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Lapata
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लापता
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लापता
प्रभाकर माचवे
राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली
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- वह समुन्दर किनारे आकर बैठ गया । दुर-दूर तक बालू फैली हुई थी। कुछ काले पत्थर थे। सुनसान था । 'बीच' पर के नारियल के पेड हवा मे सिर हिलाते थे। शायद ममुन्दर ही उनकी भाषा जानता हो । समुन्दर सिलखिला कर हम रहा था। पेड़ गर्दन हिला-हिलाकर उनके साथ संवाद कर रहे थे। एक टूटी हुई नाव बालू में फंसी हुई गी। कुछ मछुआरे लड़के वहाँ जाल सुखा रहे थे। शाम का समय था। और उसके लिए समस्या थी कि वह रात को कहाँ जायेगा । क्या करेगा ? वह घर से भागकर किसी ट्रेन में बैठकर, बिना टिकिट, इतनी दूर तक तो आ गया। उसने जान-बूझकर ऐमा रूप बना लिया था कि वह पागल है और वह सब अपना पुराना अता-पता भूल चुका है । फिर उसके मन में आता था कि घरवालो से ऐसा गुस्सा नहीं करना चाहिए । पर वहाँ उसे कोई प्रेम देनेवाला नही था। सौतेली मां रात-दिन गाली देनी, कटु वचन कहती। वाप को अपने परीक्षा के फेल होते रहने वाले दुबले- पतले बेटे की सिवा मारने के, और सुधि लेने की फुरमत नही थी । और भाई-बहन आत्मकेन्द्रित थे। यही सबसे बडा पा और निकम्मा या । वहां वह वैसे ही बड़ी देर तक बैठा था। तब एक बूता उसके पाम लकडी टेकता-टेकता आया। दोनों की बातें शुरू हुई : बूढा : "तुम कौन हो? और क्या करते हो?" नौजवान • "इन दोनो सवालो के जवाब मेरे पास नहीं हैं ?" बूढा "तो यहां क्यों बैठे हो?" नौजवान : "और कुछ करने को नहीं है, इसलिए मूर्यास्त देख रहा - लापता:5 है बूढ़ा : "उसमें तुम क्या देखते हो?" नौजवान : "कितना सुन्दर है !" बूढ़ा : "क्या सौन्दर्य से पेट भरेगा?" नौजवान : "आप वह सामने चर्च देख रहे हैं। उसमें घंटी बज रही 1 आपकी उस आवाज़ में आस्था है। क्या उससे पेट भरेगा?" बूढ़ा : "अब थोड़ी देर बाद रात हो जायेगी। और यह क्षणिक सौन्दर्य समाप्त हो जायेगा।" नौजवान : "मैं उसे पेटभर कर देखूगा । वही आज शाम का मेरा आहार है ?" बूढ़ा : "कहां रहते हो?" नौजवान : "नहीं जानता ?" बूढ़ा : "कहां जामोगे?" नौजवान : "नहीं जानता?" बूढ़ा : "कहां से आये हो ?" नौजवान : "मैं नहीं जानता । आप भी नहीं जानते। कोई भी नहीं जानता।" बूढ़े को दया हो आई । बोला-"मेरे साथ चलोगे?" नौजवान ने कहा--"क्यों नहीं ?" बूढा ईसाई था । वह अपने घर पर उसे ले गया। उसकी वृद्धा पत्नी मेरी और एक नौजवान लड़की घर में थी जिसका नाम था एडिथ । नौजवान अपने पूर्वेतिहास के बारे में कुछ भी बताने को तैयार नहीं था। मानो सब भूल चुका था। ऐसे स्मृतिहीन व्यक्ति को घर में क्यों ले आये, इस बात पर मेरी और पीटर में बड़ी बहुत बहस हुई । मेरी : "कैसे-कैसे लोगों को घर में ले आते हो ?" पीटर : "हूं..." मेरी : "ऐसे लोगों को घर में रखने खिलाने, आश्रय देने से कोई फायदा? पीटर : "हूं..." । 6:लापता .. मेरी : "बोलते क्यो नही? दो दिन देसूंगी, बाद में निकाल दूगी। पता नही कहां का चोर-उचक्का, गुंडा ही हो । अपनी भाषा तक नही जानता। पीटर : "अंग्रेजी तो जानता है। क्या हर आदमी जो घर में आता है, मलयालम अवश्य जाने हो, ऐसा कोई साइनबोर्ड बाहर क्यों नहीं लगा देती ?" मेरी : "तुम तो हर वक्त मजाक करते रहते हो। यह मजाक का विषय नहीं है।" पीटर : "फिर क्या करूं ? बाइबिल में लिखा है 'सब मनुष्यों से प्यार करो। मैं सिर्फ उसी वचन को जीवन में उतार रहा हूं।" मेरी : "बड़े आये वाइबिल वाले ! तुमने कभी अपने 'बॉस' को प्यार दिया? रात-दिन खिट-खिट चलती रहती है । तुमने मेरी मां- यानी अपनी मास को इज्जत दी ? तुमने कभी...जाने दो। यह तालिका लंबी है । वस अजनबियो को ही आप प्यार देना जानते हैं, और उसमें भी अगर वह कही स्त्री हुई, तो क्या कहने हैं. पीटर : "आज की रात वह रहेगा। कल लोग पूछेगे, क्या काम कर सकता ? और कुछ नही तो अपने अखबार के प्रेस में ही काम मा जायेगा।" मेरी : "ऐसे भुलक्कडों और पागलो से आपका प्रेस चल चुका।" पीटर : "कोशिश करके देखना चाहिए।" मेरी : “यहा पत्थर से पानी निकाले जाने की-मी बात है। इसके चेहरे-मोहरे से मुझे तो छटा हुआ बदमाश जान पडता है।" पीटर : "अपनी-अपनी दृष्टि है।" इतने मे एडिथ आ गई । उमने भी वही सवाल पूछा-यह नवागन्तुक महाशय कहां के हैं ? क्या करते हैं ? कितने दिन रहेंगे, इत्यादि । उत्तर में सिर्फ उनका नाम मिला जो अब पिताजी के दोस्त थे । यह नया आदमी खतरनाक लगता है; अंदरूनी बातें वह जानता है । कैसे ? -क्या वह गुप्तचर है? -क्या वह कोई पहुचा हुआ साधु है ?
ear- ---क्या वह सचमुच का मुसीबतजदा है ? -क्या वह घर छोड़कर भागकर माया प्राणी है ? -क्या वह वेश छिपाये कोई शरणार्थी है ? -~-क्या वह पूर्णतः स्मृति-हारा है ? कई तरह की शंकाएं मन में उठते हुए भी इस अनाम नवयुवक को अपने घर में पीटर ने आश्रय दे दिया। वह थका-मांदा था; जो भी खाने को मिला खाया और वह सो गया। सवेरे उठा तो उसने अपने साथ की स्लीपिंग बैग को खोला। उसमें दो जोड़ी कपड़े थे। नहाया। अपने कपड़े धोकर के सुखाने डाले। पीटर की छोटी-सी रहने की जगह में वह बाहर के कमरे में आ बैठा। बड़े से अनेक बैंडोंवाले रेडियो पर खवरें चल रही थीं, उनके बाद खोये हुए व्यक्तियों की सूचनाएं सुनाई गई । यह दिल्ली रेडियो है. --एक नवयुवक जिसने नीली-भूरी पतलून और चेक का लाल बुश्शर्ट पहन रखा है, कद 5 फीट, उम्र तीस लाल, क्लीन शेवन, माथे के बाल धुंघराले, आंखें नीली-हरी, घर से भाग गया है। वह बी०ए० में पढ़ता था। अंग्रेजी, हिन्दी दोनों भाषाएं जानता है । उसका नाम अरविंद है । यदि किसी को पता लगे तो वह निम्न पते पर सूचना दे । खोज निकालने वाले को 2000 रुपये इनाम दिये जायेंगे। निशानी वायें गाल पर ठुड्डी के पास तिल है । सूचना देने का पता : शिवनाथ मलहोत्रा सेक्टर तीन, क्वार्टर न० एक सौ आठ, रामकृष्णपुरम, नई दिल्ली-110022 पहले उसने हिकारत से मन में सोचा-मेरे दाम सिर्फ दो हजार रुपये? फिर पूरी सूचना सुन लेने के बाद उसने स्विच ऑफ करके रेडियो बंद कर दिया ! दाढ़ी मूंछ तो बढ़ा ही ली थी। सो चेहरे की एक पहचान 'क्लीन शेवन' से वह बच गया । वालों का धुंघरालापन और आंखों का रंग तो वह छिपा नहीं सकता था। हां कपड़े उसने बदल डाले थे। और हिन्दी भी वह जान बूझकर, विगाड़ कर टूटी-फूटी वोलता था। यहां । 8: लापता . सुदूर केरल में वह अपनी मातृभापा बंगाली बता दे तो क्या बिगड़ता है ? अब उसने सोचना शुरू किया कि कोई नाम जरूर लेना चाहिए, जो बंगालियों की तरह हो? शरच्चन्द्र ? बड़ा 'कॉमन नाम है। वकिमचन्द्र ? ऐसा नाम बड़ा 'अनकॉमन है। उसने सोचा-'देवीप्रसाद' नाम सबसे अच्छा रहेगा । कलकत्ता वह कभी नही गया था पर हां वहा काली का मंदिर है। और सुनते हैं कि वहां देवी के नाम पर बहुत नाम हैं, पुरुषों के भी-जैसे कालीकिंकर, कालीप्रसाद, कालीकृष्ण, श्यामाचरण, श्यामाप्रमाद, श्यामानंद, ताराशंकर, तारापद, देवीपद, देवीदास, देवीप्रसाद...वस-बस देवी का प्रसाद ही सबसे अच्छा नाम है । अब अपनी शिक्षा और कार्यकलाप का क्या किया जाये ? बता दूंगा मैट्रिक हूं। किसी अखबार में काम करता था। जहां जरूरत होगी बता दूंगा राजनैतिक कारणों से भाग आया। पुलिस मेरे पीछे लगी है। उपने मोचा कि यह बातें 'एडिथ' को ही धीरे-धीरे बतानी ठीक होंगी। क्योंकि उसके मन मैं महानुभूति जगाना अधिक उचित होगा। एडिय की मा मेरी तो मुझे फूटी आँखों से देखना पसन्द नही करती थी। कहूंगा-'कही काम लगा दे। किसी पत्र पत्रिका में अंग्रेजी की । या छोटी- मोटी क्ली ही सही । या फिर प्राइमरी स्कूल में टीचरी।' मैट्रिक करने में कोई सर्टीफिकेट नहीं पूछेगा। बी०ए० एम०ए० के साथ प्रमाणपत्र आदि का चक्कर है । सो अब अरविंद मलहोत्रा साहब की नयी 'इमेज' तैयार हो गई। देवी प्रसाद सेन, बंगाल के रहने वाले, मैट्रिक, एक राजनैतिक पन में संवाददाता, राजनैतिक कार्यकर्ता भी, वहां पुलिस पीछे पड़ी थी सो भाग आये । यहा तक सब मामला ठीक हुआ। पर एक बहुत बड़ी अडचन सामने आ गयी, जिसका उसने पहले से विचार नहीं किया था। एडिय के साथ बातें करते हुए उसने चुपचाप यह सब बाते बता दी। मा और बाप दोनो काम करने के लिए बाहर चले जाते थे। एडिप वयः प्राप्ता थी, और पर-पुरुप में उसका कुतूहल स्वाभाविक था।
आखिर दो तीन दिन बाद उसने कुतुहलपूर्वक पूछ ही लिया : "देवी तुम कौन से राजनैतिक दल में विश्वास करते हो?" आव देखा न ताव देवी ने कह दिया, "गुप्त संगठन में । हम समाज को पूरी तरह बदल डालेंगे। रक्तक्रांति से अलावा कोई भी रास्ता हमें पसंद नहीं। लोग हमें माक्सिस्ट (एम० एल०) कहते हैं। पर हम उनसे भी अधिक वाम-पंथी हैं।" "देवी, यह बुरी वात तुमने कही। पापा को पता लग जायेगा, तो वह एक दिन भी तुम्हें घर में नहीं टिकने देंगे । वे कट्टर क्रिश्चियन हैं।" "तो क्या हुआ? हम पूंजीपतियों, साम्राज्यवाद के एजंटों, सामंत- वादियों, प्रतिक्रियावादी रूस-परस्त, चीन-परस्त तथाकथित साम्य- वादियों, लुपेन समाजवादियों आदि सबके विरुद्ध हैं। हमें क्रिश्चियन या हिन्दू या मुस्लिम से क्या लेना देना है ? धर्म तो व्यक्तिगत वस्तु है । वह आज पूरी तरह वर्गाकांत है।" "मुझे तो तुम समझा दोगे। क्योंकि (धीरे से) इतना अधिक रात-दिन घर में माता-पिता से धर्म के वारे में सुनती रहती हूं कि अव मेरी धर्म में कोई आस्था नहीं है। लेकिन पापा नहीं मानेंगे। "तो इस बात को छिपा देते हैं । ऐसा कहूंगा कि मैं एक विना किसी पार्टी के स्वतंत्र पत्र के कार्यालय में कार्य करता था। बस इस पर तुम राजी हो जाओगी ?" "ठीक है ! मुझे तुम खतरनाक आदमी लगते हो। क्रांतिकारियों क प्रति मेरे मन में बचपन से कुतूहल है। मैंने अपनी भाषा मलयालम में शरच्चंद्र का 'पथ के दावेदार' पढ़ा है उसमें सव्यसाची के बारे में पढ़ा है। मैंने जैनेन्द्र कुमार की 'सुनीता' पढ़ी है। उसमें वह हरिप्रसन्न है। मैंने यश- पाल का 'दादा कामरेड' पढ़ा है । क्रांनिकारी आग की तरह होते हैं । उनसे दूर ही रहना अच्छा । ताप सुखद होती है । उत्ताप घर जला देता है...' उस दिन इतनी ही वात हुई। पर एडिथ फिर सोचने लगी- 'क्यों नौजवान यों नक्सल हो जाते हैं ? क्या उनके सामने और कोई रास्ता नहीं है ?' - 10:लापता 2 . । पापा गे एडिय ने कहा कि इस राह भूले नौजवान पर उपकार करें। कही काम पर लगादें तो दोहरे लाभ हैं। एक तो ईमाई होते हुए गुड समेरिटन' का सवाब मिलेगा। दूसरे अब यूढे पिता को घर में एक सहा. यक, सहारा भी मिल जायेगा। तब तक मेरा मेडिकल कोर्म पूरा हो जायेगा । मुझे गल्फ एरिया में बड़ी लम्बी चौड़ी तनख्वाह वाली नौकरी भी मिल जायेगी। फिर तब तक देखी जायेगी। यह वगाली बाबू तब तक भाग जायेगा । मो अच्छा हो कि इसे ईसाई ही बना लिया जाये । एक और चेला मूडने का सुख क्या कम है-पीटर ने सोचा। पीटर ने देवी से पूछा-"अब क्या करोगे?" "जो आप कहे ?" "मेरे कहने की बात नहीं। यहां की भाषा तो तुम जानते नहीं ?" "ऐमा काम दिलवाइये कि जिसमें भापा का व्यवधान आडे न आये।" "यही सोच रहा हूं । पत्र के लिए तो भापा ज्ञान की बहुन आवश्य- कता हो जाती है। मैं मलयालम जानता नही। और पूरे केरल मे जहा 65 से ऊपर मलयालम के पत्र हैं, अंग्रेजी का कोई अखबार नहीं पा । (अभी हाल में एक पायद निकला है।) ऐसी दशा मे क्या करें ?" "मेरा भी अखबार पर कोई आग्रह नहीं । जो काम कहेगे, कर दूंगा। अखवार न मही, कही अपने प्रभाव मे, हमें लगवा दीजिये, किसी और काम में..." चर्च की ओर से एक हाईस्कूल चलता था। उसमे एक क्लर्क की जगह खाली थी । वहां पीटर के कहने से देवी को काम मिल गया। अब वह कमरा तलाश करने लगा। जगह मिलनी मुश्किल थी। परन्तु कुछ दिनो के लिए चर्च की डामिटरी मे ही देवी रहने लगा। वहां उसकी मुलाकात कई तरह के पादरियो और ईसाई विद्यापियो और छात्राओं से होने लगी। वह जान-बूझकर किसी से वहम नहीं लापता:11 छेड़ता था। चुपचाप सवकी बातें सुनता था। देवी को लगा कि क्या हिंदू क्या ईसाई, क्या मुस्लिम, क्या सिख सबके सव एक तरह से दिशाहारा और शरणार्थी हैं। विचारों की दुनिया के मायावी हैं । उनका कोई सिद्धांत नहीं, विश्वास नहीं, मतवाद नहीं-यह बात सच नहीं थी। सव एक खूटे से बंधे थे। इसी से वे और लोगों से नफरत करते थे, जो उनके 'मत वाले' न हों। पर उनकी सबकी आत्मा 'ला-पता' थी। वे धर्म की प्रधान पुस्तक को मानते थे। पंडित या पादरी या पीर को मानते थे। उसके पास उन्होंने अपनी बुद्धि रहन रख दी थी। शंका करना ही हर धर्म में मना था। वह धर्मद्रोह था। तर्का- प्रतिष्ठानात्। देवी को लगा कि जब आदमी अपने ऊपर ओढ़ा हुआ, या जन्म से उसके नाम की तरह चिपका हुआ धर्म का लेवल छोड़ देता है; या उससे परे सोचता है, तो उसके सामने प्रश्न होता है कि वह असली इन्सान वह मूलभूत मनुष्य क्या है ? क्या उसमें आत्मा, कोई समसद् का विवेक करने वाला दिव्यांश नहीं होता? वही तो मुख्य चीज है । वही खोकर वह क्या पाता है ? एडिथ ने धीरे-धीरे उससे पूछ ही लिया-"देवी, तुम ईसाई क्यों नहीं हो जाते ?" वह विचारपूर्वक, हर शब्द तौल कर बोला-"आप कहती हैं तो सोचूंगा। पर सच बताऊं धार्मिक नहीं हूं। किसी भी धर्म का ठप्पा लगाने से क्या होगा ?" एडिथ-.-"क्यों ?" देवी-"मैं पापी हूं..." एडिथ----"इसीलिए तो धर्म की शरण लेनी चाहिए।" देवी---"जो पाप मनुष्य करता है उसे कोई धर्म धो नहीं सकता।" एडिथ-ईसाई धर्म में सब तरह के पापियों के लिए पनाह है, शरण है।" देवी-धर्म शुरू ही इस बात से होते हैं कि मनुष्य पाप छोड़ दें।" . 12: लापता एडिथ-"हां," देवी 1-~"पर मेरे पाप तो मेरी मृत्यु के बाद ही शायद छूटेंगे। वे जन्म से ही शुरू हुए। जन्म से ही जुड़े हुए हैं।" एडिय-"यह कैसे हो सकता है ?" देवी-"अगर कोई बच्चा पाप की सन्तान हो, तो उसके सिर पर वह सिक्का जनम भर के लिए लग जाता है।" एडिथ-"ईसाई धर्म में ऐमा नहीं है।" देवी-"और अगर उसने बचपन में कोई पाप किया हो तो?" एडिय-"बच्चे राब निष्पाप होते हैं । ऐमा कभी हो ही नहीं सकता कि बच्चा पापी हो। वह पाप पुण्य से परे होता है।" देवी--"कई कलाकार भी अपने आपको ऐसा ही मानते हैं।" एडिथ-"वे झूठ बोलते हैं..." देवी-"हो सकता है । पर तुम धर्मातर की बात क्यो उठाती हो?" एडिय-"हमे उससे सुख होगा।" देवी-"केवल तुम्हारे सुख के लिए मैं अपना धर्म तज दूं?" एडिय-"नही हमारा धर्म श्रेष्ठ है, इसलिए तुम उसमे आओ।" देवी-"जो आदमी एक बार धर्म बदल सकता है, वह दुवारा नहीं बदलेगा इसकी क्या गारंटी है ?" एडिय-"धर्म कोई कपड़ा नहीं जो चाहे तब उतारा, चाहे तब पहन लिया।" देबी--"यही तो मैं कहता हूं।" -"पर हिन्दू धर्म तो ऐसा कड़ा वधन नही । वह उम अर्थ में 'मजहब' नहीं है । वह तो केवल एक जीवन पद्धति है।" देवी--"क्यों बहस कर रही हो एडिथ ? किसी भी धर्म में विश्वास न करना भी तो एक जीवन पद्धति हो सकती है।" एडिय--"ऐसे लोगों को हम क्या कहें मनुष्य नही मानते । ऐसे अधर्मी मनुष्य मे और पशु में क्या अंतर है ?" देवी-"क्या पशु बनना पाप है ?" एडिय-"हां।" एडिय लापता:13 - देवी--"मनुष्य ने धर्म कब निर्माण किया?" एडिथ-"क्यों ?" देवी--"उसके पहले वह क्या था? यानी माज, अव 1983 वर्ष ईसा को सूली पर दिये हुए । ईसवी सन तभी से चला । उसके पहले सव आदमी क्या थे? जानवर?" एडिथ-"यह कैसे हो सकता है ?" देवी--"क्यों, कोई सभ्यता उससे पहले थी ?" एडिथ-"हां, यूरोप में ग्रीक सभ्यता थी।" देवी--"यूनान के लोग तो कई देवी-देवता मानते थे। मूर्तिपूजक थे । जैसे हिन्दू"" एडिथ-----"हां ईसा के पहले भी धर्म रहे होंगे ?" देवी-"चीन में कनफ्यूशस से पहले के धर्म । भारत में बुद्ध और महावीर और मिस्र में पितर पूजा और ईरान में सूर्य पूजा..." एडिथ-~"यह सब प्रकृति के तत्त्वों को ईश्वर मानना धर्म थोड़े ही है।" देवी-"फिर धर्म क्या है ?" एडिथ ---"ईसा को मानना, सलीब पर उसे चढ़ाया गया यह मानना ईसा की पवित्र वाणी 'बाइविल' को मानना..." देवी-"वस ? देखो एडिथ, अगर मैं कहूं कि मैं केवल मनुष्य को मानता हूं। उसी में ईश्वर को देखता हूं तो तुम इस वाक्य को क्या कहोगी।" एडिथ----"सोचना होगा..." देवी-"यह वाक्य मेरा नहीं; परम ईसाई टालस्टाय का है । अगर यह तुम भी मानती हो तो उस अर्थ में मैं ईसाई पहले से ही हूं, समझ लो। फिर और ईसाई बनने की क्या जरूरत है ?" एडिथ चुप हो गयी । इस तरह की बातचीत से देवी को वह धर्मातर के लिए राजी नहीं कर सकती, यह देखकर एक दिन बूढ़े पीटर ने देवी को चर्च ले जाने की बात की। वहां छोटामोटा काम दिलाने की बात की। ऐसे सब आश्रयहीन लोगों के लिए सबसे बड़ा आश्रय स्थान 'चर्च' नामक ६- - । 14:लापता संस्था में हैं, यह भी बताया पर देवी ने नौकरी भी ले ली पर वह ईसाई नही बना। देवी सोचता रहा-नाम, स्थान, जाति-पांति, धर्म, देश, भाषा यह सब मनुष्य के साथ कितने और कहां तक जुड़े रहते हैं ? उसने नामांतर किया। उसने स्थानातर किया। परन्तु जाति-पाति, धर्म के संस्कार उसके साथ कितनी गहराई से जुड़े हैं, जमे उसकी त्वचा का वर्ण; जैसे उनके बालो का घुघराला होना; जैमे उसकी आंखों का नीलापन; जैसे उसकी कई आदतें--चलने की, बोलने की... उसमे कोई मैट्रिक का सर्टीफिकेट मागता तो वह बताता वह बांग्ला देश से भागकर आया हुआ हिन्दू रेफ्यूजी है। केरल मे वगाली कम थे। उसका यह मुखोटा उस पर वरावर बना रहा। कुछ महीनो तक देवी ने वहा चर्च मे नौकरी की। कुछ पैसे बचाये, और एक दिन उसने सोचा कि यहा रहना ठीक नहीं। इसका कारण हुआ। खाडी के देशो से वहां केरल के के किनारे पर कई लोग 'स्मगलिंग' का व्यवसाय करते थे। सोना और हीरे-जवाह- रात और पता नहीं क्या-क्या लाते थे। उनके चक्कर में वह आ गया। और उनके दल का एक सदस्य बन गया। इस नाते उसे बैंक में काम करना पड़ा। वहा से उसका तबादला गोआ हो गया। ईसाइयों से उसकी बढती हुई मैत्री और मेल-जोल ने उसे यहुन फायदा पहुंचाया । वह दिन के समय देवी सेन वैक का कर्मचारी था । और रात के समय वह स्मगलरो का दिया हुआ नाम मिस्टर 'के' था। एक ही व्यक्ति में कितने व्यक्ति छिपे रहते हैं ? अरविंद मलहोत्रा को उसके माता-पिता और बचपन के मित्र और दिल्ली के लोग भूले नहीं होंगे। पर वह सबको मुला चुका है । देवी सेन को केरल के ममुद्र किनारे के उस छोटे-से गांव के पादरी, पादरी की लडकी एडिथ, और चर्च के पियानो सिखाने वाले, और डामिटरी के लोग और बैंक के मैनेजर और उस दिन पिकनिक पर गये थे, तब मिले रगीन तवीयत मछुआरे--सब भूल ।
चुके होंगे। वह उन्हें भुलाने की कोशिश में है कि यह तीसरी भूमिका उसके सामने भा गई। उसमें गुप्तता होने से वह बहुत सावधानी और सतर्कता से मिस्टर 'के' से अपना कोई संबंध नहीं है (सिवा जवानी आदेश और पालन के) यह जानता है। इसीलिए वह जान-बूझकर गोआ की वीचों पर वीटनिक और हिप्पियों के अड्डों में जाता है। पर उनके साथ पीने का बहाना करके नहीं पीता; चूंकि कहीं अधिक पी जाने पर उसके मन के भीतर का चोर कहीं बाहर न निकल पड़े । उसकी जवान से कुछ न निकल जाये, इसलिए वह यथासंभव मित्र नहीं जुटाता । वह जानता है, जीवन में वेहद अकेला है। और अकेलापन दुखदायी चीज है । पर और दूसरा उपाय भी कहां है ? अकेलेपन में ही आदमी अपना सही पता तलाशता रहता है। वह इसीलिए नौजवान होकर किसी के प्रेम में नहीं पड़ा। न वह किसी राजनैतिक प्रतिबद्धता में फंसना चाहता है । उसका विशुद्ध लक्ष्य है, इस क्षण सिर्फ पैसा कमाना । और वह अब किसी भी साधन से, किसी भी प्रकार से, किसी भी मार्ग से पैसा कमाना चाहता है । सब ऐसा कर रहे हैं, वह क्यों न करें ? एक-दो वर्षों के अंदर-अंदर देवी सेन के कमरे में कई इंपोर्टेड चीजों का अंबार लग गया। ऐसे में एक दिन एक अजीब घटना घटित हुई। 3 एक दिन वह शाम को पंजिम में एक होटल में बैठा था कि दूर से एक पहचाना हुआ-सा आदमी पास आता दिखाई दिया । पहले तो उसने अपना चेहरा मेनू-कार्ड की ओट में छिपाया, पर मुसीवत की मार, वह मादमी ठीक उसके सामने वाली कुर्सी पर आन बैठा । 16: लापता - उसी ने बोलना शुरू किया-"मेरा नाम प्रशांत मलहोना है, और मैं दिल्ली से आया है।" देवी ने कहा--"ठीक है । आप मुझसे क्या चाहते हैं ?" "आप जानते नहीं, मेरा भाई खो चुका है । तीन बरसों से उसका पना नहीं चलता। हमारे माता-पिता परेशान हैं। इस खोये हुए बेटे वो पाने के लिए उन्होंने कितने विज्ञापन दिये । रेडियो पर सदेश दिये। झाड़-फूंक भी करवाई। ओझा-ज्योतिषियों को भी दिखाया। कोई पता नहीं चलता।" कुतूहल से देवी सुनता रहा। 'हूं, हूं' कहता रहा। जब प्रगात की पूरी कहानी पूरी हो गई तब देवी बोला-"क्या और कुछ आपको कहना है ? माफ कीजिये, मुझे एक ज़रूरी काम है, मैं चलूंगा।" उसकी बात से और पता नहीं किस अज्ञात कारण से प्रांत के मन में यह शंका वस गई कि जरूर यह अरविंद ही होगा, जो देवी मेन बहकर यहां छिपा हुआ है। पर इस बात का पक्का सबून तो कोई था नहीं। प्रशांत ने बैंक मे जाकर देवी के मित्रों से-जो कि बहुन थोडे थे- खोजने की कोशिश की कि वह कहां रहता है, कहां-कहां जाता है। उसकी रुचियां क्या है ? क्या उमकी कोई स्त्री-मित्र है ? वह बीच-बीच मे नौकरी से गायब हो जाया करता था, इतना ही उसे पता लगा। वह कहा जाता है, क्या करता है-यह सब जानना प्रशांत के लिए आवश्यक हो गया। इसके लिए प्रशांत ने यह मोचा कि उसे भी देशांतर करना होगा। ऐमे सीधे-सीधे तो कुछ भी ठीक से पता नहीं चलेगा। प्रशांत कुछ दिनों के लिए पणजी (जिम) से चला गया। देवी ने सोचा कि चलो, छुट्टी को सांस ली जाये । यह जो मेरे ही भाई मेरे ऊपर जासूमी कर रहे थे, उसमें निजात तो पाई। पर यह खपाल सिर्फ खयाल ही रहा। क्योकि एक बार सदेह का वीज जो पड जाता है, वह महमा मिट नही जाता । अभिशा मनुष्य की छाया की तरह पीछा करती रहती है। देवी सेन इस समय एक बहुत बड़े स्मगलर के चक्कर में या, जिसका नाम गुप्त रखने के लिए उसे 'एच० आर०' कहते थे। वह एकदम विला.
यती ढंग से रहता था। और उसकी बोलचाल से पता ही नहीं चलता था कि वह हरीराम, या हरसेन राठोड़, या हरदेवसिंह रारेवाला, या हबीबुर रहमान, या हेनरी रॉबिन है। हो सकता है वह हशीश या हेरॉइन का 'रिटेलर' होने से उसने यह नाम लिया हो। पर उसकी कहानी बहुत कुछ 'कंगाल से करोड़पति' वाली थी। उसके कुछ विदेशी संपर्क थे और पैसा उसके लिए कोई चीज़ नहीं थी। वह हवाई जहाज से ही घूमता था। आज काठमांडू तो कल काबुल तो परसों कुवैत । स्विटजरलैंड और सेन फांसिस्को भी चक्कर लगाता था और हांगकांग और हेनोलुलू के भी, बैंकाक और सिंगापुर के भी। अब एक दिलचस्प बातचीत सुनिये । इससे कहीं भी पता नहीं चल सकता कि कोई भी आदमी, कोई भी स्मगलिंग या 'असामाजिक अपराध कहीं कर रहा हो । 'एच० आर०' की खूबी यह थी कि सदा उसके साथ एक नई महिला (जो अपने आपको सुंदरी समझती थी, या सुंदरी बनने का यत्न करती थी) अवश्य होती थी। पंजिम के एक अज्ञात कोने में कम प्रकाश वाले होटल के कोने में दूसरी बोतल खुलने के बाद, यह संवाद शुरू होता है। इसमें केवल तीन समभागी हैं 'एच० आर०', मिस डिसूजा और देवी सेन-जिसका इस समय नाम वालावलकर है। एच० आर०---"तो तुम्हारी रवलनाथ की जात्रा के बारे में क्या राय है ?" मिस डिसूजा-~~"ये 'जात्रा' क्या होता है, मिस्टर वालावलकर ?" वालावलकर---"पूर्णिमा की रात को सज-धजकरसव औरतें निकलती हैं । आधी रात तक गाना-नाच चलता है। फिर एक डंडे का जुलूस निकलता है । जो उठाता है, उसके शरीर में कुछ अज्ञात शक्ति आ जाती है । उस समय लोग उससे प्रश्न पूछते हैं । जो जवाब मिल जाता है, सच निकलता मिस डिसूजा--"हम क्रिश्चियन लोग को जाने में कोई 'आवजेक्शन' (आपत्ति) तो नहीं !" वालावलकर--"सब तरह के लोग वहां पहुंचते हैं । सव जात के, सब 18 : लापता
धर्मों के । वह तो बड़ा भारी कार्नीवाल, फेस्टीवल (त्यौहार) है । गरीव,
अमीर सव पहुंचते हैं । मैं तो हर साल जाता रहता हूं।" (यह उमने झूठ
बोला था, क्योंकि उमे यहा आये हुए ही एक माल नहीं बीता था)।
एच० आर०-"कुछ बिजनेस भी वहां होता है ।"
वालावलकर.-"धर्म में क्या विजनेस, बॉम ?"
एच० आर०-"धर्म आजकल एक विजनेस हो गया है।"
वालावलकर-(हंसकर)"इसीलिए विजनेसवाले धर्म की बड़ी-बही
बातें करते हैं।"
इतने मे मिस डिसूजा एक बड़े खान-मालिक को आते हुए देखती है
और जमे हाथ के इशारे से बुलाती है।
परिचय कराया जाता है । मेठ मफतलाल हैं-दीव-दमन में आपका
बडा ब्यौपार है । कई 'माइन्स' के मालिक हैं ।
एच० आर० (अतिरिक्त रुचि लेकर)-"ओ, आई सी। कुछ हम
आपकी सेवा कर सकते हैं ? (ताली से पैरा को बुलाकर) आपके लिए एक
'बहा पंग'।"
सेठजी-"नहीं, नहीं, हम इसका सेवन नहीं करते हैं।"
एच० आर०-"सौरो। आप क्या पियेंगे? फूट-जूस या डबल
सेवन?"
सेठजी-"मुझे नीबू पानी चलेगा..."
एच. आर०-"सोडा उसमे मिक्म करें? या न करें ?"
मिस डिसूजा--"आपको रवललाय की जाया के बारे मे कुछ मालूम
है
2॥
सेठजी-"हा, हा, मेरी बड़ी बेटी का ब्याह ही नहीं हो रहा था।
उसे हिस्टीरिया के दौरे आते है । हम उमे ले गये थे। ऊपा अच्छी हो
गई।"
एच० आर०-"क्या उसकी शादी त हो गई?"
सेठजी-"नही तो..."
एच० आर०--"ये अपने दोस्त वालावलकर हैं, ये अभी शादीशुदा
नहीं हैं । इनसे क्यो नही उसे मिलवा देते हैं ?"
सेठजी की आंखें चमक उठीं। उन्होंने झट से होटल को कुर्सी छोड़-
कर बाहर खड़ी अपनी कार के ड्राइवर को कहा-"फौरन जामो और
ऊपा को ले आओ घर से।"
एच० आर०-"आप क्या करने गये थे?"
सेठजी-"वेटी को बुला
एच० आर०-"ओ, इतनी अधीरता ? इस समय आप देख रहे हैं।
हम सब जरा 'चढ़े हुए हैं। ('हाई-अप' हैं)।"
अब ऊपा आए तब तक कुछ बातचीत चलती रही। सेठजी ने
पूछा एच० आर० से-"आपके ये दोस्त क्या करते हैं ? उनका नाम क्या
लेता हूं।"
-
"वालावलकर नाम है । गोवा के सारस्वत हैं।"
"हमारी बेटी तो मछली खाती नहीं । आपके घर में तो मछली खाते
होंगे।"
वालावलकर की ओर से एच० आर०--"ये तो एकदम यौरपीयन
ढंग से रहते हैं । बड़े बैंक में हैं । बड़े ओहदे पर। विदेश के दौरे करते
रहते हैं। हमारे बिजनेस में आप ही की बड़ी मदद है।"
"अच्छा, अच्छा," सेठजी बोले, "मगर फिर तो आपको दान-दहेज़
की भी बड़ी मांग होगी । हम तो ठहरे गरीब आदमी..."
एच० आर०ने ठहाका लगाया-"साल की पचास लाख आमदनी
अगर गरीबी कहलाती है, तो ऐसी गरीबी हटाना आसान है। देश में हैं ही
कितने करोड़पती, लखपती ?"
वालावलकर चुपचाप सुन रहा था। रहा नहीं गया। पूछा-
"लड़की पढ़ी-लिखी कितनी है ?"
"बी० ए० में थी, तभी से हिस्टीरिया लग गया। पता नहीं क्यों,
कैसे ?"
इतने में ड्राइवर ने भीतर आकर सूचना दी कि ऊपा आ गई है।
क्यों पापा ने इतनी जल्दी में बुलाया है, उसकी समझ में नहीं आ रहा है।
सेटजी ने कहा--"भीतर भेज दो।"
20: लापता
4 मादर म कथावाचक वाल रह थे। भावक जनता सुन रही थी। "महाभारत, प्रजागरपर्व, उद्योगपर्व से विदुर ने कहा हुआ केशिनी का आख्यान यों है: घृतराष्ट्र-~"हे महावुद्धिवान् विदुर, तू अत्यंत विचित्र भाषण कर रहा है । वह सुनते हुए मुझे संतोप नहीं होता। इसलिए और वचन सुना।" विदुर--"है विभो, सब तीयों में स्नान और सब प्राणियों से समता यह दोनो तुल्य फल देने वाले हैं । या यो कहें कि हम दोनों मे समता ही प्रधान है। इसलिए हे राजा, तू इन कुमारो मे, कौरवो और पांडवों में, समदृष्टि रख । इससे इस लोक में परम कीति होकर मरण के बाद तुझे स्वर्ग प्राप्त होगा। हे नरयष्ठ, जन तक मनुष्य की पुण्यकीति इस लोक में प्रसिद्ध होती है, तभी तक वह स्वर्गलोक में मान्य होता है।" इस विषय में बहुत पहले केशिनी के लिए विरोचन वा सुधन्वा से संवाद हुआ था। वह पुरातन इतिहास प्रसिद्ध है। है राजा, 'केशिनी' नामक एक अद्वितीय रूपवती राजकन्या थी। उसे उत्तम पति चाहिए था। इसलिए उसने स्वयवर रचाया। वहां विरोचन नामक एक दैत्य नाया। तब केशिनी ने उस दैत्येन्द्र से कहा- "हे विरोचन, ब्राह्मण श्रेष्ठ है या दानव श्रेष्ठ है ? मेरे मत से ब्राह्मण ही श्रेष्ठ है, क्योकि ऐसा न होता तो सुधन्वा ब्राह्मण तेरे साथ एक आसन पर कैसे बैठा होता?" विरोवन ने कहा-"हम कश्यप प्रजापति की प्रजा है, इसलिए श्रेष्ठ हैं । यह सब लोग हमारे हैं। हमारे आगे देव और ब्राह्मण सब नीचे हैं !" केशिनी-हे विरोवन, रुको! तुम इम स्वयवर मंडप में ही बैठो। कल मवेरे सुघन्वा ब्राह्मण आने वाला है । उस समय तुम दोनों एक जगह आ जाना, तब मैं तुम दोनों में श्रेष्ठ कौन है, इसका निर्णय सापती:21 करूंगी।" विरोचन ने कहा, "ठीक है"। और दूसरे दिन सुधन्वा और विरोचन दोनों एक जगह आ गये। ब्राह्मण पास आते देखकर केशिनी उठ खड़ी हुई । उसने आसन-पाद्यादिक अर्पण करके उसका सम्मान किया। तब विरोचन ने ब्राह्मण से प्रार्थना करी-कि "इस सुवर्ण सिंहासन पर मेरे पास आकर बैठो।" यह सुनकर सुधन्वा ने कहा- "हे प्रह्लाद पुत्र, तुम्हारे इस सुवर्णासन को हाथ से स्पर्श कर मैं आदर व्यक्त करता हूँ, पर तुम्हारे साथ एक आसन पर मैं कभी नहीं वैलूंगा।" उस पर विरोचन ने सुधन्वा ब्राह्मण का उपहास किया और कहा- "हे सुधन्वा, मेरे साथ इस सुवर्ण-आसन पर बैठने की पात्रता तुझमें नहीं है। मेरे आसन से कनिष्ठ काष्ठासन या वेवासन तुम्हारे लिए ठीक होगा।" सुधन्वा ने कहा--"हे दानव, पिता-पुत्र, दो विप्र, दो क्षत्रिय, दो वृद्ध-वैश्य या दो शूद्र एक आसन पर बैठ सकते हैं। उनके अलावा और किसी को परस्पर आधे आसन पर बैठने का अधिकार नहीं है । जब मैं उच्च आसन पर बैठता था तव तुम्हारा पिता प्रह्लाद नीचे बैठकर मेरी सेवा करता था। तब तू बालक था। अपने घर में सुख से बढ़े हुए तुझे इस सभा का शिष्टाचार क्या मालूम होगा ? तू कुछ नहीं जानता।" विरोचन-"हम दोनों में श्रेष्ठ कौन ?" हम इस प्रश्न का निर्णय करने के लिए मैं अपना समस्त सुवर्ण, धेनु, अश्व और असुरों का सब वित्त दांव पर लगाता हूँ। हे ब्राह्मण, हम विशेपज्ञों से यह प्रश्न पूछे।" सुधन्वा-"हे विरोचन, सुवर्ण, गीएं, घोड़े सब तुप अपने पास रखो। हम अपने प्राणों को दांव पर लगाकर ज्ञाताओं से पूछे।" विरोचन-"ठीक है । प्राणों की बाजी लगाकर हम किसके पास जायें ? क्योंकि देव और मानव उनके सामने मैं कभी भी नहीं जाऊंगा।" सुधन्वा--"प्राणों की बाजी लगाकर हम तुम्हारे पिता प्रह्लाद के पास ही जायें। फिर तो ठीक है ? तुम्हारा पिता प्रह्लाद पुत्र के हित के लिए कभी भी असत्य भाषण नहीं करेगा।" - 22:लापता विदुर ने आगे कहा कि-"हे घृतराष्ट्र, प्राणों की बाजी लगाये दोनों क्रोध मे प्रह्लाद के पास जा पहुंचे । उन्हें देखकर प्रह्लाद ने मन में सोचा-इन दोनो का जन्म-जन्म का वर है, इसलिए दोनों एक साथ घूमते हुए कभी दिखाई नहीं देंगे। ऐमा होते हुए आज दोनों एक ही मार्ग से, एक साय यहां क्यो आ रहे हैं ? दोनों सांपों की तरह शुद्ध हैं। इसलिए पहले मैं विरोचन से प्रश्न करता हूं-"वत्म विरोचन, आज तक मैंने तुम दोनों को कभी एक साथ नहीं देखा। ऐमा होते हुए तुम आज एक साथ कैसे घूम रहे हो ? पुत्र, तेरी इस सुधन्वा ब्राह्मण से मैत्री है क्या?" विरोचन--"हे नात. इग सुधन्वा मे मैंने मैत्री नहीं की। परतु हम दोनों ने प्राणों की बाजी लगाई है और इस प्रश्न का निर्णय प्राप्त करने तुम्हारे पास आये हैं । मैं तुम्हे सत्य पूछ रहा हूं, इसलिए तुम असत्य मत बताओ।" प्रह्लाद--"हे ब्राह्मण, आप मेरे लिए पूज्य हो, अतः प्रथम मेरे इस मधुपर्क को स्वीकार कीजिये !" ऐमा कहकर उसने अपने मेवको से कहा-"पहले इग सुघन्या ब्राह्मण के लिए मयुपर्क और शुभ्रवर्ण पुष्ट गो जल्दी ले आओ।" यह सुनकर मुधन्वा ने कहा- "हे प्रह्वाद, मार्ग मे हम थे तब मधुपर्क ग्रहण किया ही है। अब पहले हम प्रश्न का निर्णय करें, उसी में सब मधुपर्क मुझे मिल जायेगा। मैं जो प्रश्न पूछ रहा हूँ इसका सत्य और निश्चित उत्तर दो-ब्राह्मण श्रेष्ठ या विरोचन श्रेष्ठ यह हमारे विवाद का विषय है।" प्रलाद- "हे विप्र, विरोचन मेरा अकेला बेटा है और तू माक्षात् ब्राह्मण मेरे सामने है। ऐसे ममय तुम दोनो के वाद का निर्णय हम कैसे करें ? है भगवान, तुम पूज्य हो । यदि तुम्हारे विरोध मे में कुछ बोलूगा तो ब्रह्मद्वेप का दोप मुझे लगेगा, और विरोचन मेरा उसके विरुद्ध निर्णय देने मे पुत्रधात का दोप मुझे लगेगा।" सुधन्वा-"पुत्र को गाय या दूसरा प्रिय घन दीजिये, परंतु हे बुद्धि- मान, हारे विवाद मे आप सत्य वचन ही वोलिये, यही उचित है।" पुर होने से करूंगी।" विरोचन ने कहा, "ठीक है"। और दूसरे दिन सुधन्वा और विरोचन दोनों एक जगह आ गये। ब्राह्मण पास आते देखकर केशिनी उठ खड़ी हुई । उसने आसन-पाद्यादिक अर्पण करके उसका सम्मान किया । तव 'विरोचन ने ब्राह्मण से प्रार्थना करी-कि "इस सुवर्ण सिंहासन पर मेरे पास आकर बैठो।" यह सुनकर सुधन्वा ने कहा- "हे प्रह्लाद पुत्र, तुम्हारे इस सुवर्णासन को हाथ से स्पर्श कर मैं आदर व्यक्त करता हूँ, पर तुम्हारे साथ एक आसन पर मैं कभी नहीं बैलूंगा।" उस पर विरोचन ने सुधन्वा ब्राह्मण का उपहास किया और कहा- "हे सधन्या, मेरे साथ इस सुवर्ण-आसन पर बैठने की पात्रता तुझमें नहीं है। मेरे आसन से कनिष्ठ काष्ठासन या वेत्रासन तुम्हारे लिए ठीक होगा।" सुधन्वा ने कहा- "हे दानव, पिता-पुत्र, दो विप्र, दो क्षत्रिय, दो वृद्ध-वैश्य या दो शूद्र एक आसन पर बैठ सकते हैं। उनके अलावा और किसी को परस्पर आधे आसन पर बैठने का अधिकार नहीं है । जब मैं उच्च आसन पर बैठता था तव तुम्हारा पिता प्रह्लाद नीचे वैठकर मेरी सेवा करता था। तब तू बालक था। अपने घर में सुख से बड़े हुए तुझे इस सभा का शिष्टाचार क्या मालूम होगा ? तू कुछ नहीं जानता।" विरोचन-"हम दोनों में श्रेष्ठ कौन ?" हम इस प्रश्न का निर्णय करने के लिए मैं अपना समस्त सुवर्ण, धेनु, अश्व और असुरों का सब वित्त दांव पर लगाता हूँ। हे ब्राह्मण, हम विशेपनों से यह प्रश्न पूछे।" सुधन्वा--"हे विरोचन, सुवर्ण, गोएं, घोड़े सव तुप अपने पास रखो। हम अपने प्राणों को दांव पर लगाकर ज्ञाताओं से पूछे।" विरोचन-"ठीक है । प्राणों की बाजी लगाकर हम किसके पास जायें ? क्योंकि देव और मानव उनके सामने मैं कभी भी नहीं जाऊंगा।" सुधन्वा-"प्राणों की वाजी लगाकर हम तुम्हारे पिता प्रह्लाद के पास ही जायें। फिर तो ठीक है ? तुम्हारा पिता प्रह्लाद पुत्र के हित के लिए कभी भी असत्य भापण नहीं करेगा।" 22: लापता विदुर ने आगे कहा कि-"हे धृतराष्ट्र, प्राणों की बाजी लगाये दोनों क्रोध मे प्रह्लाद के पास जा पहुंचे। उन्हे देखकर प्रसाद ने मन में मोचा-इन दोनों का जन्म-जन्म का वैर है, इसलिए दोनों एक साथ घूमते हुए कभी दिखाई नहीं देंगे। ऐमा होते हुए आज दोनो एक ही मार्ग से, एक साथ यहां क्यों आ रहे है ? दोनो सापों की तरह युद्ध हैं। इसलिए पहले मैं विरोचन मे प्रश्न करता हूं-"वत्म विरोचन, आज तक मैंने तुम दोनो को कभी एक माप नहीं देखा। ऐमा होते हुए तुम आज एक साथ कैसे घूम रहे हो? पुत्र, तेरी इम सुधन्वा ब्राह्मण से मंत्री है वया विरोचन--"हे नात, इन सुपन्या में मैंने मैत्री नहीं की। परतु हम दोनो ने प्राणों की बाजी लगाई है और इस प्रश्न का निर्णय प्राप्त करने तुम्हारे पाम आये हैं । मैं तुम्हें मत्य पूछ रहा हूं, इसलिए तुम अमत्य मत वताओ।" प्रह्लाद- "हे ब्राह्मण, आप मेरे लिए पूज्य हो, अत: प्रथम मेरे इस मधुपर्क को स्वीकार कीजिये !" ऐमा कहकर उसने अपने मेवकों में कहा-"पहले इम मुधन्वा श्राह्मण के लिए मधुपर्क और शुभ्रवर्ण पुष्ट गी जल्दी ले आओ।" यह सुनकर सुधन्वा ने कहा-"है प्रह्वाद, मार्ग में हम ये तब मधुपर्क ग्रहण किया ही है। अब पहले हम प्रश्न का निर्णय करें, उसी में सब मधुपर्क मुझे मिल जायेगा। मैं जो प्रश्न पूछ रहा हूं इसका सत्य और निश्चित उत्तर दो-ब्राह्मण श्रेष्ठ या विरोचन श्रेष्ठ ? यह हमारे विवाद का विषय है।" प्रह्लाद-"है विप्र, विरोचन मेरा अकेला बेटा है और तू साक्षात् ब्राह्मण मेरे सामने है। ऐमे ममय तुप दोनों के बाद का निर्णय हम कैसे करें? हे भगवान, तुम पूज्य हो । यदि तुम्हारे विरोध में में कुछ बोलूगा नो ग्रह्मद्वेष का दोष मुझे लगेगा, और विरोचन मेरा पुत्र होने से उसके विरुद्ध निर्णय देने मे पुत्रधात का दोष मुझे लगेगा।" मुधन्वा-"पुत्र यो गाय या दूमरा प्रिय पन दीजिमै, परंतु हे बुद्धि- मान, हारे विवाद मे आप सत्य वचन ही बोलिये, यही उचित है।" ता..१ प्रह्लाद ने पूछा--"हे ब्राह्मण, वाद में सत्य या असत्य कोई भी निर्णय न देने वाले को या अन्याय से निर्णय देनेवाले को कौन-सा दुःख प्राप्त होता है, यह मुझे वता।" सुधन्वा ने कहा-~"पति अपना सान्निध्य छोड़कर सपत्नी के पास जाने पर स्त्री को उस रात को कैसे दुःख होता है; या द्यूत में पराजित पुरुप जैसे खेद से रात बिताता है; या दिन-भर भार वहन कर थके हुए मनुष्य का सारा बदन दुखता है, इसलिए रात-भर जैसा क्लेश सहन करता है; उस नाटक की दुःखमय रात अन्याय का निर्णय करने वाले पुरुष को सहनी पड़ती है। जिसे मन में आश्रय नहीं मिलता, उसे क्षुधात होकर द्वार के बाहर खड़े रहना पड़ता है और जो असंख्य शत्रुओं से घिरा कष्टापन्न है ऐसे पुरुप जैसा दुःख असत्य गवाह देनेवाले को सहना पडता है। भूमि के लिए असत्य बोलने वाले के सर्वस्व का नाश होता है। इसलिए हे प्रह्लाद, भूमितुल्य केशिनी के लिए तू असत्य भाषण न कर!" प्रह्लाद ने निर्णय दिया कि- "हे विरोचन, इस ब्राह्मण का पिता अंगिरा मुझसे श्रेष्ठ है; यह सुधन्वा तुमसे वरिष्ठ है और इसकी माता तुम्हारी माता से प्रशस्यता है । इसलिए इस विप्र ने तुझे जीता है। वहीं तुम्हारे प्राणों का स्वामी है, यह मेरा निर्णय है।' पुत्र को ऐसा कहकर प्रह्लाद ने सुधन्वा की ओर मुड़कर कहा .."हे ब्रह्मन न्याय से तुम्हें अर्पित किया हुआ पुत्र विरोचन तुम मुझे वापिस दो, ऐसी मेरी प्रार्थना है।" सुधन्वा ने कहा-"प्रह्लाद, चूंकि तुमने धर्म की बात की, मोह से तुम झूठ नहीं बोले, इसलिए तुम पर प्रसन्न होकर तुम्हारे पुत्र के दुर्लभ प्राण मैं तुम्हें वापिस देता हूँ और केशिनी राजकन्या के पैर हलदी से नहलाकर, मेरे सामने विरोचन से उसका विवाह तू करा दे। यह राज- कन्या इसी की भार्या बने।" विदुर ने धृतराष्ट्र से कहा--- "यह कहानी सुनाने का तात्पर्य इतना ही है कि भूमि के लिए असत्य भापण मत करो। अरे, पुत्र के लिए झूठ दोल कर पुत्र और अमात्य दोनों के साथ अपना विनाश मत करो। पशु का पालन करने वाले गोपाल की तरह वेद हाथ में लाठी लेकर . । 24: लापता . मानव का रक्षण नही करते हैं। तो जिन्हें जिनका रक्षण काम है उन्हीं मनुष्यो को वे उस तरह को सुबुद्धि देते हैं। "वेदशास्त्र कपटाचरण करनेवाले झूठे आदमी का पाप से रक्षण नहीं कर सकते । पंख फूटते ही जैसे पक्षी अपना घोंसला छोडकर उह जाता है, वैसे ही वेद ऐसे धार्मिकों का इंतकाल मे त्याग करते हैं । यह सब दृष्टांत देकर मैं यही कहना चाहता हूं कि हे राजा, तुम्हारा देव प्रतिकूल है और तुम्हारा अध्यपन निष्फल है।" प्रवचन समाप्त हुआ। कथा वाचक ने अपना पोथी-पत्रा संभाला। सब अपने-अपने घर जाने लगे। पर सेठजी और सेठानीजी योडा पीछे रुके रहे। उन्हें पता था कि कथा वाचक जी कुछ ज्योतिप भी जानते हैं, तो उनके चरणों मे दक्षिणा रसकर उन्होंने पूछना आरंभ किया : "महाराज, हमारी एक चिन्ता है।" "मो क्या है ?" "हमारी वेटी विवाह योग्य है। पर उसका विवाह ही नही होता।" "ऐसा क्यों है ?" "हम कारण नहीं जानते।" "हम बताते हैं। उसका प्रेम कही हो गया था। वह उसी के साथ विवाह करना चाहती थी। आपने मना कर दिया।" "यह सच है।" "फिर दोप उसका है या आपका?" सेठ-सेठानी थोडी देर चुप । अपना दोष स्वयं सहज कबूल करनेवाले दुनिया मे कितने कम व्यक्ति होते हैं । "तो इसका प्रायश्चित-परिमार्जन भी आपको ही करना होगा।" "सो कैसे" "अब उसकी राय पूछकर ही आप विवाह करें। अपना भार उस पर न लादें । उसी से नुकसान होता है।" "शादी-ब्याह जन्म-जन्म का सग-माय है। इसलिए उसकी जोहरी से विवाह ते करना ठीक नही 1 कई विलायत से हिग्रीधारी होने पर भी ' उसके लिए बंगाल या दिल्ली या अन्य किसी भी प्रदेश में दहेज देकर भी, ऊंचा पढ़ा-लिखा वर मिलना मुश्किल हो गया है। ये सवेरे ही चले जायेंगे । तव तो एक रात हमारे पास समय है। उसी में हम वर के बारे में जान लें।" कथावाचक सोचने लगे। उन्होंने पैतरा बदला-"ग्रहशांति करानी होगी । आपके कुछ दुष्ट ग्रह जमा हो गये हैं !" सेठ-सेठानी ने इस बात पर उनसे विदा ली। वेटी से बढ़कर उनका एक ही देवता है-पैसा ! पैसे के लिए वे कुछ भी कर सकते थे । पैसा हो तो एक क्या अनेक वर प्राप्त कर लिए जा सकते हैं। कथावाचक समझ गये । सेठजी जा रहे थे तो उनसे कहा-"पैसा तो ठीक है । पर यह खर्च जो आप करेंगे वह धर्म विधि के कारण में लगेगा। हमें पैसा जमा करके क्या करना है ? हमारी तो कथावाचकी से काम चल जाता है। पर आप ध्यान रखें-लड़की पागल हो जाएगी। उसे बीच- वीच में बेहोशी के दौरे आते हैं। वे बढ़ जायेंगे । आप दुबारा शांत चित्त से सोच लें। राहु और शनि की कुदृष्टि है।" पर पैसा खर्च करने की बात सुनते ही सेठजी वहां कहां रुकने वाले थे। 5 ऊपा भीतर आई तो लजाती हुई। उसने आसमानी रंग की साड़ी पहन रखी थी और उसी रंग की गहरी शेड का ब्लाउज । लड़की सांवली थी पर नाक-नक्श तीखे थे। आखें बड़ी-बड़ी थी। वहां बैठे लोगों को देखकर वह भांप गई कि यह वधु-परीक्षा का मामला है । वह और सकुचाकर सेठजी के पास बैठ गई। धीमे से पूछा--- "पापा, आपने इतनी देर रात गये, और यहां मुझे क्यों बुलाया? सब खैरियत 26 : लापता तो है ?" सेठजी-"नही नही" कपा--"मैं समझी आपका वही पीठ और कमर का दर्द फिर बढ़ गया होगा और डाक्टर को बुलाना हो तो मुझे बुलाकर कहना होगा। डाइ- वर से कहकर तो वैसा ही होता जैसे उस बार हुआ, वह साली हाथ लौट आया था।" एच० मार० समझ गया कि लड़की अपने बाप को बहुत चाहती और मानती है । उन्होने ही शुरुआत की-"वी० ए० करने के बाद आगे पढ़ाई का विचार है।" "हां।" का सर्चा "अजो अपने देश में क्या रखा है ? एकदम आपका दाखिला अमेरिका की एक युनिवसिटी मे करा देते हैं। अपने पहचान वाले यहां-वहां, दुनिया- भर में हैं।" जी---"यह तो ठीक है एन० आर०पर वहा को तो मेरे बस की बात नहीं ।" एच० आर०-कौन कहता है कि आप खर्च करोगे । आप तो बेटी को शादी करा दो और जमाई और बेटी के दो हवाई टिकिट सीधे शिकागो के कटवा दो। बाकी हम सब देख लेंगे।" "यह विचार तो उत्तम है। पर ऊपा की राय भी तो जान लेनी चाहिए। बेटी, विलायत जाओगी?" बेटी मौन ? "बेटी, शादी करोगी?" बेटी मौन...। "बेटी, देख दूल्हा घर पर खुद चला आया है, सिर्फ तुम्हारी 'हा' कहने की बात है। बाकी तो सब एकदम हो जायेगा।" बेटी मौन वालावलकर-"आप विवाह का मुहूतं वगैरह नहीं देखते हैं ?" सेठजी-"वह तो सेठानी को राजी करने के लिए सब सनीगो' करने ही गई हैं।" उसकी आप परवा मत करो। जरा-सा पैसा ज्यादा लापना-27 । दिया कि सब ग्रह-नक्षत्र अनुकूल कराके जो चाहे वह महीना, हफ्ता, दिन, घटिका हम पैसे से तै करा सकते हैं । पुरोहित और मुहूर्त तो अपनी मुट्ठी में हैं।" वालावलकर ने सबसे कहा-"अर्थस्य धर्मो दासः" एच० आर० ने चुटकी ली-"क्या सोच रहे हो पार्टनर, यह सौदा अच्छा है । अगले महीने ही बैंक से छुट्टी ले लो। एकाध महीना शिकागो हो आमओ।" "एकाध महीना ?" वालावलकर ने पूछा। "नहीं, नहीं। मेरे कहने का मतलब -पढ़ाई-लिखाई इनको वहां की 'सूट' करती है या नहीं, देख लेना। फिर तो तुम्हारे लिए भी कुछ काम हम वहीं जुगाड़ लेंगे।" इस सारे संवाद में ऊषा चुपचाप बैठी सुन रही थी। जैसे उसका अपना कोई मन नहीं है । बाप ने धकेला, वर के पास फेंक दिया। वर ने फेंका, पुत्र के पास रहने लगी--स्त्री को कोई स्वतंत्रता नहीं । वह मानो निरी गेंद है । ऊषा ने कहा-"पापा, अभी कोई निश्चय न कीजिये। बाद में सोचेंगे।" "क्यों ? तुम भी लड़के को-वर को-कुछ पूछना चाहती हो तो पूछ लो।" ऊपा ने एकदम दस सवाल पूछे । "आपकी पढ़ाई कहां तक हुई ?" "यही वी० कॉम।" "क्या करते हैं ?" "बैंक में हूं।" "क्या वेतन है?" "यही अट्ठारह सौ माहवार।" "घर में कितने लोग हैं ?" "कोई नहीं है । अकेला हूं।" "यहां नहीं, और कहीं तो होंगे." "नहीं, मेरा कोई सगा-संबंधी नहीं है। मैं अनाथ ही पैदा हुआ । अव 28 : लापता - तक ऐमा ही संघर्ष करता रहा हूं-विना किसी संबंधी के।" "जो लोग ऐसे अकेले रहने के आदी होते हैं, उनका स्वभाव बहुत मात्म-केंद्रित हो जाता है।" "यह सबके बारे में सच नहीं होता।" "आपकी होबी क्या है ?" "संगीत।" "कौन-सा?" "आपको कौन-सा प्रिय है ?" "मैं भारतीय ललित संगीत पसंद करती हूं।" "मुझे पाश्चात्य क्लासिकल संगीत पसंद है ।" वालावलकर ने यों ही टाल दिया। उसने सोचा कि ऐसा कहना ही अधिक सुरक्षित उपाय कपा चुप हो गयी। "और कुछ, पूछना है ?" "नहीं।" "आप चाहें तो पूछ।" "नहीं।" यो पंजिम के एक होटल में वालावलकर का विवाह त हो गया। परंतु प्रशांत चुप नहीं था । वह बरावर खोज-खबर टोहता रहा। बैक से शादी के नाम पर वह छुट्टी और कर्ज भी ले रहा है। यहां तक उसे पता था। अब लड़की कौन-सी है और क्या करती है यह जानना उसके लिए आवश्यक हो गया था। पर कोई सुराग ही हाथ नहीं लग रहा था । 6 शिकागो जाने के लिए पासपोर्ट साइज फोटो जहां वालावलकर ने खिच- - वाये, वहां से प्रशांत को पता लग गया। बच्चू हिंदुस्तान से भागने के चक्कर में है, यह वात प्रशांत के मन में पक्की घर कर गई । अब क्या किया जाये ? प्रशांत और उसके भाई की शक्लें बहुत कुछ मिलती-जुलती थी। स्टूडियो से वह फोटो लेकर प्रशांत ने दाढ़ी बढ़ानी शुरू की और दो मास के बाद उसने भी उसी स्टूडियो से वैसी ही फोटो खिंचवा ली । वह भी पासपोर्ट दफ्तर पहुंचा। यह तस्वीर दिखा- कर उसने पता लगवाया कि अपना भाई जा कहां रहा है । तो पासपोर्ट पर 'यू० एस० ए०' (संयुक्त राष्ट्र अमेरिका) देखा। वहां जाकर यह बैंक का मामूली क्लर्क करेगा'क्या ? . प्रशांत ने यहां तक उनकी यात्रा रुकवाने की कोशिश की कि पास- पोर्ट भी उसने बनवा लिया। दो पासपोर्टी के फोटो के साम्य के सहारे देवी की टोह ली पर जब यात्रा संपन्न हो रही थी, तब पता लगा कि देवी सेन की जगह वहां देवी सेन था ही नहीं, वह तो सदानंद वालावलकर या प्रशांत के सारे प्रयत्न व्यर्थ हुए। और एक दिन ऊपा और सदानंद 'पैन-एम' से बंबई से न्यूया उड़ान भरकर चले गये। हवाई अड्डे पर पहुंचाने सेठजी, सेठानी, 'एन० आर०' और उसके अंतर्राष्ट्रीय व्यापार-संघ के सदस्यगण आदि बहुत लो. उपस्थित थे । 'एन-आर०' ने व्यवस्था की थी कि जहाज़ सीधे न्यूयार्क न जाये--रास्ते में जहां-जहां उसका व्यापार था, वहां भी रुकता-रुकता जाये । अदन, वैरूत, रोम, फ्रांकफुर्त । जूरिख, लंदन होता हुआ वह न्यूयार्क- शिकागो जानेवाले थे। नव-दंपति और विलायतं-दर्शन का शौक । कारण तो पर्याप्त था। सदानंद के जिम्मे और भी गुप्त काम थे, जो केवल वह या 'एन० आर०' जानते थे । ऊषा खुश थी कि चलो शादी भी हुई और विदेश में आगे पढ़ाई भी करने को मिलेगी । ऐसी इस यात्रा का एक चरण था बस्त में दो दिन रुकना। । अभी तक ऊषा को सदानंद के स्वभाव का पता नहीं लगा था। वह बहुत ही चुपचाप रहता। संदानंद को भी ऊषा के मन की गहराई का अन्दाज़ नहीं लग सका . 30.: लापता
पा। दोनो का विवाह तो करा दिया गया था। पर दोनों एक-दूसरे के
प्रति अजनवी थी। उन दोनों में एक तरह की दूरी और संभ्रम बरावर
बना हुआ था। इमलिए कहीं भी जाते, तो बातें बहुत ऊपरी-कारी,
उहती-उडनी होती थी। में वरुन मे:
मदानंद-"यहां अदन की तरह फोपोटं है।"
कपा -"मुझे तो कुछ खरीदना नहीं। न मेरे पास इतना फॉरेन
एक्सचेंज ही है।"
मदानद--"पैमे की परवाह तुम क्यों करती हो। मेरे मित्र ने सव
जगह व्यवस्था कर दी है। पंमा मिल जायेगा।"
ऊपा-"पर मैं जानती नहीं कि अमेरिका के लिए यहां में कुछ ले
जाना ठीक होगा? अमेरिका मे तो मब चीजें मिल जाती हैं।"
फिर दोनो चुप ।
मदानद--"देखती हो यह है देश मुस्लिम, पर यहां सबसे पपादा
ईसाई होने में गवका कल्चर एकदम पश्चिमी हो गया है। भाषा भी
अंग्रेजी और फ्रेंच ज्यादा लोग जानते हैं।"
ऊषा--"हां"
सदानद-"यहां ये लोग धर्म और भाषा को एक नहीं मानते।"
ऊपा--"हू।"
सदानंद--"तुम क्या मोवती हो?"
ऊपा--- 'ऐमें गभीर विषयों पर मैंने फ्यादा सोचा ही नहीं।"
फिर बातचीत खत्म।
कभी ऊपा ने विषय छेड़ा--"देख रहे हो समुद्र किनारा कितना
सुदर है।"
सदानद-"हां"
ऊपा--"वह बालू और समुद्र के किनारे के पेड और ऊचे-ऊंचे
मकान।"
सदानंद-"देख रहा हूं।"
ऊपा - इन्हें देखकर तुम्हें क्या भारत को याद नहीं आती?"
सदानद--"आती है।"
ऊपा-"वहां की तुलना में ये सब शहर कितने ज्यादा साफ-सुथरे हैं। लोग कितने खुले दिल से समुद्र में नहाते हैं । जीवन का आनंद लेते हैं।" सदानंद-"दोनों जगह की आवो-हवा अलग है । लोगों के स्वभाव अलग हैं।" ऊपा-"सो तो है ही, पर।" सदानंद-"पर क्या?" ऊपा-"तुम मुझसे ठीक तरह से बोलते क्यों नहीं हो ?" सदानंद-"बोल तो रहा हूं।" ऊपा-"यह भी कोई वोलना है । 'हां', 'हूं', बस।" सदानंद--"ऊपा, तुम भी यही करती हो।" ऊपा~"शायद मैं मूर्ख हूं। और हम दोनों में एक-सी रुचि के विषय नहीं हैं।" सदानंद-"ऐसा तुम्हारा भ्रम है। मैं तो सब विपयों में रुचि लेता ऊपा-"पर तुम अपने पूर्व-जीवन के बारे में कुछ नहीं कहते । क्या तुम मुझसे कुछ छिपाना चाहते हो ?" सदानंद-"शादी हो जाने के बाद एक-दूसरे का क्या छिपाव हो सकता है ?" ऊपा--"मन छिपा रह सकता है। उसमें कई तरह के एक के भीतर एक दराज़ रहते हैं । मन एक गुफा है, जिसकी गहराई का पता ही नहीं लगता।" सदानंद--"तो उस चक्कर में पड़ो ही क्यों ?" ऊपा--(गंभीर होकर) "मैं नहीं चाहती कि मेरा पति मुझसे दुराव करे।" सदानंद--"यह दुराव नहीं, ऊपा, मेरा स्वभाव है। मैं बहुत कम बोलता हूं।" फिर दोनों चुप। यात्रा पर यही हाल रहा। क्या इटली में, क्या जर्मनी में, क्या स्विट- जरलैंड में । सब जगह सदानंद को पता नहीं क्यों बैंकों में कुछ काम रहता 32: लापता था। व्यवमाय का चक्कर ऐमा ही होता है। होटल में ऊपा को छोडकर सदानंद चला जाता। कहना, 'एन० आर०' के बहुत-मै काम अधूरे हैं । फ्रांकफुर्त में एक बार रात को एक नाइट-वलय जैमी जगह में मदानंद कपा को ले गया। ऊपा के सस्कार ही दूसरे थे। उमे वह सब स्त्रियों का निर्वस्त्र होना और यों उत्तेजक नाच करना अच्छा नहीं लगा। वह कहने लगी-"छोडो यह सब, होटल वापिस चलें।" सदानंद को बड़े पाहरों में रहकर ये सब तमाशे देखने की आदत थी। पर कपा के लिए सय नया-नया था। उसे बहुत बुरा लगा कि पुरुप और स्त्रियां भी खूब पी रहे हैं और कोई सुन्दरी उन सबका सार्वजनिक अग-प्रदर्शन करके मनोरंजन कर रही है। धर्म तो अर्थ का दास बना ही पा। यहां अर्थ भी काम का दास बन रहा है । सारे 'पुरुषार्थ' मानो 'स्त्रियार्थ' हुए जा रहे हैं । इस पर दोनों में खासी बहस हो गयी- ऊपा-"स्त्री इन लोगों के लिए मानो केवल शरीर है।" सदानंद-"ऐमी बात नहीं है । यूरोप मे, जर्मनी में, रूम में, इंग्लैंड मे सब जगह बड़ी-बडी विदुषी महिलाए हुई हैं । वडी-बही वोरागनाएं हुई हैं । लेसिकाए हुई हैं। कलाकार हुई हैं। इसलिए यह कहना कि सारे पश्चिम वालों के लिए स्त्री मात्र एक 'वासना की देह' है । ठीक नही है।" ऊपा-"फिर ऐसा सव स्त्री-रूप का व्यापार क्यो? पुस्तको के कवर देखिये, सिनेमा देखिये, विज्ञापन देखिये..." सदानद-"अगर चित्र मात्र से किसी पुस्तक की विक्री बढती हो तो वे लोग क्यो न वह करें आल इज फेअर इन विजनेम एंड वार।" ऊपा-"यह मरासर स्त्रियो के साथ अन्याय है।" बार पहीना पारका जानी। दोनों जमे दो चट्टानों के मामने. सामने खड़े हैं--बीच में समुद्र दहाडें मार रहा है।
7 - । अब आगे सारा यात्रा वर्णन देने से क्या लाभ? सदानंद की शिकागो की, अमेरिका प्रवास की डायरी ही हाथ लग गई है, उसके कुछ अंश देता कितने ही नाम वदले हों, जगहें और नौकरियां बदली हों, संस्कार तो भारतीय के इतने जल्दी वदलते नहीं, सो उस डायरी के अंश यहां देता हूं, जिससे सदानंद के मन की उथल-पुथल का कुछ चित्र मिल सके । "कल रात 31 दिसंबर को पुराना साल खत्म हुआ, नया साल लगा। रात के 12 बजे बड़ा जोशो-जश्न मनाया गया। न्यूयार्क में टाइम स्क्वेयर में सुनता हूं । लोग पागलों की तरह जमा हो जाते हैं। टस से मस होने को जगह तिल भर नहीं रहती। ज्यादह पीकर रश ड्राइविंग के माने कई कार-अपघात और दुर्घटनाओं में मृत्यु-संख्या सौ-दो सौ तो सहज एक बड़े शहर का एक रात का हिसाव होता है। इस उम्मीद से कि कुछ बड़ा नया देखने को मिलेगा। मैं दक्षिण भारतीय विद्यार्थी सूर्या और उनकी पत्नी लक्ष्मी का निमंत्रण पाकर रात को उनके घर पहुंचा। दो कोरिया के विद्यार्थी, शांता और लक्ष्मी नारायण ग्यारह बजे रात की राह देखते हुए वक्त काट रहे थे। गप-शप चल रही थी। महिलाओं ने काफी पी। हम सब लोग बीअर के कनों पर जुटे थे। कोरियन लोगों से पता चला कि 'त्सारंग हमीदा' उनकी भाषा में 'मैं तुमसे प्यार करता (ती) हूं का पर्यायवाची शब्द है । एक विद्यार्थी का नाम था किम, दूसरे का 'जय-हो-चाय ।' चाय ने कहा "बौद्ध धर्म बड़ी कठिन भाषा में लिखा जाता है, ईसाई धर्म बहुत आसान भाषा में लिखा जाता है। उनकी कितावें ज्यादा विकती हैं । यही दो धर्म कोरिया में हैं।" मैंने पूछा-"दक्षिण कोरिया पर अमेरिकी जीवन पद्धति का असर कहां तक हुआ है ?" चाय बोले--"खूब, काफी !" 34 : लापता मैंने पूछा-"कौन से बड़े लेखक है?" "एक नाम लेना मुश्किल है।" कहकर टाल गये और विद्याथियों की टोली आई। मय लोग सडक पर जा पहुंचे। खूब मदमाते थे। आज होटल, विशेषत: जलपान गृह (पव) देर रात तक खुले रहने वाले थे । सिनेमाघर के आगे वहा भीड-भडक्का था। कपा यह देखकर बहुत चकरायी कि आज की रात सबको मवके साथ मनमानी करने की छूट है । हमारी होली मे भी ज्यादह । तरुणिया किलकारिया मार रही थी। कुछ चीख रही थी। कुछ तरुण जबर्दस्ती कर रहे थे। फोटो खीचे जा रहे थे। काफी कमरे क्लिक कर रहे थे। भारतीय छाय अधिक पीकर नाचने लगे। बराबर बारह बजे कागज की रंग-बिरंगी टोपियां और पी पी बाजे-आ गये । ज्यूक वाक्स से और रेडियो मे जोर-जोर मे गाने चल ही रहे । लोग भूम-झूमकर गाने लगे। शास्त्री ने कहा--"शिकागो में बहुत अच्छे क्लब है । एक गोरे पलय में भारतीयों को भी जाने देते हैं । मैंने अब नाच सीप लिया है !" मैं मन ही मन कल्पना करने लगा कि यह मोटा गजे मिर का कुरूप बौना भारतीय ऊची तगडी अमेरिकी वालाओ के साथ कमे नाचना होगा? शायद वे ही इसे 'नचाती' होगी। मुझे उत्सुकता हुई तो पूछ बैठा- "आप भारत मे थे, तब यह सब पश्चिमी नाच-गान जानते थे, सारा खान-पान करते थे क्या?" वे बोले-"बिल्कुल नहीं। यही आकर पहली वार वीअर घसी। मगर अब मेरा बीस पाउण्ड वजन बढ़ गया है। मैं आपको मेरी 'गर्ल-फ्रेंड' से मिलवाऊगा..." इत्यादि। पता नही क्यो मेरे मन में बडी जुगुप्सा बढ गई । एक अच्छी मजी- सजाई दुकान की कांच की दीवार के भीतर मजी-सजाई अई-नग्न नारी भाकृतियां खडी थी। बाहर एक पियक्कड ने जोर मे के कर दी थी, उनके अवशेष गघाते पडे थे--मांस के छिछडे, टूटी बोतलें और क्या-क्या ? मोटरें बदहवास दौड रही थी, सब नियम अनुशासन की शृखलाए तोडते ..
में देर रात घर लौटा। ऊपा तो वैसे ही थक गई थी। सो गई। मुझे बड़ी रात देर तक पढ़ने का अभ्यास था । मैंने मार्गारेट पार्टन की पुस्तक 'दि लीफ एंड दि फ्लेम' उठा ली । न्यूयार्क हैरेल्ड ट्रिब्यून की प्रतिनिधि पत्रकार पार्टन भारत में पांच बरस तक रह चुकी थी। बहुत ही मनोरंजक पुस्तक लगी। शुरू में ही उसने लिख दिया था-"मुझसे कहा गया था कि भारत में जाकर भारत की जनता से एकरूप बनो। मैं इसे मूर्खता सम- झती हूं। साड़ी पहन लेने से या थोड़ा-सा गांव में धूम आने से कहीं भारतीय बना जाता है ? मैं अमेरिकन हूं, और सदा रहूंगी। इसमें मुझे कोई अपराध की भावना नहीं जान पड़ती। मैं भारतीय नहीं बन सकती।" लेकिन हमारे सब युवक (और कुछ युवतियां भी) पूरी तरह अम- रीको वनने पर तुले हैं और अमादा हैं। क्या वे अपनी त्वचा का या मांखों की पुतलियों का, या वालों का रंग बदल सकेंगे? इस विदेश में आत्मा का रूप भी त्वचा के रंग से निर्णीत किया जाता है ! हे ईशू !! शायद यहां लोग लापता आत्मा की खोज में लगे हैं। डायरी आगे चलती रही। कुछ और हिस्से : "सतारा के रहने वाले पाटील मिले । इस्लामपुर में उनकी खेती थी। प्रेम-विवाह किया, घर के लोगों से लड़कर अंतर्जातीय विवाह किया। पत्नी छह माह बाद मर गई। तब से विरक्त, यहां चले आये। दो साल से साइंस में रिसर्च करते हैं। यहां 'टाइलेट-सफाई' (पाखाने और बाथ- रूम साफ करना) का एक घंटे में दो डालर के हिसाब से काम किया। कनाडा से जो माल आता है, उसमें लकड़ी ढोने का काम करते हैं। अपनी कमाई पर खेती में रिसर्च कर रहे हैं। बीच में भारत गये थे। एक मंत्री उनके रिश्तेदार थे। वोले-"यहां क्यों आते हो ? यहां तुम्हें क्या मिलेगा? वहीं, अमेरिका में रहो! आराम से रहो।" कह रहे थे-"कल ही पी. एच. डी. का एक अमेरिकी विद्यार्थी 'मिला। वह भारत से लौटकर आया है। कलकत्ता में वेश्यायें कितनी 36: लापता सस्ती हैं, इसका रसपूर्ण वर्णन कर रहा था। सुना, उन पर थीसिस लिखने वह पुन: भारत जायेगा।" पाटिल बोसे-"मुझे लगा कि मानो सौ-सौ जूते मुझे चौक में सरे- याम किमी ने मारे हो! हमारा सीता-सावित्रियों का, सती पूजा का देश..." - गोमा के गुंडे मिल गये । उनके साथ ही फिलिपिन्स देश को शिक्षा- शास्त्र में रिसर्च करनेवाली एक स्त्री मिली-वह शेक्सपीयर की नायि- काओं पर अंग्रेजी साहित्य में प्रबंध लिख चुकी थी। उसका पति अमेरिकी लेखक-पत्रकार है। पर उसे अमेरिकियो को भग-दड, झक-शक पसंद नहीं । वह कहने लगी कि उसकी मां चीनी और बाप इस्पाहानी थे। लेकिन वह यूरेशियन होकर भी उसका दृष्टिकोण 'पूर्व' का है। उसने कहा-पूर्व और पश्चिम का आत्मिक मेल असभव है। अमेरिकी पुरुष मे विवाह करके बारह बरस बाद भी यही उस महिला की उपलब्धि है ! गुडे से गोआ को बात चली। उन्होने टिपिकल गोवाई मध्यवित्तीय भारतीय का दृष्टिकोण बताया। वे सारी गलती नेहरू और उनके परिवार की बताते हैं। मैंने कहा-आजकल भारतीयो मे एक नये तरह का भाग्यवाद आ गया है । पहले जब कोई कठिनाई थाती थी तो भगवान पर उसकी जिम्मे- दारी डाल देते थे। अब जितनी भी बुराई हो 1-अलाय-बलाय 'नेहरूवंदा पर! अच्छाई के लिए हम खुद हैं हो बुराई-बुराई सब सरकार को। चलने लगे तो मैंने एक फलसफाना वाक्य छोड़ दिया-"मानवी संबधो में दिक्कत यह है कि जिस किसी चीज की शुरुआत होती है, उसका अन्त भी होता ही है। सबसे अच्छा यह है कि जिसका आदि हो न अन्त हो।" फिलिपिनो साहित्य प्रेमिका पी। बोली-"न आदि का पता है, न अन्त का, हम सब 'मीनहाइल' से ही सतोप कर लेते हैं।" मैंने कहा-"यही तो गीता का 'व्यक्तमध्यानि भारत' है। मध्य भी हम पूरा कहां जानते हैं । केवल जितना व्यक्त है उतना ही जानते हैं ।' अमरीकी हंसा और बोला-'हर आदमी यहां 'टीवी' के प्रोग्राम के बीच में आता है। वह पूरा होने से पहले ही उठकर चल देता है...।" मैं पुराने अखवार पढ़ रहा था। विदेशी लोग भारत और चीन की आर्थिक तुलना करते हैं । 'निउ स्टेट्समैन' में शुमांत ने 'भारत के भूखे करोड़ों लेख में बहुत पहले लिखा था-"एफ.ए.ओ.के एस.के.दे ने धुमांत से पूछा था--'तुम भारत में प्रजातंत्र चाहते हो या आर्थिक प्रगति ?" क्या इन दोनों में विरोध है ? एक रेडियो में काम करने वाली लेखिका से मिलना हुआ। उसने बताया कि हत्या-खून-वलात्कार और अपराध आदि पर उपन्यास 'लिखने से सभी ज्यादह कमा लेते हों, ऐसी बात नहीं है। सात दिनों में पचास हजार शब्दों की एक कहानी उसने लिखी है, सो अब तक अप्र- काशित पड़ी है । उसने बताया कि अमुक लेखक इतना अधिक लिखता है कि जैसे रद्दी के तौल से बेचता हो। विपुल लेखन में भूसा ज्यादह दाने कम होते हैं। जैसे कहावत है कि 'क्या कावुल में गधे नहीं होते?' वैसे ही' क्या अमेरिका में रद्दी लेखक नहीं होते हैं ?" मैंने इधर भारत से आई एक पत्रिका में लम्बी कहानी, धैर्यपूर्वक 'पढ़ी। एकदम वेकार । कहीं-कहीं कुछ वाक्य अच्छे बन गये हैं। पर कुल मिलाकर प्रभाव एक ऐसे रंगफलक (पैलेट) का है जिसमें सब रंग गड्ड- मड्ड होकर मटियाले, धुंधले हो गये हों। मार्गारेट पार्टन ने लिखा है- हिंदू जन काले और सफेद में सोच ही नहीं सकता। वह सदा भूरे (ग्रे) में सोचता है।" इस तरह से सदानंद की डायरी के अंश कितने ही दिये जा सकते थे। पर वह केवल यही दिखाते हैं कि सदानंद वहां ज्यादह दिन नहीं रह पाया। ऊपा को तो एक कालेज में पढ़ने की अनुमति मिल गई थी। छोटा-मोटा - 38:लापता काम भी मिल गया था। ऊपा को छोडकर सदानंद पुनः यूरोप के रास्ते होते हुए अकेला भारत लौट आया। कही न कही गहरे में उसके मन में यह पीड़ा थी कि वह बिना जड़ो का, निमल, विच्छिन्न, एक तरह की अमरवेल का-सा जीवन बिता रहा है। फिर उमने यूरोप में गत महायुद्ध के बाद रेफ्यूजियो के जहां तांते लग गये, और जिन-जिन देशो मे विनाश के बाद पुनिर्माण का कार्य भी बड़े पैमाने पर हुआ, वह देता, और उसके मन में यह एकाकीपन उसे और भी सालने लगा। 1 ०० ऐमी दगा में वह वापिस वबई लौट आया। दिल्ली वह जाना नहीं चाहता था। उसे हर पा कि कोई पुराना पहचान वाला ही न मिल जाये। 'एन. आर.' से उसका गुप्त सबध बरावर चल रहा था, इसलिए उसकी आधिक स्थिति अच्छी थी। वह समस्या उसे सताती नहीं थी। पर कपा भी अमेरिका में छूट गई। नौकरी भी उसने बदल डाली। सदानद अब एक मनोवैज्ञानिक डॉक्टर बनकर बबई के उपनगर में रहने लगा। तरह-तरह के नीम पागल और ऐसे ही रोगियो से उसका पाला पड़ा। पुनर्जन्म के कारण पूर्व स्मृतियो के सस्कारो से पीडित कुछ लोग थे। ऐसी ही एक 'फेस' मे डॉक्टर सद्रानद (अमेरिका से वह एक डिग्री कही से जुगाड लाया था) और उस नये परिवार के व्यक्तियो को बातचीत यहा दी जा रही है। "आइये, आइये, डॉक्टर साहब आपकी बड़ी ख्याति सुनो।" "स्याति-व्याति क्या ? यों ही, कुछ सेवा कर लेते हैं।" बैठिये।" - , "शीला, जरा डॉक्टर साहब के लिए चाय, काफी, शर्वत लाना- क्या लेंगे आप?" "नहीं-नहीं, कुछ भी नहीं । अभी पीकर आ रहा हूं। तकल्लुफ रहने दीजिये।" "नहीं साहब, मेरी पत्नी बड़ी अच्छी चाय बनाती है । इसी बहाने मुझे भी थोड़ी मिल जाएगी।" "क्यों आपकी चाय पर भी श्रीमतीजी का कंट्रोल है क्या ?" "नहीं, वे चाय की विरोधिनी है। उनके विचार से इस पेय से दिमाग में खुश्की बढ़ती है । नींद नहीं आती। भूख मंद हो जाती है, आदि ...आदि।" "कुछ हद तक उनकी बातें सही हैं...." "आप सिगरेट पियेंगे?" "जी नहीं, शुक्रिया।" "इसके बारे में भी यही सब कहा जाता रहा है। जान पड़ता है कि अपने बुजुर्ग आनंद मात्र के विरोधी थे। मनःशुद्धि के नाम पर और निर्व्यसनता के नाम पर कई कुंठित पुरुष और स्त्रियों का क्रोध जागृत होता था।" "मैं पुरातन मतवाला व्यक्ति नहीं हूँ। पर व्यसनों पर मनुष्य का नियंत्रण या अधिकार रहे तो उत्तम । अन्यथा वह 'दास' बन जायेगा...." इतने में शीला चाय की ट्रे आदि लेकर आई। मुख्य विषय पर चर्चा शुरू हुई। अव प्रोफेसर ने कहना शुरू किया-"शीला को वहम हो गया है, कि वह पूर्वजन्म में एक राजकन्या थी, और उसने एक भिक्षुक का अपमान कर दिया, जिसने उसे शाप दे दिया। इसीसे वह बार-बार उसके सपने में आता है और तंग करता है।" शीला सिहरने लगी। सोफे पर बैठकर आंखें मूंदकर वह अपनी कहानी सुनाने लगी-"एक सफेद काली-चितकवरी दाढ़ी वाला, भगवी कफनी पहने, क्रोधी मुद्रा में, लाल-लाल आंखें दिखानेवाला साघु चीख रहा है-तुम कभी कोई चीज़ भूल नहीं सकोगी। बचपन से जीवन में ..- 40:लापता हुई हर छोटी से छोटी पुरी वात वरावर याद आती रहेंगी । तुम इम जन्म में मर जाओगी, अल्प वयस में-पर अगले जन्म में भी तुम मुखी कभी नही रह सकोगी।"तुम किस बात पर घमंड कर रही हो राज- कन्यै ! यह रूप ज्यादा दिन नहीं टिकने वाला है। यह धन यह तो पानी का बुलबुला है। यह प्रतीक्षा और राजमहल का मान, केवल सपना है। नही, मही, तुम कभी सुखी नही रहोगी..." बडो देर तक यह उस साधु की बात चार-बार दोहराती रही। बीच- बीच में भय से पर-पर कांपते हुए, वाणी अवस्ट हो जाती, कंठ-स्वर अधु-विगलित हो जाता। बड़ी देर बाद यह एकदम अचेत हो गई-निढाल होकर वह सोफे पर औधी गिर पड़ी। पति ने उसे वहां से उठाकर दाय्या पर लिटा दिया। डॉ. सदानंद सोचने लगे कि इसका उपाय क्या हो? शीला के पति से उसने पूछा- "इमका मन कही ऐसे अन्य मनोरंजक या दिल बहलाने वाली चीजों में भटकाना चाहिए कि वह यह सब दु.म्वप्न भूल जाये"" शोला के पति सुरेश ने कहा-"मैंने वह सब करके देता है । मैं उसे कई फिल्में दिखाने ले गया हम लोगों ने थियेटर देरो। हम छुट्टियों में विकनिक पर गये। मैंने उसे कमरा ला दिया कि यह फोटोग्राफी सीखे। घर मे संगीत के टीचर लगा दिये । पर यह सब व्यर्य सिद्ध हुआ जब दौरा आता है, वह पूर्ववत हो जाती है।" डॉ. सदानद गंभीर हो गया। फिर प्रश्न किया-"वह साथ उससे क्या चाहता है ?" "वह उसके प्राण चाहता है। शोला के मन में यह बात पक्को बैंठ गई कि वह जल्दी ही मर जायेगी~~उसका दिल बहुत कमजोर हो गया है। वह रात में नींद में से चोककर उठ जाती है । रात-रात-भर उसे नोद नहीं आती।" डॉ. सदानंद ने कहा-"मैं इसका उपाय करूंगा।" डॉ. सदानंद शीला चोर उसके पति से विदा लेकर अपने एक गाप मित्र के पास पहुंचे । साधु का इलाज साधु द्वारा ही हो सकता था।
- यह साघु मित्र नाम का साधु था। वह जीवन में कई तरह के बुरे काम कर चुका था। शायद वह 'एन० आर०' की गैंग का एक सदस्य धा। उस ढोंगी साधु का नाम था रग्घू । वह अव अप. आपको राघवानंद कहता था। एक छोटी-सी फर्म में बहुत कम तनख्वाह पर वह पहले काम करता था डेढ़ सौ रुपये माहवार पर । प्राइवेट परीक्षाएं देकर वी० ए० हो गया, वहीं उसे पैसे खाने का चस्का लग गया था। हर काम में कमीशन लेता था। धीरे-धीरे वह बढ़ता गया, सफल होता गया। जैसे को वैसे मिल ही जाते हैं। उसकी किस्मत से एक बार शहर में एक नामी स्वामी जी आये, जिनकी शिष्य-शाखाएं अमेरिका और कनाडा में थीं। उन्होंने इस चतुर. और कुशाग्र बुद्धि के व्यक्ति को देखा । और उन्होंने एक चेला मूंड लिया अब धीरे-धीरे इस साघुगिरी के कुछ टेकनिकल शब्द यह दुष्ट आदमी सीख गया -प्राणायाम, ध्यान, कुंडलिनी, शक्तिपात, नाम-योग इत्यादि और इसने भी अपनी आध्यात्मिक दुकानदारी शुरू कर दी। छोटी-सी जगह उसके पास थी। बाहर पटिया लगा दिया-स्वामी राघवानंद 'प्रणव-विशेषज्ञ' । जितनी रहस्यवादी शब्दावली का प्रयोग करो, उतना ही अच्छा ! जनसाधारण तो मूर्ख होते ही हैं, उन्हें और मूर्ख बनाने वाला चाहिए। इस देश में यह विना पूंजी का धंधा सबसे अच्छां चलता है। सदानंद ने राघवानंद को सारा किस्सा सुनाया । राघवानंद ने पूछा -''शीला का पति सुरेश कैसा आदमी है। यानी उसके पास पैसा-वैसा कितना क्या है ? कमीशन तगड़ा मिल रहा हो तो हम ही उस सपने वाले भिक्षुक का भौतिक प्रत्यक्ष रूप धारण कर लेते हैं।" सदानंद ने कहा-"चलो उसके यहां बात कर लेंगे।" शीला के घर पहुंचते ही साधु को देखकर वह चीख उठी-"अरे, वही वावा आ गये !" साधु ने दाढ़ी पर से हाथ फेरा और पूछा-"वहीं' से क्या मतलब है ?" शीला-"सपने में उन्हें रोज में देखती हूं। वैसी ही भौहें हैं । वैसी . । 42: लापता ही चितकबरी दाढ़ी है। वह भगवी कफनी भी वैसी ही पहनते हैं । हाय, अब मैं क्या करूं।" वह सिहरने लगी। माघु मुस्कराये। बोले-"बहुत अच्छा।" पोला चुप । घर में बैठे सब लोगों पर मक्ता। एक अजीब सोफ का बालम तारी हो गया। मुरेश भी चुपचाप सिगरेट पीता, नाखून कुतरता एक कोने मे बैठा रहा, नपुंमक को तरह । साधु ने कमरे मे छाया मौन तोडा-"सव लोग यहां से बाहरचले जायें। मिर्फ मैं और सदानद यहां रहेंगे। मुझे 'पेशंट' से कुछ एकान्त में ज़रूरी बातें करनी हैं । दरवाजे खिडकी के वाहर कोई कान लगाकरन बैठे। बहुत बुरा होगा, यदि प्रेतात्माओं को इस बातचीत के बीच मे कोई मत्य आ गया हो। उमी समय वह मर जायेगा।" अब मय मरने के डर से बाहर हो गये। कमरे में शीला, माधु राषया- नंद और सदानंद बचे रहे । जो बातचीत शुरू हुई उमका वैग गो कार से कोई अर्थ नहीं लगता था। कट-पटाग और जलजलूलमी, निरपंग और विसंगत बातें लगती थी। पर मनोविश्लेपण के जानकार, जो हर पान- सिक असाधारणता का अर्थ लगा लेते हैं, उममे एक गहरा गोकार किमी किसी चीज से पायेंगे, जहा मन के भीतर कोई कुठा की घडी जमकर बैठ गई थी। मन सदा लापता चीजो की खोज में लगा रहता है, तब तक चीजें घुलकर मिटती चली जाती हैं। माल्वादोर दाली की विघ- लती हुई घडियो की तरह एक हिमनदी मे आधे टूटे खभो की तरह.." साघु ने कहा--"मत डरो बच्ची।" "मैं बच्ची-बच्ची नही । मैं मयानी हो गयी हू । मेरो मा मुझे क्यों पीटती है ? मैंने पापा को बाथरूम में नगा नहाते देखा था ..।" सदानंद-"नव तुम्हारी उम्र क्या थी ?" "मेरी कोई उम्र नहीं। मैं आद्या शक्ति हू । मैरवी हू । मैं जन्म से नारी हू-मृत्यु तक रहूगी। मैं मनी हू । मैने कोई पाप नही किया है।" साघु-"त्रो तुमने उस भिक्षुक को दान क्यो नही दिया?" "वह अमभव चीजें मागता था?" सदानद-"कसी अमभव - - "माकारा कुसुम गूलर का फूल, सोने का पहाड़, रेगिस्तान में फवारा, हमेशा जमा रहने वाला इंद्र धनुप।" साधु-"तव वारिश हो रही थी ?" "विना वादल के विजली, विना आकाश के धूप-अधर में देवता नाच रहे थे...." सदानंद-"कौन से देवता?" "उनका चेहरा नहीं था। सदानंद-"फिर भी याद करने की कोशिश करो।" "उनकी आंखें लाल थीं, पड़ोस के चाचा वैजनाथ जैसी। बचपन में उनसे बहुत डरती थी।" साधु-"क्यों ?" "वह खूब शराब पीकर घुत्त होकर आते। देर रात नशे में वीवी को खूब पीटते । छोटे-छोटे बच्चे चीखते-हमारी भाभी को मत मारो! सदानंद-"कोई मदद करने नहीं आता?" "घर में कोई नहीं था। पड़ोस की बुढ़िया आकर दरवाजा पीटती पर उसकी कौन सुनता ?" साधु-"फिर क्या हुआ ?" "मैं नहीं बताऊंगी राज-कन्या को पंख उग आये। हंस उसे उड़ाकर पहाड़ के पार किले में ले गया।" सदानंद-"फिर क्या हुआ ?" "वही दुष्ट साधु लौटकर आ गया। उसने राजकन्या की दोनों टांगे तोड़ डाली।" सदानंद-"तो क्या हुआ? दुनिया में कई लंगड़े हैं । विकलांग हैं। मजे में रहते हैं।" "नहीं-नहीं वह मां बनना चाहती थी। वह मां नहीं बन सकी। उसकी ममता की डोर टूट गई।" साघु---"राजकन्या वच्चा गोद ले लेती।" सदानंद-"तुम अपने पति को चाहती हो?" "मैं उसके बिना रह नहीं सकती।" 44: लापता सदानंद--"यह साघु तुमसे व्याह करना चाहता था?" यह चीसी-और बेहोश हो गई। सदानंद ने कहा,-"साधु राघवानंदजी, अब आप जायें । हम इमका कोई-न-कोई उपाय खोज निकालेंगे।" 9 । 1 पीला का और इतिहास जानने पर पता लगा कि उसे बच्चा नहीं हुआ पा। कई बार बच्चा होनेवाला होता, पर जल्दी से गिर जाता। या तो उसके शरीर मे कोई दोप या, या मन में। डॉक्टरों को दिखाया कि कोई पारीर में कमी तो नही थी। पति-पत्नी वैसे स्वस्थ्य थे। कोई भी समस्या नयी। रोग मानसिक ही था। सदानंद ने अमेरिका मे जाकर दुनिया भर को अवानर बातें मीरम ली थी--उनसे वह लोगो पर रौब गालिब कर मकना था। अच्छी अप्रेषी बोल लेता था। अच्छे नफासत से कपड़े पहनना था। एक नूर आदमी, दस नूर कपडा । और उसमे सौ नूर बातचीत का लफडा । पर भीतर-भीतर डॉ. सदानद को एकान बहुन खलना था। अकेला होने पर उसका मन उसको खाने लगता था। बार-बार उसे अपने परिवार की याद आती । सौतेली ही क्यों न हो मा कमी है. कहा है? और सब रिश्तेदार ? आंधी आते ही पक्षी भाग नही जाते हैं ? दरिद्र का भी ऐसा ही होता है। फिर पेड पर पत्ते आये कि पक्षी चहचहाने आ जुटते हैं । पैसे वालो के पास लोग हर तरह जमा हो जाते है । जहा होगे कण, वही जुटेंगे जन। (असतील शित, तेथे जमतील भुतें)। उसे लगा कि इस तरह से अकेले रहने की जिंदगी कोई जिंदगी नहीं। इसलिए उसने विचार किया कि विज्ञापन देकर विवाह के योग ?
पत्नी या वधू ढूंढी जाये । वह जानता था कि ऐसे विवाह करना खतरों से
खाली नहीं । पर विज्ञापन का परिणाम यह हुआ कि पचासों प्रार्थना-पत्र
आ गये। उनमें से छांटना भी मुश्किल था। कई लोगों को बुलाया । एक
एक से बात की एक भी नहीं जंची।
जीवन इसी तरह दिशाहीन भटकता चल रहा था कि एक दिन
उसके चिकित्सालय में एक युवती आई । सहमी-सहमी, डरी-डरी सी।
उसने आकर बताया कि वह शीला की सहेली है, और उसके बारे में बहुत
कुछ बताना चाहती है।
सदानंद ने उसे एकांत कमरे में ले जाकर पूछना चाहा। पर वह
कहने लगी-"मैं यह सब क्यों बता दूं? मुझे इसके ऐवज में क्या
मिलेगा?"
सदानंद ने कहा- "जैसी जानकारी तुम दोगी उस पर उसके दाम
निर्भर होंगे । मैं पहले से कैसे बता दूं ? मानो मैं तुम्हें कई हजार रुपये
कहूं और तुम एकदम कुछ न बताओ, तो?"
वह जोर से हंसने लगी । बोली--"आप भी अजीव आदमी हैं। गुप्त
बातें जानने को इतने उत्सुक हैं ? पर उसके भी पैसे चाहते हैं ? मोल-तोल
करते हैं । आप वेकार आदमी हैं ।" थोड़ी देर चुप रहकर वह बोली-
"आप गाना सुनोगे ?"
सदानंद ने कहा-"क्यों नहीं ?"
निदा फाजली की गजल थी जो उसने गाई :
.
"जब से करीव हो के चले जिंदगी से हम
खुद अपने आईने को लगे अजनबी से हम
कुछ दूर चलके रास्ते सब पर एक से लगे
मिलने गये किसी से मिल आये किसी से हम
अच्छे-बुरे के फर्क ने वस्ती उजाड़ दी
मजबूर हो के मिलने लगे हर किसी से हम
शाइस्ता महफ़िलों की फिजाओं में जहर था
जिंदा बचे हैं जेहन की आवारगी से हम
46:लापता
जंगल मे दूर तक कोई दुश्मन न कोई दोस्त
मानूम हो चले हैं मगर बंबई से हम"
उसकी आवाज बहुत ही अच्छी थी। उसमें लोच भी था। दर्द भी
था।
पोडी देर दोनों चुप बैठे रहे ।
सदानंद ने कहा--"तुम्हारा नाम क्या है ?"
"लीला"
यह नाम गोला से मिलता-जुलता था। यह मेरे पास क्या केवल शीला
के बारे में बनाने आई है. या इसका कुछ और गहरा इरादा है ? डॉ०
सदानंद थोड़ा मन-मन मे सकुच गया।
ऊपर में उसने कहा--"आपका गाने का ढंग बहुत ही अच्छा है।
क्या आपने गाना कही मीखा है ?"
"हा"
.
"वहां?"
"मुन्नीजान के कोठे पर।"
"आप और मुन्नीजान का कोठा।" सदानद को विश्वास नहीं हुआ।
"क्यो, उसमे क्या बुराई है?"
"अच्छाई-बुराई नहीं। पर ऐसी बात कोई लडकी एकदम एक अपरि-
चित को बताती नहीं है।"
वह हमने लगी । उससे साफ था कि लीला इम मनोचिकित्सक की ही
मनोचिकित्सा करने आई है।
हम सब कितने भोले हैं । हम समझते हैं कि हम सब होशियार है।
और अपने को औरो की निगाह से छिपा रहे हैं। पर असल में कोई
किमी से छिपा हुआ नही है । सवको सबका पता है। सिर्फ हम एक विराट
धोखाधड़ी के शिकार है । हम सब आरम-वचक है । अपने-आपको औरो से
बेहतर मानते रहते हैं।
"तो लीला, क्या मुन्नीजान के यहा जाना तुमने स्वेच्छा से चना ?
वहा तुम क्यो गई?"
"यह सब मैं क्यो वताऊ ? पहले यह बताइये कि आप इसके बदले
में मुझे क्या देंगे?" "क्या ज्ञान की कोई कीमत है ?" "आप अपना मनोरोगों का ज्ञान वेचते रहते हैं। क्या यह पाप नहीं है ?" "पाप छिपाना है। वैसे अच्छे-बुरे कर्मो का फल तो आदमी यहीं, इसी जन्म में, दूसरे ही क्षण पा लेता है।' "क्या आप इस बारे में इतने आश्वस्त हैं ?" डॉ. सदानंद ने एक किताव अलमारी से उठाई और लीला को उसने एक भदत्तशूर का श्लोक सुनाया: पापं समाचरति वीतघृणो जघन्यः प्राप्यापदं सघृण एव तु मध्यवुद्धिः । प्राणात्ययेऽपि न तु साघुजनः सुवृत्तं वेलां समुद्र इव लंघयितुं समर्थः ।। और अर्थ भी बताया-"निर्दय नीच पुरुष सदा पापाचार में ही प्रवृत्त रहता है, मध्यम श्रेणी का व्यक्ति आपत्ति पड़ने पर कुछ सहृदय हो जाता है किन्तु साधु पुरुप-जिस प्रकार समुद्र अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता उसी प्रकार प्राण-संकट आने पर भी अपना सदाचार नहीं छोड़ते।" लीला ने सीधे प्रश्न किया-"क्या आप अपने को साधु पुरुष समझते हैं ? आप वह निर्दय नीच पुरुष हैं जो पापी और पुण्यवान के बीच में झूल रहे हैं । देखो सदानंद, मुझसे कुछ छिपाओ मत, मैं ऊपा से सब जान चुकी हूं वह यहां भारत में आ गई है। मोर तुम पर तलाक़ का मुकद्दमा करने जा रही है।" अव डॉ० सदानंद की पहली फिक्र यह हुई कि इस स्थिति से कैसे भागा जाये ? वह 'एच० आर०' की सहायता लेने गया। उसने एक कोड नंबर बताया हुआ था। उसपर उसने फोन किया । और उघर से जानकार आदमी ने सूचना दी। अभी दो दिन 'बॉस' वाहर है। फिर 'कांटेक्ट' करना। दो दिन सदानंद के बहुत बुरे बीते । वह यह सोचता था कि ऊपा उधर अमरीका में मजे में है। और अब उसकी जान संकट में है । कोई 48:लापता चिता नहीं है । न आगे पाग, न पीछे पगहा। वह मुक्ताचारी है । जो चाहे सो करेगा । उमे कोई नहीं जानता कि उसका भूत क्या है। यही मनुष्य की दूसरी बड़ी गहरी आत्मप्रवंचना है। कोई भी मनुष्य अपने 'भूत' से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकता है, न हुआ है । जय तक शरीर है, उसके निर्माण करनेवाले पिता (निश्विन न हो तो भी) माता है । उसमे परंपरित संस्कारो के बीज है । वही तो दूसरे पान्दों में पूर्वजन्म का दान है। सदानंद यथा नाम जो सदा आनद मे रहना चाहता है। पुराने सब दुःखो को भूलकर 'गुम-शुदा' बने रहने में उसे सुख है। पर अपने-आप से कहां भागेगा? उसके भीतर कुछ है जो उसे कुरेद-कुरेद कर, कोचकोंचकर जगाता, उकसाता, पहचानता रहा होता है-तू अरविद मलहोत्रा है। तू अरविंद मलहोत्रा है। तू अरविंद मलहोत्रा है। तू न देवी सेन है, न सदानद वालावलकर, तू और कुछ बन "तू यहाँ से भाग जा... "तुझं इस पृथ्वी पर कहीं चैन नहीं है, जब तक तेरा असली असली आदमी लगा नहीं लेगा। लेकिन क्या यहां ने भाग जाना इतना मामान है ? ठीक है, फिराया दिया हुआ है । और कोई बंधन या चिंता नहीं है । पैसा भी पास में काफी है। लेकिन वह सर्वशक्तिमान, मबको ऊपर से भीतर-बाहर देयते रहने वाला ईश्वर नही ~दादा 'एच० आर०' उसकी गिरफ्त से कैसे बचा जायेगा? सदानंद ने सोचा कि इसके पहले कि पा से जाकर लीला कुछ कहे और वह कोर्ट में मुकदमा दायर करे और वह समन्म उसके पलट तक आयें, वह वहां में उगी तरह भाग निकले-दो जोडी कपड़े, स्लीपिंग बैंग और बैंक अकाउंट साल पूरा खाली करा ले। कैश कितना साप में रस सकता है। किसी दूसरे ही नाम मे ट्रेलवेम चक बनवा ले। यह मय उसने दूसरे ही दिन किया। और रात को गाडी से यह पूरब चला गया। सीधे उड़ीसा मे घटक जा पहुंचा। और एक होटल में अपना नाम महादेव शार्मा लिखवाकर रहने लगा। इसी नाम मे उसने ट्रेवेलसं पता, । ।
" में मुझे क्या देंगे?' "क्या ज्ञान की कोई कीमत है ?" "आप अपना मनोरोगों का ज्ञान वेचते रहते हैं। क्या यह पाप नहीं है ?" है "पाप छिपाना है। वैसे अच्छे-बुरे कर्मों का फल तो आदमी यहीं, इसी जन्म में, दूसरे ही क्षण पा लेता है।" "क्या आप इस बारे में इतने आश्वस्त हैं ?" डॉ. सदानंद ने एक किताव अलमारी से उठाई और लीला को उसने एक भदत्तशूर का श्लोक सुनाया: पापं समाचरति वीतघृणो जघन्यः प्राप्यापदं सघृण एव तु मध्यबुद्धिः । प्राणात्ययेऽपि न तु साधुजनः सुवृत्तं वेलां समुद्र इव लंघयितुं समर्थः ।। और अर्थ भी बताया-"निर्दय नीच पुरुप सदा पापाचार में ही प्रवृत्त रहता है, मध्यम श्रेणी का व्यक्ति आपत्ति पड़ने पर कुछ सहृदय हो जाता है किन्तु साधु पुरुष-जिस प्रकार समुद्र अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता उसी प्रकार प्राण-संकट आने पर भी अपना सदाचार नहीं छोड़ते।" लीला ने सीधे प्रश्न किया-"क्या आप अपने को साधु पुरुष समझते हैं ? आप वह निर्दय नीच पुरुप हैं जो पापी और पुण्यवान के बीच में झूल रहे हैं । देखो सदानंद, मुझसे कुछ छिपाओ मत, मैं ऊपा से सब जान चुकी हूं वह यहां भारत में आ गई है। और तुम पर तलाक़ का मुकद्दमा करने जा रही है।" अब डॉ० सदानंद की पहली फिक्र यह हुई कि इस स्थिति से कैसे भागा जाये ? वह 'एच० आर०' की सहायता लेने गया। उसने एक कोड नंबर बताया हुआ था। उसपर उसने फोन किया । और उघर से जानकार आदमी ने सूचना दी। अभी दो दिन 'बॉस' बाहर है। फिर 'कांटेक्ट' करना । दो दिन सदानंद के बहुत बुरे बीते । वह यह सोचता था कि ऊपा उधर अमरीका में मज़े में है। और अब उसकी जान संकट में है । को । । 48 : लापता । चिंता नहीं है । न आगे पाग, न पीछे पगहा। वह मुक्ताचारी है । जो चाहे सो करेगा । उसे कोई नहीं जानता कि उसका भूत क्या है। यही मनुप्य की दूसरी वही गहरी आत्मप्रवंचना है। कोई भी मनुष्य अपने 'भूत' से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकता न हुआ है । जब तक शरीर है, उसके निर्माण करनेवाले पिता (निश्चित न हो तो भी) माता है । उसमें परंपरित संस्कारो के वीज हैं। वही तो दूसरे शब्दों में पूर्वजन्म का दान है। सदानंद यथा नाम जो सदा आनद में रहना चाहता है। पुराने सब दुःखो को भूनकर 'गुम-शुदा' बने रहने में उसे मुख है। पर अपने-आप से कहा भागेगा? उसके भीतर कुछ है जो उसे कुरेद-कुरेद कर, कोंच-कोंचकर जगाता, उकसाता, पहचानता रहा होता है-तू अरविद मलहोत्रा है। तू अरविंद मलहोया है। तू अरविंद मलहोत्रा है। तू न देवी सेन है, न सदानंद वालावलकर, तू और कुछ बन "तू यहा से भाग जा.. "तुझे इस पृथ्वी पर कही चैन नही है, जब तक तेरा असली पता, असली आदमी लगा नही लेगा। लेकिन क्या यहां से भाग जाना इतना आसान है ? ठीक है, किराया दिया हुआ है । और कोई बंधन या चिंता नहीं है । पैसा भी पास मे काफी है । लेकिन वह सर्वशक्तिमान, सबको कपर मे भीतर-बाहर देखते रहने वाला ईश्वर नही -दादा 'एच. आर.' उसकी गिरफ्त से कैसे बचा जायेगा? सदानंद ने सोचा कि इसके पहले कि ऊपा से जाकर लीला कुछ कहे और वह कोर्ट में मुकद्दमा दायर करे और वह समन्म उसके फ्लैट नक आयें, वह वहां में उगी तरह भाग निकले-दो जोडी कपडे, स्लीपिंग बैग और बैंक अकाउंट कल पूरा खाली करा ले । कैश कितना साथ मे रख सकता है। किसी दूसरे ही नाम मे ट्रेलवेर्म चक बनवा ले। यह मव उमने दूसरे ही दिन किया। और रात की गाडी मे वह पूरब चला गया। सीधे उडीसा से कटक जा पहुंचा । और एक होटल मे अपना नाम महादेव शर्मा लिखवाकर रहने लगा। इसी नाम से उसने ट्रैवेलर्स लापता: 49 - । चैक वनवाये थे-वंबई में जहां उसका मनोरोग का क्लिनिक था, उससे वहुत दूर, उलटी दिशा में, एक उपनगरीय बैंक से । अब महादेव शर्मा की एक नयी जिंदगी शुरू होती है। एक सस्ते से होटल में वह रहता है । वाज़ार से कुछ रंग, कुछ बुश, कुछ कैनवास खरीद- कर लाया है, और दाढ़ी उसने मुंडवा दी है । मूंछ रख ली है, चीनी ढंग की होंठों के दोनों ओर लटकती-सी। होटल मालिक को उसने अपने- आपको एक आर्टिस्ट वताया है । और स्थायी ठिकाना एक झूठा ही बिहार का भागलपुर का पता बता दिया है। होटल मालिक से उसकी बातचीत के हिस्से : "तो आप मिस्टर शर्मा, कितना दिन इहां रहेगा ?" - "आप दस दिन तो रहने ही देंगे । यह एडवांस किराया ले लीजिये। मैं फिर समुद्रतट पर जाऊंगा। मेरी इच्छा पुरी से गोपालपुर जाने की है। मैं समुद्र के अलग-अलग 'मूड्स' के कई चित्र बनाना चाहता हूं।' "उनका आप क्या करेंगे?" "कलकत्ता में उनका एवजीविशन होगा।" "समुद्र में ऐसा क्या व्यूटी आपको लगता है ?" "समुद्र में सब तरह के जीव हैं। तरंगें हैं। सब नदियां मिलती हैं। असल में मनुष्य का सबसे पहला सहचर वही है। वहीं से सारा जीवन पदा हुआ ।" "वाह, यह अच्छी होवी है।" महादेव शर्मा ने अब एक अच्छी-सी पब्लिक लाइब्रेरी में जाकर समुद्र और महासागर के बारे में पढ़ना शुरू कर दिया। समुद्र में से ही तो अमृत- मंथन हुआ था। इसीलिए श्री के अर्थ हैं दोनों अमृत और विप । श्री-श्री इसीलिए एक साथ हमारे बड़े नामों के पीछे लिखते हैं। उसने संस्कृत में समुद्र के बारे में कितनी-कितनी मनोरंजक वातें पढ़ी और अपनी डायरी में जमा कर ली। उनमें से कुछ इसलिए कि लापता आदमी की यह अपने को भुलाने की यह लंबी कोशिश किस-किस तरह से व्यक्त होती रही। समुद्र दो मर्यादाओं का पालन करता है। एक तो वह तट का उल्लंघन नहीं करता । दूसरे वह किसी भी प्यासे को एक बूद भी नहीं देता। क्या । 50:लापता विचित्र वात है, इतना बड़ा जल का पारावार, पर न किसी की तथा बुझा पाता है, न अपनी वेला से एक कदम आगे बढ़ पाता है। समुद्र को 'नदीन' भी कहते हैं । जिसकी एक बूंद भी किमी याचक के मुंह में नहीं गिरती उमे 'न दोन' या घनो-रत्नाकर या महाम्धि कहना क्या सचमुच विरोधाभास नहीं है। ऐमा धनी भी किस काम का जो गरीवं का कुछ भी भला न कर सके। समुद्र के पेट में वडवानल है । वह अपने अंतर की आग को ही नहीं बुमा पाता । उसका पानी किम काम का है ? समुद्र ने देवताओं को अमृत दिया और उन्हें विमुक्त कर दिया। वह मुक्तागार बना । सब उसी का ध्यान रखते हैं । छोटे-मोटे गर्मी में मूख जानेवाले तालावों को कौन पूछता है ? जबकि सचाई यह है कि आडे वक्त वही छोटै पोखर और नदी-नाले प्यासे को प्यास बुझाने में काम आते हैं, न कि यह बड़ा भारी द्रवमय लवण का आगार । समुद्र के कारण हो शंकर 'शशि' शेखर वना, विष्णु लक्ष्मीकात, और देवता 'अमर' कहलाये । तीनो समुद्र से निकले; मथन के वाद-चद्रमा, लक्ष्मी और अमृता है सारे जल ! तेरे ऐसे गुण के कारण कोई तेरे पाम नहीं याता, ऐमी स्थिति मे जल-जन्तुओं के लिए ऐसे भीपणाकार भवर क्यो रखते हो बढे आदमी समुद्र की तरह होते हैं। उन्हें कोई कुछ नहीं कहता। इतनी मूल्यवान मणियो को तो नीचे दबा रखा है और ऊपर तिनके तरा रहा है, फेन और शिपाए। समुद्र का लक्षण यह है कि उसके जलविंदु मे (वे सारे होने से) इतनी आशा भी व्यर्थ है कि जीभ जले और प्यास दुगुनी न लगे। समुद्र के भीतर मणिया हैं, रत्न हैं, पर्वत हैं, अनेक जीव है, दुग्ध (धीरसागर) हैं, मोतियो के ढेर हैं, बानू है, प्रवाल द्वीप हैं, मूगे की लताए हैं, सेवार है, जल है, और क्या कहा जाये उसका नाम भी रत्नाकर है। इम तरह दूर से दृष्टि को और कानो को सुखदाई (नाम) भी है, किन्तु पास से प्यास भी नहीं बुझती। वाहे देवता और दानवो के मंन्य समूह से मथा जाये, चाहे मेघ और 7 मा .
नदियों से भरा जाये अथवा बड़वानल की आग से सोखा जाये समुद्र न तो क्षुब्ध होता है न दुबला पड़ता है। ऐ समुद्र ! कभी समाप्त न होनेवाली और निरन्तर चलनेवाली तुम्हारी इन लहरों का क्या प्रयोजन है ? रुको, यह नदियों का जल है, इसमें तुम्हारा अपना क्या है ? ज़रा-सा भी जल तुम्हारा अपना नहीं । यहां रूखे, खारे पानी के सिवा क्या है, कहीं सर्प न लिपट जायें उस डर से स्वस्थचित्त होकर इसमें नहा भी नहीं सकते, बड़ी-बड़ी मछलियां तुम्हें निगल न जाये इस डर से नाव भी नहीं चला सकते, ऐसे मरुस्थल में क्यों व्यर्थ दौड़ रहे हो? उसने अपने हृदय में जो मणि छिपा रखे हैं, वह इतनी आसानी से देने वाला नहीं है । समुद्र कहता है कि मेरा जल तो शाप के कारण खारा हुआ है। मैंने महोदार होकर याचक देवताओं को अमृत दिया । लक्ष्मी का माश्रय महा- मणि कौस्तुभ, सवको शीतलता देनेवाला चंद्र, और इच्छित फल देनेवाला 'कल्पद्रुम और कामधेनु मैंने संसार को दी, इन सव गुणों को तृणयोग्य समझकर ये लोग केवल मेरे दोष ही देखते हैं। यदि ऊबो नहीं और सावधान होकर क्षण-भर मेरी वात सुनो तो हे समुद्र, तुमसे मैं कुछ पूछता हूं, उसका निश्चय करके उत्तर दो कि निराशा की ग्लानि से अत्यन्त उग्र अर्थात् लम्बी सांस भरते हुए प्यासे पथिक से जो तुम देखे जाते हो वह इस वड़वानल के दाह से कितना अधिक दाहक है ? विष्णु को लक्ष्मी, शंकर को अभिनव चंद्र, इंद्र को भी उच्चैः श्रवा घोड़ा दिया, किन्तु इन सबकी क्या गिनती है जवकि प्यासे अगस्त्य को तुमने अपनी देह तक दे डाली। अतः त्रिभुवन में सागर से बढ़कर दूसरा बोधिसत्त्व और कौन हो सकता है ? वायु के वेग के कारण यदि समुद्र रत्नों से चमचमाती हुई लहरियां उठा-उठाकर अपना किनारा बंद कर दे तो वह याचकों के विपरीत भाग्य का दोप है और इसमें उस दाता के दान भाव का थोड़ा भी दोप नहीं। हे समुद्रतल को मूंगे की लताओं और मोती के सीपों की पंक्तियों, तुम समुद्र के लिए और समुद्र तुम्हारे लिए कल्याणकारी हों । तुम्हें ही वे मुवारक हों। मैंने तो समुद्र का समस्त फल इतने से ही प्राप्त कर लिया 52:लापता कि उसके भयानक जल-जन्तुओं, अजस महासपी और मकरों-महामत्स्यों से फाड़ नहीं डाला गया। चारों ओर की मीठे जल की नदियों से जल ले-लेकर, मानी जनते छीनकर इस दुष्ट समुद्र ने क्या अजित किया ? उस सारे पानी को सारा बना डाला, बड़वाग्नि में झोक दिपा मोर पाताल के पेट में डाल दिया। सागर में इतना अपाह जल, पर मानव, प्यासा का प्यासा! यह सब संस्कृत कवियों को लिखी सूक्तियां हैं। कितने हजार बरमी पहले की बातें। इसके लिखनेवाले और रचनेवाले कौन है, यह भी कोई नहीं जानता। ऐमा सुन्दर विचारों और कल्पनाओ से भरा यह सस्कृत वाङ्मय, उसके कठिन व्याकरण के डर से हमने प्रदूपित कर गला । उसके रत्नों को मुला दिया। उसे एक आधुनिक भारतीय कवि ने 'समुद्रगगी' कहा है, कि वह सारा कूड़ा-करकट किनारे पर लाकर जमा कर देता है। और अब हम ही यह शिकायत करते हैं कि समुद्र से मिलनेपाली स्वास्थ्यकारक हवा, वह 'ओजोन' कही कम तो नहीं हो रही है ? इस तरह से रोज वह अपनी डायरी में कई-कई बातें लिखता रहता। सब चिताओं के मूल में उसे अपनी पहचान छिपाने की चिंता प्रधान थी। एक दिन वह समुद्र किनारे एक धीवर से मित्रता कर बैठा। उसने पूछा, "तुम्हारा नाम क्या है ?" धीवर बोला--"जगन्नाथ।" वह हंसा और बोला-"नाम इतना बड़ा, पर खाली हाय ?" "हमारे मां-बाप को बच्चा नहीं होता था, इसीलिए यह नाम रख दिया। हम क्या करें?हम तो मनाथ के अनाथ हैं । बचपन में वाप-मां मर गये। तव मे यही नाव पर काम कर रहे हैं। किनारे की झोपड़ी में रहते है । पेट पाल रहे हैं, किसी तरह।" "और कोई नहीं है तुम्हारे घर मे ?" "हां, एक पेटी है। मेरी बीवी तो कमी की मर गई । एक औरत हुआ और उसके जन्म के साथ मा और बच्चा दोनों गये।" "समुद्र से तुम्हारी आमदनी कितनी हो जाती होगी।"
1 "अजी बाबूजी, क्या पूछो। मेरा पेट किसी तरह पल जाता है । पर यह मीना है, जो बाजार तक मछली ले जाती है । कुछ कमाई करके लाती है। अब बड़ी हो गई है न ? वाप को बेटी के व्याह की चिता रहती है । पता नहीं कैसा पति मिले ? हमारे धीवरों में तो सव बदमाश लड़के हैं। वे इस लड़की को भगा ले जाना चाहते हैं। मेरी वही अंधे की लकड़ी है। वही चली जाये, तो बाद में क्या होगा?" महादेव शर्मा ने जेब से कुछ रुपये निकाले । यूछा-"पास में कुछ पीने को मिल जायेगा? प्यास बहुत लगी है।" "ताड़ी की दुकान है।" "चलो, तुम वहां तक ले चलो। तुम भी पीना, हम भी चखेंगे।" महादेव के मन में उन समुद्र जीवियों के जीवन की झांकी पाने की जिज्ञासा थी । उसे क्या पता था कि ऐसा कांड वहां हो जायेगा। वह पहुंचा, तो उस झोंपड़ीनुमा ताड़ी की दुकान में दो गाहकों में गाली-गुफ्ता चल रही थी। वह जल्दी ही मारा-मारी में परिणत हो गई। जब मामला हाथापाई पर आ पहुंचा, तो दुकानदार ने उन दोनों पियक्कड़ों को छुड़ाया। इतने में महादेव और जगन्नाथ वहां आ पहुंचे। पूछा-"क्यों लड़ाई कर रहे हैं ।" दुकानदार-"यह रोन का ही है बाबूजी। एक कहता है, दूसरे ने उससे पैसे उधार लिये । दूसरा कहता है वह कभी का लौटा चुका है। कोई कर्जा वाकी नहीं है।" दोनों लड़ने वाले दुकान से बाहर जा चुके थे। दुकानदार ने दोनों को गालियां दी और कहा-"दोनों झूठे और मक्कार हैं ! मुफ्त पीते भी हैं और ऊपर से रोव भी जमाते हैं !" महादेव और जगन्नाथ एक वेंच पर बैठ गये । और उन्होंने देसी बोतल मंगवाई । जगन्नाथ 'युग-युग के प्यासे' की तरह से पीता रहा और धीरे-धीरे अंड-बंड बड़बड़ाने लगा। ओडिया भाषा में, जो महादेव नहीं समझ रहा था। थोड़ी देर बाद वह बेंच पर से उठकर नाचने लगा, उन्मत्तों की तरह गाने लगा। . 54:लापता इतने में एक बड़ी-बड़ी आंखों वाली, काली-गांवली लड़की दूकान के बाहर रो ही चिल्लाती आ पहुंची-"यावू, अरे बायू, मेरे बाप को आपने क्या कर दिया ? मैं इमै बरावर पंमा नहीं देनी। पीकर यह माताल (मतवाला) हो जाता है। आपने मेरे बाप की जान संकट में डाल दो।" महादेव ममझ गया कि यह उम धीवर की बेटी मीना ही है। वह जगन्नाय को बाहर ले गया। दुकानदार को पेमे दे दिये । और सहारा देकर, उसे लडसड़ाते कदमो में चलते देस, महादेव ने उम अपरि- चित लहकी से कहा, "मैं झोपडी तक इमे पहुंचा दूंगा। तुममे यह संभलेगा ? रास्ते में ही तुम्हे मार-पीटकर पडा रहेगा औंधे मुह । यह होदा में नहीं है।" लड़की कुछ बोली नहीं। वह उपकार लेना नही भी चाहती थी। पर और चारा भी क्या था? यही से महादेव और मीना की घनिष्ठता बढती चली गई। 11 दिया था, कपा जय अमेरिका से लौटी तो वह एक बदली हुई स्त्री बनकर । सेठ मफतलालजी की वह दम्यू लडको, जिमें वाप ने बिना कुछ समने-बूझे वालावलकर से व्याह वैपी हिम्टीरिया पीड़ित प्रोड कुमारिका यह नहीं रही थी। उसने दुनिया देखी थी। देखी ही नहीं सुनी, सूघी बोर घसी भी थी। दोनों हाथो से उस दुनिया के उसने हाथ दवाये थे, उसके हापो में हाथ डालकर वह 'स्क्वेअर डास' भी कर चुकी थी । अव वह आसानी से पुरुषो के बहकाये मे आनेवाली लडकी नही रह गयी थी। आर्थिक दृष्टि से स्वतत्र, आजाद स्याल, अपने मन की मलका, वह मुक्ता महिला (लिबरेटेड वूमन) बन चकी थी। लापता:55 उनके मन में एक ही विचार था बदला लेने का । यह आदमी अपने- आपको क्या समझता है ? सदानंद सदा आनंद से नहीं रह सकेगा। इसके लिए पहली बात जो उसके मन में उठी-वह थी सदानंद के 'बॉस' 'एच० आर०' को किसी तरह मिलने की । कुछ परिश्रम के बाद उसे उस व्यक्ति का सुराग मिल गया। और एक जगह वह 'एच० आर०' से मिली । उनकी बातचीत के अंश : "अरे आप? ऊपाजी? मैं समझा फोन पर अंग्रेजी उच्चारण से कि कोई अमेरिका में बसी भारतीय प्रौढ़ महिला है । आप देखते-देखते इतनी जल्दी इतनी वयस्का कैसे हो गई?" "आपने जिस आदमी से मेरा परिचय कराया, और हमें विदेश में एक साथ भेजा, वह तो धोखेबाज़ निकला।" "ओह आप वालावलकर की बात कर रही हैं ? उसका अव हमारी गैंग से कोई संबंध नहीं।" "वह हो न हो, मेरा विश्वास है कि आपको उसका वर्तमान पता अवश्य पता होगा।" "वह लापता हो चुका।" "कोई भी आदमी जो आपके संपर्क में एक बार आ चुका है। वह आपकी नज़र से ओझल कैसे हो सकता है ?" एच० आर० हंसा-"तो इतना ताकतवर तुम हमें मानती हो।" "मानने की क्या बात है, आप हो ही।" "यह तुम क्यों मानती हो?" "आज दुनिया में पैसा सब से बड़ी शक्ति है। आप उसे चाहे जितना, चाहें जव, सब कानून-नियम तोड़कर ले आ सकते हो। और क्या चाहिए?', "सबूत ?" "अमेरिका, स्विटजरलैंड, सारे फ्री पोर्ट्स-वैरूत, अदन, सिंगापुर हाँगोंग -कहां आपके एजंट नहीं हैं ? 'एच० आर०' दो अक्षर कहना ही काफी है। जहां जो जानकार लोग हैं । वे इस नाम के आगे सिर झुकाते हैं । थरथर कांपते हैं। चाहे जितना पैसा जव चाहिए तव जहां चाहिए वहां लेकर सामने रख देते हैं।" - 56: लापता तरह है।" एच० आर० फिर बोला--"हां, यह सच है।" "फिर बताइये कि वह सदानंद कहा भाग गया? आपकी चंगुल में माने पर कोई इतनी आसानी में भाग नहीं सकता। आपने ही उमे किसी गुप्त काम पर भेजा होगा। आप बताना नहीं चाहते।" इतने में एच० भार० के एक चमचे ने अनुमान फेंका-"बॉस, वह मूलन उत्तर का रहने वाला है। उधर लौटकर जा नहीं सकता। दक्षिण से आया था और वह बंबई और समुद्र किनारे पर रहने का आदी हो गया था। अब जरूर वह हिंदुस्तान के या तो मध्य भाग में कही छिपा होगा या पूरब की ओर गया होगा-" "इतने बड़े मुल्क मे उसे खोज निकालना समुद्र में से एक बूंद का खोजने को "मैं क्या करूं? मैं उसके बिना मर जाऊंगी। मुझे उससे बदला लेना है । आप जो कहोगे वह काम करने को मैं तैयार हूं।" उसने गिड़गिडाते हुए कहा। एच० आर० को लगा कि यह घर बैठे जैसे लक्ष्मी आ गई। इस स्त्री की शिक्षा भी काफी है। अकेली है । चतुर है। क्यो न इसका उपयोग महत्त्वपूर्ण राजनैतिक कामो मे लिया जाये । उमने पैतरा बदलकर कहा- "हां, हम पता करते हैं पूर्व भारत मे हमारे 'कार्टक्टो' से-कही सदानंद वालावलकर की हुलिया, नहीं तो अगूठो के निशान वाला कोई व्यक्ति मिल जाये तो पता लगाते हैं। मेरा कयास है कि वह अब बड़े शहर में नहीं होगा। वहां उसके पहचाने जाने का डर बहुत है । इसलिए वह ऐमी किसी अज्ञात जगह में होगा, जहा पुलिस के रेकाहों में उसकी छाया या छवि पहुंच नही पाई हो। पूर्व मे आसाम, बंगाल और उहीमा तीन ही नो प्रदेश हैं । आसाम मे वह जायेगा नहीं। उसके विचार इतने सुधरे हुए और सुविधापसंद हैं कि वह कष्ट में नहीं जायेगा। वह बगाल मे या उडीसा में होगा। उसने कामघधा बदल लिया होगा । वह विजिनेम कर सक्ता नहीं । स्कृत-कालेज में कोई नौकरी उसे मिल मकती नहीं। वह बी० ए० में पढ़ता था। डिग्री उसके पाम है नहीं। बिना ट्रेनिंग या प्रमाण-पत्र के उसे नौकरी कौन देगा?" माता-
"फिर वह क्या कर रहा होगा ?"
ऊपा ने कहा-"वह पत्रकार बन सकता है। उसे लिखने का शौक
था। डायरियां उसने अनेक रंगी थीं। बाद में कई नष्ट भी कर डाली।"
"क्या वह और कोई कला जानता था ?"
"फोटोग्राफी करता था।"
"पर कैमरा उसके पास नहीं था। वह खरीदे ऐसी स्थिति में नहीं
था।"
"फिर ?"
"देखिये, अधीर मत हूजिये । हम कोशिश करते हैं।"
'एच० आर०' के एक सहकारी ने सुझाया-"सदानंद चित्रकार बन
सकता है।"
"चित्रकारी के भी अनेक रूप हैं। क्या वह उसका व्यवसाय कर
सकता है ?"
"क्यों नहीं ? वह चित्रकला सीखा है। ऐसा उसकी डायरी से पता
लगता है।"
"अच्छा ऊपा, आज से पंद्रह दिन बाद हम यहीं मिलेंगे। तब तक
शायद सदानंद का कोई सुराग मिल जाये।"
ऊपा आशा लेकर चली गई।
12
ओड़िसा तंत्र को भी भूमि थी। प्राचीन काल से वहां दक्षिणाचार
और वामाचार दोनों प्रचलित रहे हैं। दोनों मिल गये मध्यकाल में।
संस्कृत में कहावत थी, "पटकर्णोभिद्यते मंत्रः" (मंत्र चार कानों से आगे
छह कानों तक गया कि नष्ट हो गया)। ओड़िया भाषा में भी कहावत है,
58: लापता
"पड कान मंत्र भेद।" मौना केवल धीवर जगन्नाय की बेटी नहीं थी। वह तंत्र-मंत्र की जानकार थी। यह जव महादेव ने सुना तो उसकी उत्सुकता और बढ़ गई। मीना वे पढ़ी-लिखी लड़की, उसकी इसमे मया पैठ हो सकती पी भला? तंत्र पे ही साधारण जनों के लिए--अ-पहितों के लिए। पुरी में जगन्नाय भैरव रूप में प्रतिष्ठित हैं। विमला भैरवी पत्र जगन्नायस्तु भैरवः ।' मीना की बातें समझने के लिए महादेव ने किताचों में से पढ़ना शुरू किया-ओडिसा में क्षेत्र और मंत्र का इतिहास । उसे पता चला कि उड़ीसा का तंत्राचल तीन भागों में विभक्त है : सुवर्णरेखा से ऋषिकुल्या तक विरजामंडल। उसे 'महोदपि तंत्र भाग' कहते हैं। ऋषिकुल्या से संपूर्ण दक्षिण उड़ीसा 'शावरी तंत्र भाग' कहलाता है। पश्चिम उहीसा, जहां महादेव इस समय था, "बौद्ध संत्र भाग' था। इस बौद्ध तंत्र भाग में विख्यात राजा इंद्रभूति और उसकी बहन लक्ष्मीकरा ने । अद्भुत तांत्रिक उपलब्धियां हासिल की। ऐसा मिथक वहां प्रचलित था। जगन्नाथ पीठ पुरी में ही अक्षोम्य, मरद ने अपनी साधना द्वारा भगवती तारा के दर्शन किये । दस महाविद्याओं में द्वितीय महाविद्या है-- देवी तारा । उनका अगराग नीला होने में उनको नील-मरस्वती के नाम से भी जाना गया । इसीलिए उडीसा को नील-पील या नीलगिरि कहते महान् बौद्ध तात्रिक इंद्रमति ने उहीसा के प्रसिद्ध तांत्रिक कबलपाद और राजगोपाल के पुत्र अनंगवय मे तत्र शिक्षा ली। इद्रमूर्ति सबलपुर के राजा थे। इंद्रभूति ने बौद्ध-परिवार की कल्पना की : वनसत्त्व यानी अनन्न शून्य का सारतत्त्व प्रज्ञापारमिता यानी आध्यात्मिक अपौरुषेय ज्ञान इस दम्पति से पैदा हुए श्वेतांग, वैरोचन, नीलाभ-अक्षोम्य, पीनाभ रत्नसंभव, अरुणाभ अमिताभ और श्यामाग अमोधमिदि । वैरोचन की शक्ति वजाचात्त्वीश्वरी और अक्षौम्य की शक्ति लोचना की कल्पना इंद्रमूति ने की। इंद्रभूति की उपास्या देवी पो वचवाराही और कुसकुल्या। 'साधना-माला' अथ से ज्ञात होता है कि इन देवियो का अस्तित्व उड्डीयान में ही संभव था-क्योंकि उड़ीसा के सिवा और कहीं इनकी मूर्तियां नहीं हैं... मीना यह सब गहन दर्शन नहीं जानती। उसने बताया कि उत्सव. विशेष पर उसकी देह में देवी-देवता का आविर्भाव होता है और कई गुप्त बातें वे प्रकट कर देते हैं । वह 'गुणियों के साथ बैठकर यह सब सीखी है। नहीं तो यह निकम्मा वाप तो, जितनी मछली पकड़ता नहीं, उससे ज्यादा वह पीने-पिलाने और जुमा खेलने में उड़ा देता है। 'महादेव पुस्तकों में पढ़ता है-'प्राकृत तंत्र-मंत्र के दृष्टा शिव अथवा भैरव का उड्डीश तंत्र एवं उडांवर तंत्र उड्डीश नामक एक प्रधान भैरव द्वारा ही संभव हो सका। हम उड्डीश. तंत्र का वाचन शिव ने तंत्र- साधक रावण के समक्ष किया था, उडांवर तंत्र पार्वती ने शिव से सुना। उपनिपदों के रचयिताओं ने शिव, काली को देवी-देवता के रूप में आर्य देव पूजा में ग्रहण किया। 'ॐ धिया चक्रे वरेण्यो, भूतानां गर्भयादधे दक्षस्य पितरंतना' (ऋग्वेद 3.6.9)---दक्षतना या दक्षतनया यज्ञवेदी कुंड का ही एक नाम था । मुण्डकोपानिपत् (1.2.4) में आते हैं काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुलिगिना, विश्वरुचि नामक सात अग्निशिखाओं या अग्नि-जिह्वाओं के अभिधान ।... आर्य अनार्य का भेद दूर करने वाली प्रथम विप्लविनी यही दक्ष- तनया 'सती' थी। उसने अनार्य शिव को अपना पति माना। दक्ष का शिव विहीन यज्ञ एक भयानक संघर्ष में बदल गया। दक्ष प्रजापति को अपमानित होकर शिव को महादेव मानना पड़ा। केनोपनिषत् में यही कथा उमा-हेमवती की कथा आती है। यज्ञ-विध्वंस के पहले, दक्ष की सभा में, उमा ने इंद्र के समक्ष तांत्रिक प्रबोध में गुंफित ज्ञान चर्चा की। वैदिक समय में अश्वमेघ यज्ञ चैत्र मास के चित्रा नक्षत्र में अनुष्ठित किया जाता था। ठीक इसी समय दुर्गा की वासन्ती पूजा प्रचलित है। क्या मीना यह सब जानती है ? नहीं। वह केवल आदिवासियों के गीत गाती है- अथर नई रे पथर कली भेला साहा होई शिवू मा आ जे मंगला । 60: लापता
मा रेनोई जेन अवान्क
पोखरी समतूल
कुजी लहरी रे भासी जे जाउठी
मादिन साऊ फल
आदिन लाक फूल न तो न मे जाऊ
कलाई फूल केहेत सुढल
जवाब देई जान
(हे मंगला माता,
नदी की गहराई असीम है और उस पर परपर का
बेटा तराया गया है। तुम्हारी कृपा से यह बेहा आप ही शीघ्र तरणे
लगेगा। झोल की तरह समतल है। नदी का मार्ग टेढा-मेढा है । अमाम.
यिक लौकी का फूल नदी में बहा जाता है। इसे नदी मे बहने दो। मेरे
प्रिय, करेले के फूल को 'हां' कहने दो।)
धीरे-धीरे मीना महादेव को उन सब गुप्त स्थानों पर ले गई जहां
पूजा की गुह्य तांत्रिक विधियां चलती थीं । महादेव भी उमें प्रचुर दक्षिणा
देता। और यह ज्ञान प्राप्ति का सदा आनंद देने वाला मार्ग पलता गया,
चलता गया। मीना अपने बाप को ताड़ी को एक बोतल पमा देती और
वह चुपचाप झोपड़ी में पड़ा रहता।
यह एक अजीब तरह का नया रिश्ता विकसित होता जा रहा था।
13
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प्रशात, यानी अरविंद मल्होत्रा के सगे भाई ने, एक बार बबई मे
अपने खोये हुए भाई को देखा, और उसका पीछा किया और जाना कि
वह अमेरिका जा रहा है। उसके बाद उमे वह भूला नहीं था। दो साल
बाद वह पुनः उसी उपेड-युन मे लगा रहा कि अपने खोये हुए भाई को
वापिस ले आयेगा। अब की बार उसने सदानंद वालावलकर के मनोरोग- चिकित्सालय का पता लगाया, पर वह नहीं लगा। परंतु उसने उसकी पत्नी ऊपा का पता कर लिया। वह अमेरिका से लौट आई है और अपने खोये हुए पति को खोज रही है। दोनों एक ही लापता आदमी की तलाश में थे। इस बात का पता उसे एक मनोरंजक ढंग से लगा। एक दिन प्रशांत बंबई में एक होटल के बाहर के हिस्से में बैठा था कि उसने देखा, एक स्त्री बार-बार उसकी ओर देख रही है। वह स्त्री बहुत स्मार्ट थी। उसके बाल कटे हुए थे । उसने स्लीवलेस ब्लाउज पहना था, नीचे जीन्स थे। काफी मेकअप किया हुआ था । वह पहले समझा ऐसी ही कोई नये ढंग की औरत होगी। जो शाम के वक्त होटलों के आस-पास मंडराती रहती है। पर काफी की दो चुस्कियों के बाद उसने फिर देखा कि वही स्त्री पुनः उसकी ओर एकटक देख ही नहीं रही है बल्कि उसके पास आ रही है, तो वह चौंक उठा। उसने अपने मन को शांत किया और सोचा,'चलो, देखें क्या माजरा है।' वह अपरिचित महिला बड़े करीव आकर उसकी आंखों में घूरती हुई वोली-"सदानंद !" "मेरा नाम सदानंद नहीं।" "मुझे धोखा नहीं दे सकते तुम। दाढ़ी तुमने साफ कर दी है पर इसका मतलब तुम वह नहीं हो यह ठीक नहीं। वाल ठीक वैसे ही हैं। तुम सदानंद ही हो।" "नहीं, नहीं, नहीं।" वह स्त्री जोर-जोर से बोलने लगी। प्रशांत ने उसे पास बैठाया और पूछा-"कोन सदानंद ?" "मेरा स्वामी।" "वह क्या खो गया है ?" "वह मुझे धोखा देकर अमेरिका ले गया। मेरा सब पैसा लेकर भारत लौट आया...". "मैंने अमेरिका तो दूर, अदन तक भी प्रवास नहीं किया है।" 62:लापता ? "क्यों बनते हो? वह बेरुत और जूरिख और..." "यापको कुछ 'हैल्यूमिनेशन' (आभाम) हो रहा है, मंडम ! ऐसा हो जाता है। हम जिम चीज़ की खोज में लगे रहते हैं, वही हमें मब और दिवाई देने लग जाती है। कंस को जल-स्थल, काठ, पापाग मच जगह वृष्ण ही कृष्ण नजर आता पा..." यह धामिक तक भी उम महिला पर जर कारगर नहीं हुआ। तब प्रशात ने उमसे एक-एक कर बात पूछना शुरू किया। पहले अपना परि- चय दिया-"मेरा नाम है प्रशांत मल्होत्रा। मैं दिल्ली का रहने वाला हूं। पाच साल से मेरा भाई अरविंद घर से लापता है। वह मेरा सगा भाई है। मैं एक कंपनी का एजेंट हूं और मुझे भारत-भर में घूमना पड़ता है। एक बार गोआ मे एक होटल मे मैंने उसे देखा था। उसका बहुत पीछा भी किया था। तब उसका नाम देवी सेन था। मैंने उसका बहुत पीछा किया। पता लगा कि वह अमेरिका भाग गया है, किमी लड़की को लेकर..." "वह अभागी लड़की में ही हूं। पर तुम वह नहीं हो। इमका बया . सबूत है ?" प्रशांत हंसा और उमने वाया गाल रोशनी की ओर कर दिया। पूछा --"उमके वायें गाल पर ठुड्डी के पाग तिल था । वही उमकी निशानी है। दादी रख लेता तो वह छिप जाता था। मेरे चेहरे पर वह निल नहीं अब ऊपा की जान में जान आई। आंखों में आमू भरकर वह पहने लगी-"माफ कोजीये, में धोखा खा गई। एक-सा चेहरा, एक-सी लिं, एक-सा बाल रखने का अदाज , एक-सा कद, नाक-नवश-तुम सदानंद के सगे भाई हो, और यहां मिल जाओगे, इसका पता ही नही पा । तुम मेरे साप चप्लो । हम मिलकर कुछ योजना बनाते हैं । तुम्हें अपना खोया हुआ भाई चाहिए, । मुझे मेरा सोया हुआ स्वामी...।" "पर इननी वही दुनिया में; और दुनिया को छोड दें फिर भी हिंदुस्तान में कैसे सोजा जाये अरविंद को"?" "तुम उसे अरविंद कहते हो, यह तो सदानंद है।" : सापता:63 । "नहीं उसका असली नाम अरविंद मल्होत्रा है। वह बी० ए० में पढ़ता था, तभी घर से भाग निकला है । वह गोआ के किसी बैंक में काम करता था। तब उसकी मैत्री किसी लड़की से हुई...।" "मैत्री नहीं। मेरी उससे शादी से हुई। मेरे पिता ने उसे शिकागो जाने का हवाई जहाज़ का टिकिट दिया। उसने वहां विदेश यात्रा में कैसे कैसे आश्वासन दिये। मैंने जीवन में दूसरी वार धोखा खाया। सारी पुरुष जाति ही इस तरह से स्त्री को धोखा देने वाली होती है।" "सारी पुरुप जाति को क्यों बदनाम करती हो? स्त्रियां क्या कम धोखा देने वाली होती हैं ? यह सब अपने-अपने संयोग की बात है।" "मैं अबकी बार सदानंद मिले तो-" "सदानंद मत कहो, अरविंद कहो ।" "पता नहीं उस दुष्ट ने अब क्या नाम रख लिया होगा। वह मिल जाये तो उसे अगर मैं जेल की हवा न खाने को वाध्य करूं तो..." "आप जेल की हवा किस तरह से उसे खिलायेंगी?" वह नाम बदलते घूमता है। यह एक गुनाह है। दूसरे वह विना डिग्री के या सही क्वालिफिकेशन के मनोरोग-चिकित्सक बना फिरता है । उस नाम से दुकान चलाता है । यह दूसरी घोखाधड़ी हुई। तीसरे, उसने मुझसे रजिस्टर्ड शादी करके, वह अमेरिका में मेरी सारी संपत्ति लेकर एक दिन भारत भाग आया। कितने-कितने गुनाह किये हैं उसने ?" "यह सब तो तुम जानती हो। पर वह भलामानस तो अब तक दूसरे ही रूप में और कहीं विचार रहा होगा । पता नहीं उसने और कोई शादी ही कर ली हो।" "इस सारे छल-कपट और धोखाधड़ी में मेरे दिल के मरीज़ पिता मर गये । मुझे मानसिक कष्ट कितनाहुमा । सवका हरजाना उसे देना होगा। "यदि वह कहे कि आपसे वह खुश नहीं है । और तलाक देना चाहता है।" "तलाक यों ही नहीं दिया जा सकता । कारण दिखाना होगा।" "कानून यहां भी पुरुष के हक में है। तीन साल वह पत्नी से अलग रहे और सीधे 'सेपेरेशन' ले सकता है।" "एक तो 64:लापता "पर उमे मुझे 'एलिमनी' (दंड स्वरूप पत्नी को दी जाने वाली रकम) देनी होगी। मैं ऐसे नहीं छोड़ गो उमे..." "पर पहले वह आपको चंगुल में आये तव है न?" "एक काम करते हैं । तुम हिंदुस्तान भर अपनी एजेंसी के मिलसिले में घूमते ही हो। बड़े-बड़े शहरों के बड़े अखबारों में उसका फोटो मोर वर्णन छापते हैं । लापता व्यक्ति को ला देने वालों को बड़ा इनाम । कुछ भी राशि लिख देते हैं। पचास हजार" "बस, आदमी की कीमत मिर्फ पचास हजार? अजी, एक-एक हीरा और एक पिक कोट इमसे ज्यादा दाम वाला होता है।" "पुलिस को इत्तिला देते हैं।" "पुलिम ऐमे मामलो में दिलचस्पी नहीं लेती, जब तक उसमें उनका भी कोई लाभ न हो।" "आप तो मेरी ही बात को काट देते हैं। निराश कर देते हैं । आपको अपने भाई को खोज निकालना है या नहीं ?" "क्यो नहीं ? उमके मिलने मे पिताजी कितने खुद होंगे।" "तो क्यों नहीं, तुम और हम मिलकर उसकी पोज करते हैं।" अभी तक ऊपा ने यह नहीं बताया था कि उसका 'एच. आर०' की गैग से मंबंध है, और उमका अनुमान है कि शायद वह देश के पूर्वी अंचल में कहीं है। प्रशांत ने पूछा-"तुम्हारा गया अंदाज है कि वह कहां होगा?" कपा--"मेरा ख्याल है कि वह भारत के पूर्वांचल में होगा।" प्रशांत-"क्यो ?" "उमे समुद्र-नट बहुत पमद है । वह केरल मे पा। गोमा में पा। समुद्र से लगाय के कारण बंबई में पा । विदेश में भी वह समुद्रतटीय देशो और स्थानों में बहुत घूमा करता पा । उमे लगता था कि यह जन्म में कोई समुद्र पर घूमते रहनेवाला नाविक था। जंगे कि मनुष्य इतनी सारी भीड में, जन-कोलाहल में खो जाता है. वैसे ही वह कहता था-हर मनुष्य एक बूंद है जो मागर में मिल जाने को व्याकुल है। कभी कभी वह अक्ल की वान करता पा। कही न कही उमके भीतर एम. सापता:65
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भविष्यवक्ता दोनों होता है।" राव ईसाई थे। उन्हें जगन्नाय की पूजा और ईसाई धर्म की मान्यताओं में कई समानताएं दिखाई दी। जगन्नाथ सारे भारतवर्ष मे एकमात्र लकड़ी का देवता (दार-विग्रह) है। बाइबिल मे संसार-वृक्ष को उपासना प्रसिद्ध है। सावारेस मेटा- फिजिका' ग्रंय में प्लेट-इन्कोमीक्स' नामक विशाल संसार-वृक्ष का चित्र है । पुराने करार' (टेस्टामेंट) मे 'ट्री आफ लाइफ' और 'आइ हैव गिवन यू एवरी हवं वेअरिंग सौर' की चर्चा है। गीता मे 'कध्वंमूलमय : शासमस्या त्यंप्राहुरव्ययम्' कहा है । उसके छंद ही पत्ते हैं।' 'वृक्षों में मैं पोपल हूं' स्वयं भगवान ने कहा है। 1522 ईस्वी के एक उत्कीर्ण चित्र में ईसामसीह को वृक्ष के रूप में दिखाया गया है। उसका नाम 'लिग्नम फिची' है। कई विद्वानों का मत है कि यह वटा ही मवका त्राण करने वाला सलीब या 'कास' है। वेदकालीन प्रणव-तंत्र में त्रिमूर्ति है। बौद्धों के विरत्न हैं। ईमाई धर्म में पुराने करार' के 35वें अध्याय में नित्त्व के बारे में जेकर कहता है--मिस्र से जो जीव मेरे साय आये वे 'तीन कुढी (वीस) और छह' थे। जगन्नाथ में तीन मूर्तिया हैं । पुराना करार कहता है-'पुरुषोत्तम ने जीवात्मा अपनी ही प्रतिमा में बनाया, 'एक पुरप, एक नारी'-यानी एक दोनों को बनाने वाला, और स्त्री-पुरुष-तीन मूर्तियां हुई। यही तो धार- अदार और उत्तम तत्त्व है, गीता के। जगन्नाथ की आंखें वतलाकार क्यों हैं ? यह वर्तुलाकार हर गिरिजा- घर में है। यह 'दत्त' जगन्नाथ की आंखें ही नहीं, उदर, महल, यत्र, पताका सबमे है। जगन्नाप की दो बड़ी-बड़ी वर्तुसाकार असं वाहिया साहित्य में 'चकाहोला' कहलाती हैं। डिक्शनरी ऑफ सिबल्स' नामर पाश्चात्य विद्वान् की पुस्तक में इन तीन वतुलाकारो के अयं दिये हैं। मे भी म्वगं का प्रतीक ऐसी महलाकार मूति है । वे तीन अर्थ यो हैं-- बिन्दु-यूनिटी आफ दि ओरिजिन। ० वृत्त-इन्फिनिटी आफ दि यूनिवर्स । । माता.60.
है
केन्द्र-सेंटर आफ इफिनिटी ।
सन्त और अनन्त का कैसा मेल है यह ! जब दोनों एक होता है
तभी तो दृष्टि बन जाती है।
जगन्नाथ को गुंडिचा (रथयात्रा) के समय, काष्ठ से बनी वेष्ठनी,
जो 'कास' की तरह होती है, पहनाई जाती है। उसे 'सेना पट्टा' कहते हैं।
मंदिर के प्राचीनतम 'शवर' (शिकारी) सामन्तों द्वारा वह पहनाया
जाता है । वह लेनापट्टा पहन लेने के बाद छुआछूत का भाव दूर हो जाता
। यह सेनापट्टा 'क्रॉस' के आकार का है, जिसे शवर आदिवासी पवित्र
और उपादेय मानते हैं। यही स्वस्तिक का पहला रूप है।
स्कंदपुराण के जगन्नाथ-पीठ वर्णन और वैष्णव दर्शन के 'त्रिपाद
विभूति वैकुंठ' वर्णन का जेरुसलम के वर्णन से अद्भुत साम्य है । 'स्टडीज
इन कंपेरेटिव रिलीजन' (माटम् 1971) में एक निबंध में इसे सचित्र
प्रमाणित किया गया है।
उन्नीसवीं सदी के अंत में साधु सुंदरदास उत्कल के एक साधु हुए ।
उनका मठ पुरी में था। उस मठ में ईसामसीह और कृष्ण की मूर्तियों की
पूजा वे साथ-साथ करते थे। केप्टो और शीष्ट का नाम-साम्य भी था।
अव यह मठ पुरी की मरिचिकोट गली में है।
राव यह सब जानने के लिए पुरी पहुंचा।
तभी 'एच० आर०' का संदेश और उसके साथ डा० सदानंद
वालावलकर का फोटो ना पहुंचा। इस आदमी को किसी तरह खोजकर
निकालना है । केवल इतना संकेत मिला कि वह समुद्र किनारे कहीं है ।
समुद्र
के किनारे के कई होटल खोजे। एक जगह जाकर यह पता
चला कि एक आदमी वहां आया था, जो समुद्र के चित्र बनाता था। कई
हपते रहा । फिर वहां से चला गया।
"क्या चित्र भी साथ ले गया?"
"हां।"
"उसका हुलिया कैसा था ?"
70: लापता
"अब क्या बतावे साहब, यही दुवता-पतला, छरहरा आदमी रहा। ममुद्र किनारे बहुत घूमता था।" रावने फोटो दिखाया। "नहीं माहब, दादी तो उसको बिल्कुल नहीं थी।" "और कोई सास वात?" "वह रात को जागता था। और कुछ लिखता रहता था।" "पर माप उमको इतनी सोज-सबर क्यों रख रहे हैं ?" "हम सी० आई० डी० के आदमी है और उस आदमी को पकड़ना जरूरी है।" इतने में होटल के एक नौकर ने खबर दी.-"वह बाबू तो बहा रंगीन था। उसने उस जगन्नाथ धीवर की बेटी मीना को पटाया उसी के -साथ यह पता नहीं कहा भाग गया?" एक और सुराग मिला। राव जगन्नाप धीवर की झोपड़ी में पहुंचा। एक नया शहरी बाबू आता देसकर वह आगबबूला हो गया। "ये सब शहर के गुहे-सफंगे, कहां-कहां से चले आते हैं। देखिये, मेरी मोने जैसी बेटी को ही ले गया।" "वह भी तो राजी होगी, तभी तो दोनो गये।" "मैंने मीना को कुछ नहीं किया था। मैं उसे मारता नहीं था। मैंने कभी उसे भला-बुरा नहीं कहा । गाली नहीं दी। उमकी मां मर गई- उसके बाद वही तो पर चलाती थी । और क्या कहूं।" "जब ये दोनो गये उस दिन तुम क्या कर रहे थे" "मैं मछली पकडने गया था। शाम को धका-मांदा आया। मीना ने मुझे दो बोतलें ताडी को दी। मैंने पूछा भी-आज इतनी मुस-सुग नजर आ रही हो । बोली-बाबू दे गया था, आपके लिए।" "किस सुशी में ?" "उसे कोई काम मिल गया है। उसने मुझे भी यह लाकिट दिया चांदी का।" "वाह ! तू तो पूरी दुहिन लगने लगी। पर अपनी मरजाद छोड़कर । । ऊंची जात में व्याह न करना। जिंदगी खराव होगी। ऊंची जातवाले का कोई भरोसा नहीं होता, समझी? "मीना सिर्फ हंसी और चली गई । उसने उस दिन अपनी अच्छी- वाली साड़ी पहनी थी। "रात को मैं देर से पीकर लौटा तो देखा घर खुला पड़ा है। बेटी नहीं है। मैंने सोचा-चांदनी रात है-कहीं सहेलियों के साथ नाच- गान में मस्त होगी। मैं सो गया। "सवेरे उठा, तो देखा मीना नहीं लौटी। जरूर उस बदमाश बाबू ने उस पर जादू कर दिया होगा। अव मैं जिंदा रहकर क्या करूंगा? मुझे यह बड़ा समुन्दर क्यों नहीं ले जाता? कोई बड़ी मछली मुझे अपना खाद्य बना ले । मैंने अपने हाथों अपनी मीना को लुटा दिया। मेरे जैसा पापी कौन होगा?" राव ने पूछा-"मान लो, वह वाबू उसे न ले गया हो-क्योंकि वह ऐसी एक धीवरिन को अपने साथ क्यों ले जायेगा? तो वह और कहां होगी ?" जगन्नाथ ने कहा--"वह वावा के पास गई होगी।" राव-"यह वावा कौन है ?" जगन्नाथ-"बड़ा तांत्रिक है। उसी के मठ में वह चली गई होगी।" राव ने अता-पता लिया और जंगल में आत्म-रक्षा के लिए एक पिस्तौल रखकर वह उस अघोरी बावा के डेरे पर पहुंचा। 15 विचित्र जगह थी। और विचित्र उसकी आस-पास की वनराजि। घना जंगल था। वहां तक पहुंचने का मार्ग भी बहुत वीहड़ था। कोई 72: लापता 1 बस्ती आसपास नहीं । मह आदमी यहां अकेले गुफा में कैसे रहना होगा? स्या उमे जंगली जानवरों का डर नहीं था? पास में ही श्मशान पा और वह नदी किनारे था। वहां दो-चार होमों की वस्ती थी। एक मंदिर भी पा काली का। पुजारी रहता था । ज्यादातर दूर के गांव के असामाजिक तत्वों का वह अड्डा था। पुजारी खूब गांजा पीता। वहां लोग जुआ खेलते रहते और सब तरह के लूटपाट के किस्से चलते रहते। मुनसान रास्ते के पीपल के नीचे ही अक्मर हत्याएं हो जाती। लोग नाम किमी पिशाच का ले लेते। ऐसी बस्ती में मीना क्या करने माई होगी? क्यो आई होगी? जरूर इसके पीछे कोई रहस्य है-राव ने सोचा। टाचं और ज़रूरी खाने की चीज, वाटरवॉटल सब लेकर वह चसा था। पर रात कैसे गुजारेगा इसकी वात उसने सोची नही थी। यहां तक पहुंचते-पहुंचते शाम हो आई थी। गाव में एक सरायनुमा जगह थी। वहीं उसने डेरा डाल दिया । कुछ पेट-पूजा की और उस एकांत स्थान में एक दीवार की ओट में लेटा रहा। उसने त किया था कि सवेरे वहां उम तात्रिक अघोरी बाबा के पास पहुंचेगा। तब उसकी पूजा भी हो जाती है। बाबा खुशी के मिजाज में होते हैं । दो-चार चेले भी आ जुटते हैं । वहा पहुंचने पर उसे अपेक्षित लडकी वहां मिल गई। वह मीना ही थी । मब उसी नाम से उमे पुकार रहे थे। बावा की वह चेलिन बन चुकी . थी। 7 पर मुख्य जिस आदमी को खोजने वहाँ इतने कष्ट सहन करके माया था, वह लापता था । सदानंद वहां था राव को पता नहीं था कि सदानंद महादेव बन चुका पा। एकदम उमके बारे में पूछना भी ठीक नहीं था। बावा ने पूछा-"क्या चिता है तेरी ?" राव-"एक खोये हुए आदमी के बारे में पूछने आया हूं।" -"तुम पुलिम के आदमी हो?" -"नहीं।" बाबा- सापता:73 वावा -"फिर क्यों पूछते हो ?" राव-~-"जानने के लिए।" वावा--"जानने के लिए दुनिया में और बहुत-सी बातें हैं।" राव-."आप तो त्रिकालदर्शी हैं । बता दीजिये कि वह किस दिशा में है?" बावा-"फिर वही प्रश्न ? ऐसे सवालों के हम जवाब नहीं देते ।" राव-"क्या मैं मीना भैरवी से पूछ सकता हूं?" वावा (अट्टहास कर)--"पूछ ! पूछकर देख ले...!" राव-“मीना शक्ती! कहां है वह आदमी जो तुम्हारे पिता को रोज़ एक बोतल शराव दे आता था।" मीना--"मैं नहीं जानती। ऐसा कोई आदमी नहीं था।" राव -"क्या तुम्हारे पिता झूठ बोलते हैं ?" मीना-पीने के बाद आदमी कुछ भी बोल सकता है। उसे होश तो नहीं रहता।" राव ने सोचा, ऐसे काम नहीं चलेगा। वह आया और वैसे ही चुप- चाप लौट गया। 'एच० आर०' को उसने सूचना दी-कुछ-कुछ सुराग लगा है। पर लापता अभी लापता है। एच० आर० ने ऊपा को सूचना दी। ऊपा ने प्रशांत को। कुछ दिनों बाद ऊपा और प्रशांत वावा अघोरनाथ और मीना भैरवी के दर्शनार्थ आ पहुंचे । राव उनके साथ जान-बूझकर नहीं आया था। दोनों ने आकर बावा को प्रणाम किया। बाबा वैसे ही पहेलियां बुझाने वाली भाषा में बोलते थे। घावा.---"वच्चा, क्यों आए हो?" प्रशांत-"दर्शन के लिए।" बाबा---"हो गये दर्शन, भाग जाओ ?" ऊपा--"भागकर किधर जायें?" वावा.-"क्यों-आठों दिशा खुली पड़ी हैं । रोक कहां है ?" प्रशांत-"रुकावट भीतर है।" वावा--"यह क्या है ?" 74 लापता कपा-"पर नहीं उठते।" बाबा-"क्या परों में कोई रोग है ?" कपा-"मन का सवाल है।' बाबा-"मत उठो । वैठे रहो । बावा और कुछ नहीं कहेगा।" थोडी देर मौन। मीना भैरवी आ गई। कुछ और भक्त आ गए। उन्हें लाल फूल दिये । वही यात्रा का प्रसाद था। मीना-"तुम कौन हो? कुछ पहचाने से लगते हो। पहले तुम्हें फही देखा है।" प्रशात-"वह मेरा भाई होगा। उसका मेरा चेहरा एक जैसा है।" मीना--"उसने तो नहीं बताया कि उसका कोई भाई है। सुम झूठ बोलते हो।" प्रशांत-"कभी-कभी आदमी जान-बूझकर भी तो झूठ बोलता " मीना--"वह झूठा नहीं था।" प्रशात-"वह क्या करता था ?" मीना-"वह समुन्दर देखता रहता और चित्र बनाता रहता पा।" ऊपा--"क्या उसने तुम्हारा भी चित्र बनाया ?" मीना-हिश्न ! कसो बात करती हो? मैं समुद्र थोडे ही हू ।" प्रशात ने कपा की ओर देखकर कहा-"समुद्र और नारी में बहुत- सी समानताए हैं । दोनों अपनी मर्यादा नही उलायते । दोनों के हृदय के भीतर पता नहीं कितने आमू मोती बनते रहते हैं, कितना हाहाकार कपा ने हसी मे कहा-"यहां आपके सामने दो-दो समुद्र है प्रशात-"अच्छा, मोना भैरवी आप बताइये कि वह समुद्र के चित्र बनाने वालाकिपर चला गया।" मोना--"मैं क्या जानू । एक बस आई, उसमें उसने सामान रया। धूल उड़ाती वह चली गई।"
ऊपा-"उसने बताया नहीं, कहां जा रहा है।" मीना--"मैंने पूछा होता तो वह बताता। मैंने तो सिर्फ रुक जाने को कहा था। वह नहीं रुका।" ऊपा--"ऐसी क्या जल्दी थी ?" मीना--"वह बोला था कि मेरा काम बावा तक तुझे पहुंचा देना था। वह पूरा हो गया। अव आगे का रास्ता तेरा अलग, मेरा -- अलग।" प्रशांत-"मीना, तुझे अपने बाप की याद नहीं आती ?" मीना--"आती है । वह मुझे मारता-पीटता था। मैं कभी वहां सुखी नहीं रही।" ऊपा-"क्या वह आदमी जिसके साथ यहां तक आई, तुझसे शादी नहीं करना चाहता था।" मीना-"कसी बात करती हो, बहन ! वह अपनी जाति में शादी करेगा। हम लोगों के साथ उसका क्या मेल ?" प्रशांत-"क्यों वह तेरे साथ प्रेम नहीं करता था ?" मीना-"प्रेम अलग बात है । शादी अलग बात है।" ऊपा ने कहा-~यह आदिवासी अनपढ़ लड़की भी कितनी दूर तक सोचती और जानती है । वह इतना भी नहीं समझ पाई। थोड़ी देर बाद बाबा से बातें हुई। प्रशांत ने पूछा--"बाबाजी, आप इस घोर जंगल में क्यों रहते हैं ?" वावा-"तुम्हारा क्या लेते हैं, भाई ! हम चाहे जहां रहें। हम लोगों के लिए तुम्हारे शहर ही जंगल जैसे हैं।" प्रशांत-"सो कैसे ?" वावा -"वहां आदमी का मुखौटा पहने कैसे-कसे बाघ, शेर, चीते, बन-शूकर घूमते फिरते हैं। यहां कम से कम जो कुछ है, वह अन्दर-वाहर साफ है। जो हमारे मित्र हैं, मित्र हैं । जो शत्रु हैं, शत्रु । मामला विलकुल 'खड़ा और खुला खेल फरुक्खावादी' है।" ऊपा-"क्या इस मोना का अपने बाप को छोड़कर भाग आना अच्छा है ?" ! 76: लापता
बाबा--"तुम भी अपने बाप को छोड़कर विलायत गई तो क्या
अच्छा किया?"
ऊपा-"मैं तो अच्छे के लिए हो गई थी।"
बाबा-"हर आदमी यही समझता है और अपने आपको समझाता
रहता है कि जो कुछ वह करता है अच्छे के लिए ही करता है। पर
आदमी के मामले में कोई अच्छाई पूरी अच्छाई नहीं होती, न कोई बुराई
पूरी बुराई । सब मिला-जुला मामला है। यही जहर है, जान लेता है।
दवा के भी काम मे आता है, जिंदगी दे देता है-चुराई को मारकर।
आदमी का हर काम ऐसा ही है।"
ऊपा-"क्या प्रेम भी?"
बाबा-"हां, प्रेम भी।"
ऊपा-"सो कैसे?"
बादा--"देखो, वह आदमी जिसकी खोज मे तुम लोग यहां तक
आये हो, और जिसे मैं नहीं जानता, वह मीना से प्यार न करता तो वह
इस जंगल तक क्यो आवा-उसे यहां तक क्यो पहुचाता? और उसके
बाद इस तरह बिना किसी आशा के लौट क्यों जाता।"
प्रशांत-"यह उसने अच्छा नहीं किया।"
बावा-"क्योकि तुम्हें उसका पता चाहिए । यह घर से भागा-
पशायद अच्छे के ही लिए । मीना के बाप ने उस पर भाशा लगाये रखी। वह
पैसे कमा के लाये और उसे शराब पीने को छूट दे दे। यह बुरा किया। हर
काम के अच्छे-बुरे दोनो नतीजे हो सकते हैं । आपको मेरा पूर्व-जीवन मालूम
है? मैंने कौन-कौन से डाके नही डाले, या बदफैल नहीं किये । पर अब ?
मैं समझता है जो छूट गया, सो छूट गया। वही अच्छा हुआ । अब मीना
से मुझे कोई आशा नहीं। यह अपने मन से आई है। सेवा करती है।
भैरवी बन गई । बनी रहे। जिस दिन उसे फिर मीना बनना हो, बन
जाये। लौट जाये । हमने बाधकर किसी को योहे ही रखा है।"
ऊपा--"इस तरह समाज नहीं चल सकता। हर इन्सान का दूसरे
कुछ लगाव, कुछ बंधन तो होता ही है।"
बावा--"यह हमारी सामसयाली है। अन्त समय कोई किसी के
सापता:71
। काम नहीं आता। सारे बंधन क्षणेक के हैं । आज हैं, कल नहीं हैं। सारे सांसारिक मोहमाया के संबंध स्वार्थ के हैं। किसी को मरते हुए देखकर दूसरा कभी अपने आप मरा है उसके लिए-फिर चाहे जितना निकट का बंधन हो। हमारे गुरु कहते थे-संबंध सिर्फ उस ऊपर वाले एक से सच्चा है। बाकी तो सव मक्कारी है। दिल को बहलाने का ख्याल अच्छा है।" इस दार्शनिक चर्चा का कोई अन्त नहीं होता। पर वहां जंगल में रहने का कोई इन्तजाम नहीं था। प्रशांत और ऊपा वहां से चल पड़े । लापता भाई और स्वामी की तलाश में वे चल पड़े। कोई सुराग नहीं मिल रहा था । महादेव नाम और वह चित्र खींचता था, इतनी जानकारी काफी नहीं थी। अब तक तो उसने और नाम रख लिया होगा। और चित्र कहीं बेच दिये होंगे, या फेंक दिये होंगे। क्या फायदा है इस तरह आवारा बनकर घूमने-फिरने में ? कहीं कोई बंधन नहीं। कहीं कोई जिम्मेवारी नहीं। क्या यह भी कोई जिंदगी है ? प्रशांत और ऊपा यों सोचते थे । और उन्हें इस अंधी दौड़ में, हर गली एक बंद गली नज़र आ रही थी। इतने में वे उड़ीसा के उस समुद्र-तट के गांव में राव से मिले। उसने खुशी से कहा-पता "लग गया है । अरविंद कलकत्ता में है। प्रशांत और ऊपा ने पूछा-"यह कैसे पता लगा ?" राव-"यह सव मत पूछिये । एच० आर० के हाथ-पैर वहुत लंबे- चौड़े हैं। वह अपराधी को दूर-दूर तक सजा दे सकते हैं तो इस भगोड़े आदमी को खोज निकालना कौन-सा मुश्किल काम है !" कलकत्ते में कालीघाट के करीव एक गली। भक्तों का मेला । आ गयीं, आ गयीं-माताजी आ गयीं। "कौन माताजी ?" "वही जयादेवी । काली के अनन्य उपासक महात्मा दुर्गादास की चेली।" एक भक्त-"दुर्गादासजी की उम्र दो सौ बरस से कम नहीं है।" 78 : लापता -- दूसरा भक्त-"मैंने स्वयं देखा है। मुशिदाबाद के पाम महाश्मशान के पाम पंचमुटी स्थान पर उनका निवास है, अद्मत मलौकिक ममत्वारी शक्ति है उनमें ।" तीमरा भक्त-"मेरी मनोकामना पूर्ण करो माई जी !" चौथा--"वम अबकी बार सट्टे में हमारा नंबर लग जाये।" कई भक्त अपनी-अपनी दापित के अनुसार फल-मिठाई, नारियल- फूलमालाएं लिए हुए उम ठेलमठेल में आगे बढ़ने की कोशिग में पे कि एक विदेशी गोरा भक्त-लवारेदामी कुर्ता पहने, गले में जया के फूलों की माला डाले, कपाल पर कुंकुम सिंदूर का बड़ा सा टीका धारण किये-- सबसे आगे। उन्हें ठेलते हुए मंठ झिगियानी। तुंदित तनु, गंजे, टोपी धारण किये, एक हाप में माला और धोती का एक पल्ला वामकोट की जेब में डाले। और उनके साथ क्या देख रहा हूं--वही महादेव (यानी सदानंद वालावलकर, यानी देवी सेन, यानी अरविंद मल्होत्रा-बापरे भाप ! एक ही जन्म में कितने पुनर्जन्म ! ) अब की बार उनकी हुलिया बदली हुई है--मिर घुटा हुआ, एक चोटी रसे, बदन मे गजी और एक जनेऊ, एक कान पर एक फूल खोंसा हुआ आपों पर चदमा काले रग का, आधी कटी मूंछ और नीचे धोती पहने । यह रूप तो पहले कभी देखा ही नही था। सब भक्तों की भीड़ को ठेलकर यह तीन-विदेशी, मेठजी और महादेव चक्करदार कई सीढ़ियां पार कर पर पहुंचे। एक मृगासन । उस पर बिल्कुल नयी लकदक इंपोर्टेड वेसरिमा शिफोन को माडी पहने एक मुवती । रूपवती । वडा-सा कुकुम तिलक लगाये। बाल रूरो, पीठ पर छोडे हुए। गले में रुद्राक्ष की माला। हायो मे रुद्राक्ष के ककण, वाहो पर रुद्राक्ष । बस खिल-सिल हंमती जा रही है । मेठ झिगियानी--"अहाहाहा मां ! कैसा आनंदमय रूप है। हमने सुना आप विलायत गई पो?" जया माता (मुस्कुरातो हुई)-"भक्तों ने बुलाया था। पर उतनी दूर जाने का आदेश नहीं था । नेपाल तक गई थी सिर्फ।" महादेव ने मूसं की तरह प्रश्न किया-"क्या रक्सौल होकर ट्रेन से . - •79 । गई थीं?" जयमाता (दोहरी होती हुई, हंसी के मारे)-"रेल-वेल नहीं, हम हवाई जहाज़ से गये थे । गुरुजी के वहां भी इतने सारे भक्त हैं । वे कह रहे थे, और रुकिये । हमने ही मना कर दिया।" सेठजी-“धन्य है, धन्य है !! आपके लिए क्या दुर्लभ है । आपसे मिलवाने आज यह डच आदमी लाया हूँ। यू स्पीक हेंडरसन-~-दि मदर इज वेरी काइंड (माताजी परम कृपालु हैं)। शी विल आन्सर एवरी क्वेश्चन, कैन साल्व एनी प्राब्लेम (वह हर प्रश्न का उत्तर देती हैं, वह तुम्हारी किसी भी समस्या का समाधान कर देंगी।" माताजी उत्तम अंग्रेजी, बंगला, हिंदी, गुजराती, उर्दू सव भाषाएं फर्राटे से वोलती थीं । आगे जो प्रश्नोत्तरी हुई-विदेशी और जयामाता के बीच वह बातें अंग्रेजी में हुई–पर यहां उसका अनुवाद दे रहे हैं (पाठकों की सुविधा के लिए) मां-"आपका नाम क्या है ?" विदेशी-"राबर्ट हेंडरसन ।" मां-"क्या करते हैं ?" विदेशी-"व्यापार था।" मां-"अब ?" विदेशी-"अव तो अध्यात्म और योग में मन लग गया है।" मां-"क्यों आये हैं ?" विदेशी-"आपकी शरण में आया हूं। मुझे सिद्धि चाहिए।" "वह इतनी आसान नहीं है।" "जानता हूं।" "मन की तैयारी है ?" "हां" "तन की?" "मतलव ?" - "नौजवान हो, बहुत संयम से रहना होगा। खाना-पीना?" "शाकाहारी हूँ। शराब की बूंद को भी नहीं छूता।" 80:लापता "उत्तम । विवाहित हो?" "नहीं।" "तो यह भी ठीक ही है । कितना समय दे सकते हो ? "जितना आप कहें।" "और धन ?" "जितना आप कहें।" "अच्छा, एकांत में मिलना हमारा उधर एक आश्रम है--मेठजी वहां ले आयेंगे । तव बातें होगी। वैसे मैं जानती हूँ, तुम्हारी समस्या . क्या है " "क्या है ?" "मन की अगाति ।" "कारण?" "राजनैतिक पढ़यंत्र मे तुम्हें फांसा गया था। अभी तक पूरी तरह से उस कलंक से बरी नही हो। पर गुरु की कृपा से क्या नहीं हो सकता?" सेठजी-"धन्य हैं, पन्य हैं ! मा सबके मन का जान लेती हैं । कितना प्रताप है !" (गद्गद होकर आमू धरने लगते हैं।) "और तुम ? तुम्हारा क्या नाम है ?" "आशुतोप। "बंगाली हो?" "नहीं ! शिववाचक नाम है। सब शिव ही होगा।" "आपकी कृपा मा!" (सेठजी बीच-बीच में भाव-विह्वल स्वर में) "क्या कठिनाई है?" "आप तो सब जानती है माता-दिल की बात ।" "तुम छिपना चाहते हो । वह व्यवस्था हो जायेगी। मेटजी इन्हें अपनी उस नंबर दो की हवेली में ले जाना । सेवा, रहल करेंगे।" "इनसे अपना खाना बनाना बगैरह नहीं हो पायेगा।" "कोई बात नहीं। वहां अनेक दासियां हैं । हम मभी भगवती के दास दासी हैं।" Amt.."
। सेठजी वोले-"महामाता! आप इनका उद्धार करो। जो भी खर्चा लगेगा, देने को तैयार हूं। इनके पास एक बहुत बड़ा राज़ है । उसके सहारे मेरा सारा विजनेस ठीक हो जायेगा । आप तो जानती ही हैं, वे सब बातें यहां सबके सामने कहने की नहीं हैं । अमुक प्रदेश का वित्तमंत्री तो माताजी आपकी कृपा का प्यासा है । उसे एकाध बूंद कृपा-कटाक्ष से दे दीजिये । आगे हम सब संभाल लेंगे।" माताजी फिर हंसी । "अपने यहाँ भजन में ले आना" इशारा करके वंह और भक्तों की ओर मुड़ गयीं। भीड़ बराबर बढ़ती जा रही थी। भक्तों का अंबार जुट रहा था। माताजी के लिए यह कुछ नया नहीं था। भक्तों में बड़े-बड़े स्मगलर, पुलिस के आफिसर, सब राजनैतिक दलों के दादा लोगों से लगाकर गरीव वेचारे भोले-भाले, साधनहीन, निम्न मध्य वर्ग के अशिक्षित जनसाधारण भी थे । धर्म नामक इस वन्या में सब वहे जा रहे थे-फूल, दिये, पत्ते, घासफूस, लकड़ी के टुकड़े । किसी का भेंट चढ़ावा वस्त्र अच्छी-बुरी सव तरह की चीजें... यह धर्म ही था या अंघ-विश्वास ? या दोनों मिश्रित थे? मनुष्य का चमत्कारों के लिए आदिम कुतूहल, प्रत्याशा से भरा मन, श्रद्धा और मास्था से विकसित हृदय , प्रश्नहीन दिशा हारा दिमाग, स्वार्थ से लिपटा परमार्थ, संस्कारों से आवेष्ठित भाग्यवाद, नये रूप में प्रस्तुत था । क्या यह धर्म का व्यवसायीकरण था ? या निराश होकर व्यवसाय धर्म की ओर झुक रहा था। यह एक विराट परस्पर-वंचना का क्रम था। नियतिवाद में एड़ी- चोटी तक डूवे भारतीय के लिये कोई नई बात नहीं थी। अव उसका आधुनिकीकरण हो गया था। अव उसमें जेट विमान से घूमने वाले साधु- संन्यासी, साथ में सुन्दरी शिष्याओं की मालिका लिये घूमने वाले ब्रह्म- चारी, और रात-दिन मठों की प्रापर्टी के लिए झगड़ा करनेवाले और हाई कोटों तक जाने वाले संन्यासी (?) शामिल हो गये थे। पाखंड का ऐसा रूपान्तरण कि सब उसे एकमात्र मुक्ति-मार्ग मानें, कभी और नहीं देखा गया था । सव प्रचार-माध्यमों का उपयोग ! . 82:लापता छह हवेली नं0 2, जहां भाशतोष पहुंचा, क्या चीज पी? इसके पहले कि हम हवेली न02 तक जायें पहले 1983 में कलकत्ता को समझ लेना चाहिए। यह महानगर, जिसकी आवादी एर करोड़ के करीव पहुंचने जा रही है, एक विराट पैमाने पर चलनेवाली विरोधा- भापासों का मजमुआ था। यहां एक ओर मट्टालिकाएं थी, जहां अजीणं के शिकार लोग साते- खाते नहीं अघाते थे और उन्ही के पैरों तले नाली में से जूठन निकालकर उसी पर पलने वाले भिसारी वासक थे। यहा एक-एक करोड़पति की यह मोटरगाडिया थी, जिनमें कई 'इम्पोर्ट' थी, तो दूसरी ओर वहां एक लास रिक्शाचालक थे, जिनके अपने रिकने नहीं थे। यहां एक ओर कला और संस्कृति के नाम पर हजारो रुपये एकः शाम या राषि में नष्ट कर देनेवाले मनचले थे तो दूसरी ओर भूखे मरने वाले मनस्वी कलाकार थे जो ममामाजिक और अल्कोहोलिक बनकर मरे, चाहे ऋत्विक घटक हो या राजकमल चौधरी। यहां काति के घरेलू उद्योग और पिछवाड़े में रसगुल्लों की तरह बम बनाने के अवैध कारसाने थे, तो शाति के नाम पर नोवल पुरस्कार प्राप्त करनेवाली मदर टेरेसा थी। यहां साहित्य के नाम पर सस्ती वाहवाही के लिए या दुकानदारी चलाने के लिए तत्पर मेठ- चाटुकार दलाल किस्म के लोग ये, तो ऐसे भी अक्सड और एकमुरिये लोग थे जिन्होंने 'मान न जाने पार्व, जान भले ही जावं' का व्रत निभाया। यह अरविंद और रवीद्र की भूमि पी, यह लाई क्लाइव और मीरजाफर और विदेशी नस्करो की लीलाभूमि भी रही । यहा काली कलकत्ते वाली नित्य वलि लेती हुई तीन आखो मे लपलपाती लात जीभ पवाती,लपलपाते सग को ऊपर उठाये सदा प्रस्तुत थो, तो यही सर्वाधिक शोपित,दीन-दुमिपारी परणार्थी स्त्रियो की अनाम पंक्तियां थी। 1943 का अकाल, 1946 के बड़े रक्तपात, 1947 का विभाजन और उसके बाद अस्थिर सरकारों के बीच वरावर हुगली गंगासागर में मिलने पहनी जाती रही। यही में नेताजी सन् 40 में जर्मनी भागे, यहीं में गाधी ने नोवासाली यात्रा शुरू की, यही से हजारो-हजारी नौजवान कालापानी और फामी के तस्ते पर झूल गये-विप्लवीदल से नक्सलवाही तक । यही मे पहले अखबार निकले, - ता.०१ -- यहीं सबसे पुराना 'जादूघर', हिंदुस्तान का सबसे पुराना वनस्पति उद्यान, चिड़ियाघर, राष्ट्रीय ग्रंथागार, पहली युनिवर्सिटी सब कुछ अभी तक चल रहे हैं-ट्राम और रिक्शे भी पुरानी दुनिया के खंडहर और भग्नावशेष- यहीं कभी शरचंद्र ने अपनी नायिकाओं को गंदी गलियों में नाचगान करते हुए देखा, यहीं से कभी हिरोशिम लेबदेफ ने अपना पहला थियेटर चलाया, यहीं न्यू थियेटर्स में कुन्दनलाल सहगल गाते-गाते मर गये, यहीं देवीप्रसाद रायचौधरी और रामकिंकर वैज ने अपने विराट् शिल्प बनाये, यहीं यामिनी राय पट की नई दुनिया खोजते रहे, यहीं वैज्ञानिकों ने लाजवंती में मानवी संवेदना देखी, यहीं... और आज वही चौरंगी एकविराट मलवे के ढेर से आधी-दवी-चूंकि शंतान की आंत की तरह कभी खत्म न होने वाली पाताल रेलवे वहां बन रही है, अपने पुराने अंग्रेजी राज के जमाने के सपने मन में लिये, कोढ़ी बुढ़िया की तरह, फुटपाथ पर भीख मांग रही है । आज वही सब बड़े-बड़े स्थान एकदम मटियामेट हो रहे हैं, जैसे सबके ऊपर मटियावुर्ज की छांह फैल गयी हो। यहीं पर जीवन अपनी मंथर गति से रेंग रहा है, सरक रहा है किसी आदिम ऊर्जा की गति से, किसी यंत्रचालित विराट अज़दहे की गति से, पर इस ड्रैगन से अब कोई नहीं डरता। वह स्वयं एक दयनीय छिपकली बन गया है। उसी कलकत्ते के एक उपनगरीय हिस्से की एक पुरानी कोठी में इस जयमाता के तथाकथित 'न्यास' का आफिस है। इस कार्यालय में नये-नये चेलों को रख लिया जाता है। वे अलग-अलग काम में लाये जाते हैं। कुछ थोड़े समय के लिए उम्मीदवार के बतौर होते हैं। कुछ रईस वहां 'मन की शांति' खोजने आते हैं । कुछ काफी चतुर लोग माताजी की अनेक 'सेवाओं में हाथ बंटाते हैं । देश-विदेश में माताजी के आश्रमों के जाल फैले हुए हैं । कई राजनैतिक कार्यकर्ता भी वहां 'मन की 'शांति, खोजने आते हैं। अनेक स्वयंसेविकाएं हैं, बड़ा अच्छा केंटीन चलाया जाता है । एक 'एअर कंडीशन्ड' ध्यान-घर भी है । और क्या चाहिए ? लोगों को दिखावे लिए जो दान माता है उससे एक होमियोपैथिक मुफ्त का अस्पताल चलाया जाता है । धार्मिक ग्रन्थों का ग्रंथालय-वाचनालय है। 'प्रौढ़ साक्षरों के पढ़ने की व्यवस्था है, अंघशाला है, अनाथ वालिकामों . -84: लापता को सिलाई कढाई सिखाई जाती है। और क्या-क्या परोपकार चाहिए? समाज फिर भी अकृता है, इमे सिर्फ दिसावा कहना है। जयामाता की इस हवेली नं0 2 में आशुतोष पह वा दिये गये। उनसे 'नाम के वास्ते' (अभिनव ) कुछ फी ली गई । वाकी तो 'योगक्षेमं वहाम्यहे -सबका खर्चा ऊपर वाला ही चलाता है । वह सचमुच ऊपर वाला होता है। कोई नहीं जानता कि महादान कहां से आता है। हा, इसमें 'ऊपर' वाले का ऊपरी महत्त्व कायम रखने के लिए कुछ लोगों को नीचे वाला होना ही पड़ता है। वे नीची जात के नही, गरीब तबके के दास दासियां, भक्त-भक्तिनें हैं । वे नीचे ही रहती हैं। तभी कार की कोठरियों में बढ़े लोग अपना सब वडा-बडा काम कर सकते हैं। इसी में महातम है-- 'छोटन को छोटो रख, यही बड़ाई जान'! आशुतोप से पूछा गया-"वह क्या-क्या कर सकता है ?" लिखना-पढ़ना, पढाना, प्रचार, अनुवाद, पुस्तिकाओं का वितरण, मुद्रण-संपादन यह सब वह जानता है । कुछ मित्र भी बना लेता है। आवश्यकता पड़ने पर पोस्टर, साइनबोई रंगना। भाषण देना। बड़े लोगों के साथ सेक्रेटरी के तौर पर काम करना, टंकन आदि-आदि । "ठीक है, कल से आपकी ड्यूटी लगा दी जायेगी।" एक महिला ने उसे बता दिया। कमरा ठीक कर दिया गया। आशुतोप का नया अज्ञात जीवन आरंभ हो गया। 17 अव आशुतोप ने अपना नाम गुजराती ढंग से पटेल रग लिया था। पोडी-बहुत गुजराती वह पढ लेता ही था। हवेली न02 मे उसका परिचय जयामाता के प्रकाशन विभाग से संबद्ध विनीता से हुया और वह बढ़ना साप.
ही गया।
आशुतोष ने मन ही मन सोचा कि इस तरह अज्ञातवास में रहने के
लिए यह स्थान बहुत सुरक्षित है । कलकत्ता के उपनगर में सब निम्न
मध्यवित्त वर्ग के लोग रात-दिन दो जून भात पाने की चिता में जुटे हुए
हैं। किसे फुरसत हं दूसरे का दुख दर्द जानने की ?
विनीता से माशुतोष ने पूछा-"तुम जायामाता की सेविका कब से
और क्यों वन गई?"
"दो साल से यहां हूं। और 'क्यों' का उत्तर तो भाग्य या भगवान
के पास ही है।"
"नहीं, कुछ तो कारण हुआ होगा?"
"हां, मैं बाल-विधवा थी। सास-ससुर ने बहुत तंग किया ! देवर की
आंख मुझ पर थी। मैं उस तरह जिंदगी नहीं विताना चाहती थी।"
"मां-बाप के घर क्यों नहीं गई ?"
"वहां कौन बचा है मेरा ?"
"क्यों ?"
"पिता नेपाल चले गये। मां बचपन में ही मर गई। भाइयों ने
बोझ समझकर उस अधेड़ रोगी से व्याह दिया। जानते हुए भी कुएं में
'जिंदा धकेल दिया।"
"कितने दिन गृहस्थिन रही ?"
"तीन साल निभाया। उसकी रात-दिन सेवा-टहल करती रही। वह
'किसी काम का बचा हुआ नहीं था। रात-दिन खांसता रहता। दमे का
बीमार था। तपेदिक भी थी। मैंने बहुत पूजा-पाठ की। पर कुछ काम
नहीं आये । वह बच नहीं सका।"
"बहुत दुख की बात है । पर कोई नौकरी ही कर लेती।"
"पढ़ाई अधूरे में छूट गई । दर्शन मेरा प्रिय विषय था। मैंने कई
'किताबें पढ़ी थी। तभी इस जयामाता के एक भक्त ने मुझे माई का दर्शन
कराया।"
"क्या उनकी कृपा नहीं हुई ?"
"केवल गुरु-कृपा से क्या होता है दादा, पूर्वजन्म का संचित पुण्य भी
-86:लापता
चाहिए।" "तुम तो पहुंचे हुए माधु-माध्वी जैसी बातें करने लगी। मया यम के पास से सत्यवान के प्राण सावित्री वापिस नहीं ले आई थी ?" "हां, वह पुराणों की पहानियां हैं। तव सत्य-युग था । अव यात दूसरी है। अब सारे सबंध स्वारथ के हो गये हैं । इस हाप दे, उस हाय ले। प्रेम दिखावा है।" "तुम इतनी निराश क्यों हो, विनीता?" "और नही तो क्या करू ? पता नही आयु के कितने मोपान अभी चढने शेष हैं ? पता नहीं कितनी दूर को यह मंजिल है।" "क्या दुनिया सिर्फ अंधेरी ही अंधेरी है ?" "कही कोई रोशनी की किरण-एक हलकी-सी उसको मलक भी मुझे दिखाई नहीं दे रही है।" "क्या सारा दर्शन-शास्त्र पढकर तुमने यही हासिल किया ?" "छोड़ो भी, अपनी बताओ दादा, आप क्यो जया के पास आये।" आगुतीप पोटा शिक्षका । यह सच-सच बता नहीं सकता था । अपने को छिपाना चाहता था। पर यहाँ उभे लगा कि एक हृदम है जिसके सामने वह कुछ खुल सकता है। प्रनिदान की आमा है । यहां न 'एन०आर०' के लवे-लंबे हाय के खून रंग नाखूनो या शिकजा है, न ऊषा की वह भयावह छाया ही, जिनमे वह वनना चाहता है। उगने जीवन में अनेक पाप किये, पर कही तो परिताप का अवसर मिल सकेगा? कोई तो है जो उमे समझना चाहता है। आशुतोष पोडी देर मौन रहकर बताने लगा- "विनीता, मेरी कहानी भी बहुत कुछ तुम्हारी जैसी है। तुम विधवा हो, मेरा विवाह नहीं हुआ (व्हा वह झूठ बोल रहा था) वम इतना ही "क्या है तुम्हारे और मेरे जीवन में ममानता ?" "तुम्हारी मां बचपन में मर गई । मेरी भी मां नहीं रही। पिता ने दूसरी शादी कर ली। मौतेली मा ने मुझे कभी प्यार नहीं दिया।" "तो क्या तुम्हारा और कोई भाई नहीं था।" "या, पर यह मुझसे एकदम उलटा पा।" । Y...”
हो गया। आशुतोष ने मन ही मन सोचा कि इस तरह अज्ञातवास में रहने के लिए यह स्थान बहुत सुरक्षित है । कलकत्ता के उपनगर में सब निम्न मध्यवित्त वर्ग के लोग रात-दिन दो जून भात पाने की चिता में जुटे हुए हैं। किसे फुरसत है दूसरे का दुख दर्द जानने की? विनीता से आशुतोष ने पूछा- "तुम जायामाता की सेविका कब से और क्यों वन गई ?" "दो साल से यहां हूं। और 'क्यों' का उत्तर तो भाग्य या भगवान के पास ही है।" "नहीं, कुछ तो कारण हुआ होगा ?" "हां, मैं बाल-विधवा थी। सास-ससुर ने बहुत तंग किया ! देवर की आंख मुझ पर थी। मैं उस तरह जिंदगी नहीं विताना चाहती थी।" "मां-बाप के घर क्यों नहीं गई ?" "वहां कौन वचा है मेरा ?" "क्यों ?" "पिता नेपाल चले गये। मां वचपन में ही मर गई। भाइयों बोझ समझकर उस अधेड़ रोगी से व्याह दिया। जानते हुए भी कुएं जिंदा धकेल दिया।' "कितने दिन गृहस्थिन रही ?" "तीन साल निभाया। उसकी रात-दिन सेवा-टहल करती रही 'किसी काम का बचा हुआ नहीं था। रात-दिन खांसता रहता। दसे बीमार था। तपेदिक भी थी। मैंने बहुत पूजा-पाठ की। पर कुछ नहीं आये। वह बच नहीं सका।" "वहुत दुख की बात है । पर कोई नौकरी ही कर लेती।" "पढ़ाई अधूरे में छूट गई । दर्शन मेरा प्रिय विषय था। 'किताबें पढ़ी थी। तभी इस जयामाता के एक भक्त ने मुझे माई कराया।" "क्या उनकी कृपा नहीं हुई ?" "केवल गुरु-कृपा से क्या होता है दादा, पूर्वजन्म का संनि । :86: लापता चाहिए।" "तुम तो पहुंचे हुए साघ-माध्वो जैसी बातें करने लगी। क्या मम के पास से मत्यवान के प्राण सावित्री वापिस नहीं ले आई थी ?" "हा, वह पुराणों की कहानिया है । तव सत्य-युग था। अब बात दूसरी है। अब सारे संबंध स्वारप के हो गये हैं । इस हाय दे, उस हाथ ले। प्रेम दिखावा है।" "तुम इतनी निराश क्यों हो, विनीता?" "और नही तो क्या करूं? पता नही आयु के कितने मोपान अभी चढ़ने शेप हैं ? पता नहीं कितनी दूर की यह मजिन है।" "क्या दुनिया सिर्फ अंधेरी ही अंधेरी है ?" "कही कोई रोशनी की किरण-एक हलकी-सी उसकी झलक भी मुझे दिखाई नहीं दे रही है ।" "क्या सारा दर्शन-शास्त्र पढकर तुमने यही हासिल किया ?" "छोड़ो भी, अपनी बताओ दादा, आप क्यों जया के पास आये।" माशुतोष पोडा शिक्षका । वह सच-मच यता नहीं सकता था । अपने को छिपाना चाहता था। पर यहां उने लगा कि एक हृदय है जिसके सामने यह कुछ खुल मरता है। प्रतिदान की आशा है । यहा न 'एनआर०' में लंबे-लंबे हाप के सून रंगे नासूनो का शिकजा है, न ऊपा को वह भयावह छाया ही, जिनमें वह बचना चाहता है । उमने जीवन में अनेक पाप किये, पर कही तो परिताप का अवमर मिल मकेगा? कोई तो है जो उसे समझना चाहता है । आशुतोप घोही देर मौन रहकर बताने लगा--- "विनीता, मेरी कहानी भी बहुत कुछ तुम्हारी जैसी है । तुम विधवा हो, मेरा विवाह नहीं हुआ (यहां वह झूठ बोल रहा पा) वम इतना ही फर्क है।" "क्या है तुम्हारे और मेरे जीवन में ममानता ?" "तुम्हारी मां बचपन में मर गई । मेरी भी मां नहीं रही। पिता ने दूसरी शादी कर ली। मौतेली मा ने मुझे कभी प्यार नहीं दिया।" "तो क्या तुम्हारा और कोई भाई नहीं था।" "या, पर यह मुझसे एकदम उमटाया।"
"ने?" "वह मारपीट करता। घर पर आकर झूठ बोलता। सवकी सहानुभूति पाता। छोटा था न । मुझे सव दुरदुराते । सब चाहते थे कि मैं पढ़ाई पूरी करने से पहले ही कमाने लग जाऊं । यह कैसे संभव था ? मेरी कितावें वह चुराता। पन्ने फाड़ डालता मेरे होम-वर्क के। मेरे अपमानित होने में उसे बड़ा आनन्द मिलता था।" "क्या पिता तुम्हारा पक्ष नहीं लेते थे।" "नहीं, वे सदा छोटे भाई का ही पक्ष लेते थे।" "तो घर के बाहर भी कोई तुम्हारा मित्र सहानुभूति देने वाला नहीं था-पास-पड़ोस में, स्कूल-कालेज में, रिश्ते-विरादरी में।" "नहीं, कोई मुझे समझने की कोशिश ही नहीं कर रहा था।" "यों शुरू होती है एक वे पहिचाने बने रहने की दुनिया । एक तरह से सब चीजों से अलगाव । एक ऐसा वोध कि हम सबसे कटे हुए हैं। कहीं कोई छोटा-सा भी, हलका-सा भी संबंधों का तंतु शेप नहीं है। नित्य प्रताड़ित, अपमानित, वंचित, एक कुचली हुई, तुड़मुड़ाई हुई, आधी-अधूरी जिंदगी में हम जीते रहते हैं। कुछ हैं जो समझौता कर लेते हैं। अर्द्ध- सत्य को ही पूरा सत्य मान लेते हैं । यह धोखा बड़े पैमाने पर लोगों को हो जाता है। जानती हो विनीता, बड़े-बड़े लोगों को यह मुगालता रहता है। बड़े-बड़े राष्ट्रों को हो जाता है।" "सो कैसे?" "गांधी समझते रहे कि सव हिन्दू-मुसलमान, हरिजन-सवर्ण उनके साथ हैं। पर सच्चाई यह थी कि मुसलमान जिन्ना के साथ थे। हरिजन आंबेडकर के साथ । हिन्दू सावरकर और गोडसे के साथ । गांधी के साथ शेप दुनिया थी, सिर्फ उनका बड़ा बेटा ही उनके साथ नहीं था। यह कैसा चक्कर है । जो भगवान से लगाव लगा लेते हैं, उनसे दुनिया छूट जाती है, जो दुनिया से लगाव रखते हैं, उनकी तो दीन और दुनिया दोनों छूट जाती है।" "तुम अपनी बात करते-करते बड़े सवालों में उलझ गये। क्या इतना ही काफी है कि घर में सुख नहीं मिला तो घर से भागते फिरे ? . । 88: लापता
"कोट्स की कविता है :
एवर लेट दि फेमी रोय
प्लेजर नेवर इज एट होम !"
(कल्पना को मुक्त उहने दो
पर में कभी भी मुग नहीं है
या सुख कभी घर मे नही रहता)
"यह भागम भाग सब अच्छे कवियों में होती है।"
"तुम्हें कविता पसन्द है ?"
"क्या तुम्हें कविता अच्छी लगती है ?"
"किमे अच्छी नहीं लगती।" बोली ने कहा-“वी सोक फार दंट
इज नॉट ।" (जो नहीं है उसी के पीछे हम लगे हैं)। रवीन्द्रनाय का
'जाहा चाई ताहा भूल करे चाई, जाहा पाई ताहा चाई जा' यही तो है।
महादेवी वर्मा ने पीहा में तुझको ढूढा, तुझमे ढूंढ गी पीडा' कहा था।
"तुम हिन्दी कविता पनते हो?"
• हिन्दी ही क्यों, जिस भाषा में भी अच्छी कविता हो. मैं पढ़ता हूं।
मनुर एक चिर-विरही प्राणी है । संस्कृत में तो कालिदास ने पूरा 'मेपर्न'
विरही या की भावनाओं को लेकर लिरा डाला । करहण ने कहा है-
कण्ठग्रहे शिथिलता गमिते कप चि-
घो मन्यते मरणमेव सुपाम्युपायम्
गच्छन्स एव न बलाद्विषतो युवाभ्या-
मित्युज्झिते भुजलते वलयरिवास्या ।"
"इसका अर्थ पया हुआ? मैं इतनी संस्कृत नहीं जानती।"
"विरहिणी दुर्वल हो गयी है और गहने ढोले हो गये हैं । यह स्यामा-
विक ही है। कंगन हाथ मे उतर गये। जो प्रिय कंगलिगन के किसी
प्रकार से शिपिल होने पर मरण को ही सुग मानना था, वही प्रिय
प्रवास में चला गया और ये भुजाए उन्हें रोक नहीं पाई। इमलिए मानी
रूठकर बलयों ने या कंगना ने मुजाओं का साथ छोड़ दिया है।"
"माप भी कंसी-कैसी बात करते हैं ? इससे अकेलापन कम होने के
बदले बढता है । यह दुस को कम करने वाली बात नहीं है । मैं चलू...।"
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"आदमी अकेला रहना चाहता है। उसी में उसे सुप्त लगता है। पर वह अकेला रह ही नहीं सकता। बचपन में उगे परिवार, कलन, मित्र वड़ा होने पर पत्नी यति, बच्चे और कितने-कितने लोग घेरे रहते हैं। यह निस्संग रह ही नहीं पाता, और मोचता रहता है कि निसांगता ही अन्तिम सुष है। यही अकेलापन, जिमे वह सुस को कुजी मानता है, उसके दुरस की जड है। क्या वह इमलिए दुखी है कि उसे भारी दुनिया में उसके मालिक, स्वामी, माता-पिता, आत्मीय-स्वजन सबने निराश्रित छोड़ दिया है ? षया वह इस अलगाव से दुखी है ? पर पहले तो मनुष्य जंगल में, गुफाओ में रहता था। उसने बनाया हुआ कोई मर्वशक्तिमान, सर्वकृपावान ईश्वर भी नही पा। तब यह पदा अकेलेपन के दर्द से छटपटाता नहीं था? नहीं, यह इसलिए दुसी पाकि वह अपने आपको पहचानना नहीं था। उसकी पुकार थी-कौन हूं मैं ? कौन हो तुम? क्या मै ? 'क स्त्वम्, कोऽहम्, क्वाति...' उसने बहुत दर्शन और चिंतन के जाल बुने । काफी उर्धेड-युन की । तक के वारीक रेशो में वह उलझ गया। 'फैली अलके ज्यो तर्क जाल उसे समाधान नही मिला। वह यह 'अपनापन' पूरी तरह पहचान पाया। बीच-बीच में एक झलक मिलती। वह मिथ्याभास लगता । मृग-मरोनिका को नरह। जैन उसने रस्सी को ही सांप मान लिया हो । मोप भो ही चांदी समझ लिया हो। वह भटकता रहा, भटकता रहा। उसके हाथ में एक दिन एक वस्तु आई-'विमान !' उसने समझ लिया कि अब वह अकेला नही रहेगा। मारे पंच महाभूतो पर वह विजय पा सकता है। उसके हाथ मे अपरिमीम अनन्न शक्ति है। वह उस दाक्ति के मद उम नयी खोज के महकार मे कई पो और सदियो तक डूबा रहा। अब इन्सान विपुल आश्वस्त हो गया कि :91 .. उसने अपने आपको पूरी तरह जान लिया है । वाहरी दुनिया पर उसका पूरा नियंत्रण है। पर वह सच नहीं था। उसी के बनाये हुए समाज, के अर्थव्यवस्था के, राजनीति के नियम, कानून, बंधन उसे पिंजरे जैसे लगने लगे। यह वेड़ियां उसी ने बनाई थीं। उसे कभी भी अनुमान था कि औरों के लिये बनाये ये वुद्धि के भेद, ये भूलभुलैयाएं, कठिन पहेलियां, उसी को अपनी जकड़ में वांध लेंगी। उसी का पालतू विज्ञान अब बड़ा होकर, खूखार बना हुआ, उसी को आंखें दिखा रहा है। उसी पर आंखें तरेर रहा है । अव वह क्या करे ? वह भस्मासुर वाली अवस्थायें हैं । मोहिनी ने उसे नाच सिखाया-और सहज भाव से उसने अपने सिर पर ही हाथ रख दिया। वही पूरी तरह भस्म हो गया। मनुष्य का यह आत्म-प्रवंचना का नाटक लाखों वर्षों से चला आ रहा है। सृष्टि के आरंभ से। शायद सृष्टि के अन्त तक यों ही चलता रहेगा? धर्म ने कहा-देखो, तुम इधर-उधर मत भटको। हमें सब पता- ठिकाना मालूम है। हम रास्ता बताते हैं हमारे साथ चलो। आदमी धर्म के साथ चलने लगा। किसी ने कहा अन्तिम सत्य एक है। किमी ने दो, किसी ने तीन। किसी ने अनेक देवता बताये। पर व चीज़ जिसे वह देवता मान बैठा वह पत्थर का बुत निकला । वह बोल- नही था, चलता नहीं था। एक ही जगह स्थिर था। चाहे वह शिव या कावा, या सलीव । वह किताव हो या नाम, तस्वीह का मन का या 'अनहद नाम'--वह परिभाषा से परे था इसलिए वहां भी उ पहचान उसे नहीं मिली। वह खोया-खोया सा फिर लौट आया। जैसे पहाड़ की वफ़ानी चोटी पर चढ़ने के लिए जाने पर्वतारोही निराश होकर लौटे । विज्ञान नहीं, धर्म नहीं-फिर कहां है उसकी पहचान ? क्या वह उस पत्र की तरह है जो 'डेड लेटर आफिस' पहुंच चूंकि उस पर मुहर लगी है-'ठिकाना सही नहीं।' या 'इस आदमी यहां नहीं रहता।' या 'पता अधूरा है।' 02: लापता कारण कुछ भी हो, वह लापता है। विन पहचान, विन चेहरे का गति, कटी पतंग-मा, मरते पत्ते-मा, गिरते हुए नक्षत्र-गा, ज्वालामुग्गी के मुंह में लुढ़कने जाने वाले जलते पत्थर-ना, बेतरलीव विजली-गा, अप्रत्याशित बाई या आगगा, यहां दा. दर भटकना रहा है। वह अश्वत्थामा है ? या वह 'दाइरिंग ज्यू है ? यह यायावर नक्षत्र में जन्मा निद्देश्य पाय है ? चिर-प्रवामी है ? क्या है वह-अपने को नही जानता, अपने रहबर को नहीं पहचानता, अपने आखिरी ठिकाने में नावाकिफ एक पंडुलम मात्र है" उनसे दिशा-काल का बोध शायद आगे को मिल पाता है पर यह खुद दोनो से अन्धा है, वेखवर है। इसलिए चल रहा है कि किसी ने गई अरबों वर्ष पहले चाभी भर दी थी और अभी तक चल रही है । इसलिए बोल रहा है कि आरंभ में वह एक मन्द था. नाद पा, "बुन' पा, अार था-~कुछ ऐसा था जो पहचान में नहीं आता था। अन्धी को लिपि 'ल' आपवालो के लिए क्या है ? जापानी चियाक्षर जापानी न जानने वालों के लिए क्या है ? मभी धर्मों के मुख्य मंत्र, जो वह भाषा नहीं जानते उनके लिए रा है~-निरे निनाद मा शब्द ? ॐ स्वाहा, मणिपो हुँ, पमो अरिहतागो, इनाम और, आमीन... वह प्रणव और उद्गीप और महामंत्र और देवी पान्द मया है ? मनुष्य की पहवान की पहली गीढी या मनुष्य के अमान का अहसाम यह मव हायरी लिखने पर भी यागुतोप को बैन नहीं था ? बह अरविंद मलहोत्रा, देवीसेन बनकर भी चन पा सका? वह मदानद बाला- वलकर बनकर भी कहां सुखो बना? वह महादेव शर्मा के रूप में निर- असतुष्ट बना रहा । अब वह आगुतोष पटेल वनकर क्या अपनी अगली पहचान पा सकेगा। 'अपने आपको जानो! 'नो दाई गेल्फ'-उपनिषद और वाइबिल बहुन चीरसते रहे। मगर आदमी है कि वह बराबर अपने पापम भागना फिर रहा है। इसी से वह रही नही है । और मभी नहीं अपने को ?
भटकाये-अटकाये फिर रहा है।
अभी तो जयामाता ने उसे विनीता नामक एक दर्पण दिया है। देख,
उसमें अपनी तस्वीर देख !
19
..-
ऊपा और प्रशांत ने उड़ीसा के उस छोटे से सागर-तट के गांव से
जाने वाली वसों का पता चलाया। मीना ने जिस शाम के बस की बात
की थी, वह तो कलकत्ता की ओर ही जाने वाली थी। और कोई
नहीं।
कलकत्ते के पास जिस जगह वह रुकती थी, वहां दोनों उस बस से
आये । बस कंडक्टर से पता तो चला कि कुछ महीनों पहले एक दाढ़ी
बढ़ाया युवक उस वस से गया जरूर था, और उसके साथ में वहत से चित्र
भी थे। पर उससे अधिक कोई और नहीं जानता था। टिकिट उसने
वम के चलने से पहले ही खरीदा था। रुपया उसके पास बहुत रहा होगा,
चूंकि सौ का नोट उसने निकाला । नाम उसने अपना लिखाया नहीं था।
यहां तक तो खोज ठीक थी।
अव उस दक्षिण कलकत्ता के उपनगर में सपा और प्रशांत ने होटलों
की खोज
शुरू
की । यहां तक पता लगा कि एक महाकाली होटल में ऐसा
एक युवक बस से आया था । और सात दिन ठहरा था।
ये भी उस होटल में ठहर गये।
होटल के बैरा से पता चला कि आदमी दिन-भर सोता रहता था।
काम कुछ करता नहीं था। हां, जिस दिन वह यहां से चला गया तो
सामान उसके पास बहुत कम था, और उसने दाढ़ी मूछ राब कटवा दी
थी। सिर भी घुटवा लिया था।
A
-
94 : लापता
"वया यह बहुत पीता था?" "नहीं, ऐमी भी कोई बात नहीं।" "शाम को जागकर बाहर कहीं चला जाता था। देर रात बीते वापिस होटर पर आता था।" "उसके माप के मामान का उसने क्या किया?" "उसने किसी को देव-बान दिया?" "बहुत से कागज और बड़े-बडे कैनवास ये, जिन पर तस्वीरें बनी हुई थी।" झाडू देने वाले नौकर ने कहा-"हमारे तो समझ में नहीं आती थी, कैसी तस्वीरें थी। बहुत-सा पानी जमा हो ऐगे सोनपे । कही बद्दल पे। कही मोर । कही कोई वडी-बड़ी आखों वाली लही। उसकी टोकनी में मछली ही मछली।" "ऐमी तस्वीरें इस कुग्राम में खरीदने वाला कौन होगा ?" "कवाडी को बेच दी होगी उसने ।" सोजते-खोजते एक गली को नुक्कड पर एक मुमलमान पेंटर साहय मिले। पेंटर तो क्या थे, फोटो भी सोचते थे। उनकी दुकान में एक रंगीन पर्दा भी टंगा था। और गाइनयोर्ड धगरह रंगाई-पुताई का काम भी करते थे। अकेले यादमी जान पड़ते थे। दुकान में एक छोटा-मा बच्चा नौकर रखा हुआ था। उसे 'दाम' कहकर पुकारते थे । बहुत दिनो के बाद कोई ग्राहरू आया देसकर पेंटर माहब पुरा हुए। बातचीत चालू रखने के लिए कुछ काम का बहाना जरूरी हो या। प्रशान ने कहा- 'जमाल मियां पेंटर आप ही हैं "जी, हां।" "हम पासपोर्ट साइज फोटो खिंचवाना चाहते हैं।" "बरत ठीक है।" क्या दोनो के खिचवायेंगे? एक साथ सिंचवा लीजिये । जोहा बहुत अच्छा बनेगा।" दोनो हमें। ऊपा ने कहा-"मैं इनकी बीवी नहीं हू, भाभी हूं।" "मुआफ़ कीजिये । दाम क्या लेते हैं, साहर! आजकल फोटो का " - सापता:95 40 । - मैटीरिअल बड़ा महंगा हो गया है । इस गांव में कौन फोटो खिचवाता है और किसे आर्ट की पड़ी है ! "फिर भी?" "यही जल्दी होगी तो तीन कापी के पच्चीस लेंगे।" "ठीक है।" जमाल मियां अपना ही दुखड़ा सुनाने लगे। वे बांगला देश से आये बिहारी मुसलमान थे। पाकिस्तान जा भी नहीं सकते थे, वांगला देश वे वापिम जा नहीं सकते थे। विहारी होने से उर्दू बोल लेते थे। बंगाली मुसलमानो से अलग थे। गांव में एक मस्जिद थी और उसके पास ही एक मुस्लिम होटल । वहीं खाते-पीते थे। वहीं जाकर उर्दू अखवार भी पढ़ लेते थे। प्रशांत अब मुख्य मुद्दे की ओर आया--"आपके पास एक माह पहले कोई आर्टिस्ट अपनी तस्वीरें वेच गया था क्या ?" "अजी, तस्वीरें क्या थीं ? हमारी तो समझ में कुछ आया नहीं। नीला-सफेद, काला कुछ धब्बों से भरा मामला था । वह उन्हें दरिया कहता था। दरिया-वरिया कुछ नहीं था। उसके दिल को बहलाने के लिए सिर्फ खयाल था ! आदमी दरियादिल था। वह कैनवास बड़े सस्ते में फेंक गया। लगता था जैसे उस पर वोझ थे। किसी तरह उनसे छुट्टी करना चाहता था।" "नाम क्या था उसका?" "माधव-माधव कहता था। तस्वीरों पर 'एम' वना हुमा है।" "वे तस्वीरें आपके पास हैं ?" "कुछ रखी हुई हैं। कुछ तो हमने सफेद पेंट लगवाकर बेच भी दी। कुछ के पोस्टर बना डाले । वह सर्कस कंपनी वाले आये थे। चाहते थे, तो पाई पर कागज चिपकवा के दे दिए।" बची हुई बड़ी-बड़ी चार-पांच तस्वीरें थीं। वे धूलखाती कहीं मियानी में पड़ी थीं। बहुत इसरार करने पर जमाल मियाँ उन्हें ले आये । दास एक-एक पर से धूल झाड़ता-पोंछता जाता । दुकान में रखने को जगह भी नहीं थी। .. 96: लापता ऊपा को उनमें मे तीन बहुत अच्छी लगीं। एक में समुद्र का रिनारा पा सम्बा-गा, उस पर सो, अंग, घोंपे, गांप बने हुए थे। उपर उठनी हुई लहरें, दूर तक नीला विस्तार । बनदर पर एक छोटा मा पन्चे जमा दिने वाला जहाज। आगमान गे उतरती हुई जगन्नाथ की मूति: "गोल-गोल चेहरा, गोल-गोल अनि । यम, हगी नस्वीर में वहीं बड़ी-बड़ी फटी-गी आंखो वाली काली गांवली लडकी घी। ऊपा ने देखा कि उसके चेहरे और मीना के चेहरे में बहा गाम्य है। उसने बाए हाय में एक बड़ी गी टोपनी ली है, जिम में मछलिया ही मछलिया है । मछलियों में और मीना की आयो मे माम्य है । पीछे वैकग्राउंड में गमुन्दर है और उगमे जाल विद्याना एक छरहरा गिलहट है । ऊपा को यह मीना का बाप सगा। नस्योर एक लाल सिंदूर वाले त्रिशूल के पास बैठे जटाधारी या मूदं गेरा पहने वाया की थी। उसके बैठने के आसग पर कई तरह के आमन बने हुए थे-बल्कि ताधिक भापा मैं 'य'। वाया के पीछे एक दम मधेरा था। फही से कोई खोपड़ी हंग रही थी। भयाना विदप चित्र था । पर अपा ने हुज्जत करके वे तीनों कैनवास जमाल मियां ये पाग मे रपवा लिये। ये सौ रुपये के नोट से ही सुश थे । बोले. "वह दग-दग हाये मे दे गया था। पागल पा या दुनिया का सनाया हुआ । पता नहीं क्या गल गवार या। अव्वल तो ऐसी वाह्यिात तस्वीर बनाई ही क्यों ? और बनाई तो फिर येच पयों डाली" यहां तक तो अरविंद की खोज प्रशात ने पीपी। इससे आगे तभी कलकत्ते में उनकी राव में मुलाकान हो गयी । उन्हें पता चल गया था कि एक नया चेला जयामाता के चक्कर में आ गया है । मेठ अंगियानी गिधी थे। और उनका इन स्मगलरोकी अतराष्ट्रीय गंग में यानी अप्रत्यक्ष रूप में एच आर. में मध पा । विदेशी जोडच तथा कथित दार्शनिक वहा आया था । वह यी होप' (परम गाना-योन) का ही 'करियर' था । नेपाल से आया था। मध्यप्रदेश में मंदशोर से लगाकर बैंकाक, हागकाग, काठमाडौं, कावुल तक इन 'हगीरा के सरोद-फरोन करने वालों के जाल फैले थे। । लापता:97 मालवे की भूमि की थोड़ी-सी अफीम दूर-दूर तक जाकर दस हजार गुना दामों की 'हेरॉइन' बन जाती थी। दुनिया विकती है, वेचने वाला चाहिए । पुरानी कहावत 'दुनिया झुकती है, झुकाने वाला चाहिए, यह नया रूप था। आशुतोष पटेल को पता ही नहीं था कि उसकी मूल पहचान उसके पीछे-पीछे साये की तरह मंडरा रही है। हम अपने आपसे कहां तक भागकर जा सकते हैं ? 20 "क्या हमारी पहचान खो जाने का कारण हमारा अतिशय मातृ- वात्सल्य है ?" आशुतोप अपनी डायरी में लिखता जा रहा था, कि विनीता ने वह हिस्सा पढ़ लिया। वह बोली-"आपकी मां सौतेली है, इसलिए आप सब माताओं पर लांछन लगा रहे हैं। वे पालती हैं---बड़ा करती हैं । वे बच्चों को एक खास काट का बनाती हैं, जैसा वे चाहती हैं। पर वे पहचान मिटाती नहीं हैं।" आशुतोप ने कहा--"रवीन्द्रनाथ ने ही लिखा था-मुझे मनुष्य बनाओ, हे वंगजननी, बंगाली बनाकर मत रखो । और रवीन्द्रनाथ ने लिखा--- 'अतल कालो स्नेहेर माझे डुविये आमाय स्निग्ध करो,--मुझे गहरे काले स्नेह में डुबोकर हे श्यामा माता स्निग्ध करो !" विनीता-"नहीं, नहीं, रवीन्द्रनाथ की चित्रा, श्यामा नहीं है-वह नाम वर्णामयी है, विचित्रा है, उर्वशी है।" आशुतोप-"देखो, 'तोमार राते मिलाय आमार जीवन सांझेर रश्मि रेखा ।" (तुम्हारी रात में मेरे जीवन संध्या की रशिम-रेखा मिला दो) 98:लापता यह भी उन्होंने ही लिखा है । अंतिम दिनों में ये क्यामली में रहने लगे। संथाली लड़की के कितने चित्र उन्होने बनाये। शस्ति-पूजक ये नहीं थे, पर वे भी एक जगह कविता में लिखते हैं- डान् हाते तोर खड्गग्यते यां हाते करे शंकाहरण दुई नयने स्नेहेर हामी ललाट नेत्र आगुन वरण विनीता--"बंगाली के लिए मा 'वदे-मातरम्' वाली 'सरकरवाले, आयुधों से सज्जित दुर्गा ही है।" आशुतोप-"अतिम दिनों में रवीन्द्रनाय रद्रताहव नृत्यरत शिय का आवाहन करने लगे थे। बहुत पहले उन्होने कहा था- "कालोरे' रहे बसे घरी शुध्र महाकाल' (परिशेप, 1927) काली को वक्ष में रखे हुए हैं शुभ्र महाकाल ! इसी से मैं कहता हूं कि इस घेरे से वह छूट नही मके । वहीं माया है, वही कवीद्र की एसनामयी है।" विनीता-"जयामाता कहती हैं कि काली और काल दो अलग- अलग चीजें नहीं हैं । वे एक ही रूप के दो नाम हैं।" आशुतोप ने कहा-"ठीक ही तो कहा है । सारे मर्मी, रहस्यवाने उसी श्याम-श्यामा के रंग मे सने हैं । कृष्ण और काली असल में एक ही हैं। मन जो मां को बुलाने जाता है वह कहां रह पाता था। वह उमी रंग में खो जाता है।" मा बोले हाकिस ना रे मन मा के कोपा पाये भाई थाकते एदो दिता देखा सवं नाशी बचे नाई (रामप्रसाद) जो सवका संहार करनेवाली है। वह कमे बची रहेगी। यह कि बचायेगी ? शायद सहार हो जाना ही उमकी दृष्टि में बचा है।' विनीता-"आपने अभिशा की सही परिभाषा दे दो। जब तक यह, तू, मैं, वह, यह सब अलग-अलग पहचाने जाने वाले यभिधान है, तब तकः उनमे वह परमतत्व कहा है। वह पराशनि नोमवव्यापिनी है । इमोलिए
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उसने छूटते ही पूछा--"माप अरविंद मलहोत्रा को जानते है ?" "नहीं।", आशुतोप ने दृढ भाव से कहा। "आप जरूर जानते हैं।" "आपको कोई धोया हुआ है । मैं आगुतोष पटेल हूं और इस नाम के भादमी से मेरा कोई संबंध नहीं।" "जाने दीजिये । माप देवीसेन को जानते हैं?" "नहीं, बिल्कुल नहीं।" "आप सदानद वालावलकर को जानते हैं ?" "यह सब आप क्यो पूछकर मेरा समय नष्ट कर रहे हैं। मैं इनमे से किमी एक को नहीं जानता।" अब उस आगंतुक ने जैसे आखिरी तुरुप का पता होता है वैमा एक नाम लिया--"आप एच. आर. को जरूर जानते हैं ?" थाशुतोप चुप हो गया, उमे लगा कि कोई न कोई गहरा खोजी यहां आ पहुचा है। इसमें वचाव मभव नहीं। फिर भी जैसे दूबता तिनके का सहारा लेता है, वैसे मन ही मन उसने सोचा कि इस स्थिति से भी भाग निकला जाये । मागुतोष ने कहा- 'क्या आपको सैठ मगियानी ने भेजा है !' वे एच. आर को जानते हैं।" "मैं तो जयमाता के आश्रम में प्रशासन का काम देखने के लिए आया अन्तेवासी हूँ। आप मुझे तग मत कीजिये।" इतने मे विनीता आ गई। आशुतोप ने कहा-"कैसे-कमे मोग कहां-कहा के नाम लेकर चले आते हैं । सेठ झगियानी भी बड़े हो लोक संग्रही प्राणी हैं । इस पागल को भेज दिया। यह लापता लोगो को गोत्र करता-करता यहा आ पहचा। भाई मेरे, मैं इसे ठीक मे नमसा रहा? कि मेरा अता-पता यह है--मेरा काड ते जायें, चाहें तो। महा आध- स्मिक गाति के लिए भाया है और आप मेरे पीछे पड़े हुए हैं बाई में 'प्रिमिनल' हूं।" वह अजनबी आदमी हमा। उसने आस्वरवाड का एक वाक्य कहा-"एवरी सेंट हैज ए पास्ट, एवरी मिनर हैजा फ्यूचर।" ( . संत का एक भूतकाल होता है, हर पापी का एक भविष्यत्) आशुतोप कहने ही जा रहा था कि मानों कोई दोनों हो तो? इतने में वह आगंतुक विदा लेकर चला गया। 21 दूसरे दिन सवेरे विनीता आशुतोष को नाश्ते पर चलने के लिए बुलाने गई तो देखा-~-कमरा खाली है। केवल एक चिट्ठी वहां रखी थी और उसके नीचे एक डायरी । चिट्ठी में लिखा था-"विनीता, तुम्हें मेरे लिखने में रस था। इस चिट्ठी को अपने पास रखना । यह मेरी पहचान नहीं है, न निशानी है। यह एक सर्वसंग-परित्याग की मंजिल के पथिक का बयान है । टुकड़ों-टुकड़ों में, अटपटा और बेतरतीव । पर शायद इसमें तुम आज के आदमी का चेहरा पहचान सको। मेरी खोज मत करना। आशुतोप ने आत्महत्या कर ली है । और उसका कोई नामोनिशां आसानी से मिलनेवाला नहीं है।" आत्महत्या वाली बात से विनीता डर गई। चिट्ठी और डायरी तो उसने अपने झोले में छिपा ली और हवेली नं02 में हल्ला मचवा दिया कि आशुतोष का कमरा खाली है । वह कहीं चला गया है। एक ही खुशी की वात थी कि उसने आशुतोष का एक फोटो ले लिया था अपने कैमरे से। बहुत पूछताछ की गई। दरवान ने कहा-रात को तो कोई आदमी वहां से गया नहीं। और उसका सामान था ही क्या । दो जोड़ी कपड़े । वे तो ज्यों के त्यों हैं। हो सकता है, वह किसी दोस्त से मिलने गया हो । जयामाता को खबर करा दी गई। उन्होंने रूठ झंगियानी को खवर दी। सेठ ने 'एच० आर०' से कहा । 'एच० आर०' ने ऊपा और प्रशान्त को बुलाया-"तुमने अधीरता से एक आदमी को, जो अपनी चंगुल मे पूरी i02: लापता तरह आ चुका था, इस तरह मे चले जाने दिया। यह ठीक नहीं दिया। इतने बड़े कलकत्ते में, इतनी मारी गाड़ियां छूटती है, दननी यमें जाती हैं । वह फिर फरार हो गया। उने जान पडता है जिंदगी में पोई मोह बचा नहीं है। वह आत्महत्या भी कर सकता है। मही किमी तालाब में फूदकर डूब गया होगा। या किसी पटरी पर किमी रेल के नीचे आ गया होगा । या उसने..." सब बहुत दुखी हुए। कई महीने वीन गये । अपने-अपने काम में सब लग गये । रूपा ने वे चित्र संभालकर रणे थे। वह पुनः अपने पिता के पास चली गयी । प्रशात दिल्ली में फिर अपना विजिनेस देखने लग गया। मीना अघोर भैरव के पास ही थी । उसका याप शायद यही मछुआरे का धंधा करता था और भरार में अपनी जिंदगी की आखरी वूदें निचुटकर एक तरह से धीमे-धीमे आत्महत्या कर रहा था। पीला ने शादी कर ली थी दुवारा । लीला उमके माप ही रोज मिलती थी। जिंदगी बदस्तूर चली जा रही थी। 'एच० आर०' के लिए राव महत्त्वपूर्ण था। शेप सब बेकार थे । गठ अंगियानी महत्वपूर्ण था। 'जपामाता उपयोगी थी। ये मन कटिबदन' थे, 'कनेक्सन' थे। औरों से क्या लेना-देना था। 'एव० भार०' एक महायंत्र को नरह था। सत्ता और मपत्ति और भ्रष्टाचार का मिला-जुला आटोमटान । एक शेयो' । उमकी वला मे कोई जिये या मरे ? आशुनोप और विनीता के क्या कोमल भावनापूर्ण सवध बढ़ रहे थे, या टूटे थे, या डोर उलझनी जाती थी या नहीं-उममे 'एच. आर०' को कोई मतलब नहीं या। समुद्र को उसकी सतह पर गनवोट जा रही है या जान बचाने वाले जहाजियों की नाव---उससे क्या लगाव होता है। उगके लिए मय समान है। क्या शार्क, क्या मोपी । क्या पनडुब्बी, करा मवमैरीन, पया मेर मपाटे कोपानेवाला 'पाट' या माल लादनेवाला बडा जहाज । वह अपना काम करता रहता है । 'एच० आर०'अविलिन भाव में अपनी गंग को बनाये जा रहा था। मानो अच्छे-बुरे में परे- उमको क निश्चिा पहचान पी कि उसको कोई पहचान नहीं थी। उनके अनेक पते थे, चूकि वह ठिराने का आदमी था । आदमी नहीं एक बहुत बड़ा खूखार जानवर था। और वह वेचारा लापता व्यक्ति, एक अदना-सा, छोटा-सा इन्सान अरविंद । उसकी एक अपनी पहचान थी। उसे वह मिटाने में लगा था। जितना वह मिटाने जाता, उतना ही अपनी करनी से ही उसी में उलझते जाता। वह अपने आपसे भागना चाहता था। जंगलों में, समुद्र किनारे, देश में, विदेश में-कहीं उसे शांति नहीं थी। दो साल बीत गये। सव थक गये । लापता लापता ही रहेगा ऐसा सवने मान लिया। सबने उसकी खोज छोड़ दी। पर कहानी यहां खत्म नहीं हुई। 22 . शिमला के पास एक स्कूल में एक मास्टर छोटे-छोटे बच्चों को पढ़ाता और बहुत चुप्पे में एकान्त जिंदगी बिताता था। एक ढावे में वह खाने जाता। कोई नौकर उसने नहीं रखा था। वह पहाड़ी ढंग की टोपी और वैसा ही कुते के ऊपर कोट और चूड़ीदार पायजामा पहनता। उसके कंधे पर एक झोली रहती, उसमें कुछ काग़ज, कुछ कितावें, कुछ पैसे । वह सदा एक वाकिंगस्टिक साथ रखता था। उसका नाम था शिवलाल । मास्टर की बड़ी ख्याति थी। मन लगाकर पढ़ाता था । साहित्य और भाषा उसके प्रिय विषय थे । अंग्रेजी-हिंदी दोनों अच्छी तरह जानता था। पोस्ट आफिस में उसने कुछ पैसे जमा कर रखे थे। उसका कोई संगी- साथी नहीं था। खेलकूद उसे पसंद नहीं थे । कभी-कभार वह शहर चला जाता तो सिनेमा या नाटक देख लेता था। शिमला के आदिवासियों की खोज करने के लिए आये एक विदेशी से उसकी दोस्ती हो गई । वह शिवलाल को 'फिलासफर' कहता था। और 104 : लापता - यह इस विदेशी दिल को 'टूरिस्ट'। दोनों में काफी बातें होती। कई बेकार के विषयों पर । कई एमी जो गहरा मयं रगती यो। दिल शिमला और आसपास के पहाड़ी इलाय के लोगों के धर्म. विश्वासो में शोध कर रहा था, और उसे स्थानीय भाषा समझनेवाला 'दुभाषिया' चाहिए था। यह शिवलाल में उमे मिला। एक दिन बिल 1911 में सी०सी० गावेंट नाम के मंडी राग्य में मेटलमेट आफीसर की कहानी बताने लगा--"चचियोट पिले में एक कामरू नाग का मदिर है। यह पहाड़ी देवता बहुत ही विशिष्ट सिदिवाले माने जाते हैं । वहा किसी शूट को प्रवेश नहीं दिया जाता तोयानी चादी के सिक्के और गहने उस मंदिर के पास के तालाब में फेंकते थे। ताये के सिक्के सब पुजारी रख लेते थे। मैंने सुझाव दिया कि ये पैसे पानी में तालाब के तल में पड़े रहते हैं, इनसे तो अच्छा है कि उन्हें निकाला जाये और किसी अच्छे सामाजिक उपग में लगाया जाये। पर पुजारियो ने इस बात का विरोध किया। कामरू नाग के उपासरो ने भी वडा विरोध किया। मंडी के राजा में विदा लेकर गावट नीचे बाये। रास्ते में बड़ी भारी वर्षा हुई। गायेंट ने कोई पहाड़ी फल सा लिया था। उगम उमे अतिसार हो गया। सब लोगो ने कहा कि यह मय देवता का ही प्रकोप है । उसके चढाये गये चढावे को पानी में मे निकालने का मुनाव यह विदेशी विषमों क्यों देता है ?..." और, "देने तो किसी भी मदिर मे बोडी-सिगरेट पीते हुए पदर जाने नही दिया जाता, पर मडी के पुराने महल में एक बाबाकोट नामक देवता है। उसके पास सदा एक हुक्का जरूर रखा हुआ रहता है। यह देवता धूम्रपान का शौकीन है। यही उपासक और भक्त देवना को प्रसन्न करने के लिए तंबाक चाते हैं। यह विरोधाभाम तुम कसे समझाते हो, फिलामफर?" शिवलाल कुछ मुस्कराये। फिर गंभीरता से बोले-"रिस्ट, सुम भारत की देवता-परंपरा का यह परस्पर विरोधी लगनेवाला धमत्कार नहीं समझ सकोगे ! भारत कई तरह के सूत्रो का वुना एक विशाल पर है। शिव प्राध्य देवता हैं । वे स्वयं विनया का सेवन करते हैं । उन्हें विला का आदमी था । आदमी नहीं एक बहुत बड़ा खूखार जानवर था। और वह वेचारा लापता व्यक्ति, एक अदना-सा, छोटा-सा इन्सान अरविंद । उसकी एक अपनी पहचान थी। उसे वह मिटाने में लगा था। जितना वह मिटाने जाता, उतना ही अपनी करनी से ही उसी में उलझते जाता। वह अपने आपसे भागना चाहता था। जंगलों में, समुद्र किनारे, देश में, विदेश में-कहीं उसे शांति नहीं थी। दो साल बीत गये। सव थक गये। लापता लापता ही रहेगा ऐसा सबने मान लिया। सबने उसकी खोज छोड़ दी। पर कहानी यहां खत्म नहीं हुई। 22 -. शिमला के पास एक स्कूल में एक मास्टर छोटे-छोटे बच्चों को पढ़ाता और बहुत चुप्पे में एकान्त जिंदगी बिताता था। एक ढावे में वह खाने जाता। कोई नौकर उसने नहीं रखा था। वह पहाड़ी ढंग की टोपी और वैसा ही कुर्ते के ऊपर कोट और चूड़ीदार पायजामा पहनता। उसके कंधे पर एक झोली रहती, उसमें कुछ काग़ज़, कुछ कितावें, कुछ पैसे । वह सदा एक वाकिंगस्टिक साथ रखता था। उसका नाम था शिवलाल । मास्टर की बड़ी ख्याति थी। मन लगाकर पढ़ाता था । साहित्य और भापा उसके प्रिय विपय थे । अंग्रेजी-हिंदी दोनों अच्छी तरह जानता था। पोस्ट आफिस में उसने कुछ पैसे जमा कर रखे थे। उसका कोई संगी- साथी नहीं था। खेलकूद उसे पसंद नहीं थे । कभी-कभार वह शहर चला जाता तो सिनेमा या नाटक देख लेता था। शिमला के आदिवासियों की खोज करने के लिए आये एक विदेशी से उसकी दोस्ती हो गई । वह शिवलाल को 'फिलासफर' कहता था। और 104 : लापता यह इस विदेशी विल को 'टूरिस्ट'। दोनो में काफी बातें होती। कई बेकार के विषयों पर। कई ऐमो जो गहरा अयं गरती थी। दिल शिमला और आसपास के पहाड़ी इलाके के लोगों के धर्म- विश्वासों में शोध कर रहा था, और उसे स्थानीय भाषा समझनेवासा 'दुभापिया' चाहिए था। यह शिवलाल में उमे मिला। एक दिन चिल 1911 में सी०सी० गावेट नाम के मंडी राज्य के मेटलमेट आफीसर की कहानी बताने लगा-"यचियोट जिले से एक कामरू नाग का मंदिर है । यह पहाड़ी देवता वहत ही विशिष्ट सिद्धि याले माने जाते हैं। वहा किसी शूद्र को प्रवेश नहीं दिया जाता। तीर्थयात्री चांदी के सिक्के और गहने उस मदिर के पास के तालाब में फेंकते थे। ताये के सिक्के सब पुजारी रख लेते थे। मैंने सुझाव दिया कि ये पैसे पानी में तालाब के तल मे पढे रहते हैं, इनसे तो अच्छा है कि उन्हें निकाला जाये और किमी अच्छे सामाजिक उपगेग में लगाया जामे । पर पुजारियों ने इस बात का विरोध किया। कामरू नाग के उपासकों ने भी बड़ा विरोध किया। मंडी के राजा से विदा लेकर गावेट नीचे आये। रास्ते में बड़ी भारी वर्षा हुई। गाट ने कोई पहाडी फल सालिया था। उगमे उमे अतिसार हो गया। सब लोगो ने कहा कि यह मव देवता का ही प्रकोप है । उसके चढाये गये वदावे को पानी में में निकालने का मुझाव यह विदेशी विधर्मी क्यो देता है ?..." मौर, "वने तो किसी भी मदिर में धीही-सिगरेट पीते हुए पदर जाने नहीं दिया जाता, पर मही के पुराने महल में एक बाबाकोट नामक देवना है। उसके पाम मदा एक हुक्का जरूर रखा हुभा रहता है । यह देवता धूम्रपान का शौकीन है। यहां उपामक और भक्त देवता को प्रसन्न करने के लिए तंबाकू चढाते हैं। यह विरोधाभाग तुम कसे समझाते हो, फिलासफर ?" शिवलास कुछ मुस्कराये। फिर गभीरता से बोले-"रिस्ट, तुम भारत को देवता-परंपरा का यह परस्पर विरोधी लगनेवाला चमत्कार नहीं समझ मकोगे ! भारत कई तरह के सूत्रों का चुना एक विशाल पट है। शिव प्राच्य देवता हैं । वे स्वयं विजया का सेवन करते हैं । उन्हें विपला -- , धतूरे का फूल चढ़ाया जाता है । वह गले में हलाहल धारण करते हैं। अर्थ देवता मालायें. यह रुद्र मूर्ति, यह 'शिश्नदेवता' जिसकी वैदिकों ने निंदा की थी, समाहित कर लिया गया। धीरे-धीरे शिवोपनिषद् और शिवपुराण लिखे जाने लगे।" "लेकिन ये सिक्के ? यह देवताओं को चढ़ाया जाने वाला सोना, चांदी, आभूपण? क्या देवता यह सव चाहते हैं ? या यह सब पुरोहितों की चालाकी है ?" "ऐसा है विल, जिसे हम सर्वश्रेष्ठ, सर्वाधिक प्रिय मानते हैं, उसके आगे सबसे मूल्यवान धातुएं-सोना और चांदी, हीरे और जवाहरात क्या हैं ? क्या इन जड़ वस्तुओं से अधिक मूल्यवान कोई वस्तु जीवन में नहीं है, जिसे ये सब चढ़ाये जा सकें।" "तुम्हारे इस शिव के नाम भी अजीब-अजीव हैं। यह पंचानन या पांच सिरों वाला क्यों बताया जाता है । तीन आंखों और सप्तमातृकाओं या, नवमातृकाओं में यह विषम संख्याओं का क्यों विधान है ? नवरात्र और पंचमी और सप्तमी की पूजाओं का विधान क्यों ?" "मैं ज्यादा नहीं जानता टूरिस्ट । पर आदिम मनुष्य को पांच तत्त्व बहुत भय-विस्मय में डालते रहे हैं। उसे दो हाथ, दो कान, दो आंखें, दो ओंठ, दो पांव समझ में आते रहे हैं, पर यह तीन क्या हैं ? तीन तिगाड़े वात विगाड़े ! 'प्रयाणां धूर्तानां 'न गच्छयेत् 'ब्राह्मणत्रयम्' 'त्रिकाष्ठम् 7तिगड्डम 7तिकड़म; न तीन में, न तेरह में; तीन-पांच मत करो- पचासों ऐसे त्रिशूल हैं । पाँच भी जुड़ जायें तो पंचायत है, पांच उंगलियां हैं, पंच फ़ैसला है, भूत को भगाने का पंचाक्षरी मंत्र है । पर न जुड़े तो 'पांचक' है..." बिल ने बताया। "पंचनियाकारी शिव के सृष्टि, पालन, संहार, निग्रह, अनुग्रह पांच शक्तियां या प्रक्रियाएं बताई गई हैं। शिव जोगी है, हाथी की खाल ओढ़ता है.--कृत्तिवास है; गजसंहार है । वहीं कालसंहार है, शिख रेश्वर है, पशुपति है, मिक्षाटन मूर्ति है। लाहौल के आदिवासियों में लिंग और सर्प की पूजा बहुत सामान्य - - -- , 106:लापता है। लिगाकार पत्यर को मक्खन या तेल से धूपड़कर हर गांव के मदिर के बाहर रखा जाता है । सश शिवपूजक थे। केदारनाप का मंदिर मशिया है। पहाड़ो में शिवमंदिरों के पुजारी ब्राह्मण होना जरूरी नहीं। "शिव के साथ-साथ देवी की पूजा भी पहाड़ों में बहुत प्रचलित है । देवी दुःख, रोग, विघ्नी को दूर करती है। वही दोनला और मरी माई कहलाती है। वहीं शक्ति है, मुवनेश्वरी है । कुमारस्वामी ने प्रवृति के 'कलाये रूपांतरण' में कहा कि वह 'नये सूर्योदय जैसी' लावण्यमयी विजया, प्रार्थना के दोषों को हरण करनेवाली, चमचमाते मुहट को और कर्णाभूषणों को धारण करने वाली है । वह परम उदार और धन्य-धान्य समृद्धि देनेवाली आदि जननी है।" "महिषासुर का डर सारे पहाड में ऐसा छाया है कि गुरसा भी में में की बलि देते हैं । कुल्लू के दशहरे मे पहले ऐसी ही अलि पढाई जाती थी। मंडी जिले के फरसोग तहसील में काओ गांव में हर माल एक मेला होता है जिसमे मैंमा बलि में दिया जाता है । वगी या अठवार उत्सव में जुलाई महीने में, गठचाल मे भैसे को एक झटके में नहीं मारते। उमे जरूमी करके छुट्टा छोड़ देते हैं । गांव वाले लोग उसे बल्तम और भालो से मारते हैं । उसका जो खून सेतों में छिटकता है, उसे यहां के आदिवामी गेनों के उपजाऊ बनने का वरदान मानते हैं । उस भैस को पहला वार करने- वाला बहुत भाग्यवान माना जाता है। उन लोगो में इसके लिए अगडे होते हैं। "शिमला में कोटगढ़ के पास कई चट्टानो पर शिवशक्ति के चिह्न अकित हैं । कुल्लू मनाली, माहौल और लद्दास तक वे फैन हैं। नवरात्र में हर दिन नये कुमारी की पूजा होती है। कुछ लोगों में ललितापंचमी को पांच कुमारिकाओं की पूजा होती है "बसे पहाडो में नवदुर्गा के हर दिन नये-नये नाम होते हैं। पहले दिन मधु-कैटभ को मारनेवाली महाकाली, दूसरे दिन महिषासुरमर्दिनी, तीसरे दिन चंडमुंड को मारनेवाली चामुडा। चौथे दिन रक्तबीज मा रक्त पूमने याली काली । पांचवें दिन नदा, जो योगमाया बनी। दिन रक्तदती। लोगों को मकाल से बचाती है वह मान दिन । आठवें दिन दुर्गा, अहण । मापता:107 राक्षस का नाश करनेवाली लाभ्रमरी नौवें दिन । दसवें दिन दशहरा। अप्टमी को उपवास और बड़े भोज होते हैं। उसी दिन बड़ी बलि भी दी जाती है। . - . "जैसे शिवशक्ति का, वैसे ही पहाड़ों में सांप पूजा का बड़ा माहात्म्य है। शेप, तक्षक, वासुकी, वज्र, दंशन, करकोटक, केम्मली, शंखू, कली उसके नाम हैं। सर्पराज को दूध, मधु और बकरे चढ़ाये जाते हैं । किन्नर, किरान और नागों की यह भूमि । नाग पहले जल देवता रही होगी। पीपल के चौतरे के पास उसका निवास है। मंडी के पास नागाचल का मंदिर है। रिवलसर तालाव में भी उसके बारे में ऐसा ही मिथक है। कामरू नाग सरोवर के पास एक ऐसा ही मंदिर है । श्रावण शुक्ल पंचमी को नाग देवता की पूजा होती है। कश्यप की पत्नी कद्रु से पैदा हुई ये संतानें । इस विरूरी पंचमी को शिव की पूजा की जाती है। जिसके सिर पर कई नागों का मुकुट होता है। दीवारों पर पांच, सात या नौ नाग बनाते हैं । मंडी और कांगड़ा में सफेद चूने से गोवर-लीपी दीवारों पर बनाते हैं, तो गढ़वाल में चंदन या हल्दी से। यहां धूप जलाया जाता है और भुने हुए चने चढ़ाये जाते हैं। इस नागपंचमी के दिन हल चलाना मना है। दीवाली के बाद की नाग-पूजा में गोवर से बना एक नाग पूजा जाता है। उस पूजा के दिन अगर कोई सांप आ गया तो उसे 'निउगरा' कहते हैं, और उसे अपशकुनी माना जाता है और मार दिया जाता है। कामरू नाग की नाचन में पत्थर की मूर्ति है और मंडी में सनोरवादी में एक मंदिर है। शिमला और सिरमौर में 'महुन' नाग को बड़े मादरसे पूजा जाता है । सोलंगवादी, ऊपरी विआसवादी, सर्वरीवादी, वज़ीरी-रूपी, सराज जैसे कुल्लू की जगहों में असंख्य नाग-मंदिर हैं। दरवाजे, देहरी आदि पर नाग उत्कीर्ण है, पत्थरों में, लकड़ी में, लकड़ी पर लोहे के बने नाग कीलों से ठुके हैं। कश्मीर में 'अरव वन' में कई नाग-पूजक पहुंचते थे। कुगूरी गांव के पास चंवा में, केलांग नाग का मंदिर है। इस नाग ने वहां एक जगह दिखाई थी, जहां खोदने पर चश्मा निकल आया था और लोग अकाल से बच गये थे। चंवा के राजा रामसिंह ने एक अष्टधातु की नाग प्रतिमा वहां लगवाई। - 108:लापता - "नाग से ही संबंधित है गुग्गा-पूजा । कांगड़ा, मंत्री, विमामपुर के जोगी, नाथ मोर गारुडो 'गुग्गा' को देवता मानते हैं । यह गुग्गा पोई पर बैठा होता है । ज्वालामुखी से देहरा जाते हुए ध्वाला गांव में एक प्रगिस गुग्गा प्रतिमा है। वह बिना सिर के सडता जाता था, ऐगी आख्यायिका है । देवराज नामक राजपूत राजा की दो रानी थी बचना और फचला। उन्हें वच्चा नहीं होता था । सो बचप्ला गोरपनाय के मंदिर गई । उन्होंने कहा, अगली बार आना तो वरदान दूगा । कचला ने यह बात सुनकर चचला का रूप ले लिया और पहुंच गई। गोरखनाय ने एक फल उसे दिया । दूसरे दिन घचला पहुंची। गोरख ने उसे भी फल दिया । यचला ने भाधा फल पाया। आधा अपनी घोडी को दिया । कचना को लडको हुई गुग्गी और बचला को पुत्र हुआ गुग्गा"" ऐमी कितनी कहानियां विल ने घूम-घूमकर जमा की थी। शिवलाल उस विदेशी की यह अद्भुत लगन, संस्कृति के आदिम सोतो फे अध्ययन के प्रति निष्ठा देखकर-चकित हो जाता था। बिल के पाम कई साधन थे टेपरेकाहर, कैमरे और क्या-क्या नये साधन ! शिवलाल और बिल में कभी-कभी इस बात पर बहुत बहम भी हो जाती थी। "विल, तुम हमारे देश के अविश्वाम मोर प्राचीन जादू-टोने, ओझाइती में इतनी रुचि क्यों लेते हो? क्या तुम्हारा यह कहना है कि भारत एक बहुत पिछड़ा हुआ देश है ?" "किसी चीज में विश्वास या अविश्वाग मे ही कोई देश पिछडा हमा की हो जाता है। हम सिर्फ यह वह रहे हैं कि तुम्हारे देश की राज्यना बहुत पुरानी है।" "गवगे पहले तो यहा आयं आये, या बमते थे पहले मे ही।" "नहीं, सबसे पहले यहां आदिवामी थे। फिर दाविह लोग आये। इन सब अनापों के बाद आर्य।" "पर आर्य सस्कृति ने इन सबको अपने मदरसमो लिया।" "उन्हें नष्ट करने की कोशिश की। उनकी पहचान मिटा दो।" "क्या ये दोनों बातें एक ही हैं ? तुम आर्यों को प्रात्रामक और दूमरों .. की अरिमता को खा जानेवाला कह रहे हो।" "मैं नहीं कह रहा हूं। इतिहास यह बताता है। किसी समय मत्स्य, कूर्म, वराट, सिंह किसी-किसी जाति के बड़े प्रतीक थे। बाद में उन्हें अवतार बना दिया। उनके आसपास पुराण वुन लिये गये।" "नहीं विल, तुम हिंदू नहीं हो, इसलिए इस सर्वग्राहिता को समझ नहीं पा रहे हो । यह कितनी विशाल और विश्वव्यापिनी दृष्टि थी।" "क्या अपनी पहचान खो देना कोई भी पसंद करता है।" "क्यों नहीं? वच्चा बच्चा नहीं बना रहता । नौजवान नौजवान नहीं बना रहता। बूढ़ा सदा बूढ़ा नहीं रहता तो क्या एक अवस्था दूसरे की पहचान को मिटाने का क्रम है या विकास का?" "बचपन का भोलापन तो खो ही जाता है, इस क्रम में। जवानी का जोश भी ज्यों का त्यों नहीं बना रहता । तो यह कालक्रम से होने वाले नैसर्गिक परिवर्तन हैं। पर यहां जान-बूझकर आपने-औरों की मान्यताओं पर अपनी मान्यता का आरोप किया। कलम लगाया।" . "क्या, योरोप और अमरीका में ऐसा नहीं होता?" "वहां एक पौधा उखाड़कर दूसरा लगाया जाता है। यहां तो पौधे का रूप ही बदल दिया जाता है। रंग ही बदल दिया जाता है। मैंने सुना रवींद्रनाथ ने शांतिनिकेतन में आपके पेड़ की एक लता बनाने का यत्न किया। "हिन्दू रूपांतरण नहीं, कई संस्कृतियों का एक संगम स्थल है। एक समुद्र है, जिसमें कई नदियां आकर मिलती हैं । एक बड़ा पुराना पहाड़ है, जिस पर बर्फ जमा चला जाता है...'जमा चला जाता है।" है 110 : लापता 23 विनीता के पाम बचा था आशुनोप का एक फोटो और वह डायरी। डायरी में ममुद्र के साथ-साय हिमालय पर भी बहुत-मी मामग्री जमा पी। विनीता जयामाता के उस आश्रम में काम करते-करते एक दिन यह विचार करने लगी कि हो सकता है यह हिमालय की ओर चला गया हो। हिमालय लोगों की पहचान को छिपाने का बहुत अच्छा स्थान हो सकता है । और उसे ही कई लोग आत्म-ज्ञान की प्राप्ति के लिए पनते हैं। तो क्या आशुतोप किसी तीर्थस्थान में गया होगा? हरिद्वार, पिकैश, बद्रीनाथ, केदारेश्वर या अन्य कोई स्थान? मही नहीं ! आशुतोष के मन में सठित, सस्पावादी धर्म के प्रति कोई श्रद्धा नही थी। वह जयामाता के आश्रम में भी इम सारे दोग-धतूरे में बहुत बचता था, दवा जबान से उसकी निंदा भी करता था। चमत्कार मे उगका कोई विश्वास नही पा । वह किमी मिदिया शक्ति को शीघ्र प्राप्ति में भी नहीं जुटा था, तो फिर वह कहा गया होगा ? हिमालय मे ? अलमोडा? नैनीताल? मसूरी? देहरादून या दाजिलिंग, कसियाग, कलिड्पोइ, या नेपाल की मोमा पर, या तिब्बत की ओर?... हिमालय इतना वहा है। उसमें एक छोटे में मानव प्राणी का क्या ठिकाना है? उसकी हापरी में निकोलस रोरिक के बारे में बहुत-मो बातें लिम्बी हुई थी । उसे चित्रकला से प्रेम पा ही। डायरी में लिखा था- लापता: 111 . - - . । "निकोलस रोरिक रूस में सेंट पीटर्सवर्ग में 9अक्टूबर, 1874 को पैदा हुआ। वह वहीं एकेडेमी आफ आर्ट में, फैकल्टी आफ ला और इंस्टिट्यूट आफ आकिपालोजी में पढ़ने को भरती हुआ और उसने जमकर अध्ययन किया। विदेशों में भी वह आगे पढ़ने के लिए गया । रूस, योरोप, मध्य- एशिया, मंगोलिया, तिव्वत, चीन, जापान का उसने भ्रमण किया। पर कहीं शांति नही मिली । अंत में वह भारत में आया और यहीं बस गया। चौवन वरम की उम्र में उसने 1928 में पहली बार हिमालय देखा। और उन नगाधिराज के विराट सौंदर्य और गरिमा ने उसे कीलित कर दिया। वह आजीवन उस भव्यता और दिव्यता को कलम और कूची से आंकने की कोशिश करता रहा। हजारों बड़े-बड़े चित्र उसने बनाये । पर उनसे अघाया नहीं। रोरिक ने लिखा-"विश्व में ऐसा प्रकाश, ऐसी आध्यात्मिक तृप्ति और कहीं नहीं है। जैसी हिमालय के इन मूल्यवान हिमख डों मे है. यह भारत का मुकुटमणि है। इसकी महानता का संदेश मैं विश्व को दे रहा हूं।" कुल्लू की वादी में उसने जीवन के अंतिम बीस वर्ष बिताये । हिमालय की अनन्तता और अतुलनीयता से मोहित ऋपि रोरिक उसी के मनन और चिन्तन, उगी के निदिध्यास और साधना में डूब गया। यहीं उसने अपनी वे अमर कृतियां चित्रित की, जिनके नाम दिये, स्मरण करो-जीवन की बूदें, संघर्ष के मोती, मैत्रेय के चिह्न, पूर्व की । पताकाएं, तिब्बत के किले, आखिरी देवदूत, शुभ शकुन, मानवी कर्म, शापित नगर, अद्भुत आलोक, सांपों का नगर-~-जैसे पुराने चित्र जो प्रथम महायुद्ध से प्रभावित थे, वे पीछे छुट गये । अब रोरिक बनाने लगे-~संत सेगिमस, गांवटा प्रोटेक्टरिकम, संत जैसे भूत, बुद्ध-दाता, रिग्देन ज्येपो का प्रादेश, श्रीकृष्ण, कल्कि अवतार आदि । वह सत्-चित्, आनंद की उपासना में डूब गये। रोरिक ने कितनी सारी किताबें लिखी। 1914 में उनकी सम्पूर्ण रचनावली छपी थी। पर बाद में मोर्या के फूल (1921), सुदृढ़ (1925) मटले हिमालय (1929), आशीर्वाद के पथ (1929) प्रकाश का राज्य (1929), एशिया का हृदय (1929), शांथाला (1930), आग का दुर्ग . - 112: लापता (1933), भविष्य के द्वार (1936), संदर एकता(1946). हिमालय- प्रकाशक आवास (1947), हिमवेत (1947) प्रसिद्ध हैं। (कविनाएं) रहस्यवाद पर लेप, विश्वशांति का प्रचार क्तिने-कितने विषय है । कुल्लू में उसकी ममाधि है । उम पर लिखा है-- "13 दिसंबर, 1947 में निकोलम रोरिक, भारत के महान रूमी मित्र को यहाँ दफनाया गया।" उमी समय में नई दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू ने उनके चित्रों की बड़ी प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए उन्हें अपनी अदा अपित की थी। 1920 मे रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने सदन में उन्हें पत्र लिपा---'तुम्हारे 'चित्रों ने मुझे बहुत अन्तस्तल तक छू लिया है।' गोर्की ने कहा कि वह सबमे व अन्तर्दशीय (हरियुनिस्ट) ।" उन्होने सात हजार से ऊपर चित्र बनाये। उनमे में कुछ ही संग्रहालयों में हैं। पता नहीं क्यों विनीता को लगा कि हो-न-हो, आशुतोष इमी महर्षि की तलाश में गया होगा। उसकी डायरी में यही अतिम पृष्ठ थे-रोगिक कधारे मे... विनीता भी कुल्लू पहची-कैमरा लेकर। दशहरा की छुट्टियों में। वहां प्रवास मे उसको भेंट एक नवयुवर में हो गयी। वह भी मयोग की बात है। वह राजनैतिक कार्यकर्ता था। उसने अपना नाम पामरेड वंशीलाल बनाया । वह शिमला के बुलियों की यूनियन का काम करता या। पढ़ा-लिखा था और बहुत समर्पित आदर्शवादी जान पडा। विनीता ने उसमे धर्म पर वहम करना व्ययं समझा। पर राजनीति के बारे में उसके मन में कई शकाए "आपने रोरिक का नाम सुना है ?" "क्यो नही ? वडे आटिस्ट थे।" "रूसी थे। भारत-प्रेमी थे। वे रूल लौटकर क्यो नही गरें।" "यह तो उनकी मर्जी की बात है । पर मुझे लगता है वे जवाहरलात पी। उसने पूछा '. नेहरू के मित्र थे। उन्होंने विश्वशांति के लिए बड़ा काम किया।" "क्या आपको उनके चित्रों से आध्यात्मिक शांति नहीं मिलती?" "आपकी भाषा हमारी भापा से नहीं मिलती-जुलती। हम ऐसी आत्मा और शांति में विश्वास नहीं करते, जिसमें लाखों-करोड़ों भूखे-नंगे तड़प रहे हों और भाप अपनी आसपास की दुनिया से आंखें मूंदे हुए हों। यह शुद्ध पलायनवाद है।" "क्या आदमी सिर्फ पेट है, और जानवर है ?" "सबसे पहले वह यही है।" "आपने आदिवासियों को नाचते-गाते देखा है, सुना है ? वे चित्र बनाते हैं । खुश रहते हैं, अधनंगे रहकर भी।" "वह प्रकृति के साथ एकाकार हैं, या दूसरे शब्दों में हमारी तथाकथित सभ्यता से कटे हुए और दूर हैं।" "पर औद्योगिक नगरों में, यंत्र सभ्यता ने आदमी को क्या ज्यादा सुख दिया है ?" "यह वहसतलव बात है। पर इतना सच है कि भारत की आज की हालत में मुझे कोई रास्ता नहीं नजर आता, सिवा क्रांति के~" "क्यों ?" "कोई भी पैसेवाला अपनी पूंजी गरीवों में बांटकर देना नहीं चाहता वह परोपकार के नाम पर मंदिर बनवा देता है। लग्गी से पानी पिलाना चाहता है।" "पर यह काम तो नेताओं का है। वे आर्थिक वितरण ठीक से करें। वे गरीबी हटाने का उपाय करें । उचित वैज्ञानिक शिक्षा दें।" "नेता कहां से आते हैं ? किस वर्ग से आते हैं ?" "क्यों? बहुत से नेता बहुत गरीब तबके से आगे आये । लालवहादुर शास्त्री या आवेडकर, पी० सी० जोशी या जगजीवनराम, शेख अब्दुल्ला या मातंगिनी हाजरा क्या बहुत अमीर घर से आये थे।" "सवाल इस बात का नहीं है कि उनके पिता या प्रपिता गरीव थे. या अमीर । सवाल इसका है कि वे किस वर्ग का हित साध्य करते हैं।' विनीता ने देखा कि इस आदमी से बहस का कोई फायदा नहीं है ।। 114:लापता
वह पूम फिरकर उसी मूल स्वर पर आ जाता है तो उसने विषयांवर
किया-
"काहिए, वंशीलालजी, यहां आदिवामियों में भी अन्य कोई माम
करते हैं ?'
"हम पाहरी मजदूरी में काम करते हैं । होटल के कर्मचारी, छोटे
किरानी या क्लर्क, मास्टर सब मे हम यूनियन बनाना चाहते हैं...।"
"विचार तो अच्छा है । पर अभी तो मैं यहां के आदिवागियों के बारे
में जानना चाहती थी।"
"हा, एक अमेरिकन स्कालर आया था। यह शिमला के आमपारा
कई जंगली वस्तियों में गया । आप उससे मिलिये।"
"कहां रहते हैं वे ?"
"शिमला के कालंटन होटल में।"
"अच्छा, मैं जाऊंगी।"
विनीता कार्लटन होटल पहुंची तो विल हिमालय मी लोकाथाओं
और लोकगीतो मे डूबे हुए थे।
विनीता के पास कैमरा देखकर उन्होंने पूछा- "आपको भी
फोटोग्राफी का शौक है ?"
"हां।"
"और क्या शौक है ?"
"मुझे लोकगीत और लोककथाएं बहुत अच्छी लगती हैं।"
"तो आपके पास समय है ?"
"क्यों ?"
"मैं ये दो गीत और दो कहानिया जो पहाडों से प्राप्त हुई है, गुनाता
हूं। इसका अर्थ मैंने अग्रेजी में ठीक किया है या नहीं, यह आप देगें।
में भारतीयों की भावनाओ को दुसाना नहीं चाहता।"
दिल ने सुनाना शुरू किया। पहला गीत पिलर जाति का
भिएणी-गीत है-
बोगो लामा संगामा, शूम कौशाग दुखी दोम्याता मुमी
मनरिंगरन घोहक भूरे, बोन-यूगस घोहक बागे
सापता: US
जालू कोयों परायो विभांतंगामग, शूम वौशांग सुखी दोम्याता दुखी घोरवववोन धन्धेलामीक, सारेजन उसने अर्थ पढ़कर सुनाया- "अगर भिक्षुणी बनोगी तो तीन साल तक दुख अवश्य उठाना पड़ेगा। उसके बाद तो पांचों उंगलियों धीमे हैं। नारी जाति में भी तुम्हारा बड़ा मान होगा, लोक में आदर होगा। लोग तुम्हारे चरणों में शीश नवायेंगे।" "और अगर शादी करोगी तो तीन साल तो अवश्य सुखी जीवन काटोगी। उसके बाद गृहस्थ जीवन में फंसकर अपना सुख मूल जाओगी।" विनीता ने कहा-"कितनी बढ़िया वात कर दी है । त्याग और योग का सार चार पंक्तियों में निचोड़कर रख दिया। वाह ! विल ने कहा--"एक और गीत सुनो । प्रेम की महिमा का गीत है। यह भी किन्नर-देश की जनजाति का गीत है- जूमिंग संगियू तंगेस, रंगदानि चलशे रंगदानि वास्क्यड दानि लि मेदान दानिली मेदान जंगल लि मंगल जंगल लि मंगल थारंग लि तिथंड वारंग लि तिथंड, न्यातउ लि कुलंड न्यानउ लि कुलड, कुलड लि वायु आफर वास्क्यड छिरप फारक दुग्यो।" इसका अर्थ है -- "नायिका अपने प्रिय से मिलने जाती है तो रास्ते में अनेक विरोध का जो अवरोध का कार्य करते हैं शांत और बौने हो जाते हैं । बड़े-बड़े पहाड़ टीले वन जाते हैं, उनकी ऊँचाइयां झुक जाती हैं; जंगल में मंगल की संभावना बढ़ जाती है और घर में मंदिर तथा नदियां छोटे तालाव का रूप धारण कर लेती हैं । मिलन-प्रसंग में अवरोध के क्षण टलते चले जाते हैं।" विनीता ने कहा-"अभी तो मुझे जाना है। कल फिर आऊंगी तो और विस्तार से बातें करूंगी।" 116: लापता जाते-जाते उसरा ध्यान टेरस पर रिस ये साप एक भासोरपित के फोटो की ओर गया और यह ठिठक गई। उसने पूछा-यह मारो साय कौन है ? "मास्टर शिवलाल है।" "मास्टर शिवलाल कोन?" "वही हमारी सहायता करने वाला दुभाषिया है। मत होशियार नौजवान है। बहुत दुनिया घूमा हुआ है । अप्रेजी भी माती जाना है।" विनीता को फोटो देखकर उस पेहरे मे भागुतोष का भाभारा भा। शिवलाल कही आगुतोप ही तो नहीं। उसने से किया कि मगसी मार पर इस बात का पक्का पता लगायेगी। विनीता दूसरे दिन बिल के पास आई तो अपने काप गेनोपा हुआ आशुतोप का फोटो भी ले आई। पहले तो उसे बिल से दो पहाडी लोककथाएं सुननी पड़ी। भयकी बार वह तुलनात्मक रूप से हिमालय मे मसी अन्य जनजातियो, जो त 'कागलेहरोल' (लोककथाओ) में गे दो कहानियां पनी: खुमन नामक स्थान में पुमन गौगया अमीषा नाममा व्यक्ति रहता था। वह सुन्दर युवा था और अपनी ताकत के लिए गाहूर पा । पर एक छोटी-सी पुष्करिणी का मालिक था। एक दिन उगने देगा कि पूरिणी का जल गन्दा हो गया है। उसके पश्चात् कई दिनों तक क्रमसः उगने देसा कि पुष्करिणी या जल घरावर रात के समय गन्दा हो जाता है। वह बहुत ऋद हुआ और गन्दा करने वाले को पति की उसने सोची। एक रात को झाडियों के पी पिकर उगने परिणी पर दृष्टि रखी। अर्धरात्रि को उमने देखा कि मामागे गा मोई' या परियां उड़ती हुई आई और उन्होंने पुष्परिणी में उमरकर तरला और खेलना शुरू किया। यह माडियों के पीछे गे दौडताहमा मापा मोर गाने एक 'हेलोई को पकड़ लिया। परियो ने बड़ी बिनतियों की, मनुहार की, गारपि छोड़ दे। पर अचौवा नहीं माना । तव परियों ने कहा कि परी को छोड़ देने के बदले में वह जो चाहे उसे वे देने को तैयार हैं। अचीवा ने कहा कि वह सबसे छोटी और सुन्दर हैलोई या परी से विवाह करने पर ही अन्य परियों को छोड़ सकता है। परियां इस पर राजी हो गयीं और उन्होंने आशीर्वाद दिया कि हैलोई से विवाह कर वह सौ वर्ष तक जियेगा। अब अचौवा का कुछ समय तो सुख से बीता पर परी तो परी होती है। वह अपनी पादत से बाज नहीं आती थी। वह मनुष्य जीवन की परिधि में नहीं रह सकती थी ! जव अचौवा काम से लौटता तो वह परी को खेलती, गाती या वादलों के साथ उड़ती हुई पाता था । परी से उसने अनुरोध किया कि वह साधारण मनुष्यों की तरह रहे, पर वह नहीं मानती । थी। . - एक दिन वह घर छोड़कर जाने लगा कि उसने परी से विवाह करके बहुत बड़ी भूल की है। उसने अपने घर का परित्याग किया और वह किसी अनजान स्थान पर चला गया। सौ साल पूरे नहीं हुए थे। इसलिए परी ने उसे बहुत ढूंढा, पर वह अचीवा को कहीं नहीं पा सकी । इसलिए वह पुनर्जन्म की प्रतीक्षा करने लगी। "वाद में उसका जन्म पुरैम्बा नाम से हुआ और उसकी पत्नी वही 'परी न्यांग खारीमा वनी?" बिल ने टिप्पणी की-"क्या वढ़िया रूपक है मनुष्य का आदर्शो के 'पीछे जन्म-जन्मान्तर भागने का । वह सदा दुखी ही रहता है।" विनीता ने कहा - "मनुष्य के असमाधान का कारण आपके आदर्श 'नहीं, बल्कि उनकी अपूर्णता है।" "जो भी हो वह परियों के पीछे सदा से भागता आ रहा है, और यह पाता है कि वह पुरूरवा या लेडा के पीछे भागने वाले नायक की तरह अकेला ही है और वैसा ही रहेगा।" विनीता-"और उस स्त्री को भी तो यही लगता होगा। वह देवता जिसे समझी थी, वह मिट्टी का पुतला निकला।" विल जोर से हंस पड़ा और इस तरह की एक और बच्चों के लिए मैतेई लोक-कथा सुनाई, जिसमें आदमी. और वन्दर दोनों की चतु- 118: लापता राई का, अपने-आपको एक-दूमरे में अधिक चतुर ममाने का विस्मा था- "एक बार एक वृद्ध दम्पति अपने सेत में अरवी बो रहे थे। इतने में कुछ बन्दर आये। उन्होंने कहा कि अरवी बोने की ऐमी विधि उन्हें बतायेंगे जिममे अरवी को फमल शीघ्र और अच्छी हो । वृद्ध दम्मति राजी हो गये। बन्दरी ने उन्हें बताया कि अरवी के धौज फे कार पाले हिस्मे को जमीन के कार गाड़ा जाये और पत्ते वाले भाग को जमीन के नीचे । कृपक दम्पत्ति ने ऐमा ही किया। रात में बन्दरों में जमीन के ऊपर निकले अरबी के पत्तों को साडाला और जगली अरवी पतों को उनके स्थान पर गाड़ दिया। मुबह कृपक दम्पति अरवी के पत्तों को इतना जल्दी बढा हुआ देखकर बहुत आनन्दित हुआ। उन्होंने बन्दरों को सवक सिसाने की सोची। कृपक कपड़ा ओढ़कर हाय में डंडा लेकर लेट गया और उमकी पत्नी चिल्ला-चिल्लाकर रोने लगी। यह पहने लगी-- - 'पाहन साडना मिकिया, नाइटेन चाडमा हल्ला अर्थात् 'अरवी वाकर मर गया। कुछ साकर जीवित हो जा'। "मैतेई लोग मानते हैं कि कद्दू खाने मे की खुजली दूर हो जाती है।) उमका रोना मुनकर बन्दर फिर आ गये । उन्होंने बुद्धिया को टाइम संघाया कि वे युद्ध का दाहकर्म करायेंगे। ये ज्यों ही वृद्ध को उठाने सगे कि वह अचानक उठ खडा हुमा और उमने हडी मे बन्दरों की बन्छी पिटाई की।" विनीता हंस पड़ी। सब जगह मनुष्य की चतुराई किस तरह से काम आती है। हमारे लोक-माहित्य में कितना कुछ इस बारे मे लिसा भरा पड़ा है। फिर उसने गिवलाल के बारे में जानना चाहा । बिल ने बताया कि हो, वह उसे ले जायेगा और मिलायेगा। शिवलाल को भी पहाड़ी सौगों के धार्मिक विश्वामी के बारे में शोध करने में बड़ी रचि है। विनीता ने पूछा- "क्या शिवलाल ने अपने पूर्व जीवन के गरे में कुछ बताया? - विल वोला-"नहीं।' विनीता--"आपने जानने का यत्ल भी नहीं किया ।" विल-"हम किसी के निजी जीवन को ज्यादा नहीं जानना चाहते। अपना-अपना जीवन है। कोई छिपाना चाहता है, कोई खोलकर बताना।" विनीता- "यह भी ठीक ही है।' "विल-"पर आपकी उसमें दिलचस्पी क्यों है ?" विनीता--"मुझे लगता है कि वह मेरा परिचित है।" विल-"सो कैसे?" विनीता--"उसका चेहरा बहुत कुछ मेरे एक परिचित से मिलता- । -- जुलता है।" बिल---"कई बार दो चेहरे बहुत एक-से होते हैं।" विनीता--"अच्छा ? पर मैं गलती नहीं कर सकती । मेरे पास यह छायाचित्र है। देखिये।" विल ने इस चित्र को उसके कमरे में रखे चित्र से मिलाया और काफी समानता दिखाई दी। हां, मूंछे जो उसने उस समय रखी थीं वे वहां । नहीं थीं। यह त हुआ कि दूसरे दिन विल उसे शिवलाल के पास ले जायेगा। वह जब पहुंचे तब शिवलाल के साथ कामरेड वंशीलाल बैठा था। बिल हमेशा सोचता था कि दोनों में क्या समानता है ? क्यों दोनों इतना तर्क करते हैं ? कामरेड वंशीलाल मार्सवादी हैं। मजदूरों के नेता हैं। उन्हें आदिवासियों के धर्म-विश्वासों से कोई मतलब नहीं। दिल उसी की खोज करता है और उसके लिए वह शिवलाल की दुभापिए के नाते सहायता लेता है । शायद दोनों में परस्पर विरोध ही दोनों की मैत्री का मूल कारण है। कई बार दो परस्पर विरोधी बिन्दु एक-दूसरे की ओर आकृष्ट होते हैं। 120: लापता लगता था कि दोनों का यह वाद-विवाद बहुत देर में चल रहा था। और दोनों किसी नतीजे पर नहीं पहुंच रहे थे। दोनों मानो आवृत्तों में घूम रहे थे । जय अपने अपने वर्तन में दो व्यक्ति घूमते रहते है तो यहां होती है वह रेखा या विन्दु, जिस पर दोनो मिल पाते हैं। यह ज्यामिती का प्रश्न नहीं, मानवी व्यापार में संभावनाओं और संयोग का व्यापार भी महत्त्वपूर्ण है। कामरेड बंशीलाल मयोग को नहीं मानते थे। सब बुछ मुनिश्चित पा। भौतिक कारणो के भौतिक कार्य... कामरेड वंशीलाल की मास्टर शिवलाल से वहम सभी सरम ही नहीं होती थी। दोनो जितना ही एक-दूमरे को समझने का प्रयत्न करते, उतना ही वे एक-दुमरे में दूर पहुंच जाते थे। शिवलाल का प्रस्न पा- "आदिम ममान किस तरह मे असम्म है" वशीलाल-~"वह जंगली ममान है। शिकार पर जीता है।" शिवलाल-"क्या आज के सम्य समाज लोग शिकार नहीं करते। वै प्रकृति को और भी लूटपाट करते, ऐमा मुझे लगता है। देगिए, जितना प्रदूषण फैल रहा है।" बंगीलाल-"वह ममाज वंशानिक नहीं था। मनु युदि का उपयोग नहीं करता था। शिवलाल-यह भाप मे रह सकते हैं । बुद्धि का अयं यंत्र-युग में मापेक्षतावाद और अणु-बम का निर्माण ही है क्या ? प्राचीन भाग्न में गणित में, ज्योतिष में, वैद्यक और मायुर्वेद में, तई और न्याय मे कितनी मूधम चर्चा की गई है, अन्वेषण किये हैं। मारा ममार उनमे चक्ति है। और आप उन्हें वैपदा-लिसा कहते हैं ! वशी - "आप मेरी बात समझ नहीं रहे हैं। वह गुरु-शिष्य परम्परा, वह अपनी विद्या को गुप्त रसना- यह सब बातें रितनी पिटरी हुई थी। देखिए, उस समय कवि लोग राजाओ की प्रालियां लिखते थे, देय. दामिया मन्दिरों में आजन्म अविवाहित रहकर नावनी पी। एक-एक मन्दिर के निर्माण में कितने-कितने दासों का जीवन नष्ट होता था। यह कोई मन्यता पो?" " शिव-~~"आप प्राचीन भारत का एकांगी चित्र दे रहे हैं, मित्र! उसी नमय हमारे सर्वश्रेष्ठ शिल्प-स्थापत्य और चित्र-कला के नमूने निमित हुए। मौर्य और गुप्तकाल के और उससे भी पहले के मामल्लपुरम्, सांची, भग्हुत, मीनाक्षी मन्दिर, वृहदेश्वर, एलोरा, अजंता, वाहुवली, खजुराहो, भुवनेश्वर, कोणार्क यह सब प्राचीन और मध्ययुगीन भारत के चमत्कार - - राष्ट्र को वंशी-"जाने दीजिये। कला को सामाजिक जीवन दीजिये। मनु को क्या आप प्रगतिशील विचारक कहेंगे ? स्त्रियों और शूद्रों को उसने . एक-सा नीचा स्थान दिया । उसी ने वर्ण-श्रेष्ठता का सिद्धान्त चलाया, जो कि आज भी घुन की तरह लगा हुआ है।" शिव-~"मुझे यह बताइये कि मनु को छोड़ दीजिये, पर कौटिल्य का अर्थशास्त्र, कल्हण की राजतरंगिणी, महाभारत का शांतिपर्व, स्मृतियां-ये सब क्या समाज को प्रतिक्रियावादी विचार ही देते हैं ? अर्थशास्त्र में तो यहां तक लिखा है कि जिस राजा को प्रजा को सुखी रखने की राज्यकला नहीं आती, उसके विरुद्ध विद्रोह कर देना चाहिए। हर शास्त्र को परीक्षा के अनन्तर ही ग्रहण करना चाहिए, यह विधान -- वंशी --''यह सब प्राचीन भारत की बात छोड़िये । आज की दशा देवियं। यहां कुलियों की जिंदगी देखिए । बंबई में होटल मजदूरों और कलकता म रिक्शा चालकों की जिंदगी देहिये। इतनी गंदगी में वे रहते हैं। ऐमी चालो. खोलियों, बस्तियो, और झुग्गी-झोपड़ियों में रहकर आप धर्म और भारतीय संस्कृति की महानता की बातें करने है। आपको द. में कोई विरोधाम और लज्जा नहीं जान दिश ३--- ''आप विषय म दुर जा रहे है । यह मव शहरी ज़िन्दगी की बुगमां फिर उसी प्रानीन जीवन पद्धति और सास्कृतिक मूल्यों की पात्रता मे दूर जाने के कारण है। आज का मानव एकदम आचार-च्युत हो गया है । आप लोगो ने 3 क्षुधा काय का एक पशु मात्र बना दिया है। यदि राजनीनि ताममिकता पर आधारित होगी तो मनुष्य 122: लापता सात्विकता को और कैसे भागेगा?" वंशी-"माप जीवन को एकांगी दृष्टि मे देग रहे हैं। आप मनुष्य के भीतर के पशु को मुलाकर केवल देवता की बात कर रहे है । एक के बिना दूसरा बेमतलब है ।" "शिव-आप मनुष्य को एक युद-भूमि बना रहे हैं।" वंशी-"मैं नहीं बना रहा हूं आपकी गीता ने वैमा ही बना रहा है। मुझे तो गीता एक गोलमोल किताय लगती है, जिसमे सयको पुरा करने की व्यवस्था है। उसके कितने-कितने अयं किये गये।" शिव-"यह उस किताब की महानता है या शुटता? उसकी सामध्यं है या सीमा।" वंशी-"जाने दीजिए, आप हमारा द्वन्दात्मक भौतिकवाद जान- यूझकर समझना नहीं चाहते । अमली बात यह है कि हिन्दुत्य का विकल्प बुद्ध ने ही बहुत पहले सामने रख दिया था। शिव--"फिर वह चला क्यों नहीं? भारत में ही उमका सम हो गया । बाहर वह फैला।" वशी-"आपके गाधी का क्या हुआ? यहा कोई उनको आचरण में लाता नहीं। रिचड एटनबरो ने फिल्म बनाई और यह सारी दुनिया में पल गई।" शिव--"दुनिया मानेगी या न मानेगी, वपा इमो पर भारतीयता निर्भर है ? आपके रूम के साम्यवाद को कितने वर्षों बाद बाहर की दुनिया ने अपनाया और कितना अपनाया ?" वशी -रूम की प्रानि को 65 वर्ष हुए हैं- एक गनी भी पूरी नहीं बीती। एक तिहाई दुनिया आज माम्यवादी है। भारतीय मस्कृति मीन हजार बरस पुरानी है, कितने लोग हिन्दू बने हैं ? भारत के बाहर ?" गिव--"हम धर्मान्तर करने में विश्वाग नही करते । जो ऐगा धर्मान्तर करता है, वह बल और दुमरा कोई धर्म नहीं अपनायेगा, इसका क्या भरोसा है।" वशी -"मैं भौतिकवादी हूँ । और धर्म के दिन अब गिनती है, ऐसा मैं मानता हूं।"
?" शिव-ऐसा होता तो धर्म के नाम पर इतने संघर्ष---ईरान-इराक, लेबनान, जेरुसलम, इजराईल, आयरलैंड आदि में होते ही क्यों ? अभी भी धर्म के लिए प्राण देने वाले लोग सारी दुनिया में हैं।' वंशी-"मैं कहता हूं, अव भी जंगलीपन शेप है, तो इससे आदमी के सभ्य होने का दावा क्या गलत हो जाता है ?" यह वहस यों ही चलती रहती कि बिल गया। उसने कहा कि 'सुनो शिव एक लड़की मेरे पास आई है और वह तुमसे मिलना चाहती है। शिव-"कौन है वह ? विल-"वह कलकत्ते से आई है और अपना नाम विनीता बतलाती हैं । वह तुम्हारा फोटो देखकर ही बड़ी 'इम्प्रेस' हो गई।" शिव भीतर ही भीतर सिहर उठा। पुन: वही एच. आर. के लम्बे- लम्बे हाथ रक्त-रंजित नाखून-एक वड़ा-सा मकड़ा या आक्टोपस- उसके खून का पिपासु । अव वह कहां बच पायेगा? फांसी का फंदा और जेल के सींखचे उसे दिखाई देने लगे । वह वहां मे उठकर चल दिया । अब वह विचार करने लगा कि कहीं भागकर चला जाये । पर कहीं जायेगा वह इस तरह से इतना जल्दी । रात को उसे ठीक तरह से नीद नहीं आई। सवेरे ही उसके दरवाजे पर खटखट हुई और उसने दरवाजा खोलकर देखा तो विनीता खड़ी थी पहले तो विनीता कुछ वोली नहीं। शिव ने कहा -आओ अंदर । विनीता धीरे-धीरे उस छोटे-से कमरे में माई। अपने वेतरतीव कागज इधर-उधर ठीक-ठाक करके शिव ने कहा-"वैठो।" एक छोटी लकड़ी की फोल्डिग-चेअर उसने आगे कर दी। विनीता वैठ गई। शिवलाल ने ही वात शुरू की-"क्या तुमने समझ लिया था कि मैं 124: लापता
मदमुथ मर गया?"
और वह युद्ध हो हंसा।
अब बारी विनीता की थी-"जो लोग ऐगी धमकी देकर माय में
अपनी डायगे छोड़ जाते हैं, वे वैमा करते नहीं । अगर आप मर जाने तो
उम डायरी की वे मुन्दर-मुन्दर कविताएं पढकर बाद मे कौन आपको
दाद देने माता।"
शिवलाल-"क्या मचमुच धो तुकबन्दियां तुम्हें अच्छी लगी?"
विनीता--"हां, मैं झूठी प्रासा नहीं करती।"
शिवलाल-"चलो, किसी ने उन्हें पढ़ा और उनका नोटिंग तो
लिया।"
विनोतर--"आपकी कविता में बार-बार मृत्यु का उल्लेख और
सकेत क्यों आता है ?"
शिवलाल-"मुझे लगता है कि जो इतना उच्छल मागर है वह
चौदह रत्नों के छिपने का स्थान है । वह उन मूल्यवान वस्तुओं की मौत
हो तो है । चचलता सिर्फ बाहरी है । भीतर हाहाकार है, रवाला है।"
विनीना--"तुम समुद्र को अपने ऊपर पटिन कर रहे हो ?"
शिवलाल--"नहीं, इस हिमालय को ले लो। शिव ताडय करते करते
मानो यहाँ कोलित हो गये। जडीभूत हो गये।"
विनीता--"हो गवाता है प्रकृति में ऐमी तुवरा-बरी, ऐमा विरोधा-
भाम भरा हुआ हो, पर मनुष्य में भी क्या ऐमा ही होता है।"
शिवलाल-"मनुष्य अपने आपमें, अपने मून स्वभाव और धर्म में
भागता फिरता है। जितना ही भागता है, उतना ही वह दुपी होता है।
शायद इस दु.ग में ही उसका मुख छिपा है।
चिनीता--"आप इस तरह की बात करने में यहत अभ्यस्त हो गये
हैं। है उरूर मानव जीवन एक पहेली। यौर इसका धुनोवल भी शायद
उसी में छिपा है।"
शिवलाल-"मुझे कभी उम्मीद नहीं थी कि आप मुग तरह ये
यहां सहमा मिल जाओगी।"
विनीता-"योगायोग है।"
शिवलाल-वियोग के वाद संयोग कितना मधुर कितना कटु ?" विनीता--"जो भी हो, अब बताओ कि तुम्हारा आगे क्या प्रोग्राम है ?" " शिवलाल-"कुछ नहीं-यही स्कूल जाना, बच्चों को पढ़ाना। शाम को किसी के साथ गप्पें लड़ाना । मन्दिरों में घूमना ।" विनीता-वह दैनिक कार्यक्रम नहीं पूछ रही हूं । जीवन क्या इसी हिमालय से बंध गया है अव ? सारा भविष्य यहीं इसी शिमले में विताना, है ?" शिवलाल-"ऐसी प्रतिज्ञा तो मैंने नहीं की।" विनीता-"फिर बोलो, आगे कहां जाना है ? जीवन की दिशा क्या है ?" शिवलाल-"वही तो मैं नहीं जानता, विनीता !" विनीता-"मैं कहती हूं शिव, जीवन से भागो मत । उसका सामना करो।" शिवलाल-"मैं जीवन में कोई अच्छी चीज़ नहीं देख पाता।" विनीता--"यदि अच्छाई न हो तो बुराई का कोई अर्थ नहीं होता।" शिवलाल-"यह सब बोलना ठीक है, परन्तु व्यावहारिक जीवन में बुराई ही बुराई अधिक है।" विनीता-"ऐसा मैं नहीं मानती।" शिवलाल-"अपने-अपने मानने की बात है।" विनीता-"आज तो बिल और वंशीलाल यहां हैं। मैं आपसे एकान्त में आकर मिलूंगी।" शिवलाल ने समय दिया और निश्चय हुमा कि वह. मिलने आयेगी, उस समय वहां कोई नहीं होगा। 126: लापता 25 शिवलाल को विनोता का आग्रह टालना मुरिकन या । उगने महा- 'मैं वापिम उग जमामाना की हथेली में नहीं जाऊगा,वहां मेरा दम पटना है । उग अध्यात्म की आराधिता के आसपास कौम की बदमाश यान जुटे हैं। यह नेठ अगियानी और उसके एक में एक पुटे हुए दोरन । वह सारा धर्म की ओट में चलने वाला व्यापार । वह भोले विदेशी-जो इस तरह को भारत की तस्वीर बाहर पेश करके यह समझते हैं कि अफ्रीका-एशिया में आनेवाले तूफान को रोक गगे । बूढे किग कंम्यूट ने यही मोचा था। तलवार चला-चलाकर वह वढ-बहकर आनेवाली समुद्र की लहरियों को पीछे ठेलता जाता था।' विनीता ने कहा-"मैं तुम्हें कलकत्ता वापिस जाने के लिए नहीं रह रही हूं। तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, जाओ। पुरी के ममुद्र-तट पर जाओ।" "मैंने वहा समुद्र के बहुत बडे-बटे चित्र बनाये थे, पर मेरा मन भरा नहो। वहां उन मागर को एक अंजुल में पी जाने याती अगस्त्य का साहम मुझमे नही । मुझे एक आदिवागिनी लड़की ने बता दिया कि अकेला आदमी अधूरा है । जो अर्घ-नाम है यह अधं-मुक्न है, पानी यह सदा बंधा हुआ है।" विनीता-"वह कौन थी आदिवामिनी ?" शिवलाल-"वह मेरे लिए शक्ति की प्रतीक पी। वह देवी भैरवी स्न गई । मैं उसे कभी नहीं पा मषंगा । मुझे उसने बहुत अच्छी तरह बता दिया कि मैं आत्म-प्रतारक था।" विनीता-"क्या वह तुमसे प्रेम करती थी?" शिवलाल--"यह कहना कठिन है। हर गिव सक्ति प्रेम करता है । पर शक्ति हर एक को शिव नहीं मानती।" शिवलाल-"तो तुम्हें कलकत्ता नही, पुरी नहीं, नो केरल जाना चाहिए। वहा सुन्दर समुद्र तट है। गोमा जाना चाहिए... .." सापता:127 शिवलाल---"मैं सब जगह भटका हूं। लापता, वेठिकाना जहाज़ की तरह घाट-घाट गया हूं। पर मेरा बंदरगाह वहां नहीं है, न कोचीन में , नपणजी में। मैं समझ गया हूं कि मेरी नौका डांड-हीन और पाहैल, हीन है । वह राह में ही टूट जायेगी।" विनीता – “तुम कविता की भाषा में बोलते हो । समुद्र नहीं तो पर्वतराज तुम्हें अवश्य अपना पता देने में सक्षम रहा होगा।" शिवलाल हंमा । फिर धीरे-धीरे वोला--"पहाड़ किसी से बोला नहीं करते। वे बड़े चुप्पे होते हैं। सिर्फ चांदनी रात में हंसा करते हैं। देवताओं का अट्टाहास--वह हिमघवल महाराशि!" विनीता--"मौन में ही वे उत्तर देते होंगे प्रश्नों के।" शिवलाल-~-"उनकी भाषा सव नहीं समझ सकते। कुछ-कुछ रोरिक समझते थे। 'रुद्रवीणा' बजाने वाले मौन योगी पार्वती को समझते हैं शायद । बहुत लोग कैलाश-मानमरोवर की यात्रा कर पाते हैं । कुछ अच्छे यात्रा-वर्णन लिखते हैं। कुछ अच्छे फोटो खीचकर लाते हैं। प्रज्ञानानंद की तरह सुन्दरानद की तरह पर हिमालय के गूढ़-रम्य सौन्दर्य को कौन समझ पाया है अब तक ?" विनीता--"यदि समुद्र नहीं, हिमालय नहीं तो आपकी असली पहचान पाने का आधार क्या था?" शिवनाल-"ऐमा है विनीता, मैं खुद नहीं जानता कि मैं क्या खोज रहा था। मेरे दिमाग में ही कोई फितूर था। कुछ था जो मुझे एक जगह चुपचाप बैठने नही दे रहा था।" विनीना--"पर ऐसा करने में शिवलाल-~~, तुम बुरा मत मानो, पर मैं तुम्हें चाहती हूं और उसी अधिकार में पूछती हूं-तुमने कितने लोगों पर अन्याय नहीं किया " शिवलाल-~-''मुझमे न्याय किसी ने मांगा ही नहीं था।" विनीना-इमलिए क्या तुम अन्याय करते जाओगे, सव पर?" शिवलाल-"किम-किम पर मैंने अन्याय किया?" विनीता--"सोचो-अब तुमने अपनी सारी कहानी बता दी है, तो पहले तो अपने पिता पर, जिने कोई सूचना न देकर तुम भाग निकले। - 128 : लापता
फिर माई पर-जो तुम्हारे पोधे मारा-मारा फिरा । फिर एटिप पर का
पर, देवी पर, गीला पर, यहां तक कि विनीता पर भी तुमने भयापही
दिया...।"
शिवलाल-"नहीं, मैंने पिसी थे. साप पोई बुराई नहीगी।
सबकी इज्जत करता रहा, मैं सबको प्रेम करता रहा।"
विनीता-"प्रेम सिर्फ दिपाया नहीं जाता। वह गुण देने के लिए भी
आगे बढ़ता है। वह झुकता भी है। जो प्रेम अहंकार को यथावा देगा है,
जो 'मैं' से शुरू होता है. यह 'मैं' में ही जाकर ममाण हो जाता है।"
थोड़ी देर दोनो मौन रहे।
शिवलाल ने कहा-"मान लो क्षण भर के लिए कि मैने गलती की।
तो अब उस सय पुरानी मूल से क्या निस्तार है ? कही भीमपा प्रातगिरा
की कोई गजाइस नहीं"
विनीता--"आत्मा सो देने पर अन्य ही हागिस होगा।"
शिवलाल-"नहीं, कोई तो उपाय होगा? कोई तो इममेगे
रास्ता बायेगा। इस मुरग का कोई अंत होगा ही । यह भूगमाया
जन्मजन्मान्तर नहीं चलेगी।"
विनीता-"वह राह भी तुम्हें ही बनानी होगी। यापिग जानेमा
मार्ग भी आप पर पट्टी बाधकर जो लोग सुम्हें यहाँ तक लाए है, और यही
तक छोड गये है, वे नहीं बतायेंगे।"
शिवलाल ने कहा--"विनीता. मैं हार मान गया। अब तुम जो
कहोगी वही मैं करूगा।"
विनीता-"तो चलो, मैंने दो टिकट पालका मेल के कटाय है।
शिमला से कालका, वहां में दिल्ली और दिल्ली मे रामकृष्णपुरम् । भको
घर चलो।"
शिवलाल-"वे क्या कहेंगे?"
विनीता-"वे कुछ नहीं रहेंगे। उनकी मांगों में भी भागू
होग।"
ही हुआ।
सरे दिन अरविंद अपने घर लौट गया। सब लोग चकित हुए। यहां
क उसकी सौतेली मां, जिससे चिढ़कर वह घर छोड़कर भागा था-
पहले तो अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। बाद में उसी ने आरती
री। उसे प्रणाम करने के लिए घर के छोटे बच्चों से कहा । मिठाई
वाई। जश्न किया गया।
यह एक अद्भुत पुनर्मिलन था। इसमें सुख-दुख मिले हुए थे। पिता
हुत क्रुद्ध था, पर अब वह एकदम शांत हो गया, सुप्त ज्वालामुखी की
तरह।
बच्चों ने तरह-तरह के प्रश्न पूछने शुरू किये-"कहां थे, अंकल !
इतने दिनों तक आप...क्या करते रहे?"
पहले अरविंद के मन में आया कि सच-सच बता दूं। फिर डर लगा
कि कही इस सचाई से आकर्षित होकर बच्चे वैसा ही 'मिस अंडवेंचर'
(दुस्साहस) न कर बैठे।
सो अरविंद ने कहा-"मैं विदेश गया था।"
बच्चे-"कहां गये थे आप?"
"मैं नई दुनिया में गया था।"
"वहां क्या देखा?"
"वही समुद्र, जंगल, पहाड़। वे सब वैसे ही थे जैसे अपने देश में हैं।'
"पर वहां हमारे देश से अलग क्या था ?"
"वहां के आदमी ।"
"उनमें अलगपन क्या था?"
"वे सब अपने जीवन के उद्देश्य के बारे में सुनिश्चित थे। उनमें कोई
भी निरुद्देश्य नहीं था।"
"क्या वहां वेकार नहीं थे ?"
"नहीं, वे हमारे देश की तरह नही थे। न इतनी संख्यायें, न इ
आशाहीन।"
"क्या वहां भिखारी नहीं थे?"
"नहीं थे।"
130: लापता
"कायहोरासर २१
.
"यह लामो मारोहमारे सामान
फिर भी सनातर?"
"नानिए ऐका मार दाम र मे संस्कार
सोग है। हमें अपनी पुरान सवाभिमान है। हमलोना
नहीं चाहते। और नई दुनिया को सब भी पाहते है Insar
संडहर भी बना रहे और फिर से राजमहल भी कामा.यह पर
है ?"
"हम आपको मात पूरी तरह समझ नहीं पा रहे है."
एक दूसरे बच्चे ने पूछा--"सापको वह नई Tom milani
सगी तो आप यही बरा क्यों नहीं गये"
"वहां बसना मता था।"
"क्यों?"
"उन्हें दर पा सिपाहर मेसोग माकर हमाराम गोमागार
सब वैज्ञानिक, गुप्त गान-विज्ञान, विशेषत: TIRamchai।"
"पर क्या नई दुनिमा मे सोग अपना गोगा, IT. Amlor,
उपकरण सब वेचते नहीं फिरते ?"
"हो, बेपना अलग पार है। हम भोगही का दिया मागवेकर
ज्यादा मुनाफा कमा ही सकते हैं।"
"पर यह बताइये अंकल, रामगे मूल्यपान पाया है "
"सोना? स्त्राप? जानिय ? उपाण?"
"नहीं, उनसे भी गूल्यवान पगार
"मैं नहीं सम तुम्हारी यात।"
"अपनी पहचान । अपनी आगा।"
यह यागिरी उत्तर यनों में नहीं दिया था। पापा
करा दिया। उसका पग्गिय गयो का दिया गया।
विनीता ने ऐमी म्यवग्या पर दी थी कि मर anthit
तुरंत बाद यहां का भी पहुंग आये।
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एंगल से।
दोनों के एन्लार्जमेट साप-माप पे।
और अरविंद अपने घर लौट भाया था, बिना किमीकी कोशिश।
घरवाले उमका पता पा चुके थे।
अब वे इस फिक मे पे कि कही वह पुनः भाग न जाये ।
कपा फिर अरविंद से आकर मिल गई थी। जीवन की भागमभाग
अब अपनी दौड़ के आसिरी मुकाम पर या पहुंची पी
संगीत फिर 'सम' पर आ गया था। आदि कवि ने पुनः छन्द का
प्रथमाक्षर पा लिया या-'मा...'
भमिका शेष प्रश्न कुछ ऐसे प्रश्न होते हैं जिनके उत्तर निःशेप होते हैं। डाकघर में मैंने एक 'मृत पत्रों का कार्यालय' देखा है। पत्र जिसे भेजा गया है उसे न पहुंचने से 'टेस डि आरवरविले' में हार्डी कैसी ट्रेजेडी की धार बढाता है। अन्तोन चेखफ़ की एक कहानी में एक वच्चा अपनी मरी हुई मां को ईश्वर के ठिकाने पर चिट्ठी भेजता जाता है । 'शरणार्थी' में 'अज्ञेय' की भी ऐमी ही एक कहानी है। एक चिट्ठी गलत जगह पहुंच जाने से कितनी गलतफहमियां बढ़ जानी हैं। यह नव तो पत्रों के मामले में होता ही रहता है । जो सही ठिकाने पर चिट्ठियां नहीं पहुंचतीं, वे नष्ट कर दी जाती हैं। परंतु हर आदमी भी एक तरह का पत्र ही होता है। एक संदेश- वाहक । कई बार वह भूल जाता है कि कौन-सा संदेश वह वहन कर रहा होता है। वह अपना संदेश स्वयं नहीं जानता ! होता यह है कि वह निरा लिफाफा होता है, या एक 'निमित्तमात्र'। 'यंत्रारूढानि पायमा'- यह मनुष्य जिम सन्देश को ले जाता है वह शब्दों मे नही होता। वह एक ऐमी लिपि में होता है, जो मोहन जोदड़ो की चित्रलिपि की तरह उनके लिए अगम्य होती है । नहीं-नहीं। वह संकेताक्षर होते हैं । वह अपने हृत्पटल पर एक तरह की 'गुप्त भापा' (कोड लैंग्वेज) लेकर चलता है । (इस कहानी में स्मगलर लोग कई नामों से चेहरा बदल-बदलकर घूम रहे थे ! कभी वे नेता बन जाते हैं, कभी अभिनेता! पर उद्देश्य उनका . - 1134 : लापता सब एक ही होता है।) इन सबकी शिकायत एक ही होती है-'म्हारों दरद न आने पोर' ये सब 'एक हिलोर घर में आई, एक हिलोर उपर से जाये' याने दिशाहीन वायु-मकेन होते है । फभी हम उन्हें पट पाते हैं, कभी नहीं पड पाते। "प्रांतिया दवे पार आती है'--नीरो ने कहा था। तो जल्दी-जल्दी में उसे बनाने वाले ने उम कबूतर के गले में जो सन्देश लिखा वह या तो अधूरा हो लिसा था, कहा पहचाना है ! यह पना लिया ही नहीं। ऐसे भी कई लोग होते हैं । पर समुद्र में चारो ओर लहरियो म पिरे एक एकाकी द्वीप पर नाविक मवेले पड़े हैं। ये वोरलो में बद करके अपनी परिचित लिपि में मन्देश भेजते रहते हैं-तरगी में उछाल देते हैं कि कभी न कभी, कोई न कोई, कही न कही, इस सन्देश को पायेगा और इनका उदार करने मा जायेगा। . मनुष्य की आशा बदलती है । जब तक सामा, तब तक माना। इसे माक्सवादी पदो में कहा जाये नो यह एक ऐतिहामिक अनिवार्यता है कि मनुष्य सपर्ष करे- बेहतर जिंदगी के लिए । परपर भी चकमक मे आग पैदा की । अपि से याकड बना तो भूनकर अन्न साने सगा। माग से रेत के बचे शस्य-मूल जलारर 'मुभ' को रोनी की। वह मम्य और 'मुसस्कृत' बनने लगा। रोती में उसने पालतू जानवर लगाये । दास-दामी रसे। धीरे-धीरे उसका प्राम-राज्य बनने लगा। वह उगा. स्वामी, जमीदार, जागीरदार, आपुर, 'पडल ला'. हाकिम. गोस्वामी बना। उसके लिए पात्र बने । राजा यो विष्णु का अग बताया गया। राजा कालस्य कारणम् । कालाप तस्मयनम राजा महाराजा भागते कितनी देर लगती है। युट हुए । मामाग्य बने। थल मेना, जल मेना, वायु मैना, आरिता मेना... मनुष्य-मनुष्य में कतरा लगा। ...
जिस जमीन को वह जोतता था उसी से वह अलग-अलग हो गया।' जंगल तो कभी का पीछे रह गया था। जिस यंत्र को उसने बनाया कि वह उसके श्रम को कम करे ---उलटे उस यंत्र ने जो वस्तु पैदा की उसी से उसका अनगाव बढ़ता गया। एक तरह से वह अपनी पहचान धीरे-धीरे खोता जो वस्तु उगने बनायी, वह उसे मिली नहीं। मालिक को गिर्फ मुनाफ़ा मिला । वस्तु तो यंत्र से दूर ही होती चली' गई। की पुस्तका . मनुष्य और मनुष्य के बीच में अव धर्म-ग्रंथ, कानून राज्य-- मंस्था नही -- पंगा आ गया। वही पुल था, वही दीवाल थी। मनुष्य पंग भी अजनबी बनता चला गया। उसकी आत्मा को उसने इटैलियन गगीतकार पैगानिनी की तरह से शैतान को बेच दिया। - हमी बान को धर्म और अध्यात्म की शब्दावली में कहा गया कि मनुष्य अपने सप्टा, अपने निर्माता, ईश्वर से दूर हो गया था। ईश्वर उनके लिए कोहो में लंकी सच्चाई वन गया। ईश्वर गोचने लगा कि अरे, यह जो मैंने निर्मित किया था, वह कहां गया? क्या वह उस मां की तरह था, जिससे उसका बच्चा कहीं दूर चला गया है । या जो जंगल में राह भटक गया है। क्या वह यशोदा का कृष्ण है, या देवकी से यह दूर भाग गया है ? क्या वह अज्ञातवास में है ? अंक्लिम की मां, जब वह शिशु था तो नदी पर ले गई । वह उसके हाथ में फिगलकर नदी में वह ही जाता कि उसकी एड़ी मेकिलम की मां के हाथ में बनी रह गई-वह अवध्य बनी। गांधारी को अभिशाप था कि वह अपने बच्चे को देख न सके। और जब यह दुर्योधन को एक बार देखकर अमर बनाने वाली थी कि कृष्ण ने उसे फूलों की जंधिया पहना दिया। उतना ही उसका अंश वेव्य बन गया। मनुप्य घर से भूला-भटका एक मुसाफिर है । वह सुबह का भूला शाम - 136: लापता को लौट भी मा सकता है। पर कई नक्षत्र मूल ज्योतिष्कपिंड छूटकर मिर्फ आकार को सपभर आलोकित कर क्षार-चार हो जाते हैं । वे उपलमय होकर पृप्वी पर पंह. खंड विखर जाते हैं । उल्काओं से कोई उनका पता नहीं पूछना। वह इस तरह से पुरी-हीन प्राणी क्यो वन जाता है ? क्या यह उसके अपने हाथ में है ? सारे मर्मी और रहस्यवादी कवि कहते हैं कि इस पर उसमा बम नहीं। 'गुरुविन कौन बतावै बाट, विकट घाट जमघाट.. 'भंवर में नैया परी, उस पार खिवैया. 'लगा दे मोरा ठिकाना, मोरे कान्हा... 'शिवम् प्राण केवलम्... आदि-आदि । सब धर्मों मैं, सब पंथों में मनुष्य को यही असहाय अवस्था है। मानों वह इस भवसागर में धकेल दिया गया है ।तरना जानता नहीं । और 'कोई शक्ति है, जो उसका उद्धार करेगी ! उसे उठा लेगी। रक्षा करेगी, मब संकटी मे... मनुष्य ने यहा आस्था का दीपस्तंभ सदियों से बनाया था। उसे उन्नीसवी सदी तक आते-आते विज्ञान के हाथो उसने स्वय ध्वस्त कर दिया। नोत्री ने कहा-'क्या यह तुम्हारे लिए समाचार नया है कि ईस्वर ने कभी की आत्महत्या कर ली !' मावत ने कहा--'नहीं है इस विश्व का कोई बनानेवाला, न संहार करने वाला। मनुष्य ही मनुष्य को डुबोने वाला और से बचाने वाला है। तो, अव इस लापता मनुष्य का पता भी मनुष्य को ही खोजना होगा।
कैसे खोजे वह यह पता? कई तरह के उत्तर मिल रहे हैं
"कला से?"
"हृदय की वाणी', 'भीतर की आवाज', 'अन्तप्रज्ञा' से ?"
"धर्म और विज्ञान के समन्वय से?"
"इतिहम से सबक लेकर, उसी के मानचित्र के सहारे ?"
"प्रयत्न और गलती करते जाने' (ट्रायल एंड एरा) से।"
"सही शिक्षा से ?"
"संयोग से "
सब आदमी सब तरह की खोज में माहिर नहीं होते। ज्योतिषी
दूरबीन से देखते हैं । पनडुब्बी में बैठकर समुद्रतल का खोजी अवगाहन
करता है। अन्तरिक्ष यात्री ग्रह-नक्षनों तक पहुंचना चाहते हैं। जंतु
शास्त्रश सूक्ष्मवीक्षण यंत्र से देख रहे हैं। वर्फ में जहाज रास्ता काटता हुमा
'एंटार्टिका (दक्षिण ध्रुव) और साइवेरिया में अतल और अगम की खोज
कर रहा है।
मन के भीतर कितने और मन हैं ? पराविद्या क्या है ? तंभ तन
और मन के बीच क्या क्या रासायनिक और भू-तांत्रिक परावर्तनों में
पैठना चाहता है ?
मनुष्य की खोज जारी है-भीतरी, बाहरी । यहां, वहां ।
कहीं उरो शांति या तृप्ति नहीं है।
पयोंकि
मनुष्य को अपना सही पता, अपनी मंज़िले-मकसूद अभी
हासिल नहीं हो सकी है।
जो कहानी आपने पढ़ी, उसके भी पात्र इसी उधेड़-बुन और भटकन
में मुसिला थे। हमने उन्हें कुछ झलकियों में नज़दीक से देखना चाहा।
"पते की बात' हम भी नहीं पा सके।"
पर शायद वे नष्ट होने से बचा लिये जा सके पत्रों जैसे हैं। उन्हें
138: लापता
ठिकाना बदलकर फिर भेज दिया गया है। कुछ वरंग भेजनेवाले केही
पास पहुंच पाये हैं। कुछ के पते ज्यादा साफ लिसावर में पुनः लिगवा
लिये गये हैं। कुछ सही पते पर पहुंचे। पर वहां जिम तक पहुंचना पा,
वही नहीं है । वह वहां से जा चुका है, या इस मत्यलोक मे ही कृष कर
गया है।
ऐसे सब प्रश्नों से घिरे है हमारे चरित्र, हमारे पात्र, हमारे लापता
मिष...
"यन कुरालं तवास्तु' कुछ पर लिखा है।"
"कुछ खुले हैं, कुछ बद हैं।"
"कुछ रजिस्टर्ड हैं, कुछ अनरजिस्टर्ड।
"कुछ विद्या से भरे हैं. कुछ अविद्या मे।"
"कुछ पुराने ही कागजी पर नये यंहल है तो कुछ नये फागजी में
लिपटे पुराने बंडल-कुछ पत्र-यम"।
"हम सब पात्र नही', पर हैं।"
'पत्र', पुष्प, फलं, तोयम्'
(यह तेरह अक्षरों की एक चित्र-बंधात्मक कविता है, जैसे पत्ता गिर
रहा हो, इसमें लिखा है 'ए लीफ़ फालिंग' और ब्रैकेट में 'लोन्लीनेस')
एक पत्ता गिरता है
अकेलाझरता है
उसका क्या पता है?
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