Banasthali University
The Sociology Of Georg Simmel
Front matter
मुद्रक-प्रकाशक- घनश्यामदास गीताप्रेस, गोरखपुर सं० १६६० प्रथम संस्करण ३२५० मूल्य ॥2) दश आना पता- गीताप्रेस, गोरखपुर श्रीहरिः प्रार्थना महाभारतमे भगवान्के अनन्य भक्त पितामह भीष्मद्वारा भगवान्के जिन परम पवित्र सहस्र नामोका उपदेश किया गया, उसीको श्रीविष्णु- सहस्रनाम कहते है । भगवान्के नामोकी महिमा अनन्त है। हीरा, लाल, पन्ना सभी बहुमूल्य रत्न है, पर यदि वे किसी निपुण जडियेके द्वारा सम्राटके किरीटमे यथास्थान जड दिये जायें तो उनकी शोभा बहुत बढ जाती है और अलग-अलग एक-एक दानेकी अपेक्षा उस जडे हुए किरीटका मूल्य भी बहुत बढ जाता है । यद्यपि भगवान्के नामके साथ किसी उदाहरणकी समता नहीं हो सकती, तथापि समझनेके लिये इस उदाहरणके अनुसार भगवान्के एक सहस्र नामोको शास्त्रकी रीतिसे यथास्थान आगे-पीछे जो जहाँ आना चाहिये था-वही जडकर भीष्म- सदृश निपुण जडियेने यह एक परम सुन्दर, परम आनन्दप्रद अमूल्य वस्तु तैयार कर दी है। एक बात समझ रखनी चाहिये कि जितने भी ऐसे प्राचीन नामसंग्रह, कवच या स्तवन हैं वे कविकी तुकबन्दी नहीं है। गमता और सुन्दरतांके लिये आगे-पीछे जहाँ-तहॉ.शब्द नही जोड़ दिये गये है। परन्तु इस जगत् और अन्तर्जगत्का रहस्य जाननेवाले, भक्ति, ज्ञान, योग और तन्त्रके साधनमे सिद्ध अनुभवी पुरुषीद्वारा बडी ही निपुणता और कुशलताके साथ ऐसे जोडे गये है, किं जिससे वे विशेष शक्तिशाली मन्त्र बन गये हैं और जिनके यथारीति पठनसे इहलौकिक और पारलौकिक कामना-सिद्धिके साथ ही यथाधिकार भगवान्की अनन्य भक्ति या सायुज्य मुक्तितककी प्राप्ति सुगमतासे हो सकती है। इसीलिये इनके पाठका इतना माहात्म्य है। और इसीलिये सर्वशास्त्रनिष्णात परम योगी और परम ज्ञानी सिद्ध महापुरुष प्रातःस्मरणीय आचार्यवर श्रीआद्यशंकराचार्य (२) महाराजने लोककल्याणार्थ इस श्रीविष्णुसहस्रनामका भाप्य किया है आचार्यका यह भाष्य ज्ञानियों और भक्तों दोनों के लिये ही परम आदर- की वरतु है। पूज्यपाद खागीजी श्रीभोलेबाबाजीने भाष्यका हिन्दी-भाषान्तर- कर पाठकोपर बडा उपकार किया है। मेरी प्रार्थना है कि पाठक इसका अध्ययन और मनन करके विशेष लाभ उठावें। गंगा दशहरा हनुमानप्रसाद पोद्दार कल्याण-सम्पादक १९९० निवेदन बहुत दिन हुए, पूज्यपाद खामीजी महाराजने कृपापूर्वक भाष्यका हिन्दी-अनुवाद करके भेज दिया था । कई कारणोसे प्रकाशनमें विलम्ब हो गया। प्रेमी सज्जनोने बार-बार पत्र लिखकर ताकीद की। हर्पकी बात है कि अब यह पाठकोके सम्मुख रक्खा जा रहा है। इसके संशोधन आदिमे पं० श्रीचण्डीप्रसादजी शुक्ल, प्रि० गोयन्दका संस्कृत- विद्यालय काशी एवं श्रीमुनिलालजी. आदि संज्जनोंने विशेष सहायता दी है इसके लिये गीताप्रेस उनका कृतज्ञ है। घनश्यामदास प्रकाशक
No text on this page.
.
.
.
.
सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्र सरसीरुहेक्षणम् ।
सहारनपःस्थलकौस्तुभचियं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम् ॥
श्रीपरमात्मने नमः विष्णुसहस्रनाम पदच्छेद, शाङ्करभाष्य तथा हिन्दी-अनुवादसहित d- . सच्चिदानन्दरूपाय सच्चिदानन्दस्वरूप, अनायास ही कृष्णायाक्लिष्टकारिणे । सब कर्म करनेवाले, वेदान्तवेद्य, बुद्धि- नमो वेदान्तवेद्याय साक्षी गुरुवर श्रीकृष्णचन्द्रको नमस्कार गुरवे बुद्धिसाक्षिणे ॥१॥ है॥१॥ कृष्णद्वैपायनं व्यासं वेदरूपी कमलके लिये सूर्यरूप, सर्वलोकहिते रतम् । शमादिके आश्रय, सम्पूर्ण लोकके हितमे वेदाजभास्करं वन्दे तत्पर मुनिवर कृष्णद्वैपायन व्यासको शमादिनिलयं मुनिम् ॥२॥ मै वन्दना करता हूँ॥२॥ सहस्रमूर्तः पुरुषोत्तमस्य सहस्र नेत्र, मुख, पाद और भुजाओ- वाले सहस्रमूर्तिमान् श्रीपुरुषोत्तम सहस्रनेत्राननपावाहो। भगवान्के सहस्र नामोवाले प्रशस्त सहस्त्रनाम्ना स्तवनं प्रशस्तं स्तवनकी, जन्म-जरा आदिकोशान्तिके निरुच्यते जन्मजरादिशान्त्यै ॥३॥ लिये व्याख्या की जाती है ॥३॥ १ विष्णुसहस्रनाम वैशम्पायनो जनमेजयमुवाच- | श्रीवैशम्पायनजी जनमेजयसे बोले- श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः । युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत ॥१॥ श्रुत्वा, धर्मान्, अशेपेण, पावनानि, च, सर्वशः। युधिष्ठिरः, शान्तनवम् , पुनः, एव, अभ्यभाषत ।। धर्मान् अभ्युदयनिःश्रेयसोत्पत्ति धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने अभ्युदय हेतुभूतान् चोदनालक्षणान् अशेषेण और निःश्रेयसकी प्राप्तिके हेतुस्वरूप कात्स्न्येन पावनानि पापक्षयकराणि सम्पूर्ण विधिरूप धर्म तथा पवित्र अर्थात् धर्मरहस्यानि च सर्वशः सर्वप्रकारैः | पापोका क्षय करनेवाले धर्मरहस्योको सर्वशः~~-सब प्रकार सुनकर और यह श्रुत्वा । युधिष्ठिरो धर्मपुत्रः शान्तनवं समझकर कि अभीतक ऐसा कोई धर्म शन्तनुसुतं भीष्मं सकलपुरुषार्थ- नहीं कहा गया जो सकल पुरुपार्थका साधनं सुखसम्पाद्यम् अल्पप्रयासम् साधक और सुखसम्पाद्य अर्थात् अल्प अनल्पफलम् अनुक्तमिति कृत्वा प्रयाससे ही सिद्ध होनेवाला होकर भी पुनः भूय एव अभ्यभाषत प्रश्नं महान् फलवाला हो, शान्तनुके पुत्र कृतवान् ॥१॥ भीष्मसे फिर पूछा ॥ १ ॥ युधिष्ठिर उवाच- -- युधिष्ठिर बोले- - किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् । स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ॥ २॥ किम् , एकम् , दैवतम् , लोके, किम् , वा, अपि, एकम् , परायणम् । स्तुवन्तः, कम् , कम् , अर्चन्तः, प्राप्नुयुः, मानवाः, शुभम् ।।
शाङ्करभाष्य - किमेकं दैवतं देव इत्यर्थः, समस्त विद्याओके स्थान प्रकाशके खार्थे तद्धितप्रत्ययविधानात् , लोके हेतुखरूप लोकमे एक ही देव कौन है? जिसके विषयमे कहा है कि 'जिसकी लोकनहेतुभूते समस्तविद्यास्थाने आज्ञासे सब प्राणी प्रवृत्त होते हैं। यह प्रथम प्रश्न है। यहाँ 'दैवत' शब्दमे उक्तम् 'यदाज्ञया प्रवर्तन्ते सर्वे खार्थमे (उसी अर्थको बतानेके लिये) इति प्रथमः प्रश्नः। तद्धित प्रत्यय हुआ है, अतः दैवतम्' शब्दका अर्थ देव ही है। किं वाप्येक परायणम् असिल्लोके तथा एक ही परायण कौन है ? एकं परायणं च किम् ? परम् अयनं अर्थात् इस लोकमे एक ही परायण- एकही पर अयन यानी प्राप्तव्य स्थान प्राप्तव्यं स्थानं यसिनिरीक्षिते- कौन है? जिसका साक्षात्कार कर लेनेपर 'भिद्यते हृदयग्रन्थि- "उस परावर (कार्य-कारणरूप श्छिद्यन्ते सर्वसशयाः। परमात्मा) को देख लेनेपर जीवकी क्षीयन्ते चास्य कर्माणि [अविद्यारूप] हृदय-ग्रन्थि टूट जाती तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥ है, सब संशय नष्ट हो जाते है तथा (मु० उ०२।२।८) सम्पूर्ण कर्म क्षीण हो जाते है। इति श्रुतेः हृदयग्रन्थिर्भिद्यते । । इस श्रुतिके अनुसार हृदयग्रन्थि टूट जाती है। यस्य विज्ञानमात्रेणानन्दलक्षणो जिसके ज्ञानमात्रसे ही आनन्द- मोक्षः प्राप्यते; यद्विद्वान्न बिभेति खरूप मोक्ष प्राप्त होता है, जिसका कुतश्चन; यत्प्रविष्टस्य न विद्यते जाननेवाला किसीसे भय नहीं पुनर्भवा, यस्य च वेदनात्तदेव करता, जिसमे प्रवेश करनेवालेका फिर जन्म नहीं होता, जिसके जान लेनेपर भवति, 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' (मु० जो ब्रह्मको जानता है वह ब्रह्म ही हो उ० ३ । २ । ९) इति श्रुतेः। जाता है। इस श्रुतिके अनुसार मनुष्य ४ विष्णुसहस्रनाम यद्विहायापरः पन्था नृणां नास्ति, वही हो जाता है, तथा जिसे छोड़कर 'नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय' ( श्वे. मनुष्योके लिये कोई दूसरा मार्ग नहीं है, जैसा कि श्रुति कहती है- उ०६।१५) इति श्रुतेः। 'मोक्षके लिये और कोई मार्ग नहीं है। तदुक्तमेकं परायणं लोके इस प्रकार जो लोकमे एक ही परायण बतलाया गया है वह कौन यत्तत् किमिति द्वितीयः प्रश्नः । है ? यह दूसरा प्रश्न है। कं कतमं देवं स्तुवन्तः गुण- और कौन-से देवकी स्तुति-गुण- सङ्कीर्तनं कुर्वन्तः, कं कतमं देवम् कीर्तन करनेसे तथा किस देवका नाना- अर्चन्तः बाह्यमाभ्यन्तरं चार्चनं प्रकारसे अर्चन अर्थात् बाह्य और आन्त- बहुविधं कुर्वन्तः मानवा मनुसुताः | रिक पूजा करनेसे मनुष्य शुभ यानी शुभं कल्याणं स्वर्गादिफलं प्राप्नुयुः | स्वर्गादि फलरूप कल्याणकी प्राप्ति कर लमेरनिति पुनःप्रश्नद्वयम् ॥२॥ सकते है ? ये दो प्रश्न और है ॥२॥ को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः । किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥ ३ ॥ कः, धर्मः, सर्वधर्माणाम्, भवतः, परमः, मतः । किम्, जपन, मुच्यते, जन्तुः, जन्मसंसारबन्धनात् ॥ को धर्मः पूर्वोक्तलक्षणः सर्वधर्माणां | आप सर्वधर्मो-समस्त धर्मोमे पूर्वोक्त सर्वेषां धर्माणां मध्ये भवतः परमः लक्षणोसे युक्त किस धर्मको परम-श्रेष्ठ प्रकृष्टो मतः अभिप्रेत इति पञ्चमः मानते है ? यह पॉचवॉ प्रश्न है । प्रश्नः॥ किं जपन् किंजप्यं जपन् उच्चो तथा किस जपनीयका उच्च उपांशु पांशुमानसलक्षणं जपं कुर्वन् जन्तुः | और मानस जप करनेसे जननधर्मा जीव जननधर्मा । अनेन जन्तुशब्देन जन्म-संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता शाङ्करभाष्य जपार्चनस्तवनादिषु यथायोग्यं है ? इस 'जन्तु' शब्दसे जप, सर्वप्राणिनामधिकारं सूचयति । और स्तवन आदिमे समस्त प्राणियोका यथायोग्य अधिकार सूचित करते है। जन्मससारबन्धनात् जन्म अज्ञान- 'जन्म' शब्द अज्ञानसे प्रतीत होनेवाले विजृम्भितानामविद्याकार्याणामुप- अविद्याके कार्योको लक्षित करता है लक्षणम् , संसारोऽविद्या, ताभ्यां तथा 'संसार' अविद्याहीका नाम है। जन्मसंसाराभ्यां यद्वन्धनं तसात् | उन जन्म और संसारका जो बन्धन है मुच्यते मुक्तो भवतीति षष्ठः प्रश्नः। उससे कैसे छूटता है ? यह छठा प्रश्न है। मुच्यते जन्मसंसारबन्धनादि 'जन्म-ससाररूप बन्धनसे कैसे तीदमुपलक्षणम् इतरेषां फलानामपि छूटता है " यह कहना मोक्षकी प्रधानता एतद्ग्रहणं मोक्षस्य प्राधान्यख्याप- बतलानेके लिये है; अतः इस वाक्यसे नार्थम् ॥३॥ अन्य फलोका भी ग्रहण होता है॥३॥ किमेकमिति षट्प्रश्नाः कथिताः। यहाँ 'वह एक देव कौन है' इत्यादि छः प्रश्न कहे गये है, उनमेसे अन्तिम तेषु पाश्चात्योऽनन्तरो जप्यविषयः यानी जपनीयविषयक छठे प्रश्नका षष्ठः प्रश्नोऽनेन श्लोकेन परिहियते। इस श्लोकसे समाधान किया जाता है। श्रीभीष्म उत्तरमुवाच- भीष्मजीने उत्तर दिया- जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम् । स्तुवन्नामसहस्रण पुरुषः सततोत्थितः॥४॥ जगत्प्रभुम् , देवदेवम् , स्तुवन्, नामसहस्रण, अनन्तम्, पुरुपोत्तमम् । सततोत्थितः ॥ पुरुप', विष्णुसहस्रनाम - . , सर्वेषां बहिरन्तः शत्रूणां मोक्षधर्म आदिका कथन करने- वाले सर्वज्ञ [ देवव्रत ] ही बाह्य और भयहेतुर्भीष्मः मोक्षधर्मादीनां आन्तरिक समस्त शत्रुओके भयके कारण प्रवक्ता सर्वज्ञः। होनेसे 'भीष्म' कहे जाते है। जगत् स्थावरजङ्गमात्मकं तस्य प्रभु स्थावर-जगमरूप जो संसार है उसके खामिनम्, देवदेवं देवानां ब्रह्मादीनां प्रभु-स्वामी, देवदेव-ब्रह्मादि देवोके देव,अनन्त अर्थात् देश, काल और वस्तु- देवम् , अनन्तं देशतः कालतो वस्तु- से अपरिच्छिन्न,कार्य-कारणरूप क्षर और तश्चापरिच्छिन्नम् , पुरुषोत्तमं क्षरा- अक्षरसे श्रेष्ठ पुरुषोत्तमका सहस्रनामके क्षराभ्यां कार्यकारणाभ्यामुत्कृष्टं, द्वारा निरन्तर तत्पर रहकर स्तवन-गुण- संकीर्तन करनेसे पुरुष सब दुःखोसे नामसहस्रेण नाम्नां सहस्रेण स्तुवन् पार हो जाता है । पूर्ण होनेसे अथवा गुणान्सङ्कीर्तयन् सततोत्थितो निरन्तर शरीररूप पुरमे शयन करनेसे जीवका मुद्युक्तः । पुरुषः पूर्णत्वात् पुरि नाम 'पुरुष' है । यहाँसे [छठ श्लोकके] 'सर्वदुःखातिगो भवेत्' (सब दुःखोसे शयनाद्वा पुरुषः-'सर्वदुःखातिगो पार हो जाता है) इस पदका प्रत्येक भवेत्' इति सर्वत्र सम्बध्यते ॥४॥ श्लोकके साथ सम्बन्ध है ॥४॥ . -- - उत्तरेण श्लोकेन चतुर्थः प्रश्नः अगले श्लोकसे चौथे प्रश्नका समाधीयते- समाधान किया जाता है- तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् । ध्यायंस्तुवन्नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ॥५॥ तम् , एव, च, अर्चयन् , नित्यम् , भक्त्या,पुरुपम् ,अव्ययम् । ध्यायन, स्तुवन् , नमस्यन् , च, यजमानः, तम् , एव, च ॥ तमेव चार्चयन् वाह्यार्चनं कुर्वन् तथा उसी अविनाशी-विनाशक्रिया- नित्य सर्वेषु कालेषु भक्तिभंजनं रहित पुरुपका नित्य अर्थात् सब समय , शांङ्करभाष्य तात्पर्य तया भक्त्या पुरुपमव्ययं भजन अर्थात् तत्परताका नाम भक्ति है, विनाशक्रियारहितम्,तमेव च ध्यायन् उस भक्तिसे युक्त होकर पूजन करनेसे] औरउसीका ध्यान यानीआन्तरिक पूजन आभ्यन्तरार्चनं कुर्वन् , स्तुवन् , पूर्वो- तथा पूर्वोक्त प्रकारसे [ सहस्रनामद्वारा] क्तेन नमस्यन् नमस्कारं कुर्वन् , पूजा- स्तवन एवं नमस्कार करनेसे अर्थात् पूजाके शेपभूत स्तुति और नमस्कार शेषभूतमुभयं स्तुतिनमस्कारलक्षणं- करनेसे यजमान-पूजा करनेवाला फल- यजमानः पूजकः फलभोक्ता। भोक्ता [ सब दुःखोसे छूट जाता है । अथवा,अर्चयनित्यनेनोभयविध अथवा यो समझो कि अर्चयन्' शब्द- से वाह्य और आन्तरिक दो प्रकारका मर्चनमुच्यते । ध्यायंस्तुवन्नमस्य- अर्चन कहा है तथा ध्यान, स्तवन और श्चेत्यनेन मानसं वाचिकं कायिक नमन करते हुए-इससे मानसिक, चोच्यते ॥५॥ वाचिक और कायिक पूजन बताया गया है॥५॥ तृतीयं प्रश्न परिहरति उत्तरै अब अगले तीन पादोसे तीसरे स्त्रिभिः पादैः- प्रश्नका उत्तर देते है- अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत् ॥६॥ अनादिनिधनम्, - विष्णुम्, सर्वलोकमहेश्वरम् । लोकाध्यक्षम्, स्तुवन्, नित्यम्, सर्वदु खातिग , भवेत् ॥ अनादिनिधनं पड्भावविकार अनादिनिधन अर्थात् [होना, वर्जितम् , विष्णु व्यापनशीलम् , जन्म लेना, वढना, वदलना भीण होना सर्व लोक्यते इति लोको दृश्य- और नष्ट होना-इन ] छ: भावविकारोसे ८ विष्णुसहस्रनाम वर्गो लोकस्तस्य नियन्तॄणां ब्रह्मादी- रहित, विष्णु अर्थात् व्यापक तथा सम्पूर्ण लोकोके महेश्वर-जो दिखलायी दे उस नामपीश्वरत्वात् सर्वलोकमहेश्वरः दृश्य-वर्गका नाम लोक है उसके नियन्ता तम् , लोकं दृश्यवर्ग खाभाविकेन ब्रह्मादिके भी खामी होनेसे जो सर्वलोक- बोधेन साक्षात्पश्यतीति लोकाध्यक्षः | महेश्वर और सारे दृश्यवर्गको अपने तं नित्यं निरन्तरं स्तुवन् सर्व- स्वाभाविक ज्ञानसे साक्षात् देखनेके कारण लोकाध्यक्ष है, उस (देव) दुःखातिगो भवेत् इति त्रयाणां की निरन्तर स्तुति करनेसे मनुष्य सब खोके पार हो जाता है । इस प्रकार दुः स्तवनार्चनजपानां साधारणं फल- यहाँ स्तवन, अर्चन और जप इन तीनो- वचनम् । सर्वाण्याध्यात्मिकादीनि का एक ही फल बतलाया गया है । सम्पूर्ण अर्थात् आध्यात्मिक आदि दुःखान्यतीत्य गच्छतीति सर्वदुः- तीनो प्रकारके दुःखोको पार कर जाता खातिगः भवेत् स्यात् ॥६॥ है, यानी सर्वदुःखातीत हो जाता है॥६॥ पुनरपि तमेव स्तुत्यं विशिनष्टि उस स्तुति करनेयोग्य देवके ही विशेषण फिर भी बतलाते है- ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम् । लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम् ॥७॥ ब्रह्मण्यम्, सर्वधर्मज्ञम्, लोकानाम्, कीर्तिवर्धनम् । लोकनाथम्, महद्भूतम्, सर्वभूतभवोद्भवम् || ब्रह्मण्यं ब्रह्मणे स्रष्ट्रे ब्राह्मणाय जो ब्रह्मण्य अर्थात् जगत्की तपसे श्रुतये हितम् , सर्वान् धर्मान् रचना करनेवाले ब्रह्माके तथा ब्राह्मण, तप और श्रुतिके हितकारी है, सब जानातीति सर्वधर्मज्ञः तम् , लोकानां धर्मोको जानते है, लोकोके अर्थात् शाङ्करभाष्य ६ प्राणिनां कीर्तयः यशांसि स्वशक्त्या- प्राणियोके यशको उनमे अपनी शक्तिसे प्रविष्ट होकर बढाते है, जो नुप्रवेशेन वर्धयतीति तम् लोकैर्ना- लोकनाथ अर्थात् लोकोसे प्रार्थित अथवा लोकोको थ्यते लोकानुपतापयते शास्ते अनुतप्त या शासित करने- वाले अथवा उनपर सत्ता चलानेवाले लोकानामीष्ट इति वालोकनाथः तम् , है, जो अपने समस्त उत्कर्षसे वर्तमान होनेके कारण महद् अर्थात् ब्रह्म तथा महत् ब्रह्म-विश्वोत्कर्षेण वर्तमान- महद्भूत यानी परमार्थ सत्य है और जिनकी सन्निधिमात्रसे समस्त भूतोका त्वात्-महद्भूत परमार्थसत्यम् सर्व- उत्पत्ति-स्थान संसार उत्पन्न होता है इसलिये जो समस्त भूतोके उद्भवस्थान भूतानां भवः संसारो यत्सकाशा- है उन परमेश्वरका [स्तवन करनेसे दुद्भवतीति सर्वभूतभवोद्भवः तम् ॥७॥ मनुष्य सब दुःखोसे छूट जाता है ] ||७|| पञ्चमं प्रश्न परिहरति- अव पॉचवे प्रश्नका उत्तर देते है- एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः । यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥८॥ - एप , मे, सर्वधर्माणाम्, धर्मः, अधिकतम , मत । यत्, भक्त्या, पुण्डरीकाक्षम्, स्तवैः, अर्चेत्, नर., सदा ॥ सर्वेषा चोदनालक्षणानां धर्माणामेप सम्पूर्ण विधिरूप धर्मोमे मै वक्ष्यमाणो धर्मोऽधिकतम इति मे मम आगे बतलाये जानेवाले इसी धर्मको मतः अभिप्रेतः, यद्भक्त्या तात्पर्येण सबसे बड़ा मानता हूँ कि मनुष्य पुण्डरीकाक्ष हृदयपुण्डरीके प्रकाश- श्रीपुण्डरीकाक्षका अर्थात् अपने हृदय- मानं वासुदेवं स्तवैर्गुणसङ्कीर्तन- कमलमे विराजमान भगवान् वासुदेवका १० विष्णुसहस्रनाम stu लक्षणैः स्तुतिभिः सदार्चेत् सत्कार- भक्तिपूर्वक-तत्परतासहित गुणसंकीर्तन- रूप स्तुतियोसे सदा अर्चन करे यानी पूर्वकमर्चनं करोति नरः मनुष्यः मनुष्य आदरपूर्वक पूजन करे-यह इति यत् एष धर्म इति सम्बन्धः। धर्म ही मुझे सबसे अधिक मान्य है। अस्य स्तुतिलक्षणस्वार्चनस्या इस स्तुतिरूप अर्चनकी अधिक मान्यताका कारण क्या है ? सो बतलाते धिक्ये किं कारणम् उच्यते-. हिंसादिपुरुषान्तरद्रव्यान्तरदेश- हिंसादि पाप-कर्मका अभाव तथा कालादिनियमानपेक्षत्वम् आधिक्ये कालादिके नियमकी अनावश्यकता ही अन्य पुरुप एव द्रव्य, देश और कारणम् । इसकी अधिकमान्यताका कारण है। 'ध्यायन् कृते यजन् यज्ञै- विष्णुपुराणमे कहा है-'सत्ययुग- स्त्रेताया द्वापरेऽर्चयन् । मे ध्यानसे, त्रेतामे यज्ञानुष्ठानसे यदाप्नोति तदाप्नोति और द्वापरमें पूजा करनेसे मनुष्य कलौ सङ्कीर्त्य केशवम् ॥' । जो कुछ पाता है वह कलियुगमे इति विष्णुपुराणे (६ । २।१७) भगवान् कृष्णका नाम-संकीर्तन करनेसे ही पा लेता है। 'जप्येनैव तु ससिध्येद मनुजीका वचन है-'इसमे सन्देह ब्राह्मणो नात्र संशयः । कुर्यादन्यन्न वा कुर्या- नहीं कि ब्राह्मण, अन्य कर्म करे या न न्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥ करे, वह केवल जपसे ही पूर्ण सिद्धि इति मानवं वचनम् (मनु०२।८७)। प्रात कर लेता है। अतः ब्राह्मण 'मैत्र' (सबका मित्र) कहा जाता है। 'जपस्तु सर्वधर्मेभ्यः महाभारतमे कहा है-'सम्पूर्ण धर्मो- परमो धर्म उच्यते । में जप सर्वश्रेष्ठ धर्म कहा जाता है, अहिसया च 'भूताना क्योकि जपयज्ञ प्राणियोकी हिसा जपयज्ञः प्रवर्तते ॥ किये बिना ही सम्पन्न हो जाता है। इति महाभारते। यज्ञाना जपयज्ञोऽस्मि' भगवान्का भी वचन है कि 'यज्ञोमे मैं (गीता १०।२५)इति भगवद्वचनम् ।। जपयज्ञ हूँ।'
शाङ्करभाष्य . एतत्सर्वमभिप्रेत्य इन सब बातोको सोचकर ही 'एप मे सर्वधर्माणां भीष्मजीने यह कहा है कि 'मुझे समस्त धर्मोऽधिकतमो मतः । धर्मोसे यही धर्म सबसे अधिक (वि० स०८) मान्य है। ॥८॥ इत्युक्तम् ॥८॥ द्वितीयं प्रश्न समाधत्ते। । दूसरे प्रश्नका समाधान करते हैं- परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः । परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥९॥ परमम्. य., महत, तेजः, परमम्, यः, महत्, नप. । परमम्, य', महत्, ब्रह्म, परमम् , यः, परायणम् ॥ परम प्रकृष्टं महत् वृहत् तेजः चैतन्य जो सबका प्रकाशक, परम अर्थात् लक्षणं सर्वावभासक, 'थेन सूर्य- उत्तम और महान् चिन्मय प्रकाश है, स्तपति तेजसेद्धः ।' (ते० प्रा० ३ जिसके विषयमे 'जिस तेजसे प्रकाशित होकर सूर्य तपता है। उसे देवगण १२ । ९७) 'तद्देवा ज्योतिपा ज्योति.' ज्योतियोंका ज्योति कहते हैं 'वहाँ (बृ० उ० ४ । ४ । १६) 'न तत्र न सूर्यका प्रकाश पहुंचता है और न सूर्यो भाति न चन्द्रतारकम्' (मु० चन्द्रमा या तारोंका' इत्यादि श्रुतियों- उ० २ । २। १०) इत्यादि से तथा 'सूर्यके अन्तगत जो तेज है' श्रुतेः; 'यदादित्यगतं तेज' (गीता इत्यादि स्मृतियोसे भी यही प्रमाणित १५। १२) इत्यादिस्मृतेश्च । होता है। परमं तपः तपत आज्ञापयतीति जो परम तप अर्थात् तपनेवाला तपः, 'य इम च लोकं परम च लोक । यानी आज्ञा देनेवाला है, जैसा कि 'जो इस लोकको, परलोकको तथा सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरो यम- समस्त प्राणियोको उनके भीतर स्थित यति' (बृ० उ० ३१७१ १) इत्यन्तर्या- | होकर शास्ति करता है। इस श्रुति- द्वारा अन्तर्यामी ब्राह्मणमे उसको सब- मिब्राह्मणे सर्वनियन्तृत्वं श्रूयते । का नियामक कहा गया है ।
विष्णुसहस्रनाम
भीषास्माद्वातः पवते भीपोदेति तैत्तिरीय श्रुतिमे भी कहा है-
सूर्यः । भीपास्मादग्निश्चेन्द्रश्च मृत्यु- 'इसीके भयसे वायु चलता है, इसी-
के भयसे सूर्य उदित होता है तथा
विति पञ्चमः' (तै० उ०२।८।१) इसीके भयसे अग्नि, इन्द्र और
इत्यादि तैत्तिरीयके।
पांचवां मृत्यु दौड़ता है।
तपतीप्ट इति वा तपः तस्यैश्वर्य 'तपता है' अथवा 'शासन करता
है। इसलिये वह तप है । उसका
मनवच्छिन्नमिति महत्त्वम्, 'एप सर्वे- ऐश्वर्य अपरिमित है इस कारण वह
श्वरः' (मा० उ० ६) इत्यादिश्रुतेः।
महान् है । श्रुति भी कहती है कि
'वह सर्वेश्वर है।
परमं सत्यादिलक्षणं ब्रह्म महनी जो सत्यादि लक्षणोवाला परब्रह्म
यतया महत् । परमं प्रकृष्टं पुनरावृत्ति- तथा महत्तायुक्त होनेके कारण महान् है
और जो पुनरावृत्तिकी शङ्कासे रहित
शङ्कारहितम् । परायणं परम् अयनं
परम-श्रेष्ठ परायण है। परम अयन
परायणम् ।
(आश्रय) का नाम परायण है।
परमग्रहणात्सर्वत्र अपरं तेजः यहाँ सर्वत्र 'परम' शब्दका ग्रहण
होनेसे सूर्यादि अन्य तेजोंका व्यावर्तन
आदित्यादिकं व्यावय॑ते । सर्वत्र
(पृथक्करण) किया गया है और जो
यो देव इति विशेष्यते च-
देव' इस पदकी विशेपता बतायी
गयी है-
यो देवः परमं तेजः परमं तपः 'जो देव परम तेज, परम तप,
परम ब्रह्म और परम परायण है वही
परमं ब्रह्म परमं परायणं, स एकं
समस्त प्राणियोकी परम गति है। यह
सर्वभूतानां परायणमिति वाक्यार्थः | इस वाक्यका अर्थ है ॥९॥
-
इदानीं प्रथमप्रश्नस्योत्तरमाह- अब पहले प्रश्नका उत्तर देते है-
पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् ।
दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥१०॥
शाङ्करभाष्य १३ . पवित्राणाम्, पवित्रम् यः, मङ्गलानाम्, च, मङ्गलम् । दैवतम्, देवतानाम्, च. भूतानाम्, यः, अव्ययः, पिता ।। पवित्राणा पवित्र पावनानां तीर्था जो पवित्रोमे पवित्र अर्थात् पवित्र करनेवाले तीर्थादिकोमे पवित्र है। दीनां पवित्रम् । परमस्तु पुमान् परमपुरुष. परमात्मा ध्यान, दर्शन, ध्यातो दृष्टः कीर्तितः स्तुतः कीर्तन, स्तुति, पूजा, म्मरण तथा प्रणाम किये जानेपर समस्त पापोको सम्पूजितः स्मृतः प्रणतः पाप्मनः जडसे उखाड डालते है, इसलिये वे सर्वानुन्मूलयतीति परमं पवित्रम् । परम पवित्र है । संसारबन्धहेतुभूतं पुण्यापुण्या अथवा यो समझो कि संसार- त्मकं कर्म तत्कारणं चाज्ञानं सर्व बन्धनका हेतु पुण्य-पापरूप कर्म है, परमात्मा अपने खरूपके यथार्थ ज्ञान- नाशयति स्वयाथात्म्यज्ञानेनेति वा से कर्मके कारणरूप उस सम्पूर्ण पवित्राणां पवित्रम् । अज्ञानको नष्ट कर देते है। इसलिये वे पवित्रोमे पवित्र है। 'रूपमारोग्यमर्थाश्च 'मोक्षदाता श्रीहरि ध्यान करने- भोगाश्चैवानुषनिकान् । वालेको सर्वदारूप, आरोग्य, सम्पूर्ण ददाति ध्यायतो नित्य- पदार्थ और प्रासङ्गिक भोग भी दे मपवर्गप्रदो हरि.॥ देते है। 'चिन्त्यमानः समस्तानां जो अपना स्मरण किये जानेपर क्लेशाना हानिदो हि यः । समस्त क्लेशोको दूर कर देते है, और सब चिन्तनीयोंको छोड़कर समुत्सृज्याखिलं चिन्त्य उन अच्युतका ही चिन्तन क्यो नही सोऽच्युत किं न चिन्त्यते ॥ किया जाता ?
१४ विष्णुसहस्रनाम ध्यायेन्नारायणं देवं 'स्नानादि समस्त कर्मोको करते स्नानादिषु च कर्मसु । हुए श्रीनारायणदेवका ध्यान करना प्रायश्चित्तं हि सर्वस्य चाहिये।" 'यह (भगवत्स्मरण) हो दुष्कृतस्येति वै श्रुतिः ॥ सम्पूर्ण दुष्कर्मोका प्रायश्चित्त है। गरुड०१ । २३० । २८) इस विषयमे श्रुति भी सहमत है। 'संसारसर्पसन्दष्ट- संसाररूप सर्पद्वारा जैसे जानेसे नष्टचेष्टेकभेषजम् । निश्चेष्ट हुए पुरुषके लिये एकमात्र कृष्णेति वैष्णवं मन्त्र औषधरूप 'कृष्ण' इस मन्त्रको सुन- श्रुत्वा मुक्तो भवेन्नरः॥ कर मनुष्य मुक्त हो जाता है। 'अतिपातकयुक्तोऽपि 'अत्यन्त पापी पुरुष भी एक ध्यायन्निमिषमच्युतम् । पलके लिये भी अच्युतका ध्यान करनेसे बड़ा भारी तपस्वी और भूयस्तपस्वी भवति पंक्तिपावनोंको भी पवित्र करने- पक्तिपावनपावनः ॥ वाला हो जाता है। 'आलोच्य सर्वशास्त्राणि 'समस्त शास्त्रोंका मन्थन करने- विचार्य च पुनः पुनः। पर और उनका' पुनः-पुनः विचार इदमेक सुनिष्पन्न करनेपर यही निश्चित होता है कि ध्येयो नारायणः सदा ॥ सर्वदा श्रीनारायणका ध्यान करना (लिङ्ग० २।७i) चाहिये। 'हरिरेकः सदा ध्येयो 'हे विप्रगण ! आप लोगोंको भवद्भिः सत्त्वसंस्थितैः । सर्वदा सत्त्वगुणसम्पन्न होकर एक- ओमित्येवं सदा विप्राः मात्र श्रीहरिका ही ध्यान करना पठत ध्यात केशवम् ।' चाहिये। आप सदा ओ३मका जप (हरि० ३ । ८६ | L) और श्रीकेशवका ध्यान करें। * जो ब्राह्मण श्रोत्रिय और सम्पूर्ण ब्राह्मणोचित लक्षणोंसे युक्त होता है वह 'पंक्तिपावन' कहलाता है शाङ्करभाष्य १५ wok 4 'भिद्यते हृदयग्रन्थि- 'उस परावर परमात्माका दर्शन श्छिद्यन्ते सर्वसशयाः। कर लेनेपर जीवको (अविद्यारूप) क्षीयन्ते चास्य कर्माणि हृदय-प्रन्थि टूट जाती है, उसके तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥' सम्पूर्ण संशय नष्ट हो जाते है और (मु० उ० २।२।८) सारे कर्म क्षीण हो जाते है।। यन्नामकीर्तन भक्त्या 'हे मैत्रेय! सुवर्ण आदिधातुओ- को जिस प्रकार अग्नि पिघला देता विलापनमनुत्तमम् है उसी प्रकार जिसका सक्तियुक्त मैत्रेयाशेपपापाना नाम-संकीर्तन सम्पूर्ण पापोका धातनामिव पावक ॥' अत्युत्तम विलापन ( लोन करने- (विष्णु ० ६ । ८।२०) वाला) है। 'अवशेनापि यन्नाम्नि 'जिसके नामका विवश होकर कीर्तिते सर्वपातकै । कीर्तन करनेसे भी मनुष्य सिहसे डरे पुमान् विमुच्यते सद्य सिहत्रस्तैमूंगैरिव ॥ हुए हरिणोके समान तुरन्त ही (विष्णु०६।८।१०) समस्त पापोसे छूट जाता है। 'ध्यायन् कृते यजन् यजै- 'सत्ययुगमे ध्यानसे, त्रेतामे त्रेताया द्वापरेऽर्चयन् । यज्ञानुष्ठानसे और द्वापरमे भगवान्के यदाप्नोति तदाप्नोति पूजनसे मनुष्य जो कुछ प्राप्त करता है कलौ सङ्कीर्त्य केशवम् ॥ वह कलियुगमे श्रीकेशवका नाम- (विष्णु०६।२।१७) संकीर्तन करनेसे हो पा लेता है। 'हरिहरति पापानि 'श्रीहरिका यदि दुष्टचित्त पुरुषो- दुष्टचित्तैरपि स्मृतः । से भी स्मरण किया जाय तो वे उनके अनिच्छयापि सस्पृष्टो समस्त पापोको हर लेते है, जैसे दहत्येव हि पावकः॥ अनिच्छासे स्पर्श करनेपर भी अग्नि (बृ. नारद० १।११।१००)। जला हो डालता है। -- विष्णुसहस्रनाम 'ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि 'श्रीवासुदेवके, जानकर अथवा वासुदेवस्य कीर्तनात् । बिना जाने, किसी भी प्रकार किये तत्सर्व विलयं याति हुए कीर्तनसे जलमे पड़े हुए नमकके तोयस्थ लवण यथा ॥ समानसमस्तदोष लीन हो जाते है। 'यस्मिन्न्यस्तमतिर्न याति नरकं 'जिसमे चित्तलगानेवालानरक- स्वर्गोऽपि यच्चिन्तने, गामी नहीं होता, जिसके चिन्तनमें विघ्नो यत्र निवेशितात्ममनसो स्वर्गलोक भी विनरूप है, जिसमे ब्राह्मोऽपि लोकोऽल्पकः । चित्त लगजानेपर ब्रह्मलोक भी तुच्छ प्रतीत होता है तथा जो अविनाशी मुक्ति चेतसि यः स्थितोऽमलधिया प्रभु शुद्ध बुद्धिवाले पुरुषोके हृदयमे पुसा ददात्यव्ययः, स्थित होकर उन्हे मुक्ति प्रदान करता किं चित्रं यदधं प्रयाति विलयं है, उस अच्युतका चिन्तन करनेसे तत्राच्युते कीर्तिते ॥' | यदि पापविलीन हो जाते है, तो (विष्णु० ६।८।१७) इसमे क्या आश्चर्य है ?? 'शमायालं जलं वह्वे- अग्निको शान्त करनेमे जल स्तमसो भास्करोदयः । और अन्धकारको दूर करनेमे सूर्य समर्थ है, तथा कलियुगमें पाप-समूह- शान्तिः कलौ ह्यघौघस्य की शान्तिका उपाय श्रीहरिका नाम- नामसङ्कीर्तनं हरेः॥ संकीर्तन है। 'हरे मैव नामैव 'श्रीहरिका नाम ही, नाम ही, नामैव मम जीवनम् । नाम ही मेरा जीवन है; इसके कलौ नास्त्येव नास्त्येव अतिरिक्त कलियुगमे और कोई उपाय नास्त्येव गतिरन्यथा ॥' (६० नारद० १।११।१५) नहीं है। 'स्तुत्वा विष्णु वासुदेवं 'सर्वव्यापक विष्णुभगवानका विपापो जायते नरः। स्तवन करनेसे मनुष्य निष्पाप हो शाङ्करभाष्य - विष्णोः सम्पूजनान्नित्य जाता है। विष्णुभगवान्का नित्यप्रति सर्वपापं प्रणश्यति ॥ पूजन करनेसे समस्त पाप नष्ट हो जाते है। 'सर्वदा सर्वकार्येषु 'जिनके हृदयमें समस्त मङ्गलोके नास्ति तेपाममङ्गलम् । स्थान भगवान् श्रीहरि विराजते है येपा हृदिस्थो भगवान् उन्हे कभी किसी कार्यमे कोई अमङ्गल मङ्गलायतनो हरिः ।। प्राप्त नहीं होता। 'नित्य सञ्चितयेद्देव 'श्रीजनार्दन भगवानका सदा समाहित होकर चिन्तन करना । योगयुक्तो जनार्दनम् । चाहिये, यही इस (जीव) की परम सास्य मन्ये परा रक्षा रक्षा है। भला,जोभगवान्के आश्रित को हिनस्त्यच्युताश्रयम् ॥ । है उसे कौन कष्ट पहुंचा सकता है ? गड्डास्नानसहस्रपू 'हजार बार गङ्गास्नान करनेसे पुष्करस्नानकोटिषु । और करोड़ बार पुष्करक्षेत्रमे नहानेसे यत्पाप विलय याति जो पाप नष्ट होते है वे श्रीहरिका स्मृते नश्यति तद्धरौ॥ (गरुड० १ । २३० । १८) स्मरण करनेसे ही नष्ट हो जाते है ।। 'मुहूर्तमपि यो ध्याये- 'जो पुरुष अविनाशी नारायण- नारायणमनामयम् । देवका एक मुहूर्त भी चिन्तन करता, सोऽपि सिद्धिमवाप्नोति है वह भी सिद्धि प्राप्त कर लेता है। फिर जो भगवत्परायण है उसकी तो किं पुनस्तत्परायण.॥ | बात ही क्या है? 'प्रायश्चित्तान्यशेपाणि 'जितने भी तप और कर्मरूप तपःकर्मात्मकानि वै यानि तेपामशेषाणा प्रायश्चित्त है उन सबमे श्रीकृष्णका कृष्णानुस्मरण परम् ।। (विष्णु.२।६।३६) स्मरण करना सर्वश्रेष्ठ है। H २ विष्णुसहस्रनाम 'कलिकल्मपमत्युग्रं 'मनुष्योको नरककी यातनाएँ नरकार्तिप्रद नृणाम् । प्राप्त करानेवाले कलियुगके अति उग्न प्रयाति विलय सद्य- दोष जिनका एक बार स्मरण करनेसे स्सकृद्यत्रापि सस्मृते ॥ (विष्णु० ६ ।।२१) भी तुरन्त लीन हो जाते है। 'सकृत्स्मृतोऽपि गोविन्दो 'श्रीगोविन्द एक बार स्मरण किये तृणां जन्मशतैः कृतम् । जानेपर भी मनुष्योंके सैकड़ों जन्मोंमे किये हुए पाप-पुञ्जको इस प्रकार पापराशि दहत्याशु तुरन्त ही भस्म कर देते है जैसे अग्नि तूलराशिमिवानलः ।। रूईके ढेरकोजलाडालता है। 1 1 - 'यथाग्निरुद्धतशिखः कक्षं दहति सानिलः । तथा चित्तस्थितो विष्णु- योगिनां सर्वकिल्बिषम् ॥ (विष्णु० ६ । ७ । ७४) 'जिस प्रकार ऊंची-ऊंची लपटो- वाला अग्नि वायुके साथ मिलकर सूखी घासके ढेरको जला डालता है उसी प्रकार चित्तमे स्थित विष्णु- भगवान् योगियोंके समस्त दोषोंको नष्ट कर देते है। 'एकस्मिन्नप्यतिक्रान्ते 'बिनाध्यानके एक मुहूर्त निकल मुहूर्ते ध्यानवर्जिते । जानेपर भी लुटेरोंसे लूटे जाते हुए दस्युभिर्मुषितेनेव व्यक्तिके समान अत्यन्त रुदन करना युक्तमाक्रन्दितुं भृशम् ॥ चाहिये। 'जनार्दन भूतपति जगद्गुरुं 'हे महामुने! समस्त प्राणियोंके प्रभु जगद्गुरु जनार्दनका निरन्तर स्मरन्मनुष्यः सततं महामुने। स्मरण करनेसे मनुष्य समस्त दुःखों- दुःखानि सर्वाण्यपहन्ति साधय- को दूर कर देता है और जिन-जिनकी त्यशेषकार्याणि च यान्यभीप्सते॥ इच्छा करता है उन सभी कार्योको सिद्ध कर लेता है।
शाङ्करभाष्य 'एवमेकाग्रचित्तः सन् 'इस प्रकार एकाग्रचित्त होकर संस्मरन्मधुसूदनम् । श्रीमधुसूदनका स्मरण करते रहनेसे मनुष्य जन्म, मृत्यु और जरारूप जन्ममृत्युजराग्राहं ग्राहोंसे पूर्ण संसारसागरको पार कर संसाराब्धि तरिष्यति ॥ लेगा। 'कलावत्रापि दोषाढये 'इस दोषपूर्ण कलियुगमे भी. विषयासक्तमानसः । विषयासक्त मनुष्य समस्त पापोंको कृत्वापि सकलं पापं करके भी श्रीगोविन्दका चिन्तन गोविन्दं सस्मरञ्छुचिः ॥" करनेसे पवित्र हो जाता है। 'वासुदेवे मनो यस्य 'हे मैत्रेय ! जप, होम तथा जपहोमार्चनादिषु । अर्चनादिमें जिसका चित्त भगवान तस्यान्तरायो मैत्रेय देवेन्द्रत्वादिकं फलम् ॥ वासुदेवमें लगा हुआ है उसके लिये (विष्णु० २१६ । ४३) इन्द्रत्वादि फल विघ्नरूप ही हैं।" 'लोकत्रयाधिपतिमप्रतिमप्रभाव- 'तीनों लोकोके स्वामी, अनुपम प्रभावशाली तथा अनेक रूपसे प्रकट मीषत् प्रणम्य शिरसा प्रभविष्णुमीशम् । होनेवाले झुकाकर जन्मान्तरप्रलयकल्पसहस्रजात- थोड़ा-सा प्रणाम करनेसे मनुष्यके हजारों महाकल्पोमें,जन्म-जन्मान्तरों- माशु प्रणाशमुपयाति नरस्य पापम् ॥' में किये हुए सम्पूर्ण पाप तुरन्त नष्ट हो जाते हैं। 'एकोऽपि कृष्णस्य कृतः प्रणामो 'श्रीकृष्णचन्द्रको किया हुआएक प्रणाम भी दश अश्वमेध-यज्ञोंके दशाश्वमेधावभृथेन तुल्यः। [यज्ञान्त] स्नानके समान [पवित्र दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म करनेवाला है। उनमें भी दश अश्वमेध करनेवालेका तो पुनर्जन्म होता है, कृष्णप्रणामी न पुनर्भवाय ।। किन्तु कृष्णको प्रणाम करनेवालेका (महा० शान्ति० ४७ ।९१) नहीं होता। . भगवानको शिर - - २० विष्णुसहस्रनाम 'अतसीपुष्पसङ्काशं 'अलसीके फूलकेसमान पीताम्बर पीतवाससमच्युतम् । धारण करनेवाले श्रीअच्युत भगवान् ये नमस्यन्ति गोविन्द गोविन्दको जो प्रणाम करेंगे उन्हें न तेपां विद्यते भयम् ॥ किसी प्रकारका भय नहीं है। (महा० शान्ति० ४७ । १०) 'शाठ्येनापि नमस्कारः 'भगवान् चक्रपाणिको जोशठता प्रयुक्तश्चक्रपाणये (दम्भ) से भी किया हुआ नमस्कार है ससारस्थूलबन्धाना- वह भी निस्सन्देह संसारके स्थूल मुद्वेजनकरो हि सः॥ बन्धनोको काटनेवाला होता है । इत्यादिश्रुतिस्मृतीतिहासपुराण- इत्यादि श्रुति, रमृति, इतिहास और वचनेभ्यः। पुराणोके वचनोसे [ यही बात सिद्ध होती है कि वह देव पवित्रोमे पवित्र है। मगलाना च मङ्गल मङ्गलं सुखं मंगलोका मंगल-मङ्गल सुखको तत्साधनं तज्ज्ञापकं च, तेषामपि कहते है; जो उसके साधन और ज्ञापक परमानन्दलक्षणं परं मङ्गलमिति है उनका भी परमानन्दरूप परम मङ्गल मङ्गलानां च मङ्गलम् । होनेसे वह मङ्गलोका मङ्गल है। दैवतं देवतानां च देवानां देवः, 'दैवतं देवतानाम्' अर्थात् देवो- द्योतनादिभिः समुत्कर्षेण वर्तमान- का देव है क्योकि वह प्रकाशन आदि- त्वात् । मे सबसे बढकर है। भूताना य. अव्ययः व्ययरहितः तथा भूत-प्राणियोका जो अव्यय- पिता जनको यो देवः, स एक नाशरहित पिता अर्थात् उत्पन्न करने- वाला है। ऐसा जो देव है लोकमे दैवतं लोक इति वाक्यार्थः। वही एकमात्र देव है । यह इस वाक्यका अर्थ है। 'एको देवः सर्वभूतेषु गूढः 'एक देव है जो सब प्राणियोंमे सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । छिपा हुआ है, सर्वत्र व्याप्त है, सब 4 शाङ्करभाष्य २१ कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः जीवोंका अन्तरात्मा है, कर्माका अध्यक्ष (कर्म-फलका विभाग करने- साक्षी चेताः केवलो निर्गुणश्च ॥' वाला) है, सब भूतोंका अधिष्ठान है (६।११) तथा सबका साक्षी, सबको चेतना देनेवाला, एकमात्र और निर्गुण है। 'यो ब्रह्माण विदधाति पूर्व 'जो सबसे पहले ब्रह्माको रचता यो वै वेदांथ प्रहिणोति तस्मै । है और फिर उसे वेद प्रदान करता तरह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥ है, आत्मा और बुद्धिके प्रकाशस्वरूप (६ । १८) उस देवको मैं मुमुक्षु शरण लेता हूँ। इति श्वेताश्वतराणां मन्त्रोपनिषदि। ऐसा श्वेताश्वतर-शाखाके मन्त्रोपनिपद्- मे कहा है। 'सेय देवतैक्षत' (६।३।२) छान्दोग्योपनिपमे कहा है- 'एकमेवाद्वितीयम्' (६।२।१) इति इस पूर्वोक्त देवताने ईक्षण किया। छान्दोग्ये। 'वह एक ही अद्वितीय था। ननु कथम् एको देवः जीव- पू०-जीवात्मा और परमात्मामें तो परयोर्मेदात् ? भेद है, फिर एक ही देव कैसे हो सकता है ? न; 'तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्' उ०-ऐसा मत कहो, क्योकि (तै० उ० २।६)स एप इह प्रविष्ट | 'उसे रचकर उसीमे प्रविष्ट हो गया। आनखाग्रेभ्य.' (बृ. उ० ११४।७) 'वह इस[शरीर] मे नखसे लेकर शिखा- इत्यादिश्रुतिभ्योऽविकृतस्य परस्य पर्यन्त अनुप्रविष्ट है' इत्यादि श्रुतियोसे अविकारी परमात्माका ही बुद्धि तथा बुद्धितवृत्तिसाक्षित्वेन प्रवेश- श्रवणादमेदः। उसकी वृत्तियोके साक्षीरूपसे प्रवेश कहे जानेके कारण उनमे अभेद है। प्रविष्टानामितरेतरभेदात् परात्मै यदि कहो कि प्रविष्ट हुओका तो परस्पर भेद होता है, फिर जीव और ૨૨ विष्णुसहस्रनाम कत्वं कथमिति चेत्, न; ‘एको देवः परमात्माकी एकता कैसे हो सकती है, तो ऐसा कहना ठीक नही, क्योकि बहुधा सन्निविष्टः' 'एकः सन् बहुधा "एकही देव अनेक प्रकारले स्थित हैं' विचारः' 'त्वमेकोऽसि बहूननुप्रविष्टः' / 'एकहोनेपर भी अनेक प्रकारसे विचार किया जाता है' 'तुम एक ही अनेकोंमें इत्येकस्यैव बहुधा प्रवेशश्रवणात् अनुप्रविष्ट हो' इत्यादि श्रुतियोसे प्रविष्टानां च न भेदः। एकका ही अनेक प्रकार प्रवेश कहा जाता है। इसलिये प्रविष्ट हुओमे भेद नही है। 'हिरण्यगर्भः' ( ऋ० वे० १०। इसी विषयमे "हिरण्यगर्भ आदि १२१ । १) इत्यष्टौ मन्त्राः । आठ मन्त्र है। 'कस्मै देवाय' इस तैत्तिरीयक श्रुतिमे भी एकारका लोप कस्मै देवाय इत्यत्र एकारलोपेनैक- हुआ है;* अतः यह मन्त्र भी एक ही दैवतप्रतिपादकस्तैत्तिरीयके देवका प्रतिपादक है। 'अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो कठोपनिषद्मे कहा है-'जिस प्रकार संसारमे व्यात हुआ एक ही रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । अग्नि पृथक्-पृथक् आकारोंके संयोग- एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा से भिन्न-भिन्न रूपवाला होता है उसी प्रकार समस्त प्राणियोंका एक ही रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ।। अन्तरात्मा भिन्न-भिन्न रूपोंके अनुरूप 'वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो और उनके बाहर भी स्थित है। रूपं रूप प्रतिरूपो बभूव । जैसे एक ही विश्वव्यापी वायु भिन्न- भिन्न रूपोंके अनुसार तद्रूप हो गया एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा है उसी प्रकार समस्त प्राणियोंका एकही अन्तरात्मा भिन्न-भिन्न रूपोंके रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ संयोगसे उनके अनुरूप है और उनसे ------ अर्थात् यहाँ 'कस्मै' के स्थानमें 'एकस्मैः समझना चाहिये ।
शाङ्करभाष्य २३ 'सूर्यों यथा सर्वलोकस्य चक्षु बाहर भी सर्वत्र व्याप्त है। जिस प्रकार सम्पूर्ण जगत्का नेत्र सूर्य न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः। दर्शनजन्य बाह्य दोषोसे लित नहीं एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा होता उसी प्रकार समस्त प्राणियोका एक अन्तरात्मा परमेश्वर उन सबके न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः॥ दुःखोंसे लित नही होता, क्योकि "एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा वास्तवमेवह शरीरसे भिन्न है। समस्त भूतोंका एक ही अन्तरात्मा है, जो एक रूप बहुधा यः करोति । सबको वश करनेवाला है और अपने तमात्मस्थ येऽनुपश्यन्ति धीरा- एक ही रूपको नानाप्रकारका कर लेता है, अपने अन्तस्करणमे स्थित स्तेपांसुख शाश्वतं नेतरेपाम् ॥ उस देवको, जो धीर पुरुप देखते है 'नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनाना उन्हींको नित्य-सुख प्राप्त होता है, औरोको नही । जो नित्योका नित्य मेको बहूना यो विदधाति कामान् । और चेतनोकाचेतन है तथाजोअकेला तमात्मस्थ येऽनुपश्यन्ति धीरा होअनेकोको कामनाओको पूर्ण करता है उसे जो धीर पुरुष अपने अन्तः स्तेषां शान्ति शाश्वती नेतरेपाम् ॥' करणमें स्थित देखते है उन्हे ही नित्य- इति काठके (२।५।९-१३) शान्ति प्राप्त होती है, औरोकोनहीं। 'ब्रह्म वा इदमग्र आसीटेकमेव तदेक बृहदारण्यकोपनिषद्मे कहा है- सन्न व्यभवत् (१।४।११) 'प्रथम एकमात्र यह ब्रह्म ही था, 'नान्यदतोऽस्ति द्रष्टा' (३।७।२३) अकेला होनेसे उसे अपने ऐश्वर्यसे इत्यादि बृहदारण्यके। तृति न हुई, 'इसके अतिरिक्त और कोई द्रष्टा नही है इत्यादि । 'अनेजदेकं मनसो जवीयः' (ई. ईशावास्यमे कहा है-'वह एक है। उ०४) 'तत्र को मोह. क. शोक चलता नहीं है [तथापि] मनसे भी एकत्वमनुपश्यतः' (ई० उ० ७) इति अधिक वेगवाला है। 'एकत्व देखने- ईशावास्ये। वालेको फिरक्याशोक और क्यामोह? .
विष्णुसहस्रनाम 'आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीना [श्रुति कहती है-] 'पहले यह एक । न्यत्किञ्चन मिषत् ।' (ऐ० उ०१।१) आत्मा ही था और कुछ भी न था । 'समस्त प्राणियोंके भीतर जो पुरुष 'सर्वेपां भूतानामन्तरः पुरुषः स म है वह मेरा आत्मा है-ऐसा जाने। आत्मेति विद्यात् ।' 'एकं सद्विप्रा बहुधा | ऋग्वेदका भी कथन है-'उस एक- वदन्ति ।“एक सन्त बहुधा कल्पयन्ति। को. ही ब्राह्मण लोग नानाप्रकारसे कहते हैं। 'उस एककी ही नानाप्रकारसे. 'द्यावाभूमी जनयन्देव एकः ।' 'एको कल्पना करते है। वह एक ही देव दाधार भुवनानि विश्वा' 'एक एवाग्नि- पृथिवी और स्वर्गको रचता हुआ''वह बहुधा समिद्धः' इति ऋग्वेदे । 'सदेव अकेला ही सम्पूर्ण लोकोंको धारण सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' इति किये हुए है। अनेक प्रकारसे बढ़ाया हुआ अग्नि एक ही है।' छान्दोग्यमे भी छान्दोग्ये (६।२।१) कहा है-'हे सोम्य ! पहले एकमात्र यह अद्वितीय सत् ही था। 'सर्वभूतस्थित यो मां श्रीगीतोपनिषद्मे कहा है-'जो भजत्येकत्वमास्थितः । पुरुप एकत्वमे स्थित होकर सम्पूर्ण सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥' भूतोमे स्थित मुझ परमात्माको (६।३१ भजता है वह योगी सब प्रकारसे 'विद्याविनयसम्पन्ने बर्तता हुआ भी मुझहीमें बर्तता है।' ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । 'पण्डितजन विद्याविनयसम्पन्न गुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥' ब्राह्मणमे, गौमे, हाथीमे, कुत्ते और (५११८) | चाण्डालमें भी समान दृष्टि रखनेवाले 'अहमात्मा गुडाकेश होते हैं।' हे अर्जुन! मैं सम्पूर्णभूतोंके सर्वभूताशयस्थितः । अन्तःकरणोंमे स्थित उनका आत्मा अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥ हूँ तथा मैं ही समस्त प्राणियोंका (१०।२०)। आदि, मध्य और अन्त भी हूँ" शाङ्करभाष्य २५ करता है। www 'यदा भूतपृथग्भाव- 'जिससमयभूतोंके पृथक्-पृथक्भाव- मेकस्थमनुपश्यति । को एक (परमात्माके संकल्प )मे ही तत एव च विस्तार स्थित देखता है और उसीसे सब ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥' (१३ ॥३०) भूतोका विस्तार हुआ जानता है उस 'यथा प्रकाशयत्येक समय ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।' कृत्स्नं लोकमिमं रविः । 'हे अर्जुन! जिस प्रकार एक ही क्षेत्र क्षेत्री तथा कृत्स्नं सूर्य इस सम्पूर्णब्रह्माण्डको प्रकाशित प्रकाशयति भारत ॥ करता है, उसी प्रकार एक ही (१३ । ३३) आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्रको प्रकाशित 'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामक शरणं व्रज | 'इसलिये,. सर्व धर्मोको त्यागकर केवल एक मेरी अह त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥' ही शरणको प्रात हो, मैं तुझको (१८ ॥१६) सम्पूर्ण पापोसे मुक्त कर दूंगा, तू इति गीतोपनिषत्सु। शोक मत कर 'हरिरेक; सदा ध्येयो 'हे विप्रगण ! आपलोगोको भवद्भिः सत्त्वसंस्थितेः । सत्त्वगुणमे स्थित होकर सर्चदा एक- ओमित्येव सदा विप्राः मात्र श्रीहरिका ही ध्यान करना पठध्व ध्यात केशवम् ॥ चाहिये; आप सदा ओकारका जप (हरि० ३ १८६ ।) और श्रोकेशवका ध्यान करें। 'आश्चर्य खलु देवाना- 'हे पुरुषोत्तम ! निश्चय ही सम्पूर्ण मेकस्त्व पुरुषोत्तम । देवताओंमें एक आप ही आश्चर्यरूप धन्यश्चासि महाबाहो और धन्य है। हे महाबाहो!संसारमे लोके नान्योऽस्ति कश्चन॥ [आपके समान] और कोई भी नहीं इति हरिवंशे। है। इस प्रकार हरिवंशमे कहा है। भवति मनोर्माहात्म्यख्यापिनी 'जोकुछ मनुनेकहा है वहओषधि- श्रुतिः 'यद्वै किञ्च मनुरवदत्तद्भेषजम् । रूप है। यह श्रुति मनुका माहात्म्य aree विष्णुसहस्रनाम (तै० सं०२।२।१०।२) इति । बतलानेवाली है । और मनुजी कहते मनुना चोक्तम्-- है-'समस्तभूतोंमे स्थित अपनेआत्मा- 'सर्वभूतस्थमात्मान सर्वभूतानि चात्मनि । को और समस्त भूतोंकोअपने आत्मा- सम्पश्यन्नात्मयाजी वै मे देखता हुआ आत्मयज्ञ करनेवाला खाराज्यमधिगच्छति ॥ इति (मनु०१२।९१)। पुरुष स्वाराज्य लाभ करता है।' 'सृष्टिस्थित्यन्तकरणी 'वह एक ही जनार्दन भगवान् ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाम् । संसारकी रचना, स्थिति और संहार स संज्ञां याति भगवा- नेक एव जनार्दनः। करनेवाली ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप (विष्णु० १ । २ । ६६)| तीनसंज्ञाओकोप्रात होता है। 'तस्मान्न विज्ञानमृतेऽस्ति किञ्चित् 'इसलिये हे द्विज ! विज्ञानके सिवा और कोई वस्तु कभी कुछ कच्चित् कदाचिद्विज वस्तुजातम् । भी नहीं है। यह एक विज्ञान ही विज्ञानमेक निजकर्मभेदाद्- अपने-अपने कर्मोके भेदसे विभिन्न विभिन्नचित्तैर्बहुधाभ्युपेतम् ॥ चित्तवालोंको भिन्न-भिन्न प्रकारका 'ज्ञानं विशुद्ध विमल विशोक- प्रतीत हो रहा है। वह ज्ञान शुद्ध, मशेषलोभादिनिरस्तसङ्गम् निर्मल, शोकहीन और लोभादि सम्पूर्ण सङ्गोसे रहित है। वही एक एकः सदैकः परमः परेशः सत् श्रेष्ठ और परमेश्वर है तथा वही स वासुदेवो न यतोऽस्ति किञ्चित् ॥' | सर्वत्र व्याप्त है-उससे पृथक् और (विष्णु० २ । १२ । ४३-४४) कुछ नहीं है। 'यदा समस्तदेहेषु 'जब कि समस्त देहमें एक ही पुमानेको व्यवस्थितः । तदा हि को भवान् सोऽह- पुरुष व्याप्त है तब 'आप कौन हैं ? मित्येतद्विफलं वचः मैं अमुक हूँ? यह कहना व्यर्थ है। (विष्णु० २ । १३ । ९१ - शाङ्करभाष्य 'सितनीलादिभेदेन 'जिस प्रकार [दृष्टि-दोपसे] एक यथैकं दृश्यते नमः । ही आकाश श्वेत, नील आदि अनेकों भेदवाला दीख पड़ता है उसी प्रकार भ्रान्तदृष्टिभिरात्मापि भ्रान्त-दृष्टि पुरुषोंको एक ही आत्मा तथैकः सन्पृथक् पृथक् ॥ अलग-अलग दिखायी देता है। यहाँ 'एकः समस्तं यदिहास्ति किञ्चि- जो कुछ है वह सब एक अच्युत त्तदच्युतो नास्ति पर ततोऽन्यत् । भगवान् ही है, उससे अतिरिक्त और सोऽहं स च त्वं स च सर्वमेत कुछ भी नहीं है। वही मैं हूँ, वही तू है और वह आत्मस्वरूप ही यह दात्मखरूपं त्यज मेदमोहम् ॥ सब कुछ है, भेद-दृष्टिरूप मोहको 'इतीरितस्तेन स राजवर्य- छोड़ । उन (जडभरत)के इस प्रकार स्तत्याज भेदं परमार्थदृष्टिः । कहनेपर उस परमार्थ-दृष्टिवाले नृपश्रेष्ठ (विष्णु० २ । १६ । २२-२४) (रहूगण) ने भेद-भावकोत्याग दिया। यमेनोक्तम्- यमराजने [अपने दूतोसे] कहा 'सकलमिदमहं च वासुदेव. था-'यह सम्पूर्ण संसार और मैं एक- परमपुमान् परमेश्वरः स एकः । मात्र परमपुरुप परमेश्वर वासुदेव ही इति मतिरचला भवत्यनन्ते हैं-जिनकी हृदयस्थ अनन्त भगवानले हृदयगते ब्रज तान् विहाय दूरात् ॥ ऐसी दूढ़ भावना हो गयी है उन्हे तुम (विष्णु० ३ । ७ । ३२) दूरसे ही छोड़कर निकल जाया करो।' 'यदाह वसुधा सर्व 'हे देवगण! पृथ्वीने जो कुछ सत्यमेव दिवौकसः। अहं भवो भवन्तश्च कहा है वह ठीक ही है, मैं, महादेवजी सर्व नारायणात्मकम् और आप सब भी नारायणस्वरूप 'विभूतयस्तु यास्तस्य ही है । जो उसकी विभूतियां हैं तासामेव परस्परम् । आधिक्यं न्यूनता बाध्य- उन्होकी न्यूनता तथा अधिकता बाधकत्वेन वर्तते। परस्परबाध्य-बाधकरूपसे रहती है। (विष्णु०५।१।३०-३१) २८ विष्णुसहस्रनाम -AN h 'भवानहं च विश्वात्म: [भगवान् कृष्ण बलरामसे कहते नेक एव हि कारणम् । हैं ] 'हे विश्वात्मन् ! आप और मैं जगतोऽस्य जगत्यर्थे दोनों इस संसारके एक ही कारण भेदेनावा व्यवस्थितौ ।' है। इस संसारके लिये ही हम दोनो (विष्णु०५।१।३२) भिन्नरूपसे स्थित हैं। 'स्वया यदभयं दत्त [श्रीकृष्णचन्द्र महादेवजीसे कहते तहत्तमखिलं मया । हैं- 'जो अभय आपने दिया है वह मत्तो विभिन्नमात्मानं सबमेरा ही दिया हुआ है। हे शंकर ! द्रष्टुं नार्हसि शङ्कर ॥ आप अपनेको मुझसे पृथक् न देखें। 'योऽहं स त्वं जगच्चेदं जो मैं हूँ वही आप और देवता, सदेवासुरमानुषम् । असुर तथा मनुष्योके सहित यह 'अविद्यामोहितात्मानः सारा संसार है। जिन पुरुषोंका पुरुपा भिन्नदर्शिनः । चित्त अविद्यासे मोहित हो रहा है वे (विष्णु० ५ । ३३ । ४७-४६) ही भेदभाव देखनेवाले होते है। इति श्रीविष्णुपुराणे । -इस प्रकार विष्णुपुराणमे कहा है। 'विष्णोरन्यं तु पश्यन्ति भविष्योत्तरपुराणमे श्रीमहादेवजी- ये मा ब्रह्माणमेव वा । का वचन है-'जो लोग मुझे अथवा कुतर्कमतयो मूढाः ब्रह्माजीको विष्णुसे अलग देखते है पच्यन्ते नरकेष्वधः॥ वे कुतर्कबुद्धि मूढजन नीचे नरकमे 'ये च मूढा दुरात्मानो गिरकर दुःख भोगते है। तथा जो भिन्नं पश्यन्ति मा हरेः । दुष्टबुद्धि मूढलोग मुझे और ब्रह्माण च ततस्तस्मात् । ब्रह्माजीको श्रीविष्णुसे पृथक् देखते ब्रह्महत्यासमं त्वधम् ॥ । हैं उन्हें उससे ब्रह्महत्याके समान इति भविष्योत्तरपुराणे महेश्वर- पाप लगता है। तथा च हरिवंशे कैलासयात्रायां इसी प्रकार हरिवंशमे कैलास- । यात्राके प्रसंगमे महेश्वरका कथन है- -- वचनम् । महेश्वरवचनम्- - शाङ्करभाष्य २६ 'आदिस्त्वं सर्वभावानां समस्त भावोंके आदि, मध्य मध्यमन्तस्तथा भवान् । और अन्त आप ही है । यह सम्पूर्ण त्वत्तः सर्वमभूद्विश्वं त्वाये सर्व प्रलीयते॥ विश्व आपहीसे हुआ है और आपही- (हरि० ३ ।। ५१) मे लीन होता है। 'अह त्व सर्वगो देव 'हेजनार्दन! हे सर्वव्यापक देव! त्वमेवाह जनार्दन । मैं ही तू है और तू ही मै हूँ। सम्पूर्ण आवयोरन्तरं नास्ति त्रिलोकीमेहनदोनोकाशब्दसेयाअर्थ- शब्दैरथैर्जगत्त्रये से किसी प्रकार भी भेद नहीं है। हे 'नामानि तव गोविन्द यानि लोके महान्ति च । गोविन्द ! संसारमे जो-जो आपके तान्येव मम नामानि महान् नाम है वेहो मेरे भी है-इसमे नात्र कार्या विचारणा ॥ कोई सन्देह नहीं है। हेगोपते! हेजग-1 'स्वदुपासा जगन्नाथ नाथ! जोआपकी उपासना है वही मेरी सैवास्तु मम गोपते। हो। हे देव! जोआपसे द्वेप करता है, यश्च त्वां द्वेष्टि भो देव इसमे सन्देह नहीं, वह मुझसे भी द्वप स मा द्वेष्टि न सशयः ॥ करता है। हे देव! क्योकि मैं भूत- 'स्वद्विस्तारो यतो देव पति भी आपहीका विस्तार हूँ ह्यह भूतपतिस्ततः । इसलिये हे सर्वव्यापक देव ! न तदस्ति विभो देव ऐसी कहीं कोई वस्तु नहीं है यत्ते विरहित क्वचित् ॥ 'यदासीद्वर्तते यच्च जो आपसे रहित हो । जो कुछ यच्च मावि जगत्पते। था, जो कुछ है और जो कुछ होगा सर्व त्वमेव देवेश हे जगत्पते! हे देवेश्वर! वह सब विना किश्चित्वया न हि आप ही है, आपसे अतिरिक्त और (हरि० ०३1८८ । ६०-६४) कुछ नहीं है।
३० विष्णुसहस्रनाम , इत्यादिवाक्यान्येकत्वप्रतिपाद ये सब वाक्य एकत्वका प्रतिपादन कानि। करनेवाले है। अपि च-'आत्मेति तूपगच्छन्ति और भी-[परमात्माको] आत्म- खरूपसे ही प्राप्त होते हैं और [आत्म- ग्राह्यन्ति च' (ब० सू०४।१।३) स्वरूपसे ही] ग्रहण कराते हैं। आत्मेत्येवं शास्त्रोक्तलक्षणः परमा- इस सूत्रमें 'आत्मा' ऐसा कहकर त्मा प्रतिपत्तव्यः । तथा हि पर- शास्त्रोक्त लक्षणविशिष्ट परमात्माका मात्मप्रक्रियायां जाबाला आत्मत्वे- ही प्रतिपादन करना अभीष्ट है। नैवैनमभ्युपगच्छन्ति-त्वं वा अह- तथा जाबाल शाखावाले भी परमात्म- मस्मि भगवो देवते अहं वै त्वमसि' प्रक्रियामे 'हे भगवन् ! हे देव! तू ही इति । तथान्येऽपि-'यदेवेह तदमुत्र मैं हूँ और मैं ही तू है। ऐसा कहकर यदमुत्र तदन्विह' (क०3० ४।१०) उसको आत्मस्वरूपसे खीकार करते 'स यश्चायं पुरुषे । यश्चासावादित्ये । है । तथा 'जोयहाँ है वही अन्यत्र स एकः' (तै० उ० २।८।१२) है, जो अन्यत्र है वही यहाँ है' 'जोयह 'तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मीति' (बृ० | इस पुरुषमे है और जो आदित्यमे है उ०१।४।१०)'तदेतद्ब्रह्मापूर्वमन- | वह एक ही है। 'तब उसने अपनेही- परमनन्तरमबाह्यमयमात्मा ब्रह्म' (बृ० | को जाना कि मैं ब्रह्म हूँ' 'वह यह ब्रह्म अपूर्व, उ० २।५।१९) 'स वा एष ,अनन्य,अनन्तर और अबाह्य है। यह आत्मा ही ब्रह्म है। वह यह महान् महानज आत्माजरोऽमरोऽमृतोऽभयो अजन्मा आत्मा जरा, मरण, मृत्यु ब्रह्म' (बृ. उ० ४।४।२५) इत्येव- और भयसे रहित ब्रह्म ही है! इत्यादि मादयः आत्मत्वोपगमा द्रष्टव्याः। ब्रह्मको आत्मस्वरूपसे खीकार कराने- ग्राहयन्ति च बोधयन्ति चात्मत्वे- | वाले और भी बहुतसे दृष्टान्त ध्यानमे नेश्वरं वेदान्तवाक्यानि-'एष त रखने योग्य हैं । इनके सिवा 'यह तेरा आत्मान्तर्याम्यमृतः' (बृ० उ०३।७) अन्तर्यामी अमर आत्मा है। 'जो 'यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् मनसे मनन नहीं किया जाता बल्कि शाङ्करभाष्य ३१ तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते' जिसके कारण मनका मनन करना कहा जाता है, तू उसीको ब्रह्म जान, (के० उ० १।५)'तत्सत्यं स आत्मा ये लोग जिसकी उपासना करते हैं वह ब्रह्म नहीं है। 'वह सत्य है, वही आत्मा तत्त्वमसि' ( छा० उ०६।८-१६) है और वही तू है' इत्यादि अन्य वेदान्त- इत्येवमादीनि। वाक्य भी ईश्वरका आत्मभावसे ग्रहण और बोध कराते है। ननु प्रतीकदर्शनमिदं विष्णु- पू० प्रतिमामे विष्णुदृष्टि करनेके प्रतिमान्यायेन भविष्यति । समान यह प्रतीक-दर्शन ही होगा। तदयुक्तम्, गौणत्वप्रसङ्गात्, उ०-ऐसा कहना ठीक नहीं; इससे वाक्पवैरूप्याच्च । यत्र हि प्रतीक- [परमात्मामे ] गौणता आ जायगी और वाक्यका रूप भी बदल जायगा। दृष्टिरभिप्रेयते सकदेव तत्र वचनं जहाँ प्रतीक-दृष्टि अभीष्ट होती है वहाँ भवति । यथा-'मनो ब्रह्म' (छा० केवल एक बार ही कहा जाता है; जैसे- उ० ३।१८।१) 'आदित्यो ब्रह्म' 'मन ब्रह्म है 'आदित्य ब्रह्म है' इत्यादि। (छा० उ० ३।१९।१) इति । इह किन्तु यहाँ 'तू मैं हूँ और मैं ही तू है। इस प्रकार [परस्पर अभेद करके ] पुनः त्वमहमस्मि अहं वै त्वमसि' कहा है । अतः प्रतीकश्रुतिसे विरू- इत्याह । अतः प्रतीकश्रुतिवैरूप्या- पता होनेके कारण अभेदकी ही प्राप्ति दभेदप्रतिपत्तिः । भेददृष्टयपवा- होती है । इसके सिवा भेददृष्टिकी निन्दा करनेसे भी यही सिद्ध होता दाच । तथा हि-'अथ योऽन्यां है, जैसा कि-'जो अन्य देवताकी देवतामुपास्ते अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति यह समझकर उपासना करता है कि न स वेद यथा पशुः' (बृ० उ० १ । यह अन्य है और मै अन्य हूँ, वह ४।१०) 'मृत्योः स मृत्युमामोति य नहीं जानता, अतः वह देवताओके] पशुके समान है' 'जो इस लोकमे इह नानेव पश्यति' (बृ० उ० ४।४। अनेकवत् देखता है वह मृत्युसे मृत्यु- - ૨૨ विष्णुसहस्रनाम १९) 'यथोदकं दुर्गे वृष्ट पर्वतेषु को प्राप्त होता है जिस प्रकार पर्वत- विधावति । एवं धर्मान्पृथक्पश्यंस्ताने- (पर्वतोके निम्न भागोंमें) फैल जाता है शिवरपर बरसा हुआ जल पर्वतोंमे वानुविधावति' (क० उ०४।१४) उसी प्रकार आत्मा धर्मो (देहधारी जीवो) को विभिन्न देखकर उन 'द्वितीयादै भयं भवति' 'यदा ह्येवैष (उपाधियो) हीका अनुगमन करता है। एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते । अथ तस्य 'दूसरेसे निश्चय हो भय होता है जिस समय यह इस (आत्मा) मे थोड़ा- भयं भवति । तत्त्वेव भयं विदुषो साभी अन्तर करता है तभी इसे भय होता है। ऐसा माननेवाले विद्वानको मन्वानस्य' (तै० उ० २ । ७) 'सर्व भी वह (भेदज्ञान) भयरूप ही है। तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्व वेद', 'जो सबको आत्मासे भिन्न देखता है उसका सब तिरस्कार कर देते है। (बृ० उ० २।४।६) इत्येवमाद्या इत्यादि । इसी प्रकारकी अनेको श्रुतियाँ भूयसी श्रुतिर्भेददृष्टिमपवदति । भेददृष्टिकी निन्दा करती है। तथा 'आत्मैवेदं सर्वम् । (छा० उ० तथा यह सब आत्मा ही है। ७।२५।२) 'आत्मनि विज्ञाते सर्व 'आत्माको जान लेनेपर यह सबजान मिदं विज्ञातं भवति' 'इदं सर्व यदयमा- लिया जाता है। यह जो कुछ है सब त्मा' (बृ० उ० २।४।६) ब्रह्मैवेदं आत्मा ही है' 'यह सब ब्रह्म हो है' विश्वम्' (मु० उ० २।२।११) इत्यादि श्रुतियाँ [अभेदका प्रतिपादन इति श्रुतिः। करती है। तथा स्मृतिरपि स्मृति भी कहती है--'हे पाण्डव 'यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोह- जिसे जानकर फिर तू इस प्रकार मोह- मेवं यास्यसि पाण्डव । कोप्राप्त नहीं होगा और जिसके द्वारा येन भूतान्यशेपेण तू सम्पूर्ण भूतोंको अपने आत्मामे द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ।।' और मुझमे भी देखेगा' अर्थात् क्षेत्र (गीता ४ । ३५) क्षेत्रक्षेत्रज्ञेश्वरैकत्वं सर्वोपनिषत्- | और क्षेत्रज्ञ ईश्वरकी, सम्पूर्ण उपनिषदोमे प्रसिद्धं द्रक्ष्यसीत्यर्थः । प्रसिद्ध एकता देखेगा।
शाङ्करभाष्य ३३ 'सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । अविभक्त विभक्तेषु 'जिसके द्वारा सम्पूर्ण भूतोमे एक अविनाशी भाव देखता है और [उस आत्मतत्त्वको] विभिन्न भूतों- मे अभिन्नरूपसे स्थित जानता है उस ज्ञानको सात्त्विक जानो। इस प्रकार तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥ (गीता १८।२०) इति अद्वैतात्मज्ञानं सम्यग्दर्शन- भगवान्ने भी 'अद्वैत-आत्मदर्शन ही सम्यग्दर्शन है' ऐसा कहा है । अतः मित्युक्तं भगवतापि । तस्मादात्म- आत्मस्वरूप ईश्वरमे ही मनको स्थिर न्येवेश्वरे मनो दधीत ॥ करना चाहिये। 'भूतात्मा चेन्द्रियात्माच इसके सिवा आप भूतात्मा, प्रधानात्मा तथा भवान् । इन्द्रियात्मा, प्रधानात्मा, 'आत्मा और आत्मा च परमात्मा च परमात्मा हैं। इस प्रकार आप अकेले त्वमेकः पञ्चधा स्थित (विष्णु० ५।१८।१०) ही पाँच प्रकारसे स्थित हैं। इति च । तथा 'अथवा हे अर्जुन! इन सयको 'अथवा बहुनैतेन बहुत जाननेसे तुम्हें क्या प्रयोजन किं ज्ञातेन तवार्जुन। है ? मैं अपने एक अंशसे ही इस विष्टभ्याहमिदं कृत्स्न- सम्पूर्ण जगतमें प्रविष्ट होकर स्थित हैं।' मेकाशेन स्थितो जगत् ।। इत्यादि [स्मृतियाँ भी यही बतलाती है] (गीता १०। ४२) इति च । अविद्योपाधिपक्षेऽपि प्रमाणवादः अविद्यारूप उपाधिके सम्बन्धमे समस्ति- भी यह प्रमाणवाद है-'एक ही 'एक एव महानात्मा महान् आत्मा है, वही अहंकार कहा सोऽहड्वारोऽभिधीयते। जाता है और उसे ही तत्त्वज्ञानी- ३ विष्णुसहस्त्रनाम स जीवः सोऽन्तरात्मेति गीयते तत्त्वचिन्तकैः ॥ तथा विष्णुपुराणे- 'विभेदजनकेऽज्ञान नाशमात्यन्तिकंगते। आत्मनो ब्रह्मणो भेद- मसन्तं कः करिष्यति। (६।७।१६) 'परात्मनोर्मनुष्येन्द्र विभागोऽज्ञानकल्पितः । क्षये तस्यात्मपरयो- विभागोऽभाग एव हि ।। इति । विष्णुधर्म- 'यथैकस्मिन्घटाकाशे रजोधूमादिभिर्युते । नान्ये मलिनतां यान्ति दूरस्थाः कुत्रचित्क्वचित् ॥ 'तथा द्वन्द्वैरनेकैस्तु जीवे च मलिने कृते। एकस्मिन्नापरे जीवा मलिनाः सन्ति कुत्रचित् ॥ इति। लोग जीव या अन्तरात्मा कहकर वर्णन करते है। तथा विष्णुपुराणमे कहा है- 'विभेदजनक अज्ञानके आत्यन्तिक नाशको प्राप्त हो जानेपर आत्मा और ब्रह्मका भेद, जो सर्वथा असत्य है, कौन करेगा? 'हे राजन! आत्मा और परमात्मा- का विभाग अज्ञानकल्पित ही है। उस (अज्ञान)के नष्ट हो जानेपर जीव और ब्रह्माका विभाग अभागरूप ही है। विष्णुधर्ममे कहा है-'जिस प्रकार एक घटाकाशके धूलि या धुएंसे व्याप्त होनेपर उससे दूरवर्ती अन्य- घटाकाश कहीं किसी समय मलिन नही होते, उसी प्रकार अनेकों द्वन्द्वों- से एक जीवके मलिन हो जानेपर अन्य जीव कभी मलिन नही हो सकते ।। -- ब्रह्मयाज्ञवल्क्ये- है 'आकाशमेकं हि यथा घटादिषु पृथग्भवेत् । तथात्मकोऽप्यनेकेषु जलाधारेण्विवांशुमान् ॥ ब्रह्मयाज्ञवल्क्यमे कहा जिस प्रकार एक ही आकाश घट आदि उपाधियोंमे पृथक्-पृथक् प्रतीत होता है उसी प्रकार जलके पात्रोंमे प्रतिबिम्बित सूर्यके समान एक ही आत्मा अनेक उपाधियोंमे अनेक-सा जान पड़ता है।
शाङ्करभाष्य 'क्षरात्मानावीशते देव एकः' इति श्वेताश्वतरमे कहा है-'क्षर श्वेताश्वतरे* | छान्दोग्ये-'स (जडवर्ग) और आत्मा (चेतन) इन दोनोका एक हीदेवशालन करता है। एकधा भवति' इत्यादि । 'स तत्र छान्दोग्योपनिपद्का कथन है- पर्येति' ‘स वा एप एतेन दैवेन चक्षुषा ('वह एक ही प्रकार है) इत्यादि । मनसैतान्कामान्पश्यन्रमते' 'परोऽविकृत श्रुति कहती है-'वह वहाँ सव एवात्मा स्वात्मायं-जीवः' इति श्रुतेः। ओर व्याप्त है। 'वह इन दिव्य नेत्रोंसे 'स एंप इह प्रविष्टः' इति वृहदार- मनहीले द्वारा इन भोगोंको देखता हुआ रमण करता है। अधिकारी ण्यकश्रुतिः । - 'आत्मेत्येवोपासीत' परम्गत्मा ही यह अपना आत्मारूप 'तदेतद्ब्रह्मापूर्वम्' (बृ० उ० २।५।१९) जीव है तथा वही यह इसमे अनु- 'नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्योऽतोऽस्ति | प्रविष्ट है। ऐसी बृहदारण्यक श्रुति विज्ञाता' (वृ० उ०३।७।२३) 'स भी है । इसके सिवा 'वहआत्मा है-इस प्रकार ही उपासना करे 'वह यह वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञान- ब्रह्म अपूर्व है' '[इस आत्माके सिवा मयः' (बृ० उ० ४ । ४ । २२) कोई अन्य द्रष्टा या अन्य विज्ञाता 'अथ योऽन्यां देवतामुपास्ते' (बृ० उ० नहीं है। यह जो विज्ञानमय है वही १।४ । १०) 'ऐतदात्म्यमिद५ सर्वम्' | म्हान् अज आत्मा है तथा जो अन्य देवताकी उपासना करता है। (छा० उ० ६ । ८-१६) इत्यादि। 'यह सव इसीका रूप है' इत्यादि और श्रुतियाँ भी है। 'निश्चरन्ति यथा लोह- योगयाज्ञवल्क्यका वचन है- पिण्डात्तप्तात्स्फुलिङ्गकाः । 'जिस प्रकार तपाये हुए लोहेसे , हमें श्वेताश्वतर उपनिपटें यह श्रुति नहीं मिली; इसी आशयकी एक और श्रुति मिलती है, जिसका पाठ इस प्रकार है-'विद्याविये ईशते यस्तु सोऽन्यः' (श्वे० उ०५।१)।
३६ विष्णुसहस्रनाम चिनगारियाँनिकलती है, उसीप्रकार सकाशादात्मनस्तद्वत् प्रभवन्ति जगन्ति हि ॥ आत्मासे अनेको जगत इति योगयाज्ञवल्क्ये । होते हैं। 'अजः शरीरग्रहणात् ब्रह्मपुराणमें कहा है--'वह अजन्मा स जात इति कीर्त्यते । ही शरीर ग्रहण करनेके कारण जात इति ब्राह्मे। (जन्मा हुआ) कहा जाता है। 'सर्पबद्रज्जुखण्डस्तु [ इसके सिवा ] 'जिस प्रकार निशायां वेश्ममध्यगः । रात्रिके समय घरमे पड़ा हुआ एको हि चन्द्रो द्वौ व्योम्नि रस्सीका टुकड़ा सर्पके समान प्रतीत तिमिराहतचक्षुषः ॥ होता है तथा तिमिररोगसे पीड़ित नेत्रोंवालेको आकाशमे एक ही 'आभाति परमात्मा च चन्द्रमा दो-जैसा जान पड़ता है सर्वोपाधिषु संस्थितः । उसी प्रकार एक ही नित्योदित स्वयं- नित्योदितः स्वयंज्योतिः ज्योति सर्वगामी परम पुरुष सर्वगः पुरुषः परः ॥ परमात्मा समस्त उपाधियोमे स्थित अहङ्काराविवेकेन होकर भास रहा है। वह अहंकाररूप कर्ताहमिति मन्यते । अविवेकके कारण ही 'मैं कर्ता हूँ? इति । ऐसा मानता है। 'एवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना तथा 'इसी प्रकार यह पुरुप संपरिष्वक्तः' (बृ० उ०४।३।२१)| प्राज्ञात्माके साथ मिलकर' और 'सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति' | 'हे सोम्य! उस समय वह सत्से युक्त (छा० उ० ६ । ८।१) इति । हो जाता है' इत्यादि एवं- एवं 'श्रीहरि अपनी मायाले 'खमायया स्वमात्मानं अपनेको मोहित कर तिरूप मायाके मोहयन्द्रुतमायया । गुणाहतं खमात्मानं कारण अपनेको गुणयुक्त अनुभव लभतेच खयं हरिः॥' करते हैं। som .
शाङ्करभाष्य 'यस्मिन्सर्वाणि भूतान्या- तथा 'क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि' (गीता तथा 'क्षेत्रज्ञभीमुझेही जान' 'उठते १३ । २) 'उत्क्रामन्तं स्थित वापि' अथवा स्थित होते हुए 'ज्ञान अज्ञान- (गीता १५। १०) 'अज्ञानेनावृतं से ढका हुआ है। 'अव्यक्तसे विशेष ज्ञानम्' (गीता ५। १५) 'अव्यक्ता- दिविशेपान्तमविद्यालक्षणं (पञ्चभूत) पर्यन्त सव अविद्यारूप स्मृतम् 'आसीदिद तमोभूतम्' (मनु० ११५) ही माना गया है। यह सवअन्धकार- 'वाचारम्भणम्' (छा० उ०६।१। मय था' 'वाणीका विलासमात्र है। ४) 'यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर 'जहां इतके समान होता है वही। इतरं पश्यति । यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवा- | अन्य अन्यको देखता है, जहाँ इसके भूत् तत्केन कं पश्येत् तत्केन के लिये सवआत्मस्वरूपही हो गयावहाँ जि त्' (बृ० उ० २।४।१४) किससे किसको देखे और किससे किसको सूघे? 'जिस अवस्थामें सव त्मैवाभूद्विजानतः । भूत आत्मखरूप ही हो जाते हैं वहाँ तत्र को मोहः कः शोक एकत्व देखनेवाले उस ज्ञानीको क्या एकत्वमनुपश्यत. ॥' मोह और क्या शोक हो सकता है? (ई० उ०७) 'यत्र नान्यत्पश्यति नान्यत् विजा- 'जहां अन्य कुछ नहीं देखता और न नानि' (छा० उ० ७।२४।१) अन्य कुछ जानता ही है' 'यह भेद 'भेदोऽयमज्ञाननिबन्धनः 'नेह नानास्ति अज्ञानके ही कारण है। 'यहाँ नाना किञ्चन' (क० उ० ४ । ११) 'मृत्योः कुछ भी नही है' 'इस लोकमे जो स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति' अनेकवत् देखता है वह मृत्युसे मृत्यु (क० उ०४।१०) 'विश्वतश्चक्षुः' (श्वे० उ० ३ । ३) 'यो योनिमधि- कोप्राप्त होता है' 'सब ओर चक्षुवाला तिष्ठत्येको विश्वानि रूपाणि योनीश्च है' 'जो योनि (मूल) मे स्थित है वह सर्वाः' एक ही सम्पूर्ण रूप और योनियां है।
३८ विष्णुसहस्रनाम करता है और 'अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां 'अपने ही समान बहुत-सी प्रजा बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः। उत्पन्न करनेवाली एक लोहित श्वेत और कृष्ण वर्ण अजाको सेवन करने- अनो टेको जुपमाणोऽनुशेते वाला एक अज उसका अनुगमन जहात्येनांभुक्तभोगामजोऽन्यः॥' दूसरा उसे भोगकर (श्वे० उ०४।५) त्याग देता है' * 'देवात्मशक्तिको 'देवात्मशक्किं विदधे' 'न तु तद्- धारण किया' [सुषुप्तिसे ] उससे द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यत्पश्येत्' दूसरा (बुद्धिरूप प्रमाता) अन्य ' (बृ० उ० ४ । ३ । २३ ) 'एको हि (इन्द्रियरूप करण) अथवा पृथक् (विषय) कोई नहीं है जिसे वह देखे रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः' (श्वे० उ० 'एक ही रुद्र था दूसरा कोई नही' ३।२) इत्यादि। इत्यादि । मनोदृश्यमिद द्वैत तथा गौडपादकारिकामे भी कहा यत्किञ्चित्सचराचरम् । मनसो हमनीभावे -'यह जो कुछ चराचर त है द्वैतं नैवोपलभ्यते ॥ सब मनका ही दृश्य है, मनका (३।३१) | अमनीभाव हो जानेपरद्वत उपलब्ध 'प्रपञ्चो यदि विद्येत निवर्तेत न संशयः । ही नहीं होता। इसमे सन्देह नहीं, मायामात्रमिदं द्वैत- प्रपञ्च यदि होता तो अवश्य निवृत्त मद्वैतं परमार्थतः ॥ हो सकता था; किन्तु द्वैत केवल (१।१७) 'यथा स्वप्ने द्वयाभासं मायामात्र है परमार्थतः तो अढत स्पन्दते मायया मनः । ही है। जिस प्रकार स्वपमे मन तथा जाप्रवयाभास मायासे ही द्वैतका स्फुरण करता है स्पन्दते मायया मनः ।। उसी प्रकार मायावशमन ही जागृति- (३।२६) इत्यादि गौडपादे। मेद्वतकास्फुरण करता है' इत्यादि। * यहाँ अजा (बकरी) के रूपकसे प्रकृति और पुरुषादिका वर्णन किया है। अजन्मा होनेके कारण मूल-प्रकृतिका नाम 'अजा' है; रज, सत्त्व और तम-यही क्रमशः उसके लोहित, शुक्ल और कृष्ण-वर्ण है। बद्ध पुरुष ही उसे सेवन करने- वाला अज (बकरा) है और मुक्त पुरुष उसे भोगकर त्याग देनेवाला अज है ।
शाङ्करभाष्य ३६ 'तर्केणापि प्रपञ्चस्य तथा 'स्वप्नादि विषयोके समान मनोमात्रत्वमिष्यताम् । सम्पूर्ण भूत दृश्यरूप है, इसलिये दृश्यत्वात्सर्वभूताना स्वप्नादिविपयो यथा ॥ तर्कसे भी प्रपञ्चकी मनोमात्रता ही 'द्वितीयाद्वै भय भवति ।' 'ज्ञाते जानो। दूसरेसे निश्चय ही भय होता त्वात्मनि नास्त्येतत् कार्यकारणता- है' 'आत्माको जान लेनेपर यह त्मनः ।' 'एको देवः सर्वभूतेषु गूढः' आत्माकी कार्य-कारणता नही रहती' (श्वे० उ० ६ । ११) 'असङ्गो ह्यय । 'एक ही देव सम्पूर्ण भूतोमे छिपा पुरुपः' (बृ० उ० ४ । ३ । १५) हुआहै 'यह पुरुष असंग ही है' आदि। इति च । 'विस्तारः सर्वभूतस्य विष्णुपुराणमे भी कहा है- विष्णो. सर्वमिद जगत् । 'यह सम्पूर्ण जगत् सर्वभूत विष्णुका द्रष्टव्यमात्मवत्तस्मा- ही विस्तार है । अतः विचक्षण दभेदेन विचक्षणः ॥ (१।१७ । ८४) पुरुषोको इसे आत्माके समान अभेद- सर्वत्र दैत्याः समतामुपेत रूपसे देखना चाहिये। "हे दैत्य- समत्वमाराधनमच्युतस्य । गण! तुम सर्वत्र समताको प्राप्त हो, (१ । १७ । १०) क्योकि समता ही श्रीअच्युतकी 'सर्वभूतात्मके तात जगन्नाथे जगन्मये । आरावना है।' 'हे तात! सर्वभूतमय परमात्मनि गोविन्दे विश्वरूप परमात्मा जगदीश्वर श्री- मित्रामित्रकथा कुतः ॥ गोविन्दमे शत्रु-मित्रकी बात ही (१।१८।३७) कहाँ है? इति विष्णुपुराणे । 'तत्त्वमसि' (छा० उ० ६ । ८) ० उ० ६ । ८) तथा 'तू वह है' 'मैं ब्रह्म हूँ' 'यह 'अह ब्रह्मास्मि' (बृ०० १।४।१०) जो कुछ है सब आत्मा है' 'यह 'इदं सर्व यदयमात्मा' (बृ० उ०।२। आत्मा' ब्रह्म है' 'आत्मज्ञानी ४।६)'अयमात्मा ब्रह्म' (बृ० उ०२। शोकको ५।१९) 'तरतिशोकमात्मवित्' (छा० जाता है। उ०७।१।३) 'तत्र को मोहः कः एवं 'एकत्व देखनेवालेको क्या शोक एकत्वमनुपश्यतः' (ई० उ० ७) मोह और क्या शोक ? . पार कर ४० विष्णुसहस्रनाम १ इत्यादि श्रुतिस्मृतीतिहास इत्यादि श्रुति, स्मृति, इतिहास और लोकोक्तियोसे भी [यही बात पुराणलौकिकेभ्यश्च । सिद्ध होती है। सिद्धेऽर्थेऽपि वेदस्थ प्रामाण्य सिद्ध अर्थ (ब्रह्म) मे भी वेदका मेष्टव्यम्- प्रमाण मानना चाहिये; यथा- 'स्वपक्षसाधनैरकार्य- 'यदि स्वपक्ष और साधनोसे मर्थजातमाह चेत् । [प्रभाकरमतावलम्बी] अर्थसमूहको अकार्य (क्रियाके अयोग्य) बतलाता तथा परोऽपि वेद चे- है तो दूसरे लोग श्रुतिको परमात्मा- च्छ्रतिः परात्मदृड् न किम् ।। का ज्ञान करानेवाली क्यो न मानें ? इत्यभियुक्तरुक्तम् । ऐसा श्रेष्ठ पुरुषोका कथन है । अन्यान्वितखार्थे पदानां पदोका सामर्थ्य अन्यान्वितखार्थ सामर्थ्य न कार्यान्वितखार्थे, तथा कार्यान्वितखार्थ (कार्यसे युक्त अपने (अन्य पदसे युक्त अपने अर्थ) में है, सत्यर्थवादानामनन्वयप्रसङ्गात् अ- | अर्थ) मे नही। यदि ऐसा हो तो अर्थवादो (प्रशंसा-वाक्यो) का अन्वय न्वयबुद्धेः स्तुतित्वात् । न हि भवति नही हो सकता, क्योकि उनकी अन्वय-बुद्धि स्तुतिरूप ही है । जैसे- 'वायव्यं श्वेतमालभेत भूतिकामो वायुर्वै 'धनकी इच्छावाला वायु-सम्बन्धी श्वेत पशुका आलभन करे, वायु क्षेपिष्ठा देवता' इति । रागस्यैव निश्चय ही शीघ्र फल देनेवाला देवता है इस वाक्यमे [कार्यताका बोध] प्रवर्तकत्वम् , न नियोगस्य । नही होता । इस प्रकार [स्वर्गादि- विपयक] राग ही [यागादिमे ] प्रवर्तक होता है, कार्य नही । १ जैसे 'गौ लाभो' इस वाक्यमें 'गो' पदका 'लाना' क्रियासे सम्बन्धित पशुविशेपमें अभिप्राय है। २ जैसे 'गोप' शब्दका अभिप्राय 'गोपालन' कार्यान्वित व्यक्तिमें नहीं बल्कि जातिविशेषमें है। ३ क्योंकि उनमें कार्यताबोधक लिङ्-लोट् आदिका अभाव होता है। ३ शाङ्करभाष्य ४१ तथा च श्रुतिः-'अथो खल्वाहुः श्रुति भी.. कहती है-कहा भी) है-यह पुरुष कामनामय है। यह काममय एवायं पुरुप इति स यथा- जैसी कामनावाला होता है वैसाही कामो भवति तस्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति संकल्प करता है, जैसा संकल्प करता तत्कर्म कुरुते यत्कर्म तदभिसम्पद्यते । है वैसा ही कर्म करता है और जैसा कर्म करता है,उसीको प्राप्त होजाता है। तथा च स्मृतिरपि- तथा स्मृति भी कहती है-'इस 'अकामतः क्रिया काचिद् लोकमे बिना कामनाके किसीका दृश्यते नेह कस्यचित् । कर्म नहीं देखा जाता; जो-जोभीकर्म यद्यद्धि कुरुते कर्म किया जाता हैसबकामनाकी हीचेष्टा तत्तत्कामस्य चेष्टितम् । होती है। तथा यह काम है क्रोध है:- इति । 'काम एष क्रोध एषः' (गीता ३।३७) इत्यादि । अतः अन्य विषय-सम्बन्धी मन्त्र इति । अन्यपराणामपि मन्त्रार्थ- और अर्थवादोकी भी प्रामाणिकनास्वीकार वादानां प्रामाण्यमङ्गीकर्तव्यम् । करनी चाहिये, क्योकि उन्हे अप्रामा- तेषामप्रामाण्यकथनेन उरगत्वं गत-णिक कहनेसे नहुप सर्पयोनिको प्राप्त वानहुषः। तत्कथम्?- हुआ था। सो किस प्रकार [सुनिये-] ऋषयस्तु परिश्रान्ता दुरात्मा नहुपद्वारा शिविकाउठाने- वाह्यमाना दुरात्मना देवर्षयो महाभागा- मे नियुक्त किये हुए निर्मल-स्वभाव स्तथा ब्रह्मर्पयोऽमलाः ॥८॥ महाभागऋषि,ब्रह्मर्षि और देवर्षियोंने पप्रच्छुः संशय ते तु थक जानेपर पापी नहुपसे यह शङ्का नहुषं पापचेतसम् । य इमे ब्रह्मणा प्रोक्ता की-'हे इन्द्र ! ब्रह्माजीने गौओंका मन्त्रावैप्रोक्षणे गवाम् ॥९॥ प्रोक्षण करनेके लिये जो मन्त्र कहे हैं एते प्रमाणं भवत आप उन्हें प्रामाणिक मानते हैं या उताहो नेति वासव । नहुपो नेति तानाह नही? मूढ़बुद्धि नहुष उनसे सहसा सहसा मूढचेतनः ॥१०॥ कह उठा, 'नही' १ 4 ४२ विष्णुसहस्रनाम राजा -- ततो विवदमानः सन् ऋषय ऊचुः- ऋपियोने कहा-तूअधर्ममे प्रवृत्त अधर्म सम्प्रवृत्तस्त्व हो रहा है और धर्मको त्यागना धर्म च विजिघृक्षसि । चाहता है; पूर्वकालमे महर्षियोने हमे प्रमाणमेतदस्माकं वे मन्त्र प्रामाणिक बतलाये हैं। पूर्व प्रोकं महर्पिभिः ॥११॥ अगस्त्यजी बोले-तव अगस्त्य उवाच- नहुपने ऋषियोके साथ विवाद करते ऋषिभिः सह पार्थिवः । हुए अधर्मातुर हो मेरे शिरका पॉवसे अथ मामस्पृशन्मूर्ध्नि स्पर्श किया । हे इन्द्र! इससे वह नष्ट- पादेनाधर्मपीडितः ॥१२॥ तेनाभूद्धतचेताः स- बुद्धि और श्रीहीन हो गया । उस निःश्रीकश्च शचीपते । समय मैंने भयातुर और उद्विग्नचित्त ततस्तमहमुद्विग्न- नहुषसे कहा-'रेमूढ! तूने पूर्वकाल- मवोचं भयपीडितम् ॥१३॥ मे महर्षियोद्वारा बनाये और पालन यस्मात्पूर्वैः कृतं मार्ग महर्षिभिरनुष्ठितम् । किये निर्दोष मार्गको दूपित किया अदुष्टं दूपयसि वै है, मेरे शिरको पैर लगाया है और यच्च मूय॑स्पृशः पदा॥१४॥ जिनका मिलना अत्यन्त कठिन है यच्चापि त्वमृषीन्मूढ ब्रह्मकल्पान्दुरासदान् । उन ब्रह्मतुल्य महर्षियोंकोवाहक बना- वाहान्कृत्वा वाहयसि कर अपनी शिबिका वहन करायी है, तेन स्वर्गाद्धतप्रभः ॥१५॥ इसलिये, हे राजन् ! इस अपराधके त्वं स्वपापपरिभ्रष्टः क्षीणपुण्यो महीपते । कारण तू निस्तेज होकर सर्परूप दशवर्षसहस्राणि धारण कर दश सहस्त्र वर्षतक सर्परूपधरो महीम् ॥१६॥ प्रथिवीपर विचरेगा और फिर विचरिष्यसि तीर्णश्च पुनः स्वर्गमवाप्स्यसि ॥१७॥ शापमुक्त होकर पुनः स्वर्ग प्राप्त इति श्रीमहाभारते (उद्योग०१७)। करेगा। ऐसा महाभारतमे कहा है।
शाङ्करभाष्य ४३ अतः श्रद्धेयमात्मज्ञानम्- अतः आत्मज्ञानमे श्रद्धा करनी 'अश्रद्दधानाः पुरुषा चाहिये । श्रीभगवान्का भी कथन है- धर्मस्यास्य परंतप । अप्राप्य मा निवर्तन्ते 'हे शत्रुदमन! इस धर्ममे अश्रद्धा 'मृत्युमंसारवर्मनि ।' करनेवाले पुरुष मुझे न पाकर मृत्यु- (गीता है ।३) रूप संसार-मार्गमे लौट आते है।' इति श्रीभगवद्वचनात् । ऐतरेयके च 'एष पन्था एतत्कमैं ऐतरेयक श्रुतिमे भी कहा है- 'यही मार्ग है, यही कर्म है, यही ब्रह्म तब्रह्मैतत्सत्यं तस्मान्न प्रमाद्येत्तन्नातीयान्न है और यही सत्य है, अतः इससे ह्यत्यायन्यूर्व येऽत्यायंस्ते पराबभूवुः ।' प्रमाद न करे, इसका त्याग न करे। जिन्होंने पहले इसका त्याग किया था वे पराभवको प्रात हुए) तदुक्तमृषिणा--'प्रजा ह तिस्रा वेदमन्त्र भी कहता है-'तीन प्रसिद्ध प्रजाओने धर्मका त्यागकिया अत्यायमीयुय॑न्या अर्कमभितो विविश्रे। था, अन्य प्रजा सब प्रकार अर्क(अर्च- नीय अग्नि ) की उपासनामे तत्पर बृहद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तः पवमानो हरित हुई। कुछ सकल भुवनोमे म्हान् सूर्य- की उपासना करने लगी। जगत्को आविवेश' इति । पवित्रकरनेवाला वायु सब दिशाओ- मे प्रविष्ट हुआ [कुछ उलकी उपासना करने लगी।' 'प्रजाह तिस्रो अत्यायमीयुरिति या 'तीन प्रसिद्ध प्रजाओने धर्म त्याग वै ता इमा. प्रजाः तिस्रोऽत्यायमीयुस्ता- किया। जिन तीन प्रजाओने धर्मका नीमानि वयासि वङ्गा वगधाश्वेरपादाः' त्याग किया था वे पक्षी, वङ्ग, वगध इति श्रुतम् । वङ्गा वनगाः वृक्षाः । और इरपाद है' ऐसी श्रुति है । 'वन' वनके वृक्ष है, 'वगध' ओपधियाँ है वगधाः ओषधयश्च । इरपादा उर- और 'इरपाढ' उर (हृदय) ही जिनके पादाः सपदियः। पाद है वे सादि है।
विष्णुसहस्रनाम तथा च ईशावास्ये अविद्वनि तथा ईशावास्योपनिपर्दो अविद्वान्- न्दार्थों मन्त्र:- की निन्दाविपयक यह मन्त्र है- 'असुर्या नाम ते लोका 'वे असुर्य नामक लोकघोर अन्धकार- अन्धेन तमसावृताः । ले व्याप्त हैं, जो कोई आत्मघाती तारस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥ पुरुष होते है वे मरनेपर उन्हींको इति (ई० उ० ३)। प्राप्त होते है। 'असन्नेव स भवति । असद्ब्रह्मेति तैत्तिरीय उपनिपर्दो कहा है- वेद चेत्' इति तैत्तिरीये (२ । ६)। 'ब्रह्म असत् है यदि ऐसा जानता है तो वह (जाननेवाला) असत् ही तथा शकुन्तलोपाख्याने हो जाता है तथा शकुन्तलोपाख्यान- 'योऽन्यथा सन्तमात्मान- का वचन है-'जो अन्य प्रकारसे मन्यथा प्रतिपद्यते । स्थित अपने आत्माको अन्य प्रकार जानता है उस आत्मघाती चोरने किं तेन न कृतं पापं कौन पाप नहीं किया ? अस्तु ! अब चोरेणात्मापहारिणा ॥ अधिक प्रसङ्ग बढानेकी आवश्यकता इत्यलमतिप्रसङ्गेन। नही। सहस्रनामजपस्य अब, सहस्रनाम-जपके अनुरूप मानसस्नानमुच्यते- मानस-स्नानका वर्णन किया जाता है- 'यस्मिन्देवाश्च वेदाश्च 'जिसमे देवता और वेद पूर्ण एकता- पवित्रं कृत्स्नमेकताम् । को प्राप्त हो गये है उस परम पवित्र व्रजेत्तन्मानसं तीर्थ मानस-तीर्थको जाय और उसमे तत्र स्नात्वामृतो भवेत् ॥ स्नान कर अमर हो जाय। जो मनुष्य 'ज्ञानहदे ध्यानजले मानस-तीर्थमें ज्ञान-सरोवरके भीतर रागद्वेषमलापहे। राग-द्वषरूप मलको दूर करनेवाले यः स्नाति मानसे तीर्थे ध्यानरूप जलमे स्नान करता है वह सयाति परमां गतिम् ॥ परमगति प्राप्त करता है। सरस्वती अनुरूपं शाङ्करभाष्य ४५ 'सरस्वती रजोरूपा रजोमयी है, यमुना तमोमयी है और तमोरूपा कलिन्दजा। गङ्गाजी सत्त्व-स्वरूपा है; अतः वे निगुण ब्रह्मतक नहीं जा सकती। सत्त्वरूपा च गङ्गा च न यान्ति ब्रह्म निर्गुणम् ॥ आत्मा नदी है, वह संयमरूप जलसे 'आत्मा नदी संयमतोयपूर्णा भरी हुई है, सत्य उसका ह्रद (जल- सत्यह्रदा शीलतटा दयोर्मिः । प्रवाह) है, शील तट है और दया तत्रावगाहं कुरु पाण्डुपुत्र तरङ्ग है । हे पाण्डुपुत्र ! उसमे स्नान न वारिणा शुध्यति चान्तरात्मा ॥ | करो, जलसे अन्तःकरण शुद्ध नहीं इति महाभारते। हो सकता ऐसा महाभारतमे कहा है। 'मानसं स्नानं विष्णुचिन्तनम्' इति स्मृतिका कथन है-'श्रीविष्ण- स्मृतौ। भगवान्का चिन्तनमानसिकस्तान है। 'जप्येनैव तु संसिध्ये- मनुजी कहते है-'इसमे सन्देह ब्राह्मणो नात्र संशयः । नही ब्राह्मण कोई और कर्मकरेया न कुर्यादन्यन्न वा कुर्या- करे, केवल जपसे ही शुद्ध हो जाता न्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥ है,अतःब्राह्मण 'मैत्र' (सबका मित्र) इति मानवं वचनम् (मनु० २।८७) कहा जाता है।' जपस्तु सर्वधर्मेभ्यः [इसके सिवा ] 'जप सम्पूर्ण धर्मो- परमो धर्म उच्यते । मे श्रेष्ठ कहा गया है, क्योकि जप- अहिंसया च भूतानां यज्ञ प्राणियोकी हिंसाकेबिना सम्पन्न जपयज्ञः हो जाता है।' इत्यादि तथा गीताके- 'यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि ।' इति श्री- 'यज्ञोंमें मैं जपयज्ञ हूँ' आदि एवं गीतासु (१०।२४) अपवित्र हो अथवा पवित्र सभी 'अपवित्रः पवित्रो वा अवस्थाओमे स्थित हुआ भी जो श्री- सर्वावस्थां गतोऽपि वा। कमलनयन भगवानका सरण करता यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं है वह बाहर-भीतरसे पवित्रहोजाता स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥ इत्यादि [वचन भी जप-यज्ञका महत्त्व इत्यादि । (पन०९।८०११२)॥१०॥ बतलाते है ] ॥ १० ॥ प्रवर्तते ॥ - इति । MP-
४६
विष्णुसहस्रनाम
TI
.
यदेकं दैवतं प्रस्तुतं तस्योप-' जो एक देव बतलाया गया है
लक्षणमुच्यते-
उसीको लक्ष्य करके कहते है-
यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे ।
यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥१९॥
यतः, सर्वाणि, भूतानि, भवन्ति, आदियुगागमे ।
यस्मिन्, च, प्रलयम्, यान्ति, पुनः, एव, युगक्षये ।।
यतः यस्मात् सर्वाणि भूतानि आदियुग (सतयुग) के लगनेपर-
भवन्ति उद्भवन्ति आदियुगागमे कल्पके आदिमे जिससे सम्पूर्ण भूत
कल्पादौ।
उत्पन्न होते है।
यस्मिंश्च प्रलयं विलयं यान्ति और फिर युगका क्षय होनेपर-
महाप्रलयमे जिसमे विलीन अर्थात्
विनाशं गच्छन्ति पुनः भूयः, एव
नाशको प्राप्त होते है । 'एवं' का प्रयोग
इत्यवधारणार्थः नान्यसिन्नि- ' अवधारणके लिये हुआ है [अर्थात्
त्यर्थः । युगक्षये महाप्रलये ।
जिससे सब भूत उत्पन्न होते है,
उसीमे लीन होते है] दूसरेमे नही ।
चकारान्मध्येऽपि यस्मिस्तिष्ठन्ति
'च' कारका भाव यह है कि मध्यमे
'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन भी जिसमे स्थित रहते है । जैसा कि
श्रुति भी कहती है-'जिससे ये भूत
जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसं-
उत्पन्न होते हैं, जिससे उत्पन्न होनेपर
विशन्ति' (तै० उ० ३.१) इति जीवित रहते हैं और फिर मरकर
श्रुतेः॥११॥
जिसमे प्रवेश करते है। ॥११॥
-
तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते ।
विष्णोर्नामसहस्रं मे शृणु ' पापभयापहम् ॥१२॥
शाङ्करभाष्य तस्य, लोकप्रधानस्य, जगन्नाथस्य, भूपते । विष्णो., नामसहस्रम्, मे, शृणु, पापभयापहम् ॥ तस्य एवंलक्षणलक्षितस्यैकदैव हे पृथिवीपते ! ऐसे लक्षणोसे' तस्य लोकप्रधानस्य लोकनहेतुभिः बतलाये हुए उस एक देवके, जो लोक- विद्यास्थानः प्रतिपाद्यमानस्य जग- प्रधान-लोकन (प्रतीति) के कारण- नाथस्य जगतां नाथः स्वामी माया- रूप विद्यास्थानोसे प्रतिपादित, जग- शबलः परमात्मा निर्लेपश्च तस्य नाथ-~-संसारके स्वामी अर्थात् माया- भूपते महीपाल, विष्णोः व्यापन- शबल और निर्लेप परमात्मा तथा शीलस्य नामसहस्रं, नाम्नां सहस्रं विष्णु-व्यापनशील है, उनके अशुभ- अशुभकर्मकृतं पापं संसारलक्षण- कर्मजनित पाप और संसाररूप भयको भयं चापहन्तीति पापभयापहं त्वं मे दूर करनेवाले सहस्र-हजार नाम मुझसे. मत्तः शृणु एकाग्रमना भूत्वा- सुनोः अर्थात् मनको एकाग्र करके वधारयेत्यर्थः। 'एकस्यैव समस्तस्य 'हे द्विजश्रेष्ठ! एक हीसमस्त ब्रह्म- ब्रह्मणो द्विजसत्तम । के नामोंका लोकोका उपकार करने- नाम्नां बहुत्वं लोकाना- । वाला विस्तार सुनो। हे द्विजराज! मुपकारकरं शृणु ॥ 'निमित्तशक्तयो नाम्ना उन नामोके अलग-अलग भेद करनेमें भेदिन्यस्तदुदीरणात् । उनकी निमित्त-शक्तियां' ही कारण है विभिन्नान्येव साध्यन्ते और इसीलिये उनके उच्चारणसे फल फलानि द्विजसत्तम ॥ भी भिन्न-भिन्न ही सिद्ध होते हैं । हे 'यच्छक्ति नाम यत्तस्य पुरुषसिह ! जो नाम जिस शक्तिवाला तत्तस्मिन्नेव वस्तुनि । है, वह उसी सौम्य या क्रूर वस्तुका पुरुपव्याघ्र साधक है। इन विष्णुधर्मोत्तरपुराणके इति विष्णुधर्मवचनाद्यद्यपि वचनोसे, यद्यपि परब्रह्ममे शब्द-प्रवृत्तिके परस्य ब्रह्मणः षष्ठीगुणक्रियाजाति- | हेतु पष्ठी, गुण, क्रिया, जाति और रूढीनां शब्दप्रवृत्तिहेतुभूतानां रूढि-इन निमित्त-शक्तियोका होना ग्रहण करें। साधक सौम्ये क्रूरेषु वस्तुषु ॥
विष्णुसहस्रनाम निमित्तशक्तीनां चासम्भव:, तथापि असम्भव है; तथापि सर्वात्मक होनेके सगुणे ब्रह्मणि सविकारे च सर्वा- कारण सगुण और सविकार ब्रह्ममे त्मकत्वात्तेषां शब्दप्रवृत्तिहेतूनां | उन शब्द-प्रवृत्तिके हेतुओकी सम्भावना सम्भवात् सर्वे शब्दाः परमिन्पुंसि होनेसे सम्पूर्ण शब्द परमपुरुप परमात्मा- वर्तन्ते ॥१२॥ मे लग जाते है ॥१२॥ तत्र- उनमे- यानिनामानिगौणानि विख्यातानि महात्मनः । ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ॥१३॥ यानि, नामानि, गौणानि, विख्यातानि, महात्मनः । ऋपिभि', परिगीतानि, तानि, वक्ष्यामि, भूतये ।। यानि नामानि गौणानि गुण जो नाम गौण-गुणसम्बन्धी अर्थात् सम्बन्धीनि गुणयोगात्प्रवृत्तानि तेषु गुणके कारण प्रवृत्त हुए है उनमें से जो च यानि विख्यातानि प्रसिद्धानि ऋषि-| विख्यात-प्रसिद्ध है और मन्त्र तथा भि' मन्त्रैस्तद्दर्शिभिश्च परिगीतानि | मन्त्रद्रष्टा मुनियोद्वारा परिगीत अर्थात् परितः समन्ततः परमेश्वराख्यानेषु सर्वत्र भगवत्कथाओमे जहाँतहाँ गाये गये तत्र तत्र गीतानि महांश्चासावात्मेति है, उस महात्मा अचिन्त्यप्रभाव देवके महात्मा- उन समस्त नामोको पुरुपार्थचतुष्टय- 'यच्चाप्नोति यदादत्ते के इच्छुकोकी पुरुपार्थ-सिद्धिके लिये यच्चात्ति विषयानिह । वर्णन करता हूँ। जो महान् आत्मा यच्चास्ति सन्ततो भाव- है उसे महात्मा कहते है। क्योकि यह स्तस्मादात्मेति कीर्त्यते॥ (लिङ्ग० १७०६६) पुरुष[सुषुतिमे ब्रह्मभावको प्राप्त हो इति वचनादयमेव महानात्मा। जाता है, [स्वप्नमे बिना इन्द्रियोंके तस्याचिन्त्यप्रभावस्य तानि विषयोंको] ग्रहण करता है और - ४६ शाङ्करभाष्य वक्ष्यामि । भूतये पुरुषार्थचतुष्टय- [जागृतिमे ] यहाँ विषयोंको भोगता है तथा निरन्तर वर्तमान रहता है, सिद्धथै भूतये पुरुषार्थ- इसलिये 'आत्मा' कहलाता है । चतुष्टयार्थिनामिति ॥१३॥ इस वाक्यसे यह देव ही महात्मा है। अथ सहस्रनाम आत्मा च परमात्मा च अत्र नामसहस्रे आदित्यादि इन सहस्रनामोमे आये हुए शब्दानामर्थान्तरे प्रसिद्धानामादि- आदित्य आदि शब्दोके दूसरे अर्थो में त्याद्यर्थानां तद्विभूतित्वेन तद- प्रसिद्ध सूर्यादि अर्थ भी भगवानकी भेदात् तस्यैव स्तुतिरिति प्रसिद्धार्थ- ही विभूति होनेके कारण उनसे ग्रहणेऽपि तत्स्तुतित्वम् । उनका अभेद है । इसलिये उन 'भूतात्मा चेन्द्रियात्मा च शब्दोका प्रसिद्ध अर्थ ग्रहण करनेसे प्रधानात्मा तथा भवान् । भी भगवानकी ही स्तुति होती है; जैसा कि विष्णुपुराणमे कहा है- त्वमेकः पञ्चधा स्थित. ॥' 'भूतात्मा, इन्द्रियात्मा, प्रधानात्मा, (विष्णु० ५।१८।५०) आत्मा और परमात्मा-ये सब आप 'ज्योतीपि विष्णुर्भुवनानि विष्णु- ही है; आप एक ही इन पांच रूपोंमे वनानि विष्णुर्गिरयो दिशश्च। स्थित है। 'नक्षत्रगण विष्णु है, भुवन नद्यः समुद्राश्च स एव सर्व विष्णु है तथा वन, पर्वत, नदियां और यदस्ति यन्नास्ति च विप्रवर्य । दिशाएं भी विष्णु ही है। हे विप्रवर्य! (विष्णु० २ । १२ । ३८) जो है और जो नहीं है वह सब कुछ इति विष्णुपुराणे। एकमात्र वे ही है। 'आदित्यानामह विष्णुः' (१०। श्रीगीताजीमे 'आदित्योमे मैं विष्णु २१) इत्यारभ्य 'अथवा बहुनैतेन' हुँ! यहाँसे लेकर 'हे अर्जुन ! इन ४ विष्णुसहस्रनाम कि ज्ञातेन तवार्जुन । विष्टभ्याहमिदं सबके बहुत जाननेसे क्या है ? कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥ मैं अपने एक अंशसे इस सम्पूर्ण जगतको व्याप्त करके स्थित हूँ। (१०। ४२) इति पर्यन्तं गीतासु । इस वाक्यतक यही बात है। तथा- 'ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्' (मु० उ० 'यह सम्पर्ण विश्व परमोत्कृष्ट २।२।११) 'पुरुप एवेदं विश्वम्' ब्रह्म ही है 'यह विश्व पुरुष ही है। (मु० उ० २।१।१०) इति श्रुतिश्च इत्यादि श्रुतियाँ भी यही कहती है । विष्ण्वादिशब्दानां पुनरुक्ता 'विष्णु' आदि शब्दोकी पुनरुक्ति नामपि वृत्तिभेदेनार्थभेदान्न पौन- होनेपर भी वृत्तिके भेदसे अर्थका भेद होनेके कारण उनमे पुनरुक्तता नही रुक्त्यम् । श्रीपतिर्माधव इत्यादीनां है । तथा श्रीपति, माधव आदि शब्दोकी वृत्त्येकत्वेऽपि शब्दभेदान्न पौन- वृत्ति एक होनेपर भी शब्द-भेद होनेसे उनकी पुनरुक्ति नही है । अर्थकी एकता रुक्त्यम् । अर्थैकत्वेऽपि न पौनरुक्त्यं होनेपर भी यहाँ पुनरुक्ति-दोपावह नही दोषाय, नानां सहस्रस्य किमेकं हो सकती, क्योकि ये सहस्रनाम 'एक देवता कौन है ?' इस प्रकार पूछनेके दैवतमिति पृष्टेरेकदैवतविषयत्वात् । कारण एक देवताविषयक ही है । -- - --- 900 हो - यत्र पुल्लिङ्गशब्दप्रयोगस्तत्र इनमे जहॉ पुल्लिङ्ग शब्दका प्रयोग विष्णुर्विशेष्या; यत्र स्त्रीलिङ्गशब्द- हो वहाँ विष्णु, जहाँ स्त्रीलिङ्ग शब्द वहाँ देवता और जहाँ नपुंसकलिङ्ग स्तत्र देवता विशेष्यते यत्र नपुंसक हो वहाँ ब्रह्मको विशेष्य समझना लिङ्गशब्दस्तत्र ब्रह्मेति विशेष्यते । चाहिये । 'यतः सर्वाणि भूतानि' (वि० स० 'यतः सर्वाणि भूतानि' यहाँसे लेकर संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और ११) इत्यारभ्य जगदुत्पत्तिस्थिति- लयके कारणरूप ब्रह्मको ही एक लयकारणस्य ब्रह्मण एकदैवतत्वेना- देवतारूपसे कहा गया हैइसलिये शाङ्करभाष्य ५१ मिहितत्वादादावुभयविधं विश्वशब्देनोच्यते- ब्रह्म [निरुपाधिक और सोपाधिक] दोनो प्रकारका ब्रह्म पहले विश्व शब्दसे बतलाया जाता है- भूतकृद्भूतभृद्भावो ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः । भूतात्मा भूतभावनः ॥१४॥ १ विश्वम् , २ विष्णुः, ३ वषट्कारः, ४ भूतभव्यभवत्प्रभुः । ५ भूतकृत, ६ भूतभृत् , ७ भावः, ८ भूतात्मा, ९ भूतभावनः॥ विश्वस्य जगतःकारणत्वेन विश्वम् विश्व अर्थात् जगत्का कारण होनेसे ब्रह्मको विश्व' कहा गया है । इत्युच्यते ब्रह्म । आदौ तु विश्वमिति पहले यहाँ यह दिखलानेके लिये कि कार्यशब्देन कारणग्रहणम् कार्य- कार्यरूप विरिञ्चि आदि शब्दोसे भी भूतविरिञ्च्यादिनामभिरपि उप- | विष्णुकी स्तुति उपपन्न हो सकती है, 'विश्व' इस कार्यशब्दसे कारणका ग्रहण पन्ना स्तुतिर्विष्णोरिति दर्शयितुम्। किया गया है। यद्वा, परमात्पुरुषान्न भिन्नमिदं अथवा, यह विश्व वास्तवमे परम- • विश्वं परमार्थतस्तेन विश्वमित्यभि- पुरुप परमात्मासे भिन्न नहीं है इसलिये 'ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं विश्व ब्रह्मको कहा गया है । 'यह. वरिष्ठम् ।' (मु० उ० २।२।११)पुरुप विश्व परमोत्कृष्ट ब्रह्म ही है। यह सब एवेदं विश्वम्' (मु० उ०२।१।१०) पुरुप ही है। इत्यादि श्रुतिसे भी वास्तव- इत्यादिश्रुतिभ्यः तद्धिन्नं न मे ब्रह्मसे अतिरिक्त और कुछ भी सत्य किञ्चित्परमार्थतः सदस्ति । नही है। अथवा, विशतीति विश्वं ब्रह्म अथवा प्रवेश करता है-इसलिये 2. 'तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्' (तै० उ० ब्रह्म विश्व है, जैसा कि श्रुति कहती है 'उसे रचकर उसीमे प्रविष्ट हो गया । ६) इति श्रुतेः । किञ्च अथवा 'जिसमें मरकर प्रविष्ट होते हैं। धीयते ब्रह्म, । "..
५२ विष्णुसहस्रनाम संहृतौ विशन्ति सर्वाणि इस श्रुतिके अनुसार प्रलयकालमे समस्त भूतान्यस्मिन्निति विश्वं ब्रह्म 'यत्- | प्राणी इसमे प्रवेश कर जाते है इसलिये प्रयन्त्यभिसंविशन्ति' (तै० उ० ३। ब्रह्म ही विश्व है । इस प्रकार वह १) इति श्रुतेः। तथा हि-सकलं कार्यरूप सम्पूर्ण जगत्मे प्रविष्ट है, जगत्कार्यभूतमेष विशत्यत्र तथा सम्पूर्ण जगत् उसमे प्रवेश करता चाखिलं विशतीत्युभयथापि विश्वं है इसलिये दोनो ही प्रकारसे ब्रह्म ब्रह्म इति । विश्व है। 'अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मात्' (क० कठोपनिपमे 'धर्मसे अलग है उ०१ । २।१४) इत्यारभ्य- और अधर्मसे भी अलग है। 'सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति इस प्रकार प्रसंग आरम्भ करते हुए तपासि सर्वाणि च यद्वदन्ति कहा है-'सब वेद जिस पदका प्रति- यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य चरन्ति पादन करते है तथा सारे तप जिसे तत्ते पद संग्रहेण ब्रवीम्यो- प्राप्त कराते है, जिसकी इच्छाले मित्येतत् ॥ (क० उ० १।२।१५) ब्रह्मचर्यका आचरण करते है उस 'एतद्धयेवाक्षरं ब्रह्म पदका मैं तुमसे संक्षेपमे वर्णन करता एतद्धयेवाक्षरं परम् । वह 'ॐ बस यही है। यह अक्षर एतद्धयेवाक्षरं ज्ञात्वा ही ब्रह्म है, यह अक्षर ही परम श्रेष्ठ है, यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ इस अक्षरको जान लेनेपर जो जिस (क० उ० १।२।१६) वस्तुकी इच्छा करता है उसे वही इति काठके। प्राप्त हो जाती है। 'एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म प्रश्नोपनिषदमे भी 'हे सत्यकाम! यदोङ्कारः' (५।२) इत्युपक्रम्य 'यः । यह ओंकार ही पर और अपर ब्रह्म है। इस प्रकार उपक्रम करके यह कहा है कि पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं 'जो 'ॐ इस तीन मात्रावाले अक्षरसे पुरुषमभिध्यायीत' (५१५) इति परम पुरुषका ध्यान करता है [वह प्रश्नोपनिषदि । 'ओमिति ब्रह्म । मुक्त हो जाता है] यजुर्वेदीय आरण्यकमे Dhob शाङ्करभाष्य ५३ hulmi ओमितीदं सर्वम् ।' इति यजुर्वेदा- कहा है-'ॐ यस यही ब्रह्म है और रण्यके । 'तद्यथा शकुना सर्वाणि पर्णानि यही सब कुछ है।' तथा छान्दोग्यका कथन है। जिस प्रकार सब पत्ते शंकु सन्तृण्णान्येवमोङ्कारेण सर्वा वाक् (पत्तेकी नसों से व्याप्त होते है उसी सन्तृण्णा । ओङ्कार एवेदं सर्वम् । इति प्रकारओकारसे सम्पर्णवाणी व्याप्त छान्दोग्य (२।२३।३)। है, यह सब कुछ ओंकार ही है। 'ओमित्येतदक्षरमिद सर्वम्' (मा० माण्डूक्योपनिषदमे भी 'ॐ यह उ० १) इत्युपक्रम्य अक्षर ही सब कुछ है, इस प्रकार 'प्रणवो ह्यपरं ब्रह्म उपक्रम करके 'प्रणव ही अपर ब्रह्म प्रणवश्च परः स्मृतः । है और प्रणव ही परब्रह्म कहा गया अपूर्वोऽनन्तरोऽबाह्यो- । वह अपूर्व अनन्तर और ऽनपरः प्रणवोऽव्ययः॥ अबाह्य है [ अर्थात उससे पहले, पीछे 'सर्वस्य प्रणवो ह्यादि- या बाहर कुछ भी नहीं है और मध्यमन्तस्तथैव उसका कोई कार्य भी नहीं है। वह एव हि प्रणव ज्ञात्वा प्रणव अव्यय है। प्रणव ही सबका व्यश्नुते तदनन्तरम् ॥ आदि, मध्य और अन्त है; प्रणवको 'प्रणवं हीश्वरं विद्यात् ऐसा जानकर फिर उसीको प्राप्त हो सर्वस्य हृदये स्थितम् । सर्वव्यापिनमोङ्कार जाता है। प्रणवहीको सबके हृदयमें मत्वा धीरोन शोचति ॥ स्थित ईश्वर समझ सर्वव्यापी 'अमात्रोऽनन्तमात्रश्च ओंकारको जान लेनेपर धीर पुरुष द्वैतस्योपशमः शिवः । शोक नही करता। जिसने माशाहीन ओङ्कारो विदितो येन और अनन्त मात्राओंवाले तशन्य स मुनिर्नेतरो जनः॥ कल्याणस्वरूप ओकारको जान लिया (माण्डू का० १ १ २६-२६) है, वही मुनि है, और कोई नहीं । इत्यन्ता माण्डूक्योपनिषत् । यहॉतक ऐसा ही कहा है ।
विष्णुसहस्रनाम - ॐ तब्रह्म । ॐ तद्वायुः । ॐ इनके सिवा] 'वह ॐ ही ब्रह्म तदात्मा । ॐ तत्सत्यम् । ॐ तत्सर्वम् । है, ॐ ही वायु है, ॐ ही आत्मा है, (ना० उ०६८) ॐ ही सत्य है, ॐ ही सब कुछ है। इत्यादिश्रुतिभिः। इत्यादि श्रुतियोसे, तथा.- 'ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म 'जो पुरुष ॐ इस एकाक्षर ब्रह्म- व्याहरन् मामनुस्मरन् । का उच्चारण कर मुझे स्मरण करता यः प्रयाति त्यजन् देह हुआ शरीर त्यागकर जाता है वह स याति परमां गतिम् ॥ परमगतिको प्राप्त होता है। "जिस (गीता ८ । १३) 'यदक्षरं वेदविदो वदन्ति अक्षर (ॐकार)कावेदज्ञजन बखान विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः । करते है, जिसमे विरक्त यतिजन यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य चरन्ति प्रवेश करते है तथा जिसे प्राप्त करने- तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ को इच्छासे ब्रह्मचर्यकाआचरण करते (गीता ८।११) है वह पद तुम्हें संक्षेपसे बताता हूँ।' 'रसोऽहमप्सु कौन्तेय 'हेकुन्तीपुत्र!जलमे मैं रस हूँ, चन्द्रमा प्रभास्मि शशिसूर्ययोः। सर्ववेदेषु और सूर्यमे प्रकाश हूँ, सम्पूर्ण वेदोंमे शब्दः खे पौरुपं नृषु ॥ प्रणव हूँ, आकाशमे शब्द हूँ और (गीता ७ । ८) पुरुषोमे पुरुषत्व हूँ।' 'मैं महर्षियोंमे 'महर्षीणां भृगुरह गिरामस्म्येकमक्षरम् । भृगु हूँ, वाणीमे एकाक्षर (ओंकार) यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि हूँ, यज्ञोंमे जपयज्ञ हूँ तथा स्थावरो- स्थावराणां हिमालयः ॥ मे हिमालय हूँ।' 'व्यक्षर (तीन (गीता १० । २५) अक्षरवाला) ब्रह्म (ओकार) ही 'आद्यं च त्र्यक्षरं ब्रह्म आदिमे है, जिसमे वेदत्रयी स्थित है। त्रयी यस्मिन्प्रतिष्ठिता । एकाक्षरं परं ब्रह्म एकाक्षर ओंकार ही परब्रह्म है और प्राणायामः परं तपः॥ प्राणायाम ही परम तप है । प्रणवः शाङ्करभाष्य वाड्मय प्रणवं सर्व 'प्रणवाद्यास्तथा वेदाः 'वेद प्रणवसे आरम्भ होते हैं और प्रणवे पर्यवस्थिताः। प्रणवमे ही समाप्त हो जाते है, सम्पूर्ण वाणीमात्र प्रणवरूप है, इसलिये तस्मात्प्रणवमभ्यसेत् ॥ प्रणवका अभ्यास करे । इत्यादि इत्यादिस्मृतेश्च विश्वशब्देनो- स्मृतियोसे भी 'विश्व' शब्दसे ओकारका कारोभिधीयते-याच्यवाचकयो- ही निरूपण किया गया है; क्योकि रत्यन्तभेदाभावात् विश्वमित्यो- वाच्य और वाचकका आत्यन्तिक भेद नहीं होता, इसलिये तात्पर्य यह है कि कार एव ब्रह्मेत्यर्थः। विश्व अर्थात् ओकार ही ब्रह्म है। 'सर्व खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति 'यह सब निःसन्देह ब्रह्म ही है क्योकि उसीसे उत्पन्न होता, उसीमे शान्त उपासीत' (छा० ३ । १४ । लीन होता और उसीमे चेष्टा करता १) इति एतदुक्तं भवति–यसा- है, इस प्रकार शान्तभावसे उपासना सर्वमिदं विकारजातं ब्रह्म तजत्वा- करे इस श्रुतिसे यह बतलाया गया है कि यह सम्पूर्ण विकार ब्रह्महीसे उत्पन्न त्तल्लयत्वात्तदनत्वाच्च । न च होनेके कारण, ब्रह्महीमे लीन होनेके सर्वस्यैकात्मत्वे रागादयः सम्भ- कारण और उसीमे चेष्टा करनेके कारण वन्ति । तस्माच्छान्त उपासीत । ब्रह्म ही है। इस प्रकार सब एकरूप होनेसे इनमे रागादि दोप सम्भव नहीं इति श्रुतेः हैं; इसलिये शान्तभावसे उपासना करे । 'श्रूयतां धर्मसर्वस्वं 'धर्मका सार-सर्वस्व सुनिये श्रुत्वा चैवावधार्यताम् । और सुनकर उसे हृदयमे धारण आत्मनः प्रतिकूलानि कीजिये-जोकार्य अपने प्रतिकूल हों परेषा न समाचरेत् ॥ उनका दूसरोके प्रति भी आचरण (विष्णुधर्म० ३ । २५६१४४), नहीं करना चाहिये। 'आत्मौपम्येन सर्वत्र 'हे अर्जुन! जो योगी सुख और समं पश्यति योऽर्जुन] दुःखको अपनी ही तरह सर्वत्र विष्णुसहस्रनाम सुखं वा यदि वा दुःखं समान देखता है, मेरे विचारसे वही स योगी परमो मतः॥' परम योगी है। (गीता ६ । ३२) 'निर्गुणः परमात्मात्र [भीमसेनने हनुमान्जीसे कहा है-] देहे व्याप्य व्यवस्थितः । 'इस देहमे निर्गुण परमात्मा ही व्याप्त तमहं ज्ञानविज्ञेयं होकर स्थित है; उस ज्ञानगम्य नावमन्ये न लङ्घये ॥ परमात्माका मैं अनादर और लंघन 'यद्यागमैन विन्देयं नही कर सकता हूँ। यदि मैं शास्त्रों- तमहं भूतभावनम् । द्वारा उस भूतभावन परमात्माका क्रमेयं त्वां गिरि चेमं अनुभव न करता तो हनुमानजीके हनूमानिव सागरम् ॥' समुद्रोल्लङ्घनके समान तुम्हें और (महा० वन० १४७ । ४-६) इस पर्वतको भी लांघ जाता। 'बद्धवैराणि भूतानि [प्रह्लादजी दैत्यपुत्रोसे कहते है- द्वेषं कुर्वन्ति चेत्ततः। 'यदि जीव आपसमे वैर बांधकर शोच्यान्यहोऽतिमोहेन एक-दूसरेसे द्वेष करते है तो उन्हें व्याप्तानीति मनीषिणाम्॥ देखकर बुद्धिमानोंको (उनके लिये) 'एते भिन्नदृशां दैत्या इस प्रकार शोक करना चाहिये कि 'ओह! ये अत्यन्त मोहग्रस्त है।" हे विकल्पाः कथिता मया। दैत्यगण ! ये सब मैने एक- कृत्वाऽभ्युपगम तत्र पथको स्वीकार करके भेददृष्टि- सक्षेपः श्रूयतां मम ॥ वालोंके [साधनविषयक] विकल्प 'विस्तारः सर्वभूतस्य बतलाये, अब तुम मुझसे उन सबका विष्णोः सर्वमिदं जगत् । सार सुनो । यह सम्पूर्ण संसार विश्वरूप विष्णुका विस्तार है । इस- द्रष्टव्यमात्मवत्तस्मा- लिये बुद्धिमानोंको इसे आत्माके दभेदेन विचक्षणैः ।। अभिन्न-भावसे देखना समान शाङ्करभाष्य ५७ 'समुत्सृज्यासुर भावं चाहिये । इसलिये तुम और हम अपने तस्माधूय तथा वयम् । आसुरी भावको छोड़कर ऐसा प्रयत्न तथा यत्न करिष्यामो करे जिससे शान्तिको प्रात हो। यथा प्राप्स्याम निर्वृतिम्॥ (विष्णु० १ । १७ । १२-८५) 'हे दैत्यगण ! सर्वत्र समानभाव 'सर्वत्र दैत्याः समतामुपेत रक्खोक्योकिसमताहीश्रीअच्युतकी उपासना है। समत्वमाराधनमच्युतस्य । (विष्णु० १ । १७ । ६8 ) 'न मन्त्रादिकृतस्तात प्रह्लादजी अपने पितासे कहते है-] । 'हे तात! मेरा यह प्रभावन तो किसी न च नैसर्गिको मम । मन्त्रादिके कारण है औरन यह मुझमे प्रभाव एप सामान्यो स्वाभाविक ही है। यह तो, जिस- यस्य यस्याच्युतो हृदि ॥ जिसके हृदयमे श्रीहरि विराजमान हैं उस-उसके लिये साधारण बात है। 'अन्येषां यो न पापानि चिन्तयत्यात्मनो यथा । हे तात! अपने ही समान जो दूसरोके लिये भी, अनिष्ट-चिन्तन पापागमस्तात हेत्वभावान्न नही करता, कोई हेतुन रहनेके कारण उसे पापोका फलरूपदुःख नहीं होता। परपीडा करोति यः। जो पुरुप मन, वचन या कर्मसे तबीजं जन्म फलति दूसरोको दुःख देता है, उस पापकर्म- प्रभूतं तस्य चाशुभम् ॥ रूप बीजसे उसे पुनर्जन्म और अत्यन्त 'सोऽहं न पापमिच्छामि अंशुभ-प्राप्तिरूप फल होताहै। किन्तु मैं न करोमि वदामि वा । अपने हृदयमे और समस्त प्राणियोमे विराजमान श्रीकेशवकास्मरण करता चिन्तयन्सर्वभूतस्थ- हुआ नकिसीका अनिष्टचाहता हूँ, न मात्मन्यपि च केशवम् ॥ करता हूँ और न कहता ही हूँ। तस्य विद्यते ॥ 'कर्मणा मनसा वाचा ५८ विष्णुसहस्रनाम 'शारीरं मानसं वाग्ज इस तरह सर्वत्र समानचित्त दैवं भूतभव तथा । रहनेवाले मुझे शारीरिक, मानसिक, सर्वत्र समचित्तस्य. वाचिक, दैविक अथवा भौतिक दुःख तस्य मे जायते कुतः ॥ कैसे प्राप्त हो सकता है ? इस प्रकार, 'एवं सर्वेषु भूतेषु भक्तिरव्यभिचारिणी। श्रीहरिको सर्वभूतमय जानकर कर्तव्या पण्डितैत्विा पण्डितोको समस्त प्राणियोमे अवि- सर्वभूतमय हरिम् ॥ चल भक्ति करनी चाहिये। साम, (विष्णु० १ । १६ । ४-९) दान, दण्ड और भेद-ये सभी 'साम चोपप्रदानं च उपाय शत्रु-मित्रादिको वशमे करने- भेददण्डौ तथापरौ । के लिये वताये गये है, किन्तु उपायाः कथिता येते मित्रादीनां च साधने॥ पिताजी ! क्रोध न कीजिये । मुझे तो 'तानेवाह न पश्यामि कोई शत्रु-मित्रादि दिखलायी ही नही मित्रादीस्तात मा क्रुधः। देते । अतः हे महाबाहो! जब कोई साध्याभावे महाबाहो साधनैः कि प्रयोजनम् ॥ साध्य ही नहीं है तो साधनसे क्या 'सर्वभूतात्मके तात लाभ? हे तात!सर्वभूतात्मक विश्व- जगन्नाथे जगन्मये । रूप जगत्पति परमात्मा गोविन्दमे परमात्मनि गोविन्दे' शत्रु-मित्र आदि भावकी बात ही मित्रामित्रकथा कुतः ॥ (विष्णु० १ । १९ । ३५-३७) कहाँ है ? " हे प्रभो ! ये राज्यादि 'जडानामविवेकाना- तो भाग्यसे प्रात होनेवाले है। ये तो मशूराणामपि प्रभो। मूर्ख, अविवेकी, दुर्बल और अनीति- भाग्यभोग्यानि राज्यानि सन्त्यनीतिमतामपि ॥ वानोंको भी प्राप्त होते देखे जाते है। 'तस्माद्यतेत पुण्येषु इसलिये जिसे महान् वैभवकी य इच्छेन्महतीं श्रियम् । इच्छा हो वह पुण्य-सम्पादनका यतितव्यं समत्वे च प्रयत्न करे और जो मुक्त होना चाहे निर्वाणमपि चेच्छता ।। वह समत्वके लिये प्रयत करे।
शाङ्करभाष्य ५६ 'देवा मनुष्याः पशवः देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष और पक्षिवृक्षसरीसृपाः । सर्प आदि सव अनन्त विष्णु रूपमेतदनन्तस्य भगवान्के ही रूप है, ये पृथक्-पृथक् विष्णोभिन्नमिव स्थितम् ॥ स्थित-से दिखायी देते है [ किन्तु 'एतद्विजानता सर्व वास्तवमे एक ही है-ऐसा जानने- जगत्स्थावरजङ्गमम् । वालेको यह सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम द्रष्टव्यमात्मवद्विष्णु- थतोऽयं विश्वरूपधृक् ॥ जगत् अपने समान ही देखना चाहिये, क्योंकि यह विश्व-रूपधारी विष्णु 'एवं ज्ञाते स भगवा- ननादिः परमेश्वरः। । ही है ? ऐसा जान लेनेपर वह अनादि प्रसीदत्यच्युतस्तस्मि- और अविनाशी परमेश्वर प्रसन्न होता प्रसन्ने क्लेशसक्षयः॥' तथा उसके प्रसन्न होनेपर सम्पूर्ण (विष्णु० १ । १६ । ४५-४६) क्ले शोका क्षय हो जाता है। 'बहूना जन्मनामन्ते तथा गीतामे भी कहा है कि 'अनेक ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। जन्मोके अनन्तर अन्तिम जन्ममे वासुदेवः सर्वमिति ज्ञानवान् पुरुप मुझे इस प्रकार जानता है कि 'सब कुछ वासुदेव ही है वह स महात्मा सुदुर्लभः ॥ ऐसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।' (गीता ७ । १९) इत्यादिवचनैश्च । इन वचनोसे यही बात सिद्ध होती है। है , हिंसादिरहितेन स्तुतिनमस्का अथवा हिंसा आदिसे रहित होकर विश्वमात्रकी स्तुति और नमस्कार रादि कर्त्तव्यमिति दर्शयितुं विश्व- आदि करने चाहिये, यह दिखलानेके शब्देन ब्रह्माभिधीयत इति वा । लिये ब्रह्म 'विश्व' शब्दसे कहा गया है। @ पातञ्जलयोगदर्शन (साधनपाद सू० ३) में कहा है-'भविद्याऽसिताराग- द्वेषाभिनिवेशाः केशाः' अर्थात् अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेप और अभिनिवेश-ये पॉच केश हैं।
विष्णुसहस्रनाम 'मत्कर्मकृन्मत्परमो [गीतामें भी कहा है-] 'जो मेरे ही मद्भक्तः सङ्गवर्जितः । लिये कर्म करनेवाला, मेरे ही परायण निर्वैरः सर्वभूतेषु रहनेवाला, मेरा भक्त, आसक्तिरहित यः स मामेति पाण्डव ॥ और समस्त प्राणियोमे वैररहित (गीता १११५५) होता है, हे पाण्डव! वह मुझे ही इति । प्रात हो जाता है । इत्यादि 'न चलति निजवर्णधर्मतो यः [यमराजने भी अपने दूतोसे कहा सममतिरात्मसुहृद्विपक्षपक्षे है-] 'जो अपने वर्णधर्मसे विचलित न हरति न च हन्ति किञ्चिदुच्चैः नही होता, अपने सुहृद् और विरो- धियोंके पक्षमे समबुद्धि है तथा किसी स्थितमनसंतमवेहि विष्णुभक्तम् ।। वस्तुका हरण या किसी जीवका हनन (विष्णु० ३ । ७ । २०) नहीं करता उस अत्यन्त स्थिर-चित्त पुरुषको विष्णुका भक्त जानो। ....." 'विमलमतिरमत्सरः ......."वह निर्मलचित,मत्सरहीन, शुचिचरितोऽखिलसत्त्वमित्रभूतः । शान्त, पवित्र-चरित्र,समस्त प्राणियों- का मित्र, प्रिय और हितकर वचन प्रियहितवचनोऽस्तमानमायो बोलनेवाला, तथा मान और माया- रहित होता है । उसके हृदयमे वसति सदा हृदि तस्य वासुदेवः॥ श्रीवासुदेव सर्वदा निवास करते 'वसति हृदि सनातने च तस्मिन् हैं। उस सनातन प्रभुके हृदयमै भवति पुमाञ्जगतोऽस्य सौम्यरूपः । निवास करते ही पुरुष इस लोकमें प्रियदर्शन हो जाता है, जिस प्रकार क्षितिरसमतिरम्यमात्मनोऽन्तः सालका नवीन पौधाअपनी सुन्दरता- कथयति चारुतयैव सालपोतः ॥' से ही अपने अन्तर्वर्ती अति रमणीय पार्थिव रसकी सूचना दे देता है। (विष्णु० ३ । ७।२४-२५) 'सकलमिदमहं च वासुदेवः "यह सम्पूर्ण जगत् और मैं एकमात्र परपुरुष परमेश्वर वासुदेव ही है- परमपुमान्परमेश्वरः स एकः । जिनकी ऐसी मति हृदयस्थ परमेश्वर प्रशान्तः शाङ्करभाष्य oM इति मतिरचला भवत्यनन्ते श्रीअनन्तमे अविचल हो गयी हो, हृदयगते व्रज तान्विहाय दूरात् ।।' उन्हें तुम दूरहीसे छोड़कर निकल (विष्णु०३ । ७।३२) जाना!""अरे दूतो! यम-नियमा- 'यमनियमविधूतकल्मषाणा दिसे जिनके दोष दूर हो गये है, जो नित्यप्रति श्रीअच्युतमे मन लगाये मनुदिनमच्युतसक्तमानसानाम् । रहते हैं तथा जिनके सद, मान अपगतमदमानमत्सराणा और मत्सरादि निकल गये हैं उन व्रज भट दूरतरेण मानवानाम् ॥' मनुष्योसे दूर रहकर ही निकल (विष्णु०३ । ७ । २६) जाना " इत्यादिवचनैर्वैष्णवलक्षणस्यैवंप्र- इत्यादि वचनोसे वैष्णवके लक्षण कारत्वाच्च हिंसादिरहितेन विष्णोः ऐसे ही होनेके कारण विष्णु-भक्तको हिंसादि-दोपोसे दूर रहकर श्रीविष्णुके स्तुतिनमस्कारादि कर्तव्यमिति । स्तुति-नमस्कारादि करने चाहिये [यह वात सिद्ध होती है। 'श्रद्धया देयं अश्रद्धयाऽदेयम्' (ले० 'श्रद्धापूर्वक देना चाहिये, अश्रद्धा- उ०१।११।३) 'श्रद्धयाग्निः समिद्धयते' से नहीं: 'श्रद्धासे अग्नि प्रज्वलित की इत्यादिश्रुतेः जाती है इत्यादि श्रुतियोसे तथा 'श्रद्धापूतं वदान्यस्य हतमश्रद्धयेतरत् । 'दाताका [दान ] श्रद्धासे पवित्र 'इमं स्तवमधीयानः होता है और अन्य अश्रद्धाके श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ।। कारण नष्ट होजाता है। इस स्तोत्र- (वि० स० १३२) का श्रद्धा और भक्तिपूर्वक पाठ 'अश्रोत्रियं श्राद्धमधीतमव्रत करनेवाला आत्मसुख,शान्ति,लक्ष्मी, मदक्षिणं यज्ञमऋत्विजाहुतम् । धृति,स्मृति और कीर्तिसे युक्त होता अश्रद्धया दत्तमसंस्कृतं हवि- है ] 'हे दैत्यश्रेष्ठ ! बिना श्रोत्रियका भांगाः षडेते तव दैत्यसत्तम।। श्राद्ध, बिना व्रतका अध्ययन, बिना 'पुण्यं मवेषिणा यच्च दक्षिणाका यज्ञ, विना ऋत्विक्की मद्भक्तद्वेषिणा आहुति, बिना श्रद्धाका दान और तथा।
६२ विष्णुसहस्रनाम आसक्त क्रयविक्रयसकानां बिना संस्कार किया हुआ हवि-येछ: पुण्यं यच्चाग्निहोत्रिणाम् ॥ तेरे भाग है। मुझसे द्वेष करने- वालोंका, मेरे भक्तोंसे द्वेष करने- 'अश्रद्धया च यहानं वालोंका, निरन्तर क्रय-विक्रयमें यजतां ददतां तथा । रहनेवालोंका, [विधि- तत्सर्व तव दैत्येन्द्र हीन ] अग्निहोत्र करनेवालोंका मत्प्रसादाद्भविष्यति ॥ पुण्य तथा अश्रद्धापूर्वक यज्ञ या 'अश्रद्धया हुतं दत्तं दान करनेवालोंका दान, हे दैत्येन्द्र ! तपस्तप्तं कृतं च यत् । ये सब मेरी कृपासे तुझे प्राप्त होगा 'हे पार्थ ! जो हवन, दान असदित्युच्यते पार्थ यातप अश्रद्धासे किया जाता है वह न च तत्प्रेत्य नो इह ॥ असत् कहलाता है। उसका न यहाँ (गीता १७ । २०) औरनमरनेपरही कोई फल होता है। इत्यादिस्मृतिभिश्च श्रद्धया इत्यादि स्मृतियोसे भी [यही सिद्ध स्तुतिनमस्कारादि कर्तव्यमश्रद्धया होता है कि ] श्रद्धापूर्वक ही स्तुति- नमस्कारादि करने चाहिये, अश्रद्धा- न कर्तव्यम् । से नही। 'ॐतत्सदिति निर्देशो 'ॐ तत्सत्' यह ब्रह्मका तीन ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः । प्रकारका नाम कहा गया है। भगवान्- (गीता १७ । २३) के इस वचनसे [यह सिद्ध होता है इति भगवद्वचनात् स्तुतिनमस्का- कि] स्तुति और नमस्कार आदि कर्म रादिकं कर्मासात्त्विकं विगुणमपि यदि असात्त्विक और गुणहीन भी हों श्रद्धापूर्वकं ब्रह्मणोऽभिधानत्रयप्रयो- तो भी ब्रह्मके इन तीन नामोका श्रद्धा- गेण सगुणं सात्त्विकं सम्पादितं पूर्वक प्रयोग करनेसे गुणयुक्त और भवति । सात्त्विक हो जाते है। आत्मानं विष्णुं ध्यात्वार्चन ये पूजा, स्तुति और नमस्कारादि स्तुतिनमस्कारादि कर्तव्यम् । विष्णु भगवान्को आत्मरूपसे चिन्तन शाङ्करभाष्य परस्य 'नाविष्णुः कीर्तयेद्विष्णु करके करने चाहिये । महाभारत-कर्म- नाविष्णुर्विष्णुमर्चयेत् । काण्डमें कहा है-'बिना विष्णुरूप हुए विष्णुका कीर्तन न करे, बिना विष्णु नाविष्णुः सस्मरेद्विष्णु हुए विष्णुका पूजन न करे, विना नाविष्णुर्विष्णुमामयात्॥' विष्णु हुए विष्णुका स्मरण न करे और न विना विष्णु हुए विष्णुको इति महाभारते कर्मकाण्डे । प्राप्त हो। 'सर्वाण्येतानि नामानि विष्णुधर्ममे कहा है-'हे अनध! ब्रह्मणोऽनघ। ये सब नाम परब्रह्मके ही है। भक्त (विष्णुधर्भ० ३ । १२३ । १३) जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है 'यं य काममभिध्याये- निःसन्देह उसीको प्राप्त कर लेता है। तं तमामोत्यसंशयम् । सर्वकामानवाप्नोति उन जगद्गुरुको आराधना करनेसे समाराध्य जगद्गुरुम्॥ सब इच्छाएं पूर्ण हो जाती है। हे 'तन्मयत्वेन गोविन्द- दालभ्य!मनुष्यगोविन्दको तन्मयता- मेत्येतद्दाल्भ्य नान्यथा । से ही प्राप्त कर सकता है, जो पुरुष तन्मयो वाञ्छितान्कामा- तन्मय हो जाता है वह अपनी इच्छित न्यदवाप्नोति मानवः ।। वस्तुओको प्राप्त कर लेता है इसमे इति विष्णुधर्मे। कुछ भी अन्यथा नहीं है। 'सर्वभूतस्थितं यो मां श्रीभगवद्गीतामे कहा है-'जो पुरुष भजत्येकत्वमास्थितः । एकत्वमे स्थित होकर समस्त भूतोंमे सर्वथा वर्तमानोऽपि स्थित मुझ परमात्माका भजन करता स योगी मयि, वर्तते। है वह सब प्रकारसे वर्तता हुआ भी इति भगवद्गीतासु (६ । ३१) मुझहोमे बर्तता है। 'अहं हरिः सर्वमिदं जनार्दनो विष्णुपुराणका कथन है-'मैं श्री- हरिहू', यह समस्त संसारजनार्दनही नान्यत्ततः कारणकार्यजातम् । है, उस (परमात्मा) से अतिरिक्त और ६४ विष्णुसहस्रनाम ईदृड् मनो यस्य न तस्य भूयो कोई कार्य कारणादिनही है-जिसका ऐसा चित्त है उसे फिर जन्मादिसे भवोद्भवा द्वन्द्वगदा भवन्ति ।' होनेवाली द्वन्द्वरूप व्याधियाँ नहीं इति विष्णुपुराणे (१।२२ । ८७) होती। 'गुरोर्यत्र परीवादो स्मृति कहती है-'जहाँ गुरु- निन्दा वापि प्रवर्तते। कौँ तत्र पिधातव्यो का अपवाद या निन्दा होती हो गन्तव्यं वा ततोऽन्यतः ॥' वहाँ कान मूंद लेने चाहिये अथवा (विष्णुधर्म० ३।२३३ । १२) वहाँसे कहीं अन्यत्र चला जाना 'तस्माद्ब्रह्मैवाचार्य- खरूपेणावतिष्ठते चाहिये 'अतः ब्रह्म ही आचार्यरुपसे इति स्मृतेः। स्थित है। 'वरं हुतवहज्वाला- 'अग्निकी प्रचण्ड ज्वालाके पुज्जस्यान्तर्व्यवस्थितिः । भीतर रहनाअच्छा है, किन्तु श्रीहरि- न शौरिचिन्ताविमुख- चिन्तनसे विमुख लोगोंके साथ रहने- जनसंवासवेशसम् ॥ का दुःख अच्छानहीं'-कात्यायनजीके इति कात्यायनवचनाद् यत्र | इस वाक्यसे भी यही तात्पर्य निकलता देशे वासुदेवनिन्दा तत्र चासो न है कि] जहाँ श्रीवासुदेवकी निन्दा होती कर्तव्यः। हो वहाँ नही रहना चाहिये । 'यस्य देवे परा भक्ति- जिसकी भगवान्मे अत्यन्त भक्ति यथा देवे तथा गुरौ । है और भगवान्के समान ही गुरुमें तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥ भी है उस महात्माको ही इन ऊपर (६।२३) । कहे हुए अर्थोका प्रकाश होता है। इति श्वेताश्वतरोपनिषन्मन्त्र- श्वेताश्वतरोपनिषद्के इस मन्त्रसे भी वर्णात् हरौ गुरौ च परा भक्तिः यही सिद्ध होता है कि श्रीहरि और कार्येति । गुरुमे परा भक्ति करनी चाहिये ।
शाङ्करभाष्य ६५ 'अवशेनापि यन्नानि 'जिसकेनामका विवश होकर भी कीर्तिते सर्वपातकैः । कीर्तन करनेसे पुरुष, सिहसे डरे हुए पुमान्चिमुच्यते सद्यः गीदडोके समान सम्पूर्ण पापोसे सिंहतस्तै करिव । (विष्णु ० ६।८।१६) तुरन्त मुक्त हो जाता है ।। 'ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि 'जानकर अथवा विना जाने भी वासुदेवस्य कीर्तनात् । वासुदेवका कीर्तन करनेसे समस्त तत्सर्व विलयं याति पाप, जलमें पड़े हुए नमकके समान तोयस्थं लवणं यथा ॥' लीन हो जाते हैं। 'कलिकल्मषमत्युग्रं 'मनुष्योको नरककी पीडादेनेवाले नरकार्तिप्रद नृणाम् । कलिके अत्यन्त उग्र पाप श्रीकृष्णका प्रयाति विलयं सद्यः सकृत् कृष्णस्य सस्मृतेः। एक बार भी भली प्रकार स्मरण विष्णु ०६।८।२१) करनेसे तुरन्त लीन हो जाते हैं ।। 'सकृत्स्मृतोऽपि गोविन्दो 'श्रीगोविन्द एक बार भी स्मरण नृणा जन्मशतैः कृतम् । किये जानेपर मनुष्योके सैकड़ो जन्मोंमे किये हुए पापोके समूहको पापराशि दहत्याशु इस प्रकार शीघ्र ही भस्म कर डालते है तूलराशिमिवानल। जैसे अग्नि सईके ढेरको।' 'सेयं वदनवल्मीक- वासिनी रसनोरगी। या न गोविन्द गोविन्द गोविन्देति प्रभापते ।। 'जो जिह्वा 'गोविन्द ! गोविन्द ! गोविन्द! ऐसा नही कहती वह मुख- रूपी विलमे रहनेवाली सर्पिणीके ही समान है। 'जो जिला दिन-रात श्रीगोविन्द- के गुण नहोगाती वह मनुष्यके मुखमे जिह्वारूपसे पापकी वेल ही रहती है। 'पापवल्ली मुखे तस्य जिह्वारूपेण तिष्ठति। या न वक्ति दिवा रात्रौ गुणान् गोविन्दसम्भवान् ॥
६६ विष्णुसहस्रनाम 'सकृदुच्चरितं येन 'जिसने एक बार भी हरिए इन दो हरिरित्यक्षरद्वयम् अक्षरोंका उच्चारण किया है उसने बद्धः परिकरस्तेन मानो मोक्षकी ओर जानेके लिये मोक्षाय गमनं प्रति ॥ कमर कस ली है।। 'एकोऽपि कृष्णस्य कृतः प्रणामो 'श्रीकृष्णको किया हुआ एक भी प्रणाम दश अश्वमेध-यज्ञोंके स्नानके दशाश्वमेधावभृथेन तुल्यः । समान है, उनमे भी दश अश्वमेध-यज्ञ दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म करनेवालेका तो फिर जन्म होता है, किन्तु कृष्णकोप्रणाम करनेवालेका कृष्णप्रणामी न पुनर्भवाय ॥ पुनर्जन्म नहीं होता " इस प्रकारके (महा० शान्ति०४७ । ११) वचनोसे यही कहा गया है कि एवमादिवचनैः श्रद्धाभक्त्यो- श्रद्धा-भक्तिका अभाव होनेपर रभावेऽपि नामसङ्कीर्तनं समस्तं भी नामसंकीर्तन समस्त पापोको दुरितं नाशयतीत्युक्तम्, किमुत नष्ट कर देता है; फिर श्रद्धा-भक्ति- सहित किया हुआ सहस्रनामका श्रद्धादिपूर्वकं सहस्रनामसङ्कीर्त्तनं कान उन्हें कीर्तन उन्हे नष्ट कर देता है-इसमे नाशयतीति। तो कहना ही क्या है ? 'मनसा वा अग्रे सङ्कल्पयत्यथ वाचा 'पहले मनसे संकल्प करता है फिर वाणीसे बोलता है ।। मनसे जो व्याहरति' 'यद्धि मनसा ध्यायति तद्वाचा बात सोचता है वही वाणीसे कहता वदति' इति श्रुतिभ्यां मरणं ध्यानं च है। इन श्रुतियोसे स्मरण और ध्यान भी नामसंकीर्तनके अन्तर्गत ही सिद्ध नामसङ्कीर्तनेऽन्तर्भूतम् । होते है। 'यस्मिन्न्यस्तमतिर्न याति नरक खर्गोऽपि यच्चिन्तने विघ्नो यत्र निवेशिते च मनसि ब्राझोऽपि लोकोऽल्पकः । विष्णुपुराणके अन्तमे श्रीपराशरजी- ने इस प्रकार उपसंहार किया है- 'जिसमे दत्तचित्त हुआ पुरुष नरक- गामी तो होता ही नहीं, बल्कि शाङ्करभाष्य ६७ विचार्य च पुनः पुनः। मुक्ति चेतसि यः स्थितोऽमलधिया स्वर्ग भी जिसका चिन्तन करनेमे विघ्नरूप है तथा जिसमे चित्त पुंसां ददात्यव्यय. लग जानेपर ब्रह्मलोक भी तुच्छ किं चित्रं यदधं प्रयाति विलयं मालूम होता है और जो अविनाशी प्रभु शुद्धचित्त पुरुषोके अन्तःकरणमे तत्राच्युते कीर्तिते ॥ स्थित होकर उन्हें मोक्ष प्रदान करता इति विष्णुपुराणान्ते (६।८। है उस अच्युतका कीर्तन करनेसे यदि पाप नष्ट हो जाते है तो इसमे आश्चर्य ५७) श्रीपराशरेणोपसंहृतम् । क्या है? 'आलोड्य सर्वशास्त्राणि भगवान् श्रीवेदव्यासजीने भी महा- भारतके अन्तमें इसी प्रकार उपसंहार किया है कि 'समस्त शास्त्रोंका मन्थन इदमेक सुनिष्पन्न करके उनका वारम्वार विचार करने- ध्येयो नारायणः सदा||* पर यही एक बात सिद्ध होती है कि इति श्रीमहाभारतान्ते भगवता सदा श्रीनारायणका ध्यान करना श्रीवेदव्यासेनोपसंहृतम्। चाहिये। 'हरिरेकः सदा ध्येयो 'आपलोगोको सत्त्वगुणमे स्थित भवद्भि. सत्वसंस्थितैः । होकर निरन्तर एक श्रीहरिका ही ओमित्येवं सदा विप्रा ध्यान करना चाहिये । हे विप्रगण! 'ॐ इस प्रकार सदों जप करो और पठत ध्यात केशवम् ॥' केशवका ध्यान करो इस प्रकार हरि- इति हरिवंशे (८९।९) कैलास- वंशपुराणमे कैलासयात्राके प्रसंगमे यात्रायां हरिरेको ध्यातव्य इत्युक्तं । महेश्वरने भी 'एक हरिहीका ध्यान महेश्वरेणापि । करना चाहिये ऐसा कहा है। • हमें यह श्लोक महाभारतके अन्तमें नहीं मिला । लिगपुराणका (२।७।११) लोक सर्वथा इसी प्रकार है।
६८ विष्णुसहस्रनाम एतत्सर्वमभिप्रेत्य 'एप मे सर्व- धर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः' इत्या- धिक्यमुक्तम्। इन सब वचनोके अभिप्रायसे ही 'सब धमि मुझे यह धर्म सबसे अधिक मान्य है। इस प्रकार इसकी अधिकता बतलायी गयी है। 'किमेक दैवतम्' (वि० स० २) इस प्रकार 'लोकमे एक देव कौन इत्यारभ्य 'किं जपन् मुच्यते जन्तुः' है? यहॉसे लेकर 'जीव किसका जप ( वि० स० ३) इति षट्प्रश्नेषु प्रश्नोके उत्तरमे 'जिससे सब भूत हुए है' करनेसे मुक्त हो जाता है । इन छ: 'यतः सर्वणि' (वि० स०११) इति इत्यादि प्रश्नोत्तरोसे जिस ब्रह्मका वर्णन प्रश्नोत्तराभ्यां यद्ब्रह्मोक्तं तद्विश्व- | किया है वह 'विश्व' शब्दसे कहा शब्देनोच्यत इति व्याख्यातम् । जाता है-ऐसी व्याल्या की गयी है। तत्किमित्याकाङ्क्षायामाह-विष्णुः अब, 'वह विश्व कौन है ?" ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं 'विष्णुः । इति । तथा च ऋग्वेदे-'तमु ऋग्वेदमे भी 'तमु स्तोतारः पूर्व्य स्तोतारः पूयं यथाविद ऋतस्य गर्भ यथाविद ऋतस्य गर्भजनुषा पिपर्तन। जनुपा पिपर्तन । आस्य जानन्तो आस्य जानन्तो नाम चिद्विवक्तन नाम चिद्विवक्तन महस्ते विष्णो सुमति महस्ते विष्णो सुमति भजामहे' इत्यादि श्रुतियोसे सम्यक् ज्ञानकी भजामहे' इत्यादिश्रुतिभिर्विष्णोर्नाम- प्राप्तिके लिये श्रीविष्णुके नामसंकीर्तन- सङ्कीर्तनं सम्यग्ज्ञानप्राप्तये विहि- का विधान किया है । इस श्रुतिका अभिप्राय यह है कि स्तुति करनेवाले तम् । तमेव स्तोतारः पुराणं यथा- सत्यके सारभूत उस पुराणपुरुपको ज्ञानेन सत्यस्य गर्भ जन्मसमाप्ति ही यथार्थ जानकर जन्मकी समाप्ति करे । इन विष्णुके नामोको जानते बुरुत । जानन्तः आअस्य विष्णो हुए भी अन्य लोग उनका जप करे नामापि आवदत अन्ये वदन्तु मा चाहे न करे परन्तु हम तो हे विष्णो !
शाङ्करभाष्य वा हे विष्णो वयं ते सुमतिं शोभनं आपके सुन्दर तेज और सुमतिको ही महः भजामहे इति श्रुतेरभिप्रायः॥ भजते है । वेवेष्टि व्यामोतीति विष्णुः 'वेवेष्टि' अर्थात् जो व्याप्त हो विषाप्त्यभिधायिनो नुक्प्रत्य- उसका नाम विष्णु है । व्याप्ति अर्थके वाचक नुक्प्रत्ययान्त 'विप्' धातुका यान्तस्य रूपं विष्णुरिति । देशकाल- रूप 'विष्णु' बनता है । तात्पर्य यह है वस्तुपरिच्छेदशून्य इत्यर्थः। कि वह देश-काल-वस्तु-परिच्छेदसे रहित है। 'व्याप्ते मे रोदसी पार्थ महाभारतमे कहा है-हे पार्थ ! क्रान्तिश्चाभ्यधिका स्थिता । पृथिवी और आकाश मुझसे व्याप्त 'क्रमणाच्चाप्यह पार्थ विष्णुरित्यभिसंज्ञितः ॥ है तथा मेरा विस्तार भी बहुत है, इति महाभारते (शान्ति० | इस विस्तारके कारण ही मैं विष्णु ३४१ । ४२-४३)। कहलाता हूँ। 'यच्च किञ्चिज्जगत्सर्व बृहन्नारायणोपनिषदकी श्रुति है- दृश्यते श्रूयतेऽपि वा। অনলষ্টিস্থ 'जो कुछ भी संसार दिखायी या तत्सर्व व्याप्य नारायणः स्थितः ॥ सुनायी देता है, श्रीनारायण उस इत्यादिश्रुतेर्वृहन्नारायणे (१३। सवको बाहर-भीतरसे व्यास करके १-२)। स्थित है। 'सर्वभूतस्थमेकं नारायणं कारण आत्मबोधोपनिपने कहा है- पुरुषमकारणं पर ब्रह्म शोकमोह- 'सर्वभूतोमे स्थित, एक, एकाकार, विनिर्मुक्त विष्णु ध्यायन्न सीदति' कारकरूप,शोक-गोहादिसे रहित, पर- ब्रह्म नारायण विष्णुका ध्यान करनेसे इत्यात्मबोधोपनिषदि (१)। [ मनुष्य] दुःख नही पाता। विशतेर्वा नुक्प्रत्ययान्तस्य रूपं अथवा नुक्प्रत्ययान्त विश् धातुका विष्णुरिति रूप विष्णु है; जैसा कि विष्णुपुराणमे विष्णुसहस्रनाम 'यस्माद्विष्टमिदं सर्व कहा है-'उस महात्माकी शक्ति इस तस्य शक्त्या महात्मनः । सम्पूर्ण विश्वमें प्रवेश किये हुए है; इस- तस्मादेवोच्यते विष्णु- विशेर्धातोः प्रवेशनात् ॥ लिये वह विष्णु कहलाता है, क्योंकि इति विष्णुपुराणे (३।१।१५)। विश् धातुका अर्थ प्रवेश करना है। यदुद्देशेनाध्वरे वपद् क्रियते स जिसके उद्देश्यसे यज्ञमे 'वषट' किया जाता है उसे वषट्कार कहते है वषट्कारः। यसिन्यज्ञे वावपक्रिया, अथवा 'यज्ञ ही विष्णु है' इस श्रुतिके स वषट्कारः 'यज्ञो वै विष्णुः' (तै० अनुसार जिस यज्ञमे वषट क्रिया होती सं० १।७। ४ ) इति श्रुतेर्यज्ञो है वह यज्ञ वषट्कार है । अथवा जिस वषट्कारः । येन वषट्कारादि- वषट्कारादि मन्त्ररूपसे देवताओ- को प्रसन्न किया जाता है, वही मन्त्रात्मना वा देवान्प्रीणयति स वषटकार है । अथवा 'प्रजापतिश्च वषट्कारः । देवता वा, 'प्रजापतिश्च वषट्कारश्च' इस श्रुतिके तथा 'चार, वषट्कारश्च' इति श्रुतेः। चार, दो, पाँच और दो अक्षरवाले 'चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च मन्त्रोसे जिनका यजन किया जाता द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च । इयते च पुनभ्यां है, वे विष्णुभगवान् मुझपर प्रसन्न स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥ हों। इस स्मृतिके अनुसार देवता ही इत्यादिस्मृतेश्च । भूतं च भव्यं च भवच्च भूतभ- भूत, भव्य (भविष्यत्) और भवत् (वर्तमान)इनका नाम भूतभव्यभवत् है, व्यभवन्ति तेषां प्रभुः भूतभव्यभवत्- उनका जो प्रभु हो वह भूतभव्य- प्रभुः कालभेदमनाहत्य सन्मात्र- भवत्प्रभु कहलाता है। इस देवका सन्मात्रप्रतियोगिवा ऐश्वर्य* कालभेदकी १ २ वषटकार है। १ ओश्रावय, २ अस्तु श्रौषट्, ३ यज, ४ ये यजामहे, ५ वषट् । जो ऐश्वर्य केवल सत्तामात्र ही है।
शाङ्करभाष्य
प्रतियोगिकमैश्वर्यमस्येति प्रभुत्वम् ।
उपेक्षा करके रहता है, इसलिये यह
है
रजोगुणं समाश्रित्य विरिञ्चि रजोगुणका आश्रय लेकर यह ब्रह्मा-
रूपेण भूतानि करोतीति भूतकृत् ।
रूपसे भूतोकी रचना करता है, इस-
लिये
भूतकृत
है । अथवा तमोगुणको
तमोगुणमाथाय स रुद्रात्मना
स्वीकार कर रुद्ररूपसे भूतोको काटता
भूतानि कृन्तति कृणोति हिनस्तीति अर्थात् उनकी हिंसा करता है, इसलिये
भूतकृत् ।
भूतकृत् है।
सत्त्वगुणमधिष्ठाय भूतानि सत्त्वगुणके आश्रयसे भूतोका भरण-
विभर्ति पालयति धारयति पोष- पालन-धारण अथवा पोपण करता है,
यतीति वा भूतभृत् ।
इसलिये भूतभृत् है।
प्रपञ्चरूपेण भवतीति, केवलं प्रपञ्चरूपसे उत्पन्न होता है अथवा
भवतीत्येव वा भाव. । भवनं भावा
केवल है ही, इसलिये भाव है । उत्पन्न
होनेका नाम भाव है अथवा सत्तामात्र-
सवात्मको वा।
को भी भाव कहते है।
भूतात्मा भूतानामात्मान्तर्या-
भूतात्मा-'यह तेरा आत्मा
मीति भूतात्मा 'एष त आत्मान्तर्या- अन्तर्यामी और अमर है' इस श्रुतिके
म्यमृतः' (वृ० उ० ३ । ७ ।३-२२) अनुसार भूतोका आत्मा अर्थात्
इति श्रुतेः।
अन्तर्यामी होनेसे भूतात्मा है।
भूतानि भावयति जनयति वर्ध भूतोकी भावना करता है अर्थात्
उनकी उत्पत्ति या वृद्धि करता है, इस
यतीति वा भूतभावन' ॥१४॥ लिये भूतभावन है ॥१४॥
पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः ।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥१५॥
७२ विष्णुसहस्रनाम १० पूतात्मा, ११ 'परमात्मा, च, १२ मुक्तानाम् परमा गतिः । १३ अव्ययः, १४ पुरुपः, १५ साक्षी, १६ क्षेत्रज्ञः, १७ अक्षरः, एव, च ॥ भूतकृदादिमिर्गुणतन्त्रत्वं प्राप्त भूतकृत् आदि नामोंसे उसमे गुणा- धीनताका दोप प्राप्त होता है अतः प्रतिषिध्यते पूतात्मा इति, पूत आत्मा अब पूतात्मा (पवित्रस्वरूप) कह- यस्य स पूतात्मा, कर्मधारयो वा है । पूतात्मा-पवित्र है आत्मा (स्वरूप) कर उस (दोप) का प्रतिपेध करते 'केवलो निर्गुणश्च' (श्वे० उ०६।११) जिसका उसे पूतात्मा कहते है अथवा कर्मधारय समास किया जा सकता है* इति श्रुतेः । गुणोपरागः खेच्छातः वह केवल और निर्गुण है। इस श्रुति- से भी यही सिद्ध होता है । पुरुप- पुरुषस्येति कल्प्यते। का गुणोके साथ सम्बन्ध स्वेच्छासे ही माना जाता है। परमश्वासावात्मा चेति परमात्मा जो परम (श्रेष्ट) हो तथा आत्मा भी कार्यकारणविलक्षणो नित्यशुद्ध- हो, उसका नाम परमात्मा है। वह कार्य-कारणसे भिन्न, नित्य शुद्ध-बुद्ध- बुद्धमुक्तस्वभावः। मुक्त-स्वभाव है। मुक्तानां परमा प्रकृष्टा गति मुक्त पुरुपोकी जो परम अर्थात् गन्तव्या देवता पुनरावृत्त्यसम्भवा- सर्वश्रेष्ठ गति-गन्तव्य देव है वह तद्गतस्येति मुक्ताना परमा गतिः । मुक्तानां परमा गतिः (मुक्तोकी परमा गति) कहलाता है, क्योकि वहाँ 'मामुपेत्य तु कौन्तेय पहुँचे हुएका फिर लौटना नही होता। पुनर्जन्म न विद्यते ॥ भगवान्ने भी कहा है-हे कौन्तेय! (गीता ८ । १६) मुझे प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं इति भगवद्वचनम् । न व्येति नास्य व्ययो विनाशो जो वीत नही होता अर्थात् जिसका होता। तब यह अर्थ होगा-'जो पवित्र हो और आस्मा भी हो वह पूतात्मा है।'
७३ शाङ्करभाष्य विकारो वा विद्यत इति अव्ययः व्यय-विनाश या विकार नही होता 'अजरोऽमरोऽव्ययः' इति श्रुतेः। वह अव्यय है । श्रुति कहती है 'अजर है, अमर है, अव्यय है' इत्यादि । पुरं शरीरं तस्मिन् शेते पुरुषः । पुर अर्थात् शरीर, उसमे जो शयन 'नवद्वारं पुरं पुण्य- करे वह पुरुप कहलाता है। महाभारतमे मेतैर्भावै समन्वितम् । कहा है-'वह महात्मा इन पूर्वोक्त व्याप्य शेते महात्मा य- भावोसे युक्त नौ द्वारवाले पवित्र स्तस्मात्पुरुप उच्यते ॥ पुरको व्याप्त करके शयन करता है इति महाभारते । इसलिये वह पुरुष कहलाता है।' यद्वा अस्तेर्व्यत्यस्ताक्षरयोगात अथवा अस् धातुके अक्षरोको आसीत्पुरा पूर्वमेवेति विग्रहं कृत्वा उलटा करके 'पुरा' शब्दके साथ जोड- कर पुरा यानी पहलेसे ही 'आसीत्' व्युत्पादितः पुरुषः । 'पूर्वमेवाहमि- था-ऐसा पदच्छेद मानकर यह 'पुरुष' हासमिति तत्पुरुपस्य पुरुपत्वम्' इति शब्द सिद्ध हुआ है । जैसा कि श्रुति श्रुतेः। कहती है-'मैं यहाँ पूर्वमे ही था। यही उस पुरुषका पुरुषत्व है। अथवा पुरुषु भूरिषु उत्कर्ष- अथवा पुरु अर्थात् बहुत-से उत्कर्ष- शालिषु सत्त्वेषु सीदतीति, पुरूणि शाली सत्त्वो (जीवो) मे स्थित है फलानि सनोति ददातीति वा, इसलिये, या अधिक फल देता है इस- पुरूणि भुवनानि संहारसमये लिये, अथवा सहारके समय प्रचुर स्यति अन्तं करोतीति वा, पूर्ण होने, पूरिन करने या स्थित होने के भुवनोको नष्ट करता है इसलिये, अथवा पूर्णत्वात्पूरणाद्वा सदनाद्वा पुरुषः 'प्रणात्सदनाचैव ततोऽसौ पुरुषोत्तमः' भारत)मे भी कहा है पूर्ण करने और कारण वह पुरुप है। पञ्चमवेद (महा- इति पञ्चमवेदे (उद्योग० ७०।११)। स्थित होनेके कारण यह पुरुषोत्तम है।' साक्षादव्यवधानेन स्वरूपबोधे- साक्षात् अर्थात् बिना किसी
७४
विष्णुसहस्रनाम
हुआ है।
न ईक्षते पश्यति सर्वमिति साक्षी व्यवधानके अपने खरूपभूत ज्ञानसे
'साक्षाद्दष्टरि संज्ञायाम्' (पा० सू० | सब कुछ देखता है इसलिये साक्षी
है । 'साक्षाद्रष्टरि संज्ञायाम्। इस
५।२।९१)इति पाणिनिवचनादि-
पाणिनिके वचनसे यहाँ इनि प्रत्यय
निप्रत्ययः।
क्षेत्रं शरीरं जानातीति क्षेत्रज्ञः, क्षेत्र अर्थात् शरीरको जानता है
'आतोऽनुपसर्गे कः' (पा० सू० ३। इसलिये क्षेत्रज्ञ है। 'आतोऽनुपसर्गे क'
२।३) इति कप्रत्ययः 'क्षेत्रमं चापि इस सूत्रके अनुसार यहाँ कप्रत्यय
मां विद्धि' (गीता १३ । २) इति हुआ है । 'क्षेत्रज्ञ भी मुझे हो जाना
भगवद्वचनात् ।
भगवान्के इस वचनसे क्षेत्रज्ञ है। तथा
'क्षेत्राणि हि शरीराणि
महाभारतमे भी कहा है। 'शरीर ही
बीजं चापि शुभाशुभम् ।
तानि वेत्ति स योगात्मा
क्षेत्र हैं, शुभाशुभ कर्म उनका बीज
ततः क्षेत्रज्ञ उच्यते॥
है । वह योगात्मा उन्हें जानता
इति महाभारते (शान्ति०३५१।६)। है; इसलिये क्षेत्रज्ञ कहलाता है'
स एव न क्षरतीति अक्षरः जो क्षर अर्थात् क्षीण नही होता,
परमात्मा । अश्नातेरश्नोतेर्वा
सर-
वह अक्षर परमात्मा है । 'अश्'
या 'अशू' धातुके अन्तमे 'सर' प्रत्यय
प्रत्ययान्तस्य रूपमक्षर इति ।
होनेपर 'अक्षर' रूप बनता है ।
एवकारात् क्षेत्रज्ञाक्षरयोरभेदः 'एच' शब्दसे यह दिखलाया है कि
परमार्थतः, 'तत्त्वमसि' (छा० उ०
'तत्त्वमसि' इस श्रुतिके अनुसार
परमार्थतः क्षेत्र और अक्षरका अभेद
६। ८) इति श्रुतेः चकाराद्वया-
है तथा चकारसे दोनोका व्यावहारिक
वहारिको भेदश्चः, प्रसिद्धेरप्रमाण-भेद दिखलाया है, क्योकि प्रसिद्धि
प्रामाणिक नही होती ॥१५॥
त्वात् ॥१५॥
योगो योगविदां नेता
नेता प्रधानपुरुषेश्वरः।
नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥१६॥
शाङ्करभाष्य १८ योगः, १९ योगविदा नेता, २० प्रधानपुरुपेश्वरः । २१ नारसिंहवपुः, २२ श्रीमान् , २३ केशव', २४ पुरुषोत्तमः ॥ योगः- योग- 'मनके सहित समस्त ज्ञानेन्द्रियों- 'ज्ञानेन्द्रियाणि सर्वाणि निरुध्य मनसा सह । को रोककर क्षेत्र और परमात्माकी एकत्वभावना योगः एकत्व-भावनाका नाम योग है। क्षेत्रज्ञपरमात्मनोः ॥ उससे प्राप्य होनेके कारण परमात्माका तदवाप्यतया योगः। नाम भी योग है। योगं विदन्ति विचारयन्ति, जो योगको जानते है अर्थात् जानन्ति, लभन्त इति वा योग- उसका विचार करते, उसे जानते या विदस्तेषां नेता ज्ञानिनां योगक्षेम- प्राप्त करते है वे योगविद् कहलाते है, उन ज्ञानियोका योगक्षेमादि निर्वाह वहनादिनेति योगविदा नेता । करनेके कारण जो नेता है वह 'तेषां नित्याभियुक्तानां योगविदां नेता (योगवेत्ताओका नेता) योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ कहलाता है । जैसा कि-'मैं उन (गीता है । २२) नित्ययुक्तोका योगक्षेम वहन करता इति भगवद्वचनात् । इस भगवान्के वचनसे सिद्ध होता है। प्रधानं प्रकृतिर्माया, पुरुषो जीव प्रधान अर्थात् प्रकृति-माया तथा स्तयोरीश्वरः प्रधानपुरुषेश्वरः । पुरुष-जीव उन दोनोका जो स्वामी है, वह प्रधानपुरुषेश्वर है। नरस्य सिंहस्य चावयवा यस्मिन् जिसमे नर और सिंह दोनोके लक्ष्यन्ते तद्वपुर्यस्य स नारसिंहवपुः । अवयव दिखलायी देते हो ऐसा जिसका शरीर हो, वह नारसिहवपु है। यस्य वक्षसि नित्यं वसति श्रीः जिसके वक्षःस्थलमे सर्वदा श्री स श्रीमान् । बसती है, वह श्रीमान् है । अभिरूपाः केशा यस्य स जिसके केश सुन्दर हो उसे केशव ७६ विष्णुसहस्रनाम . केशवः 'केशाद्वोऽन्यतरस्याम्' कहते है। यहाँ केशाद्वोऽन्यतरस्याम्' (पा० सू० ५। २ । १०९) इति | इस पाणिनिसूत्रसे प्रशंसा-अर्थमे 'व' प्रत्यय हुआ है । अथवा क (ब्रह्मा) वप्रत्ययः प्रशंसायां यद्वा कश्च अश्च अ (विष्णु) और ईश (महादेव)-ये ईशश्च त्रिमूर्तयः केशास्ते यद्वशेन तीनो मूर्ति ही केश है। ये जिनके अधीन वर्तन्ते स केशवः केशिवधाद्वा । है वे भगवान् केशव है । अथवा केशीका वध करनेके कारण केशव है; जैसा कि विष्णुपुराणमे श्रीकृष्णचन्द्रसे नारदजी- हतः केशी जनार्दन । का वचन है-'हे जनार्दन! आपके हाथ- तस्मात्केशवनाम्ना त्वं से यह दुष्टचित्त केशी मारा गया है, लोके ख्यातो भविष्यसि ।। इसलिये आप लोकमे केशव नामसे इति विष्णुपुराणे (५ । १६। प्रसिद्ध होगे 'पृपोदरादि* गणमें होने- २३) श्रीकृष्णं प्रति नारदवचनम् । के कारण इस (केशव) शब्दके साधन- पृषोदरादित्वाच्छब्दसाधुत्वकल्पना की कल्पना की गयी है । 'यस्मात्त्वयैप दुष्टात्मा . 8 'पृपोदरादीनि यथोपदिष्टम्' (६।३। १०९) यह पाणिनि-सूत्र है। इसका भाव यह है कि पृपोदर आदि शब्द जिस प्रकार शिष्ट पुरुषोंसे व्यवहार किये गये है उसी प्रकार 'शुद्ध है। 'पृपत् और उदर' मिलकर 'पृषोदर' शब्द बनता है। इसमें तकारका लोप और सन्धि रूढिसे ही हुए है। इसी प्रकार वारिवाहकका बलाहक बनता है। यही नियम जीमूत, श्मशान, उलूखल और पिशाच आदि शब्दोंमें भी है। मनोरमामें भी कहा है पृषोदर- प्रकाराणि शिष्टैर्यथोच्चारितानि तथैव साधूनि स्युः' अर्थात् पृषोदर आदि शब्दोको शिष्ट पुरुषोंने जिस प्रकार उच्चारण किया है वे उसी प्रकार ठीक है । महाभाष्यकारने भी कहा है 'येषु लोपागमवर्णविकाराः श्रूयन्ते न चोच्यन्ते तानि पृपोदरप्रकाराणि' अर्थात् जिनमें वर्गों के लोप, आगम अथवा विकार सुने जाय किन्तु उनका शास्त्र में कोई निरूपण न हो, वे शब्द पृषोदर आदिके समान कहे जाते हैं। केशव शब्द भी नारदके कथनानुकूल 'केशीका वध करनेवाला' इस अर्थक अनुसार केशीवधक होना चाहिये, किन्तु पृपोदरादिके समान 'ई' के स्थानपर 'अ' तथा वधके स्थानपर 'व' की कल्पना करके केशव सिद्ध किया गया है। इसी प्रकार अन्य अर्थोंमें भी केशव शब्दका प्रयोग शुद्ध है।
७७ शाङ्करभाष्य पुरुषाणामुत्तमः पुरुषोत्तमः अत्र पुरुषोमे उत्तमको पुरुपोत्तम कहते 'न निर्धारणे' (पा० सू० २।२।१०) है । यहाँ 'न निर्धारणे' इस सूत्रके अनुसार पष्ठी समासका प्रतिपेध नही इति षष्ठीसमासप्रतिषेधो न भवति होता, क्योकि यहाँ किसी जाति, गुण जात्याद्यनपेक्षया समर्थत्वात् । और क्रियाकी अपेक्षा न होनेसे समास- यत्र पुनर्जातिगुणक्रियापेक्षया विधानका सामर्थ्य है [अतएव यहाँ पष्टी पृथक्रिया तत्रासमर्थत्वा- | समासके प्रतिपेधका नियम नहीं लग न्निषेधः प्रवर्तते; यथा-मनुष्याणां सकता ] जहाँ जातिगुण और क्रियाकी अपेक्षासे किसीका समुदायसे पृथक्करण क्षत्रियः शूरतमः, गवां कृष्णा गौः होता है वहाँ सामर्थ्य न होनेसे यह सम्पन्नक्षीरतमा, अध्वगानां धावन् निषेधवचन लागू होता है,जैसे मनुष्यो- शीघ्रतम इति । अथवा पञ्चमी- मे क्षत्रिय सबसे अधिक शूरवीर होता है, गौओमे कृष्णा गो स्वादिष्ठ दूधवाली समासः, तथा च भगवद्वचनम्- होती है, यात्रियोमे दौडनेवाला सबसे 'यस्मात्क्षरमतीतोऽह- तेज होता है।*अथवा यहाँ[पुरुपोसे श्रेष्ठ मक्षरादपि चोत्तमः । -ऐसा] पञ्चमी समास समझना चाहिये; अतोऽस्मि लोके वेदे च जैसा कि भगवान्का वचन है-'मैं क्षर- से परे और अक्षरसे भी उत्तम हूँ, प्रथितः पुरुपोत्तमः॥ इसलिये लोक और वेदमे पुरुषोत्तम (गीता १५। १८) | नामसे प्रसिद्ध हूँ ॥१६॥ सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिनिधिरव्ययः । सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥१७॥ ७ इन वाक्यों में क्षत्रियजाति, कृष्ण गुण तथा दौडना क्रियाके द्वारा क्रमश: मनुष्य, गौ और यात्री समुदायसे व्यक्ति-विशेषकी पृथक्ता बतलायी गयी है। इसलिये यहाँ षष्टी समास नही हो सकता । परन्तु पुरुषोत्तम शब्द में यह बात नही है।
७८ विष्णुसहस्रनाम २५ सर्वः, २६ शर्वः,२७ शिवः,२८ स्थाणुः, २९ भूतादिः, ३० निधिः अव्ययः । ३१ सम्भवः, ३२ भावनः, ३३ भर्ता, ३४ प्रभवः, ३५ प्रभुः, ३६ ईश्वरः ॥ 'असतश्च सतश्चैव 'असत् और सत् सबकी उत्पत्ति, सर्वस्य प्रभवाप्ययात् । स्थिति और प्रलयका स्थान होने तथा सर्वस्य सर्वदा ज्ञाना- सर्वदा सबको जाननेके कारण इसे सर्वमेनं प्रचक्षते ॥ सर्व कहते हैं। भगवान् व्यासके इस इति भगवद्वयासवचनात् सर्वः। वचनानुसार भगवान् सर्व है। शृणाति संहारसमये संहरति समस्त प्रजाको शीर्ण करते अर्थात् प्रलय कालमे संहार करते या कराते संहारयति सकलाःप्रजा इति शर्वः। है, इसलिये शर्व है। निस्वैगुण्यतया शुद्धत्वात् शिवः तीनो गुणोंसे रहित होनेके कारण शुद्ध होनेसे शिव है। वह ब्रह्मा है वह 'स ब्रह्मा स शिवः' (कै० उ० ८) शिव है। इस प्रकार अभेद बतलानेके इत्यभेदोपदेशाच्छिवादिनामभिर्ह- कारण शिव आदि नामोसे भी हरिहीकी रिरेव स्तूयते । स्तुति की जाती है। स्थिरत्वात् स्थाणुः । स्थिर होनेके कारण स्थाणु है। भूतानामादिकारणत्वाद् भूतादिः । भूतोंके आदिकारण होनेसे भूतादि है। प्रलयकाले सिन्स निधीयत इति प्रलयकालमे सब प्राणी इन्हीमे स्थित होते है, इसलिये निधि है। निधिः । 'कर्मण्यधिकरणे च' (पा० 'कर्मण्यधिकरणे च' इस सूत्रके अनु- सू०३।३।९३) इति किप्रत्ययः। सार यहाँ किप्रत्यय हुआ है । उस निधि शब्दकोही [अव्ययरूप विशेषण- स एव निधिर्विशेष्यते-अव्ययः से ] विशिष्ट करते है--वह अव्यय अविनश्वरो निधिरित्यर्थः। अर्थात् अविनाशी निधि है।
७६ शाङ्करभाष्य स्वेच्छया समीचीनं भवन अपनी इच्छासे भली प्रकार उत्पन्न मस्येति सम्भवः 'धर्मसंस्थापनार्थाय होते है, इसलिये लम्भव है । भगवान्के सम्भवामि युगे युगे' (गीता ४ । ८) ये वचन भी है-'मैं धर्मकी स्थापना इति भगवद्वचनात् । करनेके लिये युग-युगमे उत्पन्न 'अथ दुष्टविनाशाय होता हूँ तथा 'मैं दुष्टोका नाश करनेके साधूनां रक्षणाय च । स्वेच्छया सम्भवाम्येवं लिये और साधुओकी रक्षाके लिये गर्भदुःखविवर्जितः ॥ इसी प्रकार अपनी इच्छासे गर्भ- इति च। दुःखके बिना ही उत्पन्न होता हूँ।' सर्वेषां भोक्तृणां फलानि भावयतीति समस्त भोक्ताओके फलोको उत्पन्न भावनः सर्वफलदातृत्वम् ‘फलमत | करते है, इसलिये भावन है। 'फलमत उपपत्तेः [ ब्रह्मसूत्रके ] इस सूत्रमे उपपत्तेः' (व० मू० ३ । २ । ३८) भगवान्के सर्वफलदातृत्वका प्रतिपादन इत्यत्र प्रतिपादितम् । किया गया है। प्रपञ्चस्याधिष्ठानत्वेन भरणात् अधिष्ठानरूपसे प्रपञ्चका भरण करनेके कारण भर्ता है। प्रकर्षेण महाभूतानि अस्माजा- समस्त महाभूत भली प्रकार उन्हीसे उत्पन्न होते है इसलिये वे प्रभव है। यन्त इति प्रभवः प्रकृष्टो भयो अथवा उनका भव यानी जन्म प्रकृष्ट जन्मास्येति वा। (दिव्य) है, इसलिये वे प्रभव है । सर्वासु क्रियासु सामर्थ्याति समस्त क्रियाओमे उनकी सामर्थ्य- शयात् प्रभुः। की अधिकता होनेके कारण वे प्रभु है । निरुपाधिकमैश्वर्यमस्येति ईश्वरः भगवान्का ऐश्वर्य उपाधिरहित है, 'एष सर्वेश्वर' (माण्डू० ६) इति अत वे ईश्वर है; जैसा कि श्रुति भी श्रुतेः॥१७॥ कहती है 'यह सर्वेश्वर' है ॥१७॥ भर्ता। , ८० विष्णुसहस्रनाम . , अथवा स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः । अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥१८॥ ३७ स्वयम्भू, ३८ गम्भुः, ३९ आदित्यः, ४० पुष्कराक्षः, ४१ महास्वनः । ४२ अनादिनिधन., ४३ धाता, ४४ विधाता, ४५ धातुरुत्तम. ॥ स्वयमेव भवतीति स्वयम्भूः ‘स स्वयं ही होते है, इसलिये स्वयम्भू एव स्वयमुद्बभौ' (मनु० १।७) इति है; मनुजीने कहा है कि 'वही स्वयं 'सबके मानवं वचनम् । सर्वेषामुपरि भवति उत्पन्न हुआ। ऊपर है या स्वयं होते है इसलिये स्वयं भवतीति वा स्वयम्भूः । येषा- स्वयम्भू है। जिनके ऊपर होते है या मुपरि भवति यश्चोपरि भवति तदु- जो ऊपर होते है-इन दोनो रूपसे भयात्मना स्वयमेव भवतीति वा स्वयं ही प्रकट होते है, इसलिये 'परिभूः स्वयम्भूः' (ई० उ० ८) इति खयम्भू है; जैसा कि यह मन्त्रवर्ण है- 'सब ओर ओर होनेवाला, स्वयं मन्त्रवर्णात् । अथवा स्वयम्भूः होनेवाला है। अथवा 'स्वयम्भू परमेश्वरः स्वयमेव खतन्त्रो भवति (परमात्मा) ने इन्द्रियोंको बहिर्मुख न परतन्त्रः, 'पराश्चि खानि व्यतृणत्- | बनाकर उन्हें नष्ट कर दिया' खयम्भूः' (क० उ० २।४।१) इस मन्त्रवर्णके अनुसार खयम्भू इति मन्त्रवर्णात् । परमात्मा खयम् अर्थात् स्वतन्त्र होते है, परतन्त्र नही । शं सुखं भक्तानां भावयतीति भक्तोके लिये सुखकी भावना- उत्पत्ति करते है इसलिये शम्भु है । आदित्यमण्डलान्तःस्थो हिर आदित्यमण्डलमे स्थित हिरण्मय ण्मयः पुरुषः आदित्यः द्वादशादि- पुरुपका नाम आदित्य है । अथवा त्येषु विष्णुर्वा 'आदित्यानामहं विष्णुः' / 'आदित्योमे मैं विष्णु हूँ' इस भगव- ( गीता १० । २१ ) इत्युक्तेः ।। दुक्तिसे द्वादश*आदित्योमे विष्णु नामक द्वादश आदित्योंके नाम ये है-शक्र. अर्यमा, धाता, त्वष्टा, पूषा, विव- म्वान्, सविता, मित्र, वरुण, अंशुमान्, भग और विष्णु । शम्भुः।
शाङ्करभाष्य ८१ अथवा, अदितेरखण्डिताया मह्या अयं पति- आदित्यको आदित्य कहा गया है। अथवा 'यह अदिति है "विष्णु-पत्नी रिति वा 'इयं वा अदितिः' 'महीं देवीं भगवती पृथिवीको' इस श्रुतिके अनुसार विष्णुपत्नीम्' इति श्रुतेः । यथादित्य भगवान् विष्णु अदिति अर्थात् अखण्डिता पृथिवीके पति है इसलिये आदित्य है। एक एवानेकेषु जलभाजनेषु अनेक- जैसे एक ही आदित्य अनेक वत्प्रतिभासते, एवमनेकेषु शरीरेषु जलपात्रोमे प्रतिबिम्बित होकर अनेक- सा प्रतीत होता है वैसे ही एकही आत्मा एक एवात्मानेकवत्प्रतिभासत इति अनेक शरीरोमे अनेक-सा जान पडता आदित्यसाधाद्वा आदित्यः। है। इस प्रकार आदित्यकी समताके कारण आदित्य है। पुष्करेणोपमिते अक्षिणी यस्येति जिनके नेत्र पुष्कर (कमल) की पुष्कराक्षः । उपमावाले है वे भगवान् पुष्कराक्ष है। महानूर्जितः स्वनो नादो वा भगवानका वेदरूप अति महान् श्रुतिलक्षणो यस्य स महास्वनः खरया घोप होनेके कारण वे महास्वन 'सन्महत्' (पा० सू० २ । १। है, जैसा कि श्रुति कहती है 'इस ६१ ) इत्यादिना समासे कृते महाभूतके ऋग्वेद और यजुर्वेदश्वास- 'आन्महतः समानाधिकरणजातीययोः' प्रश्वास है। 'सन्महत्' इत्यादि सूत्र- (पा० सू० ६।३। ४६) इत्यात्वम् से समास करनेपर 'आन्महतः समाना- 'अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेत-धिकरणजातीययोः' इस नियमके दृग्वेदो यजुर्वेदः' (बृ० उ० २।४।१०); अनुसार महत्के तकारको आ आदेश इति श्रुतेः। हुआ है। आदिर्जन्म; निधनं विनाश, जिनके आदि-जन्म और निधन- तवयं यस्य न विद्यते सः अनादि- | विनाश ये दोनो नहीं है वे भगवान् अनादिनिधन है। अनन्तादिरूपेण विश्वं विभीति - अनन्त(शेपनाग)आदिके रूपसे विश्व- को धारण करते है, इसलिये धाता है। निधनः। धाता।
विष्णुसहस्रनाम कर्मणां तत्फलानां च कर्ता कर्म और उसके फलोकी रचना विधाता। करते है, इसलिये विधाता है। अनन्तादीनामपि धारकत्वाद्वि- अनन्तादिकोको भी धारण करते है, अथवा विशेषरूपसे सबको धारण शेषेण दधातीति वा धातुरुत्तम करते है, इसलिये धातुरुत्तम है। यह इति नामैकं सविशेषणं सामाना- समानाधिकरणरूपसे विशेषणसहित धिकरण्येन सर्वधातुभ्यः पृथिव्या- एक नाम है। तात्पर्य यह है कि चिद्धातु पृथिवी आदि समस्त धातुओं- दिभ्य उत्कृष्टश्चिद्धातुरित्यर्थः धातु- (धारण करनेवालो) से श्रेष्ठ है अथवा विरिश्चेरुत्कृष्ट इति वा वैयधि धाता-ब्रह्मासे भी श्रेष्ठ है इस प्रकार व्यधिकरणरूपसे विशेषणसहित एक करण्येन । नाम है नामद्वयं वा कार्यकारणप्रपञ्च अथवा दो नाम समझे जाय तो कार्य-कारणरूप सम्पूर्ण प्रपञ्चको धारणाच्चिदेव धातुः । उत्तमः धारण करनेके कारण चेतनको ही 'धातु' सर्वेषामुद्तानामतिशयेनोगतत्वा- कहा है और वह समस्त उत्कृष्ट पदार्थोंमे अत्यन्त श्रेष्ठ होनेके कारण 'उत्तम दुत्तमः॥१८॥ है [ ऐसा अर्थ करना चाहिये] ||१८|| अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः । विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥१९॥ ४६ अप्रमेयः, ४७ हृषीकेशः, ४८ पद्मनाभः, १९ अमरप्रभुः । ५० विश्वकर्मा, ५१ मनुः, ५२ त्वष्टा, ५३ स्थविष्ठः, ५४ स्थविरः ध्रुवः ॥ शब्दादिरहितत्वान्न प्रत्यक्ष शब्दादिरहित होनेके कारण भगवान् गम्य: - नाप्यनुमानविषयः, | प्रत्यक्षप्रमाणके विषय नहीं है, व्याप्य शाङ्करभाष्य वस्थाप्सलिङ्गाभावात् । नाप्युपमान- लिङ्गका अभाव होनेसे अनुमानके भी विषय नहीं हैं, भागरहित होनेसे सिद्धः निर्भागत्वेन सादृश्याभावात् । सदृशताका अभाव होनेके कारण वे उपमानसे भी सिद्ध नहीं हो सकते, नाप्यर्थापचिग्राह्यः, तद्विनानुपपद्य- भगवान्के बिना कोई अनुपपद्यमान मानसासम्भवात् । नाप्यभाव नहीं है इसलिये वे अापत्ति प्रमाणके भी विषय नहीं है और भावरूप गोचरो भावत्वेन सम्मतत्वात् । माने जानेसे तथा अभावके भी साक्षी होनेसे अभाव नामक छठे प्रमाणसे अमावसाक्षित्वाच्च न षष्ठप्रमाणस्य। भी नहीं जाने जा सकते । तथा नापि शास्त्रप्रमाणवेद्यःप्रमाणजन्या- प्रमाणजन्य अतिशयका अभाव होनेके कारण वे शास्त्र-प्रमाणसे भी जानने विशयाभावात् । यद्येवं शास्त्रयोनि- योग्य नहीं है । यदि ऐसी बात है त्वं कथम् ? उच्यते-प्रमाणादि- तो उनमे शास्त्रयोनित्व क्यों बतलाया गया है ? [ऐसी शङ्का होनेपर] कहते साक्षित्वेन प्रकाशस्वरूपस्य प्रमाणा-हैं-प्रमाणादिके भी साक्षी होनेके कारण प्रकाशस्वरूप भगवान् प्रमाणके विषयत्वेऽपि अध्यस्तातद्रूप- विषय न होनेपर भी अध्यस्त जगत्का निवर्तकत्वेन शास्त्रप्रमाणकत्वमिति अनात्मरूपसे बाध कर देनेसे शास्त्र- प्रमाणित हैं । इसलिये, अथवा साक्षी अप्रमेयः साक्षिरूपत्वाद्वा। होनेके कारण वे अप्रमेय है। हषीकाणीन्द्रियाणि तेषामीशः हुपीक इन्द्रियोको कहते है, क्षेत्रज्ञ- क्षेत्रज्ञरूपभाक् । यद्वा, इन्द्रियाणि रूप उनका स्वामी अथवा इन्द्रियाँ जिसके यस्य चशे वर्तन्ते स परमात्मा अधीन हैं वह परमात्मा हृषीकेश है हृषीकेशः यस्य वा सूर्यरूपस्य या जिस सूर्य अथवा चन्द्रमारूप चन्द्ररूपस्य च जगत्प्रीतिकरा हृष्टाः भगवान्के संसारको प्रफुल्लित करने- केशारश्मयास हृषीकेशः, सूर्यरश्मि- चाले किरणरूप केश हृष्ट अर्थात् खिले विष्णुसहस्रनाम हरिकेश. पुरस्तात्' इति श्रुतेः। हुए है वे हृषीकेश है; जैसा कि पृषोदरादित्वात्साधुत्वम् । यथोक्तं श्रुति कहती है—'सूर्यको किरणें मोक्षधर्म- आगेकीओरहरिके केश हैं। हृष्टकेश- 'सूर्याचन्द्रमसौ शश्व- के स्थानमे] 'हृषीकेश' शब्द पृपोदरादि- दंशुभिः केशसंज्ञितैः । गणमे होनेके कारण सिद्ध होता है; बोधयन् स्वापयंश्चैव जैसा मोक्षधर्ममे कहा है-'सूर्य और जगदुत्तिष्ठते पृथक् ।। 'बोधनात्स्वापनाच्चैव चन्द्रमा अपनी केश नामकी किरणोंसे संसारको जगाते और सुलाते हुए जगतो हर्षणं भवेत् । उससे अलग उदित होते हैं। उनके अग्नीषोमकृतैरेवं जगाने और सुलानेसे संसारको हर्ष कर्मभिः पाण्डुनन्दन । होता है। हे पाण्डुनन्दन! इस प्रकार हृषीकेशो महेशानो अग्नि और चन्द्रमाके किये हुए कर्मोके वरदो लोकभावनः ॥ करनेसे लोक-भावन वरदायक (महा० शान्ति० ३४२ । ६६-६७) महेश्वर हपीकेश कहलाते हैं। इति। सर्वजगत्कारणं पद्मं नाभौ जिसकी नाभिमे जगत्का कारण- यस्य स पद्मनाभः, 'अजस्य नाभावध्ये- रूप पद्म स्थित है वे भगवान् पद्मनाभ है । श्रुति कहती है—'अजकी नाभिमे कमर्पितम्' इति श्रुतेः। पृषोदरादि- एक (पद्म) अर्पित है । पृषोदरादिगणमे त्वात्साधुत्वम् । होनेके कारण [पद्मनाभिके स्थानमें ] पद्मनाभ शब्द सिद्ध होता है। अमराणां प्रभुः अमरप्रभुः । अमरो (देवताओ) के प्रभु होनेसे अमरप्रभु है। विश्वं कर्म क्रिया यस्य स विश्वकर्मा विश्व (सव) जिसका कर्म अर्थात् क्रिया है उसे विश्वकर्मा कहते है। क्रियत इति जगत्कर्म विश्वकर्मा, प्रत्यक्ष निमाणक विषय नहींरहे, नव्याप्य शाङ्करभाष्य यस्येति वा, विचित्रनिर्माणशक्ति- कर्म है । वह विश्वरूप कर्म जिनका है उन्हे विश्वकर्मा कहते है। अथवा विचित्र मत्वाद्वा विश्वकर्मा त्वष्ट्रा निर्माणशक्तिसे युक्त होनेके कारण भगवान् विश्वकर्मा है। अथवा त्वष्टाके समान होने- साहश्याद्वा। के कारण भगवान्का नाम विश्वकर्मा है। मननात् मनुः । 'नान्योऽतोऽस्ति मनन करनेके कारण मनु है; जैसा कि श्रुति कहती है-'इससे पृथक् मन्ता' (बृ० उ० ३।७।२३) इति कोई और मनन करनेवाला नहीं है। अथवा मन्त्र या प्रजापतिरूपसे भगवान्- श्रुतेः। मन्त्री वा प्रजापतिर्वा मनुः । का नाम मनु है। संहारसमये सर्वभूततनूकरण संहारके समय समस्त प्राणियोको तनु (भीण) करनेके कारण वे त्वष्टा त्वात् त्वष्टा त्वक्षतेस्तनूकरणार्थात् है। यहाँ तनूकरण अर्थवाले त्व तच्प्रत्यया। धातुसे तृच् प्रत्यय हुआ है। अतिशयेन स्थूलः स्थविष्ठः । अतिशय स्थूल होनेसे स्थविष्ठ है। पुराणः स्थविरः 'त्वेकं ह्यस्य पुरानेका नाम स्थविर है। बच स्थविरस्य नाम' इति बढचा वयो- कहते है इस स्थविरका एक नाम है।' वचनो वा स्थिरत्वाद् ध्रुवः स्थविरो अथवा आयुवाचक स्थविर (वृद्धावस्था) से तात्पर्य है । स्थिर होनेके कारण ध्रुव इत्येकमिदं नाम सविशेषणम् ध्रुव है । इस प्रकार यह स्थविर ध्रुव ॥१९॥ विशेषणयुक्त एक नाम है ॥१९॥ अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः । प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मड़लम्परम् ॥२०॥ कशास्मयों सहृषाकर्श सूपराइम पार ८६ विष्णुसहस्रनाम ५५ अग्राह्यः, ५६ शाश्वतः, ५७ कृष्णः, ५८ लोहिताक्षः, ५९ प्रतर्दनः । ६० प्रभूतः, ६१ त्रिककुब्धाम, ६२ पवित्रम् , ६३ मङ्गलं परम् ॥ कर्मेन्द्रियैर्न गृह्यते इति अग्राह्यः । 'जिसे प्राप्त न करके मनसहित 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा | वाणी लौट आती है। इस श्रुतिके सह' (तै० उ० २।९) इति अनुसार कर्मेन्द्रियोसे ग्रहण नही किये श्रुतेः। जा सकते, इस कारणभगवान् अग्राह्य हैं। शश्वत् सर्वेषु कालेषु भवतीति जो शश्वत् अर्थात् सब कालमें शाश्वतः, 'शाश्वतं शिवमच्युतम्' होउसे शाश्वत कहते हैं। श्रुति कहती (ना० उ० १३।१) इति श्रुतेः है 'शाश्वत शिव और अच्युत है।' 'कृषि वाचकः शब्दो 'कृष' शब्द सत्ताका वाचक है। णश्च निर्वृतिवाचकः । और 'ण' आनन्दका । श्रीविष्णुमें ये विष्णुस्तद्भावयोगाच्च कृष्णो भवति शाश्वतः ॥ दोनों भाव है, इसलिये वे सर्वदा कृष्ण (महा० उद्योग० ७०।५) कहलाते हैं। इस व्यासजीके वाक्यानुसार इति व्यासवचनात् सच्चिदानन्दा- सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् ही कृष्ण है। त्मकः कृष्णः। कृष्णवर्णात्मकत्वाद्वा कृष्णः। अथवा कृष्णवर्ण होनेसे कृष्ण हैं। 'कृषामि पृथिवीं पार्थ महाभारतमे कहा है-हे पार्थ! मैं भूत्वा कार्णायसो हलः। काले लोहेका हल होकर पृथिवीको कृष्णो वर्णश्च मे यस्मा- तस्मात्कृष्णोऽहमर्जुन ॥ जोतता हूँ, तथा मेरा वर्ण कृष्ण है। इति महाभारते। (शान्ति० ३४२१७९) इसलिये हे अर्जुन ! मैं कृष्ण हूँ। लोहिते अक्षिणी यस्येति लोहि जिनके लोहित (लाल) नेत्र हों वे भगवान् लोहिताक्ष कहलाते है । श्रुति ताक्षः 'असावृषभो लोहिताक्षः' इति कहती है-वह श्रेष्ठ लाल आँखों- श्रुतेः। वाला है।
शाङ्करभाष्य
८७
प्रभूतः।
प्रलये भूतानि प्रतर्दयति हिन प्रलयकालमे प्राणियोकी तर्दना
स्वीति प्रतर्दनः ।
अर्थात् हिंसा करते है इसलिये भगवान्
प्रतर्दन है।
ज्ञानेश्वर्यादिगुणैः
ज्ञान, ऐश्वर्य आदि गुणोसे सम्पन्न
होनेसे भगवान् प्रभूत है।
ऊर्ध्वाधोमध्यभेदेन तिसृणां
ऊपर, नीचे और मध्य-भेदवाली
ककुभामपि धामेति त्रिककुब्धाम तीनो ककुभों (दिशाओ) के धा
( आश्रय ) है, इसलिये भगवान्
इत्येकमिदं नाम ।
त्रिककुब्धाम है। यह एक नाम है।
येन पुनाति यो वा पुनाति
जिसके द्वारा पवित्र किया जाय
ऋषिदेवता वा तत्
पवित्रम् 'पुवः
अथवा जो पवित्र करे उस ऋषि या
संज्ञायाम्' (पा० सू० ३।२।१८५) देवताका नाम पवित्र है । यहाँ 'पुवः
'कर्तरि चर्षिदेवतयोः' (पा० सू० ३। संज्ञायाम्। 'कर्तरि चर्षिदेवतयो' इन
२।१८६) इति भगवत्पाणिनि- पाणिनि-सूत्रोके अनुसार पू धातुसे इन
स्मरणात् इत्रप्रत्ययः।
प्रत्यय हुआ है।
'अशुभानि निराचष्टे
'जो स्मरणमात्रसे पुरुषोंके
तनोति शुभसन्ततिम् ।
अशुभोंको दूर कर देता है और शुभों-
स्मृतिमात्रेण यत्पुंसां
का विस्तार करता है उस ब्रह्मको
ब्रह्म तन्मङ्गलं विदुः ।।
[शानीजन] मंगल समझते हैं।
इति श्रीविष्णुपुराणवचनात् श्रीविष्णुपुराणके इस वचनके अनुसार
कल्याणरूपत्वाद्वा मङ्गलम् । परं कल्याणरूप होनेसे भगवान्का नाम
सर्वभूतेभ्यः उत्कष्टं ब्रह्म । मंगल है। समस्त भूतोंसे उत्तम होनेके
मङ्गलं परम् इत्येकमिदं नाम कारण ब्रह्म पर है। इस प्रकार मङ्गलं
सविशेषणम् ॥२०॥
परम् यह विशेषणयुक्त एक नाम है।
ईशानः प्राणदः प्राणो ज्ोष्टः रेटः प्रजापतिः ।
हिरण्यगर्भो भूगर्भो वो मधुवनः ॥२१॥
विष्णुसहस्रनाम ६४ ईशानः, ६५ प्राणदः, ६६ प्राणः, ६७ज्येष्ठः, ६८ श्रेष्ठः, ६९ प्रजापतिः । हिरण्यगर्भः, ७१ भूगर्भः, ७२ माधव., ७३ मधुसूदनः ॥ . सर्वभूतनियन्तृत्वात् ईशानः । सर्वभूतोंके नियन्ता होनेके कारण भगवान् ईशान है। प्राणान् ददाति चेष्टयतीति वा प्राणोको देते अथवा चेष्टा कराते प्राणदः 'को ह्येवान्यात्कः प्राण्यात्' है, इसलिये प्राणद है । श्रुति कहती है- [यदि ईश्वर न हो तो] कौन अपान- (तै० उ०२ । ७) इति श्रुतेः। यद्वा, क्रिया करावे और कौन प्राणक्रिया प्राणान् कालात्मना यति खण्डय- करावे ?' अथवा कालरूपसे प्राणोको दलित अर्थात् खण्डित करते है इसलिये तीति प्राणदः, प्राणान्दीपयति प्राणद है । अथवा प्राणोंको दीप्त या शोधयतीति वा, प्राणान् ददाति शुद्ध करते है अथवा उन्हे उच्छिन्न लुनातीति वा प्राणदः । अर्थात् नष्ट करते है इसलिये प्राणद है । प्राणितीति प्राणः क्षेत्रज्ञः 'जो प्राणन करे अर्थात् श्वास- प्रश्वास ले उसका नाम प्राण है' इस परमात्मा का, 'प्राणस्य प्राणम्' (बृ० व्युत्पत्तिसे क्षेत्रज्ञ या , परमात्माका नाम प्राण है। इस विषयमे 'वह उ० ४ । ४ । १८ ) इति श्रुतेः। प्राणका भी प्राण है' यह श्रुति-प्रमाण मुख्यप्राणो वा। है, अथवा यहाँ मुख्य प्राणहीको प्राण कहा है। वृद्धतमो ज्येष्ठः 'ज्य च' (पा०सू० अधिक वृद्धको ज्येष्ठ कहते है, ५।३।६१) इत्यधिकारे 'वृद्धस्य च' क्योकि 'ज्य च' इस सूत्रके अधिकारमें पठित 'वृद्धस्य च' इस पाणिनिसूत्रके (पा० सू०५।३।६२)इति वृद्ध- अनुसार वृद्ध शब्दको ज्य आदेश शब्दस्य ज्यादेशविधानात् । किया गया है। , शाङ्करभाष्य प्रशस्यतमः श्रेष्ठः 'प्रशस्यस्य श्रः' सबसे अधिक प्रशंसनीयका नाम ( पा० सू० ५ । ३ । ६०) इति श्रेष्ठ है । क्योकि वहाँ 'प्रशस्यस्य श्र श्रादेशविधानात् । 'प्राणो वाव इस सूत्रसे प्रशस्यको श्र आदेश हुआ ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च' (छा० उ०५।१ है। अथवा 'प्राण ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ १) इति श्रुतेः मुख्यप्राणो वा, है' इस श्रुतिके अनुसार मुख्य प्राण ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ] है। क्योकि श्रेष्ठश्च' 'श्रेष्ठश्च' (ब्र० सू०२।४।८) इस ब्रह्मसूत्रके अधिकरणमे यह बात इत्यधिकरणसिद्धत्वात् । सर्वकारण- सिद्ध की गयी है। अथवा सबका कारण स्वाद्वा ज्येष्ठः, सर्वातिशयत्वाद्वा होनेसे परमात्माका नाम ज्येष्ठ तथा सबसे श्रेष्ठः। बढा-चढा होनेके कारण श्रेष्ठ है। ईश्वरत्वेन सर्वासांप्रजानां पतिः ईश्वररूपसे सब प्रजाओके पति है, प्रजापतिः । इसलिये प्रजापति है। हिरण्मयाण्डान्तर्वर्तित्वात् हिरण्य ब्रह्माण्डरूपहिरण्मय अण्डेके भीतर गर्भो ब्रह्मा विरिश्चिः तदात्मा, हिरण्य- व्याप्त होनेके कारण सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हिरण्यगर्भ है उनके आत्मस्वरूप होनेसे गर्भः समवर्तताने' (ऋ० सं० १०॥ भगवान् हिरण्यगर्भ है; क्योकि श्रुति १२१ । १) इति श्रुतेः। कहती है 'पहले हिरण्यगर्भ ही था । भूगर्भे यस्य स भूगर्भः। पृथिवी जिनके गर्भमें स्थित है वे माया:त्रिय धवः पतिः माधवः; भगवान् भूगर्भ है। मा अर्थात् लक्ष्मीके धव यानी पति मधुविद्यावबोध्यत्वाद्वा माधवः । होनेसे भगवान् माधव हैं। अथवा [बृहदारण्यक श्रुतिमे कही गयी] मधु- 'भौनाद्धयानाच्च योगाच विद्याद्वारा जानने योग्य होनेके विद्धि भारत माधवम् ।' कारण माधव हैं। अथवा 'हे भारत! मौन, ध्यान और योगले तू भगवान् (महा० उद्योग० ७०।४) माधवकासाक्षात्कार कर इसे व्यास- इति व्यासवचनाद्वा माधवः । जीके कथनानुसार भगवान् माधव हैं। - विष्णुसहस्रनाम मधुनामानमसुरं सूदितवान् इति मधुसूदनः। 'कर्णमिश्रोद्भवं चापि मधुनाममहासुरम् ब्रह्मणोऽपचितिं कुर्वन् जघान पुरुषोत्तमः ॥ 'तस्य तात वधादेव देवदानवमानवाः । मधुसूदन इत्याहु- ऋषयश्च जनार्दनम् ॥ इति महाभारते ॥२१॥ भगवान्ने मधु नामक दैत्यको मारा था इसलिये वे मधुसूदन है । महाभारतमें कहा है-'श्रीपुरुषोत्तमने ब्रह्माजीको आदर देते हुए कानके मैलसे उत्पन्न हुए मधु नामक दैत्यको माराथा।हे तात! उसके वधके कारण ही देवता, दानव, मनुष्य और ऋषियोंने श्री- जनार्दनको 'मधुसूदन' कहा ॥२१॥ " ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः । अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ॥२२॥ ७४ ईश्वरः, ७५ विक्रमी, ७६ धन्वी, ७७ मेधावी, ७८ विक्रम., ७९ क्रमः । ८० अनुत्तमः, ८१ दुराधर्षः, ८२ कृतज्ञः, ८३ कृतिः, ८४ आत्मवान् ।। सर्वशक्तिमत्तया ईश्वरः । सर्वशक्तिमान् होनेसे ईश्वर है। विक्रमः शौर्य, तद्योगाद् विक्रमी। विक्रम शूरवीरताको कहते हैं, उससे युक्त होनेके कारण विक्रमी है। धनुरस्यास्तीति धन्वी ब्रीडादित्वा- भगवान्के पास धनुष है इसलिये वे दिनिप्रत्ययः। 'रामः शखभृतामहम्' धन्ची है । धनुष् शब्द वीयादिगणमे होनेके कारण ['व्रीह्यादिभ्यश्चः (पा० (गीता १० । ३१) इति भगव- | सू० ५। २। ११६) इस सूत्रके नियमानुसार] उससे इनिप्रत्यय हुआ द्वचनात् । है। श्रीभगवान्का भी वचन है- 'शस्त्रधारियोंमे मैं राम हूँ।
शाङ्करभाष्य मेधा बहुग्रन्थधारणसामर्थ्यम्,सा जिसमे मेधा अर्थात् बहुत-से ग्रन्थो- को वारण करनेका सामर्थ्य हो उसे यस्यास्ति स मेधावी । 'अस्मायामेधास्त्र- मेधावी कहते है। यहाँ 'अस्माया- जो विनिः' (पा० सू०५।२।१२१) मेधास्रजो विनिः' इस पाणिनिके वचनानुसार मेधा शब्दसे विनिप्रत्यय इति पाणिनिवचनाद्विनिप्रत्ययः। हुआ है। विचक्रमे जगद्विश्वं तेन विक्रमः, भगवान् जगत् यानी संसारको लॉघ गये थे इसलिये वे विक्रम है । अथवा विना गरुडेन पक्षिणा क्रमाद्वा । वि अर्थात् गरुड पक्षीद्वारा गमन करनेसे विक्रम है। क्रमणात, क्रमहेतुत्वाद्वा क्रमः, क्रमण करने (लॉघने, दौडने ) या क्रम ( विस्तार ) के कारण होनेसे 'क्रान्ते विष्णुम्' (मनु० १२ । १२१) विष्णुका नाम क्रम है। मनुजीका भी इति मनुवचनात् । वचन है-'पैरकी गतिमें विष्णुकी भावना करे। अविद्यमान उत्तमो यस्मात्स: जिससे उत्तम कोई और न हो अनुत्तमः । 'यस्मात्परं नापरमस्ति | उसे अनुत्तम कहते है । श्रुति कहती किश्चित्' इति श्रुतेः,(ना०उ० १२।३) है-'जिससे श्रेष्ठ और कोई नहीं है।' 'न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यः' तथा स्मृति (गीता) का भी वचन है- 'तुम्हारे समान ही दूसरा कोई नहीं (गीता ११ । ४३) इति स्मृतेश्च । है फिर अधिक तो होगा ही कहाँसे ? दैत्यादिभिर्धर्षयितुं न शक्यत जो दैत्यादिकोसे दबाये नही जा इति दुराधर्षः। सकते वे भगवान् दुराधर्ष कहलाते है। प्राणिनां पुण्यापुण्यात्मकं कर्म प्राणियोंके किये हुए पुण्य-पापरूप कर्मोको जानते है इसलिये कृतज्ञ है। कृतं जानातीति कृतज्ञः। पत्रपुष्पाद्य- अथवा पत्र-पुष्पादि थोडी-सी वस्तु विष्णुसहस्रनाम है , ल्पमपि प्रयच्छतां मोक्षं ददातीति समर्पण करनेवालोको भी मोक्ष दे देते वा। इसलिये कृतज्ञ है। पुरुषप्रयत्नः कृतिः, क्रिया वा पुरुष-प्रयत्नका या क्रियाका नाम कृति है। सर्वात्मक होनेसे अथवा सर्वात्मकत्वात्तदाधारतया वा इनके आधार होनेके कारण भगवान् लक्ष्यते कृत्येति वा कृतिः । कृति शब्दसे लक्षित होते है। इसलिये वे कृति है। स्वमहिमप्रतिष्ठितत्वात् आत्म अपनी ही महिमामे स्थित होनेके वान् । 'स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति कारण आत्मवान् है । श्रुति कहती स्वे महिम्नि' (छा० उ० ७।२४। है-'भगवन् ! वह किसमे प्रतिष्ठित १) इति श्रुतेः ॥२२॥ है ? अपनी महिमामे ॥२२॥ . . , सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः । अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥२३॥ ८५ सुरेश , ८६ शरणम् , ८७ शर्म, ८८ विश्वरेताः, ८९ प्रजाभवः । ९० अह', ९१ संवत्सर , ९२ व्यालः, ९३ प्रत्ययः, ९४ सर्वदर्शनः ॥ सुराणां देवानामीशः सुरेशः सुर अर्थात् देवताओके ईश होनेसे सूपपदो वा राधातुः शोभनदातॄणा- सुरेश है अथवा यहाँ सु-पूर्वक रा धातु मीशः सुरेशः। है; अतः शुभ देनेवालोके ईश होनेसे भगवान् सुरेश है। आर्तानामार्तिहरणत्वात् शरणम्। दीनोका दुःख दूर करनेके कारण शरण है। परमानन्दरूपत्वात् शर्म । परमानन्दस्वरूप होनेसे शर्म है। • विश्वस्य कारणत्वात् विश्वरेताः ।।. विश्वके कारण होनेसे विश्वरेता है। 7 83 शाङ्करभाष्य व्यालः । सर्वाः प्रजा यत्सकाशादुद्भव जिनसे सम्पूर्ण प्रजा उत्पन्न होती न्ति स प्रजाभवः । है वे भगवान् प्रजाभव कहलाते है। प्रकाशरूपत्वात् अहः। प्रकाशस्वरूप होनेके कारण अहः है। कालात्मना स्थितो विष्णुः कालस्वरूपसे स्थित हुए विष्णु सवत्सर इत्युक्तः। भगवान् संवत्सर कहे जाते है। व्यालवद्ग्रहीतुमशक्यत्वात् व्याल (सर्प) के समान ग्रहण करनेमे न आ सकनेके कारण व्याल है। प्रतीतिः प्रज्ञा प्रत्ययः 'प्रज्ञान प्रतीति प्रज्ञाको कहते है, प्रतीति- ब्रह्म'(ऐ० उ० ३।५।३) इति श्रुतेः। रूप होनेके कारण प्रत्यय है । श्रुति कहती है-'प्रज्ञान ही ब्रह्म है । सर्वाणि दर्शनात्मकानि सर्वरूप होने के कारण सभी जिनके अक्षीणि यस्य स सर्वदर्शनः, सर्वा- दर्शन अर्थात् नेत्र हैं वे भगवान् सर्व- स्मकत्वात् विश्वतश्चक्षुः' (श्वे०३।३) दर्शन है, जैसा कि श्रुति कहती है- 'विश्वाक्षम्' (ना० उ० १३ । १) 'सब ओर नेत्र और सम्पूर्ण इन्द्रियो- इति श्रुतेः॥२३॥ वाला है ॥२३॥ -lond- ९५अज, अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः। वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः ॥२४॥ ९६ सर्वेश्वर.,९७ सिद्धः,९८ सिद्धिः. ९९ सर्वादिः, १०० अच्युत । १०१ वृपाकपि, १०२ अमेयात्मा, १०३ सर्वयोगविनिःसृतः ।। न जायत इति अजः, 'न जातो जन्म नही लेते इसलिये अज है। न जनिष्यते' इति श्रुते॥ श्रुति कहती है-'न उत्पन्न हुआ है न विष्णुसहस्रनाम 'न हि जातो न जायेऽह होगा , महाभारतमे कहा है- न जनिष्ये कदाचन । क्षेत्रज्ञः सर्वभूतानां 'मैं न कभी उत्पन्न हुआ हूँ, न होता तस्मादहमजः स्मृतः ॥ हूँ और नहोऊँगा।मैं समस्त भूतोंका इति महाभारते (शान्ति० ३४२। क्षेत्र हूँ इसलिये अज कहलाता हूँ। ७४)। सर्वेषामीश्वराणामीश्वरः सर्वेश्वरः, समस्त ईश्वरोके भी ईश्वर होनेसे 'एष सर्वेश्वरः' (मा० उ० ६) इति सर्वेश्वर है; श्रुति कहती है 'यह श्रुतेः। सर्वेश्वर है। नित्यनिष्पत्ररूपत्वात् सिद्धः । नित्य-सिद्ध होनेके कारण सिद्ध हैं। सर्ववस्तुषु संविद्रूपत्वात् निरति- समस्त वस्तुओमे संवित् (ज्ञान) रूप होनेके कारण अथवा सबसे श्रेष्ठ शयरूपत्वात्फलरूपत्वाद्वा सिद्धिः । होनेके कारण या सबके फलरूप होनेके खर्गादीनां विनाशित्वादफलत्वम् । कारण सिद्धि है। स्वर्गादि फल नाशवान् है, इसलिये वे वास्तवमें फल नही है। सर्वभूतानामादिकारणत्वात् सब भूतोके आदि-कारण होनेसे सर्वादि है। . सर्वादिः । स्वरूपसामर्थ्यान्न च्युतो न अपनी स्वरूप-शक्तिसे कभी च्युत च्यवते न च्यविष्यते इति अच्युतः, नही हुए, न होते है और न होगे ही इसलिये अच्युत हैं । श्रुति कहती है- 'शाश्वत शिवमच्युतम्' (ना० उ० | 'वह नित्य कल्याणवरूप और १३।१) इति श्रुतेः । तथा च अच्युत है। श्रीभगवान्ने भी कहा है- 'क्योकि मैं पहले कभी च्युत नहीं भगवद्वचनम्-'यस्मान्न च्युतपूर्वोऽह- हुआहूँ, इसलिये उस कर्मके कारण मच्युतस्तेन कर्मणा' इति । मैं अच्युत हूँ।
६५
शाङ्करभाष्य
इति नाम्नां शतमाचं विवृतम् । यहॉतक सहस्रनामके प्रथम शतक-
का विवरण हुआ।
वर्षणात् सर्वकामानां धर्मो वृषः समस्त कामनाओकी वर्षा करने-
के कारण धर्मको वृष कहते है।
कात् तोयात् भूमिमपादिति कपि-
पृथिवीका क अर्थात् जलमेसे उद्धार
राहा, वृषरूपत्वात्कपिरूपत्वाच्च किया था इसलिये कपि वराह भगवान्का
वृषाकपिः ।
नाम है। इस प्रकार वृष (धर्म) रूप
'कपिर्वराहः श्रेष्ठश्च
और कपि (वराह) रूप होनेके कारण
धर्मश्च वृष उच्यते ।
भगवान् वृषाकपिहै। महाभारतमे कहा
तस्माद्वृषाकपि प्राह
है-'कपि वराह याश्रेष्ठको कहते हैं
और वृष धर्मका नाम है, इसलिये
काश्यपो मा प्रजापतिः ।।
कश्यप प्रजापतिने मुझे वृषाकपि
इति महाभारते (शान्ति० ३४२ । कहा था।
८९)।
इयानिति मातुं परिच्छेत्तुं न
जिनके आत्मा (स्वरूप)का 'इतना
शक्यत आत्मा यस्येति अमेयात्मा । है' इस प्रकार माप-परिच्छेद न किया
जा सके वे भगवान् अमेयात्मा हैं।
सर्वसम्बन्ध विनिर्गता रावयाग-
सम्पूर्ण सम्बन्धोसे रहित होनेके
कारण सर्वयोगविनिःसृत हैं । श्रुति
विनिःसृतः, 'असङ्गो हयं पुरुषः'
महती है-'यह पुरुष निश्चय असंग
(वृ० उ० ।। ३ । १५) इति | MP अथवा नाना प्रकारके शास्त्रोक्त
श्रुतेः । नानाशास्त्रोक्ताद्योगादप- या नो) से जाने जाते है,
गतत्वाद्वा ॥२४॥
इसलिये सर्वयोगविनिःसृत हैं।॥२४॥
वसुर्वसुमनाः समः सनात्मा सग्मितः समः।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो की वृणाकृतिः ॥६॥
६६ विष्णुसहस्रनाम " १०४ वसुः, १०५ वसुमनाः, १०६, सत्यः, १०७ समात्मा, १०८ सम्मितः, १०९ समः। ११० अमोध',१११ पुण्डरीकाक्षः,११२वृषकर्मा,११३ वृपाकृतिः।। वसन्ति सर्वभूतान्यत्र, तेष्वय भगवान्मे सब भूत बसते है अथवा मपि वसतीति वा वसुः 'वसूना | उन सब भूतोमे भगवान् बसते है इसलिये पावकश्चास्मि' (गीता १०।२३ ) वे वसु है । अथवा 'वसुओंमे मैं अग्नि हूँ इस प्रकार [गीतामे ] कहा हुआ इत्युक्तो वा वसुः। अग्नि ही वसु है। वसुशब्देन धनवाचिना धनवाचक वसु शब्दसे प्रशस्तता प्राशस्त्यं लक्ष्यते । प्रशस्तं मनो (श्रेष्ठता) लक्षित होती है; अतः जिनका यस्य स वसुमनाः । रागद्वेषादिभिः | मन प्रशस्त है वे भगवान् वसुमना क्लेशैर्मदादिमिरुपलेशैश्च यतो कहलाते है। राग-द्वेपादि क्लेशो और न कलुषितं चित्तं ततस्तन्मन: मदादि उपक्लेशोंसे अदूषित होनेके प्रशस्तम् । कारण भगवान्का मन प्रशस्त है। अवितथरूपत्वात्परनात्मा सत्यः सत्यस्वरूप होनेके कारण परमात्मा 'सत्यं ज्ञानमनन्त ब्रह्म' (तै० उ०२। सत्य है । श्रुति कहती है-'ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्तरूप है।। अथवा १। १) इति श्रुतेः । मूर्तामूर्तात्मक- 'सत् (मूर्त) औरत्यद् (अमूर्त) हुआ' त्वाद्वा, 'सच्च त्यच्चाभवत्' (तै० उ०२ इस श्रुतिके अनुसार मूर्तामूर्तस्वरूप होनेके कारण भगवान् सत्त्य हैं । अथवा ६) इति श्रुतेः। सदिति प्राणा, ती. 'सदिति प्राणास्तीत्यन्नं यमित्य- त्यन्नम् ,यमिति दिवाकरस्तेन प्राणा- सावादित्य: इस श्रुतिके अनुसार सत् प्राण है, त् अन्न है और य सूर्य है; नादित्यरूपाद्वा सत्त्यः सदिति प्राणा- अतः प्राण अन्न और सूर्यरूप होनेके स्तीत्यन्नं यमित्यसावादित्यः' इति श्रुतेः । कारण भगवान् सत्य है । अथवा सदाचारियोमे श्रेष्ठ होनेके कारण सत्सु साधुत्वाद्वा सत्यः। सत्य है। सम आत्मा मनो यस्य राग जिनका आत्मा-मन सम अर्थात् शाङ्करभाष्य ६७ द्वेषादिभिरदूषितः सः समात्मा सर्व- राग-द्वेपादिसे अदूपित है वे भगवान् समात्मा है। अथवा 'आत्मा सम है- भूतेषु सम एक आत्मा वा, ऐसा जाने इस श्रुतिके अनुसार समस्त 'सम आत्मेति विद्यात्' इति श्रुतेः। प्राणियोमे सम यानी एक आत्मा है, इसलिये भगवान् समात्मा है। सर्वैरप्यर्थजातैः परिच्छिन्न: समस्त पदार्थोंसे परिच्छिन्न जाने सम्मितः; सर्वैरपरिच्छिन्नोऽमित इति | जाते है। इसलिये सम्मित है अथवा असम्मितः ।* समस्त पदार्थोंसे परिन्छिन-परिमित नहीं है, इसलिये असम्मित है। सर्वकालेषु सर्वविकाररहितत्वात् सब समय समस्त विकारोसे रहित समः; मया लक्ष्म्या सह वर्तत इति होनेके कारण सम है अथ्वा मा- लक्ष्मीके सहित विराजमान है इसलिये वा समः। सम हैं। पूजितः स्तुतः संस्मृतो वा सर्व- पूजा, स्तुति अथवा स्मरण किये फलं ददाति न वृथा करोतीति जानेपर सम्पूर्ण फल देते है, उन्हे अमोघः। अवितथसङ्कल्पाद्वा, 'सत्य- वृथा नहीं करते, इसलिये अमोध है । अथवा 'सत्यसंकल्प है' इस श्रुतिके सङ्कल्प:' (छा० उ० ८।७।१ अनुसार अव्यर्थ-संकल्पवाले होनेसे इति श्रुतेः। अमोघ हैं। हृदयस्थं पुण्डरीकमश्नुते व्या हृदयस्थ पुण्डरीक (कमल) में प्राप्त- मोति तत्रोपलक्षित इति पुण्डरी- व्याप्त होते हैं-उसमे लक्षित होते है काक्षः 'यत्पुण्डरीकं पुरमध्यसंस्थम्' इसलिये पुण्डरीकाक्ष है। श्रुति कहती है-'जो हृदयकमल पुर (शरीर) के मध्यमें स्थित है। अश्वा उन दोन * समात्मासम्मित:-इसकापदच्छेद 'समात्मा-सम्मित्तः, समात्मा-नसम्मितः' दोनों प्रकार होनेके कारण दो प्रकारसे अर्थ किया गया है। . ७ १८ विष्णुसहस्रनाम इति श्रुतेः; पुण्डरीकाकारे उभे नेत्र कमलके समान है, इसलिये अक्षिणी अस्येति वा । पुण्डरीकाक्ष है। धर्मलक्षणं कर्मास्येति वृपकर्मा । जिनके कर्म धर्मरूप है वे भगवान् 'वृषकर्मा है। धर्मार्थमाकृतिः शरीरं यस्येति जिनकी धर्मके लिये ही आकृति- स देह है [ अर्थात् जिन्होने धर्मके लिये वृषाकृतिः 'धर्मसंस्थापनार्थाय ही शरीर धारण किया है ] वे भगवान् सम्भवामि युगे युगे ॥' (गीता ४।८) वृपाकृति है; जैसा कि भगवान्का वचन है-'मैं धर्मकी स्थापना करनेके इति भगवद्वचनात् ॥२५॥ लिये युग-युगमे जन्म लेता हूँ॥२५॥ रुद्रो बहुशिरा बभ्रविश्वयोनिः शुचिश्रवाः । अमृतः शाश्वतस्थाणुर्वरारोहो महातपाः ॥२६॥ ११४ रुद्रः,११५ बहुशिराः,११६ बभ्रुः,११७ विश्वयोनिः,११८ शुचिश्रवाः । ११९ अमृतः, १२० शाश्वतस्थाणुः, १२१ वरारोह', १२२ महातपाः ॥ संहारकाले प्रजाः संहरन् रोद प्रलयकालमे प्रजाका संहार करके यतीति रुद्रः । रुदं राति ददातीति उसे रुलाते है, इसलिये रुद्र है । अथवा वा। रुर्दुःखं दुःखकारणं वा, रुद् यानी वाणी देते हैं इसलिये रुद्र हैं। अथवा रु नाम दुःखका है; अतः द्रावयतीति वा रुद्र, रोदनाद्- दुःख या दुःखके कारणको दूर भगाने- द्रावणाद्वापि रुद्र इत्युच्यते, वाले होनेसे भगवान् रुद्र है। अथवा 'रुर्दुःखं दुःखहेतुं वा रोदन (रुलाने) तथा द्रावण (दूर विद्रावयति स प्रभुः। भगाने) के कारण रुद्र कहलाते हैं । लिङ्गपुराणका वचन है-रुनाम दुःखका रुद्र इत्युच्यते तस्मा-, है, क्योंकि वे प्रभु दुःख या दुःखके च्छिवः परमकारणम् ॥ हेतुको दूर भगाते हैं इसलिये परम इति लिङ्गपुराणवचनात् । कारण भगवान शिव रुद्र कहलाते हैं।
शाङ्करभाष्य बहूनि शिरांसि यस्येति बहु- 'सहस्रशीर्पा पुरुपः' इस मन्त्रवर्णके शिराः, 'सहनशीर्षा पुरुपः' (पु० अनुसार बहुत-से शिर होनेके कारण सू०१) इति मन्त्रवर्णात् । भगवान् बहुशिरा है। विभर्ति लोकानिति बभ्रः । लोकोका भरण करते हैं, इसलिये भ्र है। and विश्वस्य कारणत्वात् विश्वयोनिः । विवके कारण होनसे विश्वयोनि है। शुचीनि श्रवांसि नामानि भगवान्के श्रव शुचि--पवित्र है, श्रवणीयान्यस्येति शुचिश्रवाः । अर्थात् उनके नाम सुनने योग्य है; इसलिये वे शुचिश्रवा* कहे जाते है। न विद्यते मृतं मरणमस्येति भगवान्का मृत अर्थात् मरण नही अमृत: 'अजरोऽमरः' (वृ० उ० ४१४) है, इसलिये वे अमृत है, श्रुति कहती २५) इति श्रुतेः। 'अजर है, अमर है। शाश्वतश्चासौ स्थाणुश्चेति शाश्व- शाइवत (नित्य) भी है और तस्थाणुः। स्थाणु (स्थिर) भी हैं, इसलिये भगवान् शाश्वतस्थाणु है। वर आरोहोऽङ्कोऽस्येति वरारोहः। भगवान्का आरोह अर्थात् गोद चरमारोहणं यसिन्निति वा, आरू- वर ( श्रेष्ठ ) है इसलिये वे वरारोह है । अथवा उनमे आरूढ होना वर ढानां पुनरावृत्त्यसम्भवात्, 'न च (उत्तम )है इसलिये वे वरारोह है क्योकि पुनरावर्तते' (छा० उ० ८।१५१) उनमे आरूढ हुए प्राणियोको फिर संसारमे नहीं आना पडता । श्रुति कहती 'यद्गत्वा न निवर्तन्ते है वह फिर नही लौटतार श्री- तद्धाम परमं मम || भगवान्ने भी कहा है--'जहाँ जाकर फिर नही लौटते वही मेरा परम- इति भगवद्वचनात्। धाम है। अवका अर्थ कीर्ति भी है, भगवान् पविन्न कीर्तिवाले हैं, इसलिये भी शुचि- श्रवा है। इति श्रुतेः, (गीता १५६) १०० विष्णुसहस्रनाम महत्सृज्यविषयं तपोज्ञानमस्येति भगवान्का सृष्टि-विषयक तप-ज्ञान महातपाः 'यस्य ज्ञानमयं तपः' (मु०७० अति महान् है, इसलिये वे महातपा १।१।९) इति श्रुतेः । ऐश्वर्य है । इस विषयमे 'जिसका ज्ञानमय तप है। ऐसी श्रुति भी है । अथवा प्रतापो वा तपो महदस्येति वा उनका ऐश्वर्य या प्रतापरूप तप महान् महातपाः ॥२६॥ है इसलिये वे महातपा है ॥२६॥ 800 सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः । वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित्कविः ॥२७॥ १२३ सर्वगः, १२४ सर्वविद्भानुः, १२५ विष्वक्सेनः, १२६ जनार्दनः । १२७ वेद', १२८ वेदवित् , १२९ अव्यङ्ग', १३० वेदाङ्गः, १३१ वेदवित् , १३२ कविः ॥ सर्वत्र गच्छतीति सर्वगः, कारण कारणरूपसे सर्वत्र व्याप्त होनेके त्वेन व्याप्तत्वात् सर्वत्र । कारण वे सभी जगह जाते है, इसलिये सर्व वेत्ति विन्दतीति वा सब कुछ जानते या प्राप्त करते सर्ववित्भातीति भानुः,'तमेव भान्त- है इसलिये सर्ववित् है, तथा भासते मनुभाति सर्वम्' (क०उ०२।५।१५) है इसलिये भानु है, इस विषयमे 'उसके ही भासित होनेसे ये सब इति श्रुतेः। भासित होते हैं। यह श्रुति और 'यदादित्यगतं तेजो 'जो सूर्यके अन्तर्गत रहनेवाला तेज जगद्भासयतेऽखिलम् ।' सम्पूर्ण संसारको भासित करता है। (गीता १५ । १२) यह रमृति प्रमाण है। इस प्रकार इत्यादिस्मृतेश्चः सर्वविच्चासौ भगवान् सर्ववित् है और भानु भी है, भानुश्चेति सर्वविद्भानुः । इसलिये सर्वविद्भानु है। सर्वग है।
शाङ्करभाष्य १०१ - विष्वक् अव्ययं सर्वेत्यर्थे । 'विप्वक' इस अव्यय पदका अर्थ विष्वगश्चति पलायते दैत्यसेना दैत्यसेना सब ओर तितर-बितर हो सर्व है । भगवान्के रणोद्योगमात्रसे यस्य रणोद्योगमात्रेणेति विष्वक्सेनः। जाती या भाग जाती है, इसलिये वे विष्वक्सेन है। जनान् दुर्जनानर्दयति हिनस्ति, दुष्ट जनोको दलित करते-मारते या नरकादीन् गमयतीति वा जनार्दनः, नरकादि तमोमय लोकोको भेजते है, जनैः पुरुषार्थमभ्युदयनिःश्रेयस- इसलिये जनार्दन है;अथवा भक्तजन उनसे अभ्युदय निःश्रेयसरूप परम पुरुपार्थकी लक्षणं याच्यते इति जनार्दनः। याचना करते है, इसलिये जनार्दन है। वेदरूपत्वाद् वेदः वेदयतीति वेदरूप होनेके कारण वेद है; चा वेदः, अथवा ज्ञान प्राप्त कराते है, इसलिये वेद 'तेषामेवानुकम्पार्थ- है; जैसा कि भगवान्ने कहा है- महमज्ञानज तमः । नाशयाम्यात्मभावस्थो 'उनपर कृपा करनेकेलिये ही मैं आत्म- ज्ञानदीपेन भास्वता ॥ भावमे स्थित हुआ उनका अज्ञान- (गीता १०।११) जन्य अन्धकार प्रकाशमय ज्ञानदीपक- इति भगवद्वचनात् । से नष्ट कर देता हूँ। यथावद्वेदं वेदार्थ च वेत्तीति वेद तथा वेदके अर्थको यथावत् वेदवित्, 'वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ' अनुभव करते है, इसलिये वेदवित् है। ( गीता १५ । १५ ) इति भग- भगवान्का कथन है-'मैं वेदान्तकी वदचनात् । रचना करनेवाला और वेद जानने- 'सर्वे वेदाः सर्ववेद्याः सशास्त्राः वाला भी हूँ। महाभारतमे कहा है- सर्वे यज्ञाः सर्व ईज्याश्च कृष्णः । 'शास्त्रोंसहित सम्पूर्ण वेद, समस्त विदुः कृष्णं ब्राह्मणास्तत्त्वतोये वेद्य-पदार्थ, सारे यज्ञ और सम्पूर्ण तेषां राजन् सर्वयज्ञाः समाप्ताः।।' जो ब्राह्मण कृष्णको तत्त्वतः जानते हैं पूजनीय देव कृष्ण ही है। हे राजन् ! इति महाभारते । उन्होने सभी यज्ञ समाप्त करलिये हैं।
१०२ विष्णुसहस्रनाम अव्यङ्गः ज्ञानादिभिः परिपूर्णोऽ ज्ञानादिसे पूर्ण अर्थात् किसी विकल इत्युच्यते; व्यङ्गो व्यक्तिर्न प्रकार अधूरे न होनेके कारण भगवान् अव्यङ्ग कहलाते है । अथवा व्यङ्ग विद्यत इत्यव्यङ्गोवा, 'अव्यक्तोऽयम्' यानी व्यक्ति न होनेके कारण अव्यङ्ग (गीता २।२५) इति भगवद्वचनात्। है । भगवान्ने कहा है-'यह अव्यक्त है। वेदा अङ्गभूता यस्य स वेदाङ्गः। वेद जिनके अङ्गरूप है वे भगवान् वेदाङ्ग है। वेदान् विन्ते विचारयतीति वेदोको विचारते है, इसलिये वेदवित् । वेदवित् है। क्रान्तदर्शी कविः सर्वदृक्, क्रान्तदर्शी यानी सबको देखनेवाले 'नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा' (बृ० उ० होनेके कारण कवि है, श्रुति कहती है- ३ । ७। २३) इत्यादिश्रुतेः । 'इससे भिन्न कोई और द्रष्टा नहीं है। 'कविर्मनीषी' (ई० उ०८) इत्यादि- तथा 'कवि है मनीषी है। यह मन्त्र- मन्त्रवर्णात् ॥२७॥ वर्ण भी है ॥२७॥ लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः । चतुरात्मा चतुर्दूहश्चतुर्दष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥२८॥ १३३ लोकाध्यक्षः, १३४ सुराध्यक्षः, १३५ धर्माध्यक्षः, १३६ कृताकृतः । १३७ चतुरात्मा, १३८ चतुर्दूहः, १३९ चतुर्दष्ट्रः, १४० चतुर्भुज ॥ लोकानध्यक्षयतीति लोकाध्यक्षः लोकोका निरीक्षण करते है, इस- सर्वेषां लोकानां प्राधान्येनोपद्रष्टा । लिये लोकाध्यक्ष यानी समस्त लोको- को प्रधानरूपसे देखनेवाले है।
शाङ्करभाष्य १०३ लोकपालादिसुराणामध्यक्षः लोकपालादि सुरो (देवताओ) सुराध्यक्षः । के अध्यक्ष है, इसलिये सुराध्यक्ष है । धर्माधौं साक्षादीक्षतेऽनुरूपं अनुरूप फल देनेके लिये धर्म और अधर्मको साक्षात् देखते है, इसलिये फलं दातुं तस्मात् धर्माध्यक्षः । धर्माध्यक्ष है। कृतश्च कार्यरूपेण अकृतश्च कार्यरूपसे कृत और कारणरूपसे कारणरूपेणेति कृताकृतः । अकृत होनेके कारण कृताकृत है। सर्गादिषु पृथग्विभूतयश्चतस्रः सृष्टिकी उत्पत्ति आदिके लिये जिनकी आत्मानो मूर्तयो यस्य सः चतुरात्मा। चार पृथक् विभूतियाँ आत्मा अर्थात् 'ब्रह्मा दक्षादयः काल- मूर्तियाँहें वेभगवान् चतुरात्मा है। विष्णु- -स्तथैवाखिलजन्तवः। विभूतयो हरेरेता पुराणमे कहा है.--'ब्रह्मा,दक्षादि प्रजा- जगतः सृष्टिहेतवः ॥ पतिगण, काल तथा सम्पूर्ण जीव-ये 'विष्णुमन्वादयः कालः भगवान् विष्णुको सृष्टिको हेतुभूत सर्वभूतानि च द्विज । चार विभूतियाँ है । हे द्विज! विष्णु, मनु आदि, काल और सम्पूर्ण भूत- 'रुद्रः कालोऽन्तकाद्याश्च ये श्रीविष्णुकी स्थितिकी हेतुभूत विभूतियाँ है तथा रुद्र, काल, मृत्यु चतुर्धा - प्रलयायैता जनार्दनविभूतयः ।। आदि और समस्त जीव-ये श्री- (विष्णु० १ । २२ । ३१-३३) जनार्दनकी प्रलयकारिणी इति वैष्णवपुराणे। विभूतियाँ है। 'व्यूह्यात्मानं चतुर्धा वै 'पुण्यकीर्ति श्रीजनार्दन अपने चार वासुदेवादिमूर्तिभिः । सृष्टयादीन्प्रकरोत्येष व्यूह बनाकर वासुदेवादि मूर्तियोसे विश्रुतात्मा जनार्दनः ।। सृष्टि आदि करते हैं। इस व्यासजीके इति व्यासवचनात् चतुर्दूहः । वचनानुसार भगवान् चतुर्दूह है । स्थितेनिमित्तभूतस्य विष्णोरेता विभूतयः ॥ समस्ताश्चैव जन्तवः। चार १०४ विष्णसहस्रनाम दंष्ट्राश्चतस्रो यस्येति चतुर्दष्टः जिनके चार डाढ़े है वे नृसिहरूप नृसिंहविग्रहः । यद्वा सादृश्याच्छृङ्ग | भगवान् चतुर्दष्ट्र है । अथवा सदृशताके दंष्ट्रत्युच्यते, 'चत्वारि शृङ्गाः' (ऋग्वेदे) कारण सीगोंको भी दंष्ट्रा कहते है, इसलिये [उसके] चार सींग हैं' इति श्रुतेः। इस श्रुतिके अनुसार चतुर्दष्ट्र है। चत्वारो भुजा अस्येति चतु चार भुजाएँ होनेके कारण चतुर्भुज र्भुजः ॥२८॥ है ॥२८॥ भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः । अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥२६॥ १४१भ्राजिष्णु., १४२ भोजनम्,१४३ भोक्ता,१४४ सहिष्णुः,१४५ जगदादिजः। १४६ अनघः, १४७ विजयः, १४८ जेता,१४९ विश्वयोनिः, १५० पुनर्वसुः ॥ प्रकाशैकरसत्वात् भ्राजिष्णुः । एकरस प्रकाशखरूप होनेके कारण भ्राजिष्णु है। भोज्यरूपतया प्रकृतिर्माया भोज्यरूप होनेसे प्रकृति यानी भोजनम् इत्युच्यते । मायाको भोजन कहते है [अतः मायारूपसे भगवान् भोजन है ] । पुरुषरूपेण तां भुङ्क्ते इति उसे पुरुपरूपसे भोगते है, इस- लिये भोक्ता है। हिरण्याक्षादीन सहते अभिभव हिरण्याक्षादिको सहन करते है तीति सहिष्णुः । अर्थात् उन्हे नीचा दिखाते है, इस- लिये भगवान् सहिष्णु है। हिरण्यगर्भरूपेण जगदादावुत्प- जगत्के आदिमे हिरण्यगर्भरूपसे द्यते स्वयमिति जगदादिजः । स्वयं उत्पन्न होते है, इसलिये जगदा- भोक्ता।
शाङ्करभाष्य १०५ अर्घ न विद्यतेऽस्येति अनघः, भगवान्मे अघ (पाप) नहीं है, 'अपहतपाप्मा' (छा० उ० ८ । ७। इसलिये अनघ है । श्रुति कहती है १) इति श्रुतेः। 'वह पापहीन है। विजयते ज्ञानवैराग्यैश्वर्यादि ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य आदि गुणोसे विश्वको जीतते है, इसलिये मिर्गुणैर्विश्वमिति विजयः । विजय है। यतो जयत्यतिशेते सर्वभूतानि क्योकि खभावसे ही समस्त भूतों- खभावतोऽतो जेता। को जीतते अर्थात् उनसे अधिक उत्कर्ष प्राप्त करते है, इसलिये जेता है। विश्वं योनिर्यस्य विश्वश्चासौ विश्व उनकी योनि है अथवा विश्व योनिश्चेति वा विश्वयोनिः । और योनि दोनो वही है, इसलिये विश्वयोनि है। पुनः पुनः शरीरेषु वसति क्षेत्रज्ञ क्षेत्रज्ञरूपसे पुन. पुन शरीरोमे रूपेणेति पुनर्वसुः ॥२९॥ बसते है, इसलिये पुनर्वसु है ॥२९॥ - उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः । अतीन्द्रः सङ्ग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥३०॥ १५१ उपेन्द्र', १५२ वामन., १५३ प्राशु , १५४ असोध., १५५ शुचि., १५६ ऊर्जितः । १५७ अतीन्द्र', १५८ सङ्गह', १५९ सर्गः, १६० धृतात्मा, १६१ नियम , १६२ यम. ॥ इन्द्रमुपगतोऽनुजत्वेनेति उपेन्द्रः अनुजरूपसे इन्द्र के पास रहते हैं, इस- यद्वा उपरि इन्द्रः उपेन्द्रः। लिये उपेन्द्र है। अथवा [इन्द्रसे] ऊपर इन्द्र है इसलिये उपेन्द्र है। हरिवंशमे १०६ विष्णुसहस्रनाम 'ममोपरि यथेन्द्रस्त्वं कहा है-'क्योकि गौओंने आपको स्थापितो गोभिरीश्वरः । मेरे ऊपर मेरा इन्द्र (स्वामी) बनाया उपेन्द्र इति कृष्ण त्वां गास्यन्ति भुवि देवताः है, इसलिये हे कृष्ण! लोकमें देवगण (हरि० २ । १६ । ४६) उपेन्द्र कहकर आपका गान करेंगे'। इति हरिवंशे बलिं वामनरूपेण याचितवा वामनरूपसे बलिसे याचना की थी, निति वामनः । सम्भजनीय इति वा इसलिये वामन है। अथवा भली प्रकार वामनः, 'मध्ये वामनमासीनं भजने योग्य होनेसे वामन है; जैसा विश्वेदेवा उपासते ।। कि मन्त्रवर्ण है-'मध्यमे स्थित वामन- (क० उ० २।५।३) इति मन्त्रवर्णात् । की विश्वेदेव उपासना करते हैं। स एव जगत्त्रयं क्रममाण: वे ही तीनो लोकोको लॉघनेके प्रांशुरभूदिति प्रांशुः । समय प्रांशु (ऊंचे) हो गये थे, इसलिये 'तोये तु पतिते हस्ते वामनोऽभूदवामनः प्रांशु है। [बलिके किये हुए सङ्कल्प- सर्वदेवमयं रूपं का जल हाथमे गिरते ही वामनजी दर्शयामास वै प्रभुः॥ अवामन हो गये। उस समय प्रभुने 'भूः पादौ द्यौः शिरश्चास्य अपना सर्वदेवमय रूप दिखलाया। चन्द्रादित्यौ च चक्षुषी । पृथिवीउनके चरण,आकाश शिर तथा (हरि० ३ । ७१ । ४३-४४) सूर्य और चन्द्रमा नेत्र थे।" इत्यादि इत्यादिविश्वरूपं दर्शयित्वा रूपसे विश्वरूप दिखलाकर हरिवंशमे - 'तस्य विक्रमतो भूमि चन्द्रादित्यौ स्तनान्तरे। नभः प्रक्रममाणस्य नाभ्या तौ समवस्थितौ॥ उनकी प्रांशुता (ऊँचाई) का इस प्रकार वर्णन किया है-'पृथिवीको मापते समय सूर्य और चन्द्र उनके स्तनके समीपहोगये, फिर आकाशको मापते .
शाङ्करभाष्य १०७ . दिवमाक्रममाणस्य समय वे उनकी नाभिपर आ गये जानुमूले व्यवस्थितौ ।' तथा स्वर्गमापते समय उनके घुटनो. इति प्रांशुत्वं दर्शयति हरिवंशे । पर ही रह गये। (३।७२।२९)। न मोघं चेष्टितं यस्य सः अमोघः । जिनकी चेष्टा मोघ (व्यर्थ) नही होती वे भगवान् अमोघ है। सरतांस्तुवतामर्चयतां च पावन स्मरण, स्तुति और पूजन करनेवालो- को पवित्र करनेवाले होनेसे भगवान् त्वात् शुचिः 'अस्य स्पर्शश्च महान् शुचिः' इति मन्त्रवर्णात् । शुचि है। इस विषयमे यह मन्त्रवर्ण है- 'इसका स्पर्श भी महान् शुचि है।' बलप्रकर्षशालित्वात् ऊर्जितः । अत्यन्त वलशाली होनेके कारण ऊर्जित है। अतीत्येन्द्र स्थितो ज्ञानेश्वर्या- अपने स्वभावसिद्ध ज्ञान-ऐश्वर्यादि- दिभिः स्वभावसिद्धरिति अतीन्द्रः । के कारण इन्द्रसे भी बढे-चढ़े है, इस- लिये अतीन्द्र है। सर्वेषां प्रतिसंहारात् सग्रहः । प्रलयके समय सवका संग्रह करने के कारण संग्रह है। सृज्यरूपतया, सर्गहेतुत्वाद्वा सृज्य (जगत् ) रूप होनेसे अथवा सृष्टिका कारण होनेसे सर्ग है। एकरूपेण जन्मादिरहिततया जो जन्मादिसे रहित रहकर अपने धृत आत्मा येन साधृतात्मा । स्वरूपको एक रूपसे धारण किये हुए है वे भगवान् धृतात्मा है। खेषु खेष्वधिकारेषु प्रजा अपने-अपने अधिकारोमे प्रजाको नियमयतीति नियमः। नियमित करते है, इसलिये नियम है। अन्तर्यच्छतीति यमः ॥३०॥ अन्तःकरणमे स्थित होकर नियमन करते है, इसलिये यम है ॥३०॥ सर्गः। . -- १०८ विष्णुसहस्रनाम वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः । अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ॥ ३१ ॥ १६३ वेद्यः,१६४ वैद्यः,१६५ सदायोगी,१६६ वीरहा, १६७ माधवः,१६८ मधुः। १६९ अतीन्द्रियः, १७० महामायः, १७१ महोत्साहः, १७२ महाबलः ।। निःश्रेयसार्थिभिर्वेदनार्हत्वात् कल्याणकी इच्छावालोद्वारा जानने योग्य है, इसलिये वेद्य है। सर्वविद्यानां वेदितृत्वात् वैद्यः। सब विद्याओके जाननेवाले होनेसे वेद्यः । वैद्य है। योगी। PM सदा आविर्भूतखरूपत्वात् सदा सदा प्रत्यक्ष-स्वरूप होनेके कारण सदायोगी है। धर्मत्राणाय वीरान् असुरान् धर्मकी रक्षाके लिये वीरोको यानी हन्तीति वीरहा। असुर योद्धाओको मारते है, इसलिये वीरहा है। माया विद्यायाः पतिः माधवः । मा अर्थात् विद्याके पति होनेसे 'मा विद्या च हरेः प्रोक्ता माधव है । हरिवंशमे कहा है-'हरि- तस्या ईशो यतो भवान्। की विद्याका नाममा है और आप तस्मान्माधवनामासि उसके स्वामी है,इसलिये आप माधव धवः खामीति शब्दितः॥' | नामवाले है क्योकि धव शब्द इति हरिवंशे (३। ८८ । ४९)। स्वामीका वाचक है।' यथा मधु परां प्रीतिमुत्पादयति जिस प्रकार मधु (शहद) अत्यन्त अयमपि तथेति मधुः। प्रसन्नता उत्पन्न करता है उसी प्रकार भगवान् भी करते है, इसलिये वे . - मधु है। शब्दादिरहितत्वादिन्द्रियाणाम- शब्दादि विषयोसे रहित होनेके शाङ्करभाष्य १०६ विषय इति अतीन्द्रियः, 'अशब्दमस्प- कारण भगवान् इन्द्रियोके विपय नही शम्' (क० उ० १ । ३ । १५) इति है, इसलिये अतीन्द्रिय है। श्रुति श्रुतेः। कहती है-'अशब्द है, अस्पर्श है। मायाविनामपि मायाकारित्वात् मायावियोपर भी माया फैला देते महामायः, 'मम माया दुरत्यया' (गीता है, इसलिये महामाय हैं । भगवान्का ७११४) इति भगवद्वचनात् । वचन है-'मेरी माया अतिदुस्तर है।' जंगदुत्पत्तिस्थितिलयार्थमुटुक्त- जगतकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके लिये तत्पर रहनेके कारण त्वात् महोत्साहः। महोत्साह है। बलिनामपि वलवत्त्वात् महाबल' बलवानोमे भी अधिक बलवान् ॥३१॥ होनेके कारण महायल है ॥३१॥ महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः। अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥ ३२ ॥ १७३ महाबुद्धि', १७४ महावीर्यः, १७५ महाशक्तिः, १७६ महाद्युतिः । १७७ अनिर्देश्यवपुः, १७८ श्रीमान्, १७९ अमेयात्मा, १८० महाद्रिधृक् ।। बुद्धिमतामपि बुद्धिमत्त्वात् महा बुद्धिमानोमे भी महान् बुद्धिमान् बुद्धिः। होनेके कारण महाबुद्धि है। महदुत्पत्तिकारणमविद्यालक्षणं संसारकी उत्पत्तिकी कारणरूप अविद्या भगवान्का महान् वीर्य है, वीर्यमस्येति महावीर्यः । इसलिये वे महावीर्य हैं। महती शक्तिः सामर्थ्यमस्येति उनकी शक्ति अर्थात् सामर्थ्य अति महाशक्तिः । महान् है, इसलिये वे महाशक्ति है। महती द्युतिर्बाह्याभ्यन्तरा च उनकी बाह्य और आभ्यन्तर द्युति विष्णुसहस्रनाम अस्येति महाद्युतिः; 'स्वयंज्योतिः' (बृ० महान् है, इसलिये वे महाद्युति है। ४ । ३ । ९) 'ज्योतिषां इस विषयमें 'स्वयं ज्योति है। ज्योतिः' (बृ० उ० ४।४।१६) 'ज्योतियोंका ज्योति है। इत्यादि इत्यादिश्रुतेः। श्रुतियाँ प्रमाण है। इदं तदिति निर्देष्टुं यन्न अज्ञेय होने के कारण जो 'वह यह शक्यते परस्मै स्वसंवेद्यत्वात्तदनि- किया जा सके उसे अनिर्देश्य कहते है; है' इस प्रकार दूसरोके लिये निर्दिष्ट न देश्यं वपुरस्येति अनिर्देश्यवपुः । भगवानका वपु (शरीर) अनिर्देश्य है, इसलिये वे अनिर्देश्यवपु है। ऐश्वर्यलक्षणा समग्रा श्रीर्यस्य जिनमे ऐश्वर्यरूप समग्र श्री है वे सः श्रीमान् । भगवान श्रीमान् है। सर्वैः प्राणिभिरमेया बुद्धिरात्मा जिनकी आत्मा---बुद्धि समस्त यस्य स अमेयात्मा । प्राणियोसे अमेय (अनुमान न की जा सकने योग्य) है वे भगवान् अमेयात्मा है महान्तमद्रि गिरि मन्दरंगोवर्धनं अमृतमन्थन और गोरक्षणके समय [क्रमशः] मन्दराचल और गोवर्धन च अमृतमथने गोरक्षणे च धृतवा- नामक महान् पर्वतोको धारण किया निति महाद्रिधृक् षान्तोऽयम् था, इसलिये भगवान् महाद्रिधृक् है । यह शब्द षान्त है । [अर्थात् महाद्रि- धृप शब्दका प्रथमान्तरूप] है ॥३२॥ wwwmaram महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः। . अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः॥ ३३ ॥ १८१ महेष्वासः, १८२ महीभर्ता, १८३ श्रीनिवासः, १८४ सतां गतिः । १८५ अनिरुद्धः,१८६ सुरानन्दः, १८७ गोविन्दः, १८८ गोविदां पतिः।। ।
शाङ्करभाष्य महानिष्वास इषुक्षेपो यस्य स जिनका इष्वास अर्थात् धनुष महेष्वासः। महान् हैं वे भगवान् महेष्वास है । एकार्णवाप्लुतां देवीं महीं च प्रलयकालीन जलमे डूबी हुई बभारेति महीभर्ता । पृथिवीको धारण किया था, इसलिये महीभर्ता है। यस्य वक्षस्यनपायिनी श्रीर्वसति जिनके वक्षःस्थलमे कभी दूर न सः श्रीनिवास । होनेवाली श्री निवास करती है वे भगवान् श्रीनिवास है। सतां वैदिकानां साधूनां सन्तजन अर्थात् वैदिक-धर्मावलम्बी पुरुषार्थसाधनहेतुः सता गतिः । सत्पुरुषोके पुरुपार्थसाधनके हेतु होनेसे भगवान् सतांगतिहे। न केनापि प्रादुर्भावेषु निरुद्ध प्रादुर्भावके समय किसीसे निरुद्ध इति अनिरुद्धः। नहीं हुए, इसलिये अनिरुद्ध है। सुरानानन्दयतीति सुरानन्दः । सुरो (देवताओ) को आनन्दित करते है, इसलिये सुरानन्द है। 'नष्टां वै धरणी पूर्व- 'मैंने पूर्वकालमे नष्ट हुई पाताल- मविन्दद्यद्गुहागताम् । गोविन्द इति तेनाह गत पृथिवीको पाया था, इसलिये देवैर्वाग्भिरभिष्टुतः ॥ देवताओंने अपनी वाणीसे 'गोविन्द' (महा. शान्ति० ३४२ १७०) कहकर मेरी स्तुति की इस मोक्षधर्म- इति मोक्षधर्मवचनात् गोविन्दः। के वचनानुसार भगवान् गोविन्द है । 'अह किलेन्द्रो देवाना हरिवंशमे कहा है-'मैं देवताओका इन्द्र हूँ और तुम गौओंके इन्द्र हुए हो गोविन्द इति लोकास्त्वा इसलिये भूमण्डलमे लोग तुम्हें (हरि०२।११।४५) 'गोविन्द' कहकर तुम्हारी सर्वदा इति। स्तुति करेंगे। त्वं गवामिन्द्रतां गतः। स्तोष्यन्ति भुवि शाश्वतम् ॥
११२ विष्णुसहस्रनाम - 'गौरेषा तु यतो वाणी तथा 'गौ-यह वाणी है और ता च विन्दयते भवान् । आप उसे प्राप्त कराते है, गोविन्दस्तु ततो देव मुनिभिः कथ्यते भवान् ॥' | इसलिये हे देव! मुनिजन आपको ) इति च हरिवंशे (३।८८१५०) गोविन्द कहते है। गौर्वाणी तां विदन्तीति गोविदः गौ वाणीको कहते है उसे जो जानते है वे गोविद् कहलाते है । तेषां पतिर्विशेषेणेति गोविदां पतिः उनके विशेषत. पति होनेके कारण ॥३३॥ भगवान् गोविदां पति है ॥३३॥ मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः । हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः॥३४॥ १८९ मरीचिः, १९० दमनः, १९१ हंसः, १९२ सुपर्णः, १९३ भुजगोत्तमः १९४ हिरण्यनाभः, १९५ सुतपाः, १९६ पद्मनाभः, १९७ प्रजापतिः ॥ तेजखिनामपि तेजस्त्वात तेजस्वियोका भी परम तेज होने- मरीचिः, 'तेजस्तेजखिनामहम्' (गीता के कारण मरीचि है । भगवान्ने कहा १० । ३६) इति भगवद्वचनात् । है-'मैं तेजस्वियोका तेज हूँ। खाधिकारात्प्रमाद्यती: प्रजा अपने अधिकारमे प्रमाद करनेवाली प्रजाको विवस्वान् (सूर्य) के पुत्र यम दमयितुं शीलमस्य वैवस्वतादि- आदिके रूपसे दमन करनेका भगवान्- रूपेणति दमनः । का स्वभाव है, इसलिये वे दमन है। अहं स इति तादात्म्यभाविन: 'अहं सः' (मै वह हूँ) इस प्रकार तादा- संसारभयं हन्तीति। हंसः । पृषो- त्म्यभावसे भावना करनेवालेका संसार- शाङ्करभाष्य ११३ दरादित्वाच्छब्दसाधुत्वस् । हन्ति | भय नष्ट कर देते है, इसलिये भगवान् हंस हैं। पृपोदरादिगणम होनेके गच्छति सर्वशरीरेविति वा हंस: कारण [अहंस. के स्थानमे] हंसः प्रयोग सिद्ध होता है । अथवा सब शरीरोमे 'हसः शुचिपत्' (क० उ० २।५। हन्ति-जाते हैं इसलिये हंस है । जैसा २) इति मन्त्रवर्णात् । कि 'आकाशमें चलनेवाले सूर्य' इस मन्त्रवर्णसे सिद्ध होता है। शोमनधर्माधर्मरूपपर्णत्वात् सु धर्म और अधर्मरूप सुन्दर पक्षोंके पर्ण', 'द्वा सुपर्णा' (मु० उ० ३ । १ । कारण सुपर्ण है, जैसा कि मन्त्रवर्ण १) इति मन्त्रवर्णात् । शोभनं पर्ण है-'दो सुपर्ण (पक्षी) हैं । अथवा जिसके सुन्दर पक्ष है वह गरुड ही यस्येति वा सुपर्णः 'सुपर्णः सुपर्ण है। भगवान्का वचन है- पनतामस्मि' इति ईश्वरवचनात् । 'पक्षियोमे मैं गरुड हूँ। भुजेन गच्छतामुत्तमो भुज भुजाओसे चलनेवालोमे उत्तम होने- से भुजगोत्तम हैं। [शेप-वासुकि आदि भगवान्की विभूतियाँ होनेके कारण उनका नाम भुजगोत्तम है] । हिरण्यमिव कल्याणी नाभि- भगवान्की नाभि हिरण्य (सुवर्ण) रस्येति हिरण्यनाभः; हितरमणी- के समान कल्याणमयी है; अतः सुन्दर नाभिवाले अथवा हिरण्मय (सुवर्णके यनाभित्वाद्वा हिरण्यनाभा । समान तेजोमय ) होनेसे वे हिरण्य- नाम है। बदरिकाश्रमे नरनारायणरूपेण बदरिकाश्रममे नर-नारायणरूपसे शोभनं तपश्चरतीति सुतपाः । 'मन- सुन्दर तप करते है, इसलिये सुतपा है। सश्चेन्द्रियाणा च ह्यकाप्रयं परमं तपः। स्मृति कहती है-'मन और इन्द्रियोंकी (ब्रह्म० १३० । १८) इति स्मृतेः । एकाग्रता ही परम तप है। गोत्तम । मयत्वाद्रा ८ 30 विष्णुसहस्रनाम पद्ममिव सुवर्तुला नाभिरस्येति, पद्मके समान सुन्दर वर्तुलाकार नाभि होनेसे अथवा सबके हृदय- हृदयपद्मस्य नाभौ मध्ये प्रकाश- पद्मकी नाभि-मध्यमे प्रकाशित होनेसे नाद्वा पद्मनाभः । पृषोदरादित्वा- भगवान् पद्मनाभ है । पृषोदरादिगणमे होनेसे [पद्मनाभिके स्थानमे] पद्मनाभ प्रयोग शुद्ध समझना चाहिये। प्रजानां पतिः पिता प्रजापतिः प्रजाओके पति अर्थात् पिता होनेसे ॥३४॥ प्रजापति है॥ ३४ ॥ त्साधुत्वम् । , न अमृत्युः सर्वदृक्सिंहःसन्धाता सन्धिमान्स्थिरः। अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥ ३५॥ १९८ अमृत्यु., १९९ सर्वदृक् , २०० सिंहः, २०१ सन्धाता, २०२ सन्धिमान् , २०३ स्थिरः । २०४ अजः, २०५ दुर्मर्षणः, २०६ शास्ता, २०७ विश्रुतात्मा, २०८ सुरारिहा॥ मृत्युर्विनाशस्तद्धेतुर्वास्य भगवान्मे मृत्यु अर्थात् विनाश या विद्यते इति अमृत्युः । उसका कारण न होनेसे वे अमृत्यु है। प्राणिनां कृताकृतं सर्व पश्यति अपने स्वाभाविक ज्ञानसे प्राणियो- स्वाभाविकेन बोधेनेति सर्वदृक् । के सब कर्म-अकर्मादि देखते है, इसलिये सर्वक है। हिनस्तीति सिंहः । पृषोदरादित्वा हनन करनेके कारण सिह है। पृषोदरादिगणमे होनेसे [ 'हिस' के त्साधुत्वम् । स्थानमे] सिह प्रयोग सिद्ध होता है। इति नाम्नां द्वितीयं शतं विवृतम् । यहॉतक सहस्रनामके द्वितीय शतक- का विवरण हुआ। कर्मफलैः पुरुषान् सन्धत्त इति पुरुषोंको उनके कोंके फलोसे सन्धाता। संयुक्त करते है, इसलिये सन्धाता हैं।
शाङ्करभाष्य अजः। फलभोक्ता च स एवेति सन्धि फलोके भोगनेवाले भी वे ही है, मान्। इसलिये सन्धिमान है। सदैकरूपत्वात् स्थिरः। सदा एकरूप होनेके कारण स्थिर है। अजति गच्छति क्षिपति इति वा [अज् धातुका अर्थ जाना या फेंकना है । भगवान् [भक्तोके हृदयोमे] जाते और [असुरादि दुष्टोको] फेकते है, इसलिये अज है। मर्षितुं सोढुं दानवादिभिर्न दानवादिकोंसे मर्पण अर्थात् सहन शक्यते इति दुर्मर्षणः। नहीं किये जा सकते, इसलिये भगवान् दुर्मर्पण है। श्रुतिस्मृत्यादिभिः सर्वेषामनु श्रुति-स्मृति आदिसे सबका अनु- शिष्टिं करोतीति शास्ता। शासन करते है इसलिये शास्ता है। विशेषेण श्रुतो भगवान्ने सत्यज्ञानादि रूप आत्मा- ज्ञानादिलक्षणः आत्माऽतो विश्रुतात्मा का विशेपरूपसे श्रवण (ज्ञान) किया है, अतः वे विश्रुतात्मा है। सुरारीणां निहन्तृत्वात् सुरारिहा सुरो (देवताओ) के शत्रुओको मारने- ॥३५॥ वाले होनेके कारण भगवान् सुरारिहा येन सत्यः है ॥३५॥ गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः । निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥ ३६॥ , २०९गुरुः, २१० गुरुतमः, २११ धाम, २१२ सत्य,२१३ सत्यपराक्रम । २१४ निमिपः, २१५ अनिमिषः, २१६ स्रग्वी, २१७ वाचस्पतिरुढारधीः॥ सर्वविद्यानामुपदेष्तृत्वात्सर्वेषां सब विद्याओके उपदेष्टा होनेसे जनकत्वाद्वा गुरुः। तथा सबके जन्मदाता होनेसे गुरु है।
विष्णुसहस्रनाम विरिच्यादीनामपि ब्रह्मविद्या ब्रह्मा आदिको भी ब्रह्मविद्या प्रदान सम्प्रदायकत्वाद् गुरुतमः, 'यो | करनेवाले होनेसे गुरुतम है । मन्त्र- ब्रह्माणं विदधाति पूर्वम्' (श्वे० उ० वर्ण कहता है-'जो पहले ब्रह्माको ६ । १८) इति मन्त्रवर्णात् । रचता है। धाम ज्योतिः, नारायणपरो ज्योतिः' धाम ज्योतिको कहते है । मन्त्र- (ना० उ० १३ । १) इति मन्त्र- वर्णमे कहा है--'नारायण परम वर्णात् । सर्वकामानामास्पदत्वाद्वा ज्योति है अथवा सम्पूर्ण कामनाओ- के आश्रय होनेके कारण भगवान् धाम, 'परम ब्रह्म परं धाम' (बृ० धाम है। श्रुति कहती है—'परम उ० २।३ । ६) इति श्रुतेः। ब्रह्म और परम धाम है।' सत्यवचनधर्मरूपत्वात् सत्यः सत्य-भाषणरूप धर्मस्वरूप होनेसे 'तस्मात् सत्यं परमं वदन्ति' इति | भगवान् सत्य है । श्रुति कहती है- 'इलीलिये सत्यको परम कहते है। श्रुतेः सत्यस्य सत्यमिति वा, अथवा सत्यका भी सत्य है, इस- 'प्राणा वै सत्यं तेपामेव सत्यम्' (बृ० लिये सत्य है । श्रुति कहती है- उ० २ । ३ । ६) इति श्रुतेः। 'प्राण सत्य हैं, [परमात्मा] उनका भी सत्य है। सत्यः अवितथ: पराक्रमो जिनका पराक्रम सत्य अर्थात् यस्य सः सत्यपराक्रमः । अमोघ है वे भगवान् सत्यपराक्रम है। निमीलिते यतो नेत्रे योगनिद्रा योगनिद्रारत भगवान्के नेत्र मुँदे रतस्य अतो निमिषः। हुए है, इसलिये वे निमिष है। नित्यप्रबुद्धस्वरूपत्वात् अनि- नित्य-प्रबुद्धरवरूप होनेके कारण मिषः, मत्स्यरूपतया वा आत्म- | अनिमिप है; अथवा मत्स्यरूप या आत्मा- रूपतया वा अनिमिषः। रूप होनेसे अनिमिप है। भूततन्मात्ररूपां वैजयन्त्याख्यां सर्वदा भूततन्मात्रारूप वैजयन्ती- स्रजं नित्यं बिभर्तीति स्रग्वी । माला धारण करते है, इसलिये स्रग्वी है।
शाङ्करभाष्य वाचो विद्यायाः पतिः वाचस्प याक अर्थात् विद्यार्क पनि गन में तिः; सर्वार्थविषया धीवुद्धिरस्य- C प्रत्यन करनेवाली इमलिये गचस्पति । भगवान बुति गर्व त्युदारधी वाचस्पतिरुदारधीः । उदारगी। वाचस्पतिस्टारधी या इत्येकं नाम ।। ३६ प्रसार : अग्रणीामणीः श्रीमान्न्यायो नेता समीरणः । सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्रानः सहस्रपात् ॥ ३७ ॥ २१८ अग्रणी.. २१०. ग्रामी.. २२० श्रीमान. २२१ न्याय , २२२ नंगा. २२३ समीरण । २२४ महतमर्धा, २२५ निधामा, २२६ महमान, २२७ सहयपात् ॥ अग्रं प्रकृष्टं पदं नयति मुमुक्षु मुमुक्षुओंको अग अर्थात उत्तम पटपर निति अग्रणीः । जाती. इमलिय अत्रणी है। भृतग्रामस्य नेतृत्वात् ग्रामणीः। भृतगामका नेतृत्व करने के कारण ग्रामणी है। श्रीः कान्तिः सर्वातिशायिन्य भगवानकी श्री अर्थात् कान्ति सबसे स्येति श्रीमान् । नाढी-चढ़ी है, इसलिये वे श्रीमान् है । प्रमाणानुग्राहकोऽभेदकारकस्तों प्रमाणोंका आश्रयभत अभेदवांचक न्याय । गर्क न्याय कहलाता है [इसलिये नगवान्का नाग न्याय है। जगद्यन्त्रनिर्वाहको नेता। जगतरूप यन्त्रको चलानेवाले हानसे नेता हैं। श्वसनरूपेण भूतानि चेष्टयतीति स्वासरूपसे प्राणियोंसे चेष्टा कराते समीरणः । हैं, इसलिये समीरण हैं।
११८ विष्णुसहस्रनाम मूर्धा । सहस्राणि मूर्धानोऽस्येति सहस्र भगवान्के सहस्र मूर्धा (शिर) है, इसलिये वे सहस्रमूर्धा है। विश्वस्यात्मा विश्वात्मा । विश्वके आत्मा होनेसे विश्वात्मा है। सहस्राण्यक्षीण्यक्षाणि वा यस्य जिनके सहस्र अक्षि ( ऑखे ) या स सहस्राक्षः । सहस्र अक्ष (इन्द्रियाँ) है वे भगवान् सहस्राक्ष है। सहस्राणि पादा अस्येति सहस्र भगवान्के सहस्र पाद (चरण) पात् । 'सहस्रशीर्षा पुरुपः सहस्राक्षः है, इसलिये वे सहस्रपात् हैं। श्रुति सहस्रपात् ' (पु० सू० १) इति कहती है-'पुरुष सहस्र शिर, सहस्र श्रुतेः ॥ ३७॥ नेत्र और सहस्त्र पादवाला हैं ॥३७॥ . आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः । अहासंवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥ ३८ ॥ २२८ आवर्तनः, २२९ निवृत्तात्मा, २३० संवृतः, २३१ सम्प्रमर्दनः । २३२ अहःसंवर्तकः, २३३ वह्निः, २३४ अनिल', २३५ धरणीधरः ॥ आवर्तयितुं संसारचक्रं शील संसारचक्रका आवर्तन करने मस्यति आवर्तनः । (धुमाने) का भगवान्का स्वभाव है, इसलिये वे आवर्तन है। संसारवन्धानिवृत्त आत्मा उनका आत्मा अर्थात् स्वरूप संसार- गिमस्येति निवृत्तात्मा । बन्धनसे निवृत्त (छटा हुआ) है, इसलिये वे निवृत्तात्मा है। रू.आच्छादिकया अविद्यया संवृ. आच्छादन करनेवाली अविद्यासे संवृत (ढके हुए) होनेके कारण संवृत है। भृत संवृतः। स्रजं नित्यं शाङ्करभाष्य । सम्यक् प्रमर्दयतीति रुद्रकाला भगवान् अपनी रुद्र और काल आदि धाभिर्विभृतिभिरिति सम्प्रमर्दनः। विभूतियोसे सबका सब ओरसे मर्दन करते है, इसलिये सम्प्रमर्दन है । सम्यगांप्रवर्तनात्सूर्यः अहः सम्यगरूपसे दिनके प्रवर्तक होन- संवर्तकः। के कारण सूर्य भगवान् अहःसंवर्तक हैं। हविर्वहनात् वह्निः । हविका वहन करने के कारण वलि है। अनिलयः अनिल , अनादि [कोई निश्चित] निवासस्थान न होनेके कारण भगवान् अनिल है । त्वात् अनिल:; अनादानाद्वा, अथवा अनादि होनेसे अनिल है। अननाद्वा अनिलः। | अथवा ग्रहण न करनेके कारण या चेष्टा करनेसे अनिल है। शेषदिग्गजादिरूपेण वराहरूपेण शेप और दिग्गजादिरूपसे अथवा च धरणीं धत्त इति धरणीधरः॥३८॥ वराहरूपसे पृथिवीको वारण करते है, इसलिये धरणीधर है ॥३८॥ सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधग्विश्वभुग्विभुः । सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नर्नारायणो नरः ॥ ३६ ॥ . २३६सुप्रसाद ,२३७प्रसन्नात्मा,२३८विश्वधृक् ,२३९विवभुक् , २४० विभुः । २४१ सत्कर्ता, २४२ सत्कृत', २४३ साधु',२४४ जह्व', २४५ नारायणः, २४६ नर ॥ शोभनः प्रसादो यस्यापकारव अपना अपकार करनेवाले शिशु- पालादिको भी मोक्ष देनेके कारण तामपि शिशुपालादीनां मोक्षप्रदा- जिनका प्रसाद (कृपा) अति सुन्दर तृत्वादिति सुप्रसादः। है वे भगवान् सुप्रसाद है।
१२० विष्णुसहस्रनाम रजस्तमोभ्यामकलुषित आत्मा भगवान्का अन्तःकरण रज और न्तःकरणमस्येति प्रसन्नात्मा । करुणा- | तमसे दृषित नहीं है, इसलिये वे ईखभावत्वाद्वा,यद्वा प्रसन्नवभावः प्रसन्नात्मा है । अथवा करुणाईस्वभाव होनेसे प्रसन्नात्मा है । या प्रसन्नस्वभाव कारुणिक इत्यर्थः अवाप्तसर्वकाम- यानी करुणा करनेवाले है अथवा त्वाद्वा। उन्हे सब प्रकारकी कामनाएँ प्राप्त है, इसलिये वे प्रसन्नात्मा है । विश्वं धृष्णोतीति विश्वधृक् । भगवान् विश्वको धारण करते है, निधृषा प्रागल्भ्ये। इसलिये वे विश्चधृक् है । प्रगल्भता- वाचक 'गिधृपा' धातुसे धृक् बनता है। विश्वं भुले भुनक्ति पालयतीति विश्वको भक्षण करते अथवा वा विश्वभुक् । भोगते यानी पालन करते है, इसलिये विश्वभुक है। हिरण्यगर्भादिरूपेण विविधं हिरण्यगर्भादिरूपसे विविध होते भवतीति विभुः, 'नित्यं विभुम्' | है, इसलिये विभु है । मन्त्रवर्ण कहता (मु० उ०१।५।६) इति मन्त्र- है 'नित्य और विभुको'। वर्णात् । सत्करोति पूजयतीति सत्कर्ता । सत्कार करते अर्थात् पूजते है, इसलिये सत्कर्ता है। पूजितैरपि पूजितः सत्कृतः । पूजितोसे भी पूजित है, इसलिये सत्कृत है। न्यायप्रवृत्ततया साधुः; साधय- साधु तीति वा साध्यभेदान् , उपादानात् साध्यमात्रसाधको वा। न्यायानुकूल प्रवृत्त होते है, इसलिये है। अथवा समस्त साध्यभेदोका साधन करते है या उपादान कारण होनेसे साध्यमात्रके साधक है, इसलिये साधु है।
शाङ्करभाष्य १२१ जनान् संहारसमये अपहृते अपहृते संहारके समय जनो (जीवो) का अपहनव ( लय ) या अपनयन अपनयतीति जह जहात्यविदुषो (वहन ) करते है, इसलिये जनु भक्तान्नयति परम्पदमिति वा । है। अथवा अज्ञानियोको त्यागते और भक्तोंको परमपदपर ले जाते है, इसलिये जहनु है। नर आत्मा, ततो जातान्या नर आत्माको कहते है, उससे काशादीनि नाराणि कार्याणि तानि उत्पन्न हुए आकाशादि नार है । उन अयं कारणात्मना व्यामोति, अतश्च कार्यरूप नारोको कारणरूपसे व्याप्त तान्ययनमस्येति नारायण:- करते है, इसलिये वे उनकं अयन (घर 'यच्च किञ्चिज्जगत्सर्व दृश्यते श्रूयतेऽपि वा। हैं, अत' भगवान्का नाम नारायण 'अन्तर्बहिश्च तत्सर्व है । मन्त्रवर्ण कहता है-'जो कुछ भी व्याप्य नारायणः स्थितः ।। जगत् दिखायीयासुनायी देता है उस (ना० उ० ६३ । १-२) सबकोनारायण वाहर-भीतरसे व्याप्त इति मन्त्रवर्णात् । करके स्थित हैं। महाभारतमे कहा है- 'नराज्जातानि तत्त्वानि नाराणीति ततो विदु । 'तत्त्व नरसे उत्पन्न हुए हैं, इसलिये वे तान्येव चायन तस्य नारकहलाते हैं। वे ही पहले भगवान- तेन नारायणः स्मृतः ।। के अयन थे, इसलिये भगवान् इति महाभारते। नारायण कहलाते है। नाराणांजीवानामयनत्वात्प्रलय अथवा प्रलय-कालमे नार अर्थात् इति वा नारायणा, 'यत्प्रयन्त्यभिसं-जीवोके अयन होनेके कारण नारायण विशन्ति' (तै० उ० ३ । १) इति है । श्रुति कहती है-'जिसमे कि सब श्रुतेः । 'नाराणामयनं यस्मात्तस्मान्नारा- जीव मरकर प्रविष्ट होते हैं।' यणः स्मृतः' इति ब्रह्मवैवर्तात् ब्रह्मवैवर्तपुराणमे कहा है-'क्योंकि 'आपो नारा इति प्रोक्ता [भगवान् ] नारोंके अयन हैं, इसलिये नारायण कहलाते हैं।' अथवा 'अप आपो वै नरसूनवः ।
विष्णुसहस्रनाम ता यदस्यायनं पूर्व (जल) नार कहलाता है क्योंकि वह नर (परमात्मा) का पुत्र है, तेन नारायणः स्मृतः ॥ और पहले वह (नार)ही परमात्मा- (मनु० १ । १०) का अयन था इसलिये वे नारायण इति मनुवचनाद्वा नारायणः। कहलाते है । इस मनुजीके वाक्यसे भी वे नारायण है । श्रीनारसिह- 'नारायणाय नम इत्ययमेव सत्यः पुराणमे कहा है-हे सुमति और संसारघोरविषसहरणाय मन्त्रः । विरक्त यतिजन! आपलोग सुनिये, शृण्वन्तु भव्यमतयो यतयोऽस्तरागा मैं बाँह उठाकर बड़े जोरसे उपदेश करता हूँ कि नारायणाय नम:-यही उच्चस्तरामुपदिशाम्यहमूर्ध्वबाहुः।।' सत्य है और यही संसाररूप घोर इति श्रीनारसिंहपुराणे । विषका नाश करनेकेलिये मन्त्र है। 'नयतीति नरः प्रोक्तः 'नयन करता (ले जाता) है, इसलिये सनातन परमात्मा परमात्मा सनातनः।' कहलाता है। इस व्यासजीके वचना- इति व्यासवचनम् ॥३९॥ नुसार भी [ भगवान् नर है ] ॥३९॥ नर , असंख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः । सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ॥ ४० ॥ २४७ असंख्येयः, २४८अप्रमेयात्मा,२४९ विशिष्टः,२५० शिष्टकृत,२५१शुचिः । २५२ सिद्धार्थः, २५३ सिद्धसङ्कल्पः, २५४ सिद्धिदः, २५५ सिद्धिसाधनः ।। यस्सिन्संख्या नामरूपभेदादिःन जिनमे संख्या अर्थात् नाम-रूप- विद्यत इति असंख्येयः। भेदादि नही है वे भगवान् असंख्येय है। अप्रमेय आत्मा स्वरूपमस्येति आत्मा अर्थात् खरूप अप्रमेयात्मा। अप्रमेय है, इसलिये वे अप्रमेयात्मा है। उनका शाङ्करभाष्य १२३ . अतिशेते सर्वमतो विशिष्टः । सबसे अतिशय (ब-च) है, इसलिये विशिष्ट है। शिष्टं शासनं तत् करोतीति शिष्ट शासनको कहते है, भगवान् शासन करते है, इसलिये वे शिष्टकृत् शिष्टकृत् , शिष्टान् करोति पालय- है। अथवा कही सामान्यार्थवाचक तीति वा। सामान्यवचनो धातुर्वि- धातुको विशेष अर्थ बोधन करते भी देखा जाता है, जैसे 'कुरु काष्ठानि' इस शेषवचनो दृष्टः कुरु काष्ठानीत्या- वाक्यमे [कृ धातु] आहरण (लाने) के अर्थमे प्रयुक्त हुआ है। इसी प्रकार हरणे यथा, तद्वदिति वा शिष्टकृत् । भगवान् शिष्टो (साधुओ) को करते या पालते है, इसलिये शिष्टकृत है। निरञ्जनः शुचिः । मलहीन होनेसे शुचि है। सिद्धो निर्वृत्तःअर्थ्यमानोऽर्थों- भगवान्का इच्छित अर्थ सिद्ध ऽस्यति सिद्धार्थः 'सत्यकामः' (छा० अर्थात् निर्वृत्त ( सम्पन्न ) हो गया है. इसलिये 'सत्यकाम' आदि श्रुतिके उ० ८ । ७११) इति श्रुतेः। अनुसार वे सिद्धार्थ है। सिद्धो निष्पन्नः सङ्कल्पोऽस्येति उनका संकल्प सिद्ध अर्थात् पूर्ण सिद्धसङ्कल्पः, सत्यसङ्कल्पः' (छा० उ० हो गया है, इसलिये वे 'सत्यसङ्कल्प' ८।७।१) इति श्रुतेः। आदिश्रुतिके अनुसार सिद्धसंकल्प है। सिद्धिं फलं कर्तृभ्यः खाधि कर्ताओको उनके अधिकारानुसार कारानुरूपतो ददातीति सिद्धिदः । सिद्वि यानी फल देते है, इसलिये सिद्धिद है। सिद्धि अर्थात् क्रियाके साधक सिद्धिसाधनः ॥४०॥ होनेके कारण सिद्धिसाधन है ॥४०॥ ल वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः । वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥४१॥ - सिद्धेः क्रियायाः साधकत्वात् १२४ विष्णुसहस्त्रनाम - है २५६ वृपाही, २५७ वृपभः, २५८ विष्णुः, २५९ वृपपर्वा, २६० वृपोदरः । २६१ वर्धनः, २६२ वर्धमानः, च, २६३ विविक्तः, २६४ श्रुतिसागरः ॥ वृषो धर्मः पुण्यम्,तदेवाहः प्रकाश वृप धर्म या पुण्यको कहते है, प्रकाशखरूपतामे समानता होनेके साधात्, द्वादशाहप्रभृतिषाहः; कारण वही अहः (दिन) है । अतः सोऽस्यास्तीति वृषाही। वृषाह इत्यत्र द्वादशाह आदि यज्ञोको वृपाह कहते है । वे द्वादशाहादि यज्ञ भगवान्मे स्थित 'राजाहःसखिभ्यष्टच' (पा०सू०५।४। है, अतः वे वृषाही है । वृपाह शब्द- ने 'राजाहःसखिभ्यटच' इस पाणिनि- ९१) इति टच्प्रत्ययः समासान्तः। सूत्रके अनुसार समासान्त टच प्रत्यय हुआ वर्षत्येष भक्तभ्यः कामानिति भक्तोके लिये भगवान् कामो वृषभः । (इच्छित वस्तुओ) की वर्षा करते है, इसलिये वे वृषभ है। विष्णुः 'विष्णुर्विक्रमणात्' (महा० 'सब ओर जाने (व्याप्त होने) के कारण विष्णु है' इस व्यासजीकी उद्योग० ०७०।१३) इति व्यासोक्तेः। उक्तिके अनुसार भगवान् विष्णु है । वृषरूपाणि सोपानपर्वाण्याहुः परमधाममे होनेकी इच्छावाले के लिये वृप (धर्म ) रूप पर्व परं धामारुरुक्षोरित्यतो वृषपर्वा । (सीढियों) बतलाये गये है, इसलिये भगवान् वृषपर्वा है। प्रजा वर्षतीव उदरमस्येति भगवान्का उदर मानो प्रजाकी वर्षा वृषोदरः । करता है, इसलिये वे वृषोदर है। वर्धयतीति वर्धनः। बढाते है, इसलिये वर्धन है । प्रपञ्चरूपेण वर्धत इति प्रपञ्चरूपसे बढते है, इसलिये आरुढ शाङ्करभाष्य वर्धमानः । इत्थं वर्धमानोऽपि पृथगेव तिष्ठ- तीति विविक्त । श्रुतयः सागर इवान निधीयन्त इति श्रुतिसागर ॥४१ ।। वर्धमान है। इस प्रकार नटते हुए नी पृथक ही रहते हैं. इसलिये विचित है। समुद्रको समान भगवान श्रुनियाँ रखी हुई है, इसलिये वे श्रुतिसागर है ॥११॥ सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः । नैकरूपो वृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥ ४२ ॥ २६५ सुभुज . २६६ दुर्धरः. २६७ वाग्मी, २६८ महेन्द्र'. २६९ वमुद , २७० वसुः । २७१ नैकरूप..२७२ वृहद्रूप..२७३ शिपिविष्ट..२७४ प्रकाशनः ।। शोभना भुजा जगद्रक्षाकराः ' भगवानकी जगतकी रक्षा करने- अस्येति सुभुज । वाली भुजा अति सुन्दर है, अतः वे सुभुज है। पृथिव्यादीन्यपि लोक जो दूसरोसे धारणा नहीं किये जा सकते, उन पृथिवी आदि लोकधारक धारकाण्यन्यैर्धारयितुमशक्यानि पदार्थोको भी धारण करते है और धारयन्न केनचिद्धारयितुं शक्य इति स्वयं किसीसे धारण नहीं किये जा दुर्धरः; दुःखेन ध्यानसमये मुमुक्षु- सकते, इसलिये दुर्धर है । अथवा भ्यानके समय मुमुक्षुओद्वारा अति मिहृदये धार्यत इति वा दुर्धरः।। कठिनतासे हृढयमे धारण किये जाते है, इसलिये वे दुर्धर है। यतो निःसृता ब्रह्ममयी वाक्, क्योकि भगवान्से वेदमयी वाणी- का प्रादुर्भाव हुआ है, इसलिये वे वाग्मी है। तसात् वाग्मी।
१२६ विष्णुसहस्रनाम वायुर्वा वसुः, महांश्चासाविन्द्रश्चेति महेन्द्रः, महान् इन्द्र अर्थात् ईश्वरोंके भी ईश्वराणामपीश्वरः। ईश्वर होनेके कारण महेन्द्र है। वसु धनं ददातीति वसुदः, वसु अर्थात् धन देते है, इसलिये 'अन्नादो वसुदानः' (बृ० उ०४।४। वसुद है । श्रुति कहती है--'अन्नका २४) इति श्रुतेः। भोक्ता और वसुका देनेवाला है।" दीयमानं तद्वखपि स एवेति वा दिया जानेवाला वसु (धन) भी वसुः आच्छादयत्यात्मस्वरूपं माय- वे ही है, इसलिये वसु है; अथवा माया- से अपने स्वरूपको ढक लेते है इसलिये येति वा वसु, अन्तरिक्ष एव वसति वसु है । अथवा अन्तरिक्षमे ही बसते नान्यत्रेति असाधारणेन वसनेन है अन्यत्र नहीं; इस प्रकार अपने 'वसुरन्तरिक्षसत्' असाधारण वासके कारण वायु ही (क० उ० २।५ । २) इति श्रुतेः । वसु है । श्रुति कहती है-'अन्तरिक्षमे रहनेवाला वसु । एक रूपमस्य न विद्यत इति इनका एक ही रूप नही है, नैकरूपः 'इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते' इसलिये ये नैकरूप है। श्रुति कहती है- (वृ० उ० २।५।१९) इति श्रुतेः 'इन्द्र (परमात्मा) मायासे अनेक रूपसे 'ज्योतीषि विष्णुः' (विष्णु०२।१२।३८) चेष्टा करता है। तथा 'ज्योतियाँ विष्णु इत्यादिस्मृतेश्च । हैं। आदि स्मृतिका भी यही अभिप्राय है। बृहन्महद्वरांहादिरूपमस्येति भगवान्के वराह आदि बृहत् (बडे- बडे ) रूप है, इसलिये वे बृहद्रूप है। शिपयः पशवः तेषु विशति प्रति शिपि पशुको कहते है, उनमे यज्ञरूपसे स्थित होते है, इसलिये तिष्ठति यज्ञरूपेणेति शिपिविष्टः यज्ञ- भगवान् यज्ञमूर्ति शिपिविष्ट है। मूर्तिः 'यज्ञो वै विष्णुः पशवः शिपिर्यज्ञ श्रुति कहती है-'यज्ञ ही विष्णु है, एव पशुषु प्रतितिष्ठति (तै०स० ११७। पशुओंको शिपिकहते है और यज्ञ ही पशुओंमे स्थित होता है।' अथवा ४) इति श्रुतेः। शिपयो रश्मयस्तेषु शिपि किरणोको भी कहते है उनमे निविष्ट इति वा। स्थित है, इसलिये शिपिविष्ट है। वृहद्रूपः ।
शाङ्करभाष्य १२७ शैत्याच्छयनयोगाच्च 'शीतलता और विष्णुभगवानके शीति वारि प्रचक्षते । शयनके कारण जलको शि कहते है, तत्पानाद्रक्षणाच्चैव उसका पान तथारक्षाकरनेके कारण शिपयो रस्मयो मताः॥ रश्मियो (किरणों) का नाम शिपि है, तथा उनमे प्रविष्ट होनेके कारण तेषु प्रवेशाद्विश्वेशः शिपिविष्ट इहोच्यते। श्रीविश्वेश्वर लोकमे शिपिविष्ट कहलाते है। सर्वेषां प्रकाशनशीलत्वात सबको प्रकाशित करनेवाले होनेके प्रकाशनः ॥४२॥ कारण भगवान् प्रकाशन है ||४२|| ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः । ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः॥४३॥ २७५ ओजस्तेजोद्युतिधर , २७६ प्रकाशात्मा, २७७ प्रतापनः। २७८ ऋद्धः, २७९ स्पष्टाक्षरः, २८० मन्त्रः, २८१ चन्द्राशुः, २८२ भास्करद्युतिः ।। ओजःप्राणवलम्: तेजः शौर्यादयो) ओज प्राण और बलको, तेज शूर- गुणाः, द्युतिदीप्तिः, ताःधारयतीति वीरता आदि गुणोको तथा युति दीप्ति ( कान्ति) को कहते है; भगवान् ओजस्तेजोद्युतिधरः । अथवा,ओजस्तेज उन्हे धारण करते है, इसलिये वे इति नामद्वयम् , 'बलं बलवता चाहम्' ओजस्तेजोद्युतिधर कहलाते है । (गीता ७१११) 'तेजस्तेजखिनामहम्' अथवा 'मैं बलवानोका बल हूँ और (गीता ७ । १०) इति भगवद्वच- 'तेजखियोका तेज हूँ' भगवान्के इन नात् । द्युतिं ज्ञानलक्षणां दीप्ति वचनोके अनुसार ओज और तेज ये दो नाम है । ज्ञानस्वरूप दीप्तिको धारण धारयतीति द्युतिधर.। करते है, इसलिये द्युतिधर है । प्रकाशस्वरूप आत्मा यस्य सः जिनका आत्मा (शरीर) प्रकाश- प्रकाशात्मा। स्वरूप है। वे भगवान् प्रकाशात्मा कहलाते है। - १२८ विष्णुसहस्त्रनाम ANT सवित्रादिविभूतिभिः विश्वं सविता (सूर्य) आदि अपनी प्रतापयतीति प्रतापनः । विभूतियोसे विश्वको तप्त करते है, इसलिये प्रतापन है। धर्मज्ञानवैराग्यादिभिरुपेतत्वात् धर्म, ज्ञान और वैराग्यादिसे सम्पन्न, ऋद्धः। होनेके कारण ऋद्ध है। स्पष्टभुदात्तम् ओङ्कारलक्षणम भगवान्का ओकाररूप अक्षर स्पष्ट क्षरमस्येति स्पष्टाक्षरः । अर्थात् उदात्त है,इसलिये वे स्पष्टाक्षर है। ऋग्यजुःसामलक्षणो मन्त्रः; मन्त्र [भगवान् साक्षात् ऋक् ,साम और बोध्यत्वाद्वा मन्त्रा। यजुरूप नन्त्र है, अथवा मन्त्रोसे जानने योग्य होनेके कारण मन्त्र है। संसारतापतिग्मांशुतापतापित संसारतापरूप सूर्यके तापसे सन्तप्त- चेतसां चन्द्रांशुरिवाह्लादकरत्वात् चित्त पुरुपोको चन्द्रमाकी किरणो- के समान आह्लादित करनेवाले है, चन्द्रांशुः। इसलिये चन्द्रांशु है। भास्करद्युतिसाधर्म्यात् भास्कर भास्करघुति (सूर्यके तेज ) के द्युतिः ॥४३॥ समान धर्मवाले होने के कारण भास्कर धुति है ॥४३॥ 2 , अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः । औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः॥४४॥ २८३ अमृतांशूद्भवः, २८४ भानुः, २८५ शशबिन्दुः, २८६ सुरेश्वरः । २८७ औपधम्, २८८ जगतः सेतुः, २८९ सत्यधर्मपराक्रमः ।। मथ्यमाने पयोनिधाव [अमृतके लिये] समुद्रमन्थन करते समय अमृताशु-चन्द्रमाकी मृतांशोश्चन्द्रस्य उद्भवो यस्मात्स: उत्पत्ति जिन [कारणरूप परमात्मा] अमृतांशूद्भवः। से हुई थी वे भगवान् अमृतांशूद्भव है ।
१२६ शाङ्करभाष्य भातीति भानु., 'तमेव भान्त- भासित होनेके कारण भानु है । मनुभाति सर्वम्' (क० उ०२। ५। श्रुति कहती है-'उसीकेभासित होने- १५) इति श्रुतेः। पर सब भासते है। शश इव बिन्दुलाञ्छनमस्येति शश (खरगोश) के समान जिसमे बिन्दु अर्थात् चिह्न है उस चन्द्रमाका शशबिन्दुश्चन्द्रः तद्वत्प्रजाः पुष्णा- नाम शशबिन्दु है । उसके समान तीति शशबिन्दुः । 'पुष्णामि चौपधीः सम्पूर्ण प्रजाका पोषण करते है, इसलिये सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः' (गीता | शशबिन्दु है । भगवान्का वचन है- 'मैं रसस्वरूप चन्द्रमा होकर सब १५ । १३) इति भगवद्वचनात् । ओषधियोका पोषण करता हूँ। सुराणां देवानां शोभनदातॄणां सुरो अर्थात् देवताओ और शुभ- चेश्वरः सुरेश्वरः । दाताओके ईश्वर होनेके कारण सुरेश्वर है। संसाररोगभेषजत्वात् औषधम् । संसाररोगका औषध होनेके कारण औषध हैं। जगतां समुत्तारणहेतुत्वादसम्भे संसारको पार करनेके हेतु होनेके दकारणत्वाद्वा सेतुवद्वर्णाश्रमा- तथा सेतुके समान वर्णाश्रमोके असम्भेद (परस्पर न मिलने) के कारण होनेसे दीनां जगतः सेतुः, 'एष सेतुर्विधरण जगत्सेतु है । श्रुति कहती है कि-'इन एषा लोकानामसम्भेदाय' (बृ० उ० लोकोंके पारस्परिक असम्भेद (न ४ । ४ । २२) इति श्रुतेः। मिलने) के लिये वही इनको धारण करनेवाला सेतु है। सत्या अवितथा धर्माःज्ञानादयो जिनके धर्म-ज्ञानादि गुण और गुणाः पराक्रमश्च यस्य सः सत्यधर्म- पराक्रम सत्य है-मिथ्या नही है वे पराक्रम. ॥४४॥ भगवान् सत्यधर्मपराक्रम हैं ॥४४॥ 8 १३० विष्णुसहस्रनाम भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः। कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः॥ ४५ ॥ २९० भूतभव्यभवन्नाथः, २९१ पवनः, २९२ पावनः, २९३ अनलः । २९४ कामहा, २९५ कामकृत् , २९६ कान्तः, २९७ कामः, २९८ कामप्रदः, । २९९ प्रभुः ॥ भूतभव्यभवतां भूतग्रामाणां भूत, भव्य (भविष्य) और भवत् नाथः, तैर्याच्यते तानुफ्तपति तेषा- (वर्तमान) प्राणियोंके नाथ है, उनसे याचना किये जाते है, उन्हे ताप देते है, मीष्टे शास्तीति वा भूतभव्यभवन्नाथः। उनके ईश्वर है अथवा उनका शासन करते है इसलिये भूतभव्यभवन्नाथ है। पवत इति पवनः, 'पवनः पवित्र करते है, इसलिये पवन है; पत्रतामस्मि' (गीता १० । ३१) इति भगवान्का वचन है-'पवित्र करने- वालों में मैं पवन हूँ। भगवद्वचनात् । पावयतीति पावनः । 'भीषास्मा चलाते है, इसलिये पावन है। द्वातः पवते' (तै०उ०२।८) इति श्रुतेः। जैसा कि श्रुति कहती है-'इसके भयसे वायुचलता है। अनान् प्राणान् आत्मत्वेन ला- अन अर्थात् प्राणोको आत्मभावसे ग्रहण करता है इसलिये जीवका नाम तीति जीवः अनलः; णलतेर्गन्धवा- अनल है । अथवा नपूर्वक गन्धवाचक चिनो नपूर्वाद्वा 'अगन्धमरसम्' । णलधातुका रूप अनल है; अतः 'अगन्ध है, अरस है' इत्यादि श्रुतिके इति श्रुते, न अलं पर्याप्तमस्य अनुसार परमात्माका नाम अनल है । अथवा भगवान्का अलं अर्थात् पर्याप्त- विद्यत इति वानला। भाव (अन्त) नही है, इसलिये वे अनल हैं।
शाङ्करभाष्य १३१ कामान् हन्ति मुमुक्षूणां भक्तानां मोक्षकामी भक्तजनो तथा हिंसको- हिंसकानां चेति कामहा। की कामनाओंको नष्ट कर देते है, इसलिये कामहा है। साचिकानां कामान् करोतीति सात्त्विकभक्तोकी कामनाओको पूरा कामकृतः काम: प्रद्युम्न: तस्य करते है, इसलिये कामकृत् है । अथवा काम प्रद्युम्नको कहते है उनके जनक जनकत्वाद्वा। होनेके कारण कामकृत् है ।* अभिरूपतमः कान्तः । रूपवान् हैं, इसलिये कान्त है। काम्यते पुरुषार्थाभिकाटिभि पुरुषार्थको आकाक्षावालोसे कामना रिति कामः। किये जाते हैं, इसलिये काम है। भक्तेभ्यःकामान् प्रकर्षेण ददा भक्तोको प्रकर्षतासे उनकी कामना तीति कामप्रदः की हुई वस्तुएँ देते है, इसलिये काम- अत्यन्त प्रद है। प्रकर्षण भवनात् प्रभुः ॥४५॥ प्रकर्ष (अतिशयता) से है, इसलिये प्रभु है ॥४५॥ युगादिकृयुगावर्तो नैकमायो महाशनः । अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥ ४६॥ ३०० युगादिकृत्, ३०१ युगावर्त., ३०२ नैकमायः, ३०३ महाशनः । ३०४ अदृश्य., ३०५ व्यक्तरूपः, च, ३०६ सहस्रजित्, ३०७ अनन्तजित् ।। * 'कामान् कृन्ततीति कामकृत्' इस व्युत्पत्तिके अनुसार कामहाके अर्थके समान ही कामनामोको काटते हैं इसलिये कामकृत् है ऐसा अर्थ भी है। +कब्रह्मा विष्णु+म-महादेव-इस विग्रहके अनुसार त्रिदेवरूप होनेसे भगवान् काम हैं।
१३२ विष्णुसहस्रनाम युगादेः कालभेदस्य कर्तृत्वात् युगादि कालभेदके कर्ता होनेके युगादिकृत्; युगानामादिमारम्भ कारण युगादिकृत् है । अथवा युगादि- का आरम्भ करते है इसलिये युगादि- करोतीति वा। कृत् है। इति नाम्नां तृतीयं शतं विवृतम् । यहॉतक सहस्रनामके तीसरे शतक- का विवरण हुआ। युगानि कृतादीन्यावर्तयति कालरूपसे सत्ययुग आदि युगोका कालात्मनेति युगावर्तः। आवर्तन करते है, इसलिये युगावत है। एका माया न विद्यते बह्वीर्माया जिनकी एक ही माया नही है वहतीति नैकमायः । 'न लोपो नञः बल्कि जो अनेको मायाओंको धारण करते है वे भगवान् नैक्रमाय है। 'न (पा० सू० ६ । ३ । ७३ ) इति लोपो नमः' इस पाणिनि-सूत्रसे यहाँ नकारलोपो न भवति, अकारा. नकारका लोप नहीं होता, क्योकि नुवन्धरहितस्यापि नकारस्य प्रति- अकारानुबन्धसे रहित 'न' भी प्रतिषेध षेधवाचिनो विद्यमानत्वात् । अर्थमें होता है। महाशनः । कल्पान्तमे सबको ग्रस लेते हैं कल्पान्ते सर्वग्रसनात् इसलिये भगवान्का महान् अशन (भोजन) है, अतः वे महाशन कह- लाते है। सर्वेषां बुद्धीन्द्रियाणामगम्या समस्त ज्ञानेन्द्रियोके अविषय है, अदृश्यः । इसलिये अदृश्य है। स्थूलरूपेण व्यक्तं स्वरूपमस्येति स्थूलरूपसे भगवान्का स्वरूप व्यक्त व्यक्तरूपः; स्वयंप्रकाशमानत्वाद्यो- है, इसलिये वे व्यक्तरूप है। अथवा स्वयंप्रकाश होनेसे योगियोके लिये गिनां व्यक्तरूप इति वा। व्यक्तरूप है। सुरारीणां सहस्राणि युद्धे जय युद्धमे सहस्रो देवशत्रुओको जीतते तीति सहस्रजित् । है, इसलिये सहस्रजित् है। महदशनमस्येति १३३ शाङ्करभाष्य सर्वाणि भूतानि युद्धक्रीडादिषु अचिन्त्य शक्ति होनेके कारण युद्ध सर्वत्राचिन्त्यशक्तितया जयतीति और क्रीडा आदिमे सर्वत्र समस्त भूतो- को जीतते है, इसलिये अनन्तजित् अनन्तजित् ॥४६॥ है ॥४६॥ इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः । क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुमहीधरः ॥ १७ ॥ ३०८ इष्ट.,.३०९ अविशिष्टः, ३१० शिष्टेष्ट., ३११ शिखण्डी, ३१२ नहुपः, ३१३ वृष. । ३१४ क्रोधहा, ३१५ क्रोवकृत्कर्ता, ३१६ विश्वबाहुः, ३१७ महीधर. ॥ परमानन्दात्मकत्वेन प्रिय इष्टः, परमानन्दरूप होनेके कारण प्रिय यज्ञेन पूजित इति वा इष्टः। है इसलिये इष्ट है, अथवा यज्ञद्वारा पूजे जाते है इसलिये इष्ट है। सर्वेषामन्तर्यामित्वेन अविशिष्टः । सबके अन्तर्यामी होनेसे अविशिष्ट है। शिष्टानां विदुषामिष्टः शिष्टेष्टः; शिष्ट अर्थात् विद्वानोके इष्ट है, अस्येति वा, इसलिये शिष्टेष्ट है। अथवा भगवान्के 'प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम शिष्टजन इष्ट (प्रिय) है, इसलिये वे प्रियः' (गीता ७ । १७) इति मैं ज्ञानीको अत्यन्त प्रिय हूँ और वह शिष्टेष्ट है; जैसा कि भगवान्ने कहा है- भगवद्वचनात् शिष्टैरिटः पूजित मुझे प्रिय है।' अथवा शिष्टोसे इष्ट इति वा शिष्टेष्टः। अर्थात् पूजित होनेके कारण शिष्टेष्ट है। शिखण्डः कलापोऽलङ्कारोऽस्येति शिखण्ड (मयूरपिच्छ ) भगवान्का शिखण्डी यतो गोपवेषधरः। शिरोभूपण है अत' वे शिखण्डी है, क्योकि वे गोपवेपधारी हुए थे । नयति भूतानि माययाऽतो भूतोको मायासे नद्ध करते (बॉधते) है, इसलिये नहुप है। णधातु बाँधने नहुपः, णह बन्धने । शिष्टा इष्टा अर्थमे है।
विष्णुसहस्रनाम
कामानां वर्षणात् वृषः धर्मः कामनाओंकी वर्षा करनेके कारण
'वृषो हि भगवान्धर्मः
धर्मको वृष कहते हैं । महाभारतमे
स्मृतो लोकेषु भारत ।
नैघण्टुकपदायानै-
कहा है-'हे भारत! लोकोमे निघण्टु-
विद्धि मां वृषमुत्तमम् ॥
की पदाख्यातिके अनुसार भगवान्
इति महाभारते (शान्ति
धर्मको वृष कहते है, अतः मुझे भी
३४२।८८)।
उत्तम वृष ही जान।
साधूनां क्रोधं हन्तीति क्रोधहा। साधुओका क्रोध नष्ट कर देते हैं,
इसलिये क्रोधहा है।
असाधुषु क्रोधं करोतीति असाधुओपर क्रोध करते है, इस-
क्रोधकृत् ।
लिये क्रोधकृत् है।
क्रियत इति कर्म जगत्तस्य
जो किया जाय उसे कर्म कहते है,
कर्ता 'यो वै बालाक एतेषां पुरुषाणा कर्ता इस प्रकार जगत् कर्म है और भगवान्
उसके कर्ता है, जैसा कि श्रुति कहती
यस्य वैतत्कर्म स वेदितव्यः' (कौ०
है-हेबालाके! इन पुरुषोकाजीकरने-
उ० ४।१८) इति श्रुतेः।
वाला है, अथवा जिसके ये सेब कर्म
हैं उसे जानना चाहिये।
क्रोधकृतां दैत्यादीनां कर्ता अथवा क्रोध करनेवाले दैत्यादिकोके
छेदक इत्येकं वा नाम ।
कर्तन करनेवाले है, इसलिये क्रोधकृत्-
कर्ता यह एक ही नाम है।
विश्वेषामालम्बनत्वेन, विश्वे बा-
सबके आलम्बन (आश्रयस्थान)
हवोऽस्येति विश्वतो बाहवोऽस्येति होनेके कारण सब भगवान्के बाहु है,
अथवा उसके बाहु सब ओर है, इसलिये
वा विश्वबाहुः 'विश्वतोबाहुः' (वे०
'विश्वतोबाहुः' इस श्रुतिके अनुसार वे
उ०३।३) इति श्रुतेः।
विश्वबाहु है।
महीं पूजां धरणी वा धरतीति मही-पूजा या पृथिवीको धारण
महीधरः ॥४७॥
करते है, इसलिये महीधर है ॥४७॥
शाङ्करभाष्य १३५ बढचाः। अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः । अपां निधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः।। ४८ ॥ ३१८ अच्युतः, ३१९ प्रथितः, ३२० प्राण., ३२१ प्राणदः, ३२२ वासवानुजः। ३२३ अपा निधिः, ३२४ अधिष्ठानम् , ३२५ अप्रमत्तः, ३२६ प्रतिष्ठितः ।। षड्भावविकाररहितत्वात् अ छः भावविकारोसे रहित होनेके च्युतः 'शाश्वतर शिवमच्युतम्' (ना० कारण अच्युत है । श्रुति कहती है- उ० १३ । १) इति श्रुतेः। 'शाश्वत शिव और अच्युत हैं ।। जगदुत्पत्यादिकर्मभिः प्र जगत्को उत्पत्ति आदि कौके ख्यातः प्रथितः । कारण प्रसिद्ध है, इसलिये प्रथित है। सूत्रात्मना प्रजाः प्राणयतीति हिरण्यगर्भरूपसे प्रजाको जीवन प्राणः 'प्राणो वा अहमस्मि' इति देते है, इसलिये प्राण है । इस विषयमे 'अथवा मैं प्राण हूँ, यह बढच श्रुति प्रमाण है। सुराणामसुराणां च प्राणं बलं देवताओ और दैत्योको क्रमश. ददाति यति वेति प्राणदः । प्राण अर्थात् बल देते या नष्ट करते है, इसलिये प्राणद है। अदित्यां कश्यपाद्वासवस्यानुजो [वामनावतारमे] कश्यपजीद्वारा जात इति वासवानुजः। अदितिसे वासव (इन्द्र) के अनुज- रूपसे उत्पन्न हुए थे, इसलिये वासवानुज है। आयो यत्र निधीयन्ते सः जिसमे अप् (जल) एकत्रित अपा निधिः, 'सरसामस्मि रहता है उस (समुद्र) को अपां निधि सागर कहते है 'सरोमे मैं सागर हूँ' इस (गीता १० । २४) इति भगवद्व- भगवान्के वचनानुसार भगवान्की विभूति होनेके कारण चनात् । ! उनका नाम अपा निधि है] । [समुद्र १३६ विष्णुसहस्रनाम अधितिष्ठन्ति भूतानि उपादान उपादान कारणरूपसे सब भूत कारणत्वेन ब्रह्मेति अधिष्ठानम् , ब्रह्ममे स्थित है, इसलिये वह अधिष्ठान 'मत्स्थानि सर्वभूतानि' (गीता ९ । ४) है; जैसा कि भगवान् कहते है- इति भगवद्वचनात् । 'सब भूत मुझहीमे स्थित हैं। अधिकारिभ्यः कर्मानुरूपं फलं अधिकारियोको उनके कर्मानुसार प्रयच्छन्न प्रमाद्यतीति अप्रमत्तः । फल देते हुए कभी प्रमाद (चूक) नही करते, इसलिये अप्रमत्त है। स्वे महिम्नि स्थितः प्रतिष्ठितः, अपनी महिमामे स्थित है, इसलिये 'स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति प्रतिष्ठित है। श्रुति कहती है-- स्वे महिम्नि' (छा० उ०७।२४।१) 'भगवन् ! वह किसमे स्थित है ? इति श्रुतेः॥४८॥ अपनी महिमामे ॥४८॥ बृहद्भानुरादिदेवः स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यों वरदो वायुवाहनः । वासुदेवो पुरन्दरः॥४९॥ ३२७ स्कन्दः, ३२८ स्कन्दधरः, ३२९ धुर्य., ३३० वरदः, ३३१ वायु- वाहनः । ३३२ वासुदेव., ३३३ बृहद्भानुः, ३३४ आदिदेव., ३३५ पुरन्दरः ॥ स्कन्दत्यमृतरूपेण गच्छति स्कन्दन करते है, अर्थात् अमृत- वायुरूपेण शोषयतीति वा स्कन्दः रूपसे बहते अथवा वायुरूपसे सुखाते है, इसलिये स्कन्द है। स्कन्दं धर्मपथं धारयतीति स्कन्द अर्थात् धर्ममार्गको धारण स्कन्दधरः । करते है, इसलिये स्कन्दधर है । धुरं वहति समस्तभूतजन्मादि समस्त भूतोके जन्मादिरूप धुर लक्षणामिति धुर्यः। ( बोझे) को धारण करते है, इसलिये धुर्य है। ।।
शाङ्करभाष्य १३७ अभिमतान्वरान्ददातीति, वरं इच्छित वर देते है, अथवा यजमान- गां दक्षिणां ददाति यजमान- रूपसे दक्षिणामे वर अर्थात् गौ देते रूपेणेति वा वरदः, 'गोर्वं वरः' है, इसलिये वरद है । श्रुति कहती है इति श्रुतेः। 'गौ ही वर है। मरुतः सप्त आवहादीन्वाहय आवह आदि सात वायुओको तीति वायुवाहन. । चलाते है, इसलिये वायुवाहन है ।* वसति वासयति आच्छादयति बसते है अथवा सबको वासित सर्वमिति वा वासुः, दीव्यति यानी आच्छादित करते है, इसलिये क्रीडते विजिगीषते व्यवहरति वासु है तथा दीव्यति अर्थात् क्रीडा करते, जीतनेकी इच्छा करते, व्यवहार द्योतते स्तूयते गच्छतीति वा देवः; करते, प्रकाशित होते, स्तुति किये वासुश्चासौ देवश्चेति वासुदेवः । जाते अथवा जाते है, इसलिये देव है। 'छादयामि जगत्सर्व इस प्रकार जो वासु भी है और देव भी भूत्वा सूर्य इवाशुभिः । है वे भगवान् वासुदेव है । यथा--'मैं सर्वभूताधिवासश्च | सूर्यके समान होकर अपनी किरणोंसे वासुदेवस्ततः स्मृतः ॥ सम्पूर्ण जगत्को ढक लेता हूँ तथा (महा० शान्ति० ३४१ । ४१) । इसलिये वासुदेव कहलाता हूँ । समस्त भूतोका निवासस्थान भी हूँ, 'वासनात्सर्वभूताना तथा उद्योगपर्वमे कहा है- 'समस्त वसुत्वाद्देवयोनितः । प्राणियोको बसानेसे, वसुरूप होने- से और देवताओंका उद्भवस्थान वासुदेवस्ततो वेदाः ॥ होनेसे भगवानको वासुदेव जानला इति उद्योगपर्वणि (७०।३) चाहिये। * आवह, प्रवाह, अनुवह, सवह, विवह, परावह और परिवह-ये वायुके सात भेद हैं। इनमेंसे मेघ और पृथिवीके बीच में आवह, मेघ और सूर्यके बीचमे प्रवह, सूर्य और चन्द्रके बीचमें अनुवह, चन्द्र और नक्षत्रोके बीचमें सवह, नक्षत्रों और ग्रहोंके वीचमें विवह, ग्रहों और सप्तर्षियोंके बीचमें परावह तथा सप्तर्पियो और ध्रुवके बीचमें परिवह रहता है।
१३८
विष्णुसहस्रनाम
'सर्वत्रासौ समस्तं च
विष्णुपुराणमे कहा है-'वह (पर-
वसत्यत्रेति वै यतः ।
मात्मा)इस सम्पूर्ण लोकमै सर्वत्र सब
ततः स वासुदेवेति
वस्तुओंमे बसता है इसलिये विद्वजन
विद्भिः परिपठ्यते।
(१२।१२) उसे वासुदेव कहते हैं। 'सबभूत उस
'सर्वाणि तत्र भूतानि
परमात्मामे बसते हैं तथा सब
वसन्ति परमात्मनि ।
भूतेषु च स सर्वात्मा
भूतोंमे वह सर्वात्मा बसता है इस-
वासुदेवस्ततः स्मृतः ॥ लिये वह वासुदेव कहलाता है।'
(६।५।८०)
इति च विष्णुपुराणे।
'बृहन्तो भानवो यस्य
'जिसकी सूर्य और चन्द्रमा आदि-
में जानेवाली अति बृहत् (महान)भानु
चन्द्रसूर्यादिगामिनः ।
(किरणे) हैं,और जोसम्पूर्ण जगत्को
तैर्विश्वं भासयति यः
प्रकाशित करता है वह परमात्मा
स बृहद्भानुरुच्यते ॥ बृहद्भानु कहलाता है।
आदिः कारणं, स चासौ देव सबके आदि अर्थात् कारण है और
ऐति आदिदेवः; द्योतनादिगुण- देव भी है इसलिये आदिदेव है ।
अथवा द्योतन (प्रकाशन) आदि
गुणवाले होनेसे ही देव है।
सुरशत्रूणां पुराणां दारणात् देवशत्रुओके पुरों (नगरों) का
पुरन्दरः 'वाचंयमपुरन्दरौ च' (पा० । ध्वस करनेके कारण पुरन्दर है।
'वाचंयमपुरन्दरौ च' इस सूत्रसे
सू०६।३।६९) इति पाणिनिना।
भगवान् पाणिनिने पुरन्दर शब्दका
निपातनात् ॥४९॥
निपातन किया है॥४९॥
-
वान् देवः।
1
-
अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः ।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ॥५०॥
शाङ्करभाष्य १३६ शौरिः । ३३६ अशोक , ३३७ तारणः. ३३८ तारः, ३३९ शूरः, ३४० शौरिः,३४१ जनेश्वरः । ३४२ अनुकूल', ३४३ शतावर्तः, ३४४ पद्मी, ३४५ पद्मनिभेक्षण.॥ शोकादिषडूमिवर्जितः अशोकः।। गोकादि छ. ऊर्मियोसे रहित है, इसलिये अशोक हैं। संसारसागराचारयतीति तारणः। संसार-सागरसे तारते हैं, इसलिये तारण हैं। गर्भजन्मजरामृत्युलक्षणाद्भया गर्भ-जन्म-जरा-मृत्युरूप भयसे त्तारयतीति तारः । तारते हैं, इसलिये तार है। विक्रमणात् शूरः । विक्रम यानी पुरुषार्थ करने के कारण शूर है। शूरस्यापत्यं वसुदेवस्य सुतः शूरकी सन्तान अर्थात् वसुदेवके पुत्र होनेसे शौरि है। जनानां जन्तूनामीश्वरो जनेश्वरः। जन अर्थात् जीयोंकि ईश्वर होनेसे जनेश्वर हैं। आत्मत्वेन हि सर्वेषाम् अनुकूल., सबके आत्मारूप होनेसे अनुकूल नहि खसिन्पातिकूल्यं स्वयमा- | है, क्योकि कोई भी अपने प्रतिकूल चरति। आचरण नहीं करता, इसलिये भगवान् आत्मभावसे] अनुकूल है। धर्मत्राणाय शतमावर्तनानि प्रा धर्मरक्षाके लिये भगवान्के सैकडो दुर्भावा अस्येति शतावर्तः नाडीशते आवर्तन अर्थात् अवतार हुए है इस. लिये वे शतावर्त हैं। अथवा प्राणरूपसे प्राणरूपेण वर्तत इति वा। [ हृदयदेशसे निकलनेवाली] सौ नाड़ियोमे आवर्तन करते है, इसलिये शतावर्त है। पऱ्या हस्ते विद्यत इति पनी । भगवान्के हाथमे पद्म है, इसलिये वे पद्मी हैं।
१४० विष्णुसहस्रनाम पानिमे ईक्षणे दृशावस्येति पद्मनिभेक्षणः ॥५०॥ उनके ईक्षण अर्थात नेत्र पद्मके समान है, इसलिये वे पद्मनिभेक्षण है ॥५०॥ . पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत् । महर्डिरृद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः॥५१॥ ३४६ पद्मनाभ., ३४७ अरविन्दाक्षः, ३४८ पद्मगर्भः, ३४९ शरीरभृत् । ३५० महर्द्धिः, ३५१ ऋद्धः, ३५२ वृद्धात्मा, ३५३ महाक्ष., ३५४ गरुडध्वजः ।। पद्मस्य नाभौ मध्ये कर्णिकायां [ हृदयरूप] पद्मकी नाभि अर्थात् स्थित इति पद्मनाभः । कर्णिकाके बीचमे स्थित है, इसलिये पद्मनाभ है। अरविन्दसहशे अक्षिणी भगवान्की अक्षि (आँख) अरविन्द अस्येति अरविन्दाक्षः। (कमल) के समान है, इसलिये वे अरविन्दाक्ष है। पास्य हृदयाख्यस्य मध्ये हृदयरूप पाके मध्यमे उपासना किये जानेके कारण पद्मगर्भ है। पोषयन्नन्नरूपेण प्राणरूपेण वा अन्नरूपसे अथवा प्राणरूपसे देह- धारियोके शरीरोका पोपण करते हुए शरीरिणां शरीराणि धारयतीति उन्हे धारण करनेके कारण शरीरभृत् शरीरभृत् । स्वमायया शरीराणि है। अथवा अपनी मायासे शरीर धारण विभीति वा। करते है, इसलिये शरीरभृत् है। महती ऋद्धिर्विभूतिरस्येति भगवान्की ऋद्धि अर्थात् विभूति महर्द्धिः। महान् है, इसलिये वे महर्द्धि है। प्रपञ्चरूपेण वर्तमानत्वाद् ऋद्धः। प्रपञ्चरूप होनेसे वे ऋद्ध है। वृद्धः पुरातन आत्मा यस्येति जिनका आत्मा (देह ) वृद्ध अर्थात् वृद्धात्मा पुरातन है वे भगवान् वृद्धात्मा है। उपास्यत्वात् पद्मगर्भः ।
शाङ्करभाष्य १४१ महती अक्षिणी महान्त्यक्षीणि वा अस्येति महाक्षः । भगवान्की दो अथवा अनेको महान् अक्षि" ( ऑखे ) है, इसलिये वे महाक्ष है। उनकी ध्वजा गरुडके चिह्नवाली है, इसलिये वे गरुडध्वज है ॥५१॥ गरुडाङ्को ध्वजो यस्यति गरुडध्वजः ।। ५१॥ अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः । सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान्समितिञ्जयः ॥ ५२ ॥ ३५५ अतुल', ३५६ शरमः, ३५७ भीमः, ३५८ समयज्ञ., ३५९ हविर्हरिः । ३६० सर्वलक्षणलक्षण्यः ३६१ लक्ष्मीवान्, ३६२ समितिञ्जयः ।। तुलोपमानमस्य न विद्यत इति भगवान्की कोई तुलना अर्थात् अतुलः, 'न तस्य प्रतिमास्ति यस्य | उपमा नहीं है, इसलिये वे अतुल है । नाम महद्यशः' (श्वे० उ० ४ । १९) श्रुतिं कहती है-'जिसका नाम ही महान् यश है उस परमात्माकी कोई इति श्रुतेः । 'न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः तुलना नही है । स्मृति (श्रीभगवद्गीता) कुतोऽन्य' (गीता ११ । ४३) मे भी कहा है-'आपके समान ही इति स्मृतेश्च। कोई नही है फिर अधिक तो कहाँसे आया? शराः शरीराणि शीर्यमाणत्वा- शीर्यमाण (नाशवान् ) होनेके तेषु प्रत्यगात्मतया भातीति कारण शरीरको ही शर कहते है, उनमे प्रत्यगात्मारूपसे भासते है, इस- शरभः। लिये शरभ है। विमेत्यस्मात्सर्वमिति भीमः । भगवान्से सब डरते है, इसलिये 'भीमादयोऽपादाने (पा० सू० ३ । वे भीम है। 'भीमादयोऽपादाने इस पाणिनिसूत्रसे अपादान कारकमे ४ । ७४) इति पाणिनिस्मृतेः। भीम शब्दका निपातन हुआ है। .
१४२ विष्णुसहस्रनाम सन्मार्गवर्तिनाम् अभीमः इति वा । अथवा उत्तम मार्गका अवलम्बन करने- वालोके लिये 'असीम है। सृष्टिस्थितिसंहारसमयवित्, षट् सृष्टि, स्थिति और संहारके समयको समयाजानातीति चा समयज्ञः । जाननेवाले है अथवा छ: समयों सर्वभूतेषु समत्वं यजनं साध्वस्येति (ऋतुओ) को जानते है, इसलिये लमयज्ञ है, अथवा समस्त भूतोंमे वा, 'समत्वमाराधनमच्युतस्य' (विष्णु० समभाव रखना ही भगवान्का श्रेष्ठ १ । १७ । ९०) इति प्रह्लाद- यज्ञ (पूजा) है इसलिये समयज्ञ है। वचनात् । प्रहादजीका कथन है कि 'समत्व श्रीअच्युतकी आराधना है। यज्ञेषु हविर्भागं हरतीति यज्ञोमे हविका भाग हरण करते है, हविर्हरिः, 'अहं हि सर्वयज्ञाना भोक्ता इसलिये हविहरि है । भगवान्ने कहा च प्रभुरेव च' (गीता ९ । २४) है "समस्तयज्ञोंकाभोक्ता और प्रभु इति भगवद्वचनात् । अथवा हूयते मैं ही हूँ।' अथवा हविद्वारा हवन किये जाते है, इसलिये हवि है। 'पुरुषरूप हविषेति हविः, 'अबध्नन्पुरुषं पशुम्' पशुको बांधा' इस श्रुतिमें भगवान्का (पु० सू० १५) इति हविष्ट्वं श्रूयते। हवनीयत्व प्रतिपादन किया गया है। स्मृतिमात्रेण पुंसां पापं संसारं वा नथा स्मरणमात्रसे पुरुषोंके पाप अथवा हरतीति, हरिद्वर्णत्वाद्वा हरिः। जन्ममरणरूप]संसारको हर लेते है,इस- 'हराम्यधं च स्मर्तृणां लिये या हरित (श्याम) वर्ण है, इसलिये हविर्भाग क्रतुष्वहम् । भगवान् हरि है। भगवान्का कथन है, वर्णश्च मे हरिः श्रेष्ठ- 'मैं अपना स्मरण करनेवालोके पाप और यज्ञोंमें हविर्भागका हरण करता स्तस्माद्धरिरहं स्मृतः ॥ * -हूँ, तथा मेरा अति सुन्दर हरितवर्ण इति भगवद्वचनात् । है, इसलिये मैं 'हरि कहलाता हूँ।' इस श्लोकका हमें पता नहीं लगा।थोडेसे पाठभेदसे एक श्लोक महाभारत 'शान्तिपर्वमें मिलता है; वह इस प्रकार है- इलोपहूतयोगेन हरे भाग ऋतुष्वहम् । वर्णश्च मे हरि श्रेष्ठस्तस्माद्धरिरहं स्मृतः ॥ (३४२ । ६८) शाङ्करभाष्य १४३ सर्लक्षणैः प्रमाणैर्लक्षणं ज्ञानं सब लक्षणो अर्थात् प्रमाणोसे जो जायते यत्तद्विनिर्दिष्टं सर्वलक्षण- लक्षण-ज्ञान होता है वह सर्वलक्षण- लक्षण कहलाता है. उस ज्ञानमे जो लक्षणम् , तत्र साधुः सर्वलक्षण- साधु अर्थात् परम उत्तम है वह लक्षण्यः, तस्यैव परमार्थत्वात् । परमात्मा ही सर्वलक्षणलक्षण्य हैं, क्योकि वे ही परमार्थस्वरूप है। लक्ष्मीरस्य वक्षसि नित्यं वस भगवानके वक्ष स्थलमे लक्ष्मीजी नित्य तीति लक्ष्मीवान् । निवास करती है, लक्ष्मीवान् है। समिति युद्धं जयतीति समिति समिति अर्थात् युद्धको जीतते है, अयः ॥५२॥ इसलिये समितिञ्जय है ॥५२॥ अत' वे विक्षरो रोहितो मार्गों हेतुर्दामोदरः सहः । महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ॥ ५३ ॥ ३६३ विक्षर., ३६४ रोहित , ३६५ मार्ग., ३६६ हेतुः, ३६७ दामोदरः, ३६८ सहः । ३६९ महीधर., ३७० महाभागः, ३७१ वेगवान् , ३७२ अमिताशन.॥ विगतः क्षरो नाशो यस्यासौ जिनका क्षर अर्थात् नाश नहीं है विक्षरः । वे भगवान् विक्षर है। खच्छन्दतया रोहितां मूर्ति अपनी इच्छासे रोहितवर्ण मूर्ति अथवा [रोहित नामक] एक मत्स्य- मत्स्यविशेषमूर्ति वा वहन् रोहितः। विशेपका स्वरूप धारण करनेके कारण रोहित है। मुमुक्षवस्तं देवं मार्गयन्ति इति मुमुक्षुजन उन परमात्मदेवका मार्गण मार्गः; परमानन्दो येन प्राप्यते स (खोज) करते है, इसलिये वे मार्ग हैं; अथवा जिस [साधन] से परमानन्द प्राप्त होता है वह मार्ग है। मार्ग इति वा।
विष्णुसहस्रनाम १४४ उपादानं निमित्तं च कारणं संसारके निमित्त और उपादान स एवति हेतुः । कारण वे ही है, इसलिये हेतु है। दमादिसाधनेनोदारोत्कृष्टा म दम आदि साधनोसे जो मति उदार तिर्या तया गम्यत इति दामोदरः, अर्थात् उत्कृष्ट हो जाती है उसीसे 'दमाद्दामोदरो विभुः' इति महाभारते भगवान् जाने जाते है, इसलिये वे (उद्योग० ७० । ८)। यशोदया दामोदर है । महाभारतमे कहा है- दानोदरे बद्ध इति वा दामोदरः, 'दमके कारण भगवान् दामोदर ददर्श चाल्पदन्तास्य [कहे गये] है अथवा यशोदाजीद्वारा स्मितहास च वालकम् ।' दाम ( रस्सी) से उदरप्रदेश (कमर)मे तयोर्मध्यगतं बाँध दिये गये थे, इसलिये दामोदर है। बद्ध दाम्ना गाढं तथोदरे। ब्रह्मपुराणमे कहा है-'बजके मनुष्योंने ततश्च दामोदरतां उन दोनों (यमलार्जुनो) के बीचमे स ययौ दामबन्धनात् ॥ गये हुए बालकको रस्सीसे उदर- (ब्रह्म० ७६ । १३-१४) देशमे खूब कसकर बंधे तथा थोड़े इति ब्रह्मपुराणे । दाँतोंवाले मुखसे मन्द-मन्द मुसकाते 'दामानि लोकनामानि देखा, तबसे दाम (रस्सी) से बाँधे तानि यस्योदरान्तरे। जानेके वह दामोदर तेन दामोदरो देवः कहलाया ।' अथवा 'दाम लोकोंका श्रीधरः श्रीसमाश्रितः ।। नाम है, वे जिसके उदर (पेट) मे है वे रमानिवास श्रीधरदेव इसी इति व्यासवचनाद् वा कारणसे दामोदर कहलाते हैं। इस दामोदरः। व्यासजीके वचनानुसार ही दामोदर है। सर्वानभिभवति क्षमत इति सबको नीचा दिखाते अथवा सबको वा सहः। सहन करते है, इसलिये सह है। महीं गिरिरूपेण धरतीति पर्वतरूप होकर मही (पृथिवी ) महीधरः, 'वनानि विष्णुर्गिरयो दिशश्च' को धारण करते है, इसलिये महीधर (विष्णु० २।१२ । ३८) इति है जैसा कि श्रीपराशरजीका वचन है- पराशरोक्तेः। 'वन,पर्वत और दिशाएँ विष्णु ही है। कारण शाङ्करभाष्य १४५ वेगो जवस्तद्वान् वेगवान् , 'अनेजदेकं मनसो जवीयः' (ई० उ० ४) इति श्रुतेः। वेग जव (तीव्र गति) को कहते है, तीव्र गतिवाले होनेके कारण भगवान् वेगवान् है; श्रुति कहती है--'आत्मा चलता नहीं, वह एक है और मनसे भी अधिक वेगवाला है। संहारके समय सारे विश्वको खा जाते है इसलिये अमिताशन है ।।५३|| संहारसमये विश्वमश्नातीति अमिताशनः ॥५३॥ उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः । करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ॥ ५४॥ ३७३ उद्भवः, ३७४ क्षोभणः, ३७५ देवः, ३७६ श्रीगर्भः, ३७७ परमेश्वरः । ३७८ करणम् , ३७९ कारणम् , ३८० कर्ता, ३८१ विकर्ता, ३८२ गहनः, ३८३ गुहः ॥ प्रपश्चोत्पत्युपादानकारणत्वात् प्रपञ्चकी उत्पत्तिके उपादान कारण उद्भवः, उद्तो भवात्संसारा- होनेसे उद्भव है। अथवा भव यानी दिति चा। संसारसे ऊपर है, इसलिये उद्भव है। . सर्गकाले प्रकृति पुरुषं च जगत्की उत्पत्तिके समय प्रकृति प्रविश्य क्षोमयामासेति क्षोभणः। और पुरुपमे प्रविष्ट होकर उन्हे क्षुब्ध 'प्रकृतिं पुरुष चैव किया था, इसलिये क्षोभण हैं । विष्णु- प्रविश्यात्मेच्छयाहरिः । पुराणमे कहा है-'अव्यय भगवान् प्रविश्य क्षोभयामास श्रीहरिने सर्गकालमे अपनी इच्छासे सर्गकाले व्ययाव्ययौ । भचिनी प्रकृति और पुरुषमे प्रविष्ट इति विष्णुपुराणे (१।२।२९)। यतो दीव्यति क्रीडति सर्गा- क्योकि दीव्यति अर्थात् सृष्टि आदिसे क्रीडा करते है, दैत्यादिकोको जीतना दिभिः,विजिगीषतेऽसुरादीन् ,व्यव- चाहते है, समस्त भूतोमे व्यवहार १० होकर उन्हें क्षुब्ध क्षुब्ध किया था।
१४६ विष्णुसहस्रनाम हरति सर्वभूतेषु, आत्मतया द्योतते, | करते है, अन्तरात्मारूपसे प्रकाशित स्तूयते स्तुत्यैः, सर्वत्र गच्छति होते है, स्तुत्य पुरुषोसे स्तवन किये जाते है और सर्वत्र जाते है, इसलिये देव है; तसात् देवः ‘एको देवः' (श्वे० उ० जैसा कि 'एक देव है' इस मन्त्रवर्णसे ६ । ११) इति मन्त्रवर्णात् । सिद्ध होता है। श्रीविभूतिर्यस्योदरान्तरे जग जिनके उदर-गर्भमे संसाररूप श्री-विभूति स्थित है वे भगवान् द्रपा यस्य गर्ने स्थितास श्रीगर्भः श्रीगर्भ है। परमश्वासावीशनशीलश्चेति पर परम है और ईशनशील है इसलिये मेश्वरः। परमेश्वर है । श्रीभगवान् कहते है-- 'समं सर्वेषु भूतेषु 'समस्त भूतोंमें समानभावसे स्थित तिष्ठन्तं परमेश्वरम् । परमेश्वरको [जो पुरुष देखता है वही (गीता १३ । २७) देखता है। इति भगवद्वचनात् । संसारकी उत्पत्तिके सबसे बड़े जगदुत्पत्तौ साधकतमं करणम्। साधन है, इसलिये करण है। उपादानं निमित्तं च कारणम् । जगत्के उपादान और निमित्त- कारण है, इसलिये कारण है। कर्ता स्वतन्त्रः। खतन्त्र होनेसे कर्ता है विचित्रं भुवनं क्रियते इति विकर्ता विचित्र भुवनोकी रचना करते है, स एव भगवान् विष्णुः। इसलिये वे भगवान् विष्णु ही विकर्ता है। स्वरूपं सामर्थ्य चेष्टितं वा उनका स्वरूप, सामर्थ्य अथवा कृत्य जाना नही जाता, इसलिये तस्य ज्ञातुं न शक्यत इति गहनः । गहन है। गृहते संवृणोति स्वरूपादि अपनी मायासे स्वरूप आदिको ग्रस्त करते है अर्थात् ढक लेते है निजमाययेति गुहः । इसलिये गुह है। भगवान्का कथन शाङ्करभाष्य १४७ 'नाहं प्रकाशः सर्वस्य है-'योगमायासे आवृत होनेके कारण योगमायासमावृतः । मैं सबको प्रकट नहीं होता हूँ॥५४॥ (गीता ७ । २५) इति भगवद्वचनात् ॥ ५४॥ NDAR- व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः । परदिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ॥ ५५ ॥ ३८४ व्यवसायः, ३८५ व्यवस्थान., ३८६ संस्थानः, ३८७ स्थानदः, ३८८ ध्रुव. । ३८९ परद्धिः, ३९० परमस्पष्टः, ३९१ तुष्टः, ३९२ पुष्टः, ३९३ शुभेक्षण.॥ संविन्मात्रखरूपत्वात् व्यवसायः। ज्ञानमात्रस्वरूप होनेसे व्यवसाय है। अस्मिन् व्यवस्थितिः सर्वस्येति जिनमे सबकी व्यवस्था है वे भगवान् व्यवस्थानः; लोकपालाघधिकार- व्यवस्थान है । अथवा लोक पालादि अधिकारोको, जरायुज, अण्डज, जरायुजाण्डजोद्भिजब्राह्मणक्षत्रिय- उद्भिज आदि जीवोको, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यशूद्रावान्तरवर्णब्रह्मचारिगृहस्थ- वैश्य, शूद्र और अवान्तर वर्णोको, ब्रह्म- वानप्रस्थसंन्यासलक्षणाश्रमतद्धर्मा- चारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास दिकान् विभज्य करोति इति वा आश्रमोको तथा उनके धर्म आदिको विभक्त करके रचते है इसलिये व्यवस्थान व्यवस्थानः। 'कृत्यल्युटो बहुलम् है। यहाँ कृत्यल्युटोबहुलम्' इस सूत्रमे (पा० सू० ३ । ३ । ११३) इति बहुल शब्दका ग्रहण (उच्चारण) होनेसे बहुलग्रहणात् कर्तरिल्युत् प्रत्ययः । कर्ता-अर्थमे ल्युट् प्रत्यय हुआ है। अत्र भूतानां संस्थितिः प्रल भगवान्मे प्राणियोकी प्रलयरूप स्थिति यात्मिका, समीचीनं स्थानमखेति है अथवा वे उस (प्रलय) के सम्यक् स्थान है इसलिये वे संस्थान है। ध्रुवादीनां कर्मानुरूपं स्थानं ध्रुवादिकोको उनके कर्मोके अनुसार ददातीति स्थानद.। स्थान देते है इसलिये स्थानद हैं। वा सस्थानः।
१४८ विष्णुसहस्रनाम अविनाशित्वात् ध्रुवः । अविनाशी होनेके कारण ध्रुध है। परा ऋद्धिर्विभूतिरस्येति पर्द्धिः भगवान्की ऋद्धि अर्थात् विभूति परा (श्रेष्ठ) है, इसलिये वे परर्द्धि है। परा मा शोभा अस्येति परमः, उनकी मा अर्थात लक्ष्मी-शोभा सर्वोत्कृष्टो वा अनन्याधीनसिद्धि- परा (श्रेष्ठ) है इसलिये वे परम है । अथवा बिना किसी अन्यके आश्रयके त्वात्, संविदात्मतया स्पष्टः ही सिद्ध होनेके कारण सर्वश्रेष्ठ है। तथा ज्ञानस्वरूप होनेसे स्पष्ट है; इस परमस्पष्टः । प्रकार [ परम और स्पष्ट होनेसे] परमस्पष्ट है। परमानन्दैकरूपत्वात् तुष्टः। एकमात्र परमानन्दस्वरूप होनेके कारण तुष्ट है। सर्वत्र सम्पूर्णत्वात् पुष्टः। सर्वत्र परिपूर्ण होनेसे पुष्ट है। ईक्षणं दर्शनं यस्य शुभं शुभ जिनका ईक्षण अर्थात् दर्शन सर्वथा करं मुमुक्षूणां मोक्षदं भोगार्थिनां शुभ यानी मनुष्योका शुभ करनेवाला है, भोगदं सर्वसन्देहविच्छेदकारणं मुमुक्षुओंको मोक्ष देनेवाला, भोगार्थियो- को भोग देनेवाला, समस्त सन्देहोका पापिनां पावनं हृदयग्रन्थेविच्छेद- उच्छेद करनेवाला, पापियोको पवित्र करं सर्वकर्मणां क्षपणम् अविद्यायाश्च करनेवाला हृदयग्रन्थिको काटनेवाला, समस्त कर्मोका नाश करनेवाला और निवर्तकं स शुभेक्षणः, 'भिद्यते अविद्याको दूर करनेवाला है, वे भगवान् हृदयग्रन्थिः' (मु० उ०२ । २ । ८) शुभेक्षण है । 'हृदयकी प्रन्थि टूट इत्यादिश्रुतेः ॥५५॥ जाती है' इत्यादि श्रुतिसे यही बात सिद्ध होती है ॥५५॥ , , रामो विरामो विरतो मार्गों नेयो नयोऽनयः । वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मों धर्मविदुत्तमः ॥ ५६ ।।
१४६ शाङ्करभाष्य ३९४ रामः, ३९५ विरामः, ३९६ विरतः, ३९७ मार्ग., ३९८ नेयः, ३९९ नयः, ४०० अनयः । ४०१ वीरः, ४०२ शक्तिमता श्रेष्ठ., ४०३ धर्म., ४०४ धर्मविदुत्तमः ॥ नित्यानन्दलक्षणेऽस्मिन् योगिनो नित्यानन्दस्वरूप भगवान्मे योगी- रमन्त इति रामः, जन रमण करते है, इसलिये वे राम 'रमन्ते योगिनो यस्मिन् है। पद्मपुराणमे कहा है-'जिस नित्या- नित्यानन्दे चिदात्मनि । नन्दस्वरूप चिदात्मामें योगिजन इति रामपदेनैत रमण करते है वह परब्रह्म 'राम इस त्परं ब्रह्माभिधीयते ॥ पदसे कहा जाता है। अथवा अपनी इति पद्मपुराणे स्वेच्छया रम- ही इच्छासे रमणीय शरीर धारण करने- णीयं वपुर्वहन्वा दाशरथी रामः । वाले दशरथनन्दन ही राम है। विरामोऽवसानं प्राणिनामसि भगवान्मे प्राणियोका विराम अर्थात् निति विराम.। अन्त होता है, इसलिये वे विराम है। विगतं रतमस्य विषयसेवाया विषयसेवनमे जिनका राग नही मिति विरतः । रहा है वे भगवान् विरत है। यं विदित्वा अमृतत्वाय कल्पन्ते । जिन्हे जानकर मुमुक्षुजन अमर हो योगिनो मुमुक्षवः स एव पन्थाः जाते हैं वे ही पथ-मार्ग है। श्रुति मार्गः 'नान्य पन्था विद्यतेऽयनाय' कहती है-'मोक्षका [आत्मज्ञानके इति श्रुतेः। अतिरिक्त ] और कोई पथ नही है।' मार्गेण सम्यग्ज्ञानेन जीव: मार्ग अर्थात् सम्यक ज्ञानसे जीव परमात्मतया नीयत इति नेयः । परमात्मभावको ले जाया जाता है, इसलिये वह (जीव) नेय है। नयतीति नय, नेता । मार्गों जो ले जाता है वह (सम्यक् ज्ञान- नेयो नय इति त्रिरूपः परिकल्प्यते रूप] नेता नय कहलाता है। इस प्रकार मार्ग, नेय और नय इन तीन रूपोसे भगवानकी कल्पना की जाती है ।
१५० विष्णुसहस्रनाम नास्य नेता विद्यत इति अनयः । भगवान्का कोई और नेता नही है इसलिये वे अनय है। इति नाम्नां चतुर्थ शतं विवृतम् । यहॉतक सहस्रनामके चौथे शतक- का विवरण हुआ । विक्रमशालित्वात् वीरः । विक्रमशाली होनेके कारण भगवान् वीर है। शक्तिमतां विरिश्चयादीनामपि ब्रह्मा आदि शक्तिमानोमे भी शक्ति- शक्तिमत्त्वात् शक्तिमता श्रेष्ठः । मान् होनेके कारण शक्तिमतां श्रेष्ठ है। सर्वभूतानां धारणाद् धर्मः, समस्त भूतोको धारण करनेके 'अणुरेष धर्मः' इति श्रुते; धर्मैरा- कारण धर्म हैं । श्रुति कहती है- 'यह धर्म अति सूक्ष्म है अथवा धर्म- राध्यत इति वा धर्मः। हीसे आराधन किये जाते है, इसलिये धर्म है। श्रुतयः स्मृतयश्च यस्याज्ञा श्रुतियाँ और स्मृतियाँ जिसकी भूताः स एव सर्वधर्मविदामुत्तमःमें उत्तम होना चाहिये । इसीलिये आज्ञारवरूप हो वही समस्त धर्मवेत्ताओं- इति धर्मविदुत्तमः ॥५६॥ भगवान् धर्मविदुत्तम है ॥५६॥ वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः । हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥ ५७ ।। ४०५ वैकुण्ठः, ४०६ पुरुपः, ४०७ प्राणः, ४०८ प्राणदः, ४०९ प्रणवः, ४१० पृथुः । ४११ हिरण्यगर्भः, ४१२ शत्रुघ्नः, ४१३ व्याप्तः, ४१४ वायुः, ४१५ अधोक्षजः ॥ विविधा कुण्ठा गतेः प्रतिहतिः! विविध कुण्ठा अर्थात् गतियोंके विकुण्ठा, विकुण्ठायाः कर्तेति | अवरोधको विकुण्ठा कहते है, उस , शाङ्करभाष्य १५१ वैकुण्ठः, जगदारम्भे विश्लिष्टानि विकुण्ठाके करनेवाले होनेसे भगवान् भूतानि परस्परं संश्लेषयन् तेषां चैकुण्ठ है; क्योकि जगत्के आरम्भमे ये बिखरे हुए भूतोको परस्पर मिलाकर गति प्रतिवनातीति। उनकी गतिको रोक दिया करते है। 'मया संश्लेषिता भूमि- महाभारत शान्तिपर्वमे कहा है-'मैंने रद्भिव्योम च वायुना । पृथिवीको जलके साथ, आकाशको वायुश्च तेजसा सार्ध वायुके साथ और वायुको तेजके वैकुण्ठत्वं ततो मम ॥ लाथ मिलाया था इसीलिये मुझमें इति शान्तिपर्वणि । (३४२।८०) वैकुण्ठता है ।* सर्वस्मात्पुरा सदनात्सर्वपापस्य सबसे पहले होनेके कारण अथवा सादनाद्वा पुरुषः; स यत्पूर्वोऽस्मात्सर्व- सब पापोका उच्छेद करनेवाले होनेसे स्मात्सर्वान्पाप्मन औषत्तस्मात्पुरुपः' पुरुष है । श्रुति कहती है-वह जो सबसे पहले था, सब पापोंको इति श्रुते, पुरि शयनाद्वा पुरुषः, भस्म कर देता है इसलिये पुरुष 'स वा अयं पुरुपः सर्वासु पूर्षु पुरि- है।' अथवा पुर यानी शरीरमे शयन करनेके कारण पुरुप है । श्रुति कहती शयः' (बृ० उ० २।५।१८) है-'वह यह पुरुष सबपुरोमे पुरिशय इति श्रुतेः। (पुरियोमे शयन करनेवाला) है। प्राणिति क्षेत्रज्ञरूपेण प्राणात्मना क्षेत्रज्ञरूपसे जीवित रहते है अथवा चेष्टयन्वा प्राणः । 'चेष्टा करोति प्राणवायुरूपसे चेष्टा करते है, इसलिये प्राण हैं। विष्णुपुराणमे कहा है- श्वसनस्वरूपी' इति विष्णुपुराणे । 'प्राण-वायुरूप होकर चेष्टा करते है। खण्डयति प्राणिनां प्राणान् प्रलय आदिके समय प्राणियोके प्रलयादिष्विति प्राणदः । प्राणोका खण्डन करते हैं, इसलिये प्राणद है। विगता कुण्ठा यस्य स विकुण्ठो विकुण्ठ एव वैकुण्ठ 'स्वार्थऽण् इस विग्रहके अनुसार जिसकी कुण्ठा अर्थात् रोक-टोक न हो उसका नाम वैकुण्ठ है, भगवान् भी किसी प्रकार प्रतिबद्ध नहीं हैं, इसलिये वे वैकुण्ठ है ।
१५२ विष्णुसहस्रनाम प्रणौतीति प्रणवः, 'तस्मादोमिति [ॐ कहकर ] स्तुति अथवा प्रणाम प्रणौति' इति श्रुतेः । प्रणम्यते इति है। श्रुतिमे कहा है अतः ओ३म् ऐसा करते है, इसलिये (ओकार ) प्रणव वा प्रणवः, [कहकर] प्रणाम करता है।' अथवा 'प्रणमन्तीह वै वेदा- प्रणाम किये जाते है, इसलिये (भगवान् ही) प्रणव है। श्रीसनत्कुमारजीका स्तस्मात्प्रणव उच्यते कथन है-'उन्हें वेद प्रणाम करते हैं, इति सनत्कुमारवचनात् । इसलिये वे प्रणव कहे जाते है। प्रपञ्चरूपेण विस्तृतत्वात् पृथुः । प्रपश्चरूपसे विस्तृत होनेके कारण पृथु है। . नात् व्याप्तः । हिरण्यगर्भसम्भूतिकारणं हिर हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) की उत्पत्तिका ण्मयमण्डं यद्वीर्यसम्भूतम् , तदस्य कारण हिरण्मय अण्ड जिनके वीर्यसे उत्पन्न हुआ है वे भगवान् उसके गर्भ -गर्भ इति हिरण्यगर्भः । है, इसलिये हिरण्यगर्भ हैं। त्रिदशशत्रून्हन्तीति शत्रुघ्नः । देवताओके शत्रुओको मारते है, इसलिये शत्रुघ्न है। कारणत्वेन सर्वकार्याणां व्याप- कारणरूपसे सब कार्योंको व्याप्त करनेके कारण व्याप्त है। वाति गन्धं करोतीति वायुः, वाति अर्थात् गन्ध करते है, इसलिये 'पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च' (गीता ७९) वायु है । भगवान्का कथन है-'पृथिवी- इति भगवद्वचनात् । मे पुण्यगन्ध मैं हूँ। 'अधोन क्षीयते जातु महाभारत उद्योगपर्वमे कहा है- यस्मात्तस्मादधोक्षज.' 'कभी नीचे [अर्थात् अपने स्वरूपसे] इति उद्योगपर्वणिः (७०।१०)। क्षीण नहीं होते इसलिये अधोक्षज है।' धौरक्षं पृथिवी चाधा, तयोर्यस्सा- अथवा द्यौ (आकाश) अक्ष है और दजायत मध्ये वैराजरूपेण इति वा पृथिवी अधः है, भगवान् उनके अधोक्षजः अधोभूते प्रत्यक् प्रवाहिते मध्यमे विराटरूपसे प्रकट होते है, अक्षगणे जायत इति वा अधोक्षजः। इसलिये वे अधोक्षज है । अथवा अक्ष- शाङ्करभाष्य १५३ 'अधोभूते ह्यक्षगणे प्रत्यग्रूपप्रवाहिते। जायते तस्य वै ज्ञान गण (इन्द्रियो) के अधोमुख अर्थात् अन्तर्मुख होनेपर प्रकट होते है इसलिये अधोक्षज है। 'इन्द्रियोके अधोभूत होनेपर अर्थात् उन्हे भीतरकी ओर प्रवृत्त करनेपर भगवानका ज्ञान होता है, इसलिये वेअधोक्षजकहलाते हैं। ॥ ५७॥ तेनाधोक्षज उच्यते॥ इति ॥ ५७॥ - ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः । उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः॥ ५८ ॥ ४१६ ऋतुः, ४१७ सुदर्शन , ४१८ कालः, ४१९ परमेष्ठी, ४२० परिग्रहः । ४२१ उग्र.,४२२ संवत्सर.,४२३ दक्षः, ४२४ विश्राम., १२५ विश्वदक्षिणः।। कालात्मना ऋतुशब्देन लक्ष्यत ऋतुशब्दद्वारा कालरूपसे लक्षित इति ऋतुः । होते है, इसलिये ऋतु है। शोभनं निर्वाणफलं दर्शनं भगवान्का दर्शन अर्थात् ज्ञान अति सुन्दर-निर्वाणरूप फल देनेवाला है, ज्ञानमस्येति, शुभे दर्शने ईक्षणे | अथवा उनके नेत्र अति सुन्दर- पद्मपत्रायते अस्येति, सुखेन दृश्यते । पद्मपत्रके समान विशाल है अथवा भक्तोको सुगमतासे ही दिखलायी दे भक्तैरिति वा सुदर्शन। जाते है इसलिये वे सुदर्शन है। कलयति सर्वमिति कालः, 'काल. सबकी कलना (गणना) करनेके कलयतामहम्' (गीता १०।३०) : कारण काल है। भगवान्ने कहा है- इति भगवद्वचनात् । 'कलना करनेवालोमे मैं काल हूँ।' परमे प्रकृष्ट खे महिनि हृदया- हृदयाकाशके भीतर परम अर्थात् अपनी प्रकृष्ट महिमामे स्थित रहनेका काशे स्थातुं शीलमस्येति परमेष्ठी | स्वभाव होनेके कारण वे परमेष्ठी है ।
१५४ विष्णुसहस्रनाम 'परमेष्ठी विभ्राजते' इति मन्त्रवर्णात् । मन्त्रवर्ण कहता है-'परमेष्ठीरूपसे सुशोभित है।" शरणार्थिभिः परितो गृह्यते सर्वगत होनेके कारण शरणार्थियों- द्वारा सब ओरसे ग्रहण किये जाते सर्वगतत्वात् , परितो ज्ञायते इति है, या सब ओरसे जाने जाते है, वा, पत्रपुष्पादिकं भक्तैरर्पितं अथवा भक्तोके अर्पण किये हुए पत्र- पुष्पादिको ग्रहण करते है, इसलिये परिगृहातीति वा परिग्रहः । परिग्रह है। सूर्यादीनामपि भयहेतुत्वात् सूर्यादिके भी भयके कारण होनेसे उग्रः, 'भीषोदेति सूर्यः' (तै० उ०२१८) उग्र है । श्रुति कहती है-'इसके भयसे इति श्रुतेः। सूर्य निकलता है। संवसन्ति भूतान्यसिन्निति सब भूत इनमे बसते है, इसलिये सवत्सरः । संवत्सर है। जगद्रूपेण वर्धमानत्वात् सर्व- जगतरूपसे बढनेके कारण, अथवा सब कार्य बडी शीघ्रतासे करते है, कर्माणि क्षिप्रं करोतीति वा दक्षः इसलिये दक्ष है। संसारसागरे क्षुत्पिपासादिषडू क्षुधा-पिपासा आदि छ: ऊर्मियोंसे मिभिस्तरङ्गिते अविद्याद्यैर्महाक्लेशैः तरङ्गित संसारसागरमे अविद्या आदि मदादिभिरुपक्लेशैश्च वशीकृतानां महान् क्लेशों और मद आदि उप- क्लेशोंसे वशीभूत किये हुए विश्रामकी विश्रान्ति कायमाणानां विश्राम इच्छावाले मुमुक्षुओको विश्राम अर्थात् मोक्षं करोतीति विश्रामः । मोक्ष देते है, इसलिये विश्राम है। विश्वस्मात् दक्षिणः शक्तः, सबसे दक्ष अर्थात् समर्थ अथवा विश्वेषु कर्मसु दाक्षिण्यादा समस्त कार्योंमे कुशल होनेके कारण विश्वदक्षिणः ॥५८॥ भगवान् विश्वदक्षिण हैं* ॥५८|| अथवा समस्त विश्व इन्हें वलिके यज्ञमें दक्षिणारूपसे मिला था, इसलिये विश्वदक्षिण हैं।
शाङ्करभाष्य १५५ विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् । अर्थोऽनों महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥ ५६ ॥ ४२६ विस्तार., ४२७ स्थावरस्थाणुः, ४२८ प्रमाणम् , ४२९ बीजमव्ययम् । १३० अर्थ , ४३१ अनर्थ , ४३२ महाकोशः, ४३३ महाभोग., ४३४ महाधनः ॥ विस्तीर्यन्ते समस्तानि जगन्त्य- भगवान्मे समस्त लोक विस्तार पाते सिन्निति विस्तारः। है, इसलिये वे विस्तार है। स्थितिशीलत्वात् स्थावर; स्थितिशील होनेके कारण स्थावर स्थितिशीलानि पृथिव्यादीनि है । तथा पृथिवी आदि स्थितिशील पदार्थ उनमे स्थित है इसलिये स्थाणु तिष्ठन्त्यसिनिति स्थाणुः; स्थाव- है । इस प्रकार स्थावर और स्थाणु रश्चासौ स्थाणुश्च स्थावरस्थाणुः । होनेसे भगवान् स्थावरस्थाणु है। संविदात्मना प्रमाणम् । संवित्स्वरूप होनेसे प्रमाण है । अन्यथाभावव्यतिरेकेण कारण बिना अन्यथाभावके ही संसारके मिति वीजमव्ययम् , सविशेषण- कारण है इसलिये उनका बीजमव्ययम् मेकं नाम । यह विशेपणसहित एक ही नाम है । सुखरूपत्वात्सर्वैरीत इति सुखस्वरूप होनेके कारण सबसे प्रार्थना किये जाते है, इसलिये अर्थ है। न विद्यते प्रयोजनम् आप्तकाम- आप्त (पूर्ण) काम होनेके कारण उनका कोई अर्थ यानी प्रयोजन नही है, इसलिये वे अनर्थ है। महान्तः कोशा अन्नमयादयः अन्नमय आदि महान् कोश भगवान्को आच्छादका अस्येति महाकोशः। ढकनेवाले है, इसलिये वे महामोश है। महान् भोगः सुखरूपोऽस्येति भगवान्का सुखरूप महान् भोग है, महाभोगः । इसलिये वे महाभोग है। । अर्थः । त्वात् अस्येति अनर्थ. ।
१५६ विष्णुसहस्रनाम . महत् भोगसाधनलक्षणं धनम- स्येति महाधनः ॥५९॥ उनका भोगसाधनरूप: महान धन है, इसलिये चे महाधन है ॥ ५९॥ अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूधर्मयूपो महामखः । नक्षत्रनेमिनक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ।। ६०॥ ४३५ अनिर्विण्णः, ४३६ स्थविष्ठः, ४३७ अभूः (भूः), ४३८ धर्मयूपः, ४३९. महामखः । ४४० नक्षत्रनेमिः, ४४१ नक्षत्री, ४४२ क्षमः, ४४३. क्षामः, ४४४ समीहनः ।। आप्तकामत्वात् निवेदोऽस्य न सम्पूर्ण कामनाएँ प्राप्त होनेके विद्यत इति अनिर्विणः । कारण भगवान्को निर्वेद (उदासीनता.) नही है, इसलिये वे अनिर्विण्ण है वैराजरूपेण स्थितः स्थविष्ठः, वैराजरूपसे स्थित होनेके कारण 'अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यो' (मु० उ० स्थविष्ठ हैं । श्रुति कहती है-'अग्नि उसका शिर है तथा सूर्य और २।१।४) इति श्रुतेः। क अजन्मा अभूः; अथवा भवतीति अजन्मा होनेसे अभू है, अथवा है; भूः भू सत्तायाम्' इत्यस्य सम्पदादि- इसलिये भू है । 'भू सत्तायाम्' यह सम्पदादिगणमे होनेके कारण भू धातुसे खात् क्विप्; मही वा। क्विप् प्रत्यय हुआ है। अथवा; भू पृथिवीको भी कहते है। यूपे पशुवत् तत्समाराधनात्मका यूपमे जिस प्रकार पशु बाँधा जाता धर्मास्तत्र बध्यन्त इति धर्मयूपः है उसी प्रकार आराधनारूप धर्म भगवान्मे बॉधे जाते है इसलिये वे धर्मयूप है। यसिन्नर्पिता मखा यज्ञा निर्वाण जिनको अर्पित किये हुए मख लक्षणफलं प्रयच्छन्तो महान्तो (यज्ञ) निर्वाणरूप फल देते हुए महान् जायन्ते स महामखः । हो जाते है वे भगवान् महामख है। चन्द्रमा नेत्र हैं। ८
शाङ्करभाष्य
१५७
'नक्षत्रतारकैः सार्ध
'नक्षत्र और तारोके सहित चन्द्र-
चन्द्रसूर्यादयो ग्रहाः।
सूर्यआदिग्रहगण वायुपाशरूपचन्ध-
वायुपाशमयैर्वन्धै-
नोसे ध्रुवकेसाथबंधे हुए हैं। इस वचन-
निवद्धा ध्रुवसजिते ॥
के अनुसार ज्योतिश्चक्रके सहित सम्पूर्ण
नक्षत्रमण्डलको भ्रमाता हुआ ध्रुव तारा-
स ज्योतिषां चक्रं भ्रामयस्ता- मय शिशुमारचक्रके पुच्छदेशमे स्थित
रामयस्य शिशुमारस्य पुच्छदेश है। उस शिशुमाग्के हृदय (मध्य) में
व्यवस्थितोध्रवः। तस्य शिशुमारस्य ज्योनिश्चक्रकी नेमि (केन्द्र) के समान
हृदयेज्योतिश्चक्रस्य नेमिवत्प्रवर्तकः उसके प्रवर्तकरूपसे भगवान् विष्णु वर्त-
स्थितो विष्णुरिति नक्षत्रनेमिः; साध्यायब्राह्मणमे शिशुमारका वर्णन
स्थितो विष्णुरिति नक्षत्रनेमिः: मान है अतः वे नक्षत्रनेमि कहलाते हैं ।
शिशुमारवर्णने 'विष्णु दयम्' इति करते हुए 'विष्णु उसका हृदय है'
स्वाध्यायब्राह्मणे श्रूयते ।
ऐसी श्रुति है।
चन्द्ररूपेण नक्षत्री, 'नक्षत्राणाम
चन्द्ररूप होनेसे भगवान् नक्षत्री
शशी' (गीता १० । २१ ) इति है, जैसा कि भगवान्का कथन है-
भगवद्वचनात्।
'नक्षत्रोमें मैं चन्द्रमा हूँ
समस्तकार्येषु समर्थः क्षमः; समस्त कार्यों में समर्थ होनेके कारण
क्षमत इति वा, 'क्षमया पृथिवीसमः क्षम है; अथवा सहन करते है, इसलिये
(वा० रा०१ ।१। १८) इति क्षम है। वाल्मीकिजीका वचन है कि
वाल्मीकिवचनात् ।
[राम] क्षमामें पृथिवीके समान हैं।
सर्वविकारेषु क्षपितेषु खात्म समस्त विकारोके क्षीण हो जानेपर
नावस्थित इति क्षामः । 'क्षायो मः' भगवान् आत्मभावसे स्थित रहते है,
(पा० सू०८।२।५३) इति निष्ठात- इसलिये क्षाम है । 'क्षायो म इस
सूत्रके अनुसार निष्ठासंज्ञक क्तके
कारस्य मकारादेशः।
तकारको मकार आदेश हुआ है।
सृष्टथाद्यर्थं सम्यगीहत इति
सृष्टि आदिके लिये सम्यक ईहा
समीहनः ॥६॥
(चेष्टा) करते है इसलिये समोहन
है॥६०॥
१५८ विष्णुसहस्रनाम , यज्ञ इज्यो महेज्यश्व ऋतुः सत्रं सतां गतिः । सर्वदशी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥ ६१ ॥ ४४५ यज्ञः, ४४६ इज्यः, ४४७ महेज्यः, च, ४४८ क्रतुः, ४४९ सत्रम् , ४५० सतां गतिः । ४५१ सर्वदर्शी, ४५२ विमुक्तात्मा, ४५३ सर्वज्ञः, ४५४ ज्ञानमुत्तमम् ॥ सर्वयज्ञस्वरूपत्वाद् यज्ञः; सर्वेषां सर्वयज्ञस्वरूप होनेके कारण यज्ञ देवानां तुष्टिकारको यज्ञाकारेण है। अथवा यज्ञरूपसे समस्त देवताओ- प्रवर्तत इति वा, 'यज्ञो वै विष्णुः को सन्तुष्ट करनेवाले है, इसलिये यज्ञ (तै० सं० ११७। ४) इति श्रुतेः। है । श्रुति कहती है-'यज्ञ ही विष्णु है। यष्टव्योऽप्ययमेवेति इज्यः । यष्टव्य (पूजनीय) भी भगवान् ही 'ये यजन्ति मखैः पुण्यै है इसलिये वे इज्य है। हरिवंशमे कहा र्देवतादीन्पितॄनपि है-'जो लोग पवित्र यज्ञोंद्वारा देवता आत्मानमात्मना नित्यं और पितृ आदिका पूजन करते है वे विष्णुमेव यजन्ति ते ॥ सर्वदा स्वयं अपने आत्मा विष्णुका इति हरिवंशे। ही पूजन करते हैं। सर्वासु देवतासु यष्टव्यासु प्रक समस्त यष्टव्य देवताओमे मोक्षरूप र्षेण यष्टव्यो मोक्षफलदातृत्वादिति फल देनेवाले होनेसे भगवान् ही सबसे महेज्यः। अधिक यष्टव्य है, इसलिये वे महेज्य है। यूपसहितो यज्ञः क्रतुः । यूपसहित यज्ञ ऋतु कहलाता है तद्रूप होनेसे भगवान् क्रतु है] । आसत्युपैति चोदनालक्षणं सत्रम्; जो विधिरूप धर्मको प्राप्त करता है वह सत्र है । अथवा सत् (कार्य- सतस्त्रायत इति वा । रूप जगत् ) से रक्षा करते है इसलिये भगवान् सत्र है। सतां मुमुक्षूणांनान्या गतिरिति सत्पुरुपो अर्थात् मुमुक्षुओंकी सतां गतिः। [भगवान्को छोडकर] कोई और गति नही है, इसलिये वे सतांगति है।
शाङ्करभाष्य १५६ सर्वेषां प्राणिनां कृताकृतं सर्व अपने खाभाविक बोधसे सनस्त पश्यति स्वाभाविकेन बोधेनेति प्राणियोके सम्पूर्ण कर्माकर्मको देखते सर्वदर्शी। है इसलिये सर्वदर्शी है। स्वभावेन विमुक्त आत्मा खभावसे ही जिनकी आत्मा मुक्त यस्पेति, विमुक्तश्वासावात्मा चेति है अथवा जो विमुक्त भी है और आत्मा भी है वे भगवान् विमुक्तात्मा वा विमुक्तात्मा, 'विमुक्तश्च विमुच्यते' है। श्रुति कहती है-'मुक्त हुआ ही (क० उ०२ । ५। १) इति श्रुतेः। मुक्त होता है।' सर्वश्चासौ ज्ञश्चेति सर्वज्ञः, 'इदर जो सर्व है और ज्ञानवरूप है वह सर्व यदयमात्मा' (बृ० उ० २।४।६) परमात्मा सर्वज्ञ है । श्रुति कहती है- इति श्रुतेः। 'यह जो कुछ है सब आत्मा ही है।' ज्ञानमुत्तममित्येतत्सविशेषणमेकं ज्ञानमुत्तमम् यह विशेषणसहित एक नाम है। जो प्रकृष्ट, अजन्य; नाम, ज्ञानं प्रकृष्टमजन्यमनवच्छिन्नं अनवच्छिन्न और सबका सबसे बड़ा सर्वस्य साधकतममिति ज्ञानमुत्तम साधक ज्ञान है वह ज्ञानमुत्तमम् ब्रह्म, 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तै० कहलाता है। श्रुति कहती है- 'ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्तरूप उ० २। १) इति श्रुतेः॥६॥ है। ॥६१॥ , सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् । मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ।। ६२ ।। ४५५ सुव्रत', ४५६ सुमुख., ४५७ सूक्ष्म, ४५८ सुघोप., ४५९ सुखद., ४६० सुहृत् । ४६१ मनोहर', ४६२ जितक्रोधः, ४६३ वीरबाहुः, ४६४ विदारणः ॥ शोभनं व्रतमस्येति सुव्रतः । भगवान्का शुभ व्रत है, इसलिये वे 'सकृदेव सुव्रत हैं। श्रीरामायणमे रामचन्द्रजी- तवास्मीति च याचते । का वाक्य है-'जो एक बार भी प्रपन्नाय १६० विष्णुसहस्रनाम तुम्हारा हूँ अभयं सर्वभूतेभ्यो मेरी शरण आकर ददाम्येतद् व्रतं मम ॥' ऐसा कहकर मांगता है उसे मैं (वा० रा० ६ । १८ । ३३) सब प्राणियोंसे अभय कर देता हूँ- इति श्रीरामायणे रामवचनम् । यह मेरा व्रत है।' शोभनं मुखमस्येति सुमुखः । उनका मुख सुन्दर है, इसलिये वे 'प्रसन्नवदनं चारु- सुमुख है । विष्णुपुराणमे कहा है- पद्मपत्रायतेक्षणम् । 'प्रसन्न मुखवाले और सुन्दर कमल- इति श्रीविष्णुपुराणे ( ६ । ७ दलके लमान विशाल नयनवाले।' ८०)। वनवाससुमुखत्वाद्वा दाश- । अथवा वनवासके समय भी सुमुख रथी रामः सुमुखः। (प्रसन्नवदन) रहनेके कारण दशरथ- 'खपितुर्वचनं श्रीमान- भिषेकात्परं प्रियम् । कुमार राम ही सुमुख हैं। रामायणमे कहा है-'श्रीमान् रामने अपने मनसा पूर्वमासाद्य वाचा प्रतिगृहीतवान् ॥ पिताके उन अभिषेकसे भी अधिक 'इमानि तु महारण्ये प्रिय [वनवास-विषयक) वचनोंको विहृत्य नव पञ्च च । | प्रथम मनसे ग्रहण कर फिर वाणीसे भी खीकार किया । वर्षाणि परमप्रीतः [वे बोले-] 'इन चौदह वर्षोंतक स्थास्यामि वचने तव ।। (वा० रा० २ । २४११७) वनमे घूम-फिरकर मैं बड़ी प्रसन्नता- से आपके वचनोंका पालन करूंगा।" 'न वनं गन्तुकामस्य 'उस समय वनको जानेके लिये त्यजतश्च वसुन्धराम् । सर्वलोकातिगस्येव तत्पर तथा पृथिवीका राज्य छोड़ते मनो रामस्य विव्यथे। वा० रा० २ । १६ । ३३) समान रघुनाथजीकाचित्त तनिक भी इति रामायणे । सर्वविद्योपदेशेन नहीं दुखा। अथवा समस्त विद्याओका हुए सम्पूर्ण लोकोंमे श्रेष्ठ योगीके शाङ्करभाष्य सूक्ष्म है। वा सुमुखः, 'यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्व उपदेश करनेके कारण सुमुख है; जैसा कि श्रुति कहती है--'जो यो वै वेदॉश्च प्रहिणोति तस्मै' (श्वे० पहले ब्रह्माको रचता है और जो उसे उ०६ । १८) इत्यादिश्रुतेः। वेद-प्रदान करता है। शब्दादिस्थूलकारणरहितत्वात् शब्दादि स्थूल कारणोंसे रहित होनेके कारण [भगवान सूक्ष्म है] शब्दादयो ह्याकाशादीनामुत्तरोत्तर- शब्दादि विषय ही आकाशादि भूतोको स्थूलत्वकारणानि, तदभावात्- उत्तरोत्तर स्थूलताके कारण है; उनका सूक्ष्मः, 'सर्वगत सुसूक्ष्मम्' (मु० उ० भगवान्मे अभाव होनेसे वे सूक्ष्म हैं । १।१।६) इति श्रुतेः। श्रुति कहती है-'सर्वगत और अति शोभनो घोषो वेदात्मकोऽस्येति, भगवान्का वेदरूप सुन्दर घोप है, अथवा वे मेघके समान गम्भीर घोप- मेघगम्भीरघोषत्वाद्वा सुघोपः । वाले है, इसलिये सुघोष है। सवृत्तानां सुखं ददाति, अस सदाचारियोको सुख देते है अथवा वृत्तानां सुखं द्यति खण्डयतीति दुराचारियोका सुख खण्डित करते हैं, वा सुखदः । इसलिये सुखद है। प्रत्युपकारनिरपेक्षतयोपकारि बिना प्रत्युपकारकी इच्छाके ही त्वात् सुहृत् । उपकार करनेवाले होनेसे सुहत् है । निरतिशयानन्दरूपत्वात् मनो अत्यन्त आनन्दस्वरूप होनेके हरतीति मनोहरः, 'यो वै भूमा तत्सुखं कारण मनका हरण करते है, इसलिये नाल्पे सुखमस्ति' (छा० उ०७।२३। मनोहर हैं । श्रुति कहती है- 'जो भूमा है निश्चय वही सुख है १) इति श्रुतेः । अल्पमे सुख नही है। जितः क्रोधोयेन स जितक्रोधः, जिन्होने क्रोधको जीत लिया है वेदमर्यादास्थापनार्थ सुरारीन् हन्ति वेदको मर्यादा स्थापित करनेके लिये भगवान् जितक्रोध है, क्योकि वे न तु कोपवशादिति। ही देवताओंके शत्रुओको मारते है- क्रोधवश नहीं। ११ १६२ विष्णुसहस्रनाम त्रिदशशत्रून्निन्नन्वेदमर्यादां स्था देव-शत्रुओको मारकर वेदकी मर्यादाको स्थापित करनेवाली भगवान्- पयन् विक्रमशाली वाहुरस्येति को बाहु अति विक्रमशालिनी है, वीरबाहुः । इसलिये वे वीरवाहु है। अधार्मिकान् विदारयतीति अधार्मिकोको विदीर्ण करने के कारण विदारणः ॥६२॥ भगवान् विदारण है ॥२॥ , स्खापनःस्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत् । वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥ ६३ ॥ ४६५ खापन., ४६६ ववश', ४६७ व्यापी, ४६८ नैकात्मा, ४६९ नैककर्मकृत् । ४७० वत्सरः, १७१ वत्सल., ४७२ वत्सी, ४७३ रनगर्भः, ४७४ धनेश्वर. ॥ प्राणिनः वापयन् आत्मसम्बो- प्राणियोको सुलाने यानी जीवोको धविधुरान् मायया कुर्वन् स्वापनः ।। मायासे आत्मज्ञानरूप जागृतिसे रहित करनेके कारण खापन है। स्वतन्त्रः स्ववशः, जगदुत्पत्ति- जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लयके स्थितिलयहेतुत्वात् । कारण होनेसे स्वतन्त्र है, इसलिये स्ववश है। आकाशवत्सर्वगतत्वात् व्यापी, आकाशके समान सर्वव्यापी होनेसे 'आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः' इति व्यापी है । श्रुति कहती है-'आकाश- के समान सर्वगत और नित्य हैं। श्रुतेः; कारणत्वेन सर्वकार्याणां अथवा कारणरूपसे समस्त कार्योको व्यापनाद्वा व्यापी। व्याप्त करनेके कारण व्यापी हैं। जगदुत्पत्यादिषु आविर्भूत-: जगत्की उत्पत्ति आदिमे नैमित्तिक निमित्तशक्तिभिर्विभूतिभिरनेकधा शक्तियोको प्रकट करनेवाली विभूतियोके तिष्ठन् नैकात्मा। द्वारा नाना प्रकारसे स्थित है, इसलिये नैकात्मा है।
शाङ्करभाष्य १६३ जगदुत्पत्तिसम्पत्तिविपत्तिप्रभृ संसारकी उत्पत्ति, सम्पत्ति (उन्नति) और विपत्ति आदि [अनेक] कर्म करते तिकर्माणि करोतीति नैककर्मकृत् । है, इसलिये नैककर्मकृत् है। वसत्यत्राखिलमिति वत्सरः । सब कुछ उन्हीमे बसा हुआ है, इसलिये वे वत्सर है। भक्तस्नेहित्वात् उत्सलः; 'वत्सा भक्तोके स्नेही होनेके कारण वत्सल है । 'वत्सांसाभ्यां कामवले. इस साभ्या कामबले' (पा० सू० ५। सूत्रके अनुसार वत्सशब्दसे लच २१९८) इति लच्प्रत्ययः । प्रत्यय हुआ है। वत्सानां पालनात् वत्सी, जग वत्सोका पालन करनेके कारण वत्सी पितुस्तस्य वत्सभूताः प्रजा इति है। अथवा जगत्पिता होनेसे प्रजा उन- की वत्सस्वरूपा है, इसलिये वत्सी है। रत्नानि गर्भभूतानि अस्येति रत्न जिसके गर्भरूप है उस समुद्र- समुद्रो रत्नगर्भः । का नाम रत्नगर्भ है। धनानामीश्वरः धनेश्वरः ॥६३॥ धनोके स्वामी होनेके कारण धनेश्वर है ॥६॥ वा वत्सी। - धर्मगुब्धर्मकृधर्मी सदसत्क्षरमक्षरम् । अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥ ६४ ॥ ४७५ धर्मगुप् , ४७६ धर्मकृत , ४७७ धर्मी, ४७८ सत्, ४७९ असत्, ४८० क्षरम् , ४८१ अक्षरम् । ४८२ अविज्ञाता, ४८३ सहस्राशुः, ४८४ विधाता, ४८५ कृतलक्षण ॥ धर्म गोपयतीति धर्मगुप, धर्मका गोपन (रक्षा) करते है, 'धर्मसस्थापनार्थाय इसलिये धर्मगुप् है । भगवान्का वाक्य सम्भवामि युगे युगे। है-'धर्मको स्थापनाके लिये मैं युग- (गीता ४।८) इति भगवदचनात्। युगमे अवतार लेता हूँ" १६४ विष्णुसहस्रनाम धर्मकृत्। - धर्माधर्मविहीनोपि धर्ममर्या धर्माधर्मसे रहित होनेपर भी धर्मकी दास्थापनार्थ धर्ममेव करोतीति मर्यादा स्थापित करनेके लिये धर्म ही करते हैं, इसलिये धर्मकृत् है। धर्मान् धारयतीति धर्मी। धर्मोको धारण करनेवाले है, इसलिये धर्मी है। अवितथं परं ब्रह्म सत्, 'सदेव सत्यस्वरूप परब्रह्म ही सत् है । सोम्येदम्' (छा० उ०६।२ । १) श्रुति कहती है-'हे सोम्य ! यह सत् इति श्रुतेः। ही [पहले था]" अपरं ब्रह्म असत्, 'वाचारम्भणं [प्रपञ्चरूप होनेसे ] अपर ब्रह्म विकारो नामधेयम्' (छा०उ०६।१। असत् है; जैसा कि श्रुति कहती है- 'विकार केवल नाममात्र है; इसलिये ४) इति श्रुतेः। वह वाणीका विलास ही है। सर्वाणि भूतानि क्षरम् । कूटस्थः 'सबभूत क्षर हैं और कूटस्थ अक्षर अक्षरम्, कहलाता है। भगवान्के इस कथना- 'क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥' | नुसार समस्त भूत क्षर है और कूटस्थ (गीता १५ । १६)) अक्षर इति भगवद्वचनात् । आत्मनि कर्तृत्वादिविकल्प- आत्मामे कर्तृत्व आदि विकल्प-विज्ञान विज्ञानं कल्पितमिति तद्वासनावगु- कल्पित है, उसकी वासनासे ढंका ण्ठितो जीवो विज्ञाता, तद्विलक्षणो हुआ जीव विज्ञाता है और उससे विष्णुः अविज्ञाता। विलक्षण विष्णु अविज्ञाता है। आदित्यादिगता अंशवोऽस्ये- सूर्य आदिकी किरणे वास्तवमे त्ययमेव मुख्यः सहस्रांशुः, 'येन भगवान्की ही है इसलिये ये ही मुख्य सूर्यस्तपति तेजसेद्धः' (तै० ब्रा० ३ सहस्रांशु है । श्रुति कहती है-जिस १२।७९।७) इति श्रुतेः, 'यदादि- तेजसे प्रज्वलित होकर सूर्य तपता है। त्यगतं तेजः' (गीता १५ । १२) तथा स्मृति भी कहती है-'आदित्यमें इति स्मृतेश्च । जो तेज है। है शाङ्करभाष्य १६५ विशेषेण शेषदिग्गजभूधरान् समस्त भूतोको धारण करनेवाले सर्वभूतानां धातॄन् दधातीति शेप, दिग्गज ओर पर्वतोको विशेष- रूपसे धारण करते है, इसलिये विधाता। विधाता है। नित्यनिष्पन्नचैतन्यरूपत्वात् नित्यसिद्ध चैतन्यस्वरूप होनके कृतलक्षणः; कृतानि लक्षणानि कारण कृतलक्षण हैं। अथवा लक्षण शाखाण्यनेनेति वा; यानी शास्त्रोकी रचना की है इसलिये कृतलमण है। इसी ग्रन्थमे आगे चल- 'वेदाः शास्त्राणि विज्ञान- कर कहेगे कि-'वेद, शास्त्र और यह मेतत्सर्व जनार्दनात् ॥ सम्पूर्ण विज्ञान जनार्दनसेहो हुए हैं। (वि० स० १३९) | अथवा भगवान्ने ही समस्त भाव- इत्यत्रैव वक्ष्यतिः सजातीय- पदार्थोंके सजातीय-विजातीय-भेदोका विजातीयव्यवच्छेदक लक्षणं । विभाग करनेवाला लक्षण (चिह) सर्वभावानां कृतमनेनेति वा; बनाया है, इसलिये या अपने वक्षः- आत्मनः श्रीवत्सलक्षणं वक्षसि स्थलमे श्रीवत्सरूप लक्षण (चिह) धारण तेन कृतमिति वा कृतलक्षण||६४॥ किये हैं इसलिये कृतलक्षण है ॥६॥ गभस्तिनमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः । आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ॥ ६५ ॥ ४८६ गभस्तिनेमिः, ४८७ सत्त्वस्थ., ४८८ सिंहः, ४८९ भूतमहेश्वर । ४९० आदिदेव , ४९१ महादेवः, १९२ देवेशः, ४९३ देवभृद्गुरु ।। गभस्तिचक्रस्य मध्ये सूर्यात्मना, गभस्तियो (किरणों) के चक्रके स्थित इति गभस्तिनेमिः । बीचमे सूर्यरूपसे स्थित है, इसलिये गभस्तिनेमि हैं। सचं गुणं प्रकाशकं प्राधान्ये प्रकाशस्वरूप सत्वगुणमे प्रधानता- नाधितिष्ठतीति, सर्वप्राणिषु तिष्ठ- से रहते है अथवा समस्त प्राणियोंमें तीति वा सत्त्वस्थः । स्थित है, इसलिये सत्त्वस्थ है। - १६६ विष्णुसहस्रनाम - विक्रमशालित्वात्सिंहवत् सिहः; सिहके समान पराक्रमी होनेसे नृशब्दलोपेन 'सत्यभामा भामा' सिह है । अथवा सत्यभामा-- इतिवद्वा सिंहः। भामाके समान नृ शब्दका लोप होनेसे नृसिह ही सिह है। भूतानां महानीश्वरः, भूतेन भूतोके महान् ईश्वर है अथवा भूत- सत्येन स एव परमो महानीश्वर | सत्यरूपसे वे ही अति महान् ईश्वर है, इति वा भूतमहेश्वरः । इसलिये भूतमहेश्वर है। सर्वभूतान्यादीयन्तेऽनेनेति भगवान् सब भूतोका आदान (ग्रहण) आदिः । आदिश्वासौ देवश्चेति करते है, इसलिये आदि है इस प्रकार वे आदिदेवः । आदि है और देव भी है, इसलिये आदिदेव है। सर्वान्भावान्परित्यज्य आत्म- समस्त भावोंको छोड़कर अपने ज्ञानयोगैश्वर्ये महति महीयते, महान् ज्ञानयोग और ऐश्वर्यसे महिमान्वित है, इसलिये महादेव तस्मादुच्यते महादेवः । कहलाते है। प्राधान्येन देवानामीशो देवेशः। देवताओमें प्रधान होनेसे देवोके ईश अर्थात् देवेश हैं। देवान् बिभर्तीति देवभृत् शक्रा, देवताओका पालन करते है इसलिये तस्यापि शासितेति देवभृद्गुरुः; इन्द्र देवभृत् है उनके भी शासक होनेसे भगवान् देवभृद्गुरु है । अथवा देवानां भरणात्, सर्वविद्यानां च देवताओका भरण करनेसे या सब निगरणाद्वा देवभृद्गुरुः॥६५॥ विद्याओके वक्ता होनेसे देवभृद्गुरु है॥६५॥ उत्तरो गोपतिगोता ज्ञानगम्यः पुरातनः । शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ॥ ६६ ।।
शाङ्करभाष्य १६७ ४९४ उत्तर, ४९५ गोपतिः, ४९६ गोप्ता, ४९७ ज्ञानगम्य , ४९८ पुरातनः । ४९९ शरीरभूतभृत्, ५०० भोक्ता, ५०१ कपीन्द्रः, ५०२ भूरिदक्षिणः ॥ जन्मसंसारवन्धनादुत्तरतीति जन्मरूप संसारबन्धनसे उत्तीर्ण उत्तरः, सर्वोत्कृष्ट इति वा, विश्व- (मुक्त) होते है, इसलिये उत्तर है। अथवा सर्वश्रेष्ठ है, इसलिये उत्तर हैं । मादिन्द्र उत्तरः' इति श्रुतेः। श्रुति कहती है-'इन्द्र (परमेश्वर) सबसे श्रेष्ठ है। गवां पालनाद्वोपवेषधरोगोपतिः, गौओका पालन करनेसे गोपवेप- गौमही; तस्याः पतित्वाद्वा । धारी कृष्ण गोपति है। अथवा गो पृथिवीका नाम है, उसके खामी होनेसे भगवान् गोपति है।* समस्तभूतानि पालयन् रक्षको समस्त भूतोका पालन करनेवाले जगतः इति गोप्ता। भगवान् जगतके रक्षक हैं, इसलिये गोता है। न कर्मणा न ज्ञानकर्मभ्यां वा कर्मसे अथवा ज्ञान और कर्म दोनो- गम्यते, किन्तु ज्ञानेन गम्यते इति के समुच्चय] से नही जाने जाते, केवल ज्ञानसे ही जाने जाते है, इसलिये ज्ञानगम्यः । ज्ञानगम्य है। कालेनापरिच्छिन्नत्वात् पुरापि कालसे अपरिच्छिन्न होनेके कारण भवतीति पुरातनः । सबसे पहले भी रहते है, इसलिये पुरातन है। शरीरारम्भकभूतानां भरणात् शरीरकी रचना करनेवाले भूतोका प्राणरूपधरः शरीरभूतभृत् । प्राणरूपसे पालन करते है, इसलिये शरीरभूतभृत् है। पालकत्वात् भोक्ता, , परमानन्द पालन करनेवाले होनेसे भोक्ता सन्दोहसम्भोगाद्वा भोक्ता। है; अथवा निरतिशय आनन्दपुञ्जका सम्भोग करनेसे भोक्ता है। * गो इन्द्रियको भी कहते हैं अतः इन्द्रियोंका पालन करनेवाला प्राण भी गोपति है। - १६८ विष्णुसहस्रनाम इति नाम्नां पञ्चमं शतं विवृतम् । यहाँतक सहस्रनामके पांचवें शतकका विवरण हुआ। कपिश्चासाविन्द्रश्चेति कपिर्वराहा, कपि वराहको कहते हैं, जो कपि वाराहं वपुरास्थितः कपीन्द्रः; कपीनां और इन्द्र भी है वे वराहरूपधारी भगवान् वानराणामिन्द्रः कपीन्द्रः राघवो कपीन्द्र है। अथवा कपियो-वानरादिके इन्द्र (खामी) श्रीरघुनाथजी ही कपीन्द्र है। भूरयो बह्वयः यज्ञदाक्षिणा:धर्म धर्ममर्यादा दिखाते हुए यज्ञा- मर्यादां दर्शयतो यज्ञं कुर्वतो विद्यन्त सी दक्षिणाएँ रहती है, इसलिये वे नुष्ठान करते समय भगवान्की बहुत- इति भूरिदक्षिणः ॥६६॥ भूरिदक्षिण है ॥६६॥ वा। सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः। विनयोजयः सत्यसन्धो दाशार्हः सात्वताम्पतिः॥६७ ५०३ सोमपः, ५०४ अमृतपः, ५०५ सोमः, ५०६ पुरुजित् , ५०७ पुरुसत्तमः । ५०८ विनयः, ५०९ जयः, ५१० सत्यसन्धः, ५११ दाशार्हः ५१२ सात्वताम्पतिः॥ सोमं पिबति सर्वयज्ञेषु यष्टव्य समस्त यज्ञोमे यष्टव्य (पूजनीय) देवतारूपेणेति सोमपः; धर्ममर्यादां देवतारूपसे सोमपान करते है, इसलिये सोमप है । अथवा यजमानरूपसे दर्शयन्यजमानरूपेण वा सोमपः । धर्ममर्यादा दिखलानेके कारण सोमप है। स्वात्मामृतरसं पिवन् अमृतपः, अपने आत्मारूप अमृतरसका पान करनेके कारण अमृतप है। असुरैः ह्रियमाणममृतं रक्षित्वा अथवा असुरोद्वारा हरे हुए अमृतकी देवान् पाययित्वा खयमप्यपिब- रक्षा करके उसे देवताओको पिलाया दिति वा। और स्वयं भी पिया इसलिये अमृतप है।
शाङ्करभाष्य १६६ जयः। सोमरूपेणौषधीः पोपयन् सोमः; सोम (चन्द्रमा) रूपसे ओपधियो- का पोषण करनेके कारण सोम है। उमया सहितः शिवो वा। अथवा उमाके साथ रहनेके कारण शिवरूपसे ही सोम है। पुरून् बहून् जयतीति पुरुजित्। पुरु अर्थात बहुतोको जीतते है, इसलिये पुरुजित् है । विश्वरूपत्वात् पुरुः, उत्कृष्ट- विश्वरूप होनेसे पुरु है और उत्कृष्ट त्वात् सत्तमः पुरुथासौ सत्तमश्चेति होनेके कारण सत्तम है । पुरु है और सत्तम है, इसलिये पुरुसत्तम है। पुरुसत्तमः । विनयं दण्डं करोति दुष्टाना दुष्ट प्रजाको विनय अर्थात् दण्ड मिति विनयः । देते है, इसलिये विनय है। समस्तानि भूतानि जयतीति सब भूतोको जीतते है, इसलिये जय है। सत्या सन्धा सङ्कल्पः अस्येति जिन भगवान्की सन्धा अर्थात् सत्यसन्धः, 'सत्यसङ्कल्पः' (छा० उ० सङ्कल्प सत्य है वे 'सत्यसङ्कल्प' इस ८/११५) इति श्रुतेः। श्रुतिके अनुसार सत्यसन्ध है । दाशो दानं तमहतीति दाशार्हः, दाश दानको कहते है, भगवान् दशाईकुलोद्भवत्वाद्वा। दानके योग्य है, इसलिये दाशाह है, अथवा दशाह कुलमे उत्पन्न होनेक कारण दाशार्ह हैं। सात्वतं नाम तन्त्रम्, 'तत्करोति सात्वत नामका एक तन्त्र है 'उसे रचता है या उसकी व्याख्या करता है। तदाचष्टे' (चुरादिगणवार्तिकम्) इति इस अर्थमे 'तत्करोति तदाचष्टे' इस णिचि कृते विष्प्रत्यये णिलोपेच कृते. वार्तिकसे णिच् प्रत्यय करनेपर फिर किप प्रत्यय करके णिका लोप कर देने- 'पदं सात्वत्, तेषां पतिः योगक्षेमकर पर सात्वत् पद बनता है, उन सात्वतो- इति सात्वता पतिः ॥६७॥ के पति अर्थात् योगक्षेम करनेवाले होने से भगवान् सात्वतां पति है* ॥६७॥ * सात्वतवंशीय यादवोंके अथवा सात्वतों, (वैष्णवों) के स्वामी होनेसे भी भगवान् सात्वतां पति हैं। . - १७० विष्णुसहस्रनाम जीवो विनयितासाक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः । अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः॥ ६८ ॥ ५१३ जीवः, ५१४ विनयितासाक्षी, ५१५ मुकुन्द., ५१६ अमितविक्रमः । ५.७ अम्भोनिधिः,५१८ अनन्तात्मा, ५१९ महोदधिशयः, ५२० अन्तकः।। प्राणान् क्षेत्रज्ञरूपेण धारयन, क्षेत्रज्ञरूपसे प्राण धारण करनेके जीवः उच्यते। कारण जीव कहे जाते है। विनायित्वं विनयिता, तां च विनयिता विनयित्वको कहते है। प्रजाकी विनयिताको साक्षात् देखते है, साक्षात्पश्यति प्रजानामिति इसलिये विनयितासाक्षी है। गति- विनयितासाक्षी; अथवा, नयतेति- अर्थके वाचक नी धातुका रूप विनयिता वाचिनो रूपं विनयिता, असाक्षी आत्माके अतिरिक्त अन्य वस्तु न है और साक्षात् न देखनेवाले अर्थात् असाक्षाद्र्ष्टा आत्मातिरिक्तं वस्तु देखनेवालेको असाक्षी कहते है। न पश्यतीत्यर्थः। [ इस प्रकार विनयिता और असाक्षी ये दो नाम भी हो सकते है । मुक्तिं ददातीति मुकुन्दः, पृषो- मुक्ति देते है इसलिये मुकुन्द है। पृषोदरादिगणमे होने के कारण [मुक्तिद- दरादित्वात्साधुत्वम् । अक्षरसा- के स्थानमे ] मुकुन्द शब्दकी सिद्धि म्यान्निरुक्तिवचनात् नैरुक्तानां होती है। अक्षरोकी समानता और निरुक्तके वचनसे निरुक्तकारोने मुकुन्द मुकुन्द इति निरुक्तिः। कहा है। - - अमिता अपरिच्छिन्ना विक्रमा-' भगवान्के विक्रम अर्थात् तीन पाद- विक्षेप अमित यानी अपरिमित है, स्त्रयः पादविक्षेपा अस्य, अमित इसलिये वे अमितविक्रम है । अथवा विक्रमणं शौर्यमस्येति वा अमित- उनका विक्रम---शूरवीरता अतुलित विक्रमः है, इसलिये वे अमितविक्रम है।
शाङ्करभाष १७१ - अम्भांसि देवादयोऽस्मिन्नि अम्भ अर्थात् देवता आदि भगवान्- धीयन्त इति अम्भोनिविः, 'तानि | मे रहते है, इसलिये वे अम्भोनिधि वा एतानि चत्वार्यम्भांसि । देवा मनुष्याः है । श्रुति कहती है-'वे ये चार अम्भ हैं-देवता, मनुष्य, पितर पितरोऽसुराः' इति श्रुतेः । सागरो और असुर अथवा 'मैं सरोंमे वा, 'सरसामस्मि सागर.' (गीता १०१ सागर हूँ! इस भगवान्के वचनानुसार २४) इति भगवद्वचनात् । समुद्र ही अम्भोनिधि है। देशतः कालतो वस्तुतश्चापरि देश, काल और वस्तुसे अपरिच्छिन्न च्छिन्नत्वात् अनन्तात्मा । होनेके कारण भगवान् अनन्तात्मा है। संहृत्य सर्वभूतान्येकार्णवं जग समस्त भूतोका संहार कर सम्पूर्ण त्कृत्वा अधिशेते महोदधिमिति जगत्को जलमय करके महादधि महोदधिशयः । (समुद्र ) मे शयन करते है, इसलिये महोदधिशय है। अन्तं करोति भूतानामिति भूतोका अन्त करते है, इसलिये । 'तत्करोति तदाच?' अन्तक है । 'तत्करोति तदाचष्टेः इस वार्तिकसे णिच् प्रत्यय करनेके (चुरादिगणवार्तिकम् ) इति णिचि अनन्तर 'वुल्तृचौ सबसे ण्वुल 'ण्वुल्तृचौ' (पा० सू० ३ । १ । प्रत्यय हो जाता है और [णलकी १३३) इति 'युवोरनाको' (पा० सू० इत्संवा लोप होनेपर ] 'वु' का 'युवोरनाको' इस सत्रसे अक आदेश ७।१।१) इति अकादेशः॥६८॥' हो जाता है ॥६८|| अन्तकः अजो महाहः स्वाभाव्यो जितामित्रःप्रमोदनः । आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ॥ ६९ ॥ ५२१ अज', ५२२ महार्हः, ५२३ स्वाभाव्य., ५२४ जितामित्र., ५२५ प्रमोदन । ५२६ आनन्द., ५२७ नन्दन , ५२८ नन्द' (अनन्द ), ५२९ सत्यधर्मा, ५३० त्रिविक्रमः ॥
१७२ विष्णुसहस्रनाम आत् विष्णोरजायत इति अ अर्थात् विष्णुसे उत्पन्न हुआ है, कामः अजः ॥ इसलिये काम अज है। महः पूजा तदर्हत्वात् महार्हः । मह पूजाको कहते है, उसके योग्य होनेके कारण महाई है। खभावेनैवाभाव्यो नित्य नित्यसिद्ध होनेके कारण खभावसे ही निष्पन्नरूपत्वात् इति स्वाभाव्यः । उत्पन्न नही होते इसलिये स्वाभाव्य है। जिता अमित्रा अन्तर्वतिनो जिन्होने रागद्वेषादि आन्तरिक और रागद्वेषादयो बाह्याश्च रावणकुम्भ- रावणादि बाह्य अमित्र यानी शत्रु जीत कर्णशिशुपालादयो येनासौ जिता- लिये है वे भगवान् जितामित्र है। मित्रः । - खात्मामृतरसास्वादानित्यं प्रमो- अपने आत्मारूप अमृतरसका दते, ध्यायिनां ध्यानमात्रेण प्रमोदं है, अथवा अपने ध्यानमात्रसे ध्यानियो- आस्वादन करनेसे नित्य प्रमुदित होते करोतीति वा प्रमोदनः। को प्रमुदित करते है; इसलिये प्रमोदन है। आनन्दःस्वरूपमस्येति आनन्दः, भगवान्का खरूप आनन्द है, इस- 'एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रा- लिये वे आनन्द है। श्रुति कहती है- मुपजीवन्ति' (बृ० उ० ४ । ३ । 'इस आनन्दकी ही मात्राका आश्रय ३२) इति श्रुतेः। ले अन्य प्राणी जीवित रहते हैं। नन्दयतीति नन्दनः । आनन्दित करते है, इसलिये जन्दन है। सर्वाभिरुपपत्तिभिः समृद्धो नन्दः । सब प्रकारकी सिद्धियोसे सम्पन्न सुखं वैषयिकं नास्य विद्यत इति होनेसे नन्द है, अथवा भगवान्मे 'यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे विषयजन्य सुखका अभाव है, इस- सुखमस्ति' (छा० उ० ७। २३ । १) 'जो भूमा (पूर्णता) है वही सुख है, लिये वे अनन्द है । श्रुति कहती है इति श्रुतेः। अल्पमे सुख नहीं है। अनन्दः, 'यो शाङ्करभाष्य १७३ सत्या धर्मज्ञानादयोऽस्येति भगवान्के धर्म-ज्ञानादि गुण सत्य हैं सत्यधर्मा । इसलिये वे सत्यधर्मा है। त्रयो विक्रमाखिषु लोकेषु क्रान्ता जिनके तीन विक्रम (डग) तीनो यस्य स त्रिविक्रमः, 'त्रीणि पदा लोकोमे क्रान्त (व्याप्त) हो गये वे विचक्रम' इति श्रुतेः, त्रयो लोकाः भगवान् त्रिविक्रम है । श्रुति कहती क्रान्ता येनेति वा त्रिविक्रमः। है--'तीन पग चले' अथवा जिन्होने 'त्रिरित्येव त्रयो लोकाः तीनो लोकोका क्रमण (लद्धन) किया कीर्तिता मुनिसत्तमैः । है वे भगवान् त्रिविक्रम है। हरिवंशमे क्रमते तांत्रिधा सर्वा- कहा है-'मुनिश्रेष्ठोने 'त्रि' शब्दसे स्त्रिविक्रम इति श्रुतः ॥ तीन लोक कहे है आप उनका तीन (३ । ८८ । ५१) बार उल्लङ्घन कर जाते हैं इसलिये इति हरिवंशे ॥६९॥ त्रिविक्रम नामसे प्रसिद्ध है।' ||६९|| ५३१ महर्षिः महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः । त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत् ॥ ७० ॥ कपिलाचार्य, ५३२ कृतज्ञः, ५३३ मेदिनीपतिः । ५३४ त्रिपदः, ५३५ त्रिदशाध्यक्ष., ५३६ महाशृङ्ग', ५३७ कृतान्तकृत् ॥ महर्षिः कपिलाचार्यः इति सवि महर्षि कपिलाचार्य यह विशेषण- शेषणमेकं नाम। महांश्चासावृषिश्चेति सहित एक नाम है । जो महान् ऋषि महर्षिः कृत्स्नस्य वेदस्य दर्शनातः हो उसे महर्षि कहते है। सम्पूर्ण अन्ये तु वेदैकदेशदर्शनाद् ऋषयः वेदोको जाननेके कारण [कपिल कपिलश्चासौ सांख्यस्य शुद्धतत्त्व- महर्षि है ] और तो केवल वेदके एक विज्ञानस्याचार्यश्चेति कपिलाचार्यः, देशको जाननेके कारण ऋपि ही है। 'शुद्धात्मतत्त्वविज्ञानं जो कपिल है और साख्यरूप शुद्ध साख्यमित्यभिधीयते । तत्त्वविज्ञानके आचार्य भी है वे ही इति स्मृतेः कपिलाचार्य है। स्मृति कहती है- १७४ विष्णुसहस्रनाम - " 'ऋषि प्रसूतं कपिलम्' 'शुद्ध आत्मतत्त्वका विज्ञान सांख्य (श्वे० उ०५ ५।२) कहलाता है। श्रुतिमे भी कहा है- इति श्रुतेश्व, 'सिद्धानां कपिलो मुनिः' 'ऋषिरूपले उत्पन्न हुए कपिलको। (गीता १० । २६) तथा यह स्मृति (गीतावाक्य) भी है-- इति स्मृतेश्च 'सिद्धोंमे मैं कपिल मुनि हूँ" कृतं कार्य जगत्, ज्ञ आत्मा, कृत कार्यरूप जगत् और ज्ञ आत्मा- को कहते है, कृत भी है और ज्ञ भी कृतं च तत् ज्ञश्चेति कृतज्ञ.! है, इसलिये भगवान् कृतज्ञ है। मेदिन्या भूम्याः पतिः मेदिनी अर्थात् पृथ्वीके पति होनेसे मेदिनीपतिः । मेदिनीपति है। त्रीणि पदान्यस्येति त्रिपदः भगवान्के तीन पद है, इसलिये 'त्रीणि पदा विचक्रमे' इति श्रुतेः। वे त्रिपद है । श्रुति कहती है- 'तीन पग चले। गुणावेशेन सञ्जातास्तिस्रो दशा गुणके आवेशसे जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति-ये तीन दशा--अवस्थाएँ उत्पन्न अवस्था जाग्रदादयः, तासामध्यक्ष दुई; उनके अध्यक्ष (साक्षी) होनेसे इति त्रिदशाध्यक्षः। त्रिदशाध्यक्ष है। मत्स्यरूपी महति शृङ्गे प्रलया- भगवान्ने मत्स्यरूप होकर अपने म्भोधौ नावं बद्धा चिक्रीड इति महाशृङ्गमे नाव बाँधकर प्रलय-समुद्रमे महाशृङ्गः। क्रीडा की थी इसलिये वे महाङ्ग है। कृतस्यान्तं संहारं करोतीति, कृत (कार्यरूप जगत् ) का अन्त अर्थात् संहार करते है, इसलिये कृतान्तं मृत्यु कृन्ततीति वा कृता- कृतान्तकृत् है । अथवा कृतान्त- न्तकृत् ||७०॥ मृत्युको काटते है, इसलिये कृतान्त- कृत् है* ॥७॥ . * कृतान्त अर्थात् मृत्युके रचनेवाले होनेसे भी कृतान्तकृत हैं।
शाङ्करभाष्य .. - , महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी । गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ॥ ७१ ।। ५३८ महावराह . ७३९ गोविन्द , ५४० सुपेण . ५४१ कनकाङ्गदी। ५४२ गुद्यः, ५४३ गभीर.. ५४४ गहन , ५४५ गुप्त , ५४६ चक्रगदाधर ॥ महांश्चासौ वराहश्चेति महावराह. महान् और वराह भी है, इसलिये महावराह है। गोभिर्वाणीभिर्विन्दते, वेत्ति भगवान्को गो अर्थात वाणीसे प्राप्त वेदान्तवाक्यैरिति वा गोविन्दः । करते हैं अथवा वेदान्त-वाक्योसे जानते 'गोभिरेव यतो वेद्यो 'है इसलिये गोविन्द है । विष्णुतिलक- गोविन्दः समुदाहृतः । मे कहा है-'क्योकि वाणीहीसे वेद्य इति श्रीविष्णुतिलके । है, इसलिये वह गोविन्द कहलाता है।' शोभना सेना गणात्मिका जिनकी पार्पदरूप सुन्दर सेना है यस्येति सुपेण । भगवान् सुपेण है। कनकमयान्यङ्गदानि अस्येति जिनके कनकमय (सोनके ) अंगद कनकाङ्गदी। (भुजबन्ध ) है वे भगवान् कनकांगदी कहलाते है। रहस्योपनिषद्वद्यत्वाद्गुहायां गोपनीय उपनिषद् विद्यासे बोध्य होनेके कारण अथवा गुहा यानी हृदयाकाशे निहित इति वा गुह्यः । हृदयाकाशमे छिपे होनेके कारण वे । गुह्य है। । ज्ञानेश्वर्यवलवीर्यादिमिर्गम्भीरो ज्ञान, ऐश्वर्य,बल और पराक्रम आदि- गभीरः। के कारण गम्भीर होनेसे गभीर है। दुष्प्रवेशत्वाद् गहनः, अवस्था- कठिनतासे प्रवेश किये जाने योग्य होनेसे गहन है अथवा तीनो अवस्थाओ- त्रयभावाभावसाक्षित्वाद् गहनोवा। के भाव और अभावके साक्षी होनेसे । गहन है। - १७६ विष्णुसहस्रनाम -- वाङ्मनसागोचरत्वात् गुप्तः, वाणी और मनके अविषय होनेसे 'एष सर्वेषु भूतेषु गुप्त है । श्रुति कहती है-'सब भूतोंमें गूढोत्मा न प्रकाशते। छिपा हुआ यह आत्मा प्रकाशित (क० उ० ५। ३ । १२) नहीं होता।' इति श्रुतेः 'मनस्तत्त्वात्मकं चक्र 'मनस्तत्त्वरूप चक्र और बुद्धि- बुद्धितत्त्वात्मिकां गदाम् । तत्त्वरूप गदाको लोक-रक्षाके लिये धारयन् लोकरक्षार्थ- धारण करनेसे भगवान् चक्रगदाधर मुक्तः चक्रगदाधरः॥ कहलाते है' इस उक्तिके अनुसार इति चक्रगदाधरः ॥७॥ भगवान् चक्रगदाधर है ॥७॥ वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणोऽच्युतः। वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥७२॥ - ५४७ वेधाः, ५४८ खाङ्गः, ५४९ अजितः, ५५० कृष्णः, ५५१ दृढः, ५५२ सङ्कर्पणोऽच्युतः । ५५३ वरुणः, ५५४ वारुण.,५५५ वृक्षः, ५५६ पुष्कराक्षः, ५५७ महामना. ॥ विधाता वेधाः। पृषोदरादित्वा विधान करनेवाले है इसलिये वेधा है। पृषोदरादिगणमे होनेके कारण त्साधुत्वम् । वेधा शब्द शुद्ध माना जाता है। स्वयमेव कार्यकरणे अङ्गं सहका कार्यके करनेमे स्वयं ही अंग अर्थात् रीति स्वागः। उसके सहकारी है, इसलिये स्वाङ्ग है। न केनाप्यवतारेषु जित इति अपने अवतारोमे किसीसे नहीं जीते अजितः । गये, इसलिये अजित है। कृष्णः कृष्णद्वैपायनः, कृष्णद्वैपायन ही कृष्ण है; जैसा 'कृष्णद्वैपायन व्यासं कि विष्णुपुराणमे कहा है-कृष्ण- विद्धि नारायण प्रभुम् । द्वैपायन व्यासको प्रभु नारायण ही शाङ्करभाष्य १७७ को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षा जानो, भला भगवान् पुण्डरीकाक्ष- न्महाभारतकृद्भवेत् ॥ को छोड़कर महाभारतका रचने- (३।४।५) वाला और कौन हो सकता है ? इति विष्णुपुराणवचनात् । खरूपसामर्थ्यादेः प्रच्युत्य भगवान्के खरूप-सामर्थ्यादिकी भावाद् दृढः । कभी प्रच्युति (ह्रास) नही होती, इसलिये वे दृढ है। संहारसमये युगपत्प्रजाः संहारके समय एक साथ ही प्रजाका आकर्पण करते है इसलिये संकर्पण है सङ्कर्षतीति सङ्कर्षणा, न च्योतति तथा अपने पदसे च्युत नही होते इसलिये खरूपादित्यच्युतः, सङ्कर्षणोऽच्युतः अच्युत है । इस प्रकार सङ्कर्षणो- इति नामैकं सविशेषणम् । ऽच्युतः-यह विशेपणसहित एक नाम है। स्वरश्मीनां संवरणात्सायङ्गतः अपनी किरणोका संवरण सूर्यो वरुणः (संकोच) करनेके कारण सायंकालीन 'इमं मे वरुण श्रुधी हवम्' सूर्य वरुण है । इस विपयमे यह मन्त्र- इति मन्त्रवर्णात् । वर्ण है-इम मेवरुण श्रुधी हवम्' इति वरुणस्यापत्यं वसिष्ठोऽगस्त्यो वरुणके पुत्र वसिष्ठ या अगस्त्य वा वारुणः । वारुण है। वृक्ष इवाचलतया स्थित इति वृक्षके समान अचल-भावस स्थित है वृक्ष', 'वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकः' | इसलिये वृक्ष है । श्रुति कहती है- 'वर्गमे वृक्षके समान स्तब्ध एक (श्वे० उ० ३ । ९) इति श्रुतेः । परमात्मा] स्थित है। व्याप्त्यर्थादक्षतेर्धातोः पुष्क जिसका उपपद (पूर्ववर्ती शब्द) पुष्कर है उस व्याप्ति अर्थवाले असू रोपपदादण्प्रत्यये पुष्कराक्षःहृदय- धातुसे अण* प्रत्यय करनेपर पुष्कराक्ष 8 'कर्मण्यण' (पा० सू० ३।२।१) सूत्रसे यहाँ अण् प्रत्यय हुआ है। १२ १७८ विष्णुसहस्रनाम पुण्डरीके चिन्तितः, स्वरूपेण शब्द सिद्ध होता है । हृदय-कमलमें चिन्तन किये जाते है अथवा चित्स्व- प्रकाशत इति चा पुष्कराक्षः। रूपसे प्रकाशित होते है, इसलिये पुष्कराक्ष है । सृष्टिस्थित्यन्तकर्माणि मनसैव सृष्टि, स्थिति और अन्त ये तीनो करोतीति महामनाः; कर्म मनसेही करते है इसलिये महामना 'मनसैव जगत्सृष्टिं है। विष्णुपुराणमे कहा है-'जो मनसे संहारं च करोति यः।' ही जगतकी उत्पत्ति और संहार इति विष्णुपुराणे ॥७२॥ करता है।॥७२॥ "DAROOK भगवान्भगहानन्दी वनमाली हलायुधः। आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥ ७३ ।। ५५८ भगवान्, ५५९ भगहा, ५६० आनन्दी, ५६१ वनमाली, ५६२ हलायुधः । ५६३ आदित्यः, ५६४ ज्योतिरादित्यः, ५६५ सहिष्णुः, ५६६ गतिसत्तमः ॥ 'ऐश्वर्यस्य समग्रस्य 'सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, धर्मस्य यशसः श्रियः । ज्ञान और वैराग्य-इन छ.का नाम ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा ।। भग है' यह [इस वाक्यमे कहा हुआ] (विष्णु० ६।५।७४) भग जिसमे है वही भगवान् है । अथवा सोऽस्यास्तीति भगवान् । 'उत्पत्तिं प्रलयं चैव विष्णुपुराणमें कहा है-'उत्पत्ति, प्रलय, भूतानामगतिं गतिम् । प्राणियोका आना और जाना, तथा वेत्ति विद्यामविद्यां च विद्याऔर अविद्याको जो जानता है स वाच्यो भगवानिति ॥ (६ ।। ७८) उसे भगवान् कहना चाहिये ।। इति विष्णुपुराणे । ® पुष्कर अर्थात् कमलके समान नेत्रवाले हैं, इसलिये भी पुष्कगक्ष हैं। - " शाङ्करभाष्य १७६ ऐश्वर्यादिकं संहारसमये हन्तीति संहारके समय ऐश्वर्य आदिका हनन करते है, इसलिये भगहा है। भगहा। सुखस्वरूपत्वात् आनन्दी, सर्व सुखरूप होनेसे आनन्दी है । सम्पत्समृद्धत्वादानन्दी वा । अथवा सम्पूर्ण सम्पत्तियोसे सम्पन्न होनेके कारण आनन्दी है। भूततन्मात्ररूपां वैजयन्त्याख्या भूततन्मात्राओकी बनी हुई वैजयन्ती नामकी वनमाला धारण करनेसे वनमालां वहन् वनमाली। भगवान् वनमाली कहलाते है। हलमायुधमस्येति हलायुधः हल ही जिनका आयुध (शस्त्र) बलभद्राकृतिः। है वे बलभद्रखरूप भगवान् हलायुध है। अदित्यां कश्यपाद्वामनरूपेण कश्यपजीके द्वारा वामनरूपसे अदितिके [गर्भसे] उत्पन्न हुए थे, इसलिये जात आदित्यः । आदित्य है। ज्योतिषि सवितमण्डले स्थिती सूर्यमण्डलान्तर्गत ज्योतिमे स्थित ज्योतिरादित्य. । है, इसलिये ज्योतिरादित्य है। इन्द्वानि शीतोष्णादीनि सहत शीतोष्णादि द्वन्द्वोको सहन करते है, इसलिये सहिष्णु है। इति सहिष्णुः । गतिश्चासौ सत्त- गति है और सर्वश्रेष्ठ है, इसलिये मश्चेति गतिसत्तमः ॥७३॥ गतिसत्तम है ॥७३॥ सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः । दिवःस्पृक्सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः॥७४॥ ५६७ सुधन्वा, ५६८ खण्डपरशुः (अखण्डपरशुः),५६९ दारुण , ५७० द्रविण- प्रदः । ५७१ दिव स्मृक् , ५७२ सर्वदृग्व्यास , ५७३ वाचस्पतिरयोनिजः ॥ शोभनमिन्द्रियादिमयं शाई भगवान्का इन्द्रियादिमय सुन्दर धनुरस्यास्तीति सुधन्वा । शाह धनुष है, इसलिये वे सुधन्वा है। - १८० विष्णुसहस्रनाम शत्रूणां खण्डनात् खण्डः परशु शत्रुओका खण्डन करनेसे जिन रस्य जामदग्न्याकृतेरिति खण्डपरशुः; परशुरामस्वरूप भगवानका परशु खण्ड अखण्डः परशुरस्येति वा [अखण्ड- कहलाता है वे खण्डपरशु है; अथवा जिनका परशु अखण्ड अर्थात् अखण्डित परशुः]। है वे भगवान् अखण्डपरशु है । सन्मार्गविरोधिनां दारुणत्वात् सन्मार्गके विरोधियोके लिये दारुण दारुणः । (कठोर ) होनेके कारण दारुण है। द्रविणं वाञ्छितं भक्तेभ्यः प्रद भक्तोको द्रविण अर्थात् इच्छित धन दातीति द्रविणप्रदः। देते है, इसलिये द्रविणप्रद है । दिवः स्पर्शनात् दिवःस्पृक् । दिव (स्वर्ग) का स्पर्श करनेसे दिवःस्पृक् है। सर्वशां सर्वज्ञानानां विस्तार सर्वदृक् अर्थात् सम्पूर्ण ज्ञानोंका कृद्वथासः सर्वदृग्व्यासः । अथवा, विस्तार करनेवाले–व्यास है; इसलिये सर्वा च सा दृश्चेति सर्वदृक् सर्वा- सर्वदृग्व्यास है । अथवा जो सर्व है और दृक् है वह सर्वाकार ज्ञान ही सर्वद्वक् कारं ज्ञानम् ; सर्वस्य दृष्टित्वाद्वा है। अथवा सबकी दृष्टि होनेके कारण सर्वदृक् । ऋग्वेदादिविभागेन भगवान् सर्वदक है । जिन्होने ऋग्वेदादि चतुर्धा वेदा व्यस्ताः कृताः, आयो विभागसे वेदको चार भागोमे विभक्त वेद एकविंशतिधा कृतः, द्वितीय किया, फिर शाखा-भेदसे उनमेसे प्रथम एकोत्तरशतधा कृतः, सामवेदः (ऋग्वेद ) के इक्कीस भाग किये, दूसरे (यजुर्वेद) के एक सौ एक भाग किये, सहस्रधा कृतः, अथर्ववेदो नवधा सामवेदको सहस्र भागोमे वॉटा और शाखाभेदेन कृतः। एवम् अन्यानि अथर्ववेदके नौ शाखा-भेद किये; इसी च पुराणानि व्यत्तान्यनेनेति व्यासः प्रकार अन्य पुराणोका भी विभाग ब्रह्मा। किया; इसलिये वह्माजी ही व्यास है। वाचस्पतिरयोनिजः; वाचो विद्या वाक् अर्थात् विद्याके पति होनेसे याः पतिः वाचस्पतिः, जनन्यां वाचस्पति है और जननीसे जन्म नही शाङ्करंभाष्य १८१ न जायत इति अयोनिजः, इति लेते, इसलिये अयोनिज है । इस प्रकार सविशेषणमेकं नाम ||७४॥ वाचस्पतिरयोनिजः यह विशेषण- सहित एक नाम है ।।७४ ॥ त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् । संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम्॥५॥ ५७४ त्रिसामा, ५७५ सामग', ५७६ साम, ५७७ निर्वाणम् , ५७८ भेपजम् , ५७९ मिपक् । ५८० संन्यासकृत् , ५८१ शमः, ५८२ शान्तः, ५८३ निष्ठा, ५८४ शान्ति., ५८५ परायणम् ॥ देवव्रतसमाख्यातैत्रिभिः सा देवव्रत नामक तीन सामोद्वारा मभिः सामगैः स्तुत इति त्रिसामा। सामगान करनेवालोसे स्तुति किये जाते है, इसलिये त्रिसामा है। साम गायतीति सामगः। सामगान करते है इसलिये सामग है। 'वेदानां सामवेदोऽस्मि' (गीता 'वेदोंमे मैं सामवेद हूँ भगवानके १० । २२) इति भगवदचनात् सामवेदः साम । इस वचनानुसार सामवेद ही साम है। सर्वदुःखोपशमलक्षणं परमा सब दुःखोसे रहित परमानन्दवरूप नन्दरूपं निर्वाणम् । ब्रह्म ही निर्वाण है। संसाररोगस्यौषधं भेषजम् । संसाररूप रोगकी औषध होनेसे भेषज है। संसाररोगनिर्मोक्षकारिणी परां गीतामे संसाररूप रोगसे छुडानेवाली विद्यामुपदिदेश गीतास्विति भिषक्, परा विद्याका उपदेश किया है, इसलिये 'भिषक्तमं त्वा भिषजा शृणोमि' इति भगवान् भिषक् है । श्रुति कहती है- 'वैद्योमे मैं तुम्हें सबसे बड़ा वैद्य श्रुतेः। सुनता हूँ।"
१८२ विष्णुसहस्त्रनाम मोक्षार्थ चतुर्थमाश्रमं कृतवा- निति संन्यासकृत् । मोक्षके लिये चतुर्थाश्रम (संन्यास) की रचना की है इसलिये संन्यासकृत् है ।* संन्यासिनां प्राधान्येन ज्ञान- संन्यासियोको ज्ञानके साधन शम- साधनं शममाचष्ट इति शमः, का विशेषरूपसे उपदेश दिया इसलिये 'यतीनां प्रशमो धर्मों भगवान् शम है । स्मृतिमे कहा है- नियमो वनवासिनाम् । 'यतियोंका धर्म शम है, वनवासियो- का नियम है, गृहस्थोका दान है और दानमेव गृहस्थानां ब्रह्मचारियोका गुरु-शुश्रूषा ही परम शुश्रूषा ब्रह्मचारिणाम् ।। धर्म है। इस शब्दमे 'तत्करोति तदाचष्टे' इति स्मृतेः । 'तत्करोति तदाचष्टे इस वार्तिकसे णिच् कर देनेपर [शमयति होता है ] उसे पचादि मान- (चुरादिगणवार्तिकम् ) इति णिचि कर अच् प्रत्यय करनेसे 'शम' पद सिद्ध पचाद्यचि कृते रूपं शम इति होता है। अथवा सब प्राणियोका सर्वभूतानां शमयितेति वा शमः । शमन करनेवाले है, इसलिये शम है । विषयसुखेष्वसङ्गतया शान्तः, विषयसुखोमे अनासक्त होनेके 'निष्कलं निष्क्रिय शान्तम्' (श्वे० उ० कारण शान्त है । श्रुति कहती है- ६।१९) इति श्रुतेः। 'परब्रह्म कलारहित, क्रियारहित और शान्त है। प्रलये नितरां तत्रैव तिष्ठन्ति प्रलयकालमे प्राणी सर्वथा भगवान्मे भूतानीति निष्ठा । ही स्थित रहते है, इसलिये वे निष्ठा है। समस्ताविद्यानिवृत्तिः शान्तिः सम्पूर्ण अविद्याकी निवृत्ति ही सा ब्रह्मैव । शान्ति है, वह शान्ति ब्रह्मरूप ही है । * नर-नारायणरूपसे भगवान्ने संन्यास ग्रहण किया था, इसलिये भी वे संन्यासकृत् हैं।
शाङ्करभाष्य १८३ परमुत्कृष्टमयनं स्थानं पुनरावृ पुनरावृत्तिकी शकासे रहित परम- त्तिशङ्कारहितमिति परायणम् । उत्कृष्ट अयन अर्थात् स्थान है, इसलिये पुंल्लिङ्गपक्षे बहुव्रीहिः ॥७५॥ परायण है। यदि [परायणम्के स्थानमे परायण ऐसा] पुंल्लिंग पाठ हो तो बहुव्रीहिसमांस करना चाहिये ॥७५|| शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः । गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ।। ७६ ॥ ५८६ शुभाङ्गः, ५८७ शान्तिद', ५८८ स्रष्टा, ५८९ कुमुदः, ५९० कुवलेशयः । ५९१ गोहित..५९२ गोपतिः, ५९३ गोप्ता, ५९४ वृपभाक्ष., ५९५ वृपप्रिय.।। सुन्दरां तनुं धारयन् शुभाङ्गः। सुन्दर शरीर धारण करनेके कारण भगवान् शुभाङ्ग है। रागद्वेषादिनिर्मोक्षलक्षणां शा राग-द्वेपादिसे मुक्त हो जानारूप न्तिं ददातीति शान्तिदः । शान्ति देते है, इसलिये शान्तिद है । सर्गादौ सर्वभूतानि ससर्जेति सर्गके आरम्भमे सब भूतोको रचा स्रष्टा । है, इसलिये स्रष्टा है। को भूम्यां मोदत इति कुमुदः । कु अर्थात् पृथिवीमे मुदित होते है, इसलिये कुमुद है। कोः क्षितेलनात् संसरणात् कु अर्थात् पृथिवीका वलन करने कुवलं जलम् , तस्मिन् शेत इति (घेरने ) से जल कुवल कहलाता है, उसमे शयन करते है इसलिये कुवलेशय कुवलेशयः, 'शयवासवासिष्यकालात्' है । 'शयवालवासिष्वकालात्' इस (पा० सू० ६।३ । १८) इति सूत्रके अनुसार यहाँ सप्तमीका लुक् (लोप) नहीं हुआ। अथवा कुवल अर्थात् अलुक् सप्तम्या:; कुवलस्य बदरी बदरीफलके मध्यमे तक्षक शयन करता * तब इसका विग्रह इस प्रकार होगा-परम् अयनं यस्य सः; अर्थात् जिसका अयन (निवासस्थान) परम (उत्कृष्ट ) हो, वह ।
विष्णुसहस्रनाम फलस्य मध्ये शेते तक्षकः, सोऽपि है, वह भी भगवान्की विभूति ही है, तस्य विभूतिरिति वा हरिः कुव- | इसलिये भी श्रीहरि कुवलेशय है। अथवा कु अर्थात् पृथिवीका आश्रय लेशयः ; को भूम्यां वलते संश्रयत लेनेके कारण सर्पोका उदर कुवल इति सणामुदरं कुवलम् , तस्मिन् कहलाता है, उसपर-शेपोदरपर शयन शेषोदरे शेत इति कुवलेशयः । करते है, इसलिये कुवलेशय है । गवां वृद्धयर्थ गोवर्धनं धृतवा- गौओकी वृद्धिके लिये गोवर्धन धारण निति गोभ्यो हितो गोहितः; गोभूमेः किया था अतः गौओके हितकारी होनेसे भगवान् गोहित है। अथवा भारावतरणेच्छया शरीरग्रहणं गो-पृथिवीका भार उतारनेके लिये कुर्वन्वा गोहितः। अपनी इच्छासे शरीर धारण करनेके कारण गोहित है। गोर्भूम्याः पतिः गोपतिः । गो अर्थात् भूमि आदिके पति होनेके कारण भगवान् गोपति है। रक्षको जगत इति गोप्ता। जगत्के रक्षक है इसलिये गोता है। स्वमायया स्वमात्मानं संवृणोतीति अथवा अपनी मायासे अपनेको ढंक वा गोता। लेते है, इसलिये गोप्ता है। भगवान्की अक्षि सकलान् कामान् वधूके अक्षिणी अक्षि (ऑखे ) सम्पूर्ण कामनाओको बरसानेवाली है, अस्येति, वृषभो धर्मः स एव वा इसलिये अथवा वृप धर्मको कहते है दृष्टिरस्येति वृपभाक्षः। और वही उनकी दृष्टि है, इसलिये वे वृषभाक्ष है। वृषो धर्मः प्रियो यस्य स वृष- जिन्हे वृप अर्थात् धर्म प्रिय है वे भगवान् वृषप्रिय है । 'वा प्रियस्या प्रियः; 'वा प्रियस्य' (वार्तिकम् ) इस वार्तिकके अनुसार प्रिय शब्दके इति पूर्वनिपातविकल्पविधानात् । पूर्वनिपातका विकल्प होनेसे यहाँ ® यह वार्तिक 'सप्तमीविशेषणे बहुव्रीहौ' (पा० सू० २।२ । ३५) सूत्रके ऊपर है।
शाङ्करभाष्य १८५ परनिपातः, वृषश्चासौ प्रियश्चेति परनिपात हुआ है । अथवा जो वृष वा ॥ ७६॥ एवं प्रिय भी है [ वे भगवान् वृपप्रिय हे ] ॥७६॥ अनिवर्ती निवृत्तात्मा सङ्क्षप्ता क्षेमकृच्छिवः । श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः।। ७७ ।। ५९६ अनिवर्ती, ५९७ निवृत्तात्मा. ५९८ सङ्खप्ता, ५९९ क्षेमकृत् , ६०० शिवः । ६०१ श्रीवत्सवक्षाः, ६०२ श्रीवास..६०३ श्रीपति., ६०४ श्री- मता वरः ॥ देवासुरसामान निवर्तत इति देवासुरसंग्रामसे पीछे नहीं हटते, अनिवर्ती, वृषप्रियत्वाद्धर्मान्न निव- इसलिये अनिवती है; अथवा धर्मप्रिय तत इति वा। होनेके कारण धर्मसे विमुख नहीं होते इसलिय अनिवती है। स्वभावतो विषयेभ्यो निवृत्त भगवान्का आत्मा यानी मन स्व- आत्मा मनोऽस्येति निवृत्तात्मा । भावसे ही विषयोसे निवृत्त (हटा हुआ) है, इसलिये वे निवृत्तात्मा है। विस्तृतं जगत् संहारसमये संहारके समय विस्तृत जगत्को सूक्ष्मरूपेण सङ्क्षिपन् सङ्क्षप्ता। सूक्ष्मरूपसे संक्षिप्त करते है, इसलिये संक्षेप्ता है। उपात्तस्य परिरक्षणं करोतीति प्राप्त हुए पदार्थकी रक्षा [ अर्थात् क्षेम] करते है, इसलिये क्षेमकृत् है । स्वनामस्मृतिमात्रेण पावयन् अपने नामस्मरणमात्रसे पवित्र करने- के कारण शिव है। इति नाम्नां षष्ठं शतं विवृतम् । यहॉतक सहस्रनामके छठे शतकका क्षेमकृत् । - शिवः । विवरण हुआ।
.१८६ विष्णुसहस्रनाम श्रीवत्ससंज्ञं चिह्नमस्य वक्षसि भगवान्के वक्षःस्थलमे श्रीवत्स नामक स्थितमिति श्रीवत्सवक्षाः । चिह्न है, इसलिये वे श्रीवत्सवक्षा है। अस्य वक्षसि श्रीरनपायिनी उनके वक्षःस्थलमे कभी नष्ट न होने- वसतीति श्रीवासः । वाली श्री निवास करती है, इसलिये वे श्रीवास है। अमृतमथने सर्वान् सुरासुरादीन् अमृतमन्थनके समय श्रीने सुर- विहाय श्रीरेनं पतित्वेन वरया- असुर सवको छोडकर भगवान्को ही पतिरूपसे वरण किया था, इसलिये वे मासेति श्रीपतिः । श्रीः पराशक्तिः, श्रीपति है। अथवा श्री पराशक्तिको तस्याः पतिरिति वा, 'परास्य शक्ति- कहते है, उसके पति होनेके कारण विविधैव श्रूयते' (श्वे० उ० ६ । ८) श्रीपति है; जैसा कि श्रुति कहती है- 'उस (ईश्वर) की पराशक्ति अनेक इति श्रुतेः। प्रकारकी ही सुनी जाती है ।। ऋग्यजुःसामलक्षणा श्रीर्येषां जिनकी ऋक्, यजुः और सामरूप तेषां सर्वेषां श्रीमतां विरिश्चथा- श्री है उन ब्रह्मा आदि श्रीमानोमे प्रधान दीनां प्रधानभूतः श्रीमतां वरः,'ऋचः | होनेसे भगवान् श्रीमतांवर है । श्रुति सामानि यजूषि । सा हि श्रीरमृता | कहती है-'क्, साम और यजुः ही सनाम्' इति श्रुतेः ॥७७॥ सत्पुरुषोंकी अमर श्री है ॥७७॥ - श्रीदः श्रीशःश्रीनिवासःश्रीनिधिःश्रीविभावनः । श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः॥ ७८ ॥ ६०५ श्रीदः, ६०६ श्रीशः, ६०७ श्रीनिवासः, ६०८ श्रीनिधि., ६०९ श्रीविभावनः । ६१० श्रीधरः, ६११ श्रीकरः, ६१२ श्रेयः, ६१३ श्रीमान् , ६१४ लोकत्रयाश्रयः ॥ श्रियं ददाति भक्तानामिति भक्तोंको श्री देते है इसलिये श्रीद है। श्रीदः ।
शाङ्करभाष्य
श्रिय ईशः श्रीशः !
श्रीके ईश होनेसे श्रोश है।
श्रीमत्सु नित्यं वसतीति श्री श्रीमानोंमे नित्य निवास करते है,
निवासः। श्रीशब्देन श्रीमन्तो इसलिये श्रीनिवास है । (यहाँ) श्री
लक्ष्यन्ते।
शब्दसे श्रीमान् लक्षित होते है।
सर्वशक्तिमयेऽसिन्नखिला श्रियो इन सर्वशक्तिमान् ईश्वरमे सम्पूर्ण
निधीयन्त इति श्रीनिधिः । श्रियाँ एकत्रित है, इसलिये ये
श्रीनिधि है।
कर्मानुरूपेण विविधाः श्रियः समस्त भूतोको उनके कर्मानुसार
सर्वभूतानां विभावयतीति श्री- | विविध प्रकारकी श्रियों देने है, इसलिये
विभावनः ।
श्रीविभावन है।
सर्वभूतानां जननीं श्रियं वक्षसि सम्पूर्ण भूतोकी जननी श्रीको
वहन् श्रीधरः ।
छातीमे धारण करने के कारण श्रीधर है।
सरतां स्तुवताम् अर्चयतां स्मरण, स्तवन और अर्चन करने-
च भक्तानां श्रियं करोतीति वाले भक्तोको श्रीयुक्त करते हैं, इसलिये
श्रीकरः।
श्रीकर है।
अनपायिसुखावाप्तिलक्षणं श्रेयः,
कभी नष्ट न होनेवाले सुखका
प्राप्त होना ही श्रेय है, और वह
तच्च परस्यैव रूपमिति श्रेयः ।
परमात्माका ही स्वरूप है, इसलिये वे
श्रेय है।
श्रियोऽस्य सन्तीति श्रीमान् । भगवान्मे श्रियाँ है, इसलिये वे
श्रीमान है।
त्रयाणां लोकानाम् आश्रयत्वात् तीनो. लोकोके आश्रय होनेसे
लोकत्रयाश्रयः ।।७८॥
लोकत्रयाश्रय है ||७८॥
वक्षः खङ्गः शतानन्दो नन्दिज्योतिर्गणेश्वरः ।
विजितात्माविधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः॥ ७९ ॥
१८८ विष्णुसहस्रनाम - , ६१५ वक्षः, ६१६ खङ्गः, ६१७ शतानन्दः, ६१८ नन्दिः, ६१९ ज्योति- गणेश्वरः । ६२० विजितात्मा, ६२१ अविधेयात्मा, ६२२ सत्कीर्तिः, ६२३ छिन्नसंशयः ॥ शोभने पुण्डरीकामे अक्षिणी भगवान्की अक्षि (आँखें) कमलके अस्येति वक्षः। समान सुन्दर है, इसलिये वे स्वक्ष है। शोभनान्यज्ञानि अस्येति खगः। उनके अंग सुन्दर है, इसलिये वे स्वङ्ग है। एक एव परमानन्द उपाधि- वे एक ही परमानन्दस्वरूप भगवान् भेदाच्छतधा भिद्यत इति शतानन्दः उपावि-भेदसे सैकड़ो प्रकारके हो 'एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रा- जाते है, इसलिये शतानन्द है । श्रुति मुपजीवन्ति' (बृ० उ०४ । ३ । ३२) कहती है-'इस आनन्दकी मात्राके ही इति श्रुतेः। । सहारे अन्य प्राणी जीते है।। परमानन्दविग्रहो नन्दिः । परमानन्दरूप होनेसे भगवान् है ज्योतिर्गणानामीश्वरः ज्योति ज्योतिर्गणों (नक्षत्रगणो) के ईश्वर गणेश्वरः। तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्' होनेसे वे ज्योतिर्गणेश्वर है; जैसा कि श्रुति कहती है-'उसके भासनेपर (क० उ० २।५।१५) इति श्रुतेः, ही सब भासते हैं। तथा स्मृतिका 'यदादित्यगतं तेजः' (गीता १५ । भी कथन है-'जो आदित्यमे स्थित १२) इत्यादिस्मृतेश्च । तेज है। इत्यादि । विजित आत्मा मनो येन स जिन्होने आत्मा अर्थात् मनको विजितात्मा। जीत लिया है वे भगवान् विजि- तात्मा है। न केनापि विधेय आत्मा भगवान्का आत्मा अर्थात् खरूप किसीके द्वारा विधिरूपसे नही कहा स्वरूपमस्यति अविधेयात्मा । जा सकता इसलिये वे अविधेयात्मा है।
शाङ्करभाष्य सती अवितथा कीर्तिररयेति भगवान्की कीर्ति सती अर्थात् सत्य सत्कीर्तिः । है, इसलिये वे सत्कीर्ति है। करतलामलकवत्सर्व साक्षात्कृत हाथपर रखे हुए ऑवलेके समान वतः क्वापि संशयो नास्तीति सबको साक्षात् देखनेवाले भगवानको कोई संशय नहीं है, इसलिये वे छिन्नसंशयः ॥७९॥ छिन्नसशय है ||७९|| " - उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः । भूशयो भूषणो भूतिविंशोकः शोकनाशनः ॥ ८ ॥ ६२४ उदीर्ण., ६२५ सर्वतश्चक्षुः, ६२६ अनीशः, ६२७ शाश्वतस्थिरः । ६२८ भूशय., ६२९ भूपण., ६३० भूतिः, ६३१ विशोकः, ६३२ शोकनाशन || सर्वभूतेभ्यः समुद्रिक्तत्वात् सब प्राणियोसे उत्कृष्ट होने के कारण उदीर्णः । उदीर्ण है। सर्वतः सर्व स्वचैतन्येन पश्य अपने चैतन्यस्वरूपसे सब ओरसे सबको देखते है, इसलिये सर्वतश्चक्षु तीति सर्वतश्चक्षुः, 'विश्वतश्चक्षुः' है । श्रुति कहती है-'ईश्वर सव ओर (श्वे० उ० ३ । ३) इति श्रुतेः। नेत्रवाला है। न विद्यतेऽस्येश इति अनीश. भगवान्का कोई ईश नहीं है इसलिये 'न तस्येशे कश्चन' (ना० उ०२) वे अनीश है; जैसा कि श्रुति कहती है- [इति श्रुते॥ 'उसका कोई ईश्वर नहीं हुआ। शश्वद्भवन्नपि न विक्रियां कदा- नित्य होनेपर भी कभी विकारको चिदुपैति इति शाश्वतस्थिरः इति प्राप्त नहीं होते, इसलिये शाश्वतस्थिर नामैकम् । हैं। यह एक नाम है। लको प्रति मार्गमन्वेषयन् लड्काके लिये मार्ग निकालनेके समय सागरं प्रति भूमौ शेत इति भूशयः। समुद्रतटपर भूमिपर सोये थे, इसलिये भूशय है।
M विष्णुसहस्त्रनाम स्वेच्छावतारैः बहुभिः भूमि अपनी इच्छासे बहुत-से अवतार भूषयन् भूपणः। लेकर पृथिवीको भूपित करनेके कारण भगवान् भूषण है। भूतिः भवनं सत्ता, विभूति भवन (होना) सत्ता या विभूतिरूप होनेसे भूति है । अथवा समस्त सर्वविभूतीनां कारणत्वाद्वा भूतिः। विभूतियोंके कारण होनेसे भूति है। विगतः शोकोऽस्य परमानन्दै परमानन्दस्वरूप होनेसे भगवान्का शोक विगत हो गया है, इसलिये वे करूपत्वादिति विशोकः । विशीक है। स्मृतिमात्रेण भक्तानां शोक अपने स्मरणमात्रसे भक्तोका शोक नष्ट कर देते है, इसलिये शोकनाशन नाशयतीति शोकनाशनः ॥८॥ है ||८०॥ , अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः । अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ॥ ८१॥ ६३३ अर्चिष्मान् , ६३४ अर्चितः, ६३५ कुम्भः, ६३६ विशुद्धात्मा, ६३७ विशोधनः । ६३८ अनिरुद्धः, ६३९ अप्रतिरथः, ६४० प्रद्युम्नः, ६४१ अमितविक्रमः ।। अर्चिष्मन्तो यदीयेनार्चिषा जिनकी अर्चियो (किरणो) से चन्द्रसूर्यादयः, स एव मुख्यः सूर्य, चन्द्र आदि अर्चिष्मान् हो रहे है अर्चिष्मान् । वे भगवान् ही मुख्य अर्चिष्मान है। सर्वलोकाचितैर्विरिश्चयादिभिर ब्रह्मा आदि सम्पूर्ण लोकोसे अर्चित प्यर्चित इति अर्चितः । (पूजित ) है, इसलिये अचित है। कुम्भवदसिन् सर्व प्रतिष्ठित कुम्भ (घड़े) के समान भगवान्मे मिति कुम्भः। सब वस्तुएँ स्थित है, इसलिये वे शाङ्करभाष्य १६१ गुणत्रयातीततया विशुद्धश्चासा तीनो गुणोसे अतीत होनेके कारण वात्मेति विशुद्धात्मा । भगवान् विशुद्ध आत्मा है, इसलिये वे विशुद्धात्मा है। स्मृतिमात्रेण पापानां क्षपणात् अपने स्मरणमात्रसे पापोका नाश विशोधनः कर देनेके कारण विशोधन है। चतुर्वृहेषु चतुर्थो व्यूहः [ वासुदेव, संकर्पण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध-इन ] चार व्यहोमेसे चौथा अनिरुद्धः, न निरुद्धयते शत्रुभिः व्यूह अनिरुद्ध है। अथवा अपने कदाचिदिति वा। शत्रुओद्वारा कमी रोके नहीं जाते, इसलिये अनिरुद्ध है। प्रतिरथः प्रतिपक्षोऽस्य न भगवान्का कोई प्रतिरथ अर्थात् विद्यत इति अप्रतिरथः । प्रतिपक्ष (विरुद्धपक्ष ) नहीं है, इसलिये वे अप्रतिरथ है। प्रकृष्टं द्युम्नं द्रविणमस्येति भगवान्का घुम्न-धन प्रकृष्ट (श्रेष्ठ) प्रद्युम्नः; चतुर्ग्रहात्मा वा। है, इसलिये वे प्रद्युम्न है । अथवा चतु- यूंहके अन्तर्वर्ती प्रद्युम्न है। अमितोऽतुलितो विक्रमोऽस्य उनका विक्रम (पुरुपार्थ या डग) इति अमितविक्रमः, अहिंसितविक्रमो अपरिमित है, इसलिये वे अमित- विक्रम है। अथवा उनका विक्रम वा ॥८॥ अहिसित-अप्रतिहत है, इसलिये अमितविक्रम है ॥८॥ कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः । त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः॥ २॥ ६४२ कालनेमिनिहा, ६४३ वीर., ६४४ शौरि , ६४५ शूरजनेश्वरः । ३४६ त्रिलोकात्मा, ६४७ त्रिलोकेश', ६४८ केशव',६४९ केशिहा, ६५० हरिः ।।
१९२ विष्णुसहस्रनाम - वीरः शूरा। कालनेमिमसुरं निजघानेति भगवान्ने कालनेमि नामक असुर- कालनेमिनिहा। का हनन किया था, इसलिये वे कालनेमिनिहा है। शूर होनेके कारण वीर है। शूरकुलोद्भवत्वात् शौरिः । शूरकुलमे उत्पन्न होनेके कारण भंगवान् शौरि है। शूरजनानां वासवादीनां शौर्या अतिशय शौर्यके कारण इन्द्र आदि तिशयेनेष्ट इति शूरजनेश्वरः । शूरवीरोका भी शासन करते है, इसलिये शूरजनेश्वर है। त्रयाणां लोकानाम् अन्तया- अन्तर्यामीरूपसे अन्तर्यामीरूपसे तीनो लोकोके मितया आत्मेति, त्रयो लोका आत्मा होनेके कारण अथवा तीनो अस्मात्परमार्थतो न भिद्यन्त इति लोक वास्तवमे उनसे पृथक् नही है, वा त्रिलोकात्मा । इसलिये वे त्रिलोकात्मा है। त्रयो लोकास्तदाज्ञप्ताः स्वेपु भगवान्की आज्ञासे तीनो लोक स्वेषु कर्मसु वर्तन्त इति त्रिलोकेशः ।। अपने-अपने कार्योंमे लगे रहते है, इसलिये वे त्रिलोकेश है। केशसंज्ञिताः सूर्यादिसङ्क्रान्ता सूर्यादिसङ्क्रान्ता | सूर्यादिके अन्दर व्याप्त हुई किरणे केश अंशवा, तद्वत्तया केशवः; कहलाती है, उनसे युक्त होनेके कारण 'अंशवो ये प्रकाशन्ते भगवान् केशव है। महाभारतमे कहा है- मम ते केशसंज्ञिताः । 'मेरी जो किरणें प्रकाशित होती हैं सर्वज्ञाः केशवं तस्मा- वे केश कहलाती हैं, इसलिये सर्वज्ञ न्मामाहुर्द्विजसत्तमाः ॥ ( शान्ति० ३४१ । १८) इति | द्विजश्रेष्ठ मुझे केशव कहते हैं । अथवा महाभारते । ब्रह्मविष्णुशिवाख्याः । ब्रह्मा, विष्णु और शिव नामकी शक्तियाँ शक्तयः केशसंज्ञिता; तद्वत्तया वा केश है, उनसे युक्त होनेके कारण .
शाङ्करभाष्य केशवः । त्रयः केशिनः' इति श्रुतेः। भगवान् केशव है । श्रुति कहती है- 'मत्केशौ वसुधातले' इति केशशब्दः 'तीन केशचाले है। तथा 'मेरे दो शक्तिपर्यायत्वेन प्रयुक्तः। केश (शक्तियाँ) पृथिवीतलमे है। इस वाक्यमे केश शब्दका शक्तिके को ब्रह्मेति समाख्यात पर्यायरूपसे प्रयोग किया गया है । ईशोऽहं सर्वदेहिनाम् । हरिवंशमे [महादेवजीने] कहा है- आवां तवांशसम्भूती 'क ब्रह्माका नाम है और मैं समस्त तस्मात्केशवनामवान् ॥ देहधारियोका ईश हूँ। हम दोनो (३।८८४८) आपके अंशसे उत्पन्न हुए है, इसलिये इति हरिवंशे। आप केशव नामवाले है।। केशिनामानमसुरं हतवानिति भगवान्ने केशी नामके असुरको केशिहा। मारा था, इसलिये वे केशिहा है। सहेतुकं संसारं हरतीति [अविद्यारूप ] कारणके सहित संसारको हर लेते है, इसलिये हरि हरिः ॥८२॥ है ॥८२॥ , कामदेवः कामपाल कामी कान्तः कृतागमः। अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जयः॥ ८३॥ ६५१ कामदेव', ६५२ कामपाल', ६५३ कामी, ६५४ कान्तः, ६५५ कृतागम । ६५६ अनिर्देश्यवपु., ६५७ विष्णु., ६५८ वीर', ६५९ अनन्तः, ६६० धनन्जय ॥ धर्मादिपुरुषार्थचतुष्टयं वाञ्छद्भिः धर्मादि पुरुषार्थचतुष्टयकी इच्छा- काम्यत इति कामः; स चासो वालोसे कामना किये जाते है, इसलिये काम है। काम भी है और देव भी है, देवश्चेति कामदेवः । इसलिये कामदेव है। कामिनां कामान् पालयतीति कामियोकी कामनाओका पालन कामपालः। करते है, इसलिये कामपाल है। १३ विष्णुसहस्रनाम - - पूर्णकामस्वभावत्वात् कामी। पूर्णकाम होनेसे कामी है। अभिरूपतमं देहं वहन् कान्तः। परम सुन्दर देह धारण करनेके द्विपरार्धान्ते कस्य ब्रह्मणोऽप्यन्तो- कारण कान्त है। अथवा द्विपराध (ब्रह्माके सौ वर्प) के अन्तमे क- ऽस्मादिति वा कान्तः। ब्रह्माका अन्त (लय) भी इन्हीसे होता है, इसलिये कान्त है। कृत आगमः श्रुतिस्मृत्यादि 'श्रुति तथा स्मृति मेरी ही लक्षणो येन स कृतागमः, 'श्रुति- आज्ञाएँ है' इस भगवद्वचनके अनुसार स्मृती ममैवाज्ञे' इति भगवद्वचनात् । जिन्होने श्रुति, स्मृति आदि आगम 'वेदाः शास्त्राणि विज्ञान- (शास्त्र) रचे है वे भगवान् कृतागम मेतत्सर्व जनार्दनात् ।' है; जैसा कि आगे चलकर कहेंगे- (वि० स० १३६) वेद, शास्त्र और विज्ञान ये सब इत्यत्रैव वक्ष्यति । श्रीजनार्दनसे ही [प्रकट] हुए है। इदं तदीदृशं वेति निर्देष्टुं यन्त्र गुणादिसे अतीत होनेके कारण शक्यते गुणाधतीतत्वात् तदेव रूप- भगवान्का रूप 'यह, वह अथवा ऐसा इस प्रकार निर्दिष्ट नही किया जा मस्येति अनिर्देश्यवपुः। सकता, इसलिये वे अनिर्देश्यवपु हैं। रोदसी व्याप्य कान्तिरम्यधिका भगवान्की प्रचुर कान्ति पृथिवी स्थितास्येति विष्णुः और आकाशको व्याप्त करके स्थित है, 'व्याप्य मे रोदसी पार्थ इसलिये वे विष्णु है । महाभारतमे कान्तिरभ्यधिका स्थिता।' कहा है-'हे पार्थ ! मेरी प्रचुर कान्ति 'क्रमणाद्वाप्यह पार्थ पृथिवी और आकाशको व्याप्त करके विष्णुरित्यभिसंज्ञितः । स्थित है [इसलिये] 'अथवा सर्वत्र इति महाभारते (शान्ति० ३४१ । क्रमण (गमन) करनेसे मैं विष्णु ४२-४३)। कहलाता हूँ। गत्यादिमत्वात् वीरः, 'ची गति आदिसे युक्त होनेके कारण वीर है, जैसा कि धातुपाठ है-'धी शाङ्करभाष्य गतिप्रजनकान्त्यसनखादनेषु' इति धातु गति, व्याप्ति, जनन, कान्ति, धातुपाठात् । फेंकनेऔरखाने अर्थमे प्रयुक्त होता है। व्यापित्वान्नित्यत्वात्सर्वात्मत्वा व्यापी, नित्य, सर्वात्मा तथा देश, देशतः कालतो वस्तुतश्चापरि- काल और वस्तुसे अपरिच्छिन्न होनेके च्छिन्नः अनन्तः, 'सत्य ज्ञानमनन्तं कारण भगवान् अनन्त हैं। श्रुति ब्रह्म' (तै० उ० २ । १) इति श्रुतेः कहती है-'ब्रह्म सत्य, ज्ञान और 'गन्धर्वाप्सरसः सिद्धाः अनन्त है । अथवा 'गन्धर्व, अप्सरा, किन्नरोरगचारणाः। सिद्ध, किन्नर, सर्प और चारण नान्तं गुणाना गच्छन्ति आदि अविनाशी भगवान के गुणोंका तेनानन्तोऽयमव्ययः॥ अन्त नहीं पा सकते, इसलिये वे अनन्त है' इस विष्णुपुराणके वचनके (२।५।२४) इति विष्णुपुराणवचनाद्वा अनन्तः। अनुसार भगवान् अनन्त है। यदिग्विजये प्रभूतं धनमजयत्तेन अर्जुनने दिग्विजयके समय बहुत-सा धन जीता था, इसलिये वे धनञ्जय है। 'पाण्डवानां तथा 'पाण्डवोंमें मैं धनञ्जय हूँ' धनञ्जयः' (गीता १० । ३७ ) इति भगवानके इस वचनानुसार [ अर्जुन भगवानकी विभूति होनेसे वे स्वयं भी भगवद्वचनात् ॥८३॥ धनञ्जय है ] ॥८॥ -lod ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः । ब्रह्मविब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥८४ ॥ ६६१ ब्रह्मण्य., ६६२ ब्रह्मकृत्, ६६३ ब्रह्मा, ६६४ ब्रह्म, ६६५ ब्रह्म- विवर्धनः । ६६६ ब्रह्मवित्, ६६७ ब्राह्मणः, ६६८ ब्रह्मी, ६६९ ब्रह्मज्ञः, ६७० ब्राह्मणप्रियः ॥ 'तपो वेदाश्च विप्राश्च 'तप, वेद,ब्राह्मण और ज्ञान-ये सब ज्ञानं च ब्रह्मसंज्ञितम् । ब्रह्म कहलाते हैं इनके हितकारी होनेसे तेभ्यो हितत्वात् ब्रह्मण्यः । भगवान ब्रह्मण्य है। धनञ्जयः अर्जुन, m विष्णुसहस्त्रनाम तपआदीनां कर्तृत्वात् ब्रह्मकृत् तप आदिके करनेवाले होनेसे ब्रह्मकृत् है। ब्रह्मात्मना सर्व सृजतीति ब्रह्मा। ब्रह्मारूपसे सबकी रचना करते है, इसलिये ब्रह्मा है। बृहत्त्वाबृंहणत्वाच्च सत्यादि- बड़े तथा बढानेवाले होनेसे भगवान् लक्षणं ब्रह्म, 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' | सत्यादि लक्षणविशिष्ट ब्रह्म है । श्रुति (तै० उ० २।१) इति श्रुतेः कहती है-'ब्रह्म सत्य,ज्ञान और अनन्त- 'प्रत्यस्तमितभेदं यत् रूप है। विष्णुपुराणमे कहा है-'जो सत्तामात्रमगोचरम् । समस्त भेदोंसे रहित, लत्तामात्र, वचसामात्मसंवेद्य वाणीका अविषय और स्वसंवेद्य तज्ज्ञानं ब्रह्मसंज्ञितम् ।। (स्वयं ही जाननेयोग्य ) है उस ज्ञान- इति विष्णुपुराणे (६।७।५३) का नाम ब्रह्म है। तपआदीनां विवर्धनात् ब्रह्म तप आदिको बढानेके कारण ब्रह्मविवर्धन है। वेदं वेदार्थ च यथावद्वेत्तीति वेद तथा वेदके अर्थको यथावत् ब्रह्मवित् । जानते है, इसलिये ब्रह्मवित् है। ब्राह्मणात्मना समस्तानां ब्राह्मणरूपसे समस्त लोकोंके प्रति लोकानां प्रवचनं कुर्वन् वेदस्थाय- | 'वेदमे यह है' ऐसा उपदेश करते मिति ब्राह्मणः। है, इसलिये ब्राह्मण है। विवर्धनः । ब्रह्मसंज्ञितास्तच्छेषभूता अत्रेति ब्रह्मी। ब्रह्मके शेषभूत [ तप, वेद, मन, प्राण आदि] जो ब्रह्म ही कहलाते है भगवान्मे ही है, इसलिये वे ब्रह्मी है। अपने आत्मभूत वेदोंको जानते है, इसलिये ब्रह्मज्ञ है। वेदान् स्वात्मभूतान् जानातीति ब्रह्मज्ञः।
शाङ्करभाष्य १६७ ब्राह्मणानां प्रियो ब्राह्मणप्रियः, ब्राह्मणोंके प्रिय होनेसे ब्राह्मणप्रिय ब्राह्मणाः प्रिया अस्येति वा । है । अथवा ब्राह्मण इनके प्रिय है, नन्तं शपन्त परुपं वदन्त इसलिये ब्राह्मणप्रिय है। जैसा कि यो ब्राह्मणं न प्रणमेद्यथाहम् । भगवान्ने कहा है-'भारते, शाप देते और कठोर भाषण करते हुए भी स पापकृब्रह्मदवाग्निदग्धो ब्राह्मणको जो यथायोग्य प्रणाम नहीं वध्यश्च दण्ड्यश्च न चास्मदीयः॥' करतावह ब्रह्मादावानलसे दग्ध पापी इति भगवद्वचनात् । मार डालने योग्य और दण्ड- 'यं देवं देवकी देवी नीय है, वह मेरा जन नही हो वसुदेवादजीजनत् । सकता।' महाभारतमे भी कहा है- भौमस्य ब्रह्मणो गुप्त्यै 'प्रज्वलित अग्निको जिस प्रकार अरणि प्रकट करती है उसी प्रकार दीप्तमग्निमिवारणिः ॥ जिस देवको पृथिवीके ब्राह्मणोंकी इति च महाभारते (शान्ति० रक्षाकेलिये देवी देवकीने वसुदेवजी- ४७ । २९) ॥८४॥ से उत्पन्न किया है ॥८४॥ ६७१ महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः। महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः॥ ८५ ॥ महाक्रम., ६७२ महाकर्मा, ६७३ महातेजा', ६७४ महोरग. । ६७५ महाक्रतु , ६७६ महायज्चा, ६७७ महायज्ञ., ६७८ महाहविः ।। महान्तः क्रमाः पादविक्षेपा भगवानका क्रम अर्थात् पादविक्षेप अस्येति महाक्रमः, 'श नो विष्णु- (डग) महान् है, इसलिये वे गहाक्रम रुरुक्रमः' ( तैत्तिरीयशान्तिपाठे ) है । श्रुति कहती है-'उरुक्रम (बड़ी इति श्रुतेः। उगोंवाले) विष्णु हमे शान्ति दे।" महत् जगदुत्पत्त्यादि कर्मास्येति उनके जगत्की उत्पत्ति आदि महाकर्मा । महान् कर्म है, इसलिये वे महाकर्मा है।
१६८ विष्णुसहस्रनाम यदीयेन तेजसा तेजस्विनी जिनके तेजसे सूर्य आदि तेजस्वी भास्करादयः तत्तेजो महदस्येति हो रहे है उन भगवान्का वह तेज महातेजाः, 'येन सूर्यस्तपति तेजसेद्धः' महान् है, इसलिये वे महातेजा है। (तै० ब्रा० ३।१२।९।७) श्रुति कहती है-'जिस तेजसे प्रज्वलित इति श्रुतेः, होकर सूर्य तपता है। स्मृति भी कहती 'यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । है-'जो तेज सूर्यमें स्थित होकर यचन्द्रमसि यच्चानौ सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करता है तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ तथा जो चन्द्र और अग्निमें भी है, (गीता १५ । १२) उसे मेरा ही जान' अथवा भगवान् इति भगवद्वचनाच्च । क्रौर्य- क्रूरता, शूरता आदि महान् गुणोसे शौर्यादिभिधमैमहद्भिः : समलकृत अलड कृत है, इसलिये महातेजा है। इति वा महातेजाः। महांश्चासावुरगश्चेति महोरगः, वे महान् उरग [अर्थात् वासुकि सर्परूप ] है, इसलिये महोरग है। 'सर्पाणामस्मि वासुकिः' (गीता १०॥ भगवानका यह वचन भी है कि २८) इति भगवद्वचनात् । 'समि मैं वासुकि हूँ।' महाश्चासौ ऋतुश्चेति महाक्रतुः, जो महान् ऋतु (यज्ञ) है वह 'यथाश्वमेधः क्रतुराट्' (मनु० ११ । महाक्रतु है जैसा कि मनुजीने कहा है-'जैसे यज्ञराज अश्वमेध । वह भी २६०) इति मनुवचनातः सोऽपि वही (भगवान् ही) है, इसलिये इस स एवेति स्तुतिः। नामसे उनकी स्तुति होती है। महांश्चासौ यज्वा चेति लोक महान् है और लोक-संग्रहके लिये संग्रहार्थ यज्ञान् निर्वर्तयन् महायज्वा। यज्ञानुष्टान करनेसे यज्वा भी हैं, इसलिये 'महायज्वा' है। महाश्चासौ यज्ञश्चेति महायज्ञः, महान् है और यज्ञ है, इसलिये 'यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि' (गीता१०।२५) महायज्ञ है; जैसा कि भगवान्ने कहा इति भगवद्वचनात् । है-'यज्ञोंमे मैं जपयज्ञ हूँ।
शाङ्करभाष्य १६६ महान् महच्च तद्धविश्चेति ब्रह्मात्मनि सर्व है और हवि है क्योकि जगत्तदात्मतया हूयत इति महाहविः। ब्रह्मात्मामे ही ब्रह्मभावसे सम्पूर्ण जगत्का हवन किया जाता है, इसलिये महाहवि महाक्रतुरित्यादयो बहुव्रीहयो है । अथवा महाक्रतु आदि नामोमे वा ।। ८५॥ [ महान् है ऋतु जिसका आदि प्रकारसे ] बहुव्रीहि समास है ॥८५|| - " स्तव्यःस्तवप्रियःस्तोत्रंस्तुतिःस्तोता रणप्रियः। पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः॥८६॥ ६७९ स्तव्यः, ६८० स्तवप्रिय., ६८१ स्तोत्रम् , ६८२ स्तुतिः, ६८३ स्तोता, ६८४ रणप्रिय. । ६८५ पूर्णः, ६८६ पूरयिता, ६८७ पुण्य., ६८८ पुण्यकीर्तिः, ६८९ अनामय.॥ सर्वैः स्तूयते न स्तोता कस्यचित् सबसे स्तुति किये जाते है स्वयं इति स्तव्यः । किसीकी स्तुति नहीं करते, इसलिये स्तव्य है। अतएव स्तवप्रियः । और इसी कारणसे स्तवप्रिय है। येन स्तूयते तत् स्तोत्रम् , गुण जिससे स्तुति की जाती है वह संकीर्तनात्मकं तद्धरिरेवेति । गुण-कीर्तन ही स्तोत्र है । वह भी श्रीहरि ही है। स्तुतिः स्तवनक्रिया। स्तवन-क्रियाका नाम स्तुति है। [सर्वरूप होनेके कारण ] स्तोता (स्तुति करनेवाले ) भी भगवान स्वयं ही है। स्तोता अपि स एव ।
विष्णुसहस्रनाम प्रियो रणो यस्य यतः पश्च जिन्हे रण प्रिय है और इसीलिये महायुधानि धत्ते सततं लोकरक्ष- जो लोक-रक्षाके निमित्त पाँच आयुध* णार्थमतो रणप्रियः । निरन्तर धारण किये रहते है वे भगवान् रणप्रिय है। सकलैः कामैः सकलाभिः समस्त कामनाओसे और सम्पूर्ण शक्तिभिश्च सम्पन्न इति पूर्णः । शक्तियोसे सम्पन्न है, इसलिये भगवान् पूर्ण है। न केवलं पूर्ण एव; पूरयिता च केवल पूर्ण ही नहीं है बल्कि सर्वेषां सम्पद्धिः। सम्पत्तिसे सबके पूरयिता ( पूर्ण करने- याले ) भी है। स्मृतिमात्रेण कल्मषाणि क्षप स्मरणमात्रसे पापोका क्षय कर देते यतीति पुण्यः । है, इसलिये पुण्य है। पुण्या कीर्तिरस्य यत: पुण्य भगवानकी कीर्ति पुण्यमयी है मावहत्यस्य कीर्तिर्नृणामिति क्योंकि वह मनुष्योको पुण्य-प्रदान पुण्यकीर्तिः। करती है, इसलिये वे पुण्यकीर्ति है। आन्तराद्यैर्व्याधिभिः कर्मजैन कर्मसे उत्पन्न हुई बाह्य अथवा आन्तरिक व्याधियोसे पीडित नही पीड्यत इति अनामयः ॥८६॥ होते, इसलिये अनामय है ॥८६॥ मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः। वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना वसुर्वसुमना हविः ॥ ८७ ॥ ६९० मनोजवः, ६९१ तीर्थकरः, ६९२ वसुरेता., ६९३ वसुप्रदः । ६९४ वसुप्रदः, ६९५ वासुदेवः, ६९६ वसुः, ६९७ वसुमनाः, ६९८ हविः ।। पाञ्चजन्य शङ्ख, सुदर्शनचक्र, कौमोदकी गदा, शाधिनुप और नन्दक खड्ग-ये भगवान के पाँच आयुध हैं।
शाङ्करभाष्य २०१ गतत्वान् मनोजवः । मनसो वेग इव वेगोऽस्य सर्व- सर्वगत होनेके कारण भगवान्का मनके वेगके समान वेग है, इसलिये वे मनोजव है। चतुर्दशविद्यानां वाह्यविद्या तीर्थ विद्याको कहते है ] भगवान् समयानां च प्रणेता प्रवक्ता चेति चौदह विद्याओ और वेद-बाह्य-विद्याओ- तीर्थकरः । हयग्रीवरूपेण मधुकैटभी के सिद्धान्तोके कर्ता तथा वक्ता है, इसलिये वेतीर्थकर है। पौराणिकोका कथन है हत्वा विरिश्चाय सर्गादौ सर्वाः कि भगवान्ने सर्गके आरम्भमे हयग्रीव- श्रुतीरन्याश्च विद्या उपदिशन् वेद- रूपसे मधु और कैटभको मारकर बाह्या विद्याः सुरवैरिणां वञ्चनाय सम्पूर्ण श्रुतियाँ और अन्य विद्याएँ ब्रह्माजीको उपदेश करके देव-शत्रुओ- चोपदिदेशेति पौराणिकाः कथ- की वञ्चनाके लिये वेद-वाह्य विद्याओका यन्ति । भी उपदेश किया था । वसु सुवर्ण रेतोऽस्येति वसुरेताः, वसु अर्थात् सुवर्ण भगवान्का रेतस् ( वीर्य ) है, इसलिये वसुरेता है। तासु वीर्यमपासृजत् । 'देवने प्रथम जलको ही रचकर उसमे तदण्डमभवद्धमं वीर्य छोड़ा। वह ब्रह्मा [की उत्पत्ति] का परम कारण सुवर्णमय अण्डा हो ब्रह्मणः कारणं परम् ॥ गया। इस व्यासवचनके अनुसार इति व्यासवचनात् । [ भगवान् वसुरेता है। वसु धनं प्रकर्षण ददाति भगवान् प्रकर्पसे (खुले हाथसे ) साक्षाद्धनाध्यक्षोऽयम्, वसु अर्थात् धन देते है, इसलिये वे इतरस्तु वसुप्रद है क्योकि साक्षात् धनाध्यक्ष तत्प्रसादाद्धनाध्यक्ष इति वसुप्रदः। तोवे ही है और (कुबेरादि) तो उनकी कृपासे ही धनाध्यक्ष है। वसु प्रकृष्टं मोक्षाख्यं फलं भक्तोको वसु अर्थात् मोक्षरूप 'देवः पूर्वमपः सृष्ट्वा भक्तेभ्यः प्रददातीति द्वितीयो उत्कृष्ट फल देते है-ऐसा दुसरे २०२ विष्णुसहस्रनाम वसुप्रदः, विज्ञानमानन्द ब्रह्म रातिर्दातुः वसुप्रद का तात्पर्य है । श्रुति कहती परायणं तिष्ठमानस्य तद्विदः' इति है-'ब्रह्म विज्ञान और आनन्दस्वरूप है, वह धन देनेवाले [कर्मपरायण श्रुते; (बृ० उ० ३ । ९ । २८) अज्ञानी ] तथा ब्रह्ममे स्थित ज्ञानी- सुरारीणां वसूनि प्रकर्षण खण्डयन् का भी परायण है।' अथवा देव- शत्रुओंके वसु ( धन ) का अधिकतर वा वसुप्रदः। खण्डन करते है, इसलिये वसुप्रद है। वसुदेवस्थापत्यं वासुदेवः । वसुदेवजीके पुत्र होनेसे वासुदेव The वे है वसन्ति भूतानि तत्र, तेष्व भगवान्मे सब भूत बसते है अथवा यमपि वसतीति वसुः । सब भूतोमे भगवान् बसते है, इसलिये वसु अविशेषेण सर्वेषु विषयेषु जो समस्त पदार्थोमे सामान्य भाव- वसतीति वसु, तादृशं मनोऽस्येति से बसता है उसे वसु कहते है, इस प्रकारका भगवान्का मन है, इसलिये वसुमनाः । वसुमना है। 'ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः' (गीता 'ब्रह्मको अर्पण किया जाता है, ब्रह्म ४ । २४) इति भगवद्वचनात् ही हवि है' भगवान्के इस वचनानुसार हविः ।। ८७॥ वे हवि है ॥८७॥ वे RO- सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः । शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः॥ ८८ ॥ ६९९ सद्गतिः, ७०० सत्कृतिः, सत्कृतिः, ७०१ सत्ता, ७०२ सद्भूतिः, ७०३ सत्परायण. । ७०४ शूरसेनः, ७०५ यदुश्रेष्ठः, ७०६ सन्निवासः, ७०७ सुयामुनः ॥
शाङ्करभाष्य २०३ सन्तः, 'अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद 'ब्रह्म है-ऐसा यदि जानता तो सन्तमेन ततो विदुः । [विज्ञजन] उसे सन्त मानते है। इस (तै० उ० २ । ६) श्रुतिके अनुसार जो ऐसा जानते है कि इति श्रुतेः, ब्रह्मास्तीति ये विदुस्ते ब्रह्म है-वे सन्त है, उनसे प्राप्त किये तैः प्राप्यत इति सद्गतिः; जाते है, इसलिये भगवान् सद्गति है । सती गतिर्बुद्धिः समुत्कृष्टा अस्येति अथवा उनकी गति यानी बुद्धि श्रेष्ठ है, वा सद्गतिः। इसलिये वे सद्गति है। सती कृतिः जगद्रक्षणलक्षणा जगत्की उत्पत्ति आदि भगवान्की अस्य यस्मात्तेन सत्कृतिः । कृति श्रेष्ठ है, इसलिये वे सत्कृति है। इति नाम्नां सप्तमं शतं विवृतम्। यहॉतक सहस्रनामके सातवे शतकका विवरण हुआ। सजातीयविजातीयस्वगतमेद: सजातीय, विजातीय और स्वगत- रहिता अनुभूतिः सत्ता, 'एकमेवा- मेदसे रहित अनुभूतिका नाम सत्ता द्वितीयम्' (छा० उ० ६ । २ । १) है । श्रुति कहती है--'एक ही इति श्रुतेः। अद्वितीय था सनेव परमात्मा चिदात्मकः वे चिदात्मक सत्खरूप परमात्मा अबाधात् भासमानत्वाच सद्भूति ; ही अबाधित तथा बहुत प्रकारसे भासित नान्यः, प्रतीतेवाध्यमानत्वाच होनेके कारण सद्भूति है और कोई नही। प्रतीतिके बाधित होनेसे अन्य सत् न सन्नाप्यसत् । श्रौतो यौक्तिको या असत् कुछ भी नहीं है, यहाँ श्रुति या वा वाधः प्रपञ्चस्य विवक्षितः। युक्तिसे प्रपञ्चका वाध ही विवक्षित है। सतां तच्चविदां परं प्रकृष्ट तत्त्वदर्शी सत्पुरुपोके परम-श्रेष्ठ भयनमिति सत्परायणम् । अयन (स्थान) है, इसलिये सत्परायण हनूमत्प्रमुखाः सैनिकाः शौर्य- जिस सेनामे हनुमान् आदि शूरवीर शालिनो यस्यां सेनायाम् सा सैनिक है वह शूरसेना जिनकी है वे शूरसेना यस्य स शूरसेनः । भगवान् शूरसेन हैं। है २०४ विष्णुसहस्रनाम यदूनां प्रधानत्वात् यदुश्रेष्ठः । यदुवंशियोमे प्रधान होनेके कारण भगवान् यदुश्रेष्ठ है। सतां विदुषामाश्रयः सन्निवासः । सत् अर्थात् विद्वानोके आश्रय है, इसलिये सनिवास है। शोभना यामुना यमुनासम्ब- जिनके यामुन अर्थात् यमुना-सम्बन्धी न्धिनो देवकीवसुदेवनन्दयशोदा- देवकी, वसुदेव, नन्द, यशोदा, बलभद्र और सुभद्रा आदि परिवेष्टा सुन्दर है वे बलभद्रसुभद्रादयः परिवेष्टारो- भगवान् सुयामुन है अथवा जिनके ऽस्येति सुयामुनः; गोपवेषधरा यमुनातटवर्ती गोपवेपधारी परिवेष्टा यामुनाः परिवेष्टारः पद्मासनादयः | या पद्म एवं आसन आदि सुन्दर है शोभना अस्येति वा सुयामुनगा८८॥ वे भगवान् सुयामुन है ||८८॥ . भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः । दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः ।।८९ ॥ ७०८ भूतावास', ७०९ वासुदेवः, ७१० सर्वासुनिलयः, ७११ अनलः । ७१२ दर्पहा, ७१३ दर्पदः,७१४ दृप्तः, ७१५दुर्धरः, अथ, ७१६ अपराजितः ॥ भूतान्यत्राभिमुख्येन वसन्तीति भगवान्मे सर्वभूत मुख्यरूपसे भूतावासः, निवास करते है, इसलिये वे भूतावास 'वसन्ति त्वयि भूतानि है । हरिवंशमे कहा है-'आपमे भूत भूतावासस्ततो भवान् । बसते हैं, इसलिये आपभूतावास है।' (३ । ८८ । ५३) इति हरिवंशे। जगदाच्छादयति माययेति जगत्को मायासे आच्छादित करते इसलिये वासु है और वे ( वासु) वासुः, स एव देव इति वासुदेवः; ही देव भी है, इसलिये वासुदेव है । है, शाङ्करभाष्य २०५ निलयः । 'छादयामि जगद्विश्वं भगवान्का वचन है-'सूर्य जैसे भूत्या सूर्य इवाशुभिः । किरणोसे ढंकता है उसी प्रकार मैं (महा० शान्ति० ३४१ । ४१) सम्पूर्ण जगत्को अपनी विभूतिसे इति भगवद्वचनात् । ढंक लेता हूँ।' सर्व एवासवः प्राणा जीवात्मके सम्पूर्ण असु अर्थात् प्राण जिस यस्मिन्नाश्रये निलीयन्ते स सर्वासु- जीवरूप आश्रयमे लीन हो जाते है वह सर्वासुनिलय है। अलम्पर्याप्तिः शक्तिसम्पदा भगवान्की शक्ति और सम्पत्तिका नास्य विद्यत इति अनलः । अलं अर्थात् समाप्ति नहीं है, इसलिये वे अनल है। धर्मविरुद्ध पथि तिष्ठतां दर्प धर्मविरुद्ध मार्गमे रहनेवालोंका दर्प हन्तीति दर्पहा । नष्ट करते है, इसलिये दर्पहा है। धर्मवमनि वर्तमानानां दर्प धर्म-मार्गमे रहनेवालोको दर्प अर्थात् ददातीति दर्पदः । गर्व ( गौरव ) देते है, इसलिये दर्पद Ghol स्वात्मामृतरसास्वादनात् नित्य- अपने आत्मारूप अमृतरसका प्रमुदितो दृप्तः । आखादन करनेके कारण नित्य प्रमुदित रहते है, इसलिये गुप्त है। न शक्या धारणा यस्य प्रणि- समस्त उपाधियोसे रहित होनके धानादिषु सर्वोपाधिविनिर्मुक्त- कारण जिनकी प्रणिधान आदिमे त्वात् , तथापि तत्प्रसादतः कैश्चि- वारणा नहीं की जा सकती, फिर भी उन भगवान्के ही प्रसादसे कोई-कोई दुःखेन धार्यते हृदये जन्मान्तर- हजारो जन्मोकी भावनाके योगसे उन्हे सहस्रेषु भावनायोगात् , तस्माद् अपने हृदयमे बडी कठिनतासे धारण करते है, इसलिये वे दुर्धर है। * 'दपं यति' इस विग्रहके अनुसार दर्पका दलन करनेवाले है, इसलिये भी दुर्धरः । दर्पद हैं।
२०६ विष्णुसहस्रनाम 'क्लेशोऽधिकतरस्तेपा- भगवान्ने कहा है-'अव्यक्तमें मन मव्यक्तासक्तचेतसाम् । लगानेवालोंको अधिक क्लेश होता है, अव्यक्ता हि गतिर्दुःख देहवद्भिरवाप्यते ॥ देहधारियोंको अव्यक्त गति कठिनता- (गीता १२ । १) से प्राप्त होती है। इति भगवद्वचनात् । न आन्त रागादिभि बैरपि रागादि आन्तरिक शत्रुओसे और दानवादिमिः शत्रुभिः पराजित बाह्य दानवादि शत्रुओसे पराजित नही इति अपराजितः ॥ ८९॥ होते, इसलिये अपराजित है ।।८९॥ विश्वमूर्तिमहामूर्तिीप्तमूर्तिरमूर्तिमान अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ॥ ९ ॥ ७१७ विश्वमूर्तिः, ७१८ महामूर्तिः, ७१९ दीप्तमूर्तिः, ७२० अमूर्तिमान् । ७२१ अनेकमूर्तिः, ७२२ अव्यक्त., ७२३ शतमृतिः, ७२४ शताननः ।। विश्वं मूर्तिरस्य सर्वात्मकत्वात् सर्वात्मक होनेके कारण विश्व इति विश्वमूर्तिः। भगवान्की मूर्ति है, इसलिये वे विश्वमूर्ति है। शेषपर्यङ्कशायिनोऽस्य महती शेषशय्यापर शयन करनेवाले मूर्तिरिति महामूर्तिः। भगवान्की मूर्ति महती (बड़ी) है, इस- लिये वे महामूर्ति हैं। दीप्ता ज्ञानमयी मूर्तिर्यस्येति, भगवान्की ज्ञानमयी मूर्ति दीप्त स्वेच्छया गृहीता तैजसी मूर्ति- है, इसलिये अथवा उनकी स्वेच्छासे धारण की हुई तैजसी [ हिरण्य- दर्दीप्ता अस्येति वा दीप्तमूर्तिः । गर्भरूप] मूर्ति दीप्तिमती है, इसलिये वे दीप्तमूर्ति है। कर्मनिबन्धना मूर्तिरस्य न उनकी कोई कर्मजन्य मूर्ति नही विद्यत इति अमूर्तिमान् । है, इसलिये वे अमूर्तिमान् है।
शाङ्करभाष्य २०७ अवतारेषु स्वेच्छया लोकाना अवतारोमे अपनी इन्छासे लोको- मुपकारिणीबहीर्तीर्भजत इति का उपकार करनेवाली अनेको मूर्तियाँ अनेकमूर्तिः । धारण करते है, इसलिये अनेकमूर्ति है। यद्यप्यनेकमूर्तित्वमस्य, तथा- यद्यपि अनेक मूर्तिवाले है तो भी प्ययमीदृश एवेति न व्यज्यत 'ये ऐसे है'--इस प्रकार व्यक्त नही इति अव्यक्तः । होते, इसलिये अव्यक्त है। नानाविकल्पजा मूर्तयः संवि ज्ञानस्वरूप भगवान्की विकल्पजन्य दाकृतेः सन्तीति शतमूर्तिः । अनेक मूर्तियाँ है,इसलिये वे शतमूर्ति है। विश्वादिमूर्तित्वं यतोऽत एव क्योकि विश्वमूर्ति आदि है, इसलिये शताननः ॥१०॥ शतानन (सैकडो मुखवाले ) है ॥९०॥ एको नैकः सवः कः किं यत्तत्पदमनुत्तमम् । लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः॥११॥ ७२५ एक., ७२६ नैकः, ७२७ सवः, ७२८ कः, ७२९ किम् , ७३० यत् , ७३१ तत्, ७३२ पदमनुत्तमम् । ७३३ लोकबन्धु', ७३४ लोकनाथ., ७३५ माधव', ७३६ भक्तवत्सलः || परमार्थतः सजातीयविजातीय परमार्थसे सजातीय, विजातीय और खगतभेदविनिर्मुक्तत्वात् एकः, खगत-भेदोसे शून्य होनेके कारण 'एकमेवाद्वितीयम्' (छा० उ० ६। परमात्मा एक है; जैसा कि श्रुति २। १) इति श्रुतेः। कहती है-'एक ही अद्वितीय था। मायया बहुरूपत्वात् नैकः, मायासे अनेक रूप होनेके कारण 'इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते' (बृ० नेक है। श्रुति कहती है--'इन्द्र (ईश्वर) उ० २।५ । १९) इति श्रुतेः। मायासे अनेकरूप प्रतीत होता है।' सोमो यत्राभिषूयते सोऽध्वरः जिसमे सोम निकाला जाता है उस सवः। यज्ञको सव कहते है।
२०८ विष्णुसहस्त्रनाम कशब्दः सुखवाचकः, तेन क शब्द सुखका वाचक है, सुख- स्तूयत इति कः, 'कं ब्रह्म' (छा० रूपसे स्तुति किये जानेके कारण परमात्मा क है; जैसा कि श्रुति कहती उ० ४ । १० । ५) इति श्रुतेः । है-'सुख ब्रह्म है। सर्वपुरुषार्थरूपत्वाब्रह्मैव विचा सर्व पुरुषार्थरूप होनेसे ब्रह्म ही यमिति ब्रह्म किम् । विचार करने योग्य है, इसलिये वह किम् है। यच्छब्देन स्वतःसिद्धवस्तूद्देश खतःसिद्ध वस्तुके वाचक यत् शब्द- वाचिना ब्रह्म निर्दिश्यत इति ब्रह्म से ब्रह्मका निर्देश होता है, इसलिये यत् , 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते' ब्रह्म यत् है। श्रति कहती है- (तै० ० उ० ३ । १) इति श्रुतेः। 'जिससे ये सब भूत उत्पन्न होते है। तनोतीति ब्रह्म तत्, ब्रह्म तनन अर्थात् विस्तार करता 'ॐ तत्सदिति निर्देशो है, इसलिये वह तत् है । भगवान्ने ब्रह्मणत्रिविधः स्मृतः। (गीता १७॥२३) कहा है-'ॐ, तत् और सत्-ये तीन इति भगवद्वचनात् । नाम ब्रह्मके कहे गये हैं। पद्यते गम्यते मुमुक्षुभिरिति मुमुक्षुओद्वारा प्राप्त किया जाता है इसलिये [ब्रह्म] पद है, क्योकि उससे पदम् । यस्सादुत्कृष्टं नास्ति तत् बढकर श्रेष्ठ कोई और नही है इसलिये अनुत्तमम् । सविशेषणमेकं नाम वह अनुत्तम है। इस प्रकार पदमनुत्त- पदमनुत्तमम् इति । मम् यह विशेषणसहित एक नाम है। आधारभूतेऽसिन्सकला लोका आधारभूत परमात्मामे सब लोक वध्यन्त इति लोकानां बंधे रहते है, इसलिये लोकोके बन्धु बन्धुः लोकबन्धुः; लोकानां होनेसे भगवान् लोकबन्धु है । अथवा लोकोके जनक होनेके कारण जनकत्वाजनकोपमो बन्धुर्नास्तीति लोकबन्धु है क्योकि पिताके समान चा, लोकानां बन्धुकृत्यं कोई बन्धु नही होता, या बन्धुओका कर्म शाङ्करभाष्य २०६ हिताहितोपदेशं श्रुतिस्मृतिलक्षणं श्रुति-स्मृतिरूप हिताहितोपदेश किया कृतवानिति वा लोकबन्धुः। है, इसलिय लोकबन्धु है। लोकै थ्यते याच्यते लोकानु- भगवान् लोकोसे याचना किये पतपति आशास्ते लोकानामीष्ट इति जाते हैं अथवा उनका नियमन, आश्वा- सन या शासन करते हैं, इसलिये वा लोकनाथः । लोकनाथ है। मधुकुले जातत्वान् माधवः । मधुवंशमे उत्पन्न होनेके कारण भगवान् माधव है। भक्तस्नेहवान् भक्तवत्सलः ॥९॥ भक्तोके प्रति स्नेहयुक्त होनेसे भक्तवत्सल हैं ॥९॥ सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी । वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ॥ ९२ ॥ ७३७ सुवर्णवर्ण'. ७३८ हेमाङ्ग', ७३९ वराङ्ग', ७४० चन्दनागदी। ७४१ वीरहा, ७४२ विपम , ७४३ शून्यः, ७४४ घृताशीः, ७४५ अचलः, ७४६ चल. || सुवर्णस्येव वर्णोऽस्येति सुवर्णवर्णः, भगवान्का वर्ण सुवर्णके समान 'यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णम्' (मु० कहती है--'जब द्रष्टा सुवर्णके-से है, इसलिये वे सुवर्णवर्ण है। श्रुति उ० ३।१।३) इति श्रुतेः। वर्णवालेको देखता है। हेमेवाङ्गं चपुरस्येति हेमाङ्गः, 'य उनका शरीर हेम (सुवर्ण) के समान है, इसलिये वे हेमाङ्ग है । श्रुति एषोऽन्तरादित्से हिरण्मयः पुरुप" कहती है--'यह जो आदित्यके भीतर (छा० उ०१।६।६) इति श्रुतेः। सुवर्णमय पुरुप है। वराणि शोभनान्यङ्गान्यस्येति उनके अङ्ग वर अर्थात् सुन्दर है, वराङ्गः। इसलिये वे वराङ्ग है। १४ " विष्णुसहस्रनाम -- चन्दनैराह्लादनैरङ्गदैः केयूरै - आह्लादित करनेवाले चन्दनो और षित इति चन्दनाङ्गदी। अङ्गदो अर्थात् भुजवन्धोसे विभूषित है, इसलिये चन्दनाङ्गदी है। धर्मत्राणाय वीरान् असुरमुख्यान् धर्मकी रक्षाके लिये [हिरण्यकशिपु हन्तीति वीरहा। आदि] प्रमुख दैत्यवीरोका हनन करते है, इसलिये चीरहा है। समो नास्य विद्यते सर्व- सबसे विलक्षण होनेके कारण विलक्षणत्वादिति विषमः, भगवान्के समान कोई नहीं है, इसलिये वे विषम है । गीतामे कहा है- 'न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यः' 'तुम्हारे समान ही कोई नहीं है फिर (गीता ११॥ ४३) अधिक तो हो ही कहाँसे ? इति भगवद्वचनात् । सर्वविशेषरहितत्वात् शून्यवत् समस्त विशेपोसे रहित होनेके कारण शून्यः । भगवान् शून्यके समान शून्य है। घृता विगलिता आशिषः भगवान्की आशिप अर्थात् प्रार्थना अस्येति घृताशीः । प्रार्थनाएँ घृत यानी विगलित है, इसलिये वे घृताशी है। न स्वरूपान्न सामर्थ्यान्न च खरूपसे, सामर्थ्य से अथवा ज्ञानादि ज्ञानादिकाद्गुणात् चलनं विद्यते- गुणोसे विचलित नही होते, इसलिये ऽस्येति अचलः । वे अचल है। वायुरूपेण चलतीति चलः ॥१२॥ वायुरूपसे चलते है, इसलिये चल हैं ॥१२॥ ॥९॥ -ridieoka- अमानी मानदो मान्यो लोकखामी त्रिलोकधृक् । सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ।। ९३॥
शाङ्करभाष्य २११ . , ७४७ अमानी, ७४८ मानद , ७४९ मान्यः, ७५० लोकस्वामी, ७५१ त्रिलोकधृक् । ७५२ सुमेधाः, ७५३ मेधज', ७५४ धन्य', ७५५ सत्यमेधा., ७५६ धराधर' ॥ अनात्मवस्तुष्वात्माभिमानोना- शुद्ध ज्ञानखरूप भगवान्को अनात्म- स्त्यस्य खच्छसंवेदनाकृतेरिति वस्तुओमे आत्माभिमान नहीं है, इसलिये अमानी। वे अमानी है। खमायया सर्वेषामनात्मस्वात्मा अपनी मायासे सबको अनात्मामे भिमानं ददाति, भक्तानां सत्कारं आत्माभिमान देते है, भक्तोको आदर मानं ददातीति, तत्त्वविदामनात्म मान देते है, अथवा तत्त्ववेत्ताओके खात्माभिमानं खण्डयतीति वा अनात्मवस्तुओमे आत्माभिमानका मानदः। खण्डन करते है, इसलिये मानद है। सर्वैर्माननीयः पूजनीयः सर्वे सबके ईश्वर होनेसे सबके मान- श्वरत्वादिति मान्यः । नीय-पूजनीय है, इसलिये मान्य है। चतुर्दशानां लोकानामीश्वर चौदहो लोकोंके स्वामी होनेसे लोकस्वामी हैं। त्रीन् लोकान् धारयतीति तीनों लोकोको धारण करते है, त्रिलोकधृक् । इसलिये त्रिलोकधृक् है। शोभना मेधा प्रज्ञास्येति भगवान्की मेधा अर्थात् प्रज्ञा सुमेधाः । नित्यमसिच्प्रजामेधयोः सुन्दर है, इसलिये वे सुमेधा है । 'नित्यमसिच्प्रजामेधयोः । (पा० सू० ५। ४ । १२२) इति सूत्रसे यहाँ समासान्त असिच्प्रत्यय समासान्तोऽसिच् । हुआ है। मेधेऽध्वरे जायत इति मेधजः। मेध अर्थात् यज्ञमे उत्पन्न (प्रकट) होते है, इसलिये मेधज है। कृतार्थों धन्यः । कृतार्थ होनेसे धन्य है। स्वात् लोकखामी।
२१२ विष्णुसहस्रनाम . सत्या अवितथा मेधा अस्येति सत्यमेधाः । अंशैरशेषैः शेषाद्यैरशेषां धरां भगवान्की मेधा सत्य अर्थात् अमोघ है, इसलिये वे सत्यमेधा है। शेप आदि अपने सम्पूर्ण अंशोसे पृथिवीको धारण करते हैं, इसलिये धराधर हैं ॥९॥ धारयन् धराधरः ॥९३॥ - तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः । प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः॥ ९४ ।। ७५७ तेजोवृषः, ७५८ श्रुतिधरः, ७५९ सर्वशस्त्रभृता वरः । ७६० प्रग्रहः, ७६१ निग्रहः, ७६२ व्यग्रः, ७६३ नैकशृङ्गः, ७६४ गदाग्रजः ॥ तेजसामम्भसां सर्वदाआदित्य आदित्यरूपसे सदा तेज अर्थात् जल- रूपेण वर्षणात् तेजोवृषः । की वर्षा करते है, इसलिये तेजोवृष है। द्युतिमङ्गगतां कान्ति धारयन् युति अर्थात् देहगत कान्तिको धुतिधरः । धारण करनेके कारण द्युतिधर है । सर्वशस्त्रभृतां श्रेष्ठः सर्वशस्त्रभृतां समस्त शस्त्रधारियोमे श्रेष्ठ होनेके कारण सर्वशस्त्रभृतां घर है। भक्तैरुपहृतं पत्रपुष्पादिकं भक्तोद्वारा समर्पित किये हुए पत्र- पुष्पादि ग्रहण करते है, इसलिये प्रग्रह प्रगृह्णातीति प्रग्रहः धावतो विषया- है। अथवा विषयरूपी वनमे दौडते रण्ये दुर्दान्तेन्द्रियवाजिनः तत्प्रसा- | हुए इन्द्रियरूपी दुर्दम्य घोडोको रस्सीके समान अपनी कृपासे बाँध देन रश्मिनेव बनातीति वा प्रग्रहवत् लेते है, इसलिये प्रग्रह (रस्सी) प्रग्रह, 'रश्मौ च' (पा० सू० ३।३। के सदृश प्रग्रह है । 'रश्मौ च, वरः । --- -- more--moreate- शाङ्करभाष्य २१३ ५३) इति पाणिनिवचनात् प्रग्रह- इस पाणिनिजीके वचनानुसार प्रग्रह * शब्दस्य साधुत्वम् । शब्द सिद्ध होता है। खवशेन सर्व निगृह्णातीति अपने अधीन करके सबका निग्रह निग्रहः । करते है, इसलिये निग्रह है। विगतमग्रमन्तो विनाशोऽस्येति उनका अग्र-अन्त यानी नाश नही व्यग्रः, भक्तानामभीष्टप्रदानेषु व्यग्र है, इसलिये वे व्यग्र है। अथवा भक्तोको इच्छित फल देनेमे लगे हुए है, इसलिये इति वा। व्यग्र है। चतु:शृङ्गो नैकशृङ्गः चतुःशृङ्ग (चार सीगवाले) होनेके 'चत्वारि शृङ्गा त्रयोऽस्य पादा कारण नैकटङ्ग है । श्रुति कहती है- द्वे शीर्षे सप्त हस्तासोऽस्य । 'जिसके चार सींग, तीन पाद, त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति दो शिर और सात हाथ है वह महोदेवो मा ५ आविवेश । तीन स्थानोमे बंधा हुआ वृपभरूप (ऋग्वेद) । महान् देवशन्द करता है और मनुष्यो- इति मन्त्रवर्णात् । मे प्रवेश किये हुए है। निगदेन मन्त्रणाये जायत इति निगद अर्थात् मन्त्रसे पहले ही निशब्दलोपं कृत्वा गदाग्रजः; यद्वा प्रकट होते है, इसलिये नि शब्दका लोप करके गदाग्रज कहलाते है गदो नाम श्रीवासुदेवावरजः अथवा गद श्रीवासुदेवजीके छोटे भाईका तस्मादने जायत इति गदाग्रजा नाम है उससे पहले उत्पन्न होनेके ॥ ९४॥ कारण गदाग्रज हैं ॥१४॥ .. • 'रश्मौ च इस सूत्रसे रश्मि (रस्सी तथा किरण) अर्थमे प्रपूर्वक ग्रह धातुसे घन् प्रत्यय वैकल्पिक होता है तो प्रवाह रूप बनता है; अतः घजके अभावमें ' अनिश्चिगमश्च (३।३।५८) सूत्रसे अप प्रत्यय करके प्रग्रह बनता है। व्याकरण महाभाष्यके प्रथम आहिकमें शब्दानुशासनका प्रयोजन बतलाते हुए महर्षि पतञ्जलिजीने इस श्रुतिको शब्दब्रह्मकी प्रतिपादिका माना है; सो इस प्रकार - २१४ विष्णुसहस्रनाम - चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्दूहश्चतुर्गतिः चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥ ९५ ॥ ७६५ चतुर्मूर्तिः, ७६६ चतुर्बाहुः, ७६७ चतुर्दूहः, ७६८ चतुर्गतिः । ७६९ चतुरात्मा, ७७० चतुर्भावः, ७७१ चतुर्वेदवित् , ७७२ एकपात् ।। चतस्रो मूर्तयो विरासत्राव्या विराट, सूत्रात्मा, अव्याकृत और कृततुरीयात्मानोऽस्येति चतुर्मूर्तिः, तुरीयरूप भगवान्की चार मूर्तियाँ है, इसलिये वे चतुर्मूर्ति है । अथवा सिता रक्ता पीता कृष्णा चेति उनकी श्वेत, रक्त, पीत और कृष्ण ये चतस्रो मूर्तयोऽस्येति वा। चार [सगुण] मूर्तियाँ है, इसलिये चतुर्मूर्ति है। चत्वारो वाहवोऽस्येति चतुर्बाहुः भगवान्की चार भुजाएँ है, इसलिये इति नाम वासुदेवे रूढम् । वे चतुर्बाहु है। यह नाम श्रीवासुदेवमे । 'शरीरपुरुषश्छन्दःपुरुषो वेदपुरुषो बचोपनिपर्दो कहे हुए 'शरीर- महापुरुषः' इति बचोपनिषदुक्ता- पुरुष, छन्दःपुरुष, चेदपुरुष और श्चत्वारः पुरुषा व्यूहा अस्येति | महापुरुष'-ये चार पुरुप भगवान्के चतुर्दूहः । व्यूह है इसलिये वे चतुर्व्यह है । आश्रमाणां वर्णानां चतुर्णा विधिके अनुसार चलनेवाले चार यथोक्तकारिणां गतिः चतुर्गतिः । आश्रम और चार वर्णोकी गति है, इसलिये भगवान् चतुर्गति है। है-इस [वृषभरूपी शब्द-ब्रह्म] के चार सीग [नाम, पाख्यात, उपसर्ग और निपात ] है, तीन पैर [भूत, भविष्यत् तथा वर्तमान काल] हैं, [निस्य और कार्यरूप शब्द ही] दो शिर तथा [सातों विभक्तिरूप] सात हाथ हैं । यह [हृदय, कण्ठ और शिररूप] तीन स्थानोंमें बंधा हुआ [कामनाओंका वर्षण करनेसे] भरूप महान् देव शब्द करता है और मनुष्योंमें प्रवेश किये हुए है। * वैष्णव-सम्प्रदायोंमें वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध-ये चार भगवान्के ब्यूह माने गये हैं, इसलिये भी भगवान् चतुर्दूह हैं। - वृष शाङ्करभाष्य २१५ रागद्वेषादिरहितत्वात् चतुर राग-द्वेपादिसे रहित होनेके कारण आत्मा मनोऽस्येति, मनोबुद्धय- | भगवान्का आत्मा-मन चतुर है, इसलिये अथवा मन, बुद्धि, अहंकार और हङ्कारचित्ताख्यान्तःकरणचतुष्टया- चित्त नामक चार अन्तःकरणोंसे युक्त त्मकत्वाद्वा चतुरात्मा । हैं, इसलिये भगवान् चतुरात्मा है । धर्मार्थकाममोक्षाख्यपुरुषार्थचतु धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-ये चार ष्टयं भवत्युत्पद्यते अस्मादिति पुरुपार्थ भगवान्से प्रकट होते अर्थात् चतुर्भावः । उत्पन्न होते है, इसलिये वे चतुर्भाव है। यथावद्वेत्ति चतुर्णा वेदानामर्थ चारो वेदोंके अर्थको ठीक-ठीक मिति चतुर्वेदवित् । जानते है, इसलिये परमात्मा चतुर्वेद- वित् है। एका पादोऽस्येति एकपात्, भगवान्का एक ही पाद [विश्व- 'पादोऽस्य विश्वा भूतानि' (पु० सू० ३) रूपसे स्थित ] है, इसलिये वे एकपात् इति श्रुतेः, है। श्रुति कहती है-'सम्पूर्ण भूत 'विष्टभ्याहमिदं कृत्स्न- इसके एक पाद हैं। भगवान्का भी मेकाशेन स्थितो जगत् ॥' वचन है-'मैं अपने एक ही अंशसे इस (गीता १० । ४२) सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करके स्थित इति भगवद्वचनाच ॥१५॥ हूँ ॥९५॥ समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो · दुरतिक्रमः । दुर्लभो दुर्गमो दुर्गों दुरावासो दुरारिहा ।। ९६ ॥ ७७३ समावर्त', ७७४ अनिवृत्तात्मा [निवृत्तात्मा ], ७७५ दुर्जय.. ७७६ दुरतिक्रमः । ७७७ दुर्लभः, ७७८ दुर्गमः, ७७९ दुर्गः, ७८० दुरावासः, ७८१ दुरारिहा ॥
२१६ विष्णसहस्रनाम उनका ~ संसारचक्रस्य सम्यगावर्तक इति संसार-चक्रको भली प्रकार घुमाने- समावर्तः । वाले है, इसलिये समावर्त है। सर्वत्र वर्तमानत्वात् न निवृत्त सर्वत्र वर्तमान होनेके कारण आत्मा कुतोऽपीति अनिवृत्तात्मा, भगवान्का आत्मा (शरीर) कहीसे भी निवृत्त नहीं है, इसलिये वे निवृत्त आत्मा मनो विषये- अनिवृत्तात्मा है । अथवा भ्योऽस्येति वा निवृत्तात्मा । आत्मा यानी मन विपयोंसे निवृत्त है, इसलिये वे निवृत्तात्मा है। जेतुं न शक्यत इति दुर्जयः । किसीसे जीते नही जा सकते, इसलिये दुर्जय है। भयहेतुत्वादस्याज्ञां सूर्यादयो भयके हेतु होनेसे सूर्य आदि भी नातिक्रामन्तीति दुरतिक्रमः, उनकी आज्ञाका अतिक्रमण (उल्लङ्घन) 'भयादस्याग्निस्तपति नही करते, इसलिये वे दुरतिक्रम है; भयात्तपति सूर्यः । जैसा कि मन्त्रवर्ण कहता है-'इस भयादिन्द्रश्च वायुश्च (ईश्वर) के भयसे अग्नि तपता है, मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ सूर्य प्रकाशित होता है और इसीके (क. उ० २।६।३) इति मन्त्रवर्णात्, 'महद्भयं वज्रमुद्य- भयसे इन्द्र, वायु और पाँचवाँ मृत्यु तम्' (क० उ० २।६।२) दौड़ता है ।' तथा [दूसरा मन्त्र कहता इति च । है-] 'महान् भयरूप वज्र उद्यत है।' दुर्लभया भक्त्या लभ्यत्वात् दुर्लभ भक्तिसे प्राप्तव्य होनेके दुर्लभः, कारण भगवान् दुर्लभ है। व्यासजीका 'जन्मान्तरसहस्रेषु कथन है-'हजारो जन्मोंमे किये हुए तपोज्ञानसमाधिभिः । तप, ज्ञान और समाधिसे जिन नराणां क्षीणपापानां मनुष्योके पाप क्षीण हो जाते है कृष्ण भक्तिः प्रजायते ॥ उन्हींकी श्रीकृष्णमे भक्ति होती है।'
२१७ शाङ्करभाष्य इति व्यासवचनात् , 'भक्त्या भगवान्ने भी कहा है-'मैं अनन्य भक्तिसे लभ्यस्त्वनन्यया' (गीता ८ । २२) ही प्राप्त हो सकता हूँ। इति भगवद्वचनाच । दुःखेन गम्यते ज्ञायत इति दुःख (कठिनता) से गम्य होते दुर्गमः । अर्थात् जाने जाते है, इसलिये दुर्गम है। अन्तरायप्रतिहतैर्दुःखादवाप्यत नाना प्रकारके विघ्नोसे प्रतिहत इति दुर्गः । (आहत) हुए पुरुषोद्वारा कठिनतासे प्राप्त किये जाते है, इसलिये दुर्ग है। दुःखेनावास्यते चित्ते योगिमिः समाधिमे योगिजन बडी कठिनतासे चित्तमे भगवान्को बसा पाते है, इसलिये समाधाविति दुरावासः । दुरावास हैं। दुरारिणो दानवादयस्तान् दानवादि दुरारियो अर्थात् दुष्ट मार्गमे चलनेवालोको मारते है, इसलिये हन्तीति दुरारिहा ॥१६॥ दुरारिहा है ।। ९६ ॥ वे शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः । इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ॥ १७ ॥ ७८२ शुभाङ्ग , ७८३ लोकसारङ्गः, ७८४ सुतन्तुः, ७८५ तन्तुवर्धनः । ७८६ इन्द्रकर्मा, ७८७ महाकर्मा, ७८८ कृतकर्मा, ७८९ कृतागम ॥ शोभनैरङ्गैध्येयत्वात् शुभाङ्गः सुन्दर अङ्गोसे ध्यान किये जानेके कारण शुभाङ्ग लोकानां सारं सारङ्गवत् भृङ्ग- लोकोका जो सार है उसे सारङ्ग अर्थात् भ्रमरके समान ग्रहण करते है, वद्गृहातीति लोकसारङ्गः, 'प्रजा- इसलिये लोकसारङ्ग है । श्रुति कहती पतिर्लोकानभ्यतपत्' इति श्रुते, है-'प्रजापतिने लोकोंको [अर्थात् लोकोका सार निकाला] ' है तपाया
२१८
विष्णुसहस्रनाम
लोकसारः प्रणवः, तेन प्रतिपत्तव्य अथवा प्रणव लोकसार है उससे जानने
योग्य होनेके कारण लोकसारङ्ग है।
इति वा; पृषोदरादित्वात्साधुत्वम् । पृपोदरादिगणमे होनेसे [लोकसारगम्य-
के स्थानमें लोकसारङ्ग] सिद्ध होता है।
शोभनस्तन्तुर्विस्तीर्णः प्रपश्चो भगवान्का तन्तु-यह विस्तृत जगत्
ऽस्येति सुतन्तुः ।
सुन्दर है, इसलिये वे सुतन्तु है ।
तमेव तन्तुं वर्धयति छेदय उसी तन्तुको बढाते या काटते है,
तीति वा तन्तुवर्धनः।
इसलिये भगवान् तन्तुवर्धन है ।
इन्द्रस्य कर्मेव कर्मास्येति
इन्द्रके कर्मके समान ही भगवान्का
इन्द्रकर्मा, ऐश्वर्यकर्मेत्यर्थः।
कर्म है, इसलिये वे इन्द्रकर्मा अर्थात्
ऐश्वर्यकर्मा है।
महान्ति वियदादीनि भूतानि
भगवान्के कर्म अर्थात् कार्य
आकाशादि भूत महान् है, इसलिये वे
कर्माणि कार्याण्यस्येति महाकर्मा ।
महाकर्मा है।
कृतमेव सर्व कृतार्थत्वात् , कृतार्थ होनेके कारण भगवान्का
न कर्तव्यं किञ्चिदपि कर्मास्य सब कुछ किया हुआ ही है, उन्हे कोई
विद्यत इति कृतकर्मा; धर्मात्मकं कर्म कर्म करना नहीं है, इसलिये वे कृतकर्मा
है । अथवा उन्होंने धर्मरूप कर्म किया है
कृतवानिति वा।
इसलिये वे कृतकर्मा है।
कृतो वेदात्मक आगमो येनेति उन्होंने वेदरूप आगम बनाया है,
कृतागमः, 'अस्य महतो भूतस्य निःश्व- इसलिये वे कृतागम है । श्रुति कहती
सितमेतद्यदग्वेदः' (बृ० उ०२। है-'इस महाभूतका निःश्वास ही
४ । १०) इत्यादिश्रुतेः ॥९७ | | ऋग्वेद है ॥९॥
उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः ।
अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविजयी ॥ १८ ॥
शाङ्करभाष्य ७९० उद्भव., ७९१ सुन्दरः, ७९२ सुन्द, ७९३ रत्ननाभ', ७९४ सुलोचनः । ७९५ अर्कः, ७९६ वाजसनः, ७९७ शृङ्गी, ७९८ जयन्तः, ७९९ सर्वविजयी ॥ उत्कृष्टं भवं जन्म स्वेच्छया भगवान् अपनी इच्छासे उत्कृष्ट भव अर्थात् जन्म धारण करते है, भजति इति, उद्गतमपगतं जन्मास्य इसलिये अथवा सबके कारण होनेसे सर्वकारणत्वादिति वा उद्भवः । जन्म नहीं है, इसलिये उनका उद्भव है। विश्वातिशायिसौभाग्यशालि विश्वसे बढकर सौभाग्यशाली होने- त्वात् सुन्दरः। के कारण सुन्दर हैं। सुष्टु उनचीति सुन्दः, उन्दी शुभ उन्दन (आर्द्रभाव) करते है, इसलिये सुन्द है । यहॉ 'उन्दी क्लेदने' क्लेदने इति धातोः पचायच्; (उन्द् धातु क्लेदन अर्थमे होता है) इस धातुसे पचादिसम्बन्धी अच् आभावस्य वाचक: करुणाकर प्रत्यय हुआ है; यह आर्द्रभावका वाचक है। इसका भाव करुणाकर है । इत्यर्थः पृषोदरादित्वात्पररूपत्वम्। 'पृपोदरादिगण' मे होनेसे सु के उकार- का पररूप [अर्थात् उत्तरवर्तीवर्णके समान रूप] हो गया है। रत्नशब्देन शोभा लक्ष्यते; रत्न शब्दसे शोभा लक्षित होती रत्नवत्सुन्दरा नामिरस्येति रत्ननाम। है । भगवान्की नामि रत्नके समान सुन्दर है, इसलिये वे रत्ननाम है। शोभनं लोचनं नयनं ज्ञानं चा भगवान्के लोचन-नेत्र अथवा अस्येति सुलोचनः । ज्ञान सुन्दर है, इसलिये वे सुलोचन है। ब्रह्मादिभिः पूज्यतमैरपि अर्च ब्रह्मा आदि पूज्यतमोके भी पूजनीय नीयत्वात् अर्कः। होनेसे अर्क है।
२२० विष्णुसहस्रनाम वाजमन्नमर्थिनां सनोति ददा याचकोको वाज अर्थात् अन्न देते तीति वाजसनः । है, इसलिये वाजसन है। प्रलयाम्भसि शृङ्गवन्मत्स्यविशेष प्रलय-समुद्रमे सींगवाले मत्स्य- रूपः शृङ्गी; मत्वर्थीयोऽतिशायने विशेषका रूप धारण करनेसे शृङ्गी है। यहाँ अतिशय अर्थमे मत्वर्थीय इनिप्रत्ययः। इनिप्रत्यय हुआ है। अरीन् अतिशयेन जयति, जय- शत्रुओको अतिशयसे जीतते है हेतुर्वा जयन्तः । अथवा उनको जीतनेके हेतु है, इसलिये जयन्त है। सर्वविषयं ज्ञानमस्येति सर्ववितः भगवान्को सब विषयोका ज्ञान है, आभ्यन्तरान् रागादीन् बाह्यान् इसलिये वे सर्ववित् है । तथा उन्हे हिरण्याक्षादींश्च दुर्जयान् जेतुं शील- रागादि आन्तरिक और हिरण्याक्षादि मस्येति जयी; तच्छीलाधिकारे । बाह्य दुर्जय शत्रुओको जीतनेका स्वभाव है, इसलिये वे जयी है । 'जिदक्षि'* 'जिदृक्षि' (पा० सू० ३।२।१५७) इत्यादि पाणिनीय वचनसे यहाँ इनि- इत्यादिपाणिनीयवचनादिनि- प्रत्यय हुआ है। इस प्रकार सर्ववित् प्रत्ययः, सर्वविच्चासौ जयी चेति है और जयी है, इसलिये सर्वविजयी सर्वविजयी इत्येकं नाम ॥९८॥ है, यह एक नाम है ॥९८॥ सुवर्णविन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः। महाहदो महाग? महाभूतो महानिधिः ॥ ९९ ॥ ८०० सुवर्णबिन्दुः, ८०१ अक्षोभ्यः, ८०२ सर्ववागीश्वरेश्वरः । ८०३ महाह्रदः, ८०४ महागतः, ८०५ महाभूतः, ८०६ महानिधिः ।। ® इस सूत्र में 'प्रजोरिनिः (३।२। १५६) सूत्रसे इनिप्रत्ययकी अनुवृत्ति होती है।
शाङ्करभाष्य २२१ विन्दवोऽवयवाः सुवर्णसदृशा भगवान्के बिन्दु अर्थात् अवयव अस्येति सुवर्णबिन्दुः, 'आप्रणखात्सर्व सुवर्णके समान है. इसलिये वे सुवर्ण- एव सुवर्णः' (छा० उ० १।६।६) बिन्दु है । श्रुति कहती है-'नखसे लेकर [शिखातक] सब सुवर्ण ही है। इति श्रुतेः; शोभनो वर्णोऽक्षरं अथवा जिसमे सुन्दर वर्ण यानी अक्षर बिन्दुश्च यस्मिन्मन्त्रे तन्मन्त्रात्मा और बिन्दु है वह मन्त्ररूप ( ओकार) वा सुवर्णविन्दुः। ही सुवर्णबिन्दु है। इति नाम्नामष्टमं शतं विवृतम् । यहॉतक सहस्रनामके आठवे शतक- का विवरण हुआ । रागद्वेषादिभिःशब्दादिविषयैश्च राग-द्वेपाठिसे, शब्दादि विषयो त्रिदशारिभिश्च न क्षोभ्यत इति और देवशत्रुओसे क्षोभित नही होते, अक्षोभ्यः । इसलिये अक्षोभ्य है। सर्वेषां वागीश्वराणां ब्रह्मादी- ब्रह्मादि समस्त वागीश्वरोके भी नामपीश्वरः सर्ववागीश्वरेश्वरः। ईश्वर है, इसलिये सर्ववागीश्वरेश्वर है। अवगाह्य तदानन्दं विश्रम्य उन आनन्दरूप परमात्मामे गोता लगाकर योगिजन विश्रान्त होकर सुखमासते योगिन इति महाहद सुखसे बैठते है, इसलिये वे एक महाह्रद इव महाहृदः। (बडे सरोवर ) के समान महाहद कहलाते है। गर्तवदस्य माया महती दुरत्य- भगवान्की माया गर्न (गडढे ) के येति महागतः, 'मम माया दुरत्यया' समान अति दुस्तर है, इसलिये वे महागत (गीता ७ । १४) इति भगवद- है । भगवान्ने कहा है-'मेरी माया चनात् ; यद्वा, गर्तशब्दोरथपर्यायो दुस्तर है' अथवा निरुक्तकार कहते है कि गत शब्द रथका पर्याय है। नैरुक्तैरुक्तः, तस्मान्महारथो महा- | अतः महारथी होनेके कारण महागर्न ; महारथत्वमस्य प्रसिद्ध है । महाभारतादिमे भगवान्का महा- भारतादिषु । रथी होना प्रसिद्ध ही है।
२२२ विष्णुसहस्रनाम कालत्रयानवच्छिन्नखरूपत्वान् तीनो कालसे अनवच्छिन्न (विभाग- रहित) स्वरूप होनेके कारण परमात्मा महाभूतः । महाभूत है। सर्वभूतानि अस्मिन्निधीयन्त जिनमे समस्त भूत रहते है अतः इति निधिः, महांश्चासौ निधिश्चेति जो महान् और निधि भी है वे भगवान् महानिधिः ॥९९॥ महानिधि है ॥९॥ कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः। अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ॥१०॥ ८०७ कुमुदः, ८०८ कुन्दरः, ८०९ कुन्दः, ८१० पर्जन्यः, ८११ पावनः, ८१२ अनिलः । ८१३ अमृताशः, ८१४ अमृतवपुः, ८१५ सर्वज्ञः, ८१६ सर्वतोमुखः ॥ कुं धरणि भारावतरणं कुर्वन् कु अर्थात् पृथिवीको उसका भार मोदयतीति कुमुदः । मुदिरत्रान्त- उतारते हुए मोदित करते है, इसलिये कुमुद है। यहाँ मुद् धातुमे णिच भांवितणिजर्थः। प्रत्ययके अर्थका अन्तर्भाव है। कुन्दपुष्पतुल्यानि शुद्धानि कुन्द पुष्पके समान शुद्ध फल देते फलानि राति ददाति, लात्यादत्ते है अथवा उन्हे लेते-ग्रहण करते है, इति वा कुन्दरः, रलयोवृत्येकत्व- | इसलिये कुन्दर है । क्योकि र और ल स्मरणात् । की एक ही वृत्ति मानी गयी है ।* 'कु धरा दारयामास अथवा 'हिरण्याक्षको मारनेकी हिरण्याक्षजिघांसया। इच्छासे भगवान्ने वराहरूप धारण- वाराहं रूपमास्थाय' करकु-पृथिवीको विदीर्ण किया था' इति वा कुन्दरः। इसलिये वे कुन्दर है। * इसलिये 'कुन्दर' शब्दका कुन्दं हाति (कुन्द देते हैं) और 'कुन्द लाति (कुन्द लेते है ) इस प्रकार दो तरहसे विग्रह किया गया है ।
शाङ्करभाष्य २२३ का दलन- कुन्दोपमसुन्दराङ्गत्वात् स्वच्छ कुन्दके समान सुन्दर अगवाले होने- तया स्फटिकनिर्मलः कुन्दः, कुं से भगवान् खच्छ, स्फटिकमणिके समान निर्मल है, इसलिये वे कुन्द पृथ्वी कश्यपायादादिति वा कुन्द, है, अथवा कश्यपजीको कु-पृथिवी 'सर्वपापविशुद्धयर्थ दी थी, इसलिये कुन्द है । हरिवंशमे वाजिमेधेन चेष्टवान् । कहा है-'भृगुनन्दन परशुरामजीने तस्मिन्यज्ञे महादाने समस्त पापोको निवृत्तिके लिये दक्षिणा भृगुनन्दनः॥ अश्वमेध-यज्ञ किया और उस मारीचाय ददौ प्रीतः महादानवाले यज्ञमे दक्षिणारूपसे कश्यपाय वसुन्धराम् ।' उन्होने मरीचिनन्दन कश्यपजीको प्रसन्नतापूर्वक सम्पूर्ण पृथिवी दे इति हरिवंशे; (१ । ४१ । १६- दी। अथवा कु-पृथिवी [पति] १७) कु पृथ्वीं धति खण्डयतीति -खण्डन करते है, इसलिये वा कुन्दः। कुशब्देन पृथ्वीश्वरा कुन्द है। यहाँ कु शब्दसे पृथिवीपति लक्ष्यन्ते; लक्षित होते है । विष्णुधर्ममे कहा है- 'निःक्षत्रियां यश्च चकार मेदिनी "जिन्होने कई बार पृथिवीको क्षत्रिय- मनेकशा बाहुवनं तथाच्छिनत्। शून्य कर दिया और कार्तवीर्यकी यः कार्तवीर्यस्य स भार्गवोत्तमो भुजारूप वनका छेदन किया, वे ममास्तु माङ्गल्यविवृद्धये हरिः ॥ भृगुश्रेष्ठ परशुरामरूप भगवान् हरि इति विष्णुधर्मे । मेरे मंगलको वृद्धि करनेवाले हो। पर्जन्यवदाध्यात्मिकादितापत्रयं पर्जन्य (मेघ) के समान आध्यात्मि- शमयति, सर्वान्कामानभिवतीति कादि तीनो तापोको शान्त करते है अथवा सम्पूर्ण कामनाओकी वर्षा करते वा पर्जन्यः । है, इसलिये पर्जन्य है। स्मृतिमात्रेण पुनातीति पावनः । स्मरणमात्रसे पवित्र कर देते है, इसलिये पावन है। इलति प्रेरणं करोतीति इल:, जो इलन अर्थात् प्रेरणा करता है उसे इल कहते है, उस (इल) से रहित तद्रहितत्वात् अनिलः; इलति स्व- होनेके कारण भगवान् अनिल है । ..
२२४
विष्णुसहस्त्रनाम
.
पिति इत्यज्ञ इलः, तद्विपरीतो | इलन अर्थात् शयन करता है अतः इल
अनको कहते है, भगवान् नित्य प्रबुद्ध-
नित्यप्रबुद्धस्वरूपत्वादिति वा;
रूप होनेसे उसके विपरीत है इसलिये वे
अथवा निलतेर्गहनार्थात्कप्रत्यया- अनिल है । अथवा गहन अर्थके वाचक
निल धातुके अन्तमे कप्रत्यय होनेपर
न्ताद्रूपम् ; अगहनः अनिलः, 'निल' रूप बनता है; भगवान् गहन
भक्तभ्यः सुलभ इति ।
(निल) नही है, इसलिये अनिल है ।
अर्थात् भक्तोके लिये सुलभ हैं ।
खात्मामृतमश्नातीति अमृताशः; स्वात्मानन्दरूप अमृतका भोग
मथितममृतं सुरान् पाययित्वा
करनेसे भगवान् अमृताश है अथवा
उन्होने समुद्रसे मथकर निकाला हुआ
स्वयं चाश्नातीति वा अमृताशः; अमृत देवताओको पिलाकर स्वयं
अमृता अनश्वरफलत्वादाशा | पिया, इसलिये वे अमृताश है या
भगवान्की आशा अर्थात् इच्छा
वाञ्छा अस्येति वा।
अविनाशी फलयुक्त होनेके कारण
अमृता अर्थात् अविनाशिनी है इसलिये
भी वे अमृताश है।
मृतं मरणं, तद्रहितं वपुरस्येति
मृत मरणको कहते है, भगवान्का
शरीर मरणसे रहित है, इसलिये वे
अमृतवपुः।
अमृतवपु है।
सर्व जानातीति सर्वज्ञः । 'यः सब कुछ जानते है, इसलिये सर्वज्ञ
सर्वज्ञः सर्ववित्' (मु० उ०१।१ । है । श्रुति कहती है-'जो सर्वज्ञ
९) इति श्रुतेः।
और सर्ववित् है।
'सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्' (गीता
'सब ओर नेत्र, शिर और मुख-
१३ । १३) इति भगवद्वचनात् वाले है' भगवान्के इस वचनानुसार
सर्वतोमुखः ॥१०॥
भगवान् सर्वतोमुख है ॥१०॥
शाङ्करभाष्य २२५ . पितैः सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः । न्यग्रोधोदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्धनिषूदनः ॥१०॥ ८१७ सुलभः, ८१८ सुव्रत., ८१९ सिद्धः, ८२० शत्रुजित् , ८२१ शत्रु- तापनः । ८२२ न्यग्रोध., ८२३ उदुम्बरः, ८२४ अश्वत्थ', ८२५ चाणूरान्ध्र- निषूदनः ॥ पत्रपुष्पफलादिभिर्भक्तिमात्रसम केवल भक्तिसे समर्पण किये पत्र- सुखेन लभ्यत इति पुष्प आदिसे भी सुखपूर्वक मिल जाते है, इसलिये भगवान् सुलभ है । महा- सुलभः । 'पत्रेषु पुष्पेषु फलेषु तोये भारतमे कहा है-'एकमात्र भत्तिहीसे ध्वक्रीतलभ्येषु सदैव सत्सु। प्राप्त होनेवाले पुराणपुरुपकी उपल- ब्धिमें उपयोगी बिनामोलही मिलने- भक्त्येकलभ्ये पुरुपे पुराणे वाले पत्र, पुष्प,फल और जल आदि- मुक्त्यै कथ न क्रियते प्रयत्नः।।*के सदा रहते हुए भी मुक्तिके लिये इति महाभारते। प्रयत्न क्यो नही किया जाता? शोभनं व्रतयति भुते भोजना भगवान् सुन्दर व्रत करते अर्थात् निवर्तत इति वा सुव्रतः । अच्छा भोजन करते है अथवा भोजन [या भोग] से हठे हुए [अर्थात् अभोक्ता] है, इसलिये सुव्रत है। अनन्याधीनसिद्धित्वात् सिद्धः। भगवान्की सिद्धि ( इच्छापूर्ति) दूसरेके अधीन नहीं है, इसलिये वे सिद्ध है। सुरशत्रव एचास्य शत्रवः, तान् देवताओके शत्रु ही भगवान्के शत्रु जयतीति शत्रुजित् । है,उन्हेजीतते है, इसलिये शत्रुजित्त् है । सुरशत्रूणां तापनः शत्रुतापनः। देवताओके शत्रुओंको तपानेवाले हैं, इसलिये शत्रुतापन है। . * गरुडपुराण । २२७ । ३३ का पाठ भी इसी प्रकार है। १५ २२६ विष्णसहस्रनाम न्यक् अर्वारोहति सर्वेषामुपरि न्यक-नीचेकी ओर उगते है और वर्तत इति न्यग्रोधः; पृषोदरादित्वात् सबके ऊपर विराजमान है, इसलिये न्यग्रोध हैं। पृषोदरादिगणमे होनेसे हकारस्य धकारादेशः; सर्वाणि न्यग्रोहके हकारको ध आदेश हो गया , भूतानि न्यक्कृत्य निजमायां है । अथवा सब भूतोंका निरास करके अपनी मायाका वरण करते है या वृणोति निरुणद्धीति वा। उसका निरोध करते है [ इसलिये न्यग्रोध है। अम्बरादुद्गतः कारणत्वेनेति कारणरूपसे अम्बर (आकाश) से भी ऊपर है, इसलिये उदुम्बर हैं। उदुम्बरः; पृषोदरादित्वादेवोकारा- पृषोदरादिगणमे होनेसे ही यहाँ अम्बर- देशः, यद्वा उदुम्बरमन्नाद्यम् । के अकारको उकार आदेश हुआ है। अथवा 'ऊर्वा अन्नाद्यमुदुम्बरम्' इस तेन तदात्मना विश्वं पोषयन् श्रुतिके अनुसार उदुम्बर अन्नरूप उदुम्बरः, 'ऊर्वा अन्नाद्यमुदुम्बरम्' , खाधको भी कहते है, खाद्यरूपसे विश्वका पोषण करते है, इसलिये इति श्रुतेः। उदुम्बर है। न्यग्रोधोदुम्बर इत्यत्र विसर्ग- • 'न्यग्रोधोदुम्बरः' इसमे न्यग्रोधःके लोपे सन्धिरार्षः। विसर्गकालोप होनेपर भी सन्धि आर्ष- प्रयोगसे हुई है। श्वोऽपि न स्थातेति अश्वत्थः । श्व अर्थात् कल भी रहनेवाला पृषोदरादित्वादेव सकारस्य तका- नही है,इसलिये [भगवान्की अभिव्यक्ति- रादेश रूप जगत् ] अश्वत्थ है । पृपोदरादि- 'ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख गणमें होनेसे ही अश्वस्थके सकारको एषोऽश्वत्यः सनातनः । तकार आदेश हुआ है । श्रुति कहती (क० उ०२।६।१) | है-'ऊपरकी ओर मूलवाला और इति श्रुतेः। नीचेकी ओर शाखाओंवाला यह २२७ शाङ्करभाष्य 'ऊर्ध्वमूलमधःशाख- सनातन अश्वत्थवृक्ष है । स्मृति भी मश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । कहती है-इस ऊपरको मूल और (गीता १६) नीचेको शाखाओंवाले अश्वत्थ- इति स्मृतेश्च । वृक्षको अविनाशी बतलाते हैं। चाणूरनामानमन्धं निपृदितवा- चाणूर नामक अन्ध्र-जातिके वीर- निति चाणूरान्ध्रनिषूदनः ॥१०१॥ इसलिये चाणूरान्ध्र- निषूदन है ॥१०॥ को मारा था, सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः । अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ॥१०२॥ ८२६ सहस्रार्चिः, ८२७ सप्तजिह्वः, ८२८ सप्तधाः, ८२९ सप्तवाहनः । ८३० अमूर्तिः, ८३१ अनघः, ८३२ अचिन्त्यः, ८३३ भयकृत , ८३४ भयनाशनः॥ सहस्राणि अनन्तानि अचीपि यस्य जिनके सहस्र अर्थात् अनन्त स सहस्रार्चिः, अर्चियाँ (किरणें ) है, वे भगवान् 'दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेयुगपदुत्थिता । सहस्राचि है । गीताजीमे कहा है- यदि भाः सदृशी सा स्या- 'यदि आकाशमें हजार सूर्योका एक दासस्तस्य महात्मनः ॥ साथ प्रकाश हो तो वह उस महात्मा- (११।१२) इति गीतावचनात् । के प्रकाशके समान हो सकता है। सप्त जिह्वा अस्य सन्तीति [अग्निरूपी भगवानकी] सात जिहाएँ सप्तजिह्वः, हैं, इसलिये वे सप्तजिह्व है। श्रुति 'काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा । कहती है-'अग्निकी काली, कराली, स्फुलिगिनी विश्वरची च देवी नोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः॥ स्फुलिङ्गिनी और देवी विश्वरुची-ये (मु० उ०१।२।४) सात लपलपाती हुई जिह्वाएँ हैं। इति श्रुतेः।
२२८ विष्णुसहस्रनाम मस्येति वा, सप्त एधांसि दीप्तयोऽस्येति अग्निरूप भगवान्की सात एधाएँ सप्तधाः अग्निः, 'सप्त ते अग्ने समिधः अर्थात् दीप्तियाँ है, इसलिये वे सप्तधा सप्त जिह्वाः' इति मन्त्रवर्णात् । है। मन्त्रवर्ण कहता है-'हे अग्ने ! तेरी सात समिध और सात जिह्वाएं हैं। सप्त अश्वा वाहनान्यस्येति सात घोड़े [सूर्यरूप] भगवान्के सप्तवाहनः; सप्तनामैकोऽश्वो वाहन- वाहन है, इसलिये वे सप्तवाहन है, 'एकोऽश्वो वहति अथवा सात नामोवाला एक ही घोडा वाहन है, इसलिये [वेदभगवान् ]* सप्तनामा' इति श्रुतेः। सप्तवाहन है । श्रुति कहती है 'सात नामोंवाला एक ही घोड़ावहन करता है। मूर्तिधनरूपं धारणसमर्थ घनरूप धारणमे समर्थ चराचर- चराचरलक्षणम्, 'ताभ्योऽभितप्ताभ्यो को मूर्ति कहते है, जैसा कि श्रुतिमे मूर्तिरजायत' इति श्रुतेः। तद्रहित कहा है-'उन अभितप्तोंसे मूर्ति उत्पन्न हुई। मूर्तिहीन होनेके कारण इति अमूर्तिः; अथवा देहसंस्थान- अमूर्ति है। अथवा देह-संस्थानरूप लक्षणा मूञ्छिताङ्गावयवा मूर्तिः, संगठित अवयव ही मूर्ति है, उससे तद्रहित इति अमूर्तिः। रहित होनेके कारण अमूर्ति है । अपं दुःखं पापं चास्य न विद्यत जिनमे अघ अर्थात् दुःख या पाप इति अनघः । नहीं है वे भगवान् अनघ है। प्रमात्रादिसाक्षित्वेन सर्वप्रमा प्रमाता आदिकं भी साक्षी होनेसे णागोचरत्वात् अचिन्त्यः; अयमी- सब प्रमाणोके अविषय होनेके कारण अचिन्त्य है अथवा सम्पूर्ण प्रपञ्चसे दृश इति विश्वप्रपञ्चविलक्षणत्वेन विलक्षण होनेके कारण 'यह ऐसे है, चिन्तयितुमशक्यत्वाद्वाअचिन्त्यः। इस प्रकार चिन्तन नही किये जा सकते, इसलिये अचिन्त्य है । * गायत्री, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुब् , उष्णिक, जगती और अनुष्टुप्-ये सात छन्द वेदभगवानके घोडे है।
शाङ्करभाष्य २२६ असन्मार्गवर्तिनां भयं करोति, असन्मार्गमे चलनेवालोको भय उत्पन्न भक्तानां भयं कृन्तति कृणोतीति करते है अथवा भक्तोका भय काटते- नष्ट करते है, इसलिये भयकृत है। चा भयकृत् । वर्णाश्रम-धर्मका पालन करनेवालो- वर्णाश्रमाचारवतां भयं नाश- यतीति भयनाशनः का भय नष्ट करते है, इसलिये भगवान् 'वर्णाश्रमाचारवता भयनाशन है। पराशरजीका वचन है- पुरुषेण परः पुमान् । 'वर्णाश्रम-आचारकापालन करनेवाले विष्णुराराध्यते पन्या पुरुपसे हो परम पुरुप भगवान् विष्णु- नान्यस्तत्तोपकारकः ॥ की आराधना बन सकती है। उन्हें (विष्णु० ३।६।६) प्रसन्न करनेका कोई और मार्ग नहीं इति पराशरवचनात् ॥१०२॥ है॥१०२॥ PRODHA- अणुबृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् । अधृतः खधृतः खास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः॥१३॥ , ८३५ अणुः, ८३६ बृहत् , ८३७ कृश., ८३८ स्थल', ८३९ गुणभृत्, ८४० निर्गुण, ८४१ महान् । ८४२ अधृतः, ८४३ स्वधृत., ८४४ खास्यः, ८४५ प्राग्वंशः, ८४६ वंशवर्धनः ॥ सौक्षम्यातिशयशालित्वात् अणुः, अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे भगवान् अणु एपोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः' है । श्रुति कहती है—'यह अणु (सूक्ष्म) आत्मा चित्तसे जानने (मु० उ०३।१।९) इति श्रुतेः। योग्य है। बृहत्वाबृंहणत्वाच ब्रह्म बृहत् , बृहत् (बडा) तथा बृंहण (जगत्- 'महतो महीयान्' (क०३० १।२।२०) रूपसे बढनेवाला ) होनेके कारण ब्रह्म वृहत् है । श्रुति कहती है- इति श्रुतेः। 'महानसे भी अत्यन्त महान् है ' २३० विष्णुसहस्रनाम है। 'अस्थूलम्' (बृ० उ०३1८1८) 'अस्थूल है' इत्यादि श्रुतिसे द्रव्यत्व- इत्यादिना द्रव्यत्वप्रतिषेधात् कृशः। का प्रतिषेध किये जानेके कारण वह कृश है। स्थूलः इति उपचर्यते सर्वा सर्वात्मक होनेके कारण ब्रह्मको त्मत्वात् । उपचारसे स्थूल कहते है। सत्त्वरजस्तमसां सृष्टिस्थितिलय सृष्टि, स्थिति और लयकर्ममे सत्त्व, कर्मस्खधिष्ठातृत्वात् गुणभृत् । रज और तम इन तीनो गुणोंके अधि- ष्ठाता होनेसे भगवान् गुणभृत् वस्तुतो गुणाभावात् निर्गुणः, परमार्थतः उनमे गुणोका अभाव 'केवलो निर्गुणश्च' (श्वे० उ०६।११) है, इसलिये वे निर्गुण है। श्रुति इति श्रुतेः। कहती है केवल और निगुण है।" शब्दादिगुणरहितत्वात् निर- शब्दादि गुणोसे रहित अत्यन्त तिशयसूक्ष्मत्वात् नित्यशुद्धसर्वगत- सूक्ष्म तथा नित्य, शुद्ध और सर्वगत त्वादिना च प्रतिबन्धकं धर्मजातं | होनेके कारण [भगवान्मे] विघ्नरूप तर्कतोऽपि यतो वक्तुं न शक्यम् | कर्म-समूह युक्तिसे भी नही कहे जा अत एव महान् । सकते, इसलिये वे महान है । आपस्तम्ब- 'अनङ्गोऽशब्दोऽशरीरो- ने कहा है-'अङ्ग, शब्द, शरीर ऽस्पर्शश्च महाञ्छुचिः। और स्पर्शसे रहित तथा महान और इति आपस्तम्बः। शुचि है। पृथिव्यादीनां धारकाणामपि पृथिवी आदि धारण करनेवालोके भी धारकत्वान्न केनचिद्धियत इति धारण करनेवाले होनेसे किसीसे भी अधृतः। धारण नही कियेजाते,इसलिये अधृत है। यद्येवमयं केन धार्यत इत्या- यदि ऐसा है तो वे स्वयं किससे धारण किये जाते है-ऐसी शंका आत्मना धार्यते होनेपर कहते है-वे स्वयं अपने- आपसे ही धारण किये जाते है, अतः - 1 शङ्कयाह-खेनैव शाङ्करभाष्य २३१ भूतस्य' इति खधृतः, 'स भगवः कस्मिन्प्रति- वे खधृत है । श्रुति कहती है- ष्ठित इति स्वे महिनि ।' (छा० उ० 'भगवन् ! वह किसमें स्थित है? अपनी ७ । २४ । १) इति श्रुतेः। महिमामें। शोभनं पद्मोदरतलताम्रमभिरूप कमल-कोशके निम्नमागके समान तममस्यास्यमिति स्वास्यः वेदात्मको भगवान्का ताम्रवर्ण मुख अत्यन्त सुन्दर है, इसलिये वे स्वास्य है। महान् शब्दराशिः तस्य मुखा- अथवा पुरुषार्थका उपदेश करने के लिये निर्गतः पुरुषार्थोपदेशार्थमिति वा उनके मुखसे वेदार्थरूपी महान् शब्द- खास्या, 'अस्य महतो समूह निकला है, इसलिये वे स्वास्य (बृ० उ० २।४।१०) इत्या- है। श्रुति कहती है-'इस महाभूतके दिश्रुतेः। [श्वास वेद हैं' इत्यादि। अन्यस्य वंशिनो वंशाः पाश्चा अन्य वंशियोके वंश पीछे हुए है। च्या, अस्य वंशः प्रपञ्चः प्रागेव, होसे है किसीसे ] पीछे नहीं हुआ परन्तु भगवान्का प्रपद्धरूप वंश पहले- न पाश्चात्य इति प्राग्वंशः । है, इसलिये वे प्राग्वंश हैं। वंशं प्रपञ्चं वर्धयन् छेदयन् वा अपने वंशरूप प्रपञ्चको बढाने वंशवर्धनः ॥१०३॥ अथवा नष्ट करनेके कारण भगवान् वंशवर्धन है ॥१०॥ भारभृत्कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः । आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः॥१०॥ ८४७ भारभृत् , ८४८ कथितः, ८४९ योगी, ८५० योगीश, ८५१ सर्व- कामदः । ८५२ आश्रमः, ८५३ श्रमणः, ८५४ क्षामः, ८५५ सुपर्णः, ८५६ वायुवाहन ॥ अनन्तादिरूपेण भुवो मार अनन्तादिरूपसे पृथिवीका भार बिभ्रत् भारभृत् । उठानेके कारण भारभृत् है।
भरतर्षभ । योगों ज्ञानम्, तनव गम्यत्वात् । २३२ विष्णुसहस्रनाम वेदादिभिरयमेव परत्वेन वेदादिकोंने पररूपसे भगवान्का कथितः, सवैवेदैः कथित इति वा ही कथन किया है अथवा सम्पूर्ण कथितः, 'सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति' वेदोसे भी भगवान् ही कथित है, इसलिये (क० उ० १।२। १५) 'वेदैश्च वे कथित है। 'सब वेद जिस पद सर्वैरहमेव वेद्यः' (गीता १५ । (ब्रह्म) का प्रतिपादन करते है 'वेदे रामायणे पुण्ये 'सम्पूर्ण वेदोंसे भी मैं ही जानने योग्य भारते हूँ! 'हे भरतश्रेष्ठ ! वेद, रामायण, आदौ मध्ये तथा चान्ते पुराण तथा महाभारत-इन सबके विष्णुः सर्वत्र गीयते ॥ आदि, मध्य और अन्तमे सर्वत्र विष्णु (महा० श्रवण ०६३) ही गाये गये हैं। 'वह मार्गको पार 'सोऽध्वन' पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् । कर लेता है, वही विष्णुका परम पद (क० उ० १ । ३।१) है। इत्यादि श्रुति-स्मृति-वाक्योद्वारा इति श्रुतिस्मृत्यादिवचनेभ्यः । [ ऐसा ही कहा गया है] । व्यापन- किं तदध्वनो विष्णोापनशीलस्य शील विष्णुके मार्गका वह तात्त्विक परमं पदं सतत्वमित्याकाङ्क्षायाम् परम पद क्या है ? ऐसी जिज्ञासा होने- इन्द्रियादिभ्यः सर्वेभ्यः परत्वेन प्रतिपाद्यते 'इन्द्रियेभ्यः परा ह्याः, पर उसका सम्पूर्ण इन्द्रियादिके पर- (क० उ० १ । ३ । १०) इत्या- रूपसे प्रतिपादन किया जाता है। रभ्य, वेदमे 'इन्द्रियोंसे विषय पर है। यहाँसे 'पुरुषान्न परं किञ्चित् आरम्भ करके 'पुरुषसे पर कुछ नहीं सा काष्ठा सा परा गतिः' है, वह सीमा है और वही परम गति (क० उ० १।३ । ११) है। इस वाक्यतक जिसका कथन किया इत्यन्तेन यः कथितः स कथितः। गया है वही कथित है। योग ज्ञानको कहते है उसीसे प्राप्तव्य होनेके कारण भगवान् योगी योगी; योगः समाधिः, स हि है। अथवा योग समाधिको भी कहते , शाङ्करभाष्य २३३ स्वात्मनि सर्वदा समाधत्ते खमा- है, परमात्मा सर्वदा अपने आत्मा त्मानम् , तेन वा योगी। (स्वरूप) मे अपने आपको समाहित रखते है, इसलिये वे योगी है। अन्ये योगिनो योगान्तरायै अन्य योगिजन योगके विन्नोसे सताये जाते है, इसलिये वे स्वरूपसे हन्यन्ते स्वरूपात्प्रमाद्यन्ति । अयं विचलित हो जाते है, परन्तु भगवान् तु तद्रहितत्वात्तेपामीशा योगीशः । अन्तरायरहित है, इसलिये योगीश है। सर्वान् कामान् सदा ददातीति सर्वदा सब कामनाएँ देते हैं, इसलिये सर्वकामदः, 'फलमत उपपत्तेः' (ब्र० सर्वकामद है। भगवान् व्यासजीने कहा है-'फल इस (परमात्मा)से ही सू० ३ १२ । ३८) इति व्यासेना- प्राप्त होते हैं, क्योकि यही [मानना] भिहितत्वात् । उपपन्न (युक्तिसंगत) है । आश्रमवत् सर्वेषां संसारारण्ये संसारवनमे भटकते हुए समस्त भ्रमतां विश्वमस्थानत्वात् आश्रमः । पुरुपोके लिये आश्रमके समान विश्रान्ति- के स्थान होनेसे परमात्मा आश्रम है। अविवेकिनः सर्वान् सन्तापय समस्त अविवेकियोको सन्तप्त करते तीति श्रमणः। है, इसलिये श्रमण है। क्षामा: क्षीणाः सर्वाः प्रजा: सम्पूर्ण प्रजाको क्षाम अर्थात् क्षीण करते है, इसलिये क्षाम है। "क्षामाः करोतीतिक्षामः ; 'तत्करोति तदाचष्टे करोतिः इस विग्रहमे ] 'तत्करोति (चुरादिगणवार्तिकम् ) इति णिचि तदाचष्टे इस बार्तिकके अनुसार पचाद्यचि कृते सम्पन्नः क्षाम इति। [क्षाम शब्दसे] णिच्प्रत्यय करनेके अनन्तर पचादिनिमित्तक अच्प्रत्यय करनेपर 'क्षाम' शब्द सिद्ध होता है। ॐ परमात्मा सबका साक्षी है और नाना प्रकारकी सृष्टि, पालन तथा संहार करता हुआ देश और काल-विशेषका ज्ञाता है, इसलिये वह कर्म करनेवालोंको उनके कर्मानुसार फल देता है-यही युक्ति है।
२३४ विष्णुसहस्रनाम शोभनानि पर्णानिच्छन्दांसि संसारवृक्षरूप परमात्माके छन्दरूप संसारतरुरूपिणोऽस्येति सुपर्णः, सुन्दर पत्ते है, इसलिये वे सुपर्ण है; 'छन्दांसि यस्य पर्णानि' (गीता १५। जैसा कि भगवान्का वाक्य है-'छन्द १) इति भगवद्वचनात् । जिसके पत्ते हैं। वायुर्वहति यद्धीत्या भूतानीति जिनके भयसे वायु समस्त भूतोका स वायुवाहनः, 'भीषास्माद्वातः पवते' वहन करता है वे भगवान् वायुवाहन (तै० उ०२। ८) इति श्रुतेः है। श्रुति कहती है-इसके भयसे ॥ १०४॥ वायु चलता है। ॥१०४॥ धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः । अपराजितः सर्वसहो नियन्तानियमोऽयमः ॥१०॥ ८५७ धनुर्धरः, ८५८ धनुर्वेदः, ८५९ दण्डः, ८६० दमयिता, ८६१ दमः । ८६२ अपराजितः, ८६३ सर्वसहः, ८६४ नियन्ता, ८६५ अनियमः, ८६६ अयमः ॥ श्रीमान् रामो महद्धनुर्धारया श्रीमान् रामने महान् धनुष धारण मासेति धनुर्धरः । किया था, इसलिये वे धनुर्धर है। स एव दाशरथिर्धनुर्वेदं वेत्तीति वे ही दशरथकुमार धनुर्वेद जानते धनुर्वेदः। है, इसलिये धनुर्वेद है। दमनं दमयतां दण्डः 'दण्डो दमन करनेवालोमे दमन [कर्म] दमयतामस्मि' (गीता १०।३८) है, इसलिये वे दण्ड है; भगवान् कहते इति भगवदचनात् । है-'दमन करनेवालोंका मैं दण्ड हूँ। वैवस्वतनरेन्द्रादिरूपेण प्रजा यम और राजा आदिके रूपसे दमयतीति दमयिता। प्रजाका दमन करते है, इसलिये भगवान् दमयिता है।
शाङ्करभाष्य २३५ दमा दम्येषु दण्डकार्य फलम् , तच्च स एवेति दमः । शत्रुभिर्न पराजित इति अपराजितः। सर्वकर्मसु समर्थ इति, सर्वान् दण्डके अधिकारियोमे दण्डकार्य और उसका फल दम कहलाता है। वह भी वे ही है, इसलिये दम है। शत्रुओंसे पराजित नहीं होते, इसलिये अपराजित हैं। समस्त कोंमे समर्थ हैं इसलिये अथवा समस्त शत्रुओको सहन करते जीत लेते) है, इसलिये सर्वसह है। शत्रून् सहत इति वा सर्वसहः । सर्वान् स्वेषु स्वेषु कृत्येषु सबको अपने-अपने कार्यमे नियुक्त व्यवस्थापयतीति नियन्ता । करते है, इसलिये नियन्ता है। न नियमो नियतिस्तस्य विद्यत भगवानके लिये कोई नियम अर्थात् नियन्त्रण नही है, इसलिये वे अनियम इति अनियमः, सर्वनियन्तुर्नियन्त्र- है; क्योकि सबके नियन्ताका कोई और न्तराभावात् । नियामक नही हो सकता। नास्य विद्यते यमो मृत्युरिति भगवान्के लिये कोई यम अर्थात् मृत्यु नहीं है, अतः वे अयम है। अयमः । अथवा, यमनियमो अथवा योगके अङ्ग जो यम और नियम योगाङ्गे तद्गम्यत्वात्स एव नियमः है उनसे प्राप्तव्य होनेके कारण वे स्वयं यमः ॥१०५॥ नियम और यम है ॥१०५|| सत्त्ववान्सात्त्विका सत्यः सत्यधर्मपरायणः । अभिप्रायः प्रियाहोऽर्हः प्रियकृत्प्रीतिवर्धनः ॥१०॥ ८६७ सत्त्ववान् , ८६८ सात्त्विक , ८६९ सत्य., ८७० ८७० सत्यधर्मपरायग। ८७१ अभिप्रायः, ८७२ प्रियाह', ८७३ अर्ह., ८७४ प्रियकृत् , ८७५ प्रीतिवर्धनः ॥ - २३६ विष्णुसहस्रनाम . शौर्यवीर्यादिकं सत्वमस्येति भगवान्मे शूरता-पराक्रम आदि सत्त्व सत्त्ववान् । है, इसलिये वे सत्त्ववान् है । सत्त्वे गुणे प्राधान्येन स्थित सत्त्वगुणमे प्रधानतासे स्थित है, इति सात्त्विकः । इसलिये सात्त्विक है। सत्सु साधुत्वात् सत्यः । समीचीनोमे साधु होनेसे सत्य है। सत्ये यथाभूतार्थकथने धर्मे च वे सत्य अर्थात् यथार्थ भाषणमे और चोदनालक्षणे नियत इति सत्य- | विधिरूप धर्ममे नियत है, इसलिये धर्मपरायणः। सत्यधर्मपरायण है। अभिप्रेयते पुरुषार्थकाटिभिः, पुरुषार्थके इच्छुक पुरुष भगवान्का अभिप्राय अर्थात् अभिलाषा रखते है, आभिमुख्येन प्रलयेऽस्मिन्प्रति अथवा प्रलयके समय संसार उनके सम्मुख जगदिति वा अभिप्रायः। जाता है, इसलिये वे अभिप्राय है। प्रियाणि इप्टान्यहतीति प्रियाहः, प्रिय-इष्ट वस्तु निवेदन करने योग्य 'यद्यदिष्टतम लोके है, इसलिये प्रियाह है। स्मृति कहती यच्चास्य दयितं गृहे। है-'मनुष्यको संसारमे जो सबसे अधिक प्रिय हो तथा उसके घरमेजो तत्तद्गुणवते देयं उसकी सबसे प्यारी वस्तु हो, उसे तदेवाक्षयमिच्छता ॥ यदि अक्षय करनेकी इच्छा हो तो इति स्मरणात् । गुणवानको दे देनी चाहिये। स्वागतासनप्रशंसाऱ्यापाद्यस्तु भगवान् स्वागत, आसन, प्रशंसा, अर्घ्य, पाद्य, स्तुति और नमस्कार आदि तिनमस्कारादिभिः पूजासाधनैः पूजाके साधनोसे पूजनीय है, इसलिये पूजनीय इति अर्हः । अह है। न केवलं प्रियाह एव, किन्तु केवल प्रियाह ही नही है बल्कि स्तुत्यादिभिर्भजतां प्रियं करो- स्तुति आदिके द्वारा भजनेवालोका प्रिय तीति प्रियकृत् । करते है, इसलिये प्रियकृत् भी है।
२३७ शाङ्करभाष्य तेषामेव प्रीतिं वर्धयतीति प्रीतिवर्धनः ॥१०६॥ उन्हीकी प्रीति भी बढ़ाते है, इसलिये प्रीतिवर्धन है॥१०६॥ विहायसगतिज्योतिः सुरुचिर्तुतभुग्विभुः। रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥१०७॥ ८७६ विहायसगतिः, ८७७ ज्योतिः, ८७८ सुरुचिः, ८७९ हुतभुक्, ८८० विभुः । ८८१ रविः, ८८२ विरोचनः, ८८३ सूर्यः, ८८४ सविता, ८८५ रविलोचनः ॥ विहायसं गतिराश्रयोऽस्यति | जिसकी गति अर्थात् आश्रय विहा- विहायसगतिः, विष्णुपदम् आदि- | यस (आकाश) है वह विष्णुपद अथवा आदित्य ही विहायसगति है। . त्यो वा। - खत एव द्योतत इति ज्योतिः, खयं ही प्रकाशित होते है, इसलिये 'नारायणपरो ज्योतिरात्मा' (ना० उ० ज्योति है; जैसा कि मन्त्रवर्ण कहता है- १३ । १) इति मन्त्रवर्णात् । 'नारायण परम ज्योतिरूप है।" मना रुचिर्दीप्तिरिच्छा वा भगवान्की रुचि-दीप्ति अथ्वा अस्येति सुरुचिः। इच्छा सुन्दर है, इसलिये वे सुरुचि है। समस्तदेवतोद्देशेन प्रवृत्तेष्वपि समस्त देवताओके उद्देश्यसे भी किये हुए कर्नामे आहुतियोको [स्वयम् ] कर्मसु हुतं भुङ्क्ते भुनक्तीति वा भोगते है अथवा उनकी रक्षा करते है, इतमुक् । इसलिये हुतभुक् है। सर्वत्र वर्तमानत्वात्, त्रयाणां सर्वत्र वर्तमान होने तथा तीनों लोकानां प्रभुत्वाद्वा विभुः । लोकोंके प्रमु होनेके कारण विभु हैं। रमानादत्त इति रवि आदि- रसोको ग्रहण करते है, इसलिये त्यात्मा मर्यरूप भगवान् रवि है । विष्णु- - २३८ विष्णुसहस्रनाम १ २ 'रसानाश्च तथादाना- धर्मोत्तरपुराणमे कहा है-'रसोंका द्रविरित्यभिधीयते।' ग्रहण करनेके कारण 'रविर (१।३० । १६) कहलाते हैं। इति विष्णुधर्मोत्तरे। विविधं रोचत इति विरोचनः । विविध प्रकारसे सुशोभित होते है, इसलिये विरोचन है। सूते श्रियमिति सूर्योऽग्निर्वा सूर्यः श्री (शोभा) को जन्म देते है, सूतेः सुवतेर्वा सूर्यशब्दो निपात्यते, इसलिये सूर्य या अग्नि सूर्य है। 'राजसूयसूर्य' (पा० सू० ३ । १ 'राजसूयसूर्य' इत्यादि पाणिनि-सूत्रके ११४) इति पाणिनिवचनात् अनुसार घूड या धू धातुसे सूर्यशब्दका सूर्यः । निपातन किया जाता है। सर्वस्य जगतः प्रसविता सविता; सम्पूर्ण जगत्का प्रसव ( उत्पत्ति) करनेवाले होनेसे भगवान् सविता है। 'प्रजानां तु प्रसवनात्सवितेति निगद्यते विष्णुधर्मोत्तरपुराणमे कहा है- (१ । ३० । १५) इति विष्णु- 'प्रजाओंका प्रसव करनेसे आप धर्मोचरे। सविता कहलाते हैं। रविर्लोचनं चक्षुरस्येति रविलो रवि भगवान्का लोचन अर्थात् नेत्र है, इसलिये वे रविलोचन है। चनः, 'अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यो' श्रुति कहती है-'अग्नि उसका शिर (मु० उ० २ । १ । ४) इति ) इति है तथा सूर्य और चन्द्र नेत्र श्रुतेः॥१०७॥ हैं। ॥१०७|| अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः । अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ॥१०८॥ 9-फूड प्राणिगर्भविमोचने (अदादि) इसके 'सूते' आदि रूप होते हैं। २-पू प्रेरणे (तुदादि) इसके 'सुवति' आदि रूप होते हैं।
२३६ शाङ्करभाष्य ८८६ अनन्तः, ८८७ हुतभुक् , ८८८ भोक्ता, ८८९ सुखदः [ असुखदः ], ८९० नैकजः, ८९१ अग्रजः । ८९२ अनिर्विण्ण.. ८९३ सदामी, ८९४ लोकाधिष्ठानम्, ८९५ अद्भुतः ।। नित्यत्वात्सर्वगतत्वाद् देश नित्य, सर्वगत और देशकालपरि- च्छेदका अभाव होनेके कारण भगवान् कालपरिच्छेदाभावात् अनन्तः अनन्त है । अथवा शेषरूप भगवान् शेषरूपो वा। ! ही अनन्त है। हुतं भुनक्तीति हुतभुक् । हवन किये हुएको भोगते है, इस- लिये हुतभुक् है। प्रकृति भोग्याम् अचेतनां भुङ्क्ते भोग्यरूपा अचेतन प्रकृतिको भोगते है, इसलिये अथवा जगतका इति, जगत्पालयतीति वा भोक्ता । पालन करते है, इसलिये भोक्ता है। भक्तानां सुखं मोक्षलक्षणं भक्तोको मोक्षरूप सुख देते है,इसलिये ददातीति सुखद.। असुखं यति सुखद है अथवा उनके असुखका दलन- खण्डयतीति वा असुखदः । खण्डन करते है, इसलिये असुखद है। धर्मगुप्तये असकृञ्जायमानत्वात् धर्म-रक्षाके लिये वारम्बार जन्म लेनेके कारण नैकज है। अग्रे जायत इति अग्रजः हिरण्य सबसे आगे उत्पन्न होता है, इसलिये गर्भः, 'हिरण्यगर्भः समवर्तताने हिरण्यगर्भ अग्रज है । श्रुति कहती है- (ऋ० सं० १० । १२१ । १)! 'पहले हिरण्यगर्भ ही वर्तमान था।" इत्यादिश्रुतेः। अवाप्तसर्वकामत्वादप्राप्तिहेत्व- सर्व कामनाएँ प्राप्त होनेके कारण अप्राप्तिके हेतुका अभाव भावानिर्वेदोऽस्य नास्तीति अनि- होनेसे परमात्माको निर्वेद (खेद) नहीं है, इसलिये वे अनिर्विण्ण है। नेकजः । - विण्णः ।
२४० विष्णुसहस्रनाम सतः साधून् आभिमुख्येन साधुओको अपने सम्मुख सहन मृष्यते क्षमत इति सदामर्षी । करते अर्थात् क्षमा करते है, इसलिये सदामी है। तमनाधारमाधारमधिष्ठाय त्रयो उस निराधार ब्रह्मके आश्रयसे लोकास्तिष्ठन्ति इति लोकाधिष्ठानं तीनो लोक स्थित है, इसलिये वह ब्रह्म। लोकाधिष्ठान है। अद्भुतत्वात् अद्भुतः, 'जो बहुतोको तो सुननेको भी 'श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः नही मिलता और बहुतसे जिसे सुन- कर भी नहीं जानते उस (ब्रह्म) का शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्यः । वक्ता आश्चर्यरूप है तथा उसका आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा लब्धा-समझनेवाला भी कोई निपुण आश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ।।' ही होता है। तथा निपुण आचार्यसे उपदेश पाकर इसे समझ लेनेवाला भी (क० उ० १ । २ । ७) आश्चर्यरूपही है-इस श्रुतिसे, और इति श्रुतेः। 'आश्चर्यवत्पश्यति | 'आश्चर्यके समान इसे कोई देख कश्चिदेनम् (गीता २। २९) पाता है । इस भगवान्के वाक्यसे भी अमृत होनेके कारण भगवान् अद्भुत इति भगवद्वचनाच । स्वरूपशक्ति- हैं । अथवा अपने स्वरूप, शक्ति, व्यापारकार्यैरद्भुतत्वाद्वा अद्भुतः व्यापार और कार्य अद्भुत होनेके ॥१०८।। कारण अद्भुत है ॥१०८॥ वे सनात्सनातनतमः कपिल: कपिरप्ययः। खस्तिदःस्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिमुक्स्वस्तिदक्षिणः॥१०९॥ ८९६ सनात् , ८९७ सनातनतमः, ८९८ कपिलः, ८९९ कपिः,९०० अप्ययः । ९०१ स्वस्तिदः, ९०२ खस्तिकृत , ९०३ खस्ति, ९०४ खस्तिभुक्, ९०५ स्वस्तिदक्षिणः ॥
२४१ शाङ्करभाष्य सनात् इति निपातश्चिरार्थ सनात् यह एक चिरकाल-चाची वचनः। कालश्च परस्यैव विकल्पना निपात है, काल भी परमात्माका ही कापि। एक विकल्प है; जैसा कि विष्णु- 'परस्य ब्रह्मणो रूपं पुराणमे कहा है-~'हे द्विज!परब्रह्म- पुरुषः प्रथमं द्विज । का प्रथमरूप पुरुप है, दूसरे रूप व्यक्त व्यक्ताव्यक्त तथैवान्ये रूपे कालस्तथापरम् ॥ और अव्यक्त है तथा फिर काल है।। (१।२ । १५) इति विष्णुपुराणे। सर्वकारणत्वाद् विरिश्चथादीना सबके कारण होनेसे भगवान् ब्रह्मा मपि सनातनानामतिशयेन सना- आदि सनातनोसे भी अत्यन्त सनातन तनत्वात् सनातनतमः । होनेके कारण सनातनतम है। बडवानलस्य कपिलो वर्ण बडवानलका कपिल (पिङ्गल) इति तद्रूपी कपिलः वर्ण होता है अतः बडवानलरूप भगवान् कपिल है। के जलं रश्मिभिः पिबन् कपि अपनी किरणोसे क अर्थात् जलको सूर्यः, कपिर्वराहो वा, 'कपिर्वराह. पीनेके कारण सूर्यका नाम कपि है। अथवा वराह भगवान् कपि है, जैसा श्रेष्ठश्च' इति वचनात् । कि कहा है--'कपि वराह और श्रेष्ठ है। प्रलये अस्मिन्नपियन्ति जग प्रलयकालमे जगत् भगवान्मे अप- न्तीति अप्ययः। गत (विलीन) होते है, इसलिये वे अप्यय है। इति नाम्नांनवमं शतं विवृतम्। यहॉतक सहस्रनामके नवे शतक- का विवरण हुआ। भक्तानां स्वस्ति मङ्गलं ददा- भक्तोको खस्ति अर्थात् मंगल देते तीति खस्तिदः। है, इसलिये खस्तिद है। १६
२४२
विष्णुसहस्रनाम
तदेव करोतीति खस्तिकृत् । वह [ स्वस्ति ] ही करते हैं, अतः
स्वस्तिकृत् है।
मङ्गलस्वरूपमात्मीयं परमानन्द भगवान्का मंगलमय निजखरूप
लक्षणं खस्ति।
परमानन्दरूप है, इसलिये वे स्वस्ति है।
तदेव भुङ्क्त इति स्वस्तिमुक् वही (खस्ति ही) भोगते है और
भक्तानां मङ्गलं स्वस्ति भुनक्तीति भक्तोके मंगल अर्थात् स्वस्तिकी रक्षा
वा स्वस्तिमुक।
करते है, इसलिये खस्तिभुक् है।
स्वस्तिरूपेण दक्षते वर्धते, स्वस्तिरूपसे बढते है अथवा स्वस्ति
स्वस्ति दातुं समर्थ इति वा स्वस्ति- करनेमे समर्थ है, इसलिये स्वस्ति-
दक्षिणः । अथवा दक्षिणशब्द दक्षिण हैं । अथवा दक्षिण शब्दका
आशुकारिणि वर्तते; शीघ्र स्वस्ति प्रयोग शीघ्र करनेवालेके लिये भी होता
दातुं अयमेव समर्थ इति, यस्य है । भगवान् ही शीघ्र खस्ति देनेमे
स्मरणादेव सिध्यन्ति सर्वसिद्धयः, समर्थ है क्योकि इनके स्मरणमात्रसे
सब सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती है। [इस-
'स्मृते सकलकल्याण-
लिये वे खस्तिदक्षिण है] इस विषयमे
भाजनं यत्र जायते ।
'जिसके स्मरणसे पुरुष सम्पूर्ण
पुरुपस्तमजं नित्यं
कल्याणका पात्र हो जाता है उस
ब्रजामि शरणं हरिम् ॥
अजन्मा और नित्य हरिकी मैं शरण
'स्मरणादेव कृष्णस्य
जाता हूँ। [तथा- जैसेवज्रके लगनेसे
पर्वत टुकड़े-टुकड़े हो जाता है उसी
पापसङ्घातपचरम् ।
प्रकार कृष्णके स्मरणमात्रसे ही
शतधा भेदमायाति
पाप-संघातरूप पञ्जरके सैकड़ों टुकड़े
गिरिर्वजहतो यथा ॥ हो जाते हैं।" इत्यादि वचन प्रमाण
इत्यादिवचनेभ्यः॥१०९॥ है॥१०९॥
अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूजितशासनः ।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ॥११॥
शाङ्करभाष्य २४३ - ९०६ अरौद्र, ९०७ कुण्डली, ९०८ चक्री, ९०९ विक्रमी, ९१० ऊर्जित- शासनः । ९११ शब्दातिगः, ९१२ शब्दसहः, ९१३ शिशिरः, ९१४ शर्वरीकरः॥ कर्म रौद्रम् , रागश्च रौद्रः, कर्म, राग और कोप ये रौद्र है। कोपश्च रौद्रा यस्य रौद्रत्रयं नास्ति आप्तकाम होनेके कारण राग-द्वेपका अवाप्ससर्वकामत्वेन रागद्वेषादेर- अभाव होनेसे जिनमे ये तीनो रौद्र भावात्सः अरौद्रः। नही है, वे भगवान् अरौद्र है। शेषरूपभाक् कुण्डली सहस्रांशु शेपरूपधारी होनेसे कुण्डली हैं मण्डलोपमकुण्डलधारणाद्वा; यद्वा, अथवा सूर्यमण्डलके समान कुण्डल धारण करनेसे कुण्डली है। अथवा सांख्ययोगात्मके कुण्डले मकराकारे इनके साख्य और योगरूप मकराकृति अस्य स्त इति कुण्डली। कुण्डल है, इसलिये कुण्डली है। समस्तलोकरक्षार्थ मनस्तत्त्वात्मकं सम्पूर्ण लोकोकी रक्षाके लिये सुदर्शनाख्यं चक्र धत्त इति चक्री, मनस्तत्त्वरूप सुदर्शनचक्र धारण करते 'चलखरूपमत्यन्त- है, इसलिये चक्री है। विष्णुपुराणमें जवेनान्तरितानिलम् । कहा है-'श्रीविष्णु अत्यन्त वेगसे चक्रवरूपं च मनो वायुको भी हरानेवाला चञ्चल धत्ते विष्णुः करे स्थितम् ॥ चक्रस्वरूप मन अपने हाथमे धारण (१।२२।७१) करते हैं।' इति विष्णुपुराणवचनात् । विक्रमः पादविक्षेपः, शौर्य वा; भगवान्का विक्रम-पादविक्षेप द्वयं चाशेषपुरुषेभ्यो विलक्षणम- (डग) अथवा शूरवीरता दोनो ही समस्त पुरुपोसे विलक्षण है, इसलिये वे स्येति विक्रमी । विक्रमी है। श्रुतिस्मृतिलक्षणमूर्जितं शासन उनका श्रुति-स्मृतिरूप शासन अत्यन्त उत्कृष्ट है, इसलिये वे ऊर्जित- मस्येति ऊर्जितशासनः । शासन है। भगवान्ने कहा है- विष्णुसहस्रनाम 'श्रुतिस्मृती ममैवाने 'श्रुति, स्मृति मेरी ही आज्ञाएँ है जो यस्ते उल्लङ्घय वर्तते । उनका उल्लङ्घन करके वर्तता है वह आज्ञाच्छेदी मम द्वेषी मेरी आज्ञाका तोड़नेवाला पुरुष मेरा मद्भकोऽपि न वैष्णवः॥' द्वषी है-वह न मेरा भक्त है और न इति भगवद्वचनात् । वैष्णव ही है। शब्दप्रवृत्तिहेतूनांजात्यादीनाम शब्दकी प्रवृत्तिके हेतु जाति आदि सम्भवात् शब्देन वक्तुमशक्यत्वात् भगवान्मे सम्भव न होनेके कारण वे शब्दातिगः, शब्दसे नही कहे जा सकते, इसलिये 'यतो वाचो निवर्तन्ते शब्दातिग है । 'जिसे प्राप्त न होकर अप्राप्य मनसा सह ।' मनसहित वाणी लौट आती है। (तै० उ० २।४) 'जिसका योगियोंसे ध्यान किया 'न शब्दगोचरं यस्य जानेवाला पद शब्दका विषय नहीं है।' योगिध्येयं परं पदम् ।' इत्यादि श्रुति-स्मृतियोसे [यही बात (वि० पु. १ । १७ । २२) सिद्ध होती है] । इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः । सर्वे वेदाः तात्पर्येण तमेव समस्त वेद तात्पर्यरूपसे भगवान्का वदन्तीति शब्दसहः, 'सर्वे वेदा ही वर्णन करते है, इसलिये वे शब्दसह है; जैसा कि 'जिस [ब्रह्म] पदकासमस्त यत्पदमामनन्ति' (क० उ०१।२।१५) वेद वर्णन करते है' इत्यादि श्रुति इति श्रुतेः, 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः' और 'समस्त वेदोसे भी मैं ही जानने (गीता १५।१५) इति स्मृतेश्च । योग्य हूँ' इत्यादि स्मृति कहती है। तापत्रयाभितप्तानां विश्रामस्थान तापत्रयसे तपे हुओके लिये विश्राम- त्वात् शिशिरः । के स्थान होनेके कारण शिशिर है। संसारिणामात्मा शर्वरीव शर्वरी; संसारियोके लिये आत्मा शर्वरी (रात्रि) के समान शर्वरी है तथा ज्ञानिनां पुनः संसारः शर्वरी; ज्ञानियोको संसार ही शर्वरी है।
शाङ्करभाष्य तामुभयेषां करोतीति शर्वरीकरः, उन (ज्ञानी-अज्ञानी) दोनोकी शर्वरियो- 'या निशा सर्वभूतानां के करनेवाले होनेसे भगवान् शर्वरीकर तस्या जागति संयमी। है । जैसा कि भगवान्ने कहा है- यस्यां जाग्रति भूतानि 'समस्त भूतोकी जो रात्रि है उसमे सा निशा पश्यतो मुनेः ।।' संयमी पुरुष जागता है और जिसमें (गीता २ । ६६ ) सव भूत जागते हैं द्रष्टा (तत्त्वज्ञानी) इति भगवद्वचनात् ॥११०॥ मुनिके लिये वही रात्रि है' ॥११०॥ अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः । विद्वत्तमो पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥११॥ वीतभयः ९१५ अक्रूरः, ९१६ पेशलः, ९१७ दक्षः, ९१८ दक्षिणः, ९१९ क्षमिणा वरः । ९२० विद्वत्तमः, ९२१ वीतभयः, ९२२ पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ क्रौर्य नाम मनोधर्मः प्रकोपज: क्रूरता मनका धर्म है, यह क्रोधसे आन्तरः सन्तापः सामिनिवेशः उत्पन्न होनेवाला अभिनिवेशयुक्त आन्तरिक सन्ताप है। आप्तकाम होनेसे अवाप्तसमस्तकामत्वात्कामाभावा- कामनाओका अभाव होनेके कारण ही देव कोपाभावा; तस्मात्क्रौर्यमस्य भगवान्में क्रोधका भी अभाव है, अतः भगवान्मे क्रूरता नहीं है, इसलिये - नास्तीति अक्रूरः । वे अक्रूर है। कर्मणा मनसा वाचा वपुषा च कर्म, मन, वाणी और शरीरसे सुन्दर शोभनत्वात् पेशलः । होनेके कारण भगवान् पेशल है। प्रवृद्धा शक्तः शीघ्रकारी च बढ़ा-चढा, शक्तिमान् तथा शीघ्र दक्षा,त्रयं चैतत् परस्मिन्नियतमिति कार्य करनेवाला-ये तीन दक्ष है। ये दक्षः। परमात्मामे निश्चित है,इसलिये वेदक्ष है।
૨૪૬ विष्णुसहस्रनाम दक्षिणशब्दस्यापि दक्ष एवार्थः, दक्षिण शब्दका अर्थ भी दक्ष ही पुनरुक्तिदोषो नास्ति, शब्दभेदात् ; है, शब्द-भेद होनेके कारण यहाँ पुनरुक्ति दोप नही है । अथवा 'दक्ष अथवा दक्षते गच्छति, हिनस्तीति धातुका गति और हिसा अर्थमे प्रयोग वा दक्षिणः, 'दक्ष गतिहिसनयोः' होता है' इस धातुपाठके अनुसार इति धातुपाठात् । भगवान् [सब ओर] जाते और [सबको] मारते है, इसलिये दक्षिण है। क्षमावतां योगिनां च पृथिव्या क्षमा करनेवाले योगियों और भार दीनां भारधारकाणां च श्रेष्ठ इति धारण करनेवाले पृथिवी आदिमे श्रेष्ठ क्षमिणां वरः । 'क्षमया पृथिवीसमः है, इसलिये क्षमिणांवर है । वाल्मीकि- जीका कथन है [राम] क्षमामे ( वा० रा० १।१।१८) इति पृथिवीके समान है।' अथवा सम्पूर्ण वाल्मीकिवचनात् ब्रह्माण्डमखिलं ब्रह्माण्डको धारण करते हुए भी पृथिवीके वहन् पृथिवीव भारेण नादित इति समान उसके भारसे पीडित नहीं होते, पृथिव्या अपि वरो वा क्षमिणः | इसलिये पृथिवीसे भी श्रेष्ठ होनेके कारण शक्ता अयं तु सर्वशक्तिमत्त्वात्स- क्षमिणां वर है । अथवा क्षमी समर्थोको कहते है, भगवान् सर्वशक्तिमान् होनेके कलाः क्रियाः कर्तु क्षमत इति वा कारण सभी कर्म करनेमे समर्थ है, क्षमिणां वरः। इसलिये वे क्षमिणा वर है। निरस्तातिशयं ज्ञानं सर्वदा सर्व भगवान्को सदा सब प्रकारका गोचरमस्यास्ति नेतरेषामिति निरतिशय ज्ञान है और किसीको नही विद्वत्तमः । है, इसलिये वे विद्वत्तम है। वीतं विगतं भयं सांसारिक सर्वेश्वर और नित्यमुक्त होनेके कारण भगवान्का सासारिक अर्थात् संसारलक्षणं वा अस्येति वीतभयः, संसाररूप भय बीत [ निवृत्त हो] सर्वेश्वरत्वान्नित्यमुक्तत्वाच्च । गया है, इसलिये वे वीतभय है।
शाङ्करभाष्य पुण्यं पुण्यकरं श्रवणं कीर्तन भगवान्का श्रवण और कीर्तन चास्येति पुण्यश्रवणकीर्तनः, पुण्यरूप अर्थात् पुण्यकारक है, इसलिये 'य इद शृणुयानित्य वे पुण्यश्रवणकीर्तन है; क्योकि 'जो यश्चापि परिकीर्तयेत् । इसे नित्य सुनता है और जो इनका नाशुभ प्राप्नुयात्किञ्चित् कीर्तन करता है उस मनुष्यको इस सोऽमुत्रेह च मानवः॥" लोक या परलोकमे बुरा फल नहीं (वि. स. १२२) मिलता है इत्यादि वाक्योसे श्रवणका इति श्रवणादिफलवचनात् ॥१११॥ फल बतलाया गया है ॥१११॥ . - उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः । वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ॥११२॥ ९२३ उत्तारणः, ९२४ दुष्कृतिहा, ९२५ पुण्य', ९२६ दुःस्वप्ननाशनः । ९२७ वीरहा, ९२८ रक्षणः, ९२९ सन्तः, ९३० जीवनः, ९३१ पर्यवस्थितः ॥ संसारसागरादुत्तारयतीति संसार-सागरसे पार उतारते है, उत्तारणः । इसलिये उत्तारण है। दुष्कृती: पापसंज्ञिता हन्तीति पापनामको दुष्कृतियोका हनन करते है, इसलिये दुष्कृतिहा है, अथवा जो दुष्कृतिहा,ये पापकारिणस्तान्हन्तीति पाप करनेवाले है उन्हे मारते है, इसलिये वा दुष्कृतिहा। दुष्कृतिहा है ! स्मरणादि कुर्वतां सर्वेषां पुण्यं स्मरण आदि करनेवाले सब पुरुषो- करोतीति, सर्वेषां श्रुतिस्मृति- को पवित्र कर देते है, इसलिये अथवा श्रुति-स्मृतिरूप वाणीसे सबको लक्षणया वाचा पुण्यमाचष्ट इति पुण्यका उपदेश देते है, इसलिये वा पुण्यः । पुण्य है। - २४८ विष्णुसहस्रनाम भाविनोऽनर्थस्य सूचकान् ध्यान, स्मरण, कीर्तन और पूजन किये जानेपर भावी अनर्थके सूचक दुःस्वमान् नाशयति ध्यातः स्तुतः दुःस्वप्नोको नष्ट कर देते है, इसलिये कीर्तितः पूजितश्चेति दुःस्वप्ननाशनः। दुःस्वप्ननाशन है ।* विविधाः संसारिणां गती संसारियोको मुक्ति देकर उनकी मुक्तिप्रदानेन हन्तीति वीरहा । विविध गतियोका हनन करते है, इसलिये वीरहा है। सत्वं गुणमधिष्ठाय जगत्त्रयं सत्त्वगुणके आश्रयसे तीनो लोकोकी रक्षा करनेके कारण रक्षण है। यहाँ रक्षन् रक्षणः ; नन्द्यादित्वाकर्तरि नन्दादिगण मानकर रक्ष धातुसे कर्ता अर्थमें ल्यु प्रत्यय हुआ है। सन्मार्गवर्तिनः सन्तः तद्रूपेण सन्मार्गपर चलनेवालोको सन्त कहते है। विद्या और विनयकी वृद्धिके लिये । विद्याविनयवृद्धये स एव वर्तत सन्तरूपसे भगवान् स्वयं ही विराजते इति सन्तः। है, इसलिये वे सन्त है। सर्वाः प्रजाःप्राणरूपेण जीवयन् प्राणरूपसे समस्त प्रजाको जीवित जीवनः । रखनेके कारण जीवन है। परितः सर्वतो विश्वं व्याप्या- विश्वको परित'-सब ओरसे व्याप्त कर- वस्थित इति पर्यवस्थितः ॥११२॥ के स्थित है,इसलिये पर्यवस्थित है।११२। HDHOOMA- अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥११॥ ९३२ अनन्तरूपः, ९३३ अनन्तश्रीः, ९३४ जितमन्युः, ९३५ भयापहः । ९३६ चतुरश्रः, ९३७ गभीरात्मा,९३८ विदिशः,९३९ व्यादिशः, ९४०दिशः।। p - 8 संसाररूप दुःस्वमका नाश करनेवाले है, इसलिये भी दुःस्त्रमनाशन हैं।
शाङ्करभाष्य
२४६
अनन्तानि रूपाण्यस्य विश्व विश्वप्रपञ्चरूपसे स्थित हुए भगवान्-
प्रपञ्चरूपेण स्थितस्येति अनन्तरूपः। के अनन्त रूप है, इसलिये वे
अनन्तरूप
ato
अनन्ता अपरिमिता श्रीः परा भगवान्की श्री अर्थात् पराशक्ति
शक्तिरस्येति अनन्तश्रीः, 'परास्य | अनन्त यानी अपरिमित है, इसलिये वे
शक्तिर्विविधैव श्रूयते' (श्वे० उ० ६ ।
अनन्तश्री है । श्रुति कहती है-
'इसकी पराशक्ति विविध प्रकारकी
८) इति श्रुतेः।
ही सुनी जाती है।
मन्युः क्रोधो जितो येन स जिन्होने मन्यु अर्थात् क्रोधको
जितमन्युः ।
जीत लिया है वे भगवान् जितमन्यु है ।
भयं संसारजं पुंसामपन्नन् पुरुपोका संसारजन्य भय नष्ट
भयापहः ।
करनेके कारण भयापह है।
न्यायसमवेतः चतुरश्रः, पुंसां पुरुपोको उनके कर्मानुसार फल
कर्मानुरूपं फलं प्रयच्छतीति । देते है, इसलिये न्याययुक्त होनेके
कारण चतुरश्र है।
आत्मा खरूपं चित्तं वा गभीरं
भगवान्का आत्मा-खरूप अथवा
मन गम्भीर है, उसका परिच्छेद-
परिच्छेत्तुमशक्यमस्येति गभीरात्मा ।
परिमाण नहीं किया जा सकता,इसलिये
वे गभीरात्मा है।
विविधानि फलानि अधिकारि अधिकारियोको विशेपरूपसे विविध
भ्यो विशेषेण दिशतीति विदिशः। | प्रकारके फल देते है, इसलिये भगवान्
विदिश है।
विविधामाज्ञां शक्रोदीनां कुर्वन् इन्द्रादिको विविध प्रकारकी आज्ञा
व्यादिशः।
करनेसे व्यादिश है।
समस्तानां कर्मणां फलानि वेदरूपसे समस्त कर्मियोको उनके
कोंके फल देते है, इसलिये दिश
दिशन् वेदात्मना दिशः॥११३।। है॥११३॥
२५० विष्णुसहस्रनाम अनादिभूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः । जननो जनजन्मादिीमो भीमपराक्रमः ॥११॥ ९४१ अनादिः, ९४२ भूर्भुवः, ९४३ लक्ष्मीः, ९४४ सुवीरः, ९४५ रुचि- रागदः । ९४६ जननः, ९४७ जनजन्मादिः, ९४८ भीमः, ९४९ भीम- . पराक्रमः ॥ आदिः कारणमस्य न विद्यत | सबके कारण होनेसे भगवान्का इति अनादिः, सर्वकारणत्वात् । कोई आदि अर्थात् कारण नहीं है, इसलिये वे अनादि है। भूराधारः, भुवः सर्वभूताश्रय भू आधारको कहते है, भुवः अर्थात् समस्त भूतोके आधाररूपसे त्वेन प्रसिद्धाया भूम्याः, भुवोऽपि प्रसिद्ध भूमिकी भी भू (आधार ) है, भूरिति भूर्भुवः । इसलिये भगवान् भूर्भुवः है। अथवा, न केवलमसौ भूःभुवः, अथवा पृथिवीके केवल आधार ही लक्ष्मीः शोभा चेति भुवो लक्ष्मीः नही बल्कि लक्ष्मी अर्थात् शोभा भी वे ही है, इसलिये लक्ष्मी है । अथवा अथवा, भूः भूर्लोका; भुवः भूर्लोकको भूः और भुवर्लोकको भुवः भुवोका, लक्ष्मीः आत्मविद्या, तथा आत्मविद्याको ही लक्ष्मी कहा 'आत्मविद्या च देवि त्वम्' इति है । श्रीस्तुतिमे कहा है-'हे देवि! आत्मविद्या भी तू ही है। अथवा भूमि श्रीस्तुतौ । भूम्यन्तरिक्षयोः शोभे- और अन्तरिक्षकी शोभा है, इसलिये ति वा भूर्भुवो लक्ष्मीः। ही भगवान् भूर्भुवो लक्ष्मी है। शोभना विविधा ईरा गतयो जिनकी विविध ईरा-गतियाँ शुभ यस्य स सुवीरः; शोभनं विविधम् विविध प्रकारसे सुन्दर ईरण (स्फुरण) है वे भगवान् सुवीर है। अथवा वे ईत इति वा सुवीरः। करते है, इसलिये वे सुवीर है ।
शाङ्करभाष्य २५१ रुचिरे कल्याणे अङ्गदे अस्येति भगवान्के अङ्गद (भुजबन्ध) रुचिर रुचिराङ्गदः । अर्थात् कल्याणरूप हैं, इसलिये वे रुचिराङ्गद है। जन्तून् जनयन् जननः, ल्यु. जन्तुओको उत्पन्न करनेके कारण जनन है । 'कृत्यल्युटो बहुलम्। विधौ बहुलग्रहणात्कर्तरि ल्युट्- (पा० सू० ३।३।११३) इस ल्युड् विधायक सूत्रमे 'बहुलम्' शब्दका प्रत्ययः प्रयोगवचनादिवत् । उपादान होनेके कारण प्रयोगवचन आदि शब्दोंकी भाँति यहाँ कर्ता-अर्थमे ल्युट प्रत्यय हुआ है। जनस्य जनिमतो जन्म उद्भवः जन्म लेनेवाले जीवके जन्म अर्थात् तस्यादिमूलकारणमिति जन- उत्पत्तिके आदि यानी मूलकारण है, जन्मादिः। इसलिये जनजन्मादि हैं। भयहेतुत्वाद् भीमः, 'भीमादयोऽ भयके कारण होनेसे भीम है, पादाने' (पा० सू० ३।४।७४) 'भीमादयोऽपादाने इस सूत्रके अनुसार भीम शब्दका निपातन किया गया है। इति निपातनात् , 'महद्भयं वज्रमुद्य- मन्त्रवर्ण कहता है-'महान् भयरूप तम्' इति श्रुतेः। वज्र उद्यत ( उठा हुआ) है। असुरादीनां भयहेतुः पराक्रमो अवतारोमे भगवान्का पराक्रम ऽस्यावतारेष्विति भीमपराक्रमः | असुरादिकोके भयका कारण होता है, ॥११४॥ इसलिये वे भीमपराक्रम है ॥ ११४ ॥ आधारनिलयोऽधाता पुष्पहास: प्रजागरः। ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥११५॥ , ९५० आधारनिलयः, ९५१ अधाता [धाता ], ९५२ पुष्पहासः, ९५३ प्रजागर । ९५४ ऊर्ध्वगः, ९५५ सत्पथाचारः, ९५६ प्राणदः, ९५७ प्रणव', ९५८ पणः ॥
२५२ विष्णुसहस्रनाम an धातुः। पृथिव्यादीनां पञ्चभूतानामा पृथिवी आदि पञ्चभूत आधारोके धाराणामाधारत्वात् आधारनिलयः । भी आधार है, इसलिये परमेश्वर आधारनिलय है। खात्मना धृतस्यास्यान्यो धाता अपने आप स्थित हुए भगवान्का नास्तीति अधाता ; 'नवृतश्च' (पा० कोई और धाता ( बनानेवाला ) नही है, इसलिये वे अधाता है। यहाँ. सू० ५। ४ । १५३) इति 'समा- 'नवृतश्च' इस सूत्रसे प्राप्त होनेवाले सान्तविधिरनित्यः' (परिभापेन्दुशेखरे 'क' प्रत्ययका 'समासान्त-विधि ८६ } इति कप्प्रत्ययाभावः । अनित्य होती है। इस परिभाषाके संहारसमये सर्वाः प्रजा धयति अनुसार अभाव है। अथवा प्रलय- कालमे सम्पूर्ण प्रजाका धयन अर्थात् पिबतीति वा धाता; घेट पाने इति पान करते है, इसलियेधाता है। यहाँ [धाता शब्दमे ] पान-अर्थका वाचक धेट धातु है। मुकुलात्मना स्थितानां पुष्पाणां कलिकारूपसे स्थित पुष्पोके हास हासवत् प्रपञ्चरूपेण विकासो- (खिलने) के समान भगवान्का प्रपञ्च- रूपसे विकास होता है, इसलिये वे ऽस्येति पुष्पहासः। नित्यप्रबुद्धखरूपत्वात् प्रकर्षण नित्यप्रबुद्ध होनेके कारण प्रकर्परूपसे जागर्तीति प्रजागरः। जागते है, इसलिये भगवान् प्रजागर है। सर्वेषामुपरि तिष्ठन् ऊर्ध्वगः । सबसे ऊपर रहनेके कारण ऊर्ध्वग है। सतां कर्माणि सत्पथास्तानाच सत्पुरुषोके कर्मोको सत्पथ कहते रत्येष इति सत्पथाचारः। है उनका आचरण करते है, इसलिये सत्पथाचार है। मृतान् परिक्षित्प्रभृतीन् जीवयन् परिक्षित् आदि मरे हुओको जीवित करनेके कारण प्राणद है। पुष्पहास है। प्राणदः ।
शाङ्करभाष्य २५३ प्रणवो नाम परमात्मनो वाचक परमात्माके वाचक ॐकारका नाम प्रोङ्कारः तदभेदोपचारेणायं प्रणव है, उसके साथ अभेटका उपचार पणवः । (व्यवहार) होनेसे परमात्मा प्रणव है। पणतिर्व्यवहारार्थः तं कुर्वन् पण धातुका व्यवहार अर्थ है, रणः, व्यवहार करनेके कारण भगवान् 'सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो पण हैं । श्रुति कहती है-'धीर पुरुष नामानि कृत्वाभिवदन्यदास्ते ॥ सेब रूपोंको विचारकर उनके नामकी कल्पना करके कहता हुआ स्थित इति श्रुतेः। पुण्यानि सर्वाणि होता है। अथवा समग्र पुण्य-कर्मोका कर्माणि पर्ण सह्याधिकारिभ्यः पणरूपसे संग्रह करके अधिकारियोको तत्फलं प्रयच्छतीति वा लक्षणया उनका फल देते है, इसलिये लक्षणा- पणः ॥११५॥ वृत्तिसे पण कहे जाते है ॥११५॥ (ते. आ.उ.११२७ प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः । तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ॥११॥ ९५९ प्रमाणम्, ९६० प्राणनिलय., ९६१ प्राणभृत् , ९६२ प्राणजीवनः । ९६३ तत्त्वम्, ९६४ तत्त्ववित्, ९६५ एकात्मा, ९६६ जन्ममृत्युजरातिग' || प्रमितिः संवित्वयंप्रमा प्रमा प्रमिति-संवित् अर्थात् स्वयं प्रमा- णम् , 'प्रज्ञानं ब्रह्म' (ऐ० उ० ३। रूप होनेसे भगवान् प्रमाण है । श्रुति ५। ३) इति श्रुतेः। कहती है-'प्रज्ञान ब्रह्म है। विष्णु- 'ज्ञानस्वरूपमत्यन्त- निर्मलं परमार्थतः। पुराणमे कहा है-'जो परमार्थतः तमेवार्थस्वरूपेण अत्यन्त निर्मल ज्ञानरूप है, किन्तु भ्रान्तिदर्शनतः स्थितम् ।। भ्रान्तिदर्शनके कारण पदार्थरूपसे इति विष्णुपुराणे। स्थित है [उन्हें प्रणाम करके] | विष्णुसहस्रनाम , प्राणा इन्द्रियाणि यत्र जीवे उसके अधीन होनेसे प्राण अर्थात् इन्द्रियाँ जिस जीवमे लीन होती है। निलीयन्ते तत्परतन्त्रत्वात् , देहस्य [ वह प्राणनिलय है ] अथवा धारकाः देहधारण करनेवाले प्राण, अपान प्राणापानादयो वा आदि उसमे (जीवमे) लीन होते है, इस- तसिनिलीयन्ते, प्राणितीति प्राणो लिये [वह प्राणनिलय है ] जो प्राणित ( जीवित) रहता है वह जीव ही जीवः परे पुंसि निलीयत इति वा प्राण है, वह परम पुरुषमे लीन होता प्राणान् जीवांश्च संहरन्निति वा है, इसलिये [ परमपुरुप प्राणनिलय है] । अथवा प्राण और जीवोको प्राणनिलयः । अपने आपमे संहृत करते है, इसलिये प्राणनिलय है। पोषयन्नन्नरूपेण प्राणान् अन्नरूपसे प्राणोका पोपण करनेके प्राणभृत् । कारण प्राणभृत् है। प्राणिनो जीवयन् प्राणाख्या प्राण नामक वायुसे प्राणियोको पवनैः प्राणजीवनः, जीवित रखनेके कारण प्राणजीवन है। 'न प्राणेन नापानेन मयों जीवति कश्चन। मन्त्रवर्ण कहता है-'कोई भी मनुष्य इतरेण तु जीवन्ति न प्राणसे जीता है न अपानसे, बल्कि यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ किसी औरहीसे जीते है जिसमें कि (क० उ० २।५।१) इति मन्त्रवर्णात् । ये दोनो आश्रित है। तत्त्वं तथ्यममृतं सत्यं परमार्थतः तथ्य, अमृत, सत्य और परमार्थतः सतत्त्वमित्येते एकार्थवाचिनः | सतत्त्व ये सब शब्द एक वास्तविक परमार्थसतो ब्रह्मणो वाचकाः सत्स्वरूप ब्रह्मके ही वाचक है, अतः शब्दाः। तत्त्वं स्वरूपं यथावद्वेत्तीति तत्त्व अर्थात् स्वरूपको यथावत् तत्त्ववित् । जानते है,इसलिये भगवान् तत्त्ववित् है। वह तत्त्व है।
शाङ्करभाष्य २५५ एकश्चासावात्मा चेति एकात्मा, भगवान् एक आत्मा है, इसलिये वे 'आत्मा वा इदमेक एवान आसीत् ' एकात्मा है । श्रुति कहती है-'पहले (ऐ० उ० १।१) इति श्रुतेः, यह एक आत्माही था। स्मृतिका भी 'यच्चाप्नोति यदादत्ते कथन है क्योकि सब विषयोंको यच्चात्ति विषयानिह । प्राप्त करता, ग्रहण करता और यच्चास्य सन्ततो भाव- भक्षण करता है तथा निरन्तर वर्तमान स्तस्मादात्मेति गीयते ॥ रहता है इसलिये यह आत्मा कहा इति स्मृतेश्च । जाता है। जायते अस्ति वर्धते विपरिणमते जन्म लेना, होना, बढना, बदलना, अपक्षीयते नश्यति इति पड्भाव- क्षीण होना और नष्ट होना-ये छः भाव- विकारानतीत्य गच्छतीति जन्म- विकार है। इनका अतिक्रमण कर जाते मृत्युजरातिगः' 'न जायते म्रियते वा है, इसलिये भगवान् जन्ममृत्युजरातिग है, जैसा कि मन्त्रवर्ण कहता है- विपश्चित्' (क० उ० १ । २ । १८) | 'ज्ञानस्वरूप आत्मा न जन्म लेताहै इति मन्त्रवर्णात् ।।११६॥ न मरता है। ॥११६॥ भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः । यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥११॥ ९६७ भूर्भुव स्वस्तरुः, ९६८ तारः, ९६९ सविता, ९७० प्रपितामह । ९७१ यज्ञः, ९७२ यज्ञपतिः, ९७३ यज्वा, ९७४ यज्ञाङ्गः, ९७५ यज्ञवाहनः ।। भूर्भुवःस्वःसमाख्यानि त्रीणि बढचोने भूः, भुवः और स्वः व्याहृतिरूपाणि शुक्राणि त्रयी- नामक तीन व्याहृतियोको वेदत्रयीका साराणि बढचा आहुः; तै)- शुक्र-सार बतलाया है । उनके द्वारा मादिनाजगत्त्रयंतरति, प्लवते वेति होमादि करके तीनो लोककी प्रजा भूर्भुवःस्वस्तरुः, तरती अथवा पार होती है, इसलिये वह २५६ विष्णुसहस्रनाम - 'अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्य [त्रयीसार] भूर्भुवस्वस्तर है । गादित्यमुपतिष्ठते मनुजीका वाक्य है-'अग्निमें भली आदित्याज्जायते वृष्टि- प्रकार दी हुई आहुति सूर्यमें स्थित होती है, सूर्यसे वर्षा होती है, वर्षासे वृष्टरन्नं ततः प्रजाः ॥ अन्न होता है और फिर उससे प्रजा (३३७६) होती है। अथवा भूर्भुवःस्वस्तरु नामक मनुवचनात् ; अथवा लोकत्रयरूप संसारवृक्ष ही भूर्भुवः- भूर्भुवःस्वःसमाख्यलोकत्रयसंसार- स्वस्तरु है । अथवा भूः, भुवः और स्वः वृक्षो भूर्भुवःस्वस्तरुः; भूर्भुवःस्व- नामक त्रिलोकीको वृक्षके समान व्याप्त राख्यं लोकत्रयं वृक्षवद्वयाप्य तिष्ठ- करके स्थित है, इसलिये वे भूर्भुवः- तीति वा भूर्भुवःस्वस्तहा। स्वरतर है। संसारसागरं तारयन् तारः, संसारसागरसे तारनेके कारण प्रणवो वा। भगवान् तार है। अथवा प्रणवतार है। सर्वस्य लोकस्य जनक इति सम्पूर्ण लोकके उत्पन्न करनेवाले सविता । होनेसे भगवान् सविता है। पितामहस्य ब्रह्मणोऽपि पितेति पितामह ब्रह्माजीके भी पिता होनेसे प्रपितामहः । प्रपितामह है। यज्ञात्मना यज्ञः, यज्ञरूप होनेसे यज्ञ है। यज्ञानां पाता, स्वामी वा यज्ञोके पालक अर्थात् स्वामी होनेसे यज्ञपतिः, 'अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता यज्ञपति है। श्रीभगवान्ने कहा है- च प्रभुरेव च ।' (गीता ९ । २४) 'सब यज्ञोंकाभोक्ता और प्रभु मैं ही हूँ।" इति भगवदचनात् । यजमानरूपसे स्थित होनेके कारण यजमानात्मना तिष्ठन् यज्वा । यज्वा है। यज्ञा अङ्गान्यस्येति वराहमूर्तिः यज्ञ वराह भगवान्के अंग है, यज्ञाङ्गः इसलिये वे यज्ञाङ्ग है । हरिवंशमे कहा - शाङ्करभाष्य 'वेदपादो यूपदंष्ट्रः है-[[वे यश्मृति वराह भगवान् ] क्रतुहस्तश्चितीमुखः । वेदरूप चरण, चूपरूप दाढ़ें, फतुरूप अग्निजिहो दर्भरोमा हाथ, चितीस्प मुख, अग्निरूप जिहा, ब्रह्मशीर्पो महातपाः॥ दर्भरूप रोम तथा ब्रह्मरूप शिरवाले और महान तपस्वी हैं। दिव्य स्व- अहोरात्रेक्षणी दिव्यो रूप हैं, रात और दिन उनके नेत्र है, वेदाङ्गश्रुतिभूपणः । छहों वेदांग कर्णभूपण हैं,घृत नासिका आज्यनासः सुवतुण्डः है, खुधा थुथनी है और सामवेदघोप सामघोपस्वनो महान् ॥ है। चे महान् धर्म-सत्यमय तथा धर्मसत्यमयः श्रीमान् श्रीसम्पन्न हैं, और क्रम-विक्रम- रूपसलियाओंवाले, प्रायश्चित्तरूप क्रमविक्रमसक्रियः । नत्रोंवाले भयंकर तथा पशुके घुटनों- प्रायश्चित्तनखो घोरः के समानघुटनेवाले तथामहान भुजा- पशुजानुमहाभुजः ॥ ओंवाले हैं और उद्गाता उनकी आँतें उद्गानन्त्री होमलिङ्गो हैं, होम लिंग है, चीज और ओपधि वीजापधिमहाफलः। महान फल हैं, गयु अन्तरात्मा है, मन्त्र त्वचा है और सोमरस रक्त है वाय्वन्तरात्मा मन्त्रस्फिन् तथा वे विशेष क्रम (गति) वाले विक्रमः सोमगोणितः॥ हैं। वेदी उनका स्कन्ध (कन्धा) है, वेदीस्कन्धो हविर्गन्धो हवि गन्ध है, तथा वे हव्य-कन्य- हव्यकव्यातिवेगवान् । रूप अत्यन्त वेगवाले,प्राग्वंश रूप प्राग्वंशकायो द्युतिमा- शरीरवाले, घड़े तेजस्वी और नाना नानादीक्षाभिरर्चितः॥ प्रकारकी दीक्षाओंसे अर्चित हैं। वह महासत्रमय महायोगी दक्षिणारूप दक्षिणाहृदयो योगी हृदयवाले उपाकर्मरूप होट और दांतोंवाले तथा प्रवरूप आवर्ता उपाकर्मोष्ठरुचकः (रोमसंस्थानों) से विभूपित हैं। प्रवर्यावर्तभूपणः ॥ नाना प्रकारके छन्द उनके आने-जाने- महासत्रमयो महान् । ७ यज्ञशालाके पूर्व भागमें यजमान आदिके ठहरनेके लिये बने हुए घरको प्राग्वंश कहते हैं।
२५८ विष्णुसहस्रनाम नानाच्छन्दोगतिपथो गुह्योपनिषदासनः । छायापत्नीसहायो बै मेरुशृङ्ग इवोच्छ्रितः॥ (३ । ३४ । ३४-४१) इति हरिवंशे । फलहेतुभूतान्यज्ञान् वाहयतीति यज्ञवाहनः ॥११७॥ का मार्ग है, अति गुह्य उ आसन (बैठनेका स्थान) है तथा मेरु,गके समान ऊंचे शरीरवाले वे (वराह भगवान्) अपनी छायारूप पत्नीके सहित विराजमान हैं। फलके हेतुभूत यज्ञोंका वहन करते है, इसलिये वे यज्ञवाहन है ।।११७|| यज्ञभृयज्ञकृयज्ञी यज्ञभुग्यज्ञसाधनः । यज्ञान्तकृयज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ॥११८॥ ९७६ यज्ञभृत् ,९७७ यज्ञकृत्, ९७८ यज्ञी, ९७९ यज्ञभुक्, ९८० यज्ञसाधनः । ९८१ यज्ञान्तकृत्, ९८२ यज्ञगुह्यम्, ९८३ अन्नम्, ९८४ अन्नादः, एव, च ।। यज्ञं बिभर्ति पातीति वा ज्ञको धारण करते अथवा उसकी यज्ञभृत् । रक्षा करते है, इसलिये भगवान् यज्ञभृत् है। जगदादौ तदन्ते च यज्ञं करोति, जगत्के आरम्भ और अन्तमे कुन्ततीति वा यज्ञकृत् । यज्ञ करते अथवा यज्ञ काटते है, इसलिये यज्ञकृत् है। यज्ञानां तत्समाराधनात्मनां अपने आरावनात्मक यज्ञोके शेषी [अर्थात् शेपकी पूर्ति करनेवाले ] है, शेषीति यज्ञी। इसलिये यज्ञी है। यज्ञं भुङ्क्ते, भुनक्तीति वा यज्ञको भोगते अथवा उसकी रक्षा यज्ञभुक्। करते है, इसलिये यज्ञभुक् है । यज्ञाः साधनं तत्प्राप्ताविति यज्ञ उनकी प्राप्तिका साधन है, यज्ञसाधनः । इसलिये वे यज्ञसाधन है।
शाङ्करभाष्य २५६ अथवा " यज्ञस्यान्तं फलप्राप्तिं कुर्वन् यज्ञका अन्त अर्थात् उसके फलकी यज्ञान्तकृत् । वैष्णवछंसनेन प्राप्ति करानेके कारण यज्ञान्तकृत् है । वैष्णव ऋक्का उच्चारण करते पूर्णाहुत्या पूर्ण कृत्वा यज्ञसमाप्ति हुए पूर्णाहुतिसे पूर्ण करके यज्ञ समाप्त करोतीति वा यज्ञान्तकृत् । करते है, इसलिये यज्ञान्तकृत् हैं । यज्ञानां गुह्यं ज्ञानयज्ञः, फला यज्ञोमे ज्ञान-यज्ञ अथवा फलकी भिसन्धिरहितो वा यज्ञः; तदभे- कामनासे रहित [कोर्ड भी] यज्ञ गुद्य दोपचाराद् ब्रह्म यज्ञगुह्यम् । है उसका ब्रह्मके साथ अभेद माननसे ब्रह्म ही यज्ञगुह्य है। अद्यते भूतैः अत्ति च भूतानिति भूतोंसे खाये जाते हैअथवा भृतो- को खाते हैं, इसलिये अन्न है। अन्नम् । अन्नमत्तीति अन्नादः । अन्नको खानेवाले होनेसे अन्नाद है। सर्व जगदन्नादिरूपेण भोक्त सम्पूर्ण जगत् अन्नादिरूपसे भोक्ता भोग्यात्मकमेवेति दर्शयितुमेवकार, भोग्यरूप ही है-यह दिखलानेके लिये च शब्दः सर्वनाम्नामेकसिन्परसि- एवकारका और सब नामोकी वृत्ति समुचित करके एक परमपुरुपमे ही नपुंसि समुच्चित्य वृत्तिं दर्शयितुम् प्रदर्शित करनेके लिये च शब्दका ॥११८॥ प्रयोग किया गया है ॥११८॥ आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः । देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ॥११९॥ ९८५ आत्मयोनि', ९८६ स्वयंजातः, ९८७ वैखान', ९८८ सामगायनः । ९८९ देवकीनन्दन', ९९० स्रष्टा, ९९१ क्षितीगः, ९९२ पापनाशनः ॥
२६० विष्णुसहस्रनाम आत्मैव योनिरुपादानकारणं आत्मा ही योनि अर्थात् उपादान- नान्यदिति आत्मयोनिः । कारण है और कोई नही, इसलिये भगवान् आत्मयोनि है *। निमित्तकारणमपि स एवेति निमित्त-कारण भी वही है यह दिखलानेके लिये खयंजात कहा गया दर्शयितुं स्वयंजातः इति ; 'प्रकृतिश्च है। 'प्रकृति (उपादान-कारण) और प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात्' (ब्र० सू० निमित्त-कारण भी ब्रह्म है, क्योंकि ऐसा माननेपर प्रतिज्ञा तथा दृष्टान्त- १। ४ । २३) इत्यत्र स्थापित- का उपरोध नहीं होता' इस ब्रह्मसूत्रसे श्रीहरिका निमित्त और उपादान- मुभयकारणत्वं हरेः। कारणत्व स्थापित किया गया है। विशेषेण खननात् वैखानः; विशेषरूपसे खोदनेके कारण धरणी विशेषण खनित्वा वैखान है । पुराणोमे यह प्रसिद्ध ही पातालवासिनं हिरण्याक्षं वाराह है कि भगवान्ने वराहरूप धारणकर रूपमास्थाय जघानेति पुराणे पृथिवीको विशेपरूपसे खोदकर प्रसिद्धम् । पातालवासी हिरण्याक्षको मारा था । सामानि गायतीति सामगायनः। करते है, इसलिये सामगायन है। देवक्याः सुतो देवकीनन्दनः । देवकीके पुत्र होनेसे देवकीनन्दन 'ज्योतींषि शुक्राणि च यानि लोके है । महाभारतमे कहा है-'लोकमे त्रयो लोका लोकपालास्त्रयी च । जितनी शुभ्र ज्योतियाँ [ग्रह- नक्षत्रादि] और अग्नियाँ है [वे सब] त्रयोऽग्नयश्चातयश्च तथा तीनो लोक, लोकपाल,वेदत्रयी, सर्वे देवा देवकीपुत्र एव ॥' तीनो अग्निया, पांचों आहुतियाँ और इति महाभारते। समस्त देवगण देवकीपुत्र ही है।' स्रष्टा सर्वलोकस्य । सम्पूर्ण लोकोके रचयिता होनेसे स्रष्टा है। * क्योंकि भगवान् और आत्मामें अभेद है। सामगान पश्च शाङ्करभाष्य २६१ क्षिते मरीशः क्षितीशः दश क्षिति अर्थात् पृथिवीके ईश (खामी) होनेके कारण दशरथपुत्र राम क्षितीश रथात्मजः॥ है। कीर्तितः पूजितो ध्यातः स्मृतः कीर्तन, पूजन, ध्यान और स्मरण पापराशिं नाशयन् पापनाशनः; करनेपर सम्पूर्ण पापराशिका नाश 'पक्षोपवासाद्यत्पाप करनेके कारण भगवान् पापनाशन है। पुरुपत्य प्रणश्यति । वृद्धशातातपका कथन है-'एक पक्षतक प्राणायामशतेनैव उपवास करनेसे पुरुपका जो पाप तत्पाप नश्यते नृणाम् ॥ नष्ट होता है वह सौ प्राणायाम करने- प्राणायामसहस्रेण यत्पापं नश्यते नृणाम् । से नष्ट हो जाता है तथा एक सहस्त्र क्षणमात्रेण तत्पाप प्राणायाम करनेसे जो पाप नष्ट होता हरेानात्प्रणश्यति ॥ है वह श्रीहरिका क्षणमात्र ध्यान इति वृद्धशातातपे ॥११९॥ करनेसे नष्ट हो जाता है।॥११९॥ शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः। रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः॥ सर्वप्रहरणायुधों नमः ॥१२०॥ ९९३ शङ्खभृत,९९४ नन्दकी, ९९५चक्री, ९९६ शार्ङ्गधन्वा, ९९७ गदाधरः । ९९८ रथाङ्गपाणि., ९९९ अक्षोभ्यः, १००० सर्वप्रहरणायुधः, सर्वप्रहरणा- युध. ॐ नम ॥ पाञ्चजन्याख्यं भूतायहङ्कारा- भूतादि (तामस) अहंकाररूप त्मकं शव विभ्रत् शङ्खभृत् । पाञ्चजन्य नामक शंख धारण करनेसे भगवान् शङ्खभृत् है। विद्यामयो नन्दकाख्योऽसिर उनके पास विद्यामय नन्दक नामक स्येति नन्दकी । खड्ग है, इसलिये वे नन्दकी है। मनस्तत्वात्मकं सुदर्शनाख्यं मनस्तत्त्वात्मक सुदर्शनचक्र धारण २६२ विष्णुसहस्रनाम चक्रमस्यास्तीति, संसारचक्रमस्या- करनेसे, अथवा संसारचक्र उनकी ज्ञया परिवर्तत इति वा चक्री । आज्ञासे चल रहा है, इसलिये चक्री है। इन्द्रियाद्यहङ्कारात्मकं शाङ्ग उनका इन्द्रियकारण [राजस] नाम धनुरस्यास्तीति शाईधन्वा । अहंकाररूप शाई नामक धनुप है, इसलिये वे शाङ्गधन्वा है । 'धनुषश्च 'धनुषश्च' (पा० मू० ५। ४ । इस सूत्रके अनुसार यहाँ समासान्त १३२) इति अनङ् समासान्तः। अनड प्रत्यय हुआ है बुद्धितत्वात्मिका कौमोदकी बुद्धितत्त्वात्मिका कौमोदकी नामक नाम गदां वहन् गदाधरः । गदा धारण करनेसे गदाधर है। रथाङ्गं चक्रमस्य पाणौ स्थित भगवान्के हाथमे रथाङ्ग अर्थात् मिति रथाङ्गपाणिः । चक्र है, इसलिये वे रथाङ्गपाणि है। अत एव अशक्यक्षोभण इति इन सब शस्त्रोके कारण उन्हे- अक्षोभ्यः । क्षोभित नही किया जा सकता, इसलिये वे अक्षोभ्य है। केवलम् एतावन्त्यायुधान्य भगवान्के केवल इतने ही आयुध स्येति न नियम्यते, अपि तु सर्वा- हो, ऐसा नियम नहीं है, बल्कि प्रहार ण्येव प्रहरणान्यायुधान्यस्येति सर्व- करनेवाली सभी वस्तुएँ उनके आयुध है, अतः वे सर्वप्रहरणायुध है । जो प्रहरणायुधः,आयुधत्वेनाप्रसिद्धान्यपि अंगुली आदि आयुधरूपसे प्रसिद्ध नही करजादीन्यस्यायुधानि भवन्तीति। है वे भी [ नृसिहावतारमे] उनके अन्ते सर्वप्रहरणायुध इति वचनं आयुध होते है । अन्तमे सत्य- उनकी सत्यसङ्कल्पत्वेन सर्वेश्वरत्वं दर्श- | संकल्परूपसे सर्वेश्वरता दिखलानेके लिये उन्हे सर्वप्रहरणायुध । यितुम् , 'एष सर्वेश्वरः' (मा० उ० कहा है, जैसा कि श्रुति कहती है- ६) इति श्रुतेः। 'यह सर्वेश्वर है।। द्विवचनं समाप्तिं द्योतयति। दो बार कहना समाप्तिका सूचक है ।
शाङ्करभाष्य २६३ ॐकारश्च मङ्गलार्थः, ओकार अन्तमे मंगलाचरणके लिये है; 'ॐकारश्चाथशब्दश्च जैसा कि कहा है-'ओडार और अथ ये द्वावेतौ ब्रह्मणः पुरा । दो शब्द पहले ब्रह्मके कण्ठको भेदन कण्ठं मित्त्वा विनिर्यातौ करके निकले थे, इसलिये ये दोनो तस्मान्माङ्गलिकावुभौ ॥ माङ्गलिक हैं।' अन्तमे नमः कहकर (वृ० ना०१।११।१० इति वचनात् । अन्ते 'नमः परिचर्या (पूजा) की है, जैसा कि इत्युक्त्वा परिचरणं कृतवान्, मन्त्रवर्ण कहता है-'हम आपको 'भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम' (ई० बारम्बार नमस्कार करते है। इसके उ० १८) इति मन्त्रवर्णात् । सिवा 'वही लग्न, वही नक्षत्र और वही 'धन्यं तदेव लग्नं पुण्य दिवस धन्य है तथा इन्द्रियोकी तन्नक्षत्र तदेव पुण्यमहः। भी सफलतातभी है जिसमे श्रीहरिको करणस्य च सा सिद्धि- प्रथम नमस्कार किया जाता है। यह यत्र हरिः प्राड् नमस्क्रियते॥ वाक्य भी है। इसमे प्राक् शब्दसे अन्तका इति च । प्रागित्युपलक्षणम् , भी उपलक्षण है, क्योकि शिष्ट पुरुपोद्वारा अन्तेऽपि नमस्कारस्य शिष्टैराचर- अन्तमे भी नमस्कार किया जाता है। णात् । नमस्कारफलं प्रागेव दार्शितम्- नमस्कारका फल तो पहले ही दिखा एकोऽपि कृष्णस्य कृतः प्रणामो चुके है कि-'श्रीकृष्णको किया हुआ दशाश्वमेधावभृथेन तुल्यः । एक प्रणाम भी दश अश्वमेध-यज्ञोके दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म समान होता है, उनमें भी दशा- कृष्णप्रणामी न पुनर्भवाय ॥ श्वमेधीको तो फिर जन्म लेना (महा० शॉ. १७ । ११) पड़ता है, किन्तु कृष्णको प्रणाम 'अतसीपुष्पसङ्काशं | करनेवालेका फिर जन्म नहीं होता। पीतवाससमच्युतम् । ये नमस्यन्ति गोविन्द | 'अलसीके फूलके सम्गन पीत वस्त्र- न तेपा विद्यते भयम् ।। वाले अच्युत श्रीगोविन्दको जो (महा० शा० ४७ । १०) नमस्कार करते है उन्हें कोई भय नहीं
२६४
विष्णु सहस्रनाम
'लोकत्रयाधिपतिमप्रतिमप्रभाव रहता।' तथा 'तीनो लोकोंके अधिपति,
अतुलितप्रभाव, सृष्टिकर्ता ईश्वरको
मीपत्प्रणम्य शिरसा प्रभविष्णुमीशम् ।
शिर नवाकर थोड़ा-सा भी प्रणाम
जन्मान्तरप्रलयकल्पसहस्त्रजात करनेले जन्मान्तर,प्रलय और हजारो
कल्पोमे किये हुए मनुष्यके सम्पूर्ण
माशु प्रशान्तिमुपयाति नरस्य पापम् ॥'
पाप लीन हो जाते है। ॥१२॥
॥१२०॥
दशवें
इति नाम्नां दशमं शतं विवृतम् ।
यहाँतक सहस्रनामके
शतकका विवरण हुआ ।
इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः ।
नाम्नां सहस्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम् ॥१२॥
इति, इदम्, कीर्तनीयस्य, केशवस्य,
महात्मनः ।
नानाम्, सहस्त्रम्, दिव्या नाम्, अशेपेण, प्रकीर्तितम् ।।
इतीदमित्यनेन नामसहस्रमन्यू.
'इतीदम्' इस पदसे 'सहस्रनाम
नानतिरिक्तमुक्तमिति
किसी तरह न्यून नही कहा गया है'-
दर्शयति
यह बात दिखलाते है । 'दिव्य
दिव्यानामप्राकृतानां नाम्नां सहस्र अर्थात् अप्राकृत
सहस्रनामोका
प्रकीर्तितमिति वदता प्रकारान्त-
कीर्तन हो चुका' ऐसा कहकर यह
दिखलाया है कि यह संख्या प्रकारान्तर-
रेणापि संख्योपपत्तिर्दर्शिता । से भी पूर्ण हो सकती है।
प्रक्रमे 'कि जपन्मुच्यते जन्तुः' आरम्भमे 'किसका जप करनेसे
इति जपशब्दोपादानात् कीर्तयेत् जीव मुक्त होता है' इस वाक्यमे जप
इत्यनेनापि त्रिविधजपो लक्ष्यते । शब्द ग्रहण किया जानेसे 'कीर्तन
करें' इस पदसे भी उच्च, उपाशु और
उच्चोपांशुमानसलक्षणस्त्रिविधोजप:
मानसरूप तीन प्रकारका जप ही
॥ १२१॥
लक्षित होता है ॥ १२१॥
य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् ।
नाशुभं प्राप्नुयात्किञ्चित्सोऽमुत्रेह च मानवः॥१२२॥
शाङ्करभाष्य २६५ - य, इटम्, शृणुयात्, नित्यम्, य , च, अपि, परिकीर्तयेत् । न,अशुभम् , प्राप्नुयात् , किञ्चित् , सः, अमुत्र, इह, च, मानवः ।। य इद शृणुयात् इत्यादिः 'य इदं शृणुयात्' इत्यादि श्लोकका स्पष्टार्थः । परलोकपाप्तस्यापि अर्थ स्पष्ट ही है । परलोकको प्राप्त | हुए ययाति. नहपादिके समान वहाँ भी ययातिनहुपादिवदशुभप्राप्त्यभावं अशुभ-प्राप्तिका अभाव सूचित करने- सूचयितुम् अमुत्र इत्युक्तम्॥१२२॥ के लिये अमुत्र शब्दका प्रयोग किया } गया है ।। १२२ ॥ वेदान्तगो ब्राह्मणः स्यात्क्षत्रियो विजयी भवेत् । वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात् ॥१२३॥ वेदान्तग', ब्राह्मणः, स्यात्, क्षत्रियः, विजयी, भवेत् । वैश्यः, धनसमृदः, स्यात्, गद्र, सुखम् , अवाप्नुयात् ॥ वेदान्तानामुपनिषदामर्थ ब्रह्म जो वेदान्तो-उपनिपटोके अर्थ ब्रह्म- गच्छत्यवगच्छतीति वेदान्तगः । को जानता है उसे वेदान्तग कहते है। 'किं जपन्मुच्यते जन्तु- 'किसका जपकरनेले जीव जन्म- जन्मसंसारबन्धनात् । मरणरूप संसारसे मुक्त हो सकता है। (वि० स० ३ इस कथनके अनुसार जपरूप कमसे इति वचनात् जपकर्मणा साक्षा- साक्षात् मोक्ष होनेकी शंका होनेपर न्मुक्तिशङ्कायां कर्मणां साक्षान्मु- 'कोकी मोक्षमे साक्षात् कारणता नहीं है, मोक्ष ज्ञानसे ही होता है'. क्तिहेतुत्वं नास्ति, ज्ञानेनैव मोक्ष यह दिखलानेके लिये 'ब्राह्मण वेदान्त- इति दर्शयितुं, 'वेदान्तगो ब्राह्मणः का ज्ञाता हो जाता है। ऐसा स्यात्' इत्युक्तम् । कर्मणां त्वन्त:- कहा है। कर्म तो अन्तःकरणकी शुद्वि- करणशुद्धिद्वारेण मोक्षहेतुत्वम् । द्वारा ही मोक्षके हेतु होते है। 'कषायपक्तिः कर्माणि 'वासनाओका पकना ही कर्म है ज्ञान तु परमा गतिः। और ज्ञान परमगति है। कर्मके द्वारा - २६६ विष्णुसहस्त्रनाम है। कपाये कर्मभिः पत्रे वासनाओके जीर्ण हो जानेपर फिर ततो ज्ञानं प्रवर्तते ।। ज्ञान होता है।' 'नित्यं ज्ञानं समासाद्य 'नित्य ज्ञानको प्राप्त करके मनुष्य नरो बन्धात्प्रमुच्यते । बन्धनमुक्त हो जाता है। 'धर्मात्सुख च ज्ञानं च 'धर्मसे सुख और ज्ञान होता है ज्ञानान्मोक्षोऽधिगम्यते ॥ तथा ज्ञानसे मोक्ष प्राप्त होता है। 'योगिनः कर्म कुर्वन्ति 'योगीजन आसक्ति त्यागकर सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये । चित्तशुद्धिके लिये कर्म किया करते (गीता ५ । ११) 'कर्मणा बध्यते जन्तु- 'जीव कर्मसे बंधता है और विद्ययैव विमुच्यते । तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति विद्यासे ही मुक्त हो जाता है, इसीलिये यतयः पारदर्शिनः ॥ पारदर्शी यतिजन कर्म नही करते ।। (ब्रह्म० १२६ । ७) 'यथोक्तान्यपि कर्माणि 'श्रेष्ठ ब्राह्मणको उचित है कि परिहाय द्विजोत्तमः । विहित कर्मोको भी त्यागकर आत्म- आत्मज्ञाने शमे च स्या- ज्ञान, और बेदाभ्यासमे द्वेदाभ्यासे च यत्नवान् ॥ यत्नशील हो। (भनु० १२॥ १२) 'तपसा कल्मपं हन्ति [मनुष्य तपसे पाप नष्ट करता विद्ययामृतमश्नुते ।' है और विद्याले अमृत प्रात करता है। 'ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां 'पापकर्मके क्षीण हो जानेपर क्षयात्पापस्य कर्मणः । पुरुपको ज्ञान उत्पन्न होता है [ उस यथादर्शतलप्रख्ये समय] वह स्वच्छ दर्पणमे प्रति- पश्यत्यात्मानमात्मनि ।' बिम्बके समान अपने आत्मामे (गरुड० १ । २३७ । ६) आत्माको देखता है।' इत्यादि स्मृतियो- इत्यादिस्मृतिभ्या, 'तमेतं वेढा- से तथा 'इस आत्माको ब्राह्मणलोग नुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन वेदानुवचनसे, यज्ञसे, दानसे, तपसे शाङ्करभाष्य २६७ केन च . दानेन तपसानाशकेन' (बृ. उ० और अनशनसे जाननेकी इच्छा करते है' और [मनुष्य ] जिस किसी भी ४ । ४ । २२) 'येन वस्तुसे अथवा दर्विहोमसे यजन यजेतापि वा दर्विहोमेनानुपहतमना करे, किन्तु इससे उसका मन ही शुद्ध होता है।' इत्यादि श्रुतियोसे भी एव भवति' इत्यादिश्रुतिभ्यः । [कर्म अन्तःकरणकी शुद्धिके ही हेतु सिद्ध होते है | ज्ञानादेव मोक्षो भवति। मोक्ष तो ज्ञानसे ही होता है; 'ज्ञानादेव तु कैवल्यं 'ज्ञानसे ही कैवल्य प्रात होता है प्राप्यते तेन मुच्यते। उससे मुक्त हो जाता है। 'ब्रह्मको 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' (तै० उ० २। १) 'तरति शोकमात्मवित्' (छा० जाननेवाला परमपदको प्राप्त कर उ०७।१ । ३) 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव लेता है । 'आत्मज्ञानी शोकसे तर भवति'. (मु. उ० ३।२।९) 'ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति' (वृ० उ० ४ । जाता है । 'जो ब्रह्मको जानता ४ । ६) है ब्रह्म ही हो जाता है । 'ब्रह्म 'तमेव विदित्वातिमृत्युमेति हुआ ही ब्रह्मको प्राप्त होता है।' नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ।' (३० उ०६ । १५)। 'उसे जानकर ही मृत्युको पार करता 'आनन्द ब्रह्मणो विद्वा- है, मोक्षके लिये कोई और मार्ग नही न बिभेति कुतश्चन ।' (तै० उ० २।४) है। 'ब्रह्मानन्दको जाननेवाला किसी- 'इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति से भी भय नही मानता। 'यदि उसे न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः।' यहाँ जान लियात तो ठीक है और (के० उ० २ । ५ 'यदा चर्मन्दाकाशं यदि नही जाना तो बहुत बड़ी हानि वेष्टयिष्यन्ति मानवाः। है। 'जब मनुष्य आकाशको चमड़ेके तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति ॥ समान लपेट लेगे तब देवको बिना (श्वे० उ० ६ । २०)| जाने भी दुःखका अन्त हो जायगा।
२६८
विष्णसहस्त्रनाम
कहा है-
न कर्मणा न प्रजया धनेन 'अमृतत्व कर्मसे, प्रजासे या धनसे
त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः ।'
प्राप्त नहीं होता; वह तो एक त्यागसे
(कै० उ० ११३
ही प्राप्त होता है। 'वेदान्त-विज्ञानसे
'वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः जिन्होने अर्थका निश्चय कर लिया है
सन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः।
तथा जो संन्यासयोगसे शुद्धचित्त
ते ब्रह्मलोके तु परान्तकाले
हो गये हैं वे सभी यतिजन प्रलयके
परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ।। समय ब्रह्मलोकमें परम अमृत होकर
कै० उ० १ १ ४) मुक्त हो जाते है । इत्यादि श्रुतियोसे
इत्यादिश्रुतिभ्यः।
यही बात सिद्ध होती है।
शूद्रः सुखमवाप्नुयात् श्रवणेनैव, शूद्र सुख प्राप्त कर सकता है
न तु जपयज्ञेन, 'तस्माच्छ्द्रो यज्ञेऽ- : किन्तु श्रवणमात्रसे ही, जपयज्ञसे
नही; क्योकि श्रुतिमे
नवक्लप्तः' (तै० सं० ७ । १ ।
। 'अतः शूद्रका यज्ञमें अधिकार नही
१ । ६) इति श्रुतेः। है। 'ब्राह्मणकी आगे करके चारो
वर्णोको श्रवण करावो इत्यादि वाक्यों-
'श्रावयच्चतुरो वर्णा-
से महाभारतमे उसे श्रवणकी आज्ञा दी
न्कृत्वा ब्राह्मणमग्रतः। गयी है। हरिवंशमे कहा है-'शूद्र-
योनिको श्रवणसे ही शुभगति प्राप्त
इति महाभारते श्रवणमनुज्ञायते ।
| होती है। अतः जो शूद्र श्रवण करता
'सुगतिमियाच्छ्रवणाच शूद्रयोनिः' इति है वह सुख पाता है इस प्रकार इस ,
हरिवंशे । यः शूद्रः शृणुयात् स ' [शूद्रपद] का व्यवधानयुक्त [१२२
सुखमवाप्नुयात् इति व्यवहितेन · श्लोकके ] शृणुयात् (श्रवण करे ) पदसे
सम्बन्धः ; त्रैवर्णिकानां कीर्तयेदि-' सम्बन्ध है और त्रैवर्णिकोका कीर्तयेत्
(कीर्तन करे ) पदसे सम्बन्ध है
त्यनेन ॥१२३॥
॥ १२३॥
PRE-
धर्माथीं प्राप्नुयाधर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् ।
कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी चाप्नुयात्प्रजाम्॥१२॥
शाङ्करभाष्य २६६ धर्मार्था, प्राप्नुयात् , धर्मम्, अर्थार्थी, च, अर्थम्, आप्नुयात् । कामान्, अवाप्नुयात् , कामी, प्रजार्थी, च, आप्नुयात्, प्रजाम् ॥ धर्म चाहनेवाला धर्म, अर्थ चाहनेवाला अर्थ, कामनाओवाला काम और सन्तान चाहनेवाला सन्तान प्राप्त करता है। चक्षुरादीनामात्मयुक्तेन मनसा आत्माके सहित मनसे अधिष्ठित धिष्ठितानां स्वेषु स्वेषु विषयेष्वानु- चक्षु आदिकी अपने-अपने विषयोके अनुरूप प्रवृत्तिको काम कहते है। कूल्यात् प्रवृतिः कामः । प्रजायत जो उत्पन्न हो वह प्रजा यानी सन्तति इति प्रजा सन्ततिः ॥१२४॥ है ॥ १२४ ॥ भक्तिमान्यः सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः । सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत्प्रकीर्तयेत् ॥१२५॥ भक्तिमान्, य, सदा, उत्थाय, , सदा, उत्थाय, शुचि , तद्गतमानसः । सहस्रम्, वासुदेवस्य, नाम्नाम् , एतत् प्रकीर्तयेत् ॥ यशः प्राप्नोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च । अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥१२६॥ यश, प्राप्नोति, विपुलम् , ज्ञातिप्राधान्यम्, एव, च । अचलाम् , श्रियम् , आप्नोति, श्रेय., प्राप्नोति, अनुत्तमम् ॥ न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्य तेजश्च विन्दति । भवत्यरोगो द्युतिमान्बलरूपगुणान्वितः॥१२७॥ न, भयम् , क्वचित् , आप्नोति, वीर्यम्, तेज , च, विन्दति । भवति, अरोग, द्युतिमान्, बलरूपगुणान्वित. ॥ जो भक्तिमान् पुरुप सदा उठकर पवित्र और तद्गत चित्तसे भगवान् वासुदेव- इस सहस्रनामका कीर्तन करता है वह महान् यश, जातिमे प्रधानता, . - के २७० विष्णुसहस्त्रनाम * अचल लक्ष्मी और सर्वोत्तम कल्याण प्राप्त करता है। उसे कही भय नही होता, वह वीर्य और तेज प्राप्त करता है तथा नीरोग, कान्तिमान् और वल, रूप एवं गुणसे सम्पन्न होता है ।।१२५–१२७॥ रोगा” मुच्यते रोगाबद्धो मुच्येत बन्धनात् । भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः ॥१२८॥ रोगात, मुच्यते, रोगात्, बद्धः, मुच्येत, बन्धनात् । भयात्, मुच्येत, भीतः, तु, मुच्येत, आपन्नः, आपदः ॥ रोगी रोगसे, बँधा हुआ बन्धनसे, भयभीत भयसे और आपत्तिग्रस्त आपत्तिसे छूट जाता है ॥१२८॥ दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम् । स्तुवन्नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः॥१२९॥ दुर्गाणि, अतितरति, पुरुपः, पुरुपोत्तमम् । स्तुवन्, नामसहस्रण, भक्तिसमन्वितः ॥ पुरुपोत्तमकी सहस्रनामसे भक्तिपूर्वक नित्यप्रति स्तुति करनेसे पुरुप शीघ्र ही दुःखोंसे पार हो जाता है ॥१२९॥ वासुदेवाश्रयो मर्यो वासुदेवपरायणः । सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम् ॥१३०॥ वासुदेवाश्रयः, मर्त्यः, वासुदेवपरायणः । सर्वपापविशुद्धात्मा, याति, सनातनम् वासुदेवके आश्रय रहनेवाला वासुदेवपरायण मनुष्य सब पापोसे शुद्धचित्त होकर सनातन ब्रह्मको प्राप्त होता है॥१३०॥ न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते कचित् । जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते ॥१३१॥ ३ आशु, नित्यम्, ब्रह्म, । " inMun.
शाङ्करभाष्य , स्तवम्, अधीयान., न, वासुदेवभक्तानाम्, अशुभम्, विद्यते, क्वचित् । जन्ममृत्युजराव्याधिभयम् , न, एव, उपजायते ॥ वासुदेवके भक्तोका कही भी अशुभ नही होता तथा उन्हे जन्म, मृत्यु, जरा और रोगोका भय भी नही रहता ॥१३॥ इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः । युज्यतात्मसुखक्षान्तिश्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः ॥१३२॥ इमम्, श्रद्धाभक्तिसमन्वितः । युज्येत, आत्मसुखक्षान्तिश्रीधृतिस्मृतिकीर्तिमि ॥ इस स्तवका श्रद्धा, भक्तिपूर्वक पाठ करनेवाला पुरुप आत्मसुख, क्षमा, लक्ष्मी, धैर्य, स्मृति और कीर्तिसे युक्त होता है । भक्तिमानित्यादिना भक्तिमतः । 'भक्तिमान्' इत्यादि श्लोकसे भक्ति- शुचेः सततमुक्तस्यैकाग्रचित्त- 'युक्त पवित्र सदा ही उद्योगशील स्य श्रद्धालोविशिष्टाधिकारिणः समाहित चित्त श्रद्धालु एवं विशिष्ट अधिकारी पुरुपके लिये विशेष फलका फलविशेष दर्शयति । निर्देश करते है। श्रद्धा आस्तिक्यबुद्धिः। भक्ति आस्तिकतायुक्त बुद्धिका नाम श्रद्धा भजनं तात्पर्यम् । आत्मनः सुखम् है । भजना या तत्पर होना भक्ति है । आत्मसुखम् । तेन च क्षान्त्यादि- आत्माके सुखको आत्मसुख कहते है। उस आत्मसुख और क्षान्ति आदि गुणोसे सम्पन्न हो जाता है ॥ १३२ ॥ भिश्च युज्यते ॥१३२॥ नक्रोधो न च मात्सर्य नलोभो नाशुभा मतिः। भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे ॥१३३॥ नक्रोध', न, च, मात्सर्यम् , नलोभ , नाशुभा, मति । भवन्ति, कृतपुण्यानाम्, भक्तानाम्, पुरुपोत्तमे ॥ पुरुषोत्तम भगवान्के पुण्यात्मा भक्तोको क्रोध, मात्सर्य ( पराये गुणमे षदृष्टि करना) लोभ और अशुभ बुद्धि नहीं होती।
२७२ विष्णुसहस्त्रनाम नक्रोधो नलोभो नाशुभा मतिः 'नक्रोधो नलोभो नाशुभा मति इति अकारानुबन्धरहितेन नकारेण इन तीन पदोमे अकारानुबन्धसे रहित समस्तं पदत्रयम् , क्रोधादयो न नकारके साथ समास है; अर्थात् भवन्ति, मात्सर्य च न भवतीत्यर्थः क्रोधादि नही होते और मात्सर्य भी नही होता ॥१३३॥ द्यौः सचन्द्रार्कनक्षत्रा खं दिशो भूमहोदधिः । वासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि महात्मनः ॥१३॥ द्यौः, सचन्द्रार्कनक्षत्रा, खम् , दिशः, भूः, महोदधिः । वासुदेवस्य, वीर्येण, विधृतानि, महात्मनः ॥ चन्द्रमा, सूर्य और नक्षत्रोके सहित स्वर्ग, आकाश, दिशाएँ तथा समुद्र-- ये सब महात्मा वासुदेवके वीर्यसे ही धारण किये गये हैं ॥१३॥ ससुरासुरगन्धर्व सयक्षोरगराक्षसम् । जगदशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम् ॥१३५॥ ससुरासुरगन्धर्वम्, सयक्षोरगराक्षसम् । जगत्, बशे, वर्तते, इदम्, कृष्णस्य, सचराचरम् ॥ देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, सर्प और राक्षसोके सहित यह सम्पूर्ण चराचर जगत् श्रीकृष्णके ही वशवर्ती है ॥१३५॥ इन्द्रियाणि मनो बुद्धिःसत्त्वं तेजो बलं धृतिः। वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च ॥१३६॥ इन्द्रियाणि, मनः, बुद्धिः, सत्त्वम् , तेजः, बलम् , धृतिः । वासुदेवात्मकानि, आहुः, क्षेत्रम्, क्षेत्रज्ञः, एच, च ।। इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अन्तःकरण, तेज, बल, धृति तथा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ- इन सबको वासुदेवरूप ही कहा है ॥१३६॥ , .
No text on this page.