Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Shatrasamasprakaranam
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क्षेत्रसमास प्रकरणम् ॥ १।।- । ॥ श्रीरबशेखसूरिमणीतं ॥ ॥ लघुक्षेत्रसमासप्रकरणम् ॥ '- वीरं जयसेहरपय-पइडिअं पणामिऊण सुगुरुं च । मंदु त्ति ससरणहा, खित्तविआराऽणुमुंछामि ॥१॥ जगतना मुकुट सरखा स्थाने रहेला श्रीवीर भगवंतने अने जयशेखरसूरिनी पाटे बेठेला मारा गुरुने नमस्कार करीने ९ मंद- बुद्धिवाळो छु तेथी मारा पोताना स्मरणने अर्थे क्षेत्र संबंधि विचारना अणुओने ( कणोने) वीणुं छु १. तिरि एगरज्जुखित्ते, असंखदीवोदही ऊ ते सव्वे । उद्धारपलियपणवीस-कोडिकोडि समयतुल्ला ॥२॥ एक रज्जु प्रमाण ती क्षेत्रमा असंख्याता दीप अने असंख्याता समुद्रो छे, ते वन्ने मळीने पचीस कोडाकोडी सूक्ष्म उद्धार पल्योपमना समयो जेटला छे २. कुरुसगदिणाविअंगुल-रोमे सगवारविहिअअडखंडे । वावण्णसयं सहसा, सगणउई वीसलक्खाणू ॥३॥ । देवकुरु अथवा उत्तरकुरुक्षेत्रना सात दिवसना जन्मेला वेटाना एक अंगुल प्रमाण रोममां सात चार आठ आठ खंड कर्य छते वीस. लाख सत्ताणु हजार एकसो बापन रोमखंड थाय ३, क - प्रकरणम् क्षेत्रसमास ते ॥ २ ॥ ॥ २ ॥ पल्लेवि हु, संखिज्जा चेव हंति सव्वेऽवि । ते इकिक असंखे, सुहमे खंडे पकप्पेह ॥४॥ थूला ए रोमखंडो वादर छे, कारंणके पल्यमां पण ते सर्वे मळीने पण निश्चय संख्याताज होय छे, तेथी ते वादर खंडोमांना दरेकना असंख्यात असंख्यात सूक्ष्मखंड करो ४. सुहुमाणुणिचियउस्से-हंगुलचउकोसपल्लि घणवट्टे । पइसमयमणुग्गह-निटिअम्मि उद्धारपलिउत्ति ॥५॥ सूक्ष्मरोमखंडोबडे भरेलो जे उत्सेधांगुलना प्रमाणथी चार गाउमो घनवृत्त कूचो तेमांथी पतिसमय एकेक रोमखंड काढतां ज्यारे ते खाली थाय त्यारे ए रीते सूक्ष्म उद्धारपल्योपम थायः ५. पढमो जंबू बीओ, धायइसंडो अ पुक्खरो तइओ। वारुणिवरो चउत्थो, खीवरो पंचमो दीवो ॥६॥ घयवरदीवो छटो, इक्खुरसो सत्तमो अ अहमओ। गंदीसरो अ अरुणो, णवमो इच्चाइअसंखिज्जा ॥७॥ पहेलो जंबूद्वीप, चीजो धातकीखंड. त्रीजो पुष्करद्वीप चोथो वारुणी द्वीप, पांचमो क्षीरवर द्वीप ६. छटो धृतवर द्वीप, सातमी इक्षु रस द्वीप, आठमो नंदीश्वर द्वीप अने नवमो अरुणद्वीप इत्यादि असंख्याता द्वीप छे ७. सुपसत्थवत्थुणामा, तिपडोआरा तहाऽरुणाईया । इगणामेऽवि असंखा, जाव य सूरावभास त्ति ॥८॥ अति उत्तम वस्तुओना नामे नामवाळा, तथा अरुणद्वीपथी प्रारंभीने त्रिप्रत्यवतारवाळा, अने एकेक नामना पण असंख्याता एवा द्वीप सूरावभास द्वीप सुधी छे ८.
प्रकरणम्
क्षेत्रसमास
॥३॥
तत्तो देवे नागे, जक्खे भूए अ सयंभुरमणे य । एए पंच वि दीवा इगेगणामा मुणेयव्वा ॥९॥
वारवाद देवद्वीप नागद्वीप यक्षद्वीप भूतद्वीप स्वयंभूरमणद्वीप ए पांचे द्वीपो एकेक नामवाळा जाणवा ९.
पढमे लवणो बीए, कालोअहि सेसएसु सव्वेसु । दीवसमानमया जा, सयंभुरमणोदही चरमो ॥१०॥
पहेले द्वीपे लवणसमुद्र, बीजे द्वीपे कालोदसमुद्र, शेष सर्व द्वीपोमां द्वीप सरखा नामवाळा समुद्रो छे ते यावत् छेल्लो स्वयंभूरमणसमुद्र सुधी.
चीओतइओ चरमो, उदगरसा पढमचउत्थपंचमगा। छट्ठोऽवि सनामरसा, इक्खुरसा, सेसजलनिहिणो ॥११॥
वीजो समुद्र त्रीजो समुद्र अने छेल्लो समुद्र ए त्रण समुद्र स्वाभाविक पाणी सरखा रसवाळा-स्वादवाळा छे, पहेलो समुद्र, चौथो
समुद्र, पांचमो समुद्र अने छठ्ठो पण समुद्र पोताना नाम सरखा रसवाळा छे, अने शेष सर्वे समुद्रो इक्षु-शेलडीना रस सरखा रसवाळा ळे ११.
जंबूद्दीवपमाणं-गुलजोअणलक्खवट्टविक्खंभो । लवणाईया सेसा, वलयामा दुगुणदुगुणा य ॥१२॥
जंबूद्वीप प्रमाणांगुलवडे एक लाख योजनना वृत्तविष्कंभवाळो छे, अने लवण समुद्र आदि शेप सर्व समुद्र अने द्वीप वलयना
आकारे छे, अने उत्तरोत्तर वमणा बमणा विस्तारवाळा छे १२.
वयरामईहिं नियनिय-दीवोदहिमज्झगणियमूलाहिं । अठ्ठचाहिं वारस-चउमूलेउवरिरुंदाहिं ॥१३॥
वित्थारदुगविसेसो, उस्सेहविभत्तखओ चओ होइ । इअ चूलागिरिकूडाइ-तुल्लविक्खंभकरणाहिं ॥१४॥
क्षेत्रसमास . ॥ ४ ॥ प्रकरणम् गाउदुगुच्चाइ तय-भागरुंदाइ, पउमवेईए । देसूणदुजोयणवरवणाइ परिमंडियसिराहिं ॥१५॥ वेईसमेण महया, गवक्त्वकडएण संपरित्ताहिं अट्टारसूणचउभत्त-परिहिदारंतराहिं च ॥१६॥ अठ्ठचचउसुवित्थर-दुपाससकोसकुड्डदाराहि । पुव्वाइमहडियदेव-दारविजयाइनामाहिं ॥१७॥ नाणामणिमयदेहलि--कवाडपरिघाइदारसोहाहिं । जगईहि ते सव्वे, दीवोदहिणो परिख्खित्ता ॥१८॥ • वज्रमय एवी तथा पोतपोताना द्वीपसमुद्रमा गणायो छे. मूळनो विस्तार जेनो एवी, तथा आठ योजन उंची तथा चार योजन मूळमां विस्तारवाळी अने चार योजन उपर विस्तारवाळी एवी १३. तथा वे विस्तारनी वादवाकी करीने उंचाइबडे भागतां जे जवाब आवे तेटली हानी अने नेटली वृद्धि थाय, ए रीते चूलिका पर्वतो अने शिखरोना विस्तारना जे गणित ते समान छे विस्तारनुं गणित जेनुं एवी १४. तथा वे गाउ उंची अने तेना आठमा भाग जेटला विस्तारवाळी, एवी जे पद्मवरवेदिका अने कंइक न्यून वे योजनना विस्तारवाळां वे उत्तम वन ते वडे शोभित छे शीर्पभाग जेनो एवी १५. तथ। वेदिका समान मोटा गवाक्षना वलयवढे सर्व बाजुथी वीरायली तथा परिधिमाथी अढार बाद करीने चारवडे भागतां जेटला योजन आवे तेटला योजन चार द्वारोनुं परस्पर अन्तर छे जेमां एवी १६. तथा आठ योजन उंचा चार योजनना विस्तारवाळां अने वे वाजुए एकेक गाउ जाडी-विस्तृत भित्तिवालां चार देवद्वार छे जेमां तथा जेनी पूर्वादि चार दिशाए चार महर्द्धिक देवोनां जे चार द्वारो छे ते देव अने द्वार ए वन्नेनां विजय आदि तुल्य नामो छे जेमां एवी १७. तथा अनेक प्रकारना मणिरत्नोना उंबरा कमाड अने भोगळ विगेरे जे द्वारशोभा ते सहित एवी -
क्षेत्रसमास
॥ ५ ॥
प्रकरणम्
॥ ५ ॥
-
जगतीभोवडे ते सर्वे द्वीपसमुद्रो वीटायला छे. १८
वरतिणतोरणज्झयछत्त-वाविपासायसेलसिलवट्टे । वेइवणे वरमंडव-गिहासणेसु रमंति सुरा ॥ १९ ॥
उत्तम तृण तोरण ध्वज छत्र वावडीओ प्रासादो क्रीडापर्वतो अने महाशिलाओवाळा वेदिकाना [वे बाजुना] वनने विषे रहेला
उत्तम मंडपो गृहो अने आसनोमां देवो रमणक्रीडा करे छे. १९
इह अहिगारो जेसि, सुराण देवीण ताणमुप्पत्ती। णियदीवोदहिणामे, असंखइमे सनयरीसु ॥ २० ॥
अहीं अढी द्वीपमा जे देव अथवा देवीओनो अधिकार [अधिपत्य] छे ते देव अने देवीओनी उत्पत्ति पोतपोताना द्वीपसमु-
द्रना नामवाळा असंख्यातमा द्वीपसमुद्रमां अने पोतानी नामवाळी नगरीओमां छे. २०
जंबूद्दीवो छहिं कुल-गिरिहिं सत्तहिं तहेव वासेहिं । पुत्वावरदीहेहि, परिछिन्नो ते इमे कमसो ॥ २१ ॥
जंबूद्वीप पूर्व पश्चिम दीर्घ एवा छ कुलंगिरिओवडे तथा सात क्षेत्रोवडे बहेंचायलो छे,ते कुलगिरिओ तथा क्षेत्रो अनुक्रमे आ प्रमाणे छे.२१
हिमवंसिहरीमहहिम-वरुप्पिनिसढोय नीलवंतो य । बाहिरओ दुदुगिरिणो, उभओ वि सवेइया सव्वे २२
लघुहिमवंत अने शिखरी, महाहिमवंत अने रुक्मी तथा निषध अने नीलवंत ए प्रमाणे वे वे पर्वतो बहारथी गणवा, अने ए
सर्वे पर्वतो बन्ने बाजुए वेदिका सहित छे. २२
भरहेरवय ति दुर्ग, दुगं च हेमवयरण्णवयरूवं । हरिवासरम्मयदुर्ग, मज्झि विदेहु त्ति सग वासा ॥२३॥
क्षेत्रसमास प्रकरणम् ॥ ६ ॥ भरतक्षेत्र अने ऐरावतक्षेत्र ए वे क्षेत्र हैमवत अने हिरण्यवत ए वे क्षेत्र तथा हरिवर्ष अने रम्यकक्षेत्र ए वे क्षेत्र अने महावि- देह,. ए सात क्षेत्रो छे. २३ दो दीहा चउ वद्दा, वेअड्डा खित्तछक्कमज्झम्मि । मेरू विदेहमज्झे, पमाणमित्तो कुलगिरीणं ॥ २४ ॥ बे दीघ वैताढ्य अने चार वृत वैताढ्य छ क्षेत्रमा छे, अने महाविदेहना मध्यमां मेरु पर्वत छे. हवे कुलगिरिओनुं प्रमाण कद्देवाय छे.२४ इगदोचउसयउच्चा, कणगमया कणगरायया कमसो। तवणिजसुवेरुलिया, बहिमज्झभिंतरा दो दो ॥२५॥ वहारना बे पर्वतो एक सा योजन उंचा छे, अने सुवर्णना छे, तथा मध्यना वे पर्वतो वसो योजन उंचा अने एक सोनानो तथा एक रजतनो [रुपानो] छे अने अभ्यन्तरना बे पर्वतो चारसो योजन उंचा तथा एक तपनीय सुवर्णनो अने एक उत्तम वैडूर्य मणिनो छे, ए प्रमाणे अनुक्रमे वे वे पर्वतोनी उंचाइ विगेरे जाणवी. २५ दुग अड दुतीस अंका, लक्खगुणा कमेण नउअसयभइया। मूलोवरि समरूवं, वित्थारं विति जुअलतिगे २६ बे आठ अने बत्रीस ए त्रण अंकोने लाखगुणा करीने अनुक्रमे एकसो नेवुए भागीए तो त्रणे युगलनो मूळमां अने उपर सर- खाममाणवाळो विस्तार कहे-आवे छे. २६ बावण्णहियो सहसो, बारकला बाहिराण वित्थारो । मज्झिमगाण दसुत्तर-बायालसया दस कला य ॥२७॥ अन्भितराण दुकला, सोलसहस्सडसया सबायाला।चउचत्तसहस दोसय, दसुत्तरा दस कला सव्वे २८ %E प्रकरणम् क्षेत्रसमास ॥ ७ ॥ बहारना वे पर्वतोनो विस्तार बावन अधिक :हजार योजन बारकळा छे. वे मध्य पर्वतनो विस्तार दश अधिक बेतालीससो योजन दश कळा छे. २७ वे अभ्यन्तर पर्वतोनो विस्तार सोळ हजार आठसो बेतालोस योजन बे कळा छे. ए प्रमाणे सर्वे पर्वतनो विस्तार भेगो करतां चुम्मालीस हजार बसो दश योजन अधिक दशकळा छे. २८ इगचउसोलसंका, पुव्वुत्तविहीइ खित्तजुअलतिगे । वित्थारं बिति तहा, चउसहिको विदेहस्स ॥ २९ ॥ पूर्व कहेला विधि प्रमाणे एक चार अने सोळना अंक क्षेत्रोना त्रण युगलनो विस्तार अनुक्रमे कहे छे-दर्शावे छे, अने विदे- हनो विस्तार चोसठनो अंक दर्शावे. छे. २९ पञ्चसया छठवीसा, छच्च कला खित्तपढमजुअलम्मि । बाए इगवीससया, पणुत्तरा पञ्च य कला य ॥३०॥ चुलसीसय इगवीसा, इककला तइयगे विदेहि पुणो । तित्तीससहस छस्सय चुलसीया तह कला चउरो ३१ क्षेत्रना पहेला युगलमां विस्तार पांचसो छवीस योजन अने छ कळा छे, बीजा युगलनो विस्तार एकवीससो पांच अधिक योजन अने पांच कळा छे. ३० त्रीजा क्षेत्रयुगलनो विस्तार चोराशीसो एकवीस योजन अने एक कळा छे, तथा विदेहनो विस्तार तेत्रीस हजार छसो चोरासी योजन अने चार कळा छे. ३१ पणपन्नसहससग सय, गुणणउआनव कलासयलवासा । गिरिखित्तकसमासे,जोअणलक्खं हवइ पुण्णं ३२ पंचावन हजार सातसो नेव्यासी योजन अने नव कळा एटलो सर्व क्षेत्रोनो विस्तार छे, ए. प्रमाणे पर्वतना विस्तारनो एकत्र .
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क्षेत्रसमास
॥ ८॥
प्रकरणम्
॥ ८॥
करेलो अंक अने क्षेत्र विस्तारनो अंक ए बे अंक भेगा करे तो जंबूद्वीपनो संपूर्ण विस्तार एक लाख योजन थाय. ३२
पन्नाससुद्ध बाहिर-खित्ते दलियम्मि दुसय अडतीसा।तिणि य कला य एसो, खंडचउकस्स विक्खंभो ३३
पचास योजन बाद करेला एवा बाह्यक्षेत्रने अर्ध करतां बसो आडत्रीस योजन अने त्रण कळा आवे,एज चारे खंडनो दरेकनो विस्तार जाणवो.
गिरिउवरि सवेइदहा, गिरिउच्चत्ताउ दसगुणा दीहा । दीहत्तअद्धरुंदा, सव्वे दसजोअणुव्वेहो ॥ ३४ ॥
पर्वतोनी उपर वेदिकासहित द्रहो छे, ते द्रहो पर्वतनी उंचाइथी दशगुणा दीर्घ-लांचा छे, अने लंवाइथी अर्ध विस्तारवाळा-
पहोला छे, अने सर्वे द्रहो दश योजन उंडा छे. ३४
बहि पउमपुंडरीया, मझे ते चेव हुंति महपुव्वा । तेगच्छिकेसरीया, अभितरिया, कमेणेसुं॥३५॥
पद्मद्रह अने पुंडरीकद्रह ए वे द्रहो बहार छे अने मध्य भागमां एज बे द्रहो 'मह' शब्दपूर्वक छे, तथा तेगच्छि अने केशरी
ए बे हो अभ्यन्तर द्रहो छे. हवे अनुक्रमे ए द्रहोमां (देवीओना नाम कहेवाय छे-ए संबंध हवे पछीनी ३३मी गाथामां आवे छे)३५
सिरिलच्छी हिरिबुद्धी, धीकित्ती नामियाउ देवीओ।भवणवईओ पलिओ-वमाउ वरकमलनिलयाओ ॥३६॥
श्रीदेवी अने लक्ष्मीदेवी, हीदेवी अने बुद्धिदेवी तथा धीदेवी अने कीर्तिदेवी ए वे वे नामवाळी देवीओ छे, एं सर्व देवीओ
भवनपतिनिकायनी पल्योपमना आयुष्यवाळी अने उत्तम कमळमां निवास करनारी छे. ३६
जल्लुवार कोसदुगुच्चं, दहवित्थरपणसयंसवित्थारं । बाहल्लवित्थरद्धं, कमलं देवीण मूल्लिल्लं ॥ ३७ ॥
प्रकरणम् ॥९॥ क्षेत्रसमास ॥ ९ ॥ जळनी उपर वे कोश उचुं, द्रहना विस्तारथी पांचसोमा भाग जेटला वस्तारवाळु अने विस्तारथी अर्ध जाडं एवं देवीओनुं मूळ कमळ होय छे. ३७ मूले कंदे नाले, तं वयरारिहवेरुलिअरूवं । जंबुणयमज्झतवणि-जबहिअदलं रत्तकेसरयं ॥ ३८॥ देवीनुं ते मूळ कमळ मूळमां वज्ररत्ननुं छे, कंदमां अरिष्टरत्ननु छे, अने नाळ चैडूर्यरत्नमय छ, तथा जांबूनदसुवर्णमय मध्य- पत्रवाळु अने तपनीय सुवर्णमय बाद्यपत्रवाळु तथा राता केरावालं छे. ३८ कमलद्धपायपिहुलुच्च-कणगमयकण्णिगोवरिं भवणं । अद्धगकोसपिहुदीह-चउदसयचालधणुहुच्छं ॥३९॥ कमळना विस्तारथी अर्ध पृथु-विस्तारवाळी अने कमळविस्तारथी चोथा भाग जेटली उंची सुवर्णनी कर्णिका छे, ते उपर देवीन भवन छे, ते भवन ०॥ गाउ विस्तारवाळु.१ गाउ दीर्घ अने अने चौदसो चालीस धनुष उंचुं छे. ३९ पच्छिमदिसि विणुधणुपण-सयउच्च ढाइज्जसय पिहुपवेसं।दारतिगंइह भवणे, मज्झे दहदेविसयणिजं ॥४०॥ पश्चिम दिशि विना शेष त्रण दिशामां पांचसो धनुष उंचा अने अढीसो धनुष पहोळाइ तथा प्रवेशवाला त्रण द्वार आ भवनमा छे, तेमज भवनना अतिमध्यभागमां द्रहदेवीनी एक शय्या छे. ४० ते मूलकमलद्धप्प-माणकमलाणं अडहिअसएणं । परिखित्तं तब्भवणेसु भूसणाईणि देवीणं ॥ ११ ॥ ते मूळ कमळ्थी अर्धप्रमाणवाळां १०८ कमळोवडे ते मूळ कमळ वीटायलु छे अने ते उपरना भवनोमांद्रहदेवीओनां आभूषण विगेरेरहे,छे.
क्षेत्रसमास प्रकरणम् ॥१०॥ ॥१०॥ मूलपउमाउ पुबि, महयरिहाणं चउण्ह चउपउमा । अवराइ सत्त पउमा, अणिआहिवईण सत्तण्हं ॥४२॥ वायव्वाईसुतिसुसुरि-सामन्नसुराण चउसहसपउमा । अट्ठदसबारसहसा, अग्गेयाइसु तिपरिसाणं ॥४३॥ मूळ कमळथी पूर्व दिशामां चार महत्वरिका देवीओनां चार कमळो छे, अने पश्चिम दिशामां सात सेनाधिपतिओनां सात कमळो छे. ४२ तथा वायव्य आदि त्रण दिशाओमां देवीना सामानिक देवोनां चार हजार कमळो छे, अने अग्निकोण आदि त्रण दिशामां त्रण पर्षदाना देवोनां अनुक्रमे ८०००-१००००-१२००० कमळो छे. ४३ इअ बीअपरिक्खेवो, तइए चउसु वि दिसासुदेवीणं । चउचउ पउमसहस्सा, सोलसहस्साऽऽयरक्खाणं ४४ ए पूर्वगाथामां बीजो परिक्षेप कह्यो. हवे त्रीजा वलयमां चारे दिशाए चार चार हजार कमळो मळी सोळ हजार कमळो छे ते देवीना आत्मरक्षक देवोना कमळो के. अभिओगाइतिवलए, दुतीसचत्ताडयाललक्खाई। इगकोडिवीसलक्खा, सड्ढा वीस सयं सव्वे ॥ ४५ ॥ अभियोगिक विगेरे देवोना त्रण वलयमा अनुक्रमे ३२०००००, ४००००००, ४८००००० कमळो छे. ते सर्व मळीने एक क्रोड वीसलाख अने लाखना अर्थ सहित एटले पचास हजार एकसोवीस के.. ४५ पुव्वावरमेरुमुहं, दुसु दारतिगं पि सदिसि दहमाणा । असीइभागपमाणं, सतोरणं निग्गयनश्यं ॥४६॥ वे सरोवरमां अनुक्रमे पूर्व दिशा सन्मुख पश्चिम दिशा सन्मुख अने मेरुपर्वत सन्मुख एमः त्रण त्रण द्वार छे, अने ते द्वार -- प्रकरणम् ॥११॥ क्षेत्रसमास ॥११॥ पोतानी दिशिए रहेला द्रहना प्रमाणथी एंसीमा भागना प्रमाणचालु छे, तोरण सहित छे, अने दरेकमांथी एकेक महानदी निकली छे, एवां ए त्रण द्वार छे. ४६ जामुत्तरदारदुर्ग, सेसेसु दहेसु ताण मेरुमुहा । सदिसि दहासियभागा, तयद्धमाणा य बाहिरिआ ॥४७॥ शेष चार द्रहने विषे दक्षिण अने उत्तर दिशाए वे वे द्वारो छे तेमांथी जे द्वारो मेरु सन्मुख रहेला छे ते पोतानी दिशामां रहेल द्रहनी लंबाइनी अपेक्षाए एंशीमां भागे छे. तथा बाह्यनां द्वारो तेनी अपेक्षाए अर्ध प्रमाणवाळां छे. ४७ गंगा सिधू रत्ता, रत्तवई बाहिरं नइचउक्कं । बहिदहपुत्वावरदार-वित्थरं वहइ गिरिसिहरे ॥ ४८॥ गंगा सिंधू रक्ता अने रक्तवती ए वहारना क्षेत्रनी चार नदीओ. बहारना द्रहोना पूर्व पश्चिम द्वारना विस्तार जेटला प्रवाहे पर्वतना शिखर उपर वहे छे. ४८ पंचसय गंतु नियगा-वत्तणकूडाउ बहिमुहं वलइ । पणसयतेवोसेहि, साहियतिकलाहिं सिहराओ ॥४९॥ निवडइ मगरमुहोवम-वयरामयजिभियाइवयरतले । नियगे निवायकुंडे, मुत्तावलिसमप्पवाहेण ॥ ५० ॥ ते चार नदीओ पांचसो योजन सुधी जइने. पोताना नामवाळा आवर्जनकूटर्थी बाझक्षेत्र सन्मुख वळे छे, त्यारबाद पांचसो त्रेवीस योजन अने कंइक अधिक त्रण कळा सुधी वहीने शिखर उपरथी मगरमुख सरखा आकारवाळी अने वज्रमय एवी जीविका द्वारा वज्रमय तळीयावाळा पोताना नामना प्रपातकुण्डमां मोतीना' हार सरखा प्रवाहे पडे छः ४९-५०
.
क्षेत्रसमास
॥१२॥
प्रकरण
॥१२॥
दहदारवित्थराओ, वित्थरपन्नासभागजड्डाओ । जड्डत्ताओ चउगुण-दीहाओ सव्वजिब्भीओ ॥ ५१ ॥
द्रहद्वारना विस्तार जेटला विस्तारवाळी. विस्तारथी पचासमा भागे जाडी,अने जाडाइथी चारगुणी दीर्घ-लांबी एची सर्वे जितिका छे.५१
कुंडतो अडजोअण, पिहुलो जलउवरि कोसदुगमुच्चो । वेइजुओ नइदेवी-दीवो दहदेविसमभवणो ॥५२॥
कुंडनी अंदर आठ योजन लांबो पहोलो, जळनी उपर वे गाउ उंचो देखातो, चारे वाजु फरती वेदिका सहित अने द्रहदेवीना
भवन सरखा भवनवाळो एवो नदीदेवीनो द्वीप छे. ५२
जोअणसढिपिडुत्ता, सवायछपिहुल वेइतिदुवारा । एए दसुंड कुंडा, एवं अन्ने वि नवरं ते ॥ ५३ ॥
ए बाह्य चार प्रपातकुंडो साठ योजन पहोळा छे, तथा जेनी वेदिकानां त्रण द्वारो सवा छ योजन पहोलां छे, अने दश योजन
उडा छे. ए प्रमाणे वीजा कुण्डो पण जाणवा, परन्तु ते कुण्डो (आगळनी गाथामां कहेवाशे ते प्रमाणे त्रण भिन्न विस्तारवाला छे)५३
पास वित्थारतिगं, पडुच्च समदुगुणचउगुणगुणा । चउसहिसोलचउदो, कुंडा सव्वेऽवि इह नवई ॥५४॥
ए चार कुण्डोना त्रण विस्तारनी अपेक्षाए विचारतां ६४ कुण्ड सरखा विस्तारवाळा छे, १६ कुण्ड वमणा विस्तारवाळा छे,
४ कुण्ड चार गुणा विस्तारवाळा छे, अने वे कुण्ड आठ गुणा विस्तारवाळा छे, ए रीते आ जंबूद्वीपमां सर्व मळीने ९० कुण्ड छे. ५४
एअं च नइचउक्कं, कुण्डाओ बहिदुवारपरिवूढं । सगसहसनइसमेअं, वेअड्डगिरिं पि भिंदेइ ॥ ५५ ॥
तत्तो बाहिरखित्त-द्ध मज्झओ वलइ पुव्वअवरमुहं । नइसत्तसहससहिअं जगइतलेणं उदहिमेइ ॥५६॥
मा
क्षेत्रसमास
प्रकरणम्
॥१३॥
॥१३॥
ए चार बाह्यनदीओ कुंडमांथी वाह्यद्वारे नीकळी सात हजार नदीओ सहित वैताव्यपर्वतने पण भेदे छे. ५५ त्यारवाद बाह्य-
धुरि कुंडदुवारसमा, पज्जते दसगुणा य पिहुलत्ते । सव्वत्थ महनईओ, विस्थरपन्नासभामुंडा ॥ ५७ ॥
विस्तारमा सर्व महानदीओ प्रारंभमां कुण्डना द्वार सरखा विस्तारवाळी, अने पर्यन्ते दशगुणा विस्तारवाळी छे, अने सर्वस्थाने
विस्तारना पचासमा भागे उंडी छे. ५७
पणखित्तमहनईओ, सदारदिसिदहविसुद्धगिरिअद्धं । गंतूण सजिब्भीहि, निअनिअकुंडेसु निवडंति ॥५०॥
निअजिब्भिअपिहुलत्ता, पणवीसंसेण मुत्तु मज्झगिरि।जाममुहा पुव्वुदहि, इअरा, अवरोअहिमुर्विति ५९
पांच क्षेत्रनी महानदीओ पोताना द्वारनी दिशा तरफ रहेल द्रहप्रमाणने पर्वतना प्रमाण मांथी बाद करी जे रहे तेना अर्धभाग
सुधी पर्वत उपर वहीने पोतपोतानी जिविकामां थइने पोतपोताना नामवाळा नीचे रहेला प्रपातकुंडोमां पडे छे. ५८ पोतानी जि-
विकाना विस्तारथी पचीसमां भागे मध्यगिरिने मूकीने दक्षिणमुखी नदीओ पूर्वसमुद्रमा जाय छे, अने वीजी एटले उत्तरमुखे न-
दीओ पश्चिम समुद्रमा जाय छे. ५९
हेमवइ रोहिअंसा, रोहिआ गंगदुगुणपरिवारा । एरन्नवए सुवन्न-रुप्पकूलाओ ताण समा ॥६० ॥
हरिवासे हरिकंता, हरिसलिला गंगचउगुणनईआ। एसि समा रम्मयए, नरकंता नारिकंता य ॥ ६१ ॥
क्षेत्रसमास प्रकरणम् ॥१४॥ ॥१४॥ सीओआ सीआओं, महाविदेहम्मि' तासु पत्तेया निवडइ पणलक्ख, दुतीससहस अडतीस: नइसलिलं ६२ हिमवतक्षेत्रमा रोहितांशानदी अने रोहितानदी गंगानदीथी बमणा. परिवारवाली छे, अनेः ऐरण्यवतक्षेत्रमा.सूवर्णकुलानदी अने रूप्यकुला नदी ते वे नदीओ सरखी. छे. ६० हरिवर्षक्षेत्रमा हरिकान्ता अने हरिसलिला ए बे नामनी नदीओ छे, अने ते गंगा- नदीना परिवारथी चारगुणा-परिवारवाळी छे,अने रम्यक्क्षेत्रमा जे नरकान्ता अने नारीकांता ए बेनामवाळी नदी छे. ते ए.बे नदीओ सरखी छे..६१ महाविदेडमां सीतोदा अने सीता ए बे नामनी नदीओ छे, ते दरेकमां ५३२०३८ नदीओचं जळ पडे छे. ६२ कुरुनइ चुलसीसहसा, छच्चेवंतरनईओ पइविजयं । दो दो महानईओ, चउदसहस्सा उ पत्तेयं ॥. ६३ ॥ कुरुक्षेत्रनी नदीओ ८४०००, छ अन्तर्नदीओ,अने दरेक विजयमांवे वे महानदी छे,ते दरेकनो चौद.चौद हज़ारनो परिवारले.६३ अडसरि महनईओ, वारस अंतरनईउः सेसाओ। परिअरनईओ,, चउद्द-सलक्खा छप्पन्नसहसा य ६४. ७८ महानदीओ, १२ अन्तर्नदीओ, अने बाकीनी बीजी १४५६००० एटली नदीओनो परिवार जंबूद्वीपमा छे-ए संबंध ६४ एगारडनवकूडा, कुलगिरिजुअलत्तिगे वि पत्तेअं। इइ छप्पन्ना चउ चउ, वक्खारेसु त्ति चउसही ॥६५॥ सोमणसिं गंधमायगि,सगसग विज्जुप्पभि मालवंति पुणो अठसयल तीसं, अडनंदणि अटकरिकूडा ६६ वर्पधरपर्वतोना त्रण युगलमा दरेक उपर अनुक्रमे अगिआर आठ अने नवकूट छे, ए ५६ गिरिकूट थया, तथा सोळ वक्षस्का- रपर्वतोउपर के-४-४ कूट छे ते ६४ कूट थया. ६५ तथा सोमनस अने गंधमादन ए वे नामना गजदंत पर्वतो उपर ७-७. कूट प्रकरण क्षेत्रसमास छे, अने विद्युत्पभ तथा माल्यवंत. ए वे गजदंतगिरि उपर दरेके. ८-८ कूट छे, माटे सर्वमळीने ३० कूट थया, तथा ८ कूट नंद- नवनमा अने ८ करिकूट (भद्रशाल वनमां छे ए १६ कूट मेरुपर्वत संबन्धी जाणवा.) ६६ इअ पणसयउच्च छासहि-सय कुडा तेसुदीहरगिरीणं । पुवनइमेरुदिसि अंतसिद्धकूडेसु जिणभवणा ६७ ए प्रमाणे पांचसो योजन उंचा १६६ कूट छे,, ते. कूटोमा जे दीर्घ पर्वतो छे, तेनी पूर्व दिशाना पर्यन्ते नदीदिशिना पर्यन्ते अने मेरु दिशिना पर्यन्ते सिद्धकूटो छे, तेमां जिनभवनो छे. ६७ ते सिरिगिहाओ दोसय-गुणप्पमाणा तहेव तिदुवारा । नवरं अडवीसाहिअ-सयगुणदारप्पमाणमिह ६८ ते जिनभवनो श्रीदेवीना भवनथी बसोगुणा प्रमाणवाळा छे, तथा श्री देवीना भवननी पेठेज त्रण द्वारवाळां छे, परन्तु विशेष एछे के-अहीं द्वारतुं प्रमाण श्रीदेवीभवनना द्वारथी एकसो अठ्ठावीस गुण जाणवू. ६८ पणवीसं कोससयं, समचउरसवित्थडा दुगुणमुच्चा । पासाया कूडेसु, पणसयउच्चेसु सेसेसु ॥ ६९ ॥ ५०० योजन उंचाइवाळा शेपकूटो उपर १२५ गाउ समचोरस विस्तारवाळा अने. तेथी वमणा उंचा एवा देवप्रसादो छे. ६९ बलहरिसहहरिकूडा, नंदनवणि मालवंति विज्जुपभे। ईसाणुत्तरदाहिण-दिसासु सहसुच्च कणगमया ७० नंदनवनमा इशानदिशाए बलकूट, माल्यवंतमा उत्तरदिशाए हरिस्सहकूट, अने विद्युत्प्रभमां दक्षिणदिशाए इरिकूटनामनु कूट छे, ए त्रणे कूट १००० योजन उंचा छे, अने सुवर्णना छे. ७०
SNE
क्षेत्रसमास
प्रकरण
॥१६॥
॥१६॥
वेअड्डेसुवि नवनव, कूडा पणवीसकोस उच्चा ते । सव्वे तिसय छडुत्तर, एसुवि पुवंति जिणकूडा ७१।
वैताढ्य पर्वतो उपर पण नव नव कूट छे, अने ते सर्वे पचीस गाउ उंचा छे, ते सर्व मळीने छ अधिक त्रणसो कूट छ, अने
ए कूटोमां पण पूर्वदिशिने अन्ते एकेक सिद्धकूट छे. ७१
ताणुवरि चेईहरा, दहदेवीभवणतुल्लपरिमाणा । सेसेसु अ पासाया, अद्वेगकोसं पिहुच्चत्ते ॥ ७२ ॥
ते सिद्धकूटोनी उपर द्रहदेवीना भवनना प्रमाणसरखा प्रमाणवाळां चैत्यो छे, अने शेपकूटो उपर ०॥ गाउ पृथु-विस्तारवाला
अने १ गाउ उंचा एवा देवप्रासादो छे. ७२
गिरकरिकाडाउच्च-तणाओ समअद्धमूलुवरि रुंदा।रयणमया नवरि विअड-मज्झिमा ति ति कणगरूवा७३
गिरिकूटो अने करिकूटो पोतानी उंचाइ तुल्प मूळविस्तारवाळा छे, अने उंचाइथी अर्धं उपर विस्तारवाळा छे, ए सर्वे कूटो
रत्नमय छे, परन्तु चैताब्यना मध्यवर्ती त्रण त्रण कूट सुवर्णनां छे. ७३
जंबूणयरययमया, जगइसमा जंबुसामलीकूडा । अछ तेसु दहदे-विगिहसमा चारु चेइहरा ॥ ७४ ॥
आठ जंबूकूट जांबूनदसुवर्णमय छ, भने आठ शाल्मलिकूट रुपाना छे तथा जगती जेटला प्रमाणवाळा छे, अने ते सर्व उपर
द्रहदेवीना भवनसरखा प्रमाणवाळां मनोहर जिनभवनो छे. ७४
तेसि समोसहकूडा, चउतीसं चुल्लकुण्डजुअलंतो। जम्बुणएसु तेसु अ, वेअड्डेसुं व पासाया ॥ ७५ ॥
प्रकरणम् ॥१७॥ क्षेत्रसमास ॥१७॥ ते जंबूशाल्मलिकूटोना सखा ३४ ऋपभकूट छे, अने ते वे लघुकुंदनी बच्चे छे. तथा जांबूनदसुवर्णमय एवा ते कूटो उपर वैताढ्यकूटो उपर जेवा प्रसाद छे तेवा प्रसाद छे ।। ७५॥ पंचसएपणवीसे, कूडा सवे वि जंबुदीवम्मि । ते पत्तेअं वरवण-जुआहि वेईहि परिक्खित्ता ॥ ७६॥ ए प्रमाणे जंबूद्वीपमां सर्वकूट पांचसो पचीस छे, ते दरेक उत्तमवनयुक्तवेदिकावडे वीटायला छे ॥ ७६ ॥ छसयरि कूडेसु तहा, चूला चउवणतरूसु जिणभवणा । भणिया जंबूद्दीवे, सदेवया सेसठाणेसु ॥७७॥ ७६ कूट उपर, चूलिका उपर, चार वनमां बे वृक्ष उपर, ए स्थाने जंबूद्वीपमा शाश्वत जिनभवनो कह्यां छे, अने शेष स्थानोमां पोतपोताना स्थानना नामवाळा देवदेवीओ छे ॥ ७७ ॥ करिकूडकुंडणइदह-कुरुकंचणयमलसमविअड्डेसु । जिणभवणविसंवाओ, जो तं जाणंति गीअत्था ॥७॥ कारट, कुंड, नदीओ, द्रहो कुरुक्षेत्र, कंचनगिरि, यमकगिरि चार, समवैताढ्य, जिनभवनो संबंधी विसंवाद छे, ते (संबंधी) गीतार्थो जाणे. ॥ ७८॥ पुव्वावरजलहिता, दसुच्चदसपिहुलमेहलचउक्का । पणवीसुच्चा पन्नासतीसदसजोअणपिहुत्ता ॥ ७९ ॥ वेईहिं परिक्खित्ता, सखयरपुरपन्नसहिसेणिदुगा । सदिसिंदलोगपालो-वभोगिउवरिल्लमेहलया ॥ ८० ॥ दुदु खंडविहिअ.भरहे-रवया दु दु.गुरुगुहा य रुप्पमया । दो दीहा वेअई, तहा दुतीसं च विजएसु॥८॥ - ܝܢ
केनतमास
प्रकरण
॥१८॥
॥१८॥
नवरं ते विजयंता सखयरपणपन्नपुर दुसेणीआ। एवं खयरपुराइं, सगतीससयाइं चालाइं ॥ ८२ ॥
पूर्वसमुद्रे अने पश्चिमसमुद्रे छेडावाळा, तथा १० योजन उंची अने १० योजन विस्तारवाळी एवी चार मेखलावाळा, २५
योजन उंचा, ५०-३०-१० योजन पहोलाइवाळा, वेदिकाओवडे वीटायला, विद्याधरना ५० अने ६० नगरनी चे श्रेणिवाळा,
पोतानी दिशितरफना इन्द्रना लोकपालोने उपभोग करवा योग्य एवी उपरनी चे मेखकावाळा, तथा भरत अने ऐरवतक्षेत्रना बेचे
खंड-विभाग जेणे कर्या छै एवा, वे वे मोटी गुफावाला अने रुपाना एका वे दीर्घ वैवाढ्यपर्वत छ, वळी विजयोमा पण वत्रीस
दीर्घवैताट्यपर्वतो पण एवा ज छे, परन्तु विशेष ए के-ते ३२ वैताट्य पर्वतोना छेडा विजयो तरफ छे, तथा विद्याधरनां ५५-५५
नगरनी चे श्रेणिवाळा छे. ए प्रमाणे विद्याधर नगरो ३७१० छे ॥ ७९-८०-८१-८२ ।।
गिरिवित्थरदीहाओ, अड्डुच्च चउ पिडुपवसेसदाराओ। बारसपिठुला अड-च्चयाउ वेअर्हृदुगुहाओ ॥८३॥
पर्वतना विस्तार जेटली लांबी, तथा आठयोजन उंचां चारयोजन पहोळां अने चार योजन प्रवेशवाळां द्वारवाळी, तथा चार-
योजन पहोळी अने आठयोजन उंची एवी वैताठ्यपर्वतनी वे वे महागुफाओ छे. ॥ ८३ ॥
तम्मज्झदुजोअणअंतराओ ति ति वित्थराओ दुणईओ।उम्मग्गणिमग्गाओ, कडगाओ महानइगयाओ॥८४
ते गुफाना अंतिमध्यभागे वे वे योजनने आंतरे त्रण त्रण योजनना विस्तारवाळी उन्मग्ना अने निमग्ना नामनी ये नदीओ
कडाहमांथी निकळी महानदीओने मळेली छे ॥ ८४ ॥
प्रकरणम् ॥१९॥ कासमास ॥१९॥ इह पइभित्तिं गुणवन्न-मंडले लिहइ चकि दु दु समुहे । पणसयधणुहपमाणे, बारेगडजोअणुज्जोए॥८५॥ आ गुफामां दरेक भीते चक्रवर्ती ओगणपचास प्रकाशमंडळोने बेबे सन्मुख रहे एवी रीते आलेखे छे, ते प्रकाशमंडळो ५०. धनुष प्रमाणमां अने १२-१-८ योजन सुधी प्रकाशकरनारा होय छे ।। ८५ ।। सा तिमिसगुहा जीए, चक्की पविसेइ मज्झखंडंतो। उसहं अंकिअ सो जीए वलइ सा खंडंगपवाया॥८६॥ जे गुफामां थइने चक्रवर्ती मध्यखंडनी अंदर प्रवेश करे , तमिस्रगुफा, अने जेमां थइने चक्रवर्ती पाभो वळे छे ते खंडक- प्रपाता गुफा ॥८३ ॥ कयमाल-नहमालय-सुराओ वइनिबद्धसलिलाओ।जा चक्की ता चिट्ठति, ताओ उग्घडिअदाराओ॥८७ कृतमाळ अने नृत्तमाळ देव वाळी, तथा वर्धकिरत्ने बांधेली नदीओवाळी एवी ते वे गुफाओ ज्यां सुधी चक्रवर्ती होय छे, त्यां सुधी ते वे गुफाओ उघाडा द्वारवाळी रहे छे ॥ ८७ ॥ बहिखंडतो वारस-दीहा नव वित्थडा अउज्झपुरी। सा लवणा वेअड्डा, चउदहिअसयं चिगारकला1८८॥ वाह्यखंडनी अंदर १२ योजन दीर्घ अने ९ योजन विस्तारवाळी अयोध्यापुरी नामनी नगरी छे, ते लवणसमुद्रथी अने वैता- व्यथी पण एकसोचौद योजन अने अगिआर कळा दूर छे ।। ८८ ॥ चक्विसनइपवेसे, तित्थदुगं मागहो पभासो अ । ताणंतो वरदामो, इह सव्वे विडुत्तरसयंत्ति ॥ ८९ ॥ M क्षेत्रसमास ॥२०॥ प्रकरणम् ॥२०॥ चक्रवर्तीने वशवती नदीओना प्रवेशस्थाने मागधतीर्थ अने प्रभासतीर्थ छे, अने ते वेनी बच्चे वरदामतीर्थ छे. ए प्रमाणे आ जंबूद्वीपमा सर्वमळीने १०२ तीर्थ छे ।। ८९ ॥ भरहेरवए छछअर-मयवसप्पिणिउसप्पिणीरूवं । परिभमइ कालचक्कं, दुवालसारं सया बि कमा ॥ ९ ॥ भरत तथा ऐरवत क्षेत्रमा छ छ आरामय अवसर्पिणी अने उत्सर्पिणी स्वरुप बारआ रावाळू काळचक्र हमेशा अनुक्रमे परिभ्रमण करे छे सुसमसुसमा य सुसमा, सुसमदुसमा य दुसमसुसमा य। दुसमाय दुसमदुसमा, कमुकमा दुसु वि अरछक्क॥ सुषमसुपमणमुपम-सुपम-सुपमदुःषम-दुपमसुषम-दुःपम-अने दुःपमदुःपम ए छ आरा अवसर्पिणी तथा उत्सर्पिणीमां क्रमे अने उत्क्रमे होय छे ॥ ९१ ।। पुव्वुत्तपल्लि समसय--अणुगहणा निहिए हवइ पलिओ । दसकोडिकोडिपलिए-हिं सागरो होइ कालस्त॥ सो सो वर्षे एकेक रोमखंडवहारकाढवाथी पूर्वे कहेलो पल्यकूबो खाली थये छते काळनो पल्योपम थाय छे, अने तेवा १० कोडाकोडि पल्योपमे काळनो एक सागरोपम थाय छे. ॥ ९२॥ सागरचउतिदुकोडा-कोडिमिए अरतिगे नराण कमा। आऊ तिदुइगपलिआ, तिदुइगकोसा तणुच्चत्तं॥९३॥ अनुक्रमे चार त्रण अने बे कोडाकोडिसागरोपमवाळा पहेला त्रण आरामां मनुष्योनुं आयुष्य त्रण वे अने एक पल्योपम, तथा शरीरनी उंचाइ त्रण वे एक गाउ प्रमाणनी छे ।। ९३ ॥ C क्षेत्रसमास ॥२१॥ प्रकरण ॥२१॥ तिदुइगदिणेहिं तूवरि-वयरामलमित्तु तेसिमाहारो । पिठकरंडा दोसय, छप्पन्ना तद्दलं च दलं ॥ ९४ ॥ ते पहेला त्रण आराना मनुष्योनो आहार अनुक्रमे त्रण वे एक दिवसने अन्तरे तुवरना दाणा जेटलो बोरजेटलो अने आमळा जेटलो होय छे, अने ते मनुष्योनी पीठनी पांसळीओ अनुक्रमे २५६: तेनुं अर्ध १२८, अने तेनुं अर्ध ६४ होय छे. ९४ गुणवन्नदिणे तह पन-रपनरंअहिए अवच्चपालणया।अवि सयलाजिआ जुअला,सुमणसुरूवायसुरगइआ९५ (ए त्रणे आरामां) ४९ दिवसनी तथा १५-१५ अधिक दिवसनी अपत्यपालना होय छे, वळी सर्वे पंचेन्द्रिय युगलिकजीवो उत्तम मनवाळा उत्तम रूपवाळा अने देवगतिमां जनारा होय छे. ९५ तेसि मत्तंग भिंगा, तुडिअंगा जोइ दीव चित्तंगा। चित्तरसा मणिअंगा, गेहागारा अणिअयक्खा ॥१६॥ पाणं भायण पिच्छण, रविपहदीवपहकुसुममाहारो। भूसण गिहवत्थासण, कप्पदुमा दसविहा दिति ९७ ते युगलिकोने मत्तंग-भृङ्ग-तूर्याङ्ग-ज्योतिरंग-दीपांग-चित्रांग-चित्ररसांग-पणितांग-गृहाकार-अने अनियत (अथवा अनग्न) ए दश नामवाला कल्पवृक्षो अनुक्रमे पाणी-भाजन-प्रेक्षण-मूर्यप्रभा-दीपमभा-पुष्प-आहार-आभूषण-गृह-अने वस्त्र आसन विगेरे आपेछे.९७ मणुआउसम गयाई, हयाइ चउरंसऽजाइ अठंसा । गोमहिसुट्टखराई, पणंस साणाइ दसमंसा ॥ ९८ ॥ हस्तिओ विगेरे मोटा जीवो मनुष्यना आयुष्य सरखा आयुष्यवाळा, अश्व विगेरे तिर्यञ्चो चोथा भागना आयुष्यवाळा, बकरों विगेरे आठमा भागना आयुष्यवाळा, तथा गाय पाडा उंट गर्दभ आदि तिर्यञ्चो पांचमा भागना आयुष्यवाळा, अने श्वान आदि क्षेत्रसमास प्रकर ॥२२॥ ॥२२॥ तिर्यंचो प्रायः मनुष्यना आयुष्यथी दशमा भाग जेटला आयुष्यवाळा होय छे. ९८ इचाइ तिरच्छाण वि, पायं सवारएसु सारिच्छं । तइआरसेसि कुलगर-नयज़िणधम्माइ उप्पत्तो ॥१९॥ पूर्वे गाथामां कह्या ते आदि तिर्यंचोर्नु पण ए कहेलं आयुष्य प्रायः सर्व आराओमां सरखंज जाणवू. हवे त्रीजो आरो कंइक वाकी रहे त्यारे कुलकरोनी अने जिनधर्मादिकनी नीतिनी उत्पत्ति थाय छे. ९९ कालदुगे तिचउत्था-रगेसु एगणनवइपक्खेसु । सेसि गएसु सिज्मंति, हुंति पढमंतिमजिणिंदा ॥१००॥ अवसर्पिणी अने उत्सर्पिणी ए बे काळना त्रीजा अने चोथा आरामा ८९ पक्ष बाकी रहे अने व्यतीत थाय, त्यारे पहेला अने छेल्ला जिनेन्द्रो मोक्षे जाय छे अने जन्मे छे. १०० एटलेके,- बाथालसहसवरिसू-णिगकोडाकोडिअयरमाणाए । तुरिए नराउ पुव्वा-ण कोडि तणु कोसचउरंसं १०१॥ तालीश हजार वर्ष न्यून १ कोटाकोटि सागरोपम प्रमाणवाळा चोथा आरामां मनुष्योनुं आयुष्य एक पूर्वक्रोड वर्ष अने शरीर एक गाउनो चोथो भाग होय छे. १०१ वरिसेगवीससहस-प्पमाणपंचमरए सगकरुच्चा । तीसहियसयाउ नरा, तयंति धम्माइयाणंतो ॥ १०२ ॥ एकवीस हजार वर्ष प्रमाणना पांचमा आरामा सात हाथ उंचा अने एकसो त्रीस वर्षना आयुष्यवाळा मनुष्यो होय छे, अने ए आराना अन्ते धर्म विगेरेनो अंत थाय छे. १०२ प्रकरणम् ॥२३॥ क्षेत्रसमास ॥२३॥ खारग्गिविसाईहिं, हाहाभूआकयाइ पुहवीए । खगबीयं विअढाइसु, नराइबीयं बिलाइसु, ॥ १०३ ॥ क्षारवृष्टि अग्निवृष्टि अने विप आजिकनी वृष्टिओवडे हाहाकारवाळी थयेली आ पृथ्वीमां पक्षीओनां वीज चैताट्य विगेरे स्था- नोमां अने मनुष्य विगेरेनां बीज विलो विगेरेमा रहेशे. १०३ बहुमच्छचक्कवहनइ-चउक्कपासेसु नव नव बिलाइं । वेअड्डोभयपासे, चउआल सयं विलाणेवं ॥ १०४ ॥ घणा मत्स्यवाळी अने चक्र जेटला प्रवाहवाळी चार नदीओने पडखे पडखे वैताट्यपर्वतनी बन्ने वाजुए ९-९ बिल छे ए प्रमाणे १४४ विल जंबूद्वीपमा छे. १०४ पंचमसमछट्ठारे, दुकरुच्चा वीसवरिसआउ नरा । मच्छासिणो कुरूवा, कूरा बिलवासि कुगईगमा ॥१०५॥ पांचमा आरासरखा प्रमाणवाळा छठा आरामां मनुष्यो बे हाथ उंचा, वीश वर्षना आयुष्यवाळा, मत्स्यभक्षण करनारा, कुरू- पवाळा, क्रूर चित्तवाला, विलोमा वसनारा अने मरीने दुर्गतिमां जनारा होय छे. १०५ निल्लज्जा निव्वसणा,खरवयणा पिअसुआइठिइरहिया।थीओ छवरिसगब्भा,अइदुहपसवा बहुसुआ य १०६ ए छठाआराना मनुष्यो निर्लज्ज, वस्ररहित, कर्कश वचनवाळा, पितापुत्र विगेरेनी मर्यादा रहित होय छे. तथा स्त्रीओ छ वर्षनी वये गर्भधारण करनारी, अतिदुःखे प्रसव करनारी, अने बहु संतानवाळी होय छे. १०६ इअ अरछक्केणऽवस-प्पिणि त्ति उस्सप्पिणी वि विवरीआ । वीसं सागरकोडा-कोडीओ कालचक्कमि १०७ . क्षेत्रसमास ॥२४॥ प्रकरणम् ॥२४॥ ए प्रमाणे छ आरांनी १ अवसपिणी, अने विपरीत स्वरूपवाळी छ आरानी १ उत्सर्पिणी पण थाय छे, जेथी एक काळच- क्रमां २० कोडाकोडि सागरोपम जेटलो काळ व्यतीत थाय छे. १०७ कुरुदुगि हरिरम्मयदुगि, हेमवएरन्नवइदुगि विदेहे । कमसो सयाऽवसप्पिणि, अरयचउकाइसमकालो १०८ वे कुरुक्षेत्रमा, हरिवर्ष रम्यक् ए बेमां, हैमवत ऐरण्यवत ए बेमां अने महाविदेहमां सदाकाळ अनुक्रमे अवसर्पिणीना चार आ- राना प्रारंभ सरखो काळ होय छे. १०८ हेमवएरन्नवए, हरिवासे रम्मए अ रयणमया । सदावइ विअडावइ, गंधावइ मालवंतक्खा ॥ १०९ ॥ चउवट्टविअड्डा साइअरुणपउमप्पभाससुरवासा । मूलुवरि पिहुत्ते तह, उच्चत्ते जोयणसहस्सं ॥ ११० ॥ हेमवंत हिरण्यवंत हरिवर्प रम्यक ए चार युगलिकक्षेत्रोमां अनुक्रमे शब्दापाती विकटापाती गन्धापाती अने माल्यवंत नामना ४ वृत्तवैताट्यपर्वतो रत्नना छे, ते चारे उपर अनुक्रमे स्वातीदेव-अरुणदेव-पद्मदेव अने प्रभास देवना आवास छे, ए चार पर्वतो मूळमां १००० योजन, शिखर उपर १००० योजन अने उंचाइमां पण १००० योजन प्रमाणवाळा छे. १०९-११० मेरू वदो सहस्स-कंदो लक्खूसिओ सहस्सुवरिं । दसगुण भूवि तं सनवइ, दसिगारंसं पिहुलमूले १११ मेरु पर्वत वृत्त आकारनो, एक हजार योजन कंदवाळो, लाख योजन उंचो, उपर शिखरस्थाने १००० योजन विस्तारवाळो, भूमिस्थाने तेथी दशगुणो, अने मूळमां ने योजन अने अगीयारीआ दश भाग सहित तेटला प्रमाणवाळो छे. १११ क्षेत्रसमास ॥२५॥ प्रकरणम् ॥२५॥ पुढवुवलवयरसकर-मयकंदो उवरि जाव सीमणसं । फलिहंकरययकंचण-मओ य जंबूणओ सेसो ११२ मेरुपर्वतनी उपर चढतां यावत् भूमितल सुधी माटी-पत्थर-वज्र अने कांकरावाळो १लो कंद छे, बीजो कांड सौमनस सुधीनो स्फटिकरत्न अंकरन रुघु अने सुवर्णनो मिश्र छे, अने शेश भाग जांबूनद सुवर्णनो छे. ११२ तदुवरि चालिसुच्चा, वट्टो मूलुवरि बार चउ पिहुला । वेरुलिआ वरचूला, सिरिभवणपमाणचेइहरा ११३ ते मेरुपर्वत उपर चालीश योजन उंची, वृत्तआकारनी, मूळमां १२ योजन अने उपर ४ योजन पहोळी, वैडूर्यरत्ननी, अने श्रीदेवीना भवन सरखा प्रमाणयुक्त चैत्यवाळी एवी उत्तम चूलिका छे. ११३ चुलातलाउ चउसय, चउणवई वलयरूवविक्खंभं । बहुजलकुण्डं पंडग-वणं च सिहरे सवेअं ॥१४॥ चूलिकाना मूळथी ४९४ योजनं जेटला वलयविष्कंभवाळु अने घणा जळसहित कुंडोवाळु एबु,शिखरउपर वेदिकासहित पंडकवन छे.११४ पन्नासजोअणेहि, चूलाओ चउदिसासु जिणभवणा । सविदिसि सक्कीसाणं चउवाविजुआ य पासाया ११५ चूलिकाथी पचास योजन दूर चार दिशामां चार जिनभवनो छे, अने पोतपोतानी विदिशिमा रहेला शक्रइन्द्रना अने इशाने- न्द्रना चार चार वापिकाओ युक्त चार वापिकाओ युक्त चार प्रासाद छे. ११५ कुलगिरिचेइहराणं, पासायाणं चिमे समगुणा । पणवीसरुदंदुगुणां-यामाउ इमा उ वावीओ ॥ ११६ ॥ कुलगिरि उपरना चैत्योथी आ चैत्यो सरखा प्रमाणवाळा छ, अने त्यांना प्रासादोंथी आ . प्रासादो आठगुणा प्रमाणबाळा
क्षेत्रसमास
प्रकर
॥२६॥
॥२६॥
छे, तथा आ वापिकाओ पचीश योजन विस्तारवाळी अने तेथी बमणी एटले पचास योजन लांबी छे. ११६
जिणहरबहिदिसिजोअण-पणसयदीहद्धपिहुल चउउच्चा।अद्धससिसमा चउरो,सिअकणगसिलासवेइआ११७
जिनभवनथी वहारनी दिशामां पांचसो योजन दीर्घ, तेथी अर्ध विस्तारवाळी, चार योजन उंची, अने अर्धचन्द्रसरखा आका-
रवाळी श्वेतसुवर्णनी चार शिलाओ वेदिकासहित छे. ११७
सिलमाणट्ठसहस्सं-समाणसीहासणेहि दोहि जुआ ! सिल पंडुकंबला रत्त-कंबला पुवपच्छिमओ ११८
चामुत्तराओ ताओ, इगेगसीहासणाओअइपुव्वा। चउसु वि तासु नियासण-दिसिभवजिणमज्जणं होई ११९
शिलाना प्रमाणथी आठ हजारमा भागना प्रमाणवाळा वे चे सिंहासनो सहित पूर्वदिशानी पांडुकंवला शिला, अने पश्चिमदि-
शानी रक्तकंवला शिला छे. ११८ दक्षिण दिशानी तेवीज शिकाओ एकेक सिंहासनवाळी अने "अति" पूर्वक नामवाळी छे. ते चारे
शिलाओ उपर पोतपोताना आसननी दिशि तरफना क्षेत्रोमा उत्पन्न थयेला जिनेश्वरोनो जन्माभिषेक थाय छे. ११९
सिहराछत्तीसेहि, सहसेहिं मेहलाइ पंचसए । पिहुलं सोमणसवणं सिलविणु पंडगवणसरिच्छं ॥ १२० ॥
मेरुपर्वतना उपरना शिखरतलथी नीचे छत्रीस हजार योजन दूर उतरीए त्यां पांचसो योजन प्रमाणनी मेखलामा पांचसो यो.
जन पहोळ सोमनस नामनुं वन छे, ते शिलारहित सर्व रीते पंडुकवन सरलुं छे. १२०
तब्बाहिरि विक्खंभो, बायालसयाइं दुसयरिजुआई । अठेगारसभागा, मज्झे तं चेव सहसूणं ॥ १२१ ॥
क्षेत्रसमास ॥२७॥ प्रकरणम् ॥२७॥ ते सौमनसवननो बाह्यविष्कंभ वेंतालीससो व्होत्र योजन अने अगिआरिआ आठ भाग जेटलो छे, अने मध्यमांनो-अभ्यन्तर विष्कंभ एज वाह्य विष्कंभमांथी हजार योजन न्यून करीए तेटलो छे. १२१ तत्तो सड्ढदुसठ्ठी-सहस्सेहिं नंदणं पि तह चेव । नवरि भवणपासायं--तरद्वदिसि कुमरिकूडा वि ॥ १२२ ॥ त्यारवाद ते सौमनसवनथी साडीवासठ हजार योजन नीचे नन्दनवन छे, ते पण तेवाज प्रकारनुं छे, परन्तु विशेष ए छे के-जिनभवन अने प्रासाद ए वेना आंतरे आंतरे एकेक मळी दिशाकुमारीओनां आठ गिरिकूट छे. १२२ नवसहस नवसयाई, चउपण्णा छञ्चिगारभागा य । नंदणबहिविक्खंभो, सहसूणो होइ मज्झमि ॥१२३॥ नंदनवनस्थाने मेरुपर्वतनो वहारनो विस्तार नवदनार नवसो चोपन योजन अने अगिआरिआ ६ भाग जेटलो छे, अने वननी अंदरना मेरुनो विष्कंभ हजार योज न्युन छे. १२३ तदहो पञ्चसएहि, महिअलि तह चेव भद्दसालवणं । नवरमिह दिग्गय चिय, कूडा वणवित्थरं तु इमं १२४ ते नंदनवननी नीचे ५०० योजन उतरतां भूमिउपर भद्रशाल नामनुं वन छे, ते पण तेबाज प्रकारनुं छे. परन्तु विशेष ए छे के अहीं दिग्गज कुटो छे, अने वननो विस्तार आ प्रमाणे १२४ बावीससहस्साई, मेरूओ पुव्वणो अ पच्छिमओ । तं चाडसीविहत्तं, वणमाणं दाहिणुत्तरओ ॥ १२५ ॥ मेरुथी पूर्वदिशामां बावीस हजार योजन अने पश्चिमदिशामां पण बावीस हजार योजन जेटलुं दीर्घ भद्रशाल वन छे, अने तेने - क्षेत्रसमास प्रकरणम् ॥२८॥ ॥२८॥ अट्यासीवडे भागता जे आवे तेटलुं वन प्रमाण दक्षिणमां अने उत्तर दिशामां छे. १२५ छब्बीससहस चउसय, पणहत्तरि गंतु कुरुनइपवाया । उभओ विनिग्गया गय-दंता मेरुम्मुहा चउरो१२६ कुरुक्षेत्रमा बहेती नदीओनाप्रपातथी २६४७५ योजन दूर जतां वन्ने बाजुए चार गजदंत पर्वतो मेरुपर्वतनी सन्मुख निकळ्या छे.१२६ अग्गेआइसु पयाहि--णेण सिअरत्तपीयनोलामा । सोमणसविज्जुप्पह--गंधमायणमालवंतक्खा ॥ १२७ ॥ अग्निकोणआदि विदिशाओमां प्रदक्षिणावर्तक्रम प्रमाणे सोमन विद्युत्मभ गंधमादन अने माल्यवंत ए नामना चार पर्वतो अनु- क्रमे श्वेत रक्त पीत अने नीलवर्णनी कांतिवाळा छे. १२७ अहलोगवासिणीओ, दिसाकुमारीउ अट्ठ एएसिं । गयदंतगिरिवराणं, हिट्ठा चिठंति भवणेसु ॥ १२८ ॥ अधोलोकनिवासिनी ८ दिशाकुमारीओ आ गजदंतपर्वतोनी नीचे भवनोमा रहे छे. १२८ धुरि अंते चउपणसय,उच्चत्ति पिहुत्ति पणसयाऽसिसमा। दोहत्ति इमे छकला,दुसय नवुत्तर सहसतीसं १२९ ए चारे पर्वतो मारंभमां ४०० योजन उंचा अने पर्यन्ते ५०० योजन उंचा तथा प्रारंभमां ५०० योजन पहोळा अने पर्यन्ते खगनी धार सरखा पातळा छे, अने लंबाइमा ३०२०९ योजन ६ कळा जेटला दीर्घ छे. १२९ ताणं तो देवुत्तर-कुराओ चंदद्धसंठिआ उ दुवे । दससहसविसुद्धमहा-विदेहदलमाणापिहलोओ ॥१३०॥ ते गजदंतगिरिओनी बच्चे अंदर देवकुरु अने उत्तरकुरुक्षेत्र ए वे क्षेत्र अर्धचन्द्रना आकारवाळां छे, अने दशहजार वाद करेल क्षेत्रसमास ॥२९॥ प्रकरणम् ॥२९॥ एका महाविदेहथी अर्धप्रमाण पहोला छे. १३० नइपूवावरकूले, कणगमया बलसमा गिरी दो दो । उत्तरकुराइ जमगा, विचित्तचित्ता य इअरीए १३१ महानदीना पूर्वकिनारे अने पश्चिमकिनारे वे वे पर्वतो सुवर्णना अने बलकूट सरखा छे, ते उत्तरकुरुक्षेत्रमा बे पर्वत यमकगिरि नामना अने देवकुरुमां चित्रगिरि तथा विचित्रगिरि नामना छे. १३१ नइवहदीहा पण पण हरया दुदुदारया इमे कमसो। निसहो तह देवकुरू, सूरो सुलसो य विज्जुपभो १३२ तह नीलवंत उत्तर-कुरु चंदेरवय मालवंतु ति । पउमदहसमा नवरं, एएसु सुरा दहसनामा ॥ १३३ ॥ नदीना प्रवाह अनुसारे दीर्घ एवा पांच पांच द्रह वे बे द्वारवाला छे, ते अनुक्रमे आ प्रमाणे-निषध-देवकुरु-सूर-मुलस- विद्युत्मभ (ए पांच द्रह देवकुरुमां) १३२ तथा निलबंत-उत्तरकुरु-चंद्र-ऐरवत अने माल्यवंत (ए पांच द्रह उत्तरकुरुमां) ए सर्व द्रह पद्मद्रह सरखा छे, परन्तु द्रहोना देवो द्रहना नाम सरखा नामवाळा छे. १३३ अडसय चउतीस जोअ-णाई तह सेगसत्तभागाओ । इक्कारस य कलाओ गिरिजमलदहाणमंतरयं १३४ निशध तथा मेरुपर्वत यमलगिरीओ अने द्रहोर्नु परस्पर अन्तर ८३४ योजन तथा सातीया एकभागसहित एवी ११ कळा जेटलं छे.१३४ दह पुत्वावरदसजो-अणेहि दस दस विअड्डकूडाणं । सोलसंगुणप्पमाणा, कंचणगिरिणो दुसय सव्वे १३५ द्रहथी पूर्व अने पश्चिमे दश योजन दूर वैताट्यकृटोथी सोळगुणा प्रमाणवाळा दश दश कंचनगिरि छे, जेथी सर्व मळी बसो + .
पणसयवट्टपिहत्तं , क्षेत्रसमास ॥३०॥ ॥३०॥ कंचनगिरि कुरुक्षेत्रमा छे. १३५ उत्तरकुरुपुव्वद्धे, जंबूणयजंबूपीढमतेसु । कोसदुगुच्चं कमि व-ड्माणु, चउवीसगुणं मज्झे ॥ १३६ ॥ उत्तरकुरुक्षेत्रना पूर्वार्धमां जांबूनद सुवर्णतुं जंबूपीठ छे, ते पर्यन्तभागे चे गाउ उंचुं छे, अने त्यारवाद अनुक्रमे वधतुं वधतुं मध्यभागमा चोवीसगुण उचुं छे. १३६ तथा पांचसो योजन वृत्ताकारे विस्तारवालु छे, एवं ते जंबूपीठ वे गाउ उंचा अने अर्ध विस्तारवाळां मनोहर चार द्वार सहित एवी पद्मवेदिकावडे वीटायलं छे. १३७ तं मज्झे अडवित्थर, चउच्च मणिपीढिआइ जंबूतरू । मूले कंदे खंधे, वरवयरारिहवेरू-लिए ॥ १३८ ॥ ते जंवूपीठनी उपर मध्यभागमा आठ योजन विस्तारवाळी अनें चार योजन उंची एक मणिपीठिका छे, अने ते उपर जंबूवृक्ष छे. ते मूळमां उत्तम वज्ररत्ननुं श्वेतवर्णे, कंद अरिष्टरत्ननुं कृष्णवर्णे, अने स्कंधमां वैडूर्यरत्ननुं नीलवर्णे छे. १३८ तस्स य साहपसाहा, दला य बिंटा य पल्लवा कमसो। सोवण्णजायरूवा, वेरुलितवणिज्जजंबुणया ॥१३९॥ तेनी शाखाओ सुवर्णनी (पानी), पशाखाओ जातरूप सुवर्णनी, पत्रो वैडूर्यनां नीलवर्ण, बीट तपनीय सुवर्णमय होवथी रक्त- वर्ण, अने गुच्छा जांबूनद सुवर्णना होवाथी किंचित् रक्तवर्णे छे. १३९ सो रययमयपवालो, राययविडिमो य रयणपुप्फफलो । कोसदुगं उबेहे, थुडसाहाविडिमविक्खंभे १४० प्रकरणम् ॥३१॥ क्षेत्रसमास ३१॥ ते जंवूवृक्ष रूपाना प्रवालवाळु रूपानी विडिमा (उभी उर्ध्वशाखा)वाळु, अनेक रत्नना पुष्पफळवालु छे. तथा उंडाइमां थडना विस्तारमा शाखाना विस्तारमा अने विडिमाना विस्तारमा बे गाउ प्रमाणवाळु छे. १४० थुडसाहाविडिमदीह-त्ति गाऊए अपनरचउवीसं । साहा सिरिसमभवणा, तम्माणसचेइयं विडिमं १४१ जम्बूवृक्षना थडनी लंबाइ ८ गाउ, शाखाओनी लंबाइ १५ गाउ अने विडिमानी लम्बाइ २४ गाउ छे. तथा चारे शाखाओ श्रीदेवीना भुवन सरखा भवनवाळी छे, अने विडिमशाखा तेटलाज प्रमाणना चैत्यवाळी छे. १४१ पुविल्लि सिज्जतिसु आ-सणाणि भवणेसु णाढिअसुरस्त । साजंबुबारसवे-इआर्हि कमसो परिक्त्तिा १४२ पूर्वदिशाना भवनमां अनादृत देवनी शय्या छे, अने त्रण दिशाना त्रण प्रासादोमां अनादृतदेवनां परिवारसहित सिंहासनो छे. तथा ए जम्बूवृक्ष अनुक्रमे बार वेदिकाओवडे वीटायलु छे. १४२ दहपउमाणं जं वि-त्थरंतु तमिहावि जंबुरुक्खाणं । नवरं महयरियाणं, ठाणे इह अग्गमहिसीओ ॥१४३॥ द्रहमां कमळोनो जे परिवार कह्यो तेवोज परिवार अहिं जम्बूवृक्षोनो पण जाणवो, परन्तु महत्तारिकादेवीओने बदले अहीं अ. आमहिषीओ कद्देवी ए विशेष छे. १४३ कोसदुसएहिं जंबु, चउदिसिं पुव्वसालसमभवणा । विदिसासु सेसतिसमा, चउवाविजुया य पासाया १४४ जम्बूवृळयी वसो गाउ दूर चारे दिशामां पूर्वनी शाखाना भवनसरखा देवभवनो छे, अने विदिशाओमां शेष त्रण प्रासाद सरखा क्षेत्रसमास ॥३२॥ प्रकरणम् ॥३२॥ चार चार कापिकाओसहित मासादो छे. १४४ ताणंतरेसु अड जिण--कूडा तह सुरकुराइ अवरद्धे । राययपीढे सामलि--रुक्खो एमेव गरुलस्स ॥१४५॥ ते भवनप्रासादोना आठ आंतरामां आठ जिनकूट छे. तथा देवकुरुक्षेत्रना पश्चिमाधमां पण रूपाना पीठउपर जम्बूक्ष सरखुज शाल्मलित छे ते गरुडदेवर्नु छे. १४५ बत्तीस सोल बारस, विजया वक्खार अंतरनईओ । मेरुवणाओ पुव्वा--वरासु कुलगिरिमहणयंता ॥१४६॥ महाविदेहक्षेत्रमा ३२ विजयो १६ वक्षस्कारपर्वतो अने १२ अन्तर्नदीओ ए सर्व मेरूना वनथी पूर्वदिशिमां अने पश्चिमदिशिमा कुलगिरि अने महानदीना अन्तवाला छे. १४६ विजयाण पिहुत्ति सग- ठभाग बारुत्तरा दुवीससया । सेलाणं पंचसए, सवेइनइ पन्नवीससयं ॥१४७ ॥ विजयोनी दरेकनी पहोळाइ बावीससोवार योजन उपरान्त एक योजनना आठीया सात भाग छे. वक्षस्कारपर्वतोनी दरेकनी पहोळाइ ५०० योजन छे, अने दरेक अन्तर्नदीनी पदोळाइ १२५ योजन छे. १४७ सोलससहस्स पणसय, बाणउआ तह य दो कलाओ य । एएसि सव्वेसिं, आयामो वणमुहाणं च १४८ ए विजयो विनेरे सर्वनी लम्बाइ १६५९२ योजन तथावे कळा छे, तेमज आगळ कहेवातावे वनमुखनी लंबाइ पण एज छे.१४८ गयदंतगिरिव्वुच्चा, वक्खारा ताणमंतरनईणं । विजयाणं च भिहाणा-इंमालयंता पयाहिणओ ॥ १४९ ॥ A
आपसमास
॥३३॥
प्रकरणम्
॥३३॥
वक्षस्कारपर्वतो गजदंतगिरि सरखा उंचां छे, ते वक्षस्कारोनां अन्तर्नदीओनां अने विजयोना नामो माल्यवंत गजदंतथी पारं-
भीने प्रदक्षिणावर्तनाक्रमथी आ प्रमाणे छे. १४९
चित्ते य बंभकूडे, नलिणीकूडे य एगसेले य । तिउडे वेसमणे वि य, अंजणमायंजणे चेव ॥ १५० ॥
अंकावइ पम्हावइ, आसीविस तह सुहावहे चंदे । सूरे नागे देवे, सोलस वक्खारगिरिनामा ॥ १५१ ॥
चित्र, ब्रह्मकूट, नलिनीकूट, एकशैल,त्रिकूट, वैश्रमण, अंजनगिरि, मातंजनगिरि, अंकापाती, पक्ष्मापाति, आशीविष, सुखावह,
चन्द्र, सूर, नाग, देव, ए १६ वक्षस्कारपर्वतोनां नाम अनुक्रमे जाणवा. १५०-१५१
गाहावइ, दहवई, वेगवई, तत्त मत्त उम्मत्ता । त्तीरोय सीयसोया, तह अंतोवाहिणी चेव ॥ १५२ ॥
उम्मीमालिणि गंभी-रमालिणी फेणमालिणां चेव । सव्वत्थ वि दसजोयण-उंडा कुंडुब्भवा एया १५३
ग्राहवती, द्रहवती, वेगवती, तप्ता. मत्ता, उन्मत्ता, क्षीरोदा, शीतस्रोता तथा अन्तर्वाहिनी, अम्मिमालिनी, गंभीरमालिनी
अने फेनमालिनी ए १२ अन्तर्नदीओ सर्वस्थाने १० योजन उंडी छे, अने एकेक कुण्डमांथी एकेक नदी निकळी छे. १५२-१५३
कच्छु सुकच्छो य महा-कच्छो कच्छावई तहा । आवत्तो मंगलावत्तो, पुक्खलो पुक्खलावई ॥ १५४ ॥
वच्छु सुवच्छो य महा-वच्छो वच्छावई वि य । रम्मो य रम्मओ चेव, रमणिज्जो मंगलावई ॥ १५५ ॥
क्षेत्रसमास
॥३४॥
प्रकरणम्
॥३४॥
पम्हु सुपम्हो य महा-पम्हो पम्हावई तओ। संखो नलिणनामा य, कुमुओ नलिणावई ॥ १५६ ॥
वप्पु सुवप्पो य महा-वप्पोवप्पावई त्ति य । वग्गू तहा सुवग्गू य, गंधिलो. गंधिलाबई ॥ १५७ ॥
१ कच्छविजय, २ सुकच्छविजय, ३ महाकच्छविजय, ४ कच्छावतीविजय, ५ आवर्तविजय, ६ मङ्गळावर्तविजय, ७ पुष्कल-
विजय, ८ पुष्कलावतीविनय, १५४ ९ वत्सविजय, १० सुवत्सविजय, ११ महावत्सविजय, १२ वत्सावती विजय, १३ रम्यविजय,
१४ रम्यकविजय, १५ रमणीय (मनीक) विजय, १६ मंगलावतीविजय. १५५ १७ पक्ष्मविजय, १८ मुपक्ष्मविजय, १९ महाप-
क्ष्मविजय, २० पक्ष्मावतीविजय, त्यारवाद २१ शंखविजय, २२ नलिनविजय नामनी विजय, २३ कुमुदविजय, २४ नलिनावती-
विजय. १५६ २५ वविजय, २६ सुवप्रविजय, ३७ महावप्रविजय, २८ चपावतीविजय, २९ वल्गुविजय, तथा ३० सुवल्युविजय,
३१ गधिलविजय ३२ गंधिलावतीविजय ॥ १५७ ॥
एए पुव्वावरगय. विअड्डदलिय त्ति नइदिसि दलेसु । भरहद्धपूरिसमाओ, इमेहिं नामेहिं नयरीओ १५८
ए सर्व विजयो पूर्व पश्चिम लम्बाइ प्रमाणे रहेला. दीर्घवैताट्योवडे अर्धभागवाळा थयेला ले, तेथी महानदी पासेना अर्धमां
दक्षिणभरतार्धनी अयोध्यानगरीसरखी अने आगळनी गाथाओमां कहेवाशे एवा नामवाळी नगरीओ छे. १५८
खेमा खेमपुरा वि अ,अरिह रिठ्ठावई य नायव्वा । खग्गी मंजुसा वि य, ओसहिपुरि पुंडरिगिणी य १५९
सुसीमा कुंडला चेव, अवराइय पहंकरा । अंकावइ पम्हावइ, सुभा रयणसंचया ॥ १६० ॥
क्षेत्रसमास MA प्रकरणम् ॥३५॥ आसपुरा सोहपुरा, महापुरा चेव हवइ विजयपुरा । अवराइया य अवरा, असोगा तह वीयसोगा य १६१ विजया य वेजयंति, जयंति अपराजिया य बोद्धव्वा । चक्कपुरा खग्गपुरा, होइ अवज्झा अउज्झा य १६२ १ क्षेमा, २ क्षेमपुरा, ३ अरिष्टा, ४ अरिष्टावती, ए चार नगरीओ जाणवी, तथा ५ खड्गी, ६ मंजुपा, ७ औषधिपुरी, पुंड- रीकिणी १५९ तथा ९ सुसीमा, १० कुंडला, ११ अपराजिता, १२ प्रभंकरा, १३ अंकावती, १४ पद्मावती, १५ शुभा, १६ रत्न- संचया १६० १७ अश्वपुर।, १८ सिंहपुरा, १९ महापुरा, २० विजयपुरा ए नगरीओ छे. तथा २१ अपराजिता, २२ अपरा, २३ अशोका, २४ वीतशोका. १६१ २५ विजया, २६ वैजपन्ती, २७ जयन्ती, २८ अपराजिवा, ए नगरीओ जाणवी, तथा २९ चंद्र- पुरा ३०. खगपुरा, ३१ अवध्या, ३२ अयोध्या ए नगरीओ छे.. १६२ कुंडुब्भवा उ गंगा-सिंधूओ कच्छपम्हपमुहेसु । असु विजएसुं सेसेसु य रत्त रत्तवई ॥ १६३ ॥ कुण्डमांथी. निकळेली एवी गंगानदी अने सिन्धुनदी नामनी बे नदीओ कच्छ आदि ८ विजयोमां अने पक्ष्मविजय आदि आठ विजयोमा छे, अने शेष १६ विजयोमा रक्तानदी तथा रक्तवतीनदी ए वे वे नदीओ छे. १६३ अविवक्खिऊण जगई, सवेइवणमुहचउक्कपिहुलत्तं । गुणतीससय दुवीसा, नइंति गिरिअंति एगकला १६४ जगतिनी विवक्षा नहि करीने वेदिकासहित चार वनमुखनो पहोळाइ नदोनी पासे २९२२ योजन छे, अने वर्षधरपर्वत पासे १ कळा २.१६४ पणतीससहस चउसय, छडुत्तरासयलविजयविक्खंभो।वणमुहदुः दुगविक्खंभो, अडवन्नसया य चउआला. १६५ समास ॥३६॥ प्रकरण ॥३६॥ सगसय पन्नासा नइ-पिहुत्ति चउवन्नसहस मेरुवणे। गिरिवित्थरि चउसहसा, सव्वसमासो हवइ लक्खं १६६ सर्व विजयोनो एकत्र विस्तार ३५४०६ योजन, बे वनमुखनो विस्तार ५८४४ योजन, छ अन्तर्नदीओनी पहोलाइ ७५० योजन, मेरुसहित भद्रशालबननो विस्तार ५४०००, अने ८ वक्षस्कार पर्वतोनी पहोळाइ ४००० योजन, ए सर्व अंकने भगा करतां जंबुद्वीपनो पूर्व पश्चिम विस्तार १ लाख योजन पूर्ण थाय छे. १६५-१६६ जायणसयदसगंते, समरधरणीओ अहो अहोगामा । बायालीप्तसहसेहि, गंतुं मेरुस्त पच्छिमओ ॥१६७॥ मेरुपर्वतथी पश्चिमदिशामां ४२००० योजन दूर जइए त्यां मेरुनी समभूतलथी नोचे १००० योजन नीचे--उंडाइमां अधोग्रामो छे.१६७ चउ चउतीसं च जिणा, जहन्नमुक्कोसओ अ हुंति कमा। हरिचकिबला चउरो, तीसं पत्तेअमिह दीवे १६८ आ जंबूद्वीपमा जघन्यथी ४ तीर्थकर अने उत्कृष्टथी ३४ तीर्थकर समकाळे होय छे, तथा वासुदेव चक्रवर्ती अने बळदेव पण दरेक जघन्यथी चार चार अने उत्कृष्टथी त्रीस त्रीस होय छे. १६८ ससिदुगरविदुगचारो, इह दीये तेसि चारखित्तं तु । पणसय दसुत्तराइं, इगसद्विभागा य अडयाला १६९ आ जंबूद्वीपमां बेचंद्र अने बेसूर्यनी गति प्रवर्त छे, अने ते चारेनुं गतिशेत्र ५१० योजन उपरांत एकसठिया अडतालीस भाग छे.१६९ पनरस चुलसीइसयं, छप्पन्नऽडयालभागमाणाई । ससिसूरमंडलाइं, तयंतराणिगिगहीणाई ॥ १७० ॥ चन्द्रनां १५ मंडल छे, अने ते दरेक एक्सठीआ छप्पनभाग प्रमाणनां छे, तथा सूर्यना एकसो चोर्यामी मंडल छे, अने ते समास ॥३७॥ प्रकरण ॥३७॥ दरेक एकसठीया ४८ भाग प्रमाणना छे, ए बन्नेना आंतरा एकेक न्यून--ओछा छे. १७० पणतीसजोअणे भा-गतीस चउरो अ भागसगभाया । अंतरमाणं ससिणो, रविणो पुण जोअणे दुन्नि १७१ चन्द्रना मण्डलोना अन्तरनु प्रमाण ३५ योजन ३० एकसठीया भाग अने एक एकसठियाना सातीय। ४ भाग जेटलुं छे, अने सूर्यना मण्डलोनुं अन्तर २-२ योजन छे. १७१ दीवंतो असिअसए, पण पणसट्ठी य मंडला तेसिं। तीसहिअतिसय लवणे, दसिगुणवीसं सयं कमसो१७२ जम्बूद्वीपनी अंदर एकसो एंसी योजनमां चंद्रनां पांच मंडल अने सूर्यना पांसठ मंडल छे, अने लवणसमुद्रमा त्रणसोत्रीस योजनमा अनुक्रमे चन्द्रना दश मंडळ छे, अने सूर्यना पांसठ मंडल छे. १७२ ससिससि रविरवि अंतरि,मज्झे इगलक्खुतिसयसाठ्ठणो।साहियदुसयरिपणचय,बहि लक्खोछसय साठहिओ सर्वाभ्यान्तरमंडले चन्द्रथी चन्द्रने अने सूर्यथी सूर्यनें परस्पर अन्तर त्रणसो साठ योजन न्यून १ लाख योजन प्रमाण छे, त्यारवाद दरेक मडले साधिक ७२ योजन चन्द्रान्तर वधता अने साधिक ५ योजन सूर्यान्तर वधतां सर्व बाह्यमंडले छसोसाठ योजन अधिक १ लाख योजन प्रमाण जेटलु परस्पर अन्तर होय छे. १७३ साहियपणसहस-तिहु-तराइ ससिणो मुहुत्तगइ मझे। बावन्नहिआ सा बहि, पइमंडलपउणचउवुड्डी १७४ सर्वाभ्यन्तरमंडले चन्द्रनी मुहूर्तगति पांच हजार त्रिहुत्तर योजनथी कंइक अधिक छे, अने सर्व बाह्य मंडले एज मुहूर्त्तगति 다 क्षेत्रसमास ॥३८॥ प्रकरणम् ॥३८॥ बावन योजन अधिक छे, तथा दरेक मंडळे पोणाचार योजन मुहूर्तगतिमां धृद्धि थती जाय छे. १७४ जा ससिणो सा रविणो, अडसयरिसएण ऽसीसएण हिआ। किंचूणाणं अट्ठा-रसहिभागाणमिह वुड्डी १७५ पूर्वगायामां जे मुहूर्त्तगति चन्द्रनी कही तेज मुहूर्चगति सूर्यनी जाणवी. परंतु सर्वाभ्यन्तरमण्डले १७८ योजन अधिक जाणवी अने सर्वबाह्यमंडले १८० योजन अधिक जाणवी,तथाहिं सूर्यनी मुहूर्तगतिमांदरेकसूर्यमंडले साठीया १८ भाग जेटली वृद्धि जाणवी.१७५ मज्झे उदयत्थंतरि, चउणवइसहस्स पणसय छवासा । बायालसहिभागा, दिणं च अट्ठारसमुहुत्तं ।१७६। सर्वाभ्यन्तरमंडले सूर्य होय ते वखते चोराणुहजार पांचसो छवीस योजन उपरान्त साठीया वेंतालीस भाग जेटलं उदयथी अस्तनुं अन्तर होय, अने दिवस १८ मुहुर्त्तनो होय. १७६ पइमंडलं दिणहाणी, पुण्ह मुहुत्तेगसहिभागाणं । अंते बारमुहुत्तं, दिणं निसा तस्स विवरीआ ॥१७७॥ दरेक मंडले मुहूर्त्तना एकसठीया वे भाग जेटली दिवसनी हानि थाय छे, जेथी सर्वपयन्तमण्डले दिवस बार मुहुर्त्तनो अने रात्रि तेथी विपरीत अढार मुहुर्रानी होय छे. १७७ उदयत्थंतरि बाहि, सहसा तेसठि छसय तेसहा । तह इगससिपरिवारे, रिक्खडवोसाऽडसीइ गहा १७८ सर्ववाह्यमण्डले उदयअस्तनुं अन्तर ६३६६३ त्रेसठहजार छमो सठ योजन छे, तथा एक चंद्रना परिवारमा २८ अठ्यावीस नक्षत्रो अने ८८ अठासी ग्रह छे. १७८ क्षेत्रसमास ॥३९॥ प्रकरणम् ॥३९॥ छासहिसहस नवसय, पणहत्तरि तारकोडीकोडीणं । सण्णंतरेण वुस्से हंगुलमाणेण वा हुंति ॥ १७९ ॥ छासठ हजार नवसो पंचोत्तर कोडाकोडी तारा एक चन्द्रनो परिवार छे. अहीं कोडाकोडिपढ़ने कोइ संज्ञान्तर माने छे, अथवा उत्सेधांगुलना प्रमाणथी एटला तारा होय छे, एम बे रीते अभिमाय छे. १७९ गहरिक्खतारगाणं, संखं ससिसंखसंगुणं काउं इच्छिअदीवुदहिम्मि य, गहाइमाणं विआणेह ॥ १८० ॥ ग्रहनक्षत्र अने ताराओनी संख्याने चंद्रनी संख्यासाथे गुणाकारकरीने इच्छेला द्वीप वा समुद्रमां ग्रहादिकनुं संख्यापमाण जाणवू.१८० चउ चउ बारस बारस, लवणे तह धायइम्मि ससिसूरा । परओदहिदीवेसु य, तिगुणा पुग्विल्लसंजुत्ता १८१ चार चन्द्र चार सूर्य लवणसमुद्रमां छे, बार चन्द्र बार सूर्य घातकीखण्डमां छे, त्यारपछीना समुद्रोमां अने द्वीपोमां त्रिगुणा करीने पूर्वना सर्व चंद्रसूर्य उमेरचा.१८१ नरखित्तं जा समसे-णिचारिणो सिग्घसिग्घतरगइणो । दिहिपहमिति खित्ता-गुमाणओ ते नराणेवं १८२ ते चन्द्रादि ज्योतिषीओ मनुष्यक्षेत्रमुधी समश्रेणिए चालनारा छे, अने क्रमशः शीघ्र शीघ्रतर गति करनारा छे, तथा क्षेत्रने अनुसारे मनुष्योने दृष्टिगोचर थाय छे, ते आ प्रमाणे- १८२ पणसय सत्तत्तीसा, चउतीससहस्स लक्खइगवीसा । पुक्खरदीवढ्ढनरा, पुवेण ऽवरेण पिच्छंति ॥१८३॥ अर्धपुष्करद्वीपना मनुष्यो पूर्वदिशामां उदय पामता सूर्यने एकवीसलाख चोत्रीसहजार पांचसो साडत्रीस योजन दूरथी देखे क्षेत्रसमास ॥४०॥ प्रकरणम् ॥४०॥ छे, तेमज एटलेज दृग्थी पश्चिम दिशामां सूर्यने अस्त पामतो देखे छे. १८३ नरखित्तवहिं ससिरवि-संखा करणंतरेहिं वा होइ।तह तत्थ य जोइसिआ, अचलद्धपमाणसुविमाणा १८४ मनुष्यक्षेत्रथी बहार चंद्रसूर्यनी संख्या पूर्व कहेला त्रिगुणपूर्वयुक्त करणथी थाय छे अथवा बीजा करणवडे पण थाय छे. तथा त्यां रहेला ज्योतिषीओ गतिवाळा नथी पण अचल स्थिर छे, अर्ध प्रमाणवाळा छे, अने विशेप सुन्दर विमानवाला छे. १८४ जंबूपरिहि तिलक्खा, सोलसहसदुसय पउणअडवीसा । धणुअडवीससयंगुल-तेरससड्डा समहिआ य १८५ अहीं जम्बूद्वीपनो परिधि एटले घेरावो त्रणलाख सोलहजार वसो पोणीअट्ठावीस योजन-एकसो अठ्ठावीस धनुप साडातेर अंगुल अने तेथी पण कंइक अधिक छे. १८५ सगसयनउआकोडी, लक्खाछप्पन्न चउणवइसहसा । सढसयं पउणदुको-स सड्ढवासठिकर गणियं ॥१८६॥ सातसोनेवुक्रोड छप्पनलाख चोराणुहजार दाढसो योजन पोणावे कोश अने साडीवासठ हाथ एटल गणितपद छे. १८६ वपरिहिं च गणिअं, अंतिमखंडाइ उसुजिअंच धणुं । बाहुँपयरं च धणं, गणिअव्वमिमेहि करणेहिं १८७ वृत्तवस्तुनो परिधि, गणितपद, छेल्ला खंड विगेरेना इषु अथवा छेल्ला खंडथी गणातो इषु, जोवा, धनुःपृष्ठ, वाहा, प्रतर, अने घन घन ए आठ मापने आ आगळ कडेवाता करणोवडे गणो-गणवा. १८७ विक्खंभवग्गदहगुण-मूलं वट्टस्स परिरओ होई । विक्खंभपायगुणिओ, परिरओ तस्स गणिअपयं ॥१८८॥ an क्षेमसमास ॥४१॥ ॥४१॥ विष्कंभना वर्गने दशगुण करी तेनु वर्गमूळ काहतां वृत्तवस्तुनो परिधि आवे छे, अने एज परिधि विष्कंभना पा भागे गुण्यो छतो ते वृत्तवस्तुनुं गणितपद थाय छे. १८८ ओगाहुउसू सुच्चिअ गुणवीसगुणो कला-उसू होई। विउसुपिहुत्ते चउगुण-उसुगुणिए मूलमिह जीवा १८९ [धनुःपृष्ठना मध्यभागथी] अवगाहीए,जेटला दूर,जइए वेटलाज निश्चय इषु कहेवाय.तथा ओगणीसगुणो करेलो इषु ते कलाइषु कहे- बाय, तथा इपुरहित वृत्तवस्तुनी पहोळाइने चारगुणा इषुवडे गुणीने वर्गमूळ काढतां जे आवे ते अदि जीवा कहेवाय. १८९ उसुवग्गि छगुणि जीवा-वग्गजुए मूल होइ धणु पिठं । धणुदुगविसेससेसं, दलिअं बाहादुगं होई ॥१९॥ इषुना वर्गने छ गुणो करी तेमां जीवानो वर्गयुक्त करी तेनुं वर्गमूळ काढीए तो धनुःपृष्ठ आवे, अने बे धनुःपृष्ठनो विश्लेष करता जे शेष रहे तेनु अर्ध करीए तेटलंबे बाहानुं प्रमाण आवे. १९० अंतिमखंडस्सिसुणा, जीवं संगुणिअचउहि भईऊणं । लद्धंमि वग्गिए दस-गुणमि मूलं हवइ पयरो १९१ छेल्ला खंडना इषुवडे जीवाने गुणीने चारे भागीने जे जवाब आवे तेनो वर्ग करी दशगुण करी तेनु वर्गमूळ काढतां प्रतर' प्राप्त थाय.१९१ जीवावग्गाण दुगे, मिलिए दलिए य होइ जं मूलं । वेअड्डाईण तयं, सपिहुत्तगुणं हवइ पयरो ॥१९२॥ नानी मोटी बे जीवानो वर्ग गेळवीने अर्ध करी तेनुं जे वर्गमूळ आवे तेने पोताना विस्तारसाथे गुणतां वैताट्यआदि पर्वतो तथा क्षेत्रोर्नु प्रतर थाय छे. १९२ समुद्रमां ते स्थाने उंडाइ जाणवी . १ ९ ६ - समास ॥४२॥ ॥४॥ बे एअं च पयरगणिअं, संववहारेण दंसिअं तेण । किंचूर्ण होइ' फलं, अहिअं पि हवइ सुहुमगणणा १९३ वळी ए प्रतरगणित व्यवहारथी दर्शाव्यु छे,माटे सूक्ष्म गणत्रीवडे प्रतररुप जवाब कंइक न्यून आवे, तेम अधिक पण होय. १९३ पयरो सोस्सेहगुणो, होइ घणो परिरयाइसव्वं वा । करणगणणालसेहि, जंतगलिहिआउ दहव्वं ॥१९४॥ जे पर्वतादिनुं मतर आवे ते प्रतरने तेज पर्वतादिनी उंचाइ साथे गुणे तो पर्वतादिनो 'घन' आवे. अथवा गणित गणवाना आळसुओए परिधि विगेरे उपरना सर्व यन्त्रमा लख्यु छे तेमांथी जाणवू. १९४ गोतित्थं लवणोभय, जोअणपणनवइसहस जा तत्थ । समभूतलाओ सगसय-जलवुड्डी सहसमोगाहो १९५ लवणसमुद्रमां बे बाजुए ९५००० योजनसुधी गोतीर्थ छे, अने त्यारवाद त्यां मध्यभागे समभूतलथी सातसो योजन उंची जन्वृद्धि छे, अने एक हजार १००० योजन जेटली उंडाइ छे. १९५ तेरासिएण मज्झि-लरासिणा संणिज्ज अंतिमगं । तं पढमरासिभइयं, उव्वेहं मुणसु लवणजले ॥१९६॥ त्रिराशिना गणितथी मध्यराशिवडे छेल्ला राशिने गुणवो, अने ते गुणाकारने पहेला अंकवडे भागवो, जे आवे तेटली लवण- हिटुवरि सहसदसगं, पिठुलामूलाउ सतरसहसुच्चा। लवणसिहा सा तदुवरि, गाउदुगं वड्डइ दुवलं १९७ नीचे अने उपर दश हजार योजन पहोळी, अने मूळमांथी सत्तरहजार योजन उंची एवी जळशिखा लवणसमुद्रमां छे, ते क्षेत्रसमास ॥४६॥ प्रकरणम् ॥४॥ शिखा पुनः १७००० योजनना उपरभागे (एक अहोरात्रमा) बे वार वे गाउ उंची वधे छे. (उछळे छे.) १९७ बहुमज्झे चउदिसि चउ, पायालावयरकलससंठाणा । जोअणसहस्स जड्डा, तहसगुणहिढुवरि रुंदा १९८ लक्खं च मज्झि पिहुला, जोअणलक्खं च भूमिमोगाढा। पुव्वाइसु वडवामुह-केजुवजूवेसरभिहाणा १९९ समुद्रना अति मध्य भागमा [भूमितळमां] वज्रना घडा सरखा आकारवाळा चारे दिशाए चार मोटा पातालकळश छे, ते हजार योजन जाडा अने हेठे उपर जाडाइथी दशगुणा विस्तारवाळा--पहोळा १९८ मध्य भागमां लाख योजन पहोळा अने लोख योजन भूमिमां दटायला छे, ते पूर्वादि चारदिशाए वडवामुख-केयूप-यूप अने इश्वर ए चार नामवाळा छे. १९९ अन्ने लहुपायाला, सगसहसा अडसया सचुलसीआ। पुव्वुत्तसयंसपमा-णा तत्थ तत्थ प्पएसेसु ॥२०॥ लवणसमुद्रमां ते ते स्थाने वीजा सात हजार आठसो चोर्यासी ७८८४ नाना पातालकळशो छे, ते पूर्व कहेला चार महाक- नशोथीं सोमा भागे प्रमाणवाळा छे. २०० कालो अ महाकालो, वेलंब पभंजणो अ चउसु सुरा । पलिओवमाउणो तह, सेसेसु सुरा तयद्धाऊ २०१ चार महाकळशोना चार अधिपतिदेव काळ-महाकाळ-वेलंव अने प्रभंजन ए नामना छे, ते चारे देवो पल्योपमना आयुष्य- वाला छे, अने शेष लघुकळशोना अधिपति जे देवो छे ते सर्व तेथी अर्ध (०॥ पल्योपम) आयुष्यवाळा छे. २०१ सव्वेसिमहो-भागे वाऊ मज्झिल्लयम्मि जलवाऊ । केवलजलमुवरिल्ले, भागदुगे तत्थ सासुव्व ॥ २०२॥ 1.
वसमास ॥४४॥ वे ॥४४॥ बहवे उदारवाया, मुच्छंति खुहंति दुण्णिवाराओ । एगअहोरत्तंतो, तया तया वेलपरिवुट्टी ॥ २०३ ॥ सर्व कळशोनी नीचेना त्रिभागमां केवळ वायु होय छे, मध्यना त्रिभागमां वायु अने जळ वे मिश्र होय छे, अने उपरना त्रि- भागमां केवळ जळ होय छे, त्यां नीचेना वे भागमां श्वासोच्छवासनी पेठे घणा मोटा वायरा उत्पन्न थाय छे, अने एक अहोरात्रमा वार ए रीते उत्पन्न थइ क्षोभ पामे छे, तेम तेम समुद्रनी वेल वृद्धि पामे छे. २०२-२०२ बायालसहिदुसयरि-सहसा नागाण मझुवरि बाहिं । वेलं धरंतिकमसो, चउहत्तर लक्खु ते सव्वे २०४ अनुक्रमे ४२००० नागकुमार देवो मध्यवेलने अटकावे छे, ६०००० देवो शिखानी उपर वधती वेलने अटकावे छे, अने ७२००० देवो वहारना भागनां वधती बेलने अटकावे छे. ए प्रमाणे ए सर्व नागकुमार देवो १७४००० छे. २०४ बायालसहस्तेहिं, पुव्वीसाणाइदिसिविदिसिलवणे । वेलंधराणुवेलं-धरराईणं गिरिसु वासा ॥ २०५ ॥ लवणसमुद्रमा ४२००० योजन दूर जइने त्यां पूर्वआदि चार दिशओमा वेलंधर राजाओना अने इशान आदि चार विदिशि- ओमां अनुवेलंधर राजाओना पर्वतो आवे छे, ते उपर तेमना आवास छे. २०५ गोथूभे दगभासे, संखे दगसोमनामि दिसि सेले । गोथूभो सिवदेवो, संखो अ मणोसिलो राया ॥२०६॥ कक्कोडे विज्जुपहे, केलास रुणप्पहे विदिसिसेले । कक्कोडगु कद्दमओ, केलास रुणप्पही सामी ॥ २०७॥ गोस्तूप नामना पर्वत उपर गोस्तूपदेवनो निवास छे, दकभास पर्वतउपर शिवदेवनो, शंख पर्वतउपर शंखदेवनो अने दकसीम * क्षेत्रसमास प्रकरणम् ॥४५॥ ॥४५॥ नामना पर्वतउपर मनःशिल नामनो देव अधिपति छे, ए प्रमाणे चार दिशाना चार पर्वतो उपर ए चार देनो अधिपति कह्या.२०६ तथा कर्कोटकपर्वतनो अधिपति कर्कोटक देव छे, विद्युत्मभपर्वतनो कर्दमक देव छे, कैलासपर्वतनो कैलासदेव, अने अरुणप्रभपर्वतनो अधिपति अरुणप्रभ नामे देव छे, ए प्रमाणे विदिशिना चार अनुवेलंधर पर्वतना अधिपति कह्या. २०७ एए गिरिणो सव्वे, बावीसहिआ य दससया मूले । चउसय चउवीसहिआ, विच्छिन्ना हुँति सिहरतले २०८ सतरससय इगवीसा, उच्चत्त ते सवेइआ सव्वे । कणगंकरययफालिह, दिसासु विदिसासु रयणमया २०९ ए सर्वे पर्वतो मूळमां १०२२ योजन विस्तारवाळा, अने शिखर उपर ४२४ योजन विस्तावाळा छे. २०८ तथा ते सर्वे पर्वतो १७२१ योजन उंचा छे, पर्यन्ते वेदिकासहित छे, पूर्वादि दिशाओमां अनुक्रमे सुवर्णन-अंकरत्न-रुपुं-अने स्फाटिकना छे, तथा विदिशामां चारे पर्वत रत्नना (श्वेतवर्णे) छे. २०९ नवगुणहत्तरिजोअण,बहि जलुवरि चत्त पणनवरुभाया । एए मज्झे नवसय,तेसहा भाग सगसयरि २१० ए आठे पर्वतो वहार जंबूद्वीपतरफ जळना उपर नवसो अगुणोत्तर योजन अने पंचाणु चालीस भाग उंचा देखाय छे, अने मध्यभागे शिखातरफ नवसो त्रेसठ योजन उपरांत पञ्चाणुआ सित्तेर भाग जळथी उंचा देखाय छे. २१० हिमवंतंता विदिसी-साणाइगयासु चउसु दाढासु । सगसग अंतरदीवा, पढमचउक्कं च जगईओ ॥२११॥ जोअणतिसएहि तओ, सयसयबुड्ढि अ छसु चउक्केसु । अन्नुन्नजगइअंतरि, अंतरसमवित्थरा सव्वे २१२ क्षेत्रसमास ॥४६॥ हिमवंतपर्वतना छेडाथी इशानादि विदिशाओमा रहेली चार दाढाओ उपर सात सात अन्तद्वीप छ, एमां पहेला चार अन्तद्वीप जगतीथी त्रणसो योजन दूर छे, वारवाद छए चतुष्कोमा द्वीपोर्नु परस्पर अन्तर तथा जगतीथी द्वीपर्नु अन्तर ए बेमा १००-१०० प्रकरणम् योजननी वृद्धि करवी, तथा ए सर्वे द्वीपो जगतीथी जेटला दूर छे, तेटलाज विस्तारवाळा छे. २१२-२१२ पढमचउक्कुञ्च बहि, अड्डाइअजोअणे य वीसंसा । सयरिंसवुड्डि परऊ, मज्झदिसिं सव्वि कोसदुर्ग २१३ पहेला चार बीप जम्बूद्वीपतरफ अढी योजन वीसअंश जळथी उंचा छे. अने त्यार पछीना चार चार डीपो ७० अंश अधिक अधिक उंचा छ, अने माते चतुष्को मध्यदिशिए तो वे बे गाउज उंचा छे. २१३ सव्वे सवेइअंता, पढमचउक्कमि तेसि नामाइं । एगोरुय आभासिय, वेसाणिय चेव लंगूले ॥ २१४ ॥ बीअचउक्के हयगय-गोसकुलिपुवकण्णनामाणो । आयंसंमिंढगअओ-गोपुवमुहाय तइयंमि ॥ २१५ ॥ हयगयहरिवग्धमुहा, चउत्थए आसकण्ण हरिकण्णो। अकण्ण कण्णपावरणु दीवो पंचमचउक्कंमि २१६ उक्कमुहो मेहमुहो, विज्जुमुहो विज्जुदंत छठम्मि । सत्तमगे दंतंता, घणलठनिगूढसुद्धा य ॥ २१७ ॥ सर्वे द्वीपोने अन्ते वेदिका छे, सात चतुष्कमा जे पहेलं चतुष्क एटले पहेला चार द्वीप ले तेना नाम-एकोरूक-आभासिक- वैपाणिक अनेलांगूलिकद्वीप २१४ वीजा चतुष्कमा हृयकर्ण, गजकर्ण, गोकर्ण, अने शष्कुलीकर्ण ए चार नामवाळा छ, तथा जीजा चतुष्कमां आदर्शमुख, मेंढमुख, अयोमुख, अने . गोमुख ए चारनामवाळा छे. २१५ चोथा चतुष्कमां हयमुख, गजमुख, हरिमुख, .
क्षेत्रसमास ॥४७॥ अने व्याघ्रमुख ए नामवाळा द्वीपो छे, तथा पांचमा चतुष्कमां आसकर्ण, हरिकर्ण, अकर्ण, कर्णप्रावरणदीप ए चार नामवाळा द्वीप छे. २१६ छठा चतुल्कमा उल्कामुख, गेघमुख, विद्युन्मुख, अने विद्युदंत ए चार नामवाळा द्वीप छे. अने सातमा चतुष्कमां प्रकरणम् घनदन्त, लष्टदन्त, गूढदन्त, अने शुद्धदन्त ए चार नामवाळा द्वीप छे. २१७ असा ॥४७॥ एमेव य सिहरम्मिवि, अडवीसं सव्वि हुंति छप्पन्ना। एएसु जुअलरूवा, पलिआसंखंसआउ नरा २१८ ए प्रमाणेज शिखरीपर्वतनां बन्ने छेडे पण २८ द्वीप छे, जेथी सर्वमळीने ५६ अन्तद्वीप छे, अने छप्पनअन्तीपोमां युगलिक- मनुष्यो पल्योपमना असंख्यातमाभागना आयुष्यवाळा वसे छे. २१८ जोयणदसमंसतणू, पिठिकरंडाणमेसि चउसठ्ठी ।असणं च चउत्थाओ, गुणसीदिणवच्चपालणया ॥२१९॥ ए युगलिकोनुं शरीर योजनना दशमा भाग जेटलु उंचुं होय छे, ए मनुष्योने पासळीओ ६४ होय छे, एक दिवसने अन्तरे आहार होय छे, अने अपत्यपालना ७१ दिवस सुधी होय छे. २१९ पच्छिमदिसि सुत्थियलव-णसामिणो गोयमुत्तिइगुदिवो।उभओवि जंबुलावण,दुदुरवि दीवाय तेसिं च २२० जगइपरुप्परअंतरि, तह वित्थर बारजोयणसहस्सा । एमेव य पुव्वदिसि, चंदचउकस्स चउदीवा !२२१॥ पश्चिमदिशामां लवणसमुद्रना अधिपति सुस्थितनामना देवनो "गौतमद्वीप" नामनो एक द्वीप छे, अने ते गौतमद्वीपनी वे बाजुए जम्बूद्वीपना चे सूर्यना बे द्वीप अने लवणसमुद्रना वे सूर्यना वे द्वीप छे, तथा ते पांचे द्वीपोनुं जगतीथी अन्तर अने द्वीपोनु INI... क्षेत्रमास प्रकरणम् ॥४८॥ ॥४८॥ परस्पर अन्तर तथा विस्तार चार हजार योजन छे, अने ए प्रमाणेज पूर्वदिशामां चार चंद्रना चार द्वीप छे. २२०-२२१ एवं चिय बाहिरओ, दोवा अठ्ठह पुत्वच्छिमओ। दुदु लवण छ छ धायइ-संड ससीणं रवीणं च १२२ एममाणेज लवणसमुद्रनी शिखाथी वहारना भागमा पूर्व दिशामांवे द्वीप बाह्यलवणचंद्रना अने छ द्वीप घातकोखंडना अभ्यन्तरचंद्रना, तथा पश्चिमदिशामांचे द्वीप बाह्यलवणमूर्यना अने छ द्वीप अभ्यन्तरघातकी मूर्यना छे, सर्व मळी ८ चंद्रद्वीप अने ८ सूर्यद्वीप छे,२२२ एए दीवा जलवरि, बहिजोयण सड्ढअसोइ तहा । भागावि य चालोलो, मज्झे पुण कोप्सदुगमेव २२३ ए वीपो अभ्यंतरदिशिए ८८।। योजन तथा ४० पंचाणुाभागजेटलाजळ उपर देखाय छे,अने बहारनी दिशिए वे गाउज देखाय छे.२२३ कुलगिरिपासायसमा, पासाया एसु नियनियपहूणं । तह लावणजोइसिया, दगफालिह उड्डलेसागा ।२२४॥ ए द्वीपोउपर पोतपोताना अधिपतिदेवोना जे प्रासादा छे ते कुलगिरि उपरना प्रासादो सरखा छे, तथा लवणसमुद्रना ज्यो- तिपीओ जळस्फटिकरत्नना अने अधिक ऊर्ध्वतेजवाला छे. जामुत्तरदोहेणं, दससयसम पिहुलपणसयुच्चेणं । उसुयारगिरिजुगेणं, धायइसंडो दुहविहत्तो ॥ २२५ ॥ दक्षिण उत्तर दीर्घ, एक हजार योजन सर्वत्र सरखा पहोळा अने पांचसो योजन उंचा एवा वे इषु कारपर्वतोवडे अने घातकी- खंड वे विभागमां वहेंचायलो छे. २२५ खंडदुगे छ छ गिरिणो, सगसग वासा य अरविवररूवा। घुरि अंति समा गिरिणो,वासा पुण पिहुलपिहुलयरा IYA क्षेत्रसमास N४९॥ प्रकरणम् ॥४९॥ बन्ने खंडमां-विभागमा ६-६ वर्षधरपर्वतो चक्रना आरा सरखा छे, अने क्षेत्रो चक्रना विवर सरखा छे, तेथी पर्वतो प्रारंभमां अने अन्ते सरखा पहोळा छे, अने क्षेत्रो अधिक अधिक पहोलाइवाळा छे. २२६ दहकुंडंडत्तममे रुमुस्सयं वित्थरं वियड्डाणं । वद्दगिरीणं च सुमे-रुवजमिह जाण पुव्वसमं ॥ २२७ ॥ द्रहोनि उंडाइ, कुंडोनी उंडाइ, मेरुविना शेषपर्वतोनी उंचाइ, वैतादयोनो विस्तार, अने मेरुसिवाय शेषवृत्तआकारवाला पर्वतोनो विस्तार ए सर्व अहिं घातकीखंडमां जम्बूद्वीपना सरखं जाणवु. २२७ मेरुदुगंपि तह च्चिय, नवरं सोमणसहिठ्ठवरिदेसे । सगअडसहस्सऊणुत्ति सहसपणसीइ उच्चते ॥२२८॥ घातकीखंडना वे गेरुपर्वत पण जम्बूद्वीपना मेरु जेवाज छे, परन्तु विशेष ए छे के-सौमनसवननी नीचेनो भाग सात हजार योजन ओछो छे, अने उपरनो भाग आठ हजार योजन ओछो छे, अने बन्ने मेरुनी उंचाइ ८५००० योजन छे. २२८ तह पणनवईचउणउ, अद्धचउणऊ य अट्ठतीसा य । दसय सयाइ कमेणं, पणठाण पिहुत्ति हिट्ठाओ २२९ तथा मेरुपर्वतनी नीचेथी प्रारंभीने पांचस्थानोमां अनुक्रमे ९५००-९४००.९३५०-३८०० अने १००० योजननो विस्तार छे.२२९ नइकुंडदीववणमुह-दहदोहरसेलकमलवित्थारं । नइउंडत्तं च तहा, दहदीहत्तं च इह दुगुणं ॥ २३० ॥ नदीओना विस्तार, कुंडना विस्तार, द्वीपोना विस्तार, वनमुखना विस्तार, होना विस्तार, दीर्घपर्वतोना विस्तार अने कमळोना विस्तार, तथा नदीओनी उडाइ, अने द्रहोनी लम्बाइ ते अहीं घातकीखंडमां ए सर्व जम्बूद्वीपथी बमणु बमणु जाणवु. २३० क्षेत्रसमास प्रकरणम् ॥५०॥ 11५०॥ इगलक्खु सत्तसहसा, अडसय गुणसोइ भदसालवणं । पुव्वावरदीहंतं, जामुत्तर अठसीभइयं ॥ २३१ ॥ भद्रशालवन एक लाख सात हजार आठसो एकोनासी योजन पूर्वदिशामां अने पश्चियदिशायां दीर्थ-लांबु छे, अने तेज लंबा- इना अठासीमा भाग जेलु दक्षिण दिशामां अने उत्तरदिशामां पहोछं छे. २३१ बहिगयदंता दोहा,पणलक्खूणसयरिसहस दुगुणष्ठा । इयरे तिलक्ख छप्प-पणसहस सय दुन्नि सगवीसा२३२ मेरुथी बहारना चार गजदंतगिरि पांच लाख एगुणोत्तेरहजार वसो साठ. योजन दीर्घ छे, अने मेल्थी अभ्यन्तस्ना चार. गज- दंतगिरिओ त्रण लाख छान हजार सो सत्तावीस योजन दीर्घ छे. २३२ खित्ताणुमाणओ से-ससेलनईविजयवणमुहायामो । चउलक्खदीहवासा, वासविजयवित्थरो उ इमो २३३ शेष वक्षस्कारपर्वतो नदी भो विजयो अने वनमुखोनी लंबाइ क्षेत्रना अनुसार जाणवी, तथा सात क्षेत्रोनी लम्बाइ ४ लाख योजन छे अने क्षेत्रो तथा विजयोनो विस्तार आ प्रमाणे जाणवो-२३३ खितंकगुणधुवंके, दोसयवारुत्तरेहि पविभत्ते । सव्वस्थ वासवासो, हवेइ इह पुण इय धुवंका ॥. २३४ ॥ क्षेत्रांबडे गुणेला ध्रुवांकने बसोवारवडे. भागतां सर्वस्थाने क्षेत्रोना विस्तार प्राप्त थाय, अने तेमां वांक ते आ प्रमाणे- २३४ धुरि चउदलक्खदुलहस दोसगनउआधुवं तहा मज्झे । दुसयअडुत्तरसतस-हिसहस छव्वीसलक्खा य २३५ गुणवीसलयंवत्तीस-सहस गुणयाललक्ख धुवमंते । नइगिरिवणमाणविसु-द्धखित्तसोलंस पिहु विजया २३६ क्षेत्रसमास ॥५१॥ प्रकरणम् ॥५१॥ प्रारंभनो ध्रुवांक चौदलाख वे हजार वसो सत्ताणु तथा मध्यनोध्रुवांक छबीललाख सडसठ हजार बसो आठ तथा अन्त्य ध्रुवांक ओगणचालीस लाख वत्रीसहजार एकसो ओगणीस छे. तथा अन्तर्नदीओ वक्षस्कारपर्वतो वनमुख मेखन ए सर्वनो विस्तार क्षेत्रमाथी वाद करतां वाकी रहे तेने सोळवडे भागतां विजयनी पहोळाइ आवे, २३५-२३६ नवसहसा छसय तिहु-तराय छच्चेव सोलभाया य।विजयपिहुसं नडगिरि-वविजयसमालि चउलक्खा २३७ दरेक विजयनी पहोळाइ नबहजार छसो लण योजन उपरान्त सोलीया छ भाग छे. तथा अन्तर्नदीओ वक्षस्कारपर्वतो वनमुख मेरुवन अने विजयो ए सर्वनो विष्कंभ एकत्र करवाथी घातकीखंडनो ४ लाख योजन जेटलो विस्तार संपूर्ण थाय छे. २३७ पुव्वं व पुरी य तरू, परमुत्तरकुरुसु धाइ मधाई । रुक्खा तेसु सुदंसण-पियदसणनाम या देवा ।२३८॥ अहिं ३२ विजयनी ३२ नगरीओना नाम तथा महाक्षोना नाम पण जंबूद्वीपमा कह्या प्रमाणे जाणवां, परन्तु तफायत ए के-पूर्वघातकीना उत्तरकुरुक्षेत्रमा "घातकीवृक्ष" नामर्नु वृक्ष छे, अने पश्चिमधातकोना उत्तरकुरुमा "महाघातकोवृक्ष" नामर्नु वृक्ष छे, अने ए वे वृक्षो उपर एटले घातकीवृक्षउपर सुदर्शन नामे देवनुं भवनादि छे,अने महाघातकोवृक्षउपर पियदर्शन नामे देवतुं भवनादि छे.२३८ धुवरासीसु अ मिलिया, एगो लक्खोय अडसयरिसहसा । अहसया बायाला, परिहितिगं धायईसंडे २३९ ध्रुवराशिओमां एक लाख अठ्योत्तर हजार आठसो बेतालीस उमेरतां घातकीखंडना त्रणे परिधि आवे. २३९ कालो सव्वत्थ वि, सहस्सुंडो वेलविरिहिओतत्थ । सुत्थियसम कालमहा-कालसुरा पुवपच्छिमओ २४० क्षेत्रसमास प्रकरणम् ॥५२॥ ॥५२॥ कालोदधिसमुद्र सर्वस्थाने १००० योजन उंडो छे, वेल रहित छ, तथा पूर्वदिशामां सुस्थितदेव सरखो काल नामनो देव रहे छे, अने पश्चिम दिशामां महाकाल नामनो देव रहे छे. २४० लवणमिव जहसंभव, ससिरविदीवा इहं पि नायव्वा । नवरं समंतओ ते कोसदुगुच्चा जलस्सुवरि २४१ जेम लवणसमुद्रमा छे तेम यथासंभव आ समुद्रमां पण चन्द्र सूर्यना द्वीप जाणवा, परन्तु ते सर्वे द्वीपो जळथी उपर सर्ववा- जुए बे गाउ उंचा देखाता जाणवा. २४१ पुक्खरदलवहिजगइव्व संठिओ माणुसुत्तरो सेलो। वेलंधरगिरिमाणो, सीहनिसाई निसढवन्नो ॥२४२॥ अर्धपुष्करनी बहार जगती सरखो मानुपोत्तरपर्वत रहेलो आवेलो छे, ते वेलंधरपर्वतसरखा प्रमाणवाळो सिंहनिपादी आकार- वाळो अने निषधपर्वतसरखा वर्णवाळो छे. २४२ जह खित्तनगाईणं, संठाणो धाइए तहेव इहं । दुगुणो य भद्दसालो, मेरुसुयारा तहा चेव ॥ २४३ ॥ घातकीखंडमां जे प्रमाणे क्षेत्रो तथा पर्वतोनो आकार छे ते प्रमाणे अहीं पुष्कराधमां जाणवो. परंतु भद्रशाल वन वमणु जा- णवं. तेमज मेरु तथा इक्षुकार पर्वतोर्नु प्रमाण घातकीखंड माफक समजवू. २४३ इह बाहिरगयदंता, चउरो दीहत्ति वीससयसहसा । तेयालीससहस्सा, उणवीसहिया सया दुन्नि ॥२४४॥ अहीं अर्धपुष्करद्वीपमा चार वाह्यगजदन्तपर्वतो २०४३२१९ (वीसलाख तेंतालीसहजार वसोओगणीस) योजन दीर्घ छे. २४४ प्रकरण क्षेमसमास ॥५३॥ अभितर गयदंता, सोलसलक्खा य सहसव्वीसा । सोलहिअं सयमेगं,दीहत्ते इंति चउरो वि ॥२४५॥ अर्धपुष्करद्वीपमा चारे अभ्यन्तरगजदन्तपर्वतो सोळलाख छवीसहजार एकसोसोल योजन दीर्घ छे. २४५ सेसा पमाणओ जह, जंबूदीवाउ धाइए भणिया । दुगुणा समा य ते तह, धायइसंडाउ इह नेया २४६ शेषपदार्थोनुं प्रमाण जंबूद्वीपथी जेम धातकीखंडमां बमणु अने सरखं काहतुं तेवी रीते ते पदार्थो अहिं पुष्कराधमां पण धातकीखंडथी बमणा अने सरखा जाणवा. २४६ अडसालक्खा चउदस-सहसा तह नवसया य इगवीसा। ब्भितरधुवरासी,पुव्वुत्तविहोइ गणियव्वो २४७ इगकोडीतेरलक्खा सहसा चउचत्त सगसय तियाला । पुक्खरवरदीवड्डे, धुवरासी एस मज्झमि ॥२४८॥ एगा कोडी अडती-सलक्ख चउहत्तरी सहस्सा य । पंचसया पणसहा, धुवरासी पुक्खरद्धंते ॥ २४९ ॥ अठ्यासीलाख चौदहजार नवसो एकवीस ए अभ्यन्तर ध्रुवांकने पूर्वे कहेली विधिए क्षेत्रांक साथे गुणवो. २४७ एक क्रोड तेर लाख चुम्मालीस हजार सातसो तालीस ए ध्रुवांक पुष्करार्धद्वीपना मध्य भागनो छे. २७८ तथा एकक्रोड आडत्रीस लाख चुम्मोतरहजार पांचसो पांसठ ए ध्रुवांक पुष्करार्धना पर्यन्तभागनो छे २४९ गुणवोससहस सगसय,चउणउ यसवाय विजयवीक्खंभो।तह इह बहिवहसलिला,पविसंति य नरनगस्साहो दरेक विजयनो विस्तार ओगणीस हजार सातसो चोराणु योजन उपरान्त पा योजन सहित छे. तथा अहिं पुष्कराधमां बहार क्षेत्रसमास प्रकरणम् ॥५२॥ १५२॥ कालोदधिसमुद्र सर्वस्थाने १००० योजन उंडो छे, वेल रहित छे, तथा पूर्वदिशामां सुस्थितदेव सरखो काल नामनो देव रहे छे, अने पश्चिम दिशामां महाकाल नामनो देव रहे छे. २४० लवणमिव जहसंभव, ससिरविदीवा इहं पि नायव्वा । नवरं समंतओ ते कोसदुगुच्चा जलस्सुवरि २४१ जेम लवणसमुद्रमा छे तेम यथासंभव आ समुद्रमां पण चन्द्र मर्यना द्वीप जाणवा, परन्तु ते सर्वे द्वीपो जळथी उपर सर्ववा- जुए बे गाउ उंचा देखाता जाणवा. २४१ पुक्खरदलवहिजगइव्व संठिओ माणुसुत्तरो सेलो । वेलंधरगिरिमाणो, सीहनिसाई निसढवन्नो ॥२४२॥ अर्धपुष्करनी बहार जगती सरखो मानुपोत्तरपर्वत रहेलो आवेलो हे, ते वेलंधरपर्वतसरखा प्रमाणवाळो सिंहनिपादी आकार- चालो अने निपधपर्वतसरखा वर्णवाळो छे. २४२ जह खित्तनगाईणं, संठाणो धाइए तहेव इहं । दुगुणो य भदसालो, मेरुसुयारा तहा चेव ॥ २४३ ॥ घातकीखंडमा जे प्रमाणे क्षेत्रो तथा पर्वतोनो आकार छे ते प्रमाणे अहीं पुष्कराधमां जाणवो. परंतु भद्रशाल वन वमणु जा- णयु. तेमज मेरु तथा इक्षुकार पर्वतोर्नु प्रमाण घातकीखंड माफक समजवू. २४३ इह बाहिरगयदंता, चउरो दीहत्ति वीससयसहसा । तेयालीससहस्सा, उणवीसहिया सया दुन्नि ॥२४४॥ अहीं अर्धपुष्करद्वीपमां चार बाह्यगजदन्तपर्वतो २०४३२१९ (वीसलाख तेंतालीसहजार वसोओगणीस) योजन दीर्घ छे. २४४ .
क्षेमसमास प्रक ॥५३॥ ॥५३॥ . अभितर गयदंता, सोलसलक्खा य सहसछव्वीसा । सोलहि सयमेगं, दीहत्ते इंति चउरो वि ॥२४५॥ अर्धपुष्करद्वीपमा चारे अभ्यन्तरगजदन्तपर्वतो सोळलाख छवीसहजार एकसोसोल योजन दीर्घ छे. २४५ सेसा पमाणओ जह, जंबूदीवाउ धाइए भणिया । दुगुणा समा य ते तह, धायइसंडाउ इह नेया २४६ शेषपदार्थोनुं प्रमाण जंबूद्वीपथी जेम घातकीखंडमां बमणु अने सरखं का इतुं तेवी रीते ते पदार्थो अहिं पुष्कराधमां पण घातकीखंडथी वमणा अने सरखा जाणवा. २४६ अडसालक्खा चउदस-सहसा तह नवसया य इगवीसा।ब्भितरधुवरासी,पुव्वुत्तविहीइ गणियव्वो २४७ इगकोडीतेरलक्खा सहसा चउचत्त सगसय तियाला । पुक्खरवरदीवड्डे, धुवरासी एस मज्झमि ॥२४८॥ एगा कोडी अडती-सलक्ख चउहत्तरी सहस्सा य । पंचसया पणसहा, धुवरासी पुक्खरखंते ॥ २४९ ॥ अठ्यासीलाख चौदहजार नवसो एकवीस ए अभ्यन्तर ध्रुवांकने पूर्वे कहेली विधिए क्षेत्रांक साथे गुणवो. २४७ एक क्रोड तेर लाख चुम्मालीस हजार सातसो तालीस ए ध्रुवांक पुष्करार्धद्वीपना मध्य भागनो छे. २४८ तथा एकक्रोड आडत्रीस लाख चुम्मोतरहजार पांचसो पांसठ ए ध्रुवांक पुष्कराधना पर्यन्तभागनो छे २४९ गुणवोससहस सगसय,चउणउ यसवाय विजयवीक्खंभो।तह इह बहिवहसलिला,पविसंति य नरनगस्साहो दरेक विजयनो विस्तार ओगणीस हजार सातसो चोराणु योजन उपरान्त पा योजन सहित छे. तथा अहिं पुष्कराधमां बहार R . क्षेत्रसमास प्रकरणम् ॥५४॥ भागे बहेती नदीओ मानुषोत्तरनी नीचे प्रवेश करे छे. २५० पुक्खरदलपुव्वावर-खंडतो सहसद्गपिहु दु कुंडा । भणिया तहाणं पुण, गीयत्था चेव जाणंति ॥२५१॥ पुष्कराधबीपना पूर्वभागमां अने पश्चिमभागमां बे हजार योजन पहाळा बे कुंड शास्त्रमा कडा छे,परन्तु तेनुं स्थान तो निश्चय बहुश्रुतोजजाणे. इह पउममहापउमा, रुक्खा उत्तरकुरूसु पुव्वं व । तेसु वि वसंति देवा, पउमो तह पुंडरीओ ॥ २५२ ॥ अहीं कराधमां पण वे उत्तरकुरुक्षेत्रमा जंबूवृक्षसरखां पद्मवृक्ष अने महापद्मवृक्ष नाहनां वे वृक्ष छे, तेमां पद्मवृक्षउपर पद्मदेव अने महापद्मवृक्षउपर महापद्मदेव रहे छे. २५२ दो गुणहत्तरि पढमे,अड लवणे बीअदीवि तइयद्धे। पिहु पिहु पणसयचाला,इअ नरखित्ते संयलगिरिणो २५३ तेरहसय सगवन्ना, ते. पण मेरूहि विरहिया सव्वे । उस्सेहपायकदा, माणुससेलो वि एमेव ॥ २५४ ॥ पहेला जंबूद्धीपमा २६९ पर्वतो छे, लवणसमुद्रमा ८ पर्वतो छे. वीजा धातकीद्वीपमा तथा त्रीजा पुष्करद्वीपना अर्ध भागमां जुदा जुदा ५४०-५४० पर्वतो छे, ए प्रमाणे मनुष्यक्षेत्रमा सर्व पर्वतो १३५७ तेरसो सत्तावन छे, तेमांथी पांच मेरुपर्वत विना सर्वे १३५२ पर्वतो पोतानी उंचाइथी चोथा भाग जेटला भूमिमां दटायला छे, अने मानुपोत्तरपर्वत पण ए प्रमाणेज छे. २५३:२५४ धुवरासीसु तिलक्खा,पणपन्न सहस्स छसय चुलसीया।मिलिया हवंतिकमसो,परिहितिगं पुक्खरद्धस्स २५५ ध्रुवांकोमां. त्रण लाख पञ्चावन हजार छसो चोरासी. ३५५६८४ मेळवता पुष्कराधना अनुक्रमे त्रण परिधि प्राप्त थाय छे. १५५ . सिमास . नइदहघणथणियागणि-जिणाइनरजम्ममरणकालाई । पणयाललक्खजोयण-नरखित्तं मुत्तु नो पुरओ २५६ नदीओ, द्रहो, मेघ, गर्जना, अग्नि, जिनेश्वर विगेरे, मनुष्योना जन्म मरण अने काळ विगेरे ए पदार्थो पीस्तालीस लाख योजनप्रमाण मनुष्य क्षेत्र छोडीने आगळ नथी. २५६ चउस्सु वि उसुयारेसु, इकिकंनरनगम्मि चत्तारि। कूडोवरि जिणभवणा, कुलगिरिजिणभवणपरिमाणा २५७ चारे इषुकार पर्वतो उपर एकेक जिनभवन छे, मानुषोत्तरपर्वत उपर चार कूट उपर जिनभवनो छे, ए सर्वे वर्षधरपर्वतो उप- रना जिनभवन सरखा प्रमाणवाळा छे. २५७ तत्तो दुगुणपमाणा, चउदारा थुत्तवपिणअसरूवे । नंदिसरि बावन्ना, चउ कुंडलि रुयगि चत्तारि ॥२५८॥ -ते. ८ चैत्योथी वमणा प्रमाणवाळा अने चार चार द्वारवाळा. चैत्यो स्तोत्रमा वर्णवेला स्वरूपवाळा नन्दीश्वरद्वीपमां वाचन छे, कुंडलद्वीपमां.४ छे, अने रुचकद्वीपमां पण ४ छे. २५८ बहुसंखविगप्पेरुय-गदीवि उच्चत्ति सहस चुलसीई।नरनगसमरुयगो पुण,वित्थरि सयठाणि सहसंको २५९ घणी संख्याना विकल्पबाळा रुचकद्वीपमा रुचकगिरि मानुषोत्तर पर्वत सरखो छे, परन्तु उंचाइमा ८४००० योजन छे, अने विस्तारमा सोने स्थाने हजार अंकवाळो छे. २५९ तस्स सिहरम्मि चउदिसि,बीयसहस्सिगिगु चउत्थि अट्टाहा। विदिसि चऊ इअ चत्ता, दिसिकुमरिकूडसहसंका क्षेत्रप्रभास प्रकरणम् ॥५६॥ ते रुचकगिरिना शिखरतले बीजा हजारमा चार दिशाए एकेक कूट ले, तथा चोथा हजारमा आठ आठ कूट छे, अने विदि- शामां चार कूट छे, ए प्रमाणे चालीस दिशाकुमारीनां ४० कूट छे, अने ते सहस्रांककूट छे. २६० इइकइवयदीवोदहि-वियारलेसो मए विमइणावि । लिहिओ जिणगणहरगुरु--सुयसुयदेवीपसाएणं २६१ ए प्रमाणे बुद्धिरहित एवा पण में केटलाक द्वीपसमुद्रोनेा लेशमात्र विचार श्री जिनेश्वरनी गणधरनी गुरुनी श्रुतनी अने श्रु- तदेवीनी कृपावडे लख्यो. २६१ सेसाणदीवाण तहोदहीणं,वियारविस्थारमणोरपारं। सया सुयाओ परिभावयंतु,सव्वपि सम्वन्नुमइंकचित्ता॥ शेषद्वीपो तथा समुद्रनापारावार रहित विचारना-स्वरूपना सर्व विस्तारने सर्वज्ञमतमा एकचित्तवाला थइने हमेशा श्रुतने अनुसारे विचारो. सूरिहि जं रयणसेहरनामएहि,अप्पत्थमेव रइयं नरखित्तविक्खं । संसोहियं पयरणं सुयणेहि लोए, पावेउ तं कुसलरंगमई पसिद्धिं ॥२६३॥ श्रीरत्नशेखमूरि नामना आचार्य जे आ मनुष्यक्षेत्रनी व्याख्यावालु प्रकरण पोताना आत्माने अर्थेज रच्यु, अने मुजनोए शोध्यु शुद्ध कर्य, ते कुशल रंगमतिवाछं आ प्रकरण लोकमा सजनोवढे प्रसिद्धिने पामो. २६३ इति श्रीक्षेत्रसमास मूलार्थसहितः समाप्तः, "7 nid