Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Sahitya Shamikshya
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साहित्य-समीक्षा
लेखक
कालिदास कपूर, एम० ए०, एल०टी०
प्रकाशक
इंडियन पेस, लिमिटेड, प्रयाग
नगर]
[ मुल्य )
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पृष्ठ
१
२२
विषय-सूची
वेषय
--हिंदी और उर्दू का विरोध
।---समालोचना
रामचरितमानस का महत्त्व
-हिंदी में नाटक और अभिनय
-सत्य-हरिश्चद्र-नाटक
।-द्विजेंद्र-नाटकावली
-~हिंदी में उपन्यास-साहित्य
-सेवासदन
-प्रेमाश्रम
रगभूमि
११०
१२०
-
निवेदन
प्रस्तुत लेख-सग्रह में 'समालोचना' शीर्षक लेस छोडकर
अन्य सब साहित्यिक लेख किसी न किसी पत्रिका में प्रकाशित
हो चुके हैं । हिदी-साहित्य मे पश्चिमी शैली के आलोचनाल
प्रधों की बहुत कमी है।
संग्रहीत लेखों में इस शैली
अनुसरण करने का प्रयत्न किया गया है। इसी लिए लेख
ने इन्हें पुस्तकाकार प्रकाशित करने का साहस किया है।
लेखक ने हिदी लिखना पूज्यवर पं० महावीरप्रसाद
द्विवेदी से ही सीखा है। आप ही ने उसके लिए हिद
साहित्य-सेवा का एक विशेष मार्ग निर्दिष्ट कर दिया है
गुरु-मृण से मुक्त होना तो असभव है। हाँ, उसे कृतज्ञतापूर्व
स्वीकार करते हुए लेखक अपना भार अवश्य हलका कर
चाहता है।
कालिदास कपूर
जा।
साहित्य-समीक्षा
१-हिंदी और उर्दू का विरोध
हिदी और उर्दू का विरोध कुछ कम होता नहीं दिखाई
कौंसिल की सीचें और दोनो तरफ के समाचार-पत्रों
वाद-विवाद के अनुशीलन से तो यही प्रतीत होता है कि
'दी और उर्दू का प्रश्न, कहीं ऐसा न हो, हमारी राजनैतिक
नति में बाधा डाले । इसलिए इस बात की बडी
गवश्यकता है कि दोनो पक्षों के विद्वान् आपस में मिल कर
ह प्रभ हल कर लें। जब हिदू और मुसलमानों के बीच
राजनैतिक झगडों पर समझौता करने का प्रयत्न हो रहा है, तो
उनके बीच जो भाषा-विषयक झगडा है उसका भी अत करना
गहिए । देश इस समय एकता के लिए सब कुछ न्यौछावर
करने को तेयार है, और साहित्य-प्रेमियो की उदारवा और
नहृदयता पर हमें पूर्ण विश्वास है। इसलिए हमें आशा है कि
दि दोनो पक्ष के विद्वान् सम्मिलित होकर समझौते का यत्न
करे, तो सफलता हो सकती है।
सच पूछिए तो हिदी और उर्दू का वास्तविक कोई विरोध
क्या दोनों अलग अलग भाषाएँ हैं। दोनों भाषाएँ
सने और पढनेवालों को अपने विचार एक दूसरे से बोल
१
२
साहित्य-समीक्षा
कर प्रकट करने में कठिनाई नहीं पड़ती। तो फिर वे अलग
अलग क्योकर हैं ? लखनऊ, दिल्ली और आगरे मे जो भाषा
बोली जाती है वह प्राय एक ही है। उसमें फारसी और
अरबी भाषा के शब्द ठेल दिये और उसको फारसी-लिपि में।
लिखने लगे तो वह उर्दू हुई, और उसके जो शब्द गारू
समझे गये उनकी जगह सस्कृत के शब्द मिला दिये गये, पर
लिखी जाती रही पहले की तरह देवनागरी लिपि मे ही,
उसका नाम होगया हिदी। भेद केवल लिपि और शब्दों का
है, भाषा का नहीं।
दुर्भाग्यवश यह भेद दिन पर दिन बढता जा रहा है
न तो पुरानो उर्दू इतनी क्लिष्ट थी और न हिदी ही। पुराने
जमाने में मुसलमान और हिंदू लोग दोनों भाषाओं के
साहित्य-भाण्डार भरने के लिए प्रयत्न करते थे। किसी समय
हिदी के कवि-समाज में जायसी के सदृश मुसलमानों
के लिए भी उच्च स्थान था, और उर्दू के मुशायरे
में तो अभी तक नानकचद जैसे लसनवी अपना सानी
नहीं रखते। परतु इतना मानना पडेगा कि अब उस एकता
में कमी हो रही है। इसका उत्तरदाता साधारण जन-समाज
क्योंकि पत्रिकाओं और पुस्तकों के बाहर जो ससार
है उसमें तो एक ही भाषा है। भेद तो उन्हीं सज्जनों के
साहित्य-सेवा का फल है जो अपने अपने साहित्य की सेवा
सन-मन-धन से लगे हुए हैं।
नहीं।
हिंदी और उर्दू का विरोध
भारतीय भाषाओं के आधुनिक साहित्य में एक मार्के की
पात यह है कि उसकी भाषा जन-समाज की भाषा से बहुत
कुछ भिन्न है। यो तो थोडा बहुत अतर प्रत्येक देश के
साहित्य में मिलेगा, परतु इतना अधिक भेद शायद ही कही
हो। इसके कई कारण हैं। उनमे से मुख्य कारण यह है कि
भारत का जन-समाज अपने साहित्य से बहुत कम परिचित
है। इसलिए उसका प्रचार अधिक नहीं होने पाता। परतु
जिस समय हमारी सरकार तथा जन-समाज अपने प्रयत्न से
इस साहित्य से परिचित हो जायँगे, उस समय यह भेद बहुत
, कम हो जायगा।
हिदी और उर्द-साहित्य का भी यही हाल है। परंतु
। प्राय हिंदी में यह भेद उर्दू से कहीं अधिक मात्रा में है
भारतवर्ष के एक कोने से दूसरे कोने तक हूँढ डालिए, कदा-
चित् दर्जन भर से अधिक ऐसे सज्जन न मिरोंगे जो अपने
हृदय पर हाथ रख कर कह सकें कि सम्मेलन की हिंदी
हमारी मातृ-भाषा है, अर्थात् वे बचपन से वही भाषा बोलवे
: चले आ रहे हैं। परतु पाठक विश्वास न करेंगे, दिल्ली,
आगरे और लखनऊ के नवाबों और काश्मीरियों सथा कायस्थों
के ऊँचे घरानों के विषय में कौन कहे, बोटे घरों की स्त्रियाँ
तक फिसाने-आजाद, और अवध-अखबार की उर्दू बोलती हैं।
यही कारण है जो उर्दू साहित्य, इतनी कठिन लिपि में लिखे
जाने पर भी, इतना प्रचलित है-यद्यपि हिंदी के सामने
-
--
, साहित्य-समीक्षा उसका बल घट रहा है और हिंदी-साहित्य, देवनागरी के सदृश सर्वमान्य लिपि में लिखे जाने पर भी, जन-समाज में यथेष्ट उन्नति नहीं कर पाया है। यदि इसका प्रत्यक्ष प्रमाण देखना हो तो आज-कल की नाटक-मडलियों की भाषा की ओर ध्यान दीजिए। क्या उनकी भाषा हिदी है ? यदि उनके नाटकों की भाषा साधारण जन-समाज को प्रिय न होती तो वे क्योंकर लाभ उठा सकती और क्यों न उनके नाटक हिंदी में लिखे जाते ? तुच्छ नौटकियों की भापा में भी जिनका प्रचार आज अभाग्यवश इस प्रांत के बहुत से जिलों मे है, फारसी-शब्द अधिकतर पाये जाते हैं, यद्यपि इनका प्रकाशन देवनागरी लिपि में होता है। बहुत से गदे उपन्यासों की भाषा भी क्लिष्ट हिदी से बहुत कुछ भिन्न है । सक्षेप में यों कहिए कि साहित्य-ससार में जिस हिंदी का अधिक मान है उससे जन-समाज को उतना प्रेम नहीं है। भाषा-भेद तो साहित्य-सेवियो का पैदा किया हुआ है, परतु लिपि-भेद की जड बहुत गहरी है। मुसलमानों ने उत्तरी भारतवर्ष में अपना गज्य स्थापन करके अपनी फ़ारसी लिपि का प्रचार किया। जब तक उनका प्रभुत्व रहा और जिन जिन प्रांतों मे वह अधिक रहा उन्हीं में इस लिपि का प्रचार रहा। राज- नैतिक दबाव के घटने पर देवनागरी-लिपि, जो फारसी-लिपि से सर्वधा श्रेष्ठ है, फिर से अपना सिक्का जमाने लगी। अभी तक फारसी-लिपि जो भारतवर्ष से इंटी नहीं, इसके कई कारण है। , हिदी और उर्दू का विरोध ५ एक तो यह कि पजाय और संयुक्त-प्रांत की अदालतों और सरकारी महकमों में अभी वक उसका अखड राज्य है। इसमें सरकार का भी अधिक दोप नहीं। क्योंकि कम से कम उत्तरी भारत में तो मुगल-राज्य ही के खंडहरों पर उसने अपनी शासन- पद्धति का भवन खड़ा किया है। दूसरे, फारसी-लिपि के प्रचलित रहने से कुछ लोगों की स्वार्थ-सिद्धि भी है। यदि वह एक-दम उठा दी जाय तो कितने ही मुशियो की रोटी में बाधा पडे। तीसरे, मुसलमानों की हठ है कि फारसी-लिपि चाहे जितनी दृपित क्यो न हो, उनको अधकार में पड़े रहने में उसने चाहे जितनी सहायता दी हो, परतु वह उनकी जातीय लिपि है और वे उसे न छोड़ेंगे-जैसा, थोडे दिन हुए, वे कहा फरते थे कि तुर्की और फारस उनका देश है। समय ने उनके राजनैतिक विचार बदल दिये हैं, और यदि ईश्वर को इस जाति फा भला करना है तो उनकी यह हठ भी दूर हो जायगी। उनसे हमारा इवना ही निवेदन है कि जातीय भाषा तथा लिपि को, देश-काल के अनुसार, परिवर्तित करने से लाभ ही लाभ है, हानि जरा भी नहीं । भाषा या लिपि के बदलने से किसी जाति या धर्म की हानि नहीं हो सकती । पारसियों को देखिए, इतने अरप-सख्यक होने तथा दूसरी भाषा और लिपि का आश्रय लेने पर भी क्या वे धर्मच्युत होगये ? आपके पूर्वजो ने फारसी और अरबी छोड कर जब भारतीय भाषाओं का आश्रय लिया तब आप उस पुरानी लिपि की लकीर के फकीर क्यों हो रहे हैं।
४ साहित्य-समीक्षा उसका बल घट रहा है-और हिंदी-साहित्य, देवनागरी के सदृश सर्वमान्य लिपि में लिखे जाने पर भी, जन-समाज में यथेष्ट उन्नति नहीं कर पाया है। यदि इसका प्रत्यत्त प्रमाण देखना हो तो आज-कल की नाटक-मडलियों की भाषा की ओर ध्यान दीजिए। क्या उनकी भाषा हिदी है? यदि उनके नाटकों की भाषा साधारण जन-समाज को प्रिय न होती तो वे क्योंकर लाभ उठा सकती और क्यों न उनके नाटक हिंदी में लिखे जाते ? तुच्छ नौटकियों की भाषा में भी जिनका प्रचार प्राज अभाग्यवश इस प्रति के बहुत से जिलों में है, फारसी-शब्द अधिकतर पाये जाते हैं, यद्यपि इनका प्रकाशन देवनागरी लिपि मे होता है। बहुत से गदे उपन्यासों की भाषा भी क्लिष्ट हिदी से बहुत कुछ भिन्न है। सक्षेप में यो कहिए कि साहित्य-ससार में जिस हिंदी का अधिक मान है उससे जन-समाज को उतना प्रेम नहीं है। भाषा-भेद तो साहित्य-सेवियों का पैदा किया हुआ है, परतु लिपि-भेद की जड बहुत गहरी है। मुसलमानों ने उत्तरी भारतवर्ष में अपना राज्य स्थापन करके अपनी फारसी लिपि का प्रचार किया। जब तक उनका प्रभुत्व रहा और जिन जिन प्रांवों में वह अधिक रहा उन्हीं में इस लिपि का प्रचार रहा। राज- नैतिक दबाव के घटने पर देवनागरी-लिपि, जो फारसी-लिपि से सर्वथा श्रेष्ठ है, फिर से अपना सिक्का जमाने लगी। अभी तक फारसी-लिपि जो भारतवर्ष से हटी नहीं, इसके कई कारण हैं , . हिदी और उर्दू का विरोध एक तो यह कि पजाब और सयुक्त-प्रांत की अदालतों और सरकारी महकमों में अभी तक उसका असड राज्य है। इसमें सरकार का भी अधिक दोप नहीं। क्योंकि कम से कम उत्तरी भारत में तो मुगल-राज्य ही के खंडहरों पर उसने अपनी शासन- पद्धति का भवन सडा किया है। दूसरे, फारसी-लिपि के प्रचलित रहने से कुछ लोगों को स्वार्थ-सिद्धि भी है। यदि वह एक-दम उठा दी जाय तो कितने ही मुशियों की रोटी में बाधा पडे। तीसरे, मुसलमानों की हठ है कि फारसी-लिपि चाहे जितनी दूपित क्यों न हो, उनको अधकार में पड़े रहने में उसने चाहे जितनी सहायता दी हो, परतु वह उनकी जातीय लिपि है और वे उसे न छोड़ेंगे- जैसा, थोडे दिन हुए, वे कहा फरते थे कि तुर्की और फारस उनका देश है। समय ने उनके राजनैतिक विचार बदल दिये हैं, और यदि ईश्वर को इस जाति का भला करना है तो उनकी यह हठ भी दूर हो जायगी। उनसे हमारा इतना ही निवेदन है कि जातीय भाषा तथा लिपि को, देश-काल के अनुसार, परिवर्तित करने से लाभ ही लाम है, हानि जरा भी नहीं। भापा या लिपि के बदलने से किसी जाति या धर्म की हानि नहीं हो सकती। पारसियों को देखिए, इतने अल्प-सख्यक होने तथा दूसरी भाषा और लिपि का आश्रय लेने पर भी क्या वे धर्मच्युत होगये १ आपके पूर्वजों ने फारसी और अरबी छोड़ कर जब भारतीय भाषाओं का आश्रय लिया तब आप उस पुरानी लिपि की लकीर के फकीर क्यों हो रहे हैं?
. ६ साहित्य-समीक्षा हिदी-साहित्य सर्वसाधारण के लिए कठिन होने पर भी, देवनागरी के सत्सग के कारण, दिन दिन उन्नति कर रहा है उसकी भाषाविषयक क्लिष्टता दूर कर देने से क्या उसकी उन्नति वेगवती न हो जायगी ? और कारण चाहे जो कुछ हो, परतु सबसे बडा कारण, जो हिदी-उर्दू के बीच में झगडा डाले हुए है, यह है कि आधुनिक हिंदी सस्कृत की बहिन बनना चाहती है। सरलवा का होना तो हिंदी-साहित्य-समाज में माना बड़ा भारी दोष समझा जाता है। यदि सस्कृत के शब्द कूट कूट कर भरे हो, तो चारो ओर से धन्य धन्य को ध्वनि आने लगती है। परतु यदि लेखक ने प्रचलित फारसी या अँगरेजी-शब्दों का थोडा भी प्रयोग किया तो वह भापा को अशुद्ध बनाने का दोषी समझा जाता है। शुद्धता का अर्थ क्या यह है कि भाषा में सस्कृत को छोड कर और किसी भाषा का अश न हो? जैसे कोई अँगरेजी के लिए यह कहे कि उसमें लैटिन को छोडकर और किसी भाषा के शब्द प्रचलित न होने पावे । परतु ऐसी शुद्धता का स्थिर रखना समय की तीव्र धारा के सम्मुख अपनी टाँग अडाना है। यह शुद्धता-भ्रम भाषा के विकास का बाधक है विचार प्रकट करने के लिए भाषा की उत्पत्ति हुई है। जो जो रंग भाषा ने अपने विकास में बदले हैं उन्हें हम, सक्षिप्त रूप में, बाल-भाषा के विकास मे प्रत्यक्ष देख सकते हैं। पहले पहल, मनुष्य-जाति के विचार बहुत सौर्य हिदी और उर्दू का विरोध ज्यो मनुष्य का ससर्ग अपने भाइयों से बढवा गया त्यों त्यों उसकी विचार-परिधि भी बढती गई। तब अपने विचारों को प्रकट करने के लिए उसको शब्दों को आवश्यकता हुई । जिन विकासों के द्वारा यह विचार उसके मस्तिष्क में उत्पन्न हुए उनको उसने तदनुरूप शब्दों में प्रकट किया। इससे उसकी भाषा के शब्दों की संख्या बढ़ती रही। नये शब्द पहले तो कुछ समय तक खलते रहे, वे आगतुक समझे नाते रहे। ठीक उनकी वही दशा रही जो किसी जाति-समूह की नये देश में बसने पर होती है। परतु भाषा के साथ रहते रहते वे शब्द उसी भाषा में फबने लगे। किसी देश के निवासियो के मस्तिष्क और भाषा में तो नये विचारों तथा नये शब्दों को स्थान पाने में देर लगती है और कहीं कहीं वे बडी जल्दी अपना लिये जाते हैं। यह जलवायु के प्रभाव का फल है। परतु यह प्राय देखा जाता है कि जिन देशों में सभ्यता उच्च स्थान पाकर पुरानी पड़ जाती है उनमें, जीर्ण मनुष्यों की तरह, नये विचारों से चिढ हो जाती है, उनमें घमड की मात्रा इतनी बढ़ जाती है कि वे अपने साहित्य, अपनी सभ्यता, अपने वल और अपनी विद्या के सामने अन्य सबको तुच्छ समझने लगते हैं यही दशा भारतवर्ष की है। जिस समय समस्त ससार अविद्याधकार में पड़ा हुआ था, उस समय आर्यावर्त उच्च- विचार-पूर्ण वेद-वनि से गूंज रहा था। परतु अभाग्यवश, भारतवर्ष में पैर रखते ही, आर्यजाति को अधकार में पड़ी हुई
साहित्य-समाचा
में भी अब
गये।
कोल-भील-जातियो का सामना करना पड़ा। उसने अपने
विचार और भाषा को शुद्ध रखने के लिए मस्तिष्क के कपाट
बद कर लिये। बस, उसी समय से वेदभाषा का हास होने
लगा। उस समय तक वेदभाषा और सर्व-साधारण की भाषा में
कोई अतर न था। इस परिवर्तन के साथ साथ यह अवर
बढने लगा । सर्वसाधारण की भाषा में अनार्य शब्द बढने लगे,
यहाँ तक कि आर्यभापा के साहित्य-सेवियो को उसका
सरकार करना पड़ा। उस सरकार की हुई अर्थात्
सस्कृत-भाषा
देरों अनार्य) शब्द
अर्थात् उसको भी वे शुद्ध दशा में स्थिर न रस
सके। जो इस विषय के ज्ञाता हैं वे बता सकते हैं कि
पाणिनि-काल से कालिदास के समय तक, व्याकरण के
कडे बधनो से जकडे रहने पर भी, सस्कृत के शब्द-भाडार में
कितना अतर आगया । भोज के समय तक यवन, शक तथा
हूण-जाति की भाषाओं के कितने ही शब्द उसके विशाल मदिर
में घुस आये, यद्यपि उनको इसमें बहुत कुछ कठिनाई , पडी
होगी। मुसलमान-काल से तो सस्कृत का प्रचार बहुत ही कम
होगया। चौके की तो वह पहले ही से पावद थी, अब
राजकीय अत्याचार के सामने उसने महलों से भाग कर काशी
और नदिया के झोपड़ी में शरण ली। वहाँ उसकी टीका-टिप्पणी
के सिवा और क्या हो सकता था । ऐसी दशा में यदि उसमे
फारसी के शब्द न आये तो आश्चर्य ही क्या । क्या मृतप्राय
N
,
। हिदी और उर्दू का विरोध शरीर में भी नये रक्त का सचार हो सकता है? अव अँगरेजी शासन के समय से फिर इस महती भाषा के जीर्णोद्धार का प्रयत्न हो रहा है । भारतवर्ष में ही नहीं, कितु योरप और अमरीका में भी अब उसने उच्च श्रेणी का स्थान पा लिया है। परतु इससे उसके भाडार में वृद्धि नहीं हो सकती। और भाषाओं को उससे चाहे जो कुछ लाभ पहुँचे, परतु वह उनसे कोई विशेष लाम नहीं उठा सकती। भारतवर्ष की वर्तमान भाषाओं का इतिहास उस समय से भारभ होता है जिस समय से सस्कृत का प्रत होता है। यह कहना कि वे सस्कृत-भाषा से निकली हैं कुछ ही दूर तक सत्य है। हाँ, यह कहना ठीक होगा कि उन सबका थोडा बहुत सघ सस्कृत से अवश्य है। इन सब भाषाओं में प्रथम ही से सर्वोच्च स्थान उसको मिला जो दिल्ली से लेकर विहार तक बोली जाती थी। इसके दो कारण थे। एक तो यह कि प्राचीन समय में अयोध्या, पाटलिपुत्र तथा इद्रप्रस्थ आर्य- सभ्यता के केंद्र थे । वही से समस्त भारतवर्ष का शासन होता था। वहीं से नवयुवक शासन नीति की शिक्षा पाकर भिन्न भित्र प्रातों का शासन करते थे। उन्हीं की राज-भाषा सीख कर उन प्रांतवालों को कार्य-साधन करना पड़ता था। यही दशा मुसलमान-काल में रही। तब से दिल्ली और आगरा शासन के केंद्र हो गये और दिल्ली को भापा राज-भाषा हो गई। दूसरा कारण यह था कि भारत के इस भाग ।
- - साहित्य-समीक्षा में, प्राचीन समय से, आर्य तथा बौद्धधर्म के तीर्थ-स्थान है। काशी की गलियो मे ही-विश्वनाथजी के मदिर में ही खडे होकर आप प्रत्यक्ष रूप से देख सकते हैं कि हिंदी ही राष्ट्र- भाषा होने के योग्य है। मदरासी, महाराष्ट्र, बगाली, पंजाबी, मारवाडी, गुजराती, सभी एक सूत्र से बँधे चले आ रहे हैं। दिल्ली में भी वही रगत है-यहाँ ससार-सुख के लिए और वहाँ स्वर्ग-सुख के लिए--परतु परिणाम एक ही निकलता है। भारतवर्ष में ऐसा कोई शहर नहीं है जहाँ दिल्ली और काशी की हिदी लोग न समझ सकें और आपका काम आप ही की भाषा के द्वारा न चल सके। उस हिंदी-भाषा का क्या रूप है जो दिल्ली से पटने तक बोली जाती है ? क्या उसमें सस्कृत और फारसी के शब्दों की उसी तरह भरमार है जैसी कि, अभाग्यवश, आज-कल हिदी भौर उर्दू-साहित्य में देखी जाती है ? सस्कृत और फ़ारसी से निकले हुए अर्थात् तद्भव शब्द अलबत्ते उसमें हैं, उन्हीं भाषाओं के जैसे के तैसे-तद्वत् या तत्सम-शब्द नहीं। ऐसे शब्द वो, आँख के ककड की तरह, खटकते हैं । इस भाषा में शब्दों को समय के प्रवाह ने पुरानी भाषाओं के खंडहरों को तोड कर, स्वाभाविक रूप दे दिया है। साहित्य की भाषा में उसके कुछ सेवियो ने इन पुरानी भाषाओं के सैंडहरों को नोड कर-समय का काम अपने हाथ मे लेकर अपनी बुद्धिमानी दिखाई है। इन्होंने यही नहीं किया कि उन शब्दों को जैसे का तैसा रख हिदी और उर्दू का विरोध दिया हो, कितु बहुतेरे तो अपनी बुद्धिमत्ता यहाँ तक दिखाते हैं कि वे व्याकरण-सबध को भी टूटने नहीं देते। 'जरूरत' का बहुवचन उर्दू के सेवक 'जरूरतें न करेंगे, वे फारसी का बहुवचन 'जरूरयात' लिसेंगे। हिदी के दरबार में भी सस्कृत के सधि और समास-सक्धी नियम, उसी रूप में, आदर पाते हुए दिसाई देते है यह उर्दू-फारसी और हिंदी-सस्कृत का ढकोसला फब तक चलेगा ? समय ने अँगरेजी के पुराने साहित्य की इस पान को तो रक्सा ही नहीं कि लैटिन के शब्द अँगरेजी में अपने ही रूप में रहें । अव तो सब शब्दों का निराला ही रग है, चाहे जिस भाषा से वे निकले हो। यही दशा वर्तमान हिदी-उर्द. साहित्य की होनेवाली है। समय से लड कर किसी को भी सफलवा हुई है ? वह इन शब्दो को-चाहे जिस भाषा से वे इस समय नावा जोडे हो-एक ही रंग में रंग देगा और भविष्य की राष्ट्रभाषा का रूप न तो हिंदी ही होगा, न उर्दू ही । वह एक ऐसी भाषा होगी जिसमें वर्तमान समय की सब भाषाओं का कुछ न कुछ अश अवश्य रहेगा । राष्ट्र-लिपि देवनागरी ही होगी, चाहे उसका रूप, और लिपियों के ससर्ग से, कुछ बदल जाय । फारसी-लिपि को अकेले सब लिपियो से लडना है। वह भारतवर्ष के लिपि-युद्ध में विजय नहीं प्राप्त कर सकती। उसको अपना बस्ता बाँध कर फारस और अफगानिस्तान की शरण लेनी पडेगी। उर्दू और फारसी-लिपि के लिए मुसलमान "
साहित्य-समीक्षा
चाहे जितनी छठ करें, परंतु समय उनकी बुद्धि को बद
देगा, यदि ईश्वर को उनका वर्तमान महत्त्व बनाये रखना है
हिदी-साहित्य संस्कृत के घर बैठ कर फारसी के विरुद्ध चा
जितना मजबूत कोट खोचे, परतु समय उसको तोड डाले
और फारसी के शब्दो को उसमें अवश्य स्थान मिलेगा, पर
अपने रूप में नहीं, हिदी ही का अँगरखा पहन कर वे राए
दरवार
में आदर पा सकेंगे, न कि फारसी की फे
पहन कर।
समय की गति को अच्छी तरह पहचान कर जब दो
पक्षो के विद्वान् अपनी हठ छोड देंगे और आपस में बै
कर विचार करेंगे, फिर वे जो कुछ ठीक समझे उसको कार्य
रूप में परिणत करेंगे, तभी भारतवर्ष का भला होगा ।
भाषा के
* यह लेन अगस्त १९१८ की सरस्वती में प्रकाशित हुआ था
गुरुवर द्विवेदीजी ने इस पर जो पत्र लिसा था वह यों हे-मेरी भ
वही राय हे जो आपकी है । मैं तदनुमार बर्ताव भी करता हूँ। सरत
लिखने की चेष्टा करता हूँ। उर्दू मिन्न भाषा नहीं। अरबी-फारम
के जो शद प्रचलित हैं, उन्हे मैं हिन्दी के ही शब्द समझता हूँ। में
बेस इस बात के प्रमाण है। पहले लोग लिखा करते थे, कहते
कि हिन्दी को विगाट रहा है। पर श्रय नहीं बोलते। और लोग म
'सरस्वती' का अनुकरण करने लगे है।
२-समालोचना* हिदी-साहित्य अब उस सीमा तक पहुँच गया है कि विशेषज्ञ समालोचकों के विना उसकी गति को ठीक रखना कठिन है । साहित्यकानन इतना विस्तृत होगया है कि अच्छे साहित्य-वृक्षों की रता के लिए अब कई साहित्यिक मालियों की आवश्यकता होगई है, जो होनहार और उपयोगी साहित्य- पल्लवों की सेवा कर और दूपित दुरुपयोगी साहित्य-जगल को साफ करते रहें। कोई समय था जब हिंदी में इने-गिने साहित्य-रल थे। जनता में इनका आदर था । परतु इनकी परस करनेवाले बहुत कम थे। सूरदास, तुलसीदास, बिहारी, केशवदास, * 'समालोचना' शीर्षक लेस 'सरस्वती' में मेरा सर्व प्रथम लेग था । पूज्यवर द्विवेदीजी के पन का प्रथम वाक्य था "पाप तो पडोस ही में छिपे रुस्तम निकले।" द्विवेदीजी न दिसम्बर १९१७ की 'सरस्वती' में 'समालोचना का सत्कार' शीर्षक लेप प्रकाशित किया था। मेरे लेख में संपादकीय लेख का बहुत कुछ प्रतिवाद था और विचार कच्चे थे, परतु उदारता देखिए । सहर्प प्रकाशित कर दिया और भाज्ञा दी कि बालोचनात्मक लेख भेजो। यो प्रापन हिदी-साहित्य-सेवा का मार्ग मेरे लिए निदिष्ट कर दिया। प्रस्तुत लेख पहली बार प्रकाशित हो रहा है। --लेखक , १४ साहित्य-समीक्षा भूषण-इनके अतिरिक अन्य साहित्यिकों का सद्योत समान जहाँ तहाँ थोडा बहुत प्रकाश था--अधिक नहीं। शांति, विद्या प्रचार और छापेखानो की बदौलत अब हिदी-साहित्य में अनेक प्रतिभाशाली कवि, इतिहासज्ञ, उपन्यास-लेखक और नाट्यकार जन्म लेने लगे हैं, साथ ही ऐसी पुस्तकें भी प्रकाशित होने लगी हैं जिनके प्रचार से जनता की सामाजिक और नैतिक हानि होने की सभावना है, जो नवयुवकों के हाथ लग कर उनके विचारों में विकार उत्पन्न करती हैं। साहित्यिक त्रिमूर्ति में इस समय ब्रह्मा का ही खूब जोर है। साहित्य-सृष्टि तो धडल्ले से हो रही है। परतु साहित्य-विष्णु लक्ष्मी की गोद में सो रहे हैं, और साहित्य- शिव सचेत तो अवश्य होगये हैं, परंतु सहारकारी गणों को अभी एकत्र नहीं कर पाये हैं। देश में जहाँ साहित्य था, उसके साथ उसके समालोचक भी थे। परतु इनकी समालोचना का ढग उस समय के लिए ही योग्य था। उस समय साहित्य की रचना साधारण जनता के लिए नहीं होती थी। इने-गिने साहित्य- प्रेमी राजाओं और रईसो के दरबारों में हो कवियों और नाट्यकारों को प्रतिष्ठा थी। इसलिए न कवियों को यह परवाह थो कि हमारी रचनाओं का जनवा पर क्या प्रभाव होगा, और न उनके समालोचकों को ही सामाजिक दृष्टि-कोण से इन रचनाओं के परसने की आवश्यकता थी। फल यह हुआ कि समालोचना प्राचीन संस्कृत की आलोचना-पद्धति में अलकार-भेद, पिगल, और भाषा सबधी गुण या अवगुण-प्रासादगुण, रूपक, शब्द-गौरव या व्याकरणीय निरकुशता-इन्हों का समावेश था । मुसलमानकाल मे भक्ति-मार्ग के उपासकों ने जो साहित्य- रचना की, वह अवश्य जनता के लिए थी। जनता ने उसका खूब आदर किया-तभी तो कबीर की साखियाँ, सूरदास के पद, और तुलसीदास की चौपाइयाँ हिदी-ससार मे इवनी प्रचलित हैं। परतु जनवा मानद 'गिरा अनयन नयन विनु बानी' कहकर ही सबने सतोष उठाना जाना। किया। लगी। देश में अँगरेजी राज्य फैला। हमने एक विदेशी साहित्य से परिचय प्राप्त किया। उसके नपीन सौंदर्य ने हमें चकित कर दिया। साये के सामने हम सेंदूर के सौदर्य को तुच्छ समझने लगे। शेक्सपियर, वर्ड्सवर्थ और टेनिसन के सामने कालिदास और तुलसीदास की आभा हमें फीकी मालूम पड़ने उधर हमारे ससर्ग से विदेशियों ने हमारे साहित्य के भी दर्शन किये। हम तो उनके साहित्य की कुछ सच्ची परख न कर सके, और करते भी तो हमारी कौन सुनता। परतु उन्होंने हमारी आँसें अवश्य खोल दी। उन्होंने कहा कि तुम हमारे साहित्य पर लट्ट, हो रहे हो। अपने साहित्य को तो देखो। कालिदास, सूरदास, और तुलसीदास तुम्हारे देश के ही नहीं-ससार के साहित्य-रत्न है। . 1 १६ साहित्य-समीक्षा अब हम अपने साहित्य-रत्नों का आदर करने लगे हैं, परतु उनकी यथेष्ट सेवा करने का हमें गौरव अभी नहीं प्राप्त हुआ है। तुलसीदास की अनेक टीका-टिप्पणियाँ हो चुकी हैं। तुलसीदास की कई जीवनियाँ निकल चुकी हैं। कहाँ पैदा हुए, कब पैदा हुए, कहाँ मरे, कब मरे, किस जाति के थे, गुरु कौन थे? इन सब पर तो प्रकाश डाला गया है। रचनाओं की भी पुराने ढग पर खूब आलोचना हुई है। उनके शरीर और कविता के बाह्य रूप की भी परस की गई है, परतु उन दोनों के भीतर जो कवि का हृदय है, उसकी जीवनी अभी तक नहीं लिखी गई है। डाक्टर वेणी- प्रसादजी , ने संक्षिप्त सूरसागर की भूमिका में सूरदास के साहित्यिक जीवन पर जो प्रकाश डाला है, उसे छोड़ कर और कहीं सूरदास की आत्मा के दर्शन नहीं मिलते। अब विश्व- विद्यालयों में भी हिदी को आदर मिलने लगा है। इसलिए आशा है कि हमारे हिदी-स्नातकों में से कुछ उत्साही और सहृदय नवयुवक अपने साहित्य-रत्नो की समालोचना करने का भार अपने सिर लेंगे। लेखक को मुजफ्फरपुर के साहित्य-सम्मेलन को नवयुवक- मंडली का कुछ अनुभव हो चुका है। इसलिए चेतावनी देना भी आवश्यक है। रस्किन ने एक जगह अपने नवयुवक पाठकों को सलाह दी है कि यदि आपको किसी नामी साहित्यिक की रचना फीकी मालूम पड़े, तो तुरत
समालोचना
उसका तिरस्कार न कीजिए। उसे पढिए और उसका मनन
कीजिए, यह सोच कर कि यदि आप इस रचना का चमत्कार
नहीं देस पाये हैं, तो यह आपकी कच्ची समझ का ही दोष
है। हिंदी के होनहार साहित्य-सेवियों से लेसफ का भी यही
विनम्र निवेदन है।
इस समालोचना कार्य के लिए तैयारी क्योंकर हो।
गुरुपद पाने के लिए बहुत समय तक शिष्य-कार्य करना
पडता है। इसलिए निवेदन है कि तैयारी के समय
आदरणीय साहित्यिको की रचनाओं का ही अध्ययन
किया जाय। उनकी परस के लिए समकालीन विदेशी
साहित्यिकों की रचनाओं और पूर्वकालीन स्वदेशी रचनाओं से
उनकी तुलना की जाय । जिस देश-काल से उन रचनाओं का
सबध हो उसकी सामाजिक अवस्था से परिचय प्राप्त किया
जाय। फिर गतकालीन साहित्य पर उन रचनाओं के प्रभाव
की जाँच की जाय। साहित्यिक पुरुष की जीवन घटनाओं
का उसकी रचनाओं पर प्रभाव पड़ता है। इसलिए उसकी
जीवन-कथा का इस दृष्टि से हा अध्ययन किया जाय कि जो
जो मुसीबतें उस पर बीती हैं, जो जो सुख उसने लूटे हैं, उनसे
उत्पन्न मनोमाव उसकी रचनाओं में कहाँ कहाँ छिपे पडे हैं
हम यह नहीं कहते कि अलकार, पिगल इत्यादि जो प्राचीन
आलोचन-पद्धति के अग हैं, उनका अध्ययन न किया जाय ।
इन विषयों के जानकारी को भी आवश्यकता है।
परतु
.
१८
साहित्य-समीक्षा
इनके चक्कर में अधिक समय नष्ट करने की अब कोई आवश
कता नहीं है। प्राचीन दरबारी आलोचना का समय ब
चुका, अब नवीन सामाजिक आलोचना का समय है।
अभी सहार-कार्य के लिए शीघता न कीजिए, अभी अ
भवी समालोचकों पर ही यह भार रहने दीजिए। जब अ
साहित्य की यथेष्ट सेवा कर चुकेंगे, जब आप अपने विषय
विशेषज्ञ हो जायेंगे तब साहित्य-समाज आपकी सहारका
आलोचनाओं का आदर करेगा, अभी नहीं ।
अब कुछ निवेदन अपने उन प्रतिष्ठित साहित्य-सेवियो
है जो साहित्य को शुद्ध रखने का अधिकार रखते हैं,
कच्चे लेखकों को साहित्य-दगल में समय से पहले उतरने ।
मना कर सकते हैं, जो धन-लोलुप प्रकाशकों को अपन
तिरस्कार-दृष्टि से हानिकारक साहित्य के बढाने से रोर
सकते हैं।
अँगरेजी साहित्य-ससार में ऐसे समालोचकों का प
निर्दिष्ट होगया है। वहाँ प्रत्येक प्रतिष्ठित विशेषज्ञ का यह में
कर्तव्य रहता है कि अपने विषय में प्रकाशित पुस्तक की क
आलोचना करे। उसकी आलोचना पर ही जनता अपन
राय कायम करती है । हिंदी-साहित्य में अभी या
बात नहीं है अभी तक यहाँ तो
फिक रही है। अभी दक यही धुन रही है कि
प्रवार की ही
समालोचना
इस कार्य के
साहित्य क्षेत्र विस्तृत हो, यदि उसमें साधारण श्रेणी के
या हानिकारक ग्रथ भी हो तो कोई हर्ज नहीं। परतु
अब वह समय आगया है कि हमारे प्रतिष्ठित साहित्य-सेवी
साहित्य-क्षेत्र की निकाई का कार्य हाथ में ले ।
लिए साहस और धैर्य की तो आवश्यकवा है ही, क्योंकि
असतुष्ट लेखकों की 'प्रत्यालोचनाओं' और जनवा की
लापरवाही का सामना करना है। साथ ही समालोचना की
शैली को भी परिमार्जित करने की आवश्यकता है।
आज-कल जो समालोचना का ढग प्रचलित है उसमें या
वो किसी प्रथ के दोष ही दोष दिखा दिये जाते हैं, या फिर
सारीफ के पुल बाँध दिये जाते हैं यह ठीक नहीं है।
आलोचना में प्रकाश और छाया, गुण और
ऐसा समिश्रण होना चाहिए कि पाठक के हृदय में पुस्तक के
प्रति तिरस्कार का भाव न आये, और लेसक का दिल न
दुखे।
इस ढग की आलोचना विशेषतया साधारण श्रेणी
की पुस्तकों के लिए ही हितकर है। किसी प्रतिभाशाली या
उदीयमान लेसक की लेखनी से निकली हुई पुस्तक की
मालोचना में विशेष सहृदयता से काम लेने की आवश्यकता
उसकी आलोचना के लिए उसी ढग की तैयारी की
आवश्यकता है जो सर्वमान्य साहित्य-रत्नों की परस के लिए
निर्दिष्ट है।
अवगुण, दोनों का
साहित्य-समीक्षा रह गये ऐसे प्रथ जो युवक-समाज के विचारों में विकार उत्पन्न कर सकते हैं, जो समाज के नैतिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। ऐसे ग्रथो पर समालोचक को अपनी त्रिनेन्न- दृष्टि डालने की आवश्यकता है। दुर्भाग्यवश अब ऐसे साहित्य की भी सृष्टि हो रही है जिसका सहार करना समालोचक- समुदाय का प्रथम कर्तव्य है। अभी तक समालोचना का भार प्राय पत्र-पत्रिकाओं के सपादकों पर ही रहा है। सपादक प्रत्येक विषय के विद्वान तो होते ही नहीं। फलत उनके द्वारा प्राय अच्छी पुस्तकों के भी परिचय-मात्र निकलते हैं। इस कार्य में विशेषज्ञ विद्वानों को भी हाथ बटाने की आवश्यकता है। अतिम निवेदन पाठक-समाज से है। कोई समय था जब हमे आपकी परवाह न थी। राजामों और रईसों के दरबारों में हमारी उदरपूर्ति होती थी। परतु अन आपही हमारे अन्नदाता हैं। इसलिए बहुत कुछ आपही पर निर्भर है कि हम कैसे साहित्य की सृष्टि करें। आपकी सम्मिलित समालोचना के सामने किसी व्यक्ति की समालोचना नहीं ठहर सकती। यह समालोचना आप यो प्रकट करते हैं कि अमुक पुस्तक हाथों हाथ बिक रही है या प्रकाशक की अल- मारियों में शोभा दे रही है। आपकी रुचि पर हमें फैसला सुनाने का कोई अधिकार नहीं है। एक विनम्र प्रश्न ही करना है। किसी देश-काल की सामाजिक अवस्था का इस बात रामचरितमानस का महत्त्व २३ फोन पुस्तकें किस किस समय लिखीं, किस समय शरीर छोडा- ये सब बातें रुचिकर अवश्य मालूम होती हैं। परतु यदि इन बाते का सबध कवि के जीवन से न हो तो इनमें किसी अन्य साधारण पुरुष के जीवन-चरित की अपेता कोई विशेषता नहीं मालूम होती । कवि-चरित में जो विशेषता होती है वह उनके मानसिक जीवन से सबध रसती है। अतएव यदि उनके विषय में हमें कुछ जानना है तो जो कुछ वे हमें दे गये हैं उसी से सतोष करना चाहिए। क्या जानें उन्होंने किस लिए अपने शरीर के जीवन को हमसे छिपा रक्सा । तो फिर क्यों हम उनकी इच्छा के विरुद्ध चल कर पुराने खंडहरों को तोडे और उनके भौतिक शरीर को कष्ट दे । हमें चाहिए कि हम उनकी मनस्तरगों से उत्पन्न राम, हेम्लेट, ओडीसियस के सदृश वीरों को छाती से लगावे, शकुतला, सीता हेलेन के सदृश नारोरत्नों को हृदय का शृगार बनावें, और उन्हीं के दिव्य स्वरूप मे उनके कवियों की आत्मा के दर्शन करें है ३-रामचरितमानस का महत्त्व इस लेख में रामचरितमानस के विधाता गोस्वामी तुलसी- दास के जीवन-चरित के विषय में कुछ नहीं कहना है, न राम- चरितमानस के अतिरिक्ति उनके किसी और प्रध के विषय में विचार करना है संसार के कवि-समाज में तुलसीदास का ऊँचा आसन । उनका जीवन-चरित लिखनेवालों को वही कठिनाइयाँ पडती है, जो शेक्सपियर के भक्तों को इँगलिस्तान में, होमर के भकों को यूनान में, और कालिदास, वाल्मीकि और कृष्ण के भक्तों को भारत में पड़ी हैं। और इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं, क्योंकि कवि के समान नि.स्वार्थ जीवन ससार में किसी और का नहीं होता। कवियों का मन उनके शरीर से सबध न रस कर प्रकृति के प्रत्येक अश में विचरता है और उसको जीवन प्रदान करता है। उसी जीवित प्रकृति को वे, कविता के रूप में, ससार के लिए छोड़ जाते हैं। उनके मनोभावों या उनकी वासनाओं को ढूंढना हो तो उनकी कविता में हृदो। जो स्थूल शरीर के कृत्यों के विषय में खोज करते हैं, उनका वह कठिन प्रयत्न सर्वथा प्रशसनीय है, परतु उससे उनके विषय में जन-समुदाय को कुछ विशेष ज्ञान-प्राप्ति नहीं होती । अमुक कवि किस वर्ष पैदा हुआ, कहाँ और किससे . अभ्ययन किया, कौन कौन विषयों में पारदर्शिता प्राप्त की, कौन , महाशय उनके रामचरितमानस का महत्व २३ कौन पुस्तकें किस किस समय लिखीं, किस समय शरीर छोडा- ये सब बातें रुचिकर अवश्य मालूम होती हैं। परतु यदि इन बातों का सबध कवि के जीवन से न हो तो इनमें किसी अन्य साधारण पुरुष के जीवन चरित की अपेक्षा कोई विशेषता नहीं मालूम होती । कवि-चरित में जो विशेषता होती है वह उनके मानसिक जीवन से सवध रसती है। प्रवएव यदि उनके विषय में हमें कुछ जानना है तो जो कुछ वे हमें दे गये हैं उसी से सतोष करना चाहिए। क्या जानें उन्होंने किस लिए अपने शरीर के जीवन को हमसे छिपा रक्सा । तो फिर क्यों हम उनकी इच्छा के विरुद्ध चल कर पुराने खंडहरों को तोडे और उनके भौतिक शरीर को कष्ट दे । हमें चाहिए कि हम उनकी मनस्तरगों से उत्पन्न राम, हैम्लेट, ओडोसियस के सदृश वीरों को छाती से लगावें, शकुतला, सीवा हेलेन के सदृश नारीरलों को हृदय का शृगार बनावें, और उन्हीं के दिव्य स्वरूप में उनके कवियों की आत्मा के दर्शन करें। रामचरितमानस ससार के महाकाव्यों में गिने जाने योग्य है। चीनी और जापानी भाषाओं का तो मुझे ज्ञान नही, परंतु जो जो महाकाव्य रामचरित मानस के साथ स्थान पाने योग्य है उनके नाम सर्वसाधारण से छिपे नहीं। प्राचीन भापा में कालिदास-कृत रघुवश, वाल्मीकीय रामायण, होमर-कृत इलियड, वर्जिल-कृत ईनियड और फिरदौसीकृत शाहनामा उच श्रेणी के काव्य समझे जाते हैं। आधुनिक भाषाओं - २४ साहित्य-समीक्षा में मिल्टन का पैराडाइज लास्ट अँगरेजी में, दांते का डिवाइन कमेडी इटेलियन में और माइकेल मधुसूदनदत्त- कृत मेघनादवध बँगला मे यह काव्य उच्च पद पाने योग्य हैं। फ्रेंच और जर्मन साहित्य में नाटकों और फुटकर कवि- ताओं को तो भरमार है, परतु अच्छे महाकाव्यों का प्राय अभाव ही सा है। रामचरितमानस के महत्व का निर्णय इन्हीं पूर्व-निर्दिष्ट प्रथा में से करना है। इस विषय में हमें दो बातों का ध्यान रखना चाहिए । एक तो यह कि हम रामचरितमानस की तुलना महा- काव्यो ही से करेंगे। कविता का एक रूप नाटक और दूसरा पाख्यान है, जिसका विस्तार बढने से वह महाकाव्य नाम से उल्लिखित होता है। इसलिए नाटक की तुलना महाकाव्य से करना ठीक नहीं । दूसरी बात यह है कि हम इन ग्रथों के विशेष विशेष अशों की तुलना एक दूसरे से न करेंगे। भाव तथा कवित्व की तुलना न वो हम करने के योग्य ही हैं, न इस छोटे-से लेख में ऐसा प्रयत्न करने से इन कवियों के काव्य-सागर में इनके भाव-रत्नों का पता ही लग सकता है। हमें विचार केवल यह : करना है कि पूर्वोक्त प्रयों में से मनुष्य के हृदय में किसने कहाँ वक स्थान पाया है, और इसी प्रश्न हल होने पर हम उसके महत्त्व का निर्णय कर सकेंगे । किसी कविता का जीवन-काल यो स्थिर हो सकता है कि वह मनुष्य के प्रांतरिक अथवा मानसिक जीवन से कहाँ
.
रामचरितमानस का महत्त्व
२५
तक मिलती है, कहाँ तक उससे उत्पन्न हुए भाव उसके मन से
मिल जाते हैं, और कहाँ तक वे उसके जीवन को दूसरे ही रग
में रंग देते हैं। जब तक कविताओं में यह पाकर्पणी शक्ति
रहती है, तभी वफ वे जीवित रहती है, उसके पश्चात् उनका
अवकाल आ जाता है। चाहे वे पुस्तक-रूप में जितने समय
तक रहें, परतु मनुष्य के हृदय में उनको स्थान नहीं मिलता।
बहुत-सी कविताएँ किसी विशेष देश या काल के लिए ही
होती हैं। उनका जीवन उसी समय तक के लिए होता है
और उनकी प्रचार-सीमा भी उसी देश या काल के प्रवर्गव
रहती है। ऐसे फविता-रत्न थोडे ही हैं जो सर्वत्र-व्यापी हो,
जो किसी देश या काल के बधन से न बँधे हों। ऐसे ही
अघ अमर होते हैं। ये जहाँ पहुँचते हैं वहीं मनुष्य के हृदय
में स्थान पा लेते हैं, इनके जन्मदावा मानसिक जीवन के प्रग
हो जाते हैं, यह किसी देश या काल के बधन से नहीं बंधे
रहते।
अच्छा तो ऐसे प्रथों और क्षण-मगुर कविताओं के
भावों में अतर क्या है ? यही कि मनुष्य के गूढ से गूढ
भावो तक उनकी पहुँच होती है। कविता के रूप में अपने
भावों को मनुष्य इन्ही अमर-प्रथों में पाता है, और बहुत
दिन से विछुडे हुए मित्र एक दूसरे के गले लगते हैं
भाषा और विषय के सयोग से महाकाव्य का जन्म
होता है। भावों तक कवि चाहे जिवना पहुँच गया हो,
परतु
प्रयत्न करे
साहित्य-समीक्षा
चाहे जितना अच्छा चित्र उसने उनका खोंचा हो, जिस
भाषा में उसने उनको प्रकट किया है, वह यदि मनुष्य के
हृदय में जीवित नहीं, यदि मनुष्य अपने प्रेम, क्रोध, मद, लोभ,
मोह इत्यादि को उस भाषा में प्रकट नहीं करता, तो वे भाव,
। उस भाषा के रूप में, उसके हृदय तक नहीं पहुँच सकते और '
वह उन्हें पहचान नहीं सकता। इस विचार से कि वे भाव
उसके पूर्वजों के हैं, कदाचित् वह उनका श्रादर करे और
अपनी भाषा के आमरण पहना कर उनको पहचानने का
। परतु उसे पूर्णतया सफलता नहीं प्राप्त होती।
यही कारण है कि सस्कृत, लैटिन, प्रौक आदि भाषाओं का
जितना आदर है, उन पर हमारा उतना प्रेम नहीं।
इन प्राचीन भाषाओ के अधिकतर ग्रथों का अनुवाद
प्रचलित भाषाओं में होगया है। इससे लाभ भी अवश्य
हुमा है। हम अपने पूर्वजों के साधारण विचारों को अपनी
ही भाषा मे समझने लगे हैं। परतु उनके काव्य-रस. का
स्वाद हम अनुवादित प्रथों में नहीं पा सकते । यदि अनुवादक
भी कवि है तो काव्य का ठीक ठीक अनुवाद भी उससे नहीं
हो सकता, क्योकि एक भाषा से दूसरी भाषा में परिवर्तन करते
समय वह अपने काव्य-रस की पुट उसमें अवश्य देता है।
दृष्टात के लिए, पोप द्वारा अनुवादित ईलियड वही चीज नहीं
जो होमर की रचना है। अँगरेजी की ईलियड में कुछ और ही
स्वाद है और ग्रीक के मौलिक अघ में कुछ और ही । बेचारी
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रामचरितमानस का महत्त्व
२७
सस्कृत को तो इवना भी सौभाग्य नहीं प्राप्त हुआ कि कालिदास
के सदृश कोई योग्य कवि वनके काव्य को किसी प्रचलित
भाषा में अनुवादित करता । यदि ऐसा होता भी तो उसके
अनुवाद में शकुतला, पार्वती, दिलीप और रघु इसी शताब्दी
के होते, आज से पद्रह सौ वर्ष पहले के नहीं।
प्राचीन भाषाओं में लिखित काव्य आधुनिक काव्यों की
समता प्राय इसी एक कारण से नहीं कर सकते कि उनकी भाषा
अब सर्वसाधारण में प्रचलित नहीं । उन काव्यो का आनद
लेने के लिए बरसों उनकी भाषा के सूखे व्याकरण को कोई
रटे, तब कहीं उसे उनके काव्य-रस चखने की योग्यता प्राप्त हो ।
पर उस समय तक उस रस के स्वाद लेने की शक्ति भी कदा-
चित् उसमें न रहे, व्याकरण और छन्द शास्त्र के दोषों को छोड
कर और कुछ उसे उनमें दिसाई ही न पडे। इन काव्यों की
तुलना हम उस काव्य से कैसे कर सकते हैं, जिसके वाक्य
बालक अपनी माँ की गोद ही से सुनने लगते हैं, जिससे उद्धव
उदाहरण उनको डाँटने या मनाने के लिए काम में लाये जाते हैं,
जिसकी शपथ की सहायता लेकर युवक-युवती प्रणय-पुष्टि करते
है, और जिसके कथा-सरोवर में वृद्ध किसान कुटुवसहित
स्नान करके कृतकृत्य होते हैं ?
भाषा ही के विचार से नहीं, विषय-प्रसग के भी विचार
से, प्राचीन काव्य वर्तमान ससार के लिए उतने उपयोगी नहीं,
जितने कि प्रचलित मापात्रों में रचित काव्य हो सकते हैं।
२९ साहित्य-समीक्षा प्राचीन काल में मानुपिक सभ्यता की बाल्यावस्था थी। उस समय के विचार सरल और शुद्ध थे, कल्पना-सृष्टि की अधिकता थी और उसका मुकाव विशेषतया मारकाट, लडाई- झगडे और जमीन-आसमान के कुलावे मिलाने की ओर था, गार्हस्थ्य जीवन की शातिमयी घटनाओं की ओर नहीं। यही कारण है जो प्राचीन काव्यों के विषय प्राय एक ही से हैं प्राचीन ग्रीस में पेरिस हेलन को उड़ा ले गया, ट्रोजन-युद्ध हुआ और होमर ने उसका वर्णन ईलियड में किया। भारत में रावण सीता को हर ले गया, राम ने लका जाकर उससे युद्ध किया, विजय पाई, और वाल्मीकि ने इस कथा का वर्णन कर राम और सीता को अमर कर दिया। परतु वर्तमान समय में मनुष्य का अधिकाश जीवन शांतिमय है। इसलिए उस समय के लेश-पूर्ण विचारों से आज-कल के लोगों की सहानुभूति नहा हो सकती। सभ्यता के विकास के साथ साथ हमारे कल्पित विचारों में भी पहले की सी तीव्रता नहीं रही । हरक्यूलीज की १२ कसरतों का हाल पढ कर बच्चे चाहे जितना आनंद प्राप्त करें, उससे और लोगों का विशेष मनोरजन नहीं हो सकता। भला बालकों और वृद्धा खियो को छोड कर कौन मान लेगा कि रावण के दस सिर थे, वह पर्वत के सदृश ऊँचा था, और कुभकर्ण छ महीने नशे में चूर सोया करता था । शाहनामे के रुस्तम महाशय भी हरक्यूलोज से कुछ कम नहीं । अतण्व उनका जीवन-चरित भी हमारे लिए विशेष काम का नहीं।
रामचरितमानस का महत्त्व २६ रघुवंश का पद इन सब काव्यों से ऊँचा है। उसमें प्रशा- तिपूर्ण घटनाएं उतनी नहीं, करपना-शक्ति की दौड भी उसमें उतनी नहीं । रस के प्रवाह और उसके आस्वादन की सामग्री का तो कहना ही क्या है । यह काव्य कालिदास की प्रौढा- वस्था-प्राप्त कवित्व-शक्ति का फल है। अन प्रचलित भापाओं के काव्यो को लीजिए । मिल्टन के पैराडायज लास्ट के विषय में मार्क पेटिसन साहब की शिकायत है कि उसको कालेज से निकलने के बाद अँगरेज लोग ही चाव से नहीं पढते, औरों की कौन कहे । इसका कारण यह है कि पैराडायज लास्ट का विषय मनुष्य जीवन से कुछ सबध नहा रसता । उसके नायकों को नेत्रहीन मिल्टन के ज्ञानचतु ही देख सकते थे, उनके चरित्रों का अनुभव उसी की अपूर्व धर्मवधन- ग्रस्त आत्मा कर सकती थी, और उसकी भाषा को वही समझ सकता है जिसने उसी की तरह ग्रीक और लैटिन साहित्य का मथन किया हो । पैराडायज लास्ट के सहोदर, डिवाइन कमेडी नामक काव्य, की भी वही दशा है। वह एक अधे अभागे कवि का स्वप्न है। नरक के उस भयानक दृश्य को फिर भला कौन दुवारा देखने की इच्छा करेगा जिसने एक बार भी, दाते की तरह, उसे देखा हो ? मेघनाद-वध काव्य इन सबसे उच्चतम है। माइकेल मधुसूदन के चरित्र जीते जागते वीर और वीरांगनाएँ हैं, और उसके फाव्य में प्रोन है । परतु उसका विषय ऐसा है कि उसके चरित्र हिदू- साहित्य-समीक्षा समाज के प्राध्यात्मिक जीवन पर कोई विशेष प्रभाव नहीं डाल सकते '-- अब रामचरितमानस को देखिए । इसकी हिदी भारतवर्ष के अधिकांश वासियो की मातृ-भाषा है, और वह भाषा इतनी सरल है कि अपढ ग्रामवासी भी उसे सुनकर किसी साहित्यसेवी विद्वान से कम आनद नहीं उठाते । प्राचीन काल से अब तक कौन ऐसा काव्य हुआ है, जिसने इतने अधिक मनुष्यो के हृदय में स्थान पाया हो और जिसने उनके जीवन पर इतना अधिक प्रभाव डाला हो १ अँगरेज-समालोचकों का यह कहना बिलकुल ठीक है कि तुलसीदास से बढकर भार- तीय समाज का सुधारक कोई नहीं हुआ । जरा ध्यान तो दीजिए, सतलज से सोन तक, और हिमालय मे विम्याचल तक, तीन सौ वर्ष से, यदि प्राय प्रत्येक गाँव में किसी भी अथ की चर्चा रही है वो रामचरितमानस की। कोई भी ऐसा हिदू नहीं जो अपने बालकों को राम और सीता का आदर्श न दिसलाता हो, जिसको समय समय पर रामचरितमानस के दोहे और चौपाइयाँ याद न आ जाती हों, वह पढा हो या बे-पढ़ा। जिस समय अँगरेजी विचारों की धारा इस देश में जोर से बह रही थी उस समय यह शका हुई थी कि कहीं हमारे देश का यह अमूल्य रत्न उसमें डूब न जाय । विश्वविद्यालय में उसके लिए कोई स्थान न था और नव-विचार-विभूपित हृदयों में
रामचरितमानस का महत्त्व
हिदी-साहित्य की ओर से घृणा का वीज उग रहा था। परतु
कुछ समय से वह धारा अपना प्रवाह बदलती हुई दिखाई
पडती है। इस हिदी-रत्न को शिक्षित-समाज अब आदर की
दृष्टि से देखने लगा है। आशा है कि कुछ समय में इसके लिए
उस समाज के हृदय मे ऊँचा आसन भी मिल जायगा।
अच्छा, अब देखिए कि इस प्रथ का क्यों इतना आदर
है। समय ने बहुत से ग्रथो का नाश कर डाला है, परतु
यह अभी तक मनुष्य-हृदय में विराजमान ही नहीं, दिन पर
दिन उसमें अपना स्थायी घर बनाता हुआ देख पडता है।
वाल्मीकीय रामायण भी तो है, पर उस पर इतनी श्रद्धा नहीं।
रामचरितमानस पर ही क्यो ?
रामचरितमानस में एक ऐसी बात है जो ससार के किसी
काव्य में नहीं । उसमें तुलसीदास ईश्वर को साधारण मनुष्य
का रूप देकर उसे सासारिक जीवन की सभी अवस्थाओं में ले
गये हैं। राम आदर्श पुरुष हैं, पर अपने कार्यों के कारण
नहीं, कितु तुलसीदास की अनन्य भक्ति के कारण । उनमें
वही गुण दोष हैं जो मनुष्य-मान में पाये जा सकते हैं। परतु
तुलसीदास ने उनका वर्णन इस प्रकार किया है कि उन्हीं दोपों
के कारण रामचद्रजी हमारे सगे होगये हैं। यदि तुलसीदास
उनमे गुण ही गुण दिखाते वो रामचरितमानस वेदोत हो
जाता । तब वह इतने आदर का पात्र न रहता। तुलसीदास के
रामचद्र वाल्मीकि के रामचद्र से बहुत कुछ भिन्न हैं । पहले
३२ साहित्य-समीक्षा वे राजकुमार थे, अब तो वे मनुष्य-मात्र के सगे ईश्वर हैं। हम उनमें अपना प्रतिविव देखते हैं, परतु साथ ही साथ तुलसी हमको याद दिलाते जाते हैं कि उन्होंने हमारे और तुम्हारे ही उद्वार के लिए जन्म लिया है। रामचरितमानस को आदि से अत तक पढ जाइए और बाल्यावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक आनद लूटिए। बचपन में राम हमारे भाई हैं, कौशल्या हमारी माँ हैं, और दशरथ हमारे वृद्ध पिता हैं । दूर की यात्रा के लिए आज्ञा देते समय दशरथ उसी तरह दुखी होते हैं जिस तरह कोई वृद्ध पिता अपने पुत्र के दूर जाते समय दुखी होता है । आज्ञा मिलती है, और रामचद्र चले जाते हैं। हम राम के साथ धनुर्विद्या सीसते हैं, वन वन विचरते हैं, और यौवनावस्था प्राप्त होने पर किसी कुमारी के प्रेम-पाश में फंसते हैं। सीता के दर्शन होने पर रामचद्र-लक्ष्मण का वार्तालाप कैसा भाव-पूर्ण और कैसे स्वर्गीय प्रेम का उदाहरण है । वाल्मीकि से तुलना कर देखिए । हम तो कहते हैं कि कालिदास की भी पहुँच वहाँ तक नहीं है । सीता तुलसीदाम ही की नहीं, जगत् की जननी हैं। तुलसीदास रामचरितमानस की नायिका के चरण-सेवक हैं। कहिए क्या किसी और कवि ने भी अपने काव्य की नायिका को इतना उच्च पद दिया है ? कालिदास शकुतला को अपने हृदय में रखते हैं, परतु तुलसीदास सीता के चरण-कमलो पर मस्तक रस कर जगत्पिता रामचद्र के साथ उनके प्रणय का वर्णन करते हैं।
रामचरितमानस का महत्व
३३
फिर क्यो न ऐसे वर्शन को बालक से लेकर चूढे तक उसी चाव
से पढ़ें और प्रेमोद्रेक से उसी तरह गद्गद हो जायें जिस तरह
सबसे पहले तुलसीदास हुए थे ।
परतु गाईस्थ्य जीवन कटकमय है। क्या तुलसीदास
इसका अनुभव न कर चुके थे' बहू को घर आये अधिक
दिन न हुए थे कि वह सौतेली सास के ईर्ष्या-बाण का निशाना
बनी । राम को वनवास की आज्ञा होगई।
कौन ऐसा कठोर-हृदय होगा जो इस वर्णन को पढकर
न पसीज ठठे १ न मालूम कितने सतान-मोक-सतप्त हृदयों
को राम ने आकर सात्वना दी होगी-
परप चारि दस विपिन बसि करि पितु-बचन प्रमान ।
श्राय पाय पुनि देखिहै। मन जनि रसि मलान ।
उखडे हुए हृदय-वृक्ष में फिर आशा-पल्लव निकलने लगते
हैं और जीवन के सव कार्य फिर ज्यों के त्यो चलने लगते हैं।
रामचद्र की वन-यात्रा का अपूर्व प्राकृतिक वर्णन कविता
के विचार से बहुत अच्छा है। परतु मानसिक चित्र खींचने में
पालि को छोड कर और किसी के लिए तुलसीदास ने विशेष
कष्ट नहीं उठाया।
लकाकांड में युद्ध का वर्णन, पुराने ढग पर, बड़ी योग्यता
के साथ किया गया है, परतु मदोदरी के चित्र को छोड कर
और सब चित्र असभव से मालूम पड़ते हैं। मानसिक चित्र
३४
साहित्य-समीक्षा
-
खींचने मे तुलसीदास ने जितनो योग्यता बालकांड ॐ
अयोध्याकांड में दिखाई है उतनी और किसी कांड में नह
उत्तरकांड बालकों तथा युवकों की भी समझ में अच्छी त
नहीं आ सकता। फिर ज्ञान का वर्णन भी त्यागी मनुष्यों
के लिए है। मालूम होता है, तुलसीदास लकाकांड सम
करते करते थक गये थे। इससे वह उत्तरकांड को कि
तरह घसीट ले गये हैं।
परतु, चाहे जहाँ देखिए, तुलसीदास राम के प्रेम में :
हैं। सेवा करने के लिए वह कहीं निपाद हो जाते हैं और क
हनूमान् का अवतार ले लेते हैं।
यदि अगाध भक्ति के कहीं भी उदाहरण देखने हो तो
दृश्यों में देखिए जहाँ तुलसीदास भक्ति की भिक्षा मांगते हैं
निपाद कहता है-
पदकमल धोई चढाइ नाव न नाथ उतराई हौं ।
'मोहि राम रावर मान दसरथ सपथ सब साची कहीं ॥
बरु तीर मारहु लखन पै जब लगि न पाय पखारिहीं।
तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपालु पार उतारिहों
हनुमानजी कहते हैं-
एक मद मैं मोहवस कीस हृदय श्रज्ञान ।
पुनि प्रभु मोहि विसारेहु, दीनबधु भगवान ।।
फिर वह बंदर के रूप में सेवा के बदले क्या
नाथ भकि तव सब सुखदायिनि । देहु कृपा करि सो
रामचरितमानस का महत्त्व - और यदि आपको भी सेवा के बदले प्रेम-मिता ही माँगनी हो तो महादेवजी सिफारिश करने के लिए आ जाते हैं- } उमा राम स्वभाव जिन जाना। ताहि भजन तजि भाव न पाना । इसी भक्ति भाव के प्राधिक्य को देखकर कुछ अँगरेज- समालोचकों ने यहाँ तक कह डाला है कि रामचरितमानस के भक्ति-भाव-विषयक उद्देश्य मे ईसाई-मत की बहुत कुछ छाया है। इस विषय में राय देना कठिन है। समता बहुत कुछ है और इसमें कोई सदेह नहीं कि राम, यीशु, कृष्ण, और बुद्ध के सदृश किसी और आत्मा ने मनुष्य के हृदय में इतनी जगह नहीं पाई है। बुद्ध के समय से प्रेम और सच्चे गार्हस्थ्य जीवन की शिक्षा भारतवर्ष के सुधारक देते चले प्रारहे हैं, अधिक सुधार तुलसीदास ने किया है उतना और किसी से नहीं बन पडा। उनकी ललित लेसनो ने बौद्ध भिक्षुको और पादरियो की आवश्यकता ही न रक्खी। सुनिए, सुनाइए और तदनुसार सुधार कीजिए। इस हिदी-साहित्य की गुदडी के लाल को यदि आपने अभी तक नहीं पहचाना, तो आशा है इस सतिप्त लेख से आपका ध्यान उधर जायगा और किसी विद्वान् के गवेपणा- पूर्ण प्रथ-द्वारा इस अपूर्व रत्न के महत्व को अच्छी तरह परस होगी। परतु जिवना ४-हिदी में नाटक और अभिनय कुछ वर्ष हुए, लखनऊ ही में नहीं, जहाँ कहीं हिंदी- भाषा बोली जाती थी, पारसी-कपनियों और उनके असीरे हिर्स और खूबसूरत बला का बोल-बाला था। अब यह समय है कि लखनऊ में ही व्याकुल भारत, किर्लोस्कर और सूर- विजय कपनियो ने सरल हिंदी में लिखे हुए नाटकों का अभिनय कर जनता को उपदेश देते हुए प्रसन्न किया है और खूब लाभ भी उठाया है। हमे तीनों नाट्य-कपनियों के खेलों के देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अधिक नाटक देखने का तो अवसर नहीं मिला। क्योकि दर्शन के साथ भेंट देना ज़रूरी था-परतु बानगियाँ अवश्य देखी । इन्हीं के आधार पर हमें इस लेख में नाट्य- कला तथा उसके हिंदी-ससार में प्रचार करने के विषय में कुछ विचार करना है इन कपनियो ने इतना तो साबित ही कर दिया कि यदि नाट्यकारों में कुछ भी योग्यता हो, यदि नदो को गाना आता हो, यदि पर्दे या पोशाकों पर काफी खर्च किया जा सके और नाच तथा कलाबाजियों के लिए दो चार नट मिल सके तो हिंदी में नाटक के अभिनय का सफल होना दुष्कर नही है।
हिंदी में नाटक और अभिनय यह सब कुछ है। हम चाहते हैं कि हिंदी-भाषा-भाषी समाज में उन्हों की भाषा-द्वारा नाटक दिखाये जायें। परतु जो कुछ इन कंपनियों ने दिखाया है, उससे हम सतुष्ट नहीं हैं। यदि हमें इस सबंध में कुछ कड़ी बाते कहनी है तो वे इस- लिए कि यह कपनियों रुपया हीन कमायें । हिदी में एक स्थायी नाट्य-साहित्य को उत्पन्न करना और नाट्य-कला को उब श्रेणी का बनाना उवना ही आवश्यक है जितना कि रुपया कमाना। यह हम मानते हैं कि साधारण जनता में नाट्य-कला, नाट्य- कार के शब्दों के भाव तथा गानविद्या के गढ रहस्यों के समझने को योग्यता नहीं होती। परतु कुछ ही समय तक आप परदों और पोशाकों की भडक के पीछे अपने नाट्यकार तथा नाट्य- फला के दोषों को छिपाये रख सकते हैं। काठ की हाँडी अधिक समय तक आग पर नहीं चढी रह सकती । कोई समय था फासजी, गौहरजान और सोराबजी इत्यादि ने पारसी-कपनियों- द्वारा नाट्य-ससार पर उर्दू का सिका जमा दिया था । हैम्लेट के उर्दू अनुरूप खूने नाहक के विषय में विद्वानों का मत था कि इसमें काउसजी का पार्ट हेनरी इर्विग के पार्ट से किसी प्रकार कम न था। ऐसे ही लोगो की कमाई उर्दू-कपनियाँ बहुत दिन तक खाती रहीं। इनमें नाट्य-फला का हास होता रहा, परतु जनता पर उस्तादों का इवना ज्यादा जादू जम चुका था कि कुछ समय तक रद्दी कपनियों की भी रोजी चलती रही।
साहित्य-समीक्षा
उर्दू में नाट्यकला के हास का यह फल हुआ कि जनता
ने हिंदी में नाटक दिखानेवाली नई कंपनियों का स्वागत
किया। इसी लिए हमारा निवेदन है कि जो कुछ सफलता
हुई है उसे स्थायी न समझिए। जो हाल उर्दू के नाटकों का
इतने समय पश्चात् हुआ है, वही, उससे भी बुरा और बहुत
शीघ्र, हिंदी के नाटकों का होनेवाला है, यदि नाट्य-कला
और नाट्यकार दोनों एक दूसरे का साथ देकर जनता को
अपने गुणों से वशीभूत न कर लेंगे।
हमने इन कंपनियों के तमाशे देखे । कहीं परदों की विशेषता,
कहा रग-बिरगी रोशनी का प्रबध, कहीं गाना अच्छा,
कहीं
नाचनेवालों और कलाबाजों का जमाव ।
नाट्यकार के शब्दो में प्राय बल था, न नटों में । उनके उच्चारण
करने में कोई विशेष योग्यता न थी। एक ही भाव है-पुरुष
लडे मरते हैं, और स्त्रियाँ रोये देती हैं। वीर-रस के व्यक्त
फरने में तो बिना अतिशयोक्ति इन नटों का काम ही नहीं
वनता। शांतिभाव के व्यक्त करने के लिए भी चिल्लाने
की आवश्यकता समझी जाती है। हास्यरस में मधुरता नहीं,
करुणा में ऑसू नहीं, बीभत्स मे ग्लानि नहीं । गाने के लिए
कोई मौका भी ठीक है। राजा साहब का दरबार लगा है।
परतु न तो
यह लेख नवबर सन् १९२३ की 'सरस्वती' में प्रकाशित हुआ
या। इस समय लेखक को किसी भी हिदी नाटक खेलनेवाली कपनी
का पता नहीं है।
है हिदो में नाटक और अभिनय ३६ एक कठिन समस्या पर विचार करना है, परतु गाना हो रहा । राजा साहब को भी भरे दरबार में गाने से एतराज नहीं है। रानी साहबा अपनी सखियों के बीच गायें तो कुछ हर्ज नहीं। परतु उन्हें प्राप, राजा साहब के सामने, बातचीत के सिलसिले में, जब वह चाहें, गाने से नहीं रोक सकते। हिंदी में इधर कई मौलिक नाटक प्रकाशित हो चुके हैं। इनके लेखकों का हिदी-साहित्य में बहुत मान है। परतु इनमें बहुत कम ऐसे हैं जो स्थायी साहित्य की श्रेणी में रक्खे जा सके जो पढने और अभिनय दोनों के योग्य हों। कारण यह है कि कुछ लेखकों ने अपनी कृतियों को अभिनय-योग्य बनाने के लिए उर्दू के अभिनीत नाटकों की शैली का अनुकरण किया फल यह हुआ है कि साहित्यिक दृष्टि से तो उनका स्थान बहुत गिर गया है, अभिनय की कसौटी पर भी वे सच्चे नहीं उतर सकते। कुछ नाटक ऐसे भी हैं, जो साहित्यिक दृष्टि से अच्छे हैं-उनकी भाषा में ओज है, उनको शैली परिमार्जित है-परतु अभिनय के योग्य वे भी नहीं हैं, क्योंकि उनके लेखकों को रग-मच का बहुत कम अनुभव रहा है। बात यह है कि अभी तक नटों के प्रति जनता के कुछ ऐसे घृणा-सूचक भाव है कि योग्य प्रतिभाशाली पुरुष नाट्य- द्वारा जीवन निर्वाह करने में अपनी मान-हानि समझते हैं। वस्तुत साधारण वुद्धि के, अधिकवर विगडे हुए लडके, साहित्य समीचा इस व्यवसाय में प्रवेश करते हैं। इनमें से थोडे बहुत अनुभव-द्वारा नाट्य-कला में प्रवीण हो जाते हैं। परंतु नाटक- निर्माण को योग्यता के लिए साहित्य से परिचय की आवश्यकता पड़ती है। इसका प्राय इनमें अभाव रहता है । इसलिए इस श्रेणी के नटों में से नाट्यकारो का निकलना दुष्कर है। शिक्षित नवयुवक-मडलियों के शौकिया अभिनयों-द्वारा हम मन्य श्रेणी की जनता में इस व्यवसाय के विरुद्ध जो कुछ विचार हैं, उन्हें दूर कर सकते हैं। हमें यह समझा देना है कि जहाँ विचार फैलाने के वक्तृता या समाचार-पत्र जैसे अन्य मार्ग हैं वहाँ एक नाटकाभिनय भी है। सच पूछिए तो इस देश में, जहाँ विद्या का इतना अभाव है, वक्तृता तथा नाटकाभिनय-द्वारा विचारों का जितना प्रचार हो सकता है उतना लेखों से नहीं हो सकता। फिर, वक्तृताओं से आप अधिकतर लोगों के विचारों ही की पुष्टि कर सकते हैं। परतु यदि भावों की पुष्टि करना है, यदि जातीयता का आदर्श मत्र उनके कान में फूंकना है, यदि उनके हृदय में खो-जाति के प्रति श्रद्धा उत्पन्न करनी है, और यदि उन्हें सच्चे गार्हस्थ्य प्रेम तथा स्वार्थत्याग का परिणाम दिसाना है, तो हमें नाट्यकार और नाट्यकला का ही आश्रय लेना पडेगा। यह तो हुई जनता को समझाने की बात । इसका अर्थ यह नहीं है कि जब तक उसके विचारों में परिवर्तन न हो, तब तक हमारे पढ़े-लिखे नवयुवक रग-मच पर पैर न रखें। . .
हिदी में नाटक और अभिनय हिंदी-नाट्य-साहित्य का उद्धार-कार्य जनता के विचार-परिवर्तन की बाट नहीं जोह सकता। और उद्धार की एक ही सूरत है। घोडे दिनों की बात है। बेकन के कुछ भक्तों ने यह साबित करना चाहा कि जिन नाटकों के निर्माता शेक्सपियर कहे जाते हैं, वे वास्तव में बेकन के लिखे हुए हैं। सब दलीलों के एक उत्तर ने उन्हें शांत कर दिया, और वह यह कि यह नाटक बेफन के नहीं हो सकते क्योंकि इनमें एक स्वाभाविकता है, जो नाट्यकार के बिना नाट्याभिनय की परीक्षा पास किये प्रा ही नहीं सकती। बिना नट बने नाट्यकार नहीं हो सकते। इसलिए हिदी-प्रेमी नवयुवकों से हमारा यह निवेदन है कि यदि उनमें नाट्यकला की ओर रुचि है, यदि वे गाना गा सकते हों, यदि उनमें कवित्व-शक्ति हो, यदि वे भावों को रगमच पर व्यक्त कर सकते हो, तो वे अवश्य इस व्यवसाय की ओर भ्यान दें। दार या शिक्षा विभाग को नौकरी से इस व्यवसाय में उन्हें अधिक लाम तो होगा ही, शायद उनमें से कुछ ऐसे प्रतिभाशाली लेखक भी निकलें, जो हिदी में एक स्थायी नाट्य-साहित्य की सृष्टि कर सकें। क्या द्विजेंद्रलालजी ने जो देश-सेवा अपने नाटकों द्वारा की है, वह किसी भी बड़े नेता की देश-सेवा से कम है ? माना कि उनकी प्रतिमा को पाना कठिन है। तो क्या प्रयल करने से जैसे नाटक आज-कल लिखे जाते हैं उनमें भी उन्नति नहीं हो सकती १ अन्यवसाय की आवश्यकता है, प्रतिभा भी उसका साथ देगी।
क्या
साहित्य-समीक्षा
नाटक कैसे हो, किन भावों का उनमें समावेश हो,
उनमें गुण हों-इसके विवरण करने की जगह इस लेख में
है। फिर हमें इसका अधिकार भी नहीं है । नाट्यशास्त्र के
1 से ही अच्छे नाटक नहीं बन जाते । मार्ग वही है जिसे
हत करने का साहस हमने यहाँ किया है।
५–सत्य-हरिश्चद्र-नाटक किसी ने सच कहा है कि लेसक की प्रतिभा का पता तभी चलता है जब उसकी पुस्तक के कापी-राइट का समय बीत जावा है। यदि अवधि समाप्त होते ही प्रकाशक-श्रेणी दगल में फाँद पडे, तब तो समझिए कि लेखक चिर काल के लिए जीवित रहा। परतु यदि पहली आवृत्ति के बाद दूसरो का समय ही न आवे, तो समझिए कि लेखक समाज की योग्यता के बहुत कुछ ऊपर है, समाज उसके गूढ विचारों को समझने के लिए तैयार नहीं, या यह कि उसके विचार इतने पुराने हैं और इस ढंग से प्रकट किये गये हैं कि समाज उनसे परिचय प्राप्त करने की कोई प्राव- श्यकता ही नहीं समझता । भारतेंदु हरिश्चद्र के ग्रंथों के कापी राइट की अवधि समाप्त हो जाने पर अभी तक नागरी-प्रचारिणी समा ही ने दगल में पग रक्खा है, सो भी डरते डरते । पहले- पहल उसने 'सत्य-हरिश्चद्र' का ही प्रकाशन किया है। प्रथम सस्करण की भूमिका में मत्री महाशय लिखते हैं कि 'यदि इस पुस्तक की विक्री अधिक हुई और भारतेंदुजी के अन्य प्रयों के स्वल्प मूल्य पर प्राप्त करने की सर्वसाधारण की रुचि का स्पष्ट प्रमागा मिला तो सभी भारतेंदुजी के अन्य प्रथ भी N ४४ , साहित्य-समीचा यथाक्रम प्रकाशित करेगी।' आशा है, अब तक इस रुचि का स्पष्ट प्रमाण मत्री महाशय को मिल चुका होगा । 'सत्यहरिश्चंद्र' भारतेंदुजी की कवित्व-शक्ति का परम प्रिय- पुज है, क्योकि उसके नायक प्रात स्मरणीय रामचद्र के पूर्वन हरिश्चद्र और आधुनिक हिदो-गद्य के जन्म-दाता हरिश्चद्र के नामो और गुणों में बहुत कुछ समता है। कवि महाशय भी नायक में जगह जगह अपने सत्याभिमान, काशी-प्रेम और करु- णामय हृदय की झलक दिखाये बिना नहीं रहते। पहले ही से वह अपने मित्र पडित शीतलाप्रसादजी के वाक्य को सूत्रधार के मुँह से अनुवाद करा देते हैं- जो गुन नृप हरिचंद्र में, जगहित सुनियत काम । सो मय कवि हरिचंद मैं लखहु प्रतच्छ सुजार ।। उपक्रम में तो भारतेंदुजी यही लिखते हैं कि पडित बालेश्वरप्रसादजी की आज्ञा के अनुसार उन्होंने यह नाटक लडको ही के लिए लिखा है, परंतु भाषा और भाव इसके ऐसे गूढ हैं कि छोटे छोटे लड़के इससे बहुत कम लाभ उठा सकते हैं। हम लोगो को उनके इस विचार से इतना लाभ अवश्य हुआ कि इसमें शृ गार-रस की पुट नहीं दी गई । हरिश्चद्र-विषयक नाटकों में सबसे अधिक मान इसी का है। इसका एक कारण यह भी है। यह लेख अप्रेल सन् 1१1८ की 'सरस्वती' में प्रकाशित हुमा था! अव भारतेंदुजी की पूर्ण प्रयावली प्रकाशित होगई है।
सत्य-हरिश्चद्र-नाटक अब यह देखना चाहिए कि किन बातों में सत्य- हरिश्चन्द्र का पद इस नाम के और नाटकों से ऊँचा है भारतेंदुजी को शायद अँगरेजी में शेक्सपियर के नाटको मार संस्कृत में कालिदास, भवभूति इत्यादि के नाटकों को छोड़ कर और बहुत कम नाटक देखने का अवसर मिला होगा । उस समय तक बगाल के प्रसिद्ध नाटककार द्विजेंद्रलाल राय के नाटकों ने नन्म भी नहीं लिया था। परतु यह प्रतीत होता है कि मान- सिक भावों की तरफ उनकी यहाँ तक पहुँच अवश्य थी कि करुणा और बीभत्सरस के साथ शृगार और हास्यरस का मिलान नहीं हो सकता। करुणा-रस फुल-झडी की तरह उड नाय, यदि हास्य का तनिक भी प्रश उसमें हो, और शृगार से घृणा होने लगे, यदि बीभत्सरस के साथ उसका योग हो। हरि- श्चद्र की कथा फरुणा-रस-पूर्ण है और नाटक भी अवश्यमेव ऐसा ही होना चाहिए । इसी लिए भारतदुजी हरिश्चद्र के साथ विदूपक नहीं रखते कि कहीं सत्याभिमान का मजाक न बड जाय । साधारण नाटफ-कार शेक्सपियर की नकल करने के लिए दुखात नाटक के नायक के साथ विदूषक रस देते । परतु 'लियर' और 'हरिश्चद्र' की कोई समता नहीं। लियर का विदूषक तो केवल उसको मूर्सता पर हँस कर बुड्ढे के अभाग्य पर दर्शकों के आँसू पहाता है। यदि हरिश्चन्द्र का विदूषक एफ क्रोधी ब्राह्मण के नाम तमाम जायदाद दे देने पर उनकी हसी उडावे तो हरिश्चद्र का सब अभिमान हवा हो हैं
जाय,
७
,
साहित्य समीक्षा
दर्शक खिलखिला पडे और नाटक का आशय हो भग
हो जाय ।
अधिकतर नाटक-कपनियाँ वेश्या का नाच दिखाने के
लिए शैव्या को उसी के हाथ विकवाती हैं। परतु भारतेंदुजी
ऐसा नहीं करते । शैव्या उपाध्याय के घर पडिताइन की सेवा
करने के ही लिए विकती है। इससे भारतेंदुजी के सामाजिक
विचारों की स्वच्छता का बहुत कुछ पता चलता है।
रोहिवाश्व को तक्षक से डसे जाने का दृश्य कदाचित
उन्होंने इसलिए नहीं दिखाया कि रोहिताश्व अभी बहुत छोटा
है, तुतला कर बातें करता है, अलग दृश्य में साथियों के साथ
मिल कर गाना, और सॉप से डसे जाने पर विलाप करना
उसके लिए असभव है। या इसलिए उस दृश्य को नहीं
दिखाया कि कहीं करुणा-रस की मात्रा बहुत अधिक
न हो जाय।
यो तो 'सत्यहरिश्चद्र' आद्योपात रुचिकर है, परतु तीसरे
और चौथे अंक में विस्तार के कारण उसकी रोचकवा कम हो गई
है। प्रारम में नारद सत्पात्र के हाथ हरिश्चन्द्र का दान देना ठीक
समझते हैं, परतु एक क्रोधी और द्वेषी ब्राह्मण की सेवा में हरि-
श्चद्र का सर्वस्व अर्पण कर देना वर्तमान विचारों से विभूषित हृदय
को अवश्य खटकता है। हो,यदि लेखक का यह प्राशय कि
"निर्गुण सत्य सर्वोपरि है" सिद्ध हो जाय तो मानसिक भावों को
तोडने-मरोड़ने में कोई हर्ज नहीं है। तीसरे अफ में कवि महाशय
सत्य-हरिश्चद्र-नाटक ने काशी और भागीरथी की महिमा अपने नाम-राशि के मुख से कहलाई है । यह उनके काशी-प्रेम का उबाल है, न कि नाटक का कोई अश। चौथे अक में श्मशान का लबा वर्णन नायक से ही एकाव में कराना भी कुछ समझ में नहीं आवा । यदि किसी दृश्य का वर्णन करना हो तो कोई सुननेवाला चाहिए । एकांत के विचार तो बाहरी दृश्य से अनभिज्ञ रहते हैं । मन उस समय केवल उस समय के लडनेवाले विचारो के मध्य में फैसला फरने में लगा रहता है। 'हैम्लेट' के एकांत समय के वाक्य देखिए । वे हरिश्चद्र के एकांत वर्णन से कितने भिन्न हैं इस तुलना से हमारा अभिप्राय भारतेंदुजी की प्रतिष्ठा कम करने का नहीं है । आशय यह है कि नाटफरचना की कठिनता का पता लग जाय । यही उनके लिए क्या कम है कि ससार के 'हैम्लेट' समान प्रसिद्ध नाटक से सत्यहरिश्चद्र की तुलना की जाय, और यही उस समय के देखते हुए उनकी प्रतिभाशालिनी लेखनी के लिए क्या कम है कि उन्होंने कहीं कहीं मनोभावो के सघर्पण दिखाने का प्रयत्न तो किया । विकने के पहले जो आवाजें नेपथ्य से आती हैं वे हृदयाफाश ही के प्रश्न हैं, और करुणा-रस के प्रवाह के मध्य जिस समय हरि- श्चद्र आत्महत्या करने से रुक जाते हैं उस समय मानसिक भावों के विवाद की कुछ झलक मिलती है। ऐसे उदाहरण अधिक नहीं मिलते। उनका कम होना ही उनके प्रकट करने की कठिनता को सूचित करता है।
४८ साहित्य-समीक्षा अतिम दृश्य में हरिश्चद्र पुत्र-शोक पर बहुत विलाप करते हैं। कहा जा सकता है कि घोर दुख की दशा में विलाप करना कठिन होता है, परतु भारत के वात जल-बायु से द्रविव हृदय अपने दुख को प्रकट किये बिना नहीं रह सकता । योर- पीय और भारतीय कविता में यही अवर है कि शीत-प्रधान देश होने के कारण पहली में कर्म-द्वारा भाव प्रकट होते हैं, परतु दूसरी अर्थात् भारतीय कविता में जिह्वा को उन्हें दवाने का बल कम रहता है । जो कुछ हो, भारतीय कविता के ढंग के विचार से विलाप को मात्रा का अधिक होना कोई दोष नहीं । हाँ, हरिश्चद्र जैसे धैर्यवान् पुरुष का पुत्र-शोक होने पर भी रोना कुछ खटकता अवश्य है। परतु याद रखना चाहिए कि 'सत्य- हरिश्चद्र' के जन्मदाता के कोमल हृदय में इतनी जगह न थी कि वह पुत्र-शोफ के सदृश अपार दु ख को चुपचाप सह लेते। क्या उन्होंने कॉपती हुई कलम से न लिखा होगा--"काँगे सबै हो नीर भरि भरि, पाछे प्यारे हरिश्चद्र की कहानी रह नायगी प्यारे हरिश्चद्र । तुम्हारी कहानी ही नहीं रह गई। यह क्या तुम्हारे लिए कम गौरव की बात है कि तुम्हारा लगाया हुआ हिंदी-साहित्य-वृत्त अब फलने फूलने भी लगा है।
६-द्विजेद्र-नाटकावली हिंदी के कुछ प्रकाशकों और अनुवादकों फ अदम्य उत्साह से अब हमारे साहित्य में उच्च कोटि के अनुवादित नाटको की कमी नहीं रही है। साहित्य के इतिहास में अनुवाद के बाद ही मौलिकता आती है, इसलिए आशा है कि इन नाटकों के पढे जाने और अभिनीत होने पर हिदी-साहित्य में उच्च कोटि के मौलिक नाटक लिसे जाने लगेंगे। अब तक द्विजेंद्र बाबू के बारह बंगला नाटक हिंदी में प्रकाशित हो चुके हैं। इस लेस में इन्हीं नाटकों की आलोचना करनी है । * विदेशी भाषा से अनुवाद करने में जो कठिनाइयों पड़ती हैं, वे इन नाटकों में अधिक प्रफट नहीं होता। इसके कई कारण हैं। एक वो द्विजेंद्र बाबू हमीं में से हैं, बगाल हमारे ही देश का एक प्रति है। हमारे ही देश के इतिहास को लेकर द्विजेंद्र बाबू ने अधिकतर नाटक-रचना की है । हिद-समाज की कुरीवियाँ, जिनका उन्होंने अपने नाटकों में दिग्दर्शन किया है, देश भर में थोड़ी बहुत सभी जगह पाई जाती हैं। जाति के अध पतन के घाव से जैसे वे पीडित हैं वैसे ही प्रत्येक विचारवान् भारतवासी * ये नाटक हिदी-अथवार कार्यालय, यई से प्रकाशित हुए है। - F4
साहित्य-समीक्षा
दुखी है। दूसरी बात यह है कि उनके पात्र अधिकतर गद्य
घोलते हैं, और वंगाली भाषा हिदी से बहुत-कुछ मिलती है
फिर, नाटकों के अनुवादक भी योग्य लेखक हैं। यदि कहीं दे
झलकता है तो वह 'सीता' ऐसे गीतनाट्य को गद्य में अनुवाति
करने में है, या बॅगला-गीतो का हिदी-रूपातर करने में
इसका कारण यह है कि पिगल तथा हिदी रंग मच के बध
अनुवादक को इतना जकड देते हैं कि न तो वह अपने ही कविल
रस की पुट दे सकता है, न मूल के ही भाव को पूर्णतया दिए
सकता है । क्या ही अच्छा होता यदि टिप्पणी या भूमिका
एक से अधिक गीत अपने ही (मूल) स्वरूप में दिखा दिये जाते
पाठकों के सामने 'मेवाड़-पतन' ही का अतिम गीत है-
'किसेर शोफ करिस भाई। आबार तोरा मानुष हे'-'तुम शोर
काहे को करो, फिर से मनुष्य सबै वनौ' इसमें चाहे आप अक्ष
का वर्णन न कर सकें, क्योंकि भापा अपनी नहीं है, पर इस
कारण इसमें कुछ भाव की कमी नहीं होती। इस सवध में
यह कहना अनुचित न होगा कि 'तारा' को अनुप्रास हीन पर
में अनुवादित करके अनुवादक ने उसकी शोभा बहुत कुछ बढा
दी है। इससे कदाचित् अभिनय करने में कठिनता हो, परत
पढने में 'वारा' से बढकर कर्ण-रोवक नाटक इस श्रेणी में कोई
नहीं है। क्या ही अच्छा होता यदि 'सीता' भी यो ही अनुवादित
4
, । द्विजेंद्र-नाटकावली ५१ अनुवाद करने में यदि पडित कामताप्रसाद गुरुजी के विचारा- नुसार पात्रों की भाषा में थोडा बहुत अतर रहता तो कदाचित रोचकता बढ जावी । परतु इसमें अनुवादकों का दोष बहुत कम है। द्विजेंद्र बाबू आपही इस भेद को बहुत कम दिसाते हैं। उनके लिए राजा से लेकर रक वक, रानी से लेकर दासी तक, सभी कवि हैं, सभी के लिए आकाश नीला, गहरा और स्वच्छ है । जब कोई दुर्घटना होनेवाली होती है तय सभी प्रध- फार, बिजली और तूफान से विचलित होते हैं। अनुवाद में भाषा को पात्र के योग्य बनाने का प्रयत्न केवल 'शाहजहाँ' में किया गया है । भाषा फारसी-मिश्रित है और सरल है, परतु उर्दू भाषा से परिचित समाज को 'सर्च', 'लायक,' 'बागी' कुछ सटकते हैं । जब 'मुहब्बत , 'कोशिश,' 'वालियेमुल्क' ऐसे शब्द ठीक लिखे गये हैं तब हलक से निकालनेवाले शब्दों ही ने क्या अपराध किया है । ऊँचे दर्जे के मुसलमान पात्रों के मुँह से अशुद्ध उर्दू के शब्द कहलाना वैसा ही है जैसे उच्च जाति के हिदू पात्रों से देहाती हिंदी के शब्द कहलाना । ग्रामीण हिदी हो, और वे-मुहावरा उर्दू भी हो, परतु पात्रापात्र का विचार करके। 'इन सब बातो को मानते हुए भी यह स्वीकार करना पडेगा कि हिदी-भाषा मे अभिनय करने और पढने,, दोनों के योग्य यदि कोई नाटकमाला है तो द्विजेंद्र बाबू की। कालिदास के समय में यवनिका को छोड़कर शायद ही और कोई परदे रहे
,
५२
साहित्य-समीक्षा
हों। शेक्सपियर के समय में भी रंग-मच ने बहुत ही कम
उन्नति की थी। पात्रों के लिए कोई प्राड न थी। दिन को
नाटक हुआ करते थे। प्रोस या धूप से बचाव न था। ऐसी
दशा
में नाटक की सफलता के लिए बहुत कुछ कल्पना की
आवश्यकता पडती थी। परतु आज-कल नाटक-कंपनियों ने
बहुत उन्नति की है, हर तरह के दृश्य दिखलाने के लिए परदों से,
और प्रत्येक घटना को दर्शाने के लिए करामातों से, ऊँचे वर्ग
के थियेटर सुसज्जित हैं । जितना बढ़िया सामान हो नाटककार
को नाटक दिखाने में उतनी ही कठिनाई पड़ती है, रंग-मच की
आवश्यकताओं को नाट्य-कल्पना से मिलाये रखने की
आवश्यकता पडती है | शेक्सपियर के समय में हैलट के हत्या-
काड में खून नहीं बहता था, 'पेस्ट' में रंग-मच पर तूफान
नहीं आता था, और इसी कारण शेक्सपियर का यश अभिनय के
समय से नहीं, पढ़ने के समय से फैला । परतु इस समय जो
दृश्य नाटककार लिस देगा उसके दर्शाने में थियेटर के मैनेजर
कोई कसर बाकी नहीं रक्खेंगे। साधारण नाटककार रग-मच ही
का विचार करके नाटक लिखते हैं, जिसका परिणाम यह
होता है कि उस पुस्तक के छपने की नौबत बहुत कम आती
है। दर्शकों की वाह वाह ही तक उनका जीवन रहता है।
रंग-मच से अनभिज्ञ कवि क नाटक में भी प्रतिभा का विकास
नहीं होता, और उसके नाटक साधारणत चिरजीवी नहीं
होते। टेनीसन के नाटक कहाँ अभिनय किये क्षावे है ?
द्विजेंद्र-नाटकावली द्विजेंद्र बाबू के नाटकों के चिरजीवी रहने में कोई सदेह नहीं मालूम होता । वे पढने, और अभिनय करने, दोनो में समाज को आनदित करते हुए शिक्षा देते हैं। उनके पात्र मनो- विचार की सूक्ष्म से सूक्ष्म तरगों में जा मिलते हैं और उनके मानसिक भाव हृदय में मिलकर पुनर्जीवन प्राप्त करते रहते हैं। हैम्लेट, पाथेलो और कार्डेलिया अभी तक जीवित हैं। द्विजेंद्र बाबू के पात्रों को जन्म लिये अभी बहुत समय नहीं हुआ। परतु भविष्य की ओर देखते हुए यह विश्वास होता है कि जब तक देश में जातीय जोश रहेगा तब तक सत्यवती, महामाया, और गोविदसिह जीवित रहेंगे, जब तक ब्रह्मचर्य का आदर्श इस देश में जीता रहेगा, तब तक भीष्म की पूजा होगी, जब तक स्वामि-भक्ति, पितृ-भक्ति और पति-प्रेम के माननेवाले इस देश में रहेंगे, तब तक कासिम, विजयसिह, लीला और सीता जीवित रहेंगे। सीता के लिए तो द्विजेंद्र बाबू ने अधिक नहीं किया, उन्हें तो भवभूति और तुलसीदास ही अमर कर गये हैं। हमारे नाटककार ने उनको केवल वीसवीं सदी की साड़ी पहना दी है। नूरजहाँ, औरगजेब, शाहजहाँ ऐसे ऐतिहासिक पात्र भी इतिहास में अवश्य अमर हैं, परतु मनुष्य हृदय मे उनको जगह द्विजेंद्र बाबू ही ने दी है । जब तक प्रेम और गौरव के धीच सकट रहेगा, तर तक नूरजहाँ हृदय में प्रस्तुत रहेगी, जब तक हृष्ट-पुष्ट होकर भी मनुष्य का हृदय दुर्बल रहेगा, तब तक औरगजेब और सिहबाहु से सहानुभूति रसनेवाले बहुत मिलेंगे । जब तक विषयी मनुष्य . .
साहित्य-समीक्षा बुढापे तक जीवित रहेंगे, तब वक शाहजहाँ और धीवर-राजसुता सत्यवती की हाय के साथ हाय करनेवाले भी रहेंगे। निवेदन किया जा चुका है कि यह सब नाटक पढ़ने हो योग्य नहीं, अभिनय करने योग्य भी हैं। अँगरेजी-समाज को किसी समय में चाहे खून से प्रेम रहा हो, परतु भारतवर्ष में बुद्ध के समय से समाज के विचार प्रेम हो की ओर अधिक झुकते गये हैं । द्विजेंद्र बाबू ने इस बात का बहुत विचार रक्खा है। उनके रग-मच पर कहीं खून नहीं वरसता । तलवारें झन- कती अवश्य हैं, और दर्शकों को इसमें आनद भी आता है, परंतु हत्या होने के पूर्व कोई न कोई प्राकर उसे अवश्य बचा लेता है । सिहवाहु निरतर तलवार लिये अपने पुत्र के सिर पर सवार रहते हैं। 'चद्रगुप्त' के आरंभ में और 'मेवाड-पतन' के प्रत में दो वीरों की तलवारें खटकती हैं, परतु वार होने के पहले सिकदर और मानसी-एक विश्वविजयो वीर, दूसरी विश्वप्रेमिणी नारी-बीच-बचाव कर देते हैं। सोचिए तो, इनको देखकर दर्शकों के उछलते हुए हृदय को कितनी शांति पहुँचती होगी । द्विजेंद्र बाबू ने बहुत से पात्रो को, जिनकी उन्होने प्राव- श्यकता नहीं समझी, या जिनको अपने नाटक के अंत तक ले जाने में कठिनता समझी, गोली से अत कर दिया । इस गोली का शब्द दर्शको को चौकन्ना अवश्य कर देता है, पर वह खून नहीं गिराती। औरंगजेब के सामने दारा का कटा हुआ सिर हो आता है, दारा रग-मच पर कत्ल नहीं किया जाता । तथापि - द्विजेंद्र-नाटकावली ५५ प्रया रग-मच हो पर शाल्व का खून कर देती है, और लीला भी दर्शको के सामने ही अपने पेट में छुरी भोक लेती है यही दशा तारा को होती है, पर दरबारी, पहरेदार या पृथ्वी तुरंत ही घटना को दर्शकों की दृष्टि से छिपा देते हैं। स्टेज मैनेजर को अपनी करामात दिखाने का अवसर यहाँ भी नहीं मिलता। इन नाटकों में परदों की कमी नहीं है। दर्शकों को परदों की शान में द्विजेंद्रजी की कल्पना का आनंद नहीं मिलता, परतु अभिनय के समय साधारण दर्शकों के लिए 'सिदल- विजय' में तूफान और 'पापाणी' में कैलाशशिखर कुछ कम रोचक नहीं हैं। द्विजेंद्र बाबू ने दर्शकों को 'स्वगत' के उच्च स्वर से बचा लिया है, परतु इससे पात्रों की कठिनवा में कुछ कमी नहीं हुई है । 'अर्ध-स्वगत' और 'अर्थपूर्ण नजर' 'स्वगत' से कहीं कठिन है । सुना है कि द्विजेंद्र बाबू के ही तैयार करने पर उनके कुछ कठिन नाटक खेले जा सके थे। जो कुछ हो, इतना जरूरी है कि जब तक पात्रों के भावों की अच्छी परस न हो, तर वक उनका रंग-मच पर ठीक ठीक दर्शाया जाना कठिन है । सीधी भाषा में भाव दर्शाना तो और भी कठिन है- "राणा-नहीं तो और क्या करेंगे? चुपचाप सहन न करेंगे वो रो लेगे। देखो, भोजन बना कि नहीं ? डर की कोई बात नहीं है। अबकी बार सर्वस्व नष्ट हो जायगा। जिस जाति में इवनी । -
साहित्य-समीक्षा
क्षुद्रता हो उसकी रक्षा स्वय परमेश्वर नहीं कर सकते, मनुष्य
की तो बात ही क्या है।"
रानी के सामने राणा रो नहीं सकते। उनके चेहरे पर
सूखी मुस्कराहट है परंतु हृदय में निराशा का समुद्र उमड रहा
है। रानी गृहिणी हैं, राज-नीति नहीं समझती, इसलिए उनसे
यही पूछा गया कि 'भोजन बना कि नहीं।
इतिहास में सग का बड़ा नाम है, परतु नाटककार ने
उसकी कुछ ही झलक दिखाई है । इतने ही से वह द्विजेंद्र के
कठिन पात्रों में गिनने योग्य होगया है--
सग-(तारा का हाथ पकडकर) तारा ?
वारा-क्या मोहित | कहो।
यह क्या । यह क्यों सहसा भर आया गला !
सग-(हाथ छोडकर) क्षमा करो। कल दूर देश को जा
रहा हूँ मैं, तारा।
तारा -यह क्या ? जाओगे कहाँ ?
-बहुत दूर १
सग-मालूम नहीं -जिस ओर को चल दूँ।
तारा-क्यों ? किसलिए? कहो तो।
सग--"किसलिए
तारा तुम हो सुखी । न पूछो "किसलिए "
यह सब कोई कविता नहीं है, बहुत ही सीधे सादे शब्द हैं,
-
, द्विजेंद्र-नाटकावली परंतु इनके भीतर बहुत गहरा भाव है, जिसका दर्शाना बहुत कठिन है। सग देश से निकाला हुआ है, वारा का नौकर है, पर वह प्रेम के प्रवाह को नहीं रोक सका । इसलिए उसने सहसा तारा का हाथ पकड लिया, परतु निराशा ने फिर गला धर दबाया। "क्षमा करो"- कविता के लिए गले मे ताकत नहीं है। गभी- रता और धैर्य ऊपर है, परतु हृदय जल रहा है। नूरजहाँ के आतरिक छेश के दिग्दर्शन के लिए थोडा सा वार्तालाप- शेर०-मेहर,-बहुत अच्छा खबर है नूर०-क्या स्वामी? शेर०–सम्राट् जहाँगीर ने मुझे पाँच हजारी का पद देकर प्रागरे में बुला भेजा है नूर०-सर्वनाश । शेर०-यह क्या कहती हो। यह तो हमारे लिए बड़े सम्मान की बात है नूर०-जाओगे? शेर०-जाऊँगा क्यों नहीं। नूर-मैं कहती हूँ, मत जाना ।-सबरदार । शेर०---इतनी उत्तेजित क्यों हो रही हो? यह तो बडे प्रानद की बात है। नूर०-वात सुनो-कहती हैं, मत जाओ-सावधान । (तेजी से जाना)
--
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साहित्य-समीक्षा
क्षुद्रता हो उसकी रक्षा स्वय परमेश्वर नहीं कर सकते, मनुष्य
की तो बात ही क्या है।"
रानी के सामने राणा रो नहीं सकते। उनके चेहरे पर
सूखी मुस्कराहट है परंतु हृदय में निराशा का समुद्र उमड रहा
है। रानी गृहिणी हैं, राज-नीति नहीं समझती, इसलिए उनसे
यही पूछा गया कि 'भोजन बना कि नहीं।
इतिहास में सग का बड़ा नाम है, परतु नाटककार ने
उसकी कुछ ही झलक दिखाई है। इतने ही से वह द्विजेंद्र के
फठिन पात्रों में गिनने योग्य होगया है-
सग-(तारा का हाथ पकडकर) तारा ?
तारा-क्या मोहित । कहो।
यह क्या । यह क्यों सहसा भर पाया गला ।
संग-(हाथ छोडकर) क्षमा करो। कल दूर देश को जा
रहा हूँ मैं, तारा।
तारा-
यह क्या ? जाओगे कहाँ ?
-बहुत दूर ?
सग-मालूम नहीं-जिस ओर को चल दूं।
तारा-क्यों ? किसलिए? कहो तो।
सग---"किसलिए -
तारा तुम हो सुखी । न पृटो "किसलिए "
यह सब कोई कविता नहीं है, बहुत ही सीधे सादे शब्द हैं,
है द्विजेंद्र-नाटकावली परंतु इनके भीतर बहुत गहराभाव है, जिसका दर्शाना बहुत कठिन । सग देश से निकाला हुआ है, तारा का नौकर है, पर वह प्रेम के प्रवाह को नहीं रोक सका । इसलिए उसने सहसा तारा का हाथ पकड लिया, परतु निराशा ने फिर गला धर दबाया । "क्षमा करो"- कविता के लिए गले मे ताकत नहीं है। गमी- रता और धैर्य ऊपर है, परतु हृदय जल रहा है। नूरजहाँ के आंतरिक छेश के दिग्दर्शन के लिए थोडा सा वार्तालाप- शेर०-मेहर, बहुत अच्छा खबर है। नूर० -क्या स्वामी? शेर०--सम्राट् जहाँगीर ने मुझे पाँच हजारी का पद देकर आगरे में बुला भेजा है। नूर०-सर्वनाश । शेर०--यह क्या कहती हो। यह तो हमारे लिए बड़े सम्मान की बात है नूर०-जाओगे? शेर-जाऊँगा क्यों नहीं । नूर०—मैं कहती हूँ, मत जाना ।-खबरदार । शेर०-इतनी उत्तेजित क्यों हो रही हो? यह तो बडे मानद की बात है। नूर०–बात सुनो-फहनी हूँ, मत जाओ-सावधान । (तेजी में जाना)
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साहित्य-समीक्षा
क्षुद्रता हो उसकी रक्षा स्वय परमेश्वर नहीं कर सकते, मनुष्य
की तो बात ही क्या है।"
रानी के सामने राणा रो नहीं सकते । उनके चेहरे पर
सूखी मुस्कराहट है परंतु हृदय में निराशा का समुद्र उमड रहा
है। रानी गृहिणी हैं, राजनीति नहीं समझती, इसलिए उनसे
यही पूछा गया कि भोजन बना कि नहीं।
इतिहास मे सग का बडा नाम है, परतु नाटककार ने
उसकी कुछ ही झलक दिखाई है । इतने ही से वह द्विजेंद्र के
कठिन पात्रों में गिनने योग्य होगया है-
सग-(तारा का हाथ पकड़कर) तारा ?
तारा--क्या मोहित । कहो ।
यह क्या । यह क्यों सहसा भर आया गला ।
सग-(हाथ छोडकर) समा करो। कल दूर देश को जा
रहा हूँ मैं, तारा।
तारा-
यह क्या ? जाओगे कहाँ ?
-बहुत दूर,
सग-मालूम नहीं-जिस ओर को चल हूँ।
तारा-क्यों ? किसलिए? कहो तो।
सग "किसलिए".--
तारा तुम हो सुखी । न पृछो "किसलिए?"
यह सब कोई कविता नहीं है, बहुत ही सीधे सादे शब्द हैं,
शेर०-इवनी उत्तेजित क्यों हो रही हो? यह तो बडे द्विजेंद्र-नाटकावली परंतु इनके भीवर बहुत गहरा भाव है, जिसका दर्शाना बहुत कठिन है । सग देश से निकाला हुआ है, धारा का नौकर है, पर वह प्रेम के प्रवाह को नहीं रोक सका । इसलिए उसने सहसा तारा का हाथ पकड लिया, परतु निराशा ने फिर गला धर दबाया। "तमा करो"- कविता के लिए गले में ताकत नहीं है। गभी- रता और धैर्य ऊपर है, परतु हृदय जल रहा है। नूरजहाँ के अतिरिफ छेश के दिग्दर्शन के लिए घोडा सा वार्तालाप- शेर०-मेहर, बहुत अच्छा खबर है। नूर०-क्या स्वामी शेर०–सम्राट् जहाँगीर ने मुझे पाँच हजारी फा पद देकर आगरे में बुला भेजा है। शेर०-यह क्या कहती हो । यह तो हमारे लिए बड़े सम्मान की बात है। नूर०-जाओगे? शेर-जाऊँगा क्यों नहीं। नूर- नूर-सर्वनाश । मैं कहती हूँ, मत जाना ।-सबरदार । आनद की बात है। नूर०–बात सुनो-कहती हूँ, (तेजी से जाना) मत जाओ-- -- -सावधान
५८
चाहता है,
साहित्य-समीक्षा
अपर से पत्ति-प्रेम, भीतर गौरव और लालसा के पूर्ण होने
की आशा । इसी लिए इतनी उत्तेजना है।
द्विजेंद्र बाबू के हाथ में औरगजेन उतना बुरा नहीं है
जितना कि इतिहासज्ञों ने उसको दर्शाया है-
औरग०-आज ही।
शायस्वा०-(मृत्युदंड का भाज्ञापन औरगजय के हाथ से
लेकर) जितनी जल्दी बला टले उतना ही अच्छा ।
जिहन०-बदगी, जहाँपनाह ।
औरंग ठहरो देवू । (दड़ की प्राजा को लेना, पढना
और फेर देना) अच्छा, जाओ । (जिहना जाना
औरगजेब फिर उसे घुला लेता है।)
औरग०-ठहरो (दड़ की प्राज्ञा को फेर लेना और फिर फेरे
देना) अच्छा, जाओ। (जिहनी का प्रस्थान)
(औरगजेय जिहना की ओर बढ़ता है, फिर लौटकर
सोचता है)
औरग०-ना, जरूरत नहीं है ।-जिहनखाँ । जिहनखाँ ।
नहीं, चला गया।-शायस्ताखाँ।
शायरता०--
-खुदावद।
औरग०-मैंने
यह क्या किया।
शायस्ता०---
-जहाँपनाह ने समझदारों का ही काम
किया
औरग-खैर, जाने दो।
५६
,
द्विजेंद्र-नाटकावली
भाई से प्रेम है, परतु दृढ नहीं, क्योंकि हृदय दुर्वल है,
और इसी लिए वह कभी शायस्वासों और कभी गुलनार की
चाल मे आ जाता है । रग-मच पर रुकते हुए शब्द ही केश को
सूचित करते हैं।
"द्विजेंद्र बाबू के नाटको में विदूषक के लिए तो कोई खास
जगह नहीं है, पर हँसी से एकदम विरोध भी नहीं है।
विचार-मग्न पात्र कम हँसते हैं, और हलके हृदय के पुरुप और
स्त्री खूब हँसते हैं, परतु इन नाटकों में हास्यपूर्ण कोई भी नहीं
है। हास्य की रोशनी केवल दुख के अधकार को दर्शाने के
लिए कहीं कहीं दिखाई देती है। इनके पुरुष पात्रों में नीचवा
और जाति-विद्रोह के लिए अधिकतर व्यग ही का दड ठोक
समझा गया है।
हिदायतहुसैन शेखी बघारना खूब जानता है, परतु हृदय
का कच्चा है। सगरसिह मुगल-सम्राट की शरण में रहते बूढे
होगये हैं, वह अपनी कमजोरी का हाल आप ही बतलाते हैं ।
उन्हें यह खबर नहीं कि वाल्मीकि कौन थे-"महर्षि वाल्मी-
कि कौन ? तुलसीदास के लडके ?"श्यामसिह जाति-विद्रोही
हैं, पर केवल कासिम की स्वामिसेवा को दर्शाने के लिए।
दिलदार विदूपक बना हुआ है, पर उसको यात मे हँसी नहीं
आती । औरगजेब उसको पहचान जाते हैं-"तुम कौन हो,
ठोक बतलाओ, तुम तो कोई मससरे नहीं हो"। हंसी केवल
मुराद की मूर्सता पर आती है। 'चद्रगुप्त' में नद के
,
.
साहित्य-समीक्षा सालों ही पर हँसी की बौछार है । 'तारा' में पाभूराव की दुर्गति उसके दर्बारी ही करते हैं। 'भारत-रमणी' मे उपेंद्र के भक्त ही अपने गुरु की नीचता दर्शाते हैं। 'पापाणी' में विश्वामित्र के घमड की खबर चिरजीव ही लेता है। "स्त्री-चरित्र को जितना अच्छा द्विजेंद्र बाबू अकित कर सके हैं, कदाचित् कोई नाटककार अभी तक नहीं कर सका। उन्हें भारतीय स्त्री-जाति पर कुछ विशेष श्रद्धा थी । वह अपने गार्हस्थ्य-जीवन में उसका अनुभव कर चुके थे, इसी लिए उनके स्त्री-पात्रों में घृणित कोई नहीं है। गुलनार और सिहबाहु की रानी वक से घृणा उत्पन्न नहीं होती। स्त्री का शरीर कमजोर है, परतु उसके हृदय मे असीम बल है। जब वह उग्र रूप धारण करता है, ससार हिल जाता है । बडे बडे अभि- मानी वीर उसकी उँगली पर नाचने लगते हैं। उस समय उनमें हँसी का नाम भी नहीं रहता । पतित अहल्या के लिए भी घृणा-सूचक कोई शब्द नहीं है, और अब मे द्विजेंद्र बाबू उसका भी उद्धार कर देते हैं । जब तक उसका हृदय किसी विशेष कामना से विचलित नहीं होता, उसके दिव्य रूप पर मुसकराहट ही झलका करती है। 'भीष्म में अविका और अबालिका हँसती ही रहती हैं। उनके हृदय हलके हैं, उन्हें वैधव्य भी नहीं सताता । शुजा पर मुसीबतों का वोझ लदा हुआ है, परतु पियारा को गाना ही सूझता है । "सूबा छीन लिया जायगा । यही न? जाने दो। अब और तो कुछ कहने
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द्विजेंद्र-नाटकावली
को नहीं है, अब मैं गाना गाऊँ ?" 'सिहल-विजय' में लीला
पर बडी बडी विपदायें पडती हैं, परतु वह हँसती ही रहती
है, क्योंकि उसके हृदय में प्रेम को छोड कोई और वासना
नहीं है । इसी लिए उसके हृदय में शांति है, और चेहरे पर
हँसी है । "मेरे जले हुए चमडे को देखकर वे हट गये, चलो
अच्छा ही हुआ। मेरे प्रेम का मोह दूर होगया। अग्नि-परीक्षा
में मलिनता जल गई" । माधुरी भी पति-प्रेम में मग्न रहती है,
चिरजीव उसको चाहे जितना पीटे ।
कहीं कहीं त्रियों का भोलापन पानेवाली घटनाओं को
और भी अधिक हृदयद्रावक बना देता है। मेवाड की रानी
सरल गृहिणी है, उसको मेवाड के ऊपर आनेवाली विपदामा
का ज्ञान नहीं । सरस्वती कि सास एक भोली-भाली माँ है।
उसको यह नहीं मालूम कि चाँद ऐसी बह का रूप लडके से
उसको छुडा देगा । 'भारत-रमणी' में कामिनी घेचारी एक
पुराने खयाल की, समाज के वधनों से जकडी हुई, गृहिणी
है। उसे सुशीला की बातें कुछ समझ ही नहीं पडतीं। वह
चोरी के इलजाम को भी चुपचाप सहन कर लेती है।
इस नाटकावली में काई फैल्स्टाफ (गृह-शूर) नहीं है,
परतु 'हम्लेट' 'पाथेलो' 'मेकनेय' या 'लियर' को टक्कर के
फरुणा-जनक पात्रों की कमी नहीं है। इन नाटकों में करुणा-
रस की प्रधानता के कई कारण हैं। प्रहसन यौवन का स्वप्न
है। मनुष्य-जीवन की प्रौढता तथा वृद्धावस्था अधिकतर
। , साहित्य-समीक्षा दु.समय है । शेक्सपियर के प्रहसन भी जवानी के हैं, और दु सात नाटक प्रोढावस्था के। ईसरे, जिस देश में हमारे नाटक- कार ने जन्म लिया है, उसकी अवस्था बहुत हीन है। समाज सैकडी रोगों से ग्रसित है, और इतिहास भी हमारे पतन ही का है, उन्नति का नहीं। द्विजेंद्र बाबू की लेखनी पर उस जातीयता की पश्चिमी वायु का अवश्य असर पड़ा है, जो मेकाले के प्रस्ताव के साथ जन्म लेकर अब सारे भारतवर्ष में व्याप रही है । इस कारण उनके उन्ही पात्रों में जीवन अधिक है, जो उनकी जातीयता के भाव को प्रकट करते हैं । राणा अमरसिह, महावतखाँ, सत्यवती, महामाया, हेलन, केदारनाथ, यह सव अपने अपने रूप में समय समय पर देश-प्रेम, जाति-प्रेमः प्रकट करते हैं। एक बात और भी है । द्विजेंद्र बाबू को अपने गार्हस्थ्य जीवन में पत्नी-वियोग का एक बड़ा भारी दुख उठाना पड़ा। इस घटना ने इनकी खो-परपरा को विशेषत दिव्य बना दिया है । लीला, अबा, महामाया नूरजहाँ, लेला, जहाँआरा, हेलन, मानसी, मुन्नी, सुशीला, कुवणी, अहल्या- (ऐसे चित्र किसी दूसरे नाटककार की कलम से नहीं निकले हैं। ताग से डेस्डिमोना की कोई समता नहीं । लीला बालक- वेष धारण करने पर भी रोजेलिड से कहीं बढकर है। हेलन और मानसी के विश्वप्रेम से शेक्सपियर स्वय अनभिज्ञ थे । अवा, नूरजहाँ, कुवेणी और सुशीला के आत्मिक धल की बराबरी लेडी मेकबेथ हो कर सकती है। , द्विजेंद्र-नाटकावली इन नाटकों में करुणा और हास्यरस दोनों विद्यमान हैं, और करुणा की मात्रा हास्य से अधिक है, परतु 'तारा' और 'सीता' को छोडकर और किसी का अत हृदयन्द्रावक नहीं होता । 'तारा' के अत में अधकार ही अधकार है। 'हैन्लेट' 'लियर और 'पाथेलो' के भयकर दृश्य आँखों के सामने फिर जाते हैं। 'सीता' के प्रत का इससे अधिक हृदयन्द्रावक दृश्य पहले ही से हृदय में अकित है । और सब नाटको के अत में दर्शकों को शांति की झलक मिल जाती है, तथा निद्रा भग नहीं होती । 'भीम' का अत शांतिमय है और उसको कृष्ण दिव्य भी बना देते हैं । 'दुर्गादास' के अव में नाटक के सब आदर्श इकट्ठे हो जाते हैं । 'सिहलविजय बहुत अधिक हृदय-द्रावक है, परतु उसके अंत में भी बौद्ध-धर्म के प्रचार का भार लेकर, विजयसिह दर्शकों के भार को हलका कर देते हैं । 'पापाणी' में गौतम अहल्या को क्षमा कर देते हैं, परतु इससे भी द्विजेंद्रजी को शांति नहीं मिलती, वह फिर उसको रामचद्रजी से शुद्ध कराते हैं। यदि 'उस पार' गार्हस्थ्य-जीवन को प्रलय में लोन कर देता है, तो 'मेवाड़- पतन' भारतवर्ष की स्वाधीनता के इतिहास का प्रतिम अध्याय है। यों हो इन दोनो में कम दुस नहीं है, परतु देशपतन के याद 'मानसी' हमको आशा की झलक दिसा देती है, और भाई भाई- अमरसिह और महाबत, हिदू और मुसलमान-फिर गले मिलते हैं, देश की आशा भी इसी में है।
साहित्य-समीक्षा 'चद्रगुप्त' के प्रत में छाया और हेलन के मिलन में पूर्वीय और पश्चिमीय सभ्यता के सयोग कारश्य है। नूरजहाँ का पतन होने पर भी वह लैला से मिलती है। बाहर मेघगर्जन अवश्य है, पर इन मां-बेटी के हृदय में शाति है। शाहजहाँ का पुत्र-प्रेम और इतिहास की आवश्यकता, दोनों मिलकर औरगजब को भी अपने पिता से आशीर्वाद दिला देते हैं। इतिहास के बधन ने 'शाहजहाँ' में बहुत जगह त्रुटियाँ डाल दी हैं, परंतु ऐसे तूफान के बाद इतनी जल्दी शाहजहाँ को पानी पानी कर देना द्विजेंद्रजी ही का काम था । सामाजिक नाटकों में भी वैराग्य और शाति का मिलन है। 'उस पार' में भगवानदास और मुन्नी के अतिम मिलन में प्रथम मिलन की लालसा के बदले उदासीनता और वैराग्य के हो भाव अधिक है। 'भारतरमणी' में उपेंद्र का उद्धार किया गया है, परतु यदि इन सामाजिक नाटकों के अत में किसी तरह कुछ भविष्य की आशा का चित्र भी अकित किया जाता, तो हृदय को अधिक सात्वना मिलती। जीवन में सुख के साथ दु ख का सबध है। यदि नाटक उसका अच्छा चित्र है, तो उसमे भी दोनो भावों का समिश्रण रहना चाहिए । प्रस्तुत नाटकों को आप यूनानी नाटकों की तरह या शेक्सपियर के कुछ नाटकों के समान हैजिडी (Trngody) अर्थात् वियोगांत और कमेडी (Comedy) अर्थात् सयोगांत श्रेणियों में विभक्त नहीं कर सकते। कहानी के आधार . : द्विजेंद्र-नाटकावली हिसाब से इनको सामाजिक, ऐतिहासिक और पौराणिक नाटा विभक्त किया गया है। 'पापाणी', 'सीता' और 'भीष्म' पौराणिक टफों की श्रेणी में हैं, क्योंकि अहल्या का उल्लेख रामचरित- नस में भी है। साता की प्रतिम कथा वाल्मीकीय मायण तथा उत्तर-रामचरित से ली गई है, और भीष्म महा- रित की कथा के प्रधान पात्र हैं। परतु यह नाटक कथा के धन से नहीं बंधे हैं। अहल्या को पतित करने पर भी इद्र फि बचा दिये जाते हैं। 'सीता' में राम के चरित्र को रामायण उच्च पद से गिरा दिया है। केवल भीम का चरित्र कथानु- र अकित किया गया है । 'उस पार' और 'भारतरमणी' माजिक नाटक हैं। इनको यह पदवी इसलिए दी गई है कि नमें हिदू-समाज की प्रचलित कुरीतियों का दिग्दर्शन गार्हस्थ्य- जीवन के पतन-द्वारा कराया गया है। इनकी कथा के लिए हाई पुस्तक देसने की आवश्यकता नहीं है । घर घर इनका वभिनय हो रहा है। द्विजेंद्रलाल के अधिकतर नाटक ऐतिहासिक है, क्योंकि नकी कथा प्राचीन हिदू इतिहास और आधुनिक मुगल था राजपूत इतिहासों से ली गई है। 'चद्रगुप्त' और 'सिहल- वेजय' में इतिहास का तो एक बहाना ही है, उनमे अधिकतर कल्पना का समावेश है । 'तारा', 'मेवाड़पतन' और 'दुर्गादास' के लिए नाटककार को सामग्री ही अच्छा मिली है। सच पूछिए तो भारतीय नाटक तथा काव्यसाहित्य के प्राधार तीन ।
साहित्य-समीक्षा ही पुस्तकें हैं--रामायण, महाभारत और टाड का राजस्थान 'तारा' राजपूताने के उत्थान, 'मेवाडपतन उसके पतन औ 'दुर्गादास' उसके उद्धार के सूचक हैं। राजस्थान में इनव कहानी ही कम रोचक नहीं है, पर नाटककार ने भी अवस को हाथ से नहीं जाने दिया। 'नूरजहाँ और 'शाहजहाँ मुगल इतिहास के बधनों से जकड़े हुए हैं, तो भी जहाँ कल्पना के अवसर मिला है, वहाँ वह बधनो से भाग निकली है । लैला और पियारा द्विज याबू ही के हैं, इतिहास के नहीं । औरग. जेब के चित्र ने भी इतिहास को बहुत कुछ देधोखा । दिया है। परतु क्या इन नाटको को कथानुसार ही विभक्त करना ठीक होगा ? क्या इनको विपयानुसार वा विचार-धारानुसार, श्रेणीबद्ध नहीं कर सकते ? सबमें प्रेम का प्रवाह आदि से अत तक है । कही वह दूसरी कामनाओं से टक्कर खाकर उबल पड़ता है, और महाविप्लव कर देता है, जैसे 'नूरजहाँ' और 'शाहजहाँ' मे, कहीं वह शाविपूर्वक उमगे लेता हुआ यव- निका में लीन हो जाता है, जैसे 'मानसी', 'विजयसिह' या 'तारा' में, परतु वह जाति और गृह-दो धाराओं में बहता है। जाति-सेवा और पत्नी-प्रेम-~यही दो द्विजेंद्र बाबू के आंतरिक जीवन के प्रधान अग थे। वे एक दूसरे से न जीवन में अलग थे,न नाटकों में ही हैं, परतु यह मानना पडेगा कि कहीं एक प्रधान है, और कहीं दूसरा । यदि इस -- द्विजेंद्र-नाटकावली प्रकार श्रेणीबद्ध करने का साहस किया जाय तो 'मेवाड-पतन', 'दुर्गादास', 'चद्रगुप्त', 'भोप्म' और 'तारा' जातीय नाटक हैं, 'सीता', 'पापाणी', 'उस पार', 'सिहल-विजय', 'नूरजहाँ', 'शाहजहाँ', और 'भारत-रमणी', गार्हस्थ्य नाटक हैं। निवेदन यह है कि नाटक की परख प्रधान पान और उनसे मिले हुए कथा के स्रोत के ढूंढ निकालने से होती है। उसी स्रोत से अन्य पात्रों को अपना अपना रूप-रस मिलता है, और उनका भाग्य प्रधान पात्र के भाग्य के साथ बदलता रहता है। 'मेवाडपतन' और 'दुर्गादास' के विषय में वो अधिक सदेह नहीं है । कथा का स्रोत मुगल और राजपूत के विद्रोह से बहता है। अमरसिह और महावतयां उस विद्रोह के नेता हैं, और विश्वप्रेमिणी मानसी उनकी समालोचक है। 'दुर्गादास' बहुत ही सरल है। दुर्गादास और महामाया उसके प्रधान पात्र हैं। और राजपूत जाति का उद्धार कथा का प्रधान उद्देश्य है । 'चद्रगुप्त', 'वारा' और 'भीम' के विषय में कुछ अधिक विचार करने की आवश्यकता है। 'भीष्म के प्रधान पात्र साफ प्रकट हैं। यह रचना मान नाटकरूप में भीष्म-चरित है। इसकी प्रधान घटना भीष्म-प्रतिज्ञा है। यह प्रतिज्ञा पिता को प्रसन्न करने के लिए ही भीष्म ने की है। परतु ब्रह्मचर्य के प्रण के पश्चात् अबा की प्रेमभिता का तिरस्कार करके ही वह अपने को गार्हस्थ्य- जीवन से मुक्त कर लेते हैं। उनका उद्देश्य प्रादि से प्रत तक एक राजा की लालसा से उत्पन्न अशक्त सतान के राज्य को
साहित्य-समीक्षा
अपने कठिन व्रत से सँभालना ही है। यदि ध्यान से देखा
तो भीष्म महाभारत के राजनैतिक पान हैं। गार्हस्थ्य प्रेम
उनमें लेश भी नहीं।
นี้
'चद्रगुप्त' के प्रधान पात्र चाणक्य और हेलेन हैं। चाए
का उद्देश्य नद-वश को नाश कर, चन्द्रगुप्त के छन के न
देश को सगठित करना है। वह प्रधानतः राजनैतिक ही
है, यद्यपि कभी कभी गार्हस्थ्य-जीवन के सुख-स्वप्न को
आकर उसके शून्य हृदय को विचलित कर देती है । हे
मानसी की सगी बहन है। उसका विवाह चद्रगुप्त के से
एक गार्हस्थ्य-घटना नहीं है। यह विश्वप्रेम के लिए एक बलि
। इस विवाह में उत्सव मनानेवाले साधारण गृहस्थ न
हैं। यहाँ हिरोडोटस और व्यास, सुकरात और बुद्ध एकिलि
और भीष्म, पंथियन और पुराण एक होगये हैं। इस विन
से पूर्व और पश्चिम, स्वर्ग और मर्त्य, इहकाल और परका
एक दूसरे में लीन होगये हैं। और इस विवाह का अभिन
लेखक की ओर से कालिदास और शेक्सपियर इस शताब
में कर रहे हैं। देश के गौरवकाल में जो विश्वप्रेम हेलेन
विवाह के साथ अकुरित हुमा है, उसका हमारे जाती
अध पतन के साथ मानसी में पूर्ण विकास होता है।
'वारा' के मुख्य पात्र पृथ्वीराज और तारा हैं। एक दृक्ष
से मिलन, प्रेम का उद्गार, विवाह, भ्रम और अत में एक
-
द्विजेंद्र-नाटकावली अपने बहनोई के हाथ मरना और दूसरी का सती होना गार्हस्थ्य-जीवन की ही घटनाएँ मालूम होती हैं। परतु उनके नीचे जातीय प्रेम की एक तीन धारा बह रही है। तारा जयमल को लौटा देती है । इधर जयमल तारा को कुछ और समझे हुए था, इसलिए शूरतान के हाथ उसको प्राणदड मिलता है। पृथ्वीराज ही टोडा के उद्धार से अनुज की विफल प्रतिज्ञा पूर्ण करता है, और राता को वरता है। वारा पृथ्वीराज ही से गार्हस्थ्य-प्रेम सीखती है। तारा देश के लिए अर्पण हो चुकी थी, पृथ्वीराज के शव पर तो अब में अर्पण हुई। जिन नाटको को गार्हस्थ्य-प्रेम दर्शक श्रेणी में रक्सा गया है, उनमें 'सीता' के विषय में अधिक नहीं कहना है। द्विजेंद्र बाबू भवभूति की कलम लेकर अपनी प्रतिभा दिखा नहीं पाये, या अनुवाद ठीक तरह नहीं हुआ । गार्हस्थ्य- प्रेम की स्वर्गीय धारा के साथ प्राचीन सामाजिक कुरीतियों की पुट देना कुछ शोभाजनक नहीं है, राम के गले उनको मढना और भी अधिक पीडा-जनक है । मुँह से दुर्मुख के प्रति दुर्वचन फह- लाना, और हाथ से शूद्रक का सिर कटाना- -इन दोनो को से 'सीता' के राम इतने अशुद्ध होगये हैं कि हम उनकी चरण-रज अपने मस्तक पर नहीं लगा सकते। 'पापाणी' के पात्र अहल्या और इद्र हैं। लालसा के वश पतित होना और तमा-द्वारा पतिव का उद्धार कराना, इस .
साहित्य-समीक्षा नाटक का उद्देश्य है। वे जोड विवाह से गार्हस्थ्य-जीवन को कैसी गहरी चोट पहुँचती है । द्विजेंद्र बाबू ने अपनी लेखनी की शक्ति से, दर्शको को शब्दों की झडी का भुलावा देकर, इन पतितों को क्षमा करा दिया है, परतु इतनी क्षमा मनुष्य- शक्ति के बाहर है। 'उस पार' और 'भारतरमणी' बगाल की वर्तमान सामाजिक दशा का दिग्दर्शन कराते हैं, और इनके पात्र भी उसी समाज , 'उस पार के मुख्य पात्र भोलानाथ, भगवानदास और मुन्नी हैं । भोलानाथ का सरलता से लसा हुआ पौत्री-प्रेम, भगवानदास की रूप-लालसा, और मुन्नी का अपूर्व नैसर्गिक प्रेम-इन्ही के संगठन से नाटक का जन्म हुआ है । सामाजिक नाटक एक ही देश-काल के लिए होते हैं । इनका अनुवाद होने से या सामाजिक जीवन में परिवर्तन हो जाने से इनमें उतना बल नहीं रहता। 'उस पार' कुछ हद तक ऐसा ही नाटक है । वगाल में इसका बडा आदर है, परतु हिदी भाषा में मूलनाटक का परिवर्तन होने पर भी, वह उतना ग्राह्य नहीं है जितना बगाल में। भोलानाथ को लीजिए। आप अपनी पौत्री को प्रेम करना सिखाते हैं। जैसी बातें हमारे समाज मे नई बह की ननदें या भावनें किया करती हैं, वैसी बातें बूढे भोलानाथ के मुंह से हमारे हिदी-रग-मच पर तो शोभा न देंगी।
द्विजेंद्र-नाटकावली
स्वय द्विजेंद्र बाबू को छोड़ भोलानाथ की सरलता किस
मनुष्य के हृदय में पाई जाती है। वह बगाली 'माघेलो'
है, और गौरीनाथ उसका 'आयागो' है । उसकी समझ
ही में नहीं आता कि मनुष्य इतना नीच हो सकता है
जितना गौरीनाथ है। उसने कभी सोचा ही नहीं कि सरस्वती
को छोड भगवानदास कभी किसी पर-स्त्री से भी प्रेम कर
सकता है। चूहे का विश्वास दृटने के साथ ही गार्हस्थ्य-जीवन
का विप्लव है। जगह जगह भोलानाथ का चरित्र हृदय को
पीडा पहुंचाता है। मेरा सर्वस्व ले लो, परतु मुझे प्यार करो'-
इस पीडा को पहुँचाना हो इस नाटक का उद्देश्य है।
'उस पार मे गार्हस्थ्य-जीवन के टुकडे टुकडे उसके पात्र ही
करते हैं, परतु 'भारतरमणी' की दु ख-कथा के लिए समाज की
एक विशेष कुप्रथा ही उत्तरदायिनी है। यह कुप्रथा हिदू-समाज
में व्याप्त है, परतु बगाल में इसका प्रचार बहुत अधिक
है। सामाजिक प्रश्नों पर इसके पात्रों द्वारा नाटककार ने अपने
बडे गभीर विचार प्रकट किये हैं, और इसी लिए यदि कोई भी
नाटक सामाजिक कहा जा सकता है, तो वह यही है । यदि
नाटक के पात्रों की ही ओर देखा जाय तो समाज के
अत्याचार से गाईस्थ्य-जीवन ही नष्ट होता है। देवेंद्र की एक
लडकी को वैधव्य का रोना है। दूसरी ओपधि के न पहुँचने
से असमय ही माँ की गोद सूना करके चल देती है
तीसरी ने पढ़ी-लिखी होने के कारण समाज की कुरीतियों
भर
. ७२ साहित्य-समीक्षा के विरुद्ध विद्रोह का झडा खडा कर दिया है, वह ब्याह ही न करेगी और द्विजेंद्र बाबू उसकी सहायता के लिए भी तैयार हैं। चौघा पुत्र कुसगति में पडकर जेल की हवा खाता है। ऐसी दशा में पिता क्यो न पागल हो जाय और मावा क्यो न घर से भाग निकले ? 'भारतरमणी' नाट्यक कला विचार से प्रतिभाशाली न होने पर भी नाटककार के सब नाटकों से अधिक उपयोगी है। जो काम सामाजिक कानफ्रेंसों के प्रस्ताव नहीं कर सकते, वह इस नाटक के अभिनय से हो सकता है। 'सिहलविजय', 'नूरजहाँ' और 'शाहजहाँ ऐतिहासिक नाटको की श्रेणी में रक्खे गये हैं। 'सिहलविजय' का वीज इतिहास में अवश्य है, परतु चरित्र-चित्रण में नाटककार ने पूर्ण स्वतत्रता ली है। इसी लिए यह नाटक 'शाहजहाँ' और 'नूरजहाँ' से अधिक पूर्ण है, यद्यपि बगाली समालोचकों ने 'नूरजहाँ' और शाहजहाँ ही के प्रति विशेष भक्ति दिसाई है। इस नाटक के प्रधान पात्र विजयसिह और कुवेणी हैं। उन्हीं के चरित्र के चारों ओर बगाल और सिद्दल की घटनाएँ घूमती हैं, और उन्हीं के मिलन तथा विच्छेद से नाटक के परदे बदलते हैं। सौत के पितृ-भक्त पुत्र के साथ दुर्बल-हृदय पिता का बर्ताव ही इस नाटक की कथा का केंद्र है। पात्रों के नाम राजसी है, नाटक का नाम 'राजनैतिक' है, परतु घटनाएं एक साधारण गृहस्थ ही के घर की हैं।
। द्विजेंद्र-नाटकावली 'सिहलविजय' और 'नूरजहाँ' तथा 'शाहजहाँ' में अतर यह है कि एक में तो मानुषिक हृदय की प्रत्येक कामना का निष्कटक उद्गार दिखाया गया है, और दूसरे में एक कामना का दूसरी कामना से युद्ध दिग्वाने का प्रयत्न किया है। द्विजेंद्र बाबू ऐसे सरल-हृदय नाटककार ने एक को तो विना विशेष प्रयत्न के अपूर्व रूप दे दिया है, परतु दूसरा काम बहुत कठिन है। विशेष प्रयत्न करने पर भी चिन्न त्रुटिमय है, और यदि बहुत कहा जाय तो यह मान सकते हैं कि शेक्सपियर को खूब नकल की गई है। लीला, सिहबाहु, विजयसिह, कुवेणी और सूरमा के चित्रों की ओर देसिए। एक एक चरित्र में एक ही कामना का उद्गार है । अपने अधे न्याय-प्रेम के कारण सिहवाहु का पतन होता है । विजयसिह अपने पितृ-प्रेम के कारण निर्वासित किये जाते हैं। लीला अपने पति-प्रेम में मन है, उसका प्रेम स्वच्छ है, वह प्रत्युपकार नहीं चाहती। कुवेणी लालसा के तूफान में लीन हो जाती है। सूरमा गाईस्थ्य-सगठन में विच्छेद होने देना पसद नहीं करती, परतु वासनाओं का रोकना अबला कन्या की शक्ति के बाहर है। नाटक का अव सिह- बाहु की मृत्यु से होता है, परतु परदा गिरने के पहले हमको आश्वासन हो जाता है कि सिहल का उद्धार करने के लिए विजयसिह ही इम तूफान से बचे हैं। 'नूरजहाँ' और 'शाहजहाँ' में कया के इतिहास की शृखला से बंधे होने पर भी कवि ने मनाविकार के
साहित्य-समीक्षा
पारस्परिक युद्ध को दिखाने का प्रयत्न किया है। यह नाटक
उद्देश्य हीन हैं। कहा जाता है कि 'शाहजहाँ' का जितना
आदर बँगला-रंग-मच पर हुआ उवना द्विजेंद्र बाबू के और
किसी नाटक का नहीं हुआ । द्विजेंद्र बाबू ने 'नूरजहाँ'
की विशेषताओं को स्वय नाटक की भूमिका मे लिखा है।
धुरधर विद्वानों की राय में राय मिलाना सहज है, परंतु अपने
स्वतत्र विचार प्रकट करना भी लेखक का कर्तव्य है, पाठक उससे
सहमत हो या न हो । 'नूरजहाँ' और 'शाहजहाँ' द्विजेंद्र बाबू
के श्रेष्ठ नाटको में हैं, परंतु यह कहना कविठन है कि स
पहलुओं की तरफ़ देखते हुए 'मेवाड़-पतन' और 'उस पसार'
इनका पद कहाँ तक ऊँचा है।
शाहजहाँ और नूरजहाँ के नाम से भारत का शिक्षित
समाज अच्छी तरह परिचित है। उनका चित्र बचपन ही से
हमारे हृदय में अकित है। यदि कथा से कुछ हद तक
परिचय हो, तो नाटक के दर्शकों की भीड और भी अधिक हो
जाती है। इन नाटको की कथा से हिदू, मुसलमान,
सभी
परिचित हैं । भीष्म, अहल्या, अमरसिह, चन्द्रगुप्त से,
मुसलमान बालको की कौन कहे, हिदू बालक भी इतने
परिचित नहाँ जितने नूरजहाँ, शाहजहाँ और औरगजेब से।
सीता से इतना अधिक परिचय है कि उनके चरित्र-अभिनय
में कोई विशेषता नहीं मालूम पडती। फिर इन पात्रों का
समय भी इतना दूर नहीं है कि साधारण जन-समाज की
द्विजेद्र-नाटकावली
समझ में न आ सके, और न इतना निकट ही है कि उसमें
कोई कौतूहल -जनक बात न मालूम पडे। मुगल-साम्राज्य का
विनाश हुए अभी बहुत समय नहीं हुआ । उसके भग्न गौरव के
चिह्न अब भी आगरे और दिल्ली में शान के साथ सडे हुए हैं।
भीष्म, अहल्या,
सिहबाहु और
चद्रगुप्त के समय को समझने
के लिए कुछ कल्पना की मात्रा होनी चाहिए, जिसके लिए
साधारण दर्शकों से आशा नहीं की जा सकती। नूरजहाँ की
सज-धज से बेचारी अहल्या क्या मुकाबला करेगी? एक हीरे
और मोतियो की चकाचौंध से घिरी हुई भारत-सम्राज्ञी, दूसरी
साधारण वस्त्र पहने हुए तपस्विनी । तव पाठक जान सकते हैं कि
किस पर अधिक करतल-ध्वनि होगी। कुछ लोगों के विचार
से इतिहास शाहजहाँ के अभिनय में रुकावटें डालता है, पर
हम समझते हैं कि वह नाट्यकला के मार्ग मे भले ही रुकावटें
डालता हो, पर अभिनय में तो सहायता ही पहुँचाता है।
इतिहास के साथ साथ पश्चिमीय शिक्षा के प्रभाव से
भी इन नाटको की कीर्ति को सहायता मिली है । अँगरेजी
नाट्य साहित्य में--कदाचित् ससार के नाट्य-साहित्य में भी-
शेक्सपियर से बढकर कोई दूसरा नाटककार नहीं हुआ।
वह कोई दार्शनिक न था, और न मानवशास्त्र का अध्ययन
किये हुए था। उस समय के रंग-मचों पर अभिनय करने-
वालों में एक वह भी था । उसने-जान-बूझकर नहीं-
अपने अपूर्व मानवीय हृदय से परिचित कल्पना की वरग
७४
साहित्य-समीक्षा
पारस्परिक युद्ध को दिखाने का प्रयत्न किया है। यह नाटक
उद्देश्य-हीन हैं। कहा जाता है कि 'शाहजहाँ' का जितना
आदर बँगला-रग-मच पर हुआ उतना द्विजेंद्र बाबू के और
किसी नाटक का नहीं हुआ । द्विजेंद्र बाबू ने 'नूरजहाँ
की विशेपताओं को स्वय नाटक की भूमिका मे लिखा है।
धुरधर विद्वानों की राय में राय मिलाना सहज है, परतु अपने
स्वतत्र विचार प्रकट करना भी लेखक का कर्तव्य है, पाठक उससे
सहमत हो या न हो । 'नूरजहाँ' और 'शाहजहाँ' द्विजेंद्र बाबू
के श्रेष्ठ नाटको में हैं, परतु यह कहना कविठन है कि स
पहलुओं की तरफ देसते हुए 'मेवाड़-पतन' और 'उस पसार'
इनका पद कहाँ तक ऊँचा है।
शाहजहाँ और नूरजहाँ के नाम से भारत का शिक्षित
समाज अच्छी तरह परिचित है। उनका चित्र बचपन ही से
हमारे हृदय में अकित है। यदि कथा से कुछ हद तक
परिचय हो, तो नाटक के दर्शको की भीड और भी अधिक हो
जाती है। इन नाटकों की कथा से हिदू, मुसलमान,
सभी
परिचित हैं । भीष्म, अहल्या, अमरसिह, चन्द्रगुप्त से,
मुसलमान बालको की कौन कहे, हिदू वालक भी इतने
परिचित नहीं जितने नूरजहाँ, शाहजहाँ और औरंगजेब से।
सीता से इतना अधिक परिचय है कि उनके चरित्र अभिनय
में कोई विशेषता नहीं मालूम पडती। फिर इन पात्रों का
समय भी इतना दूर नहीं है कि साधारण जन-समाज की
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द्विजेंद्र-नाटकावली
समझ
मे न आ सके, और न इतना निकट ही है कि उसमे
कोई कौतूहल-जनक बात न मालूम पडे। मुगल-साम्राज्य का
विनाश हुए अभी बहुत समय नहीं हुआ । उसके भन्म गौरव के
चिह्न अब भी आगरे और दिल्ली में शान के साथ खड़े हुए हैं।
भीष्म, अहल्या, सिहवाहु और चद्रगुप्त के समय को समझने
के लिए कुछ कल्पना की मात्रा होनी चाहिए, जिसके लिए
साधारण दर्शकों से आशा नहीं की जा सकती। नूरजहाँ की
सज-धज से बेचारी अहल्या क्या मुकाबला करेगी? एक हीरे
और मोतियो की चकाचर्चीध से घिरी हुई भारत-सम्रानो, दूसरी
साधारण वस्त्र पहने हुए तपस्विनी । तर पाठक जान सकते हैं कि
किस पर अधिक करतल ध्वनि होगी। कुछ लोगों के विचार
से इतिहास शाहजहाँ के अभिनय में रुकावटें डालता है, पर
हम समझते हैं कि वह नाट्यकला के मार्ग में भले ही रुकावटें
डालता हो, पर अभिनय में तो सहायता हो पहुँचाता है।
इतिहास के साथ साथ पश्चिमीय शिक्षा के प्रभाव से
भी इन नाटकों की कीर्ति को सहायता मिली है । अगरेजी
नाट्य-साहित्य में-कदाचित् ससार के नाट्य-साहित्य में भी-
शेक्सपियर से बढ़कर कोई दूसरा नाटककार नहीं हुआ।
वह कोई दार्शनिक न था, और न मानवशास्त्र का अभ्ययन
किये हुए था। उस समय के रंग-मची पर अभिनय करने-
वालों में एक वह भी था । उसने-जान-बूझकर नहीं-
अपने अपूर्व माननीय हृदय से परिचित कल्पना की घरग
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साहित्य-समीक्षा
में ही मानसिक जीवन के जो चित्र 'आथेलो', 'हेम्लेट',
'लियर' और 'मेकवेथ' में खींच दिये हैं, उनकी बराबरी करने-
वाले अब भी कोई नाटक नहीं हैं। द्विजेंद्र बाबू ने पश्चिमी
शिक्षा के भार से उऋण होने के लिए ही इन नाटकों में
मानसिक छेश का दिग्दर्शन कराने का प्रयत्न किया है।
"हेम्लेट' और 'आथेलो' के चरणों तक पहुँचने ही में 'नूरजहाँ'
और 'शाहजहाँ' का गौरव है।
शाहजहाँ की तुलना लियर के साथ की गई है, परंतु
समालोचक स्वय ही स्वीकार करते हैं कि वह लियर के आदर्श
तक नहीं पहुँच सका । यदि नाटककार इतिहास की शृखला
से न बँधे होते, तो कदाचित् शाहजहाँ को महल के बाहर ले
जाकर यमुना के श्मशान पर समाप्त कर देते, या नूरजहाँ को
इतने उच्च शिखर पर से एक-दम गिरने पर क्लियोपाट्रा की दशा
तक पहुँचा देते । परतु नूरजहाँ तो इतिहास में पतन के पश्चात्
भी बीस वर्ष तक जीवित रहती है,
उसको प्रव में
लैला से मिलाकर क्यो न शात कर देते।
इतना होने पर भी द्विजेंद्र बाबू के महत्त्व में कोई कमी
नहीं आती । बहुत सभव है कि यदि वह किसी दूसरी कथा
को लेकर, जिसमें उनको अपनी कल्पना से अधिक सहायता
मिलती, मानसिक छेश के दिसाने का प्रयत्न करते, तो नाटक,
को 'हेम्लेट' या 'माघेलो' की बराबरी तक पहुँचा देते । अपने
-फाल्पनिक पात्रों में वह इस मानसिक क्लेश का दिग्दर्शन करा
फिर वह
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७७ द्विजेंद्र-नाटकावली चुके हैं । अहल्या में कर्तव्य और लालसा का सघर्पण देखिए, सूर्यमल में मेकबेथ की झलक देखिए, भोलानाथ में आथेलो के दर्शन कीजिए, और गौरीनाथ में आयागो का प्रतिविब पहचानिए । परतु जिन नाटकों के यह पात्र हैं उनको मानसिक क्लेश दिखाने के उद्देश्य से नहीं, कदाचित् किसी दूसरे-और अधिक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य से-नाट्यकार ने लिखा है, इस- लिए यह नाटक हमारे बगाली समालोचकों की दृष्टि में 'नूरजहाँ और 'शाहजहाँ से समता नहीं कर सकते। मानसिक क्लेश का दुर्बोध होना ही उसका एक गुण है। द्विजेंद्र बाबू यह बात समझे हुए थे, और इसी लिए उनके विचार में नूरजहाँ का चरित्र विशेष प्रकार से जटिल और दुर्बोध होगया है। सभव है कि नाटककार की सरल प्रकृति ने ही अपने से उत्पन्न चरित्र को जटिल समझा हो, परतु बात ऐसी नहीं है। 'नूरजहाँ' के अपने मुंह से कहने पर भी-आत्म-प्रतारणा करने पर भी यह बात सहज ही समझी जाती है कि उसने बदला लेने के लिए सम्राट् से विवाह नहीं किया था। उसके मन में क्षमता और गौरव की श्राकांक्षा के साथ-साथ भोग-लालसा ही गुप्त रूप से बलवती थी। द्विजेंद्र बाबू की सरलवा और कला-कुशलता ने इस बात को समझने का मार्ग सर्वत्र ही सुगम कर दिया है। नूरजहाँ कुछ हेम्लेट नहीं है जिसके विषय में अभी तक यही निर्णय नहीं हुआ कि वह वास्तविक पागल था या बना हुआ।
- साहित्य-समीक्षा 'नूरजहाँ' और 'शाहजहाँ के सबंध में मानसिक प्लेश के विषय पर चाहे जो कुछ कहा जाय, पर द्विजेंद्र वायू की वृत्ति दूसरी ही ओर थी। उनका धर्म न सनातन है न आर्य, न हिदू, न मुसलमान। उनका धर्म है प्रेम । इस प्रेम का स्रोत माता की गोद से उमडकर पति-पत्नी के जीवन को सींचता हुआ देश-भक्ति में व्याप्त हो जाता है। परतु उसकी सुगधि देश ही के भीतर नहीं रहती, वह विश्वप्रेम के रूप में सर्व-व्यापी हो जाती है। गाईस्थ्य-जीवन के अत से, या देश के पतन से, उसका नाश नहीं होता। वह अमर और निर्विकार है। उसी के दिग्दर्शन में द्विजेंद्र बाबू का महत्त्व है, उसी में उनका गौरव है। यदि ससार को दिखाने योग्य द्विजेंद्र के कोई भी पात्र हैं तो वे नूरजहाँ, शाहजहाँ नहीं मानसी, हेलेन और भोलानाथ हैं। द्विजेंद्रलालजी के समय से बँगला-नाट्य-साहित्य ने जो उन्नति की है उसका अधिकतर श्रेय उपरोक्त नाटकों को ही प्राप्त है। हिंदी के मौलिक नाट्य-साहित्य की दशा अभी बहुत हीन है। इसकी उन्नति की आशा तभी की जा सकती है जब हिंदी-साहित्य मे भी द्विजेंद्र ऐसे किसी नाट्यकार का जन्म हो। इसके लिए इस प्रसिद्ध नाट्यकार के साथ वर्तमान + हिदी-संसार ने अपने होनहार साहित्यिकों की कदर करना नहीं जाना। हमारे मध्य भी एक होनहार नाट्यकार ने जन्म लिया जो दूसरा द्विजेंद्र होता यदि उसे हमारे लक्ष्मीपतियों और .
। हिदी मे उपन्यास-साहित्य ८१ परतु जिस ढरें के उपन्यास अब तक हिदी-साहित्य मे पदा- ण कर चुके है उनके विरुद्ध समालोचक की अपनी कलम ठाने का अधिकार अवश्य है। उपन्यास लिखे जायें। फसली हानियो की बात दूसरी है। परतु जिनको कुछ दिन साहित्य मे टेकना है, वे कम से कम उस श्रेणी के न हो जिसके अँगरेजी था अन्य पश्चिमी साहित्यों में फसली उपन्यास भी नहीं होते। हिंदी-साहित्य में उपन्यास तीन ढग के हैं । एक तो ये हैं जनकी नीव तिलस्म होशरवा पर है । हिदी-साहित्य में इनको न्मदाता वाबू देवकीनदन है। इनकी चद्रकांता का कुछ दिन बफ हिंदी समझनेवाला में वडा नाम रहा, लेसक ने रुपया खूब कमाया, और जो हिदी नहीं जानते थे उनमे से बहुतों ने ऐया- रयों के किस्से पढने के लिए हिदी पढी। इतना लाभ अवश्य हुआ, परतु लो यह पूछो कि इनके उपन्यासो ने किसी का चरित्र सुधारा हो, किसी पाठक के विचार उन्नत किये हों, सो नही । देवकीनदनजी ने साहित्य-फानन मे वह फूल लगाये जिन्होंने खूब जगह घेरी, देसने में सुदर भी, परतु न खुशबू न , बदबू । दूसरी श्रेणी के उपन्यास वे हैं जिनकी नीव लदन-रहस्य पर है । यदि हम भूल नहीं करते तो इनके जन्मदाता पडित किशोरीलाल गोस्वामी हैं । मालूम नहीं अब वह कहाँ हैं । कोई समय था जब उनका बड़ा नाम था । उपन्यासो या उनके पात्रों जाम न सु" । उद्देश्य बहुत ही अच्छा, पाप का फल देखो। . ।।
७-हिंदी मे उपन्यास-साहित्य
हिंदी-साहित्य के भलेमानस समालोचकों को उपन्यास के
नाम से चिढ है। साहित्य-भडार में उपन्यासो की भरमार है,
परतु
और किसी तरफ़ देखिए तो सन्नाटा है। उपन्यास बहुत
हैं। उनके विषय में लिखना या साहित्य-प्रेमियों का उनकी
ओर ध्यान दिलाना ठीक नहीं। प्रोत्साहन के लिए बहुत से
अन्य विषय हैं। क्यो न हम कुछ काल के लिए उपन्यास
लिखना बद कर दे और साहित्य के अन्य अगों को परिपुष्ट करने
फा प्रयत्न करें?
यदि यह तर्क मान लिया जाय, तो इस लेख की कोई
आवश्यकता न रहे । परतु उपन्यासों की अधिकता होते हुए भी
हम यह मानने के लिए तैयार नहीं हैं कि उपन्यास -न-लिखे--
जायें । जितनी भाषाएँ हैं, सभी के साहित्य में उपन्यासो की
अधिकवा है। उनका विषय ही ऐसा है। उनके समझने के लिए
विद्वत्ता की आवश्यकता नहीं। उनसे मनोरजन प्राप्त करने के लिए
कोई मेहनत दरकार नहीं । संसार में विद्वानों तथा मेहनतियो
की हमेशा कमी रहती है और रहेगी। इसलिए यदि उपन्यास
सर्वप्रिय हो, यदि उनका प्रचार साहित्य में सबसे अधिक हो,
तो कोई आश्चर्य नहीं।
हिंदी में उपन्यास-साहित्य परतु जिस ढरे के उपन्यास अब चक हिंदी-साहित्य में पदा- पंग कर चुके हैं उनके विरुद्ध समालोचक को अपनी कलम उठाने का अधिकार अवश्य है । उपन्यास लिखे जायें। फसली कहानियों की बात दूसरी है। परतु जिनको कुछ दिन साहित्य में टिकना है, वे कम से कम उस श्रेणी के न हो जिसके अँगरेजी तथा अन्य पश्चिमी साहित्यों में फसली उपन्यास भी नहीं होते। हिंदी-साहित्य में उपन्यास तीन ढग के हैं। एक तो वे हैं जिनकी नीव तिलस्म होशरवा पर है। हिंदी-साहित्य में इनके 17 जन्मदाता बानू देवकीनदन हैं। इनकी चद्रकांता का कुछ दिन तक हिदी समझनेवाला मे बडा नाम रहा, लेखक ने रुपया खूध कमाया, और जो हिदी नही जानते थे उनमें से बहुतों ने ऐया- रियों के किस्से पढने के लिए हिदी पढी। इतना लाभ अवश्य हुआ, परतु लो यह पूछो कि इनके उपन्यासों ने किसी का चरित्र सुधारा हो, किसी पाठक के विचार उन्नत किये हों, सो नहीं । देवकीनदनजी ने साहित्य-कानन मे वह फल लगाये जिन्होंने खूब जगह घेरी, देखने में सुदर भी, परतु न खुशबू न बदबू । दूसरी श्रेणी के उपन्यास वे हैं जिनकी नीव लदन-रहस्य पर है। यदि हम भूल नहीं करते तो इनके जन्मदाता पडित किशोरीलाल गोस्वामी हैं। मालूम नहीं अब वह कहाँ हैं। कोई समय था जब उनका बहा नाम था । उपन्यासों या उनके पात्रों के नाम न सुनिए । उद्देश्य बहुत ही अच्छा, पाप का फल देखो। 6 ८२ साहित्य-समीक्षा परतु खूबी यह कि पाप का बुरा फल देखकर भी उस पर आसक्त हो जाओ और उसे गले लगा लो। ठीक है, जैसी रूह वैसे फरिश्ते । क्या रेनाल्ड्स का उद्देश्य बुरा था ? परतु लदन-रहस्य के चरित्र ? कौन माता-पिता ऐसे उपन्यासो को अपने नवयुवक बालको के हाथ में देस थर्रा न उठेगा ? यह वे फूल हैं जिनकी मनोहरता देखकर युवक भ्रमर उनकी ओर दौडते हैं, परतु जिनके हृदय में विष है जिसे पीकर वे पतित होते हैं क्या ही अच्छा हो यदि इस श्रेणी के उपन्यास-लेखकों का देशद्रोहियों की तरह मुख बद कर दिया जाय । प्रगत तीसरी श्रेणी के उपन्यास गनीमत हैं। पर उनसे हमारे साहित्य का कोई गौरव नहीं। बंगला-साहित्य में बहुत से उच्च कोटि के उपन्यास हैं। यह उन्हीं के अनुवाद हैं, बायानुवाद हैं, या उन्हीं के ढर्रे पर लिखे हुए हैं । इनसे हिदी- साहित्य को कम से कम इतना लाभ अवश्य पहुँचा है कि लोग अच्छे बुरे का भेद तो समझने लगे हैं। यह बँगला साहित्य के लिये क्या कम गौरव-सूचक बात है कि उसके अनुवादों ने हिदी साहित्य के मौलिक उपन्यासो की आभा को फोका कर दिया है। यह वे फूल हैं जिनमें सुगधि है, अमृत है, सुदरता भी है। परतु जिन्हें देखकर हम गर्व के साथ यह नहीं कह सकते कि यह हमारे ही हैं। इन तीन श्रेणियों के उपन्यासो कोसाहित्य से निकाल डालिए। अब देखिए कितने उपन्यास बचते हैं। कोई भी उपन्यास-लेसक हिदी में उपन्यास-साहित्य इस साहित्य में है जिसकी तुलना वगाल के बकिम और खाँद्र- नाथ या इंग्लिस्तान के स्काट और थैकरे से कर सकें ? खूब हँढा तो एक महाशय मिले । उर्दू से वोडकर उन्हें किसी तरह हिदी- साहित्य मदिर की ओर लाये, तो कोई उत्साह बढानेवाला नहीं। मुदर सी कीजिए या सपादकीय प्रूफरीडिंग कीजिए तो पेट का धधा चले । फलत आपके मालिक उपन्यासो में सिर्फ एक है जिसे हम किसी अन्य साहित्य-प्रदर्शनी मे भेज सकते हैं। उसके पश्चात् बस । प्रेमचदजी से हमें अब भी आशा है। उनके 'वरदान' से हम सतुष्ट नहीं। परतु क्या जब स्काट ने अपनी आवश्यकता के लिए लिखा तो उसकी प्रतिभा में भी फीकापन नहीं प्रागना ? हम लोग आदर करना नहीं जानते । नहीं तो दूसरा 'सेवासदन' निकलवा, 'वरदान' की नौबत आती। साहित्य में उच्च कोटि के मालिक उपन्यासों की आवश्य- कता है । हम यह नहीं कहते कि अन्य विषयों की हानि हो, परतु हमे जाति के चरित्र तथा आदर्शों का भी सयाल है इसलिए हमारा पाठक-समाज से अनुरोध है कि यदि उन्हें कोई प्रतिभाशाली लेसक मिल जाय तो वे उसे सुस से जीवन व्यतीत करने का मौका अवश्य दें।* * यह लेए चैत्र १९७८ ० की 'मयादा' में प्रकाशित हुथा था। तय से श्रय तक प्रेमचदजी के कई अच्छे उपन्यास प्रकाशित हो चुके है। हिदी के मौलिक उपन्यास-साहित्य की अन्य कलाकाविदों ने भी पुष्टि की है।
८२ साहित्य-समीक्षा परंतु खूबी यह कि पाप का बुरा फल देखकर भी उस पर आसक्त हो जाओ और उसे गले लगा लो। ठीक है, जैसी रूह वैसे फरिश्ते । क्या रेनाल्ड्स का उद्देश्य बुरा था ? परतु लदन-रहस्य के चरित्र कौन माता-पिता ऐसे उपन्यासो को अपने नवयुवक बालको के हाथ में देख थर्रा न उठेगा। यह वे फूल हैं जिनकी मनोहरता देसकर युवक भ्रमर उनकी ओर दौडते हैं, परतु जिनके हृदय में विष है जिसे पीकर वे पतित होते हैं। क्या ही अच्छा हो यदि इस श्रेणी के उपन्यास-लेखकों का देशद्रोहियों की तरह मुख वद कर दिया जाय । प्रया तीसरी श्रेणी के उपन्यास गनीमत हैं। पर उनसे हमारे साहित्य का कोई गौरव नहीं। बँगला-साहित्य में बहुत से उच्च कोटि के उपन्यास हैं। यह उन्हीं के अनुवाद हैं, छायानुवाद हैं, या उन्हीं के ढर्रे पर लिखे हुए हैं। इनसे हिंदी- साहित्य को कम से कम इतना लाभ अवश्य पहुँचा है कि लोग अच्छे बुरे का भेद तो समझने लगे हैं। यह बंगला-साहित्य के लिये क्या कम गौरव-सूचक बात है कि उसके अनुवादों ने हिदी साहित्य के मालिक उपन्यासों की आभा को फोका कर दिया। है। यह वे फूल हैं जिनमें सुगधि है, अमृत है, सुदरता भी है। परतु जिन्हें देखकर हम गर्व के साथ यह नहीं कह सकते कि यह हमारे ही हैं। इन वीन श्रेणियों के उपन्यासों को साहित्य से निकाल डालिए। अब देखिए कितने उपन्यास बचते हैं। कोई भी उपन्यास-लेसफ हिदी में उपन्यास-साहित्य इस साहित्य में है जिसकी तुलना बगाल के बकिम और रवोंद्र- नाय या ग्लिस्तान के रफाट और थैकरे से कर सकें ? खूब हँढा तो एक महाशय मिले । उर्द से तोडकर उन्हें किसी तरह हिदी- साहित्य-मदिर की ओर लाये, तो कोई उत्साह बढानेवाला नहीं। मुदरिंसी कीजिए या सपादकीय प्रूफरीडिंग कीजिए तो पेट का धधा चले। फलत आपके मालिक उपन्यासों में सिर्फ एक है जिसे हम किसी अन्य साहित्य-प्रदर्शनी में भेज सकते हैं। उमके पश्चात् बस । प्रेमचदजी से हमें अब भी आशा है। उनके 'वरदान' से हम सतुष्ट नहीं । परतु क्या जब स्काट ने अपनी आवश्यकता के लिए लिया तो उसकी प्रतिमा में भी फीकापन नहीं गया ? हम लोग आदर करना नहीं जानते। नहीं तो दूसरा 'सेवासदन' निकलता, 'वरदान' की नौबत आती। साहित्य में उच्च कोटि के मालिक उपन्यासो की आवश्य- कता है । हम यह नहीं कहते कि अन्य विषयों की हानि हो, परतु हमें जाति के चरित्र तथा प्रादों का भी खयाल है। इसलिए हमारा पाठक-समाज से अनुरोध है कि यदि उन्हें कोई प्रतिभाशाली लेसक मिल जाय तो वे उसे सुख से जीवन व्यतीत करने का मौका अवश्य दें।* " यह लेस चैत्र १९७८ सं० की 'मयादा' में प्रकाशित हुआ था। तब से अब तक प्रेमचदजी के कई अच्छे उपन्यास प्रकाशित हो चुके है। हिदी के मोलिक उपन्यास साहित्य की अन्य कलाकोविदों ने भी पुष्टि की है।
८२ साहित्य-समीक्षा परतु खूबी यह कि पाप का बुरा फल देसफर भी उस पर आसक्त हो जाओ और उसे गले लगा लो। ठीक है, जैसी रूह वैसे फरिश्ते । क्या रेनाल्ड्स का उद्देश्य बुरा था ? परतु लदन-रहस्य के चरित्र ? कौन मावा-पिता ऐसे उपन्यासो को अपने नवयुवक बालको के हाथ में देस घरी न उठेगा ? यह वे फूल हैं जिनकी मनोहरता देखकर युवक भ्रमर उनकी ओर दौडते हैं, परतु जिनके हृदय में विष है जिसे पीकर वे पतित होते हैं क्या ही अच्छा हो यदि इस श्रेणी के उपन्यास-लेखकों का देशद्रोहियों की तरह मुख बद कर दिया जाय । प्रमा तीसरी श्रेणी के उपन्यास गनीमत हैं। पर उनसे हमारे साहित्य का कोई गौरव नहीं । बंगला-साहित्य में बहुत से उच्च कोटि के उपन्यास हैं। यह उन्हीं के अनुवाद हैं, छायानुवाद हैं, या उन्हीं के ढर्रे पर लिखे हुए हैं। इनसे हिंदी- साहित्य को कम से कम इतना लाभ अवश्य पहुँचा है कि लोग अच्छे बुरे का भेद सो समझने लगे हैं । यह बँगला साहित्य के लिये क्या कम गौरव-सूचक बात है कि उसके अनुवादों ने हिदी साहित्य के मौलिक उपन्यासों की आभा को फोका कर दिया है। यह वे फूल हैं जिनमें सुगधि है, अमृत है, सुदरता भी है। परतु जिन्हें देखकर हम गर्व के साथ यह नहीं कह सकते कि यह हमारे ही हैं। इन तीन श्रेणियों के उपन्यासो को साहित्य से निकाल डालिए। अब देखिए किवने उपन्यास वचते हैं। कोई भी उपन्यास-लेसक हिंदी में उपन्यास-साहित्य ८३ इस साहित्य में है जिसकी तुलना बगाल के बकिम और रवींद्र- नाथ या ग्लिस्तान के स्काट और थैकरे से कर सकें ? खूब हँढा तो एक महाशय मिले । उर्दू से तोडकर उन्हें किसी तरह हिदी- साहित्य मदिर की ओर लाये, तो कोई उत्साह बढानेवाला नहीं। मुदर सी कीजिए या सपादकीय प्रूफरीडिग कीजिए तो पेट का धधा चले। फलत आपके मौलिक उपन्यासो में सिर्फ एक है जिसे हम किसी अन्य साहित्य-प्रदर्शनी मे भेज सकते हैं। उसके पश्चात् बस । प्रेमचदजी से हमे अब भी आशा है। उनके 'वरदान' से हम सतुष्ट नहीं । परतु क्या जब स्काट ने अपनी आवश्यकता के लिए लिसा तो उसकी प्रतिभा में भी फीकापन नही आगना ? हम लोग आदर करना नहीं जानते। नहीं तो दूसरा 'सेवासदन' निकलता, 'वरदान' की नौबत आती। साहित्य में उच्च कोटि के मौलिक उपन्यासो की आवश्य- कता है। हम यह नहीं कहते कि अन्य विषयों की हानि हो, परतु हमे जाति के चरित्र तथा आदर्शों का भी खयाल है। इसलिए हमारा पाठक-समाज से अनुरोध है कि यदि उन्हें कोई प्रतिभाशाली लेसक मिल जाय तो वे उसे सुख से जीवन व्यतीत करने का मौका अवश्य दें।* * यह लेस चन १६७८ सं० की 'मयादा' में प्रकाशित हुआ था। तय से अब तक प्रेमचदजी के कई अच्छे उपन्यास प्रकाशित हो चुके है। हिदी के मौलिक उपन्यास-साहित्य की अन्य कलाकोविदों ने भी पुष्टि की है।
ड्यू माज
८-सेवासदन
माधुनिक हिदी-साहित्य में जितने उपन्यास और धार्मिक
विवाद-पूर्ण अथ प्रकाशित हुए हैं उतने और किसी विषय में नहीं
हुए । साहित्य-वाटिका में घृमिए। बहुत कुछ जमीन उपन्यास
हो घेरे हुए हैं। हिदी रसिक दर्शको तथा साहित्य-सेवक मालियो.
का ध्यान भी इसी ओर ह-1 ससार भर के भले-बुरे पौधे यहाँ
मौजूद हैं। इधर देखिए तो बगाली वकिम और रवींद्र के
साहित्य सुमनो की कलम है, उधर गुजरात से लाई हुई सरस्वती-
चद्र की बेल है। कहीं यूगो और के ऐतिहासिक
उपन्यासो की कलमे लगाने की कोशिश हो रही है। कहीं
कुछ सज्जन अँगरेजी-साहित्य के कृडे-कचरे से वाटिका को
सुशोभित करने का प्रयत्न कर रहे हैं । एक आध कोने मे, छिपे
हुए, इने-गिने साहित्य-प्रेमी अपनी सची साहित्य-सेवा का
वीज बोते दिसाई देते हैं।
हिदी मे अनुवादित उपन्यास बहुत हैं-अच्छे और बुरे
दोनो। परन्तु मौलिक उपन्यास बहुत कम हैं। कथा-
कहानियों की कमी नहीं है, क्योंकि उनका जन्म बहुत पहले
हो चुका था। परतु उपन्यास ने हिंदी-साहित्य में अंगरेजी
राज्य, अँगरेज़ो शिक्षा और आधुनिक रुचि के साथ ही अवतार.
लिया है। परलोकवासी बाबू देवकीनदन सत्री ने बहुत
पहले
समाज
सेवासदन
ही इस अववार की सब आराधना की। उनके उपन्यासों ने
अपने समय मे साहित्य को बहुत कुछ लाभ पहुँचाया।
के चरित्र को पिना पहुव विगाडे उन्होंने हिदो की ओर बहुत
से उपन्यास-रसिकों को आकृष्ट किया। जिनको तिलिस्मी
कहानियों से शौक था वे अब चद्रकांता सवति पढने लगे।
लेसा को भी आर्थिक लाभ हुआ। बस, फिर क्या था ।
ऐयारी से पूर्ण उपन्यासों की धूम मच गई। फाशी का
उपन्यास-वृक्ष इद्रायणी फलों से लद गया। कुछ महाशयों
ने-नाम लेने की आवश्यकता नहीं-प्रेम की पुट देकर अपने
उपन्यासों को और भी जहरीला कितु मनोहर बना दिया। इन
विप-भरे कनक-घटी से 'अमृत' पीकर देश के 'रसिक' नवयुवक
अपने चरित्र-पट पर नया रग रेंगने लगे। इस ओर समाज
का ध्यान भी न गया। न लेखक ने सोचा और न पाठकों ने
ही कि हमारे चरित्र के विषय मे हमारी सतान क्या कहेगी,
जन वह यह देखेगी कि हमको इन्ही गदे उपन्यासों से
शौक था।
,
परतु आशा की झलक दिखाई दे रही है । अच्छे
उपन्यासो का आदर बढता जाता है, चाहे वे अनुवादित ही क्यों
न हो। ऐसे समय में साहित्य-सेवियों का यह धर्म है कि
अच्छे उपन्यासो की ओर जनता का ध्यान आकृष्ट करें और
उनके लेसको का उत्साह बढाते रहें। इसी धर्म को यथो-
बुद्धि निवारने के लिए आज हम पाठकों से 'सेवासदन' को
साहित्य-समीक्षा परिचय कराते हैं। श्रीयुत 'प्रेमचंदजी' की आख्यायिकाओं से तो वे परिचित ही होंगे। यह उन्हीं की लेखनी से निकला हुआ पहला उपन्यास है। यह उपन्यास ऐतिहासिक नहीं। इसकी तुलना न तो बकिम-कृत दुर्गेशनदिनी से हो सकती है, न स्काट-कृत आईबन- हो (Ivanhoe) से । यदि तुलना हो सकती है तो रवींद्रनाथ या चैकरे कृत सामाजिक उपन्यासों से। परतु इसमें भी कठिनाई है सामाजिक उपन्यास के पात्र एक खास देश-काल से सबध रखते हैं। उनका प्रभाव भी तभी तक रहता है जब तक कि समाज अपनी रगत न बदले । उसी देश में उनका आदर होता है जहाँ उन्होंने जन्म लिया है। इसी लिए सामाजिक उपन्यासो का अनुवाद करना कठिन है और बेकार भी, अतएव एक दूसरे से इनकी तुलना करना कठिन है और अनुचित भी। इनके गुण-दोष समाज चित्रण ही पर आश्रित रहते हैं। शैवान के दर्शन कराना बहुव अच्छा नहीं, और न उच्चकोटि के साहित्य में उसका चित्र खींचना सरल ही है। चित्र सोचने के दो ढग हो सकते हैं। एक कुछ सरल हे और चित्रकार के लिए अच्छी रकम पैदा करने का द्वार भी है। दूसरा कठिन है, परतु यदि चित्रकार चतुर न हो तो मिहनत घाते में रहेगी, गॉठ से भी कुछ खो बैठेगा एक चित्र इतना लुभावना बनाया जा सकता कि आप उसी से प्रेम करने सेवासदन . लगें। दूसरा इस प्रकार दिखाया जा सकता है कि, दिव्य होने पर भी, उसकी ओर से आपके हृदय में भय तथा घृणा के भाव पैदा हों । इसी से इन दोनों के लिए साहित्य में भेद माना गया है । एक दूकानदारी है, दूसरा साहित्य का रत्न । उदाहरण के लिए, डिकेंस और रेनाल्ड्स की ओर देसिए । इगलिस्तान के निर्धन मजदूरों पर दोनो की कृपा है, उनके अपार कष्टों का चित्र दोनों ने सोंचा है, उनकी दरिद्रता से उत्पन्न पापो का करुणा सूचक दृश्य दिसाने का प्रयत्न दोनों ने किया है। दोनो के हृदय में देश के अमीरों के चरित्रों की ओर से घृणा है। परतु दोनों का क्रिया-कलाप अलग अलग है। डिफेंस के विषय में कहा जाता है कि यदि किसी उपन्यास- लेखक ने इँगलिस्तान के मजदूर दल के उद्धार करने में सहायता दी है तो डिकेंस ने । इसी से उसके उपन्यासो की गिनती देश के साहित्य-रत्नों मे है । रेनाल्ड्स ने अपने देश को कहाँ तक लाभ पहुँचाया, इसका उल्लेस न करना ही मला है। ईश्वर करे, हमारा साहित्य रेनाल्ड्स की कृपा की छाया से! वचित रहे। + सौभाग्य की बात है जो 'सेवासदन' रेनाल्ड्स के उपन्यास की श्रेणी का नहीं होने पाया । उसमें समाज के उस शैतान का चित्र साँचा गया है जो हमारे शहरी के खास सास याजारी के छज्जों को सुशोभित किये हुए है । लेखक ने इस कठिन कार्य को बडी चतुराई के साथ पूरा किया है।
मन साहित्य समीक्षा जहाँ-वहाँ भाषा तथा भाव में दोष दिसाये जा सकते हैं। कहानी भी एक-आध जगह जग असबद्ध सीजंचेगी। लेखक के चरित्र- चित्रण से भी, कहीं कहीं पर, पाठक सहमत न होंगे। परतु यह कहीं नहीं होने पाया है कि दालमंडी की गदी वायु में घूमते हुए भी आपके विचार कलुपित हो जायें । पाठक के भाव या तो पद्मसिह से मिलेगे या विट्ठलदास से। सदन या भोली से सहानुभूति होकर उनके में लालसा के भावन उत्पन्न होंगे। वारवनिताओं का आदर होने से गृहस्थाश्रम का अध पतन होता है। सेवासदन में कही गई कहानी के द्वारा उसके उद्धार की रीति बताई गई है। इस उपन्यास का प्रधान उद्देश यही है। परंतु इसके प्रत्येक पात्र के चरित्र से एक न एक शिक्षा मिलती है। कृष्णचद्र सच्चे हैं, परतु उन्हें अपने सत्य को देश की दहेज प्रथा-रूपिणी भीषण दुर्देवी के चरणों में बलि- दान करना पड़ता है। अपनी दुलारी और शिक्षिता लडकी के विवाह के लिए दहेज की रकम जुटाने को वह रिशवत लेते हैं, पकडे जाते हैं, कैद भुगतते हैं। घर मटियामेट हो जाता है। एक लडकी निर्धन वर के गले मढी जाती है, दूसरी दासी होकर अपना समय काटती है, स्त्री मानसिक क्लेश का शिकार बन कर बहुत शीव ससार से कृच कर जाती है। इस अग्नि-परीक्षा में हरिश्चद्र ही का सत्य टिक सकता था। जेल से लौटने पर कृष्णचद्र के चरित्र का अच्छी तरह पतन होगया है। लेखक सेवासदन बहुत देर तक उनको हमारे सामने नहीं रहने देते। विपत्ति- सागर में दो-चार और गोते लगाकर वह हमारी दृष्टि से लुप्त हो जाते हैं। कृष्णचद्र झा सा शोकमय प्रत और किसी का नहीं। बाको चरित्रों के पाठ से कहीं आनद है, कहीं शोक और कहीं विप्लव, परतु अन शांतिपूर्ण है। इन चरित्रों में सबसे अधिक ध्यान देने योग्य चरित्र सुमन का है। अत्युक्ति न समझिए, सुमन ही के चरित्र-चित्रण में उपन्यास का गौरव है। उसी में उपन्यास के प्राण हैं। सुमन के चरित्र में यदि कहीं भी बट्टा लग जाता तो उपन्यास किसी काम का न रहवा । लेखक महाशय उसे पढा-लिसा कर, और शारीरिक सुख की शोकीन बना कर, पदह रुपये महीने पर नौकर एक अधेड ब्राह्मण के साथ ब्याह देते हैं। चरित्र-चित्रण सुमन को एक इसी बात ने बचा लिया है कि वह भारतीय नारी है । वह पतिदैवत है सही, परतु प्रात्मगौरव और शारी. रिक सुख की लालसा उसको वह व्रत निबाहने नहीं देती । इधर वह देखती है कि समाज में पातिव्रत की कोई कदर नहीं। घर के सामने ही वह देखती है कि पतिता भोली का श्रादर- सम्मान बडे बडे धर्मज्ञ करते हैं, पर उसके लिए इतना भी नहीं कि वह अपना मर्यादा को एक नीच सिपाही के हाथ से भी बचा सके । पति महाशय (गजाधरजी) क्या करें। पत्नी के वघाभूषण और मान-प्राप्ति की लालसा को वह कुछ और ही ।
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साहित्य-समीक्षा
समझे । एक दिन आग लग ही तो गई । सुमन गृहिणी के उच्च
नद से गिर गई।
परतु अभी कुछ और पतन होना बाकी है । दूसरे दृश्य
में उसे हम दालमडी के एक कमरे में देखते हैं। यदि लेखक
नहाशय जरा भी चूक जाते तो सुमन के पतन की पराकाष्ठा हो
जाती । सदनसिह के प्रेम-पाश मे सुमन फँस जाती है, परतु
तित नहीं होने पाती । इसके पहले ही समाज-सुधारक
वट्ठलदास उसके उद्धार के लिए पहुँच जाते हैं। पर उसका
उद्धार नहीं होता। विधवा-आश्रम में उसका बहुत शीघ्र लाया
जाना, समाज की कृपा से उसके उद्धार-विरुद्ध कठिनाइयो का
पडना, शाता की विपत्ति, उसके भावी श्वसुर मदनसिह का
विरोध-इनमें से किसी एक का भी काम कर जाना सुमन
को गिरा देने के लिए काफी था । परतु लेखक उसको हर
तरफ से बचा कर अत में सेवासदन की सचालिका का पद
तक दे देते हैं । सुमन ने अपने ही को नहीं, उपन्यास को भी
गिर जाने से बचा लिया।
स्त्री-पात्रों में यदि प्रधान चरित्र सुमन का है तो पुरुष-पात्रों
मे पद्मसिह का मानने योग्य है । कथा-प्रसग में वह कुछ देर
बाद दिखाई देते हैं। परतु फिर वह दृष्टि के सामने से नहीं
हटते । पद्मसिह एक साधारण समाज-सुधारक हैं। विचारों
ऊँचे हैं, हृदय के बहुत कोमल हैं, परतु हैं बड़े दब्बू ।
ऐसे पुरुष लेस चाहे जितने लिख मारे, वक्तृताएँ चाहे जितनी
के बहुत
सेवासदन झाड आयें, परतु मौका पड़ने पर रहेंगे सबके पीछे । नाच के बडे विरोधी, परतु मित्रों ने दबाया तो जलसा करा बैठे। इसका उन्हें बहुत कुछ प्रायश्चित्त भी करना पडा-न यह नाच होता, और न सुमन घर से निकाली जाती। वह विट्ठलदास की शरण लेते हैं। परतु उनसे पद्मसिह की नहीं बनती । जैसे वह कर्म में कच्चे हैं, वैसे ही विट्ठलदास विचार में कच्चे हैं । चदा वसूल करने में कठिनाई, वारागनाओ को शहर के बाहर जगह देने के प्रस्ताव का म्यूनीसिपैलिटी के मेंबरों-द्वारा विरोध, इधर घर में सदनसिह की जियादती, उधर सुमन की छोटी बहन शाता के साथ सदनसिह के विवाह में विघ्न पड़ने की चोट- पद्मसिह बिलकुल ढीले पड गये । परनु विचार-गक्ति में कमी नहीं पड़ी। उन्हीं के द्वारा लेखक महाशय ने अपना विचार प्रकट किया है कि वार-नारियो को निकाल देने ही से सुधार न हो जायगा । क्यो न उनको और उनकी सतान को अच्छे मार्ग पर लाने का प्रयत्न किया जाय ? इस विचार को विट्ठलदास सेवा सदन के रूप में परिणत करते हैं। परंतु पद्मसिह के हृदय में प्रत तक भय की सत्ता बनी रहती है। झेप के मारे वह सेवा-सदन में नहीं जाते, कहीं ऐसा न हो जो सुमन से चार आँसें हो जाय । ऐसे और भी अनेक पान है । परतु लेप बढ जाने के भय से हम उनका वर्णन न करेंगे। सग्ला शांता को अनेक फार सदन करके भी, अत में, सौभाग्यवती गृहिणी का सुख भोगना
६२
साहित्य-समीक्षा
वदा था । चंचला परतु पतिव्रता सुभद्रा, अनेक आपदाएँ झेल
कर भी, पति के सामने हँसती ही रहती है। गृहस्थ गजाघर
के सन्यासाश्रमी अवतार गजानद, अत में, बहन के घर से
निकाली हुई किसी समय की अपनी पत्नी को शोक-सागर से
उबार कर शांति-प्रदान करते हैं। पुराने विचार के देहाती रईस
मदनसिह नाच कराने में अपनी मर्यादा समझते हैं। दुलार से
बिगडे हुए नवयुवक सदनसिह का पतन, और अपनी ही
मिहनत-द्वारा उद्धार, म्यूनीसिपैलिटी के मेंबरों में से कोई
गान-विद्या और हिंदी का शौकीन है, किसी को अँगरेजी बोले
बिना चैन नहीं, किसी के दुर्व्यसन वैसे ही हैं जैसे उसके
दुर्विचार-~~-इन सबके लिए इस उपन्यास में जगह है, सबके
चित्र देखने को मिलते हैं, सबसे किसी न किसी प्रकार की
शिक्षा ग्रहण करने का अवसर प्राप्त होता है।
उपन्यास के पात्रों से दृष्टि हटा कर यदि वह उसके उद्देश
की ओर प्रेरित की जाय तो एक बहुत बडा सामाजिक प्रश्न
सामने आ जाता है। क्या वह 'सेवासदन', जिसकी झलक
हम उपन्यास-स्वप्न में देखते हैं, कभी प्रत्यक्ष भी देखना
नसीब होगा ? प्रश्न कठिन है। शहरों की आबादी दिन
पर दिन बढ़ती जा रही है । इस काम को भ्यूनीसिपैलिटियों
के भरोसे छोड देने से सफलता होने की नहीं। देखे, हमारी
व्यवस्थापक-समाएँ इस प्रश्न को क्योंकर हल करती हैं। लेखक
के विचार यदि उपन्यास के बहाने पाठक-जनता पर कुछ भी
.
-
सेवासदन
असर करे तो समाज एक बडे बुरे रोग से मुक्त हो
जाय।
उपन्यास में दोप दिसाने के लिए बहुत कम जगह है ।
पुस्तक छपने में यत्र तत्र गलतियाँ रह गई हैं। मुसलमानों की
उर्दू बहुत क्लिष्ट है । यदि सरल हो सकती तो बहुत अच्छा था,
टिप्पणी में कठिन शब्दों के अर्थ ही लिस दिये जाते तो पाठको
को बहुत सुभीवा हो जाता।
हम आशा करते हैं कि लेखक महाशय की लेखनी से
और भी अच्छे अच्छे उपन्यासों की सृष्टि होगी। ईश्वर करे,
वह समय शीघ्र आवे जब हमे यह कहने का सौभाग्य प्राप्त हो
कि हिंदी-साहित्य में भी थैकरे, डिसेंस, स्काट और रवींद्र की
कमी नहीं है।
,
.
8-
-प्रेमाश्रम
प्रेमचदजी से हम निराश हो चुके थे। 'सेवासदन'
के पश्चात् 'वरदान' के दर्शन होने पर हमे बहुत शोक
हुआ
था। 'वरदान' क्या था, रुपये की आवश्यकता थी, समय
का अभाव था, और बे-मन का काम था। फिर हमने सुना,
कि वह किसी स्कूल के हेडमास्टर होगये, उसे भी छोड कर
किसी पत्रिका के सपादक होगये। हमने आशा छोड दी।
देश में साहित्य-रत्न के इतने कम जौहरी है कि वह मुदरि सी
या सपादकीय प्रूफरीडिग किया करे। किसी और देश में
'सेवासदन' के लेखक को साहित्य-ससार ने जन्म भर के लिए
स्वतत्र कर दिया होता। परतु यहाँ साहित्य-सेवा
शौकिया कर सकते हैं, पेट के लिए कोई और धधा
चाहिए। अस्तु ।
'वरदान' के बाद 'प्रेमाश्रम' के दर्शन हुए। फिर वही
आशाएँ अकुरित हुई । हिदी-साहित्य के सौभाग्य से प्रेमचदजी
की लेसनी मे कोई भी शिथिलता नहीं आने पाई। ससार दूसरा
है, समय भी दूसरा है। 'सेवासदन' में चित्र कम हैं, पर ,
। 'प्रेमाश्रम' मे चिन बहुत हैं, और उनमे से कुछ
दुर्बोध भी हैं, पर चित्रणकला में कहीं भी शिथिलता नहीं
पाने पाई है। 'सेवासदन' का उद्देश सामाजिक है, और
आप
-
5
प्रेमाश्रम प्रेमाश्रम का राजनैतिक, परतु दोनो देश-प्रेम के सूत्र में बंधे हैं। हिदी ससार के उपन्यास-साहित्य में 'प्रेमाश्रम' 'सेवासदन' से कम नहीं है। और यदि किसी पुस्तक के प्रभाव से उसके पद का निरीक्षण हो, तो शायद 'प्रेमाश्रम' आधुनिक भारतीय उपन्यास-साहित्य में सर्वश्रेष्ठ उतरे। 'प्रेमाश्रम' की समालोचना करने के लिए किस पद्धति का प्रयोग करे ? बकिमचद्रजी के उपन्यासों को देखकर अँगरेजी-साहित्य से परिचित समालोचक तुरत कह सकते हैं कि यह स्काट के ढर्रे के ऐतिहासिक उपन्यास है रवींद्रनाथजी के उपन्यासो को आप सामाजिक कह सकते हैं। आपको अँगरेजी-साहित्य में इनकी जोड के बहुत से उपन्यास- लेखक मिलेंगे । जार्ज इलियट, धैकरे, या डिफेंस, इनके वथा रवीद्रनाथजी के उपन्यास -क्षेत्र में कोई भारी भेद नहीं है । परतु प्रेमचदजी के उपन्यास इन श्रेणियों में से किसी में नहीं आ सकते। इन उपन्यासकारों का काम यह है कि किसी समय के समाज का चित्र खींच दिया, और पात्रो से सहानुभूति दिसाकर, उनकी हँसी उडाकर, या उन्हें नीचा दिसाफर, पाठकों के चरित्र सुधारने का प्रयत्न किया। परतु इनमें भविष्य का चित्र नहीं है। कला में शायद यह प्रेमचदजी से अधिक निपुण हो, परतु इनमें वह उत्तेजना-शक्ति नहीं, इतना कल्पना का विकास.. नहीं। वे समाज के सामने एक आइना रस सकते हैं जिसे देसकर वह इसे या कुडे, -
साहित्य-समीक्षा
परंतु उस आइने के पीछे कोई चित्र नहीं, जिसकी सुद
तक पहुँचने के लिए उसके हृदय में उत्तेजना हो।
'प्रेमाश्रम' के उपन्यास-पट पर सामने ती १९२१
भारतीय समाज का स्पष्ट चित्र है, और पीछे किसी में
भारत की छाया है। ऐसे चित्र का क्या नामकरगा
क्या 'प्रेमाश्रम: दार्शनिक उपन्यासो की श्रेणी में र
जाय ?
श्रेणी-बद्ध करना समालोचक के काम को सरल करन
परतु हम उसे ऐसा करने में असमर्थ हैं। अस्तु, चाहे
कठिनता हो, हम बिना नामकरण किये ही इस
अवलोकन करते हैं।
उपन्यास की भूमिका प्राय यों होती है-~~कोई पर
दृश्य है, प्रकृति का कोई विलक्षण आभास है।
पात्र
दर्शन हुए। कोई राजकुमार है, तो कोई उसका सखा
या वैरी है। दैवयोग से किसी नवयौवना से भेंट हो।
है। वह भी कोई राजकुमारी है। पर उसका पिता विवाद
लिए राजी नहीं होता । बहुत-सी कठिनाइयों के बाद---
और भी उसी मेल के पात्र अपना दर्शन देते हैं-मिलन
प्राणांत का विवरण देकर कहानी समाप्त होती है
प्रेमाश्रम
और उनके तिलिस्मो के मुकाबले विचारे लखनपुर या
हाजीपुर के झोपडो को कौन देखता है। सेवासदन का
प्रसग तो शायद, प्रचलित उपन्यासो के पाठक समझ सकें।
प्रेमाश्रम में क्या है । भला दुसरन भगत,
मनोहर,
गौसखाँ, कादिर मियाँ और बेगार के दिहाती झगडो में क्या
मनोरजन ।
यह प्रेमचदजी का ही काम था कि दिहाती झगड़ो का
करुणा-जनक दृश्य दिसाने में वह सफल हुए हैं ? यों तो राय
कमनानद, गायत्री, विद्या, ज्ञानशंकर, ज्वालासिह, डा.
इर्फानअली के गग-रंग नगर-निवासियों के हैं, परतु उनका
अस्तित्व दिहात ही से है। सुक्रा, विलासी, मनोहर,
बलराज, कादिर मियाँ—यह सब तो पूरे दिहाती ही हैं
चरित्र-चित्रण-कला का जाने दीजिए।
शायद किसी
और समय, दिहाव और बेगार, मुकद्दमेबाजी और नौकरी के
प्रश्न इतने रुचिकर न होते, पर यह उपन्यास सन् १९२१ का
लिखा हुआ है। और उस वर्ष के अंदर जितना आंदोलन और
राजनैतिक ज्ञान दिहातों में पहुँच गया, उतना शायद ही
साधारणत ५० वर्ष में पहुँचता।
प्रमाश्रम हाजीपुर का दूमरा नाम है, परतु उपन्यास की
नीव में लखनपुर है। वह बनारस के पास हो या कलकत्ते
के-इससे कोई प्रयोजन नहीं। सुक्रतू चौधरी के-से पची के
यों तो यह । n साहित्य-समीक्षा सँडहर, कादिर मियाँ के से.नरम.दिहाती नेता, - मनोहर के-से, अक्खड किसान, बलराज के-से उदार-हृदय, बलिष्ठ,...नवयुवक भारतवर्ष को प्रत्येक गाँव में देख सकते हो। बहुत समय से अज्ञानावस्था का सुख भोगते चले आ रहे थे। उनके प्रभाशकर के-से जिमीदार थे, जिनको अभी तक पाश्चात्य सभ्यता की हवा नहीं लगी थी, जो अभ्यागतों के सम्मान में अपनी इज्जत समझते थे, जिनको अपने आसामियों के प्रति सहानुभूति थी, जिन्हे अदालत जाते डर लगता था । ऐसे समय जिमींदार भी सुखी थे, और उनके किसान भी। परतु इधर पश्चिमी सभ्यता का आगमन हुआ। चीजों की निरख बढी, सो तो ठीक ही था। मालिकों की आवश्यक- ताएं भी बढी । जिन जिमीदारों के पुरखे बहेलियो पर चढते थे, घुटने के ऊपर तक धोती और चार आने सिलाई का अँगरसा या मिर्जई पहनते थे, उनकी सतानो के लिए मोटर की सवारी, लबी रेशमी किनारे को धोती और साहबी ठाट चाहिए। दिहात की उन्नति कौन करता है। इजाफा और. बेदखली का अत्याचार होना आवश्यक था। अभी तक लखनपुर पर सिर्फ उन्हीं मनुष्यो का अत्याचार है, जो वर्षा-ऋतु के बाद गाँवों पर धावा करते हैं। अभी ज्ञानशकुर ने जिमादारी पर हाथ, नहीं.. लगाया । इसलिए अभी मनोहर के माथियो का यही विचार है, कि अंगरेज हाकिम अच्छे होते हैं। परंतु इधर प्रभाशकर का ,
,
प्रेमाश्रम
बुढापा, जिमींदारी की आमदनी से ज्यादा खर्च, और उधर
ज्ञानशकर पर पश्चिमी शिक्षा का प्रभाव और यौवन की
उमग ! ज्ञानशकर ने हर तरफ हाथ बढाना शुरू कर दिया।
बस, इनके पदार्पण से उपन्यास का प्रादुर्भाव होता है।
यहाँ यह प्रश्न होता है कि इस उपन्यास में कोई नायक या
नायिका हैं या नहीं ? यदि हैं, तो कौन हैं, और नहीं-हैं- तो
क्यो नहीं?
यह तो मान ही नहीं सकते कि इस उपन्यास में नायक
और नायिका हैं ही नहीं। यदि चरित्र की उज्ज्वलता पर ही
ध्यान दिया जाय, तो एक ओर प्रेमशकर और दूसरी ओर
विद्या-यही पात्र लेखक के आदर्श मालूम पड़ते हैं । लसनपुर
में कादिर मियाँ और शहर में राय कमलानद, इन पात्रों की
और भी लेखक का आदर-भाव है।
परतु हमारा विचार है
कि चरित्र की उज्ज्वलता ही की कसौटी पर नायक तथा
नायिका की परस नहीं कर सकते। देसना यह चाहिए कि
किस चरित्र के चित्रण..में लेखक ने अधिक परिश्रम किया
है, किस पात्र के सहारे कहानी आगे बढती है, और
किसके न होने से उसका अत हो जाता है। बकिम की
'दुर्गेश नदनी' में जगत्सिह प्रेमी है और तिलोत्तमा उसकी
प्रेमिका, परतु आयेशा उपन्यास की नायिका है। 'सेवासदन'
में उपन्यास को सुमन का सहारा है, यद्यपि चरित्र विट्ठलदास
का ही आदरणीय है। इस उपन्यास में ज्ञानशकर का चरित्र
ऐश्वर्य-लोलुप, साहित्य-ममीक्षा आदरणीय नहीं है। गायनी भी विद्या के सामने तुच्छ मालूम पडती है। परतु हैं यही उपन्यास के नायक और नायिका । ज्ञानशकर न होते तो कोई लखनपुर का नाम ही न सुनता । इतिहास तो विपत्तियो का ही लिसा जाता है। देखिए न, भविष्य मे समृद्धिशाली, सुखमय लखनपुर की झलक दिखाने में लेखक ने कितने कम पन्ने रँगे हैं। यदि प्रभाशकर मालिक बने रहते, तो मनोहर से क्यों झगडा उठता, इजाफे की क्यों तजवीज होती । उपन्यास के लिए एक शिक्षित, उत्साही, परतु चरित्रहीन नायक की आवश्यकता थी। ज्ञानशकर की सृष्टि करना लेसक के लिये प्राव- श्यक था। ज्ञानशकर का चरित्र बहुत जटिल है। एक भारतीय नवयुवक पर पश्चिमी शिक्षा की नई रोशनी का प्राथमिक 'प्रमाव क्या पड़ता है, यह बहुत ही खूबी के साथ दिखलाया गया । यह बात नहीं थी कि उक्त शिक्षा ने उसकी भारतीय आत्मा को ही नष्ट कर दिया हो। जब कभी किसी पवित्र आत्मा के सामने उसकी ऐश्वर्य-लोलुपता का परदा हट जाता है, तो हमे उसकी अतरात्मा के मधुर प्रकाश की झलक देख पडती है, परतु फिर 'परदा गिर जाता है, और नानशकर फिर उसी ऐश्वर्य-छाया की ओर बढता हुआ दिखाई ज्ञानशकर नायक होते हुए भी अपने भाग्य का विधाता नहीं है। विधाता काल है। वह समझता है कि mernama - देता है।
। प्रेमाश्रम १०१ अपनी चतुरवा के बल पर वह अपना भविष्य पानदमय बना सकेगा, परतु काल उसे भी नचाता है। प्रभाशकर की भलमन- साहत, प्रेमशकर के त्याग, गायत्री की लालसा, ज्वालासिह के स्वाभिमान, गय कमलानद की निष्काम ससार-परता-सभी से वह लाभ उठावा मालूम होता है । पर किसलिए १ पुत्र मायाशकर के लिए ? क्या यह निश्चय है कि उसकी वृत्ति अपने पिता के पाक का अनुसरण करेगी १ वह भविष्य 'जिसके लिए ज्ञानशकर ने राय कमलानद को...जहर, दिया, और गायत्री को फंसाने का प्रेम-जाल रचा, उसके हाथ से 'निकल कर प्रेमशकर से मिल गया । राय कमलानद की भविष्यवाणी पूर्ण हुई "धन सपत्ति तुम्हारे भाग्य में नहीं है, तुम जो पाले चलोगे, सब उलटी पडेंगी ।" There is n destiny that shapes our ends, Rougl hiew them how we will मनुष्य कितना दीन, कितना परवश है। और भावी कितनी प्रबल, कितनी कठोर । ऐश्वर्य-लोलुपता का ऐसा विशाल चित्र हिदी-साहित्य भर में शायद ही और हो । उपन्यास के दो अग हो सकते हैं। एक सामाजिक, दूसरा राजनैतिक । ज्ञानशकर दोनों को बांधे हुए हैं। पर इन दोनों में एक एक प्रधान पात्र भी हैं। सामाजिक अग पर गायत्री का प्रभुत्व है, और राजनैतिक प्रग के विधाता प्रेमशफर हैं। गायत्री के चरित्र का इजाफे से कोई सबध नहीं है। वह एक बडी भारी जिमींदारी की मालकिन अवश्य है ।
.
साहित्य-समीक्षा
उसके प्रवध के लिए वह ज्ञानशकर को बुलाती है । परतु
इन बातों का उसके चरित्र से कोई विशेष सवध नहीं है। उसमे
धर्मनिष्ठा है। परतु साथ ही सुख-भोग की सामग्री भी
उसके पास बहुत हे । सुमन सधवा थी, उसका पतन समाज
की कुरुचि और उसकी दरिद्रता ने किया। गायत्री का पतन
उसमें धर्म-निष्ठा होते हुए भी सासारिक लालसा से होता है।
'प्रॉस की किरकिरी' में माया (विनोदनी) का पतन दूसरी
तरह होता है। रवींद्रनाथजी ने एक ही भाव को लेकर हर
पहलू से उसे दिसाया है। माया का लालसामय प्रेम सामाजिक
वधनों को तोडकर नग्न रूप में अपनी कला के बल से हमें
चकित अवश्य कर देता है। पर विचार-पूर्वक देखिए, तो
यह हिदू-समाज के लिए स्वाभाविक नहीं है । गायत्री का
पतन धर्म-जाल की मोट से होता है। उसे नहीं मालूम होता
कि वह किधर जा रही है, और जब अकस्मात् उसके सामने
पाप का अधकार-मय गढा दिखाई देता है, तो फिर वह समाज
को अपना मुँह नहीं दिखाती । हिंदू विधवा का पतन यो...ही
होना स्वाभाविक है।
जीवित उदाहरणों को किसी तीर्थ में जाकर देखिये।
जिस धर्म के नाम पर व्यभिचार होता है, उसके सजीव
प्रतिविध गायत्री और ज्ञानशकर के चित्र में हैं । सुमन का
उद्धार करना आवश्यक था, नहीं तो सेवासदन का विकास
ही न हावा । गायत्री के उद्धार की कोई आवश्यकता नही थी,
। प्रेमाश्रम १०३ इसी लिए लेखक ने उसे चार सतरो के अदर अनत विस्मृति में विलीन कर देना ही ठीक समझा। ज्ञानशकर के लिए भी ऐसा ही प्रत होना जरूरी था। उपन्यास का वह अश अधिक करुणामय है, जिसमे लखनपुर की गाथा है। इस प्रश के प्रधान पान प्रेमशकर हैं। यदि पश्चिमी शिक्षा का एक फल ज्ञानशकर की ऐश्वर्य- लोलुपता में है, तो दूसरा फल प्रेमशकर की निष्काम जाति- सेवा में है। जिस समुद्र में हलाहल विप है, उसमें अमृत भी है। प्रेमशकर उस शिक्षा के अमृत रूपी फल हैं । कुछ मित्रों का सयाल है कि प्रेमशकर मे गाधीजी की छाया है। हम लेखक के मन की थाह लेने का साहस तो नहीं कर सकते, रशिया के महर्षि टाल्स्टाय से क्यो न तुलना कीजिए। ज्ञानशफर चाहते हैं कि प्रेमशकर को गाँव का आधा हिस्सा न देना पडे । इसके लिए क्या क्या जाल रचे, सुधा को कहाँ तक भरा, विरादरी को कहाँ तक उभाडा । परंतु प्रेमशकर अमरीका से और ही पाठ सीस आये हैं । उन्हें साम्य-वादियों के मतानुसार एक आदर्श कृपक-सस्था तैयार करनी थी, गॉव को तिलाजलि दे दी, और जाति-सेवा में लीन होगये । श्रद्धा छूट गई, उसका उन्हें समय समय पर शोक होता है । भाई मे विगाड़ होगया, इसके लिए भी उनकी आत्मा को देश होता है। पर वह अपने कर्तव्य से विचलित . " १०४ साहित्य-समीक्षा नहीं होते । इसी लिए लेखक ने भी भविष्य को बागडोर को उनके हाथ से नहीं जाने दिया। प्रेमशकर हाजीपुर का एक साम्यवादी गाँव बना देते है, लसनपुर का उद्धार करते हैं, और मायाशकर को आदर्थ-ज़िमी- दार का पद देने में सफल होते हैं। प्रेमशकर के ससर्ग में जो पात्र आया, उसी को उन्होंने पवित्र कर दिया। उद्दड मनोहर, स्वार्थी ज्ञानशकर, और लालसामयो गायत्री इस योग्य नहीं थे, इसी लिए लेखक ने इनका अत ही कर दिया। सुक्खू चौधरी वैरागी होगया, ज्वालासिंह डिप्टी-कलक्टरी छोडकर जाति-सेवा में रत हुए, डाक्टर ईफेनअली ने वकालत छोड़ दो, और सा० प्रियानाध एक सर्व-प्रिय डाक्टर होगये, यहाँ तक कि पुनित दयाशकर का भी उन्होंने अपनी सुश्रूपा से उद्धार कर दिया । प्रेमशकर का जीवन एक प्रकार श्रद्धा के बिना अपूर्ण-सा था, सो श्रद्धा और प्रेम का ज्वाला-द्वारा सम्मिलन भी होगया । और भी पान हैं । गाँव के अत्याचारी अँगरेज नहीं हैं, मनो- हर और सुक्खू को गौसखाँ तथा साहबों के अहलकारों से ही शिकायत है । ज्वालासिह न्याय करने का प्रयल करते हैं, परन्तु धोया साते हैं, और इस्तीफा देना पडता है। गौसखाँ का भी वही अत हुआ जो अत्याचारी जिलेदारों का होता है । मनोहर को उद्दडता का भी फल उसे मिल गया । सुक्खू का मनोहर के खेतों की बड़ी लालसा थी, परतु गाँव पर विपत्ति आने पर वह उनका नेता होगया। कादिरमियाँ गाँव के सच्चे प्रेमाश्रम १०५ सेवक बने रहे। दुखरन भगत पर विपत्ति का दूसरा ही असर हुआ। निराशा ने उसके हृदय में जन्म भर की सचित शाल- ग्राम के प्रति श्रद्धा उसाड कर फेक दी। बलराज गाँव के भविष्य का युवक है। उसमें जो स्वतत्रता है, वह किसी में नहीं, क्योकि उसके पास जो परचा आता है उसमे लिसा है कि रूस में किसानों का राज्य है। यदि परिस्थितियाँ प्रतिकूल हुई , तो वह भविष्य का वोलशेविक होगा। मनोहर की पतिमता गृहिणी विलासी इनक झगडो को शाति करने का प्रयत्न करती रहती है, पर गाँव में विप्लव उसी के द्वारा होता है न उस गाँव की द्रौपदी पर गौसयों का अत्याचार होता, न पिट्टेष की आग इतनी भडकती । इस विप्नव के शात होने पर जो बचते हैं, वे उपसहार मे भावी गवर्नर हिज एक्सिलेंसी गुरदत्त राय चौधरी और भावी जिमीदार मायाशफरफ समय में रामराज्य का सुस- भोग करते हुए दर्शन देते हैं। उपन्यास लेखक के साथ हम भी कहते हैं-"तथास्तु"। कथा-प्रसग के परे और भी पात्र है। राय कमलानद का चित्र विशेषकर भावमय है। मालूम नहीं कि यह उपन्यास- लेसक के मस्तिष्क से निकले हैं, या इनकी जोड के इस ससार में कोई है भी। इनका जीवन सांसारिक विलास में मग्न है पर इससे इनके पोरुष में कोई फर्क नहीं पाता। इनकी भोग- क्रियाएँ इसी लिए थी कि जीवन की चरम सीमा तक सुर भांग कर मके। इनका आत्मबल इतना प्रसर था कि ज्ञानशकर १०६ साहित्य-समीक्षा भी उनके सामने नहीं ठहर सका । परंतु जीवन का आदर्श त्रुटियों से भरा था । ज्ञानशकर की कुटिलता ने इन्हें भी सच्चा मार्ग दिसा दिया, जिसकी झलक हमे उपन्यास के अत में देखने को मिलती है। विद्या और श्रद्धा के चित्र भी उल्लेख के योग्य हैं। दोनो साधारण हिदू-रमणियाँ हैं । विद्या के चरित्र में कोई विशेपता नहीं है। क्योकि उसके सामने कोई जटिल समस्या ही कभी नहीं आई। और जब उस पर कष्ट पडता है, तो लेखक उसे बरदाश्त करने योग्य न समझ कर उसका अत ही कर देते हैं। कुटिल ज्ञानशकर की पतिव्रता पत्नी का यही अत होना था। श्रद्धा के सामने पहले ही से धर्म और प्रेम की समस्या मौजूद है। पर प्रेमशकर के चरित्र का अतत उस पर इतना प्रभाव पडा कि धर्म की शृखलायें ढीली पड गई । लेखक ने श्रद्धा को प्रेम से मिला कर दोनो का जीवन सार्थक कर दिया । पात्रो का अवलोकन तो घोडा-बहुत हो चुका । अब लेख- शैली पर विचार कीजिए। प्रेमचदजी को यह पुरानी.आदत है कि भाषा हिंदी ही रहती है, पर शब्दी का रूप पात्रानुसार बद्- लता रहता है। 'सेवासदन' में मुसलमानो की दलील सलीस उर्द मे है, और अँगरेज़ी पढ़े-लिखे पात्रों की भाषा में अँगरेजी की सिचडी है। 'प्रेमाश्रम' में दिहाती पात्र भी हैं, इसलिए उनके काम में पानेवाले शब्द भी पैमे हो हैं। रिमवत, सरवस, मुदा, मस -dadaune प्रेमाश्रम १०७ कत, मूरस, सहर, अचरज, कागद, ये सब दिहातियो के ही शब्द हैं। भाषा सिर्फ करतार की बिगड़ गई है। वह ठेठ गवार है। और जितने दिहाती हैं, उनकी भाषा में पूर्वोक्त प्रकार के शब्द आने से लालित्य बढ ही गया है । विशुद्ध भाषा के पक्षपाती चाहें नाक-भौं सिकोडे , परतु हमारी समझ में इससे कोई हर्ज नहीं, यदि पात्रों की भाषा मे शब्द उनके व्यवहार में आने- वाले ही रक्खे जायँ । व्याकरण की टॉग तोडने के हम भी विरुद्ध हैं। हम यह नहीं चाहते कि बगाली पात्र की भाषा में लिग की गलतियों की जायँ, और अँगरेज की जबान में तवर्ग के शब्द ही न निकले। पर यदि पात्रानुसार दो-चार शब्दा के गढ देने से उसका अस्तित्व प्रकट या सजीव किया जा सके, तो कोई हानि नहीं। ऐसी दशा में लेगक भाषा को बिगाडने का दोषी नहीं ठहगया जा सकता। इन शब्दो ने दिहातियों के वार्तालाप को स्वाभाविक बना दिया है, उसमें जान डाल दी है। इनसे भापा को कोई क्षति नहीं पहुँचती । प्रेमचदजी ने लेख-शैली में एक बात और स्वाभाविकता की उत्पन्न कर दी है। पुरानी हिंदी में "इनवर्टेड कामाज" नहीं थे। इधर जब से अँगरेजी का हिदी पर प्रभाव पडा, फुलस्टाप को छोड़कर और सभी चिद्रों ने हिदी पर अपना प्रभुत्व जमा लिया। यह आगतुक “इनवर्टेड कामाज" हिंदी में बहुत सलते थे। लेखक ने इनका बहिष्कार ही कर दिया है। वार्तालाप में पात्र का नाम और उसके वाक्य-यस फाम निकल ।
. १०८ साहित्य-समीक्षा गया। कोई प्रातरिक विचार हुए, या कोई लबी बातचीत हुई, तो इसकी भी आवश्यकता नहीं। लेसक और पात्र दोनों एक ही तरंग में एक दूसरे से लड़ते हुए यहते चले जाते हैं अब मनोविकार के चित्र तथा विचित्र उपमाएँ देसिए । वे उपन्यास-धारा की ...तरगों पर कमल के फूलों या लेखक के अर्पण किये दीपकों की तरह दर्शन देते चलं जाते हैं। 'सेवा-सदनः लेखक के सजाने को साली नदी कर सका । 'प्रेमाश्रम' की उक्तियाँ वैसी ही नवीन और हृदय- ग्राही हैं, जैसी कि पहले उपन्यास की। मनोविकार-चित्रण ने लेखक की बात रस ली हे "मानव-चरित्र न बिलकुल श्यामल होता...है न खेत । उसमे दोनों रगो का विचित्र समिश्रण होता है। प्रेमशकर को अपनी जाति-सेवा मे भ्रातृ-विद्वेष की झलक मालूम पडती हे । ज्ञानशकर को अतत अपनी स्वार्थपरवा का अनुभव होता है। राय कमलानद को सांसारिक आनद में रत रहने का प्रसाद भोगना पडता है। सिर्फ विद्या और कादिरमियाँ के चरित्र निर्मल हैं, और यह शायद इसलिए कि लेखक ने उन पर अधिक प्रकाश नहीं डाला। इस चित्राण-कौशल का यह फल है कि किसी पात्र से हम घृणा नहीं करते, और कोई प्रादर्शमय भी नहीं है। धर्म और अर्थ में हर जगह क्लेश है। जहाँ इतने गुण दिग्वाये गये है। उपन्यास इतना बड़ा है, -- "
प्रेमाश्रम
१०६
के सिर्फ नबर दिये हुए हैं। यदि हेडिंग भी होते, तो पाठको
को अधिक सुभीता रहता। लिष्ट उर्दू के अर्थ तथा दिहाती
हिंदी शब्दों के शुद्ध रूप भी दे देना अच्छा होता । प्रफरोडिग
में बहुत कुछ असावधानी से काम लिया गया है, औरराविशेष
फमी यह है कि, आजकल.की रीति के अनुसार, इतने बड़े
उपन्यास के लिए एक चित्रकार की सहायता मी परम
आवश्यक थी--
हमारे यहाँ अनुवादित उपन्यासों का बाजार गर्म है
हम अँगरेजी, बंगला, मराठी इत्यादि भाषाओ का बहुत-कुछ
उधार गाये बैठे हैं। क्या यह सभव नहीं कि यह उपन्यास
हिदी-ससार की तरफ से इन भाषाओं को भी भेंट किया जाय ?*
*श्रोपटायर 1१२. की 'मापुरी' में उद्धत ।
१०-रंगभूमि
प्रेमचदजी के 'रंगभूमि' की इतनी आलोचनाओ के साथ
एक और आलोचना क्या निकले १ घृष्टता के लिए क्षमा-प्रार्थना
है। प्रेमचदजी के अब तक तीन उपन्यास निकल चुके हैं।
इसलिए हमें अब 'रंगभूमि' के पात्रों की विशेष व्याख्या नहीं
करना है। परतु उन गहन समस्याओं पर विचार करना है
जिन पर लेखक ने औपन्यासिक कला की आड में कुछ प्रकाश
डाला है। रगभूमि' तक पहुँच कर लेसफ की शैली और
कला.परिपक्क होगई है। इस शैली और कला की जॉच करना
है। फिर यह भी अनुमान करना है कि आधुनिक साहित्य
में और भविष्य के लिए प्रेमवदजी के उपन्यास कुछ सँदेशा भी
देंगे या यह भी अन्य सामयिक साहित्य की भॉति अपना समय
बीतने पर अनत विस्मृति को गोद में लीन हो जायेंगे।
यो तो उपन्यास का उद्देश साफ प्रकट है-
तू रगभूमि मे आया, दिखलाने अपनी माया,
क्यो धरम-नीति को वाडै ? भई, क्यो रन से मुँह मोड ?
प्रेमच दजी बार बार अपने नायक सूरदास के मुंह से
जीवन के इस महत्त्वमय रहस्य का उल्लेख करते हैं। परतु
इसके परे एक और समस्या है, जो ससार-मात्र में पारस्परिक
.
, रंगभूमि १११ कलह और अशांति का कारण हो रही है। वह है प्रचलित पुतलीघर-प्रणाली का दिहात के नैसर्गिक जीवन पर कोप और दोनो के पारस्परिक विरोध में दिहात का जीवन-विनाश और अधर्म, रोग और दुर्व्यसन का प्रचार। योरप मे यह विरोध समाप्त हो चुका । वहाँ पुतलीघरप्रणाली के सामने दिहाती जीवन का प्राय अत हो चुका है। अधर्म, रोग और दुर्व्यसन के परिणामों से योरपीय समाज को बचान के लिए वहाँ का समस्त चिकित्सा-शास्त्र, ईसाई-धर्म तथा साम्य- वाद के सिद्धांत अपने अपने ढग से प्रयत्न कर रहे हैं। भारत- वर्ष में इस विरोध का प्रारभ-मात्र हुआ है। 'रगभूमि' में जान सेवक और सूरदास-द्वारा इस विरोध की व्याख्या की गई है। प्रचलित व्यवसायप्रणाली का यह उद्देश कदापि नहीं है कि सर्वसाधारण को कष्ट हो अथवा उसके द्वारा धर्म तथा ज्ञान का विनाश हो। जान सेवक और उनके व्यवसायी भाई यही आशा करते हैं कि देश में कल कारखानों का प्रचार कर वे उसे समृद्धिशाली और सुखी बना सकेंगे। टेनिसन ने अपने लॉक्सले हॉल (Locksky Hall)* में एक ऐसे व्यावसायिक सगठन का सुस-स्वप्न देखा है जो धर्म और अर्थ दोनों के * There the common sense of most shall Hold 1 fretful realm in uno, And the hindls earth sliall slumber, lapt In uns ersal luts
११२
साहित्य-समीक्षा
अनुकूल है। परतु ऐसा सगठन कवि के स्वप्न-ससार में ही
है। उसके इस मृत्युलोकामे कही दर्शन नहीं हुए हैं।
यह समस्या क्योकर हल हो ? उपन्यास-लेखक का यह
काम नहीं है। उसने इस पर प्रकाश डाल दिया, यही बहुत
है। हॉ, समाजसुधारको तथा सपत्तिशास्रवेत्ताओं का यह
अवश्य काम है। 'प्रेमाश्रम' में जिस आदर्श ग्राम की प्रेमचदजी
ने झलक दिखाई है वह यथेष्ट नहीं है। शिल्प, वाणिज्य और
व्यवसाय की उन्नति करना देश की समृद्धि के लिए आवश्यक
है। जिस पुतलीघर-प्रथा का पश्चिम में चलन है उससे देश
समृद्धिशाली अवश्य होते है, परतु वास्तविक सुस का हास
होता ह । जापान में इस पाशविक प्रथा का ज्वलत परिणाम
लोग भुगत रहे हैं । वहाँ का सामाजिक संगठन प्राय ऐसा
ही था जैसा यहाँ है । इस प्रथा ने सामाजिक वधनो को तोड
डाला है, जिसके कारण वहाँ सर्वत्र अशाति का साम्राज्य है ।
क्या धर्म और अर्थ, ईश्वर और माया के बीच समझौते की
सभावना नहीं है ?
जिस चरखा-प्रणाली का महात्मा गाधी प्रचार कर रहे हैं
उसके हृदय मे इस अशाति की ओपधि है। यदि इस प्रचार के
साथ राजनैतिक विप्लव का सामजस्य न होता तो शायद गाधीजी
की चरखाविषयक प्रस्तावना पर सपत्तिशाववेत्ताओ का ध्यान
आकृष्ट होता और जनता इस प्रस्ताव के वास्तविक प्राशय
को समझ कर दिहात में करघे और चरखे चला कर
रगभूमि ११३ दिहातियों को कल-कारखानों की हवा से दूर रखती। यदि सरकार और समाज दोनो चाहें तो इस समस्या को हल करने का यो प्रयल कर सकते हैं --कारखानो के बनाने की तब तक आज्ञा न दी जाय जब तक मजदूरों को सपरिवार बसाने का कारसानेवाले प्रबध न कर सकें। बाहर से आये हुए माल पर इतना कर लगाया जाय और दिहातियो के अपने घर के बने हुए कपडो को इतनी सहायता दी जाय कि यह कपडे कारखाने के कपड़ो से सस्ते पडें । दूसरी समस्या जिसका सबध मनोविज्ञान से है, हमे विनय और सोफी के चरित्र-चित्रण से मिलती है। मनुष्य और स्त्री की प्रेमभावना में क्या अंतर है ? क्या यह सत्य है कि मनुष्य का प्रेमोपासना-मार्ग आदर्श प्रेम के आकाश से लालसा के पाताल तक है, और स्त्री का उससे उलटा, लालसा के पाताल से आदर्श प्रेम के आकाश तक । यदि ऐसा है तो चरित्र-चित्रण मे स्वाभाविकता का प्रश अवश्य है । विनय मे जो कुछ देश- सेवा का अकुर है वह उसकी माता जाह्नवी की कृपा से सोफी के प्रेमपाश में फंस कर उसमें अधर्मता आ जाती है। विनय आदर्श प्रेम से गिर कर इद्रिय-भोग की लालसा में अपनी आत्मा को हानि पहुँचाता है। सोफी का दूसरा हाल है। वह आदर्शवादिनी है। यों तो वह अवला है। परतु विनय के प्रति अकुरित प्रेम उसे कर्मवीरांगना बना देता है। उपन्यास के दूसरे भाग में उसी का राज्य है। F8
साहित्य-समीक्षा
'प्रेमाश्रम' और 'सेवासदन' में गायत्री और सुमन के चरित्र
में भेद यही है कि गायत्री आदर्श भक्ति के श्राफाश से गिरें
कर लालसा की कदरा में गिरती है। पर सुमन इसे पार कर
सेवा-मार्ग के आदर्श तक पहुंच जाती है । परिस्थितियों के
भेद चरित्रों को रंग-बिरंगे भावों में प्रदर्शित करते हैं। परतु
इतना अनुमान किया जा सकता है कि प्रेमचदजी ने भारतीय
स्त्रीत्व तथा मनुष्यत्व का वास्तविक चित्र खींचा है। मनुष्य
लालसा और लोभ के वश तो कर्मण्य रहते हैं, पर आदर्श उन्हें
अकर्मण्य और आलसी ही कर देता है। स्त्रियाँ भी लालसा
और लोभ के पाश में फंस जाती हैं, पर अपना धर्म नहीं खाती
और मनुष्य की भाँति कठिन समस्या आ पड़ने पर अकर्मण्य
नहीं हो जाती।
हम पहले कहीं कह चुके हैं कि प्रेमचदजी दिहाती जीवन
का करुणामय चित्र खींचने में दन हैं। यदि उनके तीनों
उपन्यास-सेवासदन, प्रेमाश्रम और रंगभूमि-पर दृष्टि डाली
नाय तो हम यह देख सकते हैं कि प्रेमचंदजी का प्रेम शहर
से दिहात की ओर झुकता जा रहा है। 'सेवासदन' काशी की
गदी गलियो और दालमडी की दूपित वायु से घिरा हुआ है।
कहीं अव में गगा पार कर हमें सेवासदन के नैसर्गिक ग्रामीण
जीवन की झलक मिलती है।
'प्रेमाश्रम में प्रेमचदजी ने 'सेवासदन' की भांति एक
आदर्श ग्राम की सृष्टि की है। पर साथ ही वास्तविक लखनपुर
रंगभूमि
११५
की भी पूरी व्याख्या की है। 'रंगभूमि' का पौडेपुर 'प्रेमाश्रम
का लपनपुर है । वही साधारणत लोभ और पारस्परिक कलह,
पर कष्ट के समय नि स्वार्थ सेवा और पारस्परिक सहानुभूति ।
'प्रेमाश्रम' में यह दिसाने का प्रयत्न किया है कि इस भारतीय
ग्राम को हम क्योंकर जिगीदार-द्वारा आदर्शमय बना सकते हैं,
और 'रंगभूमि' मे वह हृदयविदारक दृश्य है जिसका अभिनय
समस्त ससार में हो रहा है। फल और कारग्वाने क्यों कर
इस ग्राम का विनाश करते हैं और उसके साथ ही अधर्म का
प्रचार बढाते हैं, इसकी सूरदास ने कारखाने बनने की प्रस्तावना
पर पहले से ही सूचना दे दी थी। "सरकार बहुत ठीक कहते
है, मुहल्ले की रौनक जरूर बढ जायगी, रोजगारी लोगों की
फायदा भी खूब होगा। लेकिन जहाँ यह रौनक बढेगी,
चही
ताडी-शराब का भी तो प्रचार वढ जायगा, कसबियाँ भी पा
आकर बस जायँगी, परदेशी आदमी हमारी बह-बेटियों को
घरेंगे, कितना अमर्म होगा । दिहात के किसान अपना फाग
छोड कर मजूरी के लालच से दौडेंगे, यहाँ बुग युग पाग
सीखेंगे और अपने दुरे आचरण अपने गाँवों में फैलायग, feari
की लडकियां-बहु मजूरी करने पायेंगी, और यहाँ
लोभ में अपना धरम विगाडेंगी। यही रौनक शुदगी
वही रौनक यहाँ हो जायगी ।" बजरगी और जगक कान
मिट गये, सूरदास को झोपडी के लिए सत्याप्रद करना पड़ा।
परतु यह दृश्य उतने कष्टमय नहीं हैं जितना मिश्रा जिममें
-
N
११६ साहित्य-समीक्षा दिहात के नवयुवक घीसू और विद्याधर का नैतिक पवन होता है। ठीक ही है "धन का देवता बिना आत्मा का बलिदान पाये प्रसन्न नहीं होता। 'प्रेमाश्रम' में वास्तविक ग्राम और आदर्श ग्राम की तुलना की गई है। इस उपन्यास पर दिहात के जीवन का ही साम्राज्य है। नायक और नायिकायें शहर के हैं, पर वे दिहात ही पर अपनी जीविका के लिए निर्भर हैं। 'रंग- भूमि' में दिहाती जीवन के विनाश का रुणामय दृश्य है। विस्तार के कारण इसका क्षेत्र काशी से उदयपुर तक है। बहुत से पात्र हैं, देशी और विदेशी, दिहाती और शहरुए, पर नायक सूरदास है और उसके ही चरित्र में दिहात के जीवन का चित्र है। दिहातियो की सरलता, उनकी धर्मभीरुता, उनका साहस, उनकी सहनशक्ति, उनकी अपरिवर्तनमय प्रकृति, उनके घरेलू झगडे, उनकी सगठन और नेतृत्व-शक्ति-इन सब गो का सूरदास के चित्र में कौशलपूर्ण समिश्रण है। 'सेवासदन' में दिहात के उदय, 'प्रेमाश्रम' में उसके मध्याद और 'रंगभूमि' में उसके अस्त होने का दृश्य है। प्रथम उपन्यास में आशा, दूसरे में आशा और निराशा दोनों का मेल, और तीसरे में अधकार और निराशा । हमारे जीवन-स्रोत में-पोर उपन्यास-लेसक के जीवन-स्रोत में भी यों ही भावों का परिवर्तन होता रहता है। यदि यह सच है तो इन उपन्यासो को देखकर ही हम बता सकते हैं कि कौन किसके पश्चात् लिखे गये हैं। 'रंगभूमि' में करुण को पराकाष्ठा है।
रंगभूमि ११७ जहाँ कहीं हास्य है वह भी करुण-रस की शोभा बढाने के लिए। उदाहरणार्थ विनय को माता का पत्र मिला | प्राशय यह था कि तुम कर्तव्यविमुस होगये हो, मैं तुम्हारा रुख नहीं देखना चाहती । विनय को अपनी माता की आदर्शवादिवा पर गर्व हुआ, मन में कहने लगा, देवी, मैं स्वय अपने को तुम्हारा पुत्र करते हुए लज्जित हूँ। सभव है अतिम समय तुम्हारा पवित्र आशीर्वाद पा जाऊँ। विनय ने बाहर की तरफ देखा। सूर्यदेव किसी लज्जिव प्राणी की भाँति अपना कांतिहीन मुख पर्वते की आड में छिपा चुके थे। नायकराम पल्धी मारे भाँग घोट रहे थे। यह काम वह सेवको से नहीं लेते थे। कहते कि यह भी एक विद्या है, कोई हत्दी-मसाला तो है नहीं कि जो चाहे, पीस दे । इसमें बुद्धि सर्च करनी पडती है, तब जाकर बूटी बनती है। प्रेमचदजी के चरित्र चित्रण में एक दोष है, जिसका उल्लेस करना आवश्यक है। आपको जब पात्रों की आवश्यकता नहीं रहती, जब उनमें रग भरते-भरते आप थक जाते हैं तब झट उनका गला घोट डालते हैं। 'सेवासदन' में कृष्णचद्र नदी में डूब कर आत्म-हत्या करता है, 'प्रेमाश्रम' में गायत्री पहाड़े से गिर कर जान देती है और 'रंगभूमि' में विनय पिस्ताल-द्वारा अपनी हत्या करता है। हमें यह ढग दोषपूर्ण मालूम होता है। कुछ दार्शनिकों ने आत्महत्या की सिफारिश की है । कवि भी कभी कभी दुस साहित्य-समीक्षा से छुटकारा पाने के लिए अपने पात्रों को आत्महत्या की शरण देते हैं। पर आत्महत्या का नीति तथा धर्मशास्त्र दोनों में निषेध है । और धर्म और नीति दोनो की अवहेलना करना न कवि के लिए योग्य है, न उपन्यास-लेखक के लिए । उपन्यास- लेसक को भी कवि की भाँति अपनी कला में निरकुशता का अधिकार प्राप्त है। पर इतना नहीं कि जिस कर्म का शास्त्र तथा नीति में निषेध हो उसका लेखक-द्वारा सम्मान किया जाय। जहाँ तक हमारा अनुमान है, प्राचीन प्रधकारों ने इस प्रकार शास्त्रीय आज्ञाओं की अवहेलना नहीं की है। परतु इतना होते हुए भी प्रेमचंदजी के उपन्यासो का महत्व कम नहीं होता । हम हेमचद्रजी जोशी की प्रेमचद-प्रति आलोचनाओं से सहमत नहीं है । यह उपन्यास क्षणभगुर नहीं हैं। हिंदी के दुर्भाग्य से इनका अनुवाद अभी तक किसी पश्चिमी भाषा में नहीं हुआ है। यदि कभी हो, और योरप के पश्चिमीय विद्वान् प्रेमचद की खौद्रनाथ ठाकुर और टाल्टाय से तुलना करें तब हम भी समझने लग गे कि यह उपन्यास भी कुछ महत्व रखते हैं। प्रेमचद का यथासमय भारतीय साहित्य में वही सम्मान होगा जो डिफेंस और दाल्स्टाय को योरपीय साहित्य मे प्राप्त है । भारत का हृदय कलकत्ते की गलियों में नहीं है, न वह शिक्षित वगालियों की अट्टालिकाओं में है। उसका हृदय दिहात में है, किसानों के दृढ़े-फूटे झोपड़ी में है। हरे-भरे खेत को देसफर उसे शांति र गभूमि ११६ पहुँचती है। अनावृष्टि से वह सूख जाता है। उस हृदय का मार्मिक चित्र जिसने मींचा है वह देश भर का धन्यवादपात्र है। अभी भारतीय किसानों में शिक्षा का अभाव है । अभी उन्हें नहीं मालूम है कि किस उन्हीं के से सरल- प्रकृति अस्वस्थ व्यक्ति ने शारीरिक और मानसिक वेदनाएँ झेलते हुए उनके दुखो और आशाओ की कथा कही है। जब वे शिक्षित हो जायेंगे, जब उनकी आँखें खुलेंगी, और अपने पूर्वजो का चित्र जब वे इन उपन्यासों में देखेंगे, तब इनके विधाता की पूजा होगी। हाँ, अभी कुछ समय तक नहीं।
। ११-छड़ी* रोगियों को वान जाने दीजिए। रसिक लोग जब पहाडी की सैर करने जाते हैं तो तरह तरह के तोहफे मित्रों के लिए लाते हैं । मेरे भी एक मित्र मसूरी सैर करने गये । आपको वहाँ छडियाँ ही पसंद आई । फिर क्या था, दो दर्जन बाँध लाये । घर पहुँचे, मित्रो ने घेरा, बात ही बात में सब छड़ियाँ बँट गई। एक छडी मेरे भी हिस्से में आई । मैं पहले ही पहुँच गया था। बाँट कर एक बढिया मूठ की ऐसी स्टिक निकाली जो यहाँ किसी दुकान पर डेढ दो रुपये से कम में न मिलती, परतु ढेर का ढेरे आगे लगा देखकर मुझको एक हँसी सूझी। क्या ये छड़ियाँ भसूरी जानेवालों को मुफ्त बँटती हैं " मित्रवर बडे हाजिरजवाब थे बोले “जी नहीं । जानेवालो को तो नहीं,लेकिन उनके दोस्तों को जरूर याही बॅटती हैं।" मैंने जवाब दे और छडी लेकर हँसते हुए घर की राह ली। अभी तक इनका नाम नहीं बताया है न बताऊँगा। क्या करूँ, छडी की कहानी लिखने की अनुमति उन्होने इसी शर्त पर दी कि न मैं उनका नाम लिखू, न उनके उस मुँह-लगे मित्र का जिसके कारण छड़ी का एक छोटा-सा गरप बन गया है। अत इस कहानी मे जोज के ऐडिसन की शैती के अनुकरण करने की चेष्टा की गई | Adventures of a shulling म तुलना कीजिए।
,
छड़ी
१२१
पाठक कल्पित नाम से सतुष्ट रहें। मसूरीवाले महाशय का
नाम 'राजा' है और उनके मुंहलगे दोस्त हैं " मुन्नू"।
राजा ने और सब बडियाँ तो बाँट दी, पर एक छडी किसी
को न दी। इसको उन्होने मसूरो पहुँचते ही खरोदा था । आप
इस पर कुछ ऐसे प्रसन्न हुए कि जब से यह उनके हाथ लगी,
तब से हमेशा उनके साथ रहने लगी। इसने मसूरी की सैर की
और केंपटी फाल्स के पास उनकी हड्डियों को चूर चूर होने
से बचाया । इसलिए उनका प्रेम इस पर कुछ और बढ गया
था । घर पहुँचने पर यह छड़ी अलग रस ली गई । मुन्नू महाशय
के सामने बॅटनेवाली छड़ियों का ढेर लगा था, पर वह उसी
अलग रक्खी हुई छडी पर रीझे । आपने कहा कि मैं तो यही
लॅगा। राजा ने एक छडी की जगह दो, तीन, तक दी। परतु मुन्नू
जन मचलते हैं, तब किसी की नहीं सुनते। राना भी अड गये
"न लो, मै यह बडी नहीं देने का।" मुन्नू ने व्यग्यमय "बहुत
अच्छा" कहकर झगडा सतम किया, फिर छडी न मांगी।
इस घटना को हुए कोई दो वर्ष होगये । छडो हमेशा राजा
के साथ रही। आपके घर में काफी रुपया है, जमींदारी है।
पढ़े-लिखे भी हैं। नई जगानी में आपने कविताएँ भी की। अब
कुछ समय से आपको देश-सेवा और भ्रमण का शौक है । जहाँ
कोई बडी सार्वजनिक सभा होती है, आप जरूर पहुँचते हैं।
छडी को आप कभी छोडते न थे। यदि छडी के दिमाग होता
तो वह विटुपी होगई होती। उसने रोलटबिल पर शास्त्रीजी को
प
-
। १२२ साहित्य-समीक्षा बहस सुनी । दिल्ली-स्टेशन के सामने जनता-सागर के किनारे वह भी अपने प्रियतम के साथ खडी थी। हटरकमेटी के सदस्यों को भी उसके दर्शन हुए। आप बड़े गौरव के साथ कहते थे कि प्रश्न तो वे मुझसे करते थे, परतु उनकी नजर मनोमोहनी छडी ही पर थी। अमृतसर-कांग्रेस की कीचड में उसकी हालत खराब होगई थी। पर दूसरी बार जब मैंने राजा को बबई में देखा तब उसकी आभा पहले से भी अधिक होगई थी । उस पर बहुत उम्दा वार्निश चढ गया था, और चॉदी की फैंसी मूठ भी लग गई थी। नागपुर-काग्रेस ऐसे असहयोगी समाज मे भी इसकी इज्जत बनी रही। कलकत्ते वफ मे मलाकाबडियो के मुकाबले वह उनके साथ रही। परतु इधर करीब एक महीने से मैंने उनके हाथ मे छडी नहीं देखी। बिना छडी के उनकी चाल कुछ अडवगी-सी मालूम होती थी । एक दिन रास्ते में मिले, वहीं कुछ व्यग्य सूझा, मृछा, "आपकी विलायती अर्धा गिनी आज-कल कहाँ हैं ?" कुछ फिक्र और जल्दी मे थे । सिर्फ इतना कहकर चलते हुए कि बडी को पृछते हो, वह तो पटने में सो गई। एक रोज बेवक्त में राजा के घर पहुंचा, सीधा कमरे में घुस गया। आप बैठे एक पत्र हँसते हुए पढ़ रहे थे। मैंने कहा-"मैं भी शामिल हो सकता हूँ ?" राजा ने पत्र मेरे हाथ में देकर कहा-"यह न समझना कि मेरी किसी बोलती- चालती प्रणयिनी का पन है।" पाठकों के मनोरजनार्थ पत्र ज्यों ,
छड़ी
१२३
का त्यों उद्धृत करता हूँ। सिर्फ जाह और नाम बदल दिये
गये हैं।
-
कानपुर,
ता० १ अप्रेल, १६२१
प्रियतम,
एक महीने से अधिक तुमसे वियोग हुए हो गया। तुमने
मेरी सुधि तक न ली । और लेते ही क्यों । तुम जिवना मुझ
पर प्रेम प्रकट करते थे वह मित्रों को दिसाने ही के लिये था
जिससे मैं तुम्हारे साथ से अलग न होऊँ। परतु यह मै क्यों
कर मानें। यदि किसी से मुझको डाह हो सकती थी तो
श्रीमतीजी से, क्योकि मसूरी से आई हुई मेरो तमाम सगनियों
को तुम अपने मित्रों को बाँट चुके थे । मैं अकेली रह गई थी। मैं
जड हूँ और श्रीमतीजी चैतन्य हैं। परतु मुझ पर तुम्हारा
अनुराग देसकर वह मुझसे कुढा करती थीं। क्या आपने
कभी श्रीमतीजी को भी घर से बाहर जाने की आज्ञा दी?
सोचती हूँ और प्रत में यही समझ में आता है कि तुम
बडे बुद्धिमान हो । यदि यह भेद न रपते, तो शायद श्रीमतीजी
भी किसी ट्रिप में खो जाती। मेरे लिए क्या, यदि आज मैं
खो गई तो कल तुमको मेरी ऐसी मैकडों मिल जायेंगी। जेब
में सिर्फ दाम होना चाहिए।
परतु दुस यह है कि तुमने मेरे लिए कुछ भी प्रयत्न
न किया। त्रेतायुग में जब सीताजी को रावण हर ले गया
१२४
साहित्य-समीक्षा
था, उस समय न रेल थी न तारघर था, परतु राम
ने उनके लिए आकाश-पाताल लान डाले और अत में रावण
को मार कर ही उन्हें सतोष हुआ । मेरी और सीता
की कौन समता १ परंतु क्या तुम एक तार तक न दे
सकते थे? क्या पुलिस को इत्तिला भी न कर सकते थे ?
नहीं तो दुष्ट मुन्नू-उसकी नजर मुझ पर जब से मैं तुम्हारे
यहाँ आई, तभी से थी--के पाले में क्यों पडती । मेरा हृदय
तो तत्र ठडा होता जब वह पडा पडा जेलखाने में सडता,
और मैं
फिर तुम्हारे साथ पहाड, नदी और समुद्र की सैर करती, और
सभाओं में उच्च आसनो पर तुम्हारी बगल में बैठकर महात्मा
गांधी और महर्पि मालवीय की वक्तृताएँ सुनती ।
जब से इस निर्दयी के पाले पडी हूँ, मुझे बडा कष्ट है ।
मेरी बडी दुर्गति होगई है। हाय, वह दु स मैं कैसे प्रकट
करूँ-गिरा अनयन नयन विनु बानी । तुम एक तो हलके
शरीर के हो, और फिर तुम्हे मेरी कमर का हमेशा खयाल
रहता था कि कहीं वह टेढी न हो जाय, और जो कभी मेरा
सहारा लेकर खडे भी होते थे तो थोडा सा लचने में मुझे
विशेप आनद ही मिलता था । परतु यह पेटू ब्राह्मण तीन मन
से कम न होगा। एक तो रास्ते में मुझे ठुकरावा हुआ चलता
था, जिसके कारण मेरा तमाम शरीर बहुत शीघ्र छिल गया।
दूसरे, जब कभी मेरे कधे पर सहारा देकर खड़ा होकर मित्रों
से बात करने लगता था तब मेरो कमर तो टूटने-सी लगती थी।
-
छडी
१२५
मित्रों को तरस आ जाता था कहते थे कि क्या कुछ दाम नहीं
सर्च हैं जो इसकी ऐसी सरागी कर दी है। दुष्ट हँसता था
"समय सब नाहि बरावर जात-किसी समय इसकी अच्छी
हालत थी, अब पुरानी हो गई है । कुछ दिन मे जब बिलकुल
बेकार हो जायगो तम इसके मालिक को लौटा दूंगा।"
यों ही दिन भर तो कानपुर की गदी सडको पर मुझे
रगड़ता था। शाम को उसके घर पहुँच कर आशा करती थी
कि अन चैन की नींद सोऊँगी परतु मुझे तब भी शांति नहीं
मिलती थी। सीधा रसोईघर पहुँच कर मुझे एक कोने में
डाल देता था और स्वय भोजन करने बैठ जाता था। उसकी
स्त्री की कभी कभी मुझ पर नजर पड जाती थी तो वह तुम्हारी
क्षेमकुशल का हाल पूछने लगती थी। यह क्या कम उसका
मुझ पर एहसान है कि यो तुम्हारा शुभ नाम सुन लेती थी।
परतु मुन्न जिक्र आने पर बुराई ही करता था, कहता था--तुम
कहती हो कि बडा समझदार है, होगा, परतु है मतलवो । यदि
मेरी इसकी ऐसी-मेरी तरफ इशारा करके--कोई चीज खो
जाती तो मैं आकाश-पाताल एक कर देता, तुम्हें तक निछावर
कर देवा, परतु उसे हाथ से न जाने देता । ऐसी ऐसी बातें
सुनकर मेरा हृदय और भी जला करता था ।
अब मैं अपनी अतिम दशा का हाल क्या कहूँ। दिन भर
ठोकरें साते साते और रात भर उसके कमरे में पडे पडे बहुत
कमजोर होगई थी। एक दिन एक इक्केवाले से तकरार हुई,
.
१२६
साहित्य-समीक्षा
यदि क्रोध आया था तो अपना हाथ ही दे मारता । परतु
उसको अपने हाथ का मेरी कमर से ज्यादा खयाल था । बस
भरपूर ताकत से उसने मुझको उठाकर इक्केवाले की पीठ
पर पटक दिया । फिर क्या हुआ, इसका मुझे होश नहीं । जब
होश माया तब देखा कि उसी कमरे में पड़ी हूँ, मेरी कमर टूट
गई है, किसी ने उसको यल से बाँध दिया है, जिससे मेरा
कष्ट कम होगया है, परतु अब मैं किसी काम की नहीं रह
गई हूँ। अब मेरी अतिम इच्छा यही है कि तुम आकर मुझे
ले जाओ । मैं यही चाहती हूँ कि मेरी अंतिम क्रिया तुम्हारे ही
हाथ से हो।
तुम्हारी-
छडी
मैंने आद्योपात पत्र पढा और फिर पढा । पत्र क्या था,
गद्य में लवी-सी एक कविता थी। मैंने आप ही आप कहा-
वाह मुन्नू । तुम कवि कब से हुए ? तुम्हारी प्रतिभा अव चमकी।
अब तक तुम्हें कोई टके को भी नहीं पूछता था । परतु अब
गरप लिखकर अपना पेट खूब भर सकोगे। राजा को उत्तर ही
की धुन थी। बोले "भाई कोई समय था जब मैं कविता कर
सकता था, गल्प भी लिस सकता था, पर तु अब वो दिमाग
मे राजनीति, असहयोग, इतिहास इत्यादि नीरस विषय भरे
हुए हैं। कुछ तुम्ही सहायता करो । इस नवीन कवि
.
छड़ी १२७ को तो मुंह-तोड उत्तर भेजना है। मैंने सोचा कि अपनी भी वही हालत है । दिमाग में अकबर-जहाँगीर से लेकर मांटेग्यू-चैम्सफोर्ड तक मुर्दे या जिदा नौरस फूटनीतिज्ञ ही भरे पडे हैं, या लडकों के परीक्षा-पत्र । यहाँ भी सरसता से कोई सबध नहीं। उत्तर दिया “दो एक दिन ठहर जाओ, कुछ तैयारी में भी कर लूँ ।" घर पाया । गर्द विभूपिर्व उपन्यासों और काव्यों की ओर फिर दृष्टि दौडाई। दो एक को उलट पुलट कर पढा । कुछ समझ में आया, कुछ नहीं । सोचा इस नये कवि के लिए इतना ही यथेष्ट है। अवकाश मिलने पर राजा के घर पहुँचा । कवियों और उनकी कविताओं, गरपलेसकों और उनकी कल्पनाओं पर बहस होती रही। अत में मैंने कालिदास के मेघदूत का जिन किया । वस राजा की कल्पना-शक्ति जाग उठी । बोले, "अब तुम्हारी सहायता की कोई आवश्यकता नहीं है। मजमून बंध गया। फल सवेरे आकर देस जाना, तव पत्र भेजूंगा।" पत्र लिस गया। राजा ने उसको होशियारी के साथ बकस में बद कर कुजी अपनी टेंट में की, इसलिए कि कहीं ऐसा न हो कि उस पर श्रीमतीजी की नजर पड जाय और वह कुछ और का और समझ । प्रात काल पर मुझे मिला । उसको भी अक्षरश लीजिए-
१२८
साहित्य-समीक्षा
लखनऊ,
८ अप्रेल, १८२
प्रिये,
-
,
तुम्हारे वियोग की अग्नि यहाँ भी मुझे जला रही थी
एक महीने के भीवर तुम्हारे विरह के शोक में घुलते घुलते आध
रह गया हूँ । रास्ता चलते लोग मुझको टोकते हैं। मेरी क्षम
कुशल पूछते हैं और तुम्हारी याद दिलाते हैं । मैं उन्हें क्य
उत्तर दें ? मुझे क्या मालूम था कि तुम छलिया मुन्नू के पास
हो । नहीं तो जो दुर्गति तुम्हारी हुई है, वही हम उसकी करते ।
तुम्हारे आँसुओं से लिखे हुए पत्र को पढकर मेरी अश्रु-
धारा भी बह चली, वियोगाग्नि धधक उठी। प्रिये,
मैं अपना
प्रेम तुम पर कैसे प्रकट करूँ। तुमने मुझ पर भी व्यग्य कसा है,
परतु मैं शपथ साकर कहता हूँ कि जब से तुम मुझसे अलग
हुई , तब से, लोग कहते हैं, बाजार मे तुम्हारी ऐसी बहुत हैं,
परतु मैंने किसी की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखा। चाहे
दिन हो या राव, आकाश स्वच्छ हो या पानी बरस रहा हो,
मैं अकेला ही जाता हूँ। तुम्हारी उस सहायवा को कभी न
भूलूंगा, जो तुमने मुझे केंपटी फाल्स के पास दी थी । यदि
मै दशरथ होता तो आवश्यकता के समय माँगने के लिए कोई
वचन दे देवा । परतु यह मैं भी कर सकता हूँ कि तुम्हारे
ही हाथ से मुन्नू को दुरुस्त कराऊँ । बस तुम्हारी आज्ञा भर
की देर है।
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छडी १२६ तुम्हारा पत्र मुझे भीगा हुआ मिला । तुम्हारे आँसू तो पत्र लिखते ही लिखते सूख गये होंगे, सिर्फ उनकी महक बाकी थी । उसकी तरावट उस कुसमय मेघ की ही होगी जो तुम्हारे पत्र को प्रेरित करके मेरी टेबिल पटल पर छोड गया है । विरही यन ने मेघ ही द्वारा अपनी प्रणयिनी को सदेशा भेजा था । सो मौका तुम्ही को मिला । अब आकाश स्वच्छ है । कोई मेघ नहीं दिखाई देवा । वसत को सुगधि से लदी हुई वायु मेरे झरोखे से होती हुई दक्षिण की ओर जा रही है। लो यह पत्र मैं वसत ही के हाथ भेजता हूँ। वसत | जाओ, यहाँ से कानपुर तक निष्कटक मार्ग है। तुम्हें कालिदास के मेघ की भौति मार्ग में न कोई पहाड मिलेगा, न नद, न कोई नगर । खेत ही खेत मिलेगे । कोई समाधि लगाये हुए शकर भी नहीं मिलेगे। यों ही सब तुम्हारे मोह में फंसे लखनऊ की हद तक और सास कर छावनी में तुमको, कलियुगी देवी और देवता मिलेंगे। पर उनके बाद गगा के किनारे तक तुम्हें मृत्युलोक के जर्जर नर-नारी ही दिखाई देंगे। गगापार करने में तुम्हें कोई कठिनाई न होगी। अब उनकी वह महिमा नहीं रही है जो उनके पुराने उपासकों ने गाई है। अव तो यह डर है कि तुम कहाँ उस बालुकामय मैदान में मुलस न जाओ। कानपुर में प्रणयिनी के घर तक पहुँचने में भी तुम्हें बहुत कठिनाइयाँ झेलनी पडेंगी। फलियुगी फारसानों के धुओं से बच फर नाना । सडक से न जाना । वहाँ मोटरों की दुर्गधि से तुम कदापि न . 19
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साहित्य-समीक्षा
बच सकोगे । गलियाँ फिर गनीमत । एक ऐसी ही गली
पहुँचने पर एक अँधेरे कमरे के कोने में पड़ी हुई मेरी प्रणयिन
रो रही होगी, अपने ठडे वायु से उसके हृदय को शीतल
करना । यह पत्र देना और सदेशा कहना कि बहुत शीघ्र ।
तुम्हें आकर ले जाऊँगा, या मुन्नू को ही यह सजा दूंगा कि वा
तुम्हें रक्षा-पूर्वक मेरे पास तक पहुँचा दे।
तुम्हारा-
ল
पत्र पढकर मैंने कहा कि वाह राजा । तुम तो द्वितीर
कालिदास होगये । मैं कुछ अपनी तारीफ भी चाहता था
राजा खुश हुए “यह उपाधि तुम्हारे ही योग्य है । तुम्हें ते
कुछ और नहीं लिखना है; फिर मैं लिफाफा वद करूँ ?"
मुन्नू को एक छोटा-सा नोट लिख दिया-कहो कुछ
बढक
जवाब रहा न ? छड़ी लेकर आओ, तुम्हारे पेट की दावा
रही। लिफाफे पर लिखा गया-
श्रीमती छडी देवी
c/o मुन्नू मिश्र
अमुक मोहाल,
कानपुर
चार दिन बाद मुन्न महाशय का पत्र आया। "तुम्हारे पत्र
ने वो घर को कोप-भवन बना दिया। कहा उसका कुछ अश
तुम्हारी मामी महाशया को मालूम होगया। तब से मुझ पर
छडी
ब रूठी हैं । आजकल उनका सुदर मुसडा देखते ही बनता
। पेट भर भोजन भी नहीं मिलता । सचमुच दावत की
श्यकता थी । छडी लेकर आता हूँ "
राजा के घर आज छोटा-सा उत्सव है। श्रीमतीजी दौड
कर सामान जुटा रही हैं। भोजन तीन ही मित्रों के लिए
परतु मुन्नू कहता है कि एक दर्जन के लिए प्रवध करो
कि एक मैं दस राजाओं के बराबर हैं। भोजन परोसा
। छडी सामने रवी गई । मैंने कहा, "छडी देवी के
पण उतार लो, और चूल्हे में इनकी अतिम क्रिया कर दो।
, भाभीजी कितनी खुश हैं । अाज राजा की ओर से उन्हें
न हुआ है।" भोजन करते करते मैंने मुन्न से कहा
छडी ने वो एक गल्प बना दिया। बोले-"तो प्रकाशित
दो । नाम हमारा, और काम तुम्हारा ।" मैंने राजा की
देखा । पहले तो वह राजी न हुए। परतु मुन्द्र को अपनी
के प्रकाशित कराने की बडो इच्छा थी । इसलिए मेरे
अनुरोध करने पर उन्होंने स्वीकृति दे दी । यह कहानी
स्वीकृति का परिणाम है।
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