Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner

Shri Satpurushon Ke Lakshan

Muni,vidhya Vijay Ji · 2011/03

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। धीयती दूरि-साहित्यमाला-पुष्पा २२ व्याख्यानवाचस्पत्याचार्यदेव- -श्रीमद्-विजययतीन्द्रसूरीश्वरजी महाराज- प्रसादीकत- श्रीसत्पुरुषों के लक्षण। ->at:- प्रकाशक- मुनि श्रीविद्याविजयजी और सागरविजयजी के सदुपदेश से- धाणसा ( मारवाड़) निवासी- श्रीश्वेताम्बरजैन-त्रिस्तुतिक-श्रीसघ । NIRWARE श्रीवीरनि स. २४८० प्रथमसस्करण विक्रम स० २०११ श्रीराजेद्रसूरि स ४४ (१०००)। मूल्य १ रुपया। मुद्र-शाह गुलाबचद लल्लभाई धीमहोदय प्रिटींग प्रेघ दाणापीट-भावनगर حالتاسع واسع مدامعناسه مشاهده जैनी श्रावक किसको कहना, । पचमी तप तमे करो रे प्राणी ए राह- श्रावकमाई तेने कहिये, जे पौर पराई जाणे रे। पर दु खे उपकार करे पण, मन अमिमान न आणे रे ॥२॥१॥ सकल रोके वादे मुसाधुने, निन्दा न करे केनी रे । वाचा काय मन निश्चल राखे, पन धन जननी तेनी २०॥२॥ | समष्टि ने तृष्णा त्यागी, मरम्मी जेने मातरे। नीम थकी असत्य न बोले, परधन नवि प्रहे हाथ रे ॥श्रा०॥३॥ मोह माया व्यापे वि अगे, दृढ़ वैराग्य तेना मनमा रे। अरिहत नामसु रटना लागी,सकल तीरथ तेना तनमा रे ॥श्रा०॥४॥ लोभी नहीं कपटी पण नहिं, काम क्रोध निवारे रे। मणे नरसयो तेनु दरिसण, करता कुल उजवारे रे ॥श्रा०॥५॥ x x x "भणे भणावे अवर को, शासतणा नित पोल । मुहत में द्रव्य वापरे, दिले रहे सम तोल ॥१॥ आश एक अरिहत की, राखे मन में धार । क्रिया आवश्यक आचरे, परदुख मजनहार ॥२॥ ते जन उत्तमता रहे, आदर्श बन पूजाय । अमर यश सहित आयमे, अविनासी पद पाय॥३॥" .... T अग्रिम-वक्तव्य। - १ तृष्णा छिन्धि-आकाश के ममान तृष्णा का अन्त नहीं है और यह अग्नि क समान सर्व मही अवगुण है। चाहे मारे समार की साम्राज्य लक्ष्मी मिल जाय तो भी यह तप्त नहीं होता। मानव जरा-जीर्ग हो जाता है, लेकिन तृष्णा तो मदा तरुण ही रहती है। समार में अनेक अनर्थों की उत्पादिका यही है । अत यदि सुख लाभ होना चाहते हो तो तृष्णा के वेग को प्रथम रोकना सिखो। २ भज क्षमा-क्षमा रूप तलवार जिम पुरुष के हाथ में होती है, उनका कोई चाल मी याका नहीं कर सकता वह सर्वत्र विजप पाता है । क्षमा वीर पुरुषों का भूपण है जिमका सब कोइ अर्चन करत हैं। किसी कविने कहा भी है कि- क्षमा अहिंसा की जननी है, विश्व प्रेम का है आधार । क्षमा समयों का जीवन है, बलहीनों का है उपहार ।। क्षमा दण्ड से भी बढ़ कर है, अपराधी के लिये सुधार । क्षमा बना देती है हिमामय, जग को मधुमय ससार ॥ १ ॥ मासारिक उपाहारों और आत्मप्रगतिक कार्यों में । सर्वत्र इसी गुण को अपनाने से उच्चपद प्राप्त होता है ।

अतएव अपनी प्रगति क जिज्ञासुओं को इसी महा-गुण को अपना लना सीखना चाहिये। ३ जाहि मद-अभिमान से प्राणी शैतान-सा माना जाता है और प्रतिपद पर उसका तिरस्कार होता रहता जो उसकी घरवादी कराता है। अभिमान के कारण ही रावण जैसे बलशालियों का पल भी नामशेष रह गया। इमसे अगर गुण एव यश प्राप्त करना हो तो अपने हृदय- भवन से अमिमान को निकाल देना सीखो। ४ पापे रति माकृथा -इन्द्रियों के प्रतिकूल या अनुकूल विषय विकार, कपाय मावों का प्रादुर्मात्र, प्रवचन, अपहरण, अत्याचार, व्यभिचार और अमत्य-मापण आदि कार्य- -कलाप मम पापबन्धन क कारण हैं। इनमें रचे पचे रहना और आनन्द मानना निकृष्ट कर्मों का उपार्जन करना है। इससे इनमें आमोद-प्रमोद न मनाओ। ५ सत्य हि-सत्य मनुष्य -सत्य मनुष्य में मानवता पैदा करने वाला उत्तम गुण है। इमीसे मनुष्य सर्वजन प्रिय, विश्वास पान और समादरणीय बनता है और उसे समस्त व्यवहारों में सफलता मिलती है। कहावत भी है कि 'सत्य परावर धर्म नहीं, असत्य परावर अधर्म ।' अतः निरन्तर हित, मित एव मधुर सत्य बोलना सीखो, यही बड़ा भारी धर्म है। ६ अनुयाहि साधुपदीं-सदाचारी, महनशील,

सत्यनिष्ट, और शिष्ट पुरुषों के समाचरित विशुद्ध मार्ग पर
हार्दिक विश्वास रख कर दृढ़ता पूर्वक डटे रहने से मनुष्य
पूज्यपद पर समारूड होता है और अपनी एव दूसरों की
महा प्रगति कर मकता है। इसलिये मानवता या उसका
विकास करना चाहते हो तो माधु-मार्ग का आचरण करो ।
७ सेवस्व विद्वजन-जो व्यक्ति मदाचारवान् हैं,
विद्वान हैं, शास्त्रज्ञाता हैं और गुणवान् हैं उनका विनय,
सेवा एव समागम करने से भारी ज्ञान लाम प्राप्त होता है।
जिस प्रकार धागा पुष्पों की सोबत से गले का हार बनता
है उसी प्रकार अज्ञ मनुष्य भी गुणी-जनों में ममादरणीय
हो पाता है। अतएव विद्वानों की कदर करना सीखो-जिससे
समार में अच्छे गुणों की प्राप्ति हो।
८ मान्यान् मानय-मानन योग्य गुणी पुरुषों का
महुमान करने से महती योग्यता मिलती है। जो लोग
अमिमान या प्रमाद से माननीय पुरुषों का बहुमान नहीं
करत, वे अपने उद्देश्य में कमी सफल नहीं होते । अतः
मान्य पुरुषों का बहुमान करना सीखो।
९ विद्विपोऽपि अनुनय-जिस पक्ति के हृदय में
काम, क्रोध आदि शत्रु विद्यमान हैं, उसमें और मूर्स
में कुछ मी मेद नहीं है-दोनों समान ही हैं। अपकार
अपराध) का प्रतिकार वैर से नहीं होता, पर उमका

अमली प्रतिकार तो उसे अपना लेने से होता है। अगर
शुढे को मित्रं पनाना है तो उसका आदर मन्मान करना
सीखो-जिमसे यह स्वय दुश्मनाई छोड़ दवेगा।
१० प्रख्यापय स्वान् गुणान-गुडापाजी से, दसियों
में नाम रखाने से, दरों क महारे जीने से और नागाई से
दुनिया में प्रसिद्ध होने से पद पद पर अपमानित होना पड़ता
है। प्रति व्यक्ति को ऐमा सुकृत एव उपकार जनक कार्य ।
करते रहना चाहिये-जिमसे उनकी यशोगाथा दिग् दिगन्त
तक चमकती रहे और मग्ने बाद भी गवाती रहे ।
इमलिये प्रशस्त गुणों के द्वारा प्रख्यात होना और उनकी
यथावत् सुरक्षा रखना मीग्वना चाहिय ।
११ कीत्ति पालय-अपनी एप पूर्वजों की जो कीर्ति
उपार्जन की हुई है और उसी के प्रभार से अपनी इजत पढ़ी
या बनी हुई है। उम पर किमी तरह धब्बा न लगे मके
ऐसे मार्ग का अनुयायी होना चाहिय-जिमसे उम उज्जवल
कीर्ति पर कालिमा न चढ़ मक।
१२ दुग्विते कुरु दया-प्राण, भूत, सत्व एवं जीव,
ये चार तरह के प्राणी हैं। ये ममी जीने की आशा रखते हैं,
मरना कोई नहीं चाहता। ये मय सुख के कामुक हैं, दुख
की कामना कोई नहीं रखता । इमलिय इन पर दवाब
डॉलन, इन्हें हेरान करने, इनको मारने या आघात पहुंचाने

और इन पर अपनी मचा जमाने 'या इनको परेशान करने से पाप जनक महा भयकर हिमा है जो घोर कर्मबन्धन की कारण-भूत है । कहा है कि- मपळ होय के नियल को, दुख न दीजे सैन । आसिर मुश्किल होयगा, लेने से भी देन ॥ १॥ अत. हीन, दीन, दुःखी, निर्मल, प्राणियों पर सदा दया-मात्र रक्खो, यथाशक्ति इन प्राणियों को सुखी करन का प्रयत्न करो, कराओ। समार में सुख प्राप्त करने का पही मरल मार्ग है। धर्म शास्त्र मी लिखते हैं कि ' को धमों भूतदया' भूत जीनों पर दया रखना यही वास्तविक धर्म है। इसके बिना धर्म नहीं, खाली अधर्म है। 'एतत्सतां लक्षणम् '-ये ममी उत्तम पुरुषों क लक्षण हैं। इन्हीं गुणों क सपादन कर लेने से मनुष्य पूज्य माना जाता है और मानव, मत्पुरुष, एच आदर्श पुरुप कहा जाता है। क्यों कि- धैर्य शौर्यमहिष्णुते सरलता सन्तोषमत्याग्रहो, तृष्णाया विलय कपायविजयः प्रोत्साहन मानसम् । शातिर्दान्तिकदारता व समता न्याये पदार्थे रति- चैते यत्र गुणा स्फुरन्ति हृदये पत्रैव मानुष्यकम् ॥ १॥ जिम व्यक्ति के हृदय में धैर्य, शौर्य, महनशीलता, मरलता, सन्तोष, सत्याग्रह, तृष्णा का विलय, कपायजय, उत्साह, इन्द्रियदमन, उदारता, न्याय और परमार्थ में गति, ये उत्तम गुण विद्यमान हों वहीं पर मनुष्यता का निवास होता है । मनुष्यता सपन्न पुरुष ही समार में स्व पर की समुमति करने फरान में ममथ होता है। प्रस्तुत पुस्तक में उपरोक्त गुणों का ही सरल हिन्दी भाषा में विम्नत विवेचन लिखा गया है जो अति सरल होने से बाल, तरुण, वृद्ध आदि सभी के समझ म आ सकता है । यह निर्विवाद है कि इसमें लिखित विवेचन को मनन फरने स एव वाच कर और अपन हृदय में अंकित कर रखने से मनुष्य अवश्य आदर्श बन मकता है। अन्त में इस पुस्तक को श्रीधाणसा (मारवाड़) के निवासी मूर्तिपूजक श्रीश्वेताम्बर जैन सघने छपा कर प्रकाशित किया है। अत इस साहित्यिक ज्ञान सेवा के लिये श्रीसघ को हार्दिक धन्यवाद दिया जाता है। इस पुस्तक में विषयानुक्रम नहीं दिया गया, किन्तु अग्रिम- वक्तव्य में ही प्रत्यक विषय के नम्बर लगा दिये हैं। इस लिये जिज्ञासुओं को जो विषय अवलोकन करना हो, उसको उसी नम्बर पर दख लेना चाहिये, वो मिल जायगा।

विश्वपूज्यश्रीविजयराजेन्द्रसूरीश्वरेभ्यो नम ।' श्रीसत्पुरुषों के लक्षण। तृष्णा सिन्धि भज क्षमा जहि मदं पापे रति माकृथा, सत्य घूधनुयाहि साधुपदवीं सेवस्व विद्वज्जनम् । मान्यान्मानय विद्विपोऽप्यनुनय प्रख्यापय स्वान्गुणान, कीर्ति पालय दुःखिते कुरु दयामेतत्सता लक्षणम् ॥१॥ १ तृष्णां छिन्धि-तृष्णा के वेग को रोको। मुक्तिपथ में जाने के लिये सर्वप्रथम उन वस्तुओं का परित्याग करना होगा, जो मुक्तिपथ में विघ्न डालनवाली होणा का वेग उस मार्ग में जाने क लिये मारी बाधक है। इम परिवर्तनशील परिस्थिति में मुक्तिपथ के अनेक पथिक है जो वेशभूषा मात्र से सजित हो मुक्तिपथ का राही अपने को मान बैठे हैं। खाली पाम लिंग मात्र से अपवर्ग का पथिक बनना विश्वके प्रकाशमान नयनों में धूल डाल कर भोली जनता का प्रवचन करना है। अनवध अपवर्ग- पथ में जाने के लिये खाली वेशभूपा कार्यकारी नहीं होती।

लोम लालच को म प्रयम अलग करना होगा। पास्त
विस त्याग के बिना मुक्तिपथ मिलना महल नहीं, बड़ा
कठिन एव दुर्लम्य है । त्यागमार्ग क विशुद्धतम मर्व मान्य
सिद्धान्त को लक्ष्य में रख कर यदि कोइ गाईच्यावस्था से
अलग हो, अपने को मुक्तिपथ का पथिक मान ले तो यह
उसकी निरी अन्यता है । गृहस्थावस्था से अलग होने पर
मी यदि मनुष्य क हृदय में लगा का अंकुर लगा हुआ है,
काम, क्रोध, मद का ताता लगा हुआ है तो वह तणा क
पीछे उन्मत हो कर इतन्तत भूलभुलैया क ममान मटकता
ही रहेगा। जिस प्रकार अकर्मण्यता मनुष्य को गिरा दती
है, ठीक उमी प्रकार मर्मोचम पर पर अधिष्ठित मो त्यागी
को नष्णा-कामिनी अवनति के गम्भीर गर्भ में गिराये
पिना नहीं रहनी । तृष्णा अपने प्रपश्च म मनुष्य को जकर
कर अधोगति तक पहुँचान में किसी तरह की कपर नहीं
रखती। हष्णा अपने मोहिनी मत्र द्वारा माधारण मनुष्य
से लेकर योगी महात्माओं नक अपना कुटिल प्रभाव दिखाने
की क्षमता रखती है। समावत मानव तण्णान्ध हो, इमी
मोहिनी के पीछे भस्मासुर क ममान सर्पदा मस्म होता
रहता है । कहा भी है कि--
तृष्णान्धो दु ग्वमाप्नोति, परप्रेह च मानव ।
----कृष्णान्ध मनुष्य इम लोक और परलोक में फष्ट

-
पाती है, वह कृष्णा के पीछे यद्यपि क्षणिक सुख का अनुमद'
कर लेता है, किन्तु बाद में उसे नानाविध आपत्तियों का
सामना करना पड़ता है। पूर्वानुभूत सुख ही उपकी तृष्णा-
वृद्धि का प्रधान कारण है । तृष्णाजन्य साधारण कार्य की
मफलता के बाद मनुष्यं की आशा अपार बढ़ती है । उस
अवस्था में मनुष्य यह नहीं समझता कि अब तो कुछ सन्तोष
की माम लू। सन्तोप किसे कहते हैं १, मन्तोष धारण से क्या
लाम है ? इन बातों क ममझन का वह प्रयत्न नहीं करता।
प्रयत्न करना तो दूर रहा, यह मन्तोष शब्द को अपने
पाम भी नहीं आने दता । यह सब तृष्णा क अतिशय वेग का
ही परिणाम है। यदि कोई वैज्ञानिक अन्वपक इस की मीमा
का पता लगान बैठे कि यह कितनी गहरी है ?, तो वह इस
समस्या को हल करने में हताश ही रहगा। इसका मुख्य
कारण यह है कि तृष्णा आकाश के समान अनन्त एव
असीम है। तृष्णा की सीमा का पता लगाना आकाश की
सीमा को खोजना है। मनुष्य को ज्यों ज्यों वस्तुओं की
प्राप्ति होती जाती है, त्यों त्यों उसकी तृष्णा बढ़ती रहती
है। कितनी ही बार यह जीन अपार सपत्ति का स्वामी बन
चुका है, फिर भी धन से इसको वृप्ति नहीं होती । आज
भी दमड़ी दमड़ी क लिये लोग अपनी चमड़ी दने के लिये
तैयार हैं। थोड़े से लाम क लिये घोरं से घोर अन्याय,
अधर्म, या अकृत्य भी करना पड़े तो मी मनुष्य उसको किये

(१२) बिना नहीं हिचकाते 1 सपचिलाम के लिये मनुष्य सर्दी, गर्मी, भग्न, प्यास, आदि की आपचियों को मान करते हैं और अपने प्रियजनों को छोड़ कर दूर दूर देशों में जाकर रहते हैं। इतनी परेशानी सहन करने क पाद जो धन प्रास होता है वही कृष्णा रूपी प्रज्वलित अग्नि में ईन्धन का काम करता है और तृष्णा का वेग और भी अधिक विस्तृत हो जाता है । इस प्रकार तृष्णा का न कहीं अन्त है, न कहीं सीमा । ग्रन्थकारोंन कहा है कि-- निस्व वष्टिशत शती दशशत लक्ष सहस्राधिपो, लक्षेश. क्षितिपालता क्षितिपतिश्चकेशता या छति । धनेश पुनरिन्द्रता सुरपतिळम पद वाग्छति, घ्रामा शैयपद शियो हरिपद कृष्णावधि को गत १ ॥१॥ --निर्धन देश, थीम, पचाम, या सौ रुपया चाहता है, सौ वाला हजार, हजारवाला लाख और लाखपाला करोड़ों रुपया चाहता है। कोड़ों की सपचिपाला राजा, राजा महाराजा या चक्रवर्ती, चक्रवर्ती सुरेन्द्र, इन्द्र ब्रह्मा, अशा शिव और शिव विष्णु बनना चाहता है, इस तरह कृष्णा की सीमा को कौन पा सकता है, कोई भी नहीं। पद हो जाने से करा, दाँत, नत्र, कान, आदि ममी अंगारयव जीर्ण हो जात हैं, पर तम्णा कमी जीर्ण नहीं

(१३)
होती, वह तो मदा सर्वदा जवान ही रहती है, और न कमी
अपना स्वभाव बदलती है। प्रश्नोत्तरमाला में लिखा है कि-
पद्धो हि को यो विषयानुरागी,
को पा विमुक्तिर्विषये विरक्तिः।
को चास्ति घोरो नरक' स्वदेहः,
तृष्णाक्षयः स्वर्गपद किमस्ति ।।
-पन्धन में कौन है ? जो विषयानुरागी आत्मा है।
विमुक्ति कौन हे १, विषय-विकारों का त्याग ही मुक्ति है।
घोर नरक क्या है ? अपना अपवित्र शरीर ही घोर नरक
है। स्वर्ग क्या है ?, तृष्णा का नाश यही सर्ग है।
को वा दरिद्रो हि विशालतृष्णा
श्रीमाँच को यस्य समस्ततोपः ।
जीवन्मृत फस्तु निरुद्यमो या
को वा मृत स्यात्सुग्वदा निराशा॥
ससार में दरिद्री कौन है ?, जिसे हम्मा पहुत है।
धनवान् कौन है ?, जिसे सर तरह से सन्तोप है। जीता
हुमा मृतक कौन है ?, जो आलसी या निरुद्यमी है और
अमृत क्या है , जो आशा से मर्वथा रहित है।
तृष्णा के बढ़ने हुरा माम्राज्य का मर्यनाश यदि
होता है, तो केवल सन्तोष से। तृष्णा और सन्तोप का सर्प
.

लकुलवद विद्वेष है । जहाँ हदय में मन्तोष आया कि तृष्णा का ममूल अन्त हुआ। जहाँ गत है वहां दिन नहीं, इमी तरह सन्तोष है वहाँ कृष्णा नहीं। ज्यों ज्यों तृष्णा पटती जायगी और जब कृष्णा का माल नाश होगा, तभी पूर्ण सुख की अभिव्यक्ति होगी। अतः समार म वास्तविक सुखप्राप्ति का एक मात्र उपाय है-तृष्णा का निरोष करना। जब तक उष्णा का निरोध नहीं होता, तब तक शक्तिपथ भी मिलना असभव है। तृष्णा एक ऐमी वस्तु है जो मनुष्य क मद्धर्म और उत्थान पथ को नष्ट-भ्रष्ट कर पापपुञ्ज से उत्पन्न करती है। तृष्णा का निरोध प ग तोष का अनुपालन ही पापों का नाश करने की अचूक औषधि है । इमलिय प्रत्येक मनुष्य को उन्नत होन के लिय मर्वप्रथम निम्तृष्ण होने की पूरी आवश्यकता है। तृष्णा राक्षसी का मुख माला किन विना किमीको परमसुख नहीं मिल सकता । धर्मशास्त्र कहते हैं- मर्गः सम्पत्तयस्तस्य, सन्तुष्ट यस्य मानमम् । उपान गूट पादस्य, ननु चर्मावृतेव भू । ॥१॥ सन्तोपामृगतृप्ताना, यत्सुम्य शान्तचेतसाम् । कुतस्तद्वनलुब्धानामितश्चैतश्च धावताम् ॥२॥ -~~-निसका मन सन्तुष्ट है उमो सर सम्पत्तियाँ आधीनती हैं। जैस पैर में जूता पहने हुए पुरुप को सारी 1 .

एथ्वी चर्ममयी दिखाई देती है। सन्तोष रूपी अमृत से
अघाये हुए शान्त चित्तवाले लोगों को जो सुख है वह सुख
इधर उधर घूमनेगाले धन के लोमियों को कहाँ है ।
धनलुब्ध लोग तो आशापाश में जकड़े हुए रहते हैं, उन्हें
क्षिणमर भी सुख शान्ति नहीं मिलती। इसी विषय का
प्रथावत् स्वरूप समझने के लिये नीचे का उदाहरण मी
मनन करन योग्य है।
कौशाम्बीनगरी के राजा जितशत्रु क काश्यप नाम का
एक विद्वान पुरोहित था । उसके यशा नाम की सुशिक्षिता
स्त्री थी। उसकी कुक्षी से एक 'कपिल' नाम का पुत्र हुआ
था। पाल्यावस्था में ही उसका पिता मर चुका था। राजाने
काश्यप क पद पर अन्य ब्राह्मण को पुरोहित कायम कर
दिया। काश्यप की स्त्री उसके होते हुए मन्मान को देख कर
रोने को पैठी। कपिलने रोने का कारण पूछा । माने कहा
तू पढ़ा लिखा नहीं इससे अपनी सारी आजीविका का भोग
दूसरा कर रहा है। अगर तू पढ़ा होता तो वह आजीविका
दूमरों के हाथ में क्यों जाती ?, कपिलने कहा-मैं पढ़ने को
सब तरह तैयार हूँ, आप योग्य प्रबन्ध करो। माताने प्रसन
हो कर, कहा कि यहाँ तो तेरे को पढ़ाने का कोई प्रबन्ध
नहीं हो सकता, इमलिये थावस्तीनगरी में तेरे पिता का
मित्र पडित, इन्द्रदत्त रहता है, वहाँ जाकर अभ्याम कर।

कपिल माता की आशा से श्रावस्ती में इन्द्रदच के वहाँ
पहुँचा और सप हाल उसने कह सुनाया। इन्द्रदत्तने शालि
मद्रसेठ के यहाँ मोजनादि का सप प्रबन्ध कराके कपिल को
निजपुत्र क समान पढ़ाना शुरू किया। दो तीन वर्ष में ही
सतत अभ्याम करके कपिल विद्वान् बन गया। सेठने
कपिल की भोजनादि व्यवस्था क लिये एक दासी की पुत्री
नियत की थी। युवावस्था के कारण कपिल उसके प्रेम में
फॅम गया। ठीक ही है कि 'यौवन हि विकाराणा, सर्वेषामादि
कारणम् ' प्राणिमात्र के विकार पैदा होने का आदि कारण
पुवायस्था ही है।
श्रावस्ती में दास दासियों का उत्सव दिन आ गया।
कपिल की प्रेमिका क पाम में एक कौड़ी भी न होने से
उसे चिन्ता हुइ, अत उसका चेहरा उदास हो गया। कपिलने
इसका कारण पूछा । प्रेमिका बोली कि-गाँव में उत्सबारम्म
होनेवाला है, खर्च क लिये मेरे पास कुछ नहीं है, पम,
यही चिन्ता परशान कर रही है। कपिलने पूछा-इसके
मिलने का उपाय कोई है ।। प्रेमिकाने कहा-पदि आप
यहाँ के राजा धनपति क घर जा कर सबसे पहले प्राव काल
आशीर्वाद देखें तो यह आपको दो मापा सुपर्ण दगा, इसीसे
मेरा सारा कार्य सम्पन्न हो जायगा। कपिल अपनी प्रेमिका
की आशापूर्चि के लिये आधीरात को ही उठ कर चल पड़ा।
रास्ते में जाही रहा था कि पहरदारों। उसे घोर समझ कर

पकड़ लिया और रातमर कारागार में पन्द रक्खा । कपिल सोचने लगा कि भाग्यहीन को दरिद्र सताये पिना नहीं रहता । नीतिकारोंने लिखा भी है कि- दारिद्रयान्मरणाद्वापि, दारिद्रयमपर स्मृतम् । अल्पक्लेशेन मरण, दारिद्रयमतिदुस्सहम् ॥१॥ -~-दरिद्रता और मरना इन दोनों में से दरिद्रता अत्यन्त कष्टप्रद है, क्योंकि मरण वो थोड़े दुःख से होता है, किन्तु दरिद्रता तो आजीवन दुःख दती और पद पद पर अपमान कराती है। यह नीच, दुष्ट लोगों को ऊँचा चढ़वाती है, उनकी खुशामद कराती है और समी कष्ट लाकर ऊपर पटक देती है । यह लोगों को इधर-उधर घुमाती है और आखिर शून्य हस्त टूटी झोपड़ी में आने के लिय विवश करती है । दरिद्र का सारा जीवन निकम्मा है, उस अपने सगे-सम्बन्धियों मे, या अन्य लोगों में कहीं पर आदर नहीं मिलता और न आश्रय । प्रात:काल हुआ अभियुक्त कपिल को राजा के सामने ले जाया गया। राजाने सूक्ष्म-दृष्टि से अमियुक्त की ओर देखा । आकति से राजा को निश्चय हो गया कि यह वास्तव में चोर नहीं, अंधियारे में भूला मटका पथिक है । कपिल के चेहरे पर राजा को वे चिह्न दिखाई नहीं दिये जो किसी

-
पोर के पेहरे पर अपने आप प्रगट दोन राजा नीतिवान्,
विद्वान्, गादी और विद्वानों का आदर करनेवाला था।
उमने कपिल से सनी घटना पछी । कपिलने निसरोष हो
अपना ममस्त वृत्तान्त राजा को कह सुनाया राजाने उमसी
दयनीय दशा पर विचार कर कपिल को मुक्त कर दिया
और इच्छानुमार मांग लेने को कहा। कपिल दरिद्र था,
दो मापा सोने के लिये घर से निकला था। यधेन्ज दान
मांगने की रानामामुन कर बड़े अमममम में पड़ गया। सोचने
लगादो मापा सो से क्या होगा?, कम से कम भीम सोला
तो माँग छ् । पर इसने से क्या दरिद्रता मिट सकती है,
जप मनमाना मिल रहा है तो कम क्यों मांगा आप!,
इस प्रकार सोचत सोचते कपिलन मारा राज्प और मुमेरु
जिवना सोना मांग लेन का विचार स्थिर किया । सुमस्कार
यश अन्त में उसके अन्त करण में यह मत्प्रेरणा उत्पन्न
हुई फि-जो कृष्णा दो मापा मोन स पदवे पडत अधिक सीमा
तक जा पहुंची, तो न मालूम आगे कहाँ तक पढ़ती जायगी।
अगर सम्णा ज्यों की त्यों बनी रही तो उतना मांग लेने
स भी क्या सन्तोष आ जायगा, नहीं। कहा है भी कि-
सुवपणरुप्पस्स पच्यया उ भवे,
सिया हु फेलाससमा असपपा।
नररस लुद्धस्स न तेहिं किंचि,
इच्छा हु आगाससमा अणतिआ ॥
-

-कैलाश पर्वत के समान ऊचे ऊचे सोना चादी के
असख्यात पहाड़ भी मिल जॉप, नौ भी लोमी मनुष्य को
उनसे वृप्ति नहीं होती। क्यों कि तृष्णा आकाश के समान
अनन्त है ( उत्त० ९ वा अ०)
अतएव सुख एव पूर्ण शान्ति का मूल कारण है तृष्णा
को जड़ से उसाद कर फेंक देना । कृष्णाने मुझे दुःखी और
दरिद्री पना रखा है, इसलिये इसका मदा के लिये परि
त्याग करना ही सुखी होना है। ऐसे मद्विचार स्फुरण होते
ही कपिलने राजा की उदारता के लिये धन्यवाद दिया
और कुछ न माँगने का अपना निश्चय राजा के मामने प्रगट
कर दिया। राजा को हम अचानक परिवर्चन से मड़ा
आश्चर्य हुआ। कपिल के मुखकमल पर अब दीनता एवं
दरिद्रता अपना प्रभार नहीं जमा सकी। उसकी विकसित
आकतिने उसको राजा का विशेष आदरपात्र बना दिया ।
कपिल का चेहरा सन्तोप की अक्षुण्ण आमा से चमक उठा।
सन्तोप क प्रभाव से उसकी मारी चिन्ता हट गइ। वास्तव में
ये सन्तोष ही सर्वश्रेष्ठ धन, सुख और सर्वोचम धर्म है।
सन्तोष प्राप्त हो जाने पर किसी भी पौद्गलिक घन, या
विनाशी सुख की आवश्यकता नहीं रहती। मुक्तिमार्ग का
राही पनने के लिये मनुष्यमात्र को सन्तोष की आराधना
करना चाहिये । मनुष्य चाहे कितनी भी तपस्या क्यों न
करे किन्तु जब तक उसमे सन्तोष नहीं है, सब पृथा है।

(२०) सन्तोष धारण करने से मनुष्य सप सिदियों को सुलमत से प्राप्त कर सकता है। क्यों रि- जात कल्पतरु पुर. सुरगवी तेपा प्रविष्टा गृह, चिन्तारत्नमुपस्थित करतलप्राप्तो निधि. मन्निधिम् विश्व वश्यमवयमेव सुलभा स्वर्गापवर्गश्रिय, ये सन्तोपमशेपदोपदहनध्यसाम्मुद यिनते ॥१॥ जो मनुष्य दोप रूपी अग्नि को बुझाने में पादर के समान मन्तोष को धारण करते हैं-उनके सामने मानो कल्पवृक्ष पैदा हुआ है, उनक घर में कामधेनु तथा चिन्ता मणिरत्न आया है। इसी तरह नवनिधि भी उनक पाम आ जाती है, और सारा समार उनके आधीन हो जाता है। स्वर्ग और अपवर्ग की लक्ष्मी उन्हें सुलभता से प्राप्त हो जाती है । अत प्रत्येक मनुष्य को, विशेषत उन मुमुक्षुओं को जो अपने को मुक्तिपथ का राही माने बैठे हुए हैं, तष्णा का समूल छेदन कर सन्तोष धारण करना चाहिये, तभी वे अपने कार्य में सफल होंगे। सन्तोष की सुन्दरतम सीमा में प्रविष्ट हो कपिलने अनि त्यादि मापनाओं से मावित होकर परम ज्ञान प्राप्त किया। देवोंने उन्हें माधुवेश अर्पण किया। फिर उन्होंने अनेक भव्यप्राणियों को मुक्तिपथ के राही पनाये और स्वय अजर (२१) अमर पद प्राप्त किया। सदा के लिये जन्म मरण मम्बन्धी दुःखों से छुटकारा पाया। ससार में किमीको धनलोम है, किमीको अपने माना. पमान की चिन्ता है, किमीको पुत्र कामना है, फिमीको दुनिया में यश कीतिं पढ़ाने की लालमा है, फिमीको अखबारों में प्रसिद्ध होने की अमिलापा है, किमीको प्रवचन में ही मजा है, किमीको चेला चेली अधिक करने की व्यग्रता है, किसीको चर्चावाद में विजय पाने की उत्कठा है और किमीको दमरों क जान माल को हडप लेने में आमोद-प्रमोद है। जब तक ये सब हृदय मरन में विलास करते हैं तब तक पण्डित और मूर्ख दोनों ममान है-उनमें कुछ भी मेद नहीं । कहा भी है कि- काम क्रोध मद लोम की, जय लगि मन में पान । का पण्डित का मूरखे, दोनों एक समान ॥१॥ सन्तोषी पुरुषों में विपत्ति के ममय धीरता, ऐश्वर्यावस्या में सहनशीलता, समा म वचनचातुर्य और शास्त्रविचार आदि में व्यसनिता होती है। कापरता आदि दुर्गुणों को उनके हृदय में स्थान नहीं मिलता, इसीसे वे सन्त कहाते है। यों तो नाक, कान, आंख आदि इन्द्रियाँ सभी के होती हैं, परन्तु उनके सब व्यापार पाप जनक हैं । सन्तोषी पुरुषों (२२) के प्रत्येक व्यापार में योग्यता, माधुता और सुशिक्षिता झलकती है। क्यों कि- श्रवण नयन मुख नामिका, सय ही के इकठोर । हसियो पोलियो देखियो, मन्तन को कछु और ॥१॥ जिनक हृदय-मवन म सन्तोप आकर विराजमान होता है, उनके हृदय में न क्रोध रहता है, न मान, और न माया रहती है, न कामपिपामा । उनका हृदय विशुद्ध होता है और घे स्वपर को पड़ी आमानी से सुखी करने की क्षमता रखते है । अतएव दुनियादारी के आशा--पामाओं को तोड़ दो, उनक फन्द में न फसो, अखण्ड सुस के देनेवाले सन्तोष को धारण करी और सन्तोषी सन्तों की सेवा करना सीखो। लिखा मी है कि- जो सन्तन में मन को लगाये हुए हैं, वह फल मुक्त जीवन को पाये हुए हैं। जो पन्द हैं दुनिया के, गन्दे मरासर, वर फन्दे में खुद को, फंसाये हुए हैं ॥१॥ जो मोते हैं गफलत में, रोते हैं आखिर, वह खोते रतन, हाथ आये पकड़ पाया, सतगुरु के दामन को जिमने, वही है मगन, सय सताये हुए हैं ॥ २॥ 1

(२३)
२ भज क्षमा-सहनशील बनो।
धर्मपथ की ओर बढ़ानेवाला धार्मिकता का मुख्य अङ्ग
क्षमा है । जिसने अन्य शुम साधनों में सम्पन्नता प्राप्त कर
ली है, यदि क्षमा गुण का साधन नहीं किया, तो उसने
केवल मुक्ति के साथ उपहास कर अन्य साधनों के लिये
अपना अमूल्य समय व्यर्थ खोया, जो प्रायः आगे चल कर
सर्वथा निस्मार और अनुपादेय है। अहिंमा, सत्य आदि
गुणों की अपेक्षा क्षमा गुण में अभूत-पूर्व महत्ता है। कई
महापुरुषोंने इसी उपादेय अमर गुण का अवलम्बन लेकर
अपने को मुक्तिपथ का अतिथि बनाया है। अत यह कहना
मर्वथा सत्य, शास्त्रसगत, एव सैद्धान्तिक युक्तियों से निर्षि
वाद है कि क्षमाशील मनुष्य अपनी क्षमाशीलता के फल
स्वरूप जितना शीघ्र धर्मपथ की सीमा पर पहुँच सकता है,
उतना शीघ्र अन्य गुणावलम्बी साधक नहीं पहुंच सकता।
इस गुण की महत्ता को समझने क लिये यह भी जान लेना
अत्यावश्यक है कि मनुष्य में क्षमागुण की मची साधकता
होने के पश्चात् उसमें सत्य, अहिंसा, अस्तय, त्याग एव
ब्रह्मचर्य आदि उत्तम गुणों की जागृति स्वतः हो जाती है।
इसका मुख्य कारण यह है कि-धमा एक ऐमा अमाधारण,
अनुकरणीय गुणरत्न है जिसमें अन्यान्य समी गुणों का
समावेश रहता है और उनका सहनशीलता के बिना समु-

(२२) के प्रत्येक व्यापार में योग्यता, साधुता और सुशिक्षिता मलकसी है। क्यों कि- श्रवण नयन मुख नासिका, सप ही के इक टोर । हसियो पोलियो देग्विषो, सन्तन को फछु और ॥१॥ जिनक हृदय-भवन में सन्तोप आकर विराजमान होता है, उनके हृदय में न क्रोध रहता है, न मान, और न माया रहती है, न कामपिपामा । उनका हृदय विशुद्ध होता है और घे स्त्रपर को पड़ी आसानी से सुखी करने की क्षमता रखते है । अतएव दुनियादारी के आया-पामाओं को तोड़ दो, उनक फद में न फमो, अखण्ड सुख के बनेपाले सन्तोष को धारण करो और सन्वोपी सन्तों की सेश करना सीखो। लिखा भी है कि- जो सन्नन में मन को लगाये हुए हैं, वह फल मुक्त जीवन को पाये हुए हैं। जो धन्दे हैं दुनिया के गन्दे सरासर, वह फन्दे में खुद को, फंसाये हुए हैं ॥१॥ जो सोते हैं गफलत में, रोते हैं आखिर, वह ग्वोते रतन, हाथ आये पकड़ पाया, सतगुरु के दामन वही है मगन, सय सताये हुए है ॥२॥ को जिमने, स्मरणशक्ति हीन होने से मनुष्य को सारी चेतना का सर्व नाश हो जाता है। अतः मनुष्य को क्षमाशील बनने का यथासाध्य प्रयत्न करना चाहिये । जितना हो सके उतने सत्साधनात्मक प्रयत्न की अत्यधिक मात्रा इस ओर अग्रसर रहेगी, तो उसके लिये मुक्ति हथेली में ही समझना चाहिये । जिम प्रकार उडा हतोड़ा गर्म लोहे को कूट पीट कर यथेच्छ पाटदार बना दता है, उसी प्रकार क्षमा मनुष्य में मनुष्यता ठोंम ठोंस कर मर दती है-जिसक प्रमाव से वह जन्म जन्मान्तरों के पापकर्मों का ममूल नाश कर परमज्ञानी आदर्श पुरुष पन जाता है। मरे तीर्थधरों की अपेक्षा मगवान महावीरम्मामी के कर्मों का उदय अधिक था। उन्होंने अपने उन कमाँ का मर्चनाश इसी निरुपम क्षमागुण से किया था । उनमें यह गुण कितनी मात्रा मे फूट कूट भरा हुआ था, यह नीचे क वृत्तान्त से भलीमाति मालूम हो सकता है। दीक्षा धारण किये बाद प्रभु महावीर कुमारगांव के निकटवर्ती बन में कायोत्सर्ग ध्यान में खड़े थे। उस समय एक किमान अपने बैल उन्हें मला कर कार्यवश अपने घर चला गया। थोड़ी देर बाद वह वापिस आया, तो वहाँ उमको अपने बैल दिखाई नहीं दिये। किसानने चारों ओर जगल में ढूंढे, पर बैल नहीं मिले । इघर बैल चरते चरते प्रभु के (२४) चित विकास नहीं हो पाता । मनुष्यों को चाहिये कि क्षमा के अतिरिक्त पहिले अन्य गुणों को ग्रहण करने के परिणाम- स्वरूप अपनी दुखत मानसिक एकाग्रता को सुस्थिर मनाने में व्यर्थ प्रयास न करें, क्यों कि यह उनका प्रयाम प्रयास मात्र ही रहेगा। फलाम्युदय की आकाक्षा रखना तो मृगठष्णा के समान है। जो मनुष्य मत्यवादी है, अहिंसा का पूजारी, निर्लोभी, मन-मोद परित्यागी और धर्मनिष्ठ है, यदि वह क्षमाशील नहीं है, तो उसकी सत्यवादिता, अहिंसकता, निस्तृष्णता, मदमोहत्यागिता एव धर्मनिष्ठवा कहने मात्र की है-उनका वह समुचित पालक और फलगामी नहीं बन सकता । जिस मनुष्य म क्षमाशीलता नहीं, चाहे वह अन्य सद्गुणों से युक्त ही क्यों न हो, परन्तु उसके वे गुण क्षमा के अभार म उसी तरह लप्तप्राय हो जाते हैं, जिस तरह वसन्त क अभाव में कोयल की मधुर कूक। इसीका समर्थन करते हुए भगवद्गीता म लिखा है कि- शोधाद् भवति सम्मोह , सम्मोहात्स्मृतिविनमः । स्मृतिविभ्रमाद् वुद्धिनाशो, बुद्धिनाशात्मणश्यति ॥१॥ --क्षमाशीलता न होने से विवेकशून्यता, उससे स्मृति चलायमान होती है और उससे मनुष्य चेतनाहीन होकर स्वय नष्ट हो जाता है। क्रोध से विवेक चला जाता है, विवेक के चले जाने से स्मरणशक्ति नष्ट हो जाती है और

(२७ )
काँको भोग फर मैं स्त्रय नष्ट करूगा, उसमें आपका
सहारा कुछ भी कार्यकारी नहीं हो सकता। विपत्तियाँ
मनुष्यों के मानसिक दृढ़सकल्पों की परीक्षक हैं । जो पुरुष
इनमें मर्व तरह उत्तीर्ण हो जाता है, वही आगे जाकर
आदश बन जाता है। बस, इन्द्र प्रमु को
घन्दन कर वापिस
अपने स्वर्ग में चला गया।
इसी प्रकार प्रभु को चलबिचल करने के लिये कटपूतना
देवी, शूलपाणियक्ष, ग्वाल तथा सगमदेव आदिने अमद्य
कष्ट दिये, पर भगवान् अशमात्र मी चलबिचल नहीं हुए।
न उन पर नाराज हुए और न आत्मा में घबराहट को स्थान
दिया। आसिर अखण्ड क्षमाशीलता से घातिकर्मों का
समूल क्षय करक भगवान् महावीरप्रभुने लोकालोक प्रकाशी
सर्वज्ञ सर्वदर्शी पद प्राप्त किया।
ठीक है जिस महापुरुप में ऊंची नम्रता, अखड सहन
शीलता और अटूट दृढता होती है, वह त्रिभुवन का पूज्य
पनता ही है । जिस प्रकार गजराज के पीछे कुत्ते भोंकते
रहते हैं पर वह उनकी तुच्छता पर कुछ भी ध्यान नहीं
देता । इसी तरह क्षमाशील पुरुष तुच्छों की पकझाक पर
कुछ भी ध्यान न देकर अपने ध्येय में निमग्न रहते हैं। वे
मलीभांति जानते हैं कि-तुच्छों के पकने, या उनक डाले
हुए विघ्नों पर लक्ष्य रखने से ध्येय की सफलता न कमी
हुई और नहीं होती है।

(२६ )
पास आ गये। किमानने फिर आकर देखा तो बैल वहाँ
खड़े हुए हैं। 'हो न हो इसी पाखण्डीने बैल छिपा रखे
थे' ऐमा सोच कर किमान मारे क्रोध क प्रसुको मनमाने
वचन प्रहारों से कष्ट देने लगा, पर क्षमाशील प्रभु तो
अपने परम शान्तिमय ध्यान में ही मग्न रहे। उनके अनु
चित परुप वचनों पर प्रमुने कुछ भी ध्यान नहीं दिया ।
जप किमानने अपने वचन प्रहारों का कुछ भी अमर पदवे
नहीं दखा, तब वह अज्ञप्राणि प्रभु को पीटने लगा, पर
प्रभुन उसे भी महन किया, फिन्तु अपना ध्यान-मग नहीं
किया । इन्द्रने प्रगट होकर किमान को दाटा कि ये महान्
तपस्वी हैं, राजा सिद्धार्थ के पुत्र हैं और विधकल्याण के
लिये तपस्माधना कर रहे है। ये तुम्हारे बैलों को लेकर क्या
करेंगे । जो राज्य का परित्याग कर चुके हैं, उन्हें बैलों से
क्या वास्ता है । यह सुन कर किमानने प्रभु से माफी
मांगी और वह अपने बेलों को लेकर घर चला गया।
इन्द्र ने कहा-भगवन् ! आपको भारह वर्ष तक अनेक
कों का सामना करना पड़ेगा। अगर आपकी आज्ञा हो,
तो उनको हटाने के लिये मैं सेवा में रहू । प्रभुने कहा-
इन्द्र ! ससार में 'आत्मा एव कर्ता आत्मैव तद् भोक्ता'
इस सर्वमान्य सिद्धान्त के अनुसार आत्मा ही पाप करता
है और विपाक काल में आत्मा ही उनको भोगता है, उन्हें
हटानेवाला ससार में कोई नहीं है। इसलिये मेरे भोग्य

रही थी। ऐसे समय में विश्वामित्र एक तीक्ष्ण तलवार को
लेकर वशिष्ठजी के ध्यानस्थल पर जा पहुंचे। उनके आते
ही वशिष्ठ की ममाघि खुल गई। विश्वामित्र ने कहा-'वशिष्ठ !
अब भी तुम मेरे को ब्राह्मण मानते हो या नहीं? अगर
अपने मुख से मुझे ब्राह्मण न कहोगे तो मृत्युमुख के कपल
पना दूगा ।' विश्वामित्र की पैशाचिक लीला को देख कर
वशिष्ठजी को आचर्य एव खेद उत्पन्न हुआ, फिर भी धैर्यता
के माथ बोले कि क्या आप खग की प्याम युझाने से नरक्षण
बन सकते हैं , अथवा इस पैशाचिक कुकृत्य से प्रशस्त के
अधिकारी हो सकते हैं | आप अधिक से अधिक घोर
तपस्याएँ करक इम प्रकार क पैशाचिक काण्ड खड़े करते
रहेंगे, वो इमसे क्या त्रिकाल में भी अपने को प्रामण घोषित
कर सकोगे? 1 सहनशीलता, सुशीलता, अक्रोधिता, निरमि
मानिता, अमत्मरता, निरीहता, विद्वत्ता आदि आदर्श गुणों
को मनुष्य जब धारण कर लेता है, तब वह अकुलीन होकर
भी कुलीन (उत्तम) कहाता है और इन गुणों से जो रहित
होता है वह कुलीन होकर भी अकुलीन (नीच) माना जाता
है । जन्म से सभी मनुष्य शूद्र होते हैं, परन्तु वाद
सस्कारो के कारण उनमें उत्तमता या अघमता का प्रादुर्भाव
होता है जो उनको योग्यता या अयोग्यता के रूप में परिणत
करती है। इसी कारण फिर वे संसार में प्रशसा एव निन्दा
के पात्र बनते हैं। मनुस्मृतिकारने लिखा है कि-
यथा

।
(२८)
समार में फम दर्जे फ लोग गाली पर गाली न देने से
था अपकार का बदला थपकार से न लेने से अपनी अप्रतिष्ठा
समझते हैं। गाली की एवज में गाली का प्रयोग करने से
फिमाद घटता नहीं, अधिक बढ़ता है और चुप रहने से
उसका समूल उच्छेद हो जाता है। कोई यह भी नहीं
जानता कि विमने फिमो गाली दी। न्याय भी है कि
कटकफल बोने से कांटा ही पैदा होता है, ईख नहीं।
किसी ममय विचामित्र और वशिष्ठ क परस्पर घटा अन
बनाव सडा हुआ। विश्वामित्र धे धत्रिय पर महान तपम्बी।
वे कहते थे कि सच कोई मुझ को मानण कहा करें। यह यात
उस समय के नामणों को, विशेषत वशिष्ठजी को अच्छी न
लगी। वशिष्ठजीन कहा-आप महान् तपस्सी अश्य में, पर
माक्षण नहीं कहला सकने, राजपी है। इस कारण दोनों प्रापियों
में तनातनी चलने लगी। विश्वामित्र क्षत्रिय समायोचित रोष
में आकर सोचने लगे कि-वशिष्ठ को परमधाम पहुँचाय रिना
मनोरथ सफल नहीं होगा। एक दिन वशिष्ठजी एकान्त में
नयनपलकों को पन्द किये हुए ध्यान में पेठे थे। उस समय
काजल की आंधी चलाती हुई कृष्णपक्ष की अघियारी निशा
देवी चारों जोर अपना माम्राज्य जमाय हुये थी। आकारा
में काले मेघ मडल मी नीरवतामयी निशीधिनी कोनिमत्रण
देने के लिये किसी अनात स्थल को दौड़े जा रहे थे। जिधर
देखो उधर काले वस्त्र पहन पनघटा प्रहरी पन कर पहरा दे

ही मनुष्य उत्तम, कुलीन एव आदर्श माना जाता है, जाति और कुल से नहीं। इसलिये मनुष्य को अच्छे गुण सपादन फर, उत्तम पनने का प्रयत्न करना चाहिये, तभी वह आदर्श और पूज्य हो सकेगा। यह वचन सुनते ही विश्वामित्र को अपनी भूल समझ में आ गई और वे वशिष्ठजी के पैरों में गिर कर अपने अप- राघों की क्षमा याचना करने लगे । वशिष्ठनीने क्षमा दकर कहा-जिस समय आप क्रुद्ध हो जो कुछ कहते थे वह सप तुच्छातितुच्छ दिखाई देता था। इस समय आपके हृदय में वह वासना न रहने से हम आपको आदरणीय एव महा पुरुष मानते हैं । बस, आपके हृदय में मान, क्रोध, छल या मत्सर नहीं होगा तो सब कोई आपको प्रामण से भी अधिक पूज्प मानेंगे । कहा भी है कि क्षमा सकल गुण से पडी, क्षमा पुण्य को मूल । क्षमा जाहि हिरदे वसे, ताहि दैव अनुकूल ॥१॥ अपराधी निज दोपतें, दुख पावत वसु जाम । क्षमा-शील निज गुणनतें, सुखी रहत सय ठाम ||२|| सारांश यह है कि क्षमा रहित मनुष्य अपने किये अपराधों के कारण प्रत्येक स्थान में दुख एव सकटों को पाये बिना नहीं रहते । क्षमाशील मनुष्य अपने क्षमागुण से हर जगह सुख प्राप्त कर, अपने जीवन को आदर्श एवं समु.

(३०) शुद्रो ब्राह्मणतामेति, ब्रामणश्चेति शूद्रताम् । क्षत्रियाजातमेव तु, विद्याद्वैश्यात्तथैव च ॥१॥ -~सद् गुणों से शूद्र ब्राह्मणल को और असद्-गुणों से ब्राह्मण गद्गत्व को पाता है । यही पात क्षत्रिय और वैश्य के विषय में समझना चाहिये । महाराजा जनक क्षत्रिय थे, परन्तु विद्या एवं न्यायनिष्ठ होने से वे ब्राह्मण कहलाये (सत्पथनाक्षण ११, ६, २, १) इलुशापुत्र दामीजात होकर भी ब्रह्मी कहाये (ऐतरयमाण २, ११) दासीपुत्र सत्य काम, जवाल, शिष्टगुणों से माह्मण कहलाय (छान्दोग्योप निषद् ४, ४) इसी प्रकार विश्वामित्र, शृङ्गी, कौशिक, गौतम, वाल्मिकी, पारामर, द्रौण, रैपच आदि ऋषि भी नमी कह लाये हैं। महामारतकार वेदव्यासने कहा है कि- न फुलेन न जात्या चा, क्रियाभिमा॑ह्मणो भवेत् । घण्डालोऽपि हि व्रतस्थो, ब्राह्मणः स युधिष्ठिर! ।। शूद्रोऽपि शीलसपनो, गुणवान् ब्राहमणो भवेत् । ब्राह्मणोऽपि क्रियाहीन., शूद्रात्मत्यवशो भवेत् ॥ -~-हे युधिष्ठिर ! कुल, जाति और कर्म (ध) से कोई माक्षण नहीं होता। चण्डाल भी उत्तम आचरण से ब्राह्मण होता है । शील और मद्गुणों से युक्त शूद्र भी बाहाण होता है और निया मे हीन माझण भी शूद्र मे अधिक शूद्र होता है। कहने का मतलब यह है कि सद्गुणों क धारण करन से - !

ही मनुष्य उत्तम, कुलीन एव आदर्श माना जाता है, जाति और कुल से नहीं। इसलिय मनुष्य को अच्छे गुण सपादन कर, उत्तम पनने का प्रयत्न करना चाहिये, मी वह आदर्श और पूज्य हो सकेगा। यह वचन सुनते ही विश्वामित्र को अपनी भूल समझ में आ गई और वे वशिष्ठजी के पैरों में गिर कर अपने अप- राघों की क्षमा याचना करने लगे । वशिष्ठजीने क्षमा दकर कहा-जिस समय आप क्रुद्ध हो जो कुछ कहते थे वह सप तुच्छातितुच्छ दिखाई देता था । इम समय आपके हृदय वह वामना न रहने से हम आपको आदरणीय एव महा पुरुष मानते हैं । वस, आपके हृदय में मान, क्रोध, छल या मत्सर नहीं होगा तो सब कोई आपको ब्राह्मण से भी अधिक पूज्य मानेंगे । कहा भी है कि क्षमा सकल गुण से पड़ी, क्षमा पुण्य को मूल | क्षमा जाहि हिरदे घसे, ताहि दैव अनुकूल ॥१॥ अपराधी निज दोपतें, दुख पायत वसु जाम। क्षमा-शील निज गुणनते, सुखी रहत सय ठाम।।२।। सारांश यह है कि क्षमा रहित मनुष्य अपने किये अपराधों के कारण प्रत्येक स्थान में दुख एव सकटों को पाय बिना नहीं रहते । धमाशील मनुष्य अपने क्षमागुण से हर जगह सुख प्राप्त कर, अपन जीवन को आदर्श एव समु- (३२) मत पना लेता है। उक्त कथा मे यह शिक्षा लेना चाहिये कि जिम मनुष्य में क्षमा है चाहे वह पल-हीन हो उमका निर्दयी दुष्ट मनुष्य कुछ भी विगाह नहीं कर सकता। नीति भी है कि 'क्षमाधनु करे यस्य, दुर्जन किं करिष्यति ? क्षमा रूपी धनुष्य जिमके हाथ में है उमको दर्जन कमी परे शान नहीं कर माता । एक हिन्दी कविने कहा है कि- क्षमा पड़न को होत है, ओछन को उत्पात । फहा विष्णु को घटि गयो, जो भृगुने मारि लात ॥१॥ क्षमागुण के कारण प्रत्येक व्यक्ति महत्ता प्राप्त करता । महान् पुरुष ही क्षमा धारण कर सकता है। जो क्षमा नहीं रखता यह महान होता हुआ भी तुच्छ प्राणियों की येणी में गिना जाता है। महापुरुषों का आभूपण क्षमा है। इसीसे 'क्षमा वीरस्य भूपण' यह उक्ति प्रचलित हुई है। मरा हुआ घड़ा कभी नहीं झलकता, अधूरा झलकने लगता है। कहा है कि- भरा सो झलके नाही, झलके सो ही अदा । घोड़ा सो भूके नहीं, भूके सो ही गदा ।। १ ।। समागुण का परिपालन करने से मनुष्य छोटी श्रेणी में नहीं किन्तु महान् पुरुषों की श्रेणी में शोमा पात्र होता है। क्सिी ममय मृगुऋपीने क्रोध के आवेश में श्रीकृष्ण की छाती में लात मार दी, परन्तु श्रीकृष्णने कहा-महर्षी क्षमा

फरें, मेरा शरीर कठोर है, आपके चरण कोमल हैं, समष
है मेरी कर्कश छाती में मारने से आपके चरण को कहीं
चोट लगी होगी, ऐमा कह कर वे उनके पात्र दायने लगे।
घस, इसीका नाम क्षमा, या सहनशीलता है निसे देख
कर प्रत्येक व्यक्ति पानी पानी हो जाता है और उनका
अनुकरण करने लग जाता है। महनशील श्रीकृष्ण का
उदाहरण भारतीय इतिहास में एक प्रोजनल पव सजीव
पोषपाठ है जो मदा के लिये इतिहास के पृष्ठों पर अंकित
रहेगा। 'क्षमाया स्थाप्यते धर्म 'क्षमा धर्म का आधार
स्तम है । इसक विना तप, जप, ध्यान, मक्ति, दया आदि
धर्मों का वास्तविक फल प्राणियों को नहीं मिलता। इमलिये
ध्यावहारिक और धार्मिक ममी कार्यों में प्राणी मात्र को
सर्व से पहिले क्षमागुण का आश्रय लेना चाहिय जिमसे
अन्तिम ध्येय तक पहुंचा जा सके।
३ जहि मद-अभिमान कभी न करो।
मद क अन्यतम अर्थों में एक अर्थ है अहङ्कार, घमण्ड,
या अमिमान । यह एक ऐसी वस्तु है जो आज कल तो
प्राय हर जगह पर पड़ी सुलभ है। जिधर देखो उधर
छोटे से छोट और पढ़े से पड़े पुरुषों तक अभिमानने
पूरा नहीं तो अशत. अपना अधिकार जमा रक्सा है।

प्रचलित नवयुग में इसका जितना विस्तार हो चला
उतना प्राचीन युगों में शायद ही होगा। आचाल पूछ समी
इमक शिकार बने हुए हैं। यदि किसी में यह वाद्य रूप से
प्रतीत होता है, तो किसी में आम्पन्तर रूप से, पर साधा
रणसी झलक से तो कोई पचा दृष्टिपथ नहीं होता। भीड़ासा
कोई मी किमी अपेक्षा म बढ़ा हुआ वो वह अपने को शीघ्र
ही समाज में, राष्ट्र में, या कुछ समय के लिये विधमर में
अद्वितीय, विद्वान् , कलाकार एव सर्वगुणी मान बैठता है।
यह समझता है कि मेरे समान आज ममाज, या राष्ट्र में
कोई मनुष्य नहीं है, मर्वेसर्वा मैं ही। यह नहीं जानता
कि ऐमा समझने से मुझे कितनी हानि का सामना करना
पड़ेगा | क्या कहीं अपने मुख से अपनी प्रशसा करने पर
कोइ महान् पुरुप कहला मरुता है । इस प्रकार का अमि
मानी व्यक्ति धार्मिकता का उपदश देते हुए अपनी तुच्छ
धृत्ति पर फलकित हुए बिना नहीं रह सकता। वह अमिमान
के वश हो अपने को समाज से कोसों दूर अवनति के गहरे
गर्भ में गिरान का सतत प्रयत्न करता है। अभिमानी यदि
उपदशक है तो वह अवश्य ही अपनी मनोमालिन्यता का
सजीव परिचय देते हुए महापुरुषों क मुखारविन्द से निकले
हुए सैद्धान्तिक शब्द-सुमनों पर तुपारापात क साथ साथ
उन पौधों पर जहाँ से शब्द-सुमन विकमित्त होत हैं, कठोर
कुठाराघात कर समाज एर उमक नियन्ता के साथ भी

--
विश्वासघात करता है । अत. प्रत्येक मनुष्य को, विशेषत:
उनको जो उपदशक हैं और जो जनता को उपदेश प्रदान
कर सत्पथ पर ले जाना चाहते हैं, निरभिमानी होने की
पूरी आवश्यकता है।
निरमिमानिता मनुष्य के विनयशील होने का एक
सजीव चिह है। विनीत मनुष्य प्रत्येक स्थान पर आदृत
होता है, वह यदि शनु के घर भी जायगा, तो अपनी
विनय-शीलता के कारण आदरपात्र ही योगा। विनीत
मनुष्य अपने विनयगुण से उचित, अनुचित को महन कर
समाज में आदरणीय कहला मकता है। ममाज भी उमको
। प्रत्येक कार्य म आदरणीय स्थान पर नियुक्त करता है-
जिमसे उसकी शोभा चौगुनी बढ़ती है। विनयहीन अभि-
मानी व्यक्ति अपनी मदमरी उच्छृखल वृत्तियों से मर
जगह अपमानित होता है और उत्तम गुण सपादन से
प्रतिपल वचित रहता है । वह अज्ञ अपने हृदय की कल्लपित
त्तियों से छुटकारा नहीं पाता, जिनके कारण वह हर जगह
सन्मान के बदले अपमान एव तिरस्कार पाया करता है।
अभिमानी अपन सुलभ माध्य कई कार्य अपनी मदमयी
वृत्ति से विगाड बैठता है । उमक अन्दर महनशीलता का
अत्यन्त अभाव रहता है-जिमसे वह व्यक्तिगत, या माहिक
उचित अथना अनुचित आक्षेप एर आरोप आदि कुछ भी
सहन नहीं कर मकता | अमहनशीलता के परिणाम स्वरूप

दो, एक व्यक्ति, पा उसका मारा कौटुम्मिक परिवार ही नहीं, सारा ममाज उमस विपरीत हो जाता है। समाज में वह एकाकी रह जाता है। जहाँ आजस्ल की परिस्थिति में समाज, राष्ट्र और दश अपनी मामूहिक सघसगठन शक्ति द्वारा सारे राष्ट्र को उन्नति के उच्च शिखर पर चढ़ाने का मतत प्रयत्न कर रहा है और उसमें कुछ सफल भी होता जा रहा है। वहाँ समाजमिन एकाफी पुरुष किस तरह अपना व्यक्तिगत, या सामूहिक राष्ट्र कल्याण करने की क्षमता रख सस्ता है ?, विमिन्नमत एव मदति से मनुष्य निस्मन्दह अपना महान् अहित करना हुआ स्व पर क विश्वामघात करता है। ऐसे अभिमानी व्यक्ति को कितन ही ममझाया जाय पर उसका मत्पथ आरूढ़ होना दुष्क ही है । उसको अपना दम्मपथ ही अच्छा लगता है। यति. कोई शान्ति और विनय के माध कुछ शिक्षा भी देगा तो वह निर्दोष व्यक्ति पर बिगड़े पिना नहीं रहगा-उलटा उसको परेशानी में डालने का प्रयत्न करेगा । ऐसे मदमत्त प्राणि को सामान्य मनुष्य तो क्या दिग्गज विद्वान भी नहीं समझा सक्ते । नीतिकारोंने लिखा है कि अज्ञा सुग्वमाराध्य , सुग्वतरमाराध्यते विशेषज्ञः। ज्ञानरवदुर्विदग्ध, ब्रमापि त नर न रजयति ॥ १ ॥ -अपठित मूर्ख और अधिक बुद्धिमान को सहज में (३७) प्रसन्न किया जा सकता है, परन्तु अर्धदग्ध (थोडे ज्ञानवाले) अमिमानी पुरुष को ब्रह्मा भी प्रसन्न नहीं कर सकता। समार में तीन तरह के मनुष्य हैं-अज्ञ, सुज्ञ और अल्पज्ञ । जो अपने मले बुरे का ज्ञान नहीं रखते और जिन्हें कुछ भी ज्ञान नहीं है, उन अज्ञों को ममझाना कोई कठिन नहीं है । वे समझाने पर जल्दी समझ कर बात को मजूर कर लेते हैं । युक्त, अयुक्त, उचित, अनुचित और सद, असत् को भलीभाँति समझनेवाले सुज्ञों को समझाना कठिन नहीं । परन्तु जो लोग न पूरे विद्वान् हैं और न निरे मूर्ख, स्वल्पज्ञान से ही अपने को महाज्ञानी मानते हैं ऐसे अल्पज्ञ अमिमानियों को मनुष्य क्या ब्रह्मा, या सर्पन भी नहीं समझा सकता । अल्पज्ञ लोग धमड के कारण किसी बात को न जानने पर भी किसीसे पूछते नहीं है, अतः उनकी उन्नति नहीं होती, व ऐंठ में ही अपने को परवाद कर बैठते हैं, परन्तु वे मानव जीवन को सफल नहीं कर पाते। करिवाक्य है कि- फूले फले न येत, यदपि सुधा बरसहिं जलद । मूरग्ब हृदय न चेत, जो गुरु मिले विरचि सम ॥१॥ पिगर्यो होय फुसग जिदि, कौन सके समुझाय । लसन पसाये वसन को, कैसे सके यसाय ॥२॥ ठीक ही है कि कुत्ते की पूछ को यदि बारह वर्ष तक - (१८) तेल में डाल दी जाय, पर उसकी पता नहीं मिटती-बह सीधी नहीं होती। यही दशा मदमत्त पुरुषों की है। साधारण घान मिला, या निपुणता मिली कि अमिमानी अपने को अद्वितीय मान बैठता है । लाम्ब तरह से ममझाने पर भी वह अपनी वक्रता(ठ) को नहीं छोड़ता। आजकल के वायु मण्डल में यह हया अधिक रूप से पाई जाती है। इमा धग इतना विस्तृत हो चला है कि इस दुष्परिणाम, या अभिशाप स्वरूप सधे निरभिमानी एप माधुनिवाले मनुष्यों पर भी लोग दम्मात्मक सन्दह के बादल दाये बिना नहीं रहते और निरभिमानी व्यक्ति को अहम्मानी समझने लगते हैं। कहावत भी है कि सूखे शामिल आला मी जलता है। मभी मनुष्य दम्मता में घिर तुप नहीं होने और जो दम्भी है व कमी छिपे नहीं रहते । कुछ भी हो, अन्तत अभिमान- अइशार मानवजीवन को नष्ट-भष्ट करनेवाला दुरुह विपैला नाग है-निमके द्वारा डमा हुआ मानव अपने अमूल्य जीवन से हाथ धो बैठता है। अमिमान के नशे में घर हुए अमिमानी को सत् , अमत् , उचित , अनुचित, धर्म, अधर्म, कर्तव्य और अकर्तव्य का लेशमात्र ध्यान नहीं रहता । यही अभिमान के अनौचित्य का अक्षुण्ण प्रमाष है। इसके प्रभाव में घिरा हुआ मनुष्प मभी क्रियात्मक धार्मिक कृत्यों से सर्वथा वन्चित रहता है और दुर्गति का पान बनता है । मदान्ध मनुष्य अहिंसा आदि -- - - ( ३९) धर्मों को समुचित परिपालन करता हुआ मी उसका.वास्त विक फल नहीं पा सकता । वह मदमत्त गज की तरह विध का भला नहीं कर सकता और अपना अहित ही करता है। कहा मी है कि- शमालान भान् विमलमतिनाडि विघटयन् किरन दुर्वापासूत्करमगणयन्नागमणिम् । भ्रमन्नुयाँ स्वैर विनयनयतीथि विदलयन्, जन' क नानार्थ जनयति मदान्धो द्विप इव ।। १॥ --मदान्ध पुरुप मदोन्मत्त हाथी की तरह शान्ति रूपी स्तम्म को तोड़ कर, निर्मल बुद्धि रूपी रम्मी के टुकड़े कर, दुर्वचन रूपी धूल उड़ाता है और शास्त्र रूपी अकृश को न मान कर पृथ्वी पर स्वच्छन्द हो न्याय रूपी मार्ग को उजड़ करता हुआ किस अनर्थ को पैदा नहीं करता है । इमसे सिद्ध है कि अभिमान मर्व अनों की खान है। कपिने क्या अच्छा कहा है कि- तनिक ज्ञान को प्राप्त कर, जो करता अभिमान । घि जीवन धिक जान है, उसका श्वान समान ॥१॥ धर्म पालने, या धर्मकार्य करनेवाले पुरुषों को अहङ्कार से सर्वथा अलग रहना चाहिय । अमिमान रहित मनुष्य सद्धर्मानुयायी कहलाने क अधिकारी हैं । जब तक मनुष्य तेल में डाल दी जाय, पर उसकी पता नहीं मिटती-यह सीधी नहीं होती। यही दशा मदमय पुरुषों की है। साधारण शान मिला, या निपुणता मिली कि अभिमानी अपन को अद्वितीय मान बैठता है। लाग्य तरह से ममझाने पर भी वह अपनी किता(हठ) को नहीं छोड़ता। आजकल के वायु मण्डल में यह हवा अधिक रूप स पाई जाती है। इसका वेग इतना विस्तृत हो चला है कि इसक दुष्परिणाम, या अमि शाप स्वरूप मचे निरभिमानी एच माधुवृत्तिवाले मनुष्यों पर भी लोग दम्मात्मक मन्दह के पादल दाये पिना नहीं रहते और निरभिमानी व्यक्ति को अहम्मानी समझने लगते हैं। कहारत भी है कि सुसे शामिल आला मी जलता है। सभी मनुष्य दम्मता में घिर हुए नहीं होते और जो दम्भी है व कमी छिप नहीं रहत । कुछ भी हो, अन्तत• अमिमान- अहकार मानवजीवन को नष्ट-भ्रष्ट करनेवाला दुरुह पिला नाग है-जिमक द्वारा डमा हुआ माना अपने अमूल्य जीवन से हाथ धा पेठता है। अमिमान क नशे में चर हुए अभिमानी को मन, अमन , उचित, अनुचित, धर्म, अधर्म, कर्तव्य और अकर्तव्य का लेशमात्र ध्यान नहीं रहता । यही अभिमान के अनौचित्य का अक्षुण्ण प्रभाव है। इसके प्रभाव में घिरा हुआ मनुष्य सभी क्रियात्मक धार्मिक कृत्यों से सर्वथा पञ्चित रहता है और दुर्गति का पात्र बनता है। मदान्ध मनुष्य अहिंसा आदि - धर्मों को समुचित परिपालन करता हुआ मी उमका वास्त. विक फल नहीं पा सकता । वह मदमत्त गज की तरह विश्व का मला नहीं कर सकता और अपना अहित ही करता है। कहा भी है कि- शमालान मञ्जन् विमलमतिनाडि विघटयन् किरन दुर्वापासूत्करमगणयन्नागमणिम् । भ्रमन्नुयाँ स्वैर विनयनयतीथि विदलयन् , जन. क नानार्थ जनयति मदान्धो द्विप इव? ॥१॥ -मदान्ध पुरुष मदोन्मत्त हाथी की तरह शान्ति रूपी स्तम्भ को तोड़ कर, निर्मल बुद्धि रूपी रस्मी के टुकड़े कर, दुर्वचन रूपी धूल उड़ाता है और शास्त्र रूपी अंकुश को न मान कर पृथ्वी पर स्वच्छन्द हो न्याय रूपी मार्ग को उजड़ करता हुआ किम अनर्थ को पैदा नहीं करता है। इससे सिद्ध है कि अभिमान मर्म अनर्थों की खान है । कविने क्या अच्छा कहा है कि- तनिक ज्ञान को प्राप्त कर, जो करता अभिमान । धिक् जीवन धिम् ज्ञान है, उसका श्वान समान ॥१॥ धर्म पालने, या धर्मकार्य करनेवाले पुरुषों को अहङ्कार से सर्वथा अलग रहना चाहिय । अमिमान रहित मनुष्य सद्धर्मानुयायी कहलाने के अधिकारी हैं । जब तक मनुष्य (४०) अपने रदय में मद, माया, मोह आदि दुर्गुणों को रहने दता है तब तक वह धर्म को जान नहीं सकता । उसे धर्मवस्तु मिल नहीं मकती। क्यों कि- मद-माया-परित्यागी, लोभमोहविनाशकः । असामी क्रोधहीनश्च, धर्ममाप्नोति मानर ॥१॥ -जो पुरुप अहङ्कार, माया, लोम, मोह, काम, तथा क्रोध इन अन्तरङ्ग शत्रुओं से मर्वथा अलग है, वही धर्म को प्राप्त कर मकता है। आज संसार में कई मनुष्य ऐसे हैं जो सद्धर्म कर्म- सपन्न पश में उत्पन होकर भी अमिमान और कुसमादि दुर्गुणों के वश हो, विधर्मी होत हुए दृष्टिगोचर हो रहे हैं। वे इन्दी के कारण अपनी सैद्धान्तिक एर धार्मिक मर्यादा पर लेशमात्र ध्यान न दते हुए आत्मानुकूल अकृत्य करते नहीं लजाते । चाहे उस अनौचित्यमय अकृत्य का भविष्य में अपने ऊपर, या अपने उच्च वश पर आपत्ति मी आ पड़े, फिर भी वे विधर्मी मदान्ध उस पर कुछ ध्यान नहीं दने । इमसे सहज पता लग सस्ता है कि अभिमान कितना त्याज्य एव निन्दनीय है । अपना हित चाहनेवालों को, विशेषतः मोक्षपथ के गहियों को इस दुपिय से सदा अलग रहना चाहिय । प्रत्येक मनुष्य को निरमिमानी होने की परमावश्यकता है, क्यों कि अभिमान अध पतन की प्रथम

।
(४१)
सीढी है। चाहे मनुष्य कितना ही पढ़ा लिखा विद्वान् ,
धनवान, वैज्ञानिक, तपस्वी और यशस्वी क्यों न हो, किन्तु
अमिमानिता के कारण उसे गिरते देर नहीं लगेगी। विश्व
में आज ऐसा कौन प्राणि है जो मदान्धता से नीचे न गिरा
हो । मनुष्य की तो क्या गणना, बड़े बड़े चक्रवर्ती और
शासनसम्राट् मी इस गर्हणीय अभिमान के कारण अपनी
शासनसचा से सर्वदा के लिये हाथ धो बैठे हैं। लकाधि
पति रावण, युद्धवीर दुर्योधन, हिरण्यकशिपु, शिशुपाल, पलि
आदि महाप्रतापी राजाओं को भी इसी अभिमानने मिटिया
मेट कर डाला जिनके पीछे नामनिशान मी नहीं रहा ।
धर्म का गूढतत्व निवना निरमिमानिता में छिपा
हुआ है उतना किमी में नहीं। मनुष्य इसीके आधार पर
अपने को एक सच्चा धर्मात्मा बना सकता है। निरभिमानी
होना साधुता एव मानवता की खरी कसौटी है। विनयशील
एव मदहीन वही मनुष्य हो सकता है जो अपने आपको
मुक्तिपथ की ओर पहुंचाना चाहता है। द्रव्याधिक्य एष विद्वत्ता
कुलीनता और पशस्विता के घोतक नहीं है, इनकी
घोतकता तो एक निरमिमानिता ही है। निरमिमानी पुरुष
समाज, राष्ट्र और सब में कुलीन, यशस्वी एव जातिवान्
माना जाता है। मदहीन मनुष्य नम्र होता है और वह
अपनी नम्रता से मप को आकृष्ट करता है। कहा भी है कि-

नमे सो आया आमली, नमे मो दाडिम दाम। आफ पिचारा क्या नमे, जिसकी ओछी जात ॥१॥ -~~डालियों में फल लगने से आम, इमली, अनार, दाख आदि पक्ष नीचे झुक जाते हैं, परन्तु पामर एव ओछी जातिवाला आक कभी नहीं नमता । वह तो नीचा नमना नहीं जानता, टूट कर पढ़ना ही जानता है। जो मनुष्य प्रारम्भ से ही उच्च जातीय एव मत्तुलीन निरमिमानी होत हैं, उनमें सामारिक नमता और विनय शीलता विद्यमान रहती है । अकुलीन दु प्रकृतिक मनुष्यों में व गुण नहीं होते। वे तो कलदित नरकीट हैं जो म्वपर फो केवल दु खोत्पादक होत है। ऐसे नरफीट जहाँ जाते है वहाँ अपनी क्षुद्रता की छाप लगाये बिना नहीं रहते। समाज के सामन अपनी क्षुद्र अधमता का पूरा परिचय दे डालते हैं-जिमसे चे मय जगह अनादर दृष्टि से दसे जात हैं । फिर मी वे अपनी दुष्टप्रकृति को नहीं छोड़ने । वस्तुत उन मनुष्यों का जीवन घिकार के लायक है जो अभिमानी बन कर अपन आपको बड़ा ममझत हैं। उनका सिर मदा अपमान की चोटें ही महता रहता है, . किसी काम में सफल मनोरथ नहीं होते। धारानगरी क शामक राजा भोज विद्वानों की कदर में मारे ससार में म्याति प्राप्त कर चुकथ। उनका - ध्येय था कि कोई भी विद्वान राज-द्वार से निराश हो कर न जावे । इसलिये कई विन अपनी अपनी कृतियों से राजा की प्रशसा करके खूप द्रव्य प्राप्त करते थे। एक दिन राजा मोज समा में विराजमान थे। उनके चारों ओर विद्वान मण्डली सुशोमित थी। ममा में एक पण्डित अपने को विद्वान् मानता हुआ आ कर कहने लगा कि राजन् ! आपने का विद्वानों के सारगर्मित काव्य सुने होंगे, परन्तु आज मेरा भी एक दोहा जिममें पदरचना का चमत्कार और विद्वत्ता कूट कूट कर भरी है । सुनिये- मर्द तो है मूल याका, नैन याँकी गोरियाँ । गाय तो है सीग पॉकी, रग वॉकी घोरियाँ ॥१॥ -~-मर्द वही है जिसकी मूछ बाँकी हो, स्त्रियां वही हैं जिनके नेत्र बाँफ हों, गाय वही है जिमक सींग वॉक हों और घोड़ी वही है जिमका रग वॉका (मनोहर) हो । दोहा को सुन कर सारी ममा अवाकसी हो गई। परस्पर उसक लिये सभा में विचार विनिमय होने लगा। इतने में किमी गडरियने समा में आ कर कहा कि महाराज ! पण्डितजीने जो दोहा कहा है वह ठीक नहीं है- उसका मार्मिक भाव कुछ अच्छा नहीं है। इमलिये- यह पडित घड़ा अनाड़ी, इसके मारु ग्वींच कुल्हाडी। इसने सारीसमा पिगाडी,मुख से झूठी यातां कादी॥१॥ - (४२) नमे सो आबा आमली, नमे सो दाडिम दाम्व । आफ विचारा क्या नमे, जिसकी ओछी जात ॥१॥ -डालियों में फल लगने से आम, इमली, अनार, दाख आदि वृक्ष नीचे झुक जाते हैं, परन्तु पामर एव ओछी जातिगाला आक कमी नहीं नमता । वह तो नीचा नमना नहीं जानता, टूट कर पढ़ना ही जानता है। जो मनुष्य प्रारम्म से ही उच्च जातीय एव सत्कुलीन निरभिमानी होते हैं, उनमें स्वामाविक नम्रता और विनय शीलता विद्यमान रहती है । अकुलीन दुष्ट प्रकृतिक मनुष्यों में 4 गुण नहीं होते। व तो कलङ्गित नरकीट हैं जो स्वपर को केवल दुखोत्पादक होत हैं । ऐसे नरकीट जहाँ जाते हैं वहाँ अपनी क्षुद्रता की छाप लगाये बिना नहीं रहते । समाज के मामने अपनी क्षुद्र अधमता का पूरा परिचय द डालते हैं-निगसे ये मय जगह अनादर दृष्टि से देखे जात हैं। फिर भी वे अपनी दुष्टप्रकृति को नहीं छोड़ते । वस्तुत उन मनुष्यों का जीवन विकार के लायक है जो अभिमानी बन कर अपने आपको बड़ा समझते हैं। उनका सिर मदा अपमान की चोटें ही महता रहता है, . किमी काम में मफल मनोरथ नहीं होते। धारानगरी क शामक राजा भोज विद्वानों की कदर मे सार संसार में ख्याति प्राप्त कर चुक थे। उनका -

ध्येय था कि कोई भी विद्वान् राज-द्वार से निराश हो कर
न जावे । इसलिये कई विज्ञ अपनी अपनी कृतियों से राजा
की प्रशमा करके खूब द्रव्य प्राप्त करते थे। एक दिन राजा
मोज सभा में विराजमान थे। उनके चारों ओर विद्वान्
मण्डली सुशोमित थी। ममा में एक पण्डित अपने को
विद्वान् मानता हुआ आ कर कहने लगा कि राजन् ! आपने
कई विद्वानों के सारगर्भित काव्य सुने होंगे, परन्तु आज
मेरा भी एक दोहा जिसमें पदरचना का चमत्कार और
विद्वचा कूट कूट कर मरी है । सुनिये-
मर्द तो है मूछ याँका, नैन थॉकी गोरिया ।
गाय तो है सींग घॉकी, रग यॉकी घोरियाँ ॥१॥
-~मर्द वही है जिमकी मूछ बाँकी हो, स्त्रियाँ वही हैं
जिनके नेत्र नॉक हो, गाय वही है जिसके सींग यांक हों
और घोड़ी यही है जिमका रग घाँका (मनोहर) हो ।
दोहा को सुन कर सारी ममा अवाकमी हो गई।
परम्पर उमक लिये सभा में विचार विनिमय होने लगा।
इतने में किसी गडरियेने ममा में आ कर कहा कि
महाराज ! पण्डितजीने जो दोहा कहा है वह ठीक नहीं है-
उमका मार्मिक माव कुछ अच्छा नहीं है । इमलिये-
यह पडित पढ़ा अनादी, इसके मारु ग्वींच फुल्हाडी।
इसने सारीसभा यिगाडी,मुख से झूठी पातांकादी॥१॥

(४४) यह पण्डित नहीं, निरा मूर्ख है । ऐसे अमिमानी का मुख बन्द कर देना अच्छा है। विद्वानों की ममा में जो मदमत्त अमत्य पाते कहते नहीं लगाता उसे मनुष्य नहीं, जगली रोझ कहना चाहिये । आप मोचिये कि किमीकी मूंछे तो बाँकी हैं पर उनम वीरता नहीं तो वे मर्द किम काम के ? वह तो पशु से भी गया पीता है। किमी स्त्री की आँखे तिरछी सुन्दरतम हे पर वह धरित्र एव पदचलन है वो उसकी वे सुन्दर आँखे निकम्मी हैं। गाय क मींग बॉके अच्छे हैं पर वह द्ध नहीं दती हो तो उसका अच्छापन किम काम का?, निकम्मा है। इसी तरह घोड़ी कारग अच्छा है पर उसरी चाल वेढव है तो वह घोड़ी किम काम की । वास्तव में दोहा हम ढग का होना चाहिये कि- मर्द तो रण-शूर घॉका, शील पाँकी गोरियाँ। गाय तो है दूध याँकी, चाल पॉकी घोरिया ॥१॥ -मर्ट मनुष्य वही है जो युद्ध के समय अपनी शूरवीरता से शत्रुओं के छक्के छुड़ा देता है। स्त्रियाँ वही सुन्दर हैं जो अपनी सुशील सुगधी से मारे विश्व को सुवामित कर दती हैं। गाय वही अच्छी हैं जो दूध दकर अपने पालक को सन्तुष्ट रसती हैं और घोड़ी वही प्रशमनीय है जो चाल में अच्छी होती है। गडरिये का मार गर्मित माषण सुन कर समा और (४५) राजा बहुत प्रमभ हुआ। वह मदमत्त पण्डित सारी समा के सामने लजित हुआ। राजा मोजने मानी पडित की अपेक्षा गडरिये को भारी सन्मान और पारितोषिक दिया। इस दृष्टान्त का मार यही है कि पण्डित अमिमान के कारण राजसमा में अपमान पाया और गडरिया निरमिमानिता से सन्मान पाया, अत' अमिमान करना अच्छा नहीं। आज समार में जितने महापुरुष दृष्टिगोचर हैं वे सर इसी निर- मिमान गुण के कारण पूज्य माने जा रहे हैं। अमिमानी मनुष्य अपनी वर्तमान अवस्था में चाहे सुखी हो, परन्तु उमका भविष्य काल बहुत बुरी तरह बिगड़ता है । जिप्स प्रकार में म करनवाले कर का गला काटा जाता है और मैंना कहने पर भी मैना पक्षी का पड़े प्रेम से लोगों के द्वारा पालन किया जाता है। उसी प्रकार अमिमानी व्यक्ति का पकरे क ममान हाल होता है और निरभिमानी व्यक्ति का मैना पक्षी क ममान मर्वत्र,मन्मान होता है। कहा है कि- सय से ऊँचा मान आपको मानी करता काम जभी। तय उसका प्रत्येक स्थान पर करते हैं अपमान सभी। धर्म कर्म और फुल-मर्यादा डाल कुए में फिरता है। अवनति के गम्भीर गर्त में अभिमानी नित गिरता है। वस्तुत अभिमानी मदमरे नशे में मत हो प्रथम अपने को सबसे बड़ा ममझ कर हरएक कार्य को करने - (४८) के सपर्क में रखें जिमसे वे भविष्य में अच्छे सस्कारवाले हों। इस प्रकार पचपन से सुसस्कृत पालक पड़ा होने पर सपर को पापों से पचा कर सुधारने में समर्थ हो सकता है। समार में प्राणिमान को चक्र के समान भ्रमण कराने वाले पापकर्म ही हैं । जब तक जन्म जन्मान्तरों क किये हुए पापकर्मों से जीवारमा छुटकारा न पा जाय, तर तक वह परमात्मा के रूप में परिणत नहीं हो सकता। यदि आत्मा सुसस्कारी मन फर पापकर्म न करे तो उसकी नैया बहुत जल्दी पार लगेगी और वह सिद्ध, युद्ध पन सकता है। पाप-पथ की ओर झुकानेवाले समार में काम क्रोधादि विषम विषय हैं, इनका विजय कर लने से जीवों को मुक्तिपथ मिलना कठिन नहीं है। कहा है कि- यदि शिवनगरयियासा, भवे जिहासा च वो भवेद् भव्याः। तदमी विषमा विपया , किंपाकफलोपमास्त्याज्या: ॥१॥ इम मदुपदेश का पूर्णतया परिपालन कर पापाचर्द्धक विषय प्रत्येक प्राणी को अपनी आत्मा से अलग कर देना चाहिये, क्योंकि पवित्रात्मा को अपवित्र पनानेवाले यही महादोष है। मेदोपमेद मे पापजनक कार्यों की कोई सरूपा नहीं है, परन्तु मुख्य पापकार्य अठारह प्रकार के हैं जिनमें (४१) से प्राणी किमी एक का आचरण करने से पाप का भागी दार बनता है। नित्यप्रति की जानेवाली प्रतिक्रमण क्रिया में अष्टादश पापस्थानकों की आलोचना की जाती है। आजकल की परिस्थिति कुछ ऐसी है कि लोग केरल इनकी नाम रटना कर लेना जानते हैं, पर उनका परित्याग करना नहीं जानते । माधु मुनिराजों के लिये तो इनका परित्याग करना आवश्यकीय है ही। परन्तु मामारिक बन्धनों से बद्ध गृहस्थियों को भी इनका यथावत् त्याग करना उतना ही आवश्यक है जितना कि मुनिराजों के लिये है। मुनि इनसे सर्वत अलग रहत है, तो गृहस्थ दशत । पहिला पाप म्यानक प्राणातिपात है। इसका अर्थ यह है कि एकेन्द्रिय से पञ्चेन्द्रिय तक प्राणियों के प्राण अप- हरण करना । दूसरा मृपाराद बोलना है, तीसरा अदत्तारान-विना इजाजत के फिमीकी वस्तु को उठा लेना, चोथा मैथुन, पाचवाँ परिग्रह, छट्ठा क्रोध, सातवाँ मान-अभिमान, आठवौं माया-दम्म, कपट, नौमाँ लोम, दशयों राग-प्रिय वस्तु पर स्नह रग्वना, ग्यारहनों द्वेष- अप्रिय वस्तु पर अप्रसन्नता प्रगट करना, पारहमा कलह- परस्पर लड़ना झगड़ना, रहवाँ अभ्याख्यान-किमी पर दोपारोपण करना।चौदहमा पैशुन्य-फिसीकी चुगली खाना। पन्द्रहवाँ परापपाद-मरों की निन्दा करना । सोलहवाँ रति-

अरति-यनुचित कार्यों म प्रमन्नता और उचित कार्यों में
अप्रसन्नता प्रगट करना । मतरहयां मायामृपाराद-दम्मयुक्त
झूठ बोलना और अठारहवाँ मिथ्यात्य-मत्य को अमत्य,
अमत्य को सत्य, सुदेष को कुदय, फुटव को सुदव, सुगुरु
को कुगुरु, गुरु को सुगुरु और सुधर्म को अधर्म, अधर्म को
सुधर्म समझना। इन पापम्थानकों क सेवन करने से आत्मा
मलिन और पापमय होती है। आत्मा और परमात्मा की
विभिन्नता इन्हीं क कारण स्वरूप है। इन पापों से आत्मा
माया नगरी क चारों ओर चकर काटती हुइ जन्म जन्मा
न्तरों तक कर पाती रहती है।
'विश्वस्य द्विविधा गति' समार की गति दो
प्रकार की है-समार का कुछ अश पुण्यपथ की ओर प्रवृत्त
होकर अपनी आत्मा को सदा के लिय परम पवित्र
मुक्तिगामिनी बना रहा है। मरी ओर समार का एक
अंश पाप पथ की ओर प्रवृत्त होकर अपनी आत्मा को
हमेशा के लिये गन्दी तथा विषयगामिनी पना रहा है।
एक ओर मनुष्प सुग्व, ममृद्धि और ऐश्वर्य को पा कर
सुख का आनन्द मनाते हैं और दूसरी ओर मनुष्य
दुःख और आपत्तियों के शिकार होकर अपनी आत्मा
को अधोगति क गर्त में गिरात रहते हैं। एक तरफ सुख,
एक तरफ दुख, एक तरफ धनी, एक तरफ निर्धनी,
एक तरफ प्रेम, एक तरफ द्वेष-कलह, ये समार के चलते

(५१) फिरते चक्र है । एक ओर समता और एक ओर विषमता का साम्राज्प है जो प्राणीमात्र को लालायित करता रहता है। विश्व की इम विस्तृत अटवी में अगणित प्राणी अपने अपने सस्कारों का फल प्राप्त करक विविध गतियों में विवरण करते हैं । अपने पुण्यवर्धक सुसस्मरों क प्रभाव से कोई मरस, सौरम समन्वित राज-प्रामादों क सुखसागर में गोवा खाते हैं, तो कोई हतभाग्य अपने पापवर्धक सस्कारों क प्रमाव से दुर्गन्धमय, भग्नावशेष खण्डहरों म रह कर अपन प्राणों को किसा अज्ञात लोक में पहुँचात हैं। मासारिक गतिविधि का सरूप जानने के लिय नीचे का पद्य हृदय ङ्गम कर लेना अच्छा है- सर्ज दुनिया रग विरगी माया- दुनिया है दो रगी घाया, दुनिया है दो रगी। टेर । पुण्य पाप दो पहियों से यह, जीवन रथ नित चलता। ऊची नीची समतल भू में, कभी न किससे टलता। चला चला कर चतुर हुआ है, चाहक इसका जगी। याया दुनिया है दो रगी, दुनिया है दो रगी॥१॥ ऐश और आराम भवन में, एक चैन से सोता। फटे ग्वडहरों में दूजा, बिलय बिलप दिन गोता ।। दुनिया की यह बहुत पुरानी, चाल हुई बेढगी। पाया दुनिया है दो रगी, दुनिया है दो रगी ॥२॥ - पत्थर ही को देखो हक तो, देवमूर्ति पन पूज्य यना।। अगणित ठोकर ग्वाकर दूजा,दलित पतित का रूप पना उच्चवर्ण मे मान्य हुआ इक, अधम हुआ इक भगी। पापा दुनिया है दो रगी, दुनिया है दो रंगी ॥३॥ मानव चेत जगत में अप तु, शुभमय पुण्य कमा ले। सुकृत सुफल से सुरपुर मैतू, सुखमय स्थान पनाले । सूरियतीन्द्र जगत में अपना, पोई न साथी सगी । पापा दुनिया है दो रगी, दुनिया है दो रगी ॥ ४ ॥ मामारिक गतिविधि उम विलक्षण पदार्थ के ममान है जिमका आदि और अन्त का पता साधारण मतिवाले मनुष्य नहीं लगा सस्ते । वे माना अपनी असस्कत अल्प. ज्ञता के कारण उम द्विविध गति के फन्द म फंस कर अन्य चस्थित एव अनियमित गति से परिम्रमण करते रहते हैं। वे अपने जीवन म अस्थिर सस्कारों की नींव इतनी मुहद पना लेते है कि जन्म जन्मान्तरों तक विभिन्न योनियों में प्रवेश कर ऐहिक भव के चारों ओर चकर लगाते रहते हैं। न घे उसकी अन्तिम सीमा तक पहुच पाते हैं और न घे अपनी अल्प धमता का परिणाम स्वरूप ऐसा करन म प्रयत्नशील होते, है। वस्तुतः उनका जीवन ससार म अन्धकार मय व्यतीता होता है। वे सद, असत् , उचितानुचित को न समझ कर ससार के कार्यक्षन,में उतर कर भी सफल मनोरथ नहीं होते।

जिसके हाथ में ज्ञानदीपक नहीं है और जिसके अन्तर्चक्षु खुले नहीं है, उसके सामने यदि सूर्य भी अपनी किरणों से हजार चार प्रकाश करे, फिर भी वह व्यर्थ है। दिवाकर की आलोकमपी कोटि फिरणे मी अल्पज्ञ, अज्ञानी मनुष्प को प्रथम दर्शन करने में यश्चितमा अनुभर करती हैं। यह उम अज्ञानी एव अल्पज्ञ मानवाघम के लिय कितनी हीनता की बात है ? । किसी कपिने कहा है कि-- जो मनुज ज्ञानाभरण से हैं, हीन इस ससार में। घे हीन होते हैं सदा सत्, असत् के सुविचार में ।। कर्तव्य और अकृत्य का चे, ध्यान रखते है नहीं। दुष्प्राप्य मानव जन्म का, ये उपयोग करते हैं नहीं ॥१॥ अनुचित उचित की पूर्णतम, सुविवेचना करते नहीं। संसार की गति भी कभी, पहुचान सकते है नहीं। अन्याय असदाचार वश, रह पुण्य से पचित मदा। नश्वर जगत को अजजन,हामानतेस्थायी मैदा ॥२॥ अज्ञानी पापी प्राणी अपने जीवन को पशुओं ममी अधिक मात्रा में मारमय व्यतीत करता है। कामनानीय न्याय की तरह किसी दिन यह भूले मटके पपच्या पात्र 'के ममान पुण्यपथ की ओर प्रवृत्त हो जाता है, पर मरे ही क्षण वह माग्यहीन अपनी वासनाओं के शाप परम पवित्र पुण्यपथ से भ्रष्ट होकर पापमार्ग की ओर बढ़ जाता है। शास्त्रकारों न कहा है कि- अजो ज्ञानप्रकाशन, बीनोऽन्यो जगतीतले । सन्मार्ग घे परित्यज्य, अशुभे पधि गाति ॥ १ ॥ -ज्ञानरूपी प्रकाश से रहित अज्ञानी-पापबुद्धि मनुष्य अन्धे क ममान इम समार म पुण्य दायक मन्मार्ग को छोड़ कर पापर्ध अनुचित मार्ग म चला जाता है। अज्ञानी प्राणी अपनी अज्ञता या पापप्रकति के कारण पुण्यप्रदायिनी मत् क्रियाओं से वचित रह कर पाएपथ की ओर प्रवृत्त होता हुआ पातकी रहलाता है । यह सूक्ति ठीक चरितार्थ होती है कि-' अज्ञान पापकारणम्' पाप का कारण अज्ञान यान पापरामना है। इसीलिय प्रत्येक प्राणी पो पापकर्म से बचने के लिये ज्ञानवान् हो कर पापरति से पराङ्मुख रहन की आवश्यकता है। ज्ञानालोकम आलोकित होर माना अपनी मलियाओं के द्वारा निष्कर्म बन कर मोक्षपद प्राप्त करता है। मोक्षगामी बनने क लिये आत्मा को मर्व प्रथम नान की आवश्यकता रहती है। ज्ञान के मिना कोई गाणी श्रद्धा, त्याग, तप, जप आदिमकमी की ओर प्रवृत्त नहीं हो सकता। फिर कोई भी अज्ञानी मानन कदाचित् पथभ्रान्त की तरह इस क्षेत्र में उतर पड़ता है, तो वह मोक्षपद से पचित ही रहता है। क्योंकि वे ( ५५) छानान्न मुक्ति.' यह श्रुति ज्ञान के विना मुक्ति मिलने का निषेध करती है । ज्ञान मानता की सच्ची कसौटी है। इस कसौटी के द्वारा मनुष्य के मनुष्यत्व की यथार्थ परीक्षा होती है। जिस प्रकार सुवर्ण की परीक्षा घिमने, काटन आदि से होती है, उसी प्रकार माना की परीक्षा ज्ञान रूपी कमौटी से होती है । नीतिकार कहते हैं कि- यथा चतुर्भि' फनक परीक्ष्यते, निर्पणच्छेदनतापताडनै । तथा चतुर्भि पुस्प परीक्ष्यते, ज्ञानेन शीलेन कुलेन कर्मणा ॥ १ ॥ -जिम प्रकार घिमने, काटने, तपान और पीटने से सुवर्ण की परीक्षा की जाती है, उसी प्रकार ज्ञान, शील, कुल और कार्य से मनुष्य की परीक्षा की जाती है । सारांश यह है कि-आत्मा को पाप रहित करन क लिने अथवा पाप पन्धन स मुक्त कराने के लिय ज्ञान सर्वश्रेष्ठ, उपादय एष मुक्तिप्रद है । ज्ञान का अध्ययन, अरगाहन, समनन एव परिशीलन करने से आत्मा निस्मन्दह पापोन्मुक्त होकर परम पारनी पुण्य-प्रमा से प्रभावित हो उठती है। अनन्त पापकों से लिप्त होने के कारण आत्मा मत्र सागर के गहर गड्ढे म गोते खाती रहती है। निम प्रसार तुम्बिका पर मिट्टी का लेप लगा रहता है त्यो त्यों वह जल में अधिक इयती जाती है, पर जय वह लेप शनैः शनै अलग होता है, तब वह जल के ऊपर आती जाती है। उमी प्रकार जब आत्मा पर पापकर्म का पन्ध रहता है वह मरसागर में इयती जाती है और आत्मा पापों के पन्धन से उन्मुक्त हो जाय तो यह भवमागर को पार कर शीघ्र मोक्षपद प्राप्त कर लेती है । जो आत्मा प्राणातिपातादि पापों के सुदृढ़ बन्धन में जकड़ी रहती है यह जब तक अपने पापयन्यनों को न तोड़ दे, या नान, शील आदि से उनका मथा नाश न कर दे, तब तक वह मोक्षपद की अधिकारिणी नहीं हो सकती। पापकों का मनाश करन का अमोघ शस्त्र मम्यक्-ज्ञान, सम्यग्दर्शन और मम्यक् चारित्र के सिवाय दूसरा कोई नहीं है। इन्हीं तीनों सजीवन पदार्थों के सहार आत्मा परम पायन बनता है । कहा भी है कि-- मूसी पावक सोहगी, फूकन तणो उपाय | इन चारों के मिलत ज्यों, मैल कनक को जाय ॥१॥ स्यों श्रद्धा सद्-ज्ञान औ, त्याग तपस्या भाई। इन चारों के मिलत ही, मैल आत्मा को जाई ||२|| -मूसी, अग्नि, मोहगी और फूंकने वाला इन चारों के मिलने पर सोन का मैल दूर होता है और वह चमकने

(५७)
लगता है। इसी प्रकार ज्ञान, श्रद्धा, त्याग और तप इन
चारों के समाराधन से आत्मा के पापकर्म रूपी मैल हट
जाते हैं और वह निष्कलङ्क, निष्पाप और परमपवित्र होकर
चन्द्रप्रमा के समान मर्वन चमक उठता है। पाप बन्धनों
से उन्मुक्त आत्मा को परमात्म पद प्राप्त करने में किञ्चिन्मात्र
मी पिलम्ब नहीं होता। सौमाग्यवश मानवजीवन मिल जाने
पर भी जो सत्कृत्य की ओर अपना लक्ष्य नहीं रखता तो
उससे बढ़ कर फिर समार मे अभागा कौन कहा जा सकता
है १ ससार में प्राणीमात्र का परम कर्तव्य है कि पाप और
तअन्प आमोद-प्रमोद में न फंस कर पुण्यसचय करने का
यथाशक्य प्रयत्न कर । पुण्यहीन मनुष्य पापवृत्तियों के
कारण शूकर, कूकर, कीट, पतङ्ग आदि अधम योनियों में
मटकता हुआ अपने आपका अध पतन करता है, यह उसके
लिये कितनी ला जनक बात है। समार में परलोक
जाते समय प्राणी का कोइ साथी नहीं है । जो कुछ पुण्य
सचय कर लिया जायगा वही एक माथ रहमा, अन्य कुछ
नहीं । सहचर, मित्र, चान्धव, आदि सब सार्थ लग, या
जीवितास्था पर्यन्त ही कुछ साथ दते हैं, पर विपदावस्था,
या मरणावस्था में सब अलग हो जाते हैं, कोई किसीका
साथी नहीं होता । नीति का सूत्र है कि-
धनानि भूमौ पशवश्च गोछे,
भर्या गृहद्वारि सखा श्मशाने ।

पार्जन करे । पुण्य का शुभफल परलोक में तो मिलता ही
है, इस लोक में मी पुग्यशाली प्राणी की प्रमा सारे विश्व
को प्रमावान्वित किये रिना नहीं रहती। किमी नगर में कोई
पुण्यशाली परोपकारी मनुष्य मर जाता है तो उसक शुभ फर्मों
को लोग याद करते हुए उमरी स्मृति में विह्वल हो उठते हैं।
कोई कहता है-कैमा नगर का दीपक या जो आज बुझ गया।
जो मनुष्य पापाचारी होता है उसके मरने पर मभी लोग
कहने लगते हैं गि-अच्छा हुआ जो नगर का कटक दूर
हुआ। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य की भलाई या
पुराई का प्रतिविम्ब इस लोक में शुभ या अशुभ रूप से
स्मृति में अमिटमा रह जाता है । जैसे रावण के पापा
कुकृत्य की बुराई का प्रतिनिम्न उसको अनुभ-स्मृति में
आज तक बदनामी क रूप में है और रामचन्द्रजी के
नीतिमय सुकृत्य की मलाई का प्रतिविम्म उनकी शुमस्मृति
में आज तक प्रशमा क रूप में अमिट एवं अनुकरणशील
पन गया है।
लोग यह सोचने लगते है कि अभी तो पहत
समय है, समार में आये हैं तो कुछ मामारिक विषयों का
उपमोग तो कर लें, प्रौड़ या वृद्ध होने पर धर्मोशन कर
हेंग। धिक्कार ऐस कुविचारों को जो पापकृतियों एवं
अज्ञानवश में फंस जाने के कारण वे लोग समार की अमा-
रता और दह की धणमगुरता पर वास्तविक विचार नहीं

कर पाते । गभीरता से विचार करने पर पता लगता है कि मानव-दह पड़ी मुश्किल से मिलती है। जब प्राणी अनेक अनर्थों से घिरी हुई मवाटवी में भटकते और शोक सन्ताप करते कहीं कुछ कुछ अामनिरा से पुन्य सचय कर लेता है, तब मानव जन्म मिलता है। चिन्तामणिरत्न से भी अधिक अमूल्य और दुष्प्राप्य मानव जन्म को परिणाम में असुन्दर तुच्छ विषयों में लुब्ध हो सो बैठना यह कोई बुद्धिमानी नहीं है । क्या पता कि प्रौढ एव वृद्ध अवस्था फी मजल तक पहुंचा जाय या नहीं ? । अत तरुणाई को। धर्मकर्म के विना विपम विषयों के लिये परवाद कर दना इससे अधिक मूर्खता, मतिमन्दता और अकर्मण्यता कौन हो सकती है। मनुष्य जीवन की चिरकालीनता विद्यमान रखना अपने को विस्मृति और भयारह के गर्भ में गिराना है। मरोवर के अन्दर पानी के घुलनुले देखने में कितने सुन्दर और सुहाउने लगते हैं, परन्तु उनका नाश होने में कुछ विलम्ब नहीं लगता। बस, यही हाल मानपदह का है। कहा भी है कि- पाणेसु चिय परिएस चले सरीरे, तारुण्णय पि तरले,मरणे धुम्मि । धम्म समग्गसुहसघडणा निमित्त, मुत्तण नस्थि सरण मुरणे जणाण ॥१॥ - (२) --नित्य गमन करनेवाले पथिक के समान प्राण है, शरीर चचल है, युवावस्था अस्थिर है-दखते देखते बुढ़ापा और मरण आ जाता है तथा मरण अवश्यम्भावी है । इम- लिये ममग्र सुग्वप्रद घटनाओं को दनेवाले एक धर्म के सिवाय अन्य कोइ शरण नहीं है। शरीर के बिना होते कुछ भी दर नहीं होती और न इमको कायम रखने की कोइ क्षमता रखता है । इमलिये जब तक इन्द्रियों हीन नहीं हुई और पद्धत की फाँसी नहीं लगी, बभी तक पुन्योपार्जन कर लिया जायगा, तो लामकर है, फिर कुछ न हो मकेगा। पा बुद्धिमता बुद्धिमनीपा च मनीषिणाम् । यत्सत्यमतेनेह, मत्नामोति चामृतम् ॥ १॥ -बुद्धिमानों की घुद्धि और मनीषियों की मनीपा यही है कि इम क्षणभगुर अस्थिर शरीर से धर्म सम्बन्धी सत्य परमतत्व को मलीभाँति प्राप्त कर लिया जाय । सासारिक और शारीरिक प्रवन्धों में जितना समय और दिल लगाया जाता है, उसका आधा या चौथाई हिस्मा भी धार्मिक परम तत्वों क समाराधन में लगाया जाय, तो अथाह भयममुद्र का अन्त होकर आत्मा शीघ्रातिशीघ्र परम पद विलासी पन मक्ती है। विषयमोग क लिय और उनकी सामग्री जुटाने के लिये अपना अमूल्य समय खो बैठना, कोइ बुद्धिमत्ता, या मनीपा नहीं है। शरीर और

तत्सम्बन्धी प्रपन्धों में मनुष्य को उतना ही आसक्त होना
चाहिये जितना कि अत्यन्त ही आवश्यक हो।
कोई व्यापारी व्यापार के निमित्त किसी नगर में जाकर
सराय में ठहरा । उसका कर्चव्य था कि जिस लिये वह
गया, उसी पर ध्यान रख कर उमको मफल बनाने में
प्रयत्नशील रहे । यदि वह व्यापार कार्य को छोड़ कर अन्य
कार्यों के लिये अपने ममय का अपव्यय करता रह तो कमी
सफल मनोरथ नहीं होगा। ठीक इमी प्रकार मानवजीरन
प्राप्त करक जो व्यक्ति सामारिक कार्य कलापों में ही लगा
रहे और आवश्यक धर्मकार्य करने पर लक्ष्य न द, तो
अन्त में वह उम व्यापारी के समान अपने मानवजीवन
को सफल नहीं कर सरगा। बाद में वह चाह लाख प्रयत्न
भी फरे, परन्तु दुर्गतिजन्य दु ख मन्तापों से कभी नहीं पच
सकेगा। ससार में बड़े बड़े राजा, महाराजा, चक्रवर्ती,
सम्राट् आदि आये और चले गये। यहाँ के राज्य, वैभव
एव ऐश्वर्य को फिमने अपनाना नहीं चाहा और उसके
लिय क्या क्या अन्यायोत्पादक अनर्थ जनक कुकृत्य नहीं
किये १, परन्तु अन्त में चे माको यहीं छोड़ कर और
पाप का माता माथ में लेकर काल के ग्रास पन गये। वे
दुर्गति क फन्द को तोड़ने के लिय अपनी कुछ भी सामर्थ्य
नहीं दिखला मक। अगर कर्मयोग से उनन अपने ही
राज्य में जन्म लिया तो उनका अपने पिछले जन्म के राज्य

(६४) पर कुछ मी अधिकार नहीं रहता। उनको सुद के पनवाये हुए महलों में भी कोई प्रदेश तक नहीं करने दता । यही असार ससार की विषम और तिरस्कार जनक गतिविधि है। जो युद्धिमान प्रथम से ही ससार की अमारता और उसफी गति विधि को भलीभांति समझ कर पुण्यकर्म करने में प्रयत्नशील रहता है, यह निस्सन्दह मोक्षपद का अधिकारी बन जाता है। समार की गति रिधि जाननेवाले काम, मद, मोह आदि से अलग रह कर मनुष्य ससार यात्रा का निर्वाह करने क लिय अपने बल पराक्रम को परोपकारादि कार्यों में उपयुक्त करत हैं और आत्मकल्याण कर पुण्य कायों में सदा प्रयत्नशील रहत हैं। वस्तुत ऐसे महापुरुष जो विश्वकल्याण के लिय अपनी आत्मा को निष्पाप, तपात और पुण्यशाली पना कर विश्व क अभिमुख असा धारण आदर्श उपस्थित करत हैं, उन महापुरुषों के द्वारा स्थापित किये गये अमाधारण, अनुपम एस अलौकिक आनन्दप्रद आदर्शों का प्राणीमात्र को अहर्निश अनुकरण करके पापकों से अलग रहना चाहिय । इस मार्ग पर आये बिना किसीकी शोमा नहीं होती। कहा है कि- अन्नेन गात्र नयनेन वस्त्र, न्यायेन राज्य लपणेन भोजनम् । धर्मण हीन बहु जीवितव्य, न राजते चन्द्रमसा निशीथम् ॥ १॥ 4 -~-अन्न के बिना शरीर, नेत्रों के बिना मुख, न्याय के विना राज्य, नमक के बिना मोजन और चन्द्रमा के विना रात्रि जिम प्रकार शोमित नहीं होते, उसी प्रकार धर्म-पुण्यकर्म क पिना मनुष्य का जीवन शोभित नहीं होता । इसलिये चूनरमण, मांसादन, मदिरापान, वेश्या- गमन, शिकार, तस्करवृत्ति, परदारागमन, हिंसा, इन्द्रिय- लोलुपता, क्रोधादि पाय, अन्यायाचरण आदि पापस्मों को छोड़ कर धार्मिक कार्य करन में कटिवद्ध रहना चाहिये, तमी मनुष्य का जीवन सफल और सद्गति दायक होगा। ५ सत्य बहि-सदा सत्य बोलना सीसो पापनिवृत्ति और पुण्यप्राप्ति का एक मुख्य कारण सत्य है। मत्य ऐमी वस्तु है जिसमें परमात्मा का आभास होता है । सिमा इमक कोई अन्य वस्तु नहीं है जो अस्तित्व के लिये नियत हो मक । मत्य शब्द का मूल शब्द मत् है, इसका अर्थ है-होना । मद शब्द से मात्र अर्थ में य प्रत्यय लगने पर मत्य शब्द बना है। इसका व्युत्पत्ति लभ्य वर्ष है 'होने का भार।' इस व्याख्या से सर्वसाधारण को पता लग सकता है कि सत्य शन्द की और सत्यशील पुरुष की नकवल इसी लोक में, स्न्तुि परलोक में भी कितनी महचा है ५ होना चाहिये । सत्य शब्द परमात्मा वाचक है एवं उसका आचरण करनेवाला व्यक्ति भी उमीक समकक्ष है। ऐमी अवस्था में मत्य का अर्थ असाधारण, अनुपम एव अलौकिकता का द्योतक होना असमत नहीं है। लौकिक और पारलौकिक आदि सभी प्रकार के कार्यों में मत्य री पड़ी भारी महत्ता है। कोई भी विशाल कार्य स्यों न हो, यदि वह अपरिमित परिश्रम एव अतुल विद्वचा से निर्माण करन पर सत्प से हीन है, तो वह विशाल होने पर भी सर्वमान्य नहीं हो मकता, क्योंकि वह सत्य से हीन है । इसी तरह छोट स छोटा कार्य भी है पर वह मत्यता से परिपूर्ण है, तो उस विशाल कार्य की अपेक्षा वह अधिक मान्य एव प्रशसनीय होता है, क्योंकि उसमें सत्यता है। यह तो हुई लौकिक कार्यों में मत्य की महचा। इसी प्रकार पारलौकिक धर्मकार्यों में भी मप्रथम सत्य की विशेषता है । धर्म का मूल आधार मत्य है और ममस्त धार्मिक क्रियाएँ सत्यमय मावशुद्धि पर अपलम्बित है । इसीसे एक विद्वान् का कहना है कि " हमें अपने लक्ष्य स्थान, या मजिल मकसूद तक पहुचने के लिये मत्य ही की राह पर चलना चाहिय । यह राह सीधी और नजदीकी है । अर्थात सत्य की राह पर चलने से, हम अपने लक्ष्य पर बहुत जल्दी पहुँचते है । " इसलिय मत्य का परिणाम मदा सुखदाई है। आज की विषम परिस्थिति में विश्व क अस्तित्व-हीन अम-

पर्यादित विषम-प्रवाह में वहनेवाले क्षुद्र जन्तु किसी कार्य में
सत्यता होने पर भी अनुचित आक्षेप कर अपनी क्षुद्रमयी
उच्छृखलता एव उद्दण्डता का परिचय दने में नहीं हिचकने,
वो फिर उनश अमत्य, अनुचित कार्य कैमे सर्वमान्य
हो मके।
सर्वमाधारण लोग मत्य का अर्थ मच बोलना समझते
हैं। इसलिये मत्य का प्रयोग विशाल अर्थ में किया गया
है। विचार में, नाणी में, आचार में, अन्यान्य प्रन्यक कार्य
में सर्वत्र मत्य ही सत्य होना चाहिये । अगर मनुष्य मत्य
शब्द का वास्तविक अर्थ ममझ ले और अपने हरकार्य में
इमको अपना ले, तो समार में उमक लिये जान लना कुछ
भी अवशेष नहीं रहता, क्योंकि समार मर का ममस्त जान
इमीमें ममाया हुआ है । जो ज्ञान सत्य क अन्तर्भूत न हो
सके वह ज्ञान नहीं, वह तो एक कपोल-फल्पित मिथ्या
वितण्डागाद कहलायगा । अमत्य गर्मित जान नहीं और
मिथ्या ज्ञान स सचा आनन्द नहीं मिल सकता । यदि
उल्लिसित पक्तियों को कमौटी का रूप दकर हम उस पर
प्रत्येक कार्य का प्रयोग करना सीख लें तो शीघ ही हमें
पता लग जायगा कि कौनमी प्रवृत्ति एवं कौनमा कार्य
करने योग्य है और कौनमा त्याज्य । सत्य पारममणी और
कामधेनु के समान है। दोनों का प्राप्त होना जिस प्रकार
सर्वसाधारण के लिय कठिनतम है, उसी प्रकार मत्य की

प्राप्ति होना मी महा कठिन है । अभ्याम और वैराग्य के मिना सत्य की प्राप्ति नहीं होती । मदा मर्वदा प्रत्येक कार्य में मत्य की लगन रखना यही अम्पाम हे और असत्य को छोड़ कर समस्त वस्तुओं स अत्यन्त उदासीनता धारण कर लेना यही वैराग्य है । इन्हीं दो उपायों से सर्व विशुद्ध मत्य उपलब्ध होता है । सत्य की प्राप्ति क लिये प्रयास करनेवाले व्यक्तियों को प्रथम कई आपतियों का सामना करना पड़ता है । जो मनुष्य कायरता के वश आपत्तियों से घबरा जाता है वह सत्य की वास्तविक प्राप्ति नहीं कर सकता । सत्य की शोध के लिये महती तपश्चर्या करना और तकलीफें सहना पड़ती है और समय आने पर प्राणार्पण भी करना होते हैं, तब कहीं मत्य मिलता है। मत्य ही में मय प्रकार का सुरस और गौरव है। इसको हृदयङ्गम र लेने से मनुष्य उभय लोक में अनुपम सुख का अनुभव करता है । कोई मनुष्य यदि सत्यधर्म की आराधना न करता हुआ सुख ण्व वैभव की आराक्षा करता है, तो उसे यह पस्तु कभी नहीं मिल सकती । सूक्ष्म दृष्टि से विचारा जाय, तो धर्म और अधर्म क्रमशः सत्य और अमत्य पर ही निर्भर हैं। जहाँ धर्म है वहाँ मत्य है और जहाँ असत्य है वहां अधर्म है। शास्त्रोक्त मी है कि-'धर्म. स नो यत्र न सत्यमस्ति' जिस धर्म में सत्यता न हो वह धर्म नहीं, अधर्म है। धर्म चाहे पाशाडम्बरों से परिप्लुत क्यों न हो, सत्यता क बिना वह , कपोल कल्पित ही माना जायगा । इसके अतिरिक्त जो फल तपस्या और त्याग के अनवरत परिश्रम से प्राप्त किया जाता है उसकी सफलता सत्य से ही होती है। कहा भी है कि- अश्वमेधमहस्राणि, सत्य च तुलया कृतम् । अश्वमेधसहस्त्राद्धि, सत्यमेवातिरिच्यते ॥ -हजारों अश्वमेघ यज्ञ और सत्य इन दोनों को तराजू में रख कर तोले जाय तो सहस्रों अश्वमेघ से सत्य का ही पलड़ा ऊँचा रहेगा। कुछ पासण्डी लोग इम मुक्ति को लक्ष्य में न रस र सत्य को कुचल दन का शक्तिभर प्रयत्न करते हैं । उनको ममझ लेना चाहिये कि सूर्य पर धूल फैरने से वह क्या सूर्य तक पहुँच सकती है ? । अन्त में तो सदा सर्वदा सत्य की ही जय होती है। विज्ञोक्ति भी है कि 'सत्यमेव जयते नानृतम् ' सदा सत्य की जय होती है, अमत्य की नहीं । अत: सत्य के बरापर धर्म और अमात्य के समान समार में कोई पाप नहीं है । कहा है कि- साच परायर तप नहीं, झूठ परायर पाप । जाके हृदय साच है, ताके हृदय आप ॥१॥ साचे शाप न लागई, साचे काल न ग्वाय । साचे को साचा मिले, साचा माहिं समाय ॥२॥ खराब मत्री से राजा, समारियों के महवास से माधु, अति लाड़ करने से लड़का, मदिरापान से लजा, अनीति

से सपत्ति, खलपुरुषों की सोबत से शील और कपट रखने
से मित्रता का जिम प्रकार मर्वनाश हो जाता है । उसी
प्रकार अमत्य भाषण से तप आदि आत्मगुणों का मर्वनाश
होत दर नहीं लगती। इसीसे सत्य को सब से बड़ा और
अमत्य को मबसे अधिक क्षुद्र कहा गया है।
समार म प्रत्येक वस्तु के भेदोपभेद हैं-प्रिय-सत्य और
अप्रिय-मत्य । हित, मित और मधुर बचन बोलना प्रिय--
सत्य है और जनता का हितनाशक पचन घोलना वह सत्य
होने पर भी अप्रिय-सत्य है । जिन पचनों के द्वारा दूसरों
को दुख, उद्वेग पैदा होता हो, अथवा दूसरों क चित्त पर
आघात पहुँचता हो, या किसी का अहित होता हो,
ऐसे वचन प्रायः अहसार, या हठाग्रह से बोले
जात है, व सत्य नहीं, कितु अमत्य है। जो मत्य
विश्वकल्याण या आत्मकल्याण का विरोधी हो वह वस्तुत:
सत्यता का यथार्थवाची शब्द नहीं, किन्तु सत्यवादीपन के
अहङ्कार का प्रतीक है। हितैपिता की बात यदि रिमी
समय सत्य न भी हो, फिर मी उससे किमीकी हानि नहीं
हो पाती। परन्तु अहित की बात यदि मत्य मी हो, तो उमसे
हानि के सिवाय कुछ मी लाम नहीं हो सस्ता । अन्धे को
अधा और लूले को लूला कहना यद्यपि स य है । फिर मी
एमा कहने से उनकी आ मा को महा उद्वेग और दुःख
उत्पन होता है, अत' ये वचन सत्य नहीं हैं। नीतिकारोंने
Hin
ran

।
(७१)
लिखा है कि-' मत्य व्याप्रिय व्यान घूयात्सत्यमप्रियम्'
मनुष्य प्रत्येक व्यवहार में मच बोले, परतु मत्य ऐमा हो
जो मय का प्रिय एव हितकर हो । अप्रिय मत्य बोलना
उद्वेगोत्पादक होने से झूठ बोलने के समान हैं। मनुष्यमात्र
को कैमा और फिम प्रकार बोलना चाहिये। यह विषप
पड़ा गम्भीर एव पिवेचनशील है।
मनुष्य
के
मनुष्यत्व एक
पशुत्व की पहिचान बोलने मात्र से हो जाती है । जो मनुष्य
अपने प्रखर पाण्डित्य की पताका लेकर विश्व क कोने कोने
फहरा रहा हो और अपने अजोड़ ज्ञान द्वारा विश्व को
चमत्कृत करने का माहम रखता हो, पर वह बोलना नहीं
जानता, तो उसकी पताका एव विद्वचा विश्व क अभिमुख
नहीं के ममान है । अतुलित बान के अथाह मागर म गोवे
लगानेवाले व्यक्ति के मुग्व से यदि कठोर वचन निकल गये
तो उसका वह ज्ञान धूल से भी अधिक अपनत है । मधुर,
मत्य वाणी का प्रयोग करने से अपठित व्यक्ति भी मय के
श्रद्धाभाजन होते हैं । अहिंसा, अक्रोध, अस्तेय, एव अप
रिग्रह आदि नियमों का यथाविधि परिपालन करने से नि.
तना पुण्य समय नहीं होता, उतना केवल एक प्रियवचन
से पुण्य सचय होता है । सुन्दरतम दुकूल वस्त्र, सुगन्धी वि
लेपन एव रत्नजटित पहुमूल्य आभूषणों में मनुष्य की उतनी
शोमा नहीं होती नितनी कि मधुर, मत्य वाणी से होती
है। नीतिकार कहते हैं कि-

(७२)
केया न विभपयन्ति पुरुष हारा न चन्द्रोज्वला:,
नम्नान न विलेपन न कुसुम नालना मुर्धजाः ।
पाण्येका समलङ्करोति पुस्प या सस्कृता भार्यते,
सीयन्ते ग्यलु भूपणानि मतत वाग्भपण भूषणम् ॥
-हाथ में करण-बाजुघ, चन्द्र क ममान उज्जवल
हार, स्नान, चन्दनादि विलपन, पुष्प एव समारे हुए केशों
से मनुष्य की शोमा नहीं होती। उमरी पास्तविक शोमा
तो करल मधुर, सुसंस्कृत पाणी से होती है जो पूर्वजन्म के
सचिन प्रपल पुण्य म मिलती है। आभूषण आदि तो एक
दिन अपम्प नष्ट हो जात है, परन्तु मधुरवाणी रूपी आभू
पण मदा विद्यमान रहता है । अत सिद्ध है कि निम मनु
प्यने पाणी रूपी आभूपण से अपन को अलकत नहीं किया,
उमने अन्य अलकारों को योंही लजित किया । मधुर वाणी
के बिना मनुष्य का पाण्डिन्य भी निकम्मा है और यह
उमरो क्रफिन करनवाला है। कहा है कि--
सीख्यो व्याकरण न्याय साहित्य अरु वेद उन्द,
ज्योति को सीव नित रहते गरूर में।
सीरयो सप सौदागिरी पजाजी सराफी जान,
लाग्वन को फेर-फार यो जात पूर में ॥
सीख्यो सप मन्त्र तत्र सब याद मीन्यो,
पिंगल पुराण सीप भयो अति में
-

सीख्यो सप वाट घाट निपट मयानो भयो, एक योलयो न सीख्यो तो सीख्यो सप धुर मे ॥१॥ इमलिये मनुष्य को अन्यान्य शिक्षाओं के माथ साथ पोलने की भी कला सीख कर ऐमा वचन कमी नहीं पोलना चाहिये जिममे दमरों की आत्मा पर अकारण आघात पहुँचे। दूसरों की आत्मा पर आघात पहुँचाने से पुण्यधर्म का नाश और पाप का बढ़ावा होता है। किमीको भी आत्मा को ध्यथित न करना, इमीम मानकजीवन की सफलता है। जो दुर्लमता से प्राप्त अपन अमूल्य जीवन को पाकर काम क्रोधादि स कोसों दूर रहता है और मत्य, क्षमा आदि मनियमों का परिपालन करता हुआ कटु, अमत्य वचनों द्वारा किसीके हृदय पर आघात नहीं पहुंचाता, उसीका नरजीवन सफल और हितकर है। क्यों कि- उपकार सदैव किया करते, निज स्वार्थ कहीं दिखलाते नहीं। दुस देव दुखी जग के पथ, कटक हीन सुझाते फँसाते नहीं। धन धाम से काम नहीं जिनको, कुछ नाते यहाँ के लुभाते नहीं। फल पाते वही नरजीवन का, जो किसीको कभी कलपाते नहीं।

- मधुरवाणी पुण्यजनक धर्मोपार्जन में भारी महायता प्रदान करती है । घमण्डी, या अध मनुष्य अपनी निर्वि वेकता के कारण इसका सदुपयोग न करक पुण्यशील बनने से वचित रह जात हैं। वे एक के बाद एक, हम तरह भवाटवी के अनन्त चक्कर लगाते रहते हैं । घूमते घूमते थक जात हैं परन्तु उन्हें कहीं किसी प्रकार की सान्तवना नहीं मिलनी । पथभ्रष्ट पथिक के ममान उन पुण्य-हीन मनुष्यों की दुर्गति होती है जो हित, मित एप मधुर सत्य वचन का अनादर करके असत्य और कटु वचनों द्वारा अपने मुख को दुर्गधित करते है । इसलिय- युद्धे फल तत्वविचारण च, देहस्य सार व्रतधारण च । अर्थस्थ सार किल पात्रदान, चाच फल प्रीतिकर नराणाम ॥१॥ -मनुष्यों को प्राप्त पुद्धि की मार्थकता तत्वों की विचारणा से होती है, मानवदेह की सफलता प्रह्मचर्यादि व्रतों के धारण करने से होती है, प्राप्तधन-समृद्धि की मार्थ कता मरपात्र में दान दने से और वाणी की सार्थकता दूसरे प्राणियों का हित करने स होती है। इन विना उनकी पुद्धि, उनका शरीरवारण, उनको मिली लक्ष्मी और उनकी वाणी आकाश कुसुमबत् निष्फल है।

सत्य की रक्षा के लिये जो मानर प्रयत्नशील नहीं हैं
उनका जीवन ससार में मार के समान है । असख्य एवं
अपरिमित राज्यवैभव होने पर भी जिन लोगोंने प्रियमत्य
की रक्षा क लिये राजसी रैमा तो दूर रहा, अपने वश और
अपने आपको दूसरों के हाथ बेच डाला, बाल्यावस्था में
असुरों के द्वारा अमह दुख सह, रात्रि के व्यतीत हो
जाने पर सूर्योदय होत ही चौदह वर्ष तक बनवाम का
आश्रय लिया और जिन्होंने उत्तम भोजन की जगह कन्द
मूल फलाहार आदि से या निराहारिता से अपने प्राणों
की रक्षा की, उन हातकुलदीपक भगवान् महावीर,
बुद्ध, मत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र, प्रहाद, और इक्ष्वाकू
कुलमणि रामचन्द्र आदि महापुरुषों की गौरवगाथा को
कौन नहीं जानता ? जो आज इतिहास के पृष्ठों पर स्वर्णा
क्षरो में अक्षित है और आज भी सत्यपथ च्युत भ्रष्टपथिकों
को सत्य एव सर्व विशुद्ध मार्ग का प्रदर्शन करा रही है।
अतएव समार और शास्त्रवर्णित अन्य श्रेष्ठ गुणों की अपेक्षा
सत्यगुण मब से अधिक महत्ता रखता है-जिम की महिमा
करना लेसिनी से परे है। शास्त्रकार कहते हैं-
तस्याग्निर्जलमर्णवः स्थरमरिमित्र सुराः किङ्करा',
कान्तार नगर गिरिहमहिर्माल्य मृगारिमूंग ।
पाताल पिलमत्रमुत्पलदल व्याल. शृगालो विप,
पीयूष विषम सम च वचन सत्याञ्चित वक्ति ॥१॥

-जो मनुष्य सर्वदा सत्य वचन बोलता है उसके
लिये विश्व को जला दनेवाली जाज्वल्यमान अग्नि क्षणमर
में जल के समान, अथाह समुद्र स्थल के ममान, वध
चाहक शत्रु मित्र के समान, दनता नौर के ममान, बीहड़
चन नगर क समान, सिंह हरिण क ममान पहाड़ घर के
समान, मर्प पुष्पहार के ममान, पाताल बिल क ममान,
तीक्ष्ण अस्त्र कमलपर के समान कोमल, मदोन्मच हाथी
सिपाल के ममान और विप अमृत कममान हो जाता है।
इसी तरह मत्यवादी क लिय प्रतिकूलताएँ भी अनुकूलता का
अनुमरण करन लग जाती हैं। बस, इमस अधिक मत्यता का
महत्व और क्या हो मकता है।
आन क युग में पथभ्रान्त मानव पद पद पर लोगों क
द्वारा क्यों ठुकराया जाता है। इसका मूल कारण यही है कि
यह सच बोलना नहीं जानता। अगर किमी मे सच पोलने
की शक्ति है तो वह अप्रिय एव कटु है, इमसे यह विशेष
तिरम्कत होता है। शरीर-वस्त्र, विद्या और मव के माथ
साथ मनुष्य के लिये मधुर मत्य चोलन की भी अनिवार्य
आवश्यकता है। हितकर, मधुर और परिमित सत्य वचन
का ज्ञान और सद्व्यवहार के विना माना गौरनहीन ही
कहलाते हैं। क्योंकि
वपुर्घचन वस्राणि, विद्या विभव एव च ।
वकारैः पञ्चभिरौनो, नरो नार्हति गौरवम् ॥ १॥

(७७) --पु-शरीर, वख, वचन, विद्या और विमव इन पांच वकारों के विना मनुष्य कहीं भी आदर नहीं पाता। अत. गौरवता प्राप्त करने के साथ ही मनुष्य को ऐदिक और पारलौकिक दोनों मनों को सुधारने के लिये सटा सत्य पोलना चाहिये। अन्य माधनों की अपेक्षा सत्य ही मुक्ति- पथ का सरल एवं सुप्राप्य पायेय है। ६ अनुयाहि साधुपदवीम्-शिष्ट पुरुषों के मार्ग पर चलना सीखो। जिन पुण्य-पुरुषोंने विश्व की अस्थिर पिनाशी माव- नाओं से सम्बन्धित यामादि दुर्विषयों का परित्याग कर और जीवन की क्षणमगुरता को लक्ष्य में रख कर अनवरत रूप से अपने आपको परोपकारिता का मचा पूजारी पना लिया है, व सच्चे साधु कहलाने के अधिकारी है। इसके विपरीत अपने आपको साधुता का ममन्वपक माननेवाले साधुता की आड़ में दोंग और पाखण्ड को बढ़ाते हुए काले पानार को प्रोत्साहित करते हुए भारतवर्ष की भोली माली जनता को मधुरालाप के प्रलोमन पाश में फमा कर, चिर- काल तक दुखद तीक्ष्ण कटकों से परिपूर्ण पोरान्पकार मप कूप में गिरा कर अट्टहाम करनेवाले पाखण्डी साधु कहलाने योग्य नहीं । स्वार्थान्धता के पीछे विश्व की दुस्थिति का

(७८)
ज्ञान उनको नहीं होता। ये म्यामिति के लिये प्राणियों
जान माल को लूटन नहीं हिचका। क्या ऐगे पावण्ड-प्रिय
साधु विश्वहितपी कहला सकते हैं, आज के विषम पाना
चरण में जिस ओर दृष्टिपात किया जाय, उम ओर ऐसे
साधाऽमामों की संख्या अधिक देखन में आवगी जो सभी
साधुता पर क्लङ्क लगा रहे हों और मोल माले लोगों को
अपने चगुल म फमा कर उनके जान माल को ग्वनर में
डाल रह हों। स्वय मापाचार-भ्रष्ट, अपनी राह पाह
करान की आशाओं में पतित और दुर्गतिपात का कुछ भी
गय न रखनपाल नाममात्र क माधुओं के द्वारा विध
कल्याण होने की आशा रग्वना केवल निराशा माग है।
इनके उपदश और इनकी सोचन समारी या त्यागियों के
लिय जीवन को मब तरह मिटियामट करनेवाली है।
इन साध्वाभासों के उपासकों की सख्या भी कम नहीं
14 अन्धश्रद्धालु अपनी स्वार्थ एव विषयपिपामा की
प्रलोभन पत्ति के लिये उन मर्वनष्ट पापण्डप्रिय साधुनाम
धारियों के चारों ओर घेरा लगाये रहते हैं और वे ज्यों
नचाना चाहत है क्यों ही ये नाचा करते हैं। यहां तक कि
पाखन्डियों के मरमाने या कहन से धर्म-नाम को कलकिन,
या भ्रष्ट करते भी नहीं हिपकत । जो प्रदश कमी धर्मप्राण
कहलाता था, जिसके घर घर में धार्मिकता एव आस्तिकता
का प्रबल प्रचार था, यह आज अन्धोपासक के कारण

(७१)
अधार्मिकता, नास्तिकता एव अनुल्लेखनीय अनर्थों का उत्पा
दक वनता बा रहा है, यह क्या कम खेद की बात है।
वस्तुतः अधार्मिकता का निर्माण करनेवाले पाखण्डी साधु है
जो अपनी पनाई हुई अमर्यादित, अमैद्धान्तिक एव दुर्नीति
मयी कुटिलरीति से प्राणियों को तुच्छ प्रलोभन दकर अपने
अनुपापी पनाते रहते है और फिर उनमें दुराचार एव
अधार्मिकता का मचार कर देते हैं-जिससे वे उन्मत्तवत् पन
जाते हैं। अधर्म से सदाचार और मिद्धान्त मर्यादा का हास
तथा अनाचार प्रवृत्ति का पदावा होता है। दुराचार से
मर्यादा का हनन और अमानुपिकता का संचार होता है।
पाखण्डीओं में कुछ वर्ग पठित भी होता है, परन्तु समार में
स्वार्थ एक ऐसी चीज है कि उसके पीछे उनका ज्ञान मोह
माया और कृष्णा आदि से दूपित हो जाता है-जिससे वे
असाधुता का प्रसार करने लग जाते हैं । यही स्वार्थ ऐक्यता
का सर्वनाश कर घर घर में फूट का पीजारोपण करता है।
इसीके पीछे आज ऊंचे ऊंचे पदों पर स्थित अधिकारी गण
दीन और दुःसी जनों को निर्दयता से अपने पैरों तले कुच
लते जा रहे हैं। किसी कविचरने ठीक ही लिखा है कि-
स्वार्थमय समार में है, हो रहा अपना पराया।
ज्ञानियों का ज्ञान भी है, मोहमाया में भुलाया।
रूप धन अधिकार वैभव, व्योम में घनसा ममाया।
देवते कहते समझते काम, में तो मीन आया॥१॥

लोभ लम्पटता सिखाली, द्रोह दूर्गुण नीति जाया
धाधली पथ रोक करती, रूठियों की क्षुद्र माया॥
दीन दुनियों को निठुर, अधिकारपालोंने दयाया।
स्वार्थवश इस विश्व में, अति पाप और अधर्म छाया॥
सार्थपरायण लोगों को चाहिये कि स्वार्थ का त्याग कर
मिद्धान्तोक्त यथाशक्य माधुधर्म का परिपालन करते हुए
विश्व में धार्मिकता का सचार करें, अधर्मपथ की ओर जाती
हुइ जनता को रोक कर धर्मपथ की ओर झुकाव, इमीमें
विश्व का और अपना कल्याण हो मकता है। अन्यथा कौए
आदि पक्षीगण भी समार में आत और चले जात हैं, उनका
जीवन प्रशमनीय नहीं । प्रत्यक मानर को चाह वह समारी
हो या साधु ऐमा जीवन धना लेना चाहिये जो विश्वजन के
अभिमुस ज्वलन्त उदाहरण सरूप हो और जिम के समागम
से जनता सुसस्कारी बन सक। महान् पुरुष मदाचारी,
परोपकार रत और परमार्थ को म्वार्थ माननेवाले होते हैं, वे
प्राणान्त में भी क्सिीका बुरा करना नहीं चाहते और अपने
दिव्य उपदेश या प्रमान से स्वपर का सुघारा करते हैं।
इसीसे नीतिषिदोंने यह वाक्य लिखा है कि 'अनुयाहि
साधुपदवीम् ।' जो लोग महापुरुषों के मार्ग पर चलना नहीं
जानते और न उनका सग करते हैं, न उनके उपदेशों को
सुनते हैं, वे दुर्गति की गदपट्टी में पड़ कर इधर उधर
घका खाया ही करते हैं।

(८१)
प्राप्त जीवन क्षणिक है, दुनिया के सारे पैमव चपला
के समान नाशवान हैं और इन्द्रिय-विषयों का आखिरी
परिणाम असुन्दर है। इस परिवर्तनशीलता का मलीभाँति
विचार कर अपन जीवन को मदाचारी पनाने के लिये
महान् पुरुषों की सवा में रहना, उन्हीं की सगति करना
और उन्हींक मदुपदशामृत का पान करना चाहिये । कुछ
लोग पाय रूप से तो अच्छा उपदश दते हैं और जनता
को अपनी मदाचारिता का डौल दिखाते हैं, परन्तु गुप्त
रूप में जहाँ क नहाँ रहते हैं और किमी भी प्रकार के अव
लम्बन स अपना शैथिल्य पोषण कर लेते हैं। ऐसे लोग
भी माधुता से कोसों दूर हैं । अत इनके घगुल से मी मदा
माधान रह कर अपना सुधारा करना चाहिये । समार का
चित्र बड़ा विचित्र है, उमको कोई भरभीरु आत्मा ही समझ
पाता है। क्योंकि-
विश्व के दृश्य देख ये आज,
रहेंगे आगे ये न कभी ।
पदलते रहते सप व्यवहार,
जीय यौवन धन आयु समी।
जहाँ थी सघन तमिस्रा तनी,
ज्योति रवि दिखलाती है वहीं।

मगर वहाँ पीर म m पोर Mith सही पा पिर, गरपामा 31 मोर। IN पशुपार क्षेत्र, जगन को नापास विमा भानन भी मन, सुजन पादर पई रहदा मादुभाष, मसामों को कर पिन यही मार पी पिता है। हमारी प्रसारमा १५ रिषिश्या पा विग्प मोदम) निगा अधिक मामना मार नही गुना मायामदी पापोर पनाती की बीमा गना क पाए अपनपनदी कि विनी कपल प्रहार में प्रपन को न भूली । किमी कपिन पा PIRTI- पघल पन्द्र सूर्य है पपल, पपर सभी प्रा मारा। बाल अनिए अनार जाल पर, सप गगा जमे पाग है॥

जगत प्रकृति से अति ही चचल, मन की चचल लीला है। प्रतिक्षण प्रकृति चयला जैमी, यह परिवर्तनशीला है ॥१॥ अणु-परमाणु सुग्व दुव चचल, भणिक मभी सुग्नसाधन है। दृश्य सकल नश्वर परिणामी, किसको ग्ब किसको धन है॥ क्षणिक सुग्यों को स्थायी कहना, दुःख मूल यह भूल महा। घचल मानव ! क्यों भूला तू, रग्वा सृष्टि में सार कहाँ ॥२॥ मर्यादित साधुता का अनुसरण करने मे अधर्मी मनुष्य मी धर्मप्रेमी पन फर स्यपर का कल्याण करने की क्षमता रख सकता है। पठोर से कठोर र एव जघन्य कर्म करने वाले पातकी भी सत्पुरुषों के द्वारा बताय गय सन्मार्ग पर चलन स अपने क्रूर कृत्यों से उन्मुक्त होकर निष्पाप पन । जाता है । समय आने पर यह विश्व क अमिमुख अपने अखण्डित तेज क अनुपम आलोक द्वारा समस्त विश्व को आलोकित करके परमपद प्राप्त कर सकता है। सची साधुता -

का अनुसरण मी समाग्यवा से ही मिलता है। कोई काई
ऐसे अमागे मनुष्य मी देसे जाते हैं जो सत्पुरुषों द्वारा
सदुपदश सुनने का अवसर पाकर मी प्रमादयश उसको अपन
हाथों से सो देते हैं । मानव के लिये यह स्वभाव सिद्ध है कि
यह जानता और समझता हुआ मी शुभकर्म की ओर प्रवृत्त
होने की अपेक्षा अशुम एव अपिहित मार्ग का अनुपापी
जल्दी पनता है।
कुछ शिक्षित जन इम कार्य को हेय भी समझते हैं,
परन्तु मानव समाव जन्प कुमकति के कारण से वेत
भावान्ध हो समझ बैठते हैं कि समय पहुत है, अभी तो कई
दिन तक जीवित रहना है। पहले मांसारिक कार्यों से
निपट लें, पाद में अपशिष्ट आयु सन्मार्ग और साधुता का
अनुसरण करने में व्यतीत करना है, यह उनकी भारी भूल
है। शिक्षित होकर भी जो मनुष्य की मनोवृत्तियां ऐसी
विचारधाराओं में प्रवाहित होती हैं, तो उनके शिक्षित
जीवन का दुरुपयोग ही है। पूर्व पुण्यपुन के प्रबल प्रमात्र
से प्राप्त शिक्षा के साप विधामपाव करते हुए शिक्षाशास्त्र
की कलङ्कित करते हैं। अज्ञानारस्था में जो पाप, या कुठल्य
कर पैठता है यह इतना पाप का मागी नहीं होता, जितना
कि एक शिक्षिक, पठित और हिवाहित का धाता पुरुष पाप
और कृत्य कर पाप का मागी होता है। यदि विध

समस्त शिक्षितों की यही मनोवृत्तियाँ हो जाये, तो विश्वजन को शिक्षित बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है। जिम शिक्षा का उद्देश्य मानव को प्रमादावस्था में पहुंचाना हो, जिमका ध्यय मनुष्प को सन्मार्ग से पराकमुख रखने का हो, वह 'शिक्षा' क्या शिक्षा नाम से व्यवहत हो सकती है।, कदापि नहीं । शिक्षा का सदुपयोग प्रमाद छोड़ कर अविलम्ब मन्मार्ग की ओर प्रवृत्त होना है और आदर्श पनना है । जो मनुष्य शाखों का अध्ययन करके कर्तव्य- दक्षता मे अपनी माविकी माधुता का परिचय प्रदान नहीं कर माता, वह मूह नहीं तो और है क्या कहा है कि- शास्त्राण्पधीत्यापि भवन्ति मूर्वा, यस्तु फ्रियावान् पुरुषः स पण्डितः। सुचिन्तित चौपधमातुराणां, न नाममात्रेण फरोत्यरोगम् ॥१॥ -मनुष्प शास्त्र पढ़ कर भी मूर्ख होते हैं, परन्तु जो क्रियाकलाप में कटिबद्ध हैं वह पण्डित है । जैसे भलीभाँति शोधा हुआ औषध रोगियों का रोग नाम लेने मान से दूर नहीं हो सकता। अत शिक्षितों को मी माधुता का अनुमरण किये बिना वास्तविक योग्यता नहीं मिल सकती । अपवर्ग क द्वार को खोलने की यही एक कुजी है।

७ सेवस्व विद्वज्जनम्-विद्वानों की सेवा करो। यह निर्विाद है कि मनुष्य अपने गुणों, या प्रभाव शालिनी योग्यता से उतना गौरवान्वित नहीं होता, नितना कि विद्वानों के समर्ग में आकर महमा संसार के सम्मुख उन्नति के शिखर पर अपनी यशापताका फहराता हुमा गौरवशाली होता है। क्योंकि अज्ञानी मनुष्प मी विद्वानों की सवा करते हुए उनके ससर्ग से विद्वत्ता, एव सुजनता का अमिनायक बन जाता है। इमीमे शास्त्रकारोंने आदेश किया है कि सेवस्त्र विद्वानम् ।' कस्तुत विद्वानों की सेवा करना, उनके द्वारा प्रदर्शिन मन्मार्ग का अनुमरण करना प्रत्यक पुरुष के लिये महान् उपसरी है। ज्ञानी या अज्ञानी, पठिन या अपठित, कोई भी विद्वानों की निष्काम भाव से मेवा करता हुआ अपन आपका महान् उपकार कर सकता है। क्योकि दियज्ञानमयी गुणोधसहिता भन्यमभामासुरी, लोकालोककरी स्वकीयविभया श्रेयस्करी सर्वता। विदनि परिपेविता च सतत सद्बोधमयाभिा, सेवा चे विदुषां सदेव सुग्यदा मुक्तिमदा जायते ॥१॥ -दिव्य ज्ञान नथा गुण ममुदाय मे युक्त, अलौकिक कान्ति से देदीप्यमान, अपनी अनुपम प्रमा स समार स्वरूप को प्रकाशित करनवाली, मन्मार्गगामी विद्वानों में F

परिपालनीय और मय तरह कल्याण करनेवाली मुक्तिदाता
एक विद्वानों की सतन सेवा ही है । यह शास्त्रों का सुखद
शुभ सन्देश है जिसके परिपालन से प्रत्येक प्राणी सांसारिक
मर्श का ममूला उच्छेद करके अनुपम एर अक्षुण्ण सुख
प्राप्त कर सकता है। इससे शुभ सन्देश की महत्ता का महन
ही पता लग जाता है। पह सन्देश केवल अज्ञानी, या
अपठितों के लिये ही नहीं, किन्तु विद्वान् मी सेयाधर्म से
अलभ्य लाभ प्राप्त कर मकता है। जप साधारण मनुष्य की
सेवा भी निष्फल नहीं होती, तब सन्मार्गगामी विद्वानों की
सेवा फलवती हो, इमम कौन आश्चर्य हे १ । जो मनुष्य
कठिन तपस्याओं में भी अपने निकृष्ट कम नहीं खपा
मकता र मेवा करने से क्षय होते हैं। इसमे मेवा का
मह व मानरजीवन को पूर्ण माफ करन की क्षमता रखता
है। मेवा में मानव हर जगह परिपूर्ण रूप से इस लोक में
प्रसमा-पात्र बनता है और परलोक में अतुल मुखसमृद्धि
का मोक्ता होता है।
समाज-त्रा, धम-मबा, झान-मेशा, राष्ट्र-सेवा आदि
मया के अनक मेगेपभेद है। समाज को संगठित रखन
का प्रयत्न करत रहना, उमम कदाचार या अनीती का
प्रवेश न होन ना यह ममाज-मेगा है। किसी को कुमार्ग
में पचा कर मन्मार्ग पर स्थिर पवना, पा धर्म में पल.
विचल इए को धर्म में रद करना यह धर्मसेवा है। धान का

(८८)
अभ्यास कराना, उसके लिये उसे जिन करना और मान की
आशातना न करना, न होने दना यह मानमेवा है। हीन,
दीन, द सी, रुग्ग, पाल, पद लोगों को हर तरह शावा
पहुचाना जनमेगा है। राष्ट्र के राक्टों को दूर करना,
उसमें किसी तरह का विग्रह खड़ा न होन टेना यह राय
सेवा है । आज गांधीयुग में विश्व क चारों ओर राष्ट्र एवं
देश सेवा की वगरती धाराएं पढ़े वग मे प्रराहित हो रही
हैं। उनमें या छोटे, पपा बड़े सभी लोग एक मिर से दूसरे
सिरे तक प्रवाहित होते दृष्टिगोचर हो रह हैं। चाहे उनको
देश या राष्ट्र सेवा का अथ मलीभांति विदित न हो, ये
एक महान तपस्सी फ अनुयायी हो अपन का राष्ट्रसेवी
कहलान में अपन जीवन की माथकता ममझते हैं। मीक
पीछे ये कई असम पावनाएँ महन करत है, अपने कौटु
पिक जीवन से प्राप्त सुस को तृणमन् ममक्ष फर विच क
सम्मुख सेवाधर्म का अनुपम आदर्श स्थापित करत हुए राष्ट्र
के हित ऊँची ऊंची दीवालोंवाले कारागृहों में अपना जीवन
यापन करने में आनन्द समाते है। जिन्दोन सेवाधर्म का
परिपालन करते हुए राष्ट्र की पलिवेदी पर अपना बलिदान
देने में तनिक भी सेद प्रगट नहीं किया। ऐसी पई आत्माओं
का स्वर्णिल एव अनुकरणीय इतिहाम आज मी विश्व के
इतिहाम में अक्षित है और सदा क लिये चिरस्थायी होता
हुआ सेवाधर्म का पाठ पढ़ाने में पूर्ण महायक होगा।
.

समस्त विश्व को सेराधर्म का पाठ पढ़ा कर जिमने अपनी
अलौकिक प्रभा से एक नये युग का निर्माण किया, क्या
यह विश्व को आकर्पित करने में सफल नहीं हुआ ?
कुछ लोग अपने स्वार्थ क पीछे दूसरों का गला घोंटते
नहीं हिचकते, वे नराधम सेवाधर्म की महचा को नहीं
पहिचानते । इसका प्रधान कारण है पुण्यक्षीणता । पुण्य
क्षीग होने से मनुष्य क अन्दर की साविकता नष्ट हो जाती
है, वह फिर प्रतिपल कुकत्य करने में सलम रहता है । इम
प्रकार क मनुष्यों को शास्त्रों में पापान्ध कहा है । ये पापान्ध
अपनी अन्धता क वशीभूत हो कर महान् अकृत्य कर बैठते
है-जिनक कारण इनकी मारी दुर्गत्ति होती है। इसलिये
प्रत्यक मनुष्य सेवाधर्म की महत्ता को हृदयगम करना सीखेगा,
तभी उसका जीवन मार्थक होगा। सेवाधर्म का वास्तविक
परिपालन करने से और तो क्या दवता तक भी सन्तुष्ट हो
कर धन्यवाद देते हैं। महर्षी नन्दीपण सेवाधर्म क प्रभावसे
परम-पद बिलामी बने हैं । नन्दीपेणजीने प्रतिज्ञा की थी
कि पाल, पुरा एव युद्ध मुनिकरों की सेवा करके ही अपनी
तपस्या का पारणा करूगा । इस प्रण क अनुमार नन्दीपेगने
साघुसेवा को अपने जीवन का एक पेय पना लिया था।
योग मिलने पर वे निष्काम भाव से सेवाकार्य करने म जुट
जाते । इनक इस हड़तम कार्य की प्रशमा इन्द्रने अपनी
दवममा में की थी । इन्द्र के वाक्य सुन कर किमी मिथ्यावी

देवने कहा-यह पात मानने योग्य नहीं, आप कहें तो
मनदीपेण को क्षण वार में प्रतिमा भ्रए कर आऊँ। इन्द्र की
आज्ञा मिलते ही वह देव जहाँ नन्दीपेण या वहाँ आया।
उसने दो साधु का रूप विकर्षण किया। एक रूप को अति
सार रोग से पीडित कर अगल में रखा, दूसरे रूप से
नन्दीपेण जहाँ अपने सप का पारणा करने की तैयारी कर
रहे थे हाँ आया। कहने लगा कि तुझे यह मालूम नहीं
कि जगम म एक साधु अतिसार रोग से पीड़ित हो मर
रहा है ? और तु खाने को तैयार हुआ।
नन्दीपेण उमी समय पारणा की क्रिया
क्रिया को छोड़ कर
उसक माय उस पीडित मुनि के पाम आय और माधु की
अवस्था को देख कर पहुन दुखी हुए । तत्काल उस साधु
को अपने कन्धे पर पैठा कर नन्दीपेणने गाँव की ओर
प्रयाण किया । मार्ग में अतिसार पीडित माधुन महा दुर्ग
न्धित विष्टा से नन्दीषेण का मारा शरीर खराव कर दिया,
पर नन्दीपेण को उमसे तनिक भी घृणा पैदा न हुई। धे
महृदयना स उमकी सबा म सलग्न रह और अपने और
उसके शरीर को धोकर माफ किया। दवसा मन ही मन
नन्दीपेण के अनुपम सेवाकार्य की सराहना करन लगा
और मोचन लगा कि इन्द्रन जो प्रममा की थी, उससे भी
यह अधिक प्रशसनीय है। अन्त म दवन प्रकट हो कर
अपने अपराध की नन्दीपेण से माफी मांगी और जयपनि
।

करता हुआ वह स्वर्ग में चला गया। इधर नन्दीपेणने
अपनी हदप्रतिज्ञा का परिपालन कर सेनाधर्म क प्रमार से
परमपद प्राप्त किया।
कोई भी मनुष्य सदाचार रत रह कर महपी नन्दीषण
के ममान निष्काम सेवा करता है यह ससार में आदर्श बन
कर सुलभता से परमपद का अधिकारी मन सकता है।
मन्माग-निष विद्वानों की सेवा सत्सग का अच्छा तरीका
है और इसमें वह शक्ति है-जिमक प्रभाव से खल मनुष्य
भी मनु य मन कर आदर्शता की उच्चत्तम सीमा पर पहुँच
सकता है । आज समार में जितने भी महापुरुष आदीवादी
रटिगोचर होते है, उनकी महत्ता और आदर्शवादिता का
मुख्य कारण मत्सग ही है । उन महापुरुषों के सहवाम में
अपना अमूल्य समय यापन करन से नद्रूप अमूल्यरत्न की
प्राप्ति होते देर नहीं लगती और वह समार के मामन महमा
भगमगा उठता है।
किसी वेश्या के पर कोई महात्मा भूल से चले आये।
वैश्पाने उनको स्वागत पूर्वक उच्चासन पर बिठलाया।
महात्मा कुछ बोले नहीं, परन्तु वश्या के हृदय पर उनकी
अमृतमयी प्रशान्त दृष्टि का ऐमा प्रभाव पड़ा कि वह अपने
दुष्करयों का पचाताप करने लगी। कुछ भी कहे बिना
महात्मा सो नहाँ से चले गय, परन्तु अपनी अमीदृष्टि का
जो प्रमाव छोड़ गय, उमके प्रमाप से वश्या चरित्रों का

(१२) त्याग करके मगर मक्ति में लीन हो गई। घोड़े काल का भी सत्सग कितना महत्व रखता है, यह उक्त प्यान्व से समझ में आ मरता है। इस लिय- एक घरी आधी घरी, आधी सों भी आघ । फपीरा मगति साधु की, कटे कोटि अपराध ॥१॥ फपीरा मगति साधु की, नितमनि फीजे जाप । दुर्मति दूर पहाग्मी, देती सुमति पनाप ॥२॥ ८मान्यान्मानय-मान्यजनों का आदर करो। जीवन की सफलता प्राप्त कान ६ लिप प्रत्पक मनुष्प फो प्रथम माननीय पुरुषों के प्रति मद होन की और उनका यथोचित स कार करने की परमावश्यकता है । सम्प तथा चतुर मनुष्य की चातुर्य और शिष्टतामयी मानवता का यही एक ना निदर्शन है कि वह समय पर महापुरुषों का आदर करे । श्रद्धा और विधाम से उनके पवित्र आदेशों का प्रतिपल परिपालन कर। समार के अन्दर यही मानवता पथ च्युत प्राणियों को सन्मार्ग का प्रदर्शन कराती हुई मर्वदा के लिये उदाहरण स्वरूप अनुकरणीय वस्तु पन जाती है-जिस का अनुकरण करक कोई भी व्यक्ति सभ्य एव सरनों की गणना में आ सकता है। विश्व में सम्य तथा चतर मनुष्यों मे ऐसे पुरुषों की मी अधिकतम सख्या है जो माननीय

(९३ )
महापुरुषों का सत्कार कर, उनके पापात्र पनते हुए मम्य,
पतुर और योग्य बन जाते हैं। समगवश चे शनैः शनै
आदरणीय एव मान्य होकर किसी दिन परम पदवी प्राप्त
कर लेते हैं । इसी प्रकार महापुरुषों द्वारा निर्वाचित सन्मार्ग
एवं पवित्र ध्येय का ममवलम्ब और समर्थन करते हुए
उचासन पर अवस्थित होने में भी मिलम्ब नहीं होता। वे
उस अलभ्य उचामन पर आसीन होकर अपने सदुपदेश
प्रदान द्वारा काव्य-च्युत जनता का महा उपकार कर
सकते हैं । माननीय पुरुषों का हार्दिकता से समादर एर
सरकार करनेवाले सपर का कल्याण करते हुए अन्त में
मोक्षपद को भी प्राप्त कर लेते हैं । मोक्षप्राप्ति का यह कितना
सहज मान्य माधन है-जिमको साधारण मनुष्य मी हृदय
गम करके अपने उचित ध्येय की पूर्ति कर सकता है।
जो मनुष्य प्रमाद, या अज्ञान वश गण्य, मान्य
सजनों का आदर करने में फिश्चिन्मान भी अपहेलना करता
है वह किंकर्तव्य विमूढ की माँति पय दूसरों से अनाहत
होता हुमा पथभ्रष्ट हो जाता है और अन्त में दुर्गति के
गम्भीर गर्त में गिर कर अपने कत कुकर्मों का उपभोग
करता रहता है और अपन आपको परमपद की प्राप्ति से
पचित रखता है। ऐसे लोक अपना उत्थान कमी नहीं कर
सकते । बुद्धिमान् मनुष्य सन्मार्ग में कमी प्रमाद नहीं
करवा । वह आदरणीय पुरुषों का योग मिलते ही अपना
--
-
-- ...

(९४)
मय काम छोड़ कर उनकी योग्य परिचर्या एव सेवा-शुश्रुषा
करन में लग जाता है। पुद्धिमान की पुद्धिमत्ता का परि
चायक नमूना यही है कि यह जिवन भी योग्य कार्य है
उन सब का यथाविधि परिपालन करने म तनिक मी प्रमाद
नहीं करता। किमी कारित ठीक कहा है कि
मान्यजनों की शुश्रूपा औ पुण्यकार्य में विद्वलन,
कभी न करते देर सर्वदा रहते है तत्पर तत्क्षण ।
विद्वानों की विद्वत्ता से ही शोभित होती है,
हो न कथचित् ऐसातो वह निस्सार भार ही होती है।
जो विद्वान् मान्यजनों की सेवा, धर्म-कर्म आदि पुण्य
कार्यों में तनिक भी प्रमाद न रख हरममप तैयार रहते हैं
उनकी विद्वत्ता शोमित होती है, अन्यथा उनकी विद्वाना
खाली भार वहन करती हुइ हर समय अभिशापित होती है।
विज्ञ लोग प्रत्येक शुभकार्य में व्यस्त रहते हैं, वे येकार कभी
नहीं पैठते और न अपने नाम के पीछे प्रमादी शब्द लग
पाना पसन्द करते हैं। प्रमादी होना तो मूखों का काम है
जो न केवल इस अमूल्य समय का, किन्तु अपने मानव
जीवन का दुरुपयोग करते हुए प्रत्येक कार्य में आलस्य
फर बैठत है। जिन नियमों का परिपालन करन क लिये
शास्त्रकारोंन हरघड़ी आदेश दिया है, उनक पालन म
आलस्य का आश्रय लकर पुण्यान्वित होने से वचित रहना

- दुर्भाग्य क सिपाय हो ही क्या गकता है। माधारण फार्ग में जब कि आलस्य मनुष्य के लिये पातक है तो मान्यनों की सेवा शुश्रूषा आदि पुण्यकार्यों में आलस्य महाघातक सिद्ध है ही। उक्ति भी है कि 'मालम्यो हि मनुष्पाणा, शरीर स्थो महान रिपु ' मनुष्यों के शरीर में मालस्य ही मारी दुश्मन है जो धर्मकर्म मय का नाश कर देता है । अत प प्रमादयशान्मूडो, मान्यानो मन्यो पया। सनन नरक याति, मृत्यन्ते नात्र सशय ॥१॥ ~~~जो मूह प्रमादव पदि मान्यननों का आदर नहीं करता, वह निधय से मृत्यु क पक्षात् नरक में जाता है, इनमें षछ भी सन्देह नहीं है। इसलिय प्रमादों का परित्याग करफे मनुष्यमान को मान्यजनों की विनीतमाव से सवा शुश्रूषा के माय माथ उनका उचित आदर करना सीखना चाहिये-जिमस मानव जीवन सफल हो। ९ विद्विषोऽप्यनुनय-दुश्मन को भी अपनाओ। मनुष्य को अपना जीवन उन्नत पनाने के लिये सदा नम्रता का आश्रय लेना चाहिये और अपन दुश्मन को भी अपना लेना चाहिये । ननशील व्यक्ति अपने अपरिमित विनय पल से हरएक कार्य में सफलता प्राप्त कर सकता है। जिस साधारण कार्य को अविनीत पक्ति अपनी अविनयता

के कारण माल मपन नहीं पना माना। उममे भी अधिक
दुस्माध्य ण्य कठिनतम कार्य को विनीत पक्ति अपनी
नमता का परिणाम स्वरूप महन ही में सफल बना सकता
है, विनय में यही प्रमावशाली गुण है-जिसरी ममत्र
लम्बन कर व्यक्ति अपन पतित एर अपनत नीपन को
फिर से उसन यनाने की क्षमता रख सकता है । इस प्रकार
पिनयी मनुष्य अपनी लम सस्कृति र विगत मांदा को
पुना विश्व क अमिमुग्व नागृत नपा कार्यान्वित करक अपने
को सुसहकारी, मर्यादिव और कर्मण्यशाली घोषित कर
मकता है। सुप्त एव लमप्राय वस्तु को पुन नागृतावस्था
में लाना यह पिनपता का ही प्रमार है। मीसे शास्त्र
फारोंने विनयगुण को मय गुणों में शिरोमणि कह कर
विनयता की उचता एस मान्यता प्रदर्शित की है। विनय
प्राप्ति का मुरूप माधन विधाम्याम है, जो व्यक्ति रिया
म्यामी है निम्मन्दह वह पिनप से ओतप्रोत है। इसके
विपरीत जो शिक्षित होया हुआ मी अग्निीठ है वह विद्वान्
कहलाने का अधिकारी नहीं है। उसने तो शिक्षाक्षेत्र में
पाँव रख कर, उसको फलक्षित करने का प्रयत्न किया है
और माथ ही अपनी अमानुपिकता मयी अधमता का परि
चय देकर विश्व को उन्मत्तता का दिग्दर्शन कराया है।
पस्तुत अविनीत व्यक्ति अपने व्यक्तित्व से पूर्ण होन है
जिसने शिक्षा प्राप्त फरक विनयवा अगीकार न की हो।

( ९७ )
शिक्षा का अन्तिम ध्येय है-विनयी होना । विनयगुण
प्राप्त करके शिक्षा-क्षेत्र को विशेष ममुन्नत एव अनुग्रहणीय
करना है। ऐसी स्थिति में यदि शिक्षा के माथ माथ पिन
यता न प्राप्त करना, मतिमान्य या मूर्खता के अतिरिक्त हो
ही क्या मकता है। नीतिकारों का कथन है कि विद्या
ददाति विनय-विनय को विद्या उत्पन्न करती है, यह
कथन तभी मार्थक हो मकता है-जब विद्याभ्यामी पिनयी
हो । इमलिये विद्याभ्याम से उत्पन्न होनेवाले दिनयगुण को
अपना कर शिक्षा-क्षेत्र को प्रोजचालित करना मनुष्यमात्र
का प्रथम कर्त्तव्य है।
आज क विपरीत साँचे में ढले हुए विद्यार्थी कितने
उन्मत्त, उच्छृग्वल और अविनीत होते हैं ?, यह प्रायः ममी
जानत है । इनका इम उन्मत्तता एव उच्छृखलता का मुख्य
कारण पाश्चात्य रग में अनुरञ्जित होकर शिक्षा प्राप्त करना
है। एक ओर भारतीयता का गव रख कर, मरी ओर
अविनीत एन उन्मत्त बनानेवाली पाचात्य शिक्षा प्राप्त करना
अपनी रही मही सस्कृति का समूलोच्छेदन करने के लिये
और क्या? यही एक कारण पर्याप्त है। इसको प्राप्त करने की
अभिलाषा मात्र से शिक्षार्थी की न केवल बाह्य, किन्तु
। आन्तरिक मनोमायनाएं इतनी कलुषित एवं मलिन हो जाया
करती हैं कि उम शिक्षा का अध्ययन, मनन एव परिशीलन
७

करने से सांस्कृतिकता और मर्यादा की रक्षा नहीं हो सकती। यह मव पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली का प्रमाव है कि आज यह धर्मप्राण भारत प्रदश धार्मिकता से कितना ही पछात रह गया है। जहाँ प्रत्येक घर में धर्म और सदाचरण का अन- वरत गति से संचार होता रहता था, आज वहाँ अधर्म और दुराचार स जीवन यापन हो रहा है । भारतीय इतिहास के पन्ने उलटने से पता लग जायगा कि हम आज कितने कायर एव हृदयहीन होते जा रहे हैं। जहाँ का बचा यचा धर्म की रक्षा के लिये हंसते सेलत हुए भी अपने प्राणों की पलि दने में सकोच नहीं करता था, आज उसी भारत के पाचात्य शिक्षा शिक्षित लोग मन्मार्ग को फुरूड़ी और धर्मों पदष्टाओं को कूपमडूक की उपाधि प्रदान करके अपने मुख को दुर्गन्धित करन में जरा मी नहीं हिचकने । यह सब भारत के लिये कितनी लझा जनक पात है । वस्तुत शिक्षा ऐसी होना चाहिये-जिमस शिक्षार्थी धर्म पर मदाचार के मत्पथ पर अपना जीवन व्यतीत करता हुआ विनयी वन कर शिक्षा के वास्तविर उद्देश्य को सिद्ध करने म पूर्ण शक्तिशाली हो सके, तभी शिक्षा की उचित उन्नति हो सकती है। प्राचीन काल की शिक्षा कितनी लाभ दायिनी होती थी, हमका अनुमन कुछ इतिहामज्ञों को अवश्य होगा। उम ममय का माहित्य एव कला कौशल आज नाममात्र के लिये अवशेष है। कहा है कि- कमनीय कोमल वह कला, कौशल रहा अप है नहीं। सुन्दर सरस साहित्य का, सधान भी अप है नहीं। यह धर्म कर्म समाज की, कर्तव्यता अय है नहीं। जोधी पुरातन काल में पह,शक्ति भी अप है नहीं ॥१॥ प्राचीन घे गुरुकुल हमारे, अप नहीं अवशेष हैं। विस्मय जनक महोघ का, कुछ भी नहीं लवलेश है। था पूर्व में कैमा व अप, कैसा पना निज वेश है। यों मप तरह से आज यह दयनीय भारत देश है ॥२॥ पाचात्य शिक्षा से कोई विरोध नहीं, मनुष्य को ममस्त विद्याओं का अध्ययन करना चाहिय, परन्तु उनके साथ साध किमी एक विद्या पर आवश्यकता से अत्यधिक आमक्त होकर अपनी प्राचीन विद्या से जिसके आधार पर अपने राष्ट्र की सस्कृति का अस्तित्व अबलम्बित है उमको भूल कर नवीन शिक्षा में रगा नाना उचित नहीं है । नियता पर प्रहार कर उद्दण्डता और उन्मत्तता का पाठ सिखानपाठी नवीन शिक्षा है। नवीन शिक्षा के माथ धर्म, मदाचार व विनयता के पथ को प्रदर्शित करनेवाली उम प्राचीनतम शिक्षा को भो नवीन शिक्षा का एक अंग मान कर, उमका अध्ययन करना प्रत्येक शिक्षार्थी का प्रमुख कर्त्तव्य है । ऐमा करने से ही राष्ट्र या ममाज की समुन्नति हो सकती है उपलता से किमी कार्य की उन्नति होना था अमम्मा (९००) है। धर्म की मूल भित्ति विनयता है, इसके बिना मनुष्य के हुनय म धार्मिक्ता का अफर नहीं ऊगता। जहाँ विनयता है वहीं उत्थान और प्रगति है एव सभी प्रकार का विकास है। विनयता के अभाव में उनति के स्थान पर अपनति एव उत्थान के स्थान पर पतन है। प्रत्येक कार्य में अमफलता के चिह्न प्रथम से ही दृष्टिगोचर हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में अग्निीत स्थल पर धर्मतरु किम प्रकार अकुरित, पवित एर फलित हो सकता है। धर्मतरु को अकुरित और फलित करने के लिये विनय रूपी नीर से सींचने की आर श्यक्ता है । पिनय रूपी निमल मलिल क सिंचन स धर्म रूपी कल्पवृक्ष फलसपन्न होकर यच्छ फल प्रदान कर मकता है। कहा है कि- विनयेन द्रवीभूत, मानम यस्य विद्यते । करमध्यगतास्तस्य, सिद्वय सकला शुभाः॥१॥ -जिम मनुष्य का हृदय नम्रता स पिघला हुआ है उसकी हवली मे मभी कल्याण कारिणी सिद्धियाँ आइ हुई जानना चाहिय । शास्त्रोंन इसीसे आदश दिया है कि 'विद्विषोऽप्यनुनय' शत्रु स भी नन होकर व्यवहार करो। इम आदश को अङ्गीकार करके कई विभूतियाँ परमपद प्राप्त कर चुकी हैं । इमलिये अवशेष प्राणिओं को भी उक्त आदेश का पालन

(१०१)
करते हुए शनुओं के माथ नम्रता का व्यवहार सीखना
चाहिये ।
१० प्ररयापय स्वान् गुणान्-उत्तम गुणों से
प्रसिद्ध होना सीखो।
समार में ऐसा कौन प्राणी होगा जो अपने जीवन को
अधिकाधिक उन्नतशाली बनाने में प्रयत्नशील न रहता हो।
यह तो मासारिक गति-विधि है ही कि-दु माध्य कष्टों को
सहन करक भी अपने को गौरवान्वित कहलाने में अपने
जीवन की सफलता समझना, वस्तुतः ऐमा होना भी चाहिये।
जो मनुष्य अपने जीवन की गति-विधि को न पहिचान
कर व्यर्थ क निस्मार कामों म अपने अमूल्य ममय का
सर्वनाश करता है, अपने जीवन को पतितावस्था में पहुँचाता
है, पशुता एर अमानुपिकता का परिचय दता है और इसी
प्रकार क कई कुकृत्यों से मानवता पर कालिमा पोत कर
अपनी हीनता दिखलाता है, वह मनुष्य कहलाने का अधि
कारी नहीं। वह तो उन मारभृतों में है-जिन्होंने अपने
निस्सार मय कुकरयों से पृथ्वी को अधिक मारवाहिनी वना
रक्सी है । ऐसे मारभूतों का जन्म यदि सप्तार में व्यर्थ
नहीं है, तो और है क्या ? | किसी करिने लिखा है कि-

(१०२) जिनने नरजीयन पा करके, शुभ काम किया न कभी जगमें। जग को लषिक दु ग्वतप्त कभी, उमडी न दया जिनके रग में । भजते न कभी प्रभुनाम यही, करते जग को प्रभुनाम भजो। उनका यह जीवन भूतलपे, अति भार समान हुआ समझो ॥१॥ इमलिय प्राप्त माना जीवन को प्रशसनीय बनाने के लिय समार 7 अन्दर शुभ काम करना चाहिये । समार गत प्राणियों को दुःसी दख कर उनका यथाशक्ति दुख दूर करन का प्रयत्न करना और शुभकार्य करने का प्राणी मात्र से उपदश दना चाहिय-जिसस अन्य मनुष्य मी पृथ्वी क लिये मारभूत न हो मकें। यह सद्गुणी होने का एक सुगम साधन है-निससे मनुष्य अपने जीवन को अधिक उनत एव गौरवशाली यनाने म मफल हो सकता है। गौरवहीन निर्गुणी माना भी उक्त साधनों का प्रयोग करके अविलम्प कार्यान्वित हो माता है । आधुनिक वातावरण में कइ गुणवान् और बुद्धिमान् अपन मुंह से अपनी प्रशमा करने लग जाते हैं। अपने मुंह मियामि बनना यह मूर्खता का या अभिमान का चिर है। । M

(१०३)
कई मनुष्य तो सिद्ध साधक बन करके जनता की आग्यों में
धूल डालत हुए अपने पासण्ड का साम्राज्य सस्थापित
करते है और लम्बे हाथों अपने आपका विज्ञापन दकर
जनता को उगते हैं। क्या अपने मुंह से अपनी प्रशमा के
घोड़े दौड़ाने से किसी की कदर बढ़ सकती है। जो मनुष्य
अपने मुंह से अपना उत्कर्ष नहीं दिग्वलाता और ऊँचा से
ऊँचा कार्य चुपचाप करता है, उसको सारा समार मराहने
लगता है। जो लोग आत्मश्लाघा में मन हैं उनका उलटा
तिरस्कार ही होता है। शास्त्रोक्ति भी है कि " आत्मश्लाघी
पतति परितो धनुते चापमानम् "-आत्म प्रशमा करन
चाला मनुष्य पद पद पर तिरस्कृत होता एव गिरता रहता
है । उसको कदाचित् मुख जनों क द्वारा कुछ सफलता भले
ही मिल जाय, परन्तु विशेषत उमको प्रत्यक स्थान पर
असफलता का ही सामना करना पड़ता है। विद्वान् और
गुणी जनों क मध्य म आत्मश्लाघी मनुष्य को दाल नहीं
गल सत्ती । वह अपन आपकी प्रशमा करता हुआ दमरों
के सामने गुणवानों की अनुचित निन्दा करने में नहीं
चूकता, परन्तु अन्तत. अपना मेद खुल जाने पर विद्वानों
के मामने उस नतमस्तक होकर लजित होना पड़ता है।
एक समय राजा भोजने यह आज्ञा घोपित की कि जो
कोई पण्डित नवीन श्लोक बना कर लावेगा उसको एक
लक्ष रुपया मिलेगा। राना की उज्ज्वल की िक साथ

। 1 (१०४) यह आना चारों ओर फैल गई। कई विद्वान् नया श्लोक बना कर लाये और पुरस्कार लेकर चले गये । धारानगरी से कुछ दूरी पर शवजय' नामक करि पण्डित रहता था-जो प्राय राजा भोज की समा क रत्न कालिदास से ई रखता था । कवि शतजय में दूसरों की निन्दा करने का भारी दुगुण था । शतजयन आत्मश्लाघा और परनिन्दा से युक्त एक श्लोक बना कर अपन शिष्य के द्वारा राजा मोन के पास पहुँचाया कि- अपशब्दशत माघे, भारवी च शतम्रयम् । कालिदामे न गण्यन्ते, कविरेक' शतजय ॥१॥ -माधकाव्य म एकमो अपशब्द हैं, मारवी कनि के काव्या में वानमो अपशब्द है, और कालिदाम क काव्यों म नो इतन अपशब्द है कि जिनकी गिनती नहीं हो सकती । दुनिया में करि तो एक शतजय ही है जिसकी काव्य पदावली म एक भी अपशब्द नहीं है। शिष्य इस श्लोक को लेकर जा रहा था कि देवयोग से मार्ग म कालिदास मिल गय । कालिगमने पूछा कि तुम कौन हो। शिष्यन कहा-मैं कवि शतजय का विद्यार्थी हूँ | कालिदाम-तुम्हार गुरुनी आनन्द में तो है । शिष्यने कहा-जी हाँ, पड़े आनन्द में हैं। कालिदास-यह हाथ में किमका पर है । शिष्य-गुरुजीने यह श्लोक बना कर (१०५) राजा भोज को देने के लिये भेजा है। कालिदाम-जरा दिखलाना। शिष्यने कालिदास को पत्र दिया । कालिदास उस श्लोक में अपनी निन्दा देस कर बोले कि तुम्हारे गुरुने श्लोक अच्छा पनाया है, इसे दख कर राजा भोज एक लक्ष रुपया इनाम देंगे । परन्तु इसमें एक त्रुटि रह गई है, वह सुधर जाय तो राजा माहब बहुत प्रसन्न होंगे । शिष्यने कहा-वह गुटी कृपाकर आप ही सुधार दीजिये । कालिदामने 'अपशब्द ' क स्थान पर 'आपशब्द' बना कर पर दे दिया । शिष्यने कहा कि आपने पड़ी मारी रुपा की। अपना शुमनाम कहिये, म आपकी कृपा के लिये अवश्य गुरुजी से निवदन करूगा, जिससे व आपक पवित्र दर्शनों का लाभ ले सकेंगे। मरलाशयी भोल शिष्य की वाणी से कालिदास मन ही मन मुमकराये और कुछ न कह कर चल दिय । शिष्यने राजममा में जा कर राजा भोज की सेवा में वह श्लोक ममर्पण कर दिया और कहा कि यह श्लोक काम शतजयने मर द्वारा मेजा है। राजा भोजने उसे उठा कर पढ़ा और मनन किया कि- आपशब्द शत माघे, भारवौ च शतत्रयम् । कालिदासे न गण्यन्ते, कविरेक शतजयः ॥१॥ -आप-जल क सौ नाम तो माषकमि को ज्ञात हैं, तीनसौ भारवी कवि को और कालिदास को तो जल के इतने -

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म
शरसमा की ममस्त बात कह दी। कवि शवजयने आवेश
अत्यन्त लजिन हो कर उमी दिन अन्य दश में चला गया।
नीतिकार कहत है कि प्रख्यापय खान्गुणान् । प्रत्येक
(१०६)
नाम शात हैं कि उनकी गिनती ही नहीं की जा सकती।
शतनय को तो केवल एक आप शब्द ही याद है, इसके
अतिरिक्त जल का पर्याय पाथी एक भी शब्द याद नहीं है।
ममा म उपस्थिन ममी पण्डित श्लोक को सुन कर
कवि शतजय का उपहास करने लगे। स्वय राजा भोज को ।
भी हंसी आ गई। यह मय दख कर शिष्य विस्मित हुआ
और लञ्जा के मार यहाँ से चल दिया। गुरु के मामने
में आकर पूछा-मार्ग मिलने वाला व्यक्ति कौन था,
शिष्यने डरते हुए कहा-गुरुदर बहुत पूछ परछ करन पर
भी उमन अपना नाम नहीं बताया और हमते हुए चल
दिया । शतजय को विश्वाम हो गया कि कालिदाम के सिवा
दूसरा कोई होना सर्वथा अमम्मा है। शतजय मन ही मन
कहन का तात्पर्य यही है कि आत्मप्रशमा एवं दूसरों
की निन्दा करनेवाला मनुष्य अवश्य तिरस्कार पात्र होता
है और पश्चात्ताप के माथ लजित होकर उसको कवि शत
जय के समान आखिर परेशान होना पड़ता है। इसी
मनुष्य को आत्मश्लाघा से नहीं, किन्तु अपन उत्तम गुगों
से प्ररपात होना चाहिय । यदि सद्गुण युक्त आत्मा होगी
तो यह विश्व के चारों ओर सय प्रकाशमान हो जायगी
Aye

(१०७)
सब कोई उमकी उज्ज्वल कीर्ति का गुणगान करने लग
जायेंगे। जो लोग आत्मप्रशसा करने में नहीं हिचकते,
उनकी मारी अधमता है। आत्मप्रशमा करके वस्तुतः
मनुष्य अपनी पतिवावस्था के और भी निकट जाकर अपने
आपको उममें गिराने का प्रयत्न करता है । मनुष्य अच्छा
तभी कहलावेगा जब कि मारा समाज उमको सराहायगा।
सियार अपने मुंह से अपने को सिंह घोषित करके यदि
जगल का राज्य करना चाह तो क्या कर सकता है, यही
बात आत्मश्लाघी के लिये है। इसलिये अपने जीवन को
वास्तविक उन्नत और गौरवशील बनाने के लिये मनुष्य को
अपने गुणों स प्रशसित होना चाहिये, अपने मुह अपनी
प्रशमा करके नहीं।
११ कीर्ति पालय-अपने यशवाद की रक्षा करो।
मनुष्य जब निष्काम भाव से कई साधनों में सलग्न
रह कर उन माधनों द्वारा समाज व देश का कल्याण करता
है, तभी वह कीर्तिशाली और यशस्वी कहलाता है । इसी
प्रकार जो पुरुष अपन पूर्व सुकत पुण्य क प्रभाव से सासा
रिक दासों का ममूल विनाश फरक अक्षय एर असीम
परमानन्द की प्राप्ति के लिये सासारिक वस्तुओं क साथ
समार का परित्याग करता है और पुन' पुनः जन्म मरण

(१०८)
की अमद्य दु.ग्य परम्परा से बचने के लिये विशुद्ध सयम पथ
को अगीकार करता है, तब वह मचा कीर्तिशाली होता है।
ऐग पुण्य-पुरुष की उज्ज्वल कीर्ति मदा अविचल रहती हुई
उमका गुणगान कराता रहती है। विश्व को आकर्षित कर
यशस्वी पुरुष की कमनीय कीर्तिपतामा यापचन्द्रदिवाकरौ
फहराती हुई उमको अमरत्व प्रदान कर यश कार्य मे जीवित
रखने को पूर्ण क्षमता रख सकती है। इतनी मजीव कल्याण
कारिणी क्षमता कीर्ति रूपी गुणरत्न क अतिरिक्त अन्य
गुणों में होना मर्वथा अमम्मय है।
कीर्ति मनुष्य को महज में नहीं मिलती। इसकी प्राप्ति
पूर्व सचित पुण्य से होती है । जो मनुष्य सुसस्कत और पूर्व
सचित पुण्य स युक्त है, उनका माधारण कार्यों में भी यश
मिल जाता है और जो असम्झारी ए. पुण्यहीन हैं उनको
कठिनतर क्टसाध्य काय करने पर भी यश क स्थान पर
अपयश का बोझा ढोने को मिलता है। उस अपयशक
बोझ को वहन करनेवाले व्यक्ति भी समार की बेटी पर
अपने पार्थ की बलि करके धीर धीरे इमी लोक में पुण्य
सचय कर लेते हैं। उनके प्रभार से वे एक दिन सुसस्कृत
हो कीर्तिशाली पुरुप क ममान यशासपन्न वन कर समार
के सामने उमल आदर्श स्थापित करते है । उनको यगो
दुन्दुभी का मधुर नाद दिग् दिगन्त में गूज कर विश्व को
आकर्षित कर सकता है।
।
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H

(१०९)
निष्काम भावना की माधना यद्यपि दुर्लभ है, परन्तु
पशास्त्रिता के लिय वह अनिवार्य है। निष्काम मारना सत्पु
कपों को आर्शिता का प्रतीक है, इसलिय कीर्तिशाली पुरुष
को निष्फाम मार से विश्व का उपकार करक कीर्चि सवय
करना चाहिये । निष्काम भार से कोई भी कार्य करने पर
मनुष्य अवश्य यशस्वी एव गौरवान्वित होता है । इसी
प्रकार निरीह मात्र से प्रमारित होकर जो तप, नप, सका
आदि सनाचार विषयक मदनुष्ठान किय जात हैं व लोको वर
में फलदायक होन हैं। वस्तुत क्रिया करना ही हमारा
कर्तव्य है, उसका फल तो म्धत प्राप्त हो जाता है। कर्म
ण्यवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन'-क्रिया करने में तुम्हाग
अधिकार है, फलन्छा में नहीं । फलप्राप्ति की कामना करन
से अधिक फल प्राप्त नहीं होता, किन्तु फलप्राप्ति की कामना
ही फलप्राप्ति के माधन को विगाद दती है। सिद्धान्त
कारोंन कहा मी है कि जो कामना रूपी शल्य से रहित है
वही वस्तुत विश्व में कीर्तिशाली बन सकता है। उसके
जीवन की वास्तविक मफलता तमी हो सकती है जब कि
वह शुद्ध एव सुस्थिर चित्त से धार्मिक मदाचार विषयक
शास्त्र-निर्दिष्ट नियमों का अनवरत गति से परिपालन करता
रह, अन्यथा उममो कुसस्कार, या कुसग वश अनुचित करयों
द्वारा कलदित करना-मानवता को अधमता की पराकाष्ठा
पर पहुँचाना है। माथ ही अपनी मानवता के साथ विचा-

॥ । (११०) सघात करक विश्व के सामने उमको पतित बनाना है। संसार फललित जीवन को सहन नहीं कर सकता । जो मनुष्य अपनी उज्वल कीर्ति पर अनौचित्य का अमिट धन्धा लगा देता है, वह ममस्त विश्व की स्नेहमयी दृष्टि से गिर कर अति सुदूर पतितावस्था के गहरे गड़े में लड़कता हुआ अपन कलकित जीवन को व्यतीत करता करता समार से कूच कर जाता है, बाद में उसके अनौचित्य का वह काला धब्बा निन्दनीय कुस्मारक का रूप बन कर उमक निन्दनीय जीवन की घोषणा करता रहता है । कहा भी है कि- पुण्य-पुज के ही प्रभार से, मिलती है शुभ कीर्ति महा। सकर शास्त्र तत्वार्थ विज्ञ, सन्मुनियोंने यह वचन कहा। पर जो अनुचित कृत्यों से, निज कीति कलकित करता वर अधम पुरुष अवनति के, गहरे गड्ढे में गिर भरता है ॥१॥ इमलिये प्रत्येक मनुष्य को अपनी उज्ज्वल कीचि को मस्कृत्यों द्वारा विशेष रूप से प्रोयल करके उसी सप प्रकारसे रक्षा करना चाहिय-जिमस ससार क मामने वह प्रशसनीय, अमिट और चिरम्मरणीय बनी रहे । कहा धत है कि- दानवता की आड़ मक्पा मानवता का मोह हुई क्षुधित और पिपासित जनता को अपनगरा कर आन्तरिक वेदनाओं से भरी हुई उन पर कुछ विचार न कर, उन पर दया नहीं लाह की जिनका जग में यश नहीं, वे नर क्या जीवन्त ? जो नर यश लेकर आथमें, रवि पहिले ऊगन्त ॥१॥ १२ दुःखिते कुरु दयाम् दुःखी जीवों पर दया लाओ। यह तो प्राय सब को मालूम है कि प्राणी जब ससार में जन्म लेता है तप कई योनियों में मटकता हुआ अनेका नेक दुखों से सन्तप्त होकर अलभ्य मानव जीवन में आता है।इतनी यातनाओं के सुगत लेने बाद भी प्राणी के अन्त पटल पर जय मानवजीवन का मदमय नशा छा जाता है, तब वह अपने सामने किसीको कुछ नहीं समझता । अनेचे सर्वेसर्वा मान कर हीन दीन जनता को अपने अनुचित कारों क पल सन्तप्त करने कराने में अपने जीवन का मात्र लक्ष्य ममझ बैठता है । न्याय या अन्याय समोर लोगों का रुधिर चूम चूम कर द्रव्योपार्जन द्वारा इन्द्रियों को तृप्त करना उमक लिये सर्वश्रेष्ठ रस कतार रूप से परम कर्तव्य नियत हो जाता है । पर आई भाली जनता की आँखों में धूल डालग इन उसक N

( २१२)
विश्वासघात करक अपना स्वार्थ माधन करना मानवजीवन
का लक्ष्य कहा जा सकता है, कदापि नहीं । वास्तव में
क्षणिक मद में मम्न होकर ऐमा मानव कुनीति के सुह
पाश में अपने आपको फैमा कर वैयक्तिक रूप से खुद के
साथ विश्वासपात करता है और इससे यह अमार सुग्यप्सौरम
का अदन करक दुर्गति के गर्भ में पहुंच कर अमय वेदनाओं
का शिकार हो, महान् ऋष्टों का सामना करेगा ।
विश्व की क्षणिक तड़क मड़क और कार्योंघ से अपने
को न बचा करके मानव अपने अलभ्य जीवन का दुरुपयोग
करने में अविचारशीलता का परिचय देता है। माथ ही
पूर्वसुमत से प्राप्त प्रभुत्व का भी मदुपयोग न करके विश्व क
सामने अपने को मदान्ध घोषित करता है । राजसी प्रमुख
एव वैभव स उत्पन्न मद के वशीभूत होकर य निर्दगी मानव
मामारिक क्षेत्र में इस तरह विवरत है कि इनक द्वारा कोई
अशक्त या अमहाप पुक्ला भी जाय तो इनको कुछ पता
नहीं लगता । ये अपन नशे में चूर होकर अमिमान भरे
शब्दों में वार्तालाप करते और असहाय अनाथों के साथ
दुर्व्यवहार करक उनका उपहाम करने में लक्षित एव सकुचित
नहीं होते | लिखा भी है कि-
प्रभुता पाकर कौन नहीं,
करता है जगती में अभिमान ।
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दीन हीन औ पतित जनों का कभी न रहता उनको भान । निर्दयता से दुखीजनों को पना दुखी पतलाते शान, हन्त ! आज भारत का इनसे कैसे शेप रहेगा मान १ ॥ १॥ समार में मदभरी प्रमुता मनुष्य को अभिमान और दुर्वासनाओं का कलुपित केन्द्र बना देती है-निमसे वह दीन, हीन, पतित और दुःसी जनों का ध्यान न रख कर अपने अनुचित अधिकारों से उनको विशेष दुखी बना कर अपने को मच्चा गौरवशाली एव प्रभुत्व-सपन्न समझता है, यह उसकी मानवता नहीं, पशुता है । इस पशुता से तो सभ्य ममाज में यही माना जायगा कि ऐसे निर्दयी जनों का संसार में जन्म न होता तो अच्छा था। इन मदोन्मत्त पुतलों को यह भी ध्यान नहीं कि समार से कूच करते समय प्रसुता एव राजसी वैमव क्या साथ आवेगा १, अपनी उद्धताई से ये लोग इम अमिमान में चूर रहते हैं कि हमारी प्रभुता, राजसी वैमर और सुख मामग्री को छीन लेने में या बाधा डालने में कौन साहस रखता है, ये तो हमारी अविचल सपत्ति है और इस पर अपना कोई अधिकार नहीं जमा सकता । इसी मदोन्मत्तता में ये लोग मौत को 4 H, मी भूल जाते हैं और अपने को अगर अमर मान कर मृत्यु के माथ ठठोली करते रहते हैं। अगर मृत्यु का स्मरण हो आता है तो भी ये अपनी एठाई को नहीं छोड़ते। इन विचारों को यह पता नहीं कि समार में पड़े पड़े चक्रवर्ती मी मृत्यु के मामने कुछ जोरजुल्म नहीं कर मके तो औरों की क्या गिनती है । मृत्यु ममदर्शी है, उसके लिय दीन, घननान, राजा, सम्राहा चक्रपर्ची और पशु आदि मर प्राणी एक ममान हैं। उमकी किसी पर महरवानी नहीं है। उसक सामने किमी का अमिमान नहीं चल सकता। समार में ऐसा न कोई उपाय है और न ऐसी कोई विद्या या न कोई ऐमी शक्ति है जो प्राणियों को मृयु से पचा मके। उत्तराध्ययन सूत्र के १३ वें अध्ययन म लिखा है कि- जहेह सीहो व मिय गहाय, मच्च् नर नेह हु अतकाले। न तस्स माया पिआ व भाया, कालमि तम्मि महरा भवति ॥ २२ ॥ -जैसे सिंह मृग को अपने अधिकार में ले लेता है उस ममय मृग का कुछ जोर नहीं चलता । उसी तरह जन मौत आकर खड़ी हो जाती है तब माता, पिता, भाई आदि कोई भी मौत से पचा नहीं मकत । चाहे कोई महा- साम्राज्यशाली हो, चाहे मम्राट् चक्रवर्ती हो और चाह अतुल बलधारी सुरेन्द्र हो, मौत के सामने मच शक्ति और माहम ।

- हीन हो जाते हैं। मौत के आते ही सारे साम्राज्य, वैमर, मकान, महलात, मण्डार, एश आराम, माई, बन्धु आदि सम्बन्धों को छोड़ कर परलोक में अकेले ही प्रस्थान करना पड़ता है। कहा है कि- कचन के आसन वासन सय कंचन के, कचन के पलग अमानत धरे रहे। हाथी हुशालन में घोड़े घुड़शालन में, चन्द जामदानन में कपड़े पड़े रहे ।। बेटा बेटी पट्ट अफ दोलत का पार नहीं, जौहरात डिव्यों पर ताले ही जड़े रहे। च देह छोड़ कर जय लम्बे हुए प्राण तो, फुलके कुटुम्पी सप रोते ही ग्वडे रहे ॥१॥ परमर का माथी तो सत्कर्म-धर्म ही है और धर्म का वास्तविक रूप तथा आन्तरिक तथ्य-तर प्राणीमान पर दया रखना है। असहाय एवं शक्तिहीन प्राणियों की महायता करफ उनकी आत्मा प्रसन्न कर दना यही गाम्न विक दयाशीलता है । दुःखी और पीड़ित जीवों को विशेष दुःखित बना करक दयालुता की डींग हाकनवाला व्यक्ति न कमी दयाशील कहलाता है और न उमफ ऐसे कर्म को दया कहा जा सकता है। दयालु पुरुष की अन्तरा-मा की अभिव्यक्ति, उमरी आत्मा पर पड़ जाने का नाम ही दया है। जब तक मनुष्य आत्मसर्वभूतेषु' के मात्र अपने ( अन्तःपटल पर अक्ति करके उन्हें कार्य रूप में परिणत नहीं करता, तब तक यह दया के माहात्म्य का वास्तविक अर्थ समझने में अनमिन है। इसी अनभिज्ञता के फल स्वरूप यह 'दया' से सर्वथा वश्चित रह कर अपने को अधर्मी, पापी, दुष्ट और दुराचारी पनाने में देर नहीं करता। जो मनुष्य दयाहीन है-निर्दयता पूर्वक पीड़ितों पर प्रहार करता है और धर्म के अमली पत्र को भूल कर वैभव एवं प्रभुता के नशे में उन्मच होकर हिमायचि पर तुला रहता है.। वह अधर्मी, पापी, दुष्ट और दुराचारी नहीं तो दूसरा क्या कहला सकता है । अपने इन्हीं दुष्कर्म द्वारा वह माननजीवन का दुरुपयोग करक दुर्गति का पात्र पनता है। अतः प्राणीमान पर दया रखना यह धर्म सनातन है। तुलसीदासजी कहत हैं कि- दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान । तुलसी दया न छोड़िये, जय लग घट में प्रान ॥१॥ वस्तुतः दया धर्म की वास्तविक जड़ है। जिस धर्म में दया नहीं पह धर्म नहीं । वह तो पोल कल्पित ससार की आँखों में धूल डाल कर उदरपति मात्र का पासण्ड है। किमी मी सप्रदाय या धर्म में प्राणियों का हनन करने या उनकी आत्मा को कष्ट पहुंचाने का आदेश नहीं दिया। प्रत्युत लिखा है कि- (११७) अष्टादश पुराणेपु, व्यासस्य वचनद्वयम् । परोपकारस्तु पुण्याय, पापाय परपीडनम् ॥१॥ -अढारह पुराणों में व्यासजी के सार युक्त केवल दो वचन हैं-एक वो परोपकार के समान कोई पुण्य नहीं और दूसरा किमी को कष्ट पहुँचाने के समान कोई पाप नहीं। इसी प्रकार इस्लामों के धर्मग्रन्थों में अहिंमा काम्वरूप दिखलाते हुए कहा है कि मुसलमान वही है जमान और हाथ से किसी को दु ख न पहुँचाये । ईमानदार व्यक्ति वही है जिमसे सब की आत्मा प्रसन्न रहती हो। ईमाइयों के इझील में कहा है कि-तू किमीको मत मार। कवि शेखमादी का कहना है कि 'जेरे पायत गर, विदानी हाले मोर। हम चो हाले तस्त, जेरे पाये पील'- तुम्हार पान के नीचे दबी चींटी का वही हाल होता है, जो तुम हाथी के पॉर के नीचे दव जाओ तब तुम्हाग हो । बौद्धों के धम्मपद-ग्रन्थ में लिखा है कि 'सब मनुष्य दण्ड से डरते हैं, ममी मौत से भीत होते हैं, ध्यान रखो तुम भी उनके ममान हो । इसलिये किमीकी हिंसा न करो और न किसीका सहार होन दो। जो हिंसा करता है, मिथ्या मापण करता है, जो दूसरों की चीज उसके दिये पिना अपहरण करता है, वह इस लोक में अपने हाथ से अपनी जड़ खोदता है। जैनसूत्रकार कहते हैं कि- सव्ये वि सुक्खकरसी, सव्वे विहुदुक्रवभीरुणो जीवा। मव्वे वि जीवियपिया, सव्ये मरणाउ यीहति ॥१॥ -~मय जीव सुख को चाहते हैं, दुख से सब प्राणी डरते है, मर्म जीरों को अपना जीवन प्रिय है और प्राणी मात्र मरण से डरते हैं। इमलिये आस्मार्थी और सुखा मिलापी मनुष्यों को जीप मात्र की रक्षा करना मीखना चाहिये, सुख प्राप्ति का यही मार्ग है । कबीरजी कहते हैं कि- दया दिल में राखिये, तू क्यों निरदय होय। साँइ के सब जीव है, कीरी कुजर दोय ॥ १॥ बकरी पाली ग्वातु है, ताकी कादी ग्वाल । जो पकरी को खात है, तिनको कौन हयाल ॥२॥ गला काटि कला भरे, क्रिया कहै हलाल । सास्य लेग्या मागमी, तप होसी कौन हाल ॥३॥ इस प्रकार समी मत मतान्तरों के धर्मग्रन्थ पुकार पुकार कह रह हैं कि 'दुखिते कुरु दयाम् ' दुस-पीड़ित माणियों पर दया करो। यही अनुपम 'आदश प्रत्येक धर्मा पार्यन अपने अपने अनुयायी मक्तों को देकर मोक्ष प्राप्त भरने का सुगम परल पथ प्रदर्शित किया है। जीवों पर यादृष्टि रखन का भाव उत्पन्न होना मनुष्य के लिये परे सौभाग्य की बात है। दयामार पैदा होना मानो शुभ दिवस की किरण उदय होना है। इसी किरण क प्रभाव से .

नुष्य अपने मानवजीवन को सफल करता हुआ जीवन
बदण से मुक्त होता है । इसलिये अहिंमा मोक्ष का
गरण मानी गई है । अहिंमा परमपद पर अधिष्ठित
ने को जी है, फिर क्यों हतभाग्य मानर अपने द्वारा
सरों की आत्मा को कष्ट पहुँचा कर पाप का मार
होता है ? जो यहाँ मी दुःखदायी है और परलोक में
। वह यह नहीं सोचता कि मैं जिम प्रकार प्राणी को
कष्ट दे रहा हूं या मेरे कुकृत्यों से उसकी आत्मा को
वेदना हो रही है, यदि उसी प्रकार यह मुझे कष्ट पहुँचाने
और मेरी आत्मा को वेदनाओं से व्यथित चना दे तो मेरी
स्या अवस्था होगी?, ऐमा क्यों न ममझने लगा । यदि
वह इस प्रकार मनन करके अपनी मानसिक शक्ति को
परिवर्तित कर दे, तो उसे किसीको कष्ट पहुंचाने की जरूरत
नहीं रहे । किन्तु वह पापकर्मा है, पाप मारवाही है, अज्ञान
के अन्धेरे में अन्धा होकर वह चारों ओर फिरता है परन्तु
उमको दया का मार्ग दिखाई नहीं देता। वह अज्ञानी है,
बान क 'पिना दयामाव उत्पन्न होना कठिन है। धर्मशास्त्र
कार महर्षी कहते हैं कि-
पढम नाणं तओ दया, एवं चिट्ठइ सव्यसंजए।
अन्नाणी किं काही, किंवा नारि सेयपावग ॥
-मनुष्य मात्र को सर्व-प्रथम ज्ञान प्राप्त करना

।
(१२०)
श्रेयस्कर है। शान के मिना हित, अहित, मद, अमद आदि
फा मार्ग नहीं सझ पड़ता। इसी प्रकार जीप, अजीव का
पता नहीं लगता। जीवाजीव को जाने बिना दया का
पालन नहीं हो सकता। शानी पुण्य, पाप, पन्ध, मोक्ष के
रहस्य को मलीभाँति मगझ फर दयाधर्म का वास्तविक
परिपालन कर ममता है। प्रशाणी फल्याण कर और
अकल्याण कर मार्ग को नहीं जान पाता।
समार में मान मर्वोचम यस्तु है । इमीसे विनप,
योग्यता, धन आदि गुणों की प्राप्ति होती है। शान ही धर्म,
सुख, आयरु, अधिकार और वर्ग अपवर्ग का प्रदाता है।
इमको आग जला नहीं मानी, चोर धुरा मकता नहीं,
राजा या डार लूट गफत नहीं और इसमें दीमक लग
सकती नहीं। पुत्र, स्त्री, माई, बहिन, माता, पिता, दौलत
आदि समी साथ छोड़ दत है, पर मान कभी माथ नहीं
छोड़ता। ज्ञान के बिना मनुष्य सींग पूछ रहित पशु से मी
निकम्मा है । ज्ञान से ही मनुष्य मनुष्य कहाता है । इमलिये
संसार में ज्ञान की तुलना म कोई वस्तु नहीं। शासकार
कहते हैं कि-
नाण मोहमयधारहरी सहारसूरुग्गमो,
माण दिवअदिइघडणा सकप्पकप्पडुमो ।
नाण दुज्जयकम्मफुजरघडा पचत्तपचाणणो,
नाण जीवअजीयवत्थुवित्थरस्सालोयणे लोअण ॥१॥

(१२१) -झान मोह रूप महा अन्धकार की श्रेणि का सहार करने में उदीयमान सूर्य के समान है। दृष्ट, एव अदृष्ट की इष्ट घटना को प्राप्त कराने में कल्पतरु के समान है। दुर्जय फर्म रूप हाथियों की घटा का विनाश करने को सिंह के समान है और जीव, अजीव आदि वस्तु-विस्तार का वास्त- विक स्वरूप दिखाने के लिये दिव्य नेत्रों के समान है । मानव शरीर निस्मार और नम्बर है-इसका सदुपयोग परोपकार, दया आदि सत्कर्मों से ही होता है। हिंमा, झूठ, चोरी, दुराचार, लोम आदि दुष्कर्मों द्वारा मान-शरीर का दुरुपयोग होता है । जीते जी यदि किसी मनुष्यने दया, परोपकार आदि सत्कर्म कर लिया सो कर लिया, अन्यथा मरने के समय या उसके बाद कुछ नहीं हो मगा। फिर तो कत दुष्कर्मों का फल ही भोगना पड़ेगा । अत सत्कर्म करने में विलम्ब करना अच्छा नहीं । कहा है कि- अजरामरवत् माज्ञो, विद्यामर्थ च चिन्तयेत् । गृहीत इव केशेषु, मृत्युना धर्ममाचरेत् ॥१॥ -बुद्धिमान् मनुष्य अपने को अजर और अमर समझ कर विद्या और धन का सचय कर । तथा मृत्यु मेरी चोटी पकड़े हुए है यह जान कर परोपकार, दया, दान आदि धर्मकत्य करे । न मालूम किम समय मृत्यु आक्रमण कर ले । अत: जो कुछ पुण्यसचय करते पने, वह कर लेना चाहिये, मृत्यु के आ जाने पर कुछ नहीं होगा।

- (१२) पुण्यसचय करने का सुगम माधन जीवमात्रको आत्म यत् ममा कर, उन पर दया करना है। जीते जी यह जीवन का सदुपयोग हो जाय तो अच्छा है। अन्यथा यह शरीर पशु से भी गया वीना है ।पशु नो जिरिवारम्या में मोविश्व का उपहार करते हैं, और माने पाट भी अपने चर्म और अस्थियों द्वारा विश्व का महान् उपकार करते हैं। किसीका माम, किमीका मन, किमीका गोयर, किमीके केश, किसीक दाँत, किसी के हाड़, किमीके लोवन और किमीके आमन! इस प्रकार, पशु के शरीर की ममी वस्तु ससार के काम में आती है। मरने के पश्चात् मानव शरीर तो जलान, या दफनाने क अतिरिक्त दूमर किमी काम में नहीं आता । कहा है कि- हाथीदांत के खिलौने जगत के आयें काम, वाघों का वाघम्बर महेश चित लायेगा। मृगन की छाल को विछावत हैं योगीराज, वृषभ फा धर्म कछु अन्न निपजायेगा । साभर के सटके तो बाधत सिपाही लोग, गैडे की दाल राजा राना मन भायेगा। नेकी और पदी दोही सग चले मियाराम, मनुष्य का चर्म कछु काम नहीं आयेगा ॥१॥ ऐसी परिस्थिति में मानय यदि अपने हृदय में दया " अप्रिय लगता है, (१२३) धारण करके परोपकार न करे, तो वह फिर किम काम का। मनुष्य को चाहिये कि अलभ्य मानव-शरीर से अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, आदि सनियमों का परिपालन करते हुए प्राणीमात्र की रक्षा करे। सब से रसा उन्नत और मत्फल प्रदायक सर्वोत्कृष्ट धर्म दया है। सभी जीव 'सुसी रहना चाहते हैं, दुखी होना कोई नहीं चाहता। विष्ठा में उत्पन्न कीड़े को और स्वर्ग में स्थित सुरेन्द्र को जीवन आशा पराबर है । मरना प्राणिमात्र को दुख सन्तप्त होकर कोई मरना नहीं चाहता । शास्त्रों में अनेक विषयों में मत मेद है, पर दयाधर्म के विषय में सब एक मत हैं। इमलिये जो मनुष्य प्राणीमान को आत्मवत् समझता है, हर तरह उनको शाता पहुँचाता है और दुखियों को यथाशक्ति सहायता प्रदान करता है वह स्वर्गगामी है । जो अपनी रमनेन्द्रिय की लोलुपता से मूक प्राणियों को मार कर उनका मास मक्षण करता है, उसके लिये महर्षी लिखते है कि- परदोहबद्दवाडण, दग्गहग्वत्तवणणपमुहाइ । परघणलद्धोजो कुणइ, लहइ सो तिकावदुक्रवाइ ॥१॥ -परधन का लोभी हो जो मनुष्य दूसरों का द्रोह करता है, किमीको दुख या बन्धन में डालता है तथा चोरी प्रमुख दुष्कृत्य करता है, वह मर कर मवान्तर में (१२४) नरक आदि योनियों के महा भयकर कर भोगता है। किगी सायरने लिखा है कि- काटा किसीको मत लगा, जो मिस्ले गुल फूला है तू। हक में तेरे तीर है, किस यात पर भूला है तू ॥१॥ बिना अपराध यदि किसीको कष्ट पहुंचा कर कांटा चुमोया जाये तो परमर म वह काटा ही तीर वन कर उमका बदला लेता है। कर्मों का फल चाहे अमीर हो, चाहे गरीब, मन को बराबर भुगतना पड़ता है। इन्मान को यह पात कभी भूल जाना नहीं चाहिये । निबल और हीन दीन जनों को कष्ट पहुँचाना महान अनर्थ दायक है । यदि किमीका मला, या उपकार न करते बने तो उनका चुरा करक अपनी शक्ति को र्पित कर डालना अल्छा नहीं। शक्ति और वैभवशाली हो करक गरीबों को सतान, या उनको किसी प्रकार का कष्ट पहुंचाने में अपनी शक्ति और वैभर का अपव्यय एव दुरुपयोग होता है जिसका अनर्थकारी मयकर परिणाम हुए बिना नहीं रहता। पीड़ित एव अकारण व्यथित अ-त करण से गरीय लोग ऐमी आहे निकालते हैं-जिनसे व्यथित करने बालों को अहित अवश्य होता है। उनकी दुखमयी आहे उनको सतानेवालों से बदला लेती है-य आहे कभी निष्फल नहीं होती। A . - (१२५) शक्ति और वैभवशालियों को चाहिये कि गरीबों को न सताते हुए उनकी आहों से अमिशापित न होवें । अन्यथा जर मरे हुए दोर की खाल से कठिन लोहा मी भस्म हो जाता है, तो मनुष्य उसके सामने कौनसी वस्तु है।। तुलसीदासजी कहते हैं कि- तुलसी आह गरीप की, फपहुँ न निष्फल जाय । मुए दोर की ग्वाल से, लोह भस्म हुइ जाय ॥१॥ आधुनिक विषम वातावरण के स्वार्थमय सुदृढ़ पाश में फँदै हुए आज के घनिक एव वैमवशाली अहिंमावाद के अनुयायी हो कर भी अपना स्वार्थ सिद्ध करने के नाते गरीब दीन, हीन एव पतित लोगों का रुधिर जूम कर परमोत्कृष्ट अहिमावाद को कलङ्कित करते है, यह अहिंसा वादियों के लिये क्विनी लजा जनक पात है। एक ओर अहिमा के सरक्षक एव पालक होते हुए घातक के हाथों से कुछ पैसे के बदले पफरा छीन कर उसके कान में अमरकदी डलवाते हैं और दुनिया के सामने अपने को करुणाई-हृदयी घोषित करते हैं। पश्चात् उसकी कुछ भी सार समाल नहीं करते और न उसका दूसरों से प्रपन्ध कराते हैं। वह पकरा भूख एव प्याम की पीरा से पीड़ित हो धुरी दशा से यमराज का अतिथि बन जाता है। यह हिंसा और पाप की कितनी जघन्यतम पराकाष्ठा है। इसी कारण आज वास्तविक (१२६) दयाधर्म का हाम हो रहा है। जिम जाति का दया पालन करने का परम धर्म है वहीं जाति यदि हिमा और पाप-- पथ की ओर प्रवृत्त हो जाय तो धर्मरक्षा एवं उन्नति कैसे हो सकती है ? । जो व्यक्ति अहिंसावादी हो करके निर्बलों पर निर्दयता का प्रहार करता है, फिर भी वह दुनियाँ को कहता है कि में अहिंसावादी हू-दयाल ह यह पाखण्ड, या नावित्र नहीं तो और क्या है ? । किमी कविने लिखा है कि- हा! निर्धनों की हो रही है दुर्दशा कैसी बुरी, धनवान इनके कृश उदर में मारते तीखी छुरी । पन निर्दयी ये चूसते इन निर्यलों का रक्त हैं, तो भी कहें हम तो अहिमापाद के ही भक्त हैं ॥१॥ का तो विचारो ओ अहिंसावादियो। अथ ध्यान से, उन पूर्वजों के वचन को कुर तो सुनो तुम कान मे । होती अहिंसावाद की रक्षा दया के दान से, फिर चूसते क्यों निधनों को द्रव्य के अभिमान से ॥२ भावुक कवि के आशय को मम कर, मनन कर और उग पर पूरा ध्यान देकर न केरल अहिंसावादियों को, अपितु प्रत्येक मनुष्य को प्राणीमात्र पर दया करक अपना क्षणभद्गुर माना जीवन सफल एव मार्थक बनाते हुए पर मपदगामी पनो के लिये नीचे क पद्य को प्रतिपल महृदयता से मनन करते रहना चाहिये-- न (१२७) बन कर सहायक निर्धनों के दान इनको दीजिये। आवे अगर गृह द्वार पर तो मान इनको दीजिये। बन दीनवन्धु प्रेम से निस्वार्थ सेवा कीजिये। मन में दया को स्थान दे सत्कृत्य प्रतिपल कीजिये ॥१॥ दयाधर्म में इतना सामर्थ्य है कि यह जन्म जन्मान्तरों के समस्त पापों का नाश करके मनुष्य को अन्तिम ध्येय तक पहुंचा दता है और उसके जन्म मरण सम्बन्धी सप दुःख मिना दता है । अत संमार में इसकी तुलना में अन्य कोई धर्म नहीं आ मकता। कलापकोडी जणणी, दुरतदोगचदुपविहलपी। सग्गापवरगहेऊ, एगुञ्चिप होइ जीवदया ॥१॥ -~-करोडों सुख परम्पराओं को पैदा करनेवाला, दुर्गति का समूल नाश करनेवाला, स्वर्ग और अपर्ग प्राप्ति का प्रधान कारण समार में एक दयाधर्म ही है। नीतिशतक म लिखा है कि- माणाघातानिवृत्ति. परधनहरणे मयम सत्यवाक्य, काले शपया प्रदान युवतिजनकथा मूकभाव परेपाम्। तृष्णास्रोतो विभङ्गो गुरुपु च विनयः सर्वभूतानुकपा, सामान्य मर्च शास्त्रेपनुपहतविधि श्रेयसामेप पन्या. -जीवहिमा न करना, पराया धन हरण करने से मनको रोकना, सत्य बोलना, समय पर सामर्थ्यानुमार दान

(१२८)
देना, परस्त्रियों की चर्चा न करना और न सुनना, कृष्णा के
प्रवाह को तोड़ना, गुरुजनों के आगे नम्र रहना और मब
प्राणियों पर दया करना, सामान्यतया सप शास्त्रों के मन
से ये सर परमसुख प्राप्त करने के मार्ग है।
किसीकी स्वतन्त्रता या उसके अधिकारों पर जबरन
अपनी सत्ता का मोझा न लादो और उसके धन, जायदाद,
स्त्री, पुत्री आदि का अपहरण करने का जाल न बिछाओ।
यथा माग्य से जो कुछ मिला है उमी में सदा सन्तुष्ट रहो
और सब के साथ मित्रता का आचरण करो । शान्ति लाम
प्राप्त करने का यही एक सुख कर मरल मार्ग है।
सबकी प्रियवा मनुष्य को तभी मिलती है जब वह
विश्व बन्धुत्व की भावना को अपने हृदय में रख कर सब के
साथ माई के समान व्यवहार रखता है और उनके लिये
सर्वस्व अर्पण करता है । त्यागवृचि ही मनुष्य को सब का
प्रिय बनाती है । स्वार्थवृत्ति से तो मानर मरका अपमान
पात्र बनता है।
धृति, क्षमा, दया, दम, अस्तेय, निष्परिग्रह, इन्द्रिय
निग्रह, पी, विद्या, सत्य और अक्रोध, ये मानधर्म के पवित्र
अग है। इनको यथावत् पालन किये बिना मनुष्य में मनुष्यता
प्रगट नहीं होती और न वह आदर्श पुरुष पन सकता है।
अतएव " सबै पुराई छोडियो, करिवो पुण्य मिशेष । निज

( १२९) मानम को साधियो, यही युद्ध उपदेश ।। "-समस्त बुराईयों का त्याग कर और निन मानसिक मलिनताओं को मिटा कर पवित्र मार्ग का आचरण करते रहना चाहिये । मान मिक मलिनतामय अमदाचरण की आदत को मिटाये बिना कवल बुद्धिबल से कोई भी आदर्श नहीं पन शकता । जब इन्द्रियों के अनुचित व्यवहारों में जाते हुए मन को रोक कर निस्मार्थ हो प्राणिमात्र के कल्याण करने की भावना जाग्रत होगी, तभी आदर्शता मिलेगी । अन्त म इसना फिर लिख कर यह निवन्ध पूर्ण किया जाता है कि- मा माता भ्रातर द्विक्षन् , मा स्पसारमुत स्सा। मम्यश्वा मत्रता भूत्वा, नाच बदत भद्रया ॥१॥ मत्र सुपिन• सन्तु, सर्वे सन्तु निरामया । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्विदुःखमाप्नुयात् ॥२॥ माइ माई परस्पर द्वेष न कर-हिलमिल के प्रेम से से रहें । भगिनी भगिनी क साथ अदखाई न करें। विश्व के समी मानव एकमत और समान बन कर परस्पर मृदुपाणी योलें ॥१॥ समार में सभी प्राणी सुखी रहें, सभी प्राणी आरोग्य लाभ प्राप्त करें, सभी प्राणी अच्छे कार्यों को करें और कोई भी दुःखी नहीं रह ॥ २ ॥ इत्यल विस्तरेण ।

mr ७ " ( ९ १४ इसमें आये हुए सूक्तों की सूची । एक क्षमा अहिंसा की जननी है (अग्रिम-वक्तव्य) सरल होय के निवल को धैर्य शौर्यसहिष्णुते सरलता १ हप्ता छिन्धि, मज क्षमा, जहि मद २ कृष्णान्धो दुःखमाप्नोति १० ३ निस्व अष्टि शत शती दशशत ४ पदो हि को यो विषयानुरागी ५ को पा दरिद्रोहि विशालहष्णा ६ सर्क सम्पपस्तस्य ७ सन्तोपासतवताना १४ ८ दारिद्रपान्मरणादापि ९ सुवण्णरूपस्स पचया उ भवे १८ १० जाता कल्पतरु पुरः सुरगवी ११ फाम मोघ मद लोम की १२ भषण नयन मुख नासिका २२ १३ जो सन्तन में मनको लगाय हुए हैं २२ १४ जो सोते हैं गफलत में २२ १५ मोषाद् भवति सम्मोह २४ १६ शुद्रो माक्षणतामति ३० १७ म कुलेन न जात्या या १८ शद्रोऽपि शीलसम्पन्नो १९ धमा राफल गुण से पड़ी . mmmmm . 0M MAU ३२ ३ 3 N १० २० अपराधी निज दोपते २१ क्षमा बहन को होत है २२ भरा सो झलक नहीं २३ गज्ञः सुखमाराध्य २४ फूले फले न त १५ विगर्यो होय कुसग जिहि २६ शमालान मञ्जन निमलमतिनाहिं २७ तनिक झान को प्राप्त कर २८ मदमाया परित्यागी २९ नम मो आँचा आमली २० मर्द तो है मूछ घाँका ३१ यह पडित बड़ा अनाड़ी ३२ मर्द तो रण-शूर घाँका ३३ मब से ऊँचा मान आपको ३४ यादौ मनिविशते ३५ यदि शिवनगरयियामा ३६ दुनियाँ है दो रगी यावा ३७ जो मनुज ज्ञानामरण स हैं ३८ अनुचित उचित की पूर्णतम ३९ अनो धानप्राशेन ४० पपा चतुर्मि का परीक्ष्यते ११ मूसी पारक मोहगी, १३ ४३ ४९ ४५ - ५.

५७ ६२ (१३२) ४२ त्यों श्रद्धा मद्-शान औ ४३ धनानि भूमौ परावय गोष्ठे ४४ स्वारथ के मन ही मगे ४५ त्रिविध नरकस्यद ४६ पाणेसु विय पहिए चले मरीरे ४७ एपा बुद्धिमतां बुद्धिमनीपा ४८ अन्नेन गार नयनन वका ४९ अश्वमेघसहस्राणि ५० मांच बरावर तप नहीं ५१ साचे शाप न लागई ५२ केया न निभूषयन्ति पुरुष ५३ सीख्यो व्याकरण न्याय माहित्य ५४ उपकार सदैव किया करत ५५ बुद्धेः फल तत्वविचारण च ५६ तस्थाग्निर्जलमर्णव स्थलमरिमित्र ५७ वचनवस्त्राणि ५८ स्वार्थमय समार में है ५९ लोभ लम्पटता सिखा ली ६० विध के दृश्य देख ये आज ६१ जहाँ थे काले बादल घिरे ६२ चचल चन्द्र सूर्य है अचल ६३ अशु परमाणु सुख दुख चचल ७२ ७४ ७५ ७९ ८० ८१ ८२ ९२ ९२ ९४ ९५ ९९ ९९ (१३३) ६१ शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खा २५ दिव्यनानमयी गुणोपसहिता २६ एक घरी आधी घरी, E७ कवीरा सगति साधु की ८ मान्य जनों की सुथूपा ९ या प्रमादवशान् मूढो २. कमनीय कोमल वह कला ३१ प्राचीन वे गुरुकुल हमारे ३२ पिनयेन द्रवीभूत -७३ जिनने नरजीवन पा करके -७४ अपशब्दशत गाये -७५ आप शब्दशत माघे -७६ पुण्य-पुज के ही प्रभाव से -७७ जिनका जग में यश नहीं ७८ प्रभुता पाकर कौन नहीं करता -७९ जहेह सीहो व मिय गहाय ८. कचन के आमन पासन सब ८१ दया धर्म का मूल है ८२ अटादश पुराणेषु ८३ सो वि सुक्खकरखी ८४ दया दिल में राखिरे ८५ बकरी पाती सात है १०२ १०४ ११८ T M १०७ १२२ १२४ १२४ (१३) ८६ गला काटि कला मर ८७ पढम नाण तओ दया ८८ नाण मोहमहघयारलहरी ८९ अजरामरयत् प्रासो ९. हाथी दाँत के बिलौन ९१ परदोहववाडण ९० कांटा विमीको मत लगा ९१ तुलमी आइ गरीर की ९२ हा ! निर्धनों की हो रही है ९३ कुछ तो विचारो ओ अहिंमावादियो। ९४ पन कर सहायक निधनों के ९५ कलाण कोडी जणणी ९६ प्राणाघातानिपत्ति परधनहरणे प्रासगिक सक्षिप्त कथाएँ। १ काश्यप पुरोहित-पुत्र कपिल २ प्रमु महावीर और एक किमान ३ वशिष्ट और विश्वामित्र ४ भृगुमपी और श्रीकृष्ण ५ एक पण्डित और एक गहरिया ६ सेवामात्री श्रीनन्दीपेण ७ एक महात्मा की अमीट और वैश्या ८ पण्डित शतजय और प०कालीदास १२५ १२॥ १२. १५ २५ २८ ४२

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Shri Satpurushon Ke Lakshan

Author
Muni,vidhya Vijay Ji
Title
Shri Satpurushon Ke Lakshan
File name
Shri Satpurushon Ke Lakshan
Text
OCR done
Citation
1954
Published
2011/03
Publisher
Shri Shavetambar Jain Tristutik Shri Sagh
Language
Sanskrit
Pages
138
Library
Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Classification
Devotional
DLI number
551943
Barcode
4990010032634.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
Zm1QxFVkGWf
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