजा ब्रह्मभूतः स्वयं यतः ॥२७॥ योगी मनो नियुञ्जानो गतैना एवमन्वहम् । जीवन्मुक्तिमनायासाद् ब्रह्मसंवन्धतोऽभुते ॥२८|| हुधा से अनुरक्त हे। जहां २जाता है उसको वहां से रोककर माला उत्तमोत्तम सुख को पाता है। क्योंकि वह स्वयं, पाप और रखर गुण से रहित ब्रह्मरूप हो जाता है। ऐसे पाप रहित योगी मदा मन को नियोग करताहुमा ब्रह्म के सम्बन्ध से अनायास अर्थ-समदर्शी योग में मन को नियुक्त करके सर्वत्र, आत्मा में राय प्राणियों को श्रीर प्रास्मा को सब प्राणियों में व्याप्त देसता है। जो योगी सर्वत्र परमात्मा को धौर परमात्मा .(४) अर्थ- -मन जो चंचल होने से स्थिर नहीं है वह विषयों ही में वश कर रक्खें। इस प्रकार से शान्त चित से जीवन्मुक्ति को माप्त होता है समदृष्टि योगयुक्तमनाः सर्वत्र पश्यति । "आत्मन्यखिलभूतानि चात्मानं सर्वभूतगम् ॥२९॥ सर्वत्र परमात्मानं तस्मिन्सवं जगञ्च यः। ईक्षते परमात्मास्य न दूरे सुखभाक् च सः ॥३०॥ . . में वय जगत् को देखता है, परमात्मा इससे दूर नहीं है और यह योगी उत्तम मुरा को पाता भी है ।। यः सर्वव्यापिनं ब्रह्म वेत्त्येक कथमप्यसौ । वर्तमानोऽपि च ज्ञानी भूत्वा ब्रह्मण्यवाप्नुयात् ॥३१॥ यः सर्वप्राणिनां दुःखसुखेप्यात्मवदीक्षते । सर्वत्र पशुरामासी योगिनां परमोनमः ॥३२॥ अर्थ-सा पर्यव्यापी एकही प्रत को जानता है यह किसी प्रकार में रहे तो भी मामी होकर प्रलमें प्राप्त होता है।

जो सम्पूर्ण प्राणियों के सुख दुःख के समान सर्वत्र देखता है, हे परशुराम जी वह योगियों में परमोत्तम है। इत्थं परशुरामोऽथ श्रुत्वा जनकमब्रवीत् । राजन योऽयं मनःस्थैर्यहेतवे योग ईरितः ॥३३॥ त्वयास्य चिररात्राय नेक्षे पश्यन् स्थिरां स्थितिम् । मनसस्तरलत्वेनास्थिरत्वाच्च स्वभावतः ॥३४॥ मनस्तु चंचलं देहेन्द्रियप्रमथनं वलि । दुर्भेयं चापि विपयवासनाखनुरागतः ॥३५॥ तन्निग्रहोऽतिकठिनो यदजेयं स्वभावतः । वायुः सर्वत्र खव्याप्तो यथा रोढुं न शक्यते ॥३६॥ अर्थ -मनन्तर परशुराम जी ऐसा वचन मुन कर जनक राजा से बोले कि हे राजन् ! जो यह योग मन स्थिर हेग्ने के लिये मापने कहा देखते हुए भी इसकी थहुत काल तक स्थिर स्थिति नहीं देखता क्योंकि मन स्वभाव से चंचल और अस्थिर है। मन चंचल देह और इन्द्रियों को मयनेवाला बलवान् है और विषय को यासनाओं में अनुराग रहने से दुर्भद्य (दृढ़) भी है। इसलिये स्वभावतः ओ जीतने योग्य नहीं ठमका नि. ग्रह करना बहुत कटिन है जैसे आकार में सर्व व्याप्त घायु के रोक नहीं सकते। जनको यात्रवीत्पर्युराम सत्यं ब्रवीपि यत् । संशयो नास्ति मनप्तचंचलत्वेऽस्य निग्रहः ॥३७॥ ।

निग्रह किसी से हो नहीं सकता । एक ब्रह्म में तदाकार अभ्यास निग्रह होता है। जिसका मन स्थिर नहीं उसको योगसिद्धि कर्तुं शक्यो न केनापि ब्रह्मण्यभ्यासयोगतः। वैराग्येण मनोवृतिविषयाणां च गृह्यते ॥ ३८॥ निश्चिनीमोह दुष्प्रापो योगस्त्वस्थिरचेतसा । शकोत्युपायतोऽवा यत्नवान वश्यमानसः ॥३९॥ ---इस पीछे ननक जी बोले कि है परशुराम जी! ' सत्य कहते है।। मन के चंचलपने में सन्देह नहीं है और इसकी करने से और मन की वृत्ति और विषयों के वैराग्य से मन की अर्थ - . नहीं हो सकती ऐमा निद्यय करता हूं। परन्तु मन जिसके बछ में है यह यन्त्र करे तो उपाय से योग सिद्ध हो सकता है। परशुराम उवाच-~~ योगप्रवृतः श्रद्धावानप्रयत्नात्तु योगतः। चलचेता योगसिद्धिमप्राप्तो याति को गतिम् 1201 ब्रह्ममाप्तिपथोपाये मूढः स्थैर्यमलब्धवान् । कबिच्छिनाभ्रवदयेन्द्रप्टो योगक्रियाध्वनोः ॥४१|| इमं मे संशयं दूरीकर्तुं योग्यस्त्वमेव हि । त्वदृते नास्ति कोऽप्यस्य संदेहस्य निवर्तकः ।।४।। अर्थ-परशुरामती योले कि देगनकली जो पुरुप बहाः पान देकर योग मार्ग में प्रयुक्त हो परन्नु प्रयास करने मे पोग गमन पणित दो योगमिति को प्राप्त हुन्ना ग्रह काम भी गति को प्राप्त होगा। ब्रह्म प्राप्ति के मार्ग के उपाय में मोहित होकर स्थिरता को न पाकर योगमार्ग और कर्ममार्ग दोनों से भष्ट होकर क्या वायु से बिखरे हुए मेघ के समान नष्ट होजाता है ? इस मेरे संदेह को दूर करने के योग्य प्रापही हैं। आपके बिना कोई भी इस संदेह का मिटाने वाला नहीं है । जनश उवाच- कर्मभूमाविह भ्रष्टयोगस्यैनो न नारकः । परलोके न सत्कर्मा दुर्गतिं याति नो यतः ॥४॥ अर्थ-जनकजी बेग्ले कि हे परशुरामजी योग भ्रष्ट पुरुष को इस धर्म भूमि में न पाप है और न परलोक में नरक है क्योंकि उत्तम कर्म करने वाला दुर्गति को नहीं प्राप्त होता ।। यत्राश्वमेधादिकतो यान्ति तत्र चिरं वसन् । योगभ्रष्टः सदाचारिधनिनां जायते कुले ॥४॥ अल्पाभ्याती चिराभ्यासी त्वेवमुत्पद्यत्ते कुले। योगिना मेव जन्मेदृगिह मन्येऽतिदुर्लभम् ।।४।। तत्र प्राग्जन्मदेहस्य संवन्धाधुज्यते दिया। तयैव च ततो भूयो यततेऽधिकसिद्धये ॥४६॥ प्रागभ्यासेन तेनैवावशो योगे स्थिरो भवेत् । शब्दब्रह्माखिलं वेद योग जिज्ञासतेऽपि यः 12७॥ अर्ध-थोड़े साल नभ्याम करने वाला योग भष्ट पुरुप जहां अश्वमेघ धादि या करने वाले जाते हैं वहां बहुत काल

तक वास करके उत्तम प्राचारवाले धनवानों के कुल में उत्पक
करता है। फिर उसी पहिले किये हुए अभ्यास के विवश होकर
योग में स्थिर होजाता है। जो पुरुप योग को जानने भी चाहता
अर्थ-योगाभ्यास में अधिक यन फरसेवाला पुरुष पाप
रहित होकर अनेक जन्मों के योगाभ्यास से सिद्धि पाकर मानी
होता है। बहुत काल का अभ्यासी तो ऐसे ही मोगियों के ही
कुल में उत्पन्न होता है। इस लोक में ऐसा जन्म मैं बहुत दुर्लभ
भानता हूं। वहां पूर्वजन्म के देह के संबन्ध से उसी योगबुद्धि
से युक्त होता है पीछे फिर अधिक सिद्धि पाने के लिये यत्न
है वह संपूर्ण शब्द ब्रह्म (घेद) को जान लेता है।
यतमानोऽधिकं योगे निष्पापो ऽनेकजन्मनाम् ।
योगाभ्यासाल्लब्धसिद्विानी सन्मोक्षमाप्नुयात् ४८
कृच्छ्रादितपप्तां कर्तुरिष्टापूर्तादिकर्मणाम् ।
ज्ञानिनोऽप्यधिको योगी मुनेऽतो योगमभ्यस ।१९।
होकर मोक्ष को पाता है कृच्छ्र थामायणादि तप करने वाले
इष्टापूर्स (मन्दिर तलाय यनाना) प्रादि कमों से करने वाले
और सानियों (सामान्य मानियों) में भी योगी यह कर है।
हे परशुराम जी इसलिये योग का सम्पास फरो।
यो मनो निघाय सुस्थिरं परे
ब्रह्मणि स्वयं तु संयतःपुनः ।
श्रद्वयोमिति स्म सन्ततं जपन्
श्रेष्ठ एव योगिनां मतो मम ॥५०॥

अर्थ-जो परब्रह्म में मन स्थिर रख के फिर खयं भी संयत होकर श्रद्धा से ॐ ऐसा सर्वदर जपता हो उसे मैं यो- गियों में श्रेष्ठ मानता हूं। इति ब्रह्मज्ञानशास्त्र श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक परशुरामसंवादे राजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत भापारीकायां द्वादशः सर्गः॥१२॥ जनक उवाच--- तच्छृणु ॥१॥ परमात्माश्रयो योगं तदासक्तहदाभ्यसन् । सर्वैश्वर्ययुतं तं चासंशयं वेत्ति अर्थ-जनमानी परशुरामजी से कहते हैं कि हे ऋपे परमात्मा के प्राश्रय होकर उसो में मन लगा कर जो पुरुष योगाभ्यास करता हो वह विना सन्देह के सम्पूर्ण ऐश्वर्य सहित उस परमात्मा को जानता है, वह सुनो ।। वक्ष्याम्यशेषतो ज्ञानं विज्ञानं ते शुभे पथि। ज्ञात्वेह यत् पुनश्चान्यज्ज्ञातव्यं नावशिष्यते ॥२॥ सिद्ध्यै सहस्रनृप्वेको यततेऽधिकपुण्यवान् । • यतमानशतेप्वेको वेति तत्त्वत ईश्वरम् ॥३॥ अर्थ- मैं तुम्हें ज्ञान और विज्ञान (शास्त्र ज्ञान) संपूर्ण कहता हूं जो इहलोक में जान कर फिर शुभ मार्ग में और যথায় जानना शेप नहीं रहता। हजारो में एक मनुष्य सिद्धि के लिये अर्थ-पथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि र महंकार यह पाठ प्रकारों से अलग २ अपरा (जड़)नाम की प्रकृति परमेश्वर की है । इससे अन्य जीवरुप सुचेतन त्तस्मिन् प्रोतं मणिगणा इव सूत्रेऽखिलं जगत् ॥७ या करता है। और सैकड़ो यब करनेवालों में एक पुरुष रीति से परमात्मा को जानता है। भृरापोग्निः समीरः खं मनो बुद्धिरहंकृतिः अपराख्याप्टधा भिन्ना प्रकृतिः परमात्मनः ॥४॥ इतोऽन्यां प्रकृति विद्धि जीवभूतां सुचेतनाम् । ब्रह्मन् परेतिविख्यातां येदं धारयते जगत् ॥५॥ (चानयुक्त) परा (चेतन) नाम की प्रकृति को हे परशुरामजी! जाना जो इस संपूर्ण जगत् को धारण करती है। विधाप्रकृतिजान् सर्वान् विद्धि स्थावरजङ्गमान् । मृतांश्च सर्वजगतः सृष्टिप्रलयकदिभुः ॥६॥ श्रेष्ठं परशुरामान्यन्न किंचित् परमात्मनः । 4 अर्थ ~ मन स्थायर जंगम भूतों को पर और अपरा दो प्रकार की प्रकृति में उत्पन्न जानो और संपूर्ण जगत् को राष्टि और प्रलय का फतां परमेश्वर यह भी जाना । है.परशु: रामती : परमात्मा में अन्य और कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है। उस परमात्मा में गथ जगत पिरोया हुआ जैसे मृत में बहुत मधि विनास है। ।

परमात्मा सुगन्धः कावग्नौ तेजो जले रसः।
चन्द्रकयोः प्रभा शब्द आकाशे नृषु पौरुषम् वा
ॐकारोऽखिलवेदेषु सर्वभूतेषु जीवनम् ।
तपखिपु तपश्चास्ति विद्धीत्यं पशुराम तम् ॥९॥
स चराचरभूतानामादिहेतुः सनातनः।
यस्तु तेजखिना तेजो धीमता बुद्धिरुच्यते ॥१०॥
कामरागादिरहित वलं च बलिनां तु सः।
कामः परात्मा भूतेषु धर्म न विरुणद्वि यः ॥११॥
अर्थ-पृथ्वी में सुगन्ध है सो परमात्माही है। ऐसेही
अनि में तेज, जल में रस, चन्द्र मूर्य में प्रमर (कान्ति ),लाफाश
में शब्द, मनुष्यों में पराक्रम, मंपूस वेदों में ॐ कार, संपूर्ण प्रा.
गियों में जीवन, तपस्त्रियों में तप, यही परमात्मा है, हे पर-
शुरामजी ! ऐसा माना । वह सदा रहने वालाघर अचर जगत्
का प्रादि कारण है जो परमात्मा तेजस्वी पुरुषों में तेज है,
युद्धि मानों में वृद्धि है,यलयानों में कामारागादि रहित यल है,
धौर वही परमात्मा प्रारियों में काम, जो धर्म का विरोधी
न हो, उसका स्वरूप है।
सात्विका दमशान्त्याद्या उत्पन्नाः परमात्मनः।
भाया हर्पविपादाद्या राजसास्तामसा अपि ॥१२॥
शोकमोहादयः सर्व सन्ति ते परमात्मनि ।
परमात्मानतेयस्ति ब्रह्मन जानीहि तत्त्वतः ॥१३॥

अर्य-सात्विक प्रादि तीन गुणमय भावों से यह जगद
मोह को प्राप्त है से उन भावों से परे जो विकार रहित पर
अर्थ-सायिक दम, शम प्रादि राजस रई, विषाद
और तामस शोक, मोह भादि सभी भाव परमात्मा से उत्पन
हैं वे सब परमात्मा में हैं परमात्मा उनमें नहीं है हे परशुराम
जी यह यथार्थ जानो।
सात्विकाद्यैर्गुणमयैस्त्रिभिर्भावैरिदं जगत् ।
मोहितं वेचि नो तेभ्यः परमव्ययमीश्वरम् ॥१४॥
दैवी दुरत्ययेशस्य मायैपा त्रिगुणात्मिका ।
य ईशं शरणं यान्ति त एवास्यास्तरन्त्यपि ॥१५॥
मात्मा है उसे जगत् नहीं जानता।यह त्रिगुणात्मक परमेश्वर
की माया देवी है दुरत्यप (जिसका नाश करना कठिन है) है।
परमात्मा के शरण जाते है वे इससे भी तर जाते हैं ।
ईश्वरं न प्रपद्यन्ते मूढाः पापा नराधमाः।
नारका आसुरं भावं मायाहतधियः श्रिताः ॥१६॥
अर्थ-मोद को प्रास हुए पापी, अधम नर, परमात्मा
के शरस में नहीं जाते काफिमापा से जिनका ज्ञान नष्ट हुमा
है ये सार भाप को घायय फरके नरक में जाते हैं।
ज्ञात्पर्धाधों च जिज्ञासुरात एवं चतुर्विधाः ।
भजन्ते परमात्मानं ब्रह्मन मुरुतिनो जनाः ॥१७॥
तेप्चेकभक्तिः सततयुक्तो ज्ञानी विशिष्यते ।
इश्वरोज्ञानिनःप्रेयान ज्ञानीशस्य भृशं प्रियः॥१८॥

।
( ९३ )
उदारा एव चत्वारो ज्ञानीशात्मैकभावनः ।
श्रेष्ठोऽयमेव युक्तात्माऽऽस्थितो गतिमनुत्तमाम्।।१९।।
ज्ञानी च परमात्मानमाप्नोति बहुजन्मभिः ।
सर्वं जगत् परात्मै वेतिज्ञानी दुर्लभो भुवि ॥२०॥
अर्थ-ज्ञानी (तत्वज्ञ) अर्थार्थी (प्रयोजनाभिलाषी)
जिज्ञासु (जो जानने चाहता है) आर्त (संसारकै शयुक्त)
ऐसे चार प्रकार के पुण्यवान् पुरुष, हे परशुरामजी। परमात्मा
को भजते हैं। उनमें एक परमात्मा में भक्ति रखने वाला सदा
योगसाधक ज्ञानी बढ़कर है। ज्ञानी को ईश्वर अत्यन्त प्रिय
है और परमात्मा को ज्ञानी अत्यन्त प्रिय है। चारो श्रेष्ठही हैं
परन्तु ज्ञानी परमात्मा और भात्मा को एक भावना करने से
श्रेष्ठ है। यही ज्ञानी प्रात्मयोग साधने से परमोत्तम गति को
प्राप्त होता है । जानी भी परमात्मा को बहुत जन्मों के पीछे
पाता है। सब जगत् परमात्मस्वरूप ही है ऐसा जानने वाला
जानी भूमि पर दुर्लभ है।
फलमल्पधियां नृणामनित्यं जायते सुरान् ।
भजन्तोऽनित्यदेवांश्च यान्तीशयज ईश्वरम् ॥२१॥
अर्थः
अल्प बुद्धि वाले पुरुषों को नाशवान् फल मि-
लता है। जो देवताओं को भजते हैं वे नाशवान् देवताओं ही
में प्राप्त होते हैं । और जो परमात्मा का भजन करते है वे
परमात्मा में प्राप्त होते हैं।
प्रपञ्चान्यं परं भावमव्ययं परमात्मनः।
अज्ञात्वा विग्रहधरं मन्यन्ते ह्यविवेकिनः ॥२२॥

शीतोष्णादिवन्दमोहमुक्ता ईशं भजन्ति ते ॥२५॥ अर्थ-एष्टि में सब भूत राग द्वेष से उत्पन्न और मुख दुःरामादि द्वन्द्व जिसका मूल है ऐसे माह को प्राप्त होते हैं। पुरप कर्म प्राधरण से जिनका पाप नष्ट हुधा हे वे दृढव्रत चाले पुरुष शीत उप मुरादुःरा मादिद्वन्द्वों से छुट फर परमे वेदातीतानि भूतानि वर्तमानानि चेश्वरः । भविष्याणि च कोऽप्येनं न वेद परमेश्वरम् ॥२३॥ अर्थ---प्रपञ्च से अतिरिक्त अविनाशी परमात्मा के श्रेष्ठ स्वरूप को न नाम के अविवेकी लोग परमात्मा को शरीर धारी मानते हैं । परमेश्वर भूत, वर्तमान और भविष्य तीने काल के भूतों को जानता है। इस परमेश्वर को कोई नहीं सर्गे सर्वाणि भूतानि रागहेपभवं तथा । सुखदुःखादिकहन्दमूलं मोहं प्रयान्ति च ॥२४॥ सत्कर्माचरणापां पाप नष्टं दृढव्रताः। जानता। घर को मजते हैं। जरामरणतो मुक्त्यै परमात्मानमाश्रिताः। यतन्ते ते शुद्धमात्मखंरुपं ब्रह्म तद्विदुः ॥२६॥ अर्थ -~रा और मरण मे पूदने के लिये परमात्मा का साप्रप लेकर जा यय करते हैं ये उप गुढ मात्मसाप प्रहरी सोमानते -तदाराधने साधनं सर्वकर्म यदाध्यात्मिकं साधिभूताधिदैवम् । विदुः साधियज्ञं य ईशं विवेक- युता ब्रह्मरूपं विदुस्तेऽन्तकाले ॥२७॥ अर्थ -उस परमात्मा के आराधन में साधनभूत जो अध्यात्म कर्म है उसको और अधिभूत अधिदेव और अधि- यज्ञ सहित परमात्मा को जो जानते हैं वे विवेकी पुरुप अन्त काल में ब्रह्मरूर कर जानते हैं । इति ब्रह्मज्ञानशाख्ने श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक परशुरामसंवादे राजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत भापाटीकायां त्रयोदशः सर्गः ॥२३॥ परशुराम उवाच- तद्ब्रह्म किं किमध्यात्ममधिभूतं किमुच्यते। राजन् किं कर्म किमविदैवमस्मिंस्तु वमणि ॥१॥ कोऽधियज्ञो यज्ञफलप्रदो यज्ञप्रयोजकः ।... यतचिनैः कथं ज्ञेयोऽन्तकाले परमेश्वरः ॥२॥ अर्थ-परशुरामजी बोले कि हे राजन् । ब्रह्म क्या है, अध्यात्म क्या है, अधिभूत क्या कहाता है, शर्म क्या है, अधि- देव क्या है और इस शरीर में यशफलदायक यज्ञ का प्रयोजक अधियज्ञ क्या है और अन्तकाल में नियतचित्त वाले पुरुषों से परमेश्वर कैसे जाना जाता है। जनक उवाच- - ब्रह्म तु व्यापकं श्रेष्ठं क्षरतीदं कुतोऽपि.न । खतोऽस्य जीवरूपत्वं स्वभावोऽध्यात्मसंज्ञितम॥३॥ अधिभूतमधिष्ठात्रनित्यागनदेश्च यत् क्षरत् । भूतोद्भवस्थितिकरी सृष्टिः कर्माभिधीयते ॥४॥ अधिदैवं सर्वदेवाधिपतिः पुरुषः स्मृतः । योऽन्तस्थो व्यापको देहेऽधियनः परमेश्वरः ॥५॥ स्मरश्च परमात्मानं योऽन्तकाले त्यस्तनुम् । याति यो ब्रह्मभावं स प्राप्नोत्येव न संशयः ॥६॥ अर्थ जनक जी बोले कि हे परशुराम जी ब्रह्म तो ध्यापक है, श्रेष्ठ है और कहीं से सिरता नहीं अर्थात् माय: यान् नहीं अक्षर है उसका स्थपं जीयरूप होना जो सभाध है यह अध्यात्म है। अमित्य देहादि का अधिष्ठाता और नाप- थान् अधिभूत है । भूतों की उत्पत्ति भार स्थिति फरनेवाली राष्टि कर्म कहाती है। मंपूर्ण देवताओं का स्वामी पुरुष जीय) अधिदेय कहलाता है । जो देह में अन्नास्थित ध्यापक परमेश्वर যৎ ঘি ।। গলা ব্যালন হলো ধা রা রূপ हुए देह को हार कर गाता या लगायो सयप प्राप्त दाता, गमें सदेह नहीं।

( २७ ) नरो देहं त्यजन्नन्ते यंयं भावं स्मरत्यपि । तंत भावमवाप्नोति सदा तद्भावना यतः ॥७॥ सदा स्मरेश्वरं तस्माजहिह्याववासनाम् । मनो बुद्धिं समप्येशे तमेष्यसि न संशयः ॥८॥ अर्थ-पुरुप अन्त काल में देह छोड़ते हुए जिस २ भाव को स्मरण भी करता है उस २ भाव को प्राप्त होता है क्योंकि सदा उभी झी भावना रहती है। इसलिये हे परशुरामजी सदा ईश्वर स्मरण करो और युद्ध की वासना छोड़े। मन श्रीर बुद्धि को पररेश्वर में अर्पण करके उसमें प्राप्त होगे इसमें सन्देह नहीं॥ अनन्यगामिनाभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा । प्रकाशरूपं पुरुषं परं यात्यनुचिन्तयन ।।९।। । यः परब्रह्म सर्वज्ञमनादि जगदुद्भवम् । घातारं सर्वजगतां सूक्ष्मं तु परमाणुतः ॥१०॥ अचिन्त्यरूपमादित्य इव सर्वप्रकाशकम् । प्रकृतेस्तु परं ज्ञात्वान्तकाले स्थिरचेतप्ता ॥११॥ भक्तियुक्तो धुवोर्मध्ये प्राणं योगवलेन च । निवेदयं संस्मरन याति दिव्यं परमपूरुषम् ॥१२॥ अर्थ-एफ़ान और मभ्यागयोग से युक्त को चित्त उससे स्मरण करते हुए प्रशायरूप परमपुरुष की प्रास होता है। जो पुरुष प्रमको भयंश, मनादि, जगत् का उत्पादक, मर्यजगत् का ) पालनेवाला, परमाणुसे भी सूक्ष्म, अचिन्त्यरूप, सूर्य के समान रागादिरहिता यस्मिन् यतयः प्रविशन्ति च ॥१३॥ प्रस्त कहते हैं, राग आदि से रहित यति लोग जिसमें प्रवेश फरते हैं, तपस्वी लोग जिसके जानने की इच्छा से ब्रह्मचर्य अथ-मय द्वारों को राय फर मग का पदय में पित सब वस्तु का प्रकाशक और विविध प्रकृति से पर जान के अन्त काल में स्थिर चित्त से भृगुटी के मध्य में योग धल में प्राण वायु को रखकर परमेश्वर को स्मरण करते हैं वे दिव्य परमपुरुष को प्राप्त होते हैं। यं वदन्त्यक्षरं वेदविदो ब्रह्म सनातनम् । जिज्ञासया चरन्त्यस्य ब्रह्मचर्य तपखिनः । तत् संग्रहान्मोक्षपदं वक्ष्ये संक्षेपतोऽधुना ॥१४॥ अर्थ-वेदश लोग जिसको अविनाशी सर्वदास्थित पर फरते हैं, वह मोक्षरूप त्यान मवह करके संक्षेप से कहता हूं। संयम्य सकला द्वारा निरुध्य हृदये मनः। मूर्धि प्राणान् संनिधाय योगधारणया युतः ॥१५॥ एकाक्षरं परं ब्रह्म प्रणयं व्याहरन् स्मरन् । यः दारीरं त्यजन याति स प्राप्नोत्युत्नमां गतिम्॥१६॥ करके प्रारा ही नालांट में सफर योग को धारणा मे युक्त है। एकाक्षरपी पर आधार को जपते हुए म्मरण करते हुए শীৎক্ষ্য সামছু সময় বিদা মাই यो योगी नित्ययुक्तः सन् स्मरत्येकाग्रमानसः। सततं परमं ब्रह्म तस्यासन्नः परेश्वरः ॥१७॥ अर्थ-जो योगी नित्य योगाभ्यास करते हुए एकाग्र चित्त होकर सर्वदा परब्रह्म को स्मरण करता है परमेश्वर उसके समीप है। प्राप्तेऽस्मिन् दुःखसदनं पुनर्जन्मासनातनम् । परमां सिद्धिमापना लभन्ते न विवेकिनः ॥१८॥ जन्मागत्य लभन्तेऽत्र ब्रह्मलोकान्तगा इतः। उपेत्य परमात्मानं न पुनर्जन्मभाग्भवेत् ॥१९॥ अर्थ-वह परब्रह्म प्राप्त होने पर परम सिद्धि को प्राप्त हुए विधेकी लोग दु ख का स्थान, सर्वदा नहीं रहने वाले पुन- जन्म को नहीं पाते हैं। यहां से ग्रह्मलोक तक के लोग यहां पाकर जन्म लेते हैं। परमात्मा को प्राप्त होकर फिर जन्म को नहीं पाता। सहस्त्रयुगपर्यन्तं ब्रह्मणो दिवसं निशाम् । वेत्त्यहोरावविश्वासी वेदाब्रह्म जगल्लयम ॥२०॥ अव्यक्तात सर्वभूतानि जायन्ते दिवसागमे । रात्र्यारम्भे विलीयन्तेऽव्यक्ते तत्रैव कारणे ॥२१॥ भृत्याभूत्वा निशारम्भे लीयते भूतसंहतिः । अवमा कर्मभिः स्वैःखै जायते दिवसागमे ॥२२॥ अपरं कारणाव्यक्तं परोऽन्योऽस्मात् सदातनः।

निवर्तन्ते न यं प्राप्तास्तत्स्थानं परमात्मनः॥२४॥ अर्थ--जो पुरुप, हजार युग का ब्रह्मा का दिवस और उतनी ही रात्रि को जानता है वह अहोरात्र (वित्) जानने वाला कहाता है, यह ब्रह्मा तक सब जगत के लपको जानता अक्षर है, यह परमगति कहाता है। जिसको पाए हुए पुरुप ( १०० ) अव्यक्तः सर्वभूतेषु स नश्यत्सु न नश्यति ॥२३॥ परोऽव्यक्तोऽक्षरः सोऽयं परमा गतिरुच्यते । है । दिवस के प्रारंभ में सब भूत भव्यक्त (पूर्वोक्त द्विविध प्रकृति) से उत्पन्न होते हैं और रात्रि के प्रारम्भ में उसी का. रण प्रत्यक में लीन होजाते हैं, भूतों का समूह उत्पन्न हो होकर राग्नि के प्रारम्भ में नष्ट होजाता है। यह कारण अव्यक्त अपर फहाता है इससे अन्य सदा रहने वाला अव्यक्त है वह सर्थ- भूत नष्ट होने से नष्ट नहीं होता। वह पर भव्यक्त (पूर्वक्ति) फिर नहीं पलटते वह पर अव्यक्त परमात्मा का स्थान है। चराचरं जगद्व्याप्तं येन यस्यान्तरे स्थितः । भूतग्रामोऽनन्यभन्या प्राप्यः स पुरुपः परः ॥२५॥ यर्थ-जिसने घराघर जगत् को व्याप्त किया है जिसमें भूत समूह स्थित है यह परमपुरुष एसायक्ति से पाने योग्य है । मावर्तन्ते पुनयंत्रावर्तन्ते वाप्यनेहसि । प्रयाता योगिनः कालं तं वक्ष्यामि मुने शृणु ॥२६॥ अर्ध-जिम समय में गये हुए योगी पलट नहीं पाते हैं अषमा पलट भाते हैं तए कालको कहता है परशुरामगी।

(१०१) उनरायणपण्मासा: शुक्लो ज्योतिरहोऽनलः। ब्रह्मण्यर्कसृतौ याता नावर्तन्तेऽत्र योगिनः ॥२७॥ दक्षिणायनपण्मासाः कृष्णो धूमो रजन्यपि । योगिनोऽजसृतौ याता आवर्तन्तेऽत्र ते पुनः ॥२८॥ अर्थ-उत्तरायण के छः महीने, शुक्लपक्ष, कोई तेज, दिन, अग्नि, इनमें योगी लेाग मूर्य मार्ग में ब्रह्म में जाते हैं फिर पलट नहीं भाते। दक्षिणायन के छः महीने कृष्ण पक्ष धूमा रात्रि इनमें योगी लेग चन्द्रमार्ग में जाते हैं वे फिर यहां पलट भाते हैं। ब्रह्माण्डमध्यगादानाकृष्येतार्कमार्गगः । भूम्याकर्षणतश्चन्द्रादाकृष्येताजमार्गगः ॥२९॥ अर्थ-ब्रह्माण्ड के मध्यगत भूर्य से मूर्यमार्ग में गया हुआ नहीं सिंच सकता, चन्द्रमार्ग में गया हुआ भूमि के प्रा- कर्षण के कारण चन्द्र से खिंच सकता है । सूर्यचन्द्राध्वनी शुक्लकृष्णाख्ये जगतो मते । शाश्वतेयात्यनावृत्तिमावृति क्रमतो यतः ॥३०॥ कोऽपि द्वे वर्मनी एते जानन् योगी न मुद्यति । सर्वेष्वनेहस्मु ततो ब्रह्म योगमभ्यस ॥३१॥ अर्थ-मूर्यमार्ग शुक्ल नाम का, चन्द्रमार्ग कृष्ण नाम का, जगत् का सर्वदा का मार्ग है । शुक्ल में नहीं पलटता कृष्ण में पलट माता है। इन दो मार्गों को जानता हुना कोई योगी २ ५ । यढ़ कर इसकी पुण्य होता है और मोक्षस्वरूप उत्तम ( १०२ ) मोह को नहीं प्राप्त होगा। हे परशुरामजी इससे सब काल में योग का अभ्यास करी ॥ तपोदानयज्ञेषु वेदेषु लोके प्रदिष्टं तु पुण्यं फलं यत् समस्तम् । तदत्त्येति योगी विदित्वेदमुक्तं परं स्थानमाप्नोति मोक्षस्वरूपम् ॥३२॥ अर्थ- -तप दान और यज्ञों के करने से, और वे के भ्याम से लोक में जो संपूर्ण पुण्यफल होना कहा है, योगी यह पूर्वोक्त कहा हुआ जानकर उस पुगयफल को उल्लङ्घन उससे स्थान को प्राप्त होता है। करता है, इति ब्रह्मज्ञानशास्त्रे श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक परशुरामसंवादे राजवैद्यरामसेवकलाल गुप्तकृत भापाटीकायां चतुर्दशः सर्गः॥१४॥ - ( १०३ ) जनक उवाच- सोपासनं गुह्यतमं ज्ञानं वक्ष्येऽनसूयवे । तुभ्यमेतत् सविज्ञान संसारान्मोक्ष्यसे यतः ॥१॥ शुचि श्रेयो दृश्यफलं कर्तुं योग्यं सुखेन यत् । राजयोगाभिधं धयं परं गोप्यं यदव्ययम् ॥२॥ धर्मेऽस्मिन श्रद्धया हीना पुरुषाः परमेश्वरम । अप्राप्य मृत्युसंसारमार्गे भ्रान्ताः पतन्ति ते ॥३॥ अर्थ-जनरूजी बोले कि उपासना सहित अत्यन्त गोप- नीय ज्ञान, विज्ञान के साय, मैं तुमसे कहूंगा क्ये कि तुम अमूया दोष से रहित हेर, जिसके जानने से संसार से मुक्त होगे। जो पवित्र श्रेष्ठ जिसका फल दृश्य है वह राजयोग नाम का ज्ञान मुख से करने योग्य है धर्म सहित गोपनीय और अविनाशी है। इस धर्म में जो श्रद्धाहीन पुरुष हैं वह परमेश्वर को न पा- के मृत्युरूपी ससार मार्ग में घूमते हुए गिरते हैं । ईशेनाव्यक्तरूपेण कृत्स्नं व्याप्तमिदं जगत् । सर्वभूतानि तत्स्थानि नाप्ययं तेष्ववस्थितः ॥१॥ नापि भूतानि तत्स्थानि योगं पश्येदमैश्वरम् । परात्मा भूतपातासो न भूतस्योऽय भूतमृत् ॥५॥ सर्वत्रगो महान्वायुर्नित्यं व्योमस्थितो यथा । तथेशस्थानि सर्वाणि भूतानीति विचारय ॥६॥ अर्थ-अव्यक्त (अदृश्य) परमात्मा ने इस संपूर्ण जगत् in हुए भूत ममृद को उनके कमी के अनुमार फिर उत्पवं करता।परमेघरफोमुष्टि भार मलय करने के फम, धाप के को व्याप्त किया है, सर्वभूत उस परमात्मा में स्थित हैं, परनु यह ईश्वर का ऐश्वर्य देखो कि परमात्मा सर्वभूतों में स्थित नहीं (मला) और न परमात्मा में सर्वभूत स्थित हैं-(अलग है। यह परमात्मा भूतों का पालन करने वाला है भूतों को धारण करता है, भूतों में स्थित नहीं है। जैसे सर्वत्र व्याप्त महान् । वायु सदा प्राकारा में स्थित है ऐसा विचारो॥ मलये सर्वभूतानि प्रकृति त्रिगुणात्मिकाम् । यान्ति तानि पुनः कल्पारम्भे विसृजति प्रभुः ॥७॥ लये लोनं भूतगणं स्वीकृत्य प्रकृति निजाम् । तद्दशादर्शभूयो यथाकर्म सृजत्ययम् ॥८॥ न सृष्टिलयकर्माणि वनति परमेश्वरम् । तेपु कर्मस्वनासक्तं सदोदासीनवत् स्थितम् ॥९॥ साक्षीभूतेनेश्वरेण सृजति प्रकृतिर्जगत् । चराचरमतो भूयो जायते च विलीयते ॥१०॥ अर्थ प्रलय काल में सर्वभूत त्रिगुणत्मक प्रकृति ( पूत माया) में लीन होते हैं फिर फरारम्भ में उन भूतों की परमारमा उत्पन्न करता है। यह परमामा अपनी प्रति को स्वीकार करके प्रानपक्षाल में लीन हुए और प्रकृति पर से का नहीं होते शिपमान माम माम मही उदागोर मा रहता है। प्रकृति, भारीभूरा ईशर के द्वारा

{ १०५)
जगत् को उत्पन्न करती है इससे चराचर जगत् फिर फिर उ-
त्पन्न होता है और फिर फिर नष्ट होता है (ईश्वर निमित्त
मात्र है)।
नरदेहाश्रितमिवावजानन्त्यविवेकिनः।
ईशं तस्य परं भावमज्ञात्वा भूतकारणम् ||१||
निष्फला ज्ञानकर्माशा स्तेपां विक्षिप्तचेतसाम् ।
आसुरी राक्षसी मोहकारिणी प्रकृतिं श्रिताः ॥१२॥
आश्रित्य प्रकृतिं देवी महात्मानः परेश्वरम् ।
ज्ञात्वाव्ययं च भूतादि भजन्त्येकायमानसाः ।१३।
अर्थ-अविवेकी लोग परमेश्वर को देहधारी जैसा मान
के अनादर करते हैं। भूतों के उत्पत्ति का कारण ऐसे समर्थ
उसके उत्तम भाव को नहीं जानते। उन विक्षिप्त चित्त वालों
(पागलों) के ज्ञान कर्म और नाशा निष्फल हैं। वे भासुरी
(राजस) राक्षसी (तामस) मोह करने वाली प्रकृति का श्रा-
श्रय किए हुए हैं। महात्मा लोग देवी (सात्विक) प्रकृति का
भानय करके परमात्मा को भविनाशी और भूतों का कारण
जान के एकाग्रचित हेरफर भजते हैं।
उद्युक्ता विज्ञातुं दृढनियमाः कीर्तयन्त्यनिशम् ।
भक्त्यशं प्रणमन्तस्ते स्थिरचिता उपासते जगति।१४॥
यजन्तो ज्ञानयोगैनैकत्वेनान्य उपासते।
विज्ञायान्ये तु बहुधा विश्वरूपं पृथक्ततः ॥१५॥

.. हैं। उनके नियम दृढ़ होते हैं, सदा परमात्मा को भजते है मात्मा को भजते हैं और उसकी एक समझ कर उपासना करते हैं और लोग (कर्मयोगी) बहुत प्रकार का, जगत् स्वरूप,नलग भोगस्थानं च शरणं हितकृत् सृष्टिकारकः ॥१८॥ देय मानन्धी फतु (अभिलाषा सहित) पितृ राम्यन्धी स्वभा ( १०६ ) अर्थ-ऐसे लोग परमात्मा के जानने का उद्योग करते और प्रणाम करते हैं और इस जगत् में स्थिरचित होकर पर मात्मा की उपासना करते हैं। कोई ज्ञानयोग के द्वारा पर अलग जान कर भजते हैं और उपासना करते हैं । ऐशो यज्ञः ऋतुर्दैवः स्वधा पित्र्यः स ईश्वरः । हुतममिः परात्मैव मन्त्री हव्यं तथौषधम् ॥१६॥ जगतश्च पिता माता वेद्यं धाता पितामहः । ऋग्यजुःसामवेदाश्च पवित्रः प्रणवश्च सः ॥१७॥ जगतां पोपकः साक्षी नियन्ता कर्मणां फलम् । संहारकारकः स्थानं धमाधारश्च कारणम् । अविनाशी सन्ततं च परमात्मा निगद्यते ॥१९॥ सन्तापकं सूर्यतेजो जलाकर्पणकारकम् । विसर्जकमपामीशः सदसजीवन मृतिः ॥२०॥ अर्थः --परमात्मा सम्प्रन्धी या (अभिलापा रहित) यह शरमी किया हुआ होम और अगिपरमात्मा ही है। मन्त्राग ट्रय माप (मयोग्य गमिमा नादि) यही है। जगत् का पिता मासा उत्पत्तिका पितामह नगर को ये ( १०७ ) (जानने के योग्य) वही है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और पवित्र आङ्कार वही है । जगत् का पोषण करनेवाला, साली, नियन्ता (प्रभु), कर्मों का फल, आग का स्थान, शरण (रक्षक), हितकर्ता, सृष्टिकर्ता, संहारकर्ता, स्थान, धर्म का प्राधार, का. रण, अविनाशी, परमात्मा ही है। संताप करने वाला सूर्य का तेज जल को खींचने वाला और छोड़ने वाला भी वही है। जल का स्वामी (वरुण), सत् असत् (सत्य असत्य वा अच्छा बुरा) और जीवन मरण यही परमात्मा है । केवलं परमात्मानमाश्रित्यान्यान्विसृज्य च । उपासते नित्ययुक्तास्तद्योगक्षेमदो विभुः ॥२१॥ परमात्मा सर्वयज्ञभोक्ता चाधिपतिः स्मृतः। तं तत्वतो न जानन्ति ते संसारे पतन्त्यपि ॥२शा परमेशोपासनातो युक्ता नान्यस्य यो नरः। तदन्यं श्रयते जीवन शवो नरकमाप्नुयात् ॥२३॥ अर्थ--जो केवल परमात्मा को पाश्रय करके औरों को छोड़ के सदा योगयुक्त होकर उसकी उपासना करते हैं उनको .योग क्षेम (जीवन वा वृत्ति) का देनेवाला परमात्मा है पर- मात्मा सर्वयनों का भोक्ता और स्वामी है। उसको यथार्यरूप से जो नहीं जानते हैं वे संसार में गिरते भी हैं। इसलिये पर- मात्मा की उपासना करना ठीक है लौरों की नहीं। जो पुरुष परमात्मा से अन्य का भाश्रम करता है वह जीता हुआ ही मुर्दा नरक में जाता है। ।

. जपति प्रणावं नित्यं स साधुःशुभकार्यकत् ॥२७॥ ऋपिस्त्वं सद्गतिं यास्यस्यत्र नैवास्ति संशयः॥२९॥ (१०८) यद्यत्करोपि भुङ्क्ष वा जुहोपि च तपस्यसि । ददासि च मुने सर्व प्रभवे तत्तदर्पय |॥२४॥ अर्पयन् सदसत्कर्म कर्मवन्धाद्विमुत्र्यसे । सन्यासयोगयुक्स्वान्तो मुक्तो याति परेश्वरम्॥२५॥ श्रर्थ-जो जो करते हो खाते हो, हामते ही, तपते हे, देते हो हे परशुराम जी वह सब परमात्मा को अर्पण करो। शुभाशुभ कर्मों को अर्पण करते हुए तुम कर्म के बन्धनों से यूट जाओगे इसी से लेग सन्यासयोगयुक्त चितवाले मुक्त होकर परमेश्वर में प्राप्त होते हैं। स सर्वभूतेषु समः कोऽपि नास्यास्त्यरिः प्रियः। भक्या भजन्ति ये तेऽस्मिन् प्रभो तेप परेश्वरः२६ दुराचारोऽपि योऽनन्यभक्तिरीशे निधाय हृत् । ईशभक्तो धर्मवान् स्याद् द्रुत शान्तिमनारतम् । लभेतैवेति जानीहीशभक्तो नहि नश्यति ॥२८॥ नीचा अपि परात्मानमाश्रित्यातास्तु सद्गतिम् । .. अर्थ-~-परमात्मा मयंभूतों में (सम) गमभाय ने थाणा है। इसका म कोई श म प्रिय है। जो भक्ति से भशते हैं ये एम प्रभु में ६ घऔर गनमें परमेश्वर है। दुराचारी भी परणेघर में समय भक्ति कर मन उममें रखकर गदा

प्रणव (ॐ) को जपता है वह साधु है और उत्तम कर्म करने
वाला है। परमात्मा का भक्त शीघ्र ही धर्मवान् हेाता है और
सदा शान्ति को पाताही है ऐसा जानो। नीच लोग भी पर-
मात्मा.का आश्रय करके मद्गति को प्राप्त हुए। तुम ऋषि हो
सद्गति को प्रास होगे इसमें सन्देह नहीं है।
कृत्वैकाग्रं स्वं मनस्त्वं तु भत्त्या
जप्त्वोंकारं नित्यमीशं स्मरश्च ।
संपूज्यापीशं नमस्कृत्य तिष्ठः
स्वस्थो निःसन्देहतो मुक्तिभाक् स्याः॥३०॥
अर्थ-हे परशुराम जी तुम अपने मन को एकाग्र करके
भक्ति से सदा ॐकार को जप कर परमेश्वर को स्मरण करके
पूजन करके नमस्कार करके स्थिर होओ तो स्वस्थ होकर
मुक्ति को पाओगे इसमें कोई सन्देह नहीं है ।
इति ब्रह्मज्ञानशास्त्रे श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक
परशुरामसंवादे राजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत
भाषादीकायां पंचदशः सर्गः ॥१५॥

( ११० )
जनक उवाच-
R
मुने शृणुष्वभूयोऽपि श्राव्यं हि परमं वचः।
वक्ष्यामि प्रमवशतो यत्तवाहं हितेच्छया ॥१॥
अर्थ -जनक जी बोले कि हे परशुरामजी सुनने योग्य
उत्तम बात जो तुम्हारे प्रेम के वश धौर हित की इच्छा से
कहता हूं उसे फिर भी सुनो।
उत्पत्तिरहितं नित्यं सर्वलोकेश्वरं विभुम ।
यो वेति मोहरहितः स मुच्यतैनसां गणात् ॥२॥
अर्थ-उत्पत्ति से रहित सनातन सम्पूर्ण लोक का स्वामी
परमेश्वर को जो जानता है यह मोह रहित होफर पापों के
समूह से मुक्त होता है।
परेशः सर्वभूतानामादिमध्योऽन्त उच्यते ।
वस्तु श्रेष्ठं जगति यत् स एवातःशृणुप्च तत् ॥३॥
अर्थ-परगेशर सय भूतों का भादि मध्य भार अन्त
फहाता है । जो जगत् में श्रेष्ठ यस्तु हे यह यही परमात्मा है
अतः तम् प्रेष्ठ यस्तुओं को मुनो।।
उच्यते नामसु श्रेष्ठः प्रणवः परमात्मनः।
पुस्तकवथ वेद्यपु श्रेष्ठा वेदास्त्रयः स्मृताः ॥४॥
श्रेष्ठोऽस्ति देवतास्चिन्द्रो द्वादशाकेंपु वामनः ।
भास्वत्सु विपपेप्येवमुच्यते रविरंशुमान् ॥५॥

(१११ )
मरीचिश्व नभस्वत्सु नक्षत्रेषु च चन्द्रमाः।
ज्ञानशक्तिश्च भूतेषु मनो ज्ञानोन्द्रियेषु च ॥६॥
रुद्रेषु शङ्करो यक्षरक्षसा गुह्यकेश्वरः ।
मेरुः शिखरिपु श्रेष्ठो वसुष्वष्टातु पावकः ॥७॥
सेनापतिषु सेनानीः पुरोधस्तु वृहस्पतिः।
महर्षीणां भृगुर्गीयु प्रणवोऽब्धिः सरस्तु च ॥८॥
अर्थ -प्रणव (ॐ) परमात्मा के सब नामों में श्रेष्ठ है।
पुस्तकों में अथवा जानने की वस्तुओं में तीनों वेद श्रेष्ठ हैं।
ऐसेही चमकीले विषयों में कान्ति युक्त सूर्य श्रेष्ठ है। वायुओं
में मरीचि, नक्षत्रों में चन्द्रमा, प्राणियों में ज्ञानशक्ति और
ज्ञानेन्द्रियों में मन श्रेष्ठ है। ग्यारह रुद्रों में शङ्कर श्रेष्ठ है !
सेनापतियों में स्वामिकार्तिकेय, पुरोहितों में यहस्पति, म.
हपियों में भृगु, वाणियों में प्रणव और सरस्वानों में (जल-
वानों में) समुद्र श्रेष्ठ है।
जपयज्ञश्च यज्ञेषु स्थावरेपु हिमाचलः।
पिप्पलः सर्ववृक्षेषु वट इत्यपि केचन ॥९॥
युक्तं वरौ द्वावपीति देवर्षिषु च नारदः ।
ब्राह्मणेषु च वेदज्ञः क्षत्रियेप्चर्कवंशजः ||१०||
विशा रवणहारश्च शूद्राणा गोपनापितौ ।
सिद्धानां कपिलो गन्धर्वाणा चित्ररथः स्मृतः॥११॥
शस्त्रेषु वजमश्वेपूबैःश्रवा गोपु कामधुक् ।
गजेप्रावतः कामः प्रजोत्पनिकरेषु च ॥१२॥

( १९२ ) सर्पेषु वासुकिर्वारिवासिनां वरुणः स्मृतः । पितृणामर्यमा राजा नृपु दण्डभृतां यमः ॥१३॥ अर्थ-यजों में अपयज्ञ, स्यावरों में हिमाचल, सर्व वृक्षों में पीपल श्रेष्ठ है। कोई बड़ श्रेष्ठ है ऐमा भी कहते हैं। दोनों श्रेष्ठ हैं यह ठीक है। देवर्पियों में नारद, ब्राह्मणों में वेद जानने वाला, क्षत्रियों में सूर्यवंशी, वैश्यों में रवण हार और शूद्रों में ग्वाल व नाई श्रेष्ठ हैं। सिद्धों में कपिल मुनि गंधर्वो में चित्ररथ श्रेष्ठ है। शस्त्रों में बज्ज, घोड़ों में उच्चैःश्रवा, में कामधेनु, हाथियों में ऐरावत और प्रजाओं की उत्पत्ति करनेवालों में कामदेव श्रेष्ठ है। सपों में वामुकि, जल वासियों में वरुण, पित्तरों में अर्यमा, मनुष्यों में राजा और दण्ड धारण करने वालों में यम श्रेष्ठ है। सिंहः पशुपु दैत्येषु प्रह्लादो नाशकर्तृषु । कालः पक्षिपु तायश्च वायुः शुचिकरेषु च।॥१४॥ नको वारिचरेप्वन्धिनदेषु श्रेष्ठ उच्यते । सर्वविद्यासु वेदान्तविद्याऽकारोऽक्षरेषु च ॥१५॥ स्त्रीवाच्येषु च कीर्तिर्वाङ् मृत्युईर्तृषु च स्मृतः । गायत्री छन्दसां मार्गों मारस्वृतूनां सुमाकरः।१६। घृतं छलयतां तेजस्तेजस्विपु वरं स्मृतम । सर्वमन्त्रेषु गायत्री शुक्राचार्यः कविष्वपि ॥१७॥ अर्थ-शुभ में मिंह, देस्यों में प्रसाद, नारा फरने बालों में काल, पक्षियों में गा और पवित्र करने वालों में

( १९३ )
वायु श्रेष्ठ है। जलचरों में मगर, नद नदियों में समुद्र श्रेष्ठ है।
सब विद्याओं में वेदान्त विद्या, अक्षरों में प्रकार,स्त्री जो कहाती
हैं उनमें कीर्ति और वासी, हरण करनेवालों में मृत्यु, छन्दों में
गायत्री छन्द, महीनों में मार्गशीर्ष और ऋतुओं में वसन्त ऋतु
श्रेष्ठ है। छल करने वालों में जुआं, तेज वालों में तेज, सब
मन्त्रों में गायत्रीमन्त्र और कवियों में शुक्राचार्य श्रेष्ठ हैं ।।
संक्षेपादिह कथितं हि पशुराम
प्राक् प्रोक्तं पशुपतिना श्रुतं मया यत् ।
+ यचातः परमपि वा पिपृच्छिपुस्त्वं
पृच्छवाखिलमिह तबदाम तेऽहम् ॥१८॥
अर्थ-हे परशुरामजी पहिले जो नहादेवजी ने कहा था
और मैंने सुना था वह यहां संक्षेप से मैंने कहा। जो इसके
उपरान्त भी कुछ पूछना चाहते हो तो पूछो। वह सब मैं तुम-
को कहूंगा॥
वाल्मीकिमुनिः प्राह श्रीरामं परशुरामाय ।
जनकेनोक्तं श्रेष्ठज्ञान तत् ते मया कथितम् ॥१९॥
अर्थ-श्री रामचन्द्रली से वाल्मीकि ऋपि बोले कि
परशुराम जी के लिये जनया राजा ने जो श्रेष्ठ ज्ञान कहा वह
मैंने लुमली पाहा।
इति ब्रह्मज्ञानशास्त्रे श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक
परशुरामसंबादेरास्वैवरामसेवकलालगुप्तकृत
भापाटीकायां पाडशः सर्गः ॥१६॥

( १९४) परगुराम उवाच- ये भक्त्या सगुणं ब्रह्मोपासते सर्वदा नृप । ज्ञानेन निर्गुणं वा ये द्वयोः श्रेष्ठं ब्रवीहि मे ॥१॥ अर्थ-परशुरामजी वाले कि जो लेगि भक्ति के अनु- सार सदा ब्रह्म की उपासना करते हैं अथवा शान मार्ग के - नुमार निर्गुण ब्रह्म की उपासना करते हैं दोनों में श्रेष्ठ कौन है सो मुझे कहो। जनक उवाच---- ईशे मनः स्थिरं कृत्वा परया श्रद्धया युतः । एकाग्रचेतसा ब्रह्मोपासते तेऽपि सत्तमाः ॥२॥ अर्थ:-जनकजी बोले कि परमात्मा में मन स्थिर करके परम श्रद्धा से युक्त होकर एकाग्रचित से ब्रह्म की उपासना फरते हैं वे भी श्रेष्ठ हैं। सर्वत्र ये समधियः संनिरुध्येन्द्रियव्रजम् । सर्वभूतहितासक्ता अनिर्देश्यं सुरादिभिः ॥३॥ अव्यक्तं यदचिन्त्यं च समं सर्वत्र चाचलम् । नित्यमेकाक्षरं ब्रह्मोपासतेऽतिवरं स्मृतम् ॥४|| अर्थ-जो मयंत्र मममुद्वि रसकर इन्द्रियों के समूह की रोक कर गय प्राणियों के हित में लगे हैं वे, देवादिकों से भी फरने योग्य नहीं , नया इन्द्रियगाधर महीं, ध्यान में न माम्यो, मयंत्र एपामा रहे और सपल रहे ऐसे एकरसर ग्राम (3)की मदा नपापना करते हैं, यह अति श्रेष्ठ है।

अर्थ-
अतस्तु ये नराश्चितं कृत्वैकाग्रतया स्थिरम् ।
भजन्तीशं मृत्युरुपितंसाराष्ट्राक् तरन्ति ते ॥५॥
इस लिये जो पुरुष पित्त को एकाग्रता से स्थिर
करके परमात्मा को भजते हैं वे मृत्यु रूपी संसार से शीघ्र ही
पार होजाते हैं।
परमेशे पशुराम मनो बुद्धि निवेशय ।
तेन निःसंशयं विद्धि लीनः स्याः परमात्मनि ॥६॥
अभ्यासयोगतो ज्ञानं तस्माद्यानं वरं स्मृतम् ।
अस्माकर्मफलत्यागोऽतः संसाराच्छमं बजेः ॥७॥
अर्थ-हे परशुरामजी! परमेश्वर में मन और बुद्धि को
लगाओ इससे जाना कि निःसन्देह परमात्मा में लीन हो जा-
ओगे। अभ्यासयोग से जानयोग श्रेष्ठ है, ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ.
है, ध्यान से कर्मफलों का त्याग करना श्रेष्ठ है। इस कर्म फल
त्याग से संसार से शान्ति को प्राप्त होओगे।
न द्विष्यात् सर्वभूतानि त्रिोद्दीने दयेत यः।
अहन्ताममताहीनः समानः सुखदुःखयोः ॥८॥
योगी क्षमावान संतोपयुक्त एकाग्रमानसः ।
दृढ़निश्चय ईशे यो मनोवुद्धी समर्पयेत् ॥९॥
यो न त्रस्यति कस्माञ्चिन्नस्येजन्तुन कोऽप्यतः ।
हाँद्वेगभयकोधेमुक्तः प्रेष्ठः परात्मनः ॥१०॥

- श्रर्ध-जो सर्व भूतों से द्वेष न करे स्नेह करे, दीन पर दया करे, अहंकार और ममता से रहित हो, सुख दुःस को समान जाने, योग युक्त हो, क्षमा करे, संतापयुक्त हो, एकाग्र- चित्त हो, दृढ़ निश्चम रक्खे, जो परमात्मा में मन और बुद्धि को अर्पण करै, जो श्राप किसी से त्रास न पावे, कोई जन्तु . इससे त्रास न पावे और सर्प उग भय और क्रोध से रहित हो वह परमात्मा को अत्यन्त प्रिय है। निरपेक्ष उदासीनः समर्थो निय॑थः शुचिः। सर्वयनपरित्यागी प्रियः स्यात् परमात्मनः ॥११॥ नाप्रियं देष्टि नो हप्येत प्रियाच्छोचेन्न नेच्छति । सदसत्फलसंत्यागी भक्तिमानीश्वरप्रियः ॥१२॥ मानापमानयोमित्रद्विपतोः समधीभवेत् । सङ्गन्हीनश्च शीतोष्णसुखदुःखेषु यः समः ॥१३॥ स्तुतिनिन्दासमज्ञातानुप्रयोजनवर्तनः । स्थिरधीःप्राप्तसन्तोपीभक्तःस्यातू प्रिय ईशितुः।१४। अर्थ-प्रपेक्षा रहित, उदामीन, समर्थ, पीहारहित, पवित्र नार सर्व प्रयकों का (अनेया प्रकार की बुद्धियों का) स्याग पारने वाला परमात्मा को प्रिय है। प्रिय वस्तु का जो द्वेष नहीं करता, प्रिय यस्तु पाफर हर्य नहीं करता, शोक नहीं फरता, ग फुय किमी से पाहता है, शुभ अशुभ पाल त्याग करके रहता और भक्तिमान् है,यह परमात्मा को प्रिय है। मान अपमान में और मित्र शत्रु में गिधको समान धुद्धि है, मंग ।

(११७ ) रहित है, शीत उपण सुख दुःख नादि द्वन्द्वों में समता रक्खे, स्तुति और मिन्दा को समान जाने, प्रयोजन के अनुसार बरते और स्थिर वुद्धि हो, प्राप्त वस्तु से सन्तोप करे और ईश्वर का भक्त हो वह परमात्मा को प्रिय है। धर्मरूप इह मोक्षसाधनो- पाय एप कथितो मया तव । पशुराम सुधया समोरात- स्तृप्तिमाप्नुहि च मानसे खके ॥१५॥ अर्थ-हे परशुराम जी यह यहां धर्मरूप मोक्षसाधन का उपाय मैंने तुम्हें कहा, यह निश्चय से अमृत के समान है इससे अपने मन में तृप्ति को प्राप्त हेाओ। इति ब्रह्मज्ञानशास्त्रे श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक परशुरामसंवादे राजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत भापाटीकायां सप्तदशः सर्गः ॥१७॥ Pre-

( १९८ )
परशुराम उवाच-
प्रकृति पुरुष क्षेत्रं क्षेत्रज्ञं ज्ञानमेव च ।
ज्ञेयं जिज्ञासएतन्मे भूपते कृपया वद ॥१॥
अर्ध-परशुरामजी बोले कि हे राजन् प्रकृति पुरुष क्षेत्र
क्षेत्र ज्ञान और जेय इनको जानने चाहता हूं यह मुझे कृपा
फरफ कहो।
जनक द्रवाच-
भोगस्थानमयं कायः क्षेत्रं तं यो यथार्थतः।
वेनि क्षेत्रज्ञमाहुस्तं ज्ञानिनश्च विवेकिनः ॥२॥
अर्थ-जनकजी बोले कि भोग का स्थान यह शरीर क्षेत्र
है उसको जो ठीक ठीक जानता है उसको जानी और विवेकी
लोग क्षेत्र कहते हैं।
सर्वक्षेत्रेष्वनुगतं विद्धि क्षेत्रज्ञमीश्वरम् ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोज्ञानं मोक्षहेत्वीश्वरस्य तत् ॥३॥
अर्थ- सर्यक्षेत्रों में एक स्वरूप क्षेत्रात परमात्मा को
जानी इमलिये क्षेत्र का ज्ञान है सो परमेयर का भान है यह
मोक्ष का कारण है।
इन्द्रियाढ्यं स्वरूपेण जड़मिच्छादिधर्मकम् ।
क्षेत्र विकारि पुरुषप्ररुत्योयोगसम्भवम् ॥४॥
यश्चाप्यचिन्त्यैश्चर्यादिप्रभावैः पूर्ण एप सः ।
क्षेत्रन उच्यते मन इदं संक्षेपतः शृणु ॥५॥

( ११९ ) अर्थ- -जो इन्द्रियों से युक्त, स्वरूप से जड़, इच्छा भादि जिसके धर्म हैं, विकार सहित और पुरुष प्रकृति के संयोग से उत्पन्न है वह क्षेत्र है और जेर अचिन्त्य ऐश्वर्यादि प्रभावों से पूर्ण है वह क्षेत्र कहाता है यह मुझसे संक्षेप में सुना ।। पराशरवसिष्ठादिऋपिभिस्तु पृथक्पृथक् । ऋग्यजुःसामवेदैश्च ब्रह्मसूत्रपदैरपि ॥६॥ हेतुमद्भिनिश्चितैश्च क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरिदम् । यथाखरूपं वहुधा स्वरूपमिह वर्णितम ||७|| अर्थ-यह क्षेत्र क्षेत्र का जैसा स्वरूप है वैसा स्वरूप पराशर वसिष्ठ प्रादिपियों ने वर्णन किया है। ऋग्वेद, यजु- र्वेद, सामवेदों से ब्रह्मसूत्र के पदों से भी जो कारण युक्त और निश्चित हैं उनसे भी बहुत प्रकार से अलग अलग वर्णन किया गया है। पृथ्व्यादिपञ्च भूतानि प्रकृति/रहंकृतिः । ज्ञानेन्द्रियाणि पश्चापि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि च ॥८॥ ज्ञानेन्द्रियस्य विषयाः पञ्च शब्दादयो मनः। चतुर्विंशतितत्वानि भ्वादीन्येकीकृतानि चेत् ॥९॥ ज्ञानात्मिका मनोवृतिदेहो दुःखं सुखं धृतिः। इञ्छा द्वेष इदं क्षेत्र सविकारं निरूपितम् ॥१०॥ अर्थ-पृथ्वी आदि च महाभूत प्रकृति बुद्धि प्रहार माच पानेन्द्रिय नार पांच कर्मेन्द्रिय ज्ञानन्द्रियों के पांच शब्द ह ( १२० ) प्रादि विषय और मन ये पृथ्वी आदि इकट्ठा करें तो चोवीस तत्व होते हैं। ज्ञानरूप मन की वृत्ति देह मुख दुःख धैर्य इच्छा और द्वेष यह विकार सहित क्षेत्र कहा है। क्षमाऽहिंसार्जवं मानरहितत्वमदम्भिता । वाह्यशोचं गुरोः सेवाऽरागित्वं चितशुद्धता ॥११॥ स्थैर्य मनोनिग्रहश्चेन्द्रियार्थेषु विरक्तता । अनहंकारिता-व्याधिजन्ममृत्युजरादिपु ।।१२।। दर्शनं दुःखदोपाणां दारापत्यगृहादिषु । असझोत्कटरागित्वं सततं समचित्तता ॥१३॥ इटानिष्टासियु ब्रह्मण्यन्यैकाग्रचेतसा । भक्तिरेकान्तवासित्वं वैराग्यं लोकसंसदि ॥११॥ तत्वज्ञानार्थयोदृष्टिः सदेशज्ञाननिष्ठता । ज्ञानमेतत् समासेन मोक्तमज्ञानमन्यथा ॥१५॥ अर्थः -तमा रराना, दूसरों को पीड़ा न देना, सीधे मार्ग मे घसना, घमंड और दंभ को छोड़ देना, याद्य शुद्धि रराना, गुरु जी नेवा तना, रागादि रहित होना, पित्त शुद्ध रखना, स्थिर हेगा,मनोरोकना, यिपयों मे विरक्त ऐना, अहंकार सोहना, रोग जन्म मरण युट्टापा इत्यादि में दुःण र दोष देखते रहना, सो पुत्र गृह प्रादि मे मंग दोहना और तत्कट (पा कर) प्रेम रगमा,परमात्मा में एकाग्र पित गे सनन्य भक्ति रगना,एमान में साम करना,लोगों के ममा मयेरापरगना, सरयान बार सत्य के प्रपोजन में दृष्टि रगगा पार सदा

परमात्मा के जानने में स्थित रहना यह संक्षेप से ज्ञान कहा
इससे उलटा अज्ञान है ।।
यज्ञानान्मोक्षमाप्नोति वक्ष्यामि ज्ञेयमप्यदः।
निषेधविध्यविषयं नित्यं चातिशयोज्झितम् ॥१६॥
पाणिपादश्रुतिशिरोक्षिमुखं सर्वतश्च यत् ।
आवृत्य सर्वं हि जगत् तिष्ठति ब्रह्म तत् स्मृतम् ।१७॥
चक्षुरादीन्द्रियगणं रूपादिविषयानपि ।
आभासयति यत् सर्वेन्द्रियविरहितं स्वयम् ॥१८॥
असङ्ग सर्वजगतामाधार रहितं गुणैः ।
सत्वादिभिस्तथा तेपाभोक्तृ पातृ च तत् स्मृतम्।१९।
अर्थ-जिसके जानने से मोक्ष प्राप्त होता है वह शेष
भी कहता हूं। जो निषेध और विधि का विषय नहीं, (नित्य)
उत्पत्ति और नाश से रहित है, जिससे बढ़कर कोई नहीं,
चारो और हाथ पांव कान सिर नेत्र और मुख वाला जो है
और संपूर्ण जगत् को घेरे हुए रहता है वह ब्रह्म परमात्मा
कहाता है वही जेय है। नेत्र प्रादि इन्द्रियों के समूह को और
रूप भादि उनके विपयों को भी जो भासमान (देखने योग्य)
करता है और भाप संपूर्ण इन्द्रियों से रहित है,सङ्ग रहित और
सब जगत् का प्राधार है और सत्यादि गुणों से रहित है वैसेही
उन गुणों का पता र पालक है वह प्रल फहाता है।
अतीन्द्रियत्यादुर्जेयं भूतानामन्तरे बहिः ।
विवेकिनोन्तिके दूरेऽज्ञानिनामचरं चरम् ॥२०॥

. का उत्पत्तिकर्ता (१२२ ) अर्थ-सूक्ष्म होने से वह नहीं जाना जाता है सब भूतों के बाहर और भीतर वर्तमान है, विवेशियों के निकट है और प्रशानियों के दूर है, स्थावर जङ्गमरूप वही है। अभिन्नं हेतुरूपेण भिन्नं कार्यस्वरूपतः । ब्रह्म तत् सर्वभूतानां सर्जकं पातृ नाशकम् ॥२१॥ अर्थ-सर्व भूतो में कारण रूप से अभिन्न है और कार्य- रूप से भिन्न की नाई स्थित है। घराघर पालन करने हारा, तथा प्रलय काल में माशल यही ब्रह्म है। परमज्ञानतमसो ज्योतिपा च प्रकाशकम् । ज्ञानं ज्ञेयं लानलभ्यं सर्वेपां हृदयस्थितम् ॥२२॥ अर्थ-वह परब्रल प्रज्ञानरूपी अन्धकार रो पर है और प्रकाशकों का भी प्रशाशक है । 'सान शेय, शान से प्राप्त करने योग्य और संपूर्ण प्राणियों के हृदय में (नियन्ता होकर) स्थित ही परमात्मा है। क्षेत्रक्षेत्रज्ञसक्षागज्ञेयान्यत्र समासतः। उक्तान्येतानि विज्ञाय ब्रह्मभावमवामुयात् ॥२३॥ अर्थ --एग प्रकार संक्षेप से क्षेत्र सेना शान र रोय एनशा सतरा निरपरा किपा पनको जानने से वियेकी पुरुप प्रल भाव को मास होता है। पुरुषप्रस्ती हायप्यनादी विकृतीगुणान् । बुद्धयादिकाश्च सत्यायान विधि प्ररूतिजान मुने।२४।

( १२३ ) अर्थ-हे परशुरामजी पुरुष और प्रकृति दोनों ओध- नादि जाना और बुद्धि आदि विकार तथा सत्व भादि गुणे को प्राति से उत्पन्न जानो। प्रकृतिः प्रभवे हेतुः कार्याणां कारणानां च । सुखदुःखानां भोगे हेतुः पुरुषः समुद्दिष्टः ॥२५॥ अर्थ-देह आदि कार्य और उसके कारण महत्तत्य नादि इनके उत्पन्न होने में कारण प्रकृति है और सुख दुःख का अनु- भव होने में कारण पुरुप है ॥ प्रकृतिस्थ एव पुरुष- स्तजान सत्वादिकान गुणान भुड़े। गुणसङ्ग एव पुंसः खलु सदसद्योनिजन्मनां हेतुः ।।२६।। देहेऽस्मिन परपुरुपः साक्षीव प्रकृतिनिकटः सन्। पश्यत्यनकुरुते बदति जनोऽहं करोमीति ॥२७॥ कर्माणि पोपयति तान्युपभुले चेश्वरस्वरुपोऽसौ । एवं पुरुपं प्रकृति गुणैश्च सह वेति यः पुरुपः ॥२८॥ आचरतिकर्मस यदि त्यक्तापिच विधिनिपेघमर्यादाम। लभते चायं न पुनर्जन्मान्यय मुक्तिमाप्नोति ॥२९॥ अर्थ-पुरुष प्ररुति के कार्य देहादि में स्थित होकर प्रकृतिजन्य सत्यादि गुणों का उपभोग करता है। सत्यादि गुणों का संग हानाही पुरुष को उत्तम धधम योनि में जन्म .

( १२४ ) लेने का कारण निश्चय से होता है। इस देह में वह परमात्मा प्रकृति के समीप होकर साक्षी की नाई देखता है और स्वीकार करता है, मनुष्य कहता है कि मैं करता हूं। ईश्वर स्वरूप होने से यह मनुष्य उन कर्मों का पापण करता है और उपभोग करता है । इस प्रकार जो पुरुप, पुरुप और प्रकृति को गुणों के सहित जानता है वह जो विधिनिषेध की मर्यादा त्याग करके भी कार्य करता हो तो भी पुनर्जन्न को नहीं प्राप्त होता किन्तु मुक्ति को प्राप्त होता है। देहे ध्यानेन मनसा केचित् पश्यन्ति तं विभुम् । साड्यज्ञाश्चापि पुरुपप्रकृत्योर्मेदवोधतः ॥३०॥ योगनिष्ठास्तथाप्यागयोगोपासनतो दिया। परे विहितकर्माणि कुर्वन्तः कर्मयोगतः ॥३१॥ प्रोक्तप्रकारैरपरेऽजानन्तो मन्दबुद्धयः। गुरोः श्रुत्वेशरूपं निश्चित्य मृत्योस्तरन्ति ते ||३२|| अर्थ-कोई अपने शरीर में उस परमात्मा को ध्यान युक्त हो मन से देखता है सांख्ययाले भी पुरुप और प्रकृति के भेद को जान कर तमको जानते हैं और योगवाले अष्टांगयोग साधन करके युति से उमफो देखते हैं और लोग (कर्मकाण्डी) कर्मयोग से विहित कर्मों को करते हुए उसको जानते हैं और मन्द थुद्धि वाले जो कद्दे हुए प्रकारों में नहीं जान मफते थे गुरु मेयर का यहप मुन कर उसपर निश्चप रसके भंगाररूप मृत्युमे तर जाते हैं।

( १२५ ) यद्यदुत्पद्यते सत्वं पशुराम चराचरम् । संयोगतस्तत्पुरुपप्रकृत्योविद्धि चाखिलम् ॥३३॥ यश्चराचरभूतेषु समव्यातं महेश्वरम् । वेत्ति नश्यत्खनश्यन्तमाप्तुं योग्यं च वेत्त्यसौ ॥३४॥ सर्वत्र समरूपेण स्थितं पश्यति यो विभुम् । देहादिना सहानष्टं सोऽथ मुक्तिमवाप्नुयात् ॥३५॥1 अर्थ-हे परशुरामजी! जोकुछ स्थावरजङ्गमास प्राणि उत्पन्न होता है सो सब पुरुप और प्रकृति के संयोग से जानो। जो पुरुष चराचर भूतों में परमात्मा को समान व्याप्त जानता है और भूतों के नाश होने से ईश्वर को नाश रहित जानता है सो पाने योग्य वस्तु को भली भांति जानता है। जो पुरुष पर- मेश्वर को सर्वत्र समानरूप स्थित देखता है और देहादिकों के नष्ट होने पर उसको नष्ट नहीं देखता वह इस शरीर छूटने के अनन्तर मोक्ष को प्राप्त होता है। सदसत्कर्मकी यः प्रकृति वेति सर्वथा। स आत्मानमकर्तारं पश्यन मोक्षमवाप्नुयात् ॥३६॥ यदा भृतान पृथग्भूतान् प्रकृतिस्थान लये ततः । सृष्टौ विस्तारितान् पश्येद्रह्मरूपस्तदा भवेत् ॥३७॥ अर्थ-जो पुरुष प्रकृति को सर्वथा शुभ अशुभ कमों की करनेवाली जानता है और प्रात्मा को प्रस्तां देखता है सो मोसमाप्त होता है। जामिन रमाणियों को प्रलय के समय ( १२६ ) में प्रकृति में स्थित देखता है और सृष्टि के समय में प्रकृति से ही विस्तारित देखता है तब ब्रह्मस्वरूप होजाता है । ईशोऽनादिनिर्गुणोऽतः शरीरस्थोऽप्यनश्वरः। अत एव न कर्ता न लिप्यते कर्मणां फलैः ॥३८॥ सर्वत्र व्याप्तमाकाशं यथा सङ्गान लिप्यते ।' देहव्याप्तस्तथात्मापि कर्मभिर्नोपलिप्यते ॥३९॥ । रविरेको यथा लोकं प्रकाशयति चाखिलमः। तथा प्रकाशयत्यात्मा क्षेत्री क्षेत्रमशेषतः ॥४०॥ अर्थ - परमेश्वर अनादि और निर्गुण होने से शरीर में स्थित होकर भी नाशरहित है इसीलिये न वह कमी का वार्ता है और न बाट फों के फलों से लिप्त होता है। जैसे सर्वत्र व्याप्त आपाश रों के संग मे लिप्त नहीं होता वैसेही शरीर में व्याप्त प्रात्मा भी कर्मों से लिप्त नहीं होता। जैसे अकेला सूर्य संपूर्ण लोक को प्रकाशित करता है वैसे ही संपूर्ण क्षेत्र (शरीर) को क्षेत्री प्रात्मा प्रकाशित करता है। यः क्षेत्रज्ञक्षेत्रयोः पश्थतीत्थं भेदं ज्ञानाक्ष्णाथ मोक्षं प्रकृत्याः । भूतानां ध्यानाद्युपायैश्च वेद मायामुक्तोऽसौ परं स्थानमेति ॥४१॥ अर्थ-जो पुरुप प्रग प्रकार गे क्षेत्र और क्षेत्र के अद को शान रूपी नेत्रों से देखता है भार पानादि उपायों से

माणियों का प्रकृति से अलग होना वा उत्पन्न होना जानता
है वह माया से मुक्त होकर परमपद को प्राप्त होता है ।
इति ब्रह्मज्ञानशाले श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक
परशुरामसंवादे राजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत
भापाटीकायां अष्टादशः सर्गः ॥१८॥
जनक उवाच-
ज्ञानं वक्ष्यामि च तपःकर्मादिभ्यो यदुत्तमम् ।
ज्ञात्वा यहपयः सर्वे मुक्ता आपुः परं पदम् ॥१॥
श्रर्थ-जनकजी कहते हैं, हे परशुरामजी! तप कर्म
शादियों से उत्तम जो शान है यह भी कहता हूं सय ऋपि लोग
जिसको जाम कर मुक्त हो परमपद को प्राप्त हुए।
ब्रह्मण्यवाप्य यज्ज्ञानं लीनाः स्युस्ते पुनः सृतौ ।
नोत्पद्यन्ते लभन्ते न प्रलयानेहसि व्यथाम् ॥२॥
अर्थ-जिस ज्ञान को प्राप्त होके जो प्रम में लय हाजाते
है वे पुरुष पुनः संसार में उत्पन्न नहीं होते और प्रलय समय
में व्यपा फो नहीं प्राप्त हेत्ते॥
यत्कार्यक्रम सा योनिः प्रकृतिधारयत्यसौ।
शक्तिमुत्पादिकां सर्वभूतानां संभवस्ततः ॥३॥
उत्पद्यन्ते मूर्तयो पाः सर्वयोनिषु तत्र च ।
यं योनिमहब्रह्म पिता सब्रह्म वीजदः ॥४॥

( १२४ ), अर्थ-जो कार्य ब्रह्म प्रकृति है वह योनि है यह उत्पा- दक शक्ति को धारण करतो है उसी से सर्वभूतों की उत्पत्ति होती है। सपूर्ण योनियों में जो मूर्तियां उत्पन्न होती हैं वहां महन्नम (प्रकृति) योनि है और सद्मल वीज देनेवाला पिता है ऐसा जाना॥ गुणाः प्रकृतिजाः तत्वं रजस्तम इति त्रयः । शरीरे ते निवनन्ति शरीरस्थमनश्वरम् ॥५॥ अर्थ-प्रकृति से उत्पन्न सत्व, रज, तम ये तीन गुण हैं वे शरीर में रहने वाले अविनाशी (प्रात्मा) को शरीर में बंधन करते हैं। त्रिपु प्रकाशकं सत्वं नैर्मल्यानिरुपद्रवम् । वधाति ज्ञानसुखयोः पशुरामातिसङ्गतः ॥६॥ तृष्णास्त्रीधनसझोत्यं विषयप्रीतिकृद्रजः। वधाति कर्मसङ्गात् तत् पशुराम शरीरिणम् ॥७॥ अज्ञानोत्थं तमः सर्वदेहिनां विद्धि मोहनम् । निद्रालस्यप्रमादानां सङ्गात् तद्वन्धकारकम् ॥ अर्थ-तीनों गुगों में सत्यगुण निर्मल होने से प्रकाश फरने याता पार उपद्रय रहित है। यह साग और गुरा के अति मंग में यन्धन फरता है। हप्ता स्त्रीधन इनके मंग से उत्पार रजोगुण विषयों में प्रीति नपजाने वाला यह कर्म के अति मग भे प्राणि ८ रन करता है। मसाग मे गत्यात तमा गुग मात्र प्रागिपो को मेाहनेवाला है यह मिद्रा प्रायस्प प्रमाद इनके अतिसंग से वन्धन करता है। हे परशुराम जी! ऐसा जानो। सुखासक्तिकरं सत्वं कर्मासक्तिकरं रजः। सर्वतो ज्ञानमावृत्य प्रमादासक्तिकृत तमः ॥९॥ अर्थ-सत्वगुण पुरुप को सुख में आमक्त करता है, जोगुण कर्म में मासक्त करता है और तमो गुण चारो और से जान को घेर कर प्रमाद में मासक्त करता है । वर्धते सनसत्वमभिभूय रजस्तमः। रजश्च सत्वतमसी रजःसत्वे तमस्तथा ॥१०॥ अर्थ-मासक्त करने वाला सत्व गुण रज नार तम को जीत कर यदता है। यों ही प्रामुक्त करने वाला रजोगुण मत्व धौर तम को जीतकर बढ़ता है । और मासक्त करने वाला तमोगुण सत्यगुण और रजोगुण को जीत कर बढ़ता है। श्रोत्रादिद्दार्प शब्दादेान सम्यक प्रकाशते । पदा तदेव जानीयादेहे सत्वं विवर्धते ॥११॥ रजोवियुद्धाचशम इच्छारम्भश्च कर्मणाम् । लोभः प्रवृतिः संकल्पविकल्पोत्थानमेवच ॥१२॥ विवेकनाशोऽनुद्योगस्त्यागः कर्तव्यकर्मणाम् | मोहः प्रमादस्तमसि वर्धमाने च जायते ॥१३॥ अर्थ-प्रोपमादि सय द्वारों में (इन्द्रियों में)लय गाद आदि का शान राम प्रकार में प्रकाशित होता है तब

( १३० )
देह में सत्त्वगुण बढ़ रहा है ऐसा जानना, रजो गुण के बढ़ने के
समय प्रशान्ति, वर्ग करने की इच्छा नौर प्रारम्भ, लोभ,
प्रवृत्ति और मन में संकल्प विकल्प उठते है। तमो गुण बढ़ते
रहते विवेक का नाश, अनुद्योग, कर्तव्य कमी का त्याग, माह
और प्रमाद होता है।
दही सत्वे प्रवृद्धे तु यदेति प्रलयं तदा ।
उपैति निर्मलान लोकानुतमज्ञानभागिनाम् ॥१४॥
जायते कर्मिणां लोके रजसि प्रलयं गतः।
जायते मोहयुक्तानां लोके लीनस्तमस्यपि ॥१५॥
अर्थ-देही सत्वगुण के बढ़ने पर जब प्रलय (मरण)
को प्राप्त होता है तब उत्तम शानियों के निर्मल लोकों में प्राप्त
होता है (जन्म लेता है ) रजोगुण बढने पर प्रलय को प्राप्त
हो तो फर्मवालों के लोक में और तमोगुण बढने पर प्रलय
को प्राप्त हो तो मृा (नीच) लोगो के लोक (योनि) में
प्राप्त होता है।
स्यानिमलं ज्ञानफलं सात्विकं पुण्यकर्मणः ।
दुःखं रजोगुणफलमज्ञानं तु तमःफलम् ॥१६॥,
अर्थ-पुण्य फर्म का मत्वगुणप्रधान निर्मल मानरूप
फा होता है। रजोगुरा का फरा दुःरा होता है और तमोगुण
फा फरा नपान होता है।
ज्ञानमुत्पद्यते सत्वाल्लोभः स्यातु रजोगुणात् ।
प्रमादानानमाहास्तु तमसः संभवन्ति च ॥१७॥

। १३१ ) अर्थ-तत्वगुण से ज्ञान रजोगुण से लाभ और तमोगुण से प्रमाद प्रज्ञान और माह उत्पन्न होता है। हिरण्यगर्भलोके तु सात्विका यान्ति राजताः । दुःखं समुपभुजाना मृत्युलोकं प्रयान्ति च ॥१८॥ निकृष्टयोनीः संप्राप्तास्ते तमोगुणवृत्तयः । कालसूत्रादिनरकान प्रयान्त्यशुचयोऽधमाः ॥१९॥ अर्थ-पात्विक गुणवाले हिरण्यगर्भ लोक ( सत्य. लोक ) को प्राप्त होते हैं। रजोगुरा वाले दुःख को भागते हुए मृत्युलेाक में प्राप्त होते हैं । और तमोगुण वाले अपवित्र नीच निकृष्ट योनि में प्राप्त हो के फालसूत्र आदि नरको में. जाते हैं। पदा विवेकी कर्तारं गुणेभ्योऽन्यं न पश्यति । तत्परं सालिणं वेति स परात्मनि लीयते ॥२०॥ देहो देहोद्भवानेतानतीत्य वीन गुणान स्थितः । जन्मव्याधिजरामृत्युमुक्तो ब्रह्माधिगच्छति ॥२|| अर्थ ---जय विवेकी पुरुप गुणों से मतिरिक्त फत्ता को नही देपता किन्तु गुणों ही को फर्ता आनता है और उनमे पर साक्षी को जानता है यह परमात्मा में लीन होता है। देही पुरुष इध देह से वापार तीनों गुणों का अतिक्रमण करके जन्न, দাখি, সরা গান্তুন প্রয়াস ৪ মৃ া না- मन्द को प्राप्त होता है।

( १३२ )
परशुराम उवाच--
त्रिगुणातीतलिङ्गानि कान्याचरति किं च सः।
त्रीन गुणानतिवर्तेत कथमेतान वदाशु मे ॥२२॥
अर्थ--परशुरामजी बोले हे राजन् ! जिसने तीनों गुणों
को अतिक्रमण किया है उसके चिन्ह क्या हैं। वह कैसा प्रा-
चरण करता है और तीनों गुणों को अतिक्रमण कैसे करना
अर्थात् तीनों गुणों के कतिक्रमण करने का उपाय क्या है वह
मुझसे कहो।।
जनक उवाच-
सत्वात्प्रकाशं रजसः प्रवृत्तिं मोहमन्यतः।
प्रवृत्तं द्वेष्टि नो चिन्हं तनिवृत्तं न काङ्कति ॥२३॥
गुणैरकम्पितः सन् य उदासीन इव स्थितः ।
गुणस्वभावं विज्ञायातिगुणो भवति स्थिरः ॥२४॥
अर्थ-जनफजी परशुरामजी से कहते हैं कि सत्वगुण
का कार्य प्रकाश रजोगुण का का कार्य मवृत्ति और तमोगुण
का कार्य मोह है। प्रवृत्त हुए इन तीनों से जो वेपनहीं करता और
नियत्त शुओं की इच्छा नहीं करता जो गुणों से फम्पायमान न
देकर बदामीन की नाई रहता है और गुणों का वर्तमान
स्वभाय जान कर स्थित रहता है यह गुणातीत का पिम्ह है।
सुखदुःखे समे वेनि धैर्यवान् स्वस्थमानसः।
समानि पश्यति वांदमलोटानि स्वभावतः॥२५॥

(१३३ )
स्यातां समाने सर्वत्र यदभ्याशे प्रियामिये ।
समा निन्दास्तुतीति स गुणातीत उच्यते ॥२६॥
मानापमानौ मित्रारिपक्षौ तुल्यौ च वेत्ति यः ।
यस्त्यजत्यखिलोद्योगान गुणातीतः स उच्यते॥२७॥
अर्थ-जो पुरुप सुख और दुःख को समान जानता है
धैर्यवान् और स्वस्य चित होता है सोना पत्थर और मिट्टी के
टेले को स्वभावतः समान देखता है जिसके निकट प्रिय और
अमिय सवत्र समान होता है निन्दा और स्तुति के समान
जानता है वह गुणातीत'कहाता है। मान अपमान मित्रपक्ष
शत्रुपक्ष दोनों को ओ समान जानता है और संपूर्ण
उद्योगों को त्याग करता है वह गुणातीत फहाता है । इन
श्लोकों से गुणातीत के भाचरण कहे ॥
सवते यः परात्मानमेकाप्रया
सद्धिया भक्तियोगातिशय्यर्धया ।
तीन गुणानप्पतिक्रम्य पारं गतो
ब्रह्मभूयत्वमाप्नोत्यतावासा ॥२८॥
अर्थ-जो पुरुष भक्ति मेरग से प्रत्यन्त बढ़ी हुई एकरम
वहि मे परमात्मा की सेवा करता है यह तीनों गुणों को भी
अतिक्रमण करके उनके पार होसार मुरा से ग्रस रूप को मास
होता है। यह गुणातीत होने का उपाय है ।
इति प्रज्ञानशाने श्रीपाल्मोफिमुनिकते जनक
परशुराममंबादे राजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत
भापारीकापां अधादशः सर्गः ॥१८॥

( १३३ ) ,
जनक उवाच-
अर्थ-
संसाराश्वत्थवृक्षस्य सोऽव्ययः पुरुषोत्तमः ।
मूलमूईमधस्तस्य प्रवाहत्वादनादयः ॥१॥
शाखा हिरण्यगर्भाद्या यत्तु कर्मफैलादिकम् ।
श्रुतिभिः प्रतिपाद्यं तद्यस्य पर्णत्वमाश्रितम् ॥२॥
संसाररूपमश्वत्थमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
स एव वेद वेदार्थ पूर्णमत्र न संशयः ॥३॥
F-जनका राजा परशुरामजी से घोले कि यह संमार
रूपो पीपल का वृक्ष जिमकी जड़ जो ऊपर है वही उत्पत्ति
नाश रहित पुरुषोत्तम है। और नीचे उसका प्रवाह होने से
नानादि ऐसे हिरण्यगर्म प्रादि जिसभी शाखा हैं और उसके
पत्ते चेद करके प्रतिपादित (कहे हुए) कर्मफल प्रादि हैं।
जो ऐसे संमार रूपी पीपल को ठीक ठीक जानता है वही वेद
के अर्थ को पूरा जानता है इसमें सन्देह नहीं ॥
प्राप्ताः पश्यादिकां योनि ये च दुष्कृतिनो जनाः ।
ता अधः प्रसृताः शाखाः प्राप्ता देवादियोनिपु॥४॥
जनाः सुकृतिनथोड़े तच्छाखाः प्रसृता इह ।
ताः सत्यादिगुणहा रूपादिविपयारेः ॥५॥
नृलोके व्याप्तमुधिो मूलं कर्मानुसारि च ।
अस्मिन जगति संमार रुपिपिप्पलमूलकम् ॥६॥
ऊध्र्य तथाघः शाखादिरूपं नास्यावलोक्यते ।
आदिरन्तः स्थितिवापि नक्काप्यस्योपलभ्यते ॥७॥

( १३५ ) । अर्थ-जो पापी लोग पशु आदि योनि में प्राप्त हुए वे नीचे फैली हुई शाखा हैं। और जो पुण्यवान् लोग देव श्रादि योनियों में प्राप्त हुए हैं वे ऊपर फैली हुई शाखा हैं और वै शारगाएं सत्व प्रादि गुणों से बंधी हुई हैं रूप पादि विषय उसके प्रकुर हैं और कर्भानुप्तार इसकी जड़ मनुष्य लोक में कमर और नीचे व्याप्त है। इस जगत् मे संमार रूपी पीपल का मूत पर और नीचे इसका शासादिरूप नहीं देख पड़ता वैसेही इसका आदि अन्त और इसकी स्थिति भी कहीं नहीं जान पड़ती॥ हनासङ्गशवेणच्छित्वाश्वत्थं दृढाशिकम् । ततस्तमादिपुरुपं प्रपन्न इति रीतितः ॥८॥ उद्युक्तः स्यादलभ्यस्य प्राप्त्यै परमवस्तुनः । तथा तदेवं वस्तू यस्मिन् लोनो न जन्मभाक्॥९॥ संसारस्य यतोऽनादेर्या प्रवृत्तिरमुष्य च । साचानेकप्रकारेण वरीमानेति निश्चयः ॥१०॥ अर्थ- -दृह मूलवाले पीपल को प्रसङ्ग रूपी शस्त्र से फाट के किर उस मादिपुरुष के शरणागत मैं हूं इस विधि मे उस भराभ्य परमवस्तु की प्राप्ति के लिये वैसा उद्योग करे बेगे कि वह ऐसी वस्तु ऊपर है जिसमें लय होने से फिर जन्म को नहीं प्राप्त होता । उद्योग करने का कारण यह है कि इस अनादि संसार की जो प्रवृत्ति है यह अनेक प्रकार से बढ़ने वालो है यह निश्चय है!

हीना मोहाभिमानाभ्यां सदात्मज्ञानतत्पराः । रागादिदोपजेतारो निवृत्ताः कामनादितः ॥११॥ शीतोष्णसुखदुःखादिद्वन्देषु समबुद्धयः । विवेकिनो लभन्ते स्म तन्मोक्षपदमव्ययम् ॥१२॥ अर्थ-मोह और अभिमान से रहित सर्वदा प्रात्मज्ञान में तत्पर, राग श्रादि दोष के जीतने वाले, कामना सादि से निवृत, शीत उष्ण सुख दुःप इत्यादि द्वन्द्व पदार्थों को समान जानने वाले, विवेशी पुरुप उस अविनाशी मोक्षपद को प्राप्त होते हैं। यन्न सूर्यो भासयते चन्द्रोऽग्निश्चाथ योगिनः । निवर्तन्ते न यं प्राप्य तत् सद्वाम विवेकिनः॥१३॥ अर्थपूर्य चन्द्र श्रीर अग्नि जिसको प्रकाशित नहीं कर सकते योगी लोग जिसको पाकर फिर नहीं फिरते वह उत्तम धाम विवेकी पुरुष का है। जीवरुपे स्थितोऽशोऽयमनादौ परमात्मनः। . तथापि जीवं संसारे भोगार्थ विषयेषु च ॥१४॥ मनःपठेन्द्रियगणः प्रकृतिस्थोऽपकर्षति । यदेकदेहं संत्यज्य देही देहान्तरं ब्रजेत् ॥१५॥ इन्द्रियाणि गृहीत्वैति पुप्पगन्धानिवानिलः । प्राणजिदाक्षिकर्णत्यङमनांसातीन्द्रियाणि पट् ।।१६।। .

- आश्रित्य जीवो गन्धादिविषयानुपसेवते । त्यक्तकमन्यमाश्रित्य शरीरमुपसेवते ॥१७॥ विषयानिन्द्रियैः पद्धिः साकमेवावतिष्ठते । पश्यति ज्ञानदृष्टयैवं विवेकी न तु मूढधीः ॥१८॥ अर्थ-यह अनादि, जीयस्वरूप में स्थित परमात्मा का अंश है तथापि संसार में आग के लिये मन आदि इन्द्रिय प्रकृति में स्थित होकर जीव को अपने अपने विषय के ओर खींवते हैं। देही एक देह को त्याग कर जब दूसरे देह में प्राप्त होता है तब इन्द्रियों को अपने साथ लेजाता है। जैसे वायु फूलों के सुगन्धों को ले जाना है। नाश जीभ मांस कान चमड़ा और मन इन छःओं इन्द्रियों को प्राश्रय करके गन्ध सादि विषयो का अनुभव करता है । जीव एक शरीर को त्याग कर दूसरे शरीर का आश्रय कर विपयों का अनुभव करता है और कः इन्द्रियों के साथ ही रहता है ऐसा विवेकी पुरुष ज्ञानदृष्टि से देखते हैं भूख लोग नहीं देखते ।। यत्राहस्थमात्मानं योगात् पश्यन्ति योगिनः । विवेकज्ञानहीना न यत्नतोऽप्यविवेकिनः ॥१९॥ सूयें चन्द्रेऽनले तेजः स्थितं भासयते च यत् । जगत् समग्रं तत् तेजो जानीहि परमात्मनः ॥२०॥ अर्थ-योगी लोग योगाभ्यास मे प्रयत्न करते हुए देह में स्थित प्रात्मा को दसते हैं और विवेकतान से हीन प्रवि- बेको लोग यत्र करते हुए भी नहीं देख सकते । जो तेज सूर्य (१३८ ) चन्द्र और अग्नि में स्थित होकर संपूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है वह तेज परमात्मा का जाना ॥ धारयत्योजसा भूतानाविश्योर्वी चराचरान् । सोऽजोरसात्मको भूत्वा पुष्णाति सकलौषधीः।२१। स प्राणापानवायुभ्यां संयुक्तो जाठराऽनलः । प्राणिदेहस्थितो भूत्वा पचत्यन्नं रसैर्युतम ।।२२।। भक्ष्यं भोज्यं तथा लेह्य चोप्यं चेति चतुर्विधम् । सचान्तर्यामिरूपण सर्वप्राणिहदि स्थितः ॥२३॥ स्मृति व्यतीतवस्तूनां पदार्थज्ञानविस्मृती। करोति स चतुर्वेदैस्तत्तदैवतरूपतः ॥२४॥ उपास्यः शास्ववेदान्तसंप्रदायप्रवर्तकः । परमात्मा कृत्स्नवेदविज्ञातापि स एव हि ॥२५॥ अर्थ-वह परमात्मा पृथ्वी में स्थित होकर घराघर प्राणियों को धारण करता है,वही रसस्वरूप धन्द्र होकर संपूर्ण श्रीपधियों को पोषण करता है, वही जठरामिरूप प्राणियों के देश में स्थित होकर प्राण और अपान दोनों वायुओं से मिन फर भक्ष्य भोज्य लेय और चोय हम धारी प्रकार के पदस मयुक्त घन को पाचन करता है, यह संपूर्ण माणियों के पदय में अन्तयांमी रुप से स्थित होकर गत वस्तुओं का स्मरण तथा पदापं का ज्ञान और उनका विस्मरण करता है। यह चारों वेदों में तुम उम देयता के दूप से उपासना करने

योग्य है । और शास्त्रतया वेदान्त के संप्रदाय का चलानेवाला
और संपूर्ण वेद का जानने वाला वही परमात्मा है ।
क्षराक्षरौ हौ जगति पुरुषो तत्र चाक्षरः ।
मायाश्रितः परेशः स्यात् सर्वभूतानि च क्षरः॥२६॥
परमात्मा द्वयोरन्यः पुरुषोत्तम ईरितः ।
योऽविनाशीश्वरत्वेन पाति व्याप्य जगत्त्रयम् ॥२७॥
अर्थजगत् में क्षर अक्षर दो पुरुप हैं। उनमें से माया-
श्रित परमेश्वर नक्षर है और संपूर्ण प्राणी क्षर हैं। इन दोनों
से भिन्न पुरुषोतम परमात्मा कहाता है जो तीनों लोकों को
व्याप्त करके अविनाशी ईश्वर रूप से पालन करता है।
यतः स नाशरहित उत्तमश्चाक्षरादपि ।
ततो लोके च वेदे च पुरुपोत्तम ईयते ॥२७॥
एवं मोहविहीनो भजते यः सर्वभावेन ।
पुरुषोत्तमंसभकोजानात्यपि सर्ववित्स एवात्रा२८॥
अर्थः -वह जिस कारण से नाशरहित और प्रक्षर मे भी
श्रेष्ठ है इसलिये वेद और लोक में भी पुरुषोत्तम कहाता है जो
इस प्रकार से मोहरहित होकर पुरुषोतम को सर्वभाव से
भगता है वही भक्त उसको जानता है और सर्वज भी है।
इति ब्रह्मज्ञानशाने श्रीवाल्मोकिमुनिकृत जनक
परशुरामप्तवादे राजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत
भाषाटीकायां विंग्रः सर्गः ॥२०॥

(१४० )
जनक उवाय---
अभयं सर्वजीवेभ्यः सत्वशुद्विरथो रतिः ।
अभ्याले ज्ञानयोगस्य दानमिन्द्रियनिग्रहः ॥१॥
यज्ञोऽय वेदाध्ययनं तपोऽकपटचारिता ।
रागादिहानमक्रोधोऽप्यहिंसा सत्यवादिता ॥२॥
अलोभिता तथा शान्तिर्दया भूतेप्वपैशुनम् ।
मृदुखभावता स्थैर्य लज्जा निन्दितकर्मसु ॥३॥
शौचं धैर्य क्षमा तेजोऽद्रोहोनिरभिमानिता।
दैवीसंपदि जातानां भवन्त्येते नृणां गुणाः ॥४॥
श्रर्थ-जनकजी वाले हि संपूर्ण प्राणियों से निर्भय होना,
सत्यगुण प्रधान होना, मानयोग के अभ्यास में तत्पर होना,
दान करना, इन्द्रियों का निग्रह करना, यज्ञ वेदाध्ययन और
तप करना, कपट छोड़ के व्यवहार करना, राग (अनुराग)
धादि का त्याग करना, कोध नहीं करना, हिंसा नहीं करनी,
सत्य बोलना, लोभ नहीं करना, शान्ति रखना, प्राणियों पर
दया रखनी, धुगली नहीं साना, कोमल स्वभाव रसना, स्थिर
स्वभाव रखना, निन्दित को रो लज्जा करना, पवित्रता और
धैर्य रपमा, क्षमा करना, तेज (प्रभाव) रखना, द्रोह रहित
होगा, और अभिमाम नहीं करना ये देवी संपत्ति में उत्पन
पुरुषों के गुण होते हैं।
क्रोधोऽभिमानः पारुप्यं दोऽज्ञानं च दम्भिता ।
जातानामासुरीसंपोते नृणां भवन्ति च ॥५॥

(१४१ ) अर्थ-क्रोध, अभिमान, कठोर भाषण ताड़न प्रादि, अज्ञान, दम्म, ये भासुरी संपत्ति में उत्पन्न पुरुपों के गुण होते हैं। दैवी संपन्मुक्तिहेतुरासुरी बन्धकारणम् । दैवी संपदि जातोऽसि शुचः परशुराम मा ॥६॥ इहोत्पनिर्दिधा दैवी चासुरी कथिता बुधैः । मोक्ता विस्तरतो दैवी मत्तः शृण्वधुनासुरीम् ॥७॥ अर्थ-दैवी संपत्ति मुक्ति का और प्रासुरी संपत्ति बन्ध का कारण है। हे परशुराम जी तुम देवी संपत्ति में उत्पन्न है। इसलिये शोक मत करो। यहां देवी और भासुरी दो प्रकार की उत्पत्ति बुद्धिमानों ने कही है उसमें दैवी संपत्ति विस्तार से तुम को कही अब प्रासरी संपत्ति को कहता हूं सो मुझसे सुनो। पापानिवृति न विदुः प्रवृत्ति धर्म आसुराः । तेषु पाविश्यमाचारः सत्यं चापि न विद्यते ॥८॥ निरीश्वरमसत्यं ते जगत्माहुनिराश्रयम् । नान्य उत्पादकोऽस्यास्ति स्त्रीपुंसंयोगजं ह्यदः ॥९॥ इति नास्तिकदृष्टिं तआश्रित्यास्पधियोऽहिताः । नोचोग्रकर्माचरणात् स्युजगन्नाशहेतवः ॥१०॥ अर्थ-सासुरी संपत्ति वाले पुरुष धर्म में प्रवृत्ति र पाप से निवृत्ति नहीं जानते, उनमें पवित्रता माचार और ( १२ ) सत्य भी नहीं रहता,वे लोग जगत् को परमेश्वररहित असत्य और निरालय कहते हैं, जगत् का कोई दूसरा उत्पन्न करने वाला नहीं हैं यह स्त्री पुरुष के संयोग से हैं, ऐसा मानते हैं। वे अल्पबुद्धि अकल्याण पुरुष ऐसी नास्तिक दृष्टि का प्राश्रय .करके नीच और उन फर्म के प्राचरण करने से जगत् के नाश के कारण होते हैं। कामो न पूर्यते जातु येपा दम्भमदोहताः । अविवेकादुरावारा मानिनोऽशुचिवृत्तयः ॥११॥ चिन्तां प्रलयपर्यन्तामगणेयामुपाश्रिताः । परं पुमर्थ मन्वानाः कामभोगान् हि केवलम् ॥१२॥ कामकोधानुरक्ताश्च शताशापाशबन्धनाः । कामभोगार्थमन्यायादर्थसंग्रहणेप्सवः ॥१३॥ इदं लब्धं मयाद्यैतान् लप्स्ये दिजमनोरथान् । ममैतदेतदपि मे प्राप्स्येऽथ बहुधा धनम् ॥१४॥ मयाद्यैप हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरान रिपून । अहमेवेश्वरः सिद्धोऽहं वली भोगभाक् सुखी ॥१५॥ धनवत्त्वे कुलीनत्वे नान्यो मत्सहशः परः। वित्तः शंयुयज्ञदानैरज्ञानेनेति मोहिताः ॥१६॥ अर्थ-जिनकी कामना कभी पूरी नहीं होती, दम्भ मद से भर जाते हैं, प्रविवेश से निन्दित प्राचरण कहते हैं, ह. बार करते हैं, अपवित्र त्ति में रहते हैं, प्रलय पर्यन्त मिर- . .

वधि (अनन्त) चिन्ता में डूबे रहते हैं, केवल कामझेग (मनेर- ९) ही को परम पुरुषार्थ मानते हैं, काम और क्रोध में अनु- रक्त रहते हैं, सैकड़ों अशाओं के फन्दे में बंध जाते हैं, काम.. भोग के लिये अन्याय से ट्रव्य संचय की इच्छा करते हैं, आज यह धन पाया ये मेरे मनोरथ सिद्ध होंगे, यह धन मेरा है, यह भी मेरा है, अब बहुतसा धन पाऊंगा, इस शव को श्राज मैंने मारा दूसरे शत्रुओं को भी मारूंगा, मैंही ईश्वर प्रौर सिद्ध हूं, मैं बलवान् भोगी और सुखी हूं, धनवान्पने में कु- लोनता में मेरे समान दूसरा कोई नहीं हैं। यज्ञ और दान से प्रतिष्ठित और कल्याण युक्त मैं ही हूं। त्रासुरी संपत्ति वाले पुरुष ऐसे अज्ञान से माहित होते हैं। मोहजालावृताश्चितभ्रान्त्यानेकप्रकारया । कामभोगेषु संसक्ताः पतन्ति निरयेऽशुचौ ॥१७॥ मन्यन्ते श्रेष्ठमात्मानमनम्रा मदसंयुताः । अभिमानेन च युता धनाधिकतयानिशम् ॥१८॥ नामयज्ञयजन्ति स्म प्रतिष्ठामात्रकारणात् । दम्भमाथित्य वेदोक्तविघोनेवाचरन्ति ते ॥१९॥ कामदर्पवलक्रोधाहन्तायुक्ता विपन्त्यपि । ईशं खपरदहेषु निन्दन्ति च विवेकिनः ॥२०॥ संसारेप्वशुभानेतान् द्वेष्टन कूरान् नराधमान् । नियुड़े कृमिकीटादियोनिजन्मसु चेश्वरः ॥२१॥ अर्थ-अनेक प्रकार को पित्त को भ्रांति से मोह रूपी

(१४४ )
-
.
जाल में घिरे रहते हैं और कामसोग में श्रासक्त होकर अप-
वित्र नरक में पड़ते हैं। अपने को श्रेष्ठ मानते हैं, किसी से नमते
नहीं, मदान्ध होते हैं, धन के अधिक होने से सर्वदा अभिमान
से युक्त होते हैं, केवल प्रतिष्ठा के कारण दम्भ का आश्रय करके
राम राम, शिवशिव इत्यादि नामय ही से यजन करते हैं
वेदोक्त विधि का प्राधरण नहीं करते, 'काम दर्प (घमंड) बल
क्रोध और अहंकार करके युक्त होकर अपने पराये शरीर में
वर्तमान परमात्मा से द्वेष करते हैं तथा जो शरीर में परमात्मा
को मानता हो उस विवेकी पुरुष को निन्दा करते हैं। इन
अशुभ कर्मकारी द्वेषी कर अधम पुरुषों को परमेश्वर संसार में
कृमि कीट प्रादि योनि के जन्म में नियोग करता है।
ते मूढाः कृमिकीटादियोनौ जन्मनिजन्मनि ।
परमात्मानमप्राप्य मुहुर्यान्त्यधमां गतिम् ॥२२॥
अर्थ-ये प्रामुरीसंपत्ति वाले जन्मजन्म में रुमि फीट
आदि योनि में माह को माप्त होकर परमात्मा को न पाकर
वारंवार धमगति को प्राप्त होते हैं।
कामः क्रोधश्च लोभश्च विवेकज्ञाननाशकम् ।
विधेव नरकद्वारं तत्त्याग उचितस्ततः ॥२३॥
एतैस्विमिस्तमोद्वारैर्विमुक्तः श्रेय आत्मनः ।
य आचरेत् स्मरनीशं स मोक्षगतिमानुयात् ॥२४॥
ये तु शास्त्रविधींस्त्यता चरन्ति च मनोमतम् ।
न ते सिद्धिं सुग्यं मोक्ष प्राप्नुवन्ति कदाचन ॥२५॥

-झाम क्रोध और लोम, विवेक ज्ञान के नाश करने
वाले ये तीनही नरक केद्वार हैं इसलिये इन तीनों का त्याग
करना उचित है । जो पुरुष इन तीन तम के द्वारों से अलग
. होकर परमेश्वर का स्मरण करताना अपने कल्याण का प्राच-
रण करता है वह मोक्ष गति को प्राप्त होता है। और जो शास्त्र
विहित विधियों को त्याग करके मनमाना अनुष्ठान करते हैं
वे सिद्धि सुख और मोक्ष इनको कदापि नहीं पाते।
इदं हि कर्तव्यमकार्यमेतत्
प्रमाणमत्रागम एवं नान्यत् ।
तस्माद्भवान शास्त्रविधौ सदुक्तं
ज्ञात्वैव कर्माचर पशुराम ॥२६॥
अर्थ-हे परशुरामजी ! यह कर्तव्य है यह नहीं करने का
है इस स्थान में शास्त्र ही प्रमाण है दूसरा नहीं है। इसलिये
तुम शाख विधि में उत्तम प्रकार से जो कहा है उसको जान
करके ही कर्म का माचरण करो।
इति ब्रह्मज्ञानशास्त्रे श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक-
परशुरामसंधादे राजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत्त
भापाटीकायामेकविंशः सर्गः ॥२१॥

परशुराम उवाच- त्यक्ता शास्त्रविधानं तु श्रद्धायुक्ता यजन्ति ये । सत्वं रजस्तमस्तेपां परिणामे भवेत् किमु ॥१॥ अर्थ-परशुरामजी बोले किहे जनकजी! जालोग शास्त्र- विधि को स्याग कर श्रद्धायुक्त हो यज्ञ करते हैं उनको परि- णाम में सत्त्व, रज अथवा तम कौन गुण प्राप्त होता है। 'जनक उवाच- अर्थ- स्वभावतस्तु त्रिविधा श्रद्धा भवति देहिनाम् । सात्विको राजसी श्रद्धा तामसीशृणु ताः पृथक्॥२॥ --जनक जी कहने लगे कि प्राणियों को सात्विकी राजसी तामती तीन प्रकार की श्रद्धा स्वभाव से होती है उन को अलग अलग मुनो। मुने भवति सर्वस्य श्रद्धा सत्वानुसारिणी । श्रद्धावन्तो नराश्चातो यो यच्छूद्धः स तद्गुणः॥३॥ सुरान् यजन्ति सत्वस्था राजसा यक्षराक्षप्तान । यजन्ति तामसाश्चापि भूतप्रेतगणानिह ॥४॥ अर्थ:-हे परशुराम जी ! पय मनुष्यों को श्रद्धा अपने २ सत्य के अनुसार देती है इमलिये मनुष्य श्रद्धावान् पाहाते हैं। उनमें जो मात्यिक राजम तामग जिस अदाबाला होता है यह गारियक राजग तामम गुण याला काहाता है। मत्यगुणी पुरुप देयता का पूजन रजोगुणी यक्ष और रातों का पूगन और तमोगुणी यदा भूत मेतगणों का पान करते हैं। - चाहाराः सात्विकप्रिया लोके ॥२॥ ( १५७ ) घोरं तपस्तपन्ति स्म ये शाखाविहितं जनाः। युताश्च दम्भाहङ्कारकामरागदुराग्रहः ॥५॥ उपवासादिनियमैः कर्पयन्ति तनुस्थितम् । पृथ्व्यादिपञ्चभूतानां समूहं त्वीदृशा जनाः ॥६॥ अवज्ञाय परात्मानं व्यापकं संदेहगम् । तमोगुणप्रधानांश्च तान् जानीद्यविवेकिनः || अर्थ-जो लोग शास्त्र में प्रकथित घोर तपस्या करते हैं और दम्भ प्रहार काम राग तथा दुराग्रहों से युक्त है वैसेही उपवास प्रादि नियमों से शरीरस्थित पृथिवी आदि पंचभूतों के समूह को ऐसे नाग मुसाते हैं और सर्व शरीर गत व्यापक परमात्मा को नहीं जानते हैं उन अविवेकी पुरुषों को तमोगुण प्रधान माना। विधाहारोऽपि सर्वस्य मियो भवति देहिनः। दानं यजस्तपश्चापि तेपां भेदानिमान् शृणु दा अर्थ- सय प्राणियों को सीन प्रकार का आहार भी प्रिय हेवा है। ऐमेहो दान या सभी तीन २ प्रकार के प्रिय होते समन भेदों को मुने। सुरसाः स्निग्धा हया वलायुरारोग्य सुसुखसत्यमुदाम् । संवर्धकाः स्थिरा अपि (१४८ ) आहाराः कटुलवणा- म्लतीक्ष्णरुक्षा विदाहिनोऽत्युप्णाः । शोकामयदुःखानां कारो राजसत्येष्टाः ॥१०॥ अपवित्राः पर्युपिता उच्छिष्टा यातयामाश्च । दुर्गन्धयो गतरसा आहारास्तामसस्येप्टाः ॥११॥ अर्थ -उत्तम रसवाले, स्नेह युक्त, चित्त को सन्ताप देने बाले, वल मासु आरोग्यता उत्तमसुख शक्ति और प्रीति के बढ़ाने वाले और घिरकाठ रस रूप से शरीर में स्थित ऐसे साहार लोक में सत्वगुण वाले को प्रिय हैं। कहवे सारे, स? तीखे कसे जउन को उत्पन्न करने वाले बहुत गरम और शोक रोग दुःख को करने वाले आहार रजोगुराधाले को प्रिय हैं । अपवित्र,यासी,जूठे मिनके पकने पर प्रहर योत गया हो दुर्गन्ध युक्त यिनारस के आहार तमोगुणवाले को प्रिय हैं। शास्त्रानुसारं कर्तव्य इति मानसनिश्चयात् । फलेन्छारहितो यज्ञ इज्यते यःस सात्विकः ॥१२॥ कृत्वा फलाभिसन्धानं दम्भाचारेण वा पुनः । लोके य इज्यते यज्ञः स राजस उदाहृतः ॥१३॥ शाम्वोक्तविधिना हीनः सामग्या श्रद्धयापि च । दक्षिणामन्त्रहीनश्च यतस्तामत उच्यते ॥१४॥ -রানু গল্প সয় জাল টা পদ হৃ

निश्चय करके फल की इच्छा न रखकर जो यज किया जाता है
वह सात्विक यज्ञ कदाता है। फल होने की इच्छा रख कर
अथवा दम्म (कपट) रस के जो यज्ञ किया जाता है वह राजस
कहाता है। शास्त्रोक्त विधि से हीन सामग्री से हीन श्रद्धा से
हीन और दक्षिणाहीन मन्त्रहीन जो यज्ञ किया जाता है वह
तामस कहाता है।
सुरविमगुरुप्राज्ञपूजा पावित्र्यमार्जवम् ।
अहिंसा ब्रह्मचर्य च शारीरं विहि तनपः ॥१५॥
सत्यं प्रियं हितं वाक्यं यतो नोद्विजते जनः ।
वेदाद्यभ्यसनं चापि तपो वाङमयमुच्यते ॥१६॥
सौम्यता चेतसः शुद्धिमानमिन्द्रियनिग्रहः ।
स्वभावस्य पराशुद्धिरुच्यते मानतं तपः ॥१७॥
अर्थ-देवता, ब्राह्मण, गुरु और विद्वानों की पूजा 4-
वित्रता सुमार्ग से घटना अहिंसा और ब्रह्मवयं मे रहना यह
शरीर मम्मन्यो तप कहाता है। जिससे किसी को दुःत न हो
ऐसा मत्य प्रिय और हित वचन जिमसे दूसरों को देगम हो
और वेद थाय मादिका मन्या करना पद पाणो सम्बन्धी
तप है। म माय रराना, अनःकरण को शुद्ध रराणा,
भात् व्यर्थ आपण पाहमा इन्द्रियों को रोकना समाय को
बहुत ही शह रखना पद मन सम्यन्यो सप है।
एकाग्रचिनेन फलाप्रेप्सुना तन् त्रिचा तपः।
अहयोत्कृष्टया तप्तं तत्साविकमुदाहृतम् ॥१८॥

(१५०) . दम्भाभिमानैः सत्कारप्रतिष्ठाथै हि यत्कृतम् । क्षणिकं तत्तपोऽनित्यं राजसं समुदाहृतम् ।।१९।। अविवेकतया क्लेशान लहता क्रियते तपः। यत् परेपां विघातार्थमुच्यते तद्धि तामसम् ॥२०॥ अर्थ-एकाग्रचित्त होकर फल की इच्छा न रखकर उत्तम श्रद्धा से जो पूर्वोक्त तीन प्रकार का तप किया है। वह सात्विक तप कहाता है । दम्भ अभिमान से सत्कार वा प्रतिष्ठा के लिये जो तप किया जाता है वह राजस तप क्षणिक अर्थात् अनित्य फहाता है। अविधेक से शो को मह कर दूसरे की हानि होने के लिये जो तप किया जाता है वह तामस तम कहाता है। पुण्यदेशे पुण्यकाले पात्रायानुपकारिणे । यदातव्यघिया दान दीयते सात्विकं हि तत् ॥२१॥ स्वर्गादिफलमुद्दिश्य दानं यदुपकारिणे । दीयते क्लेशपूर्व वा तदुक्तं राजसं बुधैः ।।२२।। यदानमशुची देशे कुकाले चापमानतः । असत्कृत्याप्यपात्रेभ्यस्तामसं तदुदाहृतम् ॥२३॥ अर्थ-वममे उपकार होने की इध्या गरराफर मुझे देना हेम युद्धि मे पात्र (योग्य ) पुरुष को पुगप देश में पुरायकाठ में दाग दिया जाता है यद मात्यिक दाग कराता है। य. गांदिक फट का उद्देश करके अपया संशपूर्वक उममे प्रकार की रक्षा रखकर जो सगे दाम दिया जाता है यह एजमदान . कहाता है। अपवित्र देश में निषिद्ध काल में अपमान पूर्वक मस्कार न करके अपात्र (अयोग्य) पुरुषों को जो दान दिया जाता है वह तामस दान कहाना है। अयात्र वच्मि परशुराम सम्यक्फलाप्तये । यज्ञदानतपःकर्मस्वपि सागन्त्वसिद्धये ॥२॥ तत् सदिति च त्रेधा ब्रह्मणः स्मरणं परम् । मिति ब्रह्मवेद्यं यच्छ्रुतयोविहितास्ततः ॥२५॥ तजगद्धत्वविदुषां परोक्षं ब्राह्मणास्ततः । परमार्थ साधु शस्तं सट् यज्ञा विहितास्ततः ॥२६॥ अर्थ-हे परशुरामी! अब यहां या दान तपाइत्यादि कमों में उत्तम फल मिलने के लिये और उन कमी को साहता मिटु देने के लिये भी कहता हूं। ॐ तत् मत् यह तीन प्रकार पावल का परम (आम) मरा है। उममें यह तथ्य (जानगे योप) व्रत है अर्थात् ऐमा शुध्द का अपं.१ पस लिये तुमसे येदयने । तत् भगत का कारण नहीं जागने वालों को अप्रत्यक्ष हे भर्यात ऐमा तम्म्द का अर्थ लिये उम्मे बाल) यने । यही सपद का अर्घ परमापं मापुसाय या माय मठिये उमसे पात्र यने । तस्मादों तत्तदायन्ते त्रिरुतवाखिलाः कियाः। पतदानतपःस्नानयात्रापाटाशनादयः ॥२७॥ वेदशासविदां प्रोक्तास्ताच सत्वातिरेकतः। वेदोक्तफलदाभ्यः स्युहीना अपि ध्रुवम् ॥२८॥ । - ( १५२ ) अर्थ-इसलिये वेद शास्त्र जानने वाले पुरुषों के लिये यज दान तप स्नान यात्रा पाठ और भोजन ये सब क्रिया आदि और अन्त में तीन तीन वार ॐ तत्मत् कहके ही करनी ऐसा कहा है। वे क्रिया सत्यगुण अधिक होने से अङ्ग हीन है। तो भी निश्चय से वेदोक्त फल की देने वाली होती हैं। अनादिविधिरपोस्मान महात्मा नारदो भृगुः। तन्मन्त्रविद्वसिष्ठश्च याज्ञवल्क्यः पराशरः ॥२९॥ एतत्प्रभावादेवैते निर्दोपाः सन्ति सर्वदा । वरं तत् सर्वनामम्य ॐ तत् सत् परमात्मनः।३० अर्थ-यह विधि अनादि है इसीलिये महात्मा नारद मृगु धमिष्ट याज्ञवल्क्य और पराशर ये इस मन्त्र के जानने पाठे एमी मन्त्र के प्रभाव से सदा निर्दोष रहते हैं। और परमात्मा के भय नामों से वह ॐ तत् सत् श्रेष्ठ है। तन्नामत्रयमाहात्म्यं वदाम्यत्र पृथक् पृथक् । नामकैकं पवित्रीकहह्मप्राप्तिकरं परम् ॥३१॥ -उन तीन नानों का पहात्म्य यहा अउग अछग कहते हैं। एक एक नाग पवित्र करने वाठा आरक्ष की प्राप्ति करने वाटा अयश्य है। उचारयिष्यति तु य वीणि नामान्यसी शुचिः ।. सन्देहः कोऽत्रवेदेषु सारमन्त्रोऽयमीरितः ॥३२॥ अर्थ-सीमोना गाम का दरिय परेगा यह पवित्र दामा इसमें सा गंदे है। देश में पदम गारभूत कदा है। अर्थ- नाम नामत्रयप्वक येषु मन्त्रेषु वर्तते । तत्फलं नामशक्त्यैव स्यादवश्यं तथाशु च।।३३।। अर्थ-तीन नामों में से एका भी नाम जिन मन्त्रों में है उसका फल नाम यी शक्तिही से अवश्य और शीघ्र होता है। येषु नामत्रयेप्वेकमपि मन्त्रेषु नाम न । नतं मन्त्र जपेद्यस्मात संशयस्तत्फलाप्तिपु ॥३॥ अर्थ-जिन मन्त्रों में इन तीन नामों में से एक भी नाम नहीं है दन मन्त्रों को जपना न पाहिये क्योंकि उनका फल मिलने में सन्देह है। कापि किया वरा स्यात् किमेतन्मन्त्रजपं विना । क्रियाद्यन्ते ततोऽवश्यं त्रिर्मन्त्रममुमुचरेत् ||३५|| अर्थ- --का मन्त्र के जपने बिना कोई किया श्रेष्ठ हो भफती है क्या? इसलिये क्रिया के घादि और अन्त में तीन बारम मन्त्र को सवश्य ठधारण करना चाहिये। श्रुतेः तारं तु गायत्री तस्या व्याहतपस्त्रयः । तत्सारं प्रणवः प्रोक्तो गोदुग्धातु घृतं यथा ॥३६॥ -- कागार गायत्री गायत्री का मार तीन पाहुनि (भभुधार) पेर उगा गार प्राव है। भिमे गाय के दूध में में पो॥ दुग्या सयं गोप इव देभ्यो विपिनोदिता। गापत्रो साप्रेष्ठतम वेदमन्त्रेषु सर्वथा ॥३७॥ ।

(१५४) अर्थ-ब्रह्माजी ने श्रापही गोप (अहीर) के ऐसे वेदों में से दूह के गायत्री कही है। यह सर्वथा सब वेद के मन्त्रों में तस्माद्विपः क्षत्रियो वा वैश्यो वा वेचिनोयदि । गायत्रीं न जपेद्वापि स जीवन शूद्रतामियात् ३० वृथा तजन्म संसारे वन्ध्या मातास्य वा घरा। श्वजन्मनि प्रपोत सोऽवश्यं मरणोत्तरम् ॥३९॥ अर्थ-तस्मात् जो द्राक्षण क्षत्रिय और वैश्य गायत्री को नहीं जानता या गायत्री मन्त्र का जप नहीं करता वह जीता हुधा भी शूद्र के समान है उसका जन्म संसार में वृथा हे प्रथया उसकी माता यांझ रहती तो श्रेष्ठ होती । और यह ग्राह्मण आदि मरने के उपरान्त कुत्ते के जन्म को पायेगा । गायत्री नोपदिष्टा वा नचोपनयनं कृतम् । द्विजेन येन पुत्राणां स गच्छेन्नरकं ध्रुवम् ॥१०॥ थर्थ-जिम प्रावण सत्रिय या वैश्ययणं के पिता ने अपने पुत्रों को गायत्री मन्त्र का उपदेश नहीं किया था यशो- प्रयास गस्कार नहीं किया यह अयश्य ही नरफ में लापगा। द्विजेन जता गायत्री दद्यादुग्धं घृतं मधु । अर्थ चान्त ब्राह्मलाभं कुर्यान्मातेय रक्षति ॥११॥ अर्थ গ্রন স্থির বা ৫ম সঙ্গেী গল্প বা ৫ लगका गायो १४ पी मधु और चर्षणिति देती है भारममा लामियादवामाता गमागकतीहै।

ये विप्रा नरपतयो विशः प्रभाते
खां सन्ध्यामनवरतं समाचरेयुः।
ते वै राज्यघमपहन्ति ये निशायां
घसाघं त्विति समुपास्यतां वसन्ध्ये ॥४॥
अर्थ-जो ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य प्रातः काल की
सन्ध्या को नित्य करते हैं वे रात्रि के पापों को दूर करते हैं
और जो रात्रि की सन्ध्या को करते हैं वे दिन के पापों को
माश करते हैं। इसलिये दोनों काल की सन्ध्या करनी चाहिये।
त्रिविधा श्रद्धा हार
स्त्रिविधो दानं तपस्त्रिविधम्।
त्रिविधो यज्ञः प्रोक्तः
किं भूयः श्रोतुमिच्छ सीति वद ॥१३॥
अर्थ-तीन.प्रकार की श्रद्धा, तीन प्रकार का माहार,
तीन प्रकार का दान और तप तथा तीन प्रकार का यज्ञ कहा
अब कसा सुनने चाहते हो से कहो।।
इति प्रमज्ञानशास्त्रे श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक-
परशुरामसंवादेराजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत
भापाटीकायांद्वाविंशः सर्गः ॥२२॥

. परशुराम उवाच- सन्यासस्य महाराज त्यागस्य च पृथक पृथक खरूपं वेनुमिच्छामि जनकाख्यातुमर्हसि ॥१॥ कृपया परयामां यत् कृतेन्द्रियनिग्रहः । ज्ञाने भगवता साम्वशिवेन सहशो भवान् ॥२॥ अर्थ-परशुरामजी कहते हैं कि हे जनक महाराज, सन्यास और त्याग का अलग अलग स्वरुप जानने चाहता हूं सो पूर्ण कृपा करके मुझे कही। भाप संपूर्ण इन्द्रियों को जीते हुए हो और ज्ञान में भगवान् पार्वती सहित शिव के समान हो। जनक उवाच-- संन्यासः पण्डितैः प्रोक्तस्त्यागो यः काम्यकर्मणाम्। कृत्स्नकर्मफलस्यैव त्याग त्यागो बुधैः स्मृतः॥३॥ अर्थ-जनक जी कहते हैं कि विद्वान् लोगों ने काम्म कमों का जो त्याग है उसको सन्यास कहा है और उन्होंने संपूर्ण कर्मों के फल हो के त्याग को त्याग फहा है ॥ कर्मणि दोपान दृष्ट्वा प्राहुस्त्यागं विवेकिनोऽर्यवशात् । त्याज्यानि जैमिनीया नैव तपोदानयज्ञकर्माणि ।। अर्थ-यियेको लोग कमी को अर्यमूलक समझ के और उनमें दोपदेश के उनका पागकरना कहते ६ रिसीमिनीय (मीमांम) लोग तप दान और याकर्मी का त्याग नहीं फरमा ऐमा कहते हैं।

(१५७ ) निश्चयस्त्यागविपये मम यस्तं मुने शृणु । यतस्त्यागं त्रिधा प्राहुर्मुनयस्तत्वदर्शिनः ॥५॥ अर्थ-हे परशुराम जी ! त्याग के विषय में जो मेरा निश्चय है उसे सुनो। क्योंकि तत्वदर्शी मुनि लोग त्याग को तीन प्रकार का कहते हैं। यज्ञदानतपःकर्माण्यन्तःकरणशुद्धये । कर्तव्यान्येव न त्याज्यानीति प्राहुर्मनीषिणः ॥६॥ कर्माण्येतानि कर्तव्यान्येवासक्ति फलानि च । संत्यज्येति मतं मन्ये मुने निश्चितमुत्तमम् ॥७॥ अर्थ-पजदान और तप ये सीनों कर्म अन्त करण की शुद्धि के लिये हैं इसलिये करने ही चाहिये त्याग नहीं करने ऐसा बुद्धिमान् लोग कहते हैं। कों के फल और उनमें प्रा. सक्त होना लोड़ के ये कर्म करने ही चाहियें। हे परशुराम जी निश्चय से यह मत उत्तम मानता हूं। न संभवति नित्यानां त्यागो विहितकर्मणाम् । त्यजेच्चेदविवेकेन तान् त तामस उच्यते ॥८॥ देहक्लेशभयात् कर्म य हुःख मिति संत्यजेत् । तं त्यागं राजतं कृत्वा न त्यागफलमाप्नुयात् ॥९॥ नियत कर्मकर्तव्यमित्येवाचर्यते तु यत् । त्यक्ताफलानि चासक्तिमुक्तस्त्यागःस सात्विकः॥१०॥ अर्थ -नित्य और विहित कर्मों का त्याग नहीं संभव.

ता इसलिये अविवेक से जो उन्हें छोड़ दे तो वह त्याग तामस
( १५८ )
कहाता है। जो कर्म को शरीर पीड़ा के भय से दुःख समुझ के
त्याग करे वह राजस त्याग करके त्याग के फल कोनहीं पाता।
नियत कर्म करना चाहिये इतना ही समुझ के उसके फल की
इच्छा और उसमें भ्रातक्ति छोड़ के जो त्याग किया जाता है
वह त्याग सात्विक कहाता है।
दुःखदं कर्म न द्वेष्टि न सक्तः सुखदेवपि ।
स त्यागी छन्नसन्देहः सात्विको बुद्धिमान वली।११]
शरीरी सर्वकर्माणि त्यक्तुं शक्रोति नो यतः ।
ततः कर्मफलत्यागी वुधैस्त्यागीति गीयते ॥१२॥
इष्टानिष्टविमिश्राणि त्रिधा कर्मफलान्यपि।
परलोके सकामानां भवन्ति त्यागिनां न ते ॥१३॥
थर्थ-जो त्यागी दुःस देनेवाले कों से द्वेष नहीं करता
और सुरा देने वाले कमों में भासत भी नहीं होता यह त्यागी
युद्धिमान् और यलयान् कहाता है और उसके सय मन्देह मिट
जाते हैं। जिस कारण से शरीरधारी पुरुष सय कमी को दो
नहीं सकता इसलिये फर्म फलों को त्यागनेयाला त्यागी कहाता
है। प्रध्ये युरे और मिले हुए तीन प्रकार के कर्मफल परलोक
में मकाम (कामना सहित) पुरुषों को होते हैं त्यागियों को
ये मदीं होते।
अशेषकर्मसिहाथै कारणानीह पश्च च ।
मोक्तानि साक्ये वेदान्तेमत्तस्तानि मुने शृणु ॥१४॥

.. तत्राद्यमधिष्ठान कर्ता करणं पृथकप्रकारमपि । नानाविधाञ्चचेष्टाः पञ्चममत्राभिधीयते दैवम् ॥१५॥ यत् कर्मवाङनोदहैन्याय्यमन्याय्यमेव वा । आरभ्यते नरै स्वेधा तस्यैते पञ्च हेतवः ॥१६॥ अर्थ-हे परशुरामजी । संपूर्ण कमी की मिद्धि होने के लिये सांस्य शास्त्र और वेदान्त में पांच कारण कहे है से मुझ से मनीं । पहिला अधिष्ठान (जहां वा जिसमें वह कर्म किया जाता है), दूसरा कर्ता, तीमरे अलग अलग इन्द्रिय (जो उस कर्म करने के साधन हैं) चौथे नाना प्रकार की चेष्ठा और पां- पा कारणदेव है। न्याय से अथवा अन्याय से जो कर्म मनुष्य लोग वाणी मन और शरीर तीन प्रकार से प्रारंभ करते हैं उस के ये पूर्वोक्त पांच प्रकार के कारण हैं । एवं सति कर्तारं मन्यतआत्मानमेव यस्तत्र । अविवेकाटुरुशास्त्रोपदेशरहितः स नेक्षते दृश्यम्।१७। सवदेश्यनहङ्कारः पश्येद्यः प्रापिनोऽखिलान् । विवेकदृष्टयानो भिन्नान लोकदृष्ट्या पृथकस्थितान१८ स नन्नपि न हन्तीमान् लोकान् हीनोऽघाङ्कया। फलेनापि न बद्धः स्यादसौ हननकर्मणः ॥१९॥ अर्थोमा रहते ओ मात्मा ही को फी को फर्ता मा. नता है यह शास्त्रीपदेश और गुरूपदेश से रहित अपने भवि- वेक से दूश्य वस्तु को नहीं देख सकता । अहङ्कार रहित सर्व-

-
( १६० )
दर्शी पुरुष संपूर्ण प्राणियों को विवेक दृष्टि से अलग नहीं
देखता और लोग दृष्टि से अलग देखता है वह मारता हुआ
भी इन लोगों को नहीं मारता है क्योंकि उसको पाप के होने
की
शङ्का नहीं है। नार यह मारने के कर्म के फल से भी बद्ध
नहीं होता।
ज्ञान ज्ञेयं तथा ज्ञाता स्यात् कर्मप्रेरणा त्रिधा ।
कर्तृकर्मगुणास्त्रेघा कर्मसंग्रहकारकाः ॥२०॥
अर्थ F~जान जेय और पाता तीन प्रकार की कर्म की
प्रेरणा है अर्थात् इन तीनों के अनुसार कर्म होता है। मा कर्म
और प्रेरणा के गुण ये तीन कर्म के सह झरने वाले हैं।
ज्ञानं च कर्म कर्ताच त्रिधा सत्वादिभेदतः।
सायशास्त्र यथा प्रोक्ता यथावत् तानथो शृणु ।२१॥
अर्थ-शान फर्म और का ये प्रत्येक सत्यादि गुणो के
भेद से तीन प्रकार के सारशास्त्र में जैसे फहे हैं उनको प्रय
ययावत (जैसे हैं वैसे) मुनो।
येनैकमीक्षते भावं सर्वभूतेष्वनश्वरम् ।
विभक्तप्यविभक्तं तज्ज्ञानं जानीहि सात्विकम् ॥२२॥
पार्यक्ष्यं सर्वभूतेषु वेति येन पृथग्विधान ।
मुग्यदुःखादिकान् भावज्ञानं तद्विद्धि राजसम ॥२३॥
विनाममाणं यच्चैककार्यासक्तमशेपचन ।
आपारमायिकं तुच्छं ज्ञानं तत् तामसं विदुः॥२४॥

अर्थ-जिस जान से अलग अलग सर्व भूतों में अनाश- वान् एक अभिन्न भाव को देखता है वह ज्ञान सात्विक जानो। जिस ज्ञान से सर्व भूतों को भिन्न भिन्न तया उनमें सुख दुःख श्रादि भावों को अलग अलग जानते हैं उसको राजस ज्ञान जानो बिना प्रमाण के अनेक कार्यों के सदृश एक कार्य में लगा हुआ हो और जो परमार्थिक्ष न होकर तुच्छ है वह ज्ञान तामस है। रागद्वेषविहीनं यत् कर्तृत्वाभिमानशून्यं च । नियतं यच्च फलेच्छाहीनं तत् सात्विकं कर्म ॥२५ यत् कर्म क्लेशवहुलं क्रियते कार्यसिद्धये । अहंकारेण सहित राजसं तत् प्रचक्षते ॥२६॥ द्रव्यनाशं स्वसामर्थ्य फलं च परपीडनम् । अनवेक्ष्याविवेकेन कर्म यत् तामसं हि तत् ॥२७॥ अर्थ-जो राग द्वेष से कर्तृत्व के अभिमान से (मैं करता हूं इत्यादि से) और फल की इच्छा से रहित नित्य विधि- विहित फर्म है वह सात्विक कहाता है। जो कार्यसिद्धि के लिये बहुत क्लेश सह के अहसार के साथ किया जाता है वह कर्म राजस कहाता है। जी द्रव्य नाश को अपने मामय को अपने कार्य के फल को भार पराई पीड़ा को न देस के प्रवि- वेक से किया जाता है यह तामस कर्म कहाता है। धैर्योत्साहयुतस्त्यक्तसङ्गोऽहङ्कारवर्जितः। सिध्यसिझ्योहखेदशुन्यः कर्ता तु सात्विकः॥२८॥ - २१ ( १६२ ) लाभालाभे हर्पशोकयुतो लुब्धोऽशुचिः फलम् । लिप्सते हिंसको रागी कर्ता राजस उच्यते ॥२९॥ अविवेक्यविहितकर्ता छली त्वनम्रश्च परतिरस्कारे। निरतोऽलसश्च दुःखी चिरक्ति यस्तामसः कर्ता॥३०॥ अर्थ-जो पुरुष धैर्य और उत्साह से युक्त हो निःसङ्ग हो कर्तृत्वाभिमान से रहित होऔर कार्य सिद्धि से हर्ष न करे और कार्य न होने से खेद न करे उस कर्ता को सात्विक जाना। जो लाभ होने से हर्ष करे, लाभ न होने से खेद करे,लोभी हो, अपवित्र हो, फल की इच्छा करे, हिंसा करे, रागयुक्त है, यह फर्ता राजस कहाता है। जो अविवेकी हो अविहित कमों को करे, छत्तो हो, नर्म न हो, दूसरों का तिरस्कार करने में प्रा. सक्त हो, भालसी हो, दुःखी हो,, काम करने में देर करे, यह फर्ता तामस कहाता है। सत्वादित्रिगुणैवुद्धेधैर्यस्यापि त्रिधा भिदा । प्रोक्ता पृथक पृथक तां च शृणु वक्ष्याम्यशेपतः।३१) अर्थ-युद्धिार धैर्य के सत्यादि तीनों गुणों करके तीन भेद कहे , तमको सभी को अलग अलग करके मैं कहता हूं मो मुनो। पापानिवृत्तिं सुकृते प्रवृत्रिं विधिप्रयुक्तप्वभयं भयं तु। विनिन्दिते वन्धनमोक्षहेतुं जामाति बुद्धिः खलु सात्विकी सा ॥३२॥ :

- धर्माधौं यया बुद्ध्या सन्दिहानः प्रपश्यति । अकर्तव्यं च कर्तव्यं सा बुद्धी राजसी स्मृता ॥३३॥ धर्माधौ तथा सर्वान पदार्थानन्यथेक्षते । अज्ञानाच्छादिता बुद्धिस्तामसी परिकीर्तिता ॥३॥ अर्थ-पापफर्म से निवृत्त हो पुण्यकर्म में प्रवृत्त ही वि- हित कर्म में भये न करे निन्दित कर्म में भय करे और पन्ध भास के कारण को जाने वह बुद्धि निश्चय से शायित है । जिस बुद्धि से धर्म और धर्म को कर्तव्य और प्रकलव्य को सन्देह रूप से देखता है यह राजस युद्धि महाती है। धर्म अधर्म तथा अन्य सर्व पदाथों को जो बुद्धि उलटा देखती है और प्रधान से दकी है वह पुद्धि तामसी कहलाती है । एकाग्रमानसो भूत्वा प्राणेन्द्रियमनःक्रियाः । यया धारयते धृत्या सात्विकी सा धृतिः स्मृता।३५। वृत्या धारयते धर्मकामार्थान् यत्मसातः । फलाभिलापो भवति ला घृती राजसी स्मृता ॥३६॥ शोकसमभयोन्मादविपादान न विमुञ्चति । धृत्या यया च दुवुद्धिस्तामसी सा धृतिर्मता ॥३०॥ Po~-एका पिश होकर माणन्द्रिपर मन को शिपाओ को जिम में धारण करता है यह मालिक काहाता भिमफे मय फामा को मे पा. रप करता है उस फल फोदा कसा होतो यह जम - कहाता है दुर्युडि (उन्मत्त) पुरुष जिस धैर्य से शोक निद्रा भय उन्मत्तता और खेद इनको नहीं छोड़ता वह धैर्य तामस कहाता है। रमते यत्र चाभ्यासाञ्चेतो दुःखानिवर्तते । तत्सुखं त्रिविधं वक्ष्ये सत्वादिगुणभेदतः ॥३८॥ अर्थ-जिस सुख में अभ्यास से चित्त रमता है और दुःख से निवृत्त होता है वह मुस सत्वादि गुणों के भेद से तीन प्रकार का हे से कहता हूं। आरम्भे विपतुल्यं यदन्ते च सुधया समम् । धीमनोनिर्मलकरं तत् सुखं सात्विक स्मृतम् ॥३९॥ आदावमृतवचान्ते विपवद्यत् सुखं भवेत् । विषयेन्द्रिययोगेन राजसं तत् सुखं स्मृतम् ॥४०॥ आरम्मे परिणामे च यन्मनो मोहनं सुखम् । निद्रालस्याविवेकोत्थं तामसं तत्प्रकीर्तितम् ॥४१|| अर्थ-~जो पहिले विप लेसा हो और शन्त में अमृत जैसा हो र युहि तया मन को निर्मल करने याला हो यह मुख सायिक पहाता है । जो पहिले अमृत जैसा हो अन्त में विप क्षमा हो। जो विषय और इन्द्रियों के योग से उत्पन्न होता है यह रा रा कहाता है । जो मादि भार अन्त में मन को माह करने वाला होमिदा मालस्प और मयियेक से उत्पक दोपहर तामस कहाता है।

पाताले दिवि भूमावस्ति च न शरीरघृक्कोऽपि । यः सत्वाद्यैरेभिलिभिर्गुणैः प्रकृतिजैर्मुक्तः ॥४२॥ अर्थ -पाताल में स्वर्ग में व भूमि में ऐसा कोई शरीर- धारी नहीं है जो इन प्रकृति से उत्पन्न सत्यादि तीन गुणों से यूटा हा॥ इति ब्रह्मज्ञानशास्त्रे श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक- परशुरामसंवादे राजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत भापाटीकायांच्याविंशः सर्गः ॥२३॥ जनकदवाथ- गुणैः कर्मणि सत्वायैविभक्तानि स्वभावजैः । विप्रक्षत्रियविशुद्रवर्णानां तान् क्रमाञ्छृणु ॥१॥ अर्थ-जनक जी कहते हैं कि स्वभावजन्य सत्यादि गुणों से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों यशों के धर्म अलग अलग किये हैं उनको क्रम से सुनो। तपो वाद्यान्तरं शौच शान्तिरिन्द्रियनिग्रहः । क्षमा निमलता चिने विज्ञानं शास्त्रसंभवम् ॥२॥ जानं चानुभवप्रातमधनित्यत्वपीरपि । परलोकस्य विपये स्वभावाद् ब्रह्मकर्म तत् ॥३॥ अथ-तवाहर तरको दिशानि इन्द्रियों का ( १६६ ) निग्रह क्षमा चित्त में स्थिरता शास्त्र का विज्ञान अनुभव से मासज्ञान और परलेश्क के विषय में नित्यत्वबुद्धि यह स्वभाव से ब्राह्मण या कर्म है। दानं समर्थता शौर्य संग्रा मादपलायनम् । तेजश्च दक्षता धैर्य कर्म क्षात्रं स्वभावजम् ॥४॥ गोरक्षा कृषिवाणिज्ये विशां कर्म स्वभावजम् । द्विजाना परिचयैव शूद्रकर्म स्वभावजम् ॥५॥ अर्थ-दान का करना वा दान का देना समर्थ होना, शूरता संग्राम से नहीं भागना, तेजस्वी होना, चतुर हामा, धैर्य रखना, यह स्वभाव से क्षत्रिय का कर्म है। गो (पशु) की रक्षा करना,कृपि और व्यापार करना,यह स्वभाव से वैश्य का कर्म है । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों की सेवा ही स्वभाव से शृग का लभते पुरुपः सिद्धिं निरतः खस्वकर्माण । तयथावत् प्रवक्ष्यामि अणुप्वैकमना मुने ॥६॥ अर्थ-पुरुप अपने अपने कर्म में लगा रहने से सिद्धि को पाता है यह ठीक ठीक पाहता हूं हे परशुराम जी एकाग्र- पित होकर मुनो। ये न सर्वं जगहयाप्तं प्रवृत्तिः प्राणिनां यतः । संपूज्य सिद्धिं लभते पुरुपस्तं स्वकर्मणा ॥७॥ अर्थ:--गिसमे संपूर्ण जगत ध्याह और जिसरी सपूर्ण ( १६७ ) प्राणियों की प्रवृत्ति होती है उस परमेश्वर की अपने अपने कमां के अनुसार पूजा करने से पुरुष सिद्धि को पाता है । श्रेष्ठः स्वधर्मो हीनोऽपि स्वाचीर्णात् परधर्मतः। यतःस्वभावजं कर्म कुर्वन् नो दुःखमाप्नुयात् ॥८॥ अर्थ-दूसरे कर्म का उत्तम प्रकार से आचरण करे उससे अपना धर्म निकृष्ट होने पर भी श्रेष्ट है क्योंकि स्वभावज कर्म को करता हुआ पुरुष दुःख को नहीं प्राप्त हो सकता ।। स्वभावज सदोपं च कर्म नैव त्यजेद्यतः । सर्वकर्माणि दोपेणावृता धूमेन बह्निवत् ॥९॥ धर्ध -स्वभावज फर्म दोष सहित भी हो तो त्याग नहीं करना क्योंकि सभी कर्म दोष से युक्त है जैसा अनि घूम से युक्त रहता है। असमन्धीजिंता हन्तो निस्पृहो लभते पराम् । नैष्कर्म्यसिद्विसंन्यासाद्ब्रह्मात्मैक्यस्वरूपिणीम्।१०॥ अर्थ-जिम पुरुप की सग में बुद्धि न ही अहङ्कार को जीता टुभा हो इच्छा रहित हो वा संन्यास से उत्कृष्ट नि- कमसिद्धि को जो ब्रह्म और भात्मा की एकता का रूप है उमको पाता है। तां ज्ञानस्य परं हेतुं सिद्धि प्राप्तो यथा पुमान् । प्रति च तथा वक्ष्ये समासेन शृणुप्य तत् ॥११॥ अर्थ -शान को मुख्य कारण उस मिशन सिद्धि को प्राप्त ( १६८ ) होके पुरुप जैसे ब्रह्म को मास होता है वैसा संक्षेप से कहता हूं सो सुनो। युक्तः : सात्विकया वुझ्यात्मानं धैर्यण निश्चलम् । कृत्वा शब्दादिविषयान् रागहेपौ व्युदस्यं च ॥१२॥ एकान्तदेशसंवासी यतदेहवचोमनाः । ध्यानयोगे च वैराग्ये तत्परो मितभोजनः ॥१३॥ कामं क्रोधं वलं दर्पमहङ्कारं परिग्रहम् । त्यक्ता शान्तो निर्ममश्च ब्रह्मभावमवाप्नुयात्॥१४॥ अर्थ-सात्विक युद्धि से युक्त होकर धैर्य से प्रात्मा को स्थिर करके शब्दादि विषय और रागद्वेप लोड के एकान्त स्थान में रहकर शरीर वचन और मन को घश करके ध्यान- योग और वैराग्य में तत्पर हो परिमाण का आहार फरे,फाम, क्रोध, घल, दर्प, घमंड, परिग्रह को त्याग करके शान्त हो ममता छोड यह प्रस्नभाय को प्राप्त होता है। स ब्रह्मभूतो मनसि प्रसन्नो न शोकभालेच्छति वस्तु किंचित् । सर्वाणि भूतानि समानि पश्यन् परां परेशस्य लभेत भक्तिम् ॥१५॥ अर्थ नलभाय को प्राप्त होके मन में प्रसन्न होता है। उसको शेफ नहीं होता यह कोई पस्तु नहीं चाहता संपूर्ण . भूतों को समान देराता गुमा पद परमेश्वर की परमभक्ति को पाता है। 4 ( १६२) जानात्यचलया भक्तचा परमेशं यथार्थतः। व्याप्तं सर्वेषु भूतेषु सच्चिदानन्दविग्रहम् ॥१६॥ एवं यथार्थरूपेण विज्ञाय तदनन्तरम् । परमानन्दरूपं स समाप्नोति न संशयः ॥१७॥ अर्थ मनुष्य अचल भक्ति से परमेश्वर को यथार्थ रूप से जानता है। परमेश्वर सर्व भूतों में व्याप्त है और सत् चित् आनन्द के स्वरूप है। ऐसा यथार्थ रूप से जानने से उसके पीछे वह परमानन्द रूप को प्राप्त होता है इसमें सन्देह नहीं । ब्रह्माश्रयश्च सर्वाणी कुर्वन् कर्माणि सर्वदा । अनुग्रहात् परेशस्य लभते शाश्वतं पदम् ॥१८॥ अर्थ-ब्रह्माश्रय होकर सब कर्मों को सदा करता हुआ परमेश्वर के अनुग्रह से शाश्वत (नित्य) परमपद को प्राप्त - होता है। पुमथै ब्रह्म विज्ञाय सर्वकर्माणि चेतसा । समर्प चेश्वरे चुध्यैकाप्रयोमोमिति स्मर ॥१९॥ अर्थ-हे परशुराम जी ! परम पुरुषार्थ रूप ब्रह्म को जान के संपूर्ण कामों को मन से परमेश्वर में समर्पण करके ए- काग्र बुद्धि से ॐ ॐ ऐसा स्मरण करो। परेशानुग्रहात् सांसारिकदुःखाद्विमोक्ष्यसे । नचेष्ट्रोप्यस्यहङ्कारांद्रश्यसे पुरुपार्थतः ॥२०|| २२

( १७०)
-
अहङ्कारवशीभूय चेदस्वीकृत्य मद्वचः ।
योत्स्यसे तर्हियुद्धस्य यत्नःस्यानिष्फलस्तव ॥२१॥
यतः सर्वः स्वभावोत्यकर्मणा स्वेन बध्यते ।
युद्धमिच्छसि यन्मोहात् तद्वशस्त्वं न योत्स्यसे ।२२
अर्थ-परमेश्वर के अनुग्रह से तुम संसार के दुःखों से
छूट जाओगे । जो अहङ्कार से न सुनोगे तो पुरुषार्थ से भ्रष्ट हो
जाओगे। जो अहङ्कार के वश होकर मेरे वचन को स्वीकार न
करके लड़ोगे तो तुम्हारा युद्ध का प्रयत्न निष्फल होगा क्योंकि
सभी अपने अपने स्वभाव जनित कर्म से घर होते हैं। मेह
के वश होकर जो युद्ध को चाहते हो तो अपने स्वभावज कर्म
के वश होकर नहीं लहोगे।
स्वमाययेश्वरः सर्वप्राणिनां भूतसंहतिम् ।
भ्रामयन् हृदये तेषां निवासं कुरुतेऽनिशम् ॥२३॥
अतः सर्वेण भावेन तमीशं शरणं व्रज ।
यदनुग्रहतः शान्ति परां मोक्षं च लप्स्यसे ॥२४॥
अर्ध-परमेश्वर अपनी माया से मंपूर्ण प्राणियों के भूत
समुदाय को घुमाता हुना उनके हृदय में सदा चार करता है।
इमलिये मयं भाव से उस परमेघर के शरराजाओ उसके अनु-
ग्रह से परम शान्ति और मोक्ष को प्राप्त होंगे।
इति गोप्यं मया ज्ञानं कथितं पशुराम ते ।
सर्वमेतदिचार्य त्वं यथेच्छाते तथा कुरु ॥२५॥

(१५१ )
गुह्यादृह्यतमं भूयः सर्वं शृणु वचो मम ।
हितं वक्ष्यामि ते ब्रह्मन विश्वस्येटतमे त्वयि ॥२॥
अर्थ:-हे परशुरामजी ! यह गुप्त शान मैंने तुमसे कहा ।
तुम यह सपूर्ण विचार के जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा करो।
फिर गुप्त से गुप्त सब कहता हूं मेरा वचन सुनो हे ब्रह्मन् । तुमः
मेरे इष्ट हो इसलिये विश्वास करके तुम्हारा हित हो ऐसा
कहता हूं।
तपोदानपुण्यादिकं यज्ञ किंचित्
कृतं स्यात् त्वया सर्वमीशेऽर्पय त्वम् ।
परेशं नमस्कृत्य चैकाग्रचित्तः
स्मरोमित्यथो मुक्तये संशयः कः ॥२७॥
यः कोपिक्षणमात्रं च स्मरत्योमिति मुक्तिभाक् ।
तनयो जमदग्नेस्त्वं त्वन्मुक्ती संशयोऽत्र कः॥२८॥
अर्थ -जप दान पुण्य प्रादि जो कुछ तुम करो वह
सब परमेश्वर को भर्परा करी। और परमेवर को नमस्कार
करके एकाग्र चित्त होकर ॐ ऐना सुमिरो फिर मुक्ति के लिये
क्या सन्देह है। जो कोई क्षणमात्र भी ॐ ऐसा सुमिरता है वह
मुक्ति को पाता है, तुम नमदग्नि के पुत्र हो तुम्हारी मुक्ति में
क्या सन्देह है।
इदमोमिति.च वसिष्ठो वाल्मीकिमिदेवोऽत्रिः।
भृगुयाज्ञवल्क्यनारदपराशरा अद्विरा भरद्वाजः॥२९॥

( १७२ )
इन्द्रो ब्रह्मा विष्णुः शिवो जपत्योजपं विना नहि शम्।
ओमोमिति स्मर सदा कल्याणेच्छास्ति पशुराम यदि ॥
अर्थ-यह ॐ को वसिष्ठ, वाल्मीकि, वामदेव, पत्रि
भृगु, याज्ञवाल्क्य, नारद, पराशर, अगिरा, भरद्वाज, इन्द्र,
ब्रह्मा, विष्णु, शिव, ये जपते है। ॐ कार के जप के बिना
कल्याण नहीं है । हे परशुरामजी । तुमको जो कल्याण की
इच्छा है तो ॐ ॐ ऐसा सदा स्मरण करो।
इति ब्रह्मज्ञानशास्त्रे श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक-
परशुरामसंवादे राजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत
भाषाटीकायां चतुर्विशः सर्गः॥२४॥
परशुराम उवाच---
प्रणवस्मरणं राजन् कर्तव्यमिति यत् पुरा ।
भवता गदितं सम्यक् कृपया ब्रूहि तद्विधिम् ॥१॥
अर्थ-परशुराम जी बोले कि हे जनक राजा | मायने
जो पहिले कर स्मरण करना चाहिये ऐसा कहा उसका
यिघि कृपा करके उत्तम प्रकार से कहो।।
जनकत्याध-
त्वयापरशुरामैप प्रभः सम्यक्तया कृतः ।
यथोमया शिवः पृष्ट आह तत् ते वदाम्यहम् ॥२॥

सुखोपविष्टं कैलासे पार्वती शिवमेकदा । पप्रच्छ परमात्मानं संस्मरन्ति महर्पयः ॥३॥ केनमन्त्रेण देवेशा कृपया तद्वदाशु मे। ततः शम्भुश्चिरं ध्यात्वा प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥१॥ अर्थ जनक जी बोले कि हे परशुराम जी ! तुमने यह प्रश्न उत्तम प्रकार से किया जैसा पार्वतीजी ने शिव भगवान से पूछा और उन्होने कहा वह तुमसे कहता हूं । पार्वतीजी ने एक समय कैलास में सुख से बैठे हुए शिव भगवान से पूछा कि महर्षि लोग परमात्मा का स्मरण किस मंत्र से करते हैं हे शिव भगवान् । कृपा करके वह मुझे शीघ्र को फिर शिवनी देर तक पान करके कहने लगे। शिवउवाच- श्रृणु पार्वति वक्ष्यामि गोपनीयं प्रयत्नतः । नाद्यावधि च कस्मै चित् प्रोक्तं त्वत्मीतिहेतवे॥५॥ प्रकाशयामि यज्ज्ञानात् प्राप्यते परमं पदम् । नातः परतरः कश्चिन्मार्गः श्रेष्ठतमोऽधहत् ॥६॥ अर्थ-शिवजी कहते हैं कि हे पार्वतीजी । जो यत्न से गोपनीय है और अभी तक किसी को कहा नहीं है तुम्हारे मोति के अर्थ प्रकाशित करता हूं जिसके जानने से परम पद प्राप्त्य होता है इसको छोड़ के कोई दूसरा मार्ग श्रेष्ठ नहीं है जो पाप का नाश करे।

(१७४ ) ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ब्रह्मणः गदितं किल । तड्यानात् तज्जपान्मा मुच्यन्ते सर्वकिल्विपात् ।७ अध -ॐ यह एकाक्षर ब्रह्म है ऐसा परब्रह्म ने निश्चय करके कहा है उसके ध्यान से उसके जप से मनुष्य पर्व, पापों से मुक्त होते हैं। सप्तात्र सन्ति सिहान्तास्तान शृणुप्वयथोदितान् । स्मृतो हिरण्यगर्भस्य ब्राह्मणः प्रथमोऽत्र च ॥८॥ अर्थ -~-इस प्रणव (*) के विषय में सात पिहान्त हैं जैसे मैं कहता हूं वैसे उनको सुनो । यहां पहिला सिद्धान्त हिरण्यगर्भ ब्रह्माजी का कहा हुआ है। यो जिज्ञासुः परं योगं जिवृक्षुः परमात्मनः । 'प्रणवोपासतामेवं स कुर्यादिति तन्मतम् ।।९।। त्रिमात्रिकस्तु प्रणवस्तिमात्रारूप इप्यते । विब्रह्मरूपश्च तथा भृयध्यक्षररूपकः ॥१०॥ इति ज्ञात्वाय ओंकारमुपास्ते सर्वदा बुधः । हिरण्यगर्भसिद्वान्तात् स प्राप्नोतिपरं पदम् ॥११॥ अर्थ-जो गित. [जानने वाला पुरुष] परमात्मा का परम योग पाने चाहता है। यह इसी सी तपामना करे यह उनका मत है। निमाधिक त्रिमात्रारूप है। (अग्नि,वायु,सूर्य) धकेही * त्रिग्रल रूप है (अम्बेद, यजुर्थेद, सामवेद ) फिर ॐ त्रिअतर रूप हे (सकार, ठकार, मकार) ऐमा जानकर ।

( १७५ ) के जो विद्वान् सर्वदा ॐ की उपासना करता है वह हिरण्य गर्भ के सिद्धान्त से परम पद को प्राप्त होता है। द्वितीयः सामयशास्त्रस्य प्रणेतुः कपिलस्य सः । त्रिज्ञानरूपत्रिगुणस्त्रिहैतुः प्रणवः स्मृतः ।।१२।। नवभेदं मुमुक्षुर्य उपास्ते चैवमन्वहम् । स सर्वपापनिर्मुक्तः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥१३॥ अर्थ-दृमरा सिद्धान्त सांख्यशास्त्र के कर्ता फपिल महा मुनिजी का है। ॐ तीन ज्ञान रूप है ( व्यक्त ज्ञान, अव्यक्त जान, शेयज्ञान ) ॐ तीन गुण रूप है ( सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण) ॐ तीन कारण रूप है (मन, बुद्धि,अहङ्कार) इस प्रकार जो मुमुक्त पुरुप ॐ की सदा उपासना करता है वह संपूर्ण पापों से मुक्त होके मोक्ष को प्राप्त होता है ।। तृतीयोऽपान्तरतममुनेः स्यात् कर्मवादिनः । त्रिदैवतश्च त्रिमुखः प्रणवस्त्रिप्रयोजनः ॥१४॥ ज्ञात्वा यथार्थतश्चैवं शोभितं नवनामभिः । जिज्ञासुः समुपास्यैतं परं पदमवाप्नुयात् ॥१५॥ अर्थ-तीसरा सिद्धान्त कर्मयादी अपान्तरतम मुनि का है को तीन देयता (ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र) तीन मुख (गाई पत्या,साहयनीय,दक्षिणामि) तीन प्रयोजन (अर्थ,धर्म, काम ) इन ना नाम फरके शुशोभित है ऐसा जिज्ञामु पुरुष जो यथार्प जान करके इसकी उपासना फरे तो परम पद को माह होता है।

॥१६॥
-
।
( १७६)
सनत्कुमारसिद्धान्तश्चतुर्थ इह कथ्यते ।
त्रिसंज्ञकस्त्रिसमयस्त्रिलिङ्गः प्रणवः स्मृतः
नवनामस्वरूपं य एवं जिज्ञासुपूरुषः ।
उपास्ते स्मानवरतं सतु मोक्षमवाप्नुयात् ॥१७॥
अर्थ-यहां चौथा मनत्कुमार का सिद्धान्त कहते हैं
ॐ की तीन संज्ञा (बहिस्सन्धि, सन्ध्यमन्धि, क्रान्तसन्धि)
हैं तीन काल ( भूत, भविष्य, वर्तमान ) हैं तीन लिङ्ग (स्त्री,
पुरुष, नपुंसक) है ऐसा नै नाम के रूपवाले ॐ की जो जि-
सामु पुरुप सतत टपामना करता है वह मोक्ष को माप्त होता है।
पञ्चमो ब्रह्मनिष्टानां सिद्धान्तः कथ्यतेऽधुना ।
त्रिस्थानरूपत्रिपदस्त्रिप्रज्ञः प्रणवः स्मृतः ॥१८॥
.एवं ज्ञात्वा च जिज्ञासुर्य उपास्ते तमन्वहम् ।
- स सर्वपापनिमुक्को दुर्लभं मोक्षमाप्नुयात् ॥१९॥
अर्थ-पांचवां ब्रह्मनिष्ठों का सिद्धान्त प्रय कहते हैं।
ॐ के तीन स्थान (हृदय, कंट, मुढा) है तीन पद (जाग्रत
स्वाम मुपुति) हे तीन मा (महिः मा, अन्त प्रशा, म्बप्रता)
रुपॐ है। ऐमा जान करके जो जिज्ञासु पुरुप ३ को नित्य
उपासना करता है यह सब पापों से मुक्त होके दुर्लभ मोक्ष को
प्राप्त होता है।
श्रृणु पाति सिद्धान्तं पष्ठं पशुपतयेमम ।
विभोग्यरूपः प्रणवस्यवस्थारूप एव च ॥२०॥

*(१७७) ! सोम,) 'त्रिभोक्तरूपश्चैवं स्यानवनामस्वरूपवान् । तमुपास्ते ममुक्षुर्यः स परंपदमाप्नुयात् ॥२१॥ अर्थ-शिवजी कहते हैं कि हे पार्वती जी ! सुनो लट्ठा मेरा पशुपति का सिद्धान्त है। ॐ तीन भाग्य (अन्न, जल, रूप है ॐ तीन अवस्था (शान्त जाग्रत, घोर स्खम, मूद सषुप्ति) रूप है ॐ तीन भोक्ता (अमि, वायु, सूर्य) रूप है ऐसा आङ्कार के ना नाम स्वरूप हैं। जो. मुमुक्षु पुरुष ऐसे ॐ को उपासना करता है वह परम पदं को प्राप्त होता है । सिद्धान्तं सप्तमं देवि विष्णुना कथितंब्रुवे । आत्मरूपस्त्रिखभावस्त्रिव्यूहः प्रणवः स्मृतः ॥२२॥ नवनाम स्वरूपं य एवं विज्ञाय पार्वति । उपास्तेऽहरहः सोऽयं मुमुक्षु मोक्षमाप्नुयात् ॥२३॥ अर्थ-सातवां सिद्धान्त विष्णु भगवान् ने कहा हुमा कहता हूं* तीन भात्मा (बल,वीर्य,तेज) रूप है ॐ के तीन स्वभाव (जान, ऐश्वर्य, शक्ति) हैं। * के तीन व्यूह (संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध) हैं, ऐसा नो नाम स्वरूप ॐ के जानके है पार्वती जी जो प्रति दिन ॐ की उपासना करता है वह मुमुतु पुरुष मोक्ष को प्राप्त होता है। इत्थं सिद्धान्तकारैश्च सप्तभिः प्रणवस्य च । सिद्धान्तः सप्तभिः प्रोक्तोपासना नवभेदतः ॥२॥ मात्राणां तिसृणां त्रित्रिभेदात् प्रत्येकमत्र हि। नवापि ते त्रिपष्टिः स्युः सप्तसिद्धान्तभेदतः ॥२५ . ૨૩ अर्थ- -इस प्रकार प्रणव (ॐ) के सात सिद्धान्त कारें ने सात सिद्धान्तों से ना भेद की उपासना कही है। यहां तीन मात्राओं के तीन भेद से जो ना भेद यने वे सात सिद्धान्तों के भेद से तिरसठ ६३ होंगे। उपास्य एकः प्रणवः सप्तसिद्वान्तसंमतः। ओमित्येकाक्षरं नाम तत् परब्रह्मवाचकम् ॥२६॥ नामायोरभेदेन ब्रह्मरूपं तदुच्यते । इदमेवाक्षरं ब्रह्म समुपास्य च सर्वदा ॥२७॥ वीतरागादिदोपाश्च यतयो योगिनोऽपि च । स्मृत्वोमित्यात्मनिष्टाश्च मुक्तिं प्रापुरनुत्तमाम् ॥२८॥ अत ओमित्यविरतं स्मरत स्मरतामिति । ओमिति स्मरतोङ्कारब्रह्मोपास्य हि सर्वदा ॥२९॥ थर्थ-यह सातो सिद्धान्त कारों को संमत जो एक प्र- पय (ॐ)हे वही उपासना करने योग्य है । क्योंकि ॐ एक अक्षर का नाम है सो परवान का याचक है । नाम पर नाम- वाला (अर्थ) इनका भेद नहीं करने से अर्थात् नाम और श्रर्य क्षी एकता से यह प्रणय (6)ब्रह्मरूप कहाता है। इसी प्रक्षर ब्रह्म को मर्वदा उपासना करके जिनके रागादि दोष मिट गये हैं ऐसे यती और योगी लोग घालनिष्ट होके आहार का स्मरण करके मोत्तम मुक्ति को प्राप्त हुए । इसलिपे सर्वदा आहार स्मरण करो का स्मरण करो का स्मरण करी। कांकि ग्राम की उपासना सर्वदा करने योग्य है।

.( ९७२) पार्वत्युवाच- भगवन् ब्रूहि कृपयान्यैर्विद्रिरुपासकैः । यथा मात्राप्रभेदेन प्रणवोपासना कृता ॥३०॥ अर्थ-पार्वतीजी महादेवजी से पूछती हैं कि हे भग- पन् ! अन्य विद्वान् उपासकों ने जिस प्रकार मात्राओं के भेद मे प्रणव (ॐ) की उपासना की है उसे अपा करके कहो। शिव उवाच- वहुभिर्वहुधा देवि प्रणवोपासना कृता । तत्तु संक्षेपतो वक्ष्ये श्रूयतां सावधानतः ॥३१॥ अर्थ-शिवजी कहते हैं कि हे पार्वतीजी ! बहुत लोगों ने बहुत प्रकार से प्रणव (ॐ) की उपासना की है वह में संक्षेप से कहता हूं सावधान हो के श्रवण करे । समुपासित ओङ्कारो वाकल्येनैकमात्रिकः । सालपिकाइत्यर्पिभ्यां हिमात्रः समुपासितः ॥३२॥ साधहिमानं प्रणवं भजते नारदो मुनिः। त्रिमात्रमेव माण्डूक्यो मौण्डलोऽपि त्रिमात्रिकम् ॥ त्रिमात्रं सप्तऋपयस्तथा येऽध्यात्मचिन्तकाः । परादारादिकास्तैश्च चतुर्मात्र उपाप्तितः ॥३॥ वसिष्ठो भजते सार्धचतुर्मात्रमनारतम् । याज्ञवल्क्यस्त्वमात्रं तु भजतेऽनुभवात् खकात् ।३५ ( १८० ) ऋषि अर्थ -वाकल्य ऋपि ने ॐ की उपासना एक मात्रा- रूप ज्ञान के की है। माल ऋषि और काइत्य ऋषि ने दी मात्रा रूप जान के उपासना,की है । नारद मुनि ढाई मात्रा रूप प्रणव (ॐ) को जान कर भजते हैं । माण्डूक्य तीन मात्रारूप और मौएड ऋषि भी तीन मात्रा रूप प्रणय (ॐ) को भजते हैं। सत्यऋषि भी तीन मात्रा रूपही भजते हैं। श्रार पराशर प्रादि अध्यात्म चिन्तक मुनि चार मात्रा रूप जान के भजते हैं वसिष्ठ जी सर्वदा साढ़े चार मात्रा रूप जान के भजते हैं। याावल्प जी अपने अनुभव से अमात्रा रूप अर्थात् मात्रा रूप नहीं ऐसा जान के ही भजते हैं। एवमन्यैश्च मुनिभिर्यथानुभवमन्यहम् । उपासितश्च प्रणवः स्वस्वकल्पितमात्रिकः ॥३६॥ अतश्च वेदशास्त्रेभ्यो यैराचार्यैर्महर्षिभिः । यथानुभवमोहनरो यथामात्र उपासितः ॥३७॥ तत्सर्वैसफलं तेषां भजनं पत ओमिति । एकाद्यनेकमात्रात्मममात्रं ब्रह्मवाचकम् ॥३८॥ अर्थ-इस प्रकार और नर मुनियों ने अपने अपने अनुमय के अनुमार अपनी कल्पना की हुई मात्राओं के रूप से मयंदा प्रणय (ॐ) की उपासना की है। इसलिये जिन मा. चापं और महर्षि ने घेद और शाप से अपने अनुभव अनुमार जितने मात्रा रुप आधार की उपासना की है यह मभो शमकाभगम मालमयोंकि पहनालयापक सो एक में नो मनिक मात्रामा ममात्रा उपभोक्षसकता है।

( १८१ ) पार्वत्युवाच भवता कृपाब्धे यदवोचि तत् । मुमुक्षोर्मुक्तये सर्वोत्तम मालम्बनात्मकम् ॥३९॥ प्रणवोपासनं तत्तु निर्विकल्प समाधितः । मुमुक्षुणावश्यं कर्तव्यमिति सिध्यति ॥४०॥ अतस्तेषांहितार्थाय प्रणवोपासनाक्रमम् । ब्रूहि सर्वं हि भगवन् कृपां कृत्वा ममोपरि ॥११॥ अर्थ-पार्वतीजी बोली कि हे दयासागर अापने मुमुक्ष को मोक्ष प्राप्ति के लिये सर्वोत्तम लालम्बनरूप (सहारा) जो प्रणव (ॐ) को उपासना कही वह निर्विकल्प समाधि (आत्मरूपस्थिति ) से पहिले मुमुक्षु को अवश्य ही कतर्य है यह सिद्ध होता है प्रतः मुमुतुओं के हित के लिये प्रणव (2) को उपासना का संपूर्ण क्रम मेरे ऊपर कृपा करके कहो। इति श्रुत्वा वचो देव्या उवाच भगवान शिवः। यदोमित्यक्षरं होकं कर्तव्यस्तज्जपोऽन्वहम् ॥४२॥ तदर्थभावना कार्या प्रणवोपासना हि सा। तत्प्रकारमथो वक्ष्ये. सावधानतया शृणु ॥४३॥ अर्थ- ऐसा पार्वतीजी का वचन मुनके भगवान् शिवजी बोले कि हे पार्वतीजी ! जो ॐ यह एक अक्षर है उमझा प्रति दिन जप करना और उसके अर्थ की भावना करनी यही निश्चय करके ॐ की उपासना है। अब उसका प्रकार कहताहूं माय. धान हेके सुना। ।

( १८२ ) जपन्त्योमिति केचित्तु सर्वश्रवणगोचरम् । उपांशु केचिजिह्वौष्टचालनानान्यगोचरम् ॥१४॥ केचित्तु मनसैवोष्ठजिह्वाचलनवर्जितम् । प्राणायामप्रकारेण जपनत्यन्ये मनीषिणः॥४५॥ थर्थकाई पुरुप तो ॐ इस प्रकार से मय लोगों को सुनाई देधे ऐसा जप करते हैं। कोई उपांशु जप करते हैं जो जीभ और होंठ को हिलाने से होता है परन्तु दूसरों को म. नाई नहीं देता। कोई तो मानस जप करते हैं जो मनही से होठ और जीभ को बिना हिलाये ही होता है। और कोई विद्वान् प्राणायाम के प्रकार से जपते हैं। प्राणयामस्त्रिप्रकारः पूरकः कुम्भकस्तथा । रेचकस्ते कधकार कार्या इति च वम्यहम् ॥१६॥ अर्थ- -प्राणायाम तीन प्रकार के हैं पूरक, कुम्भक ये प्राणायाम कैसे करने यह भी कहता हूं। मुंवरुवा नासिकाया वामच्छिद्रं च संयतः । संपीड्यदक्षहस्तस्थमध्यानामादपेन च ॥१७॥ दक्षच्छिद्रेण नासाया वाह्यमन्तः प्रपूरयेत् । वायु पूरक इत्येप प्राणायाम उदीरितः ॥१८॥ दक्षनासापुटं दक्षामुछेनापि प्रपीड्य च । प्राणमन्तस्तु संरुन्ध्यात् कुम्भकोऽयमुदाहृतः॥४९॥ रेपक अर्थ- नासावामपुटेनैवं प्राणवायु शनैवहिः । निःसारयेद्रेचकोऽयं प्राणायाम उदीरितः ॥५०॥ मुख बन्द करके संयत होके नासिका के बामच्छिद्र को दक्षिण हाथ की मध्यमा और अनामिका इन दोनों अँगु- लियों से दवा के नामिका के दक्षिण छिद्र के मार्ग से बाहर के बायु को भीतर भरना यह पूरक प्राणायाम कहाता है। प्रय दक्षिण नासिका के छिद्र को भी दक्षिण हाथ के अँगूठे से दवा के प्राण वायु को भीतर ही रोक रक्षे यह कुम्भक प्राणायाम कहाता है। और नासिका के श्राम चिद्र को मात्र साल के उस मार्ग से प्राण वायु को धीरे धीरे बाहर निकाले यह रेचक प्राणायाम कहाता है। पूरके पूरयेदुक्ता द्वात्रिंशद्वारमोमिति । कुम्भके च चतुष्पष्टिवारं वायु तु.धारयेत् ॥५१॥ उक्ता पोडशवारं च रेचके रेचयेच्छनैः। पूरकादित्रयादेकः प्राणायामो निगद्यते ॥५२॥ अर्थ-वातीस बार ॐ ऐसा (मनोमय) कहके पूरक माणायाम में वायु पूरणा करे। कुम्भक में चौसट बार कहके वायु को रोक रफरे। रेचक में सोलह वार कहके पोरे २ वायु को निकाले । इस प्रकार पूरक कुम्भ रेषक तीनों मिल एक प्राणायाम कहाता है।" प्राणयामाः संभवेयुर्यावन्तोऽभ्यासतोऽधिकाः । तावन्तः सुधिया कार्याश्चैवमभ्यासयोगतः ॥५३॥ । के (१८४ ) प्राणवायुर्वशे तस्य तिष्ठेत् सदा स्युस्तदेनांसि सर्वाण्यरं भस्मसात् ।। स स्वयं व्रम्हरूपश्च भूत्वा क्षितौ । संचरन्नाप्नुयान्मोक्षमन्ते पुनः ॥५४॥ अर्थ-इस प्रकार अभ्यास से जितने प्राणायाम अधिक हो म बुद्धिमान ने उतने प्राणायाम करने ऐसे अभ्यास के योग से सदा माण वायु उसको वश में रहता है और उसके सब पाप शीघ्र भस्म हो जाते हैं और वह स्वयं ब्रह्मरूप हाके पृथ्वी पर विचरता है फिर अन्त में भाक्ष को प्राप्त होता है । श्रुत्वेत्यं वचनं सहर्पमवनौ धर्मस्य सारंपरं पापोडूननमञ्जस्तैव भगवच्छम्भोस्तुपाराद्विजा ॥ ये चान्येऽपि महर्पयो गतमहासन्देहसन्दोहकाः शान्तास्तहतमानसाःक्षणमिवाभृवस्तु वित्रार्पिताः॥ अर्थ--ऐसा श्रीशिय भगवान का यधन जो पृश्यी पर परमधर्म का सारभूत है और शीघ्रही पाप को वहा देनेवाला है नमको हर्ष सहित हिमाचल की कन्या पार्वती जी सधा और जो महर्षि लोग थे उन्होंने सुनके जिनके यहे यह सन्दे- के ममूह मिट गये ये सय शान्त होकर उसी फया में उनका ऐमा मन लग गया कि जिसमे क्षण भर मानो चित्र में लिये हुए भमे होगये। काश्यां गलतंटे श्वेतकेतुस्तातोपदेशतः । मुने महर्षिता प्राप स्मृत्योमिति दिनत्रयम् ॥५६।।

( १८५ ) अर्थ-हे परशुराम जी ! श्वेतकेतु काशीजी में गङ्गा के तोर पर पिता के उपदेश से तीन दिन तक ॐकार का स्मरण करके ब्रह्मर्षिय को प्राप्त हुन्मा। परशुराम समग्रमिदं श्रुतं शिववचो भवतापि शुभङ्करम् । अप किमन्यदिहेच्छसि वच्म्यहं भवति यद्भवतो मनसो मुदे ॥५॥ अर्थ-जनकराजा परशुरामजी से कहते हैं कि हे परशुरामजी ! यह कल्याण करने वाला शिवजी का वचन सय तुमने भी मुना अब और क्या चाहते हो पूलो से मैं कहता हूं जो तुम्हारे मन को प्रानन्द देने वाला हे। ॥ इति ब्रह्मज्ञानशाने श्रीवाल्मीफिमुनिकृते जनक- परशुरामसंवादे राजवैद्यरामसेवकलालगुमकृत भापाटीकायां पञ्चविंशः सर्गः॥२९॥ पशुरामोऽब्रवीद्राजन कृपया कथंयाशु तत् । यया ब्रह्मर्षितामाप श्वेतकेतुर्दिनत्रयात् ॥१॥ अर्थ-परशुरामजी बोले कि हे राजन् ! गिस प्रकार से वेतकेतु तीन दिन में मलपित्य को प्राप्त हुआ यह कृपाकरके शोध कहिये

( १८६ )
महर्पिरुद्दालकनामधेयो
ज्ञानिविहाग्यो निवसन् हि काश्याम् ।
आसीत् पुरा ज्ञानमवाप्तुमीयु-
महर्पयो यत्र च नारदाद्याः ॥२॥
अर्थ-~-जनक जी परशुराम जी से कहते हैं कि पहिले
उद्दालक नाम के महर्षि ज्ञानियों में श्रेष्ठ काशीजी में रहते थे।
जहां नारद प्रादि महर्षि ज्ञान प्राप्त होने के लिये (उनके पास)
श्राते थे।
स श्वेतकेतुं तनयं तु वेदा
मध्यापपज्ज्ञानमदाच तस्मै ।
पुत्रोऽब्रवीत् तात मया त्वधीता
'वेदा अथैकान्तनिवासमेत्य ॥३॥
स्मत तथा ध्यातुमितः परेशं
सबै विसृज्योत्सहते मनो मे।
अथाब्रवीत् खं तनयं महर्पि-
धन्योऽसि सारं कथयामि तेऽद्य ॥४॥
शृणुष्व चिनेन समाहितेन
पद् ब्रह्मणः प्रागुदभूत् तपस्तः।
तं पूर्णमन्त्रं प्रणवं भजत्य-
मेकाक्षरं ब्रह्म हि वेदमूलम् ॥५॥

( १८७ ) अर्थ- --उस उद्दालक ऋषि ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को वेद पढाये और ज्ञानोपदेश किया तव पुत्र ने कहा कि हे पिता मैं वेद पद चुका अब एकान्त रयान में बैठ कर सय छोड के पर- मेश्वर का स्मरण और ध्यान करने में मेरे मन का उत्साह है। इम उपरान्त ऋषि ने अपने पुत्र से कहा कि तू धन्य है प्राज तुझे मारवस्तु कहता हूं सो भावधान चित्त से मुन। जो ब्रह्माजी के तप से प्रगट हुआ उस एकाक्षर ब्रह्मरूप प्रणव (ॐकार ) रूपी पूर्ण मन्त्र को जो वेद का मूल है उसको भज ॥ यतश्च सर्वे प्रकटीवभूवु मन्त्राः स मन्त्रप्रवरः प्रजप्यः। विना तपः सद्गुरुसेवनं वा स्वाध्यायकालं च जपोऽस्य सिद्ध्यै ॥६ मन्त्रेषु येप्वस्ति न सिद्धिरेवं शक्तिस्तथाल्पास्ति फलं प्रदातुम ! आद्यन्तयोस्तं प्रणबेन मन्त्रं सुंसंपुटीकृत्य जपेत् सुसिद्ध्यै ॥७॥ येनास्य मन्त्रस्य च शक्तिी . भवेश तदैवतमत्र जप्तः। सुसन्मुखीभूय फलं प्रदद्या- दोहार माहात्म्यमवर्णनीयम् ॥८॥ अर्थ-जिस ॐकार में संपूर्ण मन्त्र प्रगट हुए हैं यह मन्त्र जपने योग्य है। बिना तपके घिना सद्गुरु सेवा के और यिना स्वाध्याय के (अन्नध्याय में भी) इसके जप से सिद्धि होती है। जिन मन्त्रों में सिद्धि नहीं है ऐसेही जिन मन्त्रों में फल देने की शक्ति न्यून है उस मन्त्र के अन्त र प्रादि में ॐकार से संपुट करके जपे तो सिद्धि होती है। जिस संपुट करने से इस मन्त्र की शक्ति बढ जाती है और इस मन्त्र की देवता जप करने वाले के सन्मुख होकर फल देती है सी कार का माहात्म्य वर्णन नहीं कर सकते। कुक्षौ शिशौ तिर्यगिते प्रसूतौ मातुर्भयं स्यात् सरले तथा न । मन्त्रस्तथोङ्कारसुसंपुटेन फलप्रदाता सरलः प्रजप्तुः ॥९॥ थर्थ-प्रमूति काल में पेट में यालक टेढा प्राने पर माता को भय होता है सीधा रहने से येसा भय नहीं ऐसेही अंकार के संपुट से कोई मन्त्र जपकरनेवाले को सोधा और फल देने वाला देता है। यज्ञस्य चारम्भसमाप्तिकाले त्वं प्रजत प्रणवः फलाय । यज्ञस्य पूर्तिः प्रणवेन यत्त- दाद्यन्तपाठः श्रुतिपूपदिष्टः ॥१०॥ मन्त्रोऽयमाकाशमयो यतोऽस्य मध्ये हि देवा निवसन्ति ।

अर्थ-मेही यो वेति नैनं सनिरर्थ जन्मा गतागतं नारकमेव तस्य ॥११॥ यज्ञ के बारम्न और समाप्ति के काल में अा हुआ प्रणय फल देता है। जिमलिये यन्त क्षा पूर्ण हेना प्रणव से है इनलिये इसका प्रादि और अन्त में पाठ करना वेदों में कहा है। यह प्रणव मन्त्र का प है क्योंकि इसके धोध में व्य देवता वास करते हैं। जो इसको नहीं जानता उसका जन्म व्यर्थ है वह नरक ही से प्राकर जन्मा और नरक ही में जायगर॥ विदन्तिये वोमिति जप्यमन्त्रं परं पदं यान्ति च तेऽत्र धीराः। जतुं द्विजा येऽभिलपन्ति चैतं ते तूपवासं निदिनं च कृत्वा ।।१२।। कुशासने पूर्वमुखा निषण्णा मौनव्रता एवमधाभ्यसन्तु । यः पूरकः कुम्भकरेचको च तैः माणसंयाम इहैक एव ॥१३॥ अर्थ-ओलोग जप करने योग्य ॐकार मन्त्र को जा. मते हे घे मनुष्य परम पद को प्राप्त होते हैं जो ग्रालय,सत्रिय, वेश्यस कार को अपने पाहें ये पहिने तीन दिन नपयाम *, জয়ান বা ইং সাল সুশ থাকে ( १९०) फिर ऐसा अभ्यास करें। पूरक कुम्भक और रेचक मिलके यहां प्राणायाम एकही होता है। पूरकेणानिलं सम्यग् द्वात्रिंशद्वारमोमिति । प्रजप्य पूरयेत् पश्चान्निरुन्ध्याच समीरणम् ॥१४॥ कुम्भकेन चतुष्पष्टिवारं प्रणवमुञ्चरन् । जप्त्वा पोडशवारं तु प्रणव रेचयेच्छनैः ॥१५॥ रेचकेनानिलं कार्यः प्राणायामोऽयमोहशः। ततः सहस्रससयाकं मनसा प्रणव जपेत् ॥१६॥ द्विसन्ध्ययोरनुदिनं सर्वपापैः प्रमुच्यते । यदिञ्छति तदामोति कृतकर्मफलं लभेत् ॥१७॥ अर्थ--यत्तीस वार ॐ ऐसा जप करके पूरक प्राणायाम से वायु को पूरण फरे, पीछे चौसठ वार ॐ ऐसा कहके कुंभक प्राणायाम से वायु को रोके फिर सोलह वार ॐकार का जप करके रेचक प्राणायाम से धीरे धीरे वायु को निकाले यह प्राणायाम ऐसा कहा है। प्राणायाम कहने के उपरान्त मान- सिक सहस्र जप कार का प्रति दिन देशनों सन्ध्या (प्रातः सायकाल) में करे तो संपूर्ण पापों से मुक्त होता है जो इच्छा हो यह पाता है और जो फर्म करे उसके फल को पाता है। तस्मात् पुत्र त्वमोङ्कारं जप नास्मादरः परः । मन्त्रोऽस्ति तन्नपादेवाहमपि श्रेष्ठय मातवान् ॥१० अर्थ-तस्मात हे पुत्र! तुम आहार को जपो इससे बेह ( १९१.) दूसरा मन्त्र नहीं है। इसको जय से ही मैं भी श्रेष्ठता को प्राप्त हुआ। श्वेतकेतुः पितुर्वाचमाकर्ण्य ता तं प्रणम्याथ काश्यां हि गङ्गातटे । संसरीस्मृत्य चोङ्कारमीशं तथा ब्रह्मरूपोऽभवत् सोप्यथो तातवत् ॥१९॥ अर्थ-श्वेतकेतु भी पिता के उस वचन को सुनकरके पिता को नमस्कार करके फिर फाशीजी में ही गगाजी के নলক্ষা জ্য মা নয়, ধা যায় সব ফক্ট अपने पिता के ऐसा ब्रह्मरूप हेगया ॥ इति ब्रह्मज्ञानशास्त्रे श्रीवाल्मोकिमुनिकृने जनक परशुरामसंवादे राजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत मापाटीकापां पड्विंशः सर्गः ॥२६॥ परशुराम तयाप- ओंकारस्प पुग प्रोक्तो ब्रह्मणस्तपसोद्रवः । कथं काभृत् स इति मे जनकाख्यातुमर्हति ॥१॥ अर्यः ~urशुरामजी जनराज में पूजते हैं कि पहिले आपने बालाजी की तपम्पा मे *भार को उत्पत्ति कही यह , केमे हुई? मे मुझमे करें ।

( १९२ )
अत्र गुप्तकथास्त्येका नैव जानाति कोपि ताम् ।
विज्ञातासीद्भगवतः शिवस्य कृपया मम ॥२॥
श्रोतुं ज्ञानकथाश्चेतस्तवात्युत्सहते यतः। .
अतो जानामि यत् तत्त्वज्ञानस्य कथयामितत् ॥३॥
जनक उवाच-
अर्थ-जनकजी कहते हैं कि यहां एक गुप्त कथा है उस-
को कोई नहीं जानता जो भगवान् शिव जी के कृपा से ज्ञात
माग की कथा सुनने को तुम्हारे मन में भी बहुत
उत्साह है इसलिये जो ज्ञान का तत्व मैं जानता हूं वह
कहता हूं।
एकदा पार्वती शम्भु पप्रच्छ विनयानता।
कं देवं ध्यायति भवान् भगवन् कृपया वद ॥४॥
उवाच शम्भुगिरिजे त्वं मे प्रियतमा यतः ।
गुप्तं च कथयिष्ये तत् सावधानतया श्रृणु ॥५॥
अर्थ--एक ममय पार्वती जी ने विनय से नम्र होकर
महादेव जी से पूछा कि हे भगवन् प्राप किस देवता का ध्यान
करते हैं सो रुपा करके पहिये । महादेव जी वाले कि हेपा-
यंती! तू मुझो अत्यन्त प्रिय है इसलिये तुझे यह गुरु
वार्ता
कहता हूं सायधान होकर मन ।।
सूक्ष्मत्यात् प्रकृती लोनं लयकालइदं जगत् ।
अतश्चादृश्यमासीत् तद्वहितं लक्षणेन च ॥६॥

(१९३) ज्ञातुं योग्यं न बुद्ध्यातः सुप्तवत् सर्वतश्च तत् । निजकार्य समर्थ तन्नासीदित्यर्थतः स्फुटम् ॥७॥ अर्थ- -प्रलय काल में यह जगत सूक्ष्म होने से प्रकृति में लोन था इसलिये दीखता नहीं श और लक्षणों मे रहित था बुद्धि से जानने योग्य नहीं था इसलिये धारो ओर से सोये ए के ऐसा था। अयोत स्पष्ट है कि वह अपने कार्य में समर्प नहीं था। अप प्रलयकालान्ते परमात्मा यहच्छया । निजप्रणवरूपेण प्रादुरासीत् परेश्वरः ॥८॥ अर्थ- - इस उपरान्त प्रलयकाल केस में परमात्मा अपनी इच्छा से निज प्रणय (ॐ) रूप से प्रगट हुए। प्रजाः सिसक्षुर्विविधा आदौ जलमवासृजत् । तत्र स्वशक्तिरूपं तद्दीजं व्यतूंजताद्भुतम् ||९|| ततस्तत्परमेशस्य कृपयोङ्काररूपिणः । हैममण्डं समभवत् सहस्त्रार्कसमद्युतिः ॥१०॥ ततो ब्रह्माणमसृजद्यो हेतुः सर्ववस्तुनाम् । ढुंग्राह्य इन्द्रियैनित्यः सदसवस्तुरूपधृक् ॥११॥ -उस परमेशा ने भांति मांति की प्रजा रखने की স্থা যা জল বশষ ফিমা বর্ম দীক্ষি ঈদ दस पद्धत वीज को उत्पन्न किया फिर काररूपी परमेश्वरको सपा में वह पोज हजार मूर्य को कान्ति के समान कान्ति वास- अर्थ अर्थ- ( १९४ ) सोने का अण्डा हुभ्रा। फिर जो सर्व वस्तुओं का कारण है, इन्द्रियों से जिसका जानना शक्य है नित्य है और सत् असत वस्तु के नाई रूपधारण किये हुए है उस परमेश्वर ने ब्रह्मा को उत्पन्न किया। ब्रह्मोपितस्तदण्डेऽब्द ततोऽण्डं तद् द्विधाभिनत् । खण्डाम्मा स्वर्गभूलोको ताभ्यां निर्ममईश्वरः ॥१२॥ स्वलॊकमधूखण्डेनाधरखण्डेन मेदिनीम् । मध्ये खं दिग जलस्थानमधि च समतिष्ठिपत् ॥१३॥ -ब्रह्मा ने उस अपडे में एक वर्ष वास किया इस उपरान्त उस अण्डे के दो टुकड़े हुए। उस अपडे के दो टुकड़ों से परमेश्वर ने स्वर्ग और पृथ्वी को रचा। ऊपर के टुकड़े से स्वर्गलोक को और नीचे के टुकडे से पृथ्वी को तया योच में श्राफाश पाठ दिशा जल के स्थान (नदी भादि) और समुद्र इनको स्थापन किया। अयोदभूदहङ्कारो ब्रह्मणवाभिमानकृत् । ईश्वरोस्मीति तत्रासीनभोवागशरीरिणी ॥१॥ ब्रह्मत् मा कुर्वहारं सटोङ्कारस्तवेश्वरः । प्रादुरासीन्महाशब्दस्त्रिमात्रस्तत ओमिति ॥१५॥ यतः शब्दोऽभवत् तस्मै नम इत्याह विश्वसृट् । ददर्श दक्षिणे भागे खोकारं सनातनम् ॥१६॥ अर्थ-~म उपरान में इंधरई ऐसा ग्राला को अभिमान करनेवाला महंकार उत्पामार यहां पिना शरीर की साकार पाही हुई कि हे ब्रह्मा ! तू अहंकार मत कर तेरा उत्पन्न करने वाला ईश्वर ओङ्कार है। फिर ॐ ऐसा त्रिमात्रा युक्त महा- शब्द प्रगट हुआ जहां से शब्द हुमा उसको ब्रह्मा ने नमस्कार किया और अपने दक्षिण भाग में सनातन ॐ को देखा। यस्याकाराक्षरं चादावुकारो दक्षिणे गतः । ततो मकारो नादश्च चरमे सुव्यवस्थितः ॥१७॥ अर्थ-जिस कार के आदि में प्रकार अक्षर रहा उकार उसके दक्षिण में फिर मकार और नाद अन्त में स्थित था जैसे (ओ३म्) एवंमकारमोङ्कारमग्निवर्णसमद्युतिम् । ब्रह्मापश्यत् तुरीयाया अवस्थायाः परे स्थितम् ॥१८॥ निर्गुणं केवलं तत्त्वं सुधारूपं हि निष्कलम् । बाह्याभ्यन्तरहीनं तन्मायोपद्रववर्जितम् ॥१९॥ सजातीयविनातीयभेदैविरहितं विभुम् । आदिमध्यान्तरहितं संपूर्णानन्दकारणम् ॥२०॥ सत्यमानन्दममृतं परब्रह्म परायणम् । यन्नीललोहितं नाना मृतिधर्मविवर्जितम् ॥२१॥ अर्थ- -इस प्रकार ॐ को ब्रह्मा ने देखा जो अमिवर्ण के समान कान्ति बाला और तुरीय अवस्था के परे स्थित है। निर्गुण, केवल तत्वहप, अमृतरूप निकल (एकरुप)वाहर भीतर से रहित, मापा के उपयों से रहित सजातीय विभा- ( १९७) छोड़ कर जो दूसरे का भजन करता है उपको करोड़ों कल्प भी कल्याण नहीं होगा। हे अव्यय ! (जिसका नाश नहीं होता) हे देवनाओं के स्वामी । मैं आपके शरणागत हूं, मेरी रक्षा कीजिये। और आपका जो शरण्य नाम है उसको सत्य कीजिये । - और मेरी रक्षा कीजिये। स्तुत्यानया प्रसन्नोऽभूत् प्रणवः स निरञ्जनः । वाचोवाचाशरीरिण्या ब्रह्मन् पश्य महेश्वरम् ॥२७॥ एतद्रूपं तथान्तिर्विसकन्दस्थितो हरिः। निःसृत्य चेक्षतां सोऽपि लिङ्गरूपं महेश्वरम् ॥२८॥ अर्थः -इस स्तुति से वह निरजन प्रणव (ॐ) प्रसार होके आकाशवाणी से धोले कि हेला ! इस रूप महेश्वर को देख, ऐसेही जल के भीतर कमल के जड़ में विष्णु है वह भी निकल कर लिङ्गरूप महेश्वर को देखे । तत्क्षणे भगवान् विष्णुः प्रादुरासोजलान्तरात् । पुनः खवाण्यभूत देहे हार्णचिन्हानि पश्यताम् ।२९॥ अनेन मातृकावर्णज्ञानं वै प्राप्नुतां युवाम् । मूर्पकारोऽस्य सप्रोक्त श्वाकारो मुखमण्डले ॥३०॥ इकारो दक्षिणे नेत्रे ईकारो वामचक्षुपि । उकारो दक्षिणे कणें अकारो वामकर्णके ॥३१॥ कारो दक्षिणे घ्राणे ऋकारश्च तदुत्तरे ।

( १९८ )
।
लकारो दक्षिणे गण्डे लकारश्च तथेतरे ॥३२॥
एकारउत्तरोष्ठस्थ ऐकारश्चाघरोष्टमः।
ओकारऊर्ध्वदन्तस्थ औकारोऽधरदन्तगः॥३३॥
अंजिव्हायांतु संप्रोक्तो विलों ब्रह्मरन्ध्रगः।
दक्षे वामकरे पंच कचाद्या बाहुमूलतः ॥३४॥
कूपरे मणिबन्धे चाङ्गुलिमूले तथाग्रके ।
दक्षे सव्ये तु चरणे टताद्या पादमूलंतः ॥३५॥
जानौ गुल्फे तथा मूलेगुल्यास्तद्वत्तदग्रके।
पकारो दक्षिणे पार्थे फकारो वामपार्श्वगः॥३६॥
वकारः पृष्ठभागेऽस्य भकारो नाभिदेशगः ।
तस्योदरे मकारस्तु यकारो हृदये तथा ॥३७॥
रेफोऽस्यं दक्षिणे स्कन्धे लकारश्च तदुत्तरे ।
गलपृष्ठे वकारस्तु तस्य देहे प्रतिष्ठितः ॥३०॥
शकारो हृदयादक्षकराद्गुल्यग्रगस्तथा ।
पकारो हृदयात् तस्य वामहस्ताङ्गुलाग्रगः ॥३९॥
सकारो हृदयादक्षपादागुन्त्यग्रगस्तथा ।
हकारो हृदयाहामपादाडल्यग्रगः स्मृतः ॥४०॥
नाभ्यन्तं हृदयात् तस्य कारः सुप्रतिष्ठितः।
क्षकारो हृदयात् तस्य मूर्धान्तं परिकीर्तितः॥४१॥

अर्थ उस क्षण में भगवान् विष्णु जल के भीतर मे प्रगट हए,फिर श्राकाशवाणी हुई कि हे ब्रह्मा! हे विष्णु ! तुम दोनों महेश्वर के देह में अक्षरों के चिन्ह देखा । इससे सब अक्षरों का ज्ञान तुम दोनों को होजायगा। अकार इसके मस्तक पर है, आकार मुख के गोलाई में है। इकार दक्षिण नेत्र में है, ईमार वाम (वायाँ) नेन में है, उझार दक्षिण कर्ण में है, अकार बायें फर्श में है । ऋकार दक्षिण नामिका में है, ऋकार बायै नासिका में है, लकार दक्षिण गण्ड (कनपटी) पर है, तृकार यावां कनपटी पर है। एकार ऊपर के होठ पर है, ऐकार नीचे के होठ पर है, आकार ऊपर के दाँतों पर है, औकार नीचे के दाँतों पर है। अं जिहा पर है, ब्रह्मरन्ध्र (मलक के मध्य स्थान तालू) में है। क दक्षिण हस्त के मूल (पसाहा) पर, ख दक्षिण हस्त के कूपर (कोहना) पर, ग दक्षिण इल के मणिबन्ध (गट्टा) पर, घ दक्षिण हस्त के अँगुलियों के मूल पर, उ दक्षिण हस्त के अंगुलियों के अग्र भाग पर है। च वा हस्त के मूल (पोष्ठा) पर, छ यायें हस्त के कूपर (कोहनी ) पर, जयायें हस्त के मणियन्ध (गहा) पर,झ यायें इस के अगुलियों के मूलपर, न यायें हस्त के अंगुलियों के अप्रभाग पर। दक्षिण पाँध के मूल (बांध की अद) पर, ठ दक्षिण पाँव के जानु (पुटना) पर, द दक्षिम पाय के गुरक (घुटनी) पर, ह दक्षिण पाय के अंगुलियों के मूल पर, ण इतिण पाँव के अंगुलियों के अग्रभाग परत यायें पाय के मूल (जॉप की जड़) पर, थ या पांय के जानु (पुटना) पर, द यायें पांव के गुलक (पुटनो) पर, घ यायें पांच के गु- लियों के सूत्र पर, न पायें पांच से भंगुलियों के प्रभाग पर । .

( २०० ) . प दक्षिण पार्श्व (कोख) पर, फवार्ये पाव (कोस) पर,ष पीठ पर, म नाभि पर, म उदर (पेट) पर। य हृदय पर, र दक्षिण स्कंध (संधा) पर, ल वाया रुथ (कंधा) पर, व गलपृष्ठ ( गले के पीछे के भाग) पर, श हृदय के दाहिने हाथ के अंगुलियों के अग्रभाग तक, प हृदय से बायें हाथ के अंगुलियो से अग्र- भागतक, स हदय से दहिने पॉव के अंगुलियों के अग्रभाग तक, ह हृदय से बायें पॉय के अँगुलियों के अग्रभाग तक, हृदय नाभि तक, क्ष हाय से मूर्धा (मस्तक) तक उस महेश्वर के शरीर में हैं। इत्यं महेश्वरं देवं दृष्ट्वा शब्द स्वरूपिणम् । प्रणवं परमात्मानं प्रार्थयामासतुस्तदा ॥२॥ अर्थ- प्रकार उन दोनों ने महेश्वरदेव को शब्द स्वरूप देखकर ॐ परमात्मा की प्रार्थना करने लगे। भगवन् परमात्मस्त्वं शङ्करोवाररुप भोः । यदि प्रसन्नोऽसि कृपां कुरूपर्यावयोः प्रभो ॥४३|| श्रुत्वेत्यं वचनं भूयो बभूवाकाशभारती । प्रसन्नाऽस्मोत्यथो ब्रह्मविष्णू चाचमयोचताम् ॥३४॥ त्वं प्रसन्नोऽसि चवावाभ्यां यद्यदभीप्ससि । तनत्कार्योपदेशस्तु कर्तव्यो भवताययोः ॥१५॥ अर्थ- भगयन्, है परमारमा, देशर, आहार रुप ! जो पाप प्रगत हो तो ऐमसोहम दोनो के ऊपर रुपा फरो।ऐमा यधन झुमो फिर साकारायाणी हुई कि में प्रसता हूं। - A नित्यसंहारकर्ता (२०१) रि ब्रह्मा विष्णु वाणी बोले कि हे देव जो आप प्रसन्न हैं तो हम दोनों से भाप जो जो चाहते हैं उस उस कार्य का उपदेश कीजिये। इत्युक्ते तु पुनोमवाण्यजायत तत्र च । स्रष्टात्र प्रणवेऽकार उकारः पालकः स्मृतः॥४६॥ च मकरस्तु विराजते। विधाता भवतु स्रष्टा पालकोऽस्तु जनार्दनः॥४७॥ सृष्टिसंहारकर्तास्तु पुरोदृश्यो महश्वरः श्रेष्ठा भवत सर्वेभ्य स्त्रयो यूयं दिवौकसः ॥१८॥ परब्रह्मः श्रेष्ठतमो युप्मरसु च भविष्यति । अस्त्येषा प्रकृतिदेवी नारायणसमाश्रिता ।।१९।। ब्रह्माण्यस्याः समुद्रूय यातु ब्रह्माणमाश्रयम् । अन्या च लक्ष्मीरुपेण विष्णुमाश्रित्य तितु ॥५०॥ कालो नाम्न्यपरा शक्तिभगवन्तं शिवं श्रयेत् । सशक्त्या प्रणव यूयं भजध्वं कार्यसिद्धये ॥५१॥ अर्थ-रोमा फहने पर फिर यहां सामाण्यागी दुई। मकार में मुष्टि का फलां मझार दे नकार पालन करने वाला मार मार लिहम गंहार करनेवाला है। मुष्टिका नेदारामामा दो, पाग परमेदारा विष्णु दे, और हो २९ मान देश है। यह गहेर गएका गंदार रहारा गुम गानों पर देवताओं में है। तुम गोनों में पर.

{ २०२) ब्रह्म श्रेष्ठ होगा। और यह प्रकृति देवी नारायण का श्राश्रय करके है इससे एक ब्रह्माणी शक्ति उत्पन्न होके ब्रह्मा का आश्रय करे, दूसरी शक्ति लक्ष्मीरूप से उत्पन्न होके विष्णु का श्राश्रय करके रहे, नौर काली नाम की तीसरी शक्ति उत्पन्न होकि भगवान् शिव का आश्रय करे। हे ब्रह्मा ! हे विष्णु ! हे महेश्वर ! तुम तीनों अपने २ शक्तियों के साथ ॐ परमात्मा फा स्मरण करो तुम सब लोगों का कार्य सिद्ध होगा। अत्र यूयं त्रयोदेवा स्तिस्रःशक्तय ईरिताः । सर्वैः संभृय कर्तव्यं सृष्टिकार्य ममाज्ञया ॥५२॥ अर्थ-यहां तुम तीनों देवता और कही हुई तीनों शक्ति सभी मिल करके मेरी प्राधा से सृष्टि का कार्य करी॥ श्रुत्वैवं वाचमोङ्कारं भगवन्तमधोक्षजः । ऊचे भगवदादेश स्वीकुर्मों नियतं वयम् ॥५३॥ यत्किचित् तत्र वक्तव्यं तद्भवानकर्तुमर्हति । ततोऽन्तरिक्षादुदभूद्वचनं परमात्मनः ॥५४॥ यथेच्छय तथाहं वो दद्यां युप्मद्वितं पदम् । विष्णुरूचे ममस्तुभ्यं परमात्मन् ददख नः ॥५५॥ शिवतत्वं ध्यानयोग्यं सुनताह च सेवितुम् । यस्यानुष्ठानतः पूर्ण तमः स्यादसंशयम् ॥५६॥ श्रध-ऐगा यधन मनके भगवान कार से निष्णु थाले बिहे भगवान् धापको मागहमलोग नियम से स्वीकार कर शकुद उममें हमलोगों का कहना है वह अाप करने योग्य हैं। फिर परमात्मा का वचन माझाश से निशला शि जैसा तुम चाहेगे वैसा तुम्हारा हित और इच्चित पद तुमको दूंगा। फिर विष्णु बोले कि हे परमात्मा : प्रापको नमस्कार है श्राप थान के योग्य शिवतत्व (कल्याण तत्व) दीजिये, हे सरत ! और सेवन करने योग्य हो जिसको धनुष्ठान से सय कोई निःसन्देह पूर्व समर्थ होजावे॥ इत्युक्ते परमात्मासौ शङ्करं लोकशङ्करः। नादात्मतत्त्वं तेभ्यस्तु प्रददौ प्रणवात्मकम् ॥५७ प्राप्य परमं तत्त्वं ज्ञात्वा तदजपत हृदा। श्रेयोमाग समाश्रित्य मन्त्रतत्वं च तेऽविदुः ॥५॥ अर्थ-ऐसा कहने पर वे लोक के कल्याण करने वाले परमात्मा ब्रह्मा विष्णु महेश का कल्याण कारक मादालताय कारात्मक देते भये । उन्हों ने परमतरय को पाकर भार जानकर उसका मानसिक जप किया और ये मार्ग का मा. अप करके मन्त्र के तत्य को भी उन्हों में जाना । ततो विष्णुनमस्कृत्य परमेशमुदक्षत । अर्थो तलमतीत्येवं मन्त्रः प्रणवतोऽभवत् ॥५९॥ महावाक्यात्मकः शेयो मन्त्रः पञ्चकलायुतः । श्रुद्धस्फटिकसंकाशः सर्वकामार्थसाधकः ॥६०॥ अर्थ-किर विष्णु ने नमस्कार करके अपर परमेवर ( २०४ ) . को देसा इस उपरान्त ॐतत्त्वमसि यह मन्त्र प्रणय से उत्पन्न हुआ जो महावास्यात्मक शैवमन्त्र, पञ्चकलायुक्त, शुद्ध स्फटिक के समान, संपूर्ण काम तथा अर्थ का साधक है। परेशानुग्रहाचाथ प्रणवाह्याहृतित्रयम् । प्रादुर्भूतं भूर्भुवःस्वस्ततो वेदाः प्रजज्ञिरे ॥६१।। भूरित्यतश्च ऋग्वेदः सामाभूर्भुवइत्यतः । स्व इत्यतो यजुर्वेद एवं वेदत्रयं बभौ ।।२।। अर्थ-फिर परमात्मा के अनुग्रह से (ॐ) से तीन थ्याइति भूः भुवः स्वः ये उत्पन्न हुई फिर उससे वेद उत्पन्न हुए। भूः इससे ऋग्वेद भुवः इससे सामवेद और स्यः इससे यजुर्वेद हुमा, ऐसे तीनो वेद शोभते भये ॥ ब्रह्मविष्णुमहेशेभ्यो दत्वा वेदत्रयीं विभुः । उवाचोडारनपतो प्रसन्नोस्मि सुराधिपाः ॥६३॥ .उपस्थास्यन्ति वो वेदा ब्रह्मभूता यतो हि वः । सर्वं गुह्यं वेदमन्वैस्तत्कर्मभिरवाप्स्पथ ॥६॥ अर्थ-~भगयान् ने अरमा विष्णु महेश्वर को तीनों घेद देकर कहा कि हे देयताओं1 ॐकार के जप से मैं तुमसे प्रमग्न हूं. तुमलोगों को गम येद उपस्थित होंगे (बिना पढ़े सात्रा- थो) क्योंकि नुमलेग पोंक्त जप में नालाप होगपे । भी तुमलोग घेद मन्त्रों मे तथा उनमें पाहे हुए कामों में सय गुप्त पागाभागे (गुप्त यात जान जाणे) .

( २० )
वेदारम्भे तपोध्यानदानपूजादिकर्मणि ।
ओमित्येकाक्षरोमन्त्रो जप्य आदौ तथान्तिमे ॥६५॥
तस्मात् सर्वेयु मन्त्रेषु सर्वकार्येषु योजयेत् ।
प्रणवं तेन सिद्धिः स्यादोंस्मतांतिप्रियो मम ॥६६॥
अर्थ-वेदों के प्रारम्भ (पढ्ने ) में तथा तप ध्यान दान
पूजा इत्यादि कमी में यह एकाक्षर मन्त्र प्रादि और अन्त
में अपना चाहिये । तस्मात् सव मन्त्रों में सब काम में ॐ
कार को लगावे उमसे सिद्धि होगी सारांश ॐकार का स्मरण
पाने वाला मुझे परम मिप है।
एवमुक्का ध्यानगम्योऽभवदीशस्त्रयश्च ते ।
ब्रह्मविष्णुहरा देवाचः कार्य निजंनिजम् ॥६७||
पार्वत्योहारजपतः प्रसवो मां परात्परः ।
सर्वविद्यापति चक्रे जपामि तमनुक्षणम् ॥६८॥
अर्थ-ऐमा कह कर परमेश्वर अन्तध्यान देगये। और
ब्रह्मा विष्णु महेशर तीनों देवता अपना अपना कार्य करने
लगे। हे पार्वती! ॐकार के जप मे परमेश्वर ने मुझे प्रमक
होकर सर्व विद्या का पति (यामी) दरदिया । उसी
कार मन्त्र को में प्रतिक्षा स्मरत करता हूं।
यत्र नामा तपस्तेपे सा काशी भूशिरोमणिः ।
ॐकारदर्शनं प्रापुर्वत्र ब्रह्मा हरिः शिवः ॥६६॥

( २०६ ) यत्र सर्वाक्षरोद्भतिर्यत्र वेदोद्भवोऽभवत् । पञ्चकोशात्मिका भूमिः सा काशीत्यभिधीयते ॥७०॥ अतो काशी ममापीयं बभूव परमप्रिया । ॐ ब्रह्मणः स्तपस्तत्त्यं पातुंकाशी मतो मया||७१॥ काश्यां मृतस्य जन्तोस्तु प्रणवं स्मारयाम्यहम् । सर्वकर्मविनिर्मुक्ता येन मुक्ति प्रयान्ति ते ॥७२|| अर्थ-जहां ब्रह्मा ने तप किया वही काशी संपूर्ण भूमि को शिरोमणि है ।। जहां ब्रह्मा विष्णु शिव इनको कार का दर्शन हुभा, जहां संपूर्स अक्षर उत्पन्न हुए, जहां संपूर्ण वेद उत्पन्न हुए वह पांच कोस की भूमि काशी कहाती है। इसी लिये काशी भूमि मुझे भी अत्पन्न मिय हुई । इसी हेतु काशी की रक्षा करने के लिये मैंने ॐ ब्रह्म का तप किया। काशी में मरने वाले प्राणियों को मैं प्रणव (ॐ) का स्मरण कराता हूं जिससे वे प्राणी संपूर्ण कर्मयन्धनों से छूट के मुक्ति को प्राप्त होते हैं। ॐकार काशिकापुर्यामतः परशुराम यः। जपेत् स.धन्यः संसार श्रेष्ठस्तस्मान चापरः॥७३॥ संसारे यावती भूमिः सर्वाभ्यः काशिकोत्तमा । यत्रैकः प्रणवो जप्तोऽन्यत्र लक्षगुणो भवेत् ॥७॥ यथानमुर्वराभूम्या मुप्तं स्यादन्यतो बहु । तथा काश्यां जपाद्यस्मात् श्रेष्ठा काश्युदितान्यतः७५ ।

ोया हुआ अन्न और स्थानों से बहुत होता है वैसा काशी में
(२०७ )
अर्थ-जनक जी कहते हैं कि हे परशुराम जो! इस.
लिये काशीपुरी में जो भार को जपता
वह मंमार में धन्य
है, उसकी अपेक्षा दूसरा कोई श्रेष्ठ नहीं है । संसार में जितनी
भूमि है सौ से काशी उत्तम है वहां एक वार प्रणव का जप
अन्यत्र लाख गुणों के समान है । जैसे उपजाऊ भूमि में
जप आदि कर्म का फल बहुत होता है वैसा गाना इसलिये
और स्थानों से काशी श्रेष्ठ कही है ।।
इति भार्गव यन्मयोदितं
परमं गोप्यमतः सुदुर्लभम् ।
हरिमात्मभुवं शिवं विना
तदिदं वेति न कोपि तत्त्वतः ॥७६||
इति शिवदितं प्रोक्तं सर्वं ते परशुराम मया ।
अथमाहात्म्य काश्याः पुनरपि वक्ष्ये श्रृणुप्वैतत्।७७॥
अर्थ-2 परशुराम जी ! इस प्रकार ओमेने कहा यह
अत्यन्त गुप्त रसने सी यात है अतएव यहुन दुर्लभ है। ग्रामा,
विष्णु और शिय के छोड़ के पार कोई इमको यातयाम से
परशुराम जी ! ऐगा शिमो का कहा सय
तुनको मैंने कहा सय फिर काशीगी फा महात्म्य समता हूं
जहों मानता।
समको मुना॥
इति प्रमशानभाने श्रीपास्मोकिमुनिले जनक
परशुराममंगाद राजवंशराममेवालालगुमन
भापाटीकापां सतविंशः समः ॥२०॥

( २०८ ) परशुराम उवाच-~ संवादः शिवपार्वत्योजनकात्यद्भुत स्त्वया । कथितोऽस्ति पुनः काशीमाहात्म्यं विस्तरावद ॥१॥ परशुरामजी कहते हैं कि हे जनकजी शिव पार्वतीजी का संवाद तुमने अत्यन्त अद्भुत कहा है फिर काथी का माहाल विस्तार से कहो। जनक उवाच--- शृणुप्यावहितो भूत्वा काशीमाहात्म्य मुनमम् । वम्ये तदितिहासोऽत्र प्राक्तनस्तमथो शृणु ५२।। थर्थ-जनकजी परशुरामजी मे कहते हैं कि यह काशी का माहात्म्य सावधान होकर मना मैं सहता हूं यह एक प्रा. पीन इतिहाम है उनको पहिले सुने । कर्णकोनाम नगगे रेवाया दक्षिणे तटे। तत्रोतथ्यकुले जातोन्यवासीत् कोऽपि च द्विजः॥३॥ खां भायौ पुत्रयोन्यस्य स च काशी मुपागमत् । तत्रोपित्वा चिरं कालं मृतः स्वर्ग जगाम सः॥2॥ अर्थमंदा के दक्षिण तौर पर एक कर्णकी नाम को नगरी भी यहां उतश्य प्रापि को यंग में उत्पन्न को मानण गा। यह अपगी एयो को दोनों पुत्रों को पाग सोड़ के कागो गो गया ययात दिग रएके शरीर या दाता भया आरके गया।

श्रुत्वा पुत्रौ तु तदाता पितु यत् सांपरायिकम् ।
तौ
चक्रनु रपातां खां मातरं मुतवत्सलाम ॥५॥
तादाद्य च मातापि
पत्यु द्रव्येण तद्धनम् ।
'शिष्टं विभज्य ताभ्यां च
किंचित् स्वाभ्यर्ण मप्यधात् ॥६॥
अर्थ-पुत्रों ने उस वार्ता को सुनके पिता का क्रिया
कर्म देना ने किया और अपनी पुत्रवत्सल माता का पालन
भी किया। माता ने भी अपने पति के द्रव्य से दोनो पुत्रों का
विवाह करके बना हुभा वह धन दोनों को यांट दिया कुछ
पोड़ा अपने पाम भी रक्षा
कियकालं तयैवासोनिर्याण समये पुनः ।
व्ययीकृतं धनं सर्वं पुण्यकार्येषु तत् तया ॥७॥
नोदकामश्च तत्प्राणा स्तथापीत्थं विमृश्य च ।
उचतु स्तनयौ मातः कर्तव्यं किं नु शिप्यते ॥६॥
शिष्टं चेत् कथयावाभ्यां तत् कुर्वः श्रेयसे तव ।
मातोवाचावशिष्टं तु बह्वस्ति कुरुतं यदि ॥९॥
ज्येष्ठः सुतोऽब्रवी दम्ब
वद सत्यं करोमि तत् ।
माता नवीन्ममेच्छासी यत्
काशी यामि जात्वहम् ॥१०॥

(२१०) स मे मनोरथः पूर्णों नाप्सीन्मृत्यु रुपस्थितः। मदस्थि काइयां गङ्गयां मोक्ष्ये क्षेप्स्योत चेत् सुत ॥१९॥ अर्थ-कुछ काल तक वैसी ही रही फिर मरने के समय उसने वह सब घन पुण्य में सरच करदिया तथापि उसके प्रास म निकले ऐसा सोध के दोनों पुत्र बोले कि हे माता अब क्या करना शेष है जो शेष हो वह हम दोनों को कहा जो तुमारे कल्याण के लिये करें। माता ने कहा कि जो तुम दोनों करो तो बहुत ही शेप है। फिर ज्येष्ठ पुत्र बोला कि हे माता कहो उसको सत्यही मैं करूंगा। माता ने कहा कि मेरी इच्छा पो कि कभी मैं काशीजी जाऊं यह मेरा मनोरथ पूरा नहीं हुआ और मायु का समय मा गया। प्रथजो मेरी अस्थि (हड़ी) काशीती में गड्डा में हाल दो तो मुक्त हो जाऊँ। श्रुत्वैवं मातृवचनं पुत्रः प्रोवाच तां पुनः।। मातः सत्येन ते वश्मि तत् करिष्ये यदिच्छति १२॥ प्राणास्त्पज सुखेन त्वं त्यक्ता सन्देह मात्मनः । पूर्व त्वदुक्तं कृत्वान्यत् करिष्ये तद्वतं मम ॥१३॥ एव मुक्त्वा स्वहस्तं तु मातृहस्ते निधाय च । प्रतिज्ञा मकरोत् पश्चान्माता सत्याज विग्रहम् १४ भ-ऐभा माता का पचम मुनके फिर पुत्र उभे धोला मिदमाता में मत्य में कहता हूं किराहती है पर ज्येष्ठः . (२११ ) कईगा। तूं अपना सन्देह छोड़के सुख से प्राणों को छोड़ा पहिले तेरा कहा हुया करके फिर दूसरा काम करेगा यह मेरा र है । ऐसा कहके माता के हाथ पर अपना हाथ रसके प्रतिज्ञा करता गया। मी माता ने अपने शरीर को छोड़ा । तदौ देहिकं पुत्रः स्वां भार्या मनुजे तथा । संस्थाप्य काशीयात्रार्थसामग्री मुद्युयोज्यच ॥१५॥ पुत्रः सुवादाख्यो गृहीत्वा मातुरस्थि च । कतिचिसेच मा तीर्थकामनया ययौ ॥१६॥ स्त्रीभ्रातपुत्रानाश्चास्य 'समातुः प्रियकाम्यया। वेदमन्त्रान् पठन पाठान् मङ्गल्यान निर्गतो गृहात ॥१७॥ अर्थ-पुत्र माता की क्रिया कर्म करके और अपने स्वी को अपने छोटे भाई के पास सोप के काशीयात्रा के लिये सामग्री इकट्ठा करता भया । ज्येष्ठ पुत्र जिप्रका नाम भुवाद या यह माता को अस्थि (हड्डी)लेके कितने ही सेवकों के साप तीर्थ की इच्छा से चला । स्त्रीमाई और पुत्रों को भाशा भरोसा दे अपने माताका प्रिय करने की मासे वेदमन्त्र मार माङ्ग- शिक पाठों को पढ़ता हुवा घर से निकला । तदन्हि योजनं गत्वा ग्राममेकं प्रविश्य च । विप्रस्य कस्यचिदू गेहे निवास मकरोत् स च १८॥

कृत्वा सन्ध्यावन्दनं तु रात्रियाते दिनाडिके । पुरातना ज्ञानकथाः आवयामास सेवकम् ॥१९॥ अर्थ- -उस दिन एक योजन ( चार कोस )जा के एक गांव में प्रवेश करके किसी ब्राह्मण के घर में उसने निवास किया। दोपड़ी रात बीतने पर सन्ध्या यन्दन करके पुरानी जान की कथा सेवकों को भुनाता भया । दृष्टं तत्रैक माश्चर्यं गृहेशो गृहमागतः । दुग्धा न किं गौ रित्युक्त्वा स्वां भायौं धेनुमगन्णे २० निवहां दोग्धु मायातो वसं मुक्तयत् स्त्रियम् । दृष्टा व ता मनायान्ती येते बहुँस तर्णकम् ॥२१॥ अर्थ-~-उसने यहां एक प्राश्चर्य देखा कि घर का मालिक घर में आया और अपनी स्त्री से ( क्या नहीं दूहो) ऐसा कहके प्रांगन में बँधोहुई गा को दूहने को भाया । य को छोड़ के खो की पुकारा। उतको नहीं पाती हुई देस के पद स्वयं मच्छ के बांधने का यक्ष करता अया। वत्सेन कर्पता पादाघात स्तत्पदयोः कृतः। क्रोधेन तत्क्षणे विम स्तं यष्टया ताडयद्वहु ॥२२॥ सतदा ताडितो वत्सःस्थयान मृत्वा तदास्थितः। दुग्ध्यापि गाव विमोऽसौ वत्सं पातुं नचामुचत् २३॥ अर्थ-पीने सोचते हुए म मामा के पर से मारा, मग ममप माल मे काम हमारी कोमात ( २१३ ) मारा यह ताडन किया हुआ बछड़ा तव अत्यन्त स्थिर हाके रहा। उस ब्राह्मण ने गा को दूह करके भी बछड़े को पीने के लिये नहीं छोड़ा। किं तवोपस्थित धेनू रुरोद तदुःखात् तदृष्टा तर्णकोऽब्रवीत् । दुःखं मातः किमिति रोदिपि ॥३४ तत्वोवाच गौर्दुःखं वत्साहं वक्तुमक्षमा । तदेव मे महदुःखं यद् विप्रस्त्वा मताडयत् ॥२५॥ अर्थ- उस दुःख से गैरोने लगी यह देख के वछहा बोला कि हे माता तुम्हे क्या दुःख उपस्थित हुआ क्यों रोती है। यह सुनके गा वाली कि है वेटा ! मैं दुःख कहने को समर्थ नहीं हूं। वही मुझे दुःख बड़ा है जो तुझे ब्राह्मण ने मारा । श्रुत्वा तदब्रवद्वित्सः किं शोकन शमं व्रज । किमु कुर्मः क यामश्च पतिताः कर्मवन्धने ॥२६॥ पञ्चा किंचित् कृतं पूर्व तदेवाद्योपभुज्यते । एतत्कर्म वशीभूय यथेच्छसि तथा कुरु ॥२७॥ हसन करोति कर्माणि प्राणो भुङ्ते च तद्रदन् । कर्मणैवसुखं दुःख भुतेऽतः कर्मपूज्यते ॥२८॥ कर्मण्येव स्थितं विश्वं त्वमहं प्राणिनोऽखिलाः । खे से कर्मणि वद्धास्म मा शुच स्त्वं जनन्यतः२९॥ अर्थ- -यह मुनके घड़ा घोला फिहे माता शोक करने से क्या है शान्त होगी। अपने क्या करें कहां जायें कर्म बन्धन (२१४ ) । में पड़े हैं। जो कुलू पहिले किया है वही आजागते हैं। अब इस कर्म के वश होके जो चाहो से करो । प्राणी हँसये हुए फर्मों को करता है और रोते हुए उसको भुगतता है कर्म ही से सुख दुःख को लागता है इमी से फर्म पूजित है। कर्मही में जगत स्थित है। तूं मैं और सब प्राणी अनेक २ धर्म में से हैं इसलिये हे मातातूं शेक मत कर॥ वत्सस्य वचनं श्रुत्वा गौरूचे वत्सवेग्नि तत् । यद्यप्यत्र प्रजाः सर्वाः कर्माधीनास्तथापि च ॥३०॥ ईशमाया वशीभूय विलपामि पुनः पुनः। तचित्रं यद्रुदित्वापि दुःखं शाम्यति नो हृदः ॥३१॥ इति मातृवचः श्रुत्वा वत्सो वचन मब्रवीत् । चदेवं वेत्सि किमिति रोदने क्रियते त्वया ॥३२॥ रुदितेऽपिच का सिद्धि ति दुःखमतस्त्यज । यदशक्यप्रतीकारं दुःखं तद्दोग्य मेवहि ॥३३॥ अर्थ-यर का यधन मुन के गो यौली फि हे घेटा! यह में जानती हूं। यद्यपि इहलोक में सय प्रजा कमही के प्र- धीन हैं तयापि परमेश्यर की माया के वश होकर फिर फिर विलाप करती है। यही आश्चर्य है कि जारी करके भी हाय फा दुःरा नहीं मिटता । ऐमा माता फा यवन मुमके या योला कि हे माता! जो ऐमा जानती है तो मोती है। राने पर भी च्यामिहि रिमनिये हे मातः। दुःख छोड़ी। जिस दुःख के मिटाने का उपाय नही उसको भागमाहीचाहिये। - ( २२५) तछुवा गोर्जगादेदं मदुःखं तु तदेव हि । विनयति यदा विप्रो ऽप्येवं दुःखमवाप्स्यति २४॥ अतस्ताहक स्वयं दुःख मस्मै दास्याम्यहं तदा । पुत्रजन्यं दुखमेवं भवतीत्येष वेत्स्यति ॥३५॥ प्रात रेवाहे शृङ्गाभ्यां हनिप्ये ब्राहाणात्मजम् । सोऽप्याहतो मया प्राणान् मोक्ष्यते नात्र संशयः३६ -वह सुनके गौ यह वाली कि मेरा दुःख तो तभी मिटेगा जब ब्राह्मण भी ऐसाही दुःस पावेगा। इसलिये वैसा दुःस मैं इसको सयं दूंगी तब वह जानेगा कि पुत्रजन्य दुःख ऐसा होता है। प्रातःकाल ही में सींगों से ब्राह्मण के पुत्र को मारूंगी से भी मेरे मारने से माणों को छोड़ देगा इसमें सन्देह अर्थ मही है। एवमुक्ते ब्रवीद्वत्सो मातः प्राक्तनकर्म तु। इंन्यं हि भुज्यते किं नु ब्रह्महत्याफलं भवेत् ॥३७॥ तदशक्यं वेनु मतो विप्रश्वेहन्ति हन्तु माम् । सस्वकर्मफलं भुङ्ग्यात् त्वं दुःखीयसि किं वृथा ३८ अर्थ-ऐसा कहने पर फिर यछड़ा योला कि हे माता पूर्व कर्म तोरस प्रकार भागते हो फिर ब्रह्महत्या का फल या होगा मा जान नहीं सकते । इसलिये मामण मुझे मारे तो मारोह सपने कर्म को भोगेगा तू को या दुःख करती है।

( २१६ )
सत्कर्मणैति वश्चासत्कर्मणा निरयं पुनः।
मुक्तिं कर्मक्षया देति जन्म स्यात् कर्मसंचयात ३९
नष्ट कर्मणि संसारः किंस्यान्नव कदापि न ।
एवं ज्ञात्वापि किं दुष्टं कर्म कर्तुं त्व मुद्यता ॥४०॥
माता त्वं मे सुतोऽहंते इति मिध्यैव जल्पनम् ।
कामाता का पिताबन्धुःस्वामीवा बालकोऽपि वा ४१
अर्थ --- अच्छे कर्म से मनुष्य स्वर्ग में फिर बुरे कर्भ से नरक
में जाता है कर्मों का क्षय होने से मुक्ति होती है और कर्मों के
संचय से जन्म होता है कर्मक्षय होने से फिर क्या संसार हेगा?
नहीं कदापि नहीं होगा। ऐसा जान के भी तूं दुष्ट कर्म करने
को क्यों उद्यत हुई है । तू मेरी माता मैं तेरा पुत्र यह तेरा
कहना मिथ्याही है। कान माता कौन पिता कौन यन्धु
स्वामी अथवा कोन यालक है।
त्यज दुःख मितिज्ञात्वा शुभकर्मा चरोपसि ।
गौरूचे ऽहमिदं वेद्मि परं मया गरीयसी ॥१२॥
त्यतुमिच्छाम्यहं मायां सातु मांन विमुञ्चति ।
त्यदुखं यन्मया दृष्टं दो तेन पुनः पुनः ॥३॥
यदुक्तं तत् करिष्यामि ब्रह्महत्यापि सेत्स्पति ।
ब्रह्महत्या यतो नद्रये देग्नि तत् स्थानमप्यहम् ॥४४
स्याद्ब्रह्महत्या कायः श्याम स्तन्नाशतः सितः।
इत्याग्रहयचः श्रुत्वा मातु र्वतसोऽवधीदिदम् ॥१५॥

- ब्रह्महत्या भी दूर हो जायगी।ब्रह्महत्या जहां से नष्ट होगी ( २१७ ) अर्थ-ऐसा जान के दुःस छोड़ाचार प्रातःकाल में अच्छा काम करे। गोबोली कि यह मैं जानती हूं परन्तु माया बल- वान है । मैं माया को छोड़ने चाहती हूं परन्तु वह माया मुझे नहीं छोड़ती तेरा दुःस जो मैंने देखा है उससे बारम्बार मैं चली जाती हूं। इसलिये जो मैंने कहा है वह करूंगो फिर वह स्थान भी मैं जानती हूं। ब्रह्महत्या से शरीर श्याम होगा उसके मिटने से फिर स्वेत हेगा। ऐसा माता का भाग्रह का वचन सुनके बछड़ा यह वोला। अशक्यं भावि संरोढुं स्थानं त्वहरं वद । साब्रवीद्वत्स यनितहदाम्ब धुनातव ॥४६॥ पूर्व परमहंसो हावत्रागत्य स्थितौ तयोः । गोष्टयो बभूवु निस्य वेदवाठपुरस्सरम् ॥४७॥ तत्रैकमपरः प्राह ब्रह्महत्यादि पापकृत् । ॐकार मुञ्चरन काश्यां गङ्गास्नानं करोतिचेत्॥१८॥ वार्ता का चेकहत्याया लक्षहत्योहृति भवेत् । मन्पुप्रणवःश्रेयान काशी श्रेष्ठा च भूमि पु॥४९॥ वरस में तत्र सर्वापि विनदयेत् पाप संहतिः । इति मातृवचः श्रुत्वा मौनं वत्सोऽप्य शिप्रयत्॥५०॥ अर्थ है माता! भायो रोगना अशप हे परनु पापट्टर करने वाला स्थान तो पहो। गायोती कि ऐ ग्रेटा में ।

(२१८ )
जानती हूँ यह अब तुझे कहती हूं पहिले दो परमहंस यहां
पाकर रहै उनको ज्ञान की बाते वेद पढ़ पढ़ के हुई। उनमें
एक बोला कि ब्रह्मनत्यादि पाप करनेवाला ॐकार को पढ़ता
हुआ काशी में जो गङ्गास्नान करे तो एक हत्या की क्या बात है
लास हत्या का उद्धार होजायगा। मन्त्रों में श्रेष्ठ प्रणव (ॐ) है
नौर भूमि में श्रेष्ठ काशी है । गा कहती है कि हे बेटा! वहां
मेरा सब पाप का समूह दूर हो जायगा। ऐसा मां का बथन
सुनके बड़े ने मौन का प्रानय किया (चुप रहा) ॥
श्रुत्वा सुवादः संवादमेतयो रोमहर्पणम् ।
अद्भुतं तदुपः कृत्यं दृष्ट्रा निरचिनोदमम् ॥५१॥
पशुभापा भवेत्सीत् स विप्रः सम्यक्तया ततः।
अजानात् पण्डितोज्ञानी तमुदन्तं च वेदवित्॥५२॥
थध-मुवाद पथिक ब्राह्मण ने इन दोनों का रोमाञ्च
सहा करने घाला सभ्याद सुनके यह मातःकाल का अद्भुत
रुत्य देरा केही जाने का निश्चय किया। यह ब्राह्मण पशुभाषा
को उत्तम प्रकार से मानता था पगिष्ठत या ज्ञानी था श्रार घेद
जानने वाला या इमलिये उस वृत्तान्त को उसने जाना।
जमफटधाच-
सुवादमवदत् प्रातरुत्थाय गृहनायकः ।
पथिकोनिष्ठ किं शेपे प्रभातम भवेत् किल ॥५३॥
ऊचे मुबाद उत्थाय न शयेऽहं समुत्थितः ।
रानावनुचरस्यासाच्छरीरे महती व्यथा ॥५४॥

। २१९) विलम्ब्यते ततो यातुं यास्यामि च मुहूर्ततः । एवं मिपं समाख्याय स प्रातःस्मरणे रतः ॥५५॥r अर्थ- रजनक जी परशुरामनी से कहते है कि प्रातःकाल घर का मालिक दटके सुवाद से बोला कि हे पथिक उठो क्या होते है। । निश्चय से प्रातःकाल हुआ। सुवाद छठ कर बोला कि मैं सेरता नहीं हूं ठठा हूं रात को सेवक के शरीर में बड़ी अथा हुई। इससे जाने को देर करता हूं दो घड़ी में जाऊंगा। ऐसा बहाना कहके वह प्रातःस्मरण करने में लगा। गृहाधीशः सुतं प्रोचो यामि कार्य वशात् क्वचित् । गोदोहसमयः प्राप्तो दुयतों मौरथा व्रजत् ॥५६॥ अर्थ- (घर का स्वामी पुत्र से वोलामें कहीं काम से लाता ई। मे। दुहने का समय प्राया गा दुहेरे यह कहके गया । पुत्रोणोत्याय मुमुचे वत्सो गोदोहनार्थिना । गोदोहनार्थमायाता तन्माता तत्क्षणे वयम् ॥५॥ वसं निवन्धता वत्सः कीलदण्डेन ताडितः । पुत्रेण तत्क्षणे क्रुहा गोस्तं श्रृङ्गेण चाहनत् ॥५८॥ व्यथितो मूर्छितो वालः स मर्मणि हतस्तया । पपात लोका अवदन् गवावालो निपातितः॥५९।। अर्थ-नौ दूहने को कासे पुत्र ने उट कर बड़े को छोड़ा लड़ समय उसकी माता आप ना दूदने को माई।पुर, ने बर का बांधते हुए सूटे के रे में अबो को भारा उम - (२२० । समय गाने रिस करके उस बालक को सोंग से मारा। वह यालस उस गा से मर्म में चोठ साकर व्यथा को पाय और मूछों को प्राप्त होकर गिरा। लोग कहने लगे कि गाने बालक को मारा यावन्मात्रादयःप्रोचुर्जलमानीयतां लघु । पाय याथ यतखेति तावदाम्रियतात्र सः॥३०॥ वालस्य मरणेनात्र हाहाकारो महानभूत् । अत्रान्तरे ऽमुचदोस्तु रज्जुं पथिकसेवकः ॥६१॥ तत्क्षणे श्वेतवर्णा गौः श्यामत्वम भजतू क्षणात् । तवालोका मियःप्रोचुः कृष्णाभूदौः सिताप्यघात ६२ ~जय तक उस बालक की माता भादि कहने लगे कि जल शोघ्र लाओगल पिलायन करो, तयतक वह मर गया। यालक के मरने से यहां यहा हाहाकार हुआ। इसके योध में पथिक के सेवक ने ना की रस्सी रोलदी। उसी क्षण में श्वेतवर्या क्षण में श्याम होगई तय लोग आपस में बोलने फित गा भी पाप से काली हो गई। पथिकोऽपि तदाश्चर्यं दृष्ट्वा प्रास्थित सत्वरम् । यत्र गोरगमत् तत्र सानुगः स्वयमन्वगात् ॥३॥ सा गौरुट्रित्य लाङ्गलं ययो वाराणसीपथा । एतस्मिनन्तरे काचित् सुन्दर्यागत्य चावात् ॥६॥ भर्य-पषिक भी यह लाययं देश के गीनही यहां गे अर्थ- (२२१.) चला जहां नो गई वहां अपने सेवक के साथ आप भी पीछे पला । वह गा यूंद उठायो काशी के मार्ग से चली इसी के बीच मैं कोई स्त्री पाकर बोली। क प्रस्थितोऽसि विप्रेन्द्र ब्राह्मणस्तामथात्रवीत् । शोतं मात्रस्थिगडायांकाशीयातास्मि सुन्दरि॥६५॥ साबवीहिन मास्थि क्षिपत्वं नर्मदाजले । वर्ग यास्पति ते माता ब्राह्मणस्तां तदाब्रवीत् ॥६६।। के यासि सुन्दरि त्वं का संपूर्ण गुण संयुता । साववाहि गङ्गास्मि याम्यहं नर्मदातटम् ॥६॥ प्रत्यब्द नर्मदा नानुमेकवारं व्रजाम्यहम् । वैशाखशुक्लसप्तम्या दिवसः सोयवर्तते ॥६८॥ अद्य स्नातुनर्मदायां गङ्गास्नान फलंभवेत् । सागमा विप्र मुक्त्वत्थं तत्रै वान्तहिताभवत् ॥६९।। अर्थ-हे ब्राह्मण ! तू कहां चला फिर उससे ब्राह्मण बोला-कि हे सन्दरी माता की अस्थि गङ्गा में डालने के लिये काशी जाऊंगा। तब वह खी बाली कि है ब्राह्मण तू नर्मदा के जल में माता की अस्थि हाल तेरी माता स्वर्ग में जायगी। तब उससे ब्राह्मण बोला कि हे सुन्दरी तू कौन है और कहां जाती है संपूर्ण गुणों से युक्त है । स्त्री बोली कि हे ब्राह्मण गहा हूं नर्मदा के तीर गाती हूं प्रतिवर्ष वैशाय शुक्मप्तमी को एक धार नर्मदा मान करने को जाती है। यह दिन बाज है। ॥७॥ साज नर्मदा का मान करने वाला गहा स्नान के फल को पाता है। वह गङ्गा ऐमा ब्राह्मण से कहके वहीं अन्तध्यान हो गई। धावित्वा निकटे गत्वा विप्रः प्रोवाच गां प्रति । वहुदूरे स्थिता काशी मायासीस्तत्र धेनुके ॥७०॥ स्नाशय नर्मदायां त्वं सर्वपापात् प्रमुग्यसे । तच्छुत्वा गौः परावृत्य स्मरन्ती प्रणव मुहुः नर्मदाम्भसि सुस्तात्वा मुक्तासीत् पाप संचयात । पूर्ववत् तत्क्षणाच्छ्रेता भृत्वा यातावकं गृहम् ॥७२॥ अर्थ-ब्राह्मण दाइ के गा के पाम लाकर बोला कि है गो काशी बहुत दूर पर है वहां मत जा माज तू नर्मदा में नान कर सब पापों से छूट जायगी। गा वह मुन के पलट के यार यार ॐकार का स्मरण करती हुई नर्मदा के जल में स्नान करके पापों के समूह से मुक्त हुई । उसी समय पूर्वत चेत वर्ण होके अपने घर गई। विमो ऽपि नर्मदा ताये लात्वा वाराणसी ययौ । मातुरुक्तानुसारेण तदभीष्टार्थसिद्धये ॥७३॥ सं प्राप्य काशी प्रणवमुच्चरन् ब्राह्मणोमुहुः । तत्रस्वमातुरस्थीनि भत्या गाजलेक्षिपत्॥७॥ तदेव प्राप्यदिव्यातन्माता स्वमदर्शयत् । अमिनन्यादिपा पुत्रं निष्पापास्वर्गतिं गता॥७५।।

( २२३ ) अर्थ- भी नर्मदा के जल में स्नान करके काशी को माता के कहने के अनुसार उसको इष्ट अर्थ सिद्ध होने के लिये चला। काशी में जाके बार बारॐ कार का उच्चारण करता हुआ वहां भक्ति से माता की प्रस्थि को गङ्गा के जल में हालता भया । उसी समय उसकी माता दिप देह को पा के पुत्र के प्रति अपने को दिखलाती भई । पुत्र को आशिर्वाद देकर पाप रहित होके स्वर्ग में गई ॥ स्वर्यान्ती तनयं जगादच वचोधन्योऽसियत्पावितः। स्वोवंशः कृतकृत्यतामुपगतो धन्यं कुलं तद्भवेत्।७६॥ एवं यत्र भवेत् सतः प्रणवसंस्मर्ताच वाराणसी। गङ्गास्नानरतस्तथा पितृगणोद्धर्ता सुरार्धापरः॥७७॥ अर्थ-वह माता वर्ग में जाती हुई पुत्र ओली कि हे पुत्र तू धन्य है लेर तूने अपना यंथ पवित्र किया, कृतकृत्य होगया । वह कुल धन्य होगा जहां ऐसी पुत्र का स्मरण करने वाला फाशी में गड़ा सान करनेवाला तथा पितृगणों का उद्धार करने वाला और वचन भी उत्पन हो जो प्रणव (ॐ) देव पूजन में तत्पर हो । प्रणवस्य वणितं ते.माहात्म्यं काशिकायच । गगाया रेवाया अथ यच्छुश्रूपसे वतत् ॥७८॥ अनकही परशुराम जी से कहते हैं कि तुमको (२२४ ) *कार का काशी का गहा का और नर्मदा का महात्म्य वर्णन किया अव जो सुनने चाहते हो सो कहे। इति ब्रह्मज्ञानशास्त्र श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक परशुरामसंवादेराजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत भापादीकायां अप्टविंशः सर्गः ॥२८॥ - परशुरामउवाच राजन्नुग्रं परं ज्ञानंत्वया यच्छू वणादहम् । प्रीतोऽस्मि कृपया धर्मात् गृहस्थानावदाधुना ॥१॥ अर्थ-परशुराम जी बोले कि हे राजन मापने श्रेष्ठ ज्ञान कहा जिसको सुन कर मैं प्रसन्न हुआ आप कृपा करके गृहस्यों के धर्मों को कहिये । जनक उवाच-- गृहस्थाश्रम धांश्चवक्ष्ये परशुरामतान् । सावधाने न मनसा शृणुप्य सुधियां वर ॥२॥ अर्थ- -जनपाराशा योले कि हे परशुराम जी गृहस्थाश्रम के धमों को भी फहता हूं ठनको भासपान पित्त सुना, साप विद्वानों में ग्रेट हैं। शयात चेत् पूर्वशिरा विधा लाभं सुखानिच । आयुढेि मवाक् शीपंश्चिन्तां प्रत्यशिरा अपि ।३।

और ( २२५ ) मृत्युमुनरशीपश्च प्राप्नुतेऽभ्यासयगतः । रवेरस्तात् परं भानूदयं यावनिकेतने ॥१॥ दापा ज्वलति चेत् तत्र दारिद्रयं जातु नो भवेत् । हान्य प्रत्यगवाग्वतः शुभो दीपोऽन्यदिङ्मुखः ।।५।। अर्थ-पूर्व की ओर सिर करके सोने से विद्या लाभ सुख होता है दक्षिण में सिर कर सोने से प्रायुष्य बढ़ता है पश्चिम में सिर करके सोने से चिन्ता और उत्तर में सिर करके सोने से मृत्यु होता है इसका सर्वदा अभ्यास करने से ऐसा फल होता है। सूर्यास्त के उपरान्त सूर्योदय पर्यन्त घर में दीया जलता हो तो वहां दारिद्रय कभी नहीं होता। पश्चिम और दक्षिण में दीयाका मुंह करने से हानि और अन्य दिशा में करने से शुभ होता है। शय्यायाः शुचिता पुंसः कार्यावहितया स्त्रिया। रात्रौ यामात् परं शस्तं न पूर्वं न दिवा रतम् ||६|| अर्थ-स्त्रीने सावधान होकर पुरुष के सेज की पवित्रता रसनी चाहिये पहर रात बीतने पर स्त्री सह करना शुभ पहिले अयवा दिन को शुभ नहीं है। चतुर्विशति वर्षों ना स्त्री चेत् पोडशवार्षिकी । गर्भाधान सदा युक्तं न्यूने सन्नतिहानिदम् ॥७॥ अर्थ-पोषीस यरस फा पुरुप और स्त्री मेरह धरम की होतब गांधान करना ठीक है न्यून यय रहने से मन्नान की हानि होती है।

( २२६ ) स्त्रिया रजोदर्शनाहात् स्थ तव्यं ब्रह्मचर्यतः। आचतुर्थदिनं तत्र हास्यं भूल्लेखनं नखैः ॥८॥ दिवास्वापोऽजनं स्नानमभ्यङ्गो रोदनं तथा । वज्यै नखोत्कृन्तनं च परपूरुपदर्शनम् ॥९॥ अर्थ-स्त्री ने रजोदर्शन होने से चारदिन तक ब्रह्मचर्य से रहना । और हंसना नख से भूमि को खोदना दिन को सोना लाखों में अजन लगाना स्नान करना शरीर में तेल लगाना रोना और नख काटना तथा पर पुरुप को देखना इतना करना नहीं चाहिये। शयीत कुशशय्यायामूर्णावस्त्रेषु वा पुनः। पायसं संयताभीयान गृहोपस्करं स्पृशेत् ॥१०॥ अर्थ- '-रजस्थला स्त्री चार दिन तक कुत्रों की सेज पर सावे अथवा ऊनी वस्त्र पर सावे संयम से रहे सीर भोजन करे और घर की किसी वस्तु को न वे ॥ प्रथमेऽहनि चाराडाली द्वितीये ब्रह्मघातिनी । तृतीये रनकी प्रोक्ता चतुर्थे हनि शुद्ध्यति ॥११॥ अर्थ-रजस्वला स्त्री प्रथम दिन चयडाली दूसरे दिन प्रलहत्यारी तीसरे दिन धायिन जैसे रहती है और चाचे दिन (स्पर्श दाप से) शुद्ध होती है। सा चतुर्थेऽहनि स्नात्वा पीत वस्त्रं विभृपणान् । घारयेत् स्वस्तिमंत्रैस्तु पश्येत् पत्युर्मुखं पुरा १२|| ( २२७ ) अर्थ- जखला स्त्री चौथे दिन स्नान करके घाई घातो गहने श्रादि पहने। स्वस्तिवाचन के मंत्री को पढ़ कर पहिले पति का मुख देखे ॥ खभावादेव नारीणां मासिमास्यार्तवं भवेत् ।', आपोडशाहं तत् प्रोक्तं तत्र स्त्रीगमने विधिः १३॥ अर्थ-स्त्रियों को स्वभावही से महीने महीने में रजा- दर्शन होता है। उसका समय मारह दिन तक है। उसमें स्त्री संग करने का विधि है। चतस्वोरात्रयश्चाद्या रात्रिरेकादशी तथा । त्रयोदशो च वाः स्युः प्रशस्ता दशरात्रयः॥१४॥ अर्थ-पहिले चार और ग्यारहवो तथा तेरहवी ये रात्रि श्रीसंग में वार्य हैं शेष दस रात्रि शुभ हैं। तासु युग्मातु पुत्रः स्यादयुग्मासु सुत्ता भवेत् । पप्ठ्यां सामान्यतःपुत्रोऽष्टम्यां सौभाग्यवान् भवेत्।। ऐश्वर्यवान दशम्यां स्थान द्वादश्यां बलवान् भवेत्१५ चतुर्दश्यां च पोडश्यामायुष्मांश्च प्रतापवान् ॥१६॥ सामान्यकन्या पञ्चम्यां सप्तम्यां सुभगा भवेत् । नवम्यां श्रेष्ठगुणयुक् पञ्चदश्यां नृपोपमा ॥१७॥ अर्थ-उसमें सम (वेशी) रात्रि में गर्भाधान करने से पुत्र और विषम (एकी) रात्रि में कन्या होती है। पट्टी रात में सामान्य पुत्र पाठवीं रात में भाग्यवान् दसर्वी रात में ( २२८ ) ऐश्वर्यवान् बारहवीं रात में बलवान् और चौदहवीं तथा सी- रहवी रात्रि में गर्भाधान करने से दीर्घायु और प्रतापवान् पुत्र होता है। पांचवी रात में सामान्य कन्या सातवी रात में सौभाग्यवती कन्या नववी रातमे श्रेष्ठ गुणवाली कन्या और पन्द्रहवीं रात में राजकन्या के समान कन्या होती है । गभाधानंतथा जन्मसंस्कारश्चौलकर्म च ।। उपवीतं च कर्तव्यं विप्राणां भूभृतां विशाम् ॥१८॥ वीजगर्भोद्भवाहोपात् तेन शुद्ध्यन्ति तु द्विजाः। ब्राह्मणाःक्षत्रिया:वैश्यास्त्रयौवर्णा द्विजाः स्मृताः।१९ वेदमन्त्रैर्यतस्तेषां संस्कारादपरा जनिः। एकश्चतुर्थः शूद्रः स्याद्वर्णाश्चत्वार ईरिताः ॥२०॥ अर्थ-गर्भधान सस्कार जन्म संस्कार मुण्डन और यज्ञो पवीत ये संस्कार ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य तीनो वर्णो को अवश्य करने चाहिये। इस में तीनों वर्ण वीज बार गर्भ के पाप से मुक्त होते है क्योकि वेद मंत्रो के संस्कार से उनका दूसरा जन्म होता है । धौथा वर्ण एक शृद्र है ये चार वर्ण कहे ॥ गर्भाधानाख्यसंस्कारः स्त्रियः स्यात् प्रथमातवे ।' जाते तनालच्छेदातमाग जातकर्म शिशोः स्मृतम्।। एकादशे दादाशे च जन्मतो वा शुभे दिने । वालस्य नामकरणं कर्तव्यं शुद्धये द्विजैः ॥२२॥ अर्थ-गर्भाधान मम्फार स्त्री के प्रथम रजोदर्शन में होता है।माम देने पर माग काटने के पहिले सहक का जात फर्ग शुद्धि पृष्ट न० २२० गर्भाधानंताजन्मसंस्कारचौलकर्म च । उपपीतं च कर्तव्यं विप्राणां भूभृतां पिशाम् ॥१८॥ थीज़ गर्भोद्भवाहोपात् तेन शुद्धवन्ति तु द्विजाः। वेदमन्यतस्तेषां संस्कारादपरा जनिः॥१९॥ ब्राह्मणाःक्षनियाः वैश्यास्त्रयो वर्णा द्विजाः स्मृताः। एकश्चतुर्थः शूद्रः स्यादर्णाश्चत्वार ईरिताः ॥२०॥ अर्थ-मंधान संस्कार जन्मसस्कार मुण्डन और यशो- पवीत ये सस्कार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तीनोवों को वश्य करने चाहिये। इससे तीनो वर्ण वीज और गर्मी के पाप से मुक्त होते हैं क्योकि वेद भत्री के सरकार से उनका दूसरा जन्म होता है। नाह्मण, क्षत्रिह, वैश्य ये तीन वर्ण द्विज फह- "लाते हैं। या वर्ण एक शूद्र है यह चार वर्ण कहे ॥

२२२ ) . संस्कार होता है। ग्यारहवें तथा वारस अथवा फिमी शुभ दिन में बालक का नामकरण तीनों वर्गो में शुद्धि के लिये करनी॥ नानि विप्रस्य शर्मेति वर्मेति क्षत्रियस्य च । योज्यं विशो गुप्त इति दास इत्यपरस्य च ॥२३॥ अर्थ-ब्राह्मण के नाम में शमा क्षत्रिय के नाम में वर्मा वैश्प के नाम में गुप्त और शूद्र के नाम में दास लगाना चाहिये ।। स्त्रीणां नाम सुखोच्चार्य सुमङ्गल्यं मनोहरम् । कर्तव्यं दीर्घवर्णान्तमाशीर्वादसमन्वितम् ॥२४॥ अर्थ-स्त्री का नाम सुख से कहने योग्य मङ्गलवाचक मनोहर अन्त में दीर्घ स्वर हो ऐसा और मशीर्वाद युक्त होना चाहिये। मासे चतुर्थे चालस्प रखेर्दर्शनहेतवे । गृहाहहिनिष्क्रमणं पटेनिप्राशनं स्मृतम् ॥२५॥ अर्थ-धीधे महीने में बालक को मूर्य का दर्शन कराने के लिये पर मे थाहर निकालना यह निष्क्रमण संस्कार है बह महीने में पत्र प्राशन कराये ॥ उदयं मयमं मन्यमुज्ञार्योदुत्त्यमित्यपि । ततच चित्रंदेवानां तुर्य तबक्षुरित्यपि ॥२६॥ मन्त्रैश्चतुभिः सूर्यस्य दर्शनं कारयेच्छिशोः । अवदस्मदीमयस्पानप्राशनमाचरेत् ॥२७॥ :

(२०)
व्यायुपञ्जमदग्ने श्वेत्युत्का मन्त्रं पठेत् पुनः ।
शिवोनामासोतिमन्त्रं चूडाकर्म समाचरेत् ॥२८॥
अर्थ-पहिला उदयं मंत्र, दूसरा उदुत्यं, फिर चित्र-
देवानां, चौथा तच्चतः मंत्र पढ़ के बालक को सूर्य भगवान् का
दर्शन करावे । श्रारे “अबरुद्रमदोमहि" मंत्र से बालक की
अन्नप्राशन करावे (भन्न चटावन)। पहिले 'च्यायुपंजमदग्न'।
इस मंत्रको पढ़ कर फिर 'शिवोनामासि'इस मंत्र को पढ़े
पीछे बालक का मुण्डन फरे ।
चूडाकर्म शिशोधर्मवृध्यर्थं तु द्विजातिभिः ।
प्रथमे वा तृतीयेऽदे कर्तव्यं वेदशिक्षया ॥२९॥
अर्थ-तीन वर्ग अर्थात् वालण क्षत्रिय वैश्य को
चाहिये कि धर्म की वृद्धि के लिये यालक का चूहा फर्म (मुण्डन)
संस्कार पहिले वा तीसरे वर्ष में वेद की प्राज्ञा से करना।
विप्रस्याब्देऽष्टमे गर्भादुपवीतं विधीयते ।
राक्ष एकादशे गर्भाद् द्वादशे गर्भतो विशः॥३०॥
क्रमाद्वा पञ्चमे पठेऽष्टमे तेजोविवृद्धये।
उपनीतो द्विजशिशुर्गायन्त्रीमन्त्रमभ्यसेत् ॥३१॥
अनिकाय कुलाचारं सन्ध्योपास्तिं समाचरेत् ।
गर्भाधान जातकर्म चूडा मौजोनिबन्धनम् ||३२॥
संस्कारा इति तत्रोचुरधिकारं द्विजन्मनाम् ।
शूद्रस्य सर्वे संस्कारा वेदप्रणव जिताः ॥३३॥

- ( २३१) आपोडशाहाह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते । आदाचित् क्षत्रवन्धोराचतुर्विंशतेविशाम् ॥३४॥ अर्थगर्भ में प्राइवे वर्ष में ब्राह्मण का गर्म मे ग्यारहवें वर्ष में क्षत्रिय का और गर्भ से वारहवें वर्ष में वैश्य का यज्ञो पवास करना चाहिये । अथवा अपना अपना तेज बढ़ने के लिये पांचवें वर्ष में ब्राह्मण का छटे वर्ष में क्षत्रिय का और बाट वर्ष में वैश्य का यज्ञोपवीत (जनेत) करना । यो- অঙ্গীন দিয়া মায়া মনিষ গুয় জা মাবন্ধ শামী मंत्र का जप करे अग्निकार्य (होम) कर, अपने कुल का आधार चार संध्या करे । गर्भाधान जातकर्म मुण्डन और यशोमधीत ये संस्कार हैं इनमें तीन धर्ण अर्थात् ब्राह्मण सत्रिय और घेश्य को अधिकार कहा है और शूद्र के सभी संस्कार वेद और ॐ कार करके रहित हैं (मना है)। चारह वर्ष पर्यन्त ब्राह्मण का गायत्री मंत्र ( यज्ञोपवीत ) का समय नहीं जाता।क्षत्रिय का बाइस वर्षको वैश्य का धोवीस वर्ष तक समम नहीं जाता अर्थात् ब्राह्मण का सरह वर्ष तक क्षत्रिय का वास वर्ष तक और वैश्य का पीवीस वर्ष तक भी यसी पोत संस्कार का गाय फाल है। अत ऊर्य त्रयोप्यते यथाकालमसंस्कृताः। सावित्रीपतिता व्रात्या भवन्त्यायविगहिताः ॥३५॥ अर्थ-इसके उपरान्त ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य ये तीनो वर्ष अपने अपने काल में (ममय पर) संस्कार न किये गा हो सो गायत्री मंत्र से पतित होकर ब्रात्म कहलाते हैं और ( २३२ ) - श्रेष्ठ पुरुषों में निन्दा को प्राप्त होते हैं। कार्पस क्षौम गोवाल शण वल्वतृणादिकम् । यथा सम्भवतोधार्य मुपवीतं द्विजातिभिः ॥३६॥ अर्थ- -कपास का सूत, रेशम, गोवाल अर्थात् गा की की पूछ के यान्न, शण, जन और वल्वतृण (मूंज) इत्यादि जो समय पर मिल जावे उसी का ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य यज्ञोपवीत बना कर पहिने अर्थात् जहां तद कपास का सूत मिल सके वहां तक अन्य (दूसरा) का न पहिने। किन्तु कपास के सूत के ग मिलने की दशा में रेशम आदि का पहिने । सदोपवीतिनाभव्यं सदावहशिखेन च । विशिखोव्युपवीतश्चयत्करोतिनतत्कृतम् ॥३७॥ अर्थ-सदा अनेक पहिने और शिखा में गांठ लगायें। जिसके जनेक नहीं हे, भिसा न हो यह जो फर्म (पूजा,पाठ, भजन) फरता है यह निष्फल है। शुचौदेशे शुचिः सूत्रं सहितागुलि मूलके । आवर्त्यपराणवत्यातत्तिगुणी कृत्ययत्नतः ॥३॥ अब्लिग कैश्च मन्वैस्तत्मक्षाल्यो_वृतंत्रिवृत् । अप्रदक्षिणमावृत्य सावित्र्यात्रिगुणी कृतम् ॥३९॥ ततः प्रदक्षिणा वतै समं स्यान्न वसूत्रकम् । निरावेष्टयदृटंबद्ध्या ब्राह्मविष्ण्वीश्वरानमे ॥१०॥ अर्थ-गरीर गे शद हुमा मनुष्य पवित्र रयान में अपने

(२३३)
धारो प्रॉलियों को इकट्ठी करके उनके मूल (जई) में सूत को
तिगुना कर विचार के साथ छानवे यार लपेट कर अपशब्द-
जिन में भाता है ऐमा (प्रायो हिलामो भुव स्तान जर्ने
दधावन ) इत्यादि मंत्रों के साथ जलसे धोकर उस तीनलर से
मृत को प्रथम अपर को ऐंठ कार सावित्री (गायत्री मंत्र से
पुनः उसको तिगुना करें। पीछे उन तीनों लरों को एंट कर
एकता सम नबसूत्र का करे फिर उसकी तीन लरों में एक दृढ़
गाँठ लगा कर उत्पत्तिस्थितिलय कर्ता ईश्वर ॐ को नम-
स्कार करे।
पृष्ठदेशे च नाभ्यां च धृतं यद्विन्दते कटिम् ।
तहार्यमुपवीतं स्यानातिलम्ब नचोछूितम् ॥४१॥
अर्थ-पीने पीठ पर और आगे नाभी पर होकर कटि
भाग तक पहुंच जावे ऐसा यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये
जोतिलम्वा वा प्रति छोटा न हे।।
उपवीतं वटोरेक हूँ तथेतरयोः स्मृते ।
यज्ञोपवीतमिति वा व्याहत्या वाऽपि धारयेत् ॥४२॥
“अर्थ-घटु (ब्रह्मचारी) को एफ जनेऊ पहिनना चाहिये
तथा गृहस्य भार वानप्रस्य को दो जनेऊ धारण करना चाहिये
जध नवीन जनेऊ धारण करे तो यशेपवीतंपरमं पवित्रंबा
व्याहृति ॐ भूर्भुवः स्वः) गायत्री मंत्र को पढ़कर पहिने॥
यज्ञोपवीते द्वे धायें श्रौते स्मार्ने च कर्मणि ।
तृतीयमुनरीयाथै वस्त्रालाभे तदिप्यते ॥४॥

अर्थ-श्रुति स्मृति (वेद शास्त्र) में लिखे हुए कामों के
करने में दो जनेऊ पहिने अँगोधा न हो तो उसके बदले में
एक जनेऊ और पहिने अर्थात् तीन जनेऊ पहिनना चाहिये।
विप्रक्षत्रियवैश्येषु त्रिष्वेकविधमेवच ।
यज्ञोपवीतं धार्यं स्याञ्छूद्राणां नैव तद्भवेत् ॥४४॥
अर्थ-ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य तीनों वर्षों को जनेक एक
ही प्रकार का धारण करना चाहिये और शूद्र को जनेऊ
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या नमस्कुयुः परस्परम् ।
त्रीनेतान् सहिजान शूद्रः साष्टाङ्गं प्रणमत्सदा॥४५॥
अर्थ ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य आपस में नमस्कार
करें। शूद्र इन तीन द्विजों को सर्वदा साष्टाङ्ग नमस्कार करे।
शिशुपनयनं येतु न कुर्वन्ति द्विजातयः।
सोपाध्यायास्तु ते सर्वे ध्रुवं निरयगामिनः ॥४६॥
अर्थ-जो तीनों वर्ण ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य, याठक का
यज्ञोपवीत (जनेऊ) नहीं करते येलोग पुरोहित के साथ नि-
शय से नरक में जाते हैं। इसलिपे पुरोहित को चाहिये कि
अपने जजमान को उपदेश देवे अर्थात् यज्ञोपवीत (जनेऊ)
संस्कार कराये॥
पुत्रोपनीतिसंस्कारं श्रुतेरावश्यकं चरेत् ।
ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रस्तु न च धारयेत् ॥१७॥

खोजनेक नहीं धारण करना चाहिये। अर्थ-ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य को पुत्र का यज्ञोपवीत (जनेड) संस्कार अवश्य करना चाहिये वेट मंत्र से और शूद्र यज्ञोपवीत संस्कारो यस्य जातो हिजन्मनः । तस्य वेदादिमंत्राश्च दातव्या विदुपा सदा ॥४॥ अर्थ-पिडत लोग को चाहिये कि जिस ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य का योपवीत (जनेऊ) संस्कार हुआ हो उसको वेद आदि मंत्र सदा बताना चाहिये। यज्ञोपवीतसंस्कारं विना ये हि द्विजातयः। वेदमन्त्रानविरतं जपन्त्यकृतयुद्धयः ॥१९॥ तेषां तु स जपो व्यर्थो विपरीतफलो भवेत् । असंस्कृतेन नो जप्या अतो मन्त्रा द्विजन्मना ॥५०॥ অথবা ক্লাথ নিয় ব্রয় অঞ্জীৰ কাৰ किये बिना मन्द बुद्धि से सदा मंत्र आदि जपते हैं उनका जप करना क्या है फल क्षेघदले हानि होती है इसलिये द्विजाति अर्थात् ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य को संस्कार मिये धिना वेदनादि मंत्र (कोई मंत्र) नहीं जप करना चाहिये ।। पट् कल्पितानि विप्राणां कर्माणि यजियाजने। पठन पाठनं दाने विशुद्धाच्च प्रतिग्रहः ॥५१॥ श्रर्थ-ब्राह्मणों के लिये छ कर्म फल्पित हैं। पस करना फराना पढ़ना पढ़ाना दान देना और शुद्ध मनुष्य से प्रतियह लेना।

( २३६ )
प्रजानां पालनं दानं यजनं पठनं श्रुतेः ।
विषयेष्वप्रसक्तिश्च पश्च कर्माणि भूभृताम् ॥५२॥
अर्थ-प्रजाओं का रक्षा करना दान देना यश करना
वेद पढ़ना और विषयों में भासत्ता नहीं होना ये पांच फर्म-
क्षत्रियों के हैं।
पशुपालनं तु यजनं दानं वाणिज्यकं श्रुतेः पठनम्।
कपिरपि च वाधुपित्वं कर्माण्येतानि सद्विशांसप्ता५॥
अर्थ-पशुओं को पालना, यज्ञ करना, दान देना,
बनिज करना, वेद पढ़ना, खेती करना और व्याज की पत्ति
फरना ये सात कर्म वैश्य के हैं।
शूद्रस्य चैकमेवोक्तं श्रुतौ कर्म स्वयंभुवा ।
ब्राह्मणक्षत्रियविशां सेवनं शुद्धचेतसा ॥५४॥
अर्थ-शूद्र के लिये येद में एकही कर्म ब्रह्माजी ने कहा
है कि शुद्ध चित्त से ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य इनकी सेवा
करना॥
संक्षेपत इत्युक्तो गृहस्थधर्मः स्वयंभुवा प्रोक्तः ।
ब्राह्मणराजन्यविशां शुद्राणां धर्म संसिद्ध्यै ॥५५॥
अर्थ--यह रहस्य धर्म ग्रालाजी का कहा हुमा भक्षेप से
फहा ग्रामण क्षत्रिय वैश्य और शूद्रों को धर्म सिद्धि होने
के लिये॥
ॐइति ब्रामजानशाग्ने श्रीवाल्मीकिमुनिने जनक
परशुरामसंवादे राजवैद्यराममेयकलालगुमत
मापाटीयायां एकोनप्रिंशः सर्गः ॥२९॥

(२३७ )
-
परशुरामउवाच-
राजन् पुरा कलियुगे प्राप्स्यन्ते जन्म ये नराः।
श्रोतुमिच्छामि तवृत्नं तदहि कृपपा मम ॥९॥
अर्थ
-परशुरामजी बोले कि हे जनक राजा ! भागे
कलियुग में जो मनुष्य जनम पावेंगे उनका वृत्तान्त सुनना चा-
हता हूं सौभाप कृपा करके मुझे कहा ॥
है
जनक उवाच--
प्राप्ते कलियुगे पापे लुप्येरन धर्मसेतवः ।
पाखण्डिनः वसमतैः कल्पयित्वा वहुन पथः ॥२॥
वेदान् शाखाणि निन्देयुः स्युर्धर्मभ्रशकारकाः ।
बुद्धिशात् परित्यज्य भगवन्तं सदाशिवम् ॥३॥
भूतप्रेतपिशाचादीन यजेयुः कार्यसिद्धये ।
त्यजेयुर्धर्मकमाणि नित्यं लोभवशं गताः ॥४॥
अर्थ-जनकजी वाले कि पापी पलियुग आने से धर्म
को मर्यादा लुप्त होजायगी पाखरही लोग अपने अपने मन से
अनेक पन्ध पाल्पना करके वेद और शासन को निन्दा करेंगे।
धर्म को बिगाड़ देंगे। बुद्धि के बिगड़ने से भगवान शिवजी को
छोड़ के अपमा कार्मसिद्ध होने से लिये भूत प्रेत पिशाच प्रादि
को पूजेंगे । नित्य लाभ के यश होकर धर्म कर्म छोड़ देंगे।
वान प्रस्थोऽथ गार्हस्थ्यं संन्यासो ब्रह्मचर्यकम् ।
चतुर्णाश्रमामाणां स्पा देषां लोपः कलौ युगे ॥५॥

( २३८ )
अर्थः
अर्थब्रह्मचारी गृहस्य यानप्रस्व सन्यास इन चार
प्राश्रमों का कलियुग में लोप होगा ।
विजाः सन्त्यज्य गायत्रीमन्यमन्त्रजपे रताः।
नयन्तोऽहान्यपार्थानि पतेयुर्नरके ध्रुवम् ॥६॥
प्राह्मण क्षत्रिय वैश्य तीनों गायत्री मंत्र को
छोड़ के दूसरे मंत्रों को लपने लगेंगे। इससे दिनों को या
विता के निश्चय से नरफ में पड़ेंगे ।
नृभिर्नार्याविरुहाः
स्युः पाखण्डाध्वकृतादराः।
त्यजेयुर्वेदशास्त्राणां मर्यादा दुष्टभूभृतः ॥७॥
अर्थ-पुरुषों से स्त्रियां विरुद्ध होगी दुष्ट राजा लोग
पापण्ड के पन्य का श्रादर करके वेद शास्त्र की मर्यादा को
छोड़ देंगे।
पण्डिता इति विख्याता वाचालाः स्युः कलौ युगे।
पाखण्डवार्ताचतुराः तन्तः ख्याता जटाधराः॥८||
परद्रव्यापहारो विख्याता श्चतुरा इति ।
आचारीति च पाखण्डं कर्म विस्तीर्य दर्शयन् ॥९॥
गुणी ख्यातः स यो मिथ्योपहासवचने रतः।
वेद शास्त्रे त्यजन् दुर्वाङ महात्मा मांसमद्यभुक् ।१०। .
विधन भयंकरवे नृकपालघरच यः ।
भक्षनभक्ष्यं च कलौ सिहो योगीति चोव्यते ॥११॥

फर्म
कापायवस्त्रधुण्यस्य महत्यो नखरा जटाः।
साकर बुरा धकने वाले महात्मा कहलावर्ग, भयङ्कर नेपधा-
अध-गूद लोग मानग, सनिप, घरप तीनो पक्षों का
से साधुःस तपस्खोस्यात शूलधृग् भस्मधृग्वपुः॥१२॥
अर्ध-कलियुग में बहुत बोलनेवाला पण्डित कहला-
वेगा। पारगड की बातों में चतुर जटाधारी सन्त कहलायेगा,
इमरे के द्रव्य को हरने वाले चतुर और (हौल में) पाखण्ड का
बड़ा कर दिखानेवाले आचारी फहलायेंगे। मूर हसी की
चात बनानेवाला गुणी और वेद शास्त्र को त्याग के मद्यमांस
रण करके मनुष्य को रोपही लटकाये WHEL साने वाला
कलियुग में मिह वा योगी कहलायेंगे। गेल्या वस्त्र पहिने
बड़े बड़े नस और जटा बढ़ाये त्रिशूल धारण किये भभूत
शरीर में रमाये साधू और वपस्वी कहलायेंगे।
यथा कपि वशीकृत्य नटो नर्तयते पथि ।
तथा नरान् नर्तयेयुर्वशीकृत्य स्त्रियो गृहे ॥१३॥
अर्थ-असे नट लोग यन्दर को घर में करो मार्ग में
अपाते हैं वैसे खिषों पुरुष को धारा में फरफे पर में
हिजकर्मकराः
शूद्राः शूद्रसेवाकरा दिशाः।
कर्महीना मांसमयपलाण्डलगुनाशिनः ॥१४॥

। २४० ) फर्म करेंगे और वे तीनों वर्ण शूद्र की सेवा करेंगे कर्म हीन होंगे और मद्य, मांस, प्याज, लहसुन भोजन करेंगे । ते कामक्रोधलोभानां वशीभूता नरा मिथः । विरुन्ध्यु ाह्मणान् साधून गुरुवर्गान् कलौ युगे।१५॥ अर्थ-वे मनुष्य फाम क्रोध और लाभ के वश में होकर आपस में तथा ब्राह्मण साधु गुरु जन आदियों से विरोध स्त्रियस्त्यक्ता पतिप्रेम रताः स्युः परपूरुपे । विधवा व्यभिचारिण्यः स्युर्नित्यं नूनमण्डनाः ॥१६॥ अर्थ- स्त्री लोग पति से प्रेम छोड़ के पराये पुरुष में मासक्त होंगी। विधवा स्त्रियां नित्य नये नये शङ्कार करके व्यभिचार करेंगी। ब्राह्मणा स्तं स्तुवन्ति स्म द्रव्यप्राप्तिर्यतो भवेत् । यतो द्रव्यं न लभ्येत निन्देयस्तं नरा भृशम् ॥१७॥ अर्थ-ग्राह्मण लोग गिससे द्रम्म मिले उसको स्तुति करेंगे। जिससे द्रव्य न मिले उसकी यहुत निन्दा करेंगे। नरास्तु मिथ्यावेदान्तवक्तारी ब्रह्मवादिनः। वालस्त्रीगुरुविमान्ये घातयेयुर्धनाठाया ॥१८॥ अय-मनुष्य झूटा येदान्ती नानी यगे और धन को भाया में बालक छी गुरु और प्रालयों का मध करेंगे।

.(२४१) प्रणमेयुद्दिजाः शूद्रं वेदशास्त्रवहिष्कृताः । विक्रीणीयुटुंहितरं जामातृधनलालसाः ॥१९॥ अर्थ-माह्मण क्षत्रिय वैश्य तीनों यर्श शूद्र को प्रणाम करेंगे वेद और शास्त्र से भ्रष्ट हो जायगे और मनुम्प दमाद के एन की लालच से कन्या को बेच देंगे। पापाधिक्येनानलोपानिप्यत्तिरपि नो भुवि । वर्षेयुरल्पं जलदा गोर्दुग्धं च हसिष्यति ॥२०॥ अर्थ-पाप के अधिक होने से अन्न तुप्त हो जायगा भूमि में मन नहीं उपोगा यादल घोडा बरसेंगे गो का दूध ये वेदशास्त्रमर्यादापालकाः पण्डिताश्च तान् । निन्दति स्म हसन्ति स्म नरा मात्सर्यदृपिताः ॥२१|| यो वेद शास्त्र की मर्यादा को पालने याला प. हित देगे हार करने के देव से मनुष्य उनकी निन्दा परेंगे दूपयित्वा वेदमन्त्रानन्यमन्त्रजपे रताः । नरा अपार्यदिवसान संनयेयुः कलौ युगे ॥२२॥ पर्य-मनुष्य ये गात्रों को दोपहर द्वारे गन्न जयो नगरे । सतयुग में मनुमा दिग गायेंगे। रजाः कुम्भ मारा नीचालिकगौणिमाः । चर्मशागलीशने स्पुः शिरः समुभव योगिनः २३॥

: ( २४२ ) अर्थ-धोबी, कुंभार, तेली, कलवार, चमार ये सब नीच स्त्री के लिये सिर मुंडा के योगी बन जायँगे । एते द्विजैः स्वपदपूजनतोऽतिहटाः पुत्राः प्रसूं च पितरं परिभर्सयेयुः। स्वी सेवते स्म पतिरत्रपमेवमादि भूयस्त्वमीशि कलौ कथमुंद्धृतिः स्यात् २४॥ अर्थ-ये मुंडे जोगी ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य तीनो वर्णो से अपने पग पुजाने में बड़े प्रसन्न होगे पुत्र अपने मा बाप को गाली देंगे पति निर्लज्जा होकर स्त्री की सेधा करेंगे इत्यादि बहुत पाप होगा। हे परशुरामजी ऐसे कलियुग में उद्धार कैसे होगा। ॐ इति ब्राह्मज्ञानशाने श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक परशुरामसंवाद राजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत भापाटीकायां त्रिंशः सर्गः ॐ ॥३०॥ 16 निस्तारः स्यात् कथं ब्रूहि कृपां कृत्वा ममोपरि | ( २५३ ) परशुराम उवाच- युगे कलौ घोरतमे जनितानां मृणां नृप । अर्थ-परशुरामजी बोले कि हे राजन् ! अति धार कलियुग में उत्पन्न मनुष्यों का निस्तार कैसे होगा से मुझपर क्या करके आप कहिये ॥ जनक उवाच- निस्तारायं कलियुगे नृणां परशुराम यत् । पृच्छस्पस्मिनसाध्येऽपि सदुपायस्तु कथ्यते ॥२॥ अर्थ- -राजा जनक योले कि हे परशुराम ! कलियुग में मनुष्य के निस्तार के लिये जो पूछते हो यह अमाप रहते भी उसका उत्तम उपाय कहता हूँ। यस्मिन् कृते नृणां लभ्यं परं पदमसंशयम् । सावधानेन मनसा श्रूयतां तदिहाधुना ॥३॥ अर्थ-जिसके करने से मनुष्यों को निःसन्देह परमपद मास होता है वह शायपाम वित्त से नय यहां मुनो। एकदा शिव्या शम्भ रम्ये फैलासपर्यते । महर्षीन् बोधयन्त्राप्तीहनास्तत्र कलेः कथाः ॥2॥ अर्थ- - ममप.गिय गवान् पायंतीसी के मायरम. भोपात पर महर्षियों सोनमझा रहे थे वहां कलि- :

( २४४ ) कलौ युगे नरा घोरपापिनः स्युश्च लोभिनः । कामक्रोधवशीभूय मद्यपानरताः परे ॥५॥ अर्थ-कलियुग में मनुष्य बड़े पापी और लोभी होंगे और लोग वाम और क्रोध के वश में होकर मदिरा पीवेंगे। परनिन्दारता अन्यद्रव्यग्रहणलिप्सवः । परे परस्त्रियो वीक्ष्य मोहिता जीवहिंसकाः ॥६॥ अर्थ-और परनिन्दा में प्रीति युक्त होंगे तथा परद्रव्य के हरण की इच्छा करेंगे और बिरानी स्त्रियों को देख कर मोहित होंगे तथा जीवों की हिंसा करेंगे। विस्मृत्य सच्चिदानन्दं भूतप्रेतार्चने रताः। स्वोदेवा नास्तिकाश्चैव द्रुह्येयुः पितरौ परे ॥७॥ अर्थ-च्चिदानन्दरूप को भूल कर भूत प्रेतों का पूजन फरेंगे। त्रियों में देवता कीसी प्रीति करेंगे नास्ति हो जायंगे और माता पिता से द्रोह करेंगे। कामदेवशीभूय पापबाहुल्यकारकाः । खधर्म पतिश्रूभूपारूपं संत्यज्य योपितः ॥८॥ शश्वत् प्रीति करिष्यन्ति परेपु पुरुपेषु च । स्वीयेन भर्ना श्वश्वा च द्रुह्येयुः श्वशुरेण च ॥९॥ अर्थ-कामदेय फेययीभूत होकर बहुत पाप करेंगे और सिव पतियारूप स्यधर्म को त्याग कर पर पुरुषों में प्रीति फरेंगी और अपने भा मे सास से मार समुरमे द्रोह करेंगी।

वधर्मत्यागिनो विमा वर्णधर्माविचारिणः । शूद्वान वेदं पाठयेयुद्रव्यग्रहणालप्सवः ॥१०॥ अर्थ-ब्राह्मण लोग अपने धर्म को छोड़ देंगे वर्ण और धर्म का विचार नहीं करेंगे और द्रव्य लेने की इच्छा से शूद्रों को वेद पढ़ायेगे। . शूद्राश्च द्विजश्रुभूपां त्यक्ता धर्म सनातनम् । ब्राह्मणानुपदेक्ष्यन्ति ब्राह्मणाचारतत्पराः ॥११॥ अर्थ- -शूद्र लोग भी तीन वर्णों की सेवा रुप सपने . नातन धर्म को छोड़ कर ब्राह्मण के प्राचार में तत्पर हाके मालगों को उपदेश करेंगे। ये वर्णसङ्करे नीचामिणः शौण्डिकास्तथा । चिदमें उपदेक्ष्यन्ति द्विजानुवासनस्थिताः ॥१२॥ भ-कोहार और फसयार जो वर्ग मदर में भीष है वे ये आमना कर ग्रामविप वैश्यों को जान भार धर्म का उपदेश करेंगे। श्रुतिश्रुत्यधिकारोऽपि शास्त्रे येपामलेखि न। करिष्यत्येवमेनाति ते शूद्राः कलिदोपतः ॥१३॥ अर्य-शिल को घेर के मुमने का अधिकारी शास्त्रों में नी लिये फलियुग के दोष मे मे में पाप करने

( २४६ )
सहोमया शिववचः श्रुत्वा सर्वे महर्षयः ।
क्षणमासन्नुदासीना वीक्ष्यैवं भगवांच्छिवः १४॥
ताननवोदुदाध्ये किं पृच्छयतां चेत् पिपृच्छिपा ।
दास्ये तदुत्तरमिति श्रुत्वैवं भगवद्वचः ॥१५॥
सर्वेमहर्पयस्तूष्णीं भूत्वाऽपश्यन्नुमामुखम् ।
महोणां मनोवृत्तं संविज्ञाय शिवा तदा ॥१६॥
उत्थायेशं नमस्कृत्य भगवन्तं वचोऽब्रवीत् ।
भगवन ब्रूहि कृपया नृनिस्तारः कलौ कथम् ॥१७॥
अर्थ-भगवान् शिवजी का वचन सुन के पार्वती
सहित सय महर्षि लोग क्षण भर उदास हो गए ऐसा देस के
शिवजी योले कि आप लोग उदास क्यों हो गए जोकुछ पूछने
की इच्छा है। पूछी मैं उसका उत्तर दूंगा। ऐसा शिय भगवान्
का वचन सुनके सय महर्षि लोग चुप ही कर पार्वती के मुख
के और देखने लगे। तय महर्षि लोगों के मन का यत्तान्त जान
फर पार्यतीजी उठ कर शिवजी को नमस्कार करके चोली कि
हे भगवान् श्राप रूपा करके कहें कि कलियुग में मनुष्यों का
मिस्तार कैसे होगा।
श्रुत्वैवं भगवानाह कोऽर्थः प्रभेन वोऽमुना ।
कालः कल्यागमेऽदभ्र इदानीमवशिष्यते ॥१८॥
त्रेतायुगाद्यचरणः सांप्रत परिवर्तते ।
ततोऽनवीदुमा देवी यदा भगवतोदितम् ॥१९॥

( २४७ ) कलौ युगे नृणां वृत्तं तदारभ्य महर्षयः। परानिष्ठा ब्रह्मैकतानाः कोमलचेतसः ॥२०॥ अद्यावधि च यैनैनः कृतं किंचिदपि क्वचित् । श्रुत्वा कलियुगे नृणां वृत्तं चित्तउदासत्ते ॥२१॥ अर्थ- ऐसा सुनके शिवभगवान् बोले कि आपलोगे। को इस प्रश्न से क्या प्रयोजन है क्योंकि भभी कलियुग आने में बहुत काल (थेप है) याकी है। अभी तायुग का पहिला चरख चलता है। इसके उपरान्त पार्वतीजी वाली कि जब आपने कलियुग के मनुष्यों का वृत्तान्त कहा तब से महर्षि लाग जिनकी पर स्वारथ में निष्ठा है एक ब्रह्म के ध्यान में मग्न हैं जिन का पित कोमल है और जिन्होंने भान तक कहीं कुछ भी पाप नहीं किया है वे कलियुग के मनुष्यों का वृत्तान्त सुन के चित्त में उदास हैं। तद् बृह्युदरणोपायं कृपया कलिजन्मनाम् । नृणां येन महीणां यायावेतः प्रसन्नताम् ॥२२॥ हठं विज्ञाय पार्वत्या भगवाननयोच्छिवः । देवि तत् कथयामि स्यायेनोद्वारः कलौ नृणाम २३ को फगियुग के मनुषों के उद्धार का उपाय प्राप ग कर पा जिमने मापियों का पित प्रमाण हो । भगवान् गियो गामीत्री का दान कर पाने मिहे देवी निममें रमियुग के मनुषों का उद्धार हो यह सदना । अप (२४८ ) ना य ओमित्युपासीत स जीवन्मुक्त उच्यते । मुच्यते सर्वपापेभ्यः परं पदमवाप्नुयात् ॥२४॥ कलौ युगे तु प्रणवाहते नो पार्वत्युपायोऽस्त्यपरो वरिष्ठः। तस्मादुपासीत नरः सदोमि- त्यशेषपापापहतिं य इच्छेत् ॥२५॥ अर्थ-जो मनुष्य ॐफार की उपासना करे यह जीवन्- मुक्त कहाता है। वह सब पापो से छूट कर परम पद को प्राप्त होता है। हे पार्वति कलियुग में प्रणव (ॐ) को छोड़ के दूसरा उपाय श्रेष्ठ नहीं है इसलिये जो मनुष्य मय पापों का नाश होना चाहे वह सदा ओंकार (ॐ) को उपासना करें । जनक उवाच- ओनित्यतः परो मन्त्रः पशुराम न चोत्तमः । ईशनामसु सर्वेषु प्रोज्यते श्रेष्ठ ऑमिति ॥२६॥ आमिति ज्ञातुमुचितोऽस्यैवोपासनया नरः। प्राप्ता महर्षितां चातिपापिनोऽपि परं पदम् ॥२७॥ अर्थ-2 परशुरामजी ॐ इसरो उत्तम दृगरा मंत्र नहीं, है। ईश्वर के सथ गामे में यह श्रेष्ठ कहता है, यह जानने योग्य हे मी पो उपासना मे गनुप्प महर्षि पदयी की प्रास दुपार पटे पापी लोग भी परमपद को प्राप्त गये ॥

अर्थ- मायेद में कहा दुधामको मनुनीमे
सपने मे पंचमराम?मनापामगा
दद्यान्न चोराय न लम्पटाय ॥३०॥
सदैवोमित्युपासेऽहं पशुराम न चापरम् ।
कलावोमित्युपासीत तन्मुक्तौ नास्ति संशयः ॥२८॥
'अर्थ-हे परशुरामजी ! मैं सदा ही ॐकार की उपा-
सना करता हूं दूसरे मन्त्र की उपासना नहीं करता। जो
कलियुग में ॐकार की उपासना करे उसकी मुक्ति होने में
कोई सन्देह नहीं है।
मणवोपासना सेयं मया परशुराम ते ।
कथितात्युनमा नान्यो मार्गोतः पर उत्तमः ॥२९॥
अर्थ- परशुरामजी यह प्रणय (*) को उपामना
मैंने तुमको पहिले प्रति वृत्तम रीति से कष्टी है । इस को दाद
कर दूमरा उत्तम मार्ग नहीं है।
वेदोदितोऽयं खलु मार्ग एनं
मनुः स्वतन्वे रचयांवभूय ।
उपासनां तु प्रणवस्य चाया
अश्रदधानाय च वेदशास्त्र-
वाचां मुराविक्रयपानका।
न्लेच्छाय विद्वानमुना पर्थव
कली लभेत् तत् परमं पदं हि॥३१॥

-- और को वा लम्पट को विद्वान उपदेश न करें। जो वेद शास्त्र के वचनों पर विश्वास नहीं रखते उनसी न सहे। जो मदिरा को वेचते हैं वा पीते हैं या जो म्लेच्च हैं उनको भी न कहे। कलियुग में केवल इसी मार्ग से विद्वान् मनुष्य उस परमपद को पा सकता है। इति ब्राह्मज्ञानशाने श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक परशुरामसंवादे राजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत भापाटीकायां एकत्रिंशः सर्गः ॥२६॥ . परशुराम उवाच- गृहस्थधमारित्वत्प्राक्ताः श्रुता राजनशेषतः। स्त्रीणां धर्मानशेपेण कृपया वद मेऽधुना ॥१॥ अध-परशुरामशी बोले कि हे राजन! भापके फहे हुए गृहस्थधर्म सय मेंने मुने अब भाप पा करके स्त्रियों के धर्म संपूर्ण मुझे फहिये। जन्नकदयाथ- इदानी तव नारीणां धान वक्ष्यामि सर्वशः। सावधानेन मनसा पशुराम शृणुप्य तान् ॥२॥ अजमकमी पति कि परशुरामजी तुम फेर खियां के धर्म गध पदसा हूं मायभान घिरा करने

र २५१)
पुरा स्त्रीणां न का प्यासीन्मयार्दासां यदृच्छया ।
विहारेण प्रववृते व्यभिचारोऽप्यदूपितः ॥३॥
आसीत्पुरैवं नेदानी धर्मपद्याधुनापि च ।
पशुपक्षिषु सैवास्ति कुरुखण्डे तथोत्तरे ॥४॥
अर्थ-पहिले तिरों के लिये कोई मर्यादा नहीं थी।
इनके स्वेच्छाविहारी होने में व्यभिचार प्रवृत्त हुमा । उसका
देोप भी नहीं था। ऐता पहिले धर्म मार्ग था अब नहीं है।
वसी भी प्रशु पक्षियों में तया उत्तर कुरुपण्ड में यही धर्म-
.
मार्ग है।
तं धर्ममेवानुसृतास्तत्राद्यापि महर्षयः ।
स्वल्पःकालोव्यतीयायनिकान्तासात्रभारतात।५।
अर्थ--उत्तर कुरुखण्ड में महर्पि लोग आज तक उसी
धर्ममार्ग पर चलते हैं परन्तु थोडे फाल से वह धर्ममार्ग भारत
खण्ड से उठ गया।
निशामय च तहेतुमासीदुद्दालकः पुरा ।
महर्पिस्तस्य तनयः श्वेतकेतुरिति स्मृतः ॥६॥
अर्थ म उसका कारण भी गुनो । पहिले उद्दालक
नाम एक महर्षि था। उसका पुत्र एक खेतकेतु नाम था।
तन्मातरमयान्येयुः करे कृत्वान्यभृसुरः ।
मैथुनाय पलाविन्ये तदृष्टातोव कोपितः ॥७॥

( २५२ ) .. श्वेतकेतुः सुतं दृष्ट्वा क्रुद्धमुद्दालकोऽब्रवीत् । मा क्रुध्य पुत्र धर्मोऽयं वसुधायां सनातनः ॥८॥ चतुवर्णस्त्रियः खैरचारिण्यः सन्ति गौरिव । अयुक्त ऽयं धर्म इति विज्ञाय श्वेतकेतुना ॥९॥ मर्यादेवं निवद्वासीत् स्त्री याद्यप्रभृति क्वचित् । व्यभिचारं प्रकुर्याञ्चेद् भ्रूणहत्यां लभेत सा ॥१०॥ कुर्यात् परस्त्रीसंभोगं पुरुपोऽपि बलाद्यदि । लिप्तः स्यान्मम वाक्येन सचापि भ्रूणहत्यया ॥११॥ अर्थ-फिर और किसी दिन उस श्वेत केतु की माता को दूसरा ब्राह्मण हाथ पकड़ के विषय करने के लिये बल से ले चला यह देस के श्वेतकेतु को घड़ा क्रोध हुमा । पुत्र को झोधित देख फर उद्दालक ऋपि बोले कि हे पुत्र ! क्रोध मत फर यह पृथ्वी पर सनातन धर्म है कि चारो वर्ण की स्त्री गी के ममान स्वेच्छाचारी हैं। यह धर्म अयोग्य है ऐमा श्वेतकेतु ने जान कर ऐमी मर्यादा यांधी। जो स्त्री आज से कहीं पनि चार करे तो (भ्रूण) गर्भ हत्यारूपी पाप को प्राप्त होगी। और पुरुष भी यल से जो पराये स्त्री से विषय करे तो उसे भी मेरे याय में भ्रूण हत्या लगेगी। वेनराज्ञस्तु समयान्माद ऋपिभिः पुरा । यानियोगविधी वद्धा सा तथास्त्वत्र वम्पहम् ॥१२॥ नियोगविधिना पत्यादिभिः सन्तानहेतवे । नियोजिताज्ञामुझेचेत् सापि तत्पापमानुयात् ।१३। .

सपिण्डादेनियुक्ता चेत् सतीवोत्पादयेत् सुतान् ।
सौदासराज्ञो महिपी पत्युराज्ञामवाप्य च ॥१५॥
विधवा स्त्री पतिगृहं त्यक्ता नान्यं समुदहेत् ।
( २५३)
अर्थ-पहिले येन राजा के समय से जो महर्षि लोगों
ने.नियोगविधि में मर्यादा वांधी है वह दैसी ही रहा उसमें
मैं कहता हूं कि जो स्त्री सन्तान के अर्थ पति नादियों करके
(नियोग कोजावे) दूसरे पुरुप के पास भेजी जावे वह स्त्री
उम भाजा को उल्लंघन करे तो वह भी भ्रूणहत्या के पाय को
प्राप्त हो॥
मुने शृणुष्व
तेनैप नियोगविधिराहतः।
यस्याः पतिः परेतो वा क्लीवो वा सा तु देवरात्॥
वसिष्ठादश्मनामानं सुतं समुदपादयत् ।
येन सौदासनृपतेशो विस्तारमाप्तवान् ॥१६॥
अर्थ-अनफजी फहते हैं कि हे परशुरामजी ! मुनो इस
कारण मे नियोग विधिका सादर किया गया। जिमखी फा पति
मर जावे वा नपुंसक हो यहपति आदि के नियोग करने से
देवर मे वा किमी मपि पुरुप प्रादिसे पतिग्रता जैमी पुत्रों
को उत्पन्न करे। सादास राजा की रानी पति की माता पाफर
वमिष्ट ऋषि से अरमनामक पुत्र को उत्पन्न कराती भई शिम
मौदाम राजा का वंश विस्तार को प्राप्त हुना
खजातिः परजाति पुरुपः कोऽपि या भवेत् ॥१७॥

(२९४ ) . विधवा पुनरुद्वाहं या करोति स्वजातितः । सा वहिष्कारमाप्नोति ब्रह्महत्यां लभेत च ॥१८॥ सान्ते नरकमाप्नोति न तत्स्पृष्टं जलं पिबेत् । धर्मश्चतुर्णा वर्णानामेप एव प्रकीर्तितः ॥१९॥ इमं धर्मं न मन्येत यः पुमानास्तिकाधमः। ब्रह्महत्यासमं पापं स लभेतेति निश्चितम् ॥२०॥ अंध-विधा स्त्री अपने पति के घर को छोड़ के दूसरे पुरुप से विवाह न करे चाहे वह पुरुष अपने जात का हो वा पराये जात का हो। जो विधवा स्त्री पुनर्विवाह करती है वध जात से बाहर होती है और उसको ब्रह्महत्या का पाप भी लगता है । यह अन्त में नरक में जाती है। उसकाळूबा छुपा पाल कोई नहीं पीये यही चारो वर्षों का धर्म है। जी नास्तिकों में प्रथम पुरुष इस धर्म को न मानेगा यह ब्रह्म- हत्या के समान पाप को मास होगा यह निश्चय है ।। सत्येन मनसा पत्युः सेवा स्वीणां विशिप्यते । पतिमीश्वरभावन भजेदाकायमानसैः ॥२१॥ तदाज्ञां सत्यमनसा धारयेत्र विचालयेत् । अन्धं पहुँ कुष्ठरुजं सेवेत गुरुणा सहक ॥२२॥ थर्य-गधे गम गे पति की मेया फरगी यही स्त्रियों फा यिपि धर्म याणी शरीर और मम मे पति की या भाय में मेवाको प्रशिक्षी पासाको मधेमा में धारण करे निरीक्षेताय तं जातु खप्नप्यभिलपेन च ॥२॥ ( २५५) भाभा को दाल न दे । पति अन्या हो लूला हो कोढ़ी है। उसकी भी गुरु के समान सेवा करे । पत्युराज्ञापालनं हि स्त्रीणां धर्मः परो यतः । आह्वानुसारं सेवेत तिरस्कुर्यान्न जातुचित् ॥२३॥ -यतः पति की माता पालन करना यही निश्चय से स्त्रियों का धर्म है इमलिये पति की जैसी प्राज्ञा हो वैसी इसकी सेवा कर उसका कभी तिरस्कार न करे ।। यथावयः पितृभ्रातृपुत्रैस्तुल्यं परं नरम् । -वय के अनुमार परपुरुप को पिता भाई और पुत्र के ममान देरी श्रीर पर पुरुष को कभी सपने में भी इच्छा मकरे। प्रसन्नचिनया भाव्यं सर्वदा सत्स्वभावया । अक्रोधया मिष्टगिराऽन्यविवादविमुक्तया ॥२५॥ अशी को मार गित होकर मदारपना पाहिपे पदा या यमाय मा चाहिये होप फरमा म चाहिये গীযথা ঠাসা পাখি ফিী ঃশষ্ট ৯ লংগ না पाहिये। शरीरशुहिं कुर्वति नित्य सायान सन्थ्ययोः । शुद्धं च परिवानीयमीगरीयं च धारयेत् ॥२६॥ - मोर को गुद एक मगि दिन दोनो

सन्ध्या में स्नान करे और पहिरने आढ़ने का वस्त्र शुद्ध ही
धारण करे।
पतिसेवात्तत्परा स्थागोज्यवस्तूनि नित्यशः ।
कृत्वा शुचितया देवान्निवेद्य प्रथमं पतिम् ||२७॥
भोजयेत् प्रेमसहिता भुसीयाञ्च ततः स्वयम् ।
स्वपत्युर्यावदत्र्येन तुप्येन्नेच्छेत् ततः परम् ॥२८॥
अर्थ-पति की सेवा में लवलीन रहे प्रति दिन भोजन
की वस्तुओं को पवित्रता से यना के देवताओं को भोग लगा के
पहिले पति को प्रेम युक्त होकर भोजन करावे पीछे भाप भी
भोजन करे। अपने पति के पास जाकुल हो उतने ही में
प्रसन्न रहे उससे अधिक कुछ न चाहे ।।
दुखयन्न स्वभृपार्थे पतिं तुप्येत् स्वभूषणैः ।
श्वशुरौ वृद्धवगिंश्च पति सवेत नित्यशः ॥११॥
अर्थ-अपने गहनों के लिये पति की दुःख न देवे जो
कुर प्रपमा गहना दोय उसी में संतोय करे और नित्य प्रति
साम मगर बड़े यूढ़े चार पति की सेवा करें।
यावज्जीवं पतिं नारी सेवेत गुरुणा समम् ।
पतिहि देवता स्त्रीणां न सुखं तन्निरादरात् ॥१२॥
सर्वदा दुःखभाक सा स्यादन्ते निरयमृच्छति ।
वसेत् सा नरके यावत् सूर्याचन्द्रमादिचि॥१२॥

पतिसेवा यतः स्त्रोभिः सत्येन मनसा सदा। ( २५७ ) अर्थ-स्वी जब तक अपना पति जीता रहे तबतक उसकी गुरुकेममान सेवा करे क्योंकि पतिही स्त्रियों को देवता उसका कल्याण नहीं है । वह सर्वदा दुःख पाती है अन्त में नरक में जाती है और जब तक सूर्य और चन्द्र प्रकाश में हैं तब तक नरक में रहती है । है पति के निरादरसे गुरुणा सहशा कार्या तहचः प्रतिपालयेत् ॥३२॥ पत्युराज्ञां विना नैव देवं कमपि पूजयेत् । पत्पुराज्ञां विना नारी यज्ञ कामपि देवताम्॥३३॥ या तस्याः सकला पूजा निष्फला भवति ध्रुवम् । पत्तो हि नार्यस्तु पतिर्देवता गुरुरेवेच ॥३४॥ अर्थमलिये सच्चे मन से सदा गुरु के समान पति की सेवासियों को करनी चाहिये और पति के वचन का पालन करना चाहिये। पति की मात्रा को बिना ली किमी देयता की पूजा न करे। जो स्त्रीपति के माता के बिना पत्र में किसी देवता की पूजा करती है उसकी को दुई सय पूजा नियम मे निष्कल हो जाती है कि वो फेो पतिही देयता और पति ही गुरु है। यदिच्छति फलं किंचित् पत्युः सेवारता भयेन् । एवं पतियता लोके दश नायर्योऽतिविश्रुताः ॥३५॥ अप-यो जो पुरफान को काबरे तो पति हो के

(२२८ )
सेवा में बनी रहे। इस प्रकार संसार में दस पतिव्रता स्त्री
बहुत प्रसिद्ध हैं।
सूर्यस्य पत्नी संज्ञाख्या वसिष्ठस्याप्यरुन्धती।
लोपामुद्रा धगस्त्यस्य द्विजराजस्य रोहिणी ॥३६॥
सुकन्या च्यवनस्यासोच्छ्रीमती कपिलस्य च ।
सावित्री सत्यवत्पत्नी दुप्यन्तस्य शकुन्तला ॥३७॥
दमयन्ती नलस्यात्रेरनसूयेति ता दश ।
पतिव्रतासु सर्वासु स्त्रियः श्रेष्ठतमा भुवि ॥३०॥
एतास्वपि च सावित्रीदमयन्त्यौं वरे मते ।
पतिव्रतात्वे सावित्री तयोरपि वरा मता ॥३९॥
अर्थ-मूर्य की स्त्री संज्ञा । (२) वमिष्ठ की स्त्री अरुन्ध.
ती। (२) अगस्त्य को लोपामुद्रा। (३) चन्द्रमा की रोहिणी।
(४) ध्ययन ऋपि की मुकन्या। (५) .फपिल मुनि की श्रीमती
(६) सत्यवान् को स्त्री मावित्री । (७) दुप्यन्त राजा को स्त्री
शकुन्तला । () नल राजा को खो दमयन्ती । (क) और प्रत्रि
ऋपि की स्त्री अनमूया । (१०) ऐसी ये दस स्त्रिय संमार पर
को मंपूर्ण पतिव्रता स्त्रियों में प्रत्यन्त श्रेष्ठ हैं इन दसे में भी
मायिग्री पीर दमयन्ती श्रेष्ठ है इन दोनों में भी पतिव्रता पन
में मायिनी प्रेष्ठ है।
श्रुत्वेत्यमूचे परशुधरो राजन बदाशु मे।
फवं पतिव्रतास्त्रीषु सावित्री श्रेष्ठतां गता ॥20॥

अर्थ-रोमा मुनके परशुराम जी बोले कि हे राजन् । पतित्रता स्त्रियों में सावित्री नेता को कैसी पाई सो मुके योन कहो जनक उवाच- श्रुतिस्मृत्युदितं कर्मयोग समनुतिष्ठति । यस्तस्य किमशक्यं हि प्राप्तव्यमवशिष्यते ॥४१॥ अर्थ- T-जनक राजा परशुरामजी से कहते हैं कि वो वेद और धर्मशास्त्र में कहे हुए कर्मयोग को उत्तम प्रकार से करता है उसकी कौनयी वस्तु मिलना शेष है जो प्रशम्य है ( मिल नहीं सकती। अत्रैक कथयिप्येहमितिहासं पुरातनम् । सावधानेन मनसा पावनं श्रूयतामिदम् ॥१२॥ अर्थ- ----इस विषय में मैं एक पवित्र पुरावन इतिहास , कहताई सावधान हित से इसको मुनो। आसीदश्वपतिनाम मद्रदेशे धरापतिः। परमो धार्मिको दानशीलः सत्यवचाः सदा ॥४॥ किमु कार्य करोमीति सोऽहनिशमचिन्तयत् । मामिकानां प्रजानां स्थानानवरतं हितम् ॥४॥ अर्थ-मद देश में घश्यपति नाम बड़ा धमात्मा राजा भाजो सदा शष बोलता, दाम सुपर करता और दिन रात इसी मोच में रहता कि मैं फोनमा कार्य कर जिम मदारी मजाका हित हो।

( २६०) नचासीत् तस्य संतानं काले बहुतिथे गते । विरते यौवने क्लिष्टं तदत्यै व्रतमाचरत् ॥१५॥ अर्थ-उसको कोई सन्तान नहीं था यहुत काल बीत गया जवानी भी उतार पर प्राई तय वह सन्तान पाने के लिये कहा व्रत करने लगा। वर्तता ब्रह्मचर्येणाहनिशं श्रद्धयार्थनम् । सावित्र्या अकरोद्देश्या तथादत् किंचिदल्पकम्॥४६॥ अर्थ-दिन रात ब्रम्हचर्य से रहता श्रीसावित्री देवी की श्रद्धा से पूजा करता और पीछे कुछ घोडासा सा लेता। एवमष्टादश समा व्रतं साधयतो ययुः। तदा प्रसन्ना सावित्री दत्वा दर्शनमत्रवीत् ॥४७॥ अर्थ-ऐसे व्रत को साधते हुए अट्ठारह बरस बीते । तय सावित्री ने प्रसन्न होकर दर्शन देकर कहा ॥ राजंस्त्वह्मचर्येण भक्त्याहं तोपिता भृशम् । त्वत्कामाः पूर्तिमेप्यन्ति वृणोप्य वरमीप्सितम्॥४८॥ च्युतो धर्मपथान मा भू राज्ञोक्तं देवि चेन्मयि । प्रसन्ना भवती तहिं मातमें देहि सन्ततिम् ॥१९॥ अर्थ-हे राजन् ! तुम्हारे प्रलपर्य और भक्ति में मैं बहुत ममनहूं। तुम्हारी मनोकामना पूरी होगी जो चाहो मो पर मांगा। धर्मकीराहगे मत एटना। राजा ने कहा कि देयो साप मुझपर गया तो मां । मु गन्तान दीजिये। - -" अपुत्रस्य गतिनैति श्रुतं कृतमतो ब्रतम् । सन्तानार्थ मया तत् त्वमेवं कुरु दयां मयि ॥५०॥ (६१) बन्यः सन्ततयः स्युमें येन शोभा कुलस्य च । सावित्र्योक्तं मयैतत् ते ज्ञातं प्रागेव हद्गतम् ॥५१॥ -अपुत्र की गति नहीं होती ऐसा मैंने मुना या अतः मन्नान के लिये व्रत किया है। सा भाप मेरे ऊपर ऐसी दया कीजिये कि जिससे मुझे बहुतमी सन्तति हो और पुल को शोभा हो । सावित्री ने कहा कि राजा मैंने पहिले ही से तुम्हारे मन की यह यात जान ली थी। अल्पायोभिरहोभिस्तत् तव कन्या भविष्यति । त्वं किंचिदपि मा वादीः शुभोदको मुयैव ते ॥५२॥ सो बहुत घोड़े दिनों में तुम्हें एक कन्या होगी तुम कुछ भी मत योलो इसीसे तुमको भविष्यत् काल में शुभ - पल होगा। मणनाम स सावित्री सापि चान्तहिताभवत् । राजापि गृहमागत्याशातीद्राज्यं स्वधर्मतः ॥५३॥ अपराला ने मावित्री को (दशहर) नाम किया मावित्री को भी मनायांन हेराला भी पर पर पाके सपिपास का सामान करने लगा। अयो कतिवनाहस्तु व्यतीतेपु महीभृतः। महिरी गर्भमायन समयेऽभूत कन्यकाम् ॥५॥ , अथ- ( २६२ ) अंथ-इस उपरान्त कुछ दिन बीतने पर राजा की पट्ट रानी ने गर्भ धारण किया । समय पर (नौ मास पूरे होने पर) वह कन्या को जनी॥ संचस्करे यथाशास्त्रं राज्ञा कन्यातिसुन्दरी। लब्धा प्रसादात् सावित्र्याःसावित्री नामतोऽभवत्।५ राजा ने अत्यन्त सुन्दर कन्या के शास्त्र रीति से (जातकर्म आदि) संस्कार किये सावित्री के प्रसाद से यह मिली इमलिये इसका नाम सावित्री हुआ। प्रपेदे यौवनं श्रीवर्धमाना नृपात्मजा। स्वयम्भुवा चित्रपटे विलिख्योजीवितेव सा ॥५६॥ -राजकन्या लक्ष्मी की नाई बढ़ती हुई यौवन अवस्था को प्राप्त हुई। वह ऐसी थी कि मानो ब्रह्माजी ने चित्रपट पर लिस के जीय डाल दिया है।। कुरङ्गन्नयनां सिंहकटिं स्वर्णसमद्युतिम् । विलोक्य मेनिरे लोका निखिला देवकन्यकाम्।५७) तनोविलोक्य कक्ष्यास्तेजोज्वाला विनिर्गताः। वक्तुं कोप्युदहामीति न शशाक भुवस्तले ॥५॥ जिसकी हिरन की मी धारी सिंह की सी फमर माने को मोदसि देख कर भय लोक उसे देयकन्या मानते थे। उस कमलनयनी के तन मे तेज फी ज्याला मिफकती दुई देश के भूमि पर किमी का दियाय मही पाहता था कि उसके साथ ध्याह करने को कहे। अर्थ-

देवीमिव नृपो दृष्टा स्वां सुतामत्रवीदिदम् ॥६१॥
( २६३)
एकदा शिरसा स्माता श्रुत्वा श्रुतिगिरः पुरः।
हुत्वा वेदविधानेन विप्राणां पठतां श्रुतीः ।।५९॥
सत्प्रसादस्रज हस्ते कृत्वा लक्ष्मीरिव खयम् ।
उपेत्य पितरं साध्वी चके स्रजमुपायनम् ॥६०॥
स्थितैकतः प्राञ्जलिता युवतिं चाविवाहिताम् |
अर्थ-एक समय सिर मल के नहा के वेरीति से होम
कर वेद पढ़ते हुए वाहनों की" मागे वेद वाणी सुनकर और
उनके प्रसाद की माला को हाथ में लिये हुए नामरूप लक्ष्मी
कोनाई वह सती कन्या पिता के पास जाकर माला भेट करती
भई । और एक और हाथ जोड़ के खड़ी भई । राजा भी अपनी
कन्या को देवों के समान तथा जवान हेरकर विना व्याही हुई
देख के उसको कहता भया ।
"कन्ये विवाहयोग्यासि वरमन्वेषय स्वयम् ।
परीक्ष्याख्याहि तन्नामायियेऽस्मै यमिच्छसि॥२॥
अर्थ-हे घेदी । तू विवाह करने योग्य हुई सभापही
(अपनेयोग्य) वर ढूंढ ले । तू जिसको चाहती हो उसका नाम
बता दे उसी को तुझ भांप देंगे।
नोहाहयति यः कन्यां यश्च नोदहते नरः।
मृते पितरि नो पाति मातरं स कलङ्कभाक् ॥३॥

(२६४ ) . तस्मान्मम वचः पुत्रि संमान्य निजहेतवे । वरमन्येपय त्वं मां कलङ्कने येन न स्पृशेत् ॥६४॥ श्रथः जो पिता अपनो कन्या का विवाह नहीं करता जो पुरुप अपना विवाह नहीं करता और जो पिताके मरने पर माता का पालन नहींकरता इन तीनों को कलङ्क लगताहै। सो हे बेटी ! मेरा वचन मान के नपने लिये बर ढूंढो जिससे मुझे कलङ्कका स्पर्श नही ॥ वृहमन्त्रिण आहूय वार्तामुक्ता नृपोऽखिलाम् । कृत्वा दूष्याणि शिविका दासान दासी रथान सहा६५॥ मन्त्रिभो रक्षितां वृद्धैर्विष्वक तां निरयापयत् । न किंचिल्लज्जया प्रोव्य सावित्री हैमनं रथम् ॥६६॥ समारुह्य प्रथमतो मुनीनां रुचिराण्यगात् । तपोवनानि तत्रापि वृद्धानां हि तपस्विनाम ॥६७।। प्रणम्य चरणौ सर्वाप्यन्विष्टा वनसंहतिः । ततस्तीपु संभ्रम्य पुनरायात् स्वकं पुरम् ॥६८|| अर्थ-राजाने बढ़े मंत्रियों को बुलाकर के सब घातकह के हेरे पालकी दास दासी मोररथों को माथ करके युद्ध मंत्रियों के द्वारा चारो ओर से रक्षा की हुई वम कन्या को विदा किया। सावित्री सज्जा से कुश्च न फहके सोने के रथ पर चढ़के ऋयियों के अन्दर तपायन में पहिले गई। यहां भी ऋपियों के घरों को प्रशाम करके उमने गय बन ममूह दूं छाले । वय. रान्त तीपी में गूमके फिर अपने पर माई ।।

वार्तालापं नारदेन मुनिना सह कुर्वति ॥६९॥ निविष्टं नारदं पित्रा सह दृष्ट्वाभ्यवन्दत ॥७०॥ मंत्रियों के साथ वहां पाई। उसने नारद को पिता के साथ एकदा खसभामध्ये निविष्टेऽश्वपत्तौ नृपे। सावित्री मन्त्रिभियुक्ताऽययौ तत्र गृहागता। अर्थ- -एक समय अपनी ममा में राजा अश्वपति नारद मुनि के माथ धावचीत करते रहते घर भाई हुई सावित्री बैठे हुए देश के दोनों को प्रणाम किया। तां दृष्टा नारदोऽवादीत् क गता कुत आगता । मुता ते यौवनस्थापि कथं नोद्दाहिता नृप. ॥७॥ अर्थ-उसे देस नारद जो बोले कि हे राजा । तुम्हारी सहको कहां गई पो कहां से भाई और भयान होने पर भी इसका विवाह को नहीं किया घानतया राज्ञोक्तमेतत्कार्यामेदेयं वान् पश्चतां ब्रजेतू आयाता पृच्छयत्ताने अर्थ जाने भाभी सभी पाई है पाप नहीं उग देष को मायपाम वीकार किया है। यर्थ में गवान् भर जापगा। सावित्र्योक्तं युमताद मुतामन्यं वरं वृणु। स कुमारेऽस्पवयसि देवताः पूजयन्ति यम् ॥३॥ बोले कि हे राजा एकही दोयम मम गुलों को दवाये हुए मिमी १३ संप्राप्यावसरे राज्य हृतं भूपैरनन्तरैः । तपश्चरत्युपित्वातो वनं राड्या सुतेन सः ॥७॥ अर्थ- सावित्री ने कहा कि धर्मात्मा घुमत्सेन माम शाल्व देश के राजा हैं। वे राजकुमार अल्पवय रहते कालवश अन्धे हुए। अवसर पाके पास के राजाओं ने उनके राज्य को छीन लिया । इसलिये वे राजा, रानी और राजकुमार के साथ वन में रह कर तपस्या करते हैं । कुमारः सत्यवान् नाम समया मनसा वृतः। उवाच नारदो राजन् सावित्र्या तव कन्यया ॥७॥ सत्यवन्तं गुणानेव संप्रेक्ष्य ब्रियमाणया। अनुष्ठितमजानत्यानुचितं च भयङ्करम् ॥७६॥ "अर्थ-यह सत्यवान नाम राजकुमार मैंने मन से वरा है। नारद जी घोलेपि हे राजा ! तुम्हारी कन्या सावित्री ने केवल गुगों के यवान् की वरते हुए बिना जाने तयपु संभ्रम्प पुनरॉय याद्यथा भवान् । अर्थ-राजाने पृढ़े मंत्रियों को के हेरे पालकी दास दामी और रों को कुमुपाकमत् ॥७७॥ के द्वारा पारी और मे रता की हुई उग का होना चाहिये पीछे सावित्री नमागे कुश न फदके माने के मनके नारदमुनि फहने के अन्दर तपेयन में पदिले गई। यह घरगों को प्रणाम करके उमने गया था। सूर्यसनिमः। । तीयों में घूमके फिरा. घवता समः॥७८|| 1 यूझे अहिली सर्वाप्यनि एम किया। .

उवाच नारदो दोप एक एवात्र तिष्ठति । मिटाने के लिये कोई उपाय नहींगदाप को मावधाम इति श्रुत्वा नृपः प्राह सुतामन्यं वरं वृणु। तेजस्वी बुद्धि में दहस्पति के समान्, इन्द्र के ऐसा वीर रन्तिः देव के तुल्य दानी और बलवान् चन्द्र के ऐसा सुन्दर चौर शिवि के समान धर्मात्मा है तो भी प्रारब्ध बलवान् है ॥ अर्थ-हे ( २६७ ) दानी वली रन्तिदेवसमः सुन्दर इन्दुवत् । धर्मात्मा शिविवञ्चास्ति तथापिवलवान विधिः॥७९|| राजा ! सत्यवान् राजकुमार सूर्य के समान राजोवाच गुणा उक्ता वहवो दोप उच्यताम् । येन नोहाहयोग्योऽयमिति ब्रूपे महामुने ८० अर्थ- - राजा ने कहा कि हे महामुनि जी! मापने वताये अय दोय कहिये जिस दोप से यह विवाह योग्य नहीं है ऐसा प्राप कहते हैं। गुण गुणान् सनिधःकृत्य नोपायो यद्विनाशने ॥८॥ कचनास्ति शृणुप्येनं सावधानतया नृप । अद्यमभृति वर्षेण सत्यवान पञ्चतां व्रजेत् ॥८॥ अर्थ-नारदजी याने कि हे राजा एकही दोष म भरपयान् में है। मय गुणों को दवाये हुए है निमरे होकर मुनो।सान मे एक वर्ष में गरपयान् मर जाएगा। महान्मा नारदः प्राह देवताः पूजयन्ति यम् ॥३ (२६८ ) एक एव महादोषो विनाश्य गुणसंहतीः। वर्तते सत्यवत्यब्दे पूर्णे यन्मृत्युमेष्यति ॥८॥ अर्थ-यह सुनके राजा ने कन्या सावित्री से कहा कि तू दूसरे वर को वर । जिनकी देवता लोग पूजा करते हैं वे महात्मा नारदजी कहते हैं कि गुण समूह को नाश करके एक ही भारी दोष सत्यवान् में है जो वर्ष पूरा होने पर यह मर जायगा। . सावित्र्योक्तं हि वाग्दत्ता या स्याहत्तैव सा सुता। वहस्य जीवनं वाल्पं स गुणी विगुणोऽपि वा ॥८५॥ अधुनैतद्विचारेण तात किं स्यातू प्रयोजनम् । मया वृतो यः स वृतो नान्यं वरितुमुत्सहे ॥८६॥ चिन्त्यते मनसा प्राक् तद् वक्तुं शक्यं ततस्ततः । कर्तुं शक्यमतः स्वान्ते निश्चितं निश्चितं मया ॥८७|| अर्थ-मावित्री ने कहा कि जो कन्या याणी से दी गई यह दी हो गई। हे पिता! अय "इसका जीवन यहुत है या थोड़ा है यह गुणयान् है या पम विचार में पधा प्रपोगन है । मैंने यराम वरा दूसरे को घरने नहीं चाहती। जो पहिने मन में विचारते हैं यदी पोसे कह मफते हैं पीछे पाही काम कर सकते हैं। इगलिपे ना मन में मिचित हुना घदी मेंमे मिपप किया। नारदः प्राह सावित्र्या वचो राजननुत्तरम् । न शस्यमुलद्धयितुं निश्चितं यदानया ||८||

( २६९ )
सद्गुणाः सत्यवति ये तावन्त्यन्येषु सन्ति न ।
अतः सत्यवतोहाहः सावित्र्याः संमतो मम ॥८९||
अर्थ-नारदजी ने कहा कि हे राजा ! सावित्री का
वचन बिना उत्तर का है जो इसने निश्चय किया है वह उल्लं.
पन नहीं हो सकता । जो सत्यवान् में उत्तम गुण हैं उतने
दूसरे पुरुषों में नहीं हैं। इसलिये सत्यवान् के साथ सावित्री
का विवाह होना मुझे भी संमत है ।
राज्ञोकं मन्यते नेपा संमतोऽत्र भवान् गुरुः ।
भवद्दागपि नोल्लङ्घया दास्ये सत्यवते सुताम् ॥१०॥
यत् स्याद्भाग्ये भवतु तन्न करिष्येऽनृतं वचः ।
ऊचे नारद उद्वाहः सावित्र्या भवतात् सुखम्।९।
अर्थः -राजा ने कहा यह मानती नही इसके मत में
भी संमत है। आपका वचन भी टालना न चाहिये
इसलिये सत्यवान् को कन्या दूंगा। भाग्य में है। वह हे
में
यधन को भूट न करूंगा। नारदजी ने कहा कि सावित्री
का विवाह मुख पूर्य हे 1.
वजामि युप्माकमिहास्तु भद्र-
मुक्तेति भूपं स मुनिर्जगाम ।
भूपोऽपि कन्योपयमोपयुक्त-
मुपक्रम कर्तुमयोयतोऽभूत् ॥१२॥

(२७०) अर्थ-मैं जाता हूं तुम लोगों का भला हो ऐसा राजा से कहके नारद जी चले गए। राजा भी कन्या के विवाह के उपयोग की तयारी करने में उद्योग करने लगा। । इति ब्रह्म ज्ञानशास्त्रे श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक परशुरामसंवादे राजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत भापाटीकायां द्वात्रिंशः सर्गः ॥३३॥ जनकटवाच- राजा सुतोदाहविचारबुध्या वस्त्राणि पात्राणि विभूपणानि । संपाद्य विप्रैः सह सन्मुहतें सुतां समादाय वनं जगाम ॥१॥ अर्थ- - जनक रामा परशुराम जी से कहते हैं कि राजा कन्या के विवाह के विचार की युद्धि से गहने कपड़े यासन हे एक8 करके वालों के साथ शुभ मुहूर्त में कन्या को माय लेकर यन में जाता भया॥ तपोवने युमत्सेनकुट्यासनं द्विजैः सह । यानादुत्तोर्य पढ़ः सन् ययौ भूपं तपखिनम् ॥२॥ अर्थ-जपायन में द्युमरमेन राजा को फुटी के पास मानों के माप मयारी में सर करके पैदल होकर तपस्वी राजा के पाम गाता भया॥

पीने के उपहारों से अश्वपति का सत्कार करके पाने का कारण पूछा । इस उपरान्त प्रपति संक्षेत्र में प्रयुक्त उत्तर देनेभय तत्रापश्यद् द्युमत्सेनमघस्ताच्छाकशाखिनः। अन्धं कुशासनासीनं विनीतोऽश्वपतिपः ॥३॥ नानाभिवाद्य संपूज्य ततोऽपृच्छदनामयम् । घुमत्सेनोऽपि सत्कृत्य गवाश्चपतिभूपतिम् ॥४॥ उपहारैर्वहुविधैः पप्रच्छागमकारणम् । अयो वभापेऽश्वपतिः संक्षिप्यार्थवदुनरम ॥५॥ अर्थ यहां अश्वपति राजा ने अन्धे द्युमसेन राजा को सखुदा के वृक्ष के नीचे कुशासन पर बैठे हुए देसा और अपना नाम लेकर अभिवादन विधि से नमस्कार करके और पूजन करके कुशल प्रश्न किया । द्युमत्सेन ने भी गा तथा भनेक साने इमां तु मदुहितरं सावित्री तनयस्तच । धर्मतः प्रतिगृहातु तद्भवान् खोकारोन्विति ॥६॥ -इम मेरी कन्या मायित्री को प्रापका पुत्र धर्म से प्रतिमाह करे सो बात साप स्वीकार करें। अथाब्रवीद् द्युमत्सेनो भ्रष्टराज्यो वने वसन् । तपश्चरामि ते कन्या कथं दुःखं सहेत तत् ॥4॥ अर्थ -इस उपरान्त द्युमत्सेन योला कि में राज्य में भ्रष्ट होकर वन में रह कर तपस्या करता हूं वस दुःरा की तुम्हारी कन्या कैसे सहेगी।

( २७२ ) + . अधाश्वपतिराहेति सुखं दुःखं क्रमागतम् । अहं वेनि सुता वेत्ति विचार्यैवागता वयम् ॥८॥ मया वीक्ष्यैव विज्ञतमुभयोः कुलयोहितम् । मा व्यधाः समसंबंध प्रत्याख्याय निराशताम् ॥९॥ अर्थ-इस पीछे अश्वपति ने यह कहा कि मुरा और दुःस (एक के पीछे एमा) कम से प्रातही रहते हैं यह मैं जानता हूं कन्या भी जानती है। हमलोग ऐमा सोच विचार करके ही प्रापके पान पाये हैं। मैंने दोनों कुल का हित देय ही के प्रार्थना की है। प्रापइम यराबरी के सम्बन्ध को नहीं करके मुझे निराश नत कीजिये। द्युमत्सेनोऽब्रवीदिष्ट एव संबन्ध एप नौ । ममासीद्वीनराज्यत्वाद्यत्किचिदिदमीरितम् ॥१०॥ प्राकचित्तगं यदासीन्मेऽतिथिभूय त्वयोदितम् । समाहूयाथ तो विप्रास्तपोवनगतानपि ॥११॥ पाणिग्रह सत्यवता सावित्र्याः शास्त्रमार्गतः । समकारयतां राजाश्वपतिर्भूपणादिकम् ॥१२॥ जामात्रे च दुहित्रे च समानीतं ददो मुदा । द्युमत्सेनमधामन्ध्य प्रत्यगात् वपुरं सुखम् ।।१३।। अर्थ-घुमटमेन ने कहा कि अपने देने का मम्बन्ध हाला मुझे पहिने इष्टदोगा परनु राज्य महाने में यह फुट में कहा । जो कुछ मेरे पित्त में या यही पादुग धन के आपने कहा यह कहने के उपरान्त दोनों राजाने तपावन सो बाह्मणों को बुला के सत्यपान् से सावित्री का विवाह माने कपड़े श्रादि दमाद और कन्या को मानन्द से देता सावित्र्यपिवरं श्रेष्ठं लब्ध्वा खाङ्गषु नो ममौ ॥१॥ गांव की रीति से कराया। और राजा प्रचपति लाये हुए या। फिर द्युमत्सेन में यातें करके मुख से अपने नगर को. स.सत्यवान् गुणवती वधूं प्राप्याभवत् सुखी । जाताया। अर्थ- ---यह सत्यवान्गुनवारी दुलहिन को पाकर सुखी भया और सावित्री भी मन चाहे वर को पाके अपने शरीर में कूली न समाई ॥ पितरि स्वपुरं याते सावित्री भूपणादिकम् । सर्वनार्य कापायं युक्तं परिदर्धेऽशुकम् ॥१५|| अर्थ-पिता अपने नगर जाने पर सावित्री ने गहने श्रादि उतार के (वन यासक) योग्य गेल्या वस्त्र पहिन डिया। सर्वान् सिपेवे मिष्ठाभिमृटुगीर्भिरतोपयत् । नैच्छद्रोगविलासादीन सदासीत् सरलेय सा॥१६॥ अर्थ-वह माँ की मेया भरती, मोटी नार नरम वागी मे मीको प्रसन्न करती, आपने सोग चार दिलाम को नहीं चाहती सदा सीधी सी पनी रहती। मिष्टवाकस्नेहचातुः पति सुरवश्र्चया । भ्वशुरं सेवया श्वश्रू भोलेनान्यानततुपत् ॥१७॥ ३४ (२७४) भर्थ-मीठी बोली स्नेह और चतुराई से पति को, देवता जैसी पूजा से ससुर को,सेवा करके सासू को और अन्य लोगों को अपने सुखभाव से प्रसन्न करती थी। वनेतपश्चरन्त्येवंनिन्येऽहानिच कानिचित् । नारदोक्तमविस्मृत्त्य शुचासीदवलानिशम् ॥१८॥ अर्थ- इस रीति से वन में तपस्या करती हुई सावित्री ने कितने ही दिन विताये। परन्तु नारद की कही हुई बात को न भूल के शोक से दिन रात दुवली होती जाती थी । अथो दिनं सत्यवतो विधिदृष्टमुपागतम् | विज्ञाय परिसंख्यायव्यहोपं बुवोध तम् ॥१९॥ अर्थ-इस पीछे सत्पवान् का विधिदृष्ट (मरण का) दिन पास भाया हुना जानके (हिसाब) गणित करके तीन दिन शेप है ऐसा जाना॥ अतस्त्रयहं निराहारं व्रतं कर्तुं समुद्यता । तद्विज्ञाय द्युमत्सेनःसावित्रीमाह सान्त्वयन् ॥२०॥ सुकुमारा नृपसुता त्वं, दुःसाध्यं व्रतं मुनेः। कथंध्यहं निराहारं त्वयैतत् सेत्स्यते व्रतम् ॥२१॥ अर्थ-सलिये यह सावित्री तीन दिन निराहार व्रत करने को उद्युक्त हुई। यह जान के धुमत्सेन राजा सावित्री को समझा कर कहगे लगा कि तु राजकन्या मुझुमार है और ग्रत मुनि को भी दु:माध्प हे मी तीन दिन निराहार व्रत तुझमे केमे निम मकेगा।

रान्त वर्ष भर पर मेरा व्रत करने का संकल्प ही है। आप
।
साहोद्वाहात् परं वर्षे व्रतसंकल्प एव मे।
भवान मा खिददेतं त निहिष्यन्ति देवताः ॥२॥
गृहीतं व्रतमेतनु मया न यतचित्तया ।
मनोनियमनाद्राजन् किं दुःसाध्यं भुवस्तले ॥२३॥
अर्थ-सावित्री ने कहा कि महाराज । विवाह के उप-
अर्थ-राजा
क्षेत्र न करें व्रत को तो देवता ही निभा देंगे। यह प्रत मैंने
मन को रोक कर ग्रहण किया है हेराजन् ! इस भूमितल
पर मन के रोकने पर कौनसी ऐसी वस्तु है जो दुःसाध्य हो।
राजाह वध्मीति कथं स्वीकृतं मा कथा व्रतम् ।
निर्वहस्व व्रतं शक्त्येत्येव वक्तुं ममोचितम् ॥२४॥
कहा कि मैं ऐसे कैसे कहूं कि स्वीकार
किया हुआ व्रत मत करो। शक्ति के अनुसार प्रत को निभा-
मेरे यही कहना मुझे उचित है।
इत्युक्ताविरते राज्ञि सावित्री व्रतमाचरत् ।
सा काष्ठपुत्तिकेवासीद् द्वितीयदिवसात्यये ॥२५॥
अर्थ-राजा ऐसा कहके चुप होने पर सावित्री ने प्रा
कर किया। दूसरे दिन सायंकाल में यह काठ की पुतली
सीहो गई।
कथंचिदेव तां रात्रि निन्ये नारदवाकस्मृतेः ।
प्रातरुत्थाय सुस्लाता हुत्वानीन प्रथमेक्षणे ॥२६॥

( २७६ ) नत्वैव श्वशुरं श्वश्रू द्विजान वृद्धान पुरःस्थिता। ते सर्वे सुखसौभाग्यमस्त्वित्याशिपमब्रुवन् ॥२७॥ अर्थ-शारद की बात का स्मरण करके किमी प्रकार से उस रात को विताया। प्रातःकाल उठके मन्दर स्नान करके अग्नि में होम देके दो पड़ी दिन चढ़े सामू ससुर ब्राह्मण और घद्ध जनो को नमस्कार करके प्रागे प्राफर राही हुई । वे सब लोग तुझे सुख और सौभाग्य हो ऐसा नाशीर्वाद देते भए । श्रुत्वाशिपं तु सावित्री मनस्येवं व्यचिन्तयत् । पश्यामि सत्या का वाक् स्यादेतेषां नारदस्य वा २० अर्थ--प्राथीर्वाद मुन के सावित्री ने मन में ऐसा वि- चारा । देखती हूं कि इन लोगों की प्रथया नारद की किसकी याणी सत्य होती है। व्याकुला नारदोत्यासीनेदीयान समयो यथा । एकान्तेतु स्थितां प्रेम्णा श्वशुरौ तामवोचताम् ॥२९॥ वत्से व्रतं ते सम्पूर्णमिदानी पारणं कुरु । तयोक्तं मे व्रतं पूर्ण सायं स्यादस्य पारणा ॥३०॥ अर्ध-असे असे ममप यहुत पास होता जाता था वैसे धेमे मारद के यथन से धराती थी इसमे एकान्त में येठी पी। हमको माम मगर दोनों प्रेम से (जाफर) कहने लगे। है येटी! तेरा व्रत पूरा हुमा यसको पार करो। मायित्री ने कहा कि मेरा प्रत पूरा हुमा माज सांझ को इस की पारणा होगी। - एतस्मिन्नन्तरे यातुं वनमुद्यम्य सत्यवान् । नैकाकिनाय गन्तव्ये त्वया साकं व्रजाम्यहम् । (२७७ ) कुठारं निर्गतो गेहात सावित्री तं व्यजिज्ञपत् ॥३१॥ अर्थ-इतने में मत्यवान् वन में जाने के लिये कुल्हाड़ी उदा कर घर से बाहर निकला। उनसे सावित्री ने प्रार्थना की। - सोऽत्रवीजातु नो याता वनं व्यध्वं व्रजेः कथम्।।३२॥ चतुर्दिनोपवासेन खिन्ना चरणचारिणी। सावित्र्याहोपवासेन न खेदो नाङ्घियानतः ॥३३॥ मम स्यात्स्यां न च श्रान्ता तस्यास्य विधिस्त्वयम्। नाद्य त्वया वियुक्ता स्यां यातुमाज्ञाप्यतामतः॥३४॥ अर्थ- '-माज तुम अकेले मत जाओ तुम्हारे साथ में चलंगी। सत्यवान् ने कहा कि तुम कभी वन में नहीं गई है।। राह विकट है, तुमको चार दिन का अपवास है, पांव से चलना है सो फैसे चलोगी सावित्री ने कहा कि मुझे तपपास से तथा पांव के चलने से सेद नहीं होगा और न मैं यकूगी । सस का यह विधि है कि आज तुमसे अलग न रहूंगी इसलिये चलने की माला दीजिये ।। सत्यवानाह मत्साकं चेधियाससि पृच्छ मे पितरौ येन मां कोपि न किंचिदपि दूपयेत् ॥३५॥ अर्थ -सरमथान् ने कहा कि जो मेरे माय घसने पाहती हो तो मेरे माँ बाप को पूछो जिसमे मुझे कोई भी देख नदेये॥

( २७८ ) - . ततः सावित्र्युपव्रज्य श्वशुरावाह साञ्जलिः । भवन्तौ स्थः प्रमाणं मइति विज्ञाप्यते मया ॥३६॥ अर्थ -उस पीछे सावित्री सास ससुर के पास जाके हाथ जोह के कहने लगी कि मुझे श्राप ही दोनों प्रमाण हैं इस लिये मैं प्रार्थना करती हूं। फलेन्धनान्यानयितुं यान्ति मत्स्वामिनो वनम् । तैः साकं यातुमिच्छामि यद्याज्ञा भवतां भवेत् ॥३७॥ अर्थ- मेरे स्वामी फल (पुप्प) और इन्धन (समिधा) लाने के लिये वन में जाते हैं जो आपकी प्राशा हो तो उनके माथ में जाने चाहती हूं ॥ नाद्य पत्या वियुक्ता स्यामिति व्रतविधिर्मम । व्रजन्ति ते तु गुर्वत्यमिति राहुं न शक्यते ॥३८॥ ममाप्यब्दो व्यतीयाय कुट्या नाहं बहिर्गता । पुष्पितानि वनान्यद्य द्रष्टुमुत्सहते मनः ॥३९॥ अर्थ -बाल पति से अलग न हो यह मेरे व्रत की विधि है। ये तो गुरुजी के लिये (पुष्प फल लकड़ी लेने को) जाते हैं समलिये रोक भी नहीं माती। मुझे भी घाम हो गया कि फुटी के याहरमही गई। प्राज मेरा जी चाहता है कि फूले हुए यनों को देना धुमत्सेनोऽब्रवीत् पत्नीं यदाप्रभृति ते वधूः । समानौतेह तपित्रा नेतया किंचिदत्थितम् ॥१०॥ ।

अर्थ-द्युमत्सेन
सावित्रीत्थं समाजप्ता' ययौ पत्या समं वनम् ॥३२॥
सावित्री पति के साथ बन में जाती भई।
( २७२ )
यदुक्तमधुना किंचिद्धेतुमत् सांप्रतं तु तत् ।
अनुजानीह्यतो यातुं पत्या सह वधूं निजाम् ॥४१॥
राजा ने अपनी स्त्री से कहा कि जब
से तुम्हारी बहू को उसका पिता यहां लाया तब से (प्राज़
तक) इसने कुछ भी नहीं कहा अभी जेर कुछ कहा वह कारण
अहित और योग्य कहा। इसलिये अपनी बहू को उसके पति
साह गच्छ त्वयापत्युन कार्या समयच्युतिः।
अर्ध-सामू ने कहा कि हे बहू ! जाओ तुमने पति
) জা প্রজা লীলা। স্ব সন্ধায়গায় দাদৰ
के साथ जाने की प्राज्ञा दो॥
(सत्यवान्)
भाविशोकाकुलापीयं सस्मितेवाभवद्दहिः ।
नृत्यन्ति कानने रम्ये दृष्टा यूथानि बर्हिणाम् ॥४३॥
अर्थ
-यह होनहार शोक से पराई हुई थी तो भी
रमणीय (महायने) अङ्गल में मोरों के मुडों को नाधते हुए
कर बाहर से मुमकिराने जैसी हेाती आई ।।
भेम्णात्यन्तं सत्यवान् प्राह भायाँ
पइयेः कोहङ् निर्मलं के नदीपु ।
कोहक पुष्पाण्यत्र फुल्लानि शैले
सा सावित्री पत्युरास्ये स्वदृष्टिम् ॥४॥

(२८०)
कृत्वा किञ्चित्राबवीनारदस्य
चित्ते कृत्योक्तिं पतिं स्वं मुमूर्पूम् ।
मत्वा मौनेनान्वगात् तं यतोऽस्या
नासीत् स्थाने संविदोण हृदनम् ॥५५॥
अर्थ-बड़े प्रेम से सत्यवान अपनी स्री से कहने लगा
कि देख नदियों में कैसा निर्मल जल हैं और पर्वत पर कैसे
फूल खिले हैं। वह सावित्री पति के मुख के और अपनी दृष्टि
करके कुछ न बाली । नारद की बात को चित्त में करके अपने
पति को मरा सा जान के बिना वाले चाले पीछे पीछे जाती
थी क्योंकि इसका फटा हुआ हृदय कमल अपने स्थान पर
नहीं था ।
।
इति ब्रह्मज्ञानशाले श्रीवाल्मीफिमुनिकृने जनक
परशुरामसंवादे राजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत
भापारीकायां त्रयस्त्रिंशः सर्गः॥३३॥

भेदी कर तुम मिरको अपने पलपी पर फरफेमदीरीति
गा कि हतों के काटने में मेरा माया पिराता हे हाप पांव
प्यार में जाता है। श्रय में पता नहीं रह सकता मेने को जी
उपवेश्यास्य मूर्धानं वा कृत्वा स्वझाययत्॥४॥
( २८१ ) .
जनक उवाच-
सह पल्या सत्यवतः फलपुष्पाणि चिन्वतः।
हुमशाखाः कुठोरणच्छिन्दतः खेद उद्गतः ॥१॥
अभूच शिरतः पीड़ा सोपवण्यात्रवीत् स्त्रियम् ।
हुच्छेदात् पीडयते मूर्या हस्तौ पादौ स्फुटन्ति च ॥२॥
नान्तः स्वस्थाऽस्मि मन्मूर्धा छिद्रितास्तीति लक्षये।
ने स्थातुमधुना शक्तः शयितुं गाहते मनः ॥३॥
अधः
-जनक राजा परशुरामजी से कहते हैं कि अपने
सो के माघ मत्यवान् को फल और फूलों को धुनते हुए और
कुन्हाड़ी से वृक्षों की हाले काटते हुए पमीना हे पाया और
मिर पिराने लगा। तब यह अपनी स्त्री के पास जाकर कहने
टते हैं। भीतर से स्वस्थ नहीं हूं मेरे मिर में छेद हुए हैं रोमा
श्रुचिवमाशु सावित्री पति समवलम्व्य च ।
रता है।
अप-ऐमा मुन के झट पट माथिमी ने पति के पार
मा दौना नारदवः स्वान्ते कृत्या दिनादिशम ।
सन्याय तक्षणेऽपदयत् पुरुष कृष्णरिलम् ॥५॥

( २८२ ) संरक्तनयनं रक्ताशुकं मुकुटधारिणम् | रवित्त्विपं प्रतिभयं पाशहस्तं पुरःस्थितम् ॥६॥ अर्थ-वह बिचारी नारद की बात को मन में करके दिन घड़ी जोड़ के उसी क्षण में एक काले पीले पुरुष को देखती भई। जिसकी अत्यन्त लाल अांखें थीं, जो लाल वस्त्र और मुकुट पहिने हुए, सूर्य जैसे चमकता, भयङ्कर और पाश हाथ में लिये हुए भागे खड़ा था। स्थितः सत्यवतः पार्चे स मुहुस्तमुदक्षत । तमालोक्यं शिरः पत्युरपसार्य शैनीरयम् ॥७॥ सावित्री साञ्जलि स्थित्वा कम्पन्ती वाक्यमब्रवीत्। के भवन्तोऽत्रकोऽर्थों वःका चिकीविउच्यताम।।८|| रूपतोऽनुमिनोमीपदेवाः स्थेति न मानुपाः। यमःप्रोवाच सावित्रि! त्वं कुलस्त्री पतिव्रता॥९॥ तपश्चरस्यविरतं ततो मदर्शनं तव । वदामि च त्वया नान्यनृभिर्विद्धि यमं हि माम् ॥१०॥ पत्युः सत्यवतस्तेऽद्य पूर्णमायुरमुं ततः। वध्या पाशेन नेप्यामीत्येतदर्थ ममागमः॥११॥ यह मत्यवान् के पाम राहा हुमा घरायर हमको देग रहा था यह गायित्री तमे देश के धोरमे पति का गिर गरफा के गही होकर दाय जोड़ के कांपती दुई पात फहने नगी कि साप फोग, यहां लापफा पपा काम , प्रापमा अर्थ-

करती है दससे मेरा दर्शन तुम हुआ और तुझसे बाते करता
(२८३
करना चाहते हैं सौ कहिये । रूप से अच अनुमान करती हूं
के श्राप देवता हैं मनुष्य नहीं हैं। यमराज बाले कि हे सा.
वित्री तू कुल को पालने वाली पवित्रता है सदा तपस्या
हु और मनुष्यों से बात भी नहीं करता तू मुझे ( यम) जान !
तेरे पति सत्यवान की प्राज उमर पूर्ण हुई उससे भाज इसे
कासी से बांध कर लेजाऊगा इसलिये मेरा भाचा हुआ है ।।
सावित्र्योक्तं भवता भ्रमन्ति जगतीतले ।
खयमत्र कथं प्राप्ता इति मे छिन्त संशयम् ॥१२॥
अर्थ-सावित्री ने कहा कि आपके दूत पृथ्वी पर फि-
रते हैं यहां स्वयं प्राप कैसे शापे इस मेरे संदेह को मिटाइये।
तच्छु वा स्याः प्रवोधार्थ क्रमशो हेतुमद्वचः ।
यम आह कुमारोऽयं धर्मात्मा सुन्दरो गुणी ॥१३॥
पतिव्रतास्य पत्नो च त्वद्विधेत्यहमागतः ।
महूता अत एवैनं नेतुंन प्रभवः किल ॥१॥
-यह मुन फे सावित्री को समझाने लिये व्योर
धार कारण सहित वचन समाज ने कहा कि यह कुमार स.
त्ययान् धर्मात्मा मुन्दर और गुणयान है और इसकी स्त्री तुम
जैमी पतिनता है इसलिये में यहां प्राया हूं। निश्चय है कि
इसीलिये मेरे दूत इसे लेजाने को ममर्थ नहीं हैं।
इत्युत्का सत्यवदेहाजीयमद्गुष्ठसनिभम् ।
यम आकृप्य पाशेन वध्वावाचीदिशं ययो॥५॥

(२८४ ) अर्थ-ऐसा कह के सत्यवान् के शरीर से अंगूठे को बरा यर जीय को निकाल के कांसो से बांध के यमराज दक्षिण दिशा की ओर पधारे। जीवहीनं वपुः सत्यवतः परमसुन्दरम् । अभून्मदिव निस्तेजः सावित्री चान्क्गाद्यमम् ॥१६॥ अर्थ-सत्यवान् का अत्यन्त सुन्दर शरीर जीवहीन होने पर मिट्टी जैमा यिना तेज का होगया सावित्री भी यम. राज के पीछे पीछे चली। अनुयान्तीमिति प्राह दुःखेनाकुलितां यमः । सावित्रि ! गच्छ स्वपत्तेरौवंदेहिकमाचर ॥१७॥ आयाता दूरमनणा पत्युस्त्वमधुना ब्रज। सोचे परायणः स्त्रीणां पतिरको न चापरः ॥१८॥ एवं पति जेद्यत्र कोपि वा यत्र तं नयत् । मया तत्रैव गन्तव्यं यम! निश्चय एपमे ॥१९॥ तज्यया श्वशुरयोस्तपसा पतिसेवया। व्रतेन युप्मद्ददायया गतिरोधो न मे क्वचित् ॥२०॥ अर्थ-दुःस मे पथराई हुई मायिग्री को अपने पीछे लाती हुई देग फे यमराजयोले कि हे मायित्री लोट जाओ और अपने पति का क्रिया कर्म करी । तूं यहुत दूर जागर अपने पति में परिन हो गुमी अयना। भाषिणी धोनी कि गियों को एक पति ही आश्रय है इमरा महीं । म प्रकार में जहां पति नाये अपया जहां कोरमको टेगाये वही मुझे आपकी जाना चाहिये हे सनराज यह मेरा निश्चय है । वैसे ही सास असर की पूजा से, तपस्पा में, पति की मेवा मे, वन से श्रीर दया से मुझे कहीं आने जाने की रोक्ष टोंक नहीं है। विदः साप्तपदं नहं जगुस्तदनुसारतः। भवन्तं वक्तुमिच्छामि यात्कचिच्छूयतां तु तत् ॥२१॥ अर्थ-विद्वान् लोगों क्षा सात पग साथ चलने से स्नेह होता है. ऐसा कहते हैं । उसके अनुसार आपसे जेर मुथ मैं कहना चाहती हूं उसे आप सुन लेवें। बने गुरुकुले बासादगाई स्थ्ताद्यतिधर्मतः । अवशन्द्रियचित्तानां न किंचित् फलमाप्यते ॥२२॥ तस्मात् स्वधर्मो न भवेद्धृत्वापि चतुराश्रमान । असौ विलक्षणः श्रेष्ठतमो ज्ञानादचाप्यते ॥२३॥ चतुरो प्याश्रमान् धृत्वा यत्फलं जायते तु तत् । सद्भिः पूर्यथा प्रोक्तं तदेशपाय गच्छतः ॥२४॥ द्वितीयादेस्तदा नेच्छा स्यात् स्वधमों वरस्ततः। श्रुत्वेति वाचः सावित्र्या धर्मराजोऽवचौदिदम् ॥२५॥ अर्थ-भिमझे इन्द्रिय और चित्त अपने यम में नहीं उनझर यन में यास झरने से (यानमस्य पाश्रम मे) (विद्या पढ़ने के लिये ) गुरु के पर में रहने मे (ब्रह्मण्यं साश्रम में ), गृहस्थाश्रम में प्रारमन्यासाश्रम के धर्म में कुछ भी न नहीं मस होता । तस्मात् पारो आश्रम पार करके मी बर्म, ( २८६ ) नहीं हो सकता। यह स्वधर्म विलक्षण प्रर्थात् और ही कुछ है जो मय कुछ धी से श्रेष्ठ है वह ज्ञान से ( जानने से प्राप्त होता है। चारो आश्रमं धारण करके जो फल प्राप्त होता है वही फल प्राचीन सज्जन लोगों ने जैसा कहा है उस एक राह पर चलने मे होता है ! तब दूसरे तीसरे मार्ग की इच्छा भी नहीं होती तस्मात् वधर्म श्रेष्ठ है। सावित्री की ऐसी वाणी मुनके धर्मराज यह बोले। श्रुत्वा त्वदुक्तं सावित्रि ! प्रसन्नोऽस्मि भृशं त्वयि । याह्यस्य जीवनं मुक्तान्यद्ददामि यदिच्छति ॥२६॥ अर्ध-हे सावित्री ! तेरा वचन सुनके तुझपर मैं यहुत प्रसन्न हूं तू लेट जाइमका जीना छोड़ के दूमरा जो चाहती है सा देता हूँ। सा चाह कियतः कालादन्धता श्वशुरस्य मे। तपश्चरन्ति ते कुट्यां तच्चेद्रवदनुग्रहः ॥२७॥ नीरुजत्वं तदक्ष्णोः स्यादिति याचे वरं यम । यमोप्याह तथैवास्तु श्रान्तास्येयधुना गृहम् ॥३८॥ त्वं कारयिष्यति सति व्यथां किमिति पादयोः। साविश्याहान्तिके पत्युः श्रान्तास्यांजात्वहं कथम्।। सा मे स्याद्या गति स्तेपां यास्ये नयथ यत्र तान् । वश्मि तच्छृयतां श्रेष्ठमेकदा दर्शनं सताम् ॥३०॥ नापार्थ फलदं स्नेहायवहारात तदा किमु । सर्वथा सर्वदा तस्मात् सत्सम उचितो नृणाम् ॥३१॥ .

जाते हैं वहां में भी जाऊंगी। जो कहती हूँ मा सुनिये। सज्जनों का एकवार का दर्शन श्रेष्ठ है व्यर्थ नहीं है फल देने वाला है तब उनके स्नेह र व्यरहार से क्या होगा (से। नहीं कह माती)। इसलिये मनुष्यों को सर्वथा सदा सत्ता ( २८७ ) अर्थ-सावित्री ने भी कहा कि कुछ फाल से मेरे मसुर अन्धे हो गए हैं वे कुटी में तपस्या करते हैं । सेो आप की दया हो तो उनके आंखों का रोग मिट जावे। हे । यमराज यह वर मैं मांगती हूं। यमराज ने कहा वैसा ही होगा, तू शक गई है अय घर जा। हे मती तू अपने पायों को क्यों पिरवाती है। सावित्री ने कहा कि पति के पास में भी कैसे थक सकती हूँ। जो उनकी गति है वह मेरी हो उन को आप जहां ले करना उचित है। यमः प्रोवाच ते वाताः सावित्र्येवं मनोहराः । चातुर्य शिक्ष्यत याभ्या जनेस्तु निपुणेरापे ॥३२॥ विहाय जोवनं सत्यवनोऽन्योऽपि पुनर्वरः। याज्यतां तमहं दास्य सावित्री चा व्रवीत् तदा॥३३ श्वशुरो मेहतं राज्यमामलभतां पुनः । जातु धर्माच्युतो मा भूदिति श्रुत्वात्रवोद्यमः ३॥ लब्धा ते श्वशुरो राज्यं व्युतो मा भूच धर्मतः । पूर्ण ते हृद्गतं याहीदानी दुःखं सहस्व मा ॥२५॥ अर्थ -यम बोले कि हे सावित्री । तेरी बातें ऐमी मन भावनी है कि जिनसे चतुर लोग चतुराई सीखते हैं। सो ( २८८ ) सत्यवान का जीना छोड़ के दूमरा भी वर फिर मांग उसे भी देऊंगा। तब मावित्री भी बोली कि शत्रुओं करके हरण किया हुमा राज्य मेरे श्वशुर फिर पावें। और वे धर्म से कभी न डिर्गे। यह सुनके यमराज बोले कि तेरा ससुर राज्य को पावेगा और धर्म से भी न डिगेगा। तेरे मन की बात पूरी हुई अध या दुःख मत सह। सावित्री प्राह भवता वद्धं स्वनियमैर्जगत् । तैश्च सर्वान् निगृह्णासि यम इत्युच्यसे ततः ॥३६॥ नेच्छन्त्यनिष्टं जोवस्य कस्यापि मनसापि च । कानुष्टानं क कथनं दयन्ते प्राणिनोऽखिलान्॥३७॥ ददत्यापे यथायोग्यं सतां धोऽयमीरितः। जगन्मत्पतिवत् सर्व भक्तिचातुर्यवर्जितम् ॥३८॥ समुद्धरन्ति विपमात् सन्तः संसारसागरात् । शरणं समवाप्तेषु वैरिप्वपि दया सताम् ॥३९॥ अर्ध-सावित्री बोली कि आपने अपने नियमों से सं. पूर्ण जगत् को यांध रखा है उन्हीं नियमों से आप मा को पाते हैं इभोसे यम कहाते हैं। मशन लोगों का यह धर्म कहा है कि किसी जीवजन्तुं का मन से भी धुरा नहीं चाहते फिर करना और कहना कहां रहा । सय प्राणियों पर दया फरते हैं और जो जिमके योग्य है यह उमे देते भी हैं । मेरे पति की माई मंपूर्ण जगत् है उनमें मभक्ति है और ग चतुराई है। ऐसे जगम को मगन लोफ फठिग संमार रूपी ममुद्र में भवान् विवस्वतोऽर्कस्य तनयोऽतिप्रतापवान् ॥१५ ( २८९). . रहार करते हैं। शरण श्राये हुए शत्रुओं पर भी सज्जन लोग भवन्त्वतः शत पुत्रा वंशो वर्धेत येन च । इदानीमपि तद्याहि वहुदूरं समागता ॥४३॥ दया करते हैं। अर्थ- यमः प्रोवाच ते वार्तास्तर्पयन्ति मनो मम । तृषितस्य यथा नोरमिदानीं यत्तवेप्सितम् ॥४०॥ तत् पुनवाच्यतां सत्यवतस्त्यक्ता तु जीवनम् । सावित्री माह सन्तानं मदन्यं नास्ति मे पितुः ॥४१॥ यमः प्रोवाच सावित्रि पितुस्ते स्युःशतं सुताः॥४२॥ येन वंशो विवर्धेत पूर्णास्तव मनोरथाः। -यमराज ने कहा कि तेरी बातें मेरे मन को ऐमी दृप्त करती हैं जैसे प्यासे को पानी । हे सावित्री ! मत्यवान् के जीवन लोड़ के जो तुझे इष्ट हो यह मांग । सावित्री ने कहा कि मेरे पिता को मुझे छोड़ और कोई सन्तान नहीं है इस लिये इन्हें सौ पुत्र हो जिससे वंश धढे । यम योले कि हे सा. वित्री । तेरे पिता को पुत्र हो जिमसे वंस बढे अब भी तेरे मनोरथ पूरे हुए सी लाट जा बहुत दूर भा गई है। सावित्र्याहान्तिके पत्युर्मम मार्गस्य दूरता । न ज्ञायते मन्मनस्तु पुनरग्रे प्रधावति ॥४॥ वमि किंचिह्नजन्त्येव शृण्वन् यातु भवानपि ।

( २९० ) अतो वैवस्वत इति भवन्तं तु जना जगुः। लोकान् धर्मे नियुड़े तो धर्मराजो ऽपि नामतः।।४६॥ यावान् भवति विश्वासः सत्सु तावान्न चात्मनि । अत एव सतां लोकैराश्रयोऽन्विष्यते परः॥४७॥ यदा सम्यक् स्वभावः स्याद्विश्वासो जायते तदा । स्वभावशोधनार्थं च सतां स्नेहोऽर्थ्यते जनैः॥४८॥ अर्थ-सावित्री ने कहा कि पति के पास मुझे राह की दूरी नहीं जान पड़ती । मेरा चित्त तो भागे दौड़ता है। मैं कुछ चलती हुई कहती हूं पाप सुनते चलें । श्राप विव. खान मूर्य के प्रतापी पुत्र हैं इसलिये लोक प्राप को वैवखत ऐसा, कहते हैं। श्राप लोगोंको धर्म में चलाते हैं इसलिये आपका नाम धर्मराज है। जितना विश्वास सज्जनों पर होता है इतना किसी का अपने पर भी नहीं होता इसीलिये लोग सज्जनों का उत्तम सहारा ढूंढते हैं । जय स्वमाय अच्छा होता है तब विश्वास भी होता है से स्वभाव सुधारने के लिये लोग सज्जनों से स्नेह करना चाहते हैं। श्रुत्ववेत्यं यमः प्राह वचो यद्यत् प्रभापसे । मयाद्ययावत् कस्यापि मुखतो न श्रुतं तु तत् ॥४९॥ त्वदातया प्रसन्नोऽस्मि यद्यदिच्छसि तदृणु । विहाय जीवनं सत्यवतः पश्चाद् गृहं ब्रज ॥५०॥ थर्थ-ऐगा मुमते दी यमराज ने कहा कि जो तू यात करती है गा मैंने साज तक किमी के मुंह से नहीं मुमी तरी सावित्र्योक्तं शतं वीराः बात से मैं प्रसन्मो सत्यवान् के जीवन को छोड़ के जो २ सावित्र्याह सतां रीतिः सदा धर्मपथानुगा ।। IE नापार्थः स्यात् सतां स्नेहः सन्यो नास्तिभयं कचित् । कालत्रये यद्भवति सन्ति सन्तस्तदाश्रयाः। ( २९१ ) दूरयानात् त्वमधुना खं गृहं ब्रज । सत्येन खे सतां राज्यं तपसा ते धराधराः ॥५३॥ पाहे से मांग ले और पीड़े पर चली जा। सन्तु में वलिनः सुताः। तवार्तामूढचेतस्को यमश्वाह तथास्तु तत् ॥५१॥ प्रान्ताति सत्सङ्गाजातु नो दुःखं सदैवोपकृतौ रताः ॥५॥ सन्तः प्रत्यपकारं तु कुर्वन्ति मनतापि न । उरकारः कृतः सत्सु नापार्थो जातु जायते ॥५५॥ कापि हानिर्णोपकर्तुरित्यं रीतिः सदा सताम् । जगद्रक्षन्ति विपदः सन्तोऽनेनैव हेतुना ॥५६॥ अर्थ--सावित्री ने कहा कि मुझे वीर और बलवान् सी पुत्र हों।मावित्री की यात में मोहित होके यमराज ने भी (बिना सोचे हो) कहा कि वैसा ही होगा। तू दूर भाने से यह गई है अब अपने घर का । मावित्री ने कहा कि मामलों कोरोति सदा धर्म की राह पर होती है । मज्जों का सेद कमी प्रकारप नहीं जाता। मानों से कभी भय महीं हो मकता सत्पने से मनाने का राज्य आकाश में होता है, ।

.
-
लोग तपस्या के वल से घरती को सँभाले हुए हैं। जो बीत
गया, जो हो रहा है, और जो होने वाला है सब सज्जनों ही
के सासरे है। सज्जनों के सङ्गले कभी दुःख नहीं होता। सज्जन
लोग सदा ही लोगों के उपकार में रहते हैं। किसी के नीचकर्म
का बदला मन से भी नहीं सोचते । सज्जनों पर उपकार करो
तो वह कभी था नहीं जाता । उपकार करने वाले की हानि
नहीं है। सज्जनों की सदा ऐसी रीति है। इसी कारण से
सज्जन लोग संसार को विपत्ति से बचाते हैं।
• यमः प्राह वचो धम्य वरसित्वं यथायथा ।
तथातथा हरसि मे मनस्तस्माद्यदिच्छसि ॥५७||
सत्यवजीवनं मुक्ता बृणु सर्वं ददाम्यहम् ।
ततः पतिव्रते याहि स्वगृहं कुरु मा चिरम् ॥५०॥
अर्थ-
-यमराज ने कहा जैसे जैसे धर्म की यात त करती
है धमे धैसे मेरे मन को हरती जाती है इसलिये सत्यवान् के,
जीवन को छोड़ के जो चाहती है सो मांग मैं तुझे सब देता हूं
पीले हे पतिव्रता सावित्री! अपने घर जा देर मत घर ॥
ततो विहस्य सावित्री प्रोवाचेदं यमं वचः।
दत्ता मम शतं पुत्रा भगवन् भवता पुरा ॥ ५९॥
तत् कथं पतिहीनायां घटेत मयि तद्वचः ।
स्वयमेव विचार्यातस्तन्मे देाचितं यथा ॥६॥
पातिव्रत्ये स्थिताया मे पतिरेव परायणम् ।
त बिना तु मृतेवास्मि नेवेच्छामि धनं सुखम् ॥६॥

याचेऽतः सत्यवाक् त्वं स्या वध मुक्ताऽस्तु मे पाते।६२
पगवान् पहिले आपने मुझे सौ पुत्र दिये सो वह वचन पत्ति
वैमा उचित हो वह मुझे दो। मैं पतिव्रताधर्म में स्थित हूं.
पति ही मेरे लिये प्राश्रय है। उनके विना मैं मरी जैसी हूँ।
उनके बिना धन सुख, तपाव पठ में रहना भी नहीं चाहता
( २९३ )
नापि वैकुण्ठंसंवासं नो जीवामि खलु त्रिये ।
---3ग पीदे नावित्री हँस के यह बयन वाली सि
करके होन मुझमें कैसे घटेगा। इसलिये भाप ही विचार के
उनके बिना मैं नहीं जीजंगी मर जाऊंगी। इसलिये मैं मांगती
कि श्राप का वचन सत्य हो और मेरे पति मायके यन्धन
मे छूट जावें ॥
इति श्रुत्वा धर्मराजोऽप्यासीचकितवत् तदा ।
मुक्ता प्रसनस्तत्पाशं सावित्रीमनचादिदम् ॥३॥
अर्थ-ऐमा सुन के उम समय पर्मराज भी पक्षित हो
गए। प्रसन्न हो कर सत्यवान की फांसी को छोड़ दे सावित्री
पह येले.
त्वया धर्मेण बद्धोऽस्मि तहदाम्यति दुर्लभम् ।
पतिवद्धोऽपि मुक्तस्ते त्वया सह चतुःशतम् ॥
वीण
स्यात् स नीरोगः स्तो वां पूर्णा मनोरथाः।
यशस्थिनी पुत्रशतं भाविभूपं मुतैर्वृतम् ॥६५॥
मामुतं ने पितुः पुत्रशतं स्पान्मालवाभियम् ।
पुत्रैः पौत्रेतं देवानिच तेजोघरं परम् ॥६६॥

( २९४) । - श्वशुरस्ते सुनयनो भूत्वा राज्यमकण्टकम् । प्राप्नातु ते कथा चेयं भूयात् त्रैलोक्यपावनी १६७। गच्छ सावित्रि भद्रं तइत्युक्तान्तर्दधे यमः । सावित्र्यपि गता तत्र पत्युर्यत्राभवदपुः ॥६॥ अर्थ-हे सावित्री । तूने मुझे धर्म से बांध लिया से मैं तुझे यह देता हूं जो अत्यन्त दुर्लभ है। ले बांधे हुए तेरे पति को दोड़ दिया। वह तेरे सहित चार मी वर्ष भला चना रहेगा। तुम दोनों के मनोरथ पूरे होंगे। तुम दोनों का जगत् में यश होगा। तुम को सौ पुत्र होंगे वे सब राजा होंगे उन को भी सन्तान होंगे। तेरे पिता को भी सो पुत्र होंगे वे मालव कहलावेंगे। वे भी वेटे पोते सहित और देवताओं के जैसे तेजधारी हेगे। तेरे समर को आंखें अच्छी हो जायेंगी और वह निष्काटक राज्य पावेगा । और यह तेरी कया भी लाक्य को पवित्र करने हारी होगी। हे सावित्री! तू जा तेरा भला होगा ऐसा कहके यमरान अन्तान हो गए। सावित्री भी यहां गई जहां पति (सत्यवान्) का शरीर था । तत्र गत्वोपविश्याङ्के कृत्वा पत्युः शिरः स्थिता । ने जाग्रदिवोन्मीत्य कालेऽस्मिन्नेव सत्यवान् ॥१९॥ स्नेहहप्ठ्यक्षत मुहुः परदेशागतो यथा । अत्रवादपि सावित्री दायितोऽस्म्यतिकालतः॥७॥ निशाप्यासीजागरितः गोधं किमिति न त्वया । स श्यामः पुरुषः क्वास्ति कर्षन मामनयनु यः।।७१॥

एसके स्थित भई। इसी समय जाग उठे के समान सत्यवान् प्रदेश से श्राया हो। फिर सावित्री से बोला भी कि मैं बहुत देरे में सो रहा हूं रात भी हो गई तूने मुझे शीघ्र ही क्यों नहीं अगाया । वह सांवला पुरुप कहां है जो मुझे खाँच कर अर्थ-वहां जाकर बैठ कर पलधी पर पति का सिर भांस साल के बार बार स्नेह दृष्टि से देखने लगा जैसे कोई सावियाहचिरं सुप्तो मदते जागृतोऽधुना । शक्नोपि चेत् त्यमुत्थाय पश्यात्यैदतिशर्वरी ॥७२॥ अथ-मावित्री ने कहा देर में मेरी पलपो पर साये थे अब जागे हो। होमकेत उठ के देखा कि बहुत रात बीत गई। अन्वेति संभ्रमाचिर सुखशयितवदेक्षतोत्थितः स वनम् । आहव सह त्वयाई फलानि पुष्पाणि चेतुमायातः॥७३॥ समिपश्छिन्दन शिरसः पीड़ा वध्यमानासीत् । स्थातुं तपा न शक्तस्त्वदआगत्य गायतोऽत:७१ महतोमे निद्रासोदेतापनि नान्यदिह । सोऽपदयं परितस्तमो नेतेजसा राशिम् ॥७॥ कमदिन सात त्वया यः संभाप्य चिरं यथागतं यातः।

( २९६ } कोऽसाविति सत्यमुत + स्वप्नः शक्नोपि वक्तमिदम् ॥७॥ अर्थ-यह सुन के सत्यवान् चहुंका और बड़ी बेर से सुस नीद माये हुए की नाई उठ कर उसने वन को देखा और बोला भी कि मैं तेरे साथ फलफूल चुनने के लिये पाया था। फिर समिधा काटते हुए मिर की पोर बढ़ती ही गई उससे मैं खड़ा नहीं रह सका इमसे भाफर तेरी पायी पर सो रहा मुझे बड़ी नींद भाई इतना मैं जानता हूं और यहां कुछ नहीं जानता। फिर सुपने में देखा कि चारों ओर अधेरा हो रहा है उसमें बड़ा तेजस्यो कोई था जो तेरे साथ देर तक बातचीत करके जैसे प्राया था वैसे गया । यह कौन था और यह सत्य दे वा सुपना है यह बात तू पाह सकती है। सावित्र्याहदानी रात्रिरोभूयते च वक्ष्ये श्वः । . याव च संगच्छाव श्वशुराभ्यां झटिति सूर्योस्तात् ७७ अतिकालोऽत्यद्रानिर्विवधिपुर्जन्तवो रात्रः। विसृजन्तो रौद्रगिरो भ्रमन्ति चेतस्ततो भयदाः ७८ अर्थ-सावित्री योली कि रात हो रही है फरा कहूंगी। चले धाम जी और ममुर जी में घट मिलें भूयास्त होकर बड़ी थेर दुई रात पढ़ने ही चाहती है । रास जानयर रायने चा योलते हुए पर उपर पूम रहे ६ आय को देते हैं । कुरजेन्पु च धावत्सु श्रूयते मर्मरध्वनिः । दक्षिणस्यां पश्चिमायां शृगाल्योऽपि रुदन्तिहि ॥७९ .

भाकाकर्ण्य यञ्छश्चहृदर्य कम्पते मम।
एधासोतस्ततो भूरोण्यग्निर्जलति कर्हिनित ।
प्रातर्वजाच चेदिष्टमत्रैव व्युष्य शर्वरीम् ॥८॥
(२९७)
सत्यवानाह सावित्री वनं रौद्रं तमोवृतम् ।।८०||
कथं वेत्स्यसि पन्यानं जिप्पत्ति कयं वद ।
सावित्र्युवाच तत् पश्य विपिने ज्वलतीन्धनम् ८१॥
मा शोचस्वाग्निमानीय ज्वालयामीध्मसंहतिमा८२]
नाप्येत ते वने पन्या अस्वस्थस्य तमोवृते।
.
अर्थ-हिरम देखने से पतों का मर्म शद मुनाई
देता है। पारियां दक्षिण और पशिम के और रो रही है
'मुन मन के मेरा फलेश यार बार कांपता है। प्रत्ययान
* গাযিী ৪ ফ্যাদি হল গযই লখিuা খা যাক।
उमरा कानगो और हमें पौगोभी का मायिनी
पर देश में पड़ी जान रहो है। पर
उपर कड़ी झी यहुत है ममि भी की कही जपतो तुम
मोर मत करो में निगा यात मी गती जमाती,
हमारा जी का नहीं भी पन में तुमको राम
मिलेगी भा गुम चाहो तो भाग रात को रकम
मरेगे।
मन्यवानोन्मूः पीडा में कम्पादयोः ।
भान्जेदानी मपिती ट्रष्टुमुलाने मनः ॥2॥

( २२८ ) अर्थ-सत्ययान् बोले कि मेरे सिर की पीर जाती रही। हाथ पैर भी अब नहीं दूसते अब यही मन में प्राताहै कि (चल कर) मा याप को देखू ॥ जातु कुव्या बहिर्नेयान कालो नीतो मया क्वचित् । माता नेच्छबहिर्यानं सूर्यास्तादुतरं मम ॥८५॥ बहिर्दिवापि यातोऽहं पितरौ व्याकुलौ तदा । अभूतामवजिष्टां मामन्त्रष्टुं मुनिभिः सह ॥८६॥ मुहुः पितृभ्यां दुःखिभ्यामुक्तश्चिरयसे इति । वक्तुं शक्रोमि नेदानी मदर्थ का दशानयोः ।।८७॥ अर्ध-मैंने भी कुटी के बाहर कहीं इतनी देर कभी नहीं लगाई। मां भी सांझ से मेरा बाहर जाना नहीं चाहती थी। अब दिन को भी मैं बाहर गया तो मेरे मा धाप घघराते रहे और तपस्थियों के साथ मुझे ढूंढने जाते थे। कईयार मा यापने दुखी हो कर मुझ से कहा है कि तू देर लगाता है। प्रय नहीं कह सकता हूं कि मेरे लिये उनको क्या दशा हुई होगी। अपश्यतोमा पित्रोम स्यान्महदुःखमेकदा । विमुच्याश्रूणि दुखेन तो वृद्धौ मामवोचताम् ॥८॥ तात क्षणं न जोवेव त्वां विना त्वयि जीवति । जीवावोऽन्यस्म नेनं त्वं नामपिण्डस्त्वयैव वाम ८९॥ अर्थ-मुझे बिना देरो मेरे मा माप को यहादुग हुधा दोगा एकबार आग मे मांग रहा दुगी होकर ये पूरे मुझमे माम और विवड तुम्ही से है। देखकर न जाने किस दशा को प्राप्त हुए हेगे । म अभागी हूँ ( २९९ ) हने लगे कि हेवेटा तेरे बिना हम लिन भर नहीं जी सकते, तुम जीते रहते हम जीते हैं, अन्धे की आंख तुम्ही हो, हमारा पुत्रोऽस्मि वृद्वपित्रोस्तौ न दृष्ट्रा निशि मां दशाम्। न जाने का प्रयत्स्येते निद्रां वच्मिकिमात्मनः॥९॥ दुर्भाग्योऽस्मि यदधै मे पितरौ संकटं गतौ । एवं विपत्तिमनोहं जीवयं तौ विना कथम् ॥९१॥ अर्थ-- मैं यूढ़े मा याप का लड़का हूं वे रातको मुझे ना अपनी नींद से या कहूं जिसके कारन मेरे मा बाप संकट में पहे। ऐमी विपत्ति में हुधा हुआ मैं उनके बिना कैसे जीऊंगा . पृच्छेयुरन्धाः पितरः प्रत्येकं तु तपस्विनः । शोचामि वृद्धपितरं दुर्वलां मातरं यथा ॥९२।। तपात्मनः कृते नैव मदाकुलता तयोः। तेषु जीवत्सु जीवामि खानपानादिकं तयोः ९३॥ ममैव कार्य येनेतौ सुखिनो स्तः करोमि तत् । धमत्मिा सुत इत्युका स्नेहेनोचै रुरोद च ॥९॥ अर्थ मेरे अपिता एक एक मागियों में पूने ने। मैं ? पिता बरदुधको मां का मे शाप करताई येमा अपने सिप नहीं करता। मेरे लिये उन्हें पराइलीत. रहते में जीत हालिसाना पिलामा मेराही काम है। - - ( ३०० ) . जिमसे वे सुखी हों वही काम करता हूं धर्मात्मा पुत्र ( सत्य वान् ) ऐसा कहके स्नेह से धाड़ मार कर रोने लगा। दृष्ट्वा पत्युर्दुःखं सावित्र्यश्रूणि तस्य संमाय॑ । ऊचे तपः कृतं यदानं होमश्च तेन मेश्वशुरः।।९५॥ श्वश्रूः पतिश्च कुशलं लभतामस्यां निशीथिन्याम् । सत्यं व्रतं च यदि मे तेन श्वशुरौ पतिश्च जीवन्तु।१६। अर्थ-पति का दुःख देख के सावित्री उसके प्रांसू पोंछ के वाली । जो मैं तपस्या दान वा हाम किया हो उससे मेरे सासू ससुर और पति इस रात में कुशल से रहें । और जो मेरा प्रत सत्य है तो उससे सासू ससुर और पति जीयें । सत्यवानाह पितरौ द्रष्टु मिच्छामि मा चिरम् । प्रियेऽनिष्टं पितुश्चेन्न जीवामीत्यात्मना शपे॥१७॥ स्याधर्मोऽहं च जीवेयं हृद्तं मे भवविति । यदीच्छसि वरारोहे व्रजावाशु कुटी प्रति ॥९॥ अर्थ-सत्ययान् ने कहा कि मां याप को देखने चाहता हूं देर न करो। हे प्यारी ! में अपनी मागन्द गामे कहता हूं कि कुछ पिता का पुरा होगा तो में न जीऊंगा। है प्यारी। जो तू पाहती है कि धर्म हो, मैं जोऊ और मेरे मन की थात हाताहिये कि शीघ्र फुदी को पार्ने । इति श्रुत्वैव सावित्री सहसोत्याय कुन्तलान ।

बाल मसाल के अपने पति को उठा कर बैटा दिया। सत्यवात् स्वकरौ पादौ यावत् संमाज्य पश्यति । हक्स्यूते पतितातावत् सावित्र्याहास्त्विहैव तत्॥१०॥ श्वो नपिप्ये सहाद्यास्तु कुठारास्तिमिरे निशि। तो उसकी दृष्टि धेली पर पड़ी। मावित्री ने कहा कि यह ( ३०१) अर्थ-ऐसे सुनते ही मावित्री ने चट उठ के हाथों से एतावदुक्त्वा सावित्रीशाखायांशाखिनो दृढम् ॥१२॥ बचावालम्बयत् स्यूतं गृहीत्वाशु कुठारकम् । पत्युः सकाशमागत्त्य गृहं यातुमियेप च ॥१०२॥ अर्थ-प्रत्ययान् अपने हाथ पैर झाइ के जो देखता है यहीं रहे कल ले जायेंगे। रात को अँधियारे में प्राज युल्हाटी माय रहे। इतना फहके सावित्री ने घेलो को पृत की शासा में दृढ़ बांध के घेली लटका दी। घट गुल्दाड़ी को लेके मत्य- पान के पास आकर घर चलने की चाहा ॥ निघाय वामस्कन्ये त्वे वामदोः पत्त्युरेतया । पति दक्षिणहस्तेन समालम्ब्य शनैर्ययो ॥१०३।। अर्थ -यह मायित्री पति का यायां हाप सपने पायें कन्धे पर रग कर पति को दाहिने हाय में मशाल पोर घोरपती॥ सत्यवानववीदन नित्यमाया- म्यतोऽखिलान।

( ३०२ ) पन्थानो वेद्मि वृक्षान्तः पश्यामि ज्योत्स्नयाखिलम् ॥१०॥ तस्मिन पथ्यधुना यातो यत्र प्रातः फलेग्रही। प्रत्यायातौ तु तेनैव पया मास्त्विह संशयः ॥१०॥ अर्थ-सत्यवान् वोला कि यहां मैं नित्य आता हूं इमलिये सब राहें जानता हूं और वृक्षों के बीच में चांदनी से मव देखता हूं। उस राह पर अब भाये हैं जहां सवेरे फल ले रहे थे। अपने उसी राह से लौट चले हैं जिस राह से पहिले आये थे इसमें दुविधा न करो। यायावोनरतश्च किंशुकवनासन्ने हि मार्गद्वये चेतश्चारुगिहाधुना स्ववलतो यातुं च शक्रोम्यहम् । गच्छेवाशु ममाग्रगामि पितरौ द्रष्टु मना व्याकुलं प्रोच्यैवं प्रमदादमू प्रययतुःस्वीयोटजस्यान्तिकम् १०६ अर्थ-अपने डाक के यन के पाम ओ दुराहा है उमः उत्तर में जा रहे हैं । श्रय मेरा जी भी (रोग) प्रध्दा है मैं अपने यल मे चल भी सकता हूं। अपने शीघ्र घलें मेरा आगे चलने याला मम मां बाप के देखने को पयरा रहा है ऐसा करके ये दोनों यहे हर्ष मे अपनी फुटी के पाम जाते भये । ॐइति प्रामज्ञानशाम्ने श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक परशुरामसंयादे राजवैधरामसेवकलालगुप्तकृत भापाटीफापां प्रिंशः सर्ग: *

जनकवच-
(अध्छी हो गई) उमने देखा किरात वीस गई है और सत्य-
. ( ३०३
यमस्य वरदानेन धुमत्सेनोन्यता जहा।
ददर्श रात्रि चातोता मागतः सत्यवानिति ॥१॥
सहराश्याव्याकुलेन समन्विष्टाः कुटीकुटीः ।
कुटीः सरांसि च नदीर्गियामास चाटवीः ॥२॥
अर्थ-जनक राजा परशुराम जी से कहते हैं कि इधर
यमराज के वरदान से छुमत्सेन राजा की ओर मुल गई
-
वान् आया नहीं। फिर पयरा के रानी के माप कुटी २ टूढी ।
और कुटी सरोबर नदी और बन भी वे दोनों ढूंढते भये ।।
अते वचसि कस्यापि संभ्रमादाह चाकुलः ।
एप बध्वा सहायाति सत्यवानिति संज्ञया ॥३॥
क्षतानि पादयोरासंस्तयोस्तमसि धावतोः।
शरीरं करादकैर्भिन्नं ततो रक्तमसुनुवत् ॥४॥
अर्थ-किमी की बोली सुनने पर घबडा कर संभ्रम से
अहुली दिखा कर कहता था कि यह सत्पवान् पाता है।
(रात को) अंधेरे में दाइते हुए उनके पायों में छाले पष्ट गए
शरीर बांटी से भिन गया उससे लाहू बहने लगा।
सुतार्थ दंपती धमुन्मत्तवदितस्ततः ।
वन वनमत रानौ राधास्तपस्विनः ॥५॥
पर्येत्य सांत्वपित्या व फुटी प्रावेशयच्छनैः ।
वृद्धाश्च श्रावयामासुरितिहासान पुरातनान् ॥३॥

( ३०४ ) . ददुधैर्य परन्त्वेता स्ववध्यात्मजयोगुणान् । शैशवं कर्म संस्मृत्याकुला मदतुर्मुहुः ॥णा अर्थ-वे दोनों स्त्री पुरुष के लिये पागल की माई रात को जङ्गल मैं फिर रहे थे। इनको देख के तपस्वी लोग दौड़े। उनको घेर के समझा के धीरे २ कुटो में ले गए। बूढ़े तपस्वि- यों ने पुराने इतिहास सुमिये, धीरज दिया परन्तु ये दोनों बहू बेटे के गुणों को तथा लड़कपन के कामों को सुमिर सुमिर के घय हाये हुए यार बार रोते थे । हा ! पुत्र हा! वधु क्वस्थः क्व गताविति जल्पतुः। द्रष्टुं न शेकुई दर्श तयाखं तपस्विनः ॥८॥ अर्थ-हे वेटा! हे बहू । तुम कहां हो ? कहां गए? ऐगा बड़बड़ाने लगे। तपस्वी लोग देखने के अयोग्य उनका दुःख देख न सके। एक मिजस्तता प्राह राजन् वध्यास्तपो व्रतम् । विचार्य नियनं वच्मि सत्यं जीवति सत्यवान् ॥९॥ अर्थ -तब एक बलरा बोला कि हे राजा! तुम्हारे. या के तपमत और नियमों को विचार को कहता कि सत्य- यान जीता है यह सत्य है । प्राहेको गौतमोऽन्योऽपि मया स्वाचरितं तपः। श्रुतीरङ्गानि चाधीत्य ब्राह्मचर्यादविलुतः ॥१०॥ संमेव्य च गुग्नग्निं हत्या कृत्या प्रतानि । कुशली मत्यवान सत्पमिति जानामि दिव्यदक् ॥११॥ -

अर्थ
अर्ध-एक दूसरा गौतम नाम तपस्वी भी बोला कि मैंने
उत्तम रीति से तपस्या की है वेद वेदाङ्ग पढ़ के ब्रह्मवर्य से भ्रष्ट
नहीं हुआ गुरु की मेया करके अग्नि में होम करके और व्रतों
को करके दिव्य दृष्टि से जानता हूं कि सत्य ही सत्यवान्
कुशल है।
तच्छिष्योऽथाब्रवीद्राजन् न व्यस्येद् गुरुभापितम् ।
मा भूः सत्यवतोऽर्थे त्वंव्याकुलः स तु जीवति ॥१२॥
-इप पीछे गौतम का शिष्य बोला कि हे राजा!
गुरुजी का कहना पलटेगा नहीं। सत्यवान् के लिये तुम मत
घयहाओ वह जीता है।
भरद्वाज इदं माहाकुलः किं सत्यवत्कृते ।
वैधव्ययोगी नास्त्येव सावित्र्या मास्तु ते,भ्रमः ॥१३॥
अर्थ-भरद्वाज ने यह कहा कि सत्यवान् के लिये क्यों
घयड़ाते हो । सावित्री को विधवा होने का योग हुई नहीं
तुम मम मत करो।
दाल्भ्यः प्राह यथा दृष्टनैर्मल्यं ते यथा व्रतम् ।
पध्या निर्वाढमेयं हि मुशल्येप्यति मत्यवान ॥१४॥
अर्थ -दाल्भ्य ने कहा कि मी तुम्हारी प्रांगें मध्छी
हो गई बेमे तुम्हारी यह मावित्री ने अपना व्रत निभा दिया
ऐमे ही सत्यवान् शन से भायेगा।
एवं यदा मुनिपु राजाना योगयत्सु च ।
पत्या सय मावित्री स्वाद प्राविशन्मुदा ॥१५॥

(३०६ ) अर्थ-ऐसे मुमि लोग बोल रहे हैं और राजा रानी को समझा रहे हैं इतने में सावित्री ने अपने पति के साथ ही अपनी कुटी में श्रानन्द से प्रवेश किया । तो दृष्ट्वा ब्राह्मणैरुक्तो कृपस्त्वं श्रेयसैधसे । स्वस्वक्ष्णा पश्यसि वधूपुत्री सत्यं वचो हि नः॥१६॥ अर्थ-उमको देख के ब्राह्मणों ने राजा से कहा कि आपकी बधाई है । नाप अच्छी हुई अपनी मांगों से बहू बेटा का देख रहे हो, हमलोगों की बात सच्ची हुई। श्रेयानुदर्कस्तइति गिरः स्मर पुरोऽपि नः । ततः सर्वे समेत्याग्निं प्रज्वाल्योपाविशन् सुखम् ॥२७॥ राज्ञा राड्या सत्ययता साविच्या साकमेव च । ते सत्यवन्तं प्रपच्छुचिलम्यागमकारणम् ॥१८॥ अर्थ-उत्तरोत्तर प्रापका कल्याण होने वाला है भागे भी हमारी यह यात स्मरण रक्यो । फिर सय लोग मिल के अमि जाला के राजा, रानी, मत्यवान् ग्रार सावित्री के साथ ही सुस से बैठे। और सत्यवान् को देर से शाने का कारण पूटते भये॥ कथं फुमार ! मायाता शीघं चिरयिता क्याम् । को हेतुबंहि सर्प चाफुलास्ते पितरी ययम् ॥१९॥ अर्थ-हे कुमार ! तुम दोनों शीघ्र क्यों नहीं प्राये। तुमको देर पाहां पगी। पपा कारसपा भी कहो तुम्हारे माता पिता चार हमलोग गमी पया गए थे।

(३०७) सत्यवानाह पितरावद्यापच्छ्य वनं गतः। सावित्र्या सह मे तनाकस्मादेवांसि गृहता ॥२०॥ शिरस्पीडा समुत्पन्ना शयितोऽस्मि ततश्विरम् । नैव जातु प्रसुनोऽस्मीत्येतावनि नापरम् ॥२१॥ यदायित स्तदायातो रात्रावेरव कुटी प्रति । येन यूपं नाकुलाः स्थ नान्या वार्तात्र काचन ।।२।। -सत्यवान् बोला कि माल माता पिता से पूछ के स्त्री के साथ पन में गया वहां मुझे ममिधा लेते हुए एकाएक सिर में पीर उत्पन हुई। उम पोले मैं देर तक सेाया ऐसा मैं काली नहीं मेया था। बस इतना मैं जानता हूं बार कुछ नहीं जानता । जय उठा तब रात ही को कुटी में भाया जिससे प्रापलोग नहीं घबरावें । दूसरी बात यहां कुछ नहीं है । गौतमः प्राह नयने पितुस्ते नीरजी कथम् । कुमारैतस्य नो चेत् त्वं वक्तुं शकोपि कारणम् ॥२३॥ जानती स्थाडि साचिनी साचित्रित्वं चदाधुना । गोप्या नदियं वार्ता त्यां देवोमिव मन्महे ॥२४॥ अर्थ-तिम ने कहा कि हे युमार तुम्हारे पिता की भारों कैसे अच्छी हुई इमका कारण जो तुम नहीं कह सकते तो सावित्री अवश्य जानती होगी। हे सावित्री ! तुम्हें हम- लेग देवी जैसा मानते हैं, यह बात छुपाने बीसी म हेर तेर अथ तुम कहो। सावित्रो प्राह युप्माकं विचार सत्य एव हि । गोपयामि पुरः किंवो वक्ष्ये सर्व यथामवत् ॥२५॥ 1 - ( ३०८) . अर्थ-सावित्री ने कहा कि आपलोगों का विचार ठीक है सो आपलोगों के आगे क्या शिपाऊं जैसा हुआ है सब कहती हूं। महात्मना नारदेन प्रोक्तमासीत् पुरा मम । पितरावपि जानीतः पत्युनिधनमन्दतः ॥२६॥ अत एव मया चीर्ण व्रतं कष्टतमं महत् । दिनमासीत् तदेवाघ नातस्तैर्वियुताभवम् ॥२७॥ अर्थ-महात्मा नारदजी ने मुझे पहिले कहा था कि एक वर्ष से तेरे पति का मरण होगा यह बात'मायाप भी जानते हैं। इसी लिये मैंने अत्यन्त कष्ट का बड़ा व्रत किया । घही दिन आज था इसी लिये मैं उमसे अलग नहीं हुई। यम आगत्य सुप्तानां तेषां जीयं नियध्य च । प्रस्थितो दक्षिणामाशां तद् दृष्ट्वाहं तमादरात् ॥२८॥ प्रसादयामास मुहुः स्तुत्या निर्वर्ण्य तद्गुणान् । तैम पञ्च वरा दत्ता दण्डपाशधरै रपि ॥२९॥ अर्थ-वे सोने पर यमराज प्रासर उनके जीय को यांध के दक्षिण दिशा की ओर चले । वह देश के मैंने प्रादर से यरायर उनके गुणों को यसान के स्तुति करके उनको प्रसन्न फिया । दण्टा घोर फांसी धारण किये हुए भी उन्होंने मुझे पांच यर दिये। एकेन तन नीश्यत्यं दत्तं श्वशुरनेत्रयोः। निशा राज्यमन्येनान्येन पुत्राः शतंपितुः ॥३०॥ #1 ( '३०९ ) अर्थ- - चतुर्थेन वरेणैवं मम दत्ताः शतं सुताः। मत्पतेः पञ्चमेनायुर्दत्तमदचतुःशतम् ॥३२॥ मन्ये व्रतस्याचरणाद्भगवत्याः प्रसादतः । निरन्तरायं सर्वेऽपि पूर्णा मम मनोरथाः ॥३२॥ -उन पांचो वरो में एक से मसुरजी की शांखों का अच्छा होना दिया। दूसरे से उन को शत्रुरहित राज्य दिया। तीसरे से पिताजी को सौ पुत्र दिये। ऐसे चौधे बर से मुझे सौ पुत्र दिये। पांचवे वर से मेरे पति को धार मे वरम का आयुर्दाय दिया। मैं ऐमा मानती हूं कि व्रत के करने से और भगवती के प्रसाद से बिना विघ्न के मेरे सय मारथ पूरे हुए। तपस्विन ऊचुः- दिष्ट्या सावित्रि ! धन्यासि साधुसाधु पतिव्रते । यनिमजन्नुपकुलं स्वपुण्येनोधृतं त्वया ॥३३॥ अर्थ-तपस्वी लोक बोले कि हे साविनी ! प्रानन्द है कि तू धन्य है । वाह ' बाह । पतिव्रता वाह जो डूबते हुए राजा के फुल का तूने अपने पुण्य से उद्धार किया । तएवमुक्त्वा पचनं प्रशंसन्तस्तपस्विनः । स्यवन्तं च राजानमारच्छय स्व गृहं ययुः ॥३४॥ अर्थ-वे तपस्वी लोग ऐसा वचन कहके यड़ाई करते हुए सत्ययान् और राजा से पूछ फर (विदा हो कर अपने अपने घर जाते सये। सर्षे प्रातरधान्यानित्यकृत्यं विचाय च । । -- ( ३१०) समेत्य राजनिकटे सावित्र्या अस्तुवन् गुणान् ॥३॥ -~-इस पीछे दूसरे दिन प्रातःकाल मब लोग नित्त- नेम करके राजा के पास इकट्ठे हो कर सावित्री के गुणों को 'बखानने लगे। अस्मिन् काले शाल्वदेशादागत्य बहवो जनाः । राजानं प्रणिपत्याहुः कञ्चित् स्मरथ नो निजान् ॥३६॥ अर्थ- -इस समय शाल्वदेश से बहुत से लोग आ कर राजा को प्रणाम करके बोले कि (हमलोग श्राप के हैं) हमारा आप अभी स्मरण करते हैं क्या? मन्त्रिणा निहतोऽद्यत्वे महाराज! तवाहितः । नाशिपन् वान्धवास्तस्य विध्वस्तं तहलं महत् ॥३७॥ सबै नागरिकैरेकीभूयैतत् सुविचारितम् । भवन्तमेव राजत्वेभिपेक्ष्यामोऽद्य मा चिरम् ॥२८॥ अतश्च चतुरङ्गेण चलेन सहिता वयम् । त्वामितो नेतुमायाताः कृपया स्त्री कुरुष्व तत् ॥२८॥ अर्थ-हे महाराज ! भाजफल आपके शत्रु को मन्त्री ने मार डाला है उसके भाई यन्धु कोई नहीं बचे। उमकी घड़ी भारी सेना सय तितर यितर हो गई। फिर मारे नगर के लोगों ने एक मत हाके यह विचारा कि प्राज साप ही को राज्याभिषेक करेंगे देर न हो। इसलिये रथ, हाथी, घोड़े पैदल चतुरसेना को माय लेकर हमलोग सापको ले जाने के लिये साये हैं यह आप पा करके स्वीकार करें। 1 ( ३२१ ॥ त्वदाज्ञा ख्यापिना तत्र स्वं देशं याहि मा चिरम् । सिंहासनं समारोह पुनः पूर्वेरधिष्ठिनम् ॥४०॥ दिष्ट्या सद्भाग्यमस्माकमाश्चर्य जनतासु च । नीरुजी यद् भयन्नेत्रे इत्युक्त्वा तउपारमन् ॥४१॥ अर्थ--यहां भाप की दोहाई फिर गई है अब अपने देश में पलिये देर न हो। पहिले पुरसा लोग जिसपर बैठे थे उस सिंहासन पर फिर वैठिये। जो भापकी शाखें अच्छी हो गई यह मानन्द है, हमलोगों का अच्छा जाग्य है और (दुनियां में) जगत में आश्चर्य की बात है। ऐसा कहके लोग धुप हुए। राजा राश्या पुत्रेण वध्वा च सह तान्योन् । संप्रणम्याशिपः प्राप्य स्वं देशं प्रस्थिनो मुदा ॥४२॥ नगरं प्रविशत्येव राज्ञि मनिपुरोहितैः। नृपोऽभ्यपेचि राजत्ये कुमारो युवराट् पदे ॥४३॥ अर्थ-इस पीछे रामा, रानी कुंभर और बहू के साथ उन ऋपियों को सीस नवा के उनसे अमीस पाकै मानन्द से अपने देश को गए । राजा नगर में प्रवेश करते ही प्रधान और पुरोहितों ने राजा को राजा पद पर और कुंभर को युवराज पद (कुंधर पदे) पर अभिषेक लिया। सोऽशासीत् पृथिवींनृपोऽध कतिचित्कालेऽप्यतीतेतनः साविश्या अभवन् शतं सुतनयास्तद्वच्छतं भ्रातरः। सर्व सद्गुणिनो नता विनय- ( ३१२ ) तस्तेजस्विनो धार्मिका आसंस्ने सुखिनस्तथैव भगवान् सर्वान् विधत्तांभुवि॥४४॥ अर्थ- यह धमत्सेन राजा पृथिवी पर राज्य करता भया उस पीळे कुछ भी काल बीतने पर सावित्री को सै उत्तम पुत्र हुए वैसे ही सो भाई भी हुए। वे सभी जैसे सद्गुण वाले विनय से नत्र तेजस्वी धर्मवान् और सुखी हुए वैसे ही भगवान् पृथ्वी पर सञों को करें। अनक उवाच- अधः सावित्र्येवं कर्मयोगाद्नेकान् भुक्त्वा भोगानत्र पत्या सहैव । प्राप ज्ञानं धर्मराजप्रसादा- न्मुक्ति च स्वैः कर्मभिः पशुराम॥४५॥ - जनक राजा कहते हैं कि हे परशुरामजी ! इस प्रकार नावित्री ने कर्मयोग से यहां पति के साथ नानेक उप- भोग करके धर्मराज के प्रसाद से जान पा के घपने कमों ही से मोक्ष कोनी पाया। इति नामज्ञानशास्त्रे श्रीवाल्मीकिमुनिकृने जनक परशुरामसंयाद राजवैद्यरामसेयकलालगुप्तकृत भापाटीकायां चतुर्थः सर्गः ॥३४|| उपचारः पोटामिः पुप्पैर्नानाविधेयजेत् । जनक उवाच- फरफे रहे। मध्याह मे दूध पोफर रहे वा फलाहार करे। ब्रह्मणा सह सावित्री भक्त्यामायां समर्चयेत् । अधस्तादटवृक्षस्य वित्तशाव्यविवर्जितम् ॥४॥ नालासहित सावित्री का पूजन करे सामय रहते न्यूनता परशुराम उवाच- सौभाग्यप्राप्तये चीर्ण साविश्या त्रिदिनं व्रतम् । को विधिस्तस्य कृपया राजन मे वक्तुमर्हसि ॥१॥ परशुरामजी प्रश्न करते हैं कि सौभाग्य मिलने के लिये सावित्री ने छीन दिन व्रत किया उसका विधि क्या है ? राजन् ! वह मुझे कहिये। पूर्णान्तमासमानेन ज्येष्ठामायां स्त्रिया व्रतम् । सावित्रीप्रीतये कार्य त्रिदिनं व्रतमिप्यते ॥२॥ अर्थ-पुनधासी को समाप्त होने वाले महीने से जेठ की अमावस के दिन सावित्री यो प्रीत्यर्घ स्त्री ने व्रत करना। व्रत तीन दिन करना चाहिये । प्रयोदशी समारभ्य ब्रह्मचर्यव्रते स्थिता । कृत्वैकभुक्तं मध्याहे पयो या व्रतयेत् फलम् ॥३॥ अर्थ--जेठ यदी तेरस से लेके ग्रलयर्य व्रत में एक भुक्त समायग के दिन बह के वृक्ष के नीचे शक्ति से अर्थ- न करे।

( ३१४) विविधान्ययेनारी पफान्नानि फलानि च ॥शा अर्थ-पोडशोपचार से पूजन करे । अनेक प्रकार के पुष्पों से पूजन करे स्त्री अनेक पक्वान्न और अनेक फल मावित्री देवी को समर्पण करे! वटमूले पयः सिक्त्या चटं सूत्रेण वेष्टयेत् । सप्त प्रदक्षिणाः कुर्वन् नमस्कुर्यात सदाशिवम् ॥६॥ अर्थ-घड के जाड़ में जल सौंच यह को नारे से रक्षा- चन्धन फरे अर्यात् (भूत लपेटे) सात प्रदक्षिणा करते हुए वटरूपी महादेवजी को नमस्कार करे। न वियुक्तासि पत्या त्वं यथा सापित्र्यहं तथा । यावजीयं पतिवियुङ न च स्यां त्वत्प्रसादतः ॥७॥ यटरूपःशिवाऽसि त्यं मूलैः शाखाभिराततः। यथा तथा कुटुम्वेन सन्तानः प्रतनुप्व माम् ॥८॥ एवं संप्रार्थ्य सावित्री चटरूपं च शंकरम् । ततश्चाप्टोत्तरशतं जुठुयात् पायसेन तु ॥९॥ अर्थ-हे मायित्री देवी । जैसे आप अपने पति ग्रहला जी मे फभी अलग नहीं होती है येसे दो मैं भापके प्रमाद से जीऊ जय तक पति से अलग होकं । भाप यटरुपी शिय जी है मे श्राप मूल और शाणा से फैले हुए घा पड़े हुए हैं थेमे ही फुटुभ्य और मन्तानों मे मुझे भी फेलाइये या पढ़ाये इस प्रकार सावित्री भार यदापी शियनी की प्रार्थना करके मा नाट यार फिर तीर मे होम फरे॥ एक ( ३१५ ) - तता प्रसादशेपान्नं भुशीतैवं व्रतं वधूः । कुर्यात् त्रिदिनमेकाहं दर्श वा भक्तिसंयुता ॥१०॥ अर्थ F~ठस पीछे प्रसाद का शेष अन्न (होम शेष) भोजन करे। स्त्री भक्तियुक्त होके इस प्रकार व्रत तीन दिन करे अथवा एक दिन प्रमावस को करे । कमठाभिईिजस्त्रीभित्रंत कार्य तु वैदिकम् । शूद्राणां नैव वेदोक्तं नाममन्त्रर्यजन्तु ताः ॥१२॥ अर्थ-स्वकर्म तत्पर वालण क्षत्रिय और वैश्य की स्त्रियों ने व्रत वेदमन्त्रों से करना शूद्र की स्त्रियों के वेद मन्त्र नहीं वे नाममन्त्र से पूजन करें। एवं सायिच्या व्रत पशुराम या स्त्री कुर्यात सातु देव्याः प्रसादात् । वैधव्यं न प्राप्नुयात् पुनविर्स- युक्ता पत्यान्ते सुखं स्वर्वसेच ॥१२॥ अर्थ-हे पाशुराम इस प्रकार सावित्री का व्रत और स्त्री फरेगी यह तो देवी सावित्री के प्रसाद से वैधव्य को नहीं प्राप्त होगी । पुत्रों से और धन से युक्त हेगी। अन्तकाल में पति के साथ स्वर्ग में वास भी करेगी। इति ब्रह्मज्ञानशास्त्रे श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक परशुरामसंवादे राजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत भापाटीकायां पञ्चत्रिंशः सर्गः ॥शा जनक उवाच- पुरातनतमं चैकं ब्रह्मज्ञानं हिताय ते । पशुराम प्रवक्ष्यामि सावधानमनाः शृणु ॥१॥ अर्थ-जनकजी बोले कि हे परशुराम मैं बहुत पुराना एक ब्रह्मज्ञान तुम्हारे हित के लिये कहता हूं से सावधान हो कर सुनो। पुरा मनुः स्वपितरं पप्रच्छैत्य पितामहम् । एक सातापदिश मे ब्रह्मज्ञानं पुरातनम् ॥२॥ अर्थ-पूर्वकाल में मनुजी अपने पिता ब्रह्माजी के पास जाकर पूछने लगे कि हे पिता मुख्य प्राचीन ब्रह्मज्ञान का मुझे उपदेश कीजिये। तदा ब्रह्मा मुदा युक्त प्राधन्योऽसि पुत्रक । वेत्सि सर्व परोक्षं ते किंचिदप्यस्ति वस्तु नो ॥३॥ अर्थ तय ब्रह्माजी ने प्रसन्न हो कर कहा कि हे पुत्र तुम धन्य हो तुम सय कुछ जानते हे तुमसे कोई वस्तु छिपी नहीं है। वेत्सि वेदत्रयीं सम्यक स्पनाना निर्मिता स्मृतिः। त्यया चेदानुकूलय तां जात्या व्रम तदिदुः ॥४॥ मुनयश्चाध विधांसी धर्मानुपदिशन्ति च । मजा पान्ति र राजाना धर्मसीमावशा विशः ॥५॥ स्वधर्मतत्पराः शूद्राः सेवन्ते सर्यदा टिजान् । युगेपु भाग्नमेतद्धि प्रमाणं स्यातुपि ।।३।।

(३१७) - अर्थ-तुम तीनों वेदों को अच्छी तरह से जानते ही और तुमने अपने नाम से एक धर्मशास्त्र बनाया है वह वेदों के अनुकूल ही है उसको जान कर मुनि लोग उप्त ब्रह्म को जानते हैं और पण्डित लोग धी का उपदेश करते हैं। क्षत्रिय लोग प्रजाओं का पालन करते हैं, वैश्यलोग धर्म की मर्यादा के वश रहते हैं। और शूद्र लोग अपने धर्म में तत्पर हाके सदा ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यों ही सेवा करते है निश्चय है कि यह शास्त्र चारों युगों में प्रमाण गिमा जायगा। - न मन्येत मनुप्रोक्तं शास्त्रं यः कोपि मानवः । स ब्रह्महा स्यान्नरके वसेदाचन्दतारकम् ॥७॥ वर्तनीयं बुधैस्तस्मादेतच्छास्त्रानुसारतः । तविरुद्ध यदेत् कश्चित् तन्मन्येत कदापि न ॥ अर्थ---जो कोई मनुष्य मनु के कहे हुए धर्मशास्त्र को नहीं मानेगा वह ब्रह्म हत्यारी हेगा और जब तक मूर्य और चन्द्रमा हैं तब तक नरक में वास करेगा। इसलिये विद्वानों ने इस शास्त्र के अनुसार वरतना चाहिये। उसके विरुद्ध जो कोई कहे उसको कदापि नहीं मानना ॥ वजनानपि वत्सै मन्मर्यादा रिरिनिपुः । पृच्चस्येकांप्रमनसा तच्छृणुष्व शमस्तु ते ॥६॥ अर्थ-हे पुत्र तुम ऐसा सब जानते हुए मेरो मर्यादा रखने की इच्छा से पूछते हो सो एकाय पित हो कर मुनो तुम्हारा फल्यारा हो।

( ३१८ ) ईशा वास्यमिद सर्व यत् किंच जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृथः कस्य स्विडनम् ॥१०॥ अर्थ -इस संपूर्ण जगत् को (ईशा) परमेश्वर स्वरूप प्रात्मा के रूप से ढंक देना चाहिये अर्थात् दूसरा जगत् में कुछ नहीं है ऐसा विचार करना चाहिये । जोकुछ तीनों लोक में वस्तु है उसकी ममता ( पह मेरा है) छोड़ के उपग करो। उसकी अभिलापा (यह मुझे चाहिये इत्यादि) मत करो। क्योंकि धन किसका है? किसीका नहीं। P कुर्वन्नवेहकर्माणि जिजीविपेच्छत समाः। एवं त्वयि नान्यधेतोऽस्ति न फर्म लिप्यते नरे ॥११॥ अर्थ-यहां इहलोक में फर्म करते हुए ही से बरस जीना चाहो। ऐसा करने से मनुष्यरूप तुम में (मात्मा में) फर्म लिप्त नहीं होता। इससे अन्यथा अर्थात् कर्तव्य कर्म नहीं करने से फर्म लिप्त नहीं होने का उपाय नहीं है। क्योंकि यिना कर्म के कोई रह नहीं सकता तघ जो कर्म उससे बनेगा उसीसे यह लिप्त होगा उमसे यह बँध जायगा, ऐसा कर्तव्य या यागादि फनी से नहीं बँध सकता यह अभिप्राय है ॥ असुर्या नाम ते लोका अन्धेत तमसा घृताः। तांस्ते प्रेत्यापिगच्छन्ति ये के चास्महनो जनाः ॥१२॥ अर्थ- कोई कठप फर्म नहीं करने वाले मर्यात् कामनाया से काम्प कम करने वाले अपांदेय प्रात्मा के नाश फरने यासे मनुष्य एंघे मरने के उपरान्त सन लोकों में या तम ( ३१९ ) जन्मों में प्राप्त होते हैं। जो लोक भ्रसुरों के हैं और अधियारे से घिरे हुए हैं। जो जन्म अपने प्राण पालने के हैं और अज्ञान से ढंके हैं। अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनन देवा आप्नुपन पूर्वमर्शत् । तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत् तस्मिन्नपो मातरिश्वा धाति ॥१३॥ अर्थ- -मात्मा एक है, अपनी अवस्था से डुलता नहीं, मन से भी अधिक उसका वेग है। देवता भी उसको नहीं पर सकते अर्थात् नहीं जान सकते। अथवा (देव) इन्द्रिय उसको नहीं पा सकते क्योंकि प्रात्मा मन से अधिक वेग घाला है। (पूर्वमर्शत्) जो देवताओं के वा मन इन्द्रिय आदियों के पहिले भी विद्यमान है नष्ट नहीं होता। जो (तिष्ठत् ) स्वयं विकार रहित रह के दैाहने वालों को पीछे कर देता है। उस आत्मा में वायु (अपः)प्राप्त होने वाले कर्मों को स्थापित कर देता है। तदेजति तन्नेजति तद् दूरे तदन्तिके। तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य याह्यतः ॥१४॥ अर्थ-यह प्रामा चलता है ऐसा मुढ दृष्टि से मन में प्राता है सो यह नहीं हुलता है स्थिर है। जो दूर है ऐमा भासता है यह पास ही है। वह इस संपूर्ण जगत् के भीतर और बाहर दोनों ओर है । अषया जगमरूप से वह चलता ( ३२०) है स्थावररूप से नहीं चलता। नक्षत्रादिरूप से दूर है पृथ्वी रूप से पास है। प्रालियों के भीतर विज्ञानरूप से है जरूप से बाहर है। सारांश सभी आत्मरूप है। यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्नेवानुपश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न पिचिकित्सति ॥१५॥ अर्थ- जो पुरुप सब भूतों को प्रकृति से स्थावर पर्यन्त सय चेतनों को आत्मा ही में देखता है प्रात्मा से अलग नहीं मानता और संपूर्ण चेतनों में प्रात्मा को देखता है उस देखने से उनको सन्देह नहीं होता! जय सय चेतनों को प्रात्मा में देखता है तब उनके सुख से मुखी उनके दुःख से दुःखी हेाता है और जब सय चेतनों में प्रात्मा को देखता है तब सब को मुसही देगा दुःस की न देगा तय सन्देह का अवसर ही यया रहा? अथवा प्रात्मा से अन्य दूसरा कोई नहीं है ऐसा जो देखता है उसको दूसरा कोई नहीं रहने से ही सन्देह का अवसर नहीं॥ यस्मिम् सर्वाणि भूनान्यात्मैपाभूद् विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥१६॥ अप- -शाता पुरुष के जिस अयस्था में गय घेतम मात्र मात्मा ही यन गए हैं नम अयस्या में उस एकता देखने वाले को मोह और शोक पपाश समता है? स पर्यगाच्छमकायमन्त्रण- मस्नायिरगुडमपापपिडम् ।

(३२१ ) , कचिमनीपी परिभः स्वयंभू- योधातध्यतार्थान् व्यद्धाच्छाश्वतीभ्यासमाभ्यः१७ अर्थ -वह ज्ञानी पुरुप (कवि) पग पग का वृत्तान्त जानने वाला बुद्धिमान् मर्व जगद्रूप स्वयं एकरूप है इससे शुद्ध शरीर रहित अतएव व्रणरहित तथा (स्नायु) नसे से रहित (शुद्ध) मत्यादिगुणों से अलिप्त अत एव पाप रहित या क्लेश कर्म विपाक प्राशय इनके स्पर्श से रहित जो ब्रह्म है उनको पाता है वा जानता है । और वह अनन्त वीं तक ययार्थ रूप से कर्तव्य अों को सिद्ध करता है। अन्धं नमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते। ततो भूय इव ते तमा यउ संभूत्या , रताः ॥१८॥ अर्थ-जो पुरुष प्रसंभव पुनर्जन्म नहीं हेमावा प्रात्मा का नष्ट होना मानते हैं अयानमभव मिथ्याप माया के कार्यों फेर मानते हैं ये नन्धियारे में घुमते हैं अर्थात् उनको तान प्राप्ति नहीं होती। फिर जो संभय फेवन प्रमही को मानते हैं कर्तव्य कमों में यदिभूत हैं सपना मंभव कार्यकारी गगुम प्रहम की ही पामना करते हैं ये उनमे भी अधिक संधियारे में पुमसे हैं अर्यात् ये उनसे भी अधिक मानी हैं। अगदेवाहुः संभवादन्यदारसंभगत् । इति शुभ्रम घोराणां ये नस्तहिचक्षिरे ॥१९॥ -सय में केयन प्रानोपामनामे या कार्यकारी लोशगना मे मारीसणिमादिमिहि मिटाने का फत्र ( ३२२ ) है। ऐमा ही प्रसंभव की उपामना से अंधियारे में घुसना वा प्रकृति में लय होना अथवा मिथ्यारूप जगत् का भी अनुभव लेना इत्यादि फल है, ऐसा वे विद्वान् लोग कहते हैं और उनकी बातों को हन सुनते जाते हैं जिन विद्वानों ने हमलेागों के लिये व्याख्यान दिये हैं। मभूतिं च विनाशंच यस्तछेदोभय सह । विनाशेन मृत्यु ती. संभूत्वामृतमश्नुते ॥२०॥ अर्थ -सव ब्रम, विनाश शरीर दोनों को जो पुरुष एक साथ रहने वाला नामता हे अतएव शरीर से निष्काम फर्तव्य कर्म करता है वह बिनाश से शरीर से. मृत्यु से तर जाने का कार्य करके ब्रोपामना से मोक्ष को प्राप्त होता है। अथवा संभव तत्पन्न होना विनाश मर जाना दोनों को शरीर में एक साथ जो जानता है वह उपाय में अवश्य प्रवृत्त होगा मरण वा उमके दुःखों के देखने से मृत्यु से तर जाना चाह के जन्म पाके मेति माधन करके तमको पाता है। अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । तता भय इव ते तमो यउ विद्याया रताः ॥२१॥ अर्थ-विद्या केयान अग्निहोत्रादि कर्म झरना प्रात्मा को न जानना है। विद्या के ग्रामसान, देवता और फों फोम जानमाम्या ग मानना है। जो लोग वनविद्या की पामना करते हैं, ये धिपारे में घुमते है अर्थात् प्रशानी है, फिर जी के ग्राम विद्या में ग्राम ये कर्तव्यफर्म न करने . ।

(३२३) के दोष से वा देवता शाप से उमसे अधिक अधियारे में घुसते है अधिक जानी हेासे हैं । अन्यदेवाहुविद्याया अन्यदाहुरविद्यायाः। इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचनक्षिरे ॥२२॥ अर्थ-विद्या का ब्रह्मज्ञान का मोक्षरूप और ही फल है अविद्या का कर्तव्य कमी का पितृलोकादि और ही फल है. ऐसा कहते हैं। जिन लोगों ने हमलोगों के लिये व्याख्यान दिये हैं, उन विद्वानों के ऐसे बधग हैं। चिद्यां चाविद्यां च यस्तदोभय सह । अविद्या मृत्यु तीा विद्ययामृतमश्नुते ॥२३॥ अर्थ-विद्या ब्रह्म ज्ञान या देवातावान विद्या कर्तव्य कर्मज्ञान दोनों को जो एक साथ जानता है वह फतव्य कर्म के ज्ञान से मृत्यु से तरने का उपाय फरक बलशान वा देवता शाम से मोक्ष को प्राप्त होता है। वायुरनिलममृामधेदं भस्मान्त * शरीरम् । ३ को भर लिने स्मर कृत स्मर ॥२४॥ अर्थ-(वायु) मूत्म शरीर (अनिल) परिशुद्ध बुद्धि- तत्व को तथा (अमृत) अधिदेवत मर्यात्मरूप को प्राप्त हो, यह प्रार्थना है। स्यूल शरीर का अन्त भस्म होने तक है अर्थात् इसका एक र भययव अलग हो जाने का है। ॐार ब्रह्म- वादक है स ॐ यह परनेश्वर मा सम्बोधन है प्रपात वन को ॐ इस नाम से पुकार के फहते हैं कि हे ॐ (तो संच- (३२४) ल्पात्मक कर्मरूप)स्मरण करो अर्थात् ब्रह्मचर्य में वा गार्हस्थ्य में आपकी सेवा की है उसका स्मरण करो (लिवे) मेरे लिये जो प्रापका कल्पना किया हुआ सोचा हुआ लोक है उसका स्मरण करो और जो मैंने जन्म से अब तक कर्म किये हैं उन का स्मरण करे॥ . अग्ने नय सुपथा राये अस्मान विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्ति विधेम ॥२५॥ अर्थ-हे अग्ने है अनिरूप परमेश्वर (देव) दातार (राये) मुक्तिरूप उत्तम धन मिलने के लिये हमको अच्छी राह से देवमार्ग से अथवा जन्ममरणरहित मार्ग, से लेचलो। प्राप भय [धयुन] फी के या प्रज्ञानों के जानने वाले हैं। हमारे (जुहुराण) विपरीत प्रतिवन्ध करने वाले पापों से हमको अलग फरी वा मनसे लड़े। हम तुमको यहुत से नमस्कार फरेंगे अर्थात् प्रणामरूप तुम्हारी सेवा करेंगे। हिरमधेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुग्वम् । योऽसायादित्ये पुरुपः सेोऽसावहम् ।। ॐ खंब्राम ॥२६॥ अर्थ-(हिगमप पात्र) ज्योतीरूप मण्डलसे, मत्य मृत्यं मयष्ठान में म्यित पुरुष हे उमफा मुरा शरीर ढंका हुआ है सपापि शो मूर्यमहल में पुरुष है यह यह मैं हूं। ॐ ग्रह साकायम है। यह अन्त में भायना करने का प्रकार है इति।

{३२५ )
ज्ञानं पितुः समधिगम्य मनुस्त्वथैव
स्तुत्या प्रणम्य मुदतः पितरं वभाषे।
श्रेप्टो मया प्रणव एव मतः स्वशास्त्रे-
प्यध्वा परः प्रणवतो न परेशमाप्तुम् ॥२७॥
अर्थ-ऐमा पिता के पास से ज्ञान को प्राप्त करके स्वायं
भुव मनुजी उनको प्रणाम करके उनकी स्तुति करके बोले । हे
पिता मैने अपने शास्त्र में भी प्रणव ही को श्रेष्ठ माना है पर-
मात्मा के मिलने के लिये प्रणव को छोड़ के दूसरा मार्ग
नहीं है।
इति ब्रह्मज्ञानशास्त्रे श्रीवाल्मीकिमुनिकृते जनक
परशुरामसंवादे राजवैद्यरामसेवकलालगुप्तकृत
भापाटोकायां पत्रिंशः सर्गः ॥३६॥

(३२६) वाल्मीफिरुपाच- एवं परशुरामस्तु लब्ध्वा ज्ञानं विदेहतः । सन्तुष्टः क्रोधमजहात् ततो वचनमन्त्रवीत् ॥२॥ श्रर्थ-वाल्मीकि पि रामचन्द्र जी से कहते हैं कि इस प्रकार परशुरामजी ने जनक राजा से ज्ञान पाके प्रसन्न हे। घर क्रोध को त्याग किया फिर वचन बोले ॥ राजन् शान्तो मम क्रोधो मया त्वाचरितं बहु । दुरित' यद्धेनासीन्मुहुः क्षत्रियसंहतेः ॥२॥ अद्यप्रभृति जीवानां विधास्ये न वधं भुवि । दास्ये न दुःखं केपांचित् प्रतिज्ञेयं ममेदृशी ॥३॥ अर्थ-हे जनक राजा ! मेरा क्रोध शान्त हुआ, मैंने तो यहुत पाप किया जो पाप बायर क्षत्रिय समुदायों के मारने से हुआ है । मैं नाज से भूमि पर जीवों का वध नहीं करूंगा और किसीको दुःस नहीं दूंगा ऐसी यह मेरी प्रतिज्ञा है । महात्मने कश्यपाय विजितां पृथिवीमहम् । दत्या गत्या महेन्द्राद्री स्थास्ये तं प्रएवं स्मरन् ॥४॥ यथोपदिष्टं भवता तजपन्तस्तपःस्थिताः । तातपादो निश्चिनोमि तस्मादमित्र उत्तमः॥५॥ न विना प्रणाभ्यामान्मुक्तिभाक् कोऽपि जायते । नातः परतगे मन्त्रः कोऽपि श्रेयस्करो मुधि ॥६॥ महदाकारजपतः पापं नस्येन्ममाग्विलम् । फरोत्पमिकणा यहत् तृलराशिं हि भस्मसात् ॥णा ३२७) अर्थ --अब क्षत्रियों से जीती हुई पृथ्वी को महात्मा कश्यपजी को दान करके महेन्द्राचल पर जाकर उम प्रणव का स्मरण करता हुआ मैं दहरूंगा । जैसा आपने उपदेश किया उसका जप करते हुए. मेरे पिता जी तपस्या करते थे उमसे निश्चय करता हूं कि ओंकार मंत्र उत्तम है। विना प्रणव के अभ्यास के कोई भी मुक्ति को प्राप्त नहीं होता इनलिये प्रणव छोड़ के दूमरा मंत्र कोई भी भूमि पर कल्याण कारफ नहीं है। एक बार ॐकार का जप करने से मेरा मय पाप नष्ट हो जायगा । जैसा एक अग्मि का फण रूई के ढेर यो भस्म फर देता है। प्रणयः सर्वमन्त्रेभ्यो नामभ्यः परमात्मनः । मुने श्रेष्ठतमः प्रोक्तस्तं जपन्तः सदा स्थिताः । सन्यासिनश्व मुनयो प्रावक्षत्रपिशस्तथा । तं नो विदुस्ते पशवोऽमुत्र नारकगामिनः ॥९॥ अध 5-जनस जी कहते हैं कि हे परशुराम मराय मय मंगों से तथा परमात्मा के मय नामों में श्रेष्ठ है । मन्यामी, मुनि मानग, क्षत्रिय, वैश्य TT मयंदा जप करते हुए स्थित है। लोग कार को नहीं जाते ये पार मरने पर नरक में जाते हैं। साक्षवर्ष जपन्मग्रमा सिनि चिन्ति । मुचि पामोडमारजपात ते लमते पुमान् ॥३०॥ स्मरेदामित्येन्दान्ते गृत्यायः किंचिदप्यम् ।

(३२८)
उदादिनं तदर्थं तु स्वारं नात्र संशयः ॥११॥
स्मृतिमत्यन्तकाले पशुराम सुदुलभा।
त्वमुपिया महेन्द्राद्रा स्मरामिति दृढ़ासनः ॥१२॥
सुखं ब्रह्मणि लीनः स्याः स्वःप्राप्तिःकिं नु दुर्लभा।
पशुरामावयाः सत्यसंवाद या वदेदसत् ॥१३॥
स लक्षव्रह्मत्याया दुरितं निश्चयालभेत् ।
निरये च पतेयावत् सूर्याचन्द्रमसो दिधि ॥१४॥
अर्थ -अन्य मंत्र लक्ष वर्ष जप करने पर भी मनुष्य
सिद्धि को तथा मुक्ति को नहीं पाता और तीन दिन आकार
के जप करने से मिद्धि और मुक्ति दोनों को पाता है। जो
अन्तकाल में एकयार आँकार स्मरण करे वह कितना भी पाप
किये हुए है। उमके लिये स्वर्ग का द्वार सुला हुशा है इसमें
सन्देह नहीं। हे परशुरामजी अन्त काल में आँकार का स्मरण
होना अत्यन्त दुर्लभ है। प्रय तुम महेन्द्रा चल पर याम करके
दृढ़ धामन मार फरके ऑफार का स्मरण करो तो भुरा से
ब्रह्म में लीन होजाओगे फिर स्वर्ग की प्राप्ति क्या दुर्लभ है।
हे परशुरामजी। जो पुरुष हमारे तुम्हारे मंवाद को झूठा
कहेगा यह निश्चय करके लारा ग्रहहत्या के पाप को पावेगा
और ना तक भाफाश में मूर्य और चन्द्रमा हैं तय तफ नरक
याम करेगा।
-
इदं नामज्ञानशास्त्रं लुयाय फुटिलाय च ।
एम्पटाय मध्नाय दुप्टाय ययनाय न ॥१५॥

( ३२९)
जातु वाच्यं वेदशास्त्रनिन्दातत्पर चेतसे ।
एतद् गुह्यतमं ज्ञानं श्रेष्ठं जगति नापरम् ॥१६॥
अर्थ-यह ब्रह्मशान शास्त्र लोभी को, कुटिल को लंपट
को कृतान को, दुष्ट को और ययन को कभी नहीं कहना जिसका
पित्त वेद शास्त्र की निन्दा में तत्पर है उनको भी नहीं कहना
यह जान अत्यन्त गुप्त है जगत् में दृमरा श्रेष्ठ शान नहीं है ।
सन्यासयोगयुक्तो यः पण्डिनो ब्राह्मणो मुनिः।
त्रिप घेदेप्येकमपि न वेद न मनुस्मृतिम् ॥१७॥
न मारह कोपनिपदंन न ब्रामज्ञानशास्त्रकम् ।
पश्तुन्यःम तस्य स्युः क्रियाः मर्यास्तु निष्फलाः ॥२८॥
तस्मै दानमपार्थ स्याद्ययामे मृद्धटे जलम् ।
स स्वयं नरकं याति यजमान नपत्यपि ॥१२॥
अर्थ-गो भन्यागी, पण्डित, मानप या मुनि तीनों
चेदों में से एक की येद, मनुस्मति, मागोपनिषद् मार
मानना को नहीं जानता यह पशुमपानमकी
मप किया निकन हांगी उगो दान देगा योगा
माये मिष्ट्री से परे में शरणमा है। यह भाप नरम
में जाता है और पलमान को भी गापनाता है।
नातानमार मपोतं पशुराम नन ।
मन्यामिनां मुनीनां चमानिनां यानिमियम ॥२०॥
इदमेय पुरा मानानयानुसार।
उपदि गुमन्तुप्पः म म म गतः ॥२३॥

अर्थ-हे परशुरामजी यह ब्रह्मज्ञान शास्त्र मैंने तुमको कहा वह सन्यासी, मुनि और ज्ञानी जनों को अति प्रिय होगा। शुकदेवजी को इसी ब्रह्मज्ञान शाख का मैंने उपदेश किया ये सन्तुष्ट हो कर ब्रह्म में लीन हो गए। वाल्मीकिरवाच- श्रुत्येदं पशुरामोऽपि मुनये कश्यपाय तु । अस्खिलां पृथियों प्रादाहते माहेन्द्रपर्वतात् ॥२२॥ चकमे स्वनिवासार्थ सच तो पर्वतस्थलीम् । वसुमत्यां प्रदत्तायां न चास चितो यतः ॥२३॥ अर्थ- वाल्मीकि मुनि रामचन्द्रजी से कहते हैं कि परशुरामजी ने यह सुन कर कश्यप मुनि को महेन्द्राचल छोड़ मय पृथिवी का दान कर दिया और उस महेन्द्राचल के स्थल को अपने रहने के लिये चाहा जो उसका भी दान कर देते तो उसमें रहना उचित नहीं था। ततः परशुरामस्तु महेन्द्रगिरिगदरे । पसन् स्मरंश्व प्रपा लीनो ब्रमणि चाभवत् ॥२४॥ यथा परशुरामं प्रत्युदितं जनकेन तु । ब्रह्मज्ञानं सतत् विस्तारणोदितं मया ॥२५॥ अर्थ-उमफे उपरान्त परशुरामजी महेन्द्रायल की गुफा में याम करके प्रणय फा म्मरण फरसे मान में लीन हो गए। रामचन्द्रमी ! अमा गगफ रागा ने ग्रामशान शारर परशु- रामजी को कहा येगा यह तुमस मंने विस्तार में कहा ॥

श्रुत्वैवं वचनं रामो वाल्मीकेः प्रणनाम तम् । विनयावनतश्चाङ्घयोः पतितो पाच अचिवान् ॥२वा ब्रह्मज्ञानं मुनेऽत्यन्तश्रेष्ठं यद्भवतादित्तम् । श्रतः परतरं श्रेष्ठं संसारे नास्ति किंचन ॥२७॥ य इच्छेद्रह्मणि लयं संन्यासी पण्डितो मुनिः। आत्मनः स इदं ब्रह्मज्ञानशास्त्र समभ्यसेत् ॥२॥ अर्थरामचन्द्रजी ऐमा वाल्मीकि ऋपि का बधन मुन के प्रणाम करते भये और घिनय से पावों पर पट्ट के पचन वाले कि हे वाल्मीफिजी! मापने के ब्रह्मज्ञान कहा वह अत्यन्त श्रेष्ठ है इमसे दूमरा संसार में कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है। जो सन्यासी पण्डित मुनि ब्रह्म में अपना लय होना चाहे यह इस ब्रह्मशानशास्त्र का अभ्यास करे। गुरोयसिष्ठतो ज्ञानं मया श्रुतमनेकधा । नाभवत् तेन सन्तोपो मम सन्दिग्धचेतसः ॥२२॥ साकं परशुरामेण संवादो जनकस्य च । श्रुताऽधुना नतो लब्ध प्रामज्ञानमघापहम् ॥३०॥ तस्माच्छान्तिश्च सन्तोपो मयेतस्युदभूदयम् । मरिष्यामित्येकान्ते नान्यो मन्त्रो यतः परः ॥३१॥ अर्थ-मैंने गुरु ग्रीय मिष्ठत्री में अनेक प्रकार का ज्ञान मुना मेरे मम में मन्देह पा इसलिये उममे मुझे मनाप नहीं हुधा । सभी परशुरामजी के माए जनकशी फा जो मंबाद बापा से मुना उससे पाप नाश करने मान प्रापान

पाया । उससे मेरे चित्त में शान्ति र सन्तोष उत्पन्न हुआ
अब मैं एकान्त में ओंकार का स्मरण करूंगा क्योंकि इससे श्रेष्ठ
दूसरा मन्त्र नहीं है।
वाल्मीकिरूचे ननु रामचन्द्र
नैन लघु त्वं मणवं हि विद्धि ।
श्रेष्ठोऽस्ति मन्त्रो न परस्तु यस्मा-
द्रह्मादयो यं प्रजपन्ति नित्यम् ॥३२॥
महर्पयो यं यतयश्च सिद्धा
जप्त्वामुबस्तत् परमं पदन्तु
इत्येवमुक्त्वा पुनरेव राम
चकार वाल्मीकिमुनिविरामम् ॥३४॥
अर्थ-वाल्मीकिजी बोले कि हे रामचन्द्र । इस प्रराव
को तुम छोटा सा मत जाना जिमसे श्रेष्ठ कोई दूसरा मन्त्र
नहीं है और जिसका ब्रह्मादिक देवता मी नित्य जप करते
हैं जिमका जप करके महर्पि यति और मिटु लोग उस परम
पद को पाये। ऐमा रामचन्द्रजी से वाल्मीकि जी फिर कहके
धुप हो गए।
इति वामनानशास्त्रे श्रीयारमीकिमुनिकृते जनक
परशुराममंयादे राजवैद्यराममेवालालगुप्तकृत
भापाटोकायां सप्तत्रिंशः सर्गः ॥३७॥

। अधोदतिष्ठत् कमलासनोऽपि राम सभायां प्रतिवाचमूचे। हे राम ! वाल्मीकिमुनिर्यदाह तत्सत्यमित्यत्र न कोऽपि वादः ।।१।। प्रणवस्मरणाद्यतो मया समवाप्ता पदयो गरीयसी। युसदाः सदसि स्थिता इमे- ऽप्यलभन्ताच्यपदं महर्षयः ।।२।। एतत् ब्रह्मज्ञानशास्त्रं पवित्र सर्वज्ञानेभ्यः परं यदिनात्र । नान्यः पन्था अलि लन्धुं परेशं सत्यं विद्यास्तत् त्वयाद्य श्रुतं यत् ॥३॥ इत्युक्त्वा सपदि कमण्डलुस चैक वाल्मीकाय च मुनये दा प्रहृष्टः । स्थादस्य क्षयि न जलं सदा सुचीद- मित्येवं सदसि बदन सुखापविष्टः ॥४॥ अर्थ-इस पीछे सभा में ब्रह्माजी भी उठे और राम- चन्द्रजी के प्रति वचन बोले कि हे राम जो वाल्मीकि मुनि ने कहा यह सत्य है इसमें कोई झगड़ा नहीं है। जिस कारण प्रणव के स्मरण में श्रेष्ठ पदधी मैंने पाई और जो इस सना में देवता और महर्षि स्थित हैं इन्हें! ने भी प्रणव के स्मरण से पूज्य पद पाया। यह ब्रह्मशान शाख पवित्र है सय ज्ञानों से श्रेष्ठ है जिसके बिना यहां परमेश्वर के मिलने का दूसरा मार्ग नहीं है यह बात मत्य जानी जो ब्रह्म ज्ञानशास्त्र आज तुमने सुमा है। ऐसा कह के शीघ्र ही ब्रह्माजीने एक कमण्डलु प्रसन्न हो के वाल्मीकि मुनि को दिया। और यह कहा कि इसका जल कभी नहीं घटेगा यह सदा पवित्र है ऐसा. कहते हुए सभा में मुख से बैठ गये। अथ शिव उत्थायाचे वाल्मीकिमुनेचिदेहकथितं यत् । ब्रह्मज्ञानं शास्त्रं सत्यं नातः परं श्रेष्ठम् ॥५॥ प्रणवादपरो मन्त्रः श्रेष्ठो नास्तीह यत्स्मरणात्। अहमपि महत्तमामिह पदवी प्राप्तः परेशितुः कृपया ६॥ उक्त्वैवमेकं मुनये सुपात्र दत्वाह चेष्टान्नदमेतदस्ति । दाग याचितानं प्रददाति रिक्त न स्यात् परस्तादुपविष्ट ईशः ॥७॥ थर्थ-इसपीछे शिवजी उठ कर बोले कि वाल्मीकि मुनि को जनक राजा ने जो ब्रह्म ज्ञान शास्त्र कहा वह मत्य है इममे दूमरा श्रेष्ठ नहीं है और प्रणय से दूमरा मन्त्र श्रेष्ठ नहीं है निमके स्मरण से मैंने भी अत्यन्त श्रेष्ठ पदवी को पर- मेघर की कृपा से पाया। ऐसा कह के वाल्मीकि को एक पटारा दे के कहा कि इष्ट भोजन पदार्थ देने वाला यह फटोराहे भोजन शीघ्र देता है साली नहीं होगा, पीछे शियजी घेट गये। उत्धायेन्द्रोऽच्या पाल्मीकिनार ब्रह्मानं शास्त्रमत्युत्तमं हि । भागा हुमा श्रेप्टो मन्त्रश्वोमिति ब्रह्मरूपो मार्गा नान्योऽस्मात् परेशस्य लब्धः ॥८ इत्युक्त्या सादात् सुममालां सततमम्लानाम् । नित्यनवामिव याति क्रोशावधि यस्य सोगमध्यम् ॥६॥ पत्सद्गन्धग्रहणात् सर्वे रोगा विनश्पेयुः। पश्चादुप विष्टोऽसौ कृत्या गुणवर्णनं तस्याः ॥१०॥ अर्थ-फिर इन्द्र उठ कर बोले कि याल्मीकि मुनि ने ब्रह्म शानशास्त्र कहा वह अति उत्तम है ॐ कार मंत्र भी श्रेष्ठ है और ब्रह्मरूप है इसको छोड़ के परमेश्वर के मिलने का दूमरा मार्ग नहीं है। ऐसा कह के इन्द्र ने एक फूलों की माला जो कभी नहीं मुरझाये वाल्मीकि मुनि को दी। वह माला नित्य नई जैसी रहती थी एक काम तक उसका मुगन्ध जाता था, जिसका सुगन्ध लेने से मय रोग नष्ट हो इस प्रकार उ- फा गुण यर्शन करके पीछे इन्द्रजी बैठ गये। घामदेवमुनिराह यच्मि किं यत् पितामहमुग्यैः प्रशंसितम् । ब्रमशास्त्रमय चोमिति प्रभोः प्रापकं यरमतो न चापरम् ॥११॥ अर्थ-फिर यामदेव मुनि बोले कि ब्रह्म ज्ञानशास्त्र की ग्रामा जादि सेयताभ ने प्रगंपा की उसकी में क्या कहूं। ग्रामशानशाय और ॐकार मन्त्र परमेशर को प्राप्ति करने पाला हे रस दूसरा ग्रेप्ट नहीं है।

- ( ३३६ श्रथागस्तिरुत्थाय मध्ये सभाया- मयोचित सदुक्तं हि वाल्मीकिनेदम् । न च श्रेष्ठमस्मात् परं ज्ञानमस्ति वरं हीशनामस्विहोमित्यलं हि ॥१२॥ सिद्धिमानोति लीयेत स ब्रह्मणि ब्रह्मशास्त्रं पठेद्यः स्मरेदामिति । एवमुक्त्वात्र रुद्राक्षमालां ददौ ज्ञाननिष्टाय वाल्मीकये हर्पतः ॥१३॥ अर्थ -इम पीछे अगस्ति मुनि सभा में उठो बोले यह वाल्मीकि मुनि ने बहुत उत्तम कहा इमसे दूसरा कोई जान श्रेष्ठ नहीं हैं और निश्चय से यहां परमेश्वर के नामों में ॐकार श्रेष्ठ है । और पूर्ण है जो ब्रह्मज्ञान शास्त्र को पढ़े और ॐकार का स्मरण करे वह सिद्धि को प्राप्त होता है और ब्रह्म में लीन होता है । ऐमा कह के अगस्ति मुनि ने जाननिष्ठ वाल्मीकि मुनि को हर्ष से रुद्राक्ष की माला दी। अथो वसिष्ठो वचनं जगाद यत्पशु रामाय पिदेह आह । নয়ন্তিলানিবিবিg श्रेन चाता गदितं न च स्यात् ॥१४॥ गोप्यं चैतद्रामविज्ञानशास्त्र भक्त्या येनाणितं तस्य मुक्ती। फा सन्देह घेदशास्त्रेषु तस्य ज्ञातव्यं किं चावशिष्यत लाये ॥१॥ - १३३७) अर्थ इस पीछे वसिष्ठ मुनि वचन बोले कि जो परशु- रामजी को जन राजा ने शान कहा वह सब ज्ञान के प्रकारों से श्रेष्ठ है। इसमें श्रेष्ठ दूसरा कहा हुना नहीं है और न आगे होगा। यह ब्रह्मज्ञानशास्त्र गोपनीय है जिसने भक्ति पूर्वक इसको सुना है उसके मुक्ति में क्या सन्देह है इस लोक में उस को येद और शास्त्र में जानने का क्या शेप रहेगा। प्रणव सदृशो नान्यो मन्त्रोऽस्य च मरणात् पुरा उपकुनभयो विश्वामित्रोऽयजत्यमुपेयिवान् । मनुवरममुं यो नो विद्यात् सलक्षसमास्तप- श्वरतु तदपि प्रासी मुक्तर्न चाधिकृतो भवेत् ॥१६॥ प्राणप्रयाएसमये प्राचैकवार- साजसा मजति मुक्तिमपास्तदोपः। शम्भुस्त्वभूत् सारणतोऽस्य सुरेपु वो ब्रह्माप्यवाप पदवीममरैरवाप्याम् ॥११॥ लेभे हरिः स्मरणतः प्रणवस्य शक्ति या विश्वपालन विधी चिनियुज्यते स्म । आभाप्य चैव मददाबहुमूल्ययुत्ता पाल्नोकये ललितमाक्तिकमालिकां सः॥१८॥ अर्थ-प्रणय के समान दुमरा मन्त्र नहीं है पहिले एमके स्मरण से क्षत्रिपबंध में उत्पन्न विवामित्र जी मालमत्वको प्राप्त हुए। एम मन्त्र को नहीं जाने यह भने ही पास परग तक तपस्या करे तो भी मुक्ति के पाने में दमका बाधि- कार नहीं होगा! मारा एटने के समय से एक बार प्रणय फा मराफरे यई गम पापों से फूट कर गुरु से मुक्ति की पाता (३३८) है। इसके स्मरण से महादेवजी देवताओं में श्रेष्ठ हुए ब्रह्माजी भी जो अन्य देवताओं को नहीं मिल सकती ऐसी पदवी को पाये। विष्णुजी भी प्रणव के स्मरण से उस शक्ति को पाये जा जगत् को पालन करने में काम आती है। ऐसा बोल के वा. ल्मीकि मुनि को वसिष्ठजी ने बहुत मोलवाली सुन्दर मेाति- यों की माला दी। एवं महर्पिभिरथा मुनिभिः समस्तैः शुभुपुभिः सदसमेत्य सुखोपविष्टः। वाल्मोकये च मुनये समदायि हो दाभूपणानि वसनान्युपपीतमयः ॥१९॥ केचित् कोपिनं परे क्षीमयासो मुक्तामालां वनमालां तदन्ये । वैहर्याणां मालिकां विद्यमाणां माणिक्यानां ते वितेरुः स्वशत्या ॥२०॥ अर्थ -इस पीले इसी प्रकार सय मुनियों ने मार महर्षि यों ने ओ मक्षा में प्राकर सुनने के लिये मुरा से बैठे थे या- स्मोकिं मुनि को हर्ष से भाभूपण वस्त्र यज्ञोपयोत प्रौर मर्य दिया। किमीने लँगोटी दी दूमरों ने रेशमी यख दिये और लोगों ने मोतियों की माला नीर हीरों की माला दी औरों ने येड्यं हरे मरियों की माला मूगों की माला माणकों की माला अपनी अपनी शक्ति के अनुमार दी। स्वीकृत्य रामममिता द्रुटिपादिदेवै- Tी गादरममर्पितयस्तुजातम् ।

Vedanta Ramajanatirth

Author
Gupt,ramsevakaram
Title
Vedanta Ramajanatirth
File name
Vedanta Ramajanatirth
Text
OCR done
Citation
1905
Published
2012/08
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
343
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
311653
Barcode
99999990320519.00
Scanning centre
Banasthali University
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