Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Sanat Kumar Chakrichit Mahakavyam

M. Vinay Sagar · 2010/01

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राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला
राजस्थान राज्य द्वारा प्रकाशित
सामान्यतः अखिलभारतीय तथा विशेषतः राजस्थानदेशीय पुरातनकालीन
संस्कृत, प्राकृत; अपभ्रंश, हिन्दी, राजस्थानी आदि भाषानिबद्ध
विविधवाङ्मयप्रकाशिनी विशिष्ट-ग्रन्थावली
प्रधान सम्पादक
फतहसिंह, एम.ए.,डी.लिट.
निदेशक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर
ग्रन्थाङ्क १०८
महोपाध्याय-श्रीजिनपालगणि 'शिष्यलेश' प्रणीतम्
सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम्
प्रकाशक
,
राजस्थान राज्याज्ञानुसार
निदेशक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
जोधपुर (राजस्थान)
१९६६ ई०
वि, सं० २०२५
भारतराष्ट्रीय शकाब्द १८६०
मुद्रक-हरिप्रसाद पारीक, साधना प्रेस, जोधपुर

प्रधान - सम्पादकीय . सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् का सर्वप्रथम वि० स० १२६३ मे श्री सुमति गणि ने गणधरसार्द्धशतक बृहद्वृत्ति मे उल्लेख किया था। इस ग्रन्य का नाम बहुत दिनों से सुना जाता था, अत: जब महोपाध्याय विनय सागर ने दि० ४-११-६७ के पत्र के साथ इस ग्रन्थ की सम्पादित प्रति प्रतिष्ठान मे भेजी और साथ मे यह भी लिखा कि यह सम्पादन ग्रन्थ की स० १२७८ लिखित प्रति के आधार पर है, तो मुझे बडी प्रसन्नता हुई । परन्तु जव मैने पता लगाया तो ज्ञात हुआ कि प्रतिष्ठान मे इस ग्रन्थ की कोई प्रति नहीं है । ऐसी स्थिति में प्रतिष्ठान से इस ग्रन्थ का प्रकाशन होना असभवसा प्रतीत होने लगा, क्योकि उन्हो दिनो यह निश्चय किया गया था कि जिस ग्रन्थ को प्रति प्रतिष्ठान में नही होगी, वह ग्रन्थ प्रतिष्ठान से प्रकाशित नही हो सकेगा। अत' मैंने प्रतिष्ठान के लिये इम ग्रन्थ की प्रति को प्राप्त करने का प्रयत्न किया। इस ग्रन्थ को प्रतिष्ठान के लिये प्राप्त करना कई दृष्टियो से महत्त्वपूर्ण था। प्रथम तो इतना पुराना कागज पर लिखा हुआ ग्रन्थ यहा पर एक हो और है । दूसरे, यह ग्रन्थ जन काव्य ग्रन्थो में अपना विशेष महत्त्व रखता है और तीसरे इस ग्रन्थ के लेखक जिनपालो- पाध्याय पृथ्वीराज चौहान के समकालीन विद्वत्समुदाय में मूर्धन्य समझे जाते थे, अतः सभव हो सकता है कि इस महाकाव्य के विविध-वर्णनो में इस समय को ऐतिहासिक परिस्थितियो का कुछ अप्रत्यक्ष रूप से चित्रण हो गया हो। सौभाग्यवश महोपाध्याय विनयसागर ने मेरी दुविधा को देखकर, अपने खर्चे से उस प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थ की फोटो-प्रतिलिपि करवाकर प्रतिष्ठान को भेट कर दी। अतः मै विद्वान सम्पादक महोदय को प्रतिष्ठान की ओर से दुहरा धन्यवाद अर्पित करता हूँ। उन्होने न केवल हमें इस अलभ्य ग्रन्थ को प्रति प्रदान की है, अपितु उसका सुन्दर और विद्वत्तापूर्ण सम्पादन भी किया है। वस्तुतः इस ग्रन्थ के सम्पादन के लिये महोपाध्याय विनयमागर से बढ़कर योग्य सम्पादक मिलना कठिन था। श्री विनयसागर पहले ही प्रस्तुत ग्रन्थ के लेखक जिनपालोपाध्याय को गुरु-परम्परा मे प्राचार्य जिनवल्लभसूरि (१२वी शती) के ४० ग्रन्थो का शोधपूर्ण सम्पादन करके हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग से साहित्यमहोपाध्याय नामक शोधोपाधि प्राप्त कर चुके हैं। उन्होने उपाध्याय श्रीवल्लभ के अरजिनस्तव, विक्रम कवि के नेमिदूतम् तथा प्रतिष्ठालेखसमह शोक से अनेक जैन अभिलेखों का भी सम्पादन किया है। उन्होने खरतरगच्छ का इतिहास भी लिखा है जिससे प्रतीत होता है कि जैन वाङ्मय का कितना अधिक परिचय उन्होंने प्राप्त कर रखा है। उनके द्वारा सम्पादित वृत्तमौक्तिक नामक छन्दःशास्त्र के ग्रन्थ का प्रकाशन इस प्रतिष्ठान से ३ वर्ष पहिले ही हो चुका है। अतः उनकी इतः पूर्व उपलब्धियों के आधार पर, प्रस्तुत ग्रन्थ का सम्पादन भी अच्छा होना स्वाभाविक ही था। फिर भी मैंने इस ग्रन्थ की विद्वत्तापूर्ण भूमिका को जब प्राद्योपान्त पढ़ा, तो मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि सम्पादक महोदय ने जिस कार्यपटुता, और विद्वत्ता का परिचय इस ग्रन्थ के सपादन मे दिया है वह पूर्वसम्पादित ग्रन्थो से कही अधिक उच्चकोटि की है। आशा है यह नवयुवक विद्वान्, अपनी साहित्य-सेवा से राष्ट्रभाषा को निरन्तर समृद्ध करता रहेगा। अन्त में महोपाध्याय विनयसागर ने ग्रन्थ की फोटोकॉपी को भेट करने मे जो उदारता दिखाई है, उसके लिये मैं पुनः धन्यवाद अर्पित करता हूँ। -फतहसिंह पौष शुक्ला पूर्णिमा, सं० २०२५ जोधपुर - क्रमपञ्जिका पृष्ठा १-६५ १. भूमिका कवि परिचय [गुरु-परम्परा, जिनपतिसूरि, जिनपालोपाध्याय, शास्त्रार्थविजय, सतीर्यों द्वारा यशःप्रशस्ति, कवि का उपनाम, साहित्य-सृजन ] जन-साहित्य मे सनत्कुमार का स्थान कथासार १७-२१ २१-२६ ३०-३४ ३४-३७ ३७-४६ ४६-६६ प्रस्तुत कथा में अन्तर सनत्कुमारचक्रिचरितं का महाकाव्यत्व प्रमुख पात्र और उनकी चारित्रिक विशेषताएँ [ सनत्कुमार, महेन्द्र सिंह, अश्वसेन, सहदेवी, अन्य पात्र ] वस्तु-वर्णन [प्रभातवर्णन, सन्ध्यावर्णन, चन्द्रोदयवर्णन, ऋतुवर्णन, सौन्दर्यवर्णन, बाललीलावर्णन, नगरवर्णन, अटवीवर्णन, युद्धवर्णन, राजनीतिवर्णन वस्तु-वर्णन मे अलद्वारो का प्रयोग घस्तु-वर्णन में छन्द का उपयोग रसचित्रण काव्य मे लोक-चित्रण [ वर्णाश्रम, विवाह, वस्त्राभूषण, प्रसाधन, नारी जाति की स्थिति] सांस्कृतिक एवं वैचारिक पृष्ठभूमि धर्म और दर्शन संस्कृत के महाकवियो मे जिनपालोपाध्याय का स्थान प्रति-परिचय प्राभार-प्रदर्शन ६६-६८ ६८-७३ ७३-७६ ७६-८२ ८३-८८ ८८-६१ ६३-६४ ६५ १-२१२ नामक प्रथम २. सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्य [ मूलग्नन्थ ] विष्णुश्री-हरण सग नृपप्रत्युज्जीवन द्वितीय नृपनाकलोकगमन तृतीय पाखण्डिप्रतिभाषण चतुर्थ शक्राम्युदय " " १६-२४ " पञ्चम ३२-३६ वाकप्रच्यवन पप्ठ ४०-४६ :

पृष्ठान सप्तम सर्ग ४७-५५ अष्टम ५५-६३ ६३-७० नवम दशम ७०-७८ " " " " ७८-८७ ८७-६४ " . कुमारोदय नाम योवराज्याभिषेक कुमारापहरण मित्रान्वेषण मित्रसमागम यक्षदर्शन असिताक्षयक्षविजय " चन्द्रोदय विवाहमण्डपागमन शरद्वर्णन सुनन्दासमागमन प्रज्ञप्तिलाभ सभाक्षोभवर्णन सकीर्णयुद्ध रिपुविजय गजपुर-प्रत्यागमन देवागमन शुभफलोदय ग्रन्थकर्तृप्रशस्ति एकादश द्वादश प्रयोदश चतुर्दश पञ्चदश षोडश सप्तदश अष्टादश एकोनविंशति विशति एकविंशति द्वाविंशति प्रयोविंशति चतुर्विशति ९५-१०७ १०७-११५ ११६-१२३ १२३-१३१ १३१-१३६ १३६-१४८ १४८-१५७ १५५-१६७ १६७-१७८ १७९-१८७ १८८-७ १९८-२०६ २१०-२१२ १-५५ ३. परिशिष्ट १ पद्यो का प्रकाराद्यनुक्रम २ काव्य में प्रयुक्त छन्दों के लक्षण एवं तालिका ३ लोकोक्ति-सञ्चय ४ महाकाव्यस्थ पात्र-सूची ३४-४६ -४७-५३ ५४-५५

स्वर्गीया स्नेहमयी जननी
श्रीमती पानीबाई की पुण्य स्मृति में
सम्पादक का यह लघु प्रयत्न समर्पित है

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सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम्
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प्रति के प्रथम पत्र एव अन्तिम १८४ वे पत्र की प्रतिकृति

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भूमिका कवि परिचय प्रस्तुत महाकाव्य के प्रणेता जिनपालोपाध्याय खरतरगच्छीय युगप्रवरागम श्रीजिनपतिसूरि के शिष्य हैं। कवि ने स्वय काव्य के अन्त मे अपनी गुरु-परम्परा इस प्रकार दी है-"चान्द्रकुल, वज्रशाखा में वर्द्धमानसूरि हुए जिनके दो शिष्य थे, जिनेश्वरसूरि एवं बुद्धिसागरसूरि । जिनेश्वरसूरि ने दुर्लभराज की राजसभा मे चत्यवासियो को पराजित किया था और 'प्रमालक्ष्म' आदि दर्शन एवं कथा- ग्रथों की रचना की थी। दूसरे बुद्धिसागरसूरि ने नवीन व्याकरण की रचना की थी । जिनेश्वरसृरि के पट्टधर जिनचन्द्रसूरि हुए जिन्होने 'सवेगरंगशाला' अथ की रचना की। इनके पट्टधर नवांगीटीकाकार अभयदेवसूरि हुए। इनके पट्टधर महाकवि माघ से भी अधिक श्रेष्ठ काव्य-प्रणेता जिनवल्लमसूरि हुए जो पूर्व मे चत्यवासी जिनेश्वराचार्य के शिष्य थे और बाद मे जिन्होने अभयदेवसूरि से उपसम्पदा ग्रहण की थी। जिनवल्लभसूरि के पट्टधर कृष्णमूर्ति जिनदत्तसूरि हुए । इनके पट्टधर जिनचन्द्रसूरि हुए। इनके पट्टधर युगप्रवरागम जिनपतिसूरि हैं जिन्होने 'सघपट्टक' तथा 'पलिंगी' ग्रथो पर टीकानो की रचना की है तथा जिन्होने राजा की सभाओं में अनेको विद्वानों को पराजित किया है एव जो समग्र विषयो के निष्णात हैं, उन्ही का मैं शिष्यलेश जिनपाल हूं।" इस प्रशस्ति के आधार से जिनपालोपाध्याय का गुरु-वश-वृक्ष इस प्रकार बनता है- वर्द्धमानसूरि बुद्धिसागरसूरि जिनेश्वरसूरि' जिनचन्द्रसूरि 3 अभयदेवसूरि जिनवल्लभसूरि १-४. देखें, विनयसागर: बल्लभभारती।

२ जिनदत्तसूरि' जिनचन्द्रसूरि' जिनपतिसूरि जिनपाल पही गुरु-परम्परा कवि ने षट्स्थानक प्रकरण की टीका मे दी है :-- जिनेश्वरश्चान्द्रकुलावतंसो, दुर्वारवादिद्विपकेशरीन्द्रः। सन्नीतिरत्नाकरमुख्यतर्क-नथप्रणेता समभून्मुनीशः ॥१॥ सवेगरङ्गशाला-प्रजापतिः कुमुदवत्मघाकिरणः । दोषापचितिदिनेशस्ततोऽभवत् सुरिजिनचन्द्र. ॥२॥ चक्रीव नवनिघानान्याविश्चके सुपुण्यवृत्त्या यः। अङ्गानि स्थानादीन्यजन्यसावभयदेवगुरुः ॥३॥ जिनवल्लभ -जिनदत्तो ततोऽपि सत्यविभावनोत्थायाः। श्रीपुष्पदन्तकीर्तविलोपको सद्गुरू जातो ॥४॥ तदनु जिनचन्द्रसूरिश्चन्द्र इवानन्दकन्दलनिदानम् । मूापि विबुधमानससुकुमारमृतिजन्योः ।।५।। जिनपतिरिति सूरिः सद्गुणागाढबन्ध- निविडनिगडितेवात्येति नो संयमश्रीः । क्वचिदपि पदमात्रं सर्वविद्यानवद्य- प्रचयपरिचिताङ्गी यद्वपुष्टः सुपुष्टा ॥६॥ तच्छिष्यो जिनपालः षट्स्थानकसंज्ञितप्रकरणस्य । वृत्ति व्यधादमेघा अप्येतां स्वपरहितविधये ॥६॥ जिनपतिसूरि- ग्रंथ-लेखक जिनपाल उपाध्याय के गुरु जिनपतिसूरि विक्रमपुर (जैसलमेर. का समीपवर्ती) के निवासी माल्हू गोत्रीय यशोवर्द्धन सूहवदेवी के पुत्र थे। इनका जन्म वि० सं० १२१० चैत्र कृष्णा अष्टमी को हुआ था और इनकी दीक्षा वि० सं० १२१७ फाल्गुन शुक्ला १० को जिनचन्द्रसूरि के हाथ से हुई थी। इनका - १. देखें, अगरचन्द भवरलाल नाहटा : युगप्रधान जिनदत्तसूरि । २. मणिधारी जिनचन्द्रसूरि ।

[ ३ ] दीक्षावस्था का नाम नरपति था। सं० १२२३ भाद्रपद कृष्णा १४ को जिन चन्द्र- सूरि का स्वर्गवास हो जाने से, उनके पद पर स० १२२३ कार्तिक शुक्ला १३ को युगप्रधान जिनदत्तसूरि के पादोपजीवी श्रीजयदेवाचार्य ने नरपति को स्थापित किया और नाम जिनपतिसूरि रखा। प्राचार्य-पदारोहण के समय इनकी उम्र १४ वर्ष की थी। स० १२३८ मे ये आशिका (हासी) आये। उस समय नगर का उल्लेखनीय प्रवेश महोत्सव तत्रस्थानीय नरेश भीमसिंह ने किया था। आशिका में रहते हुए वहा के प्रामाणिक दिगम्बर विद्वान् (जिनका नामोल्लेख प्राप्त नही है) को शास्त्रचर्चा मे पराजित किया था। स० १२३६ मे अजमेर मे इतिहास के प्रसिद्धपुरुप अन्तिम हिन्दू-सम्राट महाराजा पृथ्वीराज चौहान की अध्यक्षता में राज्यसभा मे फलवद्धिका-निवासी उपकेशगच्छीय पद्मप्रभ के साथ उनका शास्त्रार्थ हुआ था। उस समय राज्यसभा मे प्रधानमन्त्री कैमास, सभा के शृगार पं० वागीश्वर, जनार्दन गौड, विद्यापति आदि महाविद्वान् एव महाराजा पृथ्वीराज का अतिवल्लभ मण्डलीकराणकतुल्य तथा जिनपतिसूरि का भक्त श्रावक रामदेव आदि उपस्थित थे। आचार्यश्री के साथ शास्त्र विद्या मे एव श्रावक रामदेव के साथ मल्लविद्या मे पद्मप्रभ बुरी तरह से पराजित हुआ । दो दिवस के पश्चात् सम्राट् पृथ्वीराज ने स्वपरिवार. सहित उपाश्रय में प्राकर प्राचार्यश्री को जयपत्र प्रदान किया था । सं० १२४४ मे तीर्थयात्रार्थ सघ अापकी अध्यक्षता में निकला था। वह क्रमश: भ्रमण करता हुआ चन्द्रावतो पहुचा । यहा पूर्णिमापक्षोय अकलकदेवसूरि के साथ नाम-सम्बन्धी अनेक विषयो पर मनोविनोदार्थ सुन्दर विचार-विमर्श हुआ था। चन्द्रावती मे ही पौर्णमासिक गच्छीय तिलकप्रभसूरि के साथ तीर्थयात्रा आदि अनेक शास्त्रीय विषयो पर चर्चा हुई थी। सघ चन्द्रावती से पाशापल्ली पहुचा। यहा प्राचार्यश्री का परमभक श्रावक क्षेमघर, जिसका पुत्र प्रद्युम्नाचार्य के नाम से ख्यातिमान् वादो देवाचार्य की पौषधशाला मे रहता था, उस समय के चैत्यवासी प्राचार्यों में वह प्रमुख माना जाता था। उसकी (प्रद्युम्नाचार्य को) जिनपतिसूरि के साथ शास्त्रार्थ करने की अभिलाषा थी। इस मनोकामना को प्राचार्यश्री ने स्वीकार किया, किन्तु सघ को वहाँ ठहरने का अवकाश न होने के कारण आह्वान को लक्ष्य मे रखकर, वहाँ से प्रयाण कर, उज्जयन्त, शत्रुञ्जय आदि तीर्थों की यात्रा कर जिनपतिमूरि पुनः आशापल्ली (अहमदाबाद) आये और प्रद्युम्नाचार्य के साथ उनको इच्छानुसार [ ४ ] 'वायतन-अनायतन' सम्बन्धी शास्त्रार्थ किया। इस शास्त्रार्थ मे प्रद्युम्नाचार्य विशेष समय तक स्थित न रह सका और अन्त मे पराजय प्राप्त कर स्वस्यान को लौट गया। इसी वाद के उपलक्ष में जिनपतिसूरि ने जो उत्तर दिये थे उनका दिग्दर्शन कराने वाला 'प्रबोघोदयवादस्थल' नामक ग्रंथ प्राप्त है। सं० १२५३ मे पष्टिशतकप्रकरण के कर्ता नेमिचन्द्र भाण्डागारिक (भण्डारो) ने आचार्यश्री से प्रतिबोध पाया। इसी वर्ष अणहिलपुर पाटण का भग हो जाने से नाचार्य ने घाटी ग्राम में चातुर्मास किया था। सं० १२७२ में जिनपतिसूरि की आज्ञा से जिनपालोपाध्याय ने बृहद्वार में काश्मीरी पण्डित मनोदानन्द के साथ शास्त्रार्थ में विजय प्राप्त की थी। जिनपतिसूरि ने अपने जोवन-काल में अनेकों विद्वानों के साथ ३६ शास्त्रार्थ किये और उन सभी विवादो मे विजय-पताका प्राप्त की थी। इसीलिये परवर्ती समस्त ग्रथकारों ने आपके नाम के साथ 'पत्रिंशद्वादविजेता' विशेषण का प्रयोग किया है। आपने अपने ५४ वर्ष के आचार्यकाल में सैकड़ों प्रतिष्ठायें, सैकड़ो दीक्षायें एव अनेकों योग्य व्यक्तियों को पद-प्रदानादि विविध कार्य किये हैं जिनका वर्णन जिनपालोपाध्याय लिखित गुर्वावलो' में उपलब्ध है । सं० १२७७ पापाढ शुक्ला दशमी को पालनपुर में इनका स्वर्गवास हुआ। जिनपतिसूरि प्रौढ विद्वान् एवं समर्थ साहित्यकार भी थे। इनके प्रणीत सघपट्टक-बृहृवृत्ति, पञ्चलिंगीप्रकरण-वृहृवृत्ति, प्रबोधोदयबादस्थल तथा ८-१० स्तोत्र प्राप्त है। जित्नपालोपाध्याय- जिनपाल कहाँ के निवासी थे, उनके माता-पिता का क्या नाम था, किस सम्वत् मे उनका जन्म हुश्रा, प्रादि के सम्बन्ध में कोई उल्लेख प्राप्त नहीं है। स्वयं के सम्बन्ध में जिनपाल ने स्वप्रणोत 'खरतरगच्छालंकार युगप्रधानाचार्य गुर्वावली' में यत्र-तत्र जो उल्लेख किये हैं वे निम्नलिखित हैं :- १. जिनपतिसूरि के विशेष परिचय के लिये देखे, खरतरगच्छालंकार युगप्रधानाचार्य गुर्वावली, पृ. २३-651 २. की तरफ से प्रकाशित। ३. जिनदत्तसूरि ज्ञान भडार सुरत से प्रकाशित। ४. जैसलमेर ज्ञान भडार । जेठालाल दलसुख [ ५ ] - सं. १२२५ मे जिनपतिसूरि ने पुष्कर मे जिनपाल को दीक्षा प्रदान की। सं० १२५१ मे कुहियप ग्राम मे जिनपतिसूरि ने इनको वाचनाचार्य-पद प्रदान किया और स० १२६६ मे जाबालिपुर (जालोर) के विधिचैत्य मे उपाध्याय, पद प्रदान किया। स० १२७७ प्रह्लादनपुर (पालनपुर) में जिनपतिसूरि ने स्वर्ग- गमन के पूर्व गच्छ की धुरा सभालने वालो में सर्वदेवसूरि, जिनहितोपाध्याय नौर जिनपालोपाध्याय का उल्लेख 'मेरे सदृश'४ शब्दों से किया है । स० १२७८ माघ सुदि ६ जाबालिपुर महावीर चैत्य में जिनेश्वरसूरि के पदस्थापन महोत्सव के समय जिनपालोपाध्याय भी उपस्थित थे। सं० १२८८ आश्विन शुक्ला १० को प्रह्लादनपुर मे राजपुत्र श्री जगसिंह के सानिध्य मे साधु भुवनपाल ने स्तूप (सभवतः जिनपतिसूरि का समाधिस्थल) पर ध्वजारोहण प्रतिष्ठा का महा- महोत्सव जिनपालोपाध्याय के करकमलों से कराया था। स० १३११ प्रह्ला- दनपुर में जिनपालोपाध्याय का स्वर्गवास हुआ। जिनपाल की दीक्षाग्रहण के पूर्व कम से कम ८ या १० वर्ष की अवस्था भी आकी जाय, तो इनका जन्म स० १२१५ या १२१७ के आस-पास स्वीकार किया जा सकता है । इनका स्वर्गगमन १३११ मे निश्चित है अत: आपकी पूर्णायु शतायु के निकट ही थी। पुष्कर में दोक्षा होने से संभव है जिनपाल पुष्कर या निकटस्थ राजस्थान प्रदेश के ही निवासी हो। गुर्वावली मे जिनपालोपाध्याय द्वारा काश्मीरी प० मनोदानन्द पर शास्त्रार्थ मे विजय प्राप्त करने का सविस्तर वर्णन है जिसका अविकल सार इस प्रकार है:- म. १२७३ मे बृहद्वार में लोकप्रसिद्ध 'गगा दशहरा' पर्व पर गगा-स्नान करने के लिये बहुत से राणानो के साथ नगरकोट के महाराजाधिराज श्री पृथ्वी- चन्द्र भी पाये हुए थे । उनके साथ मे मनोदानन्द नाम का एक काश्मोरी पण्डित १. खरतरगच्छालकार युगप्रधानाचार्य गुर्वावलो, प० २३ । २. वही, पृ० ४४। ३ वही, पृ० ४४ । ४. वही, पृ. ४७ । ५. वही, पृ० ४८ । ६. वही, पृ० ४६। ७. वही, पृ० ५० । ८. वही, पृ० ४४ से ४६ ।

रहता था। उस पण्डित को जिनप्रियोपाध्याय के शिष्य श्री जिनभद्रसूरि' (जिनदास) ने जिनपतिसूरिजी के साथ शास्त्रार्थ करने को उकसाया। ५० मनोदानन्द ने दिन के दूसरे पहर पौषधशाला के द्वार पर शास्त्रार्थ का पत्र चिप- काने के लिये अपने एक विद्यार्थी को भेजा। दिन के दूसरे पहर के समय उपाश्रय मे आकर वह पत्र चिपकाने को तैयार हुआ । श्रीपूज्यजी के शिष्य धर्मरुचि गणि ने विस्मय-वश होकर अलग ले जाकर उससे पूछा-'यहा तुम क्या कर रहे थे।' ब्राह्मण बालक ने निर्भय होकर उत्तर दिया कि-'राजपण्डित मनोदानन्दजो ने आपके गुरु जिनपतिसूरिजी को लक्ष्य करके यह पत्र चिपकाने को दिया है।' उस विद्यार्थी की बात सुनकर हंसते हुए धर्मरुचि गणि ने कहा-'रे ब्राह्मण बालक ! हमारा एक सदेश पण्डितजी को कह देना कि श्री जिनपतिसूरिजी के शिष्य धर्म- रुचि गरिण ने मेरी जबानी कहलवाया है कि प० मनोदानन्दजी ! यदि आप मेरा कहना माने तो आप पीछे हट जायें तथा अपना पत्र वापिस ले लें, अन्यथा आपके दांत तोड दिये जायेंगे। अभी न सही किन्तु बाद में आप अवश्य ही मेरी सलाह का मूल्य समझेगे।' उसी विद्यार्थी से प० मनोदानन्द के विषय में जानने योग्य सारी बातें पूछकर उसे छोड़ दिया। धर्मरुचि गणि ने यह समस्त वृत्तान्त श्री पूज्यजी के आगे निवेदन किया । वहा पर उपस्थित ठ० विजय नामक श्रावक ने शास्त्रार्थ-पत्र सम्बन्धी बात सुनकर अपने नौकर को उस पत्र चिपकाने वाले विद्यार्थी के पीछे भेजा और कहा कि-'तुम इस लड़के के पीछे-पीछे जाकर जांच करो कि यह लड़का किस-किस स्थान पर जाता है । हम तुम्हारे पीछे ही प्रा रहे है।' इस प्रकार आदेश पाकर वह नौकर उक्त कार्य का अनुसन्धान करने के लिये लड़के के चरण-चिहनों को देखता हुआ चला गया। अनेक पण्डित-प्रकाण्डों को शास्त्रार्थ में पछाड़ने वाले प्रगाढ विद्वान् यशस्वी श्रीजिनपतिसूरिजी ने अपने प्रासन से उठकर, अपने अनुयायी मुनिवरो को कहा कि- 'शीघ्र वस्त्र धारण करो और तैयार हो जाओ, शास्त्रार्थ करने को चलना है।' स्वय भी तैयार हो गये । महाराज को जाने को तैयार देखकर जिनपालो- पाध्याय और ठ० विजय धावक कहने लगे, 'भगवन्! यह भोजन का समय है, साधु लोग दूर से विहार करके आये हैं इसलिये आप पहले गौचरी (भोजन) करें। बाद मे वहां जायें।' उन लोगो के अनुरोध से महाराज भोजन करके उठे। जिनपालोपाध्याय ने पूज्यश्री के चरणो मे वन्दना करके प्रार्थना की- १. यु० गुर्वावली, पृ० २० के अनुसार इनकी दीक्षा स० १२१७ मे हुई थी। इनकी रचित अपवर्गनाममालाकोष प्राप्त है।

[ ७ ] - 'प्रभो ! मनोदानन्द पण्डित को जीतने के लिये आप मुझे भेजें। आपको कृपा से में उसे हरा दूगा । भगवन् ! प्रत्येक साधारण मनुष्य से आप यदि इस प्रकार वाद-प्रतिवाद करेंगे तो फिर हम लोगो को साथ लाने का क्या उपयोग है ? उस मामूली प० मनोदानन्द को हराने के लिये आप इतने व्यग्र क्यो हो गये हैं ? कहा भी है- कोपादेकतलाघातनिपातमत्तदन्तिनः । हरेर्हरिणयुद्वेषु कियान् व्याक्षेपविस्तरः ।। [ अपने चरण की एक चपेट से मस्त हाथियो को मारने वाले सिंह को हरिणो के साथ युद्ध करने में विशेष व्यग्र होने की जरूरत नही है ] राजनीति मे भी पहले पैदल सेना युद्ध करती है और बाद मे रणविद्या-विशारद सेनापति लड़ा करते हैं। ap श्रीपूज्यजी ने कहा-उपाध्यायजी ! आप जो कहते हैं वह यथार्थ है, किन्तु पण्डित की योग्यता कैसो है यह मालूम नही । उपाध्याय०-पण्डित कैसा भी क्यों न हो, सब जगह पापको कृपा विजय सुलभ है। श्रीपूज्य०-कोई हर्ज नही, हम भी चलते हैं किन्तु तुम्ही बोलना । उपाध्याय०-महाराज ! आपकी उपस्थिति मे लज्जावश में कुछ भी नही बोल सकूगा । इसलिये आपका यही विराजना अच्छा है। जिनपालोपाध्याय का विशेष आग्रह देखकर महाराजश्री ने प्रसन्न मन से मन्त्रोच्चारण के साथ मस्तक पर हाथ रखकर, धर्मरुचि' गणि, वीरभद्र गणि' सुमति गणि' और ठक्कुर विजयसिंह आदि श्रावको के साथ जिनपालोपाध्याय को मनोदानन्द पडित को जीतने के लिये भेज दिया। जिनपालोपाध्याय नगर- कोट्टीय राजाधिराज श्री पृथ्वीचन्द्र के सभाभवन में अपने परिवार के साथ पहुंचे। उस समय वहा पर पूर्ववणित गगा-यात्री राणा लोग भी महाराजाधिराज का कुशल-मंगल पूछने के लिये आये हुए थे। जिनपालोपाध्याय ने सुन्दर श्लोको । १. यु० गु० पृ० २४ के अनुसार धर्मरुचि को दीक्षा स० १२३३ विक्रमपुर में हुई। २. यु० गु० पृ० २४ के अनुसार इनकी दीक्षा स० १२१७ मे हुई। ३. यु० गु० पृ० ४४ के अनुसार सुमति गरिण की दीक्षा स० १२६० मे हुई । तुमति गरिए रचित गणवरसाद्धशतक वहति (र० स० १२९५) मोर नेमिनाय राज प्राप्त है।

[ ८ ] द्वारा राजा पृथ्वीचन्द्र की समयानुकूल प्रशंसा करके वहां पर बैठे हुए पं० मनोदानन्द को सम्बोधित कर के कहा- पण्डितरत्न ! आपने हमारी पौषधशाला के द्वार पर विज्ञापन-पत्र किस- लिये चिपकाया था? मनोदा०-आप लोगो को जीतने के लिये। जिनपाल०-बहुत अच्छा, किसी एक विषय को लेकर पूर्व पक्ष अंगीकार कीजिये। मनोदा०-पाप लोग षड्दर्शनो से बहिर्भूत हैं, इस बात को सिद्ध करूगा। यही मेरा पक्ष है। जिनपाल०-इसे न्यायानुसार प्रमाण-सिद्ध करने के लिये अनुमान-स्वरूप- बांधिये। मनोदा०-विवादाध्यासिता दर्शनबाहयाः प्रयुक्ताचारविकलत्वात् म्लेच्छवत् अर्थात् वाद प्रतिवाद करने वाले जैन साधु छहो दर्शनो से बहिष्कृत हैं, प्रयुक्त आचार में विकल होने से म्लेच्छों की तरह । जिनपाल०-पण्डितराज ! आपके कहे हुए इस अनुमान मे मै कई दूषण दिखला सकता हूँ। भनोदा०--हां, आप अपनी शक्ति के अनुसार दिखलाये, परन्तु इसका भी ध्यान रहे कि उन सब का आपको समर्थन करना पड़ेगा। जिनपाल०-सावधान होकर सुनिये, आपके इस अनुमान में 'प्रयुक्ताचार विकलत्वात्' यह हेतु नही, अनै कान्तिक हेतु है । आपका उद्देश्य हम लोगों को षड्दर्शन-बाहयता सिद्ध करने का है, अर्थात् षड्दर्शनबाहय साध्य है । परन्तु आपके दिये हुए हेतु से षड्दर्शनो के भीतर माने हुए बौद्ध, चार्वाक आदि भी विपक्ष सिद्ध होते हैं । उनमें भी आपका हेतु चला जाता है, क्योकि वे भी आपके अभिमत वेद-प्रयुक्त आचार से पराड मुख हैं । इसलिये अतिव्याप्ति नामक दोष अनिवार्य है और आपका दिया हुआ 'म्लेच्छवत्' यह दृष्टान्त भी साधन-विकल । श्राप म्लेच्छो मे प्रयुक्त प्राचार की विकलता एक देश से मानते हैं या सर्वतोभावेन । यदि कहें एक देश से सो भी ठीक नही, क्योंकि म्लेच्छ भी अपनी जाति के अनुसार कुछ न कुछ लोकाचार का पालन करते हुए दिखलाई देते हैं अन्य सभी लोकाचार वेदोक्त हैं, इसलिये आपका कहा हुआ हेतु दृष्टान्त मे नहीं घटता । यदि श्वाप कहें कि म्लेच्छो मे सम्पूर्ण वेदोक्त आचार नहीं पाया जाता, [ ६ ] इसलिये वे दर्शन-वाह्य हैं तो ऐसा कथन भी ठीक नही, क्योंकि फिर तो पाप भी दर्शन-बाह्य हैं । वेदोक्त सम्पूर्ण प्राचार-व्यवहार का पालन शायद आप भो नहीं करते। इस प्रकार तर्क-रीति से बोलते हुए जिनपाल ने सभा में स्थित तमाम लोगो को अचम्भे में डाल दिया और अनेक दोष दर्शाकर मनोदानन्द के प्राथमिक कथन को अव्यवस्थित बतलाया। इसके बाद मानी मनोदानन्द धृष्टता से अपने पक्ष को सिद्ध करने के लिये अन्यान्य प्रमाण उपस्थित करने लगा, परन्तु उपाध्यायजी ने अपनी प्रखर-प्रतिभा के प्रभाव से राजा आदि समस्त लोगों के सामने प्रसिद्ध, विरुद्ध, अनेकान्तिक आदि दोष दिखलाकर तमाम अनुमानो का खण्डन करके प० मनोदानन्द को पराजित कर दिया। इतना ही नहीं अपि तु उपाध्यायजी ने प्रधान अनुमान के द्वारा अपने आपको षड्दर्शनाभ्यन्तर्वर्ती भी सिद्ध कर दिया। ऐसे वाक्पटु जैन- मुनि के समक्ष जब कोई उत्तर नहीं दे सका तब अति-लज्जित होकर पं० मनोदा- नन्द मन ही मन सोचने लगा कि यहां सभा मे बैठने वाले राजा, रईस लोगो को जैसा चाहिये वैसा शास्त्रीय ज्ञान का अभाव है । इसलिये वे लोग अपने सामने अधिक वोलते हुए किसी व्यक्ति को देखकर समझ बैठते हैं कि यह पुरुष बहुत अच्छा विद्वान् है । अतः इस धारणा के अनुसार मुझे भी कुछ बोलते रहना चाहिये । लोग जान जायेंगे कि १० मनोदानन्द भी एक अच्छा बोलने वाला वाक्पटु पुरुष है । ऐसा सोचकर- यच्चतन्यं च सर्वभूतानाम् । यत्परिणामस्त्रिभुवनमखिलमिद जयति सा वाणी ।। इत्यादि पुस्तको से याद किया हुआ पाठ बोलने लगा। ऐसा देखकर जिनपालोपाध्याय ने जरा कोपावेश में आकर कहा- अरे निर्लज्जो के सरदार ! ऐसा यह असबद्ध क्यो बोल रहा है ? मैंने तुमको षड्दर्शन से बहिभूत सिद्ध कर दिया है । प्रमाण और युक्तियो के बल से अगर तुम्हारी कोई शक्ति है तो पौषधशाला के द्वार पर चिपकाये गये अपने शास्त्रार्थ-पत्र के समर्थन के लिये कुछ सप्रमाण बोलो । पढ़ी हुई पुस्तकों के पाठ को प्रावृत्ति करने मे तो हम भी समर्थ हैं। इसके बाद उपाध्यायजी की आज्ञा पाकर धर्मरुचि गणि, वीरप्रभ गणि और सुमति गरिण ये तीनो मुनि श्रीजिनवल्लभसूरिजी की बनाई हुई ' चित्रकूटीय- प्रशस्ति, सङ्घपट्टक, धर्मशिक्षा' आदि सस्कृत-प्रकरणो का पाठ ऊंचे स्वर मे करने लगे। इनको धाराप्रवाह रूप धड़ाधड़ सस्कृत पाठ का उच्चारण करते हुए देख शब्दब्रह्म यदेक ?

[ १० ] कर, वहां पर उपस्थित सभी राजा, रईस लोग कहने लगे-'ओ हो ! ये तो सभी पण्डित हैं।' हार खाये पं० मनोदानन्द का मुख मलिन देखकर राजाधिराज पृथ्वीचन्द्र ने विचारा कि 'हमारे पण्डित मनोदानन्दजी की मुखच्छाया फीकी है, अगर यह राजपण्डित हार जायेगा तो दुनिया मे हमारी लघुता सिद्ध होगी। इसलिये उपस्थित जनता के आगे दोनों की समानता सिद्ध हो जाय तो अच्छा है।' मन में ऐसा निश्चय कर उपाध्यायजी की ओर लक्ष्य करके राजाजी कहने लगे- 'आप बड़े अच्छे महर्षि-महात्मा हैं। वैसे हो मनोदानन्द को ओर मुख कर के कहा-'अाप भी बड़े अच्छे पण्डित हैं।' महाराजा पृथ्वीचन्द्र के मुख से यह वचन सुनकर उपाध्यायजी ने विचार किया कि, 'पाज दिन से हम शास्त्रार्थ करने लगे थे, रात के तीन पहर बीत गये हैं। इस बीच हमने अनेक प्रमाण दिखलाये, अपनी दिमागी शक्ति खर्च की लेकिन फल कुछ नहीं हुआ । हमने मनोदानन्द को परास्त करके उसकी जवान बन्द कर दो, निरुत्तर बना दिया। फिर भी राजा साहब अपने पण्डित के पक्षपात के कारण दोनो की समानता दर्शा रहे हैं । अस्तु, कुछ भी हो, हम जय-पत्र लिये बिना इस स्थान से नहीं उठेंगे।' जिनपालोपाध्याय ने कहा-"महाराज ! आप यह क्या कहते हैं, मैं कन्धा एवं छाती ठोककर कहता हूँ कि सारे भारत-खण्ड में मेरे सामने टिकने वाला कोई पण्डित नहीं है । यह पंडित मनोदानन्द मेरे साथ व्याकरण, न्याय, साहित्य आदि किसी भी विषय में स्वतंत्रता से बोल सकता है। अगर इसको शक्ति नहीं हैं तो यह पौषधशाला वाले पत्र को अपने हाथ से फाड़ डाले । अरे यज्ञोपवीत को धारण करने वाले मनोदानन्द ! तू श्री जिनपतिसूरिजी महाराज के ऊपर पत्र चिपकाता है ? तुझे मालूम नही, उन्होने सब विद्यानो में दखल रखने वाले प्रद्युम्नाचार्य जैसे पण्डितराजों की सब लोगों के सामने धूल उड़वा दी है।" इस अवसर पर महाराजा पृथ्वीचन्द्र ने उस शास्त्रार्थ-पत्र को लेकर फाड़ डाला । उपाध्यायजी ने कहा-'राजन् ! इस पत्र को फाड़ने भर से ही मुझे सन्तोष नही होता।' राजा ने कहा-'पापको सन्तोष किस बात से हो सकता है ?' जिनपाल०-'हमें संतोष जयपत्र मिलने से होगा। और राजन् ! हमारे सम्प्रदाय मे ऐसी व्यवस्था है कि जो कोई हमारे उपाश्रय के द्वार पर पत्र चिपकाता है उसी पुरुष के हाथ से जयपत्र लिखवा कर उपाश्रय के द्वार पर जयपत्र लगवाया जाता है । इसीलिये आपसे निवेदन है कि आप अपने न्याया- धीशों से सम्मति लेकर हमारी सम्प्रदायी व्यवस्था को सुरक्षित रखें।' पडित मनोदानन्द की मुखच्छाया को मलिन हुई देखकर, यद्यपि राजा को ऐसा करने में बड़ा मानसिक दुख हो रहा था, परन्तु सभा मे बैठने वाले न्याय-विचार मे प्रवीण, प्रधान एव बुद्धिमान् पुरुषों के अनुरोध से अपने सरिस्ते- दार के हाथ से जयपत्र लिखवाकर जिनपालोपाध्याय के हाथो मे देना पड़ा। उपाध्यायजी ने इसके बदले मे धर्मलाभ आशीर्वाद प्रादि कह कर राजा की भूरि- भूरि प्रशसा अनेक श्लोको द्वारा की। रात भर शास्त्रार्थ होते रहने के कारण प्रातःकाल वहाँ से उठकर, शंखध्वनि आदि द्वारा बधाई लेते हुए तथा जयपत्र को लिये हुये, मुनि-मण्डली को साथ लेकर जिनपालोपाध्याय श्रीपूज्यजी के पास आये। श्रीपूज्यजी ने अपने शिष्य के द्वारा होने वाली जिनशासन की प्रभावना से बड़े हर्ष का अनुभव किया और बड़े आदर-सत्कार के साथ जिनपालोपाध्याय को अपने पास बिठला कर शास्त्रार्थ-सम्बन्धी सारी बातें ब्यौरेवार पूछी। स० १२७३ जेठ वदि १३ के दिन शान्तिनाथ भगवान् के जन्म-कल्याणक के अवसर पर, इस उपलक्ष मे वहाँ के श्रावको ने एक बृहत् जयोत्सव मनाया।" इस शास्त्रार्थ का उल्लेख जिनपालोपाध्याय के सतीर्थ्य चन्द्रतिलकोपाध्याय ने भीअभयकुमारचरित (रचना स० १३१२) मे किया है:- भूयो भूमिभुजङ्गससदि मनोदानन्दवित्रं घना- हङ्कारोद्धरकन्धर सुविदुर पत्रावलम्बप्रदम् । जित्वा वादमहोत्सवे पुरि वृहद्वारे प्रदोच्चक- युक्तीः सङ्घयुतं गुरुं जिनपति सन्तोपयामास यः ।। X X X सतीथ्र्यों द्वारा यशःप्रशस्ति- जिनपालोपाध्याय न्याय, दर्शन, साहित्य और जैनागमो के प्रौढ विद्वान थे। शास्त्रार्थ करने मे भी अत्यन्त पटु थे। आपके प्रतिमा की प्रशसा करते हुए प्रापके ही सतीर्थ्य (गुरुनाता) सुमति गणि गणघरसार्द्धशतक की बृहद्वत्ति (र० स० १२९५) मे लिखते हैं - १. विनयसागर : खरतरगच्छ का इतिहास, प्रयम भाग, पृ० ६६.१०४ ।

[ १२ ] , नानातर्क-वितर्क-कर्कशलसद्वाणीकृपाणीस्फुरत्- तेज:प्रौढतरप्रहारघटनानिष्पिष्टवादिवजा:। श्रीजैनागमतत्त्वभावितधियः प्रोतिप्रसन्नाननाः सन्तु श्रीजिनपाल इत्यलमुपाध्यायाः क्षितौ विश्रुताः ।।१।। [मङ्गलाचरण] चन्द्र तिलकोपाध्याय' एवं प्रबोधचन्द्रगणि आदि अनेक प्रतिभासम्पन्न विद्वानो को आपने नन्दीसूत्र आदि जैनागमों की वाचना प्रदान की थी, इसीलिये वे श्रापको गुरु-रूप में स्वीकार करते हैं:- सम्यगध्याप्य निष्पाद्य यश्चान्तेवासिनो बहून् । चक्रे कुम्भध्वजारोपं गच्छप्रासादमूर्धनि ।। श्रीजिनपालोपाध्यायमौलेस्तस्यास्य सन्निधौ । मयोपादायि नन्द्यादिमूलागमाङ्गवाचना ।। X X X श्रीजिनपालोपाध्यायकृतां त्रिःप्रेरणामहम् । चरित्रकरणे प्रापं सरस्वत्युपदेशवत् ।। सुशकुनमिवास्मि तन्मन्बानो द्रढिमान्वितः । काव्याभ्यासविहीनोपि व्यधां काव्यमिद ततः ॥ [अभयकुमारचरित्रप्रशस्ति] नृपसमितिविजितविविधप्रतिवादिवितीर्णजयपताकाढयाः । जिनपालोपाध्याया आसन् यस्यागमे गुरवः ।। [प्रबोधचन्द्रगणिकृत सदेहदोलावलिवृत्ति-प्रशस्ति] कवि का उपनाम- जिनपालोपाध्याय ने सम्भवतः अपना उपनाम 'शिष्यलेश' रखा था। यही कारण है कि सनत्कुमारचरित के प्रत्येक सर्ग के अन्त में, द्वादशकुलक में प्रत्येक २. यु० गु० पृ० ५० के अनुसार इनका दीक्षा-नाम चन्द्रकीति था । सं. १३१२ मे उपाध्याय- पद मिलने पर चन्द्रतिलक हुमा । इनका अभयकुमारचरित प्राप्त है। २. यु० गु० पू० ४९ के अनुसार इनकी दीक्षा सं० १२८७ में हुई । वाचनाचार्य पद सं० १३१२ मे प्राप्त हुआ। इनकी रचित संदेहदोलावली बृहवृत्ति (र०सं० १३२०) प्राप्त है।

[ १३ ] कुलक की टीका के अन्त में, षट्स्थानकप्रकरण, चर्चरी, उपदेशरसायन आदि ग्रथों की टीका के प्रान्त मे 'युगप्रवरागमश्रीजिनपतिसूरिशिष्यलेशविरचिते' पक्ति का ही प्रयोग किया है। साहित्यसृजन- जिनपालोपाध्याय न केवल वादीभपञ्चानन हो हैं अपि तु प्रतिभासम्पन्न महाकवि एवं प्रौढ तथा सफल टीकाकार भी। वर्तमान में उपलब्ध आपके द्वारा रचित साहित्य का संवदानुक्रम से सक्षिप्त परिचय इस प्रकार है:- १. षट्स्थानक-प्रकरण-वृत्ति:-इस ग्रथ के मूलकर्ता खरतरगच्छोय जिनेश्वर- सूरि प्रथम हैं। मूल ग्रंथ प्राकृत मे है । स०१२६२ माघ शुक्ला ८ को श्री मालपुर' मे इस टीका की रचना हुई है । इस टीका का संशोधन स्वय आचार्य जिनपतिसूरि ने किया है । श्लोक परिमाण १४६४ है । यह टीका जिनदत्तसूरि- ज्ञानभण्डार सूरत से प्रकाशित हो चुकी है। २. सनत्कुमारचक्रिवरित-महाकाव्य स्वोपज्ञ टोका सह-इस ग्रथ मे कवि ने रचना-समय नहीं दिया है किन्तु सर्ग २१ पद्य ११२ चक्रवद्ध-काव्य मे 'जिन- पालगणिविरचितमिदम्' मे स्वयं के लिये 'गणि' शब्द का प्रयोग किया है। जिनपाल को गणि-पद १२५१ मे और उपाध्याय-पद १२६६ में प्राप्त हुआ था। अतः १२५१ और १२६६ का मध्यकाल इसका रचना-समय स्कीकार किया जा सकता है। इस काव्य के सम्बन्ध मे विस्तृत विवेचन आगे किया गया है। इस काव्य की पद्य-सख्या २२०३ है और य थाग्रंथ (अनुष्टुप् श्लोकपरिमाण) ३३३१ । सुमति गणि ने गणधरसार्द्धशतक की बृहद्वृत्ति मे उल्लेख किया है कि कवि ने यह काव्य टीका-सहित बनाया है, किन्तु दुर्भाग्य है कि इसको टोका आज तक प्राप्त नहीं हुई है। सुमति गणि का उल्लेख इस प्रकार है:- नानालङ्कारसारं रचितकृतबुधाश्चर्यचित्रप्रकारं, नानाच्छन्दोऽभिरामं नगरमुखमहावर्णकाव्यप्रकामम् । दृब्धं काव्य सटीक सकलकविगुण तुर्यचक्रेश्वरस्य , क्षिप्र यस्तेऽभिपेकाः प्रथमजिनपदाश्लिष्टपाला मुदे नः । १. युग-रस-दिनकरसख्ये (१२६२), विक्रमवसुधेशवत्सरेऽतिगते । श्रोमालपुरे चैषा, समर्थिता माघशुक्ला ॥१०॥ २. सिद्धान्तकनकनिकष. कारुण्यामतपयोपिभिरतन्द्र. । श्रीमज्जिनपतिसूरिमिरियं तु संशोधिता यत्नात् ॥११॥ प्रन्याय १४९४ ।

३. उपदेशरसायन-विवरणम्-~इस अपभ्रंशभाषा मे ग्रथित लघु-काव्य के
प्रणेता युगप्रधान जिनदत्तसूरि है । पद्धटिका छन्द मे ८० पद्य हैं । इस पर
गणनायक जिनेश्वरसूरि' द्वितीय के आदेश से विवरण की रचना सं० १२६२
मे हुई है । विवरण का श्लोक परिमाण ४७६ है । यह विवरण अपभ्र शकाव्यत्रयी
मे ओरियन्टल इन्स्टीच्यूट बड़ौदा से प्रकाशित हो चुका है।
४. द्वादशकुलक-विवरणम्-इस ग्रंथ के प्रणेता प्राचार्य जिनवल्लभसूरि हैं ।
जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि इसमे बारह कुलक हैं । प्राकृत भाषा में रचित
यह प्रौपदेशिक ग्रंथ है । इस पर गणनायक जिनेश्वरसूरि (द्वितीय) के निर्देश
से सं० १२६३ भाद्रपद शुक्ला १२ को प्रस्तुत टीका की रचना पूर्ण हुई है ।
टोका विशद-विवेचनयुक्त है। इस टीका का ग्रथाग्न थ ३३६३ है। यह टीका
जिनदत्तसूरि-ज्ञान-भण्डार सूरत से प्रकाशित हो चुकी है।
५. धर्मशिक्षा-विवरणम्-प्राचार्य जिनवल्लभसूरि-रचित ४० पद्यों का यह
प्रोपदेशिक लघुकाव्य है। इसमें १८ विपयो का प्रतिपादन किया गया है। इस
टीका की रचना सं० १२६३ पौष शुक्ला ६ को पूर्ण हुई है । टोका प्रौढ,
प्राञ्जल एवं विशद है । ग्रंथाग्रंथ अनुमानतः २००० है । यह टोका अद्यावधि
अप्रकाशित है। प्रेसकॉपी मेरे संग्रह मे है ।
३. पञ्चलिङ्गी-विवरण-टिप्पणम्-श्री जिनेश्वरसूरि (प्रथम)-रचित इस
ग्रन्थ पर युगप्रवरागमजिनपतिसूरि ने बृहद्वृत्ति की रचना की। इस बृहट्टीका मे
यत्र-तत्र क्लिष्ट एवं दुर्बोध शब्दों का व्यवहार हुआ है । उसी पर यह टिप्पणक
१. इति जिनपतिसूरेः शिष्योर सायनसत्पदम् ।
किमपि किमपि व्याख्यां निन्ये निगूढमहार्थभृत् ।।
युग-नव-रविप्रस्ये (१२६२) व निदेशत प्रादृतः ।
सुकविपरिपन्नत्यत्कीर्तेजिनेश्वरसद्गुरोः ॥१॥ ग्रन्थान० ४७६
२. श्रीमत्सूरिजिनेश्वरस्य सुमुनिव्रातप्रभोः साम्प्रतं,
शीघ्र चारुमहाप्रबन्धकवितुर्वाक्यात् समारम्भि यत् ।
तनिष्ठामधुना ययौ गुणनवादित्यप्रमाणे (१२६३) वरे ।
वर्षे भाद्रपदे क्षितौ शुभतरे द्वादश्यहे पावने ।।८।।
३ त्रयस्त्रिंशच्छतान्येव त्रिपष्टया संगतानि च ।
प्रत्यक्षरं प्रमाणं भोः श्लोकानामिह निश्चितम् ॥६॥
४. गुणग्रहोष्णातिसख्यवर्षे (१२६३), पोपे नवम्यां रचिता सितायाम् ।
स्पप्टाभिधेयाद्भुतधर्मशिक्षावृत्तिविशुद्धा स्फटिकावलीव ॥२॥

[ १५ ]
है। इस टिप्पणक का रचना-काल पं० लालचन्द्र भगवानदास गान्धी ने अपभ्रश-
काव्यत्रयी की भूमिका (पृ० ६६) मे १२६३ माना है । यह टिप्पणक वृहट्टीका के
साथ जिनदत्तसूरि-ज्ञान-भण्डार सूरत से प्रकाशित है । मुद्रित सस्करण मे प्रशस्ति
नहीं है।
७. चर्चरीविवरणम्-युगप्रधान जिनदत्तसूरि ने बाग्जड-देशस्थित व्याघ्र-
पुर' में इसकी रचना की है। अपभ्र श-भाषा का यह गेयकाव्य है, इसमें ४७
पद्य हैं । इसमे विधिपक्ष का दृढता से समर्थन किया गया है । इस पर स० १२६४
चैत्र कृष्णा ३ को जिनेश्वरसूरि द्वितीय के निर्देश से इस टीका को रचना हुई
है । टीका की भाषा प्रौढ एव प्रांजल है । यह टीका भी अपभ्र शकाव्यत्रयो मे
ओरियन्टल इन्स्टीच्यूट बड़ौदा से प्रकाशित हो चुकी है ।
८. खरतरगच्छालबार-युगप्रधानाचार्य-गुर्वावली-जिनपालोपाध्याय को
सम्भवतः यह अन्तिम रचना है । यह एक ऐतिहासिक एव महत्त्वपूर्ण कृति है।
खरतरगच्छ के प्राचार्य वर्द्धमानसूरि, जिनेश्वरसूरि, जिनचन्द्रसूरि; अभयदेवसूरि,
जिनवल्लभसूरि, जिनदत्तरि एव मणिधारी जिनचन्द्रसूरि के जीवन-चरितो का
पालेखन लेखक ने गुरु-परम्परा से श्रुत-आख्यानो पर किया है किन्तु स० १२२५
से स० १३०५ आषाढ शुक्ला १० तक प्राचार्य जिनपतिसूरि एव जिनेश्वरसूरि
(द्वितीय) का व्यक्तित्व एव कृतित्व का दर्शन आंखों-देखी घटनाओ के श्राधार
से किया है । सवदनुक्रम से प्रत्येक विशिष्ट घटनामो का उल्लेख इसमे किया
गया है । यह कृति मानो जिनपालोपाध्याय की दफ्तर-बही (दैनिक डायरो) हो।
गुर्वावली की घटनाओ को देखते हुए यह माना जा सकता है कि जिनपाल प्रायः
जिनपतिसूरि के साथ रहे हो और पृथ्वीराज चौहान प्रादि की सभा में शास्त्रार्थ
के समय मे भी मौजूद हों! अन्यथा ऐसा आँखो-देखा सजीव वर्णन सम्भव नहीं
हो सकता।
इस गुर्वावलो मे अन्तिम प्रसग १३०५ प्राषाढ शुक्ला १० का है, पश्चात्
लेखक ने प्रशस्ति दे दी है। अतः इसका रचना-समय १३०५ स्वीकार किया
१. विरचिता च श्रीवाग्जडदेशतिलकायमान-श्रीमदमनाथ-जिनायतनविभूपिते श्रीव्यानपुरे ।
[प्रपत्र शकाव्यत्रयो पृ० १]
२. वेदग्रहरविवर्षे (१२६४) मधुपक्षे क्यामले तृतीयायाम् ।
सा सफला सजज्ञे मुनिजनमधुपोपभोगेन ।।२।।
थोजिनेश्वरसुरीणामादेशात् कविकुम्भिनाम् ।
इय व्यापा मया चक्रे संक्षिप्ता मन्वमेघसा ॥३॥

[ १६ ] जा सकता है । दिल्ली (दिल्ली) वास्तव्य साधु साहुलि के पुत्र साधु हेमा' की अभ्यर्थना से जिनपाल ने इसकी रचना की है । यह ग्रथ सिंघी जैन ज्ञानपीठ, भारतीय विद्याभवन, बम्बई से मुद्रित हो चुका है। इसकी एकमात्र प्रति क्षमा- कल्याण-भण्डार बीकानेर मे है। ६. स्वप्नविचार-प्राकृत-भाषा में २८ गाथाये हैं। इसमे श्रमणभगवान् महावीर के समय में मध्यमपापा के राजा हस्तिपाल ने जो ८ स्वप्न देखे उनका फल दिखाया गया है । अप्रकाशित है। राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, शाखा- कार्यालय बीकानेर, श्रीपूज्य श्रीजिनचारित्रसूरि-संग्रह-ग्रथांक २६४, लेखन स० १४१८ की प्रति मे यह कृति प्राप्त है। १०. स्वप्नविचार-भाष्य-जैन-ग्रन्थावली मे लिखा है कि इसकी भाषा प्राकृत है, ग्रन्थाग्रन्थ ८७५ है और इसकी प्रति पाटण-भण्डार नं. ५ मे है । यह अप्रकाशित है। इसके सम्बन्ध मे इतना अवश्य विचारणीय है कि यह भाष्य स्वयं-रचित 'स्वप्नविचार' पर है या जिनवल्लभसूरि-रचित 'स्वप्नाष्टक-सप्तति' पर है ? ग्रन्थ के सम्मुख न होने से निर्णय करना असम्भव है । ११. सक्षिप्त पौषधविधिप्रकरण—यह प्राकृत भाषा में १५ ार्यायों में ग्रथित है। इसमे श्रावक के पौषध ग्रहण करने की विधि प्रतिपादित है। इसकी प्रेसकॉपा श्रीअभय जनग्रन्थालय, बीकानेर में है। १२. जिनपतिसूरि-पञ्चाशिका-कृति के नाम से ही स्पष्ट है कि कवि ने अपने गुरु जिनपतिसरि की स्तवना के रूप में इसकी रचना की है। यह कृति अप्राप्त है। श्री अगरचन्दजी नाहटा के कथनानुसार जैसलमेर ज्ञानभण्डारस्थ सं० १३८४ की लिखित स्वाध्याय पुस्तिका की विषयसूची मे इसका उल्लेख था। इस प्रकार जिनपालोपाध्याय-प्रणीत समग्न ग्रन्थों की अनुष्टुप्श्लोक-पद्धति से ग्रन्थाग्रन्थ १३००० के लगभग प्राप्त होते हैं । इन ग्रन्थों के अतिरिक्त भी कवि ने सृजन किया होगा, जिस प्रकार आज सनत्कुमारचरित की टीका अप्राप्त है उसी प्रकार ये भी नष्ट हो गये हों! सभव है शोध करने पर कवि की और भी कुछ कृतियाँ प्राप्त हो । अस्तु । १. दिल्लीवास्तव्यसाधुसाहुलिसुतसा० हेमाभ्यर्थनया। जिनपालोपाध्यायरित्थं प्रथिताः स्वगुरुवार्ताः ।।

[ १७ ] जैन-साहित्य में सनत्कुमार का स्थान जैन-परम्परा के अनुसार कालचक्र के बारह प्रारक होते हैं। उत्सर्पिणी और अवपिणी मे से प्रत्येक के ६-६ प्रारक मिलकर कालचक्र बनता है। इन १२ प्रारको के नाम इस प्रकार हैं:- १ सुषमसुषमा, २. सुषमा, ३. सुषमदुःषमा, ४. दुषमसुषमा, ५. दुषमा, ६. दुषमदुःषमा, ७. दु.षमदु.षमा, ८. दु.पमा, ६. दुःषमसुपमा, १०. सुषम- दुषमा, ११. सुषमा और १२. सुषमसुषमा । प्रत्येक उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी-काल में भारत-भूमि पर ६३ महापुरुष अवतोर्ण होते है जिनमे २४ तीर्थंकर, १२ चक्रवर्ती, ६ वलदेव, ६ वासुदेव और ६ प्रतिवासुदेव होते हैं। वर्तमान अवसर्पिणो-काल के ६३ महापुरुपो का सर्वप्रथम उल्लेख स्थानांग और समवायांग सूत्र में प्राप्त होता है, जो निम्नाकित है:- २४ तीर्थङ्कर'- १. ऋषभ, २ अजित, ३. सम्भव, ४. अभिनन्दन, ५. सुमति, ६. पद्मप्रभ, ७ सुपार्श्व, ८. चन्द्रप्रम, ६. सुविधि, पुष्पदन्त, १०. शीतल, ११. श्रेयांस, १२. वासुपूज्य, १३. विमल, १४. अनन्त, १५. धर्म, १६ शान्ति, १७. कुन्थु, १८. अर, १६. मल्लि, २०. मुनिसुव्रत, २१. नमि, २२. नेमि, २३. पाव २४. वर्धमान। १२ चक्रवर्ती १. भरत, २. सगर, ३ मघवा, ४. सनत्कुमार, ५. शान्ति, ६. कुन्थु, ७. अर, ८. सुभूम, ६. महापद्म, १०. हरिपेण, ११. जय, १२. ब्रह्मदत्त । ६ बलदेव १. अचल, २. विजय, ३. भद्र, ४. सुप्रभ, ५. सुदर्शन, ६. मानन्द, ७. नन्दन, ८, पद्म (रामचन्द्र), ६. राम (बलराम)। ६. वासुदेव'- . १ दलसुख मालवणिया : स्थानांग-समवायाग, पृ० ६६६.६६८ । २. वही, १० ७४६-६४७ । ३ वही, पृ० ७५३.। ४. वही, पृ० ७५३. ।

[ १८ । . E त्रिपृष्ठ, २. द्विपृष्ठ, ३. स्वयम्भू. ४. पुरुषोत्तम, ५. पुरुषसिंह, ६. पुरुपपुण्डरीक, ७. दत्त, ८. नारायण (लक्ष्मण), ६. कृष्ण । ६. प्रतिवासुदेव'- १. अश्वनीव, २. तारक, ३. मेरक, ४. मधुकैटभ, ५. निशुम्भ, ६. बलि, ७. प्रहलाद ८. रावण, ६. जरासन्ध । दिगम्बर-परम्परा मे भी आचार्य यति वृषभ ने तिलोयपण्णत्ती (त्रिलोक- प्रज्ञप्ति) के चतुर्थ महाधिकार मे पद्यांक ५१२ से ५१६ तक ६३ महापुरुषों के नाम गिनाये हैं । ६३ का वर्गीकरण तो उपयुक्त ही है, किन्तु नामों मे कही-कही अन्तर अवश्य है जो इस प्रकार है:- चौवीस तीर्थंकरो में, नवमें का नाम पुष्पदन्त भोर २०वे का नाम सुव्रत है बारह चक्रवतियो में, नवमें का नाम पद्म और ग्यारहवें का नाम जयसेन है । ६ बलदेव-१. विजय, २. अचल, ३. सुधर्म, ४. सुप्रभ, ५. सुदर्शन, ६. नन्दी, ७. नन्दिमित्र, ८. राम और ६. पद्म है । ६ प्रतिवासुदेवों मे, ७वे का नाम प्रह्लाद के स्थान पर प्रहरण है। महाकवि पुष्पदन्त-प्रणीत महापुराण में बलदेव और प्रतिवासुदेवो के नाम श्वेताम्बर-मान्यतानुसार ही हैं। गुणभद्र-रचित उत्तरपुराण में तीर्थकर, चक्रवर्ती, और वासुदेवों के नाम तिलोयपण्णत्ती के अनुसार है। बलदेव और प्रतिवासुदेवो के नाम निम्नाकित है- बलदेव ६ठा-नदिषेण । प्रतिवासुदेव-३. मधु, ४. मधुसूदन, ५. मधुक्रीड, ६. निशुम्भ, और ७, बलीन्द्र । ये ही ६३ महापुरुष दोनों सम्प्रदायों (श्वेताम्बर एवं दिगम्बर) मे त्रिषष्टि- शलाकापुरुष के नाम से विख्यात हैं। तीन तीर्थंकर (१६वें शान्तिनाथ, १७वें कुन्थुनाथ, १८वें अरनाथ हो) क्रमशः पांचवें, छठे और सातवें चक्रवर्ती हैं, अतः देह की दृष्टि से ये ६० होते हैं। २४वे तीर्थंकर महावीर का हो जोव त्रिपृष्ठ-नामक प्रथम वासुदेव हुआ है, अतः वे जीव की दृष्टि से ५६ होते हैं । . - १. दलसुख मालवरिणया--स्थानांग समवायाग, पृ० ७५३-७५४ ।

[ १६ ] . बलदेव बड़ा भाई होता है और वासुदेव छोटा भाई, इसलिये एक ही पिता होने से नौ और उपरोक्त तीनो तीर्थंकर चक्रवर्ती होने से ३, इस प्रकार पिता को दृष्टि से ६३ महापुरुषो के ५१ पिता होते हैं । तीनों तीर्थक र चक्रवर्ती होने से, माताओ की संख्या ६० होती है। इन ६३ नामो मे से कई नाम हिन्दू-पुराणो मे भी प्राप्त होते हैं, जैसे- ऋषभ, भरत, सगर, सुभूम, रामचन्द्र, बलराम, कृष्ण, अश्वग्रोव (हयग्रोव), तारक, मधुकैटभ, निशुम्भ, बलि, प्रह्लाद, रावण और जरासघ आदि। अतएव यदि जैन-पुराण और वैदिक-पुराणों के आधार से इनका तुलनात्मक दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाय तो निश्चित ही महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं। इन ६३ महापुरुषो के अन्तर्गत बारह चक्रवर्तियो मे प्रस्तुत महाकाव्य का नायक सनत्कुमार चौथा चकवर्ती है। अत: दोनो सम्प्रदायो मे सनत्कुमार चक्रवर्ती महापुरुष का कथानक प्राप्त है। त्रिषष्टिशलाकापुरुष-सम्बन्धी श्वेताम्बर साहित्य इस प्रकार है- १. महापुरुषचरित्र (चउप्पनमहापुरुषचरिय')-शीलांकाचार्य, र० सं० ६२५, भाषा प्राकृत, श्लोक परिमाण १०००० । प्राचार्य शीलाक ने ६ प्रतिवासुदेवो को प्रतिनायक एव वासुदेवो द्वारा वध्य होने से इन्हें स्वतन्त्र नही गिना है, इसीलिये ६३ के स्थान पर ५४ को प्रमुखता है। कथानक तो वासुदेवो के साथ सबद्ध है ही। २. महापुरुषचरित्र'-अमरसूरि, भाषा प्राकृत, श्लोक परिमाण ८७६० । ३. त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित्र-हेमचन्द्राचार्य । -विमलसूरि, शान्तिनाथ-चरित्र तक अपूर्ण ही प्राप्त है। -वज्रसेन । ४. १. प्राकृत-ग्रथ-परिपद्, वाराणसी से प्रकाशित । २. अनुपलब्ध, जैन ग्रथावली और वहटिप्पनिका मे उल्लेसमात्र प्राप्त है। ३. जैन प्रात्मानन्द सभा, भावनगर से प्रकाशित । ४. जैसलमेर-वृहद्ज्ञान भण्डार मे प्राप्त है। ५. जिनरलकोश पृ० १६५ मे उल्लेख है किन्तु पत्तनस्य जैन भाण्डागारीय ग्रयरची, प. ३०० और जैसलमेरुदुर्गस्थ जैन ताडपत्रीय ग्रय-भण्डार का सूचीपत्र पृ० ६७ मे एक हो प्रशस्ति होने से यह प्रय विमलसूरि-प्रणोत ही है। वचसेन रचित-ग्रय अनुपलब्ध है। हरि कवि ने कर्पूरप्रकरण में अपने गुरु वचसेन सूरि को 'यिपष्टिसारप्रवन्ध' का कत्ती कहा है, मत. रचना अपश्य हुई है।

[ २० ] ४ ५ सं० १११५ । ८ ६. त्रिषष्टिशलाका पुरुषचरित्र-सिद्धसेन', गद्य । ७. (सक्षिप्त) –मेघविजयोपाध्याय' | इत्यादि । दिगम्बर-साहित्य में भी एतत्सम्बन्धी प्रमुख-प्रमुख ग्रन्थ निम्न हैं- १. उत्तरपुराण' गुणभद्र १०वी शताब्दी २. महापुराण पुष्पदन्त भाषा अपभ्रश ३. मल्लिषेण स० ११०४ । ४. चामुण्डपुराण' चामुण्डराय ५. उत्तरपुराण" सकलकोति ६. त्रिषष्टिशलाका महापुराण चन्द्र मुनि सनत्कुमार-सम्बन्धी स्वतन्त्र-चरित्र भी प्राप्त हैं जो निम्नोक्त हैं- १. सनत्कुमारचक्रिचरितम् जिनपालोपाध्याय २. सनत्कुमारचरित्र हरिभद्रसूरि ३. श्रीचन्द्रसूरि' शिष्य देवेन्द्रसूरि अज्ञातकर्तृक" जैन कथा-साहित्य के अन्तर्गत सनत्कुमार-कथा निम्नांकित ग्रन्थों में प्राप्त होती है- विमलसूरि २. वसुदेवहिण्डी सघदास वाचक गणि ३. उत्तराध्ययनसूत्र 'सुखबोधा' टीका ४ नेमिचन्द्रसूरि & ४. १. पउमचरिय१२ १३ २. ७. १. जिनरत्नकोश, पृ० १६५। वही, पृ० ३३५। ३. भारतीय ज्ञानपीठ काशी से प्रकाशित । ४. माणिकचन्द्र दि० ज० ग्रथमाला, बंबई से प्रकाशित । ५. जिनरत्नकोश, पृ० ६३, ३०५ । ६. वही, पृ० १२२ । वही, पृ० ४२ । वही, पृ० १६३ । ६. हरिभद्रसूरि-रचित सनत्कुमारचरित्र वस्तुतः नेमिनाथचरित्र का ही अश है। यह चरित्र डॉ० हर्मन याकोबो द्वारा सम्पादित होकर सन् १९२१ मे प्रकाशित हो चुका है। १०. जिनरलकोश, पृ० ४१२ । ११. वही, पृ० ४१२ । १२. प्राकृत ग्रन्थ परिषद् वाराणसी से प्रकाशित । १३. जैन मात्मानन्द सभा, भावनगर से प्रकाशित । १४. फूलचद खोमचंद, वलाद से प्रकाशित ।

[ २१ ] ४. उपदेशमाला 'कर्णिका' टीका उदयप्रभसूरि ५. आख्यानकमणिकोश टोका' पाम्रदेवसरि ६. कथारत्नकोश देवभद्रसूरि (र० सं० ११५८) प्रभाचन्द्र कथा- नक के अन्तर्गत 'सनत्कुमारनाटकप्रबन्ध'२ पाया है। इसमे इन्द्र के द्वारा सनत्कुमार की रूप-प्रशसा से स्वर्गारोहण तक का वृत्तान्त है। भाषा प्राकृत है । बीच-बीच में पार्षदो द्वारा आश्चर्याभिव्यक्ति के रूप में सस्कृत-भाषा का प्रयोग हुआ है। नाटक साहित्य की दृष्टि से यह कृति महत्वपूर्ण है और दूसरी बात यह है कि सनत्कुमार के नाटको का उस समय प्रचलन होना उसके महत्त्व को प्रकट करता है। ७. मरणसमाधि-प्रकीर्णक पद्य ४११ में उल्लेख प्राप्त है। कथासार १. विष्णुश्री-हरण-नामक प्रथम सर्ग-भरतक्षेत्र स्थित काञ्चनपुर नगर में विक्रमयशा नामक राजा राज्य करता है । इस राजा के पाच सौ रानिया हैं। इसी नगर मे नागदत्त नाम का श्रेष्ठी निवास करता है जिसकी पत्नी विष्णुश्री अत्यधिक सुन्दरी है। एक समय विक्रमयशा की दृष्टि उस पर पडती है और वह उसके सौन्दर्य से मुग्ध एव कामातुर होकर अपने सेवको द्वारा विष्णुश्री का अपहरण कराकर अपने अन्तःपुर में ले आता है । २. नृपप्रत्युज्जीवन-नामक द्वितीय सर्ग-नागदत्त विष्णुश्री के वियोग में पागल होकर घूमता है और इधर राजा विष्णुश्री के प्रेम मे कामान्ध होकर राज्य की तथा अन्त.पुर-स्थित अन्य रानियो की उपेक्षा कर देता है। अन्य रानियां इस दौर्भाग्य का कारण विष्णुश्री को ही समझती हैं और इसके फल-स्वरूप कामण-टूमण करने वाले मान्त्रिको के सहयोग से विष्णुश्री की हत्या करवा डालती हैं। विष्णुश्री का मरण सुनकर राजा विक्रमयशा भो मूच्छित हो जाता है। अनेक उपचारो के पश्चात् वह पुनरुज्जीवित होता है। ३. नृपनाकलोकगमन-नामक तृतीय सर्ग- विष्णुश्री के वियोग मे विलाप करता हुआ राजा उसके सौन्दर्य की अन्तिम झलक पाने के लिये श्मसान मे जाता है । श्मसान मे विष्णुश्री के शव से भयकर दुर्गन्ध पाती देखकर, राजा प्रवुद्ध होता है और अपने इस दुष्कर्म पर ऊहापोह करता हुआ वापिस राज- भवन मे पाता है । इन्ही दिनो काञ्चनपुर में प्राचार्य सुव्रतसूरि पाते हैं। १ प्राकृत ग्रन्य परिषद्, वाराणसी से प्रकाशित । २. पृ. ३५० से ३५२; जैन अात्मानन्द सभा, भावनगर, मस्करण। - [ २२ ] आचार्यश्री के उपदेश से, राजा विक्रमयशा वैराग्य-वासित होकर, राज्यवैभव का त्याग कर, महोत्सव के साथ दीक्षा ग्रहण करता है। उन तपश्चर्या करता हुआ आयु पूर्ण करके सनत्कुमार नाम से वह मरणोपरान्त स्वर्गलोक में उत्पन्न होता है। ४. पाखण्डि-प्रतिभाषण-नामक चतुर्थ सर्ग--राजा विक्रमयशा का जीव सनत्कुमार स्वर्गलोक से च्युत होकर रत्नपुर नगर में जिनधर्म-नाम से उत्पन्न होता है। सद्गुरु के उपदेश से सम्यक्त्व-रत्न प्राप्त करता है, श्रावक के द्वादश- व्रत-ग्रहण करता है और मार्गानुसारी गुणों का पालन करता हुआ अपना समय धार्मिक कार्यों में व्यतीत करता है। इधर श्रेष्ठी नागदत्त अपनी प्रियतमा विष्णुश्री के वियोग मे पागल हो जाता है और इसी दशा में मृत्यु प्राप्त कर भृ गि (भौंरा) योनि मे उत्पन्न होता है। वहां से च्युत होकर सिंहपुर नगर मे निर्धन-कुल में अग्निशर्मा नाम से जन्म लेता है। माता-पिता की मृत्यु से अनाथ होकर, वह त्रिदण्डी (सन्यासी) बन जाता है और तपस्या करता हुआ एक समय रत्नपुर नगर मे आता है। रत्नपुर का शेव राजा हरिवाहन अग्निशर्मा त्रिदण्डी को अपनी दो मास की तपस्या की पूर्णाहुति (पारणक) के लिये भक्तिपूर्वक आमन्त्रित करता है। अग्निशर्मा पारणे के लिये राजा की सभा में पहुचता है और वहां जिनधर्म श्रेष्ठी को देखकर उसके हृदय में पूर्वभव का वैर जागृत होता है। फल-स्वरूप अग्निशर्मा राजा से कहता है कि "राजन् ! यदि तुम मुझे इस जिनधर्म सेठ की पीठ पर गरम खीर परोस कर पारणा (भोजन) करायोगे तब ही करू गा, अन्यथा नही।" राजा एव सभासद उस त्रिदण्डी को समझाते हैं, किन्तु वह अपनी जिद पर अटल रहता है। ५. शक्राभ्युदय-नामक पञ्चम सर्ग अग्निशर्मा त्रिदण्डी कहता है कि "राजन् ! या तो प्रतिज्ञानुसार जिनधर्म की नगी पीठ पर गरम खीर परोस कर पारणक करवा, अन्यथा मैं भूखा रहकर यही पर मर जाऊंगा। इस हत्या का पाप तुझे लगेगा।" राजा हरिवाहन दुविधा में पड़ जाता है। राजा की दुविधा देखकर जिनधर्म इस नीच-कार्य के लिये तत्पर हो जाता है। त्रिदण्डी को इच्छानु- सार जिनधर्म को नंगी पीठ पर प्रत्युष्ण खीर का पात्र रखा जाता है और अग्नि- शर्मा स्वय को कृतकृत्य समझ कर, प्रसन्नता अनुभव करता हुआ पारणक करता है। भोजनान्त पायस-पात्र हटाने पर जिनधर्म के पीठ को चमड़ी जल जाती है, हड्डियां और नसें बाहर निकल आती हैं तथा खून बह निकलता है । जनता हृदय में त्रिदण्डी की कदर्थना करती है । श्रेष्ठी जिनधर्म इस दुष्कर्म को अपने पूर्वजन्मों ॥ २३ ] 1 - के पापों का उदय मानता है और राजा, , तथा परिवार की आज्ञा प्राप्त कर गृह त्याग कर, कालिञ्जर नामक पर्वत पर अनशन कर लेता है। रुधिरसिक्त एव निश्चल शरीर देखकर गिद्ध उसके,शरीर को नोच डालते हैं । समाधि-पूर्वक मरण प्राप्त कर जिनधर्म सौधर्म देवलोक मे दो सागरोपम की आयु वाला शकेन्द्र-रूप मे उत्पन्न होता है और स्वर्गलोक के असीम-सौख्य का अनुभव करता हुआ समय व्यतीत करता है। ६. शक्र-प्रच्यवन-नामक षष्ठ सर्ग- अग्निशर्मा त्रिदण्डी भी अपने दुष्टकर्मों के कारण मरकर सौधर्मेन्द्र के ऐरावत गज के रूप में उत्पन्न होता है। पूर्वभव के वैर के कारण सौधर्मेन्द्र को अपनी पीठ पर बिठाना नही चाहता है, किन्तु इन्द्र अपने अकुश की मार से उसको सीधा करता है। यहां से च्युत होकर त्रिदण्डो का जीव गज, व्यन्तर योनि मे प्रकोपन-नामक देव होता है । सौधर्मेन्द्र स्वर्ग के सुखो का अनुभव कर, आयु पूर्ण होने पर चक्री रूप मे उत्पन्न होता है । ७ कुमारोदय-नामक सप्तम सर्ग-कुरुजगल देश की राजधानी हस्तिनापुर मे अश्वसेन नामक राजा राज्य करता है। राजा के सहदेवी नामक प्राणवल्लभा है । विक्रमयशा राजा का जीव सौधर्मेन्द्र स्वर्गलोक से च्युत होकर सहदेवी रानी को कुक्षि मे उत्पन्न होता है । इस समय रानी सहदेवी अपने प्रावास-गृह मे सोती हुई, अर्द्धनिद्रावस्था मे गज, वृषभ, सिंह, लक्ष्मी, पुष्पमाला युग्म, चन्द्र, 'सूर्य, ध्वज, पूर्णकुम्भ, पद्मसर, क्षीरसमुद्र, देवविमान और निर्धूम अग्निशिखा इन १४ स्वप्नो को अपने मुख मे प्रवेश करती हुई देखती है। स्वप्नो को देखकर रानी जाग्रत् होती है और अपने स्वामी से इन स्वप्नो का फल पूछती है। राजा अश्वसेन भी स्वप्नो का फल चिन्तन कर कहता है कि-"प्रिये ! तुम्हें चक्रवर्ती पुत्ररत्न की प्राप्ति होगी।" रानी सहदेवो गर्भ का नियमानुसार अच्छी तरह पालन करती है। यथासमय पुत्ररत्न का जन्म होता है। राजा बधाई सुन कर अतीव हर्षित होता है और एक मास तक पुत्र-जन्म की खुशी में उत्सव करता है। ८. यौवराज्याभिषेक-नामक अष्टम सर्ग-शुभ दिवस मे राजा अश्वसेन परिजनो के समक्ष नवजात पुत्र का 'सनत्कुमार' नामकरण करता है । सनत्कुमार लालित-पालित होता हुआ और स्वजनो को अपनी वालोचित कोडायो से हुअा, क्रमशः युवावस्था को प्राप्त करता है.। समस्त कलापो में निपुणता प्राप्त करता है । महेन्द्रसिंह सनत्कुमार का अभिन्न मित्र है। हस्तिनापुर का प्रधानामात्य सूर सनत्कुमार को सर्वगुणो एवं लक्षणों से लुभाता [ २४ ] परिपूर्ण देखकर राजा अश्वसेन से निवेदन करता है कि-"महाराज ! सनत्कुमार को युवराज-पद प्रदान कीजिये।" राजा अश्वसेन कुमार को अपने समीप बुलाकर- राजनीति का उपदेश देता है और महोत्सव के साथ कुमार का यौवराज्याभिषेक करता है। ६. कुमारापहरण-नामक नवम सर्ग-वसन्त ऋतु के आगमन पर कुमार अपने अभिन्न मित्र महेन्द्रसिंह और अन्य साथियों के साथ क्रीडा हेतु अश्वों पर बैठ कर उद्यान में आता है। हजारो पौर लोग भो वसन्तोत्सव मनाने के लिये उद्यान में आते हैं। मागध (भाट) एव मागधिका कुमार के सम्मुख सुन्दर उक्तियों द्वारा वसन्त ऋतु का वर्णन करते हैं। कुमार अपने साथियो के साथ दिन भर क्रीडा करते हैं । वह सायकाल अपने घोड़े पर चढ़कर वापिस नगर की ओर चलता है । लौटते समय अश्व बिगड़ जाता है और कुमार को जगल की ओर ले भागता है । कुमार के वापिस न लौटने पर राजा चारो तरफ कुमार की शोध करवाता है, पर पता नही चलता। इससे राजा, रानो और समस्त पौरवर्ग दुःखी हो जाता है। १०. मित्रान्वेषण-नामक दशम सर्ग-सनत्कुमार की खोज न मिलने पर महेन्द्रसिंह प्रतीव दु:खी होता है और प्रतिज्ञा करता है कि "या तो मैं अपने मित्र को ढू ढ कर लाऊगा अन्यथा वीरपत्नी की तरह चिता मे भस्म हो जाऊगा।" महेन्द्रसिंह प्रतिज्ञा करके कुमार को ढूढने के लिये जगल को ओर चल पड़ता है। क्रमशः ढूंढता हुआ महेन्द्रसिंह स्वयं एक राक्षसी के समान भयानक अटवी में पहुँच जाता है। ग्रीष्मऋतु आ जाती है । ग्राम, नगर, जगल, पहाड़ आदि पर घूमते हुए महीनो व्यतीत हो जाते हैं परन्तु कुमार का पता नहीं लगता। ११. मित्र-समागम-नामक एकादश सर्ग-महेन्द्रसिंह कुमार की खोज में घूम रहा है। वर्षा ऋतु ला जातो है। नदी, सरोवर, बावड़ी द्रोणी आदि स्थानो में खोजते हुए महेन्द्रसिंह को एक वर्ष व्यतीत हो जाता है। अचानक एक सरोवर के निकट सतखण्डा महल देखता है। इसी समय महेन्द्रसिंह के दक्षिण अग स्फुरित होते हैं। शुभ शकुन मान कर प्रासाद की ओर बढता है। विद्याधर द्वारा गीय- मान श्लोको से 'प्राश्वसेनि' का नाम सुनकर वह प्रसन्न होता है और सीधा प्रासाद के उपरि भाग में पहुंच जाता है । वहां पर अपने मित्र सनत्कुमार को रति के समान प्रिया के साथ बैठा देख कर महेन्द्रसिंह की आँखें चकाचौंध हो जातो हैं। कुमार को देख कर महेन्द्रसिंह हर्षविभोर हो उठता है । १२. यक्ष-दर्शन-नामक द्वादश सर्ग--एकाएक अपने सम्मुख अभिन्न मित्र [ २५ । महेन्द्रसिंह को देख कर कुमार सिंहासन से उठा और महेन्द्रसिंह को गले लगा फर प्रेम से मिला । कुमार ने स्वजनों की कुशल-वार्ता पूछो और यहां तक पहुचने का कारण पूछा । महेन्द्रसिंह ने प्रत्युत्तर में कहा कि तुम्हारे वियोग में न केवल माता-पिता ही अपितु समस्त पौरजन दुःखी हैं । बारह महीने से मैं तुम्हे ढूढता फिर रहा हूँ। इस प्रकार अपनी-बीती सुनाने के पश्चात् कुमार को पाप-बीती सुनाने को कहा । इसी समय कुमार की पत्नी बकुलमती ने प्रज्ञप्ति- विद्या के प्रभाव से कुमार की प्राप-बीती सुनाते हुए कहा--"वह अश्व विगड़कर भागता रहा और दूसरे दिन मध्याह्न के समय एक भयकर अटवी मे आकर रुक गया । मैं अश्व से नीचे उतरा । पिपासा के कारण कण्ठ सूख रहा था, इसलिये मैं पानी की खोज मे चला, भटकता रहा पर पानी नहीं मिला। व्यथित होकर मूर्खा खा कर जमीन पर गिर पड़ा । इसी समय मेरे पुण्य से एक यक्ष उधर से निकला । उसने शीतलोपचारो से मेरी मूळ दूर की।" १३. असिताक्ष-यक्ष-विजय-नामक त्रयोदश सर्ग-कुमार के सचेत होने पर यक्ष ने कुमार से इस अटवो मे आने का कारण पूछा और स्वय का परिचय देते हुए कहा कि मैं इस सप्तच्छद वृक्ष पर निवास करता हूँ। कुमार को प्यासा देखकर यक्ष ने पीने के लिये स्वच्छ जल प्रदान किया। पानी पो कर कुमार स्वस्थ हुमा । कुमार की स्नान करने की इच्छा देखकर, यक्ष उसे निकट के सरोवर पर ले गया। कुमार ने सरोवर मे स्नान किया और प्रसन्नता के साथ सरोवर के किनारे घूमने लगा। इधर असिताक्ष-नामक यक्ष जो अपनी प्रेयसियों के साथ क्रीडा कर रहा था, कुमार को देखकर पूर्व भव मे दयिता-हरण-वैर के कारण अत्यन्त क्रोधित हो उठा और कुमार को मारने के लिये दौड़ा। कुमार ने अचानक विपत्ति पाती देखकर साहस से काम लिया। यक्ष के साथ कुमार का जमकर भयकर युद्ध हुआ । आखिर में द्वन्द्व-युद्ध मे कुमार ने उसे पूर्णरूप से पराजित कर दिया। मानव की देवों पर विजय देखकर देवांगनामो ते कुमार का जय-जयकार किया और फूलो की वृष्टि की। १४. चन्द्रोदय-वर्णन-नामक चतुर्दश सर्ग-यक्ष-विजयानन्तर कुमार ने आगे की ओर प्रस्थान किया। कुछ ही दूर जाने पर, कुमार ने विद्याधरपति भानुवेग की पाठ राजकुमारिकाप्रो को गायन करते हुए देखा। कुमारिकायें अत्यन्त सौन्दर्यवती थी। कुमारियो ने भी कुमार को देखा । कुमार के रूप-सौन्दर्य पर वे मुग्ध हो उठी और कुमार को आगह के साथ अपने महल मे ले आई । चन्द्र की नाह लादकारिणी किरणो के सानिध्य मे कुमार ने रामि वही व्यतीत की। ।

[ २६ ] लग्न मे १५. विवाह-मण्डपागमन-नामक पञ्चदश सर्ग-प्रभात होने पर सनत्कुमार शय्या-त्याग करता है और स्नानादि कार्यों से निवृत्त होता है। विद्याधरेश भानुवेग सनत्कुमार को अपने समीप बिठाकर कुशल-वार्ता के पश्चात् कहता है कि, कुमार ! मेरे साठ पुत्रियाँ हैं । इनके वर के सम्बन्ध मे अचिमाली महामुनि ने कहा था कि असिताक्ष यक्ष पर विजय प्राप्त करने वाला इनका पति होगा। अतः आप इन्हे स्वीकार करे । कुमार की स्वीकृति के पश्चात् विवाह को तैयारियां होती हैं । शुभदिवस में कुमार बड़े प्राडम्बर के साथ तोरण मारने के लिये आता है और तोरण मारकर विवाह मण्डप (चंवरी) में आकर बैठता है । १६. शरवर्णन-नामक पोडश सर्ग-भानुवेग को आठों पुत्रियो का शुभ कुमार के साथ पाणिग्रहण-संस्कार सम्पन्न होता है । भानुवेग कुमार को बड़ी ऋद्धि प्रदान करता है। विवाहानन्तर वास-भवन मे कुमार अपनी प्रियत- मानों के साथ प्रहेलिका आदि से मनोरजन करता हुआ सुख-पूर्वक सो जाता है । सोते हुए कुमार को असिताक्ष यक्ष वासभवन से उठाकर भयानक जंगल मे छोड़ देता है। प्रातःकाल, निद्रा से उठने पर अपने को जगल मे पाकर कुमार आश्चर्यचकित हो जाता है । अरण्य मे शरत्कालीन प्रकृति को मनोरम छटा बिखरी हुई है । कुमार कई दिवस इस अरण्य मे व्यतीत करता है । १७. सुनन्दा-समागमन-नामक सप्तदश सर्ग-अटवी मे भ्रमण करते हुए कुमार को गिरिशिखर पर स्थित सप्तभ्रम प्रासाद नजर आता है । कुमार इस प्रासाद का अवलोकन करता हुआ देखता है कि एक अतीव सुन्दरी रमणी शोकातुर बैठी हुई विलाप करती हुई, कह रही है कि "अश्वसेन का पुत्र सनत्कुमार ही मेरा रक्षक है।" रमणी के मुख से अपना नाम सुनकर कुमार उससे पूछता है-"तुम कौन हो, दु.खी कैसे हो, और सनत्कुमार कौन है ?" १८. प्रज्ञप्तिलाभ-नामक अष्टादश सर्ग-रमणी प्रत्युत्तर देती है—"साकेत- नगर के भूपति सुराष्ट्र की मैं पुत्री हूँ, मेरी माता का नाम महादेवी चन्द्रयशा है और मेरा नाम सुनन्दा है । एकदा एक नैमित्तिक ने मेरे पिता से कहा था कि आपकी यह पुत्री बड़ी सौभाग्यशालिनी है, स्त्रोरत्न है, असिताक्षयक्ष-विजयी सनत्कुमार उसका वल्लभ होगा। उसी दिन से मैं सनत्कुमार को हृदय से वरण कर चुकी हूँ, रात-दिवस उसी का स्मरण करती रहती हूँ। विद्युद्वेग नाम का विद्याधर मुझे हरण कर यहाँ लाया है। वह विद्या-साधन कर रहा है, आज सातवां दिन है, विद्या सिद्ध होते ही वह मेरे साथ जबरदस्ती विवाह करेगा; इसलिये में विलाप कर रही हूँ, मेरा पति तो सनत्कुमार ही है।" इसी समय २७ । विद्युद्वेग विद्या सिद्ध करके वहां पाता है और कुमार को देखकर, क्रोधित होकर युद्ध करता है। कुमार उसको युद्ध मे मार गिराता है। सुनन्दा हर्पित होकर कुमार का परिचय पूछती है । कुमार अपना परिचय देता है और वही पर दोनों का पाणिग्रहण हो जाता है। इसी समय विद्युद्वेग की मृत्यु का समाचार सुनकर प्रतिशोध की भावना से उसकी बहिन पाती है किन्तु कुमार के रूप-यौवनश्री को देखकर मुग्ध हो जाती है और कुमार से विवाह कर लेती है। भविष्य मे विग्रह की सम्भावना देख कर विद्युद्वेग की बहिन कुमार को प्रज्ञप्ति-नाम को महाविद्या तीन हजार विद्याप्रो के साथ प्रदान करती है। १६. सभाक्षोभवर्णन नामक एकोनविंशति सर्ग-दोनो प्रियाओ के साथ कुमार मनोरञ्जन करता हुआ बैठा है। इसी समय हरिश्चन्द्र और चन्द्रसेन विद्याधर-पुत्र आते हैं और कहते हैं कि "हम चण्डवेग और भानुवेग खेचर-नायक के पुत्र हैं। देवर्षि नारद के मुख से रत्नपुराधिपति विद्याधर-नायक अशनिवेग अपने पुत्र की मृत्यु का सवाद सुनकर बहुत क्रोधित हो गया है और उसने आपका तथा आपके समस्त कुल का क्षय करने की प्रतिज्ञा की है।" कुमार इन वाक्यो को सुनकर उपेक्षा कर देता है और कहता है कि "पुत्र की तरह पिता को भी गति होगी। इवर अशनिवेग ने भानुवेग (कुमार के श्वसुर) की सभा मे अपना दूत भेजकर कह- लाया कि "अपना भला चाहते हो तो कुमार को हमारे दूत के साथ भेज दो, अन्यथा तुम्हारा भी नाश होगा।" दूत के मुख से सुनकर भानुवेग, उसके पुत्र तथा समस्त सभासद अत्यन्त क्षुब्ध हुए और दूत का तिरस्कार कर, अर्धचन्द्रा- कार (कण्ठ पकडकर) देकर, धक्का देकर निकाल दिया। २०. सकीर्णयुद्ध-नामक विंशति सर्ग-दूत के मुख से तिरस्कारपूर्ण अपमान के वाक्य सुनकर अशनिवेग क्रोधित होकर विशाल सेना के साथ भानुवेग पर आक्रमण करने के लिये प्रयाण करता है। इधर हरिश्चन्द्र और चन्द्रसेन की वाहिनी तथा भानुवेग की सेना के साथ कुमार भी युद्ध-भूमि मे पहुँच जाता है। दोनो सेनामो मे भयकर युद्ध होता है, खून की नदी वह निकलती है। २१. रिपुविजय-नाम एकविंशति सर्ग-समरांगण मे अशनिवेग के श्यालक सदागति, पुत्र महावेग तथा सेनापति चण्डवेग, चित्रवेगादि की मृत्यु देख कर भशनिवेग स्वयं युद्ध का सचालन करता है और भयंकर युद्ध करता है। कुमार पर शक्ति का प्रहार करता है जिसे कुमार तीक्ष्ण वाणों से समाप्त कर देता है। पश्चात् अशनिवेग सोर कुमार का आग्नेयास्त्र, वारुणास्त्र, वायव्यास्मादि अस्त्रो के द्वारा भीषण युद्ध होता है। अन्त मे कुमार चक्र का प्रयोग करता है - । २८ । जो अंशनिवेग के शिर को पुष्प की तरह भूमि सात् कर देता है। अशनिवेग भारा जाता है। कुमार की विजय होती है। देवतागण तथा देवांगनायें आकाश से पुष्पवृष्टि करती हुई जय-जयकार करती हैं। २२. गजपुर-प्रत्यागमन-नामक द्वाविंशति सर्ग-रिपुविजय के अनन्तर कुमार ने वैताढय पर्वत, सिद्धकूटादि पर विजय प्राप्त की और सुनन्दा के साथ अशनिवेग के नगर रत्नपुर मे प्रवेश किया। राज्योत्सव हुमा । अशनिवेग की पुत्री बकुलमतो का सौ लड़कियों के साथ कुमार ने विवाह किया। रोहिणी आदि विद्यायें प्रदान की और भानुवेग ने स्वयं का राज्य भी कुमार को अर्पित कर दिया। कुमार सुनन्दा के साथ क्रीडार्थ इस स्थान पर आये हुये हैं। इस प्रकार बकुलमती के मुख से कुमार का अपूर्व-चरित्र सुनकर महेन्द्र सिंह प्रमुदित होता है। कुछ समय पश्चात् महेन्द्रसिंह कुमार को माता-पिता को वियोगपूर्ण स्थिति का ध्यान कराता हुआ हस्तिनापुर चलने का आग्रह करता है और कुमार समग्र सेना के साथ माता-पिता के चरणों में पहुंचने के लिये हस्तिनापुर की ओर प्रस्थान कर देता है। २३. देवागमन नामक त्रयोविंशति सर्ग-क्रमश: प्रस्थान करता हुमा कुमार हस्तिनापुर पहुंचता है । बड़े आडम्बर के साथ नगर-प्रवेशोत्सव होता है । कुमार माता-पिता से मिलता है। समस्त लोग कुमार को पुनः प्राप्त कर सुखी एवं प्रसन्न होते हैं। यथासमय चक्रवर्ती के चौदह रत्न उत्पन्न होते हैं। सनत्कुमार षट्खण्ड पर दिग्विजय कर सार्वभौम चक्रवर्ती-पद धारण करता है। एक समय चक्री सनत्कुमार तैल-मर्दन करवा रहा था। उसी समय द्वारपाल ने आकर कहा कि दो वैदेशिक ब्राह्मण आपके दर्शनों के इच्छुक हैं । प्राज्ञा प्राप्त कर दोनों ब्राह्मण साते हैं और सनत्कुमार का रूप और कांति देखकर, हर्षित होकर देहदीप्ति की प्रशंसा करते हैं । अपने रूप की प्रशंसा सुनकर चक्री को अहंकार पाता है और कहता है "अभी क्या देखते हो, जब मैं राजसभा मे बैठू तब मेरा रूप देखना।" दोनों ब्राह्मण डेरे पर चले जाते हैं । सनत्कुमार विशेष सज-धज के साथ राजसभा मे बैठकर दोनो ब्राह्मणों को बुलाता है । दोनों आते हैं और सनत्कुमार के शरीर को श्रीहीन देखकर, दुखी होकर शिर धुनने लगते हैं । चक्रवर्ती इन ब्राह्मणो से इसका रहस्य पूछता है तब वे कहते हैं:- महाराज ! स्वर्गलोक मे इन्द्र ने कहा था कि इस समय देवताओं से भी वधिक रूपवान् सनत्कुमार मानव है। हमे वैजयन्तक और जयन्तक दोनो को [ २६ ] विश्वास नही हुआ इसलिये ब्राह्मण-रूप धारण करके हम पाये । तैलाभ्यंग के समय आपके सौन्दर्य को देखकर, इन्द्र के वचनों पर विश्वास हुआ था, किन्तु इस समय आपके शरीर में अनेको भयंकर रोग उत्पन्न हो गये हैं, देह-दीप्ति नष्ट हो गई है और अब आपकी आयु भी केवल ६ मास शेष रह गई है । वस्तुतः मानव-देह क्षणभगुर है और शरीर व्याधियों का मन्दिर है। आप अपना आत्म- साधन करे । इतना कहकर दोनों देव चले गये। :. सनत्कुमार ने भी दर्पण मे अपनी मुख की छाया देखी, श्रीहीन एवं म्लान नजर आई। शरीर की नश्वरता से वैराग्य उत्पन्न हुआ। २४. शुभफलोदय-नामक चतुर्विशति सर्ग-वैराग्य उत्पन्न होते ही सनत्कुमार ने समस्त ऐश्वयं एवं स्वजनों का त्याग कर, विनयंघर नामक प्राचार्य के पास में दीक्षा ग्रहण करली । सनत्कुमार की रानियां और समस्त परिजन छह मास पर्यन्त इनको वापिस लौटाने के लिये इनके पीछे-पीछे फिरते रहे और अन्त मे हताश होकर वापिस लौट गये । दीक्षा-ग्रहण के पश्चात् मुनि सनत्कुमार अत्युग्र तपस्या करने लगे। पारणक मे केवल प्रजातक्र ग्रहण करते थे। इससे इनके शरीर में कुष्ठ, श्वास, उदरशूल आदि ७ भयंकर व्याधियां उत्पन्न हो गई, किन्तु सनत्कुमार इन व्याधियों तरफ ध्यान न देकर पूर्ववत् उग्र तपस्या मे सलग्न रहे । तपस्या के प्रभाव से स्पर्शीषधि, आमषों षधि आदि सात लब्धियां उत्पन्न होती हैं। एक बार पुनः सनत्कुमार के धैर्य की परीक्षा करने के लिये देव वैद्य का रूप बनाकर सनत्कुमार के पास आता है और चिकित्सा करने की इच्छा प्रकट करता है। सनत्कुमार उस वैद्य से कहता है-~-वैद्य ! तुम शरीर की चिकित्सा करते हो या आत्मा की ? यदि आत्मा की चिकित्सा करते हो तो करो। शरीर की चिकित्सा तो मैं स्वयं भी कर सकता हूँ, यह कहकर अपने हाथ की अगुली पर अपना थूक लगाकर कचन के समान बनाकर दिखाते हैं । सनत्कुमार का यह प्रभाव और धैर्य देखकर वैद्यरूपधारी देव अपने स्वरूप को प्रकट करता है, क्षमा मांगता है और मुनि की भूरि-भूरि प्रशसा करता हुआ पुन. स्वर्गलोक को चला जाता है । अन्त में सलेखना तथा पादपोपगमन-अनशन करके, तीन लाख वर्ष की आयु पूर्ण करके, जिनेन्द्र का स्मरण करते हुए मुनि सनत्कुमार स्वर्ग को प्राप्त करते [ ३० ] प्रस्तुत कथा में अन्तर जिनपाल-प्रणीत सनत्कुमारचक्रि चरितं के कथानक में तथा अन्यत्र वर्णित (श्वेताम्बर एव दिगम्बर-साहित्य मे) कथानक मे जो अन्तर प्राप्त होता है वह निम्नोक्त है:- श्वेताम्बर-कथा-साहित्य मे- १. विमलसूरिप्रणीत पउमचरियं (रचना-समय चौथी शताब्दी) के २० वे उद्देशक में पद्य ११२ से १३२ तक मे सनत्कुमार का कथानक अतीव संक्षेप रूप में प्राप्त है। इस कथानक मे विशेष अन्तर होने से इसका अविकल अनुवाद . प्रस्तुत है:- मे "इस भरतक्षेत्र मे गोवर्धन नाम का एक गांव है। वहां श्रावक कुल मे उत्पन्न जिनदत्त नाम का एक गृहपति था। सागार तप करके मरने पर उसने अच्छी गति प्राप्त की। उसकी भार्या विनयवती ने उसके वियोग मे अति विशाल जिनमन्दिर बनवाया । दृढचित्तवाली वह प्रवज्या अंगीकार करके मर गई। उसी गांव में मेघबाहु-नाम का एक गृहस्थ रहता था। वह भद्र, सम्यग्दृष्टि, धीर और उत्साहशील था । जिन-मन्दिर मे विनयवती द्वारा की गई महापूजा उसने देखी । उसे श्रद्धा हुई। मरने पर वह यक्षरूप से उत्पन्न हुआ। जिन- शासन में अनुरक्त तथा विशुद्ध सम्यक्त्व मे दृढ भाववाला वह चतुर्विध श्रमण सघ की सेवा-शुश्रूषा करता था। वहां च्युत होने पर महापुर सुप्रभ की भार्या तिलकसुन्दरी से धर्मरुचि-नाम का राजा हुआ। वह सुप्रभ-मुनि के व्रत, समिति और गुप्ति से सम्पन्न, शंका, आदि दोषो से रहित और अपने देह में भी अनासक्त ऐसा शिष्य हुआ । सध में श्रद्धा-सम्पन्न, सेवा-परायण और गुणो से महान् ऐसा वह मर कर के माहेन्द्र देवलोक मे उत्तम देव हुआ । देव-विमान से च्युत होने पर वह सहदेव राजा की पत्नी से गजपुर नगर में सनत्कुमार-नाम का चक्रवर्ती हुया। सौधर्माधिपति से रूप-वर्णन और दीक्षा-ग्रहण तक प्रसंग समान है । व्याधि- चिकित्सा के लिये इसमे देवागमन का उल्लेख नही है, केवल यही लिखा है कि - 'सनत्कुमार चक्रवर्ती ने दीक्षा ली और घोर तपश्चर्या करने लगा। अनेक १. पुण्यविजय : पउमचरिय, पृ० १६१, प्राकृत ग्रय परिषद्, वाराणसी।

[ ३१ ] लब्धियो और सुन्दर शक्तियों से सम्पन्न उसने रोगो को सहन किया । तब मस करके वह सनत्कुमार स्वर्ग मे गया।" २. सघदास गणि वाचक (अनुमानतः विक्रम की छठी शताब्दी)-विरचित 'वसुदेवहिण्डी' प्रथम खण्ड के मदनवेगालम्भक-नामक १४वें लम्भक में वर्णित सनत्कुमार-कथानक मे पूर्वभव, सनत्कुमार को जलधिकल्लोल अश्व द्वारा अटवी में ले जाना, सुन्दरियो से विवाह, विद्याधरो से युद्ध आदि के प्रसग नही हैं । सामान्य कयानक एकसा ही है । सुषेणा (मदनवेगा का पूर्वभव) का सनत्कुमार से विवाह अवश्य होता है किन्तु वह अपमानिता है-यह विशेषता है । ३. शीलाकाचार्य-रचित च उप्पनमहापुरुषचरिय' मे प्रतिपादित सनत्कुमार चक्री की कथा मे केवल सनत्कुमार के पूर्वभवो का वर्णन प्राप्त नहीं है। कथा- नक समान है । हा, सनत्कुमार के पिता का नाम अश्वसेन के स्थान पर विश्वसेन का प्रयोग है जो जिनपाल ने भी कई स्थानो पर प्रयोग किया है तथा विनयघर के स्थान पर विजयसेनाचार्य का उल्लेख है। इसके अतिरिक्त कथानक में कोई भिन्नता नही है। ४. 'उत्तराध्ययन-सूत्र' के १८वां संयती-नामक अध्ययन की गाथा ३७ की 'सुखबोधा' नामक व्याख्या में नेमिचन्द्राचार्य (र०स० ११२६) ने प्राकृतगद्य सनत्कुमार की कथा का विस्तार से वर्णन किया है । कथा-सूत्र मे कोई अन्तर नही है । नामो मे यत्किचित् अन्तर अवश्य है, सुनन्दा के पिता का नाम साकेत का सूरप्रभ है । सनत्कुमार के अनशन का स्थान सम्मेतशिखर तीर्थ लिखा है। 'उत्तराध्ययन-सूत्र' के चित्रसम्भूति नामक १३वे अध्ययन में सनत्कुमार का उल्लेख अवश्य आया है। सम्भूति का निदान करने का कारण सनत्कुमार की पत्नी (स्त्रीरत्न) का वन्दन करते हुए केशो का स्पर्श कहा गया है। ५. नेमिचन्द्रसूरिरचित 'आख्यानकमणिकोश' के व्याख्याकार प्रादेवसूरि (र० स० ११९०) ने पद्य ५२ की व्याख्या मे सनत्कुमार का चरित्र १६७ पद्यों मे गुम्फित किया है । भाषा प्राकृत है । इस कथा मे एक तो पूर्वभवों का वर्णन नही है और दूसरी बात बकुलमती के मुख से असिताक्षयक्ष पराजय तक का ही वृत्तान्त कहलाया गया है। अर्थात् भानुवेग की आठ कन्यानो से विवाह, वज्रवेग, अशनिवेग का हनन, वकुलमती आदि से पाणिग्रहण आदि घटनायो का उल्लेख नही मे १ पुण्यविजय : पउमचरियं, पृ० १६२ । २. प्राकृत ग्रंथ परिषद्, वाराणसी से प्रकाशित पु० ३६२-३६७ ।

[ ३२ ] है । अन्य कथानक एकसा ही है । इसमें हस्तिनापुर के स्थान पर गजपुर और अश्वसेन के स्थान पर विश्वसेन का उल्लेख है। (पद्य ३६ से ७४ तक पुरुष लक्षण (सामुद्रिक शास्त्र) का और पद्य ११६ से ११४ तक द्रव्यव्याधि और भावव्याधि का विस्तार से सुन्दर विश्लेषण किया है-यह वैशिष्टय है । ६. हेमचन्द्राचार्यप्रणीत 'त्रिषष्टिशलाकापुरुष-चरित्र', पर्व ४, सर्ग ७ में प्रति- पादित कथानक और प्रस्तुत कथानक में तनिक भी अन्तर नहीं है, केवल कही- कहीं पर नामभेद अवश्य हैं जैसे विद्युद्वेग का वज्रवेग आदि । ७. हरिभद्रसूरिरचित 'सनत्कुमार-चरित्र' में पूर्वभवों का वर्णन नही है । सनत्कुमार की माता का नाम सुहदेवी है और वसन्तऋतु मे एक दिन सनत्कुमार एक सुन्दरी को देखता है, दोनो एक दूसरे पर मुग्ध हो जाते हैं । इसी बीच भोजराज-पुत्र कुमार को एक जलधिकल्लोल-नामक एक प्रसिद्ध घोड़ा देता है जो कुमार को लेकर उड़ जाता है-इतना विशेष है और बाकी कथानक में समानता है। ८. धर्मदासगणिरचित 'उपदेशमाला' की उदयप्रभसूरिप्रणीत 'कणिका' टीका में (र० सं० १२९६) पद्य २८ की व्याख्या मे २२२ पद्यो में सनत्कुमार की कथा प्रतिपादित है। कथानक में कोई अन्तर नहीं है। यत्किचित् नामो में अन्तर तो अवश्य ही उपलब्ध होता है जैसे-महेन्द्रसिंह के पिता का नाम कालिन्दीसूर है। दिगम्बर-कथा-साहित्य में:- प्रस्तुत महाकाव्य की कथा में और दिगम्बर-साहित्य में प्रतिपादित कथा में विशेष अन्तर है। दिगम्बर-कथानों में सनत्कुमार की कथा एक सामान्य कथा- मात्र है, चरित्र और घटनामो में कोई विशेषता नही है। न तो सनत्कुमार पूर्वभवों का वर्णन है, न सुन्दरियों के साथ विवाह और युद्धादि का प्रसग है तथा- न सनत्कुमार की महाव्याधियो का ही वर्णन है। उदाहरणार्थ प्राचार्य गुणभद्र- रचित 'उत्तरपुराण' ६१ वां पर्व, पद्य १०३ से १३० तक का सारांश द्रष्टव्य है :- अयोध्यानगरी के सूर्यवंशी राजा अनन्तवीर्य की सहदेवी रानी के सोलहवें स्वर्ग से आकर सनत्कुमार नाम का पुत्र हुआ। उसने समस्त पृथ्वी को जीतकर अपने अधीन करली थी। चक्रकर्ती था। एक समय सौधर्मेन्द्र ने कहा कि इन्द्र से भी अधिक रूपसम्पन्न सनत्कुमार चक्रवर्ती है। इस बात की परीक्षा के लिये दो देव आते हैं और सौधर्मेन्द्र की उक्ति के अनुसार चक्रवर्ती का सौन्दर्य देखकर प्रसन्न हो जाते हैं । अपना परिचय देते हुए वे कहते हैं यदि ३३ ] कप ॥ इस संसार मे आपके लिये रोग, बुढापा, दुःख तथा मरण की सभावना न हो तो आप अपने सौन्दर्य से तीर्थंकर को भी जीत सकते हैं-ऐसा कहकर देव चले जाते हैं । सनत्कुमार प्रतिबुद्ध होकर, अपने पुत्र देवकुमार को राज्य देकर, शिवगुप्त जिनेन्द्र के पास दीक्षा ग्रहण कर लेता है । मुनि-धर्म का पालन कर केवलज्ञान को प्राप्त करता है और अन्त मे मुक्ति को प्राप्त करता है। इस कथानक मे सबसे महत्त्वपूर्ण एवं विचारणीय बात यह है कि सनत्कुमार का केवलज्ञान प्राप्त कर मोक्ष जाना। प्राचार्य गुणभद्र ने इस बात का उल्लेख किस आधार से एव कैसे कर दिया ? जव कि गुणभद्र के पूर्ववर्ती दिगम्बर सम्प्रदाय के ही महामान्य आचार्य यति वृषभ 'तिलोयपण्णत्ती' मे सनत्कुमार का स्वर्ग जाना स्वीकार करते हैं:- "अट्ठव गया मोक्ख बम्ह-सुभउमा या सत्तम पुढवि । मघवस्सणवकुमारा सरगक्कुमार गमा [चतुर्थ महाधिकार पद्य १४१०] श्वेताम्बर-साहित्य मे तो सनत्कुमार का स्वर्ग जाना प्रसिद्ध ही है । अस्तु । उपरोक्त ग्रन्थो मे सनत्कुमार-कथानक मे जो विशेप पार्थक्य है उसका सारांश निम्न प्रकार है: १. पूर्वभवों का वर्णन केवल मुखावबोधा, विषष्टिशलाकापुरुष-चरित्र और उपदेशमालाकर्णिका मे ही प्राप्त है, अन्य ग्रन्थो मे नही । 'पउमचरिय' मे प्राप्त अवश्य है जिसके अनुसार सनत्कुमार का जीव गोवर्धन गाव निवासी मेघबाहु है, यहां से मरण प्राप्त करा महापुर नगर के राजा सुपुत्र का पुत्र धर्मरुचि होता है और यहा से च्युत होकर सनत्कुमार का जाना ग्रहण करता है। २. उपरोक्त ग्रन्थो के अनुसार सौधर्म देवलोक से च्युत होकर सनत्कुमार का जन्म धारण करता है, जब कि 'पउमचरियं' के अनुसार माहेन्द्र देवलोक से और उत्तरपुराण के अनुसार १६ वें देवलोक से। ३ हस्तिनापुर या गजपुर के स्थान पर केवल उत्तरपुराण मे अयोध्या- नगरी का उल्लेख है। ४. सनत्कुमार के पिता का नाम अश्वसेन या विश्वसेन के स्थान पर पउम. चरिय मे सहदेव और उत्तरपुराण में अनन्तवीर्य है। ५. जलधिकल्लोल अश्व द्वारा हरण, सुन्दरियो से विवाह, विद्याबरों से युद्ध आदि का वर्णन 'वसुदेवहिण्डो', 'पउमचरिय' और 'उत्तरपुराण' में नहीं है।

[ ३४ ] 'पाख्यानकमणिकोष' मे असिताक्ष-यक्ष-विजय तक का ही उल्लेख है, आगे का प्रशनिवेगादि के साथ के युद्धों का उल्लेख नहीं है। ६. षट्खण्डविजय, इन्द्र द्वारा रूप-प्रशसा से लेकर स्वर्गारोहण तक का वर्णन समस्त ग्रथों में प्राप्त है किन्तु, पउमचरियं और उत्तरपुराण मे दीक्षा ग्रहण के पश्चात् देवयुगल द्वारा वैद्यों का रूप धारण कर परीक्षण का प्रसग नही है। ७. समग्र ग्रन्थों मे सनत्कुमार के शरीर में उत्पन्न ७ महाव्याधियों का उल्लेख मिलता है जब कि मरणसमाधिप्रकीर्णक में १६ महान्याधियों का उल्लेख है। पउमचरिय और उत्तरपुराण मे व्याधियो का उल्लेख नहीं है । ८. सब कथाओं मे सनत्कुमार मरण-धर्म को प्राप्त कर सनत्कुमार-नामक देवलोक में उत्पन्न होता है। पउमचरियं मे स्वर्गलोक का नाम नहीं है तथा उत्तरपुराण के अनुसार सनत्कुमार मोक्ष प्राप्त करता है। सनत्कुमारचक्रिचरितं का महाकाव्यत्व किसी उदात्त-चरित का सविस्तार उदात्तशैली मे राष्ट्रीय भावभूमि मे प्रस्तुतीकरण प्रबन्ध-काव्य को महाकाव्य-सज्ञा का अधिकारी बना देता है। भारत और पश्चिमी देशो में महाकाव्य के विषय में प्रचलित विभिन्न मतों का सारांश इस वाक्य में आ जाता है । इस दृष्टि से 'सनत्कुमारचकिचरितम्' एक उच्चकोटि का महाकाव्य है। भारतीय दृष्टिकोण से इसमे महाकाव्य के ये लक्षण प्राप्त हैं (१) यह एक सर्गबद्ध कृति है । इसमें जनसूत्रो और पुराणो में प्रसिद्ध बारह चक्रवर्तियो मे से चतुर्थ सनत्कुमार का चरित २४ सर्गों में निबद्ध किया गया है। (२) नियमानुसार इसमे प्रत्येक सर्ग मे प्रायः एक ही छन्द का प्रयोग हुआ है और सन्ति मे छन्द-परिवर्तन हो जाता है । १३ १४ ओर १५वें सर्गों में छन्दो-बाहुल्य है। (३) नायक पुराण-प्रसिद्ध व्यक्ति है। उसके साधनाशील व्यक्तित्व में घोरोदात्त नायक के गुणों का यथोचित समावेश है। (४) इस महाकाव्य का मुख्य रस शान्त है। शृगारादि अन्य रस उसी को पुष्ट करते हैं। (५) इस महाकाव्य का उद्देश्य पुरुषार्थ-चतुष्टय की ससिद्धि है।

[ ३५ ] (६) इसकी शैली मे काव्य-सौष्ठव और काव्य के अन्य समस्त गुण विकसित रूप मे मिलते हैं। (७) कथानक के विस्तार के लिये इसमे विविध प्राकृतिक उपादानो का वर्णन मिलता है। (८) इस महाकाव्य का कथानक जैन-पुराणेतिहास से सम्बन्ध रखता है। सनत्कुमार का वृत्त लोक और शास्त्र मे प्रसिद्ध रहा है। डॉ० श्यामसुन्दर दीक्षित के अनुसार घटना-बाहुल्य और उनके कलात्मक सयोजन के कारण इस महाकाव्य मे नाटकों के ढग की सक्रियता मिलती है। उनके मतानुसार नाटक को पांचो कार्यावस्थाएँ इसमे इस प्रकार मिलती है- १. प्रारम्भ-सनत्कुमार के पूर्वभव के वर्णन से लेकर वसन्तक्रीडा के लिये उपवन मे जाने तथा अदृश्य होने तक की घटनाएं। इससे भावी घटनाओं के प्रति औत्सुक्य उत्पन्न होता है। २. प्रयत्न-वन में मूच्छित होने के प्रसग से लेकर असिताक्ष-यक्ष से युद्ध होने तक की कथा । इसमे कथा तीव्र गति से आगे बढती है । ३. प्राप्त्याशा-सनत्कुमार के भानुवेग को पाठ कन्यानो से विवाह करने के प्रसग से लेकर विद्याधर-भगिनी से प्रज्ञप्तिविद्या प्राप्त करने के प्रसग तक। इसमें सनत्कुमार के भावी अभ्युदय चक्रित्व-प्राप्ति का विश्वास होता है। साथ ही असिताक्ष द्वारा सनत्कुमार को वन मे पहुचा देने तथा अन्य बाबानो के कारण प्राशका भी बनी रहती है। ४. नियताप्ति-सनत्कुमार को युद्ध-यात्रा, भानुवेग और चण्डवेग का सह- योग आदि घटनाएं नियताप्ति के अन्तर्गत आती हैं। ५. फलागम-स्वय चक्रवर्ती बनना, बकुलमती से विवाह करके घर लोटना और राज्यप्राप्ति फलागम हैं । कथानक को यहा समाप्त हो जाना चाहिए, किन्तु कथानक को शान्तरस-पर्यवसायी बनाने के लिये अन्तिम सर्ग मे सनत्कुमार द्वारा तोत्र तपस्या करने और मृत्यु के बाद शिवत्व प्राप्त करने का उल्लेख और किया गया है। वस्तुतः महाकाव्य के नायक को मिलने वाला फल शिवत्व की ससिद्धि ही १. तेरहवी चौदहवी शताब्दी के जैन सस्कृत महाकाव्य (शोधप्रबन्य) १० २४४ । २. तेरहवी चौदहवीं शताब्दी के जन महाकाव्य (शोषप्रवन्ध) ० २४५।

[ ३६ ] है। इसलिए फलागम की स्थिति शिवत्व प्राप्त करना ही है । सनत्कुमार के सारे प्रयत्न इसी के लिये हैं। चक्रवर्तित्व की संसिद्धि भी शिवत्व की साधना का ही अंग है । अकिंचन का त्याग त्याग नही होता । विरह का अनुभव तो साधारण श्रमिक भी करता है, परन्तु भावना की सघनता के लिये अधिक कोमल-वृत्ति के यक्ष की कल्पना कालिदास ने की है। इसी तरह शिवत्व को ससिद्धि तो साधारण साधक की भी हो सकती है, परन्तु इस महाकाव्य का उद्देश्य तो यह दिखाना है कि चक्रवर्ती शिवत्व के लिये कसे प्रयत्न करता है ? इतने ऊँचे स्थान पर पहुंचना और इस लाभ का उपयोग शिवत्व-सिद्धि के लिये करना-यह है काव्य का मुख्य विषय । इसमे सनत्कुमार को एक से अधिक जन्म लगा देने पड़े हैं । इसलिये चक्रवर्ती-पद की प्राप्ति नियताप्ति को स्थिति मानो जानी चाहिए। इतना ऊँचा पद पाकर कोई निरापद भोगों में फसकर अवगति को ओर भी जा सकता है-इस सम्भावना के कारण यहां द्वन्द्व की स्थिति उत्पन्न होतो है। प्राप्त्याशा की स्थिति मित्र-समागम-नामक सर्ग मे स्वीकार की जानी चाहिए। प्रज्ञप्तिविद्या-प्राप्ति का उल्लेख यहो अगले सर्ग मे हुना है। यह अश महाकाव्य का लगभग मध्यवर्ती है। विक्रमयशा के रूप मे श्मशान मे विष्णुश्री को मृतावस्था में देखकर विरक्ति का अनुभव करना-शिवत्व की ओर गति का प्रारभ है । यही ऊर्ध्वमुखो साधना का साधक में बोजारोपण होता है। आगे के प्रयत्न वैराग्य के बिरवे को अभि- सिंचित करने की दिशा में है। योगसाधना का परमावस्था का नाम ही शिवत्व या कंवल्यपद है। इसे ही बौद्ध पार्यो का गोचर, पौराणिक गोलोकधाम और वेदानुयायी गोष्पद, इळस्पद या दिव्य आर्यभूमि कहते हैं जो साधक को उत्कृष्ट मनोभूमि का नाम है। मन का विग्रह वैराग्य और अभ्यास से होता है---'अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ।', सनत्कुमार मे विरक्ति का भाव विक्रमयशा-भव मे श्मशान में जागता है और अभ्यास से मनोनिग्रह का प्रयत्न चलता रहता है। इसी प्रक्रम वह चक्रवर्ती बन जाता है। परन्तु इतना ऊचा पद भी उसे अपने उद्देश्य की प्राप्ति से विरत नहीं कर सका। डॉ० दीक्षित ने इसमे पंच सन्धियों की योजना को भी खोजा है । इस मे १. भगवद्गीता। २. तेरहवी चौदहवी शताब्दी के जैन महाकाव्य, पृ० २४५, २४६ ।

[ ३७ ] महाकाव्य का प्रारम्भ परम्परागत ढग से मगलाचरण के साथ हुआ है। महाकाव्य का नामकरण इसके नायक सनत्कुमार चक्रवर्ती के नाम से सम्बद्ध है। प्रत्येक सर्ग का नामकरण भी उसमे वर्णित प्रमुख घटना के आधार पर हुआ है। पाश्चात्य साहित्यशास्त्रियों के अनुसार महाकाव्य की पृष्ठभूमि राष्ट्रीय होनी चाहिए। इस महाकाव्य में भारतीय सांस्कृतिक-परम्परा का यथोचित निर्वाह किया गया है । निवृत्ति और प्रवृत्ति के समन्वय की हमारी जातीय विशेषता का दर्शन इस महाकाव्य मे सर्वत्र होता है । अनेक जन्म लेकर कर्म-सस्कारपूर्वक प्रज्ञोपलब्धि इस महाकाव्य का प्रमुख विषय है। इसमे पौराणिक शैली का मिश्रण भी हुआ है। इसमे मानवता को सर्वोपरि माना गया है। मानव साधना के बल पर इन्द्र पद को भी पा लेते हैं। यही क्यों ? उसे परमसिद्धि-कैवल्यपाने मे मार्गावरोध समझ कर चक्रवर्तित्व को त्याग भी देते हैं। यह महाकाव्य चमत्कार-प्रधान महाकाव्य है; परन्तु इस परम्परा के अन्य कवियो की तरह जिनपाल ने छोटे कथानक को वृहद्रूप नही दिया; वरन् विस्तृत-कथा का सुन्दर ढंग से सयोजन किया है। डॉ० दीक्षित ने इसे पौराणिक महाकाव्य माना है । इसका तात्पर्य केवल इतना ही होना चाहिए कि इसका कथानक प्राचीन कथाग्रन्थो (पुराणो) से लिया गया है। शास्त्रीय दृष्टि से इसके महाकाव्यत्व की सिद्धि हो जाती है। प्रमुख पात्र और उनकी चारित्रिक विशेषताएँ पात्रों की कल्पना करना बड़ा सरल है; परन्तु उनमे प्राण-प्रतिष्ठा करना साहित्यकार के कौशल की परीक्षा ही है । राम और कृष्ण को लोकनायक के रूप मे प्रतिष्ठित करने वाले वाल्मीकि और वेदव्यास हैं। इसी तरह इनको मर्यादा पुरुषोत्तम और लीला-पुरुषोत्तम के रूप मे प्रतिष्ठा तुलसीदास और सूर के द्वारा हुई है । पौराणिक-चरित्रों को महाकाव्य मे अपनाकर उनको लोक- प्रसिद्ध करने का काम अनेक महाकवियो ने किया है । जिनपाल उपाध्याय को गणना भी ऐसे ही महाकवियो में को जानी चाहिये । भारतीय पालोचना-शास्त्र की दृष्टि से काव्य मे पालोचक वस्तु, नायक और रस-इन तीन तत्त्वो के १. तेरहवी चौदहवीं शताब्दी के महाकाव्य, पृ० २४७ ।

[ ३८ ] आधार पर आलोचना करता है। यहां पर नायक और उनके सहयोगी मन्य प्रमुख पात्रो के चरित्र पर विचार किया जा रहा है। घटना-बाहुल्य के साथ इस महाकाव्य में पात्र-बाहुल्य भी है । उनमे से प्रमुख पात्र हैं-सनत्कुमार, अश्वसेन, महेन्द्र, भानुवेग, अशनिवेग, बकुलमती आदि । महाकाव्य का नायक सनत्कुमार- इस महाकाव्य मे सनत्कुमार के भनेक जन्मों की कहानी निबद्ध की गई है । सारा कथानक उसी को केन्द्र बनाकर चलता है, इसलिये वही इसका नायक है । पूर्वभव मे विक्रमयशा के रूप में उसके जीवन मे उच्छं खलता के दर्शन होते हैं। आगे उसका चरित्र धीरे-धीरे संस्कृत होता चलता है। सारे महाकाव्य मे एक सनत्कुमार के चरित्र का ही क्रमिक उत्थान देखने को मिलता है। उसके चार पूर्वजन्मो का वर्णन इस महाकाव्य में मिलता है। विक्रमयशा के रूप में वह एक परस्त्री-कामुक के रूप में दिखाई पड़ता है। शासक के रूप मे वह अत्यन्त योग्य और कुशल प्रशासक था। कवि ने विक्रमयशा को अत्यन्त गुणवान् और यथार्थनाम कहा है' । युद्ध मे वह अमोघ- शस्त्र था । वह सदा न्याय मे एकनिष्ठ था । विष्णुश्री को देखने के उपरान्त वह पाता है कि राज्य का तो उसके रोम के बराबर भी मूल्य नहीं है । विष्णुश्री के बिना वह स्वय को इस दशा में पाता है:- व्याघ्रोऽस्ति पृष्ठे पुरतस्तु दुस्तटो, पार्श्वद्वये ज्वालशताकुलः शिखी। महाशनिश्चालमघोऽन्धकूपकः, क्व संकटे मादश ईदृशि व्रजेत् ॥ वह सोचता है कि यदि मैं ही अन्यायमार्ग पर चरण-निक्षेप करूगा तो न्याययुक्त मार्ग पर कौन चलेगा ? यदि समुद्र ही अपनी मर्यादा त्यागेगा तो छोटे- मोटे पोखरे के विषय में कहा ही क्या जा सकता है । यदि पुण्यशीलता का अंकुर स्वाभाविक रूप से किसी को भावभूमि मे नही पाया जाता हो तो आगे उसके विकसित होकर शीतलच्छाय-वृक्ष बनने की संभावना नही की जा सकती। पूर्वभव में सनत्कुमार मे न्याय-पथ पर चलने की १. सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाग्यम् १-४४ । २. वही, १-४७ । ३ वही, १-५८ । ४. वही, १-७१। ५. वहो, १-८४॥ ६. वही, १-८१ ।

[ ३६ ] ओर सहज-रुचि विद्यमान है । इसलिये आगे चलकर वह अपने जीवन को साधना द्वारा उन्नत बना सका; परन्तु समय और मन:चाचल्य के प्रभाव से वह विष्णुश्री की ओर से स्वयं को विरत न कर सका। कामदेव से क्षतान्त.करण में विवेक का प्रवेश कैसे हो सकता है'? वह विष्णुश्री का हरण करवा लेता है और एकान्त मे उससे प्रणय-निवेदन करता है:- 'अह हि ते किंकरनिविशेषः, क्रीतः कटाक्ष भुवनैकसारैः । विष्णुश्री ने कहा कि राजा तो प्रजा का पिता होता है और सदा प्रजा रक्षण-कार्य मे तत्पर रहता है। आप राजा होकर कुलवधू के प्रति राग-युक्त वाणी का प्रयोग कैसे कर रहे हैं ? विक्रमयशा पर उसके ऐसे कथन का कोई प्रभाव नहीं हुआ। उसने अनेक उत्पथगामिनी-कथाएँ सुनाकर, विष्णुश्रो को सत्पथ से च्युत करके अपनी अकशायिनी बना लिया। मन्मयकेलिवापो में वह हसवत् क्रीडा करने लगा, तस्या महामन्मथकेलिवाप्यां, सरोजहसः कमलावतंसः । नानाविनोदैरनयद् दिनानि, प्राप्तातुलश्रीरिव सप्रमोदः ॥ विष्णुश्री को ईर्ष्यालु रानियों द्वारा कार्मण-प्रयोग द्वारा मरवा दिया गया तब वियोग-सन्तप्त विक्रमयशा को प्रतीत हुआ कि नागदत्त को विष्णुश्री का अपहरण करके उसने जो पोडा पहुचाई वह सहस्र-गुरिणत रूप मे अब उसे मिलो है: कृतं कुकर्मेह विपाककाले, नानागुण वेद्यत एवमेतत् । सहस्रवृद्धया नृपतिविडम्बाद्, यन्नागदत्ते विहितात्तमाप ॥ विष्णुश्री के शव को देखकर राजा को वैराग्य हो गया और वह राज्य करते हुए भी राज्यासक्ति से मुक्त हो गया तत्रापि वैराग्यविशेषशाली, धाम्नीव दीप्ते स रतिं न लेभे। सुधारसच्छिन्नतृषो हि पु सः, सक्तिः कथं पल्वलवारिणि स्यात् ।। है - १. सनत्कुमारचक्रिचरित महाकाव्यम् २-१ । २. वही, २-१०। ३. वही, २-१६। ४. वही, २-४४॥ ५. वही, ३-१६ । ६. वही, ३-४५।

[ ४० ] वैराग्य के कारण उसकी भावनामो का उदात्तीकरण होता है। सुव्रतसूरि के आने का वृत्तान्त सुनकर वह जलदागम जैसे मयूर पानन्दित होता है वैसे आनन्दित होता है। इनके उपदेश को सुनकर उसका चित्त निर्मल हो जाता है। वह अब मुक्तिश्री-कामी हो जाता है। उसने महाव्रतों को धारण किया और अन्त मे स्वर्ग को प्राप्त हुआ। त्रिरत्नधारी सनत्कुमार का स्वर्ग में देवाङ्गनायो ने स्वागत किया, देवताओं ने यश गाया। स्वर्ग से च्युत होने के उपरान्त विक्रमयशा का जीव रत्नपुर में जिनधर्म के नाम से उत्पन्न हुआ। वह जैनधर्म की साधना मे रत रहता था। उसकी सहनशीलता का परिचय उस समय मिलता है जब अग्निशर्मा (नागदत्त का दूसरे जन्म मे नाम) उसकी पीठ पर गरम खोर रखकर भोजन करता है। मांस-जल जाने पर भी वह विचलित नहीं होता और न इसके लिये किसी को दोषी ही ठहराता है । वह कहता है- न चान्यदोषेण ममष दाहो, यदन्यथावृत्ति न जातु कर्म । बृहस्पति न ग्रसते कदाचिद्, विधुन्तुदश्चन्द्रमसा विराद्धः ।। अगले जन्म मे जिनधर्म स्वर्ग में सौधर्मेन्द्र और अग्निशर्मा उसका वाहन ऐरावत गज वनता है । सौधर्मेन्द्र अकुश से ऐरावत को वश मे करता है। अन्त में अग्निशर्मा व्यन्तर-योनि में प्रकोपन-सज्ञक देव बनता है। सौधर्मेन्द्र ने सुधर्म के योग से चक्री-पद प्राप्त किया । उसका सनत्कुमार के राजा अश्वसेन के यहाँ जन्म हुआ। सनत्कुमार अत्यन्त सुन्दर था। उसे गोद मे लेकर अश्वसेन योगियो-जसो तल्लीनता को प्राप्त हो जाता था । उसका चुम्बन करके वह मधुव्रत बन जाया करता था। युवावस्था मे वह विदग्ध-गोष्ठियों में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करके सर्वातिशायो हो गया। क्षमा, दाक्षिण्य आदि गुण उसमें भरे हुए थे- दाक्ष्य-क्षमा-न्याय-वशित्वमुख्यास्त शिश्रियुर्घाम गुणा अघृष्यम् । सर्वे समं स्वीयपदेषु स्वीयपदेषु नूनं, प्रत्येकमुत्त्रस्ततयेव युक्ताः ॥ वह कलाओं का अभ्यास करके दक्ष हो गया। सनत्कुमार महेन्द्रसिंह का सच्चा मित्र था । सनत्कुमार प्रजानुरागी था और रूप कुरु-जगल प्रदेश १. सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम्, ३-५७ । २. वही, ५-२१॥ ३. वहीं, ८-३७ ।

[ ४१ ] उसमें सभी गुणो का सगम हो गया था' । मन्त्रियो ने गुणानुरक्त होकर सनत्कुमार के विषय में कहा है- नीतिः क्वचित्तत्र भवेन्नं शौर्य , धैर्य क्वचित्तत्र भवेन्न रूपम् । विशुद्धनिश्शेषगुणाधिवासः, कुमारवत् कोऽपि न दृश्यते ॥ अपहरण के उपरान्त वह अपने मित्र महेन्द्रसिंह से अत्यन्त नौत्सुक्य और स्नेहपूर्वक मिलता है तथा परिवार की कुशलता पूछता है । महेन्द्रसिंह से मिलकर सनत्कुमार को इतना हर्ष हुआ कि उसके सामने स्वर्ग का भोग भी नहीं ठहरता- तदा समागमेऽपूर्वः सहर्षः कोऽप्यभूत्तयोः । सुरसाम्राज्यभोगोऽपि यत्तुलां नाधिरोहति ।। उसने मित्र को अपना प्राधा श्रासन देकर सम्मानित किया । ऐसा स्नेह अन्यत्र कहाँ मिलेगा? स प्रासाधयदेंतेन स्वासनस्यार्द्धमजसा । व्यज्येत हि परः स्नेहों लोकेऽपि कथमन्यथा ॥ अपना पूर्ववृत्त सुनाने में वह बड़ा संकोच करता है । न तो वह झूठ बोलना चाहता है और न आत्म-प्रशंसा ही करना चाहता है। वह अत्यन्त पराक्रमी है, निडर है और अध्यवसायी है। उसने असिताक्ष- नामक यक्ष को द्वन्द्व युद्ध में पराजित कर दिया। वह अत्यन्त घोर और गम्भीर व्यक्तित्व से सम्पन्न है । उसके पराक्रम को देवतानो ने भी प्रशंसा की है। वह अनेक नारी-रत्नो से परिणय-सम्बन्ध स्थापित करके अपने भोग-सामथ्यं को प्रकट करता है तो वैराग्य होने पर इन सब को त्याग कर, भयानक ७ व्याधियो को सहन करता हुआ, तप करके वह उच्च प्राध्यात्मिक-बल प्राप्त करने में भी सफल होता है । जिस पराक्रम द्वारा उसने असिताक्ष, विद्युद्वेग, अशनिवेग आदि को जीत कर विजयश्री का लाभ किया, उसका पर्यवसान शम में होता हुया दिखाना ही कवि का उद्देश्य है । सनत्कुमार का उत्कर्ष दिखाकर अन्त मे उसे पहले माता-पिता के चरणो मे झुकता हुआ दिखाया है और फिर धर्म के मार्ग पर १. सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् --५७ । २. वही, ८-६० । ३. वही, १२-५॥ ४. वही, १२-६।

[ ४२ ] बढता हुआ चित्रित किया गया है । कवि ने सनत्कुमार के चरित्र द्वारा मानवीय प्रवृत्तियों का क्रमशः विकास और विसर्जन दिखाकर अन्त मे इनके द्वारा महान् माध्यात्मिक-सिद्धि की आधार भूमि तैयार करवाई है जिसके फलस्वरूप कैवल्य- पद प्राप्त होता है। महेन्द्रसिंह- महेन्द्रसिंह, अश्वसेन के मंत्री सूर का पुत्र और सनत्कुमार का सच्चा मित्र था। वह सौजन्य, शौर्य आदि गुणों का निधि कहा गया है- सौजन्यशौर्यावनिरुत्तमानां, निधिगुणानां भुवि राजबीजी' । सनत्कुमार के प्रति उसमे सर्वातिशायी अनुराग था। युद्ध मे छाया की तरह वह सदैव उसके साथ रहता था। सौम्य होते हुए भी वह तेज का सदन था। कलाओ का विशेषज्ञ था। वह अकेला ही असख्य-गुणो का आश्रय था- वैदग्धबन्धुः सदन कलानां, कोलीन्यसिन्धु. पदमिन्दिरायाः । एकोऽपि योऽसख्यगुणाश्रयोऽभूत्, पटो यथाऽच्छादितविश्वगुहयः ।। प्रेक्षागृह, गोष्ठोगृह आदि मे वह सर्वत्र सनत्कुमार का अनुगमन करता था। वनविहार से लौटते समय, सनत्कुमार का अपहरण कर लिये जाने पर, महेन्द्र- सिंह क्रुद्ध होकर राजा अश्वसेन से बोला कि कुमार को किसी ने अपहृत नही किया। वस्तुतः मेरा भाग्यवृक्ष आज मूलोच्छिन्न हो गया है । वह प्रतिज्ञा करता है कि "या तो वह मित्र को ढूढ लायेगा अन्यथा चिता मे जलकर भस्मीभूत हो जायेगा ।" वह मित्र को ढूंढने के लिये भयानक अटवी में भी प्रवेश करता है। कवि उसके स्नेह के विषय में कहता है- अहो स्नेहः पद सर्वमहाव्यसनसप्ततेः । यन्मित्रायाविशदय यमस्यास्य महाटवीम् ॥ उसने मित्र को गिरिगह्वरों, वृक्षकोटरों, भिल्लपल्लियों, शबरसेनाप्रो आदि में भी देखा । न तो उसे जलाने वाली ग्रीष्म बाधा पहुंचा सकी और न मार्गा- वरुद्ध कारिणी वर्षा । पत्तन, नगर, परिषत्, नदो, वापी, निझर, द्रोणी आदि मे कहा-कहां उसने खोज नही की। वह अन्य लोकों में भी खोज करने को तत्पर १. सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् ८४० । २. वही, ८-४४। ३. वही, ६-५६ । ४. वही, १०-१७। ५. वही, १०-४०।

[ ४३ । -- हो गया। शुभ-शकुन उसे आश्वस्त करते हैं और अन्त मे वह मित्र को पा ही लेता है। मित्र को पाकर उसे जो आनद हुअा उसके विषय मे कवि ने लिखा है- आनन्दाश्रुप्रवाहेण प्लाविताखिलविग्रहः । वनभ्रमणखेदोत्थ श्रमवारि क्षरन्निव ।। मुखे विकासं बिभ्राणः प्रातः पद्माकरो यथा । सर्वेन्द्रियेपु युगपद् भजन्निव परं सुखम् ॥ दोनो मित्रो का मिलन ऐसा हुआ जिसके सामने देवलोक का साम्राज्य भी हेय है- तदा समागमे पूर्वः, सहर्पः कोऽप्यभूत्तयोः । सुरसाम्राज्यभोगोऽपि, यत्तुला नाधिरोहति ॥ सनत्कुमार के जीवन की घटनाग्रो को प्रज्ञप्ति-विद्या के द्वारा वकुलमती से जानकर वह बडा प्रभावित होता है और अन्त मे समय देखकर सनत्कुमार को पुनः याद दिलाता है कि उसके वियोग की अग्नि मे किस प्रकार सारे नगर- वासी, परिजन, उसके माता-पिता आदि जल रहे हैं ? अन्त मे सनत्कुमार को लेकर अपने नगर को ओर चल देता है । महेन्द्र सिंह इस काव्य मे एक सच्चे मित्र के रूप में चित्रित हुआ है। लोका- तिशायी स्नेह के बिना कोई भी उतना कष्ट उठाने को तैयार नहीं हो सकता जितना महेन्द्रसिंह ने सनत्कुमार को खोजने में उठाया है। सनत्कुमार के चक्रवर्ती के रूप में व्यक्तित्व के विकास मे निश्चय ही महेन्द्रसिंह का योगदान कम नहीं है। सच्चा मित्र मिल जाना संसार में सब से बड़ी उपलब्धि है और सनत्कुमार यह लाभ पाकर निश्चय ही निर्द्वन्द्वतापूर्वक अपने जीवनोद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील होता है और अन्त मे इसमें सफलता पा लेता है। अश्वसेन- अश्वसेन हस्तिनापुर का प्रजापालक राजा और सनत्कुमार का पिता है। उसके राज्य करते हुए प्रजा को कभी भी शत्रुज-व्यया अनुभव करने का अवसर नही पाया- १. सनत्कुमारचमिचरितमहाकाव्यम् ११-७६, ८० । २ वहा, १२-५।

Mom [ ४४ ] यस्मिन् प्रजा शासति चण्डशासने, नैवान्वभूवन्प्रतिपक्षिजव्यथाः । स्युः स्फूर्तिमन्मात्रिकरक्षितेषु किं, भयानि भोगिप्रभवानि कहिचित्' । वह बड़ा पराक्रमी था। याचकों को वह प्रभूत दान दिया करता था । वह बड़ा सुन्दर था। पौरागनाएँ स्मराकुल होकर उसके सौन्दर्य-सिंधु का नेत्र-कमलों से पान करती हुई शोभा को द्विगुणित कर देती हैं । शत्रुनो को निशित असिधारा और उनकी अंगनाओं को नेत्रो मे अश्रुधारा प्रदान करके वह अपनो कीतिलता को परिवृद्ध करता था। वह नीति-अगना का आलिंगन करने वाला था। अकीति- लक्ष्मी तो उसकी ओर कटाक्ष करने मे भी समर्थ नही हुई- नीत्यङ्गनालिङ्गनलौलमूत्ति कीत्तिलक्ष्म्याऽपि कटाक्षितो यः। कि भद्रजातीयमतं गजेन्द्र, वशास्वज चुम्नति कोलकान्ता' । उसने अराति करीन्द्र के कुम्भस्थल को मुक्तावली को आकाश मे प्रकाशित कर दिया और रणोत्सव' मे जयश्री के लिए वरमाला तैयार कर दो । उसके राज्य में बन्धन, काठिन्य, अभिघात, छल, प्रवाद, विष्कभशूल आदि का नितान्त अभाव था- केशेषु बन्धस्तरलत्वमक्ष्णोः, काठिन्यलक्ष्मीकुचमण्डलेषु । सम्भोगभगिष्वदयाभिघाता, मृगीहशामेव यदीय राज्ये । प्रवादिजल्पे छलजातियोगः, सकण्टकत्व वनकेतकेषु । विष्कम्भशूले खलु योगजाते, न जातु लोकस्य तु यस्य राज्ये ॥ वह अत्यन्त समर्थ, क्षमाशील, शीलवान् और दानी था। अश्वसेन एक पुत्र-वत्सल पिता है। सनत्कुमार का जन्म होने पर वह प्रफुल्लित होकर अमित दान देता है और सारे नगर मे उत्सव मनाता है। नागरिको को उसने वस्त्राभूषण के साथ ताम्बूल प्रदान किया- ताम्बूलदान वसनैन हीन, हासेन शून्य न विलेपन च । तत्राऽभवत्प्रीतनरेन्द्र वर्गप्रकल्पित नागरसत्तमानाम् ॥ १ १. सनत्कुमारचमिचरितमहाकाव्यम् ७-३६ । २. वही, ७-३६ । ३. वही, ७-४१ । १४. वही, ७-४२ । ५. वही, ७-४४, ४५ ॥ ६. वही, ७-१०२।

[ ४५ ] सर्वांगसुन्दर पुत्र सनत्कुमार को गोद मे लेकर अश्वसेन योगियो-जैसी तन्मयता को प्राप्त हुमा- पुत्रस्य सर्वाङ्गमनोरमस्य, तस्याननाम्भोरुहमीक्षमाणः । योगीन्द्रगम्या समवाप काञ्चिन्मुद निजोत्सगगतस्य भूप:' । उसने पुत्र के मुखकमल को ऐसे चूमा जैसे वह मधुवत हो- तदास्यपद्म परिचुम्बतोऽस्य, मधुव्रतस्येव बभूव तत्र । वह यौवराज्याभिषेक के समय सनत्कुमार को हितकर उपदेश देता है । वह स्वयं प्रजापालक है और ऐसा ही होने के लिये पुत्र को उपदेश देता है। वह राजधर्म का प्राधार काम-क्रोधादि अरि-षड्वर्ग को जीतना मानता है। पुत्र के अपहरण कर लिये जाने पर वह अत्यन्त व्याकुल होकर मन में अनेक प्रकार की शकाएँ करने लगा। उसकी समानता कवि ने रामवियोगी दशरथ से की है- स प्राह रामवत्प्राप्ते वन तज्जनकाकृतिम् । त्वयि तस्पितरी पूर्णामधत्तां शोककोलिती ॥ पुत्र के वियोग की अग्नि मे वह तब तक तडफता रहा, जब तक महेन्द्र सिंह उसे लेकर लौट नही आया। पुत्र के आने पर उसके जीवन मे लोकोत्तर सुख का उदय हुआ । राजगृह मे पुत्र के प्रविष्ट होने पर उसने महोत्सव का ही अनुभव किया । सनत्कुमार ने नीति-निपुणता मे पिता का ही अनुकरण किया। अश्वसेन एक वत्सल-पिता, प्रजापालक राजा और न्यायप्रिय शासक के रूप में इस काव्य मे प्रस्तुत किया गया है । सहदेवी- सहदेवी, सनत्कुमार की माता और कुरु जगल प्रदेश के राजा अश्वसेन को राजमहिषी है। वह गीतविद्या के समान विशुद्धजन्मा, आन्वीक्षिकी-विद्या १. सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् ८-२ । २. वही, ६-४। ३ वही, १२-१४। ४. वही, २३-३ । ५. वही, २३-२४ ॥

[ ४६ ] २ समान प्रथित प्रमाणवाली और त्रयीविद्या के समान सुव्यक्त-वर्णसंस्था कही गई है । वह लक्ष्मी के समान कान्तकामा, शची के समान सौभाग्यवती और यशोमती, ज्योत्स्ना के समान विश्वदर्शनीया और सीता के समान पतिव्रता है- लक्ष्मीरिवोन्मीलितकान्तकामा, शचोव सौभाग्ययशोनिधानम् । ज्योत्स्नेव विश्वेक्षणसौधधारा, बभूव सीतेव पतिव्रता या वह केवल अनुपमित सौन्दर्यशीला ही नहीं है, गुणों मे भी वह सर्वोपरि है। वह सत्यभाषिणी है और 'नृरत्नसू' है । वह सौम्य मूर्ति है, स्वर्णवर्णा है, अलसगा- मिनी है- सुसौम्यमूत्ति द्विषणाभिरामा-प्यनङ्गसगिन्यपि राजकान्ता । या स्वर्णवर्णा महिषोति वित्ताप्यासीदमन्दाप्यलसप्रयाता' । उसे पुष्यसुधासरसी कहा गया है । चक्रवर्ति-लक्षण-युक्त पुत्र को उत्पन्न कर के वह राजा अश्वसेन से बहुमान प्राप्त करती है । वह वात्सल्यमयी माता है। अपने पुत्र को वह अगुली पकड़ कर चलना सिखाती है पुत्र का अपहरण हो जाने पर वह अत्यन्त व्याकुल होती है । उसकी दशा जल से निकाली हुई मीन के समान हो गई है। वह सनत्कुमार के वियोग की आग में अहर्निश जला करती है । उसको तभी सन्तोष होता है जब महेन्द्रसिंह उसे वापिस स्वदेश लौटा लाता है। पुत्र के चरित्र को माता की प्राशा-आकाक्षायो का विकास ही माना जाता है। इस दृष्टि से सनत्कुमार के शोल और सौजन्य का विकास माता सहदेवो के प्रभाव से ही माना जा सकता है। ५ अन्य पात्र- 'सनत्कुमारचक्रि चरितम्' काव्य मे कुछ अन्य पात्र भी आये हैं। उनके चरित्र की एक झाकी-मात्र काव्य मे प्रस्तुत की गई है। ये सारे पात्र नायक सनत्कुमार के चरित्र के विकास मे योग देते हैं। ऐसे पात्रो मे विष्णुश्री और नागदत्त के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं । ८ १. सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् ७-४७ । २. वही, ७-४६ । ३. वहो, ७-५३। ४. वही, ७-५४। ५. वही, ५-६ ।

[ ४७ ] विष्णुश्री नागदत्त की प्रिय पत्नी है। उसका अद्वितीय सौन्दर्य विक्रमयशा पर जादू-सा कर देता है। उसे वह स्वर्ग से उतरी हुई रम्भा के समान अथवा कामदेव से वियुक्त रति के समान, अथवा लक्ष्मी वा पार्वती के समान प्रतीत हुई। विक्रमयशा द्वारा हरण कर लिये जाने पर वह कापती और विलाप करती हुई उससे मुक्ति की प्रार्थना करने लगी। शील से परिच्युत होकर वह राज्य- प्राप्ति को भी कुत्सित मानती है । वह इस गुरुपदिष्ट-मार्ग की अनुयायिनी है कि कुलांगना के लिये पति ही नित्य माननीय है, जैसे कुमुदिनी को कलंकधामा और तुषारवर्षिणी होने पर भी चन्द्ररश्मि ही मान्य होती है । वह राजा के प्रणय- निवेदन करने पर कहती है कि ऐसा कुण्डल-धारण करने से क्या, जिससे कान ही लम्बा होकर छिद जाय' ? सतीत्व मे विश्वास करने वाली होने पर भी वह अन्त में राजा द्वारा दिये हुए प्रलोभनो के सामने पगजित हो जाती है और उस की अकशायिनी बन जाती है । विक्रमयशा को वह अपने सौन्दर्य से अभिभूत कर लेती है । वह आत्मसमर्पण कर देती है। प्रत्याबभाषे तमिति स्मरार्ता, त्वदेकतानाहमिति प्रतीहि । लोला-उपवन मे राजा उसके साथ क्रीडा करने लगा। उसको सारो इन्द्रियों की वृत्तियाँ त्वगिन्द्रिय मे हो प्रविष्ट हो गई । राजा उससे क्षण भर भी वियुक्त होना नहीं चाहता था। विष्णुश्री के ऐसे सौभाग्य को देखकर अन्तःपुर की रानियाँ ईर्ष्या से जल-भुन गईं। उन्होने अन्त मे कार्मणप्रयोग द्वारा उसे मरवा दिया। विष्णुश्री के चरित्र से सनत्कुमार के पूर्वभव की चारित्रिक विशेषतानो पर प्रकाश पड़ता है। प्रथमतः, उसकी रागात्मकवृत्ति का परिचय मिलता है और अन्त मे उस के उसी के शव को देखकर उसके मन में वैराग्य का उदय होता है । युवा विलासी नागदत्त विक्रमयशा का मित्र है। उसकी सुन्दरी पत्नी विष्णुश्री पर विक्रमयशा मुग्ध हो जाता है। विष्णुश्री का अपहरण किये जाने पर वह प्रिया-वियोग में प्रत्यन्त सन्तप्त होकर करुण विलाप करने लगता है- हा हसगामिन्यधुना न कुयुः, कस्या गतिं मे गृहकेलिहसाः। १. सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् २-२३ । २. वही, २-२६। ३. वही, २-३६। ४. वही, २-४६ । ५. वही, २-५३ ।

+ [ ४८ ] विलाप करते हुए कृशकाय वह मृत्यु को प्राप्त हो गया और दूसरे जन्म में भृग बना । वहा पर पेड़-पौधों पर यत्र-तत्र भटकता रहा । अन्त मे तोसरे जन्म मे अग्निशर्मा-नामक वेदपाठी ब्राह्मण हुमा। पूर्वजन्म के वैर का स्मरण करके उसने जिनधर्म से बदला लेना चाहा । उसने राजा हरिवाहन से कहा कि यदि उसे जिनधर्म की पीठ पर गरम खीर परोसी गई तो वह भोजन करेगा, अन्यथा नही ।' धर्मभीरु राजा ने अग्निशर्मा के कथन को स्वीकार कर लिया। इससे जिनधर्म की पीठ का मांस जल गया। इस घटना से जिनधर्म (सनत्कुमार) कों सहनशीलता और धर्मनिष्ठा का परिचय मिलता है। गुणाढय-सुव्रतसूरि का उल्लेख भी इस काव्य में हुआ है। पैशाची प्राकृत में वृहत्कथा की रचना करने वाले गुणाढ्य का नाम साहित्य में प्रसिद्ध है, परन्तु न तो यह कृति ही प्राप्त है और न गुणाढय के विषय में ही प्राचीन साहित्य में अधिक जानकारी ही मिलती है। पुराणो मे ऐसे अज्ञात-प्रसिद्ध पानो पर साम्प्रदायिक रग चढ़ाने की प्रवृत्ति बहुधा दिखाई पड़ती है। ऐसा ज्ञात होता है कि यहां गुणाढ्य और बृहत्कथा' का उल्लेख भी इसी प्रवृत्ति का परिणाम है । वस्तुतः सुव्रतसूरि के वर्णन में यहां मुद्रालंकार से गुणाढ्य और बृहत्कथा की ओर सकेत माना जा सकता है । सुव्रतसूरि का भी इस महाकाव्य में अवतरण सनत्कुमार के चरित्र का विकास दिखाने के लिये हुआ है । पूर्वभव मे सनत्कुमार (विक्रमयशा) ने सुव्रतसूरि की देशना से ही जैनधर्म की साधना का मार्ग अपनाया था। प्राचार्य विनयन्धर सनत्कुमार के दीक्षागुरु हैं। उन्होंने सनत्कुमार के सारे भ्रम दूर कर दिये और उसे वैराग्य-भावित उत्कृष्ट तप के लिये प्रेरित किया । बकुलमती विद्याधरी सनत्कुमार की सुन्दरी पत्नी है। उसने प्रज्ञप्ति-विद्या से सनत्कुमार के अपहरणोपरान्त वृत्त को महेन्द्रसिंह को सुना दिया। साकेत के राजा चन्द्रयशा की पुत्री सुनन्दा सनत्कुमार की पत्नी (स्त्रीरत्न) है । वह सनत्कुमार से अत्यधिक प्रेम करती है और कुमारी अवस्था से ही उसकी प्राप्ति की कामना करती रही है । विद्युद्वेग के मार दिये जाने पर वह सनत्कुमार से विवाह बन्धन में बध जाती है। सनत्कुमार, भानुवेग की पाठ पुत्रियो, बकुलमती की १०० सहेलियों, विद्युद्वेग को बहिन आदि सुन्दरियों से भी विवाह करता है । ये सब परिणीताएँ उसके दाक्षिण्यभाव के विकास मे सहायक बनती हैं। सनत्कुमार गृहस्थ जीवन विताते हुए इन सभी से अत्यधिक स्नेहपूर्ण व्यव- हार करता है। उसी के चारित्रिक प्रभाव से इनमें कभी भी सपत्नी-डाह उत्पन्न १. सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् ३-६१ ।

[ ४६ ] मे नही हुआ । विधुद्वेग की बहिन से वह प्रज्ञप्ति-विद्या भी प्राप्त करता है । अन्त सनत्कुमार मे वैराग्य जागता है और वह सब को छोडकर तप में प्रवृत्त हो जाता है । भोगो में प्रवृत्ति ही निवृत्ति को जन्म देती है । इस दृष्टि से ये सभी सनत्कुमार की पत्नियां उसके भोग-सामर्थ्य को साक्षी बनकर अन्त में भोगोप- शमन मे सहायक हुई हैं। असिताक्ष सनत्कुमार का प्रतिद्वन्द्वी है। पूर्वभव के विष्णुश्री-दयिता-हरण के वैर के' कारण वह सनत्कुमार को रोषपूर्वक मारने के लिये दौड़ता है। उसके भयकर आक्रमण का वर्णन कवि ने इस प्रकार किया है- आवर्तरावर्तनानि प्रयच्छन्, शैलानामप्युल्वणस्त कुमारम् । निन्ये भ्रान्ति सत्वरं चक्रभंग्या, स प्रोन्मीलन्मण्डलीवात उग्रः ।। सनत्कुमार ने बिना किसी भय से उसका सामना किया और अन्त में उसे पराजित कर दिया। असिताक्ष की उपस्थिति काव्य में नायक सनत्कुमार के पराक्रम और निर्भय-भाव को सूचित करने में सहायक हुई है। विद्युद्वेग, अशनिवेग चण्डवेग, चित्रवेग आदि अनेक विद्याधरों से सनत्कुमार को युद्ध करना पड़ता है। वे सभी उसके द्वारा पराजित होते हैं। इससे एक ओर तो वह विद्याधर-चक्रवर्ती बनने में सफल होता है, दूसरी ओर इन घटनाओं से उसकी चारित्रिक दृढ़ता, निर्भयता आदि गुणो की व्यंजना होती है। विद्याधर नरेश भानुवेग सत्नकुमार से मित्रता स्थापित करके अपनी आठ पुत्रियो का विवाह उससे कर देता है । वह अशनिवेग से युद्ध करते समय सनत्कुमार की सेना द्वारा सहायता करता है । सनत्कुमार के स्वदेश लौटने पर विद्याधरो का शासक भानुवेग बना दिया जाता है । सनत्कुमार की अज्ञात स्थान पर सहायता करके उसने उसके चारित्रिक विकास में महत्त्वपूर्ण योग दिया है । वस्तु-वर्णन 'सनत्कुमारचक्रिवरितम्' के कवि ने घटना-बाहुल्य पर विशेष ध्यान दिया है, परन्तु वह कवि-परम्परा मे भारवि, माघ, श्रीहर्ष आदि का अनुयायी हैं, कालिदास, भवभूति आदि का नही । श्रीहर्प तक पहुचते-पहुंचते इस परम्परा मे वैदुष्य-प्रदर्शन की भावना तीव्रतम हो गई थी। उपाध्याय जिनपाल को १. सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् ११३८ । २. वहो, ७२७ ।

[ ५० ] परम्परा का वही रूप काव्य-रचना के लिए मिला। एक ओर परम्परा का आग्रह और दूसरी ओर साम्प्रदायिक दर्शन और प्राचार का स्वरूप प्रस्तुत करने की अभिलाषा-इन दो किनारो के बीच मे इस कवि की प्रतिभा भाव-तरगिणी की सृष्टि करती है। इसमे निर्वल और सबल बिम्बो की लहरियां भी उठती हैं और कल्पना-पवन के झोके जीवन-रस को किनारों के ऊपर छलकाने की स्थिति भी उत्पन्न करते हैं। कवि की भावुकता कल्पना और औचित्य के समन्वय मे होती है । भावुक कवि वह होता है जो वस्तु के मार्मिक स्थलो की पहचान करके उनको रसपेशल- शैली मे समुपस्थित कर सके । वह इन स्थलों के गजरे से बनाकर ऋजु-सूत्र मे पिरो देता है । अगर ऐसा न कर सके तो मार्मिकता की पहचान करने पर भी कवि प्रबन्ध-काव्य के क्षेत्र में सफल नहीं हो पाता। 'सनत्कुमारचक्रिचरितम्' में घटना-बाहुल्य है इसलिए कवि की प्रतिभा का कौशल दो ही दृष्टियो से परखा जा सकता है-प्रथमतः कवि की दृष्टि मार्मिक स्थलो पर कितनी रही है और द्वितीयतः कवि औचित्य की रक्षा कहाँ तक कर सका है ? इन दोनों ही दृष्टियो से उपाध्याय जिनपाल एक भावुक और यथोचित कल्पनाशील कवि है। उसे एक सफल कवि कहा जा सकता है । भावना-जगत् के आनन्द-कानन मे कल्पना का कोमलकान्त-अकुर कालिदास, भवभूति जैसे कवियों में लहलहाता है तो भारवि, माघ, श्रीहर्ष प्रभृति विचित्र- मार्गी कवियो में वह विराट् वृक्ष का रूप लेता है। जिनपालोपाध्याय ने इस कल्पनावृक्ष को औचित्य की ज्योत्स्ना मे स्नात निराला ही बनाकर प्रस्तुत किया है। प्रभात-वर्णन- जिनपालोपाध्याय ने प्रभातकालीन सौन्दर्य का वर्णन १५वें सर्ग मे १६ छन्दों में किया है। संस्कृत-कवियो ने प्रातवर्णन मे विशेष रुचि दिखाई है। माघ ने प्रातःकालीन दृश्यों के संश्लिष्ट चित्र उपस्थित किये हैं। एक चित्र के अनुसार वालसूर्य उदयाचल-शिखररूपी अागन मे खेलता हुआ, कमल-मुखो से हंसती पद्मिनियों को देखते-देखते कोमल-कर फैलाकर, पक्षियों के कलरव के व्याज से पुकारती हुई आकाशरूपी माता की गोद मे लीलापूर्वक जा गिरता है- उदयशिखरिशृङ्गप्राङ्गणेष्वेव रिंगन् , स कमलमुखहास वोक्षितः पद्मिनीभिः ।

। ५१ ] , विततमृदुकरायः शब्दयन्त्या वयोभिः , परिपतति दिवोऽङ्के हेलया बालसूर्यः ।। एक अन्य सरस दृश्य है-- चतुर्थ प्रहर समाप्तप्राय है। पहरे का सिपाही अपने जोड़ीदार को बार-बार जगाता है, किन्तु वह निद्रा के कारण अस्पष्ट स्वर मे उत्तर देता हुआ भी जाग नहीं रहा है- प्रहरकमपनीय स्वं निदिदासतोच्चैः प्रतिपदमुपहूतः केनचिज्जागृहीति । मुहुरविशदवर्णा निद्रया शून्यशून्यां दददपि गिरमन्तर्बुध्यते नो मनुष्यः ।। कहीं कल्पना की खीचतान भी है, परन्तु ऐसे कल्पना-प्रधान दृश्य भी अपने ही ढंग के हैं । एक श्लोक मे कहा गया है कि चारो ओर फैली हुई मोटी रश्मियो के समान किरणो द्वारा खीचा जाता हुआ कलश-तुल्य सूर्य दिशारूपी नारियो द्वारा समुद्र के जल से निकाला जा रहा है- विततपृथुवरातुल्यरूपैर्मयूखैः, कलश इव गरीयान् दिम्भिराकृष्यमाण.। कृतचपलविहगालापकोलाहलाभि-जलनिधिजलमध्यादेष उत्तायतेऽकः ।। नैषधीयचरित मे श्रीहर्ष ने भी अनेक सुन्दर, भावपूर्ण कल्पनायो का प्राश्रय लेकर प्रभातकालीन शोभा का वर्णन किया है। एक श्लोक मे तीन दृश्यों पर एक साथ कवि ने दृष्टि-निक्षेप किया है । वे हैं-छोटे-छोटे तारो का लुप्त होना, परस्पर होड लगाते हुए किरणो का गगन-प्रांगण मे पहु चना और रात भर अन्धकार से सघर्प करने के कारण चन्द्रमा का क्लान्त व क्षीणतेज होना- अमहतितरास्तादृक्तारा न लोचनगोचरा- स्तरणिकिरणा धामञ्चन्ति क्रमादपरस्पराः। कथयति परिश्रान्ति रात्रीतमस्सह युध्वना- मयमपि दरिद्राणप्राणस्तमीदयितास्त्विषाम् ॥ प्रात.काल मे कुशा पर ओस की बूदे पड़ी हुई हैं, वे कवि को ऐसी प्रतीत होती है मानो लोहे को सुइयो पर छेद करने के लिये मोती रखे हुए हैं- १. २. नैषधीयचरितम् १६.४ ।

[ ५२ ] रजनिवमथुप्रालेयाम्भ:कणक्रमसम्भृतैः , कुकिशलयास्यच्छरग्रेशयेरुदबिन्दुभिः । सुषिरकुशलेनायःसूचीशिखांकुरसकर, किमपि गमितान्यन्तमुक्ताफलान्यवमेनिरे।' जिनपालोपाध्याय ने प्रभात-वर्णन में कवि-परम्परा का अनुसरण करने के साथ-साथ अपनी मौलिक सूझ-बूझ का परिचय भी दिया है। रात्रि बीत जाने पर परिरम्भ-विनोद समाप्त हुआ । कुमुद की दुर्दशा देखी नही जाती। अन्धकार के साथ चन्द्रमा वारुणी दिशा को चला गया। ऐसे भाव तो स्वाभाविक रूप से आ जाते हैं । कवि ने प्राकृत-दृश्यों का चित्रण करते हुए जीवन के गम्भीर सत्यों का उद्घाटन भी किया है । जैसे-कलकी, स्नेहीजनों के प्रति भी सुमनस्क नही होते- सकलां रजनी परिचुम्बितां, मुञ्चति नित्य रमापतिलक्ष्मीम् । शशभृत्यथवा क्व कलङ्किना, स्नेहपरेऽपि जने सुमनसस्त्वम्।। एक सश्लिष्ट चित्र मे नदियोरूपी नायिकामो के कमलरूपी स्तनो के प्रिय (सूर्य)-समागमजन्य-हर्ष से विकसित होने का उल्लेख है- उच्छ्वसितानि मनाक् कमलानि, स्तनसुभगानि सरोरुहिणीषु । सदधतीषु वधूष्विव नून, निकटनिजप्रियसङ्गमहर्षात् ॥' दिनेश के उदय होने से सब पदार्थ प्रकाशित होते हैं किन्तु उल्लू हतदृष्टि हो जाते हैं। सच है-दुष्टो पर साधु-पुरुषो का सग भी असर नहीं कर - - पाता- - दुष्टजनस्य हि साधुविषङ्गेप्यफल इतीव दिशत्यनुविश्वम् । सर्वपदार्थविभासि दिनेशोदयहतदृष्टिनि कौशिकवृन्दे ॥' कवि प्रातःकालीन वातावरण का चित्रण करते हुए चकवा-चकवी, कुक्कुट, भ्रमरकुल, पक्षिगण आदि का उल्लेख किये बिना नही रह सका । आकाश-सरोवर मे कन्दुकलोला का यह दृश्य कितना मनोरम है- १. नैषधीयचरितम् १६.६ । २. सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् १५-५ । ३. वही, १५-१४॥ ४. वही, १५-१६ [ ५३ कोकनदच्छविमभ्रसरोऽन्तेऽरुणतिलकाकृतिमिन्द्रदृशोऽपि । काञ्चनविभ्रमकन्दुकलीला, सकलहरिच्छिशुमुग्धवधूनाम् ।।' - सन्ध्या-वर्णन- सन्ध्या और रात्रि का वर्णन कवि ने बड़े ही मनोयोगपूर्वक किया है। प्रताप नष्ट हो जाने पर सूर्य मन्दज्योति होकर अस्ताचल की गुहा मे प्राश्रय- ग्रहण करता है । रक्तिम सूर्य को पश्चिम दिशा की ओर जाता हुआ देखकर अन्य दिरागनाएँ ईर्ष्या से कृष्णमुखी हो गईं; पति का विरोधी पक्ष की ओर जाना बड़ा दुस्सह होता है- सुरक्तसूर्यामभिवीक्ष्य पश्चिमा-मीषद् ध्रुवं श्याममुखास्तदेयया । सद्यो बभूवुः सकला दिगङ्गनाः, पत्युविपक्षानुगमो हि दुस्सहः ।।' प्राची की तरह पश्चिम दिशा को दिवाकर द्वारा रागशालिनी बना दिये जाने पर अन्धकार महारोषपूर्वक वन मे फैल गया है। सूर्य के लोकान्तर- प्रस्थान करने पर पक्षीगण व्याकुल होकर पेड़ो की ऊची चोटियो पर बैठकर क्रंदन करने लगे । आसन्न वियोग से आहत हृदय के घाव से निकले हुए रक्त- रूपो जलवाली नदियाँ सन्ध्याभ्र-प्रतिच्छाया को बार-बार चूमती है । कही आकाश नीला है तो कही पाटल-वर्णन का । वह फूटे हुए आम का विभ्रम उत्पन्न करता है- नीलं क्वचित् क्वापि सपाटल नभो, निष्पिच्यमानाम्रफलस्य विभ्रमम् । दधौ नृणा कालविशेषनिर्मिता, दशा विचित्रां प्रतिपादय ध्रुवम् ।। चन्द्रोदय-वर्णन- सूर्यास्त के उपरान्त रात्रि मे फैले हुए अन्धकार और चन्द्रोदय का भी कवि ने सुन्दर वर्णन किया है । चन्द्रमा का सान्निध्य प्राप्त करने की इच्छावाली प्राची-दिशा के सौन्दर्य का वर्णन देखिये- १ - १. सनत्कुमारचलिचरितमहाकाव्यम् १५-१७ । २. वही, १३-११६ । ३ वहीं, १४-३३। ४. वही, १४-३४॥ ५. वही, १४-३५॥ ६. वही, १४-३७ । ७. वही, १४-३६ ।

मितं दधच्छकदिगङ्गनायाः, सुधारुचेः सङ्ग समुत्सुकायाः । मुख रुचां जालमलञ्चकार, करपारीपरिपाण्डुमूत्तिः ।।' कलाधर की कलाएँ विविध साध्य सिद्ध करने में समर्थ हैं- चकोरदयिताननेष्वमृतबिन्दुवन्दश्रुति, ततान हसनश्रियं कुमुदकोशगर्भेष्वलम् । जगद्विजयपाटव मकरकेतुबाणेष्वहो, कलापि हि कलावतो विविधसाध्यसिद्धिक्षमम् ॥ ૨ 3 ऋतु-वर्णन- जिनपालोपाध्याय ने इस काव्य में कतिपय ऋतुओ का वर्णन बड़े ही भाव: पूर्ण ढंग से किया है। ऋतुवर्णन मे कवि ने परम्परागत शैली का ही अनुकरण किया है, परन्तु भाव-प्रकाशन में कही-कहीं मौलिकता का परिचय भी दिया है। कवि ने वसन्त को कामुक के समान माया हुया बतलाया है- उज्जृम्भिताम्भोरुहचारुवक्त्रो, नानासुगन्धिप्रसवाभिरामः । वनप्रियाकूजितकान्तगीति-रथागमत् कामुकवद् वसन्तः ॥ नानाप्रकार के पुष्पों की पराग उड़ रही है मानों कामदेव संसार को जीतने के लिए जा रहा हो और इस कारण धूल उड़ रही हो- नानाप्रसूनोच्छलितः परागैरुद्धूलित काननमद्य भाति । जगज्जयायोद्यमिनः स्मरस्य, नपस्य नून बलरेणुपूरैः ॥ वसन्त-वर्णन में कवि सहकार, कोकिल, कुरबक,भृगावली, पलाशराजि आदि मे से किसी को भी नही भुला पाया है । गीत, कुसुम, दोलाविलासादि से वन अत्यन्त मनोज्ञ हो गया है- गीत: सपानः कुसुमोघहासः, काव्यैः कथाभिः सुविलासिभोगः। दोलाविलासश्च वनं मनोज्ञः, कान्ति जयत्येतदहो ! दिवोऽपि ॥५ वसन्त के बाद ग्रीष्म का वर्णन है। भोषण ग्रीष्म ऋतु में महेन्द्रसिंह अपने १. सनत्कुमारचक्रिवरितमहाकाव्यम् १४-४७ । २. वही, १४-५४॥ ३. वही, ६-४। ४. वहीं, 8-२१॥ ५. वही, ६-३९।

[ ५५ ] मित्र सनत्कुमार को ढूढ रहा था। उस समय भयानक गरमी से सब जल रहे थे, राहगीर व्यथित हो रहे थे और जलाशय सूख कर मृगतृष्णा मे कारण बन रहे थे। छायादार वृक्षो को उखाड़ता हुआ उत्ताल वायु चल रहा था । ग्रीष्म का रोमाञ्चकारी चित्र इन पक्तियो मे द्रष्टव्य है- मण्डलोपवना उच्चरावर्तितरजोदलाः । नृत्यन् मूर्तमहाभूतलीला दधति यत्र च ।। मरुतो यत्र सध्वाना भ्रमन्तोऽयोन्यसहिताः । भूतेन्द्रा इव लक्ष्यन्ते रासकक्रीडितस्पृशः ॥ मध्याह्न धर्मस प्रस्ता वने चित्रगता इव । निसर्गचापल हित्वा यत्र तिष्ठन्ति वानराः ।।' X X X लोलजिह्वागलद्वारिसिक्तसन्तप्तभूमयः । यत्र छायास्वपि स्वास्थ्य लभन्ते न मृगारयः ।। सनत्कुमार को ढूढते हुए महेन्द्रसिंह को पर्याप्त समय बीत गया। वर्षा आ गई है। वर्षा क। एक सश्लिष्ट चित्र देखिये- धाराम्भः सायकोष क्षिपति सरभसं यत्र योधानुकारे, प्राणश्यन् मानशत्रुश्चकित इव मनोमन्दिरान्मानिनीनाम् । किं चात्यन्त दिदोपे सरलविरहिणा मानसे ऽनङ्गवह्नि- स्तेनापूर्वेन्धनेनाचिररुचिरिव सुध्यातकान्ताकुचानाम् ॥ इस समय आदित्य के समान महातेजस्वी राजा भी कान्तालिङ्गन-लोलुप होकर रण-यात्रा नही करते' । यूथिका, मौलिश्री, कुटज, केतकी आदि इस समय विशेष रूप से खिले हैं । इन्द्र-धनुष की शोभा अलग ही है। रात्रि में खद्योत चमकते हैं, दिन मे मयूर नृत्य करते हैं और प्रोपित-भर्तृकाएं नित्य आंसू बहाती १. सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् १०-५४-५६ । २. वही, १०-५६। ३. वही, १०-६२-६४ । ४. वही, १०-६६। ५. वही, ११-३ । ६. वही, ११-७।

[ ५६ । रहती हैं । वर्षा-ऋतु मे पाचों इन्द्रियो के आमोद की सामग्री एकत्र संचित रहती है । कवि जिनपाल ने १६वें सर्ग में शरद् ऋतु का बड़ा ही सुन्दर चित्रण किया है । वर्षा के बाद शरद् की निर्मलता का एक प्रशस्त चित्र द्रष्टव्य है.- यत्रासंख्यानि वीक्ष्यामलमधुरपयःपूर्णलीलासरांसि , प्राणिन्दन्नल्पकालाश्रयमपनिकट मानस राजहसाः। आकृष्येव प्रणादश्रियमसितगलेभ्यो जगुस्तानि नूच्चः, कूजव्याजेन पक्षोन्नमनविनमनैः खे प्रवृत्ताः प्रमोदात् ॥' वर्षा से वियुक्त होकर अत्यन्त शोक से पयोद पाण्डुर वर्ण के हो गये हैं। वनान्तभाग ने शारदीश्री के प्रभाव से इन्दीवर-समूह की शोभा को धारण कर लिया है । शरद्-ऋतु मे अगस्त्य-तारा उदित होता है। इस विषय मे कवि कहता है कि शारदीश्री की रमणीयता को देखने के लिए कुम्भज ऋषि भी आये हैं। वीतरागियों के मनो को हरण करने वाला सौन्दर्य और ही होता है-- रम्यामिवालोकयितु शरच्छि,य, कुम्भोद्भवो यत्र मुनिः समुद्ययो । रम्यस्य रम्यत्वदशा हि साऽपरा, वीतस्पृहाणामपि या मनोहृतिः ॥५ शरद् वर्णन करते समय कवि गुजार करते हुए मधुकरो, हिरणो, कारण्डवो, सारसो, हाथियो आदि को भी नही भूला है। कामीजनों के लिए तो शरद् ने प्रिया-आलिंगन का सुखद अवसर उत्पन्न कर ही दिया है- खलानामुग्रकार्कश्यपात्र , कुटिलतरमितीव स्व रुरुः शृङ्गमैज्झत् । विमलशशधरांशोः सज्जनस्येव संगाद् , ध्रुवममितमदाढयो यत्र कान्तोपगूढः ॥ D- हृदयमिव १. सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् ११-१४ । २. वही, ११-१३। ३. वही, १६-६३ । ४. वही, १६-६५। ५. वही, १६-७६ । ६. वही, १६-७५।

५७ । - अमृतकिरणमूर्ति चन्द्रमा शरद्-ऋतु मे सारे विश्व का मित्र वन जाता है । इसे सब लोग आनन्दित होकर व्यतीत करते हैं। सौन्दर्य-वर्णन- 'सनत्कुमारचकिचरितम्' काव्य मे रीति-ग्रन्थों मे रूढ शैली का नखशिख वर्णन नही पाया जाता, परन्तु प्रसगवश अनेक स्थानो पर पात्रो के शारीरिक सौन्दर्य का वर्णन हुआ है । १५वें सर्ग में भानुवेग की पुत्रियों का सौन्दर्य इन शब्दो में वर्णित हुना है- अमृतमधुरगिर इभपतिगमनाः, परिगतसुखकरनृपसुतवचना. । प्रतिपदमधुरिह मुदमतिसुभगा, निजजनकसदसि नृपखचरसुताः ।। विवाहार्थ प्रस्थान करते समय सनत्कुमार के सौन्दयं का वर्णन देखिए- आरुह्य मङ्गलसितद्विरद कुमारोऽसख्य भश्चरबलैरनुगम्यमानः । छत्रप्रसाधितशिरा: सुमना: प्रतस्थे, शक्रो यथा त्रिदशकोटिशतातुयातः॥' उसके आगे नृत्य करती हुई रमणियां उसके सौन्दर्य का आँखो से पान कर रही थी और नगर की स्त्रियां उसको देखकर मोहित हो गई थी। सहदेवो के सौन्दर्य का वर्णन करते हुए कवि ने कहा है- लावण्यकिञ्जल्कचिते यदास्य-पद्म विलासाक्षिमघुतताली। रसावमरना न ततः शशाफोन्मक्तु धनाज्जीर्णगवीव पवात् ।। सहदेवी ने क्षीरसिन्धु के उन्मथन से दुग्धच्छवि को प्राप्त लक्ष्मी को कीत्ति को जैसे अपने सौन्दर्य से निरस्त कर दिया- निजप्रभास्तोमपरीतमूर्तिर्या दुग्धसिन्धून्मथनोल्लसन्त्याः । क्षीरच्छटाव्याप्ततनोहि लक्ष्म्याः, कीर्ति समग्रा परिलुम्पतिस्म ।। चन्द्रमा यदि मधुपालो से युक्त हो जावे अथवा कमल यदि शिखण्ड-भार को धारण करे तो उसके श्यामला-वेणीयुक्त चन्द्रमुख से उनको उपमा दी जा सकती है। १. सनत्कुमारचलिचरितमहाकाव्यम् १६-८० । २. वही, १५-३१। ३. वही, १५-५२। ४. वही, ७-४८। ५ दही, ७-५१।

[ ५८ ] 3 शशी यदि स्यान्मधुपालियुक्तः, शिखण्डभारोद्धरमम्बुज वा। तेनोपमोयेत यदाऽऽस्यचन्द्रः, स्निग्धायतश्यामलवेणिदण्डः ॥' अन्तर्वत्नी सहदेवी आकाश-लक्ष्मी के समान सौन्दर्य से विभूषित हुई क्रमेण च क्षीरविपाण्डुगण्डा, सुनिर्मलश्वेतमयूखभूषा । आकाशलक्ष्मीरिव सा विरेजे, मन्दयती वेश्मनि दन्तिनीव ।। कवि ने सनत्कुमार के सौन्दर्य का सर्वांग विवेचन किया है । इसे परम्परागत नखशिखवर्णन की शैली में माना जा सकता है । सनत्कुमार के कण्ठ, नेत्र, ललाट, गण्डस्थल, नासा, प्रोष्ठ, श्मश्रु, स्कन्ध, कर्ण, वक्षःस्थल, बाहुदण्ड, ऊरू, पद, जघा नादि विविध अगों का अलकृत वर्णन किया गया है। नोष्ठ और श्मश्रु का वर्णन द्रष्टव्य है- श्रोष्ठोऽप्यभाच्छोणमणिप्रकाशः, श्मश्र श्रिया प्रापितकान्तकान्तिभिः । प्रवालविच्छेद इवेन्द्रनील-स्थलीनिवेशेन विशेषदीप्तः ।। वक्षःस्थल का सुन्दर वर्णन इन पक्तियो मे हुआ है- वक्षःस्थले हेमकपाटकान्तौ, श्रीवत्सराट् तस्य विनीलरोमा । सुमेरुविस्तीर्ण शिलोपविष्ट-सकृष्णसारथियमाचकर्ष ॥ उसके सौन्दर्य को देखकर रमणिया स्वेद-स्नात हो जाया करती थी। वसन्त-ऋतु मे भ्रमण के लिए निकले हुए सनत्कुमार के सौन्दर्य का वर्णन इन शब्दो मे किया गया है- उच्चैःश्रवाः किं भुवमागतोऽय, शक्रेण भक्त्या प्रहितः कुमारे । सूर्यस्य रथ्यः किमु वानरोक्ष्यलोभेन नेत्रक्षणदोश्वतीर्णः ॥५ सुनन्दा के सौन्दर्य का वर्णन करता हुआ कवि कहता है- उत्कीर्णरूपामिव चन्द्रबिम्बतः, समुद्धताङ्गीमिव पद्मगर्भत. । विभिद्य चारोहणमुत्थितामिव, प्रभाजलोत्तालतरङ्गवाहिनीम् ॥' ४ के अश्व ew १. सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् ७-५२ । २. वही, ७-७६ । ३. वही, ८-१६। ४. वही, ५-२० । ५. वही, ६-६। ६. वही, १७-११ । ५६ ] कवि ने उसके विविध अंगो का अलंकृत वर्णन किया है। शिर पर धारण किये हुए अशुक के विषय मे कवि का कहना है- ज्योत्स्नागुणव्यूतमिवाघन सित, शिरोऽशुक दर्पणकीत्तितस्करम् । दधाति सर्वावयवप्रकाशनादिय जगल्लोचनमोदचद्रिका ।।' उसके ललाट पर लगा हुमा तिलक कामदेव के सज्जीकृत शस्त्र का भ्रम उत्पन्न करता है । सविलास नर्तन करने वाली भौहें कुटिलता मे कामदेव के धनुष के समान होने पर भी उससे विशेष प्रतीत होती है । सुपक्वबिम्बाफल के समान पाटल प्रभा वाले उसके होठ अत्यन्त सुन्दर हैं- सुपक्वबिम्बीफलपाटलप्रभः, प्रभासतेऽस्या रुचिरो रदच्छदः । रागेण सर्वाङ्गगतात्मरूपतः, सर्वस्वनिर्यास इवावतारितः ।। भय भवेत् किं रतिवल्लिपल्लवः, प्रवालखण्डः किमु कामवारिधः । नानीदृशो येन कथञ्चिदीक्षणादपि प्रकुर्याद् विकृतं जगन्मनः ।। निवेशितोऽत्रैव सुधारसः सुरैर्नूनं यदस्मं स्पृहयन्ति कामुकाः । विहाय माधुर्यभुदिक्षुशर्कराखण्डादिवस्तूनि विहस्तमानसाः ।। नगर मे प्रवेश करते हुए सनत्कुमार के सौन्दर्य को देखने के लिए उत्सुक पुराङ्गनामो की सुन्दरता का वर्णन कवि ने बड़े ही नौचित्यपूर्ण ढग से किया है। तैलमर्दन के समय सनत्कुमार के सौन्दर्य को देखकर भागन्तुक देवरूप ब्राह्मण बड़े प्रभावित हुए। उन्होने उसकी शारीरिक-कान्ति की प्रशसा भी की, परन्तु अहकार के कारण शीघ्र ही सनत्कुमार का शरीर कान्तिहीन हो गया । वस्तुतः मनःप्रसाद ही सौन्दर्य का कारण है। उसके बिना वह नष्ट हो जाता है। सनत्कुमार ने जराजीर्ण शरीर को तप द्वारा अभिनव सौन्दर्य से विभूपित किया। ऐसा सौन्दर्य कवि के अनुसार शरीर नष्ट हो जाने पर भी अविनाशी बना रहता है। . बाललीला-वर्णन- कवि ने सनत्कुमार की बाललीला का बड़ा ही रोचक वर्णन किया है। १. रानत्कुमारचमिचरितमहाकाव्यम् १७-१६ । २. वही, १७-२१ । ३. वहो, १७-२२ । ४. वही, १७-३६-३८ । ५. वही, २३-६-१६ ।

। ६० ] 3 बालक सनत्कुमार के मुख को चूमकर पिता अश्वसेन मधुव्रत के समान तल्लीन हो जाता था। पिता के कान में उसके तुतले शब्द अमृत की वर्षा कर देते थे। माता या पिता की अंगुली पकड़ कर चलता हुआ बालक सनत्कुमार नवोदित चन्द्रमा के समान उनकी दृष्टि को प्राकृष्ट कर लेता है- स्खलत्पद कामति मन्दमन्द, शिशाववष्टब्धकराङ्गुलीके। धाव्या धरित्रीपतिराबवन्ध, दृष्टि नवे चन्द्र इवोदयस्थे । उसने काकपक्ष धारण कर रखे हैं । चन्द्रमा की कलाओं के समान बढता हुना वह शीघ्र हो पूर्णकला-सम्पन्न हो गया। उसने कुमारभाव से अनिरुद्ध को जीत लिया, शारीरिक-सौन्दर्य मे कामदेव को जीतने में समर्थ हो गया- जितानिरुद्धोऽपि कुमारभावे, वपुःश्रिया पुष्पशर जिगीषुः । घटना-बाहुल्य के कारण यद्यपि काव्य में बाल-चेष्टायों का अधिक वर्णन सम्भव नहीं था, फिर भी कवि ने भावुकता का परिचय देते हुए सनत्कुमार को बाललीला के वर्णन के लिए अवसर निकाल लिया है। इससे अश्वसेन और सहदेवी की सन्तान-विषयक राग को वात्सल्य रस के रूप में परिणत होने का अवसर मिल गया है। ऐसे रुचिकर मार्मिक स्थलो की खोज और उनका यथोचित चित्रण सिद्धहस्त कवियो का ही काम होता है । ५ नगर-वर्णन- जिनपालोपाध्याय ने कुरुजांगल-प्रदेश की शोभा का वर्णन वरते हुए उसे सब दिशानों का मण्डन कहा है। उसमे अनेक देवालय व बड़े-बड़े सरोवर हैं। सारे निवासी धर्मसेवी हैं। उसमें अनेक चक्रवर्ती उत्पन्न हुए जिनके द्वारा दुर्भिक्ष, रोग, व्यसनादि को समाप्त कर दिया गया। वहां की भूमि पर पुष्पकाननो के विस्तार ने स्वर्ग के नन्दनवन की शोभा को भी तिरस्कृत कर दिया है- सौरभ्यलुभ्यन्मधुपालिनाद-व्याजेन पुष्पोत्कटकाननानि । अधिक्षिपन्तीव वनं सुराणा, प्रत्यव्दमुद्यत्कुसुमानि यत्र ।। १. सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् ८-४ ॥ २. वही, ८-५॥ ३. वही, ६-६ ४. वही, -७ ५. वही, ६-८॥ ६. वही, ८-६ [ ६१ ] २ एकावली अलकार का प्रयोग करते हुए कवि कहता है कि नगर युवतियों से सकुलित हैं, युवतियां अद्भुत रूपवती हैं और रूप युवको का मन चुरा लेता है जिससे उनका मुख म्लान हो जाता है:- पुराणि योषाकुलसकुलानि, योषाकुलान्यद्भुतरूपभाजि । रूपाणि यूना मनसा हि चौराश्चौरा: परिम्लानमुखाश्च यत्र ॥' ऐसा ही वर्णन मदवर्षी-गण्डस्थल पर मडराते हुए भ्रमरो के समूह का है- न दन्तिनो दानविहीनगण्डा, न दानमप्युज्झितगन्धवासम् । गन्धोऽपि नैवासुरभिव्यंधत्त, कलत्क्वणा यत्र मघुव्रतालीम् ।। मर्त्यलोक मे भी यहां नित्य उत्सव मनाये जाते रहते हैं ! इसलिए यह पृथ्वी पर ही स्वर्ग की शोभा को उपस्थित करता है । इस प्रदेश मे हस्तिनापुर है जिसके विषय में कहा गया है- हाणि रम्यस्फटिकोपलद्युतिच्छटाजलक्षालितदिङ्मुखान्यलम् । क्षपास्वखण्डक्षणदापतिप्रभाचितानि यत्राऽऽपुरलक्ष्यमूर्तिताम् ॥' केलिवनो, सरोवरो आदि का वर्णन द्रष्टव्य है- कीर्णानि कर्णामृतकेकिकेकापिकस्वनः केलिवनानि भगाय मानस्य मनस्विनीनामल समाधेश्च समाधिभाजाम् ।। सत्सारसोदीरितमध्यमस्वरव्यामिश्रबहिस्फुटषड्जगीतिभिः सरासि पान्थाय वनैः समं सदा, प्रातर्गतौ यत्र दिशन्ति मङ्गलम् ॥" हस्तिनापुर की समृद्धि के विषय मे कवि का कहना है कि वहा की रत्नराशि को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि रत्नाकर तो नाममात्र का ही रत्नाकर है- यस्मिन्मणीनामवलोक्य रानीन्, सख्यातिगान्यन्यपथे प्रतीयुः । जनाः पयोधि हृतसर्वसार, नाम्नव रत्नाकरकोत्ति भाजम् ।। ससार की सारभूता उस पुरी को देखकर इन्द्र अपनी पुरी को भो होन समझता है- यत्र। १ सनत्कुमारचमिचरितमहाकाव्यम्, ७-१६, २० । २ वही, ७-६। ३. वही, ७-१२ । ४ वही, ७-१६॥ ५. वही, ७-२६ ।

। ६२ ] संसारसाराखिलवस्तुपानं, यद्भूरिभिः सद्गुरुभिः कवीन्द्रः । प्रसाधितं वीक्ष्य सहस्त्रनेत्रो, न वह्वमंस्ताऽऽत्मपुरी गुणज्ञः ॥' सनत्कुमार के जन्म के समय नगर के मार्गों को कुकुम-मिश्रित जल से सीचा गया, कर्पूर-धूम से सुवासित किया और ऐसा कर दिया जिससे उच्छृखल नृत्य करते समय भी नर्तकी को धूलि-कण न लगे- मार्गा असिच्यन्त च कुंकुमाम्बुभिः, सान्द्रः सधूपैर्घनसारमिश्रितैः । तथा यथोच्छृखलनर्त्तनेष्वपि, स्त्रीणां बभूवुन लसद्रज.करणाः ।। प्रत्येक घर सिन्दूर-रजित था, मंगल-वैजयन्ती-मालाएँ वायु से हिल रही थी । गलियों में पुष्प बिखरे हुए थे, जिन पर भौंरे मंडरा रहे थे और वेणु एवं वीणा के नाद के साथ किन्नरों की कला प्रकट हो रही थी- रथ्यासु पुष्पप्रकरे रणद्भिस्तारं द्विरेफैः सहसाऽवियन्त । कलाः प्रभूता अपि किन्नराणां, सवेणुवीणाध्वनयोऽपि नादाः ।। सनत्कुमार के अपने नगर में प्रवेश करते समय नागरिक लोग उसकी सुन्दरता का नेत्रों से पान करते नही अघाते । -- ४ अटवी-वर्णन कवि ने भयानक राक्षसी के समान अटवी का वर्णन भी किया है जिसमे विभीतक के पेड़ उगे हुए हैं, काक-समूह बोल रहा है, फूलों से लदे हुए पलाश हवा से कांप रहे हैं और कई सूखी लताएं भी दिखाई पड़ रही हैं- ताली हिन्तालता तालो कोटिशो यत्र दृश्यते । रुक्षा पत्रदरिद्रा च किं राज्ञा सन्ततियथा ॥र पद-पद पर मृगों की ध्वनि और किल-किलारव सुनाई पड़ता है ! क्रूर मृगाधिपति को देखकर मृग शीघ्र भाग जाते हैं। यमराज के किंकर के समान १. सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यन् १०-२३ । २. वही, ७-३३ । ३. वही, ७-६२। ४. वही, ७-६३ । ५. वही, ७-६६ ।

[ ६३ ] सब प्राणियो का वध करने वाले धनुर्धर किरात भी अटवी मे दिखाई पड़ते हैं। वृक्षो पर रंग-बिरगे वहाँ वाले मयूर दिखाई पड़ रहे हैं'। शमीवृक्ष के फल खा लेने से अतिसार-ग्रस्त गीदड़कुल मास के लिए भी नही दौड़ पाता । ऐसा वर्णन कवि सूक्ष्म-निरीक्षण-पूर्वक ही कर सकता है । उस अटवी में उल्लू घूघारव करता है एव उसे और भी भयानक बना देता है। काले सों का समूह चूहो के पीछे दौड़ता है। अटवी की भीषणता का चित्र कवि ने तदनुकूल भाषा नपना कर ध्वन्यालङ्कार द्वारा प्रस्तुत किया है- यत्रामिषरसोन्मत्ताः स्फारफेत्कारफेरवाः । जयन्त्यमृध्वनिप्रौढान्नक्त नक्तञ्चरानपि ॥' वहां अनेक वराह मारने वालो का वराह अपने दप्ट्रास्त्र से घायल कर देते हैं । मित्र-स्नेहवश महेन्द्रसिंह ऐसी अटवी में भी गया । युद्ध-वर्णन जिनपालोपाध्याय ने युद्ध के तीन प्रसग अपने काव्य मे प्रस्तुत किये है । युद्ध-प्रसग मे कवि ने वीर, रौद्र, भयानक, अद्भुत और वीभत्स रसो का चित्रण यथोचित रूप मे किया है। भापा भी तदनुरूप ओजपूर्ण और चित्रोद्भासिनी है । असिताक्ष के भयानक वाक्रमणो और सनत्कुमार के निर्भीक प्रत्याघातो का वर्णन १३ वे सर्ग मे है । समान वल के योद्धानो का रणकौशल दर्शनीय उत्सव बन गया है। विजय अवश्य सनत्कुमार को होती है, परन्तु असिताक्ष यक्ष भो अमितबल होने से प्रशसा का अधिकारी है। द्वन्द्व-युद्ध मे रत सनत्कुमार यक्ष के विषय मे सोचता है कि, यह शृङ्गहीन वृषभ है अथवा कोई लोकविश्रुत चक्रो हे । एक बार तो उसके प्रहार से वह विसज्ञ तक हो जाता है- मूर्च्छनापगमनात् समुदस्थात्, सुप्तवुद्ध इव केसरिपोतः । क्रोधवाडवपयोनिधिराजो, राजसूनुरपहस्तितवाघ. ॥' १. सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् १०-२३ । २. वही, १०-१६-२८ । ३ वही, १०-२६ । ४. वही, १०-३४ । ५ वही, १०-३५॥ ६ वही, १३-१०६।

[ ६४ ] इस युद्ध का अन्त विजयी सनत्कुमार पर देवों को पुष्पवर्षा से होता है । सनत्कुमार का दूसरा युद्ध विद्युद्व ग से हुआ । वीरवर कुमार ने उसे मुष्टि- प्रहार से ही व्यथित करके समाप्त कर दिया- मुष्टिप्रहारैजितवज्रघातस्त प्राहरद् वीरवरः कुमारः । विस्तार से युद्ध का वर्णन २०वें और २१वे सर्ग मे हुना है । यह वर्णन कवि-परम्परासिद्ध है। इसमे कवि को चित्रभाषा का प्रयोग करके पाण्डित्य प्रदर्शन करने का भी पर्याप्त अवसर मिला है। कही-कही अर्थ निकालने मे खीचातानी करनी पड़ती है। बौद्धिक-व्यायाम इसे भले ही कहा जाय परन्तु काव्य की दृष्टि से ऐसे प्रयोगो का विशेष महत्व नहीं होता। २०वें सर्ग मे उभय पक्षो की सेना के प्रयाण का रोमाचकारी वर्णन है। शत्रुपक्ष की सेना कुमार को तो वैसे ही प्रतीत हुई जैसे सिंह को मृगवाहिनी- दूरादथ कुमारस्य, चक्षुषो विषयं ययौ । मृगादनस्येव मृगीवाहिनी सचलाचला ॥ युद्ध मे सिर तो कट-कट कर ऐसे गिरने लगे जैसे मत्त हाथी कपित्थ-फल गिरा रहा हो- शिरांसि शस्त्रलूनानि पेतुस्तत्र सहस्रशः । कपित्या तूत्फलानीव स्कन्धे मत्तेभताडितात् ॥ र की नदी में शरीर बहने लगे- मूढघातैः परासूनां शरीराणि शरीरिणाम् । वहन्त्यसृग्महानद्यां यादांसीव रयाद् बभुः ॥ श्रावेश में कई वीर अपने शस्त्र फेंक कर, क्रुद्ध होकर अपने प्रतिद्वन्द्वी से केशखीचते हुए युद्ध करने लगते है- प्रक्षेपे सर्वशस्त्राणामयुध्येतां स्फुरत्क्रुधौ । केशाकेशि भुश कौचिदहो क्रोधः सुदुर्धरः ।। 3 १. सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् १३-१०६ । २. वही, १३-११५। ३. वही, १३-१२३ । ४. वही, १०-६३ । ५. वही, २०-२५। ६. वही, २०-८४॥

[ ६५ ] २१वें सर्ग मे अनेक प्रकार के भाषा-प्रयोग देखे जा सकते हैं। अपने सेनानियो के मर जाने पर अशनिवेग महान् अमर्ष से भर कर समर मे स्वयं उतरा- महामर्षभरः सोऽपि विवेश समरे स्वयम् । भीमं यमस्य वेश्मेव मुमूर्षुरिव साहसी ।।' गोमूत्रिका, खङ्ग, मुशल, धनु, हल, शक्ति, क्षुरिका, कलस, निश्रेणिका नादि बन्धो का चमत्कार-पूर्ण प्रयोग करते हुए कवि ने युद्ध का रोमाचपूर्ण वर्णन कया है । आग्नेयास्त्र, वायव्यास्त्र आदि का प्रयोग भी युद्ध मे हुआ है। वारुणास्त्र का वर्णन द्रष्टव्य है- सस्भार वारुण मन्त्रं राजबीजी जयावहम् । येन सद्यो गजश्यामानशे व्योम वारिदैः ।। इस युद्ध मे सनत्कुमार विजयी हुआ। उसको प्रशसा सर्वत्र की गई। चित्रकाव्य मे युद्ध का जैसा वर्णन जिनपाल ने किया वैसा माघ और श्री. हर्ष भी नही कर पाये। चित्रकाव्य को चाहे काव्यशास्त्री अधम काव्य मानते हों, परन्तु उसमे दक्षता पा लेना भी कम महत्त्व की बात नहीं है। . राजनीति-वर्णन अश्वसेन ने सनत्कुमार को व्यावहारिक राजधर्म की शिक्षा दी है । वह कहता है कि राजाओं का प्रथम धर्म प्रजापालन है- वत्स ! प्रजापालनमेव धर्मः, क्षोणीश्वराणां प्रथमः प्रतीतः । दुष्टो को क्षमा न करना और नीतिमान् होना, दोनो राजनीति के अंग हैं- दुष्टाक्षमित्वं नयशालिता च, द्वय तदङ्ग सहज च तत्ते। साशन प्रावृषि नर्तन चानुशिष्यते केन नवः शिखण्डी ॥ काम दुर्वार्य पिशाच है, क्रोध मदमत्त बलवान् योद्धा है । राजामो को इन १. सनत्कुमारचमिचरितमहाकाव्यम् २१-३४ (इस श्लोक में क-च-ट-नवगं का परिहार किया गया है। ) २. वहीं, २१-६२। ३. वही, ८-६३। ४. वही, ६-६६। ५. वही, ८-७०।

[ ६६ ] - - पर विजय प्राप्त करना चाहिए। राजा के वास्तविक शत्रु काम, क्रोध, मद, लोभ, दम्भ आदि ही हैं। इनको जीते बिना अन्धकार मे प्रकाश भानु भी नही कर सकता' । इन्द्रियाँ घोड़े के समान उच्छ खल होती हैं । उनको मयत करना भी आवश्यक है । कौटिल्य ने भो राज्य का मूल इन्द्रिय-जय माना है। पर-स्त्री की कामना लकेश्वर की तरह समूल नष्ट करने वाली है । यहां उस धारणा का खण्डन हो जाता है जिसके अनुसार विक्रमयशा यथा-तथा अपने जीवन की रक्षा करना दण्डनोति का आधार मानता है-पर-स्त्री का हरण करके भी- यथा तथाऽऽत्मा परिरक्षणीयः, इत्याह तावन्ननु दण्डनीतिः । प्रजा मे अनुराग बढ़ाकर राजा चिरकाल तक राज्य भोगने मे सफल होता । न्यायनिष्ठ होने से राम की तरह राजा प्रजानुरागी होता है। राजा को घोर, क्षमाशील, विनम्र होने के साथ ही पराक्रमी होना चाहिए । उत्तम गुणो से ही राजा प्रजा का पालन करने में समर्थ होता है। अश्वसेन के इस उपदेश की तुलना कादम्बरी के शुकनासोपदेश और दमयन्तो-कथा-चम्पू के सालकायनोप- देश से की जा सकती है। वस्तु-वर्णन में अलङ्कारों का प्रयोग अलकृति काव्य-शरीर के शोभा-वर्द्धन मे कारण बनती है । लोक का अध्ययन करने पर स्पष्ट प्रतीत हो जायगा कि अलकारो की ओर रुचि मनुष्य-मात्र की सहज प्रवृत्ति है । यही प्रवृत्ति कला को जन्म देती है, परन्तु काव्य-कला में इनके प्रति अतिशय प्राग्रह अरुचि का कारण भी बन जाया करता है । सस्कृत के अलकार- सम्प्रदाय के प्राचार्य अलकार को मानव की सहज-रुचि का सहजात होना स्वीकार करते है और इसी रूप मे काव्य की आत्मा मानते हैं, परन्तु विचित्र- मार्गीय भट्टि, माघ, श्रीहर्ष आदि कवि अलंकार को इस रूप मे स्वीकार नहीं करते थे। जिनपाल भी इसी परम्परा के कवि हैं और उन्होने अलकारो का उपयोग अपनी कृति मे महाकाव्योचित गरिमा और उदात्तता का समावेश करने के लिये किया है। कवि ने शब्दालकारो और अर्थालकारो-दोनो का ही उपयोग अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिए किया है । उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक, अर्थान्तरन्यास, परिसख्या, १. सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम्, ८-७२ । २. वही, १-२६ । १. वही, ६-८७।

[ ६७ ] एकावली, असगति, सदेह, उदाहरण, विषम, मुद्रा आदि अलंकारो का काव्य मे यथोचित प्रयोग हुआ है । शब्दालंकारों का भो कही-कही बड़ा हो स्वाभाविक प्रयोग पा है । यथा, अनुप्रास का प्रयोग- वसतिः कालकेलीनां रौद्रतायाः पर पदम् । दुःखानामाकरो धात्रा चक्र या कौतुकादिव ॥' श्लेष, यमक और वक्रोक्ति का भी अनेक स्थलों पर यथोचित स्वाभाविक प्रयोग हुप्रा है। ऐसे स्थलो पर कवि को अपने उद्देश्य मे सफलता मिली है । अलकारो के स्वाभाविक प्रयोग के उदाहरण अन्यत्र पा चुके हैं । जहां कवि ने खोचतान कर के अलंकारो का प्रयोग करने को चेष्टा को है। बहा कवि के उद्देश्य को हानि ही हुई है। २१वें सर्ग मे कवि ने शब्द-प्रयोग के माध्यम से चमत्कार उत्पन्न करने की चेष्टा की है। कही उसने विशेष वर्ग के वर्गों का परिहार किया है। यथा- (१) क-वर्ग-परिहार- महीयांसो भवन्त्येव महद्भ्योऽपि हि भूतले । प्रोतुना नास्यते बहीं यदाशीविषवृन्दहा ।' (२) क-च-वर्ग-परिहार- तेन तत्र तथा तेने घनश्रोः शरसन्ततिः । यथाऽसीदास्यचन्द्रस्य ग्रासच्छाया दिने ह्यरेः ।.. (३) क-च ट-वर्गप्रय-परिहार- प्रादधेऽथ यश.शेषा भूरिसेनाः स शात्रवोः । सुसंहता अपि ततो रत्नसूरिव तामसी ॥ (४) क-च-ट-तः वर्ग-चतुष्क-परिहार- सभायामसुरेशोऽपि यशः समरसम्भवम् । यस्योरुरोषभीमस्य विववार शशिप्रभम् ।।' १. सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम्. १०-३८ । २ द्रष्टव्य पूरा २१वा सगं । ३ वही, २१-७॥ ४ वही, २१-१२। ५. वहीं, २१-२१ । ६. वही, २१-३७ ।

- [ ६८ । (५) पंचवर्ग-परिहार- आहवेऽवसर: सार साहसे हावराऽशिषाम् । वीरराशेरिहाऽस्याऽसल्लीलावार सरो रवेः॥' (६) तालव्य-वर्ण-परिहार- आददे नम्रता साधु वरवाहुप्रसाधनम् । स धनुः सद्गुणोपेतं कान्तागात्रमनोहरम् ॥ इसी सर्ग में गोमूत्रिका, खङ्ग, मुशल, धनु, हल, शक्ति, शर, क्षुरिका, चामर, कलस आदि बन्धो का प्रयोग हुआ है। चक्रवन्धों में 'सनत्कुमारचक्रि- चरितमिदं' 'जिनपालगणिवचनमिद' ४ वाक्यगर्भित छन्दों का प्रयोग भी हुआ है। इन प्रयोगों से यही व्यक्त होता है कि कवि का भाषा पर असाधारण अधिकार है। वस्तु-वर्णन में छन्द का उपयोग छन्द अर्थ को प्रकाशित करने वाली सुनिश्चित पद-योजना को कहते हैं। छन्द ही सघनता और विरलता से काव्य को बन्ध या मुक्त बनाता है। छोटे से छोटे 'श्री' छन्द से लेकर 886 अक्षर के बड़े दण्डक-छन्द तक लिखने की काव्य-परम्परा विद्यमान है। विषय और शैली के अनुसार विशिष्ट छन्दों का प्रयोग होता रहा है। कुछ छन्द तो विशिष्ट काव्य-परम्परा के लिए रूढ हो गये हैं। छन्द-शब्द की व्युत्पत्ति 'छदिर् ऊर्जने, छदि सवरणे, चदि आह्लादने दीप्तौ च, छद संवरणे, छद अपवारणे' आदि धातुओं से सम्भव है । वेद में छंद को आच्छादन के अर्थ में प्रयुक्त माना गया है । छान्दोग्योपनिषद् की एक कया के अनुसार मृत्यु से डर कर देवगण त्रयोविद्या में प्रविष्ट होकर छन्दों से छादित हो गये। आच्छादन करने से ही छन्दों का छन्दत्व है । ऐतरेय-पारण्यक के अनुसार स्तोता को आच्छादित करके छन्द पापकर्मों से रक्षित करते हैं। १. सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम्, २१-४२ । २. वहीं, २१-५१ । ३. वही, ०१-१०४। ४ वही, २१-११२ । ५ वैदिक छन्दो-मीमाना-पं० युधिष्ठिर मीमासक, पृ० ११-१३ ६ यास्क-निरुक्त, ७-१२ ७. छान्दोग्योपनिषत, १-४-२, ८. ऐतरेय.यारण्यरु. २-२ शरीर का आयतन सप्त-छन्दो से निर्मित होता है' । उनका काम शरीय को मर्यादित करना होता है। वही काम छन्द करता है । साहित्य मे छन्द का अपना महत्त्व होता है। कात्यायन के अनुसार सारा वाड मय ही छन्दोरूप होता है='छन्दो मूलमिद सर्वं वाङमयम् ।' छन्द के बिना दुर्गाचार्य के अनुसार, वाक् उच्चरित नही हो सकती। केवल पद्य मे हो नही, गद्य मे भी छन्द का अनुशासन रहता है। छन्द तो शब्द की अर्थ-लय की घोषणा करने वाला होता है। इसलिये कोई शब्द छन्द-रहित नहीं होता । यह अक्षरों का नियामक होता है। कात्यायन के अनुसार यही छन्द का प्रमुख कार्य है - यदक्षरपरिमाण तच्छन्द:५ वस्तुतः भावों को आच्छादित करके अपने मे सीमित करने वाली शब्द-सघटना को साहित्य में छन्द कहते हैं। अर्थ को प्रकाशित करके अर्थचेता को आह्लादयुक्त करने मे भी छन्द का छन्दत्व प्रकट होता है', महाकाव्य तो प्रबन्ध-सज्ञा का अधि- कारी ही छन्दो से बनता है। छन्दो को तेजस्विता का चरमरूप मुक्तक-काव्य मे प्रकट होता है। महाकाव्य में छन्द अर्थ-मर्यादा मे ही कारण नही बनता, उसका काम कथा- प्रवाह को अक्षुण्ण बनाये रखना भी होता है । छन्दो के पद-पद पर परिवर्तन से कही यह प्रवाह टूट न जाय-इस आशका के कारण महाकाव्य के लक्षणकारो ने यह नियम बना दिया है कि एक सर्ग मे एक ही छन्द प्रयुक्त होना चाहिए । हां, कथा में आपेक्षिक नाटकीयता लाने और घटना को मोड देने के लिए सर्गान्त में छन्द बदला जा सकता है। कवियो ने बहुधा इस नियम का निर्वाह अपनी कृतियो मे किया है, परन्तु चमत्कारप्रिय महाकवियो ने इस ओर ध्यान नहीं दिया । उन्होने छन्दो को भी चमत्कार-प्रदर्शन का माधन बना लिया । हिन्दी के कवि केशव को यह प्रवृत्ति सस्कृत के कवियो से मिली है। जिनपालोपाध्याय उन सस्कृत-कवियों में से हैं जिन्होने चमत्कार-प्रदर्शन के इस उपाय को अपना कर आगे के कवियो के लिए प्रेरणा देने का कार्य किया। उन्होने सनत्कुमारचकि- चरितम्' मे ७६ प्रकार के छन्दो का प्रयोग किया है। इतने छन्दो का कुशलता- - १. स्वच्छन्दता, स्वतन्त्रता पोर स्वराज्य-डॉ० नदीप्रसाद पचोली २. ऋग्यजुप परिशिष्ट ५ ३. 'नाच्छन्दमि वागुच्चरति इति' निस्कत, दुर्गवत्ति, ७-२ ४. 'छन्दहीनो न शब्दोऽस्ति' नाटघशात्य, १४-१५ ५. मनुफमणी ६ म विनयसागर-वत्तमौक्तिक-भूमिका द्रष्टव्य । ७० ] - हुआ है। पूर्वक प्रयोग कर पाने से यह स्पष्ट हो जाता है कि कवि का छन्दशास्त्र पर भो असाधारण अधिकार काव्य में प्रयुक्त छन्दों के नाम सर्ग-क्रम से इस प्रकार है- १. सर्ग में-इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, इन्द्रवज्रोपेन्द्रवज्रोपजाति के १४ भेद- कीत्ति, वाणी, माला, शाला, हसी, माया, जाया, बाला, आर्द्रा, भद्रा, प्रेमा, रामा, ऋद्धि, बुद्धि-,वसन्ततिलका और अन्त मे शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग सर्ग में-इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, इन्द्रवज्रोपेन्द्रवज्रोपजाति १३ भेद, वशस्थ इन्द्रवशा, वशस्थेन्द्रवशोपजाति के १० भेद और अन्त मे मालिनी छन्द का प्रयोग आ है। ३. सर्ग मे -इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, इन्द्रवज्रोपेन्द्रवज्रोपजाति के १४ भेद, शार्दूलविक्रीडित और मालिनी छन्दों का समावेश हुआ है। ४. सर्ग मे-इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, इन्द्रवज्रोपेन्द्रवज्रोपजाति के १४ भेद, इन्द्रवशा, वशस्थेन्द्र वशोपजाति के ६ भेद और अन्त मे शार्दूलविक्रीडित छन्द का उपयोग हुआ है। ५. सर्ग मे-इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, इन्द्रवज्रोपेन्द्रवज्रोपजाति के १३ भेद, वंशस्थेन्द्रवशोपजाति के ७ भेद और अन्त मे मालिनी छन्द का प्रयोग हुआ है। ६. सर्ग मे-इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, इन्द्रवज्रोपेन्द्र वनोपजाति के १३ भेद, वशस्थेन्द्रवंशोपजाति का १ भेद, शार्दूलविक्रीडित और स्रग्धरा छन्द का व्यवहार हुआ है। ७. सर्ग मे-इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, इन्द्रवज्रोपेन्द्रवज्रोपजाति के १४ भेद, वशस्थ, इन्द्रवशा, वशस्थेन्द्रवशोपजाति के ११ भेद, वसन्ततिलका और मालिनी छन्द का समावेश हुआ है। ८. सर्ग मे-इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, इन्द्रवज्रोपेन्द्रवज्रोपजाति के १४ भेद, वंशस्थेन्द्रवंशोपजाति का १ भेद, अन्त मे शार्दूलविक्रीडित छन्द का उपयोग हुया है। ६. सर्ग में-इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, इन्द्रवज्रोपेन्द्रवज्रोपजाति के ६ भेद, आर्या, अनुष्टुप्, वशस्थेन्द्रवशोपजाति का १ भेद, वसन्ततिलका, स्रग्विणी, मालिनी, पृथ्वी और स्रग्धरा का प्रयोग हुआ है।

[ ७१ ] १०. सर्ग मे~-अनुष्टुप्, आर्या, मालिनी, पृथ्वी और अन्त मे हरिणी छन्द का व्यवहार हुआ है। ११. सगं मे-अनुष्टुप्, उपेन्द्रवज्रा, इन्द्रवज्रोपेन्द्रवज्जोपजाति के २ भेद, वसन्ततिलका, मालिनी, शार्दूलविक्रीडित और स्रग्धरा छन्द का समावेश हुधा है। १२. सर्ग में- अनुष्टुप्, इन्द्रवज्रोपेन्द्रवज्रोपजाति के ३ भेद और अन्त मे स्रग्धरा छन्द का उपयोग हुआ है। १३. सर्ग मे- आर्या, गीति, पादाकुलक, युग्मविपुला, द्विपदी, वैतालीय, द्रुत- विलम्बित, तोटक, रथोद्धता, मालिनी, विद्युन्माला, हरिणी, भ्रमरविलसिता, भुजगशिशुसृता, दोधक, प्रमाणिका, स्वागता, वसन्ततिलका, चण्डवृष्टिप्रपात- दण्डक, हरिणप्लुता, वेगवती, विषमवृत्त, इन्द्रवज्रोपेन्द्रवज्रोपजाति के ३ भेदो का प्रयोग हुआ है। १४. सर्ग मे-अर्णदण्डक, अर्णवदण्डक, व्यालदण्डक, मालिनी, प्रहर्पिणो, रुचिरा, अपराजिता, शिखरिणी, पृथ्वी, हरिणी, इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, इन्द्रवज्रो. पेन्द्रवज्रोपजाति के १० भेद, इन्द्रवशा, वशस्थ, वशस्थेन्द्रवशोपजाति के ६ भेदो का व्यवहार हुआ है। १५. सर्ग मे-मणिगुणनिकर, वाणिनी, स्रग्विणी, ऋषभगजविलसित, वसन्त- तिलका, मालिनी, उपचित्र, द्रुतमध्या, वेगवती, केतुमती छन्द का समावेश हुआ है। १६. सर्ग मे~वशस्थ, इन्द्रवशा, वशस्थेन्द्रवशोपजाति के १४ भेद-वैरासिकी, रताख्यानिकी, इन्दुमा, पुष्टिदा, उपमेया, सौरभेयो, शीलातुरा, वासन्तिका, मन्द- हासा, शिशिरा, वैधात्री, शखचूडा, रमणा, कुमारी-, भार्या, उपगीति, अनुष्टुप्, इन्द्रवज्रा, इन्द्रवज्रोपेन्द्रवज्रोपजाति के ४ भेद, मालिनी, हरिणी, पृथ्वी और स्रग्धरा छन्द का उपयोग हुआ है। १७. सग मे~वशस्थ, इन्द्रवशा, वशस्येन्द्रवशोपजाति के १४ भेद, इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, इन्द्रवनोपेन्द्रवज्रोपजाति के ३ भेद एव स्रग्धरा छन्द का प्रयोग हुआ है। १८. सर्ग मे-वशस्थ, इन्द्रवशा, वशस्थेन्द्रवशोपजाति के १४ भेद, अनुष्टुप्,इन्द्र वज्रोपेन्द्रवनोपजाति के ह भेद, शार्दूलविक्रीडित तथा नग्घरा का व्यवहार हुमा है १६. सर्ग मे--अनुष्टुप्, इन्द्रवजा, इन्द्रवज्रोपेन्द्रवज्रोपजाति के ५ भेद, [ २ ] -- वंशस्थेन्द्रवंशोपजाति का १ भेद, मालिनी एव हरिणी छन्द का समावेश हुआ है। २०. सर्ग मे-अनुष्टुप् और अन्त में स्रग्धरा का उपयोग हुआ है। २१. सर्ग में-अनुष्टुप, आर्या, इन्द्रवशा, उपेन्द्रवज्रा, शार्दूलविक्रीडित और अन्त में स्रग्धरा छन्द का प्रयोग हुआ है। २२. सर्ग में-रथोद्धता और स्रग्धरा छन्द का व्यवहार हुआ है। २३. सर्ग मे-रथोद्धता और अन्त मे मालिनी छन्द का समावेश हुआ है। २४. सर्ग में-रथोद्धता, नाला, शार्दूलविक्रीडित, स्रग्धरा और मालिनी छन्द का उपयोग हुआ है। प्रशस्ति इन्द्रवज्रा, इन्द्रवज्रोपेन्द्रवज्रोपजाति के ६ भेद, इन्द्रवशा, वशस्थेन्द्र- वंशोपजाति के २ भेद, रथोद्धता, शार्दूलविक्रीडित, शिखरिणी, प्रार्या, स्रग्धरा और मालिनी छन्द का प्रयोग हुआ है। इस प्रकार इस काव्य मे मात्रिक छन्द ७, वर्णिक छन्द ६२, अद्धसम वर्णिक छन्द ५ और विषम छन्द २, कुल ७६ छन्दों का कवि ने प्रयोग किया है । इन प्रयुक्त छन्दो का वर्गीकरण एव लक्षणों पर द्वितीय परिशिष्ट में विस्तार से प्रकाश डाला गया है, द्रष्टव्य है। कवि ने २०, २२, और २३वे सर्ग मे महाकाव्य के इस लक्षण का निर्वाह किया है कि एक सर्ग मे एक ही छन्द का प्रयोग होना चाहिए और सर्गान्त में छन्द-परिवर्तन होना चाहिए । अन्य सर्गों में अनेक छन्दो का प्रयोग हुआ है। अधिकतर सगों मे इन्द्रवज्रोपेन्द्रवज्रोपजाति, वंशस्थेन्द्रवशोपजाति, अनुष्टुप् और रथोद्धता छन्दो का प्रयोग हुआ है। ऐसा ज्ञात होता है कि कवि के ये प्रिय छन्द हैं। सब से अधिक छदो का प्रयोग १३, १४, १५, १६, १७ और १८वें सर्ग मे हुआ है । जहाँ अपभ्रश-साहित्य के प्रभाव से कवि ने पादाकुलक, द्विपदी आदि छदो का प्रयोग किया है वहाँ पाण्डित्य-प्रदर्शन की दृष्टि से चण्डवृष्टिप्रप्रात, अर्ण, अर्णव और च्याल आदि दण्डक छदो का तथा अपराजिता,ऋपभगजविलसित, मरिणगुणनिकर आदि अल्प-प्रचलित वृत्तो का भी समावेश किया है । रसानुकूल छदो का चयन एवं प्रयोग करने में कवि सिद्धहस्त प्रतीत होता है। जहाँ तक कथा-प्रवाह का प्रश्न है, निश्चय ही छदोवैविध्य से वह टूटा है,परन्तु काव्य-सौन्दर्य की दृष्टि से इसमे कोई व्याघात नही पा पाया है। ऐसा प्रतीत [ ७३ ] होता है कि कवि का मन जब वस्तु-वर्णन करते करते भावाभिभूत हो जाता है तो वह अपने मन के उल्लास को अनेक छन्दो के माध्यम से व्यक्त करने लगता है । जहा चमत्कार-प्रदर्शन की भावना से ऊपर उठ कर कवि ने इस रूप में छन्दों का उपयोग किया है वहा सचमुच ही कवि अपने कविकर्म में सफल हुआ है। रस-चित्रण - काव्यानन्द का दूसरा नाम रस है । जो आनन्दधारा काव्य में आद्योपान्त प्रवाहित होती है और जिसका पास्वादन सहृदय किया करते हैं, उसी को रस कहते हैं-रस्यते इति रसः । तैत्तिरीयोपनिषद् में रस को ब्रह्म से अभिन्न पानन्द-स्वरूप माना गया है-रसो वै सः, रस ह्येवाय लब्बानन्दो भवति" । रस काव्य-पुरुष को आत्मा है। अलकार, रोति, छन्द आदि इसके वाह्य उपकरण हैं । वामन रस को कान्ति-गुण का मूल तत्त्व स्वीकार करते हैं--'दीप रसत्व- कान्तिः' । जिनपालोपाध्याय ने अपने पूर्ववर्ती माघ, भारवि, श्रीहर्ष प्रादि को परम्परा में अपने काव्य में कान्ति को लाना आवश्यक समझा । यह कान्ति मौचित्य से प्राती है । शब्द और अर्थ का औचित्य काव्य में कान्ति को जन्म देता है और यही कान्ति रस बन जाती है। कान्ति-विहीन कविता नीरस भोर निःस्पन्द हो जाती है- एते रसा रसवतो रमयन्ति पुंसः, सम्यविभज्य रचिताश्चतुरेण चारु । यस्मादिमाननधिगम्य न सर्वरम्य , काव्यं विधातुमलमत्र तदाद्रियेत ।। ऋग्वेद के अनुसार काव्य मे रमणीयता, प्रियता, मधुर-मादकता तथा चारुता मुख्य होती है । इसका मूल रस है। इसलिए इस रस पर विचार करना वस्तुतः काव्य को प्रात्मा की खोज करना है-उसको रमणीयता का प्रत्यक्ष दर्शन करना है। जैसा कि अन्यत्र कहा जा चुका है कि सनत्कुमारचक्रिवरित-काव्य का मुख्य रस शान्त है । शृगार, दोर, बीभत्स, रौद्र मादि अन्य रस इसी को पुष्ट करते १. तैत्तिरीयोपनिषद् ११३१ २. डॉ० फतहसिंह भारतीय सौन्दर्य शास्त्र को भूमिरा, प ७३ ७४ ] हैं । शृगार-रस काव्य की रागात्मिका-वृत्ति का मुख्य आधार होता है । साहित्य- दर्पण के अनुसार शृग या कामोद्रेक के आगमन का हेतु शृंगार कहलाता है। वह उत्तम प्रकृति का होता है- शृङ्ग हि मन्मथोद्भेदस्तदागमनहेतुकः । उत्तमप्रकृतिप्रायो रसः शृंगार उच्यते । शृगार में मन की कोमल सौन्दर्य-भावना को प्रमुखता मिलती है और इसके माध्यम से दो मनोभूमियों का एकत्र आध्यात्मिक-योग प्रदर्शित किया जाता है । लौकिक्ता और अलौकिकता का अद्भुत मिलन शृगार मे देखने को मिलता है । इसलिए कवि ने इस काव्य में अपूर्व चारित्रिक-दीप्ति के विकास में शृगार का उपयोग किया है । शृगार के संयोग और वियोग दोनों पक्षों का सन्तुलित चित्रण इस काव्य मे देखा जा सकता है। प्रथम सर्ग मे ही विष्णुश्री के उद्दीपक-सौन्दर्य का चित्रण है। उसके दर्शन- मात्र से विक्रमयशा काम सन्तप्त हो जाता है। उसकी दशा का वर्णन इन शब्दों मे देखा जा सकता है- इमा विना तु क्षणमप्यलं न, प्राणानवस्थापयितुं समर्थः । ग्रीष्मोष्मसन्तप्तशिलातलस्थः, सरश्च्युतो मत्स्य इवातिदीनः ।।' विष्णुश्री के साथ विताये उसके कामोद्दीप्त-क्षणों का चित्रण कवि ने बड़े ही संयत ढग से किया है । इसके लिए उपयुक्त प्रतीकों का प्रयोग किया है। यह कहा जा चुका है कि शृगार का चित्रण कवि ने एक विशिष्ट उद्देश्य से किया है। इसीलिए वह बीच-बीच मे कामुकता को धिक्कारने से नहीं चूकता- धिक् कामुकत्व जनवाच्यतासुहृत्, सद्गौरवोल्लुण्ठनपश्यतो हरम् ।। - तथा- न कामुकः पासुरिवादधाति, स्थिति गुरूणां यदि चन्द्रबिम्वे । यतोऽस्य मालिन्यभृतः कुसस्थः, सम भवेत् सन्ततभैत्रीमत्र ।' विष्णुश्री के 'किं तेन सुकुण्डलेन यत्रोटयत्यद्भुतलम्बकर्णम्'-इस कथन में कवि ने लोकोक्ति का बड़ा ही सुन्दर और उपयुक्त प्रयोग किया है। १. सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाम्पम्, १-८२ २. वही, २-६॥ ३. वही, २-८॥

[ ७५ ॥ - वित्रमयशा विष्णुश्री से क्षण भर का भी वियोग नहीं चाहता था- यथेन्दुमौलिः सततानुरागाद्, गिरीन्दपुत्र्या क्षणमप्ययोगम् । विस्रोतसो वा सलिलाधिनाथस्तस्यास्तथा नच्छदसौ क्षितीशः ।।' संयोग मे वियोग की कोई कल्पना भी नही कर सकता। नागदत्त की वियोगावस्था का वर्णन भी काव्य मे बड़ा ही सुन्दर और औचित्यपूर्ण हुअा है। विष्णुश्री के गुणो का वखान करने वाली अभिसारिका के वचनों को सुन कर वह व्याकुल हो जाता है- प्रियागुणस्मत्यभिसारिकाभि-चिालितोऽसौ विललाप दीनम् । हा !। हमगामिन्यधुना न कुयु', कस्या गति मे गृहकेलिहसाः ।। वह चित्रलिखिता-प्रिया को देखकर उन्मत्तवत् हो जाता है- चित्रापितामप्यवलोक्य कान्ता, दूरोन्नमद्बाहुरघावदेषः । उधर विष्णुश्री को मृत्यु हो जाने पर राजा की दशा भो विगड गई। वह बड़ी देर मे होश मे आया। अन्त मे वह विरक्त हो गया और साधना द्वारा स्वर्ग को प्राप्त हुआ। नागदत्त और विक्रमयशा की वियोगावस्था के चित्रण में करण-रस की व्यजना भी देखी जा सकती है। वियोग-वर्णन हवें सर्ग मे भी हुआ है । सनत्कुमार के वियोग में उसके माता-पिता और पुरवासी सन्तप्त हैं । असिताक्ष और उसकी प्रेयसियो की सरोवर-केलि मे शृगार का यथेष्ट चित्रण देखा जा सकता है । सनत्कुमार के विविध-विवाहादि के अवसर पर भी शृगार-रस का चित्रण हुआ है। काव्य मे कई युद्ध के प्रसग भी हैं। इनमे वीर, रौद्र, अद्भुत, बीभत्स और भयानक रसों का यथोचित चित्रण हुपा है। प्रहेलिका आदि के प्रसग मे हास्य और व्यग्य का प्रयोग भी हुमा है। इन सब से क्रमशः परिपुष्ट होता हुआ शान्त-रस उदय होता है । २३३ सगं मे सनत्कुमार अपने जरारोग-ग्रस्त श्रीहीन शरीर को देख कर निवेद की १. सनत्कुमारचकिचरितमहाकाम्यम्, २-५० । २. वही, २-५३। ३. वही, २-६०।

[ ७६ ) स्थिति में वैराग्य धारण करता है। यह वैराग्य उग्न तपस्या में परिणत हुआ। यही सनत्कुमार के घीर और उदात्तचरित्र को चरमावस्था देखने को मिलती है। वह शान्ति-पथ का पथिक हो जाता है। काव्य की प्रात्मा रस के माध्यम से कवि ने अपने काव्य को चिन्तन के उच्च धरातल पर प्रतिष्ठित किया है। इसमे शृङ्गार उदात्त अवस्था को प्राप्त होता हुआ अन्त मे स्वय शान्त मे परिणत हो जाता है। सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में रसो का यह एकोभूत प्रवाह 'सनत्कुमारचकिचरित' काव्य का उच्चकोटि के महा- काव्य के रूप में प्रतिष्ठित कर देता है। काव्य में लोक-चित्रण - न कवि पर सम-सामयिक जीवन का प्रभाव अवश्य पड़ता है। चाहे उसकी काव्यकला अतीत को अपना विषय बनाकर चलती हो, किन्तु सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर उसके काव्य के इतिवृत्त में से झाँकता हुअा वर्तमान सामने आये बिना नहीं रहता। जिनपालोपाध्याय ने प्रस्तुत काव्य मे तत्कालीन समाज का सांगोपाग चित्रण किया है। सारे काव्य को पढ़ने के उपरांत इसमें कोई सदेह नही रहता कि कवि लोक का निकट से अध्ययन करने में सफल हुप्रा है। उसको कला, किसी राज दरबार की शोभा का हेतु बनी है और न उसका जीवन ही किसी सीमित क्षेत्र में विकास को प्राप्त हुआ है। जिनपाल का क्षेत्र लोक है और उसी का सच्चा प्रतिबिम्ब इस काव्य में देखने को मिलता है। यद्यपि जिनपाल श्रमण- परम्परा के अनुयायी हैं परन्तु उनकी दृष्टि संकुचित न होकर लोक- व्यापिनी है। विक्रम की तेरहवी शती में कवि के आंखों के सामने ही पृथ्वीराज चौहान एव हिन्द-साम्राज्य का अन्त हो चुका था और भारत में अफगानो का शासन सुदृढ़ हो गया था। भारतीय विचार-परम्परा में इस समय परिवर्तन प्राना स्वाभाविक था। यद्यपि जिनपाल द्वारा इस काव्य में चित्रित समाज विशुद्ध हिन्दूकालीन समाज है और सम्भव है पुराण का प्राधार लेकर उन्होने कुछ ऐसी बातो को और भी सकेत किया हो जो उस समय प्रचलन मे न हों, तो भी इस काव्य में समाज में प्राता हुमा परिवर्तन व्यजित हुए बिना न रह सका। वर्णाश्रम काव्य में वर्णाश्रम-धर्म के माने जाने की ओर सकेत मिलता है, परन्तु ७७ ] - समाज में आई हुई शिथिलता से वह प्रभावित हुए विना न रह सका। विक्रम- यशा के चरित्र से पता चलता है कि राजा विवेकशील शासक हुअा करता था, परन्तु वह वासना की क्षणिक उत्तेजना को सयत करने में असमर्थ हो जाता था। अब राजनीति आत्म-रक्षा तक ही सीमित रह गई थी- यथा तथाऽऽत्मा परिरक्षणीयः, इत्याह तावन्नन दण्डनीतिः' । यह मान्यता प्रचलित थी कि राजा प्रजा का रक्षक पिता होता है, परन्तु वह समय के प्रभाव से अपने कर्तव्य से च्युत हो गया था और अपनी प्रजा में से सुन्दर स्त्रियों का अपहरण करने से भी न चूकता था । स्त्री-हरण की घटनायें प्रायः सभी रासो ग्रन्थो मे भी मिलती है । इसलिए यह समाज की साधारण घटना हो गई थी। राजा की धर्मभीरुता का उदाहरण हरिवाहन के चरित्र में देखा जा सकता है । 'यथा राजा तथा प्रजा' के अनुसार राजा का कर्तव्यच्युत होना समाज में मर्यादाहीनता को जन्म देता है। समाज की ऐसी दशा का वर्णन काव्य मे सांकेतिक ढग से हुआ है। नागदत्त वैश्य-वर्ण का प्रतिनिधि है। वह सत्यवक्ता, प्रियंवद और याचकों को सन्तुष्ट करने वाला है, किन्तु विलासी युवा है। अग्निशर्मा नष्ठिक वेदपाठी ब्राह्मण है। उसका जन्म सिंहपुर मे हुमा जहाँ यज्ञ-धूम से सूर्य आच्छादित रहता था, सभो दिशाएं वेद-ध्वनि से गुजायमान रहती थी। उष:काल मे जहां मृगशावक केलि करते हुए मन को आकृष्ट कर लिया करते थे; परन्तु साथ ही जहां वारविलासिनियो के कलगान की ध्वनि भी सुनाई पड़ती रहती थो । अग्निशर्मा स्वय बडा क्रोधी था । वह जिनधर्म की पीठ पर गरम खीर रखवा कर उसे पीड़ा पहुचाने से भी नही चूकता। द्विजो के ऐसे चरित्र को देख कर शुद्र की क्या स्थिति होगी-इसकी कल्पना की जा सकती है। समाज को इस दशा को देख कर लेखक का ध्यान मर्यादापुरुषोत्तम राम के चरित्र को प्रोर माकृष्ट होता है। कदाचित् पद-पद पर अप्रस्तुत योजना मे राम का उल्लेख इसी कारण से हुआ है। समाज को १. सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम्, १-८६ । २. वही, २-१६ ॥ ३. वही, ४-१०-६१ । ४. वही, ४-६४। ५ वही, ४-६५।

। ७८ ] असमंजसता में मर्यादापुरुषोत्तम की ओर ध्यान जाना स्वाभाविक है। इस सकेत से जिनपालोपाध्याय के समय रामभक्ति का प्रादुर्भाव होना भी सिद्ध होता है। वर्ण-व्यवस्था की तरह आश्रम-व्यवस्था में भी शिथिलता आ रही थी। इस समय के तान्त्रिक ग्रंथ गृहस्थ और संन्यास दो ही आश्रम प्रचलन मे मानते है। इस महाकाव्य में भी इन्ही पाश्रमो की ओर सकेत है। त्रिदंडो शब्द से सन्यास की स्थिति पर प्रकाश पड़ता है। गृहस्थ-जीवन का आधार दाम्पत्यभाव है। इस समय समाज में व्याप्त विलासिता की प्रवत्ति के कारण नारी-जीवन अरक्षित होता जा रहा था और इस प्रकार गहस्थ पाश्रम के आधार-सूत्र निर्बल होते जा रहे थे । दूसरी ओर सन्यास-जीवन को मर्यादाए भी समाप्त- प्राय थी । 'सर्वभूतहितरतः' सन्यासी अब कामण-प्रयोग करने मात्र के लिए रह गए थे। इस प्रकार वर्णाश्रम-व्यवस्था में शिथिलता आ गई थी। विवाह काम-जीवन को समाज-सापेक्ष और संयत बनाने का साधन विवाह है। जिनपाल के समय सतीत्व में विश्वास बना हुआ था। पति को नारी के लिए माननीय माना जाता था' । कामुकता धिक्कार को वस्तु मानी जाती थी' प्रस्तुत काव्य में विवाह-सम्वन्धो रीति-रिवाजो को बडी ही सुन्दर झांकी प्रस्तुत की गई है। इससे कवि के व्यावहारिक ज्ञान पर व्यापक प्रकाश पड़ता है। लोग सिद्ध-पुरुषों की वाणी में विश्वास करते थे। गणितज्ञ वर-कन्या के गुण- दोषों पर विचार करते थे। शुभग्रह, प्रशस्त लग्न आदि देखे जाते थे । विवाह- मंगल के उपरान्त पाणीग्रहण की विधि सम्पन्न होती थी। भानुवेग ने विवाह के अवसर पर स्वर्ण राशि दान दी थी, जैसे वह सब पुरवासियों को अपने समान बनाने के लिए कृतसकल्प हो । कन्याओं के मंगल-स्नान के उपरान्त चाय सुहागिनो ने उन्हें कपड़े पहनाए । उन पर गुरुजनों ने लाजा बरसाए।' महावर - १. सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम्, २-२३ । २. वही, २-६ । 1. वही, १५-३२॥ ४. वही, १५-३३ । ५. वही, १५-३४॥ ६. वही, १५-४०। 1 [ ७९ ] लगा कर चरणों को, चन्दन की पत्रवल्ली बना कर मुख को, अंजन से नेत्रों को, कास्तुरिकी-पत्रवल्लो से स्तनो को और स्वर्णाभूषणो से समस्त अगों को सजा कर कन्याओ को दुलहिन के रूप मे सजाया गया था। कन्याओ की कुल- स्त्रियो ने कुमार के शरीर का सस्कार किया था। सनत्कुमार ने हाथी पर बैठ कर तोरण मारा और मणि-सज्जित मण्डप मे प्रवेश किया' । वेदी पर मधु, ग्राज्य, घृत, अक्षतादि से जातवेदा को प्रदीप्त किया गया। अग्नि की सप्त-शिखाओ की वर-वधुप्रो ने प्रदक्षिणा की। राजा ने अयुत कोटि काञ्चन प्रदान किया। साथ मे अनेक वरतन, वस्त्र, आभूषण आदि प्रदान किये । सायकाल वधुप्रो से समागम के समय प्रश्नोत्तर के रूप में विदग्धगोष्ठी का आयोजन हुआ। आज भी लोक में वधू-पक्ष की स्त्रिया वर- से प्रहेलिकाये आदि पूछती हैं। जिनपालोपाध्याय ने विदग्धगोष्ठी के आयोजन की बात लोक की इस परम्परा से ही ग्रहण की होगी। उदाहरणार्थ एक सलाप द्रष्टव्य है- प्रश्न- का प्रार्थ्यते विश्वजनेन सादर ? का वा विजेया वत चक्रवर्तिनाम् ? कीदृग नृप स्यान्न. पराभवास्पद ? भात्यम्बरे वन्दनमालिकेव का ? उत्तर सकेत-- अथोक्त्वा तातताततीरूपा काचित् ततावलीम् । दयितालोकयामास, सस्मेर वल्लभाननम् ॥ उत्तर- प्रिये किमत्र वक्तव्य प्रसिद्धा सारसावली। नणा पुनरप्याह, संव भग्यन्तरेण तत् ॥ यहा प्रिया ने चार प्रश्न पूछे-१ विश्व भर के पुरुषों द्वारा किस की यावना को जाती है ? २. चक्रवर्ती द्वारा क्या जीती जाती है ? ३. कौनसा राजा पराभूत नहीं होता? तथा ४. आकाश में वन्दनवार-सी क्या सुशोभित होती है? १. सनत्कुमारच कचरितमहाकाव्यम्, १५-४१-४६ । २. वही, १५-४७ । ३. वही, १५-५६-६० । ४. वहो, १६-४-२० । ५. वही, १६-३०-३२ ।

[ ८० ] ऐसा कह कर प्रिया ने पति को उत्तर का सकेत 'ताततातती' ततावली के रूप मे दिया। इस अक्षर-क्रम के अनुसार सनत्कुमार ने 'सारसावली उत्तर दिया। इस मे उपयुक्त चारों प्रश्नो के उत्तर भग्यन्तर-पूर्वक या जाते हैं । यथा क्रमशः १. सा (स्त्री), २. रसा (पृथ्वी), ३. बली (बलवान्) तथा ४. सारसावली। यह मनोरंजन के लिए तो प्रायोजन था ही, साथ ही इसके द्वारा बुद्धि- परीक्षा भी हो जाती थी। इससे यह भी पता चलता है कि पुरुष के साथ स्त्रियां भी सुशिक्षिता होती थी। आठ प्रकार के विवाहों मे गान्धर्व, आसुर, पैशाच आदि विवाहो का प्रचार भी था। विष्णुश्री का हरण करना क्षत्रियो द्वारा कन्याहरण करके विवाह करने से सर्वथा भिन्न कृत्य है। इसे पैशाचिक कृत्य माना जा सकता है । विवाह प्रथा को धार्मिक स्वीकृति के रूप में ग्रहण न करके इस प्रकार स्वेच्छा- चार की प्रवृत्ति का अपनाया जाना समाज की ह्रासोन्मुखो गति को सूचित करता है। वस्त्राभूषण काव्य में विविध प्रकार के वस्त्राभूषणों का उल्लेख पाया जाता है। स्त्रियां सिर पर अशुक धारण करती थी। स्तनो को सांप को कंचुली के समान मसृरण वस्त्र की चोलिका ढकती थी। ऊपर से प्रावरक लटकता था। वस्त्र शरीर की माप के होते थे, ढिले ढाले नही । विवाह के समान भानुवेग को पुत्रियो को श्वेत परिधान में सजाया गया था। उन्हें विविध अ.भूपणों से सजाया गया था। भाल पर चूडामणि, कान मे कर्णफूल, कण्ठ मे मुक्ताहार, कटि में रशना, पैरों में नूपुर आदि कुछ प्रसिद्ध आभूषणों के नाम प्रयुक्त हुए हैं । कंकण, हार, कुडल आदि पुरुष भी पहिनते थे। सनत्कुमार के नगर प्रवेश के समय स्त्रियो ने अपने प्राभूपण अन्यान्य अंगों में पहन लिए थे। आभूषणो का प्रलोभन देकर विक्रमयशा ने विष्णुश्री को अपने वश मे कर लिया था। पुत्र-जन्मोत्सव के समय अश्वसेन ने वस्त्र और आभूपण प्रजाजनों को भेंट दिए थे। प्रसाधन नारो के सौन्दर्य में अभिवृद्धि करने वाले अनेक प्रसाधन प्रचलित थे। के शो में पुष्प-रचना की जाती थी। पत्र-रचना ललाट, गण्डस्थल और स्तनो [ १ ] पर की जाती थी। इसके लिये कस्तूरी का उपयोग भी होता था । हथेली और पदतल मे अलक्तक का प्रयोग होता था। भाल का तिलक नारी-सौन्दर्य को अनेक गुना बढ़ा दिया करता था। आँखो मे अजन लगाया जाता था। पुष्प- पराग का उपयोग शरीर-प्रसाधन के लिये किया जाता था। उबटन लगा कर शरोर-सस्कार करने को प्रथा भी प्रचलित थी । 'शरीर-सस्कार' शब्द से यह व्यजित होता है कि प्रसाधन विलासिता के साधन नही थे, वरन् शरीर-शुद्धि नित्य-प्रति व्यवहार में आने वाले साधन थे। विलासिता के साधन के रूप में शरीर को कुंकुम व कस्तूरी से चर्चित किया जाता था। प्रसाधनो का प्रयोग शुभ मूहूर्त में किया जाता था। नारी-जाति की स्थिति समाज में बहुविवाह प्रथा का प्रचलन था। इसलिये नारी का स्थान समाज में गिर गया था। या तो उसे भोग की वस्तु समझा जाता था अथवा उसे धर्मकार्य-बाधक मानकर त्याज्या ठहरा दिया गया था। सतीत्व में विश्वास किया जाता था' । सती और पुत्र-प्रजनन करने वाली स्त्री का समाज मे सम्मान होता था । अन्तर्वत्नी होने पर उनकी सब इच्छाएं पूरी करके दोहद- क्रिया सम्पन्न की जाती थी। कामुकता निन्दनीय थी, परन्तु समाज मे इसकी व्याप्ति असदिग्ध रूप से मानी जा सकती है। स्त्रियों का हरण कर लेना साधारण बात थी। विवाह मे प्रहेलिका आदि पूछे जाने से निश्चित है कि स्त्रियो को शिक्षा देकर योग्य बनाया जाता था, परन्तु कार्मण प्रयोग के उल्लेख' से पता चलता है कि उनमे अन्ध-विश्वास बढ रहे थे। साधारण प्रलोभन देकर उनके सतीत्व- भग करने का प्रयत्न भी किया जाता था। यह विश्वास आमतौर से चल गया था कि विचक्षणा होने पर स्त्रियो में स्थिरता नही होती- स्थैयं क्व वा स्त्रीपु विचक्षणास्वपि । कवि ने इस काव्य के नारी-पात्रो के लिये जिन उपमानो का प्रयोग किया है उनको देखते हुए यह मानना होगा कि स्त्रियो को लक्ष्मी, शची, पार्वती, सीतादि १ सनत्कुमारचस्तिचरितमहाकाव्यम्, २-२३ । २. वही, २-६। ३. वही, २-७८। ४. वही, २-३३॥

[ २ ] के समान पवित्र माना जाता था, किन्तु उनका सामाजिक महत्त्व निरन्तर गिरता जा रहा था। कवि ने जितने मनोयोग से नारी-पात्रों के सौन्दर्य का चित्रण किया है उतने ही मनोयोग से वह उनके गुणों और सहज मानवीय आचरणों का वर्णन नहीं कर सका । यह युग-प्रभाव को सूचित करता है। समाज की सामान्यदशा ऊपर कहा जा चुका है कि भारतीय समाज ह्रासोन्मुख हो गया था। राजा प्रजा का पिता और पालक समझा जाता था' परन्तु ऐसे प्रजापालक राजा बहुत कम थे। अन्धविश्वास समाज में बढ़ते जा रहे थे। यह विश्वास तो था कि धर्म के मार्ग पर जन्म सफल होता है । पुण्यों की विजय होती है और पापात्मा को उसके उन पाप शीघ्र पतित कर देते हैं। , परन्तु धर्म अब भय की वस्तु रह गई थी। जीवन के उत्सव के रूप में ही समाज में वह स्थायी व्यवस्था और चारित्रिक-शील के विकास में सहायक होता है । इस समय यह स्थिति समाप्त हो गई थी और केवल भय धर्म को समाज का प्रेरक-स्रोत नही बना सकता। समाज का विकास महदुद्देश्य के लिये प्रात्मविसर्जन करने वाले चरित्रों से होता है । जिनपालोपाध्याय के काल में ऐसे उदार-चरितों की समाज में कमी आती जा रही थी। स्त्रियों के प्रति अविश्वास उत्पन्न होता जा रहा था। कुल मिलाकर देखें तो सनत्कुमारचक्रिचरितम्' में हारी हुई जाति के चिंतन के ही दर्शन होते हैं। जैसे प्राणरक्षा करना जीवन का आधारभूत सिद्धांत बन गया था- यथा तथाऽऽत्मा परिरक्षणीयः उन्नत समाज मे जीवन के प्रति ऐसा दृष्टिकोण नहीं होता। पूर्णायु प्राप्त करना तो सभी का अभीष्ट हो सकता है, परन्तु वीर-पुरुष स्वतन्त्र और अदीन होकर जोवित रहने में ही विश्वास करते हैं। १. पिता भवेत् भूमिपतिः प्रजानाम् । वही, २-१६ । २. वहीं, ३-६२। ३. जयन्ति पुण्यानि जनस्य सर्वया। वही, ३-८८ । ४. वही, ३-१७। ५. डॉ. पंचोली-शिक्षा का उद्देश्यः मास्मविसर्जन, भारतीय शिक्षा फरवरी १९६७ । ६. सनत्कुमारचकिचरितम्, १-१६ ।

- 1 ८३ ] सांस्कृतिक एवं वैचारिक पृष्ठ-भूमि भारतवर्ष मे जनजीवन का विकास दो धारामो मे हुआ। वे धारायें है- लोक और वेद । पूर्ण जीवन की व्याख्या मे क्या वैदिक, क्या श्रमण, दोनों परम्पराओं ने लोक और वेद का प्राश्रय लिया और सर्वत्र दोनों के समन्वय पर बल दिया। लोक-सग्रह जीवन का सर्वोपरि धर्म बन गया। जीवन की इस दृष्टि का प्रभाव साहित्य पर भी पड़ा। मध्यकाल मे अनेक सन्त कवि हुए । उनके काव्य मे मर्यादावाद का स्वर सर्वोपरि है । इस प्रकार के कवियो में गोस्वामी तुलसीदास अग्रणी कहे जा सकते है । 'रामचरितमानस' को छोड़ कर ऐसे बहुत कम काव्य होगे जिनमे मर्यादावादी विचार-धारा के साथ काव्य-सौष्ठव भी यथावत् विद्यमान रहा हो, इसका कारण यह है कि उपदेशात्मक काव्य प्रायः नीरस हो जाया करता है या यो कहना चाहिए कि वह ऐसा प्रतीत होता है । इस प्रकार की प्रतीति का कारण मनोवैज्ञानिक है । मानव स्वभावतः स्वछन्द उत्पन्न हुआ है। वह न तो विधानो के बन्धन मे रहने को तैयार होता है और न उसकी प्रवृत्ति उपदेश सुनने में ही होती है । वह राज्यादेश के प्रति विद्रोह कर उठता है तो धर्मोपदेश से उसको विरति हो जाती है। साहित्य-शास्त्र के प्राचार्यों ने मानव की इस प्रवृत्ति को भली प्रकार समझ लिया था, इसीलिए मम्मटाचार्य ने काव्यप्रकाश में काव्य के उद्देश्य बतलाते हुए कहा- कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे'। स्पष्ट है कि काव्य मे प्रियस्त्री की तरह मनभावन उपदेश प्राप्त हो सकते हैं । कान्ता के उपदेश राजा और धर्माचार्य की तो बात ही क्या, मित्र से भी अधिक प्रात्मीयता-पूर्ण एवं प्रभावशाली होते हैं। कालिदास के काव्यों और नाटको मे ऐसी शंली मे प्रभावपूर्ण प्रेरणासूत्र विद्यमान हैं। उनके काव्य में सर्वत्र लौकिक-प्रेम का चित्रण है। यहा तक कि शिव और पार्वती के दिव्य- प्रेम को भी लौकिक प्राधार पर ही प्रस्तुत किया गया है। वह शृंगार और लालित्य का कवि माना जाता है फिर भी उसे भारतीय संस्कृति का सर्वोच्च व्याख्याता कहा गया है। इसका कारण यह है कि उसने सांस्कृतिक यादों को काव्य की ललित योजना की सोमामो में बाधने की चेष्टा की है और इसमें उसे सर्वाधिक सफलता मिली है। १. काव्यप्रकाश र [ २४ ] भारत के किसी भी महाकाव्य को परखने के लिए यहां की उस दृष्टि को ध्यान में रखना आवश्यक है जो कालिदास के काव्यों में सर्वत्र विद्यमान रही है । कालिदास के काव्य में प्रेम का क्रमश: उदात्तीकरण दिखाया गया है। अभिज्ञानशाकुन्तलनाटक का प्रारम्भ कवि ने श्रेगारिक वातावरण के वर्णन से किया है- ईषदीषच्चुम्बितानि भ्रमरैः सुकुमारकेसरशिखानि । अवतंसयति दयमानाः प्रमदाः शिरीषकुसुमानि' ।। इस वातावरण में सारे परिषद् चित्तवृत्ति के एकाग्र होने से चित्र लिखे से हो जाते हैं-'अहो ! रागबद्धचित्तवृत्तिरालिखित इव विभाति सर्वतो रङ्गः । स्पष्ट है कि यह श्रृंगारिक वर्णन चित्त को एकाग्र करने के उद्देश्य से किया गया है। नाटक के प्रारम्भ में पता चलता है कि प्रेमी दुष्यन्त, राजा दुष्यन्त के सामने सभा मे अपराधी होकर खड़ा है और राजा दुष्यन्त उसे दुविनय से निवारित करता है । आगे प्रेमी दुष्यन्त के संयत होने की कहानी है। अन्त मे प्रेमो दुष्यन्त और राजा दुष्यन्त एक दूसरे मे अपना व्यक्तित्व खो देते हैं और महाप्रतापी भरत के पिता के रूप मे स्वर्ग तक मानवी-कीति को विस्तृत करता हुआ श्रद्धा वित्त और विधि से समवेत दुष्यन्त श्रेयो-मार्ग का पथिक बन कर हमारे सामने आ उप- स्थित होता है। वह कहता है-'भगवन् यथाशक्तिः श्रेयसि यतिष्ये। इस प्रकार स्वच्छन्दता से प्रारम्भ होकर क्रमशः सस्कृत होते हुए जीवन का चित्र इस कृति में हैं, जिसने कालिदास को भारत का सर्वश्रेष्ठ महाकवि बना दिया है। कालिदास द्वारा प्रदर्शित मार्ग परवर्ती कवियो के लिये प्रादर्श बन गया । बौद्धकवि अश्वघोष ने अपने सौन्दरानन्द काव्य मे प्रेम का उदात्तीकृत रूप कालिदास के अनुकरण पर प्रस्तुत किया है। जैन कवियो ने भो ऐसा हो किया। धार्मिक-परम्परामो के प्रति प्रतिबद्ध होने पर भी इन कवियो ने अप काव्य को उपदेशात्मक मात्र नहीं बनने दिया । उन्होंने यह दृष्टिकोण अपना कर सांस्कृतिक समन्वय की दृष्टि से मौलिकता का परिचय ही नहीं दिया, वरन् अपने काव्य में मनोवैज्ञानिक असगति न पाने देने की सावधानी भो वरती। 3 १. अभिज्ञानशाकुन्तलम् १-४ । २. अभिज्ञानशाकुन्तलम् १-४ । ३. डॉ० पचोलो-मभिज्ञान शाकुन्तल का नायक, वैदिक धर्म, अक्टूबर १६६६ ।

५५ ] प्रसिद्ध काव्य 'धर्मशर्माभ्युदय' में १५वें तीर्थकर धर्मनाथ का चरित वणित है। उसमें पुत्र को गोदी में लेने से प्राप्त आनन्द का वर्णन इन शब्दों में हुअा है- न चन्दनेन्दीवरहारयष्टयो, न चन्द्ररोचीपि न चामृतच्छटा । सुतागसस्पर्शसुखस्य निस्तुलां, कलामयन्ते खलु पोडशीमपि । ऐसे वर्णनों में कवि लोकदर्शन से प्रभावित हुआ है । यद्यपि इस काव्य का मुख्य रस शान्त है, परन्तु शृङ्गार, वात्सल्य श्रादि मन को रजित करने वाले रसो से उसे पुष्ट किया गया है । 'जयन्तविजय' काव्य का उद्देश्य धर्म-प्रचार होने पर भी उसका कथानक शान्तरस-पर्यवसायो नही है' । पद्मानन्द-महाकाव्य मे आदिजिन (ऋषभदेव) के चरित का वर्णन है । इसमे ऋषभदेव के पूर्व भवो के वर्णन मे शृगारिकता देखी जा सकती है । 'मुनिसुव्रत' महाकाव्य के प्रारंभ मे मगध, राजगृह, राजा सुमित्र और रानी पद्मावती का वर्णन है । 'नलायनम्' महाकाव्य मे जैन-परम्परानुमोदित नलदमयन्ती की कथा वरिणत है। 'शान्तिनाथ- चरित' में युद्ध और प्रेम के प्रसग भरे पड़े हैं। पौराणिक महाकाव्यो मे भी कवियो का दृष्टिकोण अन्य महाकाव्यो के समान ही रहा है । इन सभी काव्यो मे पाठक को लौकिकता में अलौकिकता का, राग के माध्यम से विराग का, शृगाररस के माध्यम से शान्त का, आसक्ति मे अनासक्ति का और प्रवृत्ति के साथ निवृत्ति का विकास देखने को मिलता है। जहाँ पर कवि को अवसर मिला, उसने कालिदास की तरह लौकिक प्रेम का वर्णन करते हुए, मन को स्थिरता प्रदान करते हुए उसमे प्रेम के उदात्तीकृत रूप को विकसित होते हुए दिखाया । जहाँ ऐसा अवसर नही मिला वहाँ उसने अपने आदर्श चरित-नायक या नायिका के पूर्वभव का आधार लेकर लौकिक प्रेम ग्रादि के वर्णन का अवसर निकाल लिया। धर्म के गम्भीर तत्त्व का विवेचन ऐसे वातावरण का निर्माण करके किया और एक सीमा तक धार्मिक उपदेश देने की प्रवृत्ति को काव्य का सुन्दर प्रावरण पहनाने की किसी ने सफल और किसी ने असफल चेष्टा की । धर्म का विवेचन करते समय अप्रस्तुत के रूप मे लोकजीवन के रसात्मक क्षणो को लाकर इस दिशा मे महत्त्वपूर्ण कार्य किया। प्रस्तुत महाकाव्य के कथानक को देखने से यह बात भली भाति प्रकट हो जाती है कि इस काव्य की रचना मे भी कवि ने अपने पूर्ववर्ती व समकालीन कवियो का अनुकरण किया है। १. डॉ० श्यामश कर दीक्षित-तेरहवी चौदहवीं शताब्दी के जैन महाकाय प० ३०५ ।

[ ९६ ] जिनपालोपाध्याय ने इस महाकाव्य मे शृंगार के लौकिक पक्ष को स्थान देने के लिये सनत्कुमार के पूर्वभवों का आधार लिया है । शृंगार का स्थायीभाव रति है । जन्म लेते ही बालक का भूमि से सम्पर्क हो जाता है। इसलिये गर्भ मे धारण करने वाली माता और भूमि रति के सर्वप्रथम पालम्बन हैं। 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी' का उद्घोष इसी मनोवैज्ञानिक तथ्य की ओर संकेत करता है। जिनपालोपाध्याय ने सर्वप्रथम काव्य-जननी भारती का वन्दन किया। तदुपरान्त भावभीने स्वर मे जम्बूद्वीप मे जाह नवी प्रीय सिन्धु से सिंचित भारतभूमि का यशोगान किया है। आगे काव्य के प्रथमांश की आधार. भूमि कांचनपुर की शोभा का वर्णन है । नगर का उत्कट शृगारिक वर्णन सोद्देश्य हुआ है। राजा विक्रमयशा ५०० सुन्दर पलियो मे रमण करता हुआ भी नाग- दत्त श्रेष्ठी को सुन्दरी पत्नी विष्णुश्री को ओर आकृष्ट होता है । विष्णुश्री के अप्रतिम सौन्दर्य का वर्णन उद्दीपन विभाव का उत्कृष्ट उदाहरण है। कवि विष्णुश्री के विषय मे कहता है-- रम्भा किमेषा त्रिदिवावतीर्णा, कि वा रतिः प्रोज्झितभर्तृ संगा। लक्ष्मीस्ताहो! हरिविप्रयुक्ता, शम्भो सकोपा किमु पार्वती वा' । उसके सौन्दर्य से अभिभूत विक्रमयशा सोचता है- इमां विना तु क्षणमप्यलं न, प्राणानवस्थापयितुं स्मरातः । ग्रीष्मोष्मसन्तप्तशिलातलस्थः, सरश्च्युतो मत्स्य इवातिदीनः ।। इसी प्रसंग में 'यथा तथाऽऽत्मा परिरक्षणीयः' विचारसूत्र पाया है जो लोकधर्म का आधार है । यही सोच कर वह विष्णुश्री का हरण करवा लेता है। वासना विवेक को अवरुद्ध कर देती है। विवेकहीन राजा राज्य और पारिवारिक जीवन को तिलाञ्जलि देकर विष्णुश्री में आसक्त हो जाता है। रानिया अपने दौर्भाग्य की कारणभूता विष्णुश्री को मरवा देती हैं और श्मसान मे विष्णुश्री के शव को देखकर वियोगसन्तप्त राजा को विरक्ति हो जाती है। प्रागे वह सन्मार्ग का पथिक होकर कठोर तप द्वारा अपने जीवन को सार्थक बनाता है और स्वर्गलोक मे यशस्वी होता है। + १. सनत्कुमारचक्रि चरितम्, १-७० । २. वही, १-८२ । ३. वही, १-८६ ।

[ ८७ -- सनत्कुमार के जीवन-चरित की पृष्ठभूमि पूर्वभव के रूप मे उपस्थित करके कवि ने प्रवृत्ति और निवृत्ति मे समन्वय स्थापित करने की चेष्टा की है। विक्रमयशा के जिनधर्म-नामक दूसरे जन्म का उल्लेख भी इस महाकाव्य मे हुया है जिसमे विरही नागदत्त अग्निशर्मा के नाम से जिनधर्म से पूर्वजन्म का बदला लेता है। मे शकुन्तला के इसके पहले नागदत भ्रमरयोनि मे जीवन धारण कर चुका था। प्राचीन साहित्य भ्रमर मन को चंचल प्रवृत्तियो का प्रतीक रहा है और इस प्रकार साधना के मार्ग मे साधक की उल्लसित चेतना के प्रतिद्वन्द्वी के रूप मे वणित किया जाता रहा है । सास्कृतिक कवि कालिदास ने कण्वाश्रम ऊपर मंडराने वाले भ्रमर की प्रतीक-योजना द्वारा काम-सयम की ओर सकेत किया है । लोकगीतो मे भ्रमर के अभिधान प्रिय को बुलाने की बात बहुधा आती है' । वहाँ प्रिय को सौन्दर्यलिप्सु के रूप मे ही स्वीकार किया गया है । प्रस्तुत चरित मे भी सनत्कुमार के पूर्वभव के प्रतिद्वन्द्वी भ्रमर की योजना प्रतीकात्मक है और उसके माध्यम से चचल मनोवृत्तियो के - मशः अपनयन और प्रज्ञोपलब्धि की ओर सकेत किया गया है। साधक जिनधर्म तप करके शऋ-पद प्राप्त कर लेता है। नागदत्त उसका वाहन ऐरावत गज बनता है। वहाँ से च्युत होकर वह प्रकोपन-नामक देव बनता है और शक के रूप मे आयु पूर्ण हो जाने पर जिनधर्म कुरुजागल प्रदेश में हस्तिनापुर मे अश्वसेन के राजकुमार के रूप मे उत्पन्न होता है । यही राज- कुमार सनत्कुमार चक्रवर्ती के रूप मे विख्यात होता है । सनत्कुमार असिताक्ष-नामक यक्ष को पराजित करके भानुवेग विद्याधर- राज की आठ पुत्रियो से विवाह करता है । यक्ष ऋतुकर्म की प्रेरणा देने वाले मन की संज्ञा है । यहां सकेत है कि सनत्कुमार यक्ष-मन को तामसी (प्रसित) शक्ति को जीत कर सात्विक पाठ शक्तियो को प्राप्त करता है । समय पाकर असिताक्ष फिर सनत्कुमार को जंगल मे छोड देता है । वहाँ वह विद्युद्वेग का मार कर सुनदा का वरण करता है । विद्यु द्वेग मन को राजसी वृत्ति का नाम ज्ञात होता है, जिसे समाप्त करके सनत्कुमार सुनन्दा (माहादिनी शक्ति) पत्नी रूप में और प्रज्ञप्ति (प्रज्ञा) को प्राप्त कर लेता है । सनत्कुमार विद्युद्वेग के पिता अशनिवेग को पराजित करके उसकी पुत्री १. यथा- भंवर म्हारा वागा में भाज्यो जो'-राजस्थानी लोकगीत की पपित ।

[ ८८ ] - बकुलमती का पाणिग्रहण भी कर लेता है । अत में वह दिग्विजय करके चक्र- वर्ती बनता है और रोग एवं जरा से ग्रस्त शरीर होने पर वैराग्य और तप द्वारा जोवन को सार्थक करके स्वर्गलोक को प्राप्त होता है। ऐसा ज्ञात होता है कि सनत्कुमार के जीवन को सभी घटनायें उसकी अध्यात्म-साधना की ओर सकेत करती हैं। डॉ वासुदेवशरण अग्रवाल ने कहा है कि सुन्दर फूल को देख कर उस फूल को धारण करने वाले वृक्ष का स्वरूप जानने का प्रयत्न करना चाहिए। इसी तरह कला, शिल्प, काव्य आदि मे सुन्दर कृति को देख कर भारत की सस्कृति के अश्वत्थ-वृक्ष को खोजना चाहिए। सनत्कुमारचक्रिचरितम् भार- तीय सस्कृति को समझने की एक विशिष्ट दृष्टि जगाने का काम करता है। जैन-कथा-साहित्य मे सनत्कुमार चक्रवर्ती के चरित का वर्णन मिलता है, परन्तु ज्ञानलोक मे प्रवेश करने के लिए नवीन खिड़की खोलने का काम यह महाकाव्य करता है, जैन पुराण नही । कारण स्पष्ट है-महाकवि जिनपाल की प्रतिभा का ही यह चमत्कार है। इस काव्य मे निवृत्ति-मार्ग की निःश्रेयस-परकता का प्रतिपादन किया गया है । भारतीय सस्कृति का आधार धर्म अथवा प्राचार है और जीवन का परम उद्दश्य निःश्रेयस है। अर्थ और काम का संस्कार ही धर्म प्रो निःश्रेयस मे प्रतिफलित होता है । भारत के सस्कृति-वैभव के प्रतीक सभी काव्यो में अर्थ और काम का क्रमिक संस्कार हो प्रतिपादित किया गया है। काव्य के माध्यम से प्राचार का प्रतिपादन करने का उद्देश्य लेकर चलने वाले अश्वघोष आदि बौद्ध और हरिश्चन्द्र, जिनपाल आदि जैन महाकवियो को भी भारत की यही सास्कृतिक दृष्टि मिली है । जिनपालोपाध्याय ने अपने प्रस्तुत महाकाव्य मे इस सास्कृतिक उत्तरदायित्व का निर्वाह बड़ी ही सफलतापूर्वक किया है। धर्म और दर्शन जिनपालोपाध्याय ने इस काव्य की रचना ही धर्म सिद्धि के लिए की है। इसीलिए उसमे सदाचार के प्रति प्राग्रह, असामाजिक आचरण की निन्दा, विधि- मार्ग' प्रतिपादित प्राचार के लिए प्रेरणा और जीवन के प्रति निःश्रेयसी दष्टि १. सनत्कुमारचमिचरितम्, ५१५१ । जिनवल्लभसूरि प्रतिपादित विधिमार्ग खरतरगच्छ का ही पर्याय है।

[ ८६ के समन्वित रूप का समावेश हो जाना स्वाभाविक ही है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जीवन के चार पुरुषार्थ स्वीकार किए गए हैं। इनमें धर्म मोक्ष की आधार भूमि है जिसका निर्माण अर्थ और काम के यथोचित प्रयोग से होता है। अर्थ का सञ्चय, रक्षण और व्यय जीवन को अन्यथाकर्तव्यता मे व्यस्त बनाये रखता है । इन सब के मूल मे कामवृत्ति निहित है । ये दोनो धर्म से अविरुद्ध होने पर निःश्रेयस्-परकता धारण कर लेते हैं। इस महाकाव्य में अर्थ और काम को नि:श्रेयस्-परक बनाने के लिये साकेतिक रूप से प्रेरणा दी गई है। कामुकता को धिक्कारते हुए' जिनपाल ने असयत काम को निन्द्य ठहराया है । कवि का विश्वास है कि पापात्मा के उन पाप उसे तत्काल पतन के मार्ग पर ढकेल देते हैं और धर्म के मार्ग पर चलने से जीवन सफल होता है । कवि सुन्दरता के माध्यम से सत्य को जीवन मे प्रतिष्ठित करना चाहता है, इसलिए वह विक्रमयशा को सन्मार्ग मे दीक्षित करने के लिये सुव्रतसूरि (गुणाढय) द्वारा बृहत्कथा सुनाने की बात कहता है । कथा के माध्यम से ही सुव्रतसूरि कहते हैं कि मनुष्य जन्म पाफर विवेकी को विधि धर्म-मार्ग का अवलम्बन लेना चाहिए । वीतराग-अहंत की विधि पूर्वक अर्चना करनी चाहिए। कल्याण की कामना करने वालो (शिवमीहमानः) को सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन, सम्यक चारित्र्य आदि का सेवन करना चाहिए । उत्तम दृष्टिपूर्वक भयकर भोगो के पापात्रव से पलायन करना चाहिए । विषय विष के समान हैं ! ऊपर से वे रमणीय प्रतीत होते हैं, परन्तु वस्तुतः दुःखदायी प्रमाणित होते हैं । साधना किये बिना मुक्तिश्री की सिद्धि नही होती । इन्द्रियो के विषयो से विराम ले लेने पर विशुद्ध भावो के नमत से सिंची हुई अनुभूति प्राप्त होती है । विक्रमयशा आचार्य के उपदेशानुसार वैराग्यवासित होकर, जिनेन्द्रगृह मे विधिप्रपूर्ण अष्टाह्निका प्रचना कर दीक्षा ग्रहण करता है । १. सनत्कुमारचतिचरितमहाकाव्यम्, २-६ । २. वही, ५-१७॥ २. वही, ३-६२॥ ४. वही, ३-६।। २. वही, ३-६२-६४ । १.पही, ३-६५। ७. वहीं, ३-७१। ८. वही, ३-७७॥

[ . ] जिनधर्म की धार्मिकता और उसके धर्मकृत्यों के अंकन में कवि ने उपासकों के आचार का विशदता के साथ चित्रण किया है' ! जिनधर्म मार्गानुसारी गुणों का धारक है, इसने सद्गुरु के पास सम्यक्त्वरत्न' स्वीकार कर, अनायतन' चैत्यों तथा श्राद्धविधान, होम, पिण्डप्रदान' आदि का त्याग कर दिया है। वह द्वादशवत-धारक है । षडावश्यक का अनुष्ठानक है । इसने जिनचत्य का निर्माण कर सिद्धान्त-विधानानुसार आचार्य से प्रतिष्ठा करवाई है । यहाँ जिनपाल ने अनायतन का अर्थात् चैत्यवासि-प्राचार्यों द्वारा अधिकृत चैत्यों को हेयता का संकेत कर विधिमार्ग-स्वगच्छीय परम्परा की अनुष्ठान-पद्धति की ओर प्रेरणा की है। जिनधर्म के साथ अग्निशर्मा का व्यवहार नृशसतापूर्ण है। ऐसा ज्ञात होता है कि इस प्रसग मे कवि जैनधर्म की प्रशसा और वैदिक-परम्परा की हीनता की ओर सकेत करना चाहता है। परन्तु काव्यात्मक दृष्टिकोण से यह प्रतीति नितान्त असंगत है। कवि का उद्देश्य अपने कथानायक का चारित्रिक उत्कर्ष प्रकट करना है और ऐसा तभी सम्भव हो सका है जब उसने उसकी सहनशीलता को उसके विरोधी के क्रूर-स्वभाव के साथ आनुपातिक ढग से प्रस्तुत किया। अग्निशर्मा के स्वभाव मे जितनी बदले की भावना, क्रूरता और कठोरता मिलती है, जिनधर्म में उतनी ही अधिक सहनशीलता, सहजता और कोमलता के दर्शन होते हैं। वह अग-भग को सहजभाव से स्वीकार कर लेता है और इसके लिए किसी को भी दोष नही देता । इसके विपरीत अपना ही दोष स्वीकार करता है- न चान्यदोषेण ममष दाहो, यदन्यथावृत्ति न जातु कर्म । बृहस्पतिं न ग्रसते कदाचिद्, विधुन्तुदश्चन्द्रमसा विराद्धः॥ ६ - १. सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम्, ४-१६-५५ । २. वही, ४-१८ । ३. वही, ४-२० । ४. वही, ४-१६। ५. वही, ४-२३-२४ । ६. वही, ४-३०॥ ७. वही, ४-५३ । ८. वही, ४-५०। ६. वही, ५-२१॥

[ ६१ ] २ इन्ही भावनाओं से ओतप्रोत होकर जिनधर्म विधिचैत्यों' की यथाविधि अर्चना कर, सघ का समादर कर और अर्थीजनों को दान देकर गृह-त्याग कर देता है । सोधर्मेन्द्र के रूप मे जिनेश्वरो के पाँचो कल्याणको के समय ऐश्वर्य के साथ वस्त्रादि-महोत्सव भी करता है। सनत्कुमार चक्रवर्ती भी प्रबुद्ध होने पर राज्य मे अभय-घोषणा3 (अमारी पटह) करवाता है और जिनगृहो मे आठ दिनो तक महोत्सवपूर्वक अर्चना करवा कर प्रवज्या-ग्रहण करता है । सनत्कुमार चक्रिचरितम् मे मानव की स्वाभाविक प्रवृत्तियो का यथोचित विवेचन तो हुना ही है साथ ही उसका उदात्तीकृत रूप भी काव्य का विषय बना है । सतत साधनारत रह कर आत्मसयम, श्रद्धा और तप द्वारा शिवत्व की ससिद्धि ही इस काव्य का प्राण है। . संस्कृत के महाकवियो में जिनपलोपाध्याय का स्थान सस्कृत-साहित्य की महाकाव्य-विधा अत्यंत प्रौढ ओर विकसित है। जितने महाकाव्य मिले हैं उनसे अनुमान किया जा सकता है कि कई अन्य महाकाव्य भी रहे होगे । माक्रान्ताओ ने कई को नष्ट कर दिया होगा; कई कालक्रम से वैसे ही नष्ट हो गए होगे। केवल कुछ प्रतिप्रसिद्ध महाकाव्य ही शेष रह गए हैं प्राप्त महाकाव्यो मे 'सनत्कुमारचक्रिचरितम्' का स्थान बहुत ही ऊचा है। यद्यपि वैदिक, जैन और बौद्ध परम्परा में वर्गीकरण करके महाकाव्यो का अध्य- यन करना वैज्ञानिक नहीं है। परन्तु ऐसे वर्गीकरण से एक सीमा बन जाया करती है अध्ययन करने और तुलना करने के लिए। सस्कृत के प्रमुख महाकाव्यो मे रघुवश, कुमारसम्भव, किरातार्जुनीयम्, शिलुपालवधम् और नेपधीयचरितम् के नामो का उल्लेख प्रमुखतया किया जाता है। यदि धार्मिक और दार्शनिक प्राग्रह की बात को छोड़ दिया जाय तो यह महाकाव्य उपर्युक्त प्रमुख काव्यो की शृखला को अगली कडी बन सकती है। वैसे विषय व वर्णन की दृष्टि से इस काव्य को क्षेमेन्द्र के पौराणिक इतिवृत्ता- स्मक काव्य 'दशावतारचरित', बोधिसत्त्वावदानकल्पलता' मादि के समकक्ष १. सनत्कुमारचमिचरितमहाकाव्यम्, ५-५१ । २. वही, ६-१७॥ ३. वही, २४-१ ।

[ २ ] रखा जा सकता है, अंतर इतना ही है कि कल्पना के चमत्कार की ओर क्षेमेन्द्र की दृष्टि नहीं थी। इस विशेषता में जिनपाल भारवि, माघ और श्रीहर्ष के अनुगामी हैं। काव्य की रागात्मिका वृत्ति का उपयोग धार्मिक उद्देश्य की सिद्धि के लिए करने वाले कवियों की परम्परा में जिनपालोपाध्याय अश्वघोष, शिवस्वामी (दोनो बौद्ध); रत्नाकर, मंखक (दोनों शैव), धनेश्वरसूरि, वाग्भट (दोनों जैन) के अनुयायी हैं। अश्वघोष कालिदास के 'सुकुमारमार्ग' के सफल महाकवि हैं। उनके 'बुद्धचरित' और 'सौन्दरानन्द' महाकाव्य अपनी प्रसादभित गरिमा में अनुपम है। शिवस्वामी के 'कफ्फिणाभ्युदय' में धर्म के प्रति आग्रह भी है और विचित्रमार्गीय विस्तार के साथ कल्पना-प्रियता के दर्शन भी होते हैं। इनका यह काव्य 'सनत्कुमारचक्रिचरितम्' से तुलनीय है । रत्नाकर का 'हरविजय' अपनो बृहत्कायता के कारण संस्कृत-साहित्य में वेजोड़ है। 'श्रीकण्ठचरित' मे मंखक की काव्य-जगत् के प्रति बहुमुखी दृष्टि को देखा जा सकता है तो सनत्कुमार- चक्रिचरितम् घटनाबाहुल्य मे इनसे आगे है। जैन महाकवियो मे जिनपालोपाध्याय का स्थान निश्चय ही महत्त्वपूर्ण है। इनको काव्य की सुपुष्ट परम्परा मिली थी। शब्द-चमत्कार अधमकाव्य के रूप में भले ही स्वीकार किया जाय; परन्तु इसमें कोई सदेह नहीं कि भाषा पर असाधारण अधिकार प्राप्त किये बिना ऐसे चमत्कार की सृष्टि नहीं की जा सकती। इसलिए विचित्रमार्गी कवियों के प्रयत्न को बिना सराहे नहीं रहा जा सकता । जिनपाल ने भी चमत्कार-प्रदर्शन में रुचि दिखाई है। यह युग का प्रभाव तो है ही, साथ ही कवि के भाषा पर असाधारण अधिकार का प्रमाण भी है। हेमचन्द्रसूरि (त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित्र ), धनेश्वरसूरि (शत्रुञ्जय- माहात्म्य), वाग्भट (नेमिनिर्वाण), अभयदेव (जयन्तविजय), अमरचन्द्रसूरि (बालभारत) आदि जैन महाकाव्यकार जिनपाल की समानता नहीं कर पाते । भाषा, भाव और भावप्रकाशन मे जिनपाल की तुलना इन्ही के समकालीन हरि- श्चन्द्र से की जा सकती है। उसका 'धर्मशर्माभ्युदय' संस्कृत के जैन महाकाव्यों में माघकाव्य के समान महत्त्वपूर्ण माना जाता है तो जिनपाल का सनत्कुमारचक्रि- चरितम् 'नैषधीयचरितम्' के समान सम्मान पाने का अधिकारी है । जिनपाल की कृति विस्तार मे ही 'धर्मशर्माभ्युदय' से अधिक नहीं है अपितु वह गुणों की दृष्टि से भी भागे है। जिनपाल पहले से चली प्राई हुई परम्परा को पुष्ट करने में ही सफल नहीं हुए, [ ६३ 1 वरन् उन्होने परवर्ती केशव आदि चमत्कार-प्रेमी कवियों के लिये प्रेरणा का कार्य भी किया है। इस कृति मे न तो घटना-बहुलता के कारण कही शिथिलता पाने पाई है, न काव्यगत असगतियां ही दिखाई पड़ती हैं । प्रस्तुतीकरण में नाटकीयता का समावेश होने के कारण 'सनत्कुमारचक्रिचरितम्' अत्यन्त उच्चकोटि के महाकाव्यो मे गणना किये जाने योग्य है । यह चरित्र-प्रधान काव्य है । सनत्कुमार चक्रवर्ती के चरित्र का विस्तृत चित्रण करने में कवि ने औचित्य का सदैव ध्यान रखा है। घटना-चित्रए मे कवि को इतनी सफलता मिली है कि इस महाकाव्य को घटना-प्रधान भी कहा जा सकता है। जनदर्शन और प्राचार का चित्रण करने मे भी कवि को सफलता मिली है। यह धर्म और मोक्ष की ससिद्धि को लक्ष्य करके लिखा गया है । इनका अर्थ और काम से सन्तुलन विठाने की ओर कवि ने सकेत उचित ही किया है। एक उच्चकोटि के महाकवि के रूप में जिनपालोपाध्याय चिरस्मरणीय रहेंगे। -- प्रति-परिचय प्रस्तुत महाकाव्य को प्रद्यावधि एकमात्र हस्तलिखित प्रति प्राप्त होने से संपादन-कार्य मे इसी प्रति का उपयोग किया गया है। प्रति की स्थिति इस प्रकार है- माप-२७+६.५ सी. एम. पत्र-१८४-२, . अन्तिम दो पत्रो में महाकाव्य के २१ वें सर्ग में प्रयुक्त १५ चित्र-काव्यो का पालेखन है। इन पत्रों पर पत्रांक लगा हुमा नहीं है। प्रत्येक पत्र को द्वितीय पृष्ठि में एक तरफ देवनागवे लिपि के मक मालेखित हैं और दूसरी तरफ ताडपत्रीय जैन लेखन- परम्परा के अनुसार अक्षरात्मक अको का पालेखन है। पक्ति-७ अक्षर-४२ माधार-कागज लिपि-देवनागरी लेखन-वि. सं. १२७८; लिपिकार ने लेखन-पुष्पिका इस प्रकार दी है- [ १४ ] - सम्वत् १२७८ ॥ वैशाख ववि ५ लिखितं दशा-७४७ वर्ष पूर्व कागज पर लिखित होने पर भी इसकी दशा साज भी श्रेष्ठतम कही जा सकती है। केवल प्रथम और अतिम पत्र सामान्यतया जीर्ण हो रहे हैं और पत्रांक १४६ एव १४७ का कुछ अश कीटकों द्वारा भक्षित है तथा शायद चिपक गए हो और उन्हे अलग करते समय असावधानी के कारण कुछ अक्षर नष्ट हो गए हैं। विना पत्रांक के अन्तिम दोनो पत्रो मे घर्षण के कारण चित्र-काव्यों के अक्षर अस्पष्ट हो गए हैं साथ ही जहाँ पत्रों के घर्षण के कारण अक्षर धूमिल हो गए थे वहाँ परवर्ती किसी विद्वान् ने दूसरे अक्षर लिख कर उन अक्षरों को पूर्ण तो अवश्य किया है किंतु वे अशुद्ध हैं। वैशिष्टय-(१) अथकार जिनपालोपाध्याय के जीवन-काल में ही लिखित होने के कारण इसे आदर्श प्रति की कोटि में रखा जा सकता है। (२) शुद्धतम एवं संशोधित है। कई स्थानो पर कतिपय अक्षरों को या चरण को ही काट कर पत्र के किनारों पर शुद्ध पाठ लिखा हुआ है। (३) कही-कही पर क्लिष्ट-शब्दों के पर्याय भी हाँसियों पर लिखे हुए हैं। (४) प्रथम सर्ग के पद्य २१, २४ और ५६ मे लिपिकार ने पाठान्तरों का प्रयोग भी किया है। (५) अक्षर बड़े-बड़ और लिपि सुवाच्य है। प्रस्तुत सम्पादन मे जहाँ कही पाठ अशुद्ध प्रतीत हुआ वहाँ मैंने शुद्ध पाठ ऊपर दिया है और टिप्पणियों पाठ देकर 'इति तु पुस्तके' या 'प्रती पाठः' का निर्देश किया है एव पर्यायो का मैंने सर्वत्र हो पादटिप्पणी के रूप मे प्रयोग किया है। आभार-प्रदर्शन यह आदर्श प्रति मुझे सौभाग्य से वि. स. २००६ में प्राप्त हुई थी। इसका महाकाव्यत्व और दुर्लभता के कारण मैंने वि. सं. २०११ मे बम्बई के प्रवास मे इसकी प्रेस कॉपी तैयार की थी और तभी से में इसके प्रकाशन के लिए [ ५ ॥ प्रयत्न में था। उस समय मेरी यह अभिलाषा पूर्ण न हो सको। प्रेस कॉपी करने के चौदह वर्ष पश्चात् स्वनामधन्य वेदमूर्ति डॉ. फतहसिंहजी, निदेशक रा. प्रा. वि. प्र. जोधपुर ने इस महाकाव्य को राजस्थान पुरातन ग्रथमाला की सं० १९६८-६९ की योजना मे प्रकाशनार्थ ग्रथो में स्वीकृत कर इसका मुद्रण-कार्य प्रारम्भ करवाया और इस सम्पादन को श्रेष्ठ बनाने के लिए जिस नात्मीयता के साथ समय-समय पर परामर्श एवं विदेश देकर कृतार्थ किया इसके लिए में आपका अत्यत आभारी हूँ और आजन्म ऋणी रहूंगा। मेरे परम मित्र ही नहीं अपितु अनजतुल्य श्री लक्ष्मीनारायणजी गोस्वामी ने जिस निष्ठा के साथ प्रूफ-सशोधन और पाठ-शुद्धि आदि में सहयोग दिया है उसके लिए मैं उनके प्रति हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। साधना प्रेस, जोधपुर के व्यवस्थापक श्री हरिप्रसादजी पारीक भी धन्यवाद के पात्र हैं जिन्होने इसके मुद्रण में पूर्ण सहयोग दिया है। अन्त में मै अपने परम पूज्य गुरुदेव खरतरगच्छालङ्कार आचार्यप्रवर स्व० श्रीजिनमणिसागरसूरिजी महाराज का यहाँ पर स्मरण न करना मेरे लिए महान् कृतघ्नता होगी; क्योंकि उन्ही के आशीर्वाद और कृपा से में आज कुछ योग्य बन सका। म० विनयसागर

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खरतरगच्छालङ्कार-युगप्रवरागम-श्रीजिनपतिसूरिशिप्य- महोपाध्याय-श्रीजिनपालगणि-शिष्यलेश'-प्रणीतम सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम प्रथमः सर्गः ।। ॐ नमो जिनपतये ।। - श्रियोऽपि वासात् कमलान्मनोज्ञा-वासाप्तिहृष्टेव यदीयवक्त्रे । स्याद्वादभङ्ग या नरिनत्ति वाणी, नन्द्यात् स देवो जिनपत्यभिख्यः ॥१॥ यस्याङ्गभाभिः ककुभो विभिन्नाः, कश्मीरजालेपरुचि वहन्ति । ज्योत्स्नासनाथास्वपि शर्वरीषु, श्रियं स दत्तां जिनवर्द्धमानः ॥२॥ प्रतापभाजापि सहस्रभासा, न नाशितं यन्निविड़ तमस्तत् । शुक्लद्युताऽप्यस्तमनायि येन, प्रदोषमोषं स करोतु वीरः ॥३॥ प्रज्ञाप्रकर्षेण समुद्यता नाक, भानोरिवाद्योत्यतरुक्चयेन अशेषमाकाशमिवार्थजात, यस्यास्त्वसौ भद्रकृदिन्द्रभूतिः । ४॥ स्फुरन्महावामनिरस्ततामसो, दोषान्तकृत् सत्पथदीपनाहतः । नालीकभक्तिप्रवरः शुभोदयः, श्रीसिद्धसेनो जयताद्दिवाकर ॥५॥ प्रन्येऽपि सर्वेऽपि युगप्रधानाः, सितांशुसवादियश:प्रताना.। जयन्ति नानातिशयैर्जनाना-मत्यद्भुतैः स्मारिततीर्थनाथा. ।।६।। सितां सदावृत्तमुखश्रियास्तो, निजप्रभाप्राभृतकेन नूनम् । उपास्त या शुभ्ररुचिः कलावान्, सा भारती भूतिभर तनोतु ।।७।। विहाय शेषान् सुमन.समूहान्, गुणाढयरोगेण रज-सनाथान् । समयविद्यावदनारविन्द-माध्वीकमन्वासिषताशु येषाम् ।।८।।

or सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् दन्तद्युतिप्रस्फुरणानुगामी, कथासु येषां वचनप्रपञ्चः। सम्पद्यते मर्त्यमलक्षयाय, मूर्तोऽमलो गाङ्ग इव प्रवाहः ॥६॥ व्यजेषत क्ष्मापसदः समक्ष, प्रावादुका यैः शतशः सदाः ताक्ष्य रिवोछ वासितविश्वविश्वाः, शश्वत्परच्छिद्रदृशो भुजङ्गाः ॥१०॥ अनन्यतुल्यानि तपांसि येषां, कलावपि प्रेक्ष्य विवेकिलोकः । श्रुतेष्वपि प्राच्यतपोधनेषु, व्यधत्त दृष्टेष्विव सत्यतास्थाम् ॥११॥ यश.प्रमोदोदयसविदा पदं, किमप्यवाप्यक्षरमल्पबुद्धिना। मयाऽपि येषां प्रवरप्रसादतः, सुयोगभाजा परमात्मनामिव ।।१२।। गुरूनिजांस्तान् जिनपत्यभिख्यास्त्रैलोक्यकोातिशयाम्बुराशीन् । युगप्रधानत्वयश:सुधांशु - क्षीराम्बुधीनादरतोऽभिवन्दे ॥१३॥ षड्भिः कुलकम् । प्रणम्य नम्यानिति विघ्नघातिनः, सन्मङ्गलास्तान् जगतीप्रमोदिनः । प्रवर्धमानाधिकधामसम्पदा, वितीर्णगोमण्डलरागमण्डनान् ॥१४॥ सनत्कुमारस्य कुमारतेजसः, सपत्नकक्षानलशक्तिकत्वतः । पुष्यन्महापुण्यकलापिनः शुभं, चरित्रमिन्दुद्युतिसोदरं ब्रुवे ॥१५॥ युग्मम् । प्रागेव सिन्धोर्मथनात् प्रजासृजा, संगृह्य लावण्यरसं विनिर्ममे । इतीव यस्याङ्गमनङ्गकामिनी-मन-समाकर्षणयोगतां दधौ ॥१६॥ सुमेरुगर्भादिव यः समुद्धृतः, सद्य. समुत्कीर्ण इवेन्द्रशस्त्रतः। सुरासुरास्त्रानतभेद्य विग्रहः, प्रपप्रथे प्रपप्रथे वज्रमयः क्षमातले ॥१७॥ प्रज्ञप्तिमन्त्रास्त्रन भोविहारिता, अन्येऽप्यभूवन्नतिशायिनो गुणाः । ते यस्य नो पूर्वभुवोऽपि चक्रिणोऽलञ्चक्रुरत्युच्छ्रिततेजसोऽपि यान् ॥१८॥ येनाशु चक्रेण विनापि चाददे, समग्र विद्यावरचक्रवर्तिता । सत्त्वोत्कटेनाकटकेन साहसात्, पञ्चाननेनेव मृगाधिराजता ॥१६॥ अनात्मरक्षः समभूत् प्रचण्डो, यक्षोपि साक्षाद् युधि येन रुद्धः। कि कृष्णसर्पोपि करोति तत्र, स्याद् यत्र शत्रुर्नकुलः सदर्पः ॥२०॥ - प्रथमः सर्गः mm त्रैलोक्यजेत्रा स्मरचक्रवर्तिना, श्रितान्यपि स्वान्तधनानि यो हठात् । दिवाप्यहार्षीत् सकलानि सुभ्रुवां, सुगुप्तभावान्यपि साहसाम्बुधि.'॥२१॥ तदङ्गनाभ्योऽष्टसहस्रसगुणाभजन् जिता मर्त्य मृगेक्षणा वधूः । योऽपत्रपिष्णोरतिदूरसस्थिति, समादिदेशेव हरेस्तपस्विनः ।।२२।। नाचक्रमुः शुद्ध समाधिमास्थितं, कर्मद्विषद्भुमिपतेर्भटा इव । यं कासशोषादिगदापदेशतः, सप्ताद्रिनाथाग्रमिवार्कसप्तयः ।।२३।। प्रायः पृथिव्यां नररत्नखानावपि प्रजज्ञे न यदाकृतीनाम् । यद्वा पयोधावपि रत्नयोनौ, रत्नं कियत् कौस्तुभसन्निभं स्यात् ।। पाठान्तर वा द्वितीयाः- रत्नाकरेप्यम्बुनिधौ कियद्वा, रत्नं प्रतिद्वन्द्वि भवेत् सुधांशो ॥२४॥ तं सार्वभौमावनिपालकीति - लुण्टाकमुट्टोकितसद्गुणाश्वम् । के नाम नाकर्णयितु सकर्णाः, समुत्सहन्ते शतशः कथाभिः ॥२५॥ - दशमि कुलकम् तस्याद्भुताचारविचारसिन्धो-रन्तश्चरत्सच्चरित बलान्माम् । वाचालयत्यम्बुजखण्डकोशं, गर्भे ध्वनद्धृङ्गकुलं यथोच्चै. ॥२६॥ क्व तादृशो सौगुणरत्नराशिः, क्वाज्ञोऽहमेतच्चरितं चिकीर्षुः। सुरेशितुः मावहनीयमद्रि-मुद्वोढुमुत्कः कुणिरेष नूनम् ॥२७॥ करालपातालतलं विवस्वान्नागाधिराजोपि नभस्तलं चेत् । विगाहते मन्मतिरप्रगल्भा, तदाऽस्य वृत्त गुरुणाप्यगम्यम् ॥२८॥ नवप्रियाप्रेममृधानकध्वनी, उपस्थिते योद्धरिवाहवागमे । स्वजाड्यवर्ण्यस्तुतिपक्षपातिते, द्वताय बुद्धिर्मम किं करोम्यतः ॥२६॥ तथाप्पवज्ञाय विधीयतेऽज्ञता, गुणानुरागेण तदीयसंकथा। न हि प्रियान्प्रेमत उज्झन युधो, भवेद् भटस्यापि भटत्वभूपणम् ॥३०॥ छन्दोविशुद्धौ न न संस्कृतोक्ती, प्रगल्भते वाक्प्रतिभापि नो मे। तथापि मामुत्कयति प्रसह्य, स्ववर्णने चक्रिचरित्रमग्रघम् ।।३।। . १. पेनोपमा पातु स चकनायफ पि प्रतो पाठ. ।

४ सनत्कुमारचक्रि चरितमहाकाव्यम् सुमेरुनाभिः शशिमण्डलाकृति-पोऽस्ति जम्ब प्रथमः पृथुर्भुवि । यो मध्यगो द्वीपगणस्य सर्वतः, प्राकाररूपोच्चजगत्यलकृतः ॥३२॥ यः सप्तवर्षोप्यमितप्रवर्षो, यो निम्नगालिङ्गनकृत् कुलीनः । यो मर्त्यभूरप्यपवर्गभूमिः, किमन्यदाह्रास्ततमन्तरीपम् ॥३३॥ तत्रापि वर्ष पृथु भाति भारतं, यज्जाह नवी-सिन्धुमहानदीद्वयम् । हारश्रियं बिभ्रदुदंशुवेदिका, सन्नायकभ्राजि दधाति सर्वदा ॥३४॥ पुरं पुरा तत्र च काञ्चनाख्यं, यथार्थमासीत् कनकाहितत्वात् । यद्वृत्तसालच्छलतो ह्यपाच्याः, कश्मीरजस्थासकतां प्रपेदे ॥३५॥ पयःप्रपूर्णा परिखाऽपि यस्य, द्वीपस्य पाथोधिरिवाभितोऽभूत् । प्रफुल्लपङ्केरुहलोलभृङ्ग-स्वनैः कलैः सालमिवोज्जगौ या ॥३६॥ यत्रेन्द्रनीलारुणरत्नकान्ता-संक्रान्तमूर्तिः कपिशीर्षकाली। नीलाव्ज-रक्तोत्पलखण्डलीलां, प्रातः प्रपेदे परिखाजलेषु ॥३७॥ रूपेण कामाद्वनदात् समृद्धया, बुद्धया गुरोर्यत्र गजाद्गतेन । न चक्षमुः क्षान्तिभृतोपि लोकाः, पराभवं जातु गुणैः समग्राः ॥३८॥ के राजहंसोज्ज्वलकञ्चुकाढ्याश्चक्रस्तनाः पुष्करिणीविलोक्य । रामा इवासन स्मरसायकानां, लक्ष्यं न वृद्धा अपि यत्र पौराः ॥३९॥ अनङ्गलीलाभरभङ्गिभाजो, वपु श्रिया भूषितरत्नभूषाः। पराजयन्ते स्म च यत्र कान्ताः, स्वर्गाङ्गना अङ्गविलासकान्ताः ।।४०॥ योन्दुकान्तावनिकुट्टिमेषु, ज्योत्स्नावलीढेषु विलासिनीनाम् । सक्रान्तलाक्षारसपादमुद्रा, निशास्वदुः कोकनदोऽप्यशङ्काम् ॥४१॥ यत्रावसेदुः पुरुषार्थसिद्धौ, न साधुभक्ता वणिजो जनाश्च । पद्मोश्च हंसाश्च महासरस्सु, स्ववस्थिताः पुष्टियुजो न किं स्युः ।।४२॥ मनोजयानस्वरशौचचौर्य, कुर्वन्नजस्रं कलहंसिकानाम् । वधूजनः कामनृपाश्रितः सन्, न्यरोघि राज्ञाऽपि न जातु यत्र ॥४३॥ दोर्दण्डविक्रमरिपूद्दलनाप्तकीत्ति- कान्तानितान्तपरिरम्भविनिवृतात्मा।

प्रथमः सर्ग: ५ तस्मिन् स विक्रमयशा नृपतियथार्थ- नामाऽभवद् भुवि गुणैरुपमातिगो यः ॥४४॥ जितैर्नमद्भिपतिप्रतानर्यस्य प्रतापः शिरसा समूहे। किरीटकोटीतटपद्मरागच्छलेन नूनं दिननाथदीप्रः ॥४५॥ नागाङ्गनाभिः परिगीयमानं, यशःसितं यस्य समाततान । पाताल उद्द्योतकुतूहलानि, प्रतिक्षणं हृष्टभुजङ्गमानाम् ॥४६॥ यस्यातिसौन्दर्यजितो मनोभूरमोघशस्त्रत्वमहो ! व्यतारीत् । नूनं रणेऽभूत् कथमन्यथास्य, द्विषन्न कोप्यमहतः शितास्त्रः ॥४७॥ या निर्जरैः शत्रुविदारटकैः, प्राज्यभट सद्गुरुभिश्च की। तां नूनमास्थानभुवं प्रपन्ने, ह्रियाऽश्रयद् यत्र दिवं महेन्द्रः ॥४८॥ सर्वोपसहारविरोधभेद-शब्दश्रुति टकलक्ष्मशास्त्रैः । यत्र प्रजाः शासति चण्डदण्डे, जनेऽभवन्नैव सुखावगाढे ॥४६॥ दूरं समाकृष्टविपक्षलक्ष्मी - सपुष्पकेशग्रहसौरभाढयम् । यत्पाणिपञ मधुपालिशोभा, श्यामायतां खगलता दधार ॥५०॥ यस्यावरोधोऽप्यनिरुद्धमातु-र्वपुःश्रियासूत्रितदास्यदीक्षः । तथाप्युपास्यः परमादरेण, शृङ्गारयोनेरनिशं बभूव ।।५१॥ सारं समाकृष्य सुराङ्गनाभ्यः, सङ्खयातिगाभ्योऽपि विधिः प्रसन्नः। यस्याङ्गना नूनमिहानिनाय, स्व.स्त्रीषु यत् क्वापि न तादृशी श्रीः ॥५२।। अन्त.पुरं पञ्चशतोप्रमाण - मासीच्चतु षष्टिकलाऽभिरामम् । विनिर्जयत् षोडशभिः कलाभि-बिम्बं समग्र शशिनोऽपि यस्य ॥५३॥ दृष्टिर्यदन्त.पुरिकासु कामि-वातस्य लोलाऽपि पपात नैव । उन्मजनाभावभयेन मन्ये, लावण्यलीलामृतकूपिकासु ॥५४॥ विश्वोपभोग्येन यदीयकोशे, नायातु साम्यं कथमत्र कोशः । यक्षाधिनेतुः प्रणयकपात्रं, त्रिलोचनो यस्य सखापि नग्नः ।।५।। पुरे दिवीवामरनायकस्य, तत्राधिपत्य निहतारि यस्य' । आतन्वतः शासनसारवाचो, भयादिवागान कदाप्यनीतिः ॥५६|| १ चकमिनि पाठ.।

६ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् शक्तित्रयाधिष्ठितविग्रहेण, न विग्रहं कोऽपि ततान तेन । मृगाधिपेनोननखानभाजा, स्पर्द्धत किं मत्तमतङ्गजोऽपि ॥५७|| अर्थार्जने कहि कदापि भोगे-ऽन्यदा तु धर्मेपि समुद्यतस्य । न्यायनिष्ठस्य सदापि राज्ये, प्रजासु दौस्थ्यं न बभूव तस्य ॥५८।। सिन्धाविव प्रोज्ज्वलरत्नजालै-ॉम्नीव भास्वद्रुचितारकौघैः । ऐश्वर्यदासोकृतपक्षराजैः, पौरश्चिते तत्र पुरे प्रभूतैः ।।५।। बभूव भूमीश्वरमानपात्रं, वणिग्वरः केलिगृह रमायाः । रूपप्रतिक्षिप्तमनोभवश्रो-युवा विलासी किल नागदत्तः ॥६०॥ प्रतिष्ठितः सत्यवचाः पुरे यः, प्रियंवदः प्रीणितयाचकौघः । सिंहः समग्रव्यसनोग्नकुम्भिष्वलक्ष्यत न्याय इवेह मूर्तः ॥६१॥ यश्चारुतारुण्यविकासिलीला-सरोजिनीसन्ततिदीपिकायाः । सुवर्णचूर्णच्छुरितत्वमुच्च-गौ राङ्गकान्तिच्छलतो वहन्त्याः ॥६२॥ सौन्दर्यपीयूषनिधानकुम्भि-कुम्भोन्नमत्पीनपयोधरायाः। लीनद्विरेफाङ्कपयोजपत्र-विस्तीर्णसश्रीकविलोचनायाः ॥६३।। निर्लाञ्छनप्रौढसुधांशुबिम्बा-भिभाविवक्त्राम्बुजमण्डनायाः । स्मरोद्भवद्विभ्रमराजधान्या, विष्णुश्रियः कान्ततया प्रतीतः॥६४॥ षड्भिः कुलकम् । मित्रोन्मुखे शुद्धगुणावगूढे, लक्ष्मीरुचा साम्बुरुहीव यत्र । तथापि तस्यावनतस्य जग्मुर्दिनानि भूयांसि ससम्मदस्य ॥६५॥ अथाऽऽलुलोके नृपतिः कदाचित्, प्राणप्रियां तस्य विविक्तदेशे । स्रस्तोत्तरीयप्रकटास्यलक्ष्मी-विडम्बितोत्फुल्लसहस्रपाम् ॥६६।। जृम्भावशोल्लासितबाहुमूलो-पलक्ष्यमाणस्तनकुम्भलक्ष्मीम् । श्लथीभवबन्धुरनीविबन्ध-व्यक्तस्मरोज्जृम्भकरोमराजिम् ॥६७॥ मोट्टायितेनावनताङ्गलेखां, मुष्टिग्रहास्तुलमध्यभागाम् । ध्रुवं नृपान्तःकरणव्यधायाकृष्टां स्मरेण स्वशरा (रै.) सयष्टिम् ॥६८।। विशेषकम् ।

प्रथमः सर्गः ७ ! निरीक्ष्य तो दृश्यपदार्थसीमां, शृङ्गारयोनेः परमास्त्रमेषः । व्यतर्कयद् विस्मयलोलनेत्रस्तदेकधीः प्रस्मृतधर्मशास्त्रः ॥६६॥ रम्भा किमेषा त्रिदिवावतीर्णा, किंवा रतिः प्रोज्झितभर्तृ संगा। लक्ष्मीरुताहो ! हरिविप्रयुक्ता, शम्भौ सकोपा किमु पार्वती वा ॥७०।। अहो मुख पार्वणचन्द्रकान्तं. चित्राकृतिः कापि कुचस्थलस्य । श्रोणिविलासायुधकेलिशय्या, राज्यास्तु रोम्णां न हि मूल्यमस्या. ॥७१।। रम्येष्वपीन्दुप्रभृतिष्वहार्य, कलङ्कसङ्ग. सकलेषु दृष्टः। कल्याणसवयवाऽकलङ्का, धात्रेयमेव ध्रुवमत्र सुप्टा ॥७२॥ पीयूषधारारसनिर्विशेषां, यत्र क्षिपेत् कामिनि दृष्टि मेषा । कटाक्षितः पुण्यशतैः. स एव, क्षुद्रो भुवो भारकरस्तु शेषः ॥७३।। अदृष्टिना तावदिय न शक्या, धात्रा विधातुं ध्रुवमद्भुतश्रीः । दृष्टा तु हातु स्थविरात्मनापि, प्रतीयते तत्त्वमहो न किञ्चित् ।।७४॥ यस्यैतदङ्गामृतभोगभङ्गिः, सम्पद्यते न नेत्रापि तेन त्रिदिवालयाना, किं काशपुष्पायितजन्मनाऽत्र ।।७।। ध्यायन्निदं भूरि तदेकतानः, सस्तम्भितोऽभूत् क्षणमेष कामी। अन्तर्मनोजन्ममुदोर्यबाण-श्रेण्या भुवि प्रोत इवातिमात्रम् ।।७६।। स्मरतापभाजः। सप्तभिः कुलकम् । चैतन्यहारिस्मरनागराज-स्फुरद्विकाराद्गरलादिवैषः । मुमूर्छ चात्यन्तिकरागमग्ने, विलोकयस्तन्मयमेव विश्वम् ॥७॥ पुनः कथञ्चित् परिलब्बचेतनो, गवाक्षसञ्चारितुपारमारतः । उन्मत्तवज्र मुखपाणिलोचनं, व्यस्तं निचिक्षेप तदेकमानसः ।।७।। अचिन्तयच्चष कथ नु लभ्या, मया सुपुण्येयमपुण्य भाजा। अमर्त्ययोग्या हि सुधा पवित्रा, स्वर्भानुभोग्या न पुरापि जाता ॥७६।। प्राकृष्य भर्तुः समुपाददे चेदेतामहं वज्रमनास्तदापि । स्वकोत्तिहंसी जनवाच्यताख्ये, निमज्जिता कज्जलकुण्डके स्यात् ॥८॥ अन्यायमार्गे यदि चास्मि वर्ते, न्यस्येत् पथि न्यायमये पदं कः । सोमामतिकामति चेत्पयोधि-त्तिापि का शेपसरस्सु तस्याः ।।८१॥

सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् इमां विना तु क्षणमप्यल न, प्राणानवस्थापयितुं स्मरातः । ग्रीष्मोष्मसन्तप्तशिलातलस्थः, सरश्च्युतो मत्स्य इवातिदीनः ॥२॥ इदं तदत्यन्तमहो दुरुहं, कार्य परं ब्रह्म यथाल्पबुद्धेः । क्षेपं क्षणार्द्ध क्षमते न कामः, क्षिपन्नविश्राममिषूनसङ्खयान् ॥८३॥ व्याघ्रोऽस्ति पृष्ठे पुरतस्तु दुस्तटो, पार्श्वद्वये ज्वालशताकुलः शिखी । महाशनिश्चोर्ध्वमधोन्धकूपकः, क्व संकटे मादृश ईदृशि व्रजेत् ॥८४॥ तथाप्यनल्पविहितैर्विकल्पैः, किं मे महोत्साहवतोऽपि पुंसः । इष्टस्य कार्यस्य भवेन्न सिद्धि-युद्धेऽपि यद्भीरुहृदः परेभ्यः ॥८॥ यथा तथाऽऽत्मा परिरक्षणीय, इत्याह तावन्ननु दण्डनीतिः । शास्त्रेऽपि च स्वेतरकार्ययोयत्, स्वमेव कार्य कथितं विधेयम् ॥८६॥ लोकेऽपि तीव्र ज्वलिते स्वमस्तके, नैवान्यमूर्द्धज्वलनप्रतिक्रिया। कार्येति चास्या हरणं ततो वरं, यद्देहयात्रा न ममैतया विना ॥१७॥ एवं विनिश्चित्य च तां निजान् गृहानानाय (य्य) यद्गुप्तनरेण पार्थिवः। विष्णुश्रिय त्रासविलोललोचना, मृगोमिव व्याघ्रपतिक्रमागताम् ।।१८।। साऽथ प्राप्य नरेन्द्रमन्दिरमपि प्रादुर्भवन्मानस- व्याबोधातिशयान्वभूच्छुचमलिस्त्रीवाब्जरुद्धा निशि। सौस्थ्ये सर्वमपि प्रमोदसदनं माघार्द्धरात्रेष्विव, स्नानं वामशा गिरीशदयितासौभाग्यतृष्णास्पृशाम् ॥८६॥ इति युगप्रवरागमश्रीमज्जिनपतिसूरिशिष्यलेशविरचिते श्रीसनत्कुमारचक्रिचरिते विष्णुश्रीहरणो नाम प्रथमः सर्गः समाप्तः । छ. । १

द्वितीयः सर्गः
तदागमेत्यर्थमहो नरेन्द्रो, मुदं दधौ कोविदनिन्दितेऽपि ।
चव वा जने स्यादृढपञ्चबाण धुणक्षतान्त.करणे विवेकः ।।१।।
मदोत्कटो गन्धमतङ्गराजो, मृणालिकां निर्दयमाशु मृद्नन् ।
रुच्येत केन क्षुधितो मृगेन्द्रो, मृगाङ्गना मांसलविग्रहां वा ॥२॥
तीवोऽपि वह्निः सलिलेन शम्यते, तच्चेज्ज्वलेत् किं हि तदा निवर्त्तकम् ।
कथं च तत्र श्वसिति ज्वरादितः, सञ्जीवनी यत्र विपाय कल्प्यते ॥३॥
स्वयं वितन्वत्यसमञ्जसानि, क्षमाभूति न्यायपरे प्रकृत्या।
कथं व्यवस्था स्मरवाडवाग्नि-सर्गितानर्थनिधी जने स्यात् ॥४॥
कान्तानुरागोऽभिनवं विलोचनं, व्यनक्ति यत्सन्तमसेऽपि तामसौ।
स्मराननाम्भोरुहदत्तसम्मदा, विनिर्गतां मानसमन्दिरादिव ।।५।।
धिक् कामुकत्वं जनवाच्यतासुहृत्, सद्गौरवोल्लुण्ठनपश्यतो हरम् ।
तथा हि तद्वास्त्रिदशेश्वरोऽप्यलं, तुलां समारोहति जीर्णतन्तुना ॥६॥
कुविन्दपाशेन कर्थिताना-मिवेन्दुभासामपि सद्गुणानाम् ।
सम्पद्यते कामकलङ्कभाजो,
यशःपटोन्मीलनपाटवं नो ।।७।।
न कामुकः पांसुरिवादधाति, स्थिति गुरूणा हृदि चन्द्रबिम्वे ।
यतोऽस्य मालिन्यभृतः कुसंस्थः, समं भवेत् सन्ततमत्र मैत्री ।।८।।
विष्णुश्रियः प्रेमभरात् कथञ्चिन्नासो न्यवर्तिप्ट विदन्नपीदम् ।
आकरिणता यो घनतूर्यनादः, सग्रामभूमेरिव गन्धनागः ।।६।।
एना रहस्यभ्यधित क्षितीशः, प्रिये तदेवं वसुधाधिपत्यम् ।
अहं हि ते किङ्करनिविशेषः, क्रीतः कटाक्ष वनैकसारः ॥१०॥
सामन्तचऽपि पृथुप्रतापे, त्वच्छासनं खेलनमातनोतु ।
अन्तःपुरं चानुचरं तवेदं, छायेव सुभ्र ! स्ववपुलतायाः ॥११॥
नमस्करिष्यन्ति च भक्तिभाजो, मन्मान्यता वीक्ष्य समस्तपोराः ।
तनूदरि ! त्वां नयनाभिरामा, लेखा नवीनामिव शोतभासः ॥१२॥

सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् मयि प्रसन्ने तव कातराक्षि!, क्षमातलं निघ्नमिति' प्रतीहि । समीपगे कल्पतरौ हि कस्य, न स्यात् सदा कल्पितकार्यसिद्धिः ॥१३॥ नृसिंहयोग्यां भवतीं कदर्यः, कथं नु पश्येदपि नागदत्तः। भद्रावशा जातु न रासभस्य, स्वप्नेऽपि भोग्याऽधमशेखरस्य ॥१४॥ सप्रश्रय भूपमिति ब्रुवाणं, प्रत्याह सा साध्वससन्नकण्ठो। साऽपत्रपा वेपथुदुस्थगात्रा, सबाष्पनेत्रा परिमन्दमन्दम् ॥१५॥ पिता भवेद् भूमिपतिः प्रजानां, सदापि तद्रक्षणदीक्षितत्वात् । तत्र प्रवर्तेत कथ सरागा, वाणीव दृष्टि: कुलजाङ्गनायाः ॥१६॥ राज्येन किं तेन ममाद्य कार्य, स्वं शीलशैलानपरिच्युतायाः । दुग्धोपयोगोप्यतिसन्निपात-प्रपातिदेहस्य शिवाय न स्यात् ।।१७।। यत्राऽऽस्यमप्यम्बुजवन्निशाया-मुद्घाटनं न क्षमते रजस्वि । सतीव्रतध्वंसविधौ हिविभ्रन्, मालिन्यपकं कुलपांसुलायाः ॥१८॥ तत्रेतरस्यापि जनस्य निन्द्या, सामन्तचक्रे चतुरे मदीया। जात्यन्धवक्त्रे स्मितपत्रवल्लि-लेखेव नाज्ञापि बित्ति शोभाम् ॥१६॥ युग्मम्। त्वदीयमन्तःपुरमुत्तमत्वात्, सपत्नभावाच्च कथ विसोढा। भुजङ्गयोषाकुलवत् प्रपुष्टां, मां द्विष्टभावं नकुलोमिवोग्राम् ॥२०॥ संवीतमूत्तिर्यदि मक्षिकाभिश्चित्रीभवेत् सुन्दरतानिधानम् । लभेयाहमपि प्रतिष्ठा, पापेह पापेह पोरैरनुगम्यमाना ॥२१॥ न भूपसङ्गप्रभवः प्रसादः, साध्वीषु साधुः पतिदेवतासु । किम्पाकभोगः क्षुधितप्रजासु, यथाभिरुच्योपि विपाकरौद्रः ।।२२।। गुरूपदिष्टः पतिरेव नित्यं, कुलाङ्गनानाममनोरमोपि । कलङ्कधामापि तुषाररश्मिः, कुमुद्वतीनामिव माननीयः ॥२३॥ कुवेरलक्ष्म्योक इवेति कान्त, साऽप्यर्थसारं वचनं वदन्ती । प्रत्यावभाषे नरपुङ्गवेन, स्वकार्यसंदीपितचापलेन ॥२४॥ तदा १. मायत्तं। २. ० 'पासनायाः' इति पाठः पुस्तके ।

द्वितीयः सर्गः
११
मुग्धेऽङ्गनाश्चित्तभुवोऽनुजीविका, भक्ताश्च तास्तस्य कथ हि शासनम् ।
विलवयेयुः कमनीयकामिनां, विमाननात् तत्सुहृदां महीयसाम् ।।२५।।
कुलाभिमानोऽपि न कामिनीनां, तद्भक्तिभाजामुचितो विधातुम् ।
स्वस्वामिवश्यस्य हि सेवकस्य, का स्वैरिता तत्त्वविचारणायाम् ॥२६।।
स्वशासनातिक्रमकोपितेन, ध्रुवं जटित्वादिविडम्बनाभिः ।
विडम्बितास्तेन कुलादिसीमास्तं विद्विपन्तो विदधुव्रतस्था॥२७॥
अस्यैव चाज्ञा शिरसा विधार्यते, लोकैकमल्लस्य सुरासुरैरपि ।
शेषेव कल्याणिनि ! कल्पितार्थद, तत्सर्वथाराद्धममुं त्वमर्हसि ॥२८॥
सा प्राह किं तेन सुकुण्डलेन, यत्त्रोटयत्यद्भुतलम्बकर्णम् ।
आराधितो दुर्गतये ध्रुवं स्यात्, यस्तेन किं सर्वगुणस्पृशापि ॥२६॥
प्रत्यब्रवीत्तामथ मर्त्यनायक', प्रिये ! तदाराधननिष्ठचेतसाम् ।
अच्छिन्नसम्भोगजमोदमालिका, सुधानिमज्जद्वपुपां क्व दुर्गतिः ॥३०॥
इति प्रतीतेऽपि सुखे समक्षतः, क्षमो न कर्तुं सुतनो ! विपर्ययः।
को शम्भसि स्नानविहारपानजाः,प्राप्यापि केली. कलयत्यसत्यताम् ।।३१।
निवर्त्यते चेदसुतश्च भाविनः, त्रासादसातस्य मनोहरादपि ।
तदा महाजीर्णविपाकशङ्कया, भोक्तन युज्येत कदापि पायसम् ॥३२॥
इत्थ मुहुर्मानवनाथधूर्तकः, प्रदर्शयन्नुत्पथगामिनीः कथाः ।
विष्णुश्रिय सत्त्वपयान्न्यवर्तयत्, स्थर्य क्व वा स्त्रीषु विचक्षणास्वपि॥३३॥
ह्रीमात्रयुक्तामथ तामवेत्य, क्षितीश्वरः कुण्डलहारयप्टीः ।
कान्त्यास्तृताशामुखचक्रवालास्तस्य ददौ दृप्टिमनोऽभिरामाः ॥३४॥
उवाच चैनां परलोकभीरुता, न सुन्दरी ते क्षणभाजि यौवने ।
किं कृष्णसारङ्गवदगभामिनि !, प्रत्येति यात सदिद कथञ्चन ॥३॥
एव ससामाप्रतिमप्रदान-प्रहारगाढाहतेव नष्टा ।
अपापि तस्याः समरोन्मुखानां, श्रेणिः प्रवाचामिव कातराणाम् ।।३६॥
मनोऽपि तस्या मदनावलीड, हिम यथा दायभृदप्यवश्यम् ।
क्षणेन दुद्राव विदग्धसज्ञानलोप्मतो त्यात सर्वधाम्न ॥३७॥

१२
सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम्
विष्णुश्रिया विप्लुतधैर्ययाऽथ, स्मरस्य भूपस्य च शोभनाज्ञा ।
मेनेऽथवा स्वं हि हितं न वामा, विदन्ति दोषक्षतशुद्धबोधाः ॥३८॥
प्रत्याबभाषे तमिति स्मरात, त्वदेकतानाऽहमिति प्रतीहि ।
नाम्भोजिनीनायकतः कदाचि-दम्भोजिनी येन पराङ मुखो स्यात् ॥३९॥
हेलाखिलक्षोणितलावगाहिन्यपि प्रमोदो हृदि तस्य नाऽमात् ।
कान्तामुखस्मेरसरोजनिर्यद्व चोमधुस्वादनभङ्गिजन्यः ॥४०॥
तुष्टेन साऽथ प्रतिचारिकाभिः, प्रासाध्यत स्नानविधानपूर्वम् ।
सुनिर्मलश्लक्ष्णलसद्दुकूलैः, श्वेतद्युता द्यौरिव रश्मिजालैः ॥४१॥
नानामणिप्रोच्चरदंशुजाल-प्रबद्धशक्रायुधभूषणौधैः ।
विभूषिता कल्पलतेव साभात्, सञ्चारिणी विश्वविमोहनाय ॥४२।।
तां सत्कृतो वीक्ष्य तथा प्रसन्नां, कामं सकामो नृपतिर्बभूव ।
पान्थोऽतिहृष्टः सरसीमिवार्तस्तृषा विदूरागमसादिताङ्गया ॥४३॥
तस्यां महामन्मथकेलिवाप्यां, सरोजहंसः कमलावतंसः ।
नानाविनोदैरनयद्दिनानि, प्राप्तातुलश्रीरिव सप्रमोदः ।।४४।।
विष्वक्समुन्मीलितपुष्पनेत्रस्तां सुन्दरी द्रष्टुमिवोन्मुखेषु ।
तया करिण्येव करी कदाचिच्चिक्रीड लीलोपवनेषु भूपः ॥४५॥
कदापि तत्पीनकुचाभशारि-ग्रहाग्रहाद्यूतविनोदसक्त. ।
सार्द्ध तया तत्करदत्तदृष्टिदिन समग्रं क्षणवन्निनाय ॥४६।।
सम्भावयामास तदेकतानो, दृष्ट्यापि नान्तःपुरमेष शेषम् ।
अन्धं यथा प्रौढमृगाङ्कवक्त्र-मप्युद्धतोन्मत्त इव क्षितीन्द्रः ।।४७॥
सकामतृष्णातिशयो निरन्तरं, विसारिदन्तांशुसुधाप्लवाचिताम् ।
पपौ स विस्फारितलोललोचनश्चकोरवत्तन्मुखचन्द्र चन्द्रिकाम् ॥४८।।
तथाऽभवत् तत्सुरतावमग्नो, यथोज्झितान्यप्रियकाम्यराशेः ।
शेषेन्द्रियाणामपि वृत्तयोऽस्य, त्वगिन्द्रियं नूनमनुप्रविष्टाः ॥४६॥
यथेन्दुमौलिः सततानुरागाद्, गिरीन्द्रपुत्र्याः क्षणमप्ययोगम् ।
त्रिस्रोतसो वा सलिलाधिनाथस्तस्यास्तथा नेच्छदसौ क्षितीशः ॥५०॥

द्वितीयः सर्गः १३ कान्तावियोगादथ नागदत्त, आशीविषो वोद्ध ततालुदंष्ट्र । अन्तस्तताप क्व नु सुस्थता स्याच्छमीतरोः प्रज्वलकोटरस्य ॥५१॥ मनस्विभिः क्षम्यत एव मूर्द्ध नश्छेदोऽपि कांताभिभवस्तु नोच्चैः । रामायणादावपि यत्प्रसिद्धो, रामाकृते वोरसहस्रनाश. ॥५२।। प्रियागुणस्मृत्यभिसारिकाभिर्वाचालितोऽसौ विललाप दोनम् । हा !! हसगामिन्यधुना तु कुर्यु , कस्या गतिं मे गृहकेलिहंसा ॥५३॥ त्वदङ्कपालीपरिवर्तलालितां, वीणामिमा स्कन्धतटे दधातु का। नृपाङ्गनायोग्यसुचम्पकस्रजो, न काककान्ता भवतीह भाजनम् ॥५४॥ विलुप्तदृष्टीव मुखं मनोरम, मृणालिनीमुक्तमिवेह मानसम् । व्योमेव शीतद्युतिचन्द्रिकोज्झित, त्वया विना शून्यमिवेक्ष्यते गृहम् ।।५।। रुष्टासि चेत् कोकिलयेव निम्बान्, मन्मानसाद्भीरु न सर्वथा किम् । नशे त्वया प्रत्युत मीलिताव्जरुद्धालिनी स्थैर्य मिहोऽऽललम्बे ॥५६।। इत्थं विलापेन कृशत्वमायया-वस्याङ्गयष्टिः शुचिनेव निम्नगा। समं नलिन्यातिविकस्वराब्जया, विशुद्धया चेतनयातिदु खिनः ॥५७।। पटिष्ठान्यपि तस्य माद्यत् लवड्गवच्चापलमुद्वहन्ति । पत्न्या सह प्रोपितवृत्तिभावादिवावसाद दधुरिन्द्रियाणि ॥५८।। विशस्थलेष्वक्षमनस्सु देहे, दस्युर्यथा प्राहरिकेषु गेहे। यथेष्टमुन्माद उदनचेष्टा, नानाकृतिस्तस्य समुज्जजृम्भे ।।५।। चित्रापितामप्यवलोक्य कान्तां, दूरोन्नमवाहुरघावदेषः । किं नेष' रोषो मयि कः कुतो वाऽवलोक्यसे चात्र मुहु प्रजल्पन् ॥६०॥ रजोभिरुद्ध लयति स्म गात्र, स्नात्वा यथा मत्तगज. करेण । साक्षादिवांहोभिरिहैव तूणं, क्षितीशरोपप्रभवैरनल्पै. ॥६१।। उत्तालताल च जहास नृत्यन्, भाकृतिभैरवमूत्तिरेपः । पादप्रहारैरसमं पतद्भिः, प्रकम्पितक्षोरिणतलोऽतिरोद्र. ॥३२॥ व्यभाव्यत प्रस्खलितक्रमं या, न व्यक्तवाग्लोलितरुक्षकेशः । तादृग्भिरेवानुगतः सडिम्भर्मूर्तः क्षिती भूतपति सभूतः ॥६३॥ 1. पुस्तके तु 'नैपि' पाठ. । तत १४ सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् 1 " व्यामील्य नेत्रे कमलासनस्थो, योगीव चाव्यक्तमयं निदध्यो । ध्यानावसाने च रिपाविवोग्ने, दृष्टे हितेऽपि भृकुटिं बबन्ध ॥६४॥ उन्मादराजस्त्वरितं हनिष्यन्, व्यगोपयत्तं शठचौरनीत्या । तथा विडम्बंविविधैः परापत्, यथाखिलोन्मत्तशिरोमणित्वम् ॥६५॥ दृष्ट्वापि त तादृशमीक्षणानां, कृपास्पदं कण्ठवित्ति जीवम् । नैवान्वशेत क्षितिपो मनागप्यहो ! दुरन्ता स्मरतन्त्रताऽत्र ॥६६।। विष्णुश्रियं चानुचचार राजा, कुटुम्बिनी स्वामिव चक्रवाकः । क्व वा भवेत्तत्त्वविचारहष्टिः, कामिष्वदृष्टिष्विव वामगेषु ॥६॥ सङ्गीतकेऽसौ कलगीतिकान्ते, मार्दङ्गिकत्वं स्वयमभ्युपेत्य । प्रनर्तयामास विलोलनेत्रस्तत्पीनवक्षोरुहवल्गनेषु ॥६॥ तां वेगवायूल्ललदंशुकान्त-व्यक्तातिरम्यावयवां वसन्ते । आंदोलयामास सलोलबाहुर्दोलासु लीलोपवने प्रहृष्टः ।।६।। स तत्र सक्तस्त्वतिमात्रमन्तः, स्वराज्यचिन्ता न चकार काञ्चित् । भवन्ति हि व्यालविषावलीढा, हिताहितार्थव्यवहारशून्याः ॥७०॥ पदे पदे भक्तमपि स्वकीयमन्त.पुरं चारु तिरश्चकार । द्विकः पिकासेव्यफलावनम्न-मुत्तुङ्गकनाम्रवण यथाऽज्ञः ॥७१॥ तत्प्रत्यहं तेन कदीमान, भावानुरागेऽपि चुकोप तस्मै । घर्षप्रकर्षान्ननु चन्दनादप्युद्गच्छति स्फारशिखः शिखावान् ॥७२॥ तथाप्यपश्यन्नवरोधनार्यो, विमृश्य तत्त्वं समवेत्य तावत् । कार्याणि यत्साहसनिमितानि, प्रायोऽनुतापाय भवन्ति पश्चात् ॥७३॥ नायं नपोऽस्मासु कदाचिदेवं, पारुष्यमाविश्चकृवान् रुपापि । ग्रीष्मेऽपि कि बालगभस्तिमाली, मृणालिनीमीलनतत्परः स्यात् ।।७४॥ तन्नूनमौपाधिकमस्य वृत्त, विष्णुश्रिया सङ्गमित ह्यनार्यम् । रात्रि विनाऽन्यः प्रमदावनद्ध, कः कौशिक ताण्डवयत्यकाण्डे ॥७॥ पापा तदेव वणिग्वधूटी, कुटी गरिष्ठा कपटस्य मूलम् । प्रवृद्धसाम्राज्यतरुप्रमाथि-नानादुराचारपरश्वधानाम् ।।७६॥

द्वितीयः सर्गः १५ अस्माकमुच्छेद्यत मा तदेषा, यतो न बाणेन हतापि जातु । प्रक्षेपकं तस्य विहाय बाणोन्मुखीभवत्युद्भसिंहराजिः ।।७७॥ ततस्तदुच्छेदविधिश्च ताभिः, प्रचक्रमे सत्वरमेव कर्तुम् । अवश्यनाश्येष्ववधीरणा स्याद्, ध्रुवं विनाशाय हि नाशकानाम् ॥७॥ ताः कार्मणोच्चाटनपाटवान्विता-नुपाचरन् भूरिधनेन मान्त्रिकान् । नेमुश्च नीचानपि सत्तमानिव, स्वार्थाय किं किं हि न कुर्युरङ्गनाः ॥७६।। प्रवाजिकाकार्मणतश्च ताभि , क्षणात् परावर्यंत जीवितात्मा। मोधत्वमायाति कदापि लक्ष्ये, न हि प्रयुक्त कुलिशं मघोना ॥८॥ विष्णुश्रिय वीक्ष्य तथा विपन्नां, मुमूर्छ सम्मूछेदतुच्छमन्युः । निमीलितस्वान्तहृषीकवृत्त्या, प्रेम्णा तु कुर्वन्निव तां नरेन्द्रः ।।८१॥ मयूरपक्षव्यजनानिलोघः, स वीजितोऽप्यम्बुलवावमित्रैः । न चक्षुरुत्क्षेपमपि व्यधत्त, चित्रापितारम्भ इवोनमोहः ।।१२।। कर्पूरपारोधनचन्दनाम्बु-स्निग्धच्छटालालिततालवृन्तः । चिरेण संज्ञा समवाप भूपश्चक्षुःपरिस्पन्दलवानुमेयाम् ॥१३॥ उन्मीलदक्षं बदनं तदीयं, वीक्ष्य स्फुटत्पत्रमिवाम्बुजन्मा । लोक. प्रमोदेन समुल्ललास, चन्द्रोदयेनेव पयोधिनाथ. ॥४॥ निविडनिजविपक्षोच्छेदमोदस्य पोषी, समभवदथ हर्षः कोऽपि भूपाङ्गनानाम् । शिशुमृगनयनानां वल्लभाभ्यासजाया , मुद इव सितशोचि?तसंयोगजन्मा ॥शा इति युगप्रवरागमश्रीमज्जिनपतिसूरिशिष्यलेशविरचिते श्रीसनत्कुमारचमिचरिते नृपप्रत्युज्जीवनो नाम द्वितीयः सर्ग समाप्त: । छ.। २ तृतीयः सर्ग: अथोद्भवन्मन्युभरस्खलद्गी-विमुक्तलज्जं विललाप भूपः । यच्छन्निवानरुपचीयमाते-र्जलाञ्जलि संस्थितवल्लभायाः ॥१॥ वाङ्मात्रदानेऽपि पराङ्मुखी किं, प्रियेऽधुना स्निग्धतमापि पूर्वम् । गौर्जातु मुग्धार्भकदुग्धमात्रा-र्पणे दरिद्रा न हि कामदोग्ध्री ॥२॥ अन्तस्थमूकालिनिमीलिताब्ज-श्रियं दधद्वीतवचस्तवाऽऽस्यम् । ममाधुनाऽऽलोकयतोऽपि चित्तं, दुनोति दूरीकृत विभ्रमायाः ।।३।। मुग्धे ! तव श्रोणितटावलग्ना, शोकातिरेकान्मणिमेखलापि। रोचिमिषप्रस्रवदश्रुराजि-विभाव्यते नूनमनूनमौना ॥४॥ त्वन्मानसे मानिनि ! माययायं, स्निग्धो मयीत्येवमवात्समस्मि । इतीव दीर्घेपि पथि प्रयान्त्या, नाऽभाषितोऽपि प्रखलो भवत्या ॥५॥ मृगीषु विप्रेक्षितमम्बुजेषु, वक्त्रद्युतिर्बहिषु केशपाशः । स्वस्य प्रयाणेऽत्र धृतं त्वयैतद्, ध्रुवं विनोदाय मदीक्षणानाम् ।।६।। दुर्बोधमेवं ललितं त्वदीयं, नानाविधानं नियतेरिवेदम् । विषाऽमृतस्पद्धिविषादहर्ष-द्वयं समं यच्छति साम्प्रतं मे ॥७॥ इत्यादि भूपो विलपन्नवद्य, पिशाचकी शीघ्रमभूत् सशोकात् । काष्ठागतः कामनटोपदेशः, कथं कथं नाम न नाटयेद्वा ॥८॥ उत्थाय चैनां निजमङ्कमाशु, प्रारोपयद् दुर्वहकाययष्टिम् । बालामिवानङ्गविमोहिता वा, किं नाध्यवस्यंत्यतिदुष्करं यत् ॥६॥ रुदन् क्षणं गानपरो हसंश्च, जजल्प सासूयमनल्पमेषः । उद्दिश्यतां स्त्रीषु हि शोकभाजां, वृत्तिः कुतस्त्यास्तु शुभैकरूपा ॥१०॥ नाद्यापि पूर्णा परिवादिनी सा, त्वया समारम्भि मया समं या । बद्ध कथं प्रोझय गतासि तूणं, नारव्धहीनं ह्य चितं कदाचित् ॥११॥ यस्यास्तवासीनवपुष्पशय्या-बाधाकरी केलिषु कोमलाङ्गयाः । सहिष्यसेऽग्निप्रचितां चितां साऽऽरोढुं कथं भामिनि! भीमरूपाम् ।।१२॥

तृतीयः सर्गः
१७
तामङ्कतस्तस्य विलुप्तबुद्धेः, कथञ्चिदाकर्षति बन्धुवर्गे।
उच्चैः स चुक्रोश तथा यथाऽस्य, स्वनैः सभाऽपि स्फुटति स्म नूनम् ॥१३॥
तत्र क्षणेऽभूत् क्षितिप: क्षताश, शुभाशुभाचारविवेकशून्यः ।
मग्नो भृशं दुस्तरशोकपङ्के, गजेन्द्रवद्विह्वलनेत्रगावः ॥१४॥
उन्मादरक्षोऽपि विशेषतस्तं, तदा सिषेवे विकृतत्वभूमिः ।
अप्राप्तपूर्वस्य सदापि नूनं, लोभेन पुष्टाश्रयखेलनस्य ॥१५॥
कृतं कुकर्मेह विपाककाले, नानागुणं वेद्यत एवमेतत् ।
सहस्रवृद्धचा नृपतिविडम्बाद्, यन्नागदत्ते विहितात्तमाप ।।१६।।
अत्युग्रपापा निपतन्ति सद्यः, पापात्मनां मूर्द्धनि नान्यथैतत् ।
यन्नारकाकारमनायि भूपः, तत्रैव जन्मन्यतिनिन्द्यवृत्त्या ॥१७॥
दग्धु ददौ नैव स बान्धवानां, विष्णुश्रियं निष्फलफुल्लदाश ।
क्रोष्टेव रक्षन् पृथुमांसपेशी-भ्रमेण शोणाश्मशिलामभोग्याम् ॥१८॥
अमङ्गलं कुत्स्यमनर्थक च, स्थानं गृहेऽस्या इति संपरीक्ष्य ।
क्वचिन्नृपं बालमिव प्रलोभ्य, तां प्रापयन् मन्त्रिवराः श्मशानम् ॥१६॥
अवीक्षमाणः क्षितिपः क्षणेन, तां तत्र शोकातिशयात् पृथिव्याम् ।
मुख पिधायासितजीर्णपट्या, साक्षादकीयैव पपात सद्यः ॥२०॥
ददौ न वाचं न पयोऽपि सोऽपाच्चचाल नास्नैरिव कीलिताङ्गः ।
दिनत्रयं यावदलक्षि लोकैः, प्रियामनुप्रोषित एव नूनम् ।।२१॥
प्राणप्रहाणाभिमुखी प्रवृत्ति, तथा विलोक्याऽस्य हितरमात्यः ।
अाधाय तत्पादयुग स्वमूर्द्धन्युच्चैःस्वरं विज्ञपित. सखेदैः ॥२२॥
देवेन किं विश्वविलोचनेन्दुना, राहूपरागप्रतिमः समाददे ।
पृथ्वीतलाकस्मिकदु.खवेपथु-प्रदः प्रियाशोकभरो विशृङ्खलः ॥२३॥
सङ्खयाद्विषः सन्ति पुरेऽत्र वेश्या, वश्याः स्वसौन्दर्यजितेन्द्रयोषाः ।
त्रैलोक्यवा अवरोधनार्यस्तत् किं विभुस्ताम्यति निस्वनीत्या ॥२४॥
विष्णुश्रियै चेद्विषमा दशेयं, पिशाचकान्तेव विवाघते त्वाम् ।
तदीक्ष्यतामीक्षितवस्तुतत्त्व,
सैवाऽधुना नाप्तशरीरदाहा ॥२५॥

१८ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् , तत्र प्रियाभिधानश्रवणे तदाऽसौ, सुधाभिषिक्तः किमुताऽऽप्तनाकः । आत्मानमेवं मनुते स्म यद्वा, प्रेयः श्रुतेः को धृतिहेतुरन्यः ॥२६॥ झगित्यथोत्थाय समीक्ष्यमाणो, दिदृक्षयाऽस्याः ककुभां कलापम् । करी करिण्या इव विप्रयुक्तः, प्रत्याबभाषे सचिवैः स विजः ॥२७॥ फलोपयोगोन्मदभूरिपक्षि - ध्वनिप्रतानैर्बधिरीकृताशे । पतत्पुरासत्तिचरे बनान्ते, सा वर्तते सम्प्रति देवकान्ता ॥२८॥ तत्तत्र देवेन तदीक्षणाय, प्रसद्यतां स्वस्य मनः-प्रसत्त्य । न मत्तमातङ्गकपोलपाली-मनाप्य यद्धृङ्गयुवा सुखी स्यात् ।।२६॥ प्रियावपुसङ्गिवनं परापन्नृपो वजन्नामिषलोलुपेन । निरातपं नूनमनुग्रहाय, तस्याः खगौघेन विधीयमानम् ॥३०॥ द्विकस्फोटितनेत्रयुग्मा-मपश्यदस्पृश्यतमावमाङ्गीम् । क्षतस्रवत्पूयरसप्लवाी, मूर्तीमिवान्यायजपापपङ्क्तिम् ॥३१॥ व्रणावलोलत्कृमिजालवर्म-स्पृशं तनूं त्रातुमिवाण्डजेभ्यः । नाराचपूरेभ्य प्ररूढ - दुष्कर्मवैरिद्रुतपातितेभ्यः ॥३२॥ विलुप्तनासाश्रवणां शृगालै, रामानुजाकाण्डविडम्बिताङ्गीम् । रौद्राकृति शूर्पणखामिवोच्चै-दृष्टेिरपि क्षोणिभृतामयोग्याम् ॥३३।। श्रीखण्डकर्पूरविलेपकान्ते, प्रकाशयन्ती स्तनमण्डलेऽपि। रमशानभस्मच्छुरितानि लक्ष्मीश्चलेति सम्बोधयितुं ध्रुवं नृ न् ॥३४॥ मृताहिकौलेयकमुख्यदेहि-प्रभूतदेहाक्रमसर्पिगन्धात् । अप्युत्कटं गन्धमरं किरन्ती, दिक्चक्रवालं परिवासयन्तम् ॥३५।। पञ्चभिः कुलकम् । तां वीक्ष्य बीभत्सपदार्थसीमा-मध.कृतप्रेतविलासिनीकाम् । वैराग्यमार्गापतितान्तरात्मा, सोऽचिन्तयत् कूणितनेत्रपत्रः ॥३६॥ निर्मुक्तनिर्मोकभुजङ्गराज-भोगश्रियं कुले दधाने । कलङ्कहोनेऽपि मया कलङ्कः, समर्प्यताऽज्ञानभृता यदर्थम् ॥३७॥ अपत्यादपि तीव्र रागाः, पितामहादप्यनुकूलवृत्ताः । शत्रुप्रकारेण मयाभिभूता, हा हा !! ग्रहाक्रान्तिजुषेव सर्वाः ।।३।। इव स्वस्य प्रजा !

तृतीयः सर्गः १० वाचस्पति प्रह्वदिवस्पति ये, शश्वत्कुशाग्रीयधिया जयन्ति । तानप्यमात्यानतिमात्रनम्रानमंस्यहं जीर्णतृणाय कामी ॥३९।। सप्ताङ्गमन्तःपुरचारुराज्यं, विडम्बिताऽखण्डलभूतिजोषम् । समीरणेनेव पयोदवन्द, निन्ये मयतद्विशरारुतां द्राक् ॥४०॥ तस्या अवस्था समपद्यतेयं, दृष्टि-श्रुति-ध्यातिपथातिवृत्ता। यदा तदाऽन्यत्र मनोरमेऽर्थे, क्वाऽऽस्था निबध्येत विचक्षणेन ॥४१॥ पञ्चभिः कुलकम् । विभावयस्तद्वदसौ सखेदं, समस्तमषं क्षणिकं भवस्थम् । कान्तानुरागादिव तत्प्रदेशा - नृपो न्यवर्तिष्ट विबुद्धतत्वः । ४२॥ सद्यःसमुद्वान्तमदः करोन्द्रो, यथा समुत्सृष्टविदुष्टचेष्टः । प्रसन्नता नयनाम्बुजन्मा, प्रत्याजगाम क्षितिपः पदं स्वम् ।। ४३॥ पौरैश्चकोरैरिव शारदेन्दोः, स चन्द्रिकास्तोम इवातिशुद्धः । नेत्रैः प्रफुल्लैः परिपीयमानः, पुरं विवेश क्षणदः प्रजानाम् ॥४४॥ तत्रापि वैराग्यविशेषशाली, धाम्नीव दीप्ते स रति न लेभे । सुधारसच्छिन्नतृषो हि पुंसः, सक्तिः कथं पल्वलवारिणि स्यात् ।।४।। प्रचण्डवातोश्रुतवारिबिन्दु-व्योमस्थितिस्पद्धि सुराज्यमिद्धम् । सान्तःपुर तनिखिल विहाय, स्थास्ये विमुक्तौ विरजा: कदेति ॥४६॥ सद्धर्मधान्याधिगमोन्मुखस्य, कृषीवलस्येव नृपस्य पयोदवद् ध्वस्ततताङ्गितापस्तत्राऽऽययो सुव्रतमूरिराजः ॥४७।। युग्मम् । सत्वानपायप्रणिधेविनम्र, पथि ब्रजनिश्चललोचनोऽभात् । विडम्बितानेकपयानलीलो, महाव्रतप्राज्यभराद् ध्रुव यः ।।४।। तपःश्रिया क्षामवपुर्विमुक्तो, निःशेषभूषा परिकर्मभेदः । तथापि विक्षिप्तगभस्तिमाली, समुच्चरद्भास्वरधामलक्ष्म्या ।।४६।। भङ्गयुत्तरासङ्गितशुद्धवासा, यः श्यामकेशश्च वभार गौरः । सपाण्डुकोद्यानतुरीयभागाधःपाण्डुमेघावृतमेरुलीलाम् ॥५०॥ तस्य । .

२० सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् ऋज्वायतस्वच्छदशान्तदेश-मायामवद्दण्डमृषिध्वजं यः । नानार्थसम्पादकपुण्यराशि - व्याप्तोरुचारित्रमिवाऽऽदधार ॥५१ मुखेन्दुराजन्मुखवस्त्रिकश्च, कथासु लेभे विरजा द्विजौघः । निषेवितः प्रान्तनिविष्टहंस-राजीव विभ्राजि सर श्रियं यः ॥५२।। अनन्यसाधारणवृत्तविद् यो, य एक एव प्रमदप्रदोऽभूत् । भव्यात्मनां स्यान्ननु विश्वकाम्यं, सर्वेन्द्रियाह्लादि सुपक्वमाम्रम् ॥५३॥ निधानमेकं महतां महिम्नां, माध्यस्थभाग यो जगतां विबोधम् । जाड्यस्पृशामप्यतनोत् क्षणेन, पद्माकराणामिव चण्डरोचिः ॥५४॥ जगत्सु यः प्राप यशःपताका, जिनप्रतिच्छायतयातिशुद्धाम् । किंवाऽद्भुतं येन न सुव्रताना-मगोचरः स्यादतुलोऽपि लाभः ।।५।। अष्टाभिः कुलकम् ॥ तस्थौ समागत्य स काननैक-देशे विविक्त ऽथ विविक्तचेताः । तदीयकीयैव पुराज्जनेनाऽऽहूतेन विष्वग्निचिते तदानीम् ॥५६॥ श्रुत्वा तदीयागमनं नरेन्द्रो, ननन्द केकीव पयोदनादम् । को वा नितान्तार्थितकान्तवस्तु-प्राप्तौ भवेन्नाधिकहर्षपात्रम् ॥५७।। कि प्राप्तमहानिधानस्त्रैलोक्यनाथत्वमुपागतो वा अद्याहमेवं स विकल्पयंस्तं, समाजगामोन्मुदितः प्रदेशम् ॥५८|| ससैन्यलक्ष्मी पतिः प्रजाश्च, स्वस्वानुरूपद्धिविवृद्धशोभाः । तत्राऽऽययुभक्तिविशेषहर्ष-व्यक्त्यै यथा श्रोविधिचैत्य इभ्याः ॥५६॥ प्रदक्षिणास्तस्य विधाय तिस्रो, विशुद्धभूपृष्ठनिविष्टशीर्षाः । चैनं विनिषेदुरुद्यल्ललाटबद्धाञ्जलयः प्रसन्नाः ।।६०॥ सद्धर्मलाभैरभिनन्द्य सर्वान्, प्रचक्रमे वक्त मसौ गुणाढयः । वृहत्कथा सत्पुरुषार्थनिष्ठा, दूरीकृतावद्यपदप्रयोगाम् ॥६१॥ विवेकिभिः प्राप्यमनुष्यजन्मा, जन्मप्रसाध्यो विधिधर्ममार्गः । पच्छारदेन्दोरुदयस्य नान्यत्, फलं विहाय प्रमदं जगत्याः ॥६२॥ श्रीवीतरागो विविनाऽर्चनीय, त्रिसन्ध्यमत्यादरपूतभावैः । नानादृतानां परमोऽपि मन्त्रः, फलत्यवश्यं भुवि दुष्प्रयुक्तः ॥६३॥ ततश्च : प्रणम्य तृतीयः सर्गः २१ सज्ज्ञानचारित्रनिधिस्तपस्वी, स्तोकोऽपि सेव्यः शिवमीहमानः । यत्रैव चिन्तामणिसाध्यमर्थ, शिलाः सुबह्वयोऽपि हि साधयन्ति ॥६४॥ पापास्रवेभ्योऽपि पलायनीयं, सद्दृष्टिभिर्भोगभयङ्करेभ्यः । न दावसान्निध्ययुजो हि वृक्षाः, फलन्ति पुष्टा अपि मूलबन्धः ॥६५॥ नानाजिनाभ्यर्चनदानदीक्षाः, शिवाय नैवेह विना जिनाज्ञाम् । नाथप्रमाणे युधि जातु जाते, किं कुर्यु रुना अपि शेषसैन्याः ॥६६॥ विषोपमाना विषया विहेया, आपातरम्या अपि दुःखदत्वात् । यत्रैव भोग्याः करवीरशाखाः, स्निग्धप्रसूना अपि सैन्धवानाम् ॥६७|| उपेक्षणीयाः सुकृतोद्यतानां, दूरं विदग्धा अपि पक्ष्मलाक्ष्यः । कि क्वापि कौक्षेयकतीक्ष्णधारा:, सुव्यापृताश्छेदपराङ मुखाः स्युः ।।६।। मूलं विरोधस्य कलेः प्ररोहाः, सुरञ्जिता अप्यपरानुरक्ताः । प्रियास्तथापि प्रमदाजनाना-महो दुरात्मा भुवने हि मोहः ॥६६॥ पापप्रपा नूनमिहाखिला स्त्री, यदत्र सक्ताः सुकृतामृतस्य । स्वादं जना नानुभवन्ति कञ्चिदुष्ट्रा इवाऽऽम्रद्रुमपल्लवस्य ।।७०॥ तदित्यवेत्यास्रवमुद्रणादौ, द्रुत यतध्वं यदि कौतुक व.। मुक्तिश्रियः कण्ठतटानुषङ्ग, नायत्नभाजा क्वचिदिष्टसिद्धिः ॥७१॥ इत्थं वचः शृण्वत एव सूरे-रालेख्य कर्मव विशुद्धवर्णम् । सच्चित्तभित्तो प्रतिविम्बितं तन्नृपस्य तन्नृपस्य कर्मावलिलाघवेन ॥७२॥ शेषप्रजानामपि तत्कथार्थः, प्रायः समुत्कोर्ण इवाप्रकम्पः । तस्थौ हृदि स्यान्न हि जातु वन्ध्यः, परोपकारोद्यमिना प्रयासः ॥७३॥ विभावयन् सम्यगसौ गुरूणां, वचासि भूयासि सदर्थभाजि । संवेगरगावनिनृत्तचेता, पराड मुखोऽभून्नृपतिथियोऽपि ॥७४॥ सान्त.पुरं तत्पुरमाढयलोकं, देशं च नानाद्भुतनाकदेश्यम् । जरत्तृणायापि नृपो न मेने, विनिस्पृहाणां किमु दुप्कर वा ॥७॥ गुरोनिवेद्य स्वमनोऽभिसन्धि, प्रणम्य चांह्निटितयं तदोयम् । ससैन्यपौरः स पुरं विवेश, स्वर्ग वपे वाऽनुलदेवसेनः ॥७६||

२२
सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम्
पौरः।
॥७८॥
.
अष्टाह्निकास्तत्र चकार पूजा, जिनेन्द्रगेहेषु विधिप्रपूर्णाः
आशंसयेवाऽष्टसुपुष्टकर्म - द्विषज्जयस्य त्वरितं भविष्णोः ॥७७॥
सामन्तवृन्दैविविद्धि शोभ महाव्रतोत्साहधनैश्च
सूतप्रघोषैर्बधिरीकृताश मन्त-पुरैरप्यनुगम्यमानः
ददन् महादानमपूर्वनादै मन्ये सुतूर्यैः परिकीर्त्यमानः।
समाददे सौगुरुमेत्य दीक्षा, कक्षा ध्रुवं मुक्तिवधूपयामे ॥७॥
युग्मम् ।
धन्यः स विक्रमयशाः प्रतिपन्नदीक्षः
सोत्कण्ठयेव रमणीयतपःश्रियाऽथ ।
प्राप्तश्चिरान् मदहितावनिपाललक्ष्मी ,
वैराग्यवानिति मुदान्वितयाऽऽलिलिङ्गे ॥८॥
रेमे तया सह तथाथितलब्धयाऽसौ ,
स प्रेमशैलसुतयेव नवेन्दुमौलिः ।
भाविप्रगल्भफलसन्ततिभिता सा,
यज्ञे यथाऽतिविरजा अपि चित्रमाशु ॥१॥
सकलकुकृतमिथ्यादुष्कृताविष्कृतेाक्
परमशमसमृद्धध्यानविध्यापितैनाः ।
प्रचुरतरसमाभिः शोधितात्मा तपोभिः
स्मृतजिनगुरुपादः प्राप नाकश्रियं सः ॥२॥
दण्डानां त्रितयं विखण्डितमहो गुप्तं च गुप्तित्रयं
शल्यं गौरवसङ्गतं त्रिविधमप्युत्त्रासितं दूरतः ।
रत्नानां त्रितयो व्यधीयत बतानार्योऽमुनेति ध्रुवं ,
नाकेनाऽपि निवेशितः शुभनिजोत्सङ्गे तृतीयेन सः ।।३।।
सनत्कुमारेति पदाश्रयोऽयं, भविष्यतीतीव विभावनाय।
स्वर्गेण सोऽश्लिष्यत पूर्वमेव, सनत्कुमारेति पदाश्रयेण ॥४॥
उत्पन्नमात्रस्य पुरः सुराङ्गना, मुहुर्मुहुर्जीव जयेति नन्द च ।
दत्ताशिषः पुष्पचयं निचिक्षिपु-स्तस्यैव मूर्ती दधतं यशःश्रियम् ॥८॥

तृतीयः सर्ग: २३ जगुर्विपञ्चीमधुरस्वरैः समं, सर्वैर्यथास्याननिवेशिभिः स्वरैः । क्वचित्तु यत्तत्स्वनतोऽतितारता, तासां ध्वनौ तत्र मुदेव दुष्यति ॥८६॥ दृढाहिघातोद्धतमेव ताण्डव, चक्रुः स्वजातिप्रतिपन्थि यद्यपि । ताः सम्मदात्तत्र यथाम्बुदध्वने-स्तिर्यग्विरोध्युन्नटनं कलापिनः ॥७॥ ततो विमानाधिपति सहस्रश', प्रणेमुरेन विबुधा अपीतरे । समे मृगत्वे हि तदिन्द्रता हरे-जयन्ति पुण्यानि जनस्य सर्वथा ॥८८|| ऐश्वर्यलाभेऽपि वमन्ति न स्थिति, विवेकिन. स्वामिति शासितुं जनान् । नित्याहता निचय समार्चयत्, स भक्तितः पुस्तकमप्यवाचयत् ॥८६॥ सुवेषरूपं मुदितं कृतादर, भूयांसमालोक्य निजं परिच्छदम् । ननन्द सोऽन्तर्विबुधो हि मोदते, श्रिया परस्यापि किमु स्वकीयया ॥१०॥ दिव्यांशुकोल्लोचचितं समन्तत-स्तारावलिश्रीवरहारभूषितम् । कलोपगीतिध्वनिभृङ्गशाश्वतो-न्मेषप्रसूनप्रकराञ्चिताङ्गणम् ॥६१।। पदे पदे धूपघटीसुगन्ध-घ्राणप्रसक्ता इव निश्चलाङ्गयः । पाञ्चालिका यत्र विभान्ति धातुः, शिल्पप्रकर्षा इव चारुरूपाः ॥१२॥ नानामणिस्यूततलं सिताश्मनां, भित्तिष्वमर्त्यप्रतिबिम्बनच्छलात् । विष्वक्सचित्रत्वामवानिश दधन्, मुदेऽभवत् तस्य विमानमुज्ज्वलम् ॥१३॥ त्रिभिविशेषकम् । तदप्यपास्याशु कदाचिदेष, द्वीपाऽद्रिवन्यावनिपु व्यहार्षीत् । क्षीरोपयोगादपि नित्यवृत्ता, कुतूहली हयुद्विजते जनोऽत्र ॥४॥ विशुद्धभावामृतसेकवृद्धाः, सर्वेद्रियाणा फलिता विरामाः। शश्वन्मनोहारिनिरन्तराया-खिलेन्द्रियार्थानुभवैरिवास्य ॥६५॥ मुनेरपि श्रीभरतस्य पश्यनगोचरीभूतबहुप्रयोगाम् । प्रेक्षां न चिक्षेप कदापि चक्षुः, स स्निग्धकान्तास्वपि कामिनीपु ।।६६|| कटाक्षलक्षः सुरसुन्दरीणां, स स्नप्यमानोऽपि सुधासुहृद्भिः । रक्तत्वमाविश्चकृवान् प्रकाम, वामो हि कामः खलु नान्यया स्यात् ।।६७॥

२४ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् सुधारसानन्तगुणप्रमोदनं, दिव्याङ्गनाबाहुलतोपगृहनम् । तुष्टस्मराचार्यविनीतनूतन-स्वशिल्पजत्वादिव तत्र सोऽभजत् ।।१८।। इति सुकृततरूत्थं स्वादुतौर्यत्रिकोद्य- द्रसमतुलफलं स स्वादयंस्तत्र तस्थौ । विमलमणिविमानोत्सङ्गविश्रान्तकान्तो- नतकुचतटमुक्ताहारलीली दधानः ॥६॥ इति युगप्रवरागमश्रीमज्जिनपतिसूरिशिष्यलेशविरचिते श्रोसनत्कुमारचक्रिचरिते नृपनाकलोकगमनो नाम तृतीयः सर्गः समाप्तः । छ.। ३ । चतुर्थः सर्गः चक्षु। तस्य कदाचिदस्य त्रिदशोत्तमस्य, प्रमोदलीलासदनस्य मिमील तत्प्राग्जननीयधर्म-प्रारभारवत्तस्थुष एव तत्र ॥१॥ ध्रव सन्ततजृम्भितानि, प्रोद्दामगन्धान्धितषट्पदानि । माल्यानि मम्लुः मृदुलाङ्गभङ्गा-नुसारतः स्वस्य तमाकलय्य ॥२॥ कल्पद्रुमोप्यस्य तदा चकम्पे, पश्यन्निवाने निधनं स्वभर्तुः । मन्दोदरीदक्षिणचक्षुरुच्च-र्यथा पलादेश्वरपातदशि ॥३॥ सोत्कण्ठयेवातिचिराय वल्लभः, प्राप्तः परीतो रतिवामनेत्रया । तस्या निरासाय तदा प्रमीलया, बाढं समाश्लिष्यत सश्लथद्युतिः ॥४॥ निर्वास्यमानैरिव देहमन्दिरात्, कार्याक्षमैर्दुर्बलकिंकरैरिव । प्रदर्शितोदामविकारकोटिकैः, प्राणैश्चकम्पे द्रुतमस्य दुखिनः ॥५॥ नासौ विमाने न गिरी न कानने, रम्येऽपि नैवाप्सरसा मुखाम्बुजे । रति परापनि शितासिधारया, पुमानिवाध्यासितकण्ठकन्दलः । ६॥

चतुर्थः सर्गः २५ ताण्डवमाशु अथायुषो नीरनिधेरिवाऽऽप्य, क्रमेण पारं सुमहीयसोऽपि । अच्योष्ट स स्वर्गपदाद्विभूतेः, क्व, स्फातिभाजोऽपि बत स्थिरत्वम् ॥७॥ निर्वाणदीपश्रियमाददाने, तस्मिंस्तदीयाऽप्सरसां मुखानि । तमोवृतात्युज्ज्वलदर्पणानां, दधुर्विलासं गलितच्छवीनि ॥८॥ निपत्य नाकी स तु नाकलोका-ल्ललामलावण्यमिलाबलायाः । शिरोमणि रत्नपुरं रत्नपुरं पुराणा-मलञ्चकार प्रभवेन सद्यः ।।६।। महाधनानां भवनेषु नक्त, क्रीडद्वधूनूपुरतारनादैः। दमं सतां चौरमिवावधुन्वन्, दधौ स्मरो यत्र सुयामिकत्वम् ॥१०॥ विलासिवेश्मागुरुसान्द्रधूम-व्याप्ते नभस्युन्मिषिताब्दशकाः। कलापिनः स्मापितविज्ञलोक-मारेभिरे यत्र ॥११॥ निवासिनां प्रोज्ज्वलधर्मसेतु-प्रबन्धरुद्धरिव सर्वतोऽपि । न यस्य सीमा समतीयते स्माऽपस्मारदोर्गत्यविरोधचौरैः ।।१२।। यत्पश्यतां विश्वमपि प्रकाशते, प्रासादरूप गृहदीर्घिकामयम् । उद्याननिर्वृत्तमथो शिरोगृह-प्रेसद्गवाक्षस्थकुतूहलस्पृशाम् ॥१३॥ स एव नाकी निजकर्मवेषा-वेशान्मनुष्यत्वमवाप तत्र । पुरेऽथ शैलूष इव प्रगल्भो, रङ्गाङ्गणे राघवतामनिन्द्याम् ॥१४॥ तत्राऽप्यसो भूपतिपौरलोक-नेत्रोत्सवोत्सर्पणपूर्णचन्द्रः । बभूव सम्यग्जिनधर्मवित्तो, नाम्नाऽपि वित्तो जिनधर्म एव ॥१५॥ सकण्टकं पद्मवनं विहाय, श्रिताम्बुधिं सोऽपि निदानभोगः । तद्दोषहीनं जिनधर्महयं, लब्ध्वा तु रेमे मुदितेव लक्ष्मीः ।।१६।। सदक्षिणोऽप्यक्षतवामता'-निधिः, क्रमावदातोऽपि सुलोहितक्रमः । पद्मायताक्षोऽपि सुसूक्ष्मलोचन-श्चकार चित्रं नगराधिवासिनाम् ।।१७।। मार्गानुसारित्वत एव ताव-निसर्गत शुद्धगुणप्रियोऽसौ। न वह्निरूद्धज्वलने सहायं, समीहते होन्धनवृद्धहेतिः ॥१८॥ तस्य क्रमेणाऽथ सुसाधुसङ्गात्, स एव भावः सुतरा दिदीपे । चन्द्रोदयान्नीरनिधेरिवोद्यत् - कल्लोलमालाकुलितत्वमाशु ॥१६॥ १ रमणीयता।

२६
सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम्
सम्यक्त्वगारुत्मतरत्नमादौ, समाददे सौगुरुपादमूले।
तीव्रप्ररोहद्भवकालकूट-च्छटासमुच्चाटनपाटवश्रित् ।।२०।।
तन्मार्गगामी प्रशमादिधर्म-वर्गस्तदाऽजायत तस्य निघ्नः ।
वक्षःप्रतिष्ठे नहि कौस्तुभे स्युस्तत्कान्तयः कंसरिपोरवश्याः ।।२१।।
समूलकाषं न्यकषत् सुदृष्टया, सोऽन्तस्तमस्काण्डमयी कुदृष्टिम् ।
वैधुन्तुदी कण्ठतटी कठोरा-मिवाऽसुरारिः शितचक्रवीथ्या ॥२२॥
ततोऽत्यजच्छाद्धविधानहोम-पिण्डप्रदानापरदेवनामान् ।
तीर्थान्तरीयप्रणतिप्रशंसा-विश्राणनान्यप्युपरोधवर्जम् ॥२३॥
महानवम्यादिषु देवतार्चा, संक्रान्तिसूर्याधुपरागपूजाः।
तोर्थान्तरे स्नानतप:प्रदानो-पयाचितानि त्रिविधं विधैव ॥२४॥
इत्यादि मिथ्यात्वपदं हि लोके, यच्चाऽऽगमेप्युक्तमशुद्धिधाम ।
लोकोत्तरं तीर्थपबिम्बसाधु-रूपं जिनाज्ञाविमुखप्रवृत्ति ॥२५॥
त्रिभिविशेषकम् ।
अर्योपनय॑त्वमिहाश्रुवीत मिथ्यादृशामुत्पथगामुकानाम् ।
अभोग्यता चन्दनशाखिराजि- जगमानामिव सङ्गमेन ॥२६॥
विलुप्तसंशुद्धचरित्रभूषः, क्व दृश्यतां यातु यतीश्वरोऽपि ।
हितैषिणां श्वित्रलवित्रलून-देहधुतिः श्विविजनो धनीव ॥२७॥
यदागमे
सुन्दरमप्यसुन्दरा-नुषङ्गतोऽसुन्दरतां
व्रजेदिति ।
सच्चम्पकस्रक्शकुनिप्रवेदक-द्विजादिदृष्टान्तशतैः प्रसाधितम् ॥२८॥
तत्सर्वथाऽनायतनं विहाय, श्रेयोमना आयतनं स भेजे ।
निषेवते को हि सुधां न विज्ञो, विपस्य हानादिह जीवितार्थी ॥२६॥
श्राद्धस्ततो दर्शनरत्नभागप्यधत्त स द्वादशसव्रतानि ।
न होक्षिताक्षाममृगेक्षणोऽपि, स्यानिष्क्रियस्तद्रतसौख्यपात्रम् ॥३०॥
विशुद्ध सिद्धान्तरहस्यबोधे, पाखण्डिनो जाड्यजुपः समस्तान् ।
तत्याज कालुष्यनिधीन् विरागात्, सरांसि वर्षास्विव राजहंसः ॥३१॥
स स्वातिवारीव रसद्घनौघः, पात्रे निचिक्षेप धनं विशुद्धम् ।
न कान्तमुक्ताफलकान्तिमुक्ति-श्रिये यदन्यत्र भवेन चान्यत् ॥३२॥

चतुर्थः सर्गः
२७
मुक्त्यङ्गसद्दर्शनशुद्धिहेतो-रसूत्रयत्तीर्थपमन्दिरं सः ।
नानिमलो यन्मुकुरोऽपि धत्ते, वधूमुखाब्जप्रतिमानकेलिम् ॥३३॥
भास्वद्रुचिस्फाटिकमुन्नतान, विजित्य यच्छङ्गवर हिमाद्रेः ।
रेजे समारोढुमिवोद्यत द्या, कतुर्यशो मूत्तमिव प्रवृद्धम् ॥३४।।
दानाम्बुससिक्तकपोलभित्तो, सजीवलक्ष्ये गजपीठबन्धे।
यत्रातिमुग्धा मधुपानलुब्धा, बभ्राम शश्वन्मधुपाङ्गनाली ॥३५॥
यत्राश्वपीठेऽपि बभुः प्रनुत्ता,
गारुत्मताऽश्वागतिपञ्चकेन ।
उद्वेजिताः सन्ततमेकगत्या, दिवोऽवतीर्णा इव भानवीयाः ॥३६।।
नृपीठमुत्तप्तहिरण्यदीप्रं, स्त्रीपु सयुग्माश्रितकल्पवृक्षम् ।
अदर्शयद् यत्र कुरुव्यवस्था, साक्षादिवादृष्टचरी जनानाम् ॥३७।।
काश्चित्समुन्मीलदनगरगा, रेजु. स्तनाफालकृदङ्गभङ्गाः।
मूर्ता इव स्व.सुदृशोऽवतीर्णाः, पाञ्चालिका यत्र विलासनृत्ताः ॥३८॥
अन्यास्तु निद्धौं तशरासिकुन्त-व्यग्रोल्ललत्पाणियुगा. समन्तात् ।
नूनं विराजन्जिन बिम्बरत्न - महानिधिप्रस्तुतनित्यरक्षा. ॥३६॥
नानामणीभङ्गि सुवर्णभूमि · प्रभाबलक्षालननित्यकान्तम् ।
यन्न व्यपैक्षिष्ट
वधूजनस्य,
प्रयत्नमात्मप्रतिमण्डनाय ॥४०॥
सूर्यशिलावबद्ध भूमो सहस्राशुकरावपाते।
निर्धूमधूमध्वजमङ्गलानि, प्रैक्षिष्ट सदृष्टिजनः सदापि ॥४१॥
रजोऽनुषङ्गादिव वित्रसन्ती
दूरं दिव. प्राङ्गणमारोह ।
स्वःसन्निधान दिशताऽऽश्रिताना - मारोहणश्रेणिरलं यदीया ॥४२।।
योन्दुकान्तामलजैनविम्ब - धुरत्नरोचिष्णुनिगर्भगेहे ।
अलक्ष्यसूर्यास्तमयोदये च, स्यान्मङ्गलायव हि दीपदानम् ।।४३।।
यत्सिंहकस्थानसमीपगामी, विभ्यन्मगादोलितविम्बदुस्थः ।
निज मृगाङ्कत्वमल निनिंद, प्रतिक्षप क्षिप्तकरो मृगाः ।।४४।।
यद्विश्वकर्माऽतुलशिल्पतल्प, दृग्दोपमोपाय शिरस्युदने ।
वैडूर्यवर्यामलसारकाक - व्याजेन नोलीतिलक
यस्याग्रतः
वनार॥८५॥

२८ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् - यस्योर्द्ध वमप्युज्ज्वलपद्मरागा - धारस्थचामीकरचारुकुम्भः । मुकुन्दनाभीरुहशोणपद्मो - पविष्टवेधःश्रियमाचकर्ष ॥४६।। प्रांशुं दधत्काञ्चनकेतुदण्डं, यच्चोन्ननामेव करागुलिं स्वाम् । जगत्त्रयेऽप्येकमहं मनोज्ञ-मिति ध्वनत् सध्वनिकिङ्किणीभिः ।।४।। सितापताकापवनोद्धतत्वाद्, द्राधीयसी चोर्द्ध वमुखोच्छलन्ती। यस्योपरिष्टाद्दिवमारुरुक्षुः, कर्तुर्बभौ मूर्तिमतीव कीत्तिः ॥४८॥ यत्पश्यतो नाकनिवासिनाम - प्यभूद्विमानेषु निजेषु मन्दः । सौन्दर्यदर्पो नमयत्यनम्रा - नपि प्रतापो हि जगत्प्रतीतः ॥४६॥ सिद्धान्तससिद्धविधानपूर्व - माचार्यहस्ताकलितप्रतिष्ठम् । तथा सपूर्ण निरमापयत् तद्, यथाऽभवत् सिद्धिपथो जनानाम् ॥५०॥ धर्मक्रियाकोविदकीर्तनीय कल्याणमालाकमलाप्रदाऽपि । विधीयमाना विधिना विहीना, न भूपसेवेव फलावहा स्यात् ।।५१॥ तत्र त्रिसन्ध्य महनं मुमुक्षुश्चक्र स सर्वाक्रमदूरवृत्तिः। न हीष्टभाक् स्यानिधिमीहमानः, प्रतीपचारी तदुपायजाते ॥५२॥ गार्हस्थ्यसंसाधकमर्थजात - मनिन्द्यवृत्त्या समुपार्जयत् सः । न दैन्यमालम्ब्य कदापि सिंहः, प्रकल्पयेत् स्वस्य शरीरयात्राम् ॥५३।। षट्खण्डपृथ्वीतलराज्यलक्ष्मी, प्रेप्सुर्घवं सातिशयप्रयत्नः। आसीत् षडावश्यक उग्रभावात्, तथा यथाऽन्यत्र न कुत्रचित् सः ॥५४॥ श्राद्धोचितं कर्म विवेकसागरः, शस्त समस्तं सतत चकार सः । न ताम्रपर्णीजलशुक्तिसम्भव, केनापि हीयेत गुणेन मौक्तिकम् ।।५।। इतश्च सुस्निग्धकलत्रनेत्र • ध्याता चिर तद्वियुतः स्मरातः । पद कृशत्वस्य स नागदत्तः, श्रियं दधौ भृङ्गिरिटेः समग्राम् ॥५६॥ तिर्यग्गतिः पद्मदलायताक्षी, नेहक् तनुं मा स्पृहयिष्यतीति । जीणं स तूर्णं ध्रुवमङ्गमुज्झाञ्चकार नेपथ्यमिवाढयकामी ॥५७।। आमुच्य चात्तं हृदि लम्बहार, ध्यान पुरस्कृत्य च स प्रदोषम् । तिर्यग्गति पत्रलताभिरामा, निविप्रलम्भ समुपालिलिङ्ग ।।८।।

चतुर्थः सर्ग: २६ प्रसिद्ध ।।६०॥ मुहुमुहुस्तामभजद् गति स, क्षोबो भुव वा स्वकृतानुरूप्यात् । तत्राप्यनाहार्यदुरन्ततीन - व्यथासहस्राण्यसकृच्च लेभे ॥५६॥ ततः समुद्धृत्य कथञ्चिदेष, मानुष्यक प्रापदघौघयोनिम् । यज्ञोच्छलफ़्मपिधीयमान-प्रभाकरे सिंहपुरे वेदध्वनिध्वानितदिङ्मुखेऽपि, गीत कलं वारविलासिनीनाम् । उषस्सु केली मृगशावकानां, जहार चेतांसि सदापि यत्र ॥६१।। व्योमेव यच्चित्रशिखण्डिमण्डलं, पाखण्डिनां वृन्दममण्डयन् मुदा । वेदोक्तसम्पूर्णविधानसाधन - प्रवृत्तिपात्रत्वचिकीर्षया ध्रुवम् ॥६२॥ नागदत्ताभिधसार्थवाह - स्तिर्यग्गतेदुष्कृतकर्मशेषात् । तत्राऽग्निशमैत्यभवद् द्विजन्मा, जन्मान्तरीयात् कुकृतात् कुरूपः ॥६३।। निस्वागणीलृप्तसमग्रपक्षः, पक्षीव नाना-परिभूतिपात्रम् । अत्युच्छितक्रोधधनेन किन्तु, स तत्र शेषान् धनिनोऽत्यशेत ॥६४॥ पाखण्डिन कञ्चन शिश्रिये स, स्वयं च धर्मश्रवणाय तत्र । द्विको हि निम्बेन बुभुक्षुरेतत्, संवर्ग्यते केन विगीतकर्मा ॥६५।। श्रुतत्रिदण्डिव्रतसंविधान - स्तदेव जग्राह तत्त्ववृत्त्या। मणीयते काचमपि प्रकाम - मुग्धस्य दृष्टी विततार्थसृष्टौ ।।६६।। मासद्वयादिक्षपणान्यकार्षीत्, तपांसि तीव्राणि स वालबुद्धिः। सरोहणानीव सशल्यगात्रः, फलेन रिक्तानि विदुष्टचेताः ॥६७|| भ्राम्यन् मही ससृतिवत् स मूढ', समाययौ रत्नपुरं कदाचित् । तदेव यच्छीजिनधर्मसज्ञः, श्राद्धाधिवासेन सदा पवित्रम् ॥६॥ त्रिदण्डिष्वनुरागशालो, नन्दीव शम्भुक्रमपङ्कजेपु। तेजस्विमुख्योऽपि सुसौम्यमूर्ति - बभूव भूपो हरिवाहणाख्य. ॥६९।। श्रुत्वाऽग्निशर्मवतिनस्तपस्या, देहानपेक्षा बहुशो जनेभ्यः । तस्यावलोके नृपतिः सतृष्णो, बभूव दोपस्य यया पतङ्गः ॥७०।। निमन्त्रयामास नृपस्त्रिदण्डिन, स प्राज्यभोज्य स्वगृहेऽति भक्तित. । वकोटवत्त कुटिलाशय दिने, द्विमासपर्यन्तभवे तपस्विनम् ॥७१।। स तत्र ३० सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् तत्र . अन्तर्बहिश्चैष दधत् त्रिदण्डं, कषायवन्मानसमंशुकं च । शिखामिषादुच्छितपापचूला - मथाऽऽजगाम क्षितिपस्य सौधम् ॥७२॥ भक्त्या नृपोऽप्यादिशदातिथेय-क्रियाविधौ सन्निहितं जनं स्वम् । तस्येश्वरस्येव नगाधिराजो, विराजमानः पुलकोत्करेण ॥७३॥ श्राद्धोऽपि देवाज्जिनधर्म प्रायाच्चकोरवद्रष्टुममु नृचन्द्रम् । स्फुरद्वामविलोचनाब्ज - ससूचितामङ्गलभङ्गिसङ्गः ॥७४।। विधुन्तुदस्येव सुधामरोचा - वोतोरिवोन्मादभृतो मयूरे । श्येनस्य वा क्रूरतरा कपोते, त्रिदण्डिनस्तत्र पपात दृष्टि: ।७।। जन्मांतरीयानुशयानुवेधात्, सद्योऽथ सा पाटलतां प्रपेदे । न शत्रुमित्रत्वगतौ हि लोके, विहाय चक्षुश्चतुर परं स्यात् ॥७६।। तथा विनिःस्पन्दतनुनिदध्यौ, तं धामिक धर्मदरिद्रचेताः । किं देवभूयं समुपागतोऽय-मिति प्रतीये स यथान्तिकस्थैः ॥७७॥ ततस्त्रिदण्डी दृढपापचण्डः, समापतिष्यद् भवपातदण्डः । उद्दिश्य तं श्राद्धवरं बभाषे, पृथ्वीपति कोपकदर्थ्यमानः ॥७८।। मामस्य पृष्ठे यदि पायसान्नं, तं भोजयस्युष्णमनुष्णचेताः । तत्पारणां ते सदने करोमि, चिराय सम्पूर्णसमग्रकामः ॥७६।। दम्भोलिपातानुकृति प्रपेदे, वाक्यं नृपश्रोत्रपथे तदोयम् । मन:कुटीरे तु सभासदानां, ज्वालाजटालानलसोदरत्वम् ।।८०॥ ततः स भूपः सविषादमूचे, क्षमिन् ! क्षम कि तव वक्तुमीदृक् । नाङ्गारवृष्टि विदधाति कान्तं, कदापि यच्छीतमयूखबिम्बम् ।।८१ । यतोऽतिमुग्धोऽप्यनुवर्तते विभुं, राज्ञोऽनुवृत्तौ तु जनस्य का कथा । द्वयं त्वतिक्रान्तमिदं त्वया महा - सरित्प्रवाहेण तटोभय यथा ॥८२॥ तदादिशाश्वन्यनरोपयोगं, स्वभोजनायात्र' धृतौ अयं तु लोके जिनधर्मरूपो, कल्पद्रुमः कल्पितकल्पनेन ॥५३॥ प्रत्याहतं सानुशयस्त्रिदण्डो, का तस्य भक्तिर्ननु येन नाऽऽत्मा। सर्वप्रकारेण गुरौ नियुक्तः, कार्य ह्यभक्त रनियोजनं यत् ।।४।। १. पुस्तके तु स्वभोजनामत्र' इति पाठ.। प्रसद्य।

चतुर्थः सर्गः ३१ यथोपदेशं न गुरूनमस्त यः, किं तस्य जीवेन नृपश्रियाऽथवा । तथा हि रामः प्रविहाय सम्पद, पित्राऽऽज्ञया सश्रयति स्म दण्डकाम् ।।८।। प्रत्याहुरस्तङ्गतहृत्प्रमोदाः, सभ्या असभ्याधिकभापिण तम् । तपोनिधे नास्य मनः कदयं, स्वप्राणदानेऽपि धराधिपस्य ॥८६॥ गुरावभक्तिर्न च सर्वथाऽपि, सुरेश्वरस्येव समिद्धधाम्नः । किन्त्वासमञ्जस्यभिया जयन्त, इवान्तमस्मिन्न समैहताऽयम् ।।८।। चूडामणिः किं चरणे निबध्यते, निजाङ्गनागोमयसंवरेऽथवा । वश्यापि राज्ञा न हि जातु कोविदा, मुद्राभिदः स्यु प्रभवोऽपि कुत्रचित् ।८८ त्वमेव तावत्परिचिन्तयेदं, कि पद्मकोषे विनिवेश्यतेऽग्निः । विशस्यते कामदुघा दुहाना, गृहागता कामशतानि किं वा ।।६।। तन्त्रेषु देवायतनेष्विवैका, शस्या पताकेव क्षपैव कामम् । सा पातिता स्याद्भवतव कोप - प्रचण्डवाताजिनधर्मघाते ||६|| इत्युक्तो बहुधा धराधिपतिना सभ्यैश्च पापोऽधमो दुष्टान्तःकरणात्तथाप्यकरुणो नाऽसौ व्यरसीत्ततः । स्वादोयोमधुदुग्धपानविधिभि: स्वाराधितोप्यादरा- दादत्ते शममुग्रघोरगरलः क्रोधोद्धतः किं फणी ॥६॥ इति युगप्रवरागमश्रीमज्जिनपतिसूरिशिष्यलेशविरचिते श्रीसनत्कुमारचक्रिचरिते पाखण्डिप्रतिभाषणो नाम चतुर्थः सर्गः । छ । ४ ।

पञ्चमः सर्गः - उत्सर्गतः केऽप्यपवादतः केऽप्यर्थाः कथञ्चिद् गदिता: सुशास्त्र । न राजसूयादिकमप्यवद्यं, तत्राभ्यधायीत्यवदत् त्रिदण्डी ॥१॥ राजाऽपि रज्यन् जिनधर्ममूतों, शास्त्र-व्यवस्था महतीं च शृण्वन् । प्रोवाच किं तन्त्रमतन्त्रसाम्यं, प्रापि त्वया वाणिजकस्य हेतोः॥२॥ तत्सर्वथा शास्त्रजनाविरुद्ध - माज्ञापय ज्ञानतपोनिधान ! । शत्री च मित्रे च समा हि सन्त', सूर्यांशवो वारिणि तेजसोव ॥३॥ नृपादिवाक्यः किरणैरिवेन्दोः, सिक्तोऽपि नोज्झत् प्रकृति यथाऽग्निः । स तापसो नैव हि सामपात्रं, भवन्ति वालेयसमा' अभव्याः ॥४॥ प्रत्याबभाषे च धराधिनाथं, निस्त्रिशचेताः स पुनस्त्रिदण्डी। पलालकल्पेन किमत्र भूयो - ऽभिभाषितेनेदमवेहि तत्त्वम् ॥५॥ यद्यस्य पृष्ठेन नराधमस्य, त्वं प्राशयस्यद्य तपोधन माम् । आजन्म किञ्चिन्न तदाशितव्यं, चित्रापितेनेव मयेति सर्गः ॥६॥ निशम्य रौद्रीमिति तत्प्रतिज्ञा, हृदि क्षतो मित्रसुवत्सलोऽपि । स पार्थिवः कान्तिमुपाददे द्राक्, सम्पूर्णचन्द्रस्य तमोवृतस्य ॥७॥ घातो मुनेस्तावदिहैकतोऽय-मितोऽप्यपाया पुरमण्डनस्य। सेयं वरना हयुभयत्र पाशा, धात्रोपनीता सममेति दध्यौ ॥८॥ समुद्यमे धर्मकृतेऽकृतेऽस्मिन्नधर्म आयात् कथमेष भूयान् । अहो ! सुधाय मथिते पयोधा-वुदैतमेतत् किल कालकूटम् ॥६॥ यद्येन लभ्यं लभते तदेव, स माननीयोऽपि किमत्र दैन्यः । विलोडितेऽप्यम्बुनिधी सुरत्ने, पराप हालाहलमेव शम्भुः ॥१०॥ मन्दा हि मे भाग्यपरम्परेति, समर्पयत्येव यथा तथाऽघम् । तच्छ्राद्धघातेऽपि मुनेविघातो, माऽभून् महाहा इति तं प्रपेदे ।।११।। १. रासभः। २. निश्चयः।

पञ्चमः सर्गः यथा ततो हिमानीहतपङ्कजास्यच्छाया निरीयु. सदसः सभाहाः । महेन्द्रमृत्युव्यथिता अमा, यथा सुधर्माङ्गणत. सशोकाः ।।१२।। निदेशतः श्राद्धवरोऽपि राज्ञः, सज्ञानतो दन्यविमुक्तचेताः । अङ्गीचकाराऽपि निजाङ्गभङ्ग, विपद्यनुद्वेगधना हि धीराः ॥१३॥ क्वायं क्व चाहं क्व च भूभृदाज्ञा, तत्सर्वथा भाग्यविपर्ययो मे । रामाब्धिसेतूदयवानरेन्द्र - योगो पुण्यजनेश्वरस्य ॥१४॥ स चिन्तयन्नित्यतिनिश्चलाङ्गो, धरातलन्यस्तसदक्षिवक्षाः । पुरोऽवतस्थे वतिनोऽस्य दुष्टया, दिशन्नधोयानमिवाशु तस्मै ॥१५॥ संप्रेक्ष्य त तादृशसन्निवेश, राजा स्थिति स्वस्य तनोनिनिन्द । पाखण्डिपाशस्त्वधिक ननन्द, प्रिया हि गृध्रस्य परेतभूमिः ।।१६।। यदा स धाम्नो जिनधर्मभानो - रीदृग्दशा दैववशात् समागात् । खद्योतविद्योतिषु शेषजन्तुष्वारौवकासततभासनायाम् (?) |॥१७॥ पृष्ठे ज्वलत्पायसपूर्णपात्रो-ऽप्यसौ सुधर्मा विजहो न धैर्यम् । मेरुन सर्गान्तनिरगेलोद्यद्वाताभिघातेऽपि सवेपथु स्यात् ॥१८॥ सन्तप्तपात्र बहिरस्य गात्र-मन्त शुभध्यानमुवोष रोषम् । वियोगिनश्चन्दनविप्रयोगा-विव द्वय सन्ततमक्रमेण ॥१६॥ ध्रुवं मयैवैष मयैवैष विराद्धपूर्वो, दुःशासनेनेव समीरसूनु. । शेषानशेषानपहाय दूरा-ददुद्रुवन् कथमन्यथाऽनु ।।२०।। न चान्यदोषेण ममष दाहो, यदन्यथावृत्ति न जातु कर्म । बृहस्पति न ग्रसते कदाचिद्विधुन्तुदश्चन्द्रमसा विराद्ध ॥ २१ ॥ ददाति दुष्कर्मफल पुराऽपि, तत्सम्यगेतहि न सहयते किम् । न शल्यमन्तःकुथितं विनाऽऽप, मृत्यु हि विधाम्यति कालपाके ॥२२॥ अत्यल्पमेतन्मदनातुराणा मस्मादृशामुज्ज्वलदोपभाजाम् । विराद्धदर्वीकरत' किलाऽऽलो-लमा -ऽवलोपात् कुशल कियद्वा ॥२३॥ मा १. सति । २ पुच्छः।

३४
सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम्
न संयमं येऽभ्युपयन्ति तेषा-मीदृग् भविष्यत्यसकृतिपत्तिः ।
कि दुविनीतास्तुरगाः सकृत्स्युः, कशाप्रहारप्रचयस्य पात्रम् ॥२४॥
इत्यादिसद्धचानपरो विहे, सतां व्यथामव्यथितान्तरात्मा।
यावत् कुलिङ्गी निजगाल सर्वं, तदन्नसंज्ञान्तरितं कुकर्म ॥२५॥
उपायनं प्रेषितमात्मरुच्य, तूर्णं समेष्यत् कुगतिश्रियेति ।
तत्त्वग्विदाहाशुभगन्धमिद्ध, रागात् कुलिङ्गो ध्रुवमभ्यनन्दत् ॥२६।।
तथा स लिङ्गीकृतपारणाविधिः, स्व नाकनाथादपि बह्वमन्यत ।
को वा भवेन्नाधिकतोषभाजनं, महामनोराज्यसमृद्धिसिद्धितः ॥२७॥
अमङ्गले मूत्तिमतीव मन्दिरा-नृपस्य चेतोऽसुखसन्तताविव ।
अनर्थशारणाश्मनि लिङ्गजीविनि, क्रान्ते निजाचारमलीमसं वनम् ॥२८॥
उत्पाटयामास ससम्भ्रमं जन-र्यावन् महीशः करुणार्द्रमानसः ।
स्थाल' तदीयान्मृदुपृष्ठदेशतः, कुलिङ्गिसङ्गादिव शौचवर्जितम् ॥२६॥
त्वङ्मासरक्तोल्वणनाडिभेदैस्तावत् समं तत् करगर्भमागात् ।
आकृष्यमाणं हि दिगङ्गनाभि-नोंदेत्यनुन विषमाश्वबिम्बम् ॥३०॥
त्रिभिविशेषकम् ॥
अथाऽवनम्य क्षितिपालमौलि, सलज्ज-सप्रेमदृशा च तेन ।
अन्तःपरिस्तम्भितभाषितेन, निरीक्ष्यमाणो निरगात्ततोऽसौ ॥३१॥
चक्षु:सुधावृष्टिमपि प्रकामं, तं तादृश वोक्ष्य शुशोच लोकः ।
विधुन्तुदात्यन्तकथितश्रि, सौंधाकरं बिम्बमिव प्रसन्नम् ॥३२॥
न तस्य तादृग्व्यसने प्रमोदः, कस्याप्यभूत् तत्र पुरेऽखिलेऽपि ।
कल्पद्रुमस्कन्धकुठारपातः, किं कस्यचित्तोषविशेषकृत् स्यात् ।।३३।।
बाष्पप्लुतस्निग्धविलोचनाम्बुजैश्चकार पोतैरिव बान्धवैरसौ।
संवीक्ष्यमाण. क्षणतो निजान् गृहानायाद्विशुद्धो जिनधर्मचन्द्रमाः ।।३४॥
समाललाप स्वयमेव बन्धून्, स मूनृताभाषणकोविदः स्वान् ।
कर्णामृतस्यन्दिवच-प्रदान, पुंस्कोकिल शिक्षयतीह को वा ।।३।।
भूपप्रसादा विपुलाः श्रियो वा, त्राणं न देवस्य विपर्यये स्युः।
आलम्बन नैव कराः सहस्र, सहस्रभानोः पततः
प्रदोषे ॥३६॥

पञ्चमः सर्ग: ३५ प शरीरमप्येतदसारमुख्यं, विख्यातमेवाशुचिजालमूलम् । आपातमात्रे च मनोहर सद्दवाति लोलां विक वाम्बुजस्य ॥३७॥ विशेषतश्चाद्य मदीयमङ्ग, निवृत्तनैसर्गिकसर्ग'-रूपम् । विहाय कान्तास्पृहणीयभाव, वृकद्विकप्रीतिकरं बभूव ॥३८॥ तदस्य लाभः परिगत्वरस्य, पोतस्य सिन्धाविव पातुकस्य । युक्तः समादातुममूढवुद्धि-विपद्यपि स्याद्धि विवेकिलोकः ॥३६॥ तद्बान्धवा अस्मदनुग्रहोद्यता, ददध्वमत्रानुमति ममाधुना । आमुष्मिक कार्यमलंचिकीर्षतः, शिशोरिवैकान्तनिजार्थचेतसः ॥४०॥ अभ्यथिता एवमशेषबान्धवाः, सप्रश्रयाः प्राहुरमु विवेकिनः । गतिः खरांशोरिव शुद्धमार्गतो, मतिविपर्येति किमेकदाऽपि ते ॥४१॥ प्रसादवत् सत्यहितं मनोहरं, कस्त्वामृते वक्तुमपीदृश क्षमः। विना विधु को हि नभोविभूषण-क्रियाविनिर्माणकलाविचक्षणः ॥४२॥ कार्य यदामुष्मिकमीहित ते, तत्सर्वसाधारणमेव किन्तु । वय न हि त्वादृशसत्वभाजो, मृगाः कथ सिंहपराक्रमा' स्यु ॥४३॥ स नूनमुन्यां सुकृती कृती त्व, नेदृग्दशादायिनि यस्य कोपः । किमग्निरिद्धेन्धनसन्ततिः क्वाऽप्यास्ते ह्यनुद्दीपित एव वाते ॥४४॥ गेह च देहं च समं तृणेना - ऽऽकलय्य तित्यक्षुरुदारमौलिः । वित्तादिविश्राणनमाबवित्तान्, कर्णादिवीरान् जयसि त्वमेव ॥४५॥ ततो वय चेन्न विधातुमीश्वरा,वा क्रियां सात्विक साधनोचिताम् । तवाऽपि कुर्मोऽत्र किमन्तरायक, प्रवर्त्तमानस्य परेपरा' इव ।।४६।। तदस्तु ते वाञ्चितकार्यसिद्धि - रव्याहतथीजिनधर्ममिन् । अस्माकमप्यादिश कृत्यजात, परोपकारप्रवणा हि सन्तः ॥४७॥ प्रत्यावभापे जिनधर्म एतान्, वस्त्राशनालतिदानपूर्वम् । कुर्वन्ति किं कृत्यविद. कदाचिदौचित्यभङ्ग व्यसने पि धीराः ॥४८|| १. शाद २. मानन..

३६ सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् पुत्रः स तत्त्वेन त एव सोदरा, जायाऽपि साऽन्येऽपि त एव बान्धवाः । ये मां विनाप्याहतमार्ग उज्ज्वले, चिरं भविष्यन्ति निलीनमानसाः ॥४६॥ युष्मासु केनाऽपि समं मयाऽपि, प्रमादतः प्रान्तजनायितं यत् । तन्मर्षणोयं न हि जातु भव्या, द्विष्टेऽपि विद्वेषयुजो भवन्ति ॥५०॥ भूपालमापृच्छ्य समय॑ चार्चा, यथाविधिश्रीविधिचैत्यसस्थाः । सुसंघमादृत्य विशेषमानैः, समर्थ्य चाथिप्रणयप्रबन्धान् ॥५१॥ सत्त्वैकनिष्ठः क्रमबद्धकक्षः, प्रौढोपसर्गद्विरदावमानी। गुहान्तरात् सिंह इव स्वगेहात्, स निर्ययो सन्निहितार्थसिद्धिः ॥५२॥ युग्मम् । क्रमेण चाभ्युन्नतवंशमाप, प्राप्तप्रतिष्ठं नृपवत् पृथिव्याम् । आकाशवल्लुब्धकसिंहघोरं, पातालवद्व्यालकुलाकुलं च ॥५३॥ समस्तसत्वानिव योगपद्या, दत्तुं सदा व्यात्तदरीशतास्यम् । दिनेऽपि नीलद्रुमदोर्घपक्ति - ाजादनिर्मुक्तमहान्धकारम् ॥५४॥ गृध्रद्विकादिध्वननाट्टहास - रुत्त्रासयन्तं ध्रुवमाशु पान्थान् । नदच्छिवास्याग्निशिखावलीढं, शङ्के सदावं निशि दृश्यमानम् ॥५५॥ कलिञ्जरं नाम महानगेन्द्र, समारुरोहाऽथ निधिः स धाम्नाम् । प्रातर्विवस्वानिव रक्तमूत्तिः, पूर्वाचलं भासितशुद्धमार्गः ॥५६।। चक्कलक चतुभिः। अष्टादशप्राणिवधादिपाप - स्थानेभ्य आत्मानमभिग्रहेण। न्यवर्त्तयत् सत्वरमाभव स, त्रिधा त्रिधा प्रौढमुनीन्द्रनीत्या ॥५७।। गतीश्चतस्रोऽपि निरोद्धमेक - वारं वरो नूनमनूनभाग्यः। प्रत्याचचक्षे च विचक्षणोऽसौ, चतुर्विधं भोजनमप्यतृष्णः ।।५।। स्थैर्य बहिय॑जयति स्म लोके, देहोपमानेन ह्रदः स मन्ये । भुक्त्युज्झितस्तम्भसुरूपदेह - स्थितिक्रियारूपदशापदेशात् ॥५६॥ ऊर्ध्वाङ्गयष्टिजिनमुद्रयाऽस्थात्, स तत्र निस्पन्दतरप्रतीक । उच्चैः पदं तूर्णमिवारुरुक्षु - निष्प्रग्रह'- स्तार्क्ष्य इव ध्वजाग्रम् ॥६०॥ १. निष्प्रतिवन्धः ।

पञ्चमः सर्गः ३७ : नासानिविष्टस्तिमिताक्षिपङ्कजो, ध्यायन् पर ब्रह्म समाधिसङ्गतेः । तथाऽवतस्थे प्रतिमागतो यथा, व्यभाव्यताश्मप्रतिमेत्यसौ जनैः ॥६॥ घोरे घनव्यालकुले गिरीन्द्रे, सहस्रशोऽहर्निशमापतन्त. । वत् क्षुद्रसत्वा इव तस्य लोके, केनोपसर्गाः शकिताः प्रमातुम् ॥६२॥ गृध्रः पलाशैरिव मांसगृद्धः शिवाभिरुद्दीपितवाशिताभिः । विदार्यमाणोऽपि स पृष्ठदेशे, चचाल नैवाचल राजधैर्यः ।।६३॥ महाऽहिना कण्ठविलम्बिनाऽसावुमापते रूपमधश्चकार । विषेण नीलाङ्गरुचिः प्रकाम, श्रियं च तद्दशशतैर्मुरारे: ॥६४॥ अलम्भयत् काकवृकौघमेष, स्वास्थ्यं सरक्तैस्तनुमासपिण्डैः । किं चन्दनः स्वाङ्गपरिव्ययेन, प्रमोददायी न भवेज्जनस्य ॥६५|| गृध्रादितो बाधनमादिनान्तं, शिवादितश्चामृगलाञ्छनास्तम् । नक्त दिवं तूग्रभुजङ्गमादे, क्षाम्यन् क्षणं तद्विकल' स नासीत् ॥६६॥ दुर्योधकर्मारिरणे प्रवृत्तः, सहायबुद्धया तदमस्त सर्वम् । स धीरधुर्यो दशवक्त्रसङ्खये, यथैव रामः कपिराजसैन्यम् ॥६७।। पक्ष स तस्थाविति माघवत्या, याम्यादिदिक्कुप्यति मात्र मेवम् । सर्वा दिशः सत्त्ववतां समाना, लाभेऽदिशन्नूनमिद जनानाम् ॥६८।। तं कञ्चन प्राप समाधिभेद, स तत्र तत्त्वैकनिमग्नचेताः । येनाऽभव सद्गतिपक्ष्मलाक्ष्या, कटाक्षपात्र भविता ध्रुव स ॥६६॥ स्वशिल्पकोटीरुपसर्गनाम्ना, छन्नाः प्रदर्येव चतुर्थगत्या। स नौरसस्तत्र विभाव्य नून, दूर विरागान् मुमुचे सदाऽपि ॥७०॥ पञ्चातियत्नात् परमेष्ठिपादा - नाराधयन्त कुपिता इबाऽत्र । स्ववृत्तिरोधेन समानसङ्ख्याः, खाख्यारयो नूनमपोडयस्तम् ।।७१।। मासद्वयेनाऽथ विहाय देह, गेह गदाना सुभग भविष्णुः । दिव्याङ्गनार्थीव समुत्पपात, नभः प्रति द्राक् जिनधर्म जीवः ॥७२॥ साम्राज्यमीदृग न जगत्नोऽपि, ध्रुव विचिन्त्येति तदीयपुण्टो. । पाराधितस्वामिसमवितोरण, सौधर्मनाकाधिपतित्वमस्य ।।७३।।

३८
सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम्
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यत्र द्युति?तितदिग्विभागा, विभाकरोल्लासिविभासगोत्रा।
गात्रस्य या सान्द्रतमाऽपि धत्ते, समीपगा मर्त्य गणस्य कान्तीः ।।७४॥
वसन्तपुष्पेषु मृगाङ्कपद्म-श्रियं गृहीत्वा ध्रुवमङ्गलक्ष्मीः ।
विनिर्ममे यत्र स यत्नधात्रा, यतः समस्तैतदनुत्तरा सा ॥७॥
असङ्ख्यसंवत्सरकोटिरूप
द्विसागरोन्मानमहीनमायुः
यत्राऽभवं भूरिसुखावमग्नः, प्रपूर्यते कालकलेव पूर्णम् ॥७६।।
सौख्योपभोगा अपि कामसिद्धा, अनन्यसाधारणहेतुजत्वम् ।
आख्यान्ति सद्वर्णभिदो हि केकि-पिच्छच्छटाया इव यत्र शश्वत् ॥७७।।
यस्मिन्नशीति सदां सहस्राः, सामानिकानामधिका सहस्रः।
चतुभिरेवाप्सरसोऽपि कान्ता, अष्टौ जिताऽष्टापदकान्तिका याः ॥७८||
सामानिकेभ्योऽपि चतुर्गुणाः स्यु-संत्राङ्गरक्षाः शुचिलोकपालाः ।
सभाविमानवजशान्तिकर्म - प्रवेदिनस्तु प्रचुराः
सुरुच्याः ॥७९॥
नान्यत्र नाकेऽपि समृद्धिरीदृग्, विमानपत्यप्सरसां शुचोनाम् ।
इतीव यत्राहतमज्जनेपि, मुख्याधिकारित्वमजायतोच्चैः ॥५०॥
विचित्रसद्रत्नकरम्बिताङ्का लङ्कारकान्तिच्छुरिताङ्गयष्टिः ।
यस्मिन्कदाचिन्न महेन्द्र चापा - चितान्तरिक्षश्रियमुद्ववाम ॥१॥
विमानमप्यच्छतरार्कभित्ति गर्भामरालीप्रतिबिम्बचित्रम् ।
नालेख्यकर्मप्रतिसाधनाभि - मुख्यं भजत्यद्भुतकान्ति
भजत्यद्भुतकान्ति यत्र ।।२।।
आजन्म यत्रेन्द्रियसन्निधानं, भजन्त्यहृद्याः खलु नेन्द्रियार्थाः ।
समुत्कटप्रस्फुटगीतमुख्यै - रुत्त्रासिता नूनमरिप्रकाण्डैः ॥३॥
न यत्र निद्रान्ति कदापि पुष्पाण्यस्वप्नसम्पर्कवशेन नूनम् ।
कि चम्पकाचञ्चलगन्धपात्रं, तत्सङ्गतः स्वादुतिला नहि स्युः ।।१४।।
यत्रानिमेषा अपि कामकेलौ, कान्ताकुचस्पर्शनिमीलिताक्ष्याः।
मुहूर्त्तवद्वर्षशतं नयन्ति, निष्ठा प्रमोदामृतसिन्धुमग्नाः ॥८॥
शंलेपु वापीपु
विलासिनीषु,
कदाचिदुद्यानलतागृहेषु ।
विलासिचेतोभिरिव प्रकामं, यत्र प्रसर्पद्रति दीव्यते च ॥८६॥

पञ्चमः सर्गः ३० यस्याधिपत्यान्यखिलानि शेषाण्यधुः श्रिया दास्यविलासमेव । तदाप्य रेजे जिनधर्मसत्त्वः, कलाकलाप हि यथा कलावान् ॥७॥ तस्यामरश्रेणिविनम्रमूर्व रत्नप्रभाचित्यकरम्बिताना व्यक्ताऽपि भाभा रचिता न सम्यग, व्यभाव्यताहिद्वितया सभाहः ।।८।। न शासनं शस्त्रमिवास्य कश्चित्, तीव्रप्रतापं क्रमितुं शशाक । को वा हितार्थी कुपिताऽहितुण्ड, चण्ड परिस्प्रष्टुमिहाद्रियेत ।।८।। न्यरूपयन्नाटकमग्र्यरूपकं, दशाङ्कमेकान्तमनोहरं सताम् । डिमन्तु नैवैष शुभाऽशुभान्तरज्ञा एव हि स्युविबुधाधिनायकाः ॥१०॥ भवोद्भवानन्दविभुत्वसार सर्वस्वलीलानिलयस्य तस्य । जग्मुः प्ररूढं जन्मान्तरीय - श्रेय.फलं समौघाः ॥६॥ त्रिजगतिरमणीया नैव सम्भोगभङ्गय, क्वचिदपि हि ततोऽपि प्राप यास्तत्र शक्रः। किमु किमपि महीयो द्रव्यमस्त्यम्बराद प्यमरगिरिपतेरप्युन्नतो वा स्वादयतः गिरीन्द्रः ।।६२॥ इति युगप्रवरागमश्रीमज्जिनपतिसूरिशिष्यलेशविरचिते श्रीसनत्कुमारचक्रिचरिते शक्राभ्युदयवर्णनो नाम पञ्चम सर्म. । छ.। ५ ।

षष्ठः सर्गः स त्रिदण्डिनोऽप्येवमपुष्यदुना - भियोगिक कर्म महाभटाभम् । यथा तमाकृष्य हि नारकारेः, स्ववश्यतामानयदेतदाशु ॥१॥ ततः स तेनैव सुदुष्टकर्मणा, विडम्व्यतश्चेत्र रतेन पापिना। इन्द्रस्य तस्य तस्य प्रथितोरुवाहन - द्विपत्वमासूत्रयतातिदुस्सहम् ।।२।। अहो ! दुराचारमय कुकर्म, त्रिदण्डिनः सत्वरमेव पक्वम् । यदारसन्दूरविलज्जमानः, स वाह्यते स्मात्र निरन्तरात्तिः ॥३॥ संस्मार्ग संस्मार्य पुरा कृतानि, शत्रानुयातैरतितुन्द्यमानः । सोऽन्तस्ततापाफलमेव हस्ती, यथा चिरं सेचनको व्रतस्थे ॥४॥ विवेकशून्यैर्मुदितः परेषु, वितीर्यते यद्वयसन फलेत् तत् । अन्तर्दहदुष्टविपाकमारात्, कुतोऽन्यथाऽमुष्य कुतोऽन्यथाऽमुष्य तथेभभावः ॥५॥ तत्रान्तरैर्दु खशतैर्वितप्तः, कायिकै रकबाधजैत्रः । अदृष्टशत्रुप्रकृतापमानान्, शशंस शश्वत् स हि दुर्गतिस्थान् ॥६॥ न तानि दुःखानि न तस्य यानि, स्वर्गेऽपि भाग्यात्ययनिर्मितानि । सदाऽभवन् वाक्पथदूरगाणि, शक्रस्य सौख्यानि यथा सुभाग्री. ॥७॥ सोऽमोचयत्तं न दयापरोऽपि, दस्यु यथा प्रौढकदर्थकेभ्यः । अवद्यतत्कर्मनिरुद्धवृत्ति, त्वतो ध्रुवं दारुणदुखदग्धम् ॥८॥ शक्रोऽपि तत्रैव समारोह, प्रायो विमुच्येतरवाहनानि । अवश्यसवेद्यफलं हि कर्म, न कारयेत् किं किमिहागभाजाम् ॥६॥ तं हस्तिमल्लं दधिदुग्धमुग्ध-मारूढ इन्द्रोऽपि विभूषिताङ्गः। कैलाशशृङ्गोद्गतकल्पवृक्ष - श्रिय दधौ धौतविभूषणोघ. ॥१०॥ ऐरावतस्यापि सिताङ्गकान्त्या, विनिह नुता दैत्यजनस्य दन्ताः । दत्त्वा मुदं मन्युमदु. क्षणेन, प्रौढप्रहारैः प्रौढप्रहारैः समरेषु गश्वत् ।।११।। पराजयस्सयतिना सुरेभ्य', सम्मुर्छदतुच्छशस्त्र। तारकेभ्यो, वभूव धामोदयदुर्द्धरेभ्यः ॥१२॥ । शकस्य सहत रश्मेरिव षष्ठः सर्ग: ४१ सैन्यान्यपि त्रातदिवः स्वधामभि-विभूषणान्येव सुराज्यसम्पदः । तस्याऽभवन् बोधिनकरवाकर-स्येन्दो.. करैरेव हि तारका इव ॥१३॥ न खण्डिता कापि कदाचिदासीद्, देवी महान्त पुरसंयुजोऽपि । तस्याऽथवा मन्युकृतो वधूना, किं दक्षिणाः क्वापि च नायकाः स्युः ॥१४॥ सम्भोगभनिष्वपि तत्प्रहारा, न निर्दया अप्यभवन् वधूनाम् । दुखाय कि चण्डरुचेर्भवन्ति, त्विषो नलिन्याः परितापदाव्यः ॥१५॥ सर्वाजितस्यापि च तस्य जेता, ह्यकः परं पुष्पधनुर्बभूव । तद्भुयलेशा अपि येन देव्यो, ददुर्भयं कोपविकम्पितीष्ठ्यः ।।१६।। जिनेन्द्र कल्याणकपञ्चकेऽपि, स्नानादि सर्वद्धिवृषा चकार । सम्यग्दृशा स्फातिभृतः समृद्धः, सुपात्रनिक्षेपमृते फलं किम् ॥१७॥ न चक्षमे शासनलाघव स, साक्षाज्जिनेन्द्राच्छ ततद्विपाकः । को वा बले स्फूर्जति भर्तुराज्ञा-, विलङ्घनं भृत्यवरः सहेत ॥१८॥ स भूयसा कामपरोऽपि धर्म - मपि प्रयत्नेन चकार जातु । रुच्य न यत् स्यादशन कदापि, स्वादप्यहो सल्लवणं विनेह ॥१६॥ नानारतक्रीडितहर्षभाजः, सङ्खचापरिद्वेषिणि तस्य क्षोणेऽथ रज्जाविव मृत्युकूप - प्रपातसाम्मुख्यमसो प्रपेदे ॥२०॥ कल्पद्रुकम्पप्रचलायितादि-लिङ्गः समासत्तमवेत्य मृत्युम् । षण्मासशेषायुरसो विशेषा - देकान्तपुण्यार्जनतत्परोऽभूत् ॥२१॥ विषादमागं न तदापि चेतो, जगाम तस्यातिविवेकभाजः । कालुष्यपात्रत्वमुपैति वर्षास्वपि प्रसन्नं किमु मानसं वा ॥२२॥ प्रदीपवन्नीरदखण्डबद्धा, क्षणेन स्वर्गपतिविलिल्ये। आयु क्षये वायुविधूतवृन्त - बन्धं स्थिरं किं कुसुमं भवेद्वा ।।२३।। ततोऽमरश्रणितदङ्गनानां, प्रस्फोटयनम्बरमुच्चचार । आक्रन्दनादस्त्रिदिवे निनादा द्वैतं बदनूनमतीवतारः ॥२४॥ उद्यान मुद्वान्तसमस्तसुन, व्योमस्थलं मेघविलुप्त चन्द्रम् । ततः सरो लूनसहवपत्र, यथा तथाऽभूत् विदिवं गतथि ॥२५॥ काले। स -- सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् तीवं, प्राणान् शोकातुराणाममराङ्गनानी, हस्तानविन्यस्तकपोलभाजाम् । अधोमुखानो दधति स्म हार-स्रजः स्रवद्वाष्पकरणालिलीलाम् ॥२६॥ निवृत्तसङ्गीतकलास्यलीला - सभा निदद्राविव नर्तकोव । सुस्तम्भशालिन्यपि चाऽचकम्पे, प्रभो तदामीलितनेत्रपद्मे ॥२७॥ प्रागेव शक्राद् विजही किलासा-वैरावतो वाहनताविभीतेः । कुकर्मसाहाय्यमवाप्य निजान्नूनमुदीर्णशोकः ॥२८॥ तदाभियोग्यं गुरुकर्म तिर्यग्गत्याह्वयेनास्य ततः प्रसह्य। कर्मान्तरेणोपचितेन मल्लो, मल्लान्तरेणेव बताऽऽबबाधे ॥२६॥ चेद् दुर्गतेस्तुल्यमह न देयं, दातुं क्षमाऽस्मै निजवल्लभाय । तत्कि मयेतोव विपक्षमन्योस्तिर्यग्गतिमक्षु तमाजुहाव ॥३०॥ स्वाभ्यासग तं नरकाधिकैः सा, काष्ठागतैर्दुःखशतैः प्रदेणैः । आत्मानुरूपैः समयोजयद् द्राक्, स्पर्धा हि किं किं न विधापयेद्वा ॥३१॥ गत्यन्तरारक्तमवेक्ष्य तं प्राक्, तया नवाभिर्बहुभिर्दशाभिः । तथा ददत्यापचिति स जहें, ध्रुवं यथा तां न जही चिराय ॥३२॥ तैरश्च्यदु खानि निरन्तराणि, स्निग्धाशनानीव निषेवमाण.। तीक्ष्णोपदशानिव मर्त्यकृच्छ्र भेदानसावाश्रयदन्तरन्तः ॥३३॥ जरा सशोका सरुजा दरिद्रता, बाधिर्यसान्निध्यवती महान्धता । भयादिवैकैकमशिश्रियन्त त, मानुष्यके दुःखमलघ्वपि क्षणम् ।।३४॥ मलीमसच्छिद्रितजीर्णवासाः, सर्व सितस्तत्र कदन्नभोजी। दुष्कर्मणा सङ्गमिहेव मा स्म, कार्षीदितीवोद्वहताभिसन्धिम् ॥३५॥ पुनः स तिर्यक्षु पुनर्मनुष्येष्वेवं परावृत्य भवेति भूम्ना । कालेन केनापि सुकर्मणासौ, खद्योतकद्योतचलेन जज्ञे ॥३६॥ प्रकोपनो व्यन्तरसज्ञितेषु, देवेषु तेजोजितभानुमत्सु । पराक्रमाक्रान्तविपक्षलक्षः, श्यामावदातो ह्यसिताक्षयक्षः ॥३७॥ युग्मम् । च चिकोड कोडितकामकेलि निजप्रियाश्लिष्टभुजान्तरालः, सक्तामरद्वन्द्वमनोहरेषु । नन्दने कल्पलतागृहेषु ॥३८।।

षष्ठः सर्ग:
४३
सरः
शैलेष्वपि प्रोषितभत काणा, वितीर्णदृष्टिवलनेषु शृङ्गः।
फुल्लत्तमालासनचम्पकाढयः, प्रियासखो निझरभूषु रेमे ॥३६॥
कौसुम्भवस्त्रास्विव सुन्दरीपु, चक्राह्वयद्वन्द्वशतैश्चकार ।
विलासवापोष्वपि मज्जनेषु, कान्ताकुचास्फालनदर्शनानि ॥४०॥
अन्येष्वपि स्वर्गसनाभिदेशेष्वसौ चरन् मानसमाससाद ।
कदाचिन्मदुशीतवायु - प्रनर्तिताम्भोरुहराजिराजि ॥४१॥
यदुच्छलद्भिर्जलशीकरोघे, प्रसृत्वरैव्योर्मनि शुद्धवृत्तः।
नभश्चरान् कौतुकिनस्ततान्, मुक्तोत्करादानविहस्तहस्तान् ॥४२॥
शनैश्चलद्वीचिपरम्पराभिः, कटाक्षमालाभिरिवोपरुद्धम् ।
द्रष्टु यदासन्नतमा तरूणां, कान्ता ततिं दृष्टिसुखां सलीलम् ॥४३॥
समुद्र विस्तारविडम्बिदी? - पान्तद्रमालीप्रतिविम्बनीलम्
रेजे ध्रुवं
यच्च समीपति-वन्योपभोगाय नभोवतीर्णम् ॥४४॥
अत्यन्तशीताम्बु यदुष्णकाले-ऽप्यकम्पयत् स्नानकृतो मृगाक्षीः ।
किं वाऽद्भुतं याति न जातु जात्य, स्वर्णं विदाहेऽपि यदन्यथात्वम् ।।४।।
अनाप्तकालुष्यमहो यदच्छा-द्वतस्वरूपं
जलदागमेऽपि ।
अशुद्धसङ्गेऽपि विशुद्धता स्याद्, या सा शुचित्वस्य परा हि काष्ठा ॥४६॥
स्वच्छाम्बु दूरादपि राजहसाः, समेत्य वर्षास्वपि यद्भजन्ते ।
साधारणान्नैव हि हेतुमात्राद्, भवेदसाधारणकार्यसिद्धिः ॥४७॥
जलेन सम्पृक्तमपीह दुग्धं, ततो विविच्यव पिबन्ति हंसाः।
ये तेऽपि यद्वारिसुधारसेन, सम पिबन्तस्ततृपुर्न जातु ॥४८॥
कर्पूरकक्कोललवङ्गपुष्प - परागसङ्गान्निचितान्
द्विरेफः।
यत्राभिससुर्नवराजहसान्,
प्रियभ्रमान्धाः
परदुष्टकान्ताः ॥४६।।
एलालाताकेलिगृहोपगीत सकिन्नरद्वन्द्वकलस्वनेन
ध्रुवं समोरो
हृतवाहनत्वाच्छनैः शनैर्यत्र वहत्यजतम् ॥५०॥
विसोपयोगेऽपि मृणालिनीनो, हसेपु नो यत्र पराङ्मुखत्वम् ।
माता ह्य पत्येषु कदापि दृष्टा, नावत्सला स्तन्यरतं पिवत्सु ॥५१॥

सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् बबन्ध यच्चक्रवाकैः करुणं रुवद्धि - विलासिनो बोधयतीव नक्तम् । माऽकाट कोपाकुलिता अपि क्वाऽप्ययोगबुद्धिं दयितास्वितीह ॥५२।। निर्वृत्तततीयमान, पार्श्वद्वये मिश्रितचक्रहंसम् । यस्याद्भुतां मौक्तिकपद्मराग-स्रजं सुखावासपणाय नूनम् ॥५३॥ सर्वर्तुपुष्पोन्मदसिद्धसङ्घ, यत्तोरसंरूढवनं श्रितानाम् । सजायते किं नरसुन्दरीणां, ननन्द नोत्कण्ठि कदापि चेतः ॥५४॥ विशालमप्युन्नतशालकान्तं, पुष्टार्जुनं क्रीडितधार्तराष्ट्रम् । विषस्य धामाप्यमरोपभोग्यं, यत्कन्दलभ्राजि सराजहसम् ।।५५॥ सदामरप्रार्थ्यमहोपभोगे, सरोवतंसे विनिविष्टरागः। स प्रस्मृतस्वीयनिवाससौख्यस्तव नित्यं स्थितिमाबबन्ध ॥५६।। रतान्तमन्दायितमीनकेतु - प्रबोधकृत् कोकिलनादरम्ये। उवास सोऽखण्डितकान्तकान्ता-ऽऽश्लिष्टाङ्गयष्टिः किल तत्र भूमना ।।५७॥ सौधर्मनाथोऽपि सुधर्मयोगाद्, दिवः प्रपत्याऽपि पराप लक्ष्मीम । कामैकसम्पादकशाक्रसम्पज्जित चतुर्वर्गदशक्तिमत्वात् ।।५८।। मत्येन्दिराभ्यः सकलाभ्य ऊर्च, शक्रश्रियोऽप्यद्भुतलब्धिमत्वात् । इतीव पुण्याधिपतिः प्रसनस्तस्योत्तम चक्रिपद विलेभे ।।५।। समस्तपुष्यत्पुरुषार्थमौलि निःश्रेयसश्रीपरिरम्भदाक्ष्यम् । यत्राविरस्ति स्मरसायकोपर्यथा पटुत्व प्रशमापनोदे ॥६॥ नि शेषसूक्ष्मादिशरीरिमाता, क्षमादिरत्नाडुकुररोहणाद्रिः धर्मोऽपि यत्रामृतसौख्यलक्ष्मी-विलासहेतुर्भवतीव वश्यः ॥६१॥ अर्थोऽपि विश्वार्थवतां यदि स्युः, समुच्चिताः क्वापि च कोशकोटयः । मीयेत ताभिः परमो यदीयो, यक्षादिनानामरसाध्यवृद्धिः ॥६२।। स्वीया इवार्था भुवनैः प्रकृष्टास्तावद्भिरेवातिभयाद्वितीर्णाः । स्वरक्षणार्थ बत चक्रभाजो, रत्नानि यत्रेति चतुर्दश स्युः ॥६३।। नूनं सर्वार्थसम्पद्विरचन चतुराश्चण्डरोचि प्रवेका, वश्यत्वं यान्ति यस्मिन्नवनिधिमिषतस्सद्ग्रहास्तै नवाऽपि ।

षष्ठः सर्गः ४५ निष्प्रत्यूहावदानाऽनुदितगदलवा सार्वभौमत्वहेतु- स्तत्राशु स्याद्गरीयस्यपि कथममिता यन्यथा कार्यसिद्धिः ॥६४। यक्षेभ्यो घामवद्भ्योऽप्यधिकगुणभृतो यद्वय दृश्यसेवा- स्तत्काकोड्डीनतुल्यात् स्वरुचिगमनतो मा स्म भूद्गर्व एषाम् । इत्यङ्गीकृत्य नूनं परमशुचिपदं राजहसस्वरूप, द्वंगुण्य यत्र तेभ्यो मुकुटधरनृपा सन्तत धारयन्ति ॥६५॥ ग्रामारामाभिरामाऽऽनननलिनललल्लीललावण्यलक्ष्मी- पानव्याबद्धतृष्णाभरतरलतरत्तारनेत्राध्वनीनाः पादात' वीरतोद्य सममपि नियत सख्ययाऽल विजेतु, नूनं शृङ्गारसारा इति रुचिरतमा यत्र सर्वे भवन्ति ॥६६॥ सेनाङ्गान्यङ्गभाव समरभुवि जयस्याशु तुल्य भजन्ते, तुल्यान्येवेकचित्ता इव सुभटघटाः स्फूत्तिभाजोऽपि लोके । इत्यालोच्येव शश्वत् करितुरगरथ शिश्रिये यत्र साम्य, किं वा सम्पद्यते नोपचितसुकृततः कल्पवृक्षादिवाग्र्यात् ।।६।। अस्माभिः साम्प्रत किं निरुपमसुखकृत् सङ्गम सङ्गताना, संदोहैः कामिनीनामिव सकल जगत्सारधातुप्रतोतै. । बन्ध्य संगुप्तभावादकृतपरिचयश्वक्रिणा चारुधाम्ना नून प्राकाश्यवश्या इति निखिलभुवोऽप्याकरा यत्र च स्युः ॥६॥ स्युस्तुङ्गसौधावलिशिखरलसद्दिव्यगीतप्रबन्ध- प्रेक्षाक्षिप्तेक्षणाना विरमितगतयः सर्वत खेचराणाम् । नून तद्गेयमन्त्र प्रतिनिहतन भोगामिविद्याक्षराणा, नक्त शृङ्गारयोनेर्वरपुरनिकराः केलिलीलानिवासा. ॥६६॥ यत्र द्रोणिमुखानि' सत्कविमुखानीवोभयोगियो. गद्योन्मीलितपद्ययोरिव सदा पाथ.स्वलासङ्गिनोः । भूयास्याकलितप्रसिद्धि सुभगान्याविर्भवन्त्युच्चक- यप्वेककमपि प्रलुम्पतितरा वित्तदापुया त्रियम् ।।७।। १. पुस्तके तु 'पाहावं ' इति पाठः । यत्र २६६.००।

४६ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् एवं संबाधखेटाद्यनुपमममितं वर्ण्यते तत्र कीदृग्, बाह्य सम्पत्स्वरूपं तदुपचयकृत: सन्तत यत्र यक्षाः । भूयांसः सन्ति दूरे नयनयुगपथात् किङ्करत्वं प्रपन्नः, किं वा पुण्योच्चयस्य क्षतरिपुनरपस्येव वश्यं न लोके ॥७॥ कामादाजन्मनानाकरणविधिरणन्मङ्घमजीरसिञ्जा- संहूतानङ्गनृत्यन्मृगशिशुनयनासङ्गतै रगभूमौ । शैलूरब्धिसख्याभिनयनयनहृन्नाटकं नाटितं यत्, तत्रासक्ता वितृष्णा अमृत इव सदा चक्रिणो यत्र न स्युः ।।७२।। द्वात्रिंशत्पात्रबद्धाभिनयसुखकरैर्नाटकानां सहस्र- यंत्रा क्षिप्तरजस्र बहुरपि समयो लक्ष्यते सौमुहूर्तम् । कान्ताकण्ठोपकण्ठप्रहितभुजलतैश्चक्रिभिः पुष्पमाला- माद्यद्भुङ्गागनौघाविरतकलरवव्याजसङ्गीतरूपः ॥७३॥ कामास्त्राणां समेषां वयमुपरिसमस्तेन्द्रियार्थाश्रयत्वा- दाधिक्यं चेन्न तेभ्यो भुवि भवति परं नाटकेभ्यः परेभ्यः । तत्काऽस्माकं महत्तेत्यवजितविबुधस्त्रंणलावण्यलक्ष्म्य- स्तद्वैगुण्य भजन्ते ध्रुवमसमसुखाः केकराक्ष्योऽपि यत्र ।।७४।। अप्यन्यासां यदि स्याल्लवणिमजलधिः पिण्डितः सुन्दरीणा, सर्वासां रूपदासीकृतरतिवपुषां तेन साम्यं लभेत । यत्रकस्यापि स्त्रीरत्नस्याङ्गलक्ष्मीर्ललितरतिनिधिस्तत्र किं वर्ण्यतेऽन्यत् ॥७५।। इत्थं सौधर्मनेतुः सुकृतविभुरसाधारणोपास्तिभेदा, राद्धस्तस्मै कृतार्थः समभवदसमश्रीचतुर्वर्गदानात् । किं वन्ध्यत्वं भजेतामृतरस उचितत्वेन पीतः कदाचित् किं वा स्यात् कल्पवृक्षः क्वचिदपि विफलः सेवितः सन्नजनम् ।।७।। इति युगप्रवरागमश्रीमज्जिनपतिसूरिशिष्यलेशविरचिते श्रीसनत्कुमारचक्रिचरिते शक्रप्रच्यवनो नाम पप्ठः सर्गः । छ.। ६ । चन्द्रद्रुतरसरचितस्येव सौख्याकरस्य, ! सप्तमः सर्गः - फलभारभाजः । यत्र। प्रायः देशो दिशामण्डनमेकमीषद् - विशेपहेतोविहितो विधात्रा। ध्रुव धरित्रीपतिनीतिपूतः, क्षितौ कुरुभ्यः कुरुजाङ्गलोऽस्ति ।।१।। एतत्कृतास्माकमिय समृद्धि - रिति स्थवीयः यस्मिन्नमस्कर्तुमिवाभिनेमु., स्तम्बान् शरद्युन्नतशालिशाखा ॥२॥ तटाश्रितासङ्खचसुरालयानि, बभुमहीयांसि सरांसि अधिभ्रमारब्धविलोडनानि, ध्रुवं सुरै रत्नगणाप्तिलोलेः ॥३॥ वृषाश्रितत्वाज्जनता सुरूपा, प्रमोदभाक् भूरिसमृद्धिपात्रम् । सुरावलीव श्रयते न यत्र, भयं कदाचिद् द्विषतां बलेभ्यः ॥४॥ सदा तीर्थपचक्रिमुख्य-प्रभाववद्भूपतिसम्भवेन । दुभिक्षरोगव्यसनेति डिम्बास्त्रासादिवाध्यासिपतैव ये नो ॥५॥ यत्र प्रतिग्रामममर्त्यवेश्मनी, ततिश्चकाशे महतां सितद्युतिः । तत्कर्तृकोत्तिस्त्रिदिवारुरुक्षया, विकासिताङ्गव निरन्तर दिवि ।।६।। यत्रेक्षुकाण्डाः शुकचण्डतुण्ड - प्रहारनिर्यद्रससान्द्रधाराः । सुधाप्रपाकौतुकमध्वगानां, शाला विनापि प्रतिपूरयन्ति ॥७॥ सौरभ्यलुभ्यन्मधुपालिनाद-व्याजेन पुष्पोत्कटकाननानि । अधिक्षिपन्तीव वनं सुराणां, प्रत्यब्दमुद्यत् कुसुमानि यत्र ।।८।। पुराणि योषाकुलसंकुलानि, योषाकुलान्यद्भतरूपभाजि । रूपाणि यूनां मनसा हि चोराश्चौराः परिम्लानमुखाश्च यत्र || भूम्ना बभुर्यत्र जिनास्पदानि, प्रेक्षादिदृक्षाऽचलदृष्टिलोक. । कीन्यमणैरिव सङ्गतानि, दिवो विमानानि समागतानि ॥१०॥ यत्र विपामेव हि सर्वलोप', कलावसादोऽपि शशाङ्मूतः । वृषावमुक्ति. पितृकार्य एव, स्मातस्य नान्यस्य जनस्य दृष्टः ॥११॥ न दन्तिनो दानविहीनगण्डा, न 'दानमप्युज्झितगन्धवासम् । गन्धोऽपि नेवासुरभि धत्त, कलत्क्वणा पत्र मधुरतालीम् ॥१२॥ .

४८ सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् यो मर्त्यलोकेऽपि विचित्रकेलि - प्रवृत्तनित्योत्सवमोदवद्भिः। मत्यैरमत्य रिव सन्ततश्री:, स्वर्गश्रियं दर्शयतीव नृभ्यः ॥१३॥ रत्नत्रयी यत्र जिनेन्द्रसज्ञा, द्विधाऽपि चक्र बत धारयिष्णुः । जज्ञे नवः कश्चन रोहणाद्रिः, केनोपमीयेत स देशराजः ॥१४॥ तन्दुरुक्शालविशालताचित-क्ष्मापीठमासीत् किल हस्तिनापुरम् । यत्कुण्डलीभूतभुजङ्गमाधिप-श्रियं दधौ चारुविशेषकं भुवः ॥१५॥ हारिण रम्यस्फटिकोपलद्युति-च्छटाजलक्षालितदिड्मुखान्यलम् । क्षपास्वखण्डक्षणदापतिप्रभा - चितानि यत्राऽऽपुरलक्ष्यमूर्तिताम् ।।१६।। तुषारसस्पर्शपयोधरानिशं, सौगन्धिकाम्भोजकृतावतंसका। विश्वस्य चक्षु शततुष्टिपुष्टिदा, बभूव कान्ता परिखाऽपि यत्र च ॥१७॥ यत्रोन्नतं शालपति भजन्ती, भग्नान्यसङ्गं परिखा सदापि । मूर्धाभिषिक्ता परकामुकोणा - मासीदशश्वत् परिरम्भभाजाम् ॥१८॥ कोर्णानि कर्णामृतकेकिकेका - पिकस्वनैः केलिवनानि यत्र । भङ्गायमानस्य मनस्विनीना - मल समाधेश्च समाधिभाजाम् ॥१९॥ सत्सारसोदीरितमध्यमस्वर व्यामिश्रबर्हिस्फुटषड्जगीतिभिः । सरांसि पान्थाय वनैः सम सदा, प्रातर्गतौ यत्र दिशन्ति मङ्गलम् ॥६०॥ सुरालयाग्रप्रचलत्पताका, पटाञ्चलोत्क्षेपशतैर्यदारात् । दूरागतिश्रान्तविवस्वदश्व श्रमाम्बु नूनं व्यनयद् दिनान्तः ॥२१॥ रामाजनस्याद्भुतरूपसृष्टी, स्रष्टुर्घवं यद्वरसृष्टिशाला। यत्तादृगन्यत्र न रूपसम्पद्, दृष्टा क्वचिद् भूवलयेऽखिलेऽपि ॥२२॥ गारुत्मताच्छामलसारकाणा-मन्तनिविष्टा नवहेमकुम्भाः दधुः स्मितेन्दीवरगर्भखेलच्चक्रश्रियं जिनालयेषु ॥२३॥ मूर्तिस्पृशो गोष्पतयोऽपि चित्रं, सङ्ख्याविदः सत्कवयः प्रतीताः । प्रमोहविप्टा अपि तर्कशास्त्रा-ऽवमर्शका यत्र जनाश्च भूम्ना ॥२४॥ यत्रंन्द्रनीलस्फटिकाश्महट्टा, एकान्तरा प्रोच्छलिताशुजालः। चक्रुस्तमश्चन्द्रिकयोश्चिरायोकत्रस्थिते श्चित्रयुजो विदग्धान् ॥२५॥ यत्र - सप्तमः सर्गः ४३ यस्मिन् मणीनामवलोक्य राशीन्, सङ्ख चातिगापण्यपथे प्रतीयुः । जनाः पयोधि हृतसर्वसारं, नाम्नव रत्नाकरकीत्ति भाजम् ॥२६॥ कर्णामृतस्यन्दिविलासिनीजन प्रगीतनिष्पन्दकुरङ्गशावकः । अखिद्यत द्यामतिगन्तुमुत्सुको, यच्चन्द्रशालानिकषाचरः शशी ॥२७॥ मत्ताङ्गनाविह्वलनृत्तभङ्गि-ज्वपूर्वपादक्रमशिक्षणाय जहुर्न वर्षास्वपि सौधगर्भानूनं यदीयान् शिशुकेलिहंसाः ॥२८।। श्राद्धा. श्रुतेस्तत्त्वसुधा धयन्तः, सुस्था स्थिरा साधुमुखाम्बुजेभ्यः । साक्षादिवाऽऽनन्दरसावमग्ना, मुक्त व्यंभाव्यन्त तदापि यत्र ॥२६॥ द्विपालयः कज्जलपुञ्जसोदरा, यत्रालयभू' राजपथे चरिष्णवः । विवस्वतास्तास्तमुपासितुं भिया, तत्पादलग्ना इव कालरात्रयः ॥३०॥ द्विजिह्वलविलसत्तमोभरैः, कौटिल्यमालिन्यगृहरुपासिता । श्रीनागराजस्य पुरी निरातपा, तुला न येनाऽधिरुरोह सर्वथा ॥३१॥ द्विकुण्डलालङ कृतमेककुण्डल - श्रितां सपुष्पन्न जमेकपुष्पकाम् । सुरालयोद्यद्दशनाशुमण्डलै - यंदुज्जहासेव सदाऽलकां पुरीम् ॥३२॥ ससारसाराखिलवस्तुपात्रं, यद्भरिभिः सद्गुरुभिः कवीन्द्र । प्रसाधित वीक्ष्य सहस्रनेत्रो, न बह्नमस्ताऽऽत्मपुरी गुणज्ञः ॥३३॥ तत्रोद्भट पतिभिर्नतमौलिकोटी कोषोच्छलविमलशोणमणिच्छलेन । दत्तप्रतापनिजवैभवसार आसीत् , पृथ्वोपतिः पृथुयशोनिधिरश्वसनः ।।३४।। कलालयो यो बत तेजसा निधि-भू नन्दनोऽप्यद्भुतकाव्यपद्धतिः । बुधोऽपि शत्री गुरुसिंहिकासुतः, केतु. स्ववशस्य शनैश्चरः पयि ॥३५।। यस्मिन्प्रजाः शासति चण्डशासने, नैवान्वभूवन्प्रतिपक्षजव्यथाः । स्युः स्फूर्ति मन्मान्त्रिकरक्षितेपु कि, भयानि भोगिप्रभवानि कहिचित् ।।३६।। कुर्वन् कृतार्थानखिलार्थिचातका - नेकाह एवेप्सितदानकोटिभिः । किमप्ययच्छन्नित रेषु वासरेवखिद्यतोदारमना. सदाऽपि यः ॥३७॥ १. गुभिरे

सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम्
कुम्भीन्द्रकुम्भस्थलदारणोच्छलन्-मुक्ताफलैर्दन्तुरितं नभस्तलम् ।
दिवाऽप्यभूत्तारकितं रणोत्सवे, यस्य प्रनृत्तासिकराग्रशालिनः ॥३८।।
स्मराकुलं स्मेरविलोचनाम्बुज-निपीयमानोऽपि पिपासयानिशम् ।
पौराङ्गनाभिः समवर्द्धताऽधिकं, यस्याऽस्य सौन्दर्यपयोधिरद्भुतः ।।३।।
दत्त्वा द्विषद्भयो निशितासिधारास्तदङ्गनानां नयनाम्बुधारा ।
क्लुप्ताः परीवर्त्तपरेण येन, स्वकीर्तिवल्लेः परिवृद्धिधात्रयः ॥४०॥
नीत्यङ्गनालिङ्गनलोलमूत्ति-र्नाऽकीत्तिलक्ष्म्याऽपि कटाक्षितो यः ।
किं भद्रजातीयमतं गजेन्द्र, वशास्वजं चुम्बति कोलकान्ला ॥४१॥
विदारिताऽरातिकरीन्द्रकुम्भ - मुक्तावली व्योम्नि तता चकाशे ।
संसूत्रिता यस्य रणोत्सवेषु, जयश्रिया स्राग्वरमालिकेव ॥४२॥
तुष्टामरक्षिप्तसुगन्धिपुष्प - गन्धावलुभ्यन्मधुपाङ्गनानाम्
मृधेषु यस्य श्रमवारिबिन्दून्, नुनोद पक्षव्यजनानिलः स्राक् ।।४३।।
केशेषु बन्धस्तरलत्वमक्ष्णो', काठिन्यलक्ष्मी: कुचमण्डलेषु ।
संभोग भङ्गिष्वदयाभिघाता, मृगीदृशामेव
यदीयराज्ये ॥४४॥
प्रवादिजल्पे छलजातियोगः, सकण्टकत्वं वनकेतकेषु ।
विष्कम्भशूले खलु योगजाते, न जातु लोकस्य तु यस्य राज्ये ।।४।।
समर्थतासारमभूत् क्षमित्वं, तारुण्यरूपोदयशालिशीलम् ।
विकत्थना वाड मुखमेव दानं, विवेकसङ्केतगृहस्य यस्य ॥४६।।
तस्य प्रियाऽऽसीत् सहदेव्यभिख्या, या गीतविद्येव विशुद्ध जातिः ।
आन्वीक्षिकीव प्रथितप्रमाणा, त्रयीव सुव्यञ्जितवर्णसंस्था ॥४७।।
लावण्यकिजल्कचिते यदास्य - पद्म विलास्यक्षिमधुव्रताली ।
रसावमग्ना न ततः शशाकोन्मक्त घनाज्जीर्णगवोव पङ्कात् ।।४।।
लक्ष्मीरिवोन्मीलितकान्तकामा, शचीव सौभाग्ययशोनिधानम् ।
ज्योत्स्नेव विश्वेक्षण सौधधारा, बभूव सीतेव पतिव्रता या ॥४६।।
यस्या: कटाक्षोद्भटपक्ष्मलाश्या', कक्षां जगाहे न कदापि रम्भा.।
निस्पन्दनेत्राम्बुरुहा वराकी, शिलातलोत्कुट्टितपुत्रिकेव
॥५०॥

सप्तमः सर्गः सा निजप्रभास्तोमपरीतमूर्ति-र्या दुग्धसिन्धून्मथनोल्लसन्त्याः । क्षीरच्छटाव्यास्ततनोहि लक्ष्म्याः, कीत्ति समना परिलुम्पति स्म ।।५१।। । शशी यदि स्यान्मधुपालियुक्तः, शिखण्डभारोधुरमम्बुजं वा। तेनोपमीयेत यदास्यचन्द्र, स्निग्धायतश्यामलवेणिदण्डः ॥५२॥ नृरत्नमूः सूनृतवाग्विलासा, योपित्स्वनन्यप्रतिमव यासीत् । काऽन्याऽथवा सिन्धुपु साधुमुक्ता, भुवा हि सहृष्यति' ताम्रपा ॥५३॥ सुसौम्यमूतिद्विषणाभिरामा - प्यनङ्गसङ्गिन्यपि राजकान्ता । या स्वर्णवर्णा महिषीति वित्ता - प्यासीदमन्दाप्यलसप्रयाता ॥५४॥ अनन्यसाधारणयौवनायां, तस्यो महौजाः समजायताऽसौ । स पुत्रभावेन सुराधिनाथः, पुण्योदयात् पुण्यसुधासरस्याम् ॥५५॥ चतुर्दशस्वप्नविलोकनेन, निश्चितानुत्तमपुत्रलाभा । लेभे प्रमोद नरनाथकान्ता, मृणालिनीवोद्भवदम्वुजन्मा ॥५६॥ महेभमिन्दुद्युतिमुच्चकुम्भ, कपोलगुञ्जन्मधुपोपगीतम । साक्षादिवरावतमास्यपद्म, निज विशन्त विशन्त शयिताऽऽलुलोके ।।५७।। एवं महोक्ष शरदीव पुष्टं, विषाणकोधुल्लिखिताम्बुवाहम् । भस्मच्छटावासुकिसङ्ग भीतं, माहेश्वरं यानमिवेयिवासम् ॥५८॥ स्वविक्रमं दातुमिवोदरस्थे, सलीलमाया तमुदारगात्रम् । पात्रं सहस्राशुमिवेद्धधाम्ना, शिरोललल्लूमलत मृगेन्द्रम् ।।५।। लक्ष्मी सुधौधेरभिषिच्यमानां, हस्तीन्द्रहस्तोद्धृतकुम्भमुक्त: । पाश्र्वद्वयेऽपि स्वयश प्रवाहै - रिव प्लुतानुत्तमकान्तिमूत्तिम् ॥६॥ सम्पद्यतामस्मदुपास्ति पूतं, श्रोत्रेन्द्रियस्यापि नितान्तकान्तम् । इतोव भूगरनुगम्यमानं, पुप्पत्र जोयुग्ममतीव दृश्यम् ॥६॥ एकान्ततेजस्वियोपतापी, माऽभूदय बाल इतीव चन्द्रम् । शोतप्रकृत्याश्रयिण विधातु, तमुद्यत स्व वदनं विगन्तम् ।।६२।। विना प्रतापेन न कार्यसिद्धिस्तमोपह रूपमितीव तम्म । बालाय सदर्शयितु स्वकोयं, सहवभानु विततोगभानुम् १६३॥ : १ पते ५२ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् विचित्रसद्रत्नमयं पताका - सहस्रहंसावलिचुम्बिताङ्गम् । ध्वजं स्वतुल्यध्वजलाभमुच्चै - बर्बालस्य नूनं लघु सूचयन्तम् ।।६४।। नीलोत्पलाध्यासितचारुवक्त्रं, रसौघसम्पूरितमध्यभागम् हैमं कुटं लोचनपूर्णचन्द्रं, श्यामास्ययोषित्कुचकुम्भ कान्तम् ।।६।। कश्मीरजालिप्तवधूमुखाना, बालातपालङ्कृतफुल्लपद्म: तरङ्गभङ्गश्च धनुर्लताया, लक्ष्मी हसच्चारुमहासरश्च ॥६६॥ रत्नाकरत्वेन विजित्य विश्वं, हर्षप्रकर्षादिव गजिताढयम् । दूरं समुल्लासितवोचिबाहुँ, पाथोधिनाथं परित: प्रनृत्तम् ।।६७॥ विमानमत्यद्भुतमप्यपूर्वां, मर्त्य श्रियं पश्यदिवाक्षिजालैः। अदत्तदृष्टिः सविधे मृगाक्ष्यां, कान्तोऽपि कान्तोऽत्र भवेत् कृतार्थः ॥६८।। रत्नाकरस्यापितरिक्तभावं, रत्नोत्करं निर्मलमद्रिकल्पम् । साक्षादिवोन्मीलितमर्भकस्य, पुण्योच्चय चक्रिसमृद्धिहेतुम् ॥६६॥ निर्धूमधूमध्वजमुल्लसन्तं, निवातदीप्तं नयनाभिरामम् । तेजस्विषु ज्येष्ठमशेषलोक - ससेव्यमादित्यमिवोदयस्थम् ॥७०॥ आदिकुलक चतुर्दशभिः। स्वप्नानिति प्रेक्ष्य निजाऽऽस्यपद्म, शेषे निशाया विशतो विचित्रान् । सा कौतुकाङ्कुरितचित्तभूमिः, प्रमोदफुल्लन्नयना प्रबुद्धा ॥७१।। तेषां निशम्याऽथ नरेन्द्रवक्त्रात, रत्नोत्तमानामिव चक्रनेतुः । चतुर्दशानां फलमेष्यदाशु, विश्वाद्भुतं सा मुमुदे नितान्तम् ।।७२।। स्वप्नागमाध्येतृवचोऽनुसारा - द्विनिश्चितानुत्तमचक्रिपुत्रा स्वं बह्नमस्ताऽन्यनृपाङ्गनाभ्यः, को वाऽऽप्तसम्पन्न भवेत् सदर्पः ॥७३॥ समुद्गमिष्यत्तपनेव पूर्वा, नभ'श्रीरिव चन्द्रगर्भा। तदान्तरोवेव पयोधिवेला, रराज सा भास्वरकायकान्तिः ॥७४।। समुच्छ्वसत्सर्वमनोहराङ्गो, गर्भानुभावेन बभूव राज्ञो । सुधावसिक्तेव लता भविष्यन् - महाफलाङ्गीकृतपोषलक्ष्मी ॥७५।। क्रमेण क्षीरविपाण्डुगण्डा, सुनिर्मलश्वेतमयूखभूषा । आकाशलक्ष्मीरिव सा विरेजे, मन्दं यती वेश्मनि दन्तिनीव ।।७६।। साय च सप्तमः सर्गः ५३ तथा कट्वम्लरूनितरां न तीक्ष्णैः, सर्वेन्द्रियाऽऽनन्दकरैश्च भोज्यः । पुपोष सा गर्भमनुष्णशीत - शय्याशया कोमलभाषिणी च ॥७७॥ यथा यथाऽदृश्यत बन्धुभिः सा, श्रमालसोत्थाननिवेशनेषु । तथाऽप्रीयत पूर्णसर्व कामैरिवोन्मीलितनेत्रपत्रः ॥७॥ नृपेण सम्पादितदोहदोघा, शुभग्रहेषूच्चपदस्थितेषु । बालस्य भाग्येष्विव भद्रकार्योन्मुखेषु धामातिशयान्वितेपु ॥७॥ ज्योत्स्ना निशीथेऽखिलदेहभाजा, स्वापाऽपदेशेन वितीर्णयोगे । शत्रूद्भवोत्तापभृतां हि बाला, तूणं ध्रुवं निर्वृतिसाधनाय ॥२०॥ द्वात्रिंशदुबुद्धसदङ्गलक्षणं, चतुर्थमुद्यद्रुचिचक्रवर्तिनम् । अरिष्टवेश्मागतसूतिसुन्दरी मुखाहितद्योतनमशुजालकः ॥१॥ सुखेन साऽसूत सुतं निजाङ्ग - प्रभापराभूतसमीपदीपम् । रत्नाकुर रोहणशैलराज-क्षितिर्यथा क्षुण्णमहान्धकारम् ॥२॥ चक्कलकम् । दिक्षु प्रसन्नासु तदीयचित्त - वृत्तिष्विवादर्शितविक्रियासु । समीरणेष्वप्यभितो वहत्सु, तद्वाक्प्रयोगेष्विव शीतलेपु ।।३।। तस्मिन्निव प्रोज्ज्वलधोरनादे, जयशङ्कयुग्मे । मुखेषु पद्मेष्वलिनादगीति - ष्वम्भोजिनीनामिव सुन्दरीणाम् ।।४।। समुच्छलन्त्या स्तनपीठ उच्चै, रहोगतौ व्यायतहारयष्टया। निरुध्यमानाऽपि बलाज्जगाम, काचिनृपं वर्द्धयितु कुमारी ॥८॥ विवयंसे देवसुतोद्भवेन, वेलोदयेनेव पयोधिनाथ.। प्राच्या इव श्रीसहदेविनाम्न्यास्तेजस्विसोव्याः प्रवरप्रियायाः ॥८६॥ आकर्ण्य कर्णामृतमेतदीय, वाक्यं नृपेन्द्रः प्रबभूव नाऽङ्गे। तोषस्तनूजप्रसरत्प्रभावः, प्राज्यगरिवत्योपचिताऽन्तरात्मा ॥८७॥ ददौ च तस्यै मणिभूषणावली, प्रसन्नदृग्दानपुरस्सरं नृपः । वाच च ता काञ्चन सा यया तया, तुतोष नवेतरया तथा तदा ।।८८|| अमोचयच्छाश्वतवैरिणोऽपि, कारागृहाच्छेपजनानिवासी। स नाऽऽददे प्राज्यमपीह शुल्क, देवस्ववत्तत्र दिने नृपेन्द्र ॥८६॥ नदत्यमन्द - ५४ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् नृपौकसो द्वारि सतोरणाभि - भेंजेतरां वन्दनमालिकाभिः । स्वपद्मपरिव निर्मिताभिः, श्रिया समाराधयितुं शिशु प्राक् ।।६०॥ संशोधिताः शुद्धिकरैश्च रथ्या, रजोविहीनाः सहसा बभूवुः । योगीश्वराणामिव मानसस्य, प्रवृत्तयो ध्यानविशेषलाभः ॥११॥ मार्गा असिच्यन्त च कुङ्कुमाम्बुभिः, सान्द्रैः सधूपैर्घनसारमिश्रितैः । तथा यथोच्छृङ्खलनर्त्तनेष्वपि, स्त्रीणां बभूवुर्न लसद्रजःकणाः ॥१२॥ सिन्दूररक्ताः प्रतिवेश्म रेजु-र्वातोद्धता रेजु-र्वातोद्धता मङ्गलवैजयन्त्यः । अदृश्यतत्पत्तनदेवताना - माच्छादनायेव धृताः सुपद्यः ॥१३॥ कस्तूरिकास्थासकरोचितालिकैः, प्रलम्बहारैर्युवभिनवांशुकैः तूर्याणि तुल्यं प्रहतानि तौर्थिक, राज्ञो गृहे पोरगृहेषु चाध्वनन् ॥१४॥ तथा समारभ्यत मङ्गलावलि-गृहे गृहे तत्र पुरे मुदा तदा । यथा न पुत्रप्रसव' स्म लक्ष्यते, कस्येति मुग्धप्रमदाभिरजसा ।।६।। रथ्यासु पुष्पप्रकरे रणद्भिस्तारं द्विरेफैः सहसाऽवियन्त । कलाः प्रभूता अपि किन्नराणा, सवेणुवीणाध्वनयोऽपि नादा- ।।६।। पट्टांशुकोल्लोचचितान्तराला, नरेन्द्र मार्गा. सुतजन्म मोदे। नूनं व्यराजन् परिधापिताः साक्, राज्ञा प्रसादीकृतचित्रवस्त्रैः ।।१७।। मुक्ताकलापा विपरिणष्वसङ्ख यकाः, स्वच्छा व्यभाव्यन्त विलम्बिराजयः । नक्षत्रमालामहमेनमीक्षितु, द्वीपान्तरेभ्यः समुपागता इव ॥१८॥ सिन्दूररेणुप्रकरैः प्रबद्धः, पिष्टातकैश्चोच्छलितं समन्तात् । प्रतापरिव शैशवेऽपि, प्रजानुरागैरिव वोत्सवेऽत्र ॥६॥ समुद्धतांह्रिक्रमबाहुदण्डैस्तत्ताण्डवं चक्रुरलं युवानः। व्यडम्बयच्चण्डतरं मृडानी - पतेः प्रवृत्त यदकाण्डवृत्तम् ।।१००॥ विलासिनीनां ललितानि लास्यान्यपाङ्गविप्रेक्षितसुन्दराणि । जजुः कुचाऽऽस्फालनदत्तहार - च्छेदक्रियाहासितकामुकानि ॥१०१।। ताम्बूलदानं वसनैर्न हीनं, हासेन शून्यं न विलेपनञ्च । तत्राऽभवत् प्रीतनरेन्द्रवर्ग - प्रकल्पित नागरसत्तमानाम् ।।१०२।। तस्य अष्टमः सर्गः ५५ श्रियं महैस्तैरदधाद्दिवोऽपि, ताम्बूललाभैरधिकां पुरं तत् । किं वा न पद्माद्वदन मृगाक्ष्या, धत्ते रुचं सातिशयां सुचित्रः ॥१०३।। दिने दिने चन्द्र कलेव मोदः, प्रवर्द्धमाना किल मासमेकम् । महोत्सवश्रीरभवज्जनानां, तुष्टिप्रदा मानसलोचनानाम् ॥१०४॥ अपि सकलधरायाश्चारुसङ्गोतलक्ष्म्यः क्वचिदपि यदि देवादेकत: सङ्घटेरन् । तदपि तनुजजन्मोत्सर्पिणो नोत्सवस्य , प्रतिकृतिमसमानस्यास्य दध्युः समग्राम् ।।१०।। इति युगप्रवरागमश्रीमज्जिनपतिसूरिशिष्यलेशविरचिते श्रीसनत्कुमारचक्रिचरिते कुमारोदयवर्णनो नाम सप्तम. सर्गः । छ । ७ । अष्टमः सर्गः शुभे दिनेऽथ स्वजनाय काञ्चने, विश्राणिते बन्दिगणाय कोटिशः । सनत्कुमारेति पदाभिधेयता, लेभे शिशु द्धकुलाङ्गनाजनात् ।।१।। पुत्रस्य सर्वाङ्ग मनोरमस्य, तस्याऽऽननाम्भोरुहमीक्षमाणः । योगीन्द्रगम्यां समवाप काञ्चिन्-मुदं निजोत्सङ्गगतस्य भूपः ॥२॥ कूर्चे कचाकर्पणमादधानः, सोनन्दयत् स्मेरमुखं नरेन्द्रम् । प्रियाहितं सौख्यद मेव वा स्यात्, कान्तापदाघात इवाऽपि वामम् ।।३।। तदास्यपद्म परिचुम्वतोऽस्य, परिचुम्वतोऽस्य, मधुव्रतस्यैव बभूव तृष्णातिरेकोऽभिमतानिवृत्ति , क्व सेव्यमानादपि वा सदा स्यात् ॥४॥ वचोऽपि तस्याऽस्फुटवर्णभेदं, सुधाममस्त क्षितिपः स्वकर्णे। स्वाधीनकान्तेव रुत पिकस्य, किं किं न मोदाय हि बाल कानाम् ।।५।। तन।

५६
सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम्
श्यामः
स्खलत्पदं क्रामति मन्दमन्दं, शिशाववष्टव्धकराङ्गुलीके ।
धाच्या धरित्रीपति राबबन्ध, दृष्टि नवे चन्द्र इवोदयस्थे ॥६॥
काकाद् ध्रुवं पञ्चगुणाजिघृक्ष, स काकपक्षं दधदुत्तमोऽपि ।
मूर्नाऽधमेष्वप्यनुवृत्तिरिष्टा, गुणार्थिनां नूनमिति स्म वक्ति ।।७।।
प्रवर्द्धमानश्च शशीव कान्तः, क्रमेण जग्राह कलाः समग्राः ।
द्विसप्तति सूचिततत्प्रमाण - सहस्रपूर्भेदसमीपलाभाम् ॥८॥
जिताऽनिरुद्धोऽपि कुमारभावे, वपु.श्रिया पुष्पशरं जिगीषुः ।
शिश्राय नूनं नवयौवनं स, नासाधना कापि यदिष्टसिद्धिः ।।६।।
पूर्णेन्दुभास्यप्यतिनिष्कलङ्क सच्छायमयप्यथ तस्य रेजे ।
कायोच्छलत्कान्तिजलोपरिष्टा - दुन्नालपद्मश्रिमुखं सुकण्ठं ॥१०॥
विरेजतुस्तस्य
विशालनेत्रे, शित्यन्तरे ताम्रविपाण्डुरान्ते ।
कर्णान्तविश्रान्तिपरे इवेषू, जगज्जयायाऽङ्गभुवा प्रयुक्त ॥११॥
सपुष्पस्ततवेणिदण्डस्तस्याऽऽबभौ लोचनचित्तहारी।
गोपीजनस्येव
वधूगणस्य, स राजहसो यमुनाप्रवाहः ॥१२॥
यद्यष्टमीयः क्षणदाधिनाथः, क्रान्तो भवेदजनबिन्दुनान्तः ।
तेनोपमीयेत ललाटमस्य, कस्तूरिकास्थासकचित्रगर्भम् ।।१३।।
कान्तिच्छटाऽऽच्छादितचार्वपाङ्गा - वपि प्रदत्ताधिकनेत्रशोभौ।
गण्डौ तदीयौ न हि चन्द्रपार्वे, चकोरयोति न चोयते श्री. ॥१४॥
नासा तदीया सरलोन्नता च, विस्तीर्णनेत्रोपगता सदाऽधात् ।
जगज्जयप्रस्थितमन्मथस्थो ल्लसत्पताकध्वजयष्टिलक्ष्मीम् ॥१५॥
औष्ठोऽप्यभाच्छोणमणिप्रकाशः, श्मश्रुश्रिया प्रापितकान्तकान्ति' ।
प्रवालविच्छेद इवेन्द्रनील - स्थलीनिवेशन विशेषदोप्तः ॥१६॥
तस्याऽऽवभौ श्मश्रुविनोलपङ्क्तिः, सौरभ्यपात्रं परितो मुखाजम् ।
भृङ्गावली नूनमपूर्वगन्ध - लुब्योपविष्टा प्रविहाय पद्मम् ॥१७॥
अंमस्पृशो तस्य सुसन्निवेशे, रराजतु: कर्णविलोलदोले ।
मृगेक्षणादृष्टिविलासिनोना-मन्दोलनायेव कृते
विधात्रा ॥१८॥

अष्टमः सर्गः ५७ रराज । शक्तित्रयं चारुगुणत्रयं च, राज्ये व्रते चाऽऽत्मनि सन्निधास्ये। इतीव रेखात्रितय स कण्ठे, वभार समूचयितु महात्मा ॥१६॥ वक्षःस्थले हेमकपाटकान्तौ, श्रीवत्सराट् तस्य विनीलरोमा । सुमेरुविस्तीर्णशिलोपविष्ट सत्कृष्णसारथियमाचकर्ष ॥२०॥ तस्यांसकुम्भी रुचिरौ सुपीनी, भातः स्म सौन्दर्यमुधारसेन । पूणों वधूदृष्टिचकोरिकाणा, तृप्त्यै धृतो चित्तभुवैव नूनम् ॥२१॥ गजेन्द्रहस्ताविव बाहुदण्डौ, मानस्य दत्तः स्म तरोरिवान्तम् । मनस्विनीनां हृदि विद्विया च, हेलाविलासोल्ललितौ तदीयौ ॥२२॥ पञ्चाननस्येव तनूदरं सद्वृत्तं महाशौर्यनिधे वक्ष स्थलीशैलशिलाभरेण, नितान्तमाकान्तमिवाऽस्य यूनः ॥२३॥ ऊरू तरुस्कन्धदृढौ तदीयौ, रराजतुः कुङ्कुमकान्तिचौरौ । यावस्य दिक्चक्रजये प्रशस्ति - स्तम्भश्रियं धारयत: स्म कान्तौ ॥२४॥ अपूर्वप’रुहकान्ति तस्य, पदद्वयं यत्र हि नाललक्ष्मोम् । जो विपर्यस्तचये तदूवं, सरोमिके चक्रमणेष्वधत्ताम् ॥२५॥ कि वणितैस्तस्य परैः प्रतीक - र्यदेकमप्यास्यमनर्घ्यमस्य । पयोतिधेश्चन्द्र इवाऽद्वितीयो, मणिमणीनामनणुप्रकाश. ॥२६॥ विडम्बितव्योममणिप्रकाश - श्चूडामणिर्मूर्द्धनि तस्य चाऽभात । प्रभाप्रदेशात् प्रचुरप्रतापै - राच्छादयन्नूनमिलाभृतोऽग्रे ॥२७॥ रत्नोच्चरच्चारुमरीचिवद्ध शक्रायुधद्वन्द्वमरोचताऽस्य । कर्णावतसद्वयमास्यचन्द्र मैत्र्यागतं युग्ममिवान्यदिन्द्वोः ।।२८।। मुक्ताकलापोऽपि तदीयकण्ठे, लुठनरोचिप्ट विभक्तमूत्तिः । वक्त्राब्जसौन्दर्यपयोधिनियंत् सुधाप्रवाहद्वितयानुकारो ॥२६॥ तस्याऽद्युतत् व्यायतबाहुशाखी, वंडूर्यकेयूरमयूरशाती। यत्र ध्रुव ज्ञातिविशेषयोगाद - नत्ति रामेक्षणनीलकण्ठः ॥३०॥ इत्थ महाश्चर्यकृदङ्गभाजः, कयङ्कारमसावनङ्गः। विगाहते स्म क्वचिदीक्षितः किं, नग्नं सुवेषण तुलां दधानः ॥३१॥ - कक्षा ५८ सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् मन्ये ॥३६॥ हेलासदारिसहस्रकण्ठ च्छेदैकवीरेण कुमारराजा। स्पर्धाप्यनङ्गस्य तपस्विनः का, कपालिनाप्याशु पराजितस्य ॥३२॥ संवीक्ष्य तं चन्द्रमिवाऽभिरामं, रामाः क्षणात् स्वेदमुचो बभूवुः । शशाङ्ककान्तप्रतिमा इवाक्षि - प्रस्पन्दवैमुख्ययुजः समन्तात् ॥३३॥ अपूर्ववीर्याश्रयिणश्च तस्य, श्रुत्याऽपि विख्यातपराद्धर्थसौर्याः । चकम्पिरे वैरिनृपाः सभासु, ग्रीष्मे निवातास्वपि लोलनेत्राः ॥३४।। जरद्गवी कामदुघा दृषच्च, चिन्तामणिर्दारु च कल्पशाखी । बभूव चिन्तातिगदत्तदानस्तस्मिन् कृतार्थीकृतविश्वविश्वे ॥३५।। विदग्धगोष्ठीष्वपि वाग्विलासः, सर्वातिशायी विससार तस्य । प्रसन्नगीर्दत्त निजानवद्य - विद्यौघसम्पूर्णतयेति दाक्ष्य-क्षमा-न्याय-वशित्वमुख्यास्तं शिश्रियुर्धामगुणा अधृष्यम् । सर्वे सम स्वीयपदेषु नूनं, प्रत्येकमुत्त्रस्ततयेव युक्ताः ॥३७॥ राज्ञः प्रजानां च मुदेकहेतु - रैधिष्ट कल्पद्रुमवत् स तत्र । कस्यैव किं स्यात् सहकारपाकः, प्रमोदपोषाय निसर्गकान्त. ॥३८॥ स्वीकारितानेककुटुम्बिनीकः, कुलव्यवस्थावशतः पितृभ्याम् । तथाऽप्यसौ तासु न सक्तचेता, अभूत् कलाभ्यासनिबद्धरागः ॥३६।। तस्याऽभवन्मित्रममित्रमत्त द्विपेन्द्रसिंहोऽथ महेन्द्रसिंहः । सौजन्यशौर्यावनिरुत्तमाना, निधिर्गुणानां भुवि राजबीजी ॥४०॥ यः सूरसूतोऽपि न पगुरासीत्, कालिन्दिकाजोऽपि न यो भुजङ्गः। समं कुमारेण विनीतशस्त्रो - ऽप्यधत्त रौद्रं परशु न जातु ॥४१॥ यस्याऽनुरागः स सनत्कुमारे - ऽत्यशेत यो लक्ष्मणरागमुग्रम् । रामे न सीमास्त्यथवा प्रशूढ-प्रेम्णो मृगाक्षीष्विव मन्मथस्य ।।४२॥ संयुगे शश्वददृष्टपृष्ठः, परैर्नरश्चन्द्र इवोपसर्पन् । सौम्योऽपि तेज:सदनत्वतः को-ऽथवेदृशः स्यात् परिभूतिपात्रम् ॥४३॥ वैदग्ध्यवन्धुः सदनं कलानी, कोलीन्यसिन्धुः पदमिन्दिरायाः । एकोऽपि योऽसङ्खयगुणाश्रयोऽभूत्, पटो यथाऽऽच्छादितविश्वगुह्यः ॥४४॥ यः अष्टमः सर्गः ५४ पद्माकरेणेव सरो वसन्ते, यः पुष्पवाणेन यथा वसन्तः । लीलाचयेनेव च पुष्पबाणो, व्ययुज्यत प्रेमभरान्न तेन ॥४५॥ प्रेक्षासु गोष्ठीषु गृहे बहिर्वान्वियाय यः स्वप्रतिबिम्बवत्तम् । प्रेम्णा वियुज्येत हि चक्रयुग्मं, किं कहिचित् स्वात्मवशं दिवाऽपि ॥४६॥ सङ्खयाद्विषः सन्त्यपरे वयस्या, अस्याधिकं किन्तु महेन्द्रसिंहे । प्रेमान्यपुष्टस्य वनप्रियत्वे-ऽप्याऽऽने पर कोऽपि हि पक्षपातः ॥४७।। कदाचिदुन्मत्तगजेन्द्रयुग्म मन्योन्यदन्तप्रहतिप्रचण्डम् सोऽयोधयत् मध्यधृतोरुरोधं, सक्रोधमूर्वीकृतचण्डशुण्डम् ॥४८॥ अश्वीयमुटयं गतिपञ्चकेन', स्वेदच्छलोच्छालितमध्यतेजः । सोऽवाहयद् वायुजवं महौजा, वेगेन गाढासनबन्धधीरः ॥४६।। विव्याध राधां दृढमुष्टिदृष्टि-र्धनुर्धरः क्वापि सहेलयैव । मृगाधिराजस्य हि कुम्भिकुम्भ-भेदेन्यदुःखेऽपि कियान् प्रयासः ॥५०॥ सलीलनृत्यत्पणयोषिदङ्ग - हारप्रभेदप्रथितोरुकामा । प्रेक्षाः कटाक्षेक्षणरङ्गशाला, प्रैक्षिष्ट सोऽव्यग्रमना विलासी ॥५१॥ कदाचिदुद्यानगतः सहासं, खेलनधात् पुष्पशरस्य लक्ष्मीम् । पुष्पेषुभिस्ताडितहास्यवल्गद् - विदग्धकान्ताहृदयः स कामी ॥५२।। अङ्गावनामोन्नतिबन्धमोक्ष - निष्णाततेजस्वितरस्विमल्लः । साद्धं कलालङ्कृतवज्रकाय - श्चके नियुद्धश्रममेकदाऽसौ ॥ ५३॥ धर्मश्रुतौ यौवतसङ्गमे च, द्रव्याने च क्रमते स्म धोमान् । त्रिवर्गसिद्धौ न हि राजबोजो, योग्यो भवेत् क्वापि निरुद्यमः सन् ॥५४॥ प्रवर्त्तमानः करियोधनादा-वप्येष सौम्य परिदृप्टमानः। ददौ वधूनां नयनप्रसाद, नानाफला यत् कृतिनां प्रवृत्तिः ॥५५॥ तस्याऽनुरक्तस्य च नीतिवध्वां, कीर्त्यङ्गनाऽत्यन्तविमानितेव । अशिथियद् दूरदिगन्त राणि, सुदुस्सहो हि प्रतिपक्षमानः ॥५६॥ १. पास्कन्दित, पोरितक, रेचित, वलिंगत, प्लुत गतयोऽमु. पञ्चपारा: ।

६० सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् प्रजानुरागं गुणसङ्गमं चावेक्ष्य क्षितीशोप्युपमानबाह्यम् । तस्याऽवदत् मन्त्रिवरानिदानी, युक्तात्र पुत्रे युवराजलक्ष्मीः ।।५७।। सर्वेऽप्यमात्या अपि तस्य वाक्यं, तथेति सम्यक् प्रति शुश्रुवासः । चक्रुः प्रमोद नृपमानसस्य, छन्दोनुवृत्तिर्हि मुदे न कस्य ॥५८।। प्रोचुश्च ते देव किमन्यथा स्याद्, दृष्टि: कदाचित् सुविवेकभाजाम् । भवादृशां नैव विपर्ययो यद्, गङ्गाप्रवाहस्य गतौ कदाऽपि ॥५६॥ नीतिः क्वचित्तत्र भवेन्न शौर्य, धैर्य क्वचित्तत्र भवेन्न रूपम् । विशुद्धनिश्शेषगुणाधिवासः, कुमारवत् कोऽपि न दृश्यतेऽत्र ।।६०॥ सत्स्वप्यसाधारणसद्गुणेषु, पुण्योदय' कार्यगतो गरीयान् । अत्रैव सुस्वप्नविलोकनाये - लिङ्ग. परैः स प्रथित पुराऽपि ॥६१॥ तद्यौवराज्ये विनिवेश्यता स्राक्, सूनुः समर्थश्च जनप्रियश्च । न लभ्यते स्वर्णमहो सुगन्धि, सन्नद्धमूत्तिर्मूगनायको वा ।।६२।। ततः समाहूय कुमारराज, राजाऽऽदिदेश प्रणयप्रगल्भम् । वत्स ! प्रजापालनमेव धर्म., क्षोणीश्वराणां प्रथम प्रतीत. ॥६३।। कुलक्रमादेव विधीयतेऽसा - वस्माभिरुत्त्रासितशत्रुपक्षैः। तथापि शक्तेरनतिक्रमेण, त्वयाऽपि तत्र क्रियता प्रयत्नः ॥६४॥ प्राज्ञोऽपि नाभ्यासमृतेऽपि राधा-वेध विधत्ते वशितां हृदो वा । तन्मन्त्रसिद्धेरिव पूर्वसेवा, राज्यस्य सन्धेहि कुमारभावम् ।।६।। दुष्टाऽक्षमित्वं नयशालिता च, द्वयं तदङ्ग सहजं च तत्ते । सशिन प्रावृषि नर्त्तनं चानुशिष्यते केन नव शिखण्डी ॥६६॥ किन्त्वन ! तारुण्यमरण्यवह्नि - विवेकतृष्णाप्रसरस्य दीप्त. । सदेन्द्रियार्थास्तु शुभप्रवृत्ते - विबाधका राहुकरा इवेन्दो ॥६७।। दुष्टद्विपोच्छृङ्खलचेष्टितानि, समर्पितापंदि वतेन्द्रियाणि । मनोवनौका अपि पक्ष्मलाक्षी, लताविलासोत्सुक एव लोलः ॥६८।। स्त्रियोऽपि साक्षान्नरपक्षिपाशा, द्यूतानि कूटानि धनणकानाम् । खला. खलीकारपदानि नीते, शचीपतेरप्यवशैव लक्ष्मीः ॥६६॥ - .

अष्टम. सग:
६१
कामोऽपि दुरितरः पिशाचः, क्रोधोऽपि योघः समदो बलीयान् ।
हर्षश्च दारिद्रयमिवाऽतितुच्छ - भावप्रदः स्यादनिश प्रवृत्तः ।।७०।।
दुष्पूरगर्तप्रतिमोऽत्र लोभो, मानो गुरुष्वप्यपमानदी।
इति प्रभूतारिवशः कथं स्यात्, सुखी सुविद्वानपि जीवलोके ॥७१।।
तद्वत्स ! निष्पयश.प्रियेण, षड्वर्ग एष प्रथम विजेयः ।
नाध्वंसिते सतमसे प्रकाश , प्रवद्धर्यते. यद्भुवि भानुनाऽपि ॥७२॥
यदेष सर्वव्यसनप्ररोहः, प्रोन्मूलिते चाऽत्र न सङ्घटन्ते ।
दोषा हि तारुण्यवशित्वमुख्या, न कार्यसिद्धिर्यदकारणा स्यात् ।।७३।।
ज्ञानाङ्कुशेनाऽऽत्मवशो विधेयः कुमार्गगो यौवनमत्तदन्ती।
न जातु लब्धप्रसरो भुजङ्गः, क्षेमाय कस्याऽपि महाविप: स्यात् ।।७४।।
विदग्धमप्यात्तसमस्तवित्तं, निष्ठयूतलीलामविरोपयन्ति ।
यास्तासु रम्यास्वपि पण्ययोषित्स्वासज्यते
केन विचक्षणेन ॥७॥
विपाक्तबाणप्रतिमः पर यः, समूलकाषं कषति क्षणेन ।
ससर्गतोऽसौ व्यथको मुखेन, कर्णेजप: कैः श्रियते सकणे ॥७६।।
यासु प्रमोदेन विसारिताक्षः, सदृष्टिरप्यन्धतुलां भजेत ।
कामेन नूनं हृतलोचनत्वात्, तास्वायताक्षीप्वनुरज्यते क. ||७७।।
विमृश्यता वत्स । कथैव तस्य, शूरेषु का यः सुभट: सदङ्ग ।
नग्नाटभर्गक्षतपौरुषेणा - ऽनङ्गेन जीयेत
जगद्विनिन्द्यः ॥७८॥
अपि प्रवृत्ति कुरुते न धन्यो, द्यूतेऽपि नासादि विनाशरे ।
इहैव सन्दर्शितनारकोरु - दुखे क्षुदम्बुप्रतिपेधनाग्न्यः (ग्यः) ।।७।।
उत्नस्तनश्यद्घनजन्तुघात
प्रदत्तपापद्धिमपास्तकीत्तिम् ।
प्रदीक्षितो हन्तुमरीन् रणान्,ि पापद्धिमप्युत्सृजति प्रवीरः ॥५०॥
उच्छृहल वाजिवदिन्द्रियं भवे - देकैकमप्याशु विपनि बन्धनम् ।
पञ्चापि तादृ शि तु तानि पावकाद्, दाह ध्रुवं कोटिगुणं ददत्यहो॥१॥

६२ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् अनारतं नीचगतिप्रसक्तया, गाम्भीर्यराशेः सुतयाऽपि पापया। वाच्यत्वमानायि पिता यया श्रिया,तयाऽपि माद्यन्ति कथं विवेकिनः॥२॥ अश्वादयो ह्यल्पधियाऽपि दम्या-स्ततो न तेषां दमनेऽपि कीतिः। इतीव धन्या दमयन्ति चेतः, सुदुर्दम शेषजनैः सदा यत् ।।३।। मनोरथेनाऽपि पराङ्गनाया, निपातयत्याशु स विक्रमोऽपि । लकेशवत्स्वं नरकेऽतिघोरे, तेनाऽन्ययोषां सुधियस्त्यजन्ति ।।८४॥ तत्पुत्रपुत्रीयितविश्वविश्वः, सौजन्यपण्यापणतां भजेथाः । दौर्जन्यपर्जन्यभिया सूदूरं, नश्यन्ति यन्मानवराजहसाः ।।८५॥ प्रजानुरागः परिवर्धनीयस्त्वया सरिन्नाथ इवोडुपेन । न हि श्रियस्तद्विकलस्य राज्ञो, भवन्ति भोगा इव दुर्गतस्य ।।६।। सन्न्यायनिष्ठः सदयो भव त्वं, प्रजानुरागाय यथैव रामः । यदेतदूनः स्वयशःकुलादेः, सम्पद्यते रावणवत् क्षयाय ।।८७॥ पराक्रमः सर्वगुणेषु राज्ञां, शस्यो विहङ्गेष्विव वैनतेयः । प्रकृष्टभावाद् विकला हि तेन, तृणादपि स्युर्लघवो नरेन्द्राः ॥८॥ धैर्यक्षमावैनयिकाऽऽर्यचर्या-मुख्यान् गुणान् स्वात्मनि सन्निदध्याः । उच्चै:पदाय स्तनपीठशय्या, हारोऽपि नाऽऽप्नोति गुणापवृक्तः ।।८६॥ किं भूयसा वत्स ! तवोदितेन, नैसर्गिकासङ्खयगुणस्य मूलात् । किं चन्द्रमा केनचिदद्य पाण्डु-विधीयतेऽन्येन सदाऽवदात. ॥१०॥ तत्कार्यमार्याचरितेन कार्य, त्वयाऽधुना ब्रह्माण्डभाण्डं पयसेव पूर्ण, येनाऽऽदधासि स्वयशोऽमृतेन ॥६॥ इत्यादि सप्रेमसमग्रमन्त्रि - प्रजासमक्षं क्षितिपोऽभिधाय। विनम्रवक्त्रं विनयात् त्रपायाश्चारोप्य भद्रासनभूधरेन्द्रे ॥१२॥ ध्वनद्भिरत्युद्भटनादतूयः, स्फूर्जद्यश:श्रीपटहैरिवाऽस्य । तं सर्वमङ्गल्यविधानपूर्व, निवेशयामास यौवराज्ये ॥३॥ सद्गुणवल्लभेन । स युग्मम् नवमः सर्गः ६३ शीतांशुः शरदेव पद्ममलिनेवेन्दुातेवाम्बरं, हारेणेव कुचस्थलं पिकरतेनेवाऽखिल काननम् । हसेनेव सर: स्मरस्मितविलासेनेव मुग्धानना, रेजे राजसुतः प्रजाप्रमदनोऽसौ यौवराज्यश्रिया ॥१४॥ इति युगप्रवरागमश्रीमज्जिनपतिसूरिशिष्यलेशविरचिते श्रीसनत्कुमारचक्रिचरिते यौवराज्याभिपेको नामाष्टमः सर्गः । छ ।। नवमः सर्गः इवादिकोल ॥२॥ प्राप्य श्रिय तामधिकं व्यराजद्, राकामिवाऽखण्डतनुः शशाङ्कः । ऐधिष्ट हर्षेण सह प्रजानो, महोऽपि सर्वत्र पुरेऽथ तत्र ॥१॥ भूपोऽपि तत्रापितराज्यभारः, सुखी मनाक् संववृते चिराय । क्षोणीसमुत्क्षेपसहेऽहिराजे, घरानिघृष्टांस ततो महाराजकुमारकाभ्यां, समञ्जसं जात्यतुरङ्गमाभ्याम् । सम वहद्भयामिव कल्पितार्थ-प्रसाधको राज्यरथो व्यवायि ॥३॥ उज्जम्भिताम्भोरुहचारुवक्त्रो, नानासुगन्धिप्रसवाभिरामः। वनप्रियाकूजितकान्तगीति कामुकवद्वसन्त. ॥४॥ पुष्पेषु सर्वेष्वपि दत्तहासः, कामिप्विवाधीननिजप्रियेपु। मरुत्प्रणुन्नासु लतासु लास्यं, यच्छन्नशेषाष्विव कामिनीषु ॥५॥ स निर्मलेन्दुद्भटमीनकेतु प्रगल्भमित्रो जगदप्यजषोत् । सविष्णुभोमः सकलं किरीटी, यया कुरूणां बलमुग्रवामा ॥६॥ युग्मम् । रथागमत् ६४ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् समुन्मिमील स्वत एव तत्र, शृङ्गारयोनिर्जनमानसेषु । सरस्सु पद्मोघ इव स्वभावो, नाऽपेक्ष्यते कारणमङ्गबाह्यम् ॥७॥ सनत्कुमारोऽपि महेन्द्रसिंह मुख्यैर्वयस्यैरुडुभिर्यथेन्दुः । विराजमानस्तुरगाधिरूढः, सहस्रश पौरजनविदग्धैः ॥८॥ उच्चैःश्रवाः किं भुवमागतोऽयं, शक्रेण भक्त्या प्रहितः कुमारे । सूर्यस्य रथ्यः किमु वाङ्गरौक्ष्य-लोभेन नेत्रक्षणदोऽवतीर्ण. ॥६॥ इति तर्यमाणमनिलोल्लासिगति प्रवरलक्षणनिवासम् । समुपारुरोह तुङ्ग, तुरङ्गम जलधिकल्लोलम् ॥१०॥ त्रिभिविशेषकम् । अन्तःपुरेणाऽप्यनुगम्यमानः, पुराद् विनिर्गत्य स सैन्यराजिः । उद्यानमापाह्वयदेनमारान्नूनं रवैरुन्मदकोकिलानाम् ॥११॥ विलासिनीनामिव पुष्पभाजां, वासन्तिकानामुपगृहनानि । दृढानि पुन्नागविटाः परापुर्यत्राऽनिशं तन्मकरन्दकाख्यम् ।।१२।। युग्मम् । सा श्रीर्या स्वैर्वयस्यैः सह समुपनता भुज्यते ताम्रचूड - न्यायेनाऽन्तःप्रसर्पद्बहलमदभरैः स्वैरसंवल्गिताढय । पौरैरन्त पुरैरित्यभजत सवयोभिश्च तत्कानन स , श्रीमान् कामी कुमार. सुरपतिरिव सन्नन्दन नन्दनं साक् ॥१३॥ रन्तुं प्रवृत्ते रभसात् कुमारे, समं वयस्यैर्वनितागणैश्च । तत्राऽवदन्मागधमौलिरेको, वसन्तमुद्दिश्य सनत्कुमारम् ।।१४।। देवेदानी वहन्ति त्वदरिमृगदृशा चम्पकान्यास्यलक्ष्मी , सन्नद्धानि द्विरेफैस्तदशुभचरिताकीतिशोभैः समन्तात् । मजीरभ्राजिकान्ताचरणहतिमतेऽप्यात्तहासातिरेकः, रक्ताशोकः प्रतापैरिव तव बहलैर्भूतलं भाति कीर्णैः ॥१५॥ प्रतिवनमलिनादापूर्वगीतिप्रसक्तः स्थिरतरपदगत्या वाहनैणस्य नूनम् । मलयजतरुसङ्गोद्गन्धयो मन्दमन्दं, मलयगिरिवयस्या वायवोऽमी वहन्ति ।।१६।।

नवमः सर्ग: ६५ प्रसक्ता श्रीखण्डाश्लेषमाद्यद्विषधरगरलोद्गारगाढानुषङ्गान् , मन्ये मूर्छातिरेकं ददति विरहिणां हारिणोऽमी समीराः । आनन्द निराम्भ कवलनकलनान्निध्नकान्ताकुचाना , देव! त्वदृष्टिपाता इव रिपुवपुषां भक्तिभाजां च तुल्यम् ।।१७।। पापान्यस्मन्निरोधे प्रहसितवदनान्याविरासन् न्यस्मन्मित्राम्बुजन्मद्विषति च शिशिरे चन्दनौघासहिष्णौ । कुन्दानीति प्रहन्तुं दददिव परमास्कन्दमाबद्धरोषो , धावत्याक्रान्तविश्वस्त्वमिव रिपुनृपान् मारुतो दाक्षिणात्यः ॥१८॥ पुनरपि मधुमासो दुर्लभः कामकेली वसतिरिति निरस्तद्वन्द्वमालिङ्गनेभ्यः । क्षणमपि न विरेमुः कामिनः कामिनीनां , रिपव इव तवान्तस्तापसरलेषणेभ्यः ।।१६।। मधोः स्वमित्रस्य विधुविलोक्य, लक्ष्मीमिवोनिद्ररुचिर्बभूव । तवेव विस्फारित करवाक्षः, पद्माभिरामस्य महेन्द्रसिंह ॥२०॥ नानाप्रसूनोच्छलितः परागेरुद्धूलित काननमद्य भाति । जगज्जयायोद्यमिनः स्मरस्य, नृपस्य नूनं बलरेणुपूरै ॥२१|| कान्तावक्त्राव्जवान्ताद्भुतमधुरमधूद्गन्धिगण्डूषसेके नेवोज्जम्भप्रसूना किरति विरहिणां मानसं केसरालो। रक्तश्यामातिपाण्डुप्रसवकचितः सदधातीश ! भास्व - नानारत्नोज्ज्वलस्य स्फुटितकुरबकस्त्वत् किरीटस्य कान्तिम् ।।२२।। विदधति सहकाराः कोकिलाकूजिताना , द्विगुणतरकलत्वं स्वप्रवालप्रदानः। श्रितजनविषय. स्यादुव्रताना तवेव , प्रवरतरसमृद्धिस्फातये पक्षपातः ॥२३॥ कि कामेन प्रयुक्ताः शितिदल गुलिका वश्यताय जनानां , किं वा कालेन दप्ट्रा कवलयितुमिमा व्यजिता विप्रयुक्तान् ।

६६ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् स जातः । किं वा बीजानि वृक्षस्तमस उपहितान्येवमाशयमाना , मन्येऽकीतिप्रतानाः प्रतिवनमलयस्त्वद्विषां सञ्चरन्ति ॥२४॥ विष्वक्सञ्चारिमत्तस्मरविजयगजस्फारदानाम्बुगन्ध - च्छायामेलाफलानि स्फुटनपरिमलोद्गारतः संवहन्ति । देव ! त्वत्कोतिपुष्पस्रगुदितमधुरामोदलीला परां वा, को वा नानेकलक्ष्मीक्षितिरिह भवति प्रौढपुष्यद्गुणाढ्यः ॥२५॥ मदनवनिताङ्गश्लिष्टवत्पुष्पपूर्णः कुरबकतरुरुच्चैर्नीचकोऽप्यद्य कुसुमसमयधाम्नाम्नातमप्यन्ययोगात् त्यजति हि निजवृत्त सत्वर प्रायशोऽल्पः ॥२६।। विभाति नवचम्पकस्रगुपविष्टभृङ्गावलि', प्रियाकरसमर्पिता तव विशालवक्ष स्थले । वसन्तवनसम्पदा त्वदवलोकनाय ध्रुवं, समीपतरवर्तिनी दृगुपसर्पिता कौतुकात् ॥२७।। प्रियाशिरसि शेखरो व्यरचि सादरं यस्त्वया मुदा वहति साऽथ तं त्रिजगतो महामानिनी , हि प्रियतमाजनो निजपतिप्रसादाद्वरा- ममर्त्यपतितामपि स्वहृदि मन्यते सम्मदात् ॥२८॥ पादोलिता यद्भवतैव दोलारूढप्रियागाढतरानुरागात् । तत्तत्सपत्नीवदनानि जजुः, श्यामानि मानो हि सुदुस्सहोऽरौ ॥२६॥ रामा हि दोलासु समुच्छलन्त्यः, समीपगा आम्रगकोकिलानाम् । गायन्ति यत्तेन तदङ्गनानां, विपक्षकालुष्यमुपानयन्ति ॥३०॥ ईषद्गलत्पीनकुचावृतीना, दोलासु लोलासु पुराङ्गनानाम् । विलोकनं लोलदधोशुकानां, क्षणोऽभवत् स्वर्गसमो विटानाम् ॥३१॥ अभ्यासभाजं सहकारमेषा, वासन्तिका पुष्पवती श्रयन्ती । उत्कण्ठयत्याशु सभर्तृकाणां, तथैव संश्लेषविधी मनांसि ॥३२॥ न

नवमः सर्ग:
६७
ते
वसन्तराजस्य वनश्रिया मा, समागमे सम्प्रति वर्तमाने ।
पलाशराजिः कुसुमावृतत्वात्, कौसुम्भवस्त्रेव विभाति नृत्ता ।।३३।।
इति प्रियालापिनि मागधेशे, प्रसन्नमालोक्य कुमारमेका ।
प्रियासखी मागधिकाऽर्द्धवृद्धा, पपाठ माधुर्यवदेवमुच्चैः ।।३४॥
शरीरिणां ह्लादकरः शशीव, केलेरनङ्गस्य विलासगेहम् ।
अनन्यसाधारणकार्यकर्ते त्याश्चर्यचर्यानिधिरेप कालः ॥३५॥
प्रलिनिनदकलानि स्रस्तशीतार्दनानि ,
त्रिदशनिलयलीलासृजि
नित्य धरायाः
सरसिरुहविकासाधानदक्षाण्यहानि
क्षतशिशिरकलान्येतानि
तर्जयन्ति ॥३६॥
हृष्टोऽपि चास्या वचनेन हास्यान्, न्ययुक्त चेटी पठितु कुमारः ।
साप्यप्रगल्भाप्यपठन्नि देशात्, तस्या विलङ्घया स्वविभोर्यदाज्ञा ॥३७॥
हेमन्त विच्छायितबन्धुशोका दिवाप्यमालिन्यमिहाम्बुजानि ।
सतेजसं तं हि विलोक्य नून, शोभां भजन्ते वनितननानाम् ॥३८॥
गीतैः सपानैः कुसुमौघहासः, काव्यैः कथाभि सुविलासिभोगः ।
दोलाविलासैश्च वन मनोजः, कान्ति जयत्येतदहो ! दिवोऽपि ॥३६।।
उत्तेजयत्यश्वकदम्बक नो, भास्वान् वसन्तोत्सवके लिलोल ।
एतद्वन नूनमय ह्यहास्यन्, महान्ति तेनाद्य दिनानि नाथ ! ॥४०॥
श्रुत्वेवमस्या वचनानि मागधी, सहस्ततालं युवराजमब्रवीत् ।
मूर्ना विहीना तव पण्डिता ध्रुवं, मूर्द्धन्यहीनं कयमन्यथा वचः ॥४१।।
ततः सहासे सकलेऽपि लोके, विचक्षणा मागधिकेऽतितुष्टे ।
चेटी विलक्षाप्यवदत् सकर्णा, भद्रं किलास्या अपि वीक्ष्यते नो ॥४२॥
अनोप्ठवक्त्रा यदिय वराकी, सभास्वयोग्या विदुपा नृपाणाम् ।
प्रोष्ठयस्य वर्ण्यस्य न जातु गन्धो-ऽप्यस्या वचस्यस्ति बृहद्रदायाः ।।४।।
सर्वेषु तत्र प्रतिभावतोय - मिति स्तुवन्तु प्रमनाकुमारः।
विद्वत्सु तस्य व्यतरत् समग, तग्नं निजाङ्ग शुभभूषणोधम् ॥४४॥

- ६८ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् , - रत्वा नानाविनोदैरिति दिनमखिलं प्रेमवैदग्ध्यसारः प्रस्थास्नी स्वं पुरं-प्रत्यभिनवमदने साङ्गलोले कुमारे । जात्येष्वारोपितोद्यत्कनकपरिकरेष्वश्ववृन्दारकेषु, स्वस्वामिभ्यो नियुक्तः सपदि च समुपस्थापितेष्वस्थिरेषु ॥४५।। अश्वं जलधिकल्लोलं, वायुलोलं समुन्नतम् । लघुकर्णं विशालोरः, पीठं, वक्रितकन्धरम् ।।४६।। कोमलं रोमसु स्थूलकं पिण्डयोः,पाण्डिमाडम्बरैः क्षीरधेः सादरम् । पृष्ठदेशासन श्यामरत्नांशुभि-भूषयन्तं धनैश्चक्रवालं दिशाम् ॥४७।। काञ्चनालङ्कृतिभ्राजितग्रीवक, शारदं वारिदं विद्युतेवाङ्कितम् । वलिगकानेकरत्नांशुसम्पादित - व्योमचित्रांशुकोल्लोचकौतूहलम् ॥४८॥ भिद्यवच्छोभनावतसंवर्गितं, कीर्तिपुजानुकारिस्फुरच्चामरम् । प्रान्तरेणेव चाध्यासितं तेजसा, सर्वतः फाल विस्फोटितक्ष्मातलम् ॥४६॥ आरुरोहामलस्थूलमुक्तास्रज - च्छायया धौतदिग्वामनेत्रामुखः । यौवराज्याभिषिक्तः स्वमित्रैरसौ, राजपुत्रः समं भूरिभिर्भोगिभिः ॥५०॥ षड्भिः कुलकम् । चपलतया तैर्वायुवेगेन गन्तुं , निजनिजवरवाहा: प्रेरिताः कौतुकेन । रणशिरसि सरोषेर्धन्विभिः पत्रिपूगा इव सममतिजग्मुर्भूयसा रंहसा ते ॥५१॥ तुरगखरखुराग्रक्षुण्ण आसीद् भुवेणु - प्रकर इनकरोघस्यापि धाताशु नूनम् । युवनृपवनिताना स्पर्शनं मा स्म कार्षीत्, स इति झगिति.सान्द्रः कञ्चुकीवातिभक्तः ॥५२॥ फणिपतिफणराजिभ्रश्यदुद्रश्मिरत्ना स्तृतततवलिसद्मप्राङ्गण तत्र तूर्णम् । धरणिरपि चकम्पे सूचयन्तीव शोकं , स नृपनगरलोकस्याशु सम्पत्स्यमानम् ॥५३॥ प्रथ -

नवमः सर्ग:
६६
गगनमपि निनादे बन्दिना तूर्यकाणा -
मिव कवचयति द्राक् सैनिकानां च तारे।
युवनृपतितुरङ्गः सिन्धुकल्लोललोलः,
सपदि दिवमभाक्षीत् तार्यवत् स्वामिवाही ॥५४॥
समभवदथ तत्र क्षोणिपालाङ्गजानां ,
तुमुल उरसि दाहः श्रीकुमाराङ्गनानाम् ।
नरपतिरपि शोकश्वासशकुद्वयेनो -
दलितहृदयभूमिस्तूर्णमागात् ससैन्यः ॥५५॥
किं नीतो वायुनाऽसौ किमुरगरिपुणा श्रीपतिभ्रान्तिभाजा
किं वा विद्याधरेण स्वसुतविरहिणा तादृशस्तभ्रमेण ।
किं दुष्टव्यन्तरेण त्रिदशपरिवृढेनेjया वाऽतिकान्तः
कान्ते कोपात् कयाचिद् विबुधललनया लोलया वा रतेपु ।।५६।।
"
सशोके ।
इत्याद्यनल्पकुविकल्पविसारिजल्प
गर्भानने निखिलपौरजने
स्रस्तालकालिककलङ्कितवक्त्रचन्द्र
चान्तःपुरेऽश्रुततिपातितपत्रलेखे
,
॥५७॥
महेन्द्रसिंहेऽपि विवृद्धमन्यु ज्वलच्छिखिस्फोटितचित्तवेणी।
नृपो बभाषे धुरि धैर्यसीम्ना, स्थितः समक्ष वचनं जनानाम् ॥५८।।
त्रिभिविशेषकम् ।
नासौ केनाऽपि नीत. क्वचिदपि न गतः किन्तु मद्भाग्यशाखी,
विच्छिन्नो मूलतोऽद्य ध्रुवमिति पतितं तत्फलं श्रीकुमारः।
सत्स्वेवाऽन्येषु सर्वेष्ववनिपतिसुतेपूद्भटेप्वप्यदृश्यः
कस्माज्जज्ञेऽन्यथाऽयं परिकुपित इवोन्मुक्तमित्रादिवर्गः ॥५६॥

७० सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् कि, तत्सम्प्रत्याकुलैरप्यपगतसुकृतैर्मादृशेराप्यते यामिन्यां सोऽन्तरुद्यद्विरहहुतवहैश्चक्रवाकैरिवार्क. । अप्युद्गच्छेत् खरांशुनिशि न तु कुशलं कर्म केनाऽपि शक्यं, सन्धातु जातु सद्य स्त्रुटितमिह सुरेणेव कान्त निजायुः ।। इति युगप्रवरागमश्रीमज्जिनपतिसूरिशिष्यलेशविरचिते श्रीसनत्कुमारचक्रिचरिते कुमारापहरणो नाम नवमः सर्गः । छ.। 8 । दशमः सर्गः हिमोपप्लुतपद्मौघश्रीविडम्बिभिराननै. पुरं प्रविविशुः पौरास्तदुदन्तं विना कृताः ।।१।। सप्रेमाणोऽपि ते तत्र, कत्तु किञ्चिन्न चक्षमः । विधाविवोपरक्ताने नक्षत्राणीव साहसम् ॥२॥ सिंहा इव क्रमभ्रष्टा धन्विनो वाऽच्युतेषवः । लक्ष्याद्यथा तथा तस्थुर्विलक्षा राजबीजिनः ॥३॥ अवरोधोऽपि रुद्धान्तमन्युरासीद् विनिश्चलः । चित्रापित इवोन्मीलनेत्रानुमितजीवितः ।।४।। वाचोऽपि नोपससृपुस्तत्र तस्याऽतिदुःखिनः । तीवाशनिविनिर्घातघातितस्येव उद्योगं तदन्वेषे प्रारेभे नरपुङ्गवः । मृगेन्द्रा इव कृच्छ्ऽपि सत्त्वसारा हि सत्तमाः ।।६।। सर्वथा ॥५॥ तु तदन्वेषे

दशम सर्गः
७?
-
सैनिकानादिदेशाऽसी तस्य लाभे पटीयसः ।
जानक्या राघवाधीशस्तारापतिभटानिव ॥७॥
प्रवर्द्धमानधामासावुदीची प्रति चात्मना।
भास्वानिव मधौ शश्वन्मुक्तजाड्यसमागमः ।।८।।
वृतः पत्तिसमूहेन तेजोराशिविराजिना।
ग्रहराजिश्रिया भूपः प्रतस्थे धैर्यशेवधिः ।।६।।
युग्मम्
महेन्द्रसिंहस्तं तत्र व्यजिज्ञपदनाकुलः।
गमनाय प्रभो भक्ताः कृच्छे हयात्मनिवेदिनः ।।१०।।
मयि सत्ययमायासः साम्प्रतं न तव प्रभो!।
किमस्यति तमोनूरौ यतेत स्वयमशुमान् ।।११।।
न देव ! तव नष्टोऽय किन्तु सर्वस्य बाधते ।
किमस्तान्तरित सूर्यः कस्यचित्तमसे भवेत् ।।१२।।
त बिना देव! न प्राणा मम स्थातुमपीश्वराः ।
कियत्तिष्ठन्ति पद्मानि प्रफुल्लानि दिनात्यये ॥१३॥
तद्वयस्येन स मयाऽन्वेष्यस्त्व तिष्ठ निर्वृतः ।
अब्जानन्वेषणे का हि भास्करस्यापि मित्रता ॥१४।।
प्रोचे सचिवमुख्यैरप्यसो भूपालपुङ्गवः।
हनूमानिव दक्षोऽयमीदृक्कार्ये नियुज्यताम् ॥१५॥
भक्तं साहसिकं शूरं विना भृत्यं न सिद्धयः ।
भुपतीनां न हि द्योताः क्वापि भानुमते स्फुटाः ।।१६।।
न लभेय प्रवृत्ति चेत् स्वमनोनेननन्दिनः ।
तच्चितामधिरोहामि वीरपत्नीव
इत्याधाय महासन्धो नृपादिप्टश्चचाल सः ।
परिच्छदेन स्वल्पेन तेजसा जितकेसरी ॥१८॥
युम्मम् ।
निर्धवा ॥१७॥

७२ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् विभीतक द्रुमा पुरग्रामाकराकीर्णा महीमालोकयन् मुहुः । तदर्थं भीषणां प्राप राक्षसीमिव सोऽटवीम् ॥१६॥ यत्र कायत्काककुलाकुला: । भूतानेवाऽऽह्वयन्तीव शाखादोभिः प्रसारितै ॥२०॥ भुजङ्गशीर्षरत्नांशुद्योतिच्छिद्रशताकुला या वर्षा द्यौरिवाऽऽभाति खद्योतोद्योतिता निशि ॥२१॥ पलाशाः पुष्पसंवीता यत्र वातप्रकम्पिता। पलाशा इव नृत्यन्तो रक्ताक्तवपुषो बभुः ॥२२॥ ताली हितालतालाली कोटिशो यत्र दृश्यते । रूक्षा पत्रदरिद्रा च किं राज्ञा सन्ततिर्यथा ॥२३॥ पदे पदे महादावप्लुष्यमाणमृगध्वनीन् । या तुष्टस्यान्तकस्येव धत्ते किलकिला-रवान् ॥२४॥ मृगाधिपतयः क्रूरा यत्रोच्छृङ्खलवृत्तयः । मृगानभिद्रवन्त्याशु कांशा इव देहिनः ।।२।। उद्दण्डकोदण्डकरा: सर्वसत्वान्तकारिणः किराता यत्र दृश्यन्ते कृतान्तस्येव किङ्कराः ॥२६॥ पुण्डरीकधुति' सिंहं ज्योत्स्ना यत्र पतिभ्रमात् । पुण्डरीकवधूभैजे छायया चित्रित तरोः ॥२७॥ वृक्षस्थबहिणां बर्हाश्चित्रवर्णास्तता घना: आविभ्रत्युपसंव्यानलक्ष्मी वनश्रियः ॥२८॥ शिवाफलोपयोगेन गाढातीसारबाधितम् । शिवाकुटुम्बकं यत्र मांसायापि न धावति ॥२६॥ शृङ्गारहास्यरसयो - र्दूरे या डिमरूपवत् । रौद्रस्येव पदं नृत्तप्रेतपात्रवजा यन्त्र बभौ ।।३०॥ १. भूतवासा २. श्वेतवर्ण ।

दशमः सर्गः ७३ 'कौशिकद्रुमसंलीनं काकवच्छ वापदव्रजम् । कौशिकस्त्रासयत्युच्चैर्यत्र घूघारवैर्घनैः ॥३१॥ कृष्णसविलियंत्र मूपिकौघमनुद्रुता। कालिन्दीवीचिमालेव लक्ष्यते कालतोषिणी ॥३२॥ खगाः करिकरङ्केषु पतन्तः क्रूरनिस्वनः । खगामिनामपि त्रासं यत्र यच्छन्ति दारुणा. ॥३३॥ यत्रामिषरसोन्मत्ताः स्फारफेत्कारफेरवाः। जयन्त्यदृध्वनिप्रौढान्नक्तं नक्तचरानपि ॥३४॥ वराहघातनोद्युक्ता यत्र तैरेव सैरिभा'। वराहवे भटा यद्वद् दंष्ट्रास्त्रैः पङ्गवः कृताः ॥३॥ निस्त्रिशसर्वलुण्टाक - भिल्लभल्लीहता ध्रुवम् । तत्प्रहारान् प्रशंसन्ति कणतो यत्र सार्थिकाः ॥३६॥ मृगशीर्षहस्तचित्रौद्धतलुब्धकयुजि नभःधियां यस्याम् । मृग्यति करिकुलमनिशं, शरण करुणं चकितनयनम् ।।३७।। वसतिः कालकेलीना रौद्रतायाः परं पदम् । दुःखानामाकरो धात्रा चक्र या कौतुकादिव ॥३८॥ तामपि प्रविवेशाऽसौ स्निग्धो मित्राय दारुणाम् । विशेत् को वा न तिलवत् सङ्कटं स्नेहनिर्भरः ।।३।। अहो स्नेह. पद सर्वमहाव्यसनसन्तते । यन्मित्रायाविशदयं यमस्यास्य महाटवीम् ।।४०।। तत्राऽप्येष निकुञ्जपु मार्गयस्तं निरन्तरम् । नोपलेभे स यत्नोऽपि तमःस्विव रवेः करम् ॥४१॥ गुञ्जन्मृगेन्द्ररौद्राणि गह्वराणि महीभृताम् । आलोकिष्ट स मित्राय प्रेम्णः किं वाऽस्ति दुप्फरम् ॥४२॥ १. गुग्गुल।

७४ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् वानरं नरबुद्धयाऽसौ दध्यौ कोटरगं तरोः । तदेकानमनाः स्याद्वा प्रेमणि क्वाविपर्ययः ॥४३॥ दत्तत्रासासु दुर्नादभिल्लपल्लीषु पर्यटन् । वयस्यंनाऽऽ ससादाऽसौ दुर्लभा हि मनःप्रियाः ॥४४॥ दृष्टः शबरसेनासु नासौ तेन क्वचित् सुहृत् । दरिद्रस्य गृहे चिन्तारत्नं दृश्येत केन वा ।।४५।। किरातानपि सोऽपृच्छत् तमव्यक्ताभिभाषिणः । अथिनो हि मनोऽभीष्टे युक्तायुक्तविवेचकाः ॥४६॥ यथा यथा च तद्वात्ता लेभे नाऽसौ प्रियामिव । रामवत् ससहायोऽपि प्राखिद्यत तथा तथा ॥४७॥ माऽभूद् वियोगः कस्यापि केनचिच्चित्तहारिणा । यदेषोऽन्वभवद् दुःखं तदानीमतिनारकम् ॥४८॥ अनाप्ततत्कथोऽप्येष नौज्झदन्वेषणोद्यमम् । दुदिने किमदृष्टाब्जस्तेजसो हीयते रविः ।।४।। वने न स प्रदेशोऽस्ति यस्तेन न तदथिना। आक्रान्त. स्नेहबद्धेन प्राणिनेव भवेऽटता ॥५०॥ अन्वेषयत एवास्य तं निदाघः समाययौ । तापिताशेषलोकोऽपि कोपं यो न तपत्ययः ॥५१॥ यश्चातितापकृद्भूमेभूमिभूतजलाशयः जलाशयोन्मुखकरी करीरपरिपाकदः ॥५२॥ प्रियालमञ्जरीकान्तः कान्ताकण्ठश्लथग्रहः । ग्रहाविष्ट इवोद्धृत - धूतच्छदशमीशिराः ॥५३॥ दावज्वालायते स्फूर्जन् यत्रोष्णांशुकरोत्करः । प्रगेपि स्वाश्रयस्योच्चम सत्यापयन्निव ॥५४॥ समन्तादवनियंत्र नखंपचरजःकणा सोपानकानपि प्रायो व्यथयत्यध्वगान् पथि ॥५॥ - दशमः सर्ग: ७५ . यत्र चैणा इवाध्वन्या मृगतृष्णा सुतृष्णजः । जलाशया हि' धावन्तो विपद्यन्ते मरो घनाः ॥५६॥ गाढाश्लेषस्पृहा स्त्रीणां न सरागेऽपि कुङ्कुमे । प्रेयसीवाऽभवद् यत्र क्षणे सर्वो हि वल्लभः ॥५७।। विदग्धानामभूद् यत्र प्रियाधारा गृहस्थितिः । चन्दनद्रवचर्चेव समयज्ञा हि सद्धियः ॥५॥ उन्मूलयन्ति सच्छायानपि वान्तो महीरुहान् । उत्ताला वायवो यत्र क्व वा चण्डेपु मार्दवम् ।।५।। 'मुमुराकारसिकताकणाः पवनपातिता.। दहन्ति चोरिका नेत्राण्यपि छायासु यत्र च ।।६०॥ अन्धत्वमिव यच्छन्ति यत्र ग्रामेपु योषिताम् । रेणूत्करा भृशं सान्द्रा वात्योत्क्षिप्ता दिने दिने ।।६१।। मण्डलीपवना उच्चरावर्तितरजोदलाः । नृत्यन्मूर्तमहाभूतलीलां दधति च ॥६२॥ मरुतो यत्र सध्वाना भ्रमन्तोऽज्योन्यसहिताः। भूतेन्द्रा इव लक्ष्यन्ते रासकक्रीडितस्पृश. ॥६३।। मध्याह्ने धर्मसत्रस्ता वने चित्रगता इव । निसर्गचापलं हित्वा यत्र तिष्ठन्ति वानराः ।।६४।। जगन्तीव सरांसीह यत्र नोज्झन्ति सैरिभाः। मलिना दुर्यश पुजाः कुकवीनामिव क्षणम् ॥६५॥ लोलज्जिह्वागलद्वारिसिक्तसतप्तभूमयः यत्र छायास्वपि स्वास्थ्य लभन्ते न मृगारयः ॥६६॥ दन्तिनोऽन्त समाकृष्टवारिशीकरवपिणः स्वदेहे दाहमानिन्युरन्तं यत्रातिखेदिन. ॥६७॥ जीर्णतरुस्कन्धोत्कीर्णच्छिद्रशताश्रया अपि तापेन दयन्ते कोट काश्चटका इव ॥६॥ १. 'पि' इति पुस्तके पाठः । २. शिसरवितलपति । यन यन ७६ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् यत्र वराहा अपि पङ्कानि न त्यजन्ति मृगा इव । छाया वनानीव धर्मदाहातिभीरवः ॥६६॥ पक्षिणस्तप्तभूपातपत्कस्वाङ्गः सहस्रशः। यत्रापूर्वाशनातिथ्य कल्पयन्तीव रक्षसाम् ॥७॥ गवाक्षाः सूक्ष्मवासांसि चन्दनं चन्द्रशालिकाः । यत्र सेव्यत्वमायान्ति विरोधादिव शशिरात् ॥७॥ तटरुहतरुपत्रश्रीविलोपापमाना दिव लघुतनिमानं सिंधवः संश्रयन्ते । दवदहनविदीर्यद्वेणुनादैगिरीन्द्रा वनविभवविनाशं यत्र शोचन्ति नूनम् ॥७२॥ मलिनमुखविगन्धः किंशुकादिप्रसून बहुभिरपि वसन्तस्याशुभैः किं प्रफुल्लैः। ध्रुवमिति तदवज्ञां शसितुं यो दधाति , स्मितसुरभिसुवर्ण मल्लिकापुष्पमेकम् ॥७३॥ रभसदयितपीतप्रौढलाटाङ्गनोद्य द्विशददशनवासःपाटला पाटलाऽपि । शुकहरित शिरीषस्पर्द्धयाकान्तगन्धा विकसितवदनाऽभूत् यत्र कान्ते प्रियेव ॥७४॥ अविरतजलकेलिस्निग्धकाया दिनान्त - मलयजरससिक्ताः कायमाने विशन्तः । शिशिरतरसमीरस्पर्शसम्मीलिताक्षा हिमसमयसमं यं पुण्यभाजो नयन्ति ॥७५|| दलत्कनककेतकीवदनचुम्बने कठोरधनविस्फुरत्कुटिलकण्टकराकुलम् । विशत्यलियुवा वनं तिमिरभीषणं यत्र च, श्रयन्ति किमु सङ्कटं न नवरागिणः कामिनः ॥७६!! लालसः ,

दशम. सर्गः
७७
N
खरपवनखरांशूच्चण्डदण्डाधिराजा
द्यसमघनसहायो दारुगस्तापलक्ष्म्या ।
सुरभिनृपसमृद्धिध्वसने वद्धकक्ष.
प्रतिनरपतिलीलां यः परां सदधाति ॥७७॥
तत्रापि खिन्नधीमित्र स तथैवाऽगवेषयत् ।
अत्यर्थिनो हि नाकालः कोऽपि स्वार्थप्रवर्त्तने ॥७८॥
स्वापापदेशतोऽनङ्गमूर्छावत्पान्थशालिपु ।
प्रपामण्डपदेशेषु शोताम्बुकणवपिपु ॥७॥
द्राक्षालतागृहेष्वम्भ कुल्याशीतलवायुपु ।
उद्गीतकिन्नरद्वन्द्वोत्कणितैणीघराजिपु ॥८॥
दुरितच्छेदनायव चिरवृद्धकथापरे ।
ग्रामग्राम्यसमाजेऽपि गोष्ठीबन्धसदादरे ॥१॥
पत्तनेषु पठच्छाबध्वानवृत्तजनश्रुतौ ।
स्तोमे मठाना विलुठच्छब्दब्रह्मलवे ध्रुवम् ॥२॥
आपानेषु च सैन्येषु पद्यासु परिपत्सु च ।
नृपाणां न च लेभेऽसौ तममय॑मिव क्वचित् ।।३।।
आदिकुलक पभिः ।
तथापि न त्यतिप्ट स ततो व्यवसायतः ।
धीरा हि न विपीदन्ति सादहेतो महत्यपि ।।८४||
.
पर्वतेष्वप्यसो दृष्टि पातयामास तन्मनाः ।
नप्टाऽनय॑ महारत्नाः शङ्कयन्ति गुल्नपि ।।८।।
अकस्मादन्तरिक्षेऽपि श्रुतपत्रिपटुम्बनि।
क्षिप्र चक्षु स चिक्षेप नार्थिना कोप्यगोचरः ॥८६॥

७८ सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् निखिलनगरपामारामानसाववलोकय नपि न परिशश्राम प्रेम्णा स्वमित्रदिदृक्षया। ननु कियदिदं सीताहेतोः स्फुरत्प्रभुभक्तिना, पवनतनयेनाम्भोनाथोऽप्यतारि सुदुस्तरः ॥७॥ इति युगप्रवरागमश्रीमज्जिनपतिसूरिशिष्यलेशविरचिते श्रोसनत्कुमारचक्रिचरिते मित्रान्वेषणो नाम दशमः सर्गः । छ.। १० । A एकादशः सर्गः तथैव तस्याऽटत एव विष्वक, वसुन्धरां भूमिधराभिरामाम् । अदृष्टमित्रः स इवाश्रुवर्षी, पयोदकालोऽपि समुल्ललास ॥१॥ यत्राऽम्भोभृन्नरेन्द्रो रचयितुमिव साम्राज्यमेकातपत्रं , युक्त: सैन्यैर्वकानां प्रतिनृपतिमिव ग्रीष्ममुच्छिद्य मूलात् । तृष्णां तस्यैव कान्तां हननसमुचितां तापिका विष्टपस्या - न्वेष्टु विद्यत्कटाक्षः कटु रटति रुपा व्योम्नि गर्जापदेशात् ।।२।। धाराम्भ.सायकौघं क्षिपति सरभसं यत्र योधानुकारे प्राणश्यन्मानशत्रुश्चकित इव मनो मन्दिरान्मानिनीनाम् । कि चात्यन्तं दिदीपे सकलविरहिणां मानसेऽनङ्गवह्नि - स्तेनापूर्वेन्वनेनाचिररुचिरिव सुध्यातकान्ताकुचानाम् ॥३॥ राष्परादृष्टिपात दलितमरकतत्विभिरानद्धमध्या कान्तेवाऽऽभाति सान्द्रासितवसनमहाकञ्चुका यत्र धात्री। पान्यस्त्रीहृद्विदारातनुरुधिरलवाभासिभिः शक्रगोप स्त्वन्योन्यासङ्गवद्धिविरचित विलसत्पद्मरागावलीव ||४|| एकादशः सर्गः पयः निन्ये यो वृद्धिमद्भिर्भुवि सकलनदोनीरदैरात्तनीरै - रम्भोधेस्तद्वधूनां प्रियकरणरुचिर्नूनमुच्चैः कृतज्ञः माद्यन्मद्गुप्रघोषैर्हरि'-निवहरवैश्चास्तुवंस्तां ध्रुव यं , को वा नौचित्यकारी विदितसुचरितैः कीर्त्यते पूर्णकामैः ।।५।। यत्र स्तोककयोषितो घनजला वान्तिस्पृशोऽपि ध्रुवं , दृष्ट्वा गर्भभरालसा बकवधूस्तत्रापि बद्धस्पृहाः। कूजन्त्यः करुणं पयोदमनिशं याचन्त आत्मेप्सितं, लब्ध्वा तुच्छसमीहितोऽपि जगति प्रायेण को नि:स्पृहः ।।६।। मार्गेष्वम्बुभरावरुद्धगतिपु प्रस्थास्नुपान्थाङ्गना नेत्राब्जेपु यथा श्रवत्सु जलदेष्वछिन्नधार आदित्या इव सोद्यमा अपि महातेजोनिधानत्वतः , कान्ताऽऽलिङ्गनलोलुपा इव नृपा यात्रा न यत्राऽदधुः ॥७॥ मधुरजलदनादैर्यत्र नृत्तप्रवृत्ता: समदशिखियुवानः केकयाहूय नूनम् । प्रचिकटयिषवः स्व तत्पुरो लास्यशिल्प , युवतिजनमनोभ्यो मानमुद्वासयन्ति ॥८॥ ददति स चटुनागाः सल्लकीपल्लवानि द्विगुणतररसानि प्रेयसीनां मुखेपु । तरुणमधुकरोऽन्तर्दैथिकायाः परागः परिचिततनुरासीद् यत्र गौराङ्गयष्टिः ।।६।। कुटजविटपिपुप्पैर्नव्यधाराकदम्बः प्रतिवनमपनिद्रैः शोभितो यः शिलीन्घ्रः। नवजलधरधारी तारतारावलोक द्विरदपतिविराजद् राजलीलां वित्ति ।।१०॥ १. पातक। २. मण्ट्रक ।

८० सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् यत्र द्विरेफाः स्मितकेतकानि, श्रयन्ति हित्वा कमलं जलान्तः । विपन्निमग्नं त्यजता स्वसैव्यं, ब्रीडाऽपि नो लुब्धमलीमसानाम् ॥११॥ नूनं शक्रः स्वचापं प्रकटयति घनध्वानटङ्कारकान्त मुञ्चन् धाराम्बुकाण्डान् पथिकजनमभिक्रोवतस्तनिवृत्त्यै । विष्वक यस्मिस्त डिद्भिर्नवनयनसहस्रं दधानाऽतितारं, यद् राजा दुर्बलानां बलमिति विलसत् पक्षपातोऽबलासु ॥१२॥ यत्रावहन प्रथममश्रुजलप्रवाहाः सम्भारतश्चिरगतप्रियभर्तृकाणाम् पश्चानिनादचकिताकुलसिद्धकान्ता कान्तावगृहनकृतो गिरिनिर्भरौघाः ॥१३॥ खद्योते?तमानर्नभसि भुवि जलासारवद्भिर्मरुद्भि भैंकक्वाणैः सरस्सु द्रुततिषु शिखिनां ताण्डवाडम्बरैश्च । सोत्कण्ठा सर्वतोऽपि प्रतिदिनमबला यत्र चाधीयमाना , भर्तृ ष्वाक्रोशमुच्चैर्ददति चिरतरप्रोषितेष्वप्रसन्नाः ॥१४॥ स्फूर्जत्सौरभयक्षकर्दमयुजः कान्तोपगूढा दृढं , पीतस्वादुतदद्भुताधररसा यत्राखिलाः कामिनः । शृण्वन्तो जलदध्वनि शिखिकुलस्यारब्धनृत्येक्षणाः, पञ्चानामपि सश्रयन्ति सततं यत्रेन्द्रियाणां मुदम् ॥१५॥ ऊवं प्रावृतनीलनीरदपटा वन्या लसत्कञ्चुका , बिभ्राणा सुरगोपचित्रितमधोवस्त्र तृणं विस्तृतम् । प्रौढप्रावृडिति प्रकल्पितनवाकल्पा करोत्यङ्गिनः, सोत्कण्ठानभिसारिकेव हिमगुज्योत्स्नापिधानप्रिया ॥१६॥ तत्रापि तीवादरतोऽन्वियेष, सनत्कुमारं स महेन्द्रसिंह । नदीषु वापीपु च निझरेषु, द्रोणीपु' च क्षोणिभृतां ततासु ॥१७॥ - १. शैलयो सन्धिपु।

एकादश सर्गः ८१ न किंवदन्तीमपि चापमैत्री, रुचि यथा करवखण्डमन्तः। तथापि स प्रथयतोऽवतस्थे, वने प्रतिज्ञातधना हि धीराः ।।१८|| सन्धार्यमारणप्राणस्य तत्सङ्गममनोरथैः । संवत्सरोऽतिचक्रामाऽन्देप्टुस्तस्य भुवस्तलम् ।।१६।। ततः स चिन्तयामास क्षिती तावन्न विद्यते । असौ न हि न पश्येत् सद्व्यापृत' चक्षुरादरात् ।।२०।। तद् विशामि विशाल कि भोगिभीम रसातलम् । देवाद्भवेदसम्भाव्येऽप्यस्य देहिस्थितिर्नृणाम् ॥२१॥ उत्पतामि दिव किं वा कमप्याराध्य नाकिनम् । देवताना प्रसादस्यागोचरो यन्न किंचन ॥२२॥ किं वा विद्याधरथेणी यामि सिद्धसहायक' । नागम्य स सहायानां यदस्ति किमपि क्वचित् ॥२३॥ इत्थ यावदनेकध्य ध्यायन्न ध्याममानसः । द्विवाण्येव पदान्येप चचाल स्तिमितेक्षण. ॥२४॥ तावत् सारसहसादिरवस्तेनोपशुश्रुवे । सुहृदासङ्गम मक्षु मधुर. सूचयन्निव ॥२५॥ युग्मम् । समाजगाम सुस्पशं. स्पर्शनोऽप्यस्य सम्मुख । मित्रोपश्लेषज मोद यच्छन्निव सविग्रहम् ॥२६॥ वयस्यमिव सुस्निग्ध चक्षुष्य नन्दन हृदः । वनं स पुरतोऽद्राक्षीदिलायामिव नन्दनम् ॥२७॥ चुकुजुस्तत्र च क्रो-चोद्दण्डकारण्डवादयः । सवयोऽयिनमाह्वातु त मुदा सत्वरा इव ॥२८॥ नन्तुर्नीलकण्ठा अप्यस्यासन्न महोत्सवम् । दर्शयन्त इवोत्केकाः समुदो वायवा इव ॥२६॥ १. विद्यमान २. निर्मला ३. मूत। ४. मुरकन ।

८२ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् एवमन्त समाधानाधायिनानानिमित्तवान् ब्रजन् स तद्वनाभ्यासे प्राप पूर्ण जलैः सरः ॥३०॥ निमित्तावगमादन्तर्बहिर्वारिनिषेकतः सोऽत्रेषन्निर्ववौ कान्तायुक्तः स्नात इव द्विपः ॥३१।। निमित्तान्यनुलोमानि क्व क्व वा विजनाटवी । इत्यालोचयतोऽस्यालं चक्षुः पुस्फोर दक्षिणम् ॥३२॥ तस्यापसव्यः स्कन्धोऽपि ननर्त्तव स्फुरन्मुहुः । चेतः समुल्ललासेवाऽऽकस्मिकप्रमदश्रिया ॥३३।। श्रवणातिथितां चागान्मधुरो वल्लकीक्वणः । अम्भोदस्तनितस्पद्धिमृदङ्गनिनदैः सह ॥३४॥ किन्नरीकलगीतानि कोकिलाकूजितान्यपि । द्विषन्ति श्रुतिदोलायां दोलयामासुरुन्मुदः ॥३५॥ आमोदमप्ययं जघ्रौ तं दिव्यं तत्र कञ्चन । आजन्मापि न यः पूर्वं घ्राणगोचरतां ययौ ॥३६॥ विलोक्याद्भुतमुद्भूतं तत्राकस्मिकमीदृशम् । पुनर्विभावयामास कौतुकोत्कलिकाकुलः ॥३७॥ किमिन्द्रजालमेवैतदथ स्वर्गसमागमः किं वा मम हृपीकाणामभूद् व्यत्याससन्ततिः ॥३८।। उताऽदृष्टेन दुष्टेन केनाऽपि परिपन्थिना । मामुदँशयितुं सत्वान्नाटितं कूटनाटकम् ॥३६॥ यथाग्नौ चम्पकोद्भेदो न्यग्रोधे पुष्पमञ्जरी। वालके श्मश्रू सम्भाव्यमेवं सर्वमिद वने ॥४०॥ विभिविशेषकम् । एव वितर्ककल्लोललोलमानससागर: गच्छन्क्षण ददशेष प्रासादं मेरुडम्बरम् ॥४१॥ .

एकादशः सर्गः ८३ स्फाटिक सप्तभूम सन्मणिभिविविधैश्चितम् । शारदाभ्रमिवाश्लिप्टं सुरचापप्रभोत्करैः ।।४२॥ रत्नप्रभाभिरावद्धनानाशकशरासनम् हसन्तमिव वर्षाद्यामेककोदण्डगविताम् ॥४३॥ जनौघाऽव्यक्तनादेन गुजभृङ्गमिवाम्बुजम् । धूमैः कृष्णागुरो. सान्द्ररुपर्यादर्शिताम्बुदम् ।।४४|| ऊर्श्वभूमौ महानोलप्रभास्वम्भोदविभ्रमात् । वलक्षाभि. पताकाभिर्वलाकाभिरिवाचितम् ॥४५॥ विचित्ररदनोच्चित्र रतिकेलिगृहाश्रयम् वेश्यापाटकवद् भोगिलोकस्यानन्दन दृशो ॥४६॥ निपातोत्पातवविद्याधरवरिवोज्ज्वलः पाकीर्णमवतीणं को विमानमिव वज्रिणः ॥४७॥ पादिकुलक सप्तभिः। त दृष्ट्वा भावयामास क्वेयमृद्धिर्वनं क्व च । सर्वथा फलितः कल्पशाखी धन्वन्यय महान् ।।४८।। तत् प्रविश्यात्र मित्रस्य करवाणि गवेषणम् । फलस्टोव महाक्षेत्रे कृपीवल इवादरात् ।।४६।। आसन्नतरगस्यास्य कर्णकोटरमाविशत् । स्वरस्तारः शुकस्येव नग्नाचार्यस्य कस्यचित् ।।५०।। यत् खङ्ग खङ्गिलोला' कलयति विलसन् कुम्भिकुम्भस्तनेषु , प्रौच्च नावलानां त्वनभिमतकृतामादधत् खण्डनानि । पार्थक्य क्वापि गच्छन् सुनिविडपरिवारादपि प्रौढतार- श्चित्र नैवानुरक्तस्तदपि च सुरसद्वन्द्व भावावियुक्तः ॥५१॥ स्थातु सङ्ग्रामभूमौ क्षणमपि पुरतो नाऽयमद्यस्य यक्ष- स्तायस्तेज.टियाल प्रयतपरवलाम्भोधिमन्याचलेन्द्रः १. विद्गतीला, इति पुस्तके पाठः।

८४
सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम्
शेषेसु व्योमचारिप्रभृतिषु गणना सर्पकल्पेषु को वा ,
सोऽयं विद्याधराणा जयति दिनकरो धामभिश्चक्रवर्ती ॥५२॥
पाथिवेन्द्रा:,
युग्मम्
सोऽचिन्तयन्निशम्यैतत् कोऽपि खेचरनायकः ।
कोय॑तेऽत्र न मित्र मे यत्तन्नामापि दुर्लभम् । ५३।।
अपाठीत् पुनरन्योऽपि मागधोऽगाधधीधनः ।
व्यश्नुवानः प्रतिध्वानामिवातिपटुध्वनिः ।।५४।।
सन्त्येवासङ्खचसङ्खचाहतरिपुभटश्रेणयः
भूयांसः किन्तु विद्याधरपतिविलसद्गर्वसर्वदूषोऽन्यः ।
नैव त्यक्त्वा नृपेन्द्र कुरुकुलतिलकं कोऽप्यभूद् भूतधात्र्यां ,
ज्योतिर्लक्षेऽपि सूर्यादपर इह भवेत् कस्तमस्काण्डकालः ।।५५।।
मेधानिर्द्ध तवाचस्पतिमतिविभवत्वेन सौन्दर्यसार-
प्रत्यस्तानङ्गरङ्गद्रुचिररुचितनुत्वन चाश्चर्यभूमिम् ।
रामावन्मक्षु विद्याः शतश इह मुदा नूनमन्योन्यसेाः
सहर्षाद् व्यजितस्वस्वगुणगणभराः शिश्रुयुयं मनोज्ञाः ।।५६।।
श्रीमान् विनिर्मलयश:कुमुदावलोभिः ,
सम्भूषक: सकल दिग्वनिताकुचानाम् ।
जीयादसौ
निजकुलोदयभूधरेन्द्र
प्रोद्य दिवाकर उदीर्णमहा महाश्रीः ॥५७।।
विशेषकम् ।
महेन्द्रसिंहः श्रुत्वैतदपि चैव व्यचिन्तयत् ।
नासौ विद्याधरोच्छेत्ता न च कान्ताशतप्रियः ।।५।।
कुरुवशोद्भवा भूपाः संभवन्तीह भूरिशः ।
न ह्येक एव चन्द्रोऽभूद् रत्नं रत्नाकरेऽखिले ॥५६।।
तन्नमित्रमयं किन्तु तद्गोत्राद्वैव मोदिका।
रवेरभावे तद्भापि प्रातः स्याद् दृष्टिनन्दिनी ॥६०॥

एकादशः सर्गः - अध्यवस्यत एवेत्थमस्यान्योऽप्यपठत् पुनः । नग्नाचार्य: सुराचार्यवचश्चातुर्यतर्जनः ।।६१॥ ये मूलात् स्कन्धवन्धं विदधति तरवस्ते जगत्यामसङ्ख्या ये तन्नम्राः शिरस्तस्तमपि विरचयन्त्याशु ते केचिदेव । स्वीयां साम्राज्यलक्ष्मी कुलसमुपनता भुञ्जतेऽस्या प्रभूता , एकः श्रीआश्वसेनिनिजभुजबलतः स्वीकृतास्वीयराज्य: ।।६२॥ रूपं सौन्दर्यसारं स्फुरितसहकृतं सौर्यमन्यासमान , कन्यानां रूपभाजां निरुपमनृपतिस्त्वस्य चाप्त्या द्वयं च । यस्याभूद् भूरिभूतेः सफलमफलिताऽरातिचक्रे हि तस्य , श्रीमान् सोऽय समस्तक्षितिपतिमुकुटं नन्दतात् खेचरेन्द्र. ॥६३।। सनत्कुमारः सहदेव्युदारक्षेत्राकुर. कल्पतरुः कवीनाम् । सम्पादनाच्चित्रसमृद्धिवृद्धः, प्रवर्द्धतामुन्नतराजलक्ष्म्या ॥६४॥ आकर्ण्य कर्णपीयूपं वयस्यविषयं वचः । उच्चैरानन्दितस्वान्तः प्रासाद त विवेश सः॥६॥ तत्रोच्चरासनासीनमक्षतद्युतिसञ्चयम् उदित बिम्बमुष्णांशोरिवोदयशिलोच्चये ॥६६।। मुक्ताकलापालङ्कारालड्कृत कण्ठकन्दले। सुनिर्भरद्वयोद्गारसारं मेरुमिवोनतम् ।।६७॥ कान्तया कान्तयोपेत रत्येव रनिवल्लभम् । तत्कटाक्षच्छटाक्षीरस्नपिताननपङ्कजम् ॥६६॥ करपल्लवसस्थाभ्या युगस्य पणयोषितोः । चलच्चामरहसाभ्यामवगाढप्रभाजलम् ॥६९। नानाविद्याधरस्त्रीभिः पीयमानास्यदीधितिम् । वधूभिः सच्चकोराणामिव पीयूषदीधितिम् ।।७।। अन्तविद्याधरणिनिपण्णं सनशानवम् । सुराधीशमिवोदग्रं सुरागा संसदि क्षणम् ॥७१|| ८६ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् नटैः। पुरतः प्रकृतामन्दसङ्गीतकविधि नानाभिनयनिर्माणभरतस्मृतिदायकैः ॥७२॥ दन्तद्युतिलसज्ज्योत्स्नाभिरामस्य निशाकरम् । लीलया दधतं गोष्ठी, सममासन्नकान्तया ॥७३।। कि बहुना, सा मूर्तिः सा सभा तस्य लीलास्तास्ताश्च सम्पदः । योगिनोऽपि भवेच्चेतः सस्पृह यदवेक्षणे ॥७४॥ सनत्कुमारमद्राक्षीत् तमसौ प्रियदर्शनम् । चक्रवाकमिव प्रातश्चक्षुश्चक्राह्वयोषितः ॥७॥ दशभिः कुलकम् पीयूषसागरे मग्नः किमहं किमु निर्व तः । सिक्तः कर्पू रसम्मिश्रश्रीखण्डस्य रसैरथ ।।७६।। आभवोपात्तसुकृतफलानन्दैरुताश्रितः इत्यात्मानमसौ सम्यग् न विवेद तदा मुदा ।।७७।। युग्मम् हर्षोत्कर्षोद्गताशेषवपुः पुलककञ्चुकः। जलधाराहतप्राञ्चत्कदम्बश्रियमुद्वहन् आनन्दाचप्रवाहेण प्लाविताखिलविग्रहः । वनभ्रमणखेदोत्थं श्रमवारि क्षरन्निव ॥७६।। मुखे विकासं बिभ्राणः प्रातः पद्माकरो यथा । सर्वेन्द्रियेषु युगपद् भजन्निव परं सुखम् ॥८०॥ किं चित्रं यदसावङ्गे न ममौ मोदतस्तदा । क्षीराधिः किं क्वचिन्माति क्षपाकरसमुद्गमे ।।८।। चक्कलकम मनागप्यमस्तासौ तदनभ्रमणोद्भवम् । कष्टं गुर्वपि तदृष्टी क्व वा तापो हिमोदये ॥२॥ ॥७८॥ न

द्वादशः सर्गः
८७
नूनमद्य निमित्तानि सत्यानि सकलान्यपि ।
तानि देव्यः सरस्वत्यः प्रलयेऽपि हि नान्यथा ।।३।।
स्निग्धे चिराय प्राप्ते स्युः केवलेऽपि मुद: पराः।
किं पुनः प्राज्यलक्ष्मीके राकायामिव शीतगी ।।८४॥
महेन्द्रसिंहस्तं पश्यन्नासीत् सस्तम्भित: क्षणम् ।
अनाख्येयरसात्कान्ताजनः कान्तमिवादृतः ॥८॥
वाचोऽपि तत एवास्य पुस्फुरुर्न वहिस्तदा।
सरित्सहस्रसम्पूर्णवारिधेरिव
नो राज्येन रसेन नापि न सम सर्वेष्टभोगेन च ,
प्रादु ष्यात् सुखमिद्ध सौहृदजुपा शश्वद्वयस्येषु तत् ।
यद्यन्नातिशयादहोश्च समयादन्विष्य विश्व जगत् ,
सम्प्राप्तेपु हि तेपु भाग्यनियतेः स्यादन लोकोत्तरम् ।।८७॥
वीचयः ॥८६॥
इति युगप्रवरागमश्रीमज्जिनपतिसूरिशिष्यलेशविरचिते
श्रीसनत्कुमारचक्रिचरिते मित्रसमागमो
नामैकादशः सर्गः । छ । ११ ।
द्वादशः सर्गः
सनत्कुमारस्तं सम्यक् प्रत्यभिज्ञाय सम्भ्रमात् ।
शीघ्रमेवाऽलपत् सन्तो यत्सदा पूर्वभाषिणः ।।१।।
मित्र ! मित्र ! कुतो यूयमिहेव विजने वने ।
न कदाचिच्छिलापट्टे सम्भवोऽम्भोरुहस्य यत् ।।२।।
एोहीत्यवदद् भूयोऽप्यभ्युत्थान पुरस्सरम् ।
क्वापि वैनयिके कुल्या नातसा जातु कर्मणि ॥३॥

८८ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् स तं तथा सम्भ्रदाद् बाढमुर.पेषं पिपेष सः । यथास्य निर्ययो खेदः सर्वः स्वेदच्छलाद् बहिः ॥४॥ तदा समागमेऽपूर्वः स हर्षः कोप्यभूत् तयोः । सुरसाम्राज्यभोगोऽपि यत्तुलां नाधिरोहति ।।५।। प्रासाधयदेतेन स्वासनस्यार्द्धमञ्जसा। व्यज्येत हि परः स्नेहो लोकेपि कथमन्यथा ॥६॥ तत्प्रेमाचरितं पश्यन् कौतुकोत्तानलोचनः । विद्याधरजनः सर्वोऽप्यासीत्तत्र महादरः ॥७॥ महिमानं नयन्त्येव प्रभूणां सम्भ्रमा नरम् । वैदेशिकोपि यदयं मान्योऽभूत् सर्वपर्षदः ।।८।। महेन्द्रसिंहः प्रत्यूचे तमथ श्रव्यभाषिणम् । अभ्राम्यं वत्सरं यावत् त्वत्कृते महती महोम् ॥६॥ प्रवृत्तिमपि नावापं तावकी क्वापि नन्दनीम् । घनाघनघटाच्छन्नामिव वर्षासु चन्द्रिकाम् ॥१०॥ श्रेयो निमित्तवृन्देन सूचितं त्वधुनाऽऽप्नवम् । त्वां निधानमहाकुम्भमिव दुर्गतसेवकः ॥११।। विद्याधरमहाराजस्तमूचे पुनरुत्सुकः । चक्रतुः पितरौ किं कि मद्वियोगदवादितौ ॥१२॥ अधत्ता वा कथड्रारं स्वप्राणान्प्रोषिते मयि । क्षणमप्यासते यन्न तिमयः सलिलं विना ।।१३।। स प्राह रामवत् प्राप्ते वन तज्जनकाकृतिम् । त्वयि तत्पितरौ पूर्णामधत्तां शोकको लितौ ॥१४॥ किञ्च- स्तम्भापचितसच्छायं हितपत्रलताद्युति । आसीच्छून्यपुराकारं अन्तःपुरमपि प्रियम् ॥१५॥ आस्यानि त्वद्वयस्यानां ग्रीष्मप्लुष्टदलश्रियाम् । अम्भोजानां रुचि प्रापुः स्नेहाण्यपि सन्ततम् ।।१६।।

द्वादशः सर्गः
५६
!
स कोऽपि नागरो नाऽऽसीद् यस्त्वयि प्रोपितेऽभवत् ।
पद्मवन्धाविव स्फारविकास: कमलाकरः ॥१७॥
कृत्वा प्रसाद रम्याऽथ स्वप्रवृत्ति प्रकाश्यताम् ।
अप्रकाशा हि न मुदे रूपवत्यपि नर्तकी ॥१८॥
कौतुक तन्महद् यत्त्व कथ केन क्व वाऽऽदृतः ।
कुतस्त्याः सम्पदो वैता लोकलोचनचन्द्रिकाः ॥१६॥
आशा न स्यात् कथं नाथ ! दुर्लभेऽपीह वस्तुनि ।
यदसम्भावितास्तित्वोऽप्यागास्त्वं विषयं दृशोः ॥२०॥
एव पर्यनुयुजाने मित्रे सोऽचिन्तयन्नृपः ।
अनोत्तराप्रदाने स्थादज्ञता तावदात्मनः ॥२१॥
अन्यथाऽऽख्यानतः पापं यथास्थितनिवेदने ।
स्वगुणाविष्क्रिया वेद न च वृत्तं ममापरः ॥२२॥
विक्षेपकरणं मौग्ध्यं शाव्यं व्याजान्तरोक्तितः ।
तत्कथ क्रियतामस्य कोविदस्येह निर्वृतिः ॥२३॥
विभिविशेषकम
किञ्चाऽऽत्मनः प्रशंसायां शिष्टाचारव्यतिक्रमः।
नावदान स्वमेते हि व्यञ्जयन्ति कथञ्चन ॥२४||
इत्थं विकल्पकल्लोलाकुलमानसवारिधे ।
प्रादुर्वभूव तस्यैवं
प्रातिभज्ञानचन्द्रमा ॥२५।।
एषा वकुलमत्येव श्रीप्रज्ञप्त्या. प्रसादतः ।
बुद्धास्माकीनवृत्तान्ता प्रियास्त्वस्य निवेदिका ॥२६॥
तामथाऽऽज्ञापयद् भूपो यथावाचं निवेद्यताम् ।
वयस्याय समस्तोऽपि वृत्तान्तो मे तनूदार ! ॥२७॥
मील्येते पद्मवन्ने ज्योत्स्नयेव प्रमी नगा।
मामके मदिराक्षीति रति वेश्म विमान्यहम् ॥२८॥

१०
सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम्
कस्य
तत्र चोभयतः प्रांशो गङ्गापुलिनसुन्दरे ।
सहंसपक्ष्मतूलीके सितोत्तरपटास्तृते ।।२६॥
क्षीराम्भोधाविव स्वच्छे शयनीयेऽच्युते यथा ।
सविष्टे खेचराधीशे साऽवदत् कलभाषिणी ॥३०॥
युग्मम्
आर्य ! त्वन्मित्रवृत्तान्तः सिद्धान्त इव कापिलः।
सत्त्वप्रकृतिबुद्धयादिलीलायितमनोहरः ॥३१॥
न श्रूयमाणोऽपि भवेदानन्दकन्दलः ।
वसन्ते पञ्चमोद्गारहारीव पिकनिस्वनः ॥३२॥
युग्मम्
कुमारो हि तदा दूरमपावाह्यत पत्तनात् ।
जवनेन तुरङ्गेण प्रमोद इव नागरः ॥३३॥
जन्मान्तरीय दुष्कर्मलवेनेव महाटवीम् ।
भवाटवीमिवाऽनायि तेनायं वीर्यशालिना ॥३४।।
यद्वा सुकृतपिण्डेन शुद्धेनेव श्रियं पराम् ।
क्षिप्रप्रापयितु शेषचक्रिभ्योऽभ्यधिकामिमाम् ॥३५॥
युग्मम्
पवनेनेव
तेनैवादृश्यतामप्यनीयत ।
अकाण्डे सुप्रचण्डेन तूलवत् त्वरितं दृशोः ।।३६।।
स मनोजयिना धावन् रंहसाऽश्रान्तमथमः ।
अहोरात्रमहर्मात्रयायिन रविमत्यगात् ॥३७॥
जितादित्यहरिर्वेगानूनं प्राप्तुं हरीन्द्रताम् ।
वनस्थानप्यसी जेतुं हरीन् बभ्राम तद्वनम् ॥३८॥
द्वितीयेऽपि दिने तस्य तथैव द्रुतगामिनः ।
मध्याह्नः समभूद् दाववह्नितापाभिभावुकः ॥३६।।
यत्र भानुः प्रभाव्याजाद् वर्षत्यङ्गारसंहतिम् ।
आजन्मद्वेषवन्तीव करवाणि विहिसितुम् ॥४०॥

द्वादश. सग! ६१ यत्र यत्र छायाभ्यश्चातपत्रस्त मृगेन्द्रान् क्षुधितानपि । यत्र दृष्टैणयथा अप्युत्सहन्ते न धावितुम् ।।४।। यत्र पानकरङ्केषु तीव्रतृष्णा: खगाधनाः । पिबन्तोऽपि न तृप्यन्ति तद्वार्यन्योन्यघट्टनैः ।।४२।। जैनवेश्मसु नैवेद्यं निवेद्याय॑स्य धार्मिकाः । यत्रान्तर्बहिरुत्तापान मुच्यन्ते प्रस्तुतार्चनाः ।।४३।। राज्ञो भोजनशालासु दृष्टसामोदभोजनाः । कथञ्चिद् विषगन्धान्धाश्चकोरा रोदनस्पृशः ॥४४॥ मयूराश्च प्रनृत्यन्तो बोधयन्तीह देहिनः । विरागरागयोर्हेतुरेक एवेति च ॥४५॥ युग्मम् श्रोत्रियगेहेषु होमधूमचितेष्वपि । निर्मला एव दृश्यन्ते तत्प्रियाण मुखेन्दवः ।।४६।। चञ्चूरिक्षप्तस्वपक्ष्माणः प्रियाचुम्बनलालसाः। यत्र छायासु विकृतीर्भजन्ते चटका अपि ॥४७॥ गजेन्द्रा अपि न स्नानैर्न प्रियापरिरम्भरणः । लभन्ते स्वस्थता यत्र पच्यमाना इवोष्मणा ॥४८|| कथञ्चिन्मत्तमहिषा व्यावृत्ता सलिलाशयात् । भ्रमयित्वा दृशो यत्र लुठन्ति भुवि धर्मतः ॥४६॥ एकतः कर्दमे भग्नाः स्पृष्टास्तापेन चान्यतः । अन्वभूवन् सम यत्र पोत्रिणो हिमपावको ॥५०॥ अदृष्टपद्मान्तरित प्रियः स्निग्धोऽप्ययुज्यत । दृष्टयाऽपि तया को को न भीयंत्र चाऽऽतपात् ।।५।। निवृत्तजनसञ्चारा राजमार्गा निशीथवत् । यत्राऽभूवन् महाधर्मकुकूलायित'-रेणवः ॥५२।। १. कारिपारिनः।

१२
सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम्
दारुणे तत्र मध्याह्ने गच्छन् मार्गणवद्रुतम् ।
तथा शश्राम तुरगो न चचाल पदं यथा ॥५३॥
तस्थौ च स तथावस्थः स्थाणुवन्निश्चलाकृतिः ।
वाजिनो हि क्व वा लोके दृष्टाः सततगत्वराः ॥५४।।
अपेक्षाकारिणो नूनं नैवारव्धसमापकाः ।।
यदेप नाऽपयद् देश कुमारं हृदयेप्सितम् ॥५५।।
विघटन्ते हि तरलाः सुचिरं लालिता अपि ।
पातयामास यदय कुमारं दारुणाटवीम् ॥५६॥
निश्चलस्य च तस्याऽऽसीदुच्छ्वासोऽप्यतिनिश्चलः ।
स्वामिनं ह्यनुकुर्वन्ति विनीताः सहचारिणः ।।५७।।
कुमारोऽवतताराऽस्मात् तूर्णं पिपतिषोर्भुवम् ।
अतिश्रान्तोऽपि दक्षत्वाच्छवस्पर्शभयादिव ॥५८||
स्वप्रभोरपकर्तायमितीव
मुमुचे क्षणात् ।
प्राणैः स्वाम्यपि वाहोऽसावनार्य को नु रुध्यते ॥५६॥
नूनं जलधिकल्लोलः स्वाभिधानस्य सत्यताम् ।
प्रकाशयितुमाश्वेव जगाम विल तदा ॥६०॥
कुमारः सुकुमारत्वान्मध्याह्ने मार्गखेदितः ।
तृष्णया शिश्रिये तत्र पिशाच्येवातिघोरया ॥६१॥
चचाल जलमन्वेष्टुं राज्या)ऽप्यसहायकः ।
कस्य वा स्यात् स्थिरा लक्ष्मीः कल्लोलसहवासिनी ॥६२।।
विधीयतामहङ्कारः श्रीमद्भिः श्रीभवः कथम् ।
सकण्टकाटवीं पद्भयामटन्तं प्रसमीक्ष्य तम् ॥६३॥
तद्दशा
वनदेवीनामप्याक्रन्दविधिप्रदाम् ।
नूनमद्रप्टुमभवन् द्रुमास्तत्र ह्यदृष्टयः ।।६४॥
क्व फेरवारवाः कातिथयः क्व च गीतयः ।
तस्यासन् सर्वदा कस्य सुखैकनियता दशा ॥६५॥

द्वादशः सर्गः ६३ अत्यटन्नपि तवासी नाऽऽससाद क्वचिज्जलम् । तनिष्ठदृष्टिचित्तोऽपि निदाघ इव चातकः ॥६६॥ दूरे त्वपश्यत् सामोदं पुष्पैः सप्तच्छदं तरुम् । स्कन्धे द्विपकटाघर्षमदगन्धाभिभावुकैः ॥६७।। अतिविस्तृतनीलत्वान्निरभ्रव्योमविभ्रमम् महापुरुषवन्नानाफलार्थिप्राणिसंसृतम् ॥६८ सच्छायत्वात्तुषारांशुवदुत्तप्ताङ्गिनन्दनम् श्रिया भृङ्गैश्च सन्नद्धं कमलाकरवत् सदा ॥६६॥ विभिविशेषकम् प्रतस्थे त प्रति प्राज्ञः प्रतप्तस्तपनाशुभिः । लब्ध्वा गदो विषीदेत् कः सकर्णो व्याधिपीडितः ॥७॥ यावत् सप्तच्छदच्छायां प्राप स श्रान्तविग्रहः । तावन्मूर्छा मुमूर्छाङ्ग तदीये विषवल्लिवत् ॥७१।। भ्रमयन्ती दृशोर्द्वन्द्वं स्वेदयन्ती वपुलताम् । दर्शयन्ती तमस्काण्डं विष्वद्रयञ्चं मुहुर्मुहुः ।।७२।। 'मुखलालामिवाकाले दलयन्ती च चेतनाम् । कान्तोपगृहनमुदं ददती खेदभेदनात् ॥७३॥ विशेषकम् तडितेव प्रबलया तयाऽपात्यत सोऽवनी। अशाय्यत क्षणं बातुमङ्गदेव्येव दुःखतः ।।७४॥ अत्रान्तरे तत् सुकृतरिवाशु , प्रणोदितः कोऽपि कुतोऽपि यक्षः । देशमागान्मणिभूपणाशु- च्छटाभिरेनं स्नपयन्निवोच्चः ॥७॥ तं १. प्रमृतकलालक्षण।

सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् प्रालेयशैत्यं परितर्जयद्भिः पीयूषमाधुर्यमपि क्षिपद्भिः। हसद्भिरुद्भास्वरशारदेन्दु- ज्योत्स्नाशुचित्वं पयसः कणोघः ॥७६।। अन्तःप्रवृद्धप्रणयाम्बुराशि- समुच्छलबिन्दुगणैरिवैषः। असिक्तस खिन्नमखिन्नबाहु- स्तं सन्ततं सम्भृतकिङ्करश्रीः ॥७७॥ युग्मम् प्रावीजयच्चांशुकपल्लवेन विपल्लवाविष्टम, प्रयत्नात् । असाध्यमत्रास्ति न किञ्चिदुद्यत् - पुण्याधिराजस्य समुद्गतस्य ॥७॥ इत्थं यक्षेण क्लुप्तप्रलयविलयकृत् योग्ययोग्याभ्युपाय: प्रोन्मीलन्नेत्रपत्रः सपदि समभवद् राजबीजी वितन्द्रः । शीतांशोरंशुजालैः कवचितमुकुल: कैरवाणां किमोघः स्यादुन्निद्रच्छदो नो कलितनिरुपमश्रीसमृद्धिनिशायाम् ॥७६।। - इति युगप्रवरागमश्रीमज्जिनपतिसूरिशिष्यलेशविरचिते श्रीसनत्कुमारचक्रिचरिते यक्षदर्शनो नाम द्वादशः सर्गः । छ. १२॥

त्रयोदशः सर्गः वदनमस्य विनिद्रविलोचनं, समवलोक्य ननन्द स गुह्य कः । निरुपधिप्रणयामृतसिन्धवो, जगति नाम भवन्ति हि सज्जनाः ।।१।। किमु तव व्यथते वद पुत्रक !, त्यज सहायवियोगसमुद्भवम् । विधुरमङ्ग ! न दुर्लभमस्ति ते, किमपि सन्निधिभाजि मयि क्षिती ॥२॥ न वनमित्यवसेयमिदं मयि, स्थितवतीह समस्तकृतिक्षमे । नगरमप्यधिक तदरण्यतो, भवति यत्र न सम्मतसङ्गमः ।।३।। जनकतुल्यगिरं तमुदीक्ष्य स, प्रसृतलोचनपङ्कज ऊचिवान् । अयि सतां प्रथमप्रथिताधीस्त्वमिति कः कुत इत्यमिहागमः ॥४॥ कुत इदं सलिलं दलिता रति - प्रियतमाङ्गमिवानय उज्ज्वलम् । इति स पृष्ट उदाहरदुन्मिषद् - दशनदीधितिरोचितदिङ्मुखः ॥५।। सततकान्तनिवासरुचित्वत', सुरयुवाप्यवसं भुवि भुवि गुह्यकः । क्रमसमागतमप्यगुणं सुघीस्त्यजति धामगुणोधुरमाप्य तत् ॥६॥ ध्रुवमशेषवनातुलसौरभोद्गततया कुसुमैरिति विजितकल्पतरुश्रियि भूरुहे, विषमपत्र' इहैव वसाम्यहम् । ७॥ सरसि हंस इवामृतभावतस्त्वदनुभावत ग्रागममत्र खलु षट्पदसंहतिमाह्वयत्युदितसौरभपद्धतिकेतकम् ।।८।। सलिलमाहृतमत्र च मानसाद, विमलमूत्ति यथा तव मानसम् । दिविपदो सरसः सततोन्मिपज्जलजजातरजः परिपिजरात् ।।९।। कथान्तरालेऽपि महेन्द्रसिंहः, सकौतुकः प्राह पिकस्वनां ताम् । आर्येऽद्भुत कर्म तदस्य यत्को, वनेऽपि यत् प्राणदयों चकार ॥१०॥ न पुण्यमेवाद्भुतमस्य किन्तु, सद्वृत्तमप्यार्यविचित्रमेव । अतोऽभिधास्ये तदितो विचित्र - वृत्तरपीत्याह वसंवदासा ॥११॥ सौरभे। च । न १. उप्तन्धवे ।

सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् २ पिब यथेच्छमतुच्छमिदं पयः, सकलदोषविभेदरसायनम् । भवति यन्न मुदे दयितावपु - ललितमप्युपगृहनवञ्चितम् ॥१२॥' इति यक्षवरस्य समं वचसा, मधुरं स पपौ शुचिशोतजलम् । हितदर्शितशुद्धपथानुगती, स्रगितीह सुखैषिण उद्यमिनः ॥१३॥ जलपान विधेः स पराप मुदं, सकलाङ्गलतापरितापहरम् । न हि सीममहौषधिवीर्यगते - रिह विद्यत उत्तमकार्यकृतौ ॥१४॥ अथ सुस्थवपुः क्षितिपालसुतस्तमपृच्छदनुत्सुकवाक्यगतिः । कथमीदृश वारिसुधौघनिधि-निकटी भवति श्रमनाशपटुः ॥१५।। अरणिस्थशिखीव बहिर्न बहुः, पुनरन्तरतोव स तापदवः । मम शान्तिमुपैष्यति यो हि परं, यदि तत्र विचित्रतनुस्नपनैः ॥१६॥ इति तस्य निशम्य वचो मुदितस्तमभाषत सोऽपि कृपार्द्रमनाः । रघुवंशपतेरिव वायुसुते, मयि कृत्यशतक्षमचारुबले ॥१७॥ तव भृत्यपदं दधति स्वरसाद्, भविता लघुलोलतरङ्गगतिः । निकटस्त्वदपेक्षितकार्यकरः, पयसः समुपाश्रय एष वरः ॥१८॥ युग्मम् गमनं यदि वाञ्छति तत्र भवान्, नभसाहमितोऽपि नयामि तदा। न हि किञ्चिदसाध्यममर्त्यमनःपरिकल्पितमस्त्यखिलेऽपि जने ॥१६॥ अवगततदभिप्रायो यक्षस्तं मानसं सरोऽनैषीत् । न हि सीदन्ति सुभृत्या, विदितस्वामीङ्गिताः कार्ये ॥२०॥ तत्र हैम न हिमौघशीतलां, सन्तति स पयसामसेवत । कामिनीमिव विनिद्रपङ्कजैः, सस्पृहं तदवलोकिनोमिव ।।२१।।' राजहसकलकूजितो रां, चक्रवाकमिथुनस्तनस्थलाम् । लोलवीचिपरित्तितभ्र वं, कान्तमानसविशेषशायिनीम् ॥२२॥ युग्मम्। सोऽपिवच्च विशदां मुहुर्मुहस्तां तथा प्रथितमोदसम्पदम् । कामुकाकृतिरशेषविग्रहोत्तापहानिमभजद् यथा क्षणात् ।।२३।। १. द्रुतविलन्वितम् । २. तोटकम् ( प्रयोदशपद्यादारभ्य एकोनविंशतिपद्यपर्यन्तम् ) ३. रयोद्वता (एकविंशतिपद्यादारभ्य विशत्पद्यपर्यन्तम्) ।

प्रयोदशः सर्गः लीलया स परितः परिभ्रमन्, निर्वतोऽथ वनराजिमाययो। दृश्यदर्शनविवृद्धतृष्णयोश्चक्षुपोरमृतनिम्नगामिव ॥२४॥ त्यक्तरम्यनिजवाससस्थिति - यंत्र कान्तनिखिलार्थसीमनि। चित्रकेलिरसिताक्षयक्षकः, सन्तत स वसति स्म कौतुको ।।२।। काननस्थसुरकामिनीजनस्यापि दत्तनयनाम्बुजोत्सवम् । तं निरीक्ष्य स चुकोप गुह्यकः, शर्कराऽपि कटुरेव पित्तले ।।२६।। प्राग्भवीयगृहिणीनिमित्तकोपाऽऽत्ततीव्रतरगूढमत्सरः त स लोचनगत विलोकितुं, नाऽक्षमिष्ट गरुड फणी यथा ॥२७।। निनिमेषनयनः सपाटलां, तत्र दृष्टिमधमः क्षपन् रुपा। स्नातकान्तवपुषोऽस्य कुङ्कुमालेपकान्तिमतनोद् ध्रुव तदा ॥२८॥ आक्षिपत् सपदि चैप त रुपा, रामभद्र मिव रक्षसा पतिः । यास्यसि क्व मम दृष्टिगोचर, त्व गतोऽपि सह जीविते नरे ॥२६॥ तत् सम्प्रत्याश्रये. शरण्यं, मरण ते भविताऽन्यथानुमत्तः । प्राणप्रार्थी प्रकाशयेर्वा, त्वरितमनल्प पोरुप विशिष्टम् ॥३०॥ प्रोचे वीरस्त कुमारोऽसुमारस्त्राण दीनो विभ्यदेवाभ्युपेयात् त्रासस्त्विन्द्रादप्यमोघास्त्रभाजो, वाहूत्सर्पद् वीर्यवत्वान्न मेऽस्ति ॥३१॥' दुर्वाक्यं ते मर्षित कौतुकित्वाद्, त्वबाहुश्रीनर्तनप्रेक्षणेपु । ईदृग्वाचं ह्यन्यथानात्मनीन, सद्यः स्तव्ध चूर्णपेपं पिनमि ॥३२॥ आकण्यँतद् गुह्यकः शारदार्कच्छायां बिभ्रत्तीव्रतापेन रोद्रीम् । रोषावेषान्मारुत मारणाय, ६माभृत्सूनोर्वेगवन्त मुमोच ॥३३॥ तुङ्गक्षोणीरुट्शतोन्मूलनानि, प्रादुप्कुर्वन् रहसा सस्वनेन । कल्पान्तोद्यद्वायुना स्पर्द्धमानश्चित्तोत्कम्प यो जनस्याऽऽततान ॥३४॥ विश्वस्याऽपि स्तम्भिताक्षप्रचारो, रेणोर्वपैरन्धकारानुकार. । नून दुष्टां तदृश तम रुन्धन्, यो वाति स्मोद्बोधिताकाल कालः ॥३५॥ विषम १. शालिन्तत (एकविरायादारभ्य पवारिसमयपतिन् ।)

१८ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् हत्वा लोकान् भूरिशो हेलयवा-त्यन्तानन्दानूनमारूढरंहाः । अन्योऽन्यं यस्ताडितर्गण्डशैलै-मन्ये बाढ वादयन् कांस्यतालान् ॥३६॥ दूरोद्भूतः पत्रहस्तः प्रनृत्यन्, गायन् गाढं सूत्कृतैस्तीवमन्दैः । स स्फूर्तित्वान्नवमान्विष्टपेऽपि, व्यक्तां दधे दुष्टवेताललक्ष्मीम् ।।३७॥ युग्मम् आवत्र्तरावर्तनानि प्रयच्छन्, शैलानामप्युल्वणैस्तं कुमारम् । निन्य भ्रान्ति सत्वरं चक्रभङ्गया, स प्रोन्मीलन्मण्डलीवात उग्रः ॥३८॥ चित्तेऽक्षुभ्यत् तेन नाऽसौ गभीरः, कायेऽप्यासीद् वज्रसारो न दुस्थः। कि कान्तश्रीः कालिमानं जलौघे-येताहो यामुनै राजहंसः।।३।। तत्राध्वस्ते केवलं मोघवृत्ति-दौ स्थ्यं प्रापद् यक्षकोऽसौ विलक्षः । शैलेन्द्र हि प्रोन्मदस्य द्विपस्य, प्रौढोपि स्याद् दन्तभङ्गाय घातः॥४०॥ तदपि पुनस्तं हन्तु समुद्यतस्तरुणनकुलमिव भुजगशिशुः । प्राकाशयत् स रूपं, विभीषणं रक्षसो निचितगगनतलम् ॥४१॥ पार्यागीतिः हास रौद्रेब्रह्माण्ड यत् पूर्ण चक्रे भूयो भूयः । नूनं शब्दब्रह्मव स्वैः कार्यदिः सङ्ख्यातीतैः ॥४२॥' श्यामद्युत्या मेघच्छायां बिभ्रत् शम्पाकान्ति दृग्भ्याम् । ध्वानैर्गद् यद्वर्षामा ग्रीष्मेऽप्याधात् पूर्णा रौद्रीम् ।।४३।। कालस्यास्त्री लोलां जिह्वा-मास्याद् बाह्या कुर्वद् गुर्वीम् । धुन्वत् खड्ग यत्पाणी स्वे धृत्वा क्रोशान् भूरीश्चाऽदात् ॥४४॥ पादाघातः साधीशं साहाय्यायोबुद्धं कुर्वत् । नूनं भूमि कम्पाकीर्णा चक्रे वल्गन्नाना यच्च ॥४५॥ दन्ताग्रेष्वप्याविष्कुर्वत किञ्चिज्जग्धान् जन्तोर्भागान् । न्यक्कुर्वद् यत्कालं तन्वा कृत्यैश्चासीद् भीष्मप्रष्ठम् ॥४६॥ तेनाऽप्येष क्षोणीभर्तुः सूनुः सेहे नैवाधातुम् । पात्रं भीतेरप्यल्पायाः किं नागः स्यायिक्षेपी ॥४७॥ १. विद्युन्मालाछन्दः ( द्विचत्वारिंशच्छ्लोकादारभ्य कोनपञ्चाशच्छु लोकपर्यन्तम् ।)

प्रयोदशः सर्गः 88 दत्रे। राज्ञः सूनुस्त्वेतत् प्रत्याधावत् रे ! रे! क्व त्व यासि । इत्थं जल्पस्तावत्तेनोत्क्षिप्तः खङ्गस्तत्र क्षेप्तुम् ॥४॥ पुण्याल्लग्नो नाऽसावङ्गे, त्वेतस्ोषोऽप्यस्त्र उत्पाद्योरुस्कन्धं शालं, साद्धं मूलः गाखाभिश्च ॥४॥ अथ दिवि लसद् रक्षो रूप समीक्ष्य स यक्षक, नपतितनयस्तेन क्रोधात्तथा समताडयत् । द्रुतमतिमहा ऊर्वोस्तीव्र यथाऽपतदम्बराद् । भुवि दधदधश्छिन्नस्योच्चस्तमालतरो. थियम् ॥५०॥' ततः सुरैः सिद्धगणैश्च तोषाच्चक्रे कुमारोपरि पुष्पवर्पः । स्निग्धैरिवाक्रान्तपरस्य पुसस्त्रिलोक्यपि स्याल्लघुमित्रपक्षे ॥५१॥ दत् सस्तिमभितदनु स, क्षुद्रो रोद्रानमुचदधमवी. । नो वेत्ति स्व सुदृढविदलितोऽप्यज्ञोऽसज्ञाऽवरितखरशिशु ॥५२॥ द्राधीयांसोंजनरुचिवपुपो, भुकामिन्या नवकचततयः । नूनं रेजुर्मणिकुसुमयुजो, ये विश्वस्योपहितभयभराः ।।५३।। जिह्वायुग्मैररुणसुतरल - विद्युल्लक्ष्मीमध चक्षू रुच्या विषमिव भरतो, ये मुञ्चन्ति स्म घनमसितया ॥५४॥ तानप्येषोऽच्युतरथकरणि' - दृष्टयाऽप्युच्चरमृतमधुरया। शान्ति निन्ये किमतनुसुकृता, नो कुर्वन्तीतरजनविपमम् ॥५५॥ यक्षो भूयो विषधरविसरै-र्बध्वा वाढं सकलवपुपितम् । चक्रेत्यन्तं विवशमशरण, जीव को घ इव वहुभवः ॥५६॥ बद्धश्चतैः सुरगिरिरिव स, भेजे स्पृष्टो जलधरततिभिः । दीर्घश्यामाभिरभित उदयत्, कल्याणश्रीविबुधसुरुचितः ॥५७॥ एतांस्तंतूनिव स समभिनन्मक्षु प्राणातिशय नलनिधिः । राज्ञः मूनुः शितगुरुपरशोः, किं वा चित्रं नलदविदाने' ॥५॥ उपदघतः । १. हरिणीन्दः। २. गहउहाः। ३. तुषिः।

१०० सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् रेजु. पाश्र्वेऽस्य पतितभुजगा, मेरोः श्यामा इव तरुनिवहाः । यद्वा नाभिस्थितकमलजनेः, सान्द्राभासो मधुरिपुवपुषः ॥५६॥ सर्पावेष्टविरहितवपुषो, लक्ष्मीरासीज्जलधरपटलैः। निष्ठय तस्योज्ज्वलतममहसश्चण्डाभीशोः प्रमथिततमसः ॥६०॥ भ्रमरविलसिता' इत्थं यक्षो बहुधा, पराजितोऽधिकतरां क्रुधं भेजे । जलदाभिभवावं, दीधितिमिव दशशतमयूखः ॥६॥ अवदच्च कुमारमयं रुषा, विदलितोष्ठपुटः कटुकं मया । शतशोऽवजिता बलभिबला, रिपुगणास्त्वयि का गणनाऽधुना ॥६२।। यदि शकमुपैषि भयद्रुतो, यदि च लासि मुखेन जरत्तृणम् । तव नास्ति तथापि हि जीवितं, मृगशिशोरिव सिंहगुहायुजः ॥६३।। नृपसूनुरकातरमानसस्तमतिसस्मयमेवमभाषत । वचनेन किमुद्वति फल्गुना, न हि जयन्ति परान् पटहस्वनाः ॥६४॥ यदि वालतृणेपु मृगो बली, मृगपति किमु हन्ति कदाचन । न च मूषिकवर्गपराजयी, जयति दन्तिनमुन्मदफेरवः ।।६५॥ चणकोऽतिसमुच्छलितोऽपि कि, दलयति स्थपुटं पृथुभर्जनम् । दिवि दीधितिकीटकदीधितिः, किमु पराजयते दिनकृत्प्रभाम् ।।६६।। अतिबाल इव त्वमपि स्फुटं, दृढफले दशनाय समुद्यतः। द्रुतमाप्स्यसि चान्तरमायसे, चणकखण्डनपण्डितदन्तकः ।।६७।। शरणेऽपि न तस्य भवेत् प्रियं, निजबलं न हि यस्य निराकृतेः। हरमूर्द्धगतोऽपि च राहुणा, कवलितः शशभृत् सहसा विना ॥६८|| यदि चाद्रिपतिलु ठति क्षिती, विशति नागगृहं सितदीधितिः । जलराशिरुपैति भिदा स्थिते - गंगनमुज्झति वैभवमात्मनः ।।६६॥ न तथापि वचोऽपि मनस्विनां, श्रयति दैन्यमनन्यसमौजसाम् । प्रलयेऽपि दवाति किमम्बर, कठिनतामुपलप्रयोचिताम् ।।७०।। युग्मम १. द्विपञ्चाशत्पद्यादारम्य पष्टिपद्यपर्यन्तम् ।

प्रयोदशः सर्गः १०१ वदनेन जरत्तृणसङ्ग्रह, कथममी बत कुर्यु रुदश्रवः । असह रविरश्मिततेरपि, श्रयति कैरवमग्निचय न हि ॥७१।। इति विक्रमसारवच श्रुतेः, श्रुतिपथज्ज्वलितो वनगुह्यकः । नृपसूनुमभिव्यसृजन मुहु - निविडमुष्टिततीः सुशिला इव ।।७२।। हरिणप्लुता' कि निपतन्ति घनौघाः कृतान्तदण्डा अथवा । एवमनेकविकल्पोत्थानमदु संयतिताः ॥७३॥ युग्मविपुला मानप्राणद्विगुणान्, घातांस्तस्मै ददौ कुमारोऽपि । न प्रतिकारे तुच्छा, भवन्ति कुत्रापि विपुलेच्छाः ।।७४।। यक्षोऽपि तैः प्रहारः, प्रापच्छतशर्करत्वमुद्विग्नः । अद्रिरिव कुलिशघा.तै, कठिनतमाङ्गोऽपि सहसैव ॥७५।। मल्लवदङ्गेनाङ्गं निपीडयन्ती दृढ नियुयुधाते। निष्कष्टुं मिवाऽन्योन्य विजिगीषया तावितरेतरपिण्डितवपुषौ नो लक्षितो विभेदेन । केनाऽपि नीरपयसी, इव हसेतरविहङ्गेण ।।७७॥ शंसन्ति सुरा यक्षं, कुमारमन्ये तु खचरसिद्धगणाः । निजजातिपक्षपातो, विलसति साम्येऽप्यहो विद्याधराङ्गनाना, कुमाररूपावलोकतृपितानाम् । न जये पराजये वा, चिन्तास्वार्थी हि सर्वोऽपि ॥७६।। यद्यपि सममुत्थान, पातोऽपि समः समा, प्रहाराश्च । भुजगपतिनकुलयोरिव, तयोस्तदा कोषकोटियुजो. ॥२०॥ विघटितसन्धिश्चक्र, सर्वेप्वन्पु सत्कलायोगात् । यक्षस्तेन स्युर्महतामपि महोबास. १८१ युग्मम् अतिकुपितमना क्षणमपि परिचिन्त्याघात् । प्रहरणमविधात्यं यत्, कुतिशमिव परस्तोत्रम् ॥१२॥ सत्व वीरो ॥७६॥ प्रायः ॥७८॥ तथापि, या। १. विपप्टिपधादरम्य द्विसप्ततिपय पर्यन्तम् । २. जोरदारसमूहाः।

१०२ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् पपात । मुद्गरमुज्ज्वलमायतबाहुः, सीरभुजः' शितसीरमिवैकम् । दूरमगच्छदमुं हि गृहीत्वा, मेष इव प्रतिहन्तुमनीचैः ॥८३॥' तेन च धावनपूर्वममुं स, प्राहरदुन्नतवक्षसि गाढम् । मूर्तिमतेव समस्तनिजाङ्गोल्लासिबलेन निरायतिभाजा ॥८४|| कौतुकलम्पटसिद्धवधूना - मश्रुजलैः सममेष क्षोणितले विनिमीलितनेत्रा म्भोजविषादितखेचरवारः ||८|| कूजितपुजितपक्षिनिनादै नूनमरोदिषुरुद्गतशोकाः। तत्र रुजा युजि काननदेव्यः, कस्य सुखाय हि सज्जनपातः ।।६।। मानसमध्यवहन् मृदुशीत स्पर्शसमीरनिवर्तितमूर्छ। पङ्कजबन्धुकरौघविभिन्ना म्भोरुहविभ्रममापदथैषः ॥७॥ उत्थितवत्यथ तत्र कुमारे, कन्दुकवद्विगुणस्फुरिताढचे । कोकनदच्छवियक्षमभिस्राक्, न्यस्यति चक्षुरनक्षरसत्वे ।।८।। सोऽपि युयुत्सुरधावदमु प्रत्युन्मदकाननसैरिभलक्ष्मीः । कल्पविवर्त्तसमुद्यतकाल प्रेरितबालवयस्य इवोग्रः ॥८६॥ युग्मम् वीरजनस्य हि हस्तनिविष्टं, सर्वमिहायुधमाहवकाले । येन वभार समुद्धृतमूलं, चन्दनशाखिनमाशु कुमारः ॥६०॥ किं वटचिह्नधरः प्रतियक्ष:, किमु विधृतोरुकदम्बपिशाचः । आकलयन्निति गुह्यकराजस्तं विनिवृत्तरणाग्रह आसीत् ।।१।। कोपविवृद्धिमनुप्रतिवृद्धि, यान्ति न सर्वपराक्रमलक्ष्म्यः । सातिशयानुशयोऽपि यदेषो - ऽवाञ्छदितः प्रपलायनमेव ॥१२॥ तथापि चोनमायया, जिगीषुरेनमादधे। तनोभयानक दिवि ॥६॥ खचरादिजनोपि तदाधाद्, वृद्धमवेक्ष्य विहायसि यक्षम् । मनसि ध्रुवमेष विधाता - स्माभिरमाविनिपातममुप्य ||१४|| 3 स यक्षकः प्रवर्धन, ३. १. बलभद्रः। २. दोवकवृत्तं छन्दः (त्र्यशीतिश्लोकादारभ्य द्विनवतिश्लोकपर्यन्तम्)। प्रनारिणकाछन्दः । ४. वेगवती छन्द, (चतु.नवतिश्लोकादारभ्य द्वयधिकशतश्लोकपर्यन्तम्) ।

प्रयोदशः सर्गः १०३ - अपरेऽभिदधुर्यदि मत्यं, देव इहैप जयेत् किमयुक्तम् । करिराजहते मृगराजे, स्वल्पतनौ हि क एव विपादः ।।६।। विदुराः पुनराहुरहो कि, तायशिशुभुजगस्य विजेयः । नररूपधर. खलु दिव्यः, कश्चिदयं स्फुरितः कथिताऽऽत्मा ॥६६॥ इति वादिपु कौतिकिपूच्चैश्चन्दनशस्त्रवरेण विजघ्ने । स्फुरदूरुयुगे स तु तेन, माभूदिवाऽशनिनाऽसुरराजा ।।६७।। अतिदक्षतया पुनरेन, निस्सहमापतन विदधानम् । समताडयदारसमान, तेन' करेण करीव तलद्रुम् ।।६८|| छितवृक्ष इवाचलमूर्द्ध नो, नाग इव ह्रदिनीगुरुतटयाः । शिवजूटतटादिव वाऽम्भ', सोऽपतदम्बरदेशत उच्चात् ॥६६॥ अभवद्विकलः स हतश्री, कौरवराज इवोरु विघातात् । खचरादिदृशां तदवस्था - वीक्षणमप्यतनोद गुरुतापम् ।।१०० स्ववल य इहाकलयेनो, नूनमसौ हि विगुप्यति लोके । विजितप्रचुरारिरय यत्तादृशमाप दशां नृपसूनोः ॥१०॥ पशवः सकला न शृगाला, भूमिरुहा अपि न ह्य रुवूकाः । इति तत्त्वविदप्यमु मायाद्, योद्धमहो स कुधीर्वलशकम् ।।१०२।। रुरुधे यद् भूपनन्दन, युद्धायप सिंहः सुप्तो विवोधितः, करिपोतेन बलाज्जिगीषया ॥१०३॥' वञ्चितसकलजनेक्षणमार्गस्तत्क्षणनिर्मितगुरुतरशैलम् तदुपरि पातयति स्म स साक्षात्, पिण्डमिवोरुपा निचितानाम् ॥१०४।। चूर्णनबुद्धया किमपि विलम्ब्या, क्षिपदथ शैल तस्य शिरस्तः । तत्राऽपश्यदखण्डशरीर, वज़मयत्वात् क्षितिपतनूजम् ।।१०।। सोऽपि समुल्ल सिता तनुकोपो, यावदचिन्तयदस्योन्मयनम् । तावद् यक्षोऽतिशयविलक्षो, हत इव मर्मणि सव्यथ ग्रासीत् ।।१०६॥ ज्ञात्वाऽजय्यं शेपैयुद्धं, प्रारभतेप भुजयुद्वम् । इतरमहरणविषयातोते, चक्रविमोक्षणमिव तदेतदागतम् । पर चरेशः ॥१०॥ १. चन्दनेन । २. एरण्डा । ३. पंतातोप ६.६ः।

१०४ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् चिन्तयति स्म न तत्त्वं' मुग्धः, सर्वाजय्यं पार्थिवसूनोः । वज्रस्येवानलजललोहाक्षय्यं विष्टपविदितमपीह ॥१०८।। प्रातर्कयत् कुमारः किमयं, शृङ्गविहीनो वृद्धो वृषभः । यदनकध्यं विजितोऽपीत्थ, सज्ञाशून्यो वाञ्छति योद्धम् ॥१०॥ अथवा लोकप्रथितोपाख्या, चक्रीवानात्मानं विद्यात् । कर्णामोट विना विसज्ञो, हा हाऽज्ञान दु:खनिदानम् ।।११०।। यावज्जीवति बालिश एष, प्रोज्झति तावन्न समितिबुद्धिम् । नानस्तमितो धर्ममरीचिजगदुत्तापकतां परिजह्यात् ॥१११।। तदयमनात्मविद तनुगद इव गुरुतरदोषसूत्रयिता- क्षयमुपनेय उपक्रमसार्थविदा भिषजेव वलगता। सम्प्रति हि मया न जातु तमिर उपद्रवो निवर्त्तते , विसरति तिमिरनिकरेऽपि स किन्तु निरङकुशो विवर्धते ॥११२।। इत्थमन्तरवमृश्य कुमारो, कुमारो, बाहुदण्डपरिपीडितमेतम् । आदधौ विबुधसंस्तुतवीर्यो, दैत्यभेदमिव पङ्कजनाभः ॥११३॥' स्वं विमोच्य कथमप्यथ यक्षस्त जघान विततोरसि मुष्टया। भूतले परिलुठन्न वशाङ्गः, सोऽपि मीलितविलोचन पासीत् ।।११४॥ मूर्च्छनापगमनात् समुदस्थात्, सुप्तबुद्ध इव केसरिपोतः । क्रोधवाडवपयोनिधिराजो, राजसूनुरपहस्तितबाधः ।।११।। मुष्टिभिर्विजितशैलशिलाभि - वैज्रदन्तपरिभूतिपदाभिः । अप्यमर्त्यवपुषां दलनीभिर्दाढचंतोऽतिशयितादतिवेलम् ॥११६।। अन्धकासुरमिवान्धकभेदी, शैलराजमिव निर्जरराजः। क्रुद्धनाग इव वा प्रतिनागं, प्राहरन्नृपसुतस्तममन्दम् ॥११७।। युग्मम १. स्वरूपम् । २. शक्तिकलाविशेषरूपनिराकरण हेतुज्ञात्रा वद्ये न तु लघन रक्तपावलप- नोपविशेषज्ञाया। ३. सोत्साहं चेष्टमानेन । ४. द्विपदीछन्दः। (प्रयोदशाधिकशतपद्यादारम्य एकविंशत्यधिकशतपद्य पर्यन्तम् । ५. स्वागताछन्दः त्रयोदशः सर्गः १०५ प्राप न एव। गाढघातशतजर्जरिताङ्गः, शैलशिखरच्युतमूर्तेः । स्पन्दनस्य लुलितावयवस्य, श्रीविशेपमसकृत्प्रतिपक्षः ॥११८।। आर्तनादममु चच्चितवाधो, मूर्तिमन्तमिव गर्वमखर्वम्' । क्रुद्धभूपसुतपाणिसमुत्थ-र्मुच्यते स्म न तथापि स घातैः ॥११६।। एवमप्यपजही यदेष, प्राणसार्थममरत्वन तद् ध्रुवं न हि पविक्षतपक्षो-ऽक्षीणमूतिरिह जातु गिरिः स्यात् ।।१२०॥ कण्टका इव खला न हि भङ्गादन्यथापि जहति व्यथकत्वम् । आरसन्तमपि नार्त्तमम तद्विप्रमोक्तुमिह सोऽभिललाप ॥१२१॥ त्रिदशखचरसुन्दरोणां दयार्दीभव- न्मानसाना महाप्रार्थनाना शते- वंदननिहिततजनोक सता शोच्यम- त्यन्तदीनं प्रभो मुञ्च मुञ्चेति च । अभिदधतमधीररावं पुनर्युद्धबुद्धे- रपि त्यागिनं सारमेयायित, नृपतितनुज अोझदानन्दिताशेपदि- व्यादिलोकस्तमुभ्रान्तिगं गुह्यकम् ॥१२२॥ यक्षे जिते शिरसि तस्य पपात पुष्प- वर्षः सहर्षसुरखेचरहस्तमुक्त। सौरभ्यवासितसमस्तदिगन्तरालो, मूतॊ यश:समुदयो ध्रुवमिन्दुकान्तिः ।।१२।।' उद्घोषणा प्रववृते गगनेऽपि विप्वम्, विद्याधरादिवदनाम्बुजखण्डजन्मा । निर्द्ध तविश्वसुभटोऽप्यसिताक्षयक्षो, निन्ये द्रुतं वशमहो पुरुषोत्तमेन ॥१२४॥ ३. सन्ततितक : (योपि. १. प्रभते। २. चण्डष्टिप्रपातो दायकः । धिकतमेरुपादारभ्य सतपतम्।

५
१०६
सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम्
आनन्दिपञ्चमविपञ्चनकोविंदानी,
जैत्यः स्वरैः समदकोकिलकामिनीनाम् ।
लोकत्रयश्रवणदत्तसुधौघवर्ष,
सिद्धाङ्गना अपि जगुः प्रमदप्रकर्षात् ।।१२।।
आयोधनेषु तुलितातुलकेवलस्व-
वीर्यं प्रशस्यमनयोरिदमेव लोके ।
यत्र त्वसङ्खचचतुरङ्गबलौजसव,
सिद्धिःप्रवीरविहितैरपि किं धनैस्तैः ।।१२६॥
दृष्टाः श्रुताश्च बहवोऽपि रणाः समाना,
वैषम्यभागुभयथाऽप्ययमेव चित्रः ।
मर्त्यस्य तावदमरेण समं यदेष,
प्रादुर्बभूव च यदत्र जयो नरस्य ॥१२७।।
इत्याद्यनेकविधसप्रमदप्रवाद-
व्याजप्रवादितयश पटहे सुरौघे ।
श्रीमत्कुमारमुखदर्शनलोलयोषिद,
दत्तावसादमभिजग्मुषि नाकलोकम् ।।१२।।
एतत्प्रतापपरिभूत
इवातिमन्दे ,
सूर्ये श्रयत्यपरशैलगुहान्तराणि ।
आलिङ्गितः सरभसं विजयश्रियाऽथ,
तस्माद् वनाद् द्विरदवन्निरगात् कुमारः ॥१२६॥
चक्कलकम्
एकाकिनाऽपि हरिणेव विजित्य यक्ष,
नाग बलं च नरकं च यथा तमश्च ।
प्रावद्धर्थत त्रिभुवनप्रथितप्रताप-
भाजापि मोदफलदाऽमलकीत्तिवल्लिः ॥१३०॥

चतुर्दशः सर्ग: १०७ अत्यद्भुतेऽपि तनुमप्यभजत् प्रवीरो नोत्सेकमेष समरे विजये विविक्तः । कि वा विकारमुपयाति पयोधिनाथो, गाम्भीर्यभाग गुरुतरङ्गभरेऽपि जातु ॥१३१।। - इति युगप्रवरागमश्रीमज्जिनपतिसूरिशिप्यलेशविरचिते थीसनत्कुमारचक्रिचरिते असिताक्षयक्ष- विजयो नामः प्रयोदशः सर्गः। छ. ॥१३॥ चतुर्दशः सर्गः . कतिपयपदमात्रमेपोऽपि यावज्जगाम प्रभिन्नेभलीलागतिर्भूतलं भूपयन् । सर इव कमलेर्जपाकान्तिभिः पादपृष्ठः कलैः कोकिलानां रवैर्गीयमानो ध्रुवम् । सपदि तनुविभावितानेन विद्योतिता- शेपदिकचकवाला रतेह्रीपदोन्मोलिका नयनविषयमाशु तावत् समाजग्मुरस्या- प्टससचादिशाइन्यका नूनमब्जेक्षणा. लवरिणमजितरम्भा भानुवेगात्यविद्या- धरनरपतिपुत्र्यो यक्षतुर्घव या:। क्षितिपवरसुतस्योपायनायागु नागे- विधभुरवनिमुलात् प्रेषिताः स्वोय न्याः ॥२॥ १. भारमो पतः।

१०८ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् निरुपमनिजरूपश्रीवितीर्णस्वकान्ता- गुरुपरिभवदुःखा अप्यभूवन् सुमान्याः । मदननरपतेर्या विश्वजत्रास्त्रभावा- दुपकृतिविदुरैर्यद् गण्यते नाऽपकारः ॥३॥ सुरभिषु वदनेषूत्फुल्लपद्मभ्रमेण , भ्रमरयुगमुवासेवाशु नेत्रापदेशात् । शशिरुचिमपि यासा धारयत्स्वक्रमेण द्विवसतिवसनेच्छापूरणायेव लक्ष्म्याः ॥४॥ मदनशबरनेतुः प्रोच्चदुर्गाधिवास- प्रमददमपि विश्वं जेतुमुद्योगभाजः। कुचयुगमपि पीनं लङ्घयामास यासां, नपतिरिव गुणाढयो हेलया तारहारः ॥५॥ जितजगत उदञ्चत् खेदतः स्नानभाजो, लवणिमजललोल निम्ननाभीसरस्याम् । जघनपुलिन'-मारात् कर्तुमाभाच्च यासां , स्मरधरणिभुजङ्गस्येव लीलाविहारम् ॥६।। कलरणमणिकाञ्चीदामबद्धं नितम्ब - स्थलमपि विरराज स्थेमवच्चारु यासाम् । निगडनपदमुद्यन्मत्तशृङ्गारयोनि- द्विरदपरिवृढस्येवोल्लसच्छृङ्खलावत् ॥७॥ स्तनजघननितम्वाभोगभारं महान्तं , कथमिव सुकुमारा नित्यमेता वहेयुः । ध्रुवमिति गुरुपोनस्तम्भविभ्राजि युग्म ललितरुचि यदूर्वोनिममे यौवनेन ।।८।। १. संकतम् ।

चतुर्दशः सर्गः १०६ रुचिररुचिसमुद्यल्लक्षणश्रीनिधानं पदयुगमनुलीनं मञ्जुमजीरयुग्मम् । मरकतमणिसारोद्भावि' भाति स्म यासां , फणियुगलमिवैतद् रक्षकं कुण्डलथित् ॥६॥ विरचितमिह धात्रा नूनमेतद्विधाना - वपतितपरमाणुधैणिभिः शेपविश्वम् । युवतिमयमनीदृक् केन हन्तान्यथाभ्यो, लवणिमजलधिभ्यः कान्तरूपावधिभ्यः ॥१०॥ निधय इव कलानां यौवनस्येव वासाः, सकलगुणमणीना रोहणानेरिवोद्यः । ध्रुवमपरमिवोपादाय निर्माणहेतु, निरुपमचरिताढयाश्चकिरे या विधाना ॥११॥ मधुरगतिरथैष तास्तत्र संवीक्ष्य कान्ते वने सुभ्र वो वैवुधोद्यानलीलाविडम्बिन्यलं, त्रिदशयुवतयः किमेता अथो भूरिरूपश्रितो विश्वमोहाय कृष्णेश्वरानङ्गपत्न्य. स्वयम् । प्रचुरतरविकल्पकल्लोलमाला न्यधाच्चित्तवारा निधावित्यमुद्भूतकोतूहलापूरितो , भवति हि विदुषोऽपि विश्वातिशायि क्षणाधायि- वस्तुप्रलोके महानेव मोदः क्षितौ सम्भ्रमात् ।।१२।। दृष्टोऽसौ ललितविलोलनेत्रपत्र- स्ताभिस्तत्क्षणलसितोरुमन्मथाभिः । चन्द्र वा किमु न विलोकयन्ति हा- दभ्यासे चपल चकोरयोपितो हि ।।१३॥' ३. प्रांतीयन् (वा. १. निर्यास गुदद्भुतम् । २. माल्यो २४. दारम्प एपितविपापसम्)।

११० सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् पश्यन्तो निमिषविलोचनास्तदास्यं, कन्यास्ताः क्षणमपि लेभिरे न तृप्तिम् । गावो वा किमु विरमन्ति शीततोयात् , तृष्णार्ताः कथमपि मानसं पराप्य ।।१४।। तदृष्टौ मदननिदाघतापिताङ्गय- स्ताः स्वेदप्रवहमुचः क्षणाद् बभूवुः । शीतांशोः करपरिमर्शनादिवोच्चैः, स्तम्भस्था रुचिरनवेन्दुकान्तपुत्र्यः ॥१॥ सयोगे मधुसुहृदा चिराद् वनेऽस्मिन् किं कामः प्रमुदितमानसोऽयमागात् । ना चापः शरविकलश्च सोऽपि शश्वत् , तन्नूनं पुरुषविशेष एष कोऽपि ॥१६॥ किं त्वीशो न दिविषदामपीदृशाङ्को भूयस्या नयनवनश्रियाश्रितत्वात् । नोपेन्द्रः शितितमदेहभीषणत्वा- नेशानो विषमविलोचनत्वरौद्रयात् ॥१७॥ १ न ब्रह्मा वदनचतुष्टयाङ्कितत्वा- दित्यस्यासुरसुररूपदर्पहन्तुः । त्रैलोक्ये किमपि वचो विचारमार्ग, क्रान्त्वैव स्थितमिदमद्भुतं स्वरूपम् ॥१८॥ इत्युच्चनवनवकल्पना नदीष्णा अप्येताः प्रवदितुमीशते स्म तं नो । माधुर्यं पयस इवाऽपि वाग्मिनाथः को वाऽल भुवि महतां गुणाभिधायाम् ॥१६॥ चक्कलकम् चतुर्दशः सर्ग: १११ सोत्कण्ठा: क्षणमथ निविदाभियुक्ता. , कम्पाढयाश्चकितविलोचनाः सशङ्काः। सासूया: प्रमदभरालसाः सचिन्ता - स्तत्रासन्निति बहुकामचेप्टितास्ताः ॥२०॥ आश्चर्यः स मदनदेशितस्तदानी व्यापारो वपुपि बभूव कन्यकानाम् । यं वक्तु यदि परमीश्वरः फणीन्द्रः , सोऽपि स्याद् बहुयुगकोटिजीवितश्चेत् ।।२१।। इति विविधविलासदासीकृतामय॑योषा मुहु- स्तत्र विन्यस्तविस्फारिनेत्राम्बुजप्रोच्छलत्सम्मदाः, द्विरदघटनिभस्तनान्तर्जुठद्दोघशेपायमाणा - मलस्थूलमुक्तावलीभासिताकुण्ठकण्ठस्थला.। नृपतिसुतमभिप्रवृद्धातिशायिस्पहावाशिता.' शादले कानने दानलेखाडितं कुम्भिनाथं यथा, स निकटतरमेत्य दन्तप्रभाष कृतोत्फुल्लकुन्द - धुतिस्ता वभापे स्मितक्षालिताताम्रदन्तच्छद ॥२२॥ कुतोऽत्र काः किमिति विभूपित वन निजस्य या वदत सरोजलोचनाः । कजनजा कठिनपर्वतावनी, प्ररोहण विदधति जातु कोमलाः ॥२३॥' न ससम्मदप्रणयसुधारसश्च्युत ङ्गिराघरीकृतपरपुप्टनादया । तमाश्ववादिपुरतनुस्मरस्मित - प्रभाजलप्रवृततदास्यमज्जनाः ॥२४॥ २. व्यातात्यो दपटक। ३. रचिरामदः (अपोषिविपासारम १. फरिण्यः। एकविसापर्यन्तम् ।

११२ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् अस्त्यस्मदीया प्रियसङ्गमाभिधा- नेदीयसीतः प्रवरा महापुरी। या सर्वथा दत्तदरिद्रताविधिः, पुरोऽमराणामपि विश्वसम्पदः ॥२५॥ ततोऽधुना सकरुणमादृशे जने , पुरीमिमां प्रति नरपुङ्गव ब्रजेः । गतः शनैः सकलमपि प्रमास्यसे- ऽस्मदीयमाचरितमिहागमादिकम् ॥२६॥ पवित्रिता भवति च सा त्वया पुरी, स्वदर्शनैरमृतपानसम्मितः । भवादृशा न खलु विधेयसञ्चये , किलेशे स्वयमपि नैव कोविदाः ॥२७॥ स कन्यकाः सपदि सभाजयन्मुदा, व्यधादथाभिहितममूभिरजसा । विदो न हि प्रणयभरोपरोधिता, न किञ्चनादधति वचः प्रियापितम् ॥२८॥ परापतां पुरमथ भूरिकञ्चुकि- प्रदर्शिता नवमतदीयपद्धतिः। लभेत वाभिमतमपीह धाम को, न मार्गगो हितजनशुद्धभाषया ॥३६॥ यदा प्रचलितपूगकेसरं , प्रभञ्जनः कुसुमसुगन्धलालितः। विटैरिवोपवनमुपाययो पुरः, प्रभाकरः सपदि तदा तिरोदधे ॥३०॥ कौतुकं कुवलयमोदवन्धुरे, यदुदितवत्यनुष्णगौ। चण्डदीधितिः, अदृश्यतामभजत क्व वा स्थितिः शिखिनि कटे स्फटावतः॥३१॥ च स न नृपाङ्गजे चतुदंशः सगी ११३ निधिरपि महसो महोदयकारिणो, दिवसपतिरसौ जगाम शमं तदा। कलयति हि न कं कृतान्तमहाभटः, स्वसमयवशतः समर्थशिरोमणिः ॥३२॥ सुरक्तसूर्यामभिवीक्ष्य पश्चिमा-मीषद्धृवं श्याममुखास्तदेय॑या । सद्यो बभूवुः सकला दिगङ्गनाः, पत्युविपक्षानुगमो हि दुस्सहः ॥३३।। प्राच्या: समामस्त दिशेऽपि सम्पद, दिवाकरे यच्छति रागशालिनि । तत्राविशेषज्ञशिरोमणी महारुषेव भेजे तमसस्तति वनम् ॥३४।। यदाकुलव्याहतयो विहङ्गमाः, सजग्मुरुच्चैः शिखराणि शाखिनाम् । लोकान्तरं प्रापुपि पद्मबान्धवे, क्रन्दन्त्य सुस्थाः स्म तदुच्छुचो ध्रुवम् ॥३५ । हातुं प्रियं वासकसज्जयोपित-स्तल्लालितः केलिकलापिपोतकः । आरुह्य यष्टि क्षणमुच्चुकूज यत्तनिष्क्रय दित्सुरिवंप तां प्रति ।।३६।। भविष्यदासन्न वियोगविस्फुटच्चकाहचेतः क्षतजेन सम्प्लुतम् । रक्तं जलं नूनमधुस्तदापगाः, सन्ध्याभ्ररागप्रतिविम्बचुम्बितम् ॥३७॥ गतेऽपि चास्त तिमिरप्रमाथिनि, क्षण व्यजृम्भन्त न तामसाश्चयाः । मृगाधिराजे पतितेपि यन्मृगाः, सद्यस्तदासन्नचरा भवन्ति नो ॥३८॥ नीलं क्वचित् वापि सपाटलं नभो, निष्पच्यमानाम्रफलस्य विभ्रमम् । दधौ नृणां कालविशेषनिर्मिता, दशा विचित्रा प्रतिपादयद् ध्रुवम् ॥३६॥ श्यामैकरूपत्वमथ क्षणाद् दधौ, द्यौः पुण्डरीकाक्षतरिवाभितः । का निर्मला स्याद् विगते महोनिघौ, लोकान्तर प्रेयसि वा महोयसो ॥ ४०॥ अस्तङ्गते चाथ रवो खगेश्वरे, तमोमहानागबलानि सर्वतः । निरङ्कुश कौशिकवृन्दमोदका - न्याविर्वभुबु वनोदरेऽखिले ॥४१॥ असिच्यन्तेवाऽलं मृगमदरसंसिभवना- न्यगृह्यन्तेवोच्चैः सकलकमलिन्यो मधुकरैः । समाच्छाद्यन्तेवाऽसिततरपट: स्त्रोकुनतुराः । महाकोलाभासे विलसति जगत्पन्धत मते ॥४शा' १. अपराजिता बन्द।। २. विष्णुपरिष। ३. ािरिणी।

११४ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् किं गर्भवासस्थमुताऽजनास्तृतं, किं वोरुगारुत्मतपञ्जरं श्रितम् । अथाऽहिलोके पतितं जगत्तदे त्यवेदि सम्यग् न बुधेश्वरैरपि ॥४३॥ बभूवुरुन्निद्रदृशोऽभिसारिका, विशेषतोऽन्या अपि कौशिकाङ्गनाः । तमस्यपि स्फूर्जति दृष्टिरोधिनि, क्व वा सुदुश्चारिषु लौकिकी स्थिति.४४' दृश्यत्वमापुतिये च तत्र, ग्रहा दिवि क्षोणितले प्रदीपाः । रुध्येत केन प्रसरः सुधाम्नां, चण्डत्वभाजोऽपि मलीमसेन ॥४५॥ महौषधीनां गिरिगह्वरेषु, प्रदीपनं सातिशयं तदाऽभूत् । तत्स्पर्द्धयेवोद्धतविप्रयोग - दवस्य चित्ते च रथाङ्गनाम्नाम् ॥४६।। स्मितं दधच्छऋदिगङ्गनायाः, सुधारुचेः सङ्गसमुत्सुकायाः । मुख रुचां जालमलञ्चकार, कर्पूरपारीपरिपाण्डुमूत्ति ॥४७।। श्रियं तदाऽशिश्रियदिन्द्रकाष्ठा, समर्गलो शेषसमस्तदिग्भ्यः । का स्यान्न संशेश्लिषिता प्रियेण', प्रियान्तराध्यक्षममन्दलक्ष्मीः ।।४।। किर्मीरितं व्योमशशिप्रभाभि - विष्वक् तताभिः श्रियमादधार । गङ्गाकलिन्दात्मजयोर्नदस्य, मू!र्द्ध ववृद्धप्रमदाततेर्वा ।।४।। तम पटोऽप्यंशुशरैविभिन्नः, स्वकार्यकुण्ठोऽजनि कर्मठोपि। शुद्धान्तिके दृष्टिविघातकत्वं, नाशुद्धिभाजोऽपि विजृम्भते यत् ॥५०॥ समुद्ययौ श्वेतरुचः कलाऽथ, पौरस्त्यदिक्कुम्भिशिरोङ्कुशश्रीः । दंष्ट्रावशिष्टेव हतस्य दूरं, तमो वराहाधिपतेविजिह मा ॥५१॥ चकोरदयिताननेष्वमृतबिन्दुवृन्दश्रुति ततान हसनश्रियं कुमुदकोशगर्भेष्वलम् । जगद्विजयपाटवं मकरकेतुवाणेष्वहो , कलापि हि कलावतो विविधसाध्यसिद्धिक्षमा ॥५२॥" श्रीखण्डसान्द्रद्रवचितोद्य ल्लाटीललाटश्रियमाससाद । दलं सितांशोरमृताशिनां यत्, सुधौधपाने चषाकयते स्म ॥५३।। , २. वस्थ छन्दः। २. सपत्नीसमक्ष । ३. समीपे । ४. पृथ्वीचन्दः।

चतुर्दशः सर्ग: ११५ आदाय नून कुमुदाकराणां, रुचः समग्रा अपि शोतरश्मिः । करैनिजैरेव न वो विधाता, क्रमेण सम्पूर्णतनुर्वभूव ॥५४॥ तित्यक्षुरप्येष सुरेशितुर्दिश, तस्यां क्षणं पूर्णकलोऽन्वरज्यत । कलाभृतः काममरक्तमानसा, अपि स्वकान्तासु न विक्रियास्पृशः ।।५।। उत्सृष्टरागोऽपि कुमुद्वतीनो, चुचुम्ब वक्त्राण्यथ करवाणि । ररज चन्दुः शुचितास्पदानि, स्वाधीनकान्तप्रमदामनासि ॥५६।। क्षीराब्धिवीचिप्लुतवत्सुधौघ प्रस्नातवद्दन्तसमुत्थबद्धा' । सितोत्पलोत्कीर्णवदिन्दुरश्मि - च्छटास्तृतं क्षोगितलं बभासे ॥५७।। विकासलक्ष्म्यामपि करवाणि, नादुर्मुदं चक्रगणाय काञ्चित् । कुयुः समृद्धा अपि देवदग्धे, जने गुण क खलु शीचभाजः ॥५८|| मनस्विनीनां मदनोऽपि मान - ग्रन्थि समुद्ग्रन्थितवानवाप्य । साचिव्यमिन्दो. किमु वा न साध्यं, प्रसाधयेत् प्रौढसखा प्रवीरः ॥५६।। वकोटकोके न न हसकोके - ऽप्यभूद् विभेद स्फुरिते हिमांशी । जडात्मनि स्फूर्जति साध्वसाध्वो, क्व वा विशेषः प्रथते स्फुटोऽपि ॥६०॥ कान्ताः सुरक्तानपि रक्तुमीशान्, यन्मण्डनान्यादधुरद्भुतानि । तत्प्रज्वलद्वह्निशिखासु नूनं, निचिक्षिपुः सन्ततमाज्यधाराः ॥६१।। तथाभिरामेऽपि न शीतरश्मी, स्मितानना पङ्कजिनी बभूव । सूर्यप्रिया का दयितान्तरे स्यात्, पतिव्रता जातु सहासवृत्तिः ॥६२।। सजति जगतस्तापोच्छेद सुधाकिरणेऽनिश , मृगशिशुदृशां कामक्रीडाः प्रवर्तयति स्फुटाः । नृपतितनयोऽप्यागाद् गुञ्जन्मृदङ्गधनभ्रमो- नटितशिखिभिः कान्त सौध नभश्चरभूपतेः ।।६३॥' इति युगप्रवरागमश्रीमज्जिनपतिमूरिशिष्यलेशविरचिते श्रीसनत्कुमारचकिचरिते चन्द्रोदयवर्णनो नाम चतुर्दशः सर्गः ॥१४॥ १. दिरददशनपटितमिप। २. चाहाम्पम् । ३. वरुपयार। 1. हरियो ११६ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् पञ्चदशः सर्गः स स विवेश नृपेन्द्रगृहं शनैः, शनैः, कञ्चुकिदर्शितमार्गविभागः । शुचिशोकविवर्जितमेणदृक् चित्तमिवाशु युवातिविदग्धः ॥१॥' निनाय समस्तविभावरी, लोचनपक्ष्मनिमेषमिवाशु । सुखितः शयनीयगतो महाराज इवोज्झितखेदविवाध ॥२॥ अथ एकोनविंशत्यावृत्तः प्रभातवर्णनमाह- परिहाणिमुपेयुषि शर्वरी - शीतरुचोः परिरम्भविनोदे । कुमुदादिपरिच्छददुर्दशा दर्शनशोकभरादिव सद्यः ॥३॥ तिमिरेऽपि दिश लघुवारुणी, गच्छति नूनमनुष्णमरीचेः । शरणं गरुडानजन्मकर निर्दयताडितजर्जररूपे ॥४॥ सकलां रजनी' परिचुम्बितां, मुञ्चति नित्यरतामपि लक्ष्मीम् । शशभृत्यथवा क्व कलङ्किनां, स्नेहपरेऽपि जने सुमनस्त्वम् ।।५।। शशिनोऽपि चकोरकुटुम्बिनी - निर्भरपानविधेः सुकृशेऽङ्गे। ध्रुवमुद्धरदीधितिसञ्चये, म्लानमुपेयुषि मातलिकाभे ॥६॥ अरुचित्वमुडुष्वपि यात्स्वलं, नूनमसुस्थसितांशुविलोकात् । शुचयः क्व नु कान्तियुजोऽयवा, स्वामिनि कालकलाकलिताङ्गे ॥७॥ रजनिक्षयतोंऽशुविमोक्षण व्याजत ईक्षणतोयमिवेन्दी। क्षरति प्रमदासु हि रागवान्, किं न करोत्यतिनिन्द्यमपीह ||८|| वहुचविहङ्गयुगेपु तं, कामिजनादिव सन्ततयोगम् । स्ववियोगपणार्पणतः समादित्सुपु हर्षविनिर्भरहृत्सु ॥६॥ अलिकुलकलरवचयमिषविहित- श्रवणसुखदशशधरगुणकथने । तदनुदयविमुख इव कुमुदवने, निमिपति सशुचि सकलशुचि वृपभे ॥१०॥ ३ १. उपचिन बद. (२-६ पद्यपान्तम् ) । २. मभिध्याप्य । ३. मरिणगुणनिकराज्य छन्दः ।

पञ्चदशः सर्गः ११७ कुक्कुटवासितमन्त्रनिनादे, विदधति मानमहाविपशान्तिम् । भीरुजनस्य नितान्तविषीदन् - मृदुतरमञ्जुलकायलतस्य ।।११।। पक्षिकुलेपु कुलायशतानि, प्रविरचयत्सु सजीवनिभानि । उद्भवदुद्धरभूरिनिनादै-रनुकृतयौवतहुकृतिभेदैः ।।१२।। इन्द्रदिशोऽपि मुखे श्रयति स्राक्, श्रियमतिशोणितरत्नशिलायाः । नूनममर्षवशात् सितरश्मो, वरुणदिगायिणी स्फुटरागे ।।१३।। उच्छ्वसितानि मनाक् कमलानि, स्तनसुभगानि सरोरुहिणीपु । संदधतीषु वधूष्विव नूनं, निकटनिजप्रियसङ्गमहर्षात् ॥१४॥ पङ्कजिनीषु मधुव्रतनाद - मधुरमिनोदयतो मुदितासु । गायनवृत्तिपराष्विव लोल द्विकचपलाशसुलास्यशुभासु ॥१५|| दुष्टजनस्य हि साधुविपङ्गोऽप्यफल इतोव दिशत्यनुविश्वम् । सर्वपदार्थ विभासिदिनेशोदयहतदृष्टिनि कौशिकवृन्दे ॥१६॥ कोकनदच्छविमभ्रसरोऽन्ते - ऽरुणतिलकाकृतिमिन्द्रदिशोऽपि काञ्चनविभ्रमकन्दुकलीला, सकलहरिच्छिशुमुग्धवधूनाम् ।।१७।। धातुविपाटलकुम्भविभाग · द्युतिमुपयाति सुरद्विपनेतुः । वासरनाथनवोदितबिम्बे - ऽप्युदयगिरौ धरणीकुचकुम्भे ॥१८॥ युग्मम वारवधूनिवहे नृपसौधाद्, बहिरुपयाति शनैरतिखिने । जागरतो निशि सान्द्रनखाङ्क-व्यथिततनौ वसनागविषङ्गात् ॥१६॥ मलयजमलयजतरुभरवहनात् । परिमलसुरभितसमभुवनतले । सुरतविबलबहुयुवतिकृतमुदि , प्रवहति सुशिशिर उपसि च पवने ॥२०॥ १. द्रुतमध्या छन्दः (११-१६ पयपन्तिम्)। २. मणिगुणनि मगर | ११८ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् स बुबुधे कुमारधुरीणो, मङ्गलपाठकतूर्यनिनादैः । पटुभिर्जलनाथतरङ्ग ध्वानभरैरिव कैटभभेदी ॥२॥' कुलकम निजपस्त्य इवाखिलभृत्य प्रस्तुतवैनयिकोऽथ विभाते । अगमन्नृपसन्निधिमेष, श्रीकलितः कमलापतिलीलः ॥२२॥ खचरेन्द्र वरोऽपि तमाशु, स्वागतभाषणपूर्वमतन्द्रः। उदतिष्ठदभिप्रथितोद्यद् गौरवमात्मगुरुं मघवेव ॥२३॥ न महानवसीदति कृत्ये, क्वापि शुभे गदितुं ध्रुवमेतत् । विदधौ नृपमूनुरपूर्वां, तस्य महाप्रतिपत्तिमभिज्ञः ॥२४॥ अमृतद्युतिवत्सुकलत्वाल्लोचनकान्तमशेषजनानाम् निजगाद महीपतिरेन, केसरिविष्टरसंस्थितिसुस्थम् ॥२५॥ मम जीविततोऽप्यतिकान्ता, रूपविडम्बितकामवधूकाः। प्रमदोचितविश्वकलाग्र्याः, सन्ति शुभाचरिता वरकन्याः॥२६॥ प्रथितेन भविज्ञतयाचिर्मालिमहामुनिना'-ऽप्यतिदिष्टाः । असिताक्षजयी ध्र वमासां, भर्तृवरो भवितेति पुरस्तात् ॥२७॥ एव दिनाद्वनमाभिस्त्वत्पथसम्मुखमाश्रितमारात् । मुनिवाक्यत आगमनेक्षा - ऽवश्यविधायि परादनुरागात् ॥२८॥ तदवश्यमतृष्णमना अप्यर्हसि अप्यर्हसि कर्तुं मकालविलग्वम् । वसुसंख्ययतया विदितानां, सम्प्रति पाणिपरिगहमासाम् ।।२६।। चक्कलकम् परिभाव्य ततो नृपमोल - वाक्यमिति प्रणयान्वितमेषः । समस्त भवन्ति महान्तो, ह्यथितवस्तुनि न प्रतिकूलाः ॥३०॥ अमृतमधुरगिर इभपतिगमनाः, परिगतसुखकरनृपसुतवचना: प्रतिपदमधुरिह मुदमतिसुभगा निजजनकसदसि खचरनृपसुताः ॥३१॥ तत 3 १. वेगवतीरन्दः (२१-३० पद्यपर्यन्तम्) । २. तापसेन । ३. मणिगुणनिकरायं छन्दः।

पञ्चदशा सगी ११६ - गणिते विदोषगुणपात्रे, सर्वशुभग्र हैश्च परिदृप्टे। गणकेन शुक्रधिषणेन, प्राज्ञनुतेऽथ शस्ततरलग्ने ॥३२॥ स विवाहमङ्गलममूषा, प्रस्तुतवान् मुदा खचरनाथः । प्रविडम्बितद्रुपदकन्या पाणिनिपौडनोत्सवविशेषम् ॥३३॥ युग्मम् उदघोषयन् निजपुरेऽसौ, दानमवारितं दानमवारितं कनकराशेः । स्वसमं समस्तमपि विश्वं, कत्तुं मिवेच्छन्नधरितकर्णः ॥३४॥ विदधुः प्रसाधनमनेकाः, सम्यगलङ क्रियानिपुणनार्यः । नृपपुत्रिकासु सकलासु, रूपनिरस्तकामदयितासु ॥३५।। क्षुरिमौलिना पदनखेषु, स्वीकृतदर्पणाकृतिपु तासाम् । विहिते विशोधनविधौ हि, क्षोणिपदत्तस्वर्णनिकरेण ॥३६॥ विमले निवेश्य तपनीयस्यासन आदधुः स्नपनमासाम् । स्तनकुम्भशोभिनवकुम्भः, स्वर्णमयः सुगन्धिजलपूर्णैः ।।३७।। युग्मम् वसनैः सितांशुकरचौरैः, प्रावृतकाञ्चनाङ्गलतिकास्ताः । सुरशैलतटय इव रेजुः, शारदवारिदान्तरितरूपाः ॥३८॥ सधवाश्चतस्त्र इह चक्रु स्तन्तुसरर्मुदावमननानि'। कुलयोषितोऽय॑नुपलब्व्य, प्रावरितु शरीरमिव तासाम् ।।३६।। गुरवो निचिक्षिपुरमूषा, लाजकणान् यशःशकलरूपान् । सकलौषधिप्रचयनिर्यद् - गन्वसुगन्धिकेशयुजि चरणतलानि सान्द्रतरयावकलेपभाजि , प्रविदधिरे प्रसाधनधनाभिरिहाशु तासाम् । अविरतसङ्गयाचनपरायणरागवन्ति, ध्र वमनुपाधिरागसुभगानि ययाम्बुजानि ॥४१॥ शी ॥४०॥ १. केतुमतीहन्दः (३२-४० पद्यपर्यन्तम्)। २. प्रोतराकानि । ३. पाणिनीतम्।

१२० सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् चन्दनेनान्वषेचि क्षणादाननं पत्रवल्लेः प्ररोहाय नूनं घनम् । ताभिरोष्ठोऽपि तच्चित्तवद्रागवा नप्यकारि प्रकामोज्ज्वलो यावकैः ॥४२।। - अञ्जनं नेत्रयोः श्यामयोरप्यभा न्यस्तमिन्दीवराङ्के यथा षट्पदः । कान्तवस्तुन्यकान्तोऽपि कान्ति दधा - त्येव सम्पूर्णचन्द्रे यथा लाञ्छनम् ॥४३॥ आहिता पत्रवल्ली च कास्तूरिकी शोभते स्मेभकुम्भप्रतिद्वन्द्विनोः। रक्षणायेव शृङ्गारसर्वस्वयो - मण्डली भोगिनः पीनवक्षोजयोः ॥४४।। स्थासको रोचिकस्तूरिकाकल्पित स्तल्पवत्कामिनां नेत्रविश्रामभू.। भालभागेषु तासा तासां विशालेष्वलं, चन्द्रबिम्बार्द्धलीलेषु चाङ्काकृतिः ।।४।। जात्यजाम्बूनदालङ कृतिप्रोज्ज्वला श्चक्रिरेऽङ्गे समस्तेऽपि ताः कन्यकाः। सद्रसा दोषरिक्ताः सुशब्दश्रियः, सत्कवेः काव्यवाचो यथा सद्गुणाः ॥४६॥ कन्यकावत्कुमार कुलस्त्रीकुला न्यादधुश्चारुसंस्कारभाज शाब्दिकाः सर्वविद्यामुख वा ध्वनि , विश्वविश्वार्थसम्पादकार्थनदम् ॥४७॥ - तनौ । १. सग्विणीसादः (४२.५० पापर्यन्तम्) ।

पञ्चदशः सर्ग: १२१ रत्नभूषाभिरुद्भासितोऽङ्गेऽभितः सोऽशुभन्नेत्रपीयूपसद्वृष्टिभिः स्थास्नुभिः पार्श्व एवाङ्गनाभिस्तदा , कान्तिवीचीपरीताङ्गिकाभिर्यथा ॥४८॥ प्राशुसिंहासने सोऽशुमद्भूपण श्चन्द्रिकाचारुरिन्दुर्यथा दिद्युते । प्राच्यशैले त्रिलोकोकुरझेक्षणा - करविण्योधनिद्रातिसर्वकपः ॥४९॥ कन्यकास्तत्प्रियश्चाऽरुचन्नाननैः स्वादुताम्बूल रक्ताच्छदन्तच्छदः एकदेशोद्भवत्पल्लवालोहितः सस्मितेः पङ्कजैर्यद्वदजाकराः ।।५०॥ शङ कुनिवेशनिश्चितबहुशुभतरफलं ज्योतिपिकेण लग्नमनुपममुपदिशता। सन्निधिमत्समोदभरख चरनरपते रादध उद्यमः समुपयमविधिकरणे ॥५१॥' आरुह्य मङ्गल सितद्विरदं कुमारो. ऽसख्यन भश्चरवलैरनुगम्यमानः छत्रप्रसाधितशिराः सुमनाः प्रतस्थे , शको यथा त्रिदशकोटिशतानुयातः ॥५२।। अने प्रनृत्तरमणोशतदत्त दृष्टिः शैलूपवर्यनिकरैरभिनीयमानः चकीय विश्वविजयी स्वपुरप्रवेशे, चकाङ्कपाणिरुपयामगतो . - विरेने ॥५३॥ १ पभाजविलसित पन्दः । २. नट।

१२२ सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् संवीक्ष्यमाणललितः पुरसुन्दरीभिः सोत्कण्ठमुद्भटमनोभवविभ्रमाभिः स प्राप निजितसुरेन्द्रविमानकान्ति मुद्वाहमण्डपमखण्डमनोरयश्नीः - ॥५४॥ मुक्तावचूलशतसान्द्ररुचा विलिप्ता, यत्रासितोपलतुलाः' स्फटिकाश्मलीलाम् । ऊहुः प्रहृष्टविहसद्बहुजन्यलोक स्फूर्जद्विजांशुनिकरोपहता इवोच्चैः ॥५॥ शशिविशदवितानस्तोम उज्जृम्भमाणा, वरकनकमयानी दीधितिर्भूषणानाम् । सरसि सरसिजानामुल्लसन्ती समन्तात्, प्रसृमरमकरन्दालीव यत्राऽऽबभासे ॥५६॥ घनघुसृणरसौधैः पङ्किले यत्र कान्ता: कुचकलशभरातः सश्रमं लास्यमापुः । अगुरुतिलकगन्धोन्मिश्रकर्णोत्पलश्री चटुलमधुकरालिक्षिप्त-'चक्षुःप्रचाराः ॥५७।। प्रिययुवतिषु यत्रोदामतूर्यप्रणादैः श्रुतिपथपरिमान्द्यात् संज्ञयाऽधुर्युवानः । व्यवहृतिमनुवेलं भ्रू विलासादिभावा नसकृदिव मनोज्ञान् शिक्षितुं कामशिष्टान् ॥५८।। जितसुरवनिताभिर्नर्मरम्याङ्गनाभिः स्मितमुखकमलाभिः सोऽथ तत्तोरणान्ते । किमपि च वरदेयं याचितः स्मेरवक्त्रः, शतगुणितमयच्छत्तत्प्रमोदेन ताभ्यः ॥५६॥ १. स्तम्भोपरितनपट्टाः। १. प्रतरित ।

पोडशः सर्गः १२३ त्रिदशपतितनूज'-स्पद्धिलीलोऽवतीर्य द्विरदपतिहिमाद्रेः काञ्चनाऽयो ऽनकाञ्च्याम् । वररुचिमणिमय्या भ्रू कुटिं तत्र भक्त्वा , प्रकटितशुचिवृत्तः प्राविशन्मण्डप स.॥६०॥ इति युगप्रवरागमश्रीमज्जिनपतिसूरिशिप्यलेशविरचिते श्रीसनत्कुमारचकिचरिते विवाहमण्डपागमनो नाम पञ्चदशः सर्ग.छ ।१५। षोडशः सर्गः अथानुयायिव्रजमस्य माण्डपे, कन्यास खोभिविनिवार्यतोरणे । अनीयताऽन्ता:सदन नृपाङ्गजो, यत्र स्थितास्ता परिणेयवालिका ॥१॥ ज्योत्स्नापिधाना इव तारतारिका', प्रच्छादिताजीविगदेन वाससा। स तत्र ताः प्रेक्ष्य ममी मुदा तनो, न पूरितायामिव विश्वतद्गुण ॥२।। प्रासां मुखोद्घाटनमगलं कुरु, प्रातदिशा सूर्य इवातिरागवान् । प्रदाय लक्ष्यं कनकस्य मादृशा, पण विना रत्नमिहाप्यते न हि ॥३॥ इत्थं सनर्मप्रणय सखीजनै, स व्याहृतः सस्मितमाह दीयते । मह्य न किं तन्ननु तुल्यकार्ययो-रेको हि याच्यः क्व नु नोनिरीदृशो ॥४॥ स हासयित्वेति मुहुर्मुहु. सखी-दत्वा हिरण्योच्चबमाशु नरिशः । अपावृतीनि च्चविभाजि वारिदोन्मुक्तेन्दुविम्वप्रतिनानि तत्क्षणम् ॥५॥ व्रीडाऽवनम्राणि मदोन्मुखानि स, नरोलामद्विधाभासयुताम् । अपश्यदास्यात्यय चन्द्रपद्मयोश्नपेटसज्नानि विवात्यनुत्र बाम् ।।६।। ननुतिः १. जपन्त। २. गुहास

१२४
सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम्
॥६॥
कौसुम्भरागं समुवाह कङ्कणं, करेण वक्षोरुहभोगसंस्पृशा ।
अच्छिन्नतत्केलिरुचि: समीपगं, मूतं सदा रागमिवैष भूपसूः ॥७॥
सत्कौतुकं कज्जलपुण्डकादिकं, दधुः सुवेषा अपि ते वधूवराः।
नावश्यधार्य समुपेक्षते कृती, विरूपमप्यङ्कमिवामृतद्युतिः ।।८।।
ततः स ताभिश्चतुरन्तवेदिकां, साद्धं स्वकान्ताभिरिवामराधिपः ।
आरोहदुल्लोचविलम्बिकौसुमस्रगन्तरालध्वनितालिनीकुलाम्
भूयादयं पात्रमशेषमङ्गलश्रियः कुमारः
प्रतिपादयन्निति।
समुच्चचारोच्चतरस्तदा ध्रुवं, कर्णामृतं मङ्गलतूर्य निस्वनः ॥१०॥
विडम्बयन्त्यः कलकिन्नरीध्वनीन् ,
मुदा जगुर्मङ्गलगीतसन्ततीः ।
माऽभत् स्वभा विरहो ध्रुवं कदा-
प्यस्मद्वदासामिति सप्रियाः स्त्रियः ॥११॥
विवाहकालेऽपि समुत्सुका इव, प्रसृष्टरक्तत्वसमत्वदूषणाः ।
प्रागासजन् पाणियुजो नखांशवो, वधूवराणामनुहस्तपल्लवाः ।।१२।।
समं वधूभर्तृ कराब्जसङ्गमं, दुरापमप्याप च हस्तलेपकः ।
यत्तत्तपः किञ्चिदपूर्वमादधी, ध्रुवं ने काम्योपगमोऽन्यथा भवेत् ।।१३।।
वेद्या मधुप्राज्यघृताक्षतादिभिः, प्रदीपिते मङ्गलजातवेदसि ।
दोषापवर्गक्षमदोप्रदोधितौ, सहस्ररश्माविव लोकपूजिते ॥१४॥
तत्पुण्यसर्वस्व इव प्रज्जम्भिते, हृद्ये शिखाभिश्च तदैव सप्तभिः ।
प्रदक्षिणावर्तमथाभ्रमन्वधूवराः
सुमेराविक
तारकेन्दवः ॥१५॥
युग्मम्
कन्यापिताइये परिवर्तने ददौ, वराय भारायुतकोटिकाञ्चनम् ।
एतद्वदाजन्मविशिष्टरागता, भूयादमीषामिति भासयन्निव ॥१६॥
हारार्द्धहारादिविभूषणं बहु, प्रदाद् द्वितीये विमलं विनिर्मलः !
ईदृग्गुणा ईदृशकीर्तिसञ्चयं, कुरुध्वमाश्वेवमुदाहरन्निव ॥१७॥

पोडशा सग! १२५ स्युः पात्रसङ्गन विनैहलौकिकान्यामुष्मिकाणीव न वैभवान्यहो । पात्रञ्च कच्चोलकटाहकादिकं, ध्रुव 'ददौ चेति मुदा'' तृतीयके ॥१८|| नि श्वासहार्याणि स हसलक्षणा-न्यदात् तुरीये वसनानि भूरिशः । मनोरथैः पात्रमवाप्य कोविदः, किं कि न दद्यान्मुदितो मनोहरम्।।१६।। अत्रान्तरे हर्पवशाद् यशोथिना, पक्षद्वयेनाऽप्यतुलो व्यधोयत । जनोपचार. फलमस्ति सम्पदा, किं वाऽन्यदुद्वाहमहोत्सवव्ययात् ॥२०॥ अपूर्वसौरभ्यभराधिवासिता-ऽऽशाचक्रवालानि विलेपनानि तत् । . अदाद् दबीयः सुरलोकसम्भवं, गन्धं जनं द्रागनुभावयद् ध्रुवम् ।।२१।। सुस्निग्धगन्धानि मधुव्रतनजध्वनिप्रगीतानि विलोचनामृतम् । दामानि पौष्पाणि हृपोकसन्ततेरानन्ददान्यक्रमशश्च भूरिशः ॥२२॥ कर्पूरपारीपरिणद्धमुद्धरं, ताम्बूलमामोदिपविनिताऽवरम् । स्वर्गेऽपि दुष्प्रापमितीव तज्जय, महस्य नियंजयितु भुवस्तले ॥२३॥ हस्त्यश्वचेलामलभूपणादिकं, प्राज्यं तथा विश्ववितीर्ण कौतुकम् । समस्तलोकाय यथा न सोऽनुवद्, दधीचिकर्णावपि कामितप्रदौ ॥२४॥ चतुभिश्चमकलकम् तत्पाणिपीडाविधिरेवमद्भुतो - ऽभवज्जगत्तोषपदं विभूतिभिः । सुवृत्तभाजा भुवि किं न मोदकृज्जायेत वा पूर्णवियोरिवोदयः ।।२।। विद्याधरेन्द्रेण कुमारशेखरः, स्वकन्यकाभिर्व्यरुचत् स स जित' । अष्टाभिरप्टापदभूघरो यथा, दिग्भिस्त्विवाश्लेपित उष्णरश्मिना ।।२६। सायं समागादथ वासमन्दिर, समं वधूभिनुपसूनुहन्मना । अध्यास्त तत्रापि स हंसपश्मभृच्छय्यां विशाला नवनीतकोमलाम् ॥२७॥ चिराय सम्प्राप्य च चातुरीचणाश्चकोरनेत्रा: कविदेवतोपमाः । विदग्धगोप्ठोसुखलाभलालसः, प्रश्नोत्तराण्याशु स पृच्छति स्म ताः ।।२८।। पेठुश्च ता व्यस्तसमस्तमञ्जरी - प्रवर्धमानाक्षरप मदनाः। नानाविधा जातिभिदा मनोहरा:, प्रश्नोत्तराणा निजवल्लभप्रिया ॥२६॥ १. 'पदापिति समुदा' इति प्रतौ पाठे पयोमनः स्थास्वपोरिएन ए पाउ• मा। २. पक्षायम्।

१२६ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् . सैव ॥३४॥ तथाहि- का प्रार्थ्यते विश्वजनेन सादरं ?,का वा विजेया बत चक्रवत्तिनाम्?। कीदृग् नपः स्यान्न पराभवास्पद?, भात्यम्बरे वन्दनमालिकेव का? ॥३०॥ अथोक्त्वा तातताततीरूपां काचित् ततावलीम् । दयिताऽऽलोकयामास सस्मेर वल्लभाननम् ॥३१॥ प्रिये ! किमत्र वक्तव्यं प्रसिद्धा सारसावली। नर्मणा पुनरप्याह सैव भग्यन्तरेण तत् ॥३२॥ ब्रूते बलं दीर्घ इनो विभक्ती, कस्यां शितिः ? कोऽत्र लये च धातुः ? । कः काचपि: समतां दधाना ?, धातुष्वभक्ष्या बत धार्मिकाणाम् ॥३३॥ शालनकश्रेणिरपि स्यात् कीदृक्षा विनेह लवणेन । गतिमत्प्रत्यागतिमच्चेदं हि ततावली प्राह कुमारो विहसंस्ततावली यदि न कथ्यते रोषात् । अन्या त्वया तदोत्तरमप्यन्यद् दोयते न मया ॥३५॥ सस्मितास्वथ सर्वासु भूयोऽप्यन्याऽपठत् पटुः । मञ्जुलं मञ्जरीजात्या' प्रश्नोत्तरमनुत्तरम् ॥३६॥ लक्ष्मीणां केह सत्ता दयितहृदि भवेत् कीदृशी स्त्रीषु साध्वी , साधुः कीदृक् क्रुध प्रत्यथ भवति हृदः कीदृशी चास्य माया । विष्णौ लक्ष्मीश्च कीदृक् प्रवदति च किमप्यक्षरं कठ्यता कि' । मत्तोऽभूद् दु खखिन्नः कथमथ विलपेद् वासुदेवैकभक्तः ॥३७ ।। जगत्रितयवन्द्यत्वाद् देवत्वेनोत्तमाऽत्र का ?। व्यक्ता ततावलो चेह त्तीततातीततेतता ।।३८।। मञ्जरीति च विज्ञप्तः सोऽवदद् देवि ! ते मुखात् । सुधैव स्त्रवतीत्येपा श्रीमहावीरदेवता ॥३६॥ तत: सकौतुकान्यापि प्राह प्रिय ! भवादृशाम् । विद्वत्ता स्यादेर्भािवदितैरपि ॥४०॥ ईदृग्विधैर्न १. प्रतो तु-मजीरजात्या इति पाठः । २. कोदशी।

षोडशः सर्गः
१२७
तन्नाथ !
तदस्मदुदितं किञ्चिदादृतेन निशाम्यताम् ।
इत्युक्त्वा साऽपठद्दन्तज्योत्स्नाधीताधरा मदा ॥४१॥
का कामस्य प्रसू. का स्फुरति च नयनान्त. सदाऽप्याह चन्द्रः ,
प्रस्थास्नो स्वीयसैन्यानुगत इह भवेत् कोनगो राघवस्य ।
प्रादयानां काः किलान्ध्य विदधति वितताः सप्रभाः स्युनिशाया,
काः शश्वत् कीदृशो वा प्रथित इह गुरु. शम्भुचूडामणिः क ॥४२।।
वर्द्धमानाक्षरं चेदं वृत्ताधर्षे ततः
परम्।
चलद्विसर्गसज्ञ हि, ताताततिरिति
स्फुटा ॥४३॥
ततावलीह
प्रोच्यतामुत्तर लघु ।
ब्रीडां विहाय सर्वाभ्य. श्रीयतो वा पराजयः ।।४४||
पाखवोऽप्यस्मदोकःस्था ईदृशानि विदन्ति भोः !
तत् त्वां किमहमाचक्षे व्यक्तस्तारापतिर्यत. ॥४५॥
सा विद्वन्मानिनी प्राह विलक्षेव पुन. प्रियम् ।
जात्यन्तरमितोऽप्यन्यच्चिन्त्यता चतुरोत्तम ! ॥४६॥
गीतं शसन्ति कीदृक् किमिह तनुभृतां दुखदं रागियुग्म,
कीदृक् क वा जघानामरपतिरभजद्द्यूतदोप कमुच्चै. ।
अद्धं कि कं च सभ्याः सदसि विवदिपु वारयन्ति स्म गाव ,
प्राय किं वा चरन्ति प्रखररविकर वासर कीदृगाहुः ।।४।।
पद्यं विपरीतमिदं, सुव्यक्ततरा ततावतिरपीह ।
ततततततताततमित्युत्तरमा
प्रसीदेह ॥४॥
कमलवनदवानल-मित्युत्तरमनापि पठ पुनः किञ्चित् ।
विषमतरमिति प्रोता, पटिप्युतिः पपाठेदम् ।।४९||
को नादो वायसा स्याल्लसति मुहरयाहाभिताप: कुलीना ।
नालीयन्ते न केऽत्र प्रवदति च निदा कोदशी मेखला स्यात् ।
वध्वास्तुणं वजन्त्याः शशधरतितकस्यह दष्टिनियंद .
वह्निज्वाताकराता समभवदलघुः कोदो रोपभानः ॥१०॥

१२८ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् शृङ्खलाजातिरेषाऽस्यां, ततालिस्ताततातता। श्रुत्वेदमुत्तर प्राह, कुमारः कामदारणा ॥५१॥ विचित्रमेवं मुकुलं यथाम्बुज, प्रश्नोत्तरं सूर्य इव प्रकाशयन् । आमोदयत'सारसिनीर्यथेष ताकिं वा न सर्वस्य मुदे महात्मनाम् ।।५२॥ तासां हृदि प्रेमतलं सुरूपज, वैदग्ध्यदृष्टिः' सुतरामवर्धयत् । नृपाङ्गजस्येन्दुकलेव सागरं, कल्लोलमालाकुलितं कुलीरकः ॥५३॥ विदग्धयोग्यैरनुरागचारुभि- नाविनोदैरिति सर्वशर्वरीम् । सम्भोगभंग्यादिभिरप्यनुत्सुको-ऽतिवाह्यनिद्रामभजत् क्षणं प्रगे ॥५४।। ततः प्रवुद्धः स्वमपश्यदुच्छ्वसत्, फणीश्वरश्रेरिणविलाविलक्षितौ । लुठन्तमाः किं न्विदमित्यनेकशो, वितर्कयत् कौतुकभ्रान्तमानसः ॥५५॥ धिक् संसृतिं यत्र मुहूर्तमात्रतस्तनूभृतो नाटकपात्रभङ्गिभिः । सुद्धिसंस्पद्धिमहोत्सवस्पृशो-ऽप्यहो लभन्ते परमाधमश्रियम् ।।५६।। क्व ताः परित्रस्तकुरङ्गलोचना,शिवाः क्व चैताः परुषस्वराशुभाः । पीयूषहालाहलपात्रता क्षणान्नूनं तदाऽत्रैव विलोक्यते जनः ।।५७।। विभावयन्नेवमथैष कङ्कणं, करस्थमालोक्य चिरादखिद्यत । किमिन्द्रजाल किमु विभ्रमो मतेः,प्रतारयत्येवमुताऽत्र कोऽपि माम् ॥५८।। किं वा विकल्पैरसिताक्षयक्षकानैतद् विधाता खलु सम्भवेत् परः । शिशून् समाश्वस्तहृदो नयेत कः, कृतान्ततोऽन्यः परलोकपद्धतिम् ॥५६॥ ततः समालम्व्य धृति महाशयः, प्रचक्रमे विक्रमसाररोवधिः । क्रमैरलङ्कर्तुमुदीर्णपौरुषो, मृगेन्द्रवद्भरिमृगां वनावनीम् ।।६०॥ अथाऽस्य तत्रापि मुदे मनोभवा-द्वितीययोनिबुवमाययौ शरत् । कान्तेव तत्पुण्यचयप्रयोजिता, विकासिनीलाम्वुजलोललोचना ॥६१॥ विगलितजलदालिश्यामता पद्मनेत्रा , रुचिरशशधरास्या बन्धुजीवाधराया । मदकलकलहंसारावरम्या चकाशो मिषितकुसुमहासा कस्य नाऽभून्मुदे सा ॥६२।। १. कमलिनी । २. दर्शन।

पोडशः सर्गः १२६ यत्र ददी ॥६४॥ यत्राऽसंख्यानि वीक्ष्यामलमधुरपयःपूर्णलीलासरांसि , प्राणिन्दनल्पकालाश्रयमनिकटग मानसं राजहंसाः । आकृष्येव प्रणादश्रियमसितगलेभ्यो' जगुस्तानि नूच्चैः , कूजव्याजेन पक्षोन्नमनविनमनैः खे प्रनृत्ताः प्रमोदात् ॥६३।। मधुकरततिश्लेषावेशात् सकज्जललोचनं, हसदनुवन व्याकोशत्वात् कल विपमच्छदम् । परिमलभरैयूं नो प्रकामविहारिणां, समदवनितानि-श्वासथीविलासमुदं प्रियतमनववर्षास्तद्वियोगेन नूनं,। दधुरतिशयशोकात् पाण्डिमानं पयोदाः । शुकततिरपि योन्दीवरस्मेरमाला- श्रियमधित वनान्तः श्रीशरछीप्रवेशे ॥६॥ पुण्ड्रेक्षुखण्डेष्ववरुष्य दृप्टी - विलासिनीनां नयनामृतेपु । व्यज्जृम्भतोद्दामवलो मनोभू - यंत्राप्तसाहाय्य इव प्रवीरः ॥६६॥ नमति कलमगोप्याः पादपद्म कुरजी , ततिरवनतमूर्धा तत्कलोद्गीतिसक्ता। मसृणचरणपाता सतिक ध्रुवमुपनतदास्यप्रश्रया सृजति शशधरोऽपि प्रांशुभिः स्वांगुजारी - जलदविरहदीस्तारका निप्प्रकाशा: । शरदि ननु जडात्मा को हवाप्तातुलधीः , शुचिमपि निजपक्षं नावमत्येत मानात् ।।६८॥ स्फुरत्प्रताप स्वपति वितोक्य, मुदेव यत्राऽभवदगिनो दाह । प्रबुद्धपङ्केष्वक्त्र लक्ष्मीः, सर.स्वशेषेमु नमोऽमनेषु ।।६।। ग्रीष्मे शफोत्पादितभङ्गतापान्याहत्य रोवासि तरङ्गिणीनाम् । यत्रोन्नदन्तो वृषभा विपाणः, स्ववरनिर्यात गोव्यमातुः ॥७० श्रयन्ती, रात्रौ ।।६७॥ यन १. मयूर।

१३०
सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम्
मनस्विनीनामसनं वितेने, मानस्य तीवस्य विलोकितं सत् ।
यत्रासनं नूनमिहात्मनाम्नो, यथार्थतालाभकृते विनिद्रम् ॥७१॥
बाणैः स्मितः प्रोषितभर्तृकाणां, हृदि व्यथं दुस्सहमादधद्भिः ।
बाणत्वमाविष्कृतमाशु सत्यं, श्रीपुष्पबाणस्य हि यत्र शस्त्रैः ।।७२।।
मृगेक्षणाः कुकुमकेसराणि, स्मितान्यपि प्राददिरेऽत्र नैव ।
कर्णावतंसाय सुगन्धलोलभृङ्गाकुलानीक्षणरोधभीत्या ॥७३॥
कारण्डवानामपि नादडम्बरं, मिश्रं रवैः सारसवामचक्षुषाम् ।
व्यधाद् ध्रुवं कामनरेन्द्रतुष्टये, तद्वेणुवीणास्वरमङ्गलं शरत् ।।७४।।
हृदयमिव खलानामुग्रकार्कश्यपात्रं,
कुटिलतरमितीव स्वं रुरुः शृङ्गमौज्झत् ।
विमलशशधशिोः सज्जनस्येव सङ्गाद् ,
ध्रुवममितमदाढयो यत्र कान्तोपगूढः ॥७॥
रम्यामिवालोकयितुं
शरच्छियं,
कुम्भोद्भवो यत्र मुनिः समुद्ययो ।
रम्यस्य रम्यत्वदशा हि सा परा
वीतस्पृहाणामपि या मनोहृतिः ॥७६॥
विधूतविषमच्छदोच्छलदतुच्छगन्धोद्भवत्
प्रतिद्विपमदभ्रमान् समदवारणान् गर्जयन् ।
वनेषु वनितासखान् सपदि कामिनः प्रीणयन्,
ववौ मधुरशीतलो बत समीरणो यत्र च ।।७७॥.
वनेऽपि तस्या शरदि प्रपोषभृ-
त्येणेक्षणायामिव रक्तमानसः।
सम्पन्नपञ्चेन्द्रियविश्वगोचरो,
दिनान्यनैषीत् कतिचित् सुखेन सः ॥७८||
इक्षुत्करो हंसरवश्च
पुष्पितं,
वनं घनं केसरपुष्पसौरभम् ।
यत्रानिलः शीत उपास्यतेऽनिशं ,
कथं न तत्र प्रमदोऽतुलो भवेत् ॥७॥

षोडशः सगी १३१ इति शरदि समन्ताद् विस्फुरन्त्यां कुमारो- ऽप्यमृतकिरणमूर्तेरशुभि विश्वमित्रैः । निशि नियमितखेदस्वेदबिन्दु नन्द , स्वगृह इव वनेऽपि स्वरसञ्चारचारुः ॥१०॥ इति युगप्रवरागमश्रीमज्जिनपतिसूरिशिष्यलेश विरचिते श्रीसनत्कुमारचक्रिचरिते शरद्वर्णनो नाम षोडशः सर्गः ।छ।॥१६॥ सप्तदशः सर्गः कदाचिदस्याथ गजेश्वरश्रियः, सत्वोत्कटस्योद्भटहस्तशालिनः । शिलोच्चयो विन्ध्यगिरीन्द्रविभ्रम', समापतद् दृष्टिपथ बनेष्टतः ॥१॥ तस्यापि मेरोरिव चूलिकाशिरस्यत्युन्नता सौधमतल्लिकासिता। वीक्षाम्बभूवे हसिताऽमरालयश्रीस्तेन भाभिः कृतमण्डनादिव ॥२॥ जगत्त्रयादाहृतसारवस्तुभिः, सर्वैर्मयेनेव' विनिर्म मेत्र या। लोकोत्तरास्याः कथमन्यथाऽभवल्लावण्यलक्ष्मीर्जनताविलोभिनी ॥३॥ वनागमोद्वाहमहादिकौतुक - प्रलम्भितान्त करणः स वीक्ष्यताम् । अचिन्तयन्नूनमिय न वास्तवी, मरीचिकास्वम्बुमतिर्यथा मरौ ॥४॥ न दनि विश्वासमुपैति तात्विके, दुग्वेन दग्धो वृपदंशको यथा । तथा स तत्राऽमलचाक्षुपप्रमा - विनिश्चितायामपि राजनन्दनः ॥५॥ तथापि तत्प्रेक्षणगाढकौतुको, जगाम तो स्फाटिकभित्तिशालिनीम् । सत्तोरणोपान्तनिविप्टचन्द्रकि-स्वरः कृताकारणमनलामिव ॥६॥ तस्याः प्रवेशे स्थिरपक्षिविम्बनच्छलेन चित्रातिभित्तिमयुजः । पुस्फोर तस्य त्वपसव्यलोचनं, दुरापवस्तुप्रतितम्भसूचनम् ।।७।। १.देस्पछिल्लो।

१३२ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् तन्मूर्धनि प्राच्यशिलोच्चयोन्नते, क्रान्ते कुमारेण विवस्वता यथा । समासदत् सा' श्रियमाशु कांचन, ब्रह्माण्डमाण्डोदरवत्प्रभावता ॥८॥ वडूर्यरत्नातिवीचिलम्भित प्रमृष्टमेघाङ्कनभोऽङ्गणश्रियि । तत्सप्तमक्ष्मातल इन्दुदीधिति, विडम्बयन्ती स ददर्श कन्यकाम् ॥६॥ हराद्वियुक्तामिव सर्वमङ्गलां, लक्ष्मोमिव क्षीरनिधेविनिर्गताम् । शचीमिवाऽऽश्चर्यसमागतां क्षिती, सर्वानवद्यावयवप्रसाधिताम् ।।१०॥ उत्कीर्णरूपामिव चन्द्रबिम्बतः, समुद्धताङ्गीमिव पद्मगर्भतः । विभिद्य वाऽरोहणमुत्थितामिव, प्रभाजलोत्तालतरङ्गवाहिनीम् ॥११॥ जगद्वशीकर्तुमिहावतारिता, मूर्ती स्वकान्तामिव चित्तजन्मना । स्वशिल्पकोटिप्रथनाय वाऽद्भुता, प्रकाशिता सृष्टिमिव स्वयम्भुवा ॥१२ चतुर्भिश्चक्कलकम् प्रति प्रतीकं स कुतूहल: क्रमान्न्यरूपयत्तामिति रूपशालिनीम् । अहो मुखं शारदशीतदीधिते-रिवोद्गतं भात्यकलङ्कभागतः ॥१३॥ इयं न कान्तिः क्वचिदम्बुजन्मनि, श्वेतद्युतौ त्वीदृगहो न सौरभम् । इतोव विष्वग् गुणभोगलालसा, शिवाय लक्ष्मीर्मुखमेतदुज्ज्वलम् ॥१४॥ नेवाधराद्यद्भुतरत्ननिर्भरं, मुखाब्जमस्या जडधिं विनिन्दति । निर्वासितप्रोज्ज्वलधाममन्दिरा - ऽमृतद्युतिप्रायसुरत्नसञ्चयम् ॥१५॥ सुस्निग्धनीलाकुटिलालकावलिः, परिस्फुरन्ती वदनाम्बुजं प्रति । लोनालिमालानिभृतेव लालसा, दन्तच्छदस्वादुरसे प्रकाशते ॥१६॥ निर्वासितः शोकभरान्धकारो, हृन्मन्दिरात् पृष्ठमसेवतेव । अस्याः प्रलम्बासितकेशहस्त-व्याजेन निर्व्याजजगत्प्रियायाः ॥१७॥ माल्यं हि सर्वस्वमिवासमेपो - राराधनायेव सदाऽपि गुप्तम् । केशान्तरे रक्षति रक्षिकेव, बालाऽपि वैदग्ध्यनिधानमेषा ॥१८॥ ज्योत्स्नागुणव्यूतमिवाधनं सितं, शिरोंऽशुकं दर्पणकोत्तितस्करम् । दधाति सर्वावयवप्रकाशनादियं जगल्लोचनमोदचन्द्रिका ॥१६॥ .. १. सौधमतल्लिका। २. अपूर्वाम् ।

सप्तदशः सर्गः १३३ ललाटपट्टः पटुहाटकद्युति-धतीक्षितोऽस्याः क्षणतः किलाऽरतिम् । भ्रूलेखया राहुरुचेव सक्तया, दलीकृताक्षा महिमाशुसम्मितः ॥२०॥ निरायतः सत्तिलकोऽत्र मन्मथ -प्रवीरसज्जोकृतभल्लिविभ्रमम् । बित्ति दृष्टोऽपि विहस्तकामिनां, स्वेदप्रकम्पो परितः प्रसारयन् ॥२१॥ कौटिल्यतः कामधनुर्लता तुला, प्राप्यापि होना सविलासनतनैः । साम्यापमानं न ददौ नतभ्र वो, भ्र वोस्तु चक्षुः कमलालिलेखयोः ।।२२।। नासा प्रकाण्डोल्लसिता लतेव, विभाव्यते यौवनपादपस्य । भ्र वल्लरीप्रान्तनता नु लीला - कटाक्षपुष्पातिभरादिवास्याः ।।२३।। तीक्ष्णे सुदीपे सरले च पक्ष्मले, विलोचने धत्त इहेतदोयके । प्रारब्धविश्वत्रयसिद्धिमन्मथ - क्षोणीपतेरप्रतिघातिवाणताम् ॥२४॥ मन्ये मनोभूः सविलासनेत्रयो-रस्याः स्वकार्यो घनिवेशतः कृती। अभीगिरीशात् कृतकृत्यतासुखी, सुष्वाप वक्षोरुहदुर्गमण्डले ।।२।। आभ्यां' नवं कर्म कुतोऽपि शिक्षित, हतो यदन्त:करणानि कामिनाम् । असङ्गते अप्यथवा न कौतुकं, वामस्मराचार्य विनेयतेदृशी ॥२६।। अन्तश्चरभृङ्गविकासिपङ्कज-श्रिणो अपि श्यामलगर्भयोगतः। वक्वेन्दुबिम्बोदय एव जृम्भिते, विलोचने चित्र मचित्रचित्रिते ॥२७॥ कान्तेः कलापेन शशाङ्कमण्डलं, दास्यव्रत प्राप यदाशु शारदम् । विभ्रद् विलासायुधदर्पणभ्रमं, विभाति चास्या द्वितयं कपोलयोः ॥२८॥ कामांकुरोद्भूतलतेव नीला, कस्तूरिकापत्रलताऽपि तत्र। दधाति ध्रुवमङ्गजन्मप्रतप्तकामीक्षणभृङ्गशान्त्य' ॥२६॥ समुच्छलनीलमणीद्धकुण्डले, विम्बच्छलेनाऽतनुतः कपोलयोः । चलत्कुरङ्गाकुल चन्द्रमण्डल-द्वयप्रतीति मकुराभिभाविनोः ॥३०॥ सौन्दर्यसम्भारभतत्वतो ध्रुवं, गण्डस्थले मासलताप्रसाबने । प्रीति प्रदत्तः सतत च चक्षुपो-रत्याश्चकोरीपलचारुचक्षुषः ॥३१॥ छाया १. बोपनाम्याम् । २. दापी घोशामा वपामायः । ३. सन्ताषयमा १३४ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् सुसंस्थितेनेक्षकचक्षुरेणक प्रकामबन्धोद्धरशिल्पशालिना श्रोत्रद्वयेन स्मरदीर्घवागुरा, लक्ष्मीभृतामोदमियं प्रयच्छति ॥३२॥ तत्कुण्डले जैत्रमहास्त्रचक्षुः कटाक्षलक्षप्रतिपूरितस्य । आस्यस्य मीनाङ्करथस्य चक्र - भ्रान्ति प्रदत्तो मणिरश्मिनद्धे ॥३३॥ समुन्नतानेण रुचिच्छटाछलात्, प्रस्नप्यमानेन निरन्तरं स्वयम् । नासापुटेनाङ्गजकेलिवल्लकी-कोणस्य' कान्ति सरलेन बिभ्रता ॥३४॥ विभात्यसो भ्र युगपक्षमचन्द्रकिच्छदच्छटाछत्रकमध्यसंस्पृशा । तद्दण्डकौतूहलमाशु पिप्रता, रोचिष्णुचक्षुः कमलाशिरस्यलम् ॥३५।। युग्मम् सुपक्वबिम्बोफलपाटलप्रभः, प्रभासतेऽस्या रुचिरो रदच्छदः । रागण सर्वाङ्गगतात्मरूपत, सर्वस्वनिर्यास इवावतारितः ॥३६।। अयं भवेत् किं रतिवल्लिपल्लवः, प्रवालखण्डः किमु कामवारिधेः । नाऽनोदृशो येन कथञ्चिदीक्षणादपि प्रकुर्याद् विकृतं जगन्मनः ।।३७।। निवेशितोऽत्रैव सुधारस: सुरै-नूनं यदस्मै स्पृहयन्ति कामुकाः। विहाय माधुर्यभृदिक्षुशर्कराखण्डादिवस्तूनि विहस्तमानसाः ॥३॥ अत्यद्भुतोऽस्याः कलकण्ठकन्दलो, यो यौवनोत्तुङ्गपलाशिकन्दलः । तथापि विक्षिप्तपिकाङ्गनास्वन - माधुर्यसंहूतमृगासु गीतिषु ।।३।। जग्राह कम्बोर्मधुरध्वनि ध्रुवं, रेखात्रयेणाऽपि समं स्फुरन्नयम् । विलुप्तसर्वस्व इवातिपाण्डुरा, धत्ते तनु तेन शुचा स सर्वदा ॥४०॥ हारप्रभाजालजलान्तरुत्थितो, वक्त्रोत्पलाधारतया दधात्ययम् । नालश्रियं चक्रनिभोन्नमन्मुखस्तनप्रकामप्रकृतान्तचुम्बनः ।।४।। अस्या अपूर्वं करयुग्ममम्वुजं, रक्तांगुलोपत्रततिप्रसाधितम् । यदस्तकालेऽपि सहस्रदीधितेरवेदनाझं विनिमीलनापदः ॥४२॥ किं वर्ण्यतां मार्दवमस्य मादृशे - र्यदनतः प्रापदशोकपल्लवः । शिलाविलासं नवनीततूलिका - सुस्पर्शमूर्तेररुणत्विषां निवेः ॥४३॥ १. वीणावादन।

सप्तदशः सर्गः १३५ रेखापदेशान्मकरोऽङ्गजेन, व्यतीर्यते वाकवरः करेऽस्य। स्वस्मादभेद गदितुं विलास-नूपेण भृत्याय यथाऽऽतपत्रम् ।।४४।। कराब्जयोः कौतुकमल्लिकाश्रियो - नखप्रदोपप्रभयातिसान्द्रया । निर्वय॑ते शोणमणीद्धचक्रक-द्वयं विनोदार्थमिवात्मनोऽम्बरे ॥४५|| मृणालसौन्दर्यविनिन्दिमार्दवात्, कान्त्यापि कश्मोरजकीतिलोपकम् । आन्दोलन तनचूतवल्लरी-विडम्बयद् भाति भुजालताद्वयम् ।।४६।। सुमांसल स्निग्धरुचेनिधानमिद ह्यधोऽवोऽप्युपचीयमानम् । दधाति तत्कालजकुम्भिकान्ताकरश्रिय लोलदलोलगाव्याः ॥४७॥ हिरण्मयाऽलङ्कृतयः प्रकोष्ठतः, सौन्दर्यसारात्समवापुरिन्दिराम् । नवाद्भुत यत्सरसापि नीरज, प्रसाध्यते सम्भृतवारिसम्पदा ॥४८|| अस्या हि तारुण्यमहामतङ्गजप्रोन्नम्रकुम्भस्थलविभ्रमं धनम् । भाति स्तनद्वन्द्वमुदूढचन्द्रकि-स्वर्णोरुकुम्भाकृतिनीलचूचुकम् ॥४६।। अन्तर्मनोजन्मशराहतत्वतो, विनिर्गतो नूनमशेपतो वहिः । कुमारमृद्विभ्रमभृत्युर:स्थले, पयोधरी प्रापतुरुन्नति पराम ॥५०॥ माऽभूत् कदाचिन्मनसि प्रवेशनं, 'मन्योरितीव स्तनयोयुग दधौ । अन्योन्यसंश्लेषमतीवरक्तयोर्द्वन्द्व दिवेवाम्बुनि चक्रवाकयोः ॥५१॥ सुवृत्तमप्यूर्ध्वगतः सरन्ध्रक-मुक्ताफलैः शश्वदह विघट्टितम् । इतीव चास्याः कुचकुम्भमण्डल, विपादिवक्त्रेण वित्ति कृष्णताम् ॥५२।। अस्याः सुवृत्तं विमलं यशोऽभवन्, मद्व्याजतः शाश्वतमात्तविग्रहम् । इति स्तनाग्रे स्फुति प्रभाषितु, मुक्तावली नूनमियं जनाय च ॥५३।। वक्षोजकुम्भास्यनिपातिनी सिता, मुक्तालताऽस्याः सरलत्वशालिनी। राज्याभिषेकाय मनोजभूपते-ाराऽमृतस्येव विभाव्यतेल्यवा ॥५४॥ भुजङ्गनिकिमनोहरा स्तनप्रसाधनोकञ्चुलिका कलाचिके । प्रकाशयन्तो मणिचारुकवणे, अत्यास्तनु प्रापयति श्रियं पराम् ।।५।। १ शोकस्म।

१३६ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् कन्दर्पकोदण्डविविक्तलस्तक'-श्रीहारि मध्यं स्वत एतदीयकम् । पीनस्तनानल्पभरादिवाऽधुना' धत्तेऽशनेमध्यभ्रुवोऽपि तानवम् ॥५६॥ रेखात्रयाऽऽधारतया मया समः, कण्ठः सभूषो ध्रुवमेवमीय॑या । निभूषणं मध्यमवाप तानवं, तुल्यात् पराभूतिरतीबदुस्सहा ॥५७।। निम्न स्वसौन्दर्यसुधारसप्लुतं, विभाति चास्याः शुभनाभिमण्डलम् । जगज्जयश्रान्तमनोजभूपते, क्रीडासरः कान्तिमखण्डितां दधत् ॥५८।। विराजते नाभिनदानुगामिनी, रोमावली शैवलवल्लरी ध्रुवम् । प्रोच्चालितामज्जनकेलिसङ्गतश्रीजाङ्कमीनेन विलोलचक्षुषः ॥५६॥ दृष्ट्वेव वा मध्यमपेतभूषणं, कृशं शुचेवाङ्गजसङ्गियौवनम् । रोमावलि नीलमणिस्रजं ददो, तस्मै परिष्कारविशेषमव्ययम् ॥६०॥ शुक्शाकिनी रोद्धमिवोर्ध्वमायती', हृदि प्रवेशाय वलित्रयच्छलात् । रेखात्रयं यौवनयोगिमान्त्रिक, प्रादादिहास्यास्तनुमध्यसीमनि ।।६१।। नितम्बस्थलमप्यनङ्ग - क्रीडामृगक्रीडितभूमिरेका । क्रमोन्नतं यद् विपुलं म्रदीयो, बित्ति गङ्गापुलिनस्य लक्ष्मीम् ।।६२॥ दुग्धाब्धिसंवर्तितसत्तरङ्ग भङ्गिप्रबद्धोद्धरनीविबन्धम् । डिण्डीररुक्पट्टमयं बतास्या, नितम्बवासोऽपि मुद तनोति ॥६३॥ निम्नाद् ध्रुवं नाभिनदा द्विनिर्गतो, लावण्यवारिप्रचयस्तरङ्गवान् । मूले नितम्व तु ततः समास्तृणन्, विराजतेऽस्याः परिधानभङ्गितः॥६४॥ अस्याः सदा कुण्डलितस्वरूपभाक, दधाति नोलाश्मनिबद्ध मेखला । 'रतिप्रमोदाद्भुतरत्नशेवधि-श्रोणिस्थलीरक्षकभोगिविभ्रमम् ॥६५॥ काञ्च्या रणकिङ्किणिका: कलस्वन-राहूतमीनध्वजवल्लभा ध्रुवम् । अस्याः कथ कामित तिस्सदान्यथा, समीपगाऽप्यागु रति विगाहते ॥३६।। अकुमालेपनमेव पिजरं, शिलानिवपं च विनापि कोमलम् । रुतेऽपि यन्त्रं परिलब्धवृत्तत, सृष्टिर्न वा काचिदिदं स्वयम्भुवः ।।१७।। अस्या ३. गमीर। ४. गच्दन्ती। ५. नाभेरघोगागस्य- १. मध्यप्रदेशः। २. यौवनोदये। ६. समोगानन्दः। वादी।

सप्तदशः सर्ग: १३७ ऊरुद्वय नूनमनङ्गधन्विनस्तूणीरयुग्म सकलेषु पूरितम्। तत् प्रेक्षकान् मक्षु भिनत्त्यय कथ, मृगान् यथा कामिन उत्सुकोऽन्यया।।६।। युग्मन् इद ध्रुवं मन्मथमत्तदन्तिनो, बन्धार्थमालानयुग न्यवेश्यत । प्रजासृजा तेन लसन्ति विभ्रमा, निरकुशा एतदवेक्षकाक्षिपु ॥६६॥ स्पर्शः समग्रावयवातिकोमलः, कान्तिः पराद्रावितकाञ्चनादपि । ममेति नूनं स्वगुणोग्रतामदात्, भूपान्तरं बाह्यमिदं दधाति नो ॥७॥ वृत्तानुपूर्व युगलं च जङ्घयोरस्याः स्फुरच्चम्पकदामकोमलम् । बालातपालंकृतमाधवीलता, प्रकाण्डकान्त वितनोति मे मुदम् ।।१।। विभाव्यतेऽस्याश्चरणद्वयं चलत्पयोजयुग्मं सरसः समागतम् । इमो हि लावण्यनदी निवितु, पड्वावगाहव्यथनादिव यसत् ।।७२।। निगूढगुल्फ विसरत्प्र भाजल-स्नानेन शुद्ध समतातिबन्धुरम् । वैषम्यमात्रापि न शौचभाजनेष्विति प्रवादं प्रथयद् ध्रुव भुवि ।।७३।। हृदि प्रवेशार्थमिवाम्बुजारुण, रागेण सेवाकुशलेन सेवितम् । सौन्दर्यगर्वादिव शश्वदुन्नत, कोटिल्यविद्वेपि च साधुवत् सदा ॥२४॥ मजीरनादैः कलहस विभ्रम, तदङ्गनाना जनयद् गृहेप्वपि । सौस्थ्यं समुत्पादयति प्रचारतः, स्युर्योपिता के हि मुदे न सुस्वराः ।।७।। दीप्रारुणाऽस्याः पदयोनखावलि - दिवाकरणिरिवावभासते । एतन्मुखव्याजगृहीतपङ्कज स्वबन्धुमोक्षार्थमुपान्तचारिणी ॥७६।। वक्वेन्दुनिर्माण विभावनेच्या, वाऽस्या ध्रुव विश्वसृजा प्रकल्पिता। विनिर्मला पूर्णशशाङ्ककोमला-ऽनुगामिनी गाश्वतदर्पणावलिः ।।७।। अमोघमस्त्र सुहृदो मनोभुवो, द्रक्ष्यामि नोलोत्पतालोचना कयम ईमामितीवानिशमीक्षितु स्थिता, कुतुहलाद्वा नगचन्द्र सन्ततिः ॥७८|| प्रत्यज्ञमप्येवमिय मनोहरा, किमुच्यतां तन्नि चयात्मिका तमा'। गुणाञ्चिता कान्तिकलापस जता, सुवृत्तमुक्तामणिमानिका बा ||sall १. मनोरा १३८ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् 1 रोचिष्णुरोचिःश्रवणप्रसाधना, सुहस्तलक्ष्मीगुरुदर्शनान्विता। मन्दारभूषा कविचन्द्रसस्तुता, दिवा तुला रोहति निस्तुलाप्यहो ।।८०॥ एषापि किं यूनि निवेशयेत् क्वचित्, स्मिताब्जकान्तां स्वदृश स्पृहावती। सुधाम्बुधारा निपतेत् क्व वा मरा-वमर्त्य भोगाईजलाशयोचिता ।।८।। आजन्म च स्यादपदुःखसन्तति-निर्वाणवन्मक्षु कटाक्षितोऽनया। आलिङ्गितस्तूपमिति प्रथोज्झिता, नन्दालयो नन्दति धन्यशेखरः ।।२।। किं प्रीणयेन् मामपि तिर्यगीक्षितै-रिय कदाचिन् मदनद्रुकन्दली। क्व दुर्गतस्यौकसि कल्पशाखिनः, शाखा फलेद्वाऽकृतपुण्यकर्मणः ।।८३।। यावन्महामोहभुजङ्गमोल्लसत्, स्मरोदयोद्गाढविषो व्यचिन्तयत् । इत्यं कुमारः समुदैत् कुमारिकामुखाद् ध्वनिस्तावदतीवशोकभाक् ॥४॥ आाणि चेतांसि पतत्रिणामपि, स्वरूपसंक्रान्तिवशादिवाऽदधत् । तरूनपि प्रोच्छलदण्डजस्वनैः, सुदुःखशब्दानिव सन्निधिश्रितः ॥८॥ श्रीविश्वसेनक्षितिपालदेहजः, सनत्कुमारः शरणं ममाऽधुना । भूयान्महादुःखशिलापरम्परा - निपीडिताशेषतनोस्तनो'-रिति ॥८६॥ विषादिनी तद्वदनात् स गामिमां, निशम्य चन्द्रादिव धूमसंहतिम् । सुधारसाद्वा विषमा विषच्छटा, सम्भावनातीतपदा व्यकल्पयत् ॥२७॥ क्व मूत्तिरीदृक् ? क्व च दुःखमीदृशं ? क्व मामकं नाम बने क्व कन्यका। गौरीपतेः कामविघातकत्ववन,मिथो विरुद्धं प्रतिभात्यदोऽखिलम् ।।८।। अनेक_वं प्रविकल्पकोविदः, सोऽपृच्छदेनो मधुरस्फुटाक्षरम् ।। भद्रे ! तवाऽसौ वनवासविष्णुतेः, सनत्कुमारो भवतीह किं पुमान् ।।८६ त्राणं त्वमस्य प्रतिपद्यसे यतः, का वा त्वमत्राऽऽपतिता कथं वने । दुःखातिरेकोऽपि कुतः सुलोचने !, निवेदयेदं सकलं कलानिधे !॥६॥ कौतूहलं बालकवन्ममेक्षिते, सदिन्द्रजालप्रतिमे ! तवेहिते' । तत्तथ्यवाचा परिपूरयद्रुतं, यत्सर्वथाऽऽनन्दकृतः सृदृष्टयः ॥६१|| ? १. कृशाया। २. उपद्रवः। ३. चेष्टिते।

अष्टादशः सर्गः १३६ दृष्टया पीयूपवृष्टया ललिततरलया नन्दितस्तावदस्मि , स्मराक्षिक्षेपसार, यदि तु कलगिरा नन्दयेन्नन्दनीयम् । दद्या नूनं तदानीं जलनिविमथनोत्यास्नुपीयूपलब्धि - स्वगिप्रीतेहि दास्यव्रतमनवरतं सोऽन्तरित्याऽऽनुलोचे ॥१२॥ इति युगप्रवरागमश्रीमज्जिनपतिसूरिशिष्यलेशविरचिते श्रीसनत्कुमारचक्रिचरिते सुनन्दासमागमनो नाम सप्तदशः सर्गः ॥छ. ॥१७॥ अष्टादशः सर्गः सगद्गदं प्राह ततः कुमारिका, साकेतनाम्नो नगरस्य रक्षितुः । 'सुराष्ट्रभूपाल शिरोमणेमहादेव्याः सुता सुता चन्द्रयशोभिवाभृतः ।।१।। उमा हिमाद्रेरिव दुग्धवारिधेः, पद्मालया वा जनकस्य सर्वदा। स्वप्राणितादप्यधिक च वल्लभा, नाम्ना सुनन्देत्यहमत्र विश्रुता ।।२।। महीतलाऽलङ्करणं गुणश्रिया, सनत्कुमारो मम भद्र ! वल्लभः । वाचा हृदा चानुसृतो न पाणिना, परं मया दग्धकदेवदग्धया ॥३॥ तस्मै यतोऽहं प्रतिपादिता पुरा, भक्त्या पितृभ्यां गुणपक्षपाततः । के वा गुणाढ्या न भवन्नि भाजनं, पुरस्क्रियाया मणिमालिका यया ॥४॥ यतः स रूपेण विनिजितस्मरः, परास्तकोतिर्महसा महोनिधेः । कलाकलापेन कलानिधि हसत्युद्वेष्टि शोर्येण मृगाधिनायकम् ।।५।। नैमित्तिकेनाऽऽदिदिशेऽस्य जन्मनि,'प्राज्यं सुराज्यराचरेप्यपि स्थिरम् । प्रशस्यता सा हि मृगस्य भूतले, यदिन्दुबिम्मेऽपि तदा विलासिता ॥६॥ १. नाग।

१४० सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् तथा- . प्रचण्डमार्तण्डविडम्बितेजसो-ऽसिताक्षयक्षस्य तिरस्क्रियाविधिः। प्रौढावदानेन जगत्सु या प्रथा, सैवावदातं फलमत्र जन्मनः ॥७॥ विधास्यते चास्य विनिजितामर-श्रियाऽङ्गसौन्दर्यगुणेन शंसनम् । स्वये सुधर्माधिभुवाऽप्यनेकशस्तत्पुण्यपुजं तुलयेत् सुरोऽपि' कः ॥८॥ त्रिभिविशेषकम् राधाव्यधाद्यदभुतशिल्पशेवधि-र्गः 'प्राग्भवानप्यजयन्नृपाङ्गजान् । गुणोत्थकीर्तिप्रचयेन सर्वथा, स कल्पशाखीव दुरापदर्शनः ।।६।। परम्परितरूपकालङ्कारेण तद्वर्णनं वृत्तद्वयेनाह- सत्यानुषङ्गातिशयाऽसुरारिः, क्षमाधृतिस्थैर्यमहावराहः । कलाकलापाश्रितिशारदेन्दुः, पद्मालयक्रीडनराजहसः ॥१०॥ नानाबलासंस्मितपुष्पमासः, सरस्वतीवक्त्रविलाससिन्धुः । गुरुक्रमाराधनदेवराजः, सनत्कुमारः स कुमारराजः ॥११॥ संख्यातिगानेष समाश्रितो गुणानेव प्रकारान् विजिगीपया ध्रुवम् । एकैकशौर्यादिगुणोद्वति स्पृशां, सिंहादिकानां विचचार भूतले ॥१२॥ अपि प्रमीयेत मणिव्रजो जनै, रत्नाकरस्यापि सुरानुभावतः। सुराधिपेनापि न तस्य सदगुणाः, शक्याः प्रवक्तुं गुरुसंयुजाऽप्यहो।१३।। इति श्रुते दृतमुखेन सद्गुणे, तस्मिन् कुमारे जनकेन सत्वरम् । तस्मै प्रदत्ताऽस्मि वसुन्धरा यथा, रामेण विप्रप्रचयाय सादरम् ॥१४॥ ततः प्रभृत्येव ममाऽप्यभूत्तरां, तत्राभिलाषो मधुरे फले यथा । औत्सुक्यचिन्तादिमहालताततेः, प्ररोह उद्बुद्धमनोभवोद्भवः ॥१५॥ नक्त दिवं मां न विमुञ्चति क्षणं, चिन्ता प्रसन्ना सुसखीव दुस्थिताम् । स्मरामि त धीर तदेकमानसा, शुद्ध परं ब्रह्म यथैव योगिनी ॥१६॥ सोत्कण्ठमुत्कीर्तनमस्य गौरवात्,करोमि नीतेव गुणः स्वनिध्नताम् । तल्लाभरिक्ता च कदाचिदुद्विजे, सच्चक्रवाकी निशि केवला यथा ॥१७॥ १. भगीरथादीन् । ३. मारमायत्तताम् ।

अष्टादशः सर्ग: १४१ क्व प्राप्स्यसे मन्दतमाऽल्पपुण्यया, त्वं कल्पशाखीव जगत्प्रियप्रदः । इत्थं कदाचित् प्रलपामि मन्दिरोद्याने च सीतेव बनेऽतिदुःखिता ॥१८॥ लुठामि भूमौ लुलिताऽलकावलि-हंसामि नृत्यामि च रोदिमि क्षणम् । उन्मत्तताभाक्तदनन्यभावतो, भवामि चान्येव कदाचिदजसा ।।१६।। ज्वरस्तथा रोहति कहिचिद् यथा, समीपगस्याऽपि सखोजनस्य मे। सद्यो मदुच्छवासतनूष्मतापिता,प्लुष्यन्ति कण्ठेष्वपि पुष्पमालिकाः।।२०।। शून्येक्षणाऽन्तःकरणा वदामि नो, चित्रापिताङ्गीव कदापि निश्चला। तन्नास्ति दुःखं सकलेऽपि भूतले, तदप्रयोगेऽनुभवामि यन्न भो. ॥२१॥ 'दशस्ववस्थास्विति चित्तजन्मनः,सा कापि न प्रापि मया तदानया। दग्धास्तु ताः प्रत्युत मा प्रतिस्थिता',प्रत्योकमप्याशु सहस्रशो ध्रुवम् ।।२२।। त्रपाकरं स्वं चरित तदित्यहो, वक्तु न युक्तं परसाक्षिक मम । साधोः कथञ्चित् पिशितोपयोगतो- ऽप्यस्थ्नो विबन्धः किमु युज्यते गले ॥२३॥ असाम्प्रतं चेह निजोरुदर्शन, परस्य लज्जादियुजः कुल स्त्रियाः । तवोपरोधान्महतस्तथाप्यदः, 'प्राकाश्यताऽस्वस्थहृदा मयाऽधुना ॥२४॥ पितु हेऽप्येवमनेकशः क्षता, शोकेन दावेन मृणातिका यया । भुजे न सोस्थ्येन वरान्नमप्यह,विषाक्तवत् तद्गतमानसाऽनिशम् ।।२।। सुस्पर्शशय्यापि निदाघतापिता, स्थलोव मत्स्याः परिवर्तनादिकृत् । सम्पद्यतेऽपाद्यमपोह पादयोः, सुशीतमप्यग्निरिवातितापमम् ॥२६॥ इत्थं शरीरस्थितिवजिता कृशा, निर्वेदभाक् क्वापि च जीवितादपि। अकार्पमङ्गक्षणदा मुसे ससी, पलभ्यपाशग्रहणोन्मुतं मनः ।।२७।। तथापि सगोप्य विकारमात्मग, शिरो ममाऽध स्फुटतीय वाया। स्वपिम्यतस्तूर्ण मिति प्रियाः ससी-wसय सायमपि तेन ता॥२८॥ १. मभिताप-चिन्नन माति-गुणस्पा-ग-ना-FAIRATRAI-IITHAI २. प्रकाशिष्यते ।

१४२ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् - - शय्यामुपारोहमहं स्ववाससा, वृत्त्यानानं श्वाससविशेषसोष्मणा । ततोऽधिकार्तेः सहसा स्वमन्दिराद्, विनिर्गता बन्धनिकेतनादिव । २६॥ गत्वा गृहोद्यानमशोकपादपे, बध्वा च पाशं कुलदेवताः प्रति । व्यजिज्ञपं नाऽहमितः परंसहा, दुःखौघमेवं परिसोढुमुज्ज्वलम् ।।३०।। निधाय कण्ठ तदिहैव पाशके, ब्रजामि लोकान्तरमत्तिहानये । सम्पद्यते क्वापि न निर्वृतिः परा, विना महायासतितिक्षणं' यतः ॥३१॥ तत्रापि युष्माभिरनुग्रहस्तथा, कार्यो यथा स्यान्मम तेन सङ्गमः । सद्यं कुमारेण फलन्ति किं न वा-ऽचिन्त्यप्रभावा ननु कल्पवल्लयः ॥३२॥ एतच्च साश्रुप्रतिपाद्यपातितोद्गतं मया कण्ठविबन्धिपाशकः' । समं शरीरेण तरोमहोच्छयात्, किं वा न कुर्वन्ति हि दुर्लभार्थिनः ॥३३॥ ततः परिप्रेमुरिवाखिला दिशो, भूमौ पपातेव नभः सतारकम् । प्रोवास निःश्वासखगोऽपि पजरा-दिवाङ्गतः पातविबाधनादिव ॥३४॥ मिमील चक्षुश्च मदीयदुर्दशा, दृष्टयक्षम नूनमरुद्ध तत्क्षणात् । प्राणैः समं वागपि देन्यभीतितः, सर्व तदान्यत्वमिवाऽऽययौ जगत् ॥३५॥ तदैव देवान्मम पार्श्वमागमत्, प्रियंकरा नाम सखी सुवल्लभा । प्रश्नाय सवेशनधामसस्थिते-र्जागत्ति पुण्यं हि विपद्यपि क्वचित् ।।३६।। सा मामपश्यत् सपदि प्रलम्बितां, तरोस्तले पाशनिवेशिकन्धराम् । चक्षुनिमेषस्वनशून्यचेष्टितां, स्वयं प्रनृत्तामिव यन्त्रपुत्रिकाम् ॥३७॥ हा! हा!! किमेतन्नृपपुत्रिसूत्रितं, नवं त्वया नाटकमेकपात्रकम् । महान्धकारे च विलोचनक्षमः, सामाजिको मादृश एव यस्य च ॥३८।। इत्याधुदसुप्रलपन्त्यनेकधा, साऽत्रोटयत् कण्ठत पाशुपाशकम् । कार्यैकनिष्ठातिपटिष्ठवुद्धयो, दक्षा भवन्ति व्यसनेऽपि नाऽऽकुलाः ।।३६।। उत्तालचेलाञ्चलवातवीजन र्वक्षःस्थलाद्यङ्गविमर्दनक्रमैः । साऽऽश्वासयन् मामविलम्बतो महाभिषचिकित्सेव तनूं सरोगिण ॥४०॥ १. सहनम् । २. वटकण्ठपाश शरीर पातितमित्यर्थः ।

अष्टादशः सर्गः १४३ मामन्वयुङ क्त' प्रणयातिपेशलं, किं स्वामिनि प्रस्तुतमेतदीदृशम् । युष्मद्विधा: कार्यविचक्षणाः कथं, दशामिमामात्मनि चिन्तयन्त्यपि ॥४१।। मया तु किञ्चिन्न ह्रिया प्रजल्पितं, तथाऽप्यवोध्येव तया स्वबुद्धितः । निदानमस्य प्रतिभा हि भासयत्यकांशुवत् किं किमहो! न निर्मला ॥४२।। प्राबोधयन् मामिति सा विचक्षणे, विज्ञाततत्त्वापि कथ विमुह्यसि । दृष्टे हि चन्द्रे न कदापि शकते, सुधीविपर्येति तु को निशागमे ।।४।। तत् त्वामनु ज्योतिपिकेण भापितं, पितुः पुरस्तादिति किन्नु विस्मृतम् । सनत्कुमारस्य तुरीयचक्रिणः, स्त्रीरत्नमेषा नियत भविष्यति ॥४४॥ तत्सर्वथा स्वस्थमनाः स्वमन्दिरे, भुजङ्गकन्येव सुखेन लीलया। क्रीडन्त्यमा केलिसखीभिरुच्चक-रास्वस्व वश्यार्थविधी हिकात्वरा ॥४५॥ सम्बोध्यमामित्थमनेकधाऽनयच्छय्या न चाऽमुञ्चदतः परं क्षणम् । साऽस्मत्समीपं सुहृदो ह्यनाकुलास्तिष्ठन्ति कुत्राऽसुखिते प्रिये जने ॥४६॥ सा प्रत्यह शेखसखीभिरन्विता, विनोदयत्यद्भुतभूरिकेलिभिः । मामादृता सत्यमितोऽवभाषते, स्वर्गो हि सन्मित्रमिति श्रुतेर्वचः॥४७।। दोव्यत्यय स्वर्णमहार्घकन्दुकैः, कदाचिदात्मोयगृहस्य कुट्टिमात् । छलेन केनाऽपि दशास्यकत्तिना, सोतेव तूणं गगनेऽवतारिता ॥४८॥ मुहूर्त्तमात्रेण च तेन लम्भिता, प्रासादरल स्ववलप्रसाधितम् । एतत् स दृष्टश्च मयातिभीतया, विद्याधरश्चेति विनिश्चितो घिया।।४६।। आश्वासिताऽलकृतिदानसामभिस्तयापि नैवान्वभवं सुखासिकाम् । स्वयूथ्यहीना करिणीव केवल, वहाम्युदनुप्रतिवासर मुखम् ॥५०॥ विहाय मां चात्र वनाय सोऽगमद्, विद्या शुभी साधयितुं महस्विनीम् । तत्रापि सिद्धेदिनमद्य सप्तम, स सिद्धविद्यः परिणेप्यते किल ||५|| यत्कांदिशीकेह वने मृगी यथा, वन्दीव सुस्निग्धसलीगुज्निता । तद् भद्र ! तिष्ठाम्यतिदु खितेत्यतः, सनत्कुमारं शरणं समाश्रयम् ॥५२॥ १. मादत्। २. कारण। २. मनुष्ठितस्प।

१४४ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् त्व कल्पशाखीव मरौ सुदुर्लभः, शैलानभूमाविव वा सुधारसः । अमानुषे दुर्गवनेऽद्य वीक्षितः, सुदुस्त्यजो लोचनतापसातिथिः ॥५३।। दृष्टे त्वयि प्रागमदद्य बान्धवा, योगोद्भवं दुःखमदुःखदर्शन । आस्वादिते व्याधिहरे रसायने, किं तिष्ठति क्वाप्युदरस्य वेदना ॥५४॥ दृग्वाग्विलासानुगतां विलासिनावित्थं मुदं यावदिमावुदूहतुः । कोकाविवाम्भोरुहखण्डसुस्थिती, तावन्नभस्तः सहसा स आपतत् ॥५५।। वज्राशनि: किं ? किमु पिण्डितो दवः ?, क्षयाय किं वा प्रलयानलः क्षितेः ? । प्रभास्वरत्वेन भयानकत्वत: श्चाशंक्यमानो बहुधेति खेचरैः ॥५६॥ स्त्रीरत्नसान्निध्यसुसिद्धविस्फुरद्-विद्यामदात् 'कक्षतयेक्षितापरः। न पल्वलाम्भो भुवि माति कुत्रचित्, स्वल्पेऽपि वर्षाभ्युदये नवेऽयवा।।५७॥ विद्युद्वेगोऽङ्ग भूः ख्यातोऽशनिवेगस्य भूपतेः । विद्यादोर्दण्डदणाऽधमो यो रावणायते ॥५८) चक्कलक चतुभिः सुनन्दानयनाङ्गकम्पा-तिरेकमागत्य समादधानः। उत्क्षिप्य दोष्णा गगनं निनाय, व्यालं' पतत्रीव कुमारमेषः ।।५६॥ हा! हा!! हतास्मोत्यनिशं रसन्तो, सोरस्थलाघातमियं पपात । शोकेन भूमौ सहसाऽसमेन, ह्यकाण्डकाण्डेन' हृदि क्षतेव ॥६०॥ अबान्धवेऽप्यप्रतिमानमेवं, विज्जृम्भते क्वापि तदैव सख्यम् । अानन्दनः केकिकुलस्य केन, प्रेर्यंत नृत्याय नवः पयोदे ॥६१॥ प्रागव दुखौधकथितेय, यदीदृशीं प्राप दशामवाच्याम् । तद्गाढगण्डोपरि दावदाहस्फोटस्फुटो नभस्तले तेन निरुद्धसव्य - वाहप्रचारोऽप्यपसव्यदोषा। मुष्टिप्रहारैर्जितवज्रघातैस्त प्राहरद् वीरवरः कुमारः ।।६३।। ततः नूनमजायताऽस्याः ॥६२॥ १. तुणविशेषतुल्यतया। २. भुजगम्। ३. शर.

अष्टादशः सर्गः १४५ सहस्रशस्तैः सततं हतस्याऽनश्यद् वपुष्टो बलमस्य पुष्टात् । निर्मथ्यमाने हि सुरैः पयोधी, क्वाऽवस्थितिस्तत्र सुधालवस्य ॥६४।। विद्याऽपि पुस्फोर न काचिदस्य, क्षुण्णस्य तत्राऽप्रमितः प्रहारैः । प्रभेव दीपस्य सुविस्तृताऽपि, प्रचण्डवातरनिश हतस्य ॥६५॥ स्तां' वा सुपुष्टे अपि शक्तिविद्ये, त्राणाय तेनाऽस्य तथापि देवात् । न हीशमूर्द्धस्थितिभेश्वरत्वे, ग्रहक्षणे चन्द्रमसोऽपि न स्त: ॥६६॥ तं लीलया व्योमचरं विशस्याऽऽजगाम तत्रैव पुनः कुमारः। मृगे हते को हि मृगाधिपस्य, शटाकचेऽप्युद्भवति प्रयासः ॥६७।। ततः कृतान्ताकृतितो विपक्षादनाप्तकायव्यसनं पुरस्तात् । कीरी यथौतोविकृतात् स्वकान्त, ननन्द त वीक्ष्य तथा सुनन्दा ॥६८।। शुग्भारतो मोदभरः समर्गलस्तद्दर्शनेऽस्याः समभूत् सुदुर्वचः । विदेहजाया इव लून राक्षसाधिपावनीरुदयितावलोकने ॥६९।। साऽपृच्छदेन बहुमानपूर्वकं, नभोगमाद्यागमतान्तचेष्टितम् । सोऽप्याख्यदस्यै सकल यथास्थितं, प्रश्नोत्तरे प्रेमयुजो हि लक्षणम् ।।७०।। भद्रे ! न भेतव्यमितोऽपि खेचराद्, यज्जीवनाश स ननाश पुण्यतः। तायोग्रधाम्नो महतोद्य तावकादाशोविपाभो जगतोऽपि तापनः ।।७।। आश्वास्य तामेवमरातिसूदनस्तत्रावतस्थे स कथापरायणः । विलोलतदृष्टिसरोजभानुमानुच्छ्वासयस्ता च सरोजिनीमिव ॥७२॥ निशम्य तत् सा मुमुदे मृगेक्षणा, वाक्य विपक्षक्षपणाभिवायकम्। को वा न नन्दत्यभिवाञ्छिते थुते, ध्वनो घनस्येव शिखण्डिमण्डलो ॥७३॥ विस्रब्धमेषा मुदितान्वयुक्त त, रहस्यशेष चरितं स्थिराऽदितः । पुण्यः परिप्रश्नधिया विदग्वया, प्रेयान् प्रसन्नो विजने ह्यवाप्यते ।।७४|| निवेद्यते कामिजनेन सुभ्र वे, गुह्य तदादेशमृतेऽपि रागतः । तत्प्रश्नवाक्यामृतमाप्य किं पुनस्तदेत्यभाषिष्ट त राजनन्दनः ।।७।। १ भतापा। २. नन पियते।

१४६ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् - . श्रीविश्वसेनाङ्गरुहः कुदैवतः, सनत्कुमारोऽहमिलो परिभ्रमन् । विजित्य यक्षं परिणीयकन्यका, इहागमं त्वं च गतासि दृक्पथम् ॥७६|| एतच्छ तौ नम्रमुखी सकम्पा, स्तम्भोरुरोमाञ्चपवित्रगात्रा। एकाऽपि नानास्फुटभावकान्ता, नटीव सा तत्समये बभूव ॥७॥ उक्तो मुहूर्तोऽप्यतिभूरिविघ्नः, श्रेयांसि चावश्यमनर्थभाञ्जि । क्षेपोऽसमीचीन इहेति हित्वा, त्रपां निरुद्धप्रियसङ्गवार्ताम् ॥७॥ त सा सुनन्दा प्रतिपादितास्मि ते, भद्रा सुभद्रेव पुरा किरीटिनः । पित्रा तदत्र क्रियते विलम्बनं, किमर्थमित्युत्कलिकाकुलाभ्यधात् ।।७६॥ युग्मम् पाणिग्रहे तामिति वीक्ष्य सत्वरां, गौरीमिवानन्यवराभिलाषिणीम् । स तद्वचः प्रश्रयतोऽन्वमन्यत, स्युः सर्वदा कालविदो विचक्षणाः ।।८।। हृष्टा नवेन्दीवरपत्रशोभया, दृष्टयाऽथ सा वन्दनमालिकां दधौ । लावण्यपुण्यामृतपूर्णपीवर स्तनद्वयेनोन्नतपूर्णकुम्भको ॥८॥ स्मितस्फुरनिर्मलदन्तदीधिति - प्रपञ्चतः कल्पितपुष्पमङ्गला। सुपञ्चमोद्गीतपिकाङ्गनास्वरा नुसारचारीगतिनृत्यतत्परा ।२॥ युग्मम् तत्प्रेमतो नूनमबालकेकिभिस्तदैव केकाध्वनिभिर्मनोरमः । तथाविधैरेव हि सारसस्वरः, समं समेत्य श्रुतिकोटरामृतम् ।।८३॥ प्रारभ्यते वाऽऽनकनादमिश्रितः, श्रीदुन्दुभिध्वानविधिः परिस्फुटः। इत्यं वनेऽस्याः समपद्यताऽखिलं, विवाहयोग्यं लघुगीतवादनम् ॥४॥ युग्मम् सः पर्याप्तपाणिग्रहणोपयोगिवस्तुन्यथालात्करपल्लवं करेण तस्याः स्मरकेलिवल्लेरिवोद्गतं लोहितपल्लवं स्राक् ।।८५॥ स्त्रीरत्नमेषा हि यदेतदीयः, स्पर्शो नवः कोऽपि करः सुधाशोः । सहस्रसख्यापरदारसङ्गश्रमोगसूर्योष्सहर: क्षणाद्यः ॥८६॥ १. अर्जुनः।

अष्टादशः सगा १४७ इतश्च तस्याऽम्बरचारिणः स्वसा, ससिद्धविद्यार्चनकृत्यसत्वरा । सन्ध्यावली नाम तमेव भूधरं, सन्ध्येव ताराभरणा समाययौ ॥१७॥ शुशोच चालोक्य निजं सहोदरं, सक्तं भुवि क्षोणिभुजङ्गवदृढम् । स्त्रोरत्नरागं चिरसञ्चित ध्रुवं, मूत्तं सवन्त रुधिरापदेशतः ।।८८|| मनोरथाः प्राणिगणस्य चान्यथा, दुर्दग्धदेवस्य च वृत्तिरन्यथा । तथा हि सा तत्र समाययो कथं, कथ च कार्थं विपरीततामगात् । ८६॥ चुकोप सा बान्धवजीवहारिणे, समस्ततद्वाञ्छितभङ्गकारिणे । ररज चैन प्रतिसस्मृतस्फुरद्, दैवज्ञवाग् या सहसोपशान्तिभृत् ।।६०॥ तस्यैव तत्रैव रुषः शमस्य च, क्षणेन भावो हि महाकुतूहलम् । न हीन्दुविम्बे भवतोऽमृतानलो, गतिविचित्राऽशुभकर्मणोऽयवा ॥१॥ भ्रान्तकस्यैव वधूभविष्यसीत्युक्त पुरा दैवविदा ममाऽग्रतः । इति ब्रुवाणा तमुपाजगाम सा, सेव्यो हि वह्निहदाहदाय्यपि ॥१२॥ उपस्थितां तां च करग्रहाय, पृष्ट्वा सुनन्दा स हि पर्यणपोत् । प्रियाननुज्ञातमतिप्रियं चेत्, तथापि कुर्वन्ति न दक्षिणा यत् ॥३३॥ साऽथ स्वस्य पितुर्विचिन्त्य महती यात्रा प्रिये भाविनी, विद्युद्वेगनिमित्तिका भटघटासघट्टसहारिणीम् । प्रज्ञप्ति निखिलान्यमन्त्रकलिता विद्यामदात् सम्मदा- च्छीमद्भूपसुताय तायन कृते विश्वस्य च स्वस्य च ।।१४।। यस्याः सद्धयानतः स्यात् पर चरितगतियोमसञ्चारशक्ति - नानारूपक्रियापीक्षणयुगविषयातोतताऽमोघताऽस्ने दिव्यान्याग्नेयमुख्यान्यनुपममहिमान्यायुधान्याजिभुमो प्रायः पुण्यानुसारादिति भवति शुभ सत्वभाजां समस्तम् ।।९५शा एषा विद्यासहस्र त्रितयपरिकरा यत् किलकापि यावद् - दीप्रप्राज्यप्रभावा जगति भगवता सर्वविधालु माता। तत् सिद्धाया किमस्या न भवति कृतिन सिद्धमत्यद्गु यत् कि वा चिन्तामणो स्थान वश मवनो पागिरमायमाटे ॥६॥ 1 १४८ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् -- लाभे तस्याः कुमारः श्रिय इव बलिजिन्मोदधामाधिकश्रीः, प्राज्योद्गाढप्रतापः शरद इव सदाऽप्यशुमाली सुवृत्तः । दुर्धर्षः पञ्चवक्त्रः कनकगिरिगुहागर्भभित्तेरिवाऽभू - न्नानासम्पन्नको वा भवति हि निचितः श्रेष्ठविद्याप्रतानैः ॥१७॥ इति युगप्रवरागमश्रीमज्जिनपतिसूरिशिष्यलेशविरचिते श्रीसनत्कुमारचक्रिचरिते प्रज्ञप्तिलाभो नामाष्टादशः सर्गः॥छ. ॥१८॥ एकोनविंशतितमः सर्गः स्थास्नोस्तत्र कुमारस्य कान्ताद्वितयसंयुजः । शशाङ्कस्येव सौम्यस्य रेवतीरोहिणीस्वजः ।।१।। एकस्यापि सधामत्वाद् भूषणस्य नगश्रियः । उदयाचलचूलाया इवाभ्युदितभास्वतः ॥२॥ वधूविप्रेक्षिताऽऽलापेष्वनङ्गेन क्षणेक्षिणा । सौभाग्यविजितेनेव सेव्यमानस्य सादरम् ॥३॥ हरिचन्द्र-चन्द्रसेनाभिधौ तत्रैयतुः क्षणात् । रंहसोच्छ्वासपूर्णास्यौ विद्याधरकुमारको ॥४॥ द्योतयन्तौ दिशः कान्तिमण्डलेन सुराविव । वर्मितत्वेन सत्पक्षावृताङ्गो तायंकाविव ॥५॥ दीप्रशस्त्रावलीदीप्तौ सज्ज्वाली ज्वलनाविव । शिरस्त्राणमणित्विभिः कल्पितेन्द्रायुधौ दिवि ॥६॥ मेरुपादाविवाददाङ्की गौरी श्यामलकङ्कटौ। विकासिलोचनौ फुल्लपद्मौ पद्माकराविव ॥७॥ सप्तभिा कुलकम् एकोनविंशतितमः सर्गः १४० आलोकिष्ट कुमारस्ती विस्मयस्तिमितेक्षणः । तादृग्गुणाश्रयत्वेन भोमशान्ती नृपाविव ।।८।। तत्पादनलिनद्वन्द्वं प्रणम्यार्थविशारदी। विनेयाविव तौ मूनि प्राहतुः प्रकृताञ्जली ।।६।। देवनारदतोऽवेत्य त्वत्तः सूनोः परिव्ययम् । अर्जुनादिव कर्णस्याऽशनिवेगः क्रुषं ययौ ॥१०॥ स हि विद्याधराधीशः स्वामी रत्नपुरस्य च । तृणायितान्यभूपाला सैन्यविद्यावपुर्वलः ॥११॥ नानासमरसम्पन्न विजयो बलिराजवत् । मनस्विनामसो मौलिमृगाणामिव केसरी ।।१२।। न तेन स्पर्द्धते कोऽपि खेचरेष्वपि भूपतिः । धनी क्रीडति को 'व्यालेनाबाल. कालसाक्षिणा ॥१३॥ तत्क्षणव्यजितानर्थश्चापकारिण्यसशयम् दुराचारं नरं हन्तुं कृतान्तः किं विलम्बते ॥१४॥ करदीकृतनिश्शेपभूपालः स्वप्रतापतः। न हि सम्बद्ध एवाकः सर्वमस्यति शावरम् ।।१५।। निसर्गासहनः सोऽयमाशीविष इवाहतः । दण्डेनेव सुताऽश्राव्यवृत्तान्तेन गरीयसा ॥१६।। अन्तर्दु खौघसङ्घट्टात् स स्तम्भित इवाऽभवत् । रोषदवालीढवपुस्तख्तया ध्रुवम् ॥१७॥ रेखात्रयं स भृकुटी कालदण्डयाकृति । समं जगत्त्रयं हन्तुमिव दधे नृपस्ततः ।।१८।। विदधद्भ्यामिवाशेषां सभा रक्तच्छटास्तताम् । पाटलद्युतिचक्षुामुद्वामेव स अधम् ॥१६॥ विष्टपप्रत्तवित्रासमुहुर्मूर्धविधूननेः दशाऽपि दिक्पतीन् नून तजयामास कोपनः ॥२०॥ क्षण १. सरण।

१५० सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् स्वेदबिन्दुस्रुतिव्याजादमर्षोऽन्तरमानिव विकारो हि विषस्येव तस्याङ्ग बहिरानशे ॥२१॥ सर्वाङ्गेष्वतिरौद्रत्वं स महीयः समुद्वहन् । युगान्तोत्कटकोपस्य कृतान्तस्य दधौ श्रियम् ।।२२।। तादृशे सति भूपाले तदाश्रितनृपा अपि। प्रापुः पिङ्गाम्बुजान्तस्थास्तादृक्त्वं भ्रमरा इव ॥२३॥ स संरम्भमभाषिष्ट विष्टपस्य भयानकः । और्ववह्निवदुर्वीशो रक्तनेत्रप्रभाशिखः ॥२४॥ येनाऽघाति कुमारो मे हतं तेनाऽखिलं कुलम् । अनसूचीविनाशे हि ताले किमवशिष्यते ।।२५।। इतः परिभवान्नान्या पराभूतिगरीयसी। छिदाति बाधिका देहे का हि मूर्धच्छिदोऽपरा ॥२६॥ अपि सह्येत चोत्कृष्टाऽशनिवृष्टिः सुकष्टदा । मानिना न तु पुत्रस्याश्रव्यवार्ता श्रुतिव्यथा ॥२७।। वैरनिर्यातनान्नान्यो ममार्थः प्राणधारणे। सूर्योदयस्य किं साध्यं तमस्काण्डक्षति विना ॥२८॥ वरं कक्षो वरं लोष्ठो वरं तूलं वरं रजः । न वैरप्रतीकाराभावनिष्फलपौरुषः ॥२६॥ येनारातिवने रोषदावः सद्यो न पात्यते । श्वासमात्रावशेषस्य किं तस्य जनुषः फलम् ॥३०॥ शेषशीर्षमणिप्रख्यः कि धनैः किं पराक्रमैः । पराभवपराक्रान्त व्यते मानवैः ॥३१॥ अरातिशोणितजलरेव रोषानलो मम । शम्यते न तु तत्प्राणदर्शनेन्धनराशिभिः ॥३२॥ तत्सर्वथा स मे सूनुः सामन्तोऽसौ स च प्रियः । एवारातिविटपिच्छेदनैकमना: सदा ॥३३॥ तु यत्र य

एकोनविंशतितमः सर्गः
१५१
नृपस्यवं वचः श्रुत्वा ससंरम्भं सपौरुपम् ।
सभासदः क्रुधा तत्राग्जायन्त ज्वलनोपमाः ॥३४॥
प्रलयानिलधूमालिसोदरा
भीषणत्वतः ।
परुषामुगिरन्ति स्म ते गिरं गुल्मत्सरात् ॥३५॥
स्वेदनृकुटिकम्पाद्या विकृतीमद्यपा इव ।
असख्यास्ते दधुस्ताश्च या वाचामप्यगोचराः ।३६।।
अन्यान्भीमांस्तथा भेजुर्विकारांस्ते पर.शतान् ।
यथाऽलक्ष्यन्त विश्वस्याप्याऽसुघातोद्यता इव ॥३७॥
निसर्गामर्षिणः शूराः स्वामिनोऽन्ते जिताः कथम् ।
न दीप्येरन् मरौ वायुसखा इव दवानलाः ॥३८॥
अस्रष्वपि रणोत्साहात्ते चषषि निचिक्षिपुः ।
कार्यसिद्धिनिदानेषु सद्भूत्येष्विव भूभुजः ॥३६॥
आदिश्यन्त भटै त्यास्तनुत्राहृतिहेतवे।
निवर्माणो हि न जयश्रीयुजः कर्णवन्मृधे ।।४०॥
एतया तव गृह्णीत हेतीरित्यादि भारती।
भटानामाकुला तारा व्याप शस्त्रप्रभेव खम् ।।४१॥
सदस्यशनिवेगस्याऽशनिपात इवाऽऽकुले ।
जगतीव क्षयाक्रान्ते पुरे च तुमुलध्वनी ॥४२॥
तदन्तिकान्निरातङ्कश्चतुरो वाविशारदः ।
अस्मज्जनकयोः पावमायाच्दिनगतिश्चरः ॥४३।।
युग्मम्
चण्डवेगो भातुवेगरचेति खेचरनायको।
प्रावयोः पितरो नोतिविदो गुरुकवी इव ।।४४।।
सूर्यवत् सप्रतापी च सिंहवद् दुप्पधपंगौ।
चण्डवत् प्राज्यराजन्यनामपरिवारिती ॥४॥
फुकवाकू इवात्यन्त वत्सलो बान्धवाले।
जगदानन्द कोशसमृद्ध या
घनदाचिव ॥४६॥

१५२ सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् परस्परेण सस्नेही दीपौ सायन्तनाविव । रामलक्ष्मणयोर्यद्वत् साहचर्ययुजोस्तयोः ॥४७॥ विभूषितास्थानभुवोः समागत्य वराग्रणीः । व्यासेनाऽशनिवेगस्य स वृत्तान्तं समभ्यधात् ॥४८॥ पञ्चभिः कुलकम् आकस्मिकमिवोत्पातं तमाकर्ण्य सकर्णको। तावचिन्तयतां चित्ते तत्तत्त्वं योगिनाविव ॥४६॥ सनत्कुमारः सत्वाढयस्तामसं कर्म तद्वचः' । अविराद्धः शशिग्रास कथं राहुरिवाऽऽदधे ॥५०॥ कृपालु . स निसर्गेण प्रहरेन्नैवमेव हि । प्रकृतिस्थं पयो जातु न दाहाय प्रगल्भते ॥५१॥ किन्तु तेजोनिधित्वेन स न क्षत्ता पराभवम् पञ्चानन इव क्षुण्णाऽसंख्यवैरिमतङ्गजः ॥५२॥ तदागोऽपि ध्रुव किञ्चिद् विद्युकेंगे भविष्यति । स हि ससिद्धिससिद्धचापलः कपिपोतवत् ॥५३॥ विविच्याऽऽविष्कृते चैवमाकूतेऽन्तःसभं निजे । नृपाभ्यामवदच्चित्रगति योऽपि तत्त्ववित् ।।५४॥ भो! भो!! देवौ समाकृष्य हठात्तेन स बाहुना। खं प्रत्युच्चिक्षिपे चञ्च्वा श्येनेनेव द्विकार्भकः ॥५५॥ ततः प्रतिघचण्डेन चण्डवेगेन वेगतः । चराभिमुखमावृत्य' बभाषे भीषणात्मना ॥५६॥ नात्मानं न परं दध्माता जानन्ति दुधियः । 'क्रव्यप्रपुष्टाः क्रोष्टार इव शार्दूलतर्जकाः ॥५७।। क्व सर्वसारनिर्वृत्तः कुमारः क्व च खेचरः । विद्यामात्रधनः सोऽयं खद्योतः स्पद्धिता रवेः ॥१८॥ - १. प्रतौ तदपम् । २. उपविश्य । ३. रोप एकोनविंशतितमः सर्गः १५३ परप्रयुक्तो ' मानाढ्यहुंकारोऽपि सुदुस्सहः । लघीयस्त्वतरोर्मूल किं पुनर्वाहुकर्षणम् ।।१६।। तत्पुष्पं तद्वधोऽवज्ञाशाखाया इति भाव्यताम् । फलं तु तत्कुलोच्छेद स क्षिप्र दर्शयिप्यति ॥६०॥ इत्थमूर्जस्वि तद्वाक्य भानुवेगोऽपि वृ हयन् । सुधाभीशुरिवाम्भोधि प्रोवाच वदता वरः ॥६१।। अहो ! बालिशता शत्रोरपकृत्याऽपि यत्पुरा । सन्नह्यतेऽपि तत्रैव तेजस्विनि मुमूर्षुणा ॥६२॥ तत्रोत्रासितयक्षेऽपि पुरा चानपराधिनि। रोषः प्लोपः स्वगोत्रस्य नूनमारभ्यतेऽरिणा ॥६३।। दन्धिश्चेदसौ भूप एकाकीत्यवमस्त तम् । तत् किं सबलविद्योऽह तत्पक्षस्थोऽपि विस्मृतः ॥६४॥ मयि जीवति जामातुः कर्षेत् क. केशमप्यहो ! अपि पत्रं पयोजस्य सत्य कोऽनुमोलयेत् ॥६॥ एकाक्यपि स सोत केनाऽऽजी रोपभीषणः। कृशानुरकृशज्वालापरीत इव अस्माभिस्तु स सम्भूय प्रलयानिलविभ्रमः । जगतोऽपि क्षय कुर्यात् का कथा तस्य पोविण ॥६७।। ध्रुवं न भविताराति-यद्यसो हि युयुत्सते । न हि दीपशिखालोले पतङ्गे प्राणितस्थितिः ॥६८|| एवं एवास्या शनिवेगप्रणोदितः । आजगाम स्पशस्तत्र मुखरो दुर्मुलाभिधः ॥६६॥ वभाषेऽन्तःसभं सोऽथ शासनं निजभूपते. । शासनं यद् भवेत् सद्यस्तदतिकमकारिणाम् ॥७॥ विश्वस्यापि प्रभुमिन चन्द्रवनन्दकत्वत. ! न हि कस्यचिदेवाऽऽपस्तपोकायापिकाः ॥७॥ पर्वते ॥६६॥ वदत १५४ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् युष्माकं तु विशेषेणाऽऽजन्मबद्धानुरागतः ! रविः पङ्कजखण्डानामिव शुद्धगुणस्पृशाम् ॥७२।। सणेव रुषात्यर्थं व्यर्थमन्धं भविष्णुना । महाभोगेन केनापि भूमण्डलविहारिणा ॥७३॥ विना दोषं महाविद्यः कुलकाननचम्पकः । प्राणजातादपि प्रेयान् व्यापाद्यत सुतो मम ॥७४॥ युग्मम् तदवश्यं विधास्यामि कीनाशसदनातिथिम् । सुरसिद्धशताध्यक्षं तं तनूजनिसूदनम् ॥७॥ नद् गृह्याः केऽपि ये तेऽपि लब्धारस्तद्गति हठात् । न हि स्तेनयुजस्तस्मान्न्यूनमियति निग्रहम् ॥७६॥ मित्राण्यमित्रतां प्राप्य महाशत्रुत्वमाप्नुयुः। यथा म्लेच्छत्वमम्लेच्छाः स्युर्महाम्लेच्छतापदम् ।।७७।। तद्वध्या यूयमेवादी यदि तत्पक्षगामुकाः । द्रोणाद्याः कुरुगृह्या हि पाण्डवानां यथा ध्रुवम् ।।७।। अपि दीनः समुच्येत दन्तःस्वीयांगुलिग्रहे । हरिणा इव कूटस्था यूयं तु न कथञ्चन ॥७९॥ अतिकर्कशमर्कादप्येवमाकर्ण्य तद्वचः। सभ्या अासन् रुषा ताम्राः कुसुमैरिव किंशुकाः ॥८॥ प्रागेवासन् क्रुधा दीप्ता वह्निवत्ते सतेजसः । रूक्षतद्वचनाहूत्या सुतरी प्रदिदीपिरे ॥१॥ विश्वक्षयाय प्रलयक्षुभिताम्भोधिविभ्रमम् । सदस्तदाददे नानाविकारं भीषणारवम् ॥२॥ ज्वलनतुलिततीवश्वाससंशुष्कपुष्प स्रज उपरत लौल्या निष्पतन्तो'द्विरेफाः। तदधिकतरतापानूनमापुः शितित्वं, सदसि किरणवेगस्याशु भूपालमौले ॥३॥ १. निर्गच्छन्त..

एकोनविंशतितमः सर्ग: १५५ L कनककलशचारुस्कन्धनिर्घातघोषैः सपदि भृतमहीभृद्गह्वरोऽभून्मतङ्गः । हृदयललदमन्दक्रोधरक्षोऽट्टहास स्फुटविकटनिनादत्रातवत्त्वेन मन्ये ॥४॥ कुलिशकठिनहस्तेनाग्रतः क्षोणिपृष्ठं , रणरभसविलोलोऽताडयद् यद् युधाजित् । तदुरगपतिमुच्चैर्बोधयामास निद्रो- पहतमिव सहायं भूरिशः सम्भ्रमेण ॥६५॥ शिरसि कृतविधूतिः क्रोधतो वायुवेगः कनकमुकुटकान्त्या दीपयन् शेषभूपान् । बहिरपि बहुतेजोयोगमन्तवंदेषा, प्रकटयति भुवीव स्मापराभूतिमूलम् ॥८६॥ अतिरुषिततयालं वक्तुमीशो न किञ्चिन् मुखमुरुरसनाढय व्याददानोऽभिधित्सुः । दलयितुमिव सद्विद्विश्वमुद्गोण'-जिह्वा छलगुरुयमदण्डः क्रोधतोऽभात् सभानुः ॥७॥ स्वपरगुणविभागालेख्य-सुव्यक्तिभूमि , जननफलमतुल्योत्साहभाजामिकम् । समरमुपदघानं मित्रवच्छत्रुवर्ग, समुपनतरणधीश्चित्रवेगः क्व पितरशनिवेगो मकृपाणाग्रजीव- स्त्वरितमुपनयेह त्वन्मुदे वैन चेष्टे । इति निजशिशुवाणीमुजितां तत्र अपवन , सुसमधिकमवाप कोषतः कामपान. ॥८६॥ , . शशस ॥५॥ १. उरिक्षाप्त। २. चित। २. पनि पापयन्तम् ।

१५६ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् Amm निविडकरनिघातेनियन् दूरमाशाः प्रतिरवभृतसंसद्गर्भ भागोऽतिवेगः अरुणनयनकान्त्या शोणितां हारयष्टि , पुनरनयदवज्ञाहासतः श्वेतिमानम् ॥१०॥ पवनगतिरदारीद् दर्पतः पादघातात् , कठिनमवनिपीठं येन भानोर्मयूखाः । फणिपतिफणरत्नोस्रः समेत्याऽहिलोकं , द्विगुणतरमहोभिर्योतयामासुरुग्नाः ॥११॥ शमयितुमिव तेजः शात्रवं सर्वतोऽपि , श्रमजलततबिन्दुव्याजतोऽम्भःप्रवाहान् । असृजदमिततेजा दन्तदष्टौष्ठकोष्ठः' प्रकृतविकृतचक्षुप्रेक्षणप्रेतलील: ॥१२॥ शिशुरपि हि न तत्रासीदरुष्टोऽविकारी , प्रसरति रिपुदूताद् दुर्वचः कालकूटे । दधति दहनकक्षामुष्णरश्मौ शुचौ स्यात् , किमु किमपि' सतापं सकतं शुष्कनद्याः ॥६३॥ इति सदसि समस्ते कल्पपर्यन्तगर्जत् - क्षुभितजलधिलीला 'लासयत्युग्ररोषे । सपदि स रिपुदूतोऽपूतवाग्भीतभीतः शश इव हरिदयाँ निर्ययौ दैवतोऽस्मात् ॥१४॥ निर्यान्तमेनं जगदु: क्षितीशा, न नामतः केवलमर्थतोऽपि । त्वं दुर्मुखो यत्तु न हन्यसे तद्, दूतः किलाऽवध्य इति प्रसिद्धः ॥६५॥ तादृक् प्रभोस्त्वादृश एव दूतो, यक्षानुरूपो हि बलिः सदा स्यात् । कपालिनो भृङ्गिरिटिप्रवेकात्, परिच्छदायेन न शोभतेऽन्यः ।।६६॥ १. मध्य । २. किंचिदेव । ३. प्रकाशयति । ४ सदस। ५ प्रधान ।

एकोनविंशतितमः सर्ग: १५७ - वर्मणा, ||६|| ततः प्रतीहारवरेण दत्तं, गलेऽर्द्धचन्द्राभरण दवाने । दूताधमे शत्रुमभिप्रयाते, शत्रुमभिप्रयाते, कलेस्तरोर्मूत्तिमतीवबोजे ॥१७॥ अन्तःसरोपावपि तीव्रमाशु, प्रहर्तुकामी निभृतौ तदानीम् । मेषाविवावाजनकाविहवं', सुमेधसौ प्राहिणुतां हि सद्यः ॥१८॥ अत्याहितं' दृप्तविपक्षतः क्षणाद् , विशङ्कमानौ रथमप्यमुं निजम् । सम शिरस्त्राणयुतेन सस्नेहमात्मानमिवात्तविग्रहम् निभिविशेषकम् ऊचे च ताभ्यामिह यावदावामायाव ऊर्जस्विवलेन युक्तौ । तावद् भवद्भ्यामवधानवद्भ्यां, स्थेयं कुमारे निजजीवतुल्ये ॥१०॥ ततस्तदादेशवशेन युष्मत्, पाश्वं सरो भूषितुमागमावः । चक्राविवातः परमादिश त्वं, कालोचितं कृत्यमकृत्यवते ॥१०१॥ इति तदुदितं श्रुत्वा दूरं प्रसारितलोचनः , किमपि मनसि ध्यात्वा तस्थौ तथैव नृपाङ्गजः । न कलुषनदीपातरधिविकारमियत्ति यद् , विलसितमहासत्त्वः शश्वद् गभीरतमानणीः ॥१०२॥ - इति युगप्रवरागमश्रीमज्जिनपतिसूरिशिष्यलेशविरचिते श्रीसनत्कुमारचकिचारते सभाक्षोभवर्णनो नामकोनविंशतितमः सर्गः ॥छ. ॥१६॥ १. तुमत्वावं। २. महाभौतिम् ।

१५८ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् विशतितमः सर्गः अथ दूते पुरं प्राप्ते शात्रवं धूमलानने । दुर्मुखे सुमुखत्वं यद् बहिरप्यतिदुर्लभम् ॥१॥ भानुवेगादिभूपानामैकमत्यमतिक्रुधम् तस्मादशनिवेगोऽपि विदित्वाऽभूदमर्षभूः ॥२॥ युग्मम् आदिदेश च सन्नाहभेरी ताडयितुं लघु । तनियुक्त विलम्बं तेनारियाने युयुत्सवः ॥३॥ ताड्यमानाऽथ सा भेरी पपाट प्रथमाहती। आदेष्टुरपि चात्मवत् सूचयन्तीव पाटनम् ॥४॥ सैन्येन स रुषा शत्रौ तथापि समनह्यत । क्व वाऽमर्षवतां वृत्तौ विमर्शः साध्यसाधकः ॥५॥ ध्वज आनीयमाने च क्षुतं तोरणसन्निधौ । केनापि प्रतिषेधाय जयस्येव तदीशितुः ।।६।। स्वपादेष्वेव वीराणां वसनान्तविचस्खले । युधे प्रतिष्ठमानानां सुकृतैरिव निर्मलैः ॥७॥ सुभटानां ललाटेषु स्थासकाश्चन्दनाः क्षणात् । विरच्यमाना अशुषन् प्राणा इव तदात्मनाम् ॥८॥ आरसन्ति स्म विरसं सादरं वादितान्यपि । रणतूर्याणि सविधे पश्यन्तीव प्रभोः क्षयम् ॥६॥ तेजो मदनवन्नूनं विलाय स्वेदरूपतः। सन्नद्धानां सरोषाणां वीराणां निर्ययो बहिः ॥१०॥ आवख्ने रजसाऽकस्मान्नभो यत् तद् ध्रुवं रवेः । बहिरप्यवरोद्ध सत्तेजसः सङ्गमं द्विषाम् ॥११॥ भटीनामिव चेतांसि ददुर्दाहं दिशोऽनिशम् । डमरोड्डमरारम्भे' क्व वा शान्तिविजृम्भते ॥१२॥ १. भशिवोद्भुट।

विशतितमः सगा १५६ चकम्पे काश्यपी त्रुटयन् महाभूधरवन्धनम् । निपतिष्यन् महायोधभूरिभारभयादिव ॥१३।। सा सेना प्रस्थिताप्यस्थात् क्षणमने निवारिता । सर्पता कृष्णसर्पण कालदण्डानुकारिणा ॥१४॥ वर्मितोऽशनिवेगोऽपि सर्वास्त्रद्युतिदीपितः । सविधुच्छटकल्पान्ताम्भोदभीमत्वमाददे ॥१५॥ कङ्कटेषु मणिप्रांशुज्योत्स्नांकुरशतै शरैः । विधेः प्रागेव सङ्ग्रामादासन योधाश्चिता इव ॥१६॥ दिवापि दीप्रतीनां' भासो निर्भर्त्सयन् पराः। उल्काप्रकाशो व्यकसत्' तदपुण्य चयाकृतिः ॥१७॥ सैन्ये चलति तद्वोर्यमाकृष्येवान्तरं हठात् । ववर्ष वारिदश्चेलकोपं रुधिरधारया ॥१८॥ पातितेऽप्यतिपत्रस्य दण्डेऽकाण्डे महीपतेः । विररामाऽनिलो नैव तद् युद्धोत्साहवदृढः ।।१६।। वृद्धनिरुध्यमानोऽपि सव्यरसीन यानतः । स्वाग्रहात् कृष्णमृगवदलङ्घया भवितव्यता ॥२०॥ केचिद् विमानमारूढा वैक्रियं केऽपि वाहनम् । सख्या विद्वेपिणश्चेलुः खेचरास्त्रिदशा इव ॥२१॥ तद्वले चलति व्योम्नि विप्वग निर्विवरं रसा'। अभ्राभावेऽपि साव भेजे सच्छायतां क्षणम् ।।२२।। अभ्यमित्र जवाद् यान्ती सेना मूर्छन्मल्द्वनिः । नागे विनिपतत्ता_कक्षा सा म विगाहते ।।२३।। तुर्यनादोऽपि योद्धाना सिंहनादः व्यधीवत ! करिव सहलाशो: प्रकाशो जातवेदसः ॥२॥ १. प्रहरणा २. विशिवा ३. न।

. १६० सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् । दूरादथ कुमारस्य चक्षुषो विषयं ययो। मृगादनस्येव मृगी वाहिनी सा चलाचला ॥२५॥ हरिवद् हरिवद् वीक्ष्य तामहृष्यन् नृपाङ्गजः । मण्डलीमिव नागानां' चमू वा चेदिभूपतेः ॥२६॥ तन्नेत्रपतितं सैन्यं नान्तकायास्य सर्वथा । बभूव रेणुकणवत् सात्विकैकशिरोमणेः ॥२७॥ सुदृढेन समस्ताङ्गव्यापिना गहनात्मना । संवर्मितोऽपि ससिद्धिभुवा विक्रमवर्मणा ॥२८॥ तनुवन्धत्स्व युद्धाय समाचार इति क्षणम् । अनातपेऽप्यातपत्रं महाराज इवोद्भटम् ॥२६॥ इत्युक्तश्चन्द्र सेनेन कुमारोऽपि तदग्रहीत् । तस्योपरोधात् सन्तो हि सद्वयस्यानुवर्तिनः ॥३०॥ विशेषकम् निसर्गावनतां मुष्टिग्राह्यमध्यां गुणोज्वलाम् । तृणतां कान्तकान्तावत् संयुयोज करेण सः ॥३॥ नानास्त्ररत्ननिचित: स्यन्दनो निधिचातुरीम् । चोरयन्नर्थसम्भारपदत्वेनाथ सज्जितः ॥३२॥ विश्वसिद्धिनिदानेन सान्निध्यादपि देहिनाम् । स्त्रीरत्नेन स्वयं चक्रे तस्य लाजादिमङ्गलम् ॥३३॥ हरिचन्द्रादिवर्गोऽपि द्राक् ततः समवर्मयत् । नवोदयति चण्डांशावुदास्ते तत्करोत्करः ॥३४॥ प्राज्यमानाप्यमाना या निर्भयाऽपि भयप्रदा। सहसा साऽपतत् तत्र चण्डवेगादिवाहिनी ॥३शा १. हस्ति। २. मन्यानुपलब्धमध्येन । ३. प्रकृतिनिमितेन ।

विशतितमः सर्गः १६१ सितलोलपताकाभिर्दवती दिवि शारदीम् । मानसाद्विवलत्खेलद्राजहसावलेः श्रियम् ॥३६॥ पटहानी प्रणादेन प्रतिनादवता मुहुः। रिपुगुप्तिपदान्यद्रेः पाटयन्तीव कन्दराः ॥३७।। वल्गुवल्गद्भटप्रौढध्वनिभिद्विषतां श्रुतीः । श्रुतीरिवार्हतां वाणी दलन्ती स्यात्पदक्रमः' ॥३८॥ शस्त्रप्रतिफलद्भानुप्रौढतापस्तदेव हि। कल्पान्तमरिवर्गाय दिशतोव पुरस्सरम् ॥३६॥ पञ्चभिः कुतकम् नाऽतनुत्र तनुर्वीरो न तनुत्रं शरासहम् । न शरः फलनिर्मुक्तस्तस्यां कश्चिददृश्यत ॥४०॥ मनसेव शरीरेणोत्साहरह प्रकर्षिणा । उपेत्य सा समस्तापि प्रणनाम नृपाङ्गजम् ।।४।। श्रेयसः पश्य माहात्म्य यदमुं समनंसिपुः । विद्याधरनरेन्द्रा अप्युत्प्रतापा इना इव ॥४२॥ अद्भुतः प्रोल्लसन्नेव विक्रमो वा हरेरिव । असस्तुतेष्वपि साम्यं समर्पयति शाश्वतम् ।।४३।। प्रणयादरतः सर्वे विभुत्वेनाभ्युपेत्य तम् । पुरश्चक्रुः क्रमाम्भोघि त्रिविक्रममिवामराः ॥४४॥ सोऽपि सम्भावयामास दृशा वाचा च तास्तथा । यथाऽवामसत सुरास्ते वृषानुप्लवानपि ॥४॥ विशेपानतमूर्द्धानश्चण्डवेगादयो तस्मै भृत्या इवात्मान सादर ते न्यवेदयन् ।।४६।। ततोऽपि दर्शिताऽसनरामवस्तमतत्वरन् । प्रयाणाय न कालज्ञाः स्वामिकार्य उदासते ॥४७॥ नृपाः । १. स्पामपरिपाटीविशेषः। २. हि ।

१६२ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् प्रतस्थेऽथ कुमारोऽपि कुमारपरिभावुकः । निःसपत्नमहाशक्तित्रयाधारतया तदा ॥४८॥ युधे घण्टामहानादैस्त्वरयन्तमिवोच्चकैः । विद्याधरधराधीशान् सत्वभाजोऽम्बुधीनिव ।।४६॥ पताकयापि पवनव्याधूताञ्चलहस्तया । आह्वयन्तमिवामित्रानपवित्रान् द्विकानिव ॥५०॥ चलन्तं जलदाभावेऽप्याहरन्तं चतुर्दिशम् । शम्पासम्पातजा लक्ष्मी कान्तकाञ्चनकान्तिभिः ॥५१॥ शताङ्ग यमजिह्वाग्रभीमशस्त्रावपूरितम् । स विमानरमाचौरमारुरोह महारथः ॥५२॥ । 4 . चक्कलक सितवृत्तोऽपि पूर्णेन्दुरकलङ्कस्य सम्पदम् । यस्यानासादयन्नूनं भक्त्वात्मानं मुहुर्मुहुः ॥५३॥ प्रत्यहं निर्मिमीते तत् तस्योपरि वरं दधे । प्रातपत्रं महापानमाहारजतदण्डकम् ॥५४॥ युग्मम चलच्चामरयुग्मान्तर्वर्ती सोऽथ विभुर्बभौ । पार्श्वतः प्रपतद्गौरनिर्भरोऽद्रिरिवाऽमरः ॥५॥ तत्रोच्चबन्दिनं पेठुर्यनिषादस्वरैर्घवम् । चक्रुस्तद् विजयाशंसि गजगजितमङ्गलम् ॥५६॥ तं प्रत्यमोवास्तद्भार्ये प्रयुज्यानेकधाशिषः । विद्यादेव्याविवाभातामलंकृतविमानिके ॥५७॥ खचरेन्द्राऽनुगः सोऽय व्य चालीत् सबलो द्विधा। इवाभ्योल्लासिपद्मसुनन्दकः ॥५८।। वलं घात्यममित्राणां त्वरितं प्रापयन्निव । प्रानुलोम्येन मधुरस्तत्क्षणं पवनो ववौ ॥५६॥ पद्मनाभ विशतितमः सर्गः १६३ तत्कीर्तेरतिवृद्धाया प्रारुरुक्षोर्दिव दृढम् । आलम्बनमिव प्राशुर्व्यभाव्यत पुरो ध्वज. ॥६०॥ दक्षिणाः पथि सञ्चेरुः शकुनादक्षिणामिव । तस्मै जयश्रियं दातुमायोधनमहावरे ॥६१।। दक्षिणेष्वपि शेपेसु तेपु तारध्वनेविधौ । शंकुकर्णः सकर्णत्वादिवाऽभूद् दक्षिणेतरः ॥६२॥ भेरीणां तारभाङ्कारप्रतिनादः शिलोच्चयाः । अगुञ्जन्निव वामेन मृगाधिपतयो यथा ॥६३।। दृग्विपर्यासतः शश्वत् सञ्चित वामतामलम् । ममार्ज कौशिकः कूजन् वामेन मधुर मुहुः ॥६४।। बलौघेश्चलतस्तस्य व्यानशे व्योममण्डलम् । दीप्रास्त्रद्योतविद्युद्भिर्वर्षाष्विव बलाहकः ॥६५॥ कोलाहलेन सैन्याना विप्वदिक्षु विसारिणा । चक्रश्चिराय ता एवाऽन्योन्यं नून कयाप्रयाम् ॥६६॥ रजसः सर्वथाभावान्निर्मलत्व दधुदिशाम् । मुखानि हृदयानीव तदा परमयोगिनाम् ॥६७।। यावदेवं सुगकुनश्च चालाऽवतमोक्तः। निविकारो गभीरत्वादविवद्भुपनन्दनः ॥६॥ तावदल्पे पयि प्राप द्विपता वाहनो रयात् । ग्रायान्ती कलभणिमिवागे शरभाधिप ॥६।। दुनिन मिधः सदनकोषवारात करायनो। वेगेन समगताता गुदायमानिनोन्मादी 150! उत्साहीत्स्ययोर्याउनोलतों गा ! चनातुः प्रलवारम्ने रोटी मारिदिन ।।

१६४ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् 4 M गर्वोत्साहमहानादैरपूर्वैस्तत्समागमः वाचामगोचरो ह्यासीत् परं ब्रह्मेव सर्वथा ॥७२॥ आययुः कौतुकात् तत्र सुरसिद्धतदङ्गनाः। तूर्यधीरनिनादौर्बोधिता इव सत्वरम् ।।७३॥ घातुका मलिनास्तीक्ष्णाः कुनृपा इव सात्विकैः। कृपाणास्तत्र नि.शेषाः परिवारात् पृथक्कृताः ॥७४॥ धनुर्लता गुणाढयत्वात् कुलयोषा इव प्रियः । विशुद्धः सफलारम्भयुयुजुः सरलैः शरैः ॥७॥ महामण्डलशालीनि गुणकोटियुतानि च । नमनैकसुहेवाकी नीतिबाणासनान्यहो ॥७६॥ नि:सपत्नबलोपेतैराकृष्यन्ते स्म धन्विभिः । राजकानीव सन्मित्रसम्पद्भिर्विजिगीषुभिः ।।७७॥ युग्मम् बाणरावियत व्योममण्डलं 'कुण्डलिवजः । पातालमिव सूत्कारत्रासिताशेषजन्तुभिः ॥७॥ कानकानि' तनुत्राणि भेजुः खङ्गः प्रपातुकैः । विद्युद्दीप्रस्य नभसः केतूदयवतः श्रियम् ।।७।। केचिदाहतमूर्धानो रक्ताक्ताखिलविग्रहा। खङ्गछिन्नोरुमूलाश्च द्विधाऽप्यरुणतो दधुः ।।८०॥ आनिस्वादा नरेन्द्राच्च मर्मभेदविधायिनः । तत्रेक्ष्यन्ते स्म बाणौघा विलसन्तः खला इव ।।८१॥ लालिता अपि शाक्तीकः परी सङ्गत्य निर्दयम् । चक्रुस्तदधरच्छेदं कुलटा इव शक्तयः ।।८२॥ शिरोमात्रच्छिदस्तत्र ह्यर्धचन्द्रविजिग्यिरे। खङ्गास्तदधिकानुच्चैश्छिन्दद्भिश्छत्रदण्डकान् ।।८३॥ १. सर्प। २. सौवर्णानि ।

विशतितमः सर्गः १६५ रुचः शिरांसि शस्त्रलनानि पेतुस्तत्र सहस्रशः । कपित्यात्तत्फलानीव स्कन्धे मत्तेभताडितात् ।।८४॥ असस्यापि महाधाराः समुत्पेतुरनेकशः । खररुचेर्यद्वदुदये पल्लवारुणा.॥८५|| वीराणां प्रजिहर्पूणां प्रष्ठा एवाऽभवन् क्रमाः। यथा परिणिनसूनां दन्तिनो प्रतिदन्तिपु॥८॥ ओजस्वित्वाच्छिताग्रास्त्रः परेषा सुदृढानपि । 'पटच्चराणीव भटा पाटयन्ति स्म कङ्कटान् ।।८७॥ क्षुरुप्रंगौरवक्त्राणि पातितानि दधुः श्रियम् । केपाञ्चित् पूर्णचन्द्राणामपूर्वा भूमिसयुजाम् ॥८॥ अन्येषां तु महारोद्रश्यामान्यापुः सगोत्रताम् । तत्क्षणोत्कृत्तमुक्तस्य सैहिकेयस्य तादृशीम् ॥८६॥ स्वामिदृष्ट्याधिकोजस्कैदि गुणं युयुधे भटैः । समीरपूरणासङ्गात् 'कृकवाकुकुलैरिव ॥६॥ अत्यद्भुताः प्रावहन् कुल्यास्तत्र निर्नालपङ्कजाः वीराणा कृत्तवृत्तास्यै रुधिरोद्गारसम्भवाः ॥११॥ मूढघात: परासूनां शरीराणि शरीरिणाम् । वहन्त्यसृगमहानद्यां यादासोव रयाद् वभुः ।।१२।। प्रक्षेपे सर्वशस्त्राणामयुध्येता स्फुरत्कुघो। केशाकेशि भृशं कोचिदहो क्रोवः मुदुर्द्धरः ।।६३॥ नैरन्तर्येण भूयोभिर्धन्विभिः शरवोरणिः । मुक्ता व्याप्तनभा: सोरीः सर्वथैव तरोध भाः ।।६।। महान्धकारसग्रामाटव्या युद्धाकुता *धूम्रप्रभाजजन्तूना क्षण लीला व्य डम्बयन् ॥६५॥ भटाः । १. जीणंयस्त्र । २. प्रपान गुमानुप्रक्षेत्रात् । १. डा. नाना. नारफाणाम्।

सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् सम्प... मपश्यन्त्या कौतुकिन्यः सुराङ्गनाः । तत्र क्षणेऽभवन्नूनं व्यानिमिषताश्रियः ॥६६॥ इषुः सतीवाऽवक्रापि क्षिप्ता भर्ता रुषाऽरिषु । चक्रे तथापि तत्कार्यमजी न व्यभिचारिताम् ।।६७।। सहस्रशोऽपि पतता प्रहाराणाममोघता । सुकृतव्यवसायानामिवाऽऽसीत् तत्र संयुगे ॥१८॥ नृत्यतां रक्तरक्तानामंत्रमालायुजां युधि । वेतालानां कबन्धानां चासीन्न गणनाविधिः ||६|| नीरन्ध्र गृध्रसङ्घातः परासुषु पतन्नपि । नप्राप क्रव्यसौहित्य तद्व्यासक्तशिवाभयात् ॥१००। स्वरे रौद्रे समाचारे देहिदेहविदारणे। शिवाभिर्मङ्ग लेनेव प्राशस्त्य प्रापि नामजम् ॥१०१॥ लूनदण्डध्वजभ्रष्टा वैजयन्त्यः सिता दिवि । बभुस्तल्लवकर्तृणामिव मूर्ती हि कीर्तयः ॥१०२॥ पुण्डरोकाण्यसृग्नद्या लेभिरे पुण्डरीकताम् । पतितान्यपि शुद्धा हि भूयोऽपि स्वपदस्पृशः ।।१०३।। कृतेऽवदाने सवोडाः सुगुप्ता अपि मानिनः । केतकानीव मधु" ...तबन्दिभिः ॥१०४॥ वर्षित्वा मूनि पुष्पाणि तद्यशःसुरभीण्यथ । तानेवाऽभिस्वरैस्तारैः सुरसिद्धाङ्गना जगुः ॥१०॥ [सेनान्यो] रुभयोरेवं सोत्साह सह युद्ध्वनोः । स्पर्द्धयेव तयोरास्तां समौ जयपराजयी ॥१०६॥ सु" ."यत्वं सिद्धौधे स्थेयता' गते । युद्धेऽन्वकुरुतां सैन्ये श्रियन्ते प्रोढवादिनोः ॥१०७॥ १. स्वेयाः सम्याः तुलासमा विद्वासः ।

एकविंशतितमः सर्गः १६७ नानानवनवानीकप्रदेशे रेजतुर्वले । गिरिणद्योघसम्पातैर्गङ्गासिन्युमुखे ईव ।।१०।। इत्थ सङ्कीर्णयुद्धे क्रमभव द्मशभावः, सेनानेत्रोवितन्वत्यमृतविपसमाक्रान्तसिन्धोविलासम् । दर्पक्रोधाग्नितप्ताः क्षिति..."तम क्षोणिपा: प्रातिपक्षाः सक्षुब्धाम्भोधिभीम सपदि ववलिरे धोरतारं नदन्तः ॥१०६।। इति युगप्रवरागमश्रीमज्जिनपतिसूरिशिष्यलेशविरचिते श्रोसनत्कुमारचकिचरिते सङ्कीर्णयुद्धवर्णनो नाम विंशतितमः सर्गः ॥छ. ॥२०॥ एकविंशतितमः सर्गः कुम्भकर्ण इवाभ्यर्णदीर्घनिद्र. सदागति' । प्रतस्थेऽथ पुरस्तेषां विद्युद्वेगस्य मातुलः ॥१॥ चचाल विकृताकृत्या दारुणः सबतो नवः । प्रोजसा परशुः शत्रुदारुणः सबलो नवः ॥२॥ प्रापतन्त तमालोपय ग"" यहावामुखता युद्धे वीराणां सा हि वीरता ॥३॥ धनुर्वन्वन् सम रानमनोभि. प्रोच्छनःनि । अश्वत्थामपितुलीला समरेप्सो पलोनयत् ॥४॥ वयो। - सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् 4 पत्रिभिर्व्यथितास्तस्य वर्षाम्भोभिरिवानशन् । विश्लिष्य [राज?] सन्ताना राजहसा इवारयः ॥श। मातुलेनातुलोत्साहवीर्यसंरम्भशालिना चण्डानिलश्रिया सोऽपि निरासे ...."शिवत् ॥६॥ महीयांसो भवन्त्येव महद्भयोऽपि हि भूतले । ओतुना नाश्यते बी यदाशीविषवृन्दहा ॥७॥ कवर्गपरिहारेण चक्कलकम् चित्रवेगोऽप्यथाऽगच्छत् कलावान् सत्वरत्नभूः । पयोनाथ इव प्रोद्यत्कलावान् सत्वरत्नभूः ॥८॥ प्रयुध्य बहुधा सोऽपि मुक्तामुक्तैः शितायुधैः । स्वबाणवद्विलक्षत्वं तत्र भेजे महाभुजे ॥६॥ असौ वैरिशरश्रेण्या नितान्तमुपतापितः । न नाम्ना किन्तु तत्राऽभूच्चित्रवेगः पलायने ॥१०॥ स्वपक्ष्येऽरिपराभूते चण्डवेगः प्रचण्डरुक् । भ्र कुटयाङ्कितभालेन्दुश्चचालाऽतुलसैन्यभाक् ॥११॥ तेन तत्र तथा तेने घनश्रीः' शरसन्ततिः । यथाऽसीदास्यचन्द्रस्य ग्रासच्छाया दिने हरेः ॥१२॥ निरोष्ठया शररद्धेन्दुभिस्तस्य लुलुवे श्मश्रुसंहतिः । रूपश्रीरिव सुश्रोत्रद्वितयेन समं समम् ॥१३॥ तादृशेनाऽपि तेनास्याऽप्यातपत्रं द्विधा दधे । यन्नवाऽप्रहते शर्म निहन्तरि हरेर्भवेत् ॥१४॥ तेन दष्टाधरौष्ठेन सेना मातुललालिता। सा भूतवलितां निन्ये दुर्धर्षायाऽपरन पैः ॥१५॥ १. मेध। २. सिंहस्य ।

एकविंशतितमः सगा १६३ . असहायमनायासात्तमसो हरि 'पः। राहवीयां दशां निन्ये शितास्त्रेण सुरैस्ततः ॥१६॥ क-चवगंद्वयपरिहारेण चत्वारः । अन्यानपि निरासेऽसौ गुरुमन्युभृतः परान् । भूरिवर्ण्यसपक्षत्वान् मरुत्वानिव भूभृतः ॥१७॥ गूढचतुर्थक: रुपोत्तस्थौ महावेगो विद्य द्वेगमहोदर.। पयोद इव 'धौताऽस्त्रविद्युद्वेग -सहोदरः ।।१८।। प्रास्फालितबनु दस्तस्य व्याप नभस्तलम् । सुरत्वस्वामि संन्यानां साधुवादशतैः समम् ॥१६॥ शरसन्धानपातादि तस्याऽवेदि विदापि नो। सत्वरत्वात् सिताऽश्वस्य' विभ्रमं दधतो युधि ॥२०॥ आदधेऽय यश शेपा भूरिसेनाः स शानवीः । सुसहता अपि तत्तीरन्तरुरिव तामसीः ॥२१॥ महत्यथेतरत्राऽस्य ध्वसेनाऽभूद् भिदा युधि । यवसे शिशपायां वा दाहे दावततेरिव ॥२२॥ फ-च-टवग नयपरिहारेण चत्वारः अद्भुते राजहसेऽस्मिन् परपक्षविधुननैः। क्रीडत्येवाऽपतच्चण्डवेगोकाण्डक्षयाम्बुदः ॥२३॥ अगजनपि गम्भीरः शरवरनारतम् । वर्षन्नुत्नासयामास राजहंसकुलान्यसो ॥२४॥ क्षतवीरशरोरनं.। क्षुरुषलूनकेशालि विलुलच्छेवला कुलाम् ॥२५॥ प्रावाहयन् नदीमल. १. शिव। २. पान। ३. पार्नुनस्म । ४. तपरिष। ५. सिर ।

१७० सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् न तेषु सदयो धीरो ये दुर्वृत्ता' महाऽरयः। नतेषु सदयोऽधीरो' धनदो दुष्कृताऽऽगम ॥२६॥ खङ्गाऽशनि सखाट्कारं तथा मूर्धन्यपातयत् । असावस्य यथाऽन्येऽपि पशुनाशमिहाऽनशन् ॥२७॥ अथ तत्र नृपेऽनेकं पपात कुसुमं दिवः । ससार तत एवालं सुगन्धितसितं यशः ॥२८॥ अरीणां सकला सेना विनिमीलितलोचना। तारकापेतनिशया समं रेजे महातमाः ॥२६॥ प्रसंयोगः तद्वधेऽशनिवेगोऽपि दुःखी श्यालवधादभूत् । सहस्रगुणमन्यैव स्वाङ्गभङ्गे हि वेदना ॥३०॥ मृगाधिप इवात्यन्तं मूलोत्खातनखाशनिः । निरस्तदन्तो दन्तीव फणीवोद्धृतसद्धनुः ॥३१॥ विलुप्तपक्षः पक्षीव शुशोच खचराधिपः । सन्तानसदनस्तम्भतनूजोन्माथसव्यथ: ॥३२॥ युग्म त्रिलोकीपुञ्जितक्रोधधारयेव स शिश्रिये । समं समस्ततल्लक्ष्मलक्षिताखिलविग्रहः ॥३३॥ महामर्षभरः सोऽपि विवेश समरं स्वयम् । भीमं यमस्य वेश्मेव मुमूर्षु रिव साहसी ॥३४॥ सुरैरशंसि यः सारमहो राशिविभावसुः । पविः परेपु शैलेपु श्रीवासाय सरोरुहम् ॥३५॥ शिश्रिये यो हिमाभीशुसौम्यास्यसरसीरहैः । परेपु परुपैः शूरैः पीवरासैः सहस्रशः ॥३६॥ . २. भयालुः। ३. तुल्यं । ४. शोका ५. युगपत् ।. ..६ तेज। १. दुरावाराः। ७. रविः।

एकविंशतितमः सर्गः श्रियः । सभायामसुरेशोऽपि यशः समरसम्भवम् । यस्योरोषभोमस्य विववार शशिप्रभम् ॥३७॥ क-च-ट-तवर्गचतुष्कपरिहारेण चत्वारः । निःशेषनिजसैन्यौपः प्रलयक्षुभिताम्बुधिम् । लघयन् घोरनिर्घोषरारेभे योद्धमुद्धरः ॥३८॥ आद्येऽपि तदिषुक्षेपे क्षयवृष्टि रयाधरे। चण्डवेगः प्रचण्डोऽपि कान्दिशीकत्वमाददे ।।३।। सकलं' युध्यमानोऽसौ सकलं द्विषतां वलम् । सकलङ्क ह्रिया चक्रे सकलं रोगिण' यथा ॥४०॥ शरावलिरसह्याऽस्यासुरेश्वरसह.' अरिवाररशेपेलाशस्यवश्ययशोलवैः ॥४१॥ पाहवेऽवसरः सारः साहसेहा वराऽऽशिपाम् । वीरराशेरिहाऽस्याऽसल्लीलावारसरो रवेः ॥४२॥ वारिवाह इवावश्यविसारि शरवर्पसूः । सहस्रशो वीरशिर.साव्यस्रोत्सरिल्लयः ॥४३॥ रसालः शौर्यवर्याऽले: सश्लेपो यशस. श्रियाम् । प्रासील्लीलाहवः शस्यः सुरास्यसरसोरहाम् ॥४४॥ युग्म पञ्चवर्गपरिहारेण चत्वारा। तमभि श्रीभानुवेगाऽमिततेजोमुसा नृपाः। शौर्योप्ममुपिताक र्काग्निप्रतापास्तूर्णमेयरुः |॥४५॥ स्वनाम्ना सदृश चक्रे मिततेजाः प्रतापयन् । वाणः परानन्तरपि क्रोधान्युटोपितरिव ॥४६॥ निपातितसुदुस्साघो गुणवृद्धिरयव नः । साधितानेकसन्धब्दो रणोव्याकरणायत ॥४॥ १. पनुदायन्यातान्ति सपा मति। २. वह 18ti ..। ५. प्राजः।

૨૭૨ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् सुनिर्दयं विमृद्नन्तः प्रतिपक्षं परस्परम् । मत्तेभा इव भूपालाः क्षणाधं न व्यरंसिषुः ॥४८॥ स्वयम्बरायामिव चान्दोलितायां जयश्रियि । समुत्तस्थौ रणोत्सङ्गे कुमारो हरिविक्रमः ।।४६।। सुदृष्टिः शस्यरत्नोऽपि सुपक्ष्मा कान्तसत्प्रभः । ददृशे शशिरम्योऽपि स परैः कालसन्निभः ॥५०॥ गोमूत्रिका प्राददे नम्रता साधुवरबाहुप्रसाधनम् । स धनुः सद्गुणोपेतं कान्तागात्रमनोहरम् ॥५१॥ प्रतालव्यः तत्तदा। संरोप्यमाणगुणमप्याऽऽचक्रन्दाऽथ दासदुश्छात्रवत्कुण्ठ'-वभावभावितसाहसम् ॥५२॥ संयोगञ्चापबाणेन शुद्धिभाजा समञ्जसभ् । संतोषिताऽनेकदिव्यवधूसिद्धवनेचरम् ॥५३॥ युग्मेन खड्गः दृष्टेऽपि तामसात् तस्मिन् 'नानाहेतिमनोहरे । सूर्योदय इवोलूकाः सद्यश्चुक्षुभिरे परे ॥५४॥ तादृग् धनुर्धरो धीमानोजसा द्विषता बलम् । लंघयन्मोदिसुजनो मानी शक्रं जिगाय सः ॥५॥ मुशलम् सुवंशजत्वान्नतिमद्बलादाकृष्टमप्यहो भङ्गाभिमुखतां भेजे न धनुस्तस्य सर्वथा ॥५६॥ रेजे कुण्डलितं घोरटङ्काराट्टहसं मुखम् । खं व्याप्यतद्यमस्येव लम्पटं द्विषतां व्रजे ॥५७॥ धनु: १. सोमावेन कौटिल्येन च । २. समीचीनम् । ३: शस्त्रकराश्च ।

एकविंशतितमा सगो सावधाने विशेषेण दिव्यसिद्धाङ्गनाजने । साक्षाद् दृश्याभिनेयोघं द्रष्टुं तन्नवनाटकम् ॥५८।। शिलीमुखान्निचिक्षेप तेनाऽसौ बलवदली। लीनपक्षान् कठोरास्यानितीव हयरहसा ॥५६॥ हलम् वीराणां वमिताङ्गानां 'बिभ्यत्सुश्चक्षुपां चयान् । तदा सता धुरीणोऽपि छिद्रान्वेपी बभूव सः ॥६०॥ महिमा कस्य न मुदे भिदे वातिभियोऽत्र हि। हिमभानोरिर्वतस्य ततस्तुतिभृतः प्रभाः ॥६१॥ शक्तिः शतश' सैनिकोन्मुक्ताः प्रहाराः प्राणहारिणः । यमोच्चण्डमहादण्डघातलीला व्यडम्बयन् ॥६२॥ तत्र त्रोटितमूद्धौ पः क्षुरुप्रैः सार्द्धमुज्ज्वलाः । कटाक्षा इव कालस्य निपेतुर्भीमवल्लयः ॥६३॥ भानुवेगोऽरुणेनाऽपि प्रास्तप्रायं द्विषो बलम् । ध्वान्तमिवात्यंतमनोनशत् ॥६४॥ ववलेशनिवेगोऽथ कुमारमभि कोपनः । विराद्धारं प्रतीवेद्धा विरुद्धोद्धनकेसरी ॥६॥ तेन समं सावजं नमाग्रबुद्धयाऽभिमानविमवोऽसौ। शरभपशुपाशमानी वृक इव योद्ध समारेभे ॥६६॥ तद्वक्षसि न्यधाच्छक्ति स कान्तविततद्युतिम् । सहसा सात्विकः कान्तामिव नानाजदारणाम् ॥६७।। कुमारमिहिरो १. नविकोपः। t १७४ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् " 11 दिवि । दृढप्रहारामपि तामवमत्य तदैव सः । प्राहरन्न प्रतीकारे सविलम्बा महौजसः ॥६॥ सद्यो विशसनान् माभूद् युधो विघ्न इतीव सः। श्मश्रूण्येव क्षुरुप्रेण तस्याऽलावीत् कुतूहलो ॥६६॥ द्वितीयेनाऽपि तेनाऽसौ छिन्नतच्छीर्षकोऽच्छिनत् । निःशेषाङ्गच्छिदा मूलमिव पूर्व शिरोरुहान् ॥७०॥ तं तथा विकृतं दिव्यस्त्रीणां नवकुतूहलम् । विदूषकमिवोत्प्रास्यं' पश्यन्तीनां मुहुर्मुहुः ।।७१॥ तत्राऽट्टहासकुसुमप्रकरण समं उत्तालकरतालौघदुन्दुभिध्वनिरुद्ययौ ॥७२॥ युग्मम् नीतिस्थितिप्रीतिभृतं पातयन्तं द्विषां बलम् । लम्पटेशान् शातयन्तं तं पापे यशसाऽमलम् ॥७३॥ क्षुरिका अनहयुं विवेकित्वात् कुमारं तुष्टुवुर्जनाः । अवदान्येऽप्पनौद्धत्यं विद्वत्तायाः परं फलम् ।।७४॥ युग्मम् गुनकेशोऽपि मानित्वान्न व्यरंसीत् स युद्धतः । दन्तव्यसनवान् 'दन्तीवाऽतिरोषाद् विभीषण. ॥७॥ स्वशिल्पानीव विशिखान् यान यान् भूपो व्यपीपरत् । तांस्तान् स ताडयामास सम्मुखं दुर्जनानिव ॥७६।। अनात्मज्ञे निस्त्रये चाऽनादधत्याऽरति युधः । तज्जीविताशामिव स ज्यां विचिच्छेद धन्वन. ॥७७॥ स शितासिकरो वल्गन् अर्द्धचन्द्रेण सत्वरम् । विहस्तहस्तिराजस्य निन्ये तेन' विहस्तताम् ॥७॥ . - १. उपहास्यम्। २. हस्ती। ३. कुमारे।

एकविंशतितमः सर्ग: १७५ दोलायिताऽप्याभिमुख्यं जयलक्ष्मीरनायि च । प्रहारपटुताभाजा विदाधेनेव कामिनी ॥७॥ नृमात्रप्रेक्षितस्यास्य विक्रम प्रेक्ष्य तादृशम् । किञ्चिदात्मानमज्ञासीत् स रामस्येव रावणः ॥५०॥ गते विलक्षत्वमिति क्षमापती, वलत्यनकध्यमवध्यदेहिए। पदं' महास्त्रं हि बबन्ध सद्युति, क्षणाद्भुजङ्गाकलनं रुपाचिते ॥१॥ नि.ग्रेणिका तन्माहात्म्यान् महीयांसः कालपाशा इवोरगाः। विषज्वालाविलासित्वोदुद्वमन्त इव क्रुधम् ।।२।। चक्षुःशिरोरत्नभाभिः सूत्रयन्तः सुरायुधम् । भटानां रुद्धसच्चेष्टा.पेतुः कण्ठकरांहिणि ॥३॥ युग्मम् ततस्स तत्राऽतनुधीः कुमारः, कलकपकच्छिदुरः खगेन्द्रान् । ससर्ज सन्त्रासदनादकन्दप्रदम्मुदश्शंदभिदत्तदक्षः ॥४॥ चामरम् तार्यपक्षप्रभाश्लिष्टं व्योममण्डलमाददे कौतुकात्काञ्चनाऽलिप्तमहाकौक्षेयकश्रियम् ।।८।। वभुस्ते भोगिभोगेषु चञ्चुव्यापारतत्पराः । कोका: श्यामा जनालाशलालसा इव रंहसा ॥६॥ स्वभावादेव मलिना. कुटिला द्रोहकारिणः । तेन तवंध्यता नीताः शत्रोर्मन्दा इवाहाः ॥७॥ प्राग्नेयमन्त्रं नृपतिराहावाग्निदीपनम् ! ग्राविपर्तुमिवान्त.स्थ प्रज्वलत् कोपवाडवम् ॥८॥ १. स्पितिम् ।

१७६ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् स्फूर्जद्धूमकच: शिखामयभुजः प्राण्यौघदत्तातुल- त्रासो घोररवाट्टहासविकटो वेतालकल्पः शिखी। सवृद्धो दवतोऽधिको रणभुवि प्राणापहारो जग- ज्जन्तूनामपि तूर्णमुद्धरजवात् क्षुन्दन् हसन् साहसम् ॥८॥ कलशः तेनाऽथ पावकेनाऽपि क्षुद्रोपद्रवकारिता । पारेभे वाडवेनेव कुमारबलवारिधी ।।६०॥ सर्वतश्च तदाश्लिष्टमूर्तयः प्रांशवो भटाः । आगता भारतं द्रष्टुं मेरोः पादा इवाऽऽबभुः ।।६।। सस्मार वारुणं मन्त्रं राजबीजी जयावहम् । येन सद्यो गजश्यामानशे व्योमवारिदैः ॥२॥ जयाऽऽशाचापलं शत्रोराददे तत्र विद्युता । गजितेन तु कौमारदुन्दुभिध्वानधीरता ॥६३॥ ववृषुस्तोयदास्तोयं सन्ततं कुन्तधारया । शमिताग्निपरोद्धत्यं वीरा इव शरोत्करम् ॥१४॥ समूलघातं निहते रिपुदर्प इवानले। खे विचेरुः समं सिद्धप्रमोदैः 'स्तुतिसंकथा ॥६५|| श्रीसद्माऽपि कुशेशयं ननु जडा सङ्गिस्फुरत्कुङ्कुम च्छायोऽप्यभ्युदयन् सुमास्समुपचेयाऽङ्कः शिवो मारहा । इत्थं कोऽपि न यस्य साम्यमभजद् वासस्य विश्वश्रियां, सोऽयं माननिधिः प्रतापतरणिः केनाऽवनी जीयते ॥६६॥ श्रीसनत्कुमारस्येति नामाङ्क छत्रम् जजाप मन्त्रं वायव्यं व्याहतोऽपि स भूपतिः । उल्लासः कन्दुकस्येव यो घाते साहिमानिता ||७|| १. प्रशसा। २. उपचीयमानकलकः।

एकविंशतितम. सगः १७७ प्रलयानिलविद्वेषी समूलोन्मूलितालिप.। ववी वायुः प्रतिदिश रहसा प्रोढसूत्कृतः ॥६॥ महावेतालदुर्दों रज पुजावरूपितः। सर्वतस्त्रासयामास सत्वान् सात्विकानपि ॥६६|| न याचदतिचक्राम प्रतिसैन्य स भीपणः । सद्यस्तावत् कुमारोऽपि शैलेन्द्र तत्र निर्ममे ।।१००। निजानीकपरिक्षेपी' द्वितीयो मानुषोत्तरः । वातवेताललीलानां दूरे यो मन्त्रसिद्धवत' ॥१०१।। सर्वास्त्रपरम राज्ञस्तद्वजमिव वत्रिणः । घ्नताशोऽपि हतप्रायश्चक्रे शिशुकचक्रिणा ।।१०२।। शिल्पमस्त्रं बल मन्त्र यद्यदाविश्चकार सः । समूलकाष न्यकषत् तत्तदेष महाबलः ॥१०३।। विश्वासारणक्रिय बलनिधि ततारसीमास्पद युद्धेन क्षणितु चकार लसनं मिथ्यापि गुरत्वतः । वलगत्कुण्टभुजो रिपूत्पलमहादतो मृधे चत्वरे - ऽरेक' भाविनि भूयुजः स्ववपुपोऽदष्ट्रावत. त्रस्तरे(?)॥१०४॥ सनत्कुमारचम्मिनस्तिमिदमितिवारपा राम् *नियुद्धाधानवुयाऽसो विसारितभुजदयः । रहसाऽधावदुर्वीशस्त प्रतीभ वाडकर. ॥१०५।। आक्रोशनूच्चकश्चंप महायोभन्मदर्शनः। राजाऽपि न रराव सर्वः शल्योऽनुरूपात् ।।१०६॥ मनोऽजगीरशुद्धेन स्पों स्पी मान्ममाना। इतीवाऽराल्लुलावास्य शिरसा चालना ॥१०॥ " 3४ . १. परिमेष्टर.। २. मित्र। ३. नि ....।

१७८ सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् क्लमः। प्रोच्यते , . स्फुटः। 'तत् सैनिकाश्रुभिः साद्धं तत्पपात भुवस्तले । समं सुरप्रशंसाभिर्व्याप खं चक्रिणो यशः ॥१०८।। सन्ततेर्वीरदेहानामनाथाहमिति माऽभूदितीव तद्देह[सू]तन्मुदे न्यपतद् भुवि ॥१०॥ सर्वत्राऽसति पुष्पमम्बरभवं प्रामाणिकैः दृष्टान्तस्तदमन्यताकृत' इव प्रौढेन्दुबिम्बद्युतिः । व्योमन्यद्भुतयुद्धदर्शनभवन्मोदातिरेकात् पुष्पाणां प्रकरः स्मितेन रचितः स्वःसुन्दरीभिस्तदा ॥११०॥ बंहीयस्त्वादमान्तो ध्रुवमिह भुवने साधुवादास्तदीया , अत्याश्चर्याहवोत्थाः सुविरचितमहासान्द्रताः खे प्रसस्रुः। आनन्दात् तारतारं बहलकलकलं ताडितानां सुरोघे- विश्वस्य श्रावणार्थं मधुरिमगुरवो दुन्दुभीनां निनादाः ।।१११।। तस्याऽऽजिक्षतविग्रहस्य नरपस्यान्तर्मुदालम्बिनी , "पद्मानन्दपरप्रसन्ननयना भूमित्रमाऽऽगत्य तम् । वने पात्रमचिन्त्यकोर्तनगिरां 'कोदडपाणिन्नवं', वंशद्योतरवि पवित्रवचनं नीत्याश्रितं स्वाऽऽहवम् ।।११२।। 'जिनपालगणिविरचितमिदम्' इति कविनामगर्भ चक्रम् ३ 3 8 १२ ६ इति युगप्रवरागमश्रीमज्जिनपतिसूरिशिष्यलेशविरचिते श्रीसनत्कुमारचकिचरिते रिपुविजयो नाम एकविंशतितमः सर्गः ।छ।।२१।। १. शिरः। २. वैतस्यापादनाय। ३. चेतसि हश्रियरिण। ४. सेनादिरूपाराज्यलक्ष्मीः ५. प्रशसावचसाम् । ६. धन्विनम् । ७. तरुणम् ।

द्वाविंशतितमः सर्गः १७३ द्वाविंशतितमः सर्गः अस्तखेचरपतिः स्ववीर्यतः, प्राप कृत्स्नख चरेन्द्रतामसी। केसरीव मृगराजतां किमु, प्रौढविक्रमभृतो हि दुर्तभम् ।।१।। स प्रतापनिधिराशु शात्रवं, तन्निरस्य तिमिरोधविभ्रमम् । खेचराऽचलमभिप्रचक्रमे, गन्तुमात्तरिपुकीत्तिवैभवः ॥२॥ सान्द्रचन्द्रविमलस्वकान्तिभि- रतस्य भरितस्य योऽभितः । क्षीरनीरनिधिता निशाकरद्योतनदिशति रूप्यनिर्मित: ॥३॥ नित्यमन्तरुपसर्पदापगाम्भोभृतोदरतयाऽप्यतृप्तिमान् वारुणीहरिदिशोर्मुखद्वयेनोदधिं च धयतीव यो भृशम् ॥४॥ 'सिद्धकूटमुखकूट'-कोटिभि -स्तारकौघमिव योऽदधत् वभो । सर्पराज इव भूतलं पतद्, भूरिभिः फणभुजे समुच्छितः ॥५॥ दुःप्रभोर्महत उद्वति स्पृशोऽन्तःप्रविश्य कठिनान्तरात्मना । द्वैधमिद्धमसतेव संदधे, भारतस्य भुवि येन शाश्वतम् ॥६॥ एकमप्यपरशैलकाननं, येषु भूपयति तानि कोटिशः । कामकेलिकुलमन्दिराण्यहो, यत्र खेचरयुगाणि सन्त्यलम् ॥७॥ यः कुरूनपि हसत्यराशयं, राजधर्म जिनधनराजिभिः । पत्तनरिह धरोऽपरः श्रियं, को नु तस्य तुलवेन्महानपि ।।८।। स्वर्दुरापकलकोकिलारवासक्तिमानिव सुरातनाजनः । यस्य शृङ्गविपिन कदापि न, प्रोज्झति प्रियतमानुगामुरुः ॥६॥ यस्य नूनमुदधिस्यभूधरान्, पश्यतः प्रियतया स्वगोत्रजान् । अस्तमिन्दुल्दयं दिवाकरः, सदयनयनता प्रगे दो ॥१०॥ . १. नाम । २. मनाम । ३. 13टा : १ प एप । मातु फिञ्चिनानि पोनन ५, उरमोबा. सोमाः, सेपास्तु पालमपाः ।

१८० सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् यः। उन्नतं यमनुपास्य चयपि, प्राप कोऽपि सकलो न चक्रिताम् । को हि भूभृदपरश्चरो'ऽचर-स्तेन साम्यमुपयातु भूतले ॥११॥ मानबाह्यपृतनोऽपि चक्रभृद्, यस्य कुक्षिविवरे हरेरिव । व्यासभाजि न विभाव्यते जरत्तोयबिन्दुरिह हेलयाऽशितः ॥१२॥ उन्नतेन घननीलपत्रलेनोपरिस्यितवता वनेन नूनमद्रिषु विभुत्वसूचक, छत्रमुद्वहति केकिपक्षजम् ।।१३।। यस्य कूटनिकटाच्छतारका, भान्ति मौक्तिककणा इवोज्ज्वलाः । केसरिप्रहतकुम्भिकुम्भतः, प्रच्युताः प्रसृमरा निशागमे ।।१४।। तालमूर्द्धपतितस्फुटत्फलप्रोच्छलद्रसविहस्तपाणयः यत्र नर्तनयुजः प्रमोदतो, हासयन्ति शबरीबलीमुखाः ॥१५॥ उत्क्षिपंश्च चमरीगणः सितान्, बालधीन् प्रविचलत्पयोधरः । यस्य शैलविभुतां समापयत्याशु वारवनिताकृतिः क्वचित् ॥१६॥ दैत्यहेव वनमालयाचितः, केसरीव विलसज्जटाशतः। शब्दशास्त्रमिव धातुसङ्गतो, यः समुन्नतशिराः सगर्ववत् ।।१७।। भूरिभिर्विमलदूरगामुकश्रेयसीभिरिव कीतिभिः निम्नगाभिरवनीशनाथवद्, भाति यः सरलतापुरस्कृतः॥१८॥ निर्भररवोत्त्रसद्वधूगाढकण्ठपरिरम्भमोदिताः । तुष्टुवु. शिखरवृन्दमुन्नतं, कामिसिद्ध विवहा निकुञ्जगाः ॥१६॥ दन्तिदानसलिलानुलेपनाश्चम्पकाऽऽरचितचित्रशेखराः केसरस्तबकितश्रुतिद्वया, गुञ्जिकाफलविराजिवक्षसः ॥२०॥ मन्दमन्दतमसि प्रहर्षतो, दत्तकोमलविलासरासकाः। गच्छतां शबरयोषितोऽम्बरे, रान्ति यत्र वनदेवताभ्रमम् ॥२१॥ सदा । यस्य युग्मम् १. राजा। २. अद्रिः। ३. भक्षितः। ४. वानराः।

द्वाविंशतितमः सर्गः १८१ यस्य घामधामयमुपास्य निम्नगा, काऽपि तारयति ता शिलामपि । काऽपि तूलमपि मज्जयत्यधः, स्पार्द्धते क इह तेन भूधरः ॥२२॥ पादसततोपसर्पणानूनमापि भुवने पवित्रता। गङ्गयाऽपि कथमन्यथा न सा, 'तज्जहाति युगसंक्षयेऽपि हि ।।२३।। मस्तकेन दधतः सदार्हतः, किं नु चित्रमिदमस्य सङ्गती। स्यात् परस्य यदतीवशुद्धता, काञ्चनस्य शिखिसङ्गमे यया ॥२४॥ यः पयोजविकचाक्षिपत्रया, भ्रू विलासिविलसत्तरङ्गया। पद्मसङ्गिमधुपालिकेशया, कान्तयेव मधुरैकरूपया ॥२५॥ तीररूढघनकेतकीरज.कल्पितोरुतरसकतथिया राजहसमिथुनध्वनिस्फुरत्कामकामियुगलालितान्तया ॥२६॥ स्नानकेलिचलसिद्धसुन्दरीपीवरोरसिजकुम्भताडनैः 'उद्विवृत्तशफरीविलोचनाऽऽरव्धकान्तगिरिराजवीक्षया ॥२७॥ हारिबहिनिनदप्रबोधिता ऽनङ्गनाकिमिथुनेर्वनान्तरे। खिन्नकायलतिकरपि स्फुरद्भरिभङ्गिसुरतैः सुजुष्टया ॥२८॥ कोमलेति सुरभी च सैकते, मन्मथेन 'जलमानुपोरपि । सस्पृहाः सततमादधानया, स्वप्रियेपु रमणीयसीमया ॥२६॥ वेतसीतरुतलान्यशून्यता, कामिभिः 'समय गुप्तचारिभिः । संदधन्ति तटयोयेन सच्चूत चम्पकयुजोर्दघानया ॥३०॥ गङ्गया वहुधुनीप्रसारया, सिन्धुसज्ञसरिता च पायोः । आसमुद्रहिमशेलमाप्तया, पक्षवानिव सदापि लक्ष्यते ॥३१॥ त मनोहरमवाप्य भूधरं, श्रान्तिमौजमदखिला पताफिनो। अध्वजो तृपमिवातंचातको, लब्धमध्यजतविन्दुमन्ततिः ॥३२॥ श्रीकुमारवर ग्रालिवर्ययाऽस्माकमेप नवया जरिया। श्लिष्ट इत्यधिकरागया ध्रुव, विश्वराज्यरनया काटाक्षितः ॥३३॥ १. पादोपसपंगम्। २. परात । ३ मरखी।

१८२ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् सोऽवदानपरिकीर्तनामृतस्राविवक्त्रकमलैः सुमागधैः । नन्द्यमान उपगीतकिन्नरध्वाननिन्दिनिनदैः पदे पदे ॥३४॥ वैरिणो यश 'उदीर्णमम्बरादुद्विवासयिषुरुत्कटत्वतः । व्याप्नुवन्निति निरन्तरं ध्रुवं, प्रौढतूर्यनिनदैः पुरःसरैः ॥३५॥ नृत्यमानकरणाङ्गहारवन्नर्तकीकररुहप्रभोत्करैः विस्तृतं स्वपुरतो महारिपो,: स प्रतापमपसारयन्निव ॥३६।। दिव्ययानसुविमानचारिभिः स प्रियैः खचरसञ्चयैर्वृतः । पाकशासनममर्त्यतत्प्रियारा जिराजिगमनं पराभवन् ॥३७॥ पौरचारुवनिताविलोचनान्यञ्जयन्निव सुध.शलाकया । कान्तदर्शनतया हि तन्मनो - ऽनङ्गसायकशतैः सपूरयन् ॥३८॥ विश्वभाविशिवकल्पशाखया, सिद्धमङ्गलविधिः सुनन्दया । प्राविशन्निजपराक्रमाजितं, प्रीतिमानशनिवेगपत्तनम् ॥३६॥ सप्तभि कुलकम् माङ्गलिक्यमनुरूपमिष्यते, चेष्टितस्य महतो महीभुजाम् । नूनमद्भुतरणाय चक्रिणे, सर्वराज्यमिति ते ददुर्नृपाः ।।४०॥ येऽप्यनसिषुरनल्पदर्पतो, नैव खेचरनृपा अपि प्रभुम् । तान्नदीरय इवैष नम्रता, वेतसानिव हठादवापयत् ।।४१॥ तत्र भूभृति महोदयेऽपरः, कोऽप्यभूत् क्षितिपतिर्न सत्प्रभः । चण्डरोचिषि नभः प्रसाघयत्यन्य उल्लसितभाग्रहो हि कः ॥४२॥ अभ्यषिच्यत स शेषखेचरैः, स्वप्रभुत्व उदितोरुविक्रमः । को हि सद्गुणगुरुन धार्यते, माल्यवच्छिरसि मानितैरपि ॥४३॥ नाऽपरस्य महतोऽपि चक्रिणः, कस्यचिद् गिरिवरेऽभिषेचनम् । एवमत्र खचरैर्निशम्यते, सत्तमा ह्यसमभूतिभाजनम् ॥४४॥ चन्द्रकान्त इव रत्नसन्ततो, मालतीव कुसुमेपु वर्यताम् । खेचरेषु दधदत्यवाहयत्, तत्र सौख्यनिचितः स वासरान् ॥४५।। १. उदयप्राप्तम् ।

द्वाविंशतितमः सगी , भानुवेगनृपतिः कदापि तं, प्राञ्जलिः प्रणयतो व्यजिज्ञपत् । रूपदत्तकमलाचपेटिकाः, सत्कला हि मम सन्ति कन्यकाः ॥४६।। वल्लभा बकुलमत्यपश्चिमाश्चारुभाश्च शतसत्ययान्विता.। रोहिणीप्रभृतिविद्यया चिरं, त्वत्तनरिव नितान्तमाश्रिताः ।।४७।। व्याहृता मदनुयोगपूर्वकं, ज्ञानिना सुमुनिनाऽप्यमूरिति । तुर्यचक्रिकरपङ्कजालिनीश्रीधरा हि समयेऽत्र भाविनि ॥४८|| तन्महाज्वरहरोरुतक्षकोद्दीपरत्नजलदेशनोपमम् सुष्ठु दुष्करतया मुनेर्वचो, व्याकुलोऽहमभवं निशम्य च ॥४६।। चक्रिणा क्व नु समागमो मम, क्वाऽर्थना क्व च तदर्यसङ्गतिः । इत्यनल्पकुविकल्पकल्पनै, कष्टवानुपितवानियच्चिरम् ॥५०॥ अद्य तु स्वयमिहागमत् प्रभुमत्प्रसूतिसुकृतरिवाऽऽहृतः । तत्करोतु सफलां ममाऽर्थनामङ्गजा तरुणिमोद्गमैः समम् ॥५१॥ मत्पितुर्वचनत. सदक्षिणः, कन्यकाशतमशीत'-मन्मथम् । पर्यणेष्ट हरिणाङ्कमण्डलव्याजविश्वविलसद्यशश्चयः ॥५२॥ स प्रजाकुमुदिनीसुधाकरो, बन्दिवालजननीपयोधरः । वरिमानसकुटीदवानलः, कामकेलिवलभी शिखावलः ।।५३।। काव्यसद्गुणनिबद्धभारती-शारिकारुचिरवक्त्रपञ्जरः । साधुसङ्गसुविविक्तहृद्गृहप्रस्फुरविमलतत्त्वदीपक: ॥५४॥ जैनबिम्बमहिमोद्भवन्महापुण्यशैलदलितरिवाहितः नष्टमूत्तिभिरवाधितप्रजा - सन्ततोत्सवशतप्रमोदितः ।।५।। सर्वतोऽपि घटमानसम्पदो, सु वा च परिभोगलालसः । यक्षराज इव तत्र तस्थिवानीश्वरप्रकृतचित्त निति: ॥५६|| पारसकर अन्यदाऽगमदथो हिमागमः, प्रेयसीमततमप्रियागनः । शारदाकरता पितोर्वराशान्तये ध्रुवमतीव गीतमा ॥५॥ १. उदीप्त ।

१८४ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् यत्र . वाति पवनः पतद्विमासारसीकरभृदप्यहर्निशम् । प्रोषितप्रियतमामनःकुटीकोटरेषु दवतां दधत्पराम् ॥८॥ गन्धतैलघनकुंकुमद्रवी, सान्द्र कञ्चुकसुसिक्थका-'दरी। हैमनं व्रतमिवाऽनिशं दधुर्यत्र सोष्मवपुषोऽपि योषितः ॥५६॥ ईषदुन्मिषितरोधकुड्मल, कन्यकास्तनरुचि दधाति यत् । तेन तस्य परिरम्भलोलुपः, कुन्दमेति न हि यत्र षट्पदः ॥६०॥ दह्यमानघनसारचन्दनोद्भ तगन्धसुभगः शुभानलः । स्पर्शदत्तदयिताङ्गसम्मदै-यंत्र भान्ति निचिता हसन्तिकाः ॥६१॥ तत्समीपगनिजप्रियामुखालोकमोदभरबद्धसंकथाः ईश्वराः सुरतकेलितोऽधिक, यत्र सौख्यमलभन्त कामुकाः ॥६२॥ यत्र शीतजलमज्जनैः समं, रात्रिषु क्वणितदन्तवीणया । पार्वतीमिव भजन्ति कन्यकाः, शेषयोषिदधिरूपसम्पदे ।।६३॥ कुन्दहाससुभगाः प्रियंगुभि-भूषिता अपि वनान्तभूमयः । दुर्भगा इव ददुर्मनो मुदं, यत्र पान्थनिवहायनेक्षिताः ॥६४॥ प्रौढपुष्पलवलीसमागमे, यत्र षट्पदविटोऽप्यजीजनत् । पुत्रिकामिव वियोगिनीमनो-मन्दिरानिशविलासिनी रुजम् ॥६५॥ पक्वबदरीवनश्रियः, पद्मरागशकलद्युतिद्विषः । विप्रयुक्तपथिकस्फुटद्वृदां, भान्ति शोणितमहाहवा इव ॥६६॥ यत्र नूनमसमेषुणा धनुः, स्वं सुदुर्बलमवेत्य नूतनाः । सज्जिता विरहिणीमनोभिदे, मञ्जुलाः शितिमहेक्षुयष्टयः ।।६७॥ स्निग्धसान्द्रहरितैर्यवांकुरैरात्तनीलधनकञ्चुका बालिकेव रुरुचे हिमागमश्रीरदृष्टविकसत्पयोधरा ॥३८॥ के किना न हि 'शिखण्डमण्डलं, नाऽपि पञ्चमकलापिकीरवः । एकको मरुवक: समुल्लसन्, यत्र मोदयति सर्वकामिणः ॥६६|| यत्र ध्रुवम् । १. अघरादियोग्यं मधुच्छिष्टम् । २. अग्निशकटिकाः । ३. पिच्छ।

द्वाविंशतितमः सर्गः १८५ - तत्र मित्रवच्च शिशिरोऽपि तच्छ्रियं, संपुपोप कलयाऽतिशायिभिः । साम्बुशीकरसुचण्डमारुतैः, पुष्पितैर्दमनकैश्च चालभिः ॥७॥ सोमपीनकुचगाढसङ्गम, सद्रसायनमिवैप कारयन् । कामिनो विनयति स्म दूरतस्तीबशीतमयमानय निशि ।।७१।। द्राघयत्यतितरामयं निशाः, सन्तताऽऽप्तरत केलिनिभरात् । सर्वकामिमिथुनान्महाशिपो, लब्धुकाम इव कामसम्मतः ॥७२।। भूरिधूमपटलेन सन्दित', नक्तमावसथसञ्चय व्यधात् । शीतभीतित इवात्तवासस, चण्डवायुपरिकम्गित हि यः ॥७३॥ चक्रभृत एण वक्षुषो, गन्धतैलकुसुमाढयकुन्तलाः । चक्षुपामिव जनस्य काम्यता, सन्दधुर्मधुलिहामपीक्षिता. ॥४॥ कुंकुमाविरल रागरञ्जिताः, स्वर्णचूर्णरुचिरत्विपो वभुः । काञ्चनाचलविलासभित्तयो, नूतनातपनिपेविता इव ।।७५॥ मन्मथोष्मनिचितानपि स्तनानावरोपत सुपीनकञ्चुकैः । सप्रतापमपि हृद्विबाधक, नाऽपि धत्त इह क: सचेतनः ॥७६॥ ताभिरङ्गजविहारभूमिभिः, सार्द्ध मुद्धतरसो हिमागमम् । वोतशीतविकृतिर्वसंतयंस्तुर्य चक्र भृदुपालल'-च्चिरम् इन्द्रियोधसुखसन्ततिप्रदा, अप्यपूर्वललिताक्षिविनमा। तस्य नाकिललनाजित. प्रियाः, स्वर्गतोऽप्यदुरिहाधिका मुदम् । ७८॥ कोष्णपीनकुचया सुनन्दया, प्रौढयोवनयुजा समेत्य तु । शीतजं मदनदाहज च तद् खमौरझदलित दाणेन मः ॥७९॥ दीर्घिकासु विपिनेषु पर्वतेष्विन्द्रियामत कणेपु नोतु लान् । हेलयाऽथ विहरन् कदाप्यसो, शैलमागनदमु मारम् ।।८।। अग चाद्य सुकृतद्रुमोदयाचणिोऽपि भवता समागमः । चण्डरोचिप इवाम्बुजन्मना, मोनितालिममागिना ॥१॥ ॥७७॥ १. सम्पदम्। २. चिोट।

१८६ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् स. ॥८४॥ श्रीमहेन्द्र ! मयकेऽतिलेशतस्त्वद्व यस्यचरितं प्रकाशितम् । श्रूयमाणमपि यज्जगन्मनः, केकिनो नवपयोदडम्बरम् ॥२॥ यावदित्थमवदत् कुटुम्बिनी, चक्रिणो बकुलमत्यभिख्यया । विश्रुता सुरतमन्दिरान्तरे, तावदौझ्यत विभुः स निद्रया ॥३॥ सार्द्धमाशु निजमित्रसुन्दरो, सैनिकैः प्रमदनादनिर्भरैः । चन्द्रमौलिरिव सत्परिच्छद , शलराजमगमत्त मेव तत्र चावसरमाप्य कहिचिच्छिष्यवन्निमित'-पाणिनालिके । श्रीमहेन्द्र सुहृदा प्रियवदोऽवादि साश्रु कुरुराजनन्दनः ॥८५॥ ग्रीष्ममुक्तसलिलाशयोत्पतन्मीनबालकविलासिसाम्प्रतम् । त्वद्वियोगशिखिकुण्डगर्भग, वर्तते जनकयोर्द्वयं तव ॥८६॥ त निशम्य गुरुमन्युमुद्धरं, तत्र चाशु कृतराज्यसस्थितिः । भानुवेगनृपति निजे पदे, सन्निवेश्य गिरितश्चचाल सः ॥७॥ सावरोधबहुपौरखेचरः, खं विमानपटलेन सस्तृणन् । स्वर्णशङ्खरुचिरेण तद् ध्रुवं, स्वप्रतापयशसोश्चयेन सः ।।८।। नाकिनामपि समापयन् क्रियाः, सज्ञया श्रुतिपथे जडीकृते । योधमागधमृदङ्गकाहला दुन्दुभिर्ध्वनिभिरुद्धरोद्धरैः ॥८६॥ यावदेवमगमन्नृपेश्वरः, स्वसैन्यविजितामरेश्वरः । नाऽतिदूरमथ मागधाधिपस्तस्य कौतुकमिति न्यदर्शयत् ॥६०॥ श्रीकौस्तुभेन्दुप्रभृतिहृतिभवन्मन्युनेवातिलोलत्- कल्लोलोत्ताल'-हस्ताहतिनिनदमहाभैरवोऽयं विपादी। अब्धिः सर्वस्वलोपाकुलगलितमुदश्चातुरी गाहते साक् , देव ! त्वद्वैरिनेतुर्गुरुगिरिविवरासङ्गिनः श्याममूर्तेः ॥१॥ नृत्य द्विद्याधरस्त्रोकठिनघनकुचास्फालनस्रस्तहार श्च्योतन्मुक्तावलीभिः शबलितकटकोऽष्टापदादरभिख्याम् । शश्वज्जनेन्द्रवेश्मोत्सवविधिषु जनिष्वेव तीर्थेश्वराणां', तादृग्लीलस्य 'कर्पत्यनुपममहिमाऽण्टापदोऽयं धरेन्द्रः ॥२॥ ३. शोभाम् । ४. पराजयते । स पश्य १. न्यस्ता २. उद्भटा द्वाविंशतितमः सर्ग: १८७ नाथ ! भ्रमस्य । त्वत्पूर्वजानामय'-ममरगृहयोविलुण्टाकमूर्त जैनागारस्य दासीकृतसलिलनिधेविष्णुपद्या' निर्माण मानवेच्छापथगलितमिदं दशयन्नद्भुत ते, नूनं कर्मण्युदारे प्रदिशति नितरां वृत्तिमेवविध लाक् ॥६३॥ दृष्ट्वा सम्भोगभङ्गिव्यतिकरसुभग खजनद्वन्द्वमस्या- स्तीरे भूमि खनन्तः कनकनिधिमहालाभलुव्याः किराताः। लभ्यं लघ्वापि देवाऽस्खलितकरयुजस्त्वत्प्रतापा इवैते , गङ्गायानां रमन्ति क्षणमपि ललनालालिताङ्गाः समोरैः ।।६४|| त्वत्स्त्रैणस्याऽऽस्यलक्ष्मी प्रविकचकमले. कोकयुग्मंस्तनाभा , कल्लोल विलासांस्तरलतरवपुः पश्यतस्ते मुपित्वा । सिन्धुर्मीत्येव देवान्तरिततनुलतातोरवीरुद्वितान- रेषा रेखायमाणा कुटिलगतिमती तस्करेव प्रयाति ॥६॥ सोऽयं कश्मीरदेशः कनकरुचिमुखां यत्र कान्तामुखाना , भूषायै केसराणि श्रुतियुगमलिक चाऽनुविन्यासभाजि । धृत्वा गन्धेन लक्ष्मी मृगमदजयिनस्त्वद्यशःसौरभस्या- ऽऽश्चर्यं मूत्ति तु विभ्रत्यरुणमणिरुचस्त्वत्प्रतापस्य देव ॥६६|| नाथाऽनाथेयमुर्वी कुरुकुलतिलकं नूनमेक विनेति , ध्यायन्ती त्वा सखेदा दिनकरतनयाश्यामता ता प्रपद्य । सम्प्रत्येषा नु कूजत्सितविहगकुलैः सप्रमोदा हसन्तो , नूनं याति प्रवक्तुं गजपुरमभि ते किंवदन्ती जवेन ||७|| इत्थं पश्यन्ननेक विकसितनयनः कौतुकं शक्लीला , प्राज्यप्रतापो गजपुरमचिराच्चिकृच्चित्तभित्तो। विश्वस्यापि स्वनाम्नो मदकल करिभिः प्रांशुभि रिभिर्यन् , सरुद्धाशेषमार्ग ध्रुवमनिशमभात सत्यतात्यापनाय ॥९॥ इति युगप्रवरागमधीमज्जिनपतिमुरिशिष्यताविरचित श्रोसनत्कुमारचफिचरिते गजपुरप्रत्यागमनो नाम द्वाविंशतितमः सर्गः ॥ध ॥२२॥ २. गलायतनस्य । प्राप १. मष्टापदः।

१८८ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् त्रयोविंशतितमः सर्गः 1 कीर्तिमानशनिवेगमर्दनाद्, गीयमानखचराचलार्जनः । बान्धवैर्गजवराधिरोहिभि विश्वसेनसचिवैरुपावृतः ॥१॥ सत्पताकमवबद्धमालिक, पूर्णकुम्भरुचिरं सतोरणम् । सर्वमेव स विवेश तत्पुरं, स्व:पुरायितमशेषतद्गुणः ॥२॥ युग्मम् तत्र तस्य विशतः पुरेऽभवत्, कोऽपि तज्जनकयोः सुखोदयः । सम्मदं समतिशय्य नाकिनामप्यधाद् य उपमानबाह्यताम् ॥३॥ सजमार्गमवतीर्णमङ्गनाः, पातुमिन्दुमिव तं चकोरिकाः । आययुः प्रतिपथं विलोचनैरादधत्य इव सोऽत्यलं पुरम् ॥४॥ कायकान्तिमवरोधसम्पदं, तस्य खेचरपरिच्छदं बलम् । पश्यतां पुरपुरन्ध्रिचक्षुषां, कौतुकं किमपि काममुद्ययौ ॥५॥ कापि सत्वरमपास्य बालकं, नियंती स्वगृहतः कुतूहलात् । त्रस्तनीविरभवत् कुतूहलं, सैव षिद्गनिकरस्य दूरतः ॥६॥ अस्तु पुष्परचना सविभ्रमा, बन्धनेऽप्यविहितादृतिः परा । मूद्धजेषु जवतः समाययो, कुत्र कामिनिवहे ह्यचापलम् ॥७॥ सम्भ्रमाच्छ्वसि कङ्कणं करे, कुण्डलं तु परिधाय धाविता। वाससोऽपि परिवृत्तितत्परा, कापि तत्र हसिता सखीजनैः ।।८।। अञ्जितकनयनाऽपराऽऽपतद्, वेगतः करगृहीततूलिका। नान्यदञ्जितुमसौ प्रचक्रमे, ताडितेव मदनेन पत्रिणा ॥६॥ अर्द्धरजिततलं प्रसाधिका, हस्ततोऽह्निमपकृष्य काचन । चित्तरागपदरागसङ्गमा, जीर्णभोरिव समागमद् द्रुतम् ॥१०॥ पीवरोरुजघनस्तनस्थला, रुद्धवेगगसना काऽप्यदृष्टनृपतिनिनिन्द ताऽन्यङ्गकान्यहितकृन्न शस्यते ॥११॥ समुत्सुका।

त्रयोविंशततमः सर्गः १८६ ऊर्ध्ववेल्लितभुजा चक्रवर्तिनि समीपवतिनि, व्यक्तमन्मथमदा मुदागनाः । पार्वतीप्रतिघशङ्किनाऽभवन्, शम्भुना क्षणमनीक्षिता इव ॥१२॥ चक्रुरेणनयनामुखाम्बुजर्जालकान्यनुगृह सपत्रकै.। व्यक्तलाञ्छनशशाङ्कलाञ्छितान्यप्यहन्युदितराजकौतुकाः ॥१३॥ तद्गुणश्रुतिसुधौघनिर्भरं, रोद्ध मेव चकिता बहिःप्लवात् । नूनमंगुलिमुखेन सम्मुखं, कापि कर्ण विवरं व्यघट्टयत् ।।१४॥ श्लथोभवन्-नीविरुन्नमदुरःपयोधरा। दृश्यमध्यनवरोमसन्ततिर्वीक्ष्य कापि नृपति व्यजृम्भत ।।१५।। रूपलोलितरतिः समन्मथा, निनिमेषनयना सुनिश्चला। उच्चसौधशिखर श्रिता परा, सदधे नगरदेवताकृतिम् ॥१६॥ 'निर्लसन्त्यमलमेखला स्त्रियाः, किङ्किणीबहल निक्वणैर्व्यधात् । सुप्तबुद्धमिव कामकुञ्जरं, कामिनीमृदुलताऽवलोलनम् ॥१७॥ नाकलोकबलिस कामिनी, दृष्टिमार्गमपवृज्य' भूतले। निर्ममेऽस्मदनुकम्पया ध्रुवं ब्रह्मणायमशरीरतर्जनः ॥१८॥ न्यूनरूपविभवोऽपि मन्मथः, स्पर्द्धते शशिमुखेन चक्रिणा । सोऽस्य पक्षपतितेन भस्मतां, प्रापि नूनमिति चन्द्र मौलिना ॥१६॥ किं जपेन तपसाऽपि कि यदि, प्राप्यते प्रियतमोऽत्र नेदृशः । स्वं कृते ह्यविदितैतदुन्नतिः, खिद्यते खलु नितम्बिनीजनः ॥२०॥ रूपवानिति यदीदृशं पति, प्राप्तवान् कथमयं वजनः । यन्नधातुरनुरूपसङ्गती, दृश्यते क्वचिदपि प्रवीणता ॥२१॥ एवमादिवचनामृत पिवन्, यौवतस्य समुदोऽवलोकितः । तेन' चानिमिपलोचनेन स, प्राप राजसदनस्य तोरणम् ।।२२।। मौक्तिकशुभस्तमक्षतै-योपितो नतशिरस्यवाकिरन् । इन्द्रवद्विहितविश्वमङ्गलः, प्राविशन्निजगृहं महानुपः ॥२३॥ तत्र १. संमाना। २. पम्हित्य। ३. योयतेन ।

१६० सनत्कुमारचक्रिचरिमहाकाव्यम् तत्पिता जननतो महोत्सव, सोच्छयं प्रमदतो व्यधापयत् । आत्तराज्यपदवल्लभाङ्गजस्याऽऽगमात् किमपरं हि हर्षदम् ॥२४॥ तत्समागममुदो न सम्ममुः, पौरचित्तभवनेषु विस्तृताः । तद्यशांसि भुवनेषु भीतयो, वैरिवर्गहृदयेषु वा यथा ॥२५॥ त महेन्द्रमपि मित्रमुज्जगुः, सज्जनाः सपदि मेलितप्रभुम् । सर्वतोऽभिमतकल्पपादपप्रापकं हि भुवि को न शंसति ॥२६॥ एवमुन्मुदि पुरे न्यवेश्यत, स्वे पदे स पुरुहूतशासनः । रजितेन जनकेन तद्गुणै., को हि पात्रमवधीरयेद् बुधः ॥२७॥ चक्रिणा तु वटबीजवत्तनु, प्राप्य तन्निजगुण रवय॑त । साधनेन सकलस्य भारतस्याप्तवृद्धिपरमा' हि सत्तमाः ॥२८॥ राज्यमाज्यवदकण्टकं कृती, गोसमुत्थमतिशायि सद्रसम् । स्नेहसारमतिपोषदं तनोः, सेवते स्म सुनिरामयो ह्यसौ ॥२६॥ बद्धहेममुकुटा: सहस्रशो, भूभुजोग्र्यमभिषेकमादधुः । सार्वभौमपदवीविभावन, द्वादशास्य शरदः प्रमोदतः ॥३०॥ विर्यथास्य न तथाऽभवन्नृपश्रीविधिस्तु महतोऽपि कस्यचित् । पाञ्चजन्यमपहाय किं हरे, रत्नमुद्वहति वा त्रिरेखताम् ॥३१॥ तच्चतुर्दशतयाऽस्य भास्वरं, रत्नजातमचिरादजायत । चक्रिभीतित इवाऽऽश्रितं सुरै - र्यन्नजय्यमपरैः सहस्रशः ॥३२॥ भास्करोऽप्यरुणमग्रतःसरं, सविधाय तिमिरं निकृन्तति । तदस्य जयिनः सपत्नभिद्वेधसा व्यरचि सैन्यनायकः ॥३३॥ प्रातरुप्तकलमादिलावकः, सायमाविरभवद् गृहाधिपः । तस्य सैन्यसुकृतावनीरहो, मूतिमानिव शुभ: फलोदयः ॥३४॥ शान्तिकर्मकुशलः पुरोहितस्तस्य नूनमिति स क्षतामयः । वैरिदत्तनिखिलाघिसङ्गतव्याधिकोटिरकरोत् प्रजावनम् ।।३।। १. परावणा:।

त्रयोविंशतितमः सर्ग: १६१ दन्तिराड् न नृपति गुहागतो, मण्डलान्युभयतोऽप्यकारयत् । रोहणेन लघु किं नु तच्छलाच्छेपदन्तिपु विमानना ददौ ॥३६॥ अश्वरत्नमपि तस्य तद्बभौ, यज्जवेन मरुतोऽभिभावकम् । तच्छलेन हरिणाऽवतारित, वाहन स्वमिव सर्वलक्षणम् ॥३७॥ विश्वकर्मकरणिः' सवर्द्धकिस्तस्य केन सुधिया न शस्यते । खेचराचलनदीद्वये स्थलीचारिता हि कटकस्य यो व्यधात् ।।३।। स्वावरोधपरिभोगसङ्गरे, तस्य खिन्नवपुष. सुधाश्रियम् । यद्दधे निखिलभोग्यशेखर, स्त्रोमिषेण तदभूच्च जोवितम् ॥३६।। चक्रमक्रमनिवर्तिता हि त, चक्रवालविलसत्प्रभ बभौ । भानुबिम्बमिव तत्प्रतापतो, वीडित सदुपसेवनोद्यतम् ।।४।। आतपत्रमपि तस्य चित्रकृत, स्पर्द्धया गगनमण्डलस्य यत् । विस्तृत ध्रुवमधाज्जलापदि, प्रीणयेत् कटकमन्यथा कथम् ॥४१॥ तस्य संन्यनिवहस्य तावतः, पादपीठपदवी दधद्भुवम् । यज्जिगाय तदरेणुकण्टक, रत्नतां कथमुपेतु नाजिनम् ॥४२।। यत्र चण्डमहसोऽपि कुण्ठता, खेचराचलमहागुहान्तरे । तत्र भासनपटुर्नवो रविस्तस्य शश्वदभवद्वशो मणिः ॥४३॥ भान्वनाशिततमस्तमोपहान्', दीप्रमण्डल मिपेण भास्करान् । सूत्रयन्त्यचलगान् बहून् विभोः, काकिणी विजयते स्म वेधसम् ।।४४॥ तत्कृपाण उदितप्रभोऽप्यभूद, वैरिवर्गवनितामुखेबलम् । शोकपङ्कमृगनाभिमण्डनारम्भदम्भनिपुण. पुरो गच्छतः स्थपुटभूसमत्वकृत्, वज्रतोऽपि निपतन् नुदाणः । कालदण्ड इव वैरिखण्डनस्तस्य दण्ड उदभूक्तात. ॥४६!! एवमस्य निधयो नवाऽभवन्, यक्षवामनयना क्षितीश्वरा. । सोत्सवा जनपदा. सहलगो, नाटकानि च सदा महामुदे ॥४॥ नटः ।।४५॥ १. सदृतः । २. मलेन । ३ पुस्तके तु '० मस्तमारहान वान वाह।

१६२ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् स्यन्दनाः करिवरास्तुरङ्गमा, लक्षणाङ्कवपुषश्च लक्षशः । कोटिशो कुटिलगाः पदातयो, ग्रामकाश्च नगराभिभावुकाः ।।४।। खेटकाकरपुरोरुपत्तन-द्रोणवक्त्रकमडम्बकवटाः निजितामरपुरीविभूतयस्तस्य रेजुरभयाः सहस्रशः॥४६॥ आधिपत्यमिति स प्रतापतः, पालयन् जिनमतेऽतिभक्तिमान् । पूर्वजन्मजमिवान्वभूदऽसौ, प्राप्य रूपमपरं भुवस्तले ॥५०॥ स्वीयकान्तललनौघलालितो, दानवानुपचिताऽङ्गसप्तकः' । नागकुञ्जर इवात्यवायत्, स क्षणार्द्धमिव वत्सरव्रजम् ॥५१॥ तैलरूषिततनोरभूषणस्याऽस्य कौचन कदाचिदेयतुः। 'अग्रजन्मतरुणी सकौतुकौ, सश्रमाविव किलाऽध्वलङ्घनात् ॥५२॥ द्वारपालकथिती विलोक्य तौ, रूपसम्पदमतीतवाक्पथाम् । तस्य तां तुतुषतुस्तरां हृदि, ब्रह्मणः परमयोगिणाविव ॥५३।। ध्यायतः स्म शुचिविस्मितेक्षणी, तावहो ! दिवि सुराः स्वमूर्तिभिः । नाकमात्रकदृशः स्मयाचलं, किं वहन्ति मरुकूपदर्दुराः ।।५४।। नागलोकललना अपि प्रिय-मर्कटैरिव तदङ्गना मुदम् । व्यर्थमादधति दुग्धवञ्चिता, काजिकेऽपि रमते द्विकप्रिया ॥५५॥ तेऽणवोऽत्र परमाः प्रशस्यते, चेक एव स भुवि प्रजापतिः । येन रूपकमिदं विनिर्ममे, शिल्पिनं मयमतीत्य दूरतः ॥५६।। अद्य जन्म सफलं विलोचने, दृश्यदृष्टयमृतलेखयाञ्जिते । यत्र रूपरुचिभाग्यसम्पदां, मन्दिरं महदय विलोकितः ॥५७।। इत्थमुद्गतमुदौ विलोक्यतावन्वयुक्त मधुराऽक्षरं विभुः । भूमिदेवयुगलेन भूषितं, मन्दिर किमिदमद्य मामकम् ॥५८|| प्रोचतुः प्रहसिताऽऽस्यपङ्कजो, तो नरेन्द्रमभिकोय॑ते तव । रूपसम्पदसमा जगत्त्रये, क्षिप्तदेवदतुजेश्वरद्युतिः ॥५६ १. पाम्यमात्यतुहकोशराष्ट्रदुर्गपललक्षणम् । प्राहाणा ३. परमात्मनः । ४. पप्रच्छा ४ पादशुण्डलिजतागुत सारणानि च। २. ५. दिना त्रयोविंशतितमः सर्गः १६३ च । . कौतुकेन बत तां प्रपश्यतो-रावयोः समजनिष्ट सम्मदः । तन्निशम्य जलराशिवत्क्षये, स स्मयेन सुदृढोऽपि चाऽक्षुभत् ॥६०॥ गर्वपर्वतगतोऽबनीदसौ, तैल सिक्तवपुषो हि का द्युतिः । हैमनाम्बुकणपङ्कितेऽम्बुजे, कि कदापि कमलाऽवतिष्ठते ॥६१॥ तन्मदीयतनुरूपदीधितिर्दृश्यतां सदसि चेत् कुतूहलम् । उन्मिषत्यहिमरोचिषोऽपि यत्, कोऽपि हन्त! महिमोदयाचले ॥३२॥ तौ विसृज्य कृततूर्णमज्जनोऽलङ कृतिस्तवकिताऽखिलाङ्गकः । शुभ्रकान्तिकरधौततारका-बारचुम्बिनभस: श्रियं दधत् ।।६३॥ सोऽध्युवास मृगराजविष्टर, सन्निविष्टमणिकान्तमुन्नतम् । कल्पवृक्षकलिताग्ररोहणश्रीधरं तदुपवेशने तदा ।।६४॥ चारुचामरयुगोपवीजितः, सिन्धुसिद्धसरितोयेन यक्षबद्ध मुकुटावनीश्वर-श्रेणिवारवनिताशतावृतः ॥६५॥ अङ्गरक्षशतदूतकौशिक'-व्यूहपत्तिकुलसकुल आश्रयन्न धिरुरोह वज्रिणा, स स्वसभ्यपरिवारिणा तुलाम् ॥६६।। आह्वयत् प्रमुदितः स तौ द्विजो, वीक्ष्य चक्रिणमिमी तु चक्रतुः । सैहिकेयपिहितेन्दुमण्डलद्योति तत्र वदनाम्बुज शुचा ।।६७।। मस्तकं दुधुवतुः सविस्मयौ, तो तदापहृतवातकि श्रियो । चक्रभृच्चतुरबुद्धिरुच्चकैः, पृच्छति स्म किमितीदृशी युवाम् ।।६।। ऊचतु: सुरगती सदा स्थिरा, रूपयौवनबलच्छविथियः । मासषट्कमवशेपमायुषो, यावदाहृतसुधारसादिव ॥६६॥ दृष्टनप्टसुभगाः क्षणे क्षणे, पुंसु ता अपि तडिल्लता इव । एतदित्थमिति कोऽनुयुज्यतामित्युवाच नृपराट् सुविस्मितः ।।७०॥ अङ्गमेव भवतोऽत्र साक्षिकं, कि दविष्ठमलिन-निदर्शनेः । हस्तगे प्रकटदीप्रकङ्कणे, को हि दर्पणघृती प्रयस्यति ।।१।। सदः। १ भाणागाररक्षक। २. व्यभिचारिभिः।

१६४ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् यत्तपः ॥७॥ सूक्ष्ममेतदवगम्यते कथं, तावपृच्छदिति पार्थिवेश्वरः । ऊचतुश्च विषये किलेदृशे-ऽप्यावयोः स्फुरति सविदुत्तमा ॥७२॥ एवमग्रजनिभाषितेपो, हास्यरत्यतिशयौ विदूरयन्' । संदधार डिमरूपरूपतां, कोऽप्रियश्रवणतो हि तुष्यति ॥७३॥ किं हि तत्त्वमिति मे निवेद्यतां, सम्यगेवमुदितौ नृपेण तौ। आहतुः सदसि नाटकेक्षणाऽऽक्षिप्तदृष्टिमनसो हि वज्रिणः ।।७४।। सङ्गमाख्य उरुकार्यतः सुरः, सन्निधिं त्रिदिवतोऽद्वितीयतः । कृत्स्नदेवरुचिरूपसम्पदोर्दास्यदीक्षणगुरुः समागमत् ॥७॥ द्वादशार्कपरिभावुकप्रभामण्डलेन पटकात्तिनाऽप्यधात् । तत्सभानिमिषवृन्दमन्तिके, कौतुकाद्धरिमिथाभ्यधुः सुराः ॥७६।। अस्य रूपकमला महीयसी, सर्वतोऽपि कुत ईदृशी विभो ! । शुद्धमम्लपरिवर्धमानकं, नाम दुष्करमनेन तप्तमन्यजनने ह्यनुत्तमं, तस्य चारु फलिकेयमुद्ययौ । किन्तु साम्प्रतमणीयसीयमाश्वन्तकान्तिकमुपैष्यतोऽभवत् ॥७८।। आदितस्तु सकल सुरालयं, न्यक्चकार परितः स्फुरन्त्यसौ । ईदृशः किमपरोऽपि कुत्रचित्, कश्चनेति पुनरब्रुवन सुराः ।।७६।। प्राह शक्र उदितप्रभः प्रभु रतस्य खलु हस्तिनापुरे । अस्त्यनीचकुरुवंशकेतनः कान्तताऽपहसिताऽखिलाऽमरः ।।८।। तस्य किङ्करपदे सुधाकरो, हृच्छयस्तु गलहस्तिकाश्रयः । पुष्पकाल उदयद् दयाऽऽस्पद, कान्तिरूपसुविलाससम्पदाम् ।।८।। त विधाय कृतकृत्यतासुखी, साम्प्रतं स्वपिति नूनमात्मभूः । नागलोकसुरलोकयोस्ततस्तादृशो न विवुधोऽपि जायते ॥८॥ त्वन्नुति तत' इमां निशम्य नावप्रतीतित इहाऽऽगतौ सुरौ । वैजयन्तफ-जयन्त-सज्ञिती, निह्नवाविव विभोर्वचस्यलम् ।।३।। १ पहिरन् । २. तेजःसम्पत् । ३. शुक्रात् ।

प्रयोविंशतितमः सर्गः १३५ तैलदिग्धवपुषः श्रियं परां, पश्यतो पुनरभूदनादृतिः। तद्वचस्यनुपमस्य तेन' किं, ह्यस्य वर्णितमिति प्रतीपगा ॥४॥ आस्थितस्य तु तवाधुना सदः, सत्वर क्वचिदितो जगाम सा' । बिभ्यतीव 'सुमुखी पतिव्रता, वेश्मतो हि विटकोटिसङ्कटात् ॥८॥ तत्त्वमेवमवगत्य भूपते, साध्यमात्महितमेव चिन्त्यताम् । बान्धवाविव विबोध्य तो सुरो, जग्मतुर्मधुकराभमम्बरम् ।।८।। चक्रभृच्चतुरधीरचिन्तयत्, स्वीयमङ्गमरुचि प्रलोकयन् । आशु रूपकमला कथं ययौ, स्वैरिणीव बहुधाऽपि लालिता ॥७॥ वेगवाहिस रिदम्बुपादुका', श्रीयुजीह सकलेऽपि वस्तुनि । कुत्र मानसमहो निवेश्यतां, 'सिन्धुसौध इव ही स्थिराशया ॥८॥ नूनमेणनयनाः स्वलोचनैः, प्रेमचापलमुशन्ति' चञ्चलः । "स्थामकामरविणा विशोष्यते, पल्वलाम्भ इव तापिनानिशम् ॥८६॥ नीचगामिचलवेष्टिचेष्टितैरुन्मदात् स्वपितुरम्बुधेर्बुवम् । श्रीरतीवचकिता पराड मुखो, स्थर्यसत्तमगृहाधिवासयोः ।।१०।। कुत्स्यविस्रतनगर्भदर्शनघ्राणतोऽति वहुनिविदाकुलम् । मानवान्तरुपयाति नो रति, जीवितं क्षणमितीव चञ्चलम ॥१॥ सार्वभौमपदवी च दूतिकेवाऽनिश प्रथितदुप्कयाशता। दुर्गतिप्रवरयोपिता क्षणात्, सङ्गमं नयति मुग्धभूपतिम् ॥१२॥ स्वर्गदत्तविलसच्चपेटका, ये मुदाचिततयेप्टसनमाः । तेऽपि चात्महतये द्रुतं ध्रुवं, ढौकिताऽहितसता. खला इव ॥१३॥ कर्णपादकदली" सुवालधीनुत्क्षिपन् मुहुरमून् प्रयपत्यद. । नूनमात्मचलता हि तच्छला, दन्तिपत्ति रयवानिमर्वदा ।।६४|| १. प्रभुणा। २. देहात् । ७. भापते । ३. ससम्मत। ४. पी। १. रामरोगन ।.. ८ चारोरादिक वनम् । ६ । १० .. नदी।

सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् यत्कृते च समुपास्यते रणः, कालवेश्मवदतीवदारुणः । ते कपीन्द्रमुखवृत्त्युदुम्बरोत्पातिजन्तुभिदुराः खगोचराः' ॥६॥ पत्तनादिविभुताऽपि वात्यया, साम्यमेति पुरुषं रजःकणम् । गर्वपर्वतशिरोधिरोप्य सा, तूर्णमेनमथ पातयन्त्यधः ॥६६॥ विद्यपूर्णतपनीयकुम्भक-श्रीविडम्बिबहिरुज्ज्वलत्वतः यौवतं हरति कामिसूकरस्यात्र मानसमहो विपर्ययः ॥१७॥ व्याधयोऽपि पटुतापहारिणो, दाववन्नि विडतापकारिणः । तैरहनिशमिह ग्रहैरिव, ग्रस्तशस्तवपूषः कुतः सुखम ॥१८॥ सर्वमेवमशुचिस्थिरेतरदुर्गतेरनुपम निबन्धनम् । क्षप्यते नवपतङ्गवजनिः, किं मयाऽत्र सजता दृशो: प्रिये ॥६६॥ पश्यताऽपि पशुनेव बालिशेनेदृशं भवभवं न वेदितम् । वस्तुविस्तृततमस्तया मया, कौशिकप्रतिकृति वितन्वता ।।१००॥ मामधन्यतममाप्तसम्पदो, हारिणं सुकृतदूरगत्वतः। धिम् धिगत्यरसपोषणच्छलात्, स्वस्य दुर्गतिरसप्रपोषकम् ॥१०१॥ किं पुरैः किमु गजाश्वपत्तिभि-भूरिभिविटजनोपयोगिभिः । नैकवाहनगृहादितो यतोऽन्यत्स्वयं बलवताऽपि भुज्यते ॥१०२।। अल्पराज्यविभवस्य दुर्गतिश्चास्रवोपचयजा न मा स्म भूत् । अस्य नूनमिति चक्रितामदादुच्छ्रिता मम रुषाऽऽशु दुविधिः ।।१०३।। कूटपातिहरिणस्य लुब्धकेनाऽऽहृतस्य शरणं यथा न भोः । तद्वदन्तकभटेन मे हठान्नीयमानवपुषोऽपि किं भवेत् ॥१०४॥ यो विहाय कुलटामिवेन्दिरां, लालितामपि परस्पृहावतीम् । अग्रहीद् व्रतधुरां महोक्षवन्नाभिनन्दनसुतः स शस्यते ॥१०॥ मादृशंस्तु विषदिग्धपायसा, स्वादलम्पटतुलाधिरोहिभिः । भाव्यमित्यतुलदुःखदाङ्गना, भोगरागपरमै -रिहास्यते ।।१०६॥ १. रूपोदय।। २. मिय्याज्ञानम् । ३. एकतानः।

प्रयोविंशतितमः सर्ग: १६७ तत्कुलीन इव भृत्य ईश्वरं, यावदुज्झति न मां वपुर्वलम् । तावदेतदतिदुष्करेऽपि सत्कर्मणि न्यसितुमेव साम्प्रतम् ॥१०७।। इत्यशेषभवभाव्यसारता, ध्यानकोटिमयमारुरोह ताम् । योगिनाथ इव भूमिनाथतामैच्छदुज्झितुमसङ्गधीर्यया ॥१०८।। आभिमुख्यमभजच्छिवालयद्वार उग्रचरणा तदैव सः। जातसाधनबला उदासते, 'तद्ग्रहे न गुरुसाध्यसाधकाः ।।१०६।। देहरूपगलनश्रुतेरपि, प्रोल्ललास स विवेककोरकः। तस्य यो विरतिभावनामयं, सौरभ समतनोद् विकासतः ॥११०॥ इति निरुपमनिविनिर्ममत्वोऽपि विष्वक् , सगर इव स चक्री राज्यसंस्था चकार । तनुजसचिवभृत्यः स्वस्वकृत्ये नियुक्त- गुरुरिव मुनिनागैर्गच्छ वृत्ति सुवृत्तः ।।१११॥ इति युगप्रवरागमधीमज्जिनपतिसूरिशिष्यलेशविरचिते श्रीसनत्कुमारचत्रिचरिते देवागमनो नाम त्रयोविंशतितमः सर्गः ।छ।।२३॥ 1 १. साधनानीकारे।

१९८ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् चतुर्विंशतितमः सर्गः अष्टवासरभवो महामहो, घोषिताऽभयविधिय॑धाप्यत । तेन जैनसदनेषु सर्वतो, नापकृत्यचतुरा महाशयाः ॥१३॥ कृत्यमन्यदपि तत्क्षणोचितं, सूत्रयन्नभिदधे स पार्थिवः। प्रेमपूर्वमवरोधगुह्यकाशेषपौरनिधिनायकैरपि ॥२॥ नाथ ! किं वयमुपेक्षितास्त्वयाऽकाण्ड एव निविडागसो यथा । कि विहातुमुचितो निरञ्जनः', प्रेमवानपि हि मातुरङ्गजः ।।३।। त्वां विनत्य नतवत्सल नति, क्वापरत्र मनुजे विदध्महे । कि प्रपीय हि सुधां सुधाभुजः, प्रीतिमादधति पल्वलाऽम्भसि ॥४॥ एषु केनचिदलङ्घि शासनं, तावकं किमु मदान्धशासनम् । को हि वासुकिफणामणि स्पृशेदऽह्रिणा सघृणधीः स्वजीविते ॥५॥ याचनस्त्वयि रतिः प्रियंकरे, सा न पुत्रपितृसुन्दरीष्वपि । पुष्कराणि जलजान्यपि प्रियं, भावुकं हि रविमेवमन्वते ॥६॥ तद्विधाय करुणां सुवत्सलो-ऽस्मासु तिष्ठ सुखयन् प्रजागृहे । प्रार्थिता न विमुखत्वमादधत्युन्नतप्रकृतयो हि कुत्रचित् ॥७॥ सत्यमित्यथ समर्थ्य तद्वचः, प्राह गौरवपुरस्सरं स तान् । क्वापि कोऽपि न मयि प्रतीपकृद्, ब्रह्मणीव परमे भवत्स्वहो ।।८।। किन्तु सिंहत इवोद्भटाद्भवात्, वस्तमेण इव मे मनोऽधुना । वाञ्छतीह शरणं सुगह्वर', तेन जैनचरण यथा तथा ॥६॥ तन्न केनचिदिहान्तरायदे, नेह भाव्यमिति स ब्रुवन् पुनः । तैरभाणि नगरेऽपि न क्षमाः, स्थातुमङ्ग ! तव दर्शन विना ॥१०॥ मन्दिर वनतिचन्दनं दवत्यति व्यजनचारुमारुतः । और्वति प्रवरपल्लवास्तृति-थि ! वल्लभजनादृते यतः ॥११॥ १. निहपापः। २. दुष्करत्वाद् गहनम् ।

चतुर्विंशतितमः सगी १६६ इत्यनल्पकलजल्पितानपि, प्रोझ्य तान् सपदि सोऽप्रियानिव । बद्ध हैमनृपपट्टसुन्दरेणा-ङ्गजेन स बलेन सङ्गतः' ॥१२॥ यानरूढललनाक्षितीश्वरा-ऽनेकपौरपरिवारितः क्षणात् । अन्तरुत्कटविवेकधारया, स्नापित: सुरभिवारिभिर्वहिः ।। १३॥ भूषितोऽन्तरमलमहागुण-भूषणैश्च मणिहेमजबहिः । तजितोजितरुचिधुसद्गृह-श्रीविलास शिविकाधिरोहमाक् ॥१४॥ गीतिमङ्गल विमिश्रदुन्दुभि-ध्वानरुद्ध दिगनेकपश्रुति. श्रौतधर्मधनशेवधेर्महा-म्भोनिधेश्चरण रत्नसम्पदः ॥१५॥ पापमूलमपहाय चक्रिता, सद्गुरोहि विनयन्धरप्रभो । पादमूल उदपाटयद्भरं, शुद्धशीलतपसस्तदेकधीः ॥१६॥ पञ्चभिः कुलकन् ॥१८॥ ते त्वकृत्रिममहानुरागतो-ऽन्तःपुरावनिपशेवधीश्वराः । सर्वरत्नकटकश्रिया सम, नम्रशीर्पकमलाः पदे पदे ॥१७॥ मन्त्रचूर्णविवशीकृता इव, प्रौढशाठ्य ठकिता इवाऽथवा । प्रेमतन्तुपरिकृष्टमूर्तयो, नूनमेनमनुजग्मुरञ्जसा युग्मम् एप राग इयमेव भक्तता, सर्वथार्पणमिदं च सत्प्रभो। यद्विहाय गृहमप्यनारतं, निप्परिग्रहगुरोरुपासनम् ॥१६॥ मासपट्कमिति तेऽभ्रमन् भ्रमात्तन्निवर्तनकृते वृथा श्रमा. । याति जातु न रविदिश हरे-रिणीत इति नैव ते विदन् ।।.०॥ वीतविश्वविभवस्पृहस्त्वसौ, चक्षुपाऽपि समभावयन्ननान् । कि विदाधतरुणोपतिव्रताश्चित्रिणः समदनानिरीक्षते ॥२॥ सर्वमद्भुतमहो महात्मना, यन गल्ल कटान कास्यनिन् । श्रूयतेऽनुगतिरेवमादराद्, दीक्षितस्य महतोऽपि भूतो ॥२२ । १. धनुगम्यमन। २. उडामारा:।

२०० सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् 'चक्रवालयति चर्ययाऽचिराच्छिश्रिये स नृपसंयतस्तथा । एककास्खलितसद्विहारिता, योग्यतामभजतोत्तमा यथा ॥२३॥ अष्टमासमुखतीव्रसत्तपस्तापिनोऽस्य तपसः किमुच्यताम् । यत्र षष्ठतपसो लघिष्ठता, पुद्गलेषु सकलेवणोरिव ॥२४॥ एक एव स परं प्रवेदको', लब्धयोः प्रवरभोगशोषयोः । येन शेषनरराट् तपस्विनां, दास्यदीक्षणमदायि तत्क्षणे ॥२५॥ कर्मणा सममशुष्यदङ्गक, शान्तिरुग्रतपसा सहाऽपुषत् । तस्य शुद्ध मनसस्तपोनिधे-सिरे शशिरविद्युती इव ॥२६॥ तस्य पर्युषितचीनकाभिधाऽनेन षष्ठतपसोऽप्यभूत्तदा । छागलाम्लतरतक्रसयुजा, पारणाविधिरदीनचेतसः ॥२७॥ भूय एव स चकार तत्तपः, पारणाऽप्यभवदस्य तादृशो। दुविधेः प्रबलरोगपादपोद्भ तिबोजगुलिकेव कोमला ॥२८॥ जजुरस्य तत उद्धरा रुजः, सप्त सप्तशिखसच्छिखा इव । तापिका न बहिरेव किन्तु ताः, शश्वदन्तरपि कालकूटवत् ॥२६॥ कण्डूज्वरौ कासगलावशोषौ, भक्तारुचिः कुक्षिविलोचनार्ती । सप्ताप्यमी तस्य रवेरिवाश्वा रथ यथा प्राणगणं व्यकर्षन् ॥३०॥ आसीद् रोषणवृश्चिकेद्धदशनोत्तालो -ल्ललद्वानर- "प्राञ्चच्चापलवैभवप्रद कच्छूपिशाचीग्रहः । येनानारतमुनकोटिनखरैः कण्डूयनं क्रीडया लोको न क्षणदास्वपि स्वपिति सद्धर्यो हि तत्रापि सः ॥३१॥ यत्राङ्ग तापगर्भ सुहुतहुतभुजः सश्रयत्याशु लक्ष्मी , कम्पस्वेदावसादाः क्षणमपि च रतेः संस्थिति न क्षमन्ते । तत्र प्रौढे ज्वरेऽपि प्रतिसमयमसौ ध्यानधाराधिरोहात् , क्लान्ति नागाद् विरत्या सुदृढमबलयाऽऽलिङ्गितत्वेन शङ्के ॥३२॥ उरुः ५. भोगशोषा- १. पुनः पुनराहत्या। २. तपसि। ३. अनुभविता। ४. चक्रिया। नुभवप्रस्तावे। ६. उद्भट । ७. स्फुरत्। ८. कच्टुग्रहे। ९. ग्लानि ।

चतुर्विशतितमः सर्गः २०१ २ च। कण्ठावाधपटुः समस्तधमनिश्रेण्याहृतिप्रत्यलो', विश्वांबावलिकृष्टिसृष्टिसुविधिर्नेबाजशोतद्युतिः कासः पाश इवावरुद्धनिनदाध्यापि प्रभु ऽभव त्तस्यात्मैकरति त्वजीवितहृती योगिप्रभोर्जातुचित् ॥३३॥ ग्रीष्मे पल्वलवारिणि प्रियतमाङ्गेऽपि प्रियाऽसङ्गमे , शोषो नारसतावधि वि भवन् दृष्टो ह्यदस्त्वद्भुतम् । यद्वक्त्राम्बुरुहान्महामृतकला नि.शेषयन्नप्यय, शोषः पोषयति स्म सयमरस तस्य प्रभोः प्रत्युत ॥३४॥ कामान्धस्य गुरूपदेश उदयद्भानावुलूकस्य प्रेयस्याः प्रियविप्रयोग उपलास्वादे "हरेर्वा यथा। तद्वत्तस्य नितान्तनिर्वृतिरसा-'ऽऽध्मातान्तरत्वाद् ध्रुवं , माधुर्योपगतेऽपि भोज्यनिवहे नाऽऽसीद् रुचिः सर्वथा ॥३५॥ सद्भोज्येन जिगीपुणेव विभुना स्वस्याश्रये शाश्वते , सवीक्ष्येव कदन्नवैरिणमधिष्ठातु तमुद्योगिनम् । तन्निर्वासनसोद्यमेन गणनाऽतिकान्तबाघाभरः प्रारेभे जठरे मुनेन हृदय तेनाऽप्यकम्प्यस्य तु ॥३६॥ विद्ध वायसकीलकेन कलिते वोज्ज्वालदावानले नाघ्रातेव सुवृश्चिकेन "शमनेनेव क्रुधा क्रुधा लोलिता। शश्वद्वाक्यपथातिगातिबहलाबाधाभराकान्तिभाक् दृष्टिस्तस्य तथापि नाद्यसमिति सध्वंसते स्म क्षणम् ॥३७॥ सप्तस्वेपु गदेपु शेषपुरुप ह्येकोऽपि हन्तु सम्भूता अपि त त्विमे न दुधुवुः पञ्चास्यमेणा इव । नात्युग्रा अपि सद्ग्रहा निजकरमध्नन्ति नाय रुचा, नो वा पूर्णसरित्प्रवाहनिवहाः संक्षोभयन्त्यम्बुधिम् ॥३८॥ क्षमः। १. पटीयान् । २. पाशोऽपि काठावापादिकारियादिगणो नपत्ति । ३. पादाविप न्द्रिपमनस. स्पात्मकलीनत्वम् । ४. मपनयन् । ५ विह ६. पूति। . ८. प्रमदिता। 8. मिलिता। । यमेन ।

२०२ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् । ज्ञानसत्त्वनिधिराचकांक्ष' स, व्याधिशेषसमुपागमं तदा । यन्नवेदनमृते स्वदुष्कृतस्याऽस्ति मुक्तिरिति वास्तवी श्रुतिः ॥३६॥ प्रागिवोग्रतप प्रादधे च स, 'व्याधितोऽप्यतितरामखिन्नधीः । दैन्य मन्यवदुपैति सात्विको, नैव जातु विधुरे महत्यपि ॥४०॥ इत्थमस्य सहतो महारुजः, शुद्धभावशितखड्गधारया। दुष्कृतावनिरुहान्निकृतन्ततो, जज्ञिरेऽतिशयकल्पपादपाः ॥४१॥ ते च चारुमहिमानमुद्ययु-र्व्याधिसप्तकजयोद्भवा इव । सप्त तावदुपकल्पिताऽतुल-श्रीफलास्त्रिजगति प्रथामिताः ।।४२।। स्पौषधिमूत्रविडोषधीश्च, श्लेष्मामलं विप्रुडथ प्रतीकाः । आसनिमेऽस्यौषधिभेदरूपाः, संभिन्न सर्वश्रुतिता च चित्रा ॥४३॥ अङ्गतद्भवमलादयोऽप्ययुः, सौरभं सकलरोगहारिताम् । तस्य किं हि न फलन्ति सत्तपांस्यादरेण विहितानि सत्तमैः ॥४४॥ प्रामषो षधिरस्य कामदुघया संस्पर्द्धमानाऽभवत् पाणिस्पर्शनमात्रकेऽपि हि यतः सम्पद्यते कुष्ठिनाम् । उच्छिन्नामयसम्पदुज्ज्वलमहासौभाग्यभाग्यश्रिया साद्धं रूपरमाऽसमा कनकरुक्कान्ते . वपुर्मन्दिरे ॥४५॥ विण्मूत्रादिमलान्यसौरभमपास्याऽस्य द्विरेफाङ्गना- नन्दित्वं दधति प्रबुद्धबकुलोद्गन्धित्वतोयान्यलम् । चक्रुः स्पर्शवशाद् दृढार्शसमहाकण्डूतिपीडाभृतो ऽप्युल्लाघानिति तान्यवाप्नुयुरहो साम्यं कथं पङ्कजः ॥४६॥ श्लेष्माऽप्यस्य सरुग्नराङ्गलगनेऽप्यासूत्रयन् कानकी लक्ष्मी *तद्वरधातुसङ ग्रहमृतेऽभूद्धातुवादी नवः । कि चाशेन शिवालयं ह्यनुचकाराऽऽरोग्यमापादय - नाजन्मा पुनरुद्भवेन महिमाम्भोधिः स किं वर्ण्यताम् ॥४७॥ २. पीडितः। ३. परस्परमिया ४. श्रुतिशब्देन श्रोत्रन्द्रिप १. अभिललाप। उपलक्ष्यते । ५. कनका चतुर्विशतितमः सर्गः २०३ प्रसव नून तेन न तस्याङ्गे बहिरुल्वणो मलभरः प्रस्वेदतः नन्त: प्रौढसुरूढसंयमरसेनाऽऽप्लावितः पापराट् । निजानुपङ्गवशतः प्रापय्य पूतात्मना, चक्रे स्पर्शनित्तिताखिलमहारोगः सदा रोगिणाम् ॥४८॥ विघुट् तस्य महात्मनो नववयःस्तम्भं वलिध्वसन सर्वाङ्गीण विलिप्तितः शुचिसुधेवाधानृणां रुग्बिणाम् । चिन्तारत्नतुलाजुषां त्रिजगतोऽप्याश्चर्यचर्यापुपा, वस्तूनां महिमा 'विधेरपि हि न प्रातीतिक:' कश्चन' ॥४६॥ निःशेषा अपि तस्य केशकरजाद्या. सत्प्रतीकाः कथा , तीत गन्धमसख्य रोगदमने चाऽऽपुः पर पाटवम् । सूर्यस्याखिलदिक्समूहविलसद्योतस्तमस्काण्डहा - प्रोद्यन्नद्भुतविश्रुतैकमहिमा ह्येक एवाऽशुकः ॥५०॥ भूयासस्तेन नादा युगपदुपनताः थोत्रवद्वीक्षणाद्य - रप्यक्षर्गन्धमुख्या अपि च जगृहिरे तैरशेपैरशेपाः । सभिन्न स्रोतसेति प्रतिकलममलज्ञानिनेवेद्धधाम्ना , যকি कस्येतरस्येत्यनुपमतपसोऽप्यन्यधर्मस्थितस्य ।।५१।। इत्थ सप्त सुलब्धयो निरुपमं लब्ध्वा चिरादुनम , सन्ततं तमपुपस्तोपादनन्यगृहा. । ये चाशीविषकोप्ठवुद्धिविभुताद्याः सम्पदोस्याऽभव - स्तासा क. कलयेत् प्रमा सुनिपुणोऽप्योमणीनामिव ।।५२।। लब्धिसम्पदतिवर्द्धनेऽप्यसो, तस्य शुद्धपरिणामभूपतिः । नारराम सुकृतान्तरार्जनादुद्गतेच्छ इव विश्वभूतये ॥५३॥ उनघोरमहदादिसंज्ञितान्याचचार स तपात्यतारतम्। तानि यानि घनकर्मकानने, गत्तदन्ति करदन्तता दधुः ॥५४॥ त कान्ता इव १. विधात:। २. प्रवानिविषयः। ३. साकोसर।

२०४ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् तं समुत्सुकमतिं च निर्व तो, व्याधयस्तु नितरामपीपिडन् । इन्द्रदत्तनृपतेः सुतं यथा, शेषसूनव उदग्रमत्सराः ॥५५॥ सर्वथाङ्गपरिकर्मवर्जने, रुक्परीषहजये च जातुचित् । स्वःपतिः सुमुनिसकथान्तरे, तं शशस मुनिचक्रवर्तिनम् ॥५६।। अप्यमर्त्य शिखरी प्रकम्पते, भानुमानुदयतेऽपराचले। अम्बुराशिरवगाहते नभः, क्षोणिपीठमपि वाऽप्रवर्तते ।।५७।। दैवतो यदि तथापि तन्मनो, नान्यथा स्वनियमाद् विधीयते । देवदानवशतः स स नायक-रप्यचिन्त्यबलवीर्यशालिभिः । ५८।। युग्मम भूय एव विबुधौ तथैव तावेयतुनिजविभोः पराङ मुखौ । वाक्यतः सुमधुरात् प्रियादपि, क्षीरतो ज्वरितबालकाविव ।।५।। वृद्धसच्छबरवैद्यरूपिणी, तं महामुनिमुपेत्य तौ सुरौ । सादरं रचित हस्तकुड्मला-वूचतुश्चतुरवाक्प्रपञ्चनौ ॥६०।। त्वद्वपुष्यसमरोगसम्पदो, यातना तु कृपयाऽऽत्रयोहदि । अस्तमेति सविता हि बाध्यते, मानसं' तु विरहेण कोकयोः ।।६१।। तत्कृपालुवर जल्प्यतां हि तं, तूर्णमात्मपरयोस्ततोऽभ्यधात् । सोऽस्थिरेण वपुषा चिराते, वाऽहितेन पटुनाऽपि किं फलम् ।।६२।। छन्दसां प्रणववद्रतश्रियां, कामिनीव जगतामिवाऽऽत्मभू । इन्दुकान्तयशसा यथा न यो, मूलमेतदखिलार्थसम्पदाम् ।।६३।। अस्य तेन वपुषो महादरात्, पोषण परमवन्धुनीतितः । कार्यमार्यचरित त्वदग्रतः, प्रोच्यते किमिति तो समूचतुः ।।६४।। युग्मम् प्राह साधुरतिपोषणेऽपि यद्, यात्यमुत्र पदमात्रमप्यमा । नात्मना प्रकटदुर्जनाकृतेस्तस्य कैव परमेह बन्धुता ॥६५॥ १. चित्तम् ।

चतुर्विशतितमः सर्गः २०५ श्रात्मनः व्याधयोऽपि मम कर्मसङ्गरे, सत्सहायपदवी' दबत्यमो। तत् त्यजामि विधुरे कथ हितास्तानुपेत्य समुपस्थितान् स्वयम् ॥६६॥ तौ पुन: प्रति जजल्पतुर्मुने !, धर्मवैद्यकपरी लभेवहि । त्वा सकष्टमभिवीक्ष्य निर्वृति, सज्जनप्रकृतिभावतः कथम् ॥६७।। क्षीयतां प्रकृतिरीदृशो सता, यत्सदापि परदुःखदु.खिताः । धिग् विधि तमपि येन निर्मितास्ते स्वकार्यविमुखाः शशाङ्कवत् ॥६॥ तत्प्रसद्य वितर प्रतिक्रियादेशमाशु तनुवस्तनुं तव । येन तप्ततपनीयहासिनी, मा भव पुनरभावि रुग्व्यथाम् ॥६९।। तो समूचतुरिति प्रतिक्षण, यावदाशु स मुनिनिजांगुलिम् । श्लेष्मणव चकृवान्निघृष्यता, तावदिद्धकनकद्युतिद्विषाम् ॥७०॥ नूनमंगुलिमदर्शयत्तयोHषदीप्ररुचिमोज किन्तु तीवमुद्भासयन्मुनिस्तद्विपर्ययतमोपनुत्तये ॥७१।। बाह्यरुगविटविलुण्टने पटुहट्टयोपिदिव मे प्रगल्भते । शक्तिरेव सुतपःप्रभावजा, तत्र चाङ्ग युवयोः किमर्थनम् ॥७२।। सत्यमेव भिपजो युवा यदि, क्षप्यतां मम तदान्तरो गदः । किं हि जम्बुकवधे यशो हरेरित्यभापत मुनिर्विरक्तधी. ।।७३।। किं भवादपि गदः परः परः, कोऽपि यज्जयितया प्रतन्यते । वैद्यतात्मन उरुन भूधरो, यत्सुराधिपमहीवरादपि ॥७॥ शक्तिरस्ति यदि वा प्रयत्यता, सर्वथा तदुपशान्तये ततः । शेपसाधन'-पथातिगोद्यमी, शस्यते हि रविवत्तमोपहः ।।७५|| दाढयमेवमवगम्य चेतसस्तस्य कायपरिकर्मवने। पर्वतादपि परं परीक्षकावौज्झतां तदपवर्तन गहम् ॥७॥ पाहतुश्च भिपजी भवाऽऽमवध्वसने न चतुरत्वमाययोः । किं भवेद् द्विरदकुम्भपाटने, पाटवप्रकटन पवचित् कपः ।।७।। - १. घिपम् । २ गान। ३. कारण। ४. मधिरावे चली।

२०६ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् सद्यः बध्वा आन्तरामयहतौ तु धावते, शक्तिरप्रतिहता तवैव हि । शैलपक्षलवने प्रगल्भताऽन्यस्य कस्य भवति स्वरु' विना ॥७॥ श्रीमुनीन्द्रचरितेन्दुधामभिः, सप्रमोदहृदयाऽऽर्द्र'-कैरवौ। स्वं प्रकाश्य वपुरुल्लसद्युति-त्रैदश नुनुवतुर्मुदाञ्चिती ॥७६।। येनाऽसंख्येयसख्येष्वरिनिकरमवस्कद्य करीन्द्र- व्यूहाभ स्वीकृता श्रीमगपतियशसा तस्य मुक्ताफलाभा। तामाधायोपभोग्यो पणयुवतिमिवाशेषपादातजात- स्योच्चैः साम्राज्यलक्ष्मीनिरुपधि बुभुजे स्वात्मनाऽनन्यतुल्या ।।८० । दत्वा हस्तं गले प्रागुपचितममतादासिकायाः सरोष , सर्वस्वत्यागरागात्तदनुगलिरिवाऽऽचक्रमे शोलभारैः । सद्धयानपाशैरपदयमधुना रुक्प्रतीकारहान्या, दध्वसे येन देहेऽप्यकृतपरिपुपा सा महावैरिणीव ।।१।। सच्चारित्रस्य भारः शुचिहृदयतुलारोपितो वर्द्धमानः काम कामं क्रमेण प्रतिभरनिभमुत्तोलयामास कार्यात् । किञ्चाऽऽचिक्षेप मेरोरपि गरिमयशो दुर्वहत्वात् पृथिव्या , अप्युत्क्रान्तोपमानो जगति गुरुतया यस्य वश्यात्मनेतु." ॥२।। तस्योच्चैः सद्गुणोधामृतसलिलनिधेर्यद्गुणद्वन्द्वमेव , प्राशसन्नाकिनेता सदसि गुरुगिरा तत्तिरस्कारमाविः । चक्रे तत्त्वेन नूनं समहिमरुचिराऽसंख्यचन्द्रादिरल- प्रोद्वोढुः शङ्खशुक्तिद्वय जननकथा वारिधेः का प्रशस्तिः ॥८३॥ क्वापि ज्ञान न शीलं क्वचिदपि च तपः सयमो नैव सम्यक् , लब्धिः कुत्राप्यनिन्द्या स्मयरयविमुखत्व न तत्त्वेन दृष्टम् । इत्थ नैकत्र कुत्राप्य खिलगुणमणोरोहणत्वं विना त्वां , कान्तत्वद्योतशैत्यान्यपर उडुपतेः कः स धामाऽपि दध्यात् ॥८॥ ३. निर्यामम् । ४. प्रत्यर्थम् । ५. फन्दपंम् । ६ १ वचम् । २ कोमल । स्वामी। ७. धारयेत् ।

चतुर्विंशतितमः सर्गः २०७ वाक्ये नाथस्य नौ' यः समभवदसमोऽप्रत्ययः सोऽपि पथ्यं जज्ञे त्वदर्शनेनाऽपहृतमलमहाव्याधिना पुण्ययोगात् । तत्सत्यैषा जनोक्तिः प्रवरतरभिपग्भपजेन प्रवृत्तो- ऽतीसारोऽप्युत्सवत्व क्वचिदपि भजते भग्नविप्ट घिदोपः ॥१५॥ धन्यावावां ययोर्वः शुभचरितदृशा' सौघसिद्धाञ्जनेन', प्रापच्चक्षुर्विकासं कजमिव रविणा चित्तरत्नेन सार्द्धम् । तद्भूयोऽप्याशु भूयाद्भवदमलपदाम्भोजदृष्टि, नौशे- त्युक्त्वा नत्वा च भक्त्या पुनरनुययतुस्ती सुरो नाकलोकम् ।।६।। सप्तवत्सरशतान्यसौ गदान्, सप्त तानिति दृढोऽतितिक्षत । सप्त भीतिदहनाय बहिषः, क्लृप्तसप्तदहना. शिखा इव ॥७॥ निप्कलङ्कमनुपालयंस्तपः, संयम स यमिना शिरोमणिः । कान्तकीतिपटसिद्धि'-लम्पटो,दीर्घकालमपुनाद् वसुन्धराम्॥८॥ तत्तपोमहिमतो वने मृगाः, शान्तिमीयुरतिदारुणा अपि । कि न याति सुकुमारतां दृषच्चन्द्ररुपरिचयाद् घनापि हि ॥८६॥ तद्विहाय भुवि डिम्बडम्बराः, सर्वगा अपि न चेरुरुद्ध राः । तच्चरित्रगुरुमन्त्रिणा दृढं, कोलिता इव निरस्तशक्तयः ॥६॥ सयमश्रुततप क्षमादिकास्तस्य कः कलयितुं गुणान् क्षमः । सर्वलोकपरमाणुकानिव, स्वच्छबुद्धिरपि यो न सर्ववित् ।।१।। जन्मकोटिनिचितानि दुष्कृतोग्रान्धकारपटलान्यपाटयत् । तत्तपः शरदहस्करः क्रमान्निर्मलत्ववसतिदिने वर्णलिङ्गगुरुयोगवर्जनस्तुल्यता दधदपि स्फुट हीनमेव भवनेन वाह्य तो, ह्योप्ठदन्तपटलाद्वज्जनि ॥६३|| यत्तपः सुबहु मन्यते विभुमा मनोजमपि सर्वथा न हि । इत्यनादरभरादिवागमत्, तद्यशः सपदि दुरमन्बुधिन् ॥६४|| युग्म दिने । १२॥ मवा। -- ३. नेन। १.पान। १. पावयोः । २. पाहारस्तान। निष्पति। ७. क्षिप्रधान।

२०८ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यम् . तदेव, संसारे सारमस्मै सुकृतनरपतिः सत्पदद्वन्द्वमैन्द्र, चाक्रेशं च प्रसाद्य प्रमुदितहृदयो नूनमुप्रैस्तपोभिः । सम्प्रत्युन्निद्रबोधेक्षणललिततर्नु निर्वृति नित्यमोदा , तामासन्नीचकाराऽसुखलवमपि यत्सङ्गतः क्षेप्स्यति द्राक् ॥६५॥ कौमारे ह्यर्द्धलक्षं. प्रमदजलनिधिमण्डलित्वे प्रोन्मीलच्चक्रिभावे बत नवतिसहस्रीं समानां स चक्री। दिग्यात्रायां सहस्रान् दश विरतिविधौ लक्षमेकं महात्मा , सर्वायुस्त्रीणि लक्षाण्यनयदिति लसत्पुण्यलक्ष्म्यावगूढः ॥६६॥ भोगेभ्यस्तस्य नूनं सततमपि मनस्तृष्णगासीत् सुधर्मे, दीक्षापर्यायतोऽन्ये यदमितसुमुदोऽप्यल्पमेते न भुक्ताः । कालं कौमारकाद्या भवति हि महतो भाविकल्याणकाना , दिष्टया प्रागेव चेष्टा 'तदनुगुणशुभा श्रीजिनानामिवेह ॥६७।। मन्ये द्वादशरूपिणीमविरतिं रक्षोङ्गनां ध्वसितु , तस्या द्वादशशीर्षमुख्यनिविडाङ्गानि प्रपेष्टुं हि वा । यद्वाऽऽराद्ध मशेषसूत्रतिलकान्यङ्गान्यहो द्वादशा- ऽऽतेने द्वादशवत्सरान् स भगवान् सलेखनां सर्वतः ॥६॥ कृत्वोनं वरपादपोपगमनं चालोचनापूर्वकं , नासावंशनिविष्टदृष्टिरसकृत्सामायिक चोच्चरन् । आध्यायन् परमेष्ठिनः शुभमनाः पञ्चाप्यभीष्टप्रदान् , पर्यन्ते शरणं जगाम चतुरः स श्रीजिनेन्द्रादिकान् ॥६६॥ आजीवमुज्जीवित-शुद्धभावनिर्यास-मापत्तमसौ तदानीम् । स एव येनोपमिति समागात्, सनत्कुमारो मुनिचक्रवर्ती ।। १००। इति विधिविहिताङ्गत्यागयात्रोऽप्ययासीत् , निरुपमसुखधामस्थामतेजोनिधानम् प्रथमपरिचितत्वेनेव तीवेऽपि तपसि विकसदोजाः स्वस्तृतीयं स चक्री ॥१०॥ चीणे, १. कल्याणानुकारिणी। २. मतिवदितः। ३. परमकाप्ठारूपम्।

चतुर्विशतितमः सर्गः २०६ , किमपि चरितमित्थं तुर्य चक्राधिनेतुः सुकृतकृतिफला'-विर्भावक देहभाजाम् । व्यरचि लसदतुच्छोत्साहतस्तद्गुणोध - ग्रथनसलिल केली कौतुक्रित्वान्मयतत् ॥१०२॥ छन्दोलक्षणयोर्न शुद्धिरिह काप्यन्तश्चमत्कारिणी- भक्तिर्या मम वर्णनीयसुमुनो सैवानुचिन्त्या बुधैः । बालस्येव वचो विविक्तिविकलस्यापि प्रणामे पदो- लॊलन्मस्तकपङ्कजस्य गुरुभिस्तवृत्तमोदावहै. ॥१०॥ इति युगप्रवरागम-श्रीमज्जिनपतिसूरिशिष्यलेश- विरचिते श्रीसनत्कुमारचक्रिचरिते शुभफलोदयो नाम चतुविश- तितमः सर्गः समाप्तः । छ । २४ । ग्रन्थान सर्गवृत्तानुसारेण २२०३, अनुष्टुप्प्रमाणेन तु ३३३१ समाप्त चेद श्रीसनत्कुमारतुर्यचक्रवत्तिमहामुनिचरितमिति । शुभमस्तु । १. विपास। २. विवेक। २.माग्भि.।

ग्रन्थकतुः प्रशस्तिः नमः श्रीजिनपतये। नमः श्रीश्रुतदेवताय । तुङ्गचान्द्र कुलकल्पशाखिनि, भ्राजिनि प्रवरवज्रशाखया। सुन्दरातफलप्रदायिनि, प्राणिनों सुविधिना निषेविणाम् ॥१॥ अतीन्द्रियज्ञाननिधित्वतो यः, सस्मारितश्रीगुणधारिवारः । श्रीवर्द्ध मानस्य गुरोरिहासी-च्छिष्येश्वरस्तस्य जिनेश्वराख्यः ॥२॥ यः श्रीदुर्लभराजराजसदसि न्यक्कृत्य चैत्यासिनो , यत्याभासगुरूनुडूनि सवितेवादोदिपत्स्वं भुवि । नानातर्कमहाकथादिविशदग्रन्थप्रवृत्तिच्छलाद् , यस्याद्यापि विसर्पति प्रतिपदं मूर्तेव कीतिः सदा ॥३॥ तत्सोदरोऽभूच्च स बुद्धिसागरः, सत्याभिधो व्याकरणादिपञ्चकम् । यःप्राच्यविद्वत्कृतितो विलक्षणं, चकार तत्कोतिवधूविगोपकम् ॥४॥ यः षष्ठषष्ठेषु तपस्सु पारणा-माचाम्लपूतामतनोनिरन्तरम् । जैनेन्द्रसत्तर्कगृहीतिवासरे-ध्वन्यस्समारोहति तेन कस्तुलाम् ॥५॥ वृत्तः प्रमालक्ष माद्य एतयोस्ततान ताकरण तथाऽपरः । अनन्यसाधारणवृत्तयोस्तयोः, केनोपमा स्यान्नवशास्त्रकारयोः ॥६॥ जिनेश्वरस्येव गुरोविनेय-श्चन्द्रोपमोऽभूज्जिनचन्द्रसूरिः । संवेगशास्त्रग्रथनाशुजालः, प्रबोधनान्मानवकरवाणाम् ।।७।। नवानामङ्गानां गणममुमगाहन्त मुनयः । पुराऽनेके किन्तु प्रकटितरहस्योऽस्य न भुवि । विना यं सद्बोध समजनि विहायामरगिरि , सुधामन्यः सिन्योविवुधविदिता कः समतनोत् ।।८।। नि शेषशास्त्रार्थदृढामगर्भ-सम्भेदितीक्ष्णोद्धबुद्धिटनः । अजायतोपाङ्गविवृत्तिवेवाः, श्रीमास्ततः सोऽभयदेवसूरिः ।।६।।

ग्रन्थकत्तुं: प्रशस्तिः २११ चित्रं चित्रं वितन्वन्नवरसरुचिरं काव्यमन्यच्च भूय:, सर्व निर्दोषमह्नो मुखमिव सगुणत्वेन पट्टांशुकधि । कान्तावत्कान्तवर्ण भरतनृपतिवच्चालङ्कारसारं, चक्रे माघादिसूक्तेष्वनभिमुखमहो धीमता मानसं यः ॥१०॥ शिष्यो हि भूत्वापि जिनेश्वरस्य, जिनेश्वरेणाप्युपदिप्टमार्गम् । कथ नु नाङ्गोकरवै इतोव, यः प्राग्रहीच्छाद्धगृहा'-धिवासम् ।। ११॥ तस्याऽभयदेवमुनीन्द्र लब्धचारित्रसम्पद. सुगुरोः । जिनवल्लमस्य गणयितुमल गुणान् कः सुनिपुणोऽपि ।।१२।। समनि जिनदत्तस्तस्य शिष्योऽनवद्या- तिशयशतसुविद्याधामनिष्काममौलि. । अविधिजलधिमज्जज्जन्तु जातस्य नाना- विधिविषयकथाभि -दत्तहस्तावलम्ब. ॥१३॥ स्वच्छन्दाचार्यवक्रोत्पथकथकमहादुप्टवाक्कालरात्र्या', निष्कारुण्य समने भविक 'भविजगत्यक्षणे' ध्वस्यमाने । निर्भीकः सत्त्वभूमिः सकरुण इह य सज्जसद्धर्मचक्रः शङ्के धात्रा धरित्र्या सततमवनकृन्निर्ममे कृष्णमूत्तिः ।।१४।। अलञ्चकाराऽस्य पद महोभि-श्चन्द्रोपमः श्रीजिनचन्द्र सूरि । यत्प्रातिभप्राप्तयशा इव स्वा, ययो गुम्य॑त् परिकोत्तनाय ॥१५॥ रूपेण श्रीसुतोऽपि प्रवरदम निधि नवानप्यगर्वः , सच्चारित्रोऽप्यदम्भ पृयुनिहततमा अप्य वण्डप्रभोऽभूत् । प्रायो भावा. कलस्पृश यह शगभृत्पङ्कज द्या. गायः, शश्वद्विश्वाड्योगच्युत उदितमा एक एवावनी य. ।।१६।। तस्य प्रभो पादमरोजभना, मद्वापबाहेण निरम्नानः। बभूवुरुज्जीवितशान्तिभिल्या ', शिप्योत्तमा. श्रीजिनपत्यभिन्या ।।१।। " १. धर्मात । २ पाना। ३ २RITA Int एक सप्त। 1 पता। ...।

२१२ सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् जगत्यसो नास्ति कवित्वमार्गः, समोऽसमो वाऽपि यदीयवाण्या । यश्चक्रिणो दिग्विजये ध्वजिन्या, पन्था इवाभाजितशुद्धगत्या ॥१८॥ श्रीसङ्घपट्टान्वितपञ्चलिग्या-वृत्तिच्छलात् स्वस्य सुबोधलक्ष्मीः । अप्राथि यैनमनन्यबुद्ध-निःशेषसूक्ष्मार्थविकासनेन ॥१६॥ भूभृत्समदं भुवि धर्मवादाः, प्रभावना यैर्बहवोऽप्यद. । यैराश्रिताः सिद्धजयाः समीक-क्रीडाः' प्रगल्भैरिव चक्रनाथैः ॥२०॥ सहस्राः षट्त्रिंशन्मितिरिह महान्यायजलधेः स यैरेकश्लोक क्रमवदवगाह्याऽपि निखिलः । तया वर्णावृत्त्या निशि तमसि शिष्योधपुरतो, मुदा व्याख्यातस्तान् कथमनुकरोत्विन्द्रसचिवः ॥२१॥ केचित् तर्क न काव्य 'श्रुतगतिमपरे लक्षण नैव सम्यक् , ज्योतिःसच्छास्त्रमन्ये न गणितसहिताः शेषविद्या विदन्ति । एकैकप्राणभाजो गजभषक-मृगाः सर्वशक्तीन् हरीन् वा वादीन्द्रा यान्मुनीद्रानृपसदसि सदाऽशक्नुवन्नावजेतुम् ।।२२।। वाद. सूरिजिनेश्वरं शुचितपोभेदैश्च तद् भ्रातरं, संवेगैजिनचन्द्र मङ्गविवृतिप्रस्तावकं वृत्तिभिः। काव्यः श्रीजिनवल्लभ विधिपथप्रत्यापनैः निस्तन्द्रा. जिनदत्तसूरिमनुकुर्वन्ति क्षिती साधवः] ॥२३॥ तेषां लव्धयुगप्रधानयशसा विश्वोत्तमः सद्गुणः, कश्चिच्छिष्यलवश्चकार चरितं तुर्यस्य चक्रशितुः । वसन्मुनिकथाश्रेयोविनोदे महा- लाम्पट्यादपटिष्ठबबुद्धिसचिवोऽप्येकान्तभक्तो गुरोः ॥२४॥ सवत् १२७८ ॥ वैशाखबदि ५ लिखिता। सर्वतो, ५ प्रती तु 'शंप्य- १. सप्राम। २ सिद्धान्तमार्गम्। ३.वा. ४. निरालस्या । घु" पाठी वतते। ६. 'घातः सन्यहास्वसन्' पाठ पादशंप्रती समुपलभ्यते ।

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सर्ग २१, पद्य ५५
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सर्ग २१, पद्य ५६

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वर्ग २१, प६६

चक्रम् चक्रम् १२ वि ग्री म दि श Availaadlaval मथकमनाम Marutad 2 15 NaduIYAN ho नि स्त सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्यम् ICHARSA स्वा स RAMA र Dharact R त 6 एट NEHREEN व NEETARIA श्रि เป็น Ve त्या नं सर्ग २१ पद्य १०४ सर्ग २१, पद्य ११२ प्रथमम्परिशिष्टम सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्यस्य पद्यानामकाराद्यनुक्रमः सगं पद्याक मगं पद्या श प्रत्याहित दृप्तविपक्षतः १३ ६२ मत्युग्रपापा निपतन्ति ३ असस्पृशौ तस्य प्रकामादन्तरिक्षेपि ८६ २२ १० १७ अत्र चाद्य सुकृत० पत्रान्तरे तरसुकृते. अमान्तरे हर्पवशाद् अकुङ्कुमालेपनमेव ६७ १२ ७५ १६ २१ २४ अपचपततया १५ २४ ४४ २० २६ २३ ७१ १३ २३ ६६ १ २० १३ ११० १३ ७४ प्रय तय नपोऽनेक प्रय दिवि लसद् रक्षो प्रय दूते पुर प्राप्ते पयवा लोकप्रधितो मय सुत्यवपुः प्रयानुयायियन पयायुपो नीरनिषे० प्रपालुलोके नपतिः प्रयावनय क्षितिराल प्रयास्प तत्रापि मुद्दे प्रयोदभवद् मन्युनर० १५ २३ ८० १६ १३ ८२ अगजयन्नपि गम्भीरः अग्रे प्रनत रमणी- अङ्ग तद्भवमलादयो- अङ्गमेव भवतोऽत्र अङ्गरक्षशतदूत. अद्भावनाम्नोन्नाति- अचिन्तयचंप कथ अञ्जनं नेत्रयो अजितकनयना- प्रतिकशमकदि० पतिकुपितमना भतिदक्षतया पुनरेनं मतिवाल इव त्वमपि पतिरुषिततयालं प्रतिविस्तृतनोतवान् मतीन्द्रिपान पत्पटापि तमामो प्रत्यदभुताः प्रापहन प्रत्यनुताप सनुमा पत्पभुतोऽया: पत्न.तोaigo मापल्मोनरना. ५ ६८ ३ १३ ६७ । १६ २० अदभुतः प्रोल्लराव प्रदमुते रामहले. १२ मय ज.म सदन २ १२ ६६ २० १२ प्रपतु समनदा. अष्टधातार प्रदरिदातापदिय प्रपत्ता या पिकार प्रन्याय: ए. मामोतार ६ ११ ५ २३ २ सनत्कुमार चक्रिचरितमहाकाव्ये सर्ग पद्याङ्क सर्ग पद्याइ १ ११ ७ ११ ५४ १६ ७६ १८ १३ ७६ ३ ५३ ७४ २१ २१ ७७ ७ १०५ १६ २७ १ २० ६ ४६ १० ४३ २५ ३४ १६ २१ ८२ १७ ८६ & ४३ ur ७५ . २४ ५७ १२ ५५ & १ ५३ १२ ७७ १६ ४८ १६ १७ १३ १०० २० २३ ५ ४१ ४३ ४ ७२ मपाठोत्पुन रन्योपि अपि दीनः समुच्येत अपि प्रमीयेत अपि प्रवृत्ति कुरुते अपि सकलघराया० अपि सो त चोत्कृष्टा० अपूर्वपंकेरुहकान्ति० अपूर्ववीर्याश्रयणस्य अपूर्वसौरभ्यभरा० अप्यन्यासां यदि स्यात् अप्यमत्यंशिखरी अप्रेक्षाकारिणो नूनं प्रवान्धवेप्यप्रतिमान अभवद्विकल: अभ्यथित्रं जवाद् यान्ती अभ्यथिता एवमशेप० अभ्यषिच्यत सशेष० अभ्यासमाज सहकार० अमङ्गले मूर्तिमतीव श्रमङ्गल कुत्स्यमन० अमतद्युतिवत्सुकल० अमृतमधुरगिर० अमोघमस्त्र सुहृदो० अमोचयच्छाश्वत अयं भवेत् कि रति. अरणिस्थशिखीव अरातिशोरिणतजल. परीणा सकला सेना अरुचित्वमुद्दष्वपि प्रोपनय॑त्व० अजिंने कहि मॉपि विश्वावतां अचरञ्जिततल प्रलञ्चकारास्य पदं अनन्यतुल्यानि तपांसि अनन्यसाधारण यौवनाया अनन्यसाधारणवृत्तस० अनहविवेकित्वात् अनात्मज्ञे निस्त्रपे अनात्मरक्षः समभूत अनाप्तकालुष्यमहो अनाप्ततत्कथोप्येष मनारतं नीचगतिक अनेकधव विकल्प अनोष्ठवमा यदियं अन्तःपुरेणाप्यनु- अन्तःपुरं पञ्चशती० अन्तःप्रवृदप्ररगया० अन्तः सरोषावपि अन्तर्दु खौघसंघट्टात अन्तर्वहिश्चष दधत् अन्तमंनोजन्म० अन्तविद्याधर श्रेणि अन्तश्चरद् भग० अन्तस्थमूकालिक अ(मा)न्दोलिता यद्भवतव अन्धकासुरमिवा० अन्यत्वमिव यच्छन्ति अन्यथाख्यानतः अन्यदागमदयो अन्यानपि निरासे अन्यान्मीमास्तया अन्यायमागे यदि अन्यास्तु निधीत. अन्येपि सर्वपि अन्येपा तु महारौद्र० अन्यप्वपि स्वर्ग पन्वेषयत एवास्य अपरेपि दधुदि २२ ५० १७ ११ ७१ ३२ ५ २० १६ m १७ २७ ३ ३ १५ २५ है २६ १७ ७९ १३ ११७ १० १२ २२ ७ ८६ D~ २२ ५७ १३ १६ १७ ३२ १२ २६ १६ ३७ १ १५ ४ २६ ३६ ६ ६ २० ५४ २३ ६ ४१ प्र . १० ५ ६५ ६५ पलम्भयत् काकवको० प्रथमम्परिशिष्टम् (पद्यानुक्रमः) ३ सगं पद्याइ सग पयार १० २ २० 28 ३९ यस्पच चाज्ञा शिरसा मनस्यापि महापारा. भन्ने प्वपि रणोत्साहात अहो दुराचारमय ग्रहो वालिशता पायो ग्रहो मुस पार्षण अहो स्नेहा पद ur २२ १०३ १३ २० १३ ६२ १० १० ৩; ३ २० २३ ३७ ३ १० ११ ६४ ४४ है ४६ २४ २३ १२ ४४ २४ १ १ . ५ ३ २१ १०६ १३ २१ १६ अलिकुलकलरव० अलिनिनदकलानि भल्पराविभवस्य भवगततदभिप्रायो प्रवदच्च कुमारमय भवरोधोपि सतान्त० अविरतजलकेलि० प्रवीक्षमाणः क्षितिपः प्रश्वरत्नमपि तस्य अश्वादयो ह्यल्पधिया अश्वीयमुव्यगति० मश्व जलधिकल्लोलं अष्टमासमुखतीव० अष्टवासरभवो अष्टादाप्राणि भष्टाह निकास्तन असहायमनायासा० असाम्प्रत चेह प्रसिच्यन्तेवाइल असो वैरिशरण्या मसत्यसंवत्सर० प्रस्तसेचरपति भस्तगते चाप मस्तु पुष्परचना मस्त्यस्मदीया प्रिया अस्माकमुच्यत अस्माभिः साम्प्रत भस्माभिस्तु स सम्भय मत्य सेन वपुषो मत्यरूपफमसा. भस्मा अपूर्व पर० मस्या निम्त्पत पास्या हिवारपमहा० मस्या उमा पुग्दसित समानत मित २४ २१ २७ १४ ४२ २१ १० ८२ ५ ७६ २४ १०० २२ ~ माफण्यं करणंपीयूष प्राकण्यं फर्णामृत. ग्राण्येतद् गुहाका प्राकस्मिफमिवोल्पात प्राकृप्य भर्तुः समुपाददे माक्रोश नूच्चक० पाक्षिपत्सपदि पाखवोप्यस्मदोकः प्राग्नेयमय नपति० माजन्म घस्यादप० पाजन्म पद्रिय माजीवमुज्जीवित प्रातपरमपि तस्य भाददे नम्रता साधु मादधेय गाःशेषा मादाय गुन पुनुदा० प्रादितस्तु सकल पाविदेश पन्नाह. मादिश्यन्त भटे. पातपि तपिपुणे पाधिपत्यनिति मानाप्रपाटण पानापन पानिस्तान प्राप पान्तरामयःो पार.131 १४ ४१ २१ ५१ २३ १४ २५ २ २३ ७६ २० ३ ६ १६ २१ २६ २३ । घर ६२ 222 ६५ २४ स सनत्कुमारच क्रिचरितमहाकाव्ये सगं पद्याङ्क सगं पद्याक १८ १० ११ ७७ २३ १०६ १७ २६ २४ ४५ १६ १०२ १३ १७ ४ ५८ ३४ २० १३ १२६ २० १३ ६७ 8 ७२ १५ ५२ १३ ११६ २४ १०१ १४ २२ १६ ३१ १८ १४ मापानेषु च सैन्येषु आभवोपान्तसुकृत माभिमुख्यमभिजत् आभ्या नवं कुर्म प्रामों षधिरस्य भामुच्य चा हृदि प्रामोदमप्ययं जघ्रो माययुः कौतुकात्तत्र आयोधनेषु लुलिता० पारसन्ति स्म विरसं पारुरोहामलस्थूल आरुह्य मङ्गलसित० पार्तनादममुचत् भाारिण चेतांसि आर्य त्वन्मित्रवृत्तान्त: पालोकिष्ट कुमारस्तो आवत्तरावर्तनानि श्रावन रजसा० प्राशा न स्यात कथ पाश्चर्यः समदन० आश्वासितालकृति० पाश्वास्य तामेव प्रासन्नतरगस्यास्य प्रासा मुखोद घाटन० प्रासीद् रोषणश्चि० आस्थितस्य तु प्रास्फालितधनुदि० प्रास्यानि त्वद्वयस्याना पाहवेवसरः आहिता पत्रवल्ली ग्राहयत्प्रमुदितः १२ १६ १६ ६४ ar इतश्च तस्याम्बर० इतश्च सुस्निग्ध इति तदुदितं श्रुत्वा इति तय॑मारामनिलो० इति तस्य निशम्य इति निरुपमनिवि० इति प्रतीतेपि सुखे इति प्रियालापिनि इति यक्षवरस्य इति वादिषु कौतिके इति विक्रमसारवचः इति विधिविहिता० इति विविधविलास इति शरदि समन्ताद इति श्रुते दूतमुखेन इति सदसि समस्ते इति सुकृततरूत्थं इत्थमध्य सहतो इत्यमुद गलमुदी इत्थमूर्जस्थि तद् वाक्यं इत्थं पश्यन्ननेक इत्थमन्तरवमृश्य इत्थं महापचयंकृदन इत्यं मुहुर्मानवनाथ० इत्यं यक्षेण कृप्त० इत्यं यक्षो बहुधा इत्थं यावदनेक० इत्थं वचः श्रृण्वत इत्थं विकल्पकल्लोला. इत्थं विलापेन इत्थं पारीरस्थिति इत्यं सकोरणंयुद्ध इत्यं सनम्मंप्रणय इत्य सप्तसुलपयो इस्य सोधमतुः ६६ २४ ४१ . ११ १२ २० १४ २१ १८ ५० १८ ७२ ११ ५० २२ 85 ८ سد ३१ ३३ १२ ७६ لعی २४ १६ ११ २४ २३ २१ १२ २१ १५ ४२ ४४ १२ २५ २ ५७ १० २७ २० १०६ ४ इ २४ ५२ इक्षत्करो हंसरवश्च इत.परिभवामान्या १६ ७९ १६ २६ प्रथमम्परिशिष्टम् (पद्यानुनमः) ५ सगं पद्याङ्क सग पयाज .२४ ४० १२ २३ १०८ ३ २ ६२ है ४ २५ 5 ५ २५ ३ ह ६२ ११ २२ ३ ५ २६ इत्यनल्पकल० इत्यशेषभवभाव्य० इत्यादि भूपो विलपन् इत्यादि मिथ्यात्वपदं इत्यादि सदयानपरो इत्यादि सप्रेम समग्र० इत्याद्यनल्पकुविकल्प इत्याधनेकविध० इत्याधुदन प्रलप० इत्याधाय महासन्धा इत्युक्तश्चन्द्रसेनेन इत्युक्तो बहुधा इत्युच्चनवनव० इद वदस्यन्तमहो इद ध्रुवं मन्मथ० इन्द्रदिशोपि मुखे इन्द्रियोषसुख० इमा विना तु क्षण इय न कान्ति. क्वचि० इपु सतीवाऽवकापि १३ १२८ १८ ३६ १० १८ २० ५. १ २० ४ ६१ १४ १६ १३ १२४ उत्सालचेलाञ्चल उत्तालतालं च उत्तेजयत्यश्वकद० उत्पस्तनश्यद् धन० उत्याय चैनां निज० उत्थितवत्यय तर उत्पतामि दिव कि उत्पन्नमानस्य पुरः उत्पाटपामास उत्सर्गतः केप्यपवाद० उत्साहौत्सुक्ययो. उत्सृष्टरागोपि उद्घोषणा प्रवते उद्घोषयग्निजपुरे उद्दण्डकोदण्डकरा: उद्यानमुद्वान्तसमस्त. उद्योगं तु तदन्येपे उन्नत यमनुपास्य उन्नतेन घननील. उम्मादरक्षोपि उन्मादराजस्वरित उन्मीलदक्ष वदन उन्मूलयन्ति सम्झाया. उपस्पिताat च उपेक्षीया सुरतो. उपापन प्रेपितमाम उमा हिमारिष उवाच ना परतोस १७ ६७ १० २६ २५ ६ १५ २२ e २२ ८२ १४ १७ २२ १३ २० ६७ ३ २ 4. ૨ २२ ईपदुम्मिपितरोध ईषद्गलस्पीन० १० १९ ६ ३ उ ५ १० २९ २ ॥ उक्तो मुहूर्तोप्यति० उपपोरमहदादि. उच्च पवा:कि ० २ 8 ह उचान वाजिवदि. ८१ । ६ उच्च वसितानि मनाम् उमितामोका उतादृष्टेन पुष्टेन उस्कोरूपामिय सपन चमरोगप जपतुः गुरगतो कोच तान्यामिह जापनमा 3 REERो मनमो मदान 2. २२ १६ ११ or सनत्कुमारचमिचरितमहाकाव्ये सगं पद्याक सर्ग पद्याक ऊर्ववेल्लितभुजा ऊनियष्टिजिन० ऊवं प्राकृतनील० २३ १५ ५ ६० ११ १६ एषा बकुलमत्येव एषा विद्या सहस्र० एषु केनचिदलधि एहये होत्यवदद् भूयो १२ २६ १८६६ २४ ५ १२ ३ ए २४ २५ ऐ w १२ ११ ऐरावतस्यापि ऐश्वर्यलाभेपि वमन्ति ३ ८६ २२ ७ १६ २ १३ १३० १९ ६६ प्रो प्रोजस्वित्वाच्छिताग्रा० २० औ ७ २ ओष्ठोप्यभाच्छोणमणि. ८ १६ क १८ ३३ १८ ७७ १३ १२६ १६ ४१ १३ ५८ २० १६ ३ ७ ७७ २ *~* १० ६ एक एव स परं एकतः कर्दमे मग्नः एकमप्यपरशैल० एकस्यापि सधाम० एकाकिनापि हरिणेव एकाक्यपि स सहयत एकान्ततेजस्वितयो० एतत्कृतास्माकमियं एतच्च साधु प्रति० एतच्छु तो नम्नमुखी एतत्प्रतापपरिभूत० एतया त च गृह गीत एता स्ततू निवस० एना रहस्यभ्यधित एलालताकेलिगहो० एव पर्यनुयुजाने एवमग्रजनिभापित एवमन्तःसमाधाना० एवमप्यजही न एवमस्य निघयो एवमादिवचनामृत एवमुन्मुदि पुरे एव महोक्ष शरदीव एवं वदत एवास्या० एव वितकंकल्लोल एवं विनिश्चित्य च at एवम्याघटा० एप सामाप्रतिम० एप नाग इयमेव एयापिकि पुनि १३ १२१ २४ ३३ २४ ३० १४ १ . १२ २१ २३ ७३ ११ ३० १३ १२० २३ ४७ २३ २२ १२ ४६ १३ १० कङ्कटेषु मणिप्रांशु कटाक्षलक्षः सुर० कट्वम्लरूक्ष तरी कण्टका इव खला कण्ठकाबाघपटुः कण्डूज्वरौ कासगला. कतिपयपदमात्र० कपश्चिमत्तमहिपा कपान्तरालेपि कदाचिदस्य निदशो. कदाचिदस्याय कदाचिदुद्यान गतः कदाचिदुन्मत्तगजेन्द्र० कदापि तत्पीनकुचा० कनककलशचारु० फन्दपंकोदण्ड० फायकावरकुमार कन्यकास्तत्प्रिय० फायापिता ४ १७ १ २३ २७ ५२ 2 ५८ ४१ १७ १५ १६ २४ १७ कमलवनदवानल प्रथमम्परिशिष्टम् (पद्यानुक्रमः) ७ सग पद्याङ्क सग पद्याङ्क ६ ७४ ७० ५ ૧૩ १६ १ ५ २७ १३ ४४ w २२ a졌 ६६ २४ १९५२ २४ & w ३ करदीकृतनिःशेप० १६ १५ करपल्लवसस्थाभ्यां ११ कराब्जयो। कौतुक० १७ ४५ करालपातालतलं २८ कम्पादकदली. २३ १४ कर्णामृतस्यन्दि० कपूरफक्कोललवग० ४६ कपूरपारीधन० २ ८३ कपूरपारीपरिणत १६ २३ कर्मणा सममशुष्य. २४ २६ कलरणमणिकाञ्ची० १४ ७ कलालयो यो बत ७ ३५ कलिजर नाम ५ ५६ कल्पद कम्पप्रचला० २१ कल्पद्रु मोप्यस्य तदा कस्तूरिकास्थासकरो. ६४ कस्य न श्रूयमाणोपि १२ ३२ काकाद्म व पञ्च का फामस्य प्रसूः १६ ४२ काञ्चनालंकृति० 8 ४८ काञ्च्या रणत् किंफिरिणकाः १७ फानकानि तनुप्राणि २० ७६ काननस्यसुरकामिनी० कान्तया फान्तयोपेतं ११ कान्तानुसगोभिनवं २ ५ कान्तापक्माजवान्ता है २२ कान्तावियोगादथ २ ५१ कान्ता: सुरत्तानपि १४ कान्तिच्छटाच्छादित १४ कान्ते: कलापेन २८ कापि सत्यरमपास्य २३ महा मायंते विश्वजनेन ३० कामाकुरोद्भूतलतेय १७ २९ कामादाजग्मनाना ६ ७२ कामान्यप गुरूपदेश० २४ कामास्याणां समेपा फामोपि दुरितरः कायकान्तिमवरोध कारण्डवानामपि कार्य यदामुहिमक० कालस्यास्त्री लोला फाव्यसद्गुणनियत० काश्चिरसमुन्मोलवनप. काश्मीरजालिप्तषपू० किञ्चारमन. प्रशसाया किन्तु तेजोनिधित्वेन किन्तु सिंहत इवो. किन्स्वङ्गतारुण्य. किन्नरीकलगीतानि कि नीतो वायुनाऽमो किमपि चरितमित्थं किमिन्द्रजालमे० किमु तव व्ययते वद कि कामेन प्रयुक्ता. कि गर्भवासस्थमुता कि चित्र यदसावजी fक जपेन तपसापि किवीशोन दिविषधा किं निपतन्ति पनौघn किं पुरः किमु गजाश्व० कि प्रोगयेन्मामपि कि मवादपि गदः कि भूयसा वत्स फि वटचिहानघर: कि परिपतस्तस्य कि वयंता मादक f. या विकल्परसिता. कि वा विद्यापरणो किहितत्वमिति मे fঞানার মান ६७ २१ ३५ २ २४ १०२ ११ ३८ १३ २ ९ २४ १४ 42 २३ २० २६ १४ १३ ७३ २३ १०२ २४ ७४ १० da २६ द २३ २३ १० ३ ४६ सनत्कुमारचमिचरितमहाकाव्ये सगं पद्याङ्क सगं पद्याङ्क २० २० . M १ ३६ ७ ४४ १४ ४६ ७ १६ २३ १५ ११ २२ ७५ १० १३ ५ १४ २३ २३ ९१ १७ ५० १३ ६२ २२ २९ 8 ४७ २२ ६४ २ २४ किर्मीरितं व्योमशशि० कोर्णानि कर्णामृत कोत्तिमानशनिवेग० कुक्कुटवासितमन्त्र० कुडकुमाविरल राग. कुटजविटपिपुष्पः कुत इदं सलिलं कुतोऽन फा: किमिति कुत्स्यविनतनु कुन्दहाससुभगा: फुवेरलक्षम्योक इवेति कुमारोवततारास्मात् कुमारो हि तदा दूर० कुमारः सुकुमारत्वात कुम्भकर्ण इवाम्यणं. कुम्भोन्द्रकुम्भस्थल कुरुवशोद्भवा भूपाः कुर्वन्कृतार्थानखिला० कुलक्रमादेव कुलाभिमानोपि न कुलिशकठिन हस्ते कुविन्दपार्शन कूजितपुजितपक्षि० फूटपातिहरिणस्य कूर्चे कचाकपंण कृकवाक इवात्यन्तं कृतेऽवदाने सनोहा कृत कुकर्मेह विपाक- छत्यमन्यदपि १२ ५८ १२ ३३ १२ ६१ २१ २० ६६ २२ ७६ १७ २२ १३ २३ ६० १२ १६ १७ ६१ २४ ६६ १० १६ ७ or ७ ११ केचिदाहतमूर्धानो केचिद्विमानमारूडो के राजहंसोज्ज्वल केशेपु बन्धस्तरल. कोकनदच्छविमभ्र० को नादो वायसास्या० कोपविवृद्धिमनु० कोमलेतिसुरभी कोमल रोमसु कोलाहलेन सैन्यानो कोष्णपीनकुचया० कौटिल्यतः कामधनुः कौतुकलम्पटसिद्ध फौतुकेन वत ता कौतुकं तन्महद् कौतूहलं वालकवन् कौमारे हबद्ध लक्ष कौशिकद्र म संलीन कौस्तुम्भराग समु. कौसुम्भवस्त्रास्विव क्रमेण च क्षीरविपाण्डु फ्रमेण चाभ्युन्नत क्व तादृशो सौगुण. क्व ता: परिषस्तकुरग० वव पितरशनिवेगो क्व प्राप्स्यसे मन्द० क्व फेरवारवाः क्व मूत्तिरीदक क्य च पव सर्वचारनिवृत्त क्वापि ज्ञान न शोल पवाय व चाह व च तीयता प्रति०. सोरायिवांचिन्नुत० क्षोरामोषाविव झुरिमोलिना पद. ५९ ६४ २ २६ ur १६ २ ७ . ५ २७ १३ ८६ २३ १०४ ३ १६ ४६ २० १०४ १६ १६ ३ १७ . २४ कपालु. स निसर्गेण २ १६ ५१ १२ १८ २४ स्था प्रतादरम्पाय गुत्योन वरपादपोप० अपएसविलियंत्र कफिना न हि विषय जीवन न काव्य ३२ १० २२ १४ ५७ १२ 4 २२ प्रथमम्परिशिष्टम् (पद्यानक्रम) है सगं पद्या सगं पद्या सुरुप्रगौरवक्त्राणि २० ८८ १० ૪૨ स्व १५ १. २१ २७ ६४ १३ २ २३ ३ ७६ खगाः करिकरकेषु खङ्गानि सखाटकार खचरादिजनोपि खचरेन्द्रवरोपि ख वरेन्द्रानुगः सोऽप स्वद्योतद्योतमान खरपवनखरांशू खेटकाकरपुरो गुजामगेन्द्रौद्रारिम गुरवो निचिक्षिपु० गुरावभक्तिनं च गुरूनिजास्तान् गुरूपदिष्टः पतिरेव गुरोनिवेद्य स्वमनो. गव्रद्विकादिष्तन० गृध्रादितो वाधन० गृध्र पलाशरिव गेह च देहं च सम ग्रामाराभिरामा० ग्रीष्ममुक्तसलिला. ग्रीष्मे पल्लववारिरिण ग्रीष्मे शफोत्पादित ५ १५ २३ २० ५८ ११ १४ १० ७७ २३ ४९ ५५ ५ ५ ५ ४५ ६ ग 8 ५४ २२ ૨૪ ૨૪ १६ २२ ३१ २३ ४६ ८ २२ घ १२ ४५ १५ ५७ २० १५ ३२ ५ ५८ ५ ६२ १४ ३८ २१ or २० १४ ५२ गगनमपि निनाद गङ्गया वहुवुनी० गच्छतः स्वपुटभू० गजेन्द्रहस्तविव गजेन्द्रा अपि न स्नान गरिणते विदोषगुण. गतीश्चतस्रोपि गतेपि चास्त तिमिर० गते विलक्षस्वमिति गत्यन्तरारक्तमवेक्ष्य गत्वा गृहोद्यानमशोक. गन्धलधन० गमनं यदि वा वाञ्छति गवंपवंतगतो पर्वोत्साहमहानाद. गवाक्षाः सूक्ष्मवासासि गाढघातशत. गाढालेपस्पहा स्त्रीण गारुत्मताच्छामल. गार्हस्थ्यससाधक. गीत शंसन्ति की गोतिमजलविमिष गीत: सपानः कुसुमो. २० २२ ५६ १९ २३ २३ ११ २० ७२ घनघुसणरसौषः घातुका मलिनास्तीक्ष्णाः पातो मुनेस्तावदिहक घोरे घनव्यालकुले च चकम्पे काश्यपी चकोरदयितानने चक्रमच्चतुरपीर० चकमक्रमनिवतिः चक्रवतिनि समीप चवालयतिपयंया चक्रिरणा क्व नु समागमा चक्रिणा तु वटवीज० घरेएनयना. पमा शिरोरत्नमासि पाःयावृष्टिमपि पचाल जलमन्नेष्टु पपाल विता. परियाप्तस्वपनाः २३ २३ २३ २४ २२ २८ १. २३ १ १२ १२ ૨ १२ १० सनत्कुमारचफिचरितमहाकाव्ये सगं पद्याक सगं पद्यात १३ १० १६ ४४ ५६ १५ ४२ जगन्तीव सरांसोह जगुर्विपञ्चीमधुर० जग्राह कम्बोर्मधुर० १७ जजाप मन्नवायव्य २२ ४५ २१ ६७ २४ २६ १३ ११.४४ १५ ४१ २० २० ५५ २४ ६२ २३ १२ ३४ or ३८ ४ ३६ २१ चरणकोपि समुच्छलितो चवेगो भानुवेग० चतुर्दशस्वप्न चन्दनेनाव. चन्द्रकान्त इव चरणतलानि चलच्चामरयुग्मान्त० चलन्त जलदाभावे चारुचामरयुगो० चिक्रीड च क्रीडित. चित्तेऽक्षम्यत्तेन चित्रवेगोप्यथागच्छत चित्रापितामप्यवलोक्य चित्र चित्रं वितन्वन् चिन्तयति स्म न तत्त्व चिराय सम्प्राप्य च चुकूजुस्तत्र च चुकोप सा बान्धव चूडामणिः किं चरणे चूर्णनयुद्धधा किमपि चेदुर्गतेस्तुल्य मह चैतन्यहारिस्मर० ३५ ६ २१ २ ६० प्र० १० १३ १०८ १६ २८ ११ २८ १५ ६० ६ १५ ४६ ६ १५ ५९ ४ ८८ १२ ३८ जज्ञरस्य तत जनकतुल्यगिर जनौघाव्यक्तनादेन जन्मकोटिनि'चतानि जन्मान्तरीय कम० जन्मान्तरीयानुशयानु० जयाशा चापल जरद्गवी कामदुधा जरा सशोका यरुजा जलपानविधेः स जलेन सम्पृक्तमपीह जात्यजाम्बूनदा० जितजगत उदञ्चेत् जितसुरवनिताभि जितादित्यहरिवंगान् जितानिरुद्वोपि जितनमद्भिन पति. जिनेन्द्र कल्याणक० जिनेश्वरस्येव जिह्वायुग्मररुणसुत. जम्भावशोल्लासित. जनविम्बमहिमो० जनवेश्मसु नैवेद्यं ज्योत्स्नया निशीये ज्योत्स्नागुणव्यूत. ज्योत्स्नापिधाना इव ज्वरस्तया रोहति ज्वलनतुलिततीव० ज्ञानसत्वनिधि ज्ञात्वाइजप्यं शेष शानांकुशेनात्मययो १३ १०५ ६ ३० 8 ७७ ६ १७ प्र० छ छन्दसा प्रणववद् २४ ६३ २४ १.३ ૨૨ ५५ १ छन्दो लक्षणयोन छन्दोविशुद्वौ न न छायाम्यश्चातपत्रस्त छिन्वृक्ष इवाचल मूघ्नों १२ ४३ १२ ४१ ६२ ज १६ २ १८ २. ३ १६ ३० १९८३ जगत्ययादाहृत० जगरिनतयवन्धत्वाद् जात्यसो नास्ति अगत्सुपःप्रप यः जासमोफर्तु। प्र. ३ १२ प्रथमम्परिशिष्टम् (पचानक्रमः) सगं पद्यात सगं पद्याच २० ४७ عن २४ झांगत्यथोत्याय ३ २७ ६ ३ त ३ ५ १२ ६१ २३ ३२ ७२ ३ १२ ७४ १८ ६८ २ २० १८ १६ १९ ९७ १६ ५५ १८ १५ १६ ४० ११ २० १६ 8 ततोपि दशितासन्न ततोऽमरणि ततो महाराजकुमार० ततो वयं चेन्न ततो विमानाधिपति ततो हिमानीहत० तरकार्यमार्याचरितेन तत्कोत्तरतिववाया तत्कुण्डले जैत्र० तत्कुलीन इव मृत्य तस्कृपाण उदित. तत्कृपालुवर तत्क्षणग्यजितान तत्तत्र देवेन तत्तपो महिमतो तत्त्वमेवमवगत्य तत्त्वामनु ज्योतिषिकेण सत्पाणिपीडाविधिक तत्पादनलिनद्वन्द तत्पिता जननतो तत्पुण्यसर्वस्व० तत्पुत्रपुत्रीयित 'तत्पुष्पं तद्वषोऽवना तत्प्रत्यहं तेन तत्प्रविश्याम मित्रस्य सत्प्रसद्य वितर तत्प्रेमतो नूनमवाल० तत्प्रेमाचरित पश्यन् तत्र क्षणेऽभूत् क्षितिपः न चक्रनुत तन पावसरमाप सनचोमयतः तर तस्य विद्यता सत्र दिण्टिभ्यनुराप. मन विध्यं महन तच्चतुर्दशतया० तटरुहतरुपय. तटाश्रितासख्य० तडितेव प्रवलया ततः कृतान्ताकृतितो ततः पटिष्ठान्यपि तता परिभ्र मुरिवा० ततः प्रतिघचण्डेन ततः प्रतोहारवरेण ततः प्रवुदः स्वमपश्य० तता प्रमत्येव ततः सकीनुकाऽन्यापि ततः स चिन्तयामास ततः स ताभिश्चतु. ततः स तेनैव ततः स भूपः ततः समालम्व्य ततः समाहूय कुमार ततः समुदत्य ततः सहासे सफले तता सुनन्दानयनांग. ततः सुरः सितगणश्च तत एव दिनाद्वन० ततश्च किं प्राप्तमहा० ततस्तत्रानुपीः ततस्तदादेशवोन ततस्तदुच्छेदविषिष ततस्पिदण्डी दृढपाए. ततावलीह तन्नाप पतोऽत्यजधाडविधान ततोऽधुना सकपण. २३ १०७ २३ ४५ २४ ६२ १६ १४ ३ २९ २४ ८६ २३ ८६ १२ १६ २५ १६ 8 २३ २४ ६ २ ६३ ४ १९ ६. २ ५२ ६ ४२ १८ ५९ ५६ २० २४ १९ १२ - ३ १४ २२ १६ १०१ २ ७१ 4 ४ २२ १२ २९ । ४ २३ १४ २६ ४ १२ सनत्कुमार मिचरितमहाकाव्ये सगं पद्याङ्क सगं पद्याडू १ ८५ m २ २२ ४२ २ ४६ २३ २३ १३ २१ १४ ६२ तत्र प्रोटित मुर्बोधः सत्र द्विकस्फोटित तत्र भूभति महोदये तम मौक्तिकशुभै० तत्र हम न हिमोघ० तत्राट्टहासकुसुम० तप्राध्वस्ते केवल तत्रान्तरैर्दु.खशत० तयापि खिन्नघोमित्र तथापि तीवादरतो. तत्रापि युष्माभिरनु ७२ तथाप्यनल्पविहित तथाप्यपश्यन्नवरोष० तथाप्यवज्ञाय विधीयते तथाऽभवत् तत्सुरता० तथाभिरामेपि न तथा विनि:स्पन्दतनु० तथा समारभ्यत तथा स लिङ्गीकृत० तथैव तस्याटत एवं तदङ्गनाभ्योष्टसहस्र० तदन्तिकालिरातक० ४ ७७ १३ ४० ७ ९५ w ६ ५ २७ ११ १० ११ १८ १७ १ २२ ३२ १९ ४३ तत्रापि वर्ष पृथु तदपि पुनस्त . ३ ४५ ३ ४ १५ १० १३ ११२ १५ २६ १६ ७५ २ १६ ७ ५ ४७ १२ ६६ १६ २० ५ ३६ २ १ १४ ४ 5 १९ ६३ ३४ २३ २५ २२ ६२ ६० १३ ६ तत्रापि वैराग्यविशेष तत्राप्यसो भूपति० तत्राप्येष निकुञ्जपु तयेतरस्यापि जनस्य तन्दुरुक्शाल. तत्रोच्चरासनासीन. तत्रोच्चवन्दिन पेठु० तत्रोत्यासितयक्षेऽपि तत्रोद्भटेन पतिमि० तत्समागममुदो तत्समीपगनिज० तरसम्प्रत्याकुलरप्य० तत्सम्प्रत्याप्रये: तत्सर्वथानायतनं तत्वंया शास्त्रजना० तत्सर्वपा स मे सूनुः सत्सर्वथा स्वस्थमनाः उत्सैनिकाभियुभिः तरसोदरोऽभुच्च स उपापि घोगमायया समापि सत्प्रेक्षण तथापि न यत्तिष्ट तपापिगोप २६ तदप्यपास्याशु तदयमनात्मविद तदवश्यमतृष्णमना तदवश्यं विधास्यामि तदस्तु ते वाञ्छितकार्य० तदस्मदुदितं किंचिद् तदस्य लाभः परिग० तदागमेत्यर्थमहो० सदागोपि ध्रुवं तदा दिशाश्वयनरो तदाभियोग्य गुरु० तदासमागमे तदास्यपद्म तदित्यवेत्यानव तदेव देवान्मम तद्गुणश्रुति सुघो. तद्गृहयाः केपि ये तद्दशा वनदेवीना. तदृष्टो मदननिदाय. तबले चलति म्योम्नि तवान्धवा मस्मदनु० तदयौवराज्य विनि. वत्स निस्पयन: १२ ५ ४ २६ ५ १६ २३ ४५ १२ २१ १०६ ६४ प्र. २० २२ ५ १७ w ६२ ૨ प्रपमम्परिशिष्टम् (पद्यानुक्रम.) सनं पद्याक सर्ग पद्या ६७ ३ २१ १६ २१ ७८ २४ ३० २१ ११२ १० १४ २६ २४ ७ ३० ११ २४ ६० २१ २० २8 ३३ ११ १७ ६० २ १७ २४ ११ ६० प्र १२ २ २० २७ ५ 8. २४ २३ २२ ४६ २१ २१ ८२ २ - २० तद्वक्षसि न्यघाच्छक्ति तद्वध्या यूयमेवादी तदवधेशनिवेगोपि तदवयस्येन समया. तद्विषाय करुणा 'तदविशामि विशाल तद्विहाय भुवि तनुत्रन्धत्स्व युद्धाय तन्त्र पु देवायतने तन्न केनचिविहान्त. तन्न मित्रमय किन्तु तन्नूनमोपाधिकमस्य तन्नेत्रपतित सैन्यं तन्मदीयतनुरूप. तन्महाज्वरहरो० सन्मार्गगामी प्रशमादि० तन्माहात्म्यान्महीयासः तन्मूर्धनि प्राच्यशिलो. तप.श्रिया क्षामवपु० तप्तमन्यजनने तम पटोप्यशुशर० तमभि श्रोभानुवेगा. तव भत्यपद दधति सस्पो च स तपाबस्थ. तस्थौ समागत्य तस्मिन्निव प्रोज्ज्वल. तस्मै यतोऽह प्रति. तस्य किसुरपदे सस्य क्रमेणाप तस्य ध्र. सन्तत. तस्य पयुपित तस्य प्रभोः पादसरोज तस्य प्रियासोत तस्य संन्यनिवहस्य तस्याः प्रवेशे स्पिर १७ तस्या अवस्था समय तस्याङ्ग वहिल्वणो तस्याजिक्षतविग्रहस्य तस्याद ताचार० तस्यायुतदव्यायत० तस्यानुरक्तस्य च तस्यांसकुम्भी तस्यापसव्यः स्कन्धोपि तस्यापि मेरोरिव तस्य वभो श्मश्रु० तस्याभयदेवमुनीन्द्र० तस्याभवन् मित्रममित्र तस्यामरणिविनम्र० तस्यव तव तस्योपः सद्गुणोपाः तस्यां महामन्मथ. ताज्यमानाप सा ताक प्रमोस्त्वादश तादृग धनुर्घरो तादशेनापि तेना. तादृशे सति भूपाले तामिरगजविहार० तामातस्तस्य तामथाशापयद् तामपि प्रविवेशासो ताम्बूलदान वसननं ताध्यपदाप्रभाश्लिष्ट वालमूर्षपतित. तालो हिन्तालवा. तावत्सारसहसादि. तावदल्पे पगि दाक्तिरेतरपिन्दिता माना ददि प्रेम atोश्रोभरता 41 गवात्तनमा १६ ६६ السلع ४६ २१ ५५ २३ २१ १४ २३ १४ ५० २२ १३ १८ ३ १२ १२ १० ३ ५६ ३० ७ १०२ १८ २१ ८५ २३ २२ ४ १६ १० २३ २ २५ २४ २७ २० प्र १३ ४७ १६ ३ १७ २ १४ सनत्कुमारचफिचरितमहाकाव्ये सगं पद्याङ्क सगं पद्यक २ ४३ २ १४ त तथा विकृतं त तथा सम्भ्रमाद् तं दृष्ट्वा भावयामास २१ ७१ १२ ४ ११ ४८ २२ ८७ त निशम्य गुरुमन्यु० ४ २० २४ २२ '२ १२ २६ २ ३ २३ २६ १८ ६७ २३ ८२ १३ ३५ ३ प्र. है ५२ २४ ५५ १७ २१ १८ ७४ २० २४ तो सत्कृती वीक्ष्य ता: कामरणोच्चाटन० तितक्षरप्येष तिमिरेपि दिश तिर्यग्गतिः पद्मदला. तोदणे सुदीर्घ सरले तीररुढघनकेतकी तीव्रोपि वह निमलिलेन तुङ्गशोगि रुटातो तुझचान्द्रकुल. तुरगखरखुराग्र० तुपारसस्पर्शपयो० तुष्टामरक्षिप्त- तुष्टेन साऽय तूर्यनादोपि योघाना ते च चारुमहिमान. तेजो मदनवन्नून तेऽणवोऽत्र परमा: ते त्वकृत्रिममहा० तेन च धावन० तेन तत्र तथा तेने तेन दष्टाघरीष्ठेन तेन समं सावज्ञ तेनाथ पावकेनापि तेनाप्येष क्षोणिभर्तुः तेनाप्येषोऽच्युतरय. तेपी निशम्याथ तेवा लब्धयुगप्रधान. तरच्यदुःखानि तैलदिग्धवपुषः तनरूपिततनो तो पुनः प्रति जजल्पतु तो विसज्य कृततुणं तो समूपतुरिति तकम्यन प्राप ६ १० १३ २५ १८ २५ १७ 8. ५ २२ २४ ४२ २० १० २३ ५६ २४ १७ १३ ८४ २१ १२ २१ २१ ६६ २१ ६० तं प्रत्यमोघास्तवार्य त मनोहरमवाप्य त महेन्द्रमपि तं लीलया व्योमचर त विधाय कृतकृत्यता तं विना देवन तं समुत्सुकमति त सार्वभौमाधनि० तं सा सुनन्दा त हस्तिमल्ल स्यक्तरम्यनिजवास० प्रपाकर स्वं चरितं पारणं त्वमस्य त्रिजगति रमणीया त्रिदण्डिनोप्येव० त्रिदशखचर. त्रिदशपतितनूज. त्रियंपास्य न तपा त्रिलोकीपुञ्जितक्रोध. लोक्यजेत्रा त्वड्मासरक्तोल्वर त्वत्स्त्रंणास्यास्य. त्वदपालीपरिवर्त. स्वदीयमन्त.पुर० स्वद्वपुष्यसमरोग० त्वन्नुति तत इमा स्वमानसे मानिनि त्वमेव तावत्परि० १३ १२२ २३ २१ १३ ५ ३० १३ ५५ २२ ७२ २ ५४ २४ २ २. . ६ २३ ८४ २३ ५२ ५ २४ ६७ स्वंकल्पशाखीव १५ ५३ २४ ४ ५ त्वा विनत्य नवरसत प्रथमम्परिशिष्टम् (पद्य नुश्म) सगं पद्याड सगं पद्याक द ६ १६ १७ २० -- २० ६२ ३ १८ १८ -- दक्षिणा: पथि सञ्चेरु, दक्षिणेष्वपि पेसु दग्धुदवो नैव स दण्डाना त्रितय दतत्रासासुदु द. दत्ता द्विपद्भ्यो दत्त्वा हस्त गले ३ १० १० ७ Yo ३ २४ ददति स घटुनागाः १ ५ ६७ १३ ३२ १५ १६ ६८ ३ ७९ ५ २२ दद ३ २१ है २५ २० १२ ११ ६७ ७३ ४६ २२ २० १. ६७ ३ ५५ दीप्रशस्त्रावलीदीप्ती दीप्रारणास्याः दोधिकासु विपिने दीव्यन्त्यथ स्वरण दुग्धाब्धिसतित. दुरितच्छेदनायव दुर्योधमेव ललित दुर्योधकर्मारिणे दुर्वाक्य ते मपित दुष्टजनस्य हि दुष्टद्विपोच्छ. खल. दुष्टाक्षमित्व दुप्पगत्तप्रतिमो दूरादय कुमारस्य दूरे त्वपश्यत् सामोद दुरोदतः पत्रहस्तः दूर समाकृष्टविपक्ष० दगवागविलासा० दृग्विपर्यासतः दृढप्रहारामपि दृढा हि घातोदतमेव दृश्यत्वमाद्वितये दृष्ट शवरसेनासु दृष्टनष्टसुभगाः दृष्टाः श्रुताश्च बहो दृष्ट। नवेन्दौवर० दृष्टापि त तादा. दृष्टियदन्त पुरिकासु इप्टे स्वयि प्रागमदय दृष्टेपि ताममात् दष्टोऽयो ललितपिलीत. इप्टा पीयूपपष्टपा दवा सम्भोगमांग ददा पा मध्यम नारदतोत्र २ ३६ २० ४ १३ ५२ ददरमहादान ददाति दुष्कर्मफलं ददी च तस्य मणि. ददोन वाचं न दन्तातिप्रस्फुरणा० दन्तद्यतिलंसज्ज्योत्स्ना० दन्ताग्रेष्वप्यावि० दन्तिदानसलिला० दन्तिनोऽन्तःसमाकृष्ट० दन्तिराट न नपति दम्गोलिपातानुकृति दात सस्तिमभि. दन्धिश्चेदसो दलस्कनकेतको दशस्ववस्यास्विति दहघमानधनसार दाक्ष्पक्षमान्याय. दानज्वालायते दानाम्बुससिक्त० दारुणे तर मध्याह ने दाउपमेवमवगम्य दिक्ष प्रसन्नासु दिन दिने चन्द्ररलेव शिवापि दीप्रतोना दिव्यपानसुधिमान. दिपाशुकोल्लोप० ३ १० १८ २२ २३ २२ १३ १२७ ८१ १० ५४ ३५ ५४ १२ ५३ २४ २१ १४ U ૨૨ २२ ७ १०४ २० १७ २२ .११ १६ सनत्कुमारचमिचरित महाकाव्ये समं पद्याङ्क सर्ग पद्यात & १५ ३ २३ ध्यायत स्म शुचि० घ्यायन्निद भूरि ध्रुव न भविताराति. २३ ५४ १ ७६ ६८ २३ ११० ध्रुव मर्यवैष ५ २० १७ ७ २२ २४ ध्रुवमशेषवनातुल. ध्वज मानीयमाने च ध्वद्धिरत्युद्भटनाद. w २० १ २१ ७४ १९ ५ १० २ देवेदानी वहन्ति देवेन कि विश्व० देशे दिशामण्डन देहरूपगलन० दत्य हेव वनमाल. देवतो यदि तथापि दोर्दण्डविक्रमरिपू० दोलायिताप्याभिमुख्य द्योतयन्ती दिशः द्राक्षालतागृहेष्वम्भः द्रापयत्यतित रा० द्राधीयासो जनरुचि. हाविशदुदवुद्ध द्वात्रिंशत्पत्रवदा० द्वारपालकपितो द्वादशार्यपरिभावुक० द्विकुण्डलालकृत० द्विजिह्वलक्षविलसत् द्वितीयेनापि तेनासो द्वितीयेपि दिने तस्य द्विपालय: कज्जलपुज० ११ १० २२ ७२ १३ ५३ १४ १८ ७ ६ wr १४ w २३ ५३ २३ ५ २१ ३२ ५ ६ . २१ १२ ३९ ७ २१ २६ १७ ५ घ न कामुकः पारिवा० न कि वदन्तीमपि न कौतुक कुवलय. नक्त दिव मान न खण्डिता कापि न चक्षमे शासन न चान्यदोषेण न तथापि वचोपि न तस्य तादम् न तानि दुःखानि न न तेन स्पट ते कोपि न तेषु सदयो घोरो न दनि विश्वासमुपौति न दन्तिनो दानविहीन न देव तव नष्टोयं नन्तुर्नीलकण्ठा न पुण्यमेवाद्भुतमस्य न ब्रह्मा वदनचतुष्टय. नमस्तले तेन न भूपसंगः प्रभवः नम त कलमगोप्याः न मनामध्यमस्तासो नमस्करिष्यन्ति च न महानवसीदति न यत्र निद्रान्ति नयावदतिघाम १२ २१ २० ४ ५ ११ २६ ११ ३ ८६ २४ ४ ५१ ८ ५४ धनुर्धन्वन्सम धनुलंतामुणाढयत्वात् धन्यः स विक्रमयशा: घण्यावावा ययोः धर्मक्रियाकोविद० धमथुतो यौवतसगमे धातृविपाटलकुम्भ घाम धाम यमुपास्य धाराम्भःसायको पिक कामुकत्व घि ससति पत्र समापिका १५ २ २२ १६ ६७ s૨ ૨૨ २२ ३ २ १२ २४ २ ६ १६ २१ १.० प्रथमम्मरिशिष्टम् (पद्यानुक्रम) मग पद्या सगं पद्या १० १७ ४ ६ १३ ३ २१ १ २६ प्र है प्र० ur ५ ८६ २४ ५ २४ १६ २३ २० ८६ १० न लभेय प्रवृत्ति न वनमित्यवसेय मिद नवप्रियाप्रेममुषा० नवानामङ्गाना न शासन शस्त्र न सयम येभ्युपयन्ति नाकलो बलिसप० नाकिनामपि नागलोकललना नागाङ्गनाभिः नाचक्रमु. शुद्ध० नातनुक्तनुर्वीरो नारमान न पर नाप किं वय मुपेक्षिता. नाप त्वत्पूर्वजाना० नाथानायायमुर्वी २२ २३ ५५ ४६ o १५ २२ ५१ १ २३ २० २१ १०१ २२ २४ ३ ५ १३ २२ ६३ १४ ११ २२ ६७ ३ नाद्यापि पूणा mr नासो विमाने न नि.शेपनिजमैन्यौप निःशेषशास्त्राय० नि.शंषसूक्ष्मादि० निशपा अपि तस्य निश्वासहायरिण निःसपत्नलोपेत. निखिलनगर नामा निगूढगुल्फ विसरत निजपस्त्य इवाखिल निजप्रभातोप० निजानीकपरिक्षेपी नित्यमन्तरूपमपं० निदेशतः श्रादवरोपि निधय इव कलाना निघानमेक महता निधाय कण्ठ निधिरपि समह नित्ये यो वृद्धिमाद नित्य नाकीस तु निपातितसुदुम्मायो निपातोत्पातवद् निविडनिजविपक्षो० निमन्त्रयामास निमित्ता-पनुलोमानि निमितावगमादन्त निमीतचक्षुश्च निम्नाद् ध्र व नामिना निम्न स्वसौन्दयं. नियुापान युद्धपासो निरापतः तिलको निरोपा दृश्य. निझामनिमप निममपत्र ननिनेपानमनः ३ १८ ३२ २० १०८ 8 २१ है २ ४२ २१ ११ ३ ६३ ४ २ ५ . ६ २० १८ -- ३२ ११ १. नाना जिनाभ्यन० नानानवनवाती० नानाप्रसूनोच्छलित नानामणिप्रोच्चर० नानामणिस्यूततल नानामगोभगि० नानारतक्रीडित नानावलासस्मित० नानाविद्याघरस्त्रीभिः नानासमरसम्पन्न नानास्यरत्ननिचितः नान्यन नाकेऽपि नापरस्य महतोऽपि नाय नमोऽस्मासु नासा तदीया नासानिविस्तांगता. नावाप्रकाडोहसिता नासो फेनापि नोवः ३१ १८ १२ ३२ २० ६ ५ २२ २१ १०५ - २ २१ १५ १ ५ १॥ ३ २३ ३ द २८ १८ सनत्कुमारचमिचरितमहाकाव्ये सगं पद्याङ्क सग पद्या निमुक्तनिर्मोक० ३ निर्यान्तमेन जग १२ १५ २० २३ १७ २२ ३६ १ १३ ur ४ १६ ३ १७ १७ ५ नून सर्वार्थसम्पद् नृत्यता रक्तरक्ताना० नृत्यमान करणाङ्ग. नपसूनुरकातर० नृपस्यैव वचः नपादिवाक्यः नपीठमुत्तप्त. नपेण सम्पादित० नपोकमो द्वारि नमात्रप्रेक्षितम्यास्य नरत्नसूः सून्तवाग नृसिंहयोग्या भवती ४ ५ ४ २ ३२ ७४ ४ २ ६० ૨૨ ५२ ७ ur २७ २ १४ १८ ७५ नेत्राघराद्यदभुत. १७ नैमित्तिकेनादिदिशे नग्न्तर्येण भूयोमि० नो राज्येन रतेन २. ६४ ५ १२ ५७ न्यरूपयन्नाटक. २४ न्यूनरूपविभवोपि २३ १६ निर्लसन्त्यमलमेखला निलञ्चनप्रौढ निर्वाणदोपश्रियः निर्वासितः शोकमरा० निर्वाम्यमानरिव निवत्यते चेदसुतश्च निवासिना प्रोज्ज्वल. निविडकरनिघात. निवृत्तजनमञ्चारा निवृत्तमगीतकला० निवेद्यते कामिज नेन निवेशितोऽव निशम्य तत् सा निशम्य गैरीमिति निश्चलस्य च निकलड्पनुपालयन् निसर्गाविणः शूराः नसीवनता निसर्गापहनः को निस्त्रिशसर्वलुण्टाक. निस्वागणीलुप्त. नीचगामिचलवेप्टि. नीतिः चित्ता नीतिस्थितिप्रातिमुत नीत्यंगनानिगन नोरन्ध्र गृध्रसंघातः नीलोत्पलाध्यासित नौल क्वचित् वापि नूनमङगुलिमदायत् नूनमद्य निमित्तानि नूनमेएनपना. दूनं अधिकल्लोमः नुनं एक स्वचाप १६ प २० १६ ६८ १२ १. १५ ४ ६४ १० १५ २३ १५ ६० ७१ २३ २१ २. पक्ष स तस्थाविति पक्षिकुलेषु कुलाय पक्षिणस्तप्त भूपात. पङ्कजिनीपु मधुव्रत. पञ्चातियत्नात पञ्चाननस्येव पटहानां प्रणादेन पट्टांशुकोल्लोच० पत्तनादिविभुताऽपि पत्तनेषु पठच्छात्र पताकयापि पवन. पदे पदे धूपघटी. पदे पदे भक्तमाप पदे पद महादावा पयाकरणव सरों ६७ २० १०. ८२ १४ ३६ २४ ७१ ५. २३ 8 १२ ६० १२ प्रयमम्परिशिष्टम् (पधानुक्रमः) १३ सग पद्याक सगं पद्याइ १६ ४८ २० १०३ १३ ४९ १६ ५ ४२ ८ २ ६ १२ १ w १४ २६ १५ e १४ ३ १० १४ १८ ७२ ८५ ८५ ७ क २२ ५६ १० १० १६ १२ ६१ ar ३५ ३६ है ५ २७ १० १ १३ १०२ २३ १०० २२ पद्म विपरीतमिद पय प्रपूर्णा परिखाप परप्रयुक्तो परस्परेण सस्नेही पराक्रमः सवंगुणेषु पराजयस्सयतिना पर पता पुरमथ परिभाव्य ततो परिहारिणमुपेयुपि पर्याप्त पाणिग्रहणो० पवतेष्वप्यसो पलाशा पुष्पसवीता पवनतिरदारी पवनेनेव तेनवा० पवित्रता भवतो पशवः सकलान पश्यतापि पशुनेव पश्यन्तो निमिष पश्य श्रीकौस्तुभेन्दु० पाखण्डिन कञ्चन पाणिग्रहे तामिति पातितेप्यातपत्रस्य पादाघातः साधीश पापप्रपा नूनमिहा. पापमूलमपहाय पापा तदेव पापात्यस्मिन्निरोधे पापानवेभ्योऽपि पिता भवेद् भूमिपतिः पितगहेप्येवमनेकशः पिप यथेच्छमतुन्छ. पीयूषधारारस पोसूपसागरे मग्नः पोवरोफजपनस्तन. पुति पुण्डरीकाण्यमग्नद्या पुण्ड क्षुखण्डेष्व० पुण्याल्लग्ना नासाव पुत्रः स तत्त्वेन पुत्रस्य सर्वाङ्ग पुनः कञ्चित्परि० पुनः स तिया पुनरपि मघुमासो पुरमामाकराकोरणं पुरतः प्रकृतामन्द. पुराणि योषाकुल. पुरे दिवीनामर० पुरं पुरा तमच पुषेषु सर्वेवगि पूर्णे दुभास्यप्यति. पाठे ज्वलत्पायस० पेठुश्च ता व्यस्त पोरचावनिता० पोरंश्चकोररिव प्रकोपनो ध्यन्तर० प्रक्षेपे सवंशस्त्रापा० प्रचण्डमातह. प्रचण्डवातोदधुत. प्रजा प्रपत्यादपि प्रजानुराग प्रजानुरागः प्रशप्तिमन्यास्तनमा प्रशाप्रकरण प्रणम्य नम्यानिति प्रणयादरतः प्रतस्थे उ प्रति प्रवस्थेय सुमारोऽपि प्रतापभाजाऽपि प्रति तीस प्रतिवनमसिनादा १४ १४ २२ ३८ २२ اله ४ ६ १८ १ ८० २० ६३ २० १६ ३ ३ ३ ३८ २४ २ १ ए १ १८ ४ २ १ १४ २० २५ १२ १२ २. ३ २३ २० सनत्कुमारचकिचरितमहाकान्ने सर्ग पद्याक सगं पद्या 8 १ १७ ७४ १८ ४३ २ ३० २४ २० ५४ प्राप्य श्रिय तामधिक प्रावोधयन् मामिति प्राय: पृथिव्या प्रायः सदा तीर्थप० प्रारभ्यते पानकनाद. प्रालेयशेत्यं प्रावाहयन्नदीमस्र: ७ ५ ५ ५ १८ ८४ ५ ४८ १२ ७६ २१ २५ ३६ ८४ प्रावीजयच्चाशुक० १२ ४ ८६ १६ ३५ १५ २४ ७७ ३ ६० ६ २३ २४ ६५ w २२ १५ ४६ ४ ४७ 8 १६ ६५ १६ ३५ २१ ९८ ५५, ५८ ir प्रतिष्ठितः सत्यवचा: प्रत्यङ्गमप्येवमियं प्रत्यत्रवीत्तामथ प्रत्यह निमिमोते प्रत्य बभापे च प्रत्यावभापे जिन प्रत्याभापे तमिति प्रत्याहत सानुशय० प्रत्याहुरस्तगन० प्रथितेनतु विज्ञतया प्रदक्षिणास्तस्य स दीपवन्नीरद० प्रभो महत उद्धति प्रयुष्य बहुधा प्रलयानिलधूमालि. प्रलयानिल विद्वे पो प्रवत्तम'न फरि० प्रवर्धमान- घामा प्रवर्धमानश्च शशीव प्रवादिजल्पे प्रवाजिकाकाम प्रवृत्तिमपि नावा प्रसादवत्मत्यहित प्रागिनोग्रतप० प्रागेव दुःखौघ० प्रगेव शाद प्रागेव मिन्योमयनात् प्रागेवासन् ऋचा प्रागमवीयगहिणी. प्राच्याः समामस्तदिशा प्राज्यमानाप्यमाना प्राशोपि नाभ्यासमते प्राणप्रहाणाभिमुखी प्रातप्तालमादिक प्रातयत् कुमार १० ३ २६ ८ प्राह कुमारो पाहतुश्च भिषजी प्राह शक उदितप्रमः प्राह साधुरतिपोषणे प्राशुसिंहासने प्राशु दरका चन० प्रियतमनववर्षा प्रिययुवतिपु प्रिया गुणस्मृत्य प्रियाभिधानश्रवणे प्रियालमञ्जरीकान्तः प्रियावपु:सङ्गिवन प्रियाशिरसि शेखरो प्रिये किमत्र वक्तव्यं प्रेक्षासु गोष्ठीपु पोचत प्रहमिता प्रोचतुश्च ते देव प्रोचे वीरस्त कुमारो प्रोचे सचिवमुख्य प्रौढपुष्पलवली फ ३ ७ ४५ ३० ३ 8 . २ ६० १२ १६ ३२ ५ ४२ ४३ २३ ३ ५६ १८ ६२ LE ur २८ १३ ३१ १६ १० १३ ८१ २२ ६५ ३. 2 २० ३५ फरिगपतिफराजित फनोपयागोम्मद سه २८ व ३ ६५ २२ ३४ ५७ पदश्चंतेः सुरगिरि बवन्ध निवतततीय.

प्रथमम्परिशिष्टम् (पद्यानुक्रमः) २१ सगं पद्याक सुगं पद्याच १६ प्र० २० ८६ १० २ ६० २४ ५१ १४ २४ २८ २० ६५ भूभत समक्षं मुवि भूम्ना वमुयंत्र भूय एव विबुधौ भूय एव स चकार भूयादय पायमशेप० भूयासस्तेन नादा भूमिपटलेन भूरिभिविमलदूर. भूपितोऽन्तमलं. १० २० ५६ २४ ५१ १५ 8 वमापेऽन्तः सम बभुस्ते भोगिभोगेषु बभूव भूमीश्वर० बभूवुरुविद्रदृशो बलौघंश्चलतस्तस्य बल घात्यममित्राणा वहुचविहङ्ग वाणः स्मितः प्रोषित. वारावियत० बाप्पप्लुतस्निग्ध. वाहयरुगघिट० बुबुधे स कुमार ब्रूते वल वीर्घ वहीयस्त्वादमान्तो २२ १६ ७२ १८ २० २ २० ५ ३४ २० २८ ७२ २४ ६७ १५ २१ १६ भेरीणा तारभाइर० भोगेभ्यस्तस्य नून भो भो देवी समाकृष्य भ्रमयन्ती दशो द्वन्द्र भ्रान्तकस्यैव भ्राम्यन्मही ससूतिवत् १२ ७२ १६ ३३ १११ ૨ ૨ ४ ६८ भ म १० १ ७३ ३६ ३ २० १२ १० ६२ १८ ७१ २८ ५२ ५ २२ १४ १४ ३७ ५ ૨૨ ४ २ २ २० २ ६४ भक्त साहसिक शूर भक्त्या नपोप्यादिश. भङग्युत्तरासगित० भटोनामिव चेतासि भद्र न भेतव्यमितो भवोद्भवानन्द० भविष्यदासत्रवियोग भानुवेगन पतिः भानुवेगादिभूपाना भानुवेगोऽरुणेनाऽपि भावनाशिततमः मास्फरोऽप्यरुण. भास्वदचिस्फाटिक. भिधवच्योभनातं. गुजङ्गनिमोरूमनो० भुजङ्गशोपरत्ना. भूषप्रसाद भूपालमापन्दप भूपोप तापित. १६ १४ ६४ मज्जरीति च विज्ञप्त. मजीरनाद मण्डली पवना मत्ताङ्गनाविह्वल. मपितुर्वचनतः मदनशवरनेत मदोत्कटो गन्ध० मधुकरततिश्लपा. मधुरगतिरथप मधुरजलनादयंत्र मघो. स्वमित्रस्य मध्याह्न घमंस प्रस्ता मनरेष गरेयो. मनस्विनीना मदनोपि मनस्विनीनामसन मनस्विमि. सम्पत मनोनगराउन मनोरन २१ २३ १२ २३ ३३ २० ४ १० ૬૪ ३ २० ४१ १७ १४ ५२ १० २१ ५ ३६ २ ५२ २१ १०५ ४३ २ २२ सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्ये सगं पद्य ऋ सर्ग पाक १२ २ ३७ १८ ८६ ३ ८४ G २१ ७ 8 २४ १८ २२ २१ ५ ११ २४ ११ २२ ७६ २४ ६८ १२ ११ १० ५८ १० महिमानं नयन्त्येव महीतलालङ्करणं महीयासो भवन्त्येव महेभमिन्दृयति. महेन्द्रसिंह प्रत्यूचे महेन्द्रसिंहः धृत्व० महेन्द्रसिंहस्त तत्र महेन्द्रसिंहस्त पश्यन् महेन्द्रसिंहेऽपि विवृद. महोपधोना गिरि० माङ्गलिक्यमनुरूप मातुलेनातुलोत्साह मारशंस्तु विषदिग्ध मानप्राणद्विगुणान् मानबाह्यपूतनोऽपि मानसमध्यवहन २५ ५० 8 १७ २५ - १५ २६ २२ ४० तु ६ १८ १६ ६५ २ १३ १० २१ २३ १०६ १३ ७४ २२ १२ १३ २ ८२ १२ ४५ ४८ माभूद् वियोगः १० मनोऽपि तस्या मनोरथाः प्रारिणगरणस्य मनोरथेनाऽपि मन्त्रचूर्णविवशीकृता मन्दमन्दतमसि मन्दा हि मे भाग्य मन्दिर वनति चन्दनं मन्मथोष्मानचिता० मन्ये द्वाशरूपिणी० मन्ये मनोमू: मम जीवितोप्यति मया किञ्चिन्न मयि जीवति जामातुः मयि प्रसन्ने तव मयि सत्ययमायास मयूरपक्षव्यज० मयूराश्च प्रनत्यन्तो मरुतो यत्र सध्वान मत्येन्दिराभ्यः मलयजमलयजत. मल्लवदङ्गेनाङ्ग मलिन मुखविगन्धः मलीमसच्छिद्रित. मस्तकेन दघतः मस्तक दुघुवतुः महत्ययेडरत्रास्य महाधनानां भवनेषु महानवम्पादिप महान्षकारसंग्रामा. महामण्रसशामीनि महामभरः सोऽपि महावेतामदुर्दों महासयिस्वेति मुहः महाहिना कण्ठवितबि. महिमा सत्य न मुझे १० मामघन्यतममाप्त. or ५६ २३ १०१ १८ ४१ Y ७६ १५ २० ७६ ६२ १३ १० ७३ १८ w ११ ७ १७ ४ २२ २४ ६८ २१ २२ ५ मामन्वयुक्त मामस्य पृष्ठे यदि मार्गा असिच्यन्त मार्गानुसारित्वत. मार्गध्वम्बुभरावरुद्ध माल्य हि सर्वस्व० मासद्वयादिक्षपण:० मासद्वयेनाऽय मास पट्कमिति ते मितलोलपताकाभि. मित्र मित्र कुतो मित्रवच्च शिशिरोऽपि मिग्राण्पमित्रता मित्रोन्मुखे शुद मिय: सदर्शनकोष मोल्यते पावले मुक्ताफलापालकारा. २४ २० २० ३६ ४ २४ ६५ २० २ १२ २२ २० ७६ ३४ १३ २१ २१ १६ २६ ५ २. ५ प्रथम परिशिष्टम (पद्यानुक्रम) २३ सग पाडू सग पद्याइ ६८ २९ द ८ ४३ १३ १२३ ४ ३३ १२ wr ३ ५२ १३ ७५ ११ २ २५ ६ ५२ ३ ८२ १३ १६ ३ १५ ५२ २३ ९५ १० ६० १३ ११६ ४९ २४ 86 मुक्ताकलापा विपणि मुक्ताकलापोऽपि मुक्तावचूलशन. मुक्त्यङ्गसद्दर्शन मुखलालामिवाकाले मुखेन्दुराजन्मुख० मुखे विकास विभ्राण: मुग्वेऽङ्गनाश्चित्तभुवो मुग्धे नव श्रोणितटा० मुद्गरमुज्ज्वल. मुनेरपि श्रीभरतस्य मुमुराकारसिकता मुष्टिभिविजितशेल. मुहतमायण च मुहमुस्तामभजन मुढघात पगसूनी मूच्छनापगमनात् मूर्तिम्पृशो गोपतयो मूल विरोधस्य० मृगशीपहातचित्रो मृगाधिप इवात्यात मगाधिपतयः करा मगीपु विप्रेक्षित मगेक्षणा. कुकुम० मृणालमो दयं० मताहिलंयक मेघानि तवाचस्पति० मेहगाद विवादाको मोहायितेनावनता. ५९ હર यः सप्तवर्षोऽप्यमित यः सूरसूतोऽपि य: सयगे शश्वददृष्ट. यक्षे जिते शिरसि यक्षेभ्यो घामवद्भ्यो यक्षोऽपि त: प्रहारः यक्षो भूयो विषधर० यच्चक्रवाकः करुण यतोतिमुग्धाप्यनु० यत. स रूपेण यत्कान्दिशी केह यत्कृते च समुपास्यते यस्खङ्ग. पिङ्गलीला यत्तपः सुबह मन्यते यत्यश्यता नाक० यत्पश्यता विश्वमपि यसिंहक स्थान यत्र विवपामेव हि पत्र चण्डमहसोपि यत्र चणा इवाध्यन्या या जीगतस्कम्घा. पत्र द्युतियोतित० या द्रोणिमुखानि पत्र दिरेफा: पत्र नून मस नेपुणा पत्र पवनदरी० पत्र पान करने पर प्रतिग्रामममत्यं० यय भानभायाजाद पत्र वाति नः यत्रोत लग्जनः पत्र प्राधियोहा पर मोहयो'पलो पत्र गोपाल पत्रमा ७ २४ ७ ११ ३ २३ 9 १० . २१ १० ६० ५ ७४ २५ ६ . ३ ६ ११ ११ १७ ४६ २२ ૨૨ १२ ११ ५६ ४२ ६ १२ २२ य २२ २२ २२ २५ प: फुझनपि प: पयोधिका- प:यममराज प: पाटपप्पु प्र. ३ ५ २४ २४ मनत्कुमार करितमहाकाव्ये सगं पद्याङ्क मगं पद्या १० ३४ ५२ ११ २ १ १२ १० ६१ २२ १४ २२ ११ २२ १० २१ २३ ४ ४१ १३ . २ १८ ७ ७ २ ४ ४७ १ ४१ ५ ७ २५ ४२ ३७ ५१ १८ ३ १२ ११ यशःप्रमोदोदयसविदा यश्चातितापकृदन यश्चारुतारुण्य. यस्य कूटनिकटा० यस्य निझर वो यस्य नूनमुदधिस्य यस्य पादसततोप० यम्याग्रतः सूय शिला० यस्याङ्ग भाभिः ककुभो यस्यातिसौन्दयं जितो यस्याधिपत्यन्य० यस्यानुराग. स यस्यावरोधोप्यनिरु० यस्यास्तवासीनव यस्याः कटाक्षोद्भट० यस्या सद्धयानत यस्मिन्नशीतिधु सदा यस्मिन्प्रजा शासति यस्मिन्मणीनामवलोक्य यस्य तदङ्गामृत० यस्योर्वमप्युज्ज्वल. याचनस्त्वयि यावज्जीवति यावत्सप्तच्छदच्छायो यानरूढललना या निजरैः शत्रुविदार० यावन्महामोहभुजग. यावदित्यमवदत यावदेवमगमन् ५० ७ १८ EL १० ४७ यनानिमेपा प्रपि यत्रामिपरसोन्मत्ताः यत्राम्भोभन्नरेन्द्रो ययावसेदुः यत्रावहन प्रथम यत्राश्वपीठऽपि यत्रासख्यानि यत्रास्यमप्यम्बुजवन् यक्ष काण्डा. यौन्दुकान्तामल. यत्रन्दुकान्तावनि० ययेन्द्रनीलस्फटिकाश्म० यत्र न्द्रनीलारुगा० यमोन्नत शालपति यथाग्नी चम्पको भेदो यया तयात्मा परि. यथा यथा च तदात्ता यथा यया दृश्यत ययेन्दुमौलिः यघोपदेशं न यदाकुलव्याहत यदागमे सुन्दरमप्य० यदा च म प्रचलित यदा स घाम्नो यदि चाद्रिपतिलुंठति यदि वालतणेषु पदि शक्रापंपि यदुच्छद्भिजल० यदेप सवव्यसन यदि सममुत्यान पष्टमी य पद्यस्य पाठेन ययन सभ्य लमने पहा मुकृतिपिन पविश्वा तुल. ५ ७ ७५ ७ ३६ २ ५० ७ २६ १ ४ १४ ३५ ४ २८ ur ३० २४ १३ १११ १२ ७१ २४ १३ ५ ११ १३ ६६ १३ १ १३ ur ४२ २२ २० E ६८ २० १३ यावदेव सुशकन. १३ २० ५ ur यासु प्रमोदेन युधे घण्टामहानादे० युनाक तु विशेषणा युटमासु फेनाऽपि सम १० ५ १२ X येनाऽयाति कमारो प्रथमम्परिशिष्टम् (पद्यानुफ्म.) २५ सर्ग पद्याइ । सगं पद्याक येनारातिवने दोप० येनाशु चरण १९ २४ ८० २२ ४१ २ १७ १५ ६ २२ ३० येनाऽसख्येयसख्ये० येऽप्यनसिपुरनल्प० ये मूलात्स्कन्धवन्ध यो मत्यलोकपि यो विहाय कुलटा० १४ । m १३ २३ १०५ ३ १० १३ १०३ र २१ १५ २० ६७ ४ ४२ राज्येन कि तेन राधाव्यधाद्यद्भत० रामाजनस्यात० रामा हि दोलास रुचिररुचिसमुद्यत्० रुज्वायत स्वच्छद० रुदन्क्षण गानपरो० रुरुधे यद्भपनन्दनं रुषोत्तस्थो महावेगो रुष्टासि चेत् कोकिलयेव रूपलोलिततिः रूपवानिति यदोदृर्श रूपेण कामाद्धनदात् रूपेण श्रीसुतोऽपि रूप सौन्दयंसार रेखाप्रयाघारतया रेखायं सभृकुटी रेखापदेशान्मकरो० रेजु. पार्वेऽस्य रेजे कुण्डलित घोर० २ ५६ २३ २३ २१ १ ३८ प्र० १६ २ ६१ ६ ७ १४ ५७ १५ ४८ १६ १८ ६७ १७ १३ ७ रजनिक्षयतोशु० रजसः सर्वथा भावान् रजोनुषङ्गादिव रजोभिरुफ़्लयति स्म रतान्तमन्दायित० रत्नत्रयी यत्र रत्नप्रभाभिरावद रत्नभूपाभिरबा. रत्नाकरत्वेन रत्नाकरस्यापित रत्नोचरच्चारु रत्या नानाविनोद रथ्यासु पुष्पप्रकर० रस्तुं प्रवृत्ते रभसात् रम्भसदायितपीत. रम्भा किमेपा रम्यामिवालोकयितु रम्येष्वपीन्दुप्रभृति० रसालः शोयंवर्याले राजमागमवतोरणं० राजसफलफूजितो. ५९ २८ २१ ५७ है ४५ रेमे तया सह ३ ८१ रोचिष्णुरोचिः ६६ १४ 8 ल १० ७४ १ ७० १६ १६ ७६ ६० ७२ ७ लक्ष्मो फेह सना लक्ष्मी सुधौधरभि० लक्ष्मीरिवोन्मीलित० लब्धिसम्पदतिवन. ललाटपट्ट. लवरिणमजितरम्मा २१ ४४ २४ २३ ४ २० १३ २२ १. २ राजाऽपि रज्यन् ५ ૨ लाभे तस्या कुमारः ६७ ३८ ६२ १३ राशः प्रजानांच राशः सूनुश्चेतत् राशा भोजनशालासु राज्यमाज्यवदपाण्टक लालिता पपिहातोक: लायरिजाकषिते सोसपास परितः लुठामिनो १२ २० २३ २६ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्ये सर्ग पद्यान सगं पचाक ३ २ २१ २० १०२ ३ ३६ लुनकेशोऽपि मानित्वात् लुनदण्डध्वजभ्रष्टा लोकेऽपि तीनज्वलिते लोलजिह्वायलद्वारि० ८७ १० १० ५ व १० ४३ ६० १४ १७ . ७७ ८ २० १७ ५ १८ ५६ १३ १०४ १५ १६ १० ३५ २१ ४३ १४ ५८ १२ २३ १६ ६२ १२ ५६ १३ ८१ १६ ५२ ११ ४६ १२ १ ७१ १३ १६ ३ १७ ४ वाङ्मानदानोऽपि वाचस्पति प्रह्व० वाचोऽपि तत एवास्य वाचोऽपि नोपससपु० वादैः सूरिजिनेश्वरं वानरं नरबुद्ध्यासो वारवधूनिवहे वाराहघातनोद्यक्ता वारिवाह इवावश्य० विकासलक्ष्म्यामपि विक्षेपकरण मौरव्य विगलितजलदालि० विघटाते हि तरला: विघटितसन्धिश्चक्र विचित्रमेवं मुकुल विचित्ररचनोच्चित्र० विचित्रसद्रलकरम्बि० विचित्रसदत्तमयं विडम्वयन्त्यः विडम्बितव्योममणि विनूत्रादिमलान्यः विदग्धगोष्ठीध्वपि विदग्घमण्यातसमस्त० विदग्धयोग्य रनु. विदयति सहकाराः विदघदन्यामिवाशंपा विदग्धानामभूद् विदधुः प्रसाधन० विदारिताराति० विदुराः पुनराहुरहो विद्ध वायसकोलिफेन विद्याघरमहाराज० विद्याधराङ्गनाना विद्याधरेन्द्रण विद्याऽपि पुरजोर न १० ५० ७ ६४ ७८ ११ वकोटकोकेन न वक्त्र दुनिर्माण वक्षस्यले हेमकपाट वक्षोजकुम्भास्य. वचोऽपि तस्याऽस्फुट० वनाशनिः किं किमु वञ्चितसकलजनेक्षण वदनमस्य विनिद्र० वदनेन जरत्तृण० वधूविप्रेक्षितालापे वनागमोद्वाह० वनेन स प्रदेशोऽस्ति वनेऽपि तस्या शरदि वयस्यमिव मुस्निग्य वराहा अपि पकानि वर कक्षो वर लोप्ठो वर्णलिङ्गगुरुयोग. वर्तमानाक्षर चेदं वनितोऽशनिवेगोपि वपित्वा मूनि पुष्पाणि वल्गुवल्गद्भट० वल्लभा वाकुलमत्या ववलेडशनिवेगोऽय वास्नीयदास्तो वसति. पालकैलोना वसन: सितासुकर० वसन्तपुप्पे वसन्ताजम्य चालये नावस्प नोयः २७ २७ २४ ४६ १० १९ २९ २४ ६३ १६ ५४ ३ २३ २० २० १०५ १३ १६ १० २० ३८ २२ ७ ६५ ६४ २१ १० ३८ १५ ३८ १२ १२ ५ है २५ प्रथमम्परिशिष्टम् (पचानुक्रमः) २७ सगं पद्या सगं पद्याक ३ ६२ ५ १८ ५८ १८ १२ ६३ ४ ७५ ५० w ९७ ३ २५ २३ १६ ७७ १६ ७४ ५ ३८ ४६ ७ २० २४ ४६ २ 8 २७ ३५ १६ ५८ २३ १६ ८२ २२ ३९ २० ३३ १९ ७१ २१ १०४ ३ ३ ४२ १७ ७२ २० ܘ ܐ or १६ ४८ विद्युद्वेगोऽङ्गभूः विधास्यते चास्य विघीयतामहद्वारः विधुन्तुदस्येव विधुपूर्णतपनीय० विधूतविषमच्छदो० विना दोष महाविद्यः विना प्रतापेन न विप्रुट् तस्य महात्मनो विभाति नवचम्पक० विभात्यही भ्र पुग० विभावयन्व० विभावयन्सम्यगसौ विभावयस्तद्वद विभाव्यतेऽस्याश्चरण विभीतकमा यत्र विभूपितास्थानभुवोः विमले निवेश्य विमानमत्यदभुतमप्य० विमानमप्यच्छत० विमश्यता वत्स विरचितमिह घाना विराजते नाभिनदान० विरेजतुस्तस्य विलासिनीनामिव विलासिनीनां ललितानि विलासि वेश्मागुरु० विलुप्तप्टीव मुख विलुप्तनाशाश्रवण विलुप्तपक्षः पक्षोव विलुप्तसंमुदचरित्र विलोक्याद्भुत मुद्भुत विवध्य से देवसता० विवाहकालऽपि विविच्याऽऽविधाते विवेकिमिः प्राप्य विवेकशून्य मुदितः विव्याध राधा विशालमप्युन्नत विशुद्धभावामतः विशुद्धसिद्धान्त विशेपतश्चाद्य विशेषा नतमूनि० विशस्पलेष्वक्ष० विश्वकर्मकरणि. विश्वक्षयाय प्रलय. विश्वभावि शिवकल्प विश्वसिविनिदानेन विश्वस्यापि प्रभुमिय विश्वास धरणक्रिय विश्वोपभोग्येन विषाक्तचाणप्रतिमः विपादमागं न विपादिनी तद्वदनात विपोपमाना विपया विप्रपन्न विकास विष्णुश्रियः प्रेमभरात् विष्णुश्रिया विप्लुत. विष्णुपियं. चेद्विष. विष्णुधिय चानुच चार विष्णु त्रिय वीक्ष्य विप्वक्संघारिमत० विष्वक्समुन्मोलित वितोपयोगे हि विन्धमेपा विहाय मा चार विहाय दोषान् नुनन. चौतविमिन पोरजनस्पति पोरा दिन १५ ३७ ६ २२ ७ ६६ ६७ ५ ८२ ३ १६ २० १० ह १४ १७ २ २ ५२ ११ ३ २५ है १२ २ २ ११ ह २५ ४ २ - ५५ २ ar ५१ ३२ ४ २७ --- ११ ३७ १ १२ १६ २० ८६ सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्य सर्ग पद्याङ्क सर्ग पद्याङ्क २१ ६० १० २८ १७ ७१ प्र० ६ ६ ४३ १९६२ १३ ७८ १८ २६ ६८ २१ २० २४ २३ ३० २० २० १० 8 ५ 8 ३५ ४ १३ २३ ६ १५ १५ ७ २२ ३० ४ ६१ १६ १४ 8 ५२ २२ वीराणां वर्मिताङ्गाना वक्षस्यवहिणा वृत्तानुपूर्व युगल वृत्तेः प्रमालक्षण वृद्धसच्छद्यरवैव० वृद्धहेममुकुटः वत निरुध्यमानोऽपि वन्तः पत्तिसमूहेन वृषाधितत्वाज्जनता वेगवाहिस रिदम्बु० देतसीतरुलता० वेदध्वनिध्वानित० देद्यां मधुप्राज्य वैडूर्यरत्लद्युति० वैदग्ध्यवन्धुः सदनं दरनिर्यातनान्नाभ्यो वरिणो यश उदोणं० व्यजेपतः क्षमापसदः व्यभाव्यत प्रस्खलितम व्याघ्रोऽस्ति पप्ठे व्याघयोऽपि पटुताप० व्यापयोऽपि मम ज्यामील्यनेने व्याहृता मदनुयोग० व्यामेव यच्चिन वगावलोलत्कृमिजाल वोडावनम्राणि ६२ १७ ११ ४४ २० ३६ ३५ २३ १६ २८ २२ ३५ १ १० २ ६३ शनैश्चलद्वीचि. शमयितुमेव तेज. शसन्ति सुरा यक्षं शय्यामुपारोहमहं शरणेऽपि न तस्य घरसन्धानपातादि० शरीरमप्येतदसार० शरीरिणां लादकरः शररन्दुमिस्तस्य शशिनोऽपि चकोर० शशिविशदवितान शशी यदि स्यान्मघुपा. शश्वज्जनेन्द्रवेश्मो शष्परादृष्टिपात शस्त्रप्रतिफल शान्तिकर्मकुशल: शालनकरिगरपि शिरसि कृतविधुतिः शिरसि शस्त्रलूनानि शिरोमात्रच्छिदस्तत्र शिलीमुखाग्निचिक्षेप शिल्पमस्यं वलं शिवाफलोपयोगेन शिशुरपि हि न शिधिये यो हिमा० शिष्यो हि भूत्वापि शीताशुशरदेव शुक्शाकिनी रोटु. शुग्भारतो मोदभरः शुभे दिनेऽप स्वजनाय शुशोच चालोक्य निज शून्ये क्षणान्तःकरणा. शुद्धलाजातिरेपा० शशारदास्यरसयो० पप्रजानामपि २० २० २ ८३ २३ २४ ६६ ६४ २२ २१ ५६ २१ १०३ २६ २ ४ २१ ३६ . ३ प्र० १६ ur १४ १८ ६६ १ ५७ २४ ७५ शक्तित्रय चारगुरण. सावितश्याधिष्ठित पाक्तिस्ति यदि वो शोऽपि aa साहनिवनिश्चित पास निमोन्मुक्त: ताज मनिहाप. १८ १८ २१ ६ ६ १५ १६ ॥ 10 २१ ६२ २० ५२ प्रपमम्परिशिष्टम् (पद्यानुक्रम ) २९ सगं पद्याव सर्ग पद्या प १९ ३१ ५ ८६ ३९ पट्खण्डपृथ्वीतल. ur स ur १३ ४३ ४ १४ ४० ४ शेषशीर्षमणिप्रायः शैलेषु वापीपु शैलेष्वपि प्रोपित शोकातुराणाममरा० श्यामद्युत्या मेछच्छाया श्यामकरूपत्वमथ श्यामः सपुष्पस्तत श्रवणातिथिता चागान् श्राद्धस्ततो दर्शन श्रद्धा. श्रुतेस्तत्वसुधा श्राद्धोचित कर्म श्राद्धोऽपि देवाजिनः १६ २८ ८ १२ ३४ ४ ७ २६ १५ २ ५५ ४८ ७४ १२ १७ श्रियोऽपि वासात् १ १८ १८ १२ २४ ३ १४ ४८ ७ १०३ २२ ३३ ३ ३४ १४ २३ २ है १७ ५ 0 ८२ स एव नाकी सकण्टक पावन सकन्यकाः सपदि सकलकुकृतमिथ्या० सकल युध्यमानोऽसौ सकला रजनी सकामतृष्णातिशयो स कोऽपि नागरो स गद्गद प्राह सडख्यातिगानेप सस्या द्विषः सन्ति सख्या विपः सन्त्यपरे सड़गमास्य उरुकार्यतः सड़गीतकेऽसो सचिन्तयन्नित्य० सच्चारित्रस्य भारः सच्छायत्वात्तपाराशु. सज्ज्ञानचारिष सततकान्तनिवास० स तर सक्तस्त्वतिमात्र० सत्कौतुक कज्जल० सत्त्वेकनिष्ठ सत्पताकमववद सत्यमित्यय सत्यमेव भिपजो सत्यानुपगातिराया. सत्यानपायप्रदिपे० सत्सारसोदोरि० मत्स्यवसापारण. सपक्षियोपान सरस्मानिगरपा ૨૪ २२ ११ ८२ ५७ १२ ६६ २४ ७९ ३ १७ ८६ १३ ६ श्रिय तदा शिधिय० श्रिय महैस्तैरदधाद् श्रीकुमारवर श्रीखण्डक' रविलेप० श्रीखण्डसान्द्रद्रव० श्रीखण्हाप्लेषमाद्यद् श्रीमहेन्द्रमयकेति श्रीमान् विनिर्मलयशः श्रीमुनीन्द्र चरितेन्दु श्रीविश्वसेनक्षितिपाल. श्रीविश्वसनाङ्गह श्रीवीतरागो विधिना श्रीसवपट्टान्वित० श्रीसयापि कुशेशयं श्रुतत्रिदण्डिव्रत. श्रुत्वाग्निशमंतिन० धुत्वा तदीयागमन श्रुत्वेवमस्या वचनानि धेयसः पश्य माहात्म्य धेयो निमित्तवन्देन इलेटमाप्याम सक्षम २ १८ ७६ ६३ ३ १६ १६ ५ ५२ २१ २ २३ २४ ६६ ४ २४७३ ३ ar & ४१ २० ૪૨ ६ ६१ १२ २४ *२ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्ये सर्ग पद्याङ्क सग पचाड ३ ४७ १२ ३७ १० ५५ ६ २६ 8 ४६ ६० w ३ ६१ २४ ३६ २१ ६६ ३ ४३ १५ ३६ ११ ७५ १२ १५ ८४ ५ ५४ ११ २६ or ५ २ ७ १ ३ १७ ३० ६ ७ ७५ ७ ७४ स मनोजयिना समन्तादवनियंत्र स मदनवनिताङ्ग. समभवदथ तत्र समर्थतासारमभूत् समस्तपुष्यत्पुरु० समस्तसत्वानिव समाजगाम सुम्पर्शः समाललाप स्वयमेव समुच्छलन्त्या समुच्छलनीलमणीद० समुच्छ्वसत्सर्वमनो० समुदगमिष्यत्तपनेव समुद्धताहिक्रम समुद्यमे धर्मकृते समुद्ययौ श्वेतरुचः समुद्रविस्तार० समुन्नताण समुन्मिमील स्वत० समूलकापं न्यकपत् समूलघातं निहते सम वयूमत सम्प-यमपश्यन्त्या सम्पद्यतामस्मदुपा० सप्रेक्ष्यता तादृश० सम्बोध्य मामित्या १४ ५० ११ ६४ ४. ६३ १५ २ ७ १०० ५ 8 १४ ५१ 8 w सदामरप्रायः सद्धमंधान्याधिगमो सद्धमंलाभरभिनन्द्य सदभौज्येन जिगीपुणेव सद्यो विशंसनान सद्यः समुद्रान्तमदः सधवा: चतन्त्र इव सनत्कुमारमद्राक्षीत् सनत्कुमारस्त सम्यक सनत्कुमारस्य कुमार सनत्कुमारेति पदा० सनत्कुमारोऽपि महेन्द्र० सनत्कुमारः सत्त्वाढ्य० सनत्कुमारः सहदेव्यु० स नागदत्ताभिध स निनाय समस्त स निर्मलेन्दूद्भट० स नूनमूठयाँ सन्ततेरि देहाना० सन्तप्तपाय सम्त्येवासंख्यसंख्य सन्धार्यमारणप्राणस्य मन्यायनिष्ठः सप्तवत्सरशतान्यसो सप्तस्वैपु गदेपु सप्ताङ्गमन्तःपुर० स प्रजाकुमुदिनी० स प्रतापनिधिराशु तप्रश्रयं भूपमिति स प्राताधयदेतेन स प्राह रामवत्प्राप्त सप्रेमाशोऽपि ते तत्र मायामनरेशोपि समयमा कामगरा समनि जिनदत or ५ ४४ १७ ३४ २१ 8 १०६ १६ ५ ४ २२ ११ ११ १३ २१ ६५ १६ १३ २० ६६ ८७ २४ ८७ २४ ३८ ५ १६ ३ २ ४७ ६ १५ २२ ५३ २२ २ १५ १२ ६ १२ १४ २ २३ सम्भावयामास सम्भोगभगिध्वपि सम्ध्रमाच्छवसि सम्मारवार मात्र सम्यवत्वगात्मतः सयमततपः संयोगचापवाणेन २१ ९२ २० २ २४ र २१ ५३ २१ ३७ ६ संयोगे मयुमुहदा १३ संरोप्यभाणमुगुमच्या प्रथमम्मपरिशिष्टम् (पद्यानुफमः) सर्ग पद्याङ्क सगं पद्या ३३ १५ २१ १६ ११ ८९ १ २ २१ ७ ९१ १८ १४ ७ ३ ७५ २२ २४ ३ ur ४ १८ २ २६ १३ १३ ६० १६ ७३ २ ११ २१ ar २२ ५६ ५ ७९ १८ ३७ ११ २३ ११० २४ ५६ २४ २२ २३ 88 ६ JU ५ ७३ १६ सवीक्ष्य तं चन्द्रमिवा० संवीक्ष्यमारणललितः संवीतमूर्तियदि संशोधिताः शुद्धिकरश्च ससारसाराखिल ससारे सारमस्मै सस्मार्य संस्मार्य पुरा सरसि हस इवामृत० सवेष्टविरहित० सणेव रुषात्यर्थ सर्वतश्च तदाश्लिष्ट सर्वतोऽपि घटमान सर्वयाऽसति पुष्प० सर्वथाइपरिकमं० सर्वमद्भुतमहो सर्वमेवमशुचिः सर्वतु पुष्पोन्मद सर्वाङ्गेष्वतिरौद्रत्वं सर्वा जितस्यापि च सर्वास्त्रपरम राज्ञ० सप्यमात्या अपि सर्वेपु तत्र प्रतिभाव० सर्वोपसहारविरोध० सलिलमाहृतमत्र सलीलनत्यत् स विवाहमङ्गल० स विवेश नृपेन्द्र० स शिलासिकरो वलगान् स सम्मदप्रणयसुधा० स सरम्भमभापिष्ट स संन्यलक्ष्मोन पतिः सस्मितास्वय सर्वासु स स्वस्तिवारी सहनशस्तैः सासचोऽपि पाता सहस्रा. पत्रिंशन स हि विद्याघराधोशा साऽय प्राप्य नरेन्द्र० साऽय स्वस्य पितु० सान्तःपुरं तत्पुर० सान्द्रचन्द्रविमल० सा प्रत्यहं शेपसखी. सो प्राह कि तेन साऽपृच्छदेनं सामन्तचक्रेऽपि सामन्तवृन्दै० सामानिकेभ्योऽपि सा मामपश्यत् सामूर्ति. सा सभा साऽमोचयत्त न साम्राज्यमोद्ग न साय समागादय सारा समाकृष्य सार्द्धमाशु निमिय. सार्वभौमपदवी सावधाने विशेपेण सावरोधवहपौर० सा विद्वन्मानिनो प्राह सा धीर्या स्वैवंयस्यः सा सेना प्रस्थिताप्प० सितवृत्तोपि पूर्णेन्दु सितापताका पवनो० सितां सदावत्तमुख सिद्धपुटमुरकूट. सिटान्तससिद्धा सिन्दुररस्ता: प्रतिवमा सिन्दुररेणुप्रसार सियाविध प्रोजपना सिता क्रममा नुन सामूना १६ २२ १ ५२ ६ १६ २१ १०२ २२ २३ ६२ २१ 8 ४४ २२ १ ४६ १३ है २० AWK १५ २० ५३ ३ १ १५ ८८ २१ १ १४ २२ ५ २४ ३ ५६ १३ १६ E ४ ३२ १ १८ २० . १८ सनत्कुमारचक्रिचरितमहाकाव्ये सगं पद्याङ्क सग पद्याइ २८ २० २१ ३ ९८ ४८ २१ १७ ३६ २० १७ ४७ १७ ३२ १४ ३३ १३ २३ १३ ८९ १३ १०६ २० ४५ २२ १६ २२ ३४ २२ ७१ on ५ ७७ w १४ ४ २१ १७ १ ३५ ७ . २१ १७ ५२ ६ ३ ६० सोऽध्युवास मृगराज. सोऽपिबच्च विशदां सोऽपि युयुत्सुरघाव० सोऽपि समुल्लसिता सोऽपि सम्भावयामास सोऽयं कश्मीरदेशा सोऽवदानपरिकी सोमपीनकुचगाढ० सौख्योपभोग्या अपि सौधर्मनाथोऽपि सौन्दर्यपोयूपनिधान सौन्दर्यसम्भार० सौरभ्यलुभ्यन्मधु० स्खलत्पद कामति० स्तनजघननितम्बा० स्तम्भापचितसच्छायं स्ता वा सुपुष्टे मपि स्त्रियोऽपि साक्षानर० स्त्रीरत्नमेषा हि स्त्रीरत्नसानिध्य० स्यातु सग्रामभूमी स्थामको रोचिकस्तूरि० स्थास्नोस्तत्र कुमारस्य स्थय वहिव्यंजयति स्नानकेलिचलसि० स्निग्धसान्द्रहरित० स्निन्ध चिराय प्राप्ते स्पशी पवित्र स्पर्शः समप्रावयवाति स्फाटिक सप्तभूम स्फुरन्महावामनिरस्त. १४ १२ सुदृढेन समस्ताङ्ग० सुदृष्टिः शस्यरत्नोऽपि सुधारसानन्तगुरग० सुनिर्दय विमृद्नन्तः सुपक्वबिम्बोफल० सुभटाना ललाटेपु सुमासल स्निग्वरुः सुमेरुगर्भादिव यः सुमेरुनामि. सुरक्तसूर्यामभिवीक्ष्य सुमिपु वदनेपू० सुरालयाग्रप्रचलत् सुरैरशसि यः सुवृत्तमप्यूध्वंगत. सुवेपरूप मुदितं सुवशजत्वान्नतिमद् सुसौम्यमूत्तितिपणा० सुसस्थितेनेक्षक० सुस्पर्शशय्याऽपि सुस्निग्धगन्धानि सुस्निग्धनीलाकुटिला. सु"यत्व सूक्ष्ममेतदवगम्यते सूर्यवत्सप्रतापो च सृजति जगतस्तापोन्टेदं सृजति शशधरोऽपि सेनाङ्गान्यङ्गमाव संनिकानादिदेशाऽसो संन्यान्यपि प्रातदिवः संन्ये चलति तद्वीयं संन्येन सरुपा सानो सोचिन्तयग्निशम्यतत् मोत्कण्ठमुत्कोत्तंन० सोरकण्टयेवातिचिराय मोत्कण्ठःक्षणमप्य. १५ ६६ २१ ५६ ७ ५४ १७ ३२ १८ २६ १६ २२ १० १६ २० १०७ २३ ७२ १९४५ १४ १८ ८६ १८ ११ ५२ १५ ४५ - ५ ५९ २२ २२ ११ २४ ४३ ६ १६ ६८ ६ ६७ १० १३ २० १८ २० ११ १८ ११ ४२ ५ ५ १६ ६९ स्फुरत्प्रताप स्वपति १७ २१ ४ स्फूजसौरभयक्ष. स्फूधूमकचः स्मराकुल स्मरविसांप ३१ २० प्रयमम्मपरिशिष्टिम् (पद्यानुकम) ३३ सर्ग पद्याङ्क सगं पाद १८ ८२ १४ स्वेदविन्दुतिव्याजा० स्वेदभ्र कुटिकम्पाद्या स्व विमोच्य कथमप्यथ १६ २१ १९ ३६ १३ १२४ २३ ४८ १६ १८ प्र० hc w ४७ १३ १७ १० २१ ४६ २१ ११ १६ २० २६ १६ ४ २० ७ २० ३४ ७ ७३ ७ स्मितस्फुरनिर्मल स्मित दषच्छऋ० स्यन्दनाः करिवरा० स्युः पात्रसङ्गेन स्वच्छन्दाचार्यवक्रो० स्वच्छाम्बु दूरादपि स्वनाम्न सदृश चक्र स्वपक्ष्येऽरिपराभूते स्वपरगुणविभागा० स्वपादेष्वेव वीराणा स्वप्नागमाध्येतवचो स्वप्नानिति प्रेक्ष्य स्वप्रभोरपकर्ताय० स्ववल य इहाकलयेनो स्वभावादेव मलिना: स्वयवरायामिव स्वय वितन्वत्यसमञ्ज० स्वरे रोद्रे समाचारे स्वर्गदत्तविलस० स्वर्दुरापकलफोकिला. स्वविक्रमं दातुमिवो० स्वशासनातिक्रम स्वशिल्पकोटीरुपसर्ग० स्वशिल्पानीव विशिखान् स्वापापदेशतोऽनङ्गः स्वाभ्यासगं त नरका० स्वामिदृष्ट्याधिको० स्वावरोवपरिभोग. स्वीकारिताने ककटु० स्वीयकान्तललनौष० स्वोया वार्या भुवनः ७ ७१ १२ ५९ १३ १०१ २१ ८७ २१ ४६ ११ १६ १७ ४१ १६ १७ २२ २८ १३ ४२ २ ४ २० १०१ २३ ९३ २२ ६ ७ ५९ हत्वा लोकान् भूरिशो हराद् वियुक्तामिव हरिवद् हरिवद् हरिश्चन्द्रचन्द्रसेना० हरिश्चन्द्रादिवर्गोऽपि हारिण रम्यस्फटिको० हर्षोत्कर्षोद्गताशेप० हस्त्यश्वचेलामल० हारप्रभाजालजलान्त० हारार्द्ध हारादि० हारिवहिनिनद० हासै रौद्र ब्रह्माण्ड हा हा किमतन्नप० हा हा हता स्मोत्य० हिमोपप्लुतपोध० हिरण्मयालकृतय हृदयमिव खलाना० हृदि प्रवेशायमिवा० हृष्टोऽपि चास्या वचनेन हेमन्तविच्छायित हेलाखिलक्षोणितलाव० हेला सदारिसहसा होमात्रयुक्तामय हातु प्रिय वासकारज्ज. यो सनयोरेव ६० १८ १० १७ ४८ २ २७ १६ ७५ ५ ७० २१ ७६ है o 8 १८ २ १० ७8 ६ ३१ २० ९० २३ ३२ ३६ ३२ २ ८ २३ २० १०६ ६ द्वितीयम्परिशिष्टम् काव्य में प्रयुक्त छन्दों के लक्षण एवं तालिका [ १ म. य. र. स. त ज. भ. न. ल. ग. से मगण, यगण, रगण, सगण, तगण, जगण, भगण, नगण, लघु. एव गुरु समझना चाहिये ।' २. सर्ग सकेत के पश्चात् अंकों को पद्याक समझना चाहिये ] मात्रिक छन्द छन्दनाम लक्षण-प्रतिचरण मात्रायें सरा एव पद्याङ्क १. प्राय २. गीति १२, १८, १२, १५. नवम सर्ग में-१०; दसवें सर्ग मे-३७; तेरहवें सर्ग में-२०, ६१, ७४.७५ ७६,७७,७८,७६, ८०, ८१, सोलहवें सर्ग मे-३५, ४८, ४६% इक्कीसवें सर्ग मे-६६, प्रशस्ति मे-१२. १२, १८, १२.१८. तेरहवें सर्ग मे-४२. ३ उपगीति १२, १५, १२, १५. सोलहवें सर्ग मे-३४. ४. युग्मविपुला १२, १२, १२, १२. तेरहवें सर्ग मे-७३. ५. पादाकुलकम् १६, १६, १६, १६. तेरहवें सर्ग में-५२, १०४, १०५, १०६, १०७, १०८, १०६, ११०, १११. ६. द्विपदी २८, २८, २८, २९. तेरहवें सर्ग में-११२. ७. वैतालीय प्रथम एव तृतीय चरण मे तेरहवें सर्ग में-१०३ १४ माषा, अर्थात् कला ६, र. ल. ग. द्वितीय एव चतुर्थ चरण में १६ मात्रा, अर्थात् कला ८, २.ल.ग. वणिक छन्द मक्षर ८- ८. मनुष्टुप इसके मनेको लक्षण प्राप्त नवम सगं में-४६; दसवें सगं में-१-३६, ३८-- है किन्तु सामान्यतया ७१, ७८-८६ग्यारहवें सर्ग मे-१९-५१,५३, - १. इन्दों विशेष ज्ञान के लिये द्रष्टव्य- म.यिनयतागर : वृत्तमौक्तिक (राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर) द्वितीयम्परिशिष्टम् (छन्दोलक्षण तालिका) छन्दनाम लक्षण सगं एव पद्याक लक्षण यह है-प्रत्येक ५४,५८-६१, ६५-८६, वारहवें सगं में- चरण मे पाचवा अक्षर १-७४,सोलहवें सर्ग मे-३१, ३२,३६,३८-४१ लघु और छठा प्रक्षर गुरु ४३-४६,५१, अठारहवें सगं मे-५८, उन्नीसवें होना चाहिये तथा द्वितीय सर्ग में-१-८२, वीसवें सगं मे- १-१०८%, एवं चतुर्थ चरण मे इक्कीसवें सगं मे-१-६५, ६७-८०,८२, ८३, सातवां अक्षर लघु होना ९५-८८, ६०-६५, ६७-१०३,१०५-१०६ चाहिये। ६. विद्युन्माला म म ग ग तेरहवे सग मे-४२-४६. १०. प्रमाणिका तेरहवें सर्ग मे-६३ जरल ग अक्षर 8- तेरहवें सगं मे-८२. ११. भुजगशिशु. न न म सुता अक्षर ११- १२. शालिनी म त त ग ग तेरहवें सर्ग में-३१-४०. तेरहवें सगं में-५३-६०. १३. भ्रमरविल- म भ न ल ग सिता १४. रथोदता रन र ल ग १५ स्वागता र न भ ग ग १६. दोघक भ भ भ ग ग १७. इन्द्रवजा त त ज ग ग तेरहवें सगं मे-२१-३०; वावीसवें सगं में- १६०, तेवीसवें सर्ग मे-१-११०; चौवीस सग मे-१-३०, ३६-४४,५२-७६, ८७-६४; प्रशस्ति में-१. तेरहवें सग मे-११३-१२१. तेरहवें सगं मे-८३-६२. पहले सर्ग मे-२३,२६,३४.३७,३६.५२.५४.५६. ६३,७०,७५,७६,०१,८७, दुसरे सगं में-६,११, १६,२९,४७.५६,६४,६६.७२.७५,८८तीसरे सग मे-६,१७,२४.५१,७२, चौथे पे-२१, २५,३८,४१,४५,५८,८४,६०; पांच- २,३,६,१४,३०४०,६८ ए -२१,३०, ३१,३३,६३, सात वर्ग २-१८,२२,२५,२६, ६७,६६,८०,८७, माठप सगं में-१०१३.१३, २११३३,४६,५६६२,१५,००,६५ सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्ये छन्दनाम लक्षण सगं एवं पद्याङ्क १८. उपेन्द्रवजा ज त ज ग ग नवम सर्ग मे-६,२९,३९; चौदहवें सगे में-४६%3 सोलहवें सर्ग मे-३३;सतरहवें सगं में-१७,१८3; उन्नीसवें सर्ग में-१००, प्रशस्ति मे-१६. पहले सर्ग में-८,११,१२,१७ ३०; दूसरे सर्ग मे-१,८,२३,३७,७०,७८; तीसरे सर्ग मे-२१, ६०,८८; चौथे सर्ग में-8; पांचवें सर्ग मे-2, १५ २१,३८,६४,६७,७५,७६, छठे सर्ग मे-१. ३; सातवें सर्ग मे-४; आठवें सर्ग मे-८,८६; नवम सर्ग मे-३,६,३३,३४,५८; ग्यारहवें सर्ग मे-१,१५, चौदहवे' सगं मे-६० , सतरहवें सर्ग मे-४८; इक्कीसवे सर्ग में-८४. ज त ज ग ग इन्द्रवज्रोपेन्द्रवज्रोपजाति के चौदह भेद- १६. कोत्ति (१) १ चरण उपेन्द्र पहले सर्ग मे-१,५,१०,१८,२०,३२,७१,८५, वज्रा का और २,३,४ दूसरे सर्ग मे-२६ ५२,५३,६३, तीसरे सर्ग मे- चरण इन्द्रवचा के ३३,४६,५४,५६६७,६८,८७.६२,९७, चोये सर्ग मे-२३,४२,४८; पांचवें सर्ग मे-१७,२६, त त ज ग ग ३३,५३.८२,८४,८६,६१, छठे सर्ग मे-१४,२४, त त ज ग ग २६.३५,३६ ४४.५१, सातवें सर्ग मे-९,५१, तत ज ग ग ८६,१०३, आठवें सर्ग मे-२४,४२,४६,४८,८६ ६१; अठारहवें सगं मे-६१,६३,६४; उन्नीसवें सगं मे-१०१, प्रशस्ति मै-२. २०. वाणी (२) १. ३, ४ चरण पहले सगं मे-६, १६, २४, ५०, ६४, इन्द्रवजा और ७२, दूसरे सगं मे-३४, ३६ ४४, २ चरण उपेन्द्रवज्रा तीसरे सगं मे-११, १५, २२, ३६, ५७, ६६, ७०, ७८, ८५, चौये सर्ग में-१६, ३४, ३५ ७४, पाचवे सर्ग मे-८, ११, १५, ५०, तत ज ग ग ६०,६२,६६, ७३,७७; छठे सगं में-११.४५, तत जगग ६२, सातवें सगं मे-२,५,१३,१४, ५८, ६५, ७०,७३, ६७; माठ सगं मे-२४, ४२, ४६, ५८, ८६, ९१ नवम सर्ग मे-११, ३७, ४८% चौदहवें सगं में-४५, सोलहवें सगं में-७२, सतरहवें सगं में-२३, ३३; मठारहीं सर्ग में ६२,७०, उन्नीसवें गं में.९५, प्रद्यस्ति में २०. त त ज गग जतज गग द्वितीयम्परिशिष्टम् (छन्दोलक्षण तालिफा) छन्दनाम लक्षण २१. माला (३) १, २, चरण पहले सगं में-३५, ७८, दूसरे सगं मे-१४, उपेन्द्रवना; ३, ४ १६, ५६, ७३; तीसरे सगं मे-१०, २६, चरण इन्द्रवत्रा २८, ३२, ३५, ३८, ५३, ५३, ७१, ६६; ज त ज ग ग चौथे सर्ग मे-१६, ७८; पाचवें सर्ग में-३१, ज त ज ग ग ३५,५६, छठे सगं मे-१६, २३, ४३, ५६; तत ज ग ग सातवें सर्ग मे-५२, ५४, ७६, १०१, प्राठवें त त ज ग ग सगं मे-५, ६, ७६, ८४, नवम सर्ग मे-४२, ४३; चौदहवें सर्ग मे-५०; अठारहवें सगं में- ५६%) प्रशस्ति मे-१८. २२. शाला (४) १, २, ४ चरण पहले सगं मे-५३, ६८, ७३; दुमरे सगं में- इन्द्र वज्रा २८ २१, ४५, ६८, ८३: तीसरे सगं मे- ३ चरण उपेन्द्रवज्रा ५, १२, ४१. ४५, ५०, ५६,९१; चौथे सगं में- त त ज ग ग २०, ८६; पाचवें सर्ग मे-१, २३, ३२, ४३, त त ज ग ग ५५, ७१, ७८, ८५, ८६, छठे सगं मे-२८, जत ज ग ग ४०, ५६; सातवें सर्ग में-८, २३, २६, ४८, ततज गग ६१, ६६, ७२, ७३, ८३, ६३; माठवें सगं में ३, २८, ३१, ३३, ५४, ५६% नवम सगं में- ५, बारहवें सगं मे-७३, प्रशस्ति में-६, १७ २३. हसी (५) १ ३. चरण उपेन्द्रवजा पहले सर्ग मे-४, १३, २७, ८२, दूसरे सगं में- २, ४ चरण इन्द्रवत्रा १२, २७, ५६, ७१; तीसरे सगं मे- १६, जत जग ग १९, २०, ७९ ८६; चौथे सगं मे-१४, तत ज ग ग ३७; पाचवें सर्ग मे-२२, ५४, छठे सगं मे- ज त ज ग ग ७, ३४, ३७,४६, ५५; सातवें सर्ग मे-५५, त त ज ग ग ६८, ८५, ८६, पाठवें सगं मे-२०, २२, २७ ३४, ३५, ३६, ५५, ७३ नवम सनं - ७, १२, २०, ३५; तेरहवें सगं मे-११3 २४. माया (६) १,४ चरण इन्द्र पहले सगं मे-६,५१, ५७, ६७, दूसरे सग वचा- मे-३६, ४२, ६७, ७६, ८१७ तीसरे नगरे- २, ३ चरण उपेन्द्रवजा २५, ३१, ४०.४७, ६१; चौधे मां मे-३०, ततज गग ४०, ४३, ६५, ६८, पांचवेग-८०,८३3B जतज गग सातवें वगंमे-७, ११, २८, ८६; माठ ज त ज ग ग मे-१८, ५०,७४,८०,८७, ९२, नया गं सतजगग में-३८; ग्यारहवें उग-११,१ मारह सा में-७३, 35 पौदह व २-५६, .

३८ सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्ये छन्दनाम लक्षण सर्ग एव पद्या २५. जाया (७) २६. बाला सोलहवें सर्ग -६६, अठारहवें सर्ग में-१०; प्रशस्ति में-११. १, २, ३ चरण पहले सर्ग में-७, २५, २६, ४०, ४८, ४६, उपेन्द्रवज्रा; ७६, दूसरे सर्ग में-४, १०, १३, २०, २१ ४चरण इन्द्रवजा तीसरे सर्ग मे-४, २७, ३०, ४३, ५२, ७६; ज त ज गग चौथे सर्ग मे-१,११, १२, २७ ६६,८३; पांचवें ज त ज गग सर्ग मे-७, ७०; छठे सर्ग भे-४२, ५७; सातवें ज त ज ग ग सगं में-६४,७८,१०४; आठवें सर्ग मे-६ त त ज ग ग चौदहवें सर्ग मे-४७; सोलहवें सर्ग में-७३ १, २, ३ चरण पहले सर्ग मे-२ ३३, ४१, ५५, ८८; दूसरे इन्द्रवना, ४. चरण सर्ग मे-१५, १७, ४३, ५१, ६०, ६२, ७४, उपेन्द्रवज्रा तीसरे सर्ग में-१८, २३, ३६, ६४, ७३, ६३; त त ज ग ग चौथे सर्ग मे-२, ३, ३६, ३६, ५४, ५७, ६४, त त ज गग ६६, ७०, ७६; पाचवे सर्ग मे-१६, ३६, ५६, त त ज ग ग ७२, ८८; छठे सर्ग मे-४, १०, १६, २०, ५४; जत ज ग ग सातवें सर्ग मे-१०, ४१, ४४, ४७ ५०, ६०, ६२, ७१. ६६, १०२; पाठवें सगं मे-२, १२, २३, ३०, ३२, ३८, ४४, ४५,४७, ७२.६०% नवम सगं मे-१, ३२, ४०, बारहवें सगं मे-- ७५; चौदहवें सर्ग मे-६१; सत्तरहवें सर्ग मे- २६, ६३, अठारहवें सर्ग में-६०, ७०, ७८% चौवीसवें सर्ग मे-१००, १,४ चरण उपेन्द्र- पहले सगं मे-५६, ६६, ७४. ८३, ८६ दूसरे वचा; २,३ चरण सर्ग मे-२२.६१; तीसरे सगं में-६, ५८, ६२, इन्द्रवचा १४, १५, १८, चौथे सग मे २२, २४, ३१, जतज गग ५६, ६०, ७५, ७७: पांचवें सगं में-१३, २०, त त ज ग ग २४, ३७, ३६, ४७, ५८, ६५, ८१; छठे सगं त त ज ग ग मे-१७, १८, ५३, ६०, सातवें वर्ग -४२, जत ज ग ग ५३, ५६; भाव सर्ग --११,५२, ७३, ६३; ग्यारहवें सर्ग मे-६४; तेरहवें वर्ग में-५१; चौदहवें सगं मे-५१, ५८, ५६, सोलहवें सगं मे-७१, प्रशस्ति मे-७, १५. १.३ घरपद्रवत्रा पहले सर्ग मे-२१, ४२, ४६, ४.७, ५८, ६२॥ २,४ चरण उपेन्द्रवचा दूसरे सगं में-३८, ४०, ६६, ७७, तीसरे २७. माद्री (8) २५. भद्रा (१०) ३९ द्वितीयम्परिशिष्टम् (छन्दोलक्षण तालिका) सग एवं पद्याइ छन्दनाम लक्षण त त ज ग ग जत ज ग ग ततज गग जत जगग - सर्ग में-२, ८, १३, १४, ४४, ६३, ७७, ८६% चौथे सगं मे-२०, ३३, ४९, ६७, ७३, पाचवें सर्ग मे-२५, ४५, ६९, ७४; छठे सगं मे-१५, ३६, ४७,४६, ५२, ५८, ६१; सातवें सर्ग में-१६, ४०, ४६, ६१; पाठवें सगं में- ७, १४, २६, ४०, ४३, ६६, नवम गं मे- २, १४, ३०; उन्नीसवें सर्ग मे-९८. पहले सगं मे-३, १५, २२, ६०, ६१; दूसरे सर्ग मे-२, ७, ४१,४६, ४६, ५८; तीसरे सगं मे-१, ४२,५५, ७४; चौये सर्ग मे-८१, ८७; छठे सगं मे-२, ५, २२, २७,४८; सातवें गं मे-३, १२, २१, ४५, ५७,५६, ६३, ७६, ८२, ८८ आठवें सर्ग मे-४, २५, तेरहवें सर्ग में-१०; चौदहवें सर्ग मे-४६, ४८, ६२, अठारहवें सर्ग मे-६८. उन्नीसवें सगं मे-९७. २९. प्रेमा १, २, ४ चरण उपेन्द्रवजा (११) ३ चरण इन्द्रवज्ञा जत ज ग ग ज त ज ग ग ततज राग ज त ज ग ग ३०. रामा १, २ चरण इन्द्रवत्रा ३, ४ चरण उपेन्द्रवजा त त ज ग ग तत ज ग ग ज त ज ग ग पहले सगं में-१६, ३८, ६५, ८०, ८४; तीसरे सर्ग मे-३७,६५, ७५, ८४, चौथे सग मे-८, १५, २६, २९, ३२,४४,४६,४७, ५०, ५१, ५२, ६१, ७६; पांच मर्ग मे-५, १६, ५२, ५७, ७६; छठे सगं मे-८, ६, २५, २६, ३८, ५०; सातवें सर्ग में-२४, ३३, ४३, १५, आठवें सर्ग मे-१५, १६, १६,४१,५६, ६०, ७१ नवम सर्ग मे-४, २१, ३१, चौदहवें सर्ग मे-५३, ५७; सतरह सर्ग में-६२, मठारहवें सगं मे-६५, ६६, ६६, ८५, ८६ उन्नीस सगं में-६६. ज त ज ग ग ३१. मतिः १,३,४ चरण उपेन्द्रवजा २चरण इन्द्रवज्रा पहले सगं मे-१४,२८,३६,४३,४५,६६; दूसरे सर्ग में-२४; तीसरे सगं से-७.४६.३०, पोये सग में-१०,५६,८६, पाचवे वर्ग में-४,१२, छ सगं में-१२, सात सये-४६.७४,७५, १०,१००; माठ उग -६६६६८८ नमन मुग में- चौदहवें सगं में-५५पठार सगं में-६३. जतज गग जतजग ग पतज सनत्कुमारचमिचरितमहाकाव्ये छन्दनाम लक्षण सर्ग एवं पद्याङ्क ३२. बुद्धिः (१४) १चरण इन्द्रवजा; २,३,४ चरण उपेन्द्रवज्रा पहले सर्ग मे-३१,७७ ; दूसरे सर्ग में-६५ तीसरे सगं में-३,२६,३४,४८,६६, चौथे सगं में- १८,५३,७२, पाचवें सर्ग में-१०,५१,६३,८७; छठे सर्ग मे-६,३२ ४१; सातवें सगं मे-१, आठवें सगं मे-२६,३६,६७.६८,८३, चौदहवें सर्ग में-५४; अठारहवें सर्ग मे-११,६७. त त ज ग ग ज त ज गग ज त ज ग ग ज त ज गग अक्षर १२- ३३. स्रग्विणी (लक्ष्मीघर) नवम सर्ग मे-४७.४८,४६,५०; पन्द्रहवें सगं मे-४२-५०. ३४. तोटक सस सस ३५. द्रुतविलम्बित न भ भ र ३६. इन्द्रवंशा तत जर - तेरहवें सर्ग मे-१३-१६. तेरहवें सर्ग मे-१,२,३,४,५,६,७,८,९.१२. दूसरे सर्ग में-२८, चौथे सगं पे-४,१३, सातवें सर्ग मे-६८; आठवें सगं मे-८१; चौदहवें सर्ग मे-३३,३६,४०; सोलहवें सगं मे- ४,३०,७६, सतरहवें सगं मे-२.३१,४६,५१, ५४,५६,५७,०२, प्रठारहवें सगं मे-१२,१८, ३२,३६,४६,५४,५५,७१, इक्कीसवें सगं में- ८१; प्रशस्ति में-५. दूसरे सगं में-४८; सातवें सगं में-३२; चौदहवें में-४४; सोलहवें सगं में-५५,५८ ६०,६६; सतरह सगं में-४,१३, अठारहवें सगं में- २८,९२. ३७. वशस्य ज त जर वंशस्येन्द्रवशोपजाति के १४ भेद- ३८. वैरासिको (1) १चरण वशस्य, चौदहवें सर्ग में-३५,३७; सोलह सग में-५२; २,३,४, चरण इन्द्रवंधा सतरहवें सर्ग में-३,३४,५२,७४, मठारहवें सगं में-२,१४,२२,२३,३५,४६,७३.५८. जत जर ततजर तहजर ततज द्वितीयम्परिशिष्टम् (छन्दोलक्षण-तालिका) ४१ छन्दनाम लक्षण सर्ग एव पद्या की (२) त त जर ३६. रताख्यानि १, ३, ४ चरण इन्द्रवंशा; दूसरे सर्ग-३३, चौथे सर्ग मे-८८; पाचवें सगं २ चरण वंशस्थ में-३४; छठे सर्ग मे-१३., सातवें सगं में- ६४, नवम सर्ग मे-४१, सोलहवें सगं में-७, १६,२२,२६,२७,२६; सतरहवें सगं मे-१,५, १६,२४,६०,६१,७५,६१, अठारहवें सर्ग मे- १७,४५,४७,७४. ज त ज र तत जर - तत जर ४०. इन्दुमा (३) १,२ चरण वशस्था ३,४ चरण इन्द्रवशा दूसरे मग मे-३१,३५, चौथे सगं मे-७, सातवें सर्ग मे-३६, सोलहवे सगं मे-११,५५; सतरह सर्ग मे-३२ ३६, अठारहवें सगं मे-७ २०,३६. ज त जर जत जर त त जर तत जर ४१. पुष्टिदा (४) १, २, ४ चरण इन्द्रवशा; दूसरे सगं मे-३; चौथे सगं मे-५,५५; सातवें ३ चरण वणस्थ सर्ग मे-२०,३८,६२, सोलहवें सगं मे-२०,५३, तत जर ७४; सतरहवें सगं मे-६,२५,३६,४०,५३ ७०%; त त जर अठारहवे सगं मे-१६,३०,५७,७२,८०,६२ ज त जर त त जर ४२ उपमेया १,३ चरण वशस्था २,४ चरण इन्द्रवशा दूसरे सर्ग मे-३२, चौथे सगं मे-८५, मातये सग मे-३०,३५; पाठवें सर्ग मे-१, सोलहवें सग मे-१,५,२१, सतरहवें सर्ग मे-१०,३८, ४६,७३, अठारहवें सगं मे-१, १३. ज त ज र ज त ज र तत जर ४३. सौरभेयो (६) १, चरण इन्द्रवंशा; दूसरे सगं मे-७६, सात सगं मे-२७, चौदहवें २,३ चरण वशस्थ सग मे-४१, सोलहवें सगं मे-१०.१६,२५% सतरह सगं मे-७,२६.२३,४३,५८,६५,८३, ८४,८६, महारहवें सगं में-३३,३६,४४,४, ५६, उन्नीस सग में-8.6; प्रशस्ति न-६. तत जर जत जर जत जर तत जर ४४. शीलातुरा १,२,३ चरण वास्य; (७) ४चरण इन्द्रवार पाचवें सर्ग मे-२८१०, माता-१५ चौदहवें सगं मे-३८, गोलस्येसा मे-२८, ४२ सनत्कुमारचफिचरितमहाकाव्ये छन्दनाम लक्षण सर्ग एव पद्याक ज त जर सतरह सर्ग मे-२१,५५,६७,७२,८७, अठारहवें सर्ग मे-५,८,२४,४२,६०. जत जर ज त जर त त जर ४५. वासन्तिका (८) १, २, ३, चरण इन्द्रवंशा; ४, चरण वंशस्थ चौथे सगं में-६२, पांचवें सर्ग मे-२६, ४६% सातवें सर्ग में-१५, ३६; चौदहवें सगं में-२५; सोलहवें सर्ग में-१७, १८, २३, ५६, ७०, सतरहवें सर्ग में-२२, ४१,६४, ६६,६८, ७१, ६०, अठारहवें सर्ग में-४, २१, ४०, ४१, ४३, ५२, ७६, ८१, ८४, प्रशस्ति में-४ त त जर तत जर तत जर ज त जर । ४६. मन्दहासा १, ४, चरण (8) वस्था २, ३ चरण इन्द्रवंशा पांचवें सर्ग मे-२७; सातवें सर्ग में-१७,३१; पाठवें सर्ग मे-८२; सोलहवें सर्ग मे-६, ५४, ७८; सतरहवें सर्ग मे-२०, ८९; अठारहवें सर्ग में-१५, २५, ३४, ५१, ७५. ज त जर त त जर त त जर जत जर ४७. शिशिरा (१०) १,३ चरण इन्द्रवंशा; २,४ चरण वंशस्थ त त ज र दूसरे सर्ग में-३०, पाचवें सगं मे-४०; सातवें सर्ग मे-६; चौदहवें सगं में-३४; सोलहवें सगं मे-८, १४, ७६; सतरहवें सरां मे-६, १५, ४४, ४५, ७६, ८०; अठारहवें सगं में-२६, ३७. ज त जर त त जर जत जर ४८. वैघात्री १, २, ४ चरण वंशस्य; दूसरे सर्ग में-५५; चौथे सगं मे-१७,२८%; ३ चरण इन्द्रवसा सोलहवें सर्ग मे-१२,१३,६१; सनरहवें सर्ग मे-६,३५,३७,८८, अठारहवं सग मे-३,१६, ३१. जत जर जत जर त तबर जत जर १.२ चरण ४६. संखचूडा (१२) दूसरे मर्ग मे-६,२५,५७; चौथे मर्ग -६ पाचवें सगं -४१,४६६१; मात ग- इन्द्रवा;

द्वितीयम्परिशिष्टम् (छन्दोलक्षण-तालिका) ४३ छन्दनाम लक्षण सर्ग एव पद्याक ३,४ चरण वशस्थ त त जस ३३; चौदहय सर्ग मे-३६,४३; सोलह सगं मे-२,३,१५.२४; सतरह सगं मे-२८,४२, ७७; अठारहवें सर्ग मे-६,६,२७,२६,५३. त त जर जत जर ज त जर ५०. रमणा १, ३, ४ चरण (१३) वंशस्थ २चरण इन्द्रवशा दूसरे सगं मे-५४; चौथे सगं मे-७१,८२; पाचवें सगं मे-४२; ससरह सगं में-१२,१४, ३०,४०,५२,६९,७८, अठारहवें सगं मे-८९. जत जर तत जर जत जर जत जर ५१. कुमारी (१४) चरण इन्द्रवशा २, ३,४ चरण वशस्थ दूसरे सगं मे-५; सातवें सगं मे-१६, ८१, सोलहवें सर्ग मे-६, ५६; सतरहवें सर्ग मे- ११, १६, ५०, ७६, ८१, २५; अठारहवें सगं में-५०,७६, ८३, ८७,६१. ततज र ज त जर ज त जर ज त जर अक्षर १३ ५२. महर्षिणी मन जर ग चौदहवें सर्ग मे-१३, १४, १५, १६, १७, १८ १९, २०, २१. चौदहवें सगं मे-२३, २४, २६, २७, २८, २९,३०, ३१. ५३. रुचिरा जम सजग अक्षर १४- ५४. वसन्ततिलका त भ ज जग पहले सगं मे-४४; तीसरे सर्ग -८०, ८१७ सातवें सर्ग मे-३४, नवम पुगं मे-५७, ग्यारहवें सगं में-१३. ५७तेरहवें सर्ग पे-- १२१-१३१॥ पाद्रव्ये वर्ग मे-५२, ५३, ५४, ५५. १५. अपराजिता न न र सलग चौदहा सग्रं में-३२.

४४ सनत्कुमारचमिचरितमहाकाव्ये छन्दनाम लक्षण सर्ग एवं पद्या अक्षर १५- ५६. मालिनी ननमय य - दूसरे सर्ग मे-८५; तीसरे सगं मे-२, ६६ पांचवें सगं में-६२, सातवें सर्ग में-१०५; नवम सर्ग मे-१६, १६, २३, २६, ३६,५१, ५२, ५३, ५४, ५५; दसवे सर्ग मे-७२,७३, ७४, ७५, ७७; ग्यारहवें सर्ग मे-८, ६, १०, चौदहवें सर्ग में-२, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, पन्द्रहवें सर्ग मे-५६, ५७, ५८, ५६, ६०; सोलहवें सर्ग मे-६२, ६५, ६७,६८,७५, उन्नीसवें सगं मे-८३, ८४, १५,८६८७, ५६, ८६, ६०, ६१, ६२, ६३, ६४; तेवीसवें सगं मे-१११, चौवीसवें सर्ग मे-१०१, १०२, प्रशस्ति मे-१३. पन्द्रहवें सगं मे-१०, २०, ३१. ८०, ५७. मरिणगुण. न न न न स निकर (शरभ) नक्षर १६ ५६. वारिणनी न भ भ जर ग पन्द्रह मर्ग मे-४१. पन्द्रहवे सर्ग भे-५१. ५९ ऋपभगज- भर न न न ग विलसित अक्षर १७ ६०. शिखरिणी य म न स भ ल ग ६१. हरिणी न समरसतग चौदहवें सर्ग मे-४२; प्रशस्ति मे-८. दसवें सर्ग में-८७; तेरहवें सगं में-५०; चौदहवें सर्ग मे-६३; सोलहवें सगं मे-६४; उन्नीसवें सर्ग मे-१०२. नवम सगं मे-२७, २८, दसवें सगं में -७६; चौदह सगं मे-५२, सोलहवे सगं में-७७. ६२. पृथ्वो ज स ज स य न ग अक्षर १६ ६३. शार्दूल- विलोडित म स ग सततग पहले सगं मे-८६, तीसरे सगं मे-१३ चौथे सगं मे ९१, छठे सर्ग में-७०., प्राठवें गं मे-६४, ग्यारहवें सगं में-६,७,१५,१६,१७, अठारहवें सगं मे-६४; इमकीरावें सगं मे-२, ६६. १०४, ११०, ११२, चौवीस सर्ग- द्वितीयम्परिशिष्टम् (बन्दोलक्षण-तालिका) ४५ छन्दनाम लक्षण सगं एवं पद्या ३१, ३३, ३४, ३५, ३६, ३७, ३८, ४५, ४६,४७, ४८, ४९, ५०, ५२, ९८, ९९, १०३; प्रशस्ति मे-३, २१, २४. अक्षर २१ ६४. स्रग्धरा म र भ न य य य छठे सगं मे-६४, ६५, ६६, ६७, ६८, ६६, ७१, ७२, ७३, ७४, ७५, ७६; नवम सगं मे- १३, १५, १७, १८, २२, २४, २५,४५, ५६, ५६, ६०, ग्यारहवें मगं मे-२, ३, ४, ५, १२ १४, ५१, ५२, ५५, ५६, ६२, ६३, बारहवें सर्ग मे-७६; सोलहवें सप्रे मे-३७, ४२ ४७, ५५, ६३; सतरहवें सगं मे-६२, अठारहवें सन मे-६५, ६६, ६७, वीस सर्ग मे-१०६ इक्कीसवें सगं मे-१११; वायीसवें सगं मे-६१, ६२, ६३, ६४, ६५. ६६, ६७,६८; चोवीसवें सग मे-३२, ५१, ८०, ११, ८२, २३, २४, ८५, ८६, ६५, ६६,६७, प्रशस्ति मे-१०. १४ १६. २२. अक्षर २७ तेरहवें सर्ग मे-१२२. ६५. चण्डवृष्टि- न न र र र र र र र प्रपातदण्डक अक्षर ३० ६६. प्रणं-दण्डक न न र र र र र र र र चौदहवें सर्ग -१. अक्षर ३३- ६७ अरणंव दण्डक न न र र र र र र र र र चौदहवें सर्ग में-१२. प्रक्षस ३६ ६८. व्याल- दण्डक न न र र र र र र र र र र चौदहवें सां में-२२ ६६. उपचित्र पर्द्धसम छन्द *[१.३] स स स ल ग पन्द्रहवें सगं मे~१, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८.६ *(२.४] भ भ न ग ग *[१.३] अर्थात् प्रपम और तृतीय चरण का लक्षण । [२.४] भात् द्वितीय और पतयं परण का लाए।

४६
सनत्कुमारचक्रिधरितमहाकाव्ये
छन्दनाम
लक्षण
सग एवं पद्याङ्क
७०. वेगवती
[१.३] स स स ग
[२.४] भ भ भ ग ग
७१. हरिणप्लुता [१.३] स स स ल ग
[२.४] न भ भ र
७२. केतुमती [१३] स ज स ग
[२.४] भ र न ग ग
७३. द्रुतमध्या [१.३] भ भ भ ग ग
[२.४] न ज ज य
तेरहवें सर्ग मे-६४, ६५, ६६, ६७,६८, ६६,
१००, १०१, १०२; पन्द्रहवें सर्ग मे-२१, २२,
२३, २४, २५, २६, २७, २८, २९, ३०.
तेरहवें सगं में-६२, ६३, ६४, ६५, ६६ ६७
६८,६९,७०, ७१, ७२.
पन्द्रहवें सर्ग मे-३२, ३३, ३४, ३५, ३६, ३७,
३८, ३६, ४०.
पन्द्रहवें सगं मे-११, १२, १३, १४, १५, १६,
१७, १८, १६.
विषम-वृत्त
७४.
म र य
तेरहवें सर्ग मे-३१.
सभर य
मरय
नयरय

तृतीयम्परिशिष्टम् लोकोक्ति-सञ्चयः कि कृष्णसर्पोऽपि करोति तत्र, स्याद् यत्र शत्रुनकुलः सदपं. । श२० यद्वा पयोधावपि रत्नयोनी, रत्न कियत् कौस्तुभसन्निभ स्यात् । ११२४ रत्नाकरेप्यम्बुनिघौ किया, रत्न प्रतिद्वन्द्वि भवेत् सुधांशो । ११२४ सीमामतिकामति चेत्पयोधि-त्र्तािऽपि का शेषसरस्सु तस्याः । ११८१ ग्रीष्मोष्मसन्तप्तशिलातलस्थः, सरवच्युतो मत्स्य इवातिदीनः । २१८२ व्याघ्रोस्ति पृष्ठे पुरतस्तु दुस्तटो, पानद्वये ज्वालशताकुल. शिखो। महाशनिश्चोद व मघोऽन्धकूपक , क्व सकटे मादृश ईदृशि प्रजेत् ॥ ११८४ यथा तयारमा परिरक्षणीयः १८६ लोकोऽपि तीव्रज्वलिते स्वमस्तके, नवान्यमूद्ध ज्वलनप्रतिक्रिया। ११८७ क्व वा जने स्याद् दृढपञ्चवाण-घुणक्षतान्तःकरणे विवेकः । २१२ तीनोऽपि वन्हिः सलिलेन शम्यते, तच्चेज्ज्वलेत् किं हि तदा निवर्तकम् । कथं च तम श्वसिति ज्वररादित, सञ्जीवनी यत्र विपाय कल्प्यते ।। રારૂ तुलां समारोहति जीर्णतन्तुना Rાદ कलङ्कधामापि तुपाररश्मिः, कुमुद्वतीनामिव माननीयः । २।२३ सा प्राह किं तेन सुकुण्डलेन, यत्त्रोटयत्यद्भुतलम्बकर्णम । २।२३ तदा महाजीणंविपाकशफया, भोक्तु न युज्येत कदापि पायसम् । २१३२ स्थैर्य व वा स्त्रीपु विचक्षणास्वपि २।३३ रजोभिरुत लयति स्म गाय, स्नात्वा यथा मत्तगजः करेण । २०६१ क्व वा भवेत्तत्वविचारदृष्टिः, कामिष्वदृष्टिस्विव वामगेपु । २०६७ घपंप्रकन्निनु चन्दनादप्युद्गच्छति स्फारशिख. शिखावान् । २।७२ कार्याणि यत्साहसनिमितानि, प्रायोऽनुतापाय भवन्ति पश्चात् । २०७३ स्वार्थाय किं किं हि न कुयुरङ्गनाः २०७४ वाइमानदानेऽपि पराङ्मुखी किम्, प्रियेऽधुना स्निग्धतमापि पूर्वम् । गोर्जातु मुग्धार्भकदुग्धमात्रा-पणे दरिद्रा न हि कामदोग्ध्री। ३३२ सुधारमच्छिमतपो हि पुस , सक्ति. कथ पल्वलवारिणि स्वात् । ३१४५ न दावसानिध्ययुजो हि वृक्षा., फलन्ति पुष्टा अपि मूलबन्धः। नापप्रमाये युधि जातु जाते, किं कुरुग्रा प्रपि शेपसैन्याः । किं क्वापि कौक्षेयकतीक्षणधाराः, सुव्यापताश्देवपराङ्मुना स्थः । स्वाई जना नानुभवन्ति कञ्चिदुप्ट्रा इवाऽनमपल्लवस्य । ३1० नायलभाजा पवचिदिष्टसिद्धिः । ३१७१ न वह निरूविलने सहायं, समीहते होन्धन रहेतिः । ४१८ निषेवरी को हि सुधा न विज्ञो, विषस्य हानादिह जोषितापी । ४१२३ ४८ सनत्कुमारचकिचरितमहाकाव्ये ४१५३ ४८१ ४१८२ ४१८८ ४१८६ ५३ ५६ ५।१० ५।१३ ५॥१६ ५।१८ ५।२१ ५।२२ ५।२३ ५।२४ न देन्यमालव्य कदापि सिंहः, प्रकल्पयेत् स्वस्य शरीरयात्राम् । नाङ्गारवृष्टि विदधाति कान्तं, कदापि यच्छीतमयूखविम्बम् । यतोऽतिमुग्वाप्यनुवर्तते विभु, राज्ञोऽनुवृत्ती तु जनस्य का कथा । चूडामणिः किं चरणे निवध्यते, निजाङ्गनागोमयसवरेऽथवा । वश्णपि राज्ञा नहि जातु कोविदा, मुद्राभिद: स्यु. प्रभवोऽपि कुत्रचित् ॥ त्वमेव तावत् परिचिन्तयेदं, किं पद्मकोपे विनिवेश्यतेऽग्निः । विशस्यते कामदुधा दुहाना, गृहागता कामशतानि किं वा ।। शत्री च मित्रे च समा हि सन्तः, सूर्याशवो वारिणि तेजसीव । अहो सुधाय मथिते पयोषावुदैतदेतत् फिल कालकूटम् । विलोडितेऽप्यम्बुनिधी सुरत्ने, पराप हालाहलमेव शम्भुः । अङ्गोचकाराऽपि निजाङ्गभङ्ग, विपद्यनुढे गधना हि घोर. । प्रिया हि गृध्रस्य परेतभूभिः । मेरुन सर्गान्तनिरगलोद्यद्वाताभिघातेऽपि सवेपथुः स्यात् । वृहस्पति न ग्रसते कदाचिद्, विधुन्तुवश्चन्द्रमसा विराद्धः । न शल्यमन्तः कुथितं विनाऽऽप, मृत्युं हि विश्राम्यति कालपाके । विराद्धदर्वीकरतः किलाखोल्माऽवलोपात् कुशलं कियद्वा । कि दुविनीतास्तुरगाः सकृत्स्युः, कशाप्रहारप्रचयम्य पात्रम् । कल्पद्रुमस्कन्धकुठारपातः, कि कस्यचित्तोपविशेषकृत् स्यात् । कर्णामृतस्यन्दिवचःप्रदान, पुस्कोकिलं शिक्षयतीह को वा। आलम्बन नैव करा. सहन , सहस्रभानोः पततः प्रदोपे । विना विघु को हि नभोविभूपण-क्रियाविनिर्माण कलाविचक्षणः ।' मृगाः कथं सिंहपराक्रमा: स्युः। परोपकारप्रवरणा हि सन्तः। कुर्वन्ति किं कृत्यविदः कदाचिदौचित्यभङ्ग व्यसनेऽपि धीराः। किं चन्दनः स्वाङ्गपरिव्ययेण, प्रमोददायी न भवेज्जनध्य । कि चम्पकाचञ्चलगन्धपात्र, तत्सङ्गत स्वादुतिला न हि स्यु. को वा हितार्थी कुपिताहितुण्डं, चण्ड परिस्प्रष्टुमिहाद्रियेत । अवश्यसम्वेद्य फल हि कम, न कारयेत् कि किमिहाङ्गमाजाम् । सम्भोग भङ्गिष्वपि तत्प्रहारा न निर्दया अप्यभवन वधूनाम् । दुखाय कि चण्डस्चेभवन्ति, विपो नलिन्या: परितापदाय ।। को वा वने स्फूर्जति भर्तुराज्ञा • विलवन भृत्यवरः सहैत । रुच्यं न यत् स्यावशन कदापि, स्वादप्यहो सल्लवरण विनेह । होणेऽय रज्जाविव मृत्युप-प्रपातसाम्मुख्यमसो प्रपेटे। फालुप्यमावत्वमुपैति वर्षास्वपि प्रसन्न किमु मानस वा। प्राय.क्षये वायुविधूतन्तवन्ध स्थिर किं पुसुम भवेद् वा। स्पी हि फि किं न विधापयेद्वा । कि वाऽमृतं याति न जातु सत्य, स्वर्ण विवाहेऽपि यदाययातम् । ५।३३ ५।३५ ५.३६ ५१४२ ५।४३ ५१४७ ५.४८ ५॥६५ ५1८४ ५.८६ ६९ ६.१५ ६.१८ ६॥२० दा२२ ६१२३ तृतीयम्परिशिष्टम् (लोकोक्ति-सञ्चयः) ४४ ६०४६ दा४७ ६७५ ८.६२ ८.६६ दा७० दा७२ ८.७३ पा७४ पा७६ दा८६ मनाप्तकालुष्यमहो यदच्छा-स्वरूपं जलदागमेऽपि । अशुदसङ्गऽपि विशुद्धता स्याद, या सा शुचित्यस्य परा हि काष्ठा ।। साधारणाप्नैव हि हेतुमानाद, भवेदसाधारणकार्यसिदिः । माता हयपत्येषु कदापि दृष्टा, नावत्सला स्तन्यरस पिवत्सु । किं वाध्यत्व भजेताऽमृतरस उचितत्वेन पीतः कदाचित्, किं वा स्यात् कल्पवृक्षः पचिदपि विफलः सेवितः सन्नजनम् ॥ न लभ्यते स्वर्णमहो सुगन्धि, सन्न दमूत्तिभृगनायको वा साशनं प्रावपि नर्तन चानुशिष्यते केन नवः शिखण्डी। कामोऽपि दुरितरः पिशाचः, क्रोषोऽपि योधः समदो बलीयान् । नाध्वंसिते सतमसे प्रकापाः, प्रवदयते यद्भुवि भानुनाऽपि । न कार्यसिद्धियंदकारणा स्यात् । न जातु लब्धप्रसरो भुजङ्गः, क्षेमाय कस्यापि महाविष: स्यात् । कर्णेजप: के धियते सकणेः। उच्चैःपदाय स्तनपीठशय्या, हारोऽपि नाप्नोति गुणावपृक्तः। समुम्मिमील स्वत एव तत्र, शृङ्गारयोनिजनमानसेपु । सरस्सु पद्मोघ इव स्वभावो, नापेक्ष्यते कारणमङ्गवाह्यम् । कियत्तिष्ठन्ति पनानि प्रफुल्लानि दिनात्यये । अन्जानम्वेषणे का हि भास्करस्यापि मित्रता। तच्चितामधिरोहामि वीरपत्नीव निधंवा । प्रेम्णः किं वाऽस्ति दुष्करम् । दरिद्रस्य गृहे चिन्तारत्न दृश्येत केन वा। मथिनो हि मनोऽभीष्टे युक्तायुक्तविवेचकाः। माऽभूद् वियोगः कस्यापि केनचिच्चित्तहारिणा। दुर्दिने किमदष्टान्जस्तेजसो होयते रविः। समयज्ञा हि सदियः। क्व वा चण्डेषु मादवम् । जगन्तीव सरासीह यत्र नोज्झन्ति सैरिमाः। मलिना दुयंशःपुजाः कुकवोनामिव क्षणम् । मत्यथिनो हि नाकाल' कोऽपि स्वार्थप्रवर्तने । घोरा हि न विषीदन्ति सादहेतो महत्यपि । नाऽपिन कोऽप्यगोचरः। सध्या तुन्दसमोहितोऽपि जगति प्रायेण को नि.स्पृहः । विनिमग्न त्यजस्वसेव्यं, प्रोडाऽपि नो लुब्धमलीमसानाम् । यद् राजा दुबंधान बलमिति विलसत् पक्षपातोवलातु । प्रतिमतिपना हि पोराः। फलस्येव महाक्षेत्रे कुपोरल यादरात् । ६७ १०।१३ १०।१४ १०।१७ १०॥४२ १०७५ १०१४६ १०॥४८ १०१४६ १०1५८ १०१५९ १०.६५ १०१७ १०1" १०॥८१ २१॥ ११४१२ १२०१० सनत्कुमारचमिचरितमहाकाव्यम् L ११०६० ११८२ १९८२ १२।२ १२।१३ १२११८ रवेरभावे तद्भापि प्रातः स्याद् दृष्टिनन्दिनी । क्षीराधि कि क्वचिन्माति क्षपाकरसमुद्गमे । क्व वा तापो हिमोदये। न कदाचिच्छिलापट्ट सम्भवोऽम्भोव्हस्य यत् । क्षणमप्यासते यन्न तिमयः सलिल विना । अप्रकाशा हि न मुदे रूपवत्यपि नत्तंकी। कस्य न श्रूयमाणोऽपि भवेदानन्दकन्दलः । वसन्ते पञ्मोद्गारहारीव पिकनिस्वनः ।। कस्म वा स्यात् स्थिरा लक्ष्मी: कल्लोलसहवासिनी । लम्वा गदो विपी देत् कः, सकर्णो व्याधिपीडितः । असाध्यमवास्ति न किञ्चिदुद्यत्पुण्याधिराजस्य समुद्गतस्य । निरुपधिप्रणयामृतसिन्धवो, जगति नाम भवन्ति हि सज्जनाः । नगरमप्यधिकं तदरण्यतो, भवति यत्र न सम्मतसङ्गमः । न हि सीदन्ति सुभृत्या विदितस्वामीङ्गिताः कार्य। शर्कराऽपि कटुरेव पित्तले । त स लोचनगतं विलोकितु, नाऽक्षमिष्ट गरुडं फणी यथा । शैलेन्द्र हि प्रोन्मदस्य द्विपस्य, प्रौढोऽपि स्याद् दन्तभङ्गाय घातः । किं नाग: स्यात् तायक्षेपी। वचनेन किमुद्वति फल्गुना, न हि जयन्ति परान् पटहस्वनाः । यदि बालतणेपु मृगो बली, मृगपति किमु हन्ति कदाचन । न च मूषिकवर्गपराजयी, जयति दन्तिनमुन्मदफेरवः । चरणकोऽतिसमुच्छलितोऽपि किं, दलयति स्थपुटं पृथुभजनम् । दिवि दीषितिकोटकदीधितिः, किमु पराजयते दिनकृत्प्रभाम् । अतिवाल इव त्वमपि स्फुट, दृढफले दशनाय समुद्यतः । द्रुतमाप्स्यसि चान्तरमायसे, चरणकखण्डनपण्डितदन्तकः । न तयापि वचोऽपि मनस्विना, श्रयति देन्यमनन्यसमोजसाम् । प्रलयेऽपि दघाति किमम्मर, कठिनतामुपलप्रयोचिताम् । असह रविरश्मिठतेरपि, श्रयति करवमग्निचयं न हि । न प्रतीकारे तुच्छा, भवन्ति कुत्राऽपि विपुलेच्छाः । निजजातिपक्षपाती, विलसति साम्येऽपहो प्रायः । न जये पराजये वा, चिन्तास्वार्थी हि सोऽपि । फस्य सुखाय हि सज्जनपातः । पशव. सफला न गाला, भूमिहा अपि न ह्य स्वूकाः । सिंहः सुप्तो विवोषितः, रिपोतेन बलाज्जिगोषया। नानस्तमिती धर्ममरीचिजगदुतापकता परिजयात् । कि वा विकारमुपयाति पयोधिनायो, गाम्भीयंमाग गुस्तरङ्गभरेऽपि जातु । १२।३२ १२।६२ १२१७० १२।७८ १३६१ १३।३ १३।२० १३१२६ १३।२७ १३१४० १३।४७ १३१६४ १३३६५ १३१६६ १३.६७ १३०० १३१७१ १३।७४ १३७ १३१६ १३१६ १३३१०२ तृतीयम्परिशिष्टम् (लोकोक्ति सञ्चय ) १४।१४ १४११६ १४.३१ १४।३२ १४३३ १४।३८ १४.४४ १४.५० १४१६० १४१६२ १५॥ १५।३० उपकृतिविदुरयंद् गण्यते नाऽपकारः। गावो वा किमु विरमन्ति शीततोयात, तृष्णार्ता कयमपि मानस पराप्य । माधुर्य पयस इवाऽपि वाग्मिनाथः, को वाऽल भुवि महतां गुणाभिघायाम् । बव वा स्थितिः शिखिनि कटे फटावत । कलयति हि न क कृतान्तमहाभट , स्वसमयवशत: समयं शिरोमणिः । पत्युविपक्षानुगमो हि दुस्सहः । मृगाधिराजे पतितेऽपि यन्मगाः, सद्यस्तदासम्नचरा भवन्ति नो। क्व का सुदुश्चारिपु लौकिकी स्थितिः । शुद्धान्तिके दृष्टिविघातकत्वं, नाशुद्धिमाजोऽपि विजृम्भते यत् । जहात्मनि स्फूर्जति साध्वसाध्वोः, क्व वा विशेष प्रयते स्फुटोऽपि । तथाऽभिरामेऽपि न शीतरश्मो, स्मितानना पकजिनी व भव सूर्यप्रिया का दयितान्तरे स्यात्, पतिव्रता जातु सहासवृत्तिः । क्षरति प्रमदासु हि रागवान्, किं न करोग्यतिनिन्धमपोह । दुष्टजनस्य हि साघुविषङ्गोऽप्यफल इतीव दिशत्यनुविश्वम् । सर्वपदार्थविभासिदिनेशोदयहतदृष्टिनि कोशिकवृन्दे । सममस्त भवन्ति महान्तो, ह्यथितवस्तुनि न प्रतिकूलाः । कान्तवस्तुन्यकान्तोऽपि कान्ति दघात्येव सम्पूर्णचन्द्रे यथा लाञ्छनम् पण विना रलमिहाप्यते न हि। कि वा न सर्वस्य मुदे महात्मनाम् । शिशून् समाश्वस्तहृदो नयेत कः, कृतान्ततोऽन्यः परलोकपतिम् । मरीचिकास्वम्बुमतियंया मरो। न दनि विश्वासमुपैति तात्विके, दुग्धेन दग्यो वपदशको यया । क्व दुगंतस्योकसि कल्पशाखिन , शाखा फलेद्वाऽकृतपुण्यफर्मणः । के वा गुणाढया न भवन्ति भाजन, पुरस्त्यिाया मणिमालिका यपा। साघोः कथञ्चित् पिशितोपयोगतोऽप्यस्य्नो विवन्ध. किमु युज्यते गले । फलन्ति किं न वाऽचिन्त्यप्रभावा ननु कल्पवल्लय. । किं वा न कुर्वन्ति हि दुलभार्थिन. । कार्यकनिष्ठातिपटिष्ठबुद्धयो, दक्षा भवन्ति व्यसनेऽपि नाता। दष्टे हि चन्द्र न पदापि शकते. सुधोविपति फो निरागमे । मास्वादिते व्याधिहरे रसायने, कि तिष्ठति क्याप्युदरस्य वेदना । न पत्वलाम्भो भुपि माति अचित्, स्वल्पेऽपि वायुदय नया । मानन्दन. पिकुलस्य सेन प्रेत नत्याय नप पयोदे। तद्गाः मोपरि दावदाह स्फोटस्फुटा नूनमनायतायाः । निर्मानाने दिनुः पयोधो, पारियतिस्तत्र पारसम्म मी स्वितिय रहाणे नन्द्रमपि न ! मगे.. को मापाय, गटार युदलपति प्रसा। १६३ १६.५२ १६.५४ १७.४ १७.५ १५1८३ १८.२३ ts૨૨ १८.३३ १८18 तु 1८1" १८.५७ ५२ सनत्कुमारचक्रिवरितमहाकाव्यम् १८७३ १८१८० १८ाम १९९१ १६६२ १८९३ १८९५ १८१६६ १९१३ १६।१४ १६।२५ १९२६ १९२८ १९।२९ को वा न नन्दत्यभिवाञ्छिते श्रुते, ध्वनी धनस्येव शिखण्डिमण्डली । स्युः सर्वदा कालविदो विचक्षणाः । मनोरयाः प्राणिगणस्य चान्यथा, दुर्दग्धदेवस्य च वृत्तिरन्यथा । न होन्दुविम्बे भवतोऽमृतानली, गतिविचित्राऽशुभकर्मणोऽथवा । सेव्यो हि वह्निाहदाहदाय्यपि । प्रियाननुज्ञातमतिप्रिय चेत्. तथापि कुर्वन्ति न दक्षिणा यत् । प्रायः पुण्यानुसारादिति भवति शुभं सत्त्वभाजा समस्तं । किंवा चिन्तामणी स्यान्न वशगमवनी पाणिपद्मावगाडे । धनी क्रीडति को व्यालेनाऽवालः कालसाक्षिणा। दुराचार नर हन्तु कृतान्तः किं विलम्बते । अग्रसूचीविनाशे हि ताले किमवशिष्यते । इतः परिभवान्नान्या पराभूतिगरीयसी । छिदाति वाधिका देहे का हि मूद्ध च्छिदोऽपरा। सूर्योदयस्य कि साध्यं तमस्काण्डक्षति विना । घरं कक्षो वरं लोष्ठो वरं तूलं वरं रजः । न तु वैरपतीकारामावनिष्फलपौरुषः । शेषशीपमणिप्रख्यः किं धनैः किं पराक्रमः । परामवपराकान्त व्यते यत्र मानवः । न दीप्येरन् मरी वायुसखा इव दवानला: । प्रकृतिस्थं पयो जातु न दाहाय प्रगल्भते । अपि पत्र पयोजस्य सत्य कोऽनुपालयेत् । न हि दीपशिखालोले पतङ्गे प्राणितस्थिति।। दूतः किलाsवव्य इति प्रसिद्धः। न कलुपनदीपातरधिविकारमियत्ति यद् । क्व वाऽमपंवता वृत्तो विमर्शः साध्यसाधकः । डमरोडमरारम्भ क्य वा शान्तिविज़म्मते । वृद्ध निरुध्यमानोऽपि सव्यरसीन यानतः । स्वाग्रहात् कृष्णमृगवदलष्या भवितव्यता । सन्तो हि सदयस्यानुवर्तिनः । प्रयाणाय न कालज्ञाः स्वामिकायं उदासते । प्रोतुना नाश्यते वहीं यदाशीविपन्दहा । स्वाङ्गन हि वेदना। स्यात् परस्य यदतीवशुद्धता, काञ्चनस्प शिखिसंगमे यया । कि वहन्ति मरकूपददुराः। व्यर्थमादधाति दुग्धवश्चिता काजिकेऽपि रमते मिकप्रिया । हस्तग प्रकटदीप्रकरणे, को हि दर्पणपती प्रपस्यति । १६२१ १९३८ १६।११ १९६५ १९६८ १९९५ ११.२ २०१५ २०११२ २०२० २०३० २०४७ २१७ २२।२४ २३११४ २३१५

तृतीयम्परिशिष्टम् (लोकोपित-सञ्चय
कोऽप्रियश्रवणतो हि तुष्यति ।
यौवत हरति कामसूकरस्यात्र मानसमहो विपर्ययः ।
तरहनिशमिह ग्रहैरिव, अस्तशस्तवपुषः कुतः सुखम् ।
किं प्रपीय हि सुधा सुघाभुजः, प्रीतिमादधति पल्वलाम्मसि ।
को हि वासुकिफणामणि स्पृशेदह्रिणा सघृणधीः स्वजीविते ।
प्रार्थिता न विमुखत्वमादधत्युन्नतप्रकृतयो हि कुचित् ।
किं विदग्बतरणीपतिव्रताश्चित्रिणः समदनान्निरीक्षते।
किं हि जम्बूकवधे यशो हरेरित्यमापत मुनिर्विरक्तधीः ।
किं भवेद् द्विरदकुम्भपाटने पाटषप्रकाटन क्वचित् कपः ।
किं न याति सुकुमारतां दृषच्चन्द्ररुपरिचयाद् घनापि हि ।
२३३७३
२३७६७
२३१६८
२४१४
२४१५
२४/७
२४॥२१
२४७३
२४१७७
२४18

चतुर्थम्परिशिष्टम् महाकाव्यस्थ पात्र-सूची पुरुष-पात्र अग्निशमा प्रतिवेग प्रशनिवेग प्रश्वतेन असितास यक्ष = किरगवेग नागदत्त का जीव, त्रिदण्डी, सनत्कुमार का प्रतिद्वन्द्वी विद्यावर राजा रत्नपुराधिपति. विद्याघरो का राजा, सनत्कुमार का प्रतिद्वन्द्वी हस्तिनापुर का राजा सनत्कुमार का पिता यक्ष, सनत्कुमार का प्रतिद्वन्दी, नागदत्त का जीव विद्याधर राजा सनत्कुमार का उपकारी, यक्ष गुह्यक वक्ष चण्डवेग चन्द्रसेन चित्रवेग जयन्तक जिनधर्म दुर्मुख देवय नागदत्त पवनगति नानुवेग महावेग महेन्द्रसिंह विक्रमवशा विद्युवेग पिनयन्धरसुरि वैजयन्त বানি उनत्कुमार मुनानु दुराष्ट्र विद्याधरकुमार, भानुवेग का पुत्र विद्याधर राजा ब्राह्मणरूपधारी देव रत्नपुर का श्रेप्ठि, सनत्कुमार का पीव अशनिवेग का दूत वद्यरूपधारी दो देव काञ्चनपुर का श्रेष्ठ, विष्णुत्री का पति विद्यावर राजा विद्याधर राजा, सनत्कुमार का श्वसुर, संगमपुरी का राजा अशनिवेग का पुत्र विद्युवेग का माई सनत्कुमार का मित्र, मत्री नूर का पुत्र कंचनपुर का राजा, सनत्कुमार का जीव प्रशनिदेग का पुष, व्यावली का नाई जनाचार्य, सनरकुमार के दोला-गुरु ब्राह्मणरूपधारी दव विश्वेग का मामा महासभ्य का नायक, अश्वन का पुत्र विद्यापर राना मारे नगर का राजा, सुनन्दा का पिता, नरकुमार का वर

चतुर्थम्परिशिष्टम् (महाकाव्यस्य पात्र सूची)
५५
मुव्रतसूरि
सूर
सौधर्मेन्द्र
जैनाचार्य, विक्रमयशा (सनत्कुमार का जीव) के दीक्षा गुरु
हस्तिनापुर के राजा अश्वसेन का मयी, महेन्द्रसिंह का पिता
सनत्कुमार का जीव, देवलोक का अधिपति
सौधर्म देवलोक का इन्द्र
विद्याधर कुमार, चण्डवेग का पुत्र
हरिचन्द्र
स्त्रीपान
चद्रियशा
'प्रष्टराजकुमारिया= भानुवेग की पुत्रिया, सनत्कुमार को पत्निया
कालिन्दी
महेन्द्रसिंह को माता
सुनन्दा को माता, सुराष्ट्र की रानी
बकुलमति भानुवेग की पुत्री, सनत्कुमार की पत्नी
विष्णुश्री नागदत्त की पत्नी, विक्रमयशा को प्रेयसी
सहदेवी
सनत्कुमार की माता, अश्वसेन की रानी
सध्यावली अशनिवेग की पुत्री, सनत्कुमार की पत्नी
सुनन्दा
सनत्कुमार को पत्नी, साकेतपति सुराष्ट्र की पुत्री

Sanat Kumar Chakrichit Mahakavyam

Author
M. Vinay Sagar
Title
Sanat Kumar Chakrichit Mahakavyam
File name
Sanat Kumar Chakrichit Mahakavyam
Text
OCR done
Published
2010/01
Publisher
Jodhpur.,rajasthan Prachyavidya Pratisthan
Language
Sanskrit
Pages
384
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
DLI number
327458
Barcode
99999990003047.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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