Adarsh Library, Jaipur

Utkrishth Ankho Se

Vimal Mitra · 2011/03

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मेरी आंखों से
श्रेष्ठ वंगला लेखकों की
चुनी हुई कहानियां

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मेरी आंखों से

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मेरी आंखों से
विमल मित्र, आशापूर्णा देवी, वनफूल, गजेन्द्रकुमार मित्र,
दिव्येन्दु पालित, मिहिर आचार्य, सुनील गंगोपाध्याय, प्रथमनाथ
बोसी, आइभि राहा तथा समरेश बसु की उत्कृष्ट कहानियां

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क्रम
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विमल मित्र/मेरी पाखो से
प्राशापूर्णा देवी/प्राणों से प्रिय
१.
वनफूल/ज्योतिप
गजेन्द्रकुमार मित्र/गणताविक
दिव्येन्दु पालित/सर
मिहिर प्राचार्य खून का रंग लाल
सुनील गंगोपाध्याय/उस्ताद
प्रयमनाय बीसी/क्या था विधाता के मन में
प्राइभि राहा/यह एक विचित्र अपकार
समरेश वसु/शहीद की मां
[कहानीकारो का परिचय पृष्ठ १३६ से

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भेरी आंखों से विमल मित्र . ० मेरी एक आदत से सभी परिचित हैं। लिखते-लिखते जब दिमाग खराव हो जाने जैसी अनुभूति होने लगती है तब मैं कलम रख सडक पर निकल पड़ता हूं। जिस सड़क पर अधिक-से-अधिक भीड़ हो, उम पर घूमने से ही मेरा दिमाग ठंढा होता है। रास्ते में जितनी भीड़ हो उतना ही अच्छा है, उतना ही अधिक मुझे यह महसूस होता है मानो में समुद्र के किसी एकान्त किनारे पर घूम रहा हूं। जो लोग एकान्त पाने के लिये पहाड जाते हैं या समुद्र-किनारे जाते वे लोग नहीं जानते कि निर्जनता मनुष्य का स्वास्थ्य खराब करती है 1 जगह जितनी एकात को होगी, मनुष्य उतना ही अधिक खुद को लेकर परेशान होगा। याद नहीं कहा तो पढ़ा या किमो का यह कथन कि, "The largest city is the lonliest place." इसीलिये जय शाम के वक्त सड़क की भीड-भाड़ में अकेला-अकेला घूमता हूं और जनता का निष्कपट आचरण देखता हू ता मुल ५४॥ है । उस वक्त कई धन्टों के लिये मैं खुद को भूल जाता हूं। अपनी पीड़ा भी विस्मृत हो जाती है। मुझे लगता है मानो अब मैं इस संसार के नाट्य-मंच का अभिनेता नहीं, सिर्फ एक दर्शक मात्र हूं। खुद को दर्शक समझने में जो आराम मिलता है उसकी शायद तुलना नहीं की जा सकती। मेरी अपनी समस्याएं भी उस वक्त जैसे मेरी नहीं रहती। अपनी पीड़ा भी उस वक्त अपनी नहीं रहती । अगर एक ही वाक्य में कहूं तो उस वक्त मैं सभी का होता हूं, सभी मेरे होते हैं, फिर भी मैं अकेला रहता हूं। हां तो, इस वक्त दार्शनिक बातों को जाने दें। मैं दार्शनिक नहीं हूं। बल्कि, कवि भी नहीं हूं। वो सब होने में बहुत लफड़ा है । उससे तो अच्छा है कि मैं एक मनुष्य हूं। एक साधारण मनुष्य । इस अनुभूति में एक सांत्वना तो है। साधारण होकर ही मैंने इस पृथ्वी पर जन्म लिया है और साधारण मनुप्य के रूप में ही इस दुनियां से चला जाऊंगा । इस कामना में एक विशेष गैर-जिम्मेदारी एवं कर्तव्यहीन अलसता है जिसको भोगना, महसूस करना, मुझे बहुत अच्छा लगता है। इसी तरह एक शाम को घूमते-घूमते एक जगह भीड़ देखकर मैं ठिठक गया। वह बड़े रास्ते का एक मोड़ था। सामने ही था थाना। मुझे लगा किसी प्रकार की कोई दुर्घटना हुई है । एक आदमी को घेरकर खड़े सभी लोग बहुत उत्तेजित थे । ऐसा लगता था कि उस व्यक्ति को सभी ने पकड़ रखा है और उसे मार रहे हैं । लात, चूंसे, थप्पड़ । पता नहीं, किस अपराध की सजा दे रहे हैं उसे सब मिलकर । वेचारा आदमी कहने की कोशिश करता है कि वह वेकसूर है, लेकिन उसकी सुनता कौन है । उस आदमी के बगल में ही एक कार खड़ी है। एक व्यक्ति चिल्लाता है, 'देखते क्या हो, गाड़ी में आग लगा दो।' मुझे थोड़ा डर लगा, क्या सचमुच ही ये गाड़ी में आग लगा देंगे? लेकिन नहीं, जनता में कुछ स्वस्थ मस्तिष्क के लोग भी थे। उन लोगों ने कहा, 'नहीं, नहीं, आग नहीं लगानी चाहिए। जब पुलिस मौजूद है तो सब कुछ पुलिस के हाथ में ही छोड़ दो।' . ।

पुलिस का एक सिपाही भी पास ही खड़ा था। अब उसने उस आदमी को पकड़ लिया, और पूछा, 'वोल, ड्राइवर कहा भाग गया, बोल ?' रोनी-सी सूरत बनाकर वह आदमी बोला, 'मैं कुछ नहीं जानता। मुझे छोट दीजिये।' "छोड़ियेगा नही उसको। किसी तरह भी नही छोड़ियेगा। बेटे की अच्छी तरह घुलाई करिये।' 'जिन्होंने धुलाई करने का सुझाव दिया था वे लोग पहले से ही दुद भी अपने भरसक धुलाई कर रहे थे उस बेचारे की । किसी ने उसके बाल मुट्ठी में पकट रसे हैं, तो किसी ने उसकी गर्दन पकड रखी है, तो किसी ने उसका गला पकड़ रखा है, तो किसी ने उसका कमीज खीचकर फाड दिया है। मैंने भी उचककर देखा, उस व्यक्ति की हालत शोचनीय थी। कपड़े-लत्ते सब पट गये थे । नाक तया मुह से खून निकल रहा था। फिर भी किसी की सहानुभूति नही थी उस पर । सिपाही ने उसको पकड़ रखा था लेकिन तात. चूंसों तथा चाटों से बचाने की कोशिश वह भी नही कर रहा था। बगल के एक व्यक्ति से मैंने पूछा, 'इस प्रादमी ने क्या अपराध किया है ?' उस व्यक्ति ने बताया, 'इसने गाड़ी से एक आदमी का एक्सीडेन्ट कर दिया है। मैंने पूछा, 'शायद यह गाड़ी का ड्राइवर है ?' उम व्यक्ति ने कहा, 'नहीं मिस्टर, यह ड्राइवर नहीं है । जो गाड़ी चला रहा था वह तो भाग गया है। वह पकड़ा जाता तो अब तक उसका मुरकस निकाल दिया होता। मैंने पूछा, 'तो क्या यह व्यक्ति गाड़ी का मालिक है ?' 'नहीं भई, मालिक का चेहरा क्या ऐसा ही होता है ? आप देख नहीं रहे हैं, कितनी कीमती गाड़ी है? यह आदमी तो ड्राइवर की बगल में बैठा हुआ या। शायद ड्राइवर का दोस्त है। ड्राइवर भाग गया है और यह भाग नहीं सका। मैंने 'तो फिर सब लोग मिलकर इसे क्यो मार रहे हैं ? इसको मारने -मे क्या फायदा?' पूछा, अगल-बगल के सभी लोगों ने मुझे जलती निगाहों से देखा, मानो मेरी दलील किसी को भी पसन्द नहीं आई। एक सज्जन बोले, 'मिस्टर, इसीलिए तो आये दिन एक्सीडेन्ट होते रहते हैं। इन लोगों को सजा दिये बगैर एक्सीडेण्ट भी बन्द नहीं होंगे।' सिपाही अभी तक उस आदमी से जिरह ही किये जा रहा था। पूछ रहा था,. 'बोल, कहां गया ड्राइवर ? उसका घर कहां है ? आदमी बोल रहा था, 'मैं कुछ भी नहीं जानता। वह गाड़ी लिये जा रहा था, मेरा जान-पहचानवाला था, लेकिन उसका घर कहां है, मैं नहीं जानता।' 'बर कहां है, नहीं जानते ? मजाक समझा है क्या ? चल, थाने चल ।' कहकर सिपाही ने भी एक धौल उसकी पीठ पर जमा दी। बेचारे आदमी ने एक बार फिर कहने की कोशिश की, 'हुजूर, मुझे मारिये मत । नाम-पता मुझे मालूम होगा तभी तो बताऊंगा ?' 'नो, न पता बताएगा, न नाम बतायेगा? यह तो बहुत ही शैतान है। विना अच्छी तरह ठुकाई हुए कुछ उगलनेवाला नहीं है ।' 'कहकर फिर उस वेचारे को एक धौल जमा दी। मैं खड़ा-खड़ा सब कुछ देखता रहा । यह कैसा न्याय है ? अपराध कोई करे और दण्ड किसी को मिले ! मैंने एक बार विरोध करने का विचार किया। सोचा कि कहूं, आपलोग राम के अपराध में श्याम को सजा क्यों दे रहे हैं ? लेकिन उस वक्त मेरी वात कौन सुनता भला ! मने देखा कि सिपाही भी जनता के पक्ष में ही था। वह भी चाहता था कि उन आदमी को सजा मिले । कारण कुछ हो या न हो, पर एक व्यक्ति को सजा दे पा रहा है शायद यही उसकी पद-मर्यादा के लिये गौरव की यात थी। नी: जितना ही ईंधन जुटाती थी सिपाही उतना ही उत्तेजित-उल्लसित हुआ जा रहा था। ठीक उसी वक्त एक घटना घटी। एक सज्जन ने हठात् वहां अपनी गाड़ी की। गाड़ी से उतरते ही वह वोले, 'अरे, यह गाड़ी तो मिस्टर दासगुप्त - मिस्टर दासगुप्त ! । बात मेरे कानों में भी पड़ी। सिर्फ मेरे कानो मे ही क्यों, वहा उपस्थित सभी के कानों मे ही पड़ी । बात पुलिसिये के कान में भी पड़ी। उसने पूछा, दासगुप्त ?' वे सज्जन भीड़ को चीरकर अव सिपाही की ओर बढ गये। बोले, 'अरे भाई, यह गाड़ी मिनिस्टर की है। मिनिस्टर काशीकान्त दासगुप्त की। होम मिनिस्टर । उनकी गाड़ी यहा कौन लाया? ड्राइवर कहा गया ?' इतनी देर बाद सिपाही को समझ मे बात प्रायो। अब उसके चेहरे पर भय, भक्ति, श्रद्धा के भाव प्रस्फुटित हुए । बोला, 'हमारे होम मिनिस्टर को गाडी है ? तो पहले क्यो नहीं बताया आपने ? मैं भी तो इतनी देर से यही कह रहा हूं कि यह ड्राइवर को गलती नहीं है।' जो लोग इतनी देर से उम आदमी की मरम्मत करने के लिए उछल-कूद है थे वे भी जरा अचकचा गये । सिपाही ने भीड़ की तरफ देखकर डांटा, 'यहां झमेला क्यों कर रहे हो तुन लोग? भागो। जामो यहां से । भाग जानो।' लोग विमूढ़-से हो गये । सिपाही की डांट खाकर कुछ लोग तो योड़ा पीछे खिसक गये लेकिन उनमें कुछ साहसी लोग भी थे, वे नही सिसके । बोले, 'होम मिनिस्टर को गाड़ी है तो क्या हुआ ? होम मिनिस्टर हैं तो क्या भगवान हो गये ? बुला लामो अपने होम मिनिस्टर को, अभी होम-मिनिस्टरी का मजा चखा देते हैं।' प्रय सिपाही को जरा गर्म होना पड़ा। शायद वह भी डर गया था। अचानक अपनी कमर से ह्वीसल निकालकर जोर से बजा दी उसने । मौर साथ ही थाने से दो-चार कांस्टेवल लाठी घुमाते हुए दौड़े पाये। कमर में रिवाल्वर टंगी हुई थी। 'क्या हुमा है यहा? क्या हुमा, भई ?' इधर लोगों ने शोर मचाना शुरू किया तो उघर पुलिस ने लाठी घुमाना । मौर पता नहीं कहां से इंट, पत्थर तथा सोडावाटर की बोतलें प्रादि पुलिन पर वरसनी शुरू हो गयीं । जो जिधर भाग सका भागने लगा। झट-पट. सड़क की बत्तियां बुझनी शुरू हो गई । कहां गई वह गाड़ी, और उस आदमी का क्या हुआ, मेरी विल्कुल भी समझ में नहीं आया । चारों तरफ टीयर-स छूटने की आवाज और धुंए से भरा वातावरण था । क्षण भर में ही वह जगह मानो युद्ध-क्षेत्र में बदल गयी। मैं भी वहां अधिक खड़ा नहीं रहा । चुप-चाप वहां से निकलकर अन्य इलाके की ओर चला गया जो विल्कुल शान्त था। यहां तक तो सब ठीक ही था। ऐसी घटनाएं तो कलकत्ता महानगरी के लिए ग्राम बात है । इस घटना को लेकर कहानी लिखना उचित नहीं । लेकिन कहानी बन गई। यह साधारण घटना ही दूसरे दिन सुवह कहानी बन गई। दूसरे दिन सुबह अखवार में खवर थी: 'पिछली शाम को कुछ उपद्रवी लोगों द्वारा मुरारी-पुकुर थाने पर आक्रमण किये जाने के कारण पुलिस को उन पर गोली चलानी पड़ी ।' घटना का व्यौरा देते हुए आगे लिखा था, 'उस उपद्रवी दल को शक था कि, स्वराष्ट्र मंत्री श्री काशीकान्त दासगुप्त की कार में बम है और इस शक के कारण उस दल ने कार को रोक लिया । गाड़ी की तलाशी लेने के बाद जब कहीं कुछ नहीं मिला तो उपद्रवी गाड़ी में आग लगा देना चाहते थे कि आखिर पुलिस को बाध्य होकर गोली चलानी पड़ी । स्वराष्ट्र मंत्री श्री काशीकान्त दासगुप्त दिल्ली गये हुए हैं । उनको उक्त खवर ट्रककॉल द्वारा बता दी गई है। स्वराष्ट्र मंत्रालय के एक व्यक्ति के बताने पर तीन उपद्रवियों को गिरफ्तार किया गया है। अभी तक किसी के हताहत होने का समाचार नहीं मिला है। जांच जारी है।'

प्राणों से प्रिय
प्राशापूर्णा देवी
.
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.
दिन भर
पाने, पुलिस प्रफमर के घर, अस्पताल, प्रादि बहुत-सी जगहे जाने-माने, जाने-
पाने, बहुत दुःख, बहुत कष्ट, कितनी ही जिरह, कितने ही अपमान और
कितनी ही ग्लानि के एक दोघं दिन के महासमुद्र को पार कर जव शचिनाय
घर लौटे तब रात वहुत बीत चुकी थी।
की तकलीफ मौर परेशानी में कौन-कौन उनके साथ थे, यह
शचिनाय को इस समय याद नहीं आ रहा है। क्या भानगा निमाई भी था ?
और छोटा साला निघु ? और मित्र देवेश ?
शायद वही लोग साय ग्राकर उसे पहुदा गये हैं ' या कि वे लोग भी यहीं
रुक गये हैं ? क्या टॅक्सी से सभी एकसाथ उतरे थे, पौर टॅक्सी साली लोट
गई है ? या शचिनाय अकेला ही उतरा था, बाकी सब चने गये है !
शचिनाय ठीक तरह से याद नहीं कर पा रहे हैं, लेकिन हठात् उन्हें ना कि
अगर वे लोग भी यहां उतरे होगे तो यह मान वरीप्लटी होली

उनको भी शचिनाथ की ही तरह प्यास लगी होगी। एक समुद्र को पूरी तरह सोख लेने जैसी प्यास ! इस घर में कहां है इतना पानी ! इसके अलावा, शायद उन्हें भूख भी लगी होगी। सुबह से ही तो शचिनाथ के साथ घूमते रहे हैं। फिर भी शचिनाथ इस मुहूर्त याद नहीं कर पा रहे कि सचमुच कौन-कौन थे उनके साथ ? मानो पेट से गले तक धूल भरी पड़ी हो, ऐसा महसूस हो रहा था। भीतर से बहुत जोर की उबकाई उठ रही थी। आह, काश, इस कमरे में एक सुराही पानी होता! पर यह कमरा शचिनाथ का स्टडी-रूम था। इस कमरे में सुराही या घड़ा रहने का सवाल ही नहीं उठता। सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते सीढ़ियों के बीच में बने नीची छतवाले इसी कमरे में शचिनाथ ठहर गये थे; दो तल्ले तक नहीं गये। : किस तरह जा सकते हैं ? वहां लीला जो होगी। जाने पर उससे आमना-सामना करना पड़ेगा। आश्चर्य की बात है कि, शचिनाथ के पास कोई आ नहीं रहा है । क्यों नहीं आ रहा है ? डर से ? जिस डर से शचिनाथ दो तल्ले नहीं गया ? लेकिन, फटिक तो पा सकता है ? उसे किस बात का डर है ? घर के एक छोकरे-नौकर से अधिक तो है वह। उसमें भला इतनी बुद्धि या चिन्ता कहां है जो सोचेगा कि, वावू के कमरे में अभी नहीं जाना चाहिये ! बाबू का मन ठीक नहीं है ! इतना बुद्धिमान न होकर अगर फटिक वेवकूफ की तरह ही अचानक इस कमरे में आ जाय, तो शचिनाथ उससे एक गिलास पानी मंगवा सकते थे। लेकिन आज वह भी मूर्ख की तरह काम नहीं कर रहा है इधर शचिनाथ के पेट में ऐंठन हो रही है। भयानक ऐंठन हो रही है। शायद शचिनाथ बेहोश हो जायेगा । आह, बेहोश होने से पहले अगर एक गिलास ? कुछ नहीं - पानी मिल जाता। सिर्फ एक गिलास । ठण्डे पानी का मरा हुमा एक बडा गिलास। शचिनाय से थोड़ी ही दूर, बिल्कुल थोड़ी ही दूर वह इच्छित वस्तु है, मुद शचिनाथ के ही कमाये रुपयो से खरीद फिज के अन्दर । इसी समय उठकर, फ्रिज खोलकर, चार बोतल निकालकर गटानगट पी सकता है। लेकिन ऐसा करना क्या शोभनीय होगा। शचिनाप ने सोचा। जबकि शचिनाथ को इस समय इतना भी ठीक से याद नहीं है कि दिन भर वे किसके साथ घूमते रहे हैं, किस-किसके साथ बाते करते रहे है, फिर भी उनके मन में यह बात प्रायो कि, 'क्या ऐसा करना शोभनीय होगा ?' गत रात जिसके बेटे का खून हुअा हो, दिन भर जिसको उस खून के सम्बन्ध मे पूछे गये प्रश्नों का उत्तर देते बीता हो, खुद अपनी ही नजरों से देवकर अपने ही बेटे की लाश की शिनाख्त करनी पड़ी हो, और यह रिपोर्ट लिखकर पाना पड़ा हो कि, 'हां, मेरा बेटा पार्थनाय, उम्र वाईस वर्ष, पोस्ट ग्रेजुएट का थान, कल रात जब खाना खाने बैठ रहा था कि पता नहीं क्मिने उमे बाहर से प्रावाज दी और उमको बुला ले गये। फिर, उसके बाद, वह नहीं लौटा।' वही प्रादमी म्बुद अपने हाय मे फ्रिज में मे पानी लेकर पीयेगा' 'छी: छोः !.."और फिर वह दूसरी बात उस बात को अभी कोई नहीं जानता । अगर वह वात भी सामने आ गई, तब ?........ तब लोग क्या कहेंगे शचिनाथ को? तो क्या किसी को बुलाकर ही शचिनाय एक गिलास पानी मगाये ? लेकिन क्या ऐसा करना अच्छा लगेगा? प्राश्चर्य की बात है, पार्थनाय की वे बड़ी-बड़ी प्रासे, बिखरे-बिखरे बान, वुद्धि-दीप्त युवा चेहरा, ऐसे पुत्र का गत रान खन हो गया है. मौर तब भी शचिनाय है कि बैंग-बैठा मोच रहा है, क्या अच्छा लगेगा और क्या पन्छा नहीं लगेगा? लेकिन पानी तो चाहिए ही। चिनाय मन को कड़ा करने की कोशिश करने लगे। सचिनाय फटिक को वाज देने की कोशिश करने लगे पर नहीं, गले से आवाज ही नहीं हो है। क्या गले को लकवा मार गया है ? या शचिनाथ गूंगा हो या है ? पब क्या करे शचिनाथ ? अब शचिनाथ मन-ही-मन प्रार्थना करने लगा कि कोई आ जाय इस कमरे में। और शायद सच्चे मन से की गयी प्रार्थना का असर भी होता है। इसलिये फटिक ही पाया । वह चोर की तरह दरवाजे पर आ खड़ा हुमा। शचिनाथ के हाथ मानो स्वर्ग लग गया। बोले, 'एक गिलास पानी ला।' फटिक ने झिझकते-झिझकते कहा, 'वुपा-मालकिन ने हाथ-मुंह धोकर कपड़े बदलने को कहा है।' 'जो कहता हूं. वह कर।' फिर शचिनाथ ने अचानक ही लड़के को धमकी दी, 'पानी ला।' फटिक जल्दी-जल्दी वहां से चला गया। थोड़ी देर बाद ही फ्रिज खुलने की आवाज सुनाई दी। शचिनाथ को महसूस हुआ कि यह आवाज भी इतनी मधुर हो सकती है, इसका तो उनको ज्ञान ही नहीं था अाज तक । फटिक हाथ में एक बोतल लिये वापस उनके पास और भी चोर की तरह मा खड़ा हुप्रा । बोला, 'गिलास तो मिल नहीं रहा है।' 'गिलास नहीं मिल रहा है ? अच्छा ही है ।' ठंढे पानी की वह बोतल शचिनाथ ने लगभग छीनते हुए ही लड़के के हाथ से ले ली; और फिर वह पानी, सब कुछ शीतल करता हुमा, एक मरुभूमि के रास्ते से नीचे उतरने लगा। शचिनाथ ने सोचा-मन, प्राण, आत्मा, शोक, ये सभी मिथ्या हैं। सत्य कुछ है तो वह है शरीर । शरीर ही स्वाम है। शेष सभी तो सिर्फ दास हैं । अगर ऐसा नहीं होता तो पानी की धार गले में उड़ेलते ही ऐसा क्यों लग कि सभी फष्टों से मुक्ति मिल गयी है ! खाली बोतल लौटा रहे थे कि लड़के का चेहरा उतरा हुआ-सा देखकर उन पूछा, 'शायद अभी तक तूने खाना नहीं खाया है ?' फटिक चौंक उठा। . स्नेह इस ममता भरे प्रश्न के लिये वह स्वप्न में भी प्रस्तुत नहीं था इसीलिये उसने चौंककर धीरे-से ना में सिर हिलाया। मचिनाथ ने फिर पूछा, 'शायद खाना नहीं बना है ?' सबसे ऊपर शरीर का ही महत्व नहीं होता तो पानी पीने के साथ-साथ ही क्या शाचिनाथ ऐसा एक मति स्वाभाविक प्रश्न पूछ सकते थे ? फटिक ने रुलाई के मावेग को दबाते हुए कहा, 'सुबह भी खाना नही बना था।' 'मोह, तो आज घर में किसी ने भी नहीं खाया है ?' 'मैंने और रसोइये ने दोपहर में मूडी खाई थी।' प्राचिनाय ने चट् से पूछ ही लिया, 'और तुम्हारी मालकिन ?' 'मालकिन ?' फटिक ने बड़े उत्साहित स्वर में बताया, 'मालकिन ने तो पानी की बूद तक ग्रहण नहीं की है। वुअा-मालकिन ने बर्फ डाला हुआ शरबत ले जाकर, मिन्नत करके, पिलाना चाहा था लेकिन मालकिन ने गुस्से में वह शरबत नाली में फेंक दिया ।' बर्फ डाला हुमा शरबत ! नाली में फेंक दिया। शचिनाय स्तब्ध रह गया। शचिनाथ आज अपनी ही नजरो में बहुत क्षुद्र, दीन, हीन हो उठा 1 अब इसके बाद तो लीला के सामने जाने काबिल ही नहीं रहा । तो क्या करे शचिनाय ? पाटिक को मना कर दे ? कह दे कि, 'मैंने तुमसे पानी मागकर पीया था यह किमी से नहीं कहना !' इसका मतलब शविनाय और अधिक अकिंचन हो जाये ? और अधम हो जाये ? नहीं। तो क्या वात को थोड़ा घुमाकर कहे कि, 'स्नान के पहले मैंने पानी पीया है, सुनकर, तेरी वुमा-मालकिन गुस्सा होंगी, समझे ? इसलिए यह किसी से मत बहना कि मैंने पानी पीया है।' हां, इस तरह कहा जा सकता है।

तरह कहूंगा तो फटिक भी असली बात को पकड़ नहीं पायेगा। या पर यों कहूं कि- त रात में शचिनाथ के बड़े लड़के का खून हो गया था और उस खून के तुर्म में शचिनाथ का छोटा लड़का पकड़ा गया है । इसके बावजूद, शचिनाथ अभी यहां बैठा-बैठा तिकड़म भिड़ा रहा है, सोच रहा है कि एक साधारण-सी झूठी बात को किस तरह से कहे कि वह सुनने में सच्ची और वाजिब लगे । शचिनाथ के बड़े लड़के की हत्या की बात तो बहुत लोग जानते हैं और अब तक वाकी सब ने भी जान ली होगी। हो सकता है, कल के अखबार में मोटे-मोटे अक्षरों में नाम देकर ही खबर छपे, लेकिन शचिनाथ के छोटे लड़के के बारे में अभी तक कोई नहीं जानता-सिवाय उन लोगों के जो दिन भर उसके साथ रहे थे। कौन हैं वे लोग? शचिनाथ का भानजा, साला, और मित्र ? यही न ? तो क्या वे लोग जगह-जगह यह कहानी सुनाते फिरेंगे ? हेंगे, 'पुलिस अाजकल बहुत ही मुस्तैद हो गई है । खून करने के साथ-साय । खूनी को पकड़ लिया। अव आशा होती है कि देश में शांति कायम हो जायेगी। भई, तीन-चार लड़के इस काम में एक साथ थे; सभी को झट् से पकड़ लिया । उन्हीं में शचिनाथ का छोटा लड़का शक्तिनाथ भी था, जिसकी उन्न है अट्ठारह साल । इसी वर्ष तो वी० ए० पार्ट वन की परीक्षा दी है उसने ।' शचिनाथ के बड़े लड़के के साथ जो कुछ हुआ वह तो जरा भी अविश्वास योग्य नहीं है क्योंकि वह शहर की नित्य की घटनाओं में से ही एक थी लेकिन छोटे लड़केवाली वात ? क्या इससे अधिक अविश्वसनीय भी को खवर हो सकती है इस दुनिया में ? अतः इसी बात को लेकर शहर भर चर्चा फैलेगी। तब यह खबर लीला के कानों में भी जायेगी। शचिनाथ का साला अपने भानजे की जमानत देना चाहता था। बहुत दौड़- की थी, लेकिन इसके लिये पुलिस तैय्यार नहीं हुई। अगर पुलिस राजी जाती तो किसी तरह यह खबर लीला से छिपायी जा सकती थी, लेकिन इस खबर को किस प्रकार सजाये कि- फिर वही बातों को सजानेवाली तिकड़म सोचने बैठ गया शचिनाय ! उन्होने अवश्य यही कहा था, 'कही कोई गलतफहमी हुई है । ऐसा हो ही नहीं सकता।' यह बात निमाई, निधु और देवेश ने कही थी, पर शचिनाय को ऐसा नही लगता । शचिनाथ सोचता है, कही कोई गलतफहमी नहीं हुई है । हालाकि, शचिनाथ के छोटे लड़के शक्तिनाय के वहा होने की तिल भर भी संभावना नहीं थी। बल्कि, शक्तिनाथ के तो उस समय कलकत्ता मे होने की ही बात नहीं थी। शक्तिनाथ एक छोटा सूटकेस लेकर परसों सुबह ही यह कहकर गया था कि 'चार-पाच दिन के लिये मैं कलकत्ता के बाहर जा रहा हूं।' परमो से कल तक, क्या चार दिन पूरे हो गये? हो सकता है, कहीं लौटते समय रास्ते में ही तो पुलिस ने उसे झूठ-मूठ हो-शायद निधु ने भी तो यही वहा था। शाचिनाथ ने उत्तर दिया था, 'महिपादल से लौटते समय बेहाला रास्ते में नहीं परता है, निघु ।' हा, शक्ति परसो यही कहकर गया था कि महिपादल जा रहा है । बिना किसी काम के ही महिषादल जाने की वात सुनकर शचिनाय को अच्छा नहीं लगा था। उन्होंने सोचा था, बहुत ज्यादा हाय के बाहर हुमा जा रहा है लड़का । बाप की पॉकेट से रुपये खचं करेगा मांस बन्दकर । लेकिन यह मब बातें इस जमाने के अन्य वापों की तरह शचिनाथ ने भी मुह खोलकर कही नहीं। शचिनाय ने सिर्फ इतना पूछा था, 'अचानक ही कलकत्ता के बाहर जाने का उद्देश्य क्या ? और क्या नाम है तुम्हारे गंतव्य-स्थल का ?' शक्तिनाय ने पर्यटन की दृष्टि से किसी दर्शनीय स्थल का नाम नहीं बताया; बल्कि प्रावेशभरे स्वर में ही बोला था, 'महिपादल का नाम कभी नहीं सुना आपने?' 'महिषादल का नाम कभी नहीं सुना मैंने ?' अवाक् होकर शचिनाय ने बेटे के वाक्य को ही दोहराया। 'और क्या ?' कहकर शक्तिनाथ खट-खट करता वेग जाटों से नीचे उतर गया।

'बस हो गया न ?' लीला ने कहा, 'मन की निकल गई न ? गाल आगे करके थप्पड़ खानेवाली बात हुई न !' शचिनाथ उसी वक्त चिल्ला पड़े, 'इसका मतलब मुझे यह पूछने का भी हक नहीं है कि लड़का कहां जा रहा है ?' 'नहीं । कुछ भी पूछने का हक नहीं है । आजकल वह जमाना नहीं रहा।' वह जमाना नहीं रहा, अतः शचिनाथ को चुप रह जाना पड़ा था, जवकि और सब बातों में जमाना ज्यों-का-त्यों था। 1 -- पार्थ जब वापस नहीं लौटा तो इस जमाने के अन्य सभी वापों की तरह शचिनाथ को भी रात वारह बजे तक पूरा कलकत्ता शहर छानना पड़ा था। ढूंढना पड़ा था अस्पतालों एवं थानों में । फिर वह भयानक खबर सुनने के वाद से तो मानो वेहद मानसिक यंत्रणा के बेड़े पर चढ़कर ही अगाध समुद्र जैसा एक दिन पारकर, और एक मरुभूमि साथ लेकर, लौटा था शचिनाथ । लेकिन आजकल इन सब का कोई उपाय नहीं है । गत रात के नौ बजे से हुई अव तक की सारी घटनाओं को चित्र की तरह सजाने की कोशिश की शचिनाय ने । पार्थ पढ़ते-पढ़ते उठ पाया था। वोला था, 'मां, मुझे भूख लगी है, खाना दो।' पार्थ हमेशा ऐसा ही किया करता था। छोटेपन से ही उसकी आदत थी कि भूख लगने के बाद उसे एक मिनिट की देर भी सहन नहीं होती थी। लीला ने रसोइये को आवाज दी। ठीक उसी समय बाहर से किसी ने पार्थ को भी आवाज दी। फटिक ने आकर कहा, 'बड़े भैय्या, आपको एक लड़का चुला रहा है।' 'लड़का बुला रहा है ?' लीला ने नाराज होकर कहा था, 'तव तो हो गया खाना !' एक भयानक और अशुभ क्षण में ही शायद वह अशुभ वात लीला के मुंह से निकली थी। .

"तुम थाली परोसकर लामो न मां, मैं अभी माया ।' कहकर पार्थ गया था सो फिर नहीं लौटा । बहुत देर होती देखकर लीला ने कहा था, 'फटिक, जरा देखकर मा तो सडक पर खड़ा किससे बात कर रहा है लडका?' फटिक ने अम्लान स्वर मे कहा, 'मडक पर थोड़े ही सडे हैं भया । वे तो उसी समय लडको के साथ चले गये थे।' चला गया? खाना परोसने को कहकर चला गया ! लीला हाफती-सी मेरे पास आकर बोली थी, 'ग्रजी, तुम जरा बाहर जाकर देखो न, पार्य ने मुमसे खाना मागा और अचानक पता नहीं बाहर से किसने पुकारा, उनके सग ही चला गया। मुझे बहुत चिन्ता हो रही है ।' शचिनाथ ने कहा था, 'मोह, तो चिन्ता करने का जमाना नहीं गया अभी तक?' लीला ने धिक्कारते हुए कहा, 'छो', ऐसे मौके पर तुम मुझसे बदला चुका रहे हो? तुम्हें शर्म नहीं आती ' कसे वाप हो तुम !' "हां, तुम ठीक ही कहती हो।' शचिनाय उसी समय घर से निकल गया था । दुकानें तो सभी वन्द हो चुकी थी, सड़क सुनसान पड़ी थी। शचिनाय का दिज किसी अज्ञात अाशंका से काप उठा था। मोहल्ले का जो भी व्यक्ति शचिनाय को दिखाई पड़ा उसी से पार्य के बारे में उन्होंने पूछा। किसी ने कहा, नहीं, मैंने नहीं देखा । किसी ने कहा, हां, थोडी ही देर पहले एक लडके के साथ जाते देखा था। उसके बाद? उसके बाद बगल के पडोसी भवेशवाबू के घर से फोन करने शुरू किये थे । याद पाता है, फोन-पर-फोन करते गये थे वे । और उसके बाद ? नहीं, उसके बाद कुछ भी याद नहीं । सब कुछ घुघला हो जाता है । याद नहीं कर पा रहे हैं कि कब पुलिस ने माकर पूछ-ताछ की थी, 'माका एक लड़का और भी तो है न ? क्या नाम है उसका ? कितनी उम्र है ?' याद नहीं कर पा रहे हैं कि कब निधु ने प्राकर कहा था, 'हां, मैं उनलोगों के कर अपनी आंख से देख आया हूं। शक्ति ही है इतना याद है कि अभी थोड़ी देर पहले लौटते समय निधु ने कहा था, : कहीं कोई गलतफहमी हुई है। नहीं तो ऐसा हो ही नहीं ता । असंभव । हो सकता है, वह वहां से जल्दी ही लौट आया हो और र जवाव में शचिनाथ ने कहा था, 'वेहाला तो महिपादल से लौटने के मार्ग आता नहीं है, निधु ।' उसके बाद फिर सब धुंधला हो जाता है । क्या उनलोगों ने हाथ पकड़कर शचिनाथ को इस सोफे पर लाकर बैठा दिया है ? हठात् ही उनको याद आया कि फटिक नामक भूख का मारा लड़का आज सिर्फ मूड़ी खाकर ही रह गया है । फिर हठात् ही यह याद आया कि सुषमा ने वर्फ डालकर शरबत बनाया था और लीला को पिलाने के लिये मिन्नतें कर रही थी कि लीला ने उस मूल्यवान वस्तु को नाली में फेंक दिया। काश कि वही चीज इस वक्त कोई शचिनाथ को लाकर देता ! शचिनाथ के दिमाग पर फिर कुहरा-सा छा गया। लेकिन शचिनाथ के पास कोई भी नहीं आ रहा है, जबकि सुपमा शचिनाथ की ही वहन है। इसका मतलव, लीला की अपेक्षा वे लोग शचिनाथ से अधिक डरते हैं । इसका मतलब, उन्होंने दूसरी खवर भी सुन ली है । लेकिन लीला ? कहीं उसे में नहीं सुना दी हो वह खबर ! ऐसा वे लोग कर सकते हैं भला ? वे भी मनुष्य हैं । या पापारण हैं ? 'वायू, वुया-मालकिन ने कहलाया है कि चाय का पानी रख दिया है, आप नहा लीजिये।' 'चाय का पानी ?' हठात् ही मानो शचिनाथ को दो तल्ले पर जाने का एक सहारा मिल हो । जो जगह उनको इतनी देर से खींच रही थी वहां सिर्फ इसलि गये कि अनजाने में ही सीढियों के बीच बने कमरे में वे ठहर गये थे। बस इसी लज्जावश वह अब तक ऊपर नही गये थे। अब शचिनाय ने बाकी बची सीढियों को पार किया और प्रस्फुट स्वर में चिल्लाये, 'क्यों मेरे लिए चाय का पानी क्यो रसामैं खूब शीतल होकर लौटा हूँ न ! इमीलिये मुझे यफ डालकर गरवत-वरदत देने की जरूरत नहीं समझी। क्यों" अपनी आवाज अपने ही कानों में बहुत भद्दी और वेसुरी लगी शचिनाथ को। मुपमा को भी लगी। फिर भी स्वर तो था। स्वर जिससे सहारा मिलता है । स्तव्यता भयंकर होती है । शब्दहीनता प्रेत की तरह गला दबाने को प्राती है । मुपमा अपने बड़े भाई की आवाज सुनकर हिम्मत कर भागे बड़ी, अस्फुट स्वर में बोली, 'रात हो गई है न, इसीलिये-' 'रह, इसीलिये ! तो इसका मतलब है कि दिन भर मेरे गले में कोई शीतल जन ही दालता रहा है न !' सुषमा ने मानो अपने भाई के मूखते गले को महमूम किया, बोली, 'अभी लाती हूं।' मुषमा ने और भी एक बात कही, बहुत ही अस्फुट स्वर मे, 'मैंने चाय की बात इमनिये कही थी कि ये लोग भी चाय ही पीना चाहते हैं ।' वे लोग कौन?' दे लोग से मतलब? मोह ! निमाई, निघु और देवेश ? तो वे शचिनाय को उतारकर चले नहीं गये ? वे यहां प्राये, बैठे, और चाय पी है । हो सकता है, रात का खाना भी वे यही सायेंगे, उनके लिये इमी घर में अब भोजन बनेगा! हठात् शचिनाथ को फिर फटिक का चेहरा याद मा गया । साना बनेगा तो फटिक भी खा सकेगा।

ताज्जुब की बात है ! सचिनाय क्या पत्यर का बना हुआ है ? शचिनाय के एक लड़के का खून हो गया जो इस समय मुर्दावर में पड़ा हुआ है, दूसरे को खून के जुर्म में थाने में बन्द करके रखा गया है, और इधर चिनाय है कि फटिक के खाने की बात को लेकर चिन्ता कर रहा है ? उस फटिक को लेकर जो घर का एक अकिंचन नौकर मात्र है। भैया !' शरवत से भरा हुग्रा कांच का बड़ा गिलास हाय में लिये सुपमा खड़ी थी। एक बार तो शचिनाथ की इच्छा हुई कि गिलास पर टूट पड़े, लेकिन सब जगह कुहरा छा जाने पर भी मस्तिष्क का एकाध कोना अभी भी बहुत साफ था। अतः सचिनाथ को ख्याल आया कि लीला के बारे में पूछने का यह अच्छा सुअवसर है; लीला के पास पहुंचने का भी यही स्वर्ण अवसर है। इसीलिये हाथ न बढ़ाकर उन्होंने पूछा, "भाभी ने कुछ खाया-पीया कि नहीं ?' भाभी से उनका मतलब अवश्य ही 'तुम्हारी भाभी' से था। सुपमा को मन-ही-मन जोर की हंसी आई, लेकिन ऊपर से बहुत ही मरी-ती आवाज में, मानो वही अपराधिनी हो, वोली, 'मैं तो कह-कहकर हार गई- नाराज होती हैं। 'नारान होने का मतलब ? नाराज होने की क्या बात है ?' कहकर मानो स्वयं भी गुस्से में भरकर बड़बड़ाते हुए अपने शयन-कक्ष घुस गया शत्रिनाथ । कल से जिस कमरे को प्रांख से देखा तक नहीं था, उसी कमरे में शविनाथ इसलिये गुस्से का दिखावा कर बड़बड़ाता हुमा घुस गया था कि शायद इन गुम्ने के बहाने ही पत्नी से कुछ-न-कुछ बोलना तो सहज हो जायेगा। लेकिन कमरे में घुसते ही सचमुच के गुस्से से शचिनाय की समस्त स्नायु- शिरायें दप-दप कर सुलग उठीं । शचिनाय का मन हुया कि चीखकर कहे, 'मोह, तभी ! तभी तुम्हें इतनी विलासिता सूझती है ! शरबत का गिलास नाली में फेंक देने की विलासिता ! लेकिन इच्छा होने से ही तो सब बात कही नहीं जा सकतीं। पृथ्वी की चरम अविश्वसनीय घटना के कारण सब कुछ उलट-पलट हो जाने पर भी 'क्या अच्छा लगेगा और क्या अच्छा नहीं लगेगा' का भेद तो कभी नहीं मिटेगा।

इमीलिये अपनी चीख पड़ने की इच्छा को शचिनाय ने रोक लिया । भीतर जल रही माग को नियत्रित करने की कोशिश करने लगा। पर इतना बड़ा ढोंग देखकर क्या वैसा करना सम्भव या सिर्फ ढोग ही नहीं, अश्लीलता। शचिनाथ का शयन-कक्ष अभी भी पहले की ही तरह सजा हुआ है। उसी तरह खूबसूरत रंगीन चद्दर विद्या मलङ्ग । उसी तरह किताबों को रैक पर सजी हुई छोटी-छोटी गुड़ियो की कतार । मेज पर टाइम-पोस के पास काच के दो पक्षी । सामने दीवार पर झूलता लीला द्वारा अपने बचपन में कार्पेट पर बुना प्राकृतिक दृश्य 1 कांच की मलमारी मे करीने से सजी, लीला द्वारा सचित की हुई बहुविध शौकीनी और सजावट की चीजें । सभी बातें तो ज्यों-को-त्यों, हमेशा की तरह, ठीक-ठीक हैं । कहीं कुछ भी तो अस्त-व्यस्त या इधर-उधर बिपरा हुअा नहीं है। मोर ठीक पहले की ही तरह, हमेशा की ही तरह, फुल स्पीड मे मिर पर पखा चलाये और स्वच्छ धुनी हुई साड़ी पहने लेटी हुई है लोला । इतनी स्वाभाविक्ता कैसे सहन की जा सकती है ? हालांकि दरअसल इसमें अस्वाभाविकता की कोई बात नहीं थी। अगर कोई प्राकस्मिक दुर्घटना घट जाय, तो क्या व्यक्ति घर-गृहस्थी को उजाडकर, सब वृष तहस-नहस कर डालता है ? सोने की जगह मोता नहीं ? कि बैठने जगह चंटता नहीं कि पहनने के कपड़ों में धूल-मिट्टी रगड़कर उन्हें मैला कर डालता है ? पाविनाय ने यह युक्ति-संगत बात क्यों नहीं सोची ? पाचिनाय की पासों के समक्ष कल रात से लेकर माज दिन-भर का अजस्त्र परिपन, कुत्सित, कोनत्य दृश्य तैर उठा। शचिनाय के पेट में फिर उबकाई 'जोर मारने लगी। शचिनाय ने ककंश और टूटे हुए शब्दों में कहा, 'शरदत क्यो नही पीया तुमने ?' यही तो कहना चाहता था चिनाथ । यही कहने के लिये तो वह गुस्से का दिखावा करके इस कमरे में आया था। लेकिन क्या इसी तरह से बोलना नी चाहा या उसने?

, लीला ने शचिनाथ से यह वात सुनने की उम्मीद नहीं की थी। वह उठकर बंट गई, और बोली, 'तुम भी यही बात कहते हो !' 'कहूंगा क्यों नहीं ? आखिर खाये-पिये विना तो काम चलने से रहा । अभी ना करोगी तो फिर मांगकर खाना-पीना पड़ेगा। मरुभूमि की वालू से तो पेट की भूख-प्यास बुझ नहीं जायेगी ! लीला को लगा कि शचिनाथ अभी भी अपना वहीं बदला ले रहा है । वह अपने अन्तर की तीव्र, तीक्ष्ण रुलाई के आवेग को सम्हाल नहीं सकी। हिच-. कियां बंध गयीं। रोते-रोते बोली, 'मेरा पार्थ खाना मांगकर भी विना खाये चला गया, लौटकर नहीं आया और मैं खुद खा लूं ? जब तक तुम लोग उस खूनी शैतान को पकड़कर दण्ड नहीं दिलवाते, तव तक मैं-' सचिनाथ के हृदय में फिर वही आग सुलग उठी । शचिनाय ने सोचा, इसी भरण इसकी शोक की इस विलासिता को वह मिटा सकता है, वह अस्त्र उसके हाथ में ही मौजूद है जबकि थोड़ी ही देर पहले तक वह वातों को इस तरह सजा-संवार रहा था कि किसी तरह भी वह दूसरी वात लीला के कानों तक न पहुंचे। । इसका मतलब, पूरी स्पीड में चलते पंखे के नीचे साफ-सुथरी साड़ी पहने सोई नीला को देखकर उसे ईर्ष्या हुई ! कभी वह इसी लीला को 'प्राणों से प्रिय" सम्बोधन से पत्र लिखा करता था, यह वात भी इस समय भूल गया। फिर भी शचिनाथ ने चीख-चिल्लाकर कुछ नहीं कहा । वल्कि, शान्त स्वर में ही कहा, 'उसको दण्ड मिलने से क्या पार्थ लौट आयेगा?' 'जानती हूं । जानती हूं। वह लौट नहीं आयेगा, जानती हूं।' लोला उन्मादित मावों से देखती हुई बोली, 'फिर भी मेरे कलेजे की यह अग्नि तो ठंढी हो जायेगी।' 'जहर ठंडी हो जायेगी !' शचिनाय ने व्यंग्यपूर्वक कहा, 'तव तो तुम्हें वह खबर नुनानी ही पड़ेगी। तो सुनो, उस शैतान को ढूंढने की आवश्यकता नहीं है । वह पकड़ा गया है।' 'पराड़ा गया है ? पकड़ा गया है वह ? कहां है ? कहां है वह ?' ? 'हाजत में।'

'हाजत में ! तुम देख पाये हो उसे ? पूछा था कि पार्थ ने उसका का
विगाड़ा था ?'
'नहीं पूछा।
'नही पूटा ?' लीला विलविला उठी, 'कैसा पत्थर दिल पाया है जो तुमने ?
मुझे ले चलो। मैं जाकर देखूगी उसे ।'
'देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी।' मानो शचिनाय किसी दर्शनीय वस्तु को देख
रहा हो, इस तरह पाहिस्तै-आहिस्ते, संभाल-संभालकर कहा उसने, 'बहुत देव
चुकी हो उसे ।'
'बहुत देख चुकी हूं!'
अचानक लीला भयभीत हो जाती है । बहुत ही भयभीत । लीला की रुलाई
रुक जाती है । लीला के गले से एक प्रस्फुट शब्द निकलता है, 'कौन ?'
'तेरा छोटा बेटा!'
,

.. ज्योतिष वनफूल - । ज्योतिप के आने की बात थी। मैं सूटकेस सजाकर उसके इन्तजार में बैठा हूँ । करीव महीने भर पहले हम दोनों का कश्मीर जाने का प्रोग्राम बना था । खुद उसी ने यह प्रस्ताव मेरे सामने रखा था। बोला था, 'भाई परेश, अब तो मालकत्ता जरा भी अच्छा नहीं लगता है। बम-बाजी और राजनीति, सस्ते नाटक और फालतू सिनेमा, घेराव-स्ट्राइक और हमले--मेरा तो दम घुटा जा रहा है, भाई । चल कहीं भाग चलें। कश्मीर चलेगा? इन दिनों मंजुलि भी कश्मीर में ही है। रहने की कोई असुविधा नहीं होगी। मंजुलि के पिता वहां बड़े अफसर है। उन्होंने मुझे निमंत्रण भी दिया है । चल, कश्मीर ही चला जाय।' परसों ज्योतिप ने ही रिजर्वेशन के दो टिकट खरीदकर मुझे दिये थे और कहा था कि आज ठीक समय पर वह टैक्सी लेकर आ जायेगा। मैं दाढ़ी बनाकर, मूटकेस सजाकर बैठा था, पर ज्योतिष का कोई पता नहीं था। ज्योतिष गवर्नमेन्ट फ्लंट में एक कमरा लेकर रहता है । उसके यहां फोन भी है । मैंने उसे फोन किया पर फोन यजता ही रहा । इसका मतलब, वह घर में नहीं है। ट्रेन का समय हो गया। फिर भी वह नहीं पाया। एक बार फिर फोन क्यिा, राव भी फोन बजता ही रहा। जरूर घर पर नहीं है। दोनों टिकट मेरे ही पाम थी। एक टैक्मी बुलवाकर मैं अकेला ही स्टेशन चला गया । सोचा, शारद वह स्टेशन पर ही मेरा इन्तजार कर रहा हो। लेकिन नहीं । वह स्टेशन पर भी नहीं था । वही देन ही न छूट जाय । दो बार समूचे स्टेशन के चक्कर लगाये, अच्छी तरह सौजा, पर नहीं मिला। चाहता तो मैं अकेला ही कश्मीर जा सकता था पर उसको छोड़कर जाना क्या उचित था? मैं नहीं गया । स्टेशन से ही उसके फ्लंट पर पहुंचा । देखा, उसके कमरे मे ताला लगा हुमा था। कहां गया, यह कोई नहीं बता सका । कलकत्ता शहर में कोई किसी की खबर नहीं रखता। यहां तक कि वगल के कमरे में रहनेवाला भी नहीं। मैं भी एक गवर्नमेन्ट फ्लंट में ही एक कमरा लेकर रहता हूँ। मेरे पास भी फोन है। घर आकर फिर एक बार ज्योतिष को फोन करता हूं। पर फोन बजना ही रहा लगातार । ज्योतिष घर मैं नहीं है । मामला क्या है ? मैं हयडाकर बिस्तर पर उठ बैठता हूं। सा-पीकर मैं सो गया था। मेरा पोन बन रहा है। 'हैलो, कौन?' "मैं, ज्योतिप।' 'अरे तुम, यार मामला क्या है ?' "भई, मैं तो चला पाया हूं यहां...' 'कहा? कश्मीर ? प्लेन से ? मुझे छोड़कर चला गया? बहुत ताज्जुव की दात है! 'तुम्हे लाना सनव नहीं था 1 बड़ा अद्भुत है यह देश !' 'बहुत ही खूबसूरत सीनरी है न ? कश्मीर तो पृथ्वी का स्वर्ग है। सोनरी तो अच्छी होगी ही। लेकिन मुझे छोड़कर चला गया तू !'.

-- पहल यहां आया तब देखा कि चारों तरफ निर्जन और उजाड़ है । कहीं कोई नहीं है। विराट देश, विराट आकाश, विराट मैदान, विराट दिगन्त लेकिन कहीं कोई नहीं है । मैं पैदल चलने लगा। थोड़ी दूर पैदल चलने पर देखता हूं कि लोगों का एक झुंड मेरी तरफ दौड़ा पा रहा है। मैं डर गया लेकिन भाग नहीं सका। चारों तरफ खुली जगह थी। छिपने का कोई स्थान नजर नहीं आया। वे लोग मेरे पास आकर पूछने लगे, 'आप बंगाली हैं ?' मैंने कहा, हां ।' उन्होंने कहा, 'तब पाइये हमारे साथ । हमलोग मुक्तिवाहिनी के लोग हैं । पाकिस्तानी फौज को मार भगायेंगे। वे लोग यहां भी पहुंच गये है पर यहां भी उन्हें टिकने नहीं देंगे। यहां से भी मार भगायेंग उनको । पाप आइये हमारे साथ ।' उनमें से किसी के हाथ में दाव, किसी के किसी के तलवार, किसी के लाठी आदि हथियार थे। किसी के हाथ में कुछ भी नहीं था। जिनके हाथ में कुछ भी नहीं था वे कह रहे थे, 'हमारे पास हमारे दांत हैं, नाखून हैं, मन की ताकत है, हाथों के मुक्के हैं तथा लातों की मार है। आप भी चलिये हमारे साथ । चलिये, चलिये। और देर करने का समय नहीं है।' कुदाल, किसी के किसी के बन्दूक,

"पाइपगन की गोली से ।'
"किसने मारा तुम्हे ?'
"किसने मारा यह जानता हू पर उसका नाम नही बताऊंगा। वह मेरा दोस्त
है । अपनी भूल वह खुद ही बाद में महसूस करेगा। मैं-
उमका गला भरपाया।
अचानक उघर से फोन की लाइन कट गयी।
'हैलो, हैलो !'
पर कोई जवाब नहीं मिला।
...

गणतांत्रिक गजेन्द्रकुमार मित्र . नहीं, खाने-पीने का तो आजकल कोई सवला ही नहीं उठता । वो दिन गये। विमल के पिता बताया करते हैं कि पहले के दिनों में म्युनिसिपलिटी के इलेक्शन आते ही लड़कों के चाय-नाश्तों से उनकी मां-मौसियों को छुटकारा. मिल जाता था । एक महीने से भी अधिक, कभी-कभी तो दो-तीन महीने पहले ही किसी-किसी उम्मीदवार का ऑफिस खुल जाता था। वहां सुबह- शाम ही नहीं, हर वक्त चाय-नाश्ते का खाता इन्तजाम होता था । किसी के घर से (घर में बनाने का इन्तजाम होता तो) पूड़ी तथा आलू की सब्जी मा जाती। कोई दुकान में ऑर्डर देकर जलेवी और समोसे मंगवा लेते थे। उस समय भाव ही क्या था भला । एक पैसे का एक समोसा तथा एक पैसे की दो जलेबी । फिर अगर पॉर्डर देकर बनवाया जाता तो रुपये के अस्सी या किसी-किसी दुकानवाले तो छोटी साइज बनाकर रुपये के सौ समोसे भी बना देते थे।

वोट लेने के दिन का तो कहना ही क्या ? प्रत्येक वूप के पास-पास उम्मीद- वारों के कैम्प लगते । वहा टोकरो-के-टोकरे पूडी तथा बुदिया भौर गमले भर-भरकर बालू की सब्जी रात से ही पानी शुरू हो जाती थी । फोन-कौन सा रहे हैं, कितना सा रहे हैं, कौन-से प्रार्थी के वालटियर किसके कैप में ग रहे हैं, जो लोग सा रहे हैं वे सभी वालटियर ही हैं कि नहीं, यह सब देखने की किसी को फुरसत नहीं होती थी। अब सब कुछ बदल गया है । आज-कल तो चाय और विस्कुट ही इष्ट-देवता हो रहे हैं । जो भी मिल जाय, उसी से काम चलाना पड़ता है । वहुत बार तो विस्कुट भी अच्छी कम्पनी के नहीं होते । 'विशुद्ध ब्राहारण की दुकान के विस्कुट तो कभी-कभी ही नसीय हो पाते हैं । जो दो-एक बहुत विश्वस्त वालटियर होते है उनको घुपचाप पर ले जाकर खिलाया जाता है अव तो । यहा तक कि साम इलेक्शन के दिन भी (माजकल तो धर-पकड होती है, मतलब दो दिन पहले से ही कनयासिग याद करनी पड़ती है। यूथ से एक सौ गज की दूरी तक उम्मीदवारो को कंप लगाने की भी मनाही है) पहले की तरह तली हुई पूडिया और मारा की बात तो दूर, भालू की सब्जी तक का इन्तजाम नहीं होता। कूपन दे दिया जाना है जिससे कि मोहल्ले को चाय-दुकान में जाकर सिर्फ चाय और टोस्ट में सकते हैं। अब तो निर्वाचन का अधिकतर काम पार्टी के हाथ में होता है। पार्टी गे: वालटियर ही मेहनत करते हैं, वे मंत्या में भी बहुत होते हैं, अतः उन गभी को मिलाना-पिलाना संभव नहीं होता। नहीं, अब वह अाकर्षण तया मालच नहीं रहा । निर्वाचन के याद जीतने पर अवश्य ही कोई-कोई उम्मीदवार अपने स्वयं में वृध पाम पनि भ्यालयों वो खिलाते हैं लेकिन किमी-किमी पार्टी के विधान में तो यह भी निषिद्ध ईसा है । विमल के ताऊ यहा करते हैं, नौवनमान में सूती मी प्रावास की सादर मुनी है न? आज-कल किमी भी उम्मीदवार के लिये काम करना माई है। सारी-सारी रात जागकर दीवारों पर वियना और पोस्टर निमा शाम को जुलूम निरालना, गला फाड़कर नारे लगाना, मिटर र र अनुमरण करता, और वारग कर में पौटने पर मिली है नीट .

- - । या फिर चाय-टोस्ट । पूड़ी, पालू की सब्जी और बुन्दिया तो एकदम स्वप्न की सी बात लगती है। विमल इस घर का खाकर उस घर की रखवाली करनेवालों में से नहीं है। किसी एक पार्टी के नाम के साथ जुड़ना भी पसन्द नहीं है । वह चाहता है चाहे इसके लिए कितने भी प्रयत्न क्यों न करने पड़ें-उन सभी को कुछ-न- कुछ प्रोब्लाइज्ड करके रखे । यानी उन तीनों ही मुख्य प्राथियों को जिनको हिन्दी में 'उम्मीदवार' कहा जाता है । यह काम उतना सहन नहीं है, यह वह अच्छी तरह जानता है। और यही कारण है कि इसमें उसे इतना उत्साह महसूस होता है । दोपहर को प्रदीप सरकार के घर जाकर बोल आयेगा, 'नहीं माटू दा । मैं आपके जुलूस में नारे लगाने के लिये नहीं जाऊंगा। चाहे आप नाराज हों या मुझ पर गुस्सा हो करो । क्योंकि मुझे लगता है, अलग रहकर मैं उससे बहुत बड़ा तथा बहुत महत्वपूर्ण कुछ कर सकूगा । मैं निर्मल माइति के कैप में बरावर आता-जाता रहता हूं। वे जानते हैं कि मैं उनका खास सपोर्टर हूं, अतः दिल खोलकर मुझसे सारी बातें करते हैं । वे सब बातें, यानी इलेक्शन के लिये उनकी क्या टेक्टिक्स हैं, बीच-बीच में अगर आपको बताता रहा तो उसी में आपका अधिक लाभ होगा। लेकिन प्रदीप सरकार भी घाघ प्रकृति का व्यक्ति था। उन्होंने भौंहों में वल डालकर कहा, 'तभी हमारे कैम्प में आते-जाते हो और हमारी बात उन्हें बताते हो जाकर ! कौन-सी बात सच है ?' विमल जरा- सा भी विचलित नहीं हुआ । साहित्यिक भाषा में अगर कहा जाय तो उसके चेहरे की रेखाओं में तिल भर भी कम्पन नहीं दिखा । हंसकर ही जवाब दिया उसने, 'अच्छी बात है। अगर आपको यही शक है, तो एक बार परीक्षा लेकर देख लीजिये । यह काम और किसी के लिये मुश्किल हो सकता है, लेकिन आपके लिये नहीं । और मेरे क्या दो सिर हैं जो आपके साथ ऐसी चैईमानी करूंगा? ऐसा करने का परिणाम क्या मैं नहीं जानता ? या चारों ओर की घटनाओं से मैं अनभिज्ञ हूं?' प्रदीप सरकार आश्वस्त हो जाते हैं, तथा सस्नेह विमल की पीठ थपथपाते हैं। निर्मल माइति भी आश्वस्त हो जाते हैं निर्मल से वह कहता, 'मैं आपके पास पाकर आपका काम नहीं कर रहा इससे चुरा न मानियेगा, हाबू दा । यह न सोच वैठना कि मैं उस दल का आदमी - प्रकट रूप से यहा काम करने पर वे लोग सतर्क हो जायेगे। फिर तो मुझे उनकी एक भी खबर हाय नहीं लगेगी। अभी तो वे मुझसे दिल खोलकर बात करते हैं । कोई सास पवर मिलते ही यानी इस चुनाव में उनकी क्या- क्या ट्रिक्स हैं इसका पता लगते ही आपको बता दूंगा । इसी में आपका अधिक हित होगा।' तब निर्मल माइति ने उसे चमगादड़ की कहानी सुनायी थी। वह इस प्रकार थी, 'एक वार पृथ्वी के सभी पशुओं एव पक्षियों में युद्ध छिड़ गया । बहुत जोर की लडाई छिड गई थी परस्पर । दोनों दल में से बहुत हताहत हुए । लेकिन चमगादड़ ने अपनी सुरक्षा का अच्छा उपाय ढूढ निकाला था। एक तरफ तो उसके पंख हैं, वह आकाश में उड़ता है, इसलिए पक्षी है; दूसरी तरफ वह स्तनपायी जीव है तथा अण्डे भी नहीं देता, अत वह पशु है। दर- अमल वह पशु है या पक्षी, यह समझना मुश्किल है । इसी समस्या और मेनिफिट ऑफ डाउट के सुअवसर का लाभ उठाया चमगादड ने । जब पक्षी हारते तब वह पशुओं के पास जाकर कहता, 'मैं तो तुम्हारे ही दल का एक सदस्य हूं। मैं पक्षी योड़े ही हूं। हा, पख हैं मेरे लेकिन जुड़े हुए हैं । अन्य पक्षियो जैसे नहीं है । और फिर हम तो मा का दूध पीकर बड़े होते हैं । अतः हमारे पशु होने में तो दो मत हो ही नहीं सकते।' और जब देखता कि पशुप्रो की हालत पतली हो रही है तब सीधा पक्षियो के पास पहुंचकर कहता, 'भई, हम आकाश में उड़ते हैं, पेड पर वास करते हैं । जन्तु नाम का हमारा कोई सवधी भी हो, ऐसा मुना है क्या आपने कभी ?' इसी तरह दोनों दलो को धोखा देकर खुद का बचाव कर रहा था वह, लेकिन एक दिन जब दोनों का झगडा मत्म हो गया, आपस मे सन्धि हो गई तब दोनों दलो ने ही चमगादड का महिष्कार कर दिया। उसकी चालाकी को दोनो पक्षो ने पकड़ लिया था। अब वह जमीन पर उतरता तो पशु नाखून और दांतो से उस पर आक्रमण वरने और आकाश में उड़ने पर पक्षी चोच मारते । इसीलिये चमगादड़ दिन मे किमी उजाड़, सूने खंडहर में दुवका रहता है। दिन में वह बाहर नही निकलता । रात को सब के सो जाने के बाद चुपके से बाहर निकलता है और मनुष्य के वाग से फल-फूल चोरी करके खाता है ।' यह कहानी सुनने के बाद भी विमल के चेहरे की एक रेखा तक नहीं कांपती है । वह उसी तरह हंसकर कहता है, 'टीक ही तो है, पापलोगों के हाथों वह - 'परिणाम तो निश्चित हो ही गया है, हाबू दा। नाखून और दांत की क्या बात है, उनसे फिर भी बचा जा सकता है, आपलोगों के पास तो पाइपगन, पिस्तोल, छरा आदि भी मौजूद हैं। चमगादड़ को दंड देने में देर ही कितनी लगेगी?' इसके बाद निर्मल माइति के लिए उससे हैण्ड-शोक करने के अलावा कोई चारा ही नहीं था। इन सब में तृतीय उम्मीदवार ही कुछ दुर्बल था। वह था हरीश भण्डारी । दुर्वल का मतलव अहिंसक दल का उम्मीदवार । उनके न नाखून तेज हैं न दांत, यहां तक कि वे अपनी प्रांखें भी बन्द ही रखते हैं । फिर भी बैलेट- चौरस का रहस्य कौन समझ पाया है ? यही सोचकर विमल उसे भी कभी- कभार चुपके से मोहल्ले की गतिविधि से वाकिफ करा आता; और दे आता था कुछ उपदेश । हरीश बाबू के जीतने की उम्मीद सौ में से दस प्रतिशत ही थी, फिर भी अगर बिल्ली के भाग से ही छींका टूटे तो जितनी-सी वेगार कर रहा है उसके बदले भी बहुत-कुछ दावा कर सकता है । हां, नहीं जीता तो कोई बात ही नहीं। विमल का अधिक आना-जाना उन्हीं दोनों यानी प्रदीप सरकार और निर्मल माइति के कैंप में ही था। इसके अलावा, यही दोनों परस्पर समान प्रतिपक्षी थे। इसलिए विमल सचमुच ही प्रदीप की कुछ-कुछ गुप्त योजना निर्मल को और निर्मल की गुप्त चाल प्रदीप सरकार को बताने लगा। इससे दोनों की ही प्रास्था और विश्वास उस पर बढ़ा इसमें शक नहीं, पर दोनों ही सतर्क भी हो उठे थे अपनी-अपनी गुप्त योजना के प्रति । उनकी कुछ बातें आउट हो जाने से उन्हें शक होने लगा कि उनके दल का कोई ऐसा व्यक्ति है जो उनके साथ सांघातिक रूप में विश्वासघात कर रहा है। वह कौन हो सकता है ? किसकी हिम्मत है इतनी ? दोनों दलों के सामने प्रधान समस्या यही थी। एक बार पता लग जाय तो फिर उसका उचित इन्तजाम कर देंगे। विश्वामघाती को किस तरह की सजा देनी चाहिये यह वे अच्छी तरह ही जानते हैं। विमल भी इतना लापरवाह नहीं था उस ओर से । यह आग से खेलना था। बल्कि आग से भी भयानक था यह खतरा । प्राग से जलकर फिर भी कोई- ।

कोई बच जाता है। यह खेल तो काले विपघर से खेलने के समान था। वह भी बहुत फूंक-फूंककर कदम रख रहा था। जो मंत्रणा बहुत ही सीमित विश्वासी व्यक्तियों के सामने होती उसे वह कभी किसी के सामने प्रकट नहीं करता, क्योकि ज्यादा लोग सन्देह की परिधि मे हो तो स्वयं बहुत कुछ निरापद रहा जा सकता है, पर संकीरणं घेरे में फंसने से ही मुसीबत मा जाती है। साहसिकता के सेल में भी एक अद्भुत नशा होता है। जो सपेरे काले एर गोखरे साप को लेकर खेल करते हैं उन्हें कोई अन्य सुविधाजनक निरापद जीविका मिलने पर भी वे उसे स्वीकार करेंगे कि नही, इसमे सन्देह ही ।। लेकिन इस नशे की झोक में जब मनुष्य अंधा हो जाता है तो उसफा गाग हिसाव वरावर हो जाता है। नहीं तो कुमुद चौधरी जैसा परका गिमा पचास के करीब बाघों का शिकार करने के बाद ऐसी सामाशिमा म करता? वह खुद ही कितने लोगों से कहा करता था कि गाt .. कभी विश्वास नहीं करना चाहिये । मर गया है कि नहीं, बस बात का पूरी तरह विश्वास किये बगैर उसके पास कभी नहीं जाना पाहिये । गौर पती घायल बाघ के पास जाकर अपने प्राण दे बैठा। सभी मामलों मे ऐसा ही होता है। जैसे रेग का पक्का खिलाडी दूसरी को सही घोडा बताकर भी खुद गलत घोड़े पर दाव लगाकर रायंस्य हार बैठता है। विमल भी आसिर खुद को सम्हाल नही सका । प्रदीप सरकार के दल किया था कि जो जाली वोट डालेंगे वे वाये हाथ की तर्जनी में वेमलिन गा वोरोलिन लगाकर जायेंगे जिससे स्थायी निशान रूमान में पोंछने सीमा हो जाय । जब यह मंत्रणा तय हुई तव प्रदीप गरसार मे TITLE 1 व्यक्ति और मौजूद थे। एक प्रदीप मरकार का लामा umn || वहा साला, एक उनकी पार्टी का मेक्रेटरी, भौग-1111 ही विश्वसनीय और दाहिने हाय जंगा प्रयाग मा all is wif विमल । प्रतएव यह सवाद जब निमंस माइति मे in.saik H. सरकार के संग में पहुंचा तब उन लोगों मी yri Lal ही था। लेकिन उनलोगों ने न तो या यात ही मामा .

. कुछ जानते हैं और न उत्तेजना ही जाहिर की। वे तो स्तब्ध एवं स्तंभित-से हो गये थे । सभी के मन में एक कुटिल संदेह एवं उत्तेजना फैल गई थी। अगर उस समय भी वह सम्हल जाता तो अच्छा रहता पर विमल यहीं पर चूक गया। उनको उस स्तब्धता को विमल ने अनभिज्ञता समझ लिया। उसने समझा कि इन लोगों को कुछ भी पता नहीं चला है, अत: शक होने की कोई गुंजाइश नहीं है। फिर से निःशंक हो उसने दोनों के ऑफिस में आना-जाना शुरू कर दिया । हां प्रकट में नहीं आता-जाता था, उसी तरह अन्तरंगता से चुपचाप जाता था। उसने मन-ही-मन अपनी इस चतुराई की तारीफ भी की। पर इसी बीच उघर निर्मल माइति का दल भी सतर्क हो उठा। विमल द्वारा दी हुई गुप्त खवर से उनको बहुत ही लाभ पहुंचा था लेकिन साथ ही वे विमल की ओर से शंकित भी हो उठे थे। जो उनका इतना अंतरंग होकर भी (अगर अंतरंग नहीं होता तो यह सब बातें उसे क्यों बतायी जाती!) उनके साथ इतना विश्वासघात कर सकता है उस पर किसी को भी विश्वास नहीं करना चाहिये। इसीलिये माइति-दल की चाल एवं योजना के बारे में वह कुछ भी नहीं जान सका। निर्मल माइति ने एक ऐसी योजना बनाई थी जिसकी प्रदीप-दल के लोग कल्पना भी नहीं कर सकते थे। बहुत ही जवर्दस्त योजना थी। और उसका पता चला ठीक वोट डालने के वक्त । वह उस दिन किसी बूथ के नजदीक भी नहीं फटका । खुद वोट डालने भी नहीं जो कुछ उसने सुना, बस लोगों के मुंह से ही सुना । जितने मुंह उतनी बातें हो रही थीं। फिर भी एक बात साफ थी कि उन्होंने डर दिखाकर ही वाजी मात की थी। किसी ने कहा, रिवाल्वर दिखाकर पोलिंग ऑफिसरों से बैलट पेपर छीन लिये और अपनी इच्छानुसार वोट दे दिये। किसी ने कहा, जाली बैलट पेपर छपवाकर लाये थे। किसी से सुना कि बलट बॉक्स ही अदल-बदल कर दिये। सबसे मजेदार जो वात विमल ने सुनी वह यह थी कि माइति-दल के गुप्त गुण्डे, क्यू लगाये खड़े वोटरों के कानों में चुपचाप बोल गये थे, 'तुमलोगों की गर्दन पर एक सिर भी मौजूद है, लेकिन उस सिर को अगर सही-सलामत रखना चाहते हो, तो अच्छी तरह सोच-समझ कर ही वोट गया। -- देना ।' मादि-आदि। हो सकता है, यह सब अफवाह हो हो । जिसका जैसा जो चाहा, उसने वैसी चात उडा दी। लेकिन फिर भी यह निश्चित या कि उन्होने कोई जबर्दस्त चाल अवश्य चली है। पर क्या चाल यो निर्मल माइति की, इसे विमल नहीं पकड सका। जानने का मौका ही नही मिला, इसी का अफसोस था विमल को। मौका नहीं मिला इसीलिये रातो-रात घर-गांव छोडकर उसको भागना पड़ा। वोटरों की गति देखकर, या फिर वूय के भीतर मौजूद अपने प्रादमियों के मुह से विवरण सुनकर, प्रदीप सरकार अपनी भाग्यलिपि साफ पढ सकता था। इसीलिये ज्यों-ज्यों समय व्यतीत होता जा रहा था, ज्योज्यो सूर्य अस्ताचल की ओर अग्रसर हो रहा था, वोट डालने का समय ज्यों-ज्यों समाप्ति की और पहुंच रहा था, त्यों-त्यों ही उनके दल की मुख-मुद्रा काली एव क्रूर होती जा रही थी। चेहरे पर भयानक कठोरता लिए वे लोग सरगर्मी से विमल को हूँढ़ने लगे। इम पराजय का एकमात्र अपराधी वे विमल को ही ठहरा रहे थे। उनकी धारणा थी कि विमल सब बातें जानता या । उनकी गुप्त योजना उसने निर्मल माइति को बता दी, लेकिन निर्मल माइति को एक भी बात उन्हें नहीं बतायी। माइति के दल पर उन लोगों को उतना क्रोध नहीं था। होने का कोई कारण भी नहीं था क्योकि सभी अपना स्वार्य देखते हैं और यह स्वामाविक भी है, लेकिन विश्वासघातकता दूसरी बात है । विमल अवश्य ही माइति-दल का साई था । प्रदीप का मित्र एवं विश्वासपात्र वनकर उसने गुप्त खबरें संग्रह की और उधर चालान कर दी। उधर की दो-एक फालतू खबरें जरूर ले प्राया था, लेकिन मुख्य योजना को कोई प्राव नहीं आने दी। ऐमे अपराध की क्षमा नहीं मिलती। इतना बड़ा विश्वासघात ! स्पाई सभी देशों में, सभी तरह की राजनीति में धुरिणत समझ जाते हैं; और सभी देशों में इनके लिए दंड भी एक-सा है, यानी मृत्यु । इसके अलावा, मानवता की नीं पता नहीं फिर किसका सत्यानाथ कर बैठे। अतएव और इस अतएव की प्रतीक्षा में बैठा नहीं रहा विमल । जो कपड़े पहने था उन्हीं में घर से भाग गया। सिर्फ घर से नहीं, बांगला देश से ही भागना पड़ा था उसे । वह जानता था कि इस देश में कहीं भी रहने पर ये लोग किसी-न-किसी दिन उसे ढूढ़ ही निकालेंगे। रातों-रात टैक्सी करके अंडाल आया और उसी रात को एक्सप्रेस पकड़ सीधा राउरकेला, अपने बड़े भाई की ससुराल, जा पहुंचा। हालत उसकी शोचनीय हो रही थी। कलकत्ता में भी वेकार ही था, फिर भी प्य शन करके चुद का खर्च किसी प्रकार चला लेता था। पर यहां बिल्कुल असहाय एवं खाली जेब था । इस हालत में रिश्तेदारों के यहां जाने पर शर्म की कोई सीमा नहीं रहती लेकिन और उपाय भी क्या था? बंगाल से बाहर और कोई अपना था भी तो नहीं। लाज-गर्म की पर्वाह न करके व्य शन ढूढ़ने के अलावा उसे और कोई उपाय नहीं सूझा । आत्म-सम्मान को बचाने के लिये झूठी कहानी गढ़ने में उसे कोई असुविधा नहीं हुई, क्योंकि कलकत्ता की बिगड़ी हुई स्थिति और रात-दिन होनेवाली दुर्घटनाओं के बारे में सभी को पता था । अतः इस तरह भाग आने का एक झूठा इतिहास कायम करने में उसे जरा भी देर नहीं लगी। दीनता स्वीकार करने के बावजूद यहां आने के बाद से वह थोड़ी निश्चितता भी महसूस करने लगा। लेकिन एक बात विमल ने नहीं सोची थी कि, इस पराजय की ग्लानि की आग कैसा भयंकर रूप धारण कर सकती है ! प्रतिशोध की भावना कितना उग्र रूप धारण कर सकती है! वह समझा दस-बारह दिन बाद । असवार के मार्फत पता लगा उसे । विमल का छोटा भाई अमल बी० ए० में पढ़ता था । वेचारा बहुत ही भला लड़का था। रात-दिन अध्ययन में ही व्यस्त रहता था और उसकी आन्तरिक अभिलाषा भी बस परीक्षा में अच्छी सफलता प्राप्त करना ही थी । राजनीति में उसकी कोई रुचि नहीं थी। ४२ विमल कोन पाने के क्षोभवश प्रदीप सरकार ने सभवतः उसी से बदला लिया है । पता नहीं, किन लोगों ने उसका सून कर उसे तालाब किनारे फेंक दिया था। और भी सबर मिली । ऐसी खबरें ठीक-ठीक पहुंच भी जाती हैं । इस प्रहार को अपना अपमान ममनकर, निर्मल माइति के दल ने अमल को अपने दल का व्यक्ति घोषित कर दिया है, और उसके शव को फूल-मालाओं से सजाकर सारे मोहल्ले में जुलूस घुमाया है तथा वदला लेने के लिये प्रदीर के दल को डरा- धमका रहे हैं। वेचारा अमल ! क्तिना भला और अच्छा लड़का ! बहुत ही अच्छा लडका था अमल । इस हत्या का कोई प्रतिकार भी नहीं लिया जा सकता, यह विमल अच्छी तरह जानता है । साक्षात् देखने के बावजूद कोई नहीं मानेगा । कोई गवाही नहीं देगा । कोई पकड़ा नहीं जायेगा । लेकिन अगर प्रतिकार लिया भी गया तो उनमे पायदा क्या होगा? मान लो, प्रदीप के दल के किमी सदस्य को निर्मल माइति के लोग 'साफ' कर देते हैं तो प्रदीप दुवारा उनसे बदला लेने की कोशिश करेगा । उनको पहले से ही शक है कि विमल मादति-दस का साई है। अब अमल को उम दत से जोड़ने से यह और भी प्रमाणित हो जायेगा। विमल क्रमशः अपने बड़े भाई और रिता के बारे में सोचता है। आठ माल के भतीजे के बारे में मोचता है ।....... कहीं इनमें से भी कोई उनकी चपेट मे न आ जाये। तो क्या वह लौट जाय ? विमल श्रमशः इस बारे में सोचता-विचारता है । हिसाव करता है-लाभ और नुकमान का। म्बुद लोटकर अपने कमों का फल भुगतने से ही यह माग युझेगी क्या ? सोचता है और अपेक्षा कर रहा है किसी और एक सतरनाक सबर की।

सर दिव्येन्दु पालित - रमन कमरे में घुसते ही बोला, 'सर, मैं बहुत ही मुसीबत में फंस गया हूं। आप मुझे बचा लीजिये। मैं घबरा गया। रमन के इस तरह अचानक चैम्बर में आ घुसने से नहीं, उनके बात करने तथा खड़े होने के ढंग से । टेविल के उस ओर पास-पास तीन कुर्सियां रखी थीं। चैम्बर में घुसकर बात कहने से पहले उसने एक चेयर को कसकर पकड़ लिया था और अब चेचर के सहारे वह इस तरह खड़ा था कि चेयर की पीठ उसके पेट में धंसी जा रही थी। कुतियों के पायों में शब्द- निरोधक कुशन लगाये हुए थे, नहीं तो इसी क्षण एक विकट शब्द होता। लेकिन इन सब बातों को लेकर रमन जरा भी विचलित नहीं हुआ । उसको प्रान्वें दिग्भ्रांत-सी हो रही थीं। नजरें इस कदर स्थिर धीं कि वह मेरे सिवाय और कुछ नहीं देख रहा था। ऐसे अवसरों पर जैसी होनी चाहिये, ठीक वैसी ही अभिव्यक्ति व्यक्त कर रहा था वह । इस वक्त वह मंजा हुमा अभिनेता लग रहा था। उसको साधारण मनःस्थिति में लौटने में थोडा समय लगा। रमन अभिनय कर रहा हो, ऐसी बात नही थी। ऑफिस में मैं उसका बॉस था तथा वह मेरा सबोडिनेट, इस लिहाज से यह निश्चित था कि रमन वेमौके मुझसे मजाक करने नहीं आया था। मैंने घबराकर पूछा, 'क्या हुआ ? तुम काप क्यों रहे हो ? बैठो!' 'सर, मैं बहुत मुसीबत में पड़ गया है। कहते-कहते अचानक रमन चुप हो गया। एक साय ही ढेर सारी बातें जुगन पर आ जाने से जिस तरह आगे-पीछे कहने को सभी बातें गड्ड-मड्ड हो जाती हैं, उसी तरह रमन भी दुविधा में पड़ गया । अपनी बातें कहना भूल गया, मानो जुवान तालू से चिपक गई हो। फिर किसी प्रकार कोशिश कर बोला, 'सर, मेरी पत्नी वाय-रूम मे गिर पडी है । वह सात महीने से एडवांस स्टेज में थी, बहुत ब्लीडिंग हो रही है, सर। मैं घर कैसे जाऊ मिलिट्री ने मौहल्ला घेर रखा है। हडताल चल रही है । कोई भी टैक्सी जाने को तैयार नहीं । बसें भी वन्द हैं।' रमन और भी बहुत कुछ कहना चाहता था, पर कुछ न कहकर हात् दह मेरी टेबिल की ओर खिसक आया। उसके रगङग देखकर लगा कि अब वह मेरे पैर पकडेगा । मैं फुर्ती से उठ खड़ा हुआ और उसका हाथ पकड लिया । 'रमन, होश मे पायो । बोलो, मैं तुम्हारी किम तरह मदद कर सकता है तुम अभी तक ऑफिस मे क्यों बैठे हो? एम्बुलेन्स को खबर करते तो अच्छा रहता। पंदल जाते तब भी अब तक पहुंच सकते थे। अच्छा, तुम्हारा पर 7 कहाँ है ? 'बारानगर।' अचानक दीवार से पीठ सटाकर रमन कुछ संयत हुआ, मानो उसने खुद को मम्हाल लिया हो । सभवतः इतनी देर बाद अब उमको खयाल आया हो कि मेरे साथ उसका क्या सम्बन्ध है और उस कारण वह जितना नत हुआ है उससे और ज्यादा नहीं हो सकता। शायद मेरे उपदेशों ने भी उसे कुछ निराश कर डाला था। गलती मेरी ही थी। यह मैं कैसे कह सकता हूं कि मैंने जो कुछ कहा, वैसा रमन ने नहीं सोचा या कोशिश नहीं की? बहुत ही मुसीबत में पड़े विना रमन मेरे पास नही पाता। उसकी और मेरी श्रेणी - ही अलग-अलग है। कौन किसको कितना पसन्द करता है या नहीं करता, यह मैं अच्छी तरह जानता हूं। नहीं, इस तरह की बात कहना उचित नहीं था । हो सके तो इस वक्त उसकी मदद करनी चाहिये। उसी वक्त मैंने अपने मन को स्थिर कर लिया। रमन मुझसे कैसी मदद चाहता है, यह समझने में मुझे मुश्किल नहीं हुई। घर पहुंचने की कोशिश व्यर्थ जाते देख शायद उसे सवाल पाया हो कि मेरे पास एक गाड़ी भी है। मतलब कि मैं अपनी गाड़ी में उसको घर पहुंचा आऊ । जिद्दी एवं स्नॉब के रूप में मैं चाहे जितना भी बदनाम क्यों न होऊं, लेकिन निश्चित रूप से रमन अब भी मुझे इन्सान समझता है। पूरी तरह मामले पर गौर किया तो ठण्डे कमरे में भी मेरे माथे पर पसीना झलक आया। मैंने कहा, 'ठीक है, तुम नीचे जाकर खड़े होमो । मैं आ रहा हूं।' रमन खुश हुआ या नहीं, यह मैं नहीं जान सका । वैसे भी मैं जानता था कि निराणा के अलावा इस वक्त उसके चेहरे पर और कोई भाव नहीं आयेगा । कामरे से निकलने के पहले उसकी ठण्डी नजरें मुझे छू गयीं। ब्लीडिंग सुनकर ही मेरा शरीर कांप उठा था । सांस रुक-सी गई थी । सात महीने का 5 ण गर्भ में लिये एक युवती वाथ-रूम में गिर गई है और उसके लिये कुछ किया नहीं जा रहा है, यह सब सोचने से ही वदन सिहर उठता है। मेरी एक बुना इसी तरह इसी हालत में बाथ-रूम में गिर पड़ी थी। हॉस्पिटल पहुंचते-पहुंचते उसकी मृत्यु हो गई थी। अकस्मात् ही वह घटना याद आ जाने से मुझे जोर की झुरझुरी आ गई। रमन के कमरे में से जाते ही मैंने ड्रायर में ताला लगाया और जैकेट कंधे पर डाल मैं नीचे उतर पाया। शाम हो गई थी। घिरते अंधेरे में रमन विल्कुल स्तब्ध-सा, प्रेत-छाया-सा, एम्बेसडर का सहारा लिये खड़ा था। इस वक्त वह अभिनेता-सा नहीं लग रहा था। उसकी तरफ देखते-देखते ही मेरे भीतर से एक दीर्घ-देही महापुरुष निकल आया और उसने रमन के कंधे पर हाथ रखा । रमन के कहे अनुसार तो घटना बहुत ही सीरियस लगी मुझे। एक-एक क्षण मूल्यवान महसूस हो रहा था। मेरी सहायता से अगर उसकी पत्नी स्वस्थ हो उठे तो क्या रमन जीवन भर मेरे प्रति कृतज्ञ नहीं रहेगा? यही सब सोचते-सोचते कार में बैठकर मैंने रमन के लिये पीछे का दरवाजा खोल दिया और कहा, 'मानो, गाडी मे बैठो।' रमन बिना कुछ बोले चुपचाप गाड़ी में बैठ गया । गाडी स्टार्ट होने में देर कर रही थी। रमन उकताकर बोला, 'सर, इजन तो ठीक है न ?' मैंने कुछ नहीं कहा । वास्तव मे इस चिन्ताजनक वातावरण में भी मुझे मन- ही-मन हमी आ रही थी। जिन लोगो को कभी कार में बैठना नसीव नहीं होता, वे मभी रमन की भाषा मे ही बातें करते हैं। स्टार्ट होने में देर हो रही है, अत' दजन खराब है ! रमन ने भी शायद यही सोचा था । सीधे- सादे होते हैं उनके सिद्धात । दरग्रसल उसका मोचना भी उचित था कि गाड़ी यो नही मनुष्य की तरह तत्पर होती ! यही तो समय है उसके लिए कुछ कर दिखाने का ! रमन पीछे बैठा था। मेरे हाथ स्टीयरिंग पर थे । भीड-भरे रास्ते में जितनी तेज चला सकता था उतनी तेज गाड़ी चलाने लगा मैं । मैं समझ रहा था कि गाडी में बंटकर भी वह प्राश्वस्त नहीं हुआ है । वह एक बार वांयी ओर से दायी मोर पिनका; उसके बाद वापस बायी ओर सरक पाया । साइड-लाम को थोड़ा-ना नीचा करके मैंने वापस ऊपर कर दिया । रमन बहुत ही नर्वस पोल कर रहा था। पीछे की सीट पर रमन का सीन ऐसा था मानो अधेरे में रमन खुद मे नेल रहा है । अपना एक काल्पनिक प्रतिद्वन्दी खड़ा कर लड़ रहा है तथा मोच रहा है कि उसे जीतना ही पड़ेगा । पार्क स्ट्रीट के मोड पर गाड़ी पहुवते ही अचानक चौराहे को लाल बत्ती जल उठी । मैंने जोर का ब्रेक लगा गाडी रोकी । यह घटना बहुत स्वाभाविक ही थी, फिर भी रमन ने मुह से उकता- हट भरा शब्द निकाल ही दिया । शायद मुझे ही धिक्कारा था या फिर ट्रैफिक की बत्ती को । उस छोटी-सी ध्वनि से ही मानो सारे संसार पर उसका क्रोध जाहिर हो गया था। बीमार पत्नी एव बुद के अलावा इस वक्त वह किसी भी तीमरे के अस्तित्व तक को मानने को तैयार नहीं था । इस वक्त शायद मैं भी उसके दिमाग से मोझल हो गया था । हुंह, होने दो। मैंने मन-ही-मन कहा, 'रमन, तुम निश्चित होकर बैठो। मेरी एम्बेसडर एवं मैं मभी तुम्हें पहुचा देते हैं। अचानक रमन ने पूछा, 'सर, और कितनी देर लगेगी?'

, 'देखो। टाई की गांठ मैंने ढोली कर ली। शायद आज बहुत गरमी थी । या हो सकता है, शायद रमन की उत्तेजना मुझमें भी प्रवेश कर गई थी। थोड़ी देर बाद मैंने पूछा, 'प्रटेण्ड करनेवाले लोग तो होंगे न घर में ?' 'मेरी बूढ़ी मां है । वह भला क्या केयर ले सकेगी! उसे तो ठीक से दीखता भी नहीं । वगल के मकानवालों ने मुझे फोन पर खवर दी और कहा कि डॉक्टर को बुलाना ठीक रहेगा; पर इस समय जैसी परिस्थिति है शहर की, उसमें भला डॉक्टर घर से क्यों निकलेगा?' 'रमन, इतना नर्वस होने की कोई बात नहीं है।' फिर से चौराहे की लाल बत्ती जल उठी । ऐसे ही अवसर पर तो सावधानी वरतने की जरूरत होती है। इन सब कामों में साधारणतः मैं नियम-कायदे मंग नहीं करता। दो-एक मिनट में ऐसी कौन-सी देर होती है ? लेकिन आज रमन के साथ होने की वजह से ही शायद समूचे शिष्टाचार ही मुझसे बगावत करने पर तुले थे । भीतर से एक अद्भुत प्रेरणा मिल रही थी आगे बढ़ने के लिये। उल्टे रास्ते से आती एक गाड़ी की नाक को लगभग छूता हुअा में द्रुत गति से रास्ता पर कर गया। रमन भी देख ले आज कि मैं भी कुछ कर सकता हूं। यों मैंने रमन की पत्नी को कभी देखा नहीं था, फिर भी इस समय मैंने अपने सामने उसका एक काल्पनिक चित्र बना लिया । पीड़ा से नीला पड़ा चेहरा लिये वह पति के लौट आने की प्रतीक्षा कर रही है । उसके और रमन के बीच में बाधास्वरूप खड़े हैं मिलिट्री, हड़ताल, अनिच्छुक टैक्सी, स्तब्ध बसें और एक पूरा निपिद्ध और शून्यप्रायः इलाका । मैं सोचने लगा, क्या अभी तक ब्लीडिंग वन्द नहीं हुई होगी? क्या अभी तक कोई डॉक्टर नहीं पहुंचा होगा ? जिन्होंने फोन पर खबर दी थी क्या वे रमन की प्रतीक्षा में निश्चिंत बैठे होंगे ? इस धरती पर इन्सानियत का क्या इतना अभाव हो सकता है कि किसी की असहायता और पीड़ा के प्रति मनुष्य इतना हृदयहीन एवं उदासीन हो जाय ? अव मुझे ही देखो, विना अपने किसी स्वार्थ के भी कितनी तत्परता से दौड़ा जा रहा हूं ! इसी बात से पता लगता है कि मुझे कितनी चिन्ता है ! मुझे तो लग रहा था कि एम्बेसडर में इंजन नहीं बल्कि मेरा हृदय ही धवा- धक् कर रहा है। आज का दिन मानो रमन के लिये ही विशेष रूप से उदय हुआ था, या कि - मेरे लिये। इसे सयोग ही कहिये वरना शाम के बाद मैं प्रॉफिम में क्यों रहता? अगर सब ठीक-ठाक चला होता तो इस समय मैं शोमन-मीनाक्षी की मैरिज एनिवरी की पार्टी अटेण्ड कर रहा होता। यही तय भी था। 'सिन्म यू आर ए वंचलर, दोपहर मे फोन करके मीनाक्षी ने कहा था, 'तुम जरा जल्दी ही पा जाना । मैंने सोचा था, ऑफिम से सीया ही उसके घर चला जाऊ गा। पर जैसा जमाना आ गया है आज-कल, उसमे कोई भी काम क्या अपनी इच्छा- नुसार कर सकता है इन्सान ? छुट्टी होने के योड़ी ही देर पहले शोभन ने मुझे फोन किया था, 'वेरी मॉरी, फक्शन कैंसिल कर दिया है।' 'मचानक ऐसा क्यो ?' 'बात यह है कि इधर अचानक ही हड़ताल हो गयी है । अभी-अभी यहा जमवर लड़ाई भी हो चुकी है । हमारे घर के ठीक सामने ही छुरे मारने की दो वार- दात हो चुकी हैं । दुकाने सभी बन्द हैं । इधर पाना बहुत रिस्की है।' मेरा मन खराब हो गया । जानता हूं कि आजकल चारो तरफ एक प्रकार की असंभव घटनाएं घट रही हैं । चारो तरफ हत्या और रक्त और वम और हुरे और पाइपगन आदि ही नजर आते हैं। कपडे-लत्तो की स्टाइल बदलने की तरह ही जिन्दा रहने की स्टाइल भी रातो-रात बदल गयी है । वहुत रात गये जब बम फटने के धड़ाम-धडुम शब्द मेरे कानो में पडते तब मुझे यही मह- मूस होता कि जव अन्य सभी लोग सो जाते हैं तब कुछ लोग बाहर निकल पड़ते हैं। उनके दृष्टि-हीन शरीर पर सिर्फ जीम-ही-जीम उगी हुई हैं और उन जीभों को खून के अलावा कोई स्वाद रुचता नहीं है। क्या मैं दार्शनिक हो उटा हूं? शायद । लेकिन बात विल्कुल सही है कि आजकल अनुभूतिया भी इसी तरह अमहाय बनकर पाती हैं। इसके अलावा अन्य भमेने तो अपनी जगह हैं ही। यही उस दिन की बात है, एक जरूरी फाइल तैयार करने के लिये मैंने रमन को मुबह जल्दी ही ऑफिस बुलाया था। जल्दी यानी ऑफिस शुरू होने से भी कुछ पहले ही बुलाया था। मैं मुद आठ बजे से ही प्राकर बंटा रहा था। साढ़े दस बजे का एपॉइन्टमेंट था, रमन तब तक भी नहीं पहुंचा था। काम नहीं हुआ । रमन करीब बारह बजे माया। मैंने उसे चम्बर मे बुला पौर फटकार लगायी, 'रमन, अगर यही रवैया रहा तो तुम्हारे विरुद्ध मुझे कुछ करना पड़ेगा । ऐसे गैर-जिम्मेदार लोगों से हमारा काम चलने का यादि-आदि याद नहीं और भी 'क्या-क्या कह गया था मैं । रमन ने सिर झुकाये सब सुन लिया। उसके बाद बोला, 'सर, आप लोग गाड़ियों में चढ़कर चलते हैं, आप लोग इसे नहीं समझ पायेगे । हमारे उधर बस बन्द है। ट्रेन भी बन्द है। पैदल चलकर किसी तरह यहां पहुंचा हूं। अाप शौक से कर सकते हैं मेरे विरुद्ध रिपोर्ट ।' उसकी अंतिम बात में कुछ कटुता का भाव था । यह तो उद्दडता है । काम नहीं हुआ इसके लिये जरा-सा भी अफसोस नहीं है। सिर्फ कारण दिखाता है । यह रोज का ही घंधा हो गया है । रमन नहीं तो और कोई, कोई-न-कोई, कहीं-न-कहीं अवश्य ही अटक जाता है और ठीक समय नहीं पहुंच पाता। खास बात यह है कि इसके लिये कोई भी अफसोस महसूस नहीं करता। मेरा सारा बदन गुस्से से कांपने लगा था। पेपरवेट को मुट्ठी में भींचकर मैंने उससे कहा था, 'यो के, यू मूव आउट ।' रमन चला गया। उसके विरुद्ध कोई नोट लिखू या नहीं, इसी उत्तेजना और उलझन में दिन भर मिजाज खराव रहा। और फिर उस दिन की घटना को ही लो ! लेकिन शायद उस दिन इतना क्रोधित होना ठीक नहीं हुआ। धीरे-धीरे मेरी शिरामों की उत्तेजना शांत होती जा रही है। मन खराव रहनेवाला भाव खत्म होता जा रहा है । वल्कि इस समय तो लग रहा है कि अच्छा ही हुआ जो पार्टी नहीं हुई, तभी तो हताश-परेशान रमन को मैं ऑफिस में मिल गया । मैं उस वक्त वैठा यही तो सोच रहा था कि शाम किस तरह व्यतीत की जाये ? आफ्टरॉल, यह काम सबसे ज्यादा जरूरी है। मेरी तत्परता पर ही आज एक युदती का जीवन और मृत्यु निर्भर है। अच्छा ही है, कल मीनाक्षी के पास बैठकर बात करने का एक विषय मिल गया। उसी वक्त एक नई चिन्ता ने मुझे दुविधा में डाल दिया। रमन के अनुनय- विनय पर चला तो आया हूं, लेकिन मैंने यह क्यों नहीं सोचा कि यह समय बिना सोचे-समझे उपकारी की भूमिका निभाने का नहीं है। हड़ताल के ही कारण जब शोभन की मैरिज एनिवर्सरी की पार्टी में नहीं गया तब फिर अव क्यों जा रहा हूं? रमन ने भी तो कहा था, 'हड़ताल चल रही है । उपद्रवियों और संदिग्ध अपराधियों की खोज हो रही है । सारे मोहल्ले को मिलिट्री ने घेर रखा है।' जिधर मैं जा रहा हूँ, क्या उधर रिस्क कम है ! इस क्षरण ? - मुझे रमन से अधिक स्वार्थी और कोई नहीं लगा। अपनी स्वार्थपूर्ति के लिये वह मेरा उपयोग कर रहा है। अपनी बीमार पत्नी को बचाने के लिये यह कोई भी जोखिम उठा सकता है, लेकिन मैं किस स्वार्थवश जा रहा हूँ ? रमन के लिये ? क्यों ? सभी को पता है कि हमारी श्रेणी अलग-अलग है । प्रॉफिस में तो मैं तया रमन एक-दूसरे के दुश्मन ही हैं । तो क्या इन्मानियतवश ? दयावश ? पता नहीं । शायद इन सभी से भिन्न भी कोई भाव-बिन्दु है जहा मैं और रमन एक हो जाते हैं । शायद मैं कुछ अधिक हो दार्शनिक बन बैठा पा । रमन ने मुझे जगा दिया । 'सर, अब बांयी और चंतिये !' स्पीड कम कर मैंने अपने चारो तरफ देखने के बाद गाड़ी को बायी ओर घुमाया । 'यहाँ इतना अंधेरा क्यों है ? क्या हमेशा इमी तरह अधेरा रहता है ?' 'नही, सर । मड़क के बल्ब फोड डाले हैं।' कहकर रमन क्षण भर को चुप रहा, फिर बोला, 'हमारा मौहल्ला तो मर, और भी खराव है । वहा रोज दो-एक मर्डर तो होते ही है। पन्द्रह दिनों में यह तीसरी बार हुई है हडताल ।' महा सड़क चौडी होकर दो तरफ को मुड गई थी । वहुत दूर-दूर पर नंम्प- पोस्टो में झूलती एकाध लाइट जल रही थी । किसी-किमी मकान को विड- कियों से भी रोशनी छनकर वाहर पा रही थी। इस तरह के प्रकाश से तो अन्धेरे का अहमास और भी बढ़ जाता है । किस्मत अच्छी यी कि चान्दनी रात थी। उसी रोशनी में आगे बढ़ने की बात सोची मैंने । रमन मेरी गर्दन पर झुकर मा रहा था । उसकी मांम में अपनी कनपटी पर स्पष्ट रूप से मह- मूम कर रहा था। मैंने महसूस किया कि बहुत देर चुप रहने के बाद वह फिर से अधीर हो रहा है । मैं वहा कोई प्रादमी ढूढने की कोशिश मे या पर कहीं कोई दिपाई नहीं पड़ रहा था। रात भाट बजे से ही ऐसी स्तब्धता! अचानक रमन ने कहा, 'सर, आपने मेरा बहुत उपकार किया है।' 'बैंक यू ।' मैंने उद्विग्न स्वर में जवाब दिया । 'पहले घर पहुंच जामो, वहा देखो क्या हालत है, तब यह सब बातें कहना।' 'हॉल्ट !' यह प्राकस्मिक धमको सुन मैंने शरीर को समस्त शक्ति से गाड़ी को ब्रेक -- लगाकर रोका । देखा कि सिर्फ दस गज की दूरी पर दो सैनिक राइफल ताने सड़े हैं । रोशनी की कमी के कारण उनकी उपस्थिति का पता पहले नहीं लगा था । रमन नर्वस होते हुए बोला, 'लगता है, यहां भी वही हड़ताल और 'म्बिग' वाला मामला चल रहा है।' 'कोई और रास्ता नहीं है ?' 'मेन रोड को मैंने इसीलिये एवाइड किया था कि वहां भी कुम्बिग चल रहा ............ सैनिकों में से एक जहां था वहीं खड़ा रहा तथा दूसरा आगे बढ़ पाया। 'हट जायो! जल्दी........' मेरे सिर से सिर्फ एक हाथ की दूरी पर राइफल का मुंह था। रमन गाड़ी में ही खड़े होने की मुद्रा में था। उसने जल्दी से कहा, 'भाई, बहुत जरूरी काम है।' लेकिन फिर वैसा ही कर्कश जवाब मिला, 'हट जायो !' मेरी नजर राइफल पर ही टिकी हुई थी। क्या करू', समझ में नहीं पा रहा था। हठात् रमन ने मेरा कंधा जोर से दबाकर कहा, 'सर, अंग्रेजी में बोलिये तो समझ जायेगा। । उत्तेजना एवं भय के मारे मेरी समूची देह से पसीना छूट रहा था, तब भी रमन की बात पर मुझे हंसी आ रही थी। मैंने कहा, 'कोई फायदा नहीं। कोई ऑफिसर वगैरह रहता तो उसको समझाया जा सकता था । अब तो इसी में भलाई है कि गाड़ी बैक करू ।' धीरे-धीरे गाडी बैंक की । मेरी श्रांखें राइफल पर से क्षण भर को भी नहीं हटीं। हमारी प्रांखों से उनके प्रोझल होने के साथ-साथ ही वम फटने का जोरदार धमाका सुनाई पड़ा---एक वार, वार, और प्राय: उसीके साथ-साथ चारों ओर से प्राती सुनाई दी तीखी-तेज ह्वीसल की आवाजें । हमारे आस-पास एक भी प्रादमी दिखाई नहीं दे रहा था । अधिकांश घरों के खिड़की-दरवाजे चन्द थे। रात के पाठ बजे हैं या दो, यह भी समझ में नहीं पा रहा था। 'यह जगह सेफ नहीं है। हमारा यहां से निकल जाना ही उचित है।' 'तव फिर ?' दो सीट पर 'क्या और कोई रास्ता नहीं है ?' रमन के मुंह से मानो वात नहीं निकल रही है । 'दाहिनी मोर से जाया जा सकता है, मर । उधर कोई ट्रेवल नही है । जरा-सा आगे बढ़ते ही बड़ा रास्ता है। हां, जरा चक्कर पड़ेगा।' 'ठोक है । तो फिर वहा तुम उतर जाओगे न ?' रमन ने कोई जवाब नहीं दिया। पीछे मुड़कर देखता हूं कि वह अघलेटा-सा-पडा है और जल्दी-जल्दी सिर को हाय से रगड़ रहा है । 'रमन, क्या हुप्रा ?' 'मर, कुछ समझ में नहीं आता। अगर अस्पताल ले जाना पड़ेगा, तो........?' तो मैं क्या कर सकता हू ? अब मुझे सचमुच ही गुस्सा आ रहा था। दात- पर-दांत भिच गये मेरे--सोचा, रमन, तुम हद से ज्यादा वढे जा रहे हो । अब तुम्हें स्वयं ही अपना कोई इन्तजाम करना होगा । मैं मजबूर हूँ। शायद मेरे करने लायक कुछ नही बचा है । 'सर !' 'ठीक है चलो, दाहिनी ओर चला जाय । उधर भी ट्राई कर लें।' फिर से गाड़ी को घुमाया। कही पास ही जबर्दस्त गोलमाल हो रहा है। कानों में कितनी ही तरह के अस्वाभाविक शब्द मुनाई पड़ रहे हैं । दाहिनी ओर जाते-जाते मैं और भी अधिक शंकित हो उठा । किसी-किसी रास्ते के प्रत्येक कण में अस्वाभाविकता भरी होती है यहां भी ठीक वैसा ही लग रहा था मुझे। चारों ओर सन्नाटा, अधकार और ह्वा के झोंको के साथ-साथ विविध प्रकार की रहस्यमय छायाएं हिलती-डुलती नजर आती । रमन ने कहा, 'इधर शायद कोई सतरा नही....' में इंसा। इस तरह कहकर रमन खुद को ही प्राश्वस्त कर रहा था। ममझ रहा हो कि मैं अब उसके पास नहीं है। आधा घन्टा पहले उसने मुझे अपनी पत्नी के बाथरूम में गिर जाने की खबर दी थी। दुर्घटना के समय का अगर पता रहता तो रक्तपात के परिणाम का अनुमान किया जा सकता था। ठीक उसी समय अप्रत्याशित रूप से वह घटना घट गई जिसके माय इतनी देर शायद दर की चिन्ता-फिया या उत्तेजना का कोई सम्बन्ध नहीं था। अंधेरे में से अचानक ही पांच-छः युवक प्रकट हुये। उनमें से एक सामने की ओर से गाड़ी पर कूद पड़ा। मैंने एक्सीडेन्ट की आशंका से तुरन्त गाड़ी रोकी। फिर तो पलक झपकते ही उन्होंने गाड़ी का दरवाजा खोला और भीतर मा बैठे। 'गाड़ी चलायो ! जल्दी !' अस्फुट आवाज और अंधेरे में अस्पष्ट चेहरे । आश्चर्य का प्रथम प्रहार सम्हाल- कर मैंने पूछा, 'मामला क्या है ? आप लोग इस तरह गाड़ी में कैसे पा वैठे ?' 'गाड़ी चलायो।' मैं प्रतिवाद करता उससे पहले ही गर्दन पर ठण्डी धातु के स्पर्श से मेरा शरीर बर्फ-सा हो उठा । श्राग्य से देखे विना भी मैं सब कुछ समझ गया। कालेजा मुह को पा गया। मैं समझ नहीं पा रहा था कि अब क्या करू, क्या करना उचित है ! घटना की प्राकस्मिकता का शायद रमन पर भी गहरा असर हुग्रा था। थोड़ी देर तो वह स्तब्ध-सा चुप बैठा रहा। उसके बाद टूटे-फूटे शब्दों में बोला, 'मेरी पत्नी बहुत बीमार है । प्लीज, हमलोगों को छोड़ दीजिये ।' 'ठीक है ।' मैं गर्दन घुमा नहीं सकता था, लेकिन यह समझने में मुझे कोई असुविधा नहीं हुई कि यह आवाज किसकी है ? उसने मेरी गर्दन पर से रिवाल्वर हटाकर मेरा कॉलर कसकर पकड़ लिया और बोला, 'इस साले की पत्नी बीमार है ! इसको उतार दो 1........' - 'सर!' - रमन की कातर अावाज आई। मानो वह स्वर बहुत दूर से मुझ तक पा रहा है । 'सर-सर!........' गर्दन पर फिर वही थातु का स्पर्श । मैं जानता हूं अब मुझे क्या करना है । जानता हूं कि मैं गाड़ी नहीं चलाऊंगा तब भी वह चलेगी। बॉनेट के नीचे मेरा कलेजा जोर-जोर से धक-धक् कर रहा है, वही चलाकर ले जायेगा गाढ़ी। ।

अधेरे के बाद अंधेरा । बहुत दूर पाने के बाद मेरी गर्दन पर से धातु का स हट गया। जिन्होंने मुझ पर यह कृपा की थी, उनका चेहरा देखने की जरूरत नहीं थी। सिर्फ खुद से ही मैंने प्रश्न किया, रमन, क्या तुम पहुंच गये हो? मेरे सामने से एक-के-बाद-एक दृश्य बदलते जा रहे हैं। खूब घना अंधेरा होने के कारण ही इन दृश्यो को अलग-अलग पहचान पाना समय नहीं है।

खून का रंग लाल
मिहिर प्राचार्य
बड़े वाबू के सामने आसामी को पेश किया गया ।
आसामी को देखकर दंग रह गये बड़े बाबू। अपनी जिन्दगी में आज से पहले
ऐसा विचित्र दृश्य उन्होंने कभी नहीं देखा था।
दुबला-पतला शरीर, पुरानी मैल से चीकट धोती, उलझे-विखरे वाल, धूप
से तपकर ताम्बई चेहरा और झुकी-झुकी आंखें। उम्र भी शायद चौदह या
पन्द्रह के करीव होगी।
क्या यही लड़का पॉलीटिकल केस का एक नम्बरी आसामी है ? क्या इसी
को रिवाल्वर सहित गिरफ्तार किया गया है ? वरना क्या आज भारत के
एक महान ज्योतिपी का असमय काम तमाम हो जाता ?
तो क्या संत्रास युग सचमुच लौट आया है ? बड़े वाबू ने सोचा ।
'क्या नाम है तुम्हारा ?'
'तो क्या मेरा नाम जाने बिना ही मुझे पकड़ा गया है ?' किशोर का

जवाय था। ।' 'हुम !' बडे बाबू ने गभीर स्वर मे मावाज निकाली । 'रिवाल्वर तुम्हारे पास कहा से पायो ? खिलौनेवाली नही, विल्कुल सच्ची, शक्तिशाली आग्नेयास्त्र ?' 'पा ही तो गई। यह तो आप भी देख ही रहे हैं।' 'इम उम्र में तुम्हारे हाथ में किताव-कॉपी शोभा देती है, रिवाल्वर नहीं।' 'पापको पता है, मेरा स्कूल से नाम काट दिया गया है !' 'क्यों?' 'और क्यो, आपकी सरकार चौदह साल के लड़के की पढाई निःशुल्क नहीं कर सकती इसलिये।' बड़े बाबू ने कहा, 'मोह तो, पढाई-लिखाई नहीं कर पाये इमीलिये यह प्रावारा- गर्दी अपनाई है " किशोर ने कहा, 'क्या करता, आप ही बताइये ! तीन दिन से घर में खाने को नहीं है। मेरी छोटी बहन नौलू अभी उस दिन मर गई। मां रोई, पिताजी रोये । मैं खुद अपने हायों से उसे जगल में गाड़ आया बडे बाबू ने कहा, 'दारिद्रय एक जातीय समस्या है। यह एक-दो दिन में तो खत्म हो नहीं जायेगी।' किशोर ने कहा, 'तब तक मेरी बहन मरती रहेगी। यही न? इस जातीय समस्या को समझाने के लिये ? क्या आप मेरी बहन को वापस लौटा सकते है ? नहीं न?' 'तो क्या, इसीलिये रिवाल्वर उठा लोगे? इस अस्त्र से तुम दरिद्रता के विरुद्ध लड़ोगे ? तुम्हें पता है, हमारे हाथ मे कितनी ताकत है ?' 'नहीं । दरिद्रता के विरुद्ध नहीं । आपलोगो की इस शक्ति, इसी ताकत के विरुद्ध मैं लडगा चाहता हूं।' बड़े बाबू ने कहा, 'तुम जो कुछ कह रहे हो वह तुम्हारे मन की बात है, यह मानने को तैयार नहीं मैं । ये सब वाते किसी की सिखायी हुई हैं ।' किशोर ने कहा, 'जन्म लेने के बाद ही तो मनुष्य सीतता है. बडे बाबू । क्या मेरी उम्र में आपकी कोई वहन भूख से मरी है ?' 'मैं अच्छी तरह समझता हूं कि तुम्हारे पीछे किसी दल क षड़यंत्र से तुम्हारे जीवन को तहस-नहस कर देना चाहता है। मैं तुम्हारे बाप की उम्र का हूं। मैं तुम्हें वचाऊंगा।' 'माफ कीजियेगा, अपने पिता को मैं अच्छी तरह पहचानता हूं, उनकी पीड़ा को भी मैं खूब समझता हूं। आप किस तरह मेरे पिता को समझ सकते हैं गरीबों के पिता की जात ही दूसरी होती है।' 'यह गरीब और अमीर की बात नहीं है । सभी पिता एक समान होते हैं।' 'नहीं। यह आपकी धोखा देनेवाली बात है। आप पिता हुए बिना भी अपना कर्तव्य पूरा कर सकते हैं जैसे कि मैंने अपना कर्त्तव्य पूरा कर दिया है।' वड़े बाबू ने पूछा, 'तुमने मीटिंग में मंच की ओर रिवाल्वर तानी थी-' किशोर ने बीच में ही टोककर कहा, 'हां, मुझे थोड़ी देर हो गई जिससे मैं ट्रिगर नहीं दवा सका। 'जानते हो, तुम क्या कह रहे हो? तुम्हारी वातों का मतलब क्या है ?' 'मैं एक भालू का शिकार करना चाहता था।' " 'भालू ?' 'एक ही बात है । हम दोनों का जीवित रहना नामुमकिन है । एक को जाना ही पड़ेगा।' . 'पता है, यह एक भयानक राजनैतिक अपराध है ? इस अपराव की सजा फांसी तक भी हो सकती है।' 'जिन्दगी एक ही है, बड़े बाबू ।' 'तुमको अपने प्राणों का भी मोह नहीं ? खुद से प्यार नहीं तुम्हें ?' 'है । खुद से प्यार करता हूं इसीलिये तो राह के रोडे साफ करना चाहता हूं।' बड़े वाबू ने कहा, 'बाहर तुम्हारे माता-पिता आये हुए हैं। तुमसे मिलना चाहते हैं।' किशोर ने कहा, 'उनसे मिलकर मुझे क्या लाभ होगा ?' 'तुम अपने माता-पिता को प्यार नहीं करते?' 'देखिये, मैं यहां कोई पारिवारिक नाटक के अभिनय के लिये नहीं आया हूं। अगर आपको मुझसे और कुछ नहीं पूछना है तो मुझे लॉक-अप में जाने

'तो तुम कुछ भी नही बतायोगे ?' अब बड़े बाबू ने मन्य रूप धारण किया।
'रामसिंह !'
'जी, हुजूर ।' रामसिंह ने सलाम किया।
'इसको ले जायो । जब तक यह कुछ बताने को राजी न हो"" ।'
'जी।'
किशोर को पकड़ कर रामसिंह अधेरी कोठरी मे ले आया ।
'बोल छोकरे, सच बात बोल ।'
किशोर चुप ।
।
हठात् तल-पेट पर एक घूमा पडा जोर से । किशोर उछलकर दीवार से जा
टकराया । सिर इतनी जोर से टकराया मानो फट गया हो ।
रामसिंह ने उसको बिल्ली के बच्चे की भांति फिर से उठा लिया और चुमकारते
हुए बोला, 'बोलो भाई, सच-सच बतायो । हाय राम!'
किशोर के होठों को कोर से सून बह चला या । दो दांत भी टूटकर गिर गये
ये । पसीने से वह नहा उठा या तथा कंपकंपी से उसका समूचा शरीर हिल
रहा या
'तो कुछ भी नही बोलोगे ?'
वडे वायू नै आवाज दी, 'रामसिंह, आसामी को ले पात्रो ।'
रामसिंह किशोर के बेहोश शरीर को घसीटकर ले आया ।
बड़े वाबू ने कहा, 'यह देखो, तुम्हारे माता-पिता बैठे हैं । तुमसे कुछ कहना
चाहते हैं।'
'मां।'
'बेटा ! कैसी हालत कर दी है इन्होंने तुम्हारी ?'
'मां, मुझे पानी।
'रामसिंह, एक लोटा पानी ले पायो।'
पानी लाकर रामसिंह उसे देने लगा।
५६

बड़े वावू
ने हांक . लगायो, 'ठहरो ! क्यों छोकरे, अब तो सच वात
वताओगे न ?'
किशोर ने धुंधली दृष्टि से उनकी ओर देखकर कहा, 'पानी ।'
'हां-हां, पानी मिलेगा, पर उससे पहले तुम्हें सब बताना होगा'
किशोर बड़बड़ाता-सा बोला, 'हां बताऊंगा, बताऊंगा।'
'रामसिंह, पानी दो।'
किशोर पानी पीते-पीते उल्टी करने लगा।
'हाय राम!' रामसिंह के मुंह से निकल गया।
'बड़े बाबू, इतना खून कैसे ? लड़के का हृदय डूबता जा रहा है ।' मां आर्तनाद
कर उठी।
वड़े वाबू ने भी फुर्ती दिखाई, 'कहां, देखू ?'
कलेजे के नीचे एक बहुत बड़ा घाव हो गया था। विल्कुल ताजा घाव था
और कच्ची चमड़ी के कट जाने के कारण घाव बनकर वहां से खून
निकल
रहा था।
बड़े बाबू ने व्यंग्य से कहा, 'यह नाजुक तथा दुबला-पतला शरीर लेकर ही लड़ने
चला था ! रामसिंह की दो लात तक तो सह नहीं सका । रामसिंह, डॉक्टर
को बुलायो।'
किशोर की चेतना हॉस्पिटल की वेड पर लौटी।
शाम के समय बड़े वावू आये, "अव कैसा जी है ?'
किशोर ने कहा, 'ठीक है।'
'जल्दी ही ठीक होना पड़ेगा तुम्हें । तुम्हारे बयान पर ही एक बहुत बड़ा केस
निर्भर करता है। फिर हम लोगों को भी तो अनुसन्धान करना पड़ेगा।
उहुं, हिलो-डुलो नहीं । डॉक्टर ने कहा है, अगर बैंडेज खुल गई तो फिर तुम्हें
किसी तरह से नहीं बचाया जा सकेगा। तुम्हारे शरीर में खून नहीं है।'
दो दिन बाद ।
बड़े बाबू बहुत ही आत्मीय बनकर उसकी बेड के पास चेयर खींचकर बैठ गये

गोद में डायरी का पेज खुला हुआ था और उगलियों मे पंसित दबी हुई थी। 'अब तुम शुरू हो जानो।' बडे बाबू ने आवाज में अभिभावक का-सा लाड भरते हुए कहा । - किशोर पाखें मूदे लेटा हुआ था। उसके होठ काप रहे थे और सीना साम से हिलता-सा दिखता था। उसके नासिका-रन्नो मे मानो किसी फूल की दुशबू तैरकर पा रही थी। पता नहीं, रजनीगधा की या बेला की । सुगंधमय वातावरण की लहरो पर वह मानो कमल-सा तैर रहा था। किशोर के होंठो पर हंसी फैल गई। बड़े वाळू दोनों पर नचा रहे थे। उसके बाद जरा खामे । "बहुत देर आराम कर चुके ।' बड़े बाबू ने उसके बालों में हाय फिराया । 'हा तो, अव अच्छे बच्चे की तरह शुरू कर दो।' अचानक किशोर ने प्रश्न किया, 'अच्छा बडे वायू, आदमी के मर जाने के बाद चया होता है " बड़े वाबू हसे, 'मृत्यु तो नश्वर देह की होती है, आत्मा थोडे ही मरती है।' 'कल रात मैंने एक मजेदार स्वप्न देखा है।' 'स्वप्न?' 'हां, मैं मर गया हूँ। फिर भी मुझे होग है। पता है, मैंने क्या देखा ? देखा कि कितने ही मूअर मेरे चारों तरफ घुर्र-धुरं कर रहे हैं।' 'मूमर !' बड़े बाबू वैमन-से हो-हो कर हस पड़े। 'मच्या, मब काम की बातें की जाये । हा तो, अपने दल को सवर सुनाप्रो । कौन-कौन हैं उसमे ? उनका अस्यागार कहां है ?.........' 'बड़े बाबू, चमगादड़ पशु है या पक्षी ?' - 'पाप नहीं बता सके न ?' किशोर होन्ही हंसने लगा। अव बड़े बाबू गंभीर हुए । 'शायद तुम मेरे साप ठट्ठा कर रहे हो !' 'बड़े वावू, मापको पता है, उल्लू दिन की रोगनी की मोर नहीं देख सकता ।

ग्राप जानते हैं, ऐसा क्यों होता है ? इसकी एक कहानी है।' 'मैं कहानी नहीं सुनना चाहता। मैं जो कुछ जानना चाहता हूं वह तुम बतायोगे कि नहीं?' 'एक बार की बात है, मेरी बहन है ना, वह मेरे पांव में गुदगुदी कर रही थी और मुझे बहुत जोर की हंसी आ रही थी। नीलू ऐसी ही शरीर है न!' 'चालाकी अपने पास ही रखो । तुम सोचते हो कि बातों में मुझे वहला लोगे ? कुछ बतायोगे नहीं ? तो ठीक है । तुम भी सुन लो। हमलोग सच उगलवाना जानते हैं। डॉक्टर साहब के पास एक ऐसा इन्जेक्शन है कि तुम्हें बेझेगा करके तुम्हारे मुंह से सारी सच बात उगलवा लेंगे। मैंने सोचा था कि उसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। अव तुम तैयार रहना । काल ही डॉक्टर से तुम्हारे इन्जेक्शन लगवाने का इन्तजाम करता हूं।' बड़े वावू गुस्से में भरकर वहां से निकल गये। किशोर को सारी रात नींद नहीं आयी। वह बिस्तर पर पड़ा छटपटाता रहा, क्योंकि इन्जेक्शनवाली बात ने उसे बहुत ही चिन्तित कर दिया था । अगर सचमुच ही वेहोशी की हालत में उसने सव स्वीकार कर लिया........तो ? जब तक होण में है तब तक तो डरने की कोई बात नहीं है। लेकिन वेहोशी में वह क्या बक जायेगा, यह तो उसके बस की बात है नहीं। खिड़की से बाहर हल्दिया चांद दीख रहा था । अस्पताल निस्तब्ध था। रात की ड्यूटी पर तैनात नर्स बिल्ली की तरह कुर्सी पर बैठी ऊँघ रही थी। उसको एक बार मां की याद आयी । मां बहुत दुःखी है। 'मां, मैया, मां !' उसने अस्पष्ट आवाज में मां को पुकारा। दूसरे दिन सुबह डॉक्टर को लेकर बड़े वाबू उसके वेड की ओर बढ़े। लेकिन पास पहुंचकर जो विभीपिका उन्होंने देखी उसके सामने वे स्तब्ध, स्थिर, मूर्तिवत खड़े-के-खडे रह गये। एक चौदह साल के लड़के में ऐसी लापरवाह हिम्मत पाई तो कहां से ? बेड पर विछी चादर खून से लथपथ हो लाल हो गई थी। बेड पर से रक्त की ।

धारा बह-वहकर नीचे गिरी थी, और ढेर सारे खून के बीचों-बीच एक वलि के रकरे की तरह पड़ा या किशोर । दोनों माखें खुली थीं। चेहरे पर ज्योतिर्मय मुस्कुराहट थी। डॉक्टर ने कहा, 'नड़का अापको गच्चा दे गया। उसने अपने हाथों कच्ची बडेज दोल डाली । रात भर में उसने अपना सारा खून निचोड़ डाला है।' दड़े वाबू खड़े-खडे पसीना-पसीना हो रहे थे।

उस्वाद
सुनील गंगोपाध्याय
o
'ऐ डावू, बुड्ढे को बुलाकर ला।'
'बुलाता हूं, उस्ताद ।'
'भागकर जा और दौड़कर या । कुत्ते की चाल चलना, बिल्ली की चाल नहीं ।
सममा ?'
'समझ गया, उस्ताद ! चाय-बाय चढ़ा लूं जरा ।'
'जाते समय मालूम करना कि नौ पच्चीस की रानाबाट लोकल ट्रेन लेट है
कि नहीं।
'स्टेशन जाऊं?'
'हां, स्टेशन जा। और वुड्डे से कहना, तुरन्त आये ।'
डावू चाय की दुकान में से उठकर बाहर निकल गया । उसके चलने का ढंग
भी बहुत ही विचित्र था । देखने में यों लगता मानो उसके शरीर के किसी
हिस्ते में कोई तकलीफ हो । सामने देखते हुए तो जैसे चलना जानता ही नहीं

वह । अचानक ही वह कभी वाये, कभी दाहिने, तो कमी एक्दम पाये श्री पोर गर्दन धुमा लेता । उसके दोनों हाथ कभी भी एक-माय बाहर नहीं रहते थे । एक हाथ पेन्ट की जेब में अवश्य ही रहता। चलते-चलने वह अचानक सड़क पार कर दूसरे फुटपाय पर आ जाता । कोई तड़की दिखाई पड़ जाती तो उसकी सांसें बस वही जम जाती, और तब वह कुछ देर वहीं टिळक जाना। लड़की नजर आते ही वह होंठ विचकाने तथा माखें मटकाने लगता। लडकी जितनी खूबसूरत होती, उसकी यह क्रिया उतनी ही तीब्र गति पकड़ लेती। 'ऐ परी, इधर प्रा।' 'क्या बात है, उस्ताद ? 'देख तो इस लाइटर में क्या सरावी है ? जलता नहीं है म्साला। कल सुबह ही तो पेट्रोल भरा है।' 'शायद पत्थर सतम हो गया है।' 'धत् तेरे की !' 'यह क्या, उस्ताद ! लाइटर ही फेंक दिया ! इतनी कीमती चीज फेंक दी ।' 'चुप कर । और यहृत पायेगी।' परी चुप हो गया । उस्ताद यानी पल्टू की इस तरह की पादत से वह अच्छी तरह परिचित है । किसी-किसी दिन पल्टू को यों ही चीजे वरवाद करने की मन मे आ जाती है । अब इस कीमती लाइटर की बात को ही ले, अगर वह उठाने जाय तो जोर की डाट सायेगा । थोड़ी ही देर पहले, सिगरेट परीदते समय पल्टू ने दम का नोट भुनाया था। भुनाते वक्त पल्टू के हाथ से एक वा नोट जमीन पर गिर गया था, पर पल्लू ने वह नोट वापस नहीं उठाया । पार ही एक भिसारी का लड़का एक अन्य व्यक्ति के सामने एक पैसे के लिये रिरिया रहा था। पल्लू ने उसको पुकार, रुपया दिखाकर कहा, 'ऐ, यह रपया न ले । यह रहा । ले ले।' माज पल्लू शायद और भी बहुत-कुछ फेंक देगा या बरवाद करेगा। पल्लू, परी, डावू, बुड्ढा इन सभी का एक-एक अच्छा नाम भी है । श्री बहुत दिनों से वे नाम व्यवहृत नहीं हुए। किसी ने उस नाम से उर्दू में पुकारा।

। वे लोग एक चाय-दुकान को एक केविन में बैठे थे । पर्दा गिरा हुआ नहीं है फिर भी उनके रहते उस केविन में कोई नहीं घुसेगा । यहां तक कि आवाज दिये विना वेयरे तक की वहां झांकने की हिम्मत नहीं होती। पल्लू ने अपने कप में वची हुई चाय को एश-ट्रे में डाल दिया । उसके बाद जमीन पर रखे थैले में बहुत ही सावधानी-पूर्वक हाथ डालकर शराब की एक वोतल निकाली। अपने कप में लवालव शराव भरकर परी से बोला, 'ला, तेरा कप भी खाली करके दे । डावू के सामने इसलिये नहीं निकाला कि वह जरा-सी लेते ही डाउन हो जाता है। क्या चीज है, देखी तूने !' परी ने शराब की बोतल पर चिपके लेवल को परखते हुए कहा, 'अरे वाह, वॉस, यह तो-' पल्टू ने कप को होंठों के पास ले जाकर उस रंगीन पदार्थ को एक ही धूंट में खतम कर दिया । खूबी यह कि न तो उसके चेहरे की एक भी रेखा कांपी और न ही उसे हिचकी आई । परी प्रशंसा भरी नजरों से उसकी ओर देखे जा रहा था। फिर बोला, 'यह हुई न कोई काम की बात !' इस तीखे अर्क को पान करने की प्रतिक्रिया सिर्फ उसकी आंखों में दिखाई पड़ी। कप खाली होने के साथ ही उसकी आंखों के डोरे लाल हो उठे। दुवारा भरते हुए पल्टू बोला, 'ऐसे दिनों में मुझे सवसे अधिक कौन याद आता है, जानते हो ? पगला । पगले के चले जाने से मानो मेरा दाहिना हाय ही चला गया हो।' परी ने कहा, 'पगला भी साला पॉलीटिक्स से भिड़ने क्यों गया था भला । मैंने तो उससे उसी समय कहा था कि ये सब बेकार के झमेले हैं। हर दिन कोई नई बात कहते हैं ये राजनीतिज्ञ लोग।' पल्टू गम्भीर हो जाता है। फिर अपने आप बड़वड़ाता है, 'पगले की पत्नी भी झंझटिया थी।' डाबू ने आकर कहा, 'बुड्ढा नहीं आ सकेगा। उसने कहा है कि उसे दुसार कप को पल्टू ने कुद्ध होकर कहा, 'उसने ही कहा या तूने भी देखा ?' 'बुड्ढा लेटा हुआ था यह तो मैंने भी देखा । सावी ने भी मुझसे कहा-~- पल्टू उठ खडा हुना और बोला, 'चल, देख पाते हैं। अच्छा, ट्रेन लेट है क्या?' 'बीस मिनिट ।' सड़क पर वे तीनों पास-पाम कभी नहीं चलते। एक-दूसरे से दूरी रखते हुए चला करते । इस शहर की सड़कों, रास्तों, दुकानों, मकानों एवं जिन्दगी के जो एक प्रकार के अपने नियम हैं, ये लोग उन सभी नियमों से बाहर हैं । ये लोग एक-दूसरे से इतनी दूरी पर रहते हुए भी एक-दूसरे के लिए पूरी तरह सतर्क रहते हैं। विपरीत दिशा से चार-पाच लडकों का एक और दल चला आ रहा है । यहा के रास्ते भी वटे हुए हैं । इस तरह एक ही समय एक ही रास्ते से एक माय दो दलों का गुजरना, नियम के विरुद्ध है। जगल मे भी तो यही नियम चलता है। फिर भी पल्टू के साथ रहने पर उसके दल को कोई तङ्ग नहीं करता । पर इस समय खुद पल्टू ने ही उन्हें निर्विरोध चले जाने का अधिकार दे दिया। पल्लू अपने दल के साथ दीवार से लगकर खड़ा हो गया। हाथ मे स्थित सिगरेट पाधी भी नहीं खत्म हुई थी कि उसे फेंककर पल्लू ने बहुत ही मनो- योग सहित दूसरी सिगरेट सुलगा ली। रेलवे लाइन को पार कर एक दस्ती पाती है । बस्ती के एक कोने में बुड्ढे का पर है । बुड्ढे की उम्र करीव तीस बरस है । चादर मुह पर लपेटे चुदा सोया पडा है । खटिया के पास एक दुबले चेहरेवाली लडको खड़ी है । पटू ने कमरे में घुसते ही एक झटके मे बुड्ढे के बदन पर से चादर सोचकर दूर फेंक दी और कहा, 'ऐ साला !' 'मा कसम, प्राज मुझे बुखार है । प्राज मैं नहीं जाऊंगा !' 'स्साले, भालू के बच्चे ! तुम्हारे बुखार की ऐसी-तैसी ।' परी हंस रहा था । पल्लू की चीजें बरवाद करने की पादत एव बुर की बुखार का बहाना करने की पादत, दोनों की आदतें एक-सी थी। हर बार ऐना ही होता है। पल्टू शराब की बोतल निकालकर बुड्ढे के मुंह से लगाते शेता, ने, साले । तेरा बुखार तो क्या बुखार का वाप ले-पतले चेहरेवाली लड़की ने तीखी आवाज में पल्ट से कहा, 'मैं पूछतो यह सब क्या हो रहा है ? वह आज एकदम नहीं जायेगा ! मैं कहती हूं, ह नहीं जायेगा।' लू हंस पड़ा । इस तरह की भयानक हंसी हंसने का उसने अभ्यास किया है ॥ जन्मजात आदत है, पता नहीं। पर उस हंसी को देखनेवालों के बदन सिहर उठते हैं। झट से उसने लड़की का एक हाथ कसकर पकड़ लिया और हाथ को मरोड़ते हुए बोला, 'बोल, अब बोल, तोड़ दूं ?' लड़की दर्द के मारे चीख पड़ी। बोली, 'पाह, दर्द होता है। हाय, टूट जायेगा मेरा हाथ । ' पल्टू हसते-हंसते और भी जोर से उसका हाय मरोड़ने लगा । इस बीच बुड्ढा भी हड़बड़ाकर उठ बैठा । वुड्ढे ने कुछ अनुनय तथा कुछ भत्र्सना का सम्मि- श्रण कर कहा, 'ग्रोह, यह क्या करते हो, उस्ताद ? औरत जात के शरीर पर हाय क्यों डालते हो ?' पल्टू ने उसकी बात अनसुनी कर लड़की का हाथ छोड़ दिया और तडाक् से एक चांटा लड़की के गाल पर जड़ दिया। फिर वोला, 'पागे से कभी मेरे सामने जवाब देने की हिम्मत मत करना । समझी ?' और फिर बुड्ढे की ओर मुड़कर बोला, 'चल, औजार ले लिया है न ? जल्दी चल ।' लड़की ने दर्द से बेहाल हाथ को सहलाते-सहलाते कहा, 'मरो । आज ही तुम सब-के-सव मर जायो । तुम सब मरोगे उस दिन मैं सत्यनारायण भगवान की कथा कराऊंगी, शीतला माता पर जल चढ़ाऊंगी, और तुम लोगों की चिता पर बैठकर कीर्तन करूंगी।' पल्टू दस का एक नोट उसकी ओर उछालकर जमीन पर फेंकता हुअा बोला 'मैं चला, सावी । तेरे बुड्ढे को सही-सलामत तेरे पास पहुंचा दूंगा। मैं मरू या जीऊं पर तेरा बुड्ढा तुझे सही-सलामत वापस मिल जायेगा । तब तू मां लाकर पकाना, रांधना । समझी?'

उसके बाद बस्ती के पीछे की ओर खडी की गई जीप में सवार होकर पन्द्रह मिनिट तक उन लोगो ने निरयंक चक्कर लगाये। कोई उद्देश्य नही, मिर्फ गाड़ी में बैठकर घूमना । गाडी मे बैठे-बैठे ही शराब की बोतल शेप हो गई। पल्लू ने उसे महक पर फेंक दिया । खाली बोतल का शीशा झनझनाकर चूर-चूर हो गया। आखिर जीप रेलवे स्टेशन के मामने आकर रुकी। वे तीनो उतर गये । परी जीप स्टार्ट कर वहा से चला गया ! स्टेगन पर भी वे तीनों पाम-पास खड़े नहीं हुए. एक-दूसरे से विशेष दूरी रख- कर बड़े थे। ट्रेन के आते ही तीनों व्यक्ति तीन डब्बों में चढ गये, और इस तरह चढे मानो आपस में एक-दूमरे को पहचानते हो न हो। करीब पन्द्रह मिनट चलने के बाद दो लम्बी तथा एक छोटी हिसिल देते-देते ट्रेन को गति मंथर हो गई और आखिर एक अधेरे जगल मे ठहर गई ट्रेन । क्यो ठहर गई, इनका किसी को भी पता नहीं । झट-पट वे तीनो नीचे उतर गये। दो-एक पल उनमे पता नहीं क्या विचार- विनिमय हुआ और उसके बाद तीनो एक ही डब्बे में सवार हो गये । ट्रेन फिर से धीरे-धीरे चलने लगी। पटू के हाथ में रिवाल्वर या तथा डावू और बुड्ढे के हाथो मे छुरे थे। डब्बे में उन्नीम या बीस से अधिक यात्री नहीं थे । पल्टू ने यात्रियो की ओर मुखा- तिब होकर भयानक रूप मे दात पीसते हुए कहा, 'कोई भी चिल्लाया तो गोली मार दूगा | सालों, निकालो जिस-जिसके पास जो माल है !' डध्ये में बैठे यापी निस्तब्ध-निस्पद-से बैठे थे। सिर्फ एक प्रौढ़ उम्र की महिला डर के मार चिल्ला पड़ी थी, क्योकि डब्बे में वही एकमात्र महिला यो । पर दिमी ने भी कुछ निकालकर नहीं दिया । वुइटा, सचमुच के एक वृद्ध के पास जाफर बोला, 'धड़ो योत, स्माले । इस तरह मुंह बाए क्या देग रहा है ?' पता नहीं घड़ी खोलने का हुक्म सुनकर या अपने लिये साला शब्द मुनकर वृद्ध सचमुच ही वका-बक्का रह गया था। निलुन अकारण, मिर्फ अपने शैतान दिल की सुगी के लिये, पल्लू ने अपने ममीप बैं: पादमी के मीने पर रिवाल्वर की नाल रखते हुए अश्लीन एवं वीनत्म गाली-गलौज करते-करते इतनी जोर मे उसके मुह पर मुकरा माग कि उमी समय होंठ कटकर बेचारे के होंठों से तथा मुंह से खून बहने लगा। .

अव, टपा-टप रुपये, पैसे, घड़ी आदि चीजें निकलने लगीं चारों ओर से । डावू उन सभी चीजों को थैले में भरता जा रहा था और बुड्डा जा-जाकर लोगों की तलाशी ले रहा था। एक आदमी की अंटी में सात हजार रुपये मिले। इतने रुपये लेकर वह रात की ट्रेन से सफर क्यों कर रहा है, इसका जवाब कोन देता? प्रौढ़ महिला अपने गले का हार देने को किसी तरह भी राजी नहीं हुई । गहनों से औरतों को बहुत प्यार होता है। पल्टू खुद महिला के समीप पहुंचा और हार को अपनी मुट्ठी में कसकर जोर का झटका दे तोड़ लेना चाहा, पर हार इतनी सहजता से टूटनेवाला नहीं था। पल्टू स्वभावतः लड़कियों से बहुत निष्ठुरता से पेश आता है। उसने उक्त महिला की छाती पर एक हाथ रख पीछे की ओर ढकेला तथा दूसरे हाथ से हार को पकड़कर कई झटके दिये, तव कहीं हार टूटा । उस महिला के तो मानो प्राण ही निकल गये हों इस तरह की एक चीख मारी उसने । पता नहीं, शारीरिक पीड़ा महसूस करके या दुःख कुल मिलाकर, चीजें कम इकट्ठी नहीं हुई थी फिर भी उनको ट्रेन से उतरने की कोई जल्दी नहीं थी। दो व्यक्तियों की छाती पर छुरी रखे डावू और वुड्दा उनसे पेन्ट खुलवा रहे थे। यह सब सिर्फ खेल नहीं था, टेरिलीन की पेन्ट थीं। कम-से-कम सत्तर-अस्सी रुपये की तो होगी ही। बेचारे एक ने तो पेन्ट-बुश्शर्ट दोनों ही खोल दिये । दूसरे व्यक्ति को ज्यादा ही शर्म आ रही थी, वह किसी तरह भी पेन्ट खोलने को तैयार नहीं था। बुड्ढे का पारा गर्म हो गया, उसने उस आदमी के पेट में छुरा भोंक दिया। यह उस व्यक्ति की शर्म की कीमत थी। हार खोने के में। रक्त-दर्शन के साथ-साथ ही दृश्य पलट गया। इतनी देर सब चुपचाप बैठे थे । डर के मारे सभी यात्री चीखने-चिल्लाने लगे। उन्होंने भी फुर्ती से अपनी सभी चीजें समेट ली। ट्रेन उस वक्त तक वहुत धीमी चाल से ही चल रही थी, अतः वे बड़ी फुर्ती से ट्रेन से कूद गये । अब तक डब्बे में चीख-पुकार बहुत जोरों से मच गई थी। इतना सब होने के बाद बम फेंकने की जिम्मेदारी बुड्ढे की थी। झोले में से निकाल-निकालकर एक-के-बाद-एक तीन वम फोड़े भागने से पहले । ट्रेन अव एकदम रुक गई । कुछ सिपाही बहुत ही मुस्तैदी के साथ भाग-दौड़ करने । लगे; जिस डब्बे मे गोल-माल हुअा है उसे वाद देकर तथा पल्टू लोग जिधर भागे हैं उसको विपरीत दिशा मे ही वे अधिक भाग-दौड़ कर रहे थे। परी जीप लिये तैयार खडा था। उन लोगों के जीप में सवार होते ही उसने पूछा, 'माल-बाल कैसा हाय लगा? वढ़िया ?' पल्टू ने कहा, 'बुरा तो नही। पर तू जल्दी चला।' मानो रसगुल्ले का रम हो इस तरह पल्टू ने बुड्ढे से कहा, 'बुड्ढे, तेरे हाथ मे खून लगा है, कही मेरे शरीर से मत कुप्रा देना।' जीप दौडी जा रही थी। अब तक तो प्रोग्राम बहुत ही सफल रहा । इससे पहले के दो प्रोग्राम भी इसी तरह सफल रहे थे। कही भी किसी प्रकार की मुसीबत में नहीं फमे । लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुमा । थोड़ी देर बाद ही उन्होंने देखा कि दो जीप उन्ही का पीछा करती बढी चली आ रही हैं । पर ऐसा होने की कोई संभावना तो नही यो। परी का दिमाग ठढा था, उनकी गाड़ी बहुत प्रागे निकल पाई थी अतः खतरा बहुत ज्यादा तो नहीं था। थोड़ी देर तेज रफ्तार से गाडो चलाने के बाद परी ने कहा, 'उस्ताद, सामने चेक-पोस्ट है, गाड़ी स्लो करनी पडेगी ।' पल्टू ने गर्दन घुमाकर पीछे की ओर देखने की कोशिश की और योला, 'उस जीप मे प्रो. सी. है क्या ? अगर प्रो. सी. है तो-' इतनी देर से डावू भी पीछे की ओर ही देख रहा था। उसकी तेज नजरें वाइनाकुलर की तरह दूरी को पास ले पाती थी। उसने चौंककर कहा, 'पुलिस नही, मिलिट्री है।' मिलिट्री के साय रेस लड़ने से कोई फायदा नहीं। इसके अलावा, यह भी तो सभव है कि, मिलिट्री उनका पीछा नहीं कर रही हो। उनके साइड देने पर शायद वे आगे चले जायं। जरा आगे, दाहिनी ओर एक मकरा रास्ता है, मगर वे उपर मुड़ना चाहेगे तो भी उन्हे गाड़ी की रफ्तार तो कम करनी ही पड़ेगी। पल्लू ने कहा, 'साइड कर । परी, साइड कर।' लेकिन गाही की गति धीमी होते ही उपर से गोलियो की बौछार होने लगी इन पर । और कोई उपाय भी तो नही था । मिर मुंडाते ही ओले पडनेवाली बात ।

हो गई। इस अंचल में शायद हाल में ही कपy लगा है। पॉलीटिक्स-बाज लड़कों ने इधर कोई कांड किया है और उनकी गलती का दंड पल्टू आदि को भुगतना पड़ रहा है। अचानक जीप में ब्रेक लगा, परी गाड़ी से कूदकर अंधेरे की ओर भाग गया । वह इतनी शीघ्रता से चम्पत हुया कि एक पल पहले तक उसके साथी उसके मतलब को नहीं समझ पाये । डाबू भी कूद गया था । पल्टू के हाथ में रिवा- ल्वर था पर सिर्फ एक रिवाल्वर से मिलिट्री का सामना नहीं किया जा सकता । भागने की सुविधा प्राप्त करने हेतु वुड्ढे एवं पल्टू ने सड़क पर बम फेंकने शुरू कर दिये। वे बहुत दूर तक दौड़ चुके थे लेकिन इस बीच फौजी भी जीप से उतरकर लगातार उनका पीछा कर रहे थे। इसी भाग-दौड़ में वुड्ढे की पीठ में गोली लगने से वह वहीं गिर गया। पल्टू एक पीपल के पेड़ के मोटे तने के पीछे छिपा खड़ा था । अभी भागा जा सकता है लेकिन एक फौजी बुड्ढे की देह की ओर आ रहा था। बदला लिये विना भाग जाना पल्टू के खून में ही नहीं है । शायद बुड्ढा अभी भी जीवित हो । उस व्यक्ति ने बूट से बुड्ढे की देह पर ठोकर मारी, तो पल्टू ने लगातार तीन गोलियां उस पर चलाकर उसके शरीर को छेद डाला । उसके बाद पता नहीं कहां से एक गोली उसके दाहिने बाजू में आकर लगी। पल्टू और उसके साथियों का दुर्भाग्य ही कहिये कि वे फौजी ऑफिसरों की दो जीपों के सामने पड़ गये थे। ट्रेन से उतरकर कुछ लोगों ने फौजी अफसरों की जीप को रोककर ट्रेन में हुई डकैती के बारे में बताया था। गोली खाकर पल्टू जमीन पर गिर पड़ा, लेकिन दूसरे ही पल वह उठकर भागने लगा था कि एक मजबूत हाथ ने उसकी गर्दन घर दवायी। हाय की पीड़ा के मारे पल्लू मरा जा रहा था। अतः क्रुद्ध हो पागल कुत्ते की तरह घूमकर उसने छुरी मारनी चाही कि उसकी कनपटी पर जन्नाटेदार एक थप्पड़ पड़ा । थप्पड़ पड़ने के बावजूद पल्ट्स के मुंह से आश्चर्यजनक आवाज में निकल पड़ा, 'साधन दा !' ने पूछा, 'कौन ?' 'साधन दा, मैं हूं, पल्टू । मुझे छोड़ दो।' फौजी अफसर 'कौन हो तुम ? हाथ का कमाव गर्दन पर कुछ ढीला पड़ गया था। उसी मौके का फायदा उठा- पल्टू ने खुद को फौजी अफसर के पजे से मुक्त कराकर भागना शुरू कर दिया। जाने से पहले पल्टू ने अपने विरोधी की युयनी पर सिर से जोरदार प्रहार किया था और कुछ अश्लील गालिया भी दे गया था। अब उसे कोई भी नहीं पकड़ सकता। पीछे से चिल्लाने की आवाज सुनाई पड़ी, 'हॉल्ट ! गोली मार दूंगा।' लेकिन अब भला पल्टू कही रुकनेवाला या ! उसके पैरों में अभी भी ताकत है । बुड्ढे को मारने का बदला ले लिया है उसने । अब उसकी कोई जिम्मे- दारी वाकी नहीं रही। दुवाग दहाइ मुनाई पड़ी, 'रुक जाम्रो !' पर पल्लू रुका नहीं। ठीक तभी स्टेनगन की गोलियों से उसका शरीर छलनी हो गया। मरने से पहले वह एक शब्द भी नहीं बोल सका। उसका शरीर धरती पर गिरने से पहले ही उसके प्राण-पखेरू उड़ गये थे। . 'क्यो रे पल्टू, क्या हाल-चाल हैं तेरे " 'साधन दा, मेरी मां मर गई है।' 'मोह, कय" न 'यही, करीब डेढ महीना हुआ होगा।' 'तभी, तुम्हारा घुटा-घुटा-सा सिर देखकर मैं भी सोच रहा था कि-; पहले तो मैं तुझे पहचान ही नहीं सका । क्या हुआ था उन्हें ?' 'कुछ नही । बस यों ही सर्दी-जुकाम लगकर बुखार रहने लगा था।' 'प्रोह ! पता ही नहीं चला मुझे तो । तेरी मां मुझे कितना चाहती थी।' 'तुमलोग कलकत्ता मे तो थे नहीं !' 'नहीं। हमलोग तो अब दिल्ली रहने लगे हैं । हां, तुमलोग कहां रहते हो? तुम्हारे पिताजी तो अवश्य ही जीवित होगे ?' 'हा । पिताजी ने सदा में एक छोटी दुकान कर रखी है। हम वहीं रहते हैं।'

'चेहरे से तू इतना भोंदू सरीखा क्यों दीख रहा है ? पढ़ाई-बढ़ाई तो करता
पल्टू ने गर्म से सिर झुका लिया और वोला, 'मुझसे पढ़ाई नहीं होती
दिमाग ही नहीं है मेरे पास ।'
साधन ने हंसते हुए कहा, 'तो गर्दन पर इतना बड़ा सिर बिल्कुल खाली है
क्या? स्कूल फाइनल में कितनी बार फेल हुआ ?'
'दो वार।'
'तो तीसरी बार भी हो जाते ! कोशिश तो करते ।'
'तुम्हें तो पता ही है साधन दा, मां तो है नहीं, पिताजी मुझे और आगे
पढ़ायेंगे नहीं।'
'तो फिर, तू अव क्या करेगा ?'
'कोई नौकरी-वौकरी ढूंढ़नी पड़ेगी। ड्राइविंग सीख रहा हूं, शायद ड्राइवर की
नौकरी मिल जाय।'
-
'इतनी छोटी-सी उम्र में तुझे नौकरी पर कौन रखेगा? कितनी उम्र होगी
तेरी इस वक्त ? सोलह या सत्रह का होगा तू ?'
'उन्नीस का हो गया हूं।'
'उन्नीस का हो गया ? तो फिर ड्राइवरी करके क्या करेगा? किसी कारखाने
में
घुस
सके तो कोशिश कर।
'तुम्हारी तो बहुत जगह जान-पहचान है, जरा मेरे लिये भी कोशिश
करोन!'
-
'अच्छी बात है, देखूगा। आजकल नौकरी का वाजार इतना तंग है कि बस
पूछो मत।'
'तो, तुम वापस दिल्ली चले जानोगे ?'
'हाँ । अभी एक महीने की छुट्टी पर हूं। तुम्हें मालूम है न, मैं आजकल आर्मी
में हूं।'
'हां, जानता हूं। तुमलोग अभी भी उसी मनोहरपुकुर वाले मकान में ही
रहते हो न ?'

"हा वहीं । याना कभी । अच्छा
अब मैं चलूं-
'टहरो न । इतने दिनो वाद तो तुम मिले हो ।'
'तो चल, चाय पीये।'
साधन ने पल्टू के कंधे पर हाथ रख चाय की दुकान को ओर कदम बढ़ाये ।
चलते-चलते बहुत ही अपनत्व भरे शब्दों में वोला, 'तेरी मा मर गई सुनकर
मुझे बहुत ही दुख हुमा। मुझे इतना चाहती थी, इतना स्नेह करती थी कि,
क्या बताऊ ! यह खबर मुन मेरो मा को भी बहुत ही दुख होगा।'
'मां देखो, सायन दा!'
'कहा ? हाय राम, सचमुच, यह माघन ही तो है।'
'बुलाऊं?"
'जा, जा। बुलाकर ला।'
'प्रो साधन दा साधन दा! मुझे नहीं पहचाना
?"
'कौन?'
'म पल्टू ।'
'अरे"", पल्लू ! तू तो पहचाना ही नहीं जाता अब । कितना बड़ा हो गया
'वाह, नुम भी तो बडे हो गये हो । वह देखो, मा वहा खड़ी है।'
'सच ! चल, मिल आऊं।'
साधन ने पास पहुंचकर पल्लू की मां के चरण-स्पर्श किये । मां ने भी आशीर्वाद
दिया, 'जीते रहो बेटा, सुखी रहो। कितने दिनों बाद तुम्हें देखा है !'
साधन ने कहा, 'हां चाची, सच, बहुत दिन हो गये । पल्लू को देखकर मैं तो
चकित रह गया। पहचान ही नहीं पाया। कितना बड़ा हो गया है यह !
कौन-मी क्लास में पढता है रे पल्टु ?'
'बलास सेवेन मे । देशबन्धु विद्यालय में ।'
मां ने पूछा, 'सायन, नुम अभी क्या पढ़ ही रहे हो?'
'इस बार मैंने नाई. एस-सी० की परीक्षा दी है।'

'मन्छी बात है वेटा, बहुत ही खुशी की बात है। भगवान करे तुम और अधिक विधान बनो, मां-बाप का नाम रोशन करो। यहां अचानक कैसे आये, बेटा?' 'दोस्तों के साथ मुर्शीदावाद की सैर करने आया हूं। बहरामपुर स्टेशन के पास हो एक होटल में ठहरे हैं।' 'होटल में ठहरे हो ? क्यों ? तुम यहां आ जाओ न।' 'नहीं चाची, दोस्तों के साथ आया हूं न, इसलिए उन्हीं के साथ रहना ठीक रहेगा । इसके अलावा, हमलोग कल तो जा ही रहे हैं।' 'तेरी मो कैसी है ? कलकत्ता में तुमलोग किस जगह रहते हो ?' 'हमलोगों ने मनोहरपुकुर में एक मकान खरीदा है। आप आइये न किसी दिन। आपको देखकर मां बहुत खुश होंगी। मैं मां से कहूंगा कि आपसे मिला हूं मैं ।' 'मैं तो बस जा चुकी, बेटा ! मुझे ले ही कौन जायेगा? उनका स्वास्थ्य तो ठीक नहीं रहता।' 'क्यों ? क्या पल्टू नहीं ले जा सकेगा? हां रे पल्लू ट्रेन में बैठकर नहीं जा सकेगा? ट्रेन से उतरकर एट-बी वस में चढ़ जाना।' 'हां, मैं जा सकता हूं।" मां ने कहा, 'चलो साधन, थोड़ी देर हमारे घर चलो न । दूर नहीं, वस पास ही है । इतने दिनों बाद तुम्हें देखा है।' 'चाची, दो मिनिट यहीं ठहरो, मैं दोस्तों से कह आऊं जरा।' मां ने घर का दरवाजा खोलकर भीतर प्रवेश करते हुए साधन से कहा, 'आयो, इस खाट पर बैठो। रहने दो, रहने दो; जूते उतारने की कोई जरूरत नहीं । पहले से ही घर कौन-सा साफ-सुथरा है! ऐसी हालत है मकान की कि, बाहर का कोई भी आ जाता है तो शर्मिन्दा होना पड़ता है। तुम्हारी बात दूसरी है। तुम तो अपने ही लड़के जैसे हो । जव अपने देश में थे तो तुम्हारी मां और मुझमें कितनी गहरी मित्रता थी। उसके घर में विशेष कुछ भी बनता तो मुझे खिलाये विना नहीं खाती थी। इसी तरह मैं भी कुछ अच्छी चीज बनाती तो- 'हां चाची, मुझे सब कुछ याद है ।' 'तेरी बहन चन्दना को शादी हो गई क्या 'हा, दीदी की शादी हो गई। दीदी भी अाजकल दिल्ली में हो रहती है। जीजाजी, सेन्ट्रल गवर्नमेन्ट में एक प्रॉफिसर हैं।' 'वाह भई, बहुत ही खुशी की बात है। सच मुझे बहुत खुशी हुई यह खबर सुनकर । भगवान करे उसकी गृहस्थी सदा हरी-भरी रहे । और तेरे छोटे भाई के क्या हाल हैं ? 'वह तो दार्जिलिंग में पढता है । चाची, झरना दीदी कहां है आजकल' झरना दीदी को नसिंग में भरती करवा दिया है । नमिंग की ट्रेनिग पास कर ले तो कुछ कमाने लायक हो जायेगी। क्या करू , शादी तो कर नहीं मको उमकी । और फिर करती भी कहा से घर में कोई भी तो नहीं है कमाने- बाला । तुम्हारे चाचा तो हरदम बीमार ही रहते हैं । मुन रहे हो न, खासी को अावाज ' यस इसी तरह चलता है इनके-कभी मामी, कभी बुखार ।' 'डॉक्टर को नहीं दिसाया ?' 'अस्पताल में दिखाया या। वे लोग अस्पताल में भर्ती करवाने को कहते है । लेकिन भर्ती करवाना इतना आसान थोड़े ही है !' 'चाची, पापका चेहरा भी कितना बदल गया है । स्वास्थ्य गिर गया है। पहले आप कितनी सुन्दर लगती थी, क्या स्वास्थ्य था आपका !' 'नहीं-नहीं, मुझे कुछ नही हुमा । मैं बिल्कुल ठीक है।' 'तो, अब मुझे पाना दीजिये। दोस्त लोग इन्तजार कर रहे होंगे । पल्लू कहा गया?" 'वैठो, बस थोड़ी देर और बैठो। इतने दिन बाद तुम्हें देखा है, मच, मुझे बहुत ही सुशी हो रही है । तुम सब तो कुशलपूर्वक हो, मुनकर मेरा खून बढ़ गया है रे खुशी के मारे।' 'ऐ पल्ट, कहा गया था? यह क्या चाची? आपने यह सब क्यो मंगवाया है ! चेकार ही इतनी मिठाई-विठाई मंगवायी हैं आपने । नही, मैं कुछ भी नही खाऊगा इस वक्त।' 'अरे, कुछ नहीं है, बस जरा-सी मिठाई मंगवायी है। इतने दिनो वाद तुम्हारा - प्रणाम हासिल हुया है मुझे, और इस खुशी के अवसर पर मैं तुम्हारा मुंह भी मीठा न कराऊं? जव गांव में थी तब, जब भी तुम्हारे घर जाती तो कितनी- कितनी चीजें खाकर आया करती, मुझे सब याद है।' 'अव उन बातों से-' 'पल्टू, तेरी युथनी इस तरह कैसे कट गई रे ? क्या हुआ ?' साधन दा का प्रश्न सुन पल्टू हक्का-बक्का रह गया । उसने एक वार साधन दा की ओर देखा, फिर अपनी मां की ओर देखने लगा। उसके बाद बहुत ही संकोच-सहित बोला, 'कल गिर पड़ा था।' पल्टू की मां रो पड़ी। आंखों पर आंचल ढंकती हुई वोली, 'नहीं, गिरा नहीं है। मनुष्य कितना निष्ठुर हो सकता है, यह उसी का प्रमाण है । पास ही के पटू खेलने जाया करता है । वे लोग बड़े आदमी हैं। हम उनकी नजरों में कुछ भी नहीं हैं। फिर भी हमारे बच्चे भी तो और बच्चों की तरह आखिर वच्चे ही हैं । औरों की तरह हमें भी अपने बच्चों से उतनी ही ममता है । क्या हमें अपने बच्चों का दुख-दर्द नहीं सताता ? उनके घर में वह प्रांख- मिचौली खेल रहा था। पल्टू के हाथ का धक्का लगकर उनकी एक कीमती फूल- दानी टूट गई । मान लो, इसने तोड़ ही दी, पर आखिर तो यह बच्चा ही है । इसने क्या जान-बूझकर तोड़ी थी ? उनके लड़के से भी तो टूट सकती थी। इतनी-सी बात के लिये बच्चे को इस तरह मारना चाहिये था ? तुम्हीं देखो, कितनी बुरी तरह मारा है ! खून से भीगा कमीज लेकर जव यह घर लौटा तो मैं ही जानती हूं, मेरे दिल पर क्या गुजरी है....ठोंगे वेचकर कितने कष्ट से मैं इसकी पढ़ाई करवा रही हूं, इसी उम्मीद पर कि, वड़ा होकर यह मुझे सहारा देगा।' एक मकान में 1 एक पांच साल का गोल-मटोल वच्चा उछलता-कूदता पाता है और आकर कहता है, 'मां, तुमने साधन को पैसे दिये हैं, और मुझे नहीं दिये !' 'छीः छोः पल्टू, साधन नहीं कहते, वेटा । साधन भैया कहो । वह तुमसे बड़ा है न उम्र में !" 'हा-हां, साधन भैया को तुमने पैसे क्यों दिये जवकि, मुझे नहीं दिये !' लम्बे बरामदे में विछे कार्पेट पर एक आठ साल का लड़का वाबू बना सजा- संवरा बैठा है । वह बड़े ही मनोयोगपूर्वक खीर खाने में मगन है ।

१ मा ने कहा, 'हा तुम्हें भी दूंगी, जा पहले मुंह-हाय धोकर प्रा।' पन्टू उछलता-कूदता हाथ-मुंह धोने चला गया। मा ने साधन से पूछा, 'क्यों बेटा, थोड़ी-सी और लेगा ? सीर नही लेता तो दो लड्डू ही ले ले नारियल के । बड़ा ही राजा बेटा है ! कहना मानता है मेरा ।' तब तक पल्टू भी वहा पहुच गया था। वह भी साधन की तरह साफ-सुथरा हो पानाकारी वालक की तरह बैठकर बोला, 'साधन मैया को जितने लड्ड दिये हैं उतने मुझे भी दो।' 'तूने सुवह भी खाये थे । अधिक सायेगा तो पेट दुखेगा ।' 'कुछ भी हो, प्राज तो मैं जरूर लूंगा।' 'तो ले, जल्दी से खा ले। फिर दोनो भाई सेलना । ठीक है न झगड़ा नहीं करोगे न आपस मे ?' माधन ने चाट-पोछकर खीर सा ली। पल्टू की मां ने अपने हाय से उसका मुह धोकर पोछ दिया । पल्टू की नाक से पानी वह रहा था, वह भी साफ किया । उसके बाद पल्लू का भी मुंह घोकर बोली, 'जानो, अब तुम लोग सेलने जायो।' उमी ममय माघन के मा तथा पिताजी वहा आ पहुचे । वे बगल के मकान मे किसी से मिलने आये थे। सायन की मां ने साधन से कहा, 'चल, अब घर चलना पड़ेगा। पन्टू की मां ने कहा, 'इतनी जल्दी कसे जायेगी ! अभी तो पायी है। थोड़ी देर तो बैठ । इन लोगों को खेलने दे।' मायन की मा ने पल्लू को गोद में उठाने की कोशिश की, पर वह किमी तरह भी उनकी गोद में नहीं गया । साधन की मा ने पल्टू को मा से कहा, "कनक, तेरा बेटा कितना खूबसूरत लगता है ! गहरे तथा घुघराले बाल कटौती माखें- पल्टू को मां मन्द-मन्द मुस्कुराती हुई बेटे की मोर देखती रही । सापन - पल्टू मेलने के लिये चले गये। नदी पर ऊंचा पुल बना हुआ है । बरसात का मौसम है। थोड़ी होकेको बरसात होकर चुकी है । प्राकाश, पृथ्वी तया पेड़-पौधे सब पुनपुरे से लगते हैं। धान की नोक पर पानी की बून्द टिकी हुई हैं। शाम क की हवा सरसराहट की आवाज कर रही है । और उस स्वच्छ वातावरण खेल रहे हैं दो शिशु । घेर-घुमेर कदम के पेड़ में गुच्छे-के-गुच्छे अनगिनत फूल खिले हुए थे, पर न वच्चों के हाथ फूलों तक नहीं पहुंच रहे थे। बहुत उछलने पर भी फूल य नहीं आये उनके। पल्लू ने पूछा, 'सावन दा, तुम गाछ पर चढ़ सकते हो?' सावन ने बहुत ही समझदार की तरह कहा 'वरसात के दिनों में गाछ पर नहीं चढ़ना चाहिए । इन दिनों गाछ में सांप रहते हैं। हरे रंग के सांप ।' 'मैंने सांप देखा है । तुमने देखा है कभी ?' 'बहुत, बहुत बार ।' 'कदम फूल के पेड़ पर सांप नहीं रहते।' 'हां, तुझे अधिक मालूम है ! तुझे पूछकर चढ़ेगा कदम के पेड़ पर सांप !' 'हां, मालूम तो है ही । मैं और दीदी एक दिन इस गाछ पर चढ़े थे ।' 'जा झूठे !' ?' दिखा दूं फिर बढ़कर 'सच | अच्छा । 'अगर तू गाछ पर चढ़ेगा तो मैं चाची से कह दूंगा । गाछ भीगा हुआ है। चढ़ेगा तो फिसल जायेगा । श्रा, हम अांख-मिचौली खेलें ।' थोड़ी ही देर बाद पल्टू दौड़ा-दौड़ा अपनी मां के पास गया और नाक फुला- कर बोला, 'मां, सावन दा ने मुझे मारा है !' सावन की मां ने कहा, 'उसने तुझे मारा? बुलाकर लायो उसे । मैं उसे खूब डाढूंगी । या वेटे, मुझे दिखा, कहां लगी है ? मैं सहला देती हूं। थोड़ी लगी है या ज्यादा ?' पल्लू ने कहा, 'थोड़ी ही लगी है।' पल्ट की मां ने पल्टू को डांटते हुए कहा, खेल-नेल में इस तरह शिकायत ना करते । जायो। खेलते समय ऐसा ही होता है। जाग्रो, फिर से मेन जाकर।'

7
पाख-मिचौली के खेल में साधन कभी भी पल्टू को पकड़ नहीं पाता । बहुत ही
सतर्क होकर नदी के वाघ पर चढ़कर झांका उसने पर वहा कोई भी नहीं
था । पल्लू कहीं भी नजर नहीं आया।
डरते-डरते, कापते गले से साधन ने चिल्लाकर पल्टू को पावाज दी, पो. पल्ट !
कहा गया
पटू-उ-उ-उ!
पास से ही आवाज आई, 'टूढ लो।'
साधन ने गर्दन घुमाकर चारों ओर देख लिया पर पल्लू कही भी दियाई
नहीं दिया।
पल्लू कदम के गाल पर फूलों के झुड के भीतर छुपा बैठा था। वह खिल्ली
उड़ाने के से अन्दाज मे वोला, हार गये, साधन दा हार गये ! मुझे नही
दूढ सके । साधन दा मुझे पकड़ नहीं सकते । ....
..O

क्या था विधाता के मन में प्रमथनाथ वीसी . . . 'क्या था विधाता के मन में ?' पर सच पूछा जाये तो 'क्या था विवाता के मन में यह खुद विधाता को भी कहां मालूम था ? खुद विधाता के लिए भी हर वात, हर समय पहले से ही जान लेना भला संभव है ? और अच्छा भी है कि हर समय, हर वात पहले से उन्हें भी मालूम नहीं होती, नहीं तो इस रसीली दुनिया का बहुत-कुछ रस सुखकर यह विश्व-संसार भी गणित की पुस्तक की तरह नीरस हो जाता। तभी तो विधाता ने अपने और सृष्टि के वीच थोड़ा-सा परदा रखा है, यानी जानकर भी अनजान बना रहता है । उत्तर-मेरू की उज्ज्वल हिमशिला-राज्य की एक दुग्ध-घवल हिमशिला शनैः- शनैः जब पुष्ट-मजबूत होकर भीषण रूप धारण कर रही थी तव स्कॉटलंण्ड के पहाज-निर्माण कारखाने में भी एक विशालकाय जहाज का निर्माण कार्य चल रहा था, पर उसके भयावह दुःखद परिणाम का उस समय भला किसे पता था ! अगर विधाता को इस बात का आगे से पता भी था तो उन्होंने इस रहस्य को अपने तक ही सीमित रखा । हल्का-मा प्राभास भी अगर दे देते तो लाखों लोगों की प्राण-रक्षा की जा सकती थी। हिमशिला के प्राघात से टाइटानिक जहाज के इवने को एक प्राकस्मिक दुर्घटना कह सकते हैं । उस 'दुर्घटना को नियम न कहकर नियम का व्यक्तिकम कहे तो ज्यादा उचित होगा । फिर भी कहने का साराश यह है कि नियम के व्यक्तिका में ही नियम के अस्तित्व का प्रमाण निहित रहता है । उसी नियम के अनुसार में यहा एक घटना का विवरण देने को प्रस्तुत हुया हू जिममे अप्रत्याशित संघर्ष के फल- स्वरूप एक पुरुष और एक नारी दोनों ही डूबते हैं । टाइटानिक मे तो सिर्फ पुरुप ही हुवे थे। के एक ही मोहल्ले के दो अलग-अलग मकानो में अनुपम प्रौर निन्दनीया रहते थे । वे एक-दूमरे को बिल्कुल नहीं जानते थे । जानते भी करो ? जानने का कोई कारण भी तो नही था। उनके रास्ते सिर्फ भिन्न ही नहीं एकदम विपरीत थे । फिर भी पता नहीं विधाता को क्या मपूर या ! जिम समय अनुपम गीता पढता उस वक्त अनिन्दनीया 'दि केपिटल पटनी । जब अनुपम की खद्दर को धोती छोटी होते-होते घुटनों तक आ पहुची थी तब अनिन्दनीया की साड़ी प्रायः धूल बटोरती चलती । अनुपम का मिद्धात था कि लज्जा निवारण के लिये जितना काडा आवश्यक है उसमे अधिक ग्रहण करना चोरी है जवकि अनिन्दनीया का सयाल था कि खाने-पहनने में कमी करना • पागलपन है । अनुपम जब वन्देमातरम् की पावाज बुलन्द करता तब अनिन्द्र- नीया लालित्यपूर्ण वाणी में इन्कलाब जिन्दाबाद का नारा लगाती। अगर यही तक होता तो कोई खाम बात नहीं थी क्योंकि ऐमा तो प्राय: हर घर में हो होता है । इतनी-सी बात की कहानी नहीं बन सकती, सिर्फ नीरस विवरण लिला जा सकता है। लेकिन जर इसी नीरम और साधारण-से विवरण पर हटात यह बात लागू हो गई, 'क्या या विधाता के मन में ?' तो यही विवरण एक कहानी बन गयी और इसके सवाद बन गये काव्य । ऐसे ही समय में राजनैतिक आन्दोलन के जोर से लोगों के दिलों में दवी प्राग वाहर निकल पड़ी और परिणामस्वरूप चारो मोर उमका ही ताप और कोना- हल सुनाई पडने लगा। हा, एक वाज बताना मैं भूल ही गया या । अनुपम जितना ही निष्ठावान काग्रेसी था अनिन्दनीया उतनी ही निष्ठावान कम्युनिष्ट 'धी । पर मैं भूल गया तो क्या हुप्रा, मेरे पाठक अवश्य ही समझ गये होंगे।

क्योंकि निष्ठा, पुरुपों का स्वभाव है, इसलिए वह बदल सकती है, पर नारी की निष्ठा नहीं बदलती। यह उसकी प्रकृति होती है। चाहे पति हो, चाहे धर्म, चाहे राजनीति-नारियां अपनी निष्ठा की हर वस्तु को मरते दम तक मुट्ठी में वन्द रखना चाहती हैं। अनिन्दनीया का विश्वास है कि राजनीति ही वर्तमान युग का धर्म है जबकि अनुपम का कहना है कि धर्म ही वर्तमान युग की राजनीति है । दोनों के मत, पथ, आचार, आचरण तो खैर अलग-अलग थे ही, राजनीति को लेकर तो जमीन-आसमान का फर्क था। सिर्फ यही क्यों, चेहरे और आकार-प्रकार में भी दोनों में कोई साम्य नहीं था। अनुपम स्वस्थ, सुन्दर, लम्बा, सुपुरुष दिखाई पड़ता था। रंग भी गोरा था । दस व्यक्तियों के चीच खड़ा होने पर भी सबसे अलग दिखाई पड़ता था। और अनिन्दनीया ? छरहरा शरीर, प्रांख और चेहरे के भाव में तीली धार जैसा भाव मानो ईश्वर तलवार गढ़ने बैठा और बना बैठा तनु-लता। और रंग? केले के वृक्ष के गर्भ से जव पहले पत्त की कोपल थोड़ी-सी वाहर झांकती है, उस समय उसका जंसा रंग होता है, ठीक वैसा ही रंग था अनिन्दनीया का। रंग के साथ उसके नाम का कोई मेल नहीं था। अरुणोदय की प्रथम किरण के कुशल हाथों से बुनी सुन्दर बनावट जैसी थी वह । उसके माता-पिता के पास कितने ही पात्र शादी की इच्छा लेकर आये पर लड़की का एक ही जवाव था कि वह शादी नहीं करेगी। विवाह सम्बन्धी समस्या पर शायद कुछ और आगे तक खींच-तान होती पर ऐसे ही वक्त शहर में आन्दोलन छिड़ गया। अनुपम तथा अनिन्दनीया के नेतृत्व में कांग्रेसी और कम्युनिस्ट दल आमने-सामने आ खड़े हुए । वन्देमातरम् और इन्कलाव-जिन्दावाद के नारे एक-दूसरे से प्रतियोगिता कर रहे थे। दोनों ही दलों के लोगों के हाथों में पताकाएं एवं अनेक तरह के आकर्षक और उत्तेजक नारों से सजे फेस्टून थे जो संभवतः सम्बन्धित नेताओं के समयोचित निर्देशानुसार लिखे गये थे। अव जवकि दो परस्पर विरोधी दल आमने-सामने प्रा डटे थे तो कुछ अप्रत्याशित घटित होना अवश्यम्भावी था ही। यह बात न्यूटन सम्बन्धी किसी नियम के अन्तर्गत आती है कि नहीं यह तो पता नहीं, पर राजनैतिक आंदोलन का ध्रुव नियम है यह । मुहूर्त भर में फैस्टून का मान-दण्ड राज-दण्ड के रूप में प्रगट हुना। तभी समझ में आया कि फेस्टुन के सिर की ओर बढ़ते हो, 'हैं, हैं, यह क्या करते हो? हमलोग अहिंसावादी है' कहता हुआ अनुपम प्रागे वहा । पर उसके मुंह की बात पूरी नहीं हो पाई, क्योंकि अहिंसक भाषात बड़ा ही हिसक होता है शायद इसी के प्रमाणस्वरूप सिर पर गहरी चोट खाकर अनुपम धराशायी हो गया और साथ-ही-साय वेहोश भी हो गया। घटना को विचित्र रूप से पलटते देख दोनों ही दल स्तब्ध हो गये । उस स्तब्धता को भग करके सिर्फ अनिन्दनीया के मुंह से धिक्कार गूजी, 'क्या यही तुम्हारी अहिंसा है ? काग्रेमियों के नेक्स्ट इन कमाण्ड ने कहा, 'अहिंसा तत्व को समझना तुम्हारा काम नहीं है । शत्रु के प्रति अहिंसक होने का हमें हुक्म मिला है, किन्तु अनुपम दा तो हमारे शत्रु है नही ।' पर उस वक्त महिंसा तत्व पर विचार करने लायक मन.स्थिति न होने के कारण दोनों दल मिलकर अनुपम को साथ ले गये। साथ गई थी अनिन्दनीया । पता नहीं, क्या या विधाता के मन मे !' दूसरे दिन अनिन्दनीया अनुपम को देखने अस्पताल गई तो उसने पाया कि सिर पर पट्टी बांध अनुपम पलंग पर पड़ा है । वह थोड़े-से फूल तथा फल ने गई थी। उनको पास की टेबिल पर रखकर वही खड़ी रही । थोड़ी देर बाद अनुपम ने पाखें खोलकर उसकी तरफ देखा, पर उसको पहचान नहीं पाया । रोगी ने आम वापस मूद ली। आखिर जब मिलने का समय सत्म होने की घण्टी बजी तब एक दीर्घ नि.श्वाम छोड़ वह पलो आयो । अगले दिन अनिन्दनीया फूल तथा फल ले उसी वक्त फिर गयी । आज रोगी की हालत में काफी सुधार नजर पाया । वह उपर ही देख रहा था। मनिन्द- नीया को देखते ही पहचान गया और पूछा, 'तो क्या आप कल भी पाई थी? ये फूल और फल आप ही रस गई थी?' अनिन्दनीया के मौन को स्वीकारोक्ति समझकर अनुपम ने कहा, 'पर माप सफेद फूल क्यो लाई? अपने राजनैतिक सिद्धान्त के अनुसार तो आपको लाल फूल लेकर आना चाहिये। फिर उसके हाय की तरफ देखकर बोला, 'मोह, आप तो आज भी लाई हैं ! लेकिन क्यो? यह मय क्या विजयी के ग्रहकार-चिन्ह हैं ?'

न्दनीया ने मुस्कराकर कहा, 'पहले आप ठीक तो हो लीजिये, उसके बाद मसले पर विचार किया जायेगा।' रा स्वस्य होना तो, अगर मैं गलत नहीं कहता, आप लोगों की आकांक्षा नी नहीं चाहिये। जिसने लाठी मारी थी वह......' आपको गलतफहमी हुई है, अनुपम वाबू । लाठी तो आपके ही कांग्रेसी स्वयं- वक ने मारी थी, और मुझे मारी थी। आपने खामखाह अपना सिर वीत्र में. देकर यह अनहोनी कर डाली । वह लाठी अगर मेरे सिर पर पड़ी होती तो मैं खत्म ही हो जाती। पर कांग्रेसी लोगों का सिर बहुत ठोस होता है न, इसी- लिए इस बार आप बच गये।' जवाब में अनुपम कुछ कहने जा रहा था कि लड़की ने बीच में ही रोककर कहा, 'याज के लिए इतनी बातें काफी हैं । हां, आपका मन नहीं भरा हो तो लीजियेगा।' 'तो आप कल भी आयेंगी? लेकिन क्यों? मुझ पर जासूसी करने का तथा मुझे नजरों के सामने रखने का भार शायद आपको ही सौंपा गया है !' लड़की ने हंसकर कहा, 'हां, मुझे भी यह नजरों के सामने रखनेवाला मामला ही लगता है। 'यह क्या ! आप चल दी ?' "हां । घण्टी बज चुकी है । जाने का समय हो गया है।' उसको जाते देख अनुपम ने कहा, 'अगर मैं आज की ही रात यहां से भाग जाऊ, तो?' 'अगर ऐसा ही हुआ तो भाग जाने के वाद विचार किया जायगा। आज तो मैं चली।' कल सुना , दूसरे दिन फिर ठीक समय पर लड़की या उपस्थित हुई। आज उसके हाथ फूल और फल के अलावा सन्देश भी थे । उसने देखा कि अनुपम के सिर 4 बैण्डेज खोल दी गई है तथा वाल बहुत ही छोटे-छोटे काट दिये गये हैं जिस फलस्वरूप वह बहुत ही कृश-काय दीख रहा है। लड़की के हृदय को प्राध पहुँचा उसका चेहरा देखकर । बोली, 'क्यों वेकार ही मुझे बचाने के लि अपना सिर आगे किया आपने ?'

'अगर सब सुनना चाहती हो तो नवकुमार की भाषा में जवाब देना पड़ेगा। बहुत-से लोग दूसरों का दायित्व निभाने के लिए ही जन्म लेते हैं।' भनिन्दनीया ने कहा, 'नवकुमार की स्वीकारोक्ति का शेप कयन क्यों मोन कर गये? कह दीजिये न, तुम भले ही अधम हो, लेकिन मैं महान क्यो न बनू इस वार अनुपम ने कहा, 'एक तो पाने का कष्ट वहन करती ही हैं प्राप, ऊपर से यह खर्च क्यो ?' 'जब खर्च हो ही चुका है तो फिर खाइये भी।' कहकर एक सन्देश अनुपम के हाथ पर रख दिया। अनुपम ने सन्देश खाते-खाते कहा, 'तो माप क्या सिर्फ दृष्टि-भोग ही करेंगी?' अनिन्दनीया ने हंसकर कहा, 'भोग को तो शुरूपात है, पता नही मेरी किस्मत मे अभी और क्या-क्या भोगना लिखा है !' विदा लेते वक्त लड़की के हाय में गुलाब का फूल देते हुए अनुपम ने कहा, 'अस्पताल के बगीचे से आपके लिए ही लाया था।' 'बेकार ही क्यो कष्ट किया आपने ?' 'पाप तो रोज ही कष्ट करती हैं, एक दिन मैंने भी किया समझिये । कष्ट के ऋण का शोव कष्ट से ही होता है।' लड़की ने कहा, 'समझी। बदला चुकाकर सारे सम्बन्ध ही खत्म करना चाहते हैं !' 'सम्बन्धों की तो यह शुरुआत हुई है, भई। बाद में जब फिर दोनो दल मामने- सामने होंगे तब इससे भी जोर से लाठी मारकर भूल का संशोधन कर लेना।' अनुपम ने कहा। 'मेरा खयाल है, वह शक्ति तो आपको अहिंसक लाठी में ही अधिक है।' 'अच्छा बताइये, मापको किस नाम से पुकारू ? अनिन्दनीया नाम तो बहुत ही भारी-भरकम है, अतः इसको ढोने के लिए मजदूर की आवश्यकता पडेगी।' 'तो ठीक है, एक मक्षर कम करके प्राप मुझे निन्दनीया कह सकते हैं । तब तो थोड़ा हल्का हो जायेगा न ?' 'फिर भी खास हल्का नही हुमा । मैं सोचता हूं, योड़ा मोर छोटा करके निन्दा नाम से ही क्यों न पुकारू?'

1 ने जवाब दिया, 'इस नामकरण के कारण लोग आपके सिवाय और । की निन्दा नहीं करेंगे । फिर भी आपको उसी में खुशी हो तो आप उसी से पुकारिये । अच्छा, तो आज मैं चली।' n. ले दिन उसी समय आकर अनिन्दनीया ने देखा कि अनुपम जाने के लिये पर बैठा है। गाज सुबह दस बजे ही मेरी छुट्टी हो गयी यी । डॉक्टर से कहकर कुछ घण्टा पौर रहने की इजाजत मांगी है।' लड़की ने कहा, 'यह तो मैं आज नई बात सुन रही हूं कि अस्पताल में भी कोई रोगी खुशी-खुशी अधिक रहना चाहता है ।' उसने अतिरिक्त समय मांगकर अस्पताल में क्यों रहना चाहा, यह वात अनिन्द- नीया को न समझते देख अनुपम को थोड़ा दुःख हुआ । उसके चेहरे का म्लान भाव अनिन्दनीया से छिपा नहीं रहा । मन-ही-मन वह खुश हुई । लड़कियां समझती सब कुछ हैं, सिर्फ न समझने का ढोंग करती हैं। 'अब क्या यहीं खड़े रहेंगे ? जव छुट्टी मिल ही गयी है तो चलिये, आपको पहुंचा आऊ । मेरे पास गाड़ी है।' 'घर की गाड़ी है शायद ? सचमुच, घर की गाड़ी विना कम्युनिष्ट होने का सुख नहीं है !' लड़की ने उस बात का कोई जवाब न देकर पूछा, 'आपलोग भी कार में बैठते तो हैं न ? फिर आपने ऐसी विचित्र वात क्यों पूछी, बताइये तो? वैसे मैंने सुना है, बहुतों की धारणा है कि बैलगाड़ी के अलावा और किसी गाड़ी में वैठने से कांग्रेसी लोग जाति-बाहर समझे जाते हैं।' गाड़ी दौड़ी जा रही थी। अचानक अनुपम ने पूछा, 'हमें जाना है मध्य कलकत्ता। आप गंगा-किनारे क्यों ले आई मुझे ? गंगा-प्राप्ति करवाने का इरादा तो नहीं ?' 'अगर गंगा की हवा खाने से ही गंगा-प्राप्ति होती है तो आप यही समझ लीजिये।' 'कई दिनों से तो आप संदेश खिला रही हैं, अव भला हवा खाने की जगह वर्च होगी मेरे पेट में ?' - 'मुझे तो सन्देश साने के लिए मापने एक बार भी नहीं कहा, अतः सिर्फ हवा खाने के अलावा मेरे पास और चारा ही क्या है ?' अनिन्दनीया ने जवाब दिया। कुछ कहने-सुनने को न होने पर भी जब आदमी बोले ही जाता है तब समझ लेना चाहिये कि उसकी अवस्था स्वाभाविक नहीं है। काम की बात हो तो दो मिनट में पूरी हो जाती है पर धैकार बातें द्रौपदी के चीर की तरह हैं। उन्ही बेकार बातो में मुग्ध होकर पन्द्रह मिनट का रास्ता जब डेढ़ घण्टे में तय करके अनुपम के घर के दरवाजे के सामने गाडी पहुंची तब शाम प्रायः पूरी तरह झुक प्रायी थी। अनुपम ने कहा, 'भीतर चलिये।' 'नहीं । आज नही । रात हो गई है।' "लगता है, फिर से सिर फुड़वाकर हॉस्पिटल में भर्ती होना पड़ेगा। अन्यथा तो अब आपगे भेंट होनी सम्भव नहीं।' 'मैं क्या फ्लोरेन्स नाइटेंगल हू जो अस्पताल में घूम-घूमकर रोगी की सेवा करती फिरती है?' अनुपम ने पूछा, 'अब कब मिलना होगा?' 'जल्दी तो नही ।' कहकर अनिन्दनीया गाडी मे जा बैठी मोर गाड़ी अनुपम की आम्खों से दूर हो गई। जितनी देर पोछे की ताल वत्तिया दिखाई पड़ती रही अनुपम एकटक उधर ही देखता रहा । 'जल्दी तो नहीं शहद काटे की तरह अनुपम के दिमाग में सारी रात शुभता रहा । स्वप्न एव जागरण के बीच की स्थिति में झूलता रहा वह । दो दिन पहले जो अर्शिचत थी या फिर शत्रु-पक्ष की थी, उसी के लिए इतनी तडप क्यों ? लगता था, उसके वे छोटे-छोटे तीन शब्द छोटी छुरी के घाव को तरह उसके हृदय में पीड़ा उत्सन्न कर रहे थे। ससार में दुःस-मुस दोनो ही अप्रत्याशित होते हैं-इस पुरातन उक्ति की नवीन व्याख्या तब हुई जब दूसरे दिन शाम को मनिन्दनीया की गालो अनुवम के पा के सामने प्रा सही हुई। दार्शनिकों का कहना है कि 'समय' शब्द स्थितिमात्र है । शोघ्र शन्द की स्थिति-सापेक्षता अपरिमोम है । अगस्त्य मुनि दिनमा यह कहकर गये थे कि शीघ्र लौटुगा, और फिर लौटे ही नहीं। इधर न्दिनीया कह गई थी कि जल्दी तो नहीं, जबकि चौबीस घण्टे भी पूरे नहीं } शब्द-शास्त्रों की महिमा भी अपार है । निन्दनीया को गाडी से उतारकर घर के भीतर ले जाते समय अनुपम सोच हा था कि फल की रात उसने बेकार ही दुःस्वप्न में काटी थी। जल्दी तो नहीं का अर्थ उसने दो-चार साल से ही क्यों लगाया ? दो और चार को पास- पास लिसने से चौबीस घन्टे भी तो हो सकते थे । और वही हुआ भी। अनुपम ने अनिन्दनीया का परिचय अपनी मां से कराया । बोला, 'मां, यही लड़की है जो अस्पताल जाकर मेरी देख-भाल किया करती थी। मेरी बहुत सम्भाल की है इसने ।' मां लड़की को देखकर कितनी मुग्ध हुई यह तो वाद में पता चला । दो दिन वाद ही उन्होंने लड़के से कहा, 'वेटे, लड़ की तो वहुत अच्छी है । तुम्हारी शादी ऐसी ही लड़की से हो तो बहुत अच्छा रहे।' विवाह-योग्य कन्या की पुत्र-बवू के रूप में कल्पना करना मांगों की सनक होती है। 'वह लड़की शादी नहीं करेगी, मां । इस पोर से तुम निश्चित रहो।' मां ने कहा, 'चल पगले! साठ बरस की मैं होने को आई । लड़कियां तो बहुत देवों पर ऐसी लड़की नहीं देखी जिसकी शादी करने की इच्छा न हो । सीतागी ने धनुप-मंग का प्रण किया था, फिर भी उनकी शादी अटकी नहीं।' एक दिन अनिन्दनीया ने अनुपस की मां से कहा, 'कई दिन हॉस्पिटल में रहने से ये कमजोर हो गये हैं। मैं जरा इनको गगा-किनारे घुमा लाऊ ।' उसके इस कथन को अनुपति चाहना नहीं कह सकते । अनुमति, प्रार्थना और इच्छ- ज्ञापन के बीच की स्थिति कह सकते हैं। प्रिन्सेप घाट के पासवाले घने हरे मैदान में दोनों बहुत देर तक घूमते रहे फिर गंगा-किनारे बनी वेंच पर दोनों ने पास-पास बैठकर मूगफली खाई फिर तो रोज की उनकी यही रूटीन हो गयी। एक दिन प्रिन्सेप घाट के बैठे अनुपम पीर अनिन्दनीया बातें कर रहे थे कि अनुपम ने कहा, 'निन्दा मन-ही-मन बहुत आत्मग्लानि महसूस करता हूं । देश में राजनैतिक पान्द ने हैं और मैं वेकार वक्त वरवाद करता हूं।'

लडकी ने कहा, 'क्या करें पम, तुम्हारा शरीर तो अभी भी काम लायक नह हुअा है।' अनुपम और अनिन्दनीया दोनों के नाम सक्षिप्त होकर जब पम और निन्दा परिणत हो गये तथा ग्राप सम्बोधन तुम पर आ गया, तो समझ लेना चाहि- कि इस बीच बहुत-कुछ घट चुका है जो बाहरी लोगो को मालूम नहीं है ससार की गति इमो तरह बहुत-से मध्यवर्ती प्रशो को वाद देती हुई चत करती है। कुछ देर चुप रहकर अनुपम ने कहा, 'यस थोडा-सा और प्राराम कर लेता हू शरीर थोड़ा ठीक होने ही फिर से राजनीति में भाग लूगा । धर्म ही इस यु- को राजनीति है।' लड़गी ने कहा, 'ठीक ही है । तुम ठीक हो जानो तो फिर में भी राजनीति में योग दूं । राजनीति ही इस युग का धर्म है।' 'तव फिर क्या हमारी मुलाकात नहीं होंगी?' लड़की ने जवाब दिया, 'बल्कि और जल्दी-जल्दी होगी। बिल्कुल धर्मक्षेत्र कुरक्षेत्र में। अनुपम ने कहा, 'हो गया बेड़ा गर्क ! यह तो एकदम गीता जैसी स्थिति होगी।' 'न हो तो तुम मासिंवाद अपना लो, मुझे आपत्ति नहीं है, लेकिन भविष्य में अपने दोनों दलों का सामना होने पर दूसरे का सिर बचाने के लियै अपन सिर आगे न बढ़ा देना।' अनुपम ने कहा, 'वादा नहीं कर सकता। सारी बात इम पर निर्भर करती है कि मिर किमका है ?' इसी तरह अनर्गल अन्तहीन बातो की तरंगें सामने बहती गमा की तरह प्रवाहित होती रहती थी और उपर अन्यकार की तुलिका महत्व दोपालोपित क्लस्त्ता शहर के प्राचा यो काला करने की कोशिश करती रहती थी। इन कुछ ही दिनों में अनुपम की धोती की भालर घुटनों से नीचे उतरती- उतरती प्राय टखनी को छूने नगी घी तथा गदर दामून महीन होते-होंने इतना दम हो गया था कि मिल का छद्मवेशी लगता था। इपर प्रनिन्दनीया । को साड़ी रंगीन हो गयी थी तथा उसमें बैसाखी गुल्म के फूल खिलने लगे थे। अनुपम के चरखे पर मकड़ो ने जाला बुन रखा था तथा गीता पर इतनी धूल जम गई थी कि एक फसल तैयार की जा सकती थी। अनिन्दनीया की माक्र्सवाद सम्बन्धी किताबें भी तकिये के नीचे पड़ी-पड़ी उसकी ऊचाई कुछ और बढ़ाने का गौरव प्राप्त कर रही थीं। अनिन्दनीया के साथ पुस्तकों का अब यही सम्बन्ध रह गया था । अनुपम सोचता कि उसके कर्तव्य में त्रुटि हो रही है और पार्टी के लोग पता नहीं क्या सोच रहे होंगे; उधर अनिन्द- नीया को लोग बुलाने जाते तो जवाब मिलता कि सिर्फ जुलूसबाजी करना ही राजनीति नहीं है। घर जाकर इस विषय की किताबों का भली प्रकार अध्ययन करो। पर सच्ची वात यह थी कि दोनों पक्षों के ऊर्च में एक तृतीय पक्ष भी था । और वह था शायद देवता । राजनीति अगर विशेष युग की होती है तो वह देवता निविशेष युग का होता है। उनके लिये चाहे शत्रु-पक्ष हो या मित्र-पक्ष, दोनों पक्षों के आमने-सामने आने पर वे बहुत ही कौतुक महसूस करते हैं, और फिर एक छोटा-सा वारण छोड़ते हैं। कहना उचित होगा कि वही देवता अनुपम और अनिन्दनीया के सिर पर सवार हो गया था। उन्हीं की महिमा का फल है कि अनुपम तो पम हो गया तथा अनिन्दनीया निन्दा बन गई और उन दोनों के परस्पर आप सम्बोधन तुम पर आकर व्हर गये । इतनी-सी बात शायद वे दोनों नहीं जानते या फिर जानकर भी अनजान बनते हैं । मानसिक आत्म-प्रवंचना करने की शक्ति भी अपरिसीम होती है। एक दिन शाम के वक्त निर्दिष्ट समय अनुपम के दरवाजे पर अनिन्दनीया की गाडी नहीं पहुंचने पर वह बहुत ही उद्विग्न हो उठा । आज इतनी देर क्यों हो रही है ? मोहल्ले के लोगों ने गाड़ी की उपस्थिति देखकर घड़ी का टाइम मिलाना शुरू कर दिया था। ऐसी हालत में उद्विग्न न होना ही अस्वाभाविक होता । वह अधिक सब नहीं कर सका। बाहर निकल सीधा कम्युनिस्ट पार्टी के ऑफिस जा पहुंचा। उसे वहां देखकर कामरेड-गरण घोर अचरज में डूब गये । एक ने कहा भी कि, 'प्राप"और यहां?' पर उसकी बात का जवाब देना बेकार समझ अनुपम ने पूछा, 'अनिन्दनीया कहां है ?' जवाब मिला कि वह आजकल यहां अधिक नहीं आती है। शायद घर पर ही हो । अरने अचा- नक इस तरह वहां आने की व्याख्या न कर वह सीवा अनिन्दनीया के घर की ओर चल पड़ा । वहां पहुंच विना भूमिका के घर में प्रवेश करते ही देखा - - कि दरवाजे को और पीठ किये बहुत तन्मयता के साथ प्रनिन्दनीया कुछ कर रही है । दबे कदमों से ठीक उसके पीछे पहुचने पर अनुपम ने देखा कि अनि- न्दनीया चित्र बना रही है, और वह चित्र उसका यानी अनुपम का ही है । भनिन्दनीया को पता ही नहीं चला उसके प्राने का । वह तो बस चित्र अकित करने में ही मग्न थी। साधारणतः चित्र बनाते वक्त मांडल मामने रखा जाता है पर यहा मॉडल पीचे या । लेकिन जब मॉडल हृदय में ही बसा हुअा हो तो सामने रहे या पीछे, एक ही बात है। इसी तरह पता नहीं कितनी देर और गुजरती कि मनिन्दनीया की छोटी बहन ने कमरे में प्रवेश किया और अनुपम को वहा देखते ही खुशी के मारे लगभग चीखने हुए वोल उठी, 'देसी न दोदी, कौन आया है ?' अनिन्दनीया ने पीछे मुडकर देखा और देखते हो चित्र को झटपट प्रांचल में छिपा लिया। फिर वात बनाने के लिये योही कहने लगी, 'बहुत दिन हो गये चित्र बनाना छोड़े, इमोलिये मात्र देख रही थी कि मेरा हाय ठीक चल रहा है कि नहीं।' अनुपम उक्त व्याख्या की उपेक्षा कर बोला, 'प्राज मायी क्यों नहीं ।' 'चिम बनाने जो बैठी तो समय का होश ही नहीं रहा ।' 'अब तो होश में आ गयी हो। चलो, तुममे जरूरी कान है।' दोनों गंगा-किनारे निर्दिष्ट स्थान पर पाकर बैठें। सारे दुविधा-वन्यनों को तोह अनुपम ने कहा, 'निन्दा, मैं तुम्हें प्यार करता हूं।' अनुपम अगर निपट प्रबोध नहीं होता तो समझ सकता था कि इस बात को अनिन्दतीया वहुत पहले ही समझ चुकी थी। सिर्फ अनिन्दनीया ही क्यो, पार्टी व मोहल्ले के लोग भी इस बात से अनभिज्ञ नही ये। अनभिज्ञ था तो सिर्फ प्टिक काग्रेस-कर्मी अनुपम मरकार ही था। स्वत.सिद्ध वात का क्या जवाब दे यह जव अनिन्दनीया नहीं समझ पायी तब चोली, "गंगा की धारा में प्राज इतना शोर क्यों हो रहा है ? शायद इस वक्त ज्वार आया हुआ है!' किस प्रत्याशा का कैसा उत्तर! इस बार अनुपम ने कहा, "निन्दा, तुम मुझमे शादी करोगी?' माज अनुपम बिल्कुल विनीत हो उठा था। उसकी बात मानो सुनो ही न हो इस तरह से प्रनिन्दनीया फिर बोली, 'समुद्र कितना दूर है, फिर भी उसके ज्वार के प्राघात से नद-नदियों का पानी उत्तेजित हो उठता है । यह बहुत ही अचरज की बात है न !' अंव अनुपम एकदम क्षुब्ध होकर वोला, 'भौगोलिक समस्या को इस वक्त छोड़ो और मेरी बात का जवाव दो।' अनिन्दनीया खुद में ही मगन बोले जा रही थी, 'कहां तो लाखों मील की दूरी पर चांद, फिर भी किस अदृष्य पाकर्षण शक्ति के वशीभूत हो समुद्र का पानी ज्वार-भाटा के रूप में सिर धुनता है। यह क्या अचरज की बात नहीं है, अनुपम बाबू ?' इतने दिनों बाद, इतना कुछ अघटनीय घट जाने के बाद, पम से फिर अनुपम वाबू हो गया वह ! अनुपम क्षुब्ध हो उठा । बोला, 'समझ गया । अब घर चलो । सभी लड़कियां एक जैसी ही होती हैं।' अनिन्दनीया ने निर्विकार भाव से कहा, 'यह सुनकर सचमुच मेरी चिन्ता ही मिटा दी तुमने । अब किसी भी एक लड़की से शादी कर लो, क्योंकि सभी लड़कियां तो एक समान होती हैं।' मोटर में बैठने के बाद अनुपम ने एक भी बात नहीं की। बाहर अंधेरे में प्रकृति-शोभा देखने की कोशिश करता रहा। लड़कियां छोटी रहती हैं तब वे गुड़िया से खेलती हैं । जब बड़ी हो जाती हैं तव अवोध, सीधे, सरल पुरुषों से खेलती हैं। उस समय उनकी यह हालत हो जाती है कि आंख होते हुए भी देख नहीं सकतीं, कान रहते सुन नहीं सकतीं, हां, मुंह से वात अवश्य कर सकती हैं लेकिन वे होती हैं सिर्फ 'अर्थहीन वाते।' 'पम, तुम्हारे प्रस्ताव पर मैं राजी हूं, लेकिन मैं राजनीति को नहीं छोड़ सकती । राजनीति ही इस युग का धर्म है ।' 'राजनीति छोड़ने को तुम्हें कौन कह रहा है, निन्दा ? मैं ही क्या राजनीति छोड़ दूंगा? धर्म ही इस युग की राजनीति है।' 'एक बात और भी है, तुमलोगों की गीता मैं नहीं पढ़ सकूगी।' 'क्यों ? बहुत छोटी-सी किताब है। सिर्फ सात सौ श्लोक ही तो हैं ।' 'हां, आकार में छोटी अवश्य है, पर प्रकार में नहीं । उसका टीका-भाष्य बारह हाथ की कांकुड़ वेलें के तेरह हाथ लम्वे वीज की तरह है।'

'तुम गीता पर टीका-टिप्पणी कर रही हो तो मुनी कहना पड़ेगा निन्दा, कि तुम्हारे दि कैपिटल ग्रन्य के पास तो कुछ भी नहीं है; प्रक पाठक मानों इच्छानुसार उसका अर्थ-कुमथं लगाता है।' 'खर, गीता की वात जाने भी दो रोकिन पार्टी किस तरह छोड़ सकती हूं?' 'तो ठीक है। तुम अपनी पार्टी में रहो, मैं अपनी पार्टी में रहता हूं। इसने शादी में कहा बाधा पडती है ?' 'असंभव ।' कहकर निन्दनीया गम्भीर हो गई। तय फिर? 'तब फिर और क्या कहू, अनिन्दनीया ? शंव और शाक्त में ध्या विवाह नहीं होते ? हिन्दू-क्रिस्तानों में क्या सिविल मैरिज नहीं होती। फिर अपनी ही शादी असभव क्यों होने लगी ?' अनिन्दनीया ने कहा, 'यह तुलना चलनेवाली नहीं है । व और शाक्त दोनों ही हिन्दू होते हैं । हिन्दू और गिस्तान दोनों ही धर्म को मानते हैं।' 'तुम भी तो धर्म को मानती हो । फर्क सिर्फ इतना है कि, तुम राजनीति को इस युग का धर्म मानती हो।' 'असली बात क्या है, पता है तुम्हे ? तुम हो इस युग के व्यक्ति, जबकि मैं भावी युग की हूं।" अनुपम ने हसकर उत्तर दिया, 'तो फिर वर्तमान का वश होगा" 'यह मुझे पता नही है । लेकिन इतना जानती हूं कि इस तरह विवाह कर हम दोनो ही सुनी नहीं होगे।' 'मधा निन्दा, तुम बता सकती हो कि शादी करके कभी कोई हमा है ?' अनिन्दनीया ने कहा, 'हा, बहुत से ।' 'जिस काम को करने से सभी ठगे जाते हैं, उसकी अभिज्ञता का ठीक से बताता है ? फिर भी सुनो, मैं बताता हूं, विवाहित जोड है तो अविवाहित जीवन में भी शान्ति नहीं है।' 'वृया तक करने से लाभ क्या है ? हमारी शादी नहीं हो पाई।

नि तो इस तरह अपना लिबान्त स्थिर कर लिया, लेकिन सबसे गक्तिशाली हान्न तो देवतात्रों के हाथ में था। उनके तेज वाण नित्य-प्रति ही उनको चकरले चला करते। . न दिन बाद अनिन्दनीया ने कहा, 'मैंने एक उपाय सोचा है । अब तुम नश्चित हो जायो । कोई अड़चन नहीं होगी अब ।' इस बार अनुपम की बारी यो संक्षिप्त भाषण देने की। उसने कहा, 'असंभव ।' तीन दिन और बीते ! उनकी मुलाकात रोज ही होती थी। कई बार तो एक बार से अधिक भी हो जाती। इस बार अनुपम ने कहा, 'मैंने एक उपाय सोचा है, तुम भी विचार कर देवो । जब हम राजनीति को छोड़कर रह नहीं सकते वो एक काम क्यों न करें। तुम्हारी पार्टी और मेरी पार्टी दोनों को ही जाने दें। क्यों न हम दोनों एक तीसरी पार्टी में शामिल हो जायें। फिर दो कोई अड़चन नहीं पायेगी।' 'अच्छा, मैं सोचूंगी।' अनिन्दनीया ने कहा । 1 तीन दिन बाद फिर दोनों में प्रसंग उठा । अनिन्दनीया से अनुपम ने पूछा कि उसने क्या मोत्रा है ? अनिन्दनीया ने कहा, 'तीसरी ऐसी कौन-सी पार्टी है, सुने तो नजर नहीं पा रही है।' 'मुझे आ रही है । जिनकी राजनीति हम दोनों के बीच की है, चलो उसी में हम सहयोग दें।' 'ऐसी कौन-सी पार्टी है ?' 'क्यों? पी. एन. पी. है न । वे लोग कांग्नेस तथा कम्युनिष्ट दोनों दलों वरावर दूरी रखते हैं।' वे अबोध नर-नारी अगर अपने होशो-हवास में होते तो समनते कि उन इस मुक्ति में कितना बड़ा नूठ तथा घोखा था। लेकिन उस अदृश्य देवत ने ही उन पर ऐसा मुग्ध-भाव छाया हुआ था कि एक बोन सहारे अपने मात्म-सम्मान की रक्षा करते हुए शादी-समारोह में उपस्थित होने को उदग्रीव हो रहे थे। बस अब मेरी कहानी खत्म होने को है। इतनी बडी दुनिया में ऐसा तो होगा ही रहता है । किसी घटना के प्रभाव से कितने ही प्रायोजन बन जाते हैं तो फिर सरम भी हो जाते हैं। दिन भर की मेहनत के बाद जो वास्द मरी मनार तैयार होती है वह जरा-सी माग दिखाते ही अग्निफुहार छोड़ती हुई मिल्टि भर में सत्म हो जाती है। दूसरे दिन अनुपम और अनिन्दनीया पी. एस. पी. के प्रॉफिन पहुंचे और करके सदस्य बन गये तथा उमके अगले ही दिन मैरिज रजिस्ट्रार के मास्मि में पहुंचकर उन्होंने शादी के अनुवन्य पर हस्ताक्षर कर दिये । जायद यह पहने की जरूरत नहीं कि उसी दिन विधिवत वैदिक रीति से भी उनकी शादी हो इस काह से काग्रेस और कम्युनिष्ट दोनो पार्टियो के हो सदस्य स्तम्भित रह गये। इतने दिनों के राजनैतिक जीवन का मन पापिर इस काण्ड में हुमा इस उपलक्ष्य में उन्होंने मिला-जुला जुलूम निकालकर उनके घर के सामन नारे लगाये और उन्हें चिक्कार दे पाये । फिर भी खुशी की बात यह यी कि जुलूम के कारण उस दिन ट्राम-बम बन्द नहीं हुई, क्योकि उनके घर में रास्ते में न दाम चलती थी, न यम । अगर मनुएम मोर निन्दनीया को बह मालूम होता कि 'क्या या विधाता के मन में' तो वे पहले से ही सावधान रहते ।

यह एक विचित्र अंधकार प्राइभि राहा 'ऐ देस, देख न! मां कत्तम, पहनाना-मरवाना-सा लग रहा है। याद नहीं आ रहा है, कहां तो देखा है !' 'अरे, वह तो पिकलू है । पिकलू ! तुम्हें याद नहीं ? हमारे साथ आशुतोष कॉलेज में पढ़ा करता धान?' 'मोह हां, वही, अंग्रेजी साहित्य का पिट! हम वंगला पढ़ते थे इसलिये जो उपेक्षा करता था हमारी । प्रांस-मुंह की एक खास मुद्रा बनाकर कहा करता था, अनां छोड़ो भी यार, इस देश का साहित्य भी कोई ताहित्य है ?' 'हां-हां, याद आ गया। तो पड़ोस की वह...' 'जो भी कहो, यार है चीज ! लेकिन कैसे फंसा लिया, बता तो सही ?' 'यह ऐसा कौन मुश्किल काम है ! दो रुपये अस्सी पैसे सिनेमा के और ऊपर से एक कटलेट, बस ।' 'बेटा हमको भी रंग दिखाता है। क्या शेयर करने से डर लगता है ?' - 'हा, यार । अपना तो मूषा-ही-नूवा है । जलाकर राप कर दिया है साले नै ।' हमारे घर के चबूतरे पर ही उनका अड्डा जमता या। रोज आकर बंट जाते । हल्ला-गुल्ला मचाते। राजनीति पर वहम करते। सिनेमा-म्यारो पर टीका- टिप्पणी करते। लडकी देखते ही ग्रावाज कमने। फिर चाहे वह वचपन में गोद खिलायी मोहल्ले की लड़की हो या मा की उम्र की अन्य मोहल्ले की अपरिचित महिला। दादी ने एक दिन उनके शोर-शराये मे नग आकर कहा था, 'अच्छा, क्या तुमलोगों को बैठने के लिये और कोई जगह नहीं मिलती जो यहा बंठकर इस तरह चीखते-चिल्लाते हो? तुम लोगों के मारे क्या हम दो घड़ी भजन-पूजन भी नहीं करें' बस. इतना काफी था। फिर तो दादी के लिए पिंड हुडाना मुश्किल हो गया । उनमे से एक बोना, 'वो बुडिया, बहुत रमाब दिवा रही हो? जानती हो, स्निसे वात कर रही हो? और हा, तुम्हारी नातिन के क्या हाल-चाल हैं ? उनको क्यो नहीं भेज दि कोई फैसला ही कर डालने ।' तग पेन्ट पर कुरता पहने एक लडके ने कहा, 'ज्यादा मत टर्रा वुड्ढी, नहीं तो नेरी नातिन की मिट्टी पलीद करके छोटंगे।' दादी गुन्ने में बड़बड़ाती लौट गई थी। छोटे चाचा शाम को लोटे तो सारा किम्मा मुन संमस्त हो उठे । दादी पर गुम्मा भी बहुत हुए। 'उन सभी को मैं पहबानता हूं। उनके नाम भी जानता हूँ । ये ममी मोहल्ले के प्रतिष्ठित घरों के लड़के हैं, पर युद इनको कोई इज्जत नहीं।' ? 'मा कसम, दू ही बना, बहीं चला जाय ? चबूतरे पर थोड़ी देर निश्चित होकर बैठ सके, यह भी मुश्किल कर रखा है । मानी पुलिस पाकर हुज्जत करेगी । ये पुलिसवाले भी तो वेटे उसी जाति के हैं जो कहते हैं कि, 'नूने नहीं तो तेरे बाप ने पानी गदा किया होगा । और कोई दुपा न सलाम, कोई वात न चीत, यम सीधे ले जाकर हवालात मेंस देंगे।' कमल ने मानो कोई नई सीज की हो इस तरह की मुख-मुदा बनाकर कहा, 'न्यू गार्डन चलें ? बहुत दिनों से उपर जाना ही नहीं हुमा । चलो न. माज वही चला जाय । खूब मजा.... " "तुम्हें और कोई जगह नहीं सूझी, मेरे चांद ?' कमल की बात काटते हुए असीम बीच में ही बोल पड़ा। 'मोह, तो चिढ़ते क्यों हो? उसने तो खुद के लिए उपयुक्त जगह ही ढूंढ़ी है।' दीपू की इस बात पर सभी हो-हो करके हंस पड़े। लेकिन सुमन नहीं हंसा । कमल की बात का ही उसने जवाब दिया, 'धद, वहां जाकर क्या करेंगे? वहां जाकर तो यही देखने को मिलेगा कि सभी जानवर अपने-अपने जोड़ों के साथ प्रेमालाप कर रहे हैं। सालों को देखकर और मन सराव हो जाता है । हमारी किस्मत में तो वे सब जुटेंगी नहीं।" 'क्या बात करता है, यार ? बस इतनी-सी बात के लिये मन छोटा करते हो ? मैं तो ऐसी-ऐसी कितनी ही चीजें हाथ में आई हुई भी छोड़ देता हूं।' असीम ने उपेक्षा दिखाते हुए कहा, 'रहने दे बस । तुझे डींग मारने की जरूरत नहीं है । हमें सब मालूम है, तेरी दौड़ कहां तक है ? हां, सचमुच कोई जोगाड़ हो तो चल, टिंकाज में चलें।' 'तुगलोग सिर्फ यही सब करते रहोगे क्या ? कल की बात याद है न ?' 'कल ! कल गया है ?' 'सब कुछ भूल बैठे हो, गुरू ?' 'परीक्षा ? पढ़ने-लिखने से कोई सरोकार ही नहीं, फिर वह सब किसे याद . रहता है ?' युनिपसिटी-विल्डिग के एक तल्ले से नीचे तक उनका साम्राज्य है। गेट के 'पास, सीढ़ी पर तथा कारीडोर में वे लोग अड्डा जमाये रहते हैं। उस वार मृणाल हमलोगों के साथ परीक्षा नहीं दे सका था। परीक्षा के कई महीने पहले उसकी बैंक में नौकरी लग गई थी। पढ़ने-लिखने में वह बहुत होशियार था । हम सभी जानते थे कि वह बहुत अच्छा रिजल्ट लायेगा । दो साल बाद वह इस बार परीक्षा दे रहा है। मृणाल के गेट के सामने पहुंचते ही एक लड़के ने उसको डांटा, 'साप यहां गया कर रहे हैं ?' मृणाल नर्वस हो गया। उस वक्त शायद उसके दिमाग में परीक्षा की चिन्ता के अलावा और कोई बात नहीं थी। इसीलिये वह उम्र में अपने से छोटे 71 लड़के की इस बात का जवाब देते समय भी डर के मारे हकला उठा । बोला, 'जी, में परीक्षार्थी हूं। 'सब्जेक्ट क्या हैं ?' कडाई से पूछा गया। 'जी, इ."""""इंग्लिश ।' 'ऊपर चले जाइयं । तीन तल्ले पर ।' कमाडर जैसा हुक्म हो गया । अपर पहुंचकर मृणाल परीक्षा हॉल दूढ रहा था कि एक लड़का आगे बढ आया, 'यहा क्या कर रहे हैं 'मैं अपनी क्लास ढूंढ रहा हूं।' 'सबजेक्ट क्या है, इंग्लिश ? इधर माइये । उस सामनेवाले कमरे में बैट जाइये । जाइये ! और हा, रुपये लाये हैं ? दस रुपये लगेंगे।' 'द-म-रु-प-ये ? क्यो ? इ-इतने रुपये तो मैं लाया नही । मेरे पास तो सिर्फ छ रपये हैं।' लड़के ने व्यग्य से होंठ विचकाये । परीक्षा देने माये हैं और रुपये नहीं लाये ? कहां के जन्नु हैं पाप ?' फिर कहा, 'मेर दीजिये, छः रुपये ही दीजिये । कितावें-वितावें तो लाये हैं न ? या कि वे भी... 'किताबें ? किताबें किसलिये? किताबों का क्या होगा?' 'बेड़ा गर्क हो! तो फिर पाप परीक्षा किस तरह देंगे? ना ! पाप तो ऐसे वेन से पाप परीक्षा पास करके भी क्या करेंगे? रबिश । जाइये, जाकर अपनी जगह बैठ जाइये । .... जाइये !' मृणाल को मन-ही-मन क्रोध तो बहुत पा रहा था लेकिन फिर भी वह कुछ बोल नहीं सका । बल्कि भय और आशका से यह भीतर-ही-भीतर काप रहा था । क्लास में प्रवेश कर उसने एक बार चारों ओर देख लिया। सभी के पास आवश्यक कॉरी-कितावें थीं। मृणाल का साली हाय देख सबने उसकी हमी उड़ाई । अजीब-अजीब चेहरे बनाये सभी ने जिनमें व्यग्य एव तिरबार जैसा भाव था। मृणाल भी अपने को उस वक्त अपराधी महसूस करने लगा। वह बहुत देर तक चुपचाप बैठा रहा । जव प्रश्न-पत्र सामने आया तो उसने देखा कि ये सभी • . शायद शिन वही थे जिन्हें वह याद करके आया है। उसका जा खुस हा । लेकिन उसने हॉल में चारों तरफ नजरें धुमायीं तो स्तब्ध रह गया । सभी सामने किताब खोले नकल कर रहे थे । मना करनेवाला कोई भी नहीं मृणाल को याद करके आया था अचानक सब भूल गया । उसने याद करने की बहुत कोशिश की लेकिन सफल नहीं हुआ । मानो सब गड़बड़ हो गया । तंग आकर वह उठ खड़ा हुआ । बाहर निकलते ही एक लड़के ने टोका, 'कहां जा रहे हैं ? उठकर क्यों आ गये ?' 'मैं परीक्षा नहीं दूंगा; घर जाना चाहता हूं।' 'परीक्षा नहीं देंगे? मतलव ? तो फिर पाये क्यों थे ?' दूर खड़े एक मस्ताने किस्म के लड़के ने वहीं से चिल्लाकर पूछा, 'क्यों रे लालटू, क्या मामला है ? रीले कर न ।' 'अरे गुरू, बाहर का माल चला जाना चाहता है।' 'पत्ती छोड़ी है?' 'अविक नहीं। गुंजाइश नहीं है ।' 'अरे भगा, खदेड़ उसे, कहां से साले तव...' मृणाल उनके हाथ से मुक्ति पाकर सड़क पर निकल आया। इतनी देर के दवे क्रोध को उसने प्रकट किया एडमिट कार्ड के टुकड़े-टुकड़े कर उन्हें सड़क पर फेंककर । इस वक्त उसे परीक्षा और एम. ए. की डिग्री प्रादि वातें नितान्त व्यर्थ एवं अर्थहीन प्रतीत हुई। 'अरे, क्या सोचने लगी ? डरती हो ?' 'नहीं, डरती नहीं। घर के बारे में सोच रही हूं। इस सब काण्ड के वाद वापस घर लौटने में बहुत खराव लग रहा है।' 'मोफ ! तुम चिन्ता क्यों करती हो? अब और ज्यादा दिन तो हैं नहीं। देख लेना, इस बार के इन्टरव्यू में जरूर चुन लिया जाऊंगा।' दीपंकर की आवाज में एक प्रकार का दृढ़ आत्म-विश्वास था।

"तुम कैसे कह सकते हो यह ऐसी बातें तो तुम हमेशा ही कहते हो । सब फालतू वाते हैं।' शमिता ने अविश्वास प्रकट किया । "पिछली बार तो उस साले डिरेक्टर की पत्नी का भतीजा पर टपका था चीन मे; इसीलिए मैं रह गया । साला पाकर टपका भी तो नास्ट मोमेन्ट में.... । पर इस बार की वात और है। जो लोग इन्टरव्यू लेते हैं उनके हरे नया आयो के भाव से ही पता लग जाता है । भई, जब उन्हें किसी को लेना नहीं होता तो पालतू-फालतू क्वेश्चन पूछते हैं ताकि वैवारा उम्मीदवार खुद ही हरपर भाग जाये । इनलोगो ने तो मुझने कुछ पूटा ही नहीं । इन्टरव्यू- बोर्ड में मेरे मझले जीजाजीथे न, इमीलिये तो...।' 'लेकिन अगर इस बार भी कुछ नहीं हुआ, तब ? पिताजी ने जैसा उत्पात मचा रखा है उससे तो लगता है, मेरी भी मीमा जैसी हो हालत न हो।' 'सीमा ! क्या हुआ है सीमा को ?' 'वाह ! तुम्हें नहीं मालूम ? उसने भी तो मेरी तरह किमी से बताये विना ही रजिस्ट्री-मैरिज की थी। उसके पिताजी ने जब उसकी शादी मन्यत्र तय कर दी तब उसने बताया, पर कोई लाभ नहीं हुप्रा । उसके पिता ने एक तरह से जबर्दस्ती ही उसकी शादी कर दी। छी. छोः, कसा घृणित काण्ड हुअा यद ! वह तो समीर बहुत ही मला लड़का है, वरना.. 'तो क्या तुम सोचती हो कि तुम्हारा भी यही हाल! हुँ देखना, जान नही लड़ा दूं तो अपनी। अचानक दीपकर ने आवाज दवाकर कहा, 'ऐ, एक काम करेगी ? हमारे घर चलेगी?' 'वाह ! तुम्हारे पिता, भाई" 'गोली मारो वाप और भाइयों को । उनने हमें क्या करता है ?' 'ना वावा, इन सब झझटो में पड़ने की जरूरत नहीं । घत् तेरी, अभी से यह सब नहीं करते तो ही अच्छा रहता ! तुम्ही तो वकार इतने उनावले हो रहे थे...।' 'क्यों, तुम्हे परेशानी हो गई है क्या ? तो ठीक है, अगर तुम्हारे पिताजी कहें यत् । मैं यह थोड़े ही कह रही हूँ। तुममें तो इतना बचपना है कि"। नो, पहुंच गये। टैक्सी यहां रोकोगे?' दीपंकर सहम गया । 'तु" तुम, वल्कि में ही पहले उतर जाता हूँ। तुम रंक्ती घर तक ले जायो।' शमिता ने धीरे से दोपंकर का हाय दवाया तथा इशारे से ड्राइवर के सामने अलग-अलग उतरने की बात कहने को मना किया । मानो इतनी देर से टैक्सी- ड्राइवर के कान बन्द ही थे। कम-से-कम शमिता का तो यही सपाल था शायद ! - .. बड़ी मुश्किल से दत्त की पट्टी पर पांव रख पाया। मोह ! बहुत भीड़ है ! सुबह से तो टप-टप बरसात हो रही है । ट्राम और सरकारी दत्से तो मानो नजाकत के मारे मरी जाती हैं । पानी शरीर से हूते ही वे नाराज हो जाती है । एकमात्र भरोता है पब्लिक क्त का । उन्होंने भी मौका देखकर मांग की है, भाड़ा बढायो! भीतर से किसी का खिजलाहट-भरा स्वर सुनाई पड़ा, 'वेटे क्स में लिखकर रन्गे पैतीस व्यक्तियों के बैठने की जगह, तो फिर कितने लोग खड़े रहेंगे और कितने रोड पकड़कर मूलते रहेंगे यह भी तो लिख सकते थे। बेटे व तो निकालेंगे कम और उनमें ढूंस लेंगे इतने लोगों को मानो ट्रक में कपड़े ठूत लिये हों। और भी पता नहीं वह व्यक्ति क्या-क्या बड़बड़ा रहा था। 'ओ माई, प्रो चश्मेवाले भाई, मुझे एकदम से ही आउट किये दे रहे हो! जरा देख कर, भाई। 'क्या करू भई, माप ही बताइये । मुझे भी तो पोजीशन लेनी पड़ेगी न !' 'साली वरतात भी जान साये जा रही है। तंग कर डाला ।' 'अरे दादा, धक्का क्यों दे रहे हैं ? देखते नहीं, लेडीज की हैं ?' 'जरा-सा हाप हुने में अगर धक्का लगता है तो आपको टैक्सी में ही जाना चाहिये, जनाब ! फिर हाथ तो क्या नाया तक नहीं हुयेगा।' भीतर से किसी ने आवाज कती, 'यह तो पुरानी बात हो गई बड़े दा, कुछ नया शगुफा छोड़िये ।

'टैक्सी मे जाने की तो प्रापने सलाह दे दी, पर उसका भाड़ा कौन देगा, बेटा?' मामने बैठे एक वृद्ध मजन भी प्राज-कल के चंचल छोकरों जैसा बनने की कोशिश कर रहे थे। 'वाह, क्या वान कही है. दादू (दादा), शावाम वृद्ध को उत्साह दिनाया एक छोकरे ने । 'अरे भई, क्या कर रहे हैं ? भीगा धाता शरीर पर ही लादे दे रहे हैं ! कर दिया कमीज का सत्यानाश !' वह व्यक्ति अत्यन्त श्रोध के साथ धूल झाउने की तरह कमीज पर से पानी झाडने लगा। प्रॉफिस जाकर देखता हूं कि कोई भी काम नहीं कर रहा है। सभी कर्मचारी दलो में वंटकर गप-शप कर रहे हैं । क्या बात है? तभी मुमत्र पास पाया, 'मापने मुना, विकाश को पुलिस पकड़कर ले गई है ? परसों गुवह उसके मौहल्ले में एक्शन हुआ था। अरे, वह तो उस वक्त मौहल्ले में था ही नहीं। पुलिसवाली ने उसे प्राइडेन्टिटी कार्ड दिखाने तक का अवसर नहीं दिया। विकाश ने शायद ऑफिस में फोन करना चाहा था तो जानते हो, पट्ठों ने गया कहा, 'हमसे ज्यादा होशियारी न बरतो?' क्या अन्याय है ! है न? हमने भी तय कर लिया है कि घेराव करेंगे।' 'धेराव ? हठात् घेराव किसका करेंगे।" 'प्रॉफिगरों का। थाने में फोन करके विकाश को छुड़वाने के लिए। क्या कर्म- चारियों के प्रति उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है ?' बात सुनकर शान्ता ने होंठ बिचकाये । 'क्यों, प्राकिमर का घेराव क्यों ? क्या उनके हुक्म से विकाश को पकड़ा गया है जो वे 'मफर' करेंगे?' लड़कियां इस बात के लिये वदनाम हैं कि उनमें किसी के प्रति भी रिमी प्रकार को फीलिंग्म नहीं होती। लगा कि यह बात भूट नहीं है । देवाशिप तो मुझमे बराबर ही कहता है, 'तुमलोग चाहे बी. ए. एम. ए. पास कर लो और चाहं प्रॉफिमों में नौकरी कर नो, मेकिन अभी भी पट्टी हो उमी प्रिमिटिव युग मे ही । चांद पर मनुष्य के कदम पड़ चुके हैं, देश में कमी- सो उथल-पुथल हो रही है, लेकिन तुमलोगों की विचारधारा में कोई परि- वर्तन नहीं हुआ है।' देवाशिप ठीक ही रहता है ।

जयन्त दा की पत्नी ने कुछ दिन ऑफिस से छुट्टी ली थी। वे पति-पत्नी दोनों ही हमारे प्रॉफिस में काम करते हैं । पत्नी की अनुपस्थिति के दिनों में जयन्त दा ने बहुत ही रसिक हो-होकर बातें की थीं। बस, शान्ता दी ने जयन्त के घर जाकर उसकी पत्नी को कितने ही उपदेश दे डाले और पति की तरफ से उसे सतर्क कर पाई। बाद में हमने यह खबर सुनी तो चकित रह गये। ऑफिस में चन्द्रा कुछ लजायी-लजायी-सी रहती है। अधिक वातें करना नहीं चाहती । लेकिन फिर भी उसको रिहाई नहीं मिलती है । जैसे, 'हां री. तुम्हारी शादी को कितने दिन हो गये ? हाय राम, पांच साल हो गये ? अभी तक बच्चे क्यों नहीं हुए? तो फिर, तुम्हारा पति किसकी नौकरी करता फिरता है ?' आदि-यादि । - चन्द्रा को इन सब बातों से बहुत शर्म पाती है । इस तरह की आलोचना उसे पसन्द भी नहीं है । फिर भी सभी उसे छेड़ती हैं । कम उम्रवाली लड़कियों में तो अधिकतर यही सव वातें चलती रहती हैं, या फिर 'लेटेस्ट डिजाइन' के बारे में वतियाती रहती हैं । पुरुप जब कहीं बैठकर क्रिकेट या फुटबॉल मैच की बातें कर रहे होते हैं तब ये लड़कियां बिना प्रयोजन ही वहां पहुंच जाती हैं और बात-चीत में शरीक होने की कोशिश करती हैं, कहती हैं, 'जयन्तीलाल थोड़ी देर और विकेट पर रह जाता तो मजा आ जाता। सरदेसाई तो बस फालतू ही है । एक रन बनाकर ही कूपर के हाथ में कैच दे दिया। हां, वेदी और वाडेकर कुछ अच्छा खेले हैं । फिर भी एक सौ पैंतालीस रन में ही इनिंग्स खत्म; यह भी कोई मतलव हुमा ?' इसी तरह के दो-चार मुखस्य किये नाम या अखवार में पढ़ी रिपोर्ट से, या घर में बड़े भाइयों के मुंह से सुनी बातों की पुनरावृत्ति करके स्वयं को बहुत ही जानकार-होशियार दिखाती हैं पुरुषों के सामने; मानो खेल के बारे में बहुत समझती हों। सिर्फ खेल ही क्यों, सभी विषयों के बारे में जानकारी प्रकट करना ही आज की स्टाइल है । मर्द लोग उनके ज्ञान की परिधि नाप नहीं सकते, यह वात नहीं है । वे लोग तो सिर्फ उनकी कम्पनी के लोभवश ही उनकी मूर्खतापूर्ण वकवास को भी महत्वपूर्ण बातों, की तरह मनोयोग से पास बैठे सुनते हैं । इस सातवें दशक की लड़कियों का विप्लव सिर्फ वातों एवं पोशाक में ही है, काम में नहीं। साड़ी उतरती-उतरती नाभि के नीचे तक पहुंच गई है। उसके अलावा कुर्ता, बेलवॉटम, तुंगी, - - जीन्म । नये नये फैशन भाते हैं और चले जाते हैं। d पूरे ऑफिम में खबर फैलने में देर नहीं लगी कि सुब्रत का डिमांशन हुआ है। सभी ने कहा, यह अवश्य ही अनन्त को कारमाजी है । एकाउन्ट्स सैत्रगन से उसको डिस्पैच में कर दिया गया है। मुझे एक दिन की बात याद मा जाती है । किसी बात को लेकर बड़े साहब ने सुव्रत को बुलाकर डाटा था । डाट विना कारण ही पड गई थी क्योंकि गलती जिसको थी वह बडे साहब की मात्र का तारा था। उसको बचाने के लिए मुखर्जी साहब यानी बढे साहब ने मुद्रत को लोगो के सामने अपराधी ठहराया था। सब कुछ जानते-घूमते हुए भी मुव्रत ने उनके सामने कुछ नहीं कहा । किसी प्रकार का प्रतिवाद तक नहीं किया । बस फट पडा हमलोगों के पास पहुचकर । वह अपने भीतर की ज्वाला को, प्राग को, बुझाना चाहता था अपने सह- कमियो के समक्ष बड़े साहब को..... । इन मजेदार दातो को सभी सह. फर्मी रम ले-लेकर मुनने लगे । ये सुबत को और अधिक भडकाने की कोशिश भी करते जा रहे थे। मुझे यह बात बहुत बुरी लगी । मैंने सोचा, क्या मुव्रत विल्कुल ही मूर्स है ? वह क्या इतना भी नहीं समझता कि जिनके सामने वह मन की भड़ास निकाल रहा * उनमे से कोई भी उसका मित्र नहीं है। वह तो खुद रोज देसता है तथा जानता है कि कोई किसी की भलाई फूटी आखो नहीं देख सकता। अपने सह- कर्मों की अनुपस्थिति में उसकी बुराई करते हैं, किसी की नौकरी को किम प्रकार नुकसान पहुचाया जा सकता है इसका उपाय सोचते रहते हैं, और सामने पड़ते ही कैसे बत्तीसी निकालकर हंसते हैं, मित्रता का ढोग रचाते हैं ! अमी मुद्रत का भापण जारी ही या कि इसी बीच अनन्त मित्र माकर अपनी रेबिल के सामने बैठ गया। मुद्रत फिर भी सुप नहीं हुमा, वल्कि उमका गुस्सा और अधिक बढ़ गया। अनन्त मित्र के सामने बडे साहब के विषय में कुछ बहना हितकर नहीं है, यह जानते हुए भी सुव्रत तुप नहीं रहा । लेकिन प्रापचयं तो इस बात का है कि इतनी देर से जो लोग बड़े साहब का महा-या करने में मुव्रत के लिए माल-मसाला जुटा रहे थे वे तत्काल हवा हो गये।

इससे भी अधिक आश्चर्य की बात यह कि वे अब अनन्त मित्र की टेबिल के सामने भीड़ लगाकर खड़े हो गये। उनमें से एक ने फुर्ती से सिगरेट का पैकेट खोलकर अनन्त मित्र के सामने बढ़ा दिया। अनन्त मित्र को सिगरेट जलाने का कप्ट तक नहीं करना पड़ा। एक और ने लाइटर जलाकर आगे बढ़ाया। फिर राजेन ने कहा, 'अनन्त दा, उस दिन रेडियो में आपकी बेटी का गाना सुना था । वाह, क्या खूब गाया था ! क्या गला पाया है !' उसकी बात खत्म होते-न-होते कमल ने बड़े अपनत्व से पूछा, 'इस बार पूजा पर तुम वाहर नहीं जा रहे हो, अनन्त दा?" 'भाभी कैसी है, अनन्त दा ? कहे देते हैं, भाभी के हाथ के बने मांस के समोसे एक बार और खिलाने पड़ेंगे।' उन सब के बीच में से सुमिता भी चहक उठी। श्रीपफ ! असा है यह ढोंग ! मेरा मन हुआ कि चिल्लाकर उन सबसे कहूं, 'आप सब चिड़ियाघर में वास करिये जाकर। श्रापलोगों में मनुष्यत्व नहीं, मानवीयता नहीं । जव सिर्फ दो टाइम खाना जुटाने की ही प्रॉब्लम है श्राप सभी को, तो फिर वहां जाकर रहने में ही क्या आपत्ति है ? भोजन तो, सुना है, वहां दोनों वक्त ही देते हैं।' पब्लिसिटी डिपार्टमेंट के बूढ़े क्लर्क बाबू ने कहा था, 'हूं ! हमलोग राजनीति के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं । सभाओं में भाषण देते हैं । अन्य देशों के दुःख को देखकर विचलित हो उठते हैं । उस पार के बांगला देश की मुक्ति के लिये जुलूस निकालते हैं । अविचार तथा अन्याय के प्रतिकार का बहाना बना- कर ऑफिसों में काम बन्द करते हैं। स्कूल, कॉलेजों में पढ़ाई नहीं होने देते। हड़ताल करवाते हैं । ....."और ऑफिस में इतने दिनों तक जिसके साथ बैठकर काम किया है उसके साथ अन्याय होते देखकर कुछ भी नहीं कह सकते ? डर लगता है, क्या पता, कहीं अपनी ही नौकरी न चली जाय ? अगर हम पर बड़े साहब असंतुष्ट हो गये तो ? नौकरी को बचाये रखने के लिए सिर्फ बड़े साहब को ही खुश नहीं रखना पड़ता बल्कि उनके चमचे पर भी पालिश करनी पड़ती है। वेशर्मो की तरह खुशामद करनी पड़ती है।' पटिलसिटी डिपार्टमेन्ट के क्लर्क बाबू की बात सुनकर मैं सिर झुका लेती हूं। उनको क्या कहू, मेरी भी तो हिम्मत नहीं हुई । मेरी समस्त अन्तरात्मा चीख रही थी, तव भी तो मैं उस विद्रोह को भापा देकर उसे उच्च स्वर में प्रकट नहीं कर सकी। दरअसल हम मर चुके हैं । मर रहे हैं । अपनत्व, ममता, - मित्रता प्रादि अनुभूतियो को महसूस करने की शक्ति हम खो बैंट हैं । जिस तरह पराधीनता के जमाने में एक वर्ग ऐसा था जो बड़े-बड़े खिताब पाने के लिये, नौकरी बहाल रखने के लिये वेशों की तरह राजशक्ति को मुशामद किया करता था तथा अपने देश के लोगों के प्रति उदासीनता दिखाता था, आज भी बिल्कुल वही स्थिति है । दृश्य परिवर्तन हुआ है, लेकिन पात्र नहीं चदले हैं। । दिन-ब-दिन हम कैसे भावना-शून्य हुए जा रहे हैं । शुभ भावों को सो बेटे हैं । कौन सया किसलिए आकर पड़ोसी का खून कर जाते है यह जाने बिना हम यथाशीघ्र दरवाजा बन्द कर निलिप्त हो जाते हैं। हाई-जम्प लगा-लगाकर चीजो के दाम बड़े जा रहे हैं, लेकिन हम निर्विकार हैं । सड़क पर चलती- चलती बम सी० एम० डी० या कार्पोरशन या और किसी द्वारा बनाये गढ़ में गिरकर भीतर के लोगों के बारह बजा देती है, फिर भी हमे होग नही माता । घन्टौं बस-स्टैन्डो पर सडे-खड़े बस आने के पल गिनते हैं और स्टेट ट्रासपोर्ट हमारी इस पीड़ा को रत्तो भर परवाह नहीं करती, फिर भी हम घर्य धारण किये रहते है । मोहल्ले में बम-बाजी होती है, लूट-पाट होती है, जिन्दा रहने के लिय चन्दा देना पड़ता है । वे लोग कहते हैं, 'सचमुच, यह तो बहुत बड़ा अन्याय है, बहुत सराव बात है, यह सब नहीं चल सकता। सरकारी दफ्तरो को पूर्णतया सुधारना होगा। इस सबकी जाच के लिये कमोशन बैठाना पडेगा।' और हम 'ही-ही' हमकर कहते हैं, 'तथास्तु' । और हालत ? यथा पूर्व, यथा परं । सच, इस धरती पर आज यह एक अदभुत अंधकार शिर पाया है। इसको अद्भुत अंधकार के मलावा और क्या कह सकते ? अगर यह सच नहीं होता तो उस दिन धर्मतल्ला पर पांच-छः लडके उन लड़कियों को...... मैं बस के इन्तजार मे खडी थी | मेरी तरह और भी बहुत-से लोग खडे थे । उनमें कई लड़के भी थे । उम्र उन सभी को तीस से नीचे ही होगी। टिपटॉप टाइप पेन्ट तथा कान के पूर्व नीचे तक लम्बी-लम्बी कनौतिया । वे सब खड़े-राडे सिगरेट पी रहे थे । प्रकाश की पोर मुंह करके धुए के. छले छोड़ रहे थे, और उनकी बातचीत का विषय था लडकिया। उनमें से एक बोला, 'अरे, तूने देखा, आज-कल एक तरह की छोटी साइज की लड़कियां निकली हैं ? लगता है, सभी छोकरियों ने स्कूल-बूल मे पढ़ना छोड़ दिया है । - - - नमें से एक भी हाथ लग जाय तो कसम से, मजा आ जा है, ये सभी अभी अनछुई ही हैं ।...... , जरा पास जा न, तेरी गुरुपानी हैं ।' देख....देख ! आ-हः ! टॉप ! टॉप माल है, कसम से ! आ-हः व नहीं। दिल पर ठोकर लगी है, कसम से !' ने देखा, लुंगी पहने कई लड़कियां हमारी तरफ आ रही हैं । गोरी, चुलबुली था खूबसूरत लड़कियां। 'क्या फैशन है, यार ! दिल पर कटारी चला रही हैं । गुरू, कहां से ले आये?' - उसके बाद एक बेहद गंदा फिकरा कसा उनमें से एक लड़के ने । तब तक लड़कियां पास आ गयी थीं। वात उनके कानों में भी पड़ी, लेकिन आश्चर्य की बात कि वे पीछे मुड़कर हौले-से मुस्करा दीं। इसका मतलब, उस फिकरे को उन्होंने एप्रीशियेट किया । उन्हें शर्म नहीं आई। अपमानित महसूस नहीं किया । एक छोकरे ने कहा, 'लाइन की ही है, रे!' - . सुवह रतन ने आकर अपने काका को बताया, 'कल क्या कांड हुआ, पता है ? कल रात पुलक की क्या दुर्दशा की है ! अरे, सव मौहल्ले के ही लड़के थे। कई दिनों से उनके घर सव ताश खेलने जाते रहे हैं । उन्होंने कल रात अचा- नक ही पुलक को घेर लिया और कहा, 'जेव में जितना माल-पानी है, सव निकालिये तो जरा ।' शायद पुलक ने उनमें से एक को पहचानकर कहा था, 'तुम अविनाश के बेटे गौतम हो न ? छीः छोः, तुम भले घर के लड़के होकर भी....' बस, फिर क्या था, गौतम बोला, 'ज्यादा टर्र-टर्र मत करिये, जनाव ये नक्शे किसी और को दिखाइयेगा । हुह.... ! भल्ले घर के....! खूब बढ़ि सरकारी नौकरी करके मौज मार रहे हैं, और हमें ज्ञान सिखा रहे हैं ! जब से माल बाहर करो वरना लाश ही पड़ी नजर आयेगी।' मैं कमरे में बैठा सब सुन रहा था। लेकिन आश्चर्य ! इस बात की मन पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। मैंने तो उठकर रेडियो को और तेज दिया तथा विज्ञापनयुक्त हिन्दी फिल्मी गानों का कार्यक्रम सुनने लगा।

यस में लोग ठसाठस भरे हुए हैं। सभी निर्विकार भाव से एक-दूसरे के पायो को जूतों-चप्पलो से कुचत रहे हैं । कोहनी से धक्का मारते हैं । 'माह ' मह । क्या कर रहे हैं ? जरा सोधे होकर सडे होइये न । माह, कुचल डाला रे पर 'गेट के पास से किसी ने चिचियाकर वाक्य फेंका, 'क्या बात है जनाब ? मन्दर बहिये न | रास्ता रोककर क्यों सड़े हैं ? मोर लोग नही चहेंगे क्या ?' गेट पर खडे व्यक्ति ने उसकी तरफ उपेक्षा से देखा, पर खिसका नहीं । 'सब-के-सब आवारा नक्सली है । सही बात कहो तब भी कोई कुछ सुनता हो नही....' बम चल पड़ी । अचानक ही गेट रोककर खड़े लड़के ने भागे बदकर, बड़बड़ करनेवाले भले मादमी का कमीज दातो के पास से मुट्ठी मे कसकर पकड़ लिया। बोला, 'क्यो दादा, क्या बड़वड़ा रहे थे तब ? एक बार फिर से बोलो, तो जरा तुम्हे सीधा कर दूं।' रह सज्जन लड़के के हाथ से अपना कमोज छुड़ाकर मानो कुछ कहने जा रहे थ, कि तभी लड़का फिर बोल उठा, 'शाम को तो अपनी पोती के उम्र की नोडिया को लेकर मौज उडायोगे और अब बस में चढ़कर शराफत की दुम बनते हो!' और उस सम्जन की कनपटी पर एक जोरदार घुसा पड़ा । अगल-बगल सड़े लोग खिसककर सड़े हो गये । अब तक जो लोग लड़कियो की सीट से सटकर खड़े थे और वहां से तिल भर भी हिलने को तैयार नहीं थे, वे पलक झपकते ही खिसककर भागे की ओर चले गये। सभी चुप थे । कोई कुछ भी बात नहीं कर रहा था । प्रॉफिम में जो लोग अपने अधीनस्य कर्मचारियों पर रोव माड़कर, डाटकर, अपनी पोजीशन ठीक रखने की कोशिश करते हैं, इस वक्त रे भी बिल्कुल निरीह बने एक तरफ मामोश सहे थे । बहुत-से तो अपना-अपना स्टॉपज पाने से पहले ही उतर पड़े । मेरा समस्त मस्तित्व विरोध करने को तीव्र इच्छा से अस्थिर हो उठा, लेकिन साथ-साथ भय भी लगा। प्रद हमारा सहारा सिर्फ भय हो रह गया है । मन में तीन क्रोध, प्रसए वतन लेकर भी सिर्फ डर से चुप रहते हैं हमतोग। हमारे इस डरपोक मस्तित्व को पहचानकर एक दल हमारा अपमान करता है, हमें हेय समझता है।

- दुकान पर पहुंचकर किसी वस्तु की अविश्वसनीय रूप से अधिक कीमत देखकर जब मैं कहती हूं, 'वाह, अभी उसी दिन तो आपके वगलवाली दुकान से बहुत कम में ले गयी थी। तो दुकानदार मौन साधे ही मेरे हाथ से वह वस्तु लेकर रख देता है और मेरी पूर्णतः उपेक्षा कर दूसरे ग्राहक से बात करने लगता है । मैं अपमान को चुप- चाप हजम कर वहां से चली आती हूँ। सुबह से ही पानी बरस रहा है । ऑफिस की छुट्टी हुई उस वक्त सड़क पर घुटनों तक पानी भरा हुआ था। टैक्सियां खाली होते हुए भी आवाज को अनसुनी कर आगे बढ़ जाती हैं । आखिर एक रुकी भी तो ड्राइवर ने महा- राजा की तरह रौबदार स्वर में पूछा, 'किस तरफ जायेंगी पाप ? लेकिन नॉर्थ में नहीं जाऊंगा मैं ।' मैं वात का जवाब दिये विना चुपचार टैक्सी में जा बैठी। उसके बाद आवाज में तेजी लाकर डांटने के अन्दाज में कहा, 'पहले से ही इतनी जिरह क्यों करते हैं आप? कहां जाना है, कहां नहीं, यह टैक्सी में बैठने के बाद पूछना चाहिए।' 'आप गरम क्यों हो रही हैं ? मैं नॉर्थ में नहीं जाऊंगा, यही तो कह । - रहा हूं।' 'मैं भी तो सुनूं कि क्यों नहीं जायेंगे ? पैसेंजर क्या आप जहां ले जाना चाहेंगे वहां जायेंगे ?' ड्राइवर ने क्षण भर मेरी मोर जलती निगाहों से देखकर कहा, 'पाप उतर जाइये । मेरी गाड़ी खराव है; नहीं जायेगी।' मेरे तन-बदन में आग लग गई लेकिन अगले ही क्षण एक अनजाने भय-वश मेरा हृदय कांप उठा और मैं टैक्सी का गेट खोलकर बाहर निकल आयी। टैक्सी पल भर में ही अदृश्य हो गई। मन में इतना विक्षोभ, असहनीय ज्वाला तथा पीड़ा लेकर पता नहीं हम क्या ढूंढ़ रहे हैं ? शायद एक सीढ़ी ढूंढ़ते हैं-ऊपर उठने की सीढ़ी जो हमें किसी प्रकार भी नहीं मिल रही है । और नहीं मिल रही है. इसीलिये हम विक्षुब्ध हो रहे हैं । सव कुछ तोड़-फोड़कर चूर-चूर कर देना चाहते हैं। दरअसल, हमारे सफल बनने में बाधक कौन है, यही हम नहीं समझ पा रहे हैं । इसीलिये हम गुमराह हो गये हैं । सव कुछ खो बैठे हैं ।

रतन जेठू कहते हैं, 'यह सब झस्ट्रेशन के सिवाय कुछ नहीं है। अपनी इच्चिन वस्तु नहीं पाने के कारण ही यह सब मसन्तोप है। अगर मनुष्य मुग से स्वच्छन्द रह सके तो फिर उसे और क्या चाहिम ?...' यह सब बेकार की बातें हैं। मैं ऐसा नहीं मानता। विश्वास नहीं करता। अगर यही बात होती, तो फिर अमल मुदीप्ता के साय इस तरह अमल तो बडे बाप का बेटा है । पढा-लिखा है । ऑफिस में अच्छी नौकरी करता है। फिर भी मुमत्र से उस दिन पूछ रहा था, 'तेरे जान-पहचान की कोई अच्दी-सी लड़की-बड़की है क्या हो तो यार हमारे लिये भी दो न किसी एक को ! शाम का वक्त कार्ट नहीं कटता।' 'कमी बात करते हो, यार सुदीप्ता के होते तुम्हारा समय नहीं करना वह कहा गई?' 'गोली मारी मुदीप्ता को। पिण्ड छुडा लिया है मैंने तो उमसे ।' 'तो तू उमसे शादी नहीं करेगा ? तुम लोगों में तो प्यार..?' देम गुरू, यह प्यार-ज्यार मब बेकार की बातें हैं । बैंक-डेटेड । तमझे . 30 भारी वाते देवाविप से यहीं मैंने । पहले तो वह अन्यमनस्क-मा हो गया । एक अलग स्पर्श देकर उम महा भूठ को मेरे मन से हटा देने के लिये उनी प्रायों की पुलियों में एक तृष्णा जाग उटी, पर उसने खुद पर काबू कर लिया। अपनी इम कामना का रुस उसने शुभ और मुन्दर को और मोड दिया। पूरे प्रात्म-विश्वास से वह बोला, 'प्रेम, श्रद्धा, पाहत किसी जमाने की सीमा मे बचकर नहीं रहते । कितने ही युग, कितने ही जीवन, कितने ही जन्मों को स्पर्श कर-करके प्रेम चिरायु होता है । चन्दन के प्रलेप की तरह प्यार ममूची जलन को शीतल कर देता है। प्यार वरसान को बंद की तरह पविर है । एक अन्य प्रकार की विशुद्ध भावना है। एक अनिवनीय मानन्द है।' देवाशिप में विभोर होकर मुझे अपने निकट मोच लिया । मैं ढलती शाम को गेरुई प्राभा को निहार रही थी। विक्टोरिया मेमोरियल की हरियाली जमीन पर ढलती शाम को और देख रही थी। मेरे होठो पर मुस्कराहट सेल गई। देवाशिष इशारा समझ गया। उसने खुद को अलग कर लिया, तया भावान - - में गंभीरता भरते हुए बोला, 'अपराजिता, क्या तुम नहीं जानती कि प्रेम को बहुत तपा-तपाकर, गह्री ममता से सींच-सींचकर, हृदयरूपी घर में उसका यत्नपूर्वक लालन-पालन करना पड़ता है ?' 'जानती हूं। और जानती हूं इसीलिये तो मैं गुमराह नहीं हुई हूं। मैं भटके हुए राही की तरह पथ नहीं ढूंढ़ती हूं। कदम-कदम गंतव्य की ओर बढ़ती जा रही हूं तथा बढ़ती जाऊंगी। 'मेरा यह विश्वास है कि एक दिन ऐसा ही एक घर हम जरूर ढूंढ लेंगे जिसकी खुली खिड़की से उन्मुक्त प्रकाश भीतर पायेगा; और हमारे मन को, हमारी देह को आलोकित करेगा । तव में देवाशिप में खुद को विलीन करके कभी न खत्म होनेवाला सुख पाऊंगी । जीवन की अंतिम सांस तक हम लोग निर्मल, पवित्र ज्योत्स्ना-रश्मि की तरह विहंसते रहेंगे । रात-दिन के इस बोझ को हटाकर हम किसी-न-किसी दिन वैसा ही घर जरूर ढूंढ लेंगे। हमारे प्यार का यह शुभ फल हमें जरूर मिलेगा।' देवाशिप के समूचे चेहरे पर मुग्वता मधुर किरण फैल गई। मेरे हाय को उसने कसकर पकड़ लिया। मेरी प्रांखों से अपनी प्रांखें हटाकर उसने अपने चंचल होते मन पर काबू किया। मुझे बहुत अच्छा लगा । जीवन में ऐसी बहुत-सी आकांक्षाएं है जो हाथ पसार कर मांगी नहीं जा सकतीं । सिर्फ अनुभव से प्राप्त की जाती हैं। यह बात । देवाशिष जानता है। जाड़े की शाम ने वहुत जल्दी ही पास-पास के लोगों को छाया का रूप दे दिया ! हम उठ खड़े हुए । दूर-दूर बत्तियां जल रही थीं। धीरे-धीरे नर्म पास पर कदम बढ़ाते हुए हम प्रकाश की ओर बढ़ गये। ।

शहीद की मां समरेश वसु . . मानो शरीर में कंपकंपी की लहर उठी है । विमला ने पाखें मूद ली। विमला ने स्पष्ट महसूम किया जैसे उसके पेट के भीतर कुछ हिल-डुल रहा है । उमने प्राय मूदकर, एक होंठ को दूसरे होट से कसकर दवा लिया और पेट में हिलते-जुलते अहसास को पूर्णतया महमूम करना चाहा । उसके सामने पुल्हे पर सब्जी रखी हुई है। सब्जी में पानी नहीं है प्रत. चड़-चढ़ की प्रादाज होने लगी है। शायद थोडी देर न सम्हाले तो कडाही में चिपककर सांगे सगी जल जायेगी। लेकिन फिर भी विमला हिलने में असमर्थ है । अपनी समस्त अनुभूति बटोरकर उसने कानों में सीमित कर ली और मरने गर्न की मावाज मुनने की कोशिश करने लगी। उसे महसूस हुमा मानो उसके दिल की धड़कन मे नि शब्द ही वादल का नाम गूंजने लगा है. 'बादल, बादल, तू दूसरे हो भए उसका शरीर एक बार और कांप नगर जोर-जोर से सांस लेने लगी। फिर मांखें खोल, चूल्हे पर सब्जी की काही की ही है न !'....

-- ओर देखकर वह वहां से उठ खड़ी हुई । उसकी आंखों में बहुत ही व्याकुलता भरा भाव तैर रहा था । कानों को और अधिक सतर्क बना वह वाहर की आहट लेने लगी। उसके बाद दरवाजे की ओर कदम बढ़ाने ही वाली थी कि वहीं ठिठक गई । सब्जी योंही छोड़ गई तो एकदम जल जावेगी। एक बार चूल्हे पर बड़ी सब्जी की ओर देखा उसने, लेकिन खड़े रहने की ताकत नहीं थी उसमें । परेशान हो वह बाहर निकल आयो कि, होने दो, खराब होती है तो खराब होने दो। कच्ची रहे, जल जाये, या राख हो जाये, मुझसे अब नहीं सम्हाला जायेगा। आकाश में गहरे बादल छाये हुए थे, जोरों की हवा चल रही थी। आंगन के कोने में लगा सफेद फूल का पेड़ हवा के तेज झोंकों से एकदम झुक गया था । एक साल के पौधे की भी अब झुका, तब झुका, वाली हालत हो रही थी। घर बिल्कुल सुनसान था । लकड़ी के फ्रेम में मंदी टिन की पत्तर से बनाई घर की दीवारें और टिन की ही छत थी घर की। ऐसा लग रहा था मानो घर में कोई भी नहीं है फिर भी विमला बहुत ही कदम दवा-दवाकर चलती हुई आंगन आई । बगल के मकान में कना की मां किसी से कुछ कह रही थी। विमला ने नागफनी की बाड़ को पारकर एक बार उत्त तरफ देखा। यहां से कना की मां का घर तो दिखाई पड़ता है, लेकिन उसमें रहनेवाले नहीं दीखते। उसने एक बार फिर उस घर की ओर देखा पर उपर कित्ती को भी आहट नहीं मिली । हवा ने उसके बाल उड़-उड़कर आंखों पर ला रहे थे। दूर से देखने पर बाल काले लगते थे लेकिन वस्तुतः सफेद होने शुरू हो गये थे। चौड़ी मांग में सिंदूर का वासी निशान था। हाथ में बदरंग सांखा एवं नोया (बंगाली महिलाओं की सुहाग-चिन्ह स्वरूप पहनी शंख एवं लोहे की जुड़ी) तथा सोने की कुछ चड़ियां पहन रखी थीं उत्तने । लहंगे पर तांत को युनी कत्थई बॉर्डरवाली सफेद साड़ी पहन रखी थी। साड़ी मैली हो रही थी । जगह-जगह हल्दी के धब्बे लगे हुए थे। इस प्रौढ़ अवस्था में भी शरीर का कसाव वरकरार था। चेहरे पर पड़ी रेखाओं से ही उन का महतास होता है, फिर भी इस समय का चेहरा देखकर ही पता लग जाता है कि जवानी में खूबसूरत रही होगी । उसका चौड़ा शरीर कठोर एवं कसा हुआ है । विमला कुछ पल आंगन में ही खड़ी रही। फिर सामने की ओर से न जाकर रसोईघर के पीछेवाले रास्ते से गई । नागफनी की बाड़ के सहारे-सहारे मकान - के पिछवाड़ेवाले रास्ते पर वह आगे बढ़ती ही गई। घर के पिछवाड़े के सभी घरों के खिड़की-दरवाजे बन्द धे। जिस जगह मकानों की सोमा सुत्म होती है वहा कोने में एक जवा फूल का पौधा है । विमला वहीं सड़ी रह गई। सामने सड़क है जो उत्तर-दक्षिण की ओर लम्बी चत्ती गई है। कॉलोनी की सडक है अतः पक्की नहीं है। विमला ने उत्तर की मोर देखा । उत्तर की पोर का रास्ता जिस जगह से पश्चिम की ओर मुडता है उसी भोर देखा । उन जगह मोड़ के एक किनारे कुछ इंटें अभी तक पड़ी हैं। वहा शहीद-वेदी बनी थी । इन कुछ महीनों में टूटते-दूटते सभी ईटें विखर गई है। अब तो वहां कुछ इनी-गिनी ईटें ही बची है। इन्हें भी कोई उठाकर ले जायेगा तो शहीद स्मारक का कोई भी निशान नहीं बचेगा । वेदो किसने तोडी और उनकी ईटें कहा गई, किसी को भी पता नहीं । विमला देसा करती थी कि, शुरू-शुरू में एक कुत्ता स्मारक से बिल्कुल सटकर सोया करता था। पर अब वह भी नहीं दीखता। गिनती की इंटो के अलावा मव वहां कुछ भी नहीं है। विमला ने गर्दन हिला दी, साथ ही उसके होठ भी बड़वढा उठे, 'नहीं, बादम नहीं है वहां ।' बादल को श्मशान में ही जलाया गया था। तीन महीने के करीन हुए होगे, जब यह स्मारक तैयार किया गया था तब वे लोग विमला को बुलाने पाये थे । बादल की मां थी विमला । एक शहीद की माँ । इसी- लिये वे लोग बुलाने पाये थे—वादल के मित्र, उसकी पार्टी के लड़के । पर वे लोग सिर्फ विमला को ही बुलाने आये थे । इस घर के पोर किसी भी सदस्य को नही बुलाया था उन्होंने । न तो वादल के पिता को और न उसके दोनों बड़े भाइयो को। वादल का पिता हरप्रसाद किसी दूसरी पार्टी का मादमी है । इसके अलावा, दोनों बड़े भाई कृपाल और दयाल भी अलग-अलग पार्टियों के मेम्बर हैं । घर के चार मर्द और चार पार्टियो के मेम्बर । वादल की पार्टी के लोग सिर्फ विमला को ही बुलाने आये थे। शहीद की मां को। विमता वहां गई थी। वहीं, बस जरा-सी ही दूर तो है घर से । पश्चिमी मोड़ पर, सड़क के किनारे, वही जहां अब सिर्फ कुछ ईटें ही बची हैं । शहीद स्मा- रक की अंतिम निशानी । विमला वहा किसलिये गई थी, यह उसे पता नहीं है । बादल की पार्टी के लड़कों ने आकर कहा था, 'मौसी, मापको एक. यार मत.

वहां चलना पड़ेगा।' विमला उदासी को प्रतिमूर्ति बनी वहां गई थी। उसके दो दिन पहले हो तो उसके अट्ठारह वर्ष के बेटे को किसी ने इसी जगह पीट रोटकर मार डाला था । वह दृश्य इस समय भी विमला की आँखों सामने मानो स्पष्ट घूम रहा है। बादल लहू-लुहान था । मुंह, सिर एवं शरी के विभिन्न अंगों पर खून बह-बहकर जम गया था। उसकी पार्टी के लड़के हैं मृत वादल को उठाकर उसके घर के आंगन तक ले आये थे। वादल सर्व छोटा बेटा था, पर अंतिम संतान नहीं था। उसके बाद भी दो हुए थे प जीवित नहीं रहे । अतः भव वादल के बाद की और कोई संतान नहीं है। बादल को इस हालत में देखकर विमला चीख मारकर उस पर गिर पड़ी थं या बादल को जकड़कर रोने लगी थी। वह रोती-रोती कहती जाती थी 'ऐसी बुरी मार किसने मारी रे तुझे? अरे वादल रे, बादल वेटे !'.."वाह के लोगों से घर का आंगन खचाखच भर गया था उस वक्त । कुछ देर बाद वे लोग वादल की अर्थी फूल-मालाओं से सजाकर उसे ले गये थे । लेकिन श्मशान-यात्रा के दौरान 'हरि बोल' का उच्चारण न कर स्लोगन हे थे' 'कामरेड वादल जिन्दावाद ! खून का बदला खून?'.. उसके बाद तो विमता खुलकर रो भी नहीं सको। बस, कारण-अकारण, समय-समय आंखों से आंसू बहने लग जाते । तव वह अपने आंसुओं को पोंछ लेती। दो दिन बाद ही स्मारक तैयार किया गया। जिस दिन वादल का खून हुआ था उस दिन कॉलोनी के मैदान में एक सभा हुई थी। वह सभा वादल की पार्टी के लोगों की नहीं थी, किसी अन्य दल की सभा थी। गड़बड़ को शुरुवात उसी जगह से हुई थी, हालांकि विल्कुल सही वात कोई भी नहीं बता पाया। शाम के धुंधलके में किसी ने बादल का पीछा किया था। बादल घर की ओर दौड़ पड़ा था, लेकिन मोड़ को पारकर आगे नहीं बढ़ सका । कोई कहता है, वादल अकेला ही घर की भोर मा रहा था और उसका सूनी पहले से ही मोड़ पर छिपा उसका इन्तजार कर रहा था। इसी तरह की जितने मुह, उतनी बातें सुनने में आ रही थीं। विमला को समझ में नहीं आता कि उनमें से किस बात को सच माने तथा किसको भूठ । बादल की चीख सुनकर लोग दौड़कर उसके पास पहुंचे थे, पर तब तक सारा खेत समाप्त हो चुका था । खून से लथ-पथ मृत वादल के अलावा शाम के.धुंधलके में और कोई भी वहां दिखाई नहीं पड़ा। पुलिस भी आई-यो । शायद बादल को पार्टी ने कुछ लोगों के नाम बताये थे पर वे दूढने पर भी कही नहीं मिले। पुलिस किसी को भी गिरफ्तार नहीं कर सको । हत्यारों के रूप में जिनका नाम पुलिस को बताया गया था उन पर मामला दायर किया गया था। वे सभी जमानत पर छूटकर निश्चित धूम रहे हैं । केस चल रहा है । केस इस तरह चल रहा है मानो कुछ हुआ ही न हो। वादल की हत्या के दो दिन बाद उसका स्मारक यानी शहीद स्मारक तैयार हुआ था। इन दो दिनों में कुछ छोटे-मोटे दगे भी हुए। एक दुकान को जलाकर राख कर दिया गया लेकिन क्यो, यह विमला को पता नहीं । विमला शहीद स्मारक के पास क्यो गई थी यह भी उसे पता नहीं। वह तो वहा जाकर बस थोडी देर खड़ी रहकर आ गई थी। पन्द्रह-सोलह इंटों को एक- के ऊपर एक रखकर, गारा चूना लगाकर, गाय दिया गया था। फिर चूने से उस पर मफेदी करके उस पर बादल का नाम लिया गया था। उसके वार विमला के चारो ओर बड़े होकर उन सड़कों ने वही एक ही स्लोगन बुनन्द किया था, 'कॉमरेड बादल जिन्दावाद । सून का बदला सून..." प्रादि- मारि । पता नही कौन था वह लड़का, उसने बादल का नाम ले-लेकर एक नापण भी दिया था। उसकी कही सारी बातें विमला की समझ में नहीं पाद । समझ में क्या नहीं पाई, पूरी बात मानो उसने मुनो ही नहीं। वह तो गहन दुःख में डूबी-सी पड़ी थी और उसी हालत में घर चली पाई थी। भर आकर रसोईघर में जाकर खाना बनाने बैठ गई थी। घर उस वक्त भोर कोई भी नहीं या। हरप्रसाद, कृपाल तथा दयाल पाकर माता स्वाग, साना बनाय वगर काम कैसे चलेगा, अतः वह जिस दुःस की स्थिति में वहां Tई थी उसी हालत में घर पाकर माना बनाने में जुट गई । पर किसी के ग्य भी उसने बात नहीं की। कृपाल और दयाल से तो नहीं ही की, हरप्रसाद से भी बात नही की। हरप्रसाद भुद प्राकर रसोईघर के दरवाजे के पास महा रहा था। फिर खुद से ही बोल रहा हो इस तरह बोला था, “कितनी बार मना किया पाकि उम दल से मेल-जोल मत बढ़ा, पर कोई बात मुने तब न !' विमसा ने कोई जवाब नहीं दिया। फिर भी हरप्रमाद वही सड़े रहे । थोडी देर चुप सड़े रहने के पश्चात् एक सम्बी सांस लेते हुए बोले, 'महां की ये सर पार्टिया सिवाय खून-खराबे के मौर कुछ भी नहीं जानतौं । इन्हें कोई, मतलब नहीं किसी से। जिसका गया, उसका गया । ये थोड़े ही देखने आयेंगे । अव वादल वापस तो पाने से ।' इसके बाद हरप्रसाद चुप रह गये थे। पर विमला ने फिर भी कोई जवाब नहीं दिया। वह तो चूल्हे की तरफ झुकी हुई बैठी थी। हरप्रसाद ने फिर एक गहरी सांस भरकर कहा, 'जो कुछ होना था सो हो गया। अव मन को मजबूत रखो । इसके अलावा और चारा ही क्या है, तुम्हीं वतायो ? मुझे. देर हो गई, मैं ऑफिस जा रहा हूं । खाने की विल्कुल भी इच्छा नहीं है।' हरप्रसाद चले गये थे । वस, उस दिन के बाद और कोई बात नहीं हुई। इन तीन महीनों में कभी-कभार कुछ कहते भी तो बस यही कि, 'मन को मजबुत कर; धीरज घर; बादल तो अब लौटकर आयेगा नहीं।' विमला हरप्रसाद की बातों का कोई जवाब नहीं देती। वह पति से सिर्फ गृहस्थी-सम्बन्धी आवश्यकताओं की बात ही किया करती । वादल के विषय में कोई भी बात नहीं करती। कृपाल और दयाल ने तो अपनी ओर से ही विमला से वादल सम्बन्धी कोई चर्चा नहीं की । कृपाल नौकरी करता है । व्याल बेकार है । वे दोनों अलग-अलग दल के प्रादमी हैं । घर में वे दोनों आपस में बहुत कम बातें किया करते । गमछा, तेल, सावुन आदि मांगने, नहाने आदि की बातें ही करते। इसके अलावा नाटक या सिनेमा तक की वात भी नहीं करते। अपने दल की बात तो विल्कुल ही नहीं करते । विमला से तो भूत्र लगने पर सिर्फ खाना मांगते । इसके अलावा, घर में क्या सामान लाना है यह भी पूछ लेते, पर वादल के विषय में एक शब्द भी मुंह से नहीं निकालते, मानो उनका भाई नहीं मरा, कोई और ही मरा है । मानो किसी दूसरी पार्टी का, जो उनकी नहीं थी, कोई सदस्य मर गया हो । शायद अपनी पार्टी के लोगों से इस बारे में बात करते हों, पर घर में तो किसी से भी कोई भी बात नहीं करता। विमला जवाकुसुम के पेड़ से सटकर खड़ी, टूटी हुई वेदी की ओर देख रही थी। नहीं, वादल वहां नहीं है। बादल को श्मशान में जला दिया गया है। पर आज वादल विमला के सारे शरीर में जीवित है। आज श्रावण की उन्नीस तारीख है। ग्यारह बजे हैं । अट्ठारह साल पहले इसी दिन, इसी सनय, वादल पृथ्वी पर आने के लिये विमला के पेट में छटपटा उठा था। " . .."उस वक्त घर में और कोई नहीं था। विमला एकदम अकेली थी। पूर्ण-गर्मा विमला बादल किमी भी क्षण पैदा हो सकता था । ठीक इसी समय दर्द उठने शुरू हुए थे | डॉक्टर, वैद्य की आवश्यकता तो थी नहीं । विमला बिल्कुल 'नि:शक थीं। वह समझ गई थी कि यह दर्द निष्फन देदं नहीं है। उनके शरीर को प्रत्येक अनुभूति में अभिन्नता भरी थी। ददं उठने ही वह समझ गई श्री.कि यह प्रया, यह दर्द, निष्फल नहीं जायेगा । समय निकट या । • मट्ठारह साल पहले इसी दिन, इमी समय, मूसलाधार यरसात हो रही थी । इस तरह अकेले रहना उचित नहीं था ऐमी हालत में। किमी तरह विमला दूगल के मकान तक कना की मा के पास गई थी । दर्द से कराहते हुए विमला ने गुप-नप ही कना की मा को स्थिति मे अवगत कराया । बोली, 'दीदी, अब समय नहीं है।' । सुनते ही कना को मा अपने घर का मारा काम छोड शोलता में विमला के साय पनी पाई श्री.। उम: वक्र कनाछ-सात माल को यो । उसको भेजकर, मेपू की विधवा बुढिया मां को, जो जनमी करवाया करती थी, बुलवा लिया। अाजकल की तरह टोल-इमाके नहीं पोटे जाते थे उन दिनों । मेधू,को, मा ही बच्चा जनवाया करती थी । बुढ़िया तुरन्त ही मा गई थी। उसने विमला की जार्च को और बोली, हां ददं तो. अमली है । अब अधिक देर नहीं है।' माना की मां ने जो बनसोईघर : सालोका दिया। . उभी रसोईघर मे चादल परदा हमा था। उस वक्त इस घर-को हालत कुछ और ही ली। टिन को दोधार नहीपी फर्ग:भी, साका, नहीं था। हर की, दीगरें थीं. हा, छत उस समय भी टिन की थी। फर्ग कच्चा था । विमला रमापर में चटाई पर अभी नेहती कभी वैदती, दुई यी तीव्रता, को सहन कर रही थी। कना बोला की मूम में नही पा रहा या हि वह क्या करे । वह इस तरहं पवग हीशी मानी उग्री को दर्द उठ रहे हो ।, विमला दम साधे दर्द सहन कर रही थी। दात-पर-दांत भीचकर खुद को स्थिर रखने की कोशिश कर दी थी। दर्द सहन करते करते सोच रही थी-लड़का होगा या लड़की । हरप्रसाद की ईन्यों थी कि लड़को होविमला की भी यही इन्छा यो दी सड़कों के याद - एक लड़की ही होनी जाहिर । पर उसकी प्रतिम फराह के साथ जो भूमिष्ट हा यह लड़का थी । म को मां ने रोनी हायों से विमला काः पेट कमकर, कहरसा या कोशिसभी में माल नहीं गिरी थी। विमला एफ.मार पिट. - उसी प्रकार के दर्द की अपेक्षा कर रही थी । उसी बीच उसने अपने शिशु की ओर भी एक नजर डाली थी। ताजा खून से लाल-लाल एक शिशु । उसके गले से तब तक रुलाई भी नहीं फूटी थी । बहुत धीमी फराह-सी ही निकल रही थी शिशु के गले से । पर ज्योंही नाल गिरी, शिशु सप्तम स्वर में चीख उठा, 'उवां, नवां, उवां !' नाड़ी काटते-काटते मेधू की मां ने कहा था, 'बाप रे, कितना बड़ा छोरा है ! मानो पेट से ही एक साल का निकला है । देखकर लगता है, चेहरा मां पर गया है।' क्या कहा, मां पर गया है ? विमला ने फिर एक बार शिशु की ओर देखा। पर उसकी समझ में नहीं पाया कि बच्चा किस पर गया है। मेपू की मां की गोद में बच्चे को देखते-देखते अचानक विमला को अपनी गोद बहुत साली- खाली महसूस हुई । लड़की नहीं है तो क्या हुया, अपने ही शरीर का एक हिस्सा है, गोद में लेने को तो जी ललकता ही है । पर यह बात मेधू की मां से नहीं कह सकी थी वह । मन-ही-मन वोली थी, 'मां पर गये बेटे, तुम हमेशा सुखी रहो। बाहर मूसलाधार बरसात हो रही थी। कना की मां ने विमला को सहारा लगाकर बैठाया था । दूध गरम करके पिलाया था। मेघू की मां ने नवजात शिशु को गरम पानी से पोंछकर साफ किया और गुदड़ी में लपेटकर विमला की गोद में देकर कहा, 'समझ गयी, मूसलाधार पानी साथ लेकर पाया है, बाप के इसी तरह धन बरसेगा । बाप रे, कैसा बादलिया:लड़का है ! दुनिया हब जानेवाली बरसात साथ लाया है।' रसोईघर की हालत बहुत अच्छी नहीं थी उस वक्त । अब तो पनका मांगन है, पर उस समय कच्चा फर्श तथा टिन की छत थी जो जगह-जगह से टप-टप टपक रही थी। नवजात शिशु को छाती में छिपाये एक सूखा कोना देख वहां सो रही थी विमला। ३ भवजात शिशु को परिचित कराने के लिए विमला ने अपना स्तन उसके मुह से छुआ रखा था, तथा उसके मुह की घोर देखते हुए सोच रही थी, पता नहीं, यह कैसा निकलेगा ? यही सब सोचते-सोचते उसने बालक को और भी करीव कर छाती से चिपका लिया। मेधू की मां ने कहा था, मां पर गया है।

अतः बहुत शंतान होगा यह बालक ! 'क्यों रे, शंतानी कर तू भी मेरा जो जनायेगा क्या?' इतना कह विमला हंस दी थी। फिर बोली थी, 'प्रगर संतानी करेगा तो पोटूगी। विमला के इतना कहते ही नवजात शिशु रो पड़ा था। विमला को हंसी भाई थी । बोलो, 'प्रभो योडे ही पौट रही हूं, अभी से क्यों रो रहा है ? बड़ा हो, कोई शंतानी कर, फिर देखूगी तुझे।' विमला को एक-एक बात याद है । कुछ भी नहीं भूली है वह, मानो कल की ही बात हो । कृपाल, दयाल के जन्म की भी एक-एक बात याद है विमला को। वे तो अपने देश में पद्मा के उस पार जन्मे थे । बादल इसी घर में जन्मा था। शाम को जब हरप्रसाद घर लौटे थे, तो जच्चा-पर के बाहर ही खड़े होकर, संसारकर, अपने माने की सूचना दी थी । दरवाजा भीतर से बन्द पा। विमला ने मेधू की मां से कहा, 'कृपा के पिता माये हैं, दरवाजा खोल दे।' मेयू की मां ने दरवाजा खोल दिया था। हरप्रसाद ने विमला से पूछा, 'कसी हो तुम?' विमला ने कोई जवाब नहीं दिया, सिर्फ लालटेन की रोशनी में बच्चे को मारे करके दिखा दिया था। हरप्रसाद ने 'हूँ" को प्रावाज कर कहा था, 'तुम्हार बेटा तो बहुत खूबसूरत दौखता है।' बाप का खुशी से चमकता चेहरा देसकर ही समझा जा सरता कि बहुत खुश हुए थे। विमला का चेहरा गर्व से दमक उठा पा र 'इतना खूबसूरत घेटा पाकर हरप्रसाद को बेटी न होने का मलही है। मेयू की मा ने कहा था, 'बेटा जबर्दस्त बादल-पानी साप नाग है। मादक चारता लड़का है।' पतः नाम-संस्कार उसी समय कर किन माज वही दिन पा । प्रट्ठारह साल पहले का वही दिन या भार सहर रहे थे। विमला मांस मूंदकर सामोर सही, रह-रहार दिए तो दी। उसे ऐसा लग रहा था मानो पेट में कुछ हिल-डुन रहा है। पेट में गत है। चादत ! एक कोने में जवाकुसुम से सटकर पड़ी है मिला।

गहीद-स्मारक की ओर देखकर उसने अांखें मूंद ली। हा-हां, फिर, फिर वैसा ही लग रहा है मानो पेट में ग हिल-डुल रहा है। होठों को भींवकर, दोनों हात छाती के पान, इकळे कर लिये उसने । अब यह सब क्या हो रहा है? फिर ऐसा क्यों लग रहा है ? संतान पैदा करने की शक्ति तो उसकी बहुत दिनों पहले लुप्त हो चुकी है। आज यह कौन है जो उसके गर्भ में इस तरह उछल रहा है ? तो क्या बादल उसके शरीर में ही व्याप्त है ? वह मन- हो-नत बादल को आवाज देने लगी, 'बादल, बादल 'नां, मां, मोमां!' ऋपाल अावाज दे रहा था । विमला ने कोई जवाब नहीं दिया। न ही वहां ने हिली । वह जहां खड़ी थी, जने खड़ी श्री, वैसे ही वहीं खड़ी रही । उसका बेहरा कठोर हो गया। सारा गरीर कड़ा हो गया। नजरें टूटी हुई जहीद-. देदी पर जमी थी। अपने बच्चों की पुकार का जवाब दिये बिना आज तक 'कनी नहीं रह सकी है वह, पर आज उसके मुंह में आवाज ही नहीं निकल रही श्री । आज वह किसी की बात का जवाब नहीं देगी। वहां बड़े-बड़े विमला को अपने बच्चों के बत्रपन की बातें याद आने लगी । रचपन में कृपान एवं दयाल दोनों प्रापन में बहुत झगड़ते थे पर बादल पर कनों ही जान छिड़कते थे। वे दोनों वरावर से ही थे उन में, इसलिये गड़ा करते थे पर बादल उन दोनों ने बहुत छोटा था । बादल को दिये बिना दोनों नाई कुछ भी मुंह में नहीं डालते थे। जब बादल न बोलना सीखा तो कृपाल और दयाल दोनों ने उससे पूछा था कि वह किसे अधिक चाहती है ? पर बादल भी कम लालत्री नहीं था । वह किसी भाई को भी बुद से दूर नहीं करना चाहता, अतः दोनों को वाहन की बात कहा करता था। छोटे से बच्चे की चालानी पर विमला मन-ही-मन हंसा करती थी। धीरे-धीरे कृपाल और दयाल बड़े हुए । नाय ही वादल भी बड़ा होने लगा ! लटके जन-मे बड़े होने लगे देने-चने उनका स्वभाव न जाने कैसा तो होता गया । बादल को अब अपने बड़े भाइयों का सान्निध्य पहने जितना नहीं मिलता था. ऋयोंकि अब वे घर से बाहर अधिक व्यस्त रहने लगे थे। धीरे- पीर बादल ने भी अपना रास्ता चुन लिया। उसके भी अलग-दोन्ज , अलग रेल-कूद होता था । पर इस परिवर्तन से विमला को हिरो चिन्ता नहीं हुई दी। उसने सोत्रा, लड़के : बड़े होंगे तो परिवर्तन तो आयेगा ही, उनके ।

पभावम पर लड़कों की इन सब हरकतो से चिन्ता हो रही थी तोहरप्रसाद, को। उन्हें सबसे अधिक कृपाल और दयाल पर गुस्सा आता या। विमला में हरप्रसाद के मुह से ही सुना था कि दोनों बडे लडके कॉलेज जाते तो है पड़ने के लिए, पर वहा जाकर वे राजनीति करते हैं । विमला सोवती, सभी छात्र तो ऐसा करते हैं, फिर कृपाल और दयाल का क्या दोष है ? यह बहतो. 'कॉलेज में जाकर वे लोग क्या करते है क्या नहीं, हमें इन बातों में दिमाग सपान से क्या लाभ ?' हरप्रसाद पाहते, 'सिर्फ राजनीति मे ही पडते तो भी विशेष चिन्तित होने की बात नहीं थी, पर राजनीति के नाम पर वे लोग गुण्डागर्दी करते है। * पैसो से कॉलेज में पढकर यह सब नही चलेगा। यह बात तू अपने बेटो की अच्छी तरह समझा दे। हरप्रसाद के बात करने के ढंग से विमता को मन-ही-मन बुरा लगता लेकिन फिर वह सोचती, बच्चो को याप के करने में ही चलना चाहिये, अन. कुपार और दयाल ये उसने कह दिया था, 'वेटा, तुमलोग कनिज मे पटने के लिये जाते हो। वहां जाकर तुमलोग यह सब क्या बधे करते हो? तुम्हारे पिताजी को तुम्हारे ये ढग जरा भी पसन्द नहीं हैं।' उन दोनों का एक ही जवाब था, 'यह मद तुम्हारी समझ में नहीं प्रायेगा, मां।' सिर्फ बादल की ओर से उस समय तक विमी प्रकार की चिन्ता नहीं थी। हरप्रसाद को भी उससे कोई शिकायत नहीं थी। बादल को अधिक लगाव मां से ही था, बाप से नहीं। घर के काम में मां को वही सहारा लगाया करता या यद्यपि करता पा वक-भक करने पर ही। जमाना धीरे धीरे बदल रहा था। सर्वप्रथम हरप्रसाद का गुस्सा बड़े बेटे कृपाल पर निकला था । बाहर का विरोषाधर में प्रा पहुंचा । सिर्फ वहस करके हो मामला ठडा नहीं होता - हरप्रसाद दाहो उठते बेटे पर। पर कृपाल भी पीछे नहीं रहता । वह जलती , पांखों से याप को-यूरता रहता। माखिर विमला; बीच में माकर कृपाल, को- । १२५ इले जाती और कहती, 'चल उधर, वाप के मंह पर इस तरह जवाद देता शर्म नहीं आती?' किन विमला को हरप्रसाद पर भी कम क्रोध नहीं प्राता था। कृपाल कोई हरी व्यक्ति या दुश्मन तो नहीं था उनका । आखिर था तो बेटा ही, पर र में दोनों को झगड़ते देखकर यही लगता था मानो दोनों एक-दूसरे के दुश्मन हों। सिर्फ कृपाल से ही नहीं, दयाल के साथ भी हरप्रसाद का वसा ही व्यवहार था। विमला सोचती, दयाल और कृपाल एक ही दल में शामिल हैं। पर विमला के इस भ्रम को टुटने में भी अधिक समय नहीं लगा था। उसने देखा कि दोनों भाइयों के बीच भी जमकर बहस होती है। यह विरोष घर में होने की वजह से तथा विमला की उपस्थिति की वजह से मार-पीट का रूप धारण नहीं कर सकता था। उसकी समझ में नहीं आता कि सब अलग-अलग दल में शामिल क्यों हैं ? वह सोचती, अगर सभी मिलकर एक दल बना लें तो सारा झगड़ा ही मिट जाय । पर उस वक्त घर में तीन दल थे, तथा चौबे दल में थे बादल और विमला। वैसे बादल भी बिल्कुल निरपेक्ष नहीं था। उसका अधिक झुकाव मंझले भाई दयाल की ओर था । वह कहता, मझले नया ठीक कहते हैं। विमला पूछती, 'कैसे ?' बादल कहता, 'हमारी स्कूल के ऊंची क्लास के सभी लड़के मंझले मैया को बहुत मानते हैं । गेट पर खड़े होकर जब मंझले भैया भाषण देते हैं तब सभी लड़के हड़ताल करके क्लास से बाहर निकल आते हैं।' 'तो तू भी मंझले भैया की तरह ही बनेगा?' इस बात का वादल कोई जवाब नहीं देता। वह कहता, 'अभी से मैं यह कैसे कह सकता हूं?' विमला कहती, 'तू तो इन बखेड़ों में मत पड़ना । देखता नहीं, घर में कैसी अशांति रहती है ! जैसे-जैसे समय गुजरता गया अशांति का रूप बदलता गया। भव हरप्रसाद, कृपाल, दयाल कोई भी किसी से आपस में बात नहीं करते। जब विमला खाना बना लेती तब वे चुपचाप बैठकर खा लेते। रात को अपने-अपने बिस्तर पर पडकर सो रहते । कई बार रात को कृपाल तयो दयाल घर पर नहीं रहते। सनकी पढ़ाई-लिखाई भी चौपट हो रही थी। कृपाल ने अपने लिये एक नौकरी का इन्तजाम कर लिया था। दयाल को भी नौकरी ढूढने की फिक्र लगी थी। पढाई तो प्रब होने से रही, लेकिन सिर्फ पार्टीवाजी से भी तो काम नही चलेगा । उसे भी एक नौकरी की सख्त जरूरत है। इस बीच बादल भी वडा हो गया। जब वह क्लास दस में पढ़ रहा या तय उसे टाइफाइड हो गया था। विमता का कलेजा बादल की इस बीमारी में काप उठा था । उसके मन मे दुरे-बुरे सयाल पाते रहते। वह सोचती, इतनी बड़ी करके उसने आज तक एक भी संतान नहीं खोई है । ऐसी भयानक बीमारी भी प्राज तक उसकी किसी सतान को नहीं हुई थी। तब देखा गया कि, कृपाल वीमार यादल के लिये डॉक्टर बुलाकर लाया था। दयाल वादल के सिरहाने बैठा उसके माथे पर बर्फ की यलो रख रहा था और उसकी टट्टी, खून, पेशाब आदि जाव करवाने को ले गया था। हरप्रसाद के चेहरे पर भी चिन्ता तथा उद्विग्नता की याप यो। ये भी बादल के विस्तर के पास बैठे रहते थे। तब तक बादल ने कोई पार्टी ज्वाइन नहीं की थी। अगर कर लेता तो पता नहीं क्या हान होता फिर विमला की माखों के समक्ष श्मशान-यात्रा का दृश्य घूम गया । इमी घर के प्रागन मे खून से लथपथ तथा क्षत-विदात वादल की अर्थी उठी थी। बादल की लाश को उसके दोस्तों ने ही घेर रसा था। वै सव उसकी पार्टी के ही महके थे। कृपाल तथा दयाल तो वहा एक बार भी प्राकर सड़े नहीं हुए। शायद चाहकर भी खड़े नहीं हो सके थे। हरप्रसाद कुछ दूरी पर खड़े थे। उनसे किसी ने एक भी शब्द नहीं कहा, उन्होंने भी किसी ने कुछ नहीं कहा। बादल के दोस्तों ने ही उसकी अर्थी को कंधा देकर प्रमगान तक पहुंचाया या भाइयों में से किसी ने नहीं। बादल की मृत देह दोस्तों के माधों पर चढकर ही श्मशान पहुंची थी। हरप्रसाद चुप-चाप खड़े थे, तथा दोनो भाई तो घर में ही नहीं ये उस वक्त । भगर टाइफाइड के समय वादल ने कोई पार्टी ज्वाइन कर ली होती तो पता नहीं क्या होता ? श्मशान-यात्रा की तरह ही माई तथा बार सभी दूलर रहते । पार्टी के सामने बाए, बेटे, भाई पादि किसी का कोई प्रस्तिती था। वाप ।

उनका एकमात्र परिचय है वसं पार्टी । यह केसी पार्टीवाजी है, विमला...! समझ में नहीं पाता । वह तो गृहस्थी का बोझा सम्हालना. जानती है;: इसका मतलब पार्टी ही सब कुछ है। विमला की आंखों में क्रोध को अग्नि ननक उठती है एक पल के लिये । पल भर के लिये उसकी नजरें शहीद-वेदी पर से घूमकर घर की ओर मुड़ती है, मानो एक बार गर्दन घुमाकर वह अपने घर को देख लेने की कोशिश करती है। 'भई, मुनती हो ? कहां गई ?' यह आदाज, हरह्मसाद की थी । विमला को पुकार रहे थे। पर विमला ने कोई जवाब नहीं दिया । उसने अपना चेहरा भी घुमा लिया उस. और से । वह फिर से शहीद स्मारक की ओर देखने लगी। उसे याद अाया कि आज ऑफिसों की छुट्टी है; किस बात की छुट्टी है यह उसे याद नहीं पा रहा है । कृपाल, दयाल, हरप्रसाद कोई भी काम पर नहीं गये । पर कुछ भी हो, आज विमला किसी की बात का कोई जवाब नहीं देगी । आज, इस वक्त, वह जवाब देने में असमर्थ है। उसके पेट में पता नहीं क्या हो न्हा है ? अाज अट्ठारह साल पहले, अाज के ही दिन जमा हुआ था, वैसा ही कुछ उसके रीर में आज भी हो रहा है। उस स्मारक मे भी नहीं है, श्मशान में भी हीं है, बांदल तो उसके पेट में ही है। अब वह फिर से इस धरती पर आने को मंचल रहा है। - जव वादल टाइफाइड के चंगुल से छूटा था तब वहुत ही दुबला हो गया था विमला का मन होता, छोटे बच्चे की तरह उसे अपनी गोद में ले ले । पढ़ का एक साल वरवाद हो गया था, पर उसकी कोई परवाह नहीं थी विमा को । लड़के की जान बच गई, यही बहुत है। अगर कृपाल या दयान में कोई वीनार होता तब भी विमला को उतना ही दुःख होता । उतन चिन्ता होती। हरप्रसाद की छोटी-मोटी तकलीफ से भी विमला घरां है । मर्द लोग और चाहे जितने भी महत्वपूर्ण कार्य करते हों, पर स्वास्थ्य की ओर से बहुत लापरवाह होते हैं। फिर हरप्रसाद होते गत पालनहार था उस गृहत्यी कां । विमला कभी भी पति की उपेट .

. . . वादल धीरे-धीरे विकुल ठीक हो गया या । कमजोरी भी मिट गई पर स्वास्थ्य पहले जैसा नहीं रहा, हालाकि मुन्दर वह पहले में भी अधिक हो गया था। हमेशा से कम बोलने की मादन थी उसकी-बिल्कुल विमला की नरह। विमला बहुत कम बोलती है । उसको गृहस्यो उसे अधिक बात करने का मौका ही नहीं देती,। सारी गृहस्थी उसी के कयो पर तो है। घर में मार-माई और चौका-बर्तन के अलावा बाकी सारा काम वही करती है । बादल कम दात क्यिा करता था । विमला सोचती, कम-से-कम यह तो अपने भाइयो का रास्ता नहीं अपनायेगा। घर में तीन पाटिया पहले से ही मौत थी और किमी का भी किसी के साथ अच्छा व्यवहार नहीं था। यहा तर कि बोलचाल भी चन्द है । बादल यह मब देखना ही है । मब मममता भी है, अतः वह उस रास्ते कभी नहीं जायेगा। पर विमला ने गलन मोवा था । बादल के कॉलेज ज्वाइन करने से पहले ही विमला ने मुना कि बादल भी एक अन्य ही पार्टी में शामि हो गया विमला ने पूछा, 'तू भी वही पार्टीबाजी करने में सग गया है बादल फम बात करता था। उसनेमा की बात का कोई जवाब नहीं दिया लेकिन हरप्रसाद ने उमे प्राडे हायो लिया था। जिम तरह उन्होंने कृगल तया दयाल के माय झगड़ा किया था उमी तरह वादल को भी बढ्न डराम- धमकाया था। उन्होंने कहा, 'तू एक न्यूनी पार्टी में शामिन हुप्रा है ?' विमला स्तब्य होकर मुन रही थी। बादल अपने पिता मै कह रहा था, "हमारी पार्टी, मूनी पार्टी नहीं है।' हरप्रमाद ने चिल्लाकर कहा था, 'बिल्कुल है। यूनी पार्टी है यह । गुम्दे, बदमाश, तुच्चों के अलावा उस पार्टी में एक भी भला नदका नही है । नू मुझे सिखाने की कोशिश मत कर।' बादल ने कहा था, 'मैं पिसी को कुछ नहीं सिगाता। विमला को लगा था कि वह इस वादल को नहीं पहचानती । वह शात एव दृढ स्वर में ग्रंपने बाप की वातो का जवाब दे रहा था। पाल एवं दयान की तरह ऊंची आवाज में या चीखकर नहीं बोल रहा था। विमला चक्ति. सो सड़ी सोच रही थी, बादल ने इस ढंग से बात करना कर सीख लिया? मानो अचानक ही वह बहुत बड़ा हो गया है। सय, ऊप-नीच समझने. तगा.:: . .

है । विमला यह सब सोचकर चकित होने के साथ-साथ घोड़ी नाराज भी हुई थी मन-ही-मन । वादल भी बच्चों की तरह चिल्लाकर कुछ कहता तो शायद विमला को अधिक खुशी होती। हालांकि बादल के इस तरह बोलने के ढंग से विमला को कुछ-कुछ गर्व की अनुभूति भी हो रही थी। लेकिन हरप्रसाद को तो बात करने का दूसरा कोई ढंग पाता ही नहीं था। वे तो जिस तरह कृपाल तथा दयाल से कहा-सुनी करते, उसी तरह बादल को डांट रहे थे, 'वह सब मैं कुछ सुनना नहीं चाहता । अगर तुझे इस घर में रहना है तो उस पार्टी को छोड़ना पड़ेगा।' हरप्रसाद के बात करने का यह रवैया विमला को अच्छा नहीं लगता था। वह सोचती, बातों-बातों में ये सबको घर छोड़ने की धमकी क्यों देते हैं ? बादल ने अपने पिता की उस बात का कोई जवाब नहीं दिया था। बस, उनके सामने से हट गया था। हरप्रसाद मन-ही-मन बड़बड़ाते रहे थे, 'जो देश का निर्माण करना नहीं जानते, सिर्फ उसे वरवाद करना ही जानते हैं, उन्हें मैं अपने घर में नहीं रहने दूंगा । अगर अपना-अपना अलग रास्ता ही चुनना है तो बस इसी तरह बक-झक करते रहे थे। विमला भी हरप्रसाद के सामने से उस वक्त खिसक गई थी। यह आदमी सिर्फ बक-झक करना और डांटना ही जानता है। ऐसा तो कभी नहीं देखा कि ठंढे दिमाग से अपने बच्चों को कभी कुछ समझाया हो। जिस तरह कृपाल, दयाल से पेश आते रहे हैं उसी तरह अब बादल को भी डांटने लगे हैं। विमला का हृदय सिर्फ प्रशांति एवं उद्वेग से ही भरपूर है। वह अक्सर झुंझला पड़ती। सोचती, दुनिया में इतनी चीजों के रहते पार्टीवाजी के पीछे ये लोग क्यों इतने दीवाने रहते हैं ? आखिर बादल भी उसी रास्ते चना गया जिस रास्ते उसके बाप और दो भाई गये हैं। उसने बादल से झुंझलाकर ही कहा, 'तुझे तो लिखने-पढ़ने और खेलने-खाने में मस्त रहना चाहिये । तू क्यों पार्टी-वार्टी के चक्कर में पड़ गया ?' बादल ने बहुत ही शांत स्वर में जवाब दिया, 'मैं किसी को कोई नुकसान तो पहुंचा नहीं रहा हूं।' अव विमला सचमुच गुस्सा हो गई। बोली, 'मैं नफा-नुकसान कुछ नहीं समझती । एक ही घर में तुम चार प्रारणी, चारों अलग-अलग पार्टी के पीछे पागल रहते हो, मापस मे झगड़ा-बहस करते हो, यह सब मुझमे सहन नहीं किया जाता । तू तो यह पार्टी-वार्टी छोड़ दे।' बादल ने गंभीर होकर जवाब दिया था, 'मैं घर में किसी के साथ भी ममदा करना नहीं चाहता, न मैं किसी के साप बहस करना चाहता हूं। हां, पार्टी भी नहीं छोड़ सकता है।' विमला ने कहा, 'हां, तू पार्टी क्यो छोड़ने लगा ! फिर तो मुझे पोड़ा पाराम मिल जायेगा न । समझ गई बेटा, मैं अच्छी तरह समझ गई। जब तक मैं मर नहीं जाती, तुम वाप-भाइयों की पार्टी नहीं टूटेगी। हे भगवान, में कहां चती जाऊं? मुझे उठा ले ईश्वर इस दुनिया से ! यह भी भला कोई गृहस्थी है जिसमें पार्टीबाजी के भलावा कुछ भी नहीं बचा है।' विमला का गला / गया । पाखों से प्रांसू बहने लगे। वह फिर बोली, 'अब तो लगता है, मुझे भी एक पार्टी में शामिल होना पड़ेगा।' मां की बातें सुनकर बादल कुछ विचलित-सा हो उठा । बोला, 'तुम इस तरह जी खराब क्यों करती हो ? मैंने कहा न, मैं पिताजो से या भाइयो से झगमा नहीं।' पर बादल की यह बात भी गलत साबित हुई। कभी कृपाल से, कभी दयान से, तो कभी हरप्रसाद से उसकी बहस-झड़प होती ही रहती। बाहर की प्रशांति ने घर में पुख्ता नीड़ बना लिया था। बाहर जो भी गड़बड़ होती, उसका सारा हिसाव घर आकर चुकाया जाता। उनकी बातें सुन सुनकर विमला समझ गयी थी कि बादल अपनी पार्टी के काम में सक्रिय रूप से भाग ले रहा है। पढ़ाई-वढाई की बातें तो उसके दिमाग पर से विल्कुन पछ गई थीं। शुरू-शुरू में कृपाल ने विमला से एक बार कहा था, "बादला बहुत अधिक बिगड़ गया है । तुम उसे सावधान कर देना। वरना किसी दिन कोई कांड हो गया तो हाय मलने के सिवाय कोई चारा नहीं रहेगा।' विमला ने कहा था, 'तो मुझसे कहने क्यों पाया है ? अपने छोटे भाई को तुम खुद नही समझा सकते?' 'वह समझने-समझाने की सीमा को पार कर गया है।' 'मौर तू भीतर ही है। क्यों ? तू पपनी पार्टी नहीं छोड़ सकता?' विमना -- कडुवे स्वर में कहा था। गल ने कहा, 'मुझे जो कहना था सो कह दिया । तुम्हें जानकारी देने का रा यही मतलब है कि बादल आग से खेल रहा है। मार-पीट और गुण्डागर्दी अलावा उसे आज-कल और कुछ नहीं सूझता है ।' भी का एक-दूसरे के विरुद्ध बस यह एक ही अभियोग था। विमला के पास कर सिर्फ कृपाल ने ही वादल के विरुद्ध अभियोग लगाया हो, यह वातं ही थी। दयाल ने भी वही सब बातें कही थीं तथा हरप्रसाद ने भी वही ते वादल के विरोध में कहीं जो कृपाल ने कही थीं। हरप्रसाद ने कहा था; अपने छोटे बेटे से कह देना, अव भी सनय है कि वह सम्हल, जाय। उसके बहुत पब निकल आये हैं। किसी दिन वे पंख जला दिये जायेंगे।' हरप्रसाद के मुंह से ऐसी बातें सुन विमला का हृदय कांप उठा था, लेकिन साथ ही ह्रप्रसाद पर भी उसे कम गुस्सा नहीं आया था। उसने हरप्रसाद से कहा था, 'अपने बेटे को क्या तुम नहीं समझा सकते ? तुम कोई बच्चे तो हो नहीं। तुम अपने बच्चों के सुख की खातिर पार्टी नहीं छोड़ सकते? अपने बेटे में कुछ कह भी नहीं सकते ? तुम सब मुझे ही प्रा-पाकर क्यों कहते हो? हरप्रसाद ने कहा, 'तुम यह सब नहीं समझोगी। मेरे पार्टी छोड़ने न छोड़ने से कुछ फर्क नहीं पड़ता। मैं इनलोगों की तरह गुण्डई पार्टी में नहीं हूं। लेकिन बादला जिस तरह हवा में उड़ रहा है न, वह कुछ-न-कुछ कांड किये विना नहीं मानेगा।' + विमला ने तिक्त-नाराजी भरे स्वर में कहा, 'मुझे कुछ कहने से फायदा नहीं है । मैं तो तुमलोगों के लिये एक नौकरानी से अधिक कुछ नहीं हूँ। तुमलोगों की खिदमत कर रही हूं। तुमलोगों को तो बस एक-दूसरे से झगड़ने का ही काम है । मुझे तो अब तुमलोग दुनिया के तमाम झंझटों से मुक्ति दे दो।' इतना कह विमला हरप्रसाद के सामने से चली गई थी, फिर भी हरप्रसाद की बड़बड़ाहट उसके कानों तक पहुंच रही थी-~~-'वादला की मौत मंडरा रही हैं। उसके सिर पर । पार्टी के दादायों के उकसाने पर वह अपने को बहुत-कुछ समझने लगा है।" विमला का कलेजा फिर एक बार कांप उठायो । बापं "होकर हरसाद कॅसी', ।

. बात कह रहे है ! यही नहीं कि उन्होंने ऐसा सिर्फ वादल के लिये ही कहा हो; कृपाल और दयाल को भी वे इसी तरह बहते रहते थे। तो क्या पितृत्व से भी बढकर है पार्टी भाइयों के मन में क्या जरा-मा भी भ्रातृ-प्रेम ...नहीं है ? सभी मिलकर एक मुखी गृहस्यी बसा सकते थे, वह तो हुमा नहीं: एक-दूसरे के विद्ध बस शिकायत ही करते रहते हैं। अभियोग लगाते रहते हैं। बिमता ने बादल से कहा, 'तेरे पिताजी तया माई तंगे बहुत शिकायत कर रहे थे । क्या तुम कोई भयानक काम करने हो जिसमे कोई अशुभ काड हो जाने की संभावना है " बादल ने कहा, 'काइ-याड कुछ नहीं होनेवाला, मां। वे लोग चाहते हैं कि बुद तो पार्टीवाजी करते रहें और मैनुपचाप बैठा रहू । पर मैं ऐसा क्यो • करने लगा?" उनके डराने-धमकाने से मैं रत्ती भर भी नहीं डरता । अधिक चू-चपढ़ करेंगे तो हम भी चुप बैठनेवाले नहीं हैं ।' फिर भी विमला ने उसे डांटते हुए कहा था, 'तू उनलोगों से बहम ही क्यों किंवा करता है. बादल ने जवाब दिया, 'मैं क्यों उनसे वहस करने लगा वे ही कमर कम- वकर आते हैं।' तु क्या अपने भाइयों और अपने पिताजी के साथ भी मिल-जुलकर नहीं रह . . सकता? १. 'ग्रोहजो पिताजी.नौर या लोग तो मुझसे मिलकर ही रहते है ! हरमनल, पार्टी के मामले में किसी के साथ किसी का भी मेल-जोल सभव नहीं है।' बादल एक पल के लिये,चुप रह गया, फिर बोला, 'मैं पार्टी के साथ बेईमानी नहीं कर सकता । चाहे इसके लिये भाई तथा पिताजी मुझे जितना भी क्यों न घटें। वे लोग. बुद, तो प्रापस में मार-पीट करते रहते है, और मुझ पर रोब गाठना चाहते हैं । पर मैं भी किसी की परवाह नहीं करता।' अव विमला ने अपना अन्तिम.. अमोघ अस्त्र छोड़ा । लोनी, 'याप को. नागज को यह सब कर रहा है। कल को तुझे इस, घर से चले जाने को कह . बाइल ने ततार जयार दिया था, तो याला लाऊंगा। लेकिन इस हर से । पिताजी का या पिताजी की पार्टी का समर्थन नहीं कर सकता।' विमता भजीव उलझन में फंस गई थी। उसके मन को किसी तरह भी शांति नहीं यो । इवर कुंआ, उधर खाई जैसी बात थी । अपने ही पति और पुत्रों में से किसी को भी समझा नहीं सकती वह । एक ही घर के चार सदस्यों में चार पार्टियों का झगड़ा चल रहा था। सब एक साथ बैठकर भोजन करना तक भूल गये थे। अगर किसी दिन संयोगवश सब एक साथ खाना मांग भी बैठते, तो खामोशी से खाकर उठ खड़े होते । कोई किसी के साथ एक शब्द भी नहीं कहता, मानो हाड़-मांस के निर्जीव पुतले बैठे हों। 'मां, मां, कहां गई ?' अव दयाल पुकार रहा है। इससे पहले कृपाल पुकार रहा था । उधर कब से हरप्रसाद भी पुकार रहे हैं । पर विमला ने किसी की पुकार का जवाब नहीं दिया । आज के पहले उनके पुकारने पर वह जवाव दिये विना नहीं रह सकती थी। पर आज वह किसी की बात का भी जवाब नहीं देगी। यहीं खड़ी-खड़ी वह उस उपेक्षित, टूटे हुए शहीद-स्मारक की ओर ही देखती रहेगी। बादल का खून उसी जगह हुअा था। आकाश काले बादलों से ढका हुआ है । सनसनाती हवा के साथ-साथ मोटी- मोटी बूंदें भी पड़ने लगी हैं। हवा के झोंकों से जवाकुसुम का पेड़ विमसा के मुंह तथा सारे शरीर पर झुका जा रहा है । पर वह वहां से जरा भी नहीं खिसकी। आज वह फिर उस रसोईघर में नहीं जा सकती। आज से अट्ठारह साल पहले के बादल के जन्म-स्थान यानी जच्चाघर में जाते ही उसके पेट में ऐंठन-सी होने लगती है । जी कसा कैसा हो उठता है । वह सीधी खड़ी रहने में भी असमर्थ है । मानो पेट में कुछ हिलता है, इधर-उधर होता है। पेट में बादल है क्या ? तो क्या, वादल अभी उसके गर्म में ही है ? विमला वांत से होंठ काटकर दर्द सहने की कोशिश करती है। तो क्या फिर दर्द उठ उस स्मारक की ओर देखते-देखते विमला की प्रांखों के सामने बादल का मत- विक्षत, लहू-लुहान शरीर मूतं हो उठता है और तब उसे याद आती हैं सभी सारा वादन को डांटने और धमकी दिये जाने की बातें। उसने अपने ही दिल से प्रश्न किया, किसने मारा है बादल को? कृपाल के दल ने ?. या दयाल के .

दल ने? या हरप्रसाद के दल ने सभी ने इस बात से इन्कार कर दिया है कि उनके दल ने बादल को मारा है। पुलिस ने शक मे जिनको पकड़ा था उन्होंने भी इस बात से इन्कार किया है। जबकि उसे घेतावनी-धमकी इन सभी ने दी थी। कृपाल, दयाल एव हरप्रसाद की मार्टियों के मनाया मौर भी पार्टियां हैं, पर किसी ने भी बादल को मारने की बात स्वीकार नहीं की है। विमला को भी पता नहीं कि वादल के खून से किसने हाप रगे हैं। चाहे जितना भी अस्वीकार क्यो न करें, पर किसी-न-किसी पार्टी ने तो मारा ही है बादल को । वह कौन-सी पार्टी है ? सबसे ज्यादा शक तो विमना को हरप्रसाद, कपाल तथा दयाल की पार्टीवालों पर ही है । क्योकि उन तीनों ने ही कहा था, 'बादन के सिर पर मौत मंडरा रही है। जबकि वे विमता के हो पति और पुत्र है । क्या बादन हरप्रसाद का बेटा नहीं पा रयान, कृपाल का भाई नहीं था? सिर्फ किसी एक पार्टी का कोई एक लड़का ही का? उनके लिये क्या वह उनकी विरोधी पार्टी का लड़का मात्र ही पा? भगर यही बात है, तो माज विमला भी उनको पुकार पर यहां से हिलेगी तक नहीं। बिमला को साफ सुनाई दे रहा था कि वे सभी यानी दयाल, उपान और हरप्रसाद उसे बारी-बारी से पुकार रहे हैं। 'मो, भोमा!' 'मो, कहां गई? "भई, कहाँ हो ? मुनती हो।' बिमसा सब समझ रही है कि वे लोग उसे कभी कमरे में, तो कमी रसोईपर में, तो कभी मांगन में ढूंढ़ते फिर रहे हैं। फिर पाल ने रसोईपर के पास से चिल्लाकर कना की मा को पुकारा, वह भी सुना विमता में। रसान को बावाज मा रही पो, 'मोसी, मो मौसी!' पाना की मां की भावाज सुनाई पड़ी, 'क्या बात है रे दयाल ?' 'मां भापके महा माई है क्या ?' नहीं तो। हमारे यहाँ तो मुबह से एक बार भी नहीं भाई पहा नई हैरी मो?'

ता?"यहां तो नहीं दीख रही हैं। रसोईघर का दरवाजा भी खुला है। कड़ाही की सारी-सब्जी कुत्ता खा गया है, और खानावाना कुछ नहीं है।' की मां की उद्विग्न आवाज सुनाई पड़ती है; 'यह क्या कह रहा है तू ? नां तो ऐली लापरवाही कभी नहीं करती। देखें, दुई तो सही कहाँ गई? भी आती हूं।' दिनला को जाने के लिये कहाँ जगह हैं। वह तो अपने बेटे की उसी दी हुई शहीद-वेदी की और एकटक देख रही हैं जहाँ तीन महीने पहले बादल के दोस्त से बुलाकर ले गये थे। वादल के दोस्तों ने भी सफ स्मारक बनवा दिया और छुट्टी पाली । अब उनको भी इंचर आने की या यह देखने की फुरसत कहां हैं कि उनका बनाया शहीद-नारक तीन महीने में ही. कते हूट गया है ! वे तो जैसे पहले किया करते थे, वैसे ही यंत्र भी अपनी पार्टी · का काम कर रहे हैं। केवल वही क्यों, इस घर में वादल के बनाई नी तो यही सब कर रहे हैं। किती ने कुछ नहीं खोया, सिर्फ विमला ने खोया है। ती ने उसे दत नहीने गर्भ में धारण किये रताः लट्ठारह साल पहले, लाजत दिन, इन वक्त तक, नेवू की मां ने बादलको घो-पोंछकर उसकी छाती पास नहाकर सुला दिया था। ' 'बड़ी हरनाद छाता ताने उनके पास पहुंच चुके थे! हरप्रसाद अपने भाइयों में को बड़े पे । संयुक्त परिवार होने के कारण विमला बडो वह के नाम से हौं जानी जाती थी। हरसाद भी कभी-कभी उसे इस नाम से पुकारा करते। विनला ने कोई जवाब नहीं दिया। हरमताद ने कहा, 'हम तुम्हें कब से हर जगह डूई रहे है, और तुम यहाँ खड़ी क्या कर रही हो?' रण हप्रसाद को कुछ बताने को जरूरत नहींना विमलजीती हैतिहरप्रसा जोक याद नहीं है कि आज वादल का जन्म-दिवस है। दोनों नई ' भी याद नहीं है । पर विमला नही भूल माती कि किम लड़के को उसने किस दिन जन्म दिया था। तीनो लड़को में से जब जिसका जन्म-दिन माता है, विमला थोडी-सी खीर बनाकर उसे पिला देती है । इतने वर्षों से वह ऐमा ही करती आई है। पिछनी साल आज के दिन उसने वादल को खीर बनाकर खिलाई थी, पर अब वादल के लिये विमला को कभी खीर नही बनानी पड़ेगी। हरप्रसाद की आवाज मे असहाय प्राश्चर्य था, क्योकि वे विमला को बिल्कुल भी ममझ नहीं पा रहे थे। वे तो वस बोले ही जा रहे थे, 'हमारे लिये गाना नहीं बनाया । आधी कच्ची सन्नी छोड़ आई, वह भी कुत्ता खा गया। यह सब क्या ढग हैं तुम्हारे ?' विमला के दंग हरप्रसाद नहीं समझ सकता । वह कुछ कहना-समझाना भी नहीं चाहती । इस वक्त उसकी माखो के सामने तो शिशु वादल खेल रहा है। उसके बाद वादल बड़ा हुअा | वादल स्कूल में जा रहा है । मा के पास दो पैसो के लिये पहरों जिद करता है । इस वक्त विमला को अपनी माखो के मामने मिर्फ बादल"दादल, बस वादल-ही-बादल दिख रहा है। मोरों के लिये तो वह एक पार्टी का लड़का मात्र था । संतान तो बस विमला की था। हरप्रसाद की आवाज सुन कृपान तथा दयाल भी वहा प्रा पहुंचे। वे भी चकित-से मां की ओर देख रहे थे, पर मापस मे कोई भी बोल नहीं रहा था। विमला को यो ठूठ की तरह खड़े देखकर भी आपस में बात नहीं कर पा कृपाल ने कहा, 'मां, तुम यहां क्यों सड़ी हो? क्या हो गया?' सभी अवाक है । कोई भी विमला को ससझ नहीं पा रहा है जबकि वे विमला के ही पति मौर पुत्र हैं। विमला अपने पति और पुत्रों को छोड़कर कहीं नहीं जा सकती, पर आज वह घर में होते हुए भी उनके साथ नहीं है। विमला माज बादल के साथ ही रहेगी। बादल उसके हृदय में है। हप्रसाद ने कहा, 'बड़ी बहू, भीतर चलो। यहां खड़ी-सड़ी मत भीजो।' विमला की नजरें टूटे हुए स्मारक पर जमी थी। उसने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'नहीं । मैं नहीं जाऊंगी।'

'क्या पता ? यहां तो नहीं दीख रही है। रसोईघर का दरवाजालि भी खुला पड़ा है। कड़ाही की सारी सब्जी कुत्ता खा गया है, और खानाबाता कुछ वना नहीं है।'' :: :: ::: कना की मां की उद्विग्न आवाज सुनाई पड़ती हैं, 'यह क्या कह रहा है तू? तेरी मां तो ऐसी लापरवाही कभी नहीं करती । देख, ढूढ़ तो सही कहां गई मैं भी आती हैं। पर विमला को जाने के लिये कहां जगह है। वह तो अपने बेटे की उसी ढूंटी हुई शहीद-वेदी की और एकटक देख रही है जहाँ तीन महीने पहले बादल के दोस्त उसे बुलाकर ले गये थे। वादल के उन दोस्तों ने भी सफ स्मारक वनवा दिया और छुट्टी पाली । अब उनको भी इधर गाने की या यह देखने की फुरसत कहां हैं कि उनका बनाया शहीद स्मारकी तीन महीने में ही कसे टूट गया है !"वें तो जैसे पहले किया करते थे, वैसे ही अब भी अपनी पार्टी का काम कर रहे हैं। केवल वही क्यों, "इस घर में धाँदल के बाप-भाईगी तो यही सब कर रहे हैं। ., irrk RE for किसी ने कुछ नहीं खोया, सिर्फ विमला ने खोया है। सी न उसे दस महीने गर्भ में धारण किये खान अट्ठारह साल पहले, लाजतके दिन, इस वक्त तक, मेधू की मां ने बादल को धो-पोंछकर उसकी छाती के पास सटाकर सुला दिया था।

इस संकलन के कथाकार
संक्षिप्त परिचय
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विमला का जवाब सुनकर तीनों ही पार्टी-मेम्बरों की चकित नजरें पल भर को आपस में मिल गई । कृपाल ने कहा, 'खाना नहीं बनाया । अब हम क्या खायें ? विमला ने साफ एवं दृढ़ स्वर में कहा, 'आज मैं तुमलोगों को खाना नहीं दे सकती। तीनों पार्टी के लोग आश्चर्य में डूब गये। अाज विमला उनके लिये पार्टी. से भी बड़ी उलझन बनकर उपस्थित हो गई थी । दयाल ने कहा, 'तो हमलोग क्या करें प्रव?' विमला ने कहा, 'तुमलोग अपनी पार्टी का काम करो जाकर । मुझे मत छेड़ो। अंतहीन विस्मय में डूबे तीनों व्यक्ति खामोश खड़े थे। विमला उनके सामने से हटकर नागफनी की वाड़ के पास जाकर खड़ी हो गई। तीनों ने ही एक- दूसरे की ओर देखा । तीनों की नजरों में अपरिचय की छाप थी। मानो पति, पत्नी को नहीं पहचानता। लड़के मां को नहीं पहचानते। अब उनके चेहरे पर ऐसे भाव थे मानो विमला से कुछ कहने की हिम्मत नहीं हो रही हो । यह पहली वार ही ऐसा हुआ था जव वे विमला के ढंग देखकर सिर्फ चकित ही नहीं हो रहे थे वल्कि उन्हें डर भी लग रहा था । थोड़ी देर और खड़े रहकर तीनों ही व्यक्ति वहां से चले गये । वर्षा की बौछार और हवा के तेज झोंकों के कारण वहां खड़े रहना मुश्किल था। तीनों ही व्यक्ति एक असहाय अस्थिरता एवं आश्चर्य में डूवे एक-एक कर चले गये। विमला उसी तरह खड़ी है । बरसात के पानी से वह धुली जा रही है। पता नहीं वह क्या चीज है जो उसके गले के भीतर से बाहर की ओर निकल पड़ना चाहती है । उसकी आंखों से आंसू झर रहे हैं जो उसके चेहरे पर से बहती बरसात की धार में मिल जाते हैं । विमला छाती पर दोनों हाथ रखकर पुकार उठती है, 'बादल, बादल, तू मेरे पास है । मेरे ही पास रह तू .

इस संकलन के कशाकार
संक्षिप्त परिचय
.

- विमल मित्र जन्म : १८ मार्च १६१२। कलकत्ता विश्व- विद्यालय से बंगला साहित्य में एम० ए० किया। १९४५ में 'दिनेर-पर-दिन' शीर्षक प्रथम कहानी-संग्रह प्रकाशित हुया । १६६२ में मतिलाल पुरस्कार और १९६४ में रवीन्द्र पुरस्कार प्राप्त किया। आपके दर्जनों उपन्यासों और कहानियों के हिन्दी-अनुवाद हो चुके हैं जिनमें कुछ प्रमुख उपन्यास-~~-'साहब, बीवी, गुलाम', 'खरीदी कौड़ियों के मोल', 'इकाई, दहाई, सैकड़ा', 'पटरानी', 'नायिका', 'मन ही में रही', 'काजल', 'सुरसतिया' आदि हैं। कई उपन्यासों और कहानियों पर हिन्दी में भी फिल्में बनी हैं और दर्शकों द्वारा पसन्द की गयी हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि रवीन्द्रनाथ और शरतचन्द्र के वाद हिन्दी-पाठकों में सर्वाधिक लोकप्रिय पाप ही रहे हैं। पूर्णतः लेखन-जीपी। पता : २६११११, चेतला सेण्ट्रल रोड, कलकत्ता-२७ । - .. - आशापूर्णा देवी ८ जनवरी १६०६ । पिता श्री हरेन्द्रनाथ गुप्त बंगाल के एक अच्छे चित्रकार थे। पारिवारिक संस्कारों के कारण अल्प आयु से ही साहित्य के प्रति प्रबल आकर्षण के फलस्वरूप गृह-कार्य के साथ-साथ साहित्य-साधना में भी रत । बंगला में अनेक उपन्यास और कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, और आप बंगला कथा-साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय कथा-लेखिका हैं। हिन्दी में भी आपकी कृतियों के अनुवाद हुए हैं जिनमें 'रात का पंछी' शीर्षक उपन्यास भी

शामिल है। बंगला की कई कृतियो पर सफल फिल्में भी बनी है। १९५४ में
कलकत्ता विश्वविद्यालय से लीला पुरस्कार और १९५६ में मतिताल पुरस्कार
प्राप्त हुआ। आपका पूरा समय लेखन-कायं को ही समर्पित है। पता · १७
कानूनगो पार्क, पोस्ट गडिया, जिला : २४ परगना ।
-
- वनफूल
बंगला के व्यातिप्राप्त प्रतिष्ठित कथाकार । लघु-कथानों पर तो अापका
एकाधिकार है । कम-से-कम शब्दों में बडी-मे-बडी बात कह देना पापकी
विशिष्टता है। हिन्दी-पाठको के लिये भी आप सुपरिचित हैं, कारण हिन्दी
की पत्र-पत्रिकाओं में प्रापकी कहानियों के अनुवाद अरसे से दगबर छपते रहे
हैं। बंगला में तो आपको कहानियो और लघु-कथामों के कई सग्रह छप चुके
है। पता: पी-६६, बी-ब्लॉक, लेक टाउन, कलकत्ता-५५ ।
- गजेन्द्रकुमार मित्र
जन्म : १६०६, कलकत्ता में । बचपन काशी
में बीता और छठी कक्षा तक शिक्षा भी
यही हुई । प्रथम रचना १६२८ मे 'कृत्तिक'
पत्रिका में प्रकाशित हुई। वगना में ऐति-
हामिक उपन्यासों और कहानियों के प्रार
विगिष्ट स्यातिप्राप्त कथाकार हैं।
'कलकत्ता के नजदीक ही' तथा 'नारी और नियति' उपन्यासों हिन्दीमा
भी प्रकाशित हो चुके हैं। इनमें में प्रथम पर पापको पारिप प्रभारी
पुरस्कार भी प्राप
बंगला में कई कृतियों पर फिल्में बन चुकी है। हिन्दी में भी मनी ।
की प्रसिद्ध फिल्म 'कंगन' प्रापके ही दगला उपन्यास 'रमनीगंधा' पर पापारित
थी। एक मित्र की साझेदारी में "मित्र एड पोप' गागरो एक प्रति1ि
प्रकाशन संस्थान है; उमसे और स्वतत्र गन से जीविको:lum
एण्ड घोर, १०, श्यामाचरण दे न्द्रीट, कलका-१२ ।
चुका है।

. दिव्येन्दु पालित
जन्म: १९३९ । कलकत्ता पापधातपय
एम० ए० पास करके कलकत्ता के सुप्रसिद्ध
अंग्रेजी दैनिक-पत्र 'हिन्दुस्तान स्टैण्डर्ड'
सम्पादकीय विभाग में कार्य शुरू किया।
माजकल एक व्यापारिक प्रतिष्ठान में अधि-
कारी के पद पर हैं।
बंगला के युवा कयाकारों में आपका एक विशिष्ट स्थान है। अब तक पांच
उपन्यास, एक कहानी-संग्रह और एक कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।
पता : १४॥२, हिन्दुस्थान रोड, कलकत्ता-२६ ।
.'
- मिहिर आचार्य
जन्मः १६२७, दिनाजपुर [जो अब बंगला
देश में है]1
कलकत्ता विश्वविद्यालय से
बंगला साहित्य में एम० ए० किया । सम्प्रति
अध्यापन के साथ-साथ गत आठ वर्षों से
बंगला की प्रथम श्रेणी की साहित्यिक कहानी-
पत्रिका 'शुकत्सारी' के सम्पादक हैं।
बारह उपन्यास और चार कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। कहानी-त्रहों
में 'पान-फल-परतों' और 'अपराह्न को नदी' वहु-चचित हुए हैं। इनके
अलावा, 'पूर्व वांगलार गल्प संग्रह' और 'पूर्व वांगलार कविता' शीर्षक दो
संकलनों का सम्पादन भी किया है। पता : सम्पादक 'शुकसारी', १७२१३५,
आचार्य जगदीशचन्द्र बोस रोड, कलकत्ता-१४ ।
. सुनील गंगोपाध्याय
बंगला की आज की पीड़ी के सर्वाधिक चर्चित नवयुवक कयाकार। बंगाल में
भूखी पीढ़ी के आंदोलन के समय आप उसके एक प्रमुख सूत्रधार थे। इस
अल्पायु में ही विदेश भ्रमण भी कर चुके हैं । सत्यजित राय द्वारा निर्देशित

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शीर्षक उपन्यासों पर अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं, कॉफी हाउसों और शिक्षा-
संस्थानों में न केवल गर्मागर्म वाद-विवाद ही हुए, वरन् अदालत में मुकदमें भी
चलाये गये थे । 'गंगा', 'बाधिनी', 'सात नुवनेर पार' आदि आपके अन्य
वर्षित उपन्यास हैं। बंगला में कई उपन्यासों पर बहु-धित फिल्में बनी हैं,
भौर वन रही हैं। पूर्णजया लेखन-जीवी। पता: द्वारा-मानन्द पब्लिशर्स,
४५ वेनियाटोला लेन, कलकत्ता-है।
।
NA
लिखित जादू-
• पुष्पा देवड़ा
जन्म : १६४४, पश्चिम बंगाल के
रानीगंज में। बंगला से कई कहानियों
और उपन्यासों के अनुवाद किये जो
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में एवं प्रकाशकों
से प्रकाशित हुए।
সলিন অল্প
कहानियां 'धर्मयुग' के कई अंकों में
प्रकाशित हुई। विमल मित्र का
उपन्यास 'काजल' साप्ताहिक हिन्दुस्तान' के एक हो अंक में छपा । 'परिणमा'
के बंगला प्रणय कहानी विशेषांक' और 'भारतीय प्रणय कहानी विशेषांक' के
लिये कई बंगला कहानियों के अनुवाद किये। इनके अलावा, 'अणिमा' के
'वंगला देश कया विशेषांक' के साथ-साथ प्रस्तुत 'समकालीन पश्चिम बंग कया
विशेषांक' की तब कहानियां नी आपके द्वारा ही अनुदित हैं।
प्रकाशकों में विमल मित्र के 'पटरानी', 'नायिका' और 'काजल' तया
गजेन्द्रकुमार मित्र का 'नारी और नियति' राजपाल एण्ड संज से, पाणी राय
का तनिमा-जातक' अपरा प्रकाशन से तथा ताराशंकर वन्योपाध्याय का
'कंचनमाला' हिन्दी बुक तेन्दर से प्रकाशित हुए हैं। पता : अपिना कार्यालय,
पुलिस स्मारक, जयपुर-४।

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Utkrishth Ankho Se

Author
Vimal Mitra
Title
Utkrishth Ankho Se
File name
Utkrishth Ankho Se
Text
OCR done
Published
2011/03
Publisher
Delhi,rajpal & Sons.
Language
Sanskrit
Pages
148
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Geography
DLI number
552210
Barcode
4990010032925.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
ZxVpkrHuct3
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