Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner

Shri Somprabhacharyavirchit Suktimuktawli

Suri,shri Harsh Kirti · 2011/02

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श्रीसोमप्रभाचार्यविरचित
सूक्तिमुक्तावली
सातटीकाकार -
श्रीहर्षकीर्तिमरित
मम्पादक
परमपूज्य १०८ श्री अमितमागरजी महाराज
प्रकाशक
श्री शाति वीर दि.जैन सस्थान
शासि पीर नगर, श्रीमहावीरजी

द्रव्यदाता-
श्री नन्दरालजी मागीलालजी
डोमापुर ( नागालेएट)
प्रथमात्ति
कार्तिक शुक्ला पूणिमा
पी.नि.स.२४६८
मूल्य
स्वाध्याय
प्राप्तिस्थान--
श्री शान्ति वीर नगर
भीमहावीरजी (राज.)
.
मुद्रक
नेमीचन्द पाकलीवाल
कमल प्रिटर्स
मदनगज-किशनगढ़

। श्राद्य वक्तव्य दिवगत आचार्य प्रवर श्री १०८ श्री शिवसागरजी महाराज के सुशिष्य वर्तमान मघनायक परमपूज्य आचार्यकल्प १०८ श्री श्रुत- सागरजी सघस्थ १०८ श्री अनितसागरजी महारान निरतर ज्ञाना. राधना में तन्लोन रहते हैं। उन्हें सुभापित श्लोकों का सकलन बहुत प्रिय है इसीके फलस्वरूप उनके द्वारा मलित सुभाषित मज्जरी के दो भाग और सुभाषितावली ये तीन प्रय प्रकाशित हो चुर हैं। तत्पश्चात् १०८ श्री अजिठसागरजी महाराज का ध्यान सूक्ति- मुक्तारली जिसका दूसरा नाम सिदूरप्रकर पर गया। यह लघु काय प्रय होते हुये भी बहुत ही लोकप्रिय नीति काव्य है, अपनी सास और सरल रचना के द्वारा सत्कृत साहित्य में पहुत प्रसिद्ध है। कमी सुमाषित श्लोकों का सपह है, जिसमें धर्मोपदेश, सीकर भक्ति, जिनमतभक्ति, गुरुमक्ति, सपमक्ति, पच पापों का त्याग, चतु फपायके दोषों का कथन, गुणिनन सङ्गति, इद्रियदमन, दान- फल, तप फल इत्यादि अनेक विषयों पर हृदयप्राही वर्णन है। यह रचना सरल, सरस तथा सुनोध है । इन्दी श्लोको के आधार पर हिन्दी जैन कवि श्री वनारसीदासजी द्वारा हिन्दी पद्यानुवाद भी रचे गये हैं। जो कई वर्ष पूर्व मूलसहित प्रकाशित हो चुका है। इस मूल प्रथ क का प्री सोमप्रभाचार्य हैं। ये अपने समय के सुप्रतिष्ठित विद्वान थे, धर्म शास्त्रों का उलस्पर्शी अध्ययन किया था, तक शास्त्र में ये बहुत पटु थे, काव्य रचना में भी इनकी अच्छी गति थी, व्याख्यानकला में ये अति निपुण थे। प्रस्तुत प्रथ को सस्कृत टीका के रचयिता श्री हर्षकीर्ति त्रि हैं। आप वैद्यक, ज्योतिष छद, व्याकरण और काव्य आदि अनेक विषयों के सुप्रसिद्ध विद्वान थे। ' प्रस्तुत प्रय को परम पूज्य १०८ श्री अजिससागरजी महारान द्वारा जन साधारण जीवों के सदुपयोगी जान सम्पादन कर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किम जारहा है। आशा है पाठकगण इससे यथार्थ लाम उठायेंगे। इसके प्रकाशन में भी नदलालजी मांगीलालजी पोस्ट ढीमापुर (नागालेएड) निवासी ने आर्थिक सहयोग देकर अपनी चचल लक्ष्मी का सदुपयोग किया है, एतदथ हैं शतश धन्यवाद है। व लाडमल अधिष्ठाता श्री शातिवीर गुम्कुल, श्री महावीरजी थथ समर्थयति सोमप्रभाचार्यमभा च यन्न पुसा तमपङ्कमपाकरोति । तदप्यमुष्मिन्नुपदेश्लेशे निशम्यमानेऽनिशमेति नाश ॥९९|| व्याख्या-सोमप्रभा च कातिश्च भर्यमा सूर्यो मा प्रमा सूयप्रमाऽपि पुसा (जीवाना ) यत्तम पङ्क अ धकारकर्दम न अपारोनि न दूरीकरोति । तदपि तानमपि तम पङ्क अज्ञानपाप भमुस्मिन् उपदेशलेशे (धर्मोपदेशलयेपि) निशम्यमाने अ थमाणे सति अनिश निर तर नाश क्षय पति याति । एतच्छवणाचम भज्ञान पाप च याति। अत्र सोमप्रभाचार्य इति प्रय- कृता स्वनामापि सूचित | ६ || इति पाठा तरम । पुन भर्यममा A

जिनस्तुतिः
त्रिभुवनगुरो ! जिनेश्वर परमानन्दैककारण कुरुप ।
मयि किङ्करेऽत्र करुणा यथा तथा जायते मुक्तिः ॥शा
निविण्णोऽह नितरामहन बहुदु'खया भास्थित्या ।
अपुनर्भय भरहर कुरु करुणामत्र मयि दीने ||२||
उद्धर मा पतितमतो विपमाद्भवपत. कृपा कृत्वा ।
अर्हन्नलमुद्धरणे त्वमसीति पुन: पुनर्वच्मि ॥३॥
त्व कारुणिक स्वामी स्वमेव शरण जिनेश तेनाऽदम् ।
मोहरिपुदलितमान पूत्करण तर पुरः कुनै ॥४॥
ग्रामपवेरपि करुणा परेण केमाधुपद्रुते पुसि ।
जगतां प्रभो! नकिं तव जिन मयिसलु कर्मभिः प्रहते ॥५॥
अपहर मम जन्म दयां कृत्वा चेत्येकाचसि वक्तव्यं ।
तेनाविदग्ध इति मे देव बभूव प्रलापिलम् ॥६॥
तर जिन चरणाब्जयुग करुणामृतशीतल यावत् ।
ससारतापतप्तः करोमि हृदि तावदेव सुसी ॥७॥
जगदेकशरण ! मगमन् ! नौमि श्रीपद्मनन्दितगुणोध ।
कि बहुना कुरु करुणामा जने शरणमापन्ने ॥८॥

बनारसी विलास में प्रकाशित सूक्तिमुक्तावली में निम्न
पांच श्लोक विशेष पाये जाते हैं
वाञ्दा सज्जनमगमे गुरुजने प्रीतिर्गुरोर्नम्रता,
विद्याया व्यसन स्त्रयोपितिरतिर्लोकापवादाद्भय ।
भक्तिश्चाईति शक्तिरात्मदमने ससर्गमुक्ति सले,
यस्यैताः परिणामसन्दरकला श्लाघ्य मएर क्षिती ||१||
निन्दा मुश्च शमामृतेन हृदय र सिञ्च वञ्च क्रुध,
जनेप्यात्मप्रशसां त्यज ।
मन्तोप भब

विषयसूची नमसस्या विषयनाम पृष्ठ - २ ३ १२ १४ ४ ५ मङ्गलाचरणम् धर्मोपदेशप्रक्रम उपदेशद्वार प्रक्रम तीर्णकरमक्तिप्रहम गुरुमक्तिप्रकम जिनमतभक्तिप्रक्रमा सघभक्तिप्रक्रम अहिंसाप्रक्रम सत्यप्रक्रम अस्तेयप्रक्रम मानवपक्रम परिप्रयागप्रक्रम ६ ४५ बोधजयप्रक्रम मानजयपक्रम ६५ मायात्यागप्रक्रम लोमत्यागप्रकम सौजन्यप्रक्रम गुणिसङ्गतिप्रक्रम इन्द्रियजयप्रक्रम लक्ष्मीस्वभावप्रकम ह क्रमसख्या विषय पृष्ठ दानप्रक्रम २२ तपप्रक्रम २३ भावनाप्रकम राम्यक्रम ६१८ सामान्योपदेशप्रकम १२३ प्रगस्ति १३३ এবাসেন্তিৰি आचार्यकल्प श्रीश्रुतसागरस्तुति १३६ सूक्तमुक्तावल्या प्रयुक्तछन्दाना विवरण क्रमा छ दनाम सख्या शार्दूलविक्रीडित इवा ३ मन्दाका ता ३ হিফিী ५ वशरथ ३ ६ मालिनी हरिणी पसाततिलका उपेद्रवया २ १० पृथ्वी स्रग्धरा १ A २ ३ ४ ६ ८ ५ . फुल १०॥ -

श्री १०८ आचार्य श्री शिवसागरजी महाराज
-
Mmm
मल
*pal
639
rom
नुल्लक्दीक्षा वि० स. २००० * मुनिदीक्षा वि० स० २००६
पाल्गुन शुक्ला पञ्चमी
थापाद शुक्ला एकादशी
सिद्धवरकूट
नागौर
समाधि वि. स २०२६, काल्गुन कृष्णा अमावस्या,

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श्रीधीतरागाय नम श्री सोमप्रभाचार्यविरचिता सूक्तिमुक्तावली (इर्पकीर्तिमरिकृतव्याख्यासहिता) [ मङ्गलाचरण ] श्रीमत्पाजिन नत्वा, स्वारसायस्य कारक । सयः सस्मृतिमात्रेण, प्रत्यूहव्यूहवारक ॥ १॥ श्रीचन्द्रकीर्तिमरीणा, सद्गारूणांप्रसादतः। सिन्द्रप्रकरच्याख्या, क्रियते हर्पकीर्तिना ॥ २ ॥ युग्म अथ प्रथकर्ता आदी इष्टदेवताचरणरमरणरूपमाला- घरणपूर्वक श्रोतृन् प्रति आशीर्वादवृत्तमाह (शार्दूलविक्रीडितछद) सिन्दरप्रकरस्तपः करिशिर कोडे कपायाटवी दापाश्चिर्निचय. प्रमोधदिवसप्रारमसूर्योदयः ।

२
सूक्तिमुक्तावली
मुक्तिस्त्रीचकुमकु कुमरस' श्रेयस्तरो पल्लव
प्रोल्लासः क्रमयो खद्युतिभर पाचप्रमो पातु क. ॥१॥
व्याख्या-पाचप्रमो
श्रीपार्श्वनाथस्य मयोश्चरणयो
नसय तिमर नवकातिसमूहो वो युध्मान पातु अपतु रक्षतु ।
क्यभूतो नग्वा तिभर तप करिशिर कोडे सिदूरप्रकर तप एवं
फरी हरती तत्य शिर कोडोमस्तकमध्यभाग कुम्मस्थल तत्र सिदूर-
प्रकर सिन्दूरपुख कु कुमसदृशा नसरि
तिमरस्य रक्तत्वात्।
मि दूरप्रकरोपम' पुन कयभूत पायाटवी दाराच्चिचिय पाया
बोधमानमायालोमारत एव भटयी भरण्य वन तस्या दावाचिनि-
चय दावाग्निज्वालासमूहतुल्य । पुन पथभूत प्रयोधदिवसपारभ-
सूर्योदय प्रमोधो ज्ञान स एप दिवसो दिन तस्य प्रारभे उदये
सूर्योदयसमान । पुन कथभूत मुक्तिस्रीयुचकुम्भकु कुमरस
मुक्तिरेव स्नी तस्या कुचावेव कु भो तत्र कु कुमरस काश्मीरजम
द्रवलेपतुल्य । मुक्तिस्त्रीयदक्कु युमरस इति वा पाठ । पुन क्य-
भूत श्रेयस्तरो पल्लवप्रोल्लास श्रेय फल्याणमेय तरु वृक्षरतस्य
पल्लवाना नूतन पत्राणा प्रोल्लाम उद्गम । इश पाचप्रमो
प्रमयोश्चरणयोर्नसा तिमरो पो युष्मान् पातु रक्षतु । नसद्युति-
भरस्य रक्तवणत्वात् । रक्ता एवोपमा । मो भव्यप्राणिन् ! एव शारया
मनसि वियेकमाीय श्रीपाश्वनाथस्य चरणकमी एव सेन्यो।
मेवमानाना यत्पुरयमुत्पद्यते वापुण्यप्रसादात उत्तरोत्तरमालिक्य-
माला विरतरतु॥१॥

सूक्तिमुक्तारली ३ अर्थ-पार्श्वप्रभु के चरणों की नख की काति का समूह तुम्हारी रक्षा फरे यह आचार्य का सबके लिये आशीर्वाद है। वह नस फाति समूह कैसा है उसका उत्प्रेक्षालकार रूप उपमा में वर्णन किया गया है। भगवान के द्वारा किया गया जो तप [ उपतपस्या] वही हुआ हाथी, उस हाथी के मस्तक में लगे हुये सि दूर का समूह ही है मानों कपाय रूपी वनी को भस्म करने के लिये दावानल ही है मानों, ज्ञान रूपी दिन का प्रारम्भ सूर्य का उदय ही है मानों (क्योंकि सूर्य उदय होते ममय लाल होता है और भगवान के नख भी लाल हैं ) मुक्ति पी के स्तन कश की केशर ही है मानों कल्याण रूपी वृक्ष की पल का हर्षोल्लास है मानों, इसप्रकार पार्य प्रभु का नय-कावि-समूह तुम्हारी तथा हम सब की रक्षा करे। अथ कवि सग्जनपुरुषान् प्रति स्वविज्ञप्तिमाह- सन्त सन्तु मम प्रसन्नमनमो याचा विचारोधता' सूतेऽम्म• कमलानि तत्परिमलं नाता वितन्वति यत् । किंगाम्यर्थनयानय यदि गुणोऽस्त्यास ततस्ते स्वय कारः प्रथन न चेदय यशःप्रत्यर्थिना तेन कि ॥२॥ व्यारयासत सज्जना मम प्रसन्नमनस सतु ममोपरि प्रसन्नचित्ता भवतु किंरिशिष्टा सत बाचा विचारोद्यता । वाचा कपिपापीना विचारे सदसद्विचारे उद्यता सावधाना । इय कविवाणी समीचीना इय असमीचीना इति विचारक्षा' । यत् - ४ सूक्तिमुक्तावली यस्मात् फारगणात सम्म पानीय क्मलानि सूते उत्पादयति पर तत्परिमल पा कमलाना मामोद वादा घायवो वित पति विस्तार- यदि तपाइ एन प्रय रचयिध्यामि पर प्र यस्य विस्तारण सज्जना करिष्यति यत 'पद्मानि बोधयत्य | काव्यानि कुरुते कवि तत्सीरम नभस्वत सतस्त वत्ति तद्गुणान् । पा अथवा अनया मम में अभ्यर्यनया सतामने प्रार्थनया कि अपि तु न किमपि कुत यदि चेत भासा मम वाणीना मध्ये गुणोऽस्ति सतस्तदा सात स्वय मेव प्रयन यिस्तार तार करिष्यति यदि भरिमनशास्त्र परिषद् गुणोमयिष्यति तदा स त स्वयमेव ममाभ्यर्थ नया विनय विस्तार करिष्यति । अथ यदि चेत् भासा मम वाणीना मध्ये गुणो नास्ति सदा वेन प्रथनेन विस्तारण कि अपितु न किमपि । कय भूतेन तेन प्रयनेन विस्तारणेन यश प्रत्यर्थिना यशस प्रत्यर्थि शत्रुभूत यत्तत् यश प्रत्यपि ते यश प्रत्यर्थिना यशसो विनाशकन निर्गुणरय विस्तारणेन अयश एव भवतीत्यय ॥ २॥ मर्य-निमल चित्त वाले साम्प मेरे वधनों के विचार में उद्यमपान हो । जैसे जल कमलों को उत्पन्न करता है परतु पवन (पायु ) धनको सुग घ को फैलाता है। कमलों की प्राथना से पवन सुगध को नहीं विस्तृत करता परतु अपने स्वभाव से ही विस्तृत करता है उसी प्रकार यदि मेरे वचनों में गुण (प्राह्यता का भश) हैनो प्राथना स क्या लाम और यदि गुण विधमान नहीं है तो भी प्रार्थना कर क्या साध्य है। मात्राय-इस श्लाक में आचार्य ने अपनी लघुता एव पड़े भाचार्यों की महत्ता प्रगट को है कि-सरपुरुप स्वभाव से ही गुण. ।

।
सूक्तिमुक्तावली
प्राही होते हैं दूसरों के दोषों को ग्रहण कभी नहीं करते । आचार्य
कहते हैं कि हम इस काव्य प्रथ का निर्माण कर रहे हैं सो पूर्ण
आचार्यों की परम्परा से कर रहे हैं, अपनी बुद्धि से नहीं। इस हेतु
( कारण) से हम कर्त्ता नहीं है। केवल भक्ति के अनुराग से प्रन्य
रचना की है। अत प्रमाद वश से कहीं पर भूल चूरू हो तो सज्जन
पुरुप विचार कर शुद्ध करलें। क्योंकि उनका प्रभाव ही ऐसा होता
है जो गुण ग्रहण ही करते हैं दोपों पर दृष्टिपात नहीं करते तो ऐसी
दशा में उनसे प्रार्थना करने से क्या प्रयोजन ? क्योंकि यदि हमारे
वचनों में गुण होंगे तो ये सज्जन पुरुप विस्तार ही करेंगे और यदि
दोष होंगे तो दोपों को दूर कर विस्तार करेंगे। जैसे जल कमलों को
उत्पन्न करता है परन्तु पवन गध को फैलाता है क्योंकि पवन का
स्वभाव यही है। इसी प्रकार प्रयकर्ता को यदि यश नहीं तो यश-
विस्तार की प्रार्थना करने से क्या प्रयोजन है ? यदि यश है तो भी
प्राथना करने से क्या प्रयोजन ? मत सज्जन पुरुप मुझे यालक
समझ कर अनुमह बुद्धि कर शुद्ध करेंगे ही। इस प्रकार प्रयकार
ने अपनी लघुता प्रदर्शित की है।
अथ विहितसकलसुरासुरसेवस्य देवाधिदेवस्य श्रीवीतराग-
स्यागमानुसारेण मव्याना हितहेतवे धर्मोपदेशमा-
इद्रवमाछन्द
निवर्गससाधनमन्वरेण, पशोरिवार्षिफल नरस्य ।
तत्रापि धर्म प्रवर बदति, न त विना यद्भावोऽर्थकामौ ॥३॥

सूचिमुपापली
व्याख्या-भो भन्या त्रिवर्गसमापनमतरेण नरस्य भायु'
पशोरिय विफल ज्ञेयम् । धर्मार्थकाममोक्षाश्चत्वार पुरुषार्थाश्चतुर्व
गारवेषा मध्ये साम्प्रत अस्मिन भरतने मोक्ष साधयितु न शक्य ।
अत कारणात शेपाखिषर्गा धर्मार्थकामरूपारवेषा त्रिवाणा ससा-
धन पाननम तरेण विना नरस्य मनुष्याय आयु सीवित पशोरिष
विफल निष्कल पृयेत्यर्य । येन नरेण घमार्थकामाना साधनमुपा-
जान न क्रियते तस्य जीवित पशोरिव छागादेरिय पृथा निष्फल । तथा
पोका
धर्मार्थकाममोक्षाणा, यस्यैकोऽपि न विद्यते ।
मनागलस्तनस्येन नि फल तस्य जीवितम् ॥१॥
इति । ते त्रयोपि किं सहशा वा किश्चिद वरमित्याह
'तत्रापि त्रिवर्गपि धम प्रघर पदति क्थयति । युत यत् यस्मात्
कारणात् तं धर्म विना अर्थकामौ न भवत । येन पुरुपेण पूर्वज मनि
धर्म कृतो भवति तस्यैवावार्थकामो भवत नान्यस्य । यदुक-
जिपिणेन पहुणा जज दीमइ समच्छ नियलोए ।
इदियमणोभिराम त त धम्मफल सव्य ।। २ ।।
भत धारणात् निवर्गे धर्म एव श्रेष्ठ । भो मव्यप्राणिन् ।
एव ज्ञात्वा मनसि विवेकमानीय श्रीसवनप्रणीतो धर्म पव भाचर-
णीय | घममापरता सता यत्पुण्यमुत्पद्यते तत्पुण्यप्रसादात
उत्तरोचर मालिक्यमाला आविर्मयतु विस्तरतु ॥३॥

७ सूक्तिमुक्तावरी अर्थ-धर्म, अर्थ, काम इन तीन पुस्पायों के साधन पिना मनुष्य की आयु पशु-समान निष्फल है और उन तीनों पुरुषार्यों में धर्म पुरुषार्ण सपसे मुख्य है। क्योंकि धर्म के विना अर्थ-पुस्पाय और काम पुरुषार्थ की सिद्धि नहीं होती। मथ नरमवस्य दुर्लभस्वमाह-- यः प्राप्य दुष्प्राप्यमिदं नरत्व, धर्म न यत्नेन करोति मृढः । क्लेशप्रबन्धेनसलन्धमन्यौ, चिन्तामणिपातयति प्रमादाद ॥४॥ व्याख्या-यो मूढो मूर्व इद दुष्प्राप्य नरत्व प्राप्य यत्नेन सत्यमेन धर्म न करोति म क्लेशप्राधेन लन्ध चितामणि रत्न प्रमादात् बालस्यात मधी समुद्रे पातयति । यो मूर्स पुमान् दु खेत महाकटन प्राप्य। चोल्लय' पासय' धरणं' जूषा रयणाणि' सुमणि चक्क वा। कुम्म' जुग' परमाणु दस दिड ता मणुयलमे ॥ आ.पृ०३६७॥ इत्यादि दशमिदृष्यात इद दुर्लम नरत्य मनुष्यजन्म प्राप्य लाभ्या यत्नेन साव- घानतया श्रीवीतरागप्रणीत धर्म नपरोति उपेक्षते । स पुमान् क्लेश- प्रघ धेन महता फप्टेन अतिप्रयासेन रम्घ प्रत्यक्षप्राप्त चिंतामणि- रन प्रमादाद् अघी समुद्रे पातपति । अत्र ब्राह्मण रनवोपदेच्या दत्त चिंतामपिरान समुद्र पावनसम्पयो वाच्य । भो मव्य- प्राणिन् । एव शास्वा मनसि विरेकमानीय पत्नेन धर्म एव कार्य ।

. सूक्तिमुक्तावली धर्म च कुर्वता सता यत्पुण्यमुत्पद्यते तत्पुण्यप्रसादादुत्तरोत्तरमाङ्ग लिक्यमाला विस्तर तु॥४॥ अर्य-जो भज्ञानी कठिनता से प्राप्त होने वाले इस मनुष्य पर्याय को पाकर भी सर्वज्ञ वीतराग प्रणीत धम को यत्न ( सावधान होकर ) सेवन नहीं करता यह अज्ञानी कष्टों से प्राप्त किये हुए चितामणि रत्न को प्रमाद से ममुद्र में फेंकता है। भावार्थ -मनुष्य भव की प्राप्ति विशेष पुण्योदय से होती है। श्रद्धापूर्वक वीतराग देव, जिनागम एव निर्म य गुरुओं की भक्ति करना ही इस मनुष्य नाम की सफलता प्राप्त करना है। जो ऐसा न करके सोसारिक विषय वासनाओं में लिप्त होकर महर्निश (रातदिन ) व्यतीत करते हैं वे अज्ञानी हैं. ये मानों बड़े परिश्रम से प्राप्त चितामणि रत्नको पाकर समुद्र में फेंकते हैं। इसलिये धर्म साधन कर मनुष्य जन्म सफल करना योग्य है। आगे इसी कथन फो दृष्टात द्वारा हर करते हैं- अथ मनुष्यभस्य सर्वोत्कटत्वमाह- । मदाकावाद स्वर्णस्थाले लिपति स रजः पादशौच विधचे, पीयूपेण प्रपरकरिण वाहपत्येन्धभारम् ।। चिन्तारत्न रिकिरति कराद्वायसोड्डापनार्थम्, यो दुष्प्राप्य गमयति मुधा मर्यजन्म प्रमत्तः ॥शा ६ सूक्तिमुक्तावली व्याख्या-य पुमान् प्रमत्त सन् प्रमादस्य यश गत सन् वश पतित सन् विपयकषायनिद्राविकथारूपप्रमादयशगत सन् दुष्प्राप चतुरशीतिलशजीवयोनिपु भ्रमता जोवेन दुखेन महता कप्टेन प्राप्य यत मर्त्यज म मनुष्यभव तत् मुधा वृथा श्रीजिनधर्म विना निष्फल गमयति । स पुमान् स्वर्णस्थाले रो धूलि कचरादि क्षिपति स्वर्णस्थालतुल्य मर्त्यजम रज सदृशा प्रमादा । पुन स पुमान् पीयूपेण अमृतेन कृत्या पादशीच चरणप्रक्षालन विध करोति । पीयूषस्य पिदुमाधपानेनाऽनरामरत्व स्यात तत् पादप्र- क्षालनार्थ वृथा गमयतीत्ययुक्त । पुन स पुमान् प्रवरकरिण प्रधान- हस्तिन ऐधभार काष्ठसमूह वायति यस्मिन् गरे द्वारे बद्ध सति शोभा भगति तेन इन्धनानयनमयुक्त । पुन स पुमान् वायसोडाय- नाथ काफम्य उडायननिमित्त चिंतामणिरत्न कराद् हस्ताद् विकिरति विक्षिपति यया मनोवाछितार्थदायकस्य चितामणिरत्नस्य फाकस्य उड्ढायनाथ विक्षेपणमयुक्त तथा धर्मसाधकेन मयंजमना प्रमादसेवनमयुक्त । भो भव्यप्राणिन् । एघ ज्ञात्वा मनसि विवेक- मानीय प्रमाद त्यक्त्या धर्मेण कृत्वा मनुष्यजम सफल कार्य धर्म- माचरता सता यत्पुण्यमुत्पद्यते तत्पुण्यप्रसादादुत्तरोत्तरमाङ्गलिक्य- माला विस्तरन्तु ॥५॥ मर्थ-जो प्रमादी पुरुष दुर्लभ मनुष्य जम को पाकर व्यर्थ ही विषय कषाय सेवन, विकथा भवण, जुआ खेलना आदि में गमाता है वह मानों सोने के थाल में धूल भरता है अर्थात् सुवर्ण दूध दही घी मिश्री आदि सुदर स्वादिष्ट भोजन करना चाहिये था कि तु मूर्य उस स्वर्ण थाल में धूल भरने का कार्य थाल में

सूक्तिमुक्तावली
करता है। श्रथवा वह अमृत को पाकर उसे पैर धोने के काम में
लाता है, अथवा महान् श्रेष्ठ हाथी को पाकर उससे ईधन ढोने का
काम करता है, या वह मूख आदमी कौवे को उड़ाने के लिये
चिन्तामणि रत्न को फेंकता है।
ये तु असाराणा विषयाणा कृठे धर्मम् त्यति ते मूढा
एवेत्याह-
शार्दूलविक्रीटितछद
ते धच रतरु पन्ति भुपने प्रोन्मूल्य कल्पद्रुम
चिन्तारत्नमपास्य काचशक्ल सीकुर्वते ते जडा. ।
विक्रीय द्विरद गिरीन्द्रसदृश फ्रीणन्ति ते रासम
ये लब्ध परिहत्य धर्ममधमा धान्ति भोगाशया ॥६॥
व्यारया-ये अधमा मूर्या पुरुषा ৪ মার ঘ
परिहत्य त्यक्त्वा भोगाशया विषयवाञ्छया धावति विषयाणे प्रवर्त-
- ते नरा भवने स्वगृहे प्रोद्गतमुत्पन्न कल्पवृक्ष प्रोमूल्य परसाय
धत्तरपृक्ष पति आरोपर्यात पुनस्ते सहा मूर्खा चितामणिरत्न-
मपास्य त्यक्त्या दूरीकृत्य काचशकका काचरसण्ड स्वीकुवते गृति
पुनस्ते जडा गिरी द्रसदृश पवतप्रायकाय उच्च द्विरद हरितन विक्रीय
रासम गदम क्रोति मूल्येन गृहन्ति । अत्र कल्पवृक्षसदृशो धर्म
यत्त रसाशा भोगा एव सर्वत्रोपनय' । भो मव्यप्राणिन् ! एव ज्ञात्वा
मनमि विवेकमानीय कल्पवृक्षधि तामणिसदृश श्रीधर्म एवाराध्य
धममाराघयता सता यापुण्यमुत्पद्यते तत् पुण्यप्रसादादुत्तरोत्तरमाग-
रिक्यमा विस्तर तु॥६॥

सूक्तिमुक्तावली अर्थ-जो नीच पुरुष पयित्र एवं फल्याणकारी वीवगण धर्म को पाकर भोगों की आशा से उसे छोड़ कर भय मसार के कामों में दौड धूप लगाते हैं भर्यात् विषय भोगों में मग्न हो जाते हैं ये जड़युद्धि महल में लगे हुए कल्पवृक्ष को उसाड़ कर धतूरे के पेड़ को धोते हैं. चितामणि रत्न को दूर फेंक कर काच का टुकड़ा स्वीकार करते हैं, पर्वत सदृश ऊचे हायो को घेच कर गधे को खरीदते हैं। अय नरभवस्य धर्मसामप्रयाश्च दुर्लमत्तमाह- शिसरिणी छद अपारे समारे कथमपि समामाद्य नृभव न धर्म य कुर्याद्विपयसुसतृष्णावरलितः । नढन् पारागारे प्रवरमपहाय प्रवहण स मुख्यो मूर्याणामुपलमुपलयु प्रयतते ।। ७ ॥ व्यारया-य पुमान् विषयसुखतृष्णातरलित सन् विष- याणा कामभोगाना शब्दरूपरसस्परांगधाना सुसस्य तृष्णा वान्छा तया तरलितो व्याहितो व्याकुलीत सन् अपारे अनते ससारे कय- मपि महता फष्टेन नृभव मनुध्यन म समासाद्य प्राप्य धम्म न कुर्यात् न करोति स पुमान् पारागारे समुद्र अडन् निमज्जन् प्रवर- मुत्तम प्ररहण पोत भपहाय त्यक्त्या सरणार्णमुपल पापाण उपलब्धु गृहीतु प्रयतते यत्न करोति उद्यम करोति कथभूत स मूर्खाणा मुख्य मूर्यपु वृद्धमूर्ख । अत्र ससार समुद्र धर्म प्रवहण विषया पापाएमडशा इत्युपनय । भो भव्यप्राणिन् । इति शास्वा मनसि १२ सूक्तिमुवावरी विवेकमानीय ससारसमुद्रतारण भीधर्म एवाराध्य आगघयतां प सता यत्पुण्यमुपाते तापुर-गप्रसादादुत्तरोतरमाङ्गलिक्यमाला विस्तरन्तु ॥७॥ अर्थ-इस अपार ससार में कठिनता से प्राप्त क्येि गये मनुष्य भय को पाकर जो व्यक्ति इन्द्रिय विषया के सुख की मृष्णा में आसक्त-सना हुआ मषज्ञ वीतराग प्रणीत जिनधर्म को पालन नहीं करता वह मूनों में मुरय कहा जाता है। वह समुद्र में डूबते हुये महान जहाज को मोद कर पत्थर को शिला को पकड़ने का प्रयत्न करता है। अस्मिन् शास्ने एता युपदेशद्वाराणि क्यायध्य ते इत्युपदेश- द्वारेण वृत्तमा-- शार्दूलविक्रीडितद भक्ति तीर्थरे गुरौ जिनमते सघे च हिमानृत- स्तेयाब्रह्मपरिग्रहायुपरम क्रोपायरीणा जय । सौजन्य गुणिमामिन्द्रियदम दान तपोभावना वैराग्य च कुरुष्य निर्वृतिपदे यद्यस्ति गन्तु मनः ॥८॥ व्यारया -भो भव्यप्राणिन् । यदि तय नितिपदे मोक्ष स्थाने गातु मनोऽरित तदा स्व तीक्षकरे श्रीगीतरागे भक्ति पूजा पुरध्व । पुनगुरो धर्मोपदेशके भक्ति फुरु । पुनर्निनमते जिनशासने भक्ति कुरु । पुनस्चतुर्विधसधे साधुसाध्वीरूप सघे भक्तिं कुरु । पुन हिंसाऽनृतस्तेयाऽनह्मपरिप्रहाद्य परम कुरु । हिसा जीववध प्राणाति- ३ सूक्तिमुक्तावली पात । अनृत असत्य मृपावाद । रतेय चौव्यं अदत्तादान अदत्तपर वस्तुग्रहण । अब्रह्म मेथुन स्त्रीसेवा । परिग्रहोधनधान्यादि दशविध । एभ्य उपरम निवर्तन कुरुष्व । पुन क्रोधाद्यरीणा जय मोधमानमा- यालोभरूपशणा जय कुरुष्व । पुन सौजन्य सुजनभाव सर्वजोवेपु मैत्रीभाव कुरुष्व । पुन गुणिसङ्ग गुणिना गुणवता मनुष्याणा सङ्ग मगति कुरुष्व । पुन इन्द्रियदम पचेन्द्रियाणा दमन कुरुष्व । पुन दान सुपात्रादिपचप्रकार कुरुष्व । पुनस्तपोऽनशनमूनोदर्यादि बाह्य अभ्यतर च द्वादशविध कुरुष्व । पुनर्भावना शुभचित्तभाव कुरुष्व । पुनर्वैराग्य ससाराद् भोगादिभ्यश्च विरक्तभाव कुरुष्व । एतानि मोक्षपददायकानि शास्वा सम्यकप्रकारेणाराधनीयानि । भाराधयता सता यत्पुण्यमुत्पद्यते तत् पुण्यप्रसादादुत्तरोत्तरमालिक्यमाला विस्तरतु ॥८॥ अथ- हे भव्य जीव ! ससार के दुःखों से छूट कर मोक्षपद प्राप्त करने के लिये यदि तेरे मन में इच्छा है तो आचार्यों का उप- धेश धारण कर । वह यह है-४६ गुण सहित, १८ दोष रहित तीर्थ- फर देव की भक्ति कर, २४ प्रकार परिग्रह रहित निर्घय गुरुओं की भक्ति कर, दयामई जिनधर्म और चार प्रकार के सघ (मुनि, आर्यिका, पावक, भाविका) की भक्ति कर, हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह इन पाच पापों का त्याग कर, क्रोधादि शत्रुओं को जीत, तथा सब के साथ सज्जनता का व्यवहार, गुणी पुरुषों की सगति, पाच इंद्रियों को वश में कर और चार प्रकार का दान, बारह प्रकार का तप एव ससार शरीर भोगों से विरक्तता धारण 7 १४ सूक्तिमुक्तावली कर। ऐसा करने से मेरा ससार परिभ्रमण दूर होगा और मामीफ अनत सुख को भोगेगा। भय ययोदेशस्तर निर्देश इति वचनादनुक्रमेण द्वाराणि विपृणोति । प्रथम चतुर्भिवृत्त श्रीतीर्णक्रमक्तिपूजाद्वारमाह- शार्दूलविक्रीडितबाद पाप लुम्पति दुर्गति दलयति व्यापादयत्यापद पुण्य सचिनुते श्रिय नितनुते पुष्णाति नीरोगता। सौभाग्य विदधाति पन्लपयति प्रीति प्रसते यश स्वर्ग यच्छति निर्यति च रचयत्यर्चाऽहता निर्मिता ॥९॥ -भो भव्य । अर्हता पिनाना पूजा निर्मिता छता सती पाप लुम्पति दूरीकरोति । पुन दुर्गति नरकादि दुष्पगति दलयति सण्यति निवारयति । पुन आपद कष्ट व्यापादयति विना- शयति । पुन पुण्य धर्म सचिनुने वृद्धि प्रापयति । पुन प्रिय लक्ष्मी विनुते विस्तारयति । पुन नौरोगता शगेरे मारोग्य पुष्णाति पोषयति । पुन सौभाग्य सर्वजनेषु श्लापनीयता विदधाति क्रोति । पुन प्रीति पल्लवयति उत्पादयति । पुन यश प्रसूते यशो विस्तारयति । पुन' स्वर्ग त्रिदिव देवपदी यच्छति ददाति । पुन निवृति मुक्ति रचयति ददाति । भो भव्यप्राणिन् । एव ज्ञात्वा मनसि वियेकमानीय सम्य परवनिर्मलविधायिनी इहलोके परलोके च सर्वसौरयदायिनी श्री- जिनपूजा कार्या । तत् पुर्वता सता यत्पुण्यमुत्पद्यते तत्पुण्यप्रसादादु- घरोसरमागलिक्य माला विस्तर तु ॥१॥ व्याख्या- १५ सूक्तिमुकायली अर्थ-जो भव्यात्मा श्रीअरहत वीतराग प्रभू फी भाव भक्ति से (दृढ प्रद्धा पूर्वक ) पूजन करते हैं इनके जम बम के सचित पापों का लोप (नाश ) हो जाता है, दुर्गति का नाश होता है, आपत्तिया दूर हो जाती हैं, पुण्य का भण्डार भर जाता है, इद्रादि पद की लक्ष्मी प्राप्त होती है, शरीर निरोग रहता है, सौमा- ग्य बढता है, सबसे प्रीति बढती है अर्थात उसे सब प्यार करते हैं- सय चाहते हैं, ससार में उनकी कीति फैलती है स्वर्गों का निवास मिलता है और तो क्या ? मुक्तिपद को भी प्राप्ति होती है। पुन श्रीजिनपूजाफ्लमाह-- शार्दूलविक्रीडितकाद स्वर्गस्तस्य गृहांगण सहचरी साम्राज्यलक्ष्मीः शुभा सौभाग्यादिगुणावलिम्लिसति स्वैर वपुःश्मनि । समारः सुतर शिव करतलक्रोडे लुठत्यञ्जसा, यः श्रद्धाभरमाजन जिनपतेः पूजा विधचे जनः ॥१०॥ व्याख्या-यो जन अद्धामरभाजन सन् श्रद्धा रुचिस्तस्या - भर प्रचुरता तस्या भाजन स्थान भागनशब्दस्याऽजल्लिगत्वात नपु सकरव शुभभावनायुक्त सन् निनपते श्रीवीतरागदेवस्य पूजा विधत्ते करोति तस्य जनस्य स्वर्गो देवलोको गृहागण गृहत्यागणवन्नि- फटो भवति । पुन शुभा मनोरमा साम्राज्यलक्ष्मी राज्यऋद्विस्तस्य सहचरी सावर्तिनी भवति । पुनर्वपुर्वेश्मनि वपुरेव शरीरमेव वेश्म गृह तस्मिन् सीमाग्यधैग्यौदार्यचातुर्यादिगुणाना आवलि अखि - सूक्तिमुक्तावली स्वैर स्पेच्छया विलसति मागस्य विलास नोटा करोति मितीत्यर्थ पुन संसार सुखेन सोयने इति सुतर सुखेन सरीतु शक्यो भवति । पुन शिव मोक्ष अनसा शीम तस्य करवलको हावतलमाये लुठति हस्तगोघरो मवतीत्यर्थ ।मतोऽहता पूजा पार्या । तपाहतश्च तुर्विधा नामस्थापनाद्रव्यमावभेदात् । बामजिया जिणणामा ठरणजिणा तह य साह पडिमाओ। दव्यजिणा निणजीवा भाजिणा समवसरणस्था॥ इति भो भव्यप्राणिन् । एष ज्ञास्वा मनसि वियेकमानीय अईता पूजा कार्या । तस्कुवता प सता यत्पुण्यमुत्पद्यते तत्पुण्यप्रसा- दादुत्तरोरारमालिक्यमालिका विस्तरतु ॥ १० ॥ अर्थ- F-श्रद्धा का भाजन जो पुरुष श्री निनेद्रदेव की पूजा करता है, स्वर्ग उमक घर के आगन के समान है, चक्रवर्ती द्र धरणेद्र की लक्ष्मी उसफी दासी हो जाती है, सौभाग्य भादि गुण उसके शरीर रूपी घर में पच्छ द क्रीडा (विलास ) करते हैं, विफट ससार उसके द्वारा भासानी से पार करने योग्य हो जाता है और सो क्या १ निश्चय से इसके हायों के मध्य मोक्ष का सुस लोटता है अर्थात शीघ्र ही निर्मल मोक्ष पद प्राप्त कर लेता है। विशेष-जैसे क्सिी घतन (पात्र ) में कोई वस्तु रखी जाती है उसी प्रकार जो पुरुप अपने हृदय में वीतराग देव की सदा मर लेता है तो उसको तत्काल सम्यमय की प्राप्ति होती है। नदीवर द्वीप की पूजन में उल्लेख है कि उन अत्रिम चैत्याळ यस्य पीतराग सूक्तिमुक्तावली नतिमाओं के दशन, पूजन से सम्यग्दर्शन का धारी देव हो जाता है मनुष्यों का वो यहा आवागमन ही नहीं है। मनुष्यों तियंचों के भी पोतरागदेव के दर्शन पूजन से सम्यक्त्व का आविर्भार (उत्पति) हो जाता है ऐसा शाखों में ( सर्वार्थसिद्धि, गजवार्तिक आदि में ) फयान है। कहा है जिने भक्तिर्जिने भक्ति, जिने भक्तिर्दिने दिने । सम्यक्तमेव समार वारण मोक्षकारणम् ।। अर्यात् जिनेद्र वीतराग देवको भक्ति सम्यक्रन की उत्पत्ति में प्रधान कारण है और सम्यक्त्व ससार का छेदक तथा मुक्तिका फारक है उससे अन्य सासारिक सपत्ति तो सहन ही मिल जाती है। पूनाया प्रभावमाह- शिखरिणीछद कदाचिन्नातक कुपित इव पश्यत्यभिमुसम् विद्रे दारिद्रय चक्तिमिव नश्पत्पनुदिनम् । विरक्ता कान्तेव त्यजति कुगति समुदयो न मुञ्चत्यम्यणं सुइदिय जिनाचा रचयत ॥ ११॥ व्याख्या-जिनार्चा श्रीवीतरागस्य पूना रचयत कुर्वत पुरुषस्य आतको मय फदाधित अभिमुरु सम्मुर न पश्यति न विलोकयति क इव कुपित इव यया कश्चित् कुपितो रुष्टो मवति । स यथा तस्य सम्मुस न पश्यति । तथेत्ययं । पुन' दारिद्रय दरिद्रव अनुदिन निरन्तर तस्य दूरे नश्यति दूरे याति । किमिव चकितमिर भयभीतमिव । पुननरकादिकुगतिस्तस्य सङ्ग समीप स्यादि मुञ्चति सूक्तिमुक्तावली फाइन विरक्ता कुपिता रुष्टा काता इव स्त्री इन यथा चिरता स्त्री भर्तु सग त्यति तयेत्यर्थ । पुन' उदय अभ्युदय प्रतापश्वय्या दिद्धिस्तस्याभ्यणं समीप न मुचति न स्यनति क इव सुहृदिव मित्र इव । मतोऽहंता पूजा फार्या । उक्त च- भो भव्यप्राणिन् । एष ज्ञात्वा मनसि विकमानीय श्रीनिन- पूजा फतव्या। कुर्वता च सता यत्पुण्यमुत्पद्यते तत्पुण्यप्रसादादु- तरोत्तरमागलिक्यमाला बिस्तर तु ॥११॥ अथ-जो पुरुष श्री वीतराग जिनराज प्रभू की पूजा करते हैं उनके आतङ्क अर्थात् रोग कोपायमान हुये के समान कभी भी समुख नहीं आता है अर्थात वे कभी भी अपने सामने रोग को भाया हुआ नहीं देखते हैं। धोतराग प्रभू के पूजक पुरुप सदैव स्वस्थ नीरोग रहते हैं दरिद्रता चकित हुये पुरुष की तरह दिन प्रति दिन दूर ही से नाश को प्राप्त हो जाती है अर्थात उनके दरिद्रता कभी नहीं आती सदैव लक्ष्मी से भरपूर भण्डार रहते हैं, फुगति-अपने पति से विरक्त हुई स्त्री की तरह सग छोड़ फर चली जाती है अर्थात् वीतराग के पूजक-दुर्गति नरक तिर्यच कभी भी प्राप्त नहीं करते फितु मरकर सुगति में पैदा होते हैं जहाँ उन्हें आत्मकल्याण के अनेक सापन मिलते हैं । तथा उनके महार माग्यरूपी सूय का उदय होता है जो उनका कभी भी मित्रके समान साय नहीं छोड़ता कि तु सदा माय रहता है जिससे ये भव भव में सुखी रहते हैं। ऐसा निनेद्र पूजन का अद्भुत फल जान कर प्रतिदिन जिनेद्र की पूजन करना चाहिए। पुन श्रीजिनपूजाया माहात्म्यमाह-

सूक्तिमुक्तावली
शार्दूलपिकीस्विछन्द
य. पुष्पैर्जिनमर्चति स्मितसुरनीलोचनै सोऽयते
यस्तं चन्दत एकशस्त्रिजगता सोऽहर्निश वद्यते ।
यस्त स्तौति परन पुत्रदमनस्तोमेन स स्तूयते
यस्तध्यायति क्लुप्तकर्मनिधन सध्यायते योगिभिः ॥१२॥
व्याख्या-य पुरुष पुष्प कृत्वा जिन श्रीवीतराग अर्चति
पूजयति स पुरुप स्मितसुरस्त्रीलोचनै अर्यते पूज्यते । रिमतानि
विकसितानि यानि सुरखीणा देवाङ्गनाना लोचनानि नेनाणि ते
देवलोके देवत्वेनोस्पन्न सदेवागनामि विकसितने अय॑ते पूज्यते
सराग अवलोक्यते इत्यर्थ । पुनर्य पुमान् एकश एक्वार त श्रीजिन-
देय य दते स मदनिश दियारात्री त्रिजगता त्रिभुवनेन यद्यते । यो
जिन य-रते स त्रिनगद यो भवतीत्यर्थ । पुनर्य' पुमान् त श्रोजिन
स्तोति स्तोन वर्षयति म पुमान् परत्र परलोक वृतदमनस्तोमेन
पत्रदमनाना इद्राणा स्तोमेन समूहेनस्तूयते गुणस्तुत्या कृत्वा वय॑ते ।
पुन य त भोजिन ध्यायति पिण्डस्यपदस्परूपरधरूपातीतभेदह दये
ध्यानगोचर फरोति स पुमान् योगिमि योगीश्वरै महामुनिभिा-
यले ध्यानगोचर कियते । कयभूत सक्लप्तकर्मनिधन क्लुप्त रचित
फत अष्टकर्मणा निधन विनाशो येन स क्लातफमंनिधन सिद्धाप-
स्या प्राप्त इत्यर्थ । पूजाविधिस्तुति । भनेन विधिना श्रोजिनपूजा
कार्यो । मत्र पोमिदूरप्रकराव्योपदेशशाप्ने श्रीजिनपूजाधिकार याय-
दय सबधो व्यापासोऽस्ति ततोऽय सयोधोमषिप्यति स पर्व-
मानयोगेन ज्ञायते ॥ १२॥

सूर्तिमुक्तावली अर्थ-लो मध्य पुरुष पुप्पों से घिने द्रदेव की पूजा करता है वह मद हास्ययुक्त देवाङ्गमाओं के कमलों द्वारा पूजा जाता है, हा पुरुष एकयार जिनेन्द्रदेव को पदना फरता है यह तीन लोक द्वारा सरा पदनीक होता है, और जो जिनेन्द्र देवकी स्तुति करता है उमको परमय में इद्रों द्वारा स्तुति की लाती है। जो जिनेंद्र देवका ध्यान करता है यह आठों कर्मों का नाश कर देता है और सय सिद्ध परमेष्ठी हो जाने के कारण योगियों द्वारा ध्यान करने योग्य हो जाता है। इति पूजाया प्रकरण समाप्तम्। अथ चतुर्मियुत्ते गुरुभक्तिद्वारमाह- यशस्थछद अभयमुक्त पथि यः प्रवर्तते प्रयतयत्यन्यजन च नि:स्पृहः । स एव सेव्यः स्वहितैपिणा गुरु स्वयं तरस्तारयितु सम परम् ॥१३॥ व्याख्या-भारमहितवाचकेन पुरुपेण स एव गुरु सेव्य स क या भवद्यमुक्के पापयजिते सत्ये पयि धर्ममार्गे स्वय प्रचलते घ पुन अयजन भन्यलोक शुद्धमार्गे प्रवर्तयति । यो गुरु निस्पृहः परिप्रहादिवाच्छारहित सन पुनयः स्वय ससारसमुद्र तरन् सन् पर भन्य तारयितु क्षम समर्म । गृणाति तसमिति गुरु । तयो- परेशक शुद्धप्ररूपक इत्यर्थ । , सूतिमुक्तावली दसण भट्ठो भहो दसए मट्ठरस गरिय निम्याण ! सिज्मति चरण रहिमा दसण रहिआ न सिग्मति ॥ भो भव्यप्राणिन् ! एव शारया मनसि विवेकमानीय शुद्धप्ररू- पको जिनाबाराधको गुरु सेन्य । तत्सेवमानाना यत्पुण्यमुत्पद्यते तत्पुण्यप्रसादादुत्तरोत्तरमागळिक्यमाला विस्तरन्तु ॥ १३ ॥ अर्य-जो पापरहित मुक्ति के मार्ग में प्रवृत्ति करते हैं तथा पाला रहित होकर अय मन्य जीरों को मोक्षमार्ग में लगाते हैं। भपना हित चाहो वाले व्यक्ति द्वारा ऐसे ही गुरु सेवन करने योग्य है। ऐसे ही निप्रन्य गुरु ससार समुद्र से आप तिरते हैं और दूसरों को भी ससार समुद्र से पार करने में समर्थ होते हैं। भावार्थ-परिग्रह, आरम रहित दिगम्बर जैन साधु ही सेवा एव भद्धा के योग्य हैं । अन्य मेपी कुलिंगी सेवन करने योग्य नहीं, ये संसार में पत्थर की नौका के समान वय डूबने वाले और दूसरों को हुनाने वाले हैं। अथ पुनरपि गुरुसेवाया फलमाह- मालिनीछन्द विदलयति कुपोष पोधयत्यागमार्थ सुगतिकुगतिमा पुण्यपापे व्यनक्ति। अवगमयति कृत्याकृत्यमेदं गुरुयों भवजलनिधिपोतस्त पिना नास्ति कश्चित् ॥१४॥ च्याप्या-मो मव्यास्त गुरु विना भन्य' कश्चित् भवजल- निधिपोत प्ररहण नास्ति भव एव ससार एव बलनिधि । समुद्रस्तर - २२ सूचिमुक्तावली प्रवहण ससारसमुद्रतारणे प्रवहणसमानोगुरु स्त गुरु विनान्य फरिच मास्ति । यो गुरु कुनोघ फुत्सितज्ञान मिथ्यात्व दिल्यति । पुनयों गुरु रागमार्य सिद्धा ताना अर्थ बोधयति ज्ञापयति । पुनर्यो गुरु पुण्यपापे पुण्य च पाप घ पुण्यपापे ते धर्माधों द्वे अपि व्यनक्ति प्रकटयति । इद पुण्य इद पापमिति । कथभूते पुण्यपापे सुगतिकुति मार्गी सुगतिश्च कुगतिश्च सुगतिकुगती तयो रांगों पुण्य देवनरादिसु गतिमार्ग पाप नरकतिप्यकुरूपकुगतिमाग ! पुनर्यो गुरु कृत्यात्यभेद भगमयति फतुं योग्य कृत्यमयोग्य आत्य कृत्य च अकृत्य घश्या फूरये तयोदो वियेको विचारस्त ज्ञापयति । भो भव्यप्राणिन् ! इति ज्ञात्वा मनसि विषेकमानीय समारसमुद्रतारणाय प्रगहण समान श्रीगुरो सेवा कार्या । गुरो सेया कुवता च सता यत्पुण्यमुत्पद्यते तरपुण्यप्रमावादु सरोत्तरमागलिक्यमाला यिस्तरतु ॥ १४ ॥ अथ-जो मिथ्यापान को दूर करते हैं, भागम सन् मिद्धार के अथ का भले प्रकार प्रतिपादन करते हैं (ज्ञान कराते हैं ) सुग कुगति के कारण पुण्य पाप को प्रगट करते हैं, क्तन्य भरतव्य । भेद का ज्ञान कराते हैं ये ही गुरु ससार समुद्र से पार होने क ल्टि जहान के समान है अन्य कोई भी पार करने में समय नहीं है ऐ ही दिगम्यर पीताग साधु स्तुति और सेवा करने योग्य हैं अ य भेष सुवि सेवा करने योग्य नहीं हैं। पुनर्गुस्सेनाया फलमाह- शिखरिणीद यसहचरी सूनुनिरह मुहत्स्वामी मायत्करिमटरथाश्य परिकर । पिता माता भ्राता २३ सूक्तिमुक्तावली निमज्जन्तं जन्तु नरकहरे रक्षितुमलं गुरोर्वमाधर्मप्रकटनपरात्कोऽपि न परः ॥१५॥ व्यारया-नरककुहरे नरकविवरमध्ये निमग्न त ब्रुदत पत त सन्त जतु जीव गुरोरन्य कोपिरक्षितु अल न कश्चिदपिधातु समर्थो न । का पिता ननको रक्षितु नारा माता जननी नाल भ्राता सहोदरो नाल प्रिया अत्यत वल्लभा सहचरी स्त्री रक्षितु नाल । सूनुनिवह पुत्रगणोपि रक्षितु नाल सुहमित्रमपि नाव न समर्थ । स्वामी नायकोऽपि नारा किंभूत स्वामी माद्यत्करिभटरथाश्य मा- द्य तोमदो मचा करिणो गना भटा सुमटा रथा स्यदना अश्वाश्च यस्य स एव बलवानपिस्वामी रक्षितु नाल । पुन परिकर प्रभूतसेवका- दिवर्गोपि नरके पतत रक्षितुमल न समर्थो न । किन्तु एको गुरुरेव नरके पतत जीग रक्षितु समर्थ गुरो पर कोपि नरके पतत नीज रक्षितु समर्थो न। किंविशिष्टाद्गुरो धमाधर्मप्रकटनपगद् धर्म श्च अधमश्च धमाधर्मों पुण्यपापे त्यो प्रकटने प्रकाशने परस्तत्परो या स तस्मात् । गुरु धर्माधर्मी द्वावपि दर्शयति ततश्च य प्राणी धर्ममगीकरोति स नरके न पतति किंतु सुगतिमान् भवति भो । भव्यप्राणिन् । एव ज्ञात्वा मनसि विवेकमानीय नरकपतनाद्रक्षणाय समर्थोगुरुरेव सेव्य सेवमानाना च यत्पुण्यमुत्पद्यते तापुण्यप्रसादा- दुचरोचरमागलिक्यमाला विस्तरन्तु ॥ १५ ॥ . अर्य-धर्म अधर्म को प्रगट करने में तत्पर ऐसे गुरु से अय कोइ मी पिता माता, भाई, स्त्री पुत्रसमूह. मित्र स्वामी, २४ सूक्तिमुक्तावली मदोमत्त हायो, योद्धा रथ, घोडे आदि परिकर नरक के बिलों [विवर ] में पड़ते हुए (डूयते हुये ) प्राणी को रक्षा करने में समर्थ नहीं है। भावार्थ-नरक रूपी समुद्र में डूयते हुए प्राणी को माता पिता बादि कोई भी निकालने में समर्थ नहीं है, एक श्रीगुरु ही समर्थ है ऐसा जानकर श्रीदिगम्बर जैनगुरु का ही आश्रय लेना कायकारी है। अथ गुरो माज्ञामाहात्म्यमाह- शार्दूलविक्रीडितछद किं ध्यानेन भात्यशेषविषय, त्यागैस्तपोभिः कृत पूर्ण भावनयालमिन्द्रियदमै पर्याप्तमाप्तागमै । कित्येक भानाशन कुरु गुरुप्रीत्या गुरो' शामन सर्वे येन विना विनायवलवत् स्वार्थाय नालगुणा ॥१६॥ व्याख्या-भो भव्या गुगे शासन गुरो भाता विना चेत भ्यान त सहि सेन ध्यानेन किं अपितु न किमपि फल । पुन अशेष- विषयत्यागै भवतु पूर्ण जातसमस्तविषयाना परिहारेणापि न किमपि पापुन अशेषतपोमि मृत गुरो आमा विना । पटाष्टमदशमा शुपयामापियक्षपणमामधपणसिहनि कोहिनादिभिस्तपोभि' फत्त सम्पूर्ण जात भया न किपि। पुनर्मायनया शुभभावेनापि पूर्ण जात । पुन इन्द्रियदमै पचेंद्रियाणा दमने कृत्वा महा पूर्ण सात। पुन आप्तागमे सूत्रसिक्षा उपठनैरपि पर्याप्त पूर्ण जात नहि किं प्रोत्या गरिष्टवारसत्येन अधिकादरेण गुरो शासन मासा पुर। गुरोरेवामा गुद्धा पारय किंभूत गुरो शासनेन भाज्ञया सूक्तिमुक्तावली विना सर्वेपि गुणा पूर्वोक्ता ध्यानादय स्वार्थाय स्वल्पफल साधनाय अल न समर्था न किंतु निष्फला इत्यथ । किंवत् विनायरलवत् नि यकसैन्यवत । यथा राजारहितसेना शत्रु जेतु न ममर्या भवति तथा गुरुमेवा विना सर्ग वृया भवति क्या गुरो माझा पिना क्रिया- नुहामारिक मर्ग निष्फल | ष ज्ञास्वा गुरो. आतासहित सर्ग फर्तव्य । मो मव्यमाणिन् । एव ज्ञात्वा मनसि विरेकमानीय गुरु- सेवा कर्तव्या फुर्वता च सता यत्पुण्यमुत्पद्यते तत्पुण्यप्रसादादुत्तरोत्तर मागलिक्यमाला विस्तरन्तु ॥ १६ ॥ । अर्थ-ध्यान करने से क्या प्रयोजन १ समस्त इन्द्रिय विषयों फे त्याग से क्या १ तप करने से क्या मंत्री प्रमोद धादि मावनाओं से क्या ? इन्द्रियों के वश में करने से क्या लाम १ भाप्त आगम से भी क्या साध्य ! कुछ भी नहीं, किंतु गुरु की प्रीति से ससार का एच्छेद करने वाला मात्र एक गुरु का शासन ही है अर्थान गुरु की आमा विना सम्पूर्ण गुण-स्वामी रहित सेनाकी तरह स्वाथ (मोक्ष) साधन में समर्थ नहीं हैं। मावाय-जैसे सेनापति के बिना सेना युद्ध काय में विजय प्राप्त नहीं कर सकती उसी प्रकार गुरु की आज्ञा विना ममस्त गुण मोक्ष साधक नहीं हो सकते । इति गुरुप्रक्रम । है - भय चतुर्मिचैर्जिनमवस्य जिनोक्तसिद्धा तस्य च माहात्म्य

सूषिमुक्तावली
शियरिणादाद
न देव नादेव न शुभगुरुमेन न कुगुरु
न धर्म नाधर्म न गुणपरिणद्ध न पिगुण ।
न कृत्य नात्प न हितमहित नापि निपुण
पिलोकन्ते लोका जिनपचनचचुरिहिता ॥१७॥
व्याख्या-जिनपचनपशुविरहिता निनवचनमेव पशु नेत्र
तेन रहिता सत लोका जीवा एतानि पनि न विलोकन्ते
न पश्यति न जानन्ति इत्यर्थ । किन पिलोफते देव सर्प पिव-
रागादिरियादिलक्षणोपेत न विलोक ते। पुन शुमगुरु सुगुरु
शुद्धप्ररूपय गुरु न जानति । पुन पुगुरु पचाचाररहितगुस्सूत्र
प्ररूप न जानन्ति । पुन घम अधर्म च न जानति धर्माधमयोरसर
नविदतीत्यर्थ । पुन गुणपरिणद्ध गुणे परिपूर्ण गुणवत पुन
विगुण गुणरहित निगुण प न जानन्ति गुणपत निगु ण प सदश-
मेव पश्यति । पुन पृत्य करणीय क्तुं योग्य यस्तु न जानति । पुन
अपृत्य कर्तुमनुचित अयोग्य न जानन्ति । कृत्यात्यविवेक न जान
तीव्यय । पुननिपुण सचातुर्य च सम्यम् यया स्याच्या आत्मनो
हित सुखकारण न जाति । पुन अहित च अगुभकारण पन
जानति जिनवचनश्रवण विना शुभाशुमयोर तर न जानन्ति । एवं
ज्ञारमा श्रीनिनप्रणोतसिद्धाताना प्रवण फतव्य । कुर्वता च सता
यत्पुण्यमुत्पद्यते तत्पुण्यप्रसादादुत्तरोन्सरमागलिक्यमाला विस्त-
रतु॥१७॥

२७ सूक्तिमुक्तावली अर्थ-सर्वज्ञ वीतराग के स्याद्वाद (भनेका त) गर्मित वचन रूपी नेत्रों से रहित पुरुष देव अदेव को नहीं देखते हैं, सुगुरु फुगुरु को नहीं देसते, धर्म अधर्म को नहीं देखते, गुणवान निर्गुण को नहीं देखते, करने योग्य और न करने योग्य कार्य को नहीं देखते, और हित अहित को भी अच्छी तरह नहीं देखते अर्थात जो सर्पज्ञ वीतराग प्रणीत जैन शाखों को रुचि (श्रद्धा) पूर्वक सुनते और पढते हैं उहें भले बुरे का ज्ञान भन्छी तरह होता है अत गृहकार्य छोड़कर भी जैन शास्त्रों का अभ्यास करना चाहिये । शार्दूलविक्रीडितहद मानुष्य विफल वदति हृदय व्यर्थ घृथा थोत्रयो निर्माण गुणदोपमेदकलना तेपामसभापिनीम् । दुरि नरकान्धकूपपतन मुक्तिं बुधा दुर्लभा सार्वज्ञः ममयो दयारसमयो येषा न कर्णातिथिः ॥१८॥ व्यारया-सार्वज्ञ सर्पक्षप्रणीत भीवीतरागदेवेन भापित समय आगमो येपा पुरुपाणा कर्णातिथि फर्णगोचरोन नातो ये न श्रत बुधा पहितारतेषा मनुष्याणा मानुष्य मनुष्यजम विफल निष्फल वा त । लब्धमप्यलब्ध कथयति । तेषा हदय चित्त व्यर्थ निरथक शूय वदति। पुन पामोरयो कर्णयो निमाण करण पृथा निष्फल वदति । पुनस्तेपा गुणाना दोपाणा च यो भेदोऽतर तस्य कलना विचारणा असमाविनी अर्थात् दुर्लमा पदन्ति । पुन' नरकमेव अधकूपस्तृपयल्लीवितानाच्छादित परधन पवन दुर्वार सूक्तिमुचारली वारयितुमशक्य क्थति । पुनश्लेषा मुक्ति दुर्लभा कथा त । जिना गमश्रवण विना मुक्ति मोक्ष न प्राप्नुवति । अत श्रीजिनागम- प्रवणमेव पत्तव्य भाव शिनापित हिताय भवति । यया व पेपि योधकवच श्रवण विधाय, स्याद्रोहिणे इव ज तुरुदारलाभ' । क्वायो प्यप्रिऽयोपि सरुना सुखदोरविर्वा सतापको पिनगदगभृता दिशाय इति ज्ञात्वा निमश्चनस्य भवगा कतव्य कुवता । च सता यत्पुण्यमय- धते तत्पुण्यप्रसादादुत्तरोचरमालिक्यमाला विस्तर तु ॥१८॥ अर्थ-दयामयी सयज्ञ प्रणीत सिद्धात जिन जीवों के कानों के अतिथि नहीं बने हैं अर्यात् जो पोतराग प्रणीत शास्त्रों को नहीं सुनते हैं उन मनुष्यों का मनुष्य नम पाना विफल है, हृदय व्यर्थ है, कानों का पाना पृथा है, गुण दोप के मेद झानकी विचार शक्ति उनके असभव है, नरक रूपी अधकूप (फुये ] का पतन उनके लिये दुरि है अर्थात ऐसे पापी जीव नरक में अवश्य जाते हैं और मुक्ति पद की प्राप्ति तो ऐसे जीवों को अत्यन्त दुर्लभ है ऐमा विद्वान् ज्ञानी पुरुष कहत हैं। शार्दूलविक्रीडितहद पीयूप विपरज्जल ज्वलनवचे जस्तम' स्तोमवत् मित्र शारववत्सज भुजगवञ्चितामणि लोष्ठयद । ज्योत्स्ना ग्रीष्मजधर्मवत्स मनुते कारुण्यपण्यापणं जैनेन्द्र मतमन्यदर्शनमम यो दुर्मति मन्यते १९ ।। व्यारया-यो दुम्मति मूर्म पुमान् जैनेन्द्र मत श्रीजिन- शासा अन्यदशनसम भयदर्शनै बौद्धनैयायिकमारयवैशेपिक-

सूक्तिमुक्तावली
२६
लेमनीयादिमि सम सदृश मन्यते गणयति स मूर्स पीयूष अमृत
विषवत् विषेण तुल्य मनुते गणयति । पुनर्जल परमशीतल पानीय
चलनवत् अग्नितुल्य गणयति । पुन वेज उद्योत तम स्तोमवत्
अधकारपुन्नात् मनुते पुनर्मित सखाय शात्रववत् वैरिसदृश मनुते
जानाति । पुन स्रज पुष्पमाला भुजगवरसर्पतुल्य गणयति । पुन' स
चिंतामणिरत्न लोष्ठयत् पापाणसदृश गणयति । पुन स ज्योत्स्ना
कौमुदी चन्द्रकातिं ग्रीष्मनधर्मवत उष्णकाल आतपवत् मनुते । अत्र
पीयूपादिसम जिनदर्शन विपादिसदृशाययदर्शनानीत्युपनय । किं
भूत जैनेद्र मत कारुण्यपण्यापण दयारूपक्रयाण कस्यहट्ट । एव मत्वा
श्रीजिनमतमेगगीकर्तव्य । कुर्वता च मता यत्पुण्यमुत्पद्यते तत्पुण्य-
प्रसादादुत्तरोत्तरमागलिक्यमाला विस्तर तु ॥ १६ ॥
अर्थ-जो दुर्बुद्धि जैनेन्द्र दर्शन (मत) को अन्य मिथ्या
दर्शनों के समान समझता है यह अमृत को विप तुल्य, जल को
अग्नि-समान, प्रकाश को अ धकार के समूह तुल्य, मिन को शत्रु
समान, पुष्पमाला को सर्प समान चितामणि रत्न को पायर तुल्य
चद्रमा की ठही चादनी को प्रीष्म ऋतु की गर्म धूप समान गर्म
समझता है।
शार्दूलविक्रीडितबाद
धर्म जागरयत्यय विघटयत्युत्स्थापयत्युत्पथ
भिमत्मरमुन्छिनदि कुनय नाति मिथ्यामति ।
वैराग्य रितनोति पुष्यति कृपां मुष्णाति तृष्णां च यद
तज्जैन मतमर्चति प्रथयति घ्यायत्यधीते कृती ॥२०॥

३० सूचिमुतायली व्याश्या-कृती पद्धित यग्जनेद्रमत भीजिनशासन जिनोक्त पचन अचंति पूजयन्ति । पुन प्रथयति यिस्तारयति । पुन ध्यायति चिन्तयति । पुन अधीते पठति तत् स धर्म जागरयति धमस्य जागरण दीपन करोति । पुन अघ पाप विघटयति दूरी परोति । पुन उत्पथ मार्ग अनाघार उत्यापयति निधारयति । पुनर्मरमर गुणिपु द्वेषभाव मि ते भेदयति । पुन कुनय पुस्सितनय भयाय उनिधनत्ति उ मूलयति पुनः मिथ्यामति मन्नाति यूटयुद्धिं विलोक्य दूरीकरोति । पुनराग्य तनोति विस्तारयति । पुन छपा दया पुष्यति पोपयति । पुनस्तृष्णा स्पृहा लोम मुष्णाति निराकरोति भयात येन जिनमतमाराधित देन एतानि वस्तूनि निस्तानि इत्यथ । मो भव्यप्राणिन् । इति नास्या मनसि विक्मानीय श्रीनिनमतप्रणीतसिद्धात च सम्यगाराधनीय भाराघयता च मता यत्पुण्यमुत्पद्यने तरपुण्यप्रसादादुत्तरोत्तरमाग लिक्यमाला विस्तरतु ॥ २०॥ अय-जो जैन मत उत्तम क्षमा आदि रूप धर्म को प्रकाश भान करता है, पाप को हटाता है, उत्पयअथात् मिथ्यामागपाखण्डन करता है, मरसरता ( इD) का भेदन करता है, नाश करता है, एकाउवाद का सडन करता है मिथ्यात्रुद्धि को दूर करता है, पैराग्य को बढ़ाता है दया को पुष्ट करता है और तृष्णा का शोषण करता है ऐसे हितकर जिनमत [ जिनागम ] की सुकृतारमा पुरुष पूजा फरता है प्रचार करता है, आराधना करता है, और पदता पदाता है ॥ २०॥ वह व्यक्ति उभयलोक में सुखी होत सूक्तिमुक्तावली इति जिनमतप्रस्ताव अथ चतुर्भिवृत्त सघस्य महिमानमाह- शार्दूलविक्रीडितछद रत्नानामिव रोहणक्षितिघरः ख तारकाणामिव स्वर्ग:कल्पमहीरुहामिन सर• पक रहाणामिव । पाथोधि' पयसामिवेन्दुमहमा स्थान गुणानामसा- वित्यालोच्य पिरच्यता भगनत. सघस्य पूजाविधिः ॥२१॥ - व्यारया-मो भव्या इत्यालोच्य इति विधाय्य भगवत पूज्यस्य सघस्य पूजाविधिविरच्यता इतीति किं यत असौ सघ साधु- साध्वीश्रावकमाधिकारूपश्च चतुर्विधसघ सर्वगुणाना ज्ञानदर्शन- चारित्रविनयादीना स्थान निवास । क केपामिव । रोहणक्षितिधर । रोहणश्चासौ क्षितिधरश्च पर्वतश्च स्नानामिर यथा रोहणाचलो रत्नाना स्यान तथेत्यर्थ । पुन' स आकाश तारकाणामिव पुनर्यथा स्वर्ग करपमहीरुहा कल्पवृक्षाणा स्थान तथेत्यर्थ । पुनर्यया । सरस्त- डाग पके रुहाणा कमलानां स्थान तथा। पुनर्यया पायोघि समुद्र पयसा पानीयाना स्थान तथा किंभूताना पयसा इदुमहसा इदुनि- मलाना अथवा शशीत्र महसा इति वा पाठ । यथा शशी चद्रो मह्सा तेनस्थान तथासौ सघो गुणाना स्यान । इदुवत् महो येषा तानि । इदुमहासि तेषा एव श्रीचतुर्विधसघ सर्वगुणाना स्थान इति ज्ञात्वा श्रीसघस्य भक्ति कार्या। कुर्वता च सता यत्पुण्यमुत्पद्यते तत्पुण्य-- प्रसादादुचरोचरमागलिक्यमाला विस्तरतु ॥ २१ ॥ - - ३२ सूक्तिमुक्तावली अर्थ-जैसे रत्नोंको उत्पत्ति का स्थान पर्षत होता है ताराओंका स्थान मामाश होता है, कल्पवृक्षों का स्थान वर्ग होता है, कमलोंकी उत्पत्तिका स्थान सरोवर [ तालाय ] होता है, और भगाध जल का स्थान समुद्र होता है उसी प्रकार भगवान निद्र देवकी आज्ञानुसार चलने वाला मुनि आर्यिका प्रारक मारिकाओं फा सघ पद्रमाके ममान निमल गुणोंका स्थान होता है ऐसा विचार कर उसकी [ सघको ] पूना-सरकार करना चाहिये। शार्दूलविक्रीहितछद य' ससारनिरामलालसमतिर्मुक्त्यर्थमुचिष्ठते य तीर्थ कथयन्ति पारनतया येनास्ति नान्य सम । यस्मै स्वर्गपतिनमस्पति सतायस्माच्छुम जायते स्फूर्तियम्य परा घसति च गुणायस्मिन्स सघोऽच्यता ॥२२॥ व्यारया-मो भव्या ममि स श्रीचतुविधसब अच्यता पूज्यता स क य सघ ससारनिरासलालसमति सन् ससारस्य निरासे निराकरणे त्यागे लालसा इन्छा यस्या सा इशीमति वुद्धिर्यस्य स ईदृश सन् मुक्त्यर्थ मुक्तिसाधनार्थ उत्तिष्ठते साय- धानो भवति । पुन य सघ पावनतया पवित्रत्वेन तीजभूत पथ यति । पुन येन सधेन सम सदृशोऽय' कोपि नास्ति । पुनर्यस्मै सघाय स्वर्गपति देवपति इद्र स्वय नमस्यति नमस्कार करोति । पुनर्यस्मात् सपात् सता सग्ननाना शुभ कल्याण जायते उत्पद्यते । पनयस्य सपः स्य स्पूर्तिमहिमा परा उशा वर्तने । पुनयस्मिन् सधै गुणा गाभाऱ्या । १ देवपति नर्मस्यति इति पाठातरम् ।

सूक्तिमुक्तावली ३३ धैर्यादय मूलगुणोत्तरगुणाश्च वसति तिष्ठति । एष ज्ञात्वा मो भव्यप्राणिन् ! मनसि पियेकमानीय श्रोसघस्य पूजा भक्तिश्च प्रफर्त- ज्या कुर्वता च यन् पुण्यमुत्पद्यते तत्पुण्यप्रसादादुत्तरोत्तरमागलिक्य. माला विस्तरन्तु ।। २२॥ अर्थ-जो मसार के विषय मोगों में वाला रहित बुद्धि घाला है तथा मुक्ति प्राप्ति के लिये सतत प्रयत्नशील है, रत्नत्रयादि गुणों से पवित्र आत्मा होने के कारण जिसको महापुरुष तीर्थ कहते है निस [ चतुर्विध सघ ] के समान कोई दूसरा तीर्थ नहीं कहा जा सकता [वस्तुत तीर्थ वही है जहाँ पवित्रामा आत्म कल्याण करते हैं जिसके लिए इन्द्रादि देव नमस्कार करते हैं, जिससे [ चतुर्विध सघ से ] ससार के जीवों का कल्याण [ उत्थान ] होता है, जिसकी महिमा सस्कृष्ट है, जिसमें सब गुणों का निवास है अर्थात् जो गुणों फा भण्डार है ऐसा चार प्रकार का सघ प्रत्येक प्राणी द्वारा पूजा के योग्य है अर्थात चतुर्विध सघ की मन वचन फाय से पूजा सेवा करना चाहिये इसी में प्रत्येक प्राणी फा कल्याण निहित है। इस विषय में श्री सोमदेव आचार्य की शक्ति है- फलो काले चले चित्ते, देहे चान्नादिकीटके । एतच्चिन यदद्यापि, जिनरूपधरा इसका अर्थ यह है कि यह पचम काल हुण्डावसर्पिणी का फाल घड़ा भयकर है प्राय लोगों की मनोवृत्ति चचल है-स्थिर नहीं है, शरीर मनका कीड़ा वन रहा है जिनके रात दिन एकसा है खाने पीने का रात दिन का कोई विचार नहीं है ऐसे कलिकाल नरा ॥ - सूक्तिमुपावली में यदि निमलिग के धारी मुनि, आपिंकादि विद्यमान हैं पाये जाते हैं वो यह बड़े भाश्चर्य की बात है ॥ २२ ॥ शार्दूलविक्रीडितछाद लक्ष्मीस्त स्वयमभ्युपैति रमसात्कीर्तिस्वमालिगति प्रीतिस्त भनते मति प्रयतते त लधुभुत्कण्ठया । स्व श्रीस्त परिरधुमिच्छति मुहुर्मुक्तिस्तमालोकते य सघ गुणराशिकेलिसदन श्रेयोरुचि सेक्ते ॥२३॥ व्यारत्या-य पुमान् भ योसचि सन् श्रेयसि कल्याणे धर्म 'वा रुचिरमिलापो यस्य म योचि ईदृश सन् श्रीसघ सेवते त पुरुष लक्ष्मी सपत् रभसा बेगेन स्वयमात्मना अभ्युपैति स मुस- मायाति । पुन कीतिरत पुरुष भालिङ्गति भालिजन ददाति । पुन प्रीति नेहरत भजते सेयते । पुनर्मतिघुद्धि तत्कठ्या उत्सुक्तया कृत्या न नर लघु प्राप्त प्रयतते यान करोति । पुन स्व श्री स्गलक्ष्मी- रत मुहुवार बार परिरघु मालिंगितुमिच्छति । पुनर्मुक्ति मोक्षस्त पुस्प आलोकते पश्यति । किविशिष्ट सघ गुणराशिकेलिसदन गुण- समूहस्य जीतागृह एव ज्ञात्वा सघ सेव्य ॥ २३ ॥ - अथ-कल्याण का इच्छुक लो पुरुष रत्नत्रयादि गुणों के क्रीडा करने का मन्दिर जो चतुविध सघ (जिनसघ) की सेवा फरता है, लक्ष्मी उसे शीघ्र ही चारों तरफ से प्राप्त होती है, कीर्वि उसका आलिंगन करती है अर्थात् उसकी सर्वत्र कौति विस्तृत होती है, प्रीति सेवा करती है [ उससे सभी प्राणी स्नेह करते हैं, उसे सूक्तिमुक्तावली चाहते हैं ] सुबुद्धि उसको उत्कण्ठा से प्राप्त करने का प्रयत्न करती है अर्थात् उसे शीघ्र ही सम्यग्ज्ञान [आत्मज्ञान] की प्राप्ति होती है, स्वर्ग की लक्ष्मी उसे प्राप्त करने के लिए बार बार इन्छा करती है भौर तो क्या ? मुक्ति उसके देसने की प्रतीक्षा करती है ॥ २३ ।। शार्दूलविक्रीडितछद यद्भक्तेः फलमहँदादिपदवीमुख्य कृपे' शस्यपच् । चक्रित्वनिदशेन्द्रतादितृणवत् प्रासङ्गिक गीयते ॥ शक्तिं यन्महिमस्तुती न दधते वाचोऽपि वाचस्पते । मध सोऽघहरः पुनातु चरणन्यासैः सता मदिर ॥२४॥ व्याख्या-स श्रीसघश्चरणन्यासै स्वपादस्थापन कृत सता सत्पुरुषाणा साघुमनुष्याणा मदिर गृह पुनातु पस्त्रियतु । स क यद्भक्त यस्य मघस्य भक्त अहंदादिपदवी ती करादिपदप्राप्ति- मुख्य फल वर्तते किंवत् कृपे क्षेत्रादे शस्यवत् धान्यवत चक्रित्वनिद- शेंद्रतादिचयतिल इद्रपदत्वादिक चप्रासङ्गिक प्रसगादागत फल गीयते कथ्यते किंयत् कृपेस्तृणवत् पलालादिवत् । पुनर्य महिमस्तुती यस्य सघस्य प्रभाववर्णन यस्मिन् वाचस्पतेरपि वाचो वापय शक्ति सामथ्र्य न दघते न धारयति । किविशिष्ट सघ अघहर अघ पाप हरति य स अघहर इति ज्ञात्वा भीसप' स्वगृहे आहूय सम्यक- पूजनीय ॥ २४ ॥ अर्थ-खेती करने का मुख्य उद्देश्य अन पैदा करना है, इसी प्रकार सघ की मक्ति का मुरयफल अरिहत आदि पदवी प्राप्त सूक्तिमुक्तावली करना है। खेती का गौण फर घास भादि है, उसी प्रकार मतिका गौण फल चक्रवर्ति, इद्रपना आदि ससार की विभूति प्राप्त करना है, जिस सघ की महिमा स्तुति करने में बृहस्पति के वचन भी शति नहीं रखते हैं, ऐसा शह पाप का हरण (दूर ) करने वाला सप अपने घरण यास से सजनों के मदिर ( घर ) को पवित्र फरें ऐसा यह माशीवाद सूचक वचन है ॥ २४ ॥ इति सघप्रक्रम अय हिसानिपेधेन सत्येपु दयैव क्यितामित्यर्थ । ग्रीडाभूः सुकृतस्य दु कृतरज सहारवात्या मो-- दन्वन्नौर्व्यसनाग्निमेघपटली सकेनती श्रियो । नि श्रेणिस्त्रिदिवौकस• प्रियससी मुक्ते अगत्यर्गला सत्त्वेपु क्रियतां कृपत्र मातु क्लेशेरशेपैः परै ॥२५॥ व्याख्या-भो भन्या सत्वेषु जीयेषु कृपा एष दया एवं क्रियता । परैरयरशेष समस्तै क्लेशे कायकष्टकरणे मयतु पूर्यता मा क्रियतामित्यर्थ । कयभूता कृपा सुकृतस्य पुरयाय नीहाभू क्रीडा- स्यान । पुन क्यभूता दुतरत सहारवाच्या दुत पाप तदेव फर्ममलहेतुवात् रजस्तस्य सहारे सहरणे पात्या वायुसमूहतुल्या। पुन फ्यभूता भवोद पानी भर एव ससार एष सदा यानिवोद- न्वान् समुद्रात नौ नौका। पुन' कणमूता व्यसनाग्निमेपपटली ध्यसनानि कष्टान्येवतापहेतुत्वात् अग्नयो यहयस्तेषु मेघपटली मेघ पटासमाना। पुन कपभूता प्रिया सहेतदूती मिया लक्ष्मीनों सफेतदूती सवकयका। पुन' फणभूता मुक्त प्रियससी मुके सूक्तिमुक्तारली मोक्षाय वयस्या । पुन क्यभूता कुगत्यर्गला कुगतेदुर्गते अर्गला द्वारपरिघ इति ज्ञात्वा जीवेषु कृपा एर क्यिता ॥ २५॥ अर्थ-उपरोक्त श्लोक में आचार्य ने दया का माहात्म्य दिखाया है, कि-छह काय के नीबों की रक्षा रूप दया कर । यही सर जप तपादि हैं । यदि तू जपतपादि करता है और दया पालन नहीं करता तो वह सब व्यर्थ है। वह दया फैसो है ! पुण्य की कीहा करने की भूमि है, पाप रूपी रज [ घूल ] को नष्ट करने के लिये पवन के समान है, ससाररूपी समुद्र को तिरने के लिये नाव के समान है, व्यमन रूपी अग्नि को बुझाने के लिये मेघवृष्टि है, लक्ष्मी को बुलाने के लिये दूती समान है, स्वर्ग के चढने के लिये नसैनी समान है, मुक्ति की प्यारी सखी है, और कुगतिगमन के रोकने को मागल समान है, ऐसी कृपा जीवों पर करो अन्य दूसरे किसी क्लेश को सहन करने से क्या लाम है। दया ही सर्व श्रेष्ठ है, ऐमा जान कर समस्त जीवों पर दया करना योग्य है। शिखरिणीछद' यदि ग्रारा तोये तरति तरणियद्युदयते । प्रतीच्या सप्ताचियदि मजति शैत्य कथमपि ॥ यदि मापीठ स्यादुपरि सकलस्यापि जगतः । प्रसूते सत्त्वाना तदपि न वधः क्वापि सुकृत ॥२६॥ व्यारया-यदि प्रापा पाषाणस्वोये जले तरति । पुनर्यदि तरणि सूर्य प्रतीच्या पश्चिमाया दिशि उदयति । पुन, सप्ताचि - पिगुप्तायष्ठी व्यारया-माद्रों तर छपया भाद्र भातर मध्य या न पातर इश चेत चित फरोति स पुमार स्वाय आयु नायित दीपार अधिक फरोति। सपा यपुः शरीर परसर अति प्रधान फरोति । पुनर्गोन नाम फा या गरीयस्तर अतिगरिष्ट हरे- गोत्ररूप करोति । पुनर्वित्त धन भूरितरं अतिप्रपुरै फरोवि। पुनपर वीर्य बहतर प्राज्य करोति । स्यामिरव प्रमुख सच्चातरं सर्वोशष्ट करोति । तया मारोग्या नोरोग विगतात अतररहित निरन्तर करोति । तया विषगतस्य त्रिभुवय रलायरव श्लापनीयका अरुपे सर प्रघुर फरोति । त्रिभुवनमपि त रलापते। तया ससाराम्मुनिधि भयसमुद्र सुतर सुखेन सरीतुं शक्य करोति । दयासहित घेत पलानि पस्तूनि करोति सपादयति मत फारणाम् सर्षे ओयेपु प्येष पतं. व्या। अत्रगेपरपराझो दृष्यात तथा हरियलधीवराय घरातो पाग्य ॥२८॥ इति भहिंसा प्रक्रम । अर्थ-दया से भाद्रं भयात् भीगा है चित्त निमका ऐसा पुरुष अपनी माय फो पढ़ाता है, शरीर को मनोज्ञ करता है, गोत्र को बढ़ाता है, यल को पढ़ाता है स्वामीपना पो रूप करता है आरोग्यता को सराय रहित करता है तीनलोक में अधिक प्रया फा भानन होता है, ससार समुद्र को भासा से पार करता है। भावाप-दयालु पुरुष दीघायु हात है, मनोज्ञ शरीर प्राप्त करते हैं, प्रशस्त गोत्र प्राप्त पाते हैं, अधिक वैभवशाली होते हैं, यलिष्ठ होते हैं, अनेक पुरुष जिनक मागे नतमस्तक होते हैं, ऐसा स्वामित्व प्राप्त करते हैं, सदा आरोग्य शरीर वाले होत है, तीन लोक यश के मानन होते हैं ये ससार पार कर मुक्तिपर पाते हैं ।। २८ ॥

सूक्तिमुक्तावली भय सत्यपचनस्य प्रभाव प्रकटयति- शार्दूलविक्रीडितकद विश्वासायतन विपचिदलन देः कृताराधन । मुक्तः पथ्यदन जलाग्निशमन व्याघ्रोरगस्तम्भन ।। श्रेयस्मरनन समृद्धिजनन सौजन्यसजीवन । की केलिवन प्रभावभवन सत्य वत्र पावन ।।२९।। व्याख्या-मो भव्या ! सत्य वचो हित प्रिय बदलिति शेष । कणभूत सत्य वच' विश्वासायतन विश्वासस्य बायतन स्थान पुन कथभूत विपत्तिदलन रिपत्तीना भापदा स्फेटक । पुन कथ- भूत देव सुरै कृताराधन सेवन यस्य तत्त । पुनर्मुके. सिद्ध पथि मार्गे अदन सबल । तया जलाग्निशमन जलाग्न्यो उपशामक । पुन कथाभूत व्याघ्रोरगस्तम्भन व्याघ्राणा सिंहाना सरगाणा सर्पाणा च स्तम्भकारक । पुन श्रयसो मोक्षस्य कल्याणस्य वा सवनन वशी- करण । पुन समृद्धिजनन समृद्धीना सपदा सपादक। पुन कथ- भूत सौजन्यसजीवन सुजनताया सजीवा समुत्पादक । तथा कीर्ते- यशस केलिवा क्रीडावा। पुन कपभूत प्रभावमवन प्रभावस्य महिम्नो गृह । पुन कथभूत पावा पवित्रकारकमित्यर्थ ॥ २१ ॥ -सत्य वचन कैसा है ? विश्वास का घर है विपत्ति को दूर करने वाला है, देवों के द्वारा जिसका भाराधन किया गया है, मुक्ति के लिये पायेय ( कलेवा ) समान है, जल और अग्नि को शात करने वाला है अर्थात् सत्य के प्रताप से नल, तथा अग्नि का मर्थ- मुक्तिधायली भय, या महान् सफट भी शान्त हो जाता है, व्यास (पाप) मई को स्तमन फग्न याला है, ल्यापाशीकरण अर्यात करुयाय पा गृह है समृमि को पैदा करने वाला है, सजनना का प्रोपन है, पोति का मोहान है, प्रभाव का मादर है, सा पवित्र भायपधन निरसर बोलना योग्य है ।। २६॥ पुनरसत्ययपाय दोपणनाह- शिखरिणीय यशो यस्मादम्मीमाति बननहरिव पन । निदान दुसानां यदबनिरहाणां जलमिव ।। नयन स्याच्दायातप व तप सयमकया। फपचिचन्मिल्यावचनमभिवते न मतिमान् ॥३०॥ व्याख्या--स मतिमान बुद्धिमान पुमान कथपिन् पष्टेपि सति समिध्यायपन असत्ययचा न भभि न जापति । तत् कि गरमामिप्याश्चनायश कीतिमीभवति विनश्यति । - स्कमिव । यनवा पाग्न नमिय । यया दावानलात या भरमी. भयति सथा | पुनर्य िमध्यावचा दुयाना निदा फारणे । कपा किमिव भनिरहाणां प्रशाणा जलमिय! यया जल वृक्षाणा कारण तया । पुनयंत्र मिध्यावचने सप सयमकथा पश्चारित्रयो पातापि न । कस्मिन् का इयआवपे सूर्यातप छाया इस । यया भावपे छाया न त्यात तया ।। ३०॥ अर्थ-जिस असत्य वचन से यश इस प्रकार नष्ट हो जाता है जैसे पन की भग्नि (दावाल ) से बन भरम हो जाता है।

सूक्तिमुक्तावली भसत्य वचन वृक्षों के लिये जल के समान दुखों का मुख्य कारण है। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि जल यद्यपि वृक्षों की वृद्धि का कारण -जल सींचने से वृक्ष बदते हैं परतु अधिक जलप्रवाह (जलधारा) से वृक्षों की जडे कट लाती हैं और वृक्ष पृावी पर गिर जाते हैं, उसी प्रकार असत्य भाषण से अनेक दुस सकटों के बादल सिर पर मडराते हैं तथा जिसप्रकार धूप में छाया के सुख का अनुभव नहीं होता उसी प्रकार मूठ वचन बोलने वाले व्यक्ति को तप और सयम के सुम्व का अनुभर स्वप्न में भी नहीं होता मत असत्यवचन के उपरोक्त दोप लानकर असत्य सर्वया त्याज्य है ॥ ३० ॥ वशस्थर द असत्यमप्रत्ययमूलकारणम् कुनासनामम समृद्धिवारणम् । विपन्निदान परवचनोर्जित कृतापराधं कृतिभिर्विवर्जितम् ।।३१।। व्याख्या-इति कारणात् कृतिमि पडितै असत्य कूट विशे- पेण वजित परिहत यतोऽसत्य अप्रत्ययमूलकारण अविश्वासस्य मूल- हेतु 1 पुन कुवासनाया कुमुद्धः पापबुद्धे सद्म गृह। पुन. -समृद्धिवारण समलम्या वारण निराकरण । पुनर्विनिदान -विपदा कष्टाना निदान कारण । पुन' परवचनोजित परेपा वचने विप्रतारणे अर्जितं बलिष्ठ । पुनः कृतापराप कूत' अपराध भग यस्य त् । भवपनासत्यवचन न वक्तव्य ।।३१।। RAN सूक्तिमुक्तावली अर्थ-असत्य वचन अविश्वास का मुरय कारण है अर्थात् असत्यमापी (मठ वचन योलने वाले ) का कोई विश्वास नहीं करता, खोटी वामनाओं (धुरेविचारों) को पैदा करने वाला है समृद्धि को निवारण करने वाला है अर्थात झूठ वचन से धन वैभव सय नष्ट हो जाता है विपत्तिका मूल कारण है पर के ठगपने सहित है अर्थात् मूठ। व्यक्ति सदा दूसरों को ठगता रहता है, असत्यभाषी अनेकों अपराध करता है ऐसा असत्य वचन सत्पुरुषा द्वारा सदा त्यागने योग्य है ॥ ३१॥ अप सत्यप्रभाव दर्शयति- शार्दूलविक्रीडितष्ठद तस्याग्निर्नलमर्णव' स्थलमरिमिर सुरा किंकरा' कान्तार नगर गिरि इमहिर्माल्य मृगारिमंग। पाताल विममस्त्रमुत्पलदल च्याल भृगालो विप पीयप विपम सम च वचन सत्याश्चित वक्ति य. ॥३२॥ व्याया-य' पुमान् सरयाग्नित मत्ययुक पचो पचन पक्ति मते । वस्य पु सोऽग्नियहि मत्यप्रभावानल स्यात् । तथार्णव मगुद्रस्य स्थान । तया भरि शर्मित स्यात् । पुन सुरा देवा किंकरा सेवका मादेशकारिण स्यु । पुन' फातार भरण्य नगर स्यात् । तया गिरि पश्यतो गृ स्यात् । पुनहि सो माश्य सर स्पान् । सयामृगारि सिंहो हरिण व स्यात् । सपा पाताल रसातस पिल विलरूप स्यात् । श्या अन शन उपलदल कमलपप्रसहए y सूक्तिमुक्तावली स्यात् । तथा व्यालो दुष्टगज शृगाल इव स्यात् । पुडिंप हालाहल पीयुष अमृतं स्यात् । विषम सफट या सम सपद्रप स्यात् । सत्य- प्रभावादत मत्यमेव यत्तव्य । भत्र पसुराजा पर्वत नारददृष्टातः ॥३२॥ इत्यन्तप्रक्रम । अर्थ-जो पुरुष सत्यवचन योलता है उसके भग्नि जल रूप में परिणत हो जाती है ममुद्र स्थल रूप हो जाता है, शत्रु मित्र हो जाता है, देव नौकर हो जाते हैं, वन नगर, तया पर्वत महल हो जाता है, सर्प फूलों की माला हो जाता है, सिह हिरण के समान हो जाता है, पाताल विल फे तुल्य हो जाता है, शस्त्र कमल पत्र फे समान हो जाते हैं, भयकर हायी स्याल (गीदड़) समान हो जाता है, विप अमृत रूप तया विषम वस्तु सम रूप में परिणत हो जाती है। यह सत्य वचन का ही प्रभाव है । सत्यके प्रतापसे ससार फो सब दुर्लभ वस्तुयें सुलभता से प्राप्त होती हैं ऐसा जान कर सदा सत्य व्यवहार करना योग्य है ॥ ३२॥ भय अदत्तादानवृत्तमाह-- मालिनीयद तमभिलपति सिद्धिस्त घृणीते समृद्धिस तममिमरति कीर्तिर्मुञ्चते तं भवार्तिः । स्पृहयति सुगतिस्त नेक्षते दुर्गतिस्तं परिहरति विपत यो न गृहात्यदत्तं ॥३३ --

४६
सूक्तिमुपायली
व्यारया~य पुमान् अदत्त अवितीयं प्रस्तागत् परविरा
किंचिद्वस्तु या न गृहाति त पुरुष सिद्धिकिरभिलपति पाच्छति,
पुनस्त समृद्धिविस्वादिसम्पद् वृणोते । तया फीतियश रत ममि-
मावि प्रत्यागन्दनि । मयाति ससारपोडा त मुचते यजति । सया
सुगनिर्देवमनुष्यरूपात स्पृहयति वाम्यति । तथा दुगतिर्नरफतियक
रूपा त पुरुष न पश्यति नेक्षते । रिपद् आपद् व परिहरति स्यजति
स प यो अदत्त न गृहानि ॥ ३३ ॥
-नो
पुरुष गिरा पड़ा भूला, रसा हुआ विना दिया
पदाथ पय नहीं प्रहण करता और न दूसरों को देता है म पुरुष
फी मुक्ति भी अभिलाषा करती है। ऋद्धिया उसफा वरण करती है
पीति सफे पारी भोर फैलती है, मसार की पीडा उमे स्याग देती
है, उत्तमति उन पाती है गयात् यह पुरुष भर कर पत्तम गति
पाता है, दुगति उस आस छठा कर भी नहीं देखती, विपत्तिया उसके
सिर पर मैहरातो नहीं हैं। अत्यागका ऐमा माहारस्य जान कर
प्रमका बाचरण करना कश्याणकारी है। और भी कहते
अय-
भूयोप्याचाहानगुणानाह-
शिसरिणीयर
सदर नादचे कृतकृतकाम किमपि या
गुमणिस्तम्मित्वमति फलहमीर फमले ।
पिचस्मारे अनति रजनीताम्बरमणे
बिनोठ रियर त्रिदिनागिरलक्ष्मीमनति त ॥३४॥

सूक्तिमुक्तावली
व्याख्या-य पुमान् कृत सुकृते पुण्ये अभिलापो येन
ईदृश सन् अदत्त परकीय किमपि वस्तु नादत्ते न गृह्णाति । तस्मिन्
पुसि शुभश्रेणि कल्याणपरम्परा वसति निवास करोति । कस्मिन्
फेव कमले कलहसीव यथा कमले कलहसी वसति । तथा पुनरत-
रमारपुरुपात् विपत्कष्ट दूर व्रजति दूरे याति । करमाकेर अम्बरमणे.
सूर्या रजनीव यथा सूर्याद्रागिरे वनति तथा। पुननिदिवशिवयो'
स्वर्गापवर्गयो ईक्ष्मी श्रीस्त भजते सेवते क केव विनीत विद्यव यथा
विद्या विनीत विनयान्वित पुरुष विद्या मजति मागच्छति
तया।। ३४॥
अर्थ-की है पुण्य की वॉछा जिसने ऐसा जो पुरुष किंचित
मात्र भी रिना दिया हुआ ग्रहण नहीं करता है उसको कमल में
फलहसी के समान कल्याण की परम्परा प्राप्त होती है, सूयसे जैसे
राति दूर भागती है उसी प्रकार उससे विपत्ति दूर भाग जाती है,
जैसे विद्या विनम्र पुरुष को प्राप्त होती है वैसे ही उसे स्वर्ग मोक्ष
को लक्ष्मी प्राप्त होती है ॥ ३४ ॥
व्यतिरेकेणाह-
शार्दू विक्री वितधन्द'
यन्निवर्तितकीर्तिधर्मनिधन सर्वांगसां साधनं
प्रोन्मीलदघवन्धन विरचितक्लिष्टाशयोदोधन ।
दोर्गत्यकनिवन्धन कृतमुगत्याश्लेषसरोधन
प्रोत्सर्पप्रधन जिघृक्षति न तद्धीमानदत्तं धन ॥३॥

सूक्तिमुक्तावली व्यारया-धीमान् विद्वान पुमान् भदत घन परकीय घाट न जिवृक्षति गृहीतु नेच्छति । तत् किं यत् अदत्त निवर्तितकीर्ति धर्म निधन स्यात! नियर्तित कृत पौर्विधर्मयोनिधन विनाश येन सत् । तया मर्यागमा साधन सर्वाणि घ तानि अगासि E सागस स्तेपा सागसा मवापराधाना साधन हेतु' स्यात् । पुन प्रोमो उद्वघय धन पधो लकुटादिताइन पयो रमादिना बधन प्रो •मोलति प्रगटोभवति यधबधनानि यत्र तत् । पुनर्विरचित क्लिष्ट शयोद्योधन विरचित क्लिष्टाशयस्य दुष्टाभिप्रायस्य धयोधन प्रकट येन तत् । पुनदोर्गत्येकनियधन । दोगस्यस्य दारिद्रस्य एफ अद्विती- निधन कारण । पुन फुतसुगरयारलेपसरोधन कृत सुगरारलेपर मालिंगम्य मरोधन निवारण येन तत्। पुन प्रोत्सर्परप्रसरत् प्रधान मरण यस्मात् तत् तथा। ईदृश अदस धीमान् न जिघृक्षति ॥ ३५ अर्थ-विना दिया हुआ धन कैसा होता है-जिसे प्रहर करने से फीति और धर्मका नाश हो जाता है समस्त पापों म कारण है जिससे प्राणी का वध यवन होता है सक्लेश भाश ( भावों) को पैदा करनेवाला है, दुर्गति के पथ का अद्विती कारण है, सुगति के आलिंगन को रोकने घाला है, जो युद्ध करा में सहायक है ऐसे बिना दिये धन को पुद्धिमान पुरुप ग्रहण कर- को कभी भी इच्छा नहीं करते ॥ ३५ ॥ पुनरदचदोपमाह- हरिणीयद परजनमनः पीढाक्रीडा बन चधभावना- मानमवनिव्यापि व्यापल्लता धनमण्डल !

सूक्तिमुक्तायली कुगतिगमने मार्गः स्वर्गापवर्गपुरार्गलं । नियतमनुपादेय स्तेय नृणा हितकाक्षिणा ॥३६॥ व्यारया-नियत निश्चित हितकाक्षिणा हितमिच्छा नृणा पुरुषाणा रतेय चौर्ग अनुपादेय अमाद्य भवति । मदन अमहणीय स्यात् । किंमूत अदत्त, परजनमन पीडाक्रीडावन परे च ते जनारच परजना स्तेपा मनासि चिचानि पा पीडा वाधा तस्या सोडावन रम- णीयोद्यान । पुन वधमाधनाभवन वधस्य हिंसाया मावना चिंतन तस्या गृह । पुन' अनिव्यापिव्यापल्लता धनमहल भवन्या व्यापिनी प्रसरणशीला या व्यापत् आपद् सैव लता पल्ली तस्या घनमहल मेघपटल । पुन कुगतिगमने मार्ग अध्या। पुन स्वर्गापवर्गपुरागला, स्वगापवर्गाषेव देवलोकमोक्षी एय पुर नगर तन अगला परिघ । ईटा स्तेय हितकाक्षिणा नृणा भग्राह्य स्यात् । अत्र रोहणीकया चाच्या ।। ३६॥ इति स्तेय प्रक्रम अर्थ-चोरी सी है- दूसरे मनुष्यों के मनको पीड़ा देना रूपी क्रीडा का वन है अर्थात् भपने तथा दूसरे के लिये मन स ताप का कारण है, पर के मारने की भावना का घर है अर्थात् चोरी करने वाले के दूसरोंको मारने की भावना बनी रहती है, पृथ्वी में व्याप्त आपत्ति रूपी लता के बढ़ाने को मेघों का समूह है अर्थात् चोरी से अनेक प्रकार की आपत्तियों का सामना करना पड़ता है कुगतिक गमन का सीधा मार्ग है, स्वर्ग तथा मोक्ष रूपी नगर की उत्कृष्ट आला है अथात् चोरी करनेवाला स्वर्ग नहीं जा सकता, इस प्रकार की चोरी हित के बालक पुरुषों द्वारा अवश्य ही निश्चित मुगि मुलायटी रूप से त्यागने योग्य है ॥ ३६॥ अप मैथुन गतमामियोपदेशमा- शार्दूलविकीदिनार दयस्तेन जगत्यकीर्तिपटहो गोने मपी हर्चर- रचारित्रस्य बलाम्नलिगुणगणारामस्य दागनल. । सकेत' मकलापदा शिवपुग्मार पाटो । फामास्त्यजति प्रमोदयभिदा शस्त्री परखीं न य ॥३७॥ ध्यास्या- पुमान् कामात कामपोहिन पात्री परनारी नस्याति तेन पुमा जगति विश्ये अकीर्तिपरको दस यादित । मिले गोत्रे स्वकीये वशे मपीयूचफो दत्त । पुनश्चारिणम्य श- पिरतिरूपसर्वावरतिरूपसयमय लातलिदंत । पुन गुणगणा- रामस्य दावानल गुणाना गणा मगहा एष आगमा पन सम्प दायानलो दयाग्निदं । पुनस्तेन सक्लापदा समातकटा सफेतो दस मिलनस्यान कथितं । पुस्तेन शियपुरद्वार मुक्तिनगरीधारे हद कपाटोद शोलरहितस्य मुक्गिमगायोगात् । पुन कि वि. शिष्टा परस्त्री प्रभाया उदय प्रमोदय अषया प्रभारच उदयाच प्रमो. दय सयोमिया शस्त्रप्रभा। पाठावरे तु शोल येन नि विलुप्त- मसिला प्रैलोक्यचिंतामणि । येन निज शील बिलुमम् वेन एतानि यातूनि कृतानि ॥ ३७॥ भय-जिस पुरुप ने तीन लोक में चिन्तामणि परत समान - सूक्तिमुक्तावली अपना समस्त शील ग्बो दिया उसने जगत में अपकीर्ति ( यदनामी) का ढोल बनाया, अपने वश में कालिमा लगाई, चारित को जला- अलि देदी, गुणों के समूहरूप याग में आग लगादी समस्त आप- त्तियों का समेत स्थान कुशील है जिसने शील विगाहा उसने मोक्ष नगर के दरवाने में दृढ़ता से किगड़ लगा दिये । ऐसा जान कर कुशील का त्याग करना योग्य है ।। ३७ ॥ पुन शीलगुणान् यक्ति- शार्दूलविक्रीहितछन्द व्याघ्रव्यालजलानलादिविपदस्तेपा नजति क्षय । कल्याणानि ममुल्लसति विबुधाः सान्निध्यमध्यामते ।। कीर्ति' स्फूर्तिमियर्ति यात्युपचय धर्मः प्रणश्यत्यय स्वनिर्माणसुसानि सनिदयते ये शीलमाविभ्रते ॥३८|| व्याख्या-ये नरा शील ब्रह्मचर्य भाविभ्रते धारयति पा पु सा व्यावव्यालजलानलादिविपद क्षय याति । व्याघ्र प्रसिद्ध व्यालो दुष्टगत सर्पो वा नल पानीय नदीसमुदादि अनलो वद्विरतेषा । विपद कष्टानि ते कृता विपद क्षय प्रति क्षय याति । पुन कल्या- पानि श्रेयासि समुल्लसति वृद्धि प्राप्नुवति । पुनस्तेपा विबुधा देना सानिध्य अध्यासवे साहाय कुर्वति । पुनस्लेपा कीर्ति स्फूतिमियति विस्तार याति । पुन तेपा धर्मो दानादिविधिरुपचय पोप याति । पुनस्पा अघ पाप प्रणश्यत्ति नाश याति। पुनस्तेषा स्वनिर्वाणसुसानि स्वर्गापवर्गसुग्ानि सनिदधते समीपमायाति । ये शील विभ्रते वेषा सूक्तिमुक्तावली है एतानि भवति ॥ ३८ ॥ अर्थ-जो पवित्र शीलवत पालन करता है वह आसानी से स्वर्ग मोक्ष की रचना करता है। उसे स्वर्ग मोक्ष पाना सरल है वह पापरूपी कीचड़ को धोता है, पुण्य का सचय करता है, जगत में उसकी महिमा फैलती है, देवों के समूहको नमस्कार कराता अर्थात उसे देव नमस्कार करते है घोर उपसर्ग को हनता है अर्थात उसके घोर उपसर्ग दूर हो जाते हैं ॥ ३ ॥ मालिनीछद हरति कुलक्लङ्क लु पते पापपक । सुकृतमुपचिनोति श्लाध्यतामातनोति ॥ नमयति सुरवर्ग हति दुर्गोपसर्ग । रचयति शुचिशील स्वर्गमोक्षो सलीलम् ॥३९॥ व्याख्या-पुनश्च शुचि निमल शील ब्रह्मत्रत कुलस्य कलक मलिनता हरति नाशयति । पुन शील पापमेव पक दम लु पते जिनत्ति । पुन शुचि निर्मल शुद्ध शील सुकत पुण्य उपचिनोति बद्ध यति । पुन श्लाघ्यता प्रशस्यता मातनोति विस्तारयति । पुन शील सुरवर्ग नमति देवसमूह नम्रीकरोति । पुन शीत दुर्गोपसर्ग रौद्रोपसर्ग उपद्रन हति । पुन शील पत सलील ययात्याराथा लील यैव हेलामात्रेण स्वर्गमोक्षी रचर्यात ददातीत्यथ ॥ ३६॥ अर्थ-जो असड शीलवत धारण करते हैं, उनके व्याघ्र सर्प अल अग्नि मादि कृत धापत्तिया नष्ट हो जाती है, वे कल्याणसे सुशोभित होते हैं, देव समुख भाकर नम्र होते हैं, उनकी कोति सूक्तिमुक्तावली पुरायमान होती है, धर्म वृद्धि को प्राप्त होता है, पाप नष्ट होता है और स्वर्ग तथा मोक्ष के सुरस को प्राप्त करते हैं ॥ ३ ॥ पुन शीलादिह लोकेऽपि कष्टानि यातीत्याह- शार्दूलविक्रीडितछन्द तोयत्यग्निरपि सजत्यहिरपि व्याघोपि सारगति । ध्यालोपिश्वति पर्वतोऽप्युपलति वेदोऽपि पीयूपति ।। विन्नोऽप्युत्सपति प्रियत्यरिरपि क्रीडातडागत्यपा- नाथोऽपि स्वगृहत्यटव्यपि नृणा शीलप्रभागा'ध्रुव ॥४०॥ व्यारया-नृणा मनुष्याणा ध्रुव निश्चित शीलप्रभावात् भग्निरपि सोयति तोयमिवाचरति जलवत् शीतल स्यात् । तथा अहिरपि सोपि सजति स्रगिवाचरति पुष्पमाला इवाचरति पुन शोलप्रभावातद् व्यानोऽपि सिंहोपि सारगति सारग इव हरिण शाचरति । पुनालोपि दुष्टगनोपि अश्वति अश्व इवाचरति तथा विषम पर्वतोपि उपलति उपल इवाचरति सामाय- पापाण इवाचरति पुन क्ष्वेडोपि विपमपि पीयुपति पीयूष इवाचरति अमृतमिवाचरतीत्यर्थ । विघ्नोप्यतरायोपि आपदपि उत्सवति उत्सव इवाचरति । विघ्नोप्युत्सव एव भवति । तथा भरिरपि शत्रुरपि प्रियति प्रिय इवाचरति। शत्रुरपि प्रिय एव भवति । तथा अपाना- योपि समुद्रोऽपि क्रीडातडागति खेलनसरोवर इवाचरति । अटव्यपि अरण्यमपि स्वगृहति गृहमिवाचरति । नृणा शीलप्रभावादेतानि १ शीलप्रमावानृणाम् इति पाठातरम्।

सूक्तिमुक्तावली वस्तूनि भवति ॥ ४० ॥ सुदर्शन श्रेष्ठि वकचूलि रावणकथा वाच्या इति ब्रह्म प्रक्रम । अर्थ-मनुष्यों के शील के प्रभाव से निश्चय ही अग्नि भी जल रूप में परिणत हो जाती है, सप पुष्पमाला रूप हो जाता है। याय हिरण के भाव को प्राप्त हो जाता है, भयकर हस्ती घोडे के भाव को प्राप्त हो जाता है महान पर्वत भी छोटे पत्थर रूप हो जाता है, विष अमृत में परिणत हो जाता है, विष्कारक पदार्थ चत्सव रूप में परिणमते हैं, शनु भी मित्र सरीसा व्यवहार करने लग जाता है, समुद्र भी क्रीडा करने का तालाब रूप हो जाता है, भयकर भटची ( वनी ) अपने गृह रूप हो जाती है, ऐसा शील का अद्भुत माहात्म्य जान पर उसे दृढता से पालन करना चाहिये, अनेक साटों के आने पर भी सुमेरु पर्वत तुल्य अडिग रहना चाहिये इसी से मनुष्य जम की शोभा है। शोलनत के घारत कहा है- अकरयाने भन्छील, शून्याकारप्रतादिकम् । असल्याने पुनर्नष्टे, सर्व शून्यत्रताविकम् ॥ अर्थ-शोलवत १,३४,५ आदि भटों के समान है, और अहिंसा, सत्य आदि प्रत..... शून्यों के समान हैं । १, २३, ४, ५ आदि अकों के अभाव शू यों का मूल्य नहीं है उसी प्रकार शीलरत पालन पूर्वक ही व्रतों का परिपालन सफलता का सूचक है। शीलवत रहित अहिंसादि का पालन शिफल है। प्रहाचर्य (शील) का माहात्म्य देखिये- ०.००० सूक्तिमुक्तावली शुचि भूमिगत तोय, शुचिर्नारी पतित्रता । शुचिर्मपरो गजा, ब्रह्मचारी सदा शुचि ॥ अर्थ-भूमिगत कूप का जल शुद्ध होता है, पतिघ्रता स्त्री पवित होती है, धर्मात्मा राना पवित्र माना गया है और ब्रह्मचारी पुरुष सदा पवित्र होता है ॥४०॥ अथ परिप्रहदोपानाह- शार्दूलविक्रीडितछन्द कालुष्य जनयन् जडस्य रचयन्धर्मद्रुमोन्मूलन क्लिरनन्नीतिकृपालमाकमलिनी लोभाम्बुधिं वर्द्धयन् । मर्यादातटमुद्रुजञ्छुममनोहसप्रपाम दिशन् किन्न क्लेशकरः परिग्रहनदीपूरः प्रवृद्धि गतः ॥४१॥ व्यारया-परिग्रहो धनधायक्षेत्रगृहरूप्यसुवर्णकुष्यद्विपद चतु पदाना सग्रहोमूर्छा स एव नदीपूर सरिरप्रवाह' प्रवृद्धिं गत उपचय प्राप्त सन् । किं क्लेशकर कष्टदायी न स्यात् अपितु स्यादेव । किं कुर्वन् जडत्य परिप्रहसनह फत्तुं मूर्खजनस्य फालुप्य क्लिष्टाध्यवसायत्व जनयन् उत्पादयन् अन्योपि नदीपूरोपि प्रवृद्ध सन् जलस्य पानीयस्य कालुप्य अविलव जनयति । डलयोरैक्य जहस्य जलस्य । पुन कि फुर्वन् धर्म एव द्रुमो वृक्ष तस्योन्मूलन उत्पाटनं रचयन् कुर्वन् अन्योपि नदीपूर प्रवृद्धोवृक्षाणा उत्पादन । पुन किं कुषन् नीतिकृपाक्षमामालनी नीतिर्याय कृपा करोति सूक्तिमुक्तावली दया क्षमा छाति सा एर कमलिय वा क्लिश्यन् पौडपन भयोपि नदीप फलिनी पीडयति । पुन किं कुर्वन् लोभायुधि पद्धयन् लोम एन अम्बुधि समुद्रात वद्धयन पृद्धि नयन् । "हालाहो तदा लोहो" इति । पुन किं पुरन धर्मस्य मर्यादा एव त घरविधिरूप सट उद्रुजन् पीडयन मजयन् । अ योपि नदीपूर प्रवृद्ध सन् तट पातयति । पुन किं कुर्वम् शुभमनोहमप्रयास दिशा। शुभ धर्मध्यान सहित यमनातदेव हसस्तस्य प्रवास परदेशगमन दिशन मादिशन । भयोपि नदीपूरो हसान् उडापयति (उल्लापयति ) ईदृशो मूर्यो परिग्रह क्लेशकर स्यात् ।। ४१ ॥ अथ-इस पद्यमें परिप्रह का वर्णन किया है कि परिप्रह कैसा भनर्थकारक है-हदय की कलुषत फो पैदा करता हुआ. भमानता को रचता हुआ, धर्म रूपी घृक्ष को बाहना हुआ, नीति दया क्षमा रूपी कमलिनी को क्लेश पहुँचाता हुआ, लोमरूपी समुद्र को पदाता हुआ, मर्यादा रूप तट को उखाड़ता हुआ, गुम मन रूप हस को परदेश गमन पराता हुमा परिग्रह रूपी नदी का प्रयाह वृद्धि को प्राप्त हुआ क्या क्या अनथ नहीं करता कि तु सारे हो अनयों का मूल कारण है । इसप्रकार परिग्रह को बुरा मान उसका परिमाण फरना योग्य है। अर्थात लोभ कपाय को रोकने के लिये परिग्रह की मर्यादा वाधना चाहिये। भूयोपि परिप्रहदोपानाह- मालिनीचद कलहकलमविन्ध्य' क्रोधगृधश्मशान । व्यसनमुजगरन्ध्र द्वैपदस्युप्रदोपः ॥

५७ सूक्तिमुक्तावली सुकृतवनदनाग्निर्दिवाम्भोदनायु । नयनलिनतुपारोऽत्यर्थमर्थानुराग [४॥ व्यारया-अत्यर्थ अर्थानुराग परिप्रहो परिमूळ राग इंशोस्ति । क्यभूत फलह एव फलभो यालहस्ती तस्य विंध्यो विध्याचल यथा विध्याचले कलम क्रीडत्ति तथा अत्या अर्थानुरागे द्रव्यरागे फलहो भवति । तथा कोधगृध्ररमशान क्रोध एव गृध्र पक्षिविशेषस्तस्य श्मशान प्रेनवन, यथा गृध्र श्मशाने रमते तथा क्रोध । पुन व्यसनमुजगर व्यसनमेव कष्टमेघ भुजग सर्परतस्य दिल । पुनद्वैपदरयुप्रदोष द्वेष एव दस्युश्चौरस्तस्य प्रदोष सध्यासमय । प्रदोपे चौराणा घल भवति तथा सुकृतवनदयाग्नि सुरुत एव पुण्यमेव वन तस्य दवाग्नि दावानल | पुनर्दिवाभोदवायु , मार्दव मृदुत्व कोमलल्य तदेव अमोदो मेघस्तत्र वायु । पुननयनलिनतुपार - नयो न्याय एव नलिन कमल तत्र तुपारो हिम । अत्यर्थ द्रव्यानुरागो लोमो ईदशोस्ति । अतो न कर्तव्य ॥ ४२ ॥ अर्थ-पदार्थों में अतिशय अनुराग मत्पुरुषों द्वारा त्यागने योग्य है । क्यों कि अधिक अनुराग ही परिग्रह है, अधिक ममता से निकृष्ट कर्मों का बध होता है, उसी का वणन किया जाता है - फलह (लड़ाई ) रूप जो हाथी का बच्चा उसके निवास के लिये विध्याचल पर्वत के तुल्य है अर्थात् परिग्रह ही फलह का कारण है, इसी के कारण भाई भाई का शत्रु बन जाता है, क्रोध रूपी गृद्ध पक्षी के निवास का स्थान-श्मशान के समान है अर्थात् परिग्रह के कारण ही क्रोध सत्पन होता है। सात व्यसन रूपी सर्प के बिल के समान हैं, द्वेष रूप चोर को रात्रि के समान - - ६० सूक्तिमुक्तारली धारमा तो सम्पूर्ण विभव को छोड़ फर परभव को चला जाता है तो फिर मैं व्यर्थ ही अनेक घोर पापों को क्यों करता हूँ ! ऐसा कभी भी विचार नहीं करता है। मापार्य --अगर ससार का समस्त धन भी इसे प्राप्त हो जाय तो भी कभी यह मोही प्राणी सतोप धारण नहीं करता। तथा यह जगत का भय कभी साथ भी नहीं जाता सब यहीं पर पड़ा रह जाता है तो मैं क्यों पापोपाजन करू ? जिससे नरक तिर्यञ्च भादि फी भयंकर घोर वेदनाओं का सामना करना पड़े ऐसा कभी विचार विमर्श नहीं करता ॥ ४४ ॥ तत्र नदराजाकथा। अथ क्रोधनयार्य-मुपदेशमाह- शार्दूलविक्रीडितदाद यो मित्र मधुनो विकारकरणे सराससपादने । सर्पस्य प्रतिविम्बमङ्गदहने, सप्तार्चिप' मोदर ॥ चैतन्यस्य निपूदने पितरो. सनमचारी चिर । स क्रोध कुशलामिलापकुशल निर्मूलमुन्मूल्पता ॥४५॥ व्याख्या-आत्मन श्रेयोवालाचतुरैनर स क्रोध कोपो निमूल समूल यथा स्यात् तथा उन्मल्यता उच्छिद्यता स फ य क्रोध विकारफरणे चित्वादिविकारविधाने मधुनो मद्यस्य मित्र सुहृत् । पुनयं क्रोध सत्राससपादने भयजनने सपस्य प्रतिधिन्छ सर्पसदृश । पुनर्य ग्रोध अगदहने शरीरप्रभालने सप्ताजि १ सूक्तिमुक्तावली ६१ सोदरोऽग्ने/ता । पुन य क्रोध चैतनस्य ज्ञानस्य निपूदने विना- सहमोगीशने विषतरो विषवृक्षस्य चिरमतिशयेन सब्रह्मचारी सहपाठी ॥ ४५ ॥ अर्थ-जो क्रोध चित्त को विकृत करने में मद्य का मित्र है अर्थान् शरान सा विकारी है [ोध के कारण विवेक नष्ट हो जाता है 1 भय के उत्पन्न करने में सर्प तुल्य है, शरीर को जलाने में अग्नि के समान है अर्थात् क्रोध के आवेश में आकर प्राणी अग्नि समान जाज्वल्यमान होने लगता है, चेतन (आत्मा) के जीवन फो नष्ट करने में विपक्ष का चिरकाल साथी है अर्थात् विपक्ष के समान है । आत्मा का हित चाहने वाले चतुर पुरुषों द्वारा वह क्रोध जइसे उखाड दिया जाना चाहिये। भाषाय-आत्मकल्याण के इच्छुक पुरुषों को चाहिये कि ऐसा क्रोध कभी न करें जिससे हेयोपादेय रहित बुद्धि हो जाय भत मोघ का मर्वथा त्याग करना ही श्रेयस्कर है ॥ ४५ ॥ हरिणीछ द फलितश्रेय.श्रेणीप्रसूनपरम्परः। प्रशमपयसा सिक्तो मुक्तिं तपश्चरणद्र म' । यदि पुनरसौ प्रत्यासचि प्रकोपहविर्भुजो। भनति लमते भस्मीमार तदा विफलोदयः ॥४६।। व्याख्या-सपश्चारित्ररूपएव द्रुमो वृक्ष मुक्ति मोक्ष फलति निष्पादयति । कयभूत कलितधेय श्रेणीप्रसूनपरम्पर कलिता ६२ सूक्तिमुक्तारली उत्पादिता श्रेयसा पुण्याना कल्याणाना वा श्रेणि राजिरेव प्रस्- नाना पुप्पाणा परम्परा पतिर्येन स । पुन क्यभूत प्रशम एव उपशम एव पयो जल तेन सिक्त सेफ प्रापित । यदि पुन पर तु असौ तपश्चरणद्रुम प्रकोपहविभुज प्रोधवढे प्रत्यास िसामीप्य मजति भाशयति तदा भस्मीभाव भामरूपता लभते प्राप्नोति । कथभूत विफलोदय विगत फलस्योदयो यस्य फलोदयरहित ॥४६॥ अथ-शात परिणाम रूपी मल से मींचा हुआ तपश्चर- परूपी वृक्ष अनेक पुण्य समूह रूप पुष्पों की पत्तियों से सुशोभित होता हुआ मोक्ष रूपी फल को फलना है ( मोक्षफल को देता है) यदि वह तप रूपी वृक्ष मोध रूपी अग्नि की निकटता को प्राप्त हो तो फिर विना फल दिये ही दग्ध हो जाता है। मावाथ -मुक्तिरूपी फल को देनेवाला तप रूपी पृक्ष है। अगर मोघ-अग्नि का सेवन हो जाय तो यह तपवृक्ष भरम हो जाय अत शोध का त्याग कर देना हो कल्याणकारी है॥४६॥ पुन क्रोधदोपानाह- शार्दूलविकीहितछद सताप तनुते भिनति विनय सौहार्दमुत्मादय- त्युद्वेग जनयत्यवद्यवचन मते विधचे कलिं।। कीर्ति कन्तति दुर्मति पितरति, व्याहति पुण्योदय । दत्य कुगति म हातमुचितो, रोप सदोष' सतां ॥४७॥ व्याग्व्या-स रोप बोध सता सत्पुरुषाया हातु व्यक्त -

सूक्तिमुक्तावली
६३
रचितो योग्योऽस्ति । कथभूत रोप सदोष अनेकदो सहित ।
स क यो रोप मताप चित्तोद्वेग तनुते विस्तारयति । पुन यो रोपो
विनय विनयगुण मिनत्ति विदारयत्ति विनाशयति । पुनर्यो रोप
सौहाद्रं मिनभाव उत्सादयति विनाशयति । पुनर्य उद्वेग उच्चा-
टन जनयति । पुनर्य अपचन अमत्यवचन सूने उत्पादयति ।
पुनयं कलिं कलह विधत्ते करोति । पुनर्योरोप कीर्ति यश कीर्ति
फनति छिनत्ति । पुनर्योदुर्मतिं दुम्युद्धि वितरति-दते । पुनर्य पुण्यो-
दय धर्मस्य उदय व्याहति विनाशयति । पुनर्य कुगति नरकतिर्य-
गति दत्ते ददाति । स रोप सता हातुमुचित ॥ ४ ॥
1
अर्थ-जो क्रोध सन्ताप को बदाता है विनय को नष्ट करता
है, मित्रता को उसाड़ देता है अर्थात् जिससे मित्रता नष्ट हो जाती
है, उद्वेग को उत्पन्न करता है, निन्द्य वचन को नत्पन्न करता है,
कलह करता है, कीर्ति को काट डालता है अर्थात नष्ट कर देता है,
कुशुद्धि पैदा करता है,पुण्य के भदय को नष्ट कर देता है फुगति को देता
है अर्यात् मर कर प्राणी कुगति में जाता है ऐसा भनेक दोपोंको उत्पन्न
करने वाला यह क्रोध मज्जन पुरुषों द्वारा त्याग करने योग्य है ॥४॥
शार्दूलविक्रीडितछन्द
यो धर्म दहति द्रुम दर झोन्मथ्नाति नीति लता ।
दतीवेन्दुकला विमुतुद इस क्लिश्नाति कीति नृणा ॥
स्वार्थ वायुरिवाम्बुदं विघटयत्युल्लामयत्यापदं ।
तृष्णा धर्म शोचित' कृतकृपालोप.स कोप' कथ ॥४८॥

सूक्तिमुक्तावली
व्यारया -यो धम दहति स कोप मोघ क्थ केनोपायेनोचित
योग्य स्यात् अपि तु न क्यमप्युचित । स क य कोपो धर्म श्रेयो
दहति भाभीकरोति । फ मिमिच दको दावानलो द्रुममिय यया दावा
नलो द्रुमक्ष दहति । पुनर्यो नीतियाय उ मध्नाति उ मूलयति फ
फामिष ६वी हस्ती लतामिय यया हस्ती लतामु मूलयति । नृणा
मनुष्याणा कीति क्लिश्नातिपहियति गायति । फ फामिव विधु तुदो
राहुरिंदुक्ला चद्रलेखामिव । पुनर्यो रोष स्वार्थ विघटयति । स्फेट
पति क पमिव वायुरघुदमिय यथा वायुमैघ विघटयति पुनर्य मापद
फष्ट उल्लासयति विस्तारयति क कामिय पम्म प्रीष्म सुप्रमिय।
यथा तपरतृष्णा तृषा पद्धयति । पुन स्थभूत कोप पृठकपालरोप
कृत विहित कृपाया दयाया लोपो विनाशो येन स ॥४॥
इति शोधप्राम
अर्थ-जो कोष वृक्ष को दावानल अग्नि के समान मनुष्यों
फे धर्म को जला देता है, लता को हाथी के समान नीति को उखाड़
देता है, चन्द्रमा की क्ला को राहु के समान कीर्ति को मलिन कर
देता है मेघ को पवन के समान साथ को नष्ट कर देता है, प्यास को
धूप के समान आपत्तियों को पढ़ाता है और जिस क्रोध के कारण
दयाभाव का सर्वथा लोप हो जाता है। ऐसा यह लोध करना किस
प्रकार उचित है अर्थात् नहीं करना चाहिये। क्योंकि कोध महान
अनर्थ करता है । इसका त्याग करना ही उचित है ॥ ४॥

३५ 4 । सूक्तिमुक्तारली अथ मानस्य दोषानाह- मादाक्रान्ता छन्द यस्मादाविर्भवति विततिर्दुस्तरापन्नदीना, यस्मिन् शिष्टाभिरुचितगुणग्रामनामापि नास्ति । यश्च व्याप्त वहति ववधी धृम्यया क्रोधदार, त मानाद्रि परिहर दुरारोहमोचित्यवृत्तेः ॥४९॥ व्याख्या-भो भव्यप्राणिन् । औचित्यवृत्ते उचिताचार करणान तद्योग्यविनयविधानात त मानादि मान बहकार एवं भद्रिस्त अहकारपर्वत परिहर त्यन मुन्च । त फ यस्मात् मानाने दुरतरा तरीतु अशक्या आप नदीना कष्टारूपनदीना वितति श्रेणि- राविभवति प्रकटीभवति । अन्यस्मादप्यद्रे दीना वितति प्रादु- भयति । यथा यस्मिन् मानाद्री शिष्टाभि रुचितगुणग्रामनामापि नास्ति । शिष्टाना उत्तमाना अभिरुचिता प्रीतिदायिनो ये गुण ज्ञानादय औदार्यादयो या तेषा प्राम' समूहस्तस्य नामापि नास्ति गुणाना ल्ष लेशोपि न। पुनर्यो मानाद्रि क्रोधदावानल घाति धने। फयभूत कोधदाय वघधी धूम्यया व्याप्त । हिंसाबुद्धिधूमसमूहेनालीढं । पुन फयंभूत दुरारोह भारोदुमशक्य अथवा औचित्यवृत्ते योग्यताया दुरारोह ॥४॥ अर्थ-जिस (मानकपाय) से अहकार रूपी पर्वच से कठिनता से पार करने योग्य आपचिरूपी नदियों का समूह निकलता है भयात् मान के कारण हो भनेक आपतिया सिर पर आती है, जिस मानरूपी पर्वत में सज्जन पुरुषों द्वारा प्रहण करने योग्य गुण १ रूपी. Approori - सूक्तिमुक्तावली ग्राम का नाम भी नहीं है अर्थात् अहकार के कारण मनुष्य के सय गुण नष्ट हो जाते हैं, और जो मान हिंसा युद्धिरूपी धूम से चारों तरफ फैल कर क्रोधरूपी अग्नि को धारण करता है । (मान के कारण जीनों की हिसक बुद्धि तथा क्रोधाग्नि जाज्वल्यमान हो जाती है) ऐसे उस कठिनता से पार करने योग्य मानरूपी पर्वत को उचित पार्यों से, सदाचरण से त्याग देना चाहिये ॥४॥ भूयोमानदोषानाह - शिखरिणी छद शमालान भञ्जन्विमलमतिनाडी विघटयन् , किरन्दुक्पिाशूल्करमगणपन्नागमणिम् । भ्रमन्ना स्वैर विनययनपीथीं विदलयन् । जन' कि नानथं जनयति मदांधो द्विप इस ॥५०॥ व्याख्या-मदा घो जन फिमनथ न जनयति मदेन अह- कारेण अघो गतेक्षणोजन क क अनर्थ न जनयति नोत्पादयति अपि तु सर्व अनणे जनयति क इव द्विप इव मत्तगज इव यथा मदा- घो द्विपो अनय उपद्रव जनयति । किं कुर्वन् शमालान भजन् शम एव उपशम एव आलान गजय चनस्तम्भ मजन् उमूलयन् । पुन किं कुवन् तिमलमतिनाही निर्मल बुद्धि एव नादी बधनरज्जुता विघटयन् नोटयन् । पुन किं कुवन् दुर्वापाशूकर दुवागेर दुवचनमेव पाशु धूलिस्तस्या उत्कर समूह किरन् विक्षपन् । पुन आगम एव सिद्धात एव सृणि अकुशस्त अवगणयन् अविचारयन् । पुनर्विनयनयवीयीं सूक्तिमुक्तावली विनय एव नयवीयो न्यायोणिस्ता विदलयन् विश्वसयन् अन्योपि मदाधो हस्ती एतानि वस्तूनि क्रोति ॥ ५० ॥ अर्थ-मदान्ध पुरुष की चेष्टा का वर्णन करते हुये आचार्य कहते हैं कि-मान कपाय कैसी है-समता भाव रूपी बन्धन के सम्भे को उसाड़ता हुआ, निर्मल बुद्धिरूपी साकल को तोड़ता हुआ, दुर्वचन रूपी धूल के समूह को बखेरता हुआ, आगमरूपी अकुश को नहीं गिनता हुआ पृथ्वीवल में इच्छानुसार भ्रमण करता हुमा, पिनय रूपी याग की गली को दलमलीन करता (कुचलता) हुआ अहकार से अधा पुरुष मदोन्मत्त हाथी के समान क्या क्या अनर्य नहीं करता १ किन्तु सभी प्रकार के अनर्थ कर डालता है अत मान कपाय को त्याग कर मार्दव धर्म धारण करना योग्य है ॥ ५० ॥ पुनराह- शार्दूलविक्रीडितकद औचित्याचरण विलु पति पयोगाह नमस्तानिन । प्रध्वस निनय नपत्यहिरिव प्राणस्पृशां जीवितम् ।। कीति कैरविणी मतगज इस प्रोन्मूलयत्यंजसा । मानो नीच इवोपकारनिकर हन्ति त्रिवर्ग नृणा ।।५।। व्यारया-मानोऽहकारो नृणा पुसा निवर्ग धर्मार्थकाम- रूप हति नाशयति क कमिव नीचोमनुष्य' उपकारनिकरमिव यया नीच उपकारसमूह हवि तथा 1 पुन मान औचित्याचरण योग्याचार विलम्पति स्फेटयति क कमिव नभस्यान् यायु पयोवाहमिघ । पुन-

६८
सूक्तिमुक्तानली
नि प्राणस्पृशा प्राणिना विनय अभ्युत्थानादिक प्रध्वस क्षर्य
नयति क कमिव अहि सर्पो जीवितमिव यथा सो जीवित क्षय
नयति । पुनरजसा वेगेन कीति प्रो मूलयति क कामिव मत्तगनो
हस्ती कैरविणी कमलिनी प्रो मूलयति तद्वन् ॥ १ ॥
अर्थ-तीन पपन जैसे बादलों को नष्ट कर देता है अर्थात्
वायु
के वेग से जिस प्रकार सब बादल पिघट जाते हैं उसी प्रकार
मान कपाय के कारण मनुष्य का उचित आचार विचार नष्ट हो जाता
है, जीवों के जीवन को जैसे साप नष्ट कर देता है वैसे ही मान
विनयगुण को नष्ट कर देता है ( अहकारी के विनय भाव कदापि
नहीं होता ) कमलिनी को जैसे हाथी उसाद डालता है वैसे कीर्ति
को शीघ्र ही नष्ट कर देता है - ~मान के कारण कीर्ति नष्ट हो जाती
है और उपकारी के उपकार को जैम नीच पुरुप नष्ट कर देता है।
अर्थात् किये हुये उपकार को भूलकर नीच मनुष्य उपकार करने
वाले का अहित कर डालता है उसी प्रसार मान पाय मनुष्यों के
धर्म, अर्थ, काम इन तीनों पदार्थो (पुरुषार्थों ) का नाश कर देता
है॥५१॥
भूयश्वाह-
वस ततिलकाछद
मुष्णाति यः कृतसमस्तसमीहितार्थ ।
सजीवन विनयजीरिवमङ्गमाजा ॥
जात्यादिमानविपज विषम रिकार |
त मार्दवामृतरसेन नयस्त्र शातिम् ॥५२॥

सूक्तिमुक्तावली व्याख्या-यो मानोऽङ्गभाना प्राणिना विनयनीवित विनय- गुणरूपजीवित मुष्णाति उच्छिति । कथभूत विनयजीवित कृतसमस्त- समीहितार्थ सजीवन कृत समन्ताना समीहिताना वाछितार्याना सनीवन येन तन् त नात्यादिमानविपज जातिलाभकुलेश्वर्यबलरूप- तपश्रुताना मानोऽहकार एव विष तस्मात्समुद्भव उत्पन विषम पोर विकार मार्दवामृतरसेन मृदुतासुधारमेन शातिं उपशम नयस्व प्रापय ॥ ५२ ॥ मानत्यागे बाहुबलि दृष्टात इति मानप्रक्रम । अर्थ-जो मान प्राणियों के सम्पूर्ण वाब्छितार्यरूप तया सनीवन औषधि स्वरूप विनय को चुरा लेता है अर्थात् मान (अहकार) के सद्भाव में पूज्य पुरुषों के प्रति आदर सत्कार की भाग्ना रूप विनय गुण सर्मथा नष्ट हो जाता है अत उस जात्यादि माठ प्रकार ( जातिमद, फुलमद, बलमद, ऋद्धिमद, तपमद, शरीर- मद ज्ञानमद, ऐश्वर्यमद ) के मद रूप विप से उत्पन्न हुये विपम विकार अर्थात् रोग को मार्दन धर्म (कोमल परिणाम ) रूप अमृत पान से शात करो। मान रूपी रोग को मार्दवामृत से शान्त करना । चाहिये ।। ५२॥ अथ मायात्यागमाह- मालिनीछन्द कुशलजननबन्ध्या सत्यसूर्यास्तसन्ध्यां । कुगतियुवतिमाला मोहमातगशालाम् ।।

सूक्तिमुक्तारली शमकमलहिमानी दुर्यशोराजधानी । व्यसनरातसहाया दूरतो मुश्च मायाम् ।।५।। व्याण्या-मो भव्यजन ! माया कपट दूरतो मुश्च त्यत । फयभूता माया फुगलस्य ओमस्य जनने उत्पादने वध्या यध्यात्रीरूपा पुन सत्यमेव सूर्यस्तस्यास्तमनाय सध्या ता । पुन क्थभूता फुगतिरेष युगतिस्तस्या घरणमाला ता। पुन मोह एप मातगरतस्यशाला वधनस्यानम् ता। पुन किंभूता शम एव उपशम एव फ्मलानि तेपा हिमानी हिमसहति ता । पुन किंभूता दुर्यश अपकीर्ति तस्य राजधानी निवासनगरी ता। पुन विभूता व्यसनाना कष्टाना शतानि सहाया सा वा इटशी माया दूरतो मुख्य स्थज॥ ५३॥ यस्या अर्थ-इस पद्य में मायाचारी के त्याग का उपदेश है यह माया कैसी है-कल्याण के उत्पन करने में वध्या स्त्री के समान है. (मायावी व्यक्ति के कभी भी कल्याण को मारना उत्पन्न नहीं हो सकती), सत्य वचन रूपी सूर्य के भात होने के लिये सध्या के समान है, मोह रूपीहाथी के लिये शाला के समान है, समता भाष रूपी कमलों को नाश करने के लिये तुपार [ पाला] समान है, अपकीर्तिकी रानधानी है, सैंकड़ों व्यसनों को उत्पन करने में सहायक है ऐसी माया फपाय को दूर ही से त्याग देना चाहिये ।। ५३॥

सूक्मुित्तारली ७१ पुनराह- उपेन्दवनाछन्द निधाय माया निविधैरुपायैः । परस्य ये वचनमाचरन्ति ॥ ते वञ्चयन्ति त्रिदिवापनर्ग- सुसान्महामोहमसा स्वमेव ॥५४॥ व्याख्या-ये तना विनिधर्नानाप्रकाररुपाय माया कपट विधाय कृत्वा परस्य अन्यननस्य वचन भाचरति कुर्गन्ति ते जना महामोहसखा महदज्ञानयुक्ता सत' त्रिदिपापवर्गसुम्बान देवलोक- मोक्षसुसान् स्वमेवात्मानमेव वश्चति विप्रतारयति त्याज. यति॥५४॥ मर्य-जो लोग अनेक प्रकार से मायाचारी (जालसाजी) करके दूमरे लोगों को ठगते हैं, अन्यथा प्रतिपादन करके मिथ्या- मार्ग में लगात हैं वे महामोह के मित्र (मोह कर्म के घश होकर) वर्ग और मोक्ष के सुस से अपने आपको पचित करते हैं । भावार्य-निष्कपट परिणाम सरीसी अन्य सस्यता ससार । में प्रशसा के योग्य नहीं है और मायाचारी जैसी अन्य अमरयता निदा के योग्य नहीं है। कपटी पुरुष के नतों का पालन करना, कठिन तपश्चर्या आदि करना सर्व निष्फल है। जो मायावी दूसरों अपने वाग्जाल में फंसा फर हर्प मानते हैं वे स्वय मायापारी परिणामों से निकृष्ट पधर अपने आत्माको नर्क गर्त में पतन कराते हैं। इसलिए मायाचार रूप परिणामों के त्यागे विना इस लोक में,

७२
सूचिमुक्तावली
परलोक में जीवोंको सुख शाति प्राप्त नहीं हो सकती ॥ ५४ ॥
पुनर्मायादोपमाह-
घशस्यद
मायामविनासनिलासमन्दिर ।
दुराशयो य कुरुते धनाशया ॥
सोऽनर्थसाथ न पतन्तमीक्षते ।
यथा विडालो लगुट पयः पिवन् ||५५॥
-यो दुराशयो दुष्टपित्तो जनो धनाशया द्रव्यस्य
पाच्या लोभेन माया कपट कुरुते विदधाति म जन आस्मनोऽनर्थ
सार्ण क्टसमूह पत त आगछ त नेक्षते नालोक्ते । क्थ यथा विद्यालो
मार्जार पयो दुग्ध पियन् सन् लकुट दण्डप्रहार नेक्षते नालोकते ।
फथभूता माया अविश्वासस्य अप्रतीते विलास दर क्रीडागृह मदिर-
शब्दस्य अनहल्लिगत्वात् ।। ५५ ।।
ब्यारया-
अर्य-जो दुष्ट अभिप्राय [ परिणाम ] पाला पुरुष धन की
इच्छा से अविश्वास के क्रोहा स्यान रूपी मायाचारी को फरता
पह अपने उपर आई विपचियों को नहीं देखता है। जिस प्रकार
दूध को पीवा हुआ बिलाव उपर से अपने ऊपर पड़ती हुई लकई
फो नहीं देखता है । खेद है कि मायाचारी दूसरों का भनिट सोचत
है परतु उस मायाचारी से स्वय भाा अहित-अनिष्ट हो जाता
इससे वह जरा मी नहीं डरता है ॥५॥

सूक्तिमुक्तावली पुनराह- वसन्ततिलफायद मुग्धप्रतारणपरायणमुज्जहीते । यपाटव कपटलपटचिचचे ।। जीयत्युपप्लवमवश्यमिहाप्यकृत्वा । नापध्यभोजनमिनामयमायती तत् ।।६।। व्याग्या-कपटे मायाया लपटा पाछायुक्ता चित्तवृत्तिमनो- व्यापारो यस्य म तस्य पुरुषस्य यत्पाटव चातुर्य उनिहीं। उल्लसति तत्पाटव' अवश्य निश्चयेन मायती आगामिकाले उपप्लव उपद्रग यत्वा अविधाय न जीर्यति न परिणाम याति । किंतु वस्य विपाको भवत्येव किमिव भपथ्यभोजन आमयमिव यया अपथ्य भोजन बेमन आमय रोग अकृत्वा आयती न जीर्यति न याति । कथभूत पाटव मुग्याना मूर्खाणा प्रतारणे नचने परायण तत्पर ।। ५६ ।। अत्र मल्लिनाथनीव महारळ दृष्टात भाषाढभूत दृष्टातश्च । इति मायाप्रक्रम अर्थ-सदा कपट करने में तत्पर चिच रखने वाले पुरुप को भोले पुरुषों को ठगने में जो चतुरता उल्लासमान होती है वह कपट चतुरता अवश्य ही फल देने के काल में जैसे अपध्य भोजन रोग उत्पन किये विना नहीं रहता-उसी तरह कपट प्रवृत्तिमी लोक में बिना फुछ उपद्रव कष्ट दिए बिना नहीं रहती है। तात्पर्य यह है कि 'से अपध्य भोजन करने से रोग अवश्य हो उत्सन होता है उसी प्रकार कपटो पुरुष दूसरों को ठग कर भले ही कुछ काल तक g सूक्तिमुक्तापली आन द मनावे, हपित हो पर अतमें मायाचारी का फल इस लोक में तो उन्हें भोगना ही पड़ता है और परलोक में भी मर कर दुर्गति के दु स उन्हें भोगने पड़ते हैं। यह एक अटल सिद्धात है कि "यत्करोति तदवश्यमेव मुक्के" जो जीव जैसा फर्मोपाजन करता है उसका अवश्य हो उसे फल भोगना पड़ता है।। ५६ ।। अथ लोभत्यागोपदेशमाह- शार्दूलविक्रीडितछद यदुर्गामटवीमटन्ति विक्ट कामन्ति देशान्तर । गाहन्ते गहन समुद्रमतनुक्लेशां कृर्षि पूर्वते ।। सेगन्ते कृपण पति गजघटासघट्टदु सचरं । सर्पन्ति प्रधन धनान्धितपियस्तल्लोभविस्फूर्जित ॥५७|| व्यारया- धनेन वित्तेन अधिता अधप्राया कृता धीवुद्धिर्यपा ते ईदृशा पुरुषा यत् दुर्गा विषमा अटवीमरण्य अटति भ्राम्यति । पुनयत् विकट विस्तीण देशातर कामति भ्रमति । पुनयत् गहन दुरवगाह समुद्र गाह ते उल्लघयति । पुनयन अतनुफ्लेशा बहुक्ष्ट साध्या कृषिकर्षण क्षेत्रादि कुळते विधरो। पुनर्यत् कृपण अदातार पति स्वामिन सेगते । पुनर्यन रानघटाना हस्तिसमूहाना सघट्टनेन दुसचर गतुमशक्य प्रयन युद्ध प्रतिसपति गच्छति तत् सब लोभ- स्य विस्फूर्जितं चेष्टित जानीहि । लोभवशादेतानि वस्तूनि कुर्वात मत' कारणात् लोमस्त्याज्य एव ।। ५७ ॥

सूक्तिमुक्तारली अर्थ-धनके कारण से अध हुई बुद्धि होने के कारण से ही पुरुष गहन अटयों में भ्रमण करते हैं। विदेश में गमन करते हैं, गहरे समुद्र का अवगाहन करते हैं, अधिक क्लेश वाली खेती फजूस स्वामी की सेवा करते हैं और भनेक हाथियों के सघट्ट होने से चलना है कठिन जहा पर ऐसे युद्ध में जाते हैं यह लोम का ही तो माहात्म्य है। लोम के वशीभूत होकर मनुष्य च्या २ पाप नहीं करता १ कितु सभी पाप फर बैठता है क्योंकि लाभ हो समस्त पापों का राजा है अत लोभ का त्याग करना ही उचित है ।। ५७ ॥ पुनराह- शार्दूलविक्रीडितछद मूल मोहविपद्रुमस्य सुकृताम्भोराशिकुम्भोद्भरः । क्रोधाग्नेरणि' प्रतापतरणिप्रच्छादने तोयदः ।। कीडासमकलेषिवेकशशिन' स्वर्भानुरापनदी- सिंधु' कीर्तिलताकलापकलमो लोमः पराभूयता ।।५८॥ व्याख्या-मो भव्या । लोम पराभूयता निराक्रियता त्य- ज्यतो मोह एव अज्ञानमेव विपद्रुमो विषतरुस्तस्य मूल जटारूप मूल श स्याऽजहल्लिगला । पुन कथभूतो लोभ सुकृतमेव पुण्यमेवा- भोराशि समुद्रस्तस्य शोपणे फु भोद्भवोऽगस्तिरिव । पुन क्रोधाग्ने भरणि क्रोध एव अग्निातस्य भरणी काष्ट उत्पत्तियान । पुन प्रताप पय तरणि सूर्य तस्याच्छादने ठोयो मेघोघ्र । पुन फले फलहस्य - सूक्तिमुक्तावली कोसन लीलागृह । पुनर्विवेक एव पुण्यापुण्यविचार एव शशी घद्रस्तस्य सर्भानु' राहु । पुन आप नदीसिंधु आपद कष्टायेत्र नद्यस्तामा सिंघु समुद्रस्तासा स्थानरूपयात् । पुन किं कीर्तिरेव रता पल्ली तस्या कलाप समूहस्तस्य विनाशे कलमो हरित शाव ईदृशो लोमो जीयता ॥ ५ ॥ अर्थ-कैसा है लोम-मोहरूप विषवृक्ष का है पुण्य- रूपी समुद्र को शोषण करने के लिये अगस्त्य ऋषि समान है [ऐसी एक किंवदती है कि अगुष्ठ प्रमाण अगस्त्य ऋषि ने सारा सागर का जल पी लिया था ] अर्थात अति लोभ के कारण पाप यध होने से पुण्य का क्षय हो जाता है पुण्य का अनुभाग सर्नया हीन हो जाता है, क्रोध रूपी अग्नि को बढाने के लिये भरएिणयकी लकड़ी है, प्रताप रूपी सूर्य को ढकने के लिये मेघों के समान है, कलह के क्रीड़ा करने का स्थान है विक रूपी चन्द्रमा का लिये राहु समान है, अनेक आपचि रूपी नदियों का समुद्र है, तथा कीति रूपी लता समूह को उखाड़ने के लिए हाथी के बच्चे के समान है अर्थात् मनुष्य की कीर्ति पर कालिमा लग जाती है ऐसा अनेक अनर्थों का मूलभूत एक लोम ही है अत उसका तिरस्कार करना चाहिए अर्थात उस लोम का त्याग कर देना चाहिए ॥ ५८ ।। पुनराह- वसततिलका छ द नि शेषधर्मवनदाहविजृम्भमाणे । दुखौषभस्मनि रिसर्पदकीर्तिधूमे ॥

सूक्तिमुक्तावली पाढ धनेन्धनममागमदीप्यमाने । लोमानले शलभता लभते गुणीयः ।।५९॥ व्याख्या-लोम एवानलोऽग्नि तस्मिन् लोमानले गुणोयो सानादिगुणाना ओघ ममूहः शलभता पतगला लमते पतद्ग- बनलति । कयभूते लोभानले नि शेष समस्त यद् धर्म एव वन तस्य दाइन पिन भमाण विस्तार प्राप्नुवत् तस्मिन् । पुन कथभूते दुसाना ओघ समूह एव भस्म रक्षा यन स तस्मिन् । पुन कथभूते विमर्पत् प्रसरदपकीति एव घूमो यस्मान स तस्मिन् । पुन कथभूवे पाढ अतिशयेन धना येव द्रव्याएयेंधनानि एधासि तेपा समागमेन भागमेन दीप्यमानोऽत्यात प्रज्वलन वृद्धिप्राप्नुवत् तस्मिन् । सगे- गुणा पतगवत् भवति सतोपेण लोमो निनार्य स्यात् ॥ ६ ॥ अर्थ -समस्त धर्म रूपी वन को जलाने वाली अग्नि को वृद्धि हो रही है जिसमें, दुखों का समूह ही भरम है जिसमें, अप- कोति रूपी धुआ फैल रहा है जिसमें, इच्छित धनरूपी ईधन के मिलने से जाज्वल्यता हो रही है जिसमें ऐसी लोभरूपी अग्नि में गुणों का समूह पतगों के समान जलकर भस्म हो जाता है अर्थात् लोभ के कारण सब गुण नष्ट हो जाते हैं । साराशयह है कि कोई मुनि या श्रावक धर्म पालन करे भोर अनर्थकारी लोम के फदेमें पड़ जाय तो गुण नष्ट हो जाने ससार में अपकीर्ति हो जाती है मत लोभ का त्याग करना ही श्रेयस्कर है || ५ || 7 मूक्तिमुक्तायली अथ स तोपगुणमाह शार्दूलविक्रीडितछद मात' कल्पतरु पुर' सुरगवी तेषां प्रविष्टागृह । चिंतारत्नमुपस्थित करतले प्राप्तो निधि सन्निधि ॥ विश्व वश्यमवश्यमेन सुलमा स्वर्गापवर्गथियो। ये सतोपमशेपदोपदहनधसावुद विनते ॥६०॥ ध्यारया-ये जना सतोप तृष्णानिरोध विधते धरति नेपा पुरोऽमे कल्पतरु फल्पवृक्षो नात प्रत्यक्षोऽभूत् । पुनस्तेषा गृह मुर गयी कामधेनु प्रविष्टा आगता। पुनस्तेषा करतले चितामणिरत्न उपस्थित थागत । पुनस्ठेपा निधान द्रव्यस्य निधि सनिधि समीप प्राप्त । पुनर्विश्व जगत् अवश्य निश्चित नेपा वश्य लात । पुनस्पा स्वर्गापवर्गप्रिय देवलोकमोक्षसपद सुलभा सुप्रापा स्यु । कथभूत सतोपं अशेपदोपदहनळासावुद अशेषाश्च ते दोपाश्य अशेषदोषा नेपा दहन तश्य दहनस्य ध्वस अशेषदोपध्यसनाय अभ्युद मेघ व अत सतोप एष क्तव्य' अन्न सुमोमचक्रातिदृष्टा त ॥ ६ ॥ इति लोभप्रकम अय-जो पुरुष सम्पूर्ण दोष रूपी अग्नि को नष्ट करने के लिए मेघों के समान स तोप को धारण करते हैं उनके भागे कल्प वृक्ष उत्पन हो जाता है कामधेनु उनके घर में प्रवेश करती है. चितामणि रत्न उनके हस्तक में उपस्थित हो जाता है, निधि उनके निकट आ जाती है स्यग मुक्ति की लक्ष्मी सुलभता सूक्तिमुक्तावली न होती है, और सारा संसार अवश्य ही उनके वश हो हाता है। मावार्य-जो पुरुष मतोप धारण कर धार्मिक जीवन यतीत करते हैं, उनके पुण्य उदय मे उन्हें इस लोक, परलोक में सब सुम्य के साधन मिलते हैं । कल्पवृक्ष, कामधेनु, चिन्तामणिरत्न, नव निधियों आदि ममी पदार्थोंका सहज ही समागम हो जाता है और तो क्या ? कर्म काट कर अनत अविनाशी सिद्ध पद पात्र हैं। अय सौर यविधानोपदेशमाह- शिसरिणी छन्द वर क्षिप्त' पाणिः कुपितफणिनो वस्त्रकुहरे । वर झपापातो जलदनलकुडे विरचितः ।। पर प्रासप्रान्तः सपदि जठरान्तर्विनिहितो। न जन्य दौर्जन्यं तदपि निपदा सम विदुषा ॥६॥ व्यारया-कुपितस्य फणिन क्रुषस्य सर्पस्य वक्त्रकुहरे । मुखविवरे पाणिहरत क्षिप्तो नि क्षिप्त सन् वर मेयान् । पुन - सदनल कुंडे प्रचलन अग्निकुडे मपापातो विरचित कृतो घर श्रेष्ठ पुन मासस्य कुतस्य प्रातोप जठरान्त उदरमध्ये विनिहित क्षिप्तो वर श्रे। वदपि विदुषा पडिवेन दोर्जन्य पशूय न जन्य नक्तन्यमेर। किंमूव दीर्जन्य विपदा आपदा पटाना सग गृह पानमित्यर्थः । अत कारणात् सीनन्यमेव विधेय ॥ ६ ॥ ." - ।

सूक्तिमुक्तावली अर्थ-कोप को प्राप्त हुए सर्प के मुग्य रूप छिद्र में हाय हालना अच्छा है, प्रचलित अग्नि के कुएट में मम्पापात लेना कूद पढ़ना श्रेष्ठ है, शीघ्र ही विप रग लेना भी अच्छा है परतु विद्वानों को विपत्तियों का घर दुर्जनता का करना अच्छा नहीं है। मानार्थ-त 1- तत्काल मर जाना तो श्रेष्ठ है परतु दुर्जनता फा व्यवहार करना या दुजनों को सगति करना उत्तम नहीं है॥ ६१ ॥ पुनराह- वसततिलका पद सौजन्यमेव विदवाति यशश्चय च । स्व श्रेयस च विभर च भरक्षय च।। दौर्जन्यमारहसि यत्कुमते तदर्थम् । धान्ये दव दिशसि तज्जलसेफमाध्ये ॥६॥ व्यारया-सोन यमेर सुजनतेर पुसा यशश्चय फोर्तिसमूह विदधाति करोति । पुन रसश्रेयस कल्याण विदधाति । पुनर्षिभ द्रव्य विदधाति । पुनर्मवक्षय ससारक्षय मोक्ष विदधाति । ततो हे. कुमते हे प्रबुद्धे यत्तदर्थयशश्चयाद्यर्ण दौजय पिशुनता भावहसि धरसित पाये धायझेने दव दाराग्नि दिशासि ददासि । कयभूते घाये जलसेकसाध्ये जलस्य सेकेन सिंचनेन साध्ये निष्पादनीये तन्न दाव ददासि ॥२॥ मर्थ-हे आनी जीव ! मज्जनता ही कीर्ति को सचित फरती है, आरमकरयाण सम्पदा को देती है तथा जममरण रूप

१
सूक्तिमुक्तावली
संसार का क्षय करती है । यदि तुम कोति, रयाण, सम्पत्ति आदि
फे लिए दुजनता का व्यवहार करोगे तो समझो कि तुम जल सिंचन
करने योग्य धाय में अग्नि डालने का कार्य करते हो। इसलिए दुर्जनता
का व्यवहार सर्वथा त्यागने योग्य है और साननता का व्यवहार ही
कल्याणकारी है।
दारिद्रय पि सुजनतैर श्रेष्ठत्याह-
पृष्योछन्द
घर मित्रवन्ध्यता सुजनभावभाजा नृणा-
मसाधुचरितात्मना न पुनरूर्जिता' सपदः ।
कृशत्वमपि शोभते सहजमायती सुन्दरं ।
विपाकविरसा न तु यथुसमका स्थूलता ।।६३॥
व्याख्या-परमिति सुजनभावमाजा सौजन्यसहिताना
नृणा पुसा विभवस्य वध्यता निष्फलता। निद्रव्यता दारिद्रयमेव वर
श्रेष्ठ असाधुचरितेन भजिता दोर्ज येन उपार्जिता सपद श्रियोपि
वर न श्रेष्ठा न श्लाघ्या न । कथभूता सपद ऊर्जिता बलिष्ठा प्रचुरा
तत्र दृष्टा तमाह सहज स्वाभाविक कृशष दौनत्यमपि शोभते ।
तु पुन यथुसभवा शोफा जावा स्थूलता पीनतापि न वर न
अष्टा। कथभूत कृशत्व आयती उत्तरकाले आगामिकाले सुदर
शोभन। कथमूता स्थलता विपाके परिणामे अत्यै विरसा
दारुणा ॥६३॥

। ऐसी सूचन सूक्तिमुक्तारली अर्थ 4-सज्जन पुरुषों के धन रहितपना (निर्धनता ) तो श्रेष्ठ है पर तु दुर्जनता से कमाया हुआ अधिक धन प्राप्त करना उत्तम नहीं है। जैसे कि शरीर में सुख देने वाली स्वाभारिफ फुरूपता तो अच्छी प्रतीत होती है परतु जिसका रिपाक [ फल ) धुरा है कारण होने वाली शरीर में स्थलता (मोटापन ) उत्तम सुखप्रद नहीं होती। भाषाय-सज्जनता पूर्वक जीवन विताते हुये गरीब रहना उत्तम है पर तु दुर्जनता [ दुष्टता ] से अयाय पूवक धन कमाते हुये धनी रहना उत्तम नहीं है। क्यों कि अयाय का धन कभी स्थिर नहीं रहना, नष्ट हो जाता है तथा अन्यायी जीव के परिणामों में सक्लेशता सदा विद्यमान रहती है जिसके फलस्वरूप नरकादि गतियों के दुख भोगने पड़ते हैं ॥ ६३ ॥ सौजन्यभाजा गुणानाह- शार्दूलवितीहित छद न ते परपण परगुण वक्त्यल्पमप्यन्वह । सतोप बहते परद्धिपु परावाधासु धत्ते शुचम् ।। स्वरलाघा न करोति नोति नय नौचित्यमुल्लघय- त्युक्तोऽप्यप्रियमसमा न रचयत्येतच्चरित्र सतां ॥४॥ व्यारयासता साधूना सज्जनाना एतस्परिन चेष्टिव अस्ति । एतदिति कि सजन परदूषण परदोष न न ते । पुनरल्प मपि तुच्छमपि परगुण अवगुण भरह निर तर वक्ति क्थति सूक्तिमुक्तावली पुरा परेपा ऋद्धिपु सपत्तिषु सतोप अनभिलाप अमत्सर वहते घो। पुन परायाधासु परपीडासु शुच शोफ धत्ते । पुन स्वश्लाघा आत्मप्रशसा न करोति । पुन नय न्याय नोग्मति न त्यति । पुन- रोचियं योग्यता नोल्लघयति नातिकामति । पुनरप्रिय विरूप भहित सक्कोपि भणितोपि अक्षमा क्रोध न रचयति न करोति । सता एत- चरित्र वर्तते ॥ ६४॥ अर्थ-सत्पुरुषों का चरित्र ऐसा होता है --कि वे दूसरों फे दोपों को प्रगट नहीं करते, दूसरों के थोड़े भी गुणों को रात दिन प्रशसा करते हैं, दूसरों के वैभव आदि को देख कर ईर्ष्यालु न होकर स तोप धारण करते हैं, दूसरों के दुखों को देख कर दुसी हो जाते हैं, अपनी प्रशसा अपने आप नहीं करते फितु अपनी प्रशसा सुन कर लज्जा प्रगट करते हुये लज्जा से अवनत हो जाते हैं, सकट आने पर भी न्याय नोति का त्याग नहीं करते, योग्य आचरण या सकतव्य की उपेक्षा नहीं करते और दूमरों द्वारा कटुक वचनों का प्रयोग किये जाने पर भी कोधित नहीं होते क्षमा ( पृथ्वी) की तरह क्षमा धारणा करते हैं। ऐसा यह सज्जनों का अपूर्व हो - चरित्र है। मावार्थ-जो सजन पुरुप होते हैं वे दूसरों की कटु आलो- चना नहीं करते, छिद्रान्वेषी नहीं होते। गुणग्राही होने के कारण घे दूसरों के गुणों पर ही दृष्टिपात करते हैं, अवगुणों का त्याग सूक्तिमुक्तारली अब गुणसन यर्णयति- शार्दूलविक्रीडित छन्द धर्म अस्तदयो यशरच्युतनयो पिच प्रमच' पुमान् । काव्य निष्प्रतिमस्तप शमदयाशु योऽल्पमेधा' अत ।। वस्त्वालोकमलोचनश्चलमना ध्यान च वाबत्यसो । य सग गुणिनां विमुच्य विमति. रल्याणमाकासति ।६॥ व्यारया-यो विमति निर्वृद्धि गुणिना गुणवता मनुष्याणा सग ससग विमुच्य त्यक्त्वा कल्याण श्रेय आफाक्षति असो विमति पुमान् ध्वस्तदयो गतप निर्दय सन् धर्म पुण्य पाति। पुनरत्युतनयो गत यायोऽयायमाक सन् यश कीर्ति थाछति । पुन प्रमत्त प्रमादीसन् विरा धन पाछति । पुनर्निष्प्रतिम प्रज्ञारहित सन् काव्य क्वाति । पुन शमेन उपशमेन दमेन वहीगो रहित पुमान तपो वाचति । पुन अल्पमेधा तुच्छबुद्धिबुद्धि- रहित सन् श्रुत शाख पठिनु पादति । पुनरलोचनो नेत्ररहित सन् परतूना घटपटादीना विलोकन दर्शन वावति । पुनश्चलमना चलचित्त सन् ध्यान नाति । तथा गुणरता सग विना फल्याण न॥६५॥ भयं-लो अनानी मनुष्य गुणवान् पुरुषों की सगति छोड़- फर अपना पल्याण करना चाहता है वह मूर्म या पिना धर्म को चाहता है, नीतिमार्ग रहित होकर कीर्ति सम्पादन करना चाहता है आलसी होकर धन कमाना पाहता है प्रतिभारहित हो काव्य २५ सूक्तिमुक्तापली रचना चाहता है समताऔर इन्द्रियदमन किये पिना ही तप करना चाहता है, अप बुद्धि होकर शास्त्र पारगामी होना चाहता है, नेत्रों के बिना पदार्थों को देखना चाहता है, और चचल चित्त होकर भी ध्यान करना चाहता है। भावार्थ-जिस प्रकार दया विना धर्म नहीं, न्याय विना कीर्तिलाम नहीं, परिश्रम किये विना धनोपार्जन नहीं, प्रतिमा विना काव्यरचना नहीं, शमदम बिना तप नहीं, निशिष्ट क्षयोपशम बिना पुत ज्ञान नहीं चक्षु विना पदार्यावलोकन नहीं, स्थिर मन निना ध्यान नहीं होता उसी प्रकार सत्सगति मिना मनुष्यका कल्याण भी नहीं हो सकता। पुनगुणिसङ्ग वर्णयति- — हरिणी छन्द हरति कुमति मिचे मोह करोति रिवेकिता । नितरति रति सूते नीति तनोति गुणालिं ।। प्रथयति यशो धचे धर्म व्यपोहति दुर्गतिं । जनपति नृणा किं नाभीष्ट गुणोचमसगमा १॥६६॥ व्यारया-नृणा पुसा गुणे उत्तमा गुणोत्तमारतेपो सगमो नणा किं कि अभीष्ट वाछित न जनयति न करोति अपितु सर्वम- भीष्ट जनयति । गुणोत्तमसगम कुमतिं कुबुद्धिं हरति दूरीकरोति । पुनर्मोह अज्ञान भिन्ते विदारयति । पुनर्विरेकिता तत्रयातस्वनिक्षप्त रोति । रति सतोप वितरति ददाति । पुननीति न्याय सूते सूक्तिमुक्तावली जनयति । पुनगुणावलिं गुणश्रेणी तनोति । पाठातरे तु विनीतता तनोति । पुनर्यश कीर्ति प्रययति विस्तारयति । पुनधर्म पत्ते घरति । पुनटुगति नरकतियगतिरूपा व्यपोहति स्फेन्यति । एष गुणोत्तम- सगम सबमभीष्ट जनयति ॥ ६६ ।। अय-गुणी जनों को सगति सोटी युद्धि को हटाती है जीवों की मोह परिणति को नष्ट करती है हेयोपादेय का ज्ञान प्रगट करती है, प्रेमभाव ( वात्सल्यभावना ) को बढाती है, नीति मार्ग का आप्रय बनाता है, विनयगुण की वृद्धि करती है, लोकमे यश फैलाती है धम सेन को मापना को उत्पान करता है. नरकगति तियंचगति के दुपा को हटाती है ( नाश करती है ) सासगति मनुष्यों को कौन कौन से इन्छित पदाथ प्रदान नहीं करती अर्थात् ससार में सर्व उत्तम गुणोंको प्राप्त कराती है। पुनराह- शार्दूलविक्रीडित छद लघु चुद्धिकलापमापदमपातुं निहतं पथि । प्राप्त कीर्तिमसाधुत विधुपितु धर्म समासेपितु ।। रोधु पापविषाक्माक्लयितु स्वर्गापपर्गश्रिय । घेत्त्व चिच समीहसे गुणरता मग तदङ्गीकुरु ।।६७॥ व्याया-रे चित्त चेन यदि व बुद्धिक्लाप पुद्धिसमूह लघु प्राप्तु समोहसे याछसि तत्तदा गुणवता गुणिना सग ससर्ग अगीकुरु विधेहि। पुनर्यदि पथि यायमार्गे वितु विचरतु वासि । - सूक्तिमुक्तावली पुन यदि कीर्ति यश प्राप्तु ममीहसे वाछसि । पुण्य समासैपितु कतुं समीहसे । पुनर्यदि विपद आपद अपाङ्गतुं दूरीकर्तुं समीहसे पान्छसि । पुनरसाधुता असौजन्य विधुपितु स्फेटयितु ममीहसे वाछसि । पुनर्यदि धम पुण्य ममासेपितु क्तुं समीहसे पान्छसि । पुनर्यदि पापविपाय अशुभकर्मफल रोद्ध ममोहसे । पुनर्यदि स्वर्गा- पवर्गप्रिय देवळोफमोक्षलक्ष्मी आकलयितु अनुभवितु समीहसे । तदा गुणवता सग कुरु ।। ६७ ॥ अर्थ-हे चित्त ! यदि तू वुद्धिका भण्डार प्राप्त करने के लिये, आपत्तियों को हटाने के लिए, स मार्ग में गमन करने के लिये, कीर्ति को प्राप्त करने क लिये, धर्म को शाति पूर्यक सेवन करने के लिये, पापों के फल दुखों को हटाने के लिये स्वर्ग तथा मोक्षकी लक्ष्मी को प्राप्त करने के लिये इच्छा करता है, तो सज्जन गुणवान पुरुषों की सगति को अवश्य ही स्वीकार कर । भावार्थ-यदि मनुष्य इह लोक परलोक सम्पधी सुखों को भमिलापा रखता है तो उसे गुणी जनों की सगति करनी चाहिये । क्योंकि सरसगति मे समार्ग में बाधा उपस्थित करने वाले दोषों का निराम्रण होजाता है। निर्गुणसगमदोपमाह- हरिणी छन्द हिमति महिमाम्भोजे चडानिलत्युदयाम्बुदे । द्विरदवि दयारामे क्षेमक्षमाभृति वचति ।। - f ८९ सूक्तिमुक्तावली समिति कुमत्यग्नी कदत्यनीतिलतासु य । किमभिरपा श्रेय श्रेयान्म निर्गुणिमगम ॥६८|| ध्यारया--स निर्गुणस्गम किमपि श्रेय कल्याण भीम लपता वालवा पुरुपेण क्ष श्रेय पथ आश्रयणीय स' फ यो महिमा एव महस्वमेवाभोग कमल तस्मिन् हिमति हिम इवाचति तद्विनाशकत्वात । पुनर्यो निगुणसा वदय एव धनधायप्रतापवृद्धि रेगामोदो मेघस्तत्र घडानिलति प्रचढवायुरियाचरति । पुनदया एव अथवा दम एव रामो वन तन द्विरदति द्विरदवगजवदाचरति । तदुमूलस्यात् । पुनर्य चेममेवकुशलमेर क्षमामृत गिरिस्तत्र यति वादाचरति तन्छेदस्त्यात् । पुनर्य कुमति रेवाग्निस्तत्र समिति समिद् धन इवापरति तद्धिहेतुत्गता पुनर्यो अनातिल तासुभ याय धल्लिपु कति कद इवाचरति त मूलभूतस्या । इदृशो निगुणसगम श्रेयो वाछता पुरुषेण न श्रेय न श्रयणीय । अत्र गिरिशुकपुष्पसुक्यो क्या । माताप्येका पिताप्येको गगनाना तु स व गणोति । अह च राजन मुनिपुगनाना प्रत्यक्षमेतद्भवतापि दृष्ट । ससर्गजा दोष गुणा मर्याता इति गुरिगसगमप्रकम अथ-दुजनों की सगति कैसी है इसका एक मानचित्र चित्रण किया जाता है- जो निगुणो को सगति महिमा ( प्रतिष्ठा) रूपी कमल को नष्ट व लिये तुपार के तुल्य है, पुण्योदय रूपी मेषों को अस्त व्यस्त करने के लिये तीवायु के समान है, दया रूपी उपचन के एजाड़ने के लिये हाथी के तुल्य है, कल्याण रूपी पर्वत सूक्तिमुक्तावली को चूर्ण करने के लिये वन समान है, कुसुद्धि रूपी अग्नि को प्रम- लित करने के लिये लकड़ी के समान है, अयाय रूपी लता के लिये जद समान है ऐसी यह दुजन सगति कल्याण के इच्छुक [ मुमुनु) जना को क्या कभो हितकर हो सकती है । अर्थात् कदापि नहीं। भावार्थ-जैसे शीतकाल में हिमपात के कारण कमल वन नष्ट हो जाता है या तोत्रपपन से मेघसमूह, हरनी द्वारा उपवन, पत्रपात द्वारा पर्वत आदि नष्ट हो जाते हैं उसी प्रकार निगुणी जनों को मगति से मनुष्यों की प्रतिष्ठा, कीति, न्यायबुद्धि सयम तप आदि न हो जाते हैं मत दुर्जनों का समागम हितकर नहीं है। अथेन्द्रियजयोपदेश माह- शार्दूलविक्रीडित छद आत्मान कुपयेन निर्गमयितुं यः शूकलारसायते । कृत्याकृत्यविकजीमितहतौ यः कृष्णमायते ॥ प. पुण्यद्रुमसण्डपडनविधौ स्फूर्जत्कुठारायते । व लुप्तप्रतमुद्रमिन्द्रियगण जिला शुभयु भव ॥६९॥ व्याख्या-हे साधो त इन्द्रियगण पश्चेन्द्रियसमूह नित्वा चिनिनिस्य शुभंयु शुभसयुको भय । त क य इन्द्रियगण स्पर्शन रसन प्राण चनु श्रोरसमूह भारमान व कुपथेन कुमार्गेण निर्गम- यितु नेतु सूकलाश्वायते दुर्विनीत अश्व श्वापरति तस्य धुमार्गीमि- 4 सूक्तिमुक्तावली स्वमाविश्वात् । पुन य इद्रियगण । कृत्य च भछत्य च कृत्यारत्ये तयोयियेक एक विचार एव लीवित जीवितव्य तस्य हतो हरणे कृष्ण सपोयते कृष्णसर्प इवाचरति । पुन र्य इन्द्रियगण' पुण्यमेव द्रुमा स्तेपा खण्ड वन तस्य खण्डने छेदने स्फूर्जत् कुठारायते । स्फूलत् तीक्ष्ण कुठार इवाचरति । पथभूत इद्रियगण लुप्तप्रतमुद्र लुप्ता बिना प्रताना मुद्रा मर्यादा येन स ||६|| अथ-जो इद्रियों का समूह अर्थात् इन्द्रिया इस मारमा को खोटे माग में प्राप्त कराने के लिये पद लगाम घोडे के समान है, तया जो कार्य अगाय के ज्ञान रूपी जीवन को नाश करने के लिये काले सप के समान है और जो पुण्य रूपी वृक्ष के धन को काटने के लिये तीक्ष्ण कुठार के समान है ऐसे चारित्र की मयादा को नष्ट करने वाले इन्द्रियों के ममूहको जीत फर मोक्षगामी भागाय-इद्रिय विषयों के वशीभूत होकर प्राणी सुमार्ग- गामी, अविवेकी, पापी और चारित्र भ्रष्ट हो जाता है और तो क्या अपने प्राणों को भी गमा देता है जैसा कि कहा है - पुरगमातगपतगभृङ्गमोनाहता पचभिरेव पंच। एक प्रमादी स क्थ न हन्यते, या सेव्यते पचमिरेय सद्य (१८ अथ-पशन इन्द्रिय के वशीभूत हो हाथी, रसना के वशी- भूत मछली, प्राण इद्रिय के वशीभूत मोंग, चतु विषय का विषयी पतद्ग तथा कणं द्रिय का पशीमूत हिरन अपने प्राणों को गमा पैठता है । एक एक इंद्रिय के विषयीभूत होकर जीव जब अपने सूक्तिमुक्तावली १ प्राणा को सो देते हैं, मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं तो यह प्रमादी पुरुष जो पाचों इन्द्रियों के वशीभूत हो उसका क्या २ अनर्य नहीं होगा मत द्रिय-विषय हो जीयोंका कल्याणकारी माग है। पुनराह- যিনা দু प्रतिष्ठा यन्निष्ठां नयति नयनिष्ठां विघटय- स्यकत्येप्वाधचे मतिमतपसि प्रेम तनुते । विवेकस्योत्सेक दिलयति दचे च रिपदं । पद वदोषाणां करणनिकुरुम्ब कुरु वशे ॥७॥ व्याख्या-भो भव्य । तत् करणाना इन्द्रियाणा निकुरु य समूह वशे फुरु पश्यता नय आत्मायस विधेहि । सरिक परकरणनिफु- रुव प्रतिष्ठा महत्व निष्ठा भयसान क्षय नयति प्रापयति । पुनयंत् नयनिष्ठा न्यायस्थिति विपदयति स्फेटयति । पुनयंत अकृत्येप्याना- चारेपु मति बुद्धि आपत्ते स्थापयति । पुन अतपसि अविरती प्रेम तनुते स्नेह करोति । पुनयंत् विपद भापद कष्ट दत्ते ददाति । पुन- यत् विवेकस्य कृत्याकरयविचारस्य उत्सेफ उन्नतान विदलयति विध्व सयति । वरकरणनिकुरु व इन्द्रियसमूह स्ववशे कुरु । क्थभूत दोपाणा पद स्थान।। ७०॥ अर्थ-जो इद्रिय-समूह प्रतिधा को बिगाड़ देता है, न्याय- मार्ग को नष्ट करता है, पापकार्यों में वृद्धि लगाता है, कुतप 1 १२ सूक्तिमुक्तावली (सम्यक्त्व रहित मिथ्या तप ) में अनुराग बढाता है, ज्ञान के उत्साह को नष्ट करता है, विपत्तिया को उत्पन करता है अथात इन्द्रियविषयलोलुपी मनुष्य पर ही अनेक सम्र के बादल छाये रहते हैं इस प्रकार ममस्त दोपा का स्थान उस इद्रियसमूह को वश करो यह आचाय का उपटेश मव्यात्माओं के लिये है जिससे जगत्-अजाल में जीव अपना जीवन व्यथ ही नष्ट न करें। पुनराह- शार्दूलविक्रीडितछद धनां मौनमगारमुल्झतु विधिप्रागल्भ्यमभ्यस्यता- मस्त्वन्तर्गण'मागमश्रममुपादचा तपस्तप्यतां । श्रेयः पुजनिकुजमजनमहागत न चेदिन्द्रिय- । बात जेतुमवैति भस्मनि हुत जानीत सर्वं तदा ॥७१।। व्यारया-हे साघो। भवान् मौन धत्ता फुरुता। पुन भागार गृह उज्मतु त्यजतु । पुनर्विधिप्रागल्भ्य सर्वाचारचातुर्य अभ्यस्यता कुर्व तु । अतगण गच्च धाममध्ये अथवा भतर्वन वन- मध्ये अस्तु भवतु। पुनरागमश्रम सिद्धातपठन उपादत्ता अगी. कुरुता। पुनस्तपस्वप्यता करोतु। पर चेदि इद्रियवात इन्द्रिय- ममूह जेतु वशीक्तुं नाति न जानाति तदा सन पूर्वानुष्टान मम्मान रक्षाया हुत पृया जानोत । कथभूत इन्द्रियनात इद्रियसमूह श्रेयमा कल्याणाना पुज एर निकुज तस्य भजने महावात धातूल- समान ॥१॥ १ वनमित्य पाठ।

सूक्तिमुक्तावली अर्थ-चाहे तो मौन धारण करो, घर का त्याग करो, विधि विधान की दक्षता का अभ्यास करो किसो मी गण गच्छादि में रहो, शास्त्र पठन पाठनमें कितना ही परिश्रम करो, चाहे वय तपस्या करो, परन्तु यदि कल्याण का पुज रूप लतामडप को नष्ट करने में तीन पवन के समान प्रवीण इन्द्रियों को जीतना नहीं जानते हो तो वह सब कियाकाण्ड भरम में होम करने के समान व्यर्थ (निष्फल ) है। भावार्थ-यदि मन तया इद्रियों को वश में नहीं किया, विषयों में अनगल प्रवृत्ति करते रहे, भक्ष्य अभक्ष्य का कोई विचार नहीं किया तो ऐसे मनुष्यों का मौन धारण, शास्त्राभ्यास, गृह- स्याग, विधि विधान का पाण्डित्य, तप तपन आदि क्रियायें निष्फल है उनमे कुछ लाम नहीं होता अत इन्द्रियविजयी बन कर ही कर्तव्य कार्य करना उपादेय है। पुनर्विशेषमाह- शार्दूलविक्रीडित छन्द वर्मध्वसधुरीणमभ्रमरसापारीणमापत्प्रथा- लकीणमशर्मनिर्मिति कलापारीणमेकाततः । सर्वान्नीनमनात्मनीनमनयात्यतीनमिष्टेयथा- कामीन कुमथापनीनमजयन्नौषमक्षेमभाव ॥७२॥ व्याख्या-अक्षाणा इद्रियाणा ओघ समूह अजयन् भवशी- कुन जन भक्षेमभाक् अकल्याणभाग भवति । कथभूत भौध सूक्तिमुक्तावली धर्मध्वसे धुरीण मुरयत । पुन' अभ्रमरसत्य सत्यज्ञानस्य भावारीण भावरणाय समर्थ आन्छादक मित्यय पुन फ्यभूत मापदा कष्टाना प्रणया विस्तारणे भलमर्माण कमक्षमस्त । पुन' कि विशिष्ट अगमणा अकल्याणा दुग्याना निमित्ती निर्माणकरणे कलापारोण चतुरस्त । पुन' किं विशिष्ट एकाततो निश्चयेन सर्ग- नीन सनमक्षकात । पुन किं विशिष्ट न आरमनेहित्तोऽनारम- नीनात आत्मनोऽहित । पुन किं अनये अपायेऽत्यतीऽत्यतगामी त। पुन किं इष्टे इष्टवस्तूनि ययायामश्वेन्छया वर्तते इतियथा फामीन रतं । पुन कि विशिष्ट छुमने कुत्सितमतेऽध्वनीन पाथस्त । ईदृश इन्द्रियसमूह अनयन् सन् अक्षेमभाऊ भवति ॥ ७२ ॥ फरगमातगपतगभृङ्गमीनातापचमिरेव पच । एक प्रमादी स कथन अध्यने य मेयते पचभिरेव पच ॥ इति इद्रियप्रकम अर्थ-धमको नाश करने में प्रमुख, सत्यज्ञानके आच्छा- दक आपत्तियों के पढ़ाने में समय, दुया को उत्पन करने में निपुण, सगया एकात रूप से सर्वको भक्षक मारमा का अकल्याण करने वाले, सोटी नीति में प्रवृत्ति कराने वाले, अपने इष्ट विषयों में स्वेच्छाचारी, कुमाग में चलने वाले ऐसे इद्रिय समूह को जो व्यक्ति विजय नहीं करता है वह कदापि अपना पल्याण नहीं कर सकता। भामार्ग-इन्द्रियों को वश किए मिना बारमा का कल्याण न कभी हुआ और न होगा। मिद्रिय पुरुष ही ध्यान के बल सूक्तिमुक्तावली फों को निराकर मुक्ति पद पाते हैं, देसो वो! विषय लोलुपी सुभौम चक्रवर्ती उच्च पद प्राप्त कर, पदसण्ड के अधिपति और मतुल वैभवशाली होकर भी इन्द्रिय विजयी न होने से अयोगामी हुए [ मातम नर्फ में गये। अथ लक्ष्मीस्वभाषमाह-- शार्दूलविक्रीडित छन्द निम्न गच्छति निम्नगेर नितरा निद्रेव विष्कम्भते । चैतन्य मदिरेव पुप्यति मद धूम्येर धत्तेऽन्यताम् ॥ चापल्य चपलेव चुम्पति दपज्वालेच तृष्णां नय-। युल्लास कुलटाङ्गनेन मला स्पैर परिभ्राम्यति ||७३|| व्याख्या कमला लक्ष्मी निम्न नीच गच्छति । केव नि- निगा इव नदीव यथा नदी नीच गच्छति । पुन अतिशयेन चैतन्य शान विष्कमते विनाशयति केघ निदेव यथा निद्रा भचैतन्य करोति । पुनलक्ष्मीर्मद अहकार पुग्यति पुष्णाति फेव मदिरेष सुखे यथा मदिरा मद व मत्तता करोति । पुन कमला अधत्ता दत्ते माधव करोति । केव धूम्येर धूमसमूह इव यथा धृभोप्यघ करोति । पुन लक्ष्मी पापल्य चुम्यति भजति फेर घपला इव विद्य दिव। पुन फमला एप्पा सल्लास नयति लोम पाछा वर्द्धयति केव दुषज्वाला इस यया पवनाला कृपा पद्धयति । पुन कमला स्वैर स्वेच्छया परि- भ्राम्यति परिभ्रमति फेव फुलटागना इच बसती स्त्रीव यथा असती श्री स्वेच्छया भ्राम्यति तद्वदेष १७३॥

सूक्तिमुतायली भयं-रश्मा की भपमा इयमिचागिणीनी से दी जाती है पह लक्ष्मी कैसी है -रक्ष्मी नदी क ममान सदा नीचे की ओर आनी है, नींद के ममान वेता को मदिन पर लेती है, मदिरा फे समान मद ( अहकार) पदाती है अयाम् रश्मीवान होने के फारण पाय माप्य महकारी हो जाते हैं और महकार माय फे पारण दूसर्ग का अपमान परत हैं अधिर धूम के ममान अधा बना देती है (अधिक पुरों के कारण दिपाई नहीं देता इसी प्रार रक्ष्मीयान् व्यक्ति दूसरों को देखता हुआ नही देवता, नहीं गिनता) निजली के समा7 मनुष्य कय में पलमा रश्मी का कारण बढ जाती है परिणाम में पिरता नहींरहनी, पन की याग्नि फे समान तृष्णा पढाती है, व्यभिचारिणी श्रीफ ममान स्प च्छ र इच्छानुमार यत्र तत्र [वहा कहाँ ] घूमती रहती है। धनस्य दोपानाह- शार्दूलविक्रीडित छद दायादा' स्पृहयति वस्करगणा मुग्णति भूमीमुनो। गृहन्ति छलमाकलय्य हुतमुग्मस्मीररोति क्षणात् ।। मम्म प्लाययते सितो निनिहित यला हरते हठात् । दुर्घत्ता स्तनया नयति निधन धिग्रहधीन धन ॥७४।। व्याख्या-यन द्रव्य धिक प्रस्तु । धिग निमसननिदयो । किंभूत यवधीनत्व यहष इच्छति । पथ दाया गोविण स्पृहयति गृहीतु वाति । पुनस्तस्कर गणारचौरसमूहा मुप्णति चोरयति ।

सूक्तिमुत्तारली पुन भूमिभुजो राजान छल आफलप्य मिष दखा गृहन्ति हुभुग यहि क्षणाद् धेगेन मस्मीकरोति । वालयित्वा रक्षा करोति । पुन- रम पानीय प्लावयति बाहयति । पुनर्यद्धन क्षिती भूमो विनिहित स्थापित सत् यक्षा व्यतरा हठात् बलात्कारेण दरते अपहति । पुन- दुर्वृत्ता दुराचारास्तनया पुग निधन विनाश नयति प्रापयन्ति । एव बह्वधीनं धन धिगातु ||७४ ।। अर्थ-कैसा है धन, भाई वधु कुटुम्बी जन जिसके लेने के लिए रातदिन वाछा करते हैं, घोर जिसे चुरा लेते हैं, राजा लोग फूट कपट रच कर जिसे लेते हैं, अग्नि क्षण भर में जला देती है पानी जिसे वहा ले जाता है, पृथ्वीमें गड़े हुए धन को भूत प्रेतादि जबरदस्ती हर लेते हैं, दुराचारी पुत्र जिसे नष्ट कर देते हैं ऐसे अनेक विघ्न बाधाओं के आधीन रहने वाले अर्थात् जिस धन को ममी ससारी लीव चाहते हैं पर सबको मिलता नहीं, ऐसे उस धन को धिक्कार हो। भावार्थ -धन प्राणों से भी प्यारा होता है जिसका घन चोरी चला जाता है यह पागल हो जाता है, कभी कभी तो मनुष्य घन के नष्ट हो जाने पर अपने प्राणों का भी विसर्जन कर बैठता है ऐसे धन को धिक्कार है। कहा भी है -(भारमानुशासन ६५श्लोक ) भर्थिनो धनमप्राप्य, धनिनोऽप्यवितृप्तित कष्ट सर्वेऽपि सीदति, परमेको मुनि सुखी ॥ . अर्थ-धन के चाहने वाले धन को न पाकर दुखी होते हैं मुहिगुलावधी मोर पनानों के धन कोममा पिठोमा पा हुये भी पदुगी रहते है । इस प्रकार नियंन भी पापोनों दुखी हैसिफ गुनि ही सुम्नी हैं। क्योंकि हो मर्ग र परिमा जीवांदा छोर परम सतोष पार कर लिया है। धामोहोलापमाह- जादू धषिकोलिन पर नीरस्यापि गिर पनि रापन्यायान्ति नी निति । शोरप्पगुणात्मनोऽपि दिपाणी कीर्तनं ।। निद न विदनि दिसाम्पापि सेराममे । पष्ट निमनम्मिनोऽपि मनुजा पुरन्ति रिचाधिनः १७५१ म्याग्या-ममरियनो मानवमो रक्षा भपि मनुप्या विचा. पिनो द्रव्यापी मन कि फष्ट 7 फुलति । भपिशु गर्ग कर पति । यथा नीचाया परस्याप्रे पिर घिरकास पावन पनि पार्ट- पपनानि प्रियवापिय म!ि पुराना गर। मम नति आयान्ति प्रणाम कुर्गति । पुन समोरपि भगुग्गामनोपि रिए- स्यापि उच्चरतिशयेन गुणोत्कीतन गुवर्णन विदधाति पुति। पुन अनस्यापिसेवाकमे ई पेवापरणे किसिम सोकमपितार खद येराम्य विदति नजाति विसापका रोत ॥५॥ अय-धन प्राप्त परने के ममिलापी झोपर मनायी लोग भी नीप पुस्प की पटुत पाल पर्यंत पाटुकारिता (सुशामद कपन द्वारा ही हुजूरी ) करते हैं, शत्रु के भागे भी मातफ रहते है।

सूक्तिमुक्तावली दोयीननों के मी गुण वर्णन करते हैं, कृतघ्नी मनुष्य की सेवा फरने में भी विरक्ति (ग्लानि) नहीं फरते। यही बड़े दुख का विषय है। भावार्थ-बुद्धिमान पुरुष को धन की प्राप्ति के लिये तुच्छ- जनों की सेवा, घाटुकारिता करना शोमा जनक नहीं है परन्तु स्वाभिमान प्रतिष्ठा का ध्यान रखते हुये पुण्योदय से प्राप्त वित्त भव में सतोप रसते हुये धार्मिफ जीवन व्यतीत करना ही उत्तम है। इसी भावना के बल से ही इह लोक, परलोक फा सुधार समी- चीनसया सम्पादन हो सकता है। तृष्णावान् जीव को कभी भी जीवन में सुख शान्ति का अनुमय नहीं हो सकता। मानव जीवन रूपी चितामणि भाम कल्याण के लिये पाया है न कि पर पदार्थों में परिणति को बिगाड़ कर मारमपतन के लिये। अपमानेन श्रीस्वरूपमाह- शार्दूलविक्रीडितद लक्ष्मीः सर्पति नीचमर्णवपयः सङ्गादिवाम्भोजिनी । संसर्गादिव कटकाकुलपदा न क्यापि घचे पद ।। चैतन्य विपसन्निधेरिय नृणामुज्जासयत्यजसा । धर्मस्थाननियोजनेन गुणिभिघि तदस्याः फल ॥७६।। व्याया-लक्ष्मी नीच सर्पति नीचतन प्रति याति । करमात उत्प्रेक्षवे अर्णवपय सगात समुद्रालसगमान नीचगामियभूत् । पुन- लक्ष्मी क्यापि पद स्थान न बचे न स्थापयति । कीदृशी मम्मोजिनी ससर्गात कमलिनी सयोगादिय एटकारलपदा कटकै व्याप्तचर- -- सूचिमुकायली ऐ । पुनलक्ष्मी नृणा पुसा चैतन्य शान अजमा धेगे उनासति गमयति परमात विप िनयिंपसामीप्यादिव । एम्या विपश्य च समुद्रायानत्वात् तस्माकारणान् गुशिमिगनर्भमायाननियोजनेन धमाधानव्ययकरणेनास्या छम्या +मान सासा फतव्या इस्या ॥६॥ इति लक्ष्मी स्वमाय प्रक्रम भय-रक्ष्मी ममुद्र के जल की संगति से ही माननीचे की भोर गमन करती है कमलिनी क समग मे ही मानों पैरों में फाटे घुमने की पीड़ा से भाकुलित होती हुई गानों फही पर थिर पैर नहीं रगती अयान् पहुत फाल तक एक स्थान पर लदमी नहीं रहसी तथा लक्ष्मी को विप को निकटता रही है इसी हेतु मानों यह लक्ष्मी मनुष्यों की चैतन्य शक्ति को शीघ्र ही मूर्हित कर देती है मत गुणवान् पुरुषों को धर्म ग्यानों में सग पर देने से ही इस लक्ष्मी क प्राप्त करने की सफलता प्रहण करनी चाहिये । भागाय-साहित्यिक वर्णन है कि लक्ष्मी समुद्र मेधत्पन हुई है धौर कमल निवासिनी है, समुद्र मयन से विप भी उत्पन हुआ या मत लक्ष्मी विष की यहिन है । ममुद्र-जस से उत्पन्न होने के कारण लक्ष्मी जल पे समान नीचे की ओर हो जाती है सथा कमल नियासिनी होने के कारण पैरों में फाटे घुम लाने के भयसे कहीं पर स्थिर नहीं रहती। पचला लक्ष्मीका यह स्वमात्र दिखाया है. और विप की वहिन होने के कारण लक्ष्मी मनुष्यों को भचेट कर देती है अर्याप्त धन के भरावेश भावर पुरुप अचेत हो जात है जिसके कारण पूज्य पुरुषों का भी अपमान फर येठता है, हिता- ।

सूक्तिमुक्तापली
हित का विवेक नहीं रहता । अत इसको धर्मकार्यों में लगाने से हो
इसके प्राप्त करने की मफलता है। धन सर्च करने के सात क्षेत्र है-
निनप्रतिमा, जिनमदिर, अतक्षान, मुनि, आर्यिका, प्रायर प्राविका
इन सात धर्मस्थानों में लक्ष्मी का मदुपयोग करने पाले पुरुष ही
सद्गृहस्य हैं हाँके द्वारा धर्म को अपूर्ण प्रभावना होती है, यासत्य
भाव की वृद्धि होती है, भनेक जीयों का धर्म में धर्म का स्थिति-
करण होता है तथा स्व पर कल्याण होता है।
दानोपदेश द्वारमाह--
। शार्दूलविक्रीडित छद
चारित चिनुते तनोति पिनय ज्ञान नयत्युन्नति ।
पुष्णाति प्रशम तप प्रलपत्युल्लामयत्यागम ।।
पुण्य कन्दलयत्यय दलपति स्वर्ग ददाति कमात् ।
निर्माणश्रियमातनोति निहित पाने पवित्र धन ॥७७॥
व्यारया-पवित्र न्यायोपाजित धन वित्त पाने सुपाने
निहित दत्त सत् चारित्र सयम चिनुते वर्द्धयति । विनय विनयगुण
तनोति प्रीणयति । पुनर्जान श्रुतादि उ नतिं नयति प्रापयति । पुन
प्रशम उपशम पुष्णाति पोषयति । पुनस्तपो मासक्षमणादि प्रबल-
यति पारणादियोगादुत्साहयति । पुनरागम सिद्धात पठनादि उल्ला-
सयति प्रबला करोति। पुन सरकर्मवन कदलयति फदलयुक्त
फरोति । पुन बघ पापं दलयति यहयवि । पुन वगै ददाति
क्रमात अनुक्रमेण निर्वाणप्रिय मोक्षलक्ष्मी आतनोति दचे इत्यर्थ ।
सुपाने दत्त धन एतानि वस्तूनि करोति ॥ ७ ॥

१०२
सूक्तिमुक्तावली
अर्थ-पवित्र सपान को दिया हुआ धन चारित्र का सचय
फरता है विनय पदाता है, ज्ञान की वृद्धि करता है प्रशम (शात )
भाव को परिपक्र करता है तप को प्रबल बनाता है, आगम के
ज्ञान को उल्लासित करता है अर्थात् शास्त्र ज्ञान की वृद्धि करता है,
पुरय
की जड़ को पुष्ट करता है, पापा को नष्ट करता है, स्वग देता
है और क्रम से मोक्षलक्ष्मी को प्राप्त कराता है।
साराश-पान तीन प्रकार के हैं -उत्तम, मध्यम, जघाय।
उत्तम पान मुनि, आयिका है । मध्यम पात्र व्रती माफ ग्यारहवीं
प्रतिमा तक के घारी तथा अघय पार प्रत रहित सम्यग्दृष्टी है।
सचम पानों को दान देने से उत्तम फल, मध्यम को देने से मध्यम,
और जघन्य को देने से जघय फल मिलता है। इसका विशेष वर्णन
श्रावकाचार प्रयों से जानना पर पात्र दान का फल संक्षेप में
इस प्रकार है
(श्री सम तभद्राचाय ने रस्नकरण्डश्रावकाचार
क्षितिगतमिव बटवीन,
पात्रगत दानमल्पमपि काले ।
परति च्छायाधिमा,
बहुफल मिष्ट शरीरभृताम् ।।
जिस प्रकार पट [बरगद 1 का वीज बद्भुत छोटा होता है
परतु उस छोटे बीज से इतना विशाल वृक्ष होता है कि जिसकी
छाया में हजारों पुरुष बैठ सकते हैं। इसी प्रकार पात्रों को भक्ति
पूर्वक दिया हुआ थोड़ा भी दान विशिष्ट फल को देता है।
कहा है)

सूक्तिमुक्तावली दान देते समय दावार के इतने पिशुद्ध परिणाम होते हैं कि निसको तुलना नहीं की जा सकती है। उन्हीं विशुद्ध परिणाम के कारण जिस जीव के कुगति बघ होकर परभव सम्बन्धी आयुका पध यदि नहीं पड़ा है तो वह फुगति बधको छेद कर सुगति-बध को कर लेता है । और तो क्या १ दान देने की अनुमोदना करने वाले भी उत्तम क्षेत्र में जाकर जन्मधारण करते हैं। देखिये जब राजा वजय और रानी श्रीमती भक्ति पूर्णक मुनियों को दान दे रहे थे उस समय सिंह, बैल, नेवला, अन्दर भादि पशु उस दान, पान और दातार की सराहना कर रहे थे। दान देने के माहात्म्य से ये पोनों राता रानी उत्तम भोग भूमि में उत्पन हुए और सराहना फरने वाले ये पशु भी उसी उत्तम मोग भूमि के क्षेत्र में निर्यच पर्याय में अवतरित हुये। कर्म भूमि के प्रारम्भ में राजा प्रसनघ का जीच प्रथम तीर्थकर श्री पमनाथ हुये और रानी श्रीमती का जीव श्रेया स राजा हुये जो दान के प्रथम प्रवर्तक फहलाये इस प्रकार दान की महिमा अद्भुत है । गृहस्थावस्था में पट् कर्म [ असि,ममि, कृषि, वाणिज्य, विद्या शिल्प ] द्वारा उपार्जित जो पाप हैं ये दान के प्रभाव से नष्ट हो जाते हैं ऐसा दान तीन प्रकार के पानों में निरन्तर देना योग्य है। शार्दूलविक्रीडितछ द दारिद्रय न तमीमते न भजते दौर्भाग्यमालम्बते । नाकीर्तिन पराभोऽभिलपते न व्याधिरास्कन्दति ।। दैन्य नाद्रियते दुनोति नदर क्लिरनन्ति नवापदः। पाने यो वितरत्यनर्थदलन दान निदान धिपः॥७८|| सूक्तिमुक्तारली व्याख्या- पुमान् पाने सुपारे दान वितरति प्रयच्छति तं पुरुष दारिद्रय न ईक्षते न पश्यति । पुनरत दौमाग्य दुभंगत्व न मजते न सेवते । पुन अकीतिरयशस्त नालम्पने नामयति । पुन त पराभव परिभवन नाभिलपतेन वाधति । पुनाधिरामय त नाफ- दति न शोपयति । पुनदेय दीनता नाद्रियने नाशयति । पुनरो भय व न दुनोति न पीडयति । पुन' आपदो व्यसनानि फटानि तन क्लिश्नति न पीडयति । य पाने दान ददाति । किमूत दान जन- यांना उपद्रवाना दलन देदक । पुन किंभूत प्रिया सपदा निदान कारण॥७॥ अर्थ-जो मनुष्य सत्पात्र के लिये लक्ष्मी पदने का एक मात्र कारण तथा अनयों का दूर करने वाला दान देता है उसको दरिद्रता कभी नहीं देसती अथात वह दरिद्री कभी नहीं होता, दु- भर्भाग्य उसकी कभी सेना नहीं करता, अपफोति उसकी ससार में नहीं होती, तिरस्कार उसका नहीं होता, व्याधिया ( रोग) उसको कभी नहीं सताती दीनता उसका आश्रय नहीं करती, भय क्षोभ पैदा नहीं होता आपचिया उसको कभी नहीं सताती वह सदा स्वस्थ रहता है। भावार्य-जो पात्राक लिये श्रद्धापूर्वक अपना कर्तव्य समगर पर दान देते हैं उसके सभी विघ्न, उपद्रव शात हो जाते हैं। गाईघ्य धर्म की शोमा दान से ही है। "गृही दानेन शोमवे" ऐसा आचार्यों का पाक्य है। दान घिना घर शूय माना गया है।

सूक्तिमुक्तारली दानगुणमाद- शार्दूलविक्रीडित छन्द लक्ष्मी कामयते मतिम गयते कीर्तिस्तमालोकते । प्रीतिग्चुम्बति सेवते सुभगता नीरोगतालिङ्गति ।। श्रेयः सहतिरभ्युपैति घृणुते सोपभोगास्थिति । मुक्ति वञ्चिति य. प्रयच्छति पुमान्पुण्यामर्थ निज ॥७९॥ व्याख्या-य पुमार पुण्यार्थ निज अयं यकीयं धन प्रय- पति ददाति त पुरुष लक्ष्मी कमला कामयते वाहति । पुनमाति- द्विस्त मृगयते अपर्यात । पुन कीर्तिस्त आलोकते पश्यति । पुन प्रीतिरानदाट चुम्वति शिलष्यति । पुन सुभगता सौभाग्य सवते मशति । पुन नीरोगवा आरोग्य त आलिंगति। पुन श्रेय सहति कल्याणपरम्परा त अभ्युपैति मम्मुखमायाति । पु7 पर्गोपभोगा- स्थिति देवश्यभोगपद्धतित्व घृणुते परयति । पुनर्मुक्तिर्मोक्षस्त पाब्छति य पुण्यार्ज निज भय प्रयच्छति ॥ ७ ॥ भर्य-जो पुरुष अपना धन दानादि पुण्य कार्यों के लिये दे देता है लक्ष्मी वय ही उससे मिलने की इच्छा करती है, अर्थात् दान के प्रताप से उसके घर स्क्य लक्ष्मी भजाती है, बुद्धि से ढूढती है, कीर्ति देखती है, प्रीति उसे स्पर्श करती है, सुभगता [सौभाग्यपना ] उसकी सेवा करती है, भारोग्यता आलिङ्गन करती है, फल्याण समूह प्राप्त होता है। स्वों के भोग उपभोग की सामग्री (कल्पवृक्षों द्वारा प्राप्त सुदर वस्त्र, पुष्प, वाद्यादि अनेक १०६ - - सूक्गुिलावली प्रकार प्राप्त होती है नया मुक्ति भी की इपमा दर ऐसा जान कर पात्रोको मदा फाल पान देना योग्य है। भूयोध्याह- मशकातादर तस्यामन्ना रतिरनुसरी कीर्तिराष्टिना स्निग्धा बुद्धिः परिचयपरा पवित पाणी प्राप्ता निदियकमला रामुकी मु मप्नक्षेच्या पनि विपुल रिचरीन व्याया- य पुमान् निर यकीय यौन सप्तध्या जिनभय जिन विप२. स्पाया पति तस्य पुरुषस्य रति सया तस्य पीतिरतुचरी मविका स्यात, घrहिरण्यरूपा रहिता पिलनोत्सा फापारिनधारोहवतीयानशा तस्य माना भीम विभूति सुपरिचिता स्यात् । भी पापो हरने माता संगना स्याशया की सामिलायायाय सप्तध्या अन पयसालिभद्र । अर्थ-जो पुरुष अपना बहुत बोता है (सासक्षन-जिन प्रतिमा, आयिका प्राधक, प्राविका, ये सात अन जाती है कीदि उसकी दासी रहती 1 4 सूक्तिमुक्तारली पिठत रहती है, बुद्धि उपसे प्रेम करती है चक्रवर्तिकी प्रक्रिया उसमे परिचय रखती है, स्वर्ग की लक्ष्मी उसके हाथमें भाजाती है, और तो क्या मुक्ति-लक्ष्मी उसकी अभिलाषा करती है। भारार्थ-जो पुण्यामा पुरुष धार्मिक नीति से कमाये हुये धाको धार्मिक कार्यों में सर्च करते हैं अर्थात् जिन प्रतिमा, जिन मन्दिर यनवाने में या उनका जीर्णोद्धार कराोमें शास्त्रोंको लिसने लिसाने व विसरण करने में तथा मुनि आर्यिका श्रापक भाविका के भाहार दान में, औषधिदान में उनकी परिचर्या करने कराने में अपना रुपया लगाते हैं उन्हीं का धन पाना सफल है वे ही मनुष्यों में शिरोमणि हैं, वहीं का मनुष्य ज म पा घयवाद के योग्य है, उनसे सभी जीव प्रेम करते हैं ससार में उनकी चारों ओर फीति फैलती है, लदमी उनके चरणों में लोटती है उनकी विशिष्ट बुद्धि या प्रतिमा होती है, चक्रवर्ति की विभूति भी सहें प्राप्त होती है, स्वग की लक्ष्मी तथा मुक्ति लक्ष्मी वफ इहें प्राप्त होती है इसलिये पात्रों को दान देना, उनकी सेवा भक्ति करना औषधि देना, उनके दुरव सकट उपसग को दूर करना, उनकी जान वृद्धि के हेतु शास्त्रों को वितरण करना भावकोंका कतव्य है। अथ तप उपदेशद्वारमाह- शार्दूलविक्रीडितहार यत्पूर्वार्जितकर्मशैलकुलिशं यत्कामदापानल- ज्वालाजालजल यदुनकरणग्रामाहिमन्त्रातरम् ।

सूचिमुक्तावली यत्प्रत्यूहतमः समूहदिवम् य लन्धिलक्ष्मीलता- मूल तद्विविध यथानिधि तपः कुर्वीत वीतस्पृह. ॥८१|| व्याख्या-बीतस्पृह वीता गता स्पृहा घाटा यस्य स पीत- छह सन् बाछा निदानादि रहित सन् तद्विविध तप कुर्वीत कुर्यान् सकि या पूर्वे भये अजितानि उपार्जितानि यानि कर्माणि तान्येव शैला पर्वतारनपु कुलिश वा तेपा छेदकत्वात । पुर्यतप यलाम एवं दावानलोदावाग्निस्तस्य ज्वालाना जाल समूहस्तत्र जल तद्धि नाशकत्वान् । पुनयंतप उग्रो दामणो य करणारा द्रयाणा प्राम समूह स एवाहि सर्पस्तस्य माक्षर सर्वमन्त्रस्य वीज । पुनयंत्तप' प्रत्यूहा एव विना पप तमसोऽधकारस्य समूहस्तत्र दिव दिन तानाश स्वात। पुनयत्तपो लब्धिलक्ष्मी लब्धि सपदेव लता वल्लीस्तस्या- मूल पानफद तद्विविध द्वादशप्रकार तप कुति ॥ ८१ ।। अथ-जो तप पूर्व भव में उपानित किये गये कर्मरूपी पवत को भेदने क लिये पनसमान है, काम रूपी दावानलफी ज्या. लाओं को घुमाने के लिये अल फ ममान है प्रचण्ड इन्द्रियों के समूह रूपी मर्प को वश करने के लिये मत्र के समान है, विघ्न रूपी भधकार-समूह को नाश करने के लिये दिन-समान है तथा जो तप नय केवल सन्धि को लक्ष्मी रूपी घेल या मूल कारण है। यह दो प्रकार ( अतरग, पहिरग ) का तप निस्पृह होकर विधिपूर्वक परना चाहिय। भावार्थ-- इच्छा निरोध तप से हो पूषमत्र के सचित को योनिपरा होती है, कामादि विकार परिणति दूर हो जाती है, सूक्तिमुक्तारली १०३ इन्द्रियों का दमन होता है, विघ्न आदि शात हो जाते हैं, क्षायिक- ज्ञान क्षायिक दर्शन आदि नव लब्धिया भी तप के बल से प्राप्त होती है । ऐसा जान फर बाह्य आभ्यन्तर दो प्रकार का तप निदान रहित करना चाहिये। तप प्रभावनामाह- शार्दूलविक्रीडिताइन्द यस्माद्विघ्नपरम्परा विघटते दास्य सुराः कुर्वते । काम. शाम्यति दाम्पत्तीन्द्रियगणः कल्याणमुत्सर्पति ॥ उन्मीलन्ति महई यः क्लयति धस च यः कर्मणा । स्वाधीन निदिन शिष चभाति रलायं तपस्तन्न किं ८२) व्याया~-तत्तप कि श्लान्य न प्रशस्य न अपि तु श्लाघ्य- मेव । तकि यस्मात्तपसो विघ्नपरपरा कष्टश्नरिणविघटते विलय यादि । पुन सुग देवा दारय दासत्व कुयते । पुनर्यस्मात्काम भाम्यति उपशम याति । पुनरिद्रियगण पञ्चेद्रियसमूहो दाम्यति दम प्राप्नोति । पुनर्यामात्तपस कल्याण श्रेय नामपति प्रसरति । पुन- यस्मा महर्द्धयस्तीर्थकरादिसपद उ मीलति विकसति । पुनर्यस्मात् कर्मणा ज्ञानावरणीयादीना चय समूहो पन्स नाश कलयति प्रयाति पुनर्यस्मात्तपस बिदिव स्वर्ग च पुन शिव मोह स्वाधीन स्वायत्त स्यात तत्तपस कि श्लाघ्य न स्यात् । अपितु श्लाघ्यमेव ॥२॥ अर्थ-जिस तप के प्रभाव से विघ्नों का समूह नष्ट हो जाता है, देव भी सेवक नकर सेना करते हैं काम की विकार परिणति शान्त हो जाती है, इन्द्रिया यशोभूव हो जाती हैं करयाण सूक्तिमुक्तावली नत दशा को प्राप्त होता है, भनेको महान् ऋद्धिया स्वयमेय प्रगट हो जाती हैं, कर्मों की गुणश्रेणि निर्जरा होती है तथा निसफे प्रभाव से स्वर्ग और मोक्ष अपने भाधीन हो जाव हैं ऐसा तपकिर प्रशसा योग्य क्यों न हो ? फितु अवश्य ही प्रशसा योग्य है। पुनश्च- शार्दूलविक्रीडित छन्द कान्तार न यथेतरो ज्वलयितु दक्षो दवाग्नि विना । दावाग्नि न यथापर शमयितु शक्तो विनाम्भोधर ।। निष्णात. पवन विना निरमितु नान्यो यथाम्मो धर । कौघ तपसा रिना किमपर हर्तुं समर्थस्तथा ॥८३।। व्यारया- यथा कातार बन ज्वालयितु दवाग्नि विना इतरो भयो दक्षो न । पुनर्यया दावाग्नि शमयितु विध्यापयितु भम्भो- घर मेघ विनाऽपर शक्तो न समर्यो न । पुनर्ययाऽभोधर मेघ निर- सितु दूरीक्तु पचन विनायो न निष्णातो न निपुण तयैव कमधि फम्मसमूह हर्तु छेत्त तपसा निनाऽयरिक समर्थ अपितु न किमपि किंतु तप एव कर्माणि हतु समय ॥ ८ ॥ अर्थ-जैसे वन को जलाने के लिये दावानल अग्नि के बिना भन्य दूसरा समय नहीं है, दावानल को शात करने के लिये बिना मेघों के भय कोह समय नहीं है, जैसे मेघों को छिन्न भिन्न करने के लिए पवन बिना दूसरा शक्तिमान नहीं है उसी प्रकार कर्मों को नष्ट करने के लिये तप के यिना क्या कोई दूसरा समर्थ है ? अर्थात् कोई नहीं है।

सूक्तिमुक्तावली मानार्थ -तप की सामर्थ्य से कमों की निर्जरा होती है भय दूसरा कोई साधन नहीं है। जम जमातर के सचित कर्म वप बल से ही नष्ट होते हैं अत यथाशक्ति तप अवश्य करना चाहिए। पुनराह- स्रग्धराछद सन्तोपस्थूलमूला प्रशमपरिकर स्कन्धान्धप्रपञ्चः । पञ्चाक्षीरोधशासः स्फुरदभयदलः शीलसपत्प्रवालः ॥ श्रद्धाम्म.पूरसेकाद्विपुलकुलपलैश्वर्यसौन्दर्यभोगः स्वर्गादिप्राप्तिपुष्पा शिवसुसफलदः स्यातपः पादपोऽय १८४! व्याख्या-अय तप एवं पादपो वृक्ष शिवमुसफलदा स्यान शिवसुखायेर फलानि ददातीति शिवसुग्नफ्लद मोक्षफलदाता स्यात् । किंभूत तप पाइप सतोषी मूत्याग एव स्थूल पुष्ट मूल थाय स । पुन बिभूत प्रशम क्षमा एवं परिकर परिवारो यस्य म । पुन कि भूत स्वघा आधारोगादिश्रतस्पधारतेपा बधो रचना एष प्रपथो विस्तारो यस्य म । पुन किंभूत पचाना अक्षाणा इन्द्रियाणा समाहार पचाक्षी रोष एष शाखा यस्य म । पुन किं भूत स्फुरत् देदीप्यमान भमयमभयदानमेव दल यायस । अथरा कुगनि प्रकटानि विनय रूपाणि दलानि पाणि पाय स । पुन भूिन शोलसंपदेव प्रझमतमेव प्रयाला नवपल्लवा यस्य स । पुन किंभूत' भद्धा रुचि सैव मम पानीय तस्य पूर- स्वेनसेक सिंचन तस्मात् विपुलानि विस्तीर्णानि कुराधतौरपर्यसौंदर्या- सूक्तिमुपापली एयेव भोगो यस्य स अथवा विपुल्पुयश्वयाएयेय विस्तारस्य भोगो यस्य म। पुन कि भून स्यगादीना देवलोक प्रययफाउत्तरयि माना प्राप्तय एव पुष्पाणि याय म । ईगतप ण्य पादपो पर। स शिरसुवमेव फ्ला ददाति ॥ ५ ॥ भर पसुदेव हरिकवकया । अय-यह तप वृक्ष के समान है पैसा है सपरूप वृक्ष स तोप ही है हद जद निसको, प्रशम सवेगादिरूप कप बाप पर फैलाव है जिसका, पाचों इन्द्रिया क निरोध रूप शारयायें हैं निमकी देदीप्यमान समय पत्र ( पसे ] लग रहे हैं जिमफे, शील सम्पत्ति रूपी कोंपले है जिसकी, श्रद्धा रूपी पल के माधने म उत्तम कुल, विपुल ऐश्चय सुदरता नाना प्रकार फ भोग युक्त वादिरूप पुष्प है जिसके ऐसा तप रूपी वृष मोक्ष पदम्पा फल को देता है। भावार्थ-लोक पूज्य महान् प्रत्तम फल को दो वाले ऐस सप रूपी वृक्ष की विपयादि रूपी अग्नि स रक्षा करना योग्य है अयया यह सवथा नष्ट हो जायगा। मायोपदेशमाइ-- शार्दूलविक्रीडितदार नीरागे तस्णी कटासितमिवत्यागन्यपेतप्रमोः । सेमारष्टमियोपरोपणमियाम्मोनन्मनामश्मनि ॥ विषयमियोपरतितितले दानाईदर्चातप । स्वाध्यायाध्ययनादि निप्पलमनुष्ठान गिना भापना ॥८शा सूक्तिमुक्तावली व्यारया~भावना शुभभावना विना दानाईदर्चातप स्वाध्यायाध्यनादि सर्वमनुष्टान कियाफरण निष्फल स्यात् । दान प्रसिद्ध घ अहंदा देवपूजा प तपश्च स्वाध्यायश्च से भादौ यस्य तत् दाननिनपूजातप सिद्धातपठनादिक भाव विना नि फळ किमिव । नौरागे पुरुपे तरुणी कटाक्षितमिय युवतीकटाक्षविक्षेपणमिघ । यथा नौगे नरे तरुणी कटाक्षा निष्फला । पुन किमित्र त्यागन्यपेतप्रभी पानरहिते कृपणे स्वामिनि संगपष्ट इच यथा अदातरि स्वामिनि सेवाक्ष्ट नि फल । पुन किमिव अश्मनि पाषाणे अम्भोजन्मना कमलाना' उपरोपण वपन इथ यथा पापाणोपरिफमलयापन नि फल { पुन किमिव ऊपरक्षितितो अपरभूमौ विध्वम् वर्षमिव ययोपरभूमौ सर्वतो मेघवर्षण नि फल तथा शुभावना विना सर्वा- किया नि'फला ॥५॥ अर्थ-जैसे वीतरागी पुरुष के सामने युवा स्त्री के पटाक्ष निष्फल हैं, जैसे धन न देने वाले स्वामी की सेवा करना कटमात्र है अर्थात व्यर्थ है, जैसे पत्थर में कमलों का उगाना व्यर्थ है उसी प्रकार भनित्य अशरण आदि बारह भावनाओं के चितवन बिना दान देना, अरहन्त वीतराग की पूजा करना, तप करना, स्वाध्याय करना • फराना आदि सभी क्रियायें निष्फल हैं। मावाथ-जैसे अफ मिना विदी का कोई मूल्य नहीं है. इसी प्रकार मैत्री, प्रमोद, कारुण्य, माध्याथ भावनाओं के बिना घोर त्यि अशरण भादि भावनाओं के भाये बिना दान, पूजा, सप, स्वाध्याय आदि अनुदान निष्फल है इसलिये उत्तम भावनाओं फे साथ साथ ही उत्तम किया करना उत्तम फलदायक है।

११४ सूक्तिमुक्तावली पुनराह- शार्दूलविक्रीडितहम्म सर्व शीमति पुण्यमीप्मति दयां धित्मत्यप भिन्मति । मोघ दित्सति दानशीलतपमा साफल्यमादित्सति ।। कल्याणोपचय चिकीपति भवाम्मोघेस्तट लिप्सत । मुक्तिी परिरिप्सते यदि जनस्तदारयेझारनाम् ॥८६॥ व्याख्या-यदि ननो लोक सर्व यस्तु मीप्सति सात इच्छति । पुनयदि पुण्य धम्म इप्सवि वाचति । पुनदिजो दया कृपा घित्सति पतुं इच्छति । पुनयदि अघ पाप मिस्सवि मातु दतु- मिच्छति । पुनयदि क्रोध रोप दिसति सहित च्छति। पुनर्यदि दानशीलतपमा साफ्ल्य सफ्लव सादिसति प्रहीतु- मियति । यदि पुन फल्याणोपचय फल्याणपुति चिकीपति क्तु पारसि । पुनयदि भवाम्भोधे समारसमुद्रस्य वर पार लिप्सति लघुमिन्छति । पुनयदि मुक्तिस्त्री सिद्धिरमणी परिरिप्सते मालि- गितुमिच्छति जनस्तदामावना शुभभाव भावयेत् पुर्यादित्यर्थ ॥८६॥ अय-यदि मनुष्य सर्वज्ञ होने की इच्छा करता है, पुए फी पाब्छा करता है, दया धारण करना चाहता है पापों को न करना चाहता है, कोष को भेदन करना चाहता है दान शील गुप की सफलता पाहता है, निम्तर कल्याण करने की चाह रखता है ससार रूपी समुद्र के किनारे पर भाना चाहता है और मुक्ति स्त्री यरगा की इच्छा रखता है तो निरन्तर यारह भावना भाये अर्या चितवन करे इन माननाओं के चितवन करने से शान्तिरसक ३ : सूक्तिमुक्तावली अनुभव होता है, वैराग्य भावों की पृद्धि होती है अत भावनायें सदा मावने योग्य हैं। पुनर्विशेषमाह- पृथ्वीछन्द विवेकानसारिणी प्रशमशर्मसंजीविनीं । भवार्णपमहातरी मदनदारमेघापली ।। चलासमृगपागुरा गुरुफपायशैलाशनि । विमुक्तिपर्थवेसरी भनत भावना किं परैः ।।८७।। ब्यारया-मो भव्या ! भावना शुभपरिणामरूपा भजत सेवध्व परै रयै फष्टानुष्ठाने शुभभावरहिवै किं न किंचिदित्यर्थ । फयभूत भावना विषेक कृत्यायविचार एच वन तत्र सारणि फुल्या ता । पुन प्रशमशर्मण उपशमसुखस्य सजीवनी जीवनकर्ची वा। पुन किंभूता भव पर मसार एव अर्णव समुद्रस्तत्र महातरी महा- नाव । पुन' कि भूता मदन एप दायो दाराग्निस्तत्र मेघस्यावली गि । पुन कि भूता चलानि पचलानि यानि अक्षाणि इद्रिया- एयेष भूगा हरिणास्तेषु वागुरां मृगजाल पाशवन्धन । पुन किं भूता गुरुरिष्ठश्चतु कपायरूप एष शैल पर्वत सत्र अनि र्वत्र । पुन किं भूता विमुक्ते सिद्ध पंथारतत्र बेसरी अश्वतरी सदभारवाहिका तस्माच्छुभभावनामेव कुर्य तु ॥ ८७ ॥ अर्थ-शोधियेक रूपोवनकोसिंचनफरने के लियेत्रिम नदी समान हे नहर-समान है, शान्तिभाव रूप सुख की सजीपनी औषधि है, ससार रूपी समुद्र के तिरो के लिए महान् नौका है, काम स्त्री ११६ सूक्तिमुक्तारली दावानल को शात करने के लिये मेघमाला है, चचल इन्द्रिय रूपी हिरण को पड़ने का जाल [पाश है, प्रबल फपाय रूपी पर्वत को भेदन करने के लिये वनके समान और मुक्ति के मार्ग में शीघ्र तया गमन करने के लिये सच्चरी के समान है ऐसी भावना सदा भजने ( भावने ) योग्य है दूसरे कार्यों से कुछ लाभ नहीं है। भागार्य-अन्य सभी कार्यों को छोड़ कर भावनामों का निर तर चितवन फरना चाहिए। इसी भावना के बल से अनादि काल से चली आई पर पदार्थों को अपनानरूप पर परिणति दूर हट फर, स्वपरिणति (आत्मा की भावना ) जागृत होती है अर्थात् मिध्यात्वपरिणति रूप अ धकार नष्ट होता है, हृदय में सम्यक्त्व ज्योति का आयिभाव [ प्रगट ] होता है। इसीसे प्राणिमात्र का कल्याण होता है। पुनराह- शिसरिणीछद धन दत्त वित्त जिनवचनमभ्यस्तमसिल । प्रियाकाण्ड चण्ड चितमवनी सुप्तमसकृत् ॥ तपस्तीन तप्त चरणमपि चीण चिरवर । न चेच्चिचे मापस्तुपरपनरत्सनमफलम् ।।८८|| व्याख्या-घन प्रचुर वित्त धन पानेभ्यो दत्त । पुनरखिष्ठ समाव जिनपचन जिनागमरूप अभ्यात पठित । पुनश्चद भीम क्रिया- कास लोधादि रचित कृत । पुनरपनी भूमी असद्वार बार सुप्त शयन कृत । पुनरतीन दुःपर तपस्तप्त सप फत । पुनश्चरण चारित्रं सूक्तिमुक्तावली चिरतरं बहुकाल चोगा सेपित पालित पर चेदि चित्ते हदि भायो न गुमभावना नास्ति तदा धायस्य तुपथपना मी पूर्वोक्त विफल स्यात् अत्र महदेवी भरत प्रसान घराजापाक्था ॥ ८ ॥ इति भावना प्रक्रम अर्थ-जिसने जीवन में बहुत धन का दान दिया समस्त शास्त्रों का अभ्यास किया, प्रचण्ड क्रिया काएद भी किया, सदा पृथ्वी पर ही कष्ट सहन करता हुआ शयन किया, घोर तपस्या की. चिरकाल तर चारित्र का भी पालन किया, किन्तु यदि भावना उत्तम नहीं है अर्थात् आत्मचि तपन पूर्वक ये कार्य नहीं किये तो तुष (धान के छिलके ) के वोने के समान सब यिाकाण्ड 2 भावार्थ-जैसे तुप के धपन ( घोना) करने से चावल उत्पन्न नहीं होताअत तुप कायोना व्यर्थ है इसी प्रकार शुद्ध मारना अर्थात निर्मल मायों के बिना प्रक्रियाकाण्ड करना मी निष्फळ है इसलिए, प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि निरन्तर निर्मल भावना रखे, न जाने कब परमव सम्बधी आयु का वध हो जाय। आयु बध के योग्य आठ अपकर्ष काल माने गये हैं (जिसका विशेष वर्णन गोम्मट्टसार जीवफागह, राजवार्तिक, आदि प्रयोंसे जानना) धन आठ अपकर्ष कारों के समय लिस जीप के जैसे निर्मल या मलिन परिणाम होते हैं तदनुसार ही सुगति कुगति सम्बधी आयु फायध जीवों के हो जाता है जिसका हटाना असम्भव है। हा, परमव सम्बधी श्रायु की स्थिति का अपकर्ष, उत्कर्ष तो हो सकता ११८ सूचिगुतावली है पर उसका सर्वथा अय (दौरणा ) असम्म मत सदेव सद्भावना जीवन की सफलता का सूचक है। भय पैराग्यमाह- हरिणीम यदशुमरज. पायो दप्तेन्द्रियद्विरदारा। कुशलासुमोद्यान मायन्मनःफपिला । चिरतिरमणीलीलावरम स्मरज्यरमेपनम् । शिवपथरथस्तराग्य विमृश्य भराभयः ।।८९॥ व्याया-मो मुने। सद्वैराग्य विश्य चियिायाऽमक ससारहितो भव । तकि यद्वैराग्य भशुम पापमेष रसोधूलिातत्र पायो जल तदुपशमस्तस्वात् । पुनयन्यैराग्य माधन मदो मचोचो मन एष फपिनिरस्तस्यराखला निगडो पधन पुफि विशिष्ट कुशलमेय कुसुमानि तेपा प्रधान मुराराम पुनरमानि इद्रियाएयेव द्विरदा गजास्तेपो आश वश्यफर । पुनर्यत् विरतिरमणी हीलारम विरतिरमणी देशविरतिरेपरमणीस्त्री सरया एवीलामीडागृह । पुनयत् स्मरमरभेषनामर एव वरतस्योपय सामवरीपधपुनयंत शिवपथरथ मोक्षमागे रथसमान वैराग्य विश्य विचार्य समय संसारभयरहितो मष || अर्य--जो पैराग्य पाप रूपो धूल के बहाने के लिये जल के समान है मदोमत्त इंद्रिय रूपी हायो को पश में करने के लिये भकुश समान है. वो कश्याण रूपी पुष्पों के माग समान है, भदो- 'मत्त मन रूपी पदर को यश करने के लिए साकल समान समूह अतै विनाश नयति प्रापयति । रात्रि मनम्र अर्य-जैसे प्रचण्ड पवन यर कर देता है, दावानल वृक्षों के समूह हावी है, नाश कर देता हे पसे ही एक वैएक सरकाशा सूचिमुक्तावली विरति रूपी स्त्री के कीड़ा-गृह समान है, काम रूप धर को नाश करने को औषधि समान है, और जो मोक्षमार्ग में ले जाने के लिये रथ समान है ऐसे वैराग्य का हृदय में चितवन करफे हे भव्य ! तुम निर्भय बनो। ऐसा जान कर निरतर वैराग्य का चि वरन करना चाहिये। पुनराह- वसततिलकाबन्द चण्डानिल' स्फुरितमब्दचयं वार्षि। घृक्षवन तिमिरमण्डलमाविम्य । वज्र महीधनियह नयते ययान्न । वैराग्यमेकमपि फर्म तथा मन 19.011 ध्यारया-यया घडानिल प्रवराट प्राय मेघघटात मत पिनाश नयठे प्रापति पुन गादिमिर- प्रज द्रुमसमूह अत प्रापयति । पुनर्यया अविन्दन्यमिडल भधकारसमूह अत नयते । पुनर्यथा वा नामनिवार- कर्म अत नयति ॥१०॥ ग्रिम्प भन्धकार राशि को नाश कर नंद सा देता है।

सूक्तिमुक्तावली - भावार्य-राग्य परिणति का अद्भुत माहात्म्य है । पैराग्य परिणति स भव मया तरों के सचित कम एक क्षण में नारा हो लाते हैं। मह हरि कृत नीतिशतक में कहा है भोगे रोगभय कले च्युतिभय विते नृपालाद् भयम् । मौने देयमय यले रिपुमय रूपे सराया' भयम् ॥ शास्त्रे वापभय गुणे सलमय काये कृतातामयम् । सर्ग वस्तु भयावित भुवि नृणा पैराग्यमेवाभयम् ॥ १ ॥ भयं-ससार फे भोगों में रोग का डर रहता है अर्थात् भोग भोगने क कारण रोग प्राप्त हो जाते हैं कुल में पतित होने का भय रहता है, अर्थात दुराचार के कारण व्यक्ति कुलसे पतित हो जाता है अधिक पनी हो जाने पर राजा द्वारा धन छीने आने फा भय रहा करता है, मौन धारण में दीनता का भय रहता है, पल में शत्रु के आक्रमण का भय बना रहता है, रूपयान (सुदर ) हो पर भी चुढापे का मय है क्योंकि वृद्धावस्था में रूप नष्ट हो जाता है अनेक शास्त्रों का पाठी हो जाने पर भी याद विवाद का भय रहता है, गुणवान होन पर भी दुणे से भय पना रहता है, उत्तम पलिष्ठ शरीर प्राप्त हो जाने पर भी फालसे प्रसित होने का भय रहता है। इस प्रकार सासारिक पदार्थों में सर्वत्र भय का अन्देशा है। एक पैराग्य ही ऐसा है जो भयरहित है। जिस समय ससार देव, भोगों के स्वरूप को चिन्तवन कर मनुष्य के हृदय में पैराग्य की भाषना जागृत हो जाती है दुर्धर दिगम्बर दीक्षा धारण में हद विश्वास हो जाता है उस समय उस वैराग्य रूपो रद शृङ्खला को तोड़ने में कोई सूक्तिमुकारली भी माइसी सामना नहीं कर सकता अर्थात् अनेकों भय के कारणों का प्रदर्शन किये जाने पर भी यह वीर वैरागी पुरुष अपने दृढ़ एका अकाट्य विचारों से मुह नहीं मोडता किन्तु वैराग्यावस्था धारण कर हो लेता है इसलिये कहा है मेराग्य ही अभय है। शिखरिणीछन्द नमस्या देवानां चरणवरिवस्या शुभगुरो-1 स्तपस्या निम्मीमक्लमपदमुपास्था गुणरा ।। निपद्यारण्ये स्यात्करणदमविद्या च शिवदा । विरागः क्रूरागक्षपणनिपुणोऽन्त' स्फुरति चेत् ॥२१॥ व्याख्या-चेद् यदि भत चित्ते विरागो राज्यम स्फुरति वर्तते तदा देवाना नमस्या नमरकरण शिवदा मोक्षदायिनी स्यात् । पुन शुभगुरो चरणवरिवस्या स्यात् चरणयो सेवा तदा शिवदा स्यात् । पुन नि सीमक्लमपदम् मत्यतश्रमपद ईदृशी तपस्या तदेव शिवदा स्यात् । पुन गुणपता ज्ञानादिगुणयुत्ताना उपास्या सेवापि तदेव शिवदा स्यात् । पुनररएये वने निषद्या स्थितिस्तदेव शिवदास्यात् । पुन करणदमयिद्याइन्द्रियदमनविधिरपि तदेव शिवदास्यात् । यदिअतमध्ये विरागो भवति । फयमूतो विराग राग क्षपणनिपुण क्रूर घोर यदागोऽपराधरतस्यक्षपणे आयकरणे निपुणश्चतुर ॥ ५ ॥ अर्थ-यदि वौत्र पापों के क्षय करने की सामायं वाला घेराम्य भाव हृदय में स्फुगयमान { प्रगट) हो जाय वो देवाधिदेव वीतराग का नमस्कार कार्यकारी हो जाय अथवा धोतराग देव की पूना सफर हो जाय, गुरुओं के चरण कमलोंकी उपासना सफल हो में - १२२ सूक्तिमुत्तापली जाय मर्यादा रहित क्लेश देने वाली सपरया कार्यकारी हो आया,गुण- थानों की उपासना कार्यकारी हो जाय, धनमें योगासन करना सफल हो जाय मुक्ति पद देने वाली इद्रिय के दमन की विद्या सफल हो जाय। भावार्थ-पीतराग माव विना कोई भी कार्य कार्यकारी नहीं है इसलिये वीतराग भाव का अवलम्यन ही कार्यकारी है। विरक्तगुणमाह- शादूलविक्रीडितहार भोगान्कृष्णभुजंगमोगविषमान् राज्य रज. सन्निम । यधून्यधनिवधनानि विषयग्राम निपान्नोपम ।। भूति भूतिसहोदरा तृणतुल स्त्रण विदित्वा त्यजन् । तेवासक्तिमनाविलो विलमते मुक्ति विरक्तः पुमान् ॥९२॥ व्यास्या-चिरत्तो वैराग्ययुक्त पुमान मुक्ति विलभते सिद्धि प्राप्नोतिा कि करवाभोंगान शब्दादीम् कृष्णमुजगमोगविषमान कृष्ण- श्चासौ भुजग सर्पस्तस्य मोग शरीर तद् विषमाम् भीमान विदित्वा शाया तेषु अत्यासक्ति अत्यभिलापत्यजन् । पुन राज्य आधिपत्य रन' सनिमलिसदृश मवा त्यजन् ।पुनयंधून स्वजनान् फर्मयधस्य निष- धनानि फारणानि मया । पुनर्षिपयमाम विषयसमूह विपानोपम विपमिश्रिताग्नसम मया। पुभूति ऋद्धि भूतिसहोदरां मरमभगिनी रक्षासहशी मत्वा । पुनस्रेण स्त्रीणा समूह हमियतृणसदृश विदित्वा तेपु आसक्ति अत्यभिलाप त्यजन् । कथभूतो विरक्त पुमान अनाविछ रागपाद्यनाफुल ॥१२॥ इति राम्यप्रक्रम।

सूक्तिमुक्तावली १२३ अर्थ-पिरत पुरुष ससार के विषय भोगों को फाले सर्प के कण के समान भयकर जानकर, राज्य को धूलि के समान बानकर, माई आदि कुटुम्बी जनों को पध के कारण मानकर, इन्द्रिय विपयों को विष मिश्रित अन के ममान जानकर, धन धान्यादि विभूतिको माम की। बहिन समान जानकर, खोजनित सुस।फो तृणतुल्य "जानकर तन पदायों में अर्थात् भोग, राज्य, पघु, विभूति, स्त्री में थासक्ति को छोडकर भत्यात विशुद्ध होता हुआ मुक्ति को प्राप्त मावार्थ-ये इन्द्रिय-भोगादि महान् दुसदाई हैं इनको स्याग कर, विरक्ति धारण कर, मुक्ति पद की प्राप्ति के लिये सतत प्रयत्नशील रहना हो मानव मात्र का कर्तव्य है। अथ सामान्योपदेशमाह- उपे द्रवशाहद जिनेन्द्रपूना गुरुपर्युपास्तिः सत्यानुकम्पा शुमपानदान। गुणानुरागः 'श्रुतिरागमस्य । नृजन्मक्षस्य फलान्यमूनि ।।९३॥ व्याख्यान मवृक्षस्य , मनुष्यनमवये अमूनि फलानि एते कृत्वा मनुजज मसफल भवति अमूनि कानि प्रथम ताजि- नंद्रपूना श्रीवोवरागदेवश्य पूला कार्या। पुन गुरूणा पर्युपास्ति सेवा कार्य । पुन सवाना जीवाना अनुरुपादया कार्या। पुन शुभपाने - १२४ सूपिमुपावली दान देय । पुन गुणेषु अनुगग गुणमहणेण रति' कार्या। पुन' आगमस्य सिद्धा तस्य श्रुति अषण फाय । एमि श्यामनुष्यन मसक्छ स्यात् ।।१३॥ अर्थ-पोतरा। जिनेद्र देर की प्रतिदिन पूजा करना, दिगम्बर साधुओं की सेवा सुपा करना, समस्त प्राणियों पर दया का मात्र रखना (अयात "आत्मन प्रतिकूलानि परेपा न समा चरेत्" । अपने से विरुद्ध व्यवहार दूसरों के साथ मत फरो) जैसे प्रत्येक पुरुप को अपने प्राण प्रिय हैं वैसे ही दूसरे के प्राण समको । ऐसा ज्ञात कर सब जीवों पर दया की परिणति रखना चाहिये ), पार सुपात्रों को भद्धा पूर्वक दान देना, गुण में प्रीति करना (गुण- या धर्मात्मा पुरुषों के भवलोकन मात्र से ही हृदय में हर्ष की लहरी प्लावित हो लाय या पह उठे ऐसा पं प्रगट करना), जैन शास्त्रों का सुनना अथवाशास्त्रों का पठन पाठन मनन आदि मभ्यास फरना, ये मनुष्य-जम रूपी वृक्ष के फल है। इन पटकर्मों के आचरण करने से ही मनुष्य मम की शोभा-शोमाजनक है । मनुष्य जम धारण करके यदि उपरोक षट्कर्मों का पालन जीवन में नहीं किया तो मनुष्य पर्याय पाना इस प्रकार निष्फल है जैसे कि ऊपर भूमि में योज-यपन करना ( योना) व्यर्थ है अथवा पापाय पर कमलों का वन उगाने के समान विफल है। इसलिये प्रतिदिन प्रत्येक गृहरप का कर्तव्य है कि परस्पर विरोध रहित इन पट्कर्मों के भाचरण से अपने जीवन-विटप को हरा भरा बनाये रखें।

सूक्तिमुक्तारली शिखरिणीछद त्रिसंध्य देवार्चा घिरचय चयं प्रापय यश । श्रिया पाने पाप जनय नयमार्ग नप मनः॥ स्मरझोपावारीन्दलय कलय प्राणिपु दया । जिनोक्त सिद्धान्त भृणु घृणु जवान्मुक्तिकमला ॥९॥ व्याया-सिन्ध्य त्रिकाल प्रमाते मध्याहे साय व देवाची श्रीवीतरागपूला मिरचय कुरु । पुन यश कीर्तिचय घृद्धि प्रापय । मियो लक्ष्म्या पाने मुपाने वाप जनय प । पुनर्मन चित्त नयमार्ग ‘यायमार्ग प्रति नय। पुन म्मरमोधाधारीन कामोधमानमाया- लोभादीर भरीन् शत्रून दलय सदय । पुन प्राणिपु जोगेषु दया कलय कुरु । पुन जिनोक्क भई प्रणीत सिद्धात सूत्र शृणु । एतानि करवा जवात् वेगात मुक्तिकमला शिवप्रिय वृणु वरय ।। ६४ ॥ अर्य- भव्य । प्रात काल मध्याह्नकाल और सायकाल इन सीन कालों में वीतरागदेव की पूजा करो, यशसमूह [ कीर्ति को] प्राप्त करो, पात्रों को दान देकर लक्ष्मी का योज योभो, मन को न्यायमार्ग में लगाओ, कामक्रोधादि वैरियों को विध्वस करो, सब प्राणियों पर दया करो, वीतराग देवका रहा हुआ सिद्धांत सुनो और शीघ्र ही मुक्ति रूपी लक्ष्मी का वरण करो। भावार्य-आचार्य उपदेश देते हैं कि हे भाई ! अनन्त काल से कठिनता से प्राप्त किये गये इस मनुष्य भय को पाकर ऊपर कहे गये कार्यों को परो साकि मोक्ष लक्ष्मी तुम्हें शीघ्र ही प्राप्त हो।

व्यारया- 1 '१२६ सूचिमुक्तावली शार्दूलविक्रीडिशरद कृत्वाईत्पदपूजन यतिजन नत्वा विदित्वागमै । हिला सगमधर्मकर्मठधिया पात्रेषु दत्वा धन ।। गत्या पद्धतिमृचमकमजुपा नित्तान्तरारिबन । स्मृत्वा पञ्चनमस्त्रियां कुरु करकोढस्थमिष्ट सुस ॥९॥ -भो श्राद! एतानि वा इष्ट पाछित सुस कर कोडरय हस्तोत्संग करप्राप्य कुरु । कि कृत्वा अईस्पदपूजन वीतराग- घरणपूजा कृत्वा । पुनर्यतिनन साधुजन नत्वा । पुनरागम सिद्धात विदित्वा झारया श्रुत्वा । पुन अधर्मकर्मठधिया पापासतयुद्धीना सग ससर्ग स्यकस्वा परित्यज्य 1 पुन पानेषु निज घन वित्त दया । पुना उत्तमम्मजुषा उत्तममार्गसविना पद्धति मार्ग प्रति गत्वा अनुनित्य धातरारिराज अतरगारिपड्वर्ग आभ्य तर रिसमूह जित्या । पुन पचनमरिक्रया नमस्कारमत्र स्मृत्वा ध्याना इटसुस फरप्राप्य फुरु विधेहि ॥ १५॥ पथ-हे भव्यात्मन् ! भरिह त देव के चरण कमलों की पूजा करके, भाचार्य उपाध्याय साधुजनों को नमस्कार करके, जिन- भाषित शास्त्रों को जान करफ, निर तर अधर्म काय में रत रहने वाले दुष्ट पुरुषों की सगति छोड़ करके, पात्रों में दान देकर उत्तम भाषरण के धारी सत्पुरुषों के मार्ग का अनुकरण करके अतरज के रागद्वेप कामक्रोधादि शत्रुओं को जीत करके और णमो भरहता णम्' इत्यादि पच नमस्कार मंत्र का जाप करके इष्ट'सुख मोक्ष 'सुस को अपने हस्त के मध्य प्राप्त करो। .

सूक्तिमुक्तावली हरिणीछन्द प्रसरति यथा कीर्तिर्दिक्षु सपाकरसोदरा:- भ्युदयजननी याति स्फीतिं यथा गुणसततिः। कलयति यथा वृद्धि धर्मः कुकर्महविक्षमः । कुशलसुलभ न्याये कार्य तथा पथि वर्तनः ॥१६॥ व्याया-न्याये न्यायोपपन्ने पथि मागे तथा प्रवर्तन कार्य प्रति कार्या यथा चतुर्पु दिनु क्षपाकरसोदरा चन्द्रकिरणवदुज्ज्वला कीर्ति प्रसरति स्फुरति यिस्तरति । पुनर्यया अभ्युदयजननी उदय- कारिका गुणसनति गुणश्रेणि स्फीति याति विस्तार प्रजाति । पुनर्यया कुकर्महतो पापहनने क्षम समर्थो धर्मो वृद्धि कलयति पृद्धि प्राप्नोति। सया याये पयि न्यायमार्गे प्रवर्तन कार्य । कथभूते याये पथि पुशले- रचतुरपुरुष सुलभ सुपाप सुखेन लभ्यस्तस्मिन् ।। ६६ ।। अर्थ- भव्य पुरुष ! जैसे चन्द्रमा की चादनी के समान निर्मल कीर्ति दशों दिशाओं में फैले, जैसे-स्वर्गादि सुखपद गुणों के ममूह सुरायमान हों, और जैसे पोटे कमों का नाश करने में समर्थ धर्म वृद्धि को प्राप्त हो इस प्रकार कल्याण है सुलम जिसमें, ऐसे न्याय मार्ग में प्रवर्तन करना चाहिये। भावार्थ-प्रत्येक पुरुष को ऐसे न्याय मार्ग का अनुसरण फरना चाहिये जिससे दशों दिशाओं में उसकी धवल कीर्ति फैले, दोप मतति दूर होकर आत्मा में मम्यक्त्य आदि गुण प्राट हों, धर्मकी वृद्धि एष प्रभावना प्रगट हो। ऐमा आचार्य श्री का उपदेश है जिसे पालन करना एव अपना जीवन तप धनाना मनुष्य मान का फव्य है।

१२९ सूक्तिमुक्तावली शिसरिणीपद करे श्लाम्यस्त्यागः शिरसि गुरुपादप्रणमन । मुसे सत्या वाणी श्रुतमधिगत च श्रवणयो । हदि स्वच्छा चि जियि भुजयो पौरुषमहो। विनाप्यश्वर्येण प्रकृतिमहतां मडनमिद ॥९७।। व्याया-अहो आश्चर्ये प्रकृतिमहता स्वभावनोत्तमाना पुसा ऐश्वर्येण साम्राज्येन विनापि इद मडन अस्ति इदमिति कि। करे हस्ते त्यागो दान श्लाघ्यो मडन न फकरणादि । पुन शिरसि गुरुणा पादयोश्चरणयो प्रणमन नमस्कारफरणमेव मडन न मुकुट तिलकादीनि । मुखे सत्या पाण्येव मढन न साम्यूलादि । श्रवणयो फणयोः अधिगत पठित श्रुत शानमेव महन न कुढलादि। हदि हृदये स्वच्छा निर्मला ति व्यापार एव महन न हारमालादि । मुनयो पाहोविजयि जयनशील पौरप पराक्रमो धर्मविषये यबल वदेव मडन न कयूरादि । महता पु सा धन पिनापीदमेवमदन ॥४॥ अय-हायों में प्रशसनीय दान, मस्तक में निप्रय गुरुओं के चरणकमल को नमस्कार, मुख में सत्य वचन, कणों में प्राप्त हुआ शास्त्र ज्ञान, हदय में निर्मल विचार और मुनाओं में सबको विजय करने वाला पुरुषार्य, बहो यदा भाश्चर्य है कि सज्जन पुरुषों का यह भूषण ऐश्वर्य यिना ही होता है। भावार्थ -सजन पुम्प समाव से ही अपने हाथों से धान देते हैं । दिगम्बर निर्गय गुरुओं के चरणारविद को विनय पूर्वक मस्तक से नमस्कार करते हैं मुख से सदा सत्य भाषण करते हैं। J सूक्तिमुतायली १२६ कणों से पवित्र जैनसिद्धात के शाखों का प्रवण करते हैं, जिसके हृदय में सर्वदा निर्मल विचार धारा प्रवाहित रहती है और जिनकी मुबाओं में सर्व विषयो पुरुषाय विद्यमान रहता है । अपर कहे गये यही कार्य सज्जन पुरुषों के आभूषण हैं। अन्य सोने चादी के आभूषण तो कहने मात्र के हैं उनसे मनुष्य अल्म की शोभा नहीं है और न उनसे आमा का बयान होता है। भत सानन महा पुरुपों के उपरोक्त गुण उपादेय हैं, उन्हीं से आरमाओं का कल्याण हुमा है और होगा। T N शिसरिणीछन्द भवारण्य मुक्त्वा यदि जिगमिधुर्मुक्तिनारी । तदानी मा कापी विपयविषयक्षेषु वसति ।। यतरछायाप्येा प्रथयति महामोहमचिरा- दय जन्तुर्यस्मात्पदमपि न गन्तु प्रभाति ॥९८॥ --भो श्राद्ध । यदि वेद् भवारण्य ससाररूपा पदवी मुक्त्वा त्यक्त्वा मुक्तिनगरी सिद्धिपुरी प्रति जिगमिपुरसि गतुकामोसि सदानी स्व विषयविषयक्षेपु विषया व विषवृक्षारतेषुवसति निवाममा फार्मा व्यथा कुत यामात कारणात् एषा विषयविषवृक्षाणा छायापि महामोह मदज्ञानप्रथयात विस्तारयति । यस्मामहामोहादय अन्तु प्राणी अचिराद् वेगात पदमपि गम्तु एक पादमपि चलितु न शक्नोति किन्तु स्थावरत्व प्राप्नोति ॥१८॥ अर्थ-हे भव्य ! यदि तू ससार रूप मयार वन को छोड़ कर मुषिरूपी नगरी के प्रतिगमन करने की इच्छा करता है तो इंद्रियों .

सूचिमुक्तायली फे विषय रूपी विष वृक्षों पर निगास मत कर। क्योंकि इन विषय रूपी वृक्षों की छाया भी शीघ्र ही महामोह को उत्पन्न कर देती है। जिस महान मोहमें फंसकर प्राणी एक पैर भी आगे नहीं चल + सकता। । भावार्थ-इन्द्रियों के विषय विप वृक्षों के समान हैं। इनको सेवन करने वाला या इन विषयों में अ घा हुमा [भनुरक हुआ ] भाणी कदापि मोक्ष पद प्राप्त नहीं फर सकता। इसलिये मुमुख [ मोक्ष प्राप्त करने के इच्छुक ] भव्य पुरुष को कदापि इन विषय वासनाओं का सेवन [ससग] नहीं करना चाहिये कि तु इन विषयों को किम्पाक [ कि दूरी] फ्ल समान जान कर त्याग करने का हो लक्ष्य रसना चाहिये । और इस लदयको सिद्धि में अनेकों सकटों का सामना भी करना पड़े तो भी उसकी परवाह न करके सतत प्रयरन- शील रहना चाहिये। तया आत्म-निर्मर होकर एष सहिष्णु पन फर उन सकटों-आपत्तियों को समताके साय सहन करना चाहिये । जय तक इस मार्ग का अनुसरण नहीं किया जायगा तब तक कदापि कोई भी पुरुप अपने लक्ष्यको सिद्धि तक नहीं पहुँच सकेगा यह एफ निश्चित सिद्धा त है। इसी में प्रत्येक प्राणी का कल्याण निहित है। आधुनिक भौतिकवाद विचार के लोग भले ही उस मुमुनु को पुरा यतायें, उसकी निदा फ्रें, उसे फायर कहें या मार्ग-शिथिलता के भनेकों प्रलोमन प्रदर्शन करें परतु उस दूषित वातावरण की ओर दृष्टिपात न करके अपने लक्ष्य की सिद्धि में आगे बढ़ता ही चला बाये।

सूक्तिमुक्तावली
अमिताति श्रावकाचार में आचार्य अमिताति ने कितना
কাম মৰিয়াৰবৰিাই
-
मुपियादनसनेन धर्म,
मुन्वन्ति स तो न जुधाचनीयम् ।
ततो हि दोष परमाणुमात्रो,
धर्मव्युदासे गिरिराजतुल्यम् ॥
आशय यह है कि भज्ञानियों द्वारा अपवाद किये जाने पर
एवं पीड़ित किये जाने पर भी सजन मुमुक्षु पुरुष अपने लक्ष्यभूत
पर्म को कभी नहीं छोड़ते क्योंकि वर्तमान समयका दुख तो परमाणु
मात्र है जो कि नहीं फे घराघर है किन्तु परके अपवादादि से धर्म
को छोड देने में सुमेरु पर्वत तुल्य न निगोद के दुखों को भोगना
पड़ता है जिसमें असरव्यात अनतमय दुखों में ही व्यतीत होते हैं।
इसलिये धर्म मार्ग में सदा टिपर दृद रहना चाहिये । और भी
अमितगति भाचार्य ने कहा है
सर्वेऽपि भावा' सुपकारिणोऽमी।'
मर्यात धर्मेण विना न पुसाम ।।
विन्ति वृक्षा' फळ धुप्पयुक्वा ।"
फाल किया पतुः मूलहीना ॥
मंसार में जितने पदार्थ सुखकर प्रतीत होते हैं या सुखदाई
देखे जाते हैं उनमय मा मात्र कारण धर्म सेवन ही है, धर्म
सेवा केफ से ही सप सुख के साधन सुलभता से अपलब्ध होते
है एष सदा मुम्बफर सामग्री का समागम बना रहता है। पिना
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चिगुपयली - धर्म पालन के पापरूप प्रवृत्ति से कोई भी पदार्थ सुपकर सिद्ध नहीं - हो सकता जैसे कि फल फूल पत्ते वाले वृक्ष जिनकी कि बडे काट दी गई ये कितने समय तक हरे भरे रह सकते है किन्तु किंचित्काल के पश्चात् ही ये मुरमाकर शोभाविहीन विरूप प्रतीत होने लग जाते हैं। इसी प्रकार धमता रहित प्राणी के लिये कोई भी पदाण सुखकर नहीं हो सकता। उसके लिये तो मारा ससार शून्य अधकारमय हो जाता है। इसलिए जो भव्य पुरुष धर्म की रक्षा करते हैं धम को पद्धापूनक धारण करते हैं । सपत्र धनकी रक्षा करने वाले सैकड़ों हजारों माधन सुलभता से अनायास ही आकर प्राप्त हो जाते हैं। अत धर्म से बद कर कोई भेट पदार्थ सेवा योग्य नहीं है, धर्म ही जीवन का प्राणघार है, सर्वाधार है और सय असार है | पद्रवमाद सोमप्रभाचार्यप्रभा च लोके । वस्तुप्रकाशं कुरुते यथाशु ।। तथापमुच्चरुपदेशलेश, शुमोत्सवज्ञानगुणांस्तनोति ।। ९९ ।। व्याख्या-यथा येनप्रकारेण लोके मुवने सोमप्रमा, चन्द्र- प्रमा, आचाय प्रभा, आचाय प्रतिमा च-आशु शीत वस्तुप्रफास घट- पटादिपदार्थप्रकाश कुरुते विदधाति तथा तेन प्रकारेण अयश्रयमाण उपदेशलेश सूक्तिमुक्तापलिरूप समुपदेश एवं उत्कृष्टान शुभोत्सव सूति मुक्कावली हानगुणन कल्याणप्रदज्ञानगुणान् मोति विस्तारयति अत्र श्लेपेण पवना सोमप्रमाचार्य इति पनामापि सूचितम ॥ ६ ॥ 'इति सामा यप्रक्रम अर्थ-जिस प्रकार लोक में चन्द्रमा की प्रभा और आचार्यों की प्रमा [ प्रतिभा } शीघ्र ही वस्तुओं { पदार्थों } का ज्ञान कराती है इसी प्रकार यह भादर्श स्वरूप किश्चित् आचार्य या उपदेश मी উলঙ্কা হ্রম দ্য বা প্লানাদি যা ফা নিংরা জানতা है। मत मध्यात्माओं का कर्तव्य है कि श्रद्धापूर्वक इस उपदेश को हृदयङ्गम करें। । अथ प्रशस्तिमाह मालिनीछन्द अमजद जितदेवाचार्यपट्टोदयाद्रि-। घुमणिविजयसिंहाचार्यपादारविंदे ॥ मधुकरसमता यस्तेन सोमप्रमेण । परचि मुनिपराशा सूक्तिमुक्तावलीय ॥१०॥ व्याख्या-तेन सोमप्रमेण मुनिपरामा मुनिपा मुनिश ग्वेषा राजा मीश्वरस्तेन मुनिपगा सूरीश्वरेण इय सूक्तिमुक्तावली सूक्ता पेय मुभाषितान्ये 'शोभनातायकायान्येव मुक्ता मौक्ति- कानि मुक्ताफलानि नेपा आवली' मेरिचि रचिता न फेन य सोमप्रभ अजितदेयनामाचार्यस्य पढें एष ३६याद्रिस्याचल धुमाए सूर्यसमान विजयसिंहाचायाताय पादारविंदे घरणकमले १३४ सूषिमुक्तावली मधुकरसमता भमरतुस्यता अमनत् मप्रापत । पूर्व अजितदेवाचार्य स्तत्प? विजयसिंहाचार्गस्तर सोमप्रमाचार्गरसेनेय सिंदूरकर. नामसूचिमुक्तावली व्यरचि ता॥१०॥ सोमप्रमरिणा विरचिता सूक्तिमुक्तावली समाता। श्रय-जो अजितदेव भाचार्य के पट्टरूपी उदयाचल पर सूर्य समान विजयसिंह भाचार्य के चरण रूपी कमलों में भ्रमर पी समता परता था (अर्थात धरण कमलों का सेवक था) उस सोम- प्रम आचार्य ने यह सूक्तिमुक्तावली (उत्तम वचन रूप मोतियों की माला ) नामक प्रथ रचा। नोट-'इति भीसिंदूरप्रकराख्यस्य व्यारयाया हर्षयोतिभि सरिमि विहिताया सामान्यप्रकमोऽअनि । समाप्तोऽय प्रथ। १ प्रत्येक प्रकरण की समाप्ति पर यह पुष्पिका पाक्य है । १०६ पृष्ठ का यह ८१ या श्लोक है- । पात्रे 'धर्मनिष पन तदितरे, श्रेष्ठ दयाल्यापफ । मिन, प्रोतिविषधा रिपुजने, वैरापहारक्षम || मृत्ये भक्तिमरावह नरपती समासपादः। भट्टादौ सुयशस्कर वितरण, न क्वाप्यहो निष्फल ॥ इति दान प्रक्रम १ धर्मस्य कारण २ अपात्रे ३ पान विहित दत्त सत् । ।

है - M सूक्तिमुक्तारली. श्रीमफलकाचार्यविरचिता पञ्चपरमेष्ठिस्तुतिः नामयादिनिनेश्वगन् मुनिनुतान् नाकाधिपै पूनितान् । अतातीतगुणार्णवान मुविमलान विश्वप्रकाशारमकान ।। ससाराम्युधितारकान् भवभृता यधूपमा स्वामिन । परे सद्गुणहेतरेऽत्र शिरसा मुक्स्यगनारागिण ॥१॥ भसिलभुवनसेव्यान सर्वलोकाप्रभूस्थान । निरुपमसुरपयुत्तारत्यत्तसमारदु खान् । परवमुगुणभूपान् सानदेहान् विशुद्धयै। पचर विभवपूर्णान् सस्तु सिद्धिनायान् ॥२॥ पश्चाचारमपारसौग्यसदन ये प्राचरति स्वय। शिष्याणा मुनिनायका शिवकरा आचारयन्त्येव | हेपा पाइसरोरुहा, नघहरा-नाचारशुद्धथै सदा। सूगेणा प्रणमामि भक्तिसहितो मूर्नाऽधशात्य मुदा ॥ ३॥ ये पठान सकलागममेध, पाठयति शिरद बरशिष्यान् । वे स्तुता मम दिशतु गुणोधान, पाठका सम्पयारमभवाश्च ॥४॥ ये साधयति घरण सुसरत्नवाधि। । दृरज्ञानशुद्धमनिश विविध च योग ॥ ! आतापनादिलमपोह 'दिशन्तु ते मे। श्रीसाधयोऽत्र नमिता गुणान् गरिष्टाम् ॥५॥ भई तस्निगदबुधार्षितपदा समुक्तिमुकिरदा। सिद्धा ये गुणाद्विता अवपुपो ये सूरयोऽध्यापक पश्याचारपरायणाश्च निपुणा भीसाधवो निस्पृक्षा 'ते पायाध भयाऽखिलानिजगुणान् सर्वान्प्रदार्मम १६॥ " 1 T इति पश्चगुरस्तुति ।

सूक्तिमुक्तारली १०८ श्रीथाचार्यकल्प श्रीश्रुतसागरस्तुतिः सिद्धातवेदी श्रुतपारगो य, वाग्मी पटु सतप्रपरस्नधारी। अधिन शीलगुणाकरश्च, नमाम्यह श्रीश्रुतसागर ॥१॥ स्वाध्यायनिष्ठो यमिना परिष्ठ श्रेष्ठो विरागी महता महिष्ट । ज्येष्टो मुनीशो गुणिना गरिष्ठ ईडे सदा त महिमाविशिष्ट ॥२॥ स्यत्वा सुपुत्रादि कुटुम्यित्रगान धर्मानुयूला रमणीमनिन्द्या । भीषीरसिधु गुरुमाप मोदाद् दीक्षा श्रितोजातजिनेद्ररूपा ॥३॥ श्वेताम्बरे धर्मफुले सुजम दैगम्बरे धर्मपये दीयान् । दिग्वत्रमृ मोक्षपयानुरागी पदे मुनीद्र युतसागर त ॥ ४ ॥ नित्य हि सूरेनुकूलवृत्ति कुवस्तथासी सलु मरिकल्प। स्यागी सदाभ्यास्मिकबोधनिष्ठ जीवादसी वर्षशत पृथिव्या ॥५॥ भव्याजनीना स विभाम्बर सन् मता ताम्भोनिधिपूर्णचद । विवादिनागवंविसादनाय स्याद्वादवाग्यमयुत स्तुये स॥६॥ अध्यात्ममूर्ति फिल सयमी प प सशयध्या तहरो विवस्वान् । योगी सदानिश्चयत स्वविच्च स्तुवेऽपि त मव्यवहारविज्ञ ॥७॥ नयामितेर्वाग्मिरतीयद: श्चचासमाया पलु लब्धकीर्ति । युश्या महत्या स्फुटयत्यशेष सरव अ ताधि तमह प्रवन्दे ॥८॥ वात्सल्यमूर्तिश्च कृपापयोधि सघे गरीयान् फिल साधुष । साध्वीश्च नादान मृदुमिष्टयाक्य सतोपयात शिरसा नमामि ॥३॥ नमोस्तु ते धमधुर घराय नमोस्तु ते भव्यहितकराय । नमोस्तु ते घोधिसमाधिभाने नमोस्तु ते माधुगणार्चिताय ॥ १०॥ नमोस्तु मुनिवर्य ! ते सकलतापश्चद्रमा । नमोस्तु गुम्वत्सलस्व गुणरत्ननिघये च ते || क्यिाद्धि जगता शिव मधुरवाफसुधा वर्षयन् । पुनातु भविना मन शुपिचरित्रपूतो भवान् । मया सस्तूयते निरय श्रुतसिग्घुर्मुनीश्वर ।' कुर्याच्छिय सुमन्याय मा धनगतेऽपि च ॥

श्लोकानामकाराद्यनुक्रमः श्लोक पृष्ठ मदत्त नादत्ते अपारे मसारे সমসরিই अवधमुक्त पथि असत्यमपश्यय १०० २० ३१ [भा भारमान फुफ्थेन आयुर्दीपतर वपु औचित्याचरण ३६ [ो] . १२८ ४२ पदाचि मातङ्क करे श्लाप्यस्याग फलहकलमविध्य का तार न यथेतरी कालुष्य जनयन् विध्यानेन भवत्य क्रीडाभू सुस्तस्य कुशलजननबध्या कृत्वाहरपदपूजन २४ २५ ६६ १२६ [प] घन दत्त वित्त ८९ । पाnिe सुम्ति १५८ श्लोक चारित्र चितुते तनोति {न] लात कल्पतरूः निने द्रपूजा गुरु ६० १३ १२३ [] तमभिलपति तस्यासना रवि तस्याग्निजल मणव से घत्तरता पन्ति सोयत्यग्निरपि त्रिसध्य देवार्चा १२५ निवर्गसाधन दत्तावन अगस्य दायादा' स्पृहयन्ति रारिद्रप न धमीक्षवे पत्ता मौनमगार धमध्वस धुरी धर्मध्वस्तदयो धर्म जागरयत्यय । २६ [] नदेव नादेव २६ मप्र परदूषण ६४ एलोक पृष्ठ नमाया देवाना निम्न गच्छति निम्नगेव निशेषधर्मवनदाइ नोपयापि चिर नौरा वरूपी ११२ [] १३४ दर १५ परजनमन पीडा पाप लुम्पति दुगविं पाने धर्म निधन पिता मावा भ्राता पीयूष विपवन प्रत्यर्या प्रशमस्य प्रतिष्ठा मिटा प्रसरति यथा कीर्वि २८ १२७ [क] फलति मलितश्रेय [म c भवारण्य मुक्त्वा यदि भक्ति तीर्थकरे गुरी भोगान कृष्णभुजङ्ग १२६ १२ १२२ १२ [ म] मानुष्य विफल बत मायामविश्वास मुग्धप्रतारणपरा मुष्णाति य कृत ५६ ६८ श्लोक ५८ - मूल मोइविषमस्य -- [य] ४ २६ EL य ससार निरास य प्राप्य दुष्पाप्य य पुष्पंजिनमर्चति यत्पूर्षितपर्मशैल यद्भक्के फलमदादि यदि प्रावा तोये यदगुभरज' यदुर्गामटवी निवर्तित कीर्ति यशो यामाद् । यस्माताविर्मवति यस्माद्विप्नपरम्परा यो धर्मदहति यो मित्र मघुनो ११८ ७४ ३५ ३० ४२ ४५ [] रत्नानामिव रोपण ३१ [0] लाधु बुद्धिकला लक्ष्मी कामयते १०५ लक्ष्मी स्त स्वयम्. लक्ष्मी सर्पति २३ ७६ पर विमवध्यक्षा ८१ १४१ ४ श्लोक ६१ ४४ १४ वर क्षिा• पाणि वह्नि स्तृप्यति विदलयति फुरोध विधाय माया विधि विकवनसारिणी विश्वामायतन व्याघ्र व्याल जलानला ८७ रामालान भजत् ५० [स] ११४ ८६ २ ६२ स फमलपनमग्ने सी बीपश्यति सत सतु मम प्रसन सवाप तनुते स तोपत्थर मूल सिदुरप्रकरस्तप मोमप्रमाचायप्रभा सीजयमेव विदधाति पतस्य गृहालय स्वर्णस्याले हिपति १ १३२ ८ trj ५६ हरनि कुमति मिते हरति कुलपलक हिमति महिमाम्मोजे १४२ टीकागतश्लोकानुक्रमणिका पृष्ठ श्लोक भकरयाने भवेच्छील भथिनो धनमप्राप्य कलो काले चले चित्त कि जपिणेन बहुगा ३३ . १०२ गवाशनानास वच' क्षितिगतमिव चोल्लय पासय जिने भक्ति जिने যখতিঃ दसणभट्टो भट्टी द्वेपेऽपि योधकर ঘখিকাসমীক্ষায্য मोगे रोगभय माताप्येका पिताप्येक मूखापवादासनेन शुचिर्भूमिगत २१ Pe ६ १२० सऽपि भावा १३१ टीकाकर्तुः प्रशस्तिः तपोगणे नागपुरीपपूर्व श्रीचन्द्रकीर्त्यायमूरिराजा । तेषां नियमहर्षकीतिरीश्वरो चिमिमामकार्षीत् ।।

शुद्धि पत्र पृष्ठ प. २ ११ . २ १० . ३ १ १२ १२ ११ १२ २० १४ ४ १४ १० भशुद्ध सद्गरूणा सद्गुरूणा श्रोतृन् श्रोत न मान शान प्रारमे प्रारम्भे यानय यानया अथनर अयपुनर्नर निद्रा निद्राग्नेह ऐन्धभार एधभार माचरता माचरताच काचरखण्ड काचखएह माराघयता माराघयता च श्रीधर्म श्रीजिनधर्म श्रीधर्म श्रीजिनधर्म द्वारेण द्वार भक्ति भक्ति যকিলাৰ भक्तिद्वार भव्य भव्य । कुर्वता फुर्वताप पुनयान श्रीजिन जिनपूजा जिननाातुति पूजाविधिस्तुति भनेन पूलानुतिविधि तु भागमानास्वा तेने यावदय यादय सेषमानाना सेवमानाना सवा पत्रमूतो पवन्त पत्तगत 1 १६ १३ २१ २१ २३ १.

अशुद्ध भधम पृष्ट १० २३ १४ २३ १८ २५ २४ २३ १ स्वल्पफल गुरो ६ २६ अघम च सता स्वावफल गुरो शासन भवनाशन मसार परिभ्रमणधारण यतोयेनकन पुन किनविलोक ते अदेव फुदद पुन किन पिलोकते पुन किन विलोक-ते कुगुरु पुनः किं न विलोक ते पुन किं न विलोक- पुन कि न विलोक ते पर्यात पुन' किं न विलोक ते पुन किं न विलोकते सुचातुर्य न विलोक पुन पुन कुगुरु पुन पुन पुन पश्यति पुन पुन सचातुय हित सुखकारण २६ १. २६ ११ २६ १२ २६ १७ हित सुस सुम्वकारण अशुभकारण कुर्वता शत दुःसकारण तच्ट्रयण कुर्वता अप्त किं विशिष्ट समय दयारसमय दया कृपाएवं रसो गुण स्वेन निमितो योसयारसमयो ट्यागुण प्रधान इत्यथ . पृष्ठ प. २८ ३ ३ अशुद्ध भाव कुर्वता धमस्य मिथ्यामति तनोति प्रणीतमिद्धात आराधयता ८ भाव तरङ्गीकार कुता धर्मस्य मिध्यामति वितनोति श्रीनिनप्रणीतसिद्धान्त लदाराघयता मो भव्यप्राणिम् । इति चमता रभसाद उरएठया ३३ ३ रममा उत्कठ त जिन ३५ १० C " कृत्वा यस्मिन् तस्मिन सच्चेपु सर्वसत्त्वेषु मित्यथ मित्याद क्लेशे क्लेशे पुन पथमूता त्रिदि- त्रिदिवावर्ग एव भोको यौकस निणि गृह तस्य निधि सोपानक्ति उदयति दयते ३६ २२ ३७ २२ पुन यदि प्रस्ते ३ प्रसूयते तथा तथा उरगनादमृत सर्पमुग्यात् पीयूषमिलपति तथा स्वामित्व ४० स्वामित्य " ४२ विचित कृत १४६ पृष्ठ 4. अशुद्ध शुद्ध स मधु ६ पुनरसत्यवचनस्य अथामत्यरचनस्य ४२ १३ तत कि तत किं ३ सत्यमेव मत्यमेव वध' ४५ २ वाच्छति घान्छति ३ शिक्रत्वादि स्वक्रित्यादि दोगत्येक दौर्गत्येक सर्वागस सागासि ४८ विरचित ४८ १२ मदश अदच न्य पुरार्गला पुरार्गल ५२ ३८ वें श्लोक कार्य ३६ में ३१ वैमा अर्थ ३८ चे पर पदं अविलव माविलव १३ विविक्तमना विपित्तात्मना ঘনতি धन द्रव्य द्रव्य समाजियो ६१ सोदरोग्ने सोदरो १ वनाथ २ विना सह भोगशिने विनाशने मोचित्य मौचित्य कदारूप कष्टरूप विक्षपन् विक्षिपन् विनयनय विनयवन १ न्यायरिण बननेणि विलम्पति विलुम्पति सप्ताधियो चैत यस्य १४ १८ 1 ४ ४ मत्तगनो माज सुरान् सुखाद् सुसान् सुसात मुग्नहोते मुज्जिहीते क्षण क्षेत्रादि क्षेत्रादिकर्षण राजघटात गजघटान्त मर्पति मपन्ति लिङ्गत्व लिगत्वान्नपुसकत्व भरणीकाय अरणि का धरितामना चरितार्जिता नतुन शेफाजाता शेफसजाता गुणसङ्ग निर्गुणिसद्ग যমদূন্য शमदय अल्पमेधा भल्पमेध तथा भव रुयख्या व्याख्या तस्वि विधातु विचरितु पुण्य समासेविनु समोहसे x न कथमपि निर्गुणमन्न निर्गुपिसमा निगुणसगम निगुणिसद्गम x मम तस्य पहिर मह गुनिमिरानीन सपनोतो गया। विधिप्रागल्भ्य খিলিল ८४ २१ EU Ce प. ६ है फुपये फुरिसतपथे ६५ १५ अधता पत्ते १०३ २६ १०४ ४ १०६ ११ ११८ १. ११८ १२ ११८ १५ ११८ १५ अगुद्ध पर फुमते कुरिसतमते सुखे अघता दचे खेद श्रिय परिभवन सादेव ससारहितो घधन विरतिरमणी देशविरति पष पिया परिभवो सपदेय समारहितो पधने विरति मवरेशविरति मेघपटात १२१ १३ १२४ १ मेघसमूह भवेत स्यात गुणप्रहणेए यश गुणमहणे यशश्चय

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Shri Somprabhacharyavirchit Suktimuktawli

Author
Suri,shri Harsh Kirti
Title
Shri Somprabhacharyavirchit Suktimuktawli
File name
Shri Somprabhacharyavirchit Suktimuktawli
Text
OCR done
Citation
1951
Published
2011/02
Publisher
Shri Mahaveerji,digambar Jain Santha
Language
Sanskrit
Pages
156
Library
Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Classification
Devotional
DLI number
549688
Barcode
99999990030157.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
ZlM1AapfjCD
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