Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Meri Priya Vayangaya Rachnayan
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• मेरी प्रिय व्यंग्य रचनाएं
-यालेन्दु शेखर तिवारी
एम.ए. पी-एच०डी०डी०लिट
रीडर हिन्दी विभाग
रांची विश्वविद्यालय,
रांची-834008
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© लेखकाधीन
मेरी प्रिय व्यंग्य रचनाएं / व्यंग्यकार : बालेन्दु शेखर तिवारी/प्रकाशक :
राज पब्लिशिंग हाऊम, 9/5123, पुराना सीलमपुर पूर्व, दिल्ली-
110031/प्रथम संस्करण : 1988 / मुद्रक : मनोज प्रिंटर्स, 9/2757,
कैलाश नगर, दिल्ली-110031
मूल्य पच्चीस रुपये मात्र
MERI PRIYA VAYANGAYA RACHNAYAN :
A Collection of Satires
By
Shri Balendu Shekhar Tiwari
Price Rs. 25/-
• यह भी कहना जरूरी है कि..... हास्य और व्यंग्य जीवन के सहज पक्ष हैं । साहित्य के अंतर्गत दोनों का समावेश उतना ही स्वाभाविक है जितना कि जीवन की अन्य अनु- भूतियों का। किन्तु हास्य और व्यंग्य का एक प्रमुख कार्य जीवन की विद्रूपता और विकृति को प्रकट करना है। विद्वानों ने हास्य और व्यंग्य की कई थेणियां निश्चित की है । व्यंग्य हास्य के बिल्कुल विपरीत होता है । हास्य में सहानुभूति प्रेम आदि का प्राबल्य होता है जबकि व्यंग्य में नैतिकता, दया एवं उदारता का अभाव होता है और वह मानव की शारीरिक मानसिक और सामाजिक असंग- तियों पर निर्दय आघात करता है । व्यंग्य वस्तुतः सामयिक सामाजिक यथार्थ के उद्घाटन का एक सशक्त शस्त्र है । व्यंग्य समाज के जीवन की गलित वासनाओं की कुप्रवृतियों का आपरेशन करता है जिसमें सामाजिक अग की यह विकृति कही समस्त जीवन को ही विकलांग और गलित न बना दें। सक्षेप में कहा जाये तो हास्य और व्यंग्य में उतना ही अन्तर है जितना चौराहे पर खड़े सिपाही और अस्पताल के डाक्टर में होता है । दोनों की दृष्टि में समाज हित है । लक्ष्य एक है किन्तु दृष्टिकोण भिन्न है। हास्य और व्यंग्य की जोड़ी को 'और' के माध्यम से दूर-दूर नहीं किया जा सकता है। उपरोक्त विवेचन के आधार पर श्री तिवारी की हास्य-व्यग्य की पुस्तक में संग्रहित हास्य-व्यंग्य के लेखो के सम्बन्ध में कहा जा सकता है कि जहां उनके लेख एक ओर मन को बरबस हंसने को बाध्य कर देते हैं वही यथार्थ में विद्यमान अनेक कुरीतियों पर अपनी चुटीली तीखी .
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लिखना और नहीं लिखना वे सारे प्राणी लोकल भाषा में लटक कहे जाते हैं जिन्हें हिन्दी विभाग में घटने वाली समस्त अघट घटनाओं के सूत्रधार डॉ० पतित पावन के आसपास लटकता हुआ पाया जाता है । लटकों का अपना कोई चेहरा और वजूद इम अमार संसार मे नहीं है। उनका उद्भव और विकास इस धराधाम पर लटकने मात्र के लिए हुआ है। इन लटकों की लिस्ट में डॉ० पतित पावन के रिसर्च स्कालरों, भक्तों और स्वजातीय छात्रों की गिनती होती है । लटकने के माथ-ही-माथ लटकगण अहनिया डॉ. पतित पावन का मुंह जोहने का पुनीत कार्य भी करते हैं । जिस दिन डॉ० पतित पावन का मुखारविन्द मलीन होता है उस दिन सारे लटकों के चेहरे पर बाप की मौत जैसी विशुद्ध मुदनी छा जाती है । और, जिम दिन डॉ० पतित पावन चहकते हुए नजर आते हैं उस दिन लटक वर्ग के गरीर में जहां-तहां उपलब्ध सारी वाछे खिली रहती हैं। दूर रिक्शे पर डॉ० पतित पावन के चश्मे को चमकता हुआ देखकर समस्त लटकगण हिन्दी विभाग के गेट तक लपक आये । सबने रास्ते पर अपने-अपने मौलिक पलक-पांवड़े बिछा दिये। डॉ० पतित पावन को संतप्त देखकर सारे लटको के मुखड़ो पर सफेदी पुत गई। स्टाफ रूम तक सभी डॉ० पतित पावन के साथ लटकते चले गये । वातावरण की वजनी मौनता को भंग करते हुए एक लटक-शिरोमणि ने शंका की- 'आग फिर विहंगवा के बारे में कुछ खबर मिली है क्या सर ?' 'हा, उसकी कविता 'नई दुनिया में छपी है इस महीने ।' डॉ.पतित पावन मर्माहत से बोले। यह सुनकर सारे लटक एक ऐसी अव्यक्त भाषा में प्रो० विहंग को नितांत ग्रामज गालियां देने लगे, जिनकी चर्चा कामता प्रमाद गुरु के ( 10 ) व्याकरण में वुदबुदाना नामधारी क्रिया के रूप मे मिलती है। और डॉ. पतित पावन अनमनी मुद्रा में कुर्मी पर पसर गए । पिछले महीने भी वे इसी शैली में अनमने हो गए थे। उम महीने प्रो० विहग की कहानी कलकत्ते की एक पत्रिका में छपी थी। दुख की बात यह है कि यह हादसा हर महीने साकार हो रहा है। प्रो० विहंग को कोई-न-कोई रचना कही-न-कहीं छप जाती है और डॉ. पतित पावन अपने आप को असहाय अनुभव करने लगते हैं। न तो वे विहंग की हत्या कर पाते है और न हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं का छपना बन्द कर पा रहे हैं। इस लाचारी का कुफल यह है कि हिन्दी पत्रिका का छपना दुर्भाग्यवश वदस्तूर जारी है और प्रो० विहंग की रचनाएं उनमे छपकर डॉ० पतित पावन की लोमश छाती पर उम्दा किस्म की मूंग दलने का शुभ कार्य कर रही हैं। कुर्मी पर पसरे डॉ. पतित पावन लटकों के चले जाने के बाद निर्वेद की भूमिका में चले गये। उनके दुलारे लटकों के महाभिनिष्क्रमण का कारण यह हुआ कि धीरे-धीरे हिन्दी विभाग के शेप पराक्रमी प्राध्यापक आने लगे। उस समय सबने देखा कि मारे वेदना के डॉ० पतित पावन का रंग ब्लंक वोर्ड की तरह गाढा हो गया है । पहले जुनेजा आए, फिर शर्मा जी और डॉ० भगत । सभी प्रथम श्रेणी के विहंग पीड़ित थे और संसार के अन्य सभी हिन्दी प्राध्यापकों की तरह एक दूसरे को परम मूर्ख और असाहित्यिक समझते थे। सबको विहंग विषयक ताजा समाचार पहले ही मिल चुका था। इस नाते सबके चेहरे पर श्रीहीनता पोस्टर की तरह चिपकी हुई थी। स्टाफ रूम मे विखरी हुई कुसियो को इकट्ठा कर सभी गोष्ठी की मुद्रा में बैठ गए और स्थिति की विकटता पर विचार करने लगे। विषय का प्रवर्तन डॉ. पतित पावन ने ही किया- 'आप सयको यह मालूम हो ही गया होगा कि विहंग की एक कविता इस माह 'नई दुनिया' में छपी है। हम लोग अपने ही जरूरी कामों में व्यस्त हैं और इघर वह हर महीने कही-न-कही छपकर इम विभाग का सतीत्व नष्ट कर रहा है। इसको गहरा असर छात्रों पर भी पड़ रहा है। हालत यह है कि छात्र आशा करने लगे हैं कि हम भी.विहाँ को तरह पत्रिकाओं में छपें और...' इस अवसर पर शर्मा जी ने डॉ० पतित पावन को याद दिलाया- 'छपना कौन-सी बड़ी बात है सर ! सन् 69 की कालेज पत्रिका में आपका एक लेख छपा ही था। आज तक हम लोगों को याद है।' डॉ० पतित पावन को जैसे गुजरा हुआ अतीत स्मरण हो आया । बोले-~~'हां शर्मा ! वह लेख बडा ऐतिहासिक था। उतने ऊंचे स्टैण्डर्ड का लेख तो कभी-कभी लिखा जाता है इस देश में। वरना हिन्दी में अच्छा लिखने-सोचने वाले लोग कितने हैं ? और यह विहंग है कि कूड़ा-करकट लिखकर विभाग को बदनाम कर रहा है।' अब जुनेजा को गुप्त सुसमाचार सुनाने का स्वर्ण अवसर मिला। जुनेजा ने अपनी चिरपरिचित फुसफुसाहट भरी रहस्यवादी शैली में 'कूड़ा तो वह लिखता ही है सर ! एक और खबर मिली है। वह हम सवको कीट-पतंग समझता है। भारी दुष्ट और महाघमण्डी है सर! 'ऐसा उसने कहा ?' कई आवाजें आयी, तो जुनेजा को सप्रसंग व्याख्या करनी पड़ी-- 'हां भई, कहा है उसने । परसो मैं उसकी पिछली कहानी की तारीफ कर रहा था तो उसने कहा कि हमारे विभाग में सिर्फ कीडे-मकोड़े भरे हुए हैं, कोई साहित्य मे दिलचस्पी नहीं लेता।' इम खबर से डॉ० पतित पावन को ब्रह्मानन्द सहोदर सुख मिला। वे उछल पड़े और उत्साहित स्वर में बोले, 'यह खबर अध्यक्ष तक पहुंचानी चाहिए। भगत जी! आप तो इन दिनों उनसे बेहतर विपके हुए हैं। कल रात दस बजे तक बाप उनके साथ पाये गये हैं।' 'कौन ! मैं ?' गुप्तस्थल पर गाजियन द्वारा पकड़ी गई नायिका की तरह डॉ० भगत सहमकर बोले ।
( 12 ) 'हा-हां, आप ! आप अध्यक्ष को यह खबर दे दें कि विहंग समूचे विभाग को कीट-पतंग समझता है।' डॉ० पतित पावन के इस आदेश को संकेत-भाषा मे शिरोधार्य कर डॉ० भगत चोर-सी सतर्कता दर्शाते हुए उठे और कक्षा की और चले गये। पष्ठ वर्ष के पुराने रजिस्टर के साय डॉ० भगत को स्टाफ रूम से निकलते देर नहीं लगी कि कमरे में दो मिनट तक शोक श्रद्धाजलि का मौन छा गया। हिन्दी के विद्वानों के बीच जब बातचीत शुरू हुई तो टॉपिक वदल गया। इस बार डॉ. भगत द्वारा की गई अध्यक्ष की बहु- विध सेवाओं पर टीका-टिप्पणी होने लगी। फिर जुनेजा ने इतिहास का वह अध्याय सुनाया, जिसमे डॉ. भगत द्वारा लिए गए पहले वर्ग का रोमांचकारी वर्णन है । यह एक स्थापित सत्य है कि वह दिन बडा लोम- हर्षक हो गया था, जिस दिन डॉ० भगत पहली बार कक्षा में पढ़ाने गये थे। आकाश में देवताओं की भीड इस दृश्य को देखने के लिए जमा हो गई। धरती पर भी पी. जी. कैम्पस के आसपास महामानव समुद्र उमड़ आया। सबकी उत्सुकता इसी बात में थी कि डॉ० भगत कैसे पढ़ाएगे। विस्मय के मारे मबके चेहरे चहक रहे थे कि दूर से डॉ.भगत अपनी सनातन वेशभूषा मे आते दिखे । उनकी मौलिक माज-सज्जा में केवल यही नवीनता थी कि उस दिन उनकी पत्नी ने उनके प्रशस्त ललाट की विपुवत रेखा पर तिलक कर रखा था। हाय के ब्रीफकेस को अली- किक गति से हिलाते हुए, डॉ० भगत विभाग में घुसे और ममयानुसार पष्ठ वर्ष की कक्षा में गये। जग की रीति के अनुसार पहले डॉ० भगत ने पूरी निष्ठा के साथ उपस्थिति ली। इस दिशा में भी उनका प्रयास पहला ही था, सो जिम हाजिरी को शेप अध्यापकगण मात मिनट में समाप्त कर देते हैं, उसमे डॉ० भगत ने मत्ताइग मिनट लगाये। उप- म्पिति को वही बन्द करने के बाद कमरे में वह शून्य छा गया, जिसकी पर्या कबीरदाम ने 'मुन्नमहल' नाम से की है। कुछ मिनट तक डॉ० भगत की जबान ही नहीं सुली, फिर उन्होंने भाषण शुरू किया- ( 13 समझ 'मैंने प्रेमचंद के जूतों पर रिसर्च की है, इसीलिए मुझे, प्रेमचंद की वह किताब पढाने का काम सौंपा गया है जिसका नाम गोदानी । भाइयों और बहनो, गोदान वही किताब है जिसे प्रेमचन्द ने लिखा है। और इस किताब को मैंने भी एम०ए० के कोर्स मे पढ़ा था। इस किताब को मुझे जिस विद्वान ने पढ़ाया था, वे अब भी यूनिवर्सिटी की सेवा मे हैं, फिर भी न जाने क्यों यह किताब मेरे माथे थोप दी गई है। नही पा रहा हूं कि इसमे पढ़ाना क्या है और मैं क्या पढ़ाऊ ? बेहतर यह होगा कि मैं तनिक अध्यक्ष महोदय से पूछ लेता हूँ कि मुझे क्या पढ़ाना है और कैसे पढ़ाना है ।...' इतना कहकर डॉ० भगत रजिस्टर कक्षा में ही छोड़कर भागे और पीछे-पीछे छात्र-छात्राओं का समूह भी उनका गुण-कीर्तन करता हुआ कमरे से निकला। उस दिन डॉ. भगत अध्यक्ष के कक्ष में जाने से पूर्व वाथरूम की सेवा मे गये थे और तदुपरांत अध्यक्ष महोदय के सम्मुख प्रस्तुत हुए। उनकी समस्या सुनकर अध्यक्ष मन्द गति से मुस्कराये थे और बोले-'ठीक है, धीरे-धीरे सब ठीक हो जायेगा !' वह दिन था और आज का दिन है। सीन के साथ डॉ० भगत की घोर असहमति वरकरार है। उसकी इस पूर्वकथा को हिन्दी विभाग में समय-समय पर लवण-चूर्ण मिलाकर जुनेजा सुनाया ही करते हैं । इस रोचक चर्चा मे लोग अभी उलझे ही थे कि स्टाफ रूम में प्रो. विहंग आ गए। सबने बारी-बारी से 'नई दुनियां' में छपी प्रो विहंग की ताज़ी कविता की प्रशंसा की और उन्हें बधाई दी । समर्पिता की मुद्रा मे विहंग ने सारी बधाईयां बटोरकर अपने वंग मे डाल ली। उन्होने यह सूचना भी दी कि उनकी कई रचनाए कई पत्रिकाओ द्वारा प्रकाशनार्थ स्वीकृत हुई है । डॉ० पतित पावन ने एक बार फिर बधाइयो का सिल- सिला शुरू किया और प्रो० विहम ने फिर बधाईयों का अम्बार सहेजकर रख लिया। इस बीच डॉ० भगत कक्षा से आ गए और अगली घटी के लिए प्रो० विहंग जुनेजा जी और रजिस्टर के साथ बरामदे में निकल आए।
( 14 ) एकान्त पाकर प्रो० जुनेजा ने अपनी सनातन रहस्यपूर्ण भंगिमा में कहा-'एक बात मालूम है आपको विहंग जी? किसी ने अध्यक्ष से कह दिया है कि आप विभाग को कीट-पतंगों का अड्डा कहते हैं । आप जरा उनसे मिलकर स्पष्ट कर लें।' और प्रो. विहग चिन्ता के सागर मे इवते-उतराते कक्षा मे गए । वर्ग मे कामायनी को नाटकीयता पर सक्षिप्त भाषण देकर सरदर्द के आधिक्यवश वे घर लौट आये। घर पहुंचकर नई पीढ़ी के उभरते रचनाकार प्रो० विहंग ने पहला काम तो यह किया कि पत्नी और बच्चो को जमकर पीटा और फिर एक गिलास पानी पीकर लेट गये। लेटकर उन्होने आत्महत्या से लेकर साहित्य से रिटायर हो जाने तक की सारी सम्भावनाओ पर विचार किया और जल्दी ही खरटि भरने लगे। ।
मेरे पड़ोसी माफ कीजिएगा, मैं अपने उन पड़ोसियों के बारे में आपको कुछ ही बताऊगा जो इन दिनों मेरे आसपास बसे हैं । आज मैं केवल भूत- (वं पड़ोसियों की ही चर्चा कर सकूगा जो सचमुच अभूतपूर्व थे । मेरा वश्वास है कि उन सारे सज्जनी और सजनियों की आत्मा इस धराधाम र जहां भी होगी, सुख से होगी और पड़ोमियो को दुख दे रही होगी। वाह ! कैसे होनहार पड़ोसी थे वे और कैसी मजेदार पड़ोमिने थी वे । अब वैसे पडोसी चिराग लेकर खोजने पर भी नहीं मिलते हैं। एक महा- शय सुबह अखबार ले गए और शाम तक उसे वापस कर गए । यह देखकर अपार कष्ट हुआ। पहले इस मोहल्ले मे इस स्तर के पडोसी नहीं रहते थे। वह जो सुरिन्दर लाल पास वाले फ्लंट में रहते थे, जब कभी अखबार लेकर गए उसे वापस करने के लिए नही आये। इस महान देश में कुछ पैसे के अखबार के लिए पड़ोसी-धर्म नही विगाहा जा सकता, लिहाजा हम हमेशा बाबू सुरिन्दर लाल को असबार सादर समर्पित कर देते थे। बाद में तो हालत यह हो गई कि हाकर उन्ही के मकान में मेरा असवार डाल देता था और मैं समय निकालकर यही अपना अखबार पढ़ लेता था। सुरिन्दर साल में एक आदर्श पड़ोसी के सभी पास्त्रीय गुण कूट-कूटकर भरे हुए थे। ये हमारे हर सुख में रोते थे और हर दुस में हंमते थे। आज उनसे हुई पहली मुलाकात का दृश्य स्मरण आता है तो मन मानन्द विभोर हो जाता है। पहली बार जब मैंने उनके दर्शन किए थे, उस समय वे अपने बालगोपालों पर लोकस गालिमो का बुरा प्रयोग कर रहे थे। मुहल्ले में एकदम नवागंतुक थे और मैं उनका नाम तक नहीं जानता था। उसी दिन रात के आठ बजे ( 16 ) जब मैं एक सम्पादक को फरमाईश पूरी करने की मुद्रा में था और एक रचना के प्रसव की पूरी तैयारी कर चुका था, वे हमारे ड्राइंगरूम मे पधारे-'जी ! मुझे सुरिन्दर लाल कहते हैं। रहने वाला पटने का हूं, हाल मुकाम राची है । वह जो मेरी वाइफ है न, उन्होंने बताया कि आप बहुत लिखते हैं। आपके यहां तो बहुत सारी कितावें हैं, पत्रिकाए भी। ये सब खरीदी हैं, आपने ?' मैंने निवेदन किया-'जी नहीं, जहा-तहा से चुराई हैं ।' इस साफगोई पर वे बड़े प्रसन्न हुए-अच्छा ! तभी इतनी किताबें हो गई हैं । यू नो, विमल मित्र की किताबें मुझे खूब पसन्द हैं । मैं समझ गया कि सामने रखी विमल मित्र की नई कृति पर बाबू सुरिन्दर लाल की निगाह है। मैंने वह उपन्यास उन्हें सौंप दिया, वे सहर्ष लेकर चले गये। लेकिन जल्दी ही लौट आये। इस बार वह अपने हाथ में एक कैलेण्डर लेकर आये थे। कहने लगे-लाइए, आज की मुलाकात की यादगार के रूप में यह कैलेण्डर आपके रूम में टाग दूं। लाख मना करने पर भी उन्होने खुद हथौड़े से कील ठोंकी, कोल मे कैलेण्डर को टांगा और विभिन्न कोणो से उसका मुआयना करने के बाद प्रसन्न मुद्रा में अपने घर गए । आधी रात के समय जब हम लोग सो रहे थे, दरवाजे पर जोरदार दस्तकें हुई। दरवाजा खोलने पर सुरिन्दर लाल नजर आये। कहने लगे--'माफ कीजिए, आपको बेवक्त तकलीफ दी। मुझे ऐसा लगा कि कैलेण्डर को दायी दीवार की जगह वायी दीवार पर टांगा जाए तो बेहतर रहेगा। वैसे आपकी क्या राय है ?' उस समय मैं राय देने के मूड में एकदम नही था। उन्होने मनोयोग पूर्वक कैलेण्डर को दायी ओर से बायी ओर ट्रांसफर किया । लगभग डेढ़ बजे हम तोग दुवारा सोने गए। सुबह होने पर वे आंख मलते ही आ !कितना अच्छा लगता है यह कैलेण्डर इम दीवार पर! यू मो?आप अपने सोफे का कवर बदल दीजिये और यह परदे भी। इनका रंग कैलेण्डर से मंच नहीं खा रहा है। धमके-वाह (17) हम उनके सत्परामर्श को चुपचाप सुनते रहे । उनका कैलेण्डर-पुराण तब तक चलता रहा जब तक उनके आफिस-गमन का समय नही हो गया। इसके बाद दो दिनो तक उनके दर्शन नहीं हुए। पता चला पटना गए हैं। तीसरी रात का सवेरा जब नज़दीक था, लगभग दो बजे उनकी आवाज दरवाजे पर सुनाई दी । खोलने पर प्रकट हुए- अभी-अभी पटने से लौटा हूं। सोचा, जरा कैलेण्डर को देख लू । अच्छा लग रहा है न ? बहुत खूबसूरत कलेण्डर है । कई लोग मांग रहे थे, लेकिन मैंने आप ही को दिया। आखिर आप अपने पड़ोसी है । अच्छा, अव चलूं, कुछ सो लूं। वे चले गये और उनके साथ-साय हमारी नीद भी लापता हो गई। अगले दिन उनके साक्षात्कार नहीं हुए। रात के बारह बजे हमारी नीद उन्होंने फिर तोड़ी। कहने लगे, आज तीस तारीख है, कल पहली है। मैंने सोचा, कलेण्डर का पन्ना बदल दू। उन्होंने पन्ना बदला, फिर सोफे पर बैठकर क्षमा- याचना करने लगे कि पिछले दिन मुलाकात नहीं कर सके। जब वे हमारे यहां से विदा हुए तो हमने पहला काम यह किया कि उनके द्वारा टागे गये कैलेण्डर को उतारकर खण्ड-खण्ड कर डाला और निश्चिन्त होकर सो गए। सुबह होने पर सुरिन्दर लाल ने कलेण्डर के बारे में सूक्ष्म जासूसी को, लेकिन तब तक उसके टुकड़े अग्निदेव का आहार बन चुके थे । सच तो यह है कि जब तक वाबू सुरिन्दर लाल हमारे पड़ोस में रहे, वे प्रातः स्मरणीय, दोपहर-स्मरणीय, सायं स्मरणीय और रात्रि-स्मरणीय बने रहे। जब वे घर बदलकर जाने लगे तो उनके सुपुत्र ने विदा-बेला मे कहा- अंकल ! आप हमें भूल तो नहीं जाएगे? हमने कहा--नहीं, बेटे ! खिड़कियों के वन्द शीशे, चकनाचूर घड़ी, बन्द रेडियो-ये सब बहुत दिनों तक तुम्हारी याद दिलाते रहेंगे। वह दिन था और आज का दिन है । बाबू सुरिन्दर लाल सपरिवार हमारी स्मृतियों में खड़े हैं और बोर कर रहे हैं । कुछ अरसा पहले हमारे पड़ोस में एक भारी-भरकम इन्जीनियर रहते थे। इन्जीनियरी के ( 18 ) में इनकी देन पता नही क्या थी, लेकिन तबला माशाअल्ला खूब बजाते थे। उनके घर में इतनी थोक मात्रा मे दर्शनीय किस्म की कन्याएं थी कि वे किसी को भी छछिया भर छाछ पर नचा सकती थी। एक बार उनके घर मे आग लगी। आग पर काबू पाने पर आधा घंटा लगा और फायर ब्रिग्रेड के जवानो पर काबू पाने मे तगभग दो घटे लग गए। उस दिन हमारा भरा पूरा परिवार बैठा था कि भरी-पूरी महिला का सहमा प्रवेश हुआ। हमारे नये पड़ोसी इंजीनियर की धर्मपत्नी थी यह । देखने में पचास वर्ष के करीब उम्र लगती है, लेकिन अपने आप को चालीस की समझती हैं। तीस वर्ष की महिलाओ जैसे कपड़े पहनती हैं और बीस वर्षीय युवतियो जैसी हरकतें करती है । वे हमारे घर सौ रुपये के नोट की चेंज मांगने आई थी। हमने कहा- देखिये, चेंज तो नहीं है, लेकिन यह पूछकर आपने हमारा जो सम्मान बढ़ाया है, उसके लिए हम बहुत- आभारी हैं।' उन्होने फरमाया- 'अजी, चेज तो बहाना है । दरअसल मैं आप सबसे परिचय ही बढाने आई हूं। कभी आइये न हमारे उनसे मिलने । वे अकेले बहुत बोर होते हैं, कोई बात करने वाला ही नहीं' । इस आमंत्रण को अंगीकार कर मैं दूसरे ही दिन उनके घर गया। देखा, इंजीनियर साहव नाखून काटने का कठिन परिश्रम कर रहे हैं और उनकी धर्मपत्नी मेवादायिनी सेवा कर रही थी। उन्होने ही हंसते हुए उठकर मेरा स्वागत किया। वेचारे इंजीनियर माहब शरीर की भारी-भरकमता और पली के डर के मारे उठ नहीं सके । उनकी पति-परायणा पत्नी चाय बनाने अन्दर चली गई। अब कमरे मे दो ही रह गये-मैं और इंजीनियर, इंजीनियर और मैं । मैंने उनसे पूछा-और सुनाइये वर्माजी, क्या हाल-चाल है ? उन्होंने धीरे से कहा, 'अच्छा है।' हम दोनों चुप हो गए। उन्होने नाखून काटने में अपना ध्यान एक बार फिर केन्द्रित किया। मैंने उनकी मेज पर रखी हुई कलमों को निय धीरे-धीरे तोड़ना शुरू किया। दोनों पक्षों के तखन कट जास्त होने अपना सिर ऊपर उठाया और कहा, 'और सुनाइए:विवारीजी महाल- चाल है ? मैंने भी शांतिपूर्वक कहा, 'अच्छा है।' वातचीत की ट्रेन आगे नहीं बढ़ रही थी। हम दोनों एक ही स्टेशन पर रुके हुए थे। बार-बार हमारी निगाहें उस परदे की ओर उठती थी जिधर से चाय आने वाली थी। मैंने एक बार फिर कोशिश की और सुनाइए वर्माजी, क्या हालचाल है ? वे फिर बोले, 'अच्छा है।' तभी उनकी अर्धागिनी चाय लेकर प्रकट हुई। हम दोनो ने तेजी से चाय पी, एक-दूसरे से मुक्त होने की मुद्रा में आए । उनकी पत्नी मुझे बाहर तक छोड़ने आयी! 'आज कितना अच्छा लगा आप आए तो ! वे दिन भर बोर होते हैं, कोई बात करने वाला ही नही । इसी तरह आते रहेगे न आप ?' लेकिन इसके बाद मैं फिर कभी उनके घर नहीं गया। नही मैं गलत कह रहा हूं। एक बार और गया था उनके घर । उनकी बेटी ने इल्जाम लगाया था कि सामने वाली छत का तड़का उसे लगातार पूरता रहता है । लड़के के पिताश्री मुझे भी अपने साथ वार- दात की जगह पर ले गये। इजीनियर महाशय के मकान मे कही ऐसी कोई जगह नजर नहीं आई, जहां से खड़ा होने पर सामने वाले की छत दिखती हो । मैंने अभियोगिनी बालिका से पूछा-'कहां से घूरता है वह लड़का?' 'अरे वाह ! तो क्या मैं झूठ बोलती हूं? आप यहा एक मेज लगाइये उस पर कुर्सी रखिये, फिर उस पर खड़े होकर रोशनदान से देखिए- बताइए, लड़का अपनी छत पर दिखता है या नही ?' ऐमी होनहार कन्याओं के कारण इंजीनियर साहब लम्बे अरसे तक चर्चित पड़ोसी बने रहे । जिस दिन वे ये मुहल्ला छोड़कर गए, मैंने उपवास किया। किसी ने सांत्वना दी कि दूसरे पड़ोसी भी अच्छे ही (20) होंगे। लेकिन मेरा मन उदास ही रहा। आने वाले पड़ोसी अच्छे तो होंगे, लेकिन उनके पास इतनी आनन्दकारी कन्याए भी होगी. इसकी क्या गारंटी है ? अब हमारे आसपास वैसे पड़ोसी नहीं हैं। आज तो हालत यह है कि अपने पडोसी मकान की ओर जरा-मी ताक लेते हैं तो चारों ओर सवाल होने लगते हैं कि मेरे अगने मे तुम्हारा क्या काम है ? फिर भी, ऐसे तमाम लोग जो अनपढ़ हैं और पढ़ना-लिखना बिल्कुल नहीं जानते, मेरे पास पत्र लिखें। मैं उन्हें अपने वर्तमान पड़ोसियो के बारे मे गुप्त सूचनाएं दूगा।
हमारा भी ज़माना था ! कल हमारे चिरंजीव ने परिवार का पुराना अलवम देखते हुए अपनी मां से पूछा--'मम्मी, इस फोटो में तुम्हारे कधे पर हाथ रखे यह स्मार्ट- सा नौजवान कौन है? इस पर मम्मी ने उवाचा-'यह तुम्हारे पापा हैं ।' साहबजादे को विश्वास नही हुआ-'यह पापा हैं ! तब यह कार्टून जो हमारे साथ घर में रहता है, सो कौन है ?' यह सुनने के बाद हम यह सोचने के लिए विवश हो गये कि प्राचीन काल की हमारी कुल जमा स्मार्टता का विनाश हो गया है । एक जमाने में हम बहुत सारे स्मार्ट लोगों से स्मार्टतर थे और कई सज्जनों के बीच स्मार्टतम भी कहे जाते थे। लेकिन अब तो वह कारवां गुज़र गया है, केवल गुबार बाकी रह गया है। हमारा भी क्या जमाना था । जब कभी पीछे पलटकर देखता हूं तो छत्तीम साल के शरीर में बीस साल की भावनाएं करवट बदलने लगती हैं । उम जमाने की यादें तरोताजा होने लगती हैं तो सबसे पहले शहर पटना में गुजरे हुए दिन और रात, सुवह और शाम के तमाम सीन माकार हो जाते हैं । यह वह जमाना था, जब हमारी शादी नहीं हुई थी और कालेज आने-जाने से बचे समय का मदुपयोग हम कन्या-निरीक्षण में अपने परम मित्र शम्भूनाथ के साथ मैं नियमित तौर पर संध्याकाल में अपने मुहल्ले से निकलता था और हथुआ मार्केट की परिक्रमा कर सधन्यवाद वापस आ जाता था। हालत यह थी कि उस मार्केट के तमाम दूकानदार बड़ी बेसब्री से हमारा इन्तजार करते थे, उस दिन बेचारे उदास हो जाते थे और दूसरे दिन हममे यह निवेदन करते थे कि है करते थे।
( 22 ) नररलों! आप चाहे इस धरती पर रहें, चाहे न रहें, लेकिन शाम के साढ़े पांच बजे इस मार्केट में ज़रूर पधारें। इसलिए हम कई वर्षों तक इस सघन कार्यक्रम मे जुटे रहे। दरअसल, केवल उस क्षेत्र की दूकानो का मुआयना करना ही हमारा एक सूत्री कार्यक्रम नहीं था। मार्केट में घूमते समय हम परायी नारियों, खासतौर पर कुमारियो का विशेष अध्ययन करते थे कि इन भारतीय ललनाओ को मां और बहन के अलावा और किन-किन नज़रो से देखने की दिशा में प्रयोग हो सकते हैं। इस क्षेत्र में हमारा अनुसंधान केवल शनिवार को बन्द रहता था। इसकी वजह यह थी कि उस दिन हमारे मुहल्ले की एक सुकन्या अपनी छोटी-बडी वहनो के साथ हनुमान मंदिर जाया करती थी। लिहाजा, शनिवार की शाम मे शम्भूनाथ और मैं, हम दोनों ही उस सुकन्या के चरण-चिन्हो पर चलते हुए मुहल्ला कदमकुआं से पटना जंक्शन के गेट पर मौजूद महावीर स्थान तक पदयात्रा करते थे। क्या जमाना था अब उस किस्म की पद-यात्राओ के लिए मौका ही कहां मिलता है ? उम जमाने की बालिकाओ में एक खास किस्म का कैरेक्टर था। जिस सुकन्या के पीछे-पीछे हम लोग पदयात्रा करते थे, उसके पाम एक बार हम लोगों ने नितांत प्रिंसिपल हिन्दी में एक प्रेम-पत्र लिखकर खिडकी के मार्ग से भेजा । इसके जवाब स्वरूप कन्या के बड़े भाई ने हम लोगो को अत्यन्त कोमलकात पदावली मे कई सुन्दर-सुन्दर गालियां सुनायी और भविष्य मे मारपीट करने का आश्वासन भी दिया। आजकल की हालत तो यह है कि हमारे एक एक प्रिय छात्र ने अपनी महपाठिनी के पास एक प्रेम- पम भेजा, तो उस बालिका ने धारावाहिक तौर पर लगभग अस्मी खत भेज दिये, और हमारा प्रिय छात्र पत्र लिखना ही भूल गया है । सच्चाई तो यह है कि हमारे जमाने की बात ही और थी। उम जमाने की हर चीज का अनूठा आनन्द था। रेलगाडिया अधिकतर कोयले से चलती थी, और कोयला हमारी भासो में पहता रहता था। उन कोयलों को हम इकट्ठा करते रहते थे, ताकि पर में अंगीठी जलाने के काम आ सके। गंस और बिजली या डीजल से चलने वाली रेलगाडियों से इस जमाने में वह मजा कहा रहा. उमजमाने में लोग अग्रेजी में ही अंगूठा भी लगाते थे। आज भी जो कभी हमारे प्राचीन मित्र बाबूलाल मिल जाते हैं, उस जमाने को अंग्रेजी और उस जमाने की बातचीत का नमूना साकार हो जाता है। उस जमाने में हम भी दुबले-पतले थे, एकदम स्लिम । लेकिन हमारी मित्र मंडली मे महास्लिम होने का गौरव श्रीयुत बाबूलाल को ही प्राप्त या। वे जव रिक्शे पर बैठते थे, तब रिक्शा चालक रह-रहकर पीछे वाक लेता था कि उसका पैसेंजर कही बीच में ही उतर तो नही गया ? उसी जमाने मे वी० ए० करने के बाद वे एक स्कूल में शिक्षक हो गए । जब कभी ज़ोर की हवा चलती थी, बेचारे बाबूलाल जी उडकर क्लास के बाहर हो जाते थे और उनके चेले उन्हें सभालकर फिर क्लास के अन्दर करते थे। बाबूलाल जी कभी साइकिल से नही गिरे, और इसका रहस्य यह था कि वे कभी साइकित पर चढ़े ही नहीं। उस जमाने के हमारे मित्रों की कथा अनन्त है । शम्भूनाथ और बाबूलाल जैसे पुरुष- पुरातन आज मोमबत्ती लेकर खोजने पर भी नही मिलेंगे। उस जमाने की हर बात निराली थी। जब हम कालेज में पढ़ा करते थे, तो कक्षा का सारा माहौल परम सात्विक था। एक-से-एक महावीर शिक्षक आकर भाषण देकर हमें सुलाते थे, और हम लोग बिना किसी एतराज के शहीद होते थे। समूचे कालेज में ऐसी शांति रहती थी कि प्राचार्य महोदय के कमरे में कालबेल बजने पर भ्रम होता था कि घंटा बज रहा है। हमारे कई प्रोफेसरान इतने मीधे और मामूली ढंग से रहते ये कि अक्सर हम प्रोफेसर को चपरासी और चपरासी को प्रोफेसर समझ बैठते थे। उस जमाने में एम०ए० में पढ़ने वाली सन्नारियां आदर्श भारतीय पत्नी के पद को प्राप्त कर चुकी होती थी और हम लोग उन्हें थद्धापूर्वक 'दीदी' कहते थे 1.आज वैसा पावन-परिवेश कहाँ रह गया उसी पावन परिवेश में हम डूव-उतरा रहे थे कि एक दिन हमारी शादी हो गई । यार-दोस्त बधाई देने लगे कि तुम भाग्यशाली हो कि दो- ( 24 ) दो मालियां मिली हैं । यी तो सचमुच ही दो सालियां, लेकिन कहने भर को। आदिकाल मे केवल एक ही साली, साली कहलाने काबिल थी। कालान्तर में जब तक उसका युगांत हुआ, दूसरी साली सीन पर हाजिर हो गई। आज तो आलम यह है कि दोनों ही सालियां अपने-अपने पैवेलियन में हैं और वंदा अपनी विकेट पर मजबूती से खड़ा है। अपने वैवाहिक जीवन के आरम्भिक दिनों का किस्सा फिर कभी सुनाने की कोशिश करूगा। अभी आप यही समझ लें कि हम गुजरे हुए जमाने की स्मृतियो से तर-व-तर हैं। वाह, क्या जमाना था और क्या हम थे! गांधी मैदान की मखमली घास पर बैठकर हम लोग गप्पें मारा करते थे। ऐसी-ऐसी गप्पं हांकते थे हम लोगो कि आज उन गप्पो की याद भी वेहोश कर डालती है । एक बार हमारे मित्र शम्भूनाथ ने फरमाया कि हमारे नाना का मकान इतना ऊचा था कि एक बार एक बच्चा ऊपर से गिरा तो जमीन तक पहुचते-पहुंचते वह पूरा वयस्क बन चुका था। इस पर बन्धुवर बाबूलाल ने सूचित किया कि उनके स्वर्गीय नाना जी का मकान इससे भी ऊंचा था। एक बार उस मकान की छत से कोई बन्दर फिसला और धरती पर आते-आते वह आदमी बन गया । ऐमी ऊंचे दर्जे की गप्पें मारने वाले लोग आजकल कहां मिलते हैं ? खुशामद करने, पैरवी करने और पैसे कमाने से फुरसत मिले, तर तो कोई जी भरकर गप्पे मारे, चाहे मक्खियां मारे। जी हां, हमारे जमाने में कुछ ऐसे भी होनहार लोग थे जो मक्खियों और मच्छरों का वध करने की कला में विल पुरस्कार वे प्रत्याशी थे। हमारे मुहल्ले के पाठक जी तो इतनी होसियारी के साथ मच्छरों का संहार करते थे कि मरने के बाद भी मच्छरों की आत्मा उनकी तारीफ में वही भटकती रहती पो। उम किस्म के प्रतिभाशाली लोग अब कहां रह गये हैं ? वह जमाना ही कुछ और या। पिछले महीने अपनी एक सहपाठिनी महिला के साक्षात्कार का चास मगभग सत्रह सानों के बाद मिला । आत्मा गद्गद हो गई। वहीं महिला (25) वही वाल, वही चाल | जय-जय-जय गिरिराज किशोरी, जय महेश मुखचन्द्र चकोरी। उनके पति महेश जी सड़क के उस पार चले गये थे और यह महिला दिल्ली के दरियागंज मुहल्ले में ग़लत जगह पर सड़क पार करने की कोशिश में लगी थों। उनकी इस हरकत पर पास खड़ा सिपाही लगातार सीटी बजा रहा था। हारकर सिपाही दौडता हुआ उनके पास पहुंचा। तब तक मैं भी वहां पहुंच चुका था। सिपाही ने पूछा-'सीटी की आवाज़ नहीं सुनाई पड़ती ? क्या पलटकर नही देख सकती हैं आप?' इस पर श्रीमती महेश ने मेरी ओर एक नजर फेरते हुए फरमाया-- 'पहले तो मैं एक ही सीटी की आवाज सुनकर पलट जाया करती थी, अब आदत नहीं रही। हमें यह सुनकर परम सन्तोप हुआ कि केवल हमारा ही जमाना नही चला गया है, उन सारे लोगों का जमाना भी अव भूतपूर्व हो गया है जो हमारे साथ-साथ अभूतपूर्व थे। आज सुबह एक मक्खी अपनी दुलारी नतिनी को, मेरे मस्तक पर टहलते हुए यह संस्मरण सुना रही थी कि कभी यहां पर एक पतली-सी पगडडी थी और अब तो पूरा नेशनल हाइवे निर्माणाधीन है। निश्चय ही, हमारा भी एक जमाना था। - दिल जो न कह सका इस वक्त वह सब कुछ कहना चाहता हूं जो मेरा दिल भी मौका- ए-वारदात पर नहीं कह सका। सच तो यह है कि कहने का काम मुंह ही करता है, दिल केवल धड़कने का काम करता है । इसके बावजूद हम यह मानकर चलते हैं कि हम जो कुछ कहते हैं वह दिल के टेपरिकार्डर मे रिकार्डिड बातो का ही भला या बुरा ब्राडकास्ट है । मैं इस सर्व- स्वीकृत थ्योरी को नही मानता । वावजूद इसके कि कहने की क्रिया का सम्बन्ध भाषा-वैज्ञानिको ने मुंह के साथ जोड़ा है, हमारा यह दिल- यह जो मन है सो लगातार कुछ-न-कुछ कहता रहता है । हालत यह है कि जब मुंह कुछ नही कहता और एकदम 'गिरा अनयन नयन बिनु वानी' वाली सिचुएशन हो जाती है, तब भी दिल कहता रहता है । कभी-कभी तो स्थिति यह होती है कि मुंह और दिल के भाषण एक साथ अलग-अलग हाईवे पर दौड़ते नजर आते हैं। लिहाजा दिल के कुछ नहीं कहने का सवाल ही नही है। दिल की सबसे वैज्ञानिक परिभाषा ही यही है कि दिल वह है जो मुंह से न कहे गये अमर वाक्यों का बयान करे और जवान पर न लाई गई गुप्त भाव- नाओं की सप्रसंग व्याख्या करे। विज्ञान ऐसा कोई आविष्कार नहीं कर रहा है जिसकी सहायता से दिल की बातें सुनी जा सके। हम जव कोई काम करते रहते हैं या किसी के साथ वार्तालाप में व्यस्त रहते हैं, तब दिल को भाषण की ट्रेन स्टेशन- दर-स्टेशन पार करती है । दिल के इन व्याख्यानों को जबान पर लाने का साहस आग में कर रहा हूं। ईश्वर मेरी और मेरे दिल की रक्षा करे। दिल से बेहतर हाज़िरजवाबी की कल्पना नहीं की जा सकती। कुछ ( 27 ) भी देखकर कुछ भी सुनकर दिल तत्काल अपना कमेन्ट दे डालता है । दिल की कमेन्ट्री को सुनना मनोरजक भी है और जोखिम भरा भी। दिल की बातों को सुनने की लगातार कोशिशें मैंने की हैं और हर वार मजापूर्ण मजा मिला है। आइए, सबसे पहले मैं अपने सुखी दाम्पत्य जीवन में दिल की कमेन्ट्री के कारनामो से अपना परिचय कराऊं। मेरी पत्नी और चाय दोनो सुवह एक साथ उवलना शुरू कर देते हैं। लिहाजा पहले सुबह दिल का समानान्तर भापण शुरू हो जाता है। चाय के प्याले की चंद चुस्कियां लेते हुए मैं चाय की तारीफ करता हूं-'वाह, क्या फलेवर की चाय है। वाह, एकदम फर्स्ट क्लास ।' इस वाह-वाह के समानान्तर मेरा दिल एक लम्बा भाषण देता रहता है--'धुत, ऐसी भी चाय होती है ? अच्छी से अच्छी चाय खरीदी जाय, यह औरत सारा टेस्ट बर्बाद कर देती है।' और, फिर दिल की कमेन्द्री सारे दिन चलती रहती है । परसों शाम से ही पत्नी के साथ मेरा अबोला चल रहा है। कल वे मायके गई और उनका पत्र भी आया है। अब पूरे समाचार सुनिए । किस्सा यह कि परमों हम लोग पड़ोस के मौहल्ले में एक ज्योतिषी के पास गए । उक्त ज्योतिपी ने फरमाया कि तुम्हें अत्यन्त धनी पिता की इकलौती सुन्दर लड़की पत्नी के रूप में मिलेगी। यह सुनकर मैं गद्गद हो उठा--'याह, यह तो बडी अच्छी बात है, लेकिन मेरी एक अदद बीवी और चार अदद बच्चों का आगे कौन हवाल होगा?' यह सुनकर ज्योतिषी के दिल ने क्या कहा सो तो इधर रिले नही हुआ लेकिन मेरा दिल अफमोम करने लगा कि इस होनहार ज्योतिषी से मिलने में दम साल पहले मैंने शादी क्यों कर ली ? घर मेरा दिल. अफसोस रम की मूमलाधार बारिश करता रहा और उधर हमारी का दिल गुस्से को आंच मे गरम होता रहा । घर पहुंचकर : 'यहुत दिनो के बाद वर्तन फेंकने की कला का कुशल प्रदर्शन थे ने । , (28) किया । इधर वे कटोरी फेकती थी और मैं होशियारी से बायी ओर झुक जाता था। कोई बडे साइज़ का चम्मच आता दिखता तो मैं उतनी ही विनम्रता के साथ दायी ओर झुक जाता था। अपनी-अपनी पोजीशन पर दोनों खुश थे। जव उनका निशाना सही लगता तो वे खुश हो जाती थीं और उनका निशाना चूकने पर हमेशा की तरह मैं खुश होता था। लगभग बीम मिनटीय वर्तन-प्रयोग के बाद सीज फायर हो गया । फिर हम दोनों ने एक-दूमरे से बोलना बन्द कर दिया। इसके बावजूद हमारे दिलो को डायलागवाजी वन्द नहीं हुई। इन दोनो के बीच मे कैसा ये बन्धन अनजाना था कि न मैंने जाना और न गृहलक्ष्मी ने जाना । विना कुछ बोले वे रात का खाना मेरे मामने रख गई। उनके दिल ने हुक्म दिया---'मुंह फुलाये क्या बैठे हो, चुपचाप खा लो और अच्छे बच्चे की तरह जाकर अपने बिस्तर पर लेट जाओ।' हमने इस आदेश का तत्काल पालन किया। मेरे शरीर ने बिस्तर पर पसरना शुरू किया था कि दिल बोलने लगा–सो रहे हो मिस्टर! सबेरे वाली गाड़ी से जाना है कि नहीं ? कौन जगाएगा तुम्हें ?' दिल का यह सवाल मुनकर मैंने उठकर पत्नी के नाम एक पत्र लिखा-'कल सवेरे पांच बजे मुझे जगा देना, सवेरे गाड़ी पकडनी है।' सुबह जब आठ बजे नीद खुली तब तक ट्रेन जा चुकी थी और मेरे तकिये के पास मेरी पत्नी का सन्देश रखा हुआ था-'पांच बज गए, उठ जाओ।' आगे समाचार यह है कि बच्चे अपनी मां के माप अपने नाना के यहाँ पले गये हैं । आज मेरी ताक में एक पोस्टकार्ड आया है। यह मेरी पत्नी का पत्र है, आजकल यवोला जो चल रहा है। इसी कारण यह पोग मिला है कि यह मव कुछ आपसे कह दू जो दिल अन्दर-ही-अन्दर पहना रहा है, सुलकर पेश नहीं कर सका है। अपनी पत्नी के साप पाडार मे घुमते समय मेरा दिल सगातार भुगर रहता है । करहों की एक दुकान के बाहर यो सगा पा (29) महिलाए दस मिनट मे साड़ी पसन्द करेंगी उन्हें मैचिंग ब्लाउज पीम की मिलेगा। निश्चय ही यह घोषणा दूकानदार के दिल को निरन्तर प्रतिध्वनियो का परिणाम थी। इस दूकान मे प्रविष्ट होकर श्रीमती ने साड़ियों का सूक्ष्म निरीक्षण प्रारम्भ किया और मैं वही साइड मे चुपचाप मूकदर्शक बना हुआ था । उधर वे निर्ममता के साथ साडियों की शैली वैज्ञानिक समीक्षा कर रही थी और इधर मेरा दिल बोलता जा रहा था 'अरे ! साड़ी खरीदनी है तो झट से ले लो एक । यह क्या इन्सानियत हुई कि दूकानदार बेचारा एक के बाद एक साड़ियों के पहाड़ बनाता जा रहा है और आपका अभियान खत्म नही हो रहा है । मैं तो अब तक समूचा बाधार खरीद चुका होता।' दुकानदार मेरे दिल की आवाज़ नहीं सुन रहा था वरना इस हमदर्दी पर मुझे गले लगा लेता । उसने हमसे पूछा 'कहिये साहब ! आपकी सेवा में क्या पेश करूं?' मैंने कहा, 'वस, एक रूमाल पसीना पोंछने के लिए। रूमाल खरीदकर मैंने दुकानदार को ही सादर समर्पित कर दिया, जो मेरी पत्नी को साड़ियां दिखा-दिखाकर तरबतर हो रहा था। पत्नी को वही साड़ियों के हवाले छोड़कर मैं सामने चला गया। वहा दूरबीन देखने लगा। एक दूरबीन की तारीफ करते हुए दूकानदार ने बताया कि इस दूरबीन से देखें तो चार किलोमीटर दूर खड़ी खूबसूरत लड़की को भी अच्छी तरह देख सकते है। मेरी आंखें दूरबीन मे घुसकर चार किलो. मीटर दूर तलाशने लगी और दिल ने फरमाया कि जो लड़की इतनी दूर खड़ी है, उससे क्या फायदा? दिल के समझाने पर मैं दुबारा साड़ियों को दूकान पर पहुंच गया जहाँ एक घंटे के अनुसंधान के बाद भी मेरी पत्नी एक साड़ी पसन्द नहीं कर पाई थी। वेचारा दूकानदार बेहद शामिन्दा था और अपनी सज्जनता. वश हमसे नजरें नहीं मिला रहा था। जरूर उसका दिल हमे नितान्त सभ्य और सालीन किस्म की गालियां सुना रहा होगा-कम-से-कम उसके चेहरे पर ऐसे ही सुहाने भाव थे।
(30) इधर मैंने अपने दिल की आवाज के साथ दूसरों के दिल की आवाज़ को सुनने का अभ्यास भी किया है। चूकि मैं एक आदर्श पति होने के साथ-साथ एक प्राध्यापक भी हूं, कक्षा में बोलते समय दिल की आवाजों की टकराहटें सुनता-समझता रहता हूं। जी हां, बडा मजा आता है। मेरे मुंह से हिन्दी उपन्याम के विकास की 'बनिंग ट्रेन' फुल स्पीड छूटती है, उसके समानांतर नज़रें सामने बैठे शताधिक छात्र-छात्राओं का मुआयना करती हैं और उसके समानान्तर दिल की कमेण्ट्री चलती रहती वाह, आज पुष्पा दास गुलाबी साडी पहनकर आई और रचना पांडेय को तो देखो, इस उमर मे भी दो चोटिया कर चली आई हैं । यह सुनील सहाय इस तरह मेरी ओर क्यों देख रहा है ? वह निवेदिता गुप्ता बहुत उदास लग रही है और उसके पीछे बैठी ममता सिन्हा कितनी खुश है। क्यो नही खुश होगी, शादी जो तय हो गई है। लेकिन इसमें खुशी की क्या बात है । उस परमेश्वर सिंह की शादी पिछले साल हुई थी, अभी थोबड़ा लटकाए बैठा है। कभी-कभी दिल वह सव भी बोलने लगता है जो सामने नही है । प्रेमचद की प्रासंगिकता पर व्याख्यान देते समय दिल कभी घर में चीनी के अभाय पर चिन्ता व्यक्त करता है, तो कभी अगले महीने होने वाली कलकत्ता-यात्रा की प्लानिंग करता है। लेकिन क्लास रूम में अकेले शिक्षक का दिल ही नहीं बोलता है, सीन पर मौजूद तमाम दिल यालों और दिल वालियो के दिल भी अपनी-अपनी भाषा में अपनी-अपनी बात कहते हैं। एक बार हिन्दी गद्य के विकाम पर अपना भाषण खत्म करने के बाद मैंने सामने बैंठी नई पीढ़ी से कहा कि उनके मन में कोई शंका हो तो पूछ लें । इस पर एक छात्रा सही हुई और उसने प्रश्न किया- 'आपके स्वेटर का यह डिजाइन आपकी पत्नी ने कहाँ से लिया है ?' यानी उस गान-पिपासु माला का दिल मेरे भाषण के दौरान स्वेटर की बुनावट में उलझा हुआ था। शायद किमी का दिल मेरे मिर से गायब होने वाले बालों पर रिसचं कर रहा हो या किसी का दिल महिला ( 31 ) कालेज के सेकण्ड ईवर में पढ़ने वाली अपनी प्रेमिका के आसपास चक्कर काट रहा हो। दिल की गाथा अनन्त है। दिल जो कहता है, वह भी असीम है। आप कोई महत्वपूर्ण काम करने के मूड में हों कोई आपके समय का वध करने प्रकट हो जाये तो आप अत्यन्त महत्वपूर्वक कहेंगे, 'आइए- आइए ! अजी आजकल तो आप नजर ही नहीं आते, एकदम दूज के चांद बने हुए है । आज इधर कैसे भूल पड़े ?' इन स्वागत वचनो के समानान्तर दिल का स्वगत-कथन भी चलने लगता है-~-आ गया मरदूद ऐन काम के समय ! अब आधे घटे से कम में नहीं टलेगा मनहूस । दिल जो कुछ जवान पर नही ला सका वह सब दिल-ही-दिल मे बयान को समझने का व्यापक अभ्यास किया है मैंने । तब जाकर वह सब वतला पाया हू जो दिल नही बतला सका । मैं नये प्रयोग करता हूं। लिहाजा अब और दिल के बयान नही सुनाऊगा । अपनी तो जैसे-तैसे, थोड़ी ऐसे या वैसे कट जाएगी, लेकिन जनावेआली ! आप यह बताइये कि आपका क्या होगा?
बस, अव वस ! - बस में सवार होना और उसमे सफर करना एक कला है, जिसे हिन्दुस्तानी जनता के सिवा सारे संसार में और कोई नहीं जानता। दिल्ली, कलकत्ता और बम्बई जैसे महानगरो मे बस स्टेण्डो पर लोग जिस वेचनी और तन्मयता के साथ बस का इंतजार करते हैं, वह उत्सुकता संसार के किसी भी प्राणी को लज्जित कर देने के लिए काफी है । रूस और अमेरिका भी अभी तक बसों के मा में ऐसा विकास नहीं किया है कि इन्सान बस के अन्दर ही नहीं, बस के ऊपर भी सफर करे । इसी कारण मंगल और शुक्र ग्रहो के निवासी भी वक्त-बे-वक्त भारतीय बसो का मुआयना करने पधारते रहते हैं और यह देखकर परम आनंदित होते हैं कि इन बसो मे हानं के सिवा सब कुछ बजता है और इन बसों मे आदमियों को भेड़-बकरियों की तरह सफर करना पड़ता है। और इन बसो मे रात मे वीडियो दिखाने की व्यवस्था रहती है, जबकि अधि- काश वसे दिन मे तारे दिखाने का उत्तम प्रबन्ध रखती हैं। एक दिन दैनिक समाचार-पत्र ने सुबह बताया मेरी राशि के सभी महामानवों को आज वाहन-सुख उपलब्ध होगा। दैनिक भविष्य फल के इस आश्वासन के बाद ही मैंने रांची से चाईबासा की अपनी बस-यात्रा का कार्यक्रम बनाया। बस की यात्रा का वैज्ञानिक तरीका यह है कि आदमी सीधा बस स्टैण्ड पर जा पहुंचे और अपने भाग्य के अनुरूप बस पर सवार हो जाय। लिहाजा मैं पहले उस पवित्र स्थान पर पहुंचा, शास्त्रो में बस स्टैण्ड कहा गया है । क्या शोभा थी, वाह ! पहली नजर में तो पहचान ही न सका कि बस स्टैण्ड है या गंगामागर का दलदल । एकदम वाचालों को मूक बना देने और चलने वालो को पंगु बना देने वाला सीन था। उस कीचड़पूर्ण छप्परविहीन स्टैण्ड में बसों के पास (33) पहुंच जाना साधारण पुरुषों के वश की बात नही थी। चिलचिलाती धूप 1 में गदं और कीचड़ से अपने आपको साफ बचाते हुए जो कुछ भाग्यशाली लोग बस स्टैण्ड के बीचों-बीच विराजमान हो सके, उनमें से एक मैं भी था। चाईबासा जाने वाली चटख हरे रंग की बस के बगैर टूटे शीशे वाली खिड़कियों और नर्म मुलायम गद्देदार सीटों को देखकर मन प्रसन्न हो गया। तिस पर बस के खलासी ने इसने आग्रह के साथ पुकारा कि उतने प्रेम से तो मेरी पत्नी ने भी आज तक नही बुलाया है। कच्चे धागे से बंधे हम जाकर बस मे बैठ गए, क्योकि वकील खलासी के बस खुलने ही वाली थी। बस लगभग सवा घंटे बाद खुली, तब तक मेरे साथ हाथ का अखबार समूची बस मे एक सीट से दूसरी मीट तक हस्त-यात्रा करता रहा । बस खुली तो सभी यात्रियो ने इस मंगल वेला में एक-दूसरे को बधाई दी। बस दनदनाती हुई दौड़ती रही। अचानक बस यात्रियों के बीच शोर मच गया कि बस सलत रास्ते पर जा रही है । ड्राइवर महाशय मुश्किल से कुमार्ग पर चल रही बस को सही रास्ते पर ले आये और इसके बाद बस ने रास्ता भूलने की भूल नही की। सौभाग्यवश यह उन कचरा और खटारा बसों में से नहीं थी, जिनका हर पुर्जा असहयोग आंदोलन करता रहता है। इस बस का ड्राइवर जब हानं बजाता था, तब केवल हार्न बजता था। वरना कई बसों में तो हार्न बजाने पर एक साथ कई कल-पुर्जी का कोरस सुनाई पड़ता है । रांची मे ही ओवरब्रिज पार करते-करते उसने इस शहर के नागरिकों और बस के यात्रियो के हार्नवादन का ऐसा सुमधुर कार्यक्रम पेश किया कि मन क्विटल हो गया। यह खूटी जाकर पता चला कि इस महामानव को अखिल भारतीय हानं बजावन प्रतियोगिता में कई बार गोल्ड मैडल मिल चुका है। समूची यात्रा में उसकी हार्न कला के नमूने सुनने पडे । . इस बस में एक अदद टेपरिकार्डर भी लगा था, जिसमें सेट फिट करने का महान कार्य भी हाइवर ही करता था। लिहाजा हर तीस मिनट के बाद वह संगीत- रसिक बस को रोककर कैसेट बदलता था और गीत समानान्तर अपनी - । हानं मासा पेश करता था। हामत यह हो गई कि यासिर में हम सब यात्रियों ने गरी संयुक्त निवेदन किया कि हे दोनों के नाप ! आप करोट रूपी माया को छोड़कर केयन हान रूपी पयार्य पर ध्यान दें। इसके बाद हमे फेवल हान ही हानं सुनाई पड़ा। किसी तरह यस सूटी पहुंची और यहां आधे घंटे तक टगे रहने के बाद आगे की यात्रा पर निकली। मुरहू नाममा गांव में प्रवेश से पहले ही एक जोरदार आवाज के माप बस का कोई टायर फट गया। हमारे ड्राइवर, कंहपटर, सलासी सभी बस का मुआयना करने उतर पड़े। गमूची यस की तीन-चार बार परिक्रमा करने के बाद उन्होंने यह शोध निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि दाहिनी ओर का पिछला पक्का पचर हुआ है। हम सबको वीस मिनट का आकस्मिक अवकाश प्रदान किया गया कि हम मुरहू बस स्टैण्ड पर उपलब्ध अखाद्य सामग्री का सेवन साद्य सामग्री के रूप में कर सकते हैं। वहां मौजूद मिठाइयां बड़ी यहादुरी के साथ मक्खी, धूल और अन्य कीड़े-मकोड़े के साथ जूझ रही थी। चाय की शक्ल देखकर सदेह अलंकार उत्पन्न हो जाता था कि चाय बीच पानी है कि चाय का ही पानी है कि पानी की ही चाय है। लगभग आधे घंटे के बाद जब हम अपनी प्यारी बस के पास गए, तो वस के सभी कर्मचारियो का समूह इस सामयिक विषय पर चितन-मनन करता हुआ पाया गया कि स्टेपनी का सदुपयोग किया जाय अथवा नहीं ? यानियो के विशेष अनुरोध पर उन कलाकारो ने पंचर टायर की जगह स्टेपनी को लगाया और बस एक बार फिर चलने के लिए तैयार हो गई। लेकिन, चल नहीं सकी, ड्राइवरादि अपने कठिन परिश्रम के बाद चाय पीने लगे। लगभग एक घंटे के मुरहू प्रवास के बाद बस को चाईबासा की ओर आगे बढ़ने का चांस मिला। बस ने पहाड़ी मार्ग पर चढ़ना शुरू किया तो अनेक सज्जनों और सज्जनियों ने उल्टी की सम्भावना व्यक्त की। उल्टी आने की स्थिति मे क्या करना चाहिए---इस महत्वपूर्ण विषय पर विभिन्न वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए। इसके पहले कि इस विषय पर यह गोष्ठी एक सेमिनार का रूप धारण कर लेती, बिना किसी पूर्वसूचना के एक लड़के . ( 35 ) ने अपना सारा साया-पीया आसपास बैठे लोगों के ऊपर निकाल दिया। इस घटना बाद जैसे उल्टी का बांध टूट गया हो, एक के बाद एक आठ-दस यात्री उल्टी कर बैठे, चारो ओर गदगी की ऐसी घटा छा गई कि चारा ड्राइवर हानं बजाना भूल गया। उसने किसी कुत्ते के सुपुत्र को बचाने के लिए ऐसा जोरदार ब्रेक लगाया कि समूची बस मे जैसे जलजला आ गया। जो सड़े थे, वे खड़े रह गए और जो बैठे थे, बैठ गए । वस के रुकने का सुपरिणाम यह हुआ कि पास के गाव की जो सन्नारियां बन्द गांव के साप्ताहिक हाट में पदयात्रा करती हुई जा रही थीं, वे सहमा आचार्य विनोवा भावे के सिद्धांत को भूलकर तकनीकी सभ्यता पर विश्वास करने लगी। वे सब की सब वस पर आरूढ़ हो गई। इसके बाद तो बेचारे ड्राइवर और कंडक्टर ने हर गांव की हर महिला को बस यात्रा का सम्मान दिया। सच्चाई यह थी कि नारियों को बस के अन्दर और पुरुषों को वस की छत पर स्थापित किया जा रहा था। बस सब ओर से महामानव समुद्र हो गई थी। कई लोग बस की बोनट पर बैठे थे और बस में खड़े लोगों की संख्या की गिनती नहीं की जा सकती थी। हालत यह हो गई कि जय एक सज्जन को कहीं जगह नहीं मिली तो कृपासागर ड्राइवर ने उन्हें अपने कंधे पर बैठा लिया। बहुत पहले मैंने एक सरकस में शेर को एक छोटे से स्टूल पर बैठा हुआ देखा था। इससे भी बड़ा करिश्मा बस में यह नज़र आया कि बावन सीटो वाली बस पर कम-से-कम पौने दो सौ लोग सवार थे। बस की अगली सीट से पिछली सीट के बीच में कम-से-कम पचास महिलाएं खडी थी और तगभग चालीम लोग छत पर लदे हुए थे। हर कदम पर बस के उलटने की महादशा उत्पन्न हो रही थी, लेकिन ड्राइवर और कंडक्टर नहीं चाहते थे कि आम जनता को बस यात्रा के उनके मौलिक अधिकार से वचित रखा जाय। इसीलिए बस हर हिन्दुस्तानी के स्वागत में रुकती हुई बढ़ रही थी। बसों को पहाड़ से टकराने, नदी में तैराने, खाई में छलांग लगाने, पैदल जनता को कुचलने आदि महान साहसिक कार्यों में सक्रिय बनाने में ( 36 ) ड्राइवर और कंडक्टर दोनों का सुन्दर योगदान रहता है। बन्द गांव के बाद पहाड़ी पाटी के हर मोड़ पर वस का अन्त ही नजर आता था, लेकिन न मालूम किसके पुण्य प्रताप से बस घाटी से साफ उतर गई और समतल रास्ते पर चलने लगी। इस समय तक बस पर सवार यात्रियों के स्पष्टतः दो दल विभाजित हो गए थे और दोनों दलों के घोषणा-पत्र भी जारी हो चुके थे । एक दल मे मेरे जैसे सीटासीन लोग थे, जो रांची से चाईबासा तक की सीधी यात्रा का टिकट कटाकर बैठे थे। दूसरे दल में अननितांत लोकल नर-नारियो का समूह था, जो बन्दगांव से टेबो, टेबो से कराईकेला, कराईकेला से चक्रधरपुर, चक्रधरपुर से खूटपानी जैसी लप यात्राओ के लिए ही बस पर सवार थे। इन सारे लोकल यात्रियों की खूबसूरती यह थी कि इन्हें ड्राइवर और कंडक्टर का असीम स्नेह प्राप्त था। इसकी वजह यह थी कि इन लोगो टिकट नहीं लिया था और कंडक्टर-खलासी को नकद किराया देकर प्रसन्न कर दिया था । खलासी में यह महान प्रतिभा छिपी हुई थी कि वह हर बीस मिनट बाद चलती बस में छत के ऊपर जाकर यात्रियों से पैसे वसूल लाता था । बस मे जनता इस कदर भर गई थी कि गर्मी और शोर के चलते बहुत सारे वीर पुरुपो के भी छक्के छूट गये। मैं जहां बैठा था, उनके सामने की सीट पर बैठे सज्जन ने मुखडा खिड़की से निकालकर पान की पीक इस कलाकारी से बाहर फैकी कि सारी लालिमा वापस बस के भीतर पसर गई। चन्द छीटे हमारे कपडो पर भी आ लगे। यह देखकर हमने बस की खिड़की बन्द करने की विफल चेष्टा शुरू की। खिड़की तो वन्द नहीं हुई, लेकिन इस संघर्ष के फलस्वरूप हमारी कई उगलिया जरूरत से ज्यादा लहू-लुहान हो गई। कभी हम अपने आपको देखते थे, कभी बस को देखते थे और कभी बस पर सवार लोगो को देखते थे कि सहमा बस यम गई । सभी लोग उतरने लगे, तब मालूम हुआ कि बस की टकी का पेट्रोल खत्म हो गया है । अव बस को ठेलकर किसी तरह चक्रधरपुर तक पहुंचाया जाय, ताकि बस अपनी वची-खुची यात्रा पूरी कर सके। कहना न होगा कि इस पुनीत यज्ञ मे सबको हिस्सा लेना पड़ा। चक्रधरपुर में पेट्रोल पीने और आधे घंटे तक विश्राम करने के बाद ( 37 ) बस एक बार फिर चल पड़ी। इस वार वस ने रास्ते के हर गाव के सामने रुकने का नियम बना लिया। इस बस में सफर करना विश्व युद्ध मे लड़ने से अधिक बहादुरी और बुद्धि का परिचायक था। इसीलिए मेरे अधिकांश सह्यात्रियों को चाईबासा पहुंचते-पहुंचते दिन मे तारे नजर आने लगे। बस चाईबासा पधारी तो संतोप हुआ कि जान बची और लाखो लौट के बम से घर को आए । पाए, - एक हैं के० डी० एम० ए० का रिजल्ट निकला तो के० डी० वही थे, जहां उन्हें होना चाहिए था। प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान उन्हें इसलिए नही मिला कि एम०ए० का रिजल्ट निकला तो के० डी. वही थे, जहां उन्हें होना चाहिए था । प्रथम श्रेणी मे प्रथम स्थान उन्हें इसलिए नहीं मिला कि उनके वैच की एक परम सुन्दरी कन्या सहसा आचार्य को अच्छी लगने लगी। के०डी० ने गोटी लाल कर ली थी, लेकिन कन्या उनका चांस खा गई। वेचारे के० डी० को तृतीय श्रेणी इसलिए नहीं मिली कि युनिवर्सिटी ने थर्ड क्लास का सिस्टम ही खत्म कर दिया। सो, के० डी० को द्वितीय श्रेणी मे 36वा स्थान मिला । अत्युत्तम होते हुए भी यह परीक्षाफल के० डी० की प्रतिभा का सही मूल्याकन नहीं करता है। उनकी प्रतिभा और क्षमता ठीक वैसी ही स्थिति उत्पन्न करती है, जिसका सामना न कर पाने पर तुलसीदास ने बार-बार अपने काव्य मे शेप और शारदा का सहारा लिया है। हिन्दी माहित्य को विषय मानकर एम०ए० करने वाले हर प्राणी का यह परम पावन धर्म है कि एम० ए० कर लेने के बाद वह पी-एच. डी० भी करे । हालत यह है कि छात्रगण एम०ए० करते ही घास खोदना शुरू कर देते हैं। घास खोदने की इसी परम्परा को अंग्रेजी में रिसर्च और प्रकारान्तर से पी-एच० डी० कहा जाता है। के० डी० रिसर्च के अनुकूल जल और वायु का संघान शुरू में ही कर चुके थे। इसलिए एम० ए० का रिजल्ट निकलते ही आचार्य के निवास पर जा पहुंचे । आचार्य के अहाते मे लगभग पचास और भी रिसर्बोत्सुक सज्जन उपस्थित थे। के.डी. भी उसी भीड मे मिल गए। लगभग एक घटे की प्रतीक्षा के वाद आचार्य ने बरामदे में आकर दर्शन दिए। उन्हें देखते ही सारे-के- (39) सारे शोधकर्ता सीढियों से अहाते तक साप्टाग की मुद्रा में लेट गए । यह दृश्य देखकर आचार्य धीरे से मुस्कुराए और बोले-'क्या चाहिए तुम लोगो को ?' कोरस स्वर गूंजा-'पी-एच०डी० महोदय । पी-एच०डी० महोदय । पी-एच०डी०।' आचार्य ने तथास्तु की मुद्रा में सिर हिलाया। तब एक सज्जन ने हाथ उठाकर कहा--- -'महोदय मैं डी०लिट० होना चाहता हू ।' उत्तर मिला-'ठीक है, तुम रामचरितमानस को टाइप करवाकर, अच्छी जिल्द चढ़ाकर विश्वविद्यालय में जमा कर दो, दीक्षांत समारोह के अवमर पर आकर डी० लिट० की डिग्री ले जाना।' धीरे-धीरे भीड़ छंटने लगी और अन्त में सोन पर के० डी० अकेले रह गए । आचार्य ने पूछा-'क्यों के०डी० किल बिजली का बिल जमा हो गया? और हा, आज उस शर्मा के बच्चे ने क्या नाश्ता किया है ? बोलो, रिपोर्ट दो।' के० डी० ने रिपोर्ट दी-'बिजली का बिल तो कल ही जमा कर दिया। शर्मा ने आज सवेरे तीन मूली के पराठे खाए हैं और उसके माथ चाय पी। दिन में उनके यहां खिचडी बन रही है, शनिवार है न ?' आचार्य खुश हो गए । बोले-'तुम बहुत मेधावी हो ।' के० डी० ने रोनी सूरत बनाकर निवेदन किया-'आप मारे संसार के बीच पी-एच० डी० और डी.लिट का दान कर रहे हैं। नाथ, किस कारण आपने मुझे बिसार दिया है । मैं भी रिसर्च करना चाहता हूं।' के० डी० का रोना सुनकर आचार्य का मन पिघलने लगा। उन्होंने पुचकारते हुए कहा-'इसमे दुःसी होने की क्या बात है ? तुम भी रिसचं करो। पहले कोई मनपसन्द विषय खोज लो। रिसचं की रूपरेखा बनाओ और कर लो पी-एच. डी०।' के० डी० का मन सन्तुष्ट हो गया। उन्होंने झुककर आचार्य को चरणधूलि ली और सीन से हट गए। यह तय्य तो देवो न जानाति कि के. डी. के साथ आचार्यको ( 40 ) पहली मुलाकात किन ऐतिहासिक पड़ियों में हुई थी। लेकिन मानना पडेगा कि इस बार आचार्य ने बहे परिश्रम के साथ के. ही जसे आदर्श रिसर्च फेलो का संधान किया है। न मालूम, किस गली के कोने से उन्होंने के० डी० को खोज निकाला है। पिछले कुछ महीनो मे ही के० डी० ने अपनी बुद्धि और क्षमता का ऐमा परिचय दिया है कि विश्वविद्यालय के हिन्दीतर विभागो के रिसर्च फेलोगण लज्जा के मारे जल-जल हो गए हैं । के० डी० की प्रतिमा अद्भुत है। हिन्दी विभाग में अब तक ऐमा रिमर्च-फेलो नहीं प्रकट हुआ था, जो इतनी तत्परता के साथ विभाग की मेवा करे, एक सांस मे मारा बाजार-भाव सुना दे और डेढ मन तक का वोझ हसते-हंसते आचार्य प्रवर के निवास तक पहुचा सके। इस दिशा में के० डी० का कौशल बेमिसाल है। वह रिसर्च फेलो होकर भी रिसर्च- फेलो के सिवा बाकी सब हैं और यही के० डी० की विशेषता है । हिन्दी विभाग मे ऐसे मूढ रिमर्च-फेलोजनों की सुदीर्घ परम्परा रही है, जो आलमारियो और पुस्तको के बीच बोर होते रहे । ऐसे भी रिसर्च फैलो हो गए हैं, जो आजीवन रिमचं तो नहीं ही कर सके, इतर दिशाओ मे भी अपनी प्रतिभा नहीं दिखा सके। कुछ ऐसे शोधकर्ता भी पाए गए हैं, जो स्कॉलरशिप के अर्धाश को अपनी भक्ति के नवनीत में लपेटकर आचार्य को समर्पित करते रहे और चैन की बंसी बजाते रहे । के० डी० इतनी घटिया दर्जे की फेलोशिप नही निवाहते हैं। वे रिसर्च भी करते हैं और स्कॉलरशिप भी पूरी भोगते हैं । यू० जी० सी० की निगाह में वे प्रेमचन्द के जूतों पर शोध कर रहे हैं, लेकिन सारा शहर जानता है कि के० डी० बाजार-भाव की रिसर्च करते हैं। किस दुकान की जलेबियां सबसे अधिक स्वादिष्ट होती हैं, यह किसी हलवाई से नही, के० डी० से पूछिये आपको बतलाएगे कि कहां की जलेबिया बासी मंदा से बनती हैं, किस दुकान की जलेबियो में करारापन नही रहता और कोन हलवाई गुड की जलेबिया बनाता है । जव तो हालत यह है कि हम लोग बिना के० डी० से सूचनाएं लिए वाजार जाने या चीजें खरीदने की हिमाकत नही कर सकते। के० डी० की विशेषता यह नही कि वे जी०सी० के रिसर्च फेलो हैं, बल्कि यह है कि उन्हें शहर भर का बाजार-भाव, कण्ठोंने हैं। दुरी दूर से लोग उनके पास बाजार-भाव और जरूरत की चीजों के पते पूछने आया करते है। हिन्दी-विभाग में दिन भर में कम-से-कम एक-सौ तीस ऐसे फोन तो आते ही होगे, जिनका जवाब के० डी० को देनी पड़ती है, की बात यह है कि सूचनाएं कभी गलत नहीं होती । आज तक सिर्फ एक बार यह दुर्घटना हुई है कि के० डी० ने ग़लत दूकान का भाव बता दिया। पूछने वाले ने महावीर भण्डार की पिसी हुई हल्दी की कीमत पूछी और महाव्यस्त के० डी० ने बजरंग स्टोर्स का भाव जल्दी मे बता दिया । इस कारण वेचारे जिज्ञासु को दुबारा फोन करना पड़ा। अन्यथा, इस मामले में के० डी० बेमिसाल हैं । दरअसल, के. ही० व्यक्ति नही, संस्था हैं। मैंने लक्ष्य किया है कि हिन्दी विभाग के हर आयोजन का गुरुतर प्रबन्ध-भार उन्होने अकेले ही वहन किया है। किस हाल में आयोजन होगा, किस टैक्मी पर अतिथि आएंगे, किस मैदान मे फोटोग्राफी होगी, कहां से मालाएं आएंगी और कहा से नाश्ते का माल आयेगा---इन सबकी चिन्ता अकेले के० डी० फरते हैं । आचार्य के० डी० को काम सौपकर वैसे ही निश्चिन्त हो जाते हैं, जैसे त्रेता युग मे राम अपनी अंगूठी हनुमान को सौपकर निश्चिन्त हो गये थे। हालत यह है कि आचार्य केवल खाते, सोते और नित्य कर्म करते हैं-उनके शेष कार्य के० डी० के जिम्मे हैं । इसी कारण के० डी० का ब्रीफकेस सदा आचार्य के चमची और विरोधियो की दैनिक डायरी, विजली और टेलीफोन के बिल, विभाग को मिलने वाले ग्राण्ट के काले और उजले हिसाब, किराना सामानों की लिस्ट और ऐमी ही अन्य अनिवार्य वस्तुओं से भरा रहता है । ब्रीफकेस उनका गुप्त धन है। के० डी० जान दे सकते हैं, ब्रीफकेस नही। कुछ जानकारो का तो यहां तक कहना है कि वे पत्नी के साथ बिताये गये नितात गोपनीय प्रसंगों में भी श्रीफकेस की संगति नहीं छोड़ते हैं। इतना जगजाहिर है कि ब्रीफकेस के० डी० के बहुमुखी व्यक्तित्व का एक अंग है। अधिकतर ब्रीफकेम और के० डी० को एक साथ देखकर मूखंजन यह विभेद नहीं कर पाते कि , ( 42 ) इनमें के० डी० कोन है और श्रीफकेस कोन हैं। उनकी सुविधा के लिए इतना बता देना जरूरी है कि जो लटका हुआ है वह ब्रीफकेस है और जो लटका रहा है, वह के० डी० हैं । जिस समय के० डी० आचार्य के साथ चतते हैं, उस समय का परम आल्हादकारी दृश्य देखकर श्रद्धालुओं का मन झूमने लगता है । के० डी० आचार्य से लटके हुए गोभायमान होते हैं और ब्रीफकेस के० डी० के साथ लटका रहता है । एक दिन के० डी० सब्जी-बाजार में मिले। वे बड़ी तन्मयता के साथ आलुओं पर रिसर्च कर रहे थे और अब ललाट पर उभर आए श्वेत बिन्दुओ को पोंछ रहे थे। मैंने पूछा, 'क्या हो रहा है के० डी० महाशय ?' वे बोले,'आलू खरीदा जा रहा है। आचार्य-श्री के डेरे पर भोज आचार्य महोदय निपट घरेलू मामलों में भी के० डी० की यह निष्ठा देखकर मैं बहुत लज्जित हुआ। सच तो यह है कि सेन्फोराइज्ड निष्ठा इस देश के इतिहास में हनुमान के बाद सीधे के० डी० में जनमी है। सब्जी-बाजार में के० डी० का परिश्रम देखने के बाद आचार्य को बधाई देने के सिवा और कोई चारा नही रह गया। सो, मैं तत्काल आचार्य को ऐसे विरल रिसर्च फेलो की खोज के लिए बधाई देने दौड़ गया। आचार्य प्रवर के निवास पर आयोजित भोज मे के०डी० की प्रतिभा का इस्तेमाल दूर से ही नज़र आ रहा था। जिस प्रसन्न मुद्रा में वे काम कर रहे थे, उसे देखकर शेष मन्दमति चेले-चमचों को प्रेरणा मिल रही थी। उस समय के० डी० बारी-बारी से हर चीज परोसने में व्यस्त थे । अपनी घनघोर व्यस्तता के बीच समय निकालकर के० डी० एक बार मेरे सामने भी आए और उन्होंने कृपापूर्वक पूछा, 'और कुछ चाहिए आपको?' मैं धन्य हो गया। कहा, 'नहीं, इनायत है।'
( 43 )
विनम्रता के साथ सहज स्वर में के० डी० बोले, 'जो नहीं, इनायत
तो नहीं बना है । और कुछ मांगिये !'
यह सुनकर हम सभी बधाई देने जूठे हाथ ही आचार्य के पास पहुंच
गए। सबने एक स्वर से के० डी० की महत्ता की प्रशंशा की । उस दिन
आचार्य ने यही कहा कि के० डी० रिसर्च फेलोशिप के इतिहास मे मील
का पत्थर है।
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कवि के मन कुछ और है." अपनी बात शुरू करने के पूर्व में इस देश को और यहा के कवि- पुंगवों को नमस्कार कर लेना चाहता हूं। यही वह परम पावन भारत- भूमि है, जहां किसी जमाने मे रसिकवर केशवदास को अपने सफेद बालों के कारण चन्द्रबदन वाली मृगलोचनियो से महज़ इमलिए 'बाबा' जैसा भयानक सम्वोधन सुनना पड़ता था कि उन दिनों हेयरडाई कराने का फैशन नहीं चला था। इसी धरती पर कविवर विहारी लाल को प्रति दोहा एक अशर्फी के हिमाब से टिप मिला करती थी। यही ऐसे कवि होते रहे हैं, जिनकी मौजूदगी मे राजा सुन्दरियों की कंचुकी खोलते थे और वेचारा कवि दोहा सुनाने के सिवा और कुछ नहीं कर पाता था। इसी भारतवर्ष में माताएं प्रार्थना करती हैं कि मेरा बेटा कवि बने और जनता को सताता रहे। ऐसे दिव्य कवि इसी देश में पाए जाते हैं, जो बार-बार छूट होकर भी अपनी कविता मुनाने का लोभ संवरण नहीं कर पाते। मैं इस देश और यहां के कवि-कर्म में बिजी प्राणियो को एक साथ नमस्कार करता हूं। कविता की ताजी दशा यह है कि बेचारा कवि कहता कुछ और है तथा रीडरगण उसका कुछ और ही अर्थ निकाल लेते हैं । कवि के मन में कविता लिखते समय जो भाव रहते हैं, पाठकों तक पहुंचते-पहुंचते उनका कायाकल्प हो जाता है । आजाद देश के पाठक और श्रोता इतने आजाद तो होते ही हैं कि कविताओं के अर्थ मनमाने ढंग से निकाल मर्के । इममे मन्देह नहीं कि कविताओं को सुनने, पढने और उनका अर्थ समझने में बड़ा मजा आता है । बोरियत को मधुमती भूमिका में पहुंचकर लोग कविताओ के अर्थ विलकुल निजी शैली में निकाल लेते हैं । एकदम जरूरी नहीं कि अर्थ कवि के भावों से मेल साये। यहां आकर आचार्य ( 45 ) भरत, लोल्लट, शंकुक आदि द्वारा प्रतिपादित साधारणीकरण का सिद्धात गहरी नीद मे सो जाता है और उसके खर्राटों की आवाज भी सुनाई पड़ने लगती है। पाटक और श्रोतावर्ग को कविता का एकदम मौलिक भावाभास और अर्थाभास होने लगता है। इसी मौलिकता के नमूने के रूप में उस महाकवि की कविता की अर्थ व्याप्ति प्रस्तुत है, जिसे निराला जी हमेशा कुश्ती के लिए ललकारा करते थे । सुमित्रानन्दन पन्त की कविताई के सम्बन्ध मे आलोचकों के बीच मत-वैभिन्य है । कुछ की निगाह मे पन्त जी काफी शाकाहारी किस्म के कवि हैं, क्योकि उनकी तीन चौथाई कविता घास, पेड़ और झाडी जैसी चीजों से भरी है । कुछ लोग उन्हे कवियों में सौम्य सन्त भी मानते हैं । इन्ही पन्त जी की कविता के बारे में एक अप्रतिम प्रतिभाशाली छात्र ने अपनी कापी मे लिखा था कि-'नौका विहार' सुनिता कुमारी पन्त की बनाई हुई कविता है, जिसमे राम और भरत के नौका-विहार का वर्णन है। मो, इन्ही महामहिम पन्त जी की 'मौन निमंत्रण' कविता की कुछ पंक्तियां अर्थ की व्यापक बहस के लिए प्रस्तुत की जा रही हैं- 'देख वसुधा का यौवन-भार गूज उठता है जब मधुमास विघुर उर के-से मृदु उद्गार कुसुम जब खुल पड़ते उच्छवास न जाने सौरभ के मिस कौन सन्देशा मुझे भेजता मौन ? इन पक्तियों को सुनकर या पढ़कर किसी भी सहृदय श्रोता या पाठक का हृदय पिघल सकता है। बड़ी ही रसात्मक व्यंजना है । कवि- वर पन्त को इन पंक्तियों में वसुधा का यौवन-भार कवि का रमिक मन साफ देखता है। यौवन कहां-कहां भार डालता है, इसे अधिक डिटेल में लिखने की जरूरत नहीं। हिन्दी कविता के इतिहास के पूरे दो मौ वर्ष इसी की व्यास्या में निकल गए थे। तो पन्त जी का मन वसुधा के दुःसह यौवन भार को देखकर डोलने लगता है। पन्त-साहित्य पर शोध (46) करने वाले विद्वानों को यह प्रसंग और भी उलझाएगा कि हमारे मुहल्ले के रामजीवन वायू की बेटी का नाम भी वसुधा ही है। यह वही वसुधा है जो पिछले साल गमू धोबी के साथ भाग गई थी और साल पूरा होने के पहले ही बिना कलफ लगे कपड़े की तरह वापस आ गई है। यह रिसर्च का विषय है कि पन्त जी को इसी वसुधा के योवन-भार को देखने का चांस मिला था अथवा उनके इलाके में कोई और वसुधा ऐसी ही क्राति कर रही थी। जो वसुधा हमारे मुहल्ले की है, उसका यौवन रूपी भार नितान्त असहनीय है और इसी भार को उतार फेकने के लिए बेचैन होकर वह भागी भी थी। वह लोट आई है, लेकिन भार ज्यों का त्यों है। पन्त की कविताई पर रिसर्च करने वाले स्कॉलर उसके भार को हल्का करने में मदद कर सकते हैं । बेचारे पन्त जी की ट्रेजेडी यह है कि अब बुढ़ापे और बीमारी के मणि-काचन सयोग के कारण वे इस पुण्य के योग्य नहीं रह गए हैं। इसी कारण जब मधुमास गूजने लगता है, तब उनके हृदय के सारे मीठे-मीठे उद्गार विधुर के हृदय की आवाज की तरह बेसुरे हो जाते हैं । 'गुंजन' का यह कवि मधुमास मे बेकरार हो उठता है । सब ओर बसन्त की बहार ! ऊपर से वसुधा का यौवन भार ! प्यार ही प्यार ! क्या करें पन्त जी ? सारे अरमान दब कर रह जाते हैं । लेकिन, कवि की निगाह केवल वसुधा पर ही नहीं थी। कुसुम नामक एक दुमरी बाला पर भी उनकी कृपा दृष्टि थी। सो, अपनी कविता की अगली पंक्ति में उन्होंने उसी कुसुम को सम्बोधित किया है । हे कुसुम ! ऐसी हालत में मन के उच्छ्वास आउटडोर में चले आते हैं। कुसुम की उम्र भी अब पन्त जी जैसी ही हो गयी होगी। कई बच्चों की दादी भी बन गई होगी और अपने घर की नई बहुओ को परिवार नियोजन का मंत्र देती होगी। उस कुसुम को कविप्रवर नही भूले हैं। उसकी याद करके ही उच्छ्वास निकल पड़ते हैं। कविता की अगली पक्तियां पन्त जी को सुकोमल रसिकता को एक बार फिर सिद्ध करती हैं। हमारे पड़ोस मे जो डॉ० सौरभ रहते हैं, उनकी कन्या से भी कवि के मधुर सम्बन्ध हैं । साफ लिखा है-'न जाने सौरभ के मिस कोन ?' सौरभ साहब की पाच पुत्रियां हैं और सभी मिस हैं । अब जो (47) दहेज प्रथा का खात्मा हो रहा है, इससे इन कन्याओं के मिसेज बनने के आसार नजर मा रहे हैं । वरना मिस्टर सौरभ के यहा सबसे बडी मिस की उम्र मात्र चौतीस वर्ष है । अब पन्त जी का कांटा किसके साथ भिड़ा है. यह रिसर्च का विषय है। लेकिन, कविता की इन पंक्तियो से इतना जरूर जाहिर होता है कि सौरभ साहब को किसी न किसी लड़की की ओर से कवि को इम उम्र में भी मौन निमंत्रण आता है। जो लोग छिपकर प्यार का नाटक करते हैं, उनके पास सारे निमत्रण मौन ही आते हैं । वाकी लोगो के पास पत्र या सीटी की शक्ल मे आता है । इम प्रसग पर डी० लिट के योग्य थीसिस तैयार हो सकती है कि पन्त महोदय के पास निमंत्रण की किन मौन शैलियो मे मिस साहिबा का सन्देश आता था। मिस शब्द के अर्थ-वोध में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। पंडित सदन मिश्र के जमाने से ही 'मिस' का अर्थ कुंआरी कन्या है। कुल मिलाकर, पन्त जी की इन पंक्तियों मे कवि महोदय की विविध प्रेमिकाओं का खुले शब्दो में वर्णन मिलता है । वरना हिन्दी के कवि इतने दगाबाज हैं कि कविता में प्रेमिका नाम जरूर बदल देते हैं । जैसे कविवर पन्त की ही छायावादी बिरादरी के एक और महाकवि जयशंकर प्रसाद की काव्य रचना की कलाबाजी द्रष्टव्य है-- 'तुम कनक किरण के अन्तराल में लुक-छिप कर चलते हो क्यों ? नत मस्तक गर्व वहन करते यौवन के धन रसगण ढरते हे लाज भरे सौन्दर्य ! बता दो मौन बने रहते हो क्यों ?' क्या सफाई है ! अन्धा भी यह कह सकता है कि कविता किसी पुरुष को सम्बोधित है। लेकिन सच्चाई यह नही है और वास्तविकता तो यह है कि जयशंकर प्रसाद के काव्य विषय को लेकर बड़ा विवाद है। एक बार किमी ने पूछा भी था कि आपकी कविताओं में जिसका प्रेमपूर्ण व्यापक वर्णन मिलता है, वह पुरुष है या स्त्री ? तब जयशंकर म .
( 48 ) प्रसाद ने हंसकर कहा था कि उसने कभी मेरे सामने से परदा नहीं उठाया है । लेकिन, यह वक्तव्य कवि सुलभ चालाकी के सिवा कुछ और नही । जिस कविता को छः पक्तियो को उद्धृत किया गया है, उसमे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि सारा वाकया कन्याओ से सम्बन्धित है। इन पक्तियो से कवि महोदय के कन्या प्रेम का पता चलता है । काशी के प्रसादयुगीन गजेटियरो से यह मालूम हुआ है कि उन दिनो दाल मण्डी में कनक और किरण नामक वेश्याएं नहीं थी, लेकिन इन नाम की वेश्याए कानपुर में उपलब्ध थी । उन्ही के बहाने कवि ने काशी की किन्ही दो कन्याओ को अपना काव्य विषय बनाया है। पूरी कविता में कन्याओं को पुरुयोचित सम्बोधन दिए गए हैं, ताकि कन्या के गाजियन को उलझन बनी रहे, सच का बोध न हो और पिटाई न हो। वरना सच लिखकर हरिशकर परसाई की तरह पिट जाने में समय नही लगता इस देश में । तो कनक और किरण की ही दोनों प्रतिवेशी कन्याए कवि प्रवर के सामने लुक-छिपकर चलती हैं। सामने आ जाने पर दोनो ही कन्याएं नतमस्तक हो जाती हैं और बाद में लुक-छिपकर देखा करती हैं। यह व्यवहार कवि को पसन्द नही। जिन कन्याओं के यौवन का रसकण चारो और सुगन्ध फैला रहा है, उनका यह छिपा प्रेम कवि को अजीब लगता है । मुहल्ले के कई हीरो हर रोज उन कन्याओ के रसकण में डूबने के लिए आतुर होकर रोडमास्टरी करते हैं। लेकिन, कन्याएं न उनकी ओर ध्यान देती हैं और न कवि को ही खुले तौर पर कोई निमंत्रण देती हैं । इसी तरह कही यह जवानी दीवानी न बीत जाए, इस भय से ब्रेक प्रकम्पित होकर कवि ने सवाल किया है-'हे लाज भरे सौन्दर्य, तुम मौन क्यों हो?' यानी, मौन और लाज का कार्यक्रम कुछ देर ही चलाया जा सरता । इन भावों के परमानेंट होने पर तो कवि और कन्या दोनो का समान अहित होगा। इस तरह इन पक्तियो मे जयशंकर प्रसाद ने अपने मुहल्ले की दो बालाओं के गुप्त प्रेम का अंकन किया है। यह इतना गुप्त है कि डॉ० माता प्रमाद गुप्त, डॉ. दीनदयाल गुप्त और डॉ. जगदीश गुप्त-सम्प्रदाय के आलोचक भी इसकी गहन (49) गुप्तता नहीं भेद सके थे। सच तो यह है कि कविता मे निहित गुप्त तत्वों का सही उद्घाटन पाटक ही कर सकता है। कवि इस कला पर कोई रोक नहीं लगा सकता और न आलोचक ही इस सामले में उसकी कुछ मदद कर सकता है। काव्यार्थ की इस खोजमयी बोधधारा का भविष्य बड़ा ही उज्जत है। इस ही काव्य की आत्मा नही है, शेष आत्माए भी इतनी ही महान हैं और सही पाठक के अभाव में तड़पती रहती है। सो, इन सारी आत्माओं की शांति के लिए हमें मिलकर प्रार्थना करनी चाहिए। ओम् शांतिः ! शांतिः!! शांतिः!!!
वाल वर्ष में मेरी वाल-समस्याए कल जब हम लोग पड़ोस मे चहलकदमी करके लौटे तो दरवाजे पर ही बच्चे बहुत उत्साहित मुद्रा में मिले। बालवर्ष के इस मध्यकाल में ही बच्चों का उत्साह देखकर मन गद्गदायमान हो गया। कुछ पूछने से पहले ही बड़े साहबजादे ने बतलाया- 'आज हम लोगों ने ड्राइंगरूम की सफाई की है।' छोटी बेटी ने खबर दी कि उसने मेज़ का शीशा माफ किया है। इन दोनो के मुकाबले मे बड़ी लड़की ने अभी तक अपनी कारीगरी का बयान नहीं किया था। पूछने पर उसने कहा- 'मैंने टूटा हुआ शीशा उठाकर वाहर फैका।' और, अन्दर जाकर हमने देखा कि ड्राइगरूम वाकई साफ हो चुका था। मेज़ का शीशा गुम था, कोने में रखा आर्टपीस गायब था और आगरा से मंगवाया गया ताजमहल का माडल शायद शर्म के मारे वापस भाग गया था। मैं अपने ड्राइगरूम का वर्णन नहीं कर रहा है। अपनी समस्याओ का जिक्र कर रहा हूं। मेरी चार समस्याएं हैं और ये सभी समस्याएं बहुत प्यारी हैं। जी हां, मैं अपने बच्चो का जिक्र कर रहा हूं। यही वे समस्याएं हैं, जिनसे मैं घिरा हूँ। शादी के पहले मेरे पास बच्चों के पालन-पोषण के बारे में चार सिद्धात ये और आज हालत यह है कि मेरे पास चार बच्चे हैं, सिद्धान्त कोई नही । मेरे बच्चो में किसी को भी समस्या के घेरे में समेट लेने की अद्भुत क्षमता है। आइए, मैं आपका परिचय उनसे कराऊं। बड़े साहबजादे मबसे बड़े हैं । नाम गुल्लू । कुछ महीने पहले तक अपना नाम 'दुल्लू' बतलाते थे, लेकिन अब सयाने हो गये हैं और सीक का बहुवचन झाडू बतलाने लगे हैं। इस सफाई से क्रिकेट खेलते हैं (51) कि खिड़की के तमाम शीशे आउट हो गये है और वक्त-बेवक्त गेंद उनकी बैटिंग से घबराकर हमारे मुखमण्डल की शरण मे आ जाती है। पढ़ने-लिखने के मामले में भी महासीरियस हैं। उन दिनो परीक्षाए चल रही थी तो एक दिन स्कूल से लौटकर सीधे भगवान शंकर की तस्वीर की साइड मे हाथ जोड़कर खड़े हो गए। आंखें मूदकर प्रार्थना करने लगे- 'हे भगवान, गुजरात की राजधानी गया बना दो।' यह प्रार्थना सुनकर हम लोग चकराए। पूछने पर इन्होंने बतलाया कि आज परीक्षा मैं यही लिख आए है। ऐसे ही एक बार गाय पर लेख लिख रहे थे, तो हमने सवाल किया- 'गाय के चमड़े से क्या लाम है ?' जवाब मिला- 'वह गाय को लपेटे रहता है।' इसका मतलब यह नही कि श्रीमान् गुल्लू के पास व्यावहारिकता को कमी है। दरअसल उनकी जरूरत से ज्यादा चालाकी ही हमारी समस्या है। एक दिन मेरे साथ बाजार में घूम रहे थे। श्रीमतीजी की फिक्स्ड डिपाजिट से प्राप्त पैसों मे अल्प बचत करके मैंने साहबजादे को रसगुल्ले खिलाए और समझाया- 'देखो गुल्लू ! आज तुमने जो रसगुल्ले खाए उनके बारे में मम्मी से । नहीं कहना, नहीं तो फिर कभी रसगुल्ले नहीं खिलाऊगा।' इस पर हमारी संतान नम्बर एक ने कहा- 'एकदम नहीं। मम्मी से क्यो कहूंगा? मम्मी घर पर जो मिठाइयां मंगाकर खिलाती हैं, क्या मैंने इसके बारे में आपसे कभी कहा है ?' यह सुनकर हम एकदम यथार्थवादी हो गए और वीर रस में डूयते- उतराते पर पहुंचे। घर के पास आते-आते हमारा वीर भाव शांत रस में बदल गया और श्रीमतीजी सुपुत्र के साथ ठे वात्सल्य रस मे बातें करने लगी। इन साह्य के कारण कई बार विचित्र समस्याओ का ( 52 ) सामना करना पड़ा है। कुछ ही दिन पहले की बात है इनकी मम्मी बाजार से लौटी तो इन्होंने बतलाया--'आज हमने डाकिया बनने का खेल खेला।' मम्मी ने पूछा---'वह कैसे ?' होनहार ने बतलाया--'आपको सन्दूक में पापा की जितनी भी चिट्ठिया थी, वे हमने मुहल्ले भर में बाट दो।' यह सुनने के बाद हमारा मुखारविन्द कितना दर्शनीय हो गया होगा, इसकी आप सिर्फ कल्पना कर सकते हैं । गुल्लू महाराज के साथ सबसे बड़ी ममस्या यह है कि उनके पास सवालों का अक्षय भण्डार है । प्याज के छिलको की तरह उनके सवाल मे से सवाल निकलते चले जाते हैं। मजा यह है कि उनका हर मवाल मौलिक होता है । मसलन मदिर में घटो की जगह कालवेल क्यो नही लगती? लोग गोभी का फूल गुलाव की तरह क्यो नही सूंघते है ? काली मैस का दूध सफेद क्यों होता है ? वगैरह-वगैरह । एक दिन मुझसे बोले, 'पापा ! कल हमारी मैडम कह रही थी, हम लोग गुरुत्वाकर्षण के नियम के कारण ही जमीन पर रहते है, ऊपर नही उठते हैं। क्या यह बात ठीक है ?' मेरे हां कहने पर इन्होंने अपना सवाल दागा--'ऐसी बात है तो पापा, जब यह नियम नहीं बना था, तब यह लोग जमीन पर कैसे रहते थे?' सच तो यह है कि अकेले बडे माहबजादे की कलाकारी का बयान ही पी-एच० डी० की थीसिस जितना भारी-भरकम हो सकता है। लेकिन मुझे तो अपनी शेप समस्याओ का भी परिचय देना है। तो यह है मेरी दूसरी समस्या-मेरी बड़ी बेटी गुड्डी। खाने और वोलने में बहुत होशियार है यह समस्या। घर में कही भी रखी मिठाई और फलों की खोज करने में जब हम लोग फेल हो जाते हैं, तव गुड्डी की प्रतिभा काम आती है। गुड्डी का हाल यह है कि वह पढ़ाई के सिवा हर मामलों में आगे है और हमारे लिए हर रोज एक नयी समस्या खड़ी कर देती है। एक बार उसकी क्लास में स्कूल इंस्पेक्टर आए और बच्चों की परीक्षा लेने लगे। उन्होने सभी बच्चो से चुपचाप आखें ( 53 ) बन्द करने को कहा। जब बच्ची ने आखें मूद ली, तव इस्पेक्टर ने मुह से चिड़िया के चहकने की आवाज निकाली और कहा-'आखें खोलो बच्चों और बोलो मैंने क्या किया?' इस सवाल के जवाब मे सारी क्लास चुप रही, लेकिन हमारी गुड्डी उठकर बोली--'आपने हमारी मैडम की पप्पी ली है।' यह घटना मुझे स्वय गुड्डी की मैडम ने बतलाई थी और यह जानकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई थी कि गुड्डी का जनरल नॉलेज इतना तगड़ा है। वार्षिक परीक्षा में फेल होने के बाद गुड्डी मेरे पास पहुंची और वोली-'पापा! आप आंखें मूदकर अपना नाम लिख सकते हैं ? मैंने कहा--'जरूर, क्यों नहीं।' गुड्डी बोली--- 'तो जरा आंखें मूदकर इस रिपोर्ट-बुक पर अपना नाम लिखकर दिखाइए।' दरअसल गुड्डी के समस्या-निरूपण की अपनी निजी शैली है। उसके पास फरमाइशों का अम्बार है और ठीक यही हाल उसकी छोटी बहन का भी है । जी हां, मेरी तीमरी समस्या मेरी दूसरी बेटी है । नाम है गीता । बहुत छोटी है, करीब तीन माल की। अभी उसने कामता प्रसाद गुरू के हिन्दी व्याकरण के हिसाब से वाक्य बनाकर बोलना नहीं सीखा है, लेकिन यह सीख लिया है कि अपना काम कैसे निकाला जाता है और किससे कौन-सा लाभ उठाया जा सकता है। तो यही समस्या है हमारी कि यह छोटी बेटी अव बोलने लगी है और बोलकर हमे परे. शान कर डालती है । उस दिन मुझी से सवाल कर बैठी कि पटना दुर है कि चन्दामामा। फिर खुद यह फैमला भी उसने दिया कि चन्दामामा नजदीक है और पटना दूर है। वजह यह कि पटना नहीं दीखता है और चन्दामामा रोज ही दीसता है। गीता कुछ दिन तक अंगूठा चूमती फिरती थी। एक दिन हमने ममझाया कि देखो गीता ! अगर तुमने अंगूठा चूसना नही छोटा तो तुम्हारा पेट फूलने लगेगा और आखिर में कट जाएगा। गीता की समझ में बात आ गई और उसने अंगूठा चूमना छोड़ दिया। एक दिन कोई गर्भवती महिला हमारे यहां आयी। उन्हें (54) गीता ने गौर से देखा और बोली-'आंटी ! मुझे मालूम है कि आप क्या करती रहती हैं।' इन दिनों गीता से हम उतने परेशान नहीं, जितने कि अपने छोटे साहबजादे से हैं। यह लघु मानव समूचे घर में सम्पूर्ण क्रांति मचाने के तिए अकेला ही काफी है। उसकी तिकोनी लंगोटी के बारे में आज तक इस फैसले पर नहीं पहुंचा हूं कि इसका लम्ब किघर है, आधार कहां है और कोण कौन सा बन रहा है। इसी तरह मैं अपनी इस चौथी और अंतिम समस्या की मांगों के बारे में भी कोई फैसला कभी नहीं कर सका हूं। संगीतशास्त्र के सभी आरोह-अवरोहो का ठोस ज्ञान है हमारे गुड्डू को। अर्ध-रात्री मे जव यह सगीत छेडता है तो हमको ही नही, समूचे मुहल्ले को मजा आ जाता है। हमारी नीद के इस जन्मजात शत्रु मे विलाप का मूड उस समय भी जगता है, जब मैं कोई जरूरी काम आरम्भ करता है। इधर मैंने शुरू किया और उपर हमारे लधुमानव सप्तम स्वर मे विलाप करने लगते हैं, लिहाजा हमारे काम का बही उपसहार हो जाता है और हम गुड्डू लाल को शांत करने में भगीरप वाली तत्परता दिखाने लगते हैं। इसकी जाग्रतावस्ता भी कम कप्ट- दायक नहीं है। अपने कार्यक्षेत्र में किमी समान को स्थिर छोड़ देना इनके लिए उपजत का सवाल है। कभी-कभी गुहट महाशय का उपयोग इनके बड़े भाई-बहन बड़े मौके पर करते हैं। एक बार हमारे मित्र ने दरवाजा खटखटाया और गूड्डू ने दरवाजा सोला । मित्रवर ने पूछा, 'पापा घर पर हैं ?' गुड्डी बोली, 'नहीं। मित्रयर ने फिर पूछा, 'और कोई है जिममे में बात करूं?' गुड्डी बोली, 'हां, मेरा भाई है।' और वह गुरु सान को गोद में उठा सायो। योलने में असमर्थ और रोने में गोलमेरिस्ट गहा माई को देखकर मित्रयर का जोहान हमा होगा, उगसरी बार ग्ल्पना कर सकते हैं। तो यह हाप है हमारे पापों का उगमस्थानों सा भी दीवार पर कोयले से निगेमिना ( 55 ) लेखो को पढकर पता लगाते हैं कि यह किसका नाम है। कभी हम चादर पर स्याही के धब्वे को देखकर अपने बालगोपाल को याद करते हैं। कभी हम सोफे पर चढ़ाए गए कवर को देखकर खुश होते है कि इसे हमारे ही होनहार बच्चों ने ब्लेड से खण्ड-खण्ड किया है । यानी समूचे घर मे इन महानुभावों की छाप मौजूद है और हम सबको बाल वर्ष पर भरपूर सुख मिल रहा है।
सब चलता है ठीक सौ साल पहले कविवर मैथिली शरण गुप्त का जन्म हुआ था और तब से लगातार उनसे मिलने के प्रोग्राम मैं बनाता रहा, लेकिन अपनी व्यस्ततावश उनसे कभी न मिल सका। हारकर बेचारे अब से वाईम साल पहले अनंतयात्रा पर निकल गए और ताजा समाचार यह है कि आज तक नहीं लौटे हैं। कल उनकी 'भारतभारती' के पन्ने पलटने का चास मिला तो यह देखकर परम प्रसन्नता हुई कि राष्ट्रकवि भी ठीक मेरी ही तरह देशदशा से दुवले होते रहते थे। उनकी तस्वीरें गवाही देती हैं कि वे दुबले-पतले सज्जन थे और स्थिति यह है कि खाकमार भी वैमी ही हेल्थ का स्वामी है तथा भविष्य में राष्ट्रहित के लिए ककड़ीवत होने के लिए भी तैयार है। लेकिन अपना देश इतना महान और विशाल है कि मेरे जैसे लोकमंगलकारी प्राणी की सेवाएं प्रचुर मात्रा मे नही ले रहा है। अन्यथा मेरे पास मेवा का थोक स्टॉक है। अफमोस तो इस बात का है कि इधर हम अपनी प्राइवेट समस्याओं को शटिंग मे डालकर देश सेवा के लिए व्याकुल हैं और उधर सब चलता जी हा, सब चलता है। यह अकेला महामत्र ही इम महामानव समुद्र को चला रहा है। आप कहीं भी कुछ भी करने के लिए परम फ्री हैं । आप किमी भी दफ्तर के किसी भी कमरे में जब चाहें तब ससम्मान प्रवेश कर मकते हैं। विद्यार्थी जब चाहें तब कक्षा में पधार सकते हैं और इच्छानुमार महाभिनिष्क्रमण भी कर सकते हैं। रेलो और बसो को यह पूरी छूट प्राप्त है कि वे अपनी मर्जी से चलें और जनता को यह अधिकार प्राप्त है कि वह रेलों और बसों पर अपनी मर्जी से लदे। बोलने वाले को सुविधा मिली हुई है कि यह शांतिपूर्वक बोले और सुनने ( 57 ) वाले को यह छूट उपलब्ध है कि वह शांतिपूर्वक सोए। हालत यह है कि हर दिशा में सुविधा एक्सप्रेम दौड़ रही है और हर एतराज का एक ही रेडीमेड जवाब है- -~-सब चलता है। यही कारण है कि बीच राह पर किसी गाय या बैल को अनशन की मुद्रा में विराजमान देख कर किसी मच्चे भारतवासी के मन में एक सेंटीमीटर भी आश्चर्य नहीं होता। वह सड़क ही क्या जिसके बीचों-बीच स्थापित होकर गौमाता अथवा उनके वंशज मनुष्य-चालित वाहनों को ब्रेक मारने के लिए विवश न करें । वह महक ही क्या जिस पर चांद की तरह हर कदम पर क्रेटर न हो। बरसात के मौसम मे जल और स्थल का भेद मिटा देने वाली प्राकृतिक छटा इन सड़कों पर अपने चरम उत्कर्ष पर रहती है। राह चलते हुए आपका पैर कीचड़ की ताजी आईसक्रीम से सन जाए अथवा पास से मुजरती हुई कार के प्रसादस्वरूप मापके कपड़े वीरगति को प्राप्त हो जाएं तो आप किसी से शिकायत नहीं कर सकते हैं । आप अपनी राह कोई फिल्मी गीत गुनगुनाते हुए बांई ओर की फुटपाथ पर जा रहे हैं और उसी फुटपाथ पर सामने की ओर से आ रहे किसी वेगवान पुरुष से आपकी टक्कर हो जाए, तब भी आप उन्हें बाई ओर चलने का हितोपदेश नहीं सुना सकते हैं। वजह यह कि यहां सब चलता है। इस महामंत्र का साकार रूप उस दिन नजर आया था जिस दिन मैं पटना से गया आने वाली ट्रेन पर सवार हुआ। ट्रेन नियमानुसार अपने निश्चित समय से नब्वे मिनट विलम्ब से - चली और पटना शहर के विभिन्न मुहल्लों में तीन बार रुकते-रुकते बची। मेरे सामने बैठे हुए सज्जन ने मेरे हाय का अखबार आदि से अंत तक बांच लेने के बाद ऐसी हिकारत भरी नजर से मेरी ओर देखा, जैसे डांट रहे हों कि यही सड़ा हुआ अखबार खरीदते है आप? उनके सवालिया मुखड़े से सहम कर मैं अपना अखबार पढ़ने लगा और थोड़ी ही देर बाद पाया कि ट्रेन एक आदर्श भारतीय गांव के सामने रुक गई है और चंद रेल यात्री ट्रेन से सधन्यवाद उतर कर गाव की ओर प्रस्थान कर रहे हैं । यह देखकर मैंने अपने सहयात्री के सामने ध्यानाकर्षण प्रस्ताव रखा कि ट्रेन को इस तरह -- T (58) थोड़े से प्रामवासियों की सुविधा के लिए नही रुकना पाहिए । वे अत्यन्त वीतराग महात्मा की तरह बोले."सब चलता है।' ट्रेन चल पड़ी तो हमारी बातचीत का सिलसिता भी चल निकला। मैंने उन्हें बताया कि शहरी मे सरेवाज़ार लूट और हत्या की वारदात आम हो गई हैं, तो उन्होंने फरमाया कि सब चलता है। मैंने उन्हें बताया कि यह देश इंजीनियरों और ठेकेदारो का स्वर्ग बन गया है तो वे उतनी ही तत्परता से बोले कि सब चलता है । मैंने कहा कि भ्रष्टा- चार का झरना ऊपर से नीचे तक बहता चला जा रहा है, तो उन्होंने सूचित किया कि सब चलता । मैंने जब बताया कि पटना में एक महिला ने पांच बच्चों को जन्म दिया है, तब भी वे उसी सदा सुहागन शैली में बोले कि सब चलता है। वे बर्फी की तरह चौकोर सज्जन थे, लेकिन अपना यह छोटा सा वक्तव्य इमरती की तरह घुमावदार स्टाइल मे प्रस्तुत करते थे। मैं आपादमस्तक उनकी छवि निहारने लगा कि यह कंसा महामानव है जिसकी संवाद-योजना 'सम चलता है' से आगे ही नही बढ़ रही है ? तभी पास बैठे हुए एक अन्य महापुरुष सहसा खडे हो गए और डिब्बे में लगे रोशनी के बल्वो को अत्यंत मनोयोगपूर्वक निकालने लगे। मासपास के कई बल्वों को उतार कर उन्होंने अपने झोले में डाला। वह झोला भी प्राचीनकाल मे प्रथम श्रेणी की सीट- कवर काटकर बनाया गया था। अपना झोला हाथ में लेकर वे खतरे की जजीर खीचने लगे। यह देखकर मैंने अपने सह्मात्री को एक बार फिर कुरेदा, लेकिन वे इस बार भी इतना ही कह सके सब चलता है। जंजीर खीचने के परिणामस्वरूप ट्रेन रुकी तो झोलाधारी सज्जन उतर कर'सामने के गांव में समा गए। उनके सम्मान में ट्रेन तब तक रुकी रही, जब तक वे वापस ट्रेन मे नही पधारे। मैंने उन्ही से निवेदन किया कि आपके सौजन्य से यह ट्रेन आधे घंटे तक क्यो रुकी रही, उन्होंने हंसते हुए निवेदन किया कि सब चलता है। यह तो एक यात्रा की कथा सुनाई हमने कि समूचा देश कितनी निश्चिन्तता से चल रहा है। सच तो यह कि देश-दशा की-चिन्ता करने वालों को भी अच्छी तरह पता है कि बेहतर चिन्ता करने से लाभ (59) कुछ भी नहीं है। हम चाहे देश की दुम लाख सीधी करना चाहें, यह टेढ़ी की टेढ़ी ही रहेगी। 'सब चलता है' का मंत्र जिसने रट लिया है और इसका रहस्य जान लिया है, वही वास्तविक सिद्ध पुरुष है । बड़ी-बड़ी संगोष्ठियो और कार्यसमितियों की बैठको के बाद अत मे यही निष्कर्ष सामने आता है कि चलने दो यार, सब चलता है । पिछले साल में एक अखिल भारतीय संस्था के अखिल भारतीय आयोजन में गया था, जिसमे सातवी कक्षा के छात्रों के लिए हिन्दी की पाठ्य-पुस्तक तैयार करने की तैयारी की गई थी। समूचे हिन्दुस्तान से आये विद्वानो ने 'आवाम की व्यवस्था पर संतोप व्यक्त किया और नाश्ते में चटनी के अभाव पर खेद प्रकट किया। इस विषय पर सभी महानु. भाव एकमत थे कि रात का खाना लजीज़ होता है, लेकिन सभी असन्तुष्ट थे कि भोजन के बाद मीठे का इंतजाम नहीं है। कुल मिलाकर स्थिति यह रही कि अतिथि और उनके स्वागती सब-के-सब जलपान और भोजन की शास्त्रीय चिन्ता मे ही लगे रहें । समारोह के समापन के दिन सातवी कक्षा के पाठ्यक्रम निर्माण का भार एक जूनियर टीचर पर डालकर सभी अपना-अपना टी० ए० बिल स्वीकृत कराने में व्यस्त हो गए'। एक परा- कमी विद्वान से मैंने समारोह की उपलब्धियों पर प्रकाश डालने के लिए कहा, तो उन्होने वही अमर वाक्य दुहराया - सब चलता है। यानी सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा। हम सब कुछ नही कर सकते । हम कुछ करें या न करें, स्थिति यह है कि सब चलता है । अब कल शाम का किस्सा बयान करता हूं। टेलीविजन के पिटारे के सामने सपरिवार बैठकर मूंगफली की ताजी किस्मों की पैदावार के बारे में अपना ज्ञानवर्धन कर रहा था कि मुहल्ले के बालगोपालों का समूह हमारे ड्राइगरूम में घुस आया। थोड़ी देर में उनकी मम्मियों और आटियों का जत्था भी सारीर हाजिर हो गया। इसके बाद बिना हीग- फिटकरी जैसे आइटमों के ही सीन पर ऐसा रंग चोखा आया कि मुहल्ले के टी०वी० दर्शकों को कमरे मे छोड़कर मैं पत्नी और बच्चों के साथ घर से बाहर निकल आया। बच्चे अपनी नाराजगी व्यक्त करने लगे तो . 1 1 (60) हमारी अर्धागिनी ने उन्हें शान्त करते हुए फरमाया कि चुप रहो, यह सब तो चलता ही रहता है। इस तरह चलते रहने की महादशा यह है कि कल हमारे मुहल्ले के उभरते हुए कुछ हीरो हमारे पड़ोमी कृष्णगोपाल बाबू के अन्त.पुर में घुस याये और उनकी नई नवेली बहू के चारों ओर शृंगार रस का वातावरण बनाकर सधन्यवाद लौट गए । उनका तर्क था कि आजाद देश में जन्म लेने के कारण इस देश में कही भी कुछ भी करने का जन्मसिद्ध अधिकार उन्हें प्राप्त है। अपनी बहू और कन्याओ के निर्माता-निर्देशक कृष्णगोपाल बाबू परमहंम की मुद्रा मे शांत हैं। उन्हे मालूम है कि कुछ नही किया जा सकता, यह सब चलता ही रहता है। अपने सनातन तक और अधिकार के सहारे मुहल्ले के होरो गण आज सबेरे मेरे यहां भी पधारे और वह सारा गाजर का हलवा घट कर गए जो मेरी निजी पत्नी ने खास मेरे लिए परोसा था। हलवे की समाप्ति पर मेरे बच्चों की श्रीमाता अभी तक स्वगत भाषण कर रही हैं और मैं खुश हूं कि नई पीढ़ी का आक्रमण हलवे तक ही सीमित रहा । एकदम रामराज्य है। ऐसा सुहाना वातावरण पहले कहां था ? चारों ओर आजादी पसरी हुई नजर आती है। मन के किसी कोने में अगर यह सवाल जगा कि देश का क्या होगा जनाबे आली, तो हर सवाल का एक ही जवाब है-सब चलता है । कही कोई छिपाव, कही कोई बनावट नहीं है। ठेकेदार परिश्रम- पूर्वक ऐसी सडकों और पुलों का निर्माण करते हैं, जिनका निर्माण कार्य ममाप्त होने के पहले ही मरम्मत का टेण्डर निकल आये। डॉक्टर सिर्फ अमीर रोगियों में रुचि लेते हैं और नेताओं के बारे मे तो कुछ भी कहना बड़ा मुंह और सड़ी बात होगी। अफसरो और पुलिस की कया तो और भी अकथनीय है । हालत यह है कि- गोली मेरे नाम की जित देखो तित गोल । गोली लेने दे गये, वे भी हो गये गोल ।। हमारे आसपास जो कुछ भी है सब साफ-साफ है। बिना किसी के पनाए सब कुछ अपने आप चल रहा है इसीलिए उस दिन विश्वविद्यालय (61) में डिग्री मात्र के लिए विचरण करने वाले युवकों और युवतियों का परम पावन आचरण नजर आया तो मन गद्गद हो गया । सारा समु- दाय कालेज के अहाते में इस महान समस्या पर नारेबाजी कर रहा था कि छात्रों के कामनरूप में अभी तक वी०सी०आर० क्यो नही लगा है। भीतर स्टाफरूम में शिक्षकगण चिन्तन कर रहे थे कि आज तो इस नारे- बाजी के फलस्वरूप कक्षा में जाने से बचे, कल कोन बहाना काम आयेगा अन्त मे यह फैसला किया गया कि कल यदि लाख समझाने पर भी छात्रों ने हड़ताल नहीं की तो हड़ताल कराने के लिए हम लोग हड़ताल कर देंगे । एक महावरिष्ठं शिक्षक ने यही टिप्पणी की कि-सब चलता बात की शुरुआत हमने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की देश-चिंता से की थी और वास्तव में उसी विन्दु पर टिकना भी चाहिए । बार-बार टॉपिक से बहक गया हूं। इधर अच्छे लेखक की यही पहचान हो गई है कि वह मच्छरों की जनसंख्या के बारे में लिखना शुरू करे, तो आसानी से पालक की साग और नई शिक्षा की चुनौतियों आदि पर भी अपने अमूल्य विचार व्यक्त कर दे। मैं भी कई बार बहका हूं, इसलिए निश्चय ही महान लेखक हूं । विषयान्तर से आप निराश न हो। क्या कीजियेगा, सब चलता है ! ।
तलाश एक दूल्हे की ठीक इसी मौसम मे एक बार मैं अपनी शादी में सम्मिलित हुआ था। उसके बाद में दुबारा अपनी शादी में आज तक शामिल नहीं हो पाया हूं। लेकिन हर साल इस मौसग मे शहनाइयों का शोर जरूर सुनता हूं। बारातो की धूम लगातार सुनाई देती है, दूल्हो की सजावट चकाचौंध पैदा करती है और दुल्हनों की गंध वेचन कर डालती है । इस साल भी शादियो का मौसम आ गया है। भारत-भूमि पर विचरने वाले असंख्य कुमारी और कुमारियों की आजादी पर रोक लगने का सीजन आ गया है। पिछले साल यह मौसम आया था तो हर आगन में दूल्हे के पधारने पर इकलौता सवाल पूछा जाता था कि मेरे अंगने मे तुम्हारा क्या काम है ? इस साल सवाल बदल गया है। इस साल की केन्द्रीय समस्या यह है कि फुलोरी बिना चटनी कैसे बनेगी। इस अनूठे महत्वपूर्ण सवाल की गूज हर मुहल्ले की हर गली से आ रही है। फुलोरी बिना चटनी नहीं बन पाने के कारण संतप्त अनेकानेक विवाहोत्सुक नायिकाओ का दुःख हर गांव हर शहर में फैला हुआ है। हमारी चिन्ता भी यही है । कन्याएं इतनी थोक मात्रा में हैं और उनके लिए योग्य वरों की सप्लाई मांग के अनुपात मे अत्यन्त शोचनीय है। तेरह साल हो गए अपनी शादी को और तब से दूल्हा बनने लायक अच्छे लड़कों का इस जम्बूद्वीप पर घोर अभाव हो गया है। मैं कितना अच्छा लडका था, अब क्या बताऊँ ? दूर-दूर से लोग देखने आते ये और अपनी सुकन्या को हमारे चरण-कमलो की दासी बनाने के लिए विकल हो उठते थे । आजकल वैसे लड़के मिलते कहां हैं ? एकदम अकाल पड़ गया है । हालत इतनी नाजुक हो गई है कि पिछले महीने मैंने विवाह के लिए उत्सुक दो कन्याओं को रेलवे स्टेशन पर एक-दूसरे के गले में --- (63) लिपटता हुआ देखा । यानी दो दुल्हनें मिलकर एक दूल्हे का काम करने की कोशिश करने लगी है । यूरोप मे तो लड़किया आपस मे शादियां भी करने लगी हैं। इसका कारण यही है कि सारे संसार मे अच्छे लड़कों का लोप हो गया है। सब ओर दूल्हों की तलाश चल रही है, लेकिन सेहरा वाधने के लिए आदर्श नौजवान धरती पर कितने रह गए है ? इस साल दूल्हे की तलाश का व्यापक अनुभव मुझे मिला। दरअसल पिछले साल से ही हमारी साली क्रम संख्या दो में विवाह को बेचनी जनता को दिखाई देने लगी थी। उसने पढ़ना-लिखना छोड़ दिया था और पूरी एकाग्रता से गोल-गोल चपातिया तैयार करने में जुट गई थी। वैसे इस वालिका की बनाई चपातियां कभी बिहार के नक्शे जैसी लगती हैं तो, कभी पूरे भारतवर्ष का मानचित्र मय नदी-पहाड़ों के साकार हो उठता है । उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि वह चुस्त न होते हुए भी चुस्त दिखाई देती है। स्मार्टाभाव में भी स्मार्ट दिखने की कला में वह पद्मविभूषण है ।.वह कपड़े ऐसे पहनती है कि देखने वालों की जान निकल जाती है और मजे की बात यह है कि वह खाना भी वैसा ही पकाती है कि खाने वालों की जान निकल जाए। अपनी सहधर्मिणी की इमी सबसे छोटी बहन की शादी के लिए दूल्हे की तलाश करने निकला तो पता चला कि इस इलाके में कैसा सन्नाटा छा गया है। हमारे जमाने में ऐसा हाल नहीं था। मेरे मुहल्ले में ही अच्छे लडको के कई नमूने थे। सबसे अच्छा नमूना तो मैं खुद था और दूसरे नम्बर पर शम्भूनाथ थे । एक बार जब अपनी एक मंगेतर के साथ सफर करने का चांस शम्भूनाथ जी को मिला तो बड़ी देर तक बात शुरू ही नहीं हुई। आखिर बड़ी तकलीफ के साथ गला साफ करके उन्होने कहा-'माफ कीजिएगा, आप 'इमी बस से सफर कर रही हैं ?' इस सज्जनता का फल यह हुआ कि वह मगेतर किसी और की पत्नी बन गई । इधर शम्भूनाथ जी' भी वैसे कहाँ रह गये हैं । शादी शुदा हो गये हैं और शादी की हर सालगिरह पर 'उक्त बसगामिनी आर्य पन्या की याद मे एक मिनट का मौन जरूर रखते हैं । दरअसल हमारे जमाने के लड़के इतने अच्छे होते थे कि लड़कियां उन्हें लिपट नहीं देती थीं। उन दिनों अच्छी सड़कियों का संकट था।
( 64 ) आज अच्छी-से-अच्छी लडकियां हर घर में करीने से सजी हुई हैं तो अच्छे लड़के नदारद हैं। अफसोस तो इस बात का होता है कि एक से एक भूकम्पकारी कन्याओं के इस दौर मे हम कुवारे नहीं हैं। सचमुच शादी ने हमें अवमूल्यित कर दिया, वरना हम भी आदमी थे काम के। खेर मैं अपनी साली नम्बर दो के लिए दूल्हे की तलाश की चर्चा कर रहा था । नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे सिर्फ एक दूल्हे की तलाश में जब भट- कना पड़ा तव मालूम हुआ कि कन्या राशि के विवाह में अभिभावक समुदाय को कितने किस्म के पापड़ कितनी शैतियो में बेलने पड़ते हैं । सबसे पहले मैं अपने एक सम्पादक मित्र के पास गया। उन्होंने पिछले ही साल अपनी पंचवर्षीय बेकारी का समापन कर एक पत्रिका के सम्पादक की कुर्सी हथिया ली थी। मैंने प्रस्ताव रखा कि इस महीने शादी के मुहूर्त बहुत अच्छे हैं, इसतिए हे मम्पादक जी, आप मेरी साली को पली स्वरूप स्वीकार करें। सम्पादक महोदय तमाम साहित्यिक दोस्ती भूल गए। फरमाने लगे-- 'जी नही, मैं इतनी जल्दी कोई चीज स्वीकार नहीं कर लेता । इस- लिए विवाह के लिए पत्नी भी मुझे कम-से-कम तीन माह पहले प्राप्त हो जानी चाहिए।' हम लोग सम्पादक जी को पत्नी एडवास ही सौंप देने के मूड में नहीं थे। लिहाजा दूल्हे की तलाश में आगे बढ़ गए। हमारी फुआ की ननद के देवर के ससुर साहब ने एक लड़के का पता दिया। हमे बताया गया कि लड़का बहुत बड़े होटल का जनरल मैनेजर है, उसका परिवार बहुत सम्पन्न है, सौ-दो-सौ लोग तो सुबह शाम उसके यहा भोजन करते हैं । जब हम सोग लड़के के घर पहुंचे तो मालूम हुआ कि उसका घर सचमुच बड़ा सम्पन्न है । लड़का अपने सभी भाइयो मे सबसे छोटा पा। उसके आठ बड़े भाइयो में से प्रत्येक की कम-से-कम चार सन्तानें थी। लड़का एक ढाबे का मैनेजर था और वाकई सुबह-शाम उसके यहां सौ- दोसो आदमी भोजन करते थे। यह सब देखकर हम इतने प्रसन्न हुए (65) कि ताजा खरीदा अखबार वही छोड़कर चले गए। इसके बाद एक और दूल्हे की तलाश में। हम लोग पास के शहर में गए। लड़के के पिता ने सबसे पहले वर-वधू की जन्म-पत्रियां मिला लेने का आग्रह किया। वे एक-दूसरे से इस हद तक मिलती हुई दिखाई पड़ीं कि लड़की लड़के की बजाय जन्म-पत्रियों का ही विवाह कर दिया जाता तो उनका वैवाहिक जीवन बड़े आनन्द से बीतता । जन्म-पत्रियों का सुन्दर समन्वय देखकर लडके के पिता वहुत प्रसन्न हुए । वार्ता के दूसरे चरण में उन्होंने दहेज की चर्चा शुरू की । मैं प्राचीनकाल से ही दहेज देने का विरोधी रहा हूं। कम-से-कम साली की शादी में दहेज देने के पक्ष में मैं एकदम नही हूं। लगभग एक दशक बाद मेरे लड़के की शादी होने लगेगी, तब तक शायद दहेज के बारे में मेरे विचार बदल जाएंगे। लेकिन अभी दहेज के बारे में मेरे जो विचार हैं, उन्हें सुनकर लड़के के पिता ने वार्ता का सहसा समापन कर दिया । सीन पर राष्ट्रीय धुन बजने लगी और हम सब उठ खड़े हुए।' दूल्हे की तलाश करते हुए मैं एक ऐसे घर में भी गया जो बेहद कलाकारी से सजा हुआ था । जब हम लड़के को देखने गए उस 'समय वह अपने घरेलू कुत्ते को चिकन सूप पिला रहा था । वाह ! क्या लड़का था और क्या कुत्ता था। दोनों ही इतने साफ-सुथरे और सजीले थे कि बहुत देर तक हम यही फैसला नहीं कर सके कि इनमे लड़का कौन है और कुत्ता कौन है । जब लड़के के पिता ने अपने सुपुत्र को बुलाया, तब जाकर हमारी ग़लतफहमी दूर हुई । जिसे हम अब तक कुत्ता समझते थे, वही लडका था। उसके मजबूत हाथों मे अपनी साली का कोमल हाथ सौंपने का दुःसाहस मेरे पास नहीं था। इसलिए हम वहां से भी लौट आये। दूल्हे की तलाश चल ही रही थी कि अपने परम मित्र सुरिन्दर लाल की याद आ गई। इतने आदर्श लड़के पर अब तक नजर नहीं गई थी। सुरिन्दर लाल को अच्छी नौकरी मिल गई है और देखने-दिखाने के काम भी आ सकता है। एक ही कमजोरी है अपने दोस्त में कि वह अपना दिमारा हमेशा अपने घर की एक आलमारी मे बंद रखता है। इसी कारण (66) उसकी बातें कभी-कभी मज़ाक मे उड़ा दी जाती हैं। तो सुरिन्दर लाल के पास अपनी साली की शादी का प्रस्ताव लेकर गया तो मित्रवत् साफ नकार गए। कहने लगे कि उनके यहां अपने ही रिश्तेदारो से शादी करने का रिवाज है। मसलन, उनकी मां ने पिताजी से शादी की थी, दादा ने दादी से की, काका ने काकी से की वगैरह वगैरह । एक पूरी लिस्ट है इस परम्परा की । इस सफाई के बाद हम वहा से बैरंग वापस आ गए। दूल्हे की तलाश चल रही है और वह नहीं मिल रहा है तो बड़ी थकान होती है। अपने अभिभावकों की इसी दुर्दशा को देखकर होशि- यार लड़किया अपने आप किसी के साथ शादी तय कर लेती हैं। आम जनता इसे लव-मैरेज कहती है, लेकिन इसी बहाने लड़कियों को वर तो मिल जाता है । इधर मैंने अपनी साली को कई बार यह आइडिया दिया है कि लव-मैरेज कर लेने से उत्तम रास्ता किसी भी भारतीय ललना के लिए शेष नहीं रह गया है । दूल्हो का ऐसा अभाव हो गया है कि बिहार के कई इलाको मे तो लोग लड़को का अपहरण कर अपनी लड़कियों के हाय पोले कर डालते हैं । वरो की तलाश मे दौड़ते-दौड़ते हम लोग खुद पीले हो गए है। बदहवासी का आलम यह है कि इस साल मैं अपनी शादी की सालगिरह तक भूल गया। कल रात जब घर में पर एक चिट्ठी पड़ी मिली-'आज हमारी शादी की सालगिरह है। जाकर बेड रूम में देखिए, कितना शानदार उपहार पलंग पर रखा है।' दौडादौडा बेडरूम में गया तो देखा पलंग पर हमारी श्रीमती जी सो रही हैं। नए दूल्हे की तलाश तो समाप्त नहीं हुई है, लेकिन मेरी भूतपूर्व दुल्हन को उसका भूतपूर्व दूल्हा मिल गया है। घुसा तो टेबुल - हमारे लायक कोई सेवा माफ कीजिएगा ! बहुत दिनों के बाद आपकी सेवा मे हाजिर हुआ हूं। इसका एकमात्र कारण यही है कि सेवा कार्य के लिए कुछ अन्य क्षेत्रों में भी मेरी मांग बढ़ गई है और वक्त-वेवक्त मुझे कई इलाको की सेवा करनी पड़ती है तो अब आपकी सेवा मे हाजिर हूँ। फरमाइए, हमारे लायक कोई सेवा हो तो..! जी बिल्कुल सही कहा आपने ! यह विशाल देश एक के बाद एक सेवकों से वीरान होता जा रहा है । पंडित नेहरू चले गए, शास्त्री जी नहीं रहे, निराला जी चल बसे, फिराक भी दिवंगत हो गए। देश और 'साहित्य के वैसे सेवक इन दिनो कहां रह गए हैं। हालत यह है कि इन 'दिनों में भी बीमार चल रहा हूं । लगातार इस चिन्ता मे घुला जा रहा हूं कि इस देश से सेवाधर्म का लोप हो ही जाएगा क्या? लेकिन नहीं, सेवा की राजधानी एक्सप्रेस अभी बंद नहीं हुई है। उसे हर छोटे-बड़े स्टेशन पर लाईन-क्लीयर मिल रहा है। सेवा ही धर्म है। मैं हूं आप सवकी सेवा के लिए । हमारे लायक कोई सेवा बताए! है सज्जनों और सुमुखियो ! बरसात का सीजन आ गया है । काले- काले बादलों को देखिए जो घुमड़-घुमड़ कर गर्जना कर रहे हैं जैसे वीर रस का कोई कवि मंच पर 'शोर मचा रहा हो। काले-काले मेघो से बिजली बार-बार चमक रही है, जैसे कोई गृहणी अपने इकलौते पति को बार-बार डांट रही हो । लगातार बारिश के कारण लोग जहां-तहां छिपे हुए हैं, जैसे पतियों का समूह पलियों के भय से अखबार में मुंह छिपा चुका हो। जल भर जाने से सड़कों पर झील और नदियों का सीन उपस्थित हो गया है, मानो किसी सिनेमा हाल में नई फिल्म लग गई हो। सब ओर हरियाली छा गई है, धरती पर सब कुछ बदल गया .
(68) . है, मानों किसी वेतनभोगी का ट्रांसफर ऊपरी आमदनी वाली जगह पर हो गया हो। ऐमी ही बारिश को देखकर कभी इंशा अल्ला खां ने फरमाया था कि- 'लगी है मह की झड़ी चलो वाग में मूलें। कि झूलने का मजा भी इसी बहार में है।' लेकिन बारिश की बहार में भूलने का मजा बटोरने लायक पोजी- शन मे अभी आपका यह बंदा नही है। अभी तो हम सेवा के मूड में हैं। सच तो यह है कि बरसात ने हमारे सामने सेवा के अनन्त चांस परोस दिए हैं। सब ओर पानी ही पानी है वातावरण मे सेवा की गंध समा गई है । मैं सोता हूं तो सेवा में, जागता हूं तो सेवा में । सेवा और हमारे बीच दूसरी कोई पार्टी आजकल नहीं है । याई-द-वे यह बात बता देना बहुत जरूरी है कि सेवा से हमारा इदारा हमारे मुहल्ले की कुमारी सेवा श्रीवास्तव से कतई नही है। कुमारी सेवा श्रीवास्तव में यह अनूठी प्रतिभा है कि उनकी एक आंख मारने से पर्दा हट जाता है और दूसरी आख मारने से छोरा पट जाता है । लेकिन यह किस्सा फिर कभी, अभी तो मैं खालिस सेवा की चर्चा कर रहा हूं कि बरसात ने हमारे सामने, बहुत सारे अवसरो का स्टाक जमा कर लिया है। आप हमारे लायक सेवा तो बताइए...! प्रसन्नता की बात है कि इस वर्ष हमारे गाव की ओर बड़ी अच्छी • बाढ़ आई है और मैं वाढ़ग्रस्त इलाके की सेवा का चांस नहीं खोना चाहता हूं। बस एक अदद हेलीकाप्टर का सवाल है । इधर हेलीकाप्टर का इन्तजाम हुआ उधर मैं बाढ़पीडितो की सेवा के लिए सीन पर हाजिर हुआ। अपने अब तक के सेवाकाल मे मैंने ऐसी अनेक बाढ़े देखी हैं और हर बार परम सन्तोष का अनुभव किया है। अकाल और दंगे भी देखे हैं लेकिन बाढ़ देखने का मजा ही कुछ और है। गाव-के गांव बाढ़ मे डूबे रहते है, गाव,के मर्द घर का सामान बचाने में व्यस्त रहते हैं और ग्राम पधुएं हिन्दी-माहित्य के शृंगारकाल को साकार करती रहती है । हर . साल की तरह इस साल भी में सेवा करने के लिए तैयार हूं। प्लीज इस (69) बाढ़ग्रस्त गांव का पता बताइए, जहां की कन्याएं और युवतियां देखने में देखने लायक होती हैं। सेवा करने का अपना मिशन मैं अपने शहर में भी पूरा कर सकता हूं। मैं इस शहर की सड़कों की सेवा करना चाहता हूं जिनकी शक्ल इम बरमांत ने बिगाड दी है। ऐसा आइडिया इतनी होशियारी से सड़क की मरम्मत करने का है कि अगले साल बरसात मे सड़क एक बार फिर मरम्मत का इन्तजाम करने लगे। माशा है मुझे ही सड़कों के उद्धार का ठेका प्राप्त होगा। हो सकता है कि बरसात में बनाई गई सड़कें अगले साल तक ठीक ही रह जाएं, लेकिन मेरा पूरा विश्वास है कि दो बरसाने मेलने के बाद सड़क जरूर बुरी तरह घायल हो जाएंगी। अभी नई सेवा शुरू की है इस क्षेत्र में अनुभवी जनसेवक ठेकेदार तो इतनी खूबसूरती से सड़क बनाते हैं कि आगे सड़क बनती जाती है और पीछे-पीछे मरम्मत का कार्यक्रम भी शुरू हो जाता है। सड़क मरम्मत करने की कला तो मेरी सेवा का एक नमूना है। दरअसल बरसात के इस सीजन में मेरी आत्मा हर कदग पर सेवा करने के लिए व्याकुल रहती है। कल शाम की बारिश का हाल सुनेंगे आप ! सेवा का जमाना ही नहीं रह गया है, वरना कल शाम सेवा का जैसा गोल्डन चांस मिला था, उसे कोई भला आदमी नहीं छोड़ना चाहेगा । मेन रोड पर घनघोर बारिश के बीच मैं चला जा रहा था कि साइड में एक सुकन्या भीगती हुई नजर आई। उसे बेतरह भीगता देखकर सेवा करने का सनातन उत्साह जोर मारने लगा और हमने अपने छाते में उस हसीना को चलने का निमंत्रण दिया। लेकिन कन्या की फरमाइश यह थी कि छाता उसी के पास रहे। हम ठहरे जन्म के सेवावती। छाता उसे तपाक से सौंप दिया और खुद बारिश में मराबोर होने लगे। जल्दी ही पोजीशन यह हो गई कि हम तो नख से लेकर शिख तक पानीयम हो गए थे और वह सुन्दरी हमारा छाता लेकर लापता हो गई। इधर हम अपने-आपको. बारिश की बूंदों से बचा रहे थे और उधर सुन्दरी अपने आप को हमसे बचाती हुई हमारे छाते के साथ न मालूम कब, न मालूम किस गली. .
1 (70) समा गई । सेवा भावना के इस परिणाम पर अभी हम विचार कर ही रहे थे कि सामने से एक सुन्दर जोड़ी आती हुई दिखी। पत्नी का पूरा का पूरा शरीर छाते के बाहर था क्योंकि महिला के शरीर के आयतन से छाते का आकार छोटा था। उनके पति बेचारे भीगते हुए चल रहे थे। मुझे अफसोस हुआ कि हमारे पास छाता नहीं है वरना पति महो. दय की जरूर ही सेवा करता। एक बार ऐमी ही घनघोर वारिया में हमने एक डाक्टर साहब की सेवा की थी। मैं उनके ही मुहल्ले में गया था और यह देखकर अत्यन्त संतप्त हुआ कि मात्र पन्द्रह रूपये फीस ' होने के बावजूद कोई मरीज उनकी सेवा मे नहीं जा रहा था। हारे को हरिनाम की तरह मैं उनकी सेवा मे गया और उनसे बोला कि जरा मेरे घर चलकर मेरी पत्नी को देखें । धेचारे डाक्टर ने उम मूसलाधार बारिश में कार निकाली और मुझे लेकर बाईस किलोमीटर का सफर तय कर मेरे घर आए । कार से उतरते हुए मैंने उन्हें धन्यवाद दिया और उनकी फीस भी सौंप दी। डाक्टर साहब मेरी पत्नी के बारे में पूछने लगे तो मैंने अपनी सेवा भावना को स्पष्ट कर दिया। इस बरसात में कोई टैक्ती पचास रुपये से कम में नहीं मिल रही थी। लिहाजा मुझे डाक्टर साहब की सेवा करनी पड़ी। बिना किसी रोगी को देखे उन्हें फीस मिल गई। इस किस्म की सेवाओ के लिए मैं सदा तत्पर हूं। एक सेवा तो यही कर सकता हूं कि जब कभी इस बरसाती मौसम मे आपके कपड़े गन्दे हों, तब मैं आपको सही सलाह दूंगा कि किस लांडी मे देने पर आपकी कमीज बिना बेटन टूटे वापस मिल सकती है और आपकी धोती बिना फटे लौट आएगी। दरअसल नि.शुल्क सेवा का एक सिलसिला मेरे मामने है। कई बार मुझे देखकर संताप होता है कि लोग बारिश खत्म होने के बाद भी छाता लगाए घूमते हैं। ऐसे लोगों की भी सेवा में करना चाहता हूं। लोग अपना-अपना छाता लेकर पधारें, मैं सबके छातों में बड़े आकार का एक छेद कर दूंगा, ताकि भविष्य में उन्हें पता चल सके कि बरसात चल रही है अथवा रुक गई है। ऐसा ."
(71) करने के लिए मैं आप सबका आपके रंग-बिरंगे छातों के साथ इन्तजार कर रहा हूं। मेरे पर पधारने वाले हर मज्जन और दुर्जन का एक सूत्री कार्यक्रम यही रहता है कि मैं उनकी सेवा करूं। अपने ही घर में लोगो से इतना घिरा रहता हूं कि किसी और के घर जाकर सेवा करने का चांस ही नहीं मिलता। हमारे पडोसी मिश्रा जी तो महीनों से अपने घर बुला रहे हैं। उनकी पांच अदद कन्याएं भी इस लायक हैं कि उनकी सेवा करके मन को आनन्द प्राप्त हो सकता है। लेकिन व्यस्तता इतनी है कि उन कन्याओं की सेवा भी नहीं कर पा रहा हूं। मेरी कोशिश तो यही रहती है कि सेवा का कोई मौका चूकने न पाए। सडक पर और बस में, रेल में और कार्यालय में सब जगह लिखी हिदायतो के अनुरूप सेवा करने के लिए में तैयार हूं। लेकिन सारी की सारी फरमाइशें पूरी हो सकती हैं भली ? कोई अकेला आदमी कितनी सेवा कर सकता है ? फिर भी हमारी कोशिश जारी है। उस दिन बस में बैठते ही मैंने सिगरेट सुलगाई ही थी कि कन्डक्टर ने टोक दिया-'देखिए आप सिगरेट नहीं पी सकते। साफ-साफ लिखा है वहां-सिगरेट पीना मना है । आप पढ़ नही सकते क्या? मेरे मन में आया कि कहूं--पढ़ तो सकता हूँ भये लेकिन मैं क्या- क्या पढ़ और किस-किस हिदायत के अनुसार सेवा करूं। मैं जहाँ बैठा था उसके पास ही एक बोर्ड पर लिखा था कि हमेशा हैन्डलूम की साड़ियां ही पहनिए। अब भला यह सेवा मैं कैसे कर सकता हूं। एक बार किसी पाच सितारा होटल में भटक रहा था तो वहां हर पांच कदम के बाद एक डिब्बा रखा मिला जिस पर लिखा था- यहां थूकिए । अब साहब हम थूकते-थूकते परेशान हो गए ! हारकर एक सज्जन से सवाल किया कि भाई साह्न अगर किसी का थूक खत्म हो जाए तो वह इस होटल मे क्या करेगा। भाई साहब ने कोई जवाब नहीं दिया लेकिन मेरे मामने यह सब पूरी तरह उजागर हो गया कि हम सबकी फरमाइश पूरी नहीं कर सकते। हम और आप सब मिलकर सेवा का कोई अखिल भारतीय (12) प्रोग्राम बनायें, तो बात बन सकती है। जहा चार मार मिल जाते हैं, वहाँ रात गुलजार हो जाती है और जहाँ हम मर मिल जायेंगे वहां पूरे चौबीस घन्टों के गुलजार होने में देर नहीं लगेगी। आगे समाचार यह है कि इन दिनों में मुख्य रूप अपनी पली की सेवा मे व्यस्त हूं। इसके बावजूद आपको बिना हिचक अधिकार है कि फरमाएं ! मेरे लायक कोई सेवा हो तो अवश्य बताएं।...
नए एम० पी० का स्वागत ऐ पालिश करने वाले छोकरे, ठीक से पालिश कर ! पता नहीं अब फिर कब पालिग करना नसीब हो तुझे ! बस, नए एम० पी० के आने की देर है । फिर तो उचक कर इम्पाला पर चढ़ ही जाएगा तू! अवे ओ मूंगफली वाले 'तू भी कंजूसी मत कर । सीधे नमक की आठ पुडिया थमा दे। अरे यार ! थोड़ी देर के बाद तो तू दिल्ली के अशोका होटल का मैनेजर बन जाएगा फिर कहां यह खोमचा और कहां मूंगफली ? बस नए एम.पी० के आने की देर है । अजी ओ बड़े बाबू ! क्यों परेशान हो रहे है आप ? बस, नए एम० पी० के आने की देर है । आप सीधे कलक्टर बन जाइएगा। आखिर पब्लिक का चुना हुआ एम. पी० आ रहा है कि मजाक है। कुल मिलाकर वातावरण बड़ा सुधारवादी हो गया है । होनहार विरंवानों की पीढ़ी आज विशेष उत्साह में है। कोई रिक्शे से उतरने के बाद बिना किराया चुकाए गरीब की हाय को अपनी वीरोचित घुड़की से दबा अहाते में घुस आया है । कोई अपने मुहल्ले की दुकान से नि.शुल्क उठा कर लाई हुई सिगरेटो को मुक्त हृदय से वितरण कर इस प्रकार प्रशसित हो रहा है, जैसे विशुद्ध वार का माल हो । कोई अपने कालेज के प्रिंसिपल को चुनी हुई लोकल गालियां देकर सहपाठी इष्टमित्री की आत्मा को पवित्र कर रहा है। कोई अपने लम्बे वालों में निष्ठापूर्वक कंघी फेर रहा है। कोई चौडी बेल्ट के सदुपयोग का संदेश देकर सेव बेचने वाले कृशकाय बूढे की टोकरी में से कौतुकवश कुछ सेव उठा रहा है। सर्किट हाउस के आस-पास का वातावरण देश के इन भावी कर्णा- धारों के सहयोग से घोर उत्साहमय हो गया है। दूर से ही लगता है कि 4 (74) हंसी-खुशी के ऐसे माहौल मे देश प्रति मिनट तीन किलोमीटर की रफ्तार से सुनहरे कल की ओर बढ़ रहा है। भारतवर्ष के भविष्य के प्रति इस सीमा तक आशान्वित होने का सबल कारण यही है कि आज यहां नए एम० पी० का शुभागमन होने वाला है। बस, उनके आने की देर है ! फिर क्या यह शहर ऐसा हो सडियल रह जाएगा? नए एम० पी० के पर रखते ही धरती हीरे-मोती उगलने लगेगी। सारी सडकें अपने आप साफ हो जाएगी। नालियों से विनाका कोल्ड क्रीम की मदमाती सुगन्ध आने लगेगी । मलो से गगाजल के साथ-साथ पार्टटाइम दूध भी सप्लाई होने लगेगा । तमाम गरीबों की झोपड़ी मे फूल की मार्फत नोट बरसने लगेंगे । दूर-दूर तक गरीब और गरीबी का पता-ठिकाना नहीं मिलेगा। बम नए एम० पी० के आने की देर है । आह ! आ गए नये एम० पी० । भए प्रकट कृपाला। क्या निराली छवि है। भूपन वनमाला नयन विशाला। शारदा और शेप भी उनकी वर्तमान छटा का वर्णन ठीक-ठीक नही कर सकते हैं । नेति नेति के सिवा और क्या कहा जा सकता है ? वे खली कार में आये हैं । कार में मात्र छ: प्राणियों के योग्य स्थान है, तथापि उदार हृदय एम०पी० ने चौदह-उत्साही जनों को चढ़ा लिया है । उनका यश चलता तो कुछ अन्य लोगों को कार के विभिन्न बचे हुए हिस्सों पर भी बंठा लेते। इस विलक्षण भार और स्नेह के अतिरेकवश कार नितांत मंथर गति से चल रही है। प्राचीनकाल में गजगामिनी स्त्रिया इमी चाल में घूमती-फिरती थी। कार को सर्किट हाउस के अहाते के बाहर ही रुकना पड़ा है। महामानव समुद्र उमड़ा है यहां। ऐसे में कार अहाते के अन्दर कैसे जाएगी महामहिम एम० पी० महोदय अपनी कार से उतर रहे हैं । जनता का बहुमत है कि पास पड़ा कूड़े का ढेर उनकी परण-धूलि सटते ही विस्कुटों में बदल जाएगा। अफसोस इस बात का है कि चमत्कार घटित होने से बाल-बाल बच गया। लोगों ने एम० पी० को जमीन पर उतरने ही नहीं दिया। एम. पी. अपने, चरण कमलों को कष्ट देकर सर्किट (75) हाउस के बरामदे तक जाना चाहते हैं, लेकिन जनता यह बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं कि उनकी आंखो के तारे एम० पी० की सुकोमल चप्पलो मे धूल लगे । सो, लोगों ने कंधे पर टांग लिया है। ऊपर उठने पर भी एम० पी० का चेहरा पूरी तरह नहीं दीख रहा है । शताधिक फूल-मालाओं से बोझिल है। उनकी गर्दन एवं नाक भी पुष्प मालिकाओं में डूबी हुई है। देश की युवा शक्ति उनकी जय-जयकार मचाने मे व्यस्त है। अब यात्रा बरामदे तक पहुंच गई है, लेकिन बरामदे मे पहुंचकर भी लोगों ने एम० पी० को धरती पर नहीं उतारा है। एक टेवुल पर खड़े हो गए हैं श्रीमान् ताकि देश-देशान्तर से आए लोग उनके विधिवत् दर्शन कर अपने इहलोक एवं परलोक को संवार सकें। दोनों कर-कमलों को जोड़कर एम०पी० ने ,जनता-जनार्दन को प्रणाम किया । जनता धन्य हो गई । प्रणाम मिला, तो लाखों पाए । अपनी-अपनी जेवों में एम० पी० का प्रणाम भरकर धीरे-धीरे लोग वापस होने लगे, क्योकि एम० पी० को लोगों ने सकिट हाउस के एक कमरे में पहुंचाने का अनुष्ठान पूरा कर दिया है। 2 'कमरे की दशा अनिर्वचनीय है। पलग, टेवुल और सारी कुर्सियों पर एम० पी० के चमचे और वेलचे बिछे हुए हैं। फर्श की हर सेन्टीमीटर ज़मीन पर शहर के प्रतिभाशाली विद्यार्थी ज्ञान-पिपासु मुद्रा में खड़े हैं । और, अपनी सहज सज्जनतावश एम. पी० महोदय एक छोटे-से स्टूल पर सुशोभित हैं। एम० पी० ने गले की मालाएं उतारनी शुरू की हैं। एक साथ कई हाथ इस कार्य में सहायक बन रहे हैं । जल्दी ही दर्शकों के सामने फूल- मालाओ को एक पहाड़ी कमरे के बीच बन गई, जिसे मनचले स्कूली छात्र उठाकर बाहर ले गये। कमरे में रह गये एम. पी०, उनके शिष्य और उनके भी शिष्य ! -भीड़ अब संतुलित और चुनी हुई रह गई है । एम०पी० ने चैन की दीर्घ मांस ली है और यह देखकर शेप जन बेचन हो गए हैं। मयने एक-एक कर अपनी समस्याओं का प्रस्तुतीकरण एम० पी० . 1 '.. । . m । (76) सामने शुरू कर दिया है। एम० पी० पानी पीना पाहते हैं और सोग उन्हें पचनामृत पिला-पिलाकर संतुष्ट कर रहे हैं । पकान के मारे एम. पी० की आंमें बार-बार झक रही हैं, लेकिन जनता का उत्साह कम नहीं हुआ है । लोग एम० पी० की आस में उंगली डालकर अपनी बात सुनाने के लिए कृतसंकल्प हैं । हेर सारी समस्याओ और पटनाओं की मप्रसंग व्याख्या करने के बाद जय सामान्य जनों की याणी शान्त हुई, तो छात्र वर्ग के विशिष्ट जन गामने आए। छात्रो ने एम० पी० के मामने उम युगोतकारी समस्या को प्रस्तुत किया, जिसके फलस्वरूप हमारा देश अभी तक अमेरिका और रूम के मुकाबले में खड़ा नहीं हो सका है। यानी देग तो आगे बढ़ना चाहता है लेकिन इस विश्वविद्यालय का मूद कुलपति धी०ए. की परीक्षा की तिथि न बढ़ाकर उसके मार्ग मे सासे बड़े साइज के रोडे अटका रहा है। छात्रों का विश्वास है कि बी.ए. की परीक्षा की तिथि बढ़ा दी जाय तो भारत रातो-रात टाप पर पहुंच जायेगा, इतना तय है। एम. पी० ने भी समस्या की गम्भीरता को अपने सूखे गले और थके शरीर में महसूस किया है । उन्होंने तत्काल याशा व्यक्त की है कि विश्वविद्यालय के कुलपति आदि कीट-पतंग जैसे प्राणी इस ज्वलंत समस्या का समाधान शीघ्र करेंगे। छात्रो का यह भी आइडिया है कि उनसे जो टकराता है, वह चूर- चूर हो जाता है और अब मन्दगति कुलपति के चूर-चूर होने के दिन निकट आ गये हैं। कुछ विद्यार्थियों का यह भी मत है कि कुलपति को घर-चूर करने की खास जरूरत नहीं है उस राठ का इस्तीफा ले सेना ही पर्याप्त होगा, अन्यथा यह देश कभी तरक्की नहीं कर सकेगा। इस शास्त्र चर्चा में एम० पी० का मन नहीं लग रहा है। वे आराम करना चाहते हैं इसी समय नगर रिवशा संघ के मेम्मानित सदस्यों का हसा प्रवेश कमरे में हो रहा है। उनका विचार है कि एम० पी० को इसी क्षण मृत रिक्शा चालक घुरहू प्रसाद की शव यात्रा में हिस्सा लेना चाहिए। जबकि छात्र नेताओं को सम्मति है कि एम०पी० को सबसे ( 77 ) पहले शहीद स्मारक पर जाकर फूल और आंसू गिराना चाहिएं। कुछ लोग कुछ अन्य कामों में एम० पी० के सदुपयोग के लिए चिन्तित हैं । और एम. पी० के लिए इसके सिवा और कोई चारा नहीं रह जाता है कि आराम का संकल्प छोड़कर वे शहीद स्मारक या घुरहू प्रसाद की शव- यात्रा या किसी और स्थान पर जाकर जनसंपर्क करें। वे पूरी शक्ति के साप उठ खड़े हुए हैं। एक बार फिर फूल मालाएं उनकी सुराहीदार गर्दन में गिर रही हैं। लोग फिर उन्हें कंधे पर टाग चुके हैं। सब ओर एम०पी० की जय का निनाद हो रहा है। एम० पी० का स्वागत सर्किट हाउस के बाहर भी होने वाला है। बाहर खड़ी भीड़ ने पलक और पांवड़े दोनो रास्तों पर बिछा दिए है और अपनी तमाम वांछे खिलाकर महामहिम एम०पी० की प्रतीक्षा हो रही है । एम० पी० बाहर निकल आए हैं। इस बार भी वे कंधे पर आसीन है। उनका दुबला-पतला नाटा शरीर लगातार इस कंधे से उस फंधे पर ट्रांसफर हो रहा है। लेकिन लोग उन्हें जमीन पर उता- रने के लिए तैयार नही हैं । यह खतरा भी बना हुआ है कि उनकी चरण- धूलि लगते ही शहर के सभी कूड़ेदानी में उत्तम कोटि के केक प्रकट हो जाएंगे। लिहाजा एम०पी० जनता के कंधों पर ही आसीन है । कार की ओर ले चलने का इशारा एम० पी० कर रहे हैं, लेकिन प्रेमीजन उन्हें कार मे बैठाने के मूड मे नही हैं । उनका तर्क यह है कि जनता के एम० पी० को जनता के साथ विना कार चलना चाहिए। लाचार एम०पी० को कंधों पर ही चलना पड़ता है। सड़क भरी हुई है । बीच में कुछ लोग एम० पी० को ढो रहे है, जब कभी एम. पी० गिरने लगते हैं, लोग उन्हे थाम लेते हैं। एम० पी० फिर आकाश की ओर उठ जाते हैं। हालत यह है कि एम०पी० को कंघा नामक नई सवारी के आविष्कार का पता चल रहा है और जनता को खुशी है कि नये एम० पी० का पूरा शरीर उस पर लदा हुआ है। हर मोड़ पर एम० पी० को हाथ मिलाना पड़ रहा है। कुल मिलाकर एम० पी० को लग रहा है कि स्वागत जोरदार है। ++ होली-2088 आज 15 मार्च, 2088 की दुपहरी मे हमारे शहर के अण्डरग्राउड कंप्यूटर सेण्टर पर काम करने वाले कई स्वयंचालित रोबोट अचानक एक साथ शोर मचाने लगे। इस शोर के कारण कई शार्टकिट वाले रोबोटों का तो सारा सिस्टम ही क्षतिग्रस्त हो गया। मिनटों में प्रशासन को पता चल गया कि कप्यूटर सेण्टर के उपद्रवी रोबोटों ने एक दूसरे पर लुब्रिकेटिंग आयल का छिडकाव किया, जिसके फलस्वरूप राष्ट्रीय आय में 00.6489 प्रतिकोण की क्षति हुई। शारजाह में जन्मी नीली आंखो वाली एक रोबोट कुमारी पर भी इस हलचल का असर देखा गया। उसने अपनी तमाम सहेलियों पर विक्षिप्ततावस्था के इस दौर में पालीथीन के अंडाकार गुब्बारे फैके, जिनमे राशन-कार्ड पर इशु करने के लिए मानव- को परिशुद्ध कर बनाया गया जीवन रक्षक जल भरा हुआ था। दूरभाष के सुपर एक्सचेंज में तो कुछ रोबोट अपने साथ काम करने वाली मादा रोबोट से छेडखानी करने पर आमादा हो गये। मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट के कारण दाहिने पर से जरा लंगड़ाकर चलने वाले एक बाईस वर्षीय रोबोट ने हलचल के इस दौर में ऐमी छलांग लगाई कि अपने तमाम पुर्जे तोड बैठा और उसे राष्ट्रीय रोबोट निगम के कूडेखाने में पहुंचाया गया। इन सारी गड़बडियों के तुरन्त बाद नगर प्रशासन को एक आपात- कालीन बैठक हुई। बैठक के पहले ही सुपर कंप्यूटर से इन विसंगतियो के कारण की जानकारी ली गई। सुपर कंप्यूटर ने बताया कि अब से सो साल पहले इसी दिन हिन्दुस्तान में होली नाम एक त्योहार मनाया गया था। उसी अतीत का एक झोंका शहर के कुछ इलाकों में घुस आया और इतनी सारी तबाही मचा गया । इस तवाही पर विचार-विमर्श के अध्यक्ष- " -- (79) लिए हुई बैठक में करीब चालीस प्रबुद्ध नागरिकों को प्रशासन ने आमंत्रित किया। इनमें सोलह तो रोबोट ही थे। बैठक की अध्यक्षता भी एक रोबोटं ने ही की, क्योंकि उसके बुद्धि अंक सर्वाधिक थे । -रोबोट ने यह मूलभूत सवाल उठाया कि होली किसे कहते हैं ? सभा में मौजूद रोबोट एक दूसरे का मुंह देखने लगे, क्योंकि सभी पच्चीस साल से भी कम उम्र के होली से अपरिचित यंत्र-मानव थे। बैठक में एक बूढ़ा आदमी भी था करीब साठ साल का। उसने अध्यक्ष रोबोट के पास अपना टेलीपथिक संदेश भेजा कि वह होली के बारे में कुछ कह सकता है। अध्यक्ष की अनुमति पाकर बूढ़ा आदमी कहने लगा- 'दोस्तों ! अपने बचपन में हमने सुना था कि होली के दिन हिन्दुस्तान के लोग एक दूसरे पर रंग और अबीर फेंका करते थे। हमारे डंडी ने बताया था कि लोग सड़कों से गुजरते थे, तो बच्चे बाल्टियों में रंग उनके ऊपर गिराते थे। हर मर्द-औरत होली के रंगों में सराबोर रहते थे। हमने भी अपनी जवानी के दिनो में चम्मचों-कटोरियो मे रंग भरकर मुहल्ले की भाभियों को भिगोया था। अब तो वह सब सम्भव ही नहीं हैं। हर इतवार को एक लीटर पानी सप्लाई होता है आजकल, लेकिन अव से सौ साल पहले लोग। सभा में मौजूद लोग चकित भाव से मुंह बाये यह सब सुन रहे थे। एक प्रतिभाशाली रोबोट से नहीं रहा गया तो वह बोल उठा-'हद हो गई, पहले का आदमी कितना पानी बर्बाद करता था?' - बूढ़े आदमी ने कहा-'यही नही, आपको यह जानकार और भी अचम्भा होगा कि उस जमाने के लोग होली के दिन दूध और चीनी के बने तरह-तरह के पकवान खाते थे। इन दिनो चीनी के कैप्सूल मिलते हैं, जबकि सौ साल पहले चीनी बाजार में आठ रुपये में हजार ग्राम मिलती.पी । चालीस रुपये में हजार ग्राम चीनी तो हमने भी खरीदी थी अपनी जवानी मे । चीनी के साथ दूध मिलाकर।' बात को बीच मे ही काटते हुए एक युवा आदमी ने पूछा-~'दूध ? । म - . H " (80) उसी दूध का जिक्र कर रहे हैं जिसे हम अपने राशन कार्ड पर दस बूंद प्रति यूनिट प्रतिदिन पाते हैं ?' 'हां वही दूध !'-~पूढे आदमी ने कहा-'उसी दूध का खोआ बनाया जाता था, उससे तरह-तरह की मिठाइयां बनती थी। एक जमाने मे चावल और दूध-चीनी मिलाकर खीर बनती थी, जिस पर केसर और इलायची...।' एक रोबोट ने बीच में ही यह मौलिक प्रश्न किया कि यह इलायची क्या चीज होती है ? बूढ़े आदमी ने सूचित किया कि राजधानी के राष्ट्रीय संग्रहालय के खानदान प्रकोष्ठ मे इलायची का एक दाना सुरक्षित रखा है, जिसका दर्शन किया जा सकता है। सभा के अध्यक्ष ने होली के बारे मे कुछ और जानकारियां चाही, तो बूढ़े आदमी ने होतिका जलाये जाने का उल्लेख किया। उन्होने बताया कि सौ साल पहले लोग शहर के चौराहे पर घर का कूड़ा एकत्र कर उसमें आग लगाते थे और चारो ओर से उसे तापते थे। उन्होने यह भी सूचित किया कि होलिका दहन की यादगार में उनकी उम्र के बूढे लोग अपने गैस लाइटर को ,जलाकर ताप लिया करते हैं । इस जानकारी ने नई पीढी को बेहद उत्तेजित कर दिया। एक नौजवान ने तो यह अफसोस जाहिर किया कि पुराने जमाने के लोग अपनी मूर्खतावश ऊर्जा के सबसे महान स्रोत कूड़ा-करकट को बुरी तरह नष्ट करते रहे। एक युवा रोबोट ने इस आशय का कानून बनाने का सुझाव दिया, जिससे होली के नाम पर बूढ़े गैस बर्बाद न करें। 2088 के प्रवुद्ध नागरिकों की सभा के अन्त मे होली मनाने की सो साल पहले की परम्परा की तहेदिल से भत्सना की गई। आशा व्यक्त की गई कि देश के होनहार वैज्ञानिक कोई ऐमी तरकीब निकालेंगे जिससे होली जैसी पुरानी रूढ़ियों को हवा वायुमण्डल को दूषित न कर सके। उन सारे नर और मादा रोबोटों के खिलाफ कारण बताओ नोटिस तत्काल जारी किया गया, क्योकि अनुशासन ही देश को महान बनाता है होली नहीं। - T " पुलिस प्रकरण की मानवता एक मुहल्ले में पुलिस सम्प्रदाय सज्जनों में चन्द मिठाइयो को किसी मिष्ठान विक्रेता से बिना धन्यवाद 'प्राप्त किया, तो किसी दूसरे मुहल्ले मे पुलिस समुदाय के सदस्यो ने इसी शैली में कुछ पटाक्षे हासिल किये । बस बात इतनी-सी है और अफमाना बन गया। होना तो यह चाहिए था कि इधर मिठाई की कोई दुकान सजती और उधर मिठाई का एक-एक टोकरा ससम्मान आसपास के सारे पुलिस कमियों के आंगन में पहुंच जाता । इधर गली में पटाखों की कोई दुकान खुलती और उधर सभी किस्म के पटाखो का एक-एक, मिक्सचर पुलिस वालों के बाल-बच्चों को थमा दिया जाता। आखिर त्यौहार के अवसर पर तो पुलिस को उसकी अथक सेवा के लिए याद किया जाय। लेकिन इस एहसान फरामोश देश की जनता को क्या कहा जाय ? सब-के-सव बेहद कृतघ्न किस्म के लोग हैं। बेचारी पुलिस आम जनता के हितार्थ सुबह से शाम तक व शाम से सुबह तक व्यस्त रहती है और इतनी कठिन सेवा के बदले मे पन्द मिठाइयां, कुछ पटाखे भी पुलिस को सादर मर्पित नहीं कर सकते हैं लोग? धिक्कार है ! इन्ही ओछे लोगों के बीच कानून और व्यवस्था, ट्रेफिक और क्राइम का इन्तजाम येधारी.पुलिस को करना पड़ता है। आखिर क्यो पुलिस के लोग इतनी जमत मोल लेंगे? क्या इसीलिए कि दीवाली या किसी और पर्व त्योहार के मौके पर साक्षात पुलिस को मौका-ए-वारदात पर जाकर मिठाई और पटासे वसूलना पड़ें? वास्तव में भारतीय जनता को कृतघ्नता और भारतीय पुलिस की सदा- दायता की कोई सीमा नहीं है। पुलिस की हर कार्रवाई और हर हरकत का जायजा लिया जाय तो 'मस्तक पदा से मुक जाता है। लोकमंगल की ऐसी वैधनी किसी और में (82) नही है । जब-जब धर्म को हानि होने लगती है, पुलिस स्थिति मे सही सन्तुलन पैदा करने के लिए सीन पर हाजिर हो जाती है। किसी गांव मे महीने में एक बार चोरी या डकैती की वारदात न हो तो यह उस इलाके की पुलिस के लिए लज्जा की बात होती है। ऐसी ही संगीन दुर्घटनाएं हर गांव मे घटने लगे, तो शायद पुलिस की प्रासंगिकता पर ही बहस होने लगेगी। इसीलिए पुलिस हर गांव और हर मुहल्ले मे सप्ताह में एक बार चोरी का सघन कार्यक्रम बताती है । इस पुनीत कार्य के लिए पुलिस को कुछ ऐसे नर-रत्नो का पालन-पोषण भी करना पड़ता है, जो वक्त जरूरत चोरी या डकैती का कार्यक्रम सम्पन्न कर सकते हो। कई इलाको में तो बेचारे दरोगा जी को ही इस प्रोग्राम का उद्घाटन करना पड़ता है । जनसेवा के एक अन्य क्षेत्र में भी पुलिस को पहलकदमी करनी पड़ती है। भारतीय संस्कृति में बलात्कार की अत्यन्त पुरानी महिमा है । अहल्या वाले केस के जमाने से ही बलात्कार के क्षेत्र में पुलिस चौकस है। जब किसी मुहल्ले में महीनों के बीत जाने पर भी बलात्कार की कोई अमानवीय घटना नही घटती, तो समस्त अघट घटनाओ की सूत्र- धार भारतीय पुलिस को ही बलात्कार का नमूना पेश करना पड़ता है ताकि जनता भारतीय संस्कृति के इस अनमोल अध्याय को भूल न जाए। इस महान सांस्कृतिक कार्यक्रम मे दरोगा, हवलदार, सिपाही सबको भाग लेने को छूट मिली हुई है। समाजवाद का इतना उत्तम प्रबन्ध कही और नहीं है। भारत वर्ष'को नेताओं, दलालों, इन्जीनियरों और ठेके- 'दारों का स्वर्ग कहा जाता है, जबकि पुलिस का विनम्र निवेदन यह है कि इस लिस्ट में पुलिस कर्मियों का उल्लेख भी होना चाहिए। आदर्श समाजवादी देश में नागरिक का आर्थिक स्तर कितनी तेजी से ऊपर उठता है, इसके प्रमाण स्वरूप भारतीय पुलिस के किसी भी हवलदारोत्तर पदाधिकारी के घर में झांका जा सकता है। बेचारे दारोगा साहब को कुल ग्यारह सौ रुपए वेतन के रूप में प्राप्त होते हैं लेकिन उनकी आस्था समाजवाद में इतनी तीब है कि उनके घर पर कमरे में एक अदद रंगीन ': (83) टी० बी० और किचन में एक अदद फिन मौजूद है । देश का बहुमुखी विकास करने के लिए उन्होंने तीन शहरों में सिर्फ तीन लाख की लागत से तीन मकान बना रखे हैं। देश प्रेम की यह भावना पुलिस-सेवा में संलग्न हर प्राणी में कूट-कूटकर भरी हुई है। इसी कारण चौराहे पर तनात सिपाही से लेकर वातानुकूलित कक्ष में बैठे बड़े अफसर तक में देश के विकास का संकल्प समान स्तर पर दिखाई पड़ता है। अगर कोई सिपाही किसी सब्जी वाली से चन्द टमाटर मांग लेता है या कोई सब- इन्सपेक्टर किसी स्टोरं से चार साड़ियां मांगे लेता है तो यह इन महा- मानवों की अगाध देश-सेवा के प्रतिदान में कुछ भी नही है। यह तो आम जनता का कर्तव्य है कि वह पुलिसकमियो की सुख-सुविधा का ध्यान रखें। जब जनता अपने अधिकार और कर्तव्य भूल जाती है, तब पुलिस को सक्रिय होना पड़ता है। हमारे मुहल्ले के चौक पर जिन हवलदार की ड्यूटी रहती है वे धरती के अन्य सिपाहियो की तरह रुपए-पंसे को हाथ नहीं लगाते हैं। उन्होने पास के पान मडार के साथ समझोता कर रखा है और सभी ट्रकादि चालक पान भंडार पर ही नजराना जमा करते है । लेकिन परसों एक नया अध्याय सामने आया। चौराहे पर आकर ट्रक रुका, तो हवलदार ने हमेशा की तरह ड्राईवरों को पान-मंडार पर भेज दिया। ट्रक ड्राईवर गोपाल के पास गया और बोला कि सिपाही जी अपने पच्चीस रुपये माग रहे हैं। पान वाले ने सिपाही से आखों की भाषा में पुष्टि की। सिपाही उस समय एक फल वाले से केले वसूल रहे थे। तेजी से उन्होने इशारे का जवाब दिया। पान वाले से पच्चीस रुपये लेकर ट्रक ड्राईवर चला गया। शाम ढलने पर सिपाही जी पान की दुकान पर दिन भर की कमाई बटोरने जा पहुंचे और यह जानकर परम दुखी हुए कि ड्राईवर भारतीय पुलिस को चूना लगा गया। इस घटना से भी जनता का ओछापन सामने आया है और हम सब मुहल्लावासिय ने आपस में चंदा कर सिपाही जी को पच्चीस रुपये सौपे । ऐसी हालर अत्यन्त चिन्ताजनक है । पुलिस का यह पावन धर्म है कि वह नजराना (84) सौगात आदि प्राप्त करे। इसमें बाधा पहुंचाना अधर्म और संस्कृति- विरोधी आचरण है। लिहाजा, किसी सिपाही ने किसी दुकान से मिठाई या पटाखा या कुछ और वसूल लिया तो इस बात को अफमाना बनाने की कतई आवश्यकता नहीं है। अफसाना तो तब बनेगा, जब. मुहल्ले में कोई दुकान खुले और हवलदार साहब को कुछ उपहार न मिले । अचम्भा तो तब होगा, जब थाने के सामने से कोई सुन्दरी गुजरे और साईट पर मौजूद सिपाही खांटी भोजपुरी मे कुछ बोल न छोड़े। कहानी तो तब बनेगी, जब पाकेटमार को पकड़ कर पुलिस बिना कमीशन लिए छोड़ देगी । अफसाना तब भी बनेगा, जब मिठाई और पटाखा वसूलने वाले पराक्रमी पुलिसकर्मियो को अगले साल पुलिस मंडल नहीं मिलेगा। इन्ही महामानवो के कारण यह विशाल देश चल रहा है, वरना न जाने क्या होता।
मेरी व्यंग्य- -सृजन-प्र -प्रक्रिया और ये प्रिय व्यंग्य-रचनाएं इधर साहित्यकर्मियों से उनकी सृजन-प्रक्रिया के बारे में पूछने का फैशन चल निकला है । मैंने देखा है कि पूछने वाले जितने गम्भीरता से यह मवाल करते हैं, उससे तिगुनी गम्भीरता के साथ लेखक अपनी सृजन- प्रक्रिया का ईस्टमन कलर ब्यौरा पेश करते हैं। मैं बार-बार लोगों को सृजन-प्रक्रिया को उदात्त यात्रा पर निकलते हुए देखता हूं और हर बार मुग्ध होता हूं कि कोई लेखक कैसे अपनी सृजन-प्रक्रिया का इतना सिल- मिलेवार वर्णन करता है। मेरा ख्याल है कि कोई लेखक आइने के सामने बैठकर साहित्य नही लिखता है कि इधर साहित्य का सृजन होता चले और उधर लगे हाथ सृजन-प्रक्रिया का साक्षात्कार भी होता रहे। दरअसल लेखक से पूछना ही नहीं चाहिए कि उसकी सृजन-प्रक्रिया का क्या गमाचार है। • आपने कभी उस डाकिए से उसकी रचना-प्रक्रिया के बारे में पूछा है, जो वरसती हुई लू और जमी हुई बरसात में भी आपकी डाक लेकर हाजिर होता है। एक बार सुलगती हुई लू में दरवाजे पर उपस्थित पोस्टमन से मैंने यह सहानुभूति जताई थी कि इतनी तपती दुपहरी मे खुद चिट्ठियां लाने का कप्ट क्यो किया? डाक से भेज देते ? लेकिन उस पोस्टमैन से उसकी सृजन-प्रक्रिया की पड़ताल न मैंने की और न किसी और ने की। गली-गली में घूमकर चन्दा वसूलने वाले महापुरुषों से किसी ने नहीं पूछा होगा कि हे नरश्रेष्ठ ! इस महान कार्य की पृष्ठ- भूमि में कौन-सी प्रक्रिया है ? फिर भला लेखक से ही क्यों है कि उसकी सृजन-प्रक्रिया क्या है ? मैं 1968 से व्यंग्य लिख रहा हूं . पूछा जाता . (86) और आज तक नहीं जान सका कि मेरी रचनाओ की कोई सृजन-प्रक्रिया वगैरह भी है । अगर कही कोई सृजन-प्रक्रिया जैसी चीज है तो उसका रिश्ता मेरी व्यग्य रचनाओ से है, मुझसे नही। अपनी हर रचना की एकदम निजी नितांत अलग सृजन-प्रक्रिया का साक्षात्कार मैंने किया है। क्योकि कोई भी व्यंग्यकार, या कोई भी रचनाकार सृजन के मानक सूत्रों के सहारे सही सृजना नहीं कर सकता। सूत्रों के सहारे रचना करना लक्षण-उदाहरण प्रस्तुत करने की मध्यकालीन परम्परा का अनुगमन करना होगा। उस जमाने के कवि पहले नायिका की. साईज तप कर लेते थे और फिर उस नापतौल की एक अदद नायिका सरे दरबार पेश कर देते थे। मौजूदा रचना-मिता इतनी आसान नहीं है। और फिर व्यंग्य-लेखन ? वह तो तलवार की धार पर धावने के समानान्तर है। लूनास्किी ने कहा है कि रचनाकार तभी महत्त्वपूर्ण हो सकता है जब वह कुवारी धरती को जोतता है, जब वह अपनी अंत : प्रज्ञा द्वारा एक ऐसे क्षेत्र मे प्रवेश करता है जहा तक और आंकड़ों का प्रवेश वर्जित है। व्यंग्य-लेखन इस स्थिति का जीवंत प्रमाण है कि सम्प्रेषण रचना- कार के अनुभवो को किस हद तक प्रभावित करता है और अनुभवगत सम्प्रेषणीयता किस मीमा तक अभिव्यक्तिगत सम्प्रेषणीयता के साथ घुल-मिल जाती है। गद्य की क्रियात्मक लय से जुड़ी चुस्त-बयानी का अनूठा उपक्रम है व्यंग्य-लेखन, जिसकी संरचना और अर्थसौरस्प की प्रक्रिया एक विरल बास्वाद की प्रस्तावना करती है । आत्मनियंत्रण की विरल योजना के महारे सतही राग-द्वेष से कार उठकर जब कोई रचनाकार प्रायोजिनिक व्यंग्य-सृजन करता है तभी व्यंग्य का ध्वंसात्मक, परिवर्तनकारी चरित्र सामने बाता है। व्यग्य किसी.लेखक की निजी टिप्पणी नहीं है । यह प्रयोजनशील सघनता से निःसृत यथार्थ की अभि- व्यक्ति है। ध्यंग्य परिवेश की बहुस्तरीय जटिलताओं को उधाहते हुए उस विन्दु तक अपने पाठकों को पहुंचाने में समर्थ है जहां छद्मपरायणीय तौर-तरीकों के बीच अपने होने का एहसास पाठक को बुरी तरह (87) हिन्दी के व्यंग्यकारो की लम्बी कतार में अपने को फही पाकर मुझे सतोप होता है कि मैं लेखको का लेखक नही हूं। वरना साहित्य के इलाके का ताजा समाचार यह है कि खामी संख्या में ऐसे स्वनामधन्य रचनाकार सीन पर मौजूद हैं जिनका महान साहित्य सिर्फ उन्ही के द्वारा पढ़ा जाता है अथवा उनके चंद समानधर्मी सज्जनों को पढ़ने के लिए बाध्य किया जाता है। मुतबा हुसैन ने एक ऐसे होनहार लेखक का जिक्र किया है जो खुद भी अपनी रचनाओ से चार बांस चौवीस मीटर दूर रहना पसन्द करता था। मुझे संतोष है.कि मेरा लिखा बहुतों के अनुभवों का साझीदार है और आगे भी होता रहेगा। दरअसल यह कोई मेरी खासियत नही है, व्यंग्य-लेखन.की ईमानदारी का प्रतिफल है । वे सारे लेखक हार्दिक मुबारकबाद के पात्र हैं जो पूरी सफाई के साथ अपने आसपास की सारी विसंगतियों से कतराकर निकल जाते है-फूलों और तितलियों से भरी घाटी मे घूमते हैं, पनघट से गागर लेकर चली आ रही ग्रामवधू के नाभिकुण्ड में जाकर डूब जाते हैं । अखबार मे डकतों के नेता के रूप में पुलिस इन्सपेक्टर की गिरफ्तारी का समाचार छपे और भूख से व्याकुल होकर तीन संतानों के साथ किसी मां की आत्म- हत्या की सूचना मिले, तो पता नही कोई कैसे हवा की पीठ पर सवार होकर हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर जा पहुंचता है । विघटन और मूल्य- हीनता के चरम दौर में आत्मा की धवलता का राग, अलापना प्रथम श्रेणी की बेईमानी ही तो है । ध्यंग्य-लेखन एक जगे हुए जीवंत रचना- कार की कारीगरी है। हर रोज़ तरह-तरह की घटनाएं घट रही हैं। और व्यंग्यकार की मजबूरी यह होती है कि वह खबरों को अखबार मे पढ़कर अगले कालम ओर नही बढ़ जाता, अपितु हर खबर उसकी सृजन-प्रक्रिया का हिस्सा बन जाती है । भ्रष्टाचार और अपहरण, लूट और बरात्कार, हत्या और हड़ताल के अनेकानेक शीपंक व्यंग्य-लेखन को उकसाते हैं। व्यंग्यकार के मन में देशदगा की फिल्म लगातार चलती रहती है। हर नया दृश्य, हर नई खबर उसकी सर्जना को उत्साहित करती है। उसकी सर्जना हर पाठक के मन मे देशदशा की उसी फिल्म ।
( 88 ) को एक साथ रिलीज़ कर देती है। व्यंग्य वह ईमानदार विधा है, जिमसे गुजरते समय आप यह सोचने के लिए विवश हो जाएंगे कि वह क्या बात है जो रचनाकार के मन मे बुरी तरह कुलबुला रही थी और अंततः सृजन के रूप में सामने आयी। वह क्या बात है-जिसने व्यंग्य को इतनी धार दी है, सर्वथा भिन्न मानसिकता वाले लोगों को भी सोच के धरातल पर एकत्र कर दिया है। एलिक वेस्ट ने एक जगह लिखा है कि अच्छा लेखक समाज की उत्पादक ऊर्जा को सक्रिय रूप से अनुभव करता है और उससे अपना तादात्म्य स्थापित करता है । इमी चमत्कारपूर्ण तादात्म्य को एलिक वेस्ट ने साहित्य-सृजन की प्रेरणा माना है। रचनाकर्म का पहला स्तर यही तो है कि रचनाकार अपने चारों ओर फैले अनुभव--संसार से सर्जनात्मक मांग के अनुरूप सम्प्रेपण की जमीन तैयार करे, तभी सर्जना का विस्फोट होता है। व्यंग्यकार संघर्षों और विरोधों के बीच उभरते अनुभव का ममाकलन इस तराश से करता है कि युगीन सत्य की निर्मम शल्यचिकित्सा मे उसकी सर्जना सलग्न दीखती है । व्यंग्य-दृष्टि अपनी सूक्ष्म और अंतरग शल्य-क्रिया के दौरान कभी किसी अवांछित को काट- कर फेंक देती है तो कभी विगलित सत्य की जगह जीवन की प्राणोर्जा से बिंधी स्थिति का प्रतिरोपण करती है । व्यंग्य किसी आध्यात्मिक दृष्टि का परिणाम नही है, अपितु सर्जकका अनुभव इस विधा में एक तार को छूकर सहस्त्रों तारं झनझना डालने की विलक्षण क्षमता का संगमन कर डालता है । हरिशंकर परसाई ने स्वीकार किया है कि अनुभव ही लेखक का ईश्वर होता है। लेकिन ऐसा अनुभव बेकार होता है यदि उसका अर्थ न खोजा जाए और विधिवत् विश्लेषण कर कोई तार्किक निष्कर्ष न निकाला जाए । व्यंग्यकार के अनुभवों का कोष विलक्षण होता है । मैं जिन दिनों 'स्वातंत्रयोत्तर हास्य और व्यग्य साहित्य' पर पी० एच० डी० का शोध-प्रबन्ध तैयार कर रहा था, वे मेरे गर्दिश के दिन थे। मैं और गदिश । गदिश और में। सब ओर गदिश ही गदिश, और कोई पार्टी मेरे और गदिश के बीच नही थी। इसीलिए अपने आसपास के अन्य रिसर्च- (89) धर्मियों को मैंने बहुत बारीकी से देखात अपने व्याय रिसनगाया मे मैंने उसी दौर की शोध-स्थिति के अनुभवोंश पर्यटन किया हेप में हर चरण पर चिता करता हुआ पुस्तकालयों की धूल चाट रहा था और मेरे कई पराक्रमी मित्र पांच पुस्तकों का सुन्दर समन्वय एक नये शोध-प्रबन्ध के रूप में कर रहे थे। इसे लक्ष्य कर मैंने 'रिसर्चगाथा' में लिखा- 'ऐसे विषय पर रिमर्च करना शास्त्रों में सबसे अधिक कलात्मक माना गया है, जिस पर पहले ही कम से कम सात महापुरुषों को पी- एच० डी० मिल चुकी हो। ऐसे लोक-कल्याणकारी विषय पर रिसर्च करते समय शोधकर्ता को गाईड महोदय के लिए सब्जी, राशन, दूध लाने जैसी मूर्तकलाओ पर रिसर्च का भरपूर अवकाश मिलता है।' अनुभवों ने ही मुझे पड़ोमियों और नेताओं, प्रौढ़ शिक्षा और पत्र- कारिता, चुनाव और आयोग, साहित्य और होटल, शिकार और अध्या- पन जैसे अनेकानेक संदों पर व्यंग्य-लेखन के लिए प्रेरित किया है। अपने निजी व्यवहार से लेकर बड़ी से बड़ी राष्ट्रीय चिंता तक का विस्तार व्यंग्य-रचनाओं में होता रहा है। इसी कारण शरद जोशी ने माना है कि लेखन एक किस्म की दौड़-धूप है। इस दौड़-धूप मे इस 'मीमामा की फुरसत किसे है कि व्यग्य की सृजन प्रक्रिया किन स्तरों पर तेजतर हुई है। कई व्यग्यकार जो कुछ दीखता है, उसे नोट कर लेते हैं और वक्त जरूरत ऐसी टीपों का इस्तेमाल अपनी व्यंग्य-रचनाओं के लिए करते हैं। रवीन्द्रनाथ त्यागी के पास मेरा शोध-ग्रंथ पहुंचा तो उन्होंने सूचित किया कि वे उसे पढ़ रहे हैं और नोट ले रहे हैं। कुछ अरसे बाद उनका व्यंग्य-संकलन 'भद्रपुरुप' आया तो उसमे मेरी पुस्तक से ली गई टीपो के आधार पर एक व्यंग्य भी नजर आया। इसी प्रवृति के कारण कई व्यंग्य-रचनाओं से गुजरते समय बाकायदा पर्यटन का मजा आता है। लेकिन मैं आम तौर से वही लिखता हूं जो लिखना चाहता हूं। ईमानदारी की बात तो यह है कि अपना कोई व्यंग्य मैंने अपनी प्रेरणा से नहीं लिखा है।' कुछ रचनाकार बाहरी प्रेरणाओ से सृजन- प्रक्रिया को तीव्र करते हैं। मेरे सहपाठी के भीतर का कवि तब तक नही (190) जगता था, जब तक कोई प्रेरणा उसके मुख कमल पर अपने करकमलों से प्रहार नही कर देती थी और तब उसकी आह गान के रूप में फूटती थी। मुझे हमेशा सम्पादकों या आकाशवाणी वालों ने प्रेरणा दी है। अकसर मैंने फरमाइशी लेखन किया है । ऐसा नहीं है कि आप जब चाहें बैठकर कोई रघुवंश या दैत्यवंश लिख मारें। कम से कम 'मैं तो ऐसा नहीं कर सकता । बाप मुझे कोई विषय देकर कल सुबह व्यंग्य की माग करें, मेरा व्यग्यकार सक्रिय हो जाएगा ! कल सुबह रसना आपको तयार मिलेगी। लेकिन, तब जब मेरे सामने समया की कोई सीमा नहीं होती, व्यंग्यकम लगातार टलता जाता है--शिथिल रहता है । एक बार कुछ लिखना शुरू करके उसे अधूरा छोड़ देने का सीधा मतलब मेरे लिए यही है कि यह रचना अधूरी ही रह जाएगी। मैंने अधिकाश व्यग्य रचनाएं एक बैठक में लिखी हैं। सृजन-प्रक्रिया का आरम्भ रचनाकारों की एकाग्रता और अत.केन्द्रण से मानने वाले मन:- शास्त्रियों से मेरा मतभेद नहीं है। लेकिन यह एकाग्रता मेरे लिए शुरू से आखिर तक जरूरी नहीं होती। हर रचना की दो या तीन पक्तियो तक ही.संकट रहता है मेरे सामने। शुरू की दो या तीन पंक्तियों को बार-बार कई तरह से लिखकर अंत-कोन्द्रण की कोशिश में करता हूं। वस शुरू की पंक्तिया जम जाए तो मुझे पूरी रचना खत्म कर देने मे देर नहीं लगती। मैं सोर में लिखने का अभ्यासी हूँ। मेरे बच्चे मेरो सृजन प्रक्रिया के घनिष्ठ साक्षी हैं, जिन्हें मैं न अपनी बारात में ले जा सका और न मेरी पत्नी ही मायके से लाई। यह कोई पाशक-शृंग कल्पना नहीं है कि मेरे फई व्यंग्यों का सृजन तभी हुआ, जब मेरी छोटी बेटी मेरी गोद में मोती थी। आपको विश्वास नही हो रहा होगा, लेकिन कई साहित्य-मर्जकों की सूजन-प्रक्रिया तो एकदम अकल्पनीय रही है । पी०जी० युटहाउस के बारे में कहा जाता है कि वे अपनी हास्य रच. नाओ की सर्जना टहलते हुए करते थे। जोनाथन स्पिट लिखने के लिए .एकांत में चले जाते थे। एक बार तो वह पूरे वर्ष भर एकातवास में रहे । मेरे जैसे गृहस्प नेसक के लिए एकांत की कल्पना कितनी विष्ट .
(91) है, सो मैं ही जानता हूं। राज शेखर ने काव्य-मीमासा के दसवें अध्याय में पूरी कविचर्या बतलाई है, लेकिन यह नहीं बताया है कि जब लेखक की कलम टूट जाये और स्याही कागज चुक जाएं, तब सृजन-प्रक्रिया कैसे जारी रहेगी ? दरअसल सृजन-प्रक्रिया के मूलाधार यही स्टेशनरी पदार्थ हैं ? मैंने आज तक ऐसे किसी लेखक के बारे में नहीं सुना है जिसने विना मसि-कागज के सृजन किया है। कबीरदास जैसे कुछ अपवादों की चर्चा- छोड़ दें, तो सम्भवतः कलम-कागज बिना सृजन-प्रक्रिया की कल्पना ही नहीं की जा सकती। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र सप्ताह के हर दिन के लिए अलग-अलग रंगों के कागज इस्तेमाल करते थे। अलेक्जेंडर ड्यूमानीले कागज़ पर उपन्यास, पीले कागज पर कविताएं और गुलावी कागज पर लेख लिखता था। मेरे एक गुरु हिन्दी के जमे हुए हास्यकारो में से हैं श्री रामेश्वर सिंह काश्यप। उनके पास एक हजार से अधिक कलमों का अनूठा सकलन है । कभी इस कलम से लिखते हैं, कभी उस कलम से । लेकिन स्टेशनरी -अति- शय सुविधा मात्र से किसी की सृजन-प्रक्रिया बुलेट ट्रेन नहीं हो जाती। सारी अभिजात सुविधाएं मिलने के बावजूद वेचारे कालिदास कुल तीन नाटक और चार काव्य ही लिख सके। जबकि हमारे मौहल्ले के एक कवि-कुल-कमल-दिवाकर ने कालिदास से आठ गुना लिखा है.और उसमें से कुछ भी नही छपा है। दरअसल लिखने के लिए इतना ही काफी नही है कि हमारे पास स्टेशनरी का स्टाक कितना है। भट्टतोत ने जिसे नव- नवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा कहा है, उस प्रतिभा के विना भला कुछ भी लिख पाना सम्भव है। जी० पी० श्रीवास्तव का एक प्रहसन है-साहित्य का सपूत, जिसका नायक साहित्यानन्द हास्य लिखने के लिए यह नवीन और मौलिक युक्ति निकालता है कि पहले पेट भर हंस लो, ताकि जब पेट मे हंसी ठसाठस भर जाए तो यह लेखनी द्वारा अपने माप अवश्य निकलेगी। और, चेखव ने एक जगह लिखा है कि दुःखी आदमी हास्य और व्यंग्य लिखता है। मुझे ऐसा लगता है कि संसार भर में जो लोगःहास्य और.व्यंग्य-लेखन (92) से जुड़े हैं, उनमे न तो कोई अतिशय विनोदी स्वभाव के होने के कारण हास्य लिखता है और न कोई वेदनावाद में डूबकर व्यंग्य लिखता है। वस्तुतः मौजूदा परिस्थितिया ही ऐमी है कि इन पर व्यंग्य के मिवा कुछ और नहीं किया जा सकता है । साम्प्रत परिवेश में केवल व्यंग्यकार ही वास्त. विकता के साथ योद्धाओ की तरह लड़ सकता है । व्यंग्य का हथियारपन ही उसकी अन्यतम विलक्षणता है। आज का व्यंग्य-लेसन एक ऐसे माहौल मे उभरा है जिसमें विसंग- तियों का प्राचुर्य एक सीधी नकारात्मक मुद्रा को निरन्तर उकसाता रहता है। अच्छे शेक्सपियर, अच्छे मतिराम और अच्छे गोर्की को अब योद्धा बनना पड़ेगा । व्यंग्यकार बनने के सिवा कोई और विकल्प नहीं है। इसी कारण व्यंग्य रचनाएं मनोरंजन और सुधारात्मक आग्रह न बनकर चिंतन की धीज बन गई है । व्यंग्यकार अपनी प्रतिभा से व्यग्य गढ़ता है, लेकिन उनकी क़लम जान-बूझकर उन्ही स्थितियो पर उठती है, जिनके केन्द्र में शोषण, विकृति और अनाचार है। व्यंग्यकार की प्रखर संवेदनशीलता समूह के दिमाग को खोलने और हृदय को फैलाने का काम एक साथ करती हैं। मौजूदा व्यग्य लेखन पाठक को किसी हल्के-फुल्क इलाके मे नहीं ले जाता, अपितु कुछ मोचने और करने के लिए विवश करता है। अपने आइने में व्यंग्य ने नगे को नंगा दिखलाना शुरू किया है, कौवे को काला कहने का साहस उपस्थित किया है। व्यग्य लेखन ने ही स्थापित किया है कि कलम हाथ में लेना बंदूक हाथ में लेने से अधिक खतरनाक और संजीदा काम है । मैंने खुद कई बार अनुभव किया है कि यह काम किस हद तक गंधक को सुरंग से गुजरने के समानान्तर है । एक व्यंग्य ने तो मेरी नौकरी के समापने का उत्तम प्रबन्ध कर दिया था। मित्रो और परिचितों की नाराजगी के तो अनेक अवसर आये है। हालत यह है कि मैं किसी कन्या को गौर से देखने लगता हूं तो उसकी सुमाता फर- माती है-'निरीक्षण हो रहा है क्या ? कुछ लिखने का इरादा है ? यह मेरी बड़ी लडकी है, प्लीज इस पर कुछ नही लिखना, हम लोग लड़का तलाश रहे हैं।' लिहाजा उस कन्या पर गौर करना छोडकर में दूसरे . २ विषयों पर ध्यान देने लगता है। कभी-कभी इरादा होता है बिहारीलाल की रसिकता पर लिखने का और रचना का अन्त होतोदावनिदाएकी पिटाई से। मैंने जो कुछ लिखा है, वह सब कही-न-कही छपा है । सच तो यह है कि मैंने छपने के लिए ही लिखा है। कोई भी नई रचना तयार कर सबसे पहले मैं स्वयं उस पर मुग्ध होता हूं और फिर अपनी पत्नी को मुग्ध होने के लिए बाध्य करता हूं। विवाहोत्तर-काल की मेरी सारी व्यंग्य रचनाओं की पहली श्रोता मेरी पत्नी ही होती है और सबसे पहली समीक्षा भी वही करती है । यह और बात है कि मैं उसकी समालोचना पर ध्यान दिये बगैर रचना को सादर प्रकाशनार्थ भेज देता हू । व्यंग्य लिखते समय जिस अकेली चीज़ पर मेरी कुछ सावधानता रहती है, वह उसकी भाषा है। रचनाकार अपनी सर्जना को भाषा के विशिष्ट उपयोग द्वारा केवल वेलबूटेदारी से चटक ही नहीं बनाता है, अपितु सम्प्रेषण की नई-नई मंजिलों की ओर भी अग्रसर होता है। जैसा कि अज्ञेय ने स्वीकार किया है, रचनात्मक भाषा कभी इकहरी नहीं होती। व्यंग्य-भाषा थोड़े अक्षरों मे अमित अर्थ सम्प्रेषित करने की क्षमता 'का विस्तार है । शब्द व्यंग्यकार के हाथ मे गीली मिट्टी की तरह है। उन्हें जैसा अर्थ और रूप वह देना चाहता है, देता है । एक सुपरिचित शब्द भी सर्वसम्मत अर्थ छोड़े बिना असंख्य अर्थछायाओं और अभिप्रायो का आधार बन जाता है, यह कई उदाहरणो से सिद्ध किया जा सकता है । मैं अपनी ही व्यंग्य रचनाओं से भाषिक नियंत्रण के कुछ नमूने पेश करता हूं। मेरा एक व्यंग्य है- 'मेरे पड़ोसी, उसकी कुछ पक्तियां हैं-- उनके घर मे इतनी थोक मात्रा मे दर्शनीय किस्म की कन्याएं थी कि वे किसी को भी छछिया भर छाछ पर नचा सकती थी। एक बार उनके घर में आग लगी। आग पर काबू पाने में आधा घंटा लगा और फायर ब्रिगेड के जवानो पर काबू पाने मे लगभग दो घंटे लग गये।' कुछ और पंक्तियां एक दूसरे व्यंग्य 'नये एम०पी० का स्वागत' से प्रस्तुत करता हूं- - - (94) 'होनहार बिरवानों की पीढ़ी आज विशेष उत्साह में है। कोई रिक्शे से उतरने के बाद बिना किराया चुकाये गरीब की हाय को अपनी वीरों- वित घुड़की से दबा अहाते मे घुस गया है। कोई अपने मोहल्ले की दुकान से निःशुल्क उठाकर लाई हुई सिगरेटों का मुक्त हृदय से वितरण कर इस प्रकार प्रशंसित हो रहा है, जैसे विशुद्ध बाप का माल हो। कोई अपने कालेज के प्रिंसीपल को चुनी हुई लोकल गालिया देकर सहपाठी इष्टमित्रों को आत्मा को पवित्र कर रहा है।' यह व्यंग्य-भाषा सन्दर्भ विशेष की भित्ति पर फैल रही वह अभि- व्यंजक लता है, जो कही.शीतल और कहीं तप्त प्रभाव छोडती हुई सगा- तार अर्थ की लक्ष्येकचक्षुता का निरूपण करती है। व्यग्य-भाषा की चमत्कारपूर्ण विच्छलता और आस्वाद मे गहरी उतरती हुई सहजता व्यंग्यकार की सावधानी और कारीगरी के प्रति आश्वस्त करती है। जिन शब्दो का प्रयोग कोई भी व्यंग्यकार अपने वाक्यबन्धों मे करता है, वे आविष्कृत शब्द नहीं होते। डबिशायर ने इसी सन्दर्भ में कहा है कि हम पुरानी गाड़ियों में नई यात्राएं करते है। मुझे प्रसन्नता होती है, जब मेरी हर यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर मेरे पाठक मुझसे पहले हाजिर होते हैं । यह स्थिति आज से पचास साल पहले के साहित्य की नहीं थी। इस बात को ओल्झास सुलेमेन्खोव ने भी अंगीकार किया है कि एक सामाजिक प्रक्रिया के तहत लेखक अपने पाठकों की अपेक्षा कम तेजी से बदल रहे हैं । यह बदलाव तेजी से मेरी रचनाओं मे आये, यही तो कोशिश है मेरी, हर व्यंग्यकार की, हर सर्जक की। वस्तुत व्यंग्य-लेखन बनावट और दिसावट भरे परिवेश में सच को पकड़ने की जोखिम भरी कोशिश है। इस जोखिम की सृजन-प्रक्रिया के बारे मे खुद मेरा कुछ कहना प्रासंगिक होगा, भला ? आचार्य नलिन-विलोचन शर्मा की एक उक्ति: याद आती है. यदि रचना योल सकती है. तो रचनाकार को मौन ही रहना चाहिए। लेकिन, कोई कितना चुप रहे । विशेषतः जब किसी व्यंग्यकार से उसको अपनी प्रिय व्यंग्य रचनाओं का चुनाव करने के लिए कहा जाय, (95) तो उसकी चुप्पी भला कसे काम आएगी ? तीन अदद मौलिक व्यंग्य सकलनो और तीन यदद सम्पादित व्यग्य सकलनों के प्रकाशन के बाद यह संकट सामने आया है कि अपनी प्रिय व्यंग्य रचनाओं का चयन किया जाय । दरअसल इस असार संसार मे प्रियता का एक विशिष्ट दर्शन है। अधिकतर ऐमा होता आया है कि जब-जब किसी से सुख मिलता है, तब- तव वह प्रिय हो जाता है। इसका आलम यह होता है कि इधर सुख मिलता है और उधर वह प्रिय हो जाता है। यानी सुख मिलने मे देर लगती है, प्रिय बनने में देर नहीं लगती । इस कसौटी पर इस संकलन में एकत्र व्यंग्य रचनाएं मेरे लिए सुखकारी रही हैं और इसी कारण प्रिय भी है। इसका मतलब यह नहीं कि जो रचनाएं यहां अनुपस्थित हैं, वे मुझे प्रिय नहीं है । निज कवित्त भला किसे प्यारा नहीं लगता? इसके बावजूद परोसने वाले, डाइनिंग टेबुल और थाली-बर्तन की सीमाएं हैं। इसीलिए,' इस वार इतनी ही प्रिय व्यंग्य रचनाएं एकत्र हो सकी। शेप "फिर कभी विशेष अब आप फरमाइये ।
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