Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

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2010/10

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१ ओं
नित्त नेम
ते होर वाणी
Ceo
प्रकाशक:-
माटरी-शिरोमणि गुः प्रबन्धक कमेटी,
अमृतसर।
K

ततकरा
७
३३
my 0
४५
८१
जपुजी साहिब
शबद हजारे
जापु साहिब
त्वप्रसादि सवय्ये
अनंदु साहिब
रहरासि
अरदास
सोहिला
बारह माहा
८६
११३
१४०
१४५
१५०

१ ओं वाहिगुरू जी की फतह ॥
प्रस्तावना
हम अपने चारों ओर एक संघर्प सा होता
हुआ देख रहे हैं, सत्ता और अधिकार प्राप्ति
का भयानक सङ्घर्ष ! जिस के कारण संसार
आज एक विशाल दुःखागार बन कर रह गया
है। प्रत्येक व्यक्ति दुःखी है---गरीब और
क्या अमीर, राजा और क्या रङ्क, सब बांसों
की अग्नि की भान्ति अपने ही सङ्घर्ष से
भड़काई हुई ज्वाला में दग्ध हुए जा रहे हैं।
और यह सब कुछ हो रहा है सुख की प्राशा
में। सब कोई चाहते तो सुख हैं किन्तु नहीं
जानते कि सुख है कहां! मरीचिका में
तृपातुर मृग की तरह भौतिक पदार्थों में सुख
की तलाश में भटकने हुए ठोकरें खा रहे हैं।

४
इस से कहीं भयानक दशा थी जगत् की
श्री गुरुत्रों के आगमन से पहले । जगदाधार
चाहिगुरू ने गुरुवाणी का प्रकाश देकर गुरू
नानक महाराज को संसार में भेजा। गुरु-
वाणी की जो दिव्य-ज्योति दश मानव शरीरों
में आकर ठोकरें खा रही मानवता को सुमार्ग
दिखाती रही, अब उसका प्रकाश श्री गुरु
ग्रंथ साहिब के रूप में विद्यमान है, जिस के
पाठ से आज भी लाखों सन्तप्त हृदय शान्ति
प्राप्त कर रहे हैं। जो दुःखों से प्रपीड़ित और
निराशा के सागर में
डुबकियां लेती हुई
मानवता को आज भी सुख शान्ति और
मांत्वणा प्रदान कर रही है। उसी में से यह
कतिपय विशेष वाणियों का एक छोटा सा
मग्रह है। जिम 'नित्य नियम' (नित्त नेम)
का नाम दिया गया है।

इस में पहली वाणी 'जपुजी साहित्र' है।
यह प्रथम सत्गुरू नानक देव महाराज की
वाणी है, श्री गुरू ग्रंथ साहिब में भी इसे सर्व
से पहिला स्थान प्राप्त हुआ है। उस के
पश्चात 'शब्द हजारे' हैं। इस में पञ्चम गुरु
अर्जुन देव तथा प्रथम सत्गरु की वाणियां
है जो श्री गुरू ग्रन्थ साहिब के भिन्न २ रागों
में से सङ्कलित की गई हैं।
स्मरण रहे कि सव सत्गुरुओं में गुरू
नानक की ही 'ज्योति' विद्यमान थी इस लिए
सव गुरु व्यक्ति अपनी वाणी में शब्द (भजन)
के अन्त में कर्ता का नाम 'नानक' लिखते
रहे किन्तु यह जानने के लिए कि किस गुरु
व्यक्ति की कौनसी रचना है, प्रत्येक शब्द
के आदि में 'महला' लिखा है । 'महला १'
से अभिप्राय हैं गुरु नानक, महला ५ से

तात्पर्य है गुरु अर्जुन देव । इसी प्रकार दूसरे
मत्गुरुओं की वाणी के विषय में भी समझना
चाहिये।
-
-
'जापु साहिब' तथा 'ल प्रसादि स्वये
दशम गुरू जी की वाणियां हैं। 'रहरासि' में
भी भिन्न २ गुरू व्यक्तियों की वाणियां हैं
और अन्त में 'बारह माह' है। बारह महीनों
द्वारा उपदेश । संक्रान्ति के दिन इस के पाठ
का नियम है
गुरुवाणी में शब्दान्तिक हस्व-स्वरों
(मात्राओं) का उच्चारण प्रायः नहीं होता।
यह केवल व्याकरणिक अर्थ-भेद प्रगट करने
के लिये लिखी जाती हैं। यथा--'सतिनामु'
का उच्चारण है 'सत्य नाम' | 'करता पुरखु'
का उच्चारण होगा 'कर्ता पुरख' इत्यादि।
-प्रकाशक

0.000000000000000000
o{ जपुजी)
00000000000000000
१ ओं सतिनामु करता पुरखु
निरभउ निरवैर अकालमूरति अजूनी
सभं गुर प्रसादि ॥ जपु ॥ आदि सचु
जुगादि सचु॥ है भी सचु नानक होसी
भी सचु ॥१॥ सोचै सोचि न होवई जे
सोची लखवार । चुपै चुपि न होवई जे
लाइ रहा लिव तार ॥ भुखिया भुख न
उतरी जे बंना पुरीया भार ॥ सहस
सिप्राणपा लख होहि त इक न चले
नालि ॥ किन सचिनारा होईऐ किव
Kedeo

कूड़े तुटै पालि ॥ हुकमि रजाई चलणा
नानक लिखिश्रा नालि ॥१॥ हुकमी
होवनि आकार हुकमु न कहिा जाई ।
हुकमी होवनि जीअ हुकमि मिले वडि-
आई ॥ हुकमी उतमु नीचे हुकमि लिखि
दुख सुख पाईअहि ॥ इकना हुकमी
बखसीस इकि हुकमी सदा भवाईअहि ॥
हुकमै अंदरि सभु को वाहरि हुकम न
कोई ॥ नानक हुकमै जे बुझे त हउमै कहै
न कोइ ॥२॥ गावै को ताणु होवे किस
ताणु ॥ गावै को दाति जाणे नीसाणु ॥
गावै को गुण वडिआईआ चार ॥ गावै
को विदिशा विखमु वीचारु ॥ गावै को
साजि करे तनु खेह ॥ गावे को जी ले
<<<><

ह Ko फिरि देह ॥ गावे को जाप दिसै दुरि ।। Aगावै को वेखे हादरा हदूरि ॥ कथना कथी न आये तोटि॥ कथि कथि कथी कोटी कोटि कोटि ॥ देदा दे लैदे थकि पाहि ॥ जुगा जुगंतरि खाही खाहि॥ हुकमी हुकम चलाए राहु ॥ नानक विगसे वेपरवाहु ॥ ३॥ साचा साहित्रु साचु नाइ भाखिया भाउ अपार ॥ पाखहि मंगहि देहि देहि दाति करे दातारु । फेरि कि अगे रखीऐ जितु दिसै दरवारु ।। मुहौ कि बोलणु बोलीऐ जितु सुणि धरे पियारु ॥ अंमृत वेला सचु नाउ वडिआई वीचारु॥करमी आवै कपड़ा नदरी मोखु दारु॥ नानक एवं जाणीऐ सभु आपे सचिारु ॥४॥ SMSMSeeी

>>
१०
Seema
थापिया न जाइ कीता न होइ । आपे
आपि निरंजनु सोइ ॥ जिनि सेवित्रा
तिनि पाइआ मातु ॥ नानक गावीऐ
गुणी निधानु ॥ गावीऐ सुणीऐ मनि
रखीऐ भाउ ॥ दुखु परहरि सुखु घरि लै
जाइ ॥ गुरमुखि नादं गुरमुखि वेदं
गुरमुखि रहिआ समाई ॥ गुरु ईसरु गुरु
गोरखु बरमा गुरु पारबती माई ॥ जे हउ
जाणा श्राखा नाही कहणा कथनु न
जाई । गुरा इक देहि बुझाई । सभना
जीआ का इकु दाता सो मैं विसरि न
जाई ||५|| तीरथि नावा जे तिसु भावा
विणु भाणे कि नाइ करी। जेती सिरठि
उपाई वेखा विणु करमा कि मिलै लई ।।
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११ ANKAR मति त्रिचि रतन जवाहर माणिक जे इक गुर की सिख सुणी ॥ गुरा इक देहि बुझाई ।। सभनाजीमा का इकु दाता सो मै विसरि न जाई। ६॥ जे जुग चारे आरजा होर दरणी होइ ॥ नवा खंडा विचि जाणीऐ नालि चलै सभु कोइ ॥ चंगा नाउ रखाइकै जसु कीरति जगि लेइ ॥ जे तिसु नदरि न आवई त बात न पुछे के || कोटा अंदरि कीटु करि दोसी दोसु घरे । नानक निरगुणि गुणु को गुणवंतिया गुणु दे। तेहा कोइ न सुझई जि तिसु गुणु कोइ करे ॥७॥ सुणिऐ सिधपीर सुरि नाथ ॥ सुणिऐ धरति धवल आकास।। सुणिऐ दीप लोय ह P> १४ OPoicti<<V मनै मगु न चले पंथु । मंने धरम सेती सनबंधु ॥ ऐसा नामु निरंजनु होइ ।। जे को मंनि जाणे मनि कोइ ॥१४॥ मने पावहि मोखु दुआरु ॥ मने परवार M साधारु ॥ मनै तरे तारे गुरु सिख ॥ मंने नानक भवहि न भिख ।। ऐसा नामु निरंजनु होइ । जे को मनि जाणे मनि ॥ कोई॥१५॥ पंच परवाण पंच परधानु । पंचे पावहि दरगहि मानु || पंचे सोहहि दरि राजानु।। पंचाका गुरु एकु धियानु।। जे को कहै कर वीचारु ॥ करते के करणे नाही सुमारु ॥ धौलु धरम दइया का पूतु ॥ सतोखु थापि रखिया जिनि सूति ॥ जे को बुझे होवै सचिआरु॥ <<<

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१६
देते:23
असंख भगत गुण गियान वीचागाअसंख
सती असंख दातार || असख सूर मह
भख सारा। असंख मोनि लिव लाइतार||
कुदरति करण कहा वीचारु ॥ वारिआ
न जावा एक वार ।। जो तुधु भाचे साई
भली कार || तू सदा सलामति
निरंकार ॥१७॥ असंख मूरख अंध
घोर ॥ असख चोर हरामखोर।। असख
अमर करि जाहि जोर || असंख गलवढ
हतिया कमाहि।। असख पापी पापु करि
जाहि || असख कूड़िार कूड़े फिराहि।।
अप्स ख मलेछ मलु भखि खाहि।।असख
निंदक सिरि करहि भारु ॥ नानकु नीचु
कहै वीचारु । वारिया न जावा एक
<<<<
a

१७
वार ॥जो तुधु भाव साई भली कार॥
तू सदा सलामति निरंकार ॥१८॥
असंख नाव असंख थाव ॥ अगंम अर्गम
असंख लोअ॥ असंख कहहि सिरि भारु
होइ । अखरी नामु अखरी सालाह ॥
अखरी गिानु गीत गुण गाह ।। अखरी
लिखणु बोलणु वाणि ॥ अखरा सिरि
संजोगु वखाणि || जिनि एहि लिखे
तिसु सिरि नाहि ॥ जिव फुग्माए तिव
तिव पाहि ॥ जेता कीता तेता नाउ ।।
विणु नाचे नाही को थाउ || कुदरति
कवण कहा वीचारु ॥ वारिया न जावा
एक बार ॥ जो तुधु भावै साई भली
कार ।। तू सदा सलामति निरंकार॥१६॥

१८
भरीऐ हथु पैरु तनु देह ॥ पाणी धोते
उतरसु खेह ॥ मूत पलीती कपडु होइ ।
दे साबूणु लईऐ ओह धोइ ॥ भरीऐ मति
पापा कै सगि॥ श्रोह धोपै नावै कैरंगि।।
पुनी पापी आखणु नाहि ॥ करि करि
करणा लिखि लै जाहु।। आपे बीजि अापे
ही खाहु ॥
नानक हुकमी आवहु
जाहु ॥२०॥ तीरथु तपु दइया दतु
दानु ॥ जे को पावै तिल का मानु ॥
सुणिया मंनिश्रा मनि कीता भाउ ॥
अंतरगति तीरथि मलि नाउ ॥ समि
गुण तेरे मै नाही कोइ ॥ विणु गुण V
कीते भगति न होइ ॥ सुअसति आथि
बाणी वरमाउ ॥ सति सुहाणु सदा मनि
८८
६८

१६
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चाउ ॥ कवणु सु वेला वखतु कवणु
करण थिति कपणु वारु॥ कवणि सि
रुती माहु कवणु जितु होत्रा आकारु ।।
वेल न पाईा पंडती जि होवे लेखु
पुराणु ॥ वखतु न पाइओ कादीपा जि
लिखनि लेखु कुराणु । थिति वारु ना
जोगी जाणे रुति माहु ना कोई | जा
करता सिरठी कउ साजे आपे जाणे
सोई ॥ किव करि आखा किव सालाही
किड वरनी किव जाणा || नानक /
आखणि सभु को आखे इक इकु
सिवाणा । वडा साहिबु वडी नाई कीता
जाका होवे । नानक जे को आपो जाणे
अगै गइया न सोहै ॥ २१ ॥ पाताला
A

२०
0:50
पाताल लख आगासा अागास॥
ओडक ओड़क भालि थके वेद कहनि 4
इक वात ॥ सहस अठारह कहनि कतेवा
असुलू इकु धातु ।। लेखा होइ त लिखीऐ
लेखे होइ विणासु।। नानक बडा आखीऐ ।
आपे जाणे आपु ॥२२॥ सालाही
सालाहि एती सुरति न पाईया।। नदीया
अत वाह पवहि समुदिन जाणीअहि ॥
समुद साह सुलतान गिरहा सेती मालु
धनु ॥ कीड़ी तुलि न होवनी जे तिसु
मनहु न पीसरहि ॥ २३॥ अंतु न
सिफती कहणि न अंतु ॥ अतु न करणे
देणि न अंतु ॥ अंतु न वेखणि सुणणि
न अंतु ॥ अंतु न जापै किया मनि मतु॥
१६

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२२
भूख सद मार || एहि भि दाति तेरी
दातार ॥ बंदि खलासी भाणे होइ ॥ होरु
आरिख न सके कोइ ॥ जे को खाइकु
आखणि पाइ । श्रोहु जाणे जेतीपा मुहि
A
खाइ ।। आपे जाणे आपे देइ ।। आखहि
सि भि केई केइ ॥ जिसनो बखसे सिफति
सालाह ॥ नानक पातिसाही पातिसाहु ।।
२५ ॥ अमुल गुण अमुल चापार ॥
अमुल वापारीए अमुल भंडार ॥ अमुल
आवहि असुल ले जाहि ॥ अभुल भाइ
अमुला समाहि । अमुलु घरम् अमुलु
दीवाणु ॥ अमुलु तुलु अमुलु परवाणु ।।
अमुलु बखसीस अमुलु नीसाणु ॥
अमुलु करम असुलु फुरमाणु ॥ अमुलो
ANSak

२३ goo अमुलु आखिया न जाइ। आखि आखि रहे लिव लाइ॥ आखहि वेद पाठ पुराण।। आखहि पड़े करहि बखियाण ॥ आखहि वरमे आखहि इंद ॥ आखहि गोपी ते गोविंद ॥ आखहि ईसर पाखहि सिध ॥ अाखहि केते कीते बुध ॥ आखहि दानव आखहि देव ॥ आखहि सुरि नर मुनि जन सेव ॥ केते आखहि आखणि पाहि ।। केते कहि कहि उठि उठि जाहि ॥ एते कीते होरि करेहि।। ता आखि न सकहि केई केइ ॥ जे बडु भावै तेवडु होइ ॥ नानक जाणे साचा सोइ ॥ जे को आने वोलु विगाडु ॥ ता लिखीऐ सिरि गावारा गावारु ॥२६॥ ar

२४
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सो दरु केहा सो घरु केहा जितु बहि:
सरव समाले ॥वाजे नाद अनेक असंखा A
केते वावणहारे॥ केते राग परी सिउ
कहीअनि केते गावणहारे।। गावहि तुहनो
पउणु पाणी वैसतरु गावै राजा धरम
दुआरे। गावहि चितु गुपतु लिखि जाणहि
लिखि लिखि धरमु वीचारे॥ गावहि
ईसरु वरमा देवी सोहनि सदा सवारे ।
गावहि इंद इंदासणि बैठे देवतिया दरि
नाले। गावहि सिध समाधी अंदरि
गावनि साध विचारे॥ गावनि जती सती
संतोखी गावहि वीर करारे ॥ गावनि
y पंडित पनि रखीसर जुगु जुगु वेदा
नाले ॥ गावहि मोहणीमा मनु मोहनि
>>>
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२५
RSS
सुरगा मछ पइआलो. गावनि रतन उपाए
तेरे अठसठि तीरथ नालोगावहि जोध महा
वल सूरा गावहि खाणी चारे ॥ गावहि
खंड मंडल वरभंडा करि करि रखे
धारे ॥ सेई तुधु नो गावहि जो तुधु
भावनि रते तेरे भगत रसालेहोरि केते
गावनि से मै चिति न आवनि नानकु
किया वीचारे ॥ सोई सोई सदा सचु
साहिबु साचा साची नाई ॥ हे भी होसी
जाइ न जासी रचना जिनि रचाई ॥रंगी
रंगी भाती करि करि जिनसी माइया
जिनि उपाई ॥ करि करि वेखे कीता
आपणा जिव तिस दी वडिआई। जो
तिसु भात्र सोई करसी हुकम न करणा

२६ HiSilicy जाई । सो पातिसाहु साहा पातिसाहिबु नानक रहणु रजाई।।२७।। मुदा सतोखु सरमु पतु झोली धिान की करहि विभूति ।। खिंथा कालु कुठारी काइना जुगति टंडा परतीति ॥ आई पंथी सगल जमाती मनि जीते जगु जीतु ॥ आदेसु तिस आदेसु ॥ आदि अनीलु अनादि अनाहति जुगु जुगु एको वेसु ॥२८॥ भुगति गिानु दइया भंडारण घटि घटि वाजहि नाद ॥ आपि नाथु नाथी सभ जाकी रिधि सिधि अवरा साद ।। संजोगु विजोगु दुइ कार चलावहि लेखे श्रावहि भाग ॥ आदेउ तिस आदेसु ॥ आदि अनीलु अनादि अनाहति जुगुजुगु ६८६८ <i

२७
एको वेसु ॥ २६ ॥ एका माई जुगति
विश्राई तिनि चेले परवाणु।।इकु संसारी
इकु भंडारी इकु लाए दीवाणु ॥ जिव
तिसु भात्र तिचे चलावै जिव होवै
फरमाणु ॥ ओहु वेख ओना नदरि न
आवै बहुता एहु विडाणु ॥ श्रादेमु तिस
आदेसु।। आदि अनीलु अनादि अनाहति
जुगु जुगु एको वेसु ॥३०॥ आसणु लोइ
लोइ भंडार ॥ जो किछु पाइा सु एका
बार ॥ करि करि वेखे सिरजणहारु ॥
नानक सचे की साची कार ॥ श्रादेसु
- तिस आदेसु ॥ आदि अनीलु अनादि
• अनाहति जुगु जुगु एको वेप्नु।॥३१॥इकदू
जीभौ लख होहि लख होवहि

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ne
२८
2><><><
लख वीस।। लखु लखु गेडा आखीअहि
एकु नामु जगदीस।। एतु राहि पति पव- A
डीआ चड़ीऐ होइ इ कीस ॥ सुणि गला
आकास की कीटा आई रीस ॥ नानक
नदरी पाईए कूडी कूडै ठीस ॥३२॥ ४
आरवणि जोरु चुप नह जोरु ॥ जोरु न
मंगणि देणि न जोरु ।। जोरु न जीवणि
मरणि नह जोरु ॥ जोरु न राजि मालि
मनि सोरु ॥ जोरु न मुरती गिानि
वीचारि ।। जोरु न जुगती छुट ससारु।।
जिसु हथि जोरु करि बेख सोड ।। नानक
उतमु नीचु न कोइ ॥३३॥ राती रुती
थिती वार ।। पत्रण पाणी अगनी
पाताल ॥ तिम् विचि धरती थापि रखी
na
८.८

२६
<><><>
घरमसाल || तिसु विधि जी जुगति के
रंग ॥ तिन के नाम अनेक अनंत ॥
करमी कम्मी होइ वीचारु ।। सचा प्रापि
सचा दरबारु ॥ तिथे सोहनि पंच
परवाणु ॥ नदरी करमि पर्व नीसाणु ॥
कच पकाई ओथे पाइ ॥ नानक गा
जापे जाइ ॥३४॥ धरम खंड का एहो
धरमु ।। गिआन खंड का पाखहु करमु।।
कते पत्रण पाणी वैसंतर केते काह्न
महस ।। केते बरमे घाइति घड़ीअहि रूप
रंग के बेस ।। केतीपा करम भृमी मेर
केते केते धृ उपदेस । केते इंद चंद सूर
को केते मंडल देस | केते सिध बुध
नाथ केते केत देवी बेस ॥ ते देव दानव

<<<<
३०
neey
मुनि केते केते रतन समुद || केतीया
खाणी केतीपा बाणी केते पात नरिंद।।
केतीया सुरती सेवक केते नानक अंतु
न अंतु ॥३५॥ गियान खंड महि
गियानु परचंडु। तिथे नाद विनोद कोड
अनंदु ॥ सरम खंड की वाणी रूपु ॥
तिथे घाडति घडीऐ बहुतु अनूपु ।।
ता कीया गला कथीया ना जाहिराजे को
कहै पिछे पछुताइ।। तिथे घड़ीऐ सुरति
मति मनि बुधि ॥ तिथे बड़ीऐ सुग
सिधा की सुधि ॥३६॥ करम खंड की
बाणी जोरु ॥ तिथे होरु न कोई होरु ।।
तिथे जोध महावल सूर ॥ तिन महि राम
रहिआ भरपूर।। तिथे सीतो सीता महिमा -
ago
<<<

३१
माहि। ताके रूपन कथने जाहिनाअोहि
मरहि न ठागे जाहि ।। जिनकै रामु वसै
मन माहि ॥ तिथे भगत वसहि के लो।
करहि अनंदु सचा मनि सोइ।सच खंडि
वस निरंकारु ॥ करि करि वेखे नदार
निहाल ॥ तिथे खंड मंडल वरभंड |
जेको कथै त अंत न अंत ॥ तिथे लोग
लोअ आकार ।। जिव जिव हुकमु तिवै
तिव कार ॥ खे विखस करि वीचारु ।।
नानक कथना करड़ा सारु॥३७॥ जतु
पाहारा धीरजु सुनिआरु।। अहरणि मति
वेद हथीआरु || भउ खला अगनि तप
ताउ ।। भांडा भाउ मृतु तितु ढालि ।।
घड़ीऐ सबदु सची टकसाल ॥ जिन कउ

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३०
Sa><<>
मुनि केते केते रतन समुद || केतीया
खाणी केतीया बाणी केते पात नरिंद ।।
केतीमा सुरती सेवक केते नानक अंतु
न अंतु ॥३५॥ गियान खंड महि
गिानु परचंडु। तिथे नाद विनोद कोड
अनदु ॥ सरम खंड की वाणी रूपु ।।
तिथे घाति घड़ीऐ बहुतु अनूपु ।।
ता कीया गला कथीया ना जाहिजे को
कहै पिछे पछुताइ॥ तिथै घडीऐ सुरति
मति मनि बुधि ॥ तिथे घड़ीऐ सुग
सिधा की सुधि ॥३६॥ करम खंड की
वाणी जोरु ॥ तिथे होरु न कोई होरु ॥
तिथे जोध महावल सूर ॥ तिन महि राम
रहिया भरपूर। तिथे सीतो सीता महिमा

३१
माहि|| ताके रूपन कथने जाहिनाअोहि
मरहि न ठागे जाहि ॥ जिनकै राम वसै
मन माहि ॥ तिथे भगत वसहि के लोग।
करहि अनंदु सचा मनि सोइ॥सच खंडि
वस निरंकारु ॥ करि करि वेखे नदरि
निहाल || तिथे खंड मंडल वरभंड ।।
जेको कथै त अंत न अंत ॥ तिथे लोग
लोअ आकार ।। जिच जिव हुकम तिचे
तिव कार ।। वेखे विखस करि वीचारु ॥
नानक कथना करड़ा सारु ॥३७॥ जतु
पाहारा धीरजु सुनिबारु।। अहरणि मति
वेदु हथीआरु | भउ खला अगनि तप
ताउ ॥ भांडा भाउ मृतु तितु ढालि ||
घड़ीऐ सबदु सची टकसाल ॥ जिन कउ
PoK

SCS. नदरि करमु तिन कार ॥ नानक नदरी नदरि निहाल ॥३॥ सलोकु पवणु गुरू पाणी पिता माता धरति महतु।। दिवसु राति दुइ दाई दाइआ खेले सगल जगतु ॥ चंगिआईश्रा बुरिआईया वाचै धरम हदूरि ।। करमी आपोआपणी के नेडै के दूरि ॥ जिनी नामु धिाइया गए मसकति घालि ।। नानक ते मुख उजले केनी छुटी नालि ॥१॥ Naina makeS १ ओं सतिगुर प्रसादि । 10000000000000000000000000000000000 सबद हजारे 00000 00000 20000000000000000000000000000000000 माझ महला ५ चउपदे घरु १ मेरा मनु लोचै गुर दरसन ताई ॥ बिलप करे चात्रिक की निआई ॥ त्रिखा न उतरै सांति न आवै विनु दरसन संत पिबारे जीउ॥१॥ हउ घोली जीउ घोलि घुमाई गुर दरसन संत पिबारे जीउ॥१॥ रहाउ॥ तेरा मुखु सुहावा जीउ सहज धुनि * बाणी ॥ चिरु होया देखे सारिंगपाणी ॥

३४
VSe<>
धंनु सु देसु जहा तू वसिया मेरे ~
सजण मीत मुरारे जीउ ॥२॥ हउ
घोली हउ घोलि घुमाई गुर सजण मीत
मुरारे जीउ ॥ १॥ रहाउ ॥ इक घड़ी न
मिलते ता कलिजुगु होता ॥ हुणि कदि
मिलीऐ प्रिय तुधु भगवंता। मोहि रैणि न
विहावै नीद न आवै विनु देखे गुर दरवारे
जीउ ॥३॥ हउ घोली जीउ घोलि धुमाई
तिसु सचे गुर दरवारे जीउ ॥१॥ रहाउ ।।
भागु होआ गुरि संतु मिलाइया ॥ प्रभु
अविनासी घर महि पाइआ||सेव करी पलु
चसा न विछुड़ा जन नानक दास तुमारे
जीउ ॥४॥हउ घोली जीउ घोलि घुमाई
जन नानकदास तुमारे जीउरहाउ॥१॥८॥

३५
धनासरी महला १
घरु १ चउपदे
१ ओं सति नामु करता पुरखु
निरभउ निरवैरु अकाल मृगति अजूनी
सभंगर प्रसादि॥
जीउ डरतु है आपणा कै सिउ करी
पुकार ॥ दुख बिसारणु सेवित्रा सदा
सदा दातारु ॥१॥ साहित्रु मेरा नीत
नवा सदा सदा दातारु ॥१॥रहाउ॥
अनदिनु साहिबु सेवीऐ अंति छडाए
सोइ । सुणि सुणि मेरी कामणी पारि
उतारा होइ ।। २ ॥ दइाल तेरै नामि V
तरा ॥ सद कुरवाणे जाउ ॥१॥ रहाउ ।

Share See सरवं साचा एकु है दूजा नाही कोइ ॥ ताकी सेवा सो को जा कउ नदरि करे ॥३॥ तुधु बासु पिबारे केव रहा । सा वडिआई देहि जितु नामि तेरे लागि रहां ॥ दुजा नाही कोइ जिसु आगे पिबारे जाइ कहा ॥१॥ रहाउ ॥ सेवी साहिबु आपणा अवरु न जाउं कोइ ।। नानकु ताका दाम है बिंद बिंद चुख चुख होइ॥४॥ साहित्र,ते रे, नाम विटहु विंद विंद चुख चुख होइ ॥१॥ रहाउ॥४॥१॥ तिलंग महला १घरु ३ <<< १ ओं सतिगुर प्रमादि। इहु तनु माझ्या पाहिला पियारे इते ३७ y लीजड़ा लवि रंगाए । मेरै कंत न भावे चोलड़ा पिआरे किउ धन सेजे जाए॥१॥ हंउ कुरबानै जाउ मिहरवाना हंउ कुरवान जाउ॥ हंउ कुरबानै जाउ तिना कै लेनि जो तेरा नाउ। लेनि जो तेरा नाउ तिना के हंउ सद कुरबानै जाउ ॥१॥ रहाउ॥ काइया रंङणि जे थीऐ पियारे पाईए नाउ मजीठ।। रंङण वाला जे र साहिबु ऐसा रंगु न डीठ ॥२॥ जिन के चोले रतड़े पियारे कंतु तिना कै पासि ॥ धूडि तिना की जे मिले जी कहु नानक की अरदासि ॥३॥ आपे साजे आपे रंगे आपे नदरि करेइ ।। नानक कामणि कतै भावे आपे ही रावेइ ॥४॥१॥३॥ SE

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३८
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तिलंग म० १
इआनडीए मानड़ा काइ करेहि ।।
आपनडे घरि हरि रंगो की न माणेहि ॥
सहु नेड़े धन कंमलीए बाहरु किया
हृढेहि ॥ भै कीया देहि सलाइा नणी
भाव का करि सीगारो॥ ता सोहागणि
जाणीऐ लागी जा सहु धरे पियारो।।१।।
इआणी बाली किया करे जा धन कंत
न भायै । करण पलाह को बहुतेरे
साधन महलु न पावै॥विणु करमा किछु
पाईऐ नाही जे बहुतेरा धावै ।। लव लोम
अहंकार की माती माझ्या माहि
समाणी ॥ इनी वाती सहु पाईऐ नाही
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३६
भई कामणि इाणी ॥२॥ जाइ पुछहु
सोहागणी वाहै किनी वाती सहु पाईऐ॥
जो किछु करे सो भला करि मानीऐ
हिकमति हुकमु चुकाईऐ॥ जाकै प्रेमि
पदारथु पाईरे तउ चरणी चितु लाईऐ॥
सहु कहै सो कीजै तनु मनो दीजै ऐसा
परमलु लाईऐ। ऐच कहहि सोहागणी
भैणे इनी बाती सहु पाईऐ ॥३॥ आपु
गवाईऐ ता सहु पाईऐ अउरु कैसी
चतुराई । सहु नदरि करि देखै सो दिनु
लेखै कामणि नउ निधि पाई ॥ आपणे
कंत पिारी सा सोहागणि नानक सा
सभगई ॥ ऐसे रंगि राती सहज की
माती अहिनिसि भाइ समाणी ॥ सुदरि
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४० ios साइ सरूप विचखणि कहीऐ सा सिआणी ॥४॥२॥४॥ ><><> Paise सूही महला १ कउण तराजी कवणु तुला तेरा कवणु सराफु बुलावा ॥ कउणु गुरू के पहि दीखिया लेवा कै पहि मुलु करावा ॥१॥ मेरे लाल जीउ तेरा अंतु न जाणा ॥ तू जल थलि महीअलि भरि पुरि लीणा तू आपे सरब समाणा ॥१॥ रहाउ ॥ मनु ताराजी चितु तुला तेरी सेव सराफु कमावा ॥ घट ही भीतरि सो सहु तोली इन्ह विधि चितु रहावा॥ २॥ आपे कंडा तोलु तराजी आपे तोलण

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४२
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सुश्रामी मै मूरख कहणु न जाई ॥१॥
तेरे गुण गावा देहि वुझाई | जैसे सच
महि रहउ रजाई ॥१॥ रहाउ ॥ जो किछु
होआ सभु किछु तुझ ते तेरी सभ अस-
नाई ॥ तेरा अंतु न जाणा मेरे साहिव मै
अंधुले किआ चतुराई ॥ २ ॥ किया हउ
कवी कथे कथि देखा मै अकथु न कथना
जाई । जो तुधु भावै सोई आरवा तिलु
तेरी वडिआई ॥३॥ एते कूकर हउ
बेगाना भउका
इसु तन ताई ॥
भगति हीणु नानकु जे होइगा ता खसमै
नाउ ना जाई ॥ ४ ॥१॥

४३ बिलावलु महला १ मनु मंदरु तनु वेस कलंदर घट ही तीरथि नावा ॥ ऐकु सवदु मेरै प्रानि वसतु है बाहुड़ि जनमि न आवा ॥ १ ॥ मनु बेधित्रा दइयाल सेती मेरी माई ॥ कउणु जाणे पीर पराई । हम नाही चिंत पराई ।।१ ॥ रहाउ ॥ अगम अगोचर अलख अपारा चिंता करहु हमारी ॥ जलि थलि महीअलि भरिपुरि लीणा घटि घटि जोति तुम्हारी॥२॥ सिख मति सभ बुधि तुम्हारी मंदिर छाधा तेरे।। तुझ बिनु अवरु न जाणा मेरे साहिवा गुण गावा नित ते॥३॥ जीअजंत सभि ८८८ <><S ४४ YS सरणि तुम्हारी सरव चिंत तुधु पासे ॥ जो तुधु भात्र सोई चंगा इक नानक की अरदासे॥ ४ ॥२॥ <<

示公示公
१ ओं
जापु साहिब
众分会

४६ <<<< १ओं सतिगुर प्रसादि। ॥ जापु॥ श्री मुखवाक पातिसाही १०॥ छप छंद ।। त्व प्रसादि ।। चक्र चिहन अरु वरन जाति अरु पाति नहिन जिह ।। रूप रंग अरु रेख भेख कोऊ कहि न सकत किह ॥ अचल मूरति अनभउ प्रकास अमितोजि कहिज्जै ॥ कोटि इंद्र इंद्राण साहु साहाणि गणिज्जै ॥ त्रिभवण महीप सुर नर असुर नेत नेत बन तृण कहत ।। तव सरख नाम कथै कवन करम नाम बरनत सुमत ॥१॥ SAKSae <><> ४७ ए भुजंग प्रयात छंद ।। नमसत्वं अकाले॥ नमसत्वं कृपाले ॥ नमसतं अरूपे ॥ नमसतं अनूपे ॥२॥ नमसतं अभेखे ॥ नमसतं अलेखे ॥ नमसतं अकाए । नमसतं अजाए॥३॥ नमसतं अगंजे ॥ नमसतं अभंजे ।। नमसतं अनामे ॥ नमसतं अठामे ॥४॥ नमसतं अकरमं ॥ नमसतं अधरमं ॥ नमसतं अनामं ।। नमसतं अधामं ॥१॥ नमसतं अजीते ॥ नमसतं अभीते॥ नमसतं अवाहे ॥ नमसतं अढाहे ॥६॥ नमसतं अनीले ॥ नमसतं अनादे॥ नमसतं अछेदे ॥ नमसतं अगाधे ॥७॥ नमसतं अगंने ॥ नमसतं अभंजे ॥

५० ><><<< <<< नमो सरव रंगे ।। नमो सरव भंगे॥२२॥ नमो काल काले॥ नमसतसतु दिवाले।। नमसतं अबरने॥ नमसतं अमरने ॥२३॥ नमसतं जरारं ॥ नमसतं कृतारं ॥ नमो सरव धंधे ॥ नमो सत अबंधे ॥२४॥ नमसतं निरसाके॥ नमसतं निरवाके । नमसतं रहीमे ॥ नमसतं करीमे ॥२॥ नमसतं अनंते ॥ नमसतं महंते ॥ नमसतमतु रागे॥नमसतं सुहागे ॥२६॥ नमो सरव सोखं ॥ नमो सरब पोखं ॥ नमो सरव करता ॥ हरता ॥२७॥ नमो जोग जोगे ॥ नमो भोग भोगे॥ नमो सरव दियाले ॥ नमो सरब पाले ॥२८॥ <<< नमो सरब ॥ ५१ - चाचरी छंद ॥ त्व प्रसादि ।। अरूप हैं ॥ अनूप हैं॥ अजू हैं। अभू हैं ॥२६॥ अलेख हैं ॥ अमेख हैं। अनाम हैं ॥ अकाम हैं ॥३०॥ अधे हैं।। अमे हैं। अजीत हैं। अभीत हैं॥३१॥ त्रिमान हैं । निधान हैं । त्रिवरग हैं । असरग हैं ॥३२॥ अनील हैं । अनादि है। अजे हैं ॥ अजादि हैं ॥३३॥ अजनम हैं ।। अवरन हैं ॥ अभूत हैं । अभरन हैं ॥३४॥ अगंज हैं ॥ अभंज हैं। अझूझ हैं | अझझ हैं ॥३५॥ अमीक है ॥ रफीक हैं | अधंध है। अबंध हैं ॥३६॥निरबूझ है।। असूझ है। अकाल हैं ॥ अजाल हैं ॥३७॥ अलाह :

हैं ५२ SSHRSe<SPRON हैं ॥ अजाह हैं ॥ अनंत हैं !! महंत, हैं ॥३८॥ अलीक हैं । निरसीक हैं । निरलभ हैं ॥ असंभ हैं ॥३६॥ अगंम हैं | अजम हैं | अभूत हैं | अछूत हैं ॥४०॥ अलोक हैं ॥ असोक हैं। अकरम हैं। अभरम हैं॥४१॥ अजीत हैं। अभीत हैं। अबाह हैं। अगाह हैं ॥४२॥ अमान हैं। निधान हैं। अनेक हैं| फिरि एक हैं ॥४३॥ भुजग प्रयात छद॥ नमो सरव माने ॥ समसती निधाने।। ननो देव देवे ॥ अभेखी अभेवे ॥४४॥ नमो काल काले ॥ नमो सरब पाले ॥ नमो सरव गउणे ॥ नमो सरब <<<<<

५३
भउणे ॥४५॥ अनंगी अनाथे॥ निरसंगी ४
प्रमाथे॥ नमो भान भाने ॥ नमो मान
माने ॥४६॥ नमो चंद्र चंद्र ॥ नमो
भान भाने ॥ नमो गीत गीते ॥ नमो
तान ताने ॥४७॥ नमो नृत्त नृत्ते ॥ नमो
नाद नादे ॥ नमो पान पाने | नमो
वाद वादे ॥४८॥ अनंगी अनामे ।।
समसती सरूपे ॥ प्रभंगी प्रमाथे।
समसती विभूते ॥४६॥ कलंक बिना
नेकलंकी सरूपे । नमो राज राजेस्वरं
परम रूपे ॥५०॥ नमो जोग जोगेस्वरं
परम सिद्धे॥ नमो राज राजेस्वरं परम
वृद्धे ॥५१॥ नमो सस्त्रपाणे ॥ नमो N
अस्त्रमाणे ॥ नमो परम गिआता ॥
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५४
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नमो लोक माता ॥५२॥ अमेखी
अभरमी अभोगी अभुगते । नमो जोग
जोगेस्वर परम जुगते ॥५३॥ नमो नित्त
नागइणे क्रूर करमे ॥ नमो प्रेत अप्रेत
देवे सुधरमे ॥ ॥५४॥ नमो रोग हरता
नमो राग रूपे ॥ नमो साह साहं नमो
भूप भूपे ॥५५॥ नमो दान दाने नमो
मान मानं ॥ नमो रोग रोगे नमसतं
इसनानं ॥५६॥ नमो मंत्र मंत्र ॥ नमो
मंत्र जंत्रं ॥ नमो इसट इसटे ॥ नमो
तंत्र तंत्रं ॥५७॥ सदा सच्चदानंद सरवं
प्रणासी ॥ अनूपे अरूपे
सससतुल
निवासी ॥५८॥ सदा सिद्धदा बुद्धदा
बृद्ध करता ॥ अधो उरध अरधं अघं
Swachokaa

HoCH ओघ हरता ॥५६॥ परं परम परमेस्वरं प्रोछपालं ॥ सदा सरवदा सिद्ध दाता दिवालं ॥६०॥ अछेदी अभेदी अनामं अकामं ॥ समसतो पराजी समसतसतु धामं ॥६१॥ तेरा जोरु ॥ चाचरी छंद ॥ जले हैं। थले हैं। अभीत हैं अभे हैं ॥६२॥ प्रभू हैं॥ अजू हैं। अदेस हैं। अभेस हैं ॥६३॥ भुजंग प्रयात छंद ॥ अगाधे अबाधे।। अनंदी सरूपे । नमो सरव माने ॥ समसती निधाने ॥६४॥ नमसत्वं निरनाथे ॥ नमसत्वं प्रमाथे । नमसत्वं अगंजे ॥ नमसत्वं अभंजे॥६॥ क RS ५६ See नमसत्वं अकाले ॥ नमसत्वं अपाले ॥ नमो सरव देसे ॥ नमो सरव भेसे॥६६॥ नमो राज राजे ॥ नमो साज साजे ।। नमो शाह शाहे ।। नमो माह माहे॥६७|| नमो गीत गीते ॥ नमो प्रीत प्रीते ॥ नमो रोख रोखे।। नमो सोख सोख॥६॥ नमो सरव रोगे । नमो सरव भोगे॥ नमो सरव जीत।। नमो सरव भीत॥६६॥ नमो सरब गियानं ॥ नमो परम तानं ।। नमो सरव मंत्रं ॥ नमो सरव जंत्र॥७०॥ नमो सरब दृस्सं ॥ ननो सरव कृस्सं ॥ नमो सरव रंगे॥ त्रिमंगी अनंगे ॥७१॥ नमो जीव जीवं ॥ नमो बीज बीजे ॥ N अखिज्जे अभिज्जे समसतं <> ।

SCS प्रसिज्जे ॥७२॥ कृपालं सरूपे कुकरमं प्रणासी ॥ सदा सरवदा रिद्धि सिद्ध निवासी ॥७३॥ चरपट छंद ॥ त्व प्रसादि ।। अमृत्त करमे ॥ अवृत्त धरमे ॥ अखल्ल जोगे।। अचल्ल भोग।७४॥ अचल्ल राजे|| अटल्ल साजे | अखल्ल धरमं ॥ अलक्ख करमा॥७॥ सरवं दातासखं गिाता।। सरवं भाने ॥ सरवं माने ॥७६|| सरखं प्राणं ॥ सरवं त्राणं। सरेवं भुगता। सरवं जुगता ॥७७॥ सरवं देवं । सरवं भेवं ॥ सरवं काले ॥ सरवं पाले ॥७८|| रूआल छंद ॥ त्व प्रसादि ॥ आदि रूप अनादि मूरति अजोनि पुरख

Sc
अपार ॥ सरव मान त्रिमान देव अभेव
आदि उदार || सरव पालक सरप
घालक सरव को पुनि काल || जत्र तत्र
विराजही अवधूत रूप रसाल।।७६॥नाम
ठाम न जाति जाकर रूप रंग न रेख ॥
आदि पुरख उदार मूरति अजोनि आदि
असेख ॥ देस और न भेस जाकर रूप
रेख न राग ॥ जत्र तत्र दिसा विसा
हुइ फैलियो अनुराग ॥८०॥ नाम काम
विहीन पेखत धाम हू नहि जाहि ॥ सरब
मान सरवत्र मान सदैव मानत ताहि ॥
एक मूरति अनेक दरसन कीन रूप
अनेक ।। खेल खेल अखेल खेलन अंत
को फिरि एक ॥८१॥ देव भेव न
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५६
SHRSecome
जानही जिह वेद अउर कतेव ।। रूप
रंग न जाति पाति सुजानई किंह जेब ॥
तात मात न जात जाकर जनम मरन
बिहीन ॥ चक्र चक्र फिरै चतुर चक्क
मानही पुर तीन ॥२॥ लोक चौदह के
विखे जग जापही जिंह जाप ॥ आदि
देव अनादि मृरति थापिओ सबै जिंह
थापि ॥ परम रूप पुनीत भूरति पूरन
पुरख अपार।। सरव विस्त्र रचिो सुयं-
भव गड़न भंजनहार ।।८३॥ कालहीन
कला संजुगति अकाल पुरख अदेस ।।
धरम धाम सु भरम रहित अभूत अलख
अभेस | अंगराग नरंग जाकहि जाति
पाति न नाम ॥ गरव गंजन दुसट

. ६० Sear भंजन मुकति दाइक काम ||८४॥ आप रूप अमीक अन उसतति एक पुरख अवधृत ॥ गरव गंजन सरव भंजन आदि रूप असूत ॥ अंग हीन अभंग अनातम एक पुरख अपार ॥ सरव लाइक सरव घाइक सरव को प्रतिपार॥८॥ सरव गंता सरब हंता सरव ते अनभेख ॥ सरख सास्त्र न । जानही जिंह रूप रंगु अरु रेख ॥ परम वेद पुराण जाकहि नेत भाखत नित्त ।। कोटि सिंमृत पुरान सास्त्र न आवई बहु चित्त ॥८६॥ मधुभार छद ॥ त्व प्रसादि । गुन गन उदार ॥ महिमा अपार ।। <<<<<So 8 <<< ६१ <><SC आसन अभंग || उपमा अनंग ॥७॥ अनभउ प्रकास ॥ निसदिन अनास ॥ आजान बाह ॥ साहान साह ॥८॥ राजान राज ॥ भानान भान ॥ देवान देव ॥ उपमा महान ॥८६॥ इंद्रान इंद्र ॥ बालान बाल ॥ रंकान रंक ॥ कालान काल ॥६०॥ अनभूत अंग ॥ आभा अभंग ॥ गति मिति अपार ॥ गुन गन उदार ॥६॥ मुनि गन प्रनाम ॥ निरभै निकाम अति दुति प्रचंड ॥ मिति गति अखंड ॥ १२॥ आलिंस्य करम ॥ आहस्य धरम | सरवा भरणाढय ॥ अंनडंड बाढय ॥६॥ SEKA H ६२ Saex चाचरी छद ॥ त्व प्रसादि । गुविंदे ॥ मुकंदै ।। उदारे ॥ अपारे॥१४॥ हरीअं॥ करी। निरनाम।। अकाम||५|| भुजंग प्रयात छद ॥ चतर चक्र करता ।। चतर चक्र हरता ।। चतर चक्र दाने ॥ चतर चक्र जाने॥१६॥ चतर चक्र वरती ॥ चतर चक्र भरती॥ चतर चक्र पाले ॥ चतर चक्र काले ॥१७॥ चतर चक्र पासे ॥ चतर चक्र वासे ॥ चतर चक्र मानय।। चतर चक्र दानयाहि॥ चाचरी छद॥ न सत्र॥ न मित्र ॥ न भरमं ॥ न भित्र ॥६॥ न करमं ॥ न काए ॥ अजनमं ॥ अजाए ॥१००॥ न चित्रे ॥ FOKEN S रत्र ६३ N न मित्र॥ परे हैं पवित्र ॥१०१॥ पृथीस ॥ अदीस ॥ असै ॥ असे ॥१०२॥ भगवती छंद ॥ त्व प्रसादि कथते ॥ कि आछिज्ज देसै ॥ कि आभिज्ज भेस।। कि आगंज करमै ॥ कि आभज्ज भरमै ॥१०३॥ कि आभिज्ज लोके ॥ कि आदित्त सोके। कि अवधूत वरने कि विभृत करने ॥१०४॥ कि राज प्रभा हैं॥ कि धरमं धुजा हैं ॥ कि आसोक बरनै ॥ कि सरखा अभरने ॥१०॥ कि जगतं कृती हैं। कि छत्रं छत्री हैं। कि ब्रह्म सरूपै ॥ कि अनभउ अनुप ॥१०६॥ कि आदि गैबुल गैब ६४ 8 ~ अदेव हैं। कि आपि अभेव हैं। कि चित्रं विहीन ॥ कि एकै अधीने ॥१०७॥ कि रोजी रजाकै ॥ रहीमै रिहाकै ॥ कि पाक विव हैं। कि हैं ॥१०॥ कि अफूअल गुनाह हैं। कि शाहान शाह हैं ॥ कि कारन कुनिंद हैं। कि रोजी दिहद हैं ॥१०६॥ कि राजक रहीम हैं । कि करमं करीम हैं। कि सरवं कली हैं | कि सरवं दली हैं॥११०॥ कि सरबत्र मानिये | कि सरवत्र दानिय॥ कि सरबत्र गउनै ।। कि सरवत्र भउनै ॥१११॥ कि सरवत्र देसै ॥ कि सरबत्र भेसै ॥ कि सरवत्र राजै ॥ कि सरवत्र साजै ॥११२॥ कि ॥

६५ सरवत्र दीने॥ कि सरवत्र लीनै ॥ कि सरवत्र जाहो॥ कि सरवत्र भाहो||११३॥ कि सरवत्र देस। कि सरवत्र भेस। कि सरवत्र कालीकि सरबत्र पाले॥११४।। कि सरवनहंता॥ कि सरवत्र गंता। कि सरवत्र भेखी। कि सरबत्र पेरखी॥११॥ कि सरवत्र काजै॥ कि सरवत्र राजे॥ कि सरवत्र सोखे ॥ कि सरवत्र पोखे ॥११६।। कि सरवत्र त्राणे ॥ कि सरबत्र प्राणै | कि सरवत्र देसै ॥ कि ॥११७॥ कि सरवत्र मानिय ।। सदेवं प्रधानिय ॥ कि सरबत्र जापिये। कि सरवत्र थापियै ॥११॥ कि सरवत्र भाने || कि सरवत्र माने सरवत्र भेसे ६६ << कि सरवत्र इंद्र।। कि सरवत्र चंद्र॥११॥ कि सरवं कलीम।। कि परमं फहीम ।। कि आकल अलामै ॥ कि साहिब कलामै ॥१२०॥ कि हुसनल वजू हैं ।। तमामुल रुजू हैं ॥ हमेमुल सलामैं ।। सलीखत मुदामैं ॥१२१।। गनीमल शिकसते ॥गरीवुल परसतै ॥ बिलंदुल A मकानें | जमीनुल जमानें ॥१२२|| V तमीजुल तमामैं ॥ रुजल निधान हरीफुल अजीमैं।रजाइक यकीन।।१२३॥ अनेकुल तरंग हैं। अभेद हैं अभंग हैं। अजोजुल निवाज हैं। गनीमुल खिराज A हैं।।१२४॥ निरुकत सरूप हैं। त्रिमुकति बिभूत हैं । प्रभुगति प्रभा हैं। सुजुगति 11

६७
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सुधा हैं ॥१२॥ सदैवं सरूप हैं।
अभेदी अनुप हैं | समसतोपराज हैं।
सदा सरव साज हैं ॥१२६॥ समसतुल
सलाम हैं ॥ सदेवल अकाम हैं।
निरवाध सरूप हैं ॥ अगाध हैं अनूप
हैं ॥१२७|| ओअं आदि रूपे ॥ अनादि
सरूपै ॥ अनंगी अनामे || त्रिभंगी
त्रिकामे ॥१२८॥ त्रिवरगं त्रिवाधे।।
अगंजे अगाधे ॥ सुभं सरव भागे।
मु सरवा अनुरागे ॥१२॥ त्रिभुगत
सरूप हैं । अछिज्ज हैं अछूत हैं। कि
नरकं प्रणास हैं। पृथीउल प्रवास
हैं॥१३०॥ निरुकति प्रभा हैं। सदेवं
सदा हैं। विभुगति सरूप हैं। प्रजुगति

६८ <><><V अनूप है ॥१३१॥ निरुकति सदा हैं। विभुगति प्रभा हैं ।। अनउकति सरूप A हैं। प्रजुगति अनूप हैं ॥१३२॥ चाचरी छद ॥ अभग हैं। अनग हैं। अभेख हैं। अलेख है ॥१३३॥ अभरम है । अकरम हैं ॥ अनादि हैं। जुगादि हैं॥१३४॥ अजे हैं। अब हैं।। अभूत हैं ।। अधूत हैं ॥१३५।। अनास हैं। उदास हैं। अधंध हैं। अबंध हैं ॥१३६॥ अभगत हैं । विरकत हैं ॥ अनास हैं। प्रकास हैं ॥१३॥ निर्चित हैं। सुनित हैं ।। अलिक्ख हैं ॥ अदिक्ख हैं ॥१३८॥ अलेख हैं। अभेख हैं। Aaira ६८.६८ ६६ SHEEM अढाह हैं। अगाह हैं ॥१३६॥ असंभ हैं। अगंभ हैं।।अनील हैं। अनादि - हैं ॥१४०॥ अनित्त है । सुनित्त हैं। अजात हैं ॥ अजाद हैं ॥१४१॥ चरपट छंद ॥ त्व प्रमादि ।। सरवं हंता ॥ सरवं गंता ॥ सरवं खिाता॥ सरवं गिआता ॥१४२।। सरवं हरता ॥ सरवं करता ॥ सरवं प्राणं ।। सरखं त्राणं ॥१४३ ।। सरवं करमं ॥ सर घरमं ॥ सरवं जुगता। सरवं मुकता ॥१४४॥ रसावल छद ।। स्व प्रसादि । नमो नरक नासे ॥ सईचं प्रकासे ॥ अनंग सरूपे ॥ अभंगं विभूते ॥१४५|| ASMOK ७० है प्रमायं प्रमाये ॥ सदा सरव साथे। अगाध सरू। निरवाय विभूते॥१४६॥ अनंगी अनामे ॥ त्रिभंगी त्रिकामे || निरभंगी सरूपे।। सरबंगी अनूप।।१४७॥ न पोत्र न पुत्र ।। न सौ न मित्र । न ताते न मात॥न जातैन पाते॥१४॥ निरसा सरीक हैं ॥ अमितो अमीक हैं। सदैवं प्रभा हैं। अजै हैं अजा हैं ॥१४॥ भगवती छद ।। त्व प्रसादि ।। कि जाहर जहूर हैं ॥ कि हाजर हजूर है। हमेमुल सलाम हैं ॥ समसतुल कलाम हैं ।।१५०॥ कि साहिब दिमाग है। कि हुसनल चराग हैं। कि कामल Raeein <<<<

७१
EPS
करीम है। कि राजक रहीम है ।।१५१॥
कि रोजी दिहिंद हैं।। कि राजक रहिंद
हैं || करीमुल कमाल है। कि हुसनल
जमाल हैं ॥१५२१॥ गनीमुल खिराज
है । गरीवुल निवाज हैं। हरीफुल
शिकंन हैं ।। हिगसुल फिकन ह॥१५३।।
कलंक प्रणास हैं।। समसतुल निवास
है। अगंजुल गनीम हैं ॥ रजाइक
रहीम हैं ॥१५॥ समसतुल जुबां हैं।
कि साहिव किरा है । कि नरकं प्रणास
है। बहिसतुल निवास है।।१५।। कि
कि सरवुल गवंन हैं ॥ हमेसुल वन
हैं। तमामुल तमीज हैं ॥ समसतुल
अजीज हैं ॥१५६|| परं परम ईस हैं ।
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७२ RSS: समसतुल अदीस है ।। अदेसुल अलेख ॥ हमेसुल अभेख हैं ॥१५७॥ जमीनुल जमा हैं। अमीकुल इमा हैं । करीमुल कमाल है। कि जुरअति जमाल ॥१५८॥ कि अचलं प्रकास हैं। कि अमितो सुवास हैं ॥ कि अजब सरूप हैं।। कि अमितो विभूत हैं।।१५६।। कि अमितो पसा हैं। कि आतम प्रभा हैं॥ कि अचलं अनंग हैं। कि अमितो अभंग हैं ॥१६॥ मधुभार छंद ॥ त्व प्रसादि । मुनि मनि प्रनाम | गुनि गन मुदाम ॥ अरि वर अगंज। हरि नर प्रभंज॥१६१।। अन गन प्रनाम ।। मुनि मनि सलाम ॥

७३ N हरि नर अखंड। वर नर अमंड॥१६२॥ अनभव अनास || मुनि मनि प्रकास ॥ गुनि गन प्रनाम ॥ जल थल मुदाम ॥ १६३ ॥ अनछिज्ज अंग ॥ A आसन अभंग || उपमा अपार ।। गति मिति उदार ॥१६४॥ जल यल अमंड। दिस विस अभंड || जल थल महंत ॥ दिस विस विअंत ॥१६५ ॥ अनभव अनास ।। धृत घर धुरास ॥ आजान वाहु । एकै सदाहु ॥१६६॥ ओअंकार आदि ।। कथनी अनादि । खल खंड खियाल || गुरवर अकाल ॥१६७॥ घर परि प्रनाम ॥ चित चरन नाम ।। अनछिज्ज गात ॥ आजिज न SHREE ७४ : वात ॥१६॥ अनझम गात ॥ अनरंज बात ॥ अनटुट भंडार ॥ अनठट अपार ॥१६६॥ आडीठ धरम || अति ढीठ करम || अणवृण अनंत ॥ दाता महंत ॥१७०॥ हरिवोलमना छः ॥ त्व प्रसादि ॥ करुणालय है | अरि घालय हैं। खल खंडन हैं ॥ महि मंडन हैं ॥१७१॥ जगतेस्वर हैं | परमेस्वर हैं ॥ कलि कारण है ॥ सरव उवारण हैं ॥१७२।। धृत के धरण हैं | जग के करण हैं। मन मानिय हैं।। जग जानिय हैं ॥१७३॥ सरचं भर हैं॥ सरबं कर हैं। सरव पासिय हैं ॥ सरव नासिय हैं ।।१७४॥ eSitSSRA ७५ ॥ SEE SE करुणाकर हैं। विस्वंभर हैं | सरवेस्वर जगतेस्वर हैं।।१७५॥ ब्रह्मडस हैं । खल खंडस हैं । पर ते पर हैं | करुणाकर हैं ॥१७६॥ अजपाजप हैं || अथपाथप । अकृता कृत हैं ॥ अमृता मृत हैं॥१७७॥ अमृता मृत ॥ करुणा कृत हैं ॥ अकृता कृत हैं ॥ धरणी धृत हैं ॥१७॥ अमृतेस्सर हैं।। परमेस्वर ॥ अकृता कृत हैं ॥ अमृता मृत है ॥१७६॥ अजवा कृत है ॥ अमृता अमृत है ॥ नर नाइक हैं । खल घाइक हैं ॥१८०॥ विस्वंभर हैं | करुणालय नृप नाइक हैं। सरव पाइक हैं ॥१८॥ भव भंजन हैं | अरि गंजन हैं । रिपु NSce>s ७६ Sic: तापन है ॥ जपु जापन है ॥१८२॥ V अकलं कृत हैं ॥ सरवा कृत है | करता कर हैं | हरता हरि हैं ॥१८३॥ परमातम हैं। सरवातम हैं | आतम वस है | जस के जस है ॥१८४॥ भुजग प्रयात छद ।' नमो सूरज सूरजे नमो चंद्र चंद्रे ॥ नमो राज राजे नमो इंद्र इंद्रे ।। नमो अंधकारे नमो तेज तेजे ॥ नमो बृद बृदे नमो वीज वीजे ॥१८॥ नमो राजसं तामसं सांत रूपे ॥ नमो परम तत्तं अतत्तं सरूपे । नमो जोग जोगे नमो गियान गियाने।। नमो मंत्र मंत्रे नमो धिान aa><ira<<><A ७७ धियाने ॥१८६॥ नमो जुद्ध जुद्धे नमो गियान गियाने ॥ नमो भोज भोजे नमो पान पाने || नमो कलह करता नमो सांत रूपे ॥ नमो इंद्र इंद्र अनादं विभूते ॥१८७|| कलंकार रूपे अलंकार अलंके ।। नमो आस आसे नमो बांक बंके | अभंगी सरूपे अनंगी अनामे ।। त्रिभंगी त्रिकाले अनंगी अकामे ॥१८८ एक अछरी छंद ॥ अजे।। अले ।। अभै ॥ अवै ॥१८॥ अभू ।।अजू ॥अनासा अकास॥१६०।। अगंज ॥ अलक्ख ॥ अभक्ख ॥१६१॥ अकाल | दिपाल । अलेख ॥ अभेख ॥१६२॥ अनाम ॥ SARA >>RA अभंज॥

अनाथे ॥ ७८ >>>> अकाम ! अगाह ।। अढाह ॥१६॥ प्रमाथे ॥ अजोनी ।। अमोनी ॥१६४॥ न रागे ।। न रंगे । न रूपे । न रेखे ॥१६॥ अकरमे ।। अभरमें ॥ अगॅजे ॥ अलेखे ॥११६॥ भुजग प्रयात छद॥ नमसतुल प्रणामे समसतुल प्रणासे ॥ अगंजुल अनामे समसतुल निवासे ।। निरकामं विभृते समसतुल सरूपे । कुकरमं प्रणासी सुधरमं विभूते ।।१६७॥ सदा सच्चिदानंद सत्रं प्रणासी ॥ करीमुल कुनिंदा समसतुल निवासी। A अजाइन विभूते गजाइव गनीमे ॥ हरीअं करीअं करीमुल रहीमे ॥१८॥ Sachin >>>> S

७६
चतर चक्र वरती चतर चक्र भुगते।
सुयंभव सुभं सरबदा सरव जुगते ।।
दुकालं प्रणासी दिवालं सरूपे ॥
सदा अंग संगे अभंग विभृते ॥१६६।।
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१ ओं
त्वप्रसादि सवय्ये
-
SH

८२ १ औं वाहिगुरु जी की फतह ॥ त्वप्रसादि सवय्ये साग सुद्ध समूह सिद्धान के देखि फिरिओ घर जोग जती के।। सूर सुरारदन सुद्ध सुधादिक संत समूह अनेक मती के ॥ सारे ही देस को देखि रहिओ मत कोऊन देखीयत प्रानपती के ॥ श्री भगवान की भाइ कृपा हू ते एक रती विनु एक रती के ॥१॥ माते मतंग जरे जर संग अनूप उतंग सुरंग सवारे ॥ कोट तुरंग कुरंग कूदत पउन के गउन को जात निवारे ॥ भारी भुजान के भूप भली से ८३ विधि नियावत सीस न जात विचारे।। एते भए तु कहा भए भूपति अंत को नांगे ही पांइ पधारे ॥२॥ जीत फिर सब देस दिसान को वाजत ढोल मृदंग नगारे ॥ गुंजत गूड़ गजान के सुंदर हिंसत हैं हयराज हजारे । भूत भविक्ख भवान के भूपत कउनु गने नहीं जात विचारे ॥ श्री पति श्री भगवान भजे विनु अंत को अंत के धाम सिधारे ॥३॥ तीरथ नान दइया दम दान सु संजम नेम अनेक विसेखे ॥ वेद पुरान कतेत्र कुरान जमीन जमान सबान के पेखे ॥ पउन अहार जती जत धार सबै <AN ८४ SEKSocV सु बिचार हजार क देखे ॥ श्री भगवान भजे विनु भूपति एक रती विनु एक न लेखे ॥४॥ सुद्ध सिपाह दुरंत दुवाह सु साज सनाह दुरजान दलैगे॥ भारी गुमान भरे मन मै कर परवत पख हले न हलैंगे। तोरि अरीन मगेरि मवासन माते मतंगनि मान मलेंगे॥ श्री पति श्री भगवान कृपा बिनु तिघागि जहान निदान चलेंगे॥५॥ वीर अपार वडे वरार अविचारहि सार की धार भछय्या ॥ तोरत देस मलिंद मवासन माते गजान के मान मलय्या ॥ गाहे गढान को तोड़न हार Risit:

८५ सु वातन ही चक चार लवय्या ॥ साहिबु श्री सभ को सिरनाइक जाचक अनेक सु एक दिवय्या ॥६॥ दानव देव फनिंद निसाचर भूत भविक्ख भवान जपेंगे। जीव जिते जल में थल मै पल ही पल मै सब थाप थपेंगे॥ पुन प्रतापन वाढ जयति धुन पापन के बहु पुज खपेगे॥ साध समूह प्रसंन फिरै जग सत्र सभ अवलोक चगे ॥७॥ मानव इंद्र गजिंद्र नराधप जौन त्रिलोक को राज करेंगे। कोटि सनान गजादिक दान अनेक सुअंबर साज वरेंगे॥ ब्रह्म महेसर विसन सचीपति SSSHRA ८६ >>>> अंत फसे जम फास परेंगे || जे नर श्रीपति के परस हैं पग ते नर फेर न देह धरेंगे ॥८॥ कहा भयो जो दोऊ लोचन मूद कैठि रहियो बक धिान लगाइयो । न्हात फिरिओ लीए सात समुद्रनि लोक गयो परलोक गवाइयो॥ वास कीओ विखिान सों बैठ के ऐसे ही ऐसे सु बैस विताइनो ॥ साचु कहाँ सुन लेहु सभै जिन प्रेम कीओ तिन ही प्रभ पाइओ ॥६॥ काहू लै पाहन पूज धरयो सिर काह लै लिंग गरे लटकाइयो काहू लखिो हरि अवाची दिसा महि काहू ह << <<< ८७ पछाह को सीसु निवाइयो। कोऊ बुतान को पूजत है पसु कोऊ मृतान को पूजन धाइयो । उरझियो सभही जग श्री भगवान को भेदु न पाइओ ॥१०॥ कर क्रिया स

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१ ओं
अनंदु साहिब
ब
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९० • << रामकली महला ३ अनंदु १ ओं सतिगुर प्रसादि ॥ मों सतिगुर अनंदु भइया मेरी माए सतिगुरू पाइला ॥ सतिगुरु त पाइा सहज सेती मनि वजीश्रा वाधाईआ॥ राग रतन परवार परीश्रा सबद गावण आईआसबदो त गावहु हरी केरा मनि जिनी वसाइया ॥ कहै नानकु अनंदु होआ सतिगुरू मै पाइआ ॥१॥ ए मन मेरिआ तू सदा रहु हरि नाले ॥ हरि नालि रहु तू मन मेरे दुख सभि AN ॥ विप्सारणा । अंगीकारु ओहु करे तेग कारज सभि सवारणा॥ सभना गला समरथु पुामी सो किउ मनहु विसारे । कहै नानकु मन मेरे सदा रेहु हरि नाले ॥२॥ साचे साहिबा किया नाही घरि तेरै ॥ घरि त तेरै सभु किछु है जिमु देहि सु पावए ॥ सदा सिफति सलाह तरी नामु मनि वसावए ॥ नामु जिन के मनि वसिया वाजे सवद घनेरे ॥ कहै नानकु सचे साहिब किया नाही साचा नामु मेरा आधारो॥ साचु नाम अधारु मेरा जिनि भुखा सभि गवाईआ॥ करि सांति सुख मनि आइ वसिया जिनि इछा समि S घरि तेरे ॥३॥ E- ६० ><><>< रामकली महला ३ अनंदु <<<<< 2:00 १ ओं सतिगुर प्रसादि ॥ अनंदु भइया मेरी माए सतिगुरू मै पाइया ॥ सतिगुरु त पाइा सहज सेती मनि वजीमा वाधाईआ ॥ राग रतन परवार परीश्रा सवद गावण आईआ॥ सबदो त गावहु हरी केरा मनि जिनी वसाइना ॥ कहै नानकु अनंदु होआ सतिगुरू मै पाइला ॥१॥ ए मन मेरिया तू सदा रहु हरि नाले ॥ हरि नालि रहु तू मंन मेरे दूरख समि <dia

६१
६४
विसारणा ॥ अंगीकारु बोहु करे तेग ४
कारज सभि सवारणा ॥ सभना गला
समरथु पुनामी सो किउ मनहु विसारे ।
कहै नानकु मंन मेरे सदा रेहु हरि
नाले ॥२॥ साचे साहिवा किया नाही
घरि तेरै॥ घरि त तेरै सभु किछु है
जिमु देहि सु पावए ॥ सदा सिफति
सलाह तेरी नामु मनि वसावए ॥ नामु
जिन के मनि बसिया वाजे सबद घनेरे ॥
कहै नानकु सचे साहिब किया नाही
घरि तेरै ॥३॥ साचा नामु मेरा
आधारो॥ साचु नामु अधारु मेरा
जिनि भुखा सभि गवाईला ॥ करि सांति
सुख मनि आइ वसिया जिनि इछा समि
>>>

६२ SeSakeSpace पुजाइआ ॥ सदा कुरवाणु कीता गुरू विटहु जिस दीया एहि वडिआईआ॥ कहै नानकु सुणहु संतहु सबदि धरहु पिआरो॥ साचा नामु मेरा आधारो॥४॥ वाजे पंच सबद तितु घरि सभागे ॥ घरि सभागै सबद वाजे कला जितु घरि धारीया ॥ पंच दूत तुधु वसि कीते कालु कंटकु मारिया ॥ धुरि करमि पाइला तुधु जिन कउ सि नामि हरि लागे। कहै नानकु तह सुखु होत्रा तितु घरि अनहद वाजे ॥ ५॥ साची लिवे बिनु देह निमाणी ॥ देह निमाणी लिवै वाझहु किया करे वेचारीश्रा | तुधु ४ बामु समरथ कोइ नाही कृपा करि SONOKRSHA E:

बनवारीया | एस नउ होरु थाउ नाही सदि लागि सवारीबा ॥ कहै नानकु लिवै वाझहु किया करे वेचारीया ॥६॥ आनंदु आनंदु सभु को कहै आनंदु गुरु ते जाणिया ॥ जाणिया आनंदु सदा गुर ते कृपा करे पिारिश्रा ॥ करि किरपा किलविख कटे गिआन अंजनु सारिया ॥ अंदरहु जिन का मोहु तुटा तिन का सबदु सचै सवारिआ । कहे नानकु एहु अनंदु है आनंदु गुर ते जाणिया ॥७॥ बाबा जिसु तू देहि सोई जनु पावै ॥ पावै त सो जनु देहि जिस नो होरि किया करहि वेचारित्रा। - इक भरमि भूले फिरहि दह दिसि >>PA >>>>><A ॥

६४
Vi><Site
इकि नामि लागि सवारिया || गुर
परसादी मनु भइया निरमलु जिना
भाणा भावए । कहै नानकु जिसु देहि
पिआरे सोई जनु पावए ॥८॥ श्रावहु
संत पिारिहो अकथ की करह कहाणी ॥
करहा कहाणी अकथ केरी कितु दुआरे
पाईऐ ॥ तनु मनु धनु सभु सउपि गुर
कउ हुकमि मंनिऐ पाईऐ ॥ हुकमु
मंनिहु गुरू केरा गावहु सची वाणी ॥
कहै नानकु सुणहु संतहु कथिहु अकथ
कहाणी ।।६|| ए मन चंचला चतुगई
किने न पाइया ॥ चतुराई न पाइआ
किनै तू सुणि
मंन मेरिआ ॥ एह
माइया मोहणी जिनि एतु भरमि
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<<<<<
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६५
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भुलाइया॥ माइया त मोहणी तिने /
कीती जिनि ठगउली पाईया ।। कुरवाणु
कीता तिसे विटहु जिनि मोहु मीठा
लाइया || कहे नानकु मन चंचल
चतुराई किनै न पाइना ॥१०॥ ए मन
पिारिश्रा तू सदा सचु समाले | एहु
कुटुबु तू जि देखदा चले नाही तेरे
नाले ॥ साथि तेरे चले नाही तिसु
नालि किउ चितु लाईऐ ॥ ऐसा कंमु
मूले न की जितु अंति पछोताईए
सतिगुरू का उपदेषु सुणि तू होवे तेरै
नाले ॥ कहे नानकु मन पिआरे तू सदा
सचु समाले ॥११॥ अगम अगोचरा तेरा
अंतु न पाइया । अंतो न पाइया किने
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६६ VaticSEEKS तेरा आपणा आपु तू जाणहे ।। जीy जत सभि खेलु तेरा किआ को आखि A वखाणए ॥ आखहि त वेखहि सभु तू है जिनि जगतु उपाइा ॥ कहै नानकुतू सदा अगंमु है तेरा अंतु न पाइया॥१२॥ मुरि नर मुनि जन अंमृतु खोजदे सु अंमृतु गुर ते पाइआ॥ पाइया अंमृतु गुरि कृपा कीनी सचा मनि बसाइआ ।। जीअ जंत सभि तुधु उपाए इकि वेखि परसणि आइत्रा ॥ लवु लोभु अहंकारु चूका सतिगुरू भला भाइबा ॥ कहै नानकु जिस नो आपि तुठा तिनि अंमृतु गुरु ते पाइया ॥१३॥ भगता की चाल निराली ॥ चाला निराली भगताह केरी Sach ><<<<

१७
॥
विखम मारगि चलणा ॥ लवु लोभु
अहंकारु तजि तृसना बहुतु नाही
बोलणा ॥ खंनिअहु तिखी वालहु
निकी एतु मारगि जाणा ॥ गुर परसादी
जिनी आपु तजिया हरि वासना
* समाणी ॥ कहै नानकु चाल भगता
जुगहु जुगु निराली ॥१४॥ जिउ
तू
चलाइहि तिव चलह सुनामी होरु किया
जाणा गुण तैरे ॥ जिव तू चलाइहि
तिवै चलह जिना मारगि पावहे ॥ करि
किरपा जिन नामि लाइहि सि हरि हरि
सदा धिप्रावहे ॥ जिसनो कथा
मुणाइहि आपणी सि गुर दुआरे सुखु
पावहे । कहै नानकु सचे साहिव जिउ
A

४८
Vine
भावै तिवै चलावहे ॥१॥ एहु सोहिला
सवदु सुहावा ॥ सवदो सुहावा सदा
सोहिला सतिगुरू सुणाइत्रा ॥
एहु तिन के मंनि बसिया जिन धुरहु
लिखिया अाइना॥ इकि फिरहि घनेरे
करहि गला गली किनै न पाइा ॥
कहै नानकु सबदु सोहिला सतिगुरू
सुणाइबा ॥१६॥ पवितु होए से जना
जिनी हरि धिाइया ॥ हरि धिाइया
पवितु होए गुरमुखि जिनी धिवाइया॥
पवितु माता पिता कुटंब सहित सिउ
पवितु संगति सबाईआ॥ कहदे पवितु
सुणदे पवितु से पवितु जिनी मंनि ४
वसाइना ॥ कहै नानकु से पवितु जिनी.
Nag Shik
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गुरमुखि हरि हरि धिवाइया ॥१७॥ करमी सहजु न ऊपजे विणु सहजै सहसा न जाइ ॥ नह जाइ सहसा कितै संजमि रहे करम कमाए ॥ सहसै जीउ मलीणु है कितु संजमि धोता जाए। मनु धोबहु सबदि लागहु हरि सिउ रहहु चितु लाइ ॥ कहे नानकु गुर परसादी सहजु उपजे इह सहसा इब जाइ ॥१८॥ जीबहु y मैले बाहरहु निरमल ॥ बाहरहु निरमल जीबहु त मैले तिनी जनमु जूऐ हारिया ।। एह तिसना बडा रोगु लगा मरणु मनहु विसारिया ॥ वेदा महि नामु उतमु सो सुणहि नाही फिरहि जिउ बेताजिया ॥ कहे नानकु जिन सचु M

१००
Sta
तजिया कूड़े लागे तिनी जनमु जूऐ
हारिया ॥१६।। जीबहु निरमल वाहरहु
निरमल ।। बाहरहु त निरमल जीबहु
निरमल सतिगुर ते करणी कमाणी ।।
कूड़ की सोइ पहुचे नाही मनसा
सचि समाणी ॥ जनम रतनु जिनी
खटिया भले से वणजारे ।। कहै नानकु
जिन मंनु निरमलु सदा रहहि गुर
नाले ॥२०॥ जे को सिखु गुरू सेती
सनमुखु होवै ॥ हो त सनमुखु सिखु
कोई जीअहु रहै गुर नाले गुर के
चरन हिरदै धिपाए अंतर आतमे
समाले । आपु छडि सदा रहै परण
- गुर विनु अवरु न जाणे कोए । कहै
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Saama १०१ >>> नानकु सुणहु संतहु सो सिखु सनमुखु होए ।।२१।। जे को गुर ते वेमुखु होवै विनु सतिगुर मुकति न पावै॥ पावै मुकति न होरथै कोई पुछहु विवेकीया जाए । अनेक जूनी भरमि आवे विणु सतिगुर मुकति न पाए । फिरि मुकति पाए लागि चरणी सतिगुरू सवदु सुणाए । कहै नानकु वीचारि देखहु विणु सतिगुर मुकति न पाए ॥२२॥ आवहु सिख सतिगुरू के पियारिहो गावहु सची वाणी ।। वाणी त गावहु गुरू केरी वाणीया सिरि वाणी || जिन कउ नदरि कर होवे हिरदै तिना समाणी ॥ पीबहु अंमृतु सदा रहहु हरि << ८:: १०२ <><>< रंगि जपिहु सारिगपाणी॥ कहै नानकु सदा गावहु एह सची वाणी ॥२३॥ सतिगुरू विना होर कची है वाणी ॥ वाणी त कची सतिगुरू वाझहु होर कची वाणी॥ कहदे कचे सुणदे कचे कची आखि वखाणी॥ हरि हरि नित करहि रसना कहिया कळू न जाणी ॥ चितु जिन का हिरि लइया माझ्या वोलनि पए रवाणी ॥ कहै नानकु सतिगुरू बामहु होर कची वाणी ॥२४॥ गुर का सबदु रतनु है हीरे जितु जड़ाउ। सवदु रतनु जितु मंनु लागा एहु होत्रा समाउ ॥ सबद सेती मनु मिलिया सचै A लाइा भाउ ॥ आपे हीरा रतनु अापे sºi sº vs ८.<< १०३ जिसनो देइ बुझाइ ॥ कहै नानकु सबदु रतनु है हीरा जितु जड़ाउ ॥२॥ सिव सकति आपि उपाइकै करता आपे हुकम वरताए । हुकम वरताए आपि वेखे गुरमुखि किसे बुझाए ॥ तोड़े बंधन होवै मुकतु सवदु मंनि बसाए । गुरमुखि जिसनो आपि करे सु होवै एकस सिउ लिवलाए ॥ कहै नानकु आपि करता आये हुकम बुझाए ॥२६॥ सिमृति सासत्र पुन पाप चोचारदे ततै सार न जाणी॥ ततै सार न जाणी गुरू वाझहु तते सार न जाणी॥ तिही गुणी संसारु भ्रमि सुता सुतिया रेणि विहाणी ॥ गुर किरपा ते से जन जागे <> A

१०४
SSSS:
जिना हरि मनि वसिया बोलहि अंमृत
वाणी ॥ कहै नानकु सो ततु पाए जिस
नो अनदिनु हरि लिव लागै जागत रेणि
विहाणी ॥२७॥ माता के उदर महि
प्रतिपाल करे सो किउ मनहु विसारीऐ ।
मनहु किउ विसारीऐ एवड दाता जि
अगनि महि आहारु पहुचावए ।
ओस नो किहु पोहि न सकी जिसनउ
आपणी लिव लावए ॥ आपणी लिव
आपे लाए गुरमुखि सदा समालीऐ॥
कहै नानकु एवडु दाता सो किउ मनहु
विसारीऐ ॥२८॥ जैसी अगनि उदर
महि तैसी बाहरि माइया॥ माइया y
अगनि सभ इको जेही करतै खेलु
SOKHARA
<<<<<

१०५
रचाया। जातिसु भाणा ता मिश्रा
परवारि भला माझ्या ॥ लिव छुड़की
लगी तृसना माझ्या अमर वरताइवा॥
एह माइया जितु हरि विसरै मोहु उपजै
भाउ दूजा लाइआ॥ कहै नानकु गुर
परसादी जिना लिव लागी तिनी विचे
माइला पाइया ॥२६॥ हरि प्रापि
अमुलकु है मुलि न पाइआ जाइ ।। मुलि
न पाइथा जाइ किस विटहु रहे लोक
विललाइ ॥ ऐसा सतिगुरु जे मिले
तिसनो सिरु सउपीऐ विचहु आपु
जाइ । जिसदा जीउ तिसु मिलि रहै हरि
वस मनि आइ ॥ हरि आपि अमुलकु
भाग तिना के नानका जिन हरि पले
SHRA
>>
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१०६
Sha
पाइ ॥३०॥ हरि रासि मेरी मनु
वणजारा ।। हरि रासि मेरी मनु वणजारा
सतिगुर ते रासि जाणी॥ हरि हरि नित
जपिहु जीबहु लाहा खटिहु दिहाड़ी।
एहु घनु तिना मिलिया जिन हरि आये
भाणा ॥ कहै नानकु हरि रासि मेरी मनु
होश्रा वणजारा ॥३१॥ ए रसना तू
अनरसि राचि रही तेरी पिप्राप्त न
जाइ ॥ पिास न जाइ होरतु कितै
जिचरु हरि रसु पले न पाइ ॥ हरि
रसु पाइ पले पीऐ हरि रसु बहुड़ि न
तृसना लागै आइ ।। एहु हरि रसु करमी
पाईऐ सतिगुरु मिले जिसु आइ । कहै
नानकु होरि अन रस सभि वीसरे जा हरि
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१०७
ए
वसै मनि आइ ॥३२॥ ए सरीरा मेरिया
हरि तुम महि जोति रखी ता तू जग महि
आइया । हरि जोति रखी तुधु विचि
ता तू जग महि आइया ॥ हरि प्रापे
माता आपे पिता जिनि जीउ उपाइ
जगतु दिखाइआ॥ गुर परसादी बुझिया
ता चलतु होया चलतु नदरी आडा॥
कहै नानकु सृसटि का मूलु रचित्रा
जोति राखी ता तू जग महि
आइया ॥३३॥ मनि चाउ भइया प्रभ
आगमु सुणिा ॥ हरि मंगलु गाउ
सखी गृहु मंदरु वणिया ॥ हरि गाउ
मंगलु नित सखीए सोगु दुखु न
विश्रापए ॥ गुर चरन लागे दिन सभागे
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हरि रसु देते १०८ SSSS आपणा पिरु जापए ॥ अनहत वाणी गुर सबदि जाणी हरिनामु भोगो॥ कहै नानकु प्रभु आपि मिलिया करण कारण जोगो॥३४॥ ए सरीरा मेरिया इसु जग महि आइ के किआ तुधु करम कमाइया॥ कि करम कमाइया तुधु सरीरा जा तू जग महि आइत्रा॥ जिनि हरि तेरा रचनु रचित्रा सो हरि मनि न वसाइया ॥ गुर परसादी हरि मंनि वसिआ पूरवि लिखिा पाइया॥ कहै नानकु एहु सरीरु परवाणु होत्रा जिनि सतिगुर सिउ चितु लाइा॥३५॥ ए नेत्रहु मेरिहो हरि तुम महि जोति धरी हरि विनु अवरु न देखहु कोई ।। Saira<<<A :

१०६ हरि विनु अवरु न देखहु कोई नदरी हरि निहालिया ।। एहु विसु संसारु तुम देखदे, एह हरि का रूप है हरि रूपु नदरी आइया । गुर परसादी बुझिया जा वेखा हरि इकु है हरि बिनु, अवरु न कोई ।। कहै नानक एहि नेत्र अंध से सतिगुरि मिलिऐ दिव इसटि होई ॥३६॥ ए सवणहु मेरिहो साचै सुनणे नो पठाए ॥ साचै सुनण नो पठाए सरीरि लाए सुणहु सति वाणी ॥ जितु सुणी मनु तनु हरिश्रा होया रसना रसि समाणी ।। सचु अलख विडाणी ताकी गति कही न जाए। कहै नानकु अंमृत A नामु सुणहु पवित्र होबहु साचे सुनणे नो

११०
Sne
पठाए ॥३७॥ हरि जीउ गुफा अंदरि
रखिक वाजा पवणु वजाइना ।।
वजाइआ वाजा पउण नउ दुआरे परगटु
कीए दसवा गुपतु रखाइया ॥ गुर
दुआरे लाड भावनी इकना दसवा
दुधारु दिखाइया ॥ तह अनेक रूप
नाउ नव निधि तिस दा अतुन जाई
पाइआ ॥ कहै नानकु हरि पिया जीउ
गुफा अंढरि रखिकै वाजा पवणु
वजाडा ॥३८॥ एहु साचा सोहिला
साचे घरि गावहु ॥ गावहु त सोहिला
घरि साचे जिथे सदा सचु धिभावहे ॥
सचो धिप्रावहि जा तुधु भावहि गुरमुखि
जिना बुझावहे । इहु सचु सभना का
ले
६८

१११
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खसम है जिसु वखसे सो जनु पावहे ।।
कहै नानकु सचु सोहिला सचे घरि
गावहे ॥३६॥ अनदु सुणहु वड
भागीहो सगल मनोरथ पूरे ॥ पारब्रहमु
प्रभु पाइया उतरे सगल विसूरे ॥ दूरख
रोग संताप उतरे सुणी सची वाणी।।
संत साजन भए सरसे पूरे गुर ते जाणी॥
सुणते पुनीत कहते पवितु सतिगुरु रहिया
भरपूरे ॥ विनवंति नानकु गुर चरण
लाग बाजे अनहद तू ॥४०॥१॥

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१ ओ
रहरासि
一
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११४
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रहरासि
सो दरु रागुआसा महला १
१ ओं सतिगुर प्रसादि ॥
सो दरु तेरा केहा सो घरु कहा
जितु वहि सरव समाले ॥ वाजे तेरे नाद
अनेक असंखा केते तेरे वावणहारे ॥
केते तेरे राग परी सिउ कहीअहि केते तेरे
गावणहारे ।। गावनि तुधनो पवणु पाणी
बैसंतरु गावै राजा धरम दुआरे॥ गावनि
तुधनो चितु गुपतु लिखि जाणनि लिखि
लिखि धरमु वीचारे ॥ गावनि तुधनो
ईसरु ब्रहमा देवी सोहनि तेरे सदा सवारे।।
SwaSePRESEA
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<<

११५
गावनि तुधनो इंद्र इंद्रासणि बैठे
देवतिश्रा दरि नाले ॥ गावनि तुधनो
सिध समाधी अंदर गावनि तुधनो साध
वीचारे ॥ गावनि तुधनो जती सती
संतोखी गावनि तुधनो वीर करारे ।
गावनि तुधनो पंडित पड़नि रिखीसुर
जुगु जुगु वेदा नाले ॥ गावनि तुधनो
मोहणीमा मनु मोहनि सुरगु मछु
पझ्याले ।। गावनि तुधनो रतन उपाए
तेरे अठसठि तीरथ नाले ॥ गावनि
तुधनो जोध महावल सूरा गावनि तुधनो
खाणी चारे ।। गावनि तुधनो खंड
मंडल ब्रहमंडा करि करि रखे तेरे धारे ।
* सेई तुधनो गावनि जो तुधु भावनि रते
o

११६ <ioe तेरे भगत रसाले ।। होरि केते तुधनो गावनि से मै चिति न आवनि नाना किया वीचारे ॥ सोई सोई सदा सचु साहिबु साचा साची नाई ।। है भी होसी जाइ न जासी रचना जिनि रचाई । रंगी रंगी भाती करि करि जिनसी माइया जिनि उपाई॥ करि करि देखे कीता आपणा जिउ तिसदी चडिआई॥ जो तिसु भाव सोई करसी फिरि हुकमु न करणा जाई ॥ सो पातिसाहु साहा पति साहिबु नानक रहणु रजाई ॥१॥ आसा महला १॥ सुणि वडा पाखे सभु कोइ ॥ केवडु वहा डीठा होइ॥ कीमति पाइ न कहिया 18 ११७ <<<< जाइ || कहणे वाले तेरे रहे समाइ ॥१॥ वडे मेरे साहिबा गहिर गंभीरा गुणी गहीरा || कोइ न जाणे तेरा केता केवडु चीरा ॥१॥ रहाउ॥ सभि सुरती मिलि सुरति कमाई ॥ सभ कीमति मिलि कीमति पाई ॥ गियानी धिपानी गुर A गुरहाई ॥ कहणु न जाई तेरी तिलु वडिआई ॥२॥ सभि सत सभि तप सभि चंगिआईआ ॥ सिधा पुरखा कीया वडिआईआ॥ तुधु विगु सिधी किन न पाईआ॥ करमि मिले नाही ठाकि रहाईआ ॥३॥ आखण वाला किया वेचारा | सिफती भरे तेरे भंडारा || जिसु तू देहि तिस ११८ ८६ किआ चारा || नानक सचु सवारण हारा॥४॥२॥ आसा महला ११ प्राखा जीवा विसरै मरि जाउ ॥ आखणि अउखा साचा नाउ ॥ साचे नाम की लागे भूख ।। उतु भूखै खाइ चलीअहि दूख ॥१॥ सो किउ विसरै मेरी माइ॥ साचा साहिबु साचे नाइ ॥१॥ रहाउ । साचे नाम की तिलु वडिआई ॥ आखि थके कीमति नही पाई ॥ जे सभि मिलि के आखण पाहि ॥ वडा न होवै घाटि न जाइ ॥२॥ ना श्रोहु मरै न होवै सोगु॥ देदा रहै न चूकै भोगु ॥ गुणु एहो होरु नाही goddeoA ६८ <><<< ><><><><be a कोइ ॥ ना को होश्रा ना को होइ ॥३॥ * जेवडु आपि तेवड तेरी दाति ॥ जिनि दिनु करि के कीती राति ॥ खसमु विसारहि ते कमजाति ॥ नानक नावै वामु सनाति ॥४॥३॥ रागु गूजरी महला ४॥ हरि के जन सतिगुर सतपुरखा विनउ करउ गुर पासि ॥ हम कीरे किरम सतिगुर सरणाई करि दइया नामु परगासि ॥१॥ मेरे मीत गुरदेव मो कउ राम नामु परगासि ॥ गुरमति नामु मेरा प्रानसखाई हरि कीरति हमरी रहरासि ॥१॥ रहाउ ॥ हरि जन के वड * भाग वडेरे जिन हरि हरि सरधा हरि ६ 1><><><><> ८ १२० Aachar पिपास ॥ हरि हरि नामु मिले तृपतासहि मिलि संगति गुण परगासि ॥२॥ जिन हरि हरि हरिरसु नाम न पाइबा ते भागहीण जम पासि ।। जो सतिगुर सरणि संगति नहीं आए धृगु जीवे धृगु जीवासि ॥३॥ जिन हरि जन सतिगुर संगति पाई तिन धुरि मसतकि लिखिा लिखाप्ति ॥ धनु धंनु सतसंगति जितु हरिरसु पाइया मिलि जन नानक नाम परगासि ॥४॥४॥ रागु गूजरी महला ५॥ काहे रे मन चितवहि उदमु जा आहरि हरि जीउ परिश्रा ॥ सैल पथर महि जंत उपाए ता का रिजकु श्रागै करि >>>> ><><

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१२२
१८e<></
रागु भासा महला ४ सो पुरखु
si*
१ ओं सतिगुर प्रसादि ॥
सो पुरखु निरंजनु हरि पुरखु निरंजनु
हरि अगमा अगम अपारा || समि
धित्रावहि सभि धिप्रावहि तुधु जी हरि
सचे सिरजणहारा ॥ सभि जी तुमारे
जीतू जीया का दातारा। हरि धियाबहु
संतहु जी सभि दुख विसारणहाग ।।
हरि आपे ठाकुरु हरि आपे सेवकु जी
किया नानक जंत विचारा ॥१॥ तू घट
घट अंतरि सरव निरंतरि जी हरि एको
पुरुखु समाणा ॥ इकि दाते इकि भखारी
जी समि तेरे चोज विडाणा ॥ तू
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१२४
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जासी ॥३॥ तेरी भगति तेरी भगति से
भंडार जी भरे विधेत अंता॥ तैरे भगत .
तेरे भगत सलाहनि तुधु जी हरि अनिक
अनेक अनंता ॥ तेरी अनिक तेरी अनिक
करहि हरि पूजा जी तपु तापहि जपहि
वेअता ॥ तेरे अनेक तेरे अनेक पड़हि
वहु सिमृति सासत जी करि किरिया
खटु करम् करंता ॥ से भगत से भगत
भले जन नानक जी जो भारहि मेरे
हरि भगवता ॥ ४ ॥ तू आदि पुरखु
अपरंपरु करता जी तुधु जेबडु अवरु न
कोई ॥ तू जुगु जुगु एको सदा सदा
तू एको जी तू निहचलु करता सोई॥
तुधु आपे भाव सोई वरतै जी तू आपे
SoSEKA
दे...ले.

१२५ ॥ करहि सु होई ॥ तुधु आपे ससटि सभ उपाई जी तुधु आरे सिरजि सभ गोई ॥ जनु नानकु गुण गाय करते के जी जो समस का जाणोई ॥५॥१॥ शाजा महला ४ तू करता सचिनारु मैडा साई । जो तउ भाव सोई थीसी जो तू' देहि सोई हउ पाई ॥१॥ रहाउ ॥ सभ तेरी तू सभनी धिमाझ्या ।। जिसनो कृपा करहि तिन नाम रतनु पाइया || गुरमुखि लाधा मनमुखि गवाइबा ॥ तुधु प्रापि विछोड़िया आपि मिलाइा ॥१॥ तू दरिआउ सम तुझही माहि ॥ तुझ विनु दूजा कोई नाहि ।। जी जंत समि Sangeen १२६ bacha तेरा खेलु ॥ विजोगि मिलि विछड़िा सजोगी मेलु ॥२॥ जिस नो तू जाणाइहि सोई जनु जाणे ॥ हरिंगण सद ही आखि वखाणे । जिनि हरि सेवित्रा तिनि सुरघु पाइया ॥ सहजे ही हरिनामि समाइया ॥३॥ तू आपे करता तेरा कीया सभु होइ ॥ तुधु बिनु दूजा अवरु न कोइ ।। तू करि करि वेखहि जाणहि सोइ ॥ जन नानक गुरमुखि परगटु होई ॥४॥२॥ आसा महला १ A. तितु सरवरडै भईले निवासा पाणी पावकु तिनहि कीया ॥ पंकजु मोह पगु नही चाल हम देखा तह डूबीअले ॥१॥ <<><<io १२७ Home मन एक न चेतसि मूड मना ॥ हरि विसरत तेरे गुण गलिया ॥१॥रहाउ॥ ना हउ जती सती नही पड़िया मूरख मुगधा जनमु भइया ॥ प्रणवति नानक तिन की सरणा जिन तू नाही वीसरिया ॥२॥३॥ आसा महला ५॥ भई परापति मानुख देहुरीया ॥ गोविंद मिलण की इह तेरी बरीया ॥ अवरि काज तेरै कितै न काम ॥ मिलु साध संगति भजु केवल नाम ॥१॥ सरंजामि लागु भवजल तरन के।। जनमु वृथा जात रंगि माझ्या के ॥१॥ रहाउ॥ जपु तपु संजमु धरम न कमाइया ॥ ८ ८ १२८ ve<><> + सेवा साध न जानिया हरि राइना ।। कहु नानक हम नीच करंमा ॥ सरणि परे की राखहु सग्मा ॥२॥४॥ कबियोवाच बेनती ॥ चौपई ॥ हमरी करो हाय दै रच्छा ॥ पूरन होड चित की इच्छा ॥ तव चरनन मन रहै हमारा ॥ करो प्रतिपारा ॥१॥ हमरे दुसट सभै तुम घाबहु ॥ आपु हाथ दै मोहि वचावहु ॥ सुखी बसै मोरो परिवारा || सेवक सिक्ख सभे करतारा ॥२॥ मो रच्छा निज कर दै करियै ॥ सब वैरन को आज संघरियै ॥ पूरन होइ हमारी की रहै SAKSEA अपना जान आसा ॥ तोर भजन

१२६
पिआसा ॥३॥ तुमहि छाडि कोई अवर
न धियाऊं ॥ जो वर चहाँ सु तुम
ते पाऊं ॥
सेवक सिक्ख हमारे
तारीअहि ॥ चुनि चुनि सत्र हमारे
मारीअहि ॥४॥ आप हाथ दै मुझे
उबरियै। मरन काल का त्रास निवरियौ।
हजो सदा हमारे पच्छा॥ श्री असिधुज
जू करियहु रच्छा ॥५॥ राखि लेहु
मुहि राखनहारे ॥ साहिब संत सहाइ
पियारे ॥ दीन बंधु दुसटन के हंता ॥
तुमहो पुरी चतुर दस कंता ॥६॥ काल
पाइ ब्रहमा वपु धरा । काल पाइ
सिवजू अवतरा ॥ काल पाइ कर
विसनु प्रकासा ।। सकल काल का कीया
NEERA

१३० <> तमासा ||७|| जवन काल जोगी सिव / कीयो ॥ वेदगज ब्रहमा जू थीओ ॥ जवन काल सभ लोक सबारा ॥ v नमसकार है ताहि हमारा |॥ ८ ॥ जवन काल सभ जगत बनायो॥ देव देत जच्छन उपजायो॥ आदि अंति एकै अवतारा ॥ सोई गुरू समझियहु हमारा ।। ६ ।। नमसकार तिस ही को y हमारी ॥ सकल प्रजां जिन आप सवारी॥ सिवकन को सिवगुन सुख दीओ ।। सत्रुन को पल मो बध कीओ ॥१०॥ घट घट के अंतर की जानत ॥ भले बुरे की पीर पछानत || V चीटी ते कुचर असथूला ।। सभ पर <<<A ६.८ ::

१३१
Heate
कृपा दृसटि कर फूला ॥११॥ संतन "
दुख पाए ते दुखी ॥ सुख पाए साधुन
के सुखी । एक एक की पीर पछार्ने ।
घट घट के पट पट की जानें ॥१२॥
जव उंदकरख करा करतारा।। प्रजा
धरत तव देह अपारा | जब आकरख
करत हो कबहू ॥ तुम मै मिलत देह
घर सभह ॥१३॥ जेते बदन ससटि सभ
धारै ।। आप आपनी बुझ उचारै ।
तुम सभही ते रहत निरालम ॥ जानत
वेद भेद अर आलम ॥१४॥ निरंकार
निरविकार निरलंभ ॥ आदि अनील
अनादि असंभ ।। ताका मूढ उचारत
भेदा॥जाको भेव न पावत वेदा ॥१५॥

१३२ saet ताको करि पाहन अनुमानत ॥ महा मूढ़ कछु भेद न जानत ॥ महादेव को कहत सदा सिव ॥ निरंकार का चीनत नहि भिव ॥१६॥ आपु आपनी बुधि है जेती॥ वरनत मिन भिंन तुहि तेती।। तुमरा लखा न जाइ पसारा ॥ किह विधि सजा प्रथम संसारा ॥१७॥ एकै A रूप अनूप सरूपा ॥ रंक भयो राव कही भूपा ॥ अंडज जेरज सेतज कीनी॥ उतभुज खानि बहुर रचि दीनी ॥१८॥ कहूं फूल राजा ह्र बैठा॥ कह सिमटि भयो संकर इकठा ॥ सगरी सृसटि दिखाइ अचंभव ॥ आदि जुगादि सरुप V सुयंभव ।।१६।। अब रच्छा मेरी तुम <<<SPREn ह १३३ ao करो। सिक्ख उबारि असिक्ख संघरो।। V दुष्ट जिते उठवत उतपाता ॥ सकल मलेछ करो रण घाता ।।२०।। जे असिधुज तव सरनी परे। तिनके दुष्ट दुखित ह मरे । पुरख जवन पग परे तिहारे ॥ तिनके. तुम संकट सब टारे ॥२१॥ जो कलि को इक बार धिए है ॥ ताके काल निकटि नहि ऐहै।। रच्छा होइ ताहि सभ काला ।। दुसट अरिसट टरें ततकाला ॥२२॥ कृपा इसटि तन जाहि निहरिहो।। ताके ताप तनक मो हरिहो । रिद्धि सिद्धि घर मो सभ होई ॥ दुष्ट छाह छ्नै सकै न कोई॥२३॥ एक बार जिन तुम संभारा|| ह १३४ NSSpe काल फास ते ताहि उबारा || जिन नर A नाम तिहारो कहा ॥ दारिद दुसट दोख ते रहा ॥२४॥ खड़ग केत मै सरणि तिहारी॥ आप हाथ दै लेहु उचारी ॥ सरव ठौर मो होहु सहाई ॥ दुसट दोख ते लेहु बचाई ॥२५॥ स्वैया ॥ पांइ गहे जब ते तुमरे तव ते कोऊ आंख तरे नही आन्यो ॥ राम रहीम पुरान कुरान अनेक कहैं मत एक न मान्यो ॥ सिंमृत सातत्र वेद सबै बहु भेद कहैं हम एक न जान्यो॥ श्री असिपान कृपा तुमरी करि मै न कयो सब तोहि वरखान्यो॥ <<<<A -

१३५
दोहरा ॥
सगल दुआर कउ छाडिकै गहिउ
तुहारो दुआरः॥ बांहि गहे की लाज
अस गोविंद दास तुहार ॥
रामकली महला ३ अनंदु
-
१ ओं सतिगुर प्रसादि ।
अनंदु भइया मेरी माए सतिगुरू मैं
पाइला ॥ सतिगुरु त पाइा सहज सेती
मनि वीमा वाधाईया | राग रतन
परवार परीया सवद गावण आईआ॥
सबदो त गावहु हरी करा मनि जिनी
वसाइया । कहै नानकु अनंदु होला
सतिगुरू मै पाइा ॥१॥ ए मन मेरिया
SocKA

<< ><<< १३६ RESection तू सदा रहु हरि नाले ॥ हरि नालि रहु तू मंन मेरे दूख सभि विसारणा ॥ अंगीकारु अोहु करे तेरा काग्ज सभि सवारणा ॥ समना गला समरथु सुअामी सो किउ मनहु विसारे || कहै नानकु मन मेरे सदा रहु हरि नाले ॥२॥ साचे साहिवा किया नाही घरि तेरोपरि त तेरै सभु किछु है जिसु देहि सु पावए। सदा सिफति सलाह तेरी नामु मनि वसावए ॥ नामु जिन कै मनि वसिया वाजे सबद घनेरे ॥ कहै नानकु सचे साहिब किया नाही घरि तेरै ॥३॥ साचा नामु मेरा आधारो ॥ साचु नाम अधारु मेरा जिनि भुखा सभि गवाई। Daosag.

१३७ aama कार सांति सुख मनि आइ बसिया y जिनि इछा सभि पुजाईया ॥ सदा कुरवाणु कीता गुरू विटहु जिस दीया एहि वडिआईआ ॥ कहै नानकु सुणहु संतहु सबदि घरहु पिधारो ॥ साचा नामु मेरा आधारो ॥४॥ वोजे पंच सबद तितु घरि सभागे । घरि सभागे सवद वाजे कला जितु घरि धारीया || पंच दूत तुधु वसि कीते कालु कंटकु मारित्रा।। धुरि करमि पाइबा तुधु जिन कउ सि नामि हरिके लागे ।। कहै नाना तह सुखु होआ तितु घरि अनहद बाजे ॥५॥ अनदु सुणहु वडभागीहो सगल मनोरथ पूरे॥ पारबहमु प्रभु पाइआ उतरे सगल १३८ See विसरे ॥ दुख रोग संताप उतरे सुणी सची वाणी ।। संत साजन भए सरसे पूरे गुर ते जाणी॥ सुणते पुनीत कहते पवितु सतिगुरु रहित्रा भरपूरे ॥ विनवंति नानक गुर चरण लागे वाजे अनहद तूरे ॥३०॥१॥ मु दावणी महला ५॥ थाल विधि तिनि वसतू पईओ सतु संतोखु वीचारो॥ अंमृत नामु ठाकुर का पहो जिसका सभसु अधारो। जेको खावे जे को भुचै तिस का होइ उधारो॥ एह वसतु तजी नह जाई नित नित रखु उरिधारो ॥ तम संसारु चरन लगि तरीऐ सभु नानक ब्रह्म पसारो॥१॥ <MEREKA १३६ a> सलोक महला ५॥ तेरा कीता जातो नाही मनो जोगु कीतोई || मै निरगुणिारे को गुणु नाही आरे तरसु पइनोई ॥ तरसु पइया मिहरामति होई सतिगुर सजणु मिलिया ॥ नानक नामु मिले तां जीनां तनु मनु थीचे हरिया ॥१॥ SoSERA

१४०
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अरदास
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१ ओं वाहिगुरू जी की फतह ।।
श्री भगौती जी सहाइ । वार श्री
भगौती जी की पातशाही १०। प्रथम
भगौती सिमरि के गुर नानक लई
धिाइ। फिर अंगद गुर अमरदासु
रामदास होई सहाइ । अरजन हरगोविंद
नो सिमरौ श्री हरिराड । श्री हरिकिशन
धिआईऐ जिस डिठे सभि दुखि जाइ | y
तेग बहादर सिमरिऐ घर नउ निधि
आवे धाइ। सभ थाई होइ सहाइ ।
दसवां पातशाह श्री गुरू गोविंद सिंह
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ते

१४१
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महाराज जी ! सत्र थाई होइ सहाइ ।
दशहों सत्गुरुओं के ज्योति स्वरूप श्री
गुरू ग्रन्थ साहिब जी के पाठ व दर्शन
का ध्यान धर कर बोलो जी वाहिगुरू !
पांच प्यारों, चार गुरू कुमारों, चालीस
मुक्तों, हठी-जपी-तपियों, जिन्हों ने
नाम जपा, बांट खाया, देग चलाई,
तेग चलाई, देख कर अडीठ किया, उन V
प्रेमी सत्य वादियों की पवित्र कमाई का
ध्यान धर कर खालसा जी! बोलो जी
वाहिगुरू!
जिन सिंह सिंहनियों ने धर्म
पर बलिदान दिये, अङ्ग २ कटवाए,
सिर की खोपरियां उतरवाई, चर्खियों

V
e>
<<<
१४२
S ....<><>
पर चढ़ाए गये, कर्वत्त से तन चिरवाए,
गुरुद्वारों के सुधार और पवित्रता के
निमित्त शहीद हुए, धर्म नहीं छोड़ा सिख
धर्म का केशों तथा प्राणों महित पालन
किया। उन की कृत्य कमाई का ध्यान
धर कर खालसा जी! वोलो जी
वाहिगुरू !
चारों तस्तों, समूह गुरुद्वारों का
ध्यान धर कर बोलो जी वाहिगुरू !
'. प्रथमे सर्व खालसा जी की अरदास
है जी, सर्व खालसा जी को वाहिगुरू,
वाहिगुरूं, वाहिगुरूं चित आवै, चित में
आने से सर्व सुख, हो। जहां जहां
खालसा जी साहिव, तहां तहां रक्षो

१४३
६८
रियायत, देग-तेग फतह, चिरद की
लाज, पन्थ की जीत, श्री साहिब जी
सहाय, खालसा जी का बोल वाला
हो, बोलो जी वाहिगुरू !!!
सिखों का मन नम्र, मति ऊंची,
मति का रक्षक स्वयं वाहिगुरू। हे
निःमानों के सम्मान, नित्राणों के
त्राण, निःोटो की प्रोट, निराश्रयों
A के आश्रय, सच्चे पिता वाहिगुरू ! आप
की सेवा में की प्रार्थना है।
अक्षर लग मात्र भूल चूक क्षमा
करना, सर्व के कार्य सिद्ध हों।
उन प्रेमियों का मिलाप हो जिन

vie
१४४
Sice><<<
के मिलने से चित में तेरे नाम का
निवास हो।
नानक नाम चढदी कला ।
तेरे भाणे सर्वत्त का भला॥
वाहिगुरू जी का खालसा ।
श्री वाहिगुरू जी की फतह ॥
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8

余
सोहिला
公
१ओं
公
元奖尔:

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१४५
सोहिला
रागु गउड़ी दीपकी महला १
१ . सतिगुर प्रसादि ।
जै घरि कीरति ग्राखीऐ करते का
होइ वीचारो॥ तितु घरि गावहु सोहिला
सिवरिह सिरजणहारो॥१॥ तुम गाबहु
मेरे निरभउ का सोहिला ॥ हर वारी
जितु सोहिलै सदा सुखु होइ ॥१॥रहाउ।।
नित नित जीअड़े समालीअनि देखेगा
देवणहारु ॥ तेरे दान कीमति न पवैतिसु
दाते कवणु सुमारु॥२
लिखिया मिलि करि पावहु तेलु ॥ देहु
सजण असीसड़ीआ जिउ होवै साहिब
देश
संवति साहा

१४६ <><>>>ook सिउ मेलु ॥३॥ घरि घरि एहो पाहुचा सदड़े नित पनि ॥ सदणहारा सिमरीऐ नानक से दिह आवंनि ॥ ४ ॥१॥ रागुआसा महला १॥ छिन घर छित्र गुर छित्र उपदेस । गुरु गुरु एको वेस अनेक ॥१॥ वावा जै घरि करते कीरति होइ । सो घरु राखु वडाई तोइ ॥१॥ रहाउ॥ विसुए चसिया घड़ीआ पहरा थिती वारी माहु होला । सूरजु एको रुति अनेक ॥ नानक करते के केते वेस ॥ २ ॥ २॥ रागु धनासरी महला १॥ गगन मै थालु रवि चंदु दीपक बने तारिका मंडल जनक मोती ॥ धूपू मलानलो पवणु चवरो करे सगल

१४७
वनराइ फूलंत जोती ॥१॥ कैसी
आरती होई भवखंडना तेरी आरती ॥
अनहता सबद वाजंत भेरी ॥१॥ रहाउ॥
सहस तव नैन नन नैन हहि तोहि
कउ सहस भूरति नना एक तोही।। सहस
पद विमल नन एक पद गंध बिनु सहस
तव गंध इव चलत मोही ॥२॥ सभ
महि जोति जोति है सोइ ॥ तिसदै
चानणि सभ महि चानणु होइ | गुर
साखी जोति परगटु होइ ।। जो तिसु भावै
सो आरती होइ ॥३॥ हरि चरण कवल
मकरंद लोभितमनो अनदिनो मोहि अाही
पित्रासाकृपा जलु देहि नानक सारिंग
कउ होइ जाते तेरै नाइ वासा ॥४॥३॥

>< १४८ Share ६. गुरा गउडी पूरवी महला ४॥ कामि करोधि नगरु बहु भरिश्रा मिलि साध खंडल खंडा हे ॥ पूरवि A लिखत लिखे गुरु पाइा मनि हरि लिव मंडल मंडा हे ॥११॥ करि साधु अंजुली पुनु वडा हे ।। करि डंडोत पुनु वडा हे ॥१॥ रहाउ॥ साकत हरि रस सादु न जाणिया तिन अंतरि हउमैकंडा हे|जिउ जिउ चलहि चुभै दुखु पावहि जमकालु सहहि सिरि डंडा हे ॥२॥ हरि जन हरि . हरि नामि समाणे दुखु जनम मरण भव खंडा हे॥ अविनासी पुरुखु पाइया परमेसरु बहु सोभ खंड ब्रहमंडा हे ॥३॥ .हम गरीव मसकीन प्रभ तेरे हरि राखुराखु वड वडा हे। जन नानक नामु अधारुटेक Here>< Easi १४६ >KS है हरि नामे ही सुखु मंडा हे ॥४॥४॥ रागु गउडी पूरवी महला ५ ॥ करउ बेनंती सुणहु मेरे मीता संत टहल की वेला ।। ईहा खाटि चलहु हरि लाहा आगै वसनु सुहेला ॥ १ ॥ अउध घटै दिनसु रैणा रे ।। मन गुर मिलि काज सवारे ॥१॥ रहाउ॥ इहु संसारु विकार संसे महि तरिओ ब्रहम गिआनी।जिसहि जगाइ पीआये इहु रसु अकथ कथा तिनि जानी ॥२॥ जाकउ आए सोई विहाझहु हरि गुर ते मनहि बिसेरा । निज घरि महलु पाबहु सुख सहजे बहुरि न होइगो फेरा॥३॥ अंतरजानी पुरख विधाते सरधा मन की पूग। नानक दासु इहै सुख मागे मोकउ करि संतन की धूरे ॥ ४ ॥ ५ ॥ .

१५०
SoK
बारह माहा
माझ महला ५ घरु४॥
१ ओं सतिगुर प्रसादि ॥
किरति करम के पीछुड़े करि
किरपा मेलहु राम || चारि कुंट दह
दिस भ्रमे थकि आए प्रभ की साम ।।
धेनु दुधै ते वाहरी कितै न आवै काम ।।
जल विनु साख कुमलावती उपजहि नाही
दाम ॥ हरि नाह न मिलीऐ साजनै कत ।
पाईऐ विसराम ॥ जितु घरि हरिकंतु न
प्रगटई भठि नगर से ग्राम ॥ सर्व सीगार
तंबोल रस सणु देही सम खाम ।। प्रभ
सुअामी कंत विहूणीया मीत सजण

१५१ सभि जाम || नानक की वेनंतीया करि किरपा दीजै नामु || हरि मेलहु सुश्रामी संगि प्रभ जिसका निहचल धाम ॥१॥ चेति गोविंदु अराधीऐ होवै अनंदु घणा।। संत जना मिलि पाईऐ रसना नामु भणा । जिनि पाइया प्रभु आपणा आए तिसहि गणा ॥ इकु खिनु तिसु बिनु जीवणा बिरथा जनसु जणा ॥ जलि थलि महीअलि पूरिया रविश्रा विचि वणा ।। सो प्रभु चिति न आवई कितड़ा दुखु गणा | जिनी रावित्रा सो प्रभू तिना भागु मणा ॥ हरि दरसन कंड मनु लोचदा नानक पिनास मना॥चेति मिलाए सो प्रभू तिस कै पाइ लगा ॥२॥ > ८ १५२ Si.. चैसाखि धीरनि किउ वाढीया जिना प्रेम विछोहु ॥ हरि साजनु पुरखु विसारि कै लगी माझ्या धोहु ॥ पुत्र । कलत्र न संगि धना हरि अविनासी अोहु ॥ पलचि पलचि सगली मुई भृ? A धंधै मोहु ॥ इकसु हरि के नाम विनु अगे / लईअहि खोहि ॥ दयु विसारि विगुचणा प्रभ विनु अवरु न कोइ ॥ प्रीतम चरणी जो लगे तिनकी निरमल सोइ ॥ नानक की प्रभ बेनती प्रभ मिलहु परापति होइ ।। वैसाखु सुहावा तां लगै जा संतु भेट हरि सोइ ॥३॥ हरि जेठि जुड़दा लोडीऐ जिसु अगै सभि निवंनि ॥ हरि सजण दावणि . >< SA ><< १५३ >>V लगिना किसे न देई बंनि ॥ माणक मोती नामु प्रम उन लगे नाही संनि ॥ रंग सभे नाराइण जेते मनि भावंनि ।। जो हरि लोड़े सो करे सोई जी करंनि।। जो प्रभि कीते आपणे सेई कहीअहि धनि।। आपण लीपा जे मिले विछुड़ि किउ रोवंनि ।। साध संगु परापते नानक रंग माणंनि ।। हरि जेठ रंगीला तिसु धणी जिस के भागु मथंनि ॥४॥ साडु तपंदा तिसु लगे हरि नाह न जिना पासि ॥ जगजीवन पुरखु तिभागि कै माणस संदी आस ॥ दुयै भाइ विगुचीऐ गलि पईसु जम की फास॥ जेहा चीजै सो लुण मथे जो लिखिआसु॥

१५४
Emai
रेणि विहाणी पछुताणी उठि चली गई
निरास ॥ जिन को साधू भेटीऐ सो
दरगह होइ खलासु ॥ करि किरपा प्रभ
आपणी तेरे दरसन होइ पिनास ॥ प्रभ
तुधु चिनु दूजा को नही नानक की
अरदासि ॥ आसाडु सुहंदा तिसु लगै
जिसु मनि हरि चरण निवास ॥५||
सावणि सरसी
कामणी चरन
कमल सिउ पिआरु॥ मनु तनु रता सच
रंगि इको नाम अधारु ।। विखिया रंग A
कूड़ावित्रा दिसनि सभेछारु।। हरि अंमृत
बूद सुहावणी मिलि साधू पीवणहारु ॥
वणु तिणु प्रभ संगि मउलिया संम्रथ
पुरख अपारु ॥ हरि मिलणे नो मनु
*<<<A

१५५ लोचदा करमि मिलावणहारु ॥ जिनी सखीए प्रभु पाइया हंउ तिन के सद बलिहार ॥ नानक हरि जी मइया करि सबदि सवारणहारु || सावणु तिना सुहागणी जिन रामनामु उरि हारु ॥६॥ भादुड भरमि भुलाणीआ दूजे लगा हेतु ॥ लख सीगार वणाइया कारजि नाही केतु ॥ जितु दिनि देह बिनससी तितु वेले कहसनि प्रेतु। पकड़ि चलाइनि दूत जम किमौ न देनी भेतु।। छडि खड़ोते खिन माहि जिन सिउ लगा हेतुहिथ मरोड़े तनु कपे सिपाहहु होआ सेतु।। जेहा बीजे सो लुणे करमा संदड़ा खेतु || नानक प्रभ सरणागती चरण बोहिथ प्रभ देतु॥ <<<

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१५७ Ke कतिकि करम कमावणे दोसु न AA काहू जोगु। परमेसर ते भुलिवियापनि समे रोग ।। वेमुख होए राम ते लगनि जनम विजोग ॥ खिन महि कउड़े होइ गए जितड़े माझ्या भोग ।। विचु न कोई करि सके किस थै रोबहि रोज ॥ कीता किछू न होवई लिखिया धुरि संजोग ॥ वहभागी मेरा प्रभु मिल तां उतरहि सभि नियोग ॥ नानक कउ प्रभ राखि लेहि मेरे साहित्र बंदी मोच ॥ कतिक होवै साध संगु विनसहि सभे सोच ॥६॥ मंघिरि माहि सोहंदीया हरि पिर संगि बैठड़ीयाह । तिन की सोभा किया गणी जि साहिवि मेलड़ीयाह । तनु मनु :

१५८ Bato मउलिना राम सिउ संगि साध सहेलड़ी- आह ॥ साध जना ते बाहरी से रहनि इकेलड़ीमाह ॥ तिन दुखु न कवह उतरै से जम कै वसि पड़ीाह।। जिनी रावित्रा प्रभु आपणा से दिसनि नित खडीआह ।। रतन जवेहर लाल हरि कठि तिना जड़ीबाह ।। नानक बांछै धूडि तिन प्रभ सरणी दरि पड़ीआह ॥ मंघिरि प्रभु आराधना बहुड़ि न जनमडीआह ॥१०॥ पोखि तुखारु न विश्रापई कंठि मिलिया हरि नाहु।। मनु बेधिमा चरनार बिंद दरसनि लगड़ा साहु ॥ भोट गोविद गोपाल राइ सेवा सुअामी लाहु। विखिया पोहि न सकई मिलि साधू गुण गाहु ।।

8>>Rato १५६ K8 जह ते उपजी तह मिली सची प्रीति समाहु॥ करु गहि लीनी पारवहमि बहुड़ि न विछुडीयाहु।। बारि जाउ लख बेरीया हरि सजणु अगम अगाहु || सरम पई नाराइण नानक दरि पईआहु ॥ पोखु मोहंदा सरव सुख जिसु चखसे बेपरवाहु ॥११॥ माधि मजनु संगि साधूना धूड़ी करि इसनानु ॥ हरि का नामु धिप्राइ सुणि सभना नो करि दानु ॥ जनम करम मलु उतरै मन ते जाइ गुमानु || कामि करोधि न मोहीऐ बिनसै लोभु सुभानु । सचे मारगि चलदिया उसतति करे जहानु ॥ अठसठि तीरथ सगल पुन १६० >reStee जीन दइया परवानु || जिस नो देव दइया करि सोई पुरखु सुजानु || जिना A मिलिया प्रभु आपणा नानक तिन कुरबानु । माघि सुचे से कांडीअहि जिन पूरा गुरु मिहरवातु ॥१२॥ फलगुणि अनंद उपारजना हरि सजण प्रगटे आड ॥ संत सहाई राम के करि किरपा दीया मिलाइ ।। सेज सुहावी सरब सुख हुणि दुखा नाही जाइ || इछ पुनी वडभागणी वरु पाइा हरि गइ ॥ ४ मिलि सहीा मंगलु गावही गीत गोविंद अलाइ ॥ हरि जेहा अबरु न दिसई कोई दूजा लवे न लाइ ॥ हलतु पलतु सवारिओनु निहचल दितीअनु जाइ ।। naana <><><><. ६.८

१६१
र =
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संसार सागर ते रखिअनु बहुड़ि न जनमै y
धाइ।। जिहवा एक अनेक गुण तरे नानक
चरणी पाइ॥ फलगुणि नित सलाहीऐ
जिसनो तिलु न तमाइ ॥१३॥
जिनि जिनि नामु धियाइया तिन
के काज सरे । हरि गुरु पूरा आराधिया
दरगह सचि खरे ॥ सरत्र सुखा निधि
चरण हरि भउजलु विखमु तरे ।। प्रेम
भगति तिन पाईया विखिया नाहि
जरे॥ कूड़ गए दुविधा नसी पूरन
सचि भरे ॥ पारब्रहमु प्रभु सेवदे मन
अंदरि एकु धरे ॥ माह दिवस मूरत भले
जिन कउ नदरि करे ॥ नानकु मंगै दरस
दानु किरपा करहु हरे॥१४॥१॥

गुरुद्वारा प्रिंटिङ्ग प्रेस (रामसर रोड) अमृतसर में छपा।

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OCR done
Citation
1950
Published
2010/10
Publisher
Amratsar,shiromani Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
166
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
DLI number
326620
Barcode
99999990002217.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library of India
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Zoam5TB04dx
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