Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Kenoupnishad

Sastri,shri Balkrishan · 2010/10

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प्रकाशक.
पो० कण्ठमणिशास्त्री
सचालक:
विद्याविभाग., काकरोली।
अधिक भाद्रपद
प्रथम सस्करणम्
५००
मूल्यम् २]
स २०१२
मुद्रक
चन्द्रकान्त भूषणदासजी साधू
चेतन प्रकाशन मन्दिर (प्रिं. प्रे०), शीयाघाग,
बडौदा ता १-९-५५.

१-२५ ... १ .. २ ... ... १२ ... १६ " .. १९ " ... ... विषयानुक्रमणिका केनोपनिषद-रहस्य (हिन्दी ) तथा प्रासङ्गिक.. केनोपनिषन्मनस्विनी-व्याख्या- (१-६४) प्रथम. खण्डः (मसंभावनायां प्रमाणगवदोष-निरासः) (१-२२) मङ्गलाचरण-कारिका- उपक्रम-कारिकाः-- (१) प्रथम-(केनेषित०) मन्त्र-व्याख्या ३ (२) द्वितीय-(श्रोत्रस्य-श्रोत्रं०) (३) तृतीय-( न तत्र चक्षुः० ) ( ४ ) चतुर्थ-( यद्वाचा० ) (3) पञ्चम-( यन्मनसा० ) २० ( ६ ) पठ-( यच्चक्षुषा० ) (७) सप्तम- ( यच्छ्रोत्रेण. ) २१ (८) भष्टम-( यत्प्राणेन०) उपसंहार-कारिका:- द्वितीयः खण्डः (मसंभावनायां प्रमेयगतदोप-निरास:) (२३-३२) उपक्रम-कारिका (१) प्रथम-( यदि मन्यसे० ) मन्त्र-ग्यास्या (२) द्वितीय-(नाह मन्ये.) २५ ( ३) तृतीय-( यस्यामतं०) २६ ( ४ ) चतुर्थ-(प्रतिबोध०) ( ५ ) पञ्चम-(इह चेदवेदी०) ३० उपसहार-कारिका )- तृतीयः खण्डः (विपरीतभावनायां साधनगतदोप-निरासः) (३३-४७) उपक्रम-कारिका:- (१) प्रथम-(ब्रह्म ह देवेभ्यः० ) मन्त्रन्याख्या ३५ ( २ ) द्वितीय-( तद्वैपां विजझौ०) २२ ... " ... " ... " २७ ... ... ... ... ... ३६ . ... ३९ ४२ " " ४४ ४७ (३) तृतीय- ( तेऽग्निमब्रुवन्० ) ५) चतुर्थ-( तदभ्यद्रवत् ) (५) पञ्चम-( तस्मिस्त्वयि० ) ( ६ ) षष्ठ-( वस्मै तृण ) ( ७ ) सप्तम-(भथ वायुम्०) ८) अष्टम-( सयद्वत्०) (९) नवम-( तस्मिस्त्वयि० ) ( १०) दशम- तस्मै तृणम् ० ) (११) एकादश-( अथेन्द्रमब्रुवन् ० ) ( १२ ) द्वादश- (म सस्मिझेवा० ) उपसंहार-कारिका - चतुर्थः खण्डः (विपरीतभावनायो फलगन -दोषनिरा.) उपम-कारिका ( १ ) प्रथम-( सा ब्रह्मेति० ) मन्त्र-व्याख्या (२ २ ) द्वित्तीय-(तस्माद्वा एते. ) ( ३ ) तृतीय-( तस्माद्वा इन्द्रो० ) ( ४ ) चतुर्थ-(तस्यैष भादेशो० ) ५) पञ्चम-(अथाध्यात्मम्) ( ६ ) षष्ठ-( तद्ध तद्वनम्०) (७) सप्तम-( उपनिषद भो . ) ( 6 ) अष्टम-( तस्यै तपो०) (९) नवम-( यो वा एताम्० ) उपसहार-कारिका:- समर्पण-कारिका (४८-६३) .. .. ... .. ५१ ५५ . ५९ " ६२ ३ ... मोपनिषन्मन्त्रानुक्रमणिका : उपन्यस्तवाक्य-स्थल-सकेत शुद्धिपत्रकम् १ २ . १० .

प्रासङ्गिक * -केनोपनिषद्-रहस्य- - (पो कण्ठमणिशास्त्री) उपनिषद्-विद्या :- अभ्युदय नि श्रेयम-माधिका भारतीय संस्कृति के प्राणाधार वैदिक साहित्य में 'उपनिषद्' शब्द ले उस ब्रह्म-विद्या का ग्रहण किया जाता है, जिसके द्वारा साधना-परायण जीव के समस्त दोपों का निरास होकर परमार्थ रूप में उसे रस स्वरूप, परमानन्द परब्रह्म की प्राप्ति होती है । उपनिषद् ' शब्द के उपसर्ग-प्रकृति प्रत्ययार्थ द्वारा यही निष्कर्ष निकलता है । वैदिक भाष्यों के प्रणेताओं ने शब्दान्तर से इसी अभिप्राय को स्वीकार किया है, जिसका परिज्ञान तत्तद्-माप्यों के परिशीलन से प्राप्त हो सकता है, एतावता सक्षेप में जहां मुख्य वृत्ति से 'उपनिपन्' शब्द ब्रह्म-विद्या का बोधन कराता है, यहां गौण वृत्ति से ( तादात् ) तत्प्रतिपादक ग्रन्थ का भी । जैमा वि. उपनिषदमयूम (केन ४, ३२) एतदुपनिपढो भविष्यन्ति' (छा. ८८४) मादि वाक्यों द्वारा इस की पुष्टि होती है। तात्पर्य यह कि-यद्यपि ऐसी सभी विद्याए जो-किसी भी रूप में तिरोहितानन्द जीव को पूर्णानन्द की मोर ले जाती हैं, और इसके पूर्व उमके मासारिक दुखों की मात्यन्तिक निवृत्ति कर उसे निर्दुए, शुद्ध तपोमय बना देती हैं- ब्रह्मविद्याए होने से ' उपनिषद्' कहलाती हैंतथापि तादृश विद्याओं के प्रतिपादक ईशावास्यादि ग्रन्यों को ही 'उपनिपद् ' कहा गया है। एक प्रकार से यह शब्द इन्ही के लिये योगरूड हो गया है। + ईश तथा केन की मनखिनी व्यस्या-( उपन्म कारिका ) " .

वेद-चतुष्टयो में इस प्रकार की १०८ उपनिषदें उपलब्ध होती हैं। जिनका नाम, वैदिक विभाग और शान्ति-पाठ के साथ मुक्तिकोपनिषद् (प्र अध्याय ) में उपलब्ध होता है । ब्रह्म-विद्याप्रतिपादक इन उपनिपदों की महत्ता के सम्बन्ध में कहा गया है कि- इनमें ३२ उपनिषद् मुख्य हैं, ३२ में भी दस विशेष महत्व रखती हैं। वहा लिखा है माण्डूक्यमेकमेवालं मुमुक्षूणां विमुक्तये । तथाप्यसिद्ध चेज्ज्ञानं दशोपनिषद पठ । तथापि दृढता नोचेद्विज्ञानस्याञ्जना-सुत ! द्वात्रिंशाख्योपनिषद समभ्यस्य निवर्तय विदेहमुक्ताविच्छाचेदष्टोत्तरशतं पठ": ( मुक्ति-प्र अ.) प्रस्तुत कथन से उपनिषदों में यद्यपि तरतम भाव ऑफा जासक्ता है तथापि ब्रह्मसूत्र द्वारा विशिष्ट श्रुतियों के सन्देह-निराकरण पूर्वक रहस्य-विश्लेषण में तत्तद्भाष्य-रचयिता पूर्वाचार्यों ने दश उपनिषदों को ही गौरव दिया है। ईश केन कठ प्रश्न मुण्ड माण्डूक्य तित्तिरि । ऐतरेय च छान्दोग्यं बृहदारण्यकं तथा" (मुक्ति० १३०) शु सिद्धान्त के प्रकृष्ट विद्वान् मठपति जयगोपाल भट्ट ने तैत्तिरीयोप- निषद् के 'मानन्द-वल्लीभाष्य' में उपनिषदों का एक वर्गीकरण किया है। - व्यास सूत्र-भाष्य में एक स्थान पर श्रीमन्मध्वाचार्य ने 'काषायणादि' अन्य उपनिषदों का भी उल्लेख किया है । साम्प्रतिक विदेशी विद्वान् उपनिषदों की संख्या २३५ मानते हैं। (इन्ट्रोडक्षन ऑफ उपनिषद्-मेक्समूलर पत्र ( XVIII) परन्तु इनका नाम-निर्देश मुक्तिकोपनिषद् में नहीं है, और न इनके वैदिक विभाग और शान्ति-पाठ का सकेत ही । अत इनकी प्रामाणिकता में स्वत. मन्देह होता है।

- उनके कथनानुसार, कुछ उपनिषद् प्रमेय स्वरूप कार्यकारणात्मक ब्रह्म का प्रतिपादन करती है, तो कुछ शुद्ध निर्गुण परमकाष्ठापन परब्रह्म का, कुछ साधन मौर फलों का विवेचन उपस्थित करती हैं। किन्ही उपनिषदों में मनी का मंकलन है । तात्पर्यत,- उपदेश, शका और प्रतिवचन के अनुरूप नमी दिशामों से ब्रह्मज्ञान की पुष्टि करना ही सोपनिषद विद्या का लक्ष्य है । सम्वाद, मास्यायिका उदाहरण और ऐतिह्य द्वारा वेदामिप्राय को समझाने में उपनिषदों ने जो सौर्य उपस्थित किया है, वह साधक के लिये परमोच्च सुलभ साधन है-यह कथन अस्युक्तिपूर्ण नहीं है। इसी कारण इन्हें वेदान्त' संज्ञा से अभिहित किया जाता है । वास्तव में वेद के हार्दिक अर्थ की परिममाप्ति एक प्रकार से यहीं हो जाती है। शु० सिद्धान्त का वैदिक माहित्य- विश्व-कल्याणकारक, सत्य ज्ञान के अक्षय मटार परमात्मा श्रीहरि के नि वासरूप वेद-चतुष्टय, भगवान् श्रीकृष्ण की मुखपद्म-विनि.स्त गीता, महर्षि कृष्ण पायन व्यास की ब्रह्मसूत्र-मीमांसा एव देवी जीवों की हत्तापोपशमनी भागवतीय समाधिभाषा - इस प्रमाण-चतुष्टय से निप्पन्न प्रमेय स्वरूप शुद्धाद्वैत माम्नाय में वेद अथवा तदन्तर्भूत उप- निषदों पर मूलाचार्य श्रीवल्लभाचार्य कृत किसी भाष्य विवरणात्मक रचना+ का समाव एक ऐमा शोचनीय विषय नहीं है-जो उसकी वैदिकता के प्रति सन्देह को जागृत करता हो, अथवा अपनी परिपुष्टि के लिये परमुखापेक्षी हो। शु सिद्धान्त के परिशीलन में भाचार्यों की स्पष्टोक्ति से .-- " ये धातुशब्दा यत्रार्थे, उपदेशे प्रकीर्तिताः। तथैवार्थो वेदराशे कर्तव्यो नान्यथा क्वचित् ॥" ( सर्वनि निवन्ध ) वैदिक तत्वज्ञान का सुगम पन्धा दृष्टिगोचर होने लगता है, और ननु नच' किम्वा दुराग्रह के विना- तात्विक अध्ययन की समस्या सुलझ संपर्याप वन्नि की लाइब्रेरी में वल्लभाचा कृत 'वेदवल्लभ मुना जाता है-पर अद्यावधि वह केवल कर्णगत ही है । . भाष्यका नाम . वेद-चतुष्टयो में इस प्रकार की १०८ उपनिषदें उपलब्ध होती हैं। जिनका नाम, वैदिक विभाग और शान्ति-पाठ के साथ मुक्तिकोपनिषद् (प्र अध्याय ) में उपलब्ध होता है । ब्रह्म-विद्याप्रतिपादक इन उपनिपदों की महत्ता के सम्बन्ध में कहा गया है कि- इनमें ३२ उपनिषद् मुख्य हैं, ३२ में भी दस विशेष महत्व रखती हैं। वहां लिखा है माण्डूक्यमेकमेवालं मुमुक्षुणां विमुक्तये । तथाप्यसिद्ध चेज्ज्ञानं दशोपनिषदं पठ । तथापि दृढता नोचेद्विज्ञानस्याञ्जना-सुत ! द्वात्रिंशाख्योपनिषद समभ्यस्य निवर्तय विदेहमुक्ताविच्छाचेदष्टोत्तरशतं पठ": ( मुक्ति-प्र अ.) प्रस्तुत कथन से उपनिषदों में यद्यपि तरतम भाव ऑका जासकता है तथापि ब्रह्मसूत्र द्वारा विशिष्ट श्रुतियों के सन्देह-निराकरण पूर्वक रहस्य-विश्लेषण में तत्तद्भाष्य-रचयिता पूर्वाचार्यों ने दश उपनिषदों को ही गौरव दिया है। ईश केन कठ प्रश्न मुण्ड माण्डूक्य तित्तिरि । ऐतरेय च छान्दोग्यं बृहदारण्यकं तथा" (मुक्ति० १३०) शु सिद्धान्त के प्रकृष्ट विद्वान् मठपति जयगोपाल भट्ट ने तैत्तिरीयोप- निषद् के 'मानन्द-घल्लीभाष्य' में उपनिषदों का एक वर्गीकरण किया है। व्यास सूत्र-भाष्य में एक स्थान पर श्रीमन्मध्वाचार्य ने काषायणादि अन्य उपनिपदों का भी उल्लेख किया है । साम्प्रतिक विदेशी विद्वान् उपनिषदों की संख्या २३५ मानते हैं। (इन्ट्रोडक्षन ऑफ उपनिपद्-मेक्समूलर पत्र ( XVIII) परन्तु इनका नाम-निर्देश मुक्तिकोपनिषद् में नहीं है, और न इनके वैदिक विभाग और शान्ति-पाठ का सकेत ही । अत इनकी प्रामाणिकता में स्वत: मन्देह होता है। .

३ टनके कथनानुसार, कुछ उपनिषद् प्रमेय स्वरूप कार्यकारणात्मक ब्रह्म का प्रतिपादन करती हैं, तो कुछ शुद्ध निर्गुण परमकाष्टापन्न परब्रह्म का, कुछ माधन लौर फलों का विवेचन उपस्थित करती हैं। किन्ही उपनिषदों में मनी का मंकलन है । तात्पर्यंत,- उपदेश, शंका और प्रतिवचन के अनुरूप नमी दिशालों से ब्रह्मज्ञान की पुष्टि करना ही नोपनिषद विद्या का लक्ष्य है। मम्वाद, मास्यायिका उदाहरण और ऐतिह्य द्वारा वेढाभिप्राय को समझाने में उपनिषदों ने जो लौकर्य उपस्थित किया है, वह साधक के लिये परमोच्च सुलम साधन है-यह कथन अत्युक्तिपूर्ण नहीं है। इसी कारण इन्हें वेदान्त' सज्ञा से मभिहित किया जाता है । वास्तव में वेट के हार्दिक अर्थ की परिममाप्ति एक प्रकार से यहीं हो जाती है। शु० सिद्धान्त का वैदिक साहित्य- विश्व-कल्याणकारक, सत्य ज्ञान के अक्षय महार परमात्मा श्रीहरि के निवामरूप वेद-चतुष्टय, भगवान् श्रीकृष्ण की मुखपद्म-विनि स्त गीता, महर्षि कृष्णद्वैपायन व्यास की ब्रह्मसूत्र-मीमांसा एव देवी जीवों की हृत्तापोपशमनी भागवतीय समाधिभाषा - इस प्रमाण-चतुष्टय से निप्पन्न प्रमेय स्वरूप शुद्धात नाम्नाय में वेद अथवा तदन्तर्भूत टप- निषदों पर मूलाचार्य श्रीवल्लभाचार्य कृत किसी भाप्य विवरणात्मक रचना+ का अभाव एक ऐसा सोचनीय विषय नहीं है-जो उसकी वैदिकता के प्रति सन्देह को जागृत करता हो, अथवा अपनी परिपुष्टि के लिये परमुखापेक्षी हो। शु सिद्धान्त के परिशीलन में भाचार्यों की स्पष्टोक्ति से :-- " ये धातुशब्दा यत्रार्थे, उपदेशे प्रकीर्तिताः । तथैवार्थो वेदराशे. कर्तव्यो नान्यथा क्वचित् ॥" (मर्वनि निबन्ध) वैदिक तत्वज्ञान का सुगम पन्धा दृष्टिगोचर होने लगता है, और ननु नच ' किम्वा दुराग्रह के विना- वास्विक मध्ययन की समस्या सुरज यद्याप वन्नि की लाइब्रगे में वलभाचार्य कृत 'वेदवलभ' भाष्यका नाम मुना जाता है-पर स्वावधि वह केवल कर्णगत ही है। .

घेद-चतुष्टयी में इस प्रकार की १०८ उपनिषदें उपलब्ध होती हैं। जिनका नाम, वैदिक विभाग और शान्ति-पाठ के साथ मुक्तिकोपनिषद् ( प्र अध्याय ) में उपलब्ध होता है। ब्रह्म-विद्याप्रतिपादक इन उपनिपदो की महत्ता के सम्बन्ध में कहा गया है कि- इनमें ३२ उपनिषद् मुख्य हैं, ३२ में भी दस विशेष महत्व रखती हैं। वहां लिखा है माण्डूक्यमेकमेवालं मुमुक्षूणां विमुक्तये । तथाप्यसिद्ध चेज्शानं दशोपनिषदं पठ । तथापि दृढता नोचेद्विज्ञानस्याञ्जना-सुत ! द्वात्रिंशाख्योपनिषद समभ्यस्य निवर्तय विदेहमुक्ताविच्छाचेदष्टोत्तरशतं पठ": मुक्ति-प्र. म. प्रस्तुत कथन से उपनिषदों में यद्यपि तरतम भाव ऑका जासकता है. तथापि ब्रह्मसूत्र द्वारा विशिष्ट श्रुतियों के सन्देह-निराकरण पूर्वक रहस्य-विश्लेषण में तत्तद्भाष्य-रचयिता पूर्वाचार्यों ने दश उपनिषदों को ही गौरव दिया है। ईश केन कठ प्रश्न मुण्ड माण्डूक्य तित्तिरि । ऐतरेय च छान्दोग्यं वृहदारण्यकं तथा" (मुक्ति० १३०) शु सिद्धान्त के प्रकृष्ट विद्वान् मठपति जयगोपाल भट्ट ने तैत्तिरीयोप- निषद् के 'भानन्द-वल्लीभाष्य' में उपनिषदों का एक वर्गीकरण किया है। - व्यास सुत्र-भाष्य में एक स्थान पर श्रीमन्मध्वाचार्य ने काषायणादि अन्य उपनिपदों का भी उल्लेख किया है। साम्प्रतिक विदेशी विद्वान् उपनिषदों की संख्या २३५ मानते हैं। (इन्ट्रोडक्षन ऑफ उपनिषद्-मेक्समूलर पत्र ( XVIII) परन्तु इनका नाम-निर्देश मुक्तिकोपनिषद् में नहीं है, और न इनके वैदिक विभाग और शान्ति-पाठ का संकेत ही । अत इनकी प्रामाणिकता में स्वत मन्देह होता है। , . इस प्रकार प्रारमिक भावश्यकता की पूर्ति हो जाने पर भाचार्यों के मात्मज श्रीविठ्ठलेश प्रभुचरण ने 'विद्वन्मण्टन' तथा अन्य टीका-ग्रन्थों में प्रसगोपात्त श्रुतियों के रहस्य का उद्घाटन किया है, तथापि विद्वरसमाज के विनोद की परिसमाप्ति उससे नहीं हो पाई। भागे चलकर मठपति जय. गोपाल भट्ट ने तैत्तरीयोपनिषद् की भानन्दवल्ली, एवं गोस्वामिप्रवर श्रीपुरुषो- त्तमजी ने कतिपय उपनिषदों पर भाष्य-रचना की। मर्घज्ञ योगिश्रीगोपेश्वरजी ने प्रस्तुत दिशा में विशेष श्रमकर 'यजुर्वेद-नवार्थी भाष्य का निर्माण और कुछ उपनिपदो पर स्वतन्त्र विवेचनाए भी की, पर सम्प्रति मधिकाश वे उपलब्ध नहीं होती । श्रीपुरुषोत्तमजी कृत 'माण्डूक्योपनिषद्-दीपिका नामक टीका प्राप्त और प्रकाशित है, जिसमें समर्थ पद्धति से कारिकामो पर विचार विनिमय किया गया है। इसके मनन्तर झाशीस्थ गो श्री गिरिधरजी ने ' श्रुति-रहस्य' नामक ग्रन्थ में कुछ विशिष्ट श्रुतियों का विशेषार्य- परत्वेन व्याख्यान किया। विगत ६०-७० वर्षों के युग में शुद्धाद्वैत सिद्धान्तानुसार उपनिषदों पर मधिक संख्या में व्याख्यान प्रस्तुत किये गये, जो इस प्रकार हैं .- (१) ईशावास्योपनिषद्-भाष्य (क) श्री बालकृष्ण शास्त्रीजी (संस्कृत ) (ख) श्री वलभद्र शर्माजी (,) (ग) श्री मोहनलाल शास्त्रीजी (,) (घ) श्री कण्ठमणि शास्त्री ( हिन्दी )x (ड) श्री सवलकिशोरजी चतुर्वेद (सं. हि.) ( २ ) केनोपनिपद्-भाष्य :--- (क) श्री बालकृष्ण शास्त्रीजी ( मस्कृत) ख) श्री मुखिया गोकुलदासजी शाम्रो (३) कठोपनिषद् मान्य-(अपूर्ण) (क) भा. मा ५. श्री गटूलालाजी ४ यह अप्रकाशित है, शेष प्रकाशित हैं . जाती है । इस प्रकार निरुक्त, निघण्टु, प्रातिशाख्य की पद्धति से ययपि वैदिक अर्थावबोध निरापद सिद्ध हो जाता है, तथापि जीवगत बुद्धिमान्य, मदान्तस्व, चापल्य एव कालोपगुतता मादि "दोषों से संशयानवगाही परमार्थज्ञान की असंभवता जानकर परमकृपालु भाचार्यों ने वुभुस्सुओं के लिये एक और भी सरल सरणि का निर्माण कियाथा, जिसे हम 'सर्वशास्त्र- समन्वय' की सज्ञा से अभिहित कर सकते हैं। तस्वदीप शास्त्रार्थ-निबन्धीय प्रमाण - प्रकरण में ' उत्तर पूर्वसन्देह वारक परिकीर्तित ' से उन्होंने स्पष्ट निर्देश किया है कि- प्रमाण-चतुष्टय की एकवाक्यता ही वास्तविक सिद्धान्तावगाहन की कसौटी है। 'अविरुद्ध तु यत्त्वस्य प्रमाण.' और 'एतद्विरुद्ध यस्सर्वं न तन्मानं कथञ्चन 'के द्वारा उक्त कथन को स्थूणा-खननन्याय से हट कर दिया गया है । मत - उक्त दोनों उक्तियों से जहां व्यापक सार्वभौम ज्ञान-मार्ग को उन्मुक रखा गया है, वहा भ्रामक ज्ञानजाल से सावधान रहने की भोर भी इगित किया गया है। महाप्रभु ने उक्त चतुष्टयी में श्रुति सूत्रों को एक कोटि में और गीता भागवत को द्वितीय कोटि में स्थापित किया है, तथापि एक विशिष्ट दृष्टि से 'भगवदुपदिष्ट' एव 'गुरूपदिष्ट' इन दो कोटियों में भी उन्हें विभाजित कर प्रथम में श्रुति और गीता तथा द्वितीय में ब्रह्मसूत्र और भागवत को ममिनिविष्ट किया जा सकता सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः ' के अनुसार श्रुति-उप- निषद्-धेनुओं का गीतारूपी अमृत सद्य प्रस्नुत सहज मधुर दुग्ध है, जो ब्रह्मसूत्र-मीमांसारूपी सुवर्णपात्र में शकासमाधानानल से भासंचित और भगवञ्चरित्र ( भागवत ) माधुर्य से संपृक्क कर सात्विक पेयरूप में परिणत किया गया है। एतावता-प्रस्तुत रस के सुखद पान से भी यदि वेदार्थ की पिपासा शान्त नहीं हो सकती तो 'नातः परतरोभ्युपाय' 2 ही है। मारांशत भाचार्यों ने चेद फिम्वा उपनिषदों पर प्रत्यक्ष भाष्य न करते भी उनके गांभीर्य को ग्रह्मसूत्रीय अणुभाष्य और भागवत्तीय सुबोधिनी द्वारा अभिन्यक्त किया है, जो- स्वल्प अभ्यास से भी वोधगम्य है। है इस प्रकार प्रारमिक भावश्यकता की पूर्ति हो जाने पर भाचार्यों के मात्मज श्रीविठ्ठलेश प्रभुचरण ने 'विद्वन्मण्टन ' तथा अन्य टीका-प्रन्यों में प्रमगोपात्त श्रुतियों के रहस्य का उद्घाटन किया है, तथापि विद्वरसमाज के विनोद की परिसमाप्ति उससे नहीं हो पाई। भागे चलकर मठपति जय- गोपाल भट्ट ने तैत्तरीयोपनिषद् को मानन्दवल्ली, एव गोस्वामिप्रवर श्रीपुरुषो- समजी ने कतिपय उपनिषदों पर भाष्य-रचना की। मर्यन योगिश्रीगोपेश्वरजी ने प्रस्तुत दिशा में विशेष श्रमकर यजुर्वेद-नवार्थी भाप्य का निर्माण और कुछ उपनिषदो पर स्वतन्त्र विवेचनाए भी की, पर सम्प्रति अधिकाश वे उपलब्ध नहीं होती । श्रीपुरुषोत्तमजी कृत माण्डूक्योपनिषद्-दीपिका नामक टीका प्रात और प्रकाशित है, जिसमें समर्थ पद्धति से कारिकामों पर विचार विनिमय किया गया है । इसके मनन्तर काशीस्थ गो श्री गिरिधरली ने ' श्रुति-रहस्य नामक ग्रन्थ में कुछ विशिष्ट श्रुतियों का विशेपार्थ- परत्वेन व्याख्यान किया। विगत ६०-७० वर्षों के युग में शुद्धाद्वैत सिद्धान्तानुसार उपनिषदों पर मधिक संख्या में व्याख्यान प्रस्तुत किये गये, जो इस प्रकार हैं .- (१) ईशावास्योपनिषद्-भाष्य (क) श्री बालकृष्ण शास्त्रीजी ( सस्कृत ) (ख) श्री वलभद्र शर्माजी (..) (ग) श्री मोहनलाल शास्त्रीजी (,,) (घ) श्री कण्ठमणि शास्त्री (हिन्दी)x (3) श्री सवलकिशोरजी चतुर्वेद (मं. हि.) ( २ ) केनोपतिपद्-भाष्य .--- (क) श्री बालकृष्ण शास्त्रीजी (संस्कृत) (ख) श्री मुखिया गोकुलदाप्तली शानी (३) ठोपनिषद् भाष्य-(अपूर्ण) (क) मा मा. प. श्री गठ्ठलालाजी x यह अप्रकाशित है. शेप प्रकाशित है ६ ( ४ ) छान्दोग्योपनिषद्-भाष्य (अपूर्ण) (क) श्री रमानाथ शास्त्रीजी साधारणतया दृष्टिपात करने पर यह विदित होता है कि-शुद्धाद्वैत सम्प्रदाय के विद्वानों ने इस अभाव की पूर्ति का यद्यपि प्रयत्न किया है, तथापि एक बटा अंश मभी व्याख्यान के लिये भवशिष्ट रह गया है । १ प्रस्तुत केन-उपनिषद् :- जैसा कि प्रथम कहा जा चुका है-दशोपनिषद् की क्रमगणना में • केन' का स्थान द्वितीय है । यह सामवेदीय तबलकार शास्त्रा की उपनिषद् है, और ' आप्यायन्तु ममाङ्गानि इस मत्र के द्वारा इसका शान्ति-पाठ होता हैx यद्यपि शाकर भाप्यानुसार प्रस्तुत उपनिषद् उक्त शाखा का नवम अध्याय मौर इसके पूर्व माठ अध्यायों में कर्मों की अशेषत परिसमाप्ति हो गई हैं । अत यह परग्रह्म-ज्ञान विषयक उपनिषद् है* तथापि समुपलब्ध शाखा की प्रतियों में पञ्चमाध्याय में ही यह मिलती है, जो-साक्टर बनेल, के कथनानुसार एक विसंवाद है। प्राचीन प्रतियों की अनुपलब्धि में याथातथ्य से इसका निर्णय करना असंभव-सा है । मस्तु जिस प्रकार ईशावास्य . ' आदि से प्रारंभ होने के कारण उसका नाम ईशोपनिषद् हो गया है, इसी प्रकार केनेपितं 'मादि मन्त्र होने के कारण इस उपनिषद् का नाम भी केनोपनिषद् ' पट गया है । वैदिक साहित्य के मध्ययनशील कुछ ' रेजों ' प्रभृति पाश्चात्य विद्वान् प्रस्तुत उपनिषद को अथर्ववेदीय' उपनिषद् कहते हैं। और इस कथन की पुष्टि में वे 'उमा हैमवती ' शब्दों एवं उसके उपाख्यान को पुरस्कृत करते हैं। शैवी उपनिषद् अथर्ववेद में ही उपलब्ध होती हैं-और ' उमा हैमवती का उपदेश होने से यह भी शैवी उपनिषद् है' इस प्रकार की शंका वे उपस्थापित करते हैं। x मुक्तिकोपनिषद् ( प्र अ ) * केनेपितमिस्याद्योपनिपत्परब्रह्मविषया वक्तव्येति नवमस्याध्यायस्यारम्भः । प्रागेतस्मात्कर्माण्यशेषत परिममापितानि (केन० शां भा ). । यावन्मात्र ७ - जैसा कि भने प्रतिपादन किया जायगा 'उमा' और 'हमवती' शही से इसकी गणना शैवी उपनिषदो में नहीं हो सकती । मुक्तिकोपनिषद् की गणना में इसे सामवेदीय उपनिषदों में प्रतिष्ठित किया गया है। अथर्ववेदीय उपनिषदों का शान्ति-पाठ जहा 'मद कणेभि .' इत्यादि मन्त्रों से होता है- वहां अन्य सामवेदीय उपनिषदों के समान इसका शान्ति-पाठ 'भाप्यायन्तु०' इत्यादि मन्त्र से होता है। एतावता उक्त कथन सगत नहीं जचता । दूसरी बात यह भी है कि-'सास्य देवता इस पाणनि सूत्र के माधार पर 'शिवदेवता' वाली उपनिषदों को ही सकता है, जिन्होंमें शैव धर्मोपयोगी रुद्राक्षादि वस्तुमो किम्बा माधनो का उपदेश हो-और जो शिव देवता का ही सर्वोत्कृष्टस्वेन प्रतिपादन करती हो । शैवागमोपयोगी 'रुद्राक्ष जाबालोपनिषद्' की भाँति प्रस्तुत उपनिषद् में ऐसे किसी प्रतिपाद्य विषय का वर्णन नहीं है-जो इसे उक कोटि में रख सके। ब्रह्म-माहात्म्याववोधन द्वारा तत्स्तुतिपरक होने से भी हम इसे सामवेदीय परिगणित कर सकते हैं-अत. इसके सामवेदीय उपनिषद् होने में किसी प्रकार का शका-लेश भी नहीं है। इमी प्रकार मान्त्रिक परिगणना में भी एक शंका उठती है किन्ही प्रतियो में प्रारभ से अन्त तक मंत्रों की क्रमश. मस्या दी गई है, तो किन्ही में खण्दश । परन्तु यह शंका कोई महत्वपूर्ण नहीं है-लेखक के सौर्य से दोनों पद्धतिया मंभव हो सकती हैं। 'उमा हैमवती' शब्दार्थ:- उन्होनें इन्द्र इस उपनिषद् के तृतीय खण्दान्त में वर्णन है कि जब के सन्मुख यक्ष का तिरोभाव हो गया, तव तत्वोपदेशाचे एक स्त्री का प्रादुर्भाव हुआ जो-दिव्य हेमाभरणवती भगवती उमा थी, को घा का चोधन कराया। जैसा कि प्रथम कहा जा चुका है -मधिकांश पाश्चात्य विद्वान उमा हैमवती' शब्दों से इस उपनिषद् को अथर्ववेदीय शैवी उपनिषद् मानते हैं । इस शब्द से साधारणतया- ' हिमवान् की पुत्री हेमवता भगवनी 'उमा' शिव की पत्नी का ही मर्थ लेने और इसके न्यारक ६ (४) छान्दोग्योपनिषद्-भाप्य (मपूर्ण ).- (क) श्री रमानाथ शास्त्रीजी साधारणतया दृष्टिपात करने पर यह विदित होता है कि-शुद्धाद्वैत सम्प्रदाय के विद्वानों ने इस अभाव की पूर्ति का यद्यपि प्रयत्न किया है, तथापि एक बटा अंश अभी न्याख्यान के लिये भवशिष्ट रह गया है । है प्रस्तुत केन-उपनिषद् :- जैसा कि प्रथम कहा जा चुका है-दशोपनिषद् की क्रमगणना में केन' का स्थान द्वितीय है। यह सामवेदीय सवलकार शाखा की उपनिषद् है, और 'आप्यायन्तु ममाङ्गानि इस मत्र के द्वारा इसका शान्ति-पाठ होता हैx यद्यपि शाकर भाप्यानुसार प्रस्तुत उपनिषद् उक्त शाखा का नवम अध्याय है, और इसके पूर्व माठ अध्यायों में कर्मों की अशेषस परिसमाप्ति हो गई है । अत यह परब्रह्म-ज्ञान विषय उपनिषद् है* तथापि समुपलब्ध शाखा की प्रतियों में पञ्चमाध्याय में ही यह मिलनी है, जो-दाक्टर बर्नेल, के कथनानुसार एक विसंवाद है। प्राचीन प्रतियों की अनुपलब्धि में याथातथ्य से इसका निर्णय करना मसभव-सा । मस्तु जिस प्रकार ईशावास्य ० ' मादि से प्रारभ होने मादि से प्रारम होने के कारण उसका नाम 'ईशोपनिषद्' हो गया है, इसी प्रकार केनेपितं ' मादि मन्त्र होने के कारण इस उपनिषद् का नाम भी ' केनोपनिषद् ' पह गया वैदिक साहित्य के मध्ययनशील कुछ ' रेजों ' प्रभृति पाश्चात्य विद्वान् प्रस्तुत उपनिषद को अथर्ववेदीय' उपनिषद् कहते है। और इस कथन की पुष्टि में घे उमा हैमवती' शब्दों एवं उसके उपाख्यान को पुरस्कृत करते हैं । ' यावन्मात्र शैवी उपनिषद् अथर्ववेद में ही उपलब्ध होती हैं-और 'उमा हैमवती' का उपदेश होने से यह भी शैवी उपनिषद् है' इस प्रकार की शका ये उपस्थापित करते हैं। x मुक्तिकोपनिषद् (प्र अ ) * केनेपित मित्याद्योपनिषत्परब्रह्मविषया वक्तव्येति नवमस्याध्यायस्यारम्भः । प्रागेतस्मात्कर्माण्यशेषत परिममापितानि (केन० शा. भा.). है।

जैसा कि मने प्रतिपादन किया जायगा 'उमा' और 'हमवती' शब्दो से इसकी गणना शैवी उपनिषदों में नहीं हो सकती । मुक्तिकोपनिषद् की गणना में इसे सामवेदीय उपनिषदों में प्रतिष्ठित किया गया है। अथर्ववेदीय उपनिषदों का शान्ति पाठ जदा 'भद्र कर्णेभि .' इत्यादि मन्त्रों से होता है- वहां अन्य सामवेदीय उपनिषदों के समान इसका शान्ति-पाठ 'आप्यायन्तु०' इत्यादि मन्त्र से होता है । एतावता उक्त कथन सगत नहीं जचता । दूसरी बात यह भी है कि-'सास्य देवता इस पाणनि सूत्र के आधार पर 'शिवदेवता' वाली उपनिषदो को ही शैवी' कहा जा सकता है, जिन्हो में शैव धर्मोपयोगी रुद्राक्षादि वस्तुमो किम्बा साधनों का उपदेश हो-और जो शिव देवता का ही सर्वोत्कृष्टरवेन प्रतिपादन करती हो । शैवागमोपयोगी 'रुद्राक्ष जाबालोपनिषद्' की भाँति प्रस्तुत उपनिषद् में ऐसे किसी प्रतिपाद्य विषय का वर्णन नहीं है-जो इसे उक्त कोटि में रख सके। ब्रह्म-माहात्म्याववोधन द्वारा तस्तुतिपरक होने से भी हम इसे सामवेदीय परिगणित कर सकते हैं-अत इसके सामवेदीय उपनिषद् होने में किसी प्रकार का शंका-लेश भी नहीं है। इसी प्रकार मान्त्रिक परिगणना में भी एक शका उठती है किन्ही प्रतियो में प्रारभ से अन्त तक मंत्री की क्रमश. संख्या दी गई है, तो किन्ही में खण्डश. । परन्तु यह शंका कोई महत्वपूर्ण नहीं है-लेखक के सौकर्य से दोनों पद्धतिया संभव हो सकती हैं। । 'उमा हैमवती' शब्दार्थ:- इस उपनिषद् के तृतीय खण्दान्त में वर्णन है कि-जय के सन्मुख यक्ष का तिरोभाव हो गया, तब तस्वोपदेशार्य एक स्त्री का प्रादुर्भाव हुमा जो-दिग्य हेमामरणवती भगवती उमा थी, उन्होनें इन्द्र को ब्रह्म का बोधन कराया । जैसा कि प्रथम कहा जा चुका है -अधिकांश पाश्चात्य विद्वान उमा हैमवती' शब्दों से इम उपनिषद् को अथर्ववेदीय शैवी उपनिषद मानते हैं । इस शब्द से साधारणतया- ' हिमवान् की पुत्री हेमवती भगवती 'उमा' शिव की पस्नी' का ही मयं लेने और इसके न्यारक केन' का तत्व . उपनिषद्' शब्दार्थ से प्रथम यह सिद्ध हो चुका है कि-जिस विद्या के द्वारा निर्दुष्ट अवस्था सम्पन्न जीव को पाम पुरुषार्थ रूा दुखाभाव और सत्य सुख की प्राप्ति होती है-वह विया । उपनिषद् कहलाती है । यहाँ 'मनस्विनी व्याख्यानुसार प्रस्तुत औपनिषद तस्व का दिग्दर्शन करा देना हम मावश्यक समझते हैं। यह तो निश्चित है कि, ' श्रेयो-वनया प्रोक्त ' त्रिविध योगों में से केवल कर्म के द्वारा पापपुण्यों की भृखला समाप्त नहीं हो सकती। उससे अधिक से अधिक स्वर्गादिलोक-प्राप्ति संभव है-जो अक्षय्य नहीं है, अपुनारावृत्ति' किम्वा 'अमृतत्व' की प्राप्ति उससे अशक्य है, एतापता फलाकांक्षा-राहिस्यपूर्षक केवल चित्तशुद्धयर्थ कर्म करना अपरिहार्य है इस कर्मयोग द्वारा सत्त्व-सशुद्धि से ज्ञान-प्राप्ति में सौकर्य हो जाता है, तदनु सद्गुरु की कृपा से ज्ञान की उपलब्धि हो सकती है। ज्ञानमार्ग के अनुसरण से मांसारिक शोकमोहादि के नाशपूर्वक तत्वज्ञान की उपलब्धि होती है, अर्थात् विषयात्मक बन्धनों से उन्मुक्त होने पर जीव को 'ऋते ज्ञानान्न मुक्ति ' के अनुसार दुःखाभाव पुरुषार्थ की सिद्धि तो होती है, पर परब्रह्म के परमानन्दाशनरूप सुख की प्राप्ति नहीं। परब्रह्म सभी कर्म ज्ञान भक्ति रूप साधनों से अलभ्य है, जिसका कई स्थानों पर स्पष्टीकरण हो चुका है-वह तो साध्यभक्ति-अनुग्रह-कृपैकलभ्य है-मोर उस के द्वारा ही जीव को स्वरूपानन्द-सुख परम-पुरुषार्थ समधिगत हो सकता है। कर्म अर्थस्वरूप है, ज्ञान पुरुषार्थरूप है, और भक्ति परमपुरुषार्थ है। एतावता शुद्धाद्वैत सिन्द्वान्त में-"भक्त्यैवपरमश्रेयो जीवानां नान्यथेतिहि" (केन-मन० उपक्रम-कारिका ६ ) कह कर भक्ति को ही मुख्य उपाय यताया गया है। जीवकृति से सिद्ध उपायों को साधन कहा जाता है। पुष्टि-कृपा-अनुग्रह-वरण-भगवन्दर्म है- अतः जब जीव स्वकृत साधनों को करते हुए श्रान्त होकर बैठ रहता है-नि.साधनता को प्राप्त हो जाता है- महता निवृत्ति भौर - दीनस्व' - प्रवृत्ति से कृपा-भगवद्धर्म, तम अमर हो कर उस का उद्धार करता है । अत. वह अनुप्रह, कृपा, पुष्टि साधन नहीं है माध्यरूप है, इसके द्वारा ही भात्यन्तिक दुख की निवृत्तिपूर्वक रसस्वरूप भगवत्स्वरूपानन्द का उपभोग होता है। निष्कर्ष यह कि-पस्यं ज्ञान मानन्द ब्रह्म ' इस श्रुति में ब्रह्म के सत्ता, ज्ञान और मानन्द इन तीन धर्मो का परिकथन है । इसमें क्वल कर्मकता सत्तावत् ब्रह्म की ही प्राप्ति कर सकता है। अनधिकारिता के कारण ब्रह्म-प्राप्ति होने पर भी उसे तदीय मावनानुसार ब्रह्म के केवल सत्ताश का ही प्रतीति होती है-अन्य अंशद्वयों का मान उसे नहीं होता, वे तिरोहित रहते हैं। केवल ज्ञानियों को ब्रह्म के केवल ज्ञानांश की ही भावना होती है. उन्हें वही भासित होता है, वे चित् के अतिरिक्त किसी सत् की सत्ता नहीं मानते या उसे हेय समझते हैं । मत. अनधिकारिता के कारण वे चिन्मात्र ब्रह्म को ही प्राप्त कर सकते हैं, मानन्दांश की अनुभूति उन्हें तिरोहित रहती है। ऐमी अवस्था में मानन्दाश ब्रह्म की प्राप्ति के लिये भी कुछ उपाय होना चाहिये, और वह साधन भक्ति के अतिरिक्त अन्य नहीं हो सकता, वह स्वयं रस-भानन्दभावनानुरूपा है । माध्यभक्ति के द्वारा भक्तों को मत्- चित-भानन्द समी स्वरूपों का साक्षात्कार होता है। वे सर्वभूत-हितरत होकर सदृप में, 'प्रविष्टो जीव - कलया ' के रूप से 'चिद्रूप ' में और अस्यैवानन्दस्य भूतानि मात्रामुपजीवन्ति ' के रूप में मानदांश का, इस प्रकार तीनों को समष्टि रूप में साक्षात्कार और अनुभवगम्य करते हैं अतः कर्मसाध्य पस्व-मशुद्धि से जन्य भगवन्माहात्म्य-ज्ञान द्वारा परब्रह्म-सेवनामिका मक्ति ही वास्तव में अभ्युदय नि.श्रेयस साधिका ई- अतएव परम पुरुषार्थ होने से वही उपनिषद्, ब्रह्मविद्या और विशिष्ट वेदार्थ रूप है जिसका पाहोपात विवेचन केन' उपनिषद् की प्रस्तुन टीका में मिलता है । विभाग और मन्त्रसंख्या-विश्लेपण- शुद्धाद्वैत सिद्धान्त में अन्य-व्याख्यान की एक विशिष्ट शैली है, जिसे + प्रस्तुत प्रकाशन- पत्र । "अयभाव ."-आदि अश। सकता, क्योंकि - ૧૨ श्रीमद्ववल्लभाचार्य ने अणुभ'प्य सुबोधिनी दोनों ग्रन्थों में अपनाया है। ग्रन्थादि में उसके अवान्तर विभाग, प्रकरण, मत्र अथवा श्लोकादि के भख्या- सम्बन्ध में मथच अथच पूर्वपक्षोत्तरपक्ष के पूर्व मोपपत्तिक विषय-विश्लेषण का निर्देश किया जाता है। प्रस्तुत विहगावलोकन से अन्य का स्वारस्य विज्ञात होता है, जो-अतिशय उपादेय है। 'ईशावास्य' के समान ही 'वनोपनिषद् ' के ' मनस्विनी'-टीकाकार ने बडे रोचक ढग से विभाग और मत्र-सस्या के सम्बन्ध में विवेचन प्रस्तुस किया है, जो-मन्यत्र उपलब्ध नहीं होता। वे कहते हैं :- वेद-चतुष्टय का विशिष्ट मर्थ सर्वदुः ख हर्ता भगवान् श्रीहरि की सेवना ही है। मत चारों वेदों के प्रतीक स्वरूप 'वेन' उपनिषद् में भी चार खण्ड हैं , अथवा-सेघमान जीवो के सेव्य-स्वरूप परमारमा, पुरुषार्थ चतुष्टय रूप होने से इसमें भी चतुर्थर्ग के प्रतीकरूप चार खण्डों का उपनिवेश किया गया है। फिम्बा-भगवत्सेवा-मार्ग में प्रमाण, प्रमेय, साधन और फलात्मक अनुबन्ध चतुष्टय का ही महत्व है, अत: एक एक खण्ट के द्वारा प्रत्येक का इसमें निरूपण किया गया है । यह एक गूढ रहस्य है- प्रस्तुत उपनिषद् में प्रथम खण्डद्वय से प्रमाण, प्रमेयगत भसमावना मौर द्वितीय स्वण्टद्वय में साधन फलगत विपरीत भावना की निवृत्तिकर प्रतिपाद्य विषय को पुष्ट किया गया है। खण्दश. सक्षिप्त प्रतिपादन इस प्रकार ६ प्रथम खण्ड :-माण खण्ड है। इसमें माठ मन्त्र हैं-जिसमें प्रथम मन्त्र प्रश्न और शेष सात प्रतिवचन रूप हैं । ब्रह्म लौकिक इन्द्रियों द्वारा प्राप्य नहीं है, मलौकिक मन, प्राण, वाक् , चक्षु और श्रोन ही तत्कार्य- क्षम हैं-एतावता तादृश अधिकारी ही कृतार्थता को प्राप्त हो सकता है। इस प्रकार प्रमाणरूप इन्द्रियों के द्वारा ब्रह्मप्राप्ति के सम्बन्ध में शिष्य को जो-ससमावना उदित होती थी, उसका निराकरण किया गया है। सिद्ध किया गया है कि भक्तिमार्ग में अलौकिक (निट) इन्द्रियों के द्वारा ही परमानन्द ब्रह्म की अनुभूति होती है, और वे तत्प्रवेश द्वारा ही कार्यसमर्थ + प्रस्तुत प्रकाशन, पत्र ४ कारिका ७, ८. - . .

बननी है अन्यथा नहीं। इस प्रकार निर्दोष प्रमाणों के द्वारा भी भक्ति- ब्रह्मविद्या की श्रेष्ठता स्थापित होती है-यह सिद्ध किया गया है। द्वितीय खण्ड -प्रमेय खण्ड है, जिपमें यह प्रतिपादित है कि-प्रमाण- गत- दोषों के अभाव होने पर भी विषय-प्रमेयगत दोषों के कारण शिप्य को पुनरपि ब्रह्म-प्राप्ति में भमभावना हो सकती है। अत. प्रमेय में संभाव्य दोषों का निराकरण भी अपेक्षित हो जाता है। प्रमेयगत दोष पाच प्रकार के हो सकते हैं :-(१) मल्पस्व, ( 0 ) विस्मय का अभाव, (३) अमुक प्रकार का नियम, (४ ) परतन्त्रता, एवं ( ५ ) मनुस्कर्ष । ब्रह्मस्वरूप प्रमेय-विषय-में इन पाचों दोषों की संभावना नहीं है, कारण कि-इन पांचों के विरोधी (,) ममत्व, (२) अद्भुतत्व (३) प्रकार की भनियतता (४) स्वतन्त्रता तथा (५) सर्वोत्कृष्टत्व यह पाच धर्म ब्रह्म में नियत विद्यमान हैं। - इसे इस प्रकार समझिये यदि प्रमेय ब्रह्म में ' भूमत्व ' (वृहत्त्व) न होकर 'मल्पस्व' होगा तो उसमें क्षुद्रता के कारण किसकी भी प्रवृत्ति नहीं होगी। यदि प्रमेय ग्रह्म में अद्भुतता ( विलक्षणता ) न होकर अन्य वस्तुओं की समानता होगी तो उसके प्रति किसी के साकर्षण की समावना ही नहीं हो सकती। यदि उसके प्रापयर्थ अमुक प्रकार की नियतता मानी जायगी तो वह 'इदमित्य' सिद्ध हो सकता है । यदि प्रमेय स्वतन्त्र न होकर परतन्त्र होगा-तो तस्माप्ति अकिंचिकर ही है। इसी प्रकार यदि प्रमेय ब्रह्म उत्कृष्टता से रहित होकर सर्वसाधारण होगा तो वदर्य प्रयत्न ही कौन करेगा? ऐसी अवस्या में प्रमेय ब्रह्म की वास्तविक विशेपतामों के प्रतिपादन द्वारा सभाग्य दोपों का निराकरण होना चाहिये। मतः द्वि० स्वर के पाच मन्त्रों द्वारा उक्त पांच गुणों के प्रतिपादन से पंचविध दोषों की संभावना की निवृत्ति की गई है । +प्रस्तुत प्रकाशन (पत्र २२ कारिका १२-१५) * प्रस्तुत प्रकाशन ( पत्र २३ कारिका-१६-१८) x प्रस्तुत प्रकाशन (पत्र २३ कारिका १६-१८) १४ तृतीय खण्ड .--साधन स्त्रण्ड है । इस में १२ मन्त्रों से विषय का प्रतिपादन है । गत द्वि० खण्ड में प्रमेय गत पाच धर्मों की सिद्धि द्वारा यह कहा गया है कि उसमें सभाव्य पाच दोष ऐसे नहीं है जिन से प्रमेय विषयक किसी मसभावना का उदय हो सके । प्रमेयगत दोषसिद्धि के कारण तत्सम्बन्ध से बुद्धि में भी दोष का उदय हो सकता है, और ऐसा होने से समस्त कर्तव्य निसार हो सकते हैं । मत गत द्वि० खण्ड में प्रमेयगत सभाव्य दोषों का निगकरण करते हुए यहांतक प्रमाण-प्रमेयगत अम को किया गया है। भावना अब रह जाती है-विपरीत भावना। अन्यथाख्याति पक्ष को स्वीकार करने पर प्रमेय ग्रह में दोषों के सम्बन्ध से विपरीत भावना का उदय हो सकता है जिससे बुद्धि मी विपरीत भावनाविष्ट होकर वास्तव वस्तु को ग्रहण नहीं कर सकती। एतावता साधनों की दृष्टि से भक्ति का महत्व भी निष्पन्न नहीं हो सकता, जो भावश्यक है। इसलिये साधन-फलगत विपरीत भाषना की निवृत्ति तृ० और च० खण्ड में की जाती है । भक्तिमार्गीय सिद्धान्त में अन्यख्याति को अंगीकार किया जाता ब्रह्म सर्वोत्कृष्ट है, मत उसके उत्कृष्ट धर्म तत्सम्पर्क-विना अन्य में नहीं मा सकते। उसके धर्म ही सर्वत्र भासित होते हैं :-यह साधारणतया भन्यख्याति का रूप है। सर्वथा निर्दोष होने के कारण ब्रह्म में दोषों का अल्प भारोप भी नहीं हो सकता । सांसारिक दशा में जीव स्वभाव के वश दुष्ट हो जाते हैं उनके दोषों की निवृत्ति निर्दोष पूर्णगुणविग्रह भगवान् के निर्दुष्ट साधनों से ही हो सकती है और तभी जीव स्वरूपावस्थित- कृतार्थ होता है। समस्त देवों में ब्रह्म जिज्ञासा की ओर प्रवृत्ति होने के कारण अग्नि वायु मौर इन्द्र को ही मुख्य माना गया है । इम खण्ड में तीनों के उपाख्यान द्वारा यह सिद्ध किया गया है कि --इनमें जो श्रेष्ठस्व धर्म भाया है, इनको जो जय और महिमा प्राप्त हुई है, वह ब्रह्म गत धर्म है और भक्ति के भाश्रयण से ही माविर्भूत हुभा है । ब्रह्म ही जब कृपा द्वारा माविर्भूत होकर अपने धर्मों का सस्थापन करता है, तभी जीव दिव्य धर्मों से विभूपित होता है । और जहा यह स्वधर्मों का तिरोधान कर लेता है वहा । है है वह अकिंचिरकर-निवीर्य-हो जाता है। तो-जहा देवोत्तम उक्त देवों की यह परिस्थिति है तो अन्य साधारण जीवों के लिये क्या कहा जाय ? इसीलिये प्रस्तुत-अग्नि, वायु तृण को जलाने उडाने और इन्द्र के सम्मुख यक्ष के तिरोहित हो जाने के- प्रसंग को उदाहृत दिया है । भक्ति में सब से वृहत् दोष अमिमान है-जो मासुर लक्षण । वह जव तक रहता हैं-'स्व' में सर्वोत्कृष्टत्व की भावना बनी रहती है, अन्य- कृत महस्व को भी जीव स्वकृत मानता रहता । उक्त देवों ने भी असुर- पराजय को स्वकृत माना- और वे 'अस्माकमेव विजयः अस्माकमेव महिमा' के अमिमान से अमिभूत हो गये । परन्तु यक्षरूप पूज्य ग्रह्म ने प्रकट होकर उनके इस गर्व को धूहिसात् कर दिया जिससे वे सनुतापित होकर अन्त में दीन बन गए। उन्हें अपने सामर्थ्य का परिचय हो गया। प्रस्तुत भक्ति-दोष समिमान की निवृत्ति अस्वातन्त्र्य-दन्य भावना-के उदय से ही हो सकती है। यह भस्वातन्त्र्य-(दैन्य) स्त्री के उदाहरण में ही मिलता है। 'वीमावो गूढ. पुष्टिमार्गे तत्त्वम् ' (सुबोधिनी दशम ३०) इस वाक्य में जिस 'खोभाव' का उल्लेख है-वह एक प्रकार से दैन्य ही है-और वही पुष्टि-अनुग्रह प्राप्ति के मार्ग में तस्वरूप है । स्वीगत- हार्दिक (माध्यात्मिक ) भाव- दैन्य, कोमलता, प्रवणता, दयालुता, नातिमानिता आर्जव, क्षमा मादि की अधिक अवस्थिति जिन जीवों में होती ह-और जिनमें प्रिय-प्राप्ति के प्रति नि.सा- धनतानुभूति की पराकाष्ठा होती है, वे ही जीव ' स्वीजीव ' कहे जाते हैं, क्योंकि जीव में कोई देहगत लिङ्ग-मेद नहीं है। एसे जीवों पर ही भगवान् की कृपा स्वाभाविकतया होती है, जिसे 'स्त्रीपु मस्यन्तं कृपावान् (सुवो. भ्रमर. ४४ म) द्वारा कहा गया है। उक्त देवों को यह निरमिमानिता स्त्रीरुपिणी बहु शोभमाना उमा के द्वारा अधिगत हुई, मतः उसके प्रादुर्भाव और कृपोपदेश से उन्हें वास्तविक उपास्य का परिज्ञान हुमा, वे वास्तव ब्रह्मज्ञान के अधिकारी हो सके। इस प्रकार तृ. खण्ट का यह रहस्य है। इसमें १२ मन्त्र है। प्रथम में देवों की बहिर्मुखता का 'अस्माकमेवाय विजयः अस्माकमेवायं .

महिमा' के रूप में कथन है । प्रस्तुत मिथ्या ज्ञान से-असुरों के समान देवों का भी पराभव हो जायगा, यह सोचकर अनुग्रह करने के लिये विलक्षण महनीय ( यक्ष) रूप में ब्रह्म ने अपना प्राकटय किया जिसे कोई समझ न सका । यह द्वितीय मन्त्र में कहा गया है। तृतीय, चतुर्थ, पंचम, षष्ट मन्त्रों में अग्नि से प्रश्नोत्तर और उसके शक्ति-लोप तथा ब्रह्म-सम्बन्धी भविज्ञान का वर्णन है । सप्तम, अष्टम, नवम एवं दशम में इसी प्रकार वायु का उल्लेख है । एकादश-में इन्द्र के सन्मुख तो ऐसा प्रसंग भी नहीं भाया, और ब्रह्म तिरोहित हो गया-इस प्रकार धर्णित है। मन्तिम द्वादश मन्त्र में विद्यारूपिणी उमा के साक्षात्कार और उससे संप्रश्न का वर्णन है -जो मग्रिम खण्ड की भूमिका है। इम स्थान पर अन्यों की अपेक्षा ' मनस्विनी कार ' ने ही 'अयममि- सन्धिरत्र ' ( पत्र ४५)- कह कर विद्या के पांचों पर्वो का प्रतिपादन किया है। उन्होंने आकाशाधिष्ठान की निले पता से पैराग्य, 'बहुशोभमाना' शब्द से साख्य, उमा शब्द से योग, हेमवती से तप और ' स्त्री' विशेषण से भक्ति को सिद्ध कर एक मौलिक समेत दिया है । जो द्रष्टव्य है । यहां प्रसग में काल-कर्म-स्वभाव-कृत दोषों के अभाव का दिग्दर्शन है। मग्नि में कर्मकृत, वायु में स्वभावकृत और इन्द्र में कालकृत दोष है । इन सब दोषों का अभाव अनुग्रहात्मिका परमविद्यारूर भगवती उमा द्वारा सम्पन्न हुभा है, और उनका प्रादुर्भाव दैन्य-भक्ति की प्रतिष्ठा से । भक्ति- पुष्टि-सिद्धान्त की दृष्टि में सुखपुरुषार्थ के सिद्धयर्थ जीव में पारतम्ध्य-दैन्य (अभिमानाभाव ) का होना अनिवार्य है। इस पारतभ्य से ही उसे ब्रह्मधर्म स्वातन्त्र्य की समुपलब्धि होती है-जिससे वह यथेच्छ परब्रह्म के स्वरूपानन्द का उपभोग करता है। में ही गुण इस प्रकार पारतन्य हो चाहे स्वातन्त्र्य, भक्ति में ब्रह्म और ग्रह्मदत्त ही साधन हैं, कहने में असमंजस-सा प्रतीत होता है पर यही ब्रह्म की विलक्षणता-मद्भुतकर्मता है । वह जब जीव में कालकमस्वभावजन्य दोषों का अवलोकन करता है-देन्याविष्करण द्वारा उसे पारतन्त्र्य प्रदान घर स्वरूपज्ञान कराता है, और जब जीव परतन्त्र (ब्रह्म-तन्त्र ) हो जाता है सब स्वरूपानन्द देने में ब्रह्म स्वर परतन्त्र ( भोग्य ) बन कर उसे स्वतन्त्र ( मोका) बना देता है। सह ब्रह्मणा विपश्चिता, इत्यादि श्रुति का यही रहस्य है। मविध भत्ता (मोक्का) होने कारण वह स्वतन्त्र भी है, और रसरूप ( भोग्य ) होने के कारण परतन्त्र मी । यही दोनों भाव जीव में उसकी इच्छा, 'कृपा, दान आदि से प्रपत्ति में प्राप्त होते हैं। अतएव ब्रह्म जीवगत दोषरूप, स्वातन्त्र्य-पारतन्ध्य की निवृत्ति कर स्वधर्मरूप स्वातन्त्र्य-पारतन्ध्य को स्वयं प्रदान करता है। यह सब ज्ञान गुरु-शिक्षा से होता है जिसे- मूर्तिमान् उदाहरण रूप से प्रस्तुत खण्ड में दर्शाया है । इस प्रकार साधन में आनेवाली विपरीत भावना ( अन्यथा ख्याति ) के निराकरण द्वारा १२ मत्रों से माधन रूप में भी भक्ति की श्रेष्ठता सिद्ध की गई है। चतुर्थ खण्ड :-फल स्वण्ट है। जिसमें ६ मन्त्रों से फलगत दोषों के निराकरण द्वारा 'वेदान्त' शब्दवाच्य भक्ति का उत्कर्ष सिद्ध किया गया है। तृतीय स्वण्ट में कहा गया है कि-गुरुमुख से प्राप्त ज्ञान ही फला- धायक है, तद्विना स्वाभीष्ट-सिद्धि में विफलता ही भविगत होती प्रकार के दोषों की भाशका से ब्रह्मरूप फल के प्रति जीवबुद्धि में विपरीत भावना उदित हो सकती है-जिसका निराकरण भी अभीष्ट है। वे दोप इस प्रकार हैं :- (1) गुरुमुख से ज्ञान प्राप्त न होना । (२) असनिधि (फल का समीप न होना) । (३) प्रयास (कष्ट ) से फल की लभ्यता (४) निवृति (सुख) की अनुत्पत्ति ( ५ ) स्वीय-मप्रणयता ( तन्मयता का अभाव ) और ( ६ ) मर्ष- सौहार्द -प्रियता का अनुमव । इन के दोषों के स्थान पर ( १ से लेकर ६ मंत्रों तक ) ग्रह्मरूप फल में के गुणों का निपंचन किया गया है। (१) गुरुमुख से ज्ञान -जो-सा ब्रह्मति होचाव ' से कहा गया है, और जिसकी सफलता ' ततो ईव विदाचार प्रति ' से परिदर्मित है। (२) ससिधि ससिधि -(फर-सामीप्य ) जो--' ते झेनन्नेदिप्ठं पस्पृशु , मे लक्षित है, और छनत् प्रथमो विदांचकार ग्रह्मेति' द्वारा सफलता रूप में उरित है। . ३ १८ , - (३) सुखलभ्यता- जो 'सह्येन नेदिष्ठं पस्पर्श.' से व्यक्त होती है, और 'प्रथमो विदाचकार ' से सफल बताई गई है। ५) निवृति ( सुख ) की उत्पत्ति -जो ' तस्यैष भादेशो यदेतत् इत्यादि से प्रकट और 'व्यातदा' आदि से प्रतिफलित है । (५) स्वकीय प्रवणता- जो 'अथाध्यात्म यदेतद् गच्छति' इत्यादि से अभिहित और 'उपस्मरत्यभीक्ष्ण सकल्प.' के रूप में सफल कही गई है। ( ६ ) सर्वसौहार्द-प्रियता- की समुद्भति- जो 'सर्वाणि भूतानि सवान्छन्ति ' के द्वारा कथित है-मोर तद्ध तद्वन नाम तद्वनमित्युपा- सितम्यं ' के द्वारा भजनीयता फल-रूप में निर्दिष्ट है। (७) सप्तम मन्त्र के द्वारा- 'उपनिषदं भो ब्रूहि ' की उपक्रमता से एव 'वाव त उपनिषदमब्रूमेति' इस उपसंहार से सन्दर्भ शुद्धयर्थ एकार्थ का कथन किया गया है। (८) मष्टम मन्त्र में-सारांशतः तस्यै तपो दम' इत्यादि के द्वारा भक्ति के साधनों का उल्लेख है। (९) नवम मन्त्र द्वारा ' अपहत्य पापमान अनन्ते स्वर्ग लोके ज्येये प्रतितिष्ठति' कह कर फल का उल्लेख किया गया है। एतावता प्रस्तुत खण्ट में चार प्रकरण हैं -(१) फलगत दोष निवारण ( १ से ६ मन्त्र) (२) उपक्रमोपसहार वर्णन (७ वा मन्त्र) (३) भक्तिप्राप्ति के साधन (८ वा मन्त्र ) और (४) फल निर्देश (९ वा मन्त्र) . इस प्रकार भक्तिद्वारा वननीय-भजनीय ब्रह्म के अर्थ उमा (गुरु) कृत उपदेश से देवों को ग्रह का ( सदेव ब्रह्म त्वं विद्धि) परिज्ञान हुभा, जो फलरूप से इस खण्द में कहा गया है। प्रस्तुत फलप्राप्ति के लिये भवान्तर साधनरूप में · तपोदम. कर्मेति प्रतिष्ठा वेदा सर्वाङ्गाणि सत्यमायतनम् ' ( 6 ) के द्वारा निर्देश है, और जिसे श्रीमद्वल्लभाचार्य- 'तपसा वेदयुक्त्या च प्रसादात्परमात्मनः से सक्षिप्ततया प्यक्त करते है। उपान्त मन्त्र में साधन-निर्देश के .

१९ भनन्तर मन्तिम मन्त्र में फल की भोर इङ्गित कर कहा गया है 'यो वा एतामेवं वेद, अपहत्य पाप्मानं मनन्ते स्वर्ग लोके ज्येये प्रति- तिएति ।' ..- सारांश ज्ञान और भक्ति) इस 'केन' उपनिषद् में यक्ष ( पूजनीय ) ब्रह्म-वर्णन के द्वारा ज्ञानक्रिया दोनों शक्तियों से विशिष्ट परब्रह्म के दिव्य स्वरूप का जहां वणन है, वहां उसके अचिन्त्यानन्तशक्तिमत्व एव अलौकिक माहात्म्य का प्रतिपादन भी है। प्रश्नोत्तर रूप में जिज्ञासा एव समाधान है तो भाख्यायिका द्वारा उसका पुष्टीकरण भी । नहा जीवकृत साधनो की ब्रह्मप्राप्ति में अकिंचित्करता का उल्लेख है तो वहा भगवत्कृत साक्षात् अनुग्रह द्वारा पुरुषार्य-सिद्धि के अभ्युपाय का दिग्दर्शन भी है। उपास्य की उपासनार्थ उपासक को उद्बोधन देने के लिये एक नियो- जक की उपस्थिति का अनुभव वैदिक पद्धति का सनातन प्रथम चरण है। • सद्रेश्य, अग्राह्य, भवर्ण्य, अनिरुक परबझ को इदमित्यतया ज्ञात कर लेना जीव के सामर्थ्य के बहार है। पर उस की मोर प्रवृत्ति करना भी तो निश्चित पुरुषार्थ माना गया है, सदयं किसी अभ्युपाय का निर्देश होना ही चाहिये ज्ञान की एक क्रमकोटि है । गीतानुसार प्रकृति दो प्रकार की है अपरा सौर परा । नपरा प्रकृति अष्टधा है, 'जो भूमिरापोनरो वायु' मादि द्वारा (गीता ७-४ ) कही गई है। परा प्रकृति जीवभूत है ( गीता ७-५) जिसके द्वारा जगत् धारण किया जाता है । इसे क्षर और अक्षर रूप में भी कहा जाता है । एतावता (१) सत्-ज्ञान (क्षर-ज्ञान ) (२) चित्-ज्ञान (जीवाश्म ज्ञान ) (३) ब्रह्म-ज्ञान (मक्षर ब्रह्मात्म-ज्ञान ) भावश्यक होता है। क्षर एवं मक्षर से कागे (मतीत ) एक पुरुषोत्तम है, जिसे परमल कहा जाता है । इस का ज्ञान ( ४ ) परब्रह्म-ज्ञान है । इस क्रम में उत्तरोत्तर तप भादि साधनानुमान के द्वारा साधक झज्ञान की सीमा तक पहुंच सकता है, जो शानियों के लिए मन्तिम लक्ष्य है । 'हद बा,महं ब्रह्म, ग्रह्मेद आदि पखण्रज्ञान के अनन्तर 'पर्व ब्राँव'इस प्रकार का भखण्याद्वैत का भान होना ही वास्तव में परमल ज्ञान-पुरषोत्तम-ज्ञान है ।

२० 'इदं ग्रह, अहं ब्रह्मास्मि, ग्रीवेदं सर्वम् ' इत्यादि वाक्यों से क्रमश इसो निगूढार्थ की अभिव्यक्ति करती हुई श्रुतियां जब अन्ततो गत्वा परब्रह्म-ज्ञान के लिए नेतिनेति' पुकार उठती हैं । उस समय जब ज्ञाता, ज्ञान ज्ञेय की परिसमाप्ति हो जाती है-तब परब्रह्म की ग्राह्यता के लिये भक्ति का ही अवसर माता है । ' यमेवैष वृणुते तेन लभ्य " " भक्त्याइमेकया प्रायः" मादि वचन तब चरितार्थ होते हैं। "ऋते ज्ञानान मुक्ति. भादि जैसे श्रुति- स्मृति-वाक्य सत्य ही दुःखों के अभाव-मुक्ति का प्रतिपादन करने से निरर्थक नहीं होते । एतावता ज्ञान से ब्रह्मज्ञान तक तो संभव है, पर नहीं, वह सो भक्ति से ही हो सकता है। भक्ति से परब्रह्म ग्राह्य भी हो सकता है, जो उस की इच्छापर ही निर्भर है। अनेक प्रमाण इसके लिये दिये जा सकते हैं। परब्रह्म-ज्ञान " इधर "सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति" भादि वाक्य जब इस परब्रह्म की ज्ञान से अप्राप्यता के विरुद्ध एक माभास उपस्थित करते हैं-सब 'स्वयमेवात्मनास्मान वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम !' इस समाधान द्वारा श्रीहरि के ज्ञानावतार गुरु की प्रतिष्ठा स्वीकार करनी पड़ती है, उनके बिना ज्ञानप्राप्ति असंभव हो जाती है। फिर यह ज्ञान चाहे आत्मज्ञान हो ? ब्रह्मज्ञान हो ? या परब्रह्म विषयक ज्ञान हो ? साध्य और साधक के मध्य में सदुपदेष्टा सद्गुरु के उपदेशरूप साधन के अतिरिक्त और कौन सी कडी हो सकती है? "प्रोक्कान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ । यस्य देवे परा भक्ति था देवे तथा गुरी, वस्यैते कथिता गर्या " आदि श्रुतिवचन और 'प्लवं' सुकल्प गुरुकर्णधारं" " व्यसनशसान्विताः समवहाय गुरोश्चरण यद्वासुदेव शरणा विदुरजसैव " भादि पौराणिक वचन उक्त कथन को बल देते हैं। इसी दृष्टि से जब पूर्ण पुरुषोत्तम के कृपाफलिस यत्किञ्चित् ज्ञान के लिये गुरु की भावश्यकता प्रतीत होती है, तब प्रस्तुत 'केनोपनिषद् में इन्द्रशिष्य के सन्मुख गुरुरूप बहुशोभमाना हेमवती उमा का साक्षात् होता है । इस प्रकार लौकिक प्रमाणरूप इन्द्रियां जय कुण्ठित हो जाने पर गुरु की कृपा से अलौकिक धर्मों से अधिष्ठित होकर परब्रह्म को बोधगम्य- ग्राह्य-करने में सक्षम हो जाती हैं,व अधिकारी साधक जीव अपनी साधनत्व- बुद्धि हटा लेता है और नि.साधनता रूप भगवदनुग्रह से फलात्मक परमानन्द- रस का उपमोग करने लगता हैं। यही 'केन' के चारों खण्डों का भान्तरिक सक्षिप्त रहस्य है। , के स्थान पाठ-भेद :- 'केनोपनिषद्' के मन्त्रों का अन्य व्याख्याओं से पाठ-सम्बाद करने पर क्वचित पाठ-मेद भी प्राप्त होता है जो इस प्रकार है :- (क) द्वि. खं प्रथम मन्त्र में मनस्विनीकार ने दहर पर 'दम्र ' पद की व्याख्या की है। (ख) तृ. ख. तृतीय मन्त्र में । किमेतद् यक्ष ' ऐसा पाठ है जो शांकरभाष्य से मिलता है पर पं गोकुलदासजी ने स्वकीय भाष्य में किमिदं यक्ष ' ऐसी व्याख्या की है। ग) च. सं. चतुर्थ मन्त्र में मनस्विनीकार ने ' इति न्यमीमिपदा' इस पद की व्याख्या की है, तो अन्य भाष्यों में 'इतीन न्यमीमिषदा' स्वीकार किया है। इन पाठ-मेदों का स्वारस्य समालोचनात्मक अध्ययन से विदित हो सकता है, जिस पर यहां कुछ कहना 'मस्थाने ' होगा। कुछ विशिष्ट शब्दार्थ :-- यों तो सिद्धान्त-वैलक्षण्य के कारण अन्य भाग्यटीकामों से 'मन- स्विनी कार' का अभिप्राय पृथक् ही है । तथापि इसमें एक विशेषता यह है कि-साधारण प्रसिद्ध शब्दार्थों की व्याख्या के साथ कहीं कहीं प्रकृति प्रत्ययार्थ के सहारे कीन्ही शब्दों के ममिप्राय मूलक भन्य मर्य भी किये गये हैं। जैसे :- १ पदन्ति ( १ खं. १ म.) कथनीयोऽर्थ उच्यतेः वद् इति तस्या' अन्ति-समीपे भवति । इत्यादि । २ 'इदम् ' (. सं. ४ मन्न) 'ईन्कामान्यति (वयति इति- इदम् । माप्तकामता-सम्पादकमपीत्यपि भवति' (तथा ७ मन्त्र) ।

२२ . ३ वीर्यम् ' ( २ ख • मं.) विशेषण ईरयसि क्षिपति सर्वास्तुच्छतया तद्वीरम-तस्मिन् साधु तद् वीर्यम् । ४ विद्युत ( ४ वं. ४ मं ) विशेषेण द्योतते-इति विद्युत. = मानन्द । •इति श्रुती य मानन्दात्मक भात्मा सोऽय विद्युत. । ( आदि ) निदर्शन रूप से उदाहृत शब्दों की विशेष व्याख्या का स्वारस्य पूर्वानुसन्धान से अवगत हो सकता है-जो व्याख्या के अध्ययन से ही सभव है। यहां तो उसका स्थालीपुलाक न्याय से दिग्दर्शन कराया गया है । जैपा कि-प्रथम प्रतिपादित किया गया है, प्रस्तुत प्रथ उक्त प्रकार से विषय-वर्गीकरण एव मन्त्र-संख्याओं द्वारा व्याख्यान-पद्धति द्वारा अपना एक मौलिक स्थान रखता है। यह सत्य भी तो है कि-मन्त्रों का प्रतिकथन किसी एक गमीर पूर्वापर अर्थानुसधान को लेकर ही होता है, वह अनर्गज अथवा मापासत रम्य नहीं है। 'केनोपनिषद्' की अन्य प्रकाशित भाष्यटीकाओं में इस प्रकार का विवेचन प्राप्त नहीं होता। केवल श्रीशंकर कृत 'वाक्यभाष्य' में केवल मात्र एक स्थान पर केनोपनिषद् भाष्ये क्षुद्रगण वाक्य-विवरण समाप्त कहकर ही सतोष किया गया है, विशेष विश्लेषण द्वारा गमीरार्थ का प्रस्फोट वहां भी नहीं हुभा है। यह कहने में एक विशेष गौरवानुभूति होती है कि-'केनोपनिषद्' के हार्दिक अमिप्राय को 'मनस्विनी ' व्याख्याकार ने महनीय प्रणाली से व्यक्त किया है। 'मनस्विनी' की रचना: यद्यपि 'केनोपनिषद्' पर अन्य अद्वैतवादी आचार्य और विद्वानों की रचित टीका, भाष्य उपलब्ध एवं प्रकाशित हैं तथापि मान से ६०-७० वर्ष पूर्व शुद्धाद्वैत-सिद्धान्त की ख्यापिका कोई व्याख्या नहीं थी। जैसा कि ईशावाम्य-मनस्विनी' व्याख्या के प्रकाशन में मैने लिखा था- 'ईश' और ' केन' इन दोनों उपनिषदों पर पूज्य पितृचरण ने भारतमार्तण्ड पं श्री गहलालाजी के युग (मं १९५० के लगभग ) में ही इस व्याख्या my की रचना करली थी, पर उसके लगभग २५ वर्ष बाद नाथद्वारा में स्थायी निवास करने पर उन्होने इसे पुनः संशोधित किया था। पितृचरणने इस समय अपने व्यापक परिपुष्ट ज्ञान, अनुभव एवं समीक्षा से उसे अधिक परिमार्जित विशद मौर अलंकृत कर एक मभाव की पूर्ति की। प्रस्तुत प्रकाशन के प्रारंभ हो जाने तक शु साम्प्रदायिक किसी अन्य केनोपनिषद्'-टीका की मुझे कल्पना भी नहीं थी-यह एक भाश्चय है जो सकारण है। एक दिन सहमा उमरेठ में भादरणीय भाचार्य विद्यानिधि गो. श्री १०॥ श्रीवजरत्नलालजी महाराज ( सूरत ) के समक्ष जब ग्रन्थप्रकाशन की बात चल रही थी, उन के पौत्र होनहार विद्वान् मधुर सौम्यकृति चि श्रीमथुरेशजी के द्वारा श्रीगोकुलदासजी शास्त्रि-कृत मुद्रित केनोपनिषद्-भाष्य के दर्शन हुए, पर क्षिप्रता-वश मनस्विनी ' टीका के साथ उसका सम्बाद नहीं किया जा सका। तब यह जटिल समस्या उपस्थित हो गई कि-दोनों टीकाएँ एक ही तो नहीं हैं ? नामान्तर से वे दोनों पुनः मुद्रित तो नहीं हो रही है ? एक ही नगर-कोटा, एकही मात्रयस्थान धीमथुरेशमदिर और एक ही युग ( १९५०-७०) में अतिशय सनिकट (गुरुशिष्य-सम्बन्ध )x वर्तमान दो विद्वानों का एक ही दिशा में प्रच्छन्न प्रयास ? इस ' किं कर्तव्यविमूढ' वना देनेवाली समस्या फी पूर्ति तब हुई, जय कई स्थानों से हताश हो जाने पर स्व मित्रवर श्रीलक्ष्मणशास्त्रीजी (कोटा) ने मुखियाजी ध्रीगोकुलदासजी-कृत भाष्य की मुद्रित दो प्रतियां मेज कर मुझे स्थितप्रज्ञ वनाया। दोनों व्याख्याओं का सम्बाद करने पर मुझे जो मानन्द हुमा वह अकथनीय था। दोनों मौलिक व्याख्याएँ थी । * शु. सम्प्रदाय के ग्रन्थों के प्रकाशनार्थ द्रव्य-माहाय्य देनेगले अधिकांश दानवीर सेठ मुद्रित पुस्तकों का एक बडा जत्या अपने हस्तगत कर लेते हैं। जो- या तो अनधिकारियों के हस्तगत होता है-या योही काल कवलित हो जाता है । विद्वान् उमसे वचित रह जाते हैं। ४ स्व. श्री मुखियाजी श्रद्धेय श्रीवालकृष्ण शास्त्रीजी में गुरु-भावना रखते थे। मुझे स्मरण है :-जब वे गुरुपूर्णिमा के दिन हम शिष्यवर्गों के साथ गुरुदेव की सविधि अर्चना करते थे।

२४ ऐसा विदित होता है कि-सं. १९७५-८० के लगभग श्रीमुखियाजी ने इस व्याख्या की रचना की होगी। क्यों कि सं १९०१ में साक्षात्कार होनेपर उन्होंने प्रस्तुत टीका के कुछ अंश सुनाकर सतीर्थता के व्यवहार से मुझे पापित किया था । ऐतिहासिक स्मरण में-श्रीद्वारकाधीश के मुख्य सेवक पं श्रीनिर्भयरामजी के बाद श्रीमथुरेशजी के मुख्य सेवक प श्रीगोकुलदासजी ही ऐसे विद्वान थे जो-शु. सम्प्रदाय पुष्टिमार्ग की 'सेवायां वा कथायां वा' की प्रणाली में कुछ विशिष्ट गोस्वामिप्रवरों को छोड कर मद्वितीय उदाहरण माने जा सकते है । ऐसा अनुमान होता है कि-स्वर्गीय श्रीमुखयाजी को पूज्य पितृचरण की मनस्विनी' व्याख्या-रचना की जानकारी नहीं थी। अन्यथा वे इस केन' को छोड कर किसी भग्रिम उपनिषद् पर व्याख्या लिखते । क्योंकि उस युग में 'काशीस्थ स विश्वविद्यालय ' में शुद्धाद्वैत वेदान्त के परीक्ष्य अन्यों की योजना का वातावरण चल रहा था। अस्तु । यह सौभाग्य ही है कि-सम्प्रति शु० सम्प्रदाय में केन' की निम्न- लिखित दो सस्कृत व्याख्याएँ उपलब्ध हैं, जो परस्पर पूरक सी है (1) केनोपनिषद्-मनस्थिनी व्याख्या। रचयिता स्व पो श्रीवाल- कृष्ण शास्त्रीजी। रचना एवं सम्पादन काल सं १९५०-७५ प्रकाशन स. २०१२ (प्रस्तुत प्रकाशन ) ( २ ) केनोपनिषद्-भाष्य । रचयिता स्व. मुखिया श्री गोकुलदासजी शास्त्री। रचनाकाल स १९८० (लगभग)। प्रकाशन सं. २००३ । हिन्दी भावानुवाद-सहित । कोटा वि. प्रेस से प्रकाशित । प्रस्तुप्त व्याख्यान-द्वय में यह एक अदृष्ट संयोग ही है कि-प्रथम का अनन्तर और द्वितीय का प्रथम प्रकाशन हो सका है। । प्रस्तुत प्रकाशन :- स्वर्गीय पितृचरण की रचना के सम्बन्ध में कुछ कहना यद्यपि छोटे मुह बडी घात है, तथापि यह व्यक्त करते संकोच नहीं होता कि-भारत मार्तण्र श्रीगहलालाजी के युग ( स १९५० ) के मनन्तर शु साम्प्रदायिक . - घेदुप्याधिष्ठान को साधिकार संभालने वाले विद्वद्गण में उनकी गणना कनिष्ठिकाधिष्ठित नहीं है । यद्यपि तस्कृत रचनामो में 'ईशावास्योपनिषद्- मनस्विनी' के बाद प्रस्तुत व्याख्या का ही प्रकाशन हो रहा है तथापि स्थालीपुलाक-न्याय' में उन के सार्वभौम पाण्डित्य का परिचय पाया जा सकता है। पितृचरण-रचित और उनके स्वय हस्तलिखित सर्वविध शुद्धाद्वैत. साहित्य की ४० पजिकाए मेरे समीप सुरक्षित विद्यमान है-जो सब प्रकाशन मापेक्ष है (१) वेद के कतिपय विष्णु वैश्वानर, पुरुषसूक्तादि सूक्तों के न्यारयान । ( २ ) गोतार्थ-विचार । ( ३ ) ब्रह्मसूत्रार्थ-विचार । (४) भाग बतार्थ विचार । ( ५ ) प्रकीर्ण मन्त्र-व्याख्यान । (६) पद्य-संग्रह । (७) श्रीनाथमावोञ्चय । ८ ) गोविंदपाल-कोश । (९) प्रकीर्ण सिद्धान्त विमर्श । (१०) श्रीवल्लभाचार्य-म्वरूपदीपिका । मादि । सत्यसंकल्प श्रीहरि के अनुग्रह से गत वर्ष पितृचरण-रचित ईशावास्यो- पनिपद् की यशस्विनी 'मनस्विनी' टीका प्रकाशित हुई, जो पूर्वोक्त अप्रकाशित साहित्य के प्रकाशन का प्रथम सोपान था। शु सम्प्रदाय के विद्वद्वरिष्ठ, लब्धप्रतिष्ठ पष्टपीठाधीश माचार्य गो. श्री १०८ ब्रजरत्नलालजी महाराज ( सूरत ) द्वाग वत्प्रकाशनार्थ प्रदत्त अवलम्बन के श्रीगणेशने अन्यन्त्र भी प्रोत्साहन को जागृत किया, फलरूप भाज केनोपनिषद् मनस्विनी' टीका प्रकाश में भा रही है। जिसके प्रकाशन का व्यय प्रदान कर शु सं के तृ पीठाधीश गो. श्री १०८ ब्रजभूपणलालजी महाराज ने इस शृंखला में दूसरी कढी जोढने का श्रेय मधिगत किया है । केनोपनिषद् मनस्विनी-टीका की एक ही प्रति मेरे समीप विद्यमान हे-जो ग्रन्थकार की स्वय हस्तलिखित और संशोधित परिवर्द्धित है । यावद् बुदियोदय तत्सम्पादन में कई स्थलोपर सन्देह-निरामार्थ कृवभ्रम लब्ध. प्रतिष्ठ विद्वान मित्रवर पं. श्रीवद्रीनाथजी शास्त्री 'विद्यासुधानिधि' (बटोटा) तथा पं. श्रीजगन्नाय शास्त्रीजी 'शदाद्वैतालंकार' (प्रतापगढ) से सहाय्य लिया गया है । तदर्थ यह सम्पादक उक्त युगल मूर्ति का स्नेद-भाभारी है । + इनका जीवन परिचय । ईशावास्यमनस्विनी' टीका में प्रकाशित किया गया है।

२६
सम्पादन में वर्ती गई सावधानी के बाद भी प्रस्तुत वेदान्त जैसे जटिल
विषय में अनवधानता-घश कुछ त्रुटिया संभव है-जिन्हें मनीषि-वर्ग क्षमा
कर सकता है । 'कालोझयं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी' उस उक्ति को सन्मुख
रखकर भी वर्तमान कालिक परिस्थिति के द्रष्टा हम जैसे भगवदिच्छा से अनभिज्ञ
व्यकियों को यह कहना ही पता है कि-शु. सम्प्रदाय का अप्रकाशित
साहित्य मूल और भाषान्तरों के रूप में जितनी शीघ्रता से प्रकाशित हो जाय
उतना ही हम अनुयायियों का कल्याण होगा।
कल्याणकारक श्रीहरि ही-
'तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तम.
नाशयात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता'
की उक्ति से हमें प्रेरित करें, और हम अनुकूल समय परिस्थिति एवं
साहाय्य की समुपलब्धि से भगवन्नामात्मक साहित्य-सेवा में प्रवृत्त होते रहें ।
इति शम् ।
श्रीधैठकजी मंदिर, बड़ौदा।
विधेय
पो. कण्ठमणिशास्त्री
प्र. भाद.शु. १५,
संचालक-विद्याविभाग
सं. २०१२
कांकरोली-( राजस्थान)
Fa

।। श्रीकृष्णाय नमः ॥ “ केनोपनिषद् " पो. श्रीबालकृष्णशास्त्रिविरचित- मनस्विनी" व्याख्या-सहिता - प्रथमः खण्डः। (शान्ति-पाठ ) हरिः ॐ । आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्, प्राणश्चक्षुः, श्चोत्रम्, अथो बल मिन्द्रियाणि सर्वाणि, सर्व ब्रह्मोपनिपदं, माहं ब्रह्म निगकुर्याम् , मा मा ब्रह्म निराकरोत् , अनिराकरणमस्तु, अनिरा- करणमस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु, ते मयि सन्तु ॥ १ ॥ ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।। ( मङ्गलाचरणम् ) श्रीकृष्णं परमानन्दमाचार्यान्वल्लमाभिधान् । प्रभु श्रीविठ्ठलं नत्वा गुरुश्चापि कृपानिधिम् ॥ १ ॥ तद्वागमृत-शेपेण लब्धप्रज्ञोऽस्मि मन्दधीः । हासाय विदुषां व्याख्यामल्पामुपनिपनमनः - ॥२॥ विज्ञापयन्तीमुद्वृत्तां संगृह्वामि, बुधैरिह - धाष्टय मदीयं क्षन्तव्यं, महान्तो हि दयालवः ।। ३ ।।

२] केनोपनिषद (उपक्रम-कारिकाः ) भक्तिर्हि सर्ववेदार्थस्तस्माद्देदान्त-शब्दभाक् । तद्वाचकत्वाद् ग्रन्थोऽपि तन्नाम्ना व्यपदिश्यते ॥ ४ ॥ ब्रह्मोपकण्ठे जीवस्य नितरां कोश-शीर्णता ।। ब्रह्मोपकण्ठे नितरां प्रापण वा यया भवेत् ।। रूपावसादो नितरां समीपे ब्रह्मणो यया ॥५॥ सा भक्तिरेवोपनिषद् ग्रन्योप्यत्र तु निर्णयः ॥ भक्त्यैव परमश्रेयो जीवानां नान्यथेति हि ॥ ६ ॥ अस्य जीवस्य निर्गुणब्रह्म-सेवनयैवानायासेन परमपुरुषार्थ- सिद्विरित्युपनिषत्सिद्धान्तः । स चास्यामुपनिषदि- अन्तिमखण्ड उपपादितो भविष्यति देव-वृत्तान्तेनेति, साऽऽप्या यदि निगुणस्य ब्रह्मणः सकलेन्द्रियप्रवृत्ति-विषयत्व स्यात्। नत्वेवम्, तस्य वृत्त्यविषय- त्वस्य शास्त्रे राद्धान्तितत्वात् । ननु यहि सर्वथाऽविषयत्वं स्याद् ब्रह्मणः, तर्हि प्रमाणाबलम्बिनी भक्तिरुच्छिन्ना स्यात् ? तथा च " कश्चिद्धीर प्रत्यगात्मानमैक्षदा- वृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्। मनसैव तदातव्यम्० " नेह नानास्ति किञ्चन०" इत्यादीनि श्रुतिवचनानि पीडयेरन् । यद्येते- षां वाधाभूदिति साध्वसम् ? तर्हि - उभयविधवाक्य-सङ्गतये निर्धर्मत्वं सधर्मत्वं च ब्रह्मणि मन्तव्यम् । न चैवम्-" निष्कलं निष्क्रिय शान्तं निरवा निरञ्जनम्" इति श्रुति-बाधाभयात् । एवञ्च धर्मा ब्रह्मणि न वास्तविकाः १ पल विशरणगत्यवसादनपु. इति प्रसिद्धत्वादर्थत्रयानुसन्धानेनोपनिषच्छन्दा- त्रिविधोऽयों प्रन्धकर्तुरभिमतः ।

मनस्विनी [३ 'शाखारुन्धती - न्यायेन ' शुद्धस्य परिचायन-प्रयोजनकत्वात् , इति वृत्यविषयत्वं, पूर्वाभिः श्रुतिभिश्च वृत्तिविषयत्वञ्च निर्धर्मक- स्यैवायाति । अथवा किन्नु-एतेनाकर्तव्यत्वेन व्यवस्थापितायां भक्तो ब्रह्मणि कारणानां प्रवृत्तिर्यन्न भवति, तत्कि प्रतिवन्धकम ? तत्र तत्र प्रवृत्यर्थ प्रतिवन्धकोपमर्दन-क्षम किश्चिदुत्तेजकं गवेषणीयम , यत्साहाय्येन देवताधिष्ठितानीन्द्रियाणि ब्रह्मणि प्रवर्तन्ते, यदभावे च न प्रवर्तन्ते । अन्यत्र च प्रवर्तन्ते, वक्तव्यमेतत् ? किञ्चेदं स्वाभाविकम् - यदिन्द्रियाणीष्टानिष्टेषु साधारण्येन प्रवर्तन्ते । तत्कोत्राभ्युपायो येनेष्टं प्रत्येव तेषां प्रवृत्तिरनिष्टं प्रति च न भवति । तत्र चेदधिष्ठातारं मनुते ? तहि तस्य स्वातन्त्र्य व्याख्येयम् । अथेन्द्रियाणां भेदो, येनैषा पवस्था कल्प्येत ? तर्हि प्रमाणं वक्तव्यम् । अथ यदि प्रमाणावलम्विना निर्गुणमपि ब्रह्म क्रियाज्ञानविषयं मन्येत ? तर्हि " यतो वाच० " इति श्रुतिप्राति- कृल्यम। अन्यदीयधर्माणां ब्रह्मणि चेदारोपेण समर्थना ? तर्हि तस्यासेव्यता । 'शुक्ति रजत 'मिति मत्वा स्वाभीष्ट-सिद्धयर्थमुपयु- भवत्यवश्यमुपहास्यता, तद्वदुपहासभया- त्तथा ज्ञातव्यम। । जानस्य भ्रान्तस्य इत्येवमसम्भावना-विपरीत-भावनाविष्टमानसः कश्चि- दन्तेवामी - आचार्यमुपसन्नः प्रश्नमुग्वेन निर्गुणब्रह्मणस्तत्वं, तत्से- वनातत्वञ्च वुभुत्सुराह:- " केनेपितं पतति प्रेपितं मनः, केन प्रागः प्रथमः प्रति युक्तः ॥ केनेपितां वाचमिमां वदन्ति, चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥१॥ अत्रायभिसन्धिः ब्रह्म-तत्वज्ञानार्थ सतां सङ्गोऽपेक्ष्यते, यतः शुद्धेन मनना ब्रह्मामव्यं मननद्वारा । मननन्तु वुद्या सर्व-निर्णये सति भवति ।

- ४] कनोपनिषद तन्नाशको दुःसङ्गः। तस्य परिहारः सतां सतेनैव । तत्रावश्यं कर्तव्ये सम्बन्धित्वेन व्यपदिष्टाः सन्त आचार्या एव । तेषु श्रोत्रिय- तया ब्रह्मनिष्ठतया च सत्वस्य वक्तुं शक्यत्वात् । तद्विज्ञानार्थ स गुरुमेवाभिगच्छेत्समित्पाणि श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठ "मिति श्रुति राह । तेषामुपसत्तिः पूर्व कर्तव्या, तदसिद्धौ प्रतिवन्धकानि त्रीणि भवन्ति :-अनृजुता, असूयकता, अयतता च । अत्रानृजुता-बाधो गुरुषु प्रणिपातेन भवति, असूयकता-बाधस्तत्सेवया, अयतता-बाधश्च तान्प्रति प्रश्नेनेति । तत्राप्येतद्धीर्घकालादरनैरन्तर्येणावर्तनीयमिति- सम्प्रदाय प्रवर्त- यितुं परिप्रश्नेनैव शास्त्र-प्रवृत्तिरुच्यते । अत्रागमो भवति न नरेणावरेण प्रोक्त एष सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमान', अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्तिक " " नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ०" आतृणत्यवितथेन कौँ " " अदुःखं कुर्वन्नमृतं सम्पयच्छन्० " तस्मै न द्रुह्येत्कतमञ्चनाह०" इति। " आचार्य मां विजानीया- नावमन्येत कर्हिचित् , न मर्त्यबुद्धया सूयेत सर्वदेवमयो हि सः इति च स्मृतिः। अथ व्याख्यास्यमानाया उपनिषद इयं प्राथमिकी पद- सन्ततिर्भवति-'केनेषित 'मित्यादि एवमत्र श्लोका भवन्ति :- चतुर्णामपि वेदानां विशिष्टाऽर्थों हरेभजिः । सोऽथवा सेवमानानां चतुर्वर्गात्मको मतः ॥ ७ ॥ अथवा सेवना-मार्गे मानमेये च साधनम् । फलं, बिना नात्मनास्ति - इति खण्डचतुष्टम् ॥ ८ ॥ "" तन्मन्ये पितरं मातरश्च० मनस्विनी [५ विभक्तमत्र शास्त्रे हि गूढभावसमन्विते । काण्डद्वयात्मका वेदा अष्टाधा ते विहागताः - ॥ ९ ॥ प्रमाणभाव सर्वेपामुपजीव्यतयोत्तमम् । बाह्यमाभ्यन्तरीयश्चेत्येवमष्टविधं, यतः - ॥१०॥ अलौकिकेन्द्रियं ब्रह्म, प्रमाणं लायखण्डके । अतोऽष्टौ प्रकृता मन्त्रास्सर्वसन्देह-वारकाः । प्रश्न आधन पद्येन, प्रतिवाक्यं तु सप्तभिः ॥११॥ परिप्रश्नफलस्योपदेशस्योपजीव्ये प्रणिपातः, सेवा चेति । ते अत्राक्षिप्ते भवतः। प्रयोजकप्रश्नेनोच्छृङ्खलं स्वातत्र्यं शुभ्रपुराह- भक्त्या प्रसन्नं ब्रह्म मर्यादां न सहते इति- ( मनः) उच्छृखलं भवतीति केनेषितं पतति प्रेषितं मन' इति (प्रश्नः) अयं भाव. - 'मानाधीना हि मेयस्य सिद्धि 'रिति प्रत्यक्षमेव प्रमाणं सर्वोपजीव्यत्वात् । तस्याप्युपजीव्यं मन इति प्ररने (मनः) पूर्व मुपक्षिप्यते । तथा मन एव मनुष्याणां कारणं वन्धमोक्षयो." इति बन्धमोक्ष-कारणपि भवति । तथाद्यागमः- " यस्त्वविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा मदा। तस्येन्द्रि- याण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः " । तथा-" यस्तु विज्ञान वान्भवति युक्तेन मनसा सदा, तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव साग्थेः " इति । तस्य प्राणाधीनत्वान्न स्वातन्त्र्यम् । अनागमो भवति - अथ ह प्राण उच्चिक्रमिपन्त्य यथा सुहयः पड्वीश-शक़ संखिदेदेवमितरान्प्राणान्समखिदत्तं हाभियमेत्योचुर्भगवन्नेधित्वं नः श्रेष्ठोऽसि मोत्क्रमी "रिति ।

केनोपनिषद मनोवागादिपूभयत्र प्राण-सम्बन्ध इति वागादिभ्य' पूर्वमुक्तो मनसोऽनन्तरं 'मध्यमणि-न्यायेन'। तथा सर्वस्य व्यवहारस्य वागधीनत्वम् । घाचोक्तस्य पूर्व दर्शनेच्छाऽथ च श्रवणेच्छा भवति, (इति) चक्षु श्रोत्राभ्यां पूर्वा वागुक्ता । तदत्र निगमः- " यद्वै वाङ् नाभविष्यन्न धर्मों नाधर्मों व्यज्ञापयिष्यन्न सत्य नानृतं न माधु नासाधु न हृदयज्ञो नाहृदयज्ञो वागेवैतत्सर्व विज्ञापयती "ति । तथा - वाचोक्तस्यार्थस्य सत्यत्वज्ञाने प्रथम साधनं चक्षुरेवेति श्रोत्रात्पूर्व चक्षुरुक्तम् । चक्षुषा वै पश्यन्तमाहुरद्राक्षीरिति स आहाद्राक्षमिति तत्सत्य भवति ' । इति तत्र निगमो भवति- तथा चक्षुषाऽदर्शनेनासन्तोषे श्रुत्वा सन्तोषं जनयति, इति चक्षुषोऽनन्तरं श्रोत्रमिति, मनो हि न स्वतन्त्रं करणत्वात् , छेदनार्थ वाशीवत् । प्रग्रहत्वेन निरूपणाच्च । “बुद्धिन्तु सारथि विद्धि मन' प्रग्रहमेव चे "त्यागमो भवति । यत सर्वागीन्द्रियाणि मनस्या- यत्तानि यथा, तथा मनोऽपि कस्मिश्चिदधिभवितुमर्हति । ननु प्राणाधीनत्व, वुद्धयधीनत्वं, वात्माधीनत्वमास्तामिति चेन्न- अत्रैव प्राणस्थापि मनोवत्पारतन्त्र्य-विचारणया तत्प्रेरकस्य पृच्छा-विषयत्वेन प्रेर्यत्वात् । नहि भिक्षुके भिक्षुकान्तरस्याधिपत्यं संभवदुक्तिकम् । नापि वुद्धयधीनत्वम् -" आत्मान रथिनं विद्वि शरीरं रथमेव तु, बुद्धिं तु सारथिं विद्धि०" इति श्रुतौ बुद्धरात्मा- धीनत्वेन प्रतिपादितन्यायेन समाधेः कर्तुं शक्यत्वात् । नाप्यात्मा- धीनत्वम् :- तस्यापि परन्त्रत्वादन्यथा स्वर्गनरक-भोगोऽस्य न भवेत । आत्माप्यनीशः सुखदु.ख - देतो "रिति हि श्रुतिः । तस्मात्सिद्वमेतत् :--'केनेषितं पतति प्रेपितं मन' इति । - मनस्विनी [७ अयं भावः '" सत्य ज्ञानमानन्दं ब्रह्ये"ति श्रुतौ सत्ताज्ञानानन्दख्या स्त्रयो धर्मा अभिहिताः, तत्र कर्मकर्तृभिः सत्तावदेव ब्रह्म प्राप्यम । प्राप्ते ब्रह्मणि तेषां भावनावशात्सत्तांश एव भासतेऽनधिकारित्वात् , अन्यद इयं न भासते । तथा ज्ञानिनामपि तत्र ज्ञानांश एव भासते, आनन्दांशो न भासतेऽनधिकारित्वादेवेति-तैश्चिन्मात्रं ब्रह्म प्राप्यम। तत्र यथा सत्ताचिन्मात्रयो. प्राप्ती कर्मज्ञाने - अङ्गे, तथानन्दमात्रस्य ब्रह्मणः प्राप्ती केनचित्साधनेन भाव्यम् ? न तद्भक्तेरन्यद भवितु मर्हति । सा चानन्दमात्रे चेतःश्रवणात्मिका, तञ्च चेतसस्तत्रैव पतनं भवति । इति तत्र प्रयोजकमन्तरा तत्कासिद्धिरिति गृढमर्थ व्यञ्जयन्पृच्छति । कामादिभिलिगैरेवं ज्ञायते - मनोऽस्तीति । तत्केनेषित, कैन प्रेरितं सत्प्रेपित-प्रेष्ठम् । पतनमत्र वैकल्यप्रयुक्त आश्रित देश-स्थितिफलको व्यापारविशेषः, तदाश्रय. पततीत्युच्यते । एवमुक्त्याऽन्यत्राप्रवृत्ति सूचिता । प्रति पतति। सत्तामात्रमनिष्ट, चिन्मात्रमिष्टमानन्दमात्रं हि 'प्रेष्ट' तत् । ईषिरत्र प्रेरणायां वर्तते । मनो हि क्रियाज्ञानोमयशक्तिमदिति, क्रियाशक्तिमत्ता- मस्य जानाति । ‘कने 'ति स्वातन्त्र्यवान्पृच्छा-विषयो भवति । तद ब्रह्म, इतरता ब्रह्मेति चेन्न, सधर्मकत्वापत्तेः, मन आदिन्यायेन प्रेर्यत्वापत्तेश्च । यदि च यथाकथञ्चित् प्रेरकत्वमेव मन्यते तर्हि कुतो न सर्वेषां सेवायां मन ? अथ यदि बाधकं तहिं कुतो न वैप- रीत्यम् ? ये प्रवर्तन्ते ते वाधकेन निरुहाः स्युः । अथ ये न प्रवर्तन्ते तेऽनिरुहास्युरिति । तत्र च नियामकं वक्तव्यं स्यात् । यद्यपि चन्द्रादयोऽधिष्ठायो देवतास्तत्तदिन्द्रियाणां मंभवन्ति, येन समाधिः सियेत्तथापि- आत्मवत तास्वपि पारतन्न्यमेव मन्येत, इतरच्चन्त । वैदे ब्रह्मातिरिक्तस्याभावात. "आत्मैवेदमन आसी" दिति हि श्रुतिः ।

८] केनोपनिषद् अथ यदि किञ्चित्प्रवर्तक स्वतन्त्रमेवैतदिति ? तर्हि-" स यदा मनसा मनस्यति मन्त्रानधीयीयेत्यथाधीते कर्माणि कुर्वी येत्यथ कुरुते, पुत्राँश्च पश्वेच्छेयेत्यथेच्छते." इतिवद् ब्रह्मण्यपि प्रवर्तेत ? तथा च " यतो वाचो निवर्तन्ते, अप्राप्य मनसा सहे"ति श्रुतिकोपः कथमपनेय ? " मनसैवेतदाप्तव्य "मिति श्रुतिस्तु सगुणब्रह्मविषया भवति, इति निर्गुण-ब्रह्मसेवना कथम् ? तद भावाच्च कथं पुरुषार्थः ? इत्यवश्य मनसः प्रेरकमपेक्षितम् । अथ कथञ्चित्समाधये प्रतिबन्धकमेव मन्यते तहिं सर्वतो बल वत्प्रतिबन्धकमसुराः । यत एतच्छ्तम् । मन उपक्रम्य- " तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तेनोमयं संकल्पयते संकल्पनीयश्चासंकल्पनीयन, पाप्मना ह्येतद्विद्व'मिति । परमुत्तेजकेन प्रतिबन्धकनाश-दर्शना- त्पूर्वपक्ष एवावतिष्ठते। तथा 'केन प्राण प्रथमः प्रति युक्त' इत्यपि । ननु कथमेतदुपगतं प्राणोऽस्थतन्त्र इति ? अस्त्यत्रास्य स्वातन्त्र्ये शब्दः- सुप्तेषु वागादिषु प्राण एको मृत्युनाप्तः, प्राणः संवर्गों वागादीन्संवृक्ते, प्राण इतरान्रक्षति मातेव पुत्रानिति' । अत्र प्राणस्य मृत्यु-संसर्ग-शून्यता, इतर-संग्रसितृता चोक्ता । इति चेन्न- त्रिरुन्नतं स्थाप्य सम शरीर हृदीन्द्रियाणि मनसा सन्निवेश्य, ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान्स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि"। "प्राणान्प्रपीडयेह स युक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छसीतेति निगमे-इन्द्रियाणां हृदि सन्निवेशेन शासनवत्प्राणानामायासेन पीडनतया तच्छासनस्यापि श्रावणान्मनोवत्पारसध्यमस्त्येवेति । 'प्रथमः'-प्रतमः प्रकृष्टतमो भवति । अस्थ्यादीनि निक- टानि, प्रकृष्टानीन्द्रियाणि, प्रकृष्टतरं मन प्रकृष्टतमः प्राण । इति जीव-परिकरेषु प्राणस्य मुख्यामात्य-स्थानीयत्वात्सर्वेभ्य प्राणेभ्यो गुणाधिकत्वात्प्राथम्यम् । अत्र च श्रुतिः यथावा अरा इव स्थनामी [समर्पिता एवम स्मिन् ] प्राणे सर्व प्रतिष्ठितम्० " अहमेवैतत्पञ्चधात्मानं प्रविभज्यैतद्वाणमत्र- स प्राण मनस्विनी [९ पृभ्य विधारयामि" इति पाणञ्चोपक्रम्य -" तस्मिन्नुत्क्रामत्यथै ते मर्व एवोत्क्रामन्ति, तस्मिंश्च पतिछपाने मर्व एव प्रतिष्ठन्ते " इति च । केन युक्तः ' केन योजितः । राजयुध्ववत्. अयमन्त विन- ण्यों भवति । प्रेरितः प्रेषितं प्रति प्रेति । स्वनिर्वाहार्थ महतोऽवलम्बः प्रायणं, तत्करोति । सर्वाणि वस्तूनि मृत्युना व्याप्तानि-इति न प्राणपोपकाणि । आनन्दमात्रं तु तथा भवति । तथा चात्रागम.- " को ह्येवान्यात्कः प्राण्याद्यदेए आकाश आनन्दो न स्या' दिति । अनेन भस्त्राच्छ्वासो व्यावर्तितः-'केनः प्राणः प्रथम. ति युक्त' इति एवं ' केनेपिता वाचमिमां वदन्ति' इति । दूतीरिव त्वं मनसो ऽसि, इति । ' मनः पूर्वरूपं वागुत्तररूप ' मिनि च श्रुत्या मनोनु- विधायिनो, व्यवहार-जनकं इन्द्रियं वाग् इति स्वतात्पर्यवचने- व्यापाराविष्टा साधनम् । यदि स्वतात्पर्य नाविष्कुर्याद् व्यवहार इच्छिद्येत । उच्चारित. शब्द. प्रत्यायको भवति नानुच्चारित इति । अप आगमः- यद्वै वाड़ नाभविष्यन्नधर्मो नाधर्मों व्यज्ञापयिष्यन्न मत्यं नानृतं, न साधु नासाधु, न हृदयज्ञो नाहृदयज्ञो वागेवैतत्सर्व विज्ञापयति' इति । तथा च 'केनेपिनां वाचमिमां वदन्ति' इति केनेपिता' अत इयं वाच वदन्ति, व्यक्तं शब्दं करोति । कर्मार्थी धात्वर्थे निलीन इति हितोयार्थोऽत्र, प्रथमार्थः फर्ता । कर्तृक्रिययाविभक्तिवचन व्यत्ययो छान्दसौ। अपर आह-केनेपिता एपा या वदन्ति' भवति । उद्यते योऽर्थः मः वद, बदतेयंक्तवाफकर्मण. कर्मसाधनो राहुल- काहिच् । कथनीयोऽर्थ उच्यते. घद' इति, तस्याः 'अन्ति' समीपे भवति । यावता नार्थममिधत्ते तावतार्थ इयं वाग् विप्रकृष्णा भवति । इत्येवमुच्यते-' केनेपितां वाचमिमां वदन्तोनि कार्येणानु- .

१०] केनोपनिषद मितां वाचं प्रत्यक्षां करोति । उपदेशकाल आचार्य ब्रह्मावेशाद ब्रह्म- सान्निध्यादलौकिकप्रत्यक्षेण तथा । अतएवालौकिकः प्रयोगः । शास्त्रदृष्ट्या उपदेश" इत्यत्र चेदमुपपादितवन्त आचार्या.। सर्व वस्तु पापानुषक्तमिति कथनार्ह न भवति । आनन्दमात्र- न्त्वपहतपाप्मत्वेन तथा भवति, तत्रास्याप्रवृतिः कस्य प्रेरणयेति । तथा 'चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति' इति । दीव्यतिरयमत्र कान्ति- कर्मा । तेन "स वै नैव रेमे," " तस्मादेकाकी न रमते स द्वितीय- स हैतावानास," यथा स्त्रीपुमांसौ सम्परिष्वक्तौ इति श्रुतौ स्वक्रीडा-सिद्धये येच्छा, तद्वान् देवः अस्ति कश्चनानु- मानेन सामान्यतो ज्ञातः । यः क्रीडार्थ जगनिमे। उच्चनीचभाव- मन्तरा च क्रीडा रसाधारिका न भवति, इति तत्र जगति उच्च- नीचतां कर्तुं तेनेयमिन्द्रियाणां सृष्टिः कृता । तेषां चेत्स्वातन्न्यं स्या- क्रीडा न सिद्धयेत् , इति तानि परतन्त्राणि कृतानि । इति कदाचि- स्वोपयोगे कुर्यात्तदा सिद्धयेदपि भक्तिमार्गः, परं सन्दिद्यत इति प्रश्नः । मैच्छत," " अनेनैव न्यायेन पूर्वत्र 'केने' ति यत्तृतीयया निर्दिष्टं, तत्र देवेनेति- अध्याहार्यम् । एवञ्चैकवाक्यता भवति । अयमत्रभाव: स्वक्रीडार्थ सृष्टिपक्ष ब्रह्मणो देवत्वेन सृष्टानामिन्द्रियाणा कदाचित्स्वार्थमप्युपयोगः कर्तुं शक्यते, परं यो धर्मों यत्र सन्नि- वेशितस्तेन धर्मेण सहितानां तेषां सः । श्रुते वा दृष्टे वा वस्तुनि प्रवृत्तिर्वा निवृत्तिर्वा भवति । प्रवृत्तौ सुखस्य प्रयोजकता कर्तृ- निष्ठधर्मश्च करणे समायाति, जीवानां प्रवृत्त्यर्थमपेक्षितः, अन्यथा जीवास्तत्र न प्रवते रन् । तत्र ब्रह्मणि, आनन्दाख्यो धर्म सम्बादार्थम् । स मनसि अशा- स्मको ह्यायाति- इति-आनन्देऽस्य करणता भवति । तथात्र श्रुतिः- ' मनसा वै सम्राट् स्त्रियमभिहार्यते, तस्यां प्रतिरूप. पुत्रो जायते स आनन्द इति । १

मनम्विनी
[११
तथा प्रियतापि भवति ब्रह्मधर्म.मः प्राणे जीवानां प्रवृत्त्यर्थमपे-
क्षित. } अन्यजीव-प्रवृत्तिस्तत्र न स्यादिति मः, तदर्थमंशात्मकः
ममायाति । तत्र प्राणस्य करणता। अत्रापि श्रुति.-"प्राणस्य वै
सम्नाट कामायाज्यं याजयति, अप्रतिगृह्यस्य प्रतिगृह्वाति । अपि तत्र
वधाशङ्क भवति, यां दिशमेति प्राणस्यैव कामायेति ।
एवमेव प्रज्ञान ब्रह्मधर्मः । स जीवप्रवृत्यर्थमपेक्षितः । अन्य-
जीवप्रवृत्तिन स्यात्म , तदर्थमंशात्मको वाचि समायाति, तत्र वाचः
करणता।
सम्राट् वन्धु' प्रज्ञायते " "ऋग्वेदो यजुर्वेदः
मामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराण-विद्या उपनिषदः श्लोकाः
मृत्राण्यनुव्याख्यानानि,” इष्ट हुतमाशितं पायितम,"
अय
च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि भूतानि वाचव प्रशायन्ते" । इति ।
मत्यता ब्रह्मधर्मः, स जीव-प्रवृत्त्यर्थमपेक्षितः । अन्यजीव-प्रवृत्ति
न स्यादिति म, तदर्थमंशात्मकश्चक्षुपि समायाति । तत्र चक्षुषः
करणता | "चक्षुषा वै पश्यन्तमाहुरद्राक्षीरिति, म आहाद्राक्षमिति-
तत्सत्य भवति"। इति निगमः ।
वाचा
वै
"
एवमेवानन्तता ब्रह्मधर्मः स जीव-प्रवृत्यर्थमपेक्षित , अन्यजीव-
प्रवृत्तिर्न स्यादिति सः, तदर्थमंशात्मक श्रोत्रे निवेशितः । तत्र
श्रोत्रस्य करणता ।
" तस्माद मम्राट् अपि
काञ्चन दिश
गच्छति नैवास्या अन्त गच्छति नैवास्या अन्नं गच्छति,"
अनन्ता हि दिशो, दिशो वै श्रोत्र" मिति निगमो भवति ।
एवञ्च श्रोत्रेण गुणश्रवणेन कस्यापि वस्तुनोऽलं न याति,
तथानन्तस्य ब्रह्मणः श्रोत्रेण श्रवणेऽन्तं न याति । तस्य सत्यत्वार्थ-
श्चक्षुरपेक्षितम । चक्षुषा दृष्टस्यैव भजनेऽभिरुचिरुदेति । जातेऽपि
दर्शने ज्ञानं विना नाभिरुचिरुदेति-इति प्रज्ञानार्थ वागपेक्षिता ।
प्रज्ञातेऽपि यदि प्रियत्वं न भासेत, तद्यपि नाभिरुचि स्यादिति
प्राणोऽपेक्षितः । तथा प्रियत्वे भासिते यद्यानन्दो न स्यात्तद्यपि
न स्यादभिरुचिरिति मन अपेक्षितम् । एवममिरुचिर्यथा बईते
तथातथा सेवना मियति- इति न कश्चिदपिसिहान्त-विगेव
आयाति ॥१॥

१२] केनोपनिषद परमत्राप्तकामस्य ब्रह्मणः किमपेक्षितं ? येन स्वोपयोगे सर्वेन्द्रि- याणि कुर्यादिति दृढतरनिश्चयाभावेन सन्देहस्थितेः प्रश्नः कर्तव्यो भवति- इति कृतः । कृतस्य प्रश्नस्योत्तर आचार्येण ब्रह्म वक्तव्यम् , तन्मया श्रुति षु मन आदि प्रेरकं ब्रह्म विरोधाभावाय सगुणमेव मन्त- व्यम् १ तथा च सगुणं ब्रह्म सेवना-विषयो भविष्यति, निर्गुणस्य सर्वव्यवहारातीतत्वेन सेवना-विषयत्वाभावात् । इति तेन न कथञ्चिदपि परमपुरुषार्थ सिद्धयति, भक्तिविषयस्याभावात् । इति प्रश्न, उत्तरमाहाचार्य - "श्रोत्रस्य श्रोत्रं, मनपो मनो यद् , वाचो ह वाचं, स उ प्राणस्य प्राण', चक्षुषश्चक्षुः । अतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति " ॥२ । तवार्य प्रश्नो ब्रह्म-विषये, उच्छृङ्खल-स्वातन्येऽस्य ताप्तय॑म् । उच्छृङ्खलानां सर्वधर्माणां तत्रैव समावेशात् । ब्रह्म तावद्वेदैकसमधि- गम्यं, न प्रमाणान्तरगम्यम् । अविरुद्धयोः स्मृतियोगिप्रत्यक्षयोः सन्देहवारकत्वमेव, न प्रभितिजनकत्वम् । अत्र च श्रुतिः-"तन्न्यौ- पनिषदं पुरुष पृच्छामि” इति । अन्यस्य प्रमाणस्य प्राक्प्रवृत्ती वेदानामधिगतार्थगन्तृत्वात्प्रामाण्य-भङ्गः । वेदभिन्नानां प्रमाणानां प्रत्यक्षोपजीवकत्वेन, तत्प्रामाण्यस्य गुणसापेक्षतया, गुणस्य च सत्वजन्यत्वेन सर्वेषो सत्यसापेक्षत्वात् , सत्व-प्रवृत्तेश्च वेदोक्तसाधनानुष्ठानेन तुष्टाद् ब्रह्मण. सकाशादेव मवनात्। अत्र च निगम -" महान्प्रभुवै पुरुष सत्वस्यैष प्रवर्तकः " इति । तेन सर्वेषां प्रमाणानां वेदोपजीवकत्वमस्ति, वेदद्वारव ब्रह्म जिज्ञास्यम् । अतएव श्रुतिराह " नावेदविन्मनुते तं "सर्वव्यापिनमात्मानं क्षीरे सर्पिरिवार्पितम् आत्म- विद्यातपोमलं तहह्मोपनिषत्पर" मिति । रहन्तम् " मनस्विनी । १३ तथा स ईक्षा- वेदविचारे तु - " तमेव भान्तमनुभाति सर्व तस्य भासा सर्वमिदं विभाति' । न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मन ” इति श्रुत्या य न स्पृशन्ति न विदुर्मनो वुद्धीन्द्रियासवः” इति स्मृन्या च यथा स्वप्रकाशत्वेन, मनोविषयत्वेन प्रमाणाविषयत्वं सर्वप्रमाणानु ग्राहकन्वञ्चास्ति, तथा “ सदेव लोम्येदमग्र आसीद "" एकमेवा- द्वितीय मित्युपक्रम्य " तदेक्षत वहु स्यां प्रजायेयेति चक्र" एतस्माजायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणिचे "ति श्रुत्या, इद- मेव करिष्यामीत्यध्यवसायात्मकालोचनरूपयेक्षया ब्रह्मणः सर्वप्रमा- णगोचरता महिमबोधिका। समानवलयोश्च न वाध्यवाधकमावः. न चात्राध्यारोपवादन्यायावतारः। अध्यारोपविषयांशेऽप्रामाण्य- प्रमत्या सर्वा शेऽपि तत्प्रसक्त्या वेदवैयात, विरुद्वधर्माणां ब्रह्मणि माहात्म्यवोधनार्थत्वाद भूषणत्वं न तु दृषणत्वम् । तदत्र श्रुति'-- " तदेजति तन्नजति तदरे तद्वन्तिके" अन्यदेव तद्विदिता- दयो अविदितादधी" ति । तस्मात्सर्वव्यवहारातीतोऽप्यह लोक- मृष्टिद्वारा व्यवहार्यो भविष्यामीत्यच्छन् । तेन न प्रमाणमाधन- वैयर्थ्यम एतावता प्रमाणवलेनाविषय , स्वेच्छया विषयः। इति ब्रह्मणि सिन्हम, स्वतन्त्रत्वात् । . तथा च:- "कश्चिहीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ' " मनमवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किञ्चन" इत्यादि श्रुति-वचनाना न वाधा । सापि “न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मन' इत्यादीनाम । तथा मधर्मकनिधर्मकत्वोक्त्योरपि- अप्राकृतप्राकृत गुण-नाहित्यराहित्य-तामर्यकन्वमनो न विगंध., इति न पूर्व पक्षावकाश.। तथा च २४ ] केनोपनिषद . आत्मा। यत्पुनलौकिकप्रत्यक्ष तत्मगुणमिति निर्गुणे ब्रह्मणि न प्रवर्तते, मिग्राहकमानेन तत्सि द्वमन्यथा- उत्तेजकाभावविशिष्टप्रतिवन्ध- काभा वैशिष्टय-कल्पने गौरवं स्यात् । तदर्थमेव वेदे साधनानि निरू- पितानि, तेनैव प्रत्यक्षेणेष्ट प्रति प्रवृत्तिः क्रियते, तस्य च ब्रह्माभिन्नत्वा- त्सकलकार्यक्षमतयाऽनवस्थादोषो नास्पद लभते । अतएव परा- ञ्चि खानि व्यतृणत स्वयभृस्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्तरात्मन्" इति श्रुतिः पराचां खाना स्वयभू-कृत विवरणमाह । सगुणानीन्द्रियाण्य- लौकिकेन्द्रियाणामधिष्ठानानि भवन्ति । एतेषु तेषां ब्रह्मवरणकाल एष समावेशः। तदत्र निगमः- नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन, यमे- वैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनू स्वा” मिति तेषु योग्यताये सत्येन लभ्यस्तपसा यष आत्मा सम्यग झानेन ब्रह्मचर्येण नित्य "मित्यादिषु सत्यतपआदीनि ( साधनानि ) प्रोक्तानि । एवञ्चाय श्रुत्यर्थों भवति :- " सम प्लुषिणा समो मशकेन समो नागेन सम पमिस्त्रिलोकै" इति श्रुति सर्वसमत्वमाह ब्रह्मणः, तथा तत्तदाकारेण सर्वाधिदैविकत्वम । तेनाधिदैविक यच्छ्रोत्ररूप मनआदिरूपञ्च ब्रह्म तन्मनआदीनां प्रेरकम । अतएव श्रुत्यन्तरम प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुः श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो ये विदुः," "" ते निचिक्युव्रह्म पुराणमग्य” मिति । आधिदैविक- व्यतिरेकेणाधिभौतिकात्केवलान्न कार्यसिद्धिरिति सिद्धान्त । “स उ मर्वस्य श्रोत्रस्य श्रोत्र "मिति लोकवेदप्रसिद्वि-सूचनाय 'स'इति। तयतिरिक्तस्याधिदैविकत्व-व्युदासाय एवकारार्थक 'उ' शब्दः । तेन सर्वव्यवहारविषयता ब्रह्मणः सूचिताऽतो न भक्तिमार्गाच्छेदः। अत्रैव तादृशानां वचनानां चारितार्थ्यात् । ज्ञानमार्गे न, जीवस्याक्षरे लयादिन्द्रियाणाञ्च लयात् । यथा , तथा मनस्विनी [१५ 'श्रोत्र' मिति शृणोति यस्मात्तच्छोत्रम ।' श्रोत्रं क उ देवोयु- नक्ति' इति प्रश्नानुरूपमेतत् । तथा 'स उ मनसो मनो यत्' । 'यदि' ति सर्वत्र प्राप्नुवत् , प्रेषित वा । “सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः सर्वमिदमभ्यात्तः सर्व- मिद प्रशास्ति'इति हि श्रति । तेन लौकिकापेक्षया वैलक्षण्यमुक्तम् । यद्यपि मन क्रियाशक्तिमत्तथापि-" एतस्माज्ञायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च" इति श्रुतेः कारणधर्मा प्रायः कार्ये भवन्ति, इति न दोषः। 'मनसैवानुद्रष्टव्य' मिति श्रुतावपि, एतदेव मनो निरूपितम्। स उ वाचो ह वाचम-वाच इ दैवतमिति तस्येद मित्यण । शक्यं चानेन । श्वमांप्तादिमिरपि क्षुत्यति न्तुमिति वन्न दोपः । " वाच धेनुमुपासीते" तिश्रुतावेषैव वाड् निरूपिता । सर्वकाम-दोग्धृत्वानुत्वम् (तस्या)। तथा 'प्राणस्य प्राणः' । प्राण इति प्राणयति । "को ह्येवान्यात्क प्राण्याद्यदेष आकाश आनन्दी न स्या' दिति निगम । तथा चक्षुपश्चक्षुरिति । विचष्ट इति ‘स ईश्वत लोकान्नुसजा इति नत्र निगमः। अत्र ब्रह्मणः श्रोत्रमनोवाक्प्राणचस्पना निरूपणेन तन्वं, सवि- तृत्व, वरेण्यत्वं, भर्गस्त्वं, देवत्वं च यदुक्तं मन्त्रं. तदिह स्मारितम् । धिय: प्रेरकत्वं यत्पृष्टं तदुत्तीर्णम् । यतोऽयं पृच्छको धीमॉस्तस्य प्रेटनाऽऽत्मन्येव निश्चिता नान्यत्र । तेन सिद्धान्तिना सर्वेषामात्मभृते ब्रह्मणि प्रेटतां समर्थय्य प्रमाणरूपतामापन्नस्य तस्य तत्प्रत्येव प्रेरकत्वं सिद्धान्तिनम् । भजनं हि प्रमाणप्रमेय-सापेक्षमिति, लौकिकप्रमाणान्यलौकिके प्रमेये गन्तुं न समर्थानि-इति-अलौकिकान्युत्तानि । श्रोत्ररूपेणेश्वर्य- पत्ता, प्राणेन वीर्यवत्ता, वाचा यशस्विता. चक्षुपा श्रीमत्ता, मनसा ज्ञानिता वैराग्यवत्ता च द्योतिता । नन्वेवं सति सर्वसेव्यत्वं स्य द्वन्धमोक्षव्यवस्था चोच्छिद्यतेति- । ।

१६]
केनोपनिषद
इति ।
चेत्- अत्राह :-' अतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकायमृता भवन्ति'
तत्र धीरा अस्माल्लोकादतिमुच्य प्रेत्यामृता भवन्ति- इति
सम्बन्धः । तत्रेत्याक्षेपलभ्यम् । अधिकृता धीरा भवन्ति ये अस्मा-
ल्लोकादतिमुच्य प्रेत्य अमृताश्चेति । धीरा इति धियमीरयन्ति, ध्यान
बन्तो वा ब्रह्म-भक्ताः । अस्माल्लोकादतिमुच्य वर्तमाना: पुत्रैषणा
वित्तषणालोषणाभ्यो व्युत्यिता सात्विकाः प्रेत्य वर्तमानाः,
भवान्त संभवा । अमृता, न मृतं येषां ते । 'यस्य ब्रह्य च क्षत्रं चाभे
भवत ओदन . मृत्युर्यस्योपसेचन" मिति
श्रुत्युक्तया प्रणाल्या ब्रह्मो-
दन त्वं प्राप्ता दैवास्तेऽत्र भवन्ति, प्रभवन्ति भक्ताविति ।
तथा चैतादृश विशेषणविशिष्टानामेव ब्रह्य-सेवायां फल-
मुखाधिकार , इति न वन्धमोक्ष-ववस्थोच्छेदः । नापि ब्रह्म-सेवायां
सर्व-प्रवृत्तिरिति समाहितम् ।
अत्र प्रश्न-क्रमेणोत्तगनिरूपण इदं ताप्तर्यम :--
श्रवणादीन्याधिदैविकानि यदा, तदा फलम् । पूर्व ब्रह्य-
वाचकानां पदानां शक्ति-ताप्तर्य-निर्धारो ब्रह्मणि, ततो युक्तिभि
श्चिन्तनम्, ततो वचनम् । तान्येतानि-अन्योन्यनिर्वाहकाणि, एतेषा-
मुत्तरोत्तरमावृत्या दीर्घकालादरनैरन्तर्येण व्यसनसिद्धौ तहिना
स्थातुमशक्तौ प्राणेन प्राणनं भवति । तत्फलं- प्रादुर्भूतस्य भगवतो
ब्रह्मणो लावण्यामृत-पान नेत्राभ्यामिति ॥२॥
ननु किमर्थमन्यानि प्रमाणानि कल्प्यन्ते ? तत्र लौकिकेषु
प्रतिवन्धकोत्तेजकाभ्यामेव सर्वोपपत्तेरिति चेन्न लौकिकाना
प्रमाणानां तत्र प्रवृत्तिरेव नास्ति, तस्यां हि तथा कल्प्येत नत्वन्यथे
त्याह
न तत्र चक्षुर्गच्छति, न वाग्गच्छति, नो मनो,
न विझो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात् ।।
अन्यदेव तदिदितादथो अविदितादधि।
इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे " ॥ ३ ॥

मनस्विनी [१७ तत्र ब्रह्मणि चक्षु न गच्छति' । यद्यपि चक्षुषो ज्ञानशक्ति- मत्वमेव. तथापि तमुन्नामन्त प्राणोऽनृत्कामति प्राणमन- कामन्त सर्वे प्राणा अनृत्क्रामन्ति" इति श्रुताविन्द्रियाणां शक्तिः क्रियारूपा प्रतिपादिता, अतो गमनमप्युपपद्यते । “प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति" इति ज्ञानशक्तिमत्वम् । यतो लौकिकप्रमाणाना स्वत. पृथग्भृतेषु प्रमेयेषु प्रवृत्ति , अन्यथा तैः स्वरूपमपि गृह्येत । ब्रह्म नु चक्षुःस्वरूपभृतम् । “सर्व खल्विदं ब्रह्म, तजलान् इतिनिगमः" नन्दवं ब्रह्मणि कुतो न स्यादिति चेन्न-“परास्य शक्तिर्विवि- धंव श्रृयते स्वाभाविको ज्ञानवलक्रिया च' इति श्रुत्या तत्राचिन्त्या- नन्तशक्तिमत्वस्य वोधनादनवगाद्यमाहात्म्यस्याग्रे व्युत्पाद्यत्वाच्च । एवमेव वा तत्र वाडू न गच्छति, “ यतो वाचो नियन्ते अप्राप्य मनमा सह " इति निगमः। नन्वस्ति किञ्चित्तत्यादिवद्यस्य निरूपणं न भवति, मनसा मनने तु किं प्रतिवन्धकमिति चेत्तत्राह .-' न मनो गच्छति तत्रेति न विद्मो न विजानीम" इति च । द्रव्य-स्फुरणे मति • विद्म ' इति भवति, विशिष्टज्ञाने च 'विजानीम' इति भवति । त पते बुद्वि-कार्ये भवतः । 'द्रव्यस्फुरणविज्ञान मिन्द्रियाणा मनुग्रहः" इति बुहिकार्याणि । तेन तत्र वुहिमनसी न गच्छत । अब ‘न विद्मो न विजानीम. शुश्रुम' इति निर्दिश्यते, तेन 'न प्रत्यध्याहार्यम । तथाच- नत्र नः चक्षुरादि न गच्छति । ' चक्षु रिति बहिष्करणस्योपलक्षणम, तेन श्रोत्राद्यपि तथा । इति अन्तःकरणस्योपलक्षणम् , तेन चित्ताद्यपि तथा । बुद्धिस्तु कार्यतो लभ्येव । यथैतदनुशिष्या' दिति । यथातथो. सम्वन्धो योजनीय म्नथा च-'यथा कश्चनापि पतद ब्रह्मानुशिप्यात' तथा नश्चक्षुर्वाद- मनांमि तत्र न गच्छन्ति, तथा 'न वयं विद्मो न घयं विजानीम इति योजनीयम। अयमर्थ .- चक्षुरादिभिष्टन्य धृतत्य या मन आदिभिः संक- ल्पितस्य वाचा प्रबोधनमनुशासनम . तत्तु ब्रह्मणी दु.शकम, तेपां स प्रवृत्नेरभावादिति । 'मन .

१८] केनोपनिषद नन्वेवं सर्वथा प्रमाणाविषयत्वे कथं पुरुषार्थ-सिद्धि स्वरूप- झानाभावादिति चेदत्राह तथा 'अन्यदेव तद्विदितादथो' इत्यादिना। ब्रह्मणो वेदकसमधि- गम्यत्वात्प्रथम वेदाः प्रमाण तत्र, नान्यत् । 'तद्विदिता ज्ञान विषयादन्यत् , 'अविदितादधि ज्ञानाविषयादधि = उपर्यपि भवति । ज्ञान विषय जगत् , तद्विलक्षणमक्षरं ब्रह्म । तद्रूपमात्रता व्युदासायाह अविदितादधि'-इति । अविदितादक्षरब्रह्मणो- पेक्षयाऽधि = अधिकमिति । " ते ये शत प्रजापतेरानन्दा. स एको ब्रह्मण आनन्द " इति गणितानन्दकमुक्त्वाऽग्रे " यतो वाचो निव- र्तन्ते अप्राप्य मनसा सह, आनन्द ब्रह्मणो विद्वा"निति श्रुतौ तथोच्यते। ' . अन्यथा इति' एतादृशमेवागणितानन्द ब्रह्म, ब्रह्मनिष्ठेभ्य शुश्रुम वयम् । पूर्वेषा 'मित्यस्य ब्रह्मनिष्ठेभ्य 'इति पूर्वेषामिति फल प्राप्तवद्भय । “ ते निचिक्युर्ब्रह्मपुराणमग्य "मिति श्रुत्या सर्वस्या- दिब्रह्मेत्युक्त, तत्पूर्व तदाविष्टा पूर्वे भवन्ति । ब्रह्मता हि फलम् । शुश्रुम' इति = आनुपूर्वीविशिष्टया श्रुत्या ज्ञातवन्त , श्रवणे त्वनौपनिषदत्व स्यात् । एतेन-वेदैकसमधिगम्यत्वमुदाह- तम्, ब्रह्मणो वेद-प्रतिपाद्य रूपं यादृश तदप्युक्तम् । ननु श्रुत्या ज्ञाने द्वारमपेक्षितमिति चेदत्राह –'ये नस्तद व्याचच क्षिरे' इति । 'ये'= पूर्वे 'नो' ऽस्मान् 'तत् ' ब्रह्म प्रतिपादकत्वेन ब्रह्मभूतं श्रुत ('व्याचचक्षिरे'= ) व्याख्यातवन्त । पदच्छेदार्थोक्ति-विग्रह-वाक्य-योजनाऽऽक्षेप-समाहिति रूपं व्याख्या- न कृतवन्त - इति । तथा च मीमांसया संशयानपोय ‘श्रुत्या ज्ञातवन्तो वयमित्य- थों भवति, तथा याहुराचार्या " अलौकिको हि वेदार्थो न युक्त्या प्रतिपद्यते । तपसा वेद-युक्त्या च प्रसादात्परमात्मन " इति - मारनमा व्याख्यानमुपलक्षणं नप परमात्म - प्रसादयोरिति पूर्वेषां, ब्रह्मनिष्टायां गमकमाहु न' इति । बहुवचन क्वचिन्महत्सु प्रयुज्यते, तदत्र प्रयुक्तम । तेनायमर्थ - यदि ते ब्रह्मनिष्ठा न भवेयुस्तर्हि तत्सम्बन्धा न्महत्वमपि न भवेदतस्तथेति ॥३॥ '-ब्रह्म अत परं सामान्यत उक्तं वुढ्यास्ट न भवति इति विस्तरतस्तदेव पुनवक्तुमाह यद्वाचाऽनम्युदितं, येन वागभ्युद्यते ।। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि, नेदं यदिदमुपामते "४॥ 'यत् वाचा' वागिन्द्रियेण 'अनभ्युदित '= अभि मुखीभ्यो स्थित्वा गत न भवति, इति । ब्रह्मण पराची भवति वाग ब्रह्माधीना च, तेन तथा कुत एव तबाह - येनेति, 'येन'= ब्रह्मणा बाग'= वागिन्द्यिम 'अभ्युद्यते' अभ्युदीयते अभिमुखीभूयोर्ध्व स्थित्वा, 'ईयते '= गम्यते । ब्रह्म मर्ववस्तुभ्य प्रत्यक् सर्वस्य वशि च । तेन वाचा ब्रह्म नाभ्युदित , ब्रह्मणा च वागभ्युद्यते । तेन कि तबाह - -'तदेव ब्रह्म त्व विद्धि नेदमिति । वाच प्रेरयितृ यत्तदेव ब्रह्म व विहि' जानीहि । 'इद' वागादि ब्रह्म 'न विद्धि' । इदमेव यत कारणादुपासते ततस्तथा । 'इद' मिति । उपासनापरितुष्टस्य माक्षात्कार-विषयत्व- व्यपदेश । उपास्यस्य ब्रह्मता च वोधिता, साकारतापि ब्रह्मणस्तथा 'इन्कामान्धति (बण्डयति ) इति, 'इदम' । आमकामता- सम्पादकमपीत्यपि भवति । 'अपि संराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्या मिति न्यायेप्येतलिद्धम । व्यक्तया वाण्याभिमुग्वमेवेन्द्रियमर्थ वर्णयितु प्रभवति । लौकिक- मिन्द्रियं नालौकिकस्यार्थस्याभिमुखमिति न तत्र वाक्प्रवृत्ति । ब्रह्म नु मर्वाभिमुखमितीन्द्रियरूपमपि, तथा तेनालौकिकवाग्विषयः । ' २०] केनोपनिषद '" " एतत् कार्यमपि ब्रह्म यदा करोति यन्मार्ग-निर्वाहाय, स तदा मार्ग कथमुत्कर्ष शाली न स्यात् ? तेन वेदाविप्लवाय " यत्तद द्रेश्यमग्राह्य" मित्यादीनि वाक्यानि ज्ञानमार्गपराणि, “ मनसैवा- नुद्रष्टव्यम्" तद भूतयोनि परिपश्यन्ति धीरा इत्यादीनि भक्तिमार्गपराणीति व्यवस्थितम् । ब्रह्मरूपेन्द्रियाणां भक्तिमार्गार्थ- मेव प्रादुर्भावात् , ज्ञानमार्गे इन्द्रियाणां विलयस्य श्रावणात्। स्वाधि- देविकरूपाविष्टा वाग् ब्रह्म कीर्तयति-इति कीर्तन-निर्वाहक ब्रह्मै- वेति सिद्धम् ॥ ४॥ . एवमेव मनन-निर्वाहक तदेवेत्याह यन्मनसा न मनुते, येनार्मनो मतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि, नेद यदिदमुपामते " ॥५॥ 'मनसा' इति-' उभायन्तास'वितिवत् सोरादेश । 'मन यत्कर्म ब्रह्म 'न मनुते, 'येन' ब्रह्मणा च मनो मत मिति मानितमाहु । अन्तर्भावितण्यर्थोत्र मन्यति । तदेव ब्रह्म त्व विद्धि' । मनो न ब्रह्म, यत 'इदमेवोपासते,' मनो नोपासते । यथा पूजा- साधनानि पूज्यरूपाणि न भवन्ति, तथा मनोऽपि नोपास्यम् । ( अन्यत् ) पूर्ववदत्रानुसन्धेयम् । एवञ्च स्वाधिदैविकरूपाविष्ट मन ब्रह्म मनुते इति मनन- निर्वाहकं ब्रह्मैव ॥५॥ । . एव मत्वा ब्रह्मकीर्तने फल ब्रह्म-प्रादुर्भाव , तद्विशिष्टस्य दर्शने साधन चक्षु, तस्य कार्य दर्शनम् । तन्निर्वाहकमपि तदेवेत्याह :- यच्चक्षुषा न पश्यति, येन चक्षुपि पश्यति । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि, नेदं यदिदमुपासते" ॥६॥ मनसेतिवच्चक्षुपे'ति । चक्षुर्यत् न पश्यति । चभृषि' सत् ‘पश्यति'। एक चक्षु ब्रह्मदर्शने- 'येन कारणेन चक्षुः मनस्विनी [२२ । नातृतमित्यात्मनो बहुत्वमभीप्सत् पश्यति, तदा ब्रह्मावेशाद्वहुत्व विरुद्वत्वमप्याविर्भवतीति ' चषि' इत्युक्तम् । 'तदेव ब्रह्म त्व विद्वि' । इद चक्षु न ब्रह्म यत इदमेवोपामते न चक्षुरिति । तथा च माविदेविकाविष्ट च उपद ब्रह्म पश्यति, तदा ब्रह्मण आसेचनकत्वेन तददर्शने तृप्त्यन्तमप्राप्यात्मनो बहुत्व- मभीन्सति, तदाऽऽवेशाहहु भवति, इति व्यान-साधक + ब्रह्मव । व्यापकस्य चक्षुष एव ब्रह्मणि प्रवृत्ति न संकुचितस्येति भावः ।।६।। दर्शनोत्तरकालं रसरूप ब्रह्म वस्तुगत्या पोषार्थ तिरीभवति । तेन विप्रयोगे सम्पन्ने " गुणास्तु सङ्गराहित्याज्जीवनाथ भवन्ति हि " इति न्यायेन जीवनार्थ गुणा अपेक्षिताः. विप्रयोगाग्निम्लान- जीवनस्य । ते च कीर्त्यमानश्रूयमाण-भेदेन द्विविधा । प्रथमा- स्वक्ता , द्वितीया अशिष्यन्ते । तेषामपि श्रवणविषयता-निर. पकम्य श्रवणस्य निर्वाहकं ब्रह्मैवेत्याह :- यच्छोत्रेण न शृणोति, येन श्रोत्रमिद ५ श्रुतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि, नेदं यदिदमुपामते ॥ ७ ॥ 'श्रोत्रेणे' ति विभक्ति-व्यत्यय. श्रोत्रम् । 'यन्न शृणोति'। 'येन कारणेन श्रोत्रमिदं श्रुतं' करोति । तदेव ब्रह्म त्वं विन्द्वि'। श्रोत्रं न ब्रह्म, यत 'इदमेवोपासते ' न श्रोत्रमिति | 'इदं श्रृत '. मिति श्रवण-विषय परं ब्राह्म, यदा परमपुरुषार्थत्वेन भात भवति तदेदं भवति- ईन कामान्यति-दति-'इदम'। आचार्या अप्येवमाहु :-- स्नेहाद्रागविनाशः स्थाढासक्त्या स्याद् गृहारुतिः, गृहस्थानां बाधकत्वमनात्मत्वञ्च भासते' इति तद्रीत्या मर्वत्रारुचिवाधकत्वानात्मत्वस्कृतिजनकम् । ततः प्रेम तदामतिर्व्यसनय तदा भवेत् १ इयत्रोचस्व व्यसनस्य साधकम् [मु.]

२२] केनोपनिषद् तथा च सर्वत्रारुचिबाधकत्वानात्मत्वस्फूर्तिजनक श्रवण-साधनं यच्छ्रोत्रमलौकिकं तस्यैव ब्रह्मणि प्रवृतिर्न लौकिकस्येति भावः ॥७|| एवमेव विप्रयोगावस्थायां रसस्वाभाव्यात्प्राणापगमोपस्थितौ स्थित्यर्थ प्राणोऽपेक्ष्यते, तत्कार्यस्थितेनिर्वाहकं ब्रह्मैवेत्याह " यत्प्राणेन न प्राणिति, येन प्राणः प्रणीयते । तदेव ब्रह्म वं विद्धि, नेदं यदिदमुपामते " ॥ ८ ॥ इति प्रथम. खण्ट । 'प्राणेन' कारणेन यत्कर्तृ 'न प्राणिति', न तत्र स्वकार्यद्वारा प्राण-प्रवृत्तिरिति भावः । येन' कारणेन 'प्राण ' स्वकार्य- विषय प्रति प्रणीयते 'प्राप्यते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि' इद प्राण ब्रह्म न विद्धि । अप्रयोजकतामनुसंधाय नपुंसकम् । यतः कारणादिदमेवोपासते न प्राणमिति । एवं स्वकार्यसमर्थस्यैव सर्वत्रालौकिकप्राणस्य प्रवृत्तिब्रह्मणि न लौकिकप्राणस्येति भाव । फलदशायां यादृशक्रमोऽत्र विवक्षितः सोऽत्रोक्तः ॥८॥ कारिकाः मनः, प्राणो, वचश्चक्षुः श्रोत्रमेतच्च पञ्चकम् । ब्रह्म-कार्यक्षम यस्य, स कृतार्थो न संशयः ।।१२।। यादृशानि प्रमाणानि, प्रत्तिर्याशी मता । तेषां सेव्ये भक्तिमार्गे परमे सोपपादिता ।।१३।। शिष्यस्यासंभावना या, जाता दुष्टप्रमाणतः ! निराकृता तु सा ब्रह्म-प्रमाणानां निरूपणात् ॥ १४ ॥ अलोकित्वात्तेपान्तु प्रवृत्तिः संभवत्यपि । एव प्रमाणतः श्रेष्ठयं भक्तिमार्ग निरूपितम ॥ १५ ॥ इति सामवेदीय-केनोपनिपन्मनस्विन्या प्रथम खण्डः ।।

द्वितीयः खण्डः । कारिकाः- प्रमाणदोपाभावेऽपि विषये दोप-योगतः । स्यादसंभावना तेषामवृत्तिस्तत्र वर्ण्यते ॥१६॥ १अल्पत्वं २विस्मयाभावः ३प्रकार-नियमो विदि. ४अस्वातन्त्र्यं, पञ्च दोषा ५अनुत्कप स्तथा मतः ।।१७॥ एतद्विरुद्धधर्माणां नैयत्यं ब्रह्मणि स्थितम् । पञ्चानां पञ्चभिस्तस्माद्विषयोऽत्र निरूप्यते ॥१८॥ यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम् । यदस्य त्वं यदस्य देवेवथ नु मीमांस्यमेव ते मन्ये विदितम् ॥" ॥ १ ॥ ९ ॥ (१) ननु किमर्थ जगद्विलक्षणं ब्रह्म स्चीकर्तव्यम् ? येनपा कल्पना स्यात, नामरूपकात्मकस्य जगतः सर्वांशेन यथार्थज्ञाने इष्टमस्तु, किम्बाधकमिति चेदत्राह:- 'यदि मन्यसे' इत्यादि। यदेकमव्यक्तमनन्तरूप ' मिति श्रुत्या 'सर्व खल्विदं ब्रह्म, तज्जलान्, इति श्रुत्या च जगदपि ब्रह्मणो स्पम् । “ राहोःशिर" इति वदभेदेऽपि पष्ठी भवति । रूपमित्युप- लक्षणं नामकर्मणो “प्रयं वा इदं ब्रह्म यन्नामरूप कर्मति" श्रुतिः । तन्दि रूप 'यत्' जगम यदिति स्यास्नु, संगृहणाति, तदह 'सुवेद' कास्न्येन याथातथ्येन वेदेति 'यदि' त्वं 'मन्यसे । यदस्य रूपं ब्रह्मणस्तट्टपं तदहं वेदेति सम्बन्धः । तर्हि 'दम्रमेवापि नृनं त्व चैत्य' । “यत्र नान्यत्पश्यति, नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति. मिति श्रृतेह्मणो भेदाश्रयं रूपमल्पमेव त्वं वैत्य ।

२४] केनोपनिषद " "यो वै भूमा , - . ब्रह्मणः विष्टभ्याहमिद कृत्स्नमेकाशेन स्थितो जग" दिति स्मृतिरपि भवति । यतः 'न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते" " ज्यायान्पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षात्" वृहच्च तद्दिव्यमचिन्त्यरूप' तत्सुख नाल्पे सुखमस्ति भृमैव सुख' मिनि श्रुतिर्हि ब्रह्मणोऽ नल्पत्यमाह। तद्यथा- नहि · कटक सुवर्णपरिणाम ' इति कटकं ज्ञात्वा सर्व सुवर्णमिति ज्ञातं भवति, सुवर्णे तु ज्ञाते यावानयं सुवर्णपरिणाम कटक-स्वस्तिक-रुचक-कुण्डलादिः स सर्वोऽपि ज्ञातो भवति । एवं प्रपञ्च-ज्ञानेन न ब्रह्म ज्ञात भवति ब्रह्मणि ज्ञाते तु बर्व ज्ञात भव त । इति तस्याज्ञानाद् दम्रमेवापि नृनं त्व वेत्थ, न त्वदभ्र, न च दभ्रादपि दभ्रं त्व वेत्थ । वास्तविकदर्शन व्यावतयति- नून' मिनि । अत्र कारणमाह-' त्वं यदस्य देवेषु' । 'यत् ' यस्मात्कारणात अस्य' त्व 'मन्यद्रूपं 'देवेषु'। वाजसनेयिब्राह्मणे विदग्धशाकल्येन पृष्टा याज्ञवल्क्येनोत्तरे ये देवा वार्णता “ अष्टौ वसवः एकादश रुद्राः द्वादशादित्यो स्त एकत्रिशदिन्द्रश्च प्रजापति- श्च प्रयस्त्रिंशा" इति हि श्रुतिः । तेषु देवेषु तष्ठति, सर्वान्तर्यामि- रूपं, तदतो न ज्ञात भवति, अतिसूक्ष्मत्वात्तस्य ज्ञान एवाभीष्ट . सिदिर्नान्यथेति भावः। घृतात्परं मण्डमिवातिसूक्ष्म ज्ञात्वा शिवं सर्वभूतेषु गूढ, विश्वस्यक परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशेः " इति हि श्रुतिः। ननु तहि ज्ञानमेव तस्य कथमिति चेदत्राह -' अथ नु मीमास्यमेव ते मन्ये विदित 'मिति । अथे'ति ब्रह्मज्ञानस्य भिन्नप्रक्रमार्थे । नु निश्चये 'मीमांस्य ' सत् ' ते विदितं मन्ये । मीमासयैव निणे यं सत् तद् ब्रह्म, ते विदित मन्येऽहमिति । यत " असिन्दिग्धेऽपि वेदार्थे स्थूणाखननवन्मतः । मीमांसानिर्णयः प्राज्ञ , दुर्बुद्धेस्तु ततो द्वयम्" इति । कालेन गुणेषु क्षुब्धेपु-अध्येतॄणां स्थमावभेदे सात्विकानामपि मीमासया ब्रह्मणि मन्देहानामवश्य निस्यत्वात् । ' ते ' त्वयेति- ' .

मनस्विनी [२५ अधिकारिता सूचनाय । तत्ते मीमांस्यमेवाहं मन्ये, तेन विदित भविष्यतीति शेष.। पूर्व सन्देह-निरासः कार्य., अथ विदा इतं भविष्यति, ज्ञानेन प्राप्त , भविष्यति । तथा च सन्देह राहिन्य सम्पाद्य ज्ञाने जाते तत्प्राप्तिः। 'ब्रह्मविदाप्नोति पर' मिति हि श्रुतिः। अलौकिकप्रमाविषये ब्रह्मणो यदाल्पत्वेन प्रतीति स दोषः यतोल्पानि प्रमाणानि-अल्पमेव विषयमानामन्ते, तेन दोषः प्रतीयते, स तु मीमांसया सन्देहे निरस्ते, ज्ञानेन च ग्रन्थिभेदे वाध्यते- इति निर्दुष्टमेव प्रमेयम् ॥ १॥ ९ ॥ (२) उक्ता या जगद्विलक्षणता, तां दर्शयितुं तस्यादभुतकर्मतामाहाचार्य नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च । यो नस्तद्वेद तद् वेद नो न वेदेति वेद च ॥२॥ १०॥ क इत्था वेद यत्र स" इति श्रुतेर्ब्रह्मज्ञानं दुर्घट, यतो यद्भुतकर्मत्वमाहास्य श्रुतिः । अन्धोमणिमविन्दत्तमनगुलिरावयत् " " अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षु स शृणोत्यकर्णः" इति । हिरण्यनिधि निहितमक्षेत्रज्ञा उपर्यु परि सञ्चरन्तो न विन्देयुरेव- मेवेमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दत्यनृतेन प्रत्यढाः" इति श्रुति ब्रह्मसमीप-गमनेऽपि जीवानां तदप्राप्तिमाह। विचित्रा ब्रह्मलीला, यस्तावष्टि प्राप्तव्यं ब्रह्मेति' त त्यजति, कामयते च यस्त्यक्तव्य ब्रह्मेति-तं गृह्णाति । इति ज्ञातमपि ब्रह्म न ज्ञातमदभुत कर्मत्वाधत.। यस्तावद्वेदायं 'सु वेदेति', फल-पर्यवसायि वेदन-सुवेदनम। 'म न वेदेति मन्येऽद्भुतकर्मत्वाद ब्रह्मणः । उक्तं प्रकार-यमपि ब्रह्मणि न नियतम् । यस्तावद्वेद-अय सुवेद. मोऽयं न वेदेति-स न वेद, अदभुतकर्मवाद ब्राह्मणः । कथं वेत्ताऽ वेत्तास्यात् ? इति मन्ये । तथा 'नाय वेद' मोऽयं वेदेति स न वेद' अदभुतकर्मत्याद ब्रह्मणः । कथमवेत्ता वेत्ता स्यात् । इति मन्ये । तथा ट २६] केनोपनिषद एषाऽदभुतकर्मता ब्रह्मणः पुरुषेणैव ज्ञायते न स्त्रियेति बोधना- याधिकारि-विशेषणमाह - नाह' , मिति। न तत्प्रकार-चतुष्टय जगज्ज्ञाने, इति जगद्विलक्षणं ब्रह्मेति । अस्मादेव कारणान्न जगति विस्मय उत्पद्यते । तेनेदं मिद्धम :- जगत सर्वांशेन यथार्थज्ञानेऽपि भक्तिर्नोत्पत्स्यते । विस्मय- जनकस्यैव भक्ति-जनकत्वात् , तदभावादिष्टसिद्वेरभावात् । विस्मयाजनकत्व प्रमेय-दोषः, स तु ब्रह्मणि नास्तीति तद्भक्त्यै- वेष्ट सिद्विरिति भावः ॥२॥ १०॥ (३) एव बहुविधायामद्भुतकर्मतायां व्याख्यातायां यथार्थज्ञानाभावे तत्सवितुमशक्यमिति वाहिर्मुख्यम्। एवमप्यस्य न कार्यसिद्धिः, इति शिष्यधैर्य दृढयितुं प्रकार विशेषमाह यस्यामत- तस्य मत, मत यस्य- न वेद सः । अविज्ञात विजानता, विज्ञातमविजानताम् " ॥३॥११॥ जातिगुणक्रियासंज्ञाभि. सर्व वस्तु मत भवति । ब्रह्म तु जाति गुणक्रियासंज्ञाभिरपि न भवति मतम् । पूर्वोक्तप्रकार-चतुष्टय- मध्येऽन्यतम प्रकार. स्यान्मत भवेत् , स तु नास्ति- अनवगाव- माहात्म्यवत्त्वाद ब्रह्मणः । मम ह्यनवगाह्यमाहात्म्य ब्रह्मेति-यो वेद 'तस्य मतम् ' अनव- गाह्यमाहात्म्यवत्त्वेन ज्ञातं चेज्ज्ञातं भवति-इति भाव । यदा- यस्यानुगृह्णाति भगवानात्मभावित. स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठता" मिति हि स्मृति अनुग्रहेणैत्र - मननं ब्रह्मण आह । अनवगाह्यमाहात्म्यत्रत्वाज्ञानाद 'यस्य मत' ब्रह्म 'म न वेद'। यथाकथंचिदवगाह्यमाहात्म्यं चेत् ब्रह्मैव न भवति, तस्य ज्ञान- मपि ब्रह्मज्ञानं न भवति- इति, 'न वेद स' इति यदुक्तं तत्सुष्ठूक्तम् ।

मनस्विनी [२७ । मनसैवानुद्रष्टव्य ' मिति श्रुतौ मनसानुदर्शनमुक्त यत्तदेवरूप- तयैवेति ज्ञेयम् । इय च व्यवस्था सर्वत्रानुसन्धया । एव सामान्यज्ञानमहेनोक्तं, विशेषज्ञानमनाह 'अविज्ञात 'मित्यादिना । विशिष्टज्ञानं बुध्या भवति-इति विशिष्ट ज्ञानवन्तो बुन्या 'विजानन्त' उच्यन्ते । तेषा 'मविज्ञातं' वुद्वयाऽ- नवगाद्यमाहात्म्यत्वादेव । पराश्चि खानि व्यतृणत् स्वयभृस्तस्मा- त्पराइ पश्यति नान्तरात्मन् " इति हि श्रुति । लौकिकविज्ञान- प्रणाड्या विलक्षणा ब्रह्म-विज्ञान-प्रणालीत्युक्तम् । ब्रह्म-विज्ञान-प्रणाली प्रदर्शयति-विज्ञातमविजानता 'मिति । विजानदभ्योभिन्ना ‘अविजानन्त' उच्यन्ते । ते हि बुद्ध्यनुग्रहा भावेऽपि ब्रह्मानुग्रहेणानबगाद्यमाहात्म्यं ब्रह्मेति विजानन्ति, इति लौकिकम्यो भिन्ना भवन्ति । तेषां विज्ञातं ब्रह्मेति । एवं चा- वगाद्यमाहात्म्य विषयमात्रनिष्ठो दोष , स तु ब्रह्मणि नास्ति. इति नासंभावनावकाशस्तति ज्ञेयम् । अनेन ब्रह्म-विज्ञाने प्रकार-नियमो नास्तीति व्याख्यातम् ।।३।१२।। (४) अर्थवं सत्यलौकिक प्रमाणानि वैयर्य मापद्येरनिति शहां-अल्वातन्न्ये सति तथा भवति, स्वातन्त्र्ये तु नेति-परिहत् ल्वातन्त्र्य दर्शयति " प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते । आत्मना विन्दते वीर्य. विद्यया विन्दतेऽमृतम् " ॥४॥१२॥ स्वातन्त्र्य विधा भवति-- अमृतत्व-लाभाहीय-लाभादमृत-लाभाच्च । तत्र जीवस्य स्वरूप- स्थतायाममृतत्व-लाभो भवति । तस्यैव परमपुरपांपायेन वीर्य लाभ- म्तथा तस्यवाक्षरब्रह्मभावे अमृत-लाभो भवति । नथाचात्र निगमो भवति-" यथैव विम्ब मृदयोपलिन तेजोमय भाजते तन्मधातम, तहात्मतन्त्र प्रसमीक्ष्य देही पक कृतार्थी भयते बीतशोक " इति । अत्र इति । अत्र स्वरूपस्थन्य दुग्वाभायो ।

२८] केनोपनिषद य उक्तः स एवामृतत्वम् । तथैव " नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादा"दिति श्रुतौ बलं वीर्य मिति पर्यायौ, तेन बलेनात्म- लाभ., आत्मना च हेतुना वल-लाभ इति । आत्मना बल-लाभोक्ति फलरूपादप्यात्मनोपेक्षया बलस्य फलरूपतां, आत्मनः साधनरूपतां च द्योतयितुम् । तेनात्म-लाभापेक्षया बल-लाभ उत्तमः । परब्रह्मा- पेक्षया फलरूपो भक्तिमार्ग उत्तमो यदा, तदा कर्मज्ञानाभ्यामुत्तमतास्य कैमुतिकन्यायेनानाहूतैवायाति-इति द्योतनेन स्वातन्त्र्यं द्योतयि- तुम्-" सम्प्राप्यनमृषयो ज्ञानतृप्ताः कृतात्मानो वीतरागाः प्रशान्ताः, ते सर्वग सर्वतः प्राप्य धीरा युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति " इति । ( उक्तम् )। एतत्फल वीर्येण लभ्यम् । तथा "यस्मिन्पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः " तमेवमन्य आत्मानं विद्वान्ब्रह्मामृतोऽमृत" मिति श्रुतौ यदमृतं तदेव विद्यया विन्दते । । . अयंभाव:-प्रमाणेष्वलौकिकता स्वातन्त्र्य-धोतिका, सा जीवात्म-ग्राहकत्वेन, ब्रह्मात्मक-ग्राहकत्वेन परमात्म-ग्राहकत्वेन च भवति । तस्मिन् सत्येव तत्र स्वातन्त्र्यम् । तच्चोत्तरोत्तरमुत्कृष्टमिति परमोत्तमस्वातन्त्र्यवत्वेन नालौकिकप्रमाणानां भक्तिमार्गे वैयर्थ्य- मपि तु ज्ञानमार्गे- इति सूचयितुं जीवात्म-ब्रह्मात्म-परमात्म- स्वरूपज्ञानानां फल-कथनमुखेन तारतम्य वदन्नाह प्रतिवोध विदित'मिति । यस्य 'प्रतिबोध विदित' मत च सोऽमृतत्व विन्दते । 'प्रतिबोधे'ति लुप्तविभक्तिक पदम्, अलौकि- कत्वद्योतनायैवं प्रयोग | लौकिकाद्वोधात्प्रतिकूलो बोध प्रतिबोधः । यदा साधनैर्वृद्विः प्रतीची भवति तदा प्रतिवोधमुत्पादयति, तेन प्रतिवोधेन विदित मत च यदा जीवात्मरूप भवति, तदा स अमृतत्व विन्दते। मृत मृत्य्वात्मक दुःख तन्नास्ति यस्य सोऽमृत., तस्य भावोऽ- मृतत्वदुःखाभावं विन्दते । 'विन्दत'इत्यनेन पुरुषार्थरूपता द्योतिता यावद दुखं, स्वातन्त्र्यं न तावत् । तदभावे तु स्वातन्त्र्यमस्त्येवेति ।

मनस्विनी [२९ " विषये म्वातन्न्यात्तदधीने प्रमाणेऽपि तत्सम्बन्धात्स्वातव्यम् . येन तदितरविषयाकृष्ट न भवति-इति भावः । तथा ब्रह्म-ज्ञानेन सुख विन्दते तदेवाह यस्य 'विद्यया' ब्रह्मात्मरूपं विदितं मतं च सोऽमृत'मानन्दं 'विन्दते' । ब्रह्मानुग्रह- तप.सहकृतोपनिषदर्थ-भावनाजन्य ज्ञानं विद्या । यद्यपि विद्य ब्रह्म-शक्तिर्भवति, तथापि जीवे ब्रह्मावेशेन तच्छक्तिराविशति । सा चाभेदज्ञान जीवे जनयति, इति साध्यसाधनयोरयमभेद-निर्देशो भवति । तया विदितम अन्यमुखात, मत स्वात्मना'-इति विवेक येन विन्दते । तथा च दुखाभावापेक्षया सुखस्योत्कर्षः -इति यावद दुःखाभावम्तावदस्वातन्त्र्यमेव, सुखे च स्वातन्त्र्यमिति सिद्धयति । पूर्ववदत्राप्यद्यम। तथैवात्मता वीर्य विन्दते । तदेवाह •-' आत्मना विन्दते वीयम्'-हति । यस्यात्मना विदित, मतं च स वीर्य विन्दते । करणभृतेन परब्रह्मणा विदित मत नान्येन। तस्य ज्ञानसाधनं मनन-साधनमात्मा यदा भवति तदा वीर्य विन्दते। अन्येन जायमानं ज्ञानं वीर्य न फलतीति । “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन, यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा वि वृणुते तनुं स्वाम" इति हि श्रुतिर्यमात्मानमाह-स एवेहात्मपदवाच्य तेन, वीर्य = विशेषेण ईरयति-क्षिपति सर्वास्तुच्छतया तद्वीरम, " ब्रह्मविदाप्नोति पर "मिति श्रुती परत्वेनोक्त ब्रह्म, तस्मिन्साधु यत्तद्वीर्यम् । तद्विन्दते । तदत्र निगमः-" सम्प्राप्यनमृपयो ज्ञानतृमाः कृतान्मानो वीतरागा. प्रशान्ता., ते सर्वगं सर्वत प्राप्य धीरा युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति" इति । अत्र यो युक्तात्मत्वलाभपूर्वकः सर्वावशः. स. वीर्येण विना न भवतीति-तहत्वेन बीर्यवन्तः। इति गणिता- नन्दापेक्षया वीर्यस्योत्कर्ष' । यावद गणितानन्दस्तावदत्वातन्त्र्यमेव. वीर्ये च स्वातन्त्र्यमिति सिद्ध्यति । पूर्ववत्राप्ययम् । तेन भक्तिमार्ग-अलौकिकप्रमाणानि तदा वैयर्थ्यमापोरन्यदा स्वातन्त्र्य तेपु न स्यात् ! जीवात्मनस्तु परब्रह्म-सम्बन्धस्तथा ।

३०] केनोपनिषद " तद्रूपेन्द्रिय-सम्बन्धो वर्तते-इति स्वतन्त्रो जीवो भवति, तदा किमु वाच्य तद्रूपाणामिन्द्रियाणां तथात्वे १ इति न शङ्कावकाशः । आत्मना विन्दते वीर्य 'मित्यस्य मध्ये निरूपणन्तु, उभयसम्बन्धा- भिप्रायेणामृतत्व-लाभः । अमृतत्व-लाभश्च वीर्य बिना न शोभते- इति। एवञ्चानमृतत्वमवीर्यमनमृतञ्च विषयनिष्ठो दोषः, स ब्रह्मणि नास्ति- इति नामभावनावकाशस्तत्रेति भावः । एतावता ग्रन्थेन-निर्दुष्टप्रमाणेन निर्दुष्टमेव प्रमेयमधिगन्तुं शक्यन्नेतरत-इति सिद्धम् । 'मुक्तोपसृप्यव्यपदेशाधिकरण' एवमेव सिद्धम् ॥ ४ ॥ १२॥ (५) ननु-उत्तरोत्तरस्वातन्त्र्य यदा, नदा साधन-दशायां भेदकं किञ्चित्स्यात् ? तदभावे तु प्रयाणामैक्यं कुतो न ? साधर मेदं बिना फल-मेदस्याप्रयोजकत्वात् , इति चेत्तत्राह - उत्कर्षम इह चेहवेदीदथ मत्यमस्ति, न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः । भृतेषु भूतेषु विचित्य धीराः पेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥५॥१३॥ इति द्वितीय खण्डः। अत्र मेदक फलत्रयमुत्तरोत्तर उत्कर्षे भजत्तत्रतत्रोत्कृष्ट स्वातव्यं ज्ञापयति जोवात्मस्वरूप-ज्ञाने 'सत्यमस्ति' इति ज्ञान फलम् । ब्रह्मात्म-(स्वरूप- ज्ञाने तु महाविनष्ट्यभाव फलम् । पर- ब्रह्मात्म-स्वरूपशाने तु- अमृतीमाव' फलमिति व्याख्यातव्यम् । 'इहे'त्यधिकरणमाह- जीवाधिष्ठानशरीरमिति - जीवात्म-ज्ञाने योग्यताशालि विवक्षितम् । 'चेदिति ' तस्य दौर्लभ्य द्योतयति 'अवेदी' = स्वरूप ज्ञातवान् भवति यदि, तर्हि, 'अथ तदनन्तरं सत्यमस्ति' अस्य । यावत्वरूपस्थो न भवति तावदसदेवास्य सर्व- मिति । एतच्चावान्तरं फलम् । परमफलन्तु पूर्वत्र व्याख्यातम । स्वरू- - मनस्विनी ३ महाभयात्मता या पावस्थाने योग्यतामावहति- एनन् , तथाच साधन-दशाया सत्यं भेदक सिद्धयति। ब्रह्मात्म-ज्ञाने तु 'न चेदिहावेढीदि' त्यादिना मेदक- माह, इहेति ब्रह्मात्म-ज्ञाने योग्यताशालि शरीरं विवक्षितम् । 'चेदिति' पूर्ववत् । नावेटीत न परब्रह्मात्मानं ज्ञातवान् त 'मरतो बिनःि' वैदिककर्मफलाभाव.= नटि ,स्वरूपेऽनवस्थानं विष्टिः। ब्रह्मात्म- त्वालाभो महती विनष्टिः । "आत्मलाभान परं" इति हि श्रुतिर्भवति । विनष्टिरिति स्त्रीलिङ्गेन निर्देशो महता वाधकेन संसर्ग-उत्तरो- त्तरं सन्तानजनकता-सूचनाय । न चेदादिहावेदीन्महतो विनष्टि '- रिति प्रतिकृमिदं वचनम् , महद् भय वज्रमुद्यत "मिति श्रुत्युक्त- ब्रह्मधमस्तत्सूचनाय । अनुकूलवचनन्तु -'इह चेदवेदीन्महती हि लब्धि'रिति । तस्यावचनं गणितानन्दस्यापि दुःखाभावमाने पर्यवसानं द्योतयितुम् । तथा चात्र साधन-दशायां ब्रह्मावाप्तिमें दिकेति सिद्धयति । अथ ब्रह्म-ज्ञाने भेदकमाह :-'भृतेषु भूतेपु०' इत्यादिना । 'धीरा' धियमीरयन्ति. ध्यानवन्तो वा ते। " अव्यक्ता हि गतिर्दु ग्व देहवदभिरवाप्यते” इति “भुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्ग पथस्तत्कवयो वदन्ति" इति श्रुतिस्मृत्युक्तदु खगतिपरिनिष्ठितत्व- वोधनायाधिकारिविशेषणं 'धीराः' इति । भृतेषु भूतेग्विति वीप्सा साकल्यमाह भूतानाम । विचित्य = चितिन्वा = सम्यग् ज्ञात्वा । सर्वक्षमतामपराधमाचे द्योतयिनुमिदमुच्यते । तत्रापि विशेषो व्युपसर्गेण द्योत्यते । सर्वभूतहिते रतत्वं हि विशेष । तथा चायमभिसंबन्ध - ये अमृता भवन्ति ते भृतेषु भूतेषु विचित्य, अस्माल्लोकात्प्रेत्य च भवन्ति । 'अस्माल्लोकात्मेत्येति' तेषां भवान्तर-प्राप्ति मूचिता । भृतेषु भूतेषु विचित्येति नाधनवर्गः । 'अमृता भवन्ति इति मृत मरण न विद्यते येषान्ते, अमृताःदु खा- भाववन्तः। तथा चात्र नाधन-दशायां दु खाभावो भेदकरति मिहम्। पञ्च जीवात्म-ज्ञाने यन्परमफलं दु.ग्वाभाव , स हि ब्रह्मात्म- झानेऽवान्तरफलम । यच्च ब्रह्म-ज्ञानेऽमृतीभाव परमफलं,स (परम) -

३२]
केनोपनिषद्
आत्मज्ञानेऽवान्तरफलमिति परमफलरूपतयाऽऽत्म-लाभे परमोत्कर्ष।
एवं साधनोत्कर्षः फलोत्कर्षे प्रयोजको निरूपित ।
तथा चासत्व, महाविनाश-हेतुत्वं, प्रेत्यभावाभावहेतुत्यञ्च
विषयानुत्कर्ष-हेतव । तदभावाद् ब्रह्मणि नासंभावनावकाश इति
सिद्धम् । भक्त्यैव सर्वेषामुत्कर्ष, तत्रैव च सर्वेन्द्रियाणां सार्थक्यम्,
अत्रैव विषय उत्कर्ष इति च ||५||१३।।
कारिका
विषये दोषतो बुद्धौ दोषस्तस्मात्तु जायते-
सर्वासंभावना मेये, भक्तौ सा न ह्यदोषतः ॥१९।।
-
इति सामवेदीय-वेनोपनिषन्मनस्विन्यां द्वितीय खण्ड ।।

मनस्विनी
[३३
तृतीयः खण्डः ।
कारिकाः
अन्यथाख्याति-पक्षण यदि दोपाः प्रमेयके ।
तर्हि भक्तो कथमपि ब्रह्मदोषाः ममागताः ॥२०॥
इति तेषां निवृत्त्यर्थं प्रसङ्गोत्र निरूप्यते ।
ब्रह्मणोऽन्येपु धर्माणामुत्कुष्टानामभावतः ॥२१॥
नाल्पागेपोऽन्यथाख्यातावन्यख्यातिः कृतान्ततः ।
तत्र ब्रह्मणि दोपस्तु न कथञ्चित्प्रमज्यते ॥२२॥
जीवाः स्वभावतो दुष्टास्तदभावाय यद॒दत् ।
प्रकटं तु तदा तेपामभावो, नान्यथा भवेत् ॥२३॥
देवेषु ब्रह्म-विज्ञानादुत्तमा अमरावयः ।
अग्निर्वायुस्तधेन्द्रश्च, तेप्रकर्षो वृहत्कृतः- ॥२४॥
भक्तेराश्रयणादेव जातोऽन्येषां तु का कथा ।
इति ज्ञापयितु देवाख्यानमत्र निरूपितम् ॥२५॥
भक्ती दोपोऽभिमानस्तु तत्रोपायोऽस्वतन्त्रता ।
नार्याःसा प्राप्यत इति सङ्गो देव्याः कृतोऽन्ततः ॥२६॥
वाहिर्मुख्यं च माहात्म्याज्ञानं द्वाभ्यां निरूपितम् ।
वहिवायु-प्रसङ्गश्च चतुर्मिविनिगद्यते ॥२७॥
काल कर्म स्वभावाख्या दोपाश्चत्वार इत्यतः ।
इन्द्रे कालकतो दोप एको छेकेन तत्कथा ॥२८॥
दोपाभाव उमादेव्या कृतः, एकेन वर्णितम् ।
तदनं द्वादशभिस्तृतीयः खण्ड उम्भितः ॥२९॥

३४] केनोपनिषद - तत्र नाद्य नन्वेते धर्मा ब्रह्मणि न वास्तवा "एकमेवाद्वितीय ब्रह्म" इति श्रुतिविरोधात्, अन्यगता एवास्मिन्भासन्ते- इति भ्रमविषये रजते यथेन्द्रियप्रवृत्ति , एव पूर्वखण्डे साधितानामलौकिकानां प्रमाणानामसम्भावनाविषयेऽपि भ्रम-विषये ब्रह्मधर्म प्रवृत्ते. पुनरधिष्ठान ज्ञानोत्तरकालं शुक्ति-ज्ञाने तुच्छता-बुद्धिवत् ब्रह्मणि विकारे ज्ञातेऽनुपास्यत्व-बुद्धयुदयेन, कथ प्रमाणसिद्धाया भक्ते तत्र सञ्चार ? इति- पूर्वखण्डेन समर्थितमपि, ऊषरे वर्षितमिव जातमिति चेत् अत्र भवान्प्रष्टव्य - अन्यगता धर्मा ब्रह्मणि भासन्ते' इति यदुक्त तल्लोक-कल्पनानुसारेण, आहोस्विवेदाविरुद्धकल्पनानुसारेण ? लोके तावद् व्यवहारे- उत्कृष्टसत्ताकवस्तुगता धर्म- सदृशा एव धर्माः. दोषवशाजताद्यधिष्ठानशुक्तौ प्रतीयन्ते- इति दृष्ट , तदत्र विषमम् । नहि ब्रह्मापेक्षयोत्कृष्ट वस्तु, यद्गता धर्मा ब्रह्मणि प्रतीयेरन् , श्रुति-विरोधात् । तथा हिरण्यायनीयाना खिलेषु पठ्यते ब्रह्म ज्येष्ठा वीर्या संभृतानि ब्रह्माग्रे ज्येष्ठं दिव समाततान, ब्रह्म भूतानां प्रथमं तु जज्ञे, तेनार्हति ब्रह्मणा स्पदितु कः। "इति । अस्यार्थस्तु -'ज्येष्ठा वीर्या' इत्यत्र बहुवचनस्य डादेशः, तेन- ब्रह्म ज्येष्ठं मुख्यं, तेषां तादृशानि वीर्याणि ब्रह्मणा सम्भृतानि, सम्यगन्यनरपेक्ष्येण स्वत एव धृतानि, तथा ज्येष्ठं ब्रह्म अग्रे देवादि- जननात्पूर्वमेव दिवमाततान= धुलोकं व्याप्तवत् । तथाभूतानामाका- शादीनामुत्पत्ते प्रथममेव तु ब्रह्म जज्ञे = आविर्वभूव, तेनैताश महिमवत्त्वेन ब्रह्मणा साकं स्पर्धितुं कोऽर्हति ? इति । तेनेद मिद्धम् :-अत्र लोके तिस्रो देवता महनीया गुण- वत्यश्च, इन्द्रो वायुरग्निश्च । एता यदा " वेधाद्यर्थभेदाधिकरणो- तरीत्या " ब्रह्मसम्बन्धादेव तद्विभृतित्वेनोत्कर्ष प्राप्तास्तदा ताभ्यो- न्यग्भूतानामर्थानां कथ ब्रह्मणि धर्मारोप. ? येन पूर्वपक्षोदभावनेन पूर्वसमर्थित प्रत्युक्तं स्यात् ।

मनस्विनी [३० नापि द्वितीयः- भवत्पक्ष-समर्थन-समर्थाया' श्रुतेरेवाभावात् । वक्तव्या चैत् ? यस्यां- शुक्तिरजन-दृष्टान्तेन यत्र ब्रह्मधर्मणामवास्त- यत्त्वमुक्तं स्यात् । इदन्तु परमतरीत्योक्तम् । सिद्वान्ते त्वन्यख्यातिवाद.- तत्र माया बुद्धि वहि क्षिपति. तद्विषयीभृत वृत्तिभृतं रजतं बहिः प्रतीयते । न शुक्तो रजतमन्यदिद रजतमिति । एवं प्रकृते ब्रह्मण्यपि मन्तव्यमिति न कश्चन दोष । आत्मख्यातितो योऽस्यां दोप. सः ख्यातिवादे द्रष्टव्यः । तस्माद्विपरीतभावना-निवृत्ति-हारा ब्रह्मणः साधनफलरूपतां बोधयितुमिदं खण्डद्वयमारभ्यते । नत्र सर्वेभ्योप्युत्तमाभ्य एनाभ्योऽग्नीन्द्रवाय्वात्मिकाभ्यो देवताभ्यो ब्रह्म उत्कर्ष वदिति, आख्यायिका-मुखेन वोधयितु- माख्यायिकामाह ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तम्य ह ब्रह्मणो विजये- देवा अमहीयन्त, न ऐक्षन्तास्माकमेवायं- विजयोऽम्मास्मेवाऽयं महिमेति " ||१||१४॥ यत्मभ्य उत्कृष्टत्वेन बृहत सर्वोत्कर्षाधायकत्वेन बृंहणं परमार्थ- मप वस्तु तद ब्रह्मेति'. तद्धि 'ह' प्रमिह कर्तृ 'देवेभ्यो विजिग्ये ' देवार्थ च जयमुदभावितवत । विजयो नाम सर्वोत्कर्षण स्थितिः। 'मम नर्वोत्कर्षेण स्थिती मद्विभृतीनां मदवयवानां वा स्वत उत्कर्ष: इति-ईयां यदा प्रादुश्चकार, तईवानुराः प्रतिपेदिरे- 'सुरागां पक्षे ब्रह्मेति, न वय नोंदं प्रभवाम - इति निश्चयवन्तो युद्धान्निवृत्ता.' यदा तदा ब्रह्म विजिग्ये । इत्यन्यबुद्वयनुवादोऽयम् । पतेन ब्रह्मणि य उत्कर्णधायका गुणास्ते म्बोपानकानामुत्कर्ष- निहायमेवेति वोधित • देवेभ्यो विजिग्ये' इत्यनेन । ब्रह्मणो बिजये देवा अमहीयन्त' ते देवा.स्वापकर्ष ब्रह्मण्यारोप्य ब्रह्मगतमुत्कर्षमात्मनि भावयमाना .लेनाजये राज्ञ स्वजयवम्बन्मि- न्प्राधान्यबुद्धया, ब्रह्मणि गौणबुद्धया ' वयं जिता ' इति वुदि यदा कृनवन्नम्तदाऽत्यस्य ब्रह्मणो जये देवा अमहीयन्त- 'क्यमेव तत्य ३६ ] केनोपनिषद १ सर्वोत्कर्ष शालिन '- इत्यभिमत्य स्वापकृष्टान्मनुष्यादीन् वरै प्रलोभ्य पूजां कारितवन्त । स्वातन्त्र्य साधनभक्तिमार्गे दोषः- इति स्वतन्त्रता सूचयितुं 'देवा ' इति पुंस्त्वेन निर्देश. । एतादृशसत्कृत्या याश बाहिर्मुख्यं भक्तानामपि देवाना मम्पन्न तदनुवदन्त्याह -'त ऐक्षन्त 'आलोचितवन्तस्ते। आलो- चनाप्रकारमाह-'अस्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवाय महिमेति'। अयमसुर-पराजयरूपो विजयः सर्वोत्कषेण स्थित्यात्मक सोऽस्मा- कमेव, आस्माकीन. स्वाभाविको धर्मः, नात्र कस्यचित्कारणतेति । तथा पूज्यत्व-प्रयोजिका सर्ववस्तु-समृद्धिरपि, आस्माकीनस्वाभा- विकधर्मप्रयोज्यत्वाद्धर्म नातिचरतीति । एतेन "जीवाः स्वभावतो दुष्टा. " इति सिद्धान्तो बोधितः । अभिमानसप्रतिबन्धकता भक्तिमार्गे, इति चापि सूचितम् ॥१॥१४॥ एवं जीवानां दोष-निधित्व स्वभावत उक्त्वा,स्वानन्द-दानेऽधिकृतानां सर्वेषां परोक्षे प्रियकारित्वं ब्रह्मणि बोधयितुं-जीवदोषात्तेषामकृतार्थतां मत्वा कृपाविष्ट ब्रह्म तद्दोष- निवृत्त्यर्थ प्रादुर्भवतीत्याह :- " तद्वैषां विजज्ञो तेभ्यो ह प्रादुर्वभूव । तन्न व्यजानत-किमिदं यक्षमिति ॥२॥१५॥ 'तदेव 'निरुपधिकृपाशेवधितया यत्प्रसिद्ध', 'एषां 'देवानां सम्बन्धिन दोषं 'विजज्ञौ 'ज्ञातवत् । दोषस्याकीर्तनतयाऽध्या- हार्यतां सूचयन्ति सम्बन्धिमात्र-निदेशेन । परस्मैपद-प्रयोगेण ज्ञानफलस्य देवगामिता वोधिता। यदा कृपयाऽऽलोचित-'दोषो निरसनीय इति, तदा 'तेभ्य ' तदर्थमेव प्रादुर्बभूव'। एवं तहोषस्यातिप्रवलतया ब्रह्ममात्रनिरसनीयता-द्योतनेन दोषाणामन्याप्रतीकार्यता, आधिदैविकता च सूचिता। एवं स्वकृपया दोष व्यापादयितुं प्रकटमपि ब्रह्म, जीवा. भक्त-

मनस्विनी
[ ३७
स्वभाववशान्न जानन्ति- इत्याह :-'तन्न व्यजानत, किमिद यक्ष-
मिति । ब्रह्म-विमुखानां नाम न ग्राह्यमिति- देवानामध्याहार्यतां
मृचयति। तत् 'ब्रह्म कर्म, ते देवा अभिमानदोषान्न व्यजानत ।
विशेषज्ञान-निकायाः सामग्र्या ब्रह्मज्ञानौपयिक्या अनुपस्थित्या,
सामान्यज्ञान भगवत्सान्निध्याज्जातमितिकृत्वा जानन्तोऽपि
इद यक्ष किमिति ?' विशेषाकारेण न व्यजानत । माहात्म्यज्ञान
भक्तो कारण, तदेव तेषा तिरोहितमित्युक्तम यक्ष मिति यजतेः
कर्मणि प्रत्ययः । देवानां स्वस्मिन्नुत्कर्ष भावनया यजनीयता-
बुद्विर्यादिता, तस्या निरासो येन सजातीयेन ब्रह्मणो रूपेण भवति,
तहोप-निरासार्थ रूप ‘यक्ष' मित्युच्यते ॥२॥१०॥
एवं देवा यदा प्रादुर्भूतस्य ब्रह्मणो रूप न
व्यजानत, तदा स्वापेक्षयोत्कृष्टान् देवानपृच्छन् । अस्मासु प्रय
उत्कर्षशालिनस्तत्वविद . उपासनोपयोगिनश्च, अग्निर्वायुरिन्द्र-
श्चेति तेयां बुद्धि - अग्निगधिष्ठात्री देवता. स्वाध्यात्मरूपेण
कीर्तन उपयोगिनी । वायुस्त्वगिन्द्रियाधिष्ठात्री देवता-स्वाध्यात्म-
रूपेणोपासनोपयोगिवस्तूनां मार्दव-काठिन्य-खरत्व-शीतत्वादि-
ज्ञान उपयोगिनी । इन्द्रस्तु हस्तेन्द्रियाधिष्ठात्री देवता साक्षात्परि-
चर्योपयोगिनी म्वाध्यात्मरूपेणेति, तान्पृच्छन्ति :-
तत्र क्रमेण देवप्रश्नाह :-
तेऽग्निमत्रुवञ् जातवेद ! एतद्विजानीहि-
किमेतद् यक्षमिति ?
'ते 'देवा अग्निमुक्तवन्तः । तेजसो हि विलक्षणा गतिरिति,
विलक्षणगतिमत्त्वेन वस्तु-याथात्म्यावगमे सामर्थ्य तव, तथा
त्वं जातवेदा जात वेदो धन ज्ञानं वा यस्मात । पराक्रमेणाशक्यं
तदुपायेन शक्यम् । उपायस्तु वुद्धया, धनेन वा भवति, वागधिष्टा-
तृत्वेन स्तुतिहारा धनहेतुत्वम। तेजस्वित्त्वेन- आलोकद्वारा
चाक्षुपज्ञाने महकारित्वमिति सूचितम ।
ब्रह्म ज्ञातवतामप्येषां देवानां वुहिरन्यथा जाता । केवलज्ञानिनः
१
तथेति ॥३॥१६॥

३८] केनोपनिषद परब्रह्म तत्त्व न याथाथ्ये न विदन्ति-इति सूचनाय, सा तु ब्रह्मणैव स्वमाहात्म्य-ज्ञानपूर्विकां भक्तिमुत्पादयितुं कृतेति ध्येयम् । 'विजानीहि किमेतद् यक्ष मिति-विशेषतोऽवगच्छेत्युक्तेऽग्नि- रभिमानदोषवत्तया. सर्ववस्तु-याथात्म्यावगमे समर्थोऽस्मि-इति वाष्टयन देवोक्तमगीकृतवान् । तदाह-' तथेति'। यथा भवन्तो जानन्ति तथैव मयि वीर्यम्, नात्रासंभावना कार्या, वदाम्येतस्य तत्त्व व -इति- अङ्गीकाराकार । देवा. सर्व सम्वत्सरात्मकप्रजापतेरङ्गभूताः, ते सर्वैमिलि- वोत्पादितो दोष कालकृत एव भवति-इति । अय कालकृतोऽग्नौ दोषो निरूपित ॥३॥१६।। अङ्गीकारोत्तरकाल यत्कृतवॉस्तदाह :- तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्- कोसीति ? अग्निा अहमम्मीत्यवधीज्जातवेदा वा अहमस्मीति"॥४॥१७॥ ' तदिति' नपुसक-निर्देशेन यक्षेऽग्नेस्तुच्छत्व बुद्धिर्जातेति द्योतितम । तस्याभिमुख्य भजन्नद्रवत् । द्रवणं नाम कार्य सिद्धय- नुकूलस्वारस्योभावन, तदकरोत् । स्वारस्य एतदन्तर्भावयिष्या- मीति-कार्य कर्तु व्यवसितमग्नि तदोषावबोधाय ब्रह्म तदाभिमुख्यं भजत्तमवदत्-' कोऽप्तीति । एतावद्धाष्टर्यमवलम्व्य मदाभिमुख्य भजमानः कोऽसि १ वद, स्वतत्त्वम् । प्रश्नेन स्वमाहात्म्य गोपयत् तोष दाढयं जनयति । एवं पृष्टे स उवाच-'अग्नि, अहमस्मीत्यब्रवीत् । अग्निरिति यथार्थनामा, विलक्षणगतिमत्त्वेन मर्ववस्तु-याथात्म्यावगमे साम- र्थ्यवान् । नैतद्विकत्थनमात्रम, किन्तु निश्चितमिति 'वा'शब्दमाह । परज्ञानमुक्तमेतेन । स्वेन प्रमाद-पारवश्येन यदीदं कृतं तर्हि स्वकार्य-प्रवृत्तिजनक न भवति- इति स्वज्ञानमाह- अहमस्मीति' 'अब्रवीत्' । पराक्रमे सत्यप्युपायो न चेत् कार्य प्रतिरुद्ध स्यादिति शङ्का-निरामायाह -'जातवेदा अहमस्मीति' । व्याख्यातमिदम् ।

मनस्विनी [३९ स्वात्मगतोऽहमाख्यो दोषो निरूपित. ॥१७॥ एवं पृष्टेऽपि-अहमाख्यो दोष परिपुष्ट एव जात , तस्य नयन्यं यथाकथञ्चित्तन्माभूदित्येतदर्थमजानदिव पुन प्रश्नमाह :- उदभावित. ममम एव दोषो निराकार्य इतिभावेन प्रश्न - " तस्मि स्त्वयि किम्वीर्यमित्यपीद सर्व दहेयं- यदिदं पृयिव्यामिति ॥५॥१८॥ ममाभिमुखे स्थिते ' त्वयि तस्मिन् ' पृक्तिरीत्या प्रसिन्डे किं वीर्यम् ? वीरेषु साधु वीर्यम् । परोपकाराय विशिष्ट-दारा- त्मजवित्तप्राणादीनपि, ईरयन्ति- ते वीरा , तेषु परहितमपेक्ष्यैव यत्प्रतिबन्धक-निरासार्यमुत्साहविशिष्ट पौरुषमाविर्भवति. तदु. च्यते-'वीर्य'मिति । तदस्ति चेद्दर्शनीयमित्यभिप्रायः । एवमुक्ते प्राह :-'अपीट सर्व दहेय यदिद पृथिव्यामिति अपीति गर्हायाम । धिग् यन्मे तेज पश्यदधायमालम्ब्य पृच्छसि ? सर्वमिद दहेय 'मिति-वदामि वीर्यम् । अहंकारदोषेण स्वसामर्थ्य- विषयमपि निर्दिशति- सर्वमिद मिति। इदमिति बुढ्याकलि- तम्. सर्वमिति प्रत्यक्षमनुमिनश्चेति । तम्मनश्चेदृहेयमिति । मुक्तो यदि तथा न जात तहि-अकीर्तिर्भविष्यति-इति सावधान- तयाऽऽह- यदिदं पृथिव्यामिति'। पृथिवीमधिकृत्यैव, जलस्य वाष्परूपता-सम्पादने सामर्थ्य मिति । यदिद दृश्यते' तत्सर्व दहेय'मिति । अयं स्वभावदोषी व्याख्यातः ॥२॥१८॥ एवं दोषस्य मर्वथाऽनपनोद्यतां या दया- टतयाऽनायासेन दोप दुरीकर्नु, येन वीर्ये व गर्वित. स तृणादपि- अल्पतमस्त्वमिति-स्वाभिप्राय द्योतयितुमग्नेरने तृण तत्मामर्थ्य- परीक्षार्थ निदधौ, इत्याह :- "तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति, तदुपप्रेयाय- मर्वजवेन तन्न शशाक दन्धु, स तत एव निववृते, नैतदशकं विज्ञात- यदेतद्यक्षमिति" ॥६॥१९॥ पत्र- १०] केनोपनिषद . तद्यक्ष 'तस्मै'अग्नये 'तृणं निदधौ' अग्रे स्थापितवत् । निधाय चैतदब्रवीत्-' एतद्दहेति । तस्मा इति उद्देश्यतामाह-यदि तृणमपि दहेस्तहि-एतत् तृणं तुभ्यमेव ददानि । क्षुद्रस्य तदपेक्षया महति दत्ते संतोष , एतदपेक्षयापि-अल्पतमोऽसि, इति । अल्पदाहे तव तुष्टिः सेत्स्यति-इति सूचनार्थम् । 'तृण'मिति- मदभिप्रायेण तु तव दोषभक्षकम् , त्वदभिप्रायेण- त्वयाऽदनीयम् । तृण निदधा वित्यनेन पशुर्यथा सर्वानविशेषेण पश्यति, स तृणाहस्तथा मन्महिमान न जानन् पशुरसि-इति बोधितम् । निदधौ' निश्चित्य स्थापितवत्। नाऽलमयमेतस्य दहनायेति । 'एतद हेत्य- ब्रवीत् । ' एतदिति नि सारतामाख्यातु नपुसक-निर्देश । इत्युक्ते सोऽग्निर्दोषाविष्टः सन्-'तत्=नि सारम्, अग्न्यभिप्रायेण, वस्तुतस्तु “ ॐ तत्मदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविध स्मृतः" इति ब्रह्म-निर्देशकेन निर्दिष्टमिति-ब्रह्माविष्ट तृणमुपेति, अ धिक्यं ब्रह्मावेशादेव । 'उपप्रेयायेति' प्रकृष्टगमनवानभूत् । किमेतेन ? मसारं वस्तु परित्यज नि सारं वस्तु मदने स्थापित न किञ्चिदेतत् तदर्शयामि स्ववीर्यमिति-महतोत्साहेन गमनं प्रगमनम् । सर्व- जवेन'इति सर्वजवोपलक्षित प्रगमन कृतवानित्यर्थः । आवेशेनोद्गतं पौरुष कार्यमिति शैन्येण समापयितु सर्वाङ्गेषु रहो जनयति तदुपलक्षितम् । एवं सर्वक्रोधेन सर्वोत्साहेन चित्त समुन्नत्यापि द्रष्टव्यम। एचकृते यज्जात तदाह तन्न शशाक दग्धुम् । तद्दग्धु न शशाक । तत्तुच्छमपि वस्तुतो ब्रह्माविष्टं भस्मीकर्तुं न शशाक । तदत्रागमो भवति .-" न तत्र सूर्यो भाति, न चन्द्रतारकं, नेमा विद्युतो भान्ति, कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्व, तस्य भामा मर्व मिद विभाति' इति । स्मृतिश्चापि भवति-"यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ' इति । यत्तेजः स्वमग्नौ निहितमस्ति तदुपसंहृतमिति- 'तन्न शशाक दग्धु 'मित्यनेन योतितम , तृणे च समाहितमित्यपि वाध्यम । यदा ब्रह्माविष्टस्य तृणस्य दहनाय न प्रभुस्तदा 'स तत एय निववृते' । स' इति स्मरणाऽहाऽग्नि ! तत एव-तृणादेव, निववृते- मनस्विनी [४१ निवृत्तः । अग्निना सर्वजवेनाक्रान्तेऽपि तृणे कश्चन विकारोऽपि न जातः- इति सूचनाय 'तत ' इति अविकृतत्वेन निर्देशः। पूर्व- काले मलिनस्यापि हेन्नोऽग्निसम्पर्कोत्तरकालमविकृतता भवति, नादृश्या व्यवच्छेदार्थमेवकारः । पूर्वभावादपि न प्रच्युतं तत्- इति निववृते । इति कार्याप्रमिद्धिः सूचिता। एवमनायासेन यदा कृपया ब्रह्मणा गर्गख्यो दोप परिहत- स्तदा माहात्म्य-मानवानाह देवान्प्रति। किमित्याह-तनिर्दिशति- नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति' गतदोषस्य दैन्याविष्टस्य वचनमिदम् :-एतद् विज्ञातु नाशकम । अहमाख्यो दोपो निवृत्तः, दैन्यावेश: मम्पन्न इति सूचयितु गम्यमानमहंभावमाह, न मुखत उदाजहारेति-अशकमित्युक्तम् । विशेषाकारेण तद्विशाना- भावार्थमाइ- 'तद्यनम्' इति । विस्मय:- यस्मात्कारणान्न मे विज्ञानं तत् कारणं किम ? इति माहात्म्यवत्त्व-द्योतनाथ उक्तः । एतद्यक्षमिति विशेषाकारो विमानस्य, इति । एतावता विमुखा अल्पमपि कार्य कर्तुं न प्रभवन्ति । तेन प्रकृतोपयोगि यहाच्य- ब्रह्म-धर्मा एवान्यत्र, नान्येपां ब्रह्मणि' इति, तत्समर्थितम् । यदावेशमन्तरा देवेभ्यः प्रकृष्टस्यापि जातवेदसो न तृणदाहे मामय जातं, तस्मिन्कथमन्यधर्मारोपः कर्तुं शक्य इति न तत्र विपरीतभाबनावकाशः। इनि, ब्रह्माज्ञया यत्कर्तव्यत्वेन चोदिनं तत् कर्मकृतो दीप इह वर्णित ॥६॥१९॥ अथ क्रमप्राप्तं स्वेभ्य उत्तमं त्वगिन्द्रि- याधिष्ठातारं स्वाध्यात्म-रूपेणोपासनोपयागिसर्ववस्तूनां मार्डवादि- शान उपयोगिनं वाय्वाख्यं देवमग्न्यापेक्षयाप्युत्तमम, अग्नेः प्रादु- भृनयक्षस्वरूप-विमानेऽसामर्थ्यमालोच्य देवा अवनिति-आह अथ वायुमनुवन् वायवेतद्विजानीहि- किमेतद्यक्षमिति ?- तथेति" ॥७॥२०॥ व्याख्या पूर्ववत् । चत्वारो टोपा अत्र पूर्ववत् क्रमशो व्याख्येयाः । विशेषपदानि व्याख्यायन्ते :-'अर्थ 'ति, अग्नि-प्रतिप्रश्नऽपि याथा- ६ - ४०] केनोपनिषद तयक्ष 'तस्मै'अग्नये 'तृणं निवधौ' अग्रे स्थापितवत् । निधाय चैतदब्रवीत्-' एतद्दहेति' । तस्मा इति उद्देश्यतामाह-यदि तृणमपि दहेस्तहि-एतत् तृणं तुभ्यमेव ददानि । क्षुद्रस्य तदपेक्षया महति दत्ते संतोष , एतदपेक्षयापि-अल्पतमोऽसि, इति । अल्पदाहे तव तुष्टिः सेत्स्यति-इति सूचनार्थम् । 'तृणमिति- मदभिप्रायेण तु तव दोषभक्षकम् , त्वदभिप्रायेण- त्वयाऽदनीयम् । तृण निदधा'वित्यनेन पशुर्यथा सर्वानविशेषेण पश्यति, स तृणाहस्तथा मन्महिमान न जानन् पशुरसि-इति बोधितम् । 'निदधी' निश्चित्य स्थापितयत् । नाऽलमयमेतस्य दहनायेति । 'एतदहेत्य- ब्रवीत् । ' एतदिति नि सारतामाख्यातु नपुसक-निर्देश । इत्युक्ते सोऽग्निर्दोषाविष्टः सन्-'तत्-नि सारम्, अग्न्यभिप्रायेण, घस्तुतस्तु “ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविध स्मृत" इति ब्रह्म-निर्देशकेन निर्दिष्टमिति-ब्रह्माविष्ट तृणमुपेति, अ धिक्यं ब्रह्मावेशादेव । 'उपप्रेयायेति' प्रकृष्टगमनवानभूत् । किमेतेन ? ससारं वस्तु परित्यज नि सारं वस्तु मदने स्थापित न किञ्चिदेतत् ' तदर्शयामि स्ववीर्यमिति-महतोत्साहेन गमनं प्रगमनम । सर्व- जवेन' इति सर्वजवोपलक्षित प्रगमन कृतयानित्यर्थ । आवेशेनोदगतं पौरुष कार्यमिति शैन्येण समापयितु सर्वाङ्गेषु रहो जनयति तदुपलक्षितम् । एवं सर्वक्रोधेन सर्वोत्साहेन चित्त समुन्नत्यापि द्रष्टव्यम् । एचकृते यज्जात तदाह 'तन्न शशाक दग्धुम् ' । तद्दग्धु न शशाक । तत्तुच्छमपि वस्तुतो ब्रह्माविष्टं भस्मीकर्तुं न शशाक । तदत्रागमो भवति ·-" न तत्र सूर्यो भाति, न चन्द्रतारकं, नेमा विद्युतो भान्ति, कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्व, तस्य भामा सर्व मिद विभाति' इति । स्मृतिश्चापि भवति-"यच्चन्द्रमसि यञ्चाग्नौ तत्तजो विद्धि मामकम् इति । यत्तेजः स्वमग्नो निहितमस्ति तदुपसंहृतमिति- 'तन्न शशाक दग्धु 'मित्यनेन योतितम् , तृणे च समाहितमित्यपि वाध्यम। यदा ब्रह्माविष्टस्य तृणस्य दहनाय न प्रभुस्तदा 'स तत एव निववृते' । स' इति स्मरणाऽहाऽग्नि ! तत पव-तृणादेव, निववृते= मनस्विनी [४१ . निवृत्तः । अग्निना सर्वजवेनाकान्तेऽपि तृणे कश्चन विकारोऽपि न जातः- इति सूचनाय ' तत इति अविकृनत्वेन निर्देशः । पूर्व- काले मलिनस्यापि हेन्नोऽग्निसम्पर्कोत्तरकालमविकृतता भवति, नादृश्या व्यवच्छेदार्थमेवकार. । पूर्वभावादपि न प्रच्युतं तत्- इति निववृते । इति कार्याप्रमिद्धिः सूचिता। पवमनायासेन यदा कृपया ब्रह्मणा गर्याख्यो दोप परिहत- स्तदा माहात्म्य-मानवानाह देवान्प्रति। किमिन्याह-तनिर्दिशति- 'नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति' गतदोषस्य दैन्याविष्टस्य वचन मदम् :-एतद् विज्ञातु नाशकम । अहमाख्यो दोपो निवृत्तः, देन्यावेश: सम्पन्न इति सूचयितु गम्यमानमहंभावमाह, न मुखत उदाजहारेनि-अशकमित्युक्तम् । विशेषाकारेण तद्विज्ञाना- भावार्थमाह- 'तद्यक्षम्' इति । विस्मय:- यस्मात्कारणान्त में विज्ञानं तत् कारणं किम ? इति माहात्म्यवत्त्व-द्योतनार्थ उक्तः । एतद्यक्षमिति विशेषाकारो विनानस्य, इति । एतावता विमुखा अल्पमपि कार्य कर्तु न प्रभवन्ति । तेन प्रकृतोपयोगि यद्वाच्य- ब्रह्म-धर्मा एवान्यत्र, नान्येपां ब्रह्मणि' इति, तत्समर्थिनम। यदावेशमन्तरा देवेभ्य. प्रकृष्टस्यापि जातवेदसो न तृणदाहे मामयं जातं, तस्मिन्कथमन्यधर्मारोपः कर्तु शक्य इति न तत्र विपरीतभावनावकाशः। इनि, ब्रह्माज्ञया यत्कर्तव्यत्वेन चोदिनं तत् कर्मकृतो दोष इह वर्णित ॥६॥१९॥ अथ क्रमप्राप्तं स्वेभ्य उत्तमं त्वगिन्द्रि- याधिष्ठातारं स्वाध्यात्म-रूपेणोपासनोपयागिमर्ववस्तूनां मार्दादि- धान उपयोगिनं वाय्वाख्यं देवमग्न्यापेक्षयाप्युत्तमम, अग्नेः प्रादु. भूतयक्षस्वरूप-विज्ञानेऽसामर्थ्यमालोच्य देवा अवनिति-आह अथ वायुमत्रुवन् वायवेतद्विजानीहि- किमेतद्यक्षमिति ?- तथेति ॥७॥२०॥ व्याख्श पूर्ववत् । चत्वारो टोपा अब पूर्ववत् क्रमशो व्याख्येयाः । विशेषपदानि व्याख्यायन्ते :- अर्थ 'ति, अग्नि-प्रतिप्रश्नेऽपि याथा- . । ६ ४२] केनोपनिषद् त्म्यावगमने सामर्थ्यमविभाव्य वृथास्याभिमान इति-ज्ञानानन्तर मित्यर्थ. । 'वायु ' मिति वाति सदा सर्वत्र गतिमान् भवति, निरा- लम्बेऽपि नभसि- अय म्वाश्रयश्चलति-इति वायुः। विशिष्टज्ञान- वानेव विशिष्टक्रियाशक्तिमान् भवति । अग्नि-पक्षश्चायमित्यभि- प्रायेण 'तथे 'त्यङ्गीकार ||७॥२०॥ अङ्गीकारोत्तरकालं यत्कृतवॉस्तदाह :- तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत् - कोसीति ? वायु; अहमस्मीत्यनवोन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति " ||८|॥२१॥ व्याख्या पूर्ववत् । सर्वत्र गतिमानहम् । चरणराहित्येऽपि सर्ववस्तु- प्राप्तौ न मे कश्चन विलम्ब इति-सूचितम् । ' इति 'लोकविलक्षण- ताऽपि तथा । मातरिश्वा चाहं निरालम्बे आकाशे वृद्धिमेव यामि, न तु क्षयमिति गुण , पूर्वविशेषणेन दोषाभाव (श्च) उक्तः । स्वरूप रहितमपि वस्तु मम वृद्धिकरं, तदा स्वरूपविशिष्टं किमु वक्तव्य- मिति भावं द्योतयति । ८।२१।। एवं पृष्टेऽपि- अहमाख्यो दोषः परिपुष्ट एवं जातस्तस्य नैयून्यं यथाकथञ्चिन्मा भूदित्येतदर्थमजानदिव पुनः प्रश्नमाह " तस्मि - स्त्वयि किवीर्यमित्यपीद सर्व- मादढीयं यदिदं पृथिव्यामिति" ॥ ९ ॥ २२ ॥ व्याख्या पूर्ववत् । ' आददीय ' सर्व वस्तु विकीर्णमेकत्र कुर्याम्, एकत्र स्थितं विकिराणि, ऊर्ध्व नयामि, अधः पातयामि, 'इति' सर्व वस्तु स्वाधीनं कुर्याम् । इति ॥९।।२२।। एवं दोपस्य सर्वथानपनोद्यतां दृष्ट्वा कृपा- [दया ] लुतयाऽनायासेन दोपं दुरीकर्तुं -येन वीर्येणैवं त्वं गर्वित' मनस्विनी [४३ तत्तृणादपि अल्पता त्वयि-इति स्वाभिप्राय द्योतयितु ब्रह्म वायोरने तृणं तत्सामर्थ्य-परीक्षार्थ निदधावित्याह " तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति तदपप्रेपाय सर्वजवेन- तन्न शशावादातुं, स तत एव निवरते, नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति " ||१०॥२३॥ व्याख्या पूर्ववत् । 'तन्न शशाकादातु'मिति । अत्रागमो भवति- " आसीनो दृरं व्रजति शयानो याति सर्वतः " "अपाणिपादो जवनो गृहीता० " "यदिद किञ्च जगत्सर्व प्राण प्रजति नि सृतम् "एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा०" यो वायुमन्तरो यमयति०" इति । यदादान-सामर्थ्य वायो निहितं तदुपसंहृत, तृणे च समाहित- मिति बोध्यम् । उपसंहार उपयोगिता चाख्यानस्य पूर्ववद्वोध्या ॥१०॥२३॥ अथ क्रमप्राप्त स्वेभ्य उत्तम हस्ते- न्द्रियाधिष्ठातारं स्वाध्यात्मरूपेण साक्षात्परिचर्योपयोगिनमिन्द्राख्यं देव, प्राणाजातस्य वायोः पोषकतया वृष्टि-प्रवर्तकत्वेनोत्तम, वृष्टि-सम्पादकम, अग्निदाह-शान्तिकरत्वेनाग्नेरुत्तमं, परमैश्वर्य- विशिष्ट, प्रादुर्भातयक्ष-स्वरूप-विज्ञाने बायोरसामर्थ्यमाकलय्य देवाः पर्यपृच्छन्नित्याह :- " अथेन्द्रमनुवन्मघवन्नेतद्विजानीहि-किमेतद्यक्षमिति । नथेति, तदभ्यद्रवत्तस्मात्तिरोदधे ॥११॥२४॥ वायु प्रति प्रश्नोऽपि- याथात्म्यावगमे तमसमर्थ विचार्य वृधाम्याभिमान इति-ज्ञानानन्तरम- इन्द्रं परमैश्वर्य विशिष्टत्वे अमावेशिनं, वल्लु-याथात्म्यावगती सर्वथा तमर्य, पर्यपृच्छन । तत्र प्रश्नाकारमाहुः- 'मघवन्नेतद्विजानीहि -- किमेतद्यक्ष- मिति' | देवानामपि ब्रह्म-सान्निध्याद्दोप-स्फूर्तिरस्य जातंति, तथा मम्बोधयन्ति-मवधन्निति । मघमन्तमस्यास्ति म मघयान । 'वृष्टेरन्न .

१ ४६] केनोपनिषद भक्तिविशिष्टां विद्याधिष्ठात्री देवतां 'आजगाम' = तां विद्यामेवा- चार्यरूपामासमन्ता प्राप्तवान् । परतन्त्राया (विद्यायाः) शिष्योऽपि परतन्त्रो भवतीति- तदुपसत्त्या पारतव्यं गच्छे 'स्तां होवाच किमेतद् यक्षमिति ? प्रश्नं कृतवान् । तदेतदाह-'तां हे 'ति । तां = सर्वलोकवेदप्रसिद्ध- त्वेन ब्रह्मरूपान्तरम्, आचार्यरूपतयोपस्थिताम् ' हे 'ति-उपसत्ति- प्रसिद्धि कुर्वन् ' उवाच - पृष्टवानिन्द्रः । प्रश्नाकारमाह 'किमे- तद् यक्ष 'मिति । परिप्रश्नेनोपसंहारः शास्त्रार्थ-दाढर्याय। तेन पारतन्यरूपो गुणश्चोक्त । सोप्यय ब्रह्मण एव गुणो भवति, " भर्ता सन्ध्रियमाणो बिभर्ति" इति हि समाम्नायः। सेव्य-गुणा- विष्टेनैव सेवकेन सेव्यमाराधयितु शक्यमिति । तथाचास्य ग्रन्थस्य प्रकृतार्थानुकूल्यमेवम् :- पूर्व देवानां पारतन्त्र्यमवस्थितम् । पुनर्बह्मणो जयेन अझ-धर्मा- वेशात्तेषु स्वातन्त्र्यभाविभृतम् । पुनस्तस्य देवधर्मता मा भूदिति- यक्ष-धृततृणे स्वस्व- सामर्थ्यामूर्च्छनेनास्माकमल्पेऽपि वस्तुनि न सामर्थ्यमिति ( देवाना) दैन्योद्भावेन तस्य ब्रह्म-धर्मता समर्थिता । यत आगत सामर्थ्य तत्तत्रैवोपसंक्रान्तमिति । एव यत्पारतन्त्र्य तद्यदि स्वाभाविक स्यातर्हि-अध्रुव' न स्यात् , तस्मादयमपि धर्मोऽ यदीय एव नास्माकमध्रुवत्वात् , “युक्तं भगै स्वैरितरत्र चानुवै "रिति-न वय केऽपि, नान्यत्र स्वातन्त्र्यादयो धर्मा किन्तु ब्रह्मणि ते, अन्यत्र कार्येषु गच्छन्ति । नान्यगता धर्माः ब्रह्मण्युपसंक्रामन्ति-इति कथं ब्रह्मण्यन्यधर्मारोप समर्थनीयः ? तदभावाच्च न विपरीतभावना ब्रह्मणि कर्तुं शक्या । ब्रह्म-प्राप्तौ साधनाविष्कारपूर्वक स्वस्मिन् पारतन्त्र्य-भावनं, तदपि ब्रह्म- धर्मो भवति, इति- न साधने विपरीतभावनावतारः । ब्रह्मणा दत्ते. नव तेन ब्रह्म प्राप्तुं शक्य नान्येनेति । एव प्राप्ती ब्रह्मेष प्रमाणम, ब्रह्मैव प्रमेयम् , ब्रह्मैव साधनम् भक्ताविति सिद्धम् ॥१२||२५|| मनस्विनी [४७ कारिका स्वातन्त्र्यं पारतन्त्र्यं वा ब्रह्मदत्तं हि माधनम् । भक्तौ ब्रह्म-गुणावेतौ नागेपस्तेन सिद्धयति ॥३०॥ जीवीयौ ब्रह्मणा दोपौ निवायौं, दैन्यतोदये- स्वगुणी तत्र दातव्यो, ताभ्यां ब्रह्म तु लभ्यते ॥३१॥ गुरोः सकाशाच्छिक्षा तु तत्र द्वाविति निर्णयः । विपरीता भावनैवं साधने, सा निराकृता ॥३२॥ इति मामवेदीयकेनोपनिपन्मनस्विन्यां तृतीय खण्ड ।

४६ ] केनोपनिषद् , आजगाम . भक्तिविशिष्टां विद्याधिष्ठात्री देवतां = ता विद्यामेवा- चार्यरूपामासमन्ता त्प्राप्तवान् । परतन्त्राया (विद्यायाः) शिष्योऽपि परतन्त्रो भवतीति- तदुपसत्त्या पारतन्त्र्यं गच्छे 'स्तां होवाच किमेतद् यक्षमिति ?' प्रश्नं कृतवान् । तदेतदाह- तांहे 'ति । तां = सर्वलोकवेदप्रसिद्ध- त्वेन ब्रह्मरूपान्तरम्, आचार्यरूपतयोपस्थिताम् ' हे 'ति-उपसत्ति- प्रसिद्धि कुर्वन् ' उवाच'= पृष्टवानिन्द्र । प्रश्नाकारमाह - 'किमे- तद् यक्ष 'मिति । परिप्रश्नेनोपसंहारः शास्त्रार्थ-दाढर्याय । तेन पारतन्यरूपो गुणश्चोक्त । सोप्यय ब्रह्मण एव गुणो भवति, " भर्ता सन्ध्रियमाणो बिभर्ति" इति हि समाम्नायः। सेव्य-गुणा- विष्टेनैव सेवकेन सेव्यमाराधयितु शक्यमिति । तथाचास्य ग्रन्थस्य प्रकृतार्थानुकूल्यमेवम् :-- पूर्व देवानां पारतन्त्र्यमवस्थितम् । पुनर्ब्रह्मणो जयेन ब्रह्म-धर्मा- वेशात्तेषु स्वातन्त्र्यभाविर्भूतम् । पुनस्तस्य देवधर्मता मा भूदिति- यक्ष-धृततृणे स्वस्व- सामर्थ्यामूर्च्छनेनास्माकमल्पेऽपि वस्तुनि न सामर्थ्यमिति (देवाना) दैन्योद्भावेन तस्य ब्रह्म-धर्मता समर्थिता । यत आगत सामर्थ्य तत्तत्रैवोपसंक्रान्तमिति । एव यत्पारतन्त्र्य तद्यदि स्वाभाविक स्यातर्हि-अध्रुव न स्यात् , तस्मादयमपि धर्मोऽ-यदीय एव नास्माकमध्रुवत्वात् , “युक्तं भगै स्वैरितरत्र चानुवै "रिति-न वय केऽपि, नान्यत्र स्वातन्त्र्यादयो धर्मा किन्तु ब्रह्मणि ते, अन्यत्र कार्येषु गच्छन्ति । नान्यगता धर्माः ब्रह्मण्युपसंक्रामन्ति-इति कथं ब्रह्मण्यन्यधर्मारोप समर्थनीयः ? तदभावाच्च न विपरीतभावना ब्रह्मणि कर्तुं शक्या । ब्रह्म-प्राप्तौ साधनाविष्कारपूर्वक स्वस्मिन् पारतन्त्र्य-भावनं, तदपि ब्रह्म- धर्मो भवति, इति- न साधने विपरीतभावनावतारः । ब्रह्मणा दत्ते- नैव तेन ब्रह्म प्राप्तुं शक्य नान्येनेति । एव प्राप्ती ब्रह्मेष प्रमाणम, ब्रह्मैव प्रमेयम् , ब्रह्मैव साधनम भक्ताविति सिद्धम् ||१२||२५|| मनस्विनी [४९ 'सा'= ब्रह्मण शक्तिराधिदैविकी, इन्द्रस्य फलमुखाधिकारिता. मालोच्च- इन्द्रमुवाच। सिहस्य वस्तुनस्तावत्सर्वनाम्ना निर्देशः कत शक्यः, (परं) ब्रह्मणि यक्षे तिरोहिते- इन्द्रत्वमपि तिरोहित मिति. खपुष्पमितिवच्छन्द-ज्ञानानुपातित्वस्य जातत्वान्न नाम-निर्देश'. अपित्वध्याहारः । इन्द्र यक्ष ब्रह्मेति' उवाच । वृहत्वाद वृंहणत्वाच्च ब्रह्म " वृहत्त्वादेवेदं यक्षमिति, वृंहणत्वादेवास्या- पराभाव्यं त्वयि स्थितमिति । 'हे "ति तवानुभवे वास्य प्रसिद्धिः । तेन दुरामदता, अतिदुर्पता, या- सा त्वयि ब्रह्म-धर्मः। तम- वाहः-'ब्रह्मणो वा एतत् ' इति, स्वानुभवेन निश्चितं प्रत्यक्ष चतत्- यद् ब्राह्मणों विजये महीयध्वं' ब्रह्मण स्वभक्तानामुत्कर्पाख्य- वृंहणाख्यधर्मवतो विजये = सर्वथा चाघराहिन्या विशिष्टायां सर्वोत्कर्षेणस्थिती यूयं, महीयध्वम्' उन्तर्ष प्राप्ताःस्थ । इति- गवं त्यजतेति भावः । तेनोपदेशेन किं सिद्धम ? तदाह -' ततो हैव विदां चकार ब्रह्मेति'। 'तत्' इत्यव्यय निर्देशात्-अविकृता वाग् अत्र बोधे कारणम् । श्रोतैक्यिः स वोधित इति । तानि संग्रहीतु 'इति' शब्द प्रथममुपात्तः । तानि हि- उपनिषदनन्तर उपलभ्यन्ते :- कामास्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठा क्रतोरानन्त्यमभयस्य पारं, स्तोमं महदुरुगायं प्रतिष्ठां०" एतदालम्बनर श्रेष्ठमेतदा- लम्बन परं, एतदालम्बनं ज्ञात्या ब्रह्मलोके महीयते " " यतश्चो- देति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छनि, तं देवाः मर्पितास्तदु नात्येति कश्चनेति हवै० "। इति-विपरीतभावनाया अविपयं, प्रसिद्ध, निश्चित च विदाञ्चकार = विज्ञातवान् ब्रह्मेति । अस्माक जय-हेतुरिदमे । पूर्वमस्य 'नुच्छमिद मिति ज्ञानेन्माकमेव तुच्छता सम्पन्ना । अधुना नु- अस्य वृहकन्वेन ज्ञातत्वात्पूर्वमेव तेजोऽस्माकं संक्रान्त- मित्यवश्य वयतदिति। तेन- फले म्याभीष्टार्थ-मिहयनुलन्यं गुणः, तत्प्रतिकृदन्व

४८]
केनोपनिषद
चतुर्थः खण्डः।
पूर्वखण्डे साधनगता विपरीतभावना निराकृता ।
अथ फलगतां तां निराकर्तु चतुर्थः खण्ड आरभ्यते
कारिका :-
स्वाभीष्ट-सिद्धौ वैफल्यमविज्ञानं गुरोर्मुखात् ।
अमन्निधिः, प्रयासेन लभ्यता, ऽनिर्दृतेर्जनिः ॥३३॥
स्वैकाऽप्रवणता, सर्वमौहार्द-प्रियताऽजनिः ।
एते फलगता दोषाः, विपरीता तु भावना- ॥३४॥
एतैरुदेति, ब्रह्माख्ये फले तेषामभावतः ।
तस्या निवृत्तिरत्रोक्ता पञ्चभि हेतुगर्मितैः ॥३५॥
उपक्रमोपसंहारकृतमेकार्थबोधनम् ।
सन्दर्भ-शुद्धये प्रोक्तं, भक्तिस्तत्र फलिष्यति ॥३६॥
जीवस्य तस्याः मप्राप्तौ साधनानि प्रसङ्गतः-
उक्तानि, ग्रन्थसंज्ञान-प्रसिद्धथै फलमेकतः ।
एवं चतुर्भिः खण्डोऽयं पूरितो दोष-हानये ॥३७॥
साधनं कृतं दैन्याविष्कार-पूर्वकम्, स्वस्मिन् पारतन्त्र्य-
भावनात्मकम्, तस्य फलं ब्रह्मणस्तत्त्व-ज्ञानम् । तत्र गुरूपसत्तिरङ्गम् ।
तेन साधनेन फलं कीरश लभ्यते ? तत्र गुणश्च क ? इत्याकाङ्-
क्षायां गुरु-कथनमुखेन फल-स्वरूपमाह निगमः । गुरोरेव जिज्ञा-
स्य चेत्फलाधायकमिति
सा ब्रह्मेति होवाच, ब्रह्मणो वा एतद्विजये, महीयध्वम् ,
इति ततो हैव विदाञ्चकार-ब्रह्मेति" ॥१॥२६॥

मनस्थिनी [४९ - - 'सा'ब्रह्मण शक्तिराधिदैविकी, इन्द्रस्य फलमुखाधिकारिता. मालोच्य- इन्द्रमुवाच। सिद्वस्य वस्तुनस्तावन्मर्वनाम्ना निर्देश. कर्नु शक्यः; (परं) ब्रह्मणि यक्षे तिरोहिते- इन्द्रत्वमपि तिरोहितमिति. खपुष्पमितिवच्छब्द-ज्ञानानुपातित्वस्य जातत्वान्न नाम-निर्देश'. अपित्वध्याहारः । इन्द्र यक्ष ब्रह्मेति ब्रह्मेति' 'उवाच' । वृहत्वाद् बृंहणत्वाच्च ब्रह्म" वृहत्त्वादेवेदं यक्षमिति, बृंहणत्वादेवास्या- पराभाव्यं त्वयि स्थितमिति । 'हे 'ति तवानुभवेनवास्य प्रसिद्धि । तेन दुरामदता, अतिदुर्धर्पता, या-सा त्वयि ब्रह्म-धर्मः। तमे- वाहः-'ब्रह्मणो वा एतत् ' इति, स्वानुभवेन निश्चितं प्रत्यक्ष चैतत्- 'ब्राह्मणो विजये महीयध्वं ' ब्रह्मण स्वभक्तानामुत्कर्षाख्य- वृंहणाख्यधर्मवतो विजये = सर्वथा चाघराहिल्याद विशिष्टायां सर्वोत्कर्पणस्थितौ यूयं, महीयध्वम' = उत्कर्ष प्राप्ताः स्थ । इति- गवं त्यजतेति भावः। तेनोपदेशेन किं सिहम ? तदाह :-' ततो हैव विदां चकार ब्रह्मति'। 'तन' इत्यव्यय निर्देशात्- अविकृता वाग अत्र वोधे कारणम् । श्रोतर्वाक्यः स वोधित इति । तानि संग्रहीतु 'इति' शब्द प्रथममुपात्तः । तानि हि- उपनिषदनन्तर उपलभ्यन्ते " कामास्याप्ति जगतः प्रतिष्ठा क्रतोरानन्त्यमभयस्य पारं, स्तोम महदुरुगायं प्रतिष्ठां० " एतदालम्बनर श्रेष्ठमेतदा- लम्बन परं, एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते " " यतश्यो- देति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छनि, त देवाः मर्पितास्त नात्येति कश्चनेति हवै० "। इति-विपरीतभावनाया अविषयं, प्रसिद्ध, निश्चित च विदाञ्चकार = विज्ञातवान् ब्रह्मेति' । अस्माक जय-हेतुरिदमेव । पूर्वमस्य 'तुच्छमिद मिति ज्ञानेऽस्माकमेव तुच्छना सम्पन्ना । अधुना नु- अस्य बंदकत्वेन ज्ञानत्वात्पूर्वमेव तेजोऽस्माकं संक्रान्त- मित्यवश्यं प्रावतदिति । तेन-फले स्वाभीष्टार्थ-निहन्यनुलत्वं गुणः, तत्प्रतिकृयत्व ७ ४८] केनोपनिषद चतुर्थः खण्डः। पूर्वखण्हे साधनगता विपरीतभावना निराकृता । अथ फलगतां तां निराकतु चतुर्थः खण्ड आरभ्यते कारिका :- स्वाभीष्ट-सिद्धौ वैफल्यमविज्ञानं गुरोर्मुखात् । अमन्निधिः, प्रयासेन लभ्यता, निर्दृतेर्जनिः ॥३३॥ स्वैकाऽप्रवणता, सर्वमौहार्द-प्रियताऽजनिः । एते फलगता दोषाः, विपरीता तु भावना- ॥३४॥ एतैरुदेति, ब्रह्माख्ये फले तेषामभावतः । तस्या निवृत्तिस्त्रोक्ता पञ्चमि तुर्भितैः ॥३५॥ उपक्रमोपसंहारकृतमेकार्थवोधनम् सन्दर्भ-शुद्धये प्रोक्तं, भक्तिस्तत्र फलिष्यति ॥३६।। जीवस्य तस्याः मप्राप्तौ साधनानि प्रसङ्गत:- उक्तानि, ग्रन्थसंज्ञान-प्रसिद्धथै फलमेकतः । एवं चतुर्मिः खण्डोऽयं पूरितो दोप-हानये ॥३७॥ साधनं कृतं दैन्याविष्कार-पूर्वकम्, स्वस्मिन् पारतन्द्रय- भावनात्मकम्, तस्य फलं ब्रह्मणस्तत्त्व-ज्ञानम् । तत्र गुरूपसत्तिरङ्गम् । तेन साधनेन फलं कीश लभ्यते ? तत्र गुणश्च क इत्याकाङ् क्षायां गुरु-कथनमुखेन फल-स्वरूपमाह निगमः । गुरोरेव जिज्ञा- स्य चेत्फलाधायकमिति सा ब्रह्मेति होवाच, ब्रह्मणो वा एतद्विजये, महीयध्वम् , इति ततो हैव विदाञ्चकार-ब्रह्मेति" ॥१॥२६॥ १ - मनस्विनी [१९ . । 'सा'= ब्रह्मण शक्तिराधिदैविकी, इन्द्रस्य फलमुखाधिकारिता- मालोच्य- इन्द्रमुवाच। सिद्धस्य वस्तुनस्तावत्सर्वनाम्ना निर्देश कर्त शक्यः; (परं) ब्रह्मणि यक्षे तिरोहिते- इन्द्रत्वमपि तिरोहितमिति. खपुष्पमितिवच्छब्द ज्ञानानुपात्तित्वस्य जातत्वान्न नाम -निर्देश , अपित्वध्याहारः । इन्द्र यक्ष ब्रह्मेति' उवाच । वृहत्वाद वृंहणत्वाच्च ब्रह्म वृहत्त्वादेवेदं यक्षमिति, बृंहणत्वादेवास्या- पराभाव्यं त्वयि स्थितमिति । 'हे 'ति तवानुभवेनेवास्य प्रसिद्धि । तेन दुरासदता, अतिदुर्पता, या- सा त्वयि ब्रह्म-धर्मः। तमे- वाहः-'ब्रह्मणो वा एतत् ' इति, स्वानुभवेन निश्चितं प्रत्यक्ष चैतत्- यद 'ब्रह्मणो विजये महीयध्वं ' ब्रह्मण स्वभक्तानामुत्कर्षाख्य- वृंहणाख्यधर्मवतो विजये = सर्वथा चाधराहिल्याद विशिष्टायां सर्वोत्कर्पणस्थिती यूयं, महीयध्वम'उत्क्तर्ष प्रामाः स्थ । इति- गर्व त्यजतेति भावः । तेनोपदेशेन किं तिद्धम ? तदाह -' ततो हैव विदां चकार ब्रह्मेति'। 'तन् ' इत्यव्यय निर्देशात्- अविकृता वाग् अत्र वोधे कारणम् । श्रोतर्वाक्यः म वोधित इति । तानि संग्रहीतु' 'इति' शब्द प्रथममुपात्तः । तानि हि- उपनिपदनन्तर उपलभ्यन्ते कामास्याप्ति जगतः प्रतिष्ठां क्रतोरानन्त्यमभयस्य पारं, स्तोमं महदुरुगायं प्रतिष्ठां." एतदालम्पनर श्रेष्ठमेतदा- लम्बन परं, एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते" देति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छनि, त देवाः मर्पितास्तदु नात्येति कश्चनेति हवै०७॥ इति-विपरीतभावनाया अविषयं, प्रसिद्ध, निश्चित च विदाञ्चकार = विज्ञातवान् 'ब्रह्मेति । अस्माकं जय-हेतुरिदमेव । पूर्वमस्य 'तुच्छमिद मिति ज्ञानेऽस्माकमेव तुच्छना सम्पन्ना । अधुना नु- अस्य व्रहकन्वेन शातत्यात्पूर्वमेव तेजोऽस्माकं संकान- मित्यवश्य बनवतदिति। तेन- फले स्याभीष्टाध- नियनुयूलत्वं गुणः, तत्प्रतिकूलत्व " यतश्चो- ५०] केनोपनिषद् . हेतो, च दोषः। स विपरीतभावनाया व्युत्थापक', तदभावस्तत्रानु भवसिद्धः, इति-न ब्रह्माख्ये फले विपरीतभावनावकाश , गुणा- धायकत्वात्फलस्येति सिद्धम् ॥१॥२६॥ विहितभक्तिमार्गे गुरूपसत्तिं बिना न निस्तारः,“यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ, तस्यैते कथिता यर्था. प्रकाशन्ते महात्मन.०" इति । तत्कृपयैव ब्रह्म-प्राप्तौ सर्वोत्कर्षेण स्थित्यात्मक फलं भगवदावेशस्य परिचायनम् । एतद्यत्सर्वोत्कर्षेण स्थितिरिति, तामेव ब्रह्म-प्राप्ति-गमिकामाह :- तस्माद्वा एते देवा अतितरामिवान्यान् देवान्यदग्निर्वायुरिन्द्रः, ते ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पृशुस्ते ह्येनत्प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति॥२॥२७॥ 'तस्मा'दिति - गुरु-कृपया सर्वोत्कर्षाधायकमस्माकमिदं ब्रह्मेति माहात्म्य-ज्ञानात् , 'वा' इति निश्चयेन, 'एते देवाः' इति- सर्व वाक्य सावधारणम् । ' एते एव देवाः = द्योतमाना अलौकिकतेजोविशिष्टा , 'अतितरामिवान्यान्देवा'निति - अति- शयिता अन्यान्देवानपेक्ष्येति वाक्य-पूरणम् । मनुष्येभ्यो देवाः अति, देवेभ्योप्येतेऽतितराम् । इवेन- ब्रह्मावेशादेव, न तु वास्त- विकमेतेष्वतिशयकीर्तनमिति-वचितम् । देवेषु वैविध्यम्-(वर्तते) भगवन्माहात्म्य-वित्त्वेन साधारण्येन च । निस् निश्चयेन ब्रह्म यन्ति ते न्याः । (न न्याः अन्याः । तान् । अत्र-) उपसर्गावयवस्यानुच्चारण परोक्षवादार्थम् । तथाचावित्सु देवत्व रूढम्, वित्सु च योगरूढ- मिति निर्णय । ' एत' इति स्वानुभवेन तेषु वैशिष्टय व्याख्यातम् । तान्निर्दिशन्नाह :-'यदग्नि'रित्यादि । योऽग्निर्वायुरिन्द्रश्चेति । अग्निः अञ्चनादङ्गनाहा । वायुर्हि वानादवगमनाद्वा । इन्द्र इति इन्दनादिन्धनाद्वा । ब्रह्माविष्टस्तेजोविशिष्टोऽग्निः सवै पूज्यते, सरूपतां गमयति वा स.। (वाति) गच्छति सर्वत्रेति, अवगमयति स्वाविना भावेन सर्वानिति वा वायुः । दीप्तो भवति देवराजत्वा- परमैश्वर्य-विशिष्टो या, इन्द्रः । एतेषामीदृशधर्मवत्वे कारणमाह- ते झेनन्नेदिष्ठं पस्पृशुः , मनस्विनी [५१ . . इति । ते- इति " ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः" इति ब्रह्मावेश द ब्रह्मनिर्देशकेन परामृष्टाः । 'हि'-इति युक्तम् । अम्मयमापो न व्यथयन्ति तथा, तेजोमयं तेजो यथा, एवं ब्रह्मा. विष्टाः. ब्रह्म पस्पृशु । अन्यथा ब्रह्म-तेजसा दोरन् । अग्निदे- वानामवमो विष्णु. प्रथमः" इति " नमस्ते वायो ! त्वमेव प्रत्यक्ष ब्रह्मासि ' इति - आगमो भवति । एत 'दिति प्रत्यक्षं ब्रह्म । 'नेदिष्ठ मिति कर्मणा प्राप्त ब्रह्म अन्तिक भवति। ज्ञानेनामं नेदीयो भवति । भक्त्या प्रानं नेदिष्ठम । " तद दृरे तद्वन्तिके" इति हि श्रुतिर्भवति । तादृशं पस्पृशु'रिति- त्वगिन्द्रिय-जन्यज्ञान-विपय कृतवन्त । इति देवानां विग्रहवत्ता व्याख्याता, वाक्यार्य - स्वारस्याद ब्रह्मणश्च साकारता । नहि निराकारं त्वचा ग्राह्यं भवति, अलौकिकमेतदि- न्द्रिय भगवत्कृपया लभ्यते, दिव्यं ददामि ते चक्षु' रित्यत्र निर्दिष्ट चक्षुर्वन् । ब्रह्मणश्च सेव्यता, एतेन व्याख्यता। पादसेवनाख्या चेयं भक्तिरिति प्रतिभाति । तेन त्रिवपि विशिष्टो भवति कश्चन न वा ? तत्र को हेनुरिनि-प्रश्नो प्रन्य-स्वारस्यायाध्याहार्यः। तस्योत्तरमाह .. 'ते ह्येनत्' इत्यादि । 'ते' इति तेषामेनन् इति-एप प्रथम । योहि ब्रह्मेदं यक्षम्पेगायि तमिति-विदांचकार । ते येनदित्यत्र 'हि शब्दो योग्यतामाह -अवश्य गुरुमुपसन्न फल-प्राप्तो योग्यतां लब्ध्वा नपानातीति सिद्धम् ॥२७॥ तदेतदुक्तमिन्द्रादिपु निगमर्यात : "तम्माद्वा इन्द्रोऽतितगमिवान्यान्दवान् म ह्येनन्नेदिष्ठं पापः, म हेनन् प्रथमो विदाञ्चकार- ब्रह्मेति" ||२८ । यन्माद गुरुमुपसन्नो ब्रह्म-याथात्म्य जानन्नेव प्रथमो भगति तस्मादिन्द्रोऽन्यान्देवानपेक्ष्यातिशयित । तत्र हेनुः --'म हि' इन्द्र', 'पनन 'ब्रह्म. भक्त्या 'नेदिल = अतिनिकटे वर्तमान .

५२] केनोपनिषद् ' पस्पर्श । स एव 'प्रथमः' । ' एनद' यक्षरूपेण प्रत्यक्ष ब्रह्मेति- विदांचकार'। तेनेदं सिद्धम् :- फलस्यासन्निधिरपि तद्दोषः, तेनापि फले विपरीतभावनोदेति, सा च ब्रह्मात्मके फले नास्ति, भक्त्या ब्रह्म-सन्निधे कर्तुं शक्य- त्वात् । इतोऽपि न विपरीतभावनायकाश । एतावता प्रबन्धेन फल-स्वरूपं निर्दिष्टम, यत्प्राप्त्या सर्वोत्कर्षों देवानामपि भवति, तद् ब्रह्माख्यफलमिति ॥३॥२८॥ अथ तस्मिन्फले के गुणा. ? यदभावेन फल-प्राप्तावपि सन्तोषो मनसि नोदेति, इत्याकाङ्क्षायां गुणानाह त्रिभि तत्र तदात्मको गुणो निर्दिश्यते तस्यैष आदेशो यदेतद्विद्युतो व्यद्युतदा ३ इति, (इन् ) न्यमीमिपदा ३, इत्यधिदैवतम् ॥४॥२९॥ तस्य' देवानामपि फलरूपस्य, 'एषः' बुद्धिस्थोऽग्रे निर्दिश्य- मान, 'आदेश: 'आसमन्ताद् दिश्यत उच्चार्यते - स = देशकालनिरपेक्षा उत्कर्षाधायका धर्माः । जातावेकवचनमिदम् । एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि ! निमेषा मुहूर्ता अहोरात्रा- ण्यद्धमासा मासा ऋतच संवत्सराः” इत्यागमः । 'विद्युत' इति । विशेषेण द्योतत इति विद्युत = आनन्द । 'तद् देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्योपासनेऽमृत'मित्यागमः। 'यश्चाय विधुति तेजोमयोऽमृतमय पुरुष' इति श्रुतौ य आनन्दात्मक आत्मा सोऽयं विद्युत , तधर्माश्च ततोऽभिन्ना, प्रकाशाश्रयवद्वा तेजस्त्वात् " इत्यधिकरणे चेदं सिद्धम् । यथा ब्रह्म धर्मत्रयविशिष्ट तथा गुणा अपि तस्य । तत् शब्दस्य प्रवृत्ति-निमित्तमाह 'ध्यातदा इति--' आसमन्ताद्विद्योतितवानिति-हेतोगुणो विद्युतो भवति । अयमानन्द " एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति" इति चागमः । तेन देशकालानधीनद्योतन-धर्मवत्त्वात् (ब्रह्म) आदेश, धर्मः।

मनस्विनी [५३ - सर्वत्र सुलभं भक्त्येति । " एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गााकाश औतश्च प्रोतश्चे"ति निगम-कदम्बेन सर्वत्र व्यापकता प्रतिपादनात्सुलभ- त्वम् । (तेन) प्रयामसाध्यता निराकृता । 'इति' शब्दः प्रकारवाची, तेन एवविधा गुणा ये भक्तानां सन्तापहारकास्ते वहवो ब्रह्मणि वर्तन्ते, उपलक्षणविधर्यतदुक्तमिति भाव । कार्यतोऽपि विद्युताख्यो गुण उच्यते-'न्यमीमिपदा इति । आसमन्तान्निमेषमकारयत् । निमेषोऽयमक्ष्णोधमः। धर्म-सङ्गत्तये धर्मी आक्षिप्यते । निमेषो नामाक्ष्णोर्मुद्रणम् । कालबहुलतामुपलभ्य जीवे निवृत्ते अनिमेपो भवति । आनन्दाकारस्य लावण्यामृत- पानेनातृप्नुवतो महाभागस्य कस्यचिद् दृष्टव्यान्तरस्याभावेनाक्ष्णो- निमेषो जायते । इति-कार्यतः स्वरूपतश्चानन्दात्मकता गुणस्य व्याख्याता । अत्रायमागम :-" तद्यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिवक्तो न वाद्यं किञ्चन वेद नान्तरमेवमेवाय पुरुष. प्राज्ञेनात्मना सम्प- रिष्वक्तो न वाद्यं किञ्चन वेद नान्तर "मिति । तेनेदं सिद्धम् :- प्रयास-लभ्यता, निवृत्यजनकता च फल-दोषी, ताभ्यां विपरीतभावनोदयस्तो चात्र न भवत इति - न विपरीत- भावनावकाश. फलात्मके ब्रह्मणि, लोकोत्तरत्वादिति । गुणस्यानन्दकनिष्टता-व्युत्पादनाय - 'इत्यधिदैवत 'मिति कथ- नम् ॥४॥२९॥ अथ चिदात्मको गुण उच्यते अथाध्यात्म यदेतद् गच्छतीव च, मनोऽ नेन चैतदुपस्मग्त्यमीक्ष्णं सकल्पः ॥५॥३०॥ आत्मनि घिट्टपे भवतीदमिति - अध्यात्मम् । ज्ञानं फलगुण , पश्यत्यचक्षुः स शृणोन्यकर्णः " "स येत्ति येध"मित्यागमः। स एच व्युत्पापते- यदेतदित्यादिना। यदेतन्मनो गच्छतीव 'ति । एतस्माज्जायसे-प्राणो मनः" इति - श्रुत्युक्तं यद ब्रह्मज मन., पतस्य A ५४] केनोपनिषद् तत् अणु, स्वगुणेन सर्वत्रोऽत्पतति, तदा ‘गच्छतीव ' इति व्यप- दिश्यते । 'मनो होच्चक्राम, तत्संवत्सरं प्रोष्य, पर्यत्योवाच" इत्यागमः । यदा च सर्वेभ्यो महत्तमेन ब्रह्मणा ( मन ) महाशिलया पिपीलिकेवाकान्त भवति-स्थिरं भवति । वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्ण पुरुषेण सर्व"मित्यागम । परं त स्वरूपस्य ब्रह्मणः स्वाभाव्याद् गच्छतीव । उत्कृष्ट वस्तु सर्ववस्तु-रसान्न्यक्कृत्य स्वसंस्कारमेव मनसि दृढयति, तदा तदभिलाषाय मन सर्वदेव प्रवर्तते-“ आयम्य तदभावगतेन चेतसा लक्ष्य तदेवाक्षरं सोम्य ! विद्धि"इत्यागमः। एकरूपस्यानुभवस्यैव, एकरूपसंस्कार-जनने हेतुतेति - तद्रूपतया चिद्रूपता गुणो भवति । एवमासेचनकता व्याख्याता । 'एवं स देवो भगवान्वरेण्य" इति ह्यागमः । 'च'कार' इच्छतीवेत्यादीनां संग्रहार्थः । 'एत दिति - प्रत्यक्षविषयतया सर्वतो विलक्षणरस-जनकतया स्थित ब्रह्म, " आत्मक्रीड आत्मरति.. क्रियावानेष विदा वरिष्ठः" इति समाम्नायः । यत एवमत - अनेन चैतदुपस्मराय- भीक्ष्णं संकल्प:' । अनेन मनसा, एतद , ब्रह्म कर्म उपस्मरति अधिक स्मरति जीवः । ' सत्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृति" रित्यत्रोक्ता या स्मृति माऽऽविर्भवति । तस्या ध्रौव्यं निर्दिति –' अभीक्षण'मिनि दीर्घ काल उपात्त' । उप इति आदर.। 'स्मरतीति' नैरन्तर्यमिति दीर्घ कालादरनैरन्तर्येण जीवस्य स्मृतिः, ब्रह्मरूपफल-स्वाभाव्यादेव । तेन चेतम फलैकप्रावण्यमुक्तम् । “ यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्त रिक्षमोतं मनः प्राणश्च सर्वे' रिति । "प्राणैश्चित सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन् विशुद्ध विभवत्येप आत्मेति "चागमः । जीवस्यैवभूतायामवस्थायां योग्यतार्थमाह - 'सकल्प' । कर्मा- धीनस्तु- अकल्प एव । " ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशानीशा विनि"हि श्रुतिः। ज्ञानवान्क पो भवति-" ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशै"रिति चागम । सल्पस्तु भक्त्या भवति- ' सोऽनुते सर्वान्कामान्सह ब्रह्मणा विपश्चिते' ति श्रुतिरत्र भवति । ब्रह्म तुपराधीनमेव भवति, जीव- " मनस्विनी कर्तृकफलास्वाद-दशायामेय । भर्ता सन् भ्रियमाणो विमति इति-श्रुत्युक्तं भर्तृत्व यदा जीव आविर्भावयति, तदा जीवः संकल्पो भवति, भगवांस्तु भ्रियमाणत्व दकल्पो भवति । ' य इदं मध्विद वेद, आत्मानं जीवन्तिकात , ईशानं भूतभवस्य न ततो विजुगु- सते” इति श्रुतिरत्र भवति । अन्यथाचेद् “ रमो वे सः' इति श्रुत्याम्नाता रसरूपतवोच्छियेत ? रसस्य चैवंभूनमर्यादा, इति न कोपि दोप.। एनेन स्वानुभवद्वारा स्वस्य ज्ञानरूपाख्यो गुणो भति " नान्यदतोस्ति मन्तृ नान्यदतोस्ति विज्ञातृ". इति श्रुतायुक्त । तथाच स्वैकाप्रावण्यं स्वस्य चेतसश्चत् फले दोप', तेनापि विप- रीतभावनोदेति । स तु ब्रह्माख्ये फले नास्ति- इति न विपरीत भावनावतारस्तंत्र कथंचित् सभवतीति- मिद्वम् ॥५॥३०॥ अथ सदात्मको गुण उच्यते :- "नद्ध तदनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यम् । स य एतदेवं वेदाभि हैनं सर्वाणि भूतानि संवाञ्छन्ति" ॥६॥३१॥ 'तत् ' प्रसिद्ध सर्वेपां फलरूपम् । निश्चये 'ह' शब्दः । नात्र प्रलोभना काचित। 'तद्वनं नाम'नोनीति 'तत्' सर्वविम्तार- ' विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्व " भूतानि सप्रतिष्ठन्ति यत्र "नदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य ! स सर्वज्ञ सर्वमेवाविवेशे"ति च श्रुति. । 'वनं' याचनीयम् । "यश्छंदसामुपभो विश्वरूपः छन्दोभ्यो- ध्यमृतात्संबभूव, स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु" इत्यागमः । संभजनीय वा, विज्ञानं देवा. सर्व ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते०", माह ब्रह्म निराकुर्या"मिति च भूतिः । तद्वनं भवति । सदेव ब्रह्म व्यापकम, तथा सदेव याचनोय, संभजनीय वा भवति नत्वसत् । ' नामे 'ति प्रसिद्विः । तया कल्पितत्व व्यावृत्तम् । यत एवं गुणकं ततस्तद्वनमिति - माहात्म्यं धात्वोपासिनव्य भजनीयम् । एतादृशभजनेनोपासकस्य यो गुणः प्रसिहयति समाह-' य एतदेव'मित्यादिना । 'य' इत्येकवचनेनासाधारण्य- कम।

५६]
केनोपनिषद
मुपायके व्याख्यातम् । एनद्वेद = तद्वनं ब्रह्मेत्येतद्वेद, स एवं
करोतीति शेष । ब्रह्म = सर्व-विस्तारकम् -" तस्माच्च देव. बहुधा
सप्रसूताः साध्या मनुष्या पशवो वयांसि प्राणापानी वीडियो
तपश्च श्रद्धा सत्व ब्रह्मचर्य विधिश्चे"ति हि श्रुतिः। इति सर्वभजनीय
" तमीश्वराणां परमं महेश्वरं त देवतानां परमं च दैवत , पति
पतानां परम मिति हि श्रुतिः ।
य एवंभूतामुपासनां करोति, तस्योपाकस्य फलं 'अभि हैन
मित्यादिनाह -' एनं सर्वाणि भूतानि-अभिसवाञ्छन्ति ' सर्वाणि
भूतानि प्राणिजातानि । एनमुपासकमिति, सम्यक् वाञ्छ न्त ।
प्रयोजन-रादित्येन वाञ्छन सवाञ्छनम् स्वरूपतो गुणत क्रियातश्च
वाञ्छनि -इत्यभिशब्दार्थ ।
अत्र च केनापि प्रकारेण मनःसन्तोषार्थ सम्वाद कार्य इति
द्योतनाय-' हे 'ति। एवं च यदि फले सत्व न स्यात्तर्हि तदुपा-
सकस्यापि सत्याभावात्सर्वभूतानामभिसंवाञ्छन न स्यात् अस्ति च
तत्तस्मिन्निति - तदुपासकमपि सर्वाणि भूतानि अभिस वाञ्छन्ति ।
इति सत्वाख्यो गुणः कार्येण स्वरूपतश्च निर्दिष्टः ।
तथा च स्वसेवनेन पोषकत्वं यथा फले गुण तथा ब्रह्माख्ये
फलेऽपि स्वसेवनेन सर्वभूत-प्रियसुहृत्त्वकरणं गुण । फलदोष
एव विपरीतभावना-जन्मनि निदानम् । स चात्र नास्तीति न
तस्मिन्विपरीतभावनावकाशः। सर्वभूतप्रियसुहृत्व ब्रह्म-धर्मः । स
ब्रह्मावेशादेव जीवे संक्रान्तो भवति
तस्मात्मिद्धम् :-
ब्रह्मणि भक्ति कर्तव्येति । तयैवहि जीवानां परमपुरुषार्थ-
सिद्धि । तन्मार्गे च प्रमाण-प्रमेय-साधन-फलानि न ब्रह्मातिरि-
तानि । तेषु ब्रह्मण स्वाभाविकगुणमहिम्ना नासंभावनाविपरीत-
भावनाभ्यां प्रतिवन्धकमुपस्थातुं शक्यम् । नात्र मार्गे प्रमाण-प्रमेय-
माधन-फलेषु दोषः कश्चनेति ॥६॥३१॥

मनस्विनी [५७ अथाचार्य:-"आम्रान्पृष्टः कोविदारानाचष्ट "इतिन्याय प्रसङ्गोऽध माभूदित्युपक्रमोपसंहारयोरेकार्थतया भवितव्यमिति कृत्वा शिष्येण त्वया यत् केनेपित 'मित्यादिना पृष्टं, तत्सदृशमुत्तर- मेतत्तव मनस्यारुढ न वेति ? नेति चेत्पुनर्वक्तव्यमोमिति चेन्न वक्तव्यम ? इति-शिष्याभिप्रायानुवादेन विद्याया उपसंहारमाह उपनिपदं भोः बृहीत्युक्ता त उपनिषद् ब्राह्मी बाब त उपनिपढ मत्मेति" |७||३२॥ 'उप'निपूर्वात्सीदतेरयमुपनिषच्छब्द (सिद्धः)-उप-समीपे नितरां तीदत्यनयेति उपनिषत् '1 सीदतिश्च त्रिवर्थे पु पठ्यते (१) विशरणे, (२) गतौ (३) अवसादने च । (१) विशरण- नामासंभृयावस्थानम् । विशीर्णो धान्यराशि- ग्त्यिादी दृष्टार्थम । स्वरूप-गुण-क्रियाराहित्येन रूपान्तरेण वस्तुनोऽवस्थानानुकूलो व्यापारविशेषः । ब्रह्म-सान्निध्यं प्राप्य महान्तमपि वाधकं निराकृत्य- विशी भवति कोशोऽनया सा उपनिषद्भक्तिः। यदा सर्व प्रभिद्यन्ते हृदयस्यह ग्रन्थयः, अथ मोऽ- मृतो भवत्येतावदनुशासनम् ” । अस्य विस्त्रेममानस्य शरीरस्थस्य देहिनः, दहाद्विमुच्यमानस्य किमतः परिशिष्यते " इति । " अनिमित्ता भागवती भक्तिः मिट्टैगरीयसी, जरयत्याशु या कोशं निगोर्णमनलो यथा इति हि श्रुतिस्मृती भवतः । (२) सीदति प्राप्नोति ब्रह्मानयेति वा मव । नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः, नागान्न मानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् " इत्यत्र निगमो भवति । (३) अवसादयंति जीवभाव ययेति तव । यथा नद्यः स्यन्दमानाः समद्रेऽस्त गच्छन्ति नामरूपे विहाय. ८ ५८] केनोपनिषद " ब्रह्म तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् " इति । यथोदक शुद्ध शुद्धमासिक्तं ताहगेव भवति, एवं मुनेविजानत आत्मा भवति गौतम ! । इति निगमो भवति । तेन भक्ति भोः ! बहीति तात्पर्यात् केनेषित' मित्यादिना यः) प्रश्नस्त्वया कृतस्तदुस्तरे ते-तुभ्यम, उपनिषद-भक्तिरुक्ता व्याख्याता एतस्य रहस्यस्य प्रतिपादन-पात्रतां द्योतयितुमत्र चतुर्थी (विभक्ति) तत्रापि न देवतान्तरनिष्ठा भक्तिस्तुभ्यमुक्ताऽपि तु निर्गुणब्रह्म- निष्ठेति । तदाह-' ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमब्रूमेति' । शब्दो वेदान्ते निर्गुणपरमकाष्ठापन्ने वस्तुनि रूढ , योगरूढश्च । " साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ", बृहत्वाद् बृंहणत्वाच्च ब्रह्म"। अथात आत्मादेशः, आत्मैवाधस्तादात्मोपरिष्टादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिणतः, आत्मोत्तरत , आत्मैवेद सर्वम्"। " स वा एष एव पश्यन्नेव मन्वान एव विजानन्नात्मरतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानन्द स स्वराद् भवति" इति निगमः । तस्येय 'ब्राझी' ब्रह्मप्रापिका, स्वार्थमियं निर्मितेति ब्राह्मी। (तां ब्राह्मीम् ) " नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन, यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनू स्वाम् ' इति श्रुतिरत्र भवति । “जीवशेषोनुग्रहो ब्रह्मणः, ब्रह्मशेषा तु भक्तिः" इति सिद्धान्तात् । “ भर्ता सन् भ्रियमाणो विभर्ती"ति श्रुति । 'वाव' शब्दोऽव्ययमेवकारस्वार्थे ( तेन ) निर्गुणेऽपि ब्रह्मणि नास्या अयोग इत्यर्थः । 'त उपनिषदमब्रूमे ति, तस्याः प्रतिपादकोपि वेदभाग उपनिषदुच्यते । तस्य न स्वान्त्र्येण प्रामाण्यमपि तु ब्रह्म- परत्वेनेति पारतन्त्र्यं द्योतयितु स्त्रीत्वेन ( तद्- ) व्यपदेशः । सा च ब्राह्मी निर्गुणब्रह्मपरा तुभ्यमुक्ता "सर्व वेदा यत्पद- मामनन्ति, “ छन्दांसि यज्ञाः फतवो व्रतानि, भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति " इति । एतदभ्यासेनैव विदितवेदितव्यो भविष्यसि । अग्रे वचनीयस्याभावाद भूतकालेन निर्दिशति अयूमेति' । “ येना- ब्रह्मणा मनस्विनी [५९ श्रुत श्रुतं भवति. अमतं मतं भवनि, अविज्ञातं विज्ञात भवती 'ति श्रुति । 'धन्योऽस्मि यस्य गृहे भवान् आयात 'इतिवत् - स्व- प्रशन्ना-धोतनाय ' अब्रूम'इति वहुवचनम् । तेन गुणतः प्राशस्त्यमस्य ग्रन्थस्य व्याख्यातम । स्वरूपतः फलतस्त्वग्रे वक्ष्यति 'यो वा एतामेवं वेदे'त्यादिना ||७||३२|| ननु शब्दजालरूपस्यास्य ग्रन्थस्य तात्पर्यवृत्या स्वार्थ- भक्ति ज्ञानरूपं फल सर्वान्प्रत्यग्शेिषेण भवति? आहोस्विहिशेषतः ? क्वचिन्फलजनने तु कारणान्तरेण भन्तिव्यमिति-प्रश्नोऽन्तर्लीन' शिष्यस्योत्तरकथनादुन्नेय तदुत्तरे विशेषत.क्वचिदेवास्य सन्दर्भ स्योक्तरीत्या फलजनने सिद्धान्तिते कारण-तामनीं वक्तुमाह । तथात्र या ब्रा-भक्तिीवस्य पुरुषार्थरूपतयोक्ता, तस्यामधिकार- प्राप्तौ कानि चिन्साधनानि- अपेक्षितानि ? अथवा साधनगहित्येन प्राप्यते सा? इति प्रश्ने उत्तरम् पूर्वजन्मनि साधनानुष्ठानेनवाधिकारः प्राप्यते.इति माधनान्याह "तस्यै तपो दमः स्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाङ्गाणि सत्यमायतनम् " ८॥३३॥ तस्यै ' इति तामुपफ्रान्तामुपनिषदं प्राप्नु, प्रतिष्टा= निश्चलता माधन मिति भवति । 'इति इति किम यत्तपो दम कर्मेति, अग्नि- दोघादिलक्षण नित्य नैमित्तिक यद्वेद उत्तम । तस्यानुष्ठानद्वाराs. भिव्यक्तं यत्पूर्वकाण्डार्थरूपं ब्रह्म, तत्कर्म मन्त्र-शृद्धेः कारणम् । " तदेतत्सत्य मन्त्रेपु कर्माणि कवयो यान्यपश्यस्लानि चेतायां बहुधा सन्ततानि, तान्याचरय नियनं सत्यकामा पप व. पन्या अमृतस्य लोके". "" योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्ग त्यक्त्वात्म-शुद्धये रति श्रुतिस्मृती भवतः - दम' चित्तनिग्रह । नचायं कर्माख्यनामाभिव्यक्तिमाध्य । टेवर्जीवानामधिकार-सम्पादको तन्त्र-विशाना पत्र ।

६०] केनोपनिषद देवा ऊचु - . प्रजापतिमुपसन्ना ब्रह्मचर्यमुषित्वा ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदक्षरमुवाच 'द' इति, 'व्यज्ञासिष्टा३' इति 'व्यज्ञासिष्मेति होचु., 'दाम्यते 'ति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति-श्रुतौ स उक्त । “विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवा- म्नर ,सोध्वन पारमाप्नोति तद्विष्णो परमं पद"मिति हि निगमः । सत्वे च शुद्ध तपः सिद्धयति, आलोचनात्मकम् । तच्च ब्रह्मणि ज्ञाते भवति । अत्रागम आहारशुद्धौ सत्वशुद्धिः सत्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृति , स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्ष' इति- ब्रह्मभूतस्यै- वालोचनात्मक स्तपआख्यो धर्म । “य सर्वज्ञ सर्वविधस्य ज्ञान मय तपः " इति तत्र निगमः । स्मृतिरपि :-" ब्रह्मभूत प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति, सम सर्वेषु भूतेषु मभक्ति लभते परा"मिति । तपोदमकर्मणो स्वपूर्वपूर्वोपकारकत्वम् । यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्क सदा शुचि, स तत्पदमवाप्नोति यस्माद् भूयो न जायते " इति श्रुतिर्भवति । आलोचनात्मकस्य तपसस्तु ब्रह्मभूतधर्मत्वेन भक्तिं प्रति साक्षादुपकारकत्वमिति-विवेक । तेन पूर्व कर्म, ततो दम', दम', तत. स्तप', इति योजनीयम् । तथाचात्र निगमो भवति :- श्रद्धे ये खुपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वांसो भैक्षचर्या चरन्तः सूर्य- द्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृत स पुरुषो यव्ययात्मे"ति अथवा गृहस्थस्य कर्म प्रतिष्ठा, तापसस्य दमः प्रतिष्ठा मिक्षोस्तप प्रतिष्ठा । ब्रह्मचारिणो वेदा. सर्वाङ्गाणि सत्य चाय तनमिति- वर्णाश्रमनिष्ठस्य धर्मस्यापि भक्त्यङ्गत्वम् । रेत यजुभिरन्तरिक्षं स सामभियंत् कवयो वेदयन्ते," "तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्य, येषु सत्यं प्रतिष्ठितम् । “दानव्रततपो होमजपस्वाध्यायसंयमै., श्रेयोभिर्विविधैश्वान्यैः कृष्णे भक्तिहि साध्यते " इति- श्रुतिस्मृती भवतः । तथा ग्रन्थाख्याया उपनिषद , आयतन = आसमन्ताद्यतनं येन, यतनमर्थावगम उपायः। वेदा.- त्रैगुण्यषिपया , वेदाश्चत्वारो मन्त्र तपः " ऋग्भि- मनस्विनी |६१ ब्राह्मणात्मकाः । सर्वाङ्गाणि-शिक्षादीनि, उपाङ्गानि-मीमांतादीनि, सत्य अनृतभावश्च । " लायेन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्य- रझानेन ब्रह्मचर्येण नित्यमिति । एतानि समुदितानि आयतनं, न त्वायतनानि । एतदभावे नोपनिषदों विज्ञातुं शक्यत इति- 'तस्ये' इति वाक्य-भेदेन योजनीयम। एतावता प्रबन्धेन सिद्धम् :- भक्तिमु ख्या, तत्यास्तपआदीन्यज्ञानि, तान्यपि साक्षात्पर- म्परया वोपकारकाणि, तयैवानायासेन ब्रह्मावाप्तिः फलम् । तस्या प्रतिपादिकोपनिषदपि वेदादिभ्य उत्कृष्टा प्रधानत्वात् । वेदादयः, तस्याश्चाङ्गानि ||८॥३३॥ अथास्या उपनिषद. शब्दतोऽर्थतश्च वेदने यत्फलं, तन्मन्द मध्यमयोरस्मिच्छास्ने प्रवृत्त्यर्थम् , प्ररोचना-न्यायेनाह शिज्याय, स्वाध्याय-प्रवृत्त्यर्थम् : यो वा एतामेव वेदापहत्य पाप्मानं, अनन्ते स्वर्गे- लोके ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति " ॥९॥३४॥ -- इति चतुर्थ. खण्ड । 'यः' वेदेऽधिकारवॉवर्णिकः । 'वै = इति श्रद्धालुन्वे निश्चय प्रतिपन्न । 'पतां'= मया तुभ्यमुपदिष्टाम . 'एव'मिति-अधिकारि- विषय-सम्बन्ध-प्रयोजनरुत्कर्ष गता, नत्वन्यविद्या ज्ञानकर्मप्रति- पादिकाम्, वेद= शब्दतीर्थतश्च जानाति, सोऽधिकारी पाप्मानं = शावार्थ-प्रतिपत्तो प्रतिबन्धक पापम, अन्येनोपायेनाप्रतीकार्यता- घोतनाय पुस्त्वेन निदिष्ट, अपहत्य स्वतः पृथक्करणेन स्वकार्या- क्षम कृत्वा, अनन्ते लोक ज्येये च स्वर्ग प्रतितिष्ठति प्रतिष्टां लभते। अयमथ:- शब्दतो वंदने- पाप्मापवात., पदार्यज्ञाने- ज्येयात्मकस्वर्ग- ६२] केनोपनिषद् प्रतिष्ठा फलम्, महावाक्यार्थ-ज्ञाने तु - अनन्तात्मकस्वर्गप्रतिष्ठा फलम् । स्वर्ग: = परलोकः, स च स्वर्गादारभ्याक्षरपर्यन्तम् । तत्र पदार्थ-ज्ञाता ज्येये प्रतितिष्ठति । प्रशस्यः भूलोकापेक्षया यः स ज्यायान् । “ज्यायादीयसः” इति छन्दसि विकल्पितम् , तेनाकारा- भाव , प्रत्ययावयवसकार-लोपोऽपि छान्दस इति-निभालनीयम्। प्ररोचना-चाक्यैः कर्म प्रशस्य भवति- इति ज्येयस्तद् भवति । तत्फलमपि स्वर्गः ज्यायान् । एव वाक्यार्थ-विज्ञाता लोके स्वर्ग प्रतितिष्ठति। लोको दर्शनात्मक आत्मा, ज्ञानमयः स्वर्गः । तजन्य- मात्म-सुखमपि लोकः। तत्र प्रतितिष्ठति- ततो न विचाल्यते, इति भावः। एवं महावाक्यार्थ-विज्ञस्तु- अनन्ते स्वर्ग प्रतितिष्ठति । स पुनरावर्तते" इति-श्रुत्युक्तो ब्रह्मात्मको लोकस्तत्र प्रतितिष्ठति, इति फलत उत्तमतास्य ग्रन्थस्य व्याख्याता । आवृत्तिः समाप्ति- बोधिका ॥९॥३४॥ उपसंहार-कारिकाः- भक्त्यैव सर्व जीवानां निःश्रेयसमुदीरितम् । सैव कार्या, कर्मवतां ज्ञानिनामपि निश्चितम् ॥३८॥ प्रश्नेन संशयात्मत्त्वं यच्छिण्ये समुपागतम्- गुरुनिरस्य सिद्धान्तैस्तन्नाशं समकारयत् ॥३९॥ सा चेय ब्रह्मणो लीला भक्तिमेधयितुं कृता । यत्सदा प्रियकृजीवे ब्रह्म, तत्सेव्यतामिति ॥४०॥ एवं ताप्तर्य-वृत्या तु भक्तिः साधु निरूपिता । 'भक्तिहि सर्ववेदार्थ' इति तेन निरूपितम् ॥४१॥ इति सामवेदीय केनोपनिषन्मनस्विन्या चतुर्थः खण्डः।

मनस्विनी [६३ समर्पण-कारिका याचां पुष्पाञ्जलिः श्रीमदाचार्य-चरणाजयो:- निवेदितस्तेन तुष्टा भवन्तु क्षुद्रके मयि ॥४२॥ यत्कृपालवमाश्रित्य प्रवृत्तोऽहं महोद्यसे । पारं मुखं प्रयास्यामि, तं वन्दे वल्लभ हरेः ।।४।। ब्रह्म-निश्वासभूतानां वेदानां मर्मवित् प्रभोः श्रीमद्वल्लभवाणीशाहते नान्योस्ति कश्चन ॥४४॥ अत्र धार्थ समालम्व्योत्पथेन विहितं मया- व्याख्यानमिदमुवृत्तं तत्क्षमन्तां विदो गुणैः ॥४५॥ अन्योपायेन यदपि विदां तोपो न शक्यते मया कर्तुमथाप्येतां दृष्ट्वा हास्येन सेत्स्यति ॥४६॥ इत्येवं मनसि ध्यात्वा कृतोऽयं क्षुद्र उद्यमः । मया स्व-स्वार्थ-विदुपा विदुपां सेवकेन हि ॥४७॥ अत्र यद् दुपणं किञ्चिजीच-बुद्धया भविष्यति । तदुद्धारे सन्त एव शक्ताः कृष्णात्मका यतः ।।४८|| इति श्रीमवल्लभाचार्य-चरणाश्रितपोतकृर्चि-श्रीवाल कृष्णा- शास्त्रिणा संकलिता केनोपनिषद्-व्याख्या 'मनस्विनी'-समाख्या समापत् । ॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ।। 卐 शुभम् HMMATION UP aminiating Patilta HumIAN SIGIT gamer Hum EHATI Hiudlun THINMOBIL हरि.ॐ ulallah mulgi Palam "माप्यायन्तु ममाङ्गानि० " इति शान्ति luunim lunIPS amunmaunam सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्य करवावहै ! तेजस्विनावधीतमस्तु विद्विषावहै "॥ HaurInHumne HITI मा addu ॐ शान्तिः। शान्ति.!! शान्ति 1।। durunein III NATION IMIT FATumram Top Drama AuTIDAR Monimuoto पाom JTIOHIT केनोपनिपन्मन्त्रानुक्रमणिका । च स्त्र. १५ ७ " १ ३ ७ " . " ४ प्रतीकम् खमत्रस. पत्रम् प्रतीकम् खमन्त्र स पत्रम् अथ वायुमब्रुवन् तृ ख. ७ ११'तस्यैप मादेशो यदेतत् च स्व ४ अयाध्यात्म यदेवद् ५३नेऽग्निजयुवम् जातवेद त ख ३ अयेन्द्रमब्रुवन् तृख ११ ४३ न तत्र चक्षुर्गच्छति प्रस्व ३ १६ इह चेदवेदीदय द्विख ५ ३० नाह मन्ये सुवेदेति द्वि.ख. २ उपनिषद भो प्रहि च.ख ५७/प्रतिवोधविदितं मतं २७ केनेपित पतति प्रेपित प्र व यह ह देवेभ्यो विजिग्ये ४ ख १ ३५ सदभ्यद्रवत्तमभ्य. यच्चक्षुपा न पश्यनि प्र.व ६ २० ( अग्नि.) तृ ख. ४ ३८ यच्छोत्रेण न शृणोति २१ तदभ्यद्वत्तमम्य यत्प्राणेन न प्राणिति २२ ( वायु.) , , ८ ४२ यद्वाचानभ्युदितं येन १९ तद तदन नाम च.ख.६ यदि मन्यमे सुवेदेति द्वि.ख. १ २३ स्दैषां विजज्ञो तेभ्यो तृख २ ३६ यन्मनसा न मनुते प्र.ख सस्माद्दा इन्द्रोऽति च.स्त्र.३ ५१) यस्यामत तस्य मत दिख ३ ૨૬ तस्माद्वा एते देवा २ तसिस्त्वयि कि वीर्यम् यो वा एतामेवं वेद चख ९ (माददीयं ) तृ ख ९ ४२ श्रोत्रस्य प्रोत्र मनसो प्र.ख १० वस्मिस्त्वयि कि वीर्यम् स तस्मिलेवाकाशे ३९मा प्रीति होवाच वस्मै तृणं निदधौ (भादत्स्वेति) ४३ प्र खण्डे मन्त्रा तस्मै तृणं निदधौ (दहेति), द्वि खण्डे मन्त्रा. ३९ तृ खण्टे मन्त्रा तस्यै तपो दमः कमेति च.ख च खण्ठे मन्त्राः . १ -D १ ४४ ( दहेय ) .. "" ४८ १. ३ ६ ३४ , ... . ८ .

२ -: उपन्यस्तवाक्य-स्थल-संकेत:- प्रतीकम् परिचय अ- ) अग्निर्देवानामवमो विष्णुः अथ ६ प्राण उपक्रमिषन् अयास भास्मादेशः मदु.खं कुर्वनमृत सप्रयच्छन् भनन्ता हि दिशो दिशो 4 अनिमित्ता भागवती भक्तिः मन्धो मणिम विन्दत् सपाणिपादो जवनो गृहीता मपि सराधने प्रत्यक्षानु सय लोकः परश्न सरा इव रथनामो प्राणे अलौकिको हि वेदार्थो सव्यक्ता हि गतिदु खम् अष्टौ घसव एकादश रुद्रा भसन्दिग्धेऽपि वेदार्थे स्थूणा- मस्य विस्वममानस्य महमेवैतत्पञ्चधात्मान (छान्दो ५-१-१२) (छान्दो ७-२५-२) (उपनि०) (बृह. ४-१-५) ( भागवत ) (न्याय ) ( श्वेता० ३-१९) ( ब्रह्मसूत्र 3-२-२४) (वृह ४- -२) ( प्रश्न २-६ ) (निबन्ध) ( गीता १२-६) (बृह. ३-९-२) ( अणुभाष्य १११११) (कठ २-५-४) (प्रश्न २-३) आ- माचार्य मां विजानीयात् भाचार्यवान्पुरुषो वेद मातृणस्यवितथेन कणों मात्मक्रीट मात्मरति: मात्मलामाल पर विद्यते आत्मानं रथिन विद्धि मात्माप्यनीश: सुखदुःख भारमैवेदमन भासीत् (भाग० ११-१७-२७) (छान्दो. ६-१४-२) (उपनि०) (मुण्ड. ३-१-४) (आप० धर्मसूत्रम्) (कठ १-३-३) ( श्वेता. १-२) (ऐत. १-१) माम्रान्प्रष्ट कोविदारान् भायम्य तद्भावगतेन मासीनो दूरं व्रजति शयानः आहारशुद्धी सस्वशुद्धिः (न्याय) (मुण्ड २-२-३) (2ठ १-२-२०) (छान्दो ७-२६-२) इप्टं हुवमाशितं पायित (वृह ४-१-० ) ऋम्भिरेत यजुर्मिरन्त- ऋग्वेदो यजुर्वेदोऽधर्व० (प्रश्न ५-७) (छान्दो ७-१-४) एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एतदालम्बनं श्रेष्ठम् एतस्माजायते प्राणो एतस्मिन्नु खल्वक्षरे एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने एतस्यैवानन्दस्यान्यानि एव स देवो भगवान् ओं- को तत्मदिति निर्देशो (छान्दो. ६-२-१) ( फठ. २-५-१२) (कठ १-२-१७) (मुण्ड. २-१-३) (वृह ३-८-११) ( वृह ३-८-९) (वृह ४-३-३२) ( श्वेता० ५-४) (गीता १७-२३) क इत्या वेद यत्र मः कश्चिदीरः प्रत्यगात्मानम् कामस्याति जगत प्रतिष्ठा को हयेवान्यात् क. प्राण्यात् फियावानेय ब्रह्म विदा वरिप्फ पुरम्य धारा निशिता दुरत्यया (कठ. १-२-२८) (कठ २-४-१ (कठ. १-२-११) (तैत्ति, २-०-1) (मुण्ड, ३-१-४) (कठ १-३-१४) ४ गुणास्तु संगराहित्यात (सन्या नि. १२) घृतात्पर मण्डमिवातिसूक्ष्मम् ( श्वेता ४-१६) वै चक्षुषा सम्राट् पश्यन्तमाह जीवशेषोऽनुग्रहो ब्रह्मणः (वृह ४-१-४) ( सुबो०) छन्दासि यज्ञा. तवः ( श्वेता ४-९) - जीवा स्वभाषतो दुष्टाः ज्ञाज्ञो द्वावजाचीशानीशो ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्व- ज्यायादीयसः ज्यायान् पृथिव्या ज्यायानन्तरि बालबोध १६) ( श्वेता 1-९) ( श्वेता १-८ तथा श्वे. २-१५) ( मष्टाध्यायी) ( छान्दो ३-१४-३) सत. प्रेम सदासक्ति तत्वोपनिषदं पुरुष तदेजति तन्नेजति घदेतत्सस्य मन्त्रेषु सर्दक्षत एकोऽह तद्रे तद्वन्तिके तदेव ज्योतिषां ज्योति. तद्वारा पाप्मना विविधु तद् भूतयोनि परिपश्यति तद्यथा स्त्रिया सम्परिप्वको तद्यथा हिरण्यनिधि ( भक्तिवर्द्धिनी ३) ( उपनि.) ( ईशा ५) (मुण्ट. १-२-१) ( छान्दो ६-२-३) (ईशा ५) (वृह ४-५-१६) (छान्दो. १-२-६) (मुण्ड, १-१-६ ) ( उपनि०) ( छान्दो. ८-1-२) तद्विज्ञानार्थ म गुरुम् तन्मन्ये पितरं मातरं च तपः श्रद्धे ये झुपवमन्ति तपस्वी हिमवानिव तमीश्वराणां परम तमुकामन्त प्राणो- तमेव भान्तमनुभाति तस्मादेवा बहुधा तस्मादेकाकी न रमते वस्माद्वै सम्राट मपि काचन रास्मिन्नुकामस्यथेतरे तस्मै न द्रुह्येस्कतमच्च ते निचिक्युझ पुगण तेभ्यो हेतदक्षरमुद्गीथ • 'द' ते ये शत प्रजापतेगनन्दा त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं प्रयं वा इद ब्रह्म यसाम (मुण्ड. १-२-१२) ( उपनि०) (मुण्ट. १-२-११) (वा. रामायण) (श्वेता ६-७) (वृह ४-४-२) ( कठ. २-५-१५) (मुण्ट. २-१-७) (वृह. १-४-३) (बृह. ४-१-५) (प्रश्न, २-४) ( उपनि०) (वृह ४-४-१८) (उपनि०) ( तेत्ति. २-८) (ता. २-८) (वृह १-६-१) दान व्रत तपो होम जप- दिन्यं ददामि ते चक्षुः दग्यस्फुरणविज्ञानम् ( भाग० द १७-२४) (गीता ११-८) (भाग० ३-२६-२९) (कठ. २-५-१५) (ता. ६-८) कठ. १-२-८) न तन सूर्यो भाति न न तत्समचाभ्यधिकश्व न नरेणावरेण प्रोक्त नमस्ते वायोत्वमेव न स पुनरावर्तते नान्यदतोस्ति मन्त्र नायमारमा प्रवचनेन वैति १-१ ( उपनि०) (वृह ३-८-११) (मुण्ड. ३-२-३) ६ नायमात्मा बलहीनेन नाविरतो दुश्चरितान नावेदविन्मनुते त निष्कळ निष्क्रिय शान्त नेह नानास्ति किंचन नेषा तर्केण मतिराप- (मुण्ड ३-२-४) ( कठ १-२-२३) ( उपनि० 2 ) ( श्वेता ६-१६) (बृह ४-४-१९) ( कठ १-२-९) - पराचि नानि व्यतृणत् परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते पश्यत्यचक्षु स शृणोति प्रकाशाश्रयवद्वा तेजस्वात् प्राण संवर्गो वागादीन् प्राणस्य सम्राट् कामा० प्राणान्प्रपीडयेह स युक्त प्रागैश्चित सर्वमोत प्राधान्येन व्यपदेशा. ( कठ ४-१) (श्वेता ६-८) (,, ३-१९) ( ब्रह्म. ३-२-८) (उपनि) (बृह ४-१-३ ) (श्वेता २-१) (उपनि० 2) (न्याय ) वे ( कठ १-३-३) (मुण्ड. ३-१-७) ( ब- बुद्धि तु सारथिं विद्धि वृहच्च तद्धिव्यमचिन्त्य- बृहत्वाद् वृहणत्वाच्च ब्रह्म ज्येष्ठा वीर्या सभृतानि ब्रह्मभूतः प्रसन्नारमा ब्रह्म भूतानां प्रथमं तु ब्रह्मविदामोति पर ब्रवीतु नो भवान् ( हिरण्यायनीयखिलेषु) ( गीता १८-५४) (उपनि०) तैत्तिरी १-६-९) ( उपनि०) भ- मर्ता सन् भ्रियमाणो विभर्ति से भा ३-१४१) म- मन एवं मनुष्याणा कारण मन पूर्वल्पं वागुत्तररूप मनमा वै सम्राट् त्रियममि मनसंवेदमाप्तव्यम् मनसैवानुद्रष्टव्यम् मनो होच्चकाम तत्सम्व महद्भय वज्रमुद्यतम् ( ( उपनि०) (वृह. ४-१-६) ( कठ. २-४-११) (वृह ४-४-१०) ६-१-११) ( कठ. २-६-२) श्वेता ३-१२) (न्याय) (छान्दो. शान्तिपाठे) ( ब्रह्म १-३-२) महान् प्रभुवे मानाधीना हि मेयसिद्धि माह ब्रह्म निराकर्याम् मुक्कोपस्यव्यपदेशात् य इदं मध्विद वेद यञ्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ यतश्चोदेति सूर्योऽत यतो वाचो निवर्तन्ते यत्तददेश्यनग्राद्यम् यत्र नान्यारश्यति यथा नद्य. स्यन्दमाना: यया स्त्रीपुमासो सम्परिप्वको यर्यव विम्वं मृदयो- चयोदक शुन्दे शुद्धमासिकम् यदाऽयमनुगृहाति यदा सर्वे प्रमियन्ते यदिद किन्नजगत् सर्व यदेकामयकमनन्त- यद्ध वाट् नाभविष्य सुधमो यसस्पृशन्ति न विदुः यश्चायं विद्युनि तेजो (कठ २-४-५) (गीता १५-१२) (कठ २-१-९) (तैत्ति २-४-१) (मुण्ट 1-1-६) (छान्दो. ७-२४-१) (मुण्ट ३-२-८) (उपनि०) ( श्वेता २-१४) (कठ. २-४-१५) (भाग) (कठ २-६-१५) ( कठ. २-६-२) (उपनि० ) (डान्दो. ७-२-१) ( भागवत) ( उपनि०) यश्छन्दसामृषभो यस्तु विज्ञानवान् भवति यस्स्वविज्ञानवान् भवति यस्मिन्द्यौः पृथिवी चान्तरिक्ष यस्मिन्पन्न पञ्चजना यस्मिविशुद्धे विभव- यस्यदेवे परा भक्ति था यस्य ब्रह्म च क्षत्र चोमे य. सर्वज्ञ. सर्वविद् युक भग' स्वैरितरत्र येनाश्रुतं श्रुत भवति योगिन. कर्म कुर्वन्ति यो घायुमन्तरो यमयति यो बै भूमा तत्सुख नाल्पे सैत्ति ४-१) ( कठ, १-३-६८) (कठ. १-३-५७) (मुण्ड २-२-५) (बृद्द ४-५-१७) (मुण्ड ३-१-९) ( श्वेता ६-२३) (कठ १-२-२४) ( मुण्ड १-१-९) ( भागवत) (छान्दो ६-१-३) ( गीता ५-११) (बृह ३ ७-७) (छान्दो. ७-२३-१) रसो चे सरसंोवाऽयं ( तैत्ति २-७) पे वाच धेनुमुपासीत वाचा सम्रा बंधुः विष्टम्याहमिद कृरस्नम् विज्ञान देवा सर्वे ग्रह विज्ञानसारथिर्यस्तु विज्ञानात्मा सह देवैश्च वृक्ष इव स्तब्धो दिदि विष्ठति वैराग्य साख्ययोगौच ( वृह. ५-८-१) (वृह 3-1-२) (गीता १०-४२) (तेत्ति २-४-५) (कठ १-३-९) (प्रश्न ४-११) ( श्वेता ३-९) ( सत्वदीप० शास्त्रा ४५) शाखारुन्धतीन्याय शास्त्रदृष्टया तूपदेशो (न्याय) ब्रह्मसूत्र) ९ ( स इक्षते मेनु लोकाश्च स ईक्षांचन्ने सक सर्वस्य प्रोत्रस्य सत्यं ज्ञानमानन्दं ग्रह्म सत्येनलम्यस्वपसाझेप सत्वशुद्धो ध्रुवा स्मृतिः सदेव सौम्येदमन भासीत् समोनागेन समो मशकेन सम्प्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृप्ताः सम्भावितस्य चाकीर्ति स यदा मनसा मनस्यति स वा एव एवं पश्यन्....' भारमरति ) म वेत्ति वेद्य नच तस्या सर्वे वेदाय स्पदमाम सर्वव्यापिनमात्मानं सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः सर्वमिदमन्यात स में नैव रेम तस्मादेकाकी स सर्वज्ञ. सर्वमेव स ईतावानास साक्षी चेता फेवलो निर्गुणश्च सुप्तेषु वागादिपु प्राण सोऽभुते सर्वान्कामान् स्तोम महदुरुगायं प्रतिष्ठां स्नेहादागविनाश: स्यात् (ऐत. १-३) (वृह. १-४-०) (उपनि० ) ( सैति. २-१) (मुण्ड ३-१-५) ( छान्दो. ७-२६-२) ६-२-१) (वृद. १-३-२२) (मुण्ड. ३-२-५) (गीता २-३४) ( छान्दो ७-३-१) (उपनि०) (श्वेता ३-९) ( कठ १-२-१५) (ता. १-१६) (वृह ४-५-२२) ( उपनि०) (वृह. १-४-३) (प्रश्न. ४-११) ( उपनि०) (श्वेता. ६-1) (उपनि.) ( तैत्ति. २-१) कठ. १-२-११) ( ममिवर्दिनी) शुद्धि-पत्रकम् शुद्धिः पत्रम् पंक्तिः १ १८ अशुद्धिः संगृहामि देदान्त च्छदा- कारणानां प्रतिवन्धक २ ३ संगृहामि -द्वेदान्त छद्वस्य करणानां प्रतिबन्धक २३ ३ ६ ३ ७ उपवस्था व्यवस्था अष्टाधा अष्टधा ३ उच्छृखलं उच्छृखल २४ ७ ३ नन्दल्या ब्रह्म.. या तेनोमय नन्दाख्या ब्रह्म (अन्यत्रापि) तेनोभयं ७३१६ ४१७ ८ ११ पारतज्य पारतन्ध्य " ૨૨ १० ३ ६ २३ ममित्त अलौकिक मैच्छत सन्नाटू ..गृह्वाति दिश श्रवणेऽन्त्त सिद्धयति प्रमिति सदो बुन्द्वीन्द्रिया बाधकमाव तवूरे सम्यग एमिः १३ ममिधत्ते अलौकिक मैच्छत् सम्राट् गृह्णाति दिश श्रवणेऽन्स सिद्ध्यति प्रमिति वग्रह्मो बुद्धीन्द्रिया वाघमाव. तद्रे सम्यम् एभि. " १६ २७ १६ १४ ११ पत्रम् पंक्तिः १२ अशुद्विः शुद्धिः दिमिरपि. प्रति न्तु दिमिरपि.. प्रविहन्तु मानन्दी आनन्दो मवितृत्वं भर्गस्त्व .....त्वं-त्वं १६ २० पवस्य २३ " पसरुय बन्तो..वित्त वन्त...वित्त १६ वन्ध बन्ध १४ " २५ ताप्तर्यम तहिना गच्छति तहिदिता-प्रबि शक्तिमत्व पूर्वेषां २७ ३ ६ महत्व चागिन्द्रियम् बिन्दस्व १४ " तात्पर्यम् तद्विना गच्छति तद्विदिता भवि शक्तिमत्व ( भनेपि) १७ पूर्वपा १९ महत्त्व (मन्यत्रापि) १९ वागिन्द्रियम् विरुदस्व ब्रह्मणः २११२३ यसनश्च प्रवृत्ति २२ निरूपितम् सुवेदेति...वेत्य २३ स्वीकच्यम् २३ विचस्य ३ ६।१६ २६ ३ ब्रह्मण व्यसन प्रवृत्ति निरूपितम् सुवेदेति...वेत्य स्वीकर्तव्यम् विश्वस्यक ९ १२ २४ स्वमाव स्वभाव २९ " २५ १९ चक्षुस विन्दत्यन गृहाति माहात्म्यवस्था चक्षुस विन्दन्यन गृहाति माहात्म्यवादा २६ ૨૬ १२ पत्रम् पक्तिः २७ २८ अशुद्धिः तद्वात्मतस्वं स्वातन्त्र्यवत्वेन वीर्य तद्वत्वेन चेहवेदीदथ २९ २० २६ , ३० चासत्व ૩૨ शुद्धिः तद्वात्मतत्वं स्वातन्त्र्यत्त्वेन वीर्यम्= तद्वस्वेन चेदवेदीदथ चासत्व यदुक्क प्रतिरुद्ध माधिक्य किम् पासनोपयोगि तण स्वाभाविक ते झेनन्ने धर्मवत्त्वे ३८ १४ ४१ १४ २३ ४४ यदुक प्रतिरुद्ध भ धिक्यं किम पासनोपयागि तणे स्वाभाविक ते झनन्ने धर्मपत्वे चेतस पतानां विमी २२ ४६ ५० चेतसः ५४ २३ पतीनां बिभी ५८ वृत्या ५९ ७ - वृश्या अनुक्रमणिकायाम्- तेऽग्निम तेऽग्निजवु १ जीवशेषो ज' पंको

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Kenoupnishad

Author
Sastri,shri Balkrishan
Title
Kenoupnishad
File name
Kenoupnishad
Text
OCR done
Citation
1955
Published
2010/10
Publisher
Kakroli,vidhya Vibhag Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
114
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
DLI number
326176
Barcode
99999990002231.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library of India
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