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The Grihaya Sutras Of Gobhil

P_sathyavrata_samashrami

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बी. के. शास्त्री द्वारा-
ज्योतिष प्रकाश प्रेस, विश्वेश्वरगंज,
बनारस सिटी में मुद्रित ।
先恭来来来来

प्रस्तावना ॥ . विशेषतः गृह्यसूत्रों में स्मार्त धर्मों का विधान होने से इस समय कर्मों में प्रवृत्ति कराने के लिये गृह्यसूत्रों का प्रकाशन करना आवश्यक है । श्रौत तथा गृह्यसूत्रोक्त पशु संज्ञपन विचार ॥ जिसदेश कालमें और जिस रीति से जो काम, जिसके लिये कर्त्तव्य कहा है, वह उसी, देश कालमें, उसी रीति से किया हुआ, उसी मनुष्य के लिये उचित धर्म है । अन्यथा किया हुआ, वही अधर्म हो जाता है । जैसे-रोना . सर्वत्र बुरा समझा जाता है परन्तु वेद प्रमाणानुसार पिताके घरसे पति गुड्को जाती हुयी कन्याका रोना अच्छा माना जाता है । गाली देना सर्वत्र बुरा काम है, पर विवाहमें स्त्रियां तथा पुरुष गालियों को शुभ मानते हैं। इसी के अनुसार यज्ञादि में पशुओं का पालम्भन भी पूर्वकाल में बुरा नहीं माना जाता था। परन्तु लोक रीतिसे अपना मांस बढ़ाने के लिये शास्त्र विरुद्ध पशु-हिंसा अत्यन्त बुरी मानी जाती थी। जब ऋषि आचार्यों ने ऐसा विकराल समय आते देखा तब पहिले से ही (लोकविक्रुष्ट मेवच) लिख गये कि जो धर्म जिस समय लोक में बुग समझा जावे, उस समय वह कर्त्तव्य नहीं है, इसलिये "पश्वालम्भन" कर्म इस समय कर्त्तव्य नहीं है। इस कारण ऐसे विचार इन ग्रन्थोंमें देखकर किसी को उद्वेग वा संकोच नहीं करना चाहिये । "अर्थकामेष्वसक्तानां धर्मज्ञानं विधीयते" के अनुसार था कि धर्म के सामने अन्धकार के तुल्य समूल नष्ट हो जाती थी- तब विवाह के समय कन्या के हृदय का स्पर्श करने में कुछ भी संकोच नहीं होता था-पर अब ऐसा करने में सब ही को संकोच जान पड़ता है सो इसका कारण अन्तः करण का काम लोभादि से दब जाना है। वैसे पश्वालम्भन में अन्तः करणमें सब काम सब देशकालों में सब के लिये, जब कदापि हो ही नहीं सकते तो, इन्हीं ग्रन्थों के सब लेख हमारे अनुकूल कैसे हो जायेंगे ? जैसे, शीत- कालमें खसखस की टट्टी व्यर्थ होने पर भी फिर गर्मी आने पर स्वयं सार्थक हो जाती है, वा जैसे गर्मी के दिनों में वा गर्मदेश में शीतके वस्त्र बोझामात्र व्यर्थ प्रतीत होने पर भी फिर शीत का देश वा काल आने पर सार्थक उप- कारी हो जाते हैं तथा जैसे पंसारी की दुकान में रक्खाहुआ विष कभी किसी अधिकारी के लिये अमृतवत् उपकारी हो जाता है, इसलिये उससे द्वेष घृणा वा अरुचि करनेवाले की भूल है, वैसे ही इन ग्रन्थोंके पशु संज्ञापनादि विषयों से द्वेष घृणा कुछ नहीं करे। इस समय तो यज्ञमें पशुहिंसा निषिध ही है।

गोभिलगृह्य मूत्र को विषय सूची। 6 ३ ह ब्रह्म यज्ञविधि में समावर्तन (गोदानम्)११७ वास्तुयागः विषय पृष्ठ संख्या विषय पृष्ठ संख्या विषय पृष्ठ संख्या सर्वकर्मसाधारणविधयः १ , मेधाजननं ६६ ऋणहामः २०५ अधिकार्यादिनिर्णयः २ निष्क्रामणम् हलाभियोगः २०५ नामधेयम् न्याधानम् होमपूर्वकृत्यानि २०७ नित्यहोमकामा पौष्टिकंकर्म ब्रह्मवर्चसकामकर्म २६ उपवीतविधिः मूद्धीभित्राणम् १०१ पुत्रपशुक्रामकर्म २११ प्राचमन विधि: १० चूड़ाकरणम् १०३ उभयकामकर्म २११ उपनयनम् १०६ वास्तुनिमोणकर्म २२१ वैश्वदेवविधिः बलिहरणम् २६ ब्रह्मचारिकृत्यम् ११६ प्रसादकामकर्म दर्श पौर्णमास प्रकरणम्५८ महानाम्नीसाम १३४ स्थण्डिलहोमः २२६ यागान्त्यकारिण उपाकर्म ५६ १३५ यशस्कामकर्म । महावामदेव्यसाम ६६ अनध्यायविधिः १४३ सदायकामकर्म २०७ विवाहः ६२ अद्भुतविधिः १४५ पुरुषाधिपत्यका० २२८ कन्यापरीक्षणम् स्नातकविधिः १४७ आचितसहस्रकामकर्म२३० ज्ञातिकर्म ६४ समावृत्तविधिः १५१ पशुकामकर्म २२६ परिणयविधिः ६७ गोपालन विधिः १५६ क्षुद्रपशुकामकर्म २३० पाणिग्रहणम् ७१ श्रवणाकर्म १६२ वृत्यविच्छित्तिकाम- उत्तरविवाहः ७५ श्राश्वयुजीकर्म १६२ कर्म २३१ बध्वानयनम् ८१ नवयज्ञः १६७ विषदोषनाराकामकर्म २३१ चतुर्थीकर्म ८३ श्राग्रहायणीकर्म १७३ स्नातकस्वस्त्ययनकर्म२३३ गर्भाधानम् ८५ अष्टकाविधिः १७७ विष्टरादिग्रहणविधिः२३४ पुंसवनम् ८७ अन्वष्टक्यम् १८३ मधुपर्कग्रहणविधिः २३५ सीमन्तकरणम् ८७ | पिण्डपितृत्यशः २०१ बद्धगोमुक्तिप्रकारः २३६ सोष्यन्त होमः ६३ शाकाष्टका २०३ अर्हणीयपरिगणनम्२३७ जातकर्म ६७ वपाहोमः २०५ टोकापरिशिष्टम् २३३

ॐ
सामवेदीयम् ।
अथ गोभिल-गृह्यसूत्रम्।
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अथातो गृह्याकाण्युपदेक्ष्यामः ॥१॥
'अथ' ग्रन्थारम्भद्योतकोऽयं निपातः। 'अतः तदानीन्तनाचार्याणां वचो.
भङ्गीप्रयुक्तमिदम् । गृह्याकर्माणि' गृहाय हितो गृह्यः, योगरूड्या अग्निरिति
बुध्यते; वक्ष्यत्यनुपदमेव 'स एवास्य गृह्योऽग्निर्भवति ( २१ सू० )' इति तत्र
कर्तव्यानि 'कर्माणि' नित्याग्निहोत्रहोमादीनि, तदङ्गभूतान्यग्न्याधानादीनि च
'उपदेक्ष्यामः' तत्तदितिकर्तव्यता बोधयिष्यामः । गृह्येतिदीर्घश्छान्दसः ॥ १ ॥
अथ तत्र सर्वकर्मसाधारणविधीनाह-
भाषा-इस के अनन्तर "गृह्य” अग्नि में कर्तव्य नित्य अग्निहोत्र
आदिक और उसके उपयोगी "अग्न्याधान'' प्रभृति कम्मों का उपदेश
करेंगे ॥१॥
यज्ञोपवीतिनाऽऽचान्तोदकेन कृत्यम् ॥२॥
'यज्ञोपवीतिना' किञ्च 'श्राचान्तोदकेन' उदकाचमनं कृतवतैव पुरुपेण
'कृत्यम्' कार्यम्, वक्ष्यमाणकाय्यजातमिति ॥ २ ॥
भाषा--आगे कहे जाने वाले कर्मों को यज्ञोपवीत धारण कर
और आचमन करके करना चाहिये ॥ २॥
उदगयने पूर्वपक्षे पुण्येऽहनि प्रागावर्तनादन्हः कालं विद्यात्३
'उदगयने' उत्तरायणे 'पूर्वपक्षे' शुक्लपक्षे' पुण्येऽहनि' मेघाच्छन्नादिदोषशू-
न्यदिने 'अन्हः' दिवसस्य 'श्रावर्तनात्' परिवर्तनात् 'प्राक्' पूर्वं पूर्वाह्नमेव कालम्'
समयं 'विद्यात्' जानीयात्, वक्ष्यमाणकर्मणां सर्वेषामेवेति ॥ ३ ॥

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- भाषा-जहां २ : इस ग्रन्थ में ) समय को कोई व्यवस्था नहीं किया गई हो कि 'अमुक समय अमुक कार्य करे ऐसे स्थानों में सब कार्य उत्तरायण शुक्लपक्ष, निर्दोष दिन में दोपहर के पहिले करे ॥ ३ ॥ यथादेशश्च ॥४॥ यथादेशमपि कालं विद्यात् । यत्र यत्र च विशेषतः कालमादेक्ष्यामस्तत्रतत्र स स एव काल आदरणीयो न तु सामान्यतः उक्त उदगयनादिकइति ॥ ४ ॥ भाषा-जहां २ जिस २ कालादिक की व्यवस्था करेंगे, वहां २ वही २ काल माननीय होगा, सामान्यतः ३ग सूत्रोक्त काल नहीं ॥४॥ सर्वाण्येवान्वा हायंवन्ति ॥ ५॥ 'सर्वाणि' गृह्यकर्माणि श्राहायंवन्ति एवं' अाहरणीयानि कुशाद्युपकरणानि तद्विशिष्टान्येवेति ॥५॥ भाषा-सब ही गृह्य कम्मों में कुशा प्रभृति अनेक "उपकरण (सामग्री) आवश्यक होते हैं ॥ ५ ॥ अपवर्गेऽभिरूपभोजनं यथाशक्ति ॥६॥ 'अपवर्गः कर्मसमाप्तौ 'अभिरूपभोजनम्' अभिरूपः शास्त्रबोधिततया यथोपयुक्तः तस्य तयोः तेषां वा भोजनं 'यथाशक्ति' स्वकीयायाद्यनुगतं कार्यमिति ॥ ६॥ इति सर्वकर्मसाधारणविषयः । भाषा-सब ही कर्मों की समाप्ति में यथाशक्ति यथाशास्त्र उपयुक्त एक, दो, या अधिक व्यक्ति को भोजन करावे ॥६॥ अथाग्न्याधानविधीनाह- ब्रह्मचारी वेदमधीत्यान्त्या समिधमभ्याधास्यन् ॥ ७॥ उक्तं 'गृह्याकर्माणि' इति, तत्र कोऽसौ गृह्योऽग्निः ? प्रथमन्तावत् सएव उपदिश्यते ब्रह्मचारी' इत्यारभ्य 'गृह्योऽग्निर्भवति' इत्यन्तेन ग्रन्थसन्दर्भेण । 'ब्रह्मचारी', 'वेदम् अधीत्य' गुरुकुले स्थित्वा वेदाध्ययनं समाप्य 'अन्त्यां' ब्रह्मचर्यसमापिका 'समिधमाधास्यन्' समिधमाधातुं प्रवृत्तः "अग्नि समाधान कुर्वीत (१४ सू०)" इत्यनेन सम्बन्धः । प्रतिदिनं यथाऽऽचार्याग्नावेव समिध- प्र० १ खं० १ सू०३-९] सर्वकर्मसाधारणविधयः ॥ ३ , माधत्ते तदानीं न तथा प्रादधीत अपितु अपनाहरणादिपूर्वकं अग्निप्रणयनं कृत्वैव तत्र स्वकीयेऽग्नौ तामन्त्यां समिधमादधीतेति ॥ ७ ॥ भाषा-ब्रह्मवारी (गुरुकुल में रह कर ) वेदाध्ययन के अन्त में शेष समित् , (होमीय काष्ट ) हवन करने में प्रवृत्त होकर ॥ ७ ॥ जायाया वा पाणिं जिघृक्षन् ॥ ८ ॥ यदि ब्रह्मचर्यसमापिकान्त्यसमिदाधानकालेऽग्निग्रहणं न कृतं भवेत्' तदा पूर्वपूर्वदिनवत् गुरोरन वेव ता मन्त्यां समिधमादधीत । पुनः कोऽग्निग्रहणकाल:? इत्याह-वा' अथवा 'जायायाः' 'पाणि' जिघृक्षन्' ग्रहीतुमिच्छन, पाणिग्रहणात् पूर्वमेव 'अग्निसमाधानं कुर्वीत । १४ सू०) इति ॥ ८ ॥ भाषा-- या विवाह के लिये तय्यार होकर ॥८॥ अनुगुप्ता अप आहृत्य प्रागुदप्रवणं देश सम वा परिसमूह्योपलिप्य मध्यतः प्राची लेखामुल्लिख्योदी चीवसंहतां पश्चात् मध्ये प्राचीस्निात्रउल्लिख्याभ्युत्तेतह तदग्निप्रणयनाय कीदृशः स्थानसंस्कारइष्टः ? इन्युच्यते--'अनुगुप्ताः' विराम- प्रक्षेपतैलाभ्यङ्गादिवारणेन सुरक्षिताः 'अप' उदकानि श्राहृत्य' 'प्रागुदप्रवण' प्राक् उदक् वा क्रमनिम्नं यस्य ईदृशं, 'सम' समतलं 'वा' 'देश' स्थानं तैरुदकैः 'परिसमूद्य' 'मध्यत' तत्स्थानस्यान्तरे 'प्राची' प्रागग्रां, 'च' अपिच ‘पश्चातू' तस्यैव पाददेशे 'उदीची उदगग्रां 'संलग्न प्राचीरेखया संहता मपरां, 'लेखां' रेखां मध्यस्थले 'तिस्रः प्राचीः' एव अपराः रेखाश्च 'उल्लिख्य' तत् स्थानम् 'अभ्युक्षेत्' कुशाद्यग्रजलविन्दुभिः लिम्चेत् । तदेतत् स्थानं "स्थ गडल" मुच्यते ॥ ९ ॥ भाषा-जो तालावादिक जल, मैला फेके जाने, या मूत्र त्याग, या तैलाभ्यङ्गन, या सेवार आदि द्वारा दूषित न हो, किन्तु राज आज्ञा आदि शासन में विशेष सावधानी से रक्षित हो, ऐसे ज नाशय से दोष शून्य जल लाकर उससे स्थान को लीपे । यह स्थान पूर्व या उत्तर दिशा में क्रम- निम्न समतल (वगवा) हो । इस लीपे हुए स्थान के बीच में पूर्वाग्र एक - ४ गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- . रेखा अङ्कित करे और उसी के नीचे एक रेखा उत्तराय करके उसमें मिलावे, मध्य में और भी तीन रेखायें खींचे, पीछे उक्त लाये हुए जनक उस पर छिड़क देवे ऐसी जगह को "स्थण्डिल" कहते हैं ॥ लक्षणावृदेषा सर्वत्र ॥ १०॥ 'एपा' अपनाहरणादिका क्रिया 'लक्षणावृत्' उच्यते; 'सर्वत्र' एव अग्नि- प्रणयने व्यवहर्तव्येति ॥ १० ॥ भाषा--इस क्रिया का नाम "लक्षणावृत्" है। यह अग्निप्रणयन मात्र में सब जगह व्यवहार के योग्य है ॥१०॥ भूर्भुवःस्वरित्यभिमुखमग्नि प्रणयन्ति॥११॥ 'भूर्भुवःस्व' इति मन्त्रेण 'अभिमुखं' यथास्यात् तथा कृत्वा 'अग्नि' प्रणय- न्ति' । लिंङर्थे लेट (पाणिनीये ३।४।७)-इतिलेटि, रूपम् , प्रणयेयुः । सर्व- कर्मसु सर्वैः कमिभिरेवैव मनिप्रणयनं कार्यमिति सामान्यविधित्वख्यापनायैव बहुवचनम्, सर्वे प्रणयेयुरिति ॥ ११॥ गृहस्वामी पितादिर्जीवितइति ब्रह्मचर्यावसानसमये पाणिग्रहणकालेऽप्यग्निग्र- हणं न भवेच्चेतः-गृहस्वामिनि मृते, यदैव गृहस्वामी म्रियेत तदैव अग्निग्रहणं कर्तव्यमित्याह-- भाषा-उसके बाद उस अभ्युक्षित स्थान में "भूर्भुवः स्वः"-इस मंत्र का पढ़कर अपने सम्मुख अग्नि स्थापन करे ॥ ११ ॥ प्रेते वा गृहपती परमेष्टीकरणम् ॥ १२॥ 'वा' अथवा 'गृहपतौ' पित्रादौ 'प्रेते' मृते तदैव परमेष्टीकरणम्' कृतच्चि- प्रत्ययस्यैतद्रूपम् , क्रियाविशेषणम् ; परमेष्टितया अग्नेः स्वीकरणं यथा पस्यात्तथा 'अग्निसमाधानं कुवींत (१४ सू०) इति । परमेष्टिकरणमिति इस्कारयुक्तपा ठस्तु कापि पुस्तकेऽनुपलब्धत्वान युक्तः ॥ १२ ॥ भाषा-यदि ब्रह्मचर्य की समाप्ति या विवाह समय तक पिता आदि घर के मालिक जीते हों, तो ब्रह्मचारी को अग्नि ग्रहण कत्र करना चाहिये ०१ खं० १ सू०१०-१६] अग्न्याधानम् ॥ woman - A इस पर कहते हैं कि घर के मालिक के मरने ही पर वह अग्नि ग्रहण करे ॥ १२ ॥ अग्निग्रहणस्य सामान्यतः कालत्रयमुक्तम्, तत्रैव विशेषमाह-- तथा तिथिनक्षत्रपर्वसमवाये ॥ १३ ॥ 'तथा' अग्न्याधाने यथा अन्त्यपमिदाधानादिः कालोऽपेक्षितस्तद्वदिति । तिथिनक्षत्रपर्वणां त्रयाणामेवैषां शुभानां समवाये-( उत्तरेण सम्बन्धः)॥ १३ ॥ तादृशसमवायः शीघ्रो न घटेत चेदाह- भाषा--अन्त्य समिदाधान के लिये जिस प्रकार काल अपेक्षित होता है उसी प्रकार अग्नि स्थापन में भी तिथि, नक्षत्र, पर्व का एकत्र होना आवश्यक है ॥ १३ ॥ दर्श वा पौर्णमासे वाऽग्निसमाधानं कुर्वीत ॥ १४ ॥ 'वा' अथवा 'दशैं' अमावास्यायां, 'वा' अथवा 'पौर्णमासे' पौर्णमास्याम्, “अग्निसमाधानम्' अग्नेः सम्यक् प्राधानं धारणं पोपणञ्च 'कुर्वीत्' ।। १४ ।। अग्निश्च सः कुतो ग्राह्य ? इति विधत्ते-- भाषा-तिथि, नक्षत्र, पर्व इनके यदि एकत्र मिलने में विनम्ब जान पड़े तो किसी अमावास्या या पूर्णिमा तिथि को अनि ग्रहण करे ॥ १४ ॥ वैश्यकुलादाऽम्बरीषाद्वाऽग्निमाहृत्याभ्याध्यात् ॥ १५ ।। 'वैश्यकुलाद्वा' वैश्यजातिगृहस्थगृहात्, अथवा 'अम्बरीपाद्धा' भ्राष्ट्राद्वा “अग्निम्' श्राहृत्य' 'अभ्यादध्यात्' अभ्याधान ग्रहणं कुर्वीतेति ॥ १५ ॥ भाषा--वैश्य जाति के गृहस्थ के घर से, या भ्राष्ट (भारभुजा अग्नि लाकर स्थापन करे ॥ १५॥ अपिवा बहुयाजिनएवागाराबाह्मणस्य वा राजन्यस्य वा वैश्यस्य वा ॥ १६॥ 'अपिवा' अथवा ब्राह्मणस्य वा' 'राजन्यस्य वा' 'वश्यस्य वा' 'बहुयाजिनः एवं' 'श्रागारात् अग्नि माहृत्येत्यादि पूर्वेण सम्बन्धः । बहुयाजिनोऽग्न्याहरणं विधेयम्, स च बहुयाजी, त्रयाणामन्यतमो यः कश्चन भवेन्नामेति । अत्र वैश्यस्या- नुल्लेखे ब्राह्मणक्षत्रिययोरन्यतरबहुयाजिनोग्निः ग्रहणीयः स्यात् न तु वैश्यस्य ) से

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्-
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बहुयाजिनः; पूर्वत्रानुक्ते तु बहुयाजिन एव वैश्यस्य स्यात्, तदतिरिक्तस्यापि
वैश्मनोऽग्निग्रहणमिष्टं तन्न भवेदित्युभयत्रैव वैश्यत्योल्टे ग्वः ॥ १६ ॥
भाषा-या बहुयाजी के घर से अग्नि लाकर स्थापित करे। उक्त बहुया-
जी चाहे ब्राह्मण हो, या क्षत्रिय, या वैश्य, इसमें कोई हानि नहीं ॥ १६ ॥
अपिवाऽन्यम्मथित्वाऽभ्याध्यात् ॥१७॥
'श्रपिता अथवा 'मथित्वा अरणिद्वयमन्थनं प्रकृत्यैत्र 'अभ्याध्यात
'अन्यम्' अपरं नूतनम् अग्निमिति ॥ १७ ॥
भाषा-या 'अरणि' मथकर दूसग नवीन अग्नि ग्रहण करे ॥ १७ ॥
पुण्यस्त्वेवा नर्द्धको भवतीति ॥ १८॥ यथा कामयेत
तथा कुर्यात् ॥ १६ ॥
'अनर्द्धकः' ऋद्धिशून्यः पुग्यः तु एव 'पुण्यातजनकएव भवति, अयमारणे.
योऽग्निरितिशेषः । 'इति' अतो हेतोः 'यथा कामयेत तथा कुर्यात्' स यदि श्रामु-
प्मिकफल मृद्धयादिकं कामयेत वैश्यकुलादेरग्नि गृह्णीयात्' यदि तु तत्र न प्रवृत्ति:
परंपुण्यमानं कामयेत तर्हि अणि निर्मथ्यैव गृह्णीयादिति ॥ १८-१९ ॥
भाषा-इस 'अगणि' से नवोत्पन्न अग्नि में वक्ष्यमाण अनुष्ठानों के
करने पर पुण्य तो होता है परन्तु सम्पत्ति नहीं हाती इसलिये जैसी
कामना हो वैसा करे १५-१७ ( सू० पक्षों में से कोई ) ॥ १६ ॥
स यदेवान्स्या ७ समिधमभ्याधाति जायाया वा
पाणिं जिघृक्षन् जुहोति तमभिसंयच्छेत् ॥ २० ॥
'सः' पुरुष: 'यत् एवं' यस्मिन्नेवाग्नौ 'अन्त्यां समिधम् श्रादधाति' 'वा
अथवा 'जायायाः पाणिं खिवृक्षन् जुहोति' लाजादिकान्, 'तम्' अग्निम्
'अभिसंयच्छेत् यत्नेन रक्षेत् ॥ २० ॥
भाषा-इस प्रकार अग्नि आहरण पूर्वक जिस में शेप “समित्' की
आहुति देवे, या विवाह कार्य के लाजा, होम आदि जिस में सम्पन्न करे
उस अग्नि को बड़े यत्न से रक्खे ॥२०॥

प्र० १ खं० ४ सू०१७-२३ ] अग्न्याधानम् ॥ .n -- स एवास्यगृह्योग्निर्भवति ॥ २१॥ 'सः एव अग्निः' 'अस्य' ग्रहीतुः 'गृह्यः' गृह्याय हितः गृहकर्मोपयोगी अतएव गृहाः इत्येतन्नाम्ना प्रसिद्धो भवति ॥ २१ ॥ भाषा-यही उसका 'गृह्य' अग्नि है अर्थात् इसी अग्नि में उसे बहुत दिनों तक अपने सब गृह्य कार्य सम्पन्न करना पड़ेगा ॥ २१ ॥ तेन चैवास्य प्रातराहुतिर्हता भवतीति ॥ २२ ॥ 'च' अपिच, 'तेन एव' अन्त्यसमिदाधानेन लाजादिहोमेन वा एक 'प्रात- राहुतिः' हुता' हुतैवेति सिद्धा 'भवति'; दिने अपरा प्रातराहुति पेक्ष्यतइति भावः। 'इति' अग्न्याधानप्रकरणसमाप्तिसूचकोऽयमितिशब्दः ॥ २२ ॥ अथ नित्यहोमकालादिः-- भाषा-औरयही 'अन्त्याहुति' या 'लाजाहुति, ही उसकी प्रातः कालिक आहुति सिद्ध होगी,उस दिन दूसरी प्रातःकालिक श्राहुति यावश्यक नहीं ॥२॥ सायमाहुत्युपक्रम एवात ऊवं गृह्येऽग्नौ होमो विधीयते ॥ २३ ॥ तद्दिनस्य प्रातराहुतिस्तेनैव सिद्धा परन्तु तहिने एवं सायमाहुति रुपदेष्टव्यै रिति 'सायमाहुत्यु पक्रसे एव' वदामि-'अतअदुवं अग्न्याधानोपदेशात् परं 'गृह्येऽ- ग्नौ' तस्मिन् , 'होमो विधीयते' सायं प्रातश्च होमप्रकार उपदिश्यत इति ॥२३॥ भापा-उस दिन की प्रातः कालिक आहुति उस प्रकार सिद्ध होने पर भी उस दिन भी सायं आहुति की विधि उपदेष्टव्य है; इसलिये इसके पश्चात् सामान्यतः सव दिन के लिये ही इस गृह्य अग्नि में सायं और प्रातःकाल का होम कहा जाता है ॥ २३ ॥ पुरा प्रादुष्करणवेलायाः सायंप्रातरनुगुप्ता अपना हरेत् परिचरणीयाः॥ २४ ॥ अपि वा सायम् ॥ २५ ॥ अपि वा कुम्भादा मणिकाद्वा गृह्णीयात् ।। २६ ॥ पुरास्त- गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - मयादग्निं प्रादुष्कृत्यास्तमिते सायमाहुतिं जुहुयात् ॥२७॥ पुरोदयात् प्रातः प्रादुष्कृत्योदितेऽनुदिते वा प्रातराहुति जुहुयात् ॥ २८ ॥ १ ।। बोधसौकर्याय प्रथमन्तावत् सप्तविंशाष्टविंशसूत्रयोयाख्यानं प्रकृत्यैव चतु- विशादीनि सूत्राणि व्याख्यायन्ते- 'अस्तमयात् पुरा' यावत् सूर्यास्तो न भवति तावदेव 'अग्नि' 'प्रादुष्कृत्य' सन्दीप्य, 'अस्तमिते' सूर्ये 'सायमाहुतिं जुहुयात्'-इत्युक्तः सायमाहुतिकालमात्रः (२७) 'उदयात् पुरा' यावत् सूर्यो नोदेति तावदेव प्रादुष्कृत्य' अग्निम् उदिते, सूर्ये 'अनुदिते' उदयसमये वा 'प्रातराहुतिं जुहुयात,-इन्युक्तः प्रातराहुतिकालमात्रः (२८)। 'सायं' 'प्रातः' च द्विवारमेव 'प्रादुष्करणवेलायाः पुरा' अग्निसन्दीप- नकालात् प्रागेव काले 'अनुगुप्ताः, सुरक्षिता निर्मलाः 'परिचरणीयाः श्राचमना- दिपरिचर्योपयुक्ताः 'अप:' उदकानि 'श्राहरेत्' (२४)। 'अपिवा' अथवा 'सायम्' प्रतिदिन मेकवारं, सायङ्काले अग्निसन्दीपनकालात् पूर्व मेव अप आह- रेत् तेनैव प्रातश्चाचमनादिकाः क्रियाः कर्तव्याः'; नतु पुनः प्रातराहरेदिति (२५) "अपिवा' अथवा एकदैव सायं प्रातर्वा अग्निसन्दीपनात् प्राकाले अनुगुप्ता अप श्राहृत्य कुम्भे मणिके वा स्थापयेत्, प्रतिदिनं ततएव 'कुम्भाद्वा' 'मणिकाद्वा' ताः सायं प्रातश्च 'गृह्णीयात् ॥ २६ ॥ इति गोभिलगृह्यसूत्रीय-प्रथमप्रपाठके प्रथमखण्डस्य व्याख्यानम् ॥ १,१॥ .. . भाषा--सायंकाल में-सूर्यास्त होने के पहिले ही उसी रक्षित अग्नि को खूब जलाकर सूर्यास्त होने पर उसमें आहुति प्रदान करे ॥ २७॥ प्रातः काल में-सूर्योदय के पहिले उसी रक्षित अग्नि को सन्दीपित कर सूर्योदय के पीछे या उदय हो रहा हो ऐसे समय उसमें आहुति प्रदान करे ॥ २८॥ सायं और प्रातःकाल में अग्नि प्रज्वलित काल के पहिले श्राचमनादि के उपयुक्त सुरक्षित जल लावे ॥ २४ ॥ या सायंकाल में प्र० १ खं०१ २४-२८ खं०२ सू०१] उपवीतविधिः ॥ एकवार इस जल को लाने ही से दोनों समय का काम हो सकता है ॥२५॥ या एक दिन सायंकाल में, या प्रातःकाल में अग्नि प्रज्वलित करने के पूर्व ही इस जलको लाकर कलसे या मणिके ( पानी रखने का बड़ा वर्तन) में रख देना चाहिये, पीछे प्रतिसायं और प्रातः समय आवश्यकतानुसार उससे जल लिया करे (२६) २४-२८ ॥ गोभिल गृह्यसूत्र के प्रथम प्रपाठक के प्रथमखण्ड का अनुवाद पूग हुआ ॥११॥ अथ उपवीतविधि:- यज्ञोपवीतंकुरुते सूत्रं वस्त्रं वापि वा कुशरज्जुमेव ॥ १ ॥ पूर्वमुक्तं 'यज्ञोपवीतिना कृत्यम्' इति, इदानीं तद्यज्ञोपवीतमेवोपदि श्यते-- 'सूत्र' 'वा' अथवा 'वस्त्रं श्रपिवा' अथवा 'कुशरजुमेव' यदा :चत्र यत् सुलभ, तदा तत्र तदेव 'यज्ञोपवीतं', 'कुरुते', लेटोरूपमिदम्, कुर्वीतेत्यर्थः ॥ १ ॥ भाषा-सूत, या वस्त्र, या कुशरज्जु, जिस समय जो आसानी से मिल सके, उस समय उसी के यज्ञोपवीत से काम करना चाहिये ॥ १॥ दक्षिणं बाहुमुद्धृत्य शिरोऽवधायसव्येऽसे प्रतिष्ठापयति दक्षिणं कक्षमन्ववलम्बं भवत्येवं यज्ञोपवीती भवति ॥२॥ तत्र 'दक्षिणं बाहुम्' 'उद्धत्य' उत्क्षिप्य, 'शिरः' 'अवधाय' वेष्ट- यित्वा 'सव्यऽसे' वामस्कन्धोपरि 'प्रतिष्ठापयति', तत्र 'दक्षिणं कक्षमन्व- बलम्ब', दक्षिणकक्षान्तलम्बमानम् 'भवति' भवेत् । 'एवम्', प्रकारेण सूत्रा- धन्यतमस्य धारणेन 'यज्ञोपवीती', भवति । प्रसङ्गात् प्राचीनाचीतिनोऽपि लक्षणमुच्यते- . * सुगमता से समझने के लिये पहिले २७ और २८ सूत्र का अनुवाद करके इसके बाद २४, २५, २६, सूत्रों का अनुवाद किया गया है गोभिलगृहासूत्रटीकायाम्- भाषा- उस (जनेऊ) को दाहिने कांधे पर रखकर, शिर में लपेट कर और वामस्कंध से दक्षिण कक्ष ( वगल ) के नीचे तक लटकते पहनना, इन तीन प्रकारों में से किसी एक प्रकार से जनेऊ पहनने याले को "यज्ञोपवीती" कहते हैं ॥२॥ सव्यं बाहुमुद्धृत्यशिरोऽवधाय दक्षिणेऽसे प्रतिष्ठापति सव्यं कक्षामन्ववलम्वं भवत्येवं प्राचीनावीती भवति ॥३॥ 'सव्यं', वामम् । अन्यत् सर्वं पूर्ववद् व्याख्येयम् ॥ ३ ॥ भाषा- इसी प्रकार वायें कांधे के ऊपर जनेऊ को रख कर, शिर में लपेट कर पहना और दाहिने कांधे से वामे कक्षके नीचे तक लटकाने पहनना, इन तीन प्रकारों में से किसी एक प्रकार जनेऊ पहनने वाले को "प्राचीनावीती” कहते हैं ॥३॥ पितृयज्ञे त्वेव प्राचीनायोती भवति ।। ४ ॥ 'पितृयज्ञ' श्राद्धादौं 'तु' 'प्राचीनावीती एवं' 'भवति' भवेत् । एवञ्च देवपितृकार्याभ्यामन्यत्र निवीत्येव तिष्ठेदिति सुतरां लभ्यते ॥ ४ ॥ मनविधिरुपस्पर्शनविधि - भाषा-केवल पितृयज्ञ में प्राचीनावीनी' होना चाहिये। इस यह सिद्ध होता है कि देवकार्य एवं पितृकार्य को छोड़ कर अन्य समय में "निवीती' होना चाहिये ॥४॥ उद्ङग्नेसमृप्य प्रक्षाल्य पाणी पादौ चोपविश्य बिराचामेद् द्विः परिमजीत ॥ ५॥ पादावभ्युक्ष्य शिरो- ऽभ्युक्षेत् ॥ ६ ॥ इन्द्रियाण्यद्भिः संस्पृशेत् ॥ ७ ॥ अक्षिणी नासिके कर्णाविति ॥ ८॥ यद्यन्मीमास्यं स्यात्तत्तदद्भिः स, स्पृशेत् ।। ६॥ उक्तञ्च 'पाचान्तोदकेनैव कृत्यम्-इति, इदानीं तदितिकतत्यतादिक मुपदिश्यते-- प्रथप्राच-

प्र.१ खं०२ सू०२-१२]
आचमनविधिः॥
'अग्नेः 'उद' उत्तरतः 'उत्सृष्य' सर्पगेन गत्वा, 'पाणी पादौ च प्रक्षाल्य'
उपविश्य च,-'त्रिः त्रिवारम् 'आचामेत् जलं पिबेत्; द्विः' द्विवार 'परिमृजीत'
श्रोष्ठाधरलग्नमुदकं मार्जयेत्; ततश्च 'पादौ अभ्युदय' पादयोरभ्युक्षणं प्रकृत्य,
'शिरः' 'अभ्युक्षेत्' । ततश्च 'अक्षिणीं अक्षिणी' अक्षिगोलकद्वयम्, अनन्तरं
नासिके नासिकारन्ध्रद्वयं, तदनन्तरञ्च 'क' कर्णशङ्कुलिद्वयम् ;- इति पट
'इन्द्रियाणि' 'अद्भिः 'संस्पृशेत्' ततोऽनन्तरमपरमप्यङ्गं यत् यत् मीमांस्यं अव-
वोध्यं स्यात् तत्तत् अपि' 'संस्पृशेत् ॥ ५-५ ॥
भाषा--अग्नि के कुच्छ उत्तर की ओर सरक कर जाये और दोनों
हाथ पैर धोकर उचित स्थान में बैठकर तीन वार आचमन करे। उसके
याद दा वार ओठ और अधर में लगा जल साफ करे, उसके पीछे दोनों पैर
और माथे पर जल छिड़के, तदनन्तर दोनों आँख, नाक के दोनों छिद्र
और दोनों कान, इन छः इन्द्रियों के स्थान में जल स्पर्श करे, तदनन्तर
और भी जिस २ अङ्गको अवबोधित करने की इच्छा हो उस २ अङ्गको
जलसे स्पर्श करे ॥ ५, ६, ७, ८, ६ ॥
ततदाहुः-॥१०॥
'तत्र' पाचमनविषये 'पुतत्' मद्युद्धिस्थमोप्टागतं वक्ष्यमाणम् 'उच्चिष्टो
हैवातोऽन्यथा भवति' ( स०३०)-इत्यन्तग्रन्थम् आहुः केचनेति शेपः ॥३०॥
-
तद्यथा
-
भाषा-इस आचमन के विषय में कोई २ आचार्य कहते हैं-कि॥१०॥
नोपस्पृशेद व्रजन् ॥ ११॥
'वजन्' इतश्चेतश्च भ्रमन् 'न' 'उपस्पृशेत्' अपइति शेषः ॥ ११ ॥
भाषा-भ्रमण करते समय आचमन न करना चाहिये ॥ ११॥
न तिष्ठन् ॥ १२ ॥
'तिष्टन्' दण्डायमानः सन्, 'न' उपस्पृशेदित्यनुवर्तते ॥ १२ ॥
भाषा-खड़े होकर 'भी' आचमन न करे ॥ १२ ॥

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्-
-
ANIMANMOHAMANNA
Humanimate
न हसन् ॥ १३ ॥
'न हसन्' हास्यं कुर्वाणः 'न' उपस्पृशेत् ॥ १३ ॥
भाषा-हंसते समय 'भी' आचमन न करे ॥ १३ ॥
न विलोकयन् ॥१४॥
'विलोकयन्' अपरं किमपि ईक्षमाणः 'न' उपस्पृशेत् ॥ १४ ॥
भाषा-इधर उधर ताकना हुआ भी प्राचमन न करे ॥ १४॥
नाप्रातः ।। १५ ।।
'अप्रणतः क्रोधदम्मादिभिरूपमृत्तिः सन् 'न' उपस्पृशेत् ॥ १५ ॥
भाषा-क्रोध, दम्भ आदि के कारगा अनम्र होकर श्राचमन न
करे ।। १५॥
नाङ्गुलीभिः ॥ १६ ॥
'अङ्गुलीभिः' अगुल्यग्रेपु जलं गृह्णन्नग्राड बुद्ध्या 'न' उपरपृशेत् ॥१६॥
भाषा-अङ्गुली के अग्र भाग में जन्म लेकर ( अग्राह्य बुद्धि से)
आचमन न करे ॥१६॥
नातीर्थन ॥ १७॥
'अतीर्थेन' तीर्थं ब्राह्मादिकं मन्वादिभिरुक्तम् , तदतिरिक्तेन पथा 'न'
उपस्पृशेत् ॥ १७॥
भाषा-अतीर्थ द्वारा (धातु पात्रादि में मुंह से जल लेकर या कण्ठ
में ढाल कर ) आचमन न करे ॥ १७ ॥
न सशब्दम् ॥ १८॥
'सशब्द' क्रीडाभिप्रायेण शब्दं यथा भवेत् तथैव कुर्वाणो 'न'
उपस्पृशेत् ॥ १८ ॥
भाषा-शब्द करके ( जलसे खेल करने को बुद्धि से) आचमन
न करे ॥१८॥
नानवेक्षितम् ॥ १६ ॥
'अनवेक्षितम्' हस्तगृहीतमुदकं अनवेक्षयव यथालब्धं दृश्यकीटादिसहित
"न' उपस्पृशेत् ॥ १९॥

अ० १ खं० २ सू०१३-२७ ] आचमनविधिः ॥ १३ भाषा-जलको भली भांति देखे विना आचमन न करे ॥ १६ ॥ नवाह्यासः॥ २० ॥ 'वाह्यांसः' वायो वहिभूतौ जान्वोः, अंसौ स्कन्धौ यस्य, तादृशः सन् 'न' उपस्पृशेत् ॥ २०॥ भाषा-दोनों जानुके बाहर स्कन्ध रहने से (वक्र टेढ़ा होकर) आचमन न करे ॥२०॥ नान्तरीयैकदेशस्य कल्पयित्वोत्तरीयताम् ॥ २१ ॥ 'अन्तरीयैकदेशस्य' परिहितवसनस्यैकांशस्य 'उत्तरीयता' कल्पयित्वा 'न' उपस्पृशेत् ॥ २१ ॥ भाषा-एक ही वस्त्र को पहन कर उसी के एक अंशको ओढ़ करू श्राचमन न करे ॥२२॥ नोष्णाभिः॥ २२॥ 'उष्णाभिः' वन्ह्यादितप्ताभिः अद्धिः 'न' उपस्पृशेत् ॥ २२ ॥ भाषा-गरम जलसे आचमन न करे ॥२२॥ न सफेनाभिः ॥२३॥ 'सफेनाभिः' फेनादियुक्तैर्मलिनैरद्भिश्च 'न' उपस्पृशेत् ॥ २३ ॥ भाषा-फेनैले जलसे आचमन न करे ॥ २३ ॥ न च सोपानकः कचित् ।। २४ ।। 'च' अपिच 'क्वचित्' स्थानविशेषे, यत्रानावश्यकं तत्र, 'सोपानकः' उपानदुविशिष्टः सन् 'न' उपस्पृशेत् ॥ २४ ॥ भाषा-और अनावश्यक स्थान में जूना पहन कर आचमन न करे ॥२४॥ कासक्तिकः॥२॥गले वद्धः॥२६॥चरणौ न प्रसार्य च॥२७॥ के मस्तके श्रासक्तिबन्धनं यस्य स 'कासक्तिका,' 'गले' गलदेशे 'पद्धः' गोभिलगृह्यसूत्रटीमायाम्- गलाधःकरणे व्याघातः स्यादेवं दृढबद्धः, 'च' अपिच 'चरणौ' 'प्रमार्य' 'न' उपस्पृशेत् ॥ २५-२७ ॥ भापा-मस्तक या गले में हड़ वन्धन रहते पगड़ो या डुपट्टा आदि हटा कर या दोनों पैर फैला कर आचमन न करे २५, २६, २७ ॥ अन्ततः प्रत्युपस्पृश्य शुचिर्भवति ॥ २८ ॥ 'अन्ततः' आचम्यारब्धकर्मकेण अनारब्धकर्मकेण वा शयनादीनामन्ते 'प्रत्युपस्पृश्य' अनुपद-वक्ष्यमाणप्रत्युपस्पर्शनं ग्रात्यैव 'शुचिर्भवति ॥ २८ ॥ भाषा-सो कर उठने आदि समय आचमन करने से शुद्धि होगी ॥२८॥ हृदयस्पृशस्त्वैवाप आचामेत् ॥ २६ ॥ श्राचमनजलपरिमाणमाह-'हृदयस्पृशः, यावन्त्यः प्रीताः हृदयं स्पृशन्ति, तावन्त्यएवापः हृदयस्पृशः ताः 'श्रापः, 'आचामेत् ॥ २९ ॥ भाश- जितना जल पीने से हृदय तक सिक्त हो सके, कम से कम उतने जलसे आचमन करे ॥२६॥ उच्छिष्टोहैवातोऽन्यथा भवतीति ॥३०॥ 'श्रतोऽन्यथा' उक्तादन्यप्रकारकृताचमनः 'उच्छिष्टः एवं' अशुद्धएव 'ह' निश्चयं भवति'-'इति' 'पाहु.' (सू० १) इति पूर्वेग्णान्वयः ॥ ३० ॥ भाषा--ऐसा नहीं करने पर आचमन करने वाले का मुंह जूठा ही रह जाता है॥३०॥ अथ प्रत्युपस्पर्शनानि ॥ ३१ ॥ 'अथ' अनन्तरम् 'प्रत्युपस्पर्शनानि' झीट्टकम्थलकृताचमनं प्रत्युपस्पर्शनगंज्ञा लभते ? तत् उपदेक्ष्याम इति ॥ ३१॥ -कैसी २ दशा में दोवारे आचमन करने को प्रत्युप स्पर्शन आचमन कहते हैं-सो कहते हैं। सुप्त्वा भुक्त्वा तुत्वा स्नात्वा पीत्वा विपरिधाय च रथ्यामाक्रम्य श्मशानञ्चाचान्तः पुनराचामेत् ॥ ३२ ।।

प्र० सं० २ सू० २८-३२ ] आचमनप्रत्युपस्पर्शनयोविधिः ॥ . 'सुप्त्वा' स्वापानन्तरम् १, 'भुक्त्वा' भोज्यभोजनानन्तरम् २, 'क्षुत्वा' क्षवनानन्तरम् ३, 'स्नात्वा' स्नानानन्तरम् ४, 'पीत्वा पेयपानानन्तरम् ५, 'विप- रिधाय' वसनादिपरिधानानन्तरम् ६, 'च' अपिच श्मशानम्' 'रथ्याम्' प्राम्य- मार्गम् ७. 'नाक्रम्य विचरणानन्तरम् ८, 'श्राचान्तः च' यागाद्यनुरोधतः प्रथम माचान्तोऽपि पुनराचामेत् द्वितीयमाचमनं कुर्वीत । अत्रेदं तत्त्वम् स्वापाअनन्त- रमाचामेत, तत्रैकमेवाचमनं कर्त्तव्यम्; अथ श्राचम्यारब्धकर्मकेण तु स्वापाद्य- नन्तरं पुनश्च द्वितीयमाचमनं कर्त्तव्यम्; तदिदमेस्थानिकमाचमनमेव प्रत्युपस्प- र्शनमुच्यत इति ॥ ३२ ॥ इति श्रीगोभिलीय-गृह्यसूत्रे प्रथमप्रपाठके द्वितीय खण्डस्य व्याख्यानं समाप्तम् ॥१,२॥ भाषो--सो कर उठने, भोजन करने, हिचकी आने, स्नान करने, रसादि पीने, वसन भूषणादि पहनने के श्रमके उप गमनार्थ शयनादि के पीछे जो आचमन किया जाता है उसी को "प्रत्युपस्पर्शन कहते हैं। अर्थात् नीन्द टूटने पर आचमन अवश्य करना चाहिये; यदि किसी देवानुष्ठानादि कार्य को करते २ आलस्य से तन्द्रा रूप निद्रा, या किसी प्रकार विहार करने या हिचकी हो तो ऐसे स्थान में फिर से आचमन करे किन्तु ऐसा न समझे कि एक वार आचमन कर चुका हूँ फिर क्या आवश्यकता है । एवं गली और मुर्दै जलाने के स्थान में भ्रमण करने पर, या इसके पहिल दूसरे किसी कार्य बस आचमन किया गया हो, तो ऐसे स्थानों में भी फिर आचमन करे ॥३२॥ इति श्रीगोभिलीय गृह्यसूत्रे प्रथमप्रपाठ के द्वितीय खण्डस्य व्याख्यानं समातम् ॥ १,२॥ (इति सर्वकर्मसाधारण-प्रकरणं समाप्तम् ) Aname गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- अथ ब्रह्मयज्ञ प्रकरणम् । अग्निमुपसमाधाय परिसमूह्य दक्षिणजान्वक्तो दक्षि- णेनाग्निमदितेऽनुमन्यस्वेत्युकाञ्जलिं प्रसिञ्चेत् ॥ १॥ 'अग्निम्' पूर्वोक्तप्रकारेण (१, २७-२८) 'उपसमाधाय', 'परिसमूना' वक्ष्य- माणेन मन्त्रेण, 'दक्षिणजान्वक्तः' दक्षिणं जानु अनं भूमिगतं यस्य, तादृशः सन्ः-'अदितेऽनुमन्यस्व' हे अदिते ! देवि ! एतत्कर्मकरणे अनुमति देवि इति' अनेन मन्त्रेण 'अग्निम् दक्षिणेन' कृत्वा 'उदका अलि' प्रसिचेत ॥ १ ॥ भाषा-पूर्वोक्त ( १, २७-२८) अग्नि उपसमाधान कर, परिसमूहन करके दक्षिण जानु भूमि पर टेककर, हे अदिते ! मुझ को इस कार्य के करने में अनुमति दो' इस मन्त्र से अग्नि के दतिमा भाग में उदकाञ्जलि सींचे॥१॥ अनुमतेऽनुमन्यस्वेति पश्चात् ॥२॥ 'अनुमतेऽनुमन्यस्व' हे अनुमते देवि ! अत्रानुमतिं देहि-'इति' मन्त्रेण ,पश्चात्' अग्नेः पश्चिमतः उदकाञ्जलिं प्रसिञ्चेत् ॥ २ ॥ भाषा-'हे अनुमते ! मुझको इस कार्य के करने में अनुमति दो- इस मन्त्र से अग्नि के पश्चात भाग में दृसरी उदकाञ्जलि सींचे ॥२॥ सरस्वत्यनुमन्यस्वेत्युत्तरतः ॥ ३ ॥ 'सरस्वत्यनुमन्यस्व' हे सरस्वति ! देवि ! अत्रानुमति देहि 'इति' मन्त्रण 'उत्तरतः' अग्नेः उदकाञ्जलिं प्रसिञ्चेत् ॥ ३॥ भाषा-और 'हे सरस्वति ! मुझ को इस कार्य के करने में अनुमति दो' इस मन्त्र से अग्नि के उत्तर में तीसरी उदकाञ्जलि सेंचन करे ॥३॥ देवसवितःप्रसुवेतिप्रदक्षिणमग्निं पर्युक्षेत्सकृद्वा निर्वा४ 'देवसवितः प्रसुव यज्ञं प्रसुच यज्ञपति भगाय । दिव्योगन्धर्वः केतपू: केतन्नः पुनातु वाचस्पतिर्वाचनः स्वदतु' इत्यनेन मन्त्रेण (म० वा. १ क०) 'अग्नि प्रदक्षिणं' यथाभवेत् 'सकृत वा' एकवारं वा 'त्रिर्वा' अथवा वारत्रयं 'पर्युक्षेत्' अदकधाराभिरिति शेषः ॥४॥ - प्र० १ खं०३ सू०४-११ ब्रह्मयज्ञप्रकरणम् ॥ १७ माताजETREEP GEETERMINDurant TANDARDKannaDS भाषा--एकबार या तीनवार 'देव सवितः प्रमुव' इस मन्त्र से अग्नि की प्रदक्षिणानुसार जल धारा गिरावे ! इमी को पर्युक्षण कहते हैं ॥ ४ ॥ पर्युचणान्तान् व्यतिहरन्नभिपर्युक्षन् होमीयम् ॥ ५ ॥ पर्युक्षणान्तान्' अङ्गयांगाल 'व्यतिहरन्' व्यवहरन् ‘होमीयम्' होमो- पयोगितया सहीवं वस्तुजातम् 'अभिपर्युक्षन्' उदकविन्दुभिः सिञ्चन् ॥ ५ ॥ भाषा-उक्त प्रकार 'पर्युक्षण' तक के कार्यों को शेष कर अनन्तर होम के उपयोगी अन्नादि को जज विन्दु से सींचे । इसी को 'पर्युक्षण' कहते है ॥५॥ अथ हविष्यस्यान्नस्याग्नौ जुहुयात् कृतस्य वा- ऽकृतस्य वा ॥ ६॥ 'अथः अनन्तरम् 'अग्नौ तस्मिन् ‘कृतस्य' वा पक्कस्य वा 'अकृतस्य वा' अप-क्वस्य वा 'हविष्यस्य' अन्नस्य यवादेः (अंशमितिशेषः) 'जुहुयात् ॥ ६ ॥ भाषा-अनन्तर उसमें अग्नि में का पका या कच्चा हव्य हवन करे ॥६॥ अकृतश्चेत् प्रक्षाल्य जुहुयात् प्रोदकं कृत्वा ॥ ७ ॥ तच्च होमीयं 'अकृतम्' अपक्वं 'चेत्' तत् 'प्रक्षाल्य' उदकैः, 'प्रोदक' जलाई च 'कृत्वा' “जुहुयात् ॥ ७ ॥ भापा-यदि अग्नि-पक्व भात श्रादि होम के योग्य न हो, प्रत्युत तण्डुन या फलादि ही हवनीय हो, तो उन सब को अच्छे प्रकार धोकर जल से भींगे ही दशा में हवन करे ॥ ७॥ अथ यदि दधिपयोयवागू वा, कसेन वा चरस्था- ल्या वा सुवेण वै वा ॥ ८॥ 'अथ' तत्रापि यदि दधि पयः यवागू 'वा' होतव्यं भवेत् तदा 'कसेन वा' कांस्यपात्रेण वा 'चरुस्वाल्या वा' चरुपाकपात्रेण 'वा' अथवा 'जुवेण' 'वै' एवं जुहुयात् न तु साक्षात् हस्तेन ॥८॥ भाश-यदि दही, दूध या यवागू से होम करना हो, तो उनको धोने की आवश्यकता नहीं, जैसा हो उसी प्रकार विन धोये ही कांस्यापात्र या २ गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - चरुस्थाली में रक्ख कर उस से या युवा से हवन करे (हाथ से नहीं) ॥८॥ अग्नये स्वाहेति पूर्वी तूष्णोमेवोत्तरां मध्ये चैवा- पराजितायाञ्चैव दिशीति सायम् ॥६॥ 'मध्ये' अग्नेमध्यस्थले 'पूर्वा' प्रथमामाहुतिम् “अग्नये स्वाहा” 'इति' अनेन मन्त्रेण 'पराजितायां' दिशि अग्नेरैशान्यां 'उत्तराम्' द्वितीयामाहुतिम् 'तूष्णीम्' मन्त्रशून्याम् जुहुयात् । 'इति' एवं 'सायम्' सायङ्गालीनो होमः ॥९॥ भाषा-पहिली आहुति तो "ऋग्नये स्वाहा” इस मन्त्र से अग्नि के बीच में और दूसरी आहुति ईशान कोण में विना मन्त्र ही के करे । यही सायङ्काल के होम का विधि हुआ॥६॥ अथ प्रातः,-सूर्याय स्वाहेतिपूवीं, तृष्णीमेवोत्तरां मध्ये चैवापराजितायाश्चैव दिशि ॥ १० ॥ "अथ प्रातः”-'पूर्वाम्' प्रथमामाहुति "सूर्याय स्वाहा" "इति" अनेन मन्त्रेणः अन्यत् समानं पूर्वेण ॥ १०॥ भाषा-प्रातःकाल के होम की व्यवस्था भी इसी प्रकार, होगी, केवल "अग्नये स्वाहा” मन्त्र के बदले “सूर्याय स्वाहा” मन्त्र से आहुति होगी इतना ही इसमें विशेषता है ।। १० ।। समिधमाधानुपर्युक्ष्य तथैवोदकाञ्जलीन् प्रसिञ्चदन्व- मस्था इति मन्त्रविशेषः ॥११॥ सायं प्रातश्चोभयत्रैव होमानन्तरम् -'समिधम्' 'अमन्त्रकमेव आधाय' तत्राग्नी हुत्वा 'अनुपर्युक्ष्य' पुनः पर्युक्षणं कर्तुं प्रवृत्तः 'तथैव पूर्ववदेव 'उदका- अलीन्' प्रसिञ्चेत् । तत्र 'अन्वमंस्था'-'इति' अयमेव भूतार्थपदप्रयोग एव 'मन्त्रविशेषः मन्त्रे विशेषः कर्त्तव्यः ॥११॥ भाषा-'सायंया 'प्रातः दोनों ही काल में होम के पीछे अग्नि में एक समिधा विना मन्त्र के डाल कर पहिले की नाई फिर 'पर्युक्षण करने को प्रवृत्त होकर उदकाञ्चलि सींचे । इसी को 'अनुपर्युक्षण' कहते हैं । इसी -

प्र०१खं०३ सू०११-१८]
ब्रह्मयज्ञप्रकरणम् ॥
'अनुपयुक्षण' में पूर्व मन्त्र के बदले 'हे अदिते ! तू ने मुझे इस कार्य
के करने में अनुमति प्रदान कियी थी' ( मैंने भी उसके अनुयायी कार्य
सम्पन्न किया)-इसी मन्त्र का व्यवहार करे यही विशेषता है ॥११॥
प्रदक्षिणमग्नि परिक्रम्यापाशेषं निनीय पूरयित्वा
चमसं प्रतिष्ठाप्य यथार्थम् ॥ १२ ॥
उक्तानुपर्युक्षणानन्तरम्-'अग्नि' 'प्रदक्षिणं' यथा स्यात् तथा 'परिक्रम्य
'अपाम्' अनुगुप्तानां कुम्भादेहीतानां वा 'शेष' 'निनीय' पुनगृहीत्वा, तेनैवो.
दकशेषेण 'चमसं' पानपात्रं 'पूरयित्वा' 'प्रतिष्ठाप्य' संरक्ष्य च 'यथार्थम्' यथा-
प्रयोजनम् एतदुत्तरवक्ष्यमाणं सायं सायमाशादिकं प्रात: प्रातराशादिकञ्च
कुर्वीतेति ॥ १२॥
भाषा-उक्त 'अनुपयुक्षण" के पीछे प्रदक्षिण द्वारा अग्नि की परिक्रमा
करके, गृहीत जल के अवशिष्ट को 'चमसि' में ढाल कर आवश्यकता के
अनुसार कार्य के लिये रक्ख छोड़े ॥ १२ ॥
एव मत अद्ध्वं गृह्येऽग्नौ
जुहुयादा हावयेद्वाऽऽजी
वितावभृथात् ॥ १३ ॥
'अतः अदुव॑म्' एतदिवसत ऊर्ध्वम् 'श्रा जीवितावभृथात्' जीवितं
जीवनम् , अवभृथञ्च अश्वमेधादिमहायागक्रियान्त्यकर्म, तयोः समाहारः तस्मात्
यावज्जीवनं महाक्रतुसम्पादनान्तं वा प्रतिदिनमेव सायं प्रातश्च 'एवम्' अनेन
प्रकारेणैव तत्र 'गृझे अग्नौ' 'जुहुयात् वा' स्वयम् , 'हावयेद्वा' अपरेण प्रति-
निधिना ॥ १३ ॥
भाषा-जब अग्नि ग्रहण पूर्वक प्रथम होम करे, उस दिन से सारे जीवन
या अश्वमेधादि महायाग में 'अवभृथ स्नान करने तक प्रति दिन सायं और
प्रात: दोनों ही समय उपदिष्ट प्रकार से स्वयं होम करे या प्रतिनिधि से इस
होम को करावे ॥ १३॥

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- श्रथाप्युदाहरन्ति ॥ १४ ॥ 'थ' अत्र विपये उदाहरन्ति अपि' अपरेण हावने विशेष विधिमप्यनेके वदन्ति ॥ १४ ॥ भाषा-इस प्रतिनिधि के विषय में कोई २ लोग यह कहते हैं कि॥१४॥ कामं गृह्येऽग्नौ पत्नी जुहुयात् सायंप्रात)मो गृहाः पत्नी गृह्यएषोऽग्निर्भवतीति ॥ १५ ॥ 'एपः अग्निः' 'गृह्यः' गृहाय हितएव भवति',-'पत्नी' च गृहाः' गृहा, 'इति' अतोहेतोः 'गृह्ये अग्नौ अत्र ‘पत्नी', 'काम' यथा स्यात्तथा, इच्छेच्चेत 'सायंप्रात)मौ' यथोक्तौ द्वावेव, 'जुहुयात् ॥ १५ ॥ भाषा- पत्नी को गृहा कहते हैं और इस अग्नि को भी गृह्याग्नि कहते हैं । इसलिये यदि पत्नी इच्छा करे तो दोनों ही होम करे ॥ १५ ॥ निष्टितेसायमाशप्रातराशे भूतमिति प्रवाचयेत् ॥१६॥ अनन्तरम् . 'सायमाशप्रातराशे सायं सायम्भोजने प्रातः प्रातर्भोजने च 'निष्ठिते' अनुष्ठिते, ततः ‘भूतम्' इदानी कर्त्तव्यजातं सम्पन्नम् 'इति मनसि विचार्य अन्तेवासिनो विज्ञाप्य वा 'प्रवाचयेत्' स्वाध्याय मध्यापयेत् ; स्वान्ते वासिन इति शेषः। एप एव ब्रह्मयज्ञः॥ १६ ॥ भाषा-अनन्तर सायङ्काल में सायङ्काल का भोजन और प्रातःकान में प्रात:काल का भोजन प्रस्तुत होने पर छात्रों को अध्ययन कगन ( यही 'ब्रह्मयज्ञ' है)॥१६॥ ऋते भगया वाचा शुचिर्भूत्वा-॥ १७॥ प्रतिजप. स्योमित्युच्चैस्तस्मैनमस्तन्माक्षा इत्युपाशु ॥ १८ ॥ ब्रह्मयज्ञकाले 'भगया वाचा ऋतें' वेदवाक्यं विना अपरं किमपि लौकिक प्रय 'अशुचिः भूत्वा, तदशुचित्वं दूरीकर्तुम् 'उच्चैः श्रोम् इति' किन्च 'उपांशु' नीचैः 'तस्मै नमस्तन्माक्षा:' 'इति मन्त्रद्वयं 'प्रतिजपति' प्रतिवारं यावद्वार लौकिकं वदेत तावद्वारमेव जपेदिति ॥ १७-१८॥ इति गोभिलगृह्यसूत्रे प्रथमप्रपाठके तृतीयखण्डस्य व्याख्यानं समातम् ॥ १-३॥

प्रखं४ सू०१-५] बलिवैश्वप्रकरणम् ॥ ram- RI AMA भाषा-(ब्रह्मयज्ञ कान में ) जिल वेद वाक्य से कल्याणा हो ऐने वाक्य को छोड़, मान्य वाक्यों का व्यवहार करने पर अशुचि होगी ॥१७॥ इसलिये पवित्र वाक्य के व्यवहार करने पर उनके प्रायश्चितरूप ऊंचे स्वर में “ओम्" और मन ही मन "तस्यै नमः” श्रादि दो नन्त्रों को प्रति बार ( जब २ लौकिक वाक्यों को बोले ) पढ़े ॥१८॥ गोमिनगृह्यसूत्रके प्रथम प्रपाठकके तृतीय खण्डका अनुवाद पूग हुआ॥१-३॥ अथ वाग्यलो बलोन् हरेत् ॥ १ ॥ 'प्रथ' प्रकरणारम्भद्योतकः । 'वाग्यतः' नियतवाक् हास्यझौतुकादिनिमित्त- कमनृतभाषणाद्यनियतवाचं परित्यज्य 'वलीन्' बल्यर्थपाकादीनि प्रथमकर्तव्यानि 'हरेत्' बाहरेत् सम्पादथेदित्यथः ॥ ५ ॥ उक्तनियतवाक्यत्वमेव विशदयति भाषा-हंसी जोलगी (हास्य कौतुकादि) के निमित्त भी झूठ बोलना आदि अनियन वाक्यों को न बोल कर काम में मन लगा कर "बलिकर्म" करे एवं विचार पूर्वक पाकादि सम्पादन करे । भाषेतान्नससिद्धिमतिथिभिः कामसम्भाषेत ॥ २॥ 'अन्नसंसिद्धि' अन्नसम्बन्धिनी संसिद्धिं विक्लत्यादिविषयणी "कथां प्रश्नो- तरादिकां 'भाषेत' न तत्र निषेधः । किञ्च 'अतिथिभिः' समागतैः सह 'कामं यथेच्छं विनयादिकं 'सम्भाषेत' तत्रापि न निषेधः ॥ २ ॥ वैश्वदेवविधिरुच्यते- भा०-हां, अन्नपाक विषयक वातचीत करने का निषेध नहीं और आगत अतिथियों के साथ भी नम्रता से बात करने में कोई बाधा नहीं ॥२॥ अथ हविष्यस्यान्नस्योद्धृत्य हविष्यैर्व्यञ्जनरूपसिच्यानो जुहुयात्तूष्णीं पाणिनैव ॥ ३ ॥ 'अथ' पाकनिष्पच्यनन्तरं, हविष्यस्य अन्नस्य' तस्यैव पक्वस्य हविष्यरूपा- मप्य किञ्चिद् 'उद्धत्य' गृहीत्वा, 'हविष्यै व्यञ्जनः' सूपादिभिः 'उपसिच्य' गृहीतं तत् सम्मिश्य, 'अग्नौ पूर्वोक्तलक्षणे गृह्ये 'तूष्णीम्' अस्फुटवाक् सन् "पाणिनैव जुहुयात्, न तत्र स्रुवादेरपेक्षा ॥ ३ ॥ तत्र मन्त्रदेवते विधीयते- - RA

२२
गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्-
......
भा०-पाक प्रस्तुत होने पर उस हविष्यान्न में से कुछ लेकर हविष्य
व्यञ्जन के साथ उसी अग्नि में विना मन्त्र पढ़े एक आहुति देवे । इसमें
'सुवादि' की अपेक्षा नहीं ॥३॥
प्राजापत्या पूर्वाहुतिर्भवति सौविष्टकृत्युत्तरा ॥४॥
'प्राजापत्या' प्रजापतिदेवताका, तथाच मनसा प्रजापति प्रजानामीशानं
सृष्टिस्थितिलयकर्तारं परमदेवं विचिन्त्य 'प्रजापतये स्वाहा'-इत्यस्फुटमेवोक्त्वा
'पूर्वाहुतिः प्रथमा आहुतिः भवति' सम्पद्यते । सौविष्टकृती' स्विष्टकृदेवताका,
स्विष्टं शोभनाभिलाषं करोति पूरयति यः तमेव सर्वान्तर्यामिणं परमेशं मनसा
विचिन्त्य 'स्विष्टकृते स्वाहा' इत्यस्फुटएवोक्ते 'उत्तरा' आहुतिः भवति । इत्थ-
मुपदिष्टो देवयज्ञापरनामको नित्यहोमाभिधो वैश्वदेवः ॥ ४ ॥
भा०--प्रजापति देवता अर्थात् जो इस सम्पूर्ण गज्य का प्रकृति राजा
होकर प्रजारूप विश्व संसार को पालन कर रहे हैं उन्हीं परमेश्वर का
मन ही मन चिन्तन कर प्रथम आहुति और स्विष्टकृत् देवता अर्थात् जो
एक मात्र सम्पूर्ण संसार का अन्तर्यामी और सुमनोरथ पूरण करने वाले हैं
उनका मन ही मन चिन्तमन करके दूसरी पाहुनि देवे इमी को "देवया"
"नित्यहोम" और "वैश्वदेव' कहते हैं ॥ ४॥
अथ बलीन हरेत्, वाह्यतोवान्तर्वा सुभूमि कृत्वा ।।५।।
'अर्थ' देवयज्ञापरपर्यायवैश्वदेवहोमानन्तरम्,-
'वाह्यतः वा अन्तर्वा' अग्न्यागारस्येति शेषः, 'सुभूमि' मार्जनादिभिर्भूमि-
शोधनं 'कृत्वा' बलीन्' भूतयज्ञात्मकान् पशुपक्षिपिपीलिकादीनामाहारदान
रूपान् 'हरेत्' सम्पादयेत् ॥ ५॥
भाषा-देवयज्ञ नामक उक्त होम के पीछे अग्नि-गृह के बीच में हो
या बाहर । अर्थात् यथायोग्य चाहे जिस किसी स्थान में हो, झाडू आदि
से भूमि को भली भांति साफ कर उस २ स्थान में पशु, पक्षी, पिपीलिका
आदि को आहार देकर 'बलिकार्य पूरा करे ॥ ५ ॥

प्र० १ खं० ४ सू०६-१०] बलिवैश्वप्रकरणम्- सकृदपो निनीय चतुर्धा वलिं निध्यात्, सकृद- न्ततः परिषिश्चेत् ॥ ६॥ 'सकृत्' एकवारम् 'अपः' उदकानि 'निनीय' भूमौ सिञ्चनं प्रकृत्य 'बलिं' पार्थिवभूतायुददेश्यकं दानं 'चतुर्धा' चतुःप्रकारं या स्यात् तथा निदध्यात्' तत्र मार्जितजलसिक्ते च स्थाने संग्क्षेत; 'अन्ततः' बलिनिधानान्ते पुनरपि पूर्ववत् 'सकृत् एकवारम् अपः 'परिषिञ्चत् ॥ ६॥ भाषा-साफ कियी हुयी भूमि में पहिले एक बार जल छींट कर ४ भाग बलि अलग २ रक्खे और फिर उन पर जल छिड़के ॥६॥ एकैकं वानुविधानमुभयतः परिषिञ्चेत् ॥ ७ ॥ 'वा' अथवा 'अनुविधानम्' एकस्य पश्चादपरमिति क्रमेण चतुर्णामेव बलीनां स्थापन कार्यमिति शेषः, किन्च 'एकैकम्' एवं 'उभयतः' स्थापनात् पूर्वस्मिन् पश्चादपि 'परिषिञ्चेत् ॥ ७ ॥ भाषा-या एक २ भाग करके ही बलि रक्खे और प्रत्येक भाग के रखने के पहिले एक बार और पोछे एक बार जल छिड़के ॥ ७ ॥ स यत् प्रथमं निदधाति स पार्थिवो बलिर्भवत्यथ यद्वितीय स वायव्यो यत् तृतीय स वैश्वदेवो यच्चतुर्थ स प्राजापत्यः॥८॥ 'स' बलिप्रदाने प्रवृत्तः पुरुषः 'यत् प्रथमं निदधाति', 'स:' प्रथमो 'बलि' 'पार्थिवः पृथिवीदेवताको भवति । 'अथ' अनन्तरं 'यत् द्वितीयं निदधाति, 'स' बलिः 'वायव्यः' वायुदेवताको भवति । 'यत् तृतीय' निदधाति, 'सः' बलिः 'वैश्वदेवः' विश्वदेवताको भवति यत् चतुर्थं निदधाति, 'सः' बलिः 'प्राजा- पत्यः' प्रजापतिदेवताको भवति ॥८॥ भाषा-वलि के उक्त ४ भागों में से प्रथम बनि पृथिवी देवी की दूसरी वायु देवता की, तीसरी विश्वेदेवा देवता की, चौथी प्रजापति देवता की है ॥८॥ अथापरान् बलीन् हरेदुधानस्य मध्यमस्य द्वारस्या- गोभिलगृशसूत्रटीकायाम् - की, ब्दैवतः प्रथमोबलिर्भवत्योपधिवनस्पतियोद्वितीय आका- शायतृतीयः॥६॥ 'अथ' तलिचतुष्टयविधानानन्तरम् "प्रस्ता' अभिनिधातुः 'उदधानाम्या' यस्मिन् गृहे परिचरणीया आपो रक्षित': तस्य 'हारस्य' 'नध्यम्" मगन: अपरान्' श्रीन 'बलीन्? हरेत्' सम्पादयेत् । तत्र, 'प्रथमः बलि: 'अवनः 'भवति'; 'द्वितीयः' 'प्रोपधिवनस्पतिभ्यः श्रोपधिवनस्पति देवताकः नवनि; 'तृतीयः' 'आकाशस्य सवति; तोपायेति सर्वत्र शेषणीयः ॥ ९ ॥ भापा-इन चार बलियों के रखने के पीछे यह बलि रखने वाले के के जिस घर में “परिचरणीय' जत्न रनित रहता हो, उसी घर के द्वार के बीच में छान्य नीन बलि रकग्वे । उनमें से काम अलि जत्न देवता दृमरी औपधि-बनस्पनि की और तीसरी कामाश की होली है । ६ ॥ अथापरं बलिहरेच्छयनवाधिव, वा स कामाय वा वलिर्भवति मन्यवे वा ॥ १० ॥ 'श्रथ उक्त बलित्रयहरणानन्तरम् 'श्रपरम्' अपि एक 'बलिम्' 'हरेत' सम्पादयेत् । तस्य स्थानं निर्दिशति-शयनं वा अधिवच्चं वा' सत्यागृहस्य मध्ये शयनस्थानं वा तद्गृहमध्ये एव अधिव, मूत्रत्यागादिस्थानं वा अभि- लश्यति । देवतां विधत्ते-'सः शयनस्थाने वा स्थापितो बलि: 'कामाय' भवति, अधिवच्चस्थाने वा स्थापितो बलि: 'मन्यवे' भवति ॥ १० ॥ भाषा - इन तीन बलियों के रखने के बाद सोनेके धड़में चाहे सोने ही की जगह हो, या मल मूत्र त्याग आदि स्थान ही में हो, एक और बनि रक्खे । उनमें से शयन-स्थान वाली 'वलिकाम देवता' की और मूत्र त्यागादि स्थान-जो सोने के घर में होता है उसकी बलि 'मन्यु देवता की होती हे ॥ १० ॥ अथ सस्तूप स रक्षोजनेभ्यः॥ ११ ॥ 'अर्थ' अनन्तरं 'सस्तूपं गृहावर्जनादिप्रक्षेपस्थान मभिलक्ष्य तत्रापि बलि मेक प्रक्षिपेत् । 'सः' बलिः 'रक्षोजनेभ्यः' भवति ॥१॥ - प० १ खं० ४ सू०१३-१९] बलिवैश्वप्रकरणम् ॥ MAHARA शायरा Rana भाषा-कूड़ा आदि फेकने के स्थान में एक बनि साक्षसों के लिये देवे ॥११॥ अथैतद्वलिशेषमद्भिरभ्यासिच्यापसलावि दक्षिणा- निनयेत् पितृभ्यो भवति ।। १२ ॥ 'अथ' तदनन्तरम्' 'पुतलिशेपन्' अभिः श्रभ्यासिच्य अटलेकेन धौतपार्य प्रकृत्य 'अपसलवि' अपसव्येन पितृतीर्थेन 'दक्षिणां' दक्षिणस्यां दिशि निन्येत्' विकरेत् । स एव विहीणों बलिः पितृभ्यः पितृदेवताकः भवति ॥ १२ ॥ भाषा-तव पात्र के बचे हुये अन्न को जलमें धोकर हाथकी पेत्र अंगुली से दक्षिण को ओर फेके, यह बलि पितृगण की होगी ॥ १२ ॥ [ इससे गोभिलाचार्य के मन से २० भूतबनि निर्णित हुये। उनमें से ४ अग्निगृह में, ३ जनगृह के द्वार पर, एक शय्या-स्थान में हो या मूत्र- त्यागस्थान में हो, शयन-के बगल में एक, और कूड़ा रखने की जगह एवं शेष को मकान के दक्षिण भाग में । किन्तु साधारणतः उत्तरोत्तर जल की तीन रेखा करके उसके ऊपर क्रम से ४ करके । १२ नारह सबके उत्तर एक और सबके दक्षिण में एक यों १४ वलियों का व्यवहार है ] अासीन एवाग्नौ जुहुयात् ॥१३॥ आसीनःपितृभ्यो दद्यात् यथोपपादमितरान् ॥ १४ ॥ 'दासीनः' उपविष्टः "एवं' 'अग्नौ जुहुयात्' पूर्वोक्तप्रकार मथ हविष्यस्यान्न- . 0 * (१)-जैसे----- -ब्रह्मणेन मः -कामाय नमः -प्रजापतये नमः ४ -वासुकये नमः ११.. ---- -आकाशाय नमः ७०- -विश्वेभ्योदेवेभ्यो नमः ३ 0-पितृभ्यःस्वधा १४ १३ रक्षोजनेभ्यः । -इन्द्राय नमः १० ओषधिवनस्पतिभ्यो नमः ६०-वायवे नमः १ -अभ्यो नमः ५. .---पृथिव्यै नमः १ इस प्रकार १४ बलि को चाल वा प्रणाली यमपि अमूलक नहीं, परन्तु जिस कारण गोमिलाचायं ने नहीं कहा है, इस लिये कौथुमी शाखा वाले द्विजों को ये १४ बलि कर्त्तव्य हैं ऐसा नहीं बोध होता है ॥ २२ ॥ -मन्यवे नमः ६ ०-

२६
गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्-
-
स्योद्धत्येत्यादिकं वैश्वदेवहोमं कर्त्तव्यम् । 'पितृभ्यः' अपि अवैतलिशेपमि-
त्युक्तं बलिशेषम् 'आसीनः' एवं 'दद्यात्' । 'इतरान्' अथापरानित्यायुक्तान्
उदधानादिबलीन् 'यथोपपाद' यथा यथा उपपद्यते तथातथैव तिष्ठन् प्रहश्चलन्
वा दद्यात् ॥ १३, १४ ॥
-पूर्वोक्त वैश्वदेव होम बैठकर करे,पितृगण को देने योग्य बलि-
शेष भी ( सू० १२ ) बैठ कर प्रदान करे। पूर्वोक्त जल गृहादि में देने योग्य
बलि शहिक जिस २ प्रकार सम्पन्न हो सके उस २ प्रकार करे अर्थात् खड़े
होकर, बैठ कर, निहुर कर, जैसा सुभीता हो वैसा करे ॥ १३-१४ ॥
स्वयन्त्वेवैतान यावदसेद् बलीन् हरेत् ॥१॥ अपि
वाऽन्यो ब्राह्मणः ॥ १६ ॥ दम्पती एव ॥ १७॥
'एतान्' 'बलीन्' 'यावद' 'वसेत्' स्वगृहे, तावत् 'स्वयमेव' 'हरेत् ।
'अपिवा' पीडादौ 'अन्यः ब्राह्मणः' प्रतिनिधिरपि अत्र अधिकारी । अत्र कायें
'दम्पती भार्या पतिश्च उभौ 'एवं' तुल्याधिकारिणौ ॥ १५-१७॥
भाषा-ये वलि जिस समय मकान पर रहे उस समय स्वयं ही सम्पन्न
करे या (असमर्थ होने पर) अन्य ब्राह्मण से भी करा सकता है । इस कार्य
के लिये स्त्री पुरुष दोनों ही समान अधिकारी हैं ॥ १५ ॥ १६ ॥ १७ ॥
इति गृहमेधिव्रतम् ॥ १८ ॥
'इति' एतत्खण्डोक्तं वैश्वदेवादिकं 'गृहमेधिव्रतम्' गृहमेधिनः गृहस्थस्य
व्रतम् अवश्यं प्रतिपाल्य नियमितकार्यम् ॥ १८॥
भाषा-इस खण्ड में कहे कर्म गृहस्थों के लिये जानो ॥ १८ ॥
स्त्री ह सायं प्रातः पुमानिति ।। १६ ॥
'सायं स्त्री' 'प्रातः पुमान् कुर्यादिदं बलिहरणम् 'इति' एवं नियमः
कस्यचिदाचार्यस्य अभिमतः । अत्राप्यस्य गोभिलस्य नासम्मतिः ॥ १९॥
भाषा-'प्रातः काल में घर का मालिक ही और सायंकाल में उसकी
पत्नी ही बलिहरण करे' यह भी किसी २ आचार्य का मत है ॥ १६ ॥

प्र० १ खं० ४ सू०२०-२६] बलिवैश्वप्रकरणम् ॥ २७ GHARom सर्वस्य त्वेवान्नस्यैतान् बलीन् हरेत् पित्र्यस्य वा स्वस्त्ययनस्य वार्थार्थस्य वा ॥ २० ॥ 'पित्र्यस्य वा' पितृकर्मार्थ शृतस्य, 'स्वस्त्ययनस्य वा' स्वस्त्ययनार्थ कल्याणार्थं ब्राह्मणभोजनाय शृतस्य वा, 'अर्थार्थस्य वा' अर्थः प्रयोजनं किमपि प्रयोजनं स्वभोजनादिकमुद्दिश्य पक्वस्य वा 'सर्वस्य एवं' सर्वकारस्यैवान्नस्य 'एतान् बलीन् हरेत् बलिहरणे इदमेवान्नं ग्राह्यमिति न नियमः ॥ २० ॥ भाषा-पितृ कार्य के लिये हो, या ब्राह्मण भोजनादि कार्य के लिये हो, या अपने ही खाने के लिये हो, सब ही अन्न से बलि कर्म करे ॥२०॥ यज्ञादेव निवर्त्तते ।। २१ ॥ 'यज्ञात्' ज्योतिष्टोमादिकं यज्ञमारभ्य (ल्यब्लोपे पञ्चमी) 'एव' 'निवर्तते' इतः कर्मणः पुरुष इति यावत् । यज्ञे दीक्षितस्य नास्त्यत्रेतिकर्तव्यतेति भावः॥२१॥ भाषा-ज्योतिष्टोमादि जिस किसी यज्ञ का क्यों न हो, अनुष्ठान प्रारम्भ फिर यह बलिकार्य उचित नहीं ॥ २१॥ यद्यकस्मिन् काले ब्रोहियवौ प्रक्रियेतान्यतरस्य कृत्वा कृतं मन्येत ॥ २२॥ 'यदि' 'एकस्मिन् काले' 'ब्रीहियवी' उभयविधे अन्ने प्रक्रियेताम् प्रस्तुतीकृते स्याता, तर्हि 'अन्यतरस्य' ब्रीहेर्यवस्य वा बलिहरणं कृत्वा' 'कृतम्' सम्पन्नं विधिविहितं बलिहरणमिति 'मन्येत जानीयात् ॥ २२ ॥ भाषा-यदि एक ही समय 'तण्डुल' और "यव" दोनों ही प्रकार की अन्न प्रस्तुत हों, तो दोनों प्रकार के अन्नों से बलि कार्य:न करे, चाहे दोनों अन्न में से किसी एक से बलि कार्य हो सकता है ॥ २२ ॥ यद्यकस्मिन् काले पुनः पुनरन्नं पच्येत सकृदेवैतद् वलितन्त्रं कुर्वीत ॥ २३ ॥ 'यदि' 'एकस्मिन् काले' 'पुनः पुनः' भृशम् 'अन्नं पच्येत, तर्हि प्रथमप- म्वेनान्नेन द्वितीयाद्यैर्वा 'सकृत' एकवारमेव 'एतद्' 'बोलतन्त्र' 'कुर्वीत' ॥ २३ ॥ करने पर करना गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- -- . .. भाषा-यदि एक ही समय दो, तीन, या इससे भी अधिक वार, अन्न पके तो प्रनिवार बलिकार्य नहीं करे शिन्तु एक ही वार करे ॥ २३ ॥ यद्येकस्मिन् कुले बहुधाऽसौ पच्येत गृहपलिमहानसा- देवैतद्वलितन्त्रं कुर्वीत । २४ ।। 'यदिः 'एकस्मिन् कुले' बहुभ्रात्राअधिकृते एकवेशमन्यपि पृथगन्नत्वाद बहुमहानसेषु लन्सु बहुधा अन्न पच्नेत', तर्हि 'गृहपत्ति-महानसात्' तंग मध्ये यस्य गुरुत्वाद्धतोः स्वामित्वं तत्वकस्य महानसात् पाकस्थानात् 'एव' एतद् बलितन्त्रं 'कुर्वीत' न तु प्रतिमहानसात् ॥ २४ ॥ मापा-यदि एक मकान में एक या अनेक व्यक्ति भिन्न २ पाक करते हों, तो उनमें से जो सब से मालिक बना हो, उसी के पाकशाला से इस वलि कार्य को करे: प्रत्येक मावर सवति कार्य न॥२४॥ यस्यत्वेषामग्यतः निध्येन्नियुक्तता जग्नो कृयाऽयं ब्राह्म- णाय दत्त्वा भुञ्जीत ॥२॥ यस्यो जघन्यं भुञ्जीतैवेति ॥२६॥ 'एपाम् एकगृहस्थितानां पृथगनानां भ्रात्रादीनां मध्ये 'यस्य तु' 'अप्रतः सिध्येत्' अन्नमिति यावत् , सः किञ्चिदन्नम् 'अग्नौं' 'नियुक्तं' 'कृत्वा' अनन्तरम् 'अग्रं' पक्वान्नस्याग्रभागं 'ब्राह्मणाय' अतिथथे' 'दत्त्वा' ततः स्वयं भुजीव' । 'यस्य उ” यस्य तु निष्पन्नाप्रपाकस्य जयन्यम्' अरुचिकर कदयंमत्रं पाकादिदोघेण स्यात्, स तु 'भुञ्जीत एवं' न तेनाम्नेनातिथिं सेवयेत् अपितु तदनन्तरकृतपाक- एवातिथि सत्कुर्यात् ।। २५-२६ ॥ भाषा-र्याद एक घर में अनेक पा वाले रहते हों तो उनमें से जिस का भोजन सब से पहिले प्रस्तुत हो कड़ी थोड़ा अन्न अग्नि में डाल कर पके अन्न में से अतिथि सेवा के पश्चात् , आप भोजन करे. परन्तु यदि वह अन्न पाकादि दोष से अग्राम हो जाये तो उससे अतिथि सेवा न करके उसे स्वयं भोजन करेः और फिर से पाक करके अतिथि सेवा करे ॥२५, २६ ।। * इस्ले नरमंध अर्थात् अतिथि सेवा में जिसका जिस दिन पहिले पाक हो और अच्छा पाक हो उस दिन उसी को अतिथि सेवा करनी आवश्यक है, अन्य लोगों की इच्छा रहो करें या न करें. ऐसा सूचित होता है ।। २५, २६ ।।

प्र०१खं०४ २७-३३] बलिवैश्वप्रकरणम् - - २९ REATMAmar - अथाप्युदाहरन्ति ॥ २७ ॥ 'अथापि' अपरमपि किञ्चित् 'उदाहरन्ति' वदन्ति पूर्वाचार्याः, अत्रैवेति शेषः ॥ २७ ॥ तथाहि- आषा-पूर्वाचार्यगण इस बलिहरण” विषय में विशेषता कहते हैं ॥ २७ ॥ जैसे:- एतस्यैवबलिहरणस्यान्तेकामंप्रचीतभवति हैवास्य॥२८॥ 'एतस्यैव बलिहरणस्य' 'अन्ते' अनन्तरं कामं स्वाभिलाषं 'प्रबुवीत' प्रार्थयीत । 'अस्य प्रार्थकस्य ह' निश्चयं भवति' प्रार्थितसिद्धिरिति ॥ २८ ॥ किं कुर्वन् कामं प्रब्रुवीतेत्यत्रोत्तरमाशस्यबलिहरणं कुर्वन्निति, तदेव स्वगतं विशदयितुमासस्यबलिहरणं विधत्ते भाषा-इस बलि के कर चुकने पर जैसी इच्छा हो करे; परमात्मा से मन ही मन वरमांगे, निश्चय मनोरथ सिद्ध होगा ॥२८॥ स्वयन्त्वेवाशस्थं बलिं हरेत् यवेभ्योऽध्याब्रीहिन्यो ब्रीहिभ्योऽध्यायवेभ्यः सत्वाशस्यो नाम वलिर्भवति ॥२६॥ दीर्घायुहव भवति ॥ ३०॥ 'प्राशस्यं बलिं हरेत् एतेनैव कामप्रार्थनं सम्पन्नं भवेन्नाम । 'स्वयम्' एव हरेत् , नात्र प्रतिनिधिः कार्यः। कीदृशश्च साशस्यवलिरित्याह- 'अध्याब्रीहिभ्यः' ब्रीह्यन्न त्पत्तितः पूर्व 'यवेभ्यः' यवाधारोपरि, किञ्च 'अध्या- यवेभ्यः' यवशस्योत्पत्तितः पूर्व 'ब्रीहिभ्यः' ब्रीह्याधारोपरि बलिं हरेत् 'स तु' स एव 'श्राशस्यो नाम बलिर्भवति' । 'ह' निश्चयम् 'एवं एतेन बलिप्रदानेन 'दीर्घायुः भवति' पुरुष इति ॥ २९-३० ॥ भाषा-उक्त वर प्रार्थना करनी हो तो एक "आशस्य' नामक 'बलि' स्वयं (प्रतिनिधि द्वाग नहीं) प्रदान करे । जिस समय तक हेमन्त ऋतु का धान्य शस्य (खेत में लगा हुआ अनाज) यय्यार न हो तब तक यव के अन्न होने के पूर्व और उसके बाद जब तक यव शस्य तय्यार न हो तञ्च बलि गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम् - नब तक धान्यकी उत्पत्ति के निकट एक बलि देवे । इमी को प्राशस्य बलि कहते हैं। इन बग्निप्रदान से अवश्य ही दीर्घायुलाभ होगा ॥६॥३०॥ विश्राणिते फलीकरणानामाचामस्यापामिति बलि हरेत् स रौद्रो भवति स रौद्रो भवति ॥ ३१ ॥ ४ ॥ इदानीं तत्राशस्ये बलौ द्रव्यं विधत्ते-'फलीकरणानां वितुषीकृतानां धान्यानां यवानां वा 'विश्राणिते' पाकसिद्ध सति. 'प्राचामस्य' मण्डस्प 'अपां' मण्डद्वी- भूतानामिति यावत्, अंशं गृहीत्वा तेनैव 'बलम्' श्राशस्यं 'हरेत् । तत्रैव देवतां निर्दिशति,-'सः' बलि रौद्रः' रुद्रदेवताको भवति । एतेन 'रुदायनमः'- इत्येव तत्र मन्त्रः इत्यपि सूचितम् । अभ्यासः खण्डसमाप्ति सूचकः ॥ ३१ ॥ इति गोभिलगृह्यसूत्रे प्रथमप्रपाठके चतुर्थग्लण्डस्य व्याख्यानं समाप्तम् ॥ १-४ ॥ भापा-यह बलि, यव या भात के माण्ड से "रुद्राय नमः" मन्त्र से करे ३॥ गोभिलगृह्यसूत्र के प्रथम अध्याय के चतुर्थखण्ड का भाषानुवाद पूग हुआ ॥ - अथ दर्शपौर्णमासयोः ॥ १॥ इत्यधिकारसूत्रम् । प्रपाठकान्तमधिकृतं वेदितव्यम् ॥ १ ॥ भाषा-यहां से दर्श और पौर्णमासयाग के विषय में कहा जायेगा ॥२॥ सन्ध्यां पौर्णमासीमुपवसेदुत्तरामिस्येके ॥ २, ३ ।। 'सन्ध्यां पौर्णमासी यस्मिन्न हनि प्रातःसन्ध्याकालतस्तत्पूर्वत एव वा पौर्ण- मासी पारब्धा, तमेवाहः 'उपवसेत्' । 'एके श्राचार्याः 'उत्तराम्' अस्तमितोद- यामुच्चैरुदयो वा पौर्णमासीमुपवसेत् 'इति' पाहु; तत्रापि न दोप इत्याशयः२-३ भाषा-दर्श पौर्णमासयाग करना हो तो, उस २ दिन के पूर्व उपपास रहे । सन्ध्या पौर्णमासी * लक्ष्य करके यह उपवास करे; उत्तरा पौर्णमासी में (अस्तभितोदया) या उच्चैरूदया * में ही करे । कोई २ प्राचार्य कहते हैं । अर्थात् गोभिलाचार्य के मत से जिस दिन सूर्योदय में पूर्णिमा हो, *१०म और १२ एकादश सूत्र देखने से ये तीन भेद समझ पड़ेंगे। Hinment-ANEERINR PHATITUMAN.

प्र. १ खं. ५ सू० १-७] दर्शपौर्णमासप्रकरणम् ॥
.
पश्चात् अपरान्ह में या गत्रि में परिवा हो, या अरुणोदय तक ही पूर्णिमा
हो, उसी दिन उपवास करे । किसी २ के मत से उत्तरा पौर्णमासी उपवास
के योग्य है । अर्थात् जिस दिन चतुर्दशी होकर सूर्यास्त समय या उसके
पीछे पूर्णिमा हो ॥२॥३॥
अथ यदहश्चन्द्रमा न दृश्येत ताममावास्याम् ॥ ४॥
उपवसेते यनुवर्तते । एतेन गताध्वाऽमावास्या नोपास्यति फलिता ॥ ४ ॥
भापा-जिस दिन चन्द्र दर्शन की कोई सम्भावना न हो, सूर्योदय ही
से सम्पूर्ण अमावस्या वा पीछे प्रतिपत् हो, उसी दिन अमावास्या का उप-
वास होगा। इससे जिस दिन चतुर्दशी के पीछे अमावास्या हो जिसको
'गताध्वा' कहते हैं, उसमें उपवास सुतरां निषिद्ध हुा । फल तो पूणिमा
और अमावास्या के उपवास में है, और दोनों ही में उदयातिथि ग्राह्य है,
सुतरां पूर्वपक्ष याग की परिवा और अपर पक्षयाग के प्रतिपत् सूर्योदय
में जिस दिन जो तिथि हो, उसे लेना ॥४॥
पक्षान्ताउपवस्तव्याः पक्षादयोऽभियष्टव्याः ॥५॥
यावजीवं सर्वेषामेव मासानां 'पक्षान्ताः' अमावास्याः पूर्णिमाश्च 'उपवस्त-
च्या तासु उपवासः कार्यः । किञ्च 'पक्षादयः' कृष्णानां शुक्लानाञ्च सर्वेषामेव
पक्षाणामादिभूताः प्रतिपदः 'अभियष्टव्याः' तासु वक्ष्यमाणलक्षणोयागः कार्यः॥५॥
भाषा-जब तक जीवे, प्रति मास के पक्षान्त में अर्थात् अमावास्या
और पूर्णिमा में उपवास करे एवं प्रतिमास के पक्षादि में अर्थात् शुक्ल और
कृष्ण दोनों परिवा तिथियों में याग करे ॥५॥
आमावास्येनहविषापूर्वपक्षमभियजतेपौर्णमास्येनापर
पक्षम् ॥६॥
श्रमावास्यायामुपोष्य शुक्लप्रतिपदि यद्धविहूयते तेनैव 'अामावास्येन'
हविपा' 'पूर्वपक्षम्' शुक्लपक्षं पञ्चदशाहं समग्रमेव 'अमि' व्याप्य 'यजते' यागं
कृतमिति स्वीकृतं स्यात् । एवं 'पौर्णमास्य' हविपापि 'अपरपक्ष सर्वमिति ॥६॥

३२ गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- DomaaNMANGarmanamamyuma WHENREGNENews . अत्र प्रसङ्गात्, उपवास्य-पौर्णमास्यामावास्यानिर्णयाय च पौर्णमास्यादि लक्षणं तत्तद्भेदनिर्णयञ्चाह भाषा-अमावास्या को उपवास करके शुक्ल पक्ष की परिवार को जो "याग” किया जावेगा. वही याग सम्पूर्ण शुक्ल पक्ष में व्याप्तयाग किया हुआ मानना और पूर्णिमा में उपवास करके कृष्ण पक्ष की पग्विा में जो याग किया जायेगा, उसी में समस्त कृष्णपक्ष व्यापी याग सम्पन्न जानो॥६॥ यः परमो विकर्षः सूर्याचन्द्रमसोः सा पौर्णमासी यः परमः सङ्कर्षः सामावास्या ॥ ७ ॥ 'सूर्याचन्द्रमसोः' ग्रहयोः मिथः 'यः यस्यां तिथौ 'परमः' अतिशयित: 'विकर्षः विप्रकर्षः दूरतोऽवस्थानम् (उभयोमिथः सप्तमराशिस्थत्वात् ), 'सा' तिथि: 'पौर्णमासी'; 'यः' यस्यां तु 'परमः' अतिशयितः 'सङ्कपः' सन्निकर्षः सान्निध्यम् (उभयोरेकराशिस्थत्वात् ), 'सा' तिथिः 'अमावास्या' ॥ ७ ॥ भाषा-सूर्य और चन्द्रमा इन दोनों ग्रहों के जिस तिथि में परम विकर्ष हो अर्थात् परस्पर सप्तम राशि में स्थिति होने से अति दूर में अवस्थिति होती है, उसी तिथि को 'पौर्णमासी' कहते हैं । एवं जिस तिथि में इन दोनों ग्रहों के परम संकर्ष घटे (अत्यन्त निकट) उस तिथि को अमावास्या कहते हैं ॥७॥ यदहस्त्वेव चन्द्रमा न दृश्येत ताममावास्याङकुर्वीत दृश्यमानेऽप्येकदा गताध्या भवतीति ॥६॥ 'यदहः' यस्मिन् दिने 'तु' 'चन्द्रमा न दृश्येत एव', 'ताम् तिथिम् 'श्रामा- वास्यां' 'कुर्वीत' स्वीकुर्तीत । "एकदा' एकस्मिन् काले अहोरात्रयोः दृश्यमानेऽपि चन्द्रमसि, सा 'गताध्वा' प्रातपथा अमावास्येति लब्धनामा 'भवति' इति' गत- मिदं पौर्णमास्सलक्षणम् ॥ ८,९ ॥ पौर्णमासी त्रिविधेत्याह-- भाषा--जिस रात्रि में चन्द्रमा न दीखे उस को आमावास्या कहते हैं। एकबार केवल कुछ समय के लिये चन्द्रदर्शन की सम्भावना के स्थानमें -- प्र. १ खं० ५ सू० १-१२] दर्शपौर्णमासप्रकरणम् ॥ ३३ - - . भी अमावास्या स्वीकार की जाय उसको 'गताध्वा' कहते हैं । अर्थात् आर- ब्धगति आमावास्या कहने से इससे जिस सूर्योदय कालमें या उसके पीछे सन्ध्या के पीछे तक भी चतुर्दशी हो किन्तु रात्रि में आमावास्या हो उसी को “गताध्वा” कहते हैं. एवं जिस दिन सूर्योदय से 'आमावास्या सम्पूर्ण रात्रि भी' आमावास्या वा कुछ रात्रि बीते पर भी प्रतिपदा प्रारम्भ हो; उसको भी अोमावास्या ही कहते हैं । यों दो प्रकार की अमावास्या हुई ॥ ८-६ ॥ त्रयः पौर्णमासीकाला भवन्ति सन्ध्या वास्तमितो- दिता वोच्चैर्वाऽथ यदहः पूर्णोभवति ॥१०-११ ॥ 'श्रथ' 'यदहः' यस्मिन् दिने 'पूर्णः भवति' चन्द्रमा, सैव पौर्णमासीति शेषः । 'पौर्णमासीकालाः' 'त्रयः भवन्ति । तथाहि-सन्ध्येत्यादि । सूर्योदयात् तत्पूर्वतो वा पूर्णिमा यत्र सा सन्ध्या-पौर्णमासी, सूर्यास्तमितेन साकमेव पूर्णोदयो दृश्येत चेत् सा अस्तमितोदिता-पौर्णमासी, सूर्यास्तात् उच्चैः जदुर्च रात्रौ पूर्णश्चेत् चन्द्रः, सैव उच्चैः-पौर्णमासीत्युक्तास्वयः कालाः ॥ १०, ११॥ भाषा-जिस रात्रि में पूर्ण चन्द्रमा की सम्भावना हो तब ही पूर्णिमा होती है। पूर्णिमा तीन प्रकार की है । सन्ध्या पूर्णिमा, (प्रातः सन्ध्या के पहिले प्रारम्भ, रात्रि में पूर्णिमा वा प्रतिपदा होती है । ) दुसरी, अस्त- मितोदया पूर्णिमा ( सूर्यास्तकाल में प्रारब्ध सुतरां दिन में चतुर्दशी एवं रात्रि में और उस के पोछे दिन बहुक्षण-पूर्णिमा होती है ) तीसरी, उच्चैः पूर्णिमा, ( सूर्यास्त के पोछे चतुर्दशी छोड़ कर पूर्णिमा जो पर दिन बहुत गत्रि तक रहेगी)॥१०-११ ॥ पृथगेवेतस्य ज्ञानस्याध्यायो भवत्यधीयीत वा तद्धि- दुभ्यो वा पर्वावगमयेत् ॥ १२ ॥ एतस्य ज्ञानस्य ग्रहनक्षत्रकालादिवोधस्य 'पृथगेव' ! अध्यायः' पाठ्योग्रन्थः 'भवति' ज्योतिःशास्त्र मति । 'अधीयीत वा' तं ग्रन्थं समयं तद्विद्भ्यः' ज्योतिर्वे- तृभ्यः; सम्पूर्णशास्त्राध्ययनेऽप्रवृत्तश्चेत् 'पर्व'पक्षान्तकालः तन्मात्रमेव 'अवगमयेतू' अबगतं स्यात् । अतोऽप्रकृतवर्णनाविस्तारोऽत्रास्माभिर्न क्रियतइतिभावः ॥ १२ ॥ ३ गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम् - PORNHUNPATINAR Imam BEEN भाषा--ग्रह नक्षत्रादि की स्थिति गन्यादि विपय विशेष जानने से, ये सब बातें भली भली भांत जानी जासकती हैं। इस के लिये ज्योनिपशास्त्र को पढ़े या सामान्यतः इस को कुछ २ जान लेने से भी होसकता है ॥१२॥ अथ यदहरुपवसथो भवति तदहः पूर्वाह्न एव प्रात. राहुति हुत्वैलदग्नेः स्थण्डिलं गोमयेन समन्तम्पर्युपलि. म्यत्ययेध्मानुपकल्पयते खादिरान् वा पालाशान् वा खादिरपालाशालाभे विभीतकतिल्वकवाधकनीवनिम्बरा- जवृक्ष शाल्मल्यरलुधित्थकोविदारश्लेष्मातकवर्जसर्व- वनस्पतीनामिध्मोयथा स्याद्विशाखानि प्रति लुनाः कुशावहिरुपमूललूनाः पितृभ्यस्तेषामलाभेशूकतृणशरशी- यंचल्वजमुतवनलशुण्ठवर्ज सर्वतृणान्याज्य स्थाली- पाकीयान् ब्रीहीन वा यवान् वा चरुस्थाली मेक्षण, स्व- मनुगुप्ता अप इति यानि चानुकल्पमुदाहरिष्यामो न तदहः प्रमृज्येत दूरादपि गृहानभ्ययादन्यतस्तुधनं क्रीणीयान्न विक्रीणीताबहुवादी स्यात् सत्यं विवदिषेदवापराह्न एवाप्तुत्यौपवसथिकं दम्पती भुञ्जीयातां यदेनयोः काम्या स्यात् सर्पिमिश्र स्यात् कुशलेन ॥ १३-२६ ॥ ५ ॥ 'अथ' कालनिर्णयानन्तरमुपवासदिनकर्त्तव्यतां वदामइति । 'यदहः' यस्मिन् दिने 'उपवसथः' उपवासः कर्त्तव्यः ‘भवति', 'तदहः' तस्मिन् दिने, अर्थतः पूर्वपक्षयागाय अमावास्यायामपरपक्षयागाय सन्ध्यानामपौर्णमास्यां च 'पूर्वाह्ने एवं' 'प्रातराहुति हुत्वा' अग्निहोत्रीयमातोमं समाप्य इमानि कर्तव्यानि । तानि च यथा--'एतदग्नेः' प्रातराहुत्यादिसाधनाग्नेः 'स्थण्डिल' 'गोमयेन' 'समन्त पर्युपलिम्पति' समन्तात् सर्वत उपलिम्पेत् इत्येकम् । 'अथ' तदनन्तरम् । खादिरान् वा पालाशान वा' 'इध्मान्' इन्धनकाष्टान 'उपकल्पयते' उपकल्पयेत प्र०१ खं० ५ सू० १३-२६] दर्शपौर्णमासप्रकरणम् - उपस्थितान् कुर्वीतेति द्वितीयम् । तत्र 'खादिरपालाशालाभे' एतत्सूत्रपरिगणित- बिभीतकादिकतिपयवृक्षेमवर्ज 'सर्ववनस्पतीनाम्' एव 'इध्मः' 'यथार्थ' अर्थः प्रयोजनं सिद्धं यथा स्यात् तथा कृत्वा ग्रहणीयः स्यात्। 'विशाखानि' येभ्यः स्थानेभ्यः शाखा विश्लिष्टा भवन्ति, तानि सन्धिस्थानानि 'प्रति लक्षीकृत्य 'लूना:' 'छिन्नाः' 'कुशाः कुशतृणानि 'बर्हिम्' बहिपे बहिरास्तरणादिदेवकार्यार्थ मुप- कल्पयेतेति तृतीयम् । 'उपलूनमूलाः' मूलसमीपतश्छिन्नाः कुशाः कुशतृणानि 'पितृभ्यः' पितृकार्यार्थमुपकल्पयेतेति चतुर्थम् । तत्र 'तेपां' कुशानाम् 'अलाभे शूकादिकबर्जम् ‘सर्वतृणानि एव ग्राह्याणि । 'आज्यं धृतं सम्पाद्यमिति पञ्चमम् । 'स्थालीपाकीयान्' स्थालीपाके पक्तव्यात् 'ब्रीहीन् वा यवान् ,वा' सम्पादयेदिति पष्टम् । 'चरुस्थाली' पाकपात्रं सम्पादनीय मिति सप्तमम् । 'मेक्षणं' दीविशेष- मासाद्यमित्यष्टमम् । 'त्रुवम्' आहुतिसाधनमासाद्यमिति नवमम्। 'अनगुप्ता अपः' पूर्वोक्त लक्षणाः श्रासादनीयाइति दशमम् । श्रन्यानि 'यानि च' 'अनुकल्पम्' पश्चादिहैव दर्शपौर्णमासयागकर्त्तव्यानि 'उदाहरिष्यामः' वक्ष्यामः, तान्यपि सर्वाणि सम्पाद्य स्थण्डिले उपस्थाप्यानि । अथ तदिनप्रतिपाद्यनियमानाह- 'तदहः तस्मिन्नहनि 'न प्रसृज्येत' गृहत्याग न कुर्वीतेति प्रथमनियमः । यदि पूर्व दूरगत स्तिष्ठेत् तर्हि तद्दिने तस्मात् 'दूरादपि' 'गृहान्' स्वकीयान् ‘अभ्येयात्' आगच्छदिति द्वितीयनियमः । 'अन्यतस्तु' वणिजादेः सकाशात् 'धन' करपद्रव्यं 'क्रोणीयात्' 'न विक्रीणीयात्' इति तृतीयनियमः। 'अबहुवादी' मितभाषी 'स्यात्' इति चतुर्थ नियमः। 'सत्य' 'विवदिषेत' वक्तुमिच्छेत् "सत्यसंहिता वै देवा अनृतसंहिता मनुष्या:” (ऐ० ब्रा० ३, १, ३, )-इति श्रुतिपरिचयान्नि- श्वयमेव सर्वत: सत्यपालने न विद्यते शक्तिर्मनुष्याणामिति यावच्छक्यं सत्यमेव वदेदिति पञ्चमनियमः । 'अथ' इध्मादिसम्पादनानन्तरम् 'अपराह्ने एवं' 'दम्पती' यजमानस्तस्य पत्नी च उभावेव स्नानं प्रकृत्य 'औपवसथिक' उपवासदिननियम- सेव्य मन्त्रादिकं तथा च 'लवणं' मधु मांसं च क्षारांशो येन भूयते । उपवासे न भुञ्जीत, नोरुरात्रौ च किञ्चन'-इति गृह्यान्तरवचनानुगतमिति यावत् (उरु- रात्री समधिकारात्री; अधिकारात्रिभोजनेन पीडासम्भवस्तथा च सत्यां परदिन- ३ गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - कार्यव्याघातः स्यादित्यभिप्रायः) 'एतयोः' दम्पत्योः 'यत्' किञ्चन 'काम्यम् ईप्सितं 'स्यात्' तदेव 'सर्पिमिश्र' घृतसहितं 'कुशलेन' सन्तृप्तमनसा 'भुञ्जीयाताम् ॥ १३-२६ ॥ भाषा-अब उपवास दिन के कर्तव्य आदि का उपदेश करते हैं । जिस दिन उपवास कर्त्तव्य हो, उस दिन जब कि सूर्योदय में पूर्णिमा हो और जिस दिन सूर्योदय में अमावास्या हो उस दिन पूर्वार्द्ध में अग्निहोत्र की प्रातराहुति समाप्त कर ये सब कार्य करे । अर्थात् पहिले गोवर से अग्निगृह को अच्छी प्रकार लीपे । दूसरे, खैर, या पलाश के इन्धन इकट्ठा करे । यदि खैर या पलाश के संग्रह करने में कठिनता हो तो बहेड़ा लोध, वाधक ( ? ) कदम्ब, निम्ब, राजवृक्ष, सेमर, अग्लु, दधित्थ, इन ग्यारह को छोड़ कर अन्य जो कोई काठ हो उनका यज्ञीय इन्धन हो सकता है । तीसरे देव कार्य के लिये स्कन्ध से छिन्न कई एक कुशा संग्रह करे । चौथे पितृ कार्य के लिये म्ल से छिन्न कई एक कुशा संग्रह करे । यदि कुशा संग्रह करने में कठिनता हो तो, शुकतृण, शर, शीर्य, बल्वज, मुतव, (?) इन सात तृणों को छोड़ कर अन्य जो कोई तृण हो यज्ञार्थ व्यवहृत हो सकता है। ५ म घृत, ६ ठे, स्थानी पाक में के उपयुक्त कतिपय धान्य या यव,सप्तम,चरुस्थाली (पाकपात्र), ८ म, मेक्षण; ६ म, सुव; १० म, रक्षित जल इन उक्त १० को एवं आगे जो दो कहे जायेंगे इन सब को लाकर अग्निगृह में उपस्थित करे । उस दिन कहे जाने वाले नियमों को भी प्रतिपालन करे। पहिले, गृहत्याग नहीं करे, दूसरे, दूरस्थ होने पर भी ऐसे अवसर में अपने घर को लौट आवे; तीसरे, अन्य व्यक्ति से वस्तु मोल तो ले, पर अपनी वस्तु बेचे नहीं; चौथे, प्रयोजन से अधिक न बोले, पाचवें, सम्पूर्ण रूप से सत्य ही बोले अनन्तर स्त्री, पुरुष, दोनों ही अपराह्न में स्नान कर उपवास दिन के नियमानुसार जो इच्छा हो वही घी मिला कर तृप्ति के साथ भोजन पाक करे ॥ १३-२६॥ गो० गृ० सू० के प्रथमाध्याय के एञ्चमखण्डका भाषानुवाद पूरा हुआ॥१-५॥

प्र १ खं० ६ सू०१-९] दर्शपौर्णमासप्रकरणम् ॥ ३७ काम्यो मानतन्तव्यो होवाचाहुता वा एतस्य मानुष्याहुति- भवति य औपवसथिकं नाश्नास्थनीश्वरो ह क्षोधुको भव- त्यकाम्यो जनानाम्पापवसीयसी हास्य प्रजा भवति य औपवसथिकं भुङ्क्त ईश्वरो ह भवत्यक्षोधुकः जनानां वसीयसी हास्य प्रजा भवति तस्माद्यत् कामये. तौपवसथिकं भुञ्जीयातामध एवैता रात्रि शयीयाता- न्तो खलु जाग्रन्मिश्रवेवैता रात्रि विहरेयातामितिहा- समिश्रेण वा केनचिद्धा जुगुप्सेयातान्त्वेवाव्रत्येभ्यः कर्म भ्यो न प्रवसन्नुपवसेदित्याहुः पत्न्या व्रतं भवतीति १ 8 'मानतन्तव्यो' नामाचार्यः 'उवाच ह' निश्चयत्वेन कथितवान् । तथाहि श्राहुतेत्यादि पत्न्या प्रतं भवतीत्यन्तम् । 'यः' यजमानः 'औपवसथिकम्' उवाच स-दिन-भोज्यं भोजनं 'न अश्नाति' निराहारएव तिष्ठति, 'एतस्य' 'मानुष्या- हुतिः' मनुष्योपकारार्था आहुतिः यागक्रिया 'वै निश्चयम् 'आहुता' निष्फला 'भवति' एवञ्च 'क्षोधुकः पुरुषः 'ह' निश्चयमेव अनीश्वरः' व्रतकर्मकरणे दौर्बल्या- दसमर्थः ‘भवति किञ्च 'जनानाम्' लोकसाधारणानामपि 'अकाम्यः अप्रियः भव- ति । अपिच 'ह' निश्चयमेव 'अस्य' क्षुद्युक्तस्य 'प्रजा' सन्ततिः ‘पापवसीयसी' पापबुद्धिवशीभूता भवति' । पक्षान्तरे-'यः औपवसथिकं भुङ्क्त सः सुतराम् 'अक्षोधुकः' क्षुच्छ्न्यः 'ईश्वरः' व्रतकर्मकरणे सबलत्वात् 'भवति' । किञ्च 'जना- नां लोकसाधारणानामपि' 'काम्यः' प्रियः भवति । अपिच 'ह' निश्चयमेव 'अस्य' क्षुच्छून्यस्य 'प्रजा' सन्ततिः 'वसीयसी' स्ववशभूता 'भवति' । 'तस्मात् क्षुद्युक्तस्य यजमानस्य एवं निन्दाश्रवणात् 'औपवसथिकम्' उपवसथ-दिन-भोज्यं यत् कामयेत्' 'भुजीयाताम्' दम्पतीति । एताम्' उपवासदिवसीयां 'रात्रिम्' 'श्रधः' नीचैः शयीयाताम् । किञ्च 'तो' दम्पती 'खलु' निश्चयम् । एतां रात्रि 'जा- प्रन्मिश्री' अंशशो निद्रितौ अंशशो जागरितौ "एवं' 'विहरेयाता' यापयेताम् । - , गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- HOMENMata ARTer । तत्र जागरणोपायमभिगमयितु माह-इतिहासमिश्रेण वा' इतिहासो वैदिकेतिवृत्तः "ब्रह्मह व दमेक मनत्रासीदित्यादि' यदालोचनामिश्रितेग स्त्रापेन रात्रि याप- येताम् ; 'वा' अथवा 'केनचित्' येनकेनाप्यभियुक्ततरतनेन साकं धर्मालोचनया जागरितौ रात्रंयशं यापयेताम् , न तु सर्वा रात्रिम् अस्ताद्ययान्तां जडाविव सुती भवेतामिति भावः । 'तु' परन्तु जाग्रदवस्थायाम् 'अनत्तेभ्यः कर्मभ्यः' स्त्री. संसर्गादिभ्यः 'जुगुप्सेयातामेव' श्रात्मनो रक्षणं कुर्वीयातमेवेति । 'प्रवसन्' प्रवास कुर्वन् 'नउपवसेत्' इति आहुः' केचनेति । परं तत्रापि गृहे पत्नीस्याच्चेत् तया 'पत्न्या' व्रतं भवति' न तु व्रतभङ्गाशङ्केति भावः । 'इति' खण्डारम्भादि एतत्प- र्यन्तं समस्तमेव मानतन्तव्याचार्याभिमतलिति यावत् , समाप्यभिमतमेवेति प्रदर्शितम् ॥ १-९॥ भाषा---'मानतन्तव्य' नामक प्राचार्य कहते हैं कि “जो कोई यजमान उपवास दिन में उस दिनके नियमानुसार यदि भोजन न करे ता उसक मनुष्योपकारार्थ कियी हुयी सम्पूर्ण याक्रियायें निष्फल होती हैं। पूर्व दिन निराहार रहने से परदिन में क्षुधा से व्याकुल होकर चञ्चलता के कारण यागक्रिया करने में अवश्य असमर्थ होगा। और साधारण लोगों को भी अप्रिय होगा। एवं उसके पुत्र, पौत्रादि प्रजा भी पापबुद्धि (१) के वशी भून होंगी (२)। तात्पर्य यह है कि भोजन करके कार्य करने से मन स्थिर रहने से यागक्रिया सब सम्पन्न होगी और साधारण लोगों को भी प्रिय होगा, एवं उसके पुत्र. पुत्रादि, प्रजा भी वश में रहेंगी इसलिये भूखे रह कर कोई कार्य न करे स्त्री पुरुष दोनों ही यथेच्छ भोजन करे। उपवास के दिन रात्रि में खाट के ऊपर शयन न करे एवं वैदिक इतिहास की आलोचना में या अन्य लोगों के साथ जिस किसी प्रकार हो * तुधातुर चञ्चल चित्त ब्यक्ति किसी काम के योग्य नहीं । (१)-अपने शरीर में कष्ट देख कर क्या कोई भाई प्रसन्न होंगे। (२) पितृ गण के दृष्टान्तानुसार निराहार रह कर कार्य करना चाहिये, ऐसा जान कर सन्तति गण उत्कट तुत्कष्ट सहने के कारण दोनों ही नित्य कर्म के करने से अलग रहेगे अर्थात् छोड़ देंगे, सुतरां वे लोग पितृ गण के अवश एवं पाप वश हैं यह कौन नहीं कहेगा।

प्र० १ खं० ६सू०१०-१८] दर्शपौर्णमासप्रकरणम् ॥ nni , धर्म के विचार में पात्रि का आद्यन्त काल जाग कर व्यतीत करे अर्थात् सम्पूर्ण रात्रि गाढ़ निद्रा में विभून न रह कर, थोड़ा सोवे, परन्तु स्त्री संसर्गादि ब्रतनाशक कार्य से अपने को बचावे । प्रवास में रहने से उपवास न रहे या घर में स्थित पत्नी द्वाग भी यह व्रत हो सकता है ॥ १-६॥ यथा काययेत तथा कुर्यात् ॥ १० ॥ उपवासदिने भोजनफलमभोजनफलञ्च द्वे एवोक्ते, तदन्न यथा कामयेत तथा कुर्यात्' अनीश्वरत्वादिकमिच्छेच्चेत् अभोजनएव स्यात् , अपीश्वरत्वादि कमि- च्छेच्चेद भोजनं कुर्वीतैव ॥ १० ॥ भाषा -- भोजन करके याग क्रिया करने में क्या फन है एवं भूखे रह कर करने में क्या विशेषता है सो कहा गया -दोनों में से चाहे सो करे ॥१०॥ एवमेवाहिताग्नेरप्युपवसथो भवति यथाम्नायो विद्ध्यात् । ११, १२॥ 'एवं' कथिताकारः 'एव' आहिताग्नेः' अपि नित्याग्निहोत्रिणोऽपि उपवसथः' उपवासनियमः भवति', 'यच्च' उपवसथकार्य स्थगिडललिम्पनादिकम् 'आम्नायः' वेदः विदध्यात्' विधातुं युज्यते, तदेवास्माभिः संस्मृत्य विहितमिति श्रद्धोत्पा- दनम् ॥ ११, १२॥ भाषा-उक्त उपवास के नियमादि सब "आहिताग्नि" के लिये भी हुए, इसी प्रकार वेदका विधि है जानो ॥११, १२॥ अथ पूर्वाह्न एव प्रातराहुतिहुत्वाऽग्रेणाग्निम्परि- क्रम्य दक्षिणतोऽग्नेः प्रागग्रान् दर्भानास्तीर्य तेषां पुरस्तात् प्रत्यङमुग्वस्तिष्ठन् सव्यस्य पाणेरङ्गुष्ठेनोपकनिष्ठिकया चाङ्गुल्या ब्रह्माऽऽसनात् तृणमभिसङ्घद्य दक्षिणापरम- ष्टमं देशं निरस्यति निरस्तः परावसुरिति ॥ १३-१४ ।। 'अथ' अनन्तरं तत्परदिने प्रतिपदि पूर्वाह्ने एव प्रातराहुति हुत्वा' 'अग्निम्' 'अग्रेण' सम्मुखीकृत्येति यावत् "परिक्रम्य' प्रदक्षिणीकृत्य 'अग्नेः' 'दक्षिणतः' गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - से एक तृण दक्षिणस्यां दिशि 'प्रागग्रान्' पूर्वस्यां दिशि कृताप्रभागान् 'दर्भान्' 'पास्तीय' पातयित्वा 'तेषां' पातितदर्भाणां 'पुरस्तात्' सम्मुखे 'प्रत्यङ्मुखः' पश्चिमाभिमुखः 'तिष्ठन्' स्थितिं कुर्वाण: 'सव्यस्य पाणे' वामहस्तस्य 'अङ्गुष्टेन' 'उपकनिष्ठकया' अनामिकया 'अगुल्या च' ब्रह्मासनात्' ब्रह्मानामत्विज उपवेशनाय पातिताद दर्भपुञ्जात् 'तृणम्' एकम् 'उपसंगृह्य' गृहीत्वा 'दक्षिणापरं' दक्षिणस्याः अपरस्याः पश्चिमायाश्च दिशोन्तरालं नैर्ऋतं कोणम् 'अष्टमं देश' प्रति 'निरस्तः परावसुः- इति मन्त्रेण निरस्यति' प्रक्षिपेत् ॥ इति तृणनिरसनम् ॥ १३, १४ ॥ भाषा-उसके पर दिन में पूर्वाह्न में यथानियम प्रातराहुति होम समाप्त कर अग्नि को अपने सम्मुख रक्ख, प्रदक्षिण करके अग्निके दक्षिण में कई एक कुशा गिरावे, उन कुशाओं के अग्रभाग पूर्व दिशामें रहेंगे। उस डाले हुए कुशासन पर सम्मुख पश्चिमाभिमुख कर वाम हाथ की अङ्गुष्ट और अनामिका अङ्गुली से ब्रह्मा के लिये डाले हुए कुशासन लेकर 'निरस्त परावसु' मन्त्र से नैऋत कोण में 'फेके । इसी को 'तृणनिरसन' कहते हैं ॥ १३-१४ ॥ अपउपस्पृश्याथ ब्रह्माऽऽसनउपविशत्यावसोः सदने सीदामीत्यग्निमभिमुखो वाग्यतःप्राञ्जलिरास्तधाकर्मणः पर्यवसानाद्भाषेत यज्ञससिद्धिन्नायज्ञीयां वाचं वद्य- यज्ञीयां वाचं वदेद्वैष्णवीमृचं यजुर्वा जपेदपि वा नमोवि- ष्णव इत्येवं ब्रूयात् ॥ १५-२० ॥ 'अथ' अनन्तरम 'ब्रह्मा' नाम सर्वकार्यपर्यवेक्षक ऋत्विक् 'अपः' उदकानि 'उपस्पृश्य' स्पृष्ट्वा 'श्रासने तत्र, 'श्रावसोः सदने सीदामि' इति' मन्त्रमुञ्चरन् 'उपविशति' उपविशेत् । 'श्रा कर्मणः पर्यवसानात्' कन्तिं यावत्' अग्निम् अभिमुखः' सुतरामुत्तरास्यः, 'वाग्यतः' नियमितवाक यज्ञीयवचनातिरिक्तवाक् शून्यः, प्राञ्जलिः' कृताञ्जलिपुटः सन् ‘ास्ते' श्रासीत । यदुक्तं वाग्यतइति तदेव स्फुटयति,–'यज्ञसंसिविं' यज्ञानुकुलां वाणी 'भाषेत' वदेत्' 'अयज्ञीयां वाचं न , प्र० १ खं०६सू०१५-२१ ] दर्शपौर्णमासप्रकरणम् ॥ वदेत्', 'यदि' भ्रमादपि 'अयज्ञीयां वाचं वदेत्', 'वैष्यवीम्' विष्णुदेवताका यां कामपि 'ऋचं' 'यजुर्वा' 'जपेत्' पठेत्, 'अपिवा' अथवा नमोविष्णवे 'इतिः एतदेव 'ब्रूयात् ॥ १५-२०॥ भाषा-अनन्तर ब्रह्मा नामक सब कार्य के निरीक्षक एक प्रधान पुरुष जल से हाथ पांव घोकर उस डाले हुऐ कुशासन पर अग्नि की ओर सम्मुख करके सुतरां उत्तर मुख हो दोनों हाथ जोड़ "श्रावसोः सदने सीदामि" मंत्र पढ़ कर नियमित वाक्य मात्र बोलने को मन ही मन हृढ़ प्रतिज्ञ होकर कार्य समाप्ति तक बैठे। यज्ञ-सम्बन्ध की बातें होंगी उसे ही कहे, अन्यान्य कोई वाक्य न बोले. यदि भ्रम से कोई दूसरी बात बोले तो विष्णु देवता की स्मारिका किसी ऋचा वा यजुर्वेद का मन्त्र पढ़े या 'नमो विष्णवे' कहने से भी निर्वाह होगा ॥ १५-२०॥ या वा उभयं चिकीर्षेद्धौत्रश्चैवैतेनैव कल्पेन छत्रं वोत्तरासङ्गं वोदकमण्डलु दर्भवटु वा ब्रह्मासने निधाय तेनैव प्रत्याव्रज्याथान्यच्चेष्टेत् ॥ २१ ॥६॥ 'यदि उ वै यदि हौत्रं च ब्रह्मत्वञ्च' उभयमेव एकः 'चिकीत् कर्तुमि- च्छेत् , तर्हि 'एतेनेव कल्पेन' पूर्वोक्तेनैव प्रकारेण 'छत्रं', 'वा' अथवा 'उत्तरासङ्ग' उत्तरीयकम् , 'वा' अथवा 'उदकमण्डलु' उदकपूर्ण कमण्डलुं 'वा' अथवा 'दर्भ- वटुं' कुशानिर्मितं ब्राह्मणं ब्रह्मासने' तत्र व 'निधाय' संस्थाप्य 'तेनैव' पूर्वोक्तेनैव प्रकारेण प्रदक्षिणादिना 'प्रत्यावज्यं प्रत्यावृत्य 'अथ' तदनन्तरम् 'अन्यत्' इह दर्शपौर्णमासे चरुप्रकरणादिकं यत् किमपि विशेषकार्यजातमग्रे वक्ष्यति, तदतिरि- क्तम् , अग्निहोत्रप्रकरणे कथितं भूमिजपादिकं सर्वमविशेपेण 'चेष्टेत्' कुर्वीत ॥२॥ इति गोभिलगृह्यसूत्रे प्रथमप्रपाठके षष्ठखण्डस्य व्याख्यानं समाप्तम् ॥१-६॥ भाषा-यदि होतृ-कार्य और ब्रह्मत्व दोनों क्रियाओं को एक ही व्यक्ति करने की इच्छा करे तो ब्रह्माके लिये उसी डाले हुए आसन पर उसी प्रकार छत्र या उत्तरीय या जल पूर्ण कमण्डलु या कुशा निर्मित ब्राह्मण स्थापन करके उसी प्रकार प्रदक्षिण आदि पूर्वक स्वीय होतृ-के श्रासन पर वापस .

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम् - Cr Havenous मम minummaNamawes आवे । अनन्तर इसके अग्नि कार्य मात्र हो साधारण कार्य सम (अग्निहोत्र प्रकरणोक्त भूमि जपाद सत्र हो करे ) चरु पाकादि जो कुछ इसमें विशेष कर्तव्य है, उस विपय में विशेष विधि पीछे कहा जावेगा ॥ २१ ॥ गोभिलगृह्यसूत्र के प्रथमाध्याय के छठे खण्ड का भाषानुवाद पूरा हुआ ११६ , . अथोलूखलमुसले प्रक्षाल्य शूर्पश्च पश्चादग्नेः प्रागग्रान् दर्भानास्तीर्योपसादयति ॥ १ ॥ 'अथ' तदनन्तरम् 'उलूखल मुपले' 'शूपंञ्च' 'प्रज्ञाल्य' 'अग्नेः पश्चात्' 'पाग- ग्रान् दर्भान्' आस्तीयं तदुपरि प्रक्षालितान तानि 'उपसादयति' उपस्थापयति॥ १॥ भापा--पश्चात् उलूखान, मूसन, और शूर्प अच्छे प्रकार जज से बोकर अग्नि के पीछे भाग में कई एक प्रागन कुशा डाल का उस पर कल ॥ 2 ॥ अथ हविनिर्वधति ब्रीहीन् वा यत्रान् वा कसेन वा चरुस्थाल्या वामुष्मै त्वा जुष्टं निर्वपामीति देवतानामादे- शसकृद् विस्तूष्णीम् ॥ २-३ ॥ 'अथ' तदनन्तरमुपसादिते तत्रोलूखले 'हवि' हविपे हविर्योग्यान् 'नीहीन वा यवान् वा' 'निर्वपति' निर्वपेत् प्रक्षिपेत् । 'कसेन वा चरुस्थाल्या वा तत्र प्रक्षेपः कर्तव्यः । 'अमुष्मै वा जुष्ट निर्वामि' अत्रामुष्मै-पद-श्रुतेः यत्र यद्देवताक हविः कार्य तत्र तथैवोल्लेखः, अन्यर्थहविर्निर्वापे 'अग्नये त्वा जुष्टं निर्वपामि' इत्यादि यथा, 'इति' अनेन मन्त्रेण 'देवतानामादेश' देवतानामोल्लेख 'सकृत्' एकवारं, द्विः' द्विवारं 'तूष्णीम्' मन्त्रशून्यं देवतानामोच्चारण रहितमपि निव- पतीत्यनेन सम्वन्धः । इति निर्वापः ॥ २॥३॥ भाषा-तदनन्तर हविः पाकके उपयोगी करने के लिये चाहे धान्य या यव, कांसे के वर्तन से या चरुस्थाली से फेंके जितना धान्य या हवि के योग्य करना हो वह तीन ही वार में डाल देवे उनमें से एकवार "अमुष्मै". इत्यादि मंत्र पढ़कर अन्य दोवार विना मन्त्र के डाले ॥२-३ ॥

प्र०१खं०७ ०७ सू०४-८ दर्शपौर्णमासनकरणम् ॥ watanKAIMIMTERMITTE - अथ पश्चात् पाङ्मुखोऽवहन्तुमुपक्रमतेदक्षिणोत्तराभ्यां पाणिभ्यान्त्रिः फलीकृतास्तण्डलाईस्त्रिदेवेभ्यः प्रक्षालये- दित्याहुमिनुष्येभ्यः सकृपितृभ्यइति ।। ४ ॥ ५ ॥ 'अथ' निर्वापानन्तरं 'पश्चात्' उलूखलस्य 'प्राङ्मुखः' तिष्ठन् 'दक्षिणोत्तरा- भ्याम्' उभाभ्यामेव 'पाणिभ्याम् , 'अवहन्तुम् उपक्रमते' । तत्र 'त्रिः' त्रिवारं 'फलीकृतान्' कण्डितान् 'तण्डुलान्' धान्यानां वा गृहीत्वा, देवेभ्यः देवकार्याथ 'त्रिः' त्रिवारम् , मनुष्येभ्यः' ब्राह्मणभोजनाद्यर्थ द्वि. द्विवारम् , पितृकार्यार्थ 'सकृत्' एकबारमेव 'प्रक्षालयेत्', 'इति' एवम् 'बाहु' पूर्वतनाः। इति अवहननम् ॥४-५॥ भाषा---तब उलूखन के पीछे पूर्वमुह खड़े होकर दोनों हाथ में मूसल पकड़ कूटे । कूटने से-तुप-विमुक्त धान्य या यव के तर डुल आदि तीनवार साफ कूट कर देवकार्य के लिये, ब्राह्मण भोजनादि मनुष्यकार्य के लिये दोवार, पितृकार्य के लिये एक ही वार जल में धोये । यही प्राचीन प्रथा है ॥४-५॥ पवित्रान्तर्हिताास्ताण्डुलानावपेत्कुशलशृतमिव स्था- लीपापयेत्प्रदक्षिणमुदायुञ्छतमभिधायकॊदगुदास्य प्रत्यभिधारयेत् ॥ ६ 'तण्डुलान्' तान् पवित्रान्तहितान् प्रक्षालनार्थ पवित्रस्य कुशानिर्मितबहु- च्छिद्र पात्र विशेषस्य मध्ये स्थापितान् ततएव, 'श्रा वपेत्' स्थाल्यामिति शेषः । 'प्रदक्षिण' यथास्यात्तथा उदायुवन्' मेक्षणेन मिश्री कुर्वन् 'कुशलशृतम् इव' पाकपटुना पक्वमिव 'स्थालीपार्क' तं 'श्रपयेत् । श्रपणानन्तरं तत्र पक्वेऽन्ने 'घृतमभिघार्य' घृताभि-घारणं प्रकृत्य अग्नेः 'उदक्' उत्तरस्याम् 'उद्वास्य' संस्थाप्य 'प्रत्यभिधारयेत्' पुनरपि तत्र घृतपात्रं कुर्यात् । इति निष्पन्नः - स्थालीपाकः ॥ ६-८॥ भाषा-कुशके बने "पवित्र" में साफ करने के लिये लिया हुए तण्डुल को, उसमें से लेकर स्थाली में डोले । पाक समय में "मेक्षण" से मिलाकर तुप श्रा'द ( भूसा वा छिलका ) आवरण रहित शस्य (धान्य) मात्र को तण्डुल कहते हैं।

४४ गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्-- me - ऊपर नीचे इस प्रकार पाक करे। यह पाक एक प्रवीण पाक कता के हाथ के बने हुए की नाई होना आवश्यक है। पाक होने पर घी का ढार दे अग्नि के उत्तर में उतार कर फिर उसमें भागानुसार घी मिलावे ॥६-७-८।। अग्निमुपसमाधाय कुशः समन्तं परिस्तृणुयात् पुर- स्तादक्षिणउत्तरतः पश्चादिति सर्वतस्त्रिवृतम्पञ्चवृतं वा बहुलमयुग्मसहतम्प्रागौर्मूलानिच्छादयन्पश्चाद्वास्तीर्य दक्षिणतः प्राञ्चम्प्रकर्षति तथोत्तरेण दक्षिणोत्तराण्यग्राणि कुर्यादेष परिस्तरणन्यायः सर्वेस्वाहुतिमत्सु ॥६-१५ ।। वक्ष्यत्यनुपदं बर्हिषि स्थालीपाकेत्यादि (१९ सू०), ततश्च स्थालीपाको- त्तरणात् प्रागेव परिस्तरणं कर्तव्यमिति तत्प्रकार उच्यते;-'अग्निम्' 'उपलमा- धाय' समिद्भिः प्रज्वाल्य, तस्य प्रज्वलितस्याग्नेः 'समन्तं' समन्तात् सर्वत सर्वासु दिक्षु 'कुशैः कुशासधैः 'परिस्तृणुयात्' परिस्तरमाच्छादनं कुर्वीत तत्र क्रममाह-'पुरस्तात्' पूर्वस्स्यां, ततः 'दक्षिणतः' दक्षिणस्यां, ततः 'उत्तरतः उत्तरस्यां ततः “पश्चात्' पश्चिमस्याम् 'इति' 'एवम् । तत्राप्यन्यदप्याह 'सर्वतः सर्वास्वेव दिक्षु 'त्रिवृतं पञ्चवृतं वा' परिस्तरण कार्यम् । तत्रापि 'बहुलं' बहुतृणं, परं तृणार्ना परस्परयोगेन युग्मत्वं संहतत्वं वा यथा न स्यात् । द्वयोर्योगे युग्मत्वं त्र्यादियोगे तु संहत्व मिति विवेकः । किञ्च 'प्रागणैः' पूर्वदिङमुग्वैर्दभैः 'अप्रैः' अग्रभागैः प्रथमस्तृतानां कुशानां 'भूलानि छादयन्' एवमुत्तरत्रापि । 'वा' अथवा अप्रैलाच्छादनं न कुर्याच्चेत् ‘पश्चात्' पश्चिमस्यां प्रथमतः 'आस्तीर्य दक्षिणतः' 'तथा उत्तरेण' प्राञ्चं' पूर्वदिग्भागं 'प्रपति' प्रकृष्टं कर्षेत् आकर्षणपूर्वक मिश्रयेत् । तत्र तथा कर्षणाय 'दक्षिणोत्तराणि' दक्षिणाभिमुखानि च 'अमाणि' कुशानां 'कुर्यात्' 'एपः' उभयविधएव परिस्तरणन्यायः' सर्वेषु पाहुतिमत्सु अनुष्ठानेषु ज्ञेयः ॥ ९-१५॥ भाषा-उन्नीसवे सूत्र में स्थालीपाक को उतारने के वाद। श्राज्यसंस्कार कहा जावेगा । इसलिये स्थालीपाक उतारने के पूर्व ही “परिस्तरण" करे - प्र० १ खं० ७ सू० ९-२३] दर्शपौर्णमासप्रकरणम्- से ढाक जैसे-समित् प्रक्षेप आदि द्वारा अग्नि जलाकर उक्त अग्नि के चारो ओर कुशों से ढाक देवे । क्रम से पूर्व दिशा में, दक्षिण दिशा में, तब उत्तर दिशा में अन्त में पश्चिम दिशा में, सब ही ओर तीन या पांच वार कुशा देवे; किन्तु ऐसी युक्ति से आच्छादन करे कि जिसमें दो, तीन, या उससे अधिक कुशा एक स्थान में मिल न जावें और सबही कुशाओं का अग्रभाग पूर्व की ओर रहे और उन्हीं कुशाओं के अग्रभाग के द्वारा उनका मूल आच्छादित रहे या ( यदि कुश थोड़े हों) पश्चिम दिशाको छोड़ कर दक्षिणाय कुशाके द्वारा दक्षिण से एवं उत्तराम कुशाके द्वारा उत्तर से पूर्व की ओर आकर्षित होगा । अर्थात् वृत्त या चतुष्कोण रूप नहीं आच्छादित कर त्रिकोण रूप आच्छादित करे। इसी को "परिस्तरण" कहते हैं। यह सब प्रकार के आहुति विशिष्ट अनुष्ठानों में व्यवहृत होगा ॥६-१५ ॥ परिधीनप्येके कुर्वन्ति शामीलान् पार्णान् वा। १६ । 'एके श्राचार्याः 'शामीलान्' शमीकाष्टीयान् 'वा' पार्णान्' पलाशकाष्टीयान् 'परिधीन्' कर्मप्रदीपोक्तलक्षणान् सीमरूपान् कुर्वन्ति ॥ १६ ॥ भाषा-कोई २ श्राचार्य शमी या पलाश की परिधि (सीमास्थापन) भी करते हैं ॥ १६ ॥ उत्तरतोऽपाम्पूर्णः सुवः प्रणीता भावेन वास्यादित्येके १७-१८ 'उत्तरतः' अग्नेरिति यावत्। 'श्रपा पूर्णः सुवः' 'प्रणीता' एतत् संज्ञको भवेत् । 'भावे' पूर्वोक्तचमसपात्रस्य 'न वा स्यात्' सुवः प्रणीता 'इति' एवम् 'एके' प्राचार्या वदन्ति तदपि न विरुद्धम् ॥ १७-१८ ॥ भाषा-अग्नि के उत्तर में जल-पूर्ण स्रुव की रक्षा करे उसको प्रतीणा कहते हैं। कोई २ भाचार्य कहते हैं कि पूर्वोक्त चमस पात्र में जल रक्षित रहने से, उवा में जल नहीं रखने से भी हानि नहीं ॥ १७-१८ ॥ बर्हिषि स्थालीपाकमासाद्येध्ममभ्याधायाज्यास स्कुरुते सर्पिस्तैलन्दधि पयो यवागू वा ॥ १६, २० ।।

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - स्थल 'बर्हि प' आस्तृते तत्र कुशालमूहे. 'स्थाली पाकम्' स्याल्यां पका चाम- हितस्थालीपामिह ग्राहान्न 'पासाघ' संस्थाप्य, प्रधाज्यसंस्कारः;-... 'इमम् इ- न्धनकाष्टं पूर्वोक्तं पालाशाद्यन्यतमम् 'अभ्याधाय" अग्नी अभितः प्रदाय पुनरपि सुप्रज्वाल्याग्नि-मिति यावत् ! ततस्तत्र प्रज्वलितेऽग्नी 'श्राज्यम्' अनुपश्यमा- सर्पिरादीनामन्यतमं 'संस्कृरते' संस्कुरुति । तया च 'सपिः' पतं 'तैलं. ति लस्नेह 'दधि' 'पयः दुग्धं 'यवाग' वा ॥ १९ ॥ २ ॥ भाषा-उस डाले हुए कुशाओं पर स्थानी पाक स्थापन करके इन्धन डालकर अग्नि जला कर उसमें पान्यसंस्कार करे। आन्य से में घृत तैल, दधि, दुग्ध, या-यवागू जानो। इन पांच बालुओं में ने जो कोई वस्तु मिले उसी से हो सकता है ॥ १६ . २० ॥ ततएव बर्हिषः प्रादेशमाने पवित्रे कुरुते ओषधिल- न्तर्धाय छिनति न नखेन पवित्रेस्थोवैष्णव्यावित्यनेन अभिरनुमार्टि विष्णोर्मनसा पूते स्थ इति ॥ २१-२३ ।। 'ततः' पूर्वासादितात् 'वर्हिषः एब' 'प्रादेशमात्रे' प्रादेशप्रमाणे 'पवित्र' 'कुरुते' कुर्वीत । कथमित्याकाङ्क्षायां वदति, श्रौषधिम्' ग्री:यादिकम् अन्नधाय' मध्ये स्थाप्प "पचित्रे स्थो वैष्णव्या"-'इति' अनेन मन्नेगा 'छिनति हिन्यात 'न नखेन'। अथ तदनन्तरम् 'एते' पवित्रे 'अद्भि' "विमोमनसा प्रनम्धः"- 'इति' अनेन मन्त्रेण 'अनुमार्टि' अनुमृग्यात् ॥ २१-१३ ॥ निर्मित मच ताभ्यां पवित्राभ्यामाज्योत्पवनं विधत्ते;- भाषा-अनन्तर उसी पूर्व संगृहीत कुशाओं के बीच से प्रदेश प्रमा (बालिश्तभर ) दो कुश ले कर तुम वि देवना के हो सुतगं पवित्र वा इस मन्त्र का पाठ करते अोपधि के बीचो बीच छेदन करें। उसके अनन्तर, 'विष्णु देवता के अभिप्राय से ही तुम पवित्र हो' इम मन्त्र का पाठ करके उसको जल में धोवे ॥ २१-२३ ।। सम्पूयोत् पुनात्युद्गग्राभ्याम्पवित्राभ्यामङ्गुष्ठाभ्या- चोपकनिष्ठिकाभ्याश्चाइगुलिभ्यामभिसंगृह्य प्राक्शनिक- .

प्र० १ खं० ७ सू० १९-२७] दर्शपौर्णमासप्रकरणम् ॥ JALORTAINMLasaraat त्पुनाति देवस्वासवितोत्पुनास्वच्छिद्रेणपवित्रण बसोः सूर्यस्य रश्मिभिरिति सकृयजुषां विस्तूष्णीम् ॥२४,२५॥ 'सम्पूय' ते पवित्रे पूर्वोक्तप्रकारेण शोधयित्वा शोधिताभ्यां ताभ्यामेव 'पवि- त्राभ्याम्' कीदृशाभ्याम् उदगग्राभ्याम् 'उत्पुनाति' श्राज्यमित्याशयः । श्राज्ये पतितं तृणादिकं ततउद्धत्य अग्नौ निक्षिपेदित्यर्थः । कथकृत्वा ? कतिवारम् ? केन मन्त्रेणेत्याकाङक्षात्रयं पूरयति;--'अंगुष्ठाभ्याम्' 'उपकनिष्ठिकाभ्याम्' श्रना- मिकाभ्यां 'च' 'अङ्गुलिभ्याम् अभितः 'संगृह्य' 'प्राक्शः' प्रारगतं यथा स्यात्तथा, 'निः' त्रिवारम् 'उत्पुनाति' । तत्र त्रिषु वारेषु 'सकृत् एक.वारं 'देवस्त्वेत्यादिना' 'यजुपा'यजूरूपमन्त्रेण 'द्विः द्विवारं 'तूष्णीम्'अमन्त्रक मेवेत्याज्योत्पवनम् ॥२४-२५॥ भाषा-उक्त प्रकार से दोनों "पवित्र" को शोध कर उत्तराग्र करके उसके द्वारा प्राज्योत्पवन करे अर्थात् प्राज्य में पतित तृण आदि बाहर कर पूर्व की ओर फेंक देवे । 'श्राज्योत्पवन काल में दोनों “पवित्र"को अङ्गुष्ठ और अनामिका अंगुलि से पकड़े एवं एकबार 'देवस्त्वा' इत्यादि 'यजू रूप मन्त्र पाठ करे, पुनः दोवार विना मन्त्र उत्पवन करे ॥ २४-२५ ॥ अथैनेअद्भिरभ्युक्ष्याग्नावप्युत्सृजेदथैतदाज्यमधिश्रित्यो- दगुदासयेदेवमाज्यस्यसस्करणकल्पीभवतीति २६-२८ 'अथ' तदाज्योत्पवनानन्तरम् ‘एने' पवित्रे 'अद्भिः अभ्युक्ष्य' जलधौते प्रकृत्य 'अग्नौअपि' 'उत्सृजेत्' क्षिपेत् । अपि शब्दबलादन्यत्र क्षेपणेऽपि दोषाभावः। श्रथ' अनन्तरम् 'श्राज्यं तदेव 'अधिश्रित्य' ज्वलदङ्गारेषु कृत्वैव 'उदक' अग्नरुत्तरस्यां- दिशि 'उद्वासयेत्' स्थापयेत् । आजस्य संस्करण कल्पः' "एवम्' एव भवति'२६.२८ इति गोभिलगृह्यसूत्रे प्रथमप्रपाठके सप्तमस्त्रण्डस्य व्याख्यानं समाप्तम् ॥ १-७॥ भाषा-अाज्योत्पवन के पीछे इन दो "पवित्रों को जलमें धो कर अग्नि में फेंक दे । अनन्तर अग्नि के उत्तर में जलते हुए कई एक अंगारे पर, "पूताज्यपात्र रक्खे । यह आज्यसंस्कार का कल्प होता है ॥ २६-२८ ॥ गोभिलगृह्यसूत्र के प्रथमाध्याय के सप्तम खण्ड का भाषानुवाद पूरा हुआ॥१-७॥

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - पूर्वामाज्यमपरः स्थालीपाकः ॥ १॥ अग्नेरुत्तरस्मिन्नेव 'पूर्व' पुरस्तातूस्थानम् 'आज्यम्' आज्यसहितमाज्यपात्र भवेत् , किञ्च तत्र व 'अपरः तत्पश्चातस्थानः 'स्थालीपाक:' पक्वचरुसहितस्था- ल्याधारः भवेत् ॥१॥ भाषा-चरुस्थाली और आज्यपात्र के अग्नि के उत्तर में रखने की व्यवस्था हुई है । ( ११४५, १७१२६-२८) उनमें पहिले आज्यपात्र उसके पीछे चरुस्थाली रक्खे ॥ १५ ॥ पर्युक्ष्य स्थालीपाक श्राज्यमानीय मेक्षणेनोपघात होतुमेवोपक्रमते ॥२॥ 'पर्युक्ष्य' अदितेऽनुमन्यस्वेत्यादिना पर्युक्षणान्तं प्रकृत्य, 'स्थालीपाके' चरौ 'प्राज्यं' सर्पिरादीनामन्यतमम् 'श्रानीय' क्षिप्त्वा 'मेक्षणेन' दीविशेपेण 'उपधा- तम्। उपस्तरणाभिधारणरहितं होमं होतुम्' 'उपक्रमते' प्रवर्तेत । स्रुचि स्रवेण प्रथममाज्यग्रहणं, ततश्चरुहणं, ततः पुनराज्यग्रहणम् चेत् उपस्तीर्णाभिधारितं तदुच्यते होमीयम्; तत्र चरुग्रहणात् पूर्वमाज्यग्रहणमुपस्तरणमुच्यते, परस्ताच्चा- भिधारणमिति । यत्र तु उपस्तरणमभिधारणा न भवतः, स एव होम उपघात इति विवेकः ॥ २॥ भाषा-अग्नि कार्यमात्र में अनुष्ठेय पूर्वोक्त 'अदितेऽनुमन्यस्व' प्रभृति 'पर्युक्षण' के अन्तमें कार्य सब (१३।१-५) सम्पन्न होने पर स्थालीपाक में श्राज्य प्रक्षेप कर "उपघात' होम करने के लिये उपक्रम करे ॥२॥ यधुवा उपस्तीर्णाभिधारितं जुहुषेदाज्यभागावेव प्रथमौ जुहुयाच्चतुर्ग्रहीतमाज्यं गृहीत्वा पञ्चावत्तन्तु भृगू- * त्रुच् के मध्य में चरुग्रहण के पहिले नुवा के द्वारा आज्य ग्रहण को उपस्तरण (मास्त- रण) एवं चरुग्रहण के पीछे आज्य ग्रहण को अभिधारण (आच्छादन ) कहते हैं। तदनुयायी प्रथम आज्य पीछे चरु पुनः श्राज्य लेकर जो होम किया जावे उस को उपस्तीणाभिधारित कहते हैं। जिस होम में उपस्तरण या अभिधारण की आवश्यकता न हो उसे 'उपघात होम' काते ( यज्ञारम्भ द्योतक होम)। RP Pincouple Amtutomammy4 प्र. १ खं० ८ सू० १-४] दर्शपौर्णमासप्रकरणम् ।। पामग्नये स्वाहेत्युत्तरतः सोमाय स्वाहेति दक्षिणतः प्राक्शोजुहुयात् ॥ ३, ४ ॥ 'यदि उ वा' यदैव 'उपस्तीर्णाभिधारितं' जुहुषेत्' होतुमिच्छेत् तदैव 'प्रथमौ उपधातनामोपक्रमरूपहोमसम्पादनोपयोगिनौ 'श्राज्यभागौ' उपर्युपरि होमद्वयनि- पादको 'जुहुयात्' अग्नाविति । एतावेव होमौ उपघातसझौ प्रकृतहोमस्योपस्ती- र्णाभिधारितस्योपोद्घातरूपत्वात् । । अतिकर्तव्यतादिकं ब्रूते:- 'चतुर्गृहीतम्' च- तुःकृत्वः गृहीतं खुवेण चुचीति यावत्, 'श्राज्यं' सर्पिरादीनामन्यतमम् 'गृहीत्वा' अग्निमध्ये एन, उत्तरतः, उत्तरस्याम् 'अग्नये स्वाहा' 'इति' 'दक्षिणत.' दक्षिणस्यां 'सोमाय स्वाहा' 'इति', 'प्राशः' प्राग्गतं यथा स्यात्तथा जुहुयात् । एनावेव होमो उपघाताख्यौ। अत्र विशेष:-'भृगूनां भृगुगोत्रोत्पन्नानां 'तु पञ्चावत्तं, पञ्चकृत्वः श्राज्यग्रहणमिति ॥ ३ ॥ ४ ॥ इदानीमुपस्तीर्णाभिधारितहोमप्रकारं कथयति- भाषा-जिस समय "उपस्तीगाभिधारित” नामक होम करने की इच्छा हो, उसी समय उसके पूर्व दो "उपघातहोम”करे । इस ‘उपघातहोम, के करने में स्रुच् के मध्य में प्रतिवार सुवा की धारा ऊपर चार वार श्राज्य ग्रहण करना होगा, एवं इस चाग्वार ग्रहण किया हुआ आज्य पहिले 'अग्नये स्वाहा' इस मन्त्र से अग्निकुण्ड के बीच में, उत्तर में और तत्पश्चात् 'सोमाय' इस मन्त्र से अग्निकुण्ड के दक्षिण में, पूर्व दिग्गत करके होम करे। विशेषता यह है कि भृगुगोत्रोत्पन्न गणके प्रति होम में पांचवार आज्य ग्रहण करना चाहिये ॥ ३-४॥ अथ हविषउपस्ती-वद्यतिमध्यात्पूर्वार्द्धाच्चतुरवत्ती चेदुभवति मध्यात्पूर्वार्धात्पश्चार्दादितिपञ्चावत्तीचेद्भवत्य भिघारयत्यवदानानिप्रत्यनक्तयवदानस्थानान्ययातयामता- याअग्नयेस्वाहेतिमध्येजुहुयातसकृद्धात्रितेनकल्पेन ५-१० 'अथ' उपधातहोमानन्तरम् 'उपस्तीर्य' प्राज्येन स्रुचं सस्नेहां प्रकृत्यं तदुपरि 'हविषः' चरून् 'अविद्यति' अबदाय गृह्णाति । श्रवदानप्रकारमाह-'चतुरवत्ती' गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्-- -- भृगुवंशीयादन्यः 'भवति चेत्', 'मध्यान्' मध्यं लक्षीकृत्य पूर्वार्धात अवद्यदीत्य- नुवर्तते; किन्च 'पञ्चावत्ती' भृगुवंशीयः भवति चेत्', 'मध्यात्' मध्यं लक्षीकृत्य 'पश्चात' अवधति 'इति' एवमेव नियमः । 'अवदानानि' चतुर्गृहीतानि पञ्च- गृहीतानि वा तानि 'अभिधारयति' अभिधारयेत् तदुपरि पुनः उवाज्यधारापातं कुर्वीतेति यावत् । किञ्च 'अवदानस्थानानि' चरुस्थालोमध्यतो यतोयतः चरून् चतुः पञ्च वा कृत्वा अवदाय गृहीतानि तानि, 'अयातयामताय' यातयामता यागायोग्यता तदमावाय यागयोग्यतामेव रक्षयितुमिति यावत्, 'प्रत्यक्ति यत्र यत्र मेक्षणप्रवेशचिन्हं तानि सर्वाण्येव प्रति लक्ष्याज्यसिञ्चनं कुरुते कुर्वीतेत्यर्थः । ततः तदेव उपस्तीर्णाभिधारितं हविः प्रगृह्य "अग्नये स्ताहा".-'इति' इमं मन्त्र- मुच्चरन् ‘मध्ये' अग्नेः, जुहुयात्, अयमेव होमोऽत्रोपस्तोर्णाभिवारित उच्यते। एतेन कल्पेन' कथितप्रकारंण 'सकृत वा' एकवारं वा 'त्रिी त्रिवारं वा जुहुयात् ५१० भाषा-उपघात होम के पीछे उसी स्रुच के स्रुव से एकवार प्राज्य ग्र- हण करके उसके ऊपर 'मेक्षण' से चरु ग्रहण करे। उसमें विशेषता यह है गोत्र का हो तो चरुस्थाली के मध्य में पश्चाद्ध से एवं पांचवार चरु ग्रहण करे और अन्य गोत्र का हो तो चरुस्थानी के बीच में पूर्वाद्ध से एवं चारवार मात्र चरुग्रहण करे . पीछे जिस २ स्थान से 'मेक्षा' से चरु नि- काल ले आज्य से, उसी २ स्थान को सिञ्चित कर, जिस से चरु सूख न जावे-याग के योग्य रहे । अनन्तर उसी गृहीत चरु के ऊपर फिर 'आज्य' दार कर उसी ऊपर नीचे आज्यविशिष्ट चरु से "अग्नये स्वाहा” मन्त्र पढ़ कर मध्य में हवन करे। यही उपस्तीर्णाभिघारित होम है। यों एक या तीन- वार करे ॥५-१०॥ प्रथस्विष्टकृतउपस्ती-वद्यत्युत्तरार्द्धपूर्वार्धात्मकृदेव भूयिष्ठं विरभिघारयेबद्युतश्चावती स्याद्विरुपस्तीर्यावदाय हिरभिधारयेत्न प्रत्यनक्त यवदानस्थानंयातया मतायाअ- ग्नयेस्विष्टकृते स्वाहेत्युत्तरार्द्धपूर्वार्दै जुहुयात् ॥११-१४॥ अथ' अत्राथशब्देन प्रकरणान्तरत्वमात्र लक्षयति, नत्वानन्तर्यम् ; स्विष्टक- कि भृगु दर्शपौर्णमासप्रकरणम्- - प्र० १ खं०८ सू० ५-१२] होमात् पुरस्तादेव प्रकृतयागस्य वक्ष्यमाणत्वात् (१६ सू०)। 'स्विष्टकते' स्वि- कृद्धोमसिध्यर्थम् , पूर्ववत् 'उपस्तीर्य स्रुवाज्यं त्रुचि आस्तीर्य, तन व चरुस्थाली- मध्यतएव 'उत्तरार्द्धपूर्वार्धात् उत्तरार्द्धस्य प्रथमार्धात् 'भूयिष्टं बहुतरं 'सकृत्' एक- वारम् ‘एव' अवधति अवदाय गृह्णाति; तदनन्तरं गृहोतं तं चरुं 'द्वि' द्विवाग्म् 'अभिघारयेत्' खवाज्यधारया सिञ्चेत् । अत्र विशेषः कथ्यते,-यदि उ' 'पञ्चा- वत्ती' भृगुगोत्रः 'स्यात्' यजमानः, तर्हि 'द्विः' द्विवारम् 'अवदाय' 'उपस्तीर्य' द्विरभिघारयेत्' द्विवारमेवाभिधारणं कुर्यात् । किञ्च स्विष्टकृद्यागे 'यातयामतायै यागायोग्यताभिया 'अवदानस्थान' 'न प्रत्यनक्ति' अस्यैव होमस्यान्त्यच रुहोम- त्वान्नष्टेऽपि तस्मिन् क्षत्यमावादिति भावः । स्विष्टकृन्दोमस्य मन्त्रं स्थानं 'च' बो- 'धत;-'अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा'-इति अनेन मन्त्रेण 'उत्तरार्द्धपूर्वार्दै अग्नेअरु- तराद्धंस्य पूर्वार्द्ध जुहुयात् ॥ गतोऽयं स्विष्टकृद्धोमः ॥११-१॥ अथापरोऽप्यस्ति होमः सवकर्मसाधरणस्तं विधत्ते भाषा- ( उक्त "उपस्तीर्णाभिधारितहोम" के पीछे प्रकृत होम शेष होने पर * ) स्विष्टकृत् होम' करने के लिये भी पूर्ववत् नुवा से प्राज्य ले कर खुच् में लेने पर उस चरुस्थानी में चरु के उत्तगई के पूर्वार्द्ध से एकवार मात्र, किन्तु कुछ अधिक परिमण से चरु ग्रहण करे एवं उसके ऊपर पुनः प्राज्य किञ्चन करे । विशेषता यही है कि भृगुगोत्रोत्पन्न हो तो उसे दो वार 'उपस्तरण' करे। अनन्तर इस प्रकार चरु ग्रहण और इस प्रकार दो वार अभिधारण करे । (और भी जो, स्विष्टकृत भाग ही शेष इस के पीछे और होम के लिये चरु की आवश्यकता नहीं होती अतएव ) स्विष्टकृत होम के लिये चरु ग्रहण करके, उस चरु को ठीक २ रखने के लिये उस में प्राज्य सिञ्चन करना आवश्यक नहीं। इस गृहीत * दर्शपौर्णमास का प्रकृत होम पीछे कहा जावेगा (स० २२, २५) । विवाहादि समस्त कार्यों का ही प्रकृत होम होता है। प्रकृत होम को ही 'पावाप' कहते हैं । सब हौं 'आवाप' के पहिले उपधात होम और उपस्तर्णाभिधारित-होम हुआ करते हैं और अन्त में स्विष्टकृत् होम करना होता है। ये चार प्रकार के होम चरु द्वारा निष्पन्न होते हैं ॥११-१२ ॥ Kata गोभिलगृह्यसूत्रटोकायाम्-- - में होमीय को 'अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा' मन्त्र से अग्नि के उत्तरार्द्ध के पूर्वार्द्ध हवन करे यही । 'स्विष्टक्त होम है' ॥ ११-१४ ॥ महाव्याहृतिभिराज्येनाभिजुहुयात् ॥ १५ ॥ 'महाव्याहृतिभिः' भूर्भुवः स्वरितिमन्त्रेण 'प्राज्येन' 'अभिजुहुयात्' इति सर्वसाधारणहोमप्रकारः॥ १५॥ इदानी प्रकृतहोमकालं व्यवस्थापयति- भाषा- 'भूर्भुवः स्वाहा' मन्त्र से श्राज्य द्वारो होम करना चाहिये । इसीको 'महाव्याहृति-होम, कहा है ॥ १५ ॥ प्राक् स्विष्टकृत पावापः ॥१६॥ 'स्विष्टकृतः स्विष्टकृद्धोमात् 'प्राक' पुरस्तादेव 'पावापः' प्रकृतहोमः दर्शघौ- र्णमासीयो वैवाहिकादिश्च कार्यः ॥ १६ ॥ भाषा-स्विष्टकृत् होम के पूर्व ही 'आवाप' अर्थात् दर्शपौर्णमास का.. या बिवाहादि का प्रकृत होम करे ॥ १६ ॥ गणेष्वेकम्परिसमूहनमिध्मोवहिपर्युक्षणमाज्यमाज्यभागी चसर्वेभ्यासमवदायसकृदेवसौविष्टकृतंजुहोति ॥१७, १८॥ 'गणेषु' बहुष्वावापेषु वार्त्तव्येषु श्रावापबहुत्वानुरोधतस्तत पूर्वापरकार्याणाम- पि बहुत्वं न भवेदित्याह- परिसमूहनमित्यादिकम् पूर्वोक्तं समस्तमेव एकं सकृ- देव भवेत्, किन्च 'सर्वेभ्यः 'समवदाय' अवदानपूर्वकहोमानन्तरं 'सौविष्टकृतं' 'सकृत्' एकवारमेव 'जुहोति' न तु श्रावापसंखयानुगुणमिति यावत् ॥ १७ ॥१८॥ भाषा-जिस स्थान में बहुत आवाप कर्तव्य हों, वहां आवाप के बहुत होने से इध्म ग्रहण श्रादि कार्य अनेक वार नहीं किये जावगे, और सब ही पावाप के लिये पहिले की नाई चरु ग्रहण पूर्वक होम आदिशेष पीछे सब के अन्त में एक ही वार "स्विष्टकृत्' होम करे ॥ १७-१८ ॥ हुत्वैतन्मेक्षणमनुप्रहरेत्प्रक्षाल्य चैतेनोद्धृत्य भुञ्जीत१६, २० 'एतत् स्विष्टकृत होमं 'हुत्वा' 'अनु' पश्चात् अनावश्यकमिति मत्त्वा तद्धोममात्रहोमसाधनं 'मेक्षणं' 'प्रहरेत' प्रक्षिपेत असाविति शेषः । 'वा' अथवा प्र० १ खं० ८ सू०१५-२५ ] दर्शपौर्णमासप्रकरणम् ॥ - 'प्रक्षाल्य तन्मेक्षणं रक्षेत् यथाकालम् ‘एतेन' मेक्षणेनैव ' उत्य' अन्नं 'भुञ्जीत' यजमानः । एवञ्च मेक्षणेन भोजनं यस्य सुखकरं स न प्रक्षिपेदिति भावः १९.२० भाषा-इस 'स्विष्टकृत' होम के पीछे मेक्षण, अनावश्यक हो तो, उसे अग्नि में फेंक देवे या भोजनार्थ आवश्यक निश्चित होने पर उसे धो कर रक्खे एवं यथा समय उस के द्वारा भोजन करे ॥ १६-२०॥ न सुवमनुप्रहरेदित्येकाहुः ।। २१ ।। 'एके' श्राचार्याः नुवं न अनु प्रहरेत्'-'इति अाहुः' तददि सम्मतम् ॥२१॥ अथेदानीमाहितारन्यनाहितारन्योर्दर्शपौर्णमासावापमन्त्रभेदमाह-- भाषा-कोई २ श्राचार्य कहते हैं कि 'कार्य के अन्त में सुवा भी धोकर रक्खे; उसे अग्नि में न डारे, तो भी कोई हानि नहीं ॥ २१ ॥ आग्नेय एवानाहिताग्नेरुभयोर्दर्शपौर्णमाशयोः स्था- लीपाकस्यादाग्नेयो वाग्नीषोमीयो वाऽऽहिताग्नेः पौर्णमा- स्यायामैन्द्रो वैन्द्राग्नो वा माहेन्द्रो वा अमावास्यामपिवाऽऽ. हिताग्नेरप्युभयोदर्शपौर्णमासयोराग्नेयएवस्यात् २२-२५ 'अनाहिताग्नेः' अनग्निहोत्रिणः 'उभयोः,' कयोरित्याह 'दर्शपौर्णमासयोः' 'स्थालीपाकः' स्थाल्यां पकचरु: 'अाग्नेयः' अग्निदेवताकः 'स्यात्' उपस्तीर्णाभि- वारितं चरुं गृहीत्वा 'अग्नये स्वाहा' इति मन्त्रेणैवापरोहोम श्रावापो दर्शपौर्ण- मासयोरनाहिताग्नेरित्येव पर्यवसिताथः । 'श्राहिताग्ने' नित्याग्निहोत्रिणस्तु 'पौर्णमास्यायाम्' 'आग्नेयः' एव 'वा' अथवा 'अग्निषोमीयः' किञ्च "अमावस्या- याम्' 'ऐन्द्रः वा ऐन्द्रानः वा माहेन्द्रः वा' स्थालीपाकः स्यादिति । 'अपिवा' 'श्राहिताग्नेरपि' 'उभयोः दशपौर्णमासयोः' 'आग्नेयः एव' 'स्यात्'; अस्मिन् पक्ष श्राहितारन्यनाहिताग्न्योन कोऽपि भेदइति फलितम् ॥ २२-२५ ॥ यज्ञवास्तुनामकमपरमपि किञ्चिदुपदिशति- भाषा-इस के पीछे दर्शपोर्णमास के 'श्रावाप-मन्त्र' कहते हैं-यदि यजमान 'अग्निहोत्री' हो तो, 'दर्श' और 'पौर्णमास' दोनों याग में 'अग्नये - गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - स्वाहा' इस मन्त्र से 'उपतीणा भिधारित चरु होम करे; और यदि अग्नि- होत्री हो तो 'पौर्णमासयाग' के अावाप होम' में 'अग्नये स्वाहा' या 'अग्नी- घोमाभ्यां स्वाहा' मन्त्र व्यवहार करे। और 'अमावास्यायाग' में 'इन्द्राय स्वाहा' या 'इन्द्राग्नीभ्यां स्वाहा' मन्त्र व्यवहार करे। या अग्निहोत्रा भी 'दर्श' 'पौर्णमास' दोनों ही याग में, अग्निहोत्री की नाई 'अग्नये स्वाहा' मन्त्र से आहुति देवे ॥ २२-२५ ॥ समिधमाधायानुपयुच्ययज्ञवास्तु करोति तत एव बर्हिषः कुशमुष्टिमादायाज्ये वा हविषि वा विरवद्ध्याद- ग्राणि मध्यानि मूलानीत्यक्तधरिहाणा व्यन्तु वय इत्य- धैनमद्भिरभ्युक्ष्याग्नावप्यजयेद्यः पशूनामधिपतीरुद्रस्तन्ति चरोवृषापशूनस्माकं माहिसीरेतदस्तु हुतन्तव स्वाहेस्ये- तयज्ञवास्त्वित्याचक्षते ॥ २६-२६ ॥ ८ ॥ 'समिधम् श्राधाय अनु पर्युक्ष्य' पूर्वोक्तप्रकारेण समिदाधानं प्रकृत्य पर्युक्ष- पञ्च समाप्य तस्मिन्नेव काले 'यज्ञवास्तु' नाम किञ्चित् कायं करोति' कुर्यात दर्शपौर्णमासादौ । कथमित्याह-'तत शुब बर्हिषः प्रास्तृतकुशसमूहादेव 'कुश- सुष्टिम्' मुष्टिमितानि कुशतृणानि 'श्रादाय' संगृह्म 'श्राज्ये वा' पूर्वोक्तान्यतमे वा, 'हविषि वा' पक्वचरौ वा 'अग्राणि, मध्यानि, मूलानि' 'इति' एवं त्रिः' त्रिवारम् 'श्रवदध्यात्' अञ्जयेत् 'अक्तं रिहाणा व्यन्तु वयः'-'इति' अनेन मन्त्रे- ऐति । 'अर्थ' अनन्तरम् , तानि 'अद्भिः' 'अभ्युक्ष्य' सिक्त्वा यः पशूनामित्यादि स्वाहान्तेन मन्त्रेण 'अग्नौ' 'अर्जयेत अपि' क्षिपेञ्च । 'एतत्' कर्म 'यज्ञवास्तु'- 'इति श्राचक्षते' ॥ २६-२९ ॥ ८॥ इति गोभिलगृह्यसूत्रे प्रथमप्रपाठके अष्टमखण्डस्य व्याख्यानं समाप्तम् ॥ 3-८ ॥ भाषा-दर्शपौर्णमासादि' याग में एक कार्य करना होता है. उस 'यज्ञ- वास्तु' कहते हैं। वह पूर्वोक्त प्रकार से 'समिधादान' प्रभृत्ति पर्युक्षण तक कर्म के पीछे होगा । जैसे-श्रास्तृत कुशसमूह से एक मुट्ठो कुश लेकर - प्राज्य प्र०१खं० ९सू० २६- २९।१-५] दर्शपौर्णमासप्रकरणम् ।। या चरु में अग्र, मध्य, मूल, इस क्रम से 'अक्तरिहाणा' मन्त्र को पढ़ कर तीन बार जला सींचे। तत्पश्चात् उसे जल से साफ करके 'य. पशूनामधि- पतिः' मन्त्र पढ़ कर उसे अग्नि में छोड़ देवे, यही 'यज्ञवास्तु' है।२६-२७।१८ गोभिलगृह्यसूत्रके प्रथम अध्यायके अष्टम खण्डका भाषानुवाद पूग हुआ ॥१,८॥ अथैतद्धविरुच्छिष्टमुदगुदास्योद्घता ब्रह्मणे यच्छेत् तं तितर्पयिषेद् ब्राह्मणस्य तृप्ति मनु तृप्यामीति ह यज्ञस्य वेदयन्तेऽथ यदस्यान्यदन्नमुपसिद्धरस्थात् ॥ १-४ ॥ 'अथ' महाव्याहृतिहोमानन्तरम् । एतत्' 'उच्छिष्टम्' अवशिष्टं 'हवि' चर्वन्नं 'उदक' अग्नेरुत्तरस्मिन् 'उद्वास्य' संस्थाप्य 'उद्धृत्य पात्रान्तरे गृहीत्वा 'ब्रह्मणे' ब्रह्मनामविजे प्रयच्छेत्' । 'तं ब्रह्माणं तितयिषेत्' अतिशयेन तर्पयितुं तृप्त कतमिच्छेत् । 'ह' यतः 'ब्राह्मणस्य तृप्तिम् अनु तृप्यामि'--'इतिः 'यज्ञस्य' यज्ञपुरुषस्य अभिमतं 'वेदयन्ते' ऋषयः; ब्राह्मणतृप्तयार्थमेव यज्ञानुष्ठानमिति भा- वः। 'अथ' किञ्च 'अन्यत्' अपरमपि भक्तादिकं 'यत् अन्नम्' 'अस्य यजमानस्य 'उप' समीपे सिद्ध' स्यात्' तदपि तस्मै देयमिति ॥ १-४ ॥ भाषा- यज्ञ का शेष का कहा जाता है। प्रथम, इस महाव्याहृत्त होम के पीछे अवशिष्ट चरु को अग्नि के उत्तर दिशा में रक्ख कर उसी चरु- स्थान से दूसरे पात्र में चरु लेकर ब्रह्मा, उसे ऋत्विक् को देवे, उस समय यजमान के निकट में यदि और भी दूसग, अन्न, भात प्रभृति हो, तो उमेभी उन को देवे । जैसे हो उन्हे तृप्त करने की इच्छा रक्खे, क्योंकि ऋषिगण- कहते हैं कि ब्राह्मण की तृप्ति अनुसार ही हम तृप्त होते हैं--यही यज्ञपुरुष का अभिप्राय है ॥ १-४॥ अथब्राह्मणान् भक्तेनोपेप्सेत ॥ ५ ॥ 'अथ' अनन्तरं 'भक्तन' अन्नेन 'ब्राह्मणान्' निमन्त्रितान् 'उपेप्सेत' सम्ब- दुधुमिच्छेत् भोजयेदित्यर्थः ॥ ५॥ ७ - गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्---- भाषा-अनन्तर-निमन्त्रित ब्राह्मण श्रादिक को भात आदि से परितृप्त करे ॥५॥ पूर्णपात्रो दक्षिणा तं ब्रह्मणे दद्यात् कसं चमसंवा- नस्य पूरयित्वा कृतस्य वाकृत्यस्य वापि वा फलानामेवैतं पूर्ण पात्रमित्याचक्षते ब्रह्मैवैऋस्विक् पाकयज्ञेषु स्वय होता भवति पूर्णपात्रोऽवमः पाकयज्ञानां दक्षिणाऽपरिमितं परायमपि ह सुदाः पैजवन ह सुदाः पैजवन ऐन्द्राग्नेन स्थालीपाकेनेष्टा शतसहस्राणिौ ॥ ६-१२ ॥ 'पूर्णपात्रः' पूर्णपात्रम् 'दक्षिणा' भवति दर्शपौर्णमासादियागस्येति । 'त' दक्षिणारूपं पूर्णपात्रं ब्रह्मणे' ब्रह्मनामविजे 'दद्यात्' । किन्तत् पूर्णपात्रमिति ! वदति-'कंसं कांस्यपात्रम् , 'चमसं' पानपात्रं 'वा' 'कृतस्य' पक्वस्य 'श्रकृतस्य' अपक्वस्य 'वा' अन्नस्य' समूहैः, 'अपि वा' 'फलानां समूहै: 'पूरयित्वा'; 'एतम् एव' पूर्णपात्रम् इति प्राचक्षते' । दर्शपौर्णमासादौ कमणि 'ब्रह्मा एव एकः ऋ- त्विक' वरणीय' बहुतराणात्विजां नापेक्षा होतृकार्य कथ भवेदित्याह-पाक- यज्ञेषु' दर्शपौर्णमासादिप्रभृतिषु 'स्वयं यजमान एव होता' 'भवति' भवेन्नाम । ननु दर्शपौर्णमासादिपाकयज्ञस्य पूर्णपात्रं दक्षिणा विहिता, ततोऽधिकदाने दोष सञ्जायते किम् ? नेत्याह;-'पाकयज्ञानां' पाकैः चर्वन्नैर्यजनीयानां दर्शपौण- मासादीनां कर्मणां पूर्णपात्रः' पूर्णपात्रम् 'दक्षिणा' 'अवमः' अवमम् अधर्म न्यू- नकल्पत इति यावत् । 'अपरिमितम्' बहुसङ्ख्यकस्वर्णादिकमेव दक्षिणा 'पराध्यम्' उत्तम प्रशस्तमित्यर्थः । अत्र बहुतरदानव्यवहारोऽपि निदर्श्यते;- ह' निश्चयम्; पैज- वनः' पिजवनस्य पुत्रः 'सुदाः' ऋषिः 'ऐन्द्राग्नेन स्थालीपाकेन इष्ट्वा' 'शवं शत- गुणित 'सहस्त्राणि' तथा च लक्षं सम्पन्नम् लक्षम् 'अपि' दक्षिणाः 'ददौ ६-१२ भाषा-इस दर्शपौर्णमास याग की 'दक्षिणा' पूर्णपात्र होगी । वह 'पूर्णपात्र ब्रह्मा नामक ऋत्विक् को देवे कच्चा या पका अन्न, या कतिपय फलों से 'कांस्यपात्र' या 'चमस' को भर देने का नाम, पूर्णपात्र' है। - प्र० १ खं० ९सू०६-१७] दर्शपौर्णमासप्रकरणम् ॥ दर्शपौणमास प्रभृति कार्य में एक मात्र ब्रह्मा ही 'ऋत्विक' होना चाहिये । पाक यज्ञ में (चरुपाक मात्र करके जो यज्ञ किया जाता है), इन सब यज्ञों में यजमान ही "होता” होवे। इस स्थानमें और भी जानने की बात है- जो, पाक यज्ञ को, उक्त पूर्णपात्र दक्षिणा न्यून कल्प समझना चाहिये । यदि सामर्थ्य होतो अपरिमित दक्षिणा देना उचित है। पिजवन नामक ऋषि के वंशधर सुदा ऋषि ने, इन्द्राग्नी देवता के उद्देश्य से स्थाली पाक से याग करके (अमावास्या याग के अनन्तर ) लाख (सुवर्ण, या मुद्रा- या गौ) दक्षिणा दियी थी ॥६-१२ ॥ अथ यदि गृहेऽग्नौ सायं प्रात)मयोवा दर्शपूर्ण- मासयोर्वा हव्यं वा होतारं वा नाधिगच्छेत् कथं कुर्यादित्या सायमाहुतेः प्रातराहुति त्येत्याप्रातराहुतेःसायमाहुतिग मावास्यायाः पौर्णमासं नात्येत्यापौर्णयास्या आमावास्या- मेतेनैवावकाशेन हव्यं वा होतारंवा लिप्सेतापि वा यज्ञि- यानामेवौषधिवनस्पतीनां फलानि वा पलाशानि वा अपयित्वा जुहुयादप्यप एवान्ततो जुहुयादिति ह स्माह पाकयज्ञ ऐडो हुतं ह्येव ॥ १३-१७ ॥ 'अर्थ' प्रकरणान्तरम् । 'यदि' 'गृोऽनौं' 'सायम्प्रातहोमयो ' 'दर्शपूर्ण- मासयोर्वा' 'कर्मणोः' 'हव्यं' हवनीयमाज्यादिकं 'वा' अपि 'होतारं स्वयमशक्ती प्रतिनिधि'न अधिगच्छेतू' नाप्नुयात्,तहि कथं केन प्रकारेण' कुर्यात सायम्प्रात)मौ दर्शपूर्णमासौवे त्याशङ्का । इमामाशङ्कामपनुदति,-'श्रा सायमाहुतेः' सायमा- हुतिकालं यावत् 'प्रातराहुतिः' प्रातहवनकालो 'न अन्येति' नातिक्रमते, एवम् "श्रा प्रातराहुते: सायमाहुतिः', किञ्च 'श्रा अमावास्यायाः' अमावास्यामारभ्य पौर्णमासं' यावत् अमावास्याहवनकालो 'न अत्येति'; एवमेव 'श्रा पौर्णमास्याः' पौर्णमास्यामारभ्य 'श्रामावास्या' यावत् पौर्णमास्याहवनकालो नात्येत्येव । तदित्य हव्यहानोरन्वेषणाय सायम्प्रातराहत्योश्चत्वारि यामा अवकाशः, दर्शपूर्ण- गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - मासयोस्तु पञ्चदशाहानि 'एतेन चतुर्यामरूपेण पञ्चदशाहात्मकेन वा 'अवकाशेन एवं' 'हव्यं होतारं वा लिप्सेत'लब्धुमिच्छेत् । 'अपिवा' होतृलाभे 'यज्ञियानाम् ओषधिवनस्पतीनां फलानि पलाशानि वा एव श्रपयित्वा जुहुयात्' । 'अपि' सदलाभे च 'अन्ततः' अपएव उदकान्येव 'जुहुयात्', 'ह' निश्चयम् , 'पाकथज्ञः' पाक यज्ञनियमः 'इति' एवं ऐडः' नामर्पिः 'आहस्म', तथा च फलाद्याहुतो अपि 'हि' निश्चयं 'हुतम् एवं' स्वीकार्यमस्माकम् ॥ १३-१७ ॥ भाषा-यदि किसी देवी दुर्घटना से गृहाग्नि में सायं और प्रान होम और दर्श पौर्णमास याग करने के लिये 'सामग्री' इत्रट्ठी न हो, य किसी कारण वश स्वयं और पत्नी दोनों ही असमर्थ हों और उस समय शीघ्र कोई बदले में दूसग व्यक्ति भी न मिल सके तो साय होम कग्ने तक भी प्रानगहुति का समय अतीत न समझा जायगा और प्रातराहुति के समय तक भी सायं होम का समय अतीत न समझा जायगा(ऐसी दशा में) अमावास्या संपूरिंगमा के पूर्व दिन तक १५ दिन में चाहे जिस दिन हो, 'अमावास्या याग' हो सकेगा। और पूर्णिमा से अमावास्या के पूर्व दिवस तक १५ दिन में से चाहे जिस किसी दिन हो 'पौर्णमासयाग' हो सकेगा इतने समय में जो कुछ सामग्री न हो, उसे इकट्ठी करे और होना भी कहीं से ढढ़ कर लावे । यदि हवनीय अन्नादि इकठ्ठा न हो, तो उससे भी हानि नहीं, फल से भी ह्वन हो सकता है, यदि यह भी न हो तो धान्य, शस्य, वृक्ष का, या आम्र आदि वनस्पति के पत्र से भी होम का काम पूग करे, एड ऋषि कहते हैं कि कुछ न मिले तो केवल जल से ही याग करे (पर नियम न तोड़े) १३-१७ अहुतस्याप्रायश्चित्तं भवतीति नावतोब्राह्मणःस्यादिति ॥१८॥१६॥ अथाप्युदाहरन्ति यावन्न हयेताभोजनेनैव तावत् सन्तनुयादथ यदाधिगच्छेत् प्रति जुहुयादेमप्यस्य ब्रतसन्ततं भवतीति ।। २०-२३ ।। बहुतस्य' गृह्येऽग्नौ सायम्प्रातराहुती येन न हुते, नापि दर्शपौर्यामासयौहुते

प्र० १ खं०९सू०१७-२५] यागान्तकर्माणि ॥
येन, तस्य 'प्रायश्चित्त' कर्त्तव्यं भवति'-'इति' हेतोः ब्राह्मणः' 'अव्रतः' निय-
माहुतिदानशून्यः 'न स्यात्' 'इति आदेशः ॥ ३८-१९ ॥
'अथ अपि' अपरमपि पक्षम् 'उदाहरन्ति' वदन्ति आचार्याः । तथाच-
'यावत्' कालं 'न हूयेत' सायम्प्रात)मो दर्शपौर्णमासहोमौ वा 'तावत्' 'अभो-
जनेन' भोजनमकृत्वैव 'सन्तनुयात्' कालहरणं कुर्यात् । 'श्रथ अनन्तरं काला-
तीतेऽपि 'यदा' यस्मिन्नेव समये 'अधिगच्छेतू' हव्यं होतारं वा, तदैव 'प्रति
जुहुयात्' सायमादिकालं प्रतीक्ष्य जुहुयात् । “एवमपि' अभोजनेन दिनकर्तनेनापि
व्रतं नित्यानुष्टेयं 'सन्ततम्। अविच्छिन्नं भवति', 'इति' गतमिदं प्रकरण
नित्यानुष्ठानस्य ।। २०-२३ ॥
भाषा-घोर आपात्त के कारण जल मिलना भी कठिन हो या न मिले,
तो जब तक होम का उपाय न हो, भूखे रहे, और हवनीय पदार्थ मिले या
'होता' मिले, उसी समय ठीक समय पर सायं या प्रातराहुति प्रदान करे
और दर्श या 'पौर्णमास याग' करे । यों भी उक्त कार्यों की नियमित कर्त-
व्यता रक्षा करे किन्तु ब्राह्मण विना 'व्रत' न रहे, क्योंकि प्रायश्चित करना
पड़ेगा ॥१८-२३ ॥
एषोऽत ऊर्ध्वहविराहुतिषु न्यायः ॥ २४ ॥
'अतऊर्ध' इतःपरं 'हविराहुतिषु' हविभिं चरुभिर्निष्पायेषु नैमित्तिकेषु
काम्येषु च सर्वेष्वेव होमेषु 'एपः' एवं 'न्यायः प्रकारः, अर्थतः पूर्वमुपधातहो-
मद्यं ततश्च उपस्तीर्णाभिधारितं प्रकृत्यैव हवनं कामिति ॥ २४ ॥
भाषा-अनन्तर चरु से होने योग्य जो याग कहे जावेंगे, उन स्थानों
में भी ठीक २ उसी प्रकार उलूखल, मूसल, स्थापनादि कार्य करे ॥ २४ ॥
मन्त्रान्ते स्वाहाकारः ॥ २५ ॥
'मन्त्रान्ते' हविःप्रदानमननसाधनवाक्यान्ते पूर्वत्र परत्र च सर्वत्रैव होमे 'स्वा-
हाकारः स्वाहापदं प्रयोक्तव्यम् ॥ २५ ॥
भाषा-आहुति के सब मन्त्रों के अन्त में 'स्वाहा' जोड़ कर बोले ॥२५॥

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- .. भाज्याहुतिष्वाज्यमेव सस्कृत्योपघातं जुहुयान्ना- ज्यभागौ न स्विकृदाज्याहुतिध्वनादेशे पुरस्ताचोपरिष्टाच- महाव्याहृतिभिर्होमो यथा पाणिग्रहणे तथा चूडाकर्म- ण्युपनयने गोदाने च ॥ २६-२८ !। 'प्राज्याहुतिः' यत्र हविभिनं हवनं विधेयमपि तु श्राज्यैरवाहुतयो विधास्य- ते, तत्र 'श्राज्यमेव संस्कृतस्य' चरुपाकाद्यायोजनमनर्थ कमित्युलूखलायुपसादनादि- कमकृत्वैव 'उपधात' प्रकृतयागस्योपोद्घातरूपमेकमेवहोमं 'जुहुयात्', भागो' चतुगृहीताद्याज्यभागद्वयात्मकमुपघातसवनं न कार्यम्; 'न स्विष्टकृद' स्विष्टकृद्यागोऽपि तत्रानावश्यकः । अपिच 'श्राज्याहुतिषु' सर्वत्रैव 'अनादेशे वि- शेषविध्यभावे सुतरां गर्भाधानादौ 'पुरस्तात्' प्रधानकर्मण: 'उपरिष्टाच्च' तम्य 'महाव्याहृतिभिः भूर्भुवःस्वरिति समस्ताभिः 'होमः' एकएव कार्यः । ननु चूडा- करणादावपि नास्ति कश्चिद् विशेषादेशइति तत्रापि किमेकएव होमो महाव्याहृति- 'भिरिति व्युदस्यत्यनेनातिदेशसूत्रेण, - 'पाणिग्रहणे' पाणिग्रहणनिमित्ते सति 'यथा' वक्ष्यामो होम-चतुष्टयम् 'महाव्याहृतिभिश्च पृथक् समम्ताभिश्चतुर्थीम्' इति 'चूडाकर्मणि, उपनयने, गोदाने च तिया' एव कार्य होमचतुष्टयमित्यतिदे- शसूत्रम् ॥ २६-२८ ।। भाषा--जो २ होम केवल प्राज्य ही से होने योग्य हैं, उन में श्राज्य- संस्कार मात्र करे उलुखल स्थापनादि की उन में आवश्यकता नहीं । और ऐसे स्थान में चरु से होम की नाईं चतुहीत या पञ्चगृहीत श्राज्य से दो 'उपघात' होम न करे। एक ही वार करे और 'उपस्तीर्णाभिधारित' होम भी न करे । और 'स्विष्टकृत' होम भी न करे । आज्याहुति के बदले और भी विशेषता है जो जिस किसी स्थान में विशेष विधि न हो # वहां मुख्य याग के पहिले और पीछे “भूः, भुवः, और स्वः" इन तीन महाव्याहृतियों का पाठ कर एक २ आहुति देवे परन्तु विवाह की जिस प्रकार व्यवस्था किवी Bypaper * अर्थात् गर्भाधानादि में ।

प्र०१ खं० ९ सू० २६-२९] यागान्तकर्माणि ॥ जावेगी ॐ चूड़ा करण, उपनयन, और गो दान में भी उसी प्रकार होगी। अपवृत्ते कर्मणि वामदेव्यगानईशान्त्यर्थशान्त्यर्थम् २8.8 'कर्मणि' नित्ये, नैमित्तिके, काम्ये वा सर्वत्रैव 'अपवृत्ते' समाप्ते सर्वान्तेइति यावत् 'वामदेव्यगानम्' वामदेव्यनामकस्य साम्नोगानम् (ऊ. गा० १,१,५) कर्तव्यम् , तच्च 'शान्त्यर्थं भवतीति शेषः । द्विरुक्तिरध्यायसमाप्तिद्योतिका ।२९।९ इति गोभिलगृह्यसूत्रे प्रथमप्रपाठके नवमखण्डस्य व्याख्यानं समाप्तम् ॥ इति गोभिल-गृह्यसूत्रे प्रथमः प्रपाठकः ॥ १-६ ॥ भाषा-क्या नित्य क्या नैमित्तिक, क्या काम्य सब ही होम के अन्त में 'वामदेव्य' गान करे; उस से सब प्रकार की आपत्तियों को शान्ति होती है ॥ गोभिलगृहसूत्र के प्रथम अध्याय के नवमखण्ड का भाषानुवाद पूरा हुआ १,६ प्रथम अध्याय भी समाप्त हुआ ॥१॥ * विवाह में विशेष विधि यह होगा कि 'भूः, भुवः. स्वः, इन तीन महान्याहृतियों के द्वारा भिन्न २ तीन और फिर इन को एकत्र करके पढ़े और एक, सुतरा ४ होम करे। उक्त महाव्या- हृति आदि भिन्न २ कर होम करने का ही नाम वास्तु होम है और एकत्रित पाठ पूर्वक होम करने को 'स्मस्त होम, कहते हैं । बिवाहादि में व्यस्त-समस्त (लंग और एकत्र) दोनों प्रकार होम होते हैं। * छन्द आर्चिक के द्वितीय प्रपाठक के द्वितीयार्द्ध में तृतीय दशति के पश्चम "कयानश्चित आ, ऋक् अवलम्बन करके तीन साम मन्त्र गाये गये हैं. वह 'गेय गान, के पश्चम प्रपाठक के प्रथमार्द्ध में २३, २४, २५. है उम मे तृतीय आय ब्राह्मणोक्त (१ १६) श्रुति अनुसार 'वाम देव्य, । उत्तरार्चिक के प्रथम प्रपाठकके प्रथमा में का द्वादश सूक्तके प्रथम भी 'कयानश्चित्र श्रा, ऋक् प्वं इस सूक्त के इस छन्द के और भी दो 'ऋक् है, “यद योन्यां तदुत्तरयोगायति” ताण्ड्य ब्राह्मणोक्त इस श्रुति के अनुसार इन दो में भी "वामदेव्या,, गान होता है। इन वामदेव्य क एकत्र गान होने से महावामदेव्यगान कहाता है। यह महावाम देव्य ऊहगान के प्रथम प्रपाठका के प्रथमार्द्ध में पञ्चम साम है

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्-
* महावाम देव्यमाम *
३
र
२
५
महावामदेव्यम् ।। काऽश्या । नश्चा३ इना३ श्राभुवात्।
२
२१
२
૨
उ । तीसदा वृधःस । स्वा । औ३ हो हाइ। कया२३ शचाइ।
टयोहो३ हुम्मा २। वातॊ३७५ हाइ (१) ॥ काऽस्त्वा ।
१
२
सत्योऽ३ मा३ दानाम् । मा । हिष्ठोमास्सादन्ध । सा ।
૨
२
-
१
औ३ होहाइ । दृढा२३ चिदा । रुजौहो३ । हुम्मा२। वाऽ३
सो३ऽ५ हायि ॥ (२)॥ श्राऽभी । युणाः सा३ रवीनाम् ।
२
र
४
२
२र
१
१
२
१
4-
२
आ । विता जरायितृ । णाम् । औ२३ होहायि । शता२३
म्भवा । सियो हो३ । हुम्मा२। ताऽ२ यो३७५ हायि ॥
(३) सामवेद० उ० अ० १ खं० ३ । म०१।२।३॥
* अथ द्वितीयप्रपाठकः *
॥ओं ॥ पुण्ये नक्षत्रे दारान् कुर्वीत ॥
'पुण्ये नक्षत्र ज्योति शास्त्रोक्त 'दारान्' पत्नी 'कुर्वीत' स्वीकुर्वीत ॥१॥
भाषा-ज्योतिष शास्त्रोक्त वैवाहिक नक्षत्रों से युक्त चन्द्रमा का योग
जब हो तब विवाह करे ॥ १॥
लक्षणप्रशस्तान् कुशलेन ॥२॥
कीदृशान् दारानित्याह- लक्षणप्रशस्तान्' प्रशस्तलक्षणोपेतान् 'कुशलेन'
लक्षणाभिज्ञजनेन परीक्ष्येति ॥२॥

प्र. १ ख १० सू०१-७] कन्यापरीक्षणम् ॥ ६ भाषा-शुभाशुभ लक्षणों को जानने वाले व्यक्ति से परीक्षा करा कर अच्छे लक्षण वानी कन्या से विवाह करे ॥ २ ॥ तदलाभे पिण्डान् ।। ३ ।। 'तदलाभे' लक्षणपरीक्षकालाभे लक्षणविचारेण सुलक्षणाया श्रावे च 'पि- एडान्' मृत्पिण्डग्राहणपरीक्षान् कुर्वीतेति ॥ ३ ॥ भाषा परीक्षक व्यक्ति न मिले तो या सब लक्षणों से युक्त कन्या न मिले तो कन्या को ढेना छुला कर परीक्षा करे ॥ ३ ॥ वेद्याःसीतायाहदाद्गोष्ठाच्चतुष्पथादादेवनादादहनादीरि- णात्सर्वेभ्यःसम्भार्यनवम समानकृतलक्षणान् ॥४-६।। 'वेद्याः' 'यज्ञीयवेदीतः' 'सीतायाः' लाङ्गलकृष्टस्थानात्, 'हूदाल्' अगाधजल- स्थानात्, 'गोष्ठात्' गोस्थानात्, 'चतुष्पथातू' 'श्रादेवनात्' देवनं द्यूतस्थानं तस्मात्, श्रादहनात्' श्मशानात्, 'ईरिणात्' उषरप्रदेशात् मृदो गृहीत्वा 'समान् तुल्यप्रमा- णादिकान् किञ्च 'कृतलक्षणान्' यतश्च यो मृत्पिण्डोगृहीतः तद्द्योतकचिन्हीकृतान् पिण्डान् कुर्वीतेति अष्टौ पिण्डाः सम्पन्नाः । 'सर्वेभ्यः' पि डेभ्यएव सम्भार्य' कि- 'ञ्चित् किञ्चिदाहृतमपि पिण्डमेकं कुर्वीत, तदेव 'नवम' पिण्डानां भवेत् ॥४-६॥ भाषा-यज्ञवेदी से, जोती हुई भूमि से, अगाध जलाशय से, गोशाला से, चतुष्पथ से, द्यूतस्थान से, श्मशान से, उषर भूमि से कुछ २ मिट्टी लेकर आठ भिन्न २ स्थानों में मिट्टी को पिण्ड बनाकर रक्खे, पिण्डों में से कुछर मिट्टा निकाल कर एक पिण्ड रक्खे इस प्रकार : पिण्ड रक्खे ॥ ४-६ ॥ पाणावाधाय कुमार्या उपनामयेदृतमेव प्रथम-मृतं नात्येति कश्चनइयं पृथिवी श्रिता सर्वमिदमसौ भूया दिति तस्या नाम गृहीत्वैषामेकं ब्रूयात्पूर्वेषां चतुर्णा गृह्णन्तीमुपयच्छेत् सम्भार्यमपीत्येके ॥ ७-६ ॥ उक्तान् पिण्डान् 'पाणी' 'प्राधाय' 'कुर्मायाः' विवाहार्थपरीक्षणीयायाः 'उप गृहाणेति गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - समीपे 'नामयेत्' स्थापयेत् । तत्र मन्त्रः-ऋतमेवेत्यादिभूयादित्यन्तः । ततश्च 'तस्याः' कुर्मायाः 'नाम' गृहीत्वा तां सम्बोधयित्वेति यावत् , 'एषां' पिण्डानां नवानाम् 'एक' यं कमपि 'गृहाण'-'इति' ब्रूयात् । तथाचोक्ते-'पूर्वेषां चतुणां' वेदी-सीता-हद-गोष्ठीयमृन्निर्मितानां यं कमपि 'गृह्णन्तीम्' ताम् 'उपयच्छेत्' उ- दुवहेत । 'एके श्राचार्याः 'सम्भार्य नवमं पिण्डं गृह्णन्तीमपि उपयच्छेत् इत्याहुः । चतुष्पथ देवन श्मशानोषरस्थानीयमृन्निर्मितपिण्डानामेकतमं गृह्णन्ती दुर्लक्षणेति नोद्वाह्येति सुतरां फलितम् । इति कन्यापरीक्षणम् ॥ ७-९ ।। भाषा-उक्त नव पिगडों को हाथ में लेकर जो कन्या विवाह के लिये हो इस के निकट लावे, और 'ऋत' प्रभृति मन्त्रों का पाठ कर बोले कि 'हे अमुकि ! इन पिण्डों में से जिसे तुम्हारी इच्छा हो उसे उठा लो। यों यदि उक्त चार में से एक अर्थात् वेदी जोती हुई भूमि, तालाब, ह्रद या गोशाला कापिण्ड लेवे तो उसको सुलक्षण समझ कर विवाह करे। कोई २ कहते हैं कि, यदि नवम पिण्ड ग्रहण करे, तो उस कन्या के साथ विवाह करे किन्तु चतुष्पद, चूत स्थान, श्मशान, या ऊपर मृत्तिका के ग्रहण करने से कदापि विवाहने योग्य नहीं ॥ कन्यापरीक्षा पूरी हुई ॥ ७-६ ॥ क्लीतकर्यवैमाषैर्वाऽऽप्लुतार सुहृत् सुरोत्तमेन सशरीरां त्रिमूर्द्ध न्यभिषिञ्चेत् कामवेद ते नाम मदोना- मोसीति समानयामुमिति पतिनाम गृह्णीयात् स्वाहाका- रान्ताभिरुपस्थमुत्तराभ्यां प्लावयेत् ज्ञातिकमैतत् १०,११ 'क्लीतकैः' चूर्णीकृतैः 'यवैः मासैः वा' 'श्राप्लुताम्' मर्दिताङ्कां कन्यां 'सुहृत्' कन्यायाएव काचित् सखी 'सुरोत्तमेन' उत्कृष्ट जलेन 'सशरीरा' शरीरसहितां तां 'मूर्द्धनि' मस्तके 'त्रिः त्रिवारम् 'अभिषिञ्चेत् । वेद ते नाम मदो नामासि समानयामुसुरा ते अभवत् । तपसो निर्मितोसि स्वाहा ॥२॥ इमन्त उपस्थं मधुना ससूजामि प्रजापते. मुखमेतद् द्वितीयम् । तेन पुसोऽभिभवासि सर्वानवशान्वशिन्वसि राज्ञी स्वाहा ॥ ३॥ अग्निं क्रव्यादकृण्वन् गुहानाः स्त्रीणामुपस्थमृषयः पुराणाः । तत्र “काम परमत्र जन्माने प्र०२खं.७ सू०१०-१६] ज्ञातिकर्म ॥ तेनाज्यमा बैश्चङ्गत्वाष्ट्रं त्वयि तद्दधातु स्वाहा” ॥ ४ ॥ (मं० प्रा० १,१,) ऋग्भिरभिषिञ्चनम् तत्र च समानयामुमिति मन्त्रे अमुमित्यस्य स्थाने 'पतिनाम भाविभनु नाम 'गृह्णीयात्' । किञ्चोक्ताभिषिञ्चनमन्त्राणाम् 'उत्तराभ्यां द्वाभ्याम् 'उपस्थं कन्याया विशेपेण 'प्लावयेत्' धावयेत् । 'एतत्' अभ्यङ्ग-मईन पूर्वक- मुपस्थधावनान्तं लानं 'हातिकर्म' इत्युच्यत इति गतं ज्ञातिकर्म ॥ १०-११॥ भाषा-यव चूर्ण, या उड़द के चूर्ण से कन्या का सब अङ्ग मल कर कन्या की किसी लखी से उसी "कामवेद०” प्रभृति स्याहा कागन्त भीन मंत्रोंको पढ़ कर कन्या के माथे पर तीन वार उत्तम जल इस प्रकार ढाल दे जिस से कन्या का शरीर अच्छे प्रकार धो जावे, विशेषतः इन तीन के शेष (३ य और ४ र्थ) दो का पाठ कर इस कन्या के उपस्थ इन्द्रिय को अच्छे प्रकार धो दे यह ज्ञातिकर्म' है ॥ १०, ११ ॥ पाणिग्रहणेपुरस्ताच्छालायाउपलिप्तेऽग्निरुपसमाहितोभवति 'पाकि ग्रहणे' करीये 'शालाया' मध्ये 'पुरस्तात्' 'पूर्वस्यां दिशि' 'अग्निः' 'उपममाहितः' संस्थापितः 'भवति' भवेत् ॥ १२॥ भाषा-विवाह कालमें अग्निशाना या घरके बीच पूर्व दिशा में अग्नि रक्खे ॥१२॥ अथ जन्यानामेकोध्रुवाणामपाङ्कलशं पूरयित्वा सहोदकुम्भः प्रावृतोवाग्यतोऽग्रेणाग्निम्परिक्रम्यदक्षिणत उद्ङ्मुखोऽव- निष्ठतेप्राजनेनान्यःशमीपलाशमिश्राश्च लाजाश्चतुरञ्ज- लिमात्राछूणोपसादयन्तिपश्चादग्नेशत्पुत्रञ्च ॥१३-१६॥ 'अथ' अनन्तरं 'जन्यानां कन्याज्ञातिजनानां मध्ये 'एकः' अन्यतम 'ध्रुवाणां' अति- प्रखरतापेऽप्यशुष्क जलाशयोस्थितानाम् 'अपां' 'कलशं पूरयित्वा"प्रावृतावस्वाच्छा- दितः, वाग्यतः' अनियमितवाक् शून्यः, 'अग्निम् तम् 'अग्रेण कृत्वा परिक्रम्य', 'दक्षिणतः' दक्षिणस्यामग्नेः 'उदङ्मुखः' उत्तराभिमुखश्च सन् 'अवतिष्ठते' अवति- ष्ठेत अवस्थिति कुर्यात् । 'अन्यः' तथैवैकः पुरुषः 'प्राजनेन' गवादिचालनदण्डेन सार्क प्राजनहस्त इति यावत् अवतिष्ठतेत्येव । 'शमीपलाशमिश्रान्' 'चतुरञ्जलि- 21 - गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- मात्रान् लाजान् च सूर्पण,कृत्वा तत्रैव अग्नेः पश्चात् प्रदेशे उपसादयन्ति स्थापयन्ति स्थापयेयुः ये के चात्मीयजना इति । 'दृशत्पुत्रं दृशदः पेषणाधारस्यशिलाखण्डस्य क्रोडे पुत्रवत् शेते य उपल: पेपणकरः तम् 'च'अपि उपसादयन्तीत्येव ॥१३-१६॥ भाषा-अनन्तर कन्या का सम्बन्धी जलाशय (जिसमें सदा जल रहे) से कलश भर जल लेकर कपड़ेसेढाक एकाग्र हो,अग्निके सम्मुख रक्ख प्रदक्षिण क्रमसे अग्निके दक्षिण में उतर मुख होकर बैठे । और भी एक व्यक्ति डंडा हाथमें लेकर रहे । अग्निकेपश्चात् भागमें शमीपत्र मिला चार अञ्जलि परमित लाजा और एक लोढ़ा रक्खे ॥ १३ २६ ॥ अथ यस्याः पाणिं ग्रहीष्यन् भवति सशिरस्काप्लुताभवति 'अथ' अनन्तरं 'यस्याः कन्यायाः 'पाणि 'ग्रहीप्यन् भवति' वरः,सा कन्या 'सशिरस्का' शिरः सहिता प्राप्लुतां स्नाता भवति' भवेत् । इति विवाहदिवसी- यकन्यास्नानम् ॥ १७॥ भाषा-और वर जिस कन्या का पाणिग्रहण करे; उस को मस्तक तक स्नान करा देवे। यह विवाह के दिन कन्या का स्नान होता है ॥ १७ ॥ अहतेन वसनेन पतिः परिदध्याद् या अकृन्तन्नित्ये. तयर्चा परिधत्त धत्त वाससेति च ॥ १८ ॥ एतत्स्नानानन्तरं 'पतिः' भावी "या प्रकृन्तन्नवयन् या अतन्वत याश्च देख्यो अन्तानभितो ततन्थ । तास्त्वा देव्यो जरसा संन्यन्त्वायुष्मतीदं, परिधत्स्ववासः' ॥५॥ (म० ब्रा० १,५,५)-'इत्येतया ऋचा' "परिघत्त धत्त वाससैना शतायुषी कृणु त दीर्घमायुः। शतं च जीव शरदः सुवर्चा, वसूनि चार्य वि. भृजासि जीवन्" ॥ ६ ॥ ( म० बा० १, ३, ६ )-'इति' अनया ऋचा च' 'अहतेन' अखण्डेन 'वसनेन परिदध्यात्' अहतं वसनं तां परिधापयेदित्यर्थः। इति कन्यावास परिधापनम् ॥ १८॥ भाषा०-फिर-पति “या अकृन्तन्" एवं परि धत्त धत्त वाससा" मन्त्र पढ़ कन्या को अखण्ड वस्त्र पहनावे । यही कन्यावास परिधापन" है ॥१८॥ - Tara प्र०२खं० १ सू० १७-२६] परिणय विधिः ॥ ६ १ प्रावृतां यज्ञोपवीतिनीमभ्युदानयजपेत् सोमोऽद्गन्ध- वायेति पश्चादग्नेः संवेष्टितङ्कटमेवञ्जातीयं वाऽन्यत् पदा प्रव- तयन्ती वाचयेत् प्र मे पतियानः पन्थाः कल्पतामिति स्वय- अपेदजपन्त्याम्प्रास्याइतिपहिषोऽन्नछूटान्तम्प्रापयेत् १६-२२ ततश्च 'प्रावृता' आच्छादितां किञ्च यज्ञोपवीतिनी' यज्ञोपवीतयुतां तां कन्याम् 'अभि' अभिमुखम् उत्' उत्कृष्टरूपेण प्रानयन्' समीपमानीय भावी पतिः सोमोऽददद गन्धर्वाय, गन्धवोऽदददग्नयेरयिञ्च पुत्रांश्चादादग्निर्मह्य मथोइमाम" ॥७॥ (म० ब्रा० १, १, ७)'-'इति' मन्त्रं 'जपेद' पठेत् । अपिच 'अग्नेः पश्चात्' 'संवेष्टितं कटम्' एवजातीयं कटतुल्यम्' 'अन्यत्' वास्तवा 'प्रवर्तयन्ती' पदा चालयन्ती "प्र मे पतियानः पन्थाः कलाता शिवा अरिष्टा पतलोकं गमेयम्" ॥ ८ ॥ (म० ब्रा० १, १, १, १, ८) 'इति' बन्— 'वाचयत्' । 'अजपन्त्यां' तस्यां "प्रास्याः पतियानः पन्थाः कल्पता शिवा अरिष्टा पतिलोक गम्या:" ॥ ९ ॥ (म० ब्रा० १, १, ९ वा)-इति' इमं मन्त्रं 'स्वयम् एव जपेत् । एवमेव चालयन्ती कटा- न्तं 'बहिपः' श्रास्तृतस्य 'अन्त' समीपं 'प्रापयेत् ॥ १५-१२॥ भाषा--तब कन्या को कपड़ा से ढाक कर, जनउ पहना कर पति अपने सामने निकट लाकर 'सोमोददद्' मन्त्र पढे, एवं अग्नि के पीछे स्था- पित 'कट' या इसी प्रकार का अन्य प्रासन, कन्या के पैर से चलाकर अग्नि के समीप विछाया हुआ 'बर्हि' तक ले आवे । उस समय वधू को "प्र मे०" मन्त्र पाठ करावे, वह न कर सके तो पति 'प्रास्या' मन्त्र स्वयं पढ़े॥१६-२२॥ पूर्वे कटान्ते दक्षिणतः पाणिग्राहस्थोपविशति दक्षि- णेन पाणिना दक्षिणमसमन्वारब्धायाः षडाज्याहुतीर्जु- होस्यग्निरेतु प्रथम इत्येतत्प्रभृतिभिर्महाव्याहृतिभिश्च पृथक् समस्ताभिश्चतुर्थीम् ॥ २३-२६॥ 'पूर्वे कटान्ते' कटस्य पूर्वप्रान्ते 'पाणिग्राहस्य' पाणिग्रहणे प्रवृत्तस्य भाविपत्युः दक्षिणतः 'दक्षिणस्याम् 'उपविशनि' वधूरितिशेषः (२३) । दक्षिणेन पाणिना' गोभिलगृहासूत्रटीकायाम् TRINAVRRIORMATMARATGammam HODHADMINSamweams . , वरस्य दक्षिणम् अंसम्' 'अन्वारब्धायाः' अन्वारम्भमा पृष्टतः स्पर्शनं तत् कुर्वा- गायाः वध्वाः ग्रहणद्योतकसङ्गलकामनया "अग्निरेतु प्रथमो देवताभ्यः, सोस्यै प्रजा मुञ्चातु मृत्युपाशात्, तदयं राजा वरुणोऽनुमन्यतां । यथेय स्त्री पौत्रमधं न रोदाद स्वाहा ॥ १० ॥ इमामग्निखायतां गार्हपत्यः, प्रजामस्यै जरदष्टिं कृणोतु । अश- न्योपस्था जीवतामस्तु माता, पौत्रमानन्दमभि विबुध्यतामिय स्वाहा ॥ ११ ॥ द्यौस्ते पृष्ट रक्षतु वायुरूरू अश्विनौ च स्तनन्धयन्ते पुनाविताभिरक्षत्ववास- ट्रपरिधानाद, बृहस्पतिविश्वेदेवा अभिरक्षतु पञ्चात् स्वाहा ॥ १२॥ मा ते गृहेष निशि घोप उत्थादन्यत्र त्वद्रुदन्यः संविशन्तु । मा रुदन्युर श्रावधिष्ठा जीव- पल्ली पतिलोके विराज, पश्यन्ती प्रजा सुमनस्यमाना; स्वाहा ॥ १३ ॥ अप्र- जस्यं पात्रगत्यं पाप्मानमुत वा अपम् । शोर्णः सजमिवोन्मुच्य द्विषद्भ्यः प्रति- मुञ्चामि पाश स्वाहा ॥ १४ ॥ परैतु मृत्युरमृतं म भागाद, वैवस्वतो नो अ- भयं कृणोतु परं मृत्यो अनुपोहि पन्यां यत्र नो अन्यं इतरो देवयानात् । चक्षु- प्मते गवते ब्रवीमि मानः प्रजा, रीरिपो मोत वीरान् स्वाहा' ॥ १५॥ १ ( म० वा० १, १, १०-१५)-इत्येतत् प्रभृतिभिः पड्भिर्मन्त्रैः 'पट् श्राज्या- हुतीः 'जुहोति' जुहुयात् पाणिग्राह इति शेषः (२४)। 'महाव्याहृतिभिः' ति- सृभिः 'पृथक् विभिन्नाः तिस्र पाहुतीर्जुहुयात् (२५)। समस्ताभिः' ताभिः 'चतुर्थीम् आहुति 'च' जुहुयात् (२६)॥ २२-२६ ॥ इति सामवेदीये गोभिलगृह्यसूत्रे द्वितीयप्रपाठकप्रथमखण्डस्यव्याख्यानं समाप्तम् २-१ भाषा-पैर से चनाई हुई चटाई के पूर्व प्रान्त में विवाह के लिये प्रवृत्त पति के दाहिनी ओर वधू बैठे ॥ २३ ॥ कन्या अपने दाहिने हाथ से वर के दक्षिण स्कन्ध छू लेवे, एवं वर कन्या के ग्रहण द्योतक कल्याण प्रार्थना करने में प्रवृत्त होकर 'अग्निरेतु प्रथमः" प्रभृति छः मन्त्रों से छ: आहुनि प्रदान करे ॥ २४ ॥ पीछे 'भूः' भुवः और स्वः' महाव्यहृतियों का पाठ कर, भिन्न २ तीन होम करे ॥ २५॥ एवं तीन को एकत्र 'भूर्भुवः स्वः' पढ़ कर चौथा होम करे ॥ २६॥ मामिलगृह्यसूत्रके द्वितीय अध्यायक प्रथम खण्डका भाषानुवाद पूराहा २१ प्र०२खं० १३०-४] परिणयविधिः॥ ६ MINDEMERG ----.. हुत्वोपोत्तिष्ठतः ॥ १ ॥ 'इत्वा' मवाव्याहृन्यन्तम् 'उपोत्तिष्ठतः' उपोत्थानं मिथः पृष्टतः स्कन्धार्पित- हस्तौ सन्तौ उत्मानं कर्वतः दम्पतीति ॥ ॥ भाषा-महाव्याहृनि हाम के बाद दोना एकत्र 'उपोर न करें । उत्थान कान में घर के दहिने ग्थ में, कन्या के पीट पर होकरवायकन्धेपर रहे ॥१॥ अनुपृष्ठं पतिः परिक्रम्य दक्षिणत उदङ्मुखोऽवति- ष्ठते बध्वालिं गृहीत्वा ।। २ ॥ 'पति:' अनपृष्ट परिक्रम्य' पृष्टपरिक्रमणेन 'दक्षिगातः' पतन्या दक्षिणम्यां गतः पनि: "बध्वजलिं गृहीत्वा' उदङ्मुखः' सन् 'अवतिष्ठने' ॥ २ ॥ भाषा-पति, बधू के पीठ की ओर हो कर दहिने ओर चल कर, उस की अञ्जलि पकड़ कर उत्तर मुंह हो बैठे ॥ २ ॥ यूवा माता लाजानादाय भ्राता वा बधूमाकामयेद- श्मानं दक्षिणेन प्रपदेन ॥ ३ ॥ 'माता भाता वा' 'लाजान्' 'श्रादाय' गृहीत्वा स्वान्तिके 'वधू' 'नक्षिणेन प्रपदेन' 'अश्मान' सोपलशिलापट्टकम् 'श्राकामयेत्' श्रारोहपेत् ॥ ३ ॥ भाषा--माना, या भ्राता लाजा लेकर वधूको दहिने पैरके अप्रभाग से लोढ़ा सहित शिला पर चलावे ॥३॥ पाणिग्रहो जपतीममश्मानमारोहेति ॥ ४ तस्मिन्ने वाक्रमणकाले "इममश्मान मारोहाश्मेव ७ स्थिरा भव । द्विष- •त्तम पवाधस्व मा च त्वं द्विषतामध" ॥ १ ॥ (म० ब्रा० १,२,१) 'इति'इमं मन्त्रं 'पाणिग्राहः' पाणिग्रहणकारी पति: 'जपति' जपेत् पठेदित्यर्थ ॥ ४ ॥ भाषा--'अश्मारोहण' समय पति 'इम्मश्मानमारोह' मन्त्र को पढे ॥४॥ सकृत् संगृहीतं लाजानामञ्जलिंभ्रातावध्वञ्जलावावपति तसोपस्तीर्णाभिधारितमग्नौ जुहोत्यविच्छिन्दत्यञ्जलि- गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्-- on- - मियं नार्युपतेऽयमांनु देवपूषणमित्युत्तरयो हुँते पति येथेत परिव्रज्य प्रदक्षिणमग्निपरिणयति मन्त्रवान् ब्राह्मणः कन्यतापितृभ्यइति परिणीता तथैतावतिष्ठते तथाऽऽक्रा- मतितथाजपतितथाऽऽवपतितथाजुहोत्येवं त्रिः ५-१०॥ 'सकृत' एकवारं 'सगृहीतं' 'लाजानाम् अञ्जलिं 'भ्राता' 'वध्वजला' स्वभ. गिन्या अञ्जलौ "प्रावपति" प्रयच्छति (५) 'सा' वधूः 'तम्' भ्रातृदत्तम् 'अञ्ज- लिं' लाजाञ्जलिम् उपस्तीर्णाभिधारितं पूर्वोक्तप्रकारेण (11८४) प्रकृत्य 'अ. विन्छिन्दती' विच्छेदमञ्जलिभेदमकुर्वन्ती ‘इयं नार्युपते ऽग्नौ लाजानावपन्ती । दीर्घायुरस्तु मे पतिः । शतं वणि जीवत्त्वेधन्तां ज्ञातयो मम स्वाहा' ॥२॥ (म. बा० १,२, २ }--'इति' अनेन मन्त्रेण 'अग्नौ' 'जुहोति' जुहुयात् ( ६ ) हुते' लाजहोमे सम्पन्ने अनन्तरं 'मन्त्रवान्' अधीतवेदो 'ब्राह्मणः' * 'पतिः' 'यथा" येन प्रकारेण पत्नींपृष्ठदेशेन 'इतं, गतं, तथैव 'अग्नि, 'प्रदक्षिणं' यथास्यात् तथा 'परिवज्य, प्रत्यागत्य "कन्यला पितृभ्यः पतिलोकं यतीयमपदीक्षामयष्ट । कन्या उत त्वया वयं धारा उदन्या इवातिगाहेमहि द्विषः ॥ ५ ॥ (म० प्रा० ३, २, ५)-इति' अनेन मन्त्रेण परिणयति' तां कन्या मिति शेषः, पतिलोक- प्रापरणं बोधयति कन्या मिति भाव; (९) 'परिणीता च सा पत्नी तथैव' पूर्वोक्त- प्रकारेणैव ( २ सू०) 'अवतिष्ठते'; 'तथा' एवं 'आक्रामति' अश्मानम् (३०) 'तथा' एवं 'जपति' (४०) पतिः; 'तथा' एव (पसू०) 'प्रावपति' भ्राता; 'तथा' एव (६ सू०) 'जुहोति' वारद्वयम् कन्या स्वयमेव (९) अन च 'उत्तरयोः' लाजा- होमयोः "अर्यमणं नु देवं कन्या अग्निमयक्षत । स इमां देवो अर्यमा प्रेतो मु- शाहु मा मुत स्वाहा' ॥ ३ ॥ (म० बा० १, २, ३)-"पूपणं नु देवं कन्या . का * मन्त्रवत्वेनैव ब्राह्मणत्वं पतियोग्यत्वञ्च त्येव द्योतयितु मिह पदयुरेवं विशेषणद्भयम् । कुञ्चिदिइ वा, पदमपि, पर मदधीतादिपुस्तकेषु सर्वत्रैवात्र 'वा, पदस्यादर्शनात् परिणयकाले कथ- मपि पदयतुपस्थितेरसम्भवात् प्रतिनिधेरत्यन्तानावश्यकत्वाचासङ्गतएव तादृशः पाठ इत्यनिच्छ- पत्त्यक्त मिह मुहृदो मत मातच तत्त्वकारस्येति सत्यः ।

प्र.२ खं० २ सू०५-१३ ] पाणिग्रहणम् ॥ अग्निमयक्षत । स इमां देवः पूषा प्रेतो मुञ्चातु मा मुत स्वाहा" ॥ ४॥ (म. ब्रा० १, २, ४)-इति एतौ मन्त्रौ यथाक्रमेण प्रयोत्तव्यावित्येव विशेषः (७) 'एबम्' प्रथमलाजाहोमेनोत्तरलाजाहोमद्वयमेलनेन सङ्कलनया 'त्रिः' होमवयं सम्प- झम् । (१०) इति गता परिणयक्रिया ॥५-१०॥ भाषा-कन्या का भाई, एक ही वार एक अञ्जलि ला जा लेकर अपनी बहिन की अञ्जलि में देवे, भाई की दियी हुई लाना की अजलि को पू. वोपदेशानुयार ( १८३-४) 'उपस्तीर्णाभिधारित' कर मजलिमलगर न हो सावधानी से “इयं नार्युपते" मन्त्र से: वधू अग्नि में आहुति देवे । ६। यों आहुति देने पर, वेदज्ञ ब्राह्मण पति ने जिस प्रकार गम्मन किया था, उसी प्रकार । अर्थात् कन्या को आगे लेकर अग्नि की प्रदक्षिणा काते हुये, पुनः आकर 'कन्यला पितृभ्यः' मन्त्र पढ़ कर कन्या को 'परिणीता' करे । अर्थात् कन्या जो पति लोक पाती है, यह बात उसे समझा देवे॥८॥ याँ वधू परिणीता होने पर और भी दो वार उसी प्रकार अवस्थान ( सू० २), अश्माकामण ( ३ सृ०), मन्त्र पाठ, (सू० ४), लाजा वपन (सू०५) और लाजाहोम करे। (६) किन्तु इन दोनों होम में पूर्वमन्त्र नहीं पड़े । उसके बदले में 'अर्यमणं नु देवं' एवं 'पूषणं' दो मन्त्रों को कम से पढ़े ॥७॥ यों तीन लाजा होम होंगे। इसीको 'परिणाय' कहते हैं ॥५-१०॥ शूर्पण शेषमग्नावोप्य प्रागुदीचीमभ्युत्क्रामन्त्ये कमिष- इति दक्षिणेन प्रक्रम्य सव्येनानुक्रामेन्मा सव्ये न दक्षिण- मतिक्रामेति ब्रूयात् ॥११-१३॥ 'शेष' लाजानम्, 'शूर्पण' गृहीत्वा 'अनौ' 'श्रोप्य' अमन्त्रकमेव निक्षिप्य प्रा- गूदीचीम्' ऐशानी विदिशम् "एक मिषे विष्णुरत्वा नयतु ॥६॥ जे विष्णु- स्त्वा नयतु ॥ ७ ॥ त्रीणि व्रताय विष्णुस्त्वा नयतु ॥८॥ चत्वारि भयो भवाय विष्णुस्त्वा नयतु ॥ ९॥ पञ्च पशुभ्यो विष्णुस्त्वा नयतु ॥१०॥ षडायस्पो. पाय विष्णुस्त्वा नयतु ॥ ११ ॥ सप्त सप्तभ्यो होत्राभ्या विष्णुस्त्वा जयतु ॥ १२ ॥ सखा सप्तपदी भव सख्यं ते गमय सख्यं ते मायोषाः सख्यं ते माधोट्याः ।

७२
गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्-
mas-
१३ ॥ ( १, २, ६ ७" 'इति हातभिः यजुभिः ससबारमुत्तरोत्तरम् अभ्युन्ताम-
न्ति मात्रादिपरिजना वधूमिति (११) तत्र चाकामहासमुपदिशति;-'दक्षिणेन
पादेन' प्रक्रम्य' भूमिम् , 'अनु' पश्चात् 'मच्येन' पादेन 'कामेत्' तामेव स्थलीम्
(१२ . परं तत्रापि 'मव्येन दक्षिणं मा प्रतिकाम'-'इति' इम मुपदेशं याद
ताम् (१३) एवञ्च प्रथमं सव्यपादक्षेपणं, सव्येन पादेन दक्षिणपादाक्रमणच
निषित मिति । गतमिदं सप्तपदीगमनम् ।। ११-१३॥.
•षा-तीन बार के होम से बचा लाना आदि सूप में लेकर विना मन्त्र
आग्न में डाल । ईशान कोण में 'एक मिषे' प्रभृांत सात मन्त्र पढ़ २ कर
वधू को क्रम सं, सात पग चलाव । ध्यान यह रहे कि पहिले वायां पैर आगे
न रव, और वायें पैर से दक्षिणा पग आक्रान्त भी न हो । यही 'समपदी-
गमन ह ॥ ११-१३ ॥
ईक्षकान् प्रतिमन्त्रयेत सुमङ्गलीरियं वधूरिति ॥१४॥
तदनन्तरम् "सुमङ्गली रियं बधूः रिमा समेत पश्यत । सौभाग्य मस्यै दत्त्वा
यायास्तं विपरेतन" ॥ १४ ॥ (म० प्रा० १, २, ८) 'इति' इमं मन्त्रं पठन्
पाणिग्राहः 'ईक्षकान्' विवाहदशकान् सर्वानेवाविशेषेण 'प्रति मन्त्रयत' प्राशी:
प्रार्थ येत । इदमेव प्रेक्षकामन्त्रणम् ॥ १४ ॥
भाषा-अनन्तर सुमङ्गलीरियं 'वधू' मन्त्र को पढ़ कर दर्शकों से
आशीर्वाद लेने का पात्र होवें ॥ १४ ॥ यही कन्या निरीक्षण है।
अपरेणामिमौदकोऽनुसंबज्य पाणिग्राहं मूर्द्धदेशेऽवसि-
ञ्चति तथेतराईसमञ्जन्त्वित्येतयर्चा ॥ १५ ॥
ततश्च 'औदका रदककुम्भयुक्तः कश्चन पुरुष: 'अग्निम् अपरेण' अग्नेः पश्चि-
मतः दम्पतीस्थानं 'अनुसंवज्य' समागत्य 'पाणिग्राह' वरं 'तथैव इतर वधूश्च
"समजन्तु विश्वेदेवाः समापोः हृदयानि 'नौ। सम्मातरिश्वा सन्धाता समुदेष्ट्री
दधातु" ॥ १५ ॥ (म० प्रा० १, २, ९) 'इति एतया ऋचा दम्पतीम्यामुच्य-
मानया स्वपनकालं संलक्ष्य 'मूर्द्धदेशं तयोरुभयोरेव 'अवसिन्धति' श्रा सिन्चेत
(उदकेनैवेत्यासिञ्चनम् ॥ १५॥

प्र. २ खं०९सू०६-१७] पाणिग्रहणम् ॥ wwwwwwwmtive ToRNuwww.ameramanupmNSHOWRONMENow momwww भाषा-अनन्तर कोई जल्नवाहक व्यक्ति अग्नि के पश्चम भाग में आ- कर विवाह के लिये उद्यन वर और कन्या के माथे पर जा ढान्न कर स्नान करावे और, उसी समय दम्पति एक वाक्य से 'सम जन्तु' मन्त्र पढ़े ॥१५॥ अवसिक्तायाः सव्येन पाणिनाञ्जलिपोद्गृह्यदक्षिणेन पाणिना दक्षिणं पाणिरुं साङ्गुष्ठमुत्तानं गृहीत्वैताः षट् पाणिग्रहणीया जपति गृभ्णामि त इति ॥ १६ ॥ 'अवसिक्तायाः' वध्वाः 'अञ्जलिं' 'सान पागिना' 'उपोद्गृह्य स्वसमीपे ऊर्धीकरणपूर्वकं प्रगृत्य, तस्याएव 'सागुष्ठम्' अङ्गुष्ठसहितम् ‘उत्तान' पृष्ठनि- म्नं 'पाणिं श्रामणिबन्धाङ्गुलिचर्य 'दक्षिणेन पाणिना' 'गृहीत्वा' "गृभ्णामि ते सौमगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टियासः । भगो अयमा सविता पुरन्धिर्मां त्वो दुर्गार्हपत्थाय देवाः ॥ १६ ॥ अघोरचक्षुरपतिघ्नेयधि शिवा पशुभ्यः सुमनाः सुवर्चाः । वीरमूर्जीवसूर्देवसूर्देवकामा स्योना शन्नो भव द्विपदेशं चतुष्पदे ॥१७॥ आ नः प्रजां जनयतु प्रजापतिराजरमाय समनत्वर्यमा । अदुमङ्गलीः पतिलोक माविश शन्नो भव द्विपदेशं चतुष्पदे ॥ १८ ॥ इमां त्वमिन्द्रमीढ्वः सपुत्रां सु- भगां कृधि । दशास्यां पुत्रानाधेहि पति मेकादशं कुरु ॥ १९॥ संम्राज्ञी श्वशुरे भव संम्राज्ञी श्वश्यां भव । ननान्दरि संम्राज्ञी भव संम्राज्ञी अधिदेवृषु ॥ २० ॥ मम व्रते ते हृदयं दधातु, मम चित्त मनुचितं ते अस्तु । मम वाच मेकमना जु- षस्व वृहस्पतिस्त्वा नियुनक्तु मह्यम्” ॥ २१ ॥ (१, २, १. १५) इति'-'एताः' 'पाणिग्रहणीयाः' पाणिग्रहणाथबाधिकाः ऋचः षट् जति 'जपेत् प्राणिग्राह इति शेषः। इात गतं पाणिग्रहणम् ॥१६॥ भाषा--- पति, जल सिक्त बंधू के अजलि का वायें हाथ से ग्रहण कर अपने निकट कुछ ऊपर लेकर दहिने हाथ से उस के अगूठे सहित उत्तान इहिना हाथ को पकड़ कर “गृभ्णामिन” मन्त्र पढ़े । यही विवाह ह ॥१३॥ समासासूद्वहन्ति ।। १७ ॥ २ ॥ 'समातासु' पाणिग्रहशान्तक्रियासु 'उद्वहन्ति पतिली

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गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्--
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,
स्वजनाः रथादयो वा करणादीनामपि कर्तृत्वं भवत्येव, कारकाणां विवक्षाधीन-
त्वात् 'काष्ठाः पचन्ति' इत्यादि भाष्यमेव निदर्शनमिति । इत्युद्धाहः ॥ १७ ॥
इति सामवेदवेदीयेगोभिलगृह्यसूत्रे द्वितीयप्रपाठकेद्वितीयखण्डस्यव्याख्यानंसमाप्तम् २-२
भाषा--पाणिग्रहण तक सब क्रिया समाप्त होने पर, वधू को आत्मीय
गण, रथ आदि पर, सवार करा पति के घर पहुंचावें ! यही "विवाह है" ॥१७॥
गोभिलगृह्यसूत्र के द्वितीय अध्यायके द्वितीयखण्डका भापानुवाद पूरा हुआ २-२
प्रागुदीच्यां दिशि यब्राह्मणकुलमभिरूपन्तत्राग्नि-
रुपसमाहितो भवति ॥१॥
'प्रागुदीच्यां' ऐशान्यां 'दिशि' 'यत्' 'अभिरूपं तपःस्वाध्याययतं 'ब्राह्मण-
कुलम्' 'तत्र' ब्राह्मणकुले 'अग्निः' वैवाहिकः 'उपसमाहितः' यथाविधि स्थापितः
'भवति' भवेत् ॥१॥
भाषा-~-यदि अपना मकान दुर हो, तो पास के ईशान काण के किसी
ब्राह्मण के घर में विधि पूर्वक उत्तर विवाह करने के लिये यथा विधि अग्नि-
स्थापना करे ॥१॥
अपरेणाग्निमानडह रोहितं चर्म प्राग्नीवमुत्तरलो-
मास्तीर्ण भवति ॥ २॥
'अग्निम् अपरेग' अग्नेः पश्चात् 'रोहितं लोहितम् 'पानहुई चर्म' गोचर्म
'ग्राग्ग्रीवं' 'उत्तरलोम' उपरिष्ठालोमपृष्टम् 'प्रास्तीर्ण पात्तिनम् भवति'भवेता॥
भाषा-अग्नि के पश्चिम भाग में लाल गौका चमड़ा लेकर, ऐस विछावे
कि जिसमें लोमपृष्ठ ऊपरको हो और पूर्वपश्चिम लम्बा हो चमड़े का शिगे
देश पूर्व भाग में हो और इसके नीचे का हिस्सा पश्चिम में हो ॥ २ ॥
तस्मिन्नेनां वाग्यतामुपवेशयन्ति ।। ३ ॥
'तस्मिन्' प्रास्तृते प्रानुहहे धर्मणि 'एना 'वाग्या' नियमितवाचाम् 'अप
वेशयन्ति' प्रात्मीयजनाः॥ ३ ॥

प्र०२ खं०३सू०-७] उत्तरविवाहः॥ 'सा' .. । भा०-डाले चर्म पर वधू को नियमित वाक्य कर बैठावे ॥३॥ सा खल्वास्तएवानक्षत्रदर्शनात् ।। ४ ॥ वधूः 'खलु' निश्चयम् 'पानक्षत्रदर्शनात् अस्तमिते दिवाकरे यावत् न- क्षत्रैकमपि दृश्यते तावत् तथा 'एव' 'अस्ते' ॥ ४ ॥ भाषा-वह वधू नक्षत्र के उदय तक उसी प्रकार बैठी रहे ॥४॥ प्रोक्तनक्षत्रेषडाज्याहुतीर्जुहोतिलेखा सन्धिष्वित्येत- त्प्रभृतिभिः ॥ ५ ॥ 'नक्षत्रे प्रोक्तं' मेघाच्छन्नादिहेतुभिः नक्षत्रोदयादर्शनेऽपि 'उदितमेव नक्षत्रम एडलं यतस्तत्कालोऽयमागतः' - इत्येवमभिजनैः कथिते “लेखासन्धिषु पक्षमस्वाव. ज्ञेषु च यानि ते । तानि ते पूर्णाहुत्या सर्वाणि शमयाम्यहम् ॥ १ ॥ केशेषु यच्च पापक मीक्षिते रुदिते च यत् तानि पूण्णाहुत्या सर्वाणि शमयाम्यहम् ॥ २ ॥ शीलेषु यच्च पापकं भापिते हसिते च यत् । तानि ते पूर्णाहुत्या सर्वाणि शम- याम्यहम् ॥ ३॥ आरोकेप च दन्तेषु हस्तयोः पादयोश्च यत् । तानि ते पूरण- हुत्या सर्वाणि शमयाम्यहम् ॥ ४ ॥ अर्वोरुपस्थे जङ्घयोः सन्धानेषु च यानि ते । तानि ते पूर्णाहुत्या सर्वाणि शमयाम्यहम् ॥ ५ ॥ यानि कानि च घोराणि सर्वा- नेषु तवाभवन् । पूर्णाहुतिभि राज्यस्य सर्वाणि "तान्यशीशमम्" ॥ ६ ॥ (म. ब्रा० १, ३, १-६),- 'इत्येतत्प्रभृतिभिः मन्त्रैः पद्भिः षट्' 'श्राज्याहुतोः' 'जुहोति' जुहुयात् पतिरिति शेपः ॥ ५ ॥ भाषा-कारगा वश नक्षत्र न दीख पड़े, तो किन्हीं प्राज्ञज्योतिषी के बतलाये हुए नक्षत्रोदय कालमें 'लेखासन्धिषु आदि छः मन्त्रों से छः आहुति देवे ॥५॥ आहुतेराहुतेस्तु सम्पातं मूर्द्धनि वध्वा अवनयेत् ॥ ६॥ 'आहुतेः प्राहुतेः'प्रत्याहुतेः सम्पातं'तु अवशिष्टधृतधारां वध्वा मूर्द्धनि 'अवनयेत्॥६॥ भाषा-प्रत्येक छः आहुतियों के अन्नमें वधूके माथे घीका ढार देवे ॥६॥ हुत्वोपोत्थायोपनिष्क्रम्य ध्रुवं दर्शयति ॥ ७ ॥ 'हुत्वा' एतत् षडाज्याहुतिहवनानन्तरं दम्पती उपोत्थाय'सहैवोत्तिष्ठन्ती उपनिष्कम्य गोभिलगृह्यसूत्रटोकायाम्- - , मन्त्र सहैव होमस्थानान्निर्गत्य 'भुवं' ध्रुवमझ नक्षत्रंदर्शयति पतिः वनीमिति ॥ ७ ॥ भाषा-ये छः शाहुति और पाहुति शेप ग्रहणके पीछे, वर कन्या एकत्र होमस्थान से बाहर होकर पति, पानीको ध्रुवनामक नक्षत्र दिवनावे ॥णा ध्रुवमसिधुवाहंपतिकुलभूधासममुष्यासावितिपतिना- मगृहीयादात्मनश्च ॥ ८॥ तर ध्रुवदर्शनकाले 'ध्रुवमसि ध्रुवाहं पतिकुले भूयामममु-यासौ-“इति' इम मन्त्रं वधूः पठेत् । 'च' अपि अमुथ्यइन्यस्य स्थाने स्वपतिनाम पष्टयन्तम् असी स्थाने 'श्रात्मनः' नाम प्रथमान्तम् 'गृह्णीयात् ॥ ८॥ भा०-उस ध्रुव दर्शन के समय 'ह नक्षत्र ! तुम स्थिर स्वभाव वाले हो इसी कारण 'ध्रुव' नाम से विख्यान हो । मैं भी जिसम्म पति कुल में स्थिर प्रकृति होऊं ? मैं अमुक नामवाली 'मुक नामक व्यक्ति की पत्नी है. इस को वधू पढे । इस मन्त्र के मध्यगत 'अमुक इस पद के बदले निज पति का नाम और 'अमुक नाम वाली' के बदले अपना नाम कहे ॥८॥ अरुन्धतीञ्च ॥६॥ 'च' अपि 'असन्धती नक्षत्रविशेष दर्शयति तां पतिरिति ॥ ९॥ भाषा०-उसी समय पति, बधू को "अरुन्धती" नामक नत्र दिखलावे। रुद्धाहमस्मीत्येव मेव ॥ १० ॥ तत्रारुन्धतीदर्शनकाले 'रुद्वाहमस्मि'-'इति' । 'एवमेव'- पूर्वोक्तप्रकारेण पत्युः स्वस्य च नामग्रहणपूर्वकमेव वधूः पठेदिति ॥ १३ ॥ भाषा---इस अरुन्धती के दर्शनसमय वधू कहे कि 'अमुक नाम्नी अमुक नामक पति की आज्ञा में वद्धा होती हूं' ।। १० ।। अथैनामनुमन्त्रयते ध्रुवायोरित्यतया ॥ ११ ॥ 'अर्थ' अनन्तरम् 'एना' वधं "ध्रुवा द्यौर्बुवा पृथिवी ध्रुवं विश्वमिदं जगत् । भुवासः पर्वता इमे ध्रुवा स्त्री पतिकुले श्याम्" ॥७॥ म० प्रा० १. ६, ६), इत्ये. तया ऋचा' 'अनुमन्त्रयते' पतिरिति ॥१॥ भाषा-उसके पश्चात् पति वधू से ध्रुवा द्यौः' मन्त्र को पढ़ावे ॥ ११॥ - प्र०२ खं०३ सू० १०-१६] उत्तरविवाहः॥ HETAmAJHIJHARMSBray My अनुमन्त्रिता गुरुं गोत्रेणाभिवादयते ।। १२ ॥ 'अनुमन्त्रिता सा वधू 'गोत्रे' प्राहगोत्र पतिगोत्रम् उच्चरन्ती 'गुरु' पतिम् 'अभिवादयते ॥ १२॥ भाषा-इस मन्त्रको पढ़ने वाली वधू 'अमुक गात्रा' अमुक नाम्नी मैं तुझे अभिवादन करती हूँ, बोल कर पनि के दोनों पैर छूकर प्रणाम करे ॥ १२ ॥ सोऽस्या वाग्विसर्गः॥ १३ ॥ 'सः' काल: 'अस्याः वध्वाः 'वाग्वसर्गः' नियमित वाक ग्योग-नियम विस- जनस्येति ॥ १३॥ भाष -यहां तक वधू नियमित वाक्य से रहे फिर नियम छोड़ देवे ॥१३॥ तावुभौ तत्प्रभृति त्रिरात्रमक्षारलवणाशिनौ ब्रह्म- चारिणी भूमौ सह शयीयाताम् ॥ १४ ॥ 'तत्प्रभृति' विवाहका रम्भादिनः 'त्रिरात्र' त्रीग्यहोरात्राणि 'तावुभौ' दम्प ती अक्षारलवणाशिनी क्षारलयवणातिरिक्तभोजिनौ हविष्याशिनाविति यावत् सह' सहैव तिष्ठन्तावपि 'ब्रह्मचारिणों' साङ्गमशृन्या भूमौं' पत्ल्यङ्कादि वर्जितशय्यायाम् 'शयीयाताम् ॥ १४ ॥ भाषा-जिस दिन पहिले विवाह कार्यमें प्रवृत्त हो,उस दिन तक (इदिन) पति पत्नी दोनों ही क्षार लवणको छोड़,हविष्य भोजन करे, किन्तु ब्रह्मचर्य भ्रष्ट न हो, * और भूमि, में शयन करे ॥ १४ ॥ अत्राय॑मित्याहुरागतेष्वित्येके ॥ १५ । १६ ॥ 'अत्र' तिसृषु रात्रिषु यस्मिन् करिमन्नपि काले यथावसरं कन्या पित्रा वराय 'अध्य' अहणीयवस्ट जातं मधुपर्कादिकम् प्रदातव्यम् 'इत्याहुः' प्राचीनाचार्याः #wi * कभी जिस कन्या का रजः प्रकाश न हुआ हो ऐसी कन्या गोभिलाचार्य के मत से एवं अन्यान्य मत्रकार एवं स्मृति के मत से भी सम्भोग योग्य नहीं, और इस स्थान में आचार्य ब्रह्मचर्य नष्ट होने के डर से तीन रात में भी सम्भोग निषेध करते हैं। तो इस से भी स्पष्ट प्रकाशित होता है कि रजस्वला होने ही पर कन्या विवाह योग्य उत्तम होती है अन्यथा नहीं । " गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- Manoran (१५)। 'अागतेपु' वराद्यचनीयज नेषु तस्मिन्नेव काले अय॑षु एव अध्यदलं करी- व्यम् 'इत्वेके' नव्याः (१६)॥ १५, १६ अनयो जननियमोव्यवस्थाप्यते.. भाषा-इन तीन दिनों में जिस किसी दिनमें,निम्म किमा समय हो,कन्याका पिता अपने अवसगनुसार वरको 'मधुपर्क' आदि वस्तुओंसे पूजा करे, यही 'प्राचीन मत है। किन्तु किसी २ का मत है कि जिन लोगों की करनी हो उनके आने के समय ही करें । इसी को 'प्रव्य दान करते हैं ।।।1 हविष्यमन्नं प्रथमं परिजपितं भुञ्जीत श्वोभूते वा समशनीय स्थालीपाकं कुर्वीत तस्य देवता अग्निः प्रजापतिर्विश्वेदेवा अनुमतिरित्युद्धृत्य स्थालीपार्क व्यूली कदेशं पाणिनाभिमशेदन्नपाशेन मणिनेति भुक्त्वोच्छिष्टं वध्वै प्रदाय यथार्थम् ॥ १७-२१ ॥ 'हविष्य' क्षारादिवजितम् 'अन्नम्' 'प्रथम' पर्व भोजनात् पूर्व परिजपितं' वक्ष्यमाणप्रकारेण विधास्यमानमन्त्रेण च ( २० स०) 'भुजीत' पतिः (१०) 'वा' अथवा 'श्वोभूते' तत्परदिने 'समश्नीयं सम्यगभोजनयोग्यं 'स्थालीपार्क' स्थाल्यां पक्वमन्नं 'कुर्वीत (८) तम्य' अनस्य भोजनाय 'अग्निः प्रजापतिः विश्वेदेवाः अनुमतिः'-'इति' इमा: चतस्रो देवता:' स्तुत्या: (१९) स्थाली- पाकम्' 'उहत्य' पाकस्थानात्'एकदेश' सदीयं-किन्देिशं स्वभौजनयोग्य 'प्यार' पात्रारतरे निक्षिप्य अन्नपाशेन मशिना प्राणमन्त्रेण पृश्निना। बध्नामि सत्यप्र. न्थिना मनश्च हृदयं च ते ॥ ८ ॥ यदेतद्रदयं तव तदस्तु हृदयं मम यदिदशादर्य मम तदस्तु तव ॥ ९ ॥ अन्नं प्राशस्य पड्वशस्तेन बध्नामि स्वामी' ॥ १० ॥ म०.प्रा.१, ३,८-10' 'इति' इमान्मन्त्रान् पठन् 'पाणिमा' अभिमशेता पश्वेिशयेत् (२०)। मुक्त्वा' स्वभोजनानन्तरम् 'उच्छिष्ट' तत् 'वन' तस्यै 'प्रदाग' 'यथार्थः यथाप्रयोजनं विहरेदिति शेषः (२.)॥१७-२३॥ भाषा-अब पति एवं मार्या के भोजन की व्यस्था कही जाती है। प- हिला दिन तो अर्ध्या" से उन की तृप्ति हो सकती है, दूसरे दिन वधू प्रसन्धती - 1 ।

प्र०२खं०३ सू०१७-२२।१-२] उत्तरविवाहः ॥ नक्षत्र के देखने तक व्याकुल रहेगो, विशेषतः मार्ग में दूसरे के घरमें पाक की सामग्री होनी भी कठिन होगी; यदि हो तो उसी दिन, अन्यथा, उसके दूसरे दिन प्रभात होने ही से, अपना अच्छे प्रकार भोजन योग्य पाक करे पाक प्रस्तुन होने पर, अग्नि, प्रजापति, विश्वेदेवा, और अनुमति देवतागण क्रमसे भागध्य होंगी । अपने खाने योग्यं दूसरे पात्र में ढाल कर 'अन्न पाशेन मगिना' मन्त्र को पढ़ कर परोस कर भोजन करे । खाने से बचे अन्न वधू को देवे स्वयं यथेग्छ विचरण करे ॥ १७–२१ ॥ गोर्दक्षिणा ।। २२ ॥ ३ अस्य कर्मण: 'दक्षिणा' 'गौः एकेति ॥ २३ ॥ ३ इतिसामवेदीयेगोभिलगृह्यसूत्रे द्वतीयप्रपाठकेतृतीयखण्डस्य व्याध्यानं समाप्तम्।२,३ भाषा--इस विवाह कार्य में दक्षिणा एक गौ देवे ॥ २२ ॥ गोभिलगृह्य सूत्र के द्वितीय अध्याय के तीसरे खण्ड काभाषानुवाद पूरा हुआ , यानमारोहन्स्यासुकिशुकशाल्मलिमित्येतामृचंजपेत् १ 'यानं' रथादिकम् 'पारोहन्त्यां' तस्यां वध्वा सुकि शुक; शल्मलिं वि- श्वरुप सुवर्णवर्णसुकृत सुचक्रम् । श्रारोह सूर्ये अमृतस्य नाभिस्योनं पत्ये वहतुं कृणुष्व ॥११॥ (म० ब्रा० १, ३, ११)-'इत्येताम् ऋचं 'जपेत्' पति- रिति शेषः । १ भाषा-पति के घर जाने के लिये वधूको रथ श्रादि सवारी पर विठला चे एवं वधू के चढते समय पति "सुकिं शुकं शाल्मलि मन्त्र” को पढ़े ॥१॥ अध्वनि चतुष्पथान् प्रतिमन्त्रयेत नदीश्च विषमाणि च महावृक्षाञ्छ्माशानञ्च मा विदन् परिपन्थिन इति ॥२॥ 'अध्वनि' पथि 'चतुष्पथान , नदीच''विषमाणि च' सङ्कटस्थानानि च, 'महा- वृक्षान् श्मशानश्च' प्राप्य "मा विदीदन् परिपन्थिनो या श्रासीदन्ति दम्पती सुगेभि दुर्गमतीता मपदान्त्वरातयः ॥१२॥ ( म० ब्रा० १, ३, १२),-'इति इमं मन्त्रं गोभिलगृह्यसूत्रटाकायाम् NAMIN चापत्सु, पठन् 'प्रति प्रतिवारं यदा यदा उपतिष्टेन तदा तदैव 'मन्प्रयेत' मननमीश्वरांच- न्तनं कुर्यात् । २ भाषा-मार्ग में चौगहा, नदी, या किसी प्रकार का सङ्कट स्थान, बड़ा वृक्ष, और श्मशान, जब २ मिले तब २ 'मा विदम् , मन्त्र को पड़ते हुए ईश्वरका चिन्नने करे॥२॥ अक्षभङ्गे नद्धविमोचे यानविपय्यामेऽन्यास यमेवाग्निहरन्ति तमेवोपसमाधाय व्याहृतिभिर्हत्वान्य- द्रव्य माहृत्य यऋतेचिद्भिश्रिषइत्याज्यशेपेणाभ्यजेत् ॥३ 'अक्षभङ्ग' रथच भग्ने, 'न विमोक्षे' नद्वात् प्रच्युनेऽश्वादी 'यानविपर्यासे' वाहनदौरात्म्येन रथस्य पश्चात् पार्श्वयोवां गमने सनि, 'न' अपि 'अन्यास आपल्म समापतितासु किंकर्तव्यमिन्याहः,-तदा 'यमेवाग्नि' लौकिकमलोकिक (1,१,१५-- १९ सू०) वा 'हरन्ति' श्राहरन्ति विपन्पातदर्शनसातादयः स्वजनाः पान्यास्त- दुग्राम्या वा 'तमेव अग्निम् 'उप' समीपे 'समाधाय' सम्यक प्रवाव्य तवाग्नी 'व्याहृतिभिः' तिसृभिः आज्यतन्त्रेण 'हुत्वा, ततः 'अन्यद्रय अन्यरचक्र दिक यानान्तरं वा 'माहत्य" समीपतो यथालभ्य संगृह्य 'यत्रत्तेचिमिश्रिये (मा. छ. आ० ३, २, १, २).--'इति' ऋमूलकं साम (गेगा० ६, २, २२) गायन [अनादिष्टपरिभाषयात्र साम्न एव बोधः सूत्रे ऋगादिपदानुल्लेम्बात् ] 'प्राज्यशेषेणं हुतावशिष्टनाज्येन तं चक्रादिकं यथास्थानं 'अभ्यजेत्' म्रक्षयेत् ॥ ३ ॥ भाषा यदि मार्गमें रथका पहिया टूट जावे, या रथ हांकने वाला ग्थस गिर जावे, या मार्गसे भिन्न, या पीछे रथको गिरा देवे, तो इस दोष की शान्ति के लिये वहीं अग्नि स्थापन कर तीन महाव्याहृति से आहुति देवे । यह अग्नि पूर्वोक्त विधानानुसार ( प्र० १ ख० १ सू०१५-१६) संगृहीत करने से अच्छा होगा । कारण वश ऐसा न हो, तो चाहे जैसे हो, क्षति नहीं। पीछे पहिया, या दूसरी सवारी मिलने पर 'य ऋतेचिदभिश्रिय (सी० ० मा० ३, २, १,२) ऋङ्मूलकसाम (गे० गा० ६, २, २२) गान करके होम से वचे घी को चक्रादिक के उचित स्थान में लगा देवे ॥ H प्र० २ खं०४ सू०३-१०] वध्वानयनम् ॥ वामदेव्यं गीत्वाऽऽरोहेत् प्राप्तेषु वामदेव्यम् ॥ ४, ५ ॥ ततः वामदेव्यं वामदेव्यनामक साम 'गोत्वा' 'आरोहेत्' पुनरपि रथादि यानं, पतिः वधूसहितः (१)। प्राप्तेषु' स्वगृहेषु पुनरपि 'वामदेव्यं गायेदितिशेषः॥४,५॥ भाषा-सवारी के दोष दूर होने और दूसरी सवारी आ जाने पर उसमें बधू सहित पतिके चढ़ते समय 'वामदेव्य सामगान' करे और पीछे अपने २ घर आने पर सवारी से उतरते समय भी 'वामदेव्य' गान करे ॥४॥ गृहगतां पतिपुत्रशीलसम्पन्ना ब्राह्मण्योऽवरोप्यानडुहे चर्मण्युपवेशयन्तीह गावः प्रजायध्वमिति तस्याःकुमारमुप- स्थ आध्युस्तस्मै शकलोटाञ्जलावावपेयुःफलानि वा ६-६॥ ततः 'गृहागतां' पतिभवनद्वारोपनीतां तां ब● 'पतिपुत्र-शीलसम्पन्नाः' ब्रा- ह्मण्यः' तस्मात् यानात् 'अवरोप्य' अवतार्य 'श्रानडुहे चर्मणि' पातितगोचर्मोपरि "इह गावः प्रजायध्व मिहोश्व इह पूरुषः। इहो सहस्र दक्षिणोपि पूषा निषीदतु" ॥१३॥ ( भ. ब्रा० १, ३, १३)-'इति' मन्त्रं पठन्त्याः ताएव तां तत्र 'उपवेश- यन्ति' (६) । 'तस्याः) उपस्थे' क्रोडे ताएव ब्राह्मण्यः 'कुमारम्' यं कमपि 'श्रा- दध्युः' स्थापयेयुः (७) 'तस्मै' कुमाराय क्रीडार्थे 'शकलोटान्' कईमनिर्मित- सुपक्चगोलकान् क्रीडनकान् 'अञ्जलौ' 'श्रावपेयुः' प्रदधुः (०)। 'वा' अथवा 'फलानि' अाम्रादीनि आवपेयुरित्येव (९॥६-९ ॥ भाषा-और पनिके घर के द्वारपर लायी हुई बधूको, पति पुत्रवाली और शीलवाली ब्राह्मणीगण सवारी से उतार कर 'इहगावः प्रजायध्वं मन्त्रको पढ़कर विछाए हुए गो-चर्मपर बिठलावे ॥६॥ बधूके गोदमें उन्हीं ब्राह्मणियों में से, एक स्त्री एक लड़के को देवे॥७॥ और उस बालक की अञ्जली में कई एक मट्टीका बनों अग्निमें पके हुए सुन्दर खिलौने देवे ॥८॥ या खाने के लिये आम्र आदि मधुर फल भी दे सकते हैं ।। ६।६-६॥ उत्थाप्यकुमारंध्रुवाप्राज्याहुती होत्यष्टाविहधुतिरिति १० ततश्च तस्था उत्सङ्गतः 'कुमार' 'सूर्यदचम् उत्थाप्य ध्रुवाः ध्रुवनामतः . ६ गोभिलगृह्यसूत्रटोकायाम्- m प्रसिद्धाः 'अष्टौ' सङ्ख्याकाः 'भाज्याहुतीः' आज्य तन्त्रेण आहुती: "इह तिरिह स्वरतिरिह रन्ति रिह रमस्व मयि तिमयि स्वधतिमयिरथो मयिरमस्व ॥१५॥ (म० प्रा० १, ६, १, ४),-'इति' एतत्प्रभृतिभिरष्टाभिर्यजुभिमन्त्रः यथाक्रमतः जुहोति' जुहुयात् पतिः ॥१०॥ भाषा-फिर पति वधूके गोदमें के बालक को उठा कर इहधृति आदि यजुर्वेद के ८ मन्त्रोंसे ध्रुवनाम से प्रसिद्ध ८ आहुति, प्राज्य तन्त्रसे देवे ॥१०॥ समाप्तासु “समिधमाधाय" यथावयसं "गुरुन्' गोत्रेणाभिवाद्य यथार्थम् ॥ ११ ॥ ४ ॥ 'समाप्तासु' ध्रुवाहुतिषु समिधम्' तत्राप्नो श्रमन्त्रकमेव 'प्राधाय' प्रदाय 'यथावयसं' वयोऽनुसारेणोत्तरोत्तरं गुरून मान्यान् तत्रोपस्थितान् ‘गोत्रेण गोत्रोच्चारणपूर्वकम् 'अभिवाद्य' पादग्रहणेनप्रणम्य 'यथार्थम्' स्वप्रयोजनानुसारतोविहरेत् ॥ ११, ४ ॥ इति सामवेदीये गोभिलगृह्यसूत्रे द्वितीयप्रपाठकेचतुर्थखण्डस्यव्याख्यानं समाप्तमा२,५॥ भाषा-उक्तधुवाहुति के विना मन्त्र पढ़े आग्नमें एक समिधा डाल बाद मान्य लोगों के वयसानुसार पश्चात् और बड़ी उमरवाले पहिले, छोटी उमरवाने पीछेको क्रमसे पैर पकड़ २ अपना गोत्र वोलता हुअा अभिवादन करे ॥११॥ गोभिन्नगृहसूत्रके द्वितीयअध्यायके.चतुर्थस्वण्डकाभाषानुवादपूगहा २,४। अर्थातश्चतुर्थीकर्म ॥१॥ 'अतः' इतनारम्य 'चतुर्थीकम विवाहरात्रितः चतुथ्यों तिथौ करणीयम् वचमीति शेषः ॥।॥ भाषा-अब चतुर्थी कम जो विवाहकी रातसे४थी तिथिको होता है कहता हूं ॥१॥ अग्निमुपसमाधाय प्रायश्चित्ताज्याहुतीर्जुहोत्यग्ने प्रा- यश्चित्त इति चतुरग्नेः स्थाने वायुचन्द्रसूर्याः समस्य पञ्च- मी बहुवदूह्याहुतेराहुतेः सुवसम्पातमुदपात्रेऽवनयेसनैना सकेशनखामभ्यज्य हासयित्वा प्लावयन्ति ॥२-६॥ उपसमाधाय "श्रने प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्त रसि बाह्य- 'श्रथ अनन्तरम्, प्र. २ खं० ५सू०१-६] वध्वानयनम् ॥ एस्त्वा नाथकाम उपधावामि यास्या:पापी लक्षी स्तामस्या अपजहि ॥१॥ वायो प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा नाथकाम उपधावामि यास्याः पतिनी तनूस्ता मस्या अपजहि ॥२॥ चन्द्र प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा नाथकाम उपधावामि यास्या अपुयातनूस्ता मस्या अपजहि ॥ ३ ॥ सूर्य प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा नाथकाम उपधावामि यास्या अवशव्या तनूस्ता मस्या अपजहि ॥ ४ ॥ अग्निवायु चन्द्रसूर्याः प्रायश्चित्तयो यूर्य देवानां प्रायश्चित्तयः स्थ बाह्मणो वो नाथकाम उपधावामि यास्याः पापी लक्ष्मीयों पतिघ्नी या पुश्या या पाशव्या ता अस्या अपहत' ॥५॥ (म० ब्रा० १,४१)- इति' एभिमन्त्रैः पतिः 'चतुः' सङ्ख्याः प्रायश्चित्ताहुतीः' प्रायश्चित्ताय वधूपापप्र- शमनाय भाज्यतन्त्रेण पाहुनीः 'जुहोति' जुहुयात् (२) । तत्र च द्वितीयादिषु तिसृष्वाहुतिषु 'अग्ने'-इति पदस्य स्थाने क्रमेण 'वायुचन्द्रसूर्याः' जयाः (३)। किञ्च 'पञ्चमीम्' 'समस्य' सर्वस्य आहुतीम् अग्न्यादिपदचतुष्टयस्य मेलनेन 'अग्नि- वायुचन्द्रसूर्या:'-इत्येवं सम्बुध्य अपिच 'बहुवद जय' एकवचनस्थाने बहुबचनप्र- योगेण मन्त्रपाठं विपरिणमय्य जुहुयादित्येव ( ४ )। 'आहुतेराहुते:' प्रत्याहुतेरेव 'घुवसम्पात' अवशिष्टघृतधाराम् 'उदपात्रे' चमसे 'अवनयेत्' स्थापयेत् (५)। 'तेन' रक्षितसम्पातसमुदायेन 'एना' वधू 'सकेशनखां' आपादमस्तकां सर्वतएव 'अभ्थज्य' म्रयित्वा'हासयित्वा' यानागमनादिजनितक्लेशान् शरीर ध्यथारूपान् लाघवयित्वा 'श्रापलावयन्ति, प्रवाहादिषु सन्तरणादिना नापयेयुः सख्यादयः स्व- जना इति यावत् ( ६ ॥२-६) चतुर्थीरात्रिकर्त्तव्यं गर्भाधानमाहः- --पति, पत्नीके पूर्वकृतपापप्रायश्चित्त के लिये अग्नि स्थापन कर 'अग्नेप्रायश्चिते' आदि मन्त्रों से प्राज्य तन्त्र से चार आहुति देवे (२) उनमें से द्वितीय आदि आहुति में इस मन्त्रस्थ अग्नि के बदले 'वायु' 'चन्द्र और 'सूर्य' पढ़ना चाहिये, यही विशेषता है । ३ । और पांचवी आहुती में 'अग्नि' 'वायु' 'चन्द्र' और 'सूर्य' इन्हीं चार देवताओं को एककाल में सम्बो- धन करे, सुतरां मन्त्रस्थ जितने एक वचन हैं, उन सब को बहु बचन करके पढ़े । ४ । इन पांच प्रायश्चित्त आहुति की प्रत्येक पाहुति के अन्त में घृत के - गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- ८४ धागपात क्रमस चमस में रन्तित रक्खे ।५। इस रक्षित आज्य के द्वारा उस वधू के पैर से मस्तक तक सर्वाङ्ग में अच्छे प्रकार लगा देवे, उससे मार्ग की थकावट दूर होगी, पीछे सखी आदि मिन कर नदी आदि की धाग तैरने रूप जल क्रीडा श्रादि करके नई बहू को स्नान करावे ॥ ६ ॥२-६ ॥ इसके अनन्तर चतुर्थी रात्रि में कर्तव्य गर्भाधान की व्यवस्था कही जाती है ऊर्ध्वं त्रिरात्रात् सम्भव इत्येके यद मती भव- स्युपरतशोणिता तदा सम्भवकालः ॥ ७, ८ ॥ ' जय त्रिरात्रात् सम्प्रदानरात्रितः त्रिरात्रेऽतीते 'सम्भवः' सम्भवति गर्भो- ऽस्मादिति सम्भवः सङ्गमः 'इति' एवम् 'एके' केचिदाचार्याः प्राहुः एवन्ध वि. वाहात् प्राग् दृष्टर जस्काया ऋतुमत्या नवोढायाः पतिगृहे पाय प्रकाशमनपेक्ष्यैव तस्यां चतुर्थ्या अव रात्रौगर्भाधानायसङ्गमः कार्यः इत्येवकेपाशिदाचार्याणां मतम् (७) गोमिलस्यस्वमतेतु, नवोढा पत्नी पतिगृहंसमागत्य 'यदा' पुनः 'ऋतुमती' सती 'उपरत-शोणिता' शोषितवेगप्रवाहशून्या 'भवति' भवेत् तदा तस्मिन्नेव पतिगृहागताद्य काले सम्भवकालः (८) इति गतं चतुर्थीकर्म, समाप्त विवाहप्रकरणम् , निर्णीतश्चाद्यगर्भाधानकालः ॥ ७, ८ गर्भाधामप्रकारमाहः- भाषा-विवाह रात्रिसे तीन रात्रि ब्रह्मचर्य में व्यतीत कर चौथी गत्रि में स्त्री प्रसङ्ग करे-यही कई एक आचार्यों का मत है । इससे उन लोगों के मत में विवाह के पूर्व ही दृष्ट रजस्का, ऋतुमती नवोढ़ा के गर्भाधान पक्ष पति के घर में ऋतु-प्रकाश की अपेक्षा नहीं ॥७॥ किन्तु गोभि- लाचार्य का यह स्वकीय मत नहीं है; इनके मत से नवोढ़ा पत्नी, पति के घर पर श्राने से पुनः ऋतुमती होने पर जिस समय उसका शोणित वेग (मासिकधर्म) कम होगा, वही पति के घर पर प्रकाशित भाद्य ऋतु प्रथम स- गम काल होगाचतुर्थो कर्मके साथ और विवाह प्रकरण भी पूरा हुआ में, पुनः * अतएव वक्ष्यति तृतीये "मातुरमपिण्डानाधिका तु श्रेष्ठा-प्रति दारकमेखि अननिकाया शत्या परिशिष्टे च "ऋतुमती वलपिकाचा प्रयच्छेत्तवनाग्निकाम् ति स्फुटम् ।

प्र० २ खं० ५सू० ७-१०] गर्भाधानम् ॥ दक्षिणेन पाणिनोपस्थमभिमृशेद्विष्णुयोनि कल्पयत्वित्येतय- चीगर्भन्धेहिसिनीवालीतिचसमाप्यचौंसम्भवतः। ६,१०।। प्रथमतः पतिः "विष्णुयोनि कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिशतु । श्रासिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भ दधातु ते" ॥६॥ (म० ब्रा० १ । ४।६)'इत्येतयर्चा, "गर्भन्धेहिसिनीवालि गर्भन्धेहि सरस्वति । गर्भन्ते अश्विनौ देवावाधत्तां पुष्कर- रजौ" ॥ ७ ॥ (म• ब्रा० १, ४, ७)-'इति च मन्त्राभ्यां स्वकीयेन 'दक्षिणेन हस्तेन, उपस्थं' पत्न्याः प्रजननदेशम् 'अभिभृशेत्' (८) ऋचौ' पूर्वोक्ते "समाप्य' पाठेन मननेन अभिमर्शनफलदर्शनेन च ततः 'सम्भवत: मिथः सङ्गम कुरुतः दम्पतीति (९)। गवं गर्भाधानम् ॥९,१०॥५ इति सामवेदीयेगोभिल- गृह्यसूत्रेद्वितीयप्रपाठकेपञ्चमखण्डस्यव्याख्यानंसमाप्तम् ॥२-५॥ भाषा-पहिले पति "विष्णुयोनि कल्पयतु" ऋक् एवं 'गर्भधेहि सिनीवालि' ऋक् पढ़ कर पत्नि की योनि को मार्जन करे । और ऋचाओं का पठनमन- नऔरउसके साथ अभिमर्शन फल दर्शन होनेपरदोनों संगम करे * ॥६-१०॥ गोभिलगृह्यसूत्रके द्वितीय अध्यायके पांचवे खण्डका अनुवाद पूरा हुआ।२।५ तृतीयस्य गर्भमासस्यादिसदेशे पुसवनस्य कालः ॥१॥ गर्भमासस्य तृतीयस्थ गर्भमाससम्बन्धितृतीयस्य मासस्य 'श्रादिसदेशे प्रा- 'चईस्य प्रथमपक्षस्येति यावत् सदेशे समीपे अष्टम्यभ्यन्तरे एव व्यवहारः 'पुंसवन- स्य' संस्कारविशेषस्य 'कालः' ज्ञातव्यइति शेषः । १ पुंसवनप्रकारमाहः- भाषा-जिस मासमें गर्भाधान हो, उससे तीसरे मासके आदि पक्षके निकट ही अर्थात् अष्टमी के भीतर पुंसवन संस्कार काल जानो ॥१॥ * यह गर्भाधान संस्कार आश्यलायन, मापस्तम्ब, कात्यायन प्रभृति गृह्यसूत्र कारों के मत से ऋतु मती कन्या विवाह के पीछे चौथी रात्रि में भी हो मकता है। परन्तु गोमिलाचार्य के मत से वैसी कन्या के विवाह के पीछे पति के घर फिर रजोदर्शन हाने पर, उती श्राद्य ऋतु अनिषिद्ध काल में कर्तव्य है । गर्म ग्रहण काल शान हो जाने पर प्रतिगर्भ के आधान काल में यह -संस्कार करे, अन्ततः पति के घर पहिले रजोदर्शन में तो अवश्य करे RamosamMAR - - गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- womanam Mana प्रातः सशिरस्काऽऽप्लुतोद्गग्रेषु दर्भेषु पश्चादग्नेरुद- गग्रेषु प्राच्युपविशति पश्चात् पतिरवस्थाय दक्षिणेन पाणिना दक्षिणमसमन्ववमृश्यानन्तर्हितंनाभिदेशमभिमृशेत्पुमा सौ मित्रावरुणावित्येतयर्चाथ यथार्थम् ॥२-४ ॥ 'प्रातः समये 'उददग्रेषु दर्भेपु' उपनीता बधूः 'सशिरस्ता प्राप्लुता' शिरः प्रभृतिसर्वाङ्गजलसित्ता स्नाता सती 'अग्नेः' पश्चात्' पश्चिमस्यां दिशि तथैव 'यागग्रेषु' दर्भेषु पातितेषु उपरि 'प्राची प्राङ्मुखी पुरतोऽग्निं कृत्येति फलितम् । 'उपविशति उपविशेत् (२) । ततः पश्चात् 'पतिः' 'अवस्थाय' तो बधू क्रोडी कृ- त्येति यावत्, 'दक्षिणेन पाणिना' तस्याएव बध्वाः 'दक्षिणम् अंसम्"अन्ववमृश्य' किञ्चिदुत्तानायथास्यात्तथा पश्चादाकृष्य पुमा सौ मित्रावरुणौ पुमा सावश्वि- नावुभौ । पुमानग्निश्च वायुश्च पुमान् गर्भस्तवोदरे' ॥4॥ (म०मा०१,४,८) 'इति एतया ऋचा' स्मर्त्तव्यं देवं संस्मरन् तस्याएव 'नाभिदेशम्' 'अनन्तहित' वना- थावरणशून्यं प्रकृत्य 'अभिमृशेत् । विशेषेण स्पृशेत्, शेषेण सम्येनैव हस्तेनेति गन्य ते (३)। अथ तदनन्तरं 'यथार्थम्' यथाप्रयोजनं विहरेत् सः॥ २-४ ।। भाषा-प्रातःकाल उत्तगन कुशासन पर तीन मास की गर्भवाली वधु को बैठावे एवं मस्तक श्रादि सर्व शरीर जल में प्राप्लुत कर अग्नि के पश्चिम भोर डाले हुये उत्तराम कुश के आसन पर बैठावे, और उसे गोद में लेकर पति भी बैठे । तब दहिने हाथ से बधू के दतिया कांधा अपने गोद की ओर कुछ, ऊपर को खींच कर रक्खे, और वायें हाथ से उसके कंधनी को खोल कर उसके नाभि प्रदेश को अच्छे प्रकार स्पर्श करे और छूने समय 'पुमांसौ मित्रावरुणो, ऋमन्त्र से स्मरणीय देवता का स्मरणा करें। उसके अनन्तर स्वेच्छया विचरे ॥२-४॥ अथापरम् ॥५ 'अथ तत्कार्यानन्तरम् 'अपरम्' अपि एकमस्ति कार्य पुंसवनस्येति । तदपि पोककालाभ्यन्तरे [ सू०एवं कर्तव्य परं यस्मिन् दिने नामिमर्श कृतं. WHA प्र०२खं०६पू०२-१२] पुंसवनम् ॥ - तस्मिन्नेव, तत्परदिने, तत्पर परदिने वेति नायं नियमः॥ ५॥ किन्तदपरं कार्यमिति स्फुदयति- भाषा-इस नाभिमर्शन कार्य के पीछे पुंसवन संस्कार करने में एक कार्य होता है वह भी पूर्वोक्त ही काल में होगा। (सू०१) किन्तु जिस दिन नाभि मर्शन हो उसी दिनया उसके दूसरे तीसरेदिन करे इसका नियम नहीं ॥५॥ प्रागुदीच्यां दिशि न्यग्रोधशुङ्गामुभयतः फलामस्रामा- मकृमिपरिसृप्तां त्रिसप्तैर्यवर्माषैवी परिक्रीयोत्थापयेद्य- द्यसि सौमी सोमाय त्वा राज्ञे परिक्रीणामि यद्यसि वारुणी वरुणाय त्वा राज्ञे परिक्रीणामि यद्यसि बसुभ्यो वसुभ्य- स्त्वा परिक्रीणामि यद्यसि रुद्रेभ्यो रुद्रेभ्यस्त्वा परिक्रीणामि यद्यसि मरुद्भ्यो मरुद्भ्यस्त्वा परिक्रीणामि यद्यसि विश्वे- भ्योदेवेभ्यो विश्वभ्योदेवेभ्यस्त्वा परिक्रीणाम्योषधयः सुम- नसो भूत्वाऽस्यां वीर्य समाधत्तेयं कर्म करिष्यतीत्युत्था- प्य तृणैः परिधायाहृत्यवहायसींनिध्यादृषदंप्रक्षाल्य ब्रह्मचारी व्रतवती वा ब्रह्मबन्धूः कुमारी वाऽपत्या हरन्ती पिनष्टि प्रातः सशिरस्काऽऽल्प्लुतोदगग्रेषु दर्भेषु पश्चादग्ने रुदगग्रेषुदर्भेषु प्राक्शिराःसंविशति पश्चात् पतिरवस्थाय दक्षिणस्य पाणेरगुष्ठेनोपकनिष्ठिकया चाङ्गुल्याभिसङ्- गृह्य दक्षिणे नासिकास्रोतस्यवनयेत् पुमानग्निः पुमानिन्द्र इत्येतयर्थाथ यथार्थम् ॥६-१२ ॥ ६ 'प्रागुदीच्या' ऐशान्यां दिशि सञ्जातां 'न्यग्रोधशुङ्गो' न्यग्रोधस्य वटस्य शुङ्गा अस्फुटितपत्रमिति यावत् 'त्रिः सप्तः यवैौषैर्वा' एकविंशतिमाषान् एकविंशति- यवान् वा वृक्षस्वामिने मूल्यं दत्त्वा तत्सकाशात् 'परिक्रीय उत्थापयेत् । शुङ्गा गोभिलगृह्यसूत्रटोकायाम्- - विशिनष्टि-'उभयतः फलाम्' यस्या उभयोः पार्श्वयोरेव फले विद्यते तादृशीं; किञ्च 'अस्रामाम्' अम्लानाम् , किश्च 'प्रकृमिपरिसृप्ता कृमिभिः पत्रकीटः परि- सृप्ता परिष्याप्ता, एतादृशीम् (६)। तत्परिक्रयणमन्त्राः सप्त । तानाही हे शुङ्गे! त्वं यदि 'सौमी सोमदेवतायाः प्रिया 'असि' तर्हि 'सोमाया राज्ञे' सोमराजप्रीत्यर्थमेव 'त्वा' वा 'परिक्रीणामि । त्वं 'यदि वारुणी वरुणदेव- तायाः प्रिया 'असि तर्हि तस्मै 'वरुणाय राज्ञ एव परवा परिक्रीणामि २। त्वं 'यदि' 'वसूभ्यः' वस्वष्टकानां प्रीत्यर्थमेवोत्पन्ना 'असि' तर्हि 'वसुभ्यः' एवं 'त्वा' 'परिक्रीणामि' ३। त्वं यदि' 'रुद्रेभ्यः' रुद्राणामेकादशानां प्रीत्यर्थमेवोत्पन्ना 'असि तर्हि 'रुद्रेभ्यः' एव 'त्वा' 'परिक्रीणामि' ४ । त्वं 'यदि' 'मादित्येभ्यः' द्वादशादित्यानां प्रीत्यर्थमेवोत्पना 'असि' तर्हि 'आदित्येभ्यः' एवं स्वा' 'परि- क्रीणामि' ५। त्वं 'यदि' 'मरुद्भ्यः' एकोनपञ्चाशतां मरुतां प्रीत्यर्थमेवोत्पला 'असि' तर्हि 'मरुदभ्यः एव 'त्वा' 'परिक्रीणामिः । ६ । 'यदि' 'विश्वेभ्योदेवेभ्य' सर्वदेवप्रीत्यर्थमेवोत्पना 'असि' तहिं 'विश्वेभ्योदेवेभ्यः एव 'वा' 'परिक्रीयामि' ७ । इति सप्त परिक्रयणमन्त्राः (७)। अथोत्थापनमन्त्रः;-हे 'श्रोषधयः' ! यूयं 'सुमनस:' प्रसन्नाः सन्तः 'अस्यां वध्वा 'वीर्य समाधत्त' वीर्यसमाधानं कुस्त, किनिमित्तमित्याह-'इयं वधूः 'कर्म' गर्भप्रसवनं 'करिष्यति' ततएव वीर्यस्य प्रयोजनम् ; 'इति इमं मन्त्रं पठन् 'उत्थाप्य' ता: 'तृणैः' यथालभ्यैः 'परिधाय' वेष्टयित्वा 'वैहायसी आकाशसम्बन्धिी लताममरवेलेति प्रसिद्धाम् 'पाहत्य' तदुपरि 'निदध्यात्' स्थापयेत् (८)। ततश्च 'दृषदं शिलापट्टकं 'प्रक्षाल्य' अपरवस्तुकणासंसर्ग यथा न स्यात् प्रक्षालनेनैवं विधाय तत्र 'ब्रह्मचारी' ऋता- वन्यत्र स्वभार्यायामपि यो न सङ्गच्छते सः, 'व्रतवती वा' पातिव्रत्यं व्रतं यथा पाल्यते विशेषेण सा, 'ब्रह्मबन्धूः' ब्राह्मणजातीया 'कुमारी वा' अनूढ़ा ब्राह्मण- कन्येति यावत् 'अप्रत्याहरन्ती'. प्रत्याहारस्त्यागस्तमकुर्वन्ती ' अविश्रामेणैव झटित्येवेति यावत् अन्यथा वाय्वादियोगात ओषधिवीर्य नष्टं स्यादेव 'पिनष्टि' पेषण कुर्यात् , ताः शुङमाः इत्यर्यादागतम् उपलेनेति च ()। व प्रातः, "उदगग्रेषु दमेषु उपस्थिता सा बधूः 'सशिरस्का पाप्लुता' प्र.२ खं०६ सू०५-१.] पुंसवनम् ॥ सती, अग्नेः' 'पश्चात्' पश्चिमस्यां दिशि 'उदगग्रेषु दर्भेपु' पातितेषु 'प्राशिराः' पूर्वदिग्गतमस्तका भवन्ती 'संविशति' संवेशनमर्द्धशयनमिश्रोपवेशनं कुर्यात् १०)। ततः पश्चात्' पतिः 'अवस्थाय' 'दक्षिणस्य पाणे:' अङ्गुष्ठेन' 'उपक निष्टक्या' अनामिकया 'अमुल्या' अङ्गुष्ठानामिकाभ्यामिति यावत् 'अभि' अ. भितः सर्वतोव्याप्य 'संगृह्य' तत् पिष्टशुङ्गारसं' तस्या वध्वाः 'दक्षिणे नासिका- स्रोतसि' नासिकन्रन्ध्र 'अवनयेत्' अवक्षिपेत् श्राघ्रापयेद्वाः "पुमानग्निः पुमानि. न्द्रः पुमान्देवो बृहस्पतिः। पुमासं पुत्रं विन्दस्व तं पुमाननुजायताम्" ॥११॥ (म० ब्रा० १, ४, ९)-'इति एतया ऋचा इष्टं संस्मरनिति शेषः (11)। अथ अनन्तरं 'यथार्थ' यथाप्रयोजनं विहरे दिति शेषः (१२ ॥ गतमिदंपुसवनकर्म ॥ इति सामवेदीयेगोमिलगृह्यसूत्रे द्वितीय प्रपाठकेषष्ठखण्डस्यव्याख्यानं समाप्तम् ॥२,६॥ भाषा-इशान कोण में ओ कोई बड़का वृक्ष हो, उस वृक्ष के स्वामीको २१ यव, या २१ उड़द मूल्य देकर शुङ्ग(टूसा)खरीद कर तोड़े। इस शृङ्ग के दोनों ओर फल होना चाहिये, सूखा न हो और उसमें कीड़े न लगे हों।६। इस शुङ्ग के मोल लेते समय "हे शुङ्गे !' इत्यादि ७ मन्त्रों का पाठ करे ! तत्पश्चात् इन मन्त्रों को पढ़ कर उस शुङ्ग को वृक्ष से उखाड़ या तोड़ लेवे यह कह कर कि हे औषधि गण ! तुम सब प्रसन्न होकर इस वधू में वीर्य साधन करो, जिस्से यह वधू कष्ट रहित प्रसव करे। उखाड़े हुए शुङ्ग को तृण से ढाक कर अमरवेल, या सूक्ष्म जटामांसी संग्रह कर इसकी रक्षा करे ॥८॥ अनन्तर शीलको अच्छे प्रकार धोकर उस पर कोई ब्रह्मचारी (जो गृही ऋतु काल ही में अपनी भार्या के पास गमन करता हो, ऐसा)या कोई पति व्रता. या ब्राह्मण वंशकी कोई कुमारी, उसे अविश्राम हो पीसे । अर्थात् पीसते समय ही ओषधि का सब गन्ध हवाद्वारा खीच न जावे इस लिये शीघ्र पीस लेवे । प्रातःकाल वधू उत्तराम कुशाओं पर बैठ कर माथे तक जल में गोता लगा स्नान कर अग्नि के पश्चिम ओर उत्तराम डाले हुए कुशासन पर पूर्व की ओर शिर कर जागती हुई लेटी रहे ॥ १० ॥ पति उसके पीछे रह कर अनामिका और अष्ट अङ्गुलि से पीसा हुआ शृङ्ग से रस लेकर उसके दहिने नाक - गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- । - के छिद्र में डाले, या सूंघावे । और 'पुमानग्निः पुमानिन्द्रः' मन्त्र का पाठ करते हुए पति अपने इष्ट देव का स्मरणा करे । ( ११ ) इसके अनन्तर यथेच्छ भ्रमण करे यही पुंसवन कर्म है ॥ ६.१२ । ६ ॥ गोभिलगृह्यसूत्र के द्वितीय अध्याय के छठे खण्डका भाषानुवाद पूग हुश्रा ॥२६॥ अथ सीमन्तकरणम् ॥१॥ 'अथ' प्रकरणान्तरं द्योतयति । 'सीमन्तकरणम्' नाम कर्म, संस्कारविशेषः । तदधिकृत्य वच्मीति ॥ १ ॥ तस्य कालं विधते;- भाषा-अब 'सीमन्तोन्नयन' नामक संस्कार का वर्गात किया जाता है ।। प्रथमगर्भे चतुर्थे मासि षष्ठेऽष्टमे वा ॥२॥ 'प्रथमे गर्भे' एप हि संस्कारः प्रथमे एव गर्भे कार्यः न तु प्रतिगर्भम् । तत्र च 'चतुर्थे षष्ठे अष्टमे वा मासिः कुर्यादितितत्कालविधिः ॥ २॥ ततिक भ्यता विधत्ते- भाषा-यह सीमन्तोन्नयन केवल प्रथम गर्भाधान में करे इस का समय ४ था, 'छठा', या ८ वा मास है ॥२॥ प्रातः सशिरस्काऽऽप्लुतोद्गग्रेषु दर्भेषु पश्चादग्नेरु- द्गग्रेषु दर्भेषु प्राच्युपविशति पश्चात् पतिरवस्थाय युग्म- न्तयौदुम्बरशलाटुअध्नमावध्नाति अयमूर्जावतो वृक्ष इत्यथ सीमन्तमूर्ध्वमुन्नयति भूरिति दर्भपिञ्जतीभिरेव प्रथमं भुवरिति द्वितीयं स्वरिति तृतीयमथवीरतरेण येनादितेरिस्ये तयाऽथ पूर्णचात्रेण राकामहमित्यतयर्चा विश्वतया च शलल्या यास्ते राके सुमतय इति कृसरः स्थालीपाक उत्तरघृत स्तमवेक्ष्यत् किम्पश्यसास्युक्त्वा प्रजामिति वाचयेत् तं सा स्वयं भुञ्जीत वीरसूर्जीवसू- जीवपत्नीतिब्राह्मण्यो मङ्गल्याभिर्वाभिरुपासीरन् ॥३-१२ पृष्टा सा, “(किं पश्यसि ?)-प्रजां पशून्त्सौभाग्यं मह्यं दीर्घायुष्ट पत्यु प्र. २ खं०७ सू०१-१२] सीमन्तोन्नयनम् ॥ 'प्रातः' पूर्वाह्न, 'उदगग्रेषु दर्भेषु' उत्तराग्रीकृतपातितकुशासने उपविष्टा सती 'सशिरस्का आप्लुता' स्नाता भवती 'अग्नेः पश्चात्' 'उदगग्रेषु दर्भेषु' 'प्राची' प्राङ्मुखी 'उपविशति' (३)। 'पतिः' तस्या वध्वाः 'पश्चात्' 'अवस्थाय' 'यु- ग्मन्तम्' युग्मानि फलानि यस्मिन् तादृशम् 'श्रौदुम्बरम्' उदुम्बरगुच्छं शलान- नम्' शलाटुनामफलविशेषस्य स्तवकच "श्रय मूर्जावतो वृक्ष अर्जीव फलिनी भव । पर्ण वनस्पतेऽनुत्वानुत्वा सूयता रयिः" ॥ १ ॥ (म० ब्रा० १, ५, १) 'इति' इमं मन्त्रमुच्चरन् 'श्राबध्नाति' वध्वाः मस्तके कण्ठे बाहौ कठ्यां नाभौ अञ्चले वेति न नियमः (४)। 'अथ' अनन्तरम् । 'सीमन्तम्' केशरचनाविशे- षम् 'अर्ध्वम् उन्नयति' उन्नयेत् पतिरेव । तत्र तत्र दर्भपितलीभिः' शुष्कै गर्भ- सारश्च कुशसमूहः 'भूः'-'इति' मन्त्रेण 'प्रथमम्' उन्नयनम्, 'भुवः' इति मन्त्रेण 'द्वितीयम्' उन्नयनम्, 'स्व:'--'इति' मन्त्रेण तृतीयम्' उन्नयनम्' (५)। 'वीरतरेण शरतृणविशेषेण "येनादित सीमानं नयति प्रजापतिमहते सौभगाय तेनाहमस्यै सीमानं नयामि प्रजामस्यै जरदष्टिं कृणोमि" ॥ २ ॥ (म० ब्रा० १, ५, २)-'इत्येतया ऋचा' च सीमन्तमूर्ध्वमुन्नयति पतिः (६) 'अथ' तदन न्तरम् "राकामह सुहवां सुष्टुतीहुवे शृणुत नः सुभगा बोधतु श्रात्मना । सी- व्यत्वपः सूच्या च्छिद्यमानया ददातु वीरशतदायुमुख्यम्" ॥ ३ ॥ (म० प्रा० १, ५, ३)-'इत्येतया ऋचा' 'पूर्णचात्रेण' सूत्रपूर्णतर्कुणा सीमन्तोन्नयनम् (७) 'च' किञ्च "यास्ते राके सुमतयः सुपेशसो याभिर्ददासि दाशुषे वसूनि । ताभिर्नो अद्य सुमना उपागहि सहस्र पोप सुभगे रराणा" ॥ ४ ॥ (म० ब्रा० १, ५, ४)--'इति' मन्त्रं पठन् पतिः 'विश्वेतया' त्रिषुस्थानेषु श्वेतवर्णया 'शलल्या' शक्लकीकएटकेन सीमन्तमूर्ध्वमुन्नयेत् (८)। ततश्च; 'स्थालीपाकः' स्थाल्यां पक्वः 'उत्तरघृतः' पाकान्ते घृतमिश्रितः 'कृसर' तिलतण्डुलसमूहः 'कृसरः' इति कुसरलक्षणम् ; 'तम्' तादृशं कृसरम् 'अवेक्षयेत्' दर्शयेत् पत्नी पतिरिति (९)। यदा सा तं पश्यति, तदैव पतिः पृच्छेत् 'किम् पश्यसि?-इति' 'उक्ता' पतिनैवं (म. ब्रा० १, ५)-'इति' इमं मन्त्रं 'वाचयेत्' परली पतिः (9.)।''

९२ गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- man कृसरं 'सा' वधूः 'स्वयं भुम्जीत' (११) । तस्मिन्नेव भोजनकाले 'श्रामग्यः' 'वीरसूर्जीवसूर्जीवपत्नी'--'इति' एवमादिभिः 'मङ्गल्याभिर्गीभिः पाशीर्वात्यैः 'सपासीरन्' ईश्वरमिति शेषः (१२)। इति सीमन्तोनयनम् । ३-१२॥ भाषा-अब उक्त संस्कार का विधि कहा जाता है, प्रातःकाल उत्तराम विछाये हुए कुश के श्रासन पर वधू को बैठा कर माथे तक भिगोकर स्नान करावे । पीछे अग्नि के पश्चिम भाग में विछाये हुये उत्तगम कुशासन पर पू. र्वाभिमुख उसे बैठावे, पति भी उसके पीछे रहे । अनन्तर उदुम्बर का गुच्छा और एक शलाटुका, उस वधू के अचान में या शरीर के जिस किसी वान्ध- ने योग्य कटिके ऊपर अङ्ग में बान्ध देवे। दोनों गुच्छाओं के वाधते समय 'अयमूर्जावतो वृक्षा मन्त्र पढ़े। उसके पश्चात् सारगर्भ सूखा कुशा समून निर्मित पिजूलि से उस वधू का केश सम्हारे 'भूः' इस मन्त्र से प्रथम वार, भुवः' मन्त्र से द्वितीयवार और 'स्वः' मन्त्र से तृतीय वार सीमन्त के कंश आदि पिजूलि द्वारा बढ़ा देवे । 'येनादिते०' मन्त्र को पढ़ता हुआ जिस 'श' का बारा तैयार होता हो उसी शर से सीमन्त को वीच से चीड़ कर शोभा- यमान करे । 'राकामहम्' मन्त्र को पढ़कर जिस स्याही के कांटे में तीन स्थानमें श्वेत हों ऐसे कांटे से छोटे २ केशों को ऊपर को उठा देवे । तब भी संवरा देकर भाग का पका तिल तंडुन उसे देखावे और उसके दर्शन समय उसे पति पूच्छे कि 'तुम उसमें क्या देखती हो ?, उत्तर में बधू बोले कि "प्रजा' इत्यादि। अनन्तर उस दिन वधू उसी को भोजन करे और उस भोग- न करते समय ब्राह्मणीगया वधू को 'वीर-प्रसविनी होओ' इत्यादि मान सूचक वाक्यों से ईश्वरोपासना करें। यही सीमन्तोन्नयन संस्कार है ।३.१२॥ अथ सोष्यन्तीहोमः ॥१३॥ 'अय' प्रकरणान्तरं द्योतयति । 'सोयन्तीहोमा' एतनामकबापर संस्कारः कार्यः ॥ १३॥ तस्य कालं विधते; भाषा-इसके अनन्तर 'सोष्यन्ती-होम' नामक संस्कार होता है ॥१३॥ प्रतिष्ठिते वस्ती ॥ १४ ॥ - प्र०२ख०७लू०१३-१७] सोष्यन्तीहोमः॥ ९३ 'वस्ती' योनिप्रदेश 'प्रतिष्टिते' गर्भे समुपस्थिते सोष्यन्ती होमः कार्यः इति तत्कालनिर्देशः। १४ तत्रेतिकर्तव्यतां विधत्तेः भाषा-जिस समय प्रसवके द्वार देशमें गर्भ आ पड़े उसी समय अर्थात प्रसवके लगे हुए यह 'सोष्यन्तीहोम' संस्कार करे ॥ १४ ॥ परिस्तीया॑ग्निमाज्याहुती जुहोति या तिरश्चीत्येत. तयर्चा विपश्चित्पुच्छमभरदिति च पुमानयं जनिष्यतेऽसौ नामेति नामधेयं गृह्णाति यत्तद् गुह्यमेव भवति ॥१५-१७॥ 'अग्निम् परिस्तीर्य' 'तत्र' या तिरश्ची निपद्यते अहं विधरणी इति । तां त्वा घृतस्य धारया यजे सराधनी महम् । “सराधन्यै देव्यै देष्ट्यै ॥ ६ ॥ (म० ब्रा० १, ५, ६)-'इत्येतयों', विपश्चित् पुच्छमभरत् तद्धाता पुनराहरत् । परेहि त्वं विपश्चित् पुमानयं जनिष्यतेऽसौ नाम ॥ ७॥ (म० ब्रा० १, ५, ७ 'इति' अनया च 'आज्याहुती' भाज्यतन्त्रेण आहुतिद्वयम् 'जुहोति' जुहुयात (१५)। अपरञ्च 'अयं' गर्भः 'पुमान् जनिष्यते' चेत् 'असौ नाम'-'इति' 'नामधेयं जनिष्यमाण पुत्राख्यां 'गृह्णाति' प्रकल्प्य रक्षति (१६)। 'यत् नामधेयं मनसि निश्चितम् , 'तत्' नामधेयं गुह्यम्' गोप्यमेव 'भवति' भवेत् , अन्यथा कन्याजाते हासाय स्याच्छत्रूणामिति (१७)। गतोऽयं सोप्यन्तीहोमसंस्कारः ॥ १५-१७ ॥ अथ जातकर्मोच्यते- भाषा-पूर्व उपदेश के अनुसार अग्नि स्थापनादि “परिस्तरण" कार्य के पीछे 'या तिरश्ची' इस मन्त्र से और 'विपश्चित् पुच्छमभरत्' मन्त्र से आज्य तन्त्रद्वारा दो आहुति देवे । (१५) उस समय, यदि पुत्र जन्म लेवे तो यही नाम रेवलूँगा इस प्रकार मनही मन एक नाम स्थिर कर रक्खे। अर्थात् पुत्र की आशा करे (१६) परन्तु उसे प्रकाश न करे ॥ १५-१७॥ यदाऽस्मै कुमारं जातमाचक्षीरनथ ब्रूयात् कान्क्षत नाभिकृन्तनेन स्तनप्रतिधानेन चेति ॥ १८ ॥ 'यदा' यस्मिन् काले प्रसवगृहस्थाः धात्रीप्रभृत्या सर्वे कुमारं जातम्'- गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- Appu wmomsamme indian 'इति' समाचारम् 'अस्मै पित्रे 'पाचक्षीरन्"अथ तदव्यवहितमेव पिता 'श्रूयात्'- 'नाभिकृन्तनेन' नाभिलमनाडीच्छेदनेन 'च' अपि स्तनप्रतिधानेन' स्तनपायनेन एर्न पालयितुं 'काक्षत' इच्छां कुरुत यूयम् 'इति' ॥ १८ ॥ भाषा-इसके बाद जात-कर्म संस्कार है जैसे-जिस समय सूतिका गृह में रहने वाली धाई आदि बोल उठे कि 'लड़का पैदा हुआ' तो पिता बोले कि 'नाभि से लगी हुई नाड़ी काटो और स्तन आदि पिना कर रक्षा करो'१८ ब्रीहियवो पेषयेत्तयैवाऽऽवृता यया शुङ्गान्दक्षिणस्य पाणे रङ्गुष्ठेनोपकनिष्ठिकया चागुल्याभिसगृह्य कुमा रस्य जिह्वायां निर्माष्टीयमाज्ञेति तथैव मेधाजनन सर्पिः प्राशये जातरूपेण वादाय कुमारस्य मुखे जुहोति मेधान्ते मित्रावरुणावित्येतयचर्चा सदसस्पतिमद्भुतमिति च कृ- न्तत नाभिमिति ब्रूयात् स्तनञ्च प्रतिधत्तेति ।। १६-२२ ।। नाभिकृन्तनात् पूर्वकृत्यमाह; 'यया' पूर्वोक्तया 'आवृता' परिपाट्या 'शुङ्गा' पूर्वोक्तां 'पेषयेत्' 'तयैव' ब्रीहियवौ पेपयेत् (१९) पिष्टौ च ब्रीहियवो 'दक्षिणस्य पाणेः अङ्गुष्ठेनोपकनिष्ठिकया च अगुल्या अभिसङ्ग्रह्म' "इयमाझेद मनमिद मायुरिदममृतम्" ॥ ८ ॥ (म० प्रा० १, ५, ८)-'इति' इमं मन्त्र मुच्चरन् 'कुमारस्य' तस्य 'जिह्वायां' निर्माष्टि' नियच्छति (२०)। तथैव' तेनैव' प्रकारंगा दक्षिणस्य पाणेः अङ्गुष्टानामिकाभ्यां गृहीत्वेति यावत् 'मेधा ते मित्रावरुणी मेधा ममिर्दधातु ते । मेधा ते अश्विनौ देवा वाधत्तां पुष्करमजी' ॥ ९ ॥ ( म०मा० १,५,९)-'इत्येतयो' 'च' अपि 'सदसस्पतिमद्भुतम् (छ० प्रा०२,२,३,०)- 'इति' अनया 'मेधाजमनं सर्पिः' 'प्राशयेत्' । 'वा' अथवा 'जातुरूपेण 'हिरण्येन' हिरण्मयशलाकादिमा 'प्रादाय' गृहीत्वा सर्पि, 'कुमारस्य तस्य 'मुखे "जुहोति' जुहुयात् क्षिपेत् (२१)। एतदनन्तरम् 'नाभिम् कृन्तत'-'इति', 'स्तन प्रतिधत्तर- 'इति' 'च' 'घूयात्' प्रादिश्यात् पितेति शेषः । पित्रादेशग्रहणपूर्वकमेव मामिकृन्तन स्खनप्रतिधानन्चेति गतं जातकर्म ॥ २२ ॥ aur प्र०२खं०७ सू० १८-२३] जातिकर्मविधिः ॥ भाषा-पहिले जो शुङ्गा पीसने का नियम कहा गया है उसी प्रकार धान्य तण्डुल और 'यवतण्डुल पीस कर नाड़ी छेदन के पूर्व ही दहिने हाथ से अनामिका और अगुठे के द्वारा ग्रहण करते 'यही ईश्वर की प्रा. ज्ञा है। यह मन्त्र पढ़ कर बालक की जीभ में चटा देवे और बुद्धि बढ़ने की इच्छा से 'मेधान्ते मित्रावरुणौ' मन्त्र और 'सदसस्पति मद्भुतम्' (छ. श्रा० २, २, ३, ७ ) दो मन्त्रों को पढ़ कर, दो बार उसी प्रकार अङ्गुठा, अनामिका द्वारा घृत भी चटावे, या सुवर्ण की शलाकादि के अग्र भाग से लड़के के मुख में देवे । फिर नाड़ी काट कर स्तन पिलावे, ॥ १६, २२ ॥ यही जान कर्म संस्कार है। अत उर्ध्वमसमालम्भनमादशरात्रात् ॥ २३ ॥ 'अतऊर्ध्वम्' नाभिकृन्तनात् परस्तात् 'आदशरात्रात्' दशरात्रिशेषं यावत् 'असमालम्भनम्' अस्पर्शनम् कुमारमातुरित्यशौचविधिः ॥ २३ ॥ इति सामवेदीये गोभिलगृह्यसूत्रेद्वितीयप्रपाठकेसप्तमखण्डस्यव्याख्यानं समाप्तम् ॥२,७॥ भाषा-नाड़ी छेदन के पीछे दश दिन प्रसूति स्पर्श योग्या न होगी २३ गोभिलगृह्यसूत्रके द्वितीय अध्यायके सप्तम खण्ड का भाषानुवाद पूग हुअा२,७ जननाद्यस्तृतीयज्योत्स्नस्तस्य तृतीयायां प्रातः स- शिरस्कं कुमारमाप्लाव्यास्तमिते वीते लोहितिम् न्यञ्जलि- कृतः पितोपतिष्ठतेऽथ माता शुचिना वसनेन कुमारमा. च्छाद्य दक्षिणत उचं पित्रे प्रयच्छत्युदक्शिरसम्मनुष्य- ष्ठम्परिक्रम्योत्तरतोऽवतिष्ठतेऽथ जपति यत्ते सुसीमइति यथाऽयन्नप्रमीयेतपुत्रो जनित्र्या अधीत्युदञ्चं मात्रे प्रदाय यथार्थम् ।। १-५॥ 'जनता' जन्मतः आरभ्य 'यः' 'तृतीयः' 'ज्योत्स्नः' ज्योत्स्नायुक्त पक्षः, 'तस्य पक्षस्य 'तृतीयायां तिथौ 'प्रातः' 'कुमार' 'सशिरस्कम् प्राप्लाव्य शिरसि जलदानेन स्नापयित्वा 'अस्तमिते' सूर्ये 'वीते' विगते च लोहितिम्नि', 'पिता' गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - - कुमारजनकः 'अञ्जलिकृतः' पुत्रग्रहणाय प्रसारिताञ्जलिद्वयः सन् 'उपतिष्ठते' उ- त्थितस्तिष्ठेत (१)। 'अथः तदनन्तरं 'माता' कुमारप्रसूतिः 'शुचिना' शुभ्रेण निर्मलेनति यावत् 'वसनेन' 'कुमारम्' 'श्राच्छाद्य' 'दक्षिणतः दक्षिणस्यां दिशि गत्वा 'उदन्च उत्तानम् 'उदशिरसं' 'पित्रे' कुमारजनकाय तस्मै प्रयच्छति' प्र- यच्छेत् (२)। दत्त्वा च सा 'अनुपृष्ठं परिक्रम्य स्वपतिपृष्टदेशेनागत्य 'उत्तरस्यां सुतरां पत्युमभागे 'अवतिष्ठते' अवस्थिता भवेत् (३) । 'अथ' दम्पत्योर्य- थोक्तभावेन सकुमारावस्थानानन्तरं पतिः 'यत्ते सुभोमे हृदय, हितमन्तः प्रजा- पतौ। वेदाहं मन्ये तदुब्रह्म माहं पौत्र मघं निगाम्" ॥१०॥ यत् पृथिव्या म- मृतं दिवि चन्द्रमसि श्रितम् । वेदामृतस्याहं नाम माहं पौत्रमधरिदम् ॥११॥ इन्द्राग्नी शर्म यच्छतं प्रजायै मे प्रजापतिः । यथायं न प्रमीयते पुत्रो जनिभ्या अ- घि" ॥१२॥ (म० ब्रा० १, ५, १०-१२) 'जपति' जपेत् ( ४ ) जपिस्वा च 'उदञ्च उत्तानमेव तं कुमारं मात्रे तत्प्रसूत्यै 'प्रदाय' प्रदानं कृत्वा समाप्त ज्योत्स्नोपस्थानमिति मत्वा 'यथार्यम्' यथाप्रयोजनं विहरेदिसि (५)॥२-५॥ भाषा-जन्म से तृतीय शुक्ल पक्ष की तृतीया में प्रातःकाल हीनवकुमार को मस्तक तक धोकर स्नान करावे । फिर सूर्यास्त के पीछे उस नवकुमार का पिता, पुत्र ग्रहण के लिये दोनों अञ्जलि पसार कर खड़ा हो और नव- कुमार की मातो उसे साफ वस्त्र से ढाक कर अपने स्वामी के दक्षिण ओर आकार बालक को उत्तरशिरा और उत्तानभाव से उसकी अञ्जलि में प्रदान करे । स्वयं अपने पीठ पर होकर वाम दिशा आकर युग्म रूप से अवस्थित हो । पीछे बालक के साथ पिता 'यत्ते सुसीमे' एवं से 'यथा अयं न प्रमीयेत पुत्रो जनित्या अधि' तक तीन मन्त्रों का पाठ करे । फिर पकड़े हुये पुत्र को उसकी माता को पुनः प्रदान करे यथेच्छ विचरें ॥ १-५॥ अथ येऽत ऊर्ध्व ज्यौरस्नाः प्रथमोदिष्टएव तेषु पितोपतिष्ठतेऽपामञ्जलिं पूरयित्वाऽभिमुखश्चन्द्रमसं यद- दश्चन्द्रमसीति सकृद्यजुषा द्विस्तूष्णीमुत्सृज्य यथार्थमा६७ अथ प्रकरणान्तरं द्योतयति । अतः', जननात् तृतीयज्योत्स्नातः 'ऊदुबै PIRE प्र० २ खं० ८ सू०१-८] जातिकर्म ॥ उपरिष्टात् परस्तादिति यावत् , 'य' 'ज्योत्स्नायुक्ताः कालाः शुक्लपक्षाः, 'तेषु' ज्योत्स्नेषु कालेषु 'प्रथमोद्दिष्टे' प्रथमागते ज्योत्स्ने जननाच्चतुर्थे शुक्लपक्षे, यस्यां क- स्यामप्येकस्यां तिथौ सम्भवतश्चन्द्रोदये 'पिता' कुमारजनकः 'अपामञ्जलिं पूरयित्वा' चन्द्रमसम् अभिमुखः' सन् 'उपतिष्ठते' उपतिष्ठेत उत्थितस्तिष्ठेत (६)। ततश्च "यदहश्चन्द्रमसि कृष्णं पृथिव्या हृदयश्रितम् । तदहं विद्वास्तत् पश्यन् माहं पौत्रमघरुदम् ॥ १३ ॥ ( म० ब्रा० १, ५, १३) 'इति' अनेन 'यजुषा' छन्दःशून्यमन्त्रेण 'सकृत', 'तूष्णी' श्रमन्त्रकं 'द्विः' द्विवारम् 'उत्सृज्य' गृहीतो- दकाञ्जलिमिति यावत; समाप्त मबमर्जनं कृत्य मिति मत्वा 'यथार्थ यथाप्रयोजन विहरेदिति शेषः ॥६॥७॥ अथ नामधेयं विधत्ते; भाषा-जन्म से चतुर्थ शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पूर्णिमा तक १५ रात्रि के जिस किसी रात्री में चन्द्रोदय समय कुमार का पिता खड़ा होकर चन्द्रमा के सम्मुख हो 'यदहश्चन्द्रमसि' मन्त्र पढ़ कर एक बार एवं अपर दो वार विना मन्त्र साकल्य में तीन अजलि जल छोड़ देवे ॥ ६. जननादशराने व्युष्टे शतरात्रे संवत्सरे वा नामधेयकरणम्॥ 'जननात्' जननदिनमारभ्य 'दशरात्रे शतराने संवत्सरे वा' 'व्युष्टं' अतीते एकादशदिनादौ 'नामधेयकरणम्' कुमारस्येति ॥ ८॥ तत्रेतिकर्तव्यतां विधत्ते:- भाषा-जन्म से १० या १००या एक वर्ष पर बालक कानाम करण करे ॥८॥ अथ यस्तत् करिष्यन् भवति पश्चादग्ने रुद्गग्रेषुदर्भेषु प्राङपविशत्यथ माता शुचिना वसनेन कुमारमाच्छाद्यद्- क्षिणतउचं करें प्रयच्छत्युदशिरसमनुपृष्ठं परिक्रम्यो- त्तरतउपविशत्युदगग्रेष्वेव दर्भेष्वथ जुहोति प्रजापतये तिथये नक्षत्राय देवतायाइति तस्य मुख्यान् प्राणानस्स- म्मृशनकोऽसि कतमोऽसीस्येतंमन्त्र जपत्याहस्पत्यं मासं- प्रविशासावित्यन्तेच मन्त्रस्य घोषवदाद्यन्तरस्थन्दीर्घाभि- गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - । निष्ठानान्तं कृतन्नाम ध्यादेतदतद्धितमयुग्दान्तस्त्रीणा- म्मात्रे चैव प्रथमं नामधेयमाख्याय यथार्थङ्गौईक्षिणा||६-१८॥ 'अथ' प्रक्रमार्थः 'यः पुरुषः पिता पुरोहितो वा 'तत्' नामधेयं कर्म 'करिष्यन् भवति,' सः 'अग्नेः' पश्चात, उदगग्रेषु दर्भेषु' 'प्राङ्मुखः सन् 'उपविशेत (९)। 'अर्थ' तदनन्तरं 'माता' दक्षिणतः दक्षिणस्यां कतुर्दक्षिणभागे गत्वा 'शुचिना वसनेन कुमारम् आच्छाद्या 'उदक्शिरसम्' उत्तरशिरस्कम् किञ्च' उत्तानं शिशुं 'करें' नामधेयकर्मणोऽनुष्ठात्रे प्रयच्छति (१०)। दत्त्वा च 'अनुपृष्टं परिक्रम्य' सा 'उत्तराग्रेषु दर्भेषु' 'उत्तरतः' उत्तरस्यां दिशि कर्तुर्वामभागे 'उपविशति' उपविष्टा भवेत् (११)। 'अथ' तदनन्तरं, क्रोडीकृतकुमारः सः 'प्रजापतये' प्रजापतिदेवतामनुकूलयितुं तथैव 'तिथये',तथैव 'नक्षत्राय', 'जुहोति' हवनं कुर्यात् (१२)। एवं होमानन्तरं 'तस्य' कुमारस्य 'मुख्यान् प्राणान्' मुखगतश्वासान् 'सम्मृशन्' अगुलीभिः स्पृशन् 'कोऽसि कतमोऽसि रूषोऽस्यामृतोऽसि प्राहस्पत्यं मासं प्रविशासौ ॥ १४॥ सत्वाहे परिददात्वहस्त्वारात्र्यै परिददातु रात्रि स्त्वा- होरात्राभ्यां परिददात्वहोरात्रौ त्वाद्धमासेभ्यः परिदत्तार्द्धमासास्त्वामासेभ्यः परिद- दतु मासास्त्वर्तुभ्यः परिददत्वृतवस्त्वा संवत्सराय परिददतु संवत्सरस्त्वायुपे जरायै परिददात्वसौ ॥ १५ ॥ (म० ब्रा० १, ५, १४-१५)।-'इत्येवं मन्त्रं 'जपति' जपेत् (१३)। 'मन्त्रस्य' तस्य 'आहस्पत्यं मासं प्रविशासौ' - 'इति' अत्र 'च' अपि 'अन्ते' चरमे असौ इत्यस्य स्थाने 'कृतं नवरचितं 'नाम' श्राहा- नाद्यर्थव्यवहार्य पद 'दध्यात्' स्थापयेत् व्यवहर्यादिति । तच्च नाम 'घोषवदाद्यम्' आदितएव घोषसंज्ञकाक्षरयुक्तम् , 'अन्तरन्तस्थं' अन्तस्थसंज्ञकाक्षरमध्यं, 'दीर्घा- मिनिष्टानान्त' दीर्घसंज्ञकाभिनिष्ठानसंज्ञकाक्षरयोरन्यतरावसानकं भवेत् (१४)। एतत् नाम 'अतद्धितं' तदितप्रत्ययरहितमेव कार्यम् (७५)। 'स्त्रीणाम्। कायानां तु 'अयुग्दान्तम्' अयुग्माक्षरान्तं दान्तव्यतिरिक्तश नाम दध्यादित्येव तत्र विचार्यम् (11)। 'च' पुनः तत् 'नामधेय मात्रे एवं' प्रथम 'स्याय' परिज्ञाप्य बामधेयकरणं समासमिति मत्वा 'यथार्थम् यथाप्रयोजनं विहरेदिति (१७)। अस्य कर्मणः 'गौः' एका दक्षिणा देवेति (16)। समा नामधेयकरणम् ॥ 11 प्र० २ खं० ८ सू०९-१८] मेधाजनननिष्क्रमणनामधेयकर्माणि ॥ भाषा-पिता. या पुरोहित अग्नि की पश्चिम में उत्तराम डाले हुए कुश के आसन पर पूर्वमुख वैठे, कुमार की प्रसूति, साफ वस्त्र में शिशु को ढांक कर ले आवे और नाम करण संस्कार करने के लिये प्रवृत्त कुमार के पिता या अपर ब्राह्मण के दहिने ओर आकर उत्तर शिरा और उत्तानभाव से उसे देकर नाम करण करने में प्रवृत्त पिता या ब्राह्मणा के पीठके रास्ते से पाकर कुशपुञ्ज पर बैठे। फिर कुमार को गोद में ले कर पहिले प्रजापति देवता की नुष्टि के लिये होम करे' पीछे जिस तिथि में कुमार का जन्म हुआ है, उस तिथि का नाम ले कर दूसरी आहुति प्रदान करे, उसके बाद जिस नक्षत्र में कुमार का जन्म हुआ है उसका नाम कहकर तीसरी आहुति देवे । फिर उस बालक के मुख में हाथ देकर श्वास, स्पर्श कर "कोऽस कतमोसि” मन्त्र पढ़कर एवं इस मन्त्र के पाठ समय दो स्थान में स्थित 'असौ' पदके बदले नूतन नाम रक्खकर व्यवहार करे । नामके अक्षर घोष वर्ण, मध्यमें अन्तस्थ वर्ण, एवं अन्त्य वर्ण दीर्घ या विसर्ग होगा। विशेषतः नाम में तद्धित न रहे। कन्या सन्तान का नाम युग्म अक्षर अन्त में, और दकारान्त न हो यों नाम युक्त मन्त्र के दोनों स्थान में 'असौ' पद के स्थान में मिला कर पाठ समाप्त होने पर उस नामका सबसे पहिले उसकी प्रसूति को बतलावे- यों संस्कार शेष कर, संस्कार की दक्षिणा ब्राह्मण को एक गौ देवे ॥१८॥ कुमारस्य मासिमासि संवत्सरे सांवत्सरिकेषु वा पर्वस्वग्नीन्द्रौ द्यावापृथिवी विश्वान्देवा,श्चयजेत दैवत- मिष्ट्वातिथिं नक्षत्रश्च यजेत ॥ १६ ॥ २० ॥ 'कुमारस्य' नवजातस्य संवत्सरे' प्रयमे 'मासि मासि' प्रति जन्मतिथौ, 'वा' अथवा 'सांवत्सरिके' जन्मतिथावेव प्रथमे एव 'च' अथवा 'पर्वसु' पौर्णमास्या- मावास्यासु प्रथमे संवत्सरे एव 'अग्नीन्द्रौ' 'द्यावापृथिवी' 'च' अपि विश्वान् देवान्' 'यजेत' यागेनेष्टं भावयेत् (१९) 'दैवतमिष्ठा' अग्नीन्द्रादियागं प्रकृत्य 'तिथि' जन्मनः 'च' अपि 'नक्षत्रं जन्मन एव 'यजेत' (२०) गतमिदं पौष्टिकं कर्म जन्मतिथिकृत्यं वा ॥ १९, २० ॥ अथ मूर्धाभिघ्राणम् :- गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- भाषा-प्रथम वर्ष प्रतिमास की जन्मतिथि में या प्रतिपूर्णिमा और अमावास्या पर्व में अग्नीन्द्र, द्यावापृथिवी, और विश्वेदेवा देवता की पूजा कर तिथि और नक्षत्र की भी पूजा करे । यह जन्मतिधिकृत्य है ॥१६, २०॥ विप्रोष्य ज्येष्ठस्य पुत्रस्योभाभ्यां पाणिभ्यां मूर्धानं परिगृह्य जपेद् यदा वा पिता मइति विद्यादुपेतस्य वाङ्गा दक्षात् सस्रवसीति पशूनां त्वा हिङ्कारेणाभिजिघ्रामीत्य- भिजिघघयथार्थमेवमेवावरेषां यथाज्येष्ठं यथोपलम्भं वा स्त्रियास्तूष्णीं मूर्धन्यभिजिघ्रणम् ॥ २१-२५॥ ८ ॥ 'विप्रोष्य' प्रवासादागत्य, 'वा' अथवा 'यदा' यस्मिन् काले 'मे पिता इति विद्यात्' बालकः तदैव, 'वा' अथवा 'उपेतस्य' सनिहितस्य यदैव सन्निहितो भवेत तदेव, 'ज्येष्ठस्य पुत्रस्य मूर्दानं पाणिभ्यां परिगृह्य' "अङ्गादङ्गात् स सबसि हृदयादधिजायसे। प्राणं ते प्राणेन सन्दधामि जीव मे यावदायुषम् ॥ १६ ॥ अङ्गादङ्गात् सम्भवसि हृदयाधि जायसे। वेदो वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतम् ॥१७॥ अश्मा भव परशुर्भव हिरण्यमस्तृतं भव । आत्मासि पुत्र मामृथाः- स जीव शरदः शतम्' ॥ १८ ॥ (१,५, १६, १८),-'इति' तृचं "जपेत् (२१), ततः “पशूनां त्वा हिङ्कारेणाभिजिघ्राम्यसौ ॥ १९॥ ५ (३, ५, १९) 'इतिर इमं मन्त्रं पठन् 'अभिजिघ्रय' आघ्राय समाप्त मूर्तघ्राणं कर्मेति मत्वा 'यथार्थम् यथाप्रयोजनं विहरेत् (२२)। 'अवशेषां तत्कनिष्ठानामपि पुत्राणाम् 'एवमेव मूर्दाघ्राणं कर्तव्यम् (२३)। तत्र च 'यथाज्येष्ठं' ज्यैष्टानुक्रमेणैव मुर्दाघाण कार्यम् । 'वा अथवा यथोपलम्भ' येन क्रमेण पितृसन्निधौ ते उपस्थि- तास्यु तेनैव कमेणेति ( २४)।" "खिया' कन्यायाः 'म नि' मस्तके 'अमि- जिघ्रणं प्रामाणग्रहणं 'तूष्णीम्' अमन्त्रकमेव कार्यम् (२५) । समाप्तं मूर्दा- प्राणम् । द्विवचन क्षुद्रकर्मप्रकरणसमाप्तिद्योतकम् ॥ २१-२५ ॥ ८॥ इति सामवेदीये गोभिलगृह्यसूत्रे द्वितीय प्रपाठके अष्टमखण्डस्य व्याख्यानं समातम्र, पिता जब प्रदेश से घर अावे. या जिस समय पत्र "मेरा पिता प्र०२खं०८सू० २१-२५] पौष्टिककर्ममूर्धाभिनाणंच ॥ . यही है ऐसा समझ ले, या जब ही निकट आवे उसी समय 'अङ्गादङ्गात् सम्भवसि' तीन मन्त्रों को पढ़कर हाथ से बड़े पुत्र का मस्तक पकड़ कर 'पशूनांत्वा' मन्त्रसे उसे सूंघे, पीछे यथेच्छ विचरे । अपर पुत्रादि का मस्तक भी इसी प्रकार सूघे । जो जिस के पीछे उत्पन्न हुअा हो या जो जिस समय निकट आवे तदनुसार कन्याका, विना मत्र सू/वाण करे ॥ २१-२५८ ॥ गोभिलगृह्यसूत्रके द्वितीय अध्यायके अष्टमखण्डका भाषानुवादपूगहुआ ॥२८॥ :0:-- अथातस्तृतीये वर्षे चूडाकरणम् ॥ १ ॥ 'अथ' प्रकरणान्तरतां द्योतयति । 'अतः आरभ्य चूडाकरणं' कर्म वच्नीति। तच्च 'तृतीये वर्षे कार्यमिति चूडाकरणकालः ॥१॥ तस्येतिकर्तव्यतां विधत्ते;- भाषा-यह चूड़ाकरण कार्य बालक वा वालिकाके तीसरे वर्ष में करे॥२॥ पुरस्ताच्छालाया उपलिप्तेऽग्निरूपसमाहितोभवति तत्रै- तान्तुपक्लुप्तानिभवन्त्येकविशतिदर्भपित्रुल्य उष्णोद- ककस औदुम्बरःतुरश्रादर्शो वा तुरपाणि पित इति द- क्षिणत श्रानडुहो गोमयः कृसरः स्थालीपाको वृथापक्व इ. स्युत्तरतोब्रीहियवैस्तिलमारिति पृथक् पात्राणि पूरयित्वा पुरस्तादुपनिट्युः कृसरोनापिताय सर्वबीजानिचेति ॥२-७॥ 'शालायाः' 'पुरस्तात्' पूर्वस्मिन् भागे 'उपलितें' स्थाने 'अग्नि उप समाहितः भवति' (२)। 'तत्र 'एतानि' अनुपदं वक्ष्यमाणानि 'उप क्लुप्तानि' प्रासाद्य सजितानि भवन्ति' (३)। तान्येवाह -'एकविंशतिः दर्भपितल्या', 'उष्णोद- ककंसः' उष्णोदकसहितकांस्यपात्रम् , 'श्रौदुम्बरः' उदुम्बरकाष्टनिर्मितः 'क्षुरः' 'वा' अथवा 'आदर्श' दर्पणः, 'क्षुरपाणि पित:-'इति' चत्वारि वस्तूनि सम्पाय 'दक्षिणतः दक्षिणस्यां अग्नः स्थाप्यानीति (४)। किञ्च प्रानदुहः गोमयः' वृथापक्वः' श्रमन्त्रपक्कः 'कृसरः स्थालीपाकः' इति' द्वे वस्तुनी सम्पाद्य 'उत्तरत' उत्तरस्यां अग्नरेव सर्वत्र पूर्वाभिमुखएव कर्ता सुतरां कर्तुमभागे (५)। - .. - गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - के . 'व्रीहियवैः' मिश्रितैः 'तिलमाषैः' मिश्रितैरेव 'पृथक' 'पात्राणि' 'पूरयित्वा' 'पुरस्तात्' अग्नेरेव पूर्वस्यां परस्तादिति यावत , 'उपनिदध्युः' स्थापयेयुः (६) एषु च उक्तः 'कृसरः' 'च' अपि 'सर्वबीजानि' ब्रीहियवैस्तिलमापैश्च पूरितपात्राणि 'नापिताय तस्मै देयानि (७)॥२-७ ॥ भाषा--जिस स्थान में चूडाकर्म करना हो, उसे गोमय से लीप कर पूर्व भाग में यथा विधि अग्नि स्थापन करे (२) और आगे कहे सामान को वहां रक्खे(३)जैसे-इक्कीस दर्भपिञ्जूली, गर्म जल से भरा कांसेका पात्र, गूलर काष्ठ का क्षुग, दर्पण, एवं लोहे का क्षुरा सहित नापिन, ये चार वस्तु दक्षिण दिशा में उपस्थित रखे (४) सांढ़ का गोबर, अमन्त्र पक्क कृसर, सिद्ध (तण्डुल,) ये वस्तु उत्तर में रक्खे (५) पूर्व दिशा में एक पात्र में धान्य, यव एवं दूसरे पात्र में तिल और माष रक्खे, (६) कृसर और धान्यादिपूर्ण पात्र नापित को देवे ॥२-७ ॥ अथ माता शुचिना वसनेन कुमारमाच्छद्य पश्चादग्ने. रुद्गग्रेषु दर्भेषु प्राच्युपविशति । ८॥ 'अथ' तदनन्तरम् । 'माता' वालकस्य, 'शुचिना वसनेन कुमारम् आच्छाद्य, अग्नेः पश्चात् उदगग्रेषु' 'प्राची' प्राङ्मुखी सती 'उपविशति' ॥ ८॥ भाषा-उसके वाद माता वालक को साफ वस्त्र में लपेट कर अग्नि के पीछे उत्तराम रक्खे हुए कुशासन पर पूर्व मुख बैठे ॥८॥ अथ घस्तत्करिष्यन् भवति पश्चात् प्राङवतिष्ठते ॥६॥ 'अर्थ' तदनन्तरम् । 'यः पुरुषः 'तत् चूडाकरणं नाम संस्कारकार्य करि व्यन् भवति' पिता पुरोहितो वा सः 'पश्चात्' उपविष्टायाः सपुत्रायाः, 'प्राक् प्राङ् मुखः सन् अवतिष्टते' अवस्थानं कुर्यात् ॥ ९ ॥ भाषा-पीछे पिता, या पुरोहित, जो कोई चुड़ाकरण संस्कार करने को प्रवृत्त हो, वह उसके प्रश्चात् भाग में पूर्वाभिमुख हो कर बैठे ॥६॥ अथ जपत्यायमगात् सवितातुरेणेति सवितारं मनसा H प्र०२ख०९ सू०२-१७ ] चूडाकरणम् ॥ १०३ ध्यायन् नापितं प्रेक्षमाण उष्णेन वाय उदकेनधीति वायुं मनसा ध्यायनुष्णोदककथसंप्रेक्षमाणो दक्षिणेन पाणिनाऽप आदाय दक्षिणां कपुष्णिकामुन्दत्याप उन्दन्तु जीवस इति विष्णोर्दष्ट्रोऽसीत्यौदुम्बरं तुरं प्रेक्षत आदर्श वौषधे घायस्वैनमिति सप्तदर्वपित्रुलीदक्षिणायां कपु. ष्णिकाया मभि शिरोग्रा निदधाति ता वामेन पाणिना निगृह्य दक्षिणेन पाणिनोदुम्बरं तुरं गृहीत्वाऽऽदर्श वाऽ. भिनिद्धाति स्वधिते मैनहि सीरिति येन पूषा वृहस्पते रिति त्रिः प्राञ्चं प्रोहत्यप्रच्छिन्दन सकृयजुषा द्विस्तू हणीमथायसेन प्रच्छिद्यानडुहे गोमये निधाति ॥१०-१७॥ 'अथ' तदनन्तरम् । 'नापितं प्रेक्षमाणः' 'सवितारं मनसा ध्यायन्', “प्राय भगात् सविता क्षुरेण॥१॥(मत्रा०१,६,१)-'इति' इमं मन्त्रं 'जपति जपेत्(१०) उष्णोनवाय उदकेनैधि (२) (मं० वा० १, ६, २) इति इमं मन्त्रं पठन् 'वायु मनसा ध्यायन् उष्णोदककंसं प्रोक्षमाणः' भवति सः(११)। "श्राप उन्दन्तु जीव से" ॥३॥ (म० ब्रा० १, ६, ३)-इति' इमं मन्त्रं पठन् 'दक्षिणेन पाणिना अप 'श्रादाय' 'कपुष्णिकां' शिरःपोषिकां शिरःपाववर्तिकेशजुटिकां 'उन्दति' क्लेदयति (१२)। "विष्णोर्दष्ट्रोऽसि ॥४॥ (म० बा० १,६,४),- 'इति' इमं मन्त्रं पठन 'औदुम्बरं क्षुरमादर्श वा' 'प्रेक्षते' (१३)। "औषधे त्रायस्वैनम् ॥ ५॥ (म० ब्रा० १, ६,५),-'इति' इमं मन्त्रं पठन् 'अभि- शिरोमाः' शिरोऽभिखानाः 'दर्भपिजूली:' 'दक्षिणायां कपुष्णिकायो' 'निदधाति' धारयति (१४)। 'ताः' कपुष्णिकासहिता दर्भपिञ्जूलीः 'वामेन पाणिना' 'निगृह्य दृढतया गृहीत्वा "स्वधिते मैनहि सीः॥६॥(१,६,६)-'इति' इम मन्त्रं पठन् 'दक्षिणेन पाणिना' 'औदुम्बरं क्षुरम् श्रादर्श वा' 'गृहीत्वा" अभि- निदधाति' यत्नतो धारयेत् (१५)। ततश्च तेनैवौदुम्बरेण क्षुरेण दर्पणेन वा 'प्राञ्चं प्राग्गतं चालयन् परन्तु 'अप्रच्छिन्दन्' यथा च केशान् न छिन्द्यादेवं गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - कृत्वा त्रिवारं 'प्रोहति' कथङ्कारं वपनं कर्त्तव्यमिति सवितर्क पश्यति । तत्र च 'सकृत् "एकवारं येन पूषा बृहस्पतेर्वायोरिन्द्रस्य चापवत् । तेन ते पामि ब्रह्मया जीवातवे जीवनाय दीर्घायुष्ठाय बर्चसें' ॥ ७ ॥ ( म०ब्रा०३,६,७)-'इति'अनेन 'यजुषा' गद्यात्मकमन्त्रेण' द्विः' वारद्वयं 'तूष्णीम्' अमन्त्रकमेवेति (१६) 'अथ' तदनन्तरम् 'श्रायसेन' लौहमयेन क्षुरेण सपिजूलीं दक्षिणकपुच्छिका 'प्रच्छिद्य' पूर्वासादिते 'प्रानडुहे गोमये, निदधाति' स्थापयति (१७)॥ १५-१७ ॥ भाषा-अनन्तर, पिता या पुरोहित इस क्षुरहस्त नापित को देख कर मन ही मन जगत् प्रसविता देवता को ध्यान कर 'आयगमात्' मन्त्र को पढ़े ॥१०॥ गर्म जल के साथ कांसे के पात्र में देखकर मन ही मन वायु देवता का ध्यान कर 'उष्णेनवाय' इस मन्त्र को पढ़े ॥११॥ दाहिने हाथ से 'कपुष्णिका * ग्रहण कर 'आप उन्दन्तु' मन्त्र पढ़ कर उसमें गर्म जल्न से गीला करे ॥१२॥ 'विष्णोदण्ट्रोऽसि' मंत्र पढ़ते हुए उसमें गर्म जल सीच कर गृलर के काठ का क्षुग या दर्पण देखे ॥१३॥ 'ओषधे त्रायस्वेन' मन्त्र को पढ़ कर सात दर्भ पिज्जूली नीचे को जड़ एवं ऊपर को फुनगी इस भान्ति उस कपु- ष्णिका में धारण करावे ॥१४॥ पीछे दर्भ पिञ्जूनी के साथ दहिने कपुष्णिा- का आदि वांये हाथ में धरकर 'स्वधितेमैनंहिंसीः' मन्त्र पढ़कर दहिने हाथ में गूलर के काष्ठ का क्षुरा या दर्पण लेकर कपुष्णिका में अच्छे प्रकार धारण करे ॥ १५ ॥ एवं उसको पूर्वाभिमुख कर तीनवार चला कर कैसे कटेगा इस को तर्क करके देखे । उस तीनवार के चलाने में एकवार 'येन पूषा' अपर दो वार विना मन्त्र गूलर के क्षुरा, या दर्पण चनाने में केश नहीं कटते हैं ॥१६॥ अनन्तर लोहे के क्षुरे से उसी दर्भ पिञ्जूली के साथ दक्षिणकपुष्णिका को काट कर सांढ़ के गोवर में रक्खे ॥१७॥ एतयैवावृता कपुच्छलम् ॥१८॥ एतयोत्तरां कपुष्णि- काम् ॥ १६ ॥ उन्दनप्रभृति त्वेवाभिनिवर्तयेत् ॥२०॥ * मस्तक के ऊपर दोनों पार्श्व के केशों को कपुष्णिका कहते है अर्थात् 'क, शब्द का अर्थ शिर एवं केशादि उस के पोषक होने से 'क-पुषिणका, नाम हुआ । M प्र. २ खं०९सू०१८-२४] चूडाकरणम् ॥ 'एतया एव श्रावृता' कथितपरिपाटयैव 'कपुच्छलं' शिरःपुच्छसदृशं पश्चात्के- शकलापम् श्रायसेन क्षुरेण प्रच्छिद्य प्रानडुहे गोमये निदधाति ॥ १८ ॥ एतया' परिपाटया उत्तरां कपुष्णिकाम्, अपि प्रायसेन क्षुरेण प्रच्छिद्य प्रानडुहे गोमये नि- दधाति ॥ १९ ॥ कपुच्छकच्छेदने उत्तरकपुष्णिकाच्छेदने च उन्दनप्रभृति' पूर्वोक्त क्लेदनादि गोमये निधानान्तं (१२-१७ मू०) कर्मजातम् 'अभिनिवर्तयेत् नि- पादयेत्; न तत्पूर्वतनं नाथैतत्परतनञ्च तत्र पृथक्त्वेनानुष्ठेयम् ॥ २० ॥ भाषा-पूर्वोक्त प्रकारसे कपुच्छल को लोहे के चुरेसे काटे ॥ १८ ॥ उत्तर 'कपुष्णिका' कटवानेमें भी नियम है ॥१६॥ कपुच्छल और उत्तर 'कपुष्णिका' काटने में गर्म जलसे भिंगाना आदि सबही कार्य भिन्न २ करे उसके पूर्व, या पीछे का कार्य सव, प्रत्येकवारकाटने के लिये भिन्नन होंगे ॥ २० ॥ उभाभ्यां पाणिभ्यां मूर्द्धापरिगृह्यजपेत् त्र्यायुषं जमदग्ने- रिति । एतयैवावृतास्त्रियास्तूष्णीम्मन्त्रेण तु होमः २१-२४ इत्थं वालकस्य कपुष्णिकाद्वयं कपुच्छलन्च छेदयित्वा उभाभ्यां पाणिभ्यां मूर्धान परिगृय' व्यायुष जमदग्नेः कश्यपस्य न्यायुप मगस्त्यस्य व्यायुपम् । यद्दे- वाना न्यायुषं तत्ते अस्तु न्यायुपम् ॥ ८ ॥ (म० ब्रा० १, ६, ८)-'इति' इमं मन्त्र जपेत्' (२९) 'स्त्रियाः कन्याया अपि कपुषिणकादिच्छेदनम् एतया' 'श्रावृता' परिपाट्या “एव' कार्यम् (२२)। तत्रायं विशेष:-'तूष्णीम्' श्रमन्त्र- कमेव सर्वम् (२३)। तत्राप्ययं विशेषः-'मन्त्रेण तु होमः' चूडासंस्काराय होमस्तु तत्रापि मन्त्रेणैव कार्यः ( २४ ) ॥ २२- २५ ।। भाषा-यों दोनों कपुष्णिका और कपुच्छल काटने पर दोनों हाथसे लड़के के माथे को पकड़ कर 'त्रायुषं जमदग्नेः मन्त्र का जप करे ॥ २१ ॥ कन्याका चूडाकर्म इसी प्रकार विना मन्त्र होगा किन्तु होम, मन्त्र से होगा ॥२२-२४॥ उदगग्नेरुत्सृप्य कुशलीकारयन्ति यथागोत्रकुलक- ल्पमानडुहे गोमये केशान कृत्वाऽरण्य हृत्वा निखनन्ति स्तम्ब हैके निदधति यथार्थ गौदक्षिणा ॥२५-२६ ॥

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - 'अग्नेः' 'उदक्' उत्तरस्मिन् 'उत्सृप्य' उत्सर्पणेनोपविश्य यथागोकुलकल्पं गोत्रकुलानुरूपं सशिखं शिखाशून्यं वा, पञ्चचूडं वा, (तथाच-"वासिष्ठाः पञ्चचूडाः स्युस्त्रिचूडा कुण्डपायिनः" किञ्च "सशिखं वपनं कार्यमाम्नायाद्ब्रह्म- चारिणाम् । आशरीरविमोक्षाय ब्रह्मचर्य न चेद् भवेत्" इति। एवज्ञ वसिष्ट- गोत्राणं पञ्चचूडं मुण्डनम, कुण्डपायिनां त्रिचूडं मुण्डनम्, कौथुमानामासवर्तनात् सशिखं वपनञ्चेति ) बहुवचनं साधारणविध्यपेक्षम् (२५) मुण्डयित्वा च तान् 'केशान्' 'पान हे गोमये कृत्वा' 'अरण्य' हृत्वा' नीत्वा 'निखनन्ति' मृएमध्ये प्रोथयन्ति ( २६ ) 'एके' श्राचार्या आहुः 'स्तम्बेहझिण्टिवृक्षादिकुजे एवं नि- दधति' स्थापयन्ति तान् केशानिति (२७) इति गतं चूडाकर्मेति 'यथार्थम्' यथा. प्रयोजनं विहरेत्(२८)अस्य च चूडाकर्मणः'दक्षिणा गौः'एकैव(२९)२५-२९॥९॥ इतिसामवेदीयेगोभिलगृह्यसूत्रेद्वितीयप्रपाठकेनवमखण्डस्यव्याख्यानंसमाप्तम् २, ९ भाषा-दोनों कपुष्णिको काटे जानेपर बालक वहांसे हटकर अग्नि के उत्तर भागमें बैठे और श्रात्मीय लोग नापितसे गोत्र और कुलानुसार पांच,या तीन शिखा, या शिखारहितः या शिखासहित मुण्डन करवावे, ® ॥२५॥ मुण्डन कराने पीछे केशादिको वनमें लेजाकर भूमिमें गाड़ देवे २६ कोई २ श्राचार्य कहते हैं कि उसे वनमें लेजाकर किसी सघन वन स्थनमें फेकदेवे २७ यो कर्म समाप्त होनेपर यचेच्छ विचरे ॥२८॥ दक्षिणा एक गौ होगी ॥२५-२६॥ गोभिलगृह्यसूत्र के द्वितीयअध्याय के नवमखण्ड का भाषानुवाद पूरा हुआ गर्भाष्टमेषु ब्राह्मणमुपनयेत् १॥ गभैंकादशेषु क्षत्रियम् २॥ गर्भद्वादशेषु वैश्यम् ३॥ आषोडशावर्षाद् ब्राह्मणस्यानतीतः • इस लिये जिन लोगों का गोत्र वसिष्ट है उन को ५ शिखारख कर शिर मुद्दाना चाहिये 'एवं जिन का गोत्र 'कुण्डपायी, है उन्हें ३ चूड़ा रख कर मुण्डन कराना चाहिये और जिन की कौथुमी शाखा हैं वे बेद की समाप्ति पीछे समावत्तन होने तक शिंखा भी मुण्डन करा ले किन्तु जो लोग बहुत समय तक ब्रह्मचर्य रखना चाहें एवं समावर्तन का विचार न हो, तो उन्हें शिखा रक्षा पूर्वक मुण्डक कराना चाहिये ।

प्र०२ खं० १०सू०१-५] चूडाकरणपनयने ॥ कालोभवत्याद्वाविशात्क्षत्रियस्थाचतुर्विधेशादेश्यस्य॥४॥ 'गर्भाष्टमेषु' गर्भमासतो गणनया ये अष्टमाब्दकालास्तेषु यस्मिन् कस्मिन्नपि शुभदिने ब्राह्मणम्' ब्राह्मणजातीयकुमारम् 'उपनयेत्' वक्ष्यमाणप्रकारेण संस्कृत्य कृत्स्नवेदाध्ययनाय गुरावन्तिकं प्रापयेत् ॥ ॥ गर्भकादशेषु' 'क्षत्रियम्' उपनयेत् ॥२॥ उपनयेदित्येव ॥ ३ ॥ ब्राह्मणस्य' 'श्रा षोडशवर्षात् षोड़शाब्दवयः समाप्ति यावत्, 'क्षत्रियस्य' 'श्रा द्वाविंशात्' द्वाविंशाब्दान्तं यावत्, 'वैश्यस्य''आ चतुर्वि'. शात' चतुर्विशाब्दान्तं यावत् 'अनतीतः कालो भवति' उपनयनस्येति ॥ ४ ॥ भाषा--गर्भ से अष्टम वर्ष के जिस किसी शुभ तिथि में ब्राह्मण कुमार का उपनयन करे ॥१॥ क्षत्रिय कुमार को गर्भ से ग्यारहवें वर्ष में उपनयन करे ॥२॥ वैश्य के लड़के को, गर्भमास से १२ में वर्ष के उपयुक्त मास तिथि में उपनयन करे ॥ ३॥ ब्राह्मण कुमार को १६ वर्ष की अवस्था पूरी होने तक उपनयन करे इसमें हानि नहीं। क्षत्रिय कुमार के २२ वर्षकी अवस्था तक एवं वैश्य के लड़के को २४ वर्ष की उमर तक उपनयन हो सकता है ॥ ४ ॥ अत ऊर्ध्वं पतितसावित्रीका भवन्ति ॥ ५॥ 'प्रतअल' ब्राह्मणस्य पोडशाब्दात् परं, क्षत्रियस्य द्वाविंशाब्दात् परं, श्यस्य चतुर्विशाब्दात् परम् । अर्थत: एतावत् कालमप्यनुपनीताश्चेत् तर्हि 'पति तसावित्रीकाः' नात्यापरपर्याया, 'भवन्ति' ॥५॥ भाषा-उक्त काल के पीछे अर्थात् ब्राह्मण कुमार १६ वर्ष की अवस्था के पीछे, क्षत्रियकुमार २३वर्षकी अवस्था पीछे, वैश्यकुमार २४वर्षकी अवस्था पीछे, सावित्री पतित अर्थात् सावित्री मन्त्र के उपदेश योग्य नहीं रहते हैं ॥५॥ नैनानुपनयेयुर्नाध्यापयेयुर्न याजयेयुभिर्विवहेयुः ॥ ६॥ 'एतान्' पतितसावित्रीकान् 'न उपनयेयुः न अध्यापयेयुः, न 'याजयेयुः किञ्च 'एभिः सह' न विवहेयुः' कन्योद्वाहसम्बन्धं न कुर्युः । इति गतः कालनियमः ॥६॥ भाषा-उक्त सावित्रीपतित लोगों को पुनः उपनयन नहीं हो सकता है । ऐसों को कोई अध्ययन भी न करावे, न यज्ञ करावे, न इनका विवाह करे।६। यदहरुपैष्यन्माणवकोभवति प्रगएवैनं तदहभॊज.

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- यन्ति कुशलीकारयन्त्याप्लावयम्त्यला कुर्वन्त्यहतेन वा- ससाऽऽच्छादयन्ति ॥७॥ 'माणवकः' अनधीतवालक: “यदहः' यस्मिन्नहनि 'उपैष्यन्' उपनीती भ विष्यन् भवति, तदहः तस्मिन्नहनि 'प्रगे एव' प्रातरेव भोजयन्ति' मात्रादयः,यान कानप्याहार्यान् प्रातराशमात्र वा तं माणवकमिति शेषः । ततः 'कुशलीकारयन्ति' मुण्डयन्ति । ततः ‘प्राप्लावयन्ति' स्नापयन्ति । ततः ‘अलङ्कुर्वन्ति' शोभयन्ति । ततः 'अहतेन वासमसापाच्छादयन्ति' । सर्वदैव तं माणवकम् मात्रादय इति॥७॥ भाषा---जब बालक का उपनयन होवे, उस दिन प्रातः काल उसे प्रात- राश (दो पहर दिन से पहिले का भोजन ) या और अन्यखाद्य भोजन करावे । पीछे उस को मुण्डित कर स्नान करावे एवं, भूषणादि पहनावे और उसे अखण्ड वस्त्र से ढाक देवे ॥७॥ क्षौमशाणकार्पासौर्णान्येषां वसनानि । ८। ऐणेयरी- रवाजान्यजिनानि ।। 'एषां' ब्राह्मणादीनां त्रयाणां 'वसनानि' परिधेयानि 'क्षौमशाणकापासौणानि' कुर्युः ॥८॥ एषां 'अजिनानि' उत्तरीयचर्माणि ऐणेयरौरवाजानि' कर्तव्यानि ॥९॥ भाषा-बालक को पहनने योग्य वस्त्रः रेशमी, शण, कपास, या उनी चाहिये ॥८॥ और ओढ़ने के लिये ऐणेय, गैग्व, और वकरेके कर्मका होगाह मुञ्जकाशताम्बल्योरशनाः।१०।पार्णविल्वाश्वत्थादण्डाः॥११॥ एषां रशनाः' कटिबन्धनरजवः 'मुञ्जकाशताम्बल्यः ॥ १० ॥ एषां 'दण्डा:' हस्तपाद्याः 'पार्णवैल्वाश्वत्थाः' कर्त्तव्याः ॥ ११ ॥ भाषा-बालक के लिये (मेखला)कमर कस-मुज्ज, काश, या मजीठ, का होगा ॥१०॥ और दण्ड पलाश, बेल, या पीपर का होगा ॥११॥ क्षौमशाणं वा वसनं ब्राह्मणस्य कार्पासं क्षत्रियस्या- विकं वैश्यस्यैतेनैवेतराणि व्याख्यातान्यलाभे वा सर्वाणि सर्वेषाम् ॥ १२-१४ ॥

प्र.२ खं०१० सू०६-१४]] उपनयनम् ॥ पूर्वोक्तानां क्षौमादीनां मध्ये,-ब्राह्मणस्य' 'क्षौम' तसरादि प्रसिद्ध 'वा' अथवा 'शाणं' शणसूत्रमयं 'वसन' परिधेयं कार्यम् । 'क्षत्रियस्य' कार्पासं सूत्र- मयं वसनं कार्यम् । 'वैश्यस्य' श्राविक' अव्यूर्णामयं वसनं कार्यम् । एतेनैव' वसननियमकथनप्रकारेणैव 'इतराणि द्रव्याणि' अजिनरशनादण्डरूपाणि 'व्याख्या तानि' जथितानीवेति । तथाच पूर्वसूत्रेषु ( ९, १०, ११) यथाक्रमतोव्यवस्था ब्राह्मणस्य--ऐणेयं कृष्णसारमृगचर्म अजिनम् , 'मौञ्जी' मुञ्जमयी रशना पाण:' पलाशकाष्टीयश्च दण्डः । क्षत्रियस्य-रौरव' रुरुमृगचर्म अजिनम् , 'काशी' काश- मयी रशना, 'वैल्वः' विल्वकाष्टीयश्च दण्डः । वैश्यस्य-'आज' 'अजामृगचर्म अ- जिनम्, 'ताम्बली' शणमयी रशना, 'श्राश्वत्थ: अश्वत्थकाष्टीयश्च दण्डः । 'वा' अथवा 'अलाभे ब्राह्मणादीनाम् क्षौमैणेयादीनामप्राप्तौ 'सर्वेषा' ब्राह्मणक्षत्रिय. वैश्यानां 'सर्वाणि' क्षौमादीनि ऐणेयादीनि मौज़्यादीनि पोर्णादीनि च द्रव्याणि यस्य यथालाभतो ग्राह्याणि ॥ १२-१४ ॥ भाषा-उन में से ब्राह्मण को पहनने के लिये कपड़ा-रेशमी, या शण का, क्षत्रिय के लिये कपास का, वैश्य के लिये ऊनी होगा । मृग-छाला भी इसी प्रकार क्रम से ब्राह्मण के लिये कृष्णसार मृग का चर्म, क्षत्रिय के लिये रुरुमृग का और वैश्य के लिये वकरी का चर्म होगा। ब्राह्मण के लिये मुंजको कमर कस, क्षत्रिय के लिये काश का, वैश्य के लिये शण काहोगा। और ब्राह्मण के लिये पलाश का दण्ड, क्षत्रिय के लिये विल्व का, वैश्य के लिये पीपर का होगा । यदि समयानुसार यथा नियम ब्रह्मणादि के यथा योग्य वसन आदि दुर्लभ होवें तो, सबही वर्ण अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, सब प्रकार के वसन आदि व्यवहार कर सकेंगे। रेशमी जब जिस, समय, जिस किसी प्रकार का, वसन सुलभ पावे, उस समय वही ब्राह्मण आदि निविशेष व्यवहार कर सकेंगे, अजिनादि के विषय में भी समयानुसार इसी प्रकार यथा लाभ व्यवस्था करे ॥ १३-१४॥ पुरस्ताच्छालायाउपलिप्तेऽग्निरुपसमाहितोभवति१५ अग्ने व्रतपतइति हुत्वा पश्चादग्नेरुद्गग्रेषु दर्भेषु प्राङा- , गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- -- -- चार्योऽवतिष्ठते ॥ १६ ॥ अन्तरेणाग्न्याचायौँ माणवकोऽ- अलिकृतोऽभिमुख आचार्यमुद्गग्रेषु दर्भेषु ॥ १७ ॥ 'शालायाः पुरस्तात्' 'उपलितें स्थाने 'अग्निः उपसमाहितः भवति ॥१२॥ तत्र चाग्नौ 'प्राचार्यः' वेदाध्यापकः कश्चित् माग वक, प्रतिनिधिर्भवन् "अग्ने व्रत- पते व्रतं चरिष्यामि तत्ते प्रब्रवीमि । तच्छ केयं तेनास मिदमहमनृतात् सत्य- मुपैमि स्वाहा ॥६॥ वायो व्रतपटे व्रतं चरिष्यामि तत्ते प्रबचीमि तच्छकर्य तेनासमिदमहमनृतात् सत्यमुपैमि स्वाहा ॥ १० ॥ सूर्य व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तत्ते प्रब्रवीमि । तच्छकेयं तेनासमिदमहमनृतात् सत्यमुपैमि स्वाहा ॥ ११ ॥ चन्द्र व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तत्ते ब्रवीमि । तच्छकेयं तेनासमिदमहमनृतात् सत्यमुपैमि ॥ १२॥ व्रतानां व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तत्ते प्रवीमि । तच्छ केयं तेनासमिदमहमनृतात् सत्यमुपैमि' ॥ १३ ॥ (म० बा० १, ६, ९-१३)- 'इति' एभिः पञ्चभिर्मन्त्रः 'हुत्वा' 'अग्नेः पश्चात् उदग्रेषु दर्भेषु' 'प्राङ्' प्राङ्मुखः 'सन् 'प्रवतिष्ठते' श्रवतिष्ठेत ॥ १६ ॥ 'अन्तरेणान्याचायौं' अग्न्याचार्ययोः मध्ये "माणवक' 'आचार्यम् अभिमुखः' 'अञ्जलिकृतः' उदकग्रहणोपयुक्ता 'कृताञ्जलिः सन् 'उद्गग्रेषु दर्भेषु' अवतिष्ठत ॥ १७ ॥ भाषा-उपनयनार्थ अग्नि को यज्ञशाला के पूर्व भाग में लीपे हुए स्थान में स्थापित करे १५ उस अग्नि में आचार्य लड़के के प्रतिनिधि होकर "अग्ने व्रतपते" आदि पांच मन्त्रोंसे पांच पाहुति प्रदान कर अग्नि के पश्चिम उत्तगम कुशों परे बैठे ॥१६॥ अग्नि और प्राचार्य के मध्यस्थ में डाले हुए उत्तगम कुशात्रों पर प्राचार्य के सम्मुख और कृताञ्जलि हो लड़का बैठे ॥ १७ ॥ तस्य दक्षिणतोऽवस्थाय मन्त्रवान् ब्राह्मणोऽपामसलिं पूरयत्युपरिष्टाचाचार्यस्य ॥ १८ ॥ १६ ।। 'तस्य तादृशावस्थस्य माणवकस्य 'दक्षिणतः दक्षिणस्यां तिष्ठन् कश्रित मन्त्र- वान्' अधीतवेदः 'ब्राह्मणः तस्यैवमाणवकस्य अञ्जलिं 'अ' दानेन पूरयति । उप- परिष्टात् तत; परस्तात् 'आचार्यस्य च अपि अञ्जलिं पूरयति मां दानेनेति १८-१९ .

प्र०२खं० १.सू.१५-२६] उपनयनम् ॥ भाषा-उस लड़के की. दक्षिगा में रहकर कोई वेदपाठीब्राह्मण, उस की अञ्जलि जलसे भर देवे । उसके वाद आचार्य की अञ्जलिभी भरे ॥१६॥ प्रेक्षमाणोजपत्यागन्त्रा समगन्महीति ब्रह्मचर्यमागामिति वाचयतिकोनामासीति नामधेयं पृच्छति तस्याचार्यः।२०.२२ 'प्राचार्यः' 'प्रेक्षमाणः' माणवकमिति यावत् "श्रागन्त्रा समगन्महि प्रसुमर्त्य युयोतन । अरिष्टाः सञ्चरेमहि स्वस्ति चरतादयम् ॥ १४॥ अग्निष्टे हस्तमग्रही सविता हस्तमग्रहीत् । अर्यमा हस्तमग्रहीन्मित्ररुचमसि कर्मणा ॥ १५ ॥ (अग्निराचार्यस्तव) (म० ब्रो०१, ६, १४-१५) 'इति' दुव्यूचं 'जपति' स्वयम् । "ब्रह्मचर्यमागामुपमानयस्व" ॥ १६ ॥ (म० ब्रा० १, ६, १६)-'इति इमामृचं 'वाचयति' माणवकम् । “को नामा सि ? असो नामास्मि" ॥ १७ ॥ (म० ब्रा० १,६,१)-'इति' इमं मन्त्रं पठन् 'तस्य' माणवकस्य नामधेयं पृच्छति' ॥२० २२॥ भाषा-आचार्य, लड़के को देखकर "आगन्त्रा०" दो मन्त्रों को स्वयं पढ़े और 'ब्रह्मचर्यमागाम्' मंत्रको लड़के से पढ़वाये एवं 'को नामासि' पढ़ कर वालक का नाम पूछे ॥२०-२२॥ अभिवादनीयं नामधेयं कल्पयित्वा देवताश्रयं वा नक्षत्राश्रयं वा गोत्राश्रयमप्येक उत्सृज्यापामञ्जलिमाचार्यो दक्षिणेन पाणिना दक्षिणं पाणिसाङगुष्ठं गृह्णाति देवस्य ते सवितुः प्रसवेऽश्विनोाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याई हस्तं गृहाम्यसाविति ॥ २३-२६ ॥ 'श्राचार्यः' 'अभिवादनीय' अभिवादनाय हितं 'नामधेयं' द्वितीयजन्मसूचकं नूतनं नाम 'कल्पयित्वा' अमुकनामाहमस्मीति तन्माणवकनामैव तन्माणवर्क वाचयित्वा ( २३), 'श्रपामञ्जलिं गृहीतमुदकाञ्जलिम्' 'उत्सृज्य' परित्यज्य, "देवस्य ते सवितुः प्रसवेऽश्विनो हुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्या हस्वं गृह्णाम्यसौ" ॥ १८॥ (म० प्रा० १, ६, १८),-'इति' (१) इमं मन्त्रं पठन् “दक्षिणेन पाणिना' साङ्गुष्ठं 'दक्षिणं पाणि' 'गृह्णाति' (२६) । तच्च द्विजत्वसूचक नामधेयं

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्-
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कीदृशं कर्तव्यमित्याह;-'देवताश्रयं' वेदगर्भब्रह्मवतेत्यादिकं, 'वा' अथवा
'नक्षत्राश्रयं' पाश्विन-रौहिणेत्यादिकं ( २४), 'वा' अथवा 'एके' प्राचार्या.
'गोत्राश्रयं वेदपैल्वेत्यादिकम् 'अपि' नामधेयम् आहुरिति शेषः (२५)॥२३-२६॥
भाषा-पीछे आचार्य स्वयं अभिवादन समय में कथनीय द्वितीय जन्म-
सूचक एक नवीन नाम कल्पना कर लड़के से "मैं अमुक नाम वाला गुरो
तुमको अभिवादन करता हूं" कहवा कर लिये हुए जलाञ्जलि को छोड़
कर "देवस्य ते” मन्त्र पढ़ते हुए दहिने हाथ से बालक के अंगुठे के साथ
दहिना हाथ ग्रहण करे । वह नाम देवताश्रित, या नक्षत्राश्रित या गोत्रा-
श्रित होगा ( देवताश्रित जैसे-वेदगर्भ, ब्रह्मव्रत, प्रभृति, नक्षत्राक्षित जैसे
आश्विन रौहिण प्रभृति; गोत्राश्रित जैसे०वैद, पैल्व प्रभृति ) ॥२३:२६॥
अथैनं प्रदक्षिणमाषर्तयति सूर्यस्यावृतमन्वावर्तस्वा-
साविति ।२७ दक्षिणेनपाणिना दक्षिणमसमन्ववमृश्या-
नन्तर्हितां नाभिमभिमृशेत् प्राणानां ग्रन्धिरसीति ॥२८॥
'अर्थ' अनन्तरम् । 'एन' माणवकम् सूर्यस्यावृत्त मन्वावर्तस्वासौ ॥१९॥
(म० ब्रा० १६, १९,),-'इति' मन्त्रं पठन् 'प्रदक्षिणं यथास्यात्तथा 'श्रावर्तयति'
प्राङ्मुखं करोति, प्राचार्यएव ॥ २७ ॥ दक्षिणेन पाणिना' माणवकस्य 'दक्षिण-
मंसम्' 'अन्ववमृश्य' स्पृशन्नेव "प्राणानां ग्रन्थिरसि मा विस्रसोऽन्तक इदं ते.
परिददाम्यमुम्" ॥ २० ॥ (म० ब्रा० १, ६, २०)-'इति' मन्त्रं पठन् 'श्र-
नन्तर्हिता' वस्त्राच्छादनशून्यां 'नाभिम्' 'अभिमशेत' संस्पृशेत् श्राचार्यएव॥२८॥
भाषा-अनन्तर इस बालक को प्रदत्तिण क्रम से पूर्वाभिमुख कर 'सूर्य-
स्य' इस मन्त्र का पाठ करे ॥२७॥ पश्चात् आचार्य "प्राणानां ग्रन्थिरसि"
मन्त्र पढ़ते हुए दहिने हाथ से उस बालक को दहिने कांधे पर होकर वस्त्रादि
आवरण शून्य नाभि छूए ॥२८॥
उत्सृप्य नाभिदेशमहुरइति ॥ २६ ॥ उत्सृप्य हृदय-
देशं कृशनइति ॥ ३० ॥ दक्षिणेन पाणिना दक्षिणमय
समन्वालभ्य प्रजापतये स्वा परिददाम्यसाविति ॥३१॥

प्र०२खं० १० सू०२७-३४ ] उपनयनम् ॥ माणवकस्य 'नाभिदेशम्' 'उत्सृप्य' हस्तानचालनेन स्पृष्ठवा "अहुर इदं ते परिददाम्यमुम्" ॥ २१ ॥ ( म० ब्रा० १, ६, २१)-'इति' मन्त्रं पठेत् प्रा- चार्यः ॥ २९ ॥ माणवकस्य 'हृदयदेश' 'उत्सृप्य' हस्ताग्रचालनेन स्पृष्ट्वा कृशन इदं ते परिददाम्यमुम्' ॥ २२ ॥ (मं० ब्रा० १, ६, २२)-'इति मन्त्रं पठेत् प्राचार्यः । ३० दक्षिणेन पाणिना' माणवकस्य 'दक्षिणमंसम्' 'अन्दालभ्य' स्पृष्ठा "प्रजापतये त्वा परिददाम्यमुम्" ॥ २३ ॥ (म० ब्रा० १, ६, २३).-- 'इति' मन्त्रं पठेत् प्राचार्यः ॥ ३१ ॥ भाषा-आचार्य बालक के नाभि पर हाथ चलाकर 'अहुरः' मन्त्र पढ़े ॥२६॥ फिर हृदय पर हाथ चला कर 'कृसनः' मन्त्र पढ़े ॥३०॥ फिर आचार्य दहिने हाथ से बालकके दाहिने कांधेको स्पर्श कर 'प्रजापतये त्वा' मन्त्र पढ़े ३१ सव्येन सव्यं देवाय त्वा सवित्रे परिददाम्यसाविति ॥ ३२ ॥ अथैनसंप्रेष्यति ब्रह्मचार्यस्थसाविति समिध- माधेह्यपोशोन कर्मकुरु मा दिवा स्वाप्सीरिति॥३३॥३४॥ 'लव्येन' वामेन पाणिना, माणवकस्य 'सव्यं' वाममंसं स्पृष्ठा देवाय त्वा स- वित्रे परिददाम्यसौ" ॥ २४ ॥ (म० ब्रा० १, ६, २४)-'इति' मन्त्रं पठेत प्राचार्यः ॥ ३२ ॥'अर्थ' तदनन्तरम् । प्राचार्यः, 'एन' माणवकं त्वमेतनामकः, अद्यप्रति "ब्रह्मचारी असि" (म० ब्रा० १, ६, २५)-'इति' हेतोः 'समि- धम् आधेहि अग्नौ प्रतिदिनमेव समिदाधानं कुरु, 'अपोशान कर्म' यथास्थानं यथाप्रयोजनञ्च शौचाचमनादि च कुरु, 'मा दिवा स्वाप्पीः' दिवानिद्राञ्च मां कु. रु,-'इति' समिधमाधेह्यपोशान कर्म कुरु मा दिवा स्वाप्सीः २६ (म०ब्रा०१,६, २६) एतत्रितयोपदेशबोधकं मन्त्रम् पठन् 'सम्प्रेष्यतिः उपदिशति ॥ ३२-३४ ॥ भाषा-इसी प्रकार वांये हाथ से बालक के वांये कांधे को छूकर 'सवि. त्रेत्वा' मन्त्र पढ़े ॥ ३२ ॥ पश्चात् श्रोचार्य, बालक को "तुम आज से इस नाम से प्रसिद्ध ब्रह्मचारी होते हो, प्रति दिन सायं प्रातः अग्नि में समिदाधान करना और शौचाचार से रहना, दिन में न सोना" आदि उपदेश देवे ॥३३,३४॥ उदङग्नेरुत्सृष्य प्राङाचार्य उपविशत्युदगग्रेषु दर्भेषु .

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - ॥ ३५ ॥ प्रत्यङ्माणवको दक्षिणजान्वक्तोऽभिमुखाचा. यमुदगग्रंष्वेव दर्भेषु ॥ ३६ ॥ 'प्राचार्यः' अग्नेः' 'उदक' उत्तरस्या उदगग्रेषु दर्भेषु 'प्राङ' प्राङ्मुखः सन् 'उपवि- शति' उपविशेत् ३५ माणवकः' तत्रैव 'उदगमेष्वेव दर्भेषु'दक्षिणजान्वक्तः' भूमिग- तदक्षिणजानुकः 'श्राचार्यमभिमुखः' 'प्रत्यङ्' पश्चिममुखः सन् उपविशेदित्येव ॥३६॥ भाषा-आचार्य अग्नि के उत्तर में उत्तगग्र रक्खे हुए कुशों पर पूर्व मुह बैठे ॥ ३५ ॥ बालक भी उसी स्थान में उत्तराम रक्खे हुए कुशाओं पर अपना दहिना जांघ भूमि में लगा कर आचार्य के सम्मुख बैठे ॥ ३६॥ अथैनं त्रिः प्रदक्षिणं मुञ्जमेखला परिहरन् वाचयती- यंदुरुक्तात् परिवाधमानेत्य॒तस्य गोत्रीति च ॥ ३७ ।। 'अथ' तदनन्तरम् । प्राचार्यः 'एन' मारावकं 'त्रिःप्रदक्षिणं' यथास्यात्तथा 'मुञ्जमेखलां' मुञ्जमयीं रशना 'परिहरन्' परिधापयन् “इयं दुरुक्तात्परिबाधमाना वर्ण पवित्रं पुनती मागात् । प्राणापानाभ्यां बलमाहरन्ती स्वसादेवी सुभगा मेखलेयम्" ॥ २७ ॥ (म० ब्रा० १, ६, २७ )-'इति' मन्त्रं, ऋतस्य गोपत्री तपसः परवी नती रक्षः सहमाना अरातीः। सा मा समन्तमभिपयेहि भद्रे धारस्ते मेखले मा रिषाम" ॥ २८ ॥ (म० ब्रा० १, ६, २८)- इति' मन्त्रं 'च' 'वाचयति' । अत्रैव यज्ञोपपीतपरिधापनव्यवहारश्च, परं कौथुमानां सूत्रकारा- नुल्लेखादकृतेऽपि न दोष इति नव्याः। वस्तुतो वेदाध्ययनायाचार्यसमीपे नयनमे- वोपनयनं, यज्ञोपवीतधारणन्तु देवकार्यानुष्टानार्थमेव सूत्रकारेण विहितमिति यदायदैव देवकार्य कर्तव्यं भवेत् तदा तदैव धार्य स्यादिति न क्षतिः, शिखापरिर- क्षणन्तु सर्वथैव कार्यमेवान्यथा दैवकार्यकाले कुतमायास्यनीति ॥ ३७ ॥ भाषा-आचार्य, वालक को मूंज की बनी हुई मेखला, तीन फेरा करके पहना कर 'इयं दुरुक्तात्' और 'ऋतस्य' गोपत्री दो मन्त्रों को पढ़ावे ॥३७॥ अथोपसीदत्यधीहि भोः सावित्री मे भवाननुब्रवी. त्विति ॥ ३८ ॥ तस्माअन्वाह पच्छोऽर्द्धर्चश ऋक्शइति प्र. २ खं०१० सू०३६-४१]- उपनयनम् ॥ महाव्याहृतीश्च विहृता ओंकारान्ताः ॥ ३९ ॥ ४०॥ 'अथ' तदनन्तरम्। माणवकः 'भो ! 'अधीहि अध्यापय, भवान् मे सावि- त्रीम् अनुब्रवीतु'-'इति' प्रार्थनावाक्यं कथयन् 'उपसीदति' शरणगतो भवति ॥३८॥ ततश्च 'तस्मै' माणवकाय' प्रथमं 'पच्छः' पादं पादं कृत्वा, ततः 'अर्द्धशः' अर्द्ध- चमर्द्धचें कृत्वा, तदन्ते च 'ऋक्शः' "तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्" २९ पूर्णामृचमावर्तयित्वा 'इति' एवमेव 'अन्वाह' अनुक्रमेण ब्रूयात(२९) च' अपि 'विहिताः विभिन्नीकृताः(१) श्रोङ्कारान्ताः' 'महाध्याहृती: "भूर्भुवस्वः''(मत्रा०१।६) इति अनुब्रूयात् ततः ॐइत्यस्याप्युपदेशः कार्यइत्यर्थः भाषा-अनन्तर वालक गुरु के निकट हाथ जोड़, नम्रता पूर्वक प्रार्थना करे कि-'हे गुरो ! मुझे वेद पढ़ावें, एवं सावित्री उपदेश करें ॥ ३८ ॥ इसी प्रकार बालक कत्तृक वेदाध्ययन एवं उसका प्रारम्भ सूचक सावित्री मन्त्र के प्रथम उपदेश प्रार्थित होने पर प्राचार्य उसे पहिले एक २ चरण करके, पुनः आधी २ ऋचा, फिर सम्पूर्ण ऋचा वार २ श्रावृत्ति करा देवे । तदनन्तर "भूः, भुवः, और स्वः''-इन तीन महा व्याहृतियों को अलग २ एवं कार भी अभ्यास करावे ॥ ३८ ॥ ३६ ।। ४०॥ वार्तञ्चास्मै दण्डंप्रयच्छन्वाचयतिसुश्रवसं माकुर्विति ४१ 'च' ततः 'अस्मै' माणवकाय 'वाई' पलाशवृक्षावयवं दण्डं, 'प्रयच्छन्' सुश्रवः सुश्रवसं मा कुरु यथा त्व,सुश्रवः सुश्रवाः । देवेष्वेव महसुश्रवःसुश्रवा ब्राह्मणेषु भूयासम्" ३३ (म०मा०1,६,३१);-'इति' मन्त्रं 'वाचयति' माणवकमेव भाषा-पश्चात् आचार्य, इस माणवक के हाथ में पलाश वृक्ष का दण्ड देकर "सुश्रवसः सुश्रवसं मा कुरु" मन्त्र को पढ़वावे ॥४१॥ अथ भैक्षं चरति मातरमेवाग्रे हे चान्ये मुहृदो यावत्वो वा सन्निहिताः स्युराचार्याय भैक्षं निवेदयति ।४२॥४३॥४४॥ 'अथ' उपनयनानन्तरं 'भैक्षं भिक्षार्थ 'चरति अटति ॥४२॥ 'अग्रे 'मात- रमेव भिक्षेतेति शेषः । 'च' अपि मातुरेव 'अन्ये द्वे सुहृदौ' ततः परं भिक्षेत ।

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- . 'वा' अथवा 'यावत्यः' स्त्रियः 'सन्निहिताः' तत्रोपस्थिताः स्युः, ताः सर्वाएव मात्रादिक्रमेण प्रथमं भिक्षेत । पुरुषभिक्षणस्य नात्रोल्लेख इत्यपि ध्येयम् ॥४३॥ संगृहीतञ्च तदु 'भैक्षं भिक्षानं सर्वमेव 'आचार्याय' 'निवेदयति' उत्सृजति ॥४४॥ भाषा-~इस प्रकार उपनयन होने पर बालक, भिक्षाचरण करे। पहिले माता से भिक्षा मांगे, तब माता के दो सुहृद् के पास या उस स्थान में जि- तनी स्त्रियां उपस्थित हों, माता से प्रारम्भ कर सब ही ४ से भिक्षा ग्रहण करे * । सब भिक्षा को संग्रह कर आचार्य को निवेदन करे ॥४२॥४३॥४४॥ तिष्ठत्यहःशेषं वाग्यतः ॥ ४५ ॥ भिक्षाचरणान्तकर्मयापितदिवाबहुभागो माणवकः 'अहःशेष' तहिनावशि. टांशं 'वार यतः' संयतवाक् सन् तिष्ठति' तिष्टत् अवस्थितिं कुर्यात् ॥ ४५ ॥ भाषा-बालक का साग दिन वीत जायेगा, तब शेष दिन संयत् वाक् हो कर विश्राम करते वितावे ।४५॥ अस्तमिते समिधमाद्धात्यग्नये समिधमाहार्षमिति॥४६॥ 'अस्तमिते' दिवाकरे अग्नये समिधमाहार्ष बृहते जातवेदसे। यथा त्वमग्ने समिधा समिधस्येवमहमायुषा मेधया वर्चसा प्रयजा पशुभिब्रह्मवर्चसेन धनेना. बायेन समेधिषीय ( स्वाहा )॥ ३२॥ (म० ब्रा० १, ६, ३२)-'इति मन्त्रं पठन् 'समिधम्' समित्काष्टकम् 'श्रादधाति' अनाविति शेषः ॥ ४६ ॥ भाषा-पीछे सूर्यास्त होने पर "अग्नये समिध माहार्षम्” मन्त्र को पढ़ते हुए अग्नि में एक समित् काष्ठ डाले ॥४६॥ त्रिरात्रमधारलवणाशी भवति ॥४७॥ तस्यान्ते सा- वित्रश्चरुः ॥४८॥ यथार्थम् ॥४६॥ गौर्दक्षिणा ॥५०॥१०॥ * पुरुष के निकट भिक्षा मांगने का कोई उल्लेख न होने से जान पड़ता है कि मिना देना कार्य गृहिणी हो का है। साधारणतः भी भिक्षुक लोक गृहस्थ के घर पर “ भिक्षा दो भाई ., बोल कर भिक्षा मांगा करते। काशी में ब्रह्मचारी गण भी गृहस्थ के द्वार पर उपस्थित होकर 'भवति, भिक्षा देहि,, इस वाक्य द्वारा भिक्षा मांगते हैं, इस लिये पिता आदि के निकट भिक्षा प्राथना और ग्रहण व्यवहार, पिता आदि के भिक्षा दान वानछा की सफलता मान के लिये हैं। -:

प्र० २।३ खं० १०५ सू० ४२-५०१२] उपनयन समावर्शने ॥ 'त्रिरात्रं' तदिनप्रभृति दिनत्रयम् 'अक्षारलवणाशी: क्षारलवणभिन्नभोजी 'भवति' भवेत् ।। ४७ ॥ तस्य' दिनत्रयस्यान्ते चतुर्था हे 'सावित्रः' सवितृदेवताका 'चहा' पक्तव्यः होतव्यश्चेति सुतरामागतः ॥ ४८ ॥ अनन्तरं 'यथार्थम्' यथायो- जनं विहरणविश्रामादि कुर्यात् ॥ ४९ ॥ उपनयनसंस्कारस्यैतस्य 'दक्षिणा' 'गौः' एकैवेति समाप्तमुपनयनम् ॥ १०॥१०॥ इति सामवेदीये गोभिलगृह्यसूत्रे द्वितीय प्रपाठकेदशमखंडस्य ब्याख्यानं समाप्तम् २, १० समाप्तश्चायं द्वितीयः प्रपाठकः ॥ २॥ भाषा-उपनयन काल से तीन दिन तक क्षार लवण न खावे इसकेवाद चरु से पाक करके सविता देवता के उद्देश से आहुति प्रदान करे यो उपनयन संस्कार शेष होने पर यथेच्छ इस की दक्षिणा एक गौ बिचरे है ४७-५० गोभिलगृह्यसूत्र के द्वितीय प्रपाठक के दशमखण्ड का अनुवाद पूरा हुआ ।। २, १०॥ गोभिलगृह्यसूत्र का द्वितीय प्रपाठक भी पूरा हुआ ॥ २ ॥ अथातः षोडशे वर्षे गोदानम् ॥ १॥ चूडाकरणेन केशान्तकरणं व्याख्यातम् ॥ २॥ 'अर्थ' प्रकरणान्तरद्योतनाय । 'अत' उपनयनकालतः षोडशे वर्षे तथाच यस्य गर्भाष्टमेऽब्देभूतमुपनयनं तस्य गर्भचतुर्विंशाब्दे,एवं यस्य नवमादि षोडशाब्दान्ते एवोपनयनं तस्य पञ्चविंशादि द्वात्रिंशाब्दान्ते 'गोदानम्' नाम संस्कारविशेष कार्यम् ॥ १॥ अस्मिंश्च कर्मणि केशवपनं कर्त्तव्यम् , तच्च केशान्तकरां' "चूडाकरणेन' पूर्वोक्तेन 'व्याख्यातम्' कथितम् ; चूडाकरणवत् कर्तव्यमित्यर्थः ॥२॥ भाषा-उपनयन काल से सोलहवें वर्ष में अर्थात् जिसका गर्भ काल से गिनती कर पाठवें वर्ष में उपनयन हुआ है, उसके गर्भ से २४ वें वर्ष में, और जिसका नवम आदि १६ वर्ष की अवस्था में उपनयन हुआ हो उसका २५ वर्ष से ३२ वर्ष की उमर में गोदान संस्कार करे ॥ १ ॥ इस समावर्तन कार्य में जो केश कटाना पड़ता है वह पूर्वोक्त चूडाकरण के नियमानुसार ॥२॥ ब्रह्मचारी केशान्तानकारयतेसाण्यङ्गखोमानिसहारयते गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - ब्रह्मचारी ब्रह्मवेद ,तद्ग्रहणाचारविशिष्टः श्राद्याश्रमी,यदैव केशान्तान् ,कारयते' तदेव 'सर्वाणि अङ्गलोमानि संहारयते' कक्षवक्षोपस्यशिखाकेशानपि वापयेदित्यर्थः ॥३,४॥ भाषा-ब्रह्मचारी जिस समय केश कटावे । उस समय वग़ल छाती, उपस्थ, (लिङ्ग) और शिखा तक के रोम कटा देवे ॥ ३, ४ ॥ गोमिथुनं दक्षिणा ब्राह्मणस्य अश्वमिथुनं क्षत्रियस्य अविमिथुनं वैश्यस्य गौवैव सर्वेषाम् ॥५-८॥ अस्य हि गोदानकर्मणः 'दक्षिणा' 'गोमिथुनं गोद्वयम् प्राचार्याय देयम् 'ब्राह्म- णस्य' कर्ता ब्राह्मणश्चेदित्यर्थः ५ । 'क्षत्रियस्य' अश्वमिथुनम् अश्वद्वयं गोदानक- मणः दक्षिणा ६ । 'वैश्यस्य 'अविमिथुनं' मेषद्वयं दक्षिणा ७ । 'वा'अथवा 'गौः एव' सर्वेषां' ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यानां दक्षिणा ८ । तथाहि ब्राह्मणब्रह्मचारी, वैश्य- ब्रह्मचारी च स्वस्वाचार्याय गोद्वयमेव दक्षिणा वेदाध्यापनस्यदेयेति ॥५-८॥ भाषा-इस गोदान संस्कार की दक्षिणा ब्राह्मगा ब्रह्मचारी हो, तो प्राचार्य को दो गौ, ॥५॥ क्षत्रिय हो, तो छः घोड़े ॥ ६ ॥ और वैश्य हो तो दो भेड़ा देवे ॥७॥ या ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीनों ही गौ ही दक्षिणा देवें ॥८॥ अजः केशप्रतिग्राहाय ॥६॥ 'केशप्रतिग्राहाय केशप्रतिग्रहकरें नापिताय 'अजः' पुमान् छागः एकएव दक्षिणा देया सर्वजातिब्रह्मचारिभिरिति ॥ ९॥ भाषा-केश लोम आदि काटकर फेकनेवाले नाई को एक छाग देवे ॥६॥ द्वितीयाश्रमग्रहणस्य वर्षाधिककालाऽपेक्षास्तीति ज्ञायेत एव चेत, प्राचार्याय गोदक्षिणादानानन्तरमपि "अनाश्रमी न तिष्ठेत् क्षणमपि" इति ब्रह्मचर्याश्रमएवा- वलम्बनीयइति पुनरपि प्राचार्यान्तिकमुपनीतोभवेत्, तस्यैवाचार्यस्यान्तिके ब्रह्मा- परपर्यायवेदालोचनयास्योद्वाहकालं प्रतीक्षेतेति । तत्रोपनयनेतिकत्र्तव्यतामाह:- भाषा-[ यदि ब्रह्मचारीको समावर्तनके अनन्तर गृहस्थाश्रममें श्रानेमें एकवर्षसे अधिक विलम्ब जान पड़े,तो प्राचार्यको दक्षिणा देनेपर भी "एक- तण श्रानाश्रमी न रहे" के अनुसार उसी ब्रह्मचर्याश्रम का अवलम्ब करे 48 प्र.३ खं० १ सू. ३-१३] समावर्तनम् ॥ और फिरसे अपना उपनयन करे अर्थात् पूर्ववत् नियमसे आचार्य्यके निकट रहकर वेद की आलोचना करते हुये अपने विवाहकी प्रतीक्षा करे । इसलिये दोवारे उपनयन करने की रीतिको कहते हैं ] उपनयनेनैवोपनयनं व्याख्यातनस्विहाहतं चासो नियुक्त नालङ्कारः १०-१२ नाचरिष्यन्तसम्वत्सरमुपनयेत्॥१३॥ 'उपनयनेन' पूर्वोक्तेनैव 'उपनयनम्' एतदपि 'व्याख्यातम्' कथितम् ॥ १०॥ विशेषस्तु 'इह' उपनयने 'अहतं वासः न नियुक्तम्' ११ किञ्चह 'अलङ्कारः अपि न नियुक्तः इत्येव १२ । एतदुपनयननिषेधमाह; एतदुपनयनतः 'संवत्सरम्' अपि 'अचरिष्यन्तं' ब्रह्मचर्यव्रतानुष्ठानमकरिष्यन्तं ब्रह्मचारिणं 'न उपनयेत्' पुनरुपनी- तीभवनस्य प्रयोजनं नास्तीति भावः ।समाप्तं गोदानम् १३ ब्रह्मचारिणां ब्रह्मचर्या- बस्थायां यथा यथाचरणं कर्त्तव्यं, यद् यच्च व्रतमनुष्ठेयम्, अतस्तद्वक्तुमारभते;- -पूर्वोक्त उपनयन कहा गया है कि विशेष इस उपनयन के पीछे एक वर्ष काल भी जो ब्रह्मचर्य प्रत का अनुष्ठान न करना निश्चित हो, उस को इतने कम दिनके लिये पुनः उपनीत होने की आवश्यकता नहीं ॥१३॥ अब ब्रह्मचारी के कर्तव्य को कहते हैं। वाक्षश्चास्मै दण्डं प्रयच्छन्नादिशति ॥ १४ ॥ प्राचा- यांधीनो भवान्यनाधर्माचरणात् ॥ १५ ॥ उपनयनकाले यदा माणवकाय 'वाक्षं दण्डं प्रयच्छन्' तदैव 'पादिशति' अनु- सूत्रवक्ष्यमाणान् उपदेशानिति ॥१॥ ते चोपदेशाइमे;-(१)'अधर्माचरणात् अन्यत्र' अधर्माचरणमाचार्यस्य नानुकरणीयम् अधर्मकोपदेशश्च न श्रवणीयः, ततो- ऽन्यत्र सदा सर्वथैव 'श्राचार्याधीनो भव' आचार्याज्ञाकारी प्राचार्याभिमतानुगामी च भव, इति प्रथमोपदेशः ॥१५॥ भाषा-उपनयन काल में जब माणवक को दण्ड प्रदान करे उस समय वक्ष्यमाण सूत्रों द्वारा कहे हुए उपदेशादि देवे ॥ १४ ॥ प्राचार्य का यदि कोई अधम्माचरण देखो, तो उसका अनुकरण न करो, और प्राचार्य यदि

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्-
चर्चा,
अधर्म करने कहें तो, उसे भी न करो; अधम्माचरण छोड़ प्राचार्य, जब
जो कहें, वही करो, सदैव उनके मतानुगामी रहो ॥ १५ ॥
क्रोधानृते वर्जय ॥ १६ ॥ मैथुनम् ॥ १७ ॥ उपरि
शय्याम् ॥ १८ ॥ कौशीलवगन्धाञ्जनानि ॥ १६ ॥
(२,३) 'क्रोधानृते' क्रोधम्, अनृतम् मिथ्याव्यवहारञ्च 'वर्जय' सत्यपि क्रोध-
कारणे क्रोधकार्य विवादादिकं मा कुरु, किञ्च मिथ्याभाषणादिकमपि न कार्यम् ॥
॥१६॥ (8) 'मैथुनं स्त्रीसङ्गं वर्जय इत्येव सर्वत्र ॥१७॥ (५) 'उपरि शय्यां' गुरु-
शय्यातः उच्चैः शयनं वर्जय । इति पञ्चमोपदेशः ॥१८॥ (६,७,८) कौशीलवं
नृत्यगीतवादित्राद्यनुष्ठानम्, गन्धः घृष्टमलयजादिको माल्याद्युत्थश्च, अञ्जनं चक्षु-
षोः शोभासम्पादकम् एतान्यपि त्रीणि वजय । अत्रापि यथा चाध्ययनस्य व्याघात-
करो मनोजाविर्भावः स्यादेवं कौशीलवादिकं वर्जयेत्, न तु सामादिगीतवादित्र-
नापि गुरुप्रसादगन्धमाल्यादि, न च रोगाद्युपशमनायाञ्जनव्यवहारंवर्ज-
येत् । अतएवमनुनाऽभ्यधायि "यःवग्यपिद्विजोऽधीते' इत्यादि ॥१६-१९॥
भाषा-क्रोध के कोई कारण होने पर भी क्रोध प्रकाश पूर्वक विवादादि
न करो झूठा मत वोलो ॥१६॥ स्त्री प्रसङ्ग न करो।१॥ गुरु की शय्या की
अपेक्षा अपनी शय्या ऊंची न करो ॥ १८ ॥ जिस्से मनोविकार उत्पन्न हो,
ऐसा नृत्य, गीत, वाजा, आदि की चर्चा, चन्दन, और मालादिगन्ध का
व्यवहार एवं आंखों में अञ्जन धारण ओदि न करो ॥ १६ ॥
स्नानम्॥२०॥अवलेखनन्तप्रक्षालनपादप्रक्षालनानि ॥२१॥
(९) 'स्नानम्' जलक्रीडापूर्वकं, वर्जय ॥२०॥ (१०,११,१२) श्रवलेखन'
'मुखशोभनालकातिलकादि' 'दन्तप्रक्षालन' दन्तमलदरीकरणायैव यावदावश्यक
तदतिरिक्तं दन्तशोभादिसम्पादनाय तुत्थरञ्जनादिनोपसेवनम् , 'पादप्रक्षालन'
आवश्यकातिरिक्तम् । इमानि च त्रीणि वर्जय ॥ २०-२१ ॥
भाषा-जल क्रीड़ा पूर्वक स्नान न करे ॥२०॥ अलका तिलक से मुखको
सुन्दर करना, तुत्थकादि से दांत रंगना, आवश्यकतानुसार पैर धोना ॥२१॥

प्र०३खं०१ सू० १४-२७] समावर्त्तनम् ॥ १२१ - तुरकृत्यम् ॥ २२ ॥ मधुमासे ॥ २३ ॥ गोयुक्तारो- हणम् ॥ २४ ॥ अन्तर्यामउपानहोर्धारणम् ॥ २५ ॥ (१३) 'क्षुरकृत्यम्' क्षुरेण केशलोमादीनां वापनं वर्जय। पूर्व यदुक्तं ब्रह्म- चारीत्यादि सूत्रद्वयं केशवपनव्यवस्थापकं तत् समावर्तनाङ्गभूतं बोध्यम् ॥ २॥ (१४,१५) 'मधु' सारघं वर्जय । २३ । (१६) गोयुक्त शकटादौ प्रारोहणं वर्जय ॥२४॥ (१७) अन्तामे' ग्राममध्ये 'उपानहोः' चर्मपादुकयोः 'धारणं' वर्जय ॥२५॥ भाषा-तुरे से केश, लोम, आदि का मुण्डन न करावे ॥२२॥ ॐ मधु मक्खियों से एकत्र किया शहत एवं मांस भी न खावे ॥२३॥ गौ से जो सवारी चलायी जावे, उस पर न चढ़े ॥२४|| गांव में हो कर जाता न पहने ॥२५॥ स्वयमिन्द्रियमोचन मिति २६मेखलाधारणभैक्षचर्यदण्डधार पसमिदाधानोदकोपस्पर्शनप्रातरभिवादा इत्येते नित्यधर्माः।। (१०) 'स्वयमिन्द्रियमोचनम्' हस्तमैथुनञ्च वजयेत्येव । 'इति' इमेऽष्टादश वर्जनीया गताः ॥२६॥ कर्तव्यानुपदिशति;-(१-५) मेखलाया धारणम् , भिक्षा- चारिणोभावावलम्बनम् , दण्डस्य धारणम्, समिधः श्राधानम्, उदकानामुपस्पर्श- नवकमीश्वरोपासनम् , प्रातरुत्थायैव गुरुजनेभ्योऽभिवादनम्, 'इति एते' पञ्च व्यवहाराः नित्यधर्माः प्रतिदिन कर्त्तव्याः ॥२७॥ ब्रह्मचारिणां चत्वारि वेदवतान्य. नुष्टेयानि गोतमेनोक्तानि चाचार्योप्यऽयमाह; भाषा-हस्त मैथुन ® न करे । ये १८ उपदेश समाप्त हुए ॥२६॥ मेखला धारण, भीख मांग कर पेट भरना, दण्ड धारण, समिदाधान, जल से हाथ पैर धोकर ईश्वरोपासना, प्रातः उठ कर गुरु जनों को अभिवादन, ये कर्म प्रति दिन करे ॥२६,२७॥ समावर्तन के पीछे ब्रह्मचारी ४ व्रत और भी करे । गोदानिकत्रातिकादित्यव्रतोपनिषदज्यैष्ठसामिकाः संवत्सराः . • इस के पूर्व ३ ये सूत्र में जो केश मुण्डन की व्यवस्था कही गयी है, वह समावर्तन संस्कार में कर्त्तव्य द्वितीय सूत्रोक्त ही का विशेष विधिमात्र है । ** यह दुर्गुन आज कल-स्कूल एवं कालिज के लड़कों में अधिकांश पाया जाता है इस का कारण शिक्षा का अभाव है।

१२२ गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- MARUR . 'संवत्सराः, पूर्वोक्ताः उपनयनतः षोडशसंख्याकाः, गोदानिकादिकाः भवेयु- रित्यर्थः । तत्र षोडशाब्देषु, केचनाब्दाः 'गोदानिकाः स्युः, अत्र वेदग्रन्थानां सर्वे- पामेवाध्ययनं समाप्यम् । केचनाब्दाः 'नातिकाः स्युः विशेषतोऽत्रारण्यसंहितोवत- पर्वणामेवानुशीलनं कर्त्तव्यम्। केचनाब्दाः 'मादित्यव्रतोपनिषदाः स्युः,अत्र आदि. त्यव्रतसाम्नामुपनिषद्ब्राह्मणस्य चानुशीलनं प्रधानतः कर्त्तव्यम् । केचनाब्दाः 'ज्यैष्ठ- सामिकाः' : अत्र तु ज्येष्टसाम्नां त्रयाणामेवानुशीलनं प्रधानतः कार्यमिति । यद्यपीमे षोडशैवाब्दाः । गोदानिकाः परन्तत्राप्युत्तराब्दानां वातिकादिविशेषपरिच- यसत्त्वादाद्याब्दानां कतिपयानां तदभावात् केचनाब्दाः प्रथमादयः सामान्यतो गो- दानिका इत्येवाख्यायन्ते, पराब्दाश्च विशेषतो ब्रातिकेत्यादिभिः प्रसिद्धाः। यथा च सामवेदीय प्राच्चिकः सर्वएव छन्दोमय स्तथापि उत्तरदलस्य उत्तराञ्चिक इति विशे- पनोमप्रसिद्धः पूर्वस्य तु 'छन्दः' इत्येव । यथापि ज्योतिःशास्त्रे, ग्रहादीनां सर्वेषामेव दशाकालानां बहुत्वेऽपि निजभोग्य वर्षाः मासा वा तत्र स्वल्पाएव भवन्तीति ॥२८॥ भाषा-उपनयन से १६ वर्ष ब्रह्मचर्य अवलम्बन कर ब्रह्मचारी वेदाध्य- यनादि पूरा होने पर प्राचार्य को दक्षिणा में दो गौ देकर अपने घर लौट जावे, इसी कारण २४ वर्ष के वयस में कर्तव्य संस्कार को 'गोदानिक' एवं 'समावर्तन' कहते हैं । इस १६ वर्षके बीच' ४ व्रत करने पड़ते हैं और उसके अनुयायी ही यह षोडशाब्द चार नाम से प्रसिद्ध हैं। उनमें से जो कई वर्षों में वेद ग्रन्थों का अध्ययन समाप्त होगा उसे गोदाननत एवं उस कई एक वर्ष को उसका अनुयायी 'गोदानिक अब्द' कहते हैं। उसके बाद जो कई एक वर्ष में पुनः "अरण्य संहिता" के व्रत पर्व का विशेष अनुशीलन करना होता है उस कई एक वर्ष को 'बातिकाब्द' कहते हैं। अनन्तर जो कई एक वर्ष में "प्रादित्य व्रत”साम आदि और उसके साथ उपनिषद् अब्द कहते हैं। इसी प्रकार शेष को जिस वर्ष में' या कई एक वर्ष में ज्येष्ठ साम आदि का विशेष अनुशीलन किया जाता है। उस कई एक वर्ष को "ज्येष्ठसामिक अब्द" कहते हैं। यद्यपि बस्तुतः ये षोडशाब्द ही "गोदानिक" है किन्तु जिस प्रकार साम- वेदीय श्रार्चिक ग्रन्थ का आद्यन्त सब ही छन्दोमय होने पर भी उत्तर दल

प्र.३०१ सू०२८-३३] ब्रह्मचारिकृत्यम् ॥
में
का 'उत्तरा' यह विशेष नाम रहने से पूर्व दल मात्र कोही 'छन्द' कहते हैं उसी
प्रकार इस स्थानमें भी उत्तराब्द आदिका व्रतादि विशेष नाम रहनेसे प्रथमादि
कई एकवर्ष मात्रको 'गोदानिक अब्द कहते हैं । ज्योतिषमें भी ग्रहों की दशा
समधिक काल होने पर प्रथम कुछ समयतक उसकी 'अपनीदशा होती है २८
तेषुसायंप्रातरुद्कोपस्पर्शनमादित्यव्रतन्तुनचरन्त्येके ॥३०॥
'तेषु' गोदानिकादिषु चतुर्वेव व्रतेषु 'सायंप्रातः' 'उदकोपस्पर्शनम् , श्राचम-
नादिपूर्वकमीश्वरोपासनं कार्यम् ॥ २९ ॥ 'एके' 'श्रादित्यवतन्तु' न 'चरन्ति'
उपनिषव्रतमेव केवलमाचरन्ति न पुनरादित्यवतयुक्तं तदिति भावः ॥ ३० ॥
भाषा-इन्हीं गोदानिक आदि चार व्रतों में सायङ्काल
एवं प्रातःकाल
आचमन आदि करके यथोक्त रीति से ईश्वरोपासना करे ॥२८॥ अनेक लोग
"उपनिषद्” व्रत के साथ "आदित्यव्रत” का अनुशीलन नहीं करतेहैं ॥३०॥
ये चरन्त्येकवाससो भवन्त्यादित्यञ्चनान्तर्दधतेऽन्यत्र वृक्षश-
रणाभ्यांनापोऽभ्यवयन्त्यूर्वजानुभ्यामगुरुप्रयुक्ताः।३१-३३।
'ये' तु 'चरन्ति' चरेयुः, ते 'एकवाससः' उत्तरी यही नाः भवन्ति' भवेयुः
तावत्कालमिति तेषां प्रति प्रथमोपदेशः । 'च' पुन: 'वृक्षशरणाभ्याम् अन्यत्र'
'आदित्यं न अन्तर्दधे' वृक्षच्छायां गृहे च भवत्येवादित्यान्तर्धानम् ततोऽन्यत्र
आदित्यान्तर्धानाय छत्रादिकं न व्यवहरेयुरिति द्वितीयः। 'अगुरुपयुक्ताः' गुरुभिः
विशेपकार्यार्थमननुज्ञाताः 'जानुभ्यामूर्ध्वम् अपः' जानुध्नाधिकान्दकानि 'न
अभ्यवयन्ति' नावतरन्ति गंभीरनदीपारं न गच्छेयुरिति तृतीयोपदेशः ३१-२३ । १
इति सामवेदीये गोभिलगृह्यसूत्रे तृतीय प्रपाठके प्रथमखंडस्य व्याख्यानं समाप्तम् ३,१॥
भाषा-जो लोग 'आदित्यव्रत' के साथ 'उपनिपव्रत' अवलम्बन कर
ते हैं उनको निम्नलिखित तीन व्रत अवलम्बन करना चाहिये । प्रथम जब
तक इस व्रतका अनुष्ठान करे' उत्तरीय वस्त्र का व्यवहार न करें एक ही वस्त्र
से निर्वाह करे । द्वितीय तव तक घर एवं वृक्षके अतिरिक्त सूर्य को तिरोहित
न कर अर्थात् छाते आदि का व्यवहार न करे । तृतीय' तब तक' गुरू की
विशेष प्राज्ञा विना जानु परिमाण जल से अधिक जल में न तैरे ॥३१-३३॥
गोभिलगृह्यसूत्रकेतृतीयअध्यायकप्रथमखण्डकाअनुवादपूरा हुआ ॥३१॥

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- vvvvrai द्वादशमहानाम्निकाःसंवत्सरानवषट्त्रयइतिविकल्प:१-३ 'महानाम्निकाः' महानाम्निसामानुशीलनसाध्याः 'संवत्सरा' 'द्वादश, नव, षट्, त्रयः'--'इति विकल्पः' अस्ति। इमे च काम्यव्रतसाधना द्वादशादिका अब्दाः गोदानिकषोडशाब्दतोऽतिरिक्ता ज्ञेयाः ॥ १-३ ॥ भाषा-"महानाम्नी" नाम से प्रसिद्ध सामानुशीलन-साध्य व्रत करे, वह १२, ६, ६, या ३ वर्षों में पूरा होगा। ये द्वादश आदि वर्ष, पूर्वोक्त १६ वर्ष से अतिरिक्त हैं । जो लोग इस काम्यव्रत के अनुष्ठान करने की इच्छा करें वे षोडशाब्द में गोदानादि चारो व्रत अनुष्ठान करके अवश्य कर्तव्य ब्रह्मचर्य समाप्त कर और यथा सामर्थ्य १२, ६, ६ वा ३ वर्ष और भी ब्रह्मचर्य करें। इस व्रत का फल आगे कहा जावेगा ॥ १-३॥ संवत्सरमप्येके व्रतन्तु भूयः पूर्वश्वेच्छुतामहानाम्न्यः॥४-६।। 'संवत्सरम्' 'अपि' तस्य साम्नोऽनुशीलनम् 'इति' 'एके प्राचार्या वदन्ति ॥ ४ ॥ 'तु' अपि 'व्रतम्' एकवार्षिकमेवेदम् 'भूयः' बहु मन्येत, यदि 'चेत्' 'पूर्वैः' प्रतप्राक्कालैः 'महानाम्न्यः' 'श्रुताः' अनुशीलिताः स्युः ॥ ४-६ ॥ एतत्का- म्यकर्मणोवहादरताबोधनाय वेदश्रुतं लौकिकप्रवादं दर्शयति;- भाषा-किसी है कि एक ही वर्ष इस व्रत का अनुष्ठान करने का है ॥ ४॥ इस व्रत के अनुष्ठान के पूर्व "महानाम्नीसाम” की ठीक शिक्षा वि, तो एक ही वर्ष का वन यथेष्ट है ॥५। ६॥ अभापिरोरुकि ब्राह्मणं भवति कुमारान् ह स्म वै मातरः पाय. माना आहुःशक्वरीणां पुत्रका व्रतं पारयिष्णवो भवति -8 'अथापि' 'रौरुकि ब्राह्मणं' रोरुकिनामबाह्मणोक्तं लौकिकप्रवादवचनं 'भवति' अस्ति । किन्तत् ? इत्युच्यते-'है' निश्चयं पुरा 'मातरः' 'कुमारान्' स्वपुत्रान् 'पायमानाः' स्तन्यमिति यावत् पाहुः स्म' उक्तवत्यः। किमुक्तवत्यः तदाह "हे" 'पुत्रकाः !' यूयं 'शक्करीच्छन्दोमूलकमहानाम्नीनां 'चतम्' अनुशीलननियम 'पारयिष्णवः' 'भवत'-'इति ॥ ७-९॥ इदानीं तदुव्रतकालेष्वनुष्ठेयानाह- - का मत , - प्र.३ खं०१सू०१-२० ] ब्रह्मचारिकृत्यम् ॥ -"रोरुकिब्राह्मण" में एक लौकिक प्रवाद है कि मातृगण अपने पुत्रादिक को स्तन्य पान कगते २ कहती हैं कि "हे वत्स ! शक्वरी व्रता. नुष्ठान के निमम को पार करने में समर्थ होओ" । महानाम्नी सामकी अस्थि स्वरूप पद्य मन्त्र आदि शक्वरी छन्द है ॥ ७॥८॥६॥ तास्वनुसवनमुदकोपस्पर्शनम् ॥१०॥ नानुपस्पृश्य भोजनं प्रातः॥१२॥ सायमुपस्पृश्याभोजनमासमिदाधानात् ॥१२॥ (१) 'तासु शकरीषु शक्करीसाधनायेति यावत् । 'अनुसवनम्' प्रतिसन्ध्यम् 'उदकोपस्पर्शनम्' जलैहस्तपादादिकं विधूयेश्वरोपासनं कर्त्तव्यमिति प्रथमनियमः ॥ १०॥ (२) प्रतिसन्ध्यम् 'अनुपस्पृश्य' ईश्वरोपासनायोदकस्पर्शनमकृत्वा 'प्रातर्भोजनम्' अपि न कर्त्तव्यम् ॥ ११ ॥ (३) 'सायम्' 'उपस्पृश्य' अपि 'श्रासमिदाधानात्' समिदाधानात् प्राक् 'अभोजनं' भोजनं न कर्त्तव्यम् ॥ १२ ॥ भाषा-महानाम्नी व्रत में प्रत्येक सन्धिकाल में जल से हाथ पग श्रादि धोकर ईश्वरोपासना करे ॥१०॥ प्रति सन्धाकालमें ईश्वरोपासनाके लिये जल स्पर्श आदि किये विना प्रातःकालीन भोजन भी न करे ॥ ११ ॥ सायंकाल में ईश्वरोपासनाके लिये जल न ग्रहण करके भी समिदाधान के पहिले भोजन न करे अर्थात् सन्ध्योपासन और समिदाधान करने पर सन्ध्याका भोजनकरे। कृष्णवस्त्रः ॥ १३॥ कृष्णभक्षः॥१४॥ प्राचार्याधीनः ॥१॥ अपन्यदायी ॥१६॥ तपस्वी ॥१७॥ तिष्ठेदिवा ॥१८॥ श्रासीत नक्तम् ॥१६॥ वर्षति च नोपसर्पच्छन्नम् ॥ २० ॥ (४) कृष्णवर्ण रञ्जितमपि वा नलपित्तमेव वस्त्रं व्यवहरेत् ॥ १३ ॥ (५) कदर्याकदर्याविचारेणैवान्नादिकं भक्षणीयम् ॥ १५॥ (६) श्राचार्यस्य अधीन: सर्वतश्राज्ञाकारी भवेदिति शेषः ॥ १५॥ पथिकेभ्यः पन्थादानशीलो न भवेत तथाच स्नातकवतमाचरेदिति भावः ॥ १६॥ (८) भवेदित्येव । तपस्वित्वञ्चानि. मसूत्रत्रिकेण स्फुटीभविष्यति ॥ १७ ॥ (क) 'दिवा' अहनि 'तिष्ठेत' इत्येव; नोपविशेत् शयनकथा तु दूरपराहता ॥ १८॥ (ख) 'नक्तम्' रात्रौ 'श्रासीत' १२६ गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम् - mes . शयनोपवेशने कुर्वीत, न च तिष्ठेदिति नियमः ॥ १९॥ (ग) 'वर्षति च' पर्जन्ये 'छन्नं मनुष्यादिभिर्निर्मितं गृहादिकं 'न उपसत्' नाश्रयेत, वृष्टिषि एव भवे. दित्याशयोऽथवा वृक्षादिच्छायावलम्बनेऽपि न दोपः॥ २० ॥ भाषा-काला या रंगीन या मलिन वस्त्र व्यवहार करे ॥ १३ ॥ भोजन के लिये जो मिले उसे खाये ॥ १४ ॥ सर्वथा प्राचार्य का आज्ञाकारी हो ॥ ॥ १५ ॥ पथिकों को रास्ता देने में वाध्य न हो ॥ १६ ॥ तपस्वी होवे । "तपस्वी" का लक्षण ३ सूत्रों में आगे कहेंगे ॥ १७ ॥ दिन में खड़ा रह कर काल काटे, सोने की बात तो दूर रहे, बैठे भी नहीं ॥ १८॥ रात्रि में बैठे या सोवे, परन्तु खड़ा न हो ॥ १६ ॥ मेंह वर्षने पर पानी से भीगने के भय से मनुष्यादि निर्मित गृहादि का आश्रय न करे; प्रत्युत दिन में खड़ा होकर, एवं रात्रि में बैठ, या सोकर, पानी वर्षते में भीगते, या विशेष क्लेश बोध होने पर, वृक्ष आदि नैसर्गिक छाया का भी अवलम्बन करे, ॥ २० ॥ वर्षन्तं ब्रूयादापः शक्वर्य इति ॥ २१॥ विद्योतमानं ब्रूयादेव रूपाः खलु शक्वर्यो भवन्तीति ॥२२॥ स्तनयन्तं ब्रयान्मह्या महान् घोष इति ॥ २३ ॥ (९) 'वर्षन्तं' पर्जन्य मभिलक्ष्य प्रापः' इमाः अपि शकर्यः' शक्वरिच्छन्दोरूपा- एव 'इति' एवं 'ब्रूयात्'२१ (१०) विद्योतमानं वलाहकमभिलक्ष्य एवंरूपाः खलु शक्वर्यः भवन्ति इति' एवं 'ब्रूयात् २१ (११) 'स्तनयन्तं' गर्जन्तं घनघटामण्डल मभिलक्ष्य 'मह्याः' महत्याः शक्वर्याएव 'महान् घोषः' 'इति' एवं 'ब्रूयात्' ॥२३॥ भाषा-पानी वसते देखकर बोले कि “ये जलधारा समस्त शक्वरी छन्दो- मय मन्त्र हैं", विजुली देख कर-"शक्वरी छन्द सव भी निश्चय इसी प्रकार हैं। मेघ गर्जन सुनकर बोले कि ये बड़े २ शब्द अवश्यही शक्वरी छन्दके हैं' न स्रवन्तीमतिक्रामेदनुपस्पृशन ॥ २४ ॥ न नावमा- रोहेत् ॥ २५ ॥ प्राणसएंशये तूपस्पृश्यारोहेत् ॥ २६ ॥ (१२) 'स्त्रवन्ती नदीम् 'अनुपस्पृश्य' उपस्पर्शन मकृत्वैव 'न अतिक्रामेत् प्र०३ खं० सू०२१-३०] ब्रह्मचारिकृत्यम् ।। पन्थानमिति ॥२४॥ (१३) 'नावं न आरोहेत्, सन्तरणेनैव नदीपारादिकं गच्छे- दिति भावः ॥२५॥ (18) 'प्राणसंशये' यत्र सन्तरणेन पारादिगमने प्राणसंशयः स्यात्, तत्र 'तु' 'उपस्पृश्य' जलम् 'आरोहेत्' नावमिति ॥२६॥ भाषा-रास्ते में सोतेवाली नदी यदिअनति दूर पर बांये, या दहिने मिले,तो उसको विना छूये न जावे। नौका पर सवार न हो, तैर कर ही नदी पार जावे । तैरने में प्राण संकट का भय हो, तो जल छू कर नौका में बैठ पार जावे२४.२६ तथा प्रत्यवरुह्य ॥२८॥ उदकसाधवो हि महानाम्न्य इति ॥२८॥ एवं खलु चरतः कामवर्षी पर्जन्यो भवति॥२६॥ 'प्रत्यवरुह्य' नौतइति यावत् 'तथा' एव उपस्पर्शनं कर्त्तव्यम् ॥ २७ ॥ महा- नाम्नीव्रते कथमेवं कर्तव्यमित्याह-'हि' यत: 'महानाम्न्यः' ऋचः 'उदकसाधवः' उदकंव्यवहारेणैव साधनीया भवन्ति अतः एतव्रतसाधनाय सर्वथैवोदकव्यवहारो विधेय इति भावः ॥२८तेन किम्फलमित्याह;-'एवम् उक्तप्रकारेण चरतः'जनस्य 'खलु'निश्चयमेव पर्जन्यः'कामवर्षी भवति । एवञ्च व्रतमिदं काम्यमितिफलितम् २९ भाषा-नौकासे उतरते समय भी उसी प्रकार जल स्पर्श करे । महानाम्नी ऋग् आदि जिस कारण जल व्यवहारसे ही साधनीय है, इसलिये इस ब्रतमें सब प्रकारसे जलका व्यवहार कहा गया है, यो आचरण करनेवाले के पक्षमें मेघ निश्चयही कामवर्षी होते हैं । अर्थात् इस प्रकार ब्रतानुष्ठान सिद्ध-व्यक्ति के वृष्टिकी इच्छा करने पर वृष्टि अवश्य होगी ।। २७-२६ ॥ अनियभो वा कृष्णस्थानासनपन्धभक्षेषु ॥ ३० ॥ 'वा' अथवा 'कृष्णस्थानासनपन्थभक्षेषु' पूर्वोक्तेषु 'अनियमः' कर्तव्यतया नियमो न स्वीकर्तव्या, असमर्थश्चेदकृतेऽपि कस्मिंश्चिनियमे न क्षतिरित्यर्थः ॥३०॥ भाषा-या असमर्थ होने के कारण पूर्वोपदिष्ट कृष्ण वस्त्र धारण आदि नियमके प्रतिपालन न करने में कोई दोष नहीं है ।। ३० ॥ तृतीये चरित स्तोत्रीयामनुगापयेदेवमितरे स्तोत्रीये सी वाऽन्ते सर्वस्य ॥ ३१-३३ ॥

१२८ गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - यावत्कालमेतद् व्रतमाचरितव्यम्भवेत, तस्य तृतीये' अंशे 'चरिते' 'स्तोत्रीयां' प्रथमामृचम् 'अनुगापयेत्' आचार्यः । व्रतानुष्ठेयकाल-तृतीय-भाग-गते प्राचार्यस्तं अतिनमाद्यमूलकं सामाध्यापयेदित्यर्थः (३१) 'इतरे' द्वितीय-तृतीये अपि 'स्तो- त्रीये' ऋचौ 'एवम्' तृतीयांशानुसारत एवानुगापयेत् । एवं हि व्रतकालस्य मध्यम तृतीयेऽशेऽतीते मध्यममूलक सामाध्यापयेत् किञ्चान्तिमतृतीयेऽशेऽन्तिममूलकं साम चाध्यापयेदिति पर्यवसितार्थः (३२) 'वा' अथवा 'सर्वस्य' व्रतकालस्य 'अन्ते' एकदैव 'सर्वाः' स्तोत्रीयाः अनुगापयेत्, महानाम्नीसाम पूर्णमेवाध्यापयेदिति यावत् (३३) ॥३१-३३॥ यद्विहितं महानाम्नीसामानुगापनं तत्रेति कर्तव्यतामाह!- भाषा- यह महानाम्नी व्रत जब तक अनुष्टेय हो, उसके एक तृतीयांश समय वीतने पर, आचार्य इस व्रती को प्रथम ऋग् गान का अभ्यास करावे, पीछे और एक तृतीर्याश समय बीतने पर मध्यम ऋग् का गान उप- देश करे, अनन्तर शेष तृतीयांश वीतने पर शेष ऋग का भी गान कगवे, या समस्त व्रतकाल शेष होने पर एक ही वार में तीनों ऋचाओं का गान करावे. अर्थात् समस्त महानाम्नी सामका उपदेश अन्तमें एकही वार करे ॥३१-३३॥ उपयोषिताय सम्मीलितायानुगापयेत् ॥ ३४ ॥ 'उपोषिताय वक्ष्यमाण (३७) विध्यनुगतभोजनशून्याय किञ्च 'सम्मीलिताय' वक्ष्यमाण (३५) विध्यनुगतवसनबद्धनेत्राय एव ब्रह्मचारिणे 'अनुगापयेत्' शक्करी स्तोत्रीयास्तिस्रः, प्राचार्यः ॥ ३४ ॥ सम्मीलनप्रकार माहः भाषा-३७ वे सूत्र में कहे अनुसार अभोजन और ३५ वे सूत्र में कहे अनुसार अांख बन्द करना; ब्रह्मचारी को आचार्य शक्वरी छन्द के तीन स्तोत्रीय गान करावे, इसी गान को महानाम्नी-साम कहते हैं ॥३४॥ कंसमपां पूरयित्वा सर्वोषधीः कृत्वा हस्ताववधाय प्रदक्षिणमाचार्योऽहतेन वसनेन परिणोत् ॥ ३५ ॥ 'कंसं' पात्रमेकम् 'अपा' प्रदानेन 'पूरयित्वा' तत्रोदकपर्णकांस्यपात्रे 'सौं- षधीः, ब्रीह्यादीः सत "कृत्वा' क्षिप्त्वा, तत्रैव 'हस्तौ' ब्रह्मचारिणः 'अवधाय!

प्र० २ खं० १० सू०३४-५२ ] ब्रह्मचारिकृत्यम् ॥ यथा निमग्नौ कारयित्वा 'प्राचार्य: "प्रदक्षिण' यथा स्यात् तथा 'अहतेन वसनेन' तस्यैव अक्षिणी 'परिणयेत्' बद्ध कुर्यात् । इत्थमेव सम्पाद्यं तस्य सम्मीलनम् ॥ ३५ ॥ भाषा-आचार्य, एक कांसे के पात्र में जल भर कर उसमें धान्य आदि सात औषधि डालकर ब्रह्मचारी के दोनों हाथ को डुवा कर रक्खे और इसी अवस्था में उसकी दोनों आंखों को अखण्ड वस्त्र से बान्ध देवे । यों मुद्रित नेत्रहोगा। जिसको परिणइन कहते हैं ।। ३५ ॥ परिणहनान्ते वाऽनुगापयेत् ॥३६॥ परिणद्धो वाग्यतो न भुञ्जीत त्रिरात्रमहोरात्रौ वा ॥ ३७॥ 'परिणहनान्दे। 'वा' च 'अनुगापयेत्' ब्रह्मचारिणं महानाम्नीसाम आचार्यः ॥ ३६॥ 'परिणद्धः सः 'वाग्यतः' भवेत् किञ्च 'त्रिरात्रम् अहोरात्रौ वा, सामर्थ्य 'न भुञ्जीत' भोजनं न कुर्वीत ॥ ३७ ॥ परिणहनोपवासवैकल्पमाह;- भाषा-इस प्रकार परिणहन' अर्थात् आंख बान्धने पर आचार्य ब्रह्म- चारी को महानाम्नी साम का अध्ययन करावे ॥३६॥ पूर्वोक्त प्रकार से परि- णद्ध ब्रह्मचारी संयत्वाक् हो अपनी शक्ति अनुसार तीन रात, या एक दिन रात भोजन न करे ॥ ३७ ॥ परिणहन पूर्वक उपवास का अनुकल्प कहते हैं। अपिवारण्ये तिष्ठेदाऽस्तमयाच्छवोभूतेऽरण्येऽग्निमु. पसमाधाय व्याहृतिभिर्हत्वाऽथैनमवेक्षयेदग्नि माज्यमा- दित्यं ब्रह्माणमनड्वाहमन्नमपोधीति स्वरभिव्यख्यं ज्यो- तिरभिव्यख्यमिति एवं त्रिः सर्वाणि ३८-४२॥ 'अपि वा' अथवा 'श्रा अस्तमयात्' सूर्यास्तकालादारभ्य अरण्ये तिष्ठेत्' अरण्य- स्थिति कुर्वीत । ततः श्वोभूते प्रभातायां रजन्यां 'अरण्ये, एव तत्र 'अग्निम्' 'उप समाधाय' यथाविधि प्रज्वाल्य नत्र भाज्यलितेऽनौब्रह्मचारी व्याहृतिभिः, भूर्भुव:- स्वरिति 'हुत्वा' 'अथ' अनन्तरम् . प्राचार्यः 'एनम् ब्रह्मचारिणं:'अग्निम्' प्राज्यम् , आदित्यं, ब्रह्माणम् , अनड्वाहम , शन्नम , अपः, दधि-'इति' अष्टौ 'अवेक्षयेत्' दर्शयेत् । तत्र च 'स्वरभिव्यख्यं ज्योतिरभिव्यस्य'-'इति' इमं मन्त्रं पाठयेत् । ह गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - 'एवं' उद्धलक्षण मन्त्रं 'त्रिः त्रिवारं 'सर्वाणि' वस्तूनि प्रति पाठयेदित्येव । तथाच एतन्मन्त्रस्य त्रिस्त्रिः पाठेनैव अग्न्यादीनामवेक्षणमिति निष्पन्नम् ॥३९- ४२॥ भाषा-या सूर्यास्त समयसे वनमें रहे। अनन्तर निशा-प्रभात समय उसी वनमें यथाविधि अग्नि जलाकर, जलती आगमें व्याहृति मन्त्रसे हवन प्रदान करे । फिर प्राचार्य उसे अग्नि, आज्य, श्रादित्य, बाह्मण,वृषभ, अन्न, जल, और दधि-ये आठ माङ्गलिक वस्तु क्रमशः दिखलावे एवं प्रत्येक वस्तुके देखते समय तीन २ वार "स्वः” "देखा"-ज्योतिः, देखा कहवावे । ३८-४२ शान्तिं कृत्वा गुरुमभिवादयते।४३ सोऽस्य वाग्विसर्गः॥४४॥ सर्वकमशेषे 'शान्ति कृत्वा' शान्तिपाठं पठित्वेति यावत् 'गुरुम्' आचार्यम् 'अभिवादयते ॥ ४२ ॥ 'सः' अभिवादनकालएव 'अस्य' तिनः 'वाग्विसर्गः' वाचा विसर्गो यत्र तादृशः ॥ ४४ ॥ भाषा-सब कर्मों की समाप्तिमें शोन्ति पाठकर प्राचार्य को अभिवादन करे ॥ ४३ ॥ गुरुको अभिवाइन करने तक ब्रह्मचारी संयत्वाक् रहे एवं अभिवादन के वाद 'संयत्वाक का नियम छोड़ देवे ॥४४॥ अनवान् कंसो वासो वर इति दक्षिणाः प्रथम विकल्प अाच्छादयेद्गुरुमित्येके ।। ४५-४७ ।। 'अनड्वान्' वृषभः, 'कंस' कांस्यपात्रम् , 'वासः' वसनम्, 'वर' गौः 'इति' चतस्रः दक्षिणा' महानाम्निव्रतस्येति शेषः (४५)। तत्र च 'प्रथमे' अनडुदद्रव्ये एवं 'विकल्पः' विकल्पतः कंसादीना मन्यतमोव्यवस्थेयः (४६) 'एके आचार्या 'तु' 'गुरुम् आच्छादयेत्'-वासोभिरिति शेषः-इत्येव विदधतीति ॥ ४५-४७ ॥ भाषा-इस व्रत के साथ वृषभ, कांस्यपात्र, वसन और गौ दक्षिणा देवे। इनमें से कांस्यपात्र आदि तीन वस्तु गौ का ही विकल्प है । इससे वृषभ ही प्रकृत दक्षिणा है। कांस्य प्रभृति तीनों वस्तु साध्यानुसार व्यवस्था कियी है । गौ न हो तो कांस्यपात्र, वह न हो तो वसन, इसके अभाव में किसी के मत से गुरु को सर्वाङ्ग वस्त्र से श्रावृन करे ॥ ४५४७॥ ।

प्र० ३ खं० २ सू० ४३-५०] ब्रह्मचारिकृत्यम् ॥
ऐन्द्रःस्थालीपाकस्तस्यजुहुयाचं सामयजामहइत्येतया सद
सस्पतिमद्भुतमितिचोभाभ्यां वा अनुप्रवचनीयेष्वेवम् ४८,४६
महानान्निकवतकृत्य मुक्त्वेदानीं सर्वव्रतसाधारणशेषकर्त्तव्याणि क्रमादु विधत्ते;
'ऐन्द्र' इन्द्रदेवताकः 'स्थालीपाकः' पक्तव्यइति यावत् । 'तस्य' स्थालीपा-
कानस्य भागै कम् 'ऋचं साम यजामहे (४, २, ३, १०) 'इति' एतया ऋचा,
'वा' अथवा 'सदसस्पतिमद्भुतम् (२,२,३,४,)'--'इति' एतया ऋचा, 'वा' अथवा
'उभाभ्याम् एव ऋग्भ्याम् 'जुहुयात् (४८)। एवम्' उक्तत्रकारोविधिः 'अनुप्रवच-
नीयेषु सर्वसामाध्ययनेष्वेव बोध्यः, न तु महानाम्नियामाध्ययनार्थएवेति॥४४,४९॥
पूर्वत्र (२०१०ख०१६सू०) व्रतग्रहणकाले ये मन्त्रा विहिताः,व्रतसमाप्तिकाले
तेषामेव पाठपरिवर्तनेन व्यवहारो विधीयते:-
भाषा-इन्द्र देवताक स्थाली पाक चरु प्रस्तुत करे । एवं इस चरुको यथा
भाग ग्रहगा कर 'ऋचं साम यजामहे" (५,२,३,१०) मन्त्र पाठ करते
या "सद सम्पतिम नम्'' (२,२,३,७) मन्त्र पाठ करते हुए या दोनों मन्त्र
पढ़ते हुए होम करके ॥४८॥ जो कोई साम ग्रन्थ अध्ययनकरे उन सब ग्रन्थ
की समाप्ति में यह होम करे, केवल महानाम्नी सामके लिये नहीं ॥४८,४६॥
महानाम्नी व्रतके कर्त्तव्यको कहकर साधारण व्रतोंके अन्तमें कर्तव्यको कहते हैं:-
[ पूर्व (प्र० २ खं० १० सू०१६) व्रत ग्रहण कालमें जो मन्त्र आदि
कहे गये हैं, कुछ पाठ बदल कर वे ही सब व्रत समाप्ति कालमें भी विहित हैं।
सर्वत्राचार्ष तदशकं तेनारात्समुपगामिति मन्त्रविशेषः॥५०॥
'सर्वत्र' व्रतान्तेषु 'मन्त्रविशेषः' पाठपरिवर्तनकृतः कर्त्तव्यः इति कानि च
तानि पाठपरिवर्तनानि ? इत्याह-'अचार्षन्', 'तदशकम्' 'तेनारात्सम्' उपागाम्'
'इति' इमानि । तानि च मन्त्रब्राह्मणोक्तेषु 'अग्ने व्रतपते (१,६,९-१३) इत्येव-
मादिषु पञ्चसु बोध्यानि ॥ ५० ॥
भाषा-व्रत समाप्त होने पर पूर्वोक्त मन्त्र (म० प्रा० १,६९-१०)
क्रिया आदि भूनकालके रूपमें व्यवहृत करना चाहिये ॥ ५० ॥

RA १३२ गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- पर आग्नेयेऽज ऐन्द्रे मेषो गौः पावमाने पर्वदक्षिणाः॥५१॥ 'श्राग्नेये' पर्वणि अधीते, तस्याध्यापनस्य दक्षिणा, 'अजः' एकः श्राचार्याय देयः । 'ऐन्द्रे' पर्वणि अधीते, तस्याध्यापनस्य दक्षिणा, 'मेषः' एकः प्राचार्याय देयः । 'पावमाने' पर्वणि अधीते, तस्याध्यापनस्य दक्षिणा, 'गौः एका आचार्याय देयाइति 'पर्वदक्षिणाः' गेयगाननाम-गानग्रन्थीय-पर्वनाम-परिच्छेदानामध्य- यननिमित्ता दक्षिणाः श्राचार्यलभ्याः, ताश्च ब्रह्मचर्यावस्थायां दातुममर्थश्चेत् गृह- स्थानमप्रवेशकाले एव दातव्याः तत्र च न दोपश्रुतिः ॥ ५१ ॥ गुरुकुलात् पितृगृहे प्रत्यागतत्य गुर्वादिभोजनं विधत्ते; भाषा-आग्नेय पर्व पढ़ लेने प्राचार्य को एक छाग देवे, ऐन्द्र पर्व पढ़ने पर, एक भेड़ा एवं पावमान पर्व पढ़ लेने पर एक गौ दक्षिण देव । इसस को पर्वदक्षिणा कहते हैं। अर्थात् गेयगान नामक सामवेदीय गान ग्रन्थका पर्व नाम से प्रधान परिच्छेदत्रय के पढ़ाने की दक्षिणाये हैं, इसे ब्रह्मचर्यावस्था में न देसके तो गृहस्थाश्रम के प्रवेश काल में भी देवे ॥ ५१ ॥ प्रत्येत्याचार्य सपर्षत्कं भोजयेत् सब्रह्मचारिणश्चो- पसमेतान् ॥ ५२, ५३ ॥ 'प्रत्येति' गुरुकुलात स्वगृहे प्रत्यागतः 'सपर्षक' पुत्रादिपरिजनसहितम् 'श्राचार्य 'भोजयत्। तदिदं भोजनं स्वगृहे प्राचार्यादिकानानीय प्राचार्यगृहे गत्वा वेति न नियमः ॥ ५२ ॥ किञ्च 'सब्रह्मचारिणः' सतीर्थाः समानकालवत चारिणश्च 'उप' समीपे स्वगृहे 'समेतान्' नियन्त्रणाहूतान् 'च' अपि भोजयेदित्येव ॥ ५३ ॥ भाषा-गुरुकुल से घर वापिस सोने पर गुरु पुत्रादि गुरु परिजन के साथ गुरुको भोजन कगवे । ( यह भोजन, चाहे अपने घर हो. या गुरु के ही घर पर हो) परन्तु निज सहपाठी आदिक को और समकाल ब्रह्मर्य स- माप्तकारी गण को भी घर पर निमन्त्रण कर भोजन करावे ॥५२,५३॥ येष्टसाम्नो महानानिकेनैवानुगापनकल्पो व्याख्यातः॥५४॥ ज्येष्ठसाम्न: 'अनुगापनकल्प' अध्यापनप्रकारः 'महानाम्निकेन एवं' कथितः। .

प्र०३ खं० २ सू०५१-५९] ब्रह्मचारिकृत्यम् ॥ - - ज्येष्ठसाम च महानास्निकमिव उपोषितमुपनद्धाक्षमरण्यगं वाध्यापयेदित्यर्थः ॥५४॥ अथेदानी कौथुमानां चिरप्रतिपाल्यनियमानाह;- भाषा-ज्येष्ठसाम के पढ़ाने की रीति महानाम्निकसाम की नाई है । (ज्येष्ठसाम के अध्ययन में भी विद्यार्थी को उपवास रहकर, अांख बांध कर, आदि कार्य )॥५४ ॥ कौथुमी शाखा वालोंके पाननीय नियम कहते हैं। तत्रैतानि नित्यव्रतानि भवन्ति ।। ५५ ॥ न शूद्रामु- पेयात् ।। ५६ ।। न पक्षिमासं भुञ्जीत !! ५७ ॥ एकधान्य- मेकदेशमेकवस्त्रश्च वर्जयेत् ।। ५८ ।। 'तत्र' समावर्तनात् परम् एतानि नित्यवतानि' सर्वथैव प्रतिपाल्पनियमाः 'भवन्ति' (१) शूद्रां न उपेयात्' शूद्रायाः पाणिग्रहणं न कुर्यात् (२) पक्षिमांसं न भुञ्जीत्' विहिताविहितस्य कस्यापि पक्षिणो मांसं न अद्यात् (३)। 'एकाधा. न्यम्' एक देशं एकवस्त्रं च वर्जयेत्' चिरमेकविध शस्यमेव नाद्यात्, सर्वदैव निर- न्तरमेकदेशे एव वासं न कुर्यात् किञ्च आच्छिन्नमेकमेव वस्त्रं न परिदध्यात् अपितु कदाचित् धान्यं कदाचिट्ठा गोधूम, कदाचिद्वा यवं भक्षेत, एवं वर्षमध्ये एकवा- रमपि देशाटनं कर्तव्यमेव, किञ्च परिहितवस्त्राणि सदैव परिवर्त्य प्रक्षालनादिना पुनगृह्यादिति ॥ ५५-५६-५७-५८ ॥ भाषा-समावर्तनके वाद वक्ष्यमाण नियमोंका अवश्य पालन करे (२)शूद्रा कन्यासे विवाह न करे (२) चिड़ियेका मांस न पवावे (३) प्रतिदिन एक ही प्रकारका अन्न न खावे; कभी धान्य,कभी गेहूं, कभी यव व्यवहार करे; बहुत दिनों तक निरन्तर एकही देश में न रहे,अन्ततः वर्ष में एकबार भी देश पर्यटन करे; एवं एक वस्त्र जब तक न फटे, तबतक अत्याज्यरूप व्यवहार न करे, . वरन सर्वदा ही वदलते हुए धुलाकर ग्रहण करे ।। ५५-५६-५७-५८ ॥ उधृताभिरद्भिपस्पृशेत् ॥ ५६ ॥ (४) 'उद्धताभिः अद्भिः उपस्पृशेत्' तत्क्षणमेवोदकान्युकृत्यतैरेव हस्तमुखम- झालनादिकं कुर्यात् न तु पूर्वोकृतैः । एतेन च शीतकाले उष्णवारिलाभः, प्रीष्मे गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - . N च शीतवारिलाभः सुकरो भवेत,विपकीटपतनादिदोपशङ्कापि न स्यादिति भावः॥५१॥ भाषा-(४) जिस २ समय हाथ, पैर, मुखा आदि धोनेकी आवश्यक हो, उस उस समय कूप आदिसे जनभर लेवे, या भरवा लेबे, इससे शीतकान में गर्म जल एवं ग्रीष्मकाल में शीतल जल सुगमता से मिलेगा ॥ ५६ ।। आदेशनात्प्रभृतिन मृण्मयेऽश्नोयातून पिवेच्छवणादिस्येके (५) 'श्रादेशनात् प्रभृति' सावित्र्युपदेशादारभ्य 'मृण्मये न अश्नीयात्' किञ्च मृण्मये 'पिबेत् अपि'न'। 'एके प्राचार्यास्तु श्रवणात्' गुरुमुखात् वेदाध्ययनश्रवण- समातियंदा भवेत, ततः प्रभृत्येव मृण्मयेन अश्नीयात् न च पिवेदित्याहुः ६०-६२ इति सामवेदीये गोभिलगृह्यसूत्रे तृतीय प्रपाठकेद्वितीयखण्डस्य व्याख्यानं समाप्तम् ३-२ भाषा-जव 'सावित्री' दीक्षा हो तबसे मट्टीक वर्गनमें भोजन या पान न करे । कोई २ श्राचार्य कहते हैं कि जब तक प्राचार्यके पास बेद श्रवण करे, तब तक ऐसा न करनेसे भी चल सकता है। अनन्तर वेदाध्ययन समाप्ति कर घर आने तक मिट्टीके पात्रमें भोजन, या जलपान न करे ॥ ६०-६१-६२॥ गोभिलगृहसूत्रकेतृतीयअध्यायके द्वितीयखण्डका अनुवाद पूरा हुआ॥३-२॥ अथ महानाम्नी साम | (प्रथम स्तोत्रीयानुगानम् २ १२ २ १ र १ ए २ । विदामघवन्विदाः । गातुमनुशशिषः । दाइ २ ५ मा ३ १ उवा २३ । ई ३ ४ डा । ए २ । शिक्षाशचीना- २२ र १२ म्पताइ । पूर्वीणाम्पूरू २ । वसा ३१ उवा २३ । १ Mchar ४ २२.१ २, २ आभिष्ट्रमभा २ इ । ष्टिभिरा ३१ उ वा २ ३ । ई प्र०३ खं० २ सू०१-१०] महानाम्नीसान॥ - ~~ ५ २ h ३ ४ डा। स्वनाशू२ :। हा ३ २ उवा २३ । ई ३ ४ ११२ १ - डा । प्राचे । तनप्रचेतया । इन्द्रा । धन्नाय ना २ इषाइ । १ १ ૨ २१र १ १ २ इडा । इन्द्रा। शुन्नायन २ इषाइ । अथा। इन्द्रा। धुन्ना- १ २ यना २ इषाइ । इडा । एवा हिशक्रोरायेवाजायवा १ जी ३ वाः शविष्ठ वजिन्ना ३ । जासाइ । महिष्ठ वजिन्ना ३ १ १ १ २ २३ हो । जा सा ३ २ उवा ३२। इद् इडा २ ३ ४ ५ १ २ m श्रा या । हि पिब मा २त् सुवा । इ डा २ ३ ४ ५ ।।- (द्वितीयस्तोत्रीयानुगानम् ) १ ए २। विदारायेसुवीरियाम् । भुवो वाजानाम्पतिर्व- १ १ २ ५ १ २ 5 २ शा२। अनुश्रा ३ १ उवा २३ । ई ३४ डा । ए २ । महिष्ट वजिन्नसाइ । यः शविष्टः शूरा २ णा ३ १ उवा २३ । ई ३ ४ ३ डा । योमहिष्ठ मघो २ । ना ३१ उवा २३। ई ३ ४ डा । अशुनशोचा २ इः । हा ३१ २ २ उवा २३ । ई ३४ डा। चाइ । कित्वो अभिनोनया। ईन्द्रो । विदेतमू २ स्तुहाइ । इडा । ईन्द्रो । विदेतमू २ गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- A १ or स्तुहाइ । अथा। ईन्द्रो । विदेतम २ स्तुहाइ । इडा । र पर ईशेहिशक्रस्तमूतये हवा १ मा ३ हाइ । जेतारमपरा ३ । जाइताम् । सनः स्वर्षदता २ ३ होइ । द्वा: इषा ३ १ उवा १ २ १ १ २३ । इद् इडा २३४५। क्रातुः । छन्द ऋता २ म्बृहा - १ त् । इडा २३४५॥ महानाम्नी साम । (तृतीयस्तोत्रीयानुगानम् ) १ ए २ । इन्द्रधनस्य सातयाइ । हवामहे जेतारमपरा - २ २। जितमा ३ १ उवा २ ३॥ई ३४ डा। ए २ । सनः-स्वर्ष दति द्विषाः । सानः स्वर्षदता २ इ। द्विष प्रा ३१ उवा २ १ - २ ई ३ ४ डा। पूर्वस्य यत्ता २ । द्विव ा ३ १ उवार २ - ई ३ ४ डा। अशुर्मदाया २। हा ३१ उवा २३ । Alan .w २र १ १ ई ३४ डा । सून्नआधेहिनोवसाउ । पूर्तीः । शविष्ठशारस्य १ ताइ । इडा । पूर्तीः । शविष्ठशा २ स्यताइ । अथा । १ पूर्ताः । शविष्ठशारस्य ताइ। इडा।वशीहिशक्रोनूनं तन्नव्य

प्र०३ खं०२ सू०१०-१३] महानान्नीसाम ।
२
१
२ १र
१
र
१
र
धंसान्या३साइ । प्रभो जनस्यवा ३ । बाहान् । समयेषु
बवा २३ होइ । वाहा ३१ उवा २३ । इदउडा २ ३ ४ ५।
-
१
or
२
शूरो । योगोषुगा २ च्छता ३ । इडा । साखा । सुशेवो
२ दयुः । इडा २३ ४ ५॥-
(पञ्चपुरीय पदानुगानम् )
१
१
प्राइवा । हियेवा २ ३ ४ ५ । होइ । हो । वाहा ३१ उ
or
on
वा २३ । ई ३४ डा। प्राइवो हियग्ना २ ३ ४ ५ इ । होइ
इ
२र
-
२
२
हो । वा हा ३ १ उवा २ ३ । ई ३ ४ डा। आइवा। हि
इन्द्रा २ ३ ४ ५ होइ । हो। वाहा ३१ उवा २३ । इ ३४
१
२
S
SS
२र
डा । आइवा हि पूषा २ ३ ४ ५ न् । होह। हो। वाहा
२
३१ उवा २३ । ई३४डा ।
आइवा । हि देवा २ ३ ४ ५
होइ । हो । वाहा ३ १ उवा २३ । ई ३ ४ डा। आइवा
in cho
१
हि देवा २ ३ ४१५ । होइ । हो । वाहा ३ १ उवा २३
ई ३ ४ डा ॥१॥

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- BawanSINMMAmeanAmasmine rumwwmurare प्रौष्ठपदीहस्तेनोपाकरणम् ॥ १॥ "हस्तेन प्रौष्ठपदी" हस्तनक्षत्रयुतां भाद्रपदीयां यां कामपि तिथि प्राप्य नदेव "उपाकरण" नाम वेदाध्यापनारम्भसूचकं कम वक्ष्यनाणेतिकत्तव्यताकं कर्तव्यम् । उप समीपे प्राक्रियन्ते अध्ययनाच शिष्याः येन कर्मणा तत् ॥१॥ अत्रोपाकरणे:- भाषा- भाद्रभास के किसी तिथि के पूर्वान्ह में हस्ता नक्षत्र युक्त हो, उसी दिन 'उपाकरण' कर्म करना चाहिये ॥ १॥ व्याहृतिभिक्षुत्वा शिष्याणा सावित्र्यनुवचनं यथोपनयने 1-'व्याहृतिभिः भूर्भुवः स्वरिति मन्त्रत्रिकैः 'हुत्त्वा' अाज्यमेव 'शिष्याणां वेदाध्य- यनारम्भकर्तुमुपस्थितानां नवानां 'सावित्र्यनुवचनं सावित्रीनामचोऽध्यापनं कर्त्त- व्यम् । एतच्च 'यथा उपनयने' कृतम्, तथैवात्रापि पादशोऽद्ध-शक्श इति यावत् २॥ भाषा-भूः, भुवः, और स्वः, इन तोन मन्त्रों का पाठ करते हुए तीन आहुति देवे । वेदाध्ययन का प्रारम्भ करने के लिये समुपस्थित नये छात्रों को उपनयन में उपदेश होने की नाई पहिले पाद २, फिर आधी २ ऋचा और अन्तमें समस्त ऋक् आवृत्तिक्रमसे सावित्री मन्त्रका अभ्यासकरावे । २ सामसावित्रीञ्च ॥३॥ सोमराजानंवरुणमिति ॥४॥ (२) 'च' अपि 'सावित्रीम्'ऋचमाश्रित्य गीतं ग्रन्थाध्यापनारम्भसूचक 'साम' अनुच्यात् अनुवाचयेत शिप्यान् । आदौ तावदाचार्यों भागशोब्रूयात्तदनु तथैव तत्साकमेव शिष्याः सर्वएव मिलित्वा ब्रूयुरिति यावत् ॥ ३ ॥ (३) 'च' अपि * जिस क्रिया के द्वारा वेद के नूतन पाठका अध्ययन और अध्यापन प्रारम्भ किया जाता, उस अनुष्ठान को 'उपाकरण' कहते हैं । यह 'उपाकरण' आचार्य एवं छात्र दोनों ही को समान कर्तव्य है, सुतरां सब ही मिलकर करते हैं । ऋग्वेदी और यजुर्वेदियों को यह 'उपाकरण श्रावण मास में ह.ता है एवं किसी २ के मत से कौथुमियों को भी श्रावण ही मास में होता हैं । श्रतएव इस अनुष्ठान को 'श्रावणी' भी कहते हैं। + वेदों के अध्यापन प्रारम्भ कालमें सर्वदा हो सावित्री पाठ और तत समागम कर्तव्य एवं उसी प्रकार व्यवहार भी है। यदि थोड़े ही दिन में उपनोत होजावे तो सावित्री साम का अभ्यास छुट जा सकता है सुतरां यह सावित्री अन्यून उनके लिये विशेष आवश्यक है। Indana है प्र.३ खं० ३ सू०१-९] उपाकर्म ॥ १३९ ORAMANANDITHINGEET MaRNANDS 'सोमं राजानं वरुणम्' (छ. आ० १, २, ५, १) 'इति' नच मनूच्यात् तन्मूलकं साम च (गे. गा० ३, १,१) ॥४॥ भाषा-एवं यह सावित्री ऋक् अबलम्बन पूर्वक गीत साम भी एक २ भाग कर,आचार्य,निजकृत उच्चारण के पीछे और सङ्ग २ उस छात्रको पढ़ाते हुए अभ्यास कगवे ॥ ३ (३) सोमा राजानं (छ,गाँ१,२,५.१) ऋक् एवं यह ऋङ् मूलक साम (गें,गाँ ३,१,१) इस प्रकार क्रमसे अभ्यास करावे ॥ ४ ॥ आदितश्छन्दसोऽधीत्य यथार्थम् ॥ ५ ॥ (४) ततः सर्वेमिलिस्दा 'छन्दसः छन्दोनामपामवेदीयाचिकग्रन्थस्य आदितः आरभ्य सर्वमेव भागद्वयं यावदधीत वा अधीमीरन् सामवेदसंहितायाः सामशू- न्यायाः समनायाः यावधीताया वा पारायणं करीयमित्यर्थः। 'अधीत्य' पारा- यणे समाप्ते 'यथार्थम्' यथाप्रयोजनमपरापर कार्य कर्त्तव्यम् ॥ ५ ॥ भाषा-अनन्तर छन्दोनामक (आञ्चिक) * ग्रन्थके पूर्व और उत्तर दोनों भाग ही श्राद्यन्त ( जहां तक पढ़ा है ) सब मिलकर पाठ करें। उसी प्रकार वेद पारायण समाप्त होने पर यथा प्रयोजन अन्य कार्य करे ॥५॥ अक्षतधाना भक्षयन्ति धानावन्तङ्करम्भिणमिति ॥६॥ (५) अनुवचनेऽध्ययने च समासे 'धानावन्तङ्करम्भिणम् (छ० अङ्क ३,१) २,७)-'इति' इमा मृचं पठित्वा 'अक्षतधाना.' भ्रष्टएव धाना उच्यन्ते तत्र चाक्षतत्वं मृग्यम्, ता एव 'भक्षयन्ति' प्राचार्यादयः ॥ ६॥ भाषा-(५) वेद परायणके अनन्तर 'धानावन्तङ्करम्भिणम्' मन्त्रका पाठ करते हुये अभग्न भुना हुआ यव सब लोग भक्षण करें ॥ ६ ॥ दनः प्राश्नन्ति दधिक्रावणोकारिषमिति ।७ श्रा चान्तो- दकाः ८ खाण्डिकेभ्योऽअनुवाक्या अनुगेयाः कारयेत्॥६॥ ततश्च 'दधिक्राबणोपकारिषम् (छ०अ०४,२,२,७) इति' ऋचं पठित्वा 'दध्नः • यही साम वेद का मूल ग्रन्थ अर्थात् संहितास्थि है। इसी का अवलम्बन कर गेय गान प्रभृति गान ग्रन्थ सब बने हैं एवं ब्राह्मण ग्रन्थ भी इसी का व्यवस्थापक है इत्यादि ।

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम् --- प्राश्नन्ति' तएवेति । अनन्तरम् 'अाचान्तोदकाः' उदकैः कृताचमनाः ते सर्वे भवेयुः (भू)। ततः 'खाण्डिकेभ्यः' अधीनवेदखण्डेभ्यः पुरातनछात्रेभ्यः इति यावत् । 'अनुवाक्याः अनुवाकशएव 'अनुगेयाः स्वगानानुरूपगायकाः 'कारयेत् प्राचार्यः॥९॥ भाषा-तदनन्तर 'दधिक्राव्णोकारिषम्' मन्त्र पाठ करके सब लोग दही खावें। तब आचमन कर यथा स्थान स्वस्थ हो बैठे। पीछे प्राचार्य, जिन छात्रों ने जहां तक पढ़ा हो, उसके परे से अध्ययन करावें ॥ ६ ॥ सावित्रमहः काङ्क्षन्त।१० उद्गयने च पक्षिणी रात्रिम्।।११ 'सावित्रमहः' यहिने सावित्र्युपदेशोऽनुवचनं वा तद्दिनं 'काङ्क्षन्ते' वाञ्छन्ति आचार्या: वेदाभ्यासतो विश्रामाति ॥१०॥'च' अपि तदेव सावित्रमहः उपनयन- निबन्धनं वक्ष्यमाण मुत्सर्गनिमित्त वा 'उदगयने' चेद् भवेत् तर्हि 'पक्षिणी रात्रि तद्दिनमारभ्य परदिनावशेष पर्यन्तं विश्रामाय काङ्क्षन्ते प्राचार्या इति ॥ ११ ॥ [ यहां जिस प्रकार वेदोंका 'उपाकरण' कहा गया है, उसी प्रकार उत्तरायण में वेदों को 'उत्सर्ग' क्रिया की भी व्यवस्था कियी जावेगी] भाषा-जिस दिन यह 'उपाकरण' क्रिया हो, उस दिन दही खाकर एवं आचमन कर लेनेपर नये विद्यार्थियोंको विश्राम देवे ॥१०॥ उस उत्तगयणमें छात्रोंको पक्षिणी विश्राम देवकी व्यवस्था करे अर्थात् क्या वेद,क्या वेदाङ्ग, सम्बन्धी नया वा पुराना पाठ कुछ भी न करे करावे ॥ ११ ॥ उभयत एके त्रिरात्रम् ॥ १२॥ आचार्याणाञ्चोदको- त्सेचनमुभयन्त्र ॥ १३ ॥ 'एके' तु प्राचार्याः 'उभयतः' दक्षिणायनोत्तरायणेतदुभयकाले एव तथा च वेदोपाकरणे वेदोत्सर्गे च कर्मणि सम्पन्ने 'त्रिरात्रं' काङ्क्षन्ते विश्रामायेति ॥१२॥ (२.) उभयत्र' उपाकरणे उत्सर्दै च 'श्राचार्याणां वेदशाखाप्रचारकाणां नामतः 'उदकोत्सेचन' जलाञ्जलिक्षेपणं तर्पणमिति यावत् कर्त्तव्यमिति शेषः ॥ ३ ॥ भाषा-कोई २ प्राचार्य कहते-कि 'उपाकरण' और 'उत्सर्ग' इन दोनों क्रियाओं में छात्रों को तीन रात्रि विश्राम देवे ॥ १२ ॥ ( 'उपाकरण' और , प्र० ३ खं०३। सू०१०-१६] उपाकर्म ॥ उत्सर्ग, इन दोनों क्रियाओं में जलाञ्जलि क्षेपण पूर्वक प्राचार्यों का नाम स्मरण करके ( स्वीय) तृप्तिसाधन करे ॥ १३ ॥ श्रवणामेकउपाकृत्यैतमासावित्रात् कालं कान्क्षन्ते ॥ १४ ॥ तैषीमुत्सृजन्ति ॥ १५ ॥ 'एके' प्राचार्याः 'श्रवणां' श्रावणी पौर्णमासी प्राप्य 'उपाकृत्य' 'प्रासावित्रात्' सवतृदेवताकं भाद्रपदीयं हस्तनाम नक्षत्र मभिव्याप्य 'एतकालं' काङ्क्षन्ते' अध्य- यानाध्यापनविश्रामायेति । इत्युपाकरणम् अथोत्सर्गः । 'तैषी' तिष्यनामनक्षत्रयुतां पौषी पौर्णमासी मिति यावत् प्राप्य 'उत्सृजन्ति'वेदाध्यापनत्यागमूचक मुत्सर्जन नाम कर्म कुर्वन्ति प्राचार्याएवेति । इदमेवोदगयनीय प्रत्युपाकरणम् ॥१४-१५॥ भाषा-कोई २ श्राचार्य कहते हैं कि श्रावण मासकी पूर्णिमासी को यह 'उपाकरण करे एवं उस दिनसे भाद्रमासके हस्तानक्षत्र युक्त तिथि तक छात्रों को विश्राम देवे । पौष की पूर्णमासी को वेदाध्यापन का 'उत्सर्ग' कई महीनों केलिये नया पाठ छोड़ देवे । यह 'प्रत्युपाकरण' है ॥ १४-१५॥ प्रावोदङ्वा ग्रामान्निष्क्रम्य या श्रापोऽनवमेहनीयास्ता- अभ्यस्थोपस्पृश्यच्छन्दास्यूषीनाचायाँश्च तर्पयेयुः ॥१६॥ एतस्मिन्नुदगयीनीये सम्पन्ने च पक्षिणी त्रिरात्रं वा विश्रामाय काङ्क्षन्ते श्रा- चार्या इत्युक्तं पुरस्तात् । तत्र च विश्रामावसरे 'ग्रामात्' स्ववासभूमेः 'प्राक् वा' पूर्वस्यां दिशि वा 'उदक वा' उत्तरस्यां दिशि या निष्कम्य, 'या आपः' 'अनद- मेहनीयाः' मेहनस्पर्शिन्यो मेहनीयाः ततोऽर्वाचीनाः अवमेहनीयाः, न तादृश्यः, मेहनोदुर्ध्वगता नाभिदघ्ना इति यावत् ; 'ता:' श्रापः 'अभ्येत्य, 'उपस्पृश्य' 'छ- न्दांसि' छन्दोनामान्युल्लिस्य, 'ऋषीन्' मन्त्रद्रष्टुषिनामान्युल्लिख्य, 'प्राचार्यान्' स्व-स्व-शाखाकारनामादीन्युल्लिख्य 'च' तर्पयेयुः जलाञ्जलिदानैः स्मरणतः स्वा- त्मतृप्तिं सम्पादयेयुरित्यर्थः ॥ १६ ॥ भाषा-यह 'उत्सर्ग' क्रिया पूरी होनेपर तीन गत सब प्रकार अध्ययन न करे, यह पूर्वही व्यवस्था कियी गयी है। उस विगमकालमें, अपने २ वास ..

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम् - JUMIKumarwarRIDINowomamme . प्रामके पूर्व, या उत्तर भागनें, जाहर, कमसे कम नाभि-प्रमागा-जलवाले जलाशयमें गोवा मारकर उपस्पर्श पूर्वक छन्दोंके नामका उल्नेख करते हुए और मन्त्र द्रष्टा ऋषियों का नाम लेकर एवं अपनी २ शाखा प्रवर्तकादि प्राचार्यों का नाम लेते हुये जनाञ्जलि देकर तर्पगा करे ॥६॥ तस्मिन्प्रत्युपाकरणऽभ्रानाध्यायापुनरुपाकरणाच्छन्दसः१७ 'तस्मिन्' उक्तलक्षणे प्रात्युपाकरणे' उत्सर्गापरपर्याये कमरिण सम्पन्ने ततः प्रभृति 'श्रा पुनरुपाकरणात् भाद्रपदीयहस्तनाम नक्षत्रयुक्तकालं यावत् छन्दमः सामवेदीय छन्दो ग्रन्थमात्रस्य 'अभ्रानध्यायः अन्ननिमित्तकोवश्यमाणलक्षणोऽन- ध्यायोभवति, अत्र चानध्यायकाले अधोतानामपि छन्द्रोग्रन्थानामभ्यासं विचारा- दिकञ्च वर्जनीयम् ॥ १७ ॥ उक्ताभ्रानध्यायमेव स्फुटयतिः- भापा-यों 'प्रत्युपाकरण कर्म, सम्पन्न होने तक पुनः उपाकग्गा न होने तक, इन कई एक महीने नया पाठ तो होगा नहीं अधिकन्तु मेघ निमित्तक अनध्याय भी होगा,इस अनध्यायमें पुगतन पाठका अभ्यास या विचारादि भी त्याज्य है। किन्तु "आभ्रानध्याय" छन्दोग्रन्थ मात्रके लिये है ॥ १७ ॥ विद्युत्स्तनयित्लुषितेष्वाकालम् ॥ १८ ॥ विद्युत् गर्जनपूर्वदृश्यज्योतिः, स्तयित्नुर्मे धमाला, पृपितावृष्टिविन्दवः, एत- त्रितयमेकदैव दृश्येत चेत् तदा या कालम् यतकालिकी घटना, तत्पर दवसीय. तावत्कालं यावत् अनध्यायच्छन्दोऽध्ययनस्यति । अयमेवाभ्रानध्याय उच्यते । भाषा-बिजुली, मेघमाला, और वृष्टि देखने पर आ-काल अभ्रानध्याय होगा। अर्थात् अभ्रनिमित्तक ( मेघके कारण.) उपद्रव जिस समय उपस्थित हो, उसके पर दिन उसी समय तक छन्दो ग्रन्थकी चर्चा भी न करे ॥१८॥ उल्कापातभूमिचलनज्योतिषोरुपसर्गेषु निर्घाते च ॥२०॥ उल्कापाते, भूमिचलने, ज्योतिषोः सूर्यचन्द्रयोः उपसर्गे ग्रहणादौ च श्रा काल- मेवानध्यायः सर्वेषामेव ग्रन्थानाम् । 'च' अपि 'निर्घाते मेघोदये विमलाकाशे वा स्थिते वज्रपाते श्रा कालमेवानध्याय:२०अथ सार्वकालिकसाधारणानध्यायानाहा . - प्र० ३ खं०३ सू०१७-२९] अनध्यायाः १४३ भाषा-- उल्कापात,भूकम्प, सूर्य, चन्द्रग्रहणके पर दिवसीय उसी समय तक अनध्याय होगा यह अनध्याय सबही ग्रन्थोंका जानो । वज़ गिरने पर भी उसके पर दिनके उमी समय तक ग्रन्थों के अनध्याय होगा ॥२०॥ अष्टकामावास्यासु नाधीयीरन् ॥२१॥ पौर्णमासीषु च ॥२२॥ 'अष्टकामावास्यासु' लात्वेव वेदं वेदाङ्गानि च 'न अधीयीरन्' एष नित्या- नाध्यायः। २१ 'पौर्णमासीषु' 'च' 'न अधीयोरन् एषोऽपि नित्यान-यायः॥२२॥ भाषा-प्रति अमावास्या, प्रत्येक अष्टमीको सब प्रकार अनध्याय होगा। २१ प्रति पूर्णिमामें इसीप्रकार जबतक तिथि रहे अनध्याय होगा ॥ २२ ॥ तिसृषुकार्तिक्यां फालगुन्यामाषाढ्याचाहोरात्रम्।२३ 'कार्सिक्यों फालगुन्याम् आषाढ्याम्'-इत्येतासु 'तिसृषु' 'अहोरात्रम्' तदिन तद्रात्रिश्च नाधीयीरन्नित्येव । २३ अथ नैमित्तिकानध्याया उच्यन्ते;- भाषा-विशेषतः कार्तिकी, फाल्गुणी और आषाढ़ी पूर्णिमा को एक दिन एवं एक रात्रि सब प्रकार अनध्याय होगा ॥ २३ ॥ सब्रह्मचारिणि च प्रेते ॥२४॥ स्वे च भूमिपती ॥२॥ 'सब्रह्मचारिणि' सतीर्थे 'प्रेते' 'च' मृते अहोरात्रम् नाधीयीरन् ॥२॥ 'च' अपि 'स्वे' भूमिपतौ भूस्वामिनि प्रेते अहोरात्रम् नाधीयोरन् ॥ २५ ॥ भाषा-एक गुरुके शिष्य के मृत्यु होने पर भी एक दिन रात सब प्रकार अनध्याय होगा ॥२४॥ और भूस्वामी के मरने पर भी अनध्याय रहेगा ॥२५॥ त्रिरात्रमाचा!२६उपसन्ने स्वहोरात्रम्।२७।गीतवादि- त्ररुदितातिवातेषु तत्कालम्।२८शिष्टाचासेऽतोऽन्यत्र ।२६। 'श्राचार्य स्वे एव प्रेते 'त्रिरात्रम्' नाधीयोरन् ।२६। 'उपसन्ने' शिष्ये प्रेते 'तु' 'अहोरात्रम्' एव नाधीयोरन् ।२७। गीतं, वादित्रं, रुदितं, अत्तिवातो झन्झा, एषु सत्सु 'तत्कालम्' यावत् स्यात् तावदेव नाधीयोरन् ।२८। 'अतः' उक्तभ्य एभ्यः हेतुभ्यः 'अन्यत्र शिष्टाचारः' अप्येकोऽनध्यायहेतु; तथाहि शिष्टेऽपि कस्मिंश्चित् समागते नाधीयोरन् ।२९ गतमिदं वेदाध्धनप्रकरणम् । अथादभुतप्रकरणम् गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्--- woman भाषा-श्राचार्य के मृत्यु होने पर, तीन रात तक सबप्रकार अध्ययन. न करे और र अन्य प्राचार्य सेपढ़े ॥ २६॥ शिष्य के मरने पर एक दिन और एक रात अनध्याय होगा । उस दिन रात में उस मठ में किसी का पाठ न होगा ॥ २७ ॥ गीत, वाद्य, गेना, प्रान्धी उपस्थित होने पर जब तक उपद्रव शान्त न हो, सब प्रकार अनध्याय रहेगा ॥ २८ ॥ पूर्वोक्त निमित्तों के अति- रिक्त' विशेष प्रतिबन्धक होने पर और भी अनध्याय होंगे जैसे शिष्ट व्यक्ति मठ में श्रावे, तो उनके आदरार्थ अनध्याय होगा ॥२६॥ अद्भुते कुलपत्योः प्रायश्चित्तम् ॥३०॥ वशमध्य- मयोमणिके वा भिन्ने व्याहृतिभिर्जुहुयात् ॥ ३१ ॥ 'अद्भुते' कस्मंश्चिदपि उपस्थिते 'कुलपत्योः' यस्मिन् कुले समुपस्थित मद्भुतम् भवेत् तस्यैव स्वामिनो: दम्पत्योः 'प्रायश्चित्तं कर्तव्यम् भवेत् । ३० कीदृशेऽद्धत कीदृशं प्रायश्चित्तं कर्त्तव्यमित्याह ;-- वंशः स्थूणोपरिस्थः, मध्यमाश्च स्तम्भाः, एतयोः "भिन्न भिन्नयोः अनिमित्ततएव विदीर्णयोः सतोः 'वा' अथवा 'मसिके जलाधारहदभाण्डे भिन्ने अनिमित्तमेव स्फुटिते, एतदद्भुत दोषप्रशमनाय 'स्या हृतिभिः भूर्भुवःस्वरिति मन्त्रैः 'जुहुयात्' प्राज्यहवनं कुर्यात् ॥ ३१ ॥ भाषा-कोई अद्भुत् बात हो पड़े तो गृहस्वामी और उस की स्त्री प्रा- यश्चित्त करे ॥ ३० ॥ क्यार होने पर सो कहते हैं कि जिस वांस के ऊपर सम्पूर्ण घर का ठाठ हो वह, या घर के खम्भे सब हठात् फट जावे, या जल का घड़ा, वा मांट फूट जावे, तो व्याहृति मन्त्रों से आज्याहुति देवे ॥३१॥ दुःस्वप्नेष्वद्यनोदेवसवितरित्येतामृचं जपेत्३२अथापरम्३३ 'दुःस्वप्नेषु 'अद्यनोदेवसवितः (छ. श्रा० २, १, ५, (७)-'इति' एताम् 'ऋ' 'जपेत् । एतज्जपादेव एतदभुतदोषप्रशमनं भवेन्नाम । गतमिदमदभुत- प्रकरणम् । ३२ । 'अथ' अद्भुतप्रायश्चित्तविधानानन्तरम् 'अपरम्' अपि किचि. जैमित्ति कमस्ति तदु वक्तव्यम् ॥ ३३ ॥ भाषा-बुग स्वप्न देखने पर 'अद्यनोदेवसवितः' (छ० प्रा०२,१,५० ७) मन्त्र पढ़े ३२ और भी कुछ घटानाके अनुसार कर्तव्य कहा जाता है३३ - प्र.३ खं०३। सू०३१-३६] अदभुतविधिः॥ चित्ययूपोस्पर्शनकर्णक्रोशाक्षिवेपनेषु सूर्याभ्युदितः सूर्याभिनिम्लुप्त इन्द्रियश्च पापस्पर्श पुनामैत्विन्द्रियमि- त्ये ताभ्यमाज्याहुती जुहुयात् ।। ३४ ।। किन्तदित्याह;-'चित्ययूपः' बौद्धयूपः तस्य उपस्पर्शनम्, कर्णयोः स्वयोः को- शः शब्दः, अक्षणोः वेपनं कम्पनम् ; एषु निमित्तेषु:-किञ्च सुप्ते एव सूर्योभ्युदितः अपिवा सुप्ते एव सूर्योऽस्तं गतश्चेत;-इन्द्रियैः हस्तादिभिः पापवस्तूनां परबधू- रोजादीनां स्पर्शे "पुनर्मा मैत्विन्द्रियं पुनरायुः पुनर्भगः। पुनविण मैतु मा पुन- ब्राह्मण मैतु मा ॥ ३३ ॥ पुनर्मनः पुनरात्मा म आगात् पुनश्चक्षुः पुनः श्रोत्रं म आगात् । वैश्वानरो अदब्ध स्तनूपा अन्तस्तिष्ठतु मे मनोऽमृतस्य केतुः (स्वाहा) ॥ ३४ ॥ (म० ब्रा-१, ६, ३३-३४)-'इति' एताभ्याम् ऋग्भ्याम्' प्राज्या- हुती' आज्यास्याहुतिद्वयं 'जुहुयात् ॥ ३४ ॥ भाषा-दैवात् बौद्धरूप प्रकट होने, कान में किसी प्रकार के शब्द होने, आंखके स्फुरन होने, एवं सूर्योदय के पीछे जागने, या सूर्यास्त समय नींद आने, और भी हाथ आदि इन्द्रियों के द्वारा पराई स्त्री के स्तन आदि स्पर्श करने पर,"पुनर्मामैत्विन्द्रियम्” इत्यादि दो मन्त्रों से दो भाज्याहुति देवे ॥३४॥ आज्यलिप्ते वा समिधा । ३॥ जपेद्रा लघुषु ॥३६-३॥ 'वा' अथवा अनतिरिक्तनिमित्ते 'आज्यलिप्ते' समिधौ' समित्काष्ठद्वयमानं जुहुयात् । तथैव तत्पापप्रशमनं भवेन्नाम । ३५ 'वा' अथवा 'लघुषु' ततोऽप्यल्प- निमित्तेषु उक्तमृगद्वयं जपेदेव न तु समिदाहुतेरप्यपेक्षेति शम् ॥ ३६ ॥ इतिगोभिलगृह्यसूत्रेतृतीयप्रपाठकेतृतीयखण्डस्यव्याख्यानंसमाप्तम् ॥३,३॥ भाषा- यदि अतिरिक्त पाप स्पष्ट न हो जावे तो घी से लपेटी लकड़ी (दो) अग्नि में हवन करे ॥ ३५॥ बहुत छोटा दोष होने पर उक्त दोनों मन्त्र मन ही मन जप करे, परन्तु आहुति प्रदान न करे ॥ ३६ ॥ गोभिलगृह्यसूत्रके तृतीयअध्यायकेतृतीयखण्डका अनुवादपूराहुआ ॥३,३॥ - men १० गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - अथ स्नातकप्रकरणम् । कृतब्रह्मचर्योगार्हस्थानुप्रवेशायाचार्यानुमतः विधिवि- शेषेण स्नातः सन् पितृकुलं प्रतिगच्छति । एतदेव स्नातकव्रतमुच्यते । तदेवास्मिन् खण्डे यथाक्रमं विधत्ते,- ब्रह्मचारी वेमधीत्योपन्याहृत्य गुरुवेऽनुज्ञातो दारान कुर्वीतासगोत्रान् ॥ १, २, ३, ४ ॥ 'ब्रह्मचारी' आद्याश्रमीद्विजः 'वेदम्' वेदैकम् श्राद्यन्तम् । 'अधीत्य' गुरुमुखा. दनुश्रुत्य यथाशक्ति बुद्ध्वाच (१) 'उपनी' उपनीः उपनयनं तद्दक्षिणाप्युपचा- रादुपनीरित्युच्यते; ततो द्वितीयैकस्य सुपांसुरिति लुकि उपनीति; उपनयनदक्षि- णामिति यावत् 'गुरुवे' तस्मै वेदाध्यापकायाचार्याय 'श्राहृत्य' निवेद्य (२) ततस्तेनैव गुरुणा 'अनुज्ञातः' द्वितीयाश्रमग्रहणे लब्धानुज्ञः सन् ‘दारान्' पत्नी 'कुर्वीत' (३)। दारांश्च कीदृशान् कर्तव्यानित्याह;—'असगोत्रान्' समानगो. त्रातिरिक्तान् स्वगोत्रजभिन्नानिति यावत् (४)॥ ४ ॥ भाषा-ब्रह्मचारी एक वेद को आद्योपान्त अध्ययन कर, गुरु को उपन- यन की दक्षिणा दे, और उनकी आज्ञानुसार अपना विवाह स्थिर करे, जिस कन्यासे विवाह करे उसका और अपना एकही गोत्र न हो ॥ १, २, ३, ४ ॥ मातुरसपिएडा ।।अनग्निका तु श्रेष्ठा ।६।अथाप्लवनम् ७ तत्र दारकर्मणि 'मातुः असपिण्डा' मातृसमानपिण्डा कन्या न ग्राह्या ॥५॥ तत्र च 'तु' अपि 'अनग्निका' यस्याः कन्यायाः ऋतु भवत् , यावच्च नग्ना उल- गापि विचरितुं शक्नुयात् , सा नग्निका, तद्भिन्ना अनग्निका ऋतुमती प्राप्तयो. वना, सैव 'श्रेष्ठा' प्रशस्या; कन्याया ऋतौ सञ्जाते ह्येवाग्निभोग्यत्व मुपयुज्यते, तदैव च 'सोमो ददद गन्धर्वाय'-इति मन्त्रप्रयोगो युज्यते नान्यथेत्येव दारकर्मणि ऋतुमत्याः प्राशस्त्यम् । अतएवाह मनुरपि 'देवदत्तां पतिर्भार्या विन्दते नेच्छ- यात्मनः ९, ९५)-इति । तदेवं प्राप्तायां प्राप्तयौवनायाम् आसन्नयौवनापि नोद्वाह्येति फलितम् (६)। ६ 'अथ' दारकरणे गुर्वनुमतिप्राप्तयनन्तरम् 'श्राप्ल- वनम्' ब्रह्मचर्यव्रतसमातिसूचकं विधिविशेष विहितं स्नानम् उपदेश्याम इति शेषः॥७॥ भाषा-और वह कन्या ब्रह्मचारी की माता के पिता के सात पीढ़ी में प्र०३ खं० ४ सू०१-११] सातकविधिः॥ न हो ॥ ५ ॥ जिस कन्या का मासिक धर्म प्रकाश हो चुका हो, ऐसी प्राप्त 'यौवना' को 'अनग्निका' कहते हैं। अग्निका ही विवाहने योग्य होती है। विवाह के निमित्त गुरु की आज्ञा पाकर व्रत समाप्ति सूचक स्नान करे ॥७॥ उत्तरतः पुरस्तादाऽचार्यकुलस्य परिवृतम्भवति॥८॥ 'प्राचार्यकुलस्य' प्राचार्यकुलसम्बन्धिन्येव स्थाने 'उत्तरत- पुरस्तात् वा' उत्त- रस्यां पूर्वस्यां वा दिशि परिवृतं' सर्वतः प्रावृतं स्नानागारं 'भवति' भवेत् ॥४॥ भाषा-प्राचार्य परिवार सम्बन्धी स्थान की उत्तर, या पूर्व दिशा में अच्छे प्रकार आच्छादित एक स्नान घर ननावे ॥ ८ ॥ तत्र प्रागग्रेषु दर्भेषूदङ्ङाचार्य उपविशति । प्राग् ब्रह्मचार्युद्गग्रेषुदर्भेषु ॥ ६ ॥ १० ॥ 'तत्र' स्नानागारे 'श्राचार्य' 'प्रागग्रेषु दर्भेषु' 'उदङ्मुखः सन् 'उपविशति' उप- विशेत् । 'ब्रह्मचारी' 'उदगग्रेषु दर्भेषु"प्राक'प्राङ्मुखः सन् उपविशेदित्येव ॥९-१०॥ भाषा-स्नानागार' में पश्चिम की ओर जड़ और पूर्व की ओर शिर इस प्रकार डाले हुये कुशाओं पर प्राचार्य उत्तराभिमुख होकर बैठे एवं 'उत्त- राम रक्खे हुये कुशाओं पर ब्रह्मचारी पूर्वाभिमुख बैठे ॥ ६ ॥ १० ॥ सौंषधिषिफाण्टाभिरभिर्गन्धवतीभिः शीतोष्णा- भिराचार्योऽभिषिञ्चेत् ॥ ११ ॥ कुट्टितद्रव्याण्युष्णजले निक्षिप्प वस्त्रादिना पूतीकृवं तज्जलं फाण्टमुच्यते । सर्वौषधिविफाण्टाभिः' सौंषधिदव्यैस्तथाविधकृताभिः 'गन्धवतीभिः' सुगन्ध- द्रव्यमिश्रिताभिः 'शीतोष्णाभिः' शीतलजलमिश्रिताभिः कदुष्णाभिर्वा 'अद्भिः' 'श्राचार्यः' 'अभिषिञ्चत् ब्रह्मचारिणं प्रथममिति ॥ ११ ॥ भाषा-सुगन्ध, कच्चा पक्का मिला सौंषधि-फाण्ट जल से प्राचार्य प्रथम ब्रह्मचारी को अभिषिञ्चन करे ।। ११ ॥ * सब द्रव्यों को कूट कर गरम जल में छोड़ कपड़े से ढांक देवे ऐसे जल को 'फारद्ध' कहते हैं । कूड़, जटामान्ती, हरिद्रा, वच, शिलाजित, चन्दन, मुरामान्सी, लालचन्दन, कपूर, -भद्रमोथ इन का नाम सर्वोषधि है। ।

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्-- RAM .. स्वयमिव तु ॥ १२॥ मन्त्रवर्णो भवति ॥ १३ ॥ 'तु' अप्यर्थः। अनन्तरम्, 'इव' तद्वत् श्राचार्याभिषिञ्चनप्रकारेण 'स्वयम्' अपि ब्रह्मचारी आत्मानम् अभिषिञ्चदित्येव ॥ १२ ॥ अत्र स्वयमभिसिञ्चनकाले 'मन्त्रवर्णः' मन्त्रोच्चारण कर्त्तव्यं भवति' भवेत् ॥ १३॥ स्वयमभिषिञ्चनकाले श्रादौ तावत् पञ्चभिर्मन्त्रैः पञ्चाजल्युदकानां व्यवहारस्ततोऽवशिष्टानामेकदैव तू- रणीम् । तत्र चायमन द्वयाभ्यामुदकाञ्जलिद्वयं भूमौ क्षिप्त्वा तृतीयादिभिरुदका- अलिमिः शिरःप्रभृत्यङ्गानां सिञ्चनमभिमतम् । तदेव यथाक्रमं विधत्ते;- भाषा- तब ब्रह्मचारी स्वयं मंत्र से प्रापे को अभिषिश्चित करे ॥१२॥१३॥ [स्वयं अभिषिञ्चन होते समय पहिले पांच मन्त्रोंसे जलांजलिसे जल व्यवहार कर अन्त में बाकी जल एकही वाग्में मस्तक पर ढ़ार लेवे। उनमें प्रथम दो मन्त्रोंसे लिया शेष अञ्जलि जल भूमि पर डारकर तृतीय आदि तीनों मन्त्रोंसे मम्तक आदि सब शरीर सिंचन करे । ये अपस्वन्तरग्नयः प्रविष्टा इत्यपामञ्जलिमवसिञ्चति।१४॥ "ये अप्स्वन्तरमयः प्रविष्टा गोह्य उपगोह्योमरुको मनोहाः। खलो विरुजस्तनू. इषिरिन्द्रियहा अतितान्त्सृजामि” ॥ १॥ (म० ब्रा० १, .)-'इति' अनेनः मन्त्रेण 'अपामञ्जलिम्' 'अवसिञ्चति' त्यजति भूमाविति ॥ १४ ॥ भाषा-"ये इत्या द” मन्त्र से एक अञ्जलि जल पृथ्वी पर गिरावे ॥१४॥ यदपां घोरं यदपाङ् क्रूरं यदपामशान्तमिति च । १५॥ ततः, "यदपां घोर यदपां क्रूरं यदपामशान्तमति तत्सृजामि" ॥२॥ (म० ब्रा० १, ७,२)-'इति' अनेन 'च' अपि अवसिञ्चत्येव ॥ १५ ॥ .. भाषा-पश्चात् 'यदपां घोर' से एक अञ्जलि जल भूमि पर डाले ॥१५॥ यो रोचनस्तमिह गृह्णामीत्यात्मानमभिषिञ्चति॥१६॥ 'ततः "यो रोचनस्तमिह गृह्णामि तेनाहं मामभिषिञ्चामि" ॥३॥ (म०ब्रा०१,७,३)- इति' अनेन मन्त्रेण 'आत्मानं शिरःप्रभृतिकम् 'अभिषिञ्चति' स एव ब्रह्मचारी १६ भाषा- 'यो इत्यादि मन्त्रसे एक अजलि जल से मस्तका दसिञ्चित करे। ७ -- प्र०३ खं० ४ सू० १२-२३] स्नातकविधिः॥ यशसेतेजसइतिचायेनस्त्रियमकृष्णुतमितिचीतूष्णीश्चतुर्धम् १६ ततः “यशसे तेजसे ब्रह्मवर्चसाय बलायेन्द्रियाय वीर्यायान्नाधाय रायस्पोषाय अपचित्यै" ॥ ४ ॥ (म० ब्रा० १, ७, ४)-'इति' अनेन 'च' अपि प्रात्मानम- भिषिञ्चेत् । १७ ततः येन स्त्रियमकृणुतं येनापामृषतसुराम् । येनाक्षानभ्यपिञ्च येनेमां पृथिवीं महीम् । यद्वान्तरश्विना यशस्तेन मामभिषिञ्चतम्" ॥५॥ (म० बा. १, ७, ५)-'इति' अनेन 'च' श्रात्मानमभिषिञ्चेत् ॥ १० ॥ ततोऽवशिष्टान्यु- दकान्येकदैवगृहीत्वा 'तूष्णीं' मन्त्रशून्यम् आत्मानमभिषिञ्चेत् । तदिदं चतुर्थम् १९ भाषा-तब "यश से तेज से" मन्त्र से एक अजलि जल से मस्तकादि सिञ्चित करे ॥ अन्त में "येन स्त्रिय” से तृतीय जलाञ्जलि से पुनः मस्तकादि सिञ्चित करे ।। शेष जल को विना मन्त्र माथे पर ढार देवे ॥ १७-१६ ॥ उपोत्थायादित्यमुपतिष्ठेतोद्यभ्राजभृष्टिभिरित्येत- त्प्रभृतिना मन्त्रेण ॥ २० ॥ 'ततश्चोपोत्थाय' स्नानासनादुत्थानं प्रकृत्य "उद्यन् भ्राजभृष्टिभिरिन्द्रो मरुद्ध- भिरस्थात् प्रातर्यावभिरस्थात् । दशसनिरसि दशसनि माकुर्वा त्वा विशाम्या मा. विश ॥ ६ ॥ उद्यन् भ्राज भृष्टिभिरिन्द्रो मरुदभिरस्थात् सान्तपनेभिरस्थात् । शत- सनिरसि शतसनिं कुर्वा त्वा विशाम्या माविश ॥ ७ ॥ उद्यन् भ्राजभृष्टिभिरिन्द्रो मरुदभिरस्थात् सायं यावभिरस्थात् । सहस्त्रसनिरसि सहस्त्रसनिं माकुळ त्वा विशास्या माविश" । ८ (म० ब्रा० १,७,६ वा ७ वा ८) 'इत्येतत् प्रवृतिना' एवम्प्रकारेण षष्ठाद्यन्यतमेन 'मन्त्रेण' 'श्रादित्यं सूर्यम् 'उपतिष्टेत श्राराधयेत् ।२० भाषा-और नहाने की जगह पर खड़े होकर "उद्यन् भ्राज भृष्टिभिः" (६, ७, ८) तीन मन्त्रों में से किसी एक से सूर्य की आराधना करे ॥२०॥ यथालिङ्ग वा विहरन् ॥ २१ ॥ 'वा' अयं शब्दोऽत्र व्यवस्थायाम् । 'यथालिङ्ग मन्त्रलिङ्गानुसारतएव व्यवस्था 'विहरन्' व्यवहरन् मन्त्रेण श्रादित्यमुपतिष्ठेतेत्येव । तथा च षष्ठे मन्त्र "माता- वभिरिति मन्त्रलिङ्गदर्शनात् प्रातस्तस्यैव प्रयोगः, सप्तमे पुनः सान्तपनेभिरिति गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्-- mp M "चक्षुरसि चक्षुष्व मन्त्रलिङ्गदर्शनात् मध्याह्ने तस्यैव प्रयोगः, अष्टमे तु सायंयावभिरिति मन्त्रलि, दर्शनात तस्यैव सायं प्रयोगः इति व्यवस्था" ॥ २१ ॥ भाषा-पूर्वोक्त ३ मन्त्रों में से जिसमें 'प्रातः' 'बड पटिन है. उसका प्रातःकालके उपस्थान.में, जिसमें मध्यान्ह 'सान्नपन' शब्द है उसको मध्यान्त्र उपस्थान में और 'सायं' जिसमें पढ़ा है उसको सायंकान्न उपस्थानमें पढ़े। चक्षुरसीत्यनुबध्नीयात् ॥ २२ ॥ मस्यवमे पाप्मानं जहि। सोमस्त्वा राजावतु नमस्तेऽस्तु मामा हिउंसी:” ॥ ९॥ ( म० प्रा० १, ७, ९)-'इति इमं मन्त्रम् 'अनु' पश्चात् कालत्रये एव मन्त्रत्रयस्य 'वनीयात् बन्धनं कुर्यात् । उद्यन् भ्राजभृष्टिभि- रित्येतदनरं सर्वत्रैव पाठ्यमित्यर्थः ॥ २२ ॥ भाषा-'चक्षुरसि' मन्त्र को प्रातःकालादि समय पढ़ने योग्य (उदान भ्राजभृष्टिभिः आदि) मन्त्रोंके बाद इन मन्त्रों के साथ-यह मन्त्र सदैव पढे २२ मेखलामवमुञ्चत उदुत्तमं वरुणपाशमिति ॥ २३ ॥ तदनन्तरञ्च ब्रह्मचर्यकाले गृहीतां 'मेखला' 'अवमुचते' अधस्तान्मोचन कुर्वीत । तत्र मन्त्रः"उदुत्तयं वरुणपाशमस्मदवाधर्म विमध्यममाया प्रथादित्य व्रते वयन्तवानागसो अदितये स्याम" ॥ १०(म०ब्रा०,७,१०)- इति अयं बोभ्यः२३ भाषा-पश्चात् “उदुत्तमं वरुण पाशम्” मन्त्र पढ़ कर, ब्रह्मचर्य ग्रहया समय की पहनी हुई मेखला को नीचे छोड़ देवे ॥ २३ ॥ ब्राह्मणान् भोजयित्वा स्वयम्भुक्त्वा केशश्मश्रुरोम- नखानि वापयीत शिखावर्जम् ॥ २४॥ एवं स्नानं समाप्य मेखलात्यागानन्तरं स्नातकव्रतं समाप्तं मन्यमान आश्रमसन्धी स्थितः सः 'ब्राह्मणान्' कतिपयान् भोजयित्वा' ततः स्वयं भुक्त्वा च "शिखावर्ज" शिखाव्यतिरिक्तं 'केशश्मश्रुरोम' सर्व 'नखानि च 'वापयीत' नापितेनेति ॥२४॥ भाषा-यों स्नान कर मेखला त्यागने और स्नातक व्रत की समाप्त बाद अहस्थाश्रम में प्रवेश समय ब्रह्मचारी कई ब्राह्मणों को भोजन करावे एवं प्र० ३ खं०४ सू०२२-२८ ] स्नातकविधिः॥ पीछे आप भी भोजन करे । और र नापित से मूंछ,रोम,नख श्रादि बनवावे२४ स्नात्वाऽलङ्कृत्याहते वाससी परिधाय स्त्रजमाब- ध्नीत श्रीरसि मयि रमस्वेति ॥ २५ ॥ पूर्वोक्तवापनानन्तरं पुनः नायात्, स्नात्वा', 'अलङ्कृत्य' स्वदेहम्, 'अहते' अखण्डे 'वाससी' उपसंव्यानोत्तरीये 'परिधाय' "श्रीरसि मयि रमस्व" ॥११॥ (म० वा० १,७,११-('इति' अनेन मन्त्रेण 'स्रजम्' 'श्राबध्नीत' स्वमूर्नीतिशेषः ॥२५॥ भापा-उक्त प्रकार और कर्म कराने पश्चात् भूषणादि पहन, अखण्ड दोनों वस्त्र नीचे ऊपर (धोती अङ्गोच्छा) पहन कर "श्रीरसि मयि रमस्व" इस मन्त्रका पाठ करता हुआ अपने मस्तक में माला पहने ॥ २५ ॥ नेत्र्यौ स्थो नयतम्मामित्युपानही ।। २६ ॥ "नेत्र्यो स्थो नयतं माम्" ॥१२॥ (म० ब्रा० १, ७, १२),-'इति' मन्त्रेण 'उपानही' चर्मपादुके परिधायेत्येव ॥ २६ ॥ भाषा--पीछे 'नेत्र्योस्थ' मन्त्र पढ़कर जूता पहने ॥ २६ ॥ गन्धर्वोऽसीति वैणवन्दण्डगृह्णाति ॥ २७ ॥ 'गन्धर्वोऽस्युपाव उपमामव' ॥ १३ ॥ (म० ब्रा० १, ७, १३)-'इति' मन्त्रेण वैणवं' वेणुवंशभवं “दण्डं' 'गृह्णाति ॥ २७ ॥ भाषा-और 'गन्धर्वोऽसि' मन्त्रसे यथा नियम वांस की वनी यष्टि ग्रहगा करे ।। २७ ॥ श्राचार्य सपरिषत्कमभ्येत्याचार्यपरिषद्मीक्षते यक्षमिव चक्षुषः प्रियो वो भूयासमिति ।। २८ ।। * शरीर के किम २ भङ्ग में माला पहनने से माला की विशेष संशा क्या २ होती है सो कहते हैं जो मस्तक में धारण किया जावे उसे 'लक' एवं उसी को माला भी कहते हैं। केरा के भीतर पहनने से 'गर्भक' नाम होता है, शिखा में लटकने से 'प्रभ्रष्टक' कहते हैं, सम्मुख माग में ललाट पर जो भूलती हो उसे 'ललामक' कहते हैं। जो कण्ठ में पहिनी नावे उसे 'प्रालम्ब' 'इतेयकही 'उपवीत, वा प्राचीनीत्रीति की नाई काँख तक लटकती हो उसे 'वैकचिक' कहते हैं ।।

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गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्-
।
'सपरिषत्कं' शिष्यादिमण्डलिविराजितम् 'श्राचार्यम्' 'अभ्येत्य' "यक्षमिव
चक्षुषः प्पियो वो भूयासम्" ॥१४॥ (म० प्रा० १, ७, १४) 'इति' मन्त्र मुचरन
'प्राचार्यपरिषदं तम् 'ईक्षते' पश्येत ॥ २८ ॥ अथ यात्राप्रकारः ।
भाषा-तब शिष्यों से घिरे हुए आचार्य के पास बैठकर "यक्षमिव
भूयास' मन्त्रसे शिष्य युक्त आचार्य का दर्शन करे ॥ २८ ॥
उपोपविश्य मुख्यान् प्राणान् सम्मृशन्नोष्ठापिधाना
नकुलीति ॥ २६ ॥ अत्रैनमाचार्योऽहयेत् ॥ ३० ॥
'उपोपविश्य' अझैपवेशनं प्रकृत्य 'मुख्यान्' मुखागतान् 'प्राणान् वायन्
'सम्मृशन्, पवित्रीकुर्वन्, “ोष्ठापिधाना नकुली दन्तपरिमितः पविः । जिह मा
विह्वलो वाचं चारुमाघेह वादय" ॥ (म०वा०१,७,१५) 'इति' मन्त्रं पठेदिति । अत्र'
अस्मिन्नेव समये 'प्राचार्यः 'एन' स्नातकम् 'अर्हयेत्' श्राशिपेति भावः ।२९-३०॥
भाषा-अझैपवेशन कर अपने मुखमें आये हुए श्वास वायुका अनुभव
करते हुए "ओष्ठापिधाना नकुली' मन्त्रको पढ़े ॥ २६ ॥ इस समय प्राचार्य
उस ब्रह्मचारी को आशीर्वाद देकर प्रसन्न करे ॥ ३०॥
गोयुक्त रथमुपसंक्रम्य पक्षसी कूवरबाट्ट वाऽभि-
मृशेखनस्पते बीड्वङ्गो हि भूया इति ॥ ३१ ॥
ततश्च 'गोयुक्तं गोभ्यां युक्तं रथ यानम् 'उपसङ्क्रम्य तत्समीपगमनेन प्राप्य,
तस्यैव रथस्य 'पक्षसी' चक्रौ 'वा' अथवा 'कूवरबाहू युगन्धरपावें । "वनस्पने
चीड्वङ्गोहि भूया अस्मत्सखा प्रतरणः सुवीरः। गोभिः सन्नद्धोप्रसि वीडयस्व प्रा-
स्थाता ते जयतु जेत्वानि" ॥ (म०ब्रा०१,७,२) 'इति' मन्त्रेण अभिमृशेत्' स्पृशेत्।
भाषा इस प्रकार यात्राके लिये जिस रथमें सवार होना हो, उसके चक्र
याँ जूना छकर 'वनस्पते बीड्वङ्गोहि' मन्त्रको पढ़े ॥ ३१ ॥
भास्थाता ते जयतु जैत्वानीत्यातिष्ठति ॥ ३२ ॥
तथा पर्शनम् कृत्वा "आस्थाता ते जयतु जेत्वानि'' (म० प्रा० १,१७)
इति मन्त्रं पटन तदुपरि 'पा' प्राभिमुख्येन विति' भारोहतीत्यर्थः ॥ ३९ ॥

प्र०२खं० ४ सू० २९-३४ ] सातकविधिः ॥ भाषा-उसके बाद "आस्थाता ते” मन्त्र पढ़कर, रथके ऊपर चढ़े ॥३२॥ प्राङ्वोदङ्वाभिप्रयाय प्रदक्षिणमावृत्योपयाति ॥ ३३ ॥ 'प्राङ्' पूर्वाभिमुखस्तत्रोपविष्टा 'वा' अथवा 'उदङ्' उत्तराभिमुखएवोपविष्टा 'अभिप्रयाय' सर्वतश्वालयित्वा तद्रयमिति शेषः । प्रदक्षिणं यथा स्यात् तथा 'श्रावृत्य' श्रावर्तनेन गत्वा स्ववासमिति ॥३३॥ भाषा-इस रथपर पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख वैठकर रथ चलावे अपनी वास भूमिको दक्षिण में रखकर आवर्तन करते हुए वहां बैठे ॥ ३३ ॥ उपयाताया_मिति कोहलीयाः॥ ३४ ॥ 'उपयाताय' स्वावासप्रासाय तस्मै स्नातकाय 'श्रयम्' देयं पुरजनैरात्मजनैर्वा 'इति' एवं 'कौहलोयाः श्राहुः । तत्राप्यस्माक नासम्मति रिति भावः ॥ ३४ ॥ इति गोभिलगृह्यसूत्रे तृतीय प्रपाठके चतुर्थखण्डस्य व्याख्यानं समाप्तम् ॥ ३,४ ॥ भाषा-बहुत दिन तक गुरु गृहमें वास पूर्वक कृत ब्रह्मचर्य, अधीतवेद, स्नातक को घर में आनेपर परिवार के लोग आदर के साथ ग्रहण करें ॥३४॥ गोभिलगृह्यसूत्रके तृतीय अध्यायके चतुर्थखण्डका अनुवाद पूरा हुआ॥३,४॥ अत ऊर्ध्व वृद्धशीली स्यादिति समस्तोद्देशः ॥ १ ॥ 'अतः' ब्रह्मचर्यात् 'जय' परस्तात् अकृतोद्वाहोऽपि पुरुषः वृद्धशीलीस्यात्' वृद्धानां मात्रादीनां शुश्रूषापर श्राज्ञानुवर्ती च भवेत् । अथवा वृद्धः पक्कबुद्धिः तत्स्वभावको भवेत् । 'इति' एतन्मात्रेणैव 'समस्तोद्देशः' समग्राणामेव धर्मा- साम् उपदेश. सिद्धो भवेदिति ॥१॥ भाषा-ब्रह्मचर्य समाप्त करने पर विवाह के पहिले आश्रम सन्धि समय तक गृहधर्म करना चाहिये । उससे पिता माता प्रभृति वृद्ध जनोंकी सेवामें परायण एवं सुपक्व बुद्धि होवे । यह सब उपदेशों का मूल है ॥ १ ॥ तत्रैतान्याचार्याः परिसचक्षते ॥ २॥ 'सत्र' ब्रह्मचर्योत्तरकाले प्राश्रमसन्धाविति यावत्, 'प्राचार्याः' गोभिलादयः गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम् --- 'एतानि' बुद्धिस्थानि अनुपदं वक्ष्यमाणानि परिसञ्चक्षते' परिसंख्यानानि कुर्वन्ति। परिसंख्यानञ्च निषेधविशेषम् , निषिद्धादन्यत्र विधानमित्येव तस्य विशेषत्वान् ॥२॥ भाषा-ब्रह्मचर्य से आये व्यक्तियों के लिये प्राचार्यों के उपदेश हैं जैसे-॥२॥ नाजातलोम्न्योपहासमिच्छेत् नायुग्वा न रजस्वलया न समाना ॥ ३-६ ॥ 'प्राजातलोस्न्या' रसानभिज्ञया वालिकया उपहासम्' अपि 'न 'इच्छेत् अपि । 'अयुग्वा' अयोग्यया अपि 'न' तथा ॥ 'रजस्वलया' अपि 'न' तथा 'समानयों समानः योग्यः ऋपिः पतिः यस्या अस्ति, तया सधवया अपि 'न तथा ॥३-६॥ भाषा-अन्तोमवाली कन्या तथा रससे अनभिज्ञा वालिका से उपहास न करे ॥ योंआयु रूप गुण प्रभृतिमें सर्वथा अयोग्या नारी के साथ भी उप- हास न करे ॥ रजस्वला पत्नीसे अलग रहे ॥ परस्त्रीके साथ मजाक न करे। नापरया द्वारा प्रपन्नमन्नं भुञ्जीत ॥ न द्विपकम् ॥ न पर्युषितम् ॥ अन्यत्र शाकमसयवपिष्टविकारेभ्यः ।७-१०॥ 'अपरया' गुप्तया द्वारा 'प्रपन्नम्' प्राप्तम् 'अन्नम्' 'न भुञ्जीत' ॥७॥ 'द्विप- कम्' पक्वं पुनःपकम् अन्नं 'न' भुञ्जीतेत्येव।८। 'पर्युषितम्" श्रनम् 'न' भुखात ।। तत्रास्ति विशेषः-शाकमांसयवानां पिष्टविकाराभ्याम् अन्यत्र पूर्वोक्तो निधी ज्ञेयः तथा च शाकादिविकृतपिष्टकमिष्टानादौ पर्युपितत्वं न दोपायति ॥१०॥ भाषा-अन्य किसी गुप्त रीतिसे प्राप्त अन्न भोजन न करे 1150 दोवारका पका अन्न भोजन न करे ॥८॥वासी भात भी न खावे ॥६॥ कन्द, मन्न फलादि से तैयार किया हुआ मांसकी नाई यव आदि अन्नसे समुत्पन्न जलेवी आदि या अन्य किसी प्रकारका खाद्य मिष्टान्नादि वासी खावे ॥१०॥ नवर्षतिधावेत्नोपानहोस्वयहरेत्नोदपानमवेक्षेत् ।११-१३॥ 'वर्षति' पर्जन्ये 'न' धावेत् ॥ 'उपानहीं' स्वस्यापि 'स्वयं' 'नाहरंत' हस्तेनेति निर्माणप्रज्ञया वा ॥'उदपानम्' कूपं 'न'अवेक्षेत्' तथावेक्षणे तत्र पतनसम्मवाता३ भाषा-पानी वसते समय या वर्सने पर कीचड़ भरे मार्गमें दौड़ कर प्र.३ खं० ५ सू०३-२२] समावृत्तविधिः ॥ IWANLaw न चले ॥११॥ अपना जूता स्वय हाथमें लेकर न चले और न स्वयं अपना जूता बनावे ॥ १२॥ बहुत गहरे कूप आदि में एक टक से न देखे ॥ १३ ॥ न फलानि स्वयं प्रचिन्वीत ॥ नागन्धाजं धारयेत् ।। अन्या७हिरण्यस्त्रजः ॥ नामालोक्ताम् ॥१४-१७॥ 'फलानि' आम्रपनसादोनि स्वयं' 'न प्रचिन्वीत' वृक्षशाखादिभ्य इति यावत् ॥१४॥ 'अगन्धां' गन्धशून्यां 'ख' माला 'न धारयेत्' मस्तके इति यावत् ॥१५॥ तत्राप्ययं विशेषः-'हिरण्यत्रजः' सुवर्णमालातः अन्यां' न धारयेत् स्वर्णमालाभ- रणन्तु धारयेदित्येव ॥ १६ ॥ गृहस्थाश्रमतः प्राक् श्रामालोक्तां माला व्यतिरिक्ता प्रालम्बादिकां 'न' धारयेत् ॥१७॥ भाषा--आम आदि कोई फल स्वयं पेड़ोंसे तोड़कर न जमा करे ॥१४॥ माथेपर विना गन्धकी माला न धारण करे ।। १५ ॥ किन्तु सोने की माला धारण करे ॥१६।। माला शब्दसे जिस मालेका व्यवहार हो, उसीको धारण करे, गृहाश्रमके पहिले आश्रम सन्धिमें प्रालम्ब आदि का व्यवहार न करे १७ स्रगिति वाचयेत् ॥ भद्र मित्येतां वृथावाचंपरिहरेत् । भद्र मिति ब्रूयात् ॥ तत्रैते त्रयः स्नातका भवन्ति १६-२१ स्रग्लक्षणं शिरोवेष्टमिकां माला तु धारयेदेव । १८ 'भद्रम्'--'इति' वृथा वाचं' अभद्रेऽपि भद्रोक्तिं 'परिहरेत्' न प्रयुञ्जीत । १९ ‘भद्रम्'-इति' 'यात्' सत्य मेव तद् भद्रं चेत् । २० अथ स्नातक विभागान् दर्शयति,-'तत्र' समावर्ति- नेषु स्रातकाः' कृतवह्मचर्यव्रतान्तस्नानाः 'त्रयः' त्रिविधाः भवन्ति' ॥ २१ ॥ तत्रिविधत्वमेवे स्फुटयति- भाषा-जिस का नाम स्रक है, उसी को धारण करे ॥ १८ ॥ जो वस्तु अच्छी न हो, उसे अच्छी है ऐसा न कहे ॥ १६ ॥ इस प्रकार, जो वस्तुतः अच्छी हो उसे ही अच्छी कहै ॥२०॥ समावर्तित द्विज तीन प्रकार के होते हैं २१ विद्यास्नातको व्रतस्नातको विद्यावतस्नातक इति ॥२२॥ 'विद्यास्नातक: विद्याप्रहणनियमपालनमन्तरेणापि बेदविद्या समप्रामवाप्यैव गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- प्रगृह्यद्र अपूर्णेऽपि काले स्नातः 'व्रतस्नातकः' विद्याग्रहणनियमान् प्रतिपाल्यापि समनवे- दविद्याग्रहणे न कृतकृत्योऽपि च पूर्णे काले स्नातः 'विद्यावतस्नातकः' विद्या समयां व्रतं च यथावत् प्रतिपाल्य,यथाकालं स्नातः, 'इति' इमे त्रयःस्नातकाः ॥२२॥ भाषा-प्रथम, विद्यात्नातक अर्थात् जितने नियमों का ब्रह्मचर्य में प्रति- पालन करना पड़ताहै, उतने नियमों का पालन न कर सकने पर, एवं जितने काल तक ब्रह्मचर्य कर्तव्य हैं, उतने काल तक न करके वेदाध्ययन समाप्त कर ब्रह्मचर्य समाप्ति सूचक स्नानकारी होता है । द्वितीय, व्रतस्नातक अर्थात् जितने समय तक ब्रह्मचर्यकर्त्तव्य हो, एवं जिसर नियम से कर्तव्य हो, उसर प्रकार वेदाध्ययन समाप्त न करके भी 'व्रतस्नातक' होता है । तृतीय-'विद्यावत- स्नातक' नियमसे यथोक्त काल तक ब्रह्मचर्य करके सम्पूर्ण वेदाध्यायीहोता है तेषामुत्तमः श्रेष्ठस्तुल्यौ पूर्वी नार्द्र परिधीत निकं परिधी तान मनुष्यस्य स्तुतिं प्रयुञ्जीत । नादृष्टंदृष्टतोब्रुवीत।।२३-२७ 'तेषां त्रिविधानां स्नातकानां मध्ये 'उत्तमः' तृतीयः विद्यावतस्नातकएव श्रेष्ट' 'पूर्वी विद्यास्नातक व्रतस्नातकौ उमावेव 'तुल्यौ' समानमर्यादौ ।। २३ ।। पुनरपि स्नातकव्रतान्याह,-'श्राद्' वासः 'न' 'परिदधीत' ॥ २४ ॥ 'एक' वासः '' 'प- रिदधीत' एवञ्च अन्तर्वासः कौपीनखञ्जड व्यवहरेदेव । २५ मनुष्यस्य स्तुति" न प्रयुञ्जीत चाटुवादं परित्यजेदिति । २६ 'अदृष्टं' किमपि कर्म 'दृष्टतः' परदृष्टहेतुना स्वयं दृष्टमिव सूचयन् मन्वानो वा 'श्रुवीतः ॥ २७ ॥ भाषा-उक्त ३ स्नातकों में से 'विद्यावतस्नातक' ही सब से अच्छा है, अन्य दो समान हैं ॥ २३ ॥ भीगा कपड़ा, ॥ २४ ॥ केवल एक ही वस्त्र, न (भीतर काच्छा, या कौपीन) पहने ॥ २५ ॥ मनुष्य की झूठी प्रशंसा व करे ॥ २६ ॥ जिसे अपनी आंखों न देखे, उसे अपनी आंख देखा न कहे ॥ नाश्रुतश्रुततः ॥ २८ ॥ स्वाध्यायविरोधिनोऽर्थानु- त्सृजेत् ॥ २६ ॥ तैलपात्रमिवात्मानं दिधारयिषेत्॥३०॥ अश्रुतं किमपि वाक्य, श्रुततः परश्रुतहेतुना स्वयं श्रुतमिव सूचयन मन्बानो प्र० ३ खं०५ सू० २३-२८] समावृत्तधिधिः ॥ -rammemorn- वा न ब्रुवीत । २८ 'स्वाध्यायविरोधिनः अर्थान्' स्वाध्यायः पञ्चधा उपपद्यते, स्त्री- कारात् विचारात अभ्यसनात जपात् छात्रेभ्योदानाच्च तदेषामन्यतमस्यापि विरो- धिनो येऽर्था विषयाः तान् 'उत्सृजेत्' परित्यजेत् । २९ 'तैलपात्रं तैलैः पूर्ण पात्रं पर्णद्रोण्यादिकम् 'इव' श्रात्मानं' जीवात्मानं 'दिधारयिषेत्' देहे धारयितुमिच्छेत् । तैलपूर्णपात्रहस्तः कश्चिद् यथा पथि अतीव सावधानो गच्छति, अन्यथा वेगगमनेन वक्रगमनेन मनसोऽप्रणिधानेन च पात्रस्थतैलानामुच्छलनं सपात्रानां भूमौ पतनं ततश्च पुनरापादनासम्भवः, भूम्याः कथञ्चिदापादितेष्वपि तेषु मालिन्यादिकं परि- माणाल्पत्वञ्चानिवार्य भवेत् । तथैव देहस्थमिमात्मान मतियत्नेनैव देहे रक्षित. मिच्छेत् चिरं देहे रक्षणं त्वसम्भवमेव, परिमिच्छेत् तादृशेच्छेया च किञ्चित्काल. मपि रक्षितुं सार्थो भवेत् किञ्च यावत् कालं रक्षितः स्यात् तावदपेक्षाकृतोऽक्ले- शोऽपि स्यात, अन्यथा यावत् स्थेयं तावत्कालमपि न तिष्ठेकिञ्चिस्थतोऽप्यपेक्षा. कृत: क्लेशीभवेन्नामेति ॥ २८॥ भाषा-जिसे अपने कानों से न सुना हो, उसे अपने कान से सुना है ऐसा न कहे ॥ २८॥ पांच प्रकार के ( स्वीकार, विचार, अभ्यास, जप,. और छात्रों को देना) स्वाध्यायों में से किसी में बाधा न हो, ऐसा वतै । अर्थात् ऐसा कार्य न करे जिससे स्वाध्याय को बाधा पहुंचे ॥ २६ ॥ मार्ग में चलता पुरुष जिस प्रकार तेल से भरा, तेल का वर्तन अपने हाथ में रक्ख कर, उस के गिरने के डर से बहुत सावधानी से चलता है; नहीं तो अनव- धानता से शीघ्रता, या टेढी चाल चलने से, तेल पृथिवी पर गिरकर नष्ट हो जावे, यदि भूमि पर से गिग तेल उठा लेवे, तो भी उसकी मलीनता एवं न्यूनता अनिवार्य है। इसी प्रकार इस शरीर में आत्मा की भी सावधानी से रक्षा करे, नहीं तो अकाल ही में, यह शरीर च्युत या दुःखीहो जावेगा। यद्यपि यह, एक शरीर में चिरस्थायी और दुःख रहित नहीं रह सकता, तथापि यत्न करने पर अपेक्षाकृत स्थायी और अपेक्षाकृत सुखी हो सकता है ॥ ३०॥ नवृक्षमारोहेत्। नप्रतिसायंग्रामान्तरंव्रजेत्। नैकः ॥३१-३३॥ 'वृक्ष 'न आरोहेत् । तदारोहणेन ततः पतनमनु मरणमनहानि वा भवे-

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम् --
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-
नाम । ३१ 'प्रतिसायं ग्रामान्तरं' 'न ब्रजेत् । तादृशवजनेन गुप्तप्रणयादिकं तथा-
च ततएव प्राणहानि रपि सम्भवति । ३२ 'एकः' एकाकी एव ग्रामान्तरं 'न'
ब्रजेत् तथा च ग्रामान्तरगतोविपन्नश्चेत् यः सहायो भवेत् अथवा यथास्थानं संवा-
दपि नयेदेवं कश्चनापरो द्वितीयः सहगोऽत वावश्यकः ॥ ३३ ॥
भाषा-पेड़ पर न चढ़े (क्योंकि इससे गिर कर मर जाये, चोट लगने
आदि की शङ्का है)॥३१॥ प्रतिदिन सन्ध्या के पीछे दूसरे गांव में भ्रम
णार्थ न जावे (इससे गुप्त प्रणय आदि दोष होनेका डरहै) ।३२। अकेला दूसरे
गांव में न जावे (एकाकी विपन्न होने पर, सहायकारी, या संवाद दाता का
प्रभाव होताहै। इसलिये ग्रामान्तर जातेसमय एकसाथी सदा सङ्ग रक्खे)३३
न वृषलैः सह। न कामृत्या ग्रामं प्रविशेत् । न चाननुचरश्च-
रेत्। एतानि समावृत्तव्रतानि।यानि च शिष्टा विद्ध्युः॥३४.३८
'वृपलैः' दुर्नीतिकैः 'सह' 'न व्रजेत्' । तथाच 'संसर्गजा दोषगुणा भवन्ति।
३४ 'कासृत्या' कुपथेन 'ग्रामं न प्रविशेत्' अपितु प्रसिद्धेन पथा दूरतरेणापि प्रवि-
शेत् तथाच निर्भयगमनं भवेत् । ३५ 'च' अपि 'अननुचरः' भृत्यशिष्यात्मीया-
न्यतमपरिचारकविहीनः 'न चरेत् प्रवासं न गच्छेत् । अतएवोक्तं 'भृत्याभावे भ-
वति मरणम्' । ३६ "एतानि' उक्तानि समावृत्तव्रता' समावृत्तानां स्नातकानां
कर्माणीति ॥ ३७ ॥ 'च' अपि 'यानि' उक्तान्यानि “शिष्टा:' गुर्वादयः विदयुः
तानि च कर्तव्यान्येवेति ॥ ३८॥
इति गोभिलगृह्यसूत्रे तृतीय प्रपाठके पञ्चमखण्डस्यव्याख्यानं समाप्तम् ३,५
भाषा-दुष्ट लोगों का संसर्ग न करे ( संसर्गसे दोष गुण उत्पन्न होते)
॥३४॥ प्रसिद्ध मार्ग रहने पर भी, जल्दी पहुंचने के विचारसे प्रसिद्ध मार्गको
छोड़ कुपथसे न जावे ॥३५॥ एवं प्रवास जाते समय नौकर छात्र, या किसी
एक अपने अनुचरको अवश्य सङ्गले लेवे ॥३६॥ ये सब कर्म स्नातकके लिये
कहेगये हैं ॥३७॥ और भी जो कुछ शिष्टगा स्नातकों के हितार्थ नियम कहें,
उन २ का प्रतिपालन अवश्य करे ॥३८॥ गोलिगृह्यसूत्रके तृतीयप्रपाठक के
पञ्चम खण्ड काअनुवाद पूरा हुआ ॥३५॥

प्र०३ खं० ५ सू०३४-४८१-३] समावृत्तविधिगोपालनविधिश्च ॥ . . गाः प्रकाल्यमाना अनुमन्त्रयतेमा मे विश्वतो वीर्य इति ॥ १ ॥ प्रत्यागता इमा मधुमतीमह्यमिति ॥ २॥ "प्रकाल्यमानाः" चरणभूमौ गमनार्थं गृहानिष्काश्यमाना गाः, "इमा मे विश्वतो वीर्यो भव इन्द्रश्च रक्षतम् । पूषस्त्वं पर्यावर्त्तयानष्टा श्रायन्तु नो गृ- हान्” ॥ ५ ॥ (म० ब्रा० १,८,१)-'इति' :अनेन मन्त्रेण 'अनुमन्त्रयेत' । १- 'प्रत्यागताः' चरणभूमितो गृहागता स्ता गाः "इमा मधुमती मह्य मनष्टाः पयसा सह । गाव भाज्यस्य मातर इहेमाः सन्तु भूयसीः" ॥२ (म० ब्रा० १, ८,२) 'इति' अनेन मन्त्रेण अनुमन्त्रयेतेत्येव ॥२॥ भाषा-चारण भूमि में चराने के लिये गौ श्रादि को घरसे बाहर ले जाते समय "इमामे विश्वतो वीर्यः' यह मन्त्र पढ़े॥१॥और जब गौ आदि चरकर घर आवें तो "इमा मधुमती मह्यम्" यह मन्त्र पढ़े ॥२॥ पुष्टिकामः प्रथमजातस्य वत्सस्य प्राङमातुः प्रलेहनाज्जि. हया ललाटमुल्लिह्य निगिरेद् गवा श्लेष्मासीति ॥३॥ 'पुष्टिकामः पुरुषः, 'प्रथमजातस्य वत्सस्य, मातुः प्रलेहनात् प्राक् एव तस्य 'ललाट जिह्वया' स्वकीयया 'उल्लिह्या आस्वाद्य लेहनेन मुखागतं श्लेष्माणं "ग- या श्लेष्मासि गावो मयि श्लिप्यन्तु” ॥ ३॥ (म० ब्रा० १, ८, ३)-'इति' इम मन्त्रं मनसा पठन्नेव निगिरेत्' गलाधः कुर्यात् । इत्येतत् पुष्टिकामस्य प्रथम कार्यम् (एतेन वत्समातुः स्नेहतोऽपि समधिकः स्नेहः प्रतिपालकस्यावश्यकस्त- थासत्येव यथाभिलषितपुष्टिर्भवतीति सूचितम्)॥ ३ ॥ भाषा--जो लोग, पुष्टि की कामना करें, वे गौ के वत्स, को जन्म के साथ ही, जबतक उसकी अपनी मा उसे चाटे, या न चाटे, पुरुष अपनी जिह्वा से, वत्सका ललाट चाटे ( अर्थात् मा के स्नेह से भी पालक का स्रह कुछ अधिक होना आवश्यक है)। इस प्रकार चाटते समय मुंह में पाया हुआ लारको “गवां श्लेष्मासि' मन्त्र मन ही मन पढ़कर निगल जावे ॥३॥ पुष्टिकाम एव संप्रजातामु निशायां गोष्ठेऽग्निमुपस- N १६० गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्---- -~. माधाय विलयनं जुहुयात् संग्रहण संगृहाणेति ॥ ४॥ 'पुष्टिकाम एवं' पुरुषः, 'निशायां' रात्रौ 'सम्प्रजातासु प्रसूतासु गोपु; 'गोष्टे' तत्रैव गोस्थाने, 'अग्निम्' 'उपसमाधाय, सम्यक् प्रज्वाल्य, तत्र, "संग्रहण संगृहा- ण ये जाताः पशवो मम । पृषैषा शर्म यच्छतु यथा जीवन्तो अप्ययात्" ॥४॥ (म० ब्रा० १, ३, ४)-'इति' एतेन मन्त्रेण 'विलयन' अर्द्धमथितं दधि 'जुहु- यात्' सुवेणेति । (इत्येतत् पुष्टिकामस्य द्वितीयं कार्यम् । एतेन, गवां प्रसवक्ले- शरुज मपनीतं स्यात् )॥४॥ भाषा-जिन्हें पुष्टि की इच्छा हो, वे रात में गौ के बच्चा जनने पर, घर में अच्छे प्रकार आग जला कर "संग्रहण संगृहण” यह मन्त्र पढ़ते हुए "विलयन" (आधा महा हुआ दधि) होम करे ॥ ४ ॥ पुष्टिकामएवसंजातास्वादुम्बरेणासिना वत्समिथनयोर्लक्षणं करोति पुसएवाग्रेऽथ स्त्रिया भुवनमसिसाहस्रमिति॥५॥ 'पुष्टिकामएव' पुरुषः, 'सम्प्रजातासु प्रसूतासु गोषु, 'वत्समिथुनयो द्वयोई योर्वत्सयोः 'औदुम्बरेण' उदुम्बरकाष्टीयेन असिना, चिह्नकविशेषेण 'लक्षण चिह्नम् उभयोः समरूपमेव 'करोति' कुर्यात् । तत्र, 'पुंसः एव' चिह्नम् 'अने' कर्त्तव्यम्, 'अथ' तदनन्तरं च 'स्त्रियाः' । अत्र चिन्हकरणे मन्त्री "भुवनमसि साहसमि- न्द्राय त्वा समोऽददात् अक्षतमरिष्टमिलान्दम् ॥५॥ गो पोषणमसि गोपोषस्येशिषे गोपोषाय त्वा । सहस्र पोषणमसि सहस्रपोषस्येशिषे सहस्रपोषाय त्वा ॥६॥ (म० ब्रा० १,८, ५, ६)-'इति इमौ ॥ ५॥ भाषा-जो लोग पुष्टि की इच्छा करें, वे गूलर की लकड़ी की बनी लाल तरवार से नवोत्पन्न प्रति बच्चे के दोनों कानों को इस प्रकार चिन्ह कर देखें कि ( यदि जोड़ो उत्पन्न हो तो) प्रथम बाच्छे को, फिर वच्छिया को। दोनों कानमें चिन्ह करते समय, "भुवनमसि साहस्राः" ये मन्त्र पढ़े ॥५॥ कृत्वा चानुमन्त्रयेत लोहितेन स्वधितिनेति ॥ ६ ॥ कृित्वा इन, 'च तक लोहितेन स्वधितिना मिथुनं कर्णयोः कृतम्' । - प्र० ३ खं०६ सू०४-१०] गोपालनविधिः ॥ , ( यावतीनां) भूयसीनां व एषमो लक्षणमकारिषम् । (भूयसीनां ) भूयसीनां व उत्तरामुत्तरासमां क्रियासम्" ॥७॥ (म० प्रा० १, ८, ७)-'इति' अनेन मन्त्रेण 'अनुमन्त्रयेत' ताम् वत्सानिति शेषः। अत्र च मन्त्रे 'लोहितेन -इति पदलिङ्गात् स चौदुंबरोऽसिः लोहितः स्यादिति गम्यते, लोहितत्वञ्च तस्य ज्वल- नेन सिन्दूरादिना वा भवितव्यम् । तथा च दाहने सिन्दूरादिरञ्जितेन वा वत्सयु- ग्माः चिन्हिताः स्यः किञ्चात्रैव 'कर्णयोः' इति पददर्शनात् तेरो कणेष्वेव चि. न्हानि कर्त्तव्यानीति च गम्यते । ( एतेन ) चरणभूम्यादौ वहुस्वामिक वत्साना- मेकत्र चरणेऽपि विभ्रमः सुपरिहार्यः, किञ्चैकविधचिन्हेन द्वयोर्द्वयोः कर्णाङ्किता- विति एकेऽपहृते तदन्वेषणं सुकरं भवेदित्येतत् पुष्टिकामस्य तृतीयं कार्यम् ॥ ६ ॥ भाषा-उक्त प्रकार चिन्ह करने पर, "लोहितेन स्वधितिना' मन्त्र पढ़े (एक २ जोड़ा वत्स का एक २ प्रकार चिन्ह रहने से एक बच्चा भुलाने पर उसके मिलने का सुभीता होगा,)॥६॥ तन्त्रीप्रसार्यमाणांबद्धवत्साञ्चानुमन्त्रयेतेयंतन्त्रीगवांमातेति 'प्रसायमाणा' शुष्कीभवनाय बद्धवत्साञ्च' गो दोहनादौ 'तन्त्री बत्मबन्धनरज्जु "इयं तन्त्री गवां माता सवत्सानां निवेशनी। सा नः पयस्वती दुहा उत्तरामुत्तरा समाम्" ॥ ८ (म० ब्रा०१,८,०)-'इति' अनेन मन्त्रेण 'अनुमन्त्रयेत' ॥ ७ ॥ भाषा-इय० मन्त्र पढ़ कर वत्स वान्धने की रस्सी को सुखावे ॥७॥ तत्रैतान्यहरहः कृत्यानि भवन्ति ॥८॥ निष्कालन- प्रवेशने तन्त्रीविहरणमिति॥६।।गोयज्ञे पायसश्चत॥१०॥ 'तत्र' गोपोषणे 'एतानि''अहरहः कृत्यानि' प्रतिदिनं कर्तव्यानि भवन्ति' भवेयुः । ८ 'निष्कालन प्रवेशने' प्रथमद्वितीयसूत्रोक्ते 'तन्त्रीविहरण' सप्तमसूत्रो- कम् अपि 'इति' इमानि त्रीणि। ६ अथ पुष्टिकामेन गोयज्ञः कायः तत्र द्रव्य- देवते विधत्ते; "गोयज्ञेपायसः पयसा सिद्धः 'चरुः' पक्तव्यः ॥१०॥ भाषा-गौ पोषण करने में प्रति दिन, ये नियम करना चाहिये ॥८॥ प्रथम, गो आदिक को चारण भूमि में चरने देना, २ तीय, चर कर पाने -

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गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्-
पर उनको यत्न से ग्रहण करना और तृतीय, गौओं से विशेष बच्चों की सेवा
करनी ॥३॥ गो-यज्ञ के निमित्त दृध में का पका चरु आवश्यक है ॥२०॥
अग्निं यजेत पूषणमिन्द्रमीश्वरम् । ऋषभपूजा।गोयज्ञेनैवा-
श्वयज्ञो व्याख्यातः। यमवरुणो देवतानामन्त्राधिको ११-१४
'अग्नि' 'पूषणम्' 'इन्द्रम्' 'ईश्वरम्'-इमान् चतुरो देवान् 'यजेत' अर्चयेत्।
११ 'ऋपभस्य' वृषभस्य पूजा अपि कार्या। १२ गोयज्ञन' उन्नानेन 'ए'
'अश्वयज्ञः' व्याख्यातः विशेषेणोपदिष्टः। तथा च अश्वयज्ञेऽपि पायवरुद्धव्यम् ;
अग्नाद्या एव देवता: । अपभपूजास्थानेऽश्वपूजनम् । १३ 'अत्र' अश्वयज्ञ देव-
तानाम्' मध्ये 'यमवरुणौ' इमौ देवौ 'अधिकौ' पूज्याविति ॥ १४ ॥
भाषा-और अग्नि, पूषा, इन्द्र और ईश्वर, ये चार नाम वाले देव विशेष
अर्चनीय हैं । ( जिन मन्त्रोंके ये देवता हैं उन मन्त्रों से ) ११ ऋषभ पूजा
भी गोयज्ञ का प्रधान अङ्ग है ।। १२ ॥ गोयज्ञ और अश्वयज्ञ दोनों ही एक
प्रकारसे होंगे (इससे अश्वयज्ञमें भी दुग्धसिद्ध चरु श्रावश्यक है और अग्नि
प्रभृति उक्त चार देवता भी विशेष अर्चनीय हैं) १३। गो-यक्षसे,अश्व-यामें
विशेषता यह है कि अश्व यज्ञमें 'यम' एवं वरुण देवताको पूजा होती है ॥१४॥
गन्धरभ्युक्षणं गवां गन्धैरभ्युक्षणं गवाम् ।१५।। ६॥
'गन्धैः' धूपादिभिः 'गवाम्' 'अभ्युक्षणं' प्रहर्पणं कार्यमिति शेषः। वीप्सा-
याञ्च द्विवचनम् , तेन प्रतिदिनमेव सायंप्रातः सायमेव वा गोगृहे अग्नि प्रज्वाल्य
तत्र गुग्गुलादिगन्धद्रव्यक्षेपणेन च तद्गृहं धूपायितं कार्यम् । एतेन मशकादी-
नामुपद्रवो यारितः स्यात्, गृहदोषश्च विद्वरितो भवेदिति ॥ १५ ॥
इति गोभिलगृह्यसूत्रे तृतीयप्रपाठके षष्टखण्डस्य व्याख्यानंसमाप्तम् ॥ ३, ६ ॥
भाषा-गौ-शाला में प्रतिदिन सायं प्रातः काल, अन्ततः सायंकाल भी
आग जलाकर उसमें धूना, गुग्गुल प्रभृति से धूप देकर, घरको साफ रखे।
गोभिलगृह्यसूत्रके तृतीयप्रपाठकके छठेखण्डका अनुवाद पूरा हुआ ॥ ३६॥
अथातः श्रवणाकर्म।१पौर्णमास्यां कृत्यम् ।२ पुरस्ता
छाखाया उपलिप्य शालाग्नेरग्निं प्रणयन्ति ॥३॥

प्र०३ खं०७ ७ सू०१-८] श्रवणाकर्म ॥ Vvvv.ru -ummmm 'श्रथ' अधिकारार्थः । 'श्रतः' ऊर्ध्वं 'श्रवणाकर्म' अधिकृतं वेदितव्यम् ।। तच्च श्रवणाकर्म 'पौर्णमास्यां' तिथौ 'कृत्यं करणीयं भवति प्रारब्धव्यमिति । श्रवणाकर्मेति महासंज्ञाकरणसामर्थ्यादन्वथतः श्रवणानक्षत्रयुक्तायामेव पौर्णमास्या- मिति । २ 'शालायाः' अग्न्यागारस्य 'पुरस्तात्' पुरोभागे 'उपलिय गोमयेत्यादिना, 'शालाग्नेः' अग्न्यागारस्थिताग्नितएव 'अग्नि' गृहीत्वा प्रणयन्ति' यथाविधि प्रज्वालयन्ति प्रज्वालयेयुः गृहस्था अविशेषेणेति ॥ ३ ॥ भाषा-अब श्रवणा कर्म का प्रारम्भ जानो ॥ १॥ यह कम प्राविणी पूर्णिमा से प्रारम्भ करे ॥२॥ जिस घर में नित्य अग्निहोत्र का अग्निस्था- पित हो उसी के पुरो भाग में गौ के गोबर से लीप कर अग्निहोत्र से अग्नि लेकर पृथक् यथा विधि अग्नि प्रज्वलित करे ॥३॥ अभितश्चत्वार्युपलिम्पन्ति । ४ प्रतिदिशम् ५। साधिके प्रक्रमे । ६। अग्नौ कपालमाधाय सकृत्संगृहीतं यवमुष्टिं भृज्जत्यनुपदहन् ॥ ७ ॥ 'अभितः तस्याभिनवस्याग्नेः, "चत्वारि स्थानानि 'उपलिम्पन्ति' गोमयेत्या- दिनैव । ४ 'प्रतिदिशं दिशं दिशं प्रति 'साधिके प्रक्रमे अन्यून प्रक्रमपरिमित- स्थाने तल्लिम्पनं कर्त्तव्यम् । 'त्रिपदः प्रक्रमः स्मृतः । ५,६ । 'अनौं' तत्र 'कपालं' घटार्द्धप्रायं भाजनम् 'श्राधाय' स्थाप्य, तस्मिन्नेवोत्तप्ते भ्राष्ट्रे 'सकृत्सङ्ग्रहोतं एक- दैव सगृहीतं मुष्टिमितं यवान्नम् 'अनुपदहन्' दग्धं यथा न भवेत् तथा कृत्वा 'भृजति' भर्जयेत् ॥ ७ ॥ भाषा-उस नये स्थापित अग्नि की चारो ओर चार स्थान भी गोबर से लीपे ॥४॥ प्रत्येक दिशा में कम से कम तीन पग स्थान लीपे ॥ ५, ६ उस नये अग्नि पर एक खपरी (घड़े का श्रद्धा ) रक्ख उस में एक मुट्ठी यव एकवार डाल कर उसे ऐसा भूने जिस में यव भस्म न हो जावे ॥ ७ ॥ पश्चादग्नेरुलूखलं दृहयित्वाऽवहन्त्युद्धेचम् ॥८॥ 'अग्नेः' तस्य ‘पश्चात्' भागे 'उलूखलं' 'वृंहयित्वा दृढं स्थापयित्वा तत्र उद्वेच, तुष मुक्तं यथा स्यात्तथा कृत्वा 'अवहन्ति मुष्टिमितान् तान् भृष्टयवान्, मुखलेनेति। ।

गांभिल गृह्यसूत्रटीकायाम् - . भाषा-उस अग्नि के पीछे दृढ़ता से उनूखल रकब, उम में उक्त भूने यव आदि को साफ करने के लिये रख कर मृसन से छांट देवे ॥८॥ सुकृतान्सक्तन् कृत्वा चमस ओप्य शूर्पणापिधाय नि- दधाति ।। ६ ।। दक्षिणपश्चिमे अन्तरेण सञ्चरः ।। १० ।। एवञ्च 'सुकृतान्' निस्तुपीकृतान् सक्तून् भृष्टयवचन 'कृत्वा' 'चमम पानपात्रविशेषे 'अोप्य' संस्थाप्य 'शूर्पण' अपिधाय च 'निदधाति अास्थानं रक्ष- ति ॥२॥ व दिशि रक्षेत् ! इत्याशङ्कामपनोदितुमार;-दक्षिणपश्चिमें' है दिशी 'अन्तरेण मध्ये 'सञ्चरः' गमनागमनमार्गः । तदेतत्सवानिरिक्तप्रदेशेषु यत्र कुत्र वा रक्षेदित्यभिप्रायः ॥१०॥ भाषा–यों भूने यव आदि की भूसी निकान और चूर्गा कर सुन्दर मत्त प्रस्तुत कर उसे चमसे में रग्ब कर, सूप से ढांक कर यन से रक्ख ह। नैऋ - त्यकोगा में जाने आने का गस्ता छोड़ कर, जहां चाहे वहां सत्तु को रवन्न १. अस्तमिते चमसदाचादाय शूर्पञ्चातिप्रणीतस्याद ब्रजति । ११ । शूर्पसक्तनावपति चमसे चोदकमादत्ते ।१२। 'अस्तमिते' सवितरि 'चमस-दव्यौ शूर्पे च' 'प्रादाय' गृहीत्या 'अतिप्री- तस्य' अतिरिक्तरूपेण स्थापितम्य, नित्याग्नितः पृथक् कृत्वा द्वितीयता स्थापितस्य 'अभिनवस्य, तस्यैवानेः 'अर्द्ध' समीपं 'व्रजति' होमामिति । ११ । चमसे रक्षि- तान् तान् ‘सत्तून्' 'शू' श्रावपति 'च' अपि शृन्ये तत्र चमसे 'उदकम्' 'श्रादत्त गृह्णीयात् ।।२। भाषा-सूर्यास्त होने पर, चमस, दीं, सूप, लेकर नित्य स्थायी अग्नि से भिन्न नये अग्नि के पास होम करने के लिये जावे ॥ ११ ॥ पहिले चमसे में रकवा सत्त आदि सूप में डाल कर, उस चमसे में जल ग्रहगा कर ॥१२॥ सकृत् संगृहीतान् दा सक्तून् कृत्वा पूर्व उपलिप्त उद्कं निनीय, बलिं निर्वपति यःमाच्यां दिशि सर्पराज एष ते वलि रिति १३ उपनिनयत्यपाशेष यथा बलिं न प्रवक्ष्यतीतिर४ में प्र०३खं०७ सू०९-१६] श्रवणाकर्म ॥ ततः 'दा' तया 'सक्तून्' 'सकृत्' एकवारं 'संगृहीतान् कृत्वा, गृहीत्वा, किञ्च 'पूर्वे' पूर्वस्यां दिशि 'उपलिप्तें गोमयादिलिप्तस्थाने 'उदकं' चमसाद गृहीतं 'निनीय' निषिच्य, तदुपरि “यः प्राच्यां दिशि सर्पराज एष ते बलिः" : (म०ब्रा० २,१,१)-इति' अनेन मन्त्रेण 'बलि' भागं निवपति संस्थापयति १३ 'अपां शेष' तञ्चमसपात्रस्थमवशिष्टं जलं 'उपनिनयति, उपनिनयेत स्थापितबलेपरि किञ्चित क्षिपेत् । तथा कृत्वा क्षिपेत् 'यथा' च 'बलिं' तं बलिं 'न प्रवक्ष्यति' न प्रवत् १४ भाषा-फिर उस दर्वी से एक ही बार में पूग सत्तू उठाले और पूर्वदिशा में गोबर से लीपे हुए स्थान में चमस पात्र में रक्खा जल सींचकर उसके ऊपर यथा क्रम से "प्राच्या" मन्त्र से बलिभाग रक्खे १३ चमस पात्र के बचेजन को बलि पर छोटे। जल को ऐसे छीटे जिसमें ये बलि आदि बह न जावे १४ सव्यं बाहुमन्वावृत्त्य चमसावभ्युक्ष्य प्रताप्यैवं दक्षिणैवं प्रतीच्येवमुदीची यथालिङ्गमव्यावर्त्तमानः। शूर्पण शेषमग्नावाप्यानतिप्रणीतस्यार्द्ध व्रजति ॥१५॥१६॥ ततश्च 'अव्या वर्तमानः तत्रैकत्रवस्थितो 'सव्यं बाहुम् 'अन्वावृत्त्य वामभागा- वर्तनक्रमेण 'एवं' यथोक्तन सकृत् संगृहीतादिप्रकारेण 'दक्षिणा' दक्षिणस्यां दिशि देया बलिः 'यथालिङ्ग' मन्त्रलिङ्गमनतिक्रम्य मन्त्रलिङ्गानुसारतएव मन्त्रं “यो द- क्षिणम्यां दिशि सर्पराज पुष ते बलिः ॥२ यः प्रतिच्यां दिशि सपराज एष ते बलिः ॥३ यः उदीच्या दिशि सपंराज एष ते बलिः" ॥४ (मं०ब्रा०२,१, २-४) पठित्वा हर्तव्येति ।। एवं प्रतीची' बलिः हर्तव्या। 'एवम् उदीची' बलिः च हर्त्तव्या । ततश्च 'चमसदव्यौं' 'अभ्युक्ष्य' जलधौते प्रकृत्य 'प्रताप्य' तस्मिन्नेवालो, 'शेष' अवशिष्ट- सत्तुभागम् 'अग्नौ तस्मिन्नेव 'श्रोप्य' प्रक्षिप्य 'अनतिप्रणीतस्य चिरस्थायिनएव तस्य, यतो गृहीत्वा एषोऽतिप्रणीतः तस्य 'अर्द्ध' समीपं 'ब्रजति' ब्रजेत् ।१५,१६॥ भाषा-उसी एक स्थान में रहते हुए थोड़ा वाई ओर हटकर, इसी प्रकार दक्षिण ओर एक बलि पश्चिम भोर एक और उत्तर ओर भी एक बलि, रक्खे और उस २ बलि देते समय अर्थानुसार यथा वत् ३ मन्त्रों का व्यवहार करे। पीछे चारो ओर चार बलि प्रदान करे और उसके ऊपर बचा जल छिड़के। , ..

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- wwe- ..." पीछे खाली चमस और दर्वी जन में धोकर उसी अग्नि के ऊपर सुखाकर और अवशिष्ट मत्तू आदि उसी अग्नि में डालकर जिस अग्नि से कुछ आग लेकर यह अग्नि प्रस्तुत हुअा है, उसी चिरस्थाची अग्निके निकट जाये १५ पश्चादग्ने भूमौ न्यञ्चौ पाणी प्रतिष्ठाप्य नमः पृथिव्या- इत्येतं मन्त्रं जपति ॥ १७ ।। प्रदोषे पायसश्चरूः ॥ १८ ।। 'अग्नेः चिरस्थापितस्य अनतिप्रणीतस्य तस्य पश्चात्' भूमौ 'न्यचौ' अधो- मुखौ 'पाणी' हस्तौ 'प्रतिष्टाप्य' "नमः पृथिव्यै दयाय विश्वभृन्मा ते अन्ते रिषाम ॥ सहतं माविवधी विहतं मा निसंवधीः" ॥५॥ (म०मा०२,१,३) 'इति एतं मन्त्रं जपति॥१७॥ ततः प्रदोपे' रात्रिप्रथमयामे 'पायसः चरुः' पत्तव्यः ॥१८॥ भाषा-उस अनति प्रगीत चिरस्थापित अग्नि के पृष्ठ भाग में दोनों हाथ नीचे कर "नमः पृथिव्यै” मन्त्र को पढ़े ॥ १७ ॥ तब गत्रि के पहिले अध पहरे में पायस चरु पकावे ॥ १८ ॥ तस्य जुहुयात् ; श्रवणाय विष्णवेऽग्नये प्रजापतये विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहेति ।। १६ ॥ 'तस्य चरो; एकैकं भागं गृहीत्वा 'श्रवणाय स्वाहा' 'इति' इत्येवं पञ्चभि- मन्त्रैः 'जुहुयात्' पञ्चहोमान् कुर्यादिति ॥ १९ ॥ भाषा-उस चरु में से एक २ भाग लेकर 'श्रवणाय स्वाहा' प्रभृति पांच मन्त्रों से पांच आहुति देवे ॥ १६ ॥ स्थालीपाकावृताऽन्यत्। उत्सरतोऽग्नेदर्भस्तम्बसमूल प्रति- ष्ठाप्य सोमोराजेत्येतंमंत्रजपतियासंधासमधत्तेतिच२१ 'अन्यत्' कर्मशेष 'स्थाली पाकावृता' स्थालीपाकरीत्या कत्तव्येति शेषः १२० 'अग्नेः' तस्यैव उत्तरतः' 'समूलं दर्भस्तम्ब 'प्रतिष्ठाप्य' "सोमो राजा सोमस्तम्बो राजा सोमो स्माक राजा सोमस्य वयस्मः॥ अहिजम्मन मसि सौमस्तम्ब सौमस्तम्ब महिजम्भन मसि" ॥६॥ (म ब्रा० २,१,१) इति 'एतं 'मन्त्र' 'च अपि “या सन्धा७ समधा यूय सप्तऋषिभिः सह । ता समात्यकामिष्ट प्र० ३ खं० ७ सू.१७-२३ ] श्रावणकर्म॥ नमो वो अस्तु मानो हिसिष्ट" ॥७॥ (म०ब्रा०२,१,५) इति' मन्त्रं 'जपति २०-२१ भाषा-अपर शेप कर्म सब स्थाली, पाकयज्ञ जिस प्रकार सिद्ध करना होता उसी प्रणालि से करे २० उस अग्निके उत्तर भाग में मूल के साथ कुश पुञ्ज स्थापन कर 'सोमो गजा' यह मन्त्र और 'यासन्धा, मन्त्र पढ़े २१ श्वस्ततोऽक्षतसक्तून कारयित्वा नवे पात्रेऽपिधाय निद्धाति। अहरहस्तूष्णींबलीनहरेत्सायंप्राग्योमादाग्रहायण्याः।२२-२३ 'ततः तदनन्तरं 'श्वः' परदिने 'अक्षतसक्तून्' यवसक्तून् कारयित्वा' पुत्रपुरो- हितादिना 'नवे पात्रे 'अपिधाय' श्राच्छाद्य 'निदधाति' स्थापयति । तैरेव सक्तुभिः प्रहरहः' प्रतिदिनं 'सायं होमात्' सायङ्कालीनहोमतः पुरस्तादेव 'तूष्णीम्' अम- न्त्रकमेव 'बलीन् हरेत्' । 'श्रा श्राग्रहायण्याः' अग्रहायणमासीयपौर्णमासी यावत् पौर्णमासीतः प्राग्दिनपर्यन्तमिति । समाप्तं श्रवणाकर्म ॥ २२-२३ ॥ इति गोभिलगृह्यसूत्रे तृतीय प्रपाठके सप्तम खण्डस्य व्याख्यानं समाप्तम् ॥३-७॥ भाषा-उस के दूसरे दिन अपने पुत्र, या पुरोहित आदि द्वारा यव का सत्तू तय्यार कराकर नये पात्र में ढाक कर रक्खे और इसी से प्रतिदिन होम के पहिले पूर्ववत् बलिभाग यथा स्थान में प्रदान करे। अग्रहण महीने की पूर्णिमा के पूर्वदिन तक इसी प्रकार करे ॥ २२, २३ ॥ गोभिलगृह्यसूत्र के तृतीय प्रपाठक के सप्तम खण्ड का अनुवाद पूरा हुआ ॥३,७॥ आश्वयुज्यां पौर्णमास्यां पृषातके पायसश्चरूरौद्रः ॥१॥ 'श्राश्वयुज्यां पौर्णमास्यां अाश्विनपूर्णिमायां 'पृषातके श्राज्यमिश्रिते,पयसि सम्पा. दिते (इति भावतोलब्धः) 'रौद्र रुद्रदेवताक: 'पायसः चरु पक्तव्यः इति शेषः ॥१॥ भाषा-आश्विन मास की पूर्णिमा को, पृषातक अर्थात् घी मिला दूध तय्यार कर रुद्र देवता की तुष्टि के लिये पायस चरु पाक करे ॥१॥ * भाज इसी "श्रवणाकर्म" के बदले स्रावन की पूर्णिमा को सलोनो 'राखी' वा 'रक्षाब- न्धन' ब्राह्मण लोग अपने २ मजमानों को "येन बद्धो बली राजा दानेवेन्द्रो महाबलस्तेन त्वां प्रतिवध्नामि रक्ष माचल माचल" इस श्लोक को पढ़ राखी-रङ्गीन धागा बान्ध कर दक्षिणा पाते हैं। * इसी के बदले “कोजागरी कृत्य" अर्थात् कौनागर पौर्णमासी को लक्ष्मी पूजा हुआ करती है गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- wwwwbadev तस्य जुहुयादा नो मित्रावरुणेति प्रथमां मानस्तोक इति द्वितीयाम् ॥ २॥ 'तस्य' चरोः एकैकमंशं गृहीत्वा 'आनोमित्रावरुणा" (छ० श्रा०३,१,३,७) 'इति' 'प्रथमाम्' आहुति किञ्च "मानस्तोके तनये मा न श्रायो मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः । वीरान्मा नो रुद्र भामिनो बधी हविष्मन्तः सदामित्वा हवा- महे" ॥८॥ (म० ब्रा ०२, १,८) 'इति' 'द्वतीयाम्' 'पाहुति 'जुहुयान ॥ २ ॥ भाषा-उक्त चरु का एक २ भाग लेकर "आनो मित्रा वरुणा" (द्र० श्रा०४, २, ३, ७) मन्त्र से प्रथम और "मान स्तोक ननये” मन्त्र में दूसरी आहुति देवे ॥२॥ गोनामभिश्च पृथक् काम्यासीत्येतत्प्रभृतिभिः ॥ ३ ॥ स्थालीपाकावृताऽन्यत् ॥ ४ ॥ 'च' अपि 'काम्यासि इत्येतत् प्रभृतिभिः' यजुर्वेद प्रसिद्वैः (म०वे००८,४३) 'गोनामभिः' एकादशभिः 'पृथक्' नामशः एकादशाहुती जुहुयानाम्यैव घरोरंशं गृहीत्वेति। अन्यत्' सर्व 'स्थालीपाकावृता' स्थालीपाकरीत्या एव कत्तव्यमितिा३-४। भाषा-'काम्यासि आदि यजुर्वेद के प्रसिद्ध ११ (२०६० सं०८,४३) गौ के नामों का उच्चारण करे, इस चरु के भाग को लेकर भिन्न २ * ग्यारह आहुति देवे ॥३॥ और अन्यान्य सब कार्य स्थालीपाक की नाई कर ॥४॥ पृषातकं प्रदक्षिणमग्निं पर्याणीय ब्राह्मणानवेक्षयि- त्वास्वयमवेक्षेत तच्चतुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् । पश्ये- म शरदः शतं जीवेम शरदः शतमिति ॥ ५ ॥ ततः 'अग्नि प्रदक्षिणं' यथा स्यात् तथा पृषातकम्। श्राज्य मिश्रितं पयः 'पर्याणीय' स्वसमीर्ष गृहीत्वा तच्च 'ब्राह्मणान्'तत्रागतान् 'अवेक्षयित्वा दर्शयित्वा तञ्चक्षुर्देवहितम्'-'इति' इमं मन्त्रं पठन् 'स्वयम् अवेक्षेत ॥ ५ ॥ भाषा-उसके अनन्तर अग्नि की प्रदक्षिणा कगकर उस पृषातक को अ- * इला रम्भा, हव्या, काम्या, चन्द्रा, जयोता, अदिति, सरस्वती, मही, विति. अन्या. युर यसदोक्त गौ के नाम हैं। Sameer प्र०२ख०८ सू०२-१ -२] सातकविधिः ॥ पने निकटस्थ लेकर स्थानीय ब्राह्मणों को देखावे एवं तच्चक्षुर्देवहितं, इत्यादि मन्त्र पढ़ २ कर उसमें अपना मुख देखे ॥ ५॥ ब्राह्मणान् भोजयित्वा स्वयं भुक्त्वा जातुषान्मणीन् सर्वौषधिमिश्रानाबध्नीरन् स्वस्त्ययनार्थम् ॥ ६॥ 'ब्राह्मणान्' निमन्त्रितान् 'भोजयित्वा' भोजनदानेन तर्पयित्वा ततः 'स्वयं भुक्त्वा' 'सौषधिमिश्रान्' ब्रीहिशालिमुद्गगोधूम-सर्षप-तिल--यव-मिश्रपोट्ट- लिसहितान् ‘जातुपान्' जातुपनामकीन् लाक्षाकृतान् 'मणीन्' 'स्वस्त्ययनार्थ" कल्याणाय 'अबध्नोरन्' स्वबाहादाविति ॥ ६ ॥ भाषा-इस प्रकार कम की समाप्ति में, निमन्त्रित ब्राह्मणादिको को भोजन करा कर, आप भी भोजन करे और १ ब्रोहि, २ धान्य, ३ मूंग ४ गेहूम, ५ सर्षप, ६ तिल, ७ यव, इन सात अनाज की पुटली बना इसके साथ जातुष नामक कई एक मणि के साथ बाहु पर, या दूसरे किसी कमर से ऊपर के 8 अंगो में बान्धे । इसले कल्याण की बृद्धि होती है ॥ ६ ॥ सायं गाः पृषातक प्राशयित्वा सहवत्सा वासयेत ॥७॥ स्वस्ति हासां भवति ॥८॥नवयज्ञे पायसश्चरुरैन्द्राग्नः ॥६॥ 'सायं' समुपस्थिते 'गाः' 'पृषातकं तत् 'प्राशयित्वा' पाययित्वा 'सहवत्याः' वत्सैः सहिताः ताः 'वासयेत' तां रात्रिमिति । एतेन कम्मणा 'प्रास्ता' गवां 'स्व- स्ति' 'सुखं' भवति' । 'नवयज्ञे' नृतनशस्यनिमित्तोत्साहादिप्रकाशनाय परमदेवा- * आज इसी के बदले ब्राह्मण गण जई, ( जयन्ती ) बान्धा करते हैं । यद्यपि ये लोग उक्त सात ७ अनाज से रक्षा बन्धन नहीं करते, किन्तु आश्विन मास के शुक्लपक्ष की नवमी की रात्रि में काली के पूजार्थ जो कलश रक्खा जाता, उस वेदी में जो यव बोया रहता है, उसको जन्मने पर दशमी के दिन ब्राह्मण लोग कलशे में से उखाड़ कर अपने २ यजमानी को श्लोक- ( जयन्ती मङ्गला काली, भद्रकाली कपालिनी दुर्गे क्षमा क्षमा यात्रा, भद्रकालो नमोस्तु ते ) पढ़ कर उनकी शिखा में जयन्ती बान्धकर दक्षिणा पाते है। ** जिसका रंग माणिक्य की नाई, लाह सदृश होता है उसी को जतु कहते । द्रमामय भी इसी का नामान्तर है । जतु खएढ़ को जातुष कहते हैं। ,

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम् -
अञ्चनं कर्तव्यं भवति, तत्र । 'पायसः पयसा दुग्धेन सम्पादितः 'चरुः' पक्तव्यः ।
स च चरु. 'ऐन्द्रामः' इन्द्राग्निदेवताको भवेदिति नवयज्ञद्रव्यदेवतानिदेशः १७-९६
भाषा-सायंकाल में, जब गौय चर कर बाहर से वापस आवं, उनको
पृषातक पिलावे और रात्रि में बच्चों को अलग २ न बान्धकर, अपनी २
माके पास ही रक्खे । इससे गौ आदिक प्रसन्न रहेंगी ॥ ७, ८॥ नूतन शस्य
निमित्तक उत्साह आदि प्रकाशनार्थं परम देवतार्चन यज्ञ करना होता है।
नवान्नेष्टि में इन्द्राग्नी कहकर प्रसिद्ध दोनों देवता के नाम से आहुति दी
जावेगी और वह उसी नये शस्य के पायस चरुसे होगी ॥६॥
तस्य मुख्या हविराहुति हुस्वा चतसृभिराज्या-
हुतिभि रभिजुहोति शतायुधायेत्येतत्प्रभृतिभिः ॥१०॥
स्थाली पाकावृताऽन्यत् ॥ ११ ॥
'तस्य' नवयज्ञस्य 'मुख्याम् आहुति' इन्द्राग्निदेवताका 'हुत्त्वा' ततः परं
"शतायुधाय शतवीर्याय शतोतयेभिमातिपाहे । शतं यो नः शरदो अजीजादिन्द्रो
नेषदतिदुरितानि विश्वा यो। चत्वारः पथयो देवयाना अन्तराद्यावापृथिवी वियन्तिः ।
तेषां यो अन्यानि मजीजिमावहास्तस्मै नो देवाः परिदत्तेह सर्वे ।१० ग्रीष्मो हेमन्त
उत नो वसन्तः शरद्वर्षाः सुवितन्नो अस्तु । तेषा मृतूनाशत शारदानां निवात
एपा मभये स्याम 1११॥इद्वत्सराय परिवत्सराय संवत्सराय कृणुता बृहनमः । तेषां
वय, सुमतौ यज्ञियानां ज्योगजीता अहताः स्याम'' ॥१२॥ (म०या०२,१,९,१२)
'इत्येतत्प्रभृतिभिः' 'चतसृभिः' मन्त्रैः 'श्राज्याहुतिभिः' अभिजुहोति' १० 'अन्यत्'
अवशिष्टकार्यजातं 'स्थालीपाकावृता' स्थालीपाकयज्ञरीत्या एव भवेशाम ॥1॥
भाषा-उस नूतन यज्ञ की मुख्य यह ऐन्द्राग्नि आहुति देने पर “शता-
युधाय” इत्यादि चार मन्त्रों से श्राज्याहुति द्वारा और भी चार होम करे
॥१०॥ अवशिष्ट कार्य सब स्थाली पाकयज्ञ के विधि अनुसार करे ।। ११ ।।
हविरुच्छिष्टशेष प्राशयेद् यावन्त उपेताः स्युः ॥ १२ ।।
'उच्छिष्टशेषम्' उत्सर्गीकृतस्य हविषः शेष 'हविः 'यावन्तः' दर्शकार परिजमा
निमन्त्रिताच 'उपेताः' तत्रागताः 'स्युः' तान् सर्वानेवाविशेषेख 'प्राशयेत् ॥१२॥

प्र०३ खं०८ सू०१०-२१] नवयज्ञः॥ भाषा-होम में की बची हुई शेप हवि, यज्ञ दर्शनार्थ आये परिजन, निमन्त्रण से आये हुए लोगों को यथा भाग खवावे ॥ १२ ।। सकृदपामुपस्तीर्य विश्वरोरवद्यति ॥१३॥ त्रिभृगूणाम्॥१४॥ 'चरोः' उपरि 'अपां' भागं 'सकृत्' एकवारम् 'उपस्तीर्य' प्रथमसिञ्चनं प्रकृत्य 'द्विः' द्विवारम् 'अवद्यति' तं चरु मेक्षणेनेति ॥ १३ ॥ 'भृगुगोत्रोत्पन्नानां 'त्रिः' त्रिवारमवदानं कर्त्तव्यमिति विशेपः ॥ १४ ॥ भाषा-होम से बचे हुए चरु के ऊपर एक वार जल छिड़क कर मेक्षण द्वाग, दो वार खण्ड २ करे अर्थात उस चरु को तीन भाग करे ।१३।। भृगु- गोत्र वाले उस चरु को चार भाग में वांटे, यही इसमें विशेषता है ॥१४॥ अपांचैवोपरिष्टात् ॥१॥ असईस्वादनिगिरेद्भद्रान्नः श्रेय इति ॥ १६ ॥ एवं त्रिः॥ १७ ॥ 'च' अपि 'उपरिष्टात् तस्यैवावदातस्य चरोः, 'अपां' प्रक्षेपः कर्तव्यः ।१५। एवं. कृत्वा ततः कियन्मानं तच्च "भद्रानःश्रेयः समनैष्टदेवास्त्वया वसेन समशीमहि त्वा । सनो मयोभूः पितेवाविशस्व शं तोकाय तन्वै स्योनः (स्वाहा)" ||३ (म० बा० २, १, १३) 'इति' इमं मन्त्रं पठित्वा 'असंस्वाद तच्चरोः प्रास्वादं सम्यक् गृहीतं न भवति यथा तथाकृत्यैव 'निगिरेत्' दन्तैश्चवर्णमकृत्वैव गलाधः कुर्या- दिति॥१६॥ एवं मन्त्रपाठपूर्वकमसंस्वादश्च 'त्रिः' त्रिवारम् निगरणं कर्तव्यम्॥१७॥ भाषा-उसी प्रकार कई भागों में वटे हुए चरु पर भी एक वार जल छिड़के ॥ २५ ॥ तत्र चरु में से कुछ लेकर "भद्रान्नः श्रेय" मन्त्र पढ़ कर स्वाद न लेकर तीन वार चरु भाग को निगल जावे ॥ १६-१७ ॥ तूष्णीं चतुर्थम् ॥ १८॥ भूय एवावदाय कामन्तत्र संस्वादयेरन् ॥१६॥ आचान्तोदकाः ॥२०॥ प्रत्यभिमशेर- न्मुखएं शिरोऽङ्गानीत्यनुलोमममो सीति ॥ २१ ॥ 'चतुर्थ' निगरणं 'तूष्णीम् 'श्रमन्त्रकमेवपरमत्राप्यसंस्वादमिति वर्त्तते 'भूयः' पुनरपि पूर्ववत् 'अवदाय' चरुच्छेदं प्रकृत्य 'तत्र तस्मिन् पक्षे 'काम' यथा स्यात् तथा.

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - 'संस्वादयेरन्' तं चरुभागमिति । ततः 'श्राचान्तोदकाः' भवेयुः उदकैः कृताचमनाः स्युरिति । ततश्च "श्रमोसि प्राण तदृतं ब्रवीम्यमाह्यसि सर्वमनुप्रविष्टः । स मे जराष्ट्र रोगमपमृज्य शरीरादपाम एधि मा मृथा न इन्द्र (स्वाहा) १४(म०बार, ०१,१४) 'इति' इमं मन्त्रं पठन्नेव मुखं 'ललाटादि चिवुकपर्यन्तं 'शिरः' ब्रह्मरन्ध्रम् 'अङ्गानि' कर्णमूलादीनि पादाग्रान्तानि प्रत्यभिमशेरन्' उदकैः सिञ्चरन्निति ॥ १८ - २१॥ भाषा-~चौथी वार में मन्त्र न पढ़े स्वाद ग्रहण न करे ।। १८ ॥ फिर उसी प्रकार मेक्षण द्वाग चरु को टुकड़ा २ कर भक्षण करे, एवं इच्छा हो, तो स्वाद भी ले सकता है ।१६। अनन्तर, जलसे आचमन करे जलसे आचमन करे मुख हाथ पैर धोवे ।२०। और "अमोसि प्राण" मन्त्र पढ़ ललाटसे डाढी तक और ब्रह्मरन्ध्र प्रदेश एवं कान की जड़ से पैर तक अच्छे प्रकार धोवे ।। २१ ।। एतयैवावृता श्यामाकयवानामग्निः प्राश्नातु प्रथम इति श्यामा- कानामेतमुत्यं मधुना संयुतं यवमितियवानाम् २२-२४।३,८ 'एतया एव प्रावृता' अनया नवव्रीहियज्ञोक्तरीत्या एवं श्यामाकयवानाम् अपि नवानां यज्ञः कार्यः। विशेषस्तु ;-'श्यामाकानां श्यामाकसम्बन्धिनि यज्ञे "अग्निः पश्चात् प्रथमः स हि वेद यथा हविः शिवा । अस्मभ्य मोषधीः कृणोतु विश्वचर्षणिः” (स्वाहा) १५ (म० ब्रा० २, १, १५) इति' एप मन्त्रोध्यवहार्यः किञ्च 'यवाना' यवसम्बन्धिनि यज्ञे "एतमुत्यं मधुना संयुतं य व सरस्वत्या अधि- वनाव चकृधि । इन्द्र आसीत्लीरपतिशतक्रतुः कीनाशा अासन्मरुतः सुदानवः' (स्वाहा) (म० ब्रा० २,१,१६)-'इति' एप मन्त्रो व्यवहर्तव्यइति ॥२२-३३-२४॥ इतिगोभिलगृह्यसूत्रेतृतीयप्रपाठके अष्टमखण्डस्यव्याख्यानसमातम् ॥३,८॥ -ब्रीहि शस्य के विषय में पूर्व ही कहा गया। सामा, यव, शस्य के विषय में भी ऐसाही जानो । विशेषता यह है कि नूनन इसी सामा यक्ष में 'शतायुधाय' मन्त्र के बदले "अग्निः प्राश्नातु” प्रथम मन्त्र और नूतन यव यज्ञ में "एत मुत्यं मधुना" मन्त्र को पढ़े ॥ २२, २३, २४ ॥ गोभिलगृह्यसूत्रकेतृतीय प्रपाठक के अष्टमखण्ड का अनुवाद पूग हुमा ३,८ भाषा- प्र०३खं०९सू०१-५] आग्रहायणीकर्म॥ . आग्रहायण्यांबलिहरणम्। तत् श्रावणेनैव व्याख्यातम्। १।२। 'श्राग्रहायण्यान्' अग्रहायणो मार्गशीर्ष इति पर्यायवचनम्। अग्रहायणस्ये यमाग्रहा- यणी, तस्यां पौर्णमास्याम् अपि 'बलिहरणं' कर्त्तव्यम् । एतच्च बलिहरणं 'श्रावणेन एव व्याख्यातम् श्रावण्यां बलिहरणे यद्यदुपदिष्टमिहापि तत्तदेव बोध्यमिति ॥१॥२॥ भाषा-जिस प्रकार श्रावण मास के बलिहण का विधान पहिले कहा गया है-उसी प्रकार अगहन की पूर्णिमा को भी बलि प्रदान करे ॥१॥२॥ * नमः पृथिव्या इत्येतं मन्त्रं न जपति ॥३॥ 'नमः पृथिव्यै' (पृ० १५१ ).---'इति एतं मन्त्रं' 'न जपति' श्राग्रहायण- बलिहरणकारीति श्रावण्यां बलिहरणे उक्तं 'न्यञ्चौ पाणी प्रतिष्ठाप्य 'नमः पृथि. व्या' इत्येतं मन्त्रं जपति (पृ० १५१) तदत्र न भवतीत्येव विशेष इति ॥३॥ अपराण्यपि कानिचित् तद्दिनकर्तव्यान्याह;- भाषा-श्रावण मास के बलिहर में "ननःपृथिव्यै” मन्त्र का व्यवहार करने का विधि है । इस में उस को न करनाही विशेषता है ॥३॥ अथ पूर्वाह्न एव प्रातराहुति, हुत्वा दर्भान् शमी वीरणां फलवतीमपामार्ग शिरीषमेतान्याहारयित्वा तू- ष्णीमक्षतसक्तनामग्नौ कृत्वा ब्राह्मणान् स्वस्तिवाच्यैस्तैः सम्भारैः प्रदक्षिणमान्यागारात् प्रभृति धूमं शातयन् गृ- हाननुपरीयात् ॥ ४ ॥ उत्सृजेत् कृतार्थान् सम्भारान् ॥५॥ 'श्रय' शब्दो बलिप्रकरणतो वैभिन्नं द्योतयति । तहिने पूर्वाह्न प्रातराहुति हुत्वा एवं' 'दर्भान्' कुशतृणानि, 'शमी' तवृक्षपत्रं, 'वीरणा' वीरणतृणं, फलवती' सफलां वदरीशाखा, 'अपामार्ग' तच्छाखां, 'शिरीष तच्छाखां, 'एता- नि' सम्भाराणि 'आहारयित्वा' येन केनचित् 'अक्षतसक्तूनां यवसक्तूनां भागं 'तू- णीम्' मन्त्रकमेव 'अग्नौ कृत्वा प्रक्षिप्य 'ब्राह्मणान् तत्रत्यान् दक्षिणादाना- फल- * श्रावण की पूर्णिमा से प्रतिदिन जो स्वस्त्यथन होगा सो इसी बलिहरण में शेष होगा। प्राचीन समय में भी इन्हीं चार मासों में प्लेग का भय होता था।

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्-
me-
दितोषणेन 'स्वस्ति' शब्दं कल्याणवचनं वा 'वाचयित्वा' 'एतैः दर्भादिभिः 'स-
म्भारैः सह 'प्रदक्षिणं' यथा स्यात् तथा 'अग्न्यागारात्' अग्निगृहात् 'प्रभृति'
'गृहान्' सर्वानेव 'अनु' लक्ष्य 'धूम' प्रदाय 'शातयन्' निर्वापयंश्च 'परीयात्' स.
तो ब्रजेत् एतेन सर्वगृहेषु शान्त्यर्थं दर्भादिभिधूमदानं फलितम् ॥ ४॥ तान् ‘स-
म्भारान्। 'कृतार्थान्' निष्पन्नप्रयोजनान् इति 'उत्सृजेत्' परित्यजेत् ॥ ५॥
भाषा-और भी, उस दिन दो पहर के पीछे प्रातःकाल की आहुति दे
कर, कुश, पीपर का पत्ता, खस फल सहित वैर का डाढ़, चिरचीरी का डाल
और शिरीष की शाखा को लाकर अग्नि में विना मन्त्र के सत्तू से होम कर,
वहां उपस्थित ब्राह्मणों से 'स्वस्ति' कहवा दक्षिणा देकर प्रसन्न करे, इन दभ
आदि सम्भार, को लेकर अग्नि गृह से प्रारम्भ कर सारे घर में धूम देव
और धूम को ठण्डा भी कर और कुश आदि को फेंक देवे ॥ ४ ॥ ५ ॥
जातशिलासु मणिकं प्रतिष्ठापयति वास्तोष्पतइत्ये.
तेनद्रिकेन ॥ ६ ॥ पर्केण द्वावुदकुम्भौ मणिक आसिञ्चेत्
॥७॥ समन्न्यायन्तीत्येतयर्चा प्रदोषे पायसश्चरुः॥८॥
'जातशिलासु' उत्पन्नशिलासु शिलावदृढनिम्मितासु इष्टकासु इष्टकनिम्मित
वेद्याम् 'वास्तोष्पते (गे गा० ७, २, २०, २१),-'इति' 'अनेन द्विकेन'साम-
द्वयेन 'मणिक' मृण्मयं ताम्रादिमयं वा वृहत् जलाधारं 'प्रतिष्ठापयतिः ॥ ६॥
ततः तस्मिन् 'मणिके' 'पण' पर्कनाममन्त्रेण (गे. गा० १, १, १)''
'उदकुम्भौं' उदकपूर्णकलशो 'आसिञ्चेत् ॥ ७ ॥ 'प्रदोप' रजनी मुखे 'समन्न्या-
यन्ति' (अ.प्रा० ३, ३, ६) इति' एतया ऋचा' 'पायसः चरः' पक्तव्यः ॥८॥
भाषा-पत्थर की नाई सुदृढ़ ईटों से बनी, वेदी के ऊपर “वास्तोष्षते"
(गे० गा०-७, २०-२१) दो साम मन्त्रों को पढ़ कर जल का घड़ा करवं
फिर उस घड़े में 'पर्कसाम' (गे० गा० १, २, १) मंत्र पढ़ते हुए काशे
से जल ढाले ॥७॥ रात्रि-को प्रारम्भ में "समन्न्यायन्ति" (अ० श्रा-३,
३, ६), मन्त्र से 'पायसचरु' पकावे ॥८॥

प्र.३ खं० ९सू०६-१४ ] आग्रहायणीकर्म॥ तस्य जुहुयात् प्रथमाहव्युवाससेति ॥६॥ स्थालीपा- कावृतान्यत् ॥१०॥ पश्चादग्नेर्बर्हिषि न्यञ्चौ पाणी प्रतिष्ठा प्यप्रतिक्षत्रइत्येताव्याहृतीर्जपति ॥ ११ ॥ 'तस्य' चरोः अंशं गृहीत्वा "प्रथमा हव्युवास सा धेनु रभवद्यमे । सा नः पयस्वती दुहा उत्तरामुत्तरा समाम्" ॥ १ ॥ ( म० ब्रा० २, २,१)-इति' मन्त्रेण 'जुहुयात् ॥ ९॥ 'अन्यत्' अवशिष्टकार्यजातं 'स्थालीपाकावृता' स्था- लीपाकयज्ञरीत्याएव भवेन्नाम ॥ ५० ॥ अग्नः' तस्य 'पश्चात्' पश्चिमे 'बर्हिषि' आस्तृतकुशोपरि 'न्यञ्चौ' अधोमुखौ 'पाणी' हस्तौ 'प्रतिष्टाप्य "प्रतिक्षत्रे प्रति- तिष्ठामि राष्ट्र॥ २॥ प्रत्यश्वेषु प्रतितिष्ठामि गोषु ॥३॥ प्रतिप्राणे प्रतितिष्ठामि पुष्टौ ॥ ४ ॥ प्रत्यङ्गेषु प्रतितिष्ठाम्यात्मनि ॥ ५ ॥ प्रतिद्यावा पृथिव्योः प्रतितिष्टा- मि यज्ञे" ॥ ६ ॥ (म ब्रा० २,२, २-६)-'इति एताव्याहृती जपति' ॥११॥ भाषा--उस चरुका कुछ अंश लेकर प्रथमाहव्युवाससा'मन्त्रसे एक आहुतिदेवे स्वाकीकार्य पूर्वाक्त स्थालीपाककी रीतिसे होंगे १० अग्निके पश्चिममें कुशके ऊपर, दोनों हाथ नीचे रक्ख 'प्रतिक्षत्रे' आदि व्याहृति ३ मंत्रपढ़ करे ॥१॥ पश्चादग्नेः स्रस्तरमास्तारयेदुद्गग्रैस्तृणैरुदक्प्रवणम् । ॥१२॥ तस्मिन्नहतान्यास्तरणान्यास्तीयं दक्षिणतो गृहपति रुपविशति ॥१३॥ अनन्तरा अवरे याथाज्येष्ठम् ॥ १४॥ 'अग्ने'; तस्य “पश्चात्' पश्चिमस्यां दिशि 'उदगः तृणैः उत्तराग्रीकृतैः कुशा- शादिभिः 'उदभवणं' उत्तरनिम्नं यथा स्यात्तथा 'स्रस्तरं' श्रासनं 'श्रास्तारयेत्' आस्तृतं कुर्यात् ॥१२॥ तस्मिन्' स्रस्तरे 'अहतानि अखण्डितानि 'पास्तरणानि तिर्यप्रक्षेपणीयतृणानि 'आस्तीर्य' पातयित्वा तत्र 'दक्षिणतः' दक्षिणस्यां 'गृ. हपतिः' अनुष्टानकारी 'उपविशति' उपविशेत् ॥ १३ ॥ "अनन्तराः' अव्यवहिता 'अनन्तराः' अव्यवहिता: 'अवरे गृहपतितः कनिष्ठाः याथाज्येष्टं' ज्येष्ठानुक्रमेण उत्तरोत्तरं स्थानमधिकुय्युरिति ॥ १४ ॥ भाषा-फिर अग्नि के पश्चिम और उत्तराम कुशा आदि पर बैठनेके लिये गोभिलगृह्यसूत्रटाकायाम् - wwws आसन बनाने में लग जावे यह स्थान उत्तर दिशा में गहग होगा १२ उस पर अच्छिन्न अास्तरण आदि बिछाकर सबसे दक्षिण घर का मालिक बैठे ५३ उनके बाई ओर प्रथम बड़े बैठे, तब छोटे, इसी रीतिमे और लोग बैठे ॥१४॥ अनन्तराश्च भााः सजाताः ।१५। समुपविष्टेषु गृह- पतिः स्वस्तयेत् ।१६। न्यञ्चौ पाणी प्रतिष्ठाप्य स्योनापथि- विनोभवेत्येतामृचं जपति ।। १७ ।। 'अनन्तराः' तदव्यवहिताः "भााः' गृहपतिबध्वादयः 'च' अपि याथा ज्ये- ष्टमुत्तरोत्तरं उपविशेयुरित्येव । तत्र विशेषमाह 'सजाताः' समानजातीयाः प्रम- वर्णानामत्रोपवेशने नाधिकार इति भावः॥१५॥ 'समुपविष्टेपु' स्वावरादि भाय्या- न्तेषु परिजनेषु 'गृहपतिः' अनुष्ठाता 'स्वस्तयेत् स्वस्तिवाचनं कुरयात् ॥१६॥त. थाहि स्वस्तिवाचनप्रकारमेव दर्शयति न्यञ्चौ अधोमुखौ 'पाणी' हस्ती 'प्रतिष्ठा- प्या "संस्थाप्य स्योना पृथिवि नो भवानृक्षरा निवेशनी । यच्छानः शर्म स प्रथको देवान्मा भयादिति" ॥ ७॥ (म०ब्रा० २,२,७) 'इति एतां ऋचं जपति' ॥१७॥ भाषा-एवं अपने वर्णकी भार्या श्रादि भी उक्त प्रकार बड़े छोटे क्रमसे बैठे ॥१५॥ सबके ठीक २ बैठ जाने पर, घरका मालिक स्वस्त्ययन प्रारम्भ करे ॥१६॥ दोनों हाथ नीचे कर 'श्योनाटथिविनो भवा' मन्त्र पढ़े ॥ १७ ॥ समाप्तायां संविशन्ति दक्षिणैः पाश्र्वैः ॥ १८॥ एवं निरभ्यात्मावृत्य स्वस्त्ययनानि प्रयुज्य यथान्यायम् ॥१६॥ 'समाप्तायां' पाठक्रियायां 'दक्षिणैः पार्वैः' दक्षिणपाश्र्वानुसारेण स्वावरा- दिभार्यान्तोपविष्टः सर्वपरिजनप्रदक्षिणतः इति यावत् 'संविशन्ति' अग्निपरिज- नयोर्मध्याकः आगच्छन्ति ॥ १८ ॥ ‘एवं' परिजनप्रदक्षिणया 'त्रि: त्रिवारम् अभ्यात्म स्वोप वेशद नस्थानमभिलक्ष्य 'श्रावृत्य' आवर्तनं कृत्वा 'स्वस्त्ययनानि' वामदेव्यादीनि सा- मानि 'प्रयुज्य' गीत्वा "यथान्यायं पूर्वोक्तवत् क्रियाशेष कार्यामिति ॥ १९॥ भाषा-मंत्र पढ़ लेने पर सब को प्रदक्षिणा कर अग्नि और परिजन के प्र.३ खं० ९-१० सू० १५.२१।१-४] प्राग्रहायणी कर्मश्रष्टकाविधि॥ १७७ .. बोच हो कर अपनीजगहा बैठे १८ ॥ यों तीन वार प्रदक्षिण कर 'वामदे- व्यादि' 'स्वस्त्ययन सामगानके अन्त में पूर्वोक्तरीति से क्रिया शेष करे १६ ॥ अरिष्टसामसंयोगमेके ॥२०॥ उपस्पृश्य यथार्थम् २१ ॥ ३, ६ 'एके प्राचार्या अत्र 'अरिष्टसामसंयोग' अरिष्टनामकसाम्नः संयोगमपि पाहुः । "उपस्पृश्य अप आचम्यक्रियासमातिमत्वा यथार्थ स्वप्रयोजनानुगतंविहरेदिति ॥२॥ इति गोभिलगृह्यसूत्रे तृतीय प्रपाठकेनवम खण्डस्य व्याख्यानं समाप्तम् ॥३-९|| भाषा-कोई २ प्राचार्य स्वस्त्ययन में अरिष्ट नामक साम को मिलाना चाहते हैं ॥२०॥आचमन करके कर्म की समाप्ति मानकर यथेच्छ विचरे ॥२१॥ इति गोभिलगृह्यसूत्रेतृतीयप्रपाठके नवमखण्डस्यव्याख्यानं समाप्तम्३,६॥ अष्टका रात्रिदेवता ॥१॥ पुष्टिकर्म ॥२॥ 'रात्रिदेवता' रात्रिः देवता अस्याः 'अष्टका' इति नाम क्रिया कर्त्तव्येति शेष: "पुष्टिकर्म" पुष्टिःपोपणं फलमस्येति।पुष्टिकाम एवास्याधिकारी तथाचास्य काम्यत्वं स्थितम् । १-२॥ भाषा-"अष्टका" गत्रि में होतीहै ॥१॥ पुष्टि की इच्छाहोतोइसे करे॥२॥ आग्नेयी विश्या वा प्राजापत्यकुंदेवता वैश्वदेवीति देवताविचाराः ॥ ३ ॥ चतुरष्टको हेमन्तस्ताः सर्वाः समांसाश्चिकीर्षेदिति कौत्सः॥४॥ 'आग्नेयी' अग्निदेवताका 'पित्र्या' पितृदेवताका 'वा' अथवा 'प्राजापत्या' 'प्रजापतिदेवताका' 'ऋतुदेवता' ऋतव एवं देवता यस्याः 'वैश्वदेवी' सर्वदेवता 'इति' एवं 'देवताविचाराः' सन्तीतिशेपः ॥ ३ ॥ कौत्सः' आचार्यस्तु 'हेमन्तः' कार्तिकादिमाघान्तोमासचतुष्टयः 'चतुरष्टकः चतसृभिरष्टकाभिरुपेतः 'इति' मन्यते । किञ्च 'ताः सर्वाः अष्टकाः 'समांसा:' मांसद्रव्यकाः 'चिकीर्षेत्' कर्तुमिच्छेत् ॥४॥ भाषा-उक्त अष्टका के विषय में आचार्यों के भिन्न २ मत हैं कोई कहता इस की देवता अग्नि हैं, कोई पितृगण, कोई, प्रजापति को कहते हैं, किसी का मत है कि यह शीतऋतु के उपभोगार्थ प्रकृत रूप से किया जाता है । सब देवताओं के प्रीतिके लिये इसका करना बतलाते हैं ॥३॥ १२ गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- परन्तु कौत्स नामक आचार्य अग्रहायण प्रभृति हेमन्त - चार महीनों में चार 'अष्टको' करे और इस को मांस से करे ऐसा मानते हैं ॥४॥ त्र्यष्टकइत्यौदगाहमानिस्तथा गौतमवार्कखएडी ॥ ५ ॥ 'श्रौद्गाहमानिः' 'तथा' 'गौतम-वार्कखण्डी' इमे प्राचार्याः, हेमन्तः श्य- टकः तिस्रोऽष्टका यत्र 'इति' मन्यन्ते इति शेषः ॥ ५ ॥ भाषा-उद्गाहमानि नामक आचार्य एवं गौतम और वार्कखण्डी आचार्यगण-हेमन्त ऋतु में तीन ही 8* अष्टका यज्ञ करना मानते हैं ॥५॥ योर्ध्वमाग्रहायण्यास्तामिस्राष्टमी तामपूपाष्टकेस्याचक्षते६।। 'अाग्रहायण्याः' पौर्णमास्याः, ऊर्ध्वम्' उपरि 'या' 'तामिस्राष्टमी' अन्धकारपक्षीया 'अष्टमी तिथिः 'ताम् तिथिम् 'अपूपाष्टका' 'इति' 'पाचक्षते' प्राचार्या इति यावत्। एतेन तत्राष्टम्याम् अष्टकाकृत्यं कर्तव्यम् , तच्च अपूपैः, साध्यमिति फलितम् ॥६॥ भाषा-अग्रहणमास की पूर्णिमा के पीछे कृष्णाष्टमी को आचार्य लोग 'अपूपाटक' कहते हैं। उस तिथि में अपूप से अष्टका करना चाहिये ॥ ६ ॥ स्थालीपाकावृता तण्डुलानुपस्कृत्य चरअपयति ॥७॥ 'स्थालीपाकावृता' पूर्वोक्त्या स्थालीपाकरीत्या 'तण्डुलान् 'उपस्कृत्य' संस्कृत्य तैरेव तण्डुलैः 'चहें हवनीयान्नं 'श्रपयति' श्रपयेत् परिपचेत् ॥ ७ ॥ * "द्वादश मासाः पञ्चवो हेमन्त शिशिरयोः समासेन" ऐ० प्रा० १, १,१। इससे पाच ऋतुमें एकवर्ष पूरा होता है, इस मतसे हेमन्त और शिशिर दोनों ही ऋतुको हेमन्त कहते हैं और वेदमें “शत हिमाः" "शरदः शत” इत्यादि अनेक प्रयोग रहते भी शरत् ऋतुमें वर्षकी पत्ति और हेमन्त में ही वर्षारम्भ जान पड़ता है, अग्रहायण पदसे वर्षका पहिला महीना जान पड़ता है, सुतरां, अग्रहोयण से हेमन्त ऋतु गिनना चाहिये ।। चार महीनों में तीन अष्टका कर्तव्य होने से, सुतरा एक मास छूट जावेगा। कौन महीना छूटेगा, सो स्पष्ट न कहने से जिस २ प्रकार अष्टका करनी होगी सो क्रमसे कहा जावेगो, तो जिस मासमें कुछ नहीं कहा जावेगा, वही मास छूटेगा ऐसा जानना चाहिये ।। *** पूा--का परिचय और उसके द्वारा प्रष्टका कृत्य कस प्रकार करना होगा, सो सब कमसे कहा जावेगा। Holida प्र.३ खं० १० सू०५-१२] अष्टकाकर्म ॥ भाषा-स्थालीपाककीभांति इसमें भी तण्डुल आदिसे 'चरु' पाक करे ७ ॥ अष्टौ चापूपान् कपालेऽपरिवर्तयन् ॥ ८॥ 'च' अपि कपाले' एकस्मिन् मृत्कटाहे 'अष्टौ' अपूपान्' पिष्टकविशेषान् 'अपरिवर्तयन्' मेक्षणादिना अस्पृशन्नेव अपयेत् ॥ ८॥ और एक बड़ी मट्टी की कराही में, आठ पूत्रा पकावे परन्तु पूआ टूटे नहीं । (एक समय में ८ पूजा के लिये आठ कगही आवश्यक होंगी) ॥८॥ एककपालानमन्त्रानित्यौद्गाहमानिःहयम्बकप्रमाणान् १० इमान् अपूपान् परिमाणेन 'एककपालान्' एककपालपूर्णमितान्, किञ्च 'श्र- मन्त्रान्' मन्त्रपाठसाहित्यशून्यान् ‘इति' 'श्रौद्गाहमानिः' श्राचार्यः मन्यते इति शेषः । । त्रयम्बकं करतलम्, तत्प्रमाणानेव अपूपान् श्रपयेत् इत्यस्माकं मतंमिति। भाषा-उद्गाहमानि आचार्य के मतसे पूएको भिन्न २ फराहियों में विना मंत्र पढ़े बनावे ॥६॥ पूआ हथेली बरावर होगा ॥१०॥ शृतानभिघार्योदगुदास्य प्रत्यभिधारयेत् ॥ ११ ॥ 'वृतान्' पक्वान् तान् 'अभिघायं' घृतेन, 'उदक्' उत्तरतः अग्नेः, 'उद्वास्य' संस्थाप्य 'प्रत्यभिधारयेत्' घृतेनैव तान पूपानिति ॥ ११ ॥ भाषा-पूत्रा आदि पक जाने पर घी का ढार दे अग्निकी उत्तर में उसे उतार पुनः घो का ढार देवे ॥ ११ ॥ स्थालीपाकावृतावदाय चरोश्वापूपानाश्चाष्टकायै स्वा- हेति जुहोति ॥ १२ ॥ स्थालीपाकावृतान्यत् ॥ १३ ॥ 'स्थालीपाकावृता' स्थालीपाकरीत्या 'चरोश्च' तस्य 'अपूपानाञ्च' तेषाम् अं. शान् 'अवदाय' सङ्कर्त्य गृहीत्वा “अष्टकायै स्वाहा'-'इति' अनेनमन्त्रेण 'जुहो- ति जुहुयात् ॥१२॥ 'अन्यत्' क्रियाशेषं सर्व स्थालीपाकावृता' स्थालीपाकरीत्यैव कार्य मिति समाप्तापूपाष्टका ॥ १२ ॥ १३ ॥ -पूर्वोक्त स्थाजीपाक के नियम से उस चरु और पूए आदि से कुछ २ अंश काटकर, इस काटे हुए अंशको "अष्टकायैस्वाहा"-मन्त्रसे अग्नि में डाले ॥ १२ ॥ स्थालीपाक के सब ही साधारण नियम यहां होंगे ॥ १३ ॥ ,

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम् -
सैघ्याऊदुर्ध्वमष्टम्यां गौः।१४ा तासन्धिवेलासमीपं पुरस्ता
इग्नेरवस्थाप्योपस्थितायांजुहयाद्यत्पशव प्रध्यायतेति ॥१॥
'तैष्याः' पौषपौर्णमास्या: 'ऊर्ध्वम्' पुरस्तात् 'अष्टम्यां' कृष्णपक्षीयायाम्.
'गौः' श्रालब्धव्येति शेषः ॥ 'सन्धिवेलासमीपं सूर्योदयकालात् किञ्चित् पूर्वमेव
'तो' गां 'अग्नेः पुरस्तात् अवस्थाप्य' 'उपस्थितायां' तस्यां सन्धिवेलायाम्, सूर्यो-
दयक्षणे इति यावत्, 'यत्पशवः प्रध्यायत मनसा हृदये न च । वाचा सहस्रपायथा
मयि बध्नामि वो मनः" ॥ ८॥ (म० ब्रा० २, २, ८-'इति' मन्त्रेण तत्रैवाग्नी
'जुहुयात्' धृत मिति ॥ १४ ॥ १५ ॥
भाषा-पौष मास की पूर्णिमा के पीछे अष्टमी को गोमांस से मांसाष्ट
का करे । सन्धिवेला के कुछ पहिले अग्निके पूर्व भाग में उस गोको लाकर
रक्खे, और ठीक वेला पर “यत्पशव प्रध्यायत” मन्त्रसे घी की आहुति दे
कार्य का प्रारम्भ करे ॥ १४-१५॥
हुत्वा चानुमन्त्रयेतानु स्वा माता मन्यतामिति ॥ १६ ॥
'हुत्वा' कार्यारम्भद्योतिका माहुति पूर्वोक्ताम्, 'च' अपि 'तो' गाम् “अनु-
त्वा माता मन्यता मनुपितानुभ्रातानु सगर्योऽनुसखा सयूथ्यः" ॥ ९॥ (म.
ब्रा० २, २, ९)-इति' मन्त्रण 'अनुमन्त्रयेत' संज्ञपानार्थ निमन्त्रयेदिति ॥१६॥
भाषा-पूर्वोक्त आहुति देने पर यव मिला जल पवित्र, क्षुर, शाखा,
विशाखा, बहिः, इध्म, आज्य, दो समिधा, और सव, ये सब भी अपने पास
ठीक रक्खे “अनुत्वा” मन्त्रसे गौ को मारने के लिये निमन्त्रण देवे ॥१६॥
यवमतीभिरद्भिःप्रोक्षेष्टकायै त्वा जुष्टां प्रोक्षामीति ॥१७॥
'अष्टकाय अष्टकानामदेवतायाः तुष्टयर्थ 'त्वा' "जुष्टी' प्रीति-सेवनीयां गाम्
'प्रोक्षामि' अहम्-'इति' मन्त्रं पठन् 'यवमतीभिः' अनिः 'प्रोक्षेत्" तामालब्धयां
गामिति ॥ १७॥
भाषा-'अष्टका देवता की प्रीति के लिये प्रीति पूर्वक सेवनीय तुम्हें
घोता है-मन्त्रसे बध्य गौ को यव से भींगा जलसे धोवे ॥ १७ ॥

प्र०३ खं०१०सू०१४-२३]
अष्टकाकर्म ॥
उल्मुकेन परिहरेत् परिवाजपतिः कविरिति ॥१८॥
अप: पानाय दद्यात् ॥ १६ ॥
“परिवाजपतिः कविः (छ. आ. १, १, ३, १०)'-'इति' मन्त्रम्पठन्
'उल्मुकेन प्रज्वलिताग्निना "परिहरेत् प्रदक्षिणीकुर्यात् तां गा मिति ॥ १८॥ तस्यै
गवे इति शेषः ॥ १६॥
भाषा..."परिवाजपतिः” (छ० श्रा० १, १, ३, १०) मन्त्र से एक
मुट्ठी खर जला कर, उस खर से गौ की प्रदक्षिणा करे ॥ और गौ को एक
पात्र में जल पीने को देवे ॥१८-१६ ।।
पीतशेषमधस्तात्पशोरवसिञ्चेदात्तंदेवेभ्योहविरिति ॥२०॥
पीतशेष' पानाववशिष्ट मुदकम् "आत्तं देवेभ्यो हविः । १० (म० ब्रा०२
२, १०)" 'इति' मन्त्रम्पठन् 'पशोः' तस्यैव 'अधस्तात् अवसिञ्चत् नीचेः सि.
ञ्चनं कुर्वीत ॥ २० ॥
भाषा०-पीने से जो पानी बचे, उस में "आत्तं देवेभ्यो हविः' मन्त्र
से गौ के अधोभाग को सींचे ॥२०॥
अथैनामुदगुत्मप्य संज्ञपयन्ति ॥२१॥ पाशिरसमुदक-
पदी देवदेवस्ये दक्षिणाशिरसं प्रत्यक्पदी पितृदेवत्ये२२,२३
'अथ' अनन्तम् 'एनाम्' गाम् 'उदक्' अग्नेरुत्तरतः 'उत्सृप्य' उत्सर्पणेन
नीत्वा 'संज्ञपयन्ति' हन्युः शासितार ऋत्विज इति ॥ तत्र च-'देवदेवत्ये' कार्य
तां 'प्राक्तिरसम् उपपदी' किन्तु पितृदेवत्ये कार्ये 'दक्षिणाशिरसं प्रत्यक्षदी'
संज्ञपेयुरिति ॥ २१ ॥ २२ ॥ २३ ॥
भाषा०-तब मारने के लिये तैयार ऋत्विकगण, गौको अग्नि के उत्तर
में ला कर काटें। यदि देवकार्य निमित्त गौ मारी जावे, तो पशु का मस्तक
पूर्वदिशा में रक्खे और चारो पैर उत्तर की ओर पितृकार्य के लिये हो, तो
पशु का मस्तक दक्षिण में, और उसके पैर सब पश्चिम ओर रक्खे ॥२१.२३॥
संज्ञप्तायां जुहुयाद्यत्पशुर्मायुमकृतेति ॥ २४ ॥

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- me vah mayamINIK हुए शिर 'संज्ञप्तायां' तस्यां “यत्पशुायु मकृतोरीवापभिराहत । अग्निा तस्मादे- नसो विश्वामुञ्चत्वछहसः” ॥ ११ ॥ ( म० ग्रा० १, २. ११)-इति' मन्त्रेम जुहुयात् श्राज्य मिति शेषः ॥ २४ ॥ भाषा०-गौ मारे जाने पर “यत्पशु" मन्त्र से आज्य होम करे ॥२४॥ पत्नी चोदकामादाय पशोःसर्वाणि स्रोतांसि प्रक्षालयेत्।२५. 'च' श्रपि तदैव पत्नी' यजमानस्य, 'उदकम् श्रादाय 'पशोः' मंरक्षम्य 'सर्वाणि स्रोतांसि' चक्षुरिन्द्रियादीनि 'प्रक्षालयेत्' ॥ २५ ॥ भाषा०–एवं उस समय यजमान की स्त्री जल से, उस कटे वाली गौ के नेत्र आदि इन्द्रियों को अच्छेप्रकार धोले (माथे में नेत्र आदि सात, चार स्तन, नाभि, कटिदेश, गुह्यदेश, ये १४ स्थान हैं)॥२५॥ अग्रेण नाभिं पवित्रे अन्तर्धायानुलोम माकृत्यवपा मुद्धरन्ति 'अग्रेण नाभि' नाभेरग्रतः नाभिसमीपे 'पवित्रे' 'अन्तर्वाय' 'अनुलोम' यथा स्यात्तथा 'आकृत्य क्षुरेग्ण निम्नाभिगामि कर्तनं कृत्वा, ततः 'वां' मेदसम् 'उद्धरन्ति' उद्धरेयुः ॥ २६ ॥ भाषा०-नाभि के समीप पवित्रद्वय छिपा कर लोमानुसरण कम से निम्न-नाभि चालन से काट कर उस में से वपा को निकाले ॥ २६ ॥ ताशाखाविशाखयोः काष्ठयोरवसज्याभ्युक्ष्य अप- येत् ॥२७॥ प्रश्च्युतितायां विशसथेति ब्रूयात् ॥२८॥ 'शाखाविशाखयोः' एतनामकपात्रयोः 'काष्टयोः' पलानिर्मितयोः उद्धा- धोमुखीभावावस्थितयोः प्राधाराच्छादनयोः मध्ये 'तां' वा 'अवसज्य' संस्थाप्य अभ्युक्ष्य' जलपातैः श्रपयेत्' पचेदिति ॥२७॥ 'प्रश्च्युतितायां' प्रक्षारितायां तस्या वपायर्या "विशसथ' गां विगतचर्मा कुरुथ 'इति' ब्रूयात् ॥ २८ ॥ भाषा०--और निकाली हुई वपा को, शाखा, विशाखा नामक पत्नाश की लकड़ी का बना हुआ ढक्कन के प्राधार पर रक्ख कर, जल से सामान्यरूप से धोकर, अग्नि से सिद्ध करे। इधर, गौ के नाभि के समीप से काट कर, निकाल, इस के चमरा निकालने की आशा करे ॥ २७-२८ ॥ HANNEHA प्र०३ खं०१० सू०२४-३२] अष्टकाकर्म॥ १८३ यथा न प्रागग्नेभूमिळेशोणितं गच्छेत् ।२६।शृता मभि- घार्योदगुद्वास्थ प्रत्यभिधारयेत् ।३०।स्थालीपाकावृता वपा मवदाय स्विष्टकृदावृता वाष्टकायै स्वाहेति जुहोति॥३१॥ परं तत्र विशसने सातळ मिद मवलम्बयम्: 'अग्नेः' 'प्राक्' पुरतः भूमि 'शोणितं' 'यथा न गच्छेत्' इति । 'शृतां' पक्कां वपाम् 'अभिधार्य' घृतेन, 'उदक्' अग्नेः उत्तरतः 'उद्वास्य संस्थाप्य 'प्रत्यभिधारथेत्' पुनर्वृतेनैवाभिधारणं कुर्यात् । ततः शैत्येन कठिनीभूतां तां 'वपाम्' स्थालीपाकरीत्या स्विष्टकृद्रीत्या वा अवदा- नेन 'अवदाय' कर्तयित्वा, कत्तितमंशं गृहीत्वा "अष्टकायै स्वाहा''-'इति' मन्त्रेण तत्र अग्नौ "जुहोति' जुहुयात् ॥ २६ ॥ ३० ॥ ३३ ॥ भाषा-परन्तु चमरा छुड़ाते समय, ऐसा न हो कि अग्नि के आगे हो कर रुधिर वह चले। इस वपा के तैयार होने पर, उसमें धी का ढार दे उसे अग्नि के उत्तर भाग में उतार कर रक्खे और पुनः उसमें घी का ढार देवे तब उस आग में पकी बपा, जो ठंढे के कारण जम जायेगी, 'स्थालीपाक' की रीति से, या स्विष्टकृत् की रीति से उसको चाकू से काट कर, "अष्टकायै स्वाहा” मन्त्रसे होम करे ॥ २६॥३०॥३१॥ स्थालीपाकावृतान्यत् स्थालीपाकावृतान्यत् ॥ ३२ ।। 'अन्यत्' अवशिष्टकार्यजातं 'स्थालीपाकावृता' .स्थालीपाकरीत्यैव कुर्यादिति शेषः । द्विवचनं प्रपाठकसमाप्तिसूचक मिति ॥ ३ ॥१०॥ इति गोभिलगृह्यसूत्रेतृतीयप्रपाठकेदशमखण्डस्यव्याख्यानसमात ॥३॥१०॥ अध्यायश्च समाप्तः ॥ ३ ॥ भाषा-बाकी सब काम 'स्थालीपाक' के नियम से होंगे ॥ ३२॥ गोभिलगृह्यसूत्र के तृतीय प्रपाठकके दशम खण्डका अनुवाद पूरा हुआ ॥३॥१०॥ अनु प्रहरति बपाश्रपण्यौ प्राची मेकशूलां प्रतीचीमितराम्? 'अनु' पश्चात, वपाहोमानन्तर मिति यावत् । 'वपाश्रपण्यौ' वपाश्रपणसा- धन्यौ ते पूर्वोक्ते शाखा-विशाखे 'प्रहरति' परिहरेत, प्रक्षिपेत् । क ? पूर्वोकन्यायात् गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - तत्रैवाग्नौ। तत्र च प्रहरणेऽयं नियमः,-'एकलां' शाखानामिकां वपाश्रपणों 'प्राची' प्रागग्राम्, 'इतराम्' अपरां विशाखानामिकां वपाश्रपणी 'प्रतीची' प्रत्य- गग्राम्; प्रहरेदिति योभ्यम् ॥१॥ भाषा--वपा पाक कर्मकी समाप्त पर उन दोनों * "वपाश्रपणी" को उसी अग्नि में इसप्रकार डाल देवे कि एक शूना पूर्वाग्रा हो एवं अपर पश्चिमाया हो ॥१॥ अवद्यन्स्यवदानानि सर्वाङ्गेभ्योऽन्यत्र वामाच सक्थनः क्लोम्नश्च ॥२॥ वाम सक्थ्यन्वष्टक्याय निध्यात् ॥३॥ 'वामात्' सक्थ्नः, 'क्लोम्नः च,' अन्यत्र, वामसक्थि क्लोम च वर्जयित्वा अन्येभ्यः सर्वाङ्गेभ्यः' 'अवदानानि' मांसानि 'अवद्यन्ति' क्षुरेण खण्डखण्डी कुर्वन्ति ॥ २ ॥ तदखण्डिवं 'वाम सक्थि' अन्वष्टत्त्याय अनुपदवक्ष्यमाणायकर्मणे निदध्यात् संस्थापयेत् ॥ २ ॥३॥ भाषा-वाम सक्थि और क्लोम छोड़कर, सब अङ्गोसे खण्ड २ करके मांस ग्रहण करे वाम सक्थि समस्त ही 'अन्वष्टका' कार्यके लिये रक्खे ॥२३॥ तस्मिन्नेवाग्नौ अपयत्योदनचरुश्चमासचरुञ्चपृथङमे- क्षणाभ्यां प्रदक्षिण मुदायुवन् ॥ ४॥ शृतावभिघार्योदगु- दास्य प्रत्यभिधारयेत् ॥ ५ ॥ 'तस्मिन्नेव' एकस्मिन् 'अग्नौ 'श्रोदनचरुञ्च मांसचरुच' उभावेव चरू 'पृथक- मेक्षणाम्यां पृथक्पृथक्स्थापिताभ्यां मेक्षणाभ्यां 'प्रदक्षिणं' दक्षिणावर्त्तन मेक्षण- चालनं यथा स्यात्तथा 'उदायुवन्' ऊर्ध्वमीषन्मिश्रयन् 'अपयति । अपयेत् पञ्चे- दिति । 'शृतौ तौ चरू 'अभिधार्य' घृतेन, 'उदका अग्नेरुत्तरतः 'उद्वास्य' 'प्रत्य- भिघारयेत्' घृतेनैव ॥ ४ ॥५॥ . MINER अर्थात् ऊपर नीचे भाव से जोड़ा पलाश काठ निर्मित, वपा पाक की सिद्धि के लिये दी पात्र । एक में यपा रख कर सिद्ध की जाती और उस के ऊपर ढका रहता है, उनमे से ऊपर वाले पात्र को "शाखा,, और 'एकशला, मी कहते हैं ) इस में वपा रक्षित होती है और उस के ऊपर ढाकने के लिये नीचे मुंह रक्खे पात्र को 'विशाखा, कहते हैं । * यह उस अग्नि में डाला जाता, इस कारण इसे 'वपापणी, कहते है।

प्र.४खं०१ सू०१-८
-८]
अष्टकाकर्म ॥
भाषा--उसी अग्निमें 'ओदनचरु' और सांसचरु'पकावे, परन्तु दोनों में भिन्नर
चलौने से चजावे, एकही से नहीं। दोनोंके अच्छे प्रकार पक जाने पर, घो
का ढार दे अग्निके ऊपर भागमें उतारलेवे और पुनः उसमें घीका ढारदेवे ४।५
कंसे रसमवासिच्य प्लक्षशाखावतिप्रस्तरेऽवदानानिकृत्वा
स्थालीपाकावृतावदानानां कसेऽवद्यति स्विष्टकृतश्च पृथक
मांसचरुस्थालीतः निचोट्य 'रसं मांसयूषं ' कसे' कांस्यपात्रे ' अवासिच्य'
पातयित्वा 'लक्षशाखावति' प्लक्षशाखानिर्मिताच्छादनविशिष्टे 'प्रस्तरे प्रस्तर-
निर्मितकुण्डे 'अवदानानि' 'यूषहीनमांसखण्डानि 'कृत्वा' स्थापयित्वा 'च' अपि
'स्विष्टकृतः' स्विष्टकृयागार्थ 'पृथक् कंसे' पूर्वस्थापितयूषाधारातिरिक्तकांस्यपात्रे
'स्थालीपाकरीत्या 'अवदानानां' मांसानांकिञ्चिदशम् 'अवद्यति' सङ्कर्त्यगृह्णाति ६
भाषा-मांस के यूष को, एक कांसेके वर्तन में ढार रक्खे मांस आदिक
को एक पत्थरकी कुण्डीमें रक्खे और पुनः उस मांसमें से थोड़ा स्थालीपाक
के नियमसे काट लेवे,एवं उसे स्विष्टकृत् यागार्थ दूसरे कांसपत्र में रक्ख छोड़े।
चरोरुधृत्य बिल्वमात्र मवदानः सह युषण सन्नयेत् ॥७॥
ओदनचरुस्थालीतः 'बिल्वमात्रं बिल्वनमाणं 'चरोः' अंशम् 'उहत्य' 'श्रव-
दानैः' प्लक्षशाखाच्छादितप्रस्तरपात्रस्थितैः मांसखण्डैः 'सह' 'यूषेण' कांस्यपात्र-
स्थेन मांसरसेन 'सन्नयेत् एकीकुर्यात् तत्रैव यूपमध्ये एव स्थापयेदिति ॥ ७ ॥
भाषा-प्रोदन की हांड़ी से बेलकी वरावर चरु लेकर पत्थर की कुण्डी
में रक्खे और मांस खण्ड के साथ कांसे पात्र में रक्खे हुए यूषको मिलावे ॥७
चतुर्ग्रहोतमोज्यं गृहीस्वाष्टर्चप्रथमया जुहुयादग्नावग्निरिति
'चतुर्गृहीतम् श्राज्यम्' (पूर्ववत् ) गृहीत्वा 'अष्टप्रथमया' अष्टाना मृचां
समाहारोऽष्टर्चम् (म० ब्रा० २, २, १२-१८), तत्र या प्रथमा ऋक् तया
"अमावनिश्चरति प्रविष्ट ऋषीणां पुत्रो अधिराज एषः । स नः स्योनः सुयजा यजा
च यथा देवानां जनिमानि वेद" ॥ १२॥ (म. ब्रा० २, २, १२)--'इति'
'अनया जुहुयात्' गृहीतं तत् ॥ ८॥

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- wismABYTARAMINORIESOMomwwws भाषा--पूर्वोक्त रीतिसे चारवार ग्रहण किया हुआ ाज्य लेकर अपना वग्निः' आदि आठ मन्त्रों में से "अग्नावग्निः” मन्त्रसे हवन करे॥८॥ सन्नीतात् तृतीयमात्र मवदाय द्वितीयातृतीयाभ्यां जुहोत्यु त्तरस्यां स्वाहाकारं दधास्येच मेवावरचतुर्थीपञ्चमीभ्याप ष्टीसप्तमीभ्याञ्च शेष मवदायसौविष्टकृतनष्टन्यां जुहुयात् । 'सन्नीतात्' (पूर्वोक्कात् ) यूपपात्रे नीतात् बिल्वप्रमाणात प्रोदनचरो 'तृतीयमात्रम्' एकतृतीयांशम् 'अबदाय' कर्तयित्वा 'द्वितीया तृतीयाःप' "श्रौलूखलाः सम्प्रदन्ति प्रावाणो हविष्कृण्वन्तः परिवत्सरीगाम् । एकाष्टके सुषजसः सुवीरा ज्योग् जीवेम बलिहृतो वयं ते ॥ १३ ॥ इडायास्पदं वृत्तवत्सरी- सूपं जातवेदः प्रतिहव्या गृभाय। ये ग्राम्याः पशवो विश्वरूपास्तेषा सप्तान मयि रन्ति रस्तु' (स्वाहा )॥ १४ ॥ (म० ब्रा० २, २, १३-१४) इत्येताम्य मृग्भ्यां 'जुहोति' जुहुयात् । तत्र च 'उत्तरस्याम्' तृतीयायाम् "इडायास्पदम् इत्येतस्यान् एव अन्ते 'स्वाहाकारं दधाति' स्वाहापदं प्रयुंज्यात् । 'अवरें' अपर द्वे तृतीयमाने 'चतुर्थी -पञ्चमीभ्याम्' "एषैव सा या पूर्वा व्यौच्छत् से यमस्व- न्तश्चरति प्रविष्टा । वसूर्जिगाय प्रथमा जनित्री विश्वे ह्यस्यां महिमानो अन्त: ॥ १५ ॥ एषैव सा या प्रथमा व्यौच्छत् सा धेनुरभद्विश्वरूपा । सम्वत्सरस्य य: पत्नी सा नो अस्तु सुमङ्गली" (स्वाहा ) ॥ १६॥ (म० प्रा० २, २, १५-१६) इत्येताभ्याम् ऋग्भ्यां षष्ठीसप्तमीभ्यां 'यां देवाः प्रतिपश्यन्ति रात्री धेनु मित्र:- यतीम् । सा नः पयस्वती दुहा उत्तरा मुत्तरापमाम् ॥ १७॥ सम्वत्सरस्य प्रतिमां यां त्वा रात्रिं यजामहे। प्रजा मजयां नः कुरु रायस्पोपेग्य समज (स्वाहा ) ॥ १८ ॥ (म० वा० २, २, १७..१८) इत्येताभ्यां जुहुयादिति । 'सौविष्टकृतम्' स्विष्टकृदर्थ 'शेषम्' इत्येताभ्या मृग्भ्यां 'च' एव मेव "उत्तरस्या स्वाहाकार"- इत्येतनियमेनैव स्थालीपाकरीत्या यदगृहीतम्, तत् 'अवदाय' गृहीत्वा अष्टम्या, "अन्वियनो अनुमतिर्यज्ञं देवेप मन्यताम् । अग्निश्च हव्यवाहन स नोऽदाहाद्दाशुषे मयः ॥१९॥ (म० प्रा०२,२,१९) इत्यनयर्चा 'जुहुयात् ॥९॥ भाषा-पूर्वोक्त विल्व की वरावर जो श्रोदन चा मांस के साथ मिला .

प्र० ४ खं० १ सू०९-१०]
अन्वष्टक्यम् ॥
१८७
कर युषमें रक्खा गया है, उसमें से एक तिहाई लेकर द्वितीय और तृतीय
मन्त्रसे एक आहुति देवे, उसके तृतीय श्राहुति के अन्त में 'स्वाहा' शब्दका
प्रयोग करे । अपर दो तिहाई भी चतुर्थ और पञ्चम मन्त्रले, एवं छठा और
सातवां मन्त्र से, इसी नियम से अर्थात् शेष मन्त्र के अन्तमें 'स्वाहा' जोड़
कर यथाक्रम दो आहुति देवे । सबके अन्तमें अष्टम मन्त्र पढ़कर स्विष्टकृत
यागके लिये पूर्व गृहीत मांस खण्ड आदि से होम करे ॥६॥
यद्यवा अल्पसम्भारतमः स्यादपि पशुनैव कुर्वीतापिवा स्था-
लीपाकं कुर्वीतापि वा गोग्रास माहरेदपि वारण्ये कक्ष मुपा-
धाय ब्रूयादेषा मेऽष्टकेति-न स्वेचन कुर्वीत न त्वेव न कुर्वीत१०
'यदि' 'उ' अपि 'वै' निश्चयेन 'अल्पसम्भारतमः' अत्याल्यायोजनः पुरुषः
स्यात्, 'अपि' तथापि 'पशुना' सप्तानां ग्राम्याणां पशूना मन्यतमेन येन केनापि
'कुर्वीत' 'एव' सम्पादयीतैव एतामष्टकाम् । 'अपि वा पश्वभावेऽपि 'स्थालोपाक'
'कुर्वीत' एव । अपि वा' स्थालोपाककरणमामाभावेऽपि गोग्रासम् बाहरेत्'-
एतेनापि सिद्धेनामाष्टकाकृत्यम् । अपि वा 'अरण्ये' 'कक्षम् उपाधाय' कक्षं
दर्शयित्वा, उर्ध्वबाहुभूत्वेति यावत्, एषा म अष्टका'-'इति' 'ब्रूयात्' एतेनापि
सिद्धेशामाष्टकाकृत्यम् । 'तु' प्रत्युत गोपश्वलाभे मांसाष्टकां 'न कुर्वीत'--इति न
एवं द्विवचनं प्रपाठकसमाप्तिद्योतकमिति समाता मांसाष्टका ॥ १०॥1॥
इति गोभिलगृह्यसूत्रे चतुर्थप्रपाठ के प्रथम खण्डस्यव्याख्यानं समाधम् ॥४॥॥
भा०-यदि विशेष शामग्री न कर सके,तथापि पशुसे ही मांसाष्टका करे। यदि
पशुसे न कर सके तो स्थालीपाक से करे । दोनोंके अभाव में गौको 'प्रास देने
से भी हो सकता है। यदि वह भीन कर सके तो बनमें जाकर दोनों बाहू उठाकर
कहे कि...'यही हमाग मांसाष्टका है' किन्तु 'मांसाष्टका' अवश्य करे ॥१०॥
गोभिलगृह्यसूत्रके चतुर्थ प्रपाठकके प्रथमखण्डका अनुवाद पूग हुआ ॥४-१॥
श्वस्ततोन्वष्टक्य मपरश्वो वा ॥१॥ दक्षिणपूर्वेऽष्ट-
मदेशे परिवारयन्ति तथायतं तथामुखैः कृस्यम् ॥ २ ॥

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- n 'ततः' अष्टकाकार्यादनन्तरम् । श्वः' द्वितीयदिने 'अपरश्वः, तृतीयदिने 'वा' 'अन्वष्टक्यम्' अन्वष्टकाकृत्यं कुर्यादिति ॥ १ ॥ स्वावासभूमौ 'दक्षिणपूर्वे' दक्षि- णपूर्वयोर्दिशोरन्तराले श्राग्नेय कोणे, 'अष्टमदेशे' स्वावासस्थानाष्टमे भागे, 'तथा- यत' दक्षिणपूर्वायतं स्थानम् , 'तयामुग्वैः' श्राग्नेयाभिमुग्वैः स्थापित सम्भारादिभिः 'कृत्यम्' अन्वष्टक्यम् कार्य यथा स्यादेव प्रशस्तं कृत्वा 'परिवारयन्ति' परितः पाच्छादयन्ति, पाच्छादयेयुर्जना यजमानकर्मकरा इति ॥ २ ॥ भाषा-अष्टका कार्य के दूसरे दिन या उसके तीसरे दिन 'अन्वष्टको' कार्य करे ॥ १॥ रहने के घर से अग्निकोण में, अष्टम भाग स्थान रोक कर, दक्षिण पूर्वदिशा में विस्तृत, इस अग्निकोणाभिमुख स्थापित द्रव्यादि से कार्य सिद्ध करने के लिये रुकावट न हो, ऐसा एक उत्तम मण्डप बनावे॥२॥ चतुरवराान प्रक्रमान् पश्चादुपसञ्चार उत्तरार्द्ध परिवृतस्य लक्षणं कृत्वाग्निं प्रणयन्ति ॥ ३ ॥ 'परिवृतस्य' तस्य मण्डपस्य 'श्रवराद्वान्' अपराविदितान् 'चतुःप्रक्रमान' अन्यूनान् द्वादशपदभूमि विहाय ततः 'पश्चात्' 'उपसञ्चारः' गमनागमन मार्ग: भवेत्, 'उत्तरार्द्ध' तु 'लक्षणं' पूर्वोक्तं कृत्वा' 'अग्निं प्रणयन्ति ॥ ३ ॥ भाषा--उस मण्डप में ऊपर की ओर कमसे कम १२ वारह पग भूमि छोड़ कर, तत्पश्चात् जाने श्राने का रास्ता छोड़, नीचे के श्राधे भाग में रेखा कर वहाँ अग्नि प्रणयन करे ॥३॥ पश्चादग्नेरुलूखलं दृहयित्वा सकृत्संगृहीतं ब्रीहिमुष्टि मवहन्ति सव्योत्तराभ्यां पाणिभ्याम् ॥ ४ ॥ 'अग्नेः पश्चात्' उलूखलं' टुंहयित्वा दृढ़ स्थापयित्वा तत्र 'सकृत' एकवारेणेव 'संगृहीतं' ब्रीहिमुष्टिम्' कतिपयमुष्टिपरिमितं धान्यं यथा च कृर्त्य सम्पयेत 'सव्योत्तराभ्याम्' उभाभ्यामेव 'पाणिम्यां' मुसलं गृहीत्वा 'अवहन्ति' अवहन्याताया भाषा-अग्नि के पश्चिम भाग दृढ़ता के उलूखल रक्ख कर, उस में एकही वार कईएक मुट्ठी धान्य लेकर दोनों हाथ से मूसल पकड़ धान्य कूटे।४ में साथ

प्र.४ खं० २ सू०१-७]]
अन्वष्टक्यंकर्म॥
१८९
यदा वितुषाः स्युः सकृदेव सुफलीकृतान् कुर्वीत ॥५॥
तेनावघातेन 'यदा' ते धान्यसंवाता: 'वितुषाः' विगततुपाः 'स्युः' तदा
'सकृदेव' एकवारेणैव तान् श्रवहतधान्यसमूहान् 'सुफलीकृतान्' शूर्पादिना तुपान्
पृथक् कृत्य तण्डुलरूपान् 'कुर्वीत' ॥ ५ ॥
भाषा-पूर्वोक्त प्रकार कूटने से धान्य आदि में जव भूसी न रहे, तब उसे
सूपसे फटक कर, उस भूसी आदिको उड़ा कर तण्डुल तैयार करे ॥ ५ ॥
अथामुष्माच सक्थनोमासपेशीमवकृस्य नवायासूना-
यामणुशश्छेदयेद्यथा मांसाभिघाराः पिण्डा भविष्यन्तीति ।६
'अथ' अपरत्र 'च' 'अमुष्मात्' अष्टकायै हतायाः गोः 'सक्थ्नः' रक्षितवाम-
सक्थिभागात् 'मांसपेशीम्' 'अवकृत्य' कर्त्तनेन गृहीत्वा 'नवायां' 'सूनायां
व्यञ्चनकर्त्तन्यां तथा 'अणुशः' छेदयेत्' 'यथा' कर्तिताः ते 'मांसाभिघारा:' घृत-
मिश्रिताः सन्तः 'पिण्डाः' पिण्डाकाराः भवेयुर्नाम ॥६॥
भा०-इधर, उस पूर्व-रक्षित वाम-ऊरु से मांस-पेशी आदि काट कर
नये वर्तन में खण्ड २ कर काटे, इस प्रकार खण्ड २ करे, जिस में घी के
ढार देते वह पिण्डाकार बन जावे ॥१॥
तस्मिन्नेवाग्नौ अपयत्योदनचरुञ्च मांसचरुञ्च पृथङ्
मेक्षणाभ्यां प्रसव्य मुदायुवन् ॥ ७॥
'तस्मिन्नेव' एकस्मिन् 'अग्नौ' "श्रोदनचरुञ्च मांसचरुञ्च' उभावेव चरू
'पृथड्भेक्षणाभ्यां' पृथक् पृथक् स्थापिताभ्यां मेक्षणद्वयाभ्यां 'प्रसव्यं' वामावर्तेन
मेक्षणचालनं यथा स्यात् तथा 'उदायुवन्' उर्ध्वमीषन्मिश्रयन्- 'श्रपयेत्' पचेदिति
भाषा-एक ही अग्नि पर 'रोदनचरु' और 'मांसचर' को भिन्न २
रक्खेहुए मेक्षणद्वारा बाई ओर से चलावे और ऊपर को चलौना से उठा २
कर देखता हुआ उसे पकावे ॥ ७॥
शृतावभिचार्य दक्षिणोदास्य न प्रत्यभिधारयेत् ॥८॥

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - .. 'शृतौ तौ चरु 'अभिवार्य" वृतेन, 'दक्षिणा' अर्दक्षिणतः साम्य संस्थाप्य 'न प्रत्यभिधारयेत्' अष्टकाया मिवात्र प्रत्यभिवारणं न कुर्बोनेति ॥८॥ भाषा-इन दोनों चरु के अच्छे प्रकार पक जाने पर, बी का ढार दे, अग्नि के दक्षिणभाग में उनारे,परन्तु उस में पूर्ववत् पुनः घी का ढार न देवे १८ दक्षिणा परिवृतस्य तिस्रः कः खानयेत् पूर्वोपक्र- मा:प्रादेशयामाश्चतुरगुलपृथिवीस्तथावखाताः ॥ ६ ॥ 'परिवृतस्य तस्य मण्डपस्य दक्षिणा' दक्षिणेऽशे 'तिसः कप: त्रीन् गन्ि 'खामयेत्'; ताश्च कर्षवः 'पूर्वोपक्रमाः' पूर्व दिगारभ्य क्रमेणारब्धाः, 'प्रादेशयामाः' चादेशपरिमितदीर्वाः, नुर गुलप्रशस्ताः, 'तथा श्रवन्वाता:' चतुरङ्गुलग्यात- विशिष्टाः भवेयुरिति ॥ ९॥ भाषा--उस मराइप के इक्षिणा भाग में तीन गढ़ा बुदवाये। इन गढ़ों की लम्बाई प्रादेशमात्र, चौड़ाई ४ अंगुल,चार ही 'अंगुल' गहगाई भी होगी 15 पूर्वस्याः कवाः पुरस्ताल्लक्षणं कृत्वाग्नि प्रणयन्त्य- परेण कः पर्याहत्य लक्षणे निध्यात् ॥ १० ॥ ११ ॥ 'पूर्वस्याः कवाः' प्रथमस्य गर्तस्य 'पुरस्तात्' 'लक्षणं' पूर्वोक्तरूपं कृत्वा तत्र 'अग्निप्रणयन्ति' प्रणयेयुरिति । किम्च, 'अपरण कपः कर्पूणाम् अपरपार्वेऽदूरे एव अनि 'पर्याहृत्य' परित आहृत्य 'लक्षणे' पूर्वोक्त 'निदध्यात्' स्थापयेत् ॥१०॥11॥ भाषा-पहिले गड़हे के सामने रेखा खींच कर अग्नि प्रगायन करे और इन दो लक्षणों से अग्नि लावे, और उसे गड़हों के निकट दृसरे बगल में रक्खे ॥१०-११ ॥ सकृदाच्छिन्नं दर्भमुष्टिस्तृणोतिक:श्च पूर्वोपक्रमाः १२०१३ 'प्राच्छिन्न' ईषच्छिन्न किञ्चिन्मूलच्छिन्नं 'दर्भमुष्टिम्' 'सकृत् ' एकवारं 'स्तृणोति' स्तृणुयात, अग्नेश्चर्दिक्षु । 'च' अपि 'पूर्वोपक्रमा.' कः स्तृणुयादेव १३२,१३ भाषा--कुछ जड़ काटी हुई कुश मुट्ठी एक ही बार में अग्नि के चारों प्रोर बिछादेवे और पूर्वादि क्रमसे उस गड़हे में भी वही कुशमुट्ठी बिछाये ॥

प्र० ४ खं०२सू०९-२०] अन्वष्टक्यकर्म॥
पश्चात् कणा स्वस्तर मास्तारयेद्दक्षिणाः कुशेर्द-
क्षिणाप्रवणम् ॥ १४ ॥ वृषीञ्चोपध्यात्तत्र ॥ १५ ॥
'कर्पूणां' गानां 'पश्चात्' 'दक्षिणाः कुशैः' 'दक्षिणाप्रवणम्' 'स्वस्तरम्'
'आस्तारयेत् ॥ १४ ॥ तत्रकर्पूण पश्चादेव 'वृषी' काष्टासनं 'च' 'उपदध्यात्'
स्थ पयेदिति ॥ १५॥
भाषा०-तीनों गड़हके पश्चिम भागमें दक्षिणाय कई एक कुश से दक्षिणा
प्रवणस्वरूप स्वस्तरातरण करे, उसी स्थान में काठ का आसन रक्खे ॥१४॥१५॥
अस्मााहरन्त्येकैकशः सव्यं बाहु मनु चरुस्थाल्यो
मेक्षणे कसं दर्वी मुदक मिति ॥ १६ ॥
'अस्मै अस्य यजमानस्य 'सव्यं वाहुम् अनु लक्षीकृत्य वामभागे इति यावत्
'चरुस्थाल्यौ' मांसौदनयोः 'मेक्षणे अन्नाद्यावर्तनसाधने 'कंसम्' अन्नद्याधारभूत
कांस्यपात्रम् 'दीम्' परिवेशनसाधनम्' 'उदकम्' च 'एकैकशः' क्रमात् 'पाहरन्ति'
आहृत्य स्थापयेयुः ॥ १६ ॥
भापा०-यजमान के वाई ओर मांस, चरुकी दो हांढ़ी, दोनों के
चलौने और जल ले रक्खे ॥ १६ ॥
पत्नी बर्हिषि शिलां निधाय स्थगरं पिनष्टि तस्या-
त्रैवाञ्जनं निघृष्य तिस्रो दर्भपिञ्जूलीरञ्जूति सव्यन्तरा-
स्तैलञ्चोपकल्पयेत् क्षौमदशाञ्च ॥१७॥१८॥१६॥२०॥
'पत्नी यजमानस्य 'बर्हिषि' कुशोपरि 'शिला' पेपणाधारभूतां 'निधाय
संस्थाप्य, तत्र 'स्थगरं चन्दनादिकं गन्धद्रव्यं 'पिनष्टि' पेषणं कुर्यात् । किञ्च
'तस्याम् एव शिलायाम् 'अञ्जन' सौवीरं 'निवृष्य' वर्षयित्वा तेन 'तिप्रदर्भ-
पितलीः' 'स-व्यन्तरा:' व्यन्तरः पुनःपुनरवकाशः, तत्सहिताः कृत्वा 'अञ्जति'
अजेत् । 'च' अपि 'तैलम्' 'उपकल्पयेत्' करतलमदर्दनादिना पेपणेनैव वा तिला-
नाम् । क्षौमदशा' क्षुमनिर्मित वसनस्य 'दशां' प्रान्तस्थितदशास्थसूत्रम् 'च'अपि
'उपकल्पयेत्' क्षौमवसनप्रान्ततो निष्कास्य रक्षेत् ॥ १७ ॥ १८॥ १९ ॥ २०॥

१९२ गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- NE भाषा०-यजमान की स्त्री बिछाए हुए कुश के ऊपर शिना रक्ख', उस पर चन्दनादि पीसे । एवं उस में 'अञ्जन' घिस कर, उस से तीन दर्भ- पिंजूली थोड़ी २ दूर पर रंगे। उसी शिला पर तेल भी तैय्यार करे एवं रेश्मी कपड़े के किनारे से सूत निकाल कर रकग्वे ॥ १७, १८, १६, २० ॥ शुचौ देशे ब्राह्मणाननिन्द्यानयुग्मानुदङ्मुखानुपर्वश्य दर्भात प्रदायोदकपूर्व तिलोदकं ददाति पितुर्नाम गृहीत्वाऽसावेतत्ते तिलोदकं ये चात्र त्वा ममुयाश्च त्व मनु ते स्वधेति॥२१॥ 'शुचौ देशे' पवित्रे स्थाने (कर्पूणां 'दक्षिणत एव, यथा च तेषामग्रत एव क—पिण्डाः स्युः ) 'अनिन्द्यान्' पाङ्क्तेयान्' 'अयुग्मान्' त्रीन् 'ब्राह्मणान्' 'उदङ्- मुखान्' 'उपवेश्य' तेभ्यो 'दर्भान् श्रासनार्थ 'प्रदाय' 'पितुः स्वस्य 'नाम' 'गृही त्वा' "असावेतत्त”-इत्यादिकमन्त्रेण 'उदकपूर्व' उदकदानपूर्वम्, 'तिलोदकम् तिलैमिश्रित मुदकं 'ददाति' दद्यात् ॥ २१ ॥ भाषा०--गड़हे के दक्षिण में कुशासन पर तीन अनिन्द्य ब्राह्मगों को उत्तर मुंह बिठला कर अपने पिता का नाम धर, एक ब्राह्मण के हाथ में थोड़ा जल देकर "असावेतत्ते"- -मन्त्र से तिल मिला जलदान देये ॥ २१ ॥ अथ उपस्पृश्यैव मेवेतरयोः ॥ २२ ॥ 'इतरयोः' स्वपितामहप्रपितामहयोः प्रतिनिधिब्राह्मणयोः अपि 'एव मेव' उदकपूर्वं तिलोदकदानम्, परम् 'अप उपस्पृश्य' जलस्पर्शनं कृत्वा । एकस्मै ब्राह्म- माय स्वपितृनामोच्चारणपूर्वक मुदकदानं त मनु तिलोदकदानञ्च कृत्वा ततो जल- स्पर्शनं इस्तधौतं कृत्वैवापरस्मै द्वितीयब्राह्मणाय स्वपितामहनामोच्चारणपूर्वक मुद- कदानं त मनु तिलोदकदानञ्च प्रकृत्य ततः पुनरपि जलम्पर्श प्रकृत्य तृतीयवाझ- णाय स्वप्रपितामहनामोच्चारणपूर्वक मुदकदानं तमनु तिलोदकदानच कुर्यादितिर२ भाषा-पितामह और प्रपितामह के प्रतिनिधि स्वरूप अन्य दोब्राह्मणों को इसी प्रकार हाथ धो २ कर प्रत्येक को तिल, जल दान करे ॥२२॥ तथा गन्धान ॥२३ अग्नौ करिष्यामीत्यामन्त्रण होव्यतः॥२४ ६०४ खं० २-३ सू० २२.२५।१-२] अन्वष्टक्यम् ॥ १९३ . 'गन्धान्' अपि तेभ्यः 'तथा' एव दद्यात् ॥ २३ ॥ 'होष्यतः' होम कारभ्यतो यजमानस्य "अग्नौ करिष्यामि" 'इति' उक्त्या 'श्रामन्त्रणं कर्तव्य मिति ॥२४॥ भाषा-उन्हें उसी प्रकार गन्धादि भी देवे ॥२३॥ होम करने के पहि ने यजमान उन तीनों ब्राह्मणों को पूछे कि-अग्निमें पितृगण की अर्चना करूं'। कुर्वित्युक्ते कसे चरू समवदाय मेक्षणेनोपघातं जुहुयात् स्वाहा सोमाय पितृमत इति पूर्वा स्वाहाग्नये कव्यवाहनायेत्युत्तराम् ॥ २५ ॥ २॥ तैः आमन्त्रितब्राह्मणैः "कुरु" इति' 'उक्त' होमकरणे प्रवृत्तो यजमानः 'कंसे' कांस्यपात्रे 'चरू' श्रोदनचरुं मांसचरुञ्च 'समवदाय' एकीकृत्य 'मेक्षणेन' तदीयं किञ्चिद् गृहीत्वा 'उपवातं जुहुयात् उपघातनामहवनं यागारम्भसूचकं होमं कुर्यात् । तत्र 'पूर्वाम्' पाहुति "स्वाहा सोमाय पितृमते”-इति, 'उत्तराम्' आहुतिं "स्वा- हाग्नये कव्यवाहनाय”-'इति ॥ २५ ॥ २ ॥ इति गोभिलगृह्मसूत्रे चतुर्थप्रपाठके द्वितीयखण्डस्य व्याख्यानं समाप्तम् ॥४॥२॥ भाषा--तीनों ब्राह्मण एक वाक्य से 'कगे' ऐसा कहें । कांसे के वर्तन में मांसचरू और प्रोदनचरु में से मेक्षगा से थोड़ासा एकत्र लेकर उपघात होम करे । उनमें से "स्वाहा सोमाय पितृमते” मन्त्रसे प्रथम आहुति देवे और स्वाहाग्नये कव्यवाहनाय" से दूसरी आहुति ॥ २५, २ ॥ गोभिलगृह्यसूत्रके चतुर्थ प्रपाठकके द्वितीय खण्डका अनुवाद पूग 'हुआ ४।२ अत ऊर्ध्व प्राचीनावीतिना वाग्यतेन कृत्यम् ॥ १ ॥ 'अतः ऊर्ध्वम्' इत श्रारभ्य अन्वष्टक्यसमाप्ति यावत् । 'प्राचीनावीतिना' दक्षिणस्कन्धत उपवीतं धृत्वा, 'चाग्यतेन' नियतवाग् भूत्वा 'कृत्यम् एतदन्वष्टक्यं नाम कार्य मिति ॥ १ ॥ भाषा-इसके पश्चात् 'अन्वष्टका' कार्य की समाप्ति तक जो २ क्रियायें करनी हों उन में प्राचीनावीति' होकर करे और संयत् वाक् होकर रहै ॥ १॥ सव्येन पाणिना दर्भपितली गृहीत्वा दक्षिणानां लेखा मुल्लिखेदपहता असुरा इति ॥ २!! तब यजमान १९४ गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- , 'सव्येन, वामेन 'पाणिना' 'दर्भपिञ्जली' स्वस्तरात् 'गृहीत्वा' दक्षिणे पाणी "अपहता असुरा रक्षासि दिषदः” ॥ ३५ ॥ (म० प्रा० २, ३, ३)-इति मन्त्रेण 'दक्षिणाम्रो लेखाम्' तयैव पितल्या 'उल्लिग्वेत' तासु करिवति ॥ २ ॥ भाषा-वायें हाथ में 'स्वस्तर' से एक 'दर्भ पिञ्जूनी' लेकर दाहिने हाथमें लेते हुए, "अपहता असुरा' से तीनों कपू से क्रमशः दक्षिण मुंह रेखा करे ॥२॥ सव्येनैव पाणिनोल्मुकं गृहीत्वा दक्षिणार्दै कर्षणां निध्याये रूपाणि प्रतिमुश्चमाना इति ॥ ३ ॥ 'सव्येन एव पाणिना' 'उ.मुकं ज्वलदग्निं 'गृहीत्वा' श्रानीय दक्षिणे पाणी 'कर्पूणां' तासां मध्ये 'दक्षिणार्दै' (तथा च रेखापातमुखे इति फलितम् ) "ये रूपाणि प्रति मुन्चमाना असुराः सन्तः स्वधया चरन्ति । परा पुरो निपुरो ये भर- न्त्यग्निष्ठांल्लोकात् प्रणुदत्वस्मात्" ॥४॥ ( म० प्रा० २, ३, ४) इति मन्त्रं सर्व- त्रैव पठन् तं हस्तस्थ मुल्मुकं 'निध्यात्' स्थापयेत् ॥ ३॥ भाषा-वायें हाथ से जलती आग ले दहिने हाथ में रक्ख, कर्पू आदि के बीच रेखा पात के अगले भाग में "ये रूपाणि" मन्त्र से स्थापन करे ॥३॥ अथ पितनावाहयत्येत पितरः सोम्यास इति ॥ ४ ॥ 'अथ' अनन्तरम् । तत्रैव "एत पितरः सोम्यासो गम्भीभिः पथिभिः पूर्वि- णेभिः । दत्तास्मभ्यं द्रविणेह भद्र रयिं च नः सर्ववीरं नियच्छत" ॥५॥ (म. ब्रा० २, ३, ५) इति' 'पितृन्' पितामहप्रपितामहान् यथाक्रमेण 'आवाहपति' आवाहयेदिति ॥१॥ भाषा-फिर उन्हीं तीन कषूओं से एक ही समय पिता, पितामह, और प्रपितामह, तीनों को "एत पितरः" मन्त्र पाठानुसार आवाहन करे ॥४॥ अथोदपात्रान् कद्देषु निध्यात् ॥ ५॥ 'अथ' आवाहनानन्तरम्, 'कर्तेषु' 'उदपात्रान्' त्रीन् एकैकक्रमेण 'निदध्यात्' स्थापयेदिति ॥ ५॥ भाषा-इसके पश्चात् उन कर्पूशादि में एक २ जलपान रकखे ॥ ५ ॥ ह प्र.४ ख.३सू०३-९] अन्वष्टक्यंकर्म ॥ भाषा-वायें ६ सव्येनैव पाणिनोदपात्रं गृहीत्वासलवि पूर्वस्यां की दर्भेषु निनयेत् पितुर्नाम गृहीत्वासाववनेनिश्व ये चात्र स्वा मनु याश्च स्व मनु तस्मै ते स्वघेति ॥ ६ ॥ 'सव्येन एव पाणिना' 'उदपात्रं' इतः पूर्वमेव स्थापित मुदकपात्रं 'गृहीत्वा' तदुदकपात्रस्थं जलम् 'अवसलवि' दक्षिणहस्तवृद्धाअष्टमूलेन पितृतीर्थेन पथा 'पितुर्नाम गृहीत्वा' स्वपितृनामग्रहणपूर्वकं “असाववनेनिक्ष्व" इति मन्त्रं पठन् 'पूर्वस्या कवी' पातिता ये दर्भाः, तेषु 'दर्भेषु' 'निनयेत्' आहूतं पितरं प्रापयेदिति। हाथ से कर्पूके पास रक्खे हुए जलपात्र को लेकर दहिने हाथके अंगूठे की जड़ से जल को पिता का नाम लेकर "असौ अवनेनिक्ष्व" इत्यादि मन्त्र पढ़ कर पहिले से रक्खे हुए कर्पू के ऊपरदर्भ में श्राहूत अपने पिता को प्राप्त करावे, इसी को 'निनयन' कहते हैं। अप उपस्पृश्यैव मेवेतरयोः ॥ ७॥ 'इतरयोः' पितामहप्रपितामहयोरर्थयोरपि निनयनम् ‘एवमेव' कार्यम् अप- रयोः कार्यथाक्रमेणेति । तत्र च प्रतिवारम् अप उपस्पर्शनं कर्त्तव्यमिति ॥ ७ ॥ भाषा-पितामह और प्रपितामह के उद्देशसे भी इसी प्रकार 'निनयन' प्रतिवार जल स्पर्श करे । पितृ निनयन के पीछे हाथ धोकर 'पितामह निनयन' करे, फिर हाथ धोकर प्रपितामह के लिये निनयन करे ॥७॥ सम्येनैव पाणिनादर्वी गृहीत्वा सन्नीतात् तृतीय- मात्र मवदायावसलवि पूर्वस्यां का दर्भेषु निद्ध्यात् पितुर्नाम गृहीत्वासावेष ते पिण्डोये चात्र त्वा मनुयाश्च व मनु तस्मै ते स्वधेत्यप उपस्पृश्यैव मेवेतरयोः ।।८।। यथा पूर्व निनयनं कृतम् वथैव तिसृष्वेव कपूषु पिण्डदानञ्च कार्य मिति फलितार्थः । अत्र मन्त्रे "असावेष ते पिण्डः" इत्येव विशेषः । पूर्वस्थापितां 'द- चीम्' । 'सन्नीतात्' पूर्व कांस्यपात्रे श्रोदनचस्मीसचरुश्च सन्नीतः, तस्मात् । 'तृती- यमात्रम्' एकतृतीयांश मिति ॥८॥९॥ करे, परन्तु

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम् -
WR
के
.
भाषा-पूर्वगृहीत कांसे के पात्र में मिला हुआ चरु दवी से काटकर तीन
भाग करे और एक २ कर क्रम से
हाथ
धो २ कर कुश ऊपर अपने पिता
का नाम लेकर "असावेष ते पिण्डः-मन्त्रसे क्रमसे तीन पिण्ड देवे ॥८॥
यदि नामानि न विद्यात् स्वधा पितृभ्यः पृथिवीषद्भ्य
इति प्रथमं पिण्डं निदध्यात् स्वधा पितृभ्योऽन्तरिचसद्भ्य
इति द्वितीय स्वधा पितृभ्यो दिविषद्भ्य इति तृतीयम्॥१०॥
'यदि' 'नामानि' पित्रादीनाम्' 'न विद्यात? तहि 'प्रथमं पिगड "स्वधा."-
'इति मन्त्रेण निदध्यात्' तत्र कपूमध्येपूर्ववदित्येव; 'द्वितीय' पिराई "स्वधा." इति'
मन्त्रेण निदध्यादित्येव;-तृतीयं पिण्डं 'स्वधा."-इति मन्त्रेण निदध्यादित्येव॥१०॥
भाषा-यदि पिता का नाम स्मरण न हो, तो पहिला पिण्ड पृथिवास्थायी
पितृगण के लिये, द्वितीय अन्तरिक्ष स्थायी पितृगण के लिये एवं तृतीय
धुनोकस्य पितृगण के लिये कपूओं के बीच पूर्वोक्तानुसार रक्खे ॥ १० ॥
निधाय जपत्यत्र पितरो मादयध्वं यथाभाग मावृषा.
यध्व मित्यपर्यावृत्त्य ॥१२॥ पुरोच्छ्वासादर्भिपर्यावर्तमा-
नो जपेदमी मदन्त पितरोयथाभाग मा वृषायिषतेति ।१२।
पिण्डान् त्रीनेव तिसृपु कपूंषु यथोपदिष्टं निधाय' 'अपर्यावृत्य पर्यावत्तनं
वर्जयित्वा एकत्रैव स्थितो यजमान: "अत्र पितरो मादयध्वं यथाभागमावृषायचं'
॥६॥ (म० प्रा० २, ३, ६) इति मन्त्रं जपति' जपेदिति ॥११॥ 'उच्छ्वासात'
नासिकया श्वासत्यागात् 'पुरा' प्रागेव 'अभिपर्यावर्त्तमानः' 'तिसः कपूः अभि-
व्याप्य 'परि' सर्वतः (अनुल्लम्फेनेति भावः) 'आवर्तमानः' श्रावर्तनं कुर्वाणो यज-
मानः "श्रमी मदन्त पितरो यथाभागमावृषायिपत' ॥७॥ (म. ब्रा० २,३,७)
'इति'इमं मन्त्र जपेत् अभिपर्यावर्तनचैतद्वामत एव पैत्रे सव्यस्यैव सर्वत्र विधानात् ।
भाषा-तीन गड़हों में पूर्वोक्त रीति से रखने पर यजमान एक स्थान में
कर "अत्र पितरः मन्त्र पढ़े । ११ एक निःश्वास के काल की वरावर
बाई ओर से गड़हे आदि की परिक्रमा कर "श्रमी मदन्त मन्त्रको पढ़े ॥१२॥

प्र० ४ खं० ३ सू०१०-२१] अन्वष्टक्यकर्म ॥
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।
सव्येनैव पाणिना दर्भपिञ्जूलीं गृहीत्वावसलवि पू.
वस्यां का पिण्डे निध्यात् पितुर्नाम गृहीत्वासावेतत्त
प्राञ्जनं ये चात्र त्वा मनु याश्च त्व मनु तस्मै ते स्वधे-
त्यप उपस्पृश्यैव मेवेतरयोः ॥ १३ ॥ १४ ॥
यथा पूर्व निनयनं पिण्डदानञ्च कृतम्। तथैव 'दर्भपितली पत्न्या सौवीराज-
नेनाक्तां स्थितां क्रमतोऽप उपस्पृश्य पिण्डानामुपरि दद्यादिति। तदत्र मन्त्रे "असा
चेतत्त श्राञ्जनम्"-इत्येव विशेषः ॥ १३ ॥ १४ ॥
भाषा-वाये हाथमें उस अञ्जन से रंगे कुशकी तीन पिंजूली लेकर
दहिने हाथके अंगूठे की जड़से पूर्व आदि तीन गड़हों में स्थित तीन पिण्ड
पर एक २ क्रमसे "असावेतत् त भाजनम्' मन्त्रसे प्रदान करे । और प्रथम
और २ रे पिण्ड पर पिजूली देने पर एक २ वार हाथ धोवे ॥ १३,१४ ॥
तथा तैलं तथा सुरभि ॥ १५ १६ ॥
'तया' पिञ्जलीदानोक्तप्रकारेणैव 'तैलं' पत्न्यापादितं तेनैव मन्त्रेण तास्वेव
कर्पूपु दद्यात् । किञ्च 'तथा' तेनैव प्रकारेण 'सुरभि पल्या' रिष्टं स्थगरं तेनैव
मन्त्रेण तास्वेव कर्पूषु दद्यात् । पर मुभयत्रैव 'असावेतत्ते तैलम्'- इति, "असावे-
ततेसुरभि"-इति चोहनं कर्त्तव्य मेव ॥ १५ ॥ १६ ॥
भाषा-तब पिजूनी दानके अनुसार इस मन्त्र से उस २ के ऊपर
तैन, सुगन्धि चन्दनादि प्रदान करे । मन्त्र में विशेषता यह होगी कि
'श्राञ्जन' शब्द के बदले 'तैल' और 'सुरमि' शब्द व्यवहृत हांगे ॥१५॥१६॥
अथ निन्हुते पूर्वस्यां कर्धा दक्षिणोत्तानो पाणी
कृत्वा नमो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः शूषायति
मध्यमायासव्योत्तानो नमो वः पितरो घोराय नमो वः
पितरो रसायेत्युत्तमायां दक्षिणोत्तानो नमो वः पितरः
स्वधायै नमो. वः पितरो मन्यव इत्यथाञ्जलिकृतो जपति
नमो वः पितरः पितरो नमो व इति॥१७॥१८॥१६॥२०॥२१॥

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- 'अथ' सुरभिदान नन्तरं 'निन्हुतेनिन्हवर्म नमस्करण कार्यमिति । तत्र 'पूर्वन्न स्याम्' 'उत्तमाया' च 'की 'दक्षिणोत्तानौ' 'पाणी' कृत्या' 'मध्यमायां' तु 'सव्योत्तानौ' पाणी कृत्वा' ततो तिसृष्वेव कर्पष्वेकदैव 'अञ्जलिकृतः' जपति जपेत यथाक्रमेण चतुरो मन्त्रान् “नमो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः शूपाय ८ नमो वः पितरो घोराय नमो वः पितरो रसाय ॥९॥ नमो वः पितरः स्वध नमो वः पितरो मन्यवे ॥ १०॥ नमो वः पितरः पितरो नमो वः ॥ ११॥(म ब्रा० २, ३, ८-11)-इत्यादिकानिति ॥ १७--२ ।। भाषा-अनन्तर पहिला पिण्ड पर दक्षिणोत्तान दोनों हाथ (दक्षिणा कर तल ऊपर को रहे एवं उसके ऊपर वायां करतल नीचे को हो) फिर मध्यम पिण्ड पर वायां करतल ऊर्द्ध मुख और उस पर दक्षिण करतान्न अधो मुख और शेष पिण्ड पर, पुनः दक्षिणोत्तान दोनों हाथ पर सब के अन्त में समस्त पिण्ड लक्ष्य कर अञ्जलि पूर्वक “नमो वः' इत्यादि चार वार नमस्कार करे ॥ १७ ॥ १८ ॥ २६ ॥ २० ॥ २१ ॥ गृहानवेक्षते गृहान् नः पितरो दत्तेति ॥२२॥ पिण्डा. नवेक्षते सदो वः पितरो देष्मेति ॥ २३ ।। ततः 'गृहान्' स्वगृहिणीम् 'अवेक्षते; "गृहानःपितरो दत्त" ॥२॥(म०मा. २,३,१२)-'इति' मन्त्रं पठन्निति ॥ २२॥ ततः सदो वः पितरो देम" ॥ १३ ॥ ( म०ब्रा० २,३, १३)-'इति' मन्त्रं पठन् 'पिएडान्' तानेव अवेक्षतेति ॥ २३ ॥ भाषा-अनन्तर "गृहान्न” मन्त्र पढ़ कर गृहिनी को देखे ॥ २२ ॥ इसके अनन्तर 'सदोवः पितरों मन्त्र से पिण्ड प्रादि देखे ॥ २३ ।। सव्येनैव पाणिना सूत्रतन्तुं गृहीत्वावसजवि पूर्वस्यां को पिण्डे निदध्यात् पितुर्नाम गृहीत्वासावेतत्ते वासो ये चात्र स्वा मनु याश्च त्व मनु तस्मै ते स्वधेत्यप उप- स्पृश्यैव मेवेतरयोः॥ २४, २५ ॥ सम्पादिता क्षौमदशा, त एव एकैकं - 'सूत्रतन्तुं 'गृहीत्वा' पूर्वादिषु प्र० ४ खं०३ सू०२३-२९] अन्वष्टक्यंकर्म ॥ कर्तेषु क्रमात् पित्रादिनामग्रहणपूर्वकं निदध्यात् । मन्त्रे तु "एतद्वः पितरो वासः', ॥१४॥-इत्येव विशेषः । अत्रापि द्वितीयतृतीययोरप उपस्पर्शनं कार्य मेव । २४,२५ भाषा-पत्नी द्वारा बने रेशमी कपड़े के किनारे से एक २ सूत लेकर पूर्वादि गड़हे क्रम से पिता आदि के नाम ले २ कर “एतद्धः०” मन्त्र से पिण्ड आदि के ऊपर प्रदान करे ॥ २४ ॥ २५ ॥ सव्येनैव पाणिनोदपात्रं गृहीत्वावसलवि पिण्डान् परिषिश्चेदर्ज वहन्तोरिति ॥२६॥ मध्यमं पिएडं पुत्रकामा प्राश्नीयादाधत्त पितरो गर्भ मिति ॥ २७ ॥ 'उदपात्रं' पूर्वमेव स्थापितं तत् 'सव्येनैव पाणिना गृहीत्वा 'अवसलवि' पितृतीर्थेन "उर्ज वहन्ती रमृतं धृतं पयः कीलालं परिस्रुत स्वधास्थ तर्पयत मे पितॄन्" ॥१६॥ (म० ब्रा० २, ३, १५)-'इति' मन्त्रेण 'पिण्डान्' त्रीन् एकदैव 'परिषिञ्चेत् ॥२६॥ 'पुत्रकामा पत्नी' "श्राधत्त पितरो गर्भ कुमारं पुष्करस्रजम् । यथेह पुरुषः स्यात् ॥१६॥ (म. ब्रा० २, ३, १६) 'इति' मन्त्रं पठती 'मध्यम पिण्डम्' समग्रं तदीयं किञ्चिदंशं वा 'प्राश्नीयात्' ॥२७॥ भाषा-पूर्व स्थापित जल पात्र को वाये हाथ में लेकर पहिले की नाई 'पितृतीर्थ' मार्ग से अंगूठे से एक ही वार में तीन पिंड पर 'ऊज वहन्ता' मन्त्र से परिषिञ्चन करे ॥ २६ ॥ पुत्र की कामना वाली पत्नी 'पाधत्त' मन्त्र का पाठ कर मध्यम पिण्ड को सत्र, या थोड़ा भक्षण करे ।। २७ ॥ यो वा तेषां ब्राह्मणाना मुच्छिष्टभाक स्यात् ॥२८॥ अभून्नो दूतो हविषो जातवेदा इत्युल्मुक मद्भिरभ्युक्ष्य द्वन्द्वपात्राणि प्रक्षाल्य प्रत्यतिहारयेत् ॥ २६ ॥ 'उच्छिष्टभाक्' दौहित्रः श्रद्धासमन्वितश्च । प्राश्नीयादित्येव ॥२८॥ "अभूलो दूतो हविषो जातवेदा अवाढव्यानि सुरभीणि कृत्वा । प्रादात् पितृभ्यः स्वधया ते अक्षन् प्रजाननग्ने पुनरेहि योनिम्" ॥१७॥ (म० प्रा० २, ३, १७) 'इति' मन्त्रं पठन् 'उल्मुक' कबूंदक्षिणार्द्ध स्थापितम् 'अद्भिः' 'अभ्युक्ष्य' तदीयेनैव भ- . गोमिलगृह्यसूत्रटीकायाम्-- स्मना 'इन्द्वं यथा स्यात् तथा 'पात्राणि' चरम्याल्यादीनि 'प्रक्षाल्य' 'प्रत्यतिहा. रयेत्' श्रानयेत् शिष्यादिनेति ॥२९॥ भापा-उन ब्राह्मणों के उच्छिष्ट खाने वाले जो काई हों, वे भी इन २ पिण्डों को समस्त या कुछ अंश खा सकते हैं 11 २८॥ "अभून्नो" मन्त्र को पढ़ कर गड़हे आदि के दक्षिणार्द्ध में रखा इंगोरा पर जान छिड़के एवं उस भस्म पर चरुस्थाली पात्र प्रादि को धोकर लावे ॥२६॥ अप्सु पिण्डान्त्सादयेत् प्रणीत वाग्नौ ब्राह्मणं वा भोजयेद् गवे वा दयाद् ।।३०, ३३॥ वृद्धिपूर्सेषु युग्मानाश- येत् प्रदक्षिण मुपचारः॥३४, ३५॥ यवैस्तिलार्थः॥३६॥३।। तान् त्रीनेव 'पिण्डान्' भुक्तशेषान् वा पिण्डांशान् 'अप्सु' नद्यादिपु 'साद- येत्' निक्षिपेत् । 'वा' अथवा 'प्रणीते अग्नौ' तत्रैव मादयेदित्येव, 'वा' अथवा ब्राह्मणे' यं कमपि क्षुधातुरं 'भोजयेत्' । 'वा' अथवा 'ग' यस्यै कस्यै चिद् दया- दिति समाप्त मन्वष्टक्यम् । ३०-३३ ! श्राद्धप्रसङ्गात् वृदध्यादिपु विशेष मुप- दिशतिः-वृद्धिः शरीरथदध्यनुसारतः सम्पाद्या अन्नप्राशनादिका, पूसांस्तु वापीकृ- पतड़ागादया, तेष्वपि कर्तव्येषु तत्तत्कर्मणः प्रागेव अन्वष्टक्यवत् पित्रीनं कर्तव्य मिति । विशेषतस्तु तेषु 'युग्मान्' प्राह्मणान् ‘ाशयेत्' इह तु प्रयुग्मान्-इत्यु- क्तम् (प्र० ४ खं० २ सू० २३) किन इहोपचारे 'सय्यम्' इत्युक्तम् (प्र.४ खं० २ सू० ७) वृद्धध्यादिषु तु 'प्रदक्षिणम्' यथा स्यात् तथा 'उपचारः' कर्तव्यः इति । ३४, ३३ अथ तेषु व्यातिदेश उच्यते । तिलैः यः अर्थः प्रयोजनं भवेत, यवैः अपि स एवार्थः सिद्धेदिति । ३६ ॥ ३॥ इतिगोमिलगृह्यसूत्रेचतुर्थप्रपाठके तृतीयस्खएखस्यव्याख्यानसमासम् ॥ ३ ॥ भाषा-उन सब पिण्डों को जल में फेक देवे.या उसी अग्नि में डाले या किसी भूखे ब्राह्मण को भोजन करावे, या किसी गौ को खिलाये । वृद्धि और पूर्व ** के उपलत में पितृलोक की अर्चना समय भी पूर्वोक्त सव अनुष्ठान करें । विशेषता-अन्वष्टका कार्य में १,३ आदि बेजोड़ ब्राह्मण और वृद्धि अनुसार अन्नप्राशन आदि सरकार || वापी, कूप, तालाब मादि का खोदवाना ॥

प्र० ४ खं०३-४ सू० ३०-३६॥ १-८] अन्वष्टक्यपिण्डपितृयज्ञश्च ॥
की व्यवस्था है, यहां २, ४ आदि जोड़े ब्राह्मण भोजन करावे एवं अन्वष्ट
का कार्य में वामावर्त में चरु पाक करने का नियम है, यहां दक्षिणा वर्ग में
चरु पाक करे॥तिलसे जो२ कार्य कहे गये हैं,यवसे भी वे कार्य होंगे॥३४-३६॥
गोभिलगृह्यसूत्र के चतुर्थप्रपाठक के तृतीयखण्ड का भाषानुवाद पूराहुआ ॥३६॥
अन्वष्टक्यस्थालीपाकेन पिण्डपितृयज्ञो व्याख्यातः॥१॥
'पिण्डपितृयज्ञः' पिण्डं शरीरं, भस्मीभूतं तदुपलक्ष्य यत् पितृपुरुषस्यार्चनम्,
तदेव कर्म पिण्डपितृयज्ञइत्युच्यते । स च यज्ञोऽनेनैव पुरस्तादुक्तेन अन्वष्टक्यवि-
हितेन स्थालीपाकेनैव 'व्याख्यातम् । तत्र स्थालीपाकनियमो यथा विहितः, अ-
त्रापि तथैवेत्यतिदेशः॥१॥
भाषा-अन्वष्टका कार्य में स्थाली पाक की व्यवस्था के समान पिण्ड
पितृ यज्ञ में भी जानना ॥१॥
अमावास्यायां तच्छाद्धम् ॥२॥इतरदन्वाहार्य मासी-
नम्।।दक्षिणाग्नौ हविषः सस्करणं ततश्चैवातिप्रणयः॥४,५
'तत्' पिण्डपितृयज्ञं कर्म 'श्राद्धम्'-इत्याचक्षते, 'अमावास्यायाम् पित्रा-
दिमरणानन्तरं प्रथमाया मेव वर्षमध्ये यस्यां कस्याश्चिद्वा कर्त्तव्यम् ॥२॥ 'इनरत्'
अपर मपि श्राद्धम् , 'मासीनम्' मासि मासि क्रमेण संवत्सरं यावत् 'अन्वाहा-
र्यम्' प्रथम मनु प्रथम मिव व्यवहार्यम् ॥ ३ ॥ श्राहिताग्नेरिति ॥ ४॥५॥
भाषा-उस पिण्ड पितृयज्ञ-श्राद्ध को पिता आदि के वियोग होने पर,
प्रथम अमावास्या को करे, ॥२॥ न होने से वर्षकी किसी अमावास्या को
करे अपर ११ अमावास्या को भी ११ श्राद्ध इसी प्रकार करे ॥ ३ ॥ आहि-
ताग्नि यजमानगण, इस श्राद्ध के इवि को, दक्षिणाग्नि में संस्कृत करें और
उसी में पूर्वोक्त अग्नि प्रणयन करें ॥ २-३४-५ ॥
शालानावनाहिताग्नेः ॥६॥ एका कः ॥७॥ तस्या
दक्षिणतोऽग्ने स्थानम् ॥ ८॥

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - मनाहिताग्नेः 'शालाग्नी' गृह्याग्नौ पुत्र ॥६॥ नात्रान्वष्टक्यवत् कर्तत्रयमिति भावः ॥७॥ तस्याः कः । नान्वष्टक्यवत् पूर्वत इति भावः ॥८॥ भाषा-अनाहिताग्नि के गृह्मग्नि में वह कर्म होगा ॥ ६॥ यहां अन्य टका कार्य की नाई तीन कपू न होंगे, ॥७किन्तु एक ही कर्पू होगा कपू के दन्तिगा में अग्निस्थान होगा; अन्वष्टका की नाई कपू के पूर्व भाग में ८ नात्रोल्मुकनिधानं न स्वस्तरोनाञ्जनाभ्यञ्जने नसुरभि न निन्हवन मुदपात्रान्तो वासस्तु नियात् ॥६-१५ ॥ 'अ' पिगडपितृयज्ञे अन्वष्टस्यवत् 'उल्मुकनिधानं 'स्वस्तर', 'अञ्जनाभ्यञ्जने', 'सुरमि' 'निहवनं च 'न' भवति, ततश्च 'उदपात्रान्त.' एवासौ यज्ञः, 'तु' अपि अत्र 'वासः निदध्यात्' न अन्वष्टक्यवत् दशासूत्रमिति समाप्ता प्रासंगिकीकथा९-१५ भाषा-इम पिएड पितृ-यज्ञ में अन्वष्टका कार्य की नाई "उल्मुक निधान,” "स्वस्तर," "अञ्जनाभ्यन्नन,” "सुरभिदान," और "निह्नवन' न करे सुतगं यह उदपात्रान्त ही समाप्त होगा, एवं इस में पिण्ड पर अन्व- का कार्य की नाई सूत न देकर बस्त्र डालना चाहिये ॥६-१५ ॥ माध्या ऊर्ध्व मष्टम्यां स्थालीपाकः ॥ १६ ॥ माघमासीयपौर्णमास्याः परस्तात् कृष्गाष्टम्यां तृतीयाष्टका शाकाष्टकास्या कसंख्या, तत्र म्धालापाकः पूर्ववत् पक्तव्यः ॥ १६ ॥ भाषा--माघी पूर्णिमा के पीछे कृष्णाष्टमी तिथिको “शाकाटका"नामक तृतीय प्रष्टका करे और उसमें भी पूर्ववत् स्थानीपाक करे ॥ १६ ॥ तस्य जुहुयादष्टकायै स्वाहेति जुहोति स्थालीपाका- वृतान्यछाक व्यञ्जन मन्वाहार्यम् ।। १७,१८,१६, २० ।। सर्व पूर्ववत् , विशेषतस्त्विह 'शाकं' नाम 'व्यम्जन' भोजनोपकरणम् स्वाहार्यम्' भवेदिति शाकाटका.-२० ॥ भाव-स्थालीपाकको कुछ अंशसे अष्टकायै स्वाहा से होम करे अन्यान्य कार्य स्थालीपाकके से होंगे। विशेषतः इसमें शाक व्यञ्जन नावे ॥१७-२०॥ -

प्र.४ खं० ४ सू०९-२६] पिण्डपितृयज्ञः शाकाष्टका च ॥
R
अथ पितृदेवत्येषु पशुषु वह वपां जातवेदः पितृभ्य
इति वपां जुहुयाद्देवदेवस्येषुजातवेदो वपयागच्छ देवानि-
त्यानाज्ञातेषु तथादेशं यथाष्टकायै स्वाहेति जुहोति स्था.
लीपाकावृतान्यत् ॥ २१, २२, २३, २४ ॥
'अथ' अष्टकाविधानसमनन्तरम् । सर्वत्रैव 'पितृदेवत्येषु पशुपु' "वह वां
जातवेदः पितृभ्यो यत्रैन्वेत्थ निहितान् पराचः । मेदसः कुल्या अभितान्त स्रवन्तु
सत्या एषा माशिषः सन्तु कामात्" (स्वाहा)॥१०॥ (म० ब्रा० २, ३, १८)
इति मन्त्रेण,-'देवदेवत्येषु पशुषु “जातवेदो वपया गच्छ देवास्त्वहि होता
प्रथमो बभूव । सत्या वपा प्रगृहीता मे अस्तु समृध्यतां मे यदिदं करोमि"॥१८॥
(म० प्रा० २, ३, १९) इति मन्त्रेण,-'अनाज्ञातेषु' यत्र संज्ञप्यमानपशौ
देवता 'श्रा' सम्यक् न ज्ञाता, तादृशेषु, सन्दिग्धदेवत्येषु बहुदैवतेषु वा पशुषु
'तथादेशं तत्र तत्रैव यथा विहितं तथा विहितानुरूपेणैव मन्त्रेण 'वां जुहुयात्।
अनाज्ञातेषु मन्त्रप्रयोगदृष्टान्तं दर्शयति'-'यथा' "अष्टकायै स्वाहा"-'इति' म-
न्त्रेण 'जुहोति' अष्टकाकर्मणि श्रष्टकापशोश्च बहुदेवतात्वात् विवदमानदेवतात्वाद्वा
अनाज्ञातदेवदेवत्यत्वम् । वपाहोमे 'अन्यत्' सर्व 'स्थालीपाकावृता' स्थालीपाक-
रीत्यैव कार्यम् ॥ २१-२४ ॥
भाषा-जहां पितृगण के निमित्त पशु हनन करे, वहां “वह वपा' मन्त्र
से वपाहोम करे । जिस स्थान में किन्हीं देवता के लिये पशुहनन करे, वहां
"जात वेदो वपया” मन्त्र से वपा होम करे । जहां कर्त्तव्य कार्य के देवता
निश्चय में सन्देह हो कि यहां कौन देवता होवे वहां के लिये विशेष मन्त्र
कहा जाता है। ऐसे स्थानों में जो मन्त्र कहा जावे उसी मन्त्र से वपा होम
करे । जैसे 'अष्टका' "अष्टकायै स्वाहा” मन्त्र वपा होम में व्यवहृत होगा।
अन्यान्य सब कार्य स्थाली-पाक के नियम से होंगे ॥ २१, २२, २३, २४ ॥
ऋणे प्रज्ञायमाने गोलकानां मध्यमपर्णेन जुहुयात्कु-
सीद मिति । २५ । अथातो हलाभियोगः ॥ २६ ॥

२०४ गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- 'ऋणे प्रज्ञायमाने' स्वल्प मुखम्, ऋण मिति न ज्ञातं भवति, तदन्यत्र, ब- वृणे जाते इति यावत् । 'गोलकानां' पलाशानां (?) 'मध्यमपर्णेन' "यत कुसोद मप्रदत्तं मयेह येन यमस्य निधिना चराशि । इदं तदग्ने अनृणो भवामि जीवन्नेव प्रतिदत्ते ददानि" ॥ २०॥ (म० प्रा० २, ३. १९) 'इति' मन्त्रेण जुहुयात् ॥ २५ ॥ 'अथ' अनन्तरम् । 'प्रतः' प्रारम्भ हलाभियोगः' हलप्रयोग- उपदिश्यते इतिशेषः ॥ २६ ॥ भाषा-जब यह जाने कि ऋण बहुत हो गया, गया, तो “यत् कुम्मीदम्" मन्त्र का पाठ करके ऋण संख्यानुसार (जितना कर्ज हो) मध्यम पनाश पत्रका होम करे ॥ २५ ॥ अव हलप्रयोग का विधि कहा जाता है ॥२६॥ पुण्ये नक्षत्रे स्थालीपाक अपयित्वताभ्यो देवताभ्यो जुहुयादिन्द्राय मरुभ्यः पर्जन्यामाशन्यै भगाय ।२७ सी- तामाशामरडामनघाञ्ज यजेत ॥२८॥ स्पष्टम् ॥ २७ ॥ सीतादीनि चत्वारि कृपियन्त्राणि च पूजयेत् ॥ २८॥ भाषा-पुण्य नक्षत्र में कृषि कार्य में प्रवृत्त होका पहिले स्थानीपाक कर वक्ष्यमाण देवता आदि को आहुति देवेः “इन्द्राय स्वाहा" मन्त्र से देव राट को, *'मरुदभ्यः स्वाहा,' से मरुद् गण * को, 'पर्यन्याय स्वाहा' से पर्जन्य देव को ** अशन्यै स्वाहा' से अशनि देवता को 8 और 'भगाय * जो वृत्र (मेघ) के साथ युद्ध कर, बहुत बम फेक, उस असुर के (बलवान् मलाधार के) शरीर को खण्ड २ करते एवं शची (सब कमी के) पति, जिनके प्रभाव में सब क्रिया होती हैं (ऐश्वरीय बल विशेष) ** जो देवगण वृत्रासुर के साथ युद्ध काल में इन्द्र की सहायता करते है और पौड़े पर देह को खण्ड २ होने पर पृथिवी पर वेग पर वेग के साथ गिराते है ( वायु समूह ) । *** जो वेद में वृत्रासुर नाम से परिचित है (मेघ) * वन- वस्तुतः मेषाश्रित तेज मात्र को प्रानि कहते, जिसके प्रकारामान् श्योति को 'विद्युत, कहते हैं।

प्र० ४ खं० ४ सू० २७-३३] वपार्णयोहोंमोहलाभियोगश्च ॥ --- PRv.." स्वाहा' से भग देवता को ॥ २७ ॥ सीता, * ( हल का फाला) आशा, अरडा, अनघा की पूजा करे ।२८18888 एता एव देवताः सीतायज्ञखलयज्ञप्रवणप्रलवनपर्य यणेषु । २६ । आखुराजञ्चोस्करेषु यजेत ॥ ३० ॥ यदा 'सीतायज्ञः' सीतायाः लांगलपद्धतेश्चालनम्, 'खलयज्ञ' खलेशस्थादीनां मर्दनम् , 'प्रवपणम्' शस्यबीजानाम् , 'लवनम्' पक्वानां शस्यानां छेदनम् , 'पर्ययणम्' तृणवियुक्तधान्यादिशस्यानां गृहानयनम् ; अत्र सर्वत्रैव 'एता:' पूर्वो- क्ताः इन्द्रादयः 'एव' 'देवताः' स्मर्त्तव्याः ॥ २९ ॥ 'उत्करेषु' मूपिकास्थानेषु 'पा- खुराजञ्च' 'यजेत' तत्खाद्य दानेन तोषयेत् ॥ ३०॥ भाषा-जब हल चलावे, खलिहान में दौनी करे, खेत में बीज बोये, पके शस्य काटे जावें, एवं जिस समय तैयार अनाज घर में लावे; तब २ पूर्वोक्त इन्द्रादि देवता को स्मरण करे ॥ २६ ॥ पीछे शस्य आदि घर में रखने पर चूहे के बिल में भी मूस की तुष्टि के लिये कुछ अनाज देवे ॥३०॥ इन्द्राण्याः स्थालीपाकस्तस्य जुहुयादेकाष्टका तपसा तप्यमानेति ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ स्थालीपाकावृतान्यत् स्थाली- पाकावृतान्यत् ॥ ३३ ॥४॥ इन्द्राणीदेवतातोपणाय 'स्थालीपाकः' पक्तव्यः । पक्तस्य च तस्य' स्थालीपा कस्य अंशं गृहीत्वा "एकाष्टका तपसा तप्यमाना जजान गर्भ महिमान मिन्द्रम् । तेन देवा असहन्त शत्रून् हन्ता सुराणा मभवच्छचीभिः" ॥ २५ ॥ (म० वा. २, ३, २१)-'इति' मन्त्रेण जुहुयात्' । ३१, ३२ । 'अन्यत्' सर्वे यदत्रानुप- दिष्टं तत, 'स्थालीपाकावृता' स्यालीपाकरीत्यैव कार्यम् , न तत्र कश्चिदपि विशेष इति भावः। द्विरुक्तं खण्डसमाप्तिसूचक मिति हलाभियोगः ॥३३॥४॥ इति गोभिलगृह्यसूत्रेचतुर्थप्रपाठकेचतुर्थखण्डस्यव्याख्यानसमाप्तम् ॥॥॥ ***** भग शब्द ऐश्वर्य वाचक और कृपिही सब प्रकार के ऐश्वर्य की जड़ है अतएव जिस देवता के अनुग्रह से कृषि सुफल हो, उन्हीं को 'भग, देवता कहते (सूर्य) ।। * सीता प्रभृति चार ही खेती के यन्त्र होते हैं।

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम् - भाषा-अनन्तर इन्द्रागगी देवता की प्रसन्नता के लिये स्थानीपाक करे और परिपक स्थालीपाक में से थोड़ा लेकर "एकाष्टका नपसा"-से आहुति देवे ॥ ३१॥३२ ॥ अन्यान्य सब कार्य स्थालीपाक केसे करे ॥ ३३ ॥ गोभित्लगृह्यसूत्रके चतुर्थप्रपाठकक चतुर्थखगडका अनुवाद पृग हुआ ॥४, ४॥ काम्येष्वत ऊर्ध्वम्पूर्वषु चके ।। १, २ ॥ 'प्रत अवध्वं' यत् किञ्चिद्वक्ष्यमाणं तत्मर्व मेव 'काम्येषु' वेदितव्यम् । 'एके' प्रधानाः, गोभिलादयः पुनराचार्याः वक्ष्यमा मपि किचित् विरूपाक्षजपादिकम् 'पूर्वेषु' नित्यनैमित्तिकेयु 'च' म्बीकुर्वन्ति ॥ १, २ ॥ भाषा-अब काम्य कर्म को कहेंगे प्रधान प्राचार्यों के मन में वक्ष्यमागा विरूपाक्ष जप आदि कार्य, पूर्वोक्त नित्य नैमित्तिक कार्य में भी करें॥१२॥ पश्चादग्नेभू मो न्यञ्चौ पाणो प्रतिष्ठाप्येदम्भमेर्भजा- मह इति ॥ ३ ॥ वस्वन्तरात्री धन मिति दिवा ॥४॥ इम स्तोम मिति तृचेन परिसमूहेत् ॥ ५ ॥ 'अग्नेः पश्चाद' 'भूमी' 'प्राणी' स्वकीयो 'न्याची' आत्माभिमुखौ बक्रो 'प्र. तिष्टाप्य' "इदम्भूमे जामह इदं भद्र सुमङ्गलम् । परा सपत्नान् बाभस्वा- न्येषां विदन्ते वसु ॥ (अन्येषां विदन्ते धनम् )" ॥ 1 ॥ (म.प्रा० २,५,३) 'इति' मन्त्र जपेदिति भूमिजपः ॥३॥ 'रात्रौ' भूमिजपं चेत् 'वस्वन्तं' वसुपदान्तं मन्त्रं जपेत् 'दिवा' प्रहनि चेत् धनम्'-इत्यन्त जपेदित्येव ॥४॥"कृत्वा- ग्न्यभिमुखौ हस्तौ स्वस्थानस्यौ सुसंहितौ । प्रदक्षिणं तयासीनः कुर्यात् परिस. मूहनम्।'-इति कर्मप्रदीपः । तिस्णा मृचां समाहारः तृचः तेन । एष च तृचः ३० प्रा० ५, ,, १-३-३ । “इम स्तोम महंते जातवेदसे रथमिव सम्म- हेमा मनीषया । मदा हि नः प्रमतिरस्य ससाग्ने सल्ये मारिषामा वर्ष ता॥ ॥ २ ॥ भरामेथ्म कृणवामा हवीपि ते चितयन्तः पर्वषा पर्वया वयम् । जी. वातवे प्रतरासाधय धियोऽग्ने सस्थे मारिपामा वयं तव ॥३॥शकेमत्वा .

प्र० ४ खं० ५सू०१-७] होमपूर्वकृत्यानि भोजननियमश्च ॥ , , , समिध साधया धियस्त्वे देवा हविरदयन्त्या हुतम् । त्वमादित्याएं श्रावह ता! ह्य श्मस्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव" ॥ ४ ॥ (म० ब्रा० २, ४, २-४)५ भाषा-अग्नि के पश्चिम भाग में, अपने दोनों हाथोंको अपने सम्मुख वक्रभाव से रक्खे "इदं भूमेर्भजामहे” मन्त्र का जप करे । इसी को 'भूमि- जप' कहते हैं ॥ ३ ॥ रात्रि काल में इस मन्त्र को अन्त में 'वसु' इस पदका प्रयोग करे और दिन में, 'धनम्' पढ़े ॥४॥ "इमं स्तोम” प्रभृति तीन मन्त्रों से परिसमूह न करे ( ये तीनों मन्त्र उ० श्रा०४, १, ७, १-२-३, और मं० ब्रा० के २।४।२-४ मंत्र हैं)॥५॥ वरूपाक्षः पुरस्ताद्धोमानाङ्काम्येषु च प्रपदस्तपश्चतेजश्चेति६,७ नित्यनैमित्तिककाम्येषु सर्वत्रैव 'होमानां' पुरस्तात्' वैरूपाक्षः “विरूपाक्षो. ऽसि दन्ताञ्जिस्तस्य ते शय्यापर्णो गृहा अन्तरिक्षे विमित हिरण्यं तद्देवाना हृदयान्ययस्मये कुम्भे अन्तः सन्निहितानि तानि बलभृच्च बलसाच्च रक्षतोऽप्रमनी अनिमिषतः सत्यं यत्ते द्वादश पुत्रास्ते त्वा सम्बत्सरे सम्बत्सरे कामप्रेण यज्ञेन यायित्वा पुनर्ब्रह्मचर्यमुपयन्ति त्वं देवेषु ब्राह्मणो ऽस्यहं मनुष्येषु ब्राह्मणो वै ब्राह्मण मुपधावत्युप त्वा धावामि जपन्तं मामा प्रतिजापी जुह्वन्तं मामा प्रति- होषीः कुर्वन्तं मामाप्रतिकार्षीस्त्वां प्रपद्ये त्वया प्रसत इदं कर्म करिष्यामि तन्मे राध्यतां तन्मे समृध्यतां तन्म उपपद्यतां समुद्रो मा विश्वव्यचा ब्रह्मानुजानातु तुथो मा विश्ववेदा ब्रह्मणः पुत्रोऽनुजानातु श्वात्रो मा प्रचेता मैत्रावरुणो ऽनुजा- नाच तस्मै विरूपाक्षाय दत्ताञ्जये समुदाय विश्वव्यचसे तुथाय विश्ववेदसे श्वा- त्राय प्रचेतसे सहस्राक्षाय ब्रह्मणः पुत्राय नमः ॥ ६ ॥ (म० ब्रा० २, ४, ५)- इति मन्त्रः पठितव्यः । 'काम्येपु' कर्मसु 'प्रपदश्च' "तपश्च तेजश्च श्रद्धा च हीच सत्यञ्चाक्रोधश्च त्यागश्च धृतिश्च धर्मश्च सत्वञ्च वाक्च मनश्चात्मा च ब्रह्म च तानि प्रपद्येतानि मा मवन्तु भूर्भुवः स्वरोम्महान्त मात्मानं प्रपद्ये" ॥५॥ (म० प्रा० २,४,५)-'इति' प्रपदमन्त्रोऽपि पठितव्यः ॥ ६, ७॥ भाषा-नित्य, नैमित्तिक और काम्य, कर्मों के होम के पहिले "विरू- पाक्षासि” मन्त्र पढ़े।सब काम्य कर्मों में "तपश्च" आदि मन्त्र को भी पढ़े ६७ . - गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- waanwar जपित्वा प्राणायाम मायम्यार्थमना वैरूपाक्ष मार भ्योच्छवसेत् ॥८॥ काम्येषु प्रपदवरूपाक्षयोरुभयोरेव जपो विहितः । तत्र प्रपदजपानन्तरं प्राणा- यामः कर्तव्यः । “पूरककुम्भरेचकाख्यः प्राणायामः' -इति सन्ध्यासूत्रोक्त एवात्र ग्राह्यः । तत्र पूरककुम्भकयोः प्रपदमन्त्रार्थमननं कर्त्तव्यम् , रेचकारम्भत एव वैरू. पाक्षमन्त्रं जपेदिति ॥ ८॥ अथ भोजनयियमः।- भाषा-काम्य कर्मों में 'प्रपद' मन्त्र और 'वैम्पान्त' मन्त्र दोनों ही के पाठ करने की व्यवस्था है, उन में प्रपद मन्त्र पढ़ कर प्रागाायाम प्रारम्भ करे एवं इस प्राणायाम काल में 'पूरक' और 'कुम्भक' प्रपद मन्त्र के अर्थ का विचार कर रेचक' प्राणायामानुसान वैम्पाक्ष मन्त्र जप करे ॥८॥ काम्येषु त्रिरानाभोजनं त्रीणि वा भक्तानि ।६,१०॥ 'काम्येषु' कर्मसु कर्तव्येपु 'तिरावाभोजनं' कारम्भदिवसस्याव्यवहितेषु प्र- वैषु त्रिपु दिवसेषु त्रिपु भोजनं माध्याटिक नैशं च न कर्तव्यम् । 'या' असमर्थ- श्वेत् तेषु दिवसेपु त्रीणि' एव भक्तानि' भोजनानि कर्त्तव्यानि तथा च तेषु दिव- सेषु माध्यन्दिनं नैशं वा एकैकमेव भोक्तव्यम; न तु यथामियमं वारद्वयम् ॥९-१०॥ भाषा-काम्य कर्म करने के पूर्व दिन, तीन मध्यान्ह और दो गत का भोजन छोड़ देवे, यदि एक साथ दोनों भोजन न छोड़ सके तो कम से कम, एक भोजन छोड़ देवे । दिनरात में केवल एकवार भोजन करे ॥ ६॥१०॥ नित्यप्रयुक्तानान्तु प्रथमप्रयोगेषु ॥ ११ ॥ उपोष्य यजनीयप्रयोगेषु ॥ १२॥ कञ्चित् काम ममिलक्ष्य यत् कर्म द्विवार मनेकवारं वा क्रियते, तदेव नि. त्यप्रयुक्त मित्युच्यते; तादृशानान्तु कर्मणां 'प्रथमप्रयोगेषु' एवं पूर्वोक्तो भोजन. नियमः कर्त्तव्यः, न तु द्वितीयादिषु ॥ ११॥ यानि कर्माणि बहुदिनं यावत् प्रतिदिनं यजनीयतया प्रयुज्यन्ते, तादृशेषु 'यजनीयप्रयोगेषु तु' 'उपोष्य प्रातरा- शादिक मल्पाहार मेक कृत्वा तत्तद्यजन विधेयम् ॥ १२॥ Cal प्र० ४ खं०५ सू०८-१७ ] ब्रह्मवर्चसादिकाम्यकर्माणि ॥ , भाषा-जो कर्म, किसी एक उद्देश्य की सिद्धि के लिये अनेक वार करना पड़े, उसमें एकही वार, प्रथम वारमें पूर्वोक्त पहिला तीन दिन भोजन न करे, या एक भोजन व्यवस्था अर्थात् प्रतिवार कार्य प्रारम्भ के पूर्व तीन दिन भोजन न करे,या एक भोजन न करे ॥११॥जो सब कर्म बहुत समयमें समाप्त हो, उनमें प्रति दिन प्रातराशादि थोड़ा खा २कर काम में प्रवृत्त हो ॥१२॥ उपरिष्टाद् दैक्षसान्निपातिकम् ॥ १३ ॥ 'सानिपातिक' नैमित्तिकं कर्म, उपरिष्टाक्ष' निमित्त घटनात् पर मेव तस्य दीक्षा इति वेदितव्य मिति भोजननियमः ॥ १३॥ श्रथ ब्रह्मवर्चसकामकर्म- भाषा-निमित्त घटना के पीछे नैमित्तिक कर्म समूह की दीक्षा कर्त्तव्य है, वही वैसे कार्यों के लिये निर्दिष्ट काल है, उस के पूर्व अभोजन, या एक भोजन, या 'उपवास' यथा सम्भव व्यवस्थित होंगे ॥ १३ ॥ अरण्ये प्रपदं प्रयुञ्जीत दर्भेष्वासीनःप्राक्कूलेषु ब्रह्म- वच्चसकामः ॥ १४ ॥ उदक्कूलेषुपुत्रपशुकामः ॥ १५ ॥ यः कश्चन 'ब्रह्मनच्चसकामः' स्यात् स एष 'अरण्ये' गत्वा 'प्राक्कुलेषु' दर्भेषु 'आसीनः सन् 'प्रपदं (तपश्च पृ० १८९)-इति मन्त्रं प्रयुञ्जीत' ॥१४॥ यः कश्चन पुत्रकामः पशुकामो वा स्यात, स खलु अरण्ये गत्वा 'उदक्कुलेषु दर्भेषु आसीनः त मेव प्रपदमन्त्रं प्रयुञ्जीत ॥ १५॥ अथ ब्रह्मवर्चस-पुत्रपशुकामकर्म- भाषा जो कोई 'ब्रह्मवर्चस' की इच्छा करे, वह वनमें जा कर पूर्वाग्र रक्ख हुए कुश पर बैठ कर 'प्रपद' मन्त्रसे पठित मन्त्रोंसे साधना करे ॥१४॥ और जो कोई पुत्र, या पशुकी इच्छा करे, वह बनमें जाकर उत्तराम कुश पर बैठकर इस "प्रपद' मन्त्रसे साधना करे ॥१०॥ उभयेषूभयकामः ॥ १६॥ पशुस्वस्त्ययनकामो वीहि- यवहोमं प्रयुञ्जीत सहस्रगहुहूंपत्य इति ॥ १७ ॥ * प्राचीन समय में प्रातराश, आदि थोड़े खाने को 'उपवास, कहते थे, इदानी 'उपवास, शब्दसे एक मात्र भोजन नहीं करना समझा जाता है, जो उस समय 'अभोजन' शब्द से व्यव- हृत होता था। - गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- , 'उभयकामः' प्रथम सत्रोपातं ब्रह्मवर्चसं द्वितीयसत्रोपात्तं पुत्रं पशुं च यः कामरेत, म बल अरण्ये गत्वा युगपत् 'उभयेषुः' प्राक्कूलेषु, तदुपरि पातितेषु कालेषु च दर्भेषु माग्मीना, त मेव प्रपदं नाम मन्त्रं प्रयुञ्जीत ॥ १६ ॥ पशूनां गृहपालितानां गवादीनां स्वस्त्ययनं कामयेत चेन् "सहस्रबाहु गौपत्यः स पशून- भिरक्षतु । मयि पुष्टिं पुष्टिपति दधातु मयि प्रजां प्रजापतिः (स्वाहा) ॥ ७५ ॥ ( म० प्रा० २, ४, ७)-'इति' मन्त्रैण 'ग्रीहियवहोम' नीहिणा यवेन च पाहु- तिमनी 'प्रयुजीत' ॥ १७ ॥ भाषा--प्रथम सूत्रोक्त 'ब्रह्मवर्चस' एवं द्वितीय सूत्रोक्त पुत्र और पशु, उन दो की जो कामना करे, वह बन में जा कर, पूर्वाग्रकुश बिछा कर उस पर उत्तगन कुश रकम्य, उन पर बैठ 'प्रपद' मन्त्र से साधना करे ॥१६॥ जो पामन गो भेद भादि की भरनाई चाहे, वह ."सहस्त्रबाहुः" मन्त्र से धान्य श्रीरयय का होम करे ॥ १७ ॥ कौतोमतेन महावृक्षफलानि परिजप्य प्रयच्छेद्यस्था- स्मनि प्रसाद मिच्छेत्तस्मा एकभूयास्यात्मनायुग्मानि कु- र्यात् ॥ १८ ॥ १६ ॥ वृक्ष इवेति पञ्चर्चः ॥ २० ॥ अध प्रमादकामकर्म-'यस्य' कस्य चिजनस्य पुरुषस्य स्त्रिया वा 'प्रसादम्' प्रमभमान 'इयर', 'तस्मै कौतोमत संवनन सुभागं करणं मम नाकुली माम ने माताबाई पुरुषानयः । यसी कामम्य विछिन्नं तो सन्धे झोपधे" ॥८॥ (RAATAR,.,४) महावृक्षफलानि गुवाकामि प्रामाणि वा परिजप्य' 'प्रयच्छेत्' । लानि च फलामि एकभूोसि' एकस्मिवेव गुच्छे बहूनि विद्यन्ते चेत्, तर्हि दानात् पूर्वमेव प्रात्मनः' प्रारमना स्वयमेव 'अयुग्मानि' विरिछसानि कुर्यात्' १८-१९॥ अब पार्षिवं कर्म-(म.मा.३, -1) अधिकृतो वेदितव्यः ॥ २० ॥ भाषा-किसी व्यक्ति को प्रसन्नता लाम की इच्छा हो तो उस व्यक्ति को "कोसाम" मन्त्रसे पठित कई एक* महावृक्षफल प्रदान करे, इन फलों इससे महापच फल शब्द से यहां माम् और गुवाक (सुपारी) इन्यादि जानना ।

प्र० ४ खं०५सू०१८-२६] काम्यकर्माणि ॥ को गुच्छासे स्वयं एक २ कर तोड़ लेवे ॥१८,१६॥ "वृक्ष इव" इत्यादि जो पांच मन्त्र हैं, उन का व्यवहार, यथाक्रम से कहा जाता है ॥ २० ॥ तस्मिन् प्रथमं पार्थिवं कर्म ॥ २१ ॥ अर्द्धमास मभु- क्त्वाशक्तौ वा पेया मन्यतरं कालम् ॥ २२ ॥ २३ ।। 'तस्मिन्' अधिकृते पञ्चच्र्चे, तेनैव पञ्चच्र्चेन समुदितेन 'प्रथमम्' एक 'कर्म' "पार्थिव' क्षेत्राद्यर्थ कुर्वीतेति ॥ २१ ॥ तच्च पार्थिवं कर्म 'श्र मास मभुक्त्वा' एव कार्यम् । श्रभोजनेऽसमर्थश्चेत् 'अन्यतरं कालं' दिवा रात्रौ वा एकवार मेव 'पेयां' मण्ड-दुग्धादिकं पिवेदिति ॥ २२ ॥ २३ ॥ भाषा-उन्हीं पांच मन्त्रों से पहिले पार्थिव कर्म खेत को ऐसा करे कि जिस से उस में सब प्रकार के शस्य अच्छेप्रकार उत्पन्न हों) इत्यादि सिद्धि के लिये एक क्रिया का अनुष्ठान किया जाता है ॥ २१ ॥ यह पार्थिव कर्म, अर्द्धमास पर्यन्त अभोजन रह कर करे, यदि विना खाये न रहा जावे, तो एक समय केवल पेय पान करे ॥२२॥ २३ ॥ यत्रात्मानं परिपश्येत् ॥२४॥ एतद्बत मर्द्धमासव्रतेषु ॥२५॥ 'यत्र पेयायाम् 'प्रात्मानं' आत्मच्छायां दर्पणादाविव 'परिपश्येत्' तादृशी. मेव वरलां पेयां पिवेदिति २४ 'एतत्' पार्थिवं कर्म 'व्रतम्'उच्यते, तच्च अर्द्धमास- व्रतेषु' गण्यते। तथाच शुक्लप्रतिपद्यस्यारम्भः पौर्णमास्यां च समाप्तिः सिद्धा ॥२५॥ भाषा--जिस 'पेय' वस्तु में अपना मुंह दीख पड़े ऐसा तरल पदार्थ पीवे ॥ २४ ॥ यह पार्थिवकर्म एक व्रत विशेष है, यह अर्द्धमास व्रतों में गण- नीय है । यह व्रत शुक्ल पक्ष की परिवा से आरम्भ कर पूर्णिमा को पूरा करे ॥२५॥ पौर्णमास्यांरात्रावविदासिनि हृदे नाभिमात्र मव- गाद्याक्षततण्डुलानगन्तेष्वास्येन जुहुयात् स्वाहेत्युद्के २६ 'पौर्णमास्यां रात्रौ 'अविदासिनि' 'हृदे' निदाघेऽपि यस्य विदासः शोषो न, तादृशे जलाशये 'नाभिमात्र मवगाह्य' 'अक्षततण्डुलान्' प्रास्ये कृत्वा तेनैव "प्रास्येन अधिकृतानां पञ्चानामेकैकेनर्धा 'उदके' तन्नैव 'जुहुयात्'; 'ऋगन्तेषु' गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - treamin आहुति तासां पचाना मृचा मन्तेषु च 'स्वाहा-इति' यादिति पार्थिवं कर्म ॥ २६ ॥ अथ भोगादिकामकर्माणि- भाषा-पूर्णिमा की रात में अविदासी जलाशय में (जिस का जल ग्रीष्म ऋतु में भी न सूखे) नाभि मात्र जलमें पैठ, स्नान कर, मुंहमें अक्षत तण्डुल ले कर उन्हीं पांच मन्त्रों से, उसी जल में एक २ कर पांच देवे एवं मन्त्रों में से, प्रत्येक के अन्त में "स्वाहा'शब्द को भी जोड़ताजावे॥२६॥ अथापरम् ॥२७॥ प्रथमयाऽदित्यमुपतिष्ठेत भोगका- मोऽर्थपतिचक्षुर्विषये सिद्धत्यर्थः ॥ २८ ॥ पञ्चाना मधिकृताना मृचां समुदितानां व्यवहारेण प्रथमं कर्म पार्थिवं नाम उक्तम्। 'श्रथ' अनन्तरम् , तासामेवर्चा मसमुदितानां व्यवहारेण 'अपरम्' द्वितीय कर्म श्रादित्योपस्थानादिकं वक्ष्यते इति ॥ २७॥ 'भोगकामः' पुरुषः, 'प्रथमया' "वृक्ष इव पक्वस्तिष्ठसि सर्वान् कामान् भुवस्पते । यस्त्वैवैवं वेद तस्मै मे भोगान् धुश्चाक्षतान् बृहन्" ॥ ९॥ (म० प्रा० २, ४, ९) इत्यनयर्चा 'आदित्य मुपतिष्टेत' ! क्वोपतिष्ठेत ? इत्याह,-'अर्थपतिचक्षुविषये' यतोऽर्थपतेः अर्थ कामयते, तस्यैव चार्गोचरे प्रदेशे तथाच 'अर्थः' प्रयोजनं 'सिद्ध्यति' ॥२८॥ भाषा-उक्त पांच मन्त्रों से पहिले पार्थिव कर्म कहा गया है, अब उन्हीं पांच में से प्रत्येक के व्यवहार में एक २ अपर कर्म कहा जाता है ॥ २७ ॥ भोग चाहने वाला वह "वृक्ष इव" मन्त्र से सूर्योपस्थान करे । प्रयोजन के होने की सम्भावना हो, वहीं करने से मनोरथ सिद्ध होगा ॥२८॥ द्वितीययाऽऽदित्ये परिविष्यमाणेऽक्षततण्डुलान् जुहु- याद् बृहत्पत्रस्वस्त्ययनकामः ॥ २६ ।। पत्रं वाहनम् , बृहत्पत्रं हस्त्यश्वादि, 'बृहत्पत्रस्वस्त्ययनकामः' पुरुषः, "द्वितीयया ऋतं सत्ये प्रतिष्ठितं भूतं भविष्यता सह । श्राकाश उपनिरजतु महामन्न मथोप्रियम् ॥ १॥ (म० प्रा० २, ४, १०)-इत्यनया 'श्रादित्ये परिविष्यमाणे 'अक्षत तण्डुलान्', 'जुहुयात' “वाताचैर्मण्डलीभूताः सूर्याच- बमसो का मालामा ज्योम्ति दृश्यन्ते परिवेषस्तु सः स्मृतः" । इति ॥२९॥ pune प्र.४ खं०५सू०२७-३२] काम्यकर्माणि ॥ । भाषा-हाथी आदि बड़े वाहन के कल्याणार्थ "ऋतं सत्ये" द्वितीय मन्त्र से अक्षत तण्डुल हवन करे। यह कर्म सूर्य मण्डल में परिवेष समय करे॥२६॥ तृतीयया चन्द्रमसि तिलतण्डुलान् तुद्रपशुस्वस्त्य- यन कामः ॥ ३० ॥ चतुर्थ्यादित्य मुपस्थायार्थान् प्रपद्येत स्वस्त्यर्थवानागच्छति ॥ ३१ ॥ क्षुद्रपशवो गोमेषादयः, तत्स्वस्त्ययनकामः पुरुषः, तृतीयया "अभिभागो- सि सर्वस्मि स्तदु सर्व त्वयिश्रितम् । तेन सर्वेण सर्वो मा विवासन विवा- सय" ॥१॥ (म० प्रा०२,४,११)-इत्यनयर्चा 'चन्द्रमसि' परिविष्यमाणे एवं काले 'तिल तण्डुलान्' जुहुयादित्येव ॥ २८ ॥'चतुर्था "कोश इव पूर्णो वसुना त्वं प्रीतो ददसे । अदृष्टोदृष्ट माभर सर्वान् कामान् प्रयच्छ मे" ॥ १२ ॥ (मा० ब्रा० २, ४, १२)--इत्यनयर्चा 'आदित्य मुपस्थाय' 'अर्थान्' अभिलक्ष्य 'प्रप- द्यत' यात्रां कुर्वीत, तेन सः 'स्वस्त्यर्थवान् सन् श्रागच्छति' गृहानिति ॥ ३१ ॥ भाषा-गौ, भेड़ आदि छोटे २ पशुओं के कल्याण चाहने वाले "अभि- भगोऽसि” मन्त्रसे तिल तण्डुल होम करे,चन्द्रमण्डलमें परिवेष कालमें यह कर्म करे ॥ ३० ॥ "कोश इव" से सूर्योपस्थान कर प्रयोजन को लक्ष्य कर, यात्रा करने से प्रयोजन सिद्ध कर घर वापस आवेगा ॥३१॥ पञ्चम्यादित्य मुपस्थाय गृहान् प्रपद्येत स्वस्ति गृहा- नागच्छति स्वस्तिगृहानागच्छति ॥ ३२ ॥ ५ ॥ 'पञ्चम्या' "श्राकाशस्यैष श्राकाशे यदेतद् भाति मण्डलम् । एवं त्वा वेद यो वेद वेदेशानेशान् प्रयच्छ मे" ॥ १३॥ (म० ब्रा० २, ४, १३)-इत्यनया 'श्रादित्य मुपस्थाय' 'गृदान्' अभिलक्ष्य 'प्रपद्येत' यात्रां कुर्वीत, तेन सः प्रवासात प्रतिचलितः 'स्वस्ति यथा स्यात्तथा 'आगच्छति' प्रत्यायाति । द्विर्वचनं खण्ड- समाप्तिद्योतनार्थम् ॥ ३२ ॥ ५ ॥ इति गोभिलगृह्यसूत्रे चतुर्थप्रपाठके पन्चमखण्डस्य व्याख्यानं समाप्तम् ॥४,५॥ भाषा-"श्रोकाशस्यैष" इस पञ्चम मन्त्र से सूर्योपस्थान कर अपने ,

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्-
घर को लक्ष्य कर प्रति यात्रा में करने से निर्विघ्न घर वापस श्रावेगा ३२॥३॥
गोभिलगृह्यसूत्रके चतुर्थ अध्याय के पञ्चमखण्ड का भाषानुवाद पूग हुआ,
भूरित्यनकाममारं नित्यंप्रयुञ्जीत न पापरोगान्नाभिचाराद्भयम्
भूर्भुवः स्वरोसूर्य इव दृशे भूयास मग्निरिव तेजसा वायुरिव प्राणेन
सोम इव गन्धेन बृहस्पतिरिव बुद्धयाऽश्विनाविव रूपेणेन्द्रानी इव बलेन ब्रह्म-
भाग एवाहं भूयासं पाप्माभागा मे द्विपन्तः १४ (म० प्रा० २, ४, १५) इति'
अनकाममारं; इच्छामरणसाधनं मन्त्रं 'नित्यं सततमेव प्रतिदिनं वा 'प्रयुञ्जीत'
तेन 'न' 'पापरोगात्' कुष्ठादितः, न च 'अभिचारात, शत्रुकृतात् 'भयम्' स्यात् ॥१॥
भाषा-जो विना कष्ट उचित समय मृत्यु की इच्छा कर। (अकाल मृत्यु
न हो,) वे "भूः' मन्त्र को सतत जप करें, मन्त्र के प्रभावसे शत्रुकृत मारण
आदिसे भय नहीं रहता कुष्टादि पाप रोग से भी भय नहीं होता ॥१॥
अलक्ष्मी निर्णोदो यजनीयप्रयोगो मूर्भोऽधिम इत्येकैकया २
मोऽधि मे वैश्रवणाग्छिरसोऽनुप्रवेशिनः । ललाटाद् घस्वरान् घोरान्
विघ्नान् विवहामि वः ( स्वाहा)॥ ॥ ग्रीवाभ्यो मे स्कन्धाभ्यां मे नस्तो मे
ऽनुप्रवेशिनः । मुखान्मे वद्वदान् घोरान् विबृहामि वः (स्वाहा ) ॥२॥ बाहुभ्यां
मे यतो यतः पार्श्वयोरुत्तुतानधि । उरस्तो वद्वदान् घोरान विध्नान् विबृहामि वः
(स्वाहा)॥ ३ ॥ वङ्क्षणाभ्यां मे लोहितादान योनिहान् पम्जिहानधि । असभ्यो
निश्लिषो घोरान् विघ्नान विबृहामि वः ( स्वाहा ) ॥ ४ ॥ जङ्घाम्यां मे यतो
यतः पायोरुत्तु तानधि । पादयो विकारान् विवृहामि वः ( स्वाहा ) ॥ ५ ॥
परिवाधं यजामहेऽणु जङ्घ शबलोदरम् । योनोऽयं परिवाधते दानाय च भगाय
व स्वाहा)॥ ६ ॥ (म० प्रा० २, ५, १.८ ) 'इति' अष्टचस्य सूक्तस्य 'एकै-
कया ऋचा एकैका माहुविहातव्या । अय मेय पूर्वोक्तो यजनीयप्रयोगः-
च्यते । एतस्यहि कर्मणः प्रभावात् 'मलक्ष्मीनिर्णोदः दारिघुनाशः भवेदिति ॥२॥
भाषा, "मूनॊधिमे" इत्यादि मन्त्रों से एक २ आहुति प्रदान करे । ययज
प्रयोग में गयनीय है। इस क्रिया के फल से दरिद्रता दूर होती है ॥२॥

प्र.४ खं० ६ सू० १-७] काम्यकर्माणि ॥ मन्त्र से या तीरश्चीति सप्तमी वामदेव्यों महाव्याहृतयः प्रजापत इत्युत्तमया ॥ ३ ॥४॥ ५ ॥६॥ इह यजनीयप्रयोगे या 'सप्तमी' पाहुतिः, सा मन्त्रपाठक्रमात् “अपेहि त्वं परिबाध मा विवाध विबाधथाः । सुग पन्थानं मे कुरु येन मा धन मेष्यति" (स्वाहा ) (म० ब्रा० २, ५, ७)-इस्यनया प्राप्ता' परं न तथाभीष्टा; अपि तस्याः स्थाने "या तिरश्ची (?)"-इत्येषा प्रयोक्तव्या । किञ्च ततो 'वामदेव्य. र्चः (उ० प्रा० १, ३, १२, १)-महान्याहृतयः, च जप्तव्याः, ततः "प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परिता बभूव । यत्कामास्ते जुहुमस्तनो श्रस्तु वयस्याम पतयो रयीणा' (स्वाहा ) ॥ (म० ब्रा० २,५८) इत्यनया अष्टम्या ऋचा अष्टमी श्राहुतिहोतव्येति ॥३-६॥ अथ यशस्कामकर्म । भाषा-इस यजनीय प्रयोग में जो आठ आहुति होंगी, उनमें सप्तम सप्तम आहुति न दे कर “या तिरश्ची" मन्त्र से सप्तम आहुति होगी एवं उस के पश्चात् 'वामदेव्य' आदि (उ ०० १, १, १२ १) तीन मन्त्रों से और उसके पश्चात् महाव्याहृति आदि का पाठ करे इस के पश्चात् "प्रजापते' इस पाठवें मन्त्र से आठ आहुति देवे ॥३-६ ॥ यशोऽहं भवामिति यशस्काम आदित्य मुपतिष्ठेत पू. वाह्नमध्यन्दिनापराहेषु प्रातरहस्येति सन्नामयन् ॥७॥ 'यशस्कामः' पुरुषः, "यशोऽहं भवामि ब्राह्मणानां यशो राज्ञां यशो विशाम् । यशः सत्यस्य भवामि भवामि यशसां यश: ॥ ९॥ पुनर्मा यन्तु देवता या मदपचक्रमुः । महस्वन्तो महान्तो भवाम्यस्मिन् पात्रे हरिते सोमपृष्ठे ॥ ३० ॥ रूपं रूपं मे दिशः प्रातरम्हस्य तेजसः । अनमुप्रस्य प्राशिष मस्तु मयि । मयि त्वयीदमस्तु त्वयि मयीदम् ॥११॥ यदिदं पश्यामि चक्षुषा त्यया दत्तं प्रभासया तेन मा भुज तेन भुक्षिषीय तेन मा विश ॥ १२॥ अहनों अत्यपीपरदात्रिों अतिपारयत् । रात्रिों अत्यपीपरदहनों अतिपारयत्" ॥ १३॥ (म० प्रा० २, ५, ९-१३)-'इति' पञ्चच्च सूक्तं पठन् , तत्र च तृतीये मन्त्रे पठितं 'प्रातरण- २१६ - गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- -~r. स्येति' पदं 'सन्नामयन्' यथाकालं मध्यन्दिनस्येति अपराह्नस्येति च परिवर्तयन , पूर्वाह्नपराह्नेषु, त्रिष्वेव कालेषु' 'श्रादित्य मुपतिष्ठेत ॥णाअथ स्वस्त्ययनकामकर्म भाषा-जिन्हें यश की कामना हो, वे "यशोऽहं" इन पांच मन्त्रों से प्रातः मध्याह्न, और सायं तीन समय सूर्योपस्थान करें 'प्रातरहस्य यह पाठ यथा कान परिवर्तन करें । अर्थात् मध्याहन काल में उस के स्थान में "मा. ध्यन्दिनस्य" और सायं समय 'अपराहनस्य' ऐसा कहे ॥ ७ ॥ सन्धिवेलयोरुपस्थानत्वस्त्ययन मादित्यनाव मिति ॥८॥ 'सन्धिवेलयोः' उभयोरेव "आदित्यनाव मारोक्षं पूर्णामपरिपारिनीम् । अ- च्छिन्द्रां पारयिष्णी शतारित्राएं स्वस्तये ॥ (श्रोनम श्रादित्याय नम आदित्याय नम श्रादित्याय) ॥ १४॥ (म० ग्रा० २, ५, १४) इति मन्त्रं पठन् 'उप- स्थान' कर्त्तव्यम् तथा च 'स्वस्त्ययनं' सिध्येत् ॥ ८ ॥ भाषा-प्रातः और सायं दोनों सन्धि वेला में श्रादित्यनाव"-मन्त्र से उपस्थान करे, इससे कल्याण होगा ॥८॥ उद्यन्तं त्वादिस्यानूदियांस मिति पूर्वाह्ने प्रतितिष्ठन्तं स्वादित्यानुप्रतितिष्टास मित्यपराहे ॥६॥१०॥ श्राचित. शतकामोऽर्द्धमासब्रतः॥ ११ ॥ तत्र, पूर्वाहे' उद्यन्तन्त्वादित्यानूदियासम् ॥ १५ ॥ ( म० २, ५, १५) 'इति' यजुश्च प्रयोक्तव्यम् । 'अपराह्ने' च 'प्रतितिष्ठन्तं त्वादित्यानु प्रतितिष्ठासमु ॥ १६ ॥ (म० प्रा० २५, १६)--३ति'' च यजुः प्रयोक्तव्यमेव ॥ ९॥१॥ अथ प्राचितशतकामकर्म । 'याचितशतकामः पुरुषः, 'अर्द्धमासवतः' म्यान् ॥ ११ ॥ भाषा-- उपस्थान काल में विशेषतः प्रातः सन्धि काल में "उद्यन्त', भन्त्र भी एवं सायं सन्धि काल में "प्रतिष्ठन्त" मन्त्र भी पढ़े 18, १.। जो कोई १०० आचित. ( २५ मन, वा एक गाड़ी बोझ) को कामना करे, वह अर्द्धमास-व्रत का अनुष्ठान करे ॥१॥ तामिस्रादौ ब्रीहिकांसोदनं ब्राह्मणान् भोजयित्वा JasmRJA प्र.४ खं०६सू०८-१४ ] काम्यकर्माणि ॥ २१७ तस्य कणानपरासु सन्धिवेलासु प्रत्यग्ग्रामानिष्क्रम्य च- तुष्पथेऽग्नि मुपसमाधायादिस्य मभिमुखो जुहुयागलाय स्वाहा भल्लाय स्वाहेति १२एतयैवावृतापरौ तमिस्रौ ॥१३॥ 'तामिस्रादौ कृष्णप्रतिपदि सन्धिवेलायां 'व्रीहिकांसौदन' पक्त्वा, तेन च 'ब्राह्मणान् भोजयित्वा' 'अपरासु' द्वितीयादिषु 'सन्धिवेलासु' 'तस्य' ब्रीहिका- सस्य 'कणान्' "भलाय स्वाहा ॥ १७॥ भल्लाय स्वाहा ॥१८॥ (म० ब्रा० २, ४, १७, १८) इति मन्त्रद्वयेन जुहुयात् । कुन प्रदेशे ! 'प्रत्यगमामानिष्क्रम्य चतुष्पथे 'अग्निमुपसमाधाय, आदित्य मभिमुखः' सन् ॥ १२ ॥ एतया एवं श्रावृता' पूर्वोक्तया एव रीत्या 'अपरौं' द्वौ 'तामिस्रौ' कृष्णपक्षौ व्यवहर्तव्यौ । तदेवं त्रिभिः कृष्णपक्षैः एषोऽर्द्धमासवतः सम्पाद्य इति ॥ १३ ॥ भाषा-कृष्ण पक्षकी परिवा तिथिको सन्धि वेला समय, कांस परिमित तण्डुल पाक करके, कई ब्राह्मणों को भोजन करावे । इसके अनन्तर अमा- वास्या तक प्रतिसन्धिवेला में गांवके बाहर पश्चिम ओर चौराहे पर अग्नि जला कर उसमें 'भलाय' दोनों मन्त्रोंसे, सूर्यके सम्मुख होकर तण्डुलके कणा आदिसे होम करे ॥ १२ ॥ पूर्वोक्त रीतिसे और भी दो कृष्ण पक्षमें अनुष्ठान करे । तीन कृष्णपक्ष में यह अर्द्धमास व्रत सम्पन्न होगा ॥१२,१३॥ तामिस्रान्तरेषुब्रह्मचारीस्यादासमापनादासमापनात् ॥१४॥ 'तामित्रान्तरेषु' कृष्णपक्षमध्येष्वहोरात्रेषु व्रती पुरुषः 'श्रासमापनात्' व्रत- समाप्ति यावत् 'ब्रह्मचारीस्यात् ॥ १४॥६॥ इति गोभिलगृह्यसूत्रे चतुर्थ प्रपाठके पष्टखण्डस्य व्याख्यानं समाप्तम् ॥४॥ भाषा-जिन तीन कृष्णपक्षों में यह "अद्धमास व्रत' अनुष्ठान किया जावे, उसमें व्रतकी समाप्ति तक व्रती ब्रह्मचर्य से रहे ॥ १४, ६ ॥ गोभिलगृह्यसूत्रके चतुर्थअध्याय के छठे खण्डका अनुवाद पूग हुआ ।४६॥ अवसानं जोषयेत ॥१॥ समंलोमश मविभ्रंसि प्राच्य गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- उदोच्यो वा यत्रापः प्रवर्तेरन्नक्षीरियोऽकएटका अकटुका यत्रौषधयः स्युः ॥२॥ 'अवसान' विरामलक्षणं अन्यवास्तुभिरवेष्टितं वक्ष्यमाणलक्षणं भूम्बएई 'जो. षयेत' सेवेत वासायेति ॥ १॥ तच्च अवसानं 'सम' समतल स्यात् । तच्च 'लो- मर्श' धासविशिष्टं स्यात् । तञ्च 'अविभ्रंसि' विनंशोऽधः पतनं न यत्र सम्भाव्यते तादृशं स्यात् । 'यत्र' 'प्राच्यः उदीच्यः वा' 'प्रापः' नद्यादिका: 'प्रवर्तेरन् विद्य- रन् । 'यत्र' च समीपे एव 'प्रक्षोरिण्यः 'अकाटकाः 'मोषधयः' 'स्यु': ॥ २ ॥ भाषा--दुसरे मकानों से यथा सम्भव अलग अपने रहने का मकान बनाने के लिये उपयोगी अच्छी भूमि लेवे ॥ १ ॥ उक्त वास मूमि ममसन होवे, घासों से छिपी रहे, तालाब आदि से हठात् गिर जाने का भय न हो, उसके पास पूर्व या उत्तर दिशा में बड़ा जलाशय हो, एवं जिस भूमि के पास क्षीरी, कण्टकी, और कटु औषधि वृत्त न हों, यह वास योग्य है ।१,२। गौरपासु ब्राह्मणाय लोहितपाशु चत्रियस्य कृ- ष्णपासु वैश्यस्य । ३।४।५ । स्थिराघात मेकवर्ण मशुष्क मनूषर ममरुपरिहित मकिलिनम् ।। ६ ।। पांसवो रेणवः । एवं पांसुपरीक्षा प्रकृत्य तत्र तत्र ब्राह्मणादयो वास्तुनिर्माणं कारयेयुरिति भावः ॥ ३-५ ॥ 'स्थिराघात' स्वल्पाघातेनैव पनावटीभवेत् तत् । 'एकवी क्वचिदगौर मेवं वहुवर्णत्वं न दृश्यते यत्र, बादशम् । 'अशुष्क' यत्रो- स्पद्यमाना ओषधयो न शुष्काः स्युः, तथाविधम् । 'अनूपर' यत्रोतं बीज तादृशम् । 'अमरुपरिहितम्' मरुभूमिभिः अधेष्टितम् । 'अक्लिनम्' क्लिन्न स. जलम, तद्विपरीतम् । एवम् अवसानं जोषयेते-त्येव ॥ ६ ॥ भाषा-जहां धूलि का रंग गौर, वह ब्राह्मण के लिये क्षत्रिय के लिये लाल रंग की धूली वाली एवं वैश्यगण काली मट्टीवाली वासभूमिमें बनावें। ॥३-५ ॥ जहां थोड़े चोट वा आघात से भूमि धस न पड़े, जिस स्थान की धूलि अनेक रंग की न दीख पड़े, जहां किसी कूल के पेड़ सेपने से सूख १

3. ४ खं० ७ सू०१-११]
काम्यकर्माणि ॥
२१९
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जावे, जहां शस्य आदिके उपजने की शक्ति भी हो, जिस के प्राय चारो ओर
मरु भूमि न हों,एवं जहां जत्न न हो,-ऐसी भूमि वासार्थ के लिये लेबे ॥६॥
दर्भसम्मितं ब्रह्मवर्चसकामस्य बृहत्तृणैर्बलकामस्य
मृदुतृणैः पशुकामस्य ॥ ७ ॥ ८॥ ६ ॥
'ब्रह्मवर्चसकामस्य' ब्राह्मणस्य 'दर्भसम्मितं' कुशाबहुलं स्थानं स्यात तथाच
दैवं पित्र्यं वा कर्म कत्तु कुशाहरणाय क्लेशो न भवेत् । 'बलकामस्य' क्षत्रियस्य
'बृहत्तृणैः आकीर्ण स्थान मुचितम् , तथाचाश्वादीनां भोजनं सुलभ स्यात् ।
'पशुकामस्य' वैश्यस्य मृदुतृणैः परिव्यातं स्थानं वासयोग्यम् , तथाच पशुचारणं
सुकरं भवेदिति ॥ ७॥ ८॥९॥
भाषा-जहां समधिक कुश जन्मता हो, ऐसी भूमि ब्राह्मण के लिये
जहां घोड़ा आदि के खाने योग्य बड़ी घास आदि बहुत पाई जावे, ऐसी भूमि
क्षत्रियों के रहने योग्य है। और जहां कोमल २ घास हों, चारण भूमि के
लिये चिन्ता न करनी पड़े, वह भूमि वैश्य के लिये उपयुक्त है ॥७॥८॥६॥
शादासम्मितं मण्डलदीपसम्मितं वा यत्र वा श्वभ्राः
स्वयं खाताः सर्वतोऽभिमुखाः स्युः ।१०। अनुद्वारश्च ।११।
शादा इष्टका उच्यते, 'तत्सम्मितम्' चतुष्कोण मित्यर्थः । मण्डलं वर्तुल
मुच्यते, मध्योन्नवं क्रमादभितो निम्नं यत्र, तद्द्वीप मुच्यते। तथाच द्वीपमिव
मध्योच्च वर्तुल मपि स्थानं दोषावहम् । अपि 'वा' 'यत्र' स्थाने 'स्वयं' 'खाताः'
अकृत्रिमाः 'सर्वतोऽभिमुखाः' 'श्वभ्राः' गर्ताः 'स्युः' तत् श्रचतुरस्र मद्वीपवर्भुल
मपि वासार्ह मिति ॥ १०॥ 'अनुद्वारञ्च' गृहे मनुष्यादिप्रवेशाय वायुप्रवेशाय
वा यावन्ति द्वाराणि स्युः, तेषां सर्वेषा मेव समसूत्रपातानुकृतानि द्वाराणि यत्र,
तादृशं गृहं कुर्वीतेत्येव । नात्र नेत्यनुवर्तते अप्रसक्तस्य निषेधाप्रवृत्तेः ॥ ११ ॥
भाषा-रहने के मकान का स्थान चतुष्कोण हो; गोल होने से भी हानि
नहीं; किन्तु उसका मध्य भाग क्रम से ऊंचा हो । यदि ऐसा स्थान भी दुर्लभ
होतो त्रिकोण, बहुकोण, असमकोण, प्रभृति स्थान भी मकानके लिये स्वीकार
करे, परन्तु यदि ऐसे स्थान के चारो ओर अकृत्रिम कोई गड़हा हो ॥१०॥

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम् R- New घर में चाहे मनुष्य आदि के प्रवेश के लिये जितने दरवाजे हों, उन दरवाजे आदि के ममसूत्रपात से, उस के ममान अन्य द्वार भी रहना चाहिये ॥११॥ तत्रावसानं प्रागद्वारं यशस्कामो बलकामः कुर्वीतोद- गद्वारं पुत्रपशुकामो दक्षिणाद्वारसर्वकामो न प्रत्यगद्वारं कुर्वीत ॥१२॥ गृहद्वारं यथा न संलोकि स्यात् ॥ १३ ॥ 'तत्र' तादृशे स्थाने 'यशस्कामः' 'बलकामः' पुरुषः 'प्रारद्वारम्' अवमान' वासगृहं 'कुर्वीत' । पुत्रकामः पशुकामश्च पुरुषः 'उदद्वारम्' अवमानं कुर्वीत 'सर्वकामः' पुरुषः 'दक्षिणाद्वारम्' अवसानं कुर्वीत । 'प्रत्यरद्वारं पश्चिमद्वार मवसानं न कोऽपि कुर्वीतति ।। १२ ॥ तथा कुर्वीतति ॥ १३ ॥ भाषा-पूर्वोक्त स्थानों में घर बनावे । उन में से जो विशेषतः यश और वल की इच्छा करे, वे मकान का दरवाजा पूर्व मुख, जो विशेषतः पुत्र और पशु की इच्छा करें, वे उत्तर मुख, जिनको विशेष कामना न हो, किन्तु सत्र ही कामना हो, वे दक्षिण मुख द्वार करें, परन्तु पश्चिम मुख दरवाजा कभी न करे ॥ १२ ॥ मकान के भीतर के घर के द्वार आदि ऐसे हों जहां से घर के भीतर के मनुष्य आदि बाहरी दरवाजे से न दीख पड़े ॥ १३ ॥ वर्जयेत् पूर्वतोऽश्वत्थं प्लक्ष दक्षिणतस्तथा । न्यग्रोध मपराद् देशादुत्तराचाप्युदुम्बरम् । अश्वस्थादग्निभयं वि- यात् प्लक्षाद् ब्रूयात् प्रमायुकान् । न्यग्रोधाच्छस्त्रसम्पीडा मत्वामय मुदुम्बरात् । आदित्यदेवतोऽश्वत्थाप्लक्षोयमदे- वतः।न्यग्रोधो वारुणो वृक्षः प्राजापत्य उदुम्बरः ॥१४॥ अश्वत्था-चलदलः, सच आदित्यदेवतः, तं पूर्वतः स्वावासस्य, वर्जयेत; पूर्वतः स्थितात् अश्वत्थात् अग्निभयं विद्यात् । प्लक्षा-पर्कटी, सच यमदेवतः, तं, दक्षिणतः स्वावासस्य वर्जयेत; दक्षिणतः स्थितात् प्रमायुकान् इसितायुकान् 'अल्पायुषः स्युस्तत्र वासिन इति बयात् । न्यग्रोधावटा, स च वृक्षः 'वारुषा' वरुणदेवतः, तम् अपराद्वदेशात् पश्चिमात् प्रदेशात् स्वावासस्य, वर्जयेत्, पश्चि- .

प्र०४ खं०७ सू०१२-१९ ]
वास्तुयागः॥
..
मस्थितात् न्यग्रोधात् शस्त्रसम्पीडा भवेत् । उदुम्बर:-यज्ञवृक्षः, स च प्राजापत्यः
प्रजापतिदेवतः, तम् उत्तरात् स्वावासस्य वर्जयेत्, उत्तरस्थितात् उदुम्बरात
अक्ष्यामय मक्षिरोगो भवेदेवेति ॥१४॥
भाषा-पीपल के पेड़ की देवता सूर्य, मकान के पूर्व दिशा में पीपल
वृक्ष न रक्खे, पूर्व भाग में पीपल के पेड़ रहने से अग्नि का भय रहता है।
पाकड़ की देवता यम, मकान के दक्षिण भाग में पाकड़ का पेड़ रहने से श्रायु
की हानि होती है । वट वृक्ष की देवता वरुण हैं, घरके पश्चिमभाग में बड़का
पेड़ रहने से शस्त्राघात का सन्देह रहता है। गूलरवृक्ष की देवता 'प्रजापति
हैं अतएव मकान से उत्तर भाग में गूलर रहने से, नेत्र रोग होता है १४ ॥
तानस्वस्थानस्थान् कुर्वीतैताश्चैव देवता अभियजेत ॥१॥
'तान्' अश्वत्थादीन् पूर्वादिष्ववस्थितान्' अस्वस्थानस्थान्' स्वस्थानेभ्य
उत्थाप्यान्यत्राभिलषितस्थानेषु संस्थितान् 'कुर्वीत्'; अपि 'च' तत्तदुत्थानकाले
'एताः देवता' तत्तवृक्ष देवताः ‘एवं' 'अभियजेत' होमादिभिरर्चयेत् ॥ १५॥
भाषा-अनुपयुक्त स्थान में समुत्पन्न पीपल आदि के पेड़ों को उखाड़ कर
उपयुक्त स्थानमें रोप कर उस २ वृक्ष की उन २ देवता को होमादि से पूजा करे॥१५॥
मध्येऽग्नि मुपसमाधाय कृष्णया गवा यजेताजेन वा
श्वेतेन सपायसाभ्यां पायसेन वा ॥१६॥१७॥१८॥१६॥
'मध्ये' वास्तुभवनस्य, 'अग्निम्' 'उपसमाधाय' पूर्वोक्तविधिना प्रज्वाल्य
'कृष्णया गवा' कृष्णायाः गोः मांसादिना 'यजेत'-इति प्रथमः कल्पः । 'श्वेतेन
अजेन वा' यजेतेति द्वितीयः। 'सपायसाभ्याम्' गोऽजाभ्याम, पायसेनच गोऽजयो
रन्यतरेण चेति तृतीयः । 'पायसेन' पायसमात्रेणैव 'वा' इत्यधमः कल्पः ॥१६-१९
भाषा-वास्तु भूमि पर आग जलाकर काली गौ के मांस आदि से याग
करे, सफेद छाग के मांस द्वारा भी यह 'याग' हो सकता है, काली गौ का
मांस या सफेद छाग के मांस के साथ यदि 'पायप्त' हो तो और भी उत्तम
हो, न हा ता केवल पायस ही से याग करे ॥१६॥१७॥१८॥१६॥

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- mube वसा माज्यं मासं पायस मिति संयूयाष्टगृहीतं गृहीत्वा जुहुयादास्तोष्पत इतिप्रथमा वामदेव्य) महा- व्याहृतयः प्रजापतयइत्युत्तमा । २०.२१,२२,२३-२४ 'इति' इमानि वसादीनि चत्वारि 'संयूय' सम्यक मिश्रीकृत्य मिश्रितं तत् 'अष्टगृहीत' चतुर्ग्रहीत मिव गृहीत्वा 'जुहुयात्' । सन "वास्तोपते प्रतिजानी- स्मान्त्स्वादेशो अनमीवो भवानः । यते महे प्रतितो जुपस्व शन्नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे" ॥ (म० ग्रा० २, ६, १)-'इति मन्त्रेण 'प्रथमा' आहुतिः । ततो 'वामदेव्यः' तिनः प्रयोक्तव्याः । ततश्च 'महाव्याहृतयः प्रयोक्तव्याः। ततः 'प्रजापतये' एतन्मात्रेणेव मन्त्रेण उत्तमा' आहुति.तब्येति ॥ २०-२४ ।। भाषा-वसा, घृत, मांस, और पायस, इन चार को एकत्र मिला कर (जिस प्रकार चार वार लेना कहा गया है, उसी प्रकार )प्रतिवार ८ ग्रहण करता हुआ होम करे । उन में से “वास्तोष्पते” मन्त्र से पहिली पाहुति देवे, अनन्तर 'वामदेव्य' संज्ञक तीन मन्त्रों से, उसके पोछे महान्याहूति यादि का प्रयोग करे; पीछे "प्रजापतये"-मन्त्र से शेष पाहुति देवे ॥२०.२४॥ हुस्वा दश बलीन् हरेत् प्रदक्षिणं प्रतिदिशमवाम्तर- देशेष्वानुपूयेणाव्यतिहरन् ।। २५ ॥ 'हुत्वा' उक्तवास्तुहोमानन्तर मेव 'प्रतिदिशे' 'प्रदक्षिण' यथा स्यात् तथा कृत्वा, 'अवान्तरदेशेपु' कोणेषु व्यतिहरो यथा न भवेत् तथा च कृत्वा, 'भानु- पूयेण' एवं 'दश सङ्ख्याकान् 'बलीन्' 'हरेत् ॥ २५ ॥ बलीनां स्थानानि म- न्त्रांश्वोपदिशति- भाषा-वास्तु होम करके उसके पीछे प्रदक्षिणानुसार प्रति दिशा में और प्रति कोण में क्रम से १० बलि प्रदान करे ॥ २५ ॥ इन्द्रायेति पुरस्तात् वायव इत्यवान्तरदेशेयमायेति दक्षिणतः पितृभ्य इस्यवान्तरदेशे वरुणायेति पश्चान्महारा जायेत्यवान्तरदेशे सोमायेत्युत्तरतो महेन्द्रायेत्यवान्सरदेश प्र.४ खं०७ सू०२०-३५] वास्तुयागः॥ २२३ वासुकय इत्यधस्तादूर्ध्व नमोब्रह्मण इतिदिवि ॥२६-३३॥ सुस्पष्टान्येतानि ॥ २६-३३ ॥ भाषा-रहने के मकान से पूर्व दिशा में, फिर अग्निकोण आदि पाठ दिशाओं में, फिर नीचे ऊपर, इन दिशाओं में 'इन्द्राय' प्रभृति दश मन्त्रों से बलि प्रदान करे ॥ २६-३३॥ प्राच्यूावाचीभ्योऽहरहनित्यप्रयोगः संवत्सरसंव- त्सरे नवयज्ञयो । ३४, ३५ ॥ ७ ॥ प्राच्यादिदेवताभ्यः पूर्वोक्ताभ्यः 'अहरहः' प्रतिदिन मेव बलिहरणं कर्त्तव्यम्; एवञ्चैषः 'नित्यप्रयोगः' इति कस्यचिन्मतम् । स्वमते तु संवत्सरे सम्वत्सरे यदा यदा नवयज्ञौ ब्रीहियज्ञो यवयज्ञश्च भवतः तदा तदैवासा मपि तिसणां बलिहरण मिति शम् ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ ७ ॥ इतिगोभिलगृह्यसूत्रेचतुर्थप्रपाठकेसप्तमखण्डस्यव्याख्यानंसमाप्तम् ॥१७॥ भाषा-~-इन्द्र देवता के लिये ऊपर को पूर्व दिशा में ब्रह्म देवता के लि- ये, एवं नीचे को वासुकि देवता के लिये, प्रतिदिन बलिकर्म करे, या प्रति वर्ष जिस समय नया अनाज हो और जिस समय यव आदि शस्य नूतन हों उस २ नवान्न समय में इनतोस बलि करने से भी हो सकता है ॥३४-३५॥ गोभिलगृह्यसूत्र के चतुर्थ अध्याय के सप्तमखण्डका अनुवादपूरा हुआ ॥४॥ श्रवणाग्रहायणीकर्मणोरक्षतान्छिष्ट्वा प्राङ्बोदवा ग्रामान्निष्क्रम्य चतुष्पथेऽग्नि मुपसमाधाय हये राक इत्ये- कैकयाञ्जलिना जुहुयात् ॥ १॥ पुरस्तादुक्ते श्रवणाग्रहायणी' कर्मणी । तयोः अक्षतबलयश्च विहिताः। तत्रस- रेवाक्षतर्बलिहरण मकृत्वा कतिचित् 'अक्षतान्' 'शिष्टा' बलिशेषभूतान् रक्षित्वा तैरेवाक्षतैः 'अञ्जलिना' "हये राके सिनीवालि सिनीवालि पृथुष्टु के । सुभद्रे पथ्ये रेवति यथा नो यश प्रावह (स्वाहा) ॥२॥ ये यन्ति प्राञ्चः पन्थानो य उ वोत्तरत प्राययुः। ये मे सर्वे पन्धान स्तेभितॊ यश प्रावह ( स्वाहा) ॥३॥ ।

२२४ गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- m- यथा यन्ति प्रपदो यथा मासा अहर्जरम् । एवं मा श्रीधातारः समवयन्तु सर्वतः (स्वाहा)।यथा समुद्र स्रवन्तीः समवयन्ति दिशो दिशः एवं मा सखायो ब्रह्मचारिणः समवन्तु दिशो दिशः ( स्वाहा) ५ (म०मा० २६, २.५)'-'इति' सूक्तान्तर्गतानां चतसृणा मृचाम् ‘एकैकया' 'जुहुयात्' । स च होमः, 'प्रामात्- प्राङ्वा उदङ्वा निष्कम्य' 'चतुष्पथे अग्निम् उपसमाधाय' तत्रैव कर्त्तव्य इति ॥३॥ भाषा-इसके पहिले 'श्रवणाकर्म' और 'अाग्रहायणी कर्म' कहे गये हैं। उन कर्मों में 'अक्षतवलि' भी कहा गया है। इस बलि के समय सब अक्षत आदि वलि कार्य में व्यवहार न करके, उस में से थोड़ा अक्षत अवशिष्ट रक्खे । इसी को एक २ अञ्जलि कर 'हये राके' इत्यादि चार मन्त्रों से पाहुति देवे । यह होम गांव से बाहर पूर्व, या उत्तर दिशा में चौराहे पर भाग जला कर करे ॥ १ ॥ प्राङत्क्रम्य वसुवन एधीत्यूर्ध्व मुदीक्षमाणो देव- जनेभ्यस्तिर्यङिङतरजनेभ्योऽडिवेक्षमाणोऽनपेक्षमाण प्र- त्येत्याक्षतान् प्राश्नीयादुपेतैरमात्यैः सह ।। २-४ ॥ 'उत्क्रम्य' उत्क्रमणं व्यूत्क्रमणं विपरीतगमनं प्रतिगमनारम्भण मिति यावत् , तत् कृत्वा तत्र पथ्येव यत्र कुत्रचित्पाङ प्राङ्मुखः, 'ऊर्ध्वम्' उपरि 'उदीक्षमाणः 'देवजनेभ्यः' देवगणानुद्दिश्य “वसुवन एधि वसुवन एधि" वसुवमएधि ॥ ६ ॥ (म० ब्रा०२,६,६)-'इति' मन्त्रं पठेत् । सतः 'तिर्य' गृहगमनाय पश्चिमाभिमुखो दक्षिणाभिमुखो वा भवितुं तिरश्चीनः सन्, 'अछि' अध.अवेक्षमाणः' इतरजने. भ्यः' देवातिरिक्तप्राणिगणानुद्दिश्य त मेत्र मन्त्रं पठेत् । 'अनवेक्षमाणः' पश्चाद- चलोकन मकृत्वैव प्रत्येत्य' स्ववासं 'उपेनैः' तदानीं तत्रो' पस्थितैः 'अमात्यैः 'व- धुवर्ग: 'सह' 'अक्षतान्' होमावशिष्टान् 'प्राश्नी यात भुञ्जीत ॥ २-४ ॥ भाषा-उसके बाद मकान में फिरने के लिये, चल कर गस्ते में किसी एक स्थान में ऊपर मुंह होकर, देवताओं के लिये 'वसुवन एधि' मन्त्र का पाठ करे । पुनः पश्चिम मुख, या दक्षिणाभिमुख । प्रथात् घर सम्मुख होने ही से टेढ़ा होना पड़ेगा, उसी तिरछा होते समय नीचे देखकर, अन्यान्य प्राणियों के लिये, पुतः इस मन्त्र का पाठ करे । अनन्तर.पीछे न देख कर - प्र.४ खं०८सू०५-१०] प्रसादकामकर्म ॥ २२५ अपने स्थान पर आकर, उस समय उस स्थान में जो सब आत्मीय लोग उपस्थित हों, उन के साथ, होम से बची सामग्री भोजन करे ॥२-४ ॥ स्वस्त्ययनम् ॥॥ वशङ्गमौ शङ्खश्चेति पृथगाहुतीव्रीहियवहोमो प्रयुञ्जीत यस्यात्मनि प्रसादमिच्छेत्तस्मै नित्यप्रयोगः॥६,७॥ उक्तन श्रवणाग्रहायणी शेपाक्षतबलिकर्मणा 'स्वस्त्यनं, फलं भवेत्' तथाच स्वस्त्ययनकाम एवास्याधिकारी ॥ ५॥ अथ प्रसादकामकर्म-'यस्य' जनस्य 'श्रारमनि स्वे प्रसादम् 'इच्छेत्' 'तस्मै' तदुद्देशतः “वशङ्गमौ देवयानी युवस्थो यथा युवयोः सर्वाणि भूतानि वश मायन्ति, एवं ममाऽसौ वशमेतु (स्वाहा) ॥७॥ (म० ब्रा० २, ६, ६)-शङ्खश्च मन श्रायुश्च देवयानौ युवस्थो यथा युवयोः सर्वाणि भूतानि वश मायन्ति एवं ममाऽसौ वशमेतु ( स्वाहा)" ॥ ८ ॥ (म० ब्रा० २, ६, ८)--'इति' प्राभ्यां मन्त्राभ्यां नीहियवहोमौ' व्रीहियव द्रव्यकहोमौ 'पृथगाहुती' विभिन्नद्रव्यहवनौ 'प्रयुञ्जीत' कुर्वीत । पृथगाहुतीत्युक्तया वशङ्गमाविति मन्त्रेण ब्रीहिहोमः शङ्खश्चेति मन्त्रेण च यवहोम इति । नित्यप्रयोगः तत्प्रसादलाभपर्यन्तमहरह एवैपः प्रयोगः कर्तव्य इति ॥ ६ ॥ ७ ॥ भाषा-उक्त श्रवणा और अाग्रहायणी दोनों कर्मों के अवशिष्ट अक्ष. तबलि कर्म का फल-स्वस्त्ययन है, इसलिये जो लोग विशेष 'स्वस्त्ययन' चाहें, वेही इसे करें ॥५॥ मनुष्य प्रसन्नता चाहे वह 'वशङ्गमौ' मन्त्र से ब्रीहि- होम और 'शङ्खश्च' मन्त्र से यव होम करे । जब तक उद्देश्य सिद्ध न हो, तब तक प्रतिदिन यही प्रयोग (अनुष्ठान) करे ॥ ६ ॥ ७ ॥ एकाक्षर्याया मर्द्धमासवते द्वे कर्मणी ॥८॥ पौर्णमास्यारात्री खदिरशङ्कुशतंजुहुयादायुष्काम आयसान्वधकामः॥६,१० 'एकाक्षर्यायाम् "श्राकृती देवीं मनसा प्रपद्ये यज्ञस्य कातर सुहवा मे अस्तु । यस्यास्त एक मक्षरं पर सहस्रा अयुतं च शाखास्तस्यै वाचे निहवे जुहोस्था मा वरो गच्छतु श्रीर्यशश्च ( स्वाहा)॥ ९॥ (म०. ब्रा० २, ६, ९)" इत्यस्य मृचि 'द्वे कर्मणी' अनुपदवक्ष्यमाणे वियेते, ते च द्वे एव 'अर्द्धमासवते' वेदितव्ये ॥ ८॥ तत्र प्रथमं कर्म शङ्कुशतहवनं नाम, तच्च कामनाद्वयभेदात् गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- - *- द्विविधम् , तद् द्विविधमेवोपदिशति । स्वम्य प्रारम्य वा 'आयुष्कामः' पुरुषः 'खदिरशङ्कुशतं खादिराणां शङ्कनां कीलकानां शतं जुहुयात, स्वस्य अपराम्य वा बधकामश्चेत् 'प्रायसान्' लोहविकृतान् शन् शतं जुहुयादिति । कदेत्यु- च्यते,--'पौर्णमास्यां रात्रौ' इति ॥ १,१० ॥ अथ स्थगिलहोमः । भाषा-'प्राकृति देवी' इम मन्त्र को एकानगे कहने हैं। इस एकाक्षरी मन्त्र विषयक जो दो कर्म कहे जाने वाले हैं, उन्हीं दो कमों को 'अर्द्धमास- व्रत' जानो ॥८॥ अपनी या दृसरे की आयु बढ़ाने की कामना हो तो खैर की १०० कील होम करे । और अपनी या दृमरे की वायु के हानि की इच्छा हो तो लोहे के १०० कीलकों का होम करें, ये कर्म पूर्णिमा की रात में एकाक्षरी मन्त्र से करे । इस को शङ्कुशन होम कहते हैं ।। ८६।१०।। अथापरम् ॥ ११ ॥ प्राङ् वोदङ् वा ग्रामानिष्कम्य चतुष्पथे पर्वते वारण्यैः स्थण्डिलं प्रताप्यापोद्यागारान मन्त्रं मनसानुद्रुत्य सर्पिरास्येन जुहुयात् ।। १२ ॥ यदुक्तं 'द कर्मणी'--इति. तत्र मवमदशमसूत्राभ्यां द्विविधं शङ्कुशतहवन 'अय' क्रमप्राप्तम् 'अपरम्। द्वितीय कर्म स्थण्डिलहवन मिद मुपदिश्यते । अपिचानापि वैविध्यमस्ति ॥ ११ ॥ 'ग्रामात्' स्ववासस्थामात् 'प्राइ' पूर्वाभि- मुखः, 'उदङ्वा' अथवा उत्तराभिमुखः "निष्कम्य, निर्गतो भूत्वा, 'चतुष्पये पर्वते वा उपस्थितः सन् , 'भारण्यैः गोमयैः 'स्थरिडलं' लोहपात्रं 'प्रताप्य' प्रततं कृत्वा, 'प्रकारान्' गोमयकृतान् स्थगिडलस्पृष्टान् 'अपोह्य' दूरीकृत्य; 'मन्त्र' प्रकृत मेकाक्षरीनामक 'मनसा' 'अनुदुत्य दुतं पठित्वा तत्रैव प्रतप्ते स्थण्डिले 'भास्येन' स्वमुखेन 'सर्पिः' धृतं जुहुयात् ॥ १२ ॥ भाषा-पहिले ही (८ मं० सूत्र में ) कहा गया है कि 'एकातरी' मन्त्र से दो कर्म सिद्ध होते हैं, उन में से इसके पूर्व दो प्रकार 'शङ्कुशत होम कर्म कहा गया है। अब 'स्थण्डिल होम' नामक द्वितीय कर्म कहा जाता है। यह दो प्रकार का है ॥ ११ ॥ गांवकी वस्ती से पूर्व, या उत्तर जाकर किसी एक चौगहे, या पहाड़ पर जङ्गली कण्डे से एक स्थण्डिल (वेदी) अच्छी प्र० ४ ० ८ सू०११-२० काम्यकर्माणि ॥ प्रकार तपा कर, उस अङ्गार आदि को हटाकर, इस एकाक्षरी मन्त्र को मन ही मन शीघ्र पाठ कर, अपने मुंह में घी लेकर उस से होम करे ॥ १२ ॥ ज्वलन्त्यांद्वादशनामा:धूमेश्यवराद्धयाअमोघंकर्मेत्याचक्षते। तादृशे होमे हुते 'ज्वलन्त्यां शिखायां यजमानस्य 'द्वादशनामा:' लभ्याः भवेयुः, प्रज्वलनाभावेन 'धूमे' सति त्र्यवरार्द्धयाः' अवराद्धर्यशब्दोऽन्यूमवचनः श्रतो न्यूनतोऽपि त्रयो ग्रामाः भवेयुः, ज्वालाधूमयोः अल्पत्वबहुत्वाभ्यां लब्ध. व्यग्रामसङ्ख्यानामल्पत्वबहुत्वे । एवञ्चैतत् सर्वथाप्यनिष्फल मिति 'अमोघं कर्म' 'इति' नाम 'पाचक्षते' वृद्धाः । तदेतत् 'स्थण्डिलहोम-नाम एकाक्षयों द्वितीयं कर्म ॥१३-१५॥ स्थण्डिलहोमस्यैव प्रकारान्तरेण फलान्तरजन-कत्वमुच्यते। भा०-आहुति के देते ही यदि शीघ्र ज्वाला उठे तो अनुष्ठाताको १२ ग्राम लाभ होंगे और यदि ज्वाला न हो धूम दीख पड़े तो तीन गांव मिलेंगे। बूढ़े लोग इसे 'अमोघ कर्म' कहते हैं । यह भी 'अर्द्धमासव्रत हैं ॥१३-१५॥ वृत्त्यविच्छित्तिकामो हरितगोमयान् सायं प्रातर्जुहुयात्१६ यजमानः यदि 'वृत्त्यविच्छित्तिकामः' वृत्तिजीवनोपायः तस्य विच्छेदो न स्यात् इत्येवङ्कामः स्यात्, तर्हि तत्रैव प्रारण्यगोमयैः प्रतप्ते स्थण्डिले सर्पिोम- विनिमयतः 'हरितगोमयान्' सद्योविसृष्टगोमयान् तेनैव प्रास्येनैव 'सायं' 'प्रातः' 'जुहुयात्' इति समाप्त मेकाक्षरीकृत्यम् ॥ १६ ॥ अथ पण्यहोमः । भाषा-जीविका का नाश न हो, ऐसी इच्छा वाला जङ्गली गोवर से तप्त कियी हुई वेदी पर घी होम न करके सायं और प्रातःकाल तात्कालिक गोवर को मुंह में रक्ख उससे होम करे ॥ १६ ॥ त्रिरात्रोपोषितःपण्यहोमं जुहुयादिद्महमिमं विश्वकर्माण मिति वाससस्तन्तून् गोर्वालानेव मितरेभ्यः परायेभ्यः१७-२० काम्येषु कर्मसु त्रिरात्राभोजनं विहितम् (प्र० ४ खं०५सू०९) पण्यहोमोऽपि काम्यं कर्म, अत्रापि तत् प्राप्त मिति विशेष विधत्ते,--त्रिरात्रोपोषितः' उपवासस्तु अल्पभोजनं न त्वभोजन मित्युक्तं पुरस्तात् (प्र. खं० ५ सू० १३-२६, प्र.

२२८ mawari गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- *. . खं० ६ सू० १-८) 'पण्यहोम' पण्यं विक्रय्यद्रव्यं, तस्मै होमः परयहोमस्तम् । "इदमह मिमं विश्वकर्माण श्रीवत्स मभिजुहोमि (स्वाहा" ) ॥ १० ॥ (म० ब्रा० २, ५, १०) 'इति मन्त्रेण 'जुहुयात् । कि जहुयादिति होमगव्यं विधत्ते,-'वाससः' वासः परयं चेत् तस्य तन्तून्' दशास्त्राणि जुहुयात् । गौः पण्यं चेत, तस्य 'गो:' 'बालान्ः पुच्छलोमानि जुहुयात् । 'इतरेभ्यः' अजावि- कादिभ्यः पण्येभ्योऽपि 'एवम् एव एकदेशं लोमादिक मुदत्य जुहुयादित्येव । ॥ १७-२० ॥ अथ यशस्कामसहायकामयोः यजनीयप्रयोगा। भाषा-व्यवहार की उन्नति की इच्छा वाले व्यापार के द्रव्य में का, एक २ अंश लेकर जैसे कपड़े के किनारे से सृत निकाल ले, गौ का हो तो उस की दुम में से थोड़ा वानले ) "इदमह मिम" मन्त्र से होम करे ।१५,२०॥ पूर्णहोमो यजनीयप्रयोग इन्द्रामवदादिति च यश. स्कामः पूर्वाईसहायकाम उत्तराम् ॥ २१, २२, ॥ ८ ॥ 'पूर्णहोमः' "पूर्ण होम यशसे जुहोमि, योऽस्मै जुहोति वर मस्मै ददाति, वरं वृणे यशसा भामि लोके ( स्वाहा)" ॥ ११ ॥ (म० ग्रा० २, ६, १)-इति होमः"इन्द्रामवदात् तमो वः परस्तात् । अहं वो ज्योतिर्मा मभ्येत सर्व (स्वाहा)" ॥ १२॥ (म० ब्रा० २, ६, १२)"-'इति' मन्त्रेण 'च' होमः 'यजनीयप्रयोगः' (प्र. ४ खं० ५ सू० १२) बोध्यः । तत्र च 'यशस्कामः' चेत् 'पूर्वाम्' ऋचम् प्रयुञ्जीत 'सहायकामः' चेत् 'उत्तराम्' ऋचम् प्रयुञ्जीतेति ॥ २ ॥ २२ ॥ ८ ॥ इति गोभिलगृह्यसूत्रे चतुर्थ प्रपाटकेऽष्टम खण्डस्य पाख्यानं समाप्तम् ॥ ४॥८॥ भा०--"पूर्ण होमं यशसे जुहोमि” से होम करे और "इन्द्रामवदात्' से होम करे, ये दोनों होम 'यजनीय प्रयोग हैं, यश की इच्छा से प्रथम मन्त्रका और सहायताकी इच्छा होतो शेषमन्त्रका व्यवहार करे ।। २१ ॥२२॥ ८ ॥ गोभिलगृह्यसूत्र के चौथे अध्यायके अष्टम खण्डका अनुवाद पूरा हुश्रा ॥४,८॥ , KHE पुरुषाधिपत्यकामोऽष्टरात्र मभुक्तबौदुम्बरान्तस्रचम- सेधमानुपकल्पयित्वा प्राङ्वोदइ वा प्रामानिष्कम्य चतु- प्र० ४ खं०८१९सू०२१।२२।१-५] काम्यकर्माणि ॥ २२९ पथेऽग्नि मुपसमाधायाज्य मादित्य मभिमुखो जुहुयादन्नं वा एकच्छन्दस्य श्रीर्वा एषेति च ॥ १, २ ॥ पुरुषाणां सैनिकानां साधारणानां वानेकेषाम् आधिपत्यं यदि कामयेत, तर्हि तेन अष्टरात्र मभोजनं कर्त्तव्यम् , तत्रैव चाष्टरात्रे, औदुम्बरान्' नुवादीन् प्रकल्प्य , तदष्टरानान्ते तान् स्रुवादीन् गृहीत्वा 'प्राङ् उदङ् वा प्रामात् निष्क्रम्य' यं कञ्चि दपि चतुष्पथं प्राप्य तत्रैव 'अग्निम् उपसमाधाय' 'आदित्यं घुस्थम् 'अभिमुखः' "सन् अन्न वा एकञ्छन्दस्य मन्न, येकं भूतेभ्यच्छदयति ( स्वाहा )" ॥ १३ ॥ (म. ब्रा० २, ६, १३) इति मन्त्रेण 'भाज्यं जुहुयात्' । ततः "श्रीर्वा एपा यत्सत्वानो, विरोचनो मयि सत्त्व मवदधातु (स्वाहा)" ॥ १४ ॥ (म० ब्रा० २, ६, १४) 'इति' मन्त्रेण 'च' पुनरपि श्राज्यमेव जुहुयादिति ॥ १, २ ॥ भाषा-बड़े पद के चाहने वाले व्यक्ति पाठ रात भोजन न करे, इसी बीच में गूलर की लकड़ी का स्रवा चमस और ईम संग्रह कर सब को अपने साथ लेकर गांव के पूर्व उत्तर बाहर जाकर क्रिसी चौराहे पर अग्नि स्थापन कर "अन्नं वा” मन्त्र से घी की आहुति देवे एवं उसी के बाद लगा- तार "श्रीर्वाएषः' मन्त्र से दूसरी आहुति देवे ॥ १, २ ॥ अन्नस्य घृत मेवेति ग्रामे तृतीयां गोष्ठे पशुकामो विदूयमाने चीवरम् ॥ ३ ॥ ४ ॥ ५ ॥ ततः 'ग्रामे' प्रत्यागत्य"अन्नस्य घृतमेवरसस्तेजःसम्पत्कामोजुहोमि (स्वाहा)" १५ (म० व. २, ६, १५) 'इति' मन्त्रेण 'तृतीयाम्' श्राहुतिं जुहुयात् श्राज्य- स्यैव । स च पुरुषाधिपत्य कासः पुरुषः यदि 'पशुकामः' अपि तर्हि ग्रामे होतव्यां ता माहुति 'गोष्ठे' एव जुहुयात् । तत्रापि तद् गोष्ठं विद्यमानम्' आई चेत् तत्र 'विद्यमाने' गोष्टे 'चीवर' लौहचूर्ण जुहुयात् नाज्य मिति ॥ ३-५ ॥ भाषा-ग्राम में वापस आकर “अन्नस्य घृत मेव" मन्त्र सेतृतीय श्राहुति देवे । यदि पूर्वोक्त व्यक्ति यह भो इच्छा करे कि मुझे बहुत पशु हों, तो उस तृतीय आहुति को गोशाला में देवे। और यदि वह गोशाला गीली हो, नो वहां घी की तीसरी आहुति न करके, लोह चूर्ण का होम करे ॥३,४,५॥

२३. गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- re- प्रतिभयेऽध्वनि वस्त्रदशानां ग्रन्थीन् बध्नीतोपेत्य वसन- वतः स्वाहाकारान्ताभिः सहायानाञ्च स्वस्स्ययनम्॥६,७॥ 'अध्वनि' मार्गे 'प्रतिभये' भयहेतौ उपस्थिते 'वसनवतः' सहचारिणो पान्य- जनान् 'उपेत्य' तत्समीपं गत्वा 'स्वाहाकारान्ताभिः साभिरंव "अचं वा" (म० ब्रा० २०६-१३-१५) इत्यादिभिस्तिमृभिः ऋम्भिः 'वबादशानां अन्योन्' 'बध्नीत । एतेन कर्मणा 'सहायानां सहचारिणा मपि पथिकानों 'स्वस्त्ययनं' भवेत, किम्पुनः भयप्राप्तस्यैकस्य तस्येति ॥ ६, ७ ॥ अथ आचितसहस्रकामकर्म- भाषा-यदि रास्ते में एकाएक भय आपड़े तो झट सहगामी के पास हो कर पूर्वोक्त "अन्नं वा” इन तीन मन्त्रों से स्वाहाकागन्त जप करते हुए कपड़े के किनारे के सूत श्रादि बांधे। इस से उक्त व्यक्ति का भय तो दूर हो ही गा, किन्तु उसके साथी पथिक को भी मङ्गल होगा ।। ६, ७ ॥ आचितसहस्रकामोऽचतसक्स्वाहुतिसहस्रं जुहुयात् ॥८॥ ताभिस्तिसृभिः ऋग्भिः स्वाहाकारान्ताभिरेव, एकैकाहुतिहतिव्येति च ॥ भाषा-जो कोई सहस्र आचित (२५ मन अर्थात् एक गाड़ी का बोझ) की कामना करे वह तीनों मन्त्रों से अक्षत-सत्तू की १००० आहुति देवे ॥८॥ पशुकामो वत्समिथुनयोः पुरीषाहुतिसहस्रं जुहुयात् ॥६॥ पशून् गवादीन् कामयते यः पुरुषः, सः 'वत्समिथुनयोःपुरीपाहुतिसहसं जुहु- यात्' स्वाहाकारान्ताभिस्ताभिस्तिसृभिरेवभिरिति ॥९॥ अथक्षुदपशुकामकर्म- भाषा-यदि कोई चाहे कि मुझे गौ आदि बड़े २ पशु हों, तो वह बछड़ेके सूखेगोबरसे उक्त तीन मन्त्र से १००० आहुति देवे ॥६॥ अविमिथुनयोः क्षुद्रपशुकामः ॥ १०॥ अविमिथुनयोः शुष्क पुरीषैरिति, तामिस्तिसमिः स्वाहाकारान्ताभिरिति च ॥१०॥ श्रथ वृज्यविच्छित्तिकामकर्म- भाषा-यदि कोई चाहे कि मुझे भेड़ आदि छोटे २ पशु हों तो वह दो मेंडके सुखेगोबरसे उक्त तीन मन्त्रों से १००० पाहुति देवे ॥१०॥ - प्र० ४ खं०९ सू०६-१४] काम्यकर्माणिविषनाशकञ्च ॥ २३१ वृत्त्यविच्छित्तिकामः कम्बूकान् सायंप्रातर्जुहुयात् तुधे क्षुत्पिपासाभ्यास्वाहेति ॥ ११ ॥ 'कम्बूकान्' तुषान् ; फलीकरणकक्वशानिति टीकान्तरम् । अन्य व्याखात मिवैव ॥ ११॥ अथ विषदोषनाशकामकर्म- भाषा-यदि कोई चाहे कि मेरी जीविका निरन्तर बनी रहे, वह प्रतिदिन सायं प्रातःकाल "क्षुधेस्वाहा” से तुष की आहुति देवे । ॥ ११ ॥ मा भैषीन मरीज्यसीति विषवता दष्ट मद्भिरभ्युक्षनजपेत्।१२ 'विषवता' सर्पण, वृश्चिकादिना वा 'दष्टं' स्थानम् 'अद्भिः श्रभ्युक्षन् “मा भैषीन मरिष्यसि जरदष्टि भविष्यसि । रसं विषस्य नाविद मुग्रं फेन मिवास्यम्" ११०॥ (म० ब्रा० २,६,१८) इति मन्त्र जपेत् ॥१२॥अथ स्नातकस्वस्त्ययनकर्म- भाषा-विषधर सांप आदिके डसनेपर, काटे हुए स्थानको धोकर"माभै- षीन" मन्त्र का जप करे । इस से सब प्रकार के विष दूर होंगे ॥ १२ ॥ तुरगोपायेति स्नातकः संवेशनवेलायां वैणवं दण्ड मुपनिधीत स्वस्त्ययनार्थम् ॥ १३ ॥ 'स्नातकः कृतसमावर्तनो द्वितीयाश्रमाय उद्युक्तः 'संवेशनवेलायां शयनसमये 'स्वस्त्ययनार्थम्' "तुरगोपाय मा नाथ गोपाय मा। अशस्तिभ्यो अरातिभ्यः स्वस्त्ययन मसि ॥ १९ ॥ (म० ब्रा० २, ६, १९)"-'इति' मन्त्रेण 'वैणवं दण्ड' वंशयष्टिम् 'उप' समीपे स्वस्यैव 'निदधीत' स्थापयीत ॥ १३॥ अथ क्रिमिनाशकामकर्म- भाषा-तीनों प्रकार के स्नातक अपने २ कल्याणार्थ, शयन काल में "तुरगोपाय” मन्त्र से बांसकी एक छड़ी वा लाठी पास रक्खे ॥ १३ ॥ हतस्ते अत्रिणा क्रिमिरिति क्रिमिमन्तं देशे मद्भिरभ्युक्षनजपेत् 'क्रिमिमन्तं देशम्। व्रणार्दिक मथउदरादिकञ्च 'अद्भिः अभ्युक्षन्' "हतस्ते * अत्रि ऋषि ही ने सब से पहिले कृमिनाशक भौषधि भाविष्कार किया था, पीछे यमदग्नि, फिर गोतम ऋषि ने ।

२३२ गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्- १-४)". अत्रिणा क्रिमि इतस्ते जमदग्निना । गोतमेन तिनीकृतो व त्या क्रिमे ब्रह्मव- द्यमवद्य ॥ १ ॥ भरद्वाजस्य मन्त्रेणः सन्तिनोमि क्रिमे त्या। क्रिमिह वक्त्र- तोदिनं, क्रिमिमान्त्रानुचारिणम् क्रिमि द्विशीर्ष मजुनं द्विशीप चतुहनुम् ॥२॥ हतः क्रिमीणां क्षुद्रको हता माता हतः पिता । श्रथैषां भिन्नकः कुम्भो य एषां विषधानकः ॥ ३ ॥:23. क्रिमि मिन्द्रस्य बाहुभ्या मवाञ्चं पातयामसि । हताः क्रिमयः साशातिकाः सनीलमक्षिकाः ॥ ४॥ ७ ॥ (म०मा० २,७, 'इति' चतुरचं सूक्तं, 'जपेत् । एतेनैव क्रिमिनाशो भवेदिति ॥ १४ ॥ भाषा -घाव, आदिमें कीड़े पड़े हों तो उस स्थानको जनसे धोकरहनस्ते" आदि चार मन्त्रों को पढ़े इसी से सब स्थानों के कीड़े नष्ट हो जावगे ॥१४॥ पशूनाचं चिकीर्षेदपराह्ने सीतालोष्ट माहृत्य वैहायसी निध्यात्तस्य पूर्वाह्ने पाशुभिः परिकिरन जपेत् ॥१५॥६॥ तदेव क्रिमिनाशनं 'पशूनां' गृहपालितानां गवादीनं चिकीत् चेत्' तर्हि 'अपराह्ने काले 'सीतालोष्ट' लाङ्गलोत्थं लोष्टम् 'थाहत्य' 'वहायसी' दिशा निद ध्यात्' अनावृते ऊर्श्वे स्थापयेदिति यावत् । ततो रात्रिप्रभाते 'पूर्वाहे' एव काले 'तस्य' लोष्ट्रस्य 'पांशुभिः' रजोभिः पशोः क्रिमिमन्तं प्रदेशम् 'परिकिरन्' त मेव सक्तं, 'जपेत् । एतेनैव पशूनां क्रिमिनाशो भवेदिति ॥ १५ ॥ ९ ॥ इति गोभिलगृह्यसूत्रेचतुर्थप्रपाठकेनवमखण्डस्यब्याख्यानसमाप्तम् ॥ ४ ॥ ९ ॥ भाषा-पशु आदि के कीड़ों को नाशके लिये दिनको दो पहर बाद हान जोतने से जो डेला निकला हो, उसे लेकर मैदान में ऊपर को झूला रक्खे, दूसरे दिन उस डेले को फोड़ कर उसकी धूलि, जहां कीड़े पड़े हों, उस पर छीट २ कर ४ मन्त्रोंको पढ़े। इससे सब कीड़े नष्ट हो जावेगे ॥ १५ ॥ ६ ॥ गोभिलगृह्यसूत्रके चौथे प्रपाठकके नवम खण्डका अनुवाद समाप्त हुआ ४६ . * भारद्वाज ऋषि के मन्त्र से भाविष्कृत औषधि की सहायता से तीन प्रकार के क्रमियों को नाश करता हूं || इन्द्रयव से 'त्रिवृत नाम भौषधि से।

प्र० ४ खं०९।१० सू० १५५१-५] स्नातकस्वस्त्ययनादि कर्माणि ॥ २३३ A- , । उत्तरतो गां बद्ध्वोपतिष्ठेरन्नहणा पुत्रवाससेति॥१॥ इदमह मिमां पद्यां विराज मन्नाद्यायाधितिष्ठामीति प्रति- तिष्ठमानो जपेद्यत्रैन महयिष्यन्तः स्युर्यदा बार्हयेयुः ॥२॥ प्राचार्यादीनां षणणा मन्यतमस्य अहणीयस्य 'उत्तरतः' 'गां बध्या' "अर्हणां पुत्रवाससा धेनु रभवधमे । सा नः पयस्वती दुहा उत्तरा मुत्तरासमाम् ॥ ॥ ( म० ब्रा० २, ८,.)"-'इति' मन्त्रं पठन्, तमहणीयम् 'उपतिष्ठेरन् ॥ १ ॥ 'यत्र' स्थाने 'एनम्' अहणीयम् 'अर्हयिष्यन्तः' : शिष्यादयः 'स्युः' 'यदा वा' यस्मिंश्च काले ते 'अर्हयेयुः' पूजयेयुः, तत्रैव स्थाने, तदैव काले, सः अर्हणीयः प्राचार्यादीना मन्यतमः 'प्रतितिष्ठमानः' दण्डायमानः "इदमह मिमां पद्यां विराज मन्नाधायाधितिष्ठामि" ॥२॥ (म० ब्रा० २, ८, २"--'इति: मन्त्रं 'जपेत्' ॥२॥ विष्टरादीनां पञ्चामां त्रिस्त्रिवेदनीयता माह, भाषा-आचार्य प्रभृति ग्रहीय व्यक्ति के उत्तर भागमें गौ बन्धकर रक्खे और "अहणा पुत्र वाससा" मन्त्रसे उन अहणीय व्यक्ति के आने पर अनुमोदन करे ॥५॥ जिस स्थान में इन "अर्हणीय व्यक्ति की पूजा करने के लिये शिष्य आदि की इच्छा हो,एवं जिस समय अर्चना करनी सम्भव हो, वहीं ग्रहणीय व्यक्ति खड़ा होकर "इद मह मिमां” मन्त्र पढ़े ॥२॥ विष्टरपाद्यार्याचमनीयमधुपर्कानेकैकशस्त्रिनिर्वेदयेरन्॥३॥ विष्टरादीज् पञ्च रकैकशः' प्रत्येकं त्रि: त्रिः' उच्चार्य 'वेदोरन्’ निवेदयेरन्, अर्हयितार इति शेषः ॥३॥ विष्टरग्रहणविधिः । भाषा-विष्टर, पाद्य अर्घ्य, आचमनीय और मधुपर्क खाने की वस्तु ये पांच वस्तु लावे इनमें से एक २ करके तीन २ वार निवेदन करे ॥३॥ या ओषधीरित्युदञ्चं विष्टर मास्तीर्याध्युपविशेत्॥४॥ द्वौ चेत् पृथगृगभ्याम् ।। ५ ॥ 'श्रहणीयो जनः विष्टरं प्राप्य "या श्रोषधीः सोमराज्ञी बहवीः शतविच- क्षणाः । ता मह्म मस्मिन्नासनेऽच्छिन्द्राः शर्म यच्छत ॥३॥" "या श्रोषधी: १ ..

गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्-- msmmomenormonews - सोमराज्ञी विष्ठिताः पृथिवीमनु । ता महा मस्मिन् पादयो रच्छिद्राः शम्म यच्छत ॥४॥ ( म० प्रा० १,८, ३, ४)"-'इति' चं सूक्तं पठन् तं विष्टरम् 'उद- ञ्चम्' 'उत्तरामम्' कृत्वा प्रासने 'भास्तीय पातयित्वा; 'अधि' तदुपरि 'उपविशेत' (आसने इति तु मन्त्रलिजाद ज्ञायते, )॥॥ 'दो' विष्टरी प्राप्तो चेत् दावेव ती 'पृथग्ऋग्भ्यो पूर्वसूत्रोक्त या प्रोपधीरिति सक्त श्रुताभ्यां विभिन्नाभ्यां व्यवहायौं॥५॥ भाषा-अहंगीय व्यक्ति विष्टर पाकर “या ओषधी.' इन दो मन्त्रों का पाठकर उत्तरान आसन पर बैठे ॥ ४॥ यदि पूजा करने वाला दो विष्टर देवे तो, पूर्वोक्त दो मन्त्रों में से एक २ को पढ़कर इन दो विष्टरों को देवे ॥५॥ पायोरन्यम् ॥६॥ यती देवी रित्यपःप्रेक्षेत ॥७॥ सव्यं पाद मवनेनिज इति सव्यं पादं प्रचालयेत् ॥ ८ ॥ तत्र एक विष्टरम् श्रासनोपरि पास्तीर्याध्युपविशेदित्युक्तम् अभ्यम् द्वीतीय (म० प्रा० २,१, ५)"-तु पादयोः' अधस्तात् भास्तीयाध्युपविशेदित्येव ॥ ६ ॥ पाद्यग्रहणविधिः॥ अहयित्रा पाशाय दत्ताः 'अपः' "यतो देवी प्रतिपश्याम्याप- स्ततो मा राखिरागच्छतु (म० ग्रा. २१८५ ) ॥५॥ इति मन्त्रं पठन् 'प्रेक्षेत' अर्हणीयो जन इति (पाद्यादिलक्षणत्वस्या एव टीकायाः परिशिष्टे)।७१ "सव्यं पाद मवनेनिजे ऽस्मिन् राष्ट्र श्रियं दधे ॥ ६॥ (म० श्रा० २,५,६) 'इति' पठन् अर्हणीयः सः 'सव्यं' वाम 'पाद प्रक्षालयेत् ॥ ८ ॥ भाषा--एक विष्टर श्रासन पर डाले, दूसग दोनों पैर के नीचे रक्वे ॥ ६ ॥ पूजा करने वाले से, जल पैर धोने के दिये जाने पर उस जल को "यतो देवी” मन्त्र से मान्य व्यक्ति निरीक्षया करे ॥७॥ अनन्तर वह मान्य व्यक्ति थोड़ा जल लेकर "सव्यं पाद मवनेनिजे" मन्त्र से वायां पैर धोवे ८ दक्षिणं पाद मवनेनिज इति दक्षिणं पादं प्रक्षालयेत् ॥ ६ ॥ पूर्व मन्य मपर मन्य मित्युभी शेषेण ॥ १० ॥ ततः “दक्षिणं पाद मवनेजिजे ऽस्मिन् राष्ट्र श्रिय मावेशयामि (मवार त मन्त्रं पठन् स.अहवीयः 'दक्षिणं पादं प्रक्षालयेत् ।। शेषेण' R०४ खं० १० सू०६-१५] मधुपर्कविधिः॥ २३५ अवशिष्टेन पाद्योदकेन 'उभौ' पादौ सव्यदक्षिणी एकत्रीकृत्य प्रक्षालयेत्, तत्र च "पूर्व मन्य मपर मन्य मुभौ पादाववनेनिजे । राष्ट्रस्य बुर्या अभयस्यावरुद्ध्यै" ८ (म० ब्रा० २,८,८)-इति मन्त्रः प्रयोक्तभ्यः । १० । अर्घ्यग्रहणविधिः । भाषा-उस के बाद "दक्षिणपाद मवनेनिजे" मन्त्र से दहिना पैर धोवे ॥६॥ बाकी जल से “पूर्व मन्य'' मंत्र से दोनों पैर एकत्र धोवे ॥१०॥ अन्नस्थ राष्ट्रिरसीत्ययं प्रतिगृह्णीयात् ॥ ११ ॥ य. शोऽसोत्याचमनीय माचामेत् ॥१२॥ यशसो यशोऽसीति मधुपर्क प्रतिगृह्णीयात् ॥ १३ ॥ "अन्नस्य राष्ट्रिरसि राष्ट्रिस्ते भूयासम्'' ॥ ९॥ (म० ब्रा० २, ५, ८)--'इति' मन्त्रं पठन्, स अहणीयः, अर्हयित्रा दत्तम् 'अयम्' प्रतिगृह्णीयात् ॥ ११ ॥ आचमनीयग्रहणविधिः । “यशोऽसि यशो मयि धेहि" ॥१०॥ (म० बा० २, १०)-इति' मन्त्रं पठन् , स अर्हणीयः अर्हयित्रा दत्तम् 'आचमनीयम्। आचम- नार्थ मुदकं गृहीत्वा 'श्राचामेत्' आचमनविधिना आचमनं कुर्यादिति । मधुपर्क- ग्रहणविधिः । ततोऽर्हयित्रा दत्तं 'मधुपर्क' “यशसो यशोऽसि ॥११॥ (म० बा. २,८,११)-'इति' मन्त्र पठन् अर्हयिता प्रतिगृह्णीयात् ॥ १३ ॥ भाषा-"अन्नस्य राष्ट्रिरसि" मन्त्र से मान्य व्यक्ति अर्हयिता का दिया अयं ग्रहण करे ॥ ११॥ अनन्तर पूजक से आचमनीय जल पाने पर उस जल से “यसोऽसि” मन्त्र से, पूर्वोक्त आचमन विधि अनुसार, आचमन करे ॥१२॥ तब अर्हयिता से 'मधुपर्क' दिये जाने पर मान्य व्यक्ति "यशसो" यह मन्त्र पड़ कर उसे ग्रहण करे ॥ १३ ॥ यशसो भक्षोऽसि महसोभक्षोऽसि श्रीक्षोऽसि श्रियं मयि धेहीति त्रिः पिबेत्तूष्णीं चतुर्थम् ॥ १४॥१५॥ गृहीतञ्च तं मधुपर्क "यशसो भक्षोऽसि महसो भक्षोऽसि श्रीभक्षोऽसि श्रियं मयि धेहि ॥१२॥ (म० ब्रा० २,८,१२,)"-'इति' मन्त्रेण 'त्रि.' त्रिवारं "पिवेत्' 'तूष्णीम्' प्रमन्त्रक मेव 'चतुर्थ' पान मिति ॥ १४, १५॥

गोभिलगृपसत्रटीकायाम् -- भाषा-लिये हुये उस मधुक को " यशमो मन्त्र को तीन बार पढ़ कर एवं चौथी वार विना मन्त्र पढ़े पान करे ॥ १५, १५ ॥ भूय एवाभिपाय शेषं ब्राह्मणाय दद्यात् ।। १६ ।। मधुपर्काधिक्यञ्चेत् 'भरः' पुनरपि पञ्चमबार मपि श्रमन्त्रक मेव 'अभिपाय' 'शेष' पानावशिष्ट 'बाझरणाय' श्रद्धावते यम्मै कम्मै चित 'दद्यात्' ॥१६॥ वद्ध- गोमुक्तिप्रकारः। भाषा-यदि मधुपर्क अधिक प्राप्त हो जाये, (जो चार बार पाने पर भी न निघटे) तो पञ्चम वार भी विना मंत्र उन्ने पीर, ! १६ ॥ श्राचान्तोदकाय गौरिति नापिनम्नियात् ।। १७ ।। ततश्च 'प्राचान्तोदकाया स्वचित्ताय श्रईगीयाग 'नापिन.' गमादेविशसिता 'गौः'-इति पदं 'त्रिः' त्रिवार 'यूयान्। चारप्रयगोपदोचारणमाङ्गिनेन बदना गौरिदांनी मालब्धव्या न वा ?' इति अहंणीय मुद्दिश्य विशमिता नापितः पृच्छेदिति ॥ १७ ॥ ततस्तं नापितं कि प्रतियादित्याह भाषा-पीछे जब वह मान्य व्यक्ति मुंह आदि धो कर स्वस्थ चित्त होवे, तब शस्त्र हाथ में लेकर नापित भाकर उसे नीनवार जननावे, "गो!" (इसी समय क्या गौ काटनी पड़ेगी ? ) ॥ १७ ॥ मुश्च गां वरुणपाशाद् द्विषन्तं मेऽभिधेहीति तं जह्य- मुष्य चोभयोरुत्सृज गामत्तुतृणानि पिबदकमिति यात्१८ "मुञ्च गां वरुणपाशाद द्विषन्तं मे ऽभिधेहि ॥ १३ ॥ (म. प्रा० २, ८, १३)"-'इति' मन्त्रं "वं जयमुष्य, चोभयो छ रुत्सृज, गा मत्तु तृणानि, पिथ- तूदकम् ॥१॥(म० प्रा० १, ८, १५)"-'इति' मन्त्रं च तं नापित यात्- इमौ मन्त्रौ पठाहणीयो गोमोचनायादेशं कुर्यादिति ॥ १८ ॥ भाषा-अनन्तर नापित के उत्तर में मान्य व्यक्ति "मुझगां" मन्त्र एवं "तंजामुष्य" मन्त्रों को पढ़ कर गौ छोड़ने की आज्ञा देवे ॥ १८॥ माता रुद्राणा मित्यनुमन्त्रयेत॥१॥अन्यत्र अज्ञात् ।।२०।। ?

प्र० ४ खं०१०सू०१६-२५] वास्तुयागः॥ २३७ उस ॥१६॥ श्रौत- तादृशादेशेन मुक्तायां गवि ता मेव गा मवलोक्यन्नहणीय एव "मासा रुदाणांदुहिता वसून स्वसादित्याना ममृतस्य नाभिः । प्रनु वोचं चिकितुषे जनाय मा गा मनागा मदितिं वधिष्ट” ॥१५॥८॥२ (२,८,१५)-'इति' अनेन मन्त्रण अनुमन्त्रणं कुर्वीतेति ।।९। गवालम्भनानालन्भनयोर्व्यवस्थामाह-'यज्ञात, यज्ञः श्रौत सूत्राद्यनुसारत्तोऽनुष्ठेयो ज्योतिष्टोमादिः, तस्मात् 'अन्यत्र गृह्यसूत्रोक्तविवाहादौ पूर्वोक्तो गोमोचन-विधिः विद्यादिति ॥२०॥ भाषा-मान्य व्यक्ति की आज्ञा सुन, गौ को नापित छोड़ दे, मान्य व्यक्ति, "माता रुद्राणां” मन्त्र से गौ को अनुमन्त्रण करे सूत्रानुसार जो ज्योतिष्टोम आदि यज्ञ अनुष्टित होते, उस से भिन्न स्थान में, अर्थात् गृह्य सूत्रोक्त विवाह आदि संस्कार में उक्त गौ मोचन व्यवस्था समझे।२०। कुरुतेत्यधियज्ञम्॥२१॥षाही भवन्ति ॥२२॥ आचार्य ऋत्विक स्नातको राजा विवाह्यः प्रियोऽतिथिरिति । २३॥ 'अधियज्ञम्' यज्ञम् अधिकृत्य आदेशवचनं तु 'कुरुत' बद्धायाः तस्याः गाः बालभनम् ‘इति' एव । २१ । अहणीयपरिगणनम् -अाहीः अर्ध्य प्राप्तियोग्याः 'घट्' एव भवन्तिार।के ते!इत्याह,-'प्राचार्यः' कल्पादिसहितसमग्रवेदाध्यापकः, 'ऋत्विक होत्रादीना मन्यतमः, स्नातकः' कृतसमावर्तनाङ्गस्नानः, 'राजा' अभि- पिक्तो राज्ये, "विवाह्यः' विवाहं कत्तु मागतः, 'प्रियोऽतिथिः;' विद्यादिगुणवान- भ्यागतः :- इति पट् ।२३। श्रहण कालनिर्णयं करोत्याचार्यः। भाषा-यज्ञ के खूटे में इस प्रकार बंधे हुए गौ को मोचनार्थ पूंछने पर "करो" अर्थात् उस “गौ को बध करो" यही आदेश करे ॥ २१ ॥ छः व्यक्ति अर्हणीय होते हैं ॥ २२ ॥ आचार्य, ऋत्विग, स्नातक, राजा, वर और गुणवान् अतिथि, ॥ २३ ॥ परिसंवत्सरानहयेसुः ॥ २४ ॥ पुनर्यज्ञविवाहयोश्च पुनर्यज्ञविवाहयोश्च ।। २५ ॥ १० ॥ ॥ इति गोभिलगृह्यसूत्रं समाप्तम् ।। .. - २३८ गोभिलगृह्यसूत्रस्य- 'परिसंवत्सरान्' वीप्सायां परि; संवत्सरान् प्रतीति यावत् । तथाच प्रति- तृतीयादिवर्षान्ते तानाचार्यादीनहरणीयान् 'अहयेयुः पूजयेयुः शिष्यादय इति १२५॥ संवत्सरत्रयमध्येऽप्याह । यज्ञे विवाहे च समागतान् तान् संवत्परत्रयमध्ये 'पुनः' 'च' अपि अर्हयेयुरित्येव । द्विर्वचन मध्यायसमाप्तिसूचकमिति शम् । २५ ॥१०॥ इति सामवेदीये गोभिलगृह्यसूत्रे चतुर्थप्रपाठके दशम स्वगम्य श्राममित व्याख्यानं समाप्तम् ॥ ४ ॥ १०॥ चतुर्थप्रपाठक समाप्तः ॥ ४ ॥ भाषा-अन्यून प्रति-तीसरे वर्ष के अन्त में प्राचार्य आदि की पूजा करे ॥ २४ ॥ यज्ञ और विवाह के अवसर पर मान्य लोग ( उक्त ६) तीन वर्ष के बीच में भी यदि आवे तो उन का यथावत् सत्कार करे ॥ २५ ॥ गोभिलगृह्यसूत्र के चौथे प्रपाठक के दशम खराड का अनुवाद समाप्त हुआ। चौथा प्रपाठक भी समाप्त हुमा और गोभिलगृह्यसूत्र भी समाप्त हुआ। टीकापरिशिष्टम्। इह गृह्यसूत्रे यानि कानिचित् दुर्बोधपदादीनि विद्यन्ते नेपां अर्थादिबोधनायेदम् । गृह्याकर्माणि ।। १ ।। प्र० १ खं १ । "पत्न्यः पुत्राश्च कन्याश्च अनिष्याश्चपरे सुताः । गृमा इति समाख्याता यज- मानस्य दायकाः ॥३५॥ तेषां संस्कारयोगेन शान्तिकर्मकियासुन् । प्राचार्यविहितः कल्पस्तस्माद गृह्य इति स्थितिः" ॥३६॥ इति गृह्मासः ॥१॥ एवञ्च गोभिलाचार्यप्रणीता इयं स्मृतिः 'गृह्या'-इत्युच्यते, तस्यां यानि कर्माणि वक्ष्यमाणानि, तान्येव गृह्याकर्माणि । इत्येकोऽर्थः। अपरायंस्तु मूलेन साकमेव मुद्रितः । केचित्तु 'गृह्य'-इति कर्माणीत्यस्य विशेषणं, पृथक् पद, सुपांसुलुगित्यात्वेच रूप मिति मन्यन्ते, तथाच 'गृती अनुष्ठेयानि कर्माथि' इति तृतीयोऽर्थः सम्पद्यते ।

टीकापरिशिष्टम् ॥ - अन्वाहार्यवन्ति ॥ ५॥ प्र० १ खं० १ । "यत् श्राद्धं कर्मणा मादौ या चान्ने दक्षिण भवेत् । अमावास्यां द्वितीयं यत् अन्वाहार्य तदुच्यते ॥” क० प्र० ३ । अन्वाहार्य विद्यते येषां कर्मणां तानी. मानि अन्वाहार्यवन्ती-त्यर्थः। तत्रापि विशेषोऽस्ति, तथायुक्तं कर्मप्रदीपे- "नाष्टकासु भवेच्छाद्धं न श्राद्धे श्राद्ध मिष्यते । न सोष्यन्ती-जातकर्म--प्रोषिता गत कर्मसु ॥” इत्यादि। अभिरूपभोजनम् ॥ ६॥प्र० १ खं० १ । "यत्र विद्या च वित्तं च सत्यं धर्मः शमो दमः। श्रभिरूपः स विज्ञेयः स्वाश्रमे यो व्यवस्थितः ॥"गृ० सं० २०१२ अन्त्यां समिधम् ॥ ७॥प्र० १ खं० १ । "प्राचार्यणाभ्यनुज्ञात प्राचार्या नौ विधिर्यथा । प्रणीतेऽग्नौ समिद्दद्यादन्त्या सा ब्रह्मचारिणाम् ॥” गृ० २ । १८ "नाङ्गुष्ठादधिका ग्राह्या समित् स्थूलतया क्वचित् । न वियुक्तत्वचा चैव न सकीटा न पाटिता। प्रादेशान्नाधिका नोना न तथा स्याद्विशाखिका । न सपर्णा न निर्वीर्या होमेषु च विजानता क. प्र. । अभ्युक्षेत् ॥६॥ प्र० १ खं० १ । "उत्तानेनैव हस्तेन प्रोक्षणं समुदाहृतम् । न्यञ्चताभ्युक्षणं प्रोक्तं तिरश्चावोक्षणं मतम् ॥' गृ०१।१०३ भा. लक्षणावृत्॥१० ।। प्र० १ नं०१ । अवाहरणाद्यभ्युक्षणान्तं लक्षण मुच्यते, तस्य श्रावृत् रीति रिति । गृहासंग्रहे तु-"लक्षणं तत् प्रवक्ष्यामि प्रमाणं दैवतश्च यत्॥४७॥x x x x तस्मात् फलेन पुष्पेण पणेनाथ कुशेन वा । प्रोल्लिखेल्लक्षणं विप्रः सिद्धिकामस्तु कर्मसु ॥४८॥ सव्यं भूमौ प्रतिष्ठाप्य प्रोल्लिखेदु दक्षिणेन तु । सावनोत्थापयेत् पाणिं यावदग्नि निधापयेत् ॥४९॥ प्रागगता पार्थिवी ज्ञेया आग्नेयी चाप्युदग्गता। प्राजापत्या तथा चैन्द्री सौमी च प्राकृता स्मृता ॥ ५० ॥ उत्करं गृह्य रेखाभ्योऽरविमात्रे निधापयेत् । द्वारमेकन्तु द्रव्याणां प्रागुदीच्यां दिशि स्मृतम् ॥५॥ पार्थिवी चैव २४० गोभिलगृह्यसूत्रटीकायाम्--- सौमी च लेखे द्वे द्वादशाङ्गुले । एकविंशतिराग्नेयी प्रादेशिन्ये उभे स्मृते ॥५२॥ पडङ्गुलान्तराः कार्या श्राग्नेयी संहितास्तु ताः। पार्थिवायास्तु रेखायास्तिस्रस्ता उत्तरोत्तराः॥ ५३ ॥ शुकुवा पार्थिवा स्यादाग्नेयी लोहिता भवेत् । प्राजापत्या भवेत् कृष्ण नीलामैन्द्रीं । विनिद्दिशेत् ॥ ५४॥ पीतवर्गन सौमी स्यादेखागां वर्णलक्षणम् । एष लेखविधिः प्रोक्तो गृपाकर्मसु सर्वसु ॥ ५५ ॥ सूक्ष्मास्ता ऋजवः कार्या लेखास्ताः सुसमाहिताः ॥" ५६ ॥ १ ॥ अग्निं प्रणयन्ति ।। ११ ॥ प्र० १ खं०१। "कपालैभिन्नपात्रैर्वा न त्वामैगामन या। अग्निप्रणयनं कार्य यजमान भयावहम् ॥ ६४ ॥ अल्पः प्रीतो विच्छिन्नोऽसमिद्धश्चापरिश्रुतः । त्वरया पुन- रानीतो यजमानभयावहः ॥ ६५ ॥ तम्मानभेन पावेगा अविच्छिन्नाशं बहु । अग्निप्रणायनं कुर्यात् यजमान मुम्बावहन् ॥६६॥ शुभं पावन्तु कांस्यं स्यात् तेना- ग्निं प्रायेद बुधः । तस्याभावे शरावेगा नवेनाभिमुखञ्च तम् ॥६७ (गृ०सं०१॥ अग्निसमाधानम् ॥ १४ ॥ प्र० १ खं० १ । "प्राधानस्य तु चत्वार उक्ताः कालाः पृथक पृथक् । (1) अन्त्या समिद, (२) विवाहश्च, (३) विभागः, (४) परमेष्टिनः ॥" गृ० सं० ।। ७६ गोभिली- यानान्तु त्रयएव कालाः विभागकालस्तु गौतमीयानाम् । मथित्वा ॥ १७ ॥ प्र०१ ग्वं० १ । अरणिद्वयमिति शेषः । श्ररगिद्वयलक्षणं त्वेवम्,-"अश्वत्यो यः शमीगर्भः प्रशस्तोर्वीसमुद्भवः । तस्य या प्रामुग्नी शाखा वादीची चोर्ध्वगापि वा। अरणि. स्तन्मयी प्रोक्ता, तन्मय्येवोत्तरारणिः" ॥ इत्यादि क०प्र० 1 "देवयोनिः स 'वज्ञेयस्तत्र मथ्यो हुताशनः गृ० सं० १८० उदिते, अनुदिते ॥ १८ ॥ प्र० १ खं०१। "रेखामानं तु दृश्येत रशिमभिश्च समन्वितम् । उदयं तं विजानीयात् होम कुर्याद विचक्षणः ॥" . सं० १ । ७५ “रात्री षोड़शमे मागे ग्रहनक्षत्रभूषिते । अनुदयं विजानीयाद्धोमं तत्र प्रकल्पयेत् " गृ० सं० ।। ५ समयाभ्युषित- टोकापरिशिष्टम् ॥ कालेऽपि होमो मन्वादिभिरुपदिष्टः, परं न तत्कौथुकानाम्, गोभिलानुक्तेः । तत्काल- लक्षणं त्वेवम्,-"ततः प्रभातसमये नष्टे नक्षत्रमण्डले । रविविम्बं न दृश्येत सम- याध्युषितं स्मृतम् ॥” गृ० सं० १।७४ यज्ञोपवीतम् ॥१॥प्र.१ खं० २ । 'त्रिवृद्धवृतं कार्य तन्तुत्रय मधोवृतम् । त्रिवृतञ्चोपवीतं स्यात् तस्यैका प्रन्थिरिष्यते ॥' क. प्र. , "यज्ञोपवीतं कुर्वीत सूत्रेण नवतान्तवम् ॐ ॐ ॐ । द्विगुणं त्रिगुणं वापि एकनन्थिकृतं विदुः "गृ० सं० ११४८.-५१ ॥ जुहुयात्, कृतस्य, अकृतस्य ॥६॥ प्र० १ खं० ३। "होमपात्र मन.देशे द्रवद्रव्ये खुवः स्मृतः । पाणिरेवेतरस्मिंस्तु त्रुचा चात्र न हूयते ॥” iक० प्र० १ “यवतीयकृतं ज्ञेयं तण्डुलादि कृताकृतम् । श्रोदनं तु कृतं विद्यात् न तस्य करणं पुनः ॥" गृ० सं० १९३ ॥ चरुस्थाल्या, सुवेण ॥ ८॥प्र० १ खं० २ । "तिर्यगूदुर्घ समिन्मात्रा हड़ा नातिबृहन्मुखी। मृन्मय्यौडम्बरी वापि च रु. स्थाली प्रशस्यते ॥" क० प्र० २ "खादिरो वाथ पाएँ वा द्विवितस्तिः सुवः स्मृतः । स्रुक् बाहुमात्रा विज्ञेया वृत्तस्तु प्रग्रहस्तयोः । नुवाने घ्राणवत् खातं द्वयङ्गुष्टपरिमण्डलम् । जुह्वाःशराववत् खातं, स्रुचश्चार्द्ध षडङ्गुलम् ॥" क ... अपराजितायां ॥ ६॥ प्र०१ खं० २। प्रक्रमणे तथोद्धाहे होमेष्विष्टकृते तथा । यस्यां दिशि विधि प्राहुस्तामाहुरप- राजिताम् ॥' गृ० सं० २१७८ ॥ उपाशु ॥ १८॥ प्र.१ खं०३। शनैरुच्चारयेन्मन्त्र मीषदोष्ठौ प्रचालयन् । किञ्चिच्छब्दं स्वयं,विद्यादुपांशुश्चैव जपः स्मृतः॥"म. अतिथिभिः॥२॥प्र० १ खं०४। एकर त्रं हि निवसनतिथिाह्मणः स्मृतः । अनित्यं हि स्थितो यस्मास स्मा- दतिथिहच्यते ॥" मनुः ३।१०२ ॥ १६ ..

गोभिलगृह्यसूत्रस्थ- फलीकरणानाम् , आचामस्य ।। ३१॥ प्र. १ खं ४ । "कन्चुकाश्च कणाश्चैव फलीकरणककुशाः ॥” गृ- भा० "प्रोदनामद्रवं प्राहु- राचामं हि मनीषिणः ॥ गृ. भा०॥ सन्ध्यां उपवसन् ॥ ३ ॥ प्र० १ खं० ५। "अहोरात्रस्य यः सन्धिः सूर्यनक्षत्रवर्जितः । सा च सन्ध्या ममास्याता मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥' उपवासदिनकर्तव्यताकर्तव्यते स्वयमे बोक्ने उपावृत्तस्य पापेभ्यो यस्तु वासो गुणः सह । उपवासः स विज्ञेयो न शरीरविशोषणम् ॥" इति च स्भृत्यन्तरम् । पूर्णः ॥ १०, ११ ।। प्र०१ खं० ५। "राकामध्यगतश्चन्द्रः पूर्गा इत्यभिधीयते"। स्थाण्डिलं,इध्मान् ,मेक्षणम् ,ौपवमाथिकम् १३-१६प्र०१खं०५ "वेदिः परिष्कृता भूमिः समे स्थण्डिलचत्वर ।" इत्यमरः । "प्रादेशद्वयमि- धमस्य प्रमाणं परिकीर्तितम् ।' क. प्र. २ ॥ "इध्मः सबहनादानं धरुपण मेव च । तूष्णी मेलानि कुर्वीत समस्तञ्चम माददेत् ॥” गृ० सं०१।१०२ "इध्मजातीय मिध्मार्द्धनमाण मेक्षणं भवेत् । वृत्तञ्चाङ्गुष्टपृथ्वग्र मवदानक्रियाक्षमम् ॥ एपैव दर्वी यस्तत्र विशेषस्त महं युवे । दची द्वयगुलपृथ्वग्रा तुरीयोनन्तु मेक्षणम्" इति क. प्र. २॥ औपवसधिकं नानाति-इत्यादि ॥१-६॥ प्र० १ । ख. ६! उपवासदिननियमितखाद्यमीपवसयिकमित्यर्थः । तच्चोक्तं, "लवणं मधुमासञ्च क्षारांशो येन भूयते । उपवासे न भुञ्जीत नोकरात्रौ कथञ्चन ॥" क. प्र. ३ अत- एवाह स्मृतिः,-"गृह्यस्थो ब्रह्मचारी च यर स्वनभंस्तपश्चरेत् । प्राणाग्निहोत्र लोपेन अवकीर्णी भवेत्तु सः ।"-इति, "अनड्वान् ब्रह्मचारी च प्राहिताग्निश्च ते त्रयः । अनन्त एव सिध्यन्ति नैषां सिदिरनग्नताम्" इति च । दर्भवटुम् ॥ २१ ।। प्र.१ खं ६ । "ऊर्ध्वकेशोभवेद् ब्रह्मा लम्बकेशस्तु विष्टरः । दक्षिणावर्तको ब्रह्मा वामा- टीकापरिशिष्टम् ॥ Jun -- वर्तस्तु विष्ठरः॥ कतभिश्च कुशैब्रह्मा ? कतिभि विष्टरः स्मृतः ! पञ्चाशद्भिः कुशै- ब्रह्मा तदर्थेन च विष्टरः ॥" गृ. १ । ८८, ८९ "द्विरावृत्त्याथ मध्ये वै अर्द्ध वृत्त्यान्त देशतः । प्रन्थिः प्रदक्षिणावत्तः स ब्रह्मपन्थिसंज्ञकः ॥” इति पु. "यज्ञवास्तुनि मुष्टयाच्च स्तम्बे दर्भवटी तथा। दर्भसंख्या न विहिता विष्टरास्तर- णेष्वपि ॥” इति च क० प्र० ॥ उलूखलमुसले, शूर्पम् ॥ १॥प्र.१ खं०७ "मुसलोलूखले वाः स्वायते सुदृढे तथा । इच्छाप्रमाणे भवतः शूर्प वैणव मेव च ॥"-इति क० प्र० २ हविनिर्वपति ॥ २॥ ३ ॥ प्र. १ खं० ७ "चूडाकर्मणि सीमन्ते यश्च पाकः सदा गृहे। विवाहे चैव लाजानां नोक्तो निर्वपणे विधिः॥" गृ० स० २। ३९ अभिधार्योदास्य प्रत्यभिधारयेत् ॥ ८॥३०१ खं०७ "पवित्रान्तहितं कृत्वा चहं प्राज्ञोऽभिधारयेत् । उदास्य चैवं विधिना एवं तन्त्रं न लुप्यते । चतुर्मुष्टिश्चरूः कार्यश्चतुर्णामुत्तरोऽपि वा ॥” गृ० स० २१६९ परिधीन् ।॥ १६ ॥ प्र० १ खं० ७ "बाहुमात्रा: परिधय जवः सत्वचोऽत्रणा; । त्रयो भवन्त्यशीर्णाग्रा एके. पस्तु चतुर्दिशम् । प्रागग्रावभितः पश्चादुदगग्र मयापरम् । न्यसेत् परिधि मन्यश्च उदगम: स पूर्वत: ॥" क. प्र. २ प्रणीता ॥ १७ ॥ १८॥ प्र० १ खं० ७ "विहितप्रतिषिद्धाञ्ज प्रणीतां नोपकल्पयेत् ॥” गृ० स० ।। ९६ प्राज्यं, सर्पिस्तैलं दधि पयो यवागूवा ॥१६॥२०प्र०१ खं०७ "अग्निना चैव मन्त्रेण पवित्रेण च चक्षुषा । चतुर्मिरेव यत् पूतं तदा मितरदु घृतम् ॥ १०६ ॥ घृतं वा यदे वा तैलं, पयो वा यदि यावकम् । प्राज्यस्थाने नियुक्ताना माज्यशब्दो विधीयते ॥ १.७॥ प्राज्यानां सर्पिरादीनां संस्कारे विधि- चोदिते । अनधिश्रयणं दनःशेषाणां श्रयणं स्मृतम् ॥ १८॥ यथा सीमन्तिका गोभिलगृह्यसूत्रस्य- नारी पूर्वगर्भेण संस्कृता । एव माज्यस्य संस्कारः संस्कार विधिनोदिते॥ १८९ !! इति गृ० स० ॥ पवित्रे ॥ २१.२३ ॥ प्र० १खं० ७ "श्रनन्तर्गभिणं सायं कौशं द्विदल मेव च । प्रादेशमात्रं विज्ञेयं पवित्रं यत्र कुत्रचित् ॥" क. प्र. १ सम्पूय, उत्पुनाति ॥ २४ ॥ प्र० १ खं०७ "पवित्र मन्तरे कृत्वा स्थाल्या मान्य समावपेत् । एतत् सम्पूयनं नाम पश्चा- दुत्पवनं स्मृतम् ॥" गृ० सं० १।१०६ आज्यम् ॥ २६ ॥ प्र. १ खं० ७ श्राज्यसहित माज्यपात्र माज्यस्थाली मिति याक्न् । “भाज्यस्थाली च कर्तव्या तैजसद्व्यसम्भवा । महीमयी वा कर्तव्या सर्वास्वाज्यहुतीषु च ॥ आज्यस्थाल्या: प्रमाणं तु यथाकामं तु कारयेत् । सुदृढ़ा मरणां भद्रा माग्यस्थाली प्रचक्षते ॥" क. प्र. २ उपघातम् ॥ २॥ प्र० १ खं०८ "पाणिना मेक्षगेनाथ सुवेणैव तु यद्धविः । हयते चानुपस्तीर्य उपघात: स उच्यते ।" इति गृ० स० १.११ महाव्याहृतिभिः ॥ २ ॥ प्र० १ खं० ८ "भूराद्यास्तिस्र एवैता महाव्याहृतयोऽव्यय:"। इति क० प्र० बीहयः शालयो मुद्गा गोधूमाः सर्पपास्तिलाः। यवाश्वौषधयः सप्त विपदो नन्ति धारिताः ॥"-इति क. प्र. भा० । सुरोत्तमेन ॥१॥ प्र० २ खे०१ .' सुरा-इतिः निवण्टौ उदकनामसु (अखं.) पाठभेदेन पञ्चविंश- तितमं पद मस्ति, तदेवात्र ग्राह्य मित्याधुमिकानाम् । परं तत्र तथा निगममात् उदकार्थस सुराशब्दस्याभाव एनानेकेषा मतएवात्रा- "स्ववमिरनिन्याभिरद्वमिरक्षतमिश्रितः। स्नानं चतुर्भिः कलशैः सोभिः ।

टीकापरिशिष्टम् ॥ २४५ -- स्त्रीं यत्र प्लावनम् ॥ १५ ॥ गौडी पौष्टी च माध्वी च विज्ञेयास्विविधाः सुराः । पाणिकर्मणि गौडी स्यात् सत्या माध्व्यधमा सुराः ॥" १६ ॥ इति गृ० स०२। प्राजनेन, ध्रुवणा मपा, लाजाम् ॥ १३-१६ ॥प्र० २ खं० १ "अवसिक्तन्तु विधिना पाणिग्राहन्तु प्राजनी। रक्षणार्थ मनुगच्छेत् सप्ताह हय मेव वा ॥'०स०२॥३५ "महानदीषु या श्रापः कोप्यान्याश्च ह्रदेषु च । सर्व वर्णरसैर्युक्ता ६वास्ता इति निश्चयः ॥” गृ० स० २।२५ "अक्षतास्तु यवाः प्रोक्ता भृष्टा धाना भवन्ति ते । भृष्टास्तु ब्रीहयो लाजा घटाः खाण्डिक उच्यते ॥"क०प्र०३ प्रपदेन ॥ ६॥ प्र. २ खं० २ "पादाग्रं प्रपदम्"-इत्यमरः २ । ६ । ७१ ॥ प्रदक्षिणमग्निं परिणयति ॥४-१२ ॥ प्र० २ खं० २ "लाजानाज्यं नवं कुम्भं प्राजनाश्मान मेव च । प्रदक्षिणानि कुर्वीत दम्पती तु विना ग्रही ॥" गृ० स०२ । २९ 'ग्रही'-इति उदकग्राहम्प्राजमग्राहञ्च 'विनेत्यर्थः । अनुमन्त्रयते ॥ ११ ।। प्र० २ खं० ३ "स्पृशन्ननामिकाग्रेण क्वचिदालोकयन्नपि । अनुमन्त्रणीयं सर्वत्र सर्वदैवानुम- न्त्रयेत् -" इति क० प्र० । अर्घ यम् ॥ २४ ॥ प्र० २ खं० ३ "पडाहरे भवन्ति"-इत्यादि वक्ष्यत्याचार्यः स्वय मेव (४१०२२) हविष्यम् ॥ १७ ॥ १ प्र० २ खं० ३ "अयुक्त मम्ललवणैरपर्युषित मेव च । हृविष्य मेतदन्नाद्य मसुरैरप्यसंयुतम् ॥" गृ० स०२ । ७६ नदीः ॥ २॥ प्र. २ खं० ४ "मासद्वयं श्रावणादि सर्वा नद्यो रजस्वलाः । तासु स्नानं न कुर्वीत वर्जयि- त्वा समुद्रगाः ॥ धनुः सहस्राण्यष्टौ च गतिर्यासां न विद्यते । न दुनदी शब्दवहा गस्तेि परिकीर्तिताः ॥" क. प्र. १

गोभिलगृह्यसूत्रस्य
।
नुक्सम्पातम् , ह्रासयित्वा ।। २-६ ।। प्र० २ खं० ५
"हुत्याज्यं परिशेपेण यद् द्रव्य मुपकल्पितम् । वेव तु तत् स्पृष्टं सम्पानं
चैव तं विदुः ॥" गृ० स० ।। १६४ उदतनं नवच्छो रोग छेदन मेव च ।
मंसनं मेखलायाश्च हासनानि विदुबुधाः ॥" गृ० म०२ । ३८
न्यग्रोधशुङ्गा, व्रतवती, ब्रह्मन्धूः ॥६-१२। प्र. २ खं० ६
"लताप्रपलवो बुध: शुङ्गेति परिकी रचते । पतिव्रता प्रतवती प्रबन्धस्तथा-
श्रतः॥" क० प्र०३
सलाटुग्रन्धम् ।।४। प्र० २ खं०७
"शल टु नील मित्युक्तं ग्रन्यः स्तबक च्यने ।" क. प्र. ३ 'श्रामे फले
शलाटुः स्यात्' इत्यमरः २ । ४ । ३५
दर्भपिज्जूलीभिः, ॥५॥ प्र० २ खं० ७
"एतत्प्रमाणा मेवैके कोशी मेवाईमञ्जरीम् । शुष्को वा शीर्गा कुसुमां पिजू.
ली परिचक्षते ।"-क० प्र० . 'एतत्प्रमाण प्रादेशप्रमाया मिति यावत् ।
वीरतरेण, शलल्या ॥६॥ प्र० २ खं० ७
"त्रिभिःश्वेतैश्च शटली, प्रोक्तो वीरतर: शरः।" गृ. स. 11 ९५ "श्वा-
विच्छलाका शलली तथा वीरतरः स्मृतः ।" क० प्र० ३
कृसरः ॥६॥ प्र०२ खं०७
"तिलतण्डुलसम्पनः कृसरः सोऽभिधीयते ।" क. प्र.३
कपुष्णिकां, कपुच्छलम् ॥१८, १६॥ प्र० २ खं०६
"कपुष्णिका भितः केशा मूर्ध्नि पश्चात् कपुच्छलम् ।" इति क. प्र. ३
यथागोत्रकुलकल्पम् ॥ २५ ॥ प्र० २ खं०६
"दक्षिणाकपः शिष्टा पात्रेपासिकपर्दिनः । आङ्गिरसः पञ्जबड़ा मुरडा
मृगों शिखिनोऽन्ये । गृ० सं० २। ४.
उपनयेत् ॥ १॥ प्र. २ खं० १०.

टीकापरिशिष्टम् ॥ marnatan lam har "गृह्योक्तकर्मणा येन समीपं नीयते गुरोः । बालो वेदाय तद्योगाद बालस्यो- पनयनं विदुः ॥ इति स्मृ. ऐणेयरौरवाजानि॥३॥ मुञ्जकाशताम्बल्यः॥१०॥प्र०२खं०१० 'अनुचो माणवको ज्ञेयः एणः कृष्णमृगः स्मृतः। रुरुगौरमृगःप्रोक्ता, ताम्बलः शण उच्यते ।" क. प्र. ३ स्नानम् ॥२०॥ प्र० ३ खं० १ जलक्रीडादिपूर्वक मन्जनमेव स्नानमिहेप्यते । "न गात्रोत्सादनं कुर्यादनापदि कथञ्जन । जलक्रिया मलङ्कारं व्रती दण्ड इवाप्लवेत् ॥" क. प्र. ३ वरः ॥ ४५ ॥ प्र० ३ खं० २ "गौविशिष्टतमा विप्रैदेष्वपि निगद्यते । न ततोऽन्यद वरं यस्माद तस्माद् गौवर उच्यते ॥” इति क० प्र०३ अक्षतधानाः ॥ ६ ॥ प्र० ३ खं०३ "अक्षतास्तु यवाः प्रोक्ताः भृष्टा धाना भवन्ति ते।" क.प्र. पक्षिणीम् ॥ ११ ॥ प्र०३ खं० ३ "द्वावन्हावेकरात्रिश्व पक्षिणीत्यभिधीयते ।” इति शु० निर्घाते ॥ २० ॥ प्र. ३ खं. ३ "यदान्तरिक्षे बलवान् मारुतो मरुताहतः । पतत्यधः स निर्घातो जायते वायुसम्भवः ॥' इति ज्यो० शिष्टाचारः ॥ २६ ॥ प्र. ३ खं०३ "धर्मणाधिगतो यैस्तु वेदः सपरिबृंहणः । ते शिष्टा ब्राह्मणा ज्ञेयाः श्रुतिप्र- त्यक्षहेतवः ॥” स्मृ० अद्भुते ॥ ३० ॥ प्र० ३ खे० ३ "प्रकृतिविरुद्ध मदभुत मापदः प्राक् प्रबोधाय देवाः सृजन्ति" इत्याथर्वणम् अनाग्नका ॥ ६॥ प्र०३ खं०.४ गोभिलगृह्यसूत्रस्य- Homematomemale main Reimaages Miniatuwedeseenemom "नग्निकां तु वदेत् कन्यां यावअमिती भयेन । अनुमतो त्वनग्निका, तां प्रयच्छेत्वनग्निकाम् । १७ अप्राप्ता रनमो गौरी, प्राप्त र जसिरोहिणी । अभ्यजिता भवेत् कन्या, कुचहाना व नग्निका । ६८ व्यजनैस्तु मम्पनः पोमो भुनीत क- न्यकाम् । पयोधरैस्तु गन्धी, रजसाग्निः प्रकीर्तितः। १९ तस्मादन्यजनोपता परजा अपयोधरा । अभुक्ता चैव सोमायः : कन्यका न प्रशम्यते ।"२० इलि गृ० सं०२॥ मनुरपि-- देवदतां पतिया विन्दते नेच्छयात्मनः ।" ९, ९५ विलयनम् ॥ ४ ॥ प्र. ३ खं० ६ "दध्या मथितं सर्व तद्वै विलयनं स्मृतम् ।। इति गृ० भा० सप्तमस्खण्डे- प्रनामे ॥६॥ प्र० ३ ख०७ "संसक्तपदविन्यासविपदः प्राम: स्मृतः । स्मार्ने कर्मणि सर्वत्र सागे त्व. ध्वर्युचोदितः ॥” इति गृ० भा० कपालम् ।। ७ ।। प्र०३ खं० ७ "कपालं मृगमयं पात्रं चक्रघटित मुच्यते । धासुर चाटतं देये पैचे च वर्जयेत् ॥” इति गृ• सै०२ । ७८ भा० न्यञ्ची पाणी ॥ १७॥ प्र. ३ खं०७ "दक्षिणं वामतो वाह्य मात्माभिमुख मेव च । कर करस्य कुर्वीत करणे न्यचकर्मणः ॥" क.प्र. २ स्थालीपाकवृतान्यत् ॥ २० ॥ प्र० ३ खं. ७ "स्थालीपाकावृतान्यत्तु यत्र संज्ञा निपात्यते । तत्राज्यभागी हुत्वैत्रत मास्ता- विद्यति ॥" गृ० सं. ११५ पृषातके पायसश्चकः॥ १॥ प्र० ३ खं०८ "पयो यदाज्यसंयुक्त तत् पृषातक मुच्यते । दध्येके। तदुपासाद्य कर्तव्यः पायलचल क०प्र०३. गोनामभिः॥ ३ ॥ प्र. ३ खं०८।

टीकापरिशिष्टम् ॥ 11. "काम्या प्रिया च हव्या च इडा रन्ता सरस्वती । मही विश्रुता चाप्नया च गोनामानि विदुर्बुधाः ॥” इति गृ० स० २ । ६० नवयज्ञे ॥ ८ !! प्र० ३ खं०८। "शरद्वसन्तयोः केचिन्नवयज्ञं प्रचक्षते । शान्यपाकवशादन्ये श्यामाको वनिनः स्मृतः ॥ आश्वयुज्यां तथा कृष्टयां वास्तुकर्मणि याज्ञिकाः । यज्ञार्थतत्त्ववेत्तारो होम मेवं प्रचक्षते ॥" क. प्र.३ फलवतीम् ॥ ४ ॥प्र० ३ खं०६। "सफला वदरीशाखा फलवत्यभिधीयते । क. प्र. जातशिलासु॥ ६॥ प्र० ३ खं०६। "धना विकसिताशङ्गाः स्मृता जातशिलास्तु ताः।" क०प्र० ३ स्वस्तरम् ॥ १२ ॥ प्र० ३ खं०६। "स्वस्तरे सर्व मासाद्य यथा यदुपयुज्यते । देवपूर्वं ततः श्राद्धं सत्वरः शुचि- रारभेत् ॥" क०प्र० २ "पारिभाषिक एव स्यात् कालो गोवाजियज्ञयोः । अन्यथा नुपदेशात्त स्वस्तरारोहणस्य च गृ० स० अपूपाम् , त्रैयम्बकप्रमाणान् ॥८, १०॥ प्र० ३ खं० १० । "त्रयम्बकं करतल मप्पा मण्डकाः स्मृताः ॥' क० प्र० ३ उल्मुकेन ॥ १८॥प्र० ३ खं० १० । "अङ्गारोऽलात मुल्मुकम्'-इत्यमरः २, ९, ३० । स्रोता सि ॥ २५ ॥ प्रे० ३ खं० १० । "सप्त तावन्मूर्धन्यानि तथा स्तनचतुष्टयम् । नाभिः श्रोणिरपानञ्च गोः स्रो- सांसि चतुर्दश ॥" क. प्र. ३ mume- सर्वाङ्गेभ्यः ॥ १॥ प्र० ४ खं० १ । "हजिह्वाक्रोडसक्थीनि यकृवृक्वौ गुदं स्तनाः। श्रोणिः स्कन्धसटा श्वेव पश्वङ्गानि प्रचक्षते ॥

२५० गोभिलगृह्म सत्रस्यall MANIANResemom एकादशाना मङ्गाना मवदानानि सङ्ग्यया । पाश्चन्य वृषकसक्थ्नोत्र द्वित्वादा- हुश्चतुर्दश ॥' क. प्र. ३ वृषीम् ।। १५ ।। प्र० खं० २। "वृषी कुर्यादुवइमुखीम्" पृ० सं १ { ३८ का शासनमित्यर्थः । शङ्कुश्चैवो. पवेशश्च द्वादशाङ्गुल इयत्ते" गृ० स० : { ८४ 1 वृष्यपरपर्याय उपवेशः इति नारायणोपाध्यायः। स्थगरम् ॥ १७-२० ॥ प्र० ४ खं० २ । "स्थगरं सुरभि ज्ञेयं चन्दनादि विलेपनम् ।" क० प्र० २ । पूर्वस्या काम् ।' ६ ॥ प्र० ४ ग्वं० ३ । 'पुरतो यात्मनः कः सा पूर्वा परिकीय॑ते । मध्यमा दक्षिणेनास्यास्त हक्षि- गत उत्तमा । कर प्र०२। एवमेवेतरयोः ॥ ॥ प्रः ४ खं० ३ । "पितु स्तरकर्वन्ते मध्यमे मध्यमस्य तु । दक्षिणे तस्पितुश्चैव पिण्हान् पर्वणि निर्वपेत् क. प्र०२॥ पिण्डम् ॥ १० ॥ प्र. ४ खं० ३ । पिण्डप्रमाणं त्वाह "पिण्डान् दत्वा बिल्वप्रमाणकान् ।" क.प्र.. वृद्धिपूर्तेषु । ३४ ॥ प्र० ४ खं० ३ । "वृद्धिः पुरुषसंस्कारः"-इत्येव भट्टभाप्यम् । "वापीकूपतडागादि देवताया- तनानि च, अन्नप्रदान मारामाः पूर्त मित्यभिधीयते ॥" जातकर्णः । गोलकानां ।। २५ प्र. ४ खं०४ ! "पालाशा गोलकाश्चैव" क. प्र.३ । परिसमूहेत् ॥ ५॥प्र. ४ खं० ५। 5 : "कृत्वाग्न्यभिमुखौ पाणी स्वस्थानस्थौ सुसंयतो। प्रदक्षिणं तथासोनः कर्यात परिसमूहनम्" क० प्र० २।

टीकापरिशिष्टम् ॥ ANANntuk ... भ० भा०॥ वैरूपाक्षः ॥ ६॥ प्र० ४ खं० ५ । "विरूपाक्षोऽसि-इति मन्त्रः । म० प्रा० २, ४, ५ प्रपदः ॥ ७ ॥ प्र० ४ खं० ५। "तपश्च तेजश्च"-इति मन्त्रः। म० प्रा० २, ४,५ अविदासिनि ॥ २६॥ प्र० ४ खं० ५। "मध्ये स्थण्डिल मन्ते च वारिणा परिसंवृतम् । श्रविदासिन हद विद्यात्ता. दृशं कर्मणो विदुः ॥” इति गृ० स २-१२ उपतिष्ठेत ॥ २८ ॥ प्र०४ खं० ५। "तदसंसक्तपाणिर्वा एकपादर्द्धपादपि । कुर्यात् कृताञ्जलिवापि उर्ध्वादु- रथापि वा। परिविष्यमाणे ॥ २६ ॥ प्र० ४ खं० ५। 'वाताधैमण्डलीभूताः सूर्याचन्द्रमसोः कराः । मालाभाः योनि दृश्यन्ते परिवेषस्तु स स्मृतः ॥ इति भरत-कृत-साहसाङ्कः । प्राचितशतकामः ॥ ११ ॥ प्र. ४ खं० ६। "सुवर्णविस्तौ हेम्नोऽक्षे कुरुविस्तस्तु तत्पले । तुला स्त्रियां पलशतं भारः स्याद विंशतिस्तुलाः । श्राचितो दश भाराः स्युः शाकटो भार प्राचितः ॥” इति ९,८७ ॥ व्रीहिकांसौदनं, कणान् ॥ १२ ॥ प्र० ४ खं० ६ । "ब्रोणः स्यात् कांसमानकः" ब्रीहीणां कासं व्रीहिकासम् , तस्य श्रोदनं भक्तं बीहिकांसौदनम् , तम् । “कञ्चुकाश्च कणाश्चैव फलीकरणकक्कुशाः ।"गृ०भा०॥ अनुषरम्, अमरुपरिहितम् , अकिलिनम् ॥८॥प्र०४खं०७। "उर्वरा सर्वसस्यादया स्यादृषः क्षारमृत्तिका। ऊपवानूषरो द्वावव्यन्यलिङ्गो स्थलं स्थली॥"अ०को २,१,५,"किलिनं सजलं प्रोक्तं दूरखातोदको मरुः।" क०प्र०३ दर्भसम्मितम् ॥९॥ प्र० ४ खं०७। दर्भः सम्मित माच्छन्नम् । अतएव गृह्यान्तरे,-"यस्मिन् कुशवीरणप्रभूतम्" .. अमरकोशे २, .

२५२ गोभिलगृह्यसूत्रम्य meani Antawuniyaranyamiiane . + शादासम्मितं, मण्डलद्वीपसाम्मतम् , सर्वतः |॥१०॥ प्र. ४ खं० ७॥ "शादा चैबेष्टका मना" (क०म०३)। तथा सम्मितं तुल्यं चतुरम्य मिति यावत् । मण्डलं वर्नुलम् । "द्वीप मुन्नत मारल्यातम्" (क०५० ३)। तत्सम्मितं तत्तुल्य मिति । "दिशा विदिशाव यत्र नोना विचारणा । सर्वतस्तत्र श- ब्दोऽयं विधिमोगे निपात्यने ।" गृ० स० १९६ ॥ इन्द्राय, पितृभ्यः ॥ २६.३३ ।। प्र० ४ खं०७ । "अमुष्मै नम इत्येवं यलिदानं विधीयते । बलिदानप्रदानाय नमस्कारः कृतो यतः॥"-इति, "स्वधाकारण निनयेत् पिश्यं यलि मतः सदा।इति विशेषोपदेशात् “इन्द्राय नम:"-इत्यादि "पितृभ्यः स्वधा" इति च बोध्यम् । एकाक्षयाम् ॥ ८॥ प्र० ४ खं०८। श्राकृति देवो मनसा प्रपद्य (म. मा० २,६,९)- इत्येतस्मिन् मन्ने "एक मक्षरम्"--इति दर्शनादय मेव मन्त्र एकाक्षरीति भ्यपदिश्यतेऽत्र । खदिरशङ्कुशतम् ॥६॥ प्र. खं०८। "सत्वचः शङ्कदा कार्यास्तीक्षामा वीतमपटकाः । समिलनगमंयुनः सूची- सुल्यास्तथायता:॥" क. प्र. २ "शंकुचैवोपवेषश्चद्वादशाङ्गुल इष्यते" । गृ० मं पूर्णहोमः ।। २१ ॥ प्र० ४ खं०८। पूर्णहोम यशसे जुहोमि ( म० प्रा० २,६,11"-इति पूर्णशब्दान्वितमन्त्रे- होमः। चीवरम् प्र. ४ खं०९। "लोहचूर्णन्तु चीवरम्।' क.प्र. ३ कम्बूकान् ॥ ११॥ प्र. ४ खं०१। "फलीकरणकक्कुशान्" इति ममाष्यम् । कणान्-इत्येव तनिष्कर्षार्थ इति तुषानित्येवास्मद्वगुरुवचनम् । तदत्रार्थनिर्णये भूमिदेवाः प्रमाणम् । है।

प्र.४ खं० १० सू०६-१५] मधुपर्कविधिः ॥ २५३ संवेशनवेलायाम् ॥ १३ ॥ प्र० ४ खं०६। "स्यामिदा शयनं स्वापः स्वमः संवेश इत्यपि ।" श्र० को० १, ७,३६ विष्टरम् ॥ ४॥ प्र. ४ खं० १० । "ब्रह्मविष्टरयोश्चापि सन्देहे समुपस्थिते । ऊर्ध्वकेशो भवेद् ब्रह्मा लम्ब केश- स्तु विष्टरः ॥८८॥ कतिभिस्तु भवेद् ब्रह्मा ? कतिभिर्विष्टरः स्मृतः ! पञ्जाशद्धिा कुशैब्रह्मा तदर्द्धन तु विष्टरः ॥” इति गृ० स० १ । ८९ ॥ 'यज्ञवास्तुनि मुष्टयाञ्च स्तम्बे दर्भवटौ तथा । दर्भसंख्या न विहिता विष्टरास्तरणेष्वपि ।" क० प्र० १ अपः = पाद्यम् ॥ ७॥ प्र. ४ खं० १० । "पादार्थमुदकं पार्थ केवलं जल मेव तत् । तत्तैजसेन पात्रेण शङ्खनापि निवेदयेत् गृह्यान्तरम् । अर्घ्यम् ॥ ११ ॥प्र० ख०१० । "दध्यक्षतसुमनस अापश्चेति चतुष्टयम् । अर्घ्य एष प्रदातव्यो गृह्ये ये अर्या- होः स्मृताः ॥" गृ० २ । ६२ अष्टाङ्कमयलक्षणञ्चैवम्,-"दध्यक्षतसुमनसो घट सिद्धार्थका यवाः। पानीयजैव दर्भाश्च अष्टाङ्गो ह्यय॑ उच्यते ॥" गृ० स. "कांस्येनैवाईणीयस्य निनयेदर्य मञ्जलौ ।' क. प्र. ३ मधुपर्कम् ॥ १३ ॥ प्र० ४ खं० १० ॥ "सर्पिषा मधुना दन्ना अर्चयेदर्हयन् सदा । ऋषिप्रोक्तेन विधिना मधुपण याज्ञिकः ॥६४॥ कसे त्रितय मासिच्य कंसेव परिसंवृतम् । परिश्रितेषु देयः स्यान् मधुपर्क इति ध्रुवम् ॥ ५॥ इति गृ०स०२। “साक्षतं सुमनोयुक्त मुदकं दधिसं- युतम् । अयं दधिमधुभ्याञ्च मधुपर्को विधीयते । कांस्यापिधानं कांस्यस्थं मधु- पर्क समर्पयेत् । क. प्र.३ "दधान पयसि वाथवा कृतान्ने मधुदद्यान्मधुपक्कमे- तदाहुः । दधिमधुसलिलेषु सततः पृथगते विहितास्त्रयस्तु मन्याः' इतिगृ. स. २०६८ शेषम् ॥ १६ ॥प्र० ४ खं० १०॥ पीतावशिष्टम् । नास्योच्छिष्टता, तथाहि-"मधुपर्के तथा सोमे अप्सु प्राणा गोभिलगृह्यसूत्रस्य - . . हुतीषु च । अनुच्छिष्टो भवेद विप्रो यथा वेदविदो बिदु ॥ ६६ ॥ प्राणाहुति सोमेपु मधुप तथैव च । पाम्यहोमेषु पर्वेषु नोस्ट्रिप्टो भवति द्विजः ॥ ६॥ इति गृ० स० । प्राचार्यः, ऋत्विक् ।। २३ ॥ प्र० ४ खं० १० । "उपनीय तु यः शिघ्यं चंद्र मध्यापयेद द्विजः । सकलप सरहस्यच तमा चाय प्रचक्षते ॥' स० म० २ । १४० "अग्न्याधानं पाकयज्ञाननिष्टोमादिकान् मखान् । यः करोति वृतो यस्य स तस्यस्विगिहोच्यते ॥" म स०२।१५३ अग्निनामानि ( गृ० सं० १ प्र०) "लौकिकः पावको राशिः प्रथमः परिकीर्तितः । अग्निस्तु मारतो नाम गर्भाधाने विधीयते ॥ २॥ पुछमवने चान्द्रमसः शुद्राकमणि शोभनः । सीमन्ते महलो नाम प्रागल्भो जातकम्मणि ॥२॥ नाम्नि स्यात् पार्थिवो ह्यग्निः प्राशने च शुचिस्तथा । सभ्यनामाऽथ नडे तु व्रतादेशे समुद्भवः ॥ ४ ॥ गोदाने सूर्यनामा तु केशान्ते ह्यग्निरुच्यते । वैश्वानरो विसर्गे विवाहे योजकः स्मृतः ॥ ५॥ चतुर्थ्यान्तु शिखी नाम धृतिरग्निस्तथापरे । पावसथ्ये भवो शेयो अमिहोने पावकः ॥ ६ ॥ ब्रह्मा वै गाईपत्ये स्यादीश्वरो दक्षिणे तथा । विष्णु गाहवीये तु अग्निहोत्रे योग्नयः ॥णा लक्षहोमे तु वन्हिः स्पात कोटिहोमे हुनाशनः । प्रायश्चित्ते विधिश्चैव पाकयज्ञे तु साहसः ॥ ८ ॥ देवानां हव्यवाहस्तु पितृणां कव्यकाहनः । पूर्णाहुत्यां मृडो नाम शान्तिके वरदस्तथा ॥९॥ पौष्टिके वलदश्चैव क्रोधोऽग्निश्रा- भिचारके । वश्याथे कामदो नाम वनदाहे तु इतकः ॥ १० ॥ कोटे तु जठरो नाम कन्यादो मृतभक्षणे । समुद्रे वाडवो ज्ञेयः क्षये संवत्तको भवेत् ॥१॥ एतेऽग्नयः समाख्याता: श्रावयेत् ब्राह्मणः सदा।समविशतिविख्याता ज्ञातव्याश्च द्विजेन तु । PARANTERNE इति टीकापरिशिष्टम् समातम् ।। श्रीसामगाचार्यसत्यव्रतसामनमिभट्टाचार्यविरचितय । 'व्याख्यान' नामकया तत्परिशिष्टेन च समन्वितं ठाकुरोपनामक उदयनारायणसिंह कृत भाषानुवादेन मगिडत गोभिलगृह्यत्रं समासम् ॥ तु । -- अाय्यभटीय सटीक सानुवाद । मूल्य १) महामति ६० आर्य्यभट कुसुमपुर निवासी ने वेद के अनुकूल श्रार्याछन्दों में यह अपूर्व ज्योतिष का ग्रन्थ शाकं ४२६ में, बनाया था। इसी पुस्तक में पृथिवी का भ्रमण साफ २ लिम्बा है । इस की भूमिका में समुद्रमथन, रामलीला, आदि पुराणोक्त उपख्यानों का विचार किया गया है । यह ग्रन्थ श्राज तक हिन्दुस्तान में नहीं छपा था हम ने इस को जर्मन देश से मंगवा कर मूल तथा पं० परमेश्वरा- चार्य कृत् टीका और भाषानुवाद सहित छपवाया है । मूल्य १) है सूर्यसिद्धान्त भा० टी० और बृहद्भुमिका सहित मू० २।।) यह ग्रन्थ-सिद्धान्त ज्योतिष के उपलब्ध अन्धों में सब से प्रा- चीन सर्वमान्य है। भारतवर्ष में ज्योतिष के अनुसार पञ्चांग आदि बनने तथा गणित आदि सिद्धान्त ज्योतिष के विषय सम्बन्धी वि. वाद होने पर-इसी ग्रन्थ का प्रामाण्य माना जाता है। आज तक इस अमूल्य ज्योतिष के ऊपर ऐसा अपूर्व विचार नहीं किया गया था । इस की भूमिका के १५० पृष्ठों में प्रायः संस्कृत ज्योतिष, अंगरेजी श्रादि ज्योतिष, वेद, ब्राह्मणादि पुस्तको से भारतवर्षीय ज्योतिषशास्त्र का गौरव सिद्ध किया गया है। केवल इस एक ही पुस्तक के पढ़ने से विना गुरु प्रायः ज्योतिष के विषयों का ज्ञाता हो सकता है। न्यायदर्शन भाष्यसहित सानुवाद ॥) वेद, उपवेद और वेद के छः अङ्गों के रक्षार्थ-हमारे ऋषियों ने छः उपाङ्ग म्वरूप-छः दर्शन शास्त्र रचे हैं;। इन दर्शनों में वेदोक्त सत्य सनातन धर्म को युक्ति तथा प्रमाणों से बड़े २ नास्तिकों के श्राक्षेपों का उत्तर देकर वेदोक्त धर्म की रक्षा कियी है। इन छः दर्शनों में से सब से अधिक हमारे गौतम ऋषि ने चार्वाक, बौध, आईत, जैन श्रादि मतों का अकाटय उत्तर दिया है । इस दर्शन में एक बड़ी वि- लक्षणता यह है कि इसको ठीक समझ लेने पर, शास्त्रार्थ वा वहस की रीति खूब मालूम हो जाती है और चाहे कैसा भी प्रबल नास्तिक क्यों न हो इसे शास्त्र के जानने वाले के सामने नहीं ठहर सकता। शास्त्रप्रकाश भवन; मधुरापुर, बिदुपुर बाजार- मुजफ्फरपुर। } उदयनारायणसिंह। - * विज्ञापन विदित हो कि हमारे शास्त्र प्रकाशभवन से नीचे लिग्ने प्राचीन आर्य ग्रन्थ मूल सूत्र, संस्कृत टीका या भाष्य और भाषानुवाद सहित छपकर विक्रयार्थ प्रस्तुत हैं और अधिकांश ग्रन्थ मुद्रणार्थ प्रेस में दिये गये हैं। जिन महानुभावों को मँगाना हो चे कृपया नीचे लिखे पते से वी०पी० द्वारा या नकद मूल्य से अभिलिषित पुस्तकें मंगा लेवें । १ गोभिलगृह्यसूत्र सटीक सानुवाद २॥), खादिर गृह्यसूत्र सटीक सानुवाद २॥), द्राद्यायण गृह्यमूत्र सटीक सानुवाद २॥), बाराह गृह्यसूत्र सानुवाद १), और क्षत्रिय धर्म प्रकाश ), क्षत्रिय वंशावली॥), तम्बाकू विड़ो निषेध), और बम्बई तथा इटावा ब्राह्मण सर्वस्व की छपी पुस्तकें हमारे पाम से मंगा सकते हैं। और नये वर्ष के बड़े छोटे पञ्चाङ्ग भी यहाँ से मिलेंगे। ये पुस्तके मुद्रणार्थ प्रेस में हैं। सटीक सानुवाद १-आश्वलायन गृह्यसूत्र २-पारस्कर गृह्यमूत्र ३-प्रापस्तम्ब गृह्यसूत्र ४-मानव गृह्यसूत्र -जैमिनि गृह्यसूत्र ६-हिरण्यकेशि गृह्यसूत्र ७-भारद्वाज गृह्यसूत्र ८-शांख्यायन गृह्यसूत्र है काठक गृह्यसूत्र १० कौषितकि गृह्यसूत्र ११-वैखानस गृह्यसूत्र १२-लोगाति गृह्यसूत्र १३-कौशिक गृह्यसूत्र १४-बोधायन महासूत्र शाखमकाश भवन मधुरापुर, विदूपुर बाजार निवेदका- आकुर-उदयनारायण सिंह।

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The Grihaya Sutras Of Gobhil

Author
P_sathyavrata_samashrami
Other authors
Ccl
Title
The Grihaya Sutras Of Gobhil
File name
The Grihaya Sutras Of Gobhil
Text
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Citation
1934
Publisher
-
Language
Sanskrit
Pages
262
Library
Scl
DLI number
326564
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