Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Isvarwad
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भो विजयधमति अन प्रथमाला पुरुष ६१
ईश्वरवाद
लेसका मुनिराज श्री विद्याविजयजी
श्रीमभयन मन्यातय।
नापना गुनाह
घोकानेर,
1372
Fina
धर्म से २७
मूल्य १-8-
प्रकाश
सत्यनारायण पच्या
मंत्री, विजयधर्ममरि जैन प्रपमाला
शिवपुरी (गालियर)
सहायक
५०. पुस्तक
धर्मप्रेमी
श्रीमान सेठ अमीचदजी कासटिया
भोपाल
.
मुद्रक
शानद भी प्रेस
भाषनगर
4
સ્વ. શાસવિશારદ જૈનાચાર્ય શ્રી વિજયધમસૂરીશ્વરજી મહારાજ
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विषयानुक्रमणिका
पृष्ठ
५
२१
२६
४४
१विषयमधेश
२३श्वर का मस्तित्व
सिरके मस्तिस्य का कारण
४ आश्मा सो परमात्मा
५ आवरण की स्वरूप
६रका स्वरूप
७घर का अवतार
पर और जगत्
९ नगत से इश्वर को निलिप्तता
१० पदार्थों का स्वमा
२१ मका प्राधान्य
१२ पांच कारण
१३ पूज्य को पूरा
१४ फलमाप्ति का माधार
१५स्मरण-भकि
१६ दर्शा और सर्शन का महत्व
१७ मतिमय जगत्
१८ मणिपूजा
१९ मूर्तिपूजा के भेद
७४
७८
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ईश्वरवाद मुनिराज विद्याविजयजी
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विषयप्रवेश प्राचीन और अर्वाचीन माहित्य में ईश्वर के विषय में अनेक पुस्तकें लिखी गई है आस्तिक कहेजानेकाले दार्शनिकोंने ईश्वर के अस्तित्व को दिसलाते हुए उसके प्रति बहुत कुछ सम्मान दिखलाया है, यहा तक कि समार की उत्पति मे लेकर ससार की प्रत्येक घटना में ईश्वर के ही कर्तृत्व का आरोप किया है। कुछ दार्श- निकोंने ईश्वर में कर्तृत्व का आरोप नहीं करते हुए भी, उसी के उपर समी कुछ छोड दिया है।
पार्श मे नास्तिक कईजानेवाल दानिक ने
ईघर के अस्तिर मे इनकार किया है। जैन दर्शन
के विषय में लोगों की मान्यता अमी तर परत
ही अमपूर्ण पली आ रही है। प्रापः अनतर
लोगों का यह क्या है कि 'अन दर्शन ईमर को
नहीं मानता, अत एव वह नास्तिक दर्शन है।'
आस्तिक नास्तिक का झगडा अपनी अपनी
मान्यताओं के अनुसार, परम्पग में, एक दूसरे
के साथ चला आ रहा है। पास्तविकता को
समतो पो बहुत ही कम लोग घटा करते है।
एको कहा-"नास्निको पेदानंतर " दूसरे ने
कहा-"नास्तिको बैननिंदर " तीमरे ने कहा
"नास्तिको पौद्धनिंदका"। इस तरह परस्पर
एक दूसरे को नास्तिक दिखलाने की कोशिश
करते रहते है। पर सच याव यह है-नास्तिको
नास्ति पादका नास्ति आत्मा, नास्ति पुष्पम्,
नास्ति पाप , नास्ति स्वर्ग , नास्ति मोध।" इस
प्रकार हरएक वस्तु के नास्तित्व को स्वीकार
विषयप्रवश
करनेवाला नास्तिक है। मेरी राय है कि ससार
में जो आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करता है,
वह ईश्वर के अस्तित्व को अवश्य स्वीकार करेगा
ही। यदि कुछ भी मतभेद है, तो वही ईश्वर में
कर्तृत्व का आरोप करने के ही विषय में है।
ईश्वर को मानते हुए उसमें क्तत्व का अस्वीकार
करना कोई 'नास्तिकवाद' नहीं है। वर्तमान समय
में, विशेष कर के पठित वर्ग में ईश्वर की अस्सीकृति
की एक सास प्रवृत्ति दृष्टिगोचर होरही है। इसी
के परिणामस्वरूप ' ईयर और धर्म ढोंग है"
तथा "ईश्वरनो इन्कार" इत्यादि पुस्तकें हमारे
दृष्टिगोचर हो रही है। इन पुस्तकों के अत्यत
सूक्ष्मतापूर्वक अवलोकन करने से प्रतीत होता है
कि वस्तुत ईश्वर की अस्सीकृति सम्पन्धी जो
विचारधारा पठितवर्ग में वेग से प्रवाहित हुई
है, उमका कारण ईश्वर का अस्तित्व नहीं,
किन्तु ईश्वर में कर्तृत्व के स्वीकार की मान्यता
ही है । अरूप, अतन, निष्क्रिय, रागद्वेप रहित,
इवान
।
शुद्ध सचिदानन्दमय, इच्छाओं मे परे रहनेवाले
इधर का मसार की प्रत्येक घटना में सम्बन्ध
स्थापित एन प्रदर्शित करना, स्विनी अप्राकृतिक
एर असगत पात है। इन्हीं धारणाओंने लोगों
में अनीश्वरवाद की उत्पचि की है। सम्पत्ति का
देना और बाद में छीन लेना, पुत्र का देना और
फिर लेलेना आदि ऐन्द्रजालिर सेल ईश्वर जैसी
वीतराग और निष्क्रिय शक्ति में आरोपित करना
स्तिनी अनासी, असगत और अन्यायपूर्ण पाव
है ? समझदारों के मस्तिफ में ये पावें तानुरूप
नहीं जचती, इसीलिए वे ईश्वर का अस्वीकार
करते है । जैन इष्टि में ईश्वर का विचार मिन्न
रीति से ही किया गया है । इश्वर के अस्तित्व
फा स्वीकार करते हुए और ईश्वर को सर्वशक्तिमान
मानते हुए, ईश्वर में जगत् के पर्दृत्व का और
नगव की किसी भी घटना में ईश्वर के हस्तक्षेप
का कोई आरोप नहीं किया जाता। इस प्रकार
जैन दृष्टि से, ईश्वर, न तो हमारे ऊपर उपकार
विषयप्रवेश
करता है और न अपकार हो । फिर भी वह
पूज्य है, माननीय है, उपास्य है, ध्येय है। यह
जैनदर्शन का सिद्धान्त है। और इसकी सिद्धि
क लिये जैनदर्शन की जितनी भी दलीलें हैं, वेही
इस छोटी सी पुस्तिका में, वर्णन की गई हैं।
इम इस छोटी सी पुस्तिका में ईश्वर का
अस्तित्व, ईश्वर का स्वरूप, ईश्वर की एकरूपता
तथा अनेकरूपता, ईश्वर और जगत का सम्बन्ध,
जगत की उत्पत्ति का कारण, ससार की प्रत्येक
घटना का रहस्य, ईश्वरोपासना का कारण
तथा कैसे करना चाहिये ? इत्यादि पातों पर
प्रकाश डालने की चेष्टा करेंगे।
आशा है, पाठक इमको पढते समय अपने
मस्तिष्क को कोरे कागज की तरह निर्मल और
निर्विकार रसेंगे तथा अपने पूर्व विचारों को
मस्तक से दूर करके वास्तविकता को समझने की
चेष्टा करेंगे।
-
ईश्वर का अस्तित्व- २ ईश्वर के अस्तित्व पर विचार करने के साथ ही एक वस्तु हमारे सम्मुस आती है और यह है जगत् । आन जिसको हम जगत् कह रहे हैं, उसमें पृथ्वी, पानी, वायु, तेज आदि पदार्थ विद्यमान है । हम देखते है कि इस विचित्र समार में कोई राजा है और कोई रक, कोई पदार्थ घटता है ते कोई पढता है और कोई पदार्थ ज्यों का त्यों हमेशा एक सी स्थिति में देखा जाता 1 यह सब जगत् के पदार्थों की क्रियाएँ हैं। इस समस्त पदायों और क्रियाओं का हम जगत् शन्द से व्यवहार कर रहे हैं। प्रश्न यह पदा होता है कि यह जगत् वस्तुतः क्या है ?
इधर का मस्विरद
कुछ लोगों का कहना है कि जो पदार्थ
देखे जाते हैं अथवा जिनका हम अनुभव कर रहे
हैं वस्तुत वे कोई चीज नहीं है । यह केवल
आत्मा की भ्रान्ति मान है । जैसे स्वप्न में कोई
खाता है, किन्तु उसकी भर नहीं मिटती, अर्थात्
स्वप्न का भोजन भ्रान्ति मात्र है। इसी प्रकार
अन्धेरे में पड़ी हुई रस्सी को मनुष्य सर्प
समझ लेता है, वस्तुत वह सर्प नहीं । इसी प्रकार
का यह जगद है। किन्तु विचार करने पर प्रतीत
होगा कि वस्तुत ऐसा है नहीं । जो चीज है ही
नहीं उसका आघात, प्रत्याघात भी हो नहीं
सकता । खरगोश को सींग नहीं होते, इसका
अर्थ यह है कि सींगो कासरगोश में अभाव है।
यह कोई कैमे कह सकता है कि सरगोश का
सींग मुझे लगा। रज्जु में सर्प की भ्रान्तिवाला
मनुष्य उमको सर्प समझकर मयभीत होनाता
है और दूर हट जाता है । स्वम में मिह को देखकर
मनुष्य डर जाता है, किमी सुन्दर वस्तु को
INE
देगकर ममम हो है. किमीग्रीमोदिंगार
विवादोमाता है। यदि सार मी फोरम
ही 7 होगी नी उपक परिणाम दिगांगर होने
हो नहीं शाहिप । र्प, शोर, भप भादि
की उत्पत्ति ही पस्तु के अस्तिस्य का
प्रमाण । यदि मानन पोई पम्त ही नहीं है,
छो क्षुधा यो निति नहीं होनी चाहिये। हमी-
लिये कहना पदना है कि समार है-जगत है-
और यह अना पदाधों पा मार। उमर
अस्तिन्य चीकार नहीं पग्ना प्रकाशोधा
मनाने के सुल्प है।
पदि स्वीकार करने को वेदात में "मर
मम मिप्पा भगन् " कहा गया है, यह यों।
पेशक, प्रम-प्रात्मा-ईधर-यहसस्प है, शाप
है, निप है और बग मिथ्या है। इसमें से
मतमेद नहीं, किन्तु 'मिथ्पा, शन्द भर्प
वास्तव में मतभेद है।' मिया' या अर्थ
नाशवान-अनिय, न कि अत्यन्त अमार अग
इधर का भविस्व
:
मिथ्या नगद
के कुल पदार्थ जो हमारी दृष्टि से देखे जाते हैं,
अनुमव किये जाते हैं, आनित्य है, नाशवान हैं,
प्रतिक्षण परिवर्तनशील हैं। ऐमे अनित्य पदार्थों
के प्रति अनासक्ति रसना यही सत्य ना
का आशय है । आत्मा को ऐसे
अनित्य पदार्थों में आसक्त नहीं होने देने के लिये
ही यह कथन कहा गया है। परन्तु इसका अर्थ
यह नहीं है कि, जगत् जैसी चीज कोई है ही
नहीं, अथरा जगत् में सिवाय 'ब्रह्म' के-सिवाय
आत्मा' के-कोई पदार्थ ही नहीं।
शब्दों का व्यवहार हमेशा सापेक्ष हुआ
करता है। किसी भी शब्द का उच्चारण तभी
होता है, जब उसकी सार्थकता बतानेगली
वस्तु हो, अन्यथा नहीं। हम कहते है कि,
'वह बडा सजन मनुष्य हैं। इससे स्पष्ट है कि
कोई दुर्जन भी अवश्य है । सत्य, असत्य, चोर,
साहूकार, नीति, अनीति, श्वेत, श्याम कुछ भी
काहये, जो कुछ भी कहेंगे, उसके प्रतिपक्ष में
पान्त समार में जो गुम है माघनिक अपरा
यो बहना चाहिये कि दुरा की धार की
निशापि मात्र को गुन कहते हैं। पुष्प मारी
पाहता है कि मैं वर्तमान स्थिति की अधा
विशेष सुर प्राप्त कर और पा गुग हो स्थापी।
दाग का नाम मी न रहे और शामन पुरा हो ।
शिन्तु सोगनीय यह है फिर्गमा मापन
गुग प्राप्त पंगे दोरमका सत्या मामा
और सरत जबार यह है । हिमने उम मुस को
प्राप्त करलिया है और जो उम गुम को अनुमर
फर रहा है उसका समागम-उपागना-करने मे
शासत सुर मिन गस्ता है। जिससे जिम
यस्तु की आवश्यकता हो, इसको यह यस्तु उमी
में प्राप्त हो सकती है, जिसके पाम यह रिपमान
है और यह प्राप्त की जागपती है। उसके नारीक
बाने स-उपासना करने से-गति करने मे दरिद्र
मनुप्प धनवान के पास में ही धन एकत्रित कर
सकता है। संसार में दुरसी मनुष्य यदि आत्मा
इबर के मस्तिष का कारण
की शान्ति प्राप्त करना चाहता है, तो उसको
चाहिये कि वह उसके पास जाय, जिसने ससार
की उपाधियों को छोडकर आत्मिक शान्ति को
प्राप्त करलिया है । वेश्यामिलापी उसी मनुष्य की
सोन करता है, जो वेश्यागामी होता है। इसी
प्रकार चरम सुख प्राप्त करने की इच्छा रसने
थाले मनुष्य को उसी की उपासना करनी चाहिये,
जिसने शाश्वत सुख की प्राप्ति कर ली है। ऐसे
शाश्वत सुख को भोगनेाला, यदि कोई है तो
वह केरल ईश्वर-परमात्मा । जिसे शास्त्रकारोंने
सिद्ध कहार भी पुकारा है। ऐसे मोक्षगामी
जीव शासत सुख के स्वामी हैं। ससार में रहते
हुए कोई भी जीव चरम सुख को प्राप्त नहीं कर
सकता,
क्योंकि
ससार तो
ससारात्मा सदा दुखी
जन्म-मरण-शोकभाक् ।
चतुरशितिलक्षासु
योनिषु भ्राम्यते सदा।
दु'समय है-
যিবােৰ अर्थात् जन्म, मरण और शोक में डूबा हुआ ससारी आत्मा हमेशा दुखी ही है, और वह चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण करता रहता है। ससार में जिस सुख का अनुभव किया जाता है वह वस्तुतः सुख है या नहीं यह भी एक विचारणीय प्रश्न है। यह हम पहिले ही लिख चुके है कि, ससार में जिन सुखों का अनु भव किया जाता है, ये दु.ख की क्षणिक निवृत्ति मात्र हैं । एक मनुष्य कामज्वर से पीडित है अत' वह विपय का सेवन करता है । वह समझ लेता है कि इससे मुझे सुख हुआ, परन्तु यह भूलनाता है कि कामज्वर की औषधि-विषयसेवन को अगीकार करने से ही वह जर दूर हुआ है । इसमें सुख क्या है ? भूत लगी और भोजन किया तो भूख नष्ट होगई । ठण्ड लगी तो कम्बर से नदन को आच्छादित करलिया, उगली पक तो ऑपरेशन करवाया, जिससे पीर बह निकल- गया और समझलिया कि सुख होगया। किन्तु . इश्वर के मस्तिष का कारण सुस क्या हुआ ? जिसको भूस लगी नहीं वह साकर मला कैसे सुस माना सकेग ? जिमकी अगुली पकी नहीं, उसे ऑपरेशन कराकर क्या सुस मिलेगा? जिमको ठण्ड लगी नहीं, वह कम्बल ओढकर क्या करेगा ? उपर्युक्त वस्तुओं की मला उसे जरूरत ही क्या रहेगी। इससे यह निश्चय होचुका कि, ससार में जितने भी मुख देखे और मुने जाते हैं, वे क्षणभर के लिये दु स की निवृत्ति मान है। समय टल जानेपर वे ही दुःस फिर आकर अपना अस्तित्व मिद्ध करने लगते है। वास्तविक सुस-सामाविक सुस-शाश्वत सुस- वह है जो प्राप्त होने के बाद नष्ट नहीं होता। दु,ख उत्पन्न ही न हो अर्थात् सर्वथा दुास की निति होजाय, वही शाश्वत सुख है । ऐसे सुरस के मोगनेवाले व्यक्ति की मगति में ही शाश्वत सुख की उपलब्धि हो सकती है। ऐसा व्यक्ति यदि कोई है तो वह एकमात्र ईभर है-परमात्मा -सिद्ध है, जो संसार से सर्वथा पर है। २
परयाद
-
यहाँ यह शका को जासकती है कि यह
कैमे कहा जासकता है कि एक ईश्वर ही है जो
परम सुख-शाश्वतसुध-को ही भोग रहा है?
हम इस प्रश्न का जाप, 1 केवल शास्त्र के
आधार से ही, परिक युक्ति और अनुमर से भी
देने की चेष्टा करेंगे।
यह पहिले कहा चुका है कि, शब्दों का
उच्चारण सापेशित है, इतना ही नहीं, वस्तुमात्र
सापेक्षित है, अर्थात् यदि ससार है वो मप्तार से
परे कोई वस्तु होना ही चाहिये और उस वस्तु
का नाम है मोक्ष-मुक्ति-मिद्धि | ससार पन्धन
है और पन्धन से परे है मुक्ति । ससार में आधि,
व्याधि और उपाधि है। इन निरिध तापों से
रहनेवाला जीन सिद्ध-मुक्त जात्मा है-ईश्वर
है। अगर ससारी जीव दुःसी है वो मुक्कामा
जीव परम सुखी है, यह स्वाभाविक ही है। और
इसी करण ससारी जीन को
आत्मा' और
मुक्त जीव को 'परमात्मा' कहते हैं।
आत्मा सो परमात्मा
ईयर के विषय में विचार करते ही हमारे
सामने जगत् का स्वरूप समझने की आवश्यकता
मडी होती है । जगत् क्या है ' जगत् गन्द मे
जिमका व्यवहार होता है, उममें कौनमी चीजें
समाविष्ट होती हैं ? सुखदुस का अनुभव किमे
होता है ? मनुष्य से लेकर पशु, पक्षी तक की
भिन्न भिन्न स्थितियों का कारण क्या है ? ये
ममस्त पात विचारणीय है और इनका रिचार हम
आगे करेंगे । किन्तु इस समय हमें यह देखना
कि ससार में मुख्य कौनसे पदार्थ हैं और
उनका स्वरूप क्या है?
हमारे समक्ष आनेवाली वस्तुओं में सिर्फ
पाचार
--
दो प्रकार की वस्तुएँ ही देखी जाती है। पछ
पदार्थ ऐगे है मिनरी स्थिति हमेशा एकमी
रहती है। ये परिवर्तनशील नहीं होते । गुछ
पदार्थ मे है जिनमें पटना, पढ़ना आदिविमिन
प्रकार की क्रिपा र आती है । शागारों
ने इन दोनों प्रकार के पदार्थों का नाम रगा है
जट और पतन । निनमें सल छ मीनिया
नदी होती, यह बड़ है और जिनमें रिपाएँ होती
है उनका नाम है पतन । प्रियाओं के दाने और
न होने में कुछ तो कारण अपम्प होना ही
चाहिये ।निस पक्तिये कारण पदार्थ में त्रियाएँ
होती है, उस शक्ति का नाम है घेतन अपमा
आत्मा।
घुट लोगा कामहना है कि जगन में चेतन
अथवा आत्मा जैसी कोई वस्तु ही नहीं है, रितु
जब दो पदार्थों में क्रियात्मक और अक्रियात्मक
भेद देखा जाता है, तो उससकुछ फारण ताहोना
ही चाहीए । उसका जो कारण हो, उसको हम
पारमा सो परमात्मा
.
आत्मा' शब्द से व्यवहार करते हैं । एक
बात और है। हम पहिले ही लिख चुके हैं कि शब्द
का प्रयोग सापेक्ष ही होता है, निरपेक्ष शब्द का
प्रयोग कमी भी नहीं होता । ससार में न तो
अकेला जड़ पदार्थ ही रह सकता है, न अफेला
चेतन ही । हमारे जीवन में भी दो पदार्थ हैं
जड और चेतन । शरीर, जो एक दृश्यमान
पदार्थ है, जड है और शरीर की जो कुछ भी
क्रियाएँ होती है, वे 'चेतन' के कारण से ।
शरीर में एक ऐसी शक्ति विद्यमान है, जिसके
कारण से ये सारी क्रियाएँ हो रही है और इसका
प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि, दृश्यमान शरीर ज्यों का
त्यों रहते हुए भी एक ऐसा समय भी आता है,
जर इस शरीर की समस्त क्रियाएँ बन्द होनाती
हैं । इसका यही कारण है कि वह शक्ति जिसे हम
आत्मा कहते हैं, शरीर से दूर होनाती है और दूर
होजाने में सारी क्रियाएँ बन्द होनाती है । इसका
नाम है मृत्यु । और इस शक्ति की उपस्थिति
पावाद
।
में हमे ना मुरादुराका अनुमर होता है, पह
उस शक्ति से दूर होनाने स नहीं होगा।
इममे यह सिद्ध होता है कि मुगदुराको भोगने-
चारा यह दृश्यमान शरीर नहीं, किन्तु वहीं
आत्मा है।
इस नात्मा के मम्प ध में सभी शायमान
अपने अपने अमर लिग । आमादी ममी
दर्शनकार इस बात को मानते कि आमा
अरूप है, अ ध है, अमेय है, अतीद्रिय
और निप्रिय है। फिर भी समार की विविधता
इम पान यो प्रमाणित करती है कि अरूपी, अ
ऐच, अमेय और निष्क्रिय आत्मा के साथ
ऐसा कोई पदार्थ अवश्य होना चाहिये भिगके
कारण यह सर भदानुभेद और विचित्रता, देसी
जाती है। यह वही कारण है, जिमको हम कर्म,
माया तथा आवरण आदि नामों से पुकारते
है। इस धर्म के विषय में हम आगे लिखनेवाले
है, इसलिए उम विषय में यहाँ अधिक न
M
भारमा घो परमात्मा
३
--
--
लिखते हुए, मिर्फ इतना ही कहना चाहते हैं
कि इन्हीं कमा-आवरणों के कारण आत्मा के
तीन भेद माने गये हैं। वस्तुतः शुद्धस्वरूप,
सचिदानदमय आत्मा के भेद नहीं होसकते,
किन्तु आत्मा से सम्बद्ध इन आवरणों की मिचि
त्रता की वजह से, 'कारण मे कार्य का उपचार'
करके तीन मेद कहे गये है। पहिला पहिरात्मा,
दूसरा अन्तरात्मा और तीसरा परमात्मा ।
यहाँ हम तीनों प्रकार के आत्माओं का स्वरूप
समझाने की चेष्टा करेंगे।
पहिरात्मा--
आत्मनुद्धिः शरीरादौ
यस्य स्यादात्मविभ्रमात् ।
पहिरात्मा स विज्ञेयो
मोहनिद्रास्तचेतनः ॥
शरीर, धन, पुत्र, माता, पिता, पति,
what riktinat
XAR
Trt
winnifer m
mtkirat
Karatrinary
Arrit
FIRST में -
भोपाटामा
नरी II
उन परमो का माई मी "
IRST HAR,
भारमा सो परमात्मा
२५
-
आत्मा में ही 'आत्मबुद्धि' को स्थिर कर लेता
है, उसको अन्तरात्मा कहते है। कहा है-
पहिर्भावानतिमम्य
यस्यात्मन्यात्मनिश्चयः।
सोऽन्तरात्मा मतस्तज्जै-
विभ्रमध्यान्तभास्करैः॥
अर्थात् बाह्य पदाथो का अतिक्रमण करके
निस आत्मा का आत्मा में ही निश्चय होता
है वह ' अन्तरात्मा' है। ऐसा महापुरुषोंने
कहा है। ऐसा 'अन्तरात्मा' समझता है कि,
मैं भिन्न वस्तु है और ये बाह्य पदार्थ मुझसे अलग
हैं । आत्मा निर है, याह्य पदार्थ अनित्य हैं।
ऐमी भावना में जो आत्मा दृढ़ है, वही
अन्तरात्मा है।
सम्राट भरत के पास अटूट समृद्धि थी-
हजारों प्रकार की भोगोपभोग की सामग्री थी,
फिर भी उन्होंन कैवल्य ज्ञान को प्राप्त किया,
क्योंकि उनशामात्मा 'अन्तरात्मा था। गमार के प्रमों में उन्होंने पपने आत्मा को अलग कर लिया था। " अनित्य ममारे भवति सरन पमपन- गम् " अथात् नेत्री से देगे आनाले सभी पदार्थ अनित्य है, नाशाह, मेरे ही म अलगशुद्ध सम्प, मी प्रान्तरिक मापना- ने ही उनको फैल्प शान प्राप्त सरापा था। यह कहलाता है अन्तरात्मा। ससार में रहते हुए भी अन्तरारमा पाप- माता की तरह अलग रहता है। मप कुछ पाय किया एँ करते हुए यह समझता है यह सप मेरा नहीं है। इस अतरात्मा की स्थिति, जर शुद्ध अस्पा में-निर्लेप अवस्था में-आजाती है, तर यह 'परमात्मा' कहलाता है । इसी को 'ईश्वर' से पुकारा जाता है। के नाम मामा सो परमात्मा २७ निलेपो निष्कला शुद्धो निष्पन्नोऽत्यन्तनिवृतः। निर्विकर पश्च शुद्धात्मा परमात्मति वर्णितः। अर्थात् जो निलेप यानी आररण से रहित है, शुद्ध है, रागद्वेषादि विकारों से परे है, मिद्ध- सम्रूप है, सर्वथा निर्वृत्त है, अविनाशी है, सुस रूप है, निर्विकल्प है, और जिममें कोई भेद नहीं, ऐसा शुद्ध स्वरूप आत्मा परमात्मा है। इसे ईसर' या 'ब्रह्म' भी कह सकते हैं। पाठक समझ सकेंगे कि, आत्मा शुद्ध स. रूप होते हुए भी, अपने ऊपर लगे हुए कर्मों के आचरण से तीन भेदों में विभक्त होजाता है, निमे हम 'आत्मा' कहते है, वही अपनी सर्वथा शुद्ध अस्था में 'परमात्मा' 'ईश्वर' होजाता है। और इसीलिए कहा जाता है कि-'आत्मा सो परमात्मा -
आवरण का स्वरूप
-
आत्मा पा शुद्ध सम्र होने हुए भी,
आरणों कारण पहिरात्मा, अन्तगत्मा और
परमारमा-ये तीन भेद माने जाते हैं। इनका
वर्णन पिछले अध्याय में होतुका है, अब इन
आवरणों के स्वरूप पर गिर करना आवश्यक है।
प्राणीमाम जिन रियायों को करने
उनका कुछ न कुछ परिणाम होनारी पाहिये ।
कई ऐसे जीव है नो फेवल शारीरिक क्रियाही
करते हैं। कई जीव शारीरिक और याचिक और
कई शारीरिक, पाक्षिक एवं मानसिक तीनों
प्रकार की क्रियाएँ करते है। इन क्रियाओं
भावरखका स्वरूप - के परिणाम स्वरूप आकाशवासी पुद्गगलों (पर- माणुओं) को जीन ग्रहण करता है, यही आर- रण है । आवरण को 'कर्म । भी कहते हैं । इन आरणों के-कर्म के-अपने अपने स्वभाव है और उन स्वभावों के अनुसार जो फल मिलता है वही 'कर्म का फल' कहाजाता है । और वह आत्मा का भोगना पड़ता है। प्रत्येक जीव को सुख-दुःस का अनुमर करना, इसी कर्म का परिणाम है। एक अथवा अनेक इंद्रियों का प्राप्त होना, राजसीवैमर और रकता, जन्मजात अथवा पाद की शारीरिक, मानसिक, वाचिक, आर्थिक, व्यवहारिक आधि, व्याधि एप उपाधियों का प्राप्त होना और न होना, आदि सारी विचित्रताएँ इन्ही कर्मों के कारण से आत्मा के मी भेद माने जाते हैं। एक गति से दूसरी गति में प्रवेश करना यह मी कर्मों का ही कारण है। पही यह शमा होमस्ती है कि शुद्ध
पहा यदि कोई यह प्रश्न करे कि, इन
पमा का फल केमे मिलता है। इससे उपर
यह है कि कर्म जड पदार्थ हैं और आत्मा
चैतन्य शक्तिमय है परन्तु मे आत्मा की शक्ति
अनन्त है-आत्मा अपने स्वमाव को कायम
रमसा है, उसी प्रकार कर्म जड़ होते हुए भी
अनन्त शक्तिसम्पन्न है। और वह भी अपने
स्वभाव को रमता है। इन्हीं स्वभाग के पारण,
साभाविक रीनि से, उन कमो का फल मिलता
है। इसमें किमी की प्रेरणा और प्रयत्न सीजर
रत नहीं । लोहगुम्बक लोहे को अपनी तरफ
सापता है। यह उसका स्वभाव है इसमें किसी
की प्रेरणा नहीं।
एक और उदाहरण लीजिये। दो तुम्ने
हैं। उनका समान ही पानी पर तैरने का है।
इनमें से एक पर कपट मिट्टी करके उसे गोले
की आकृति देदीजिये। सहसा देखनेवाला कोई भी
मनुष्य, दोनों तम्बों को देखते ही यही कहेगा
कि, एक तो तूम्मा है दूसरा मिट्टी का गोला है
है। अब दोनों को पानी में डाल दीजीये । पहिला
तूम्मा अपने स्वभावानुसार पानी पर कैरेगा, और
कपड मिट्टी के कारण दूसरा डूब जावेगा, क्योंकि
उसका स्वभाव बदल गया है । मिट्टी का स्वभाव
है डूबने का, इसमें किसी की प्रेरणा की जरूरत
नहीं । ठीक इसी प्रकार कर्म से आच्छादित
आत्मा भारी होकर इन चौरामी लाख योनियों
में परिम्रमण करता है और सुख दुःख को
भोगता है।
अब पुन उस तूम्मे पर आइये । वह पानी
में डूबा हुआ तम्मा पानी के कारण ऊपर की
मिट्टी को धीरे धीरे अलग फरदेता है और जिस
समय सम्पूर्ण मिट्टी सर्वथा दूर होजाती है, उस
समय पिना किमी की प्रेरणा के वह ऊपर
चला आता है। कर्मों के आवरण से मारी होने
३
याला आत्मा, शान, ध्यान, गपस्पादि अनकर
सापनीद्वारा उन आवरणों को दूर करके स्वत
ऊपर उठ आयेगा और पन्धना से मुक्त होकर
सचिदानन्दमय ईथर पन जायेगा ।
ईश्वर का स्वरूप
अभीतक के विवेचन पर से पाठकों को यह
समझ में आगया होगा कि किस प्रकार समार का
कोई भी आत्मा, अपने कर्मों के जावरणों को दूर
करके परमात्मा-ईश्वर-बन सकता है । इस पर से
यह शका अवश्य होसकती है कि, ससार तो
एक ईश्वर' को मानता है और इस हिसाच
से तो अनन्त ईश्वरों की स्थापना होजाती है।
यदि ध्यानपूर्वक विचार किया जाय तो ये दोनों
पाने मत्य ही प्रतीत होंगो। भिन्न भिन्न आत्मा
परमात्म पद'- ईश्वरपद'-को प्राप्त कर
मकता है, इस दृष्टि से यदि अनेक ईश्वर कहें, तो
वह भी सत्य ही है । परमात्म स्थिति में पहुंचे
.
।
ईपरवाए हुये समस्त आत्माओं का स्वरूप एक है-ज्योति में ज्योति मिली हुई है-स्वरूप से इसमें अश मात्र भी भिन्नता नहीं, इस दृष्टि स 'एक ईश्वर' कहना भी कोई अनुचित नहीं । आमती से ईश्वर के स्वरूप में कोई भेद न होने के कारण ही ससार में 'एक ईश्वर' की मान्यता विशेष तया प्रचलित है। . ईश्वर को ' अरूप' कहा है । जब ऐसा ही है तो उसका स्वरूप कैमा ? ईश्वर हमारी दृष्टि से अवश्य 'अरूप' है । अरूप हाने पर मी ईश्वर जैमी पस्तु अवश्य है और जब वस्तु है तो फिर वह जिस रूप में भी हो, अवश्य ही 'स्वरूपी' है। उसका ' स्वरूप वह स्वत ही ममझ सकता है। फिर भी भूत, वर्त- मान और भविष्य के समस्त मावों, पदार्थों और हम बैसे प्राणियों तथा अगम्य वस्तुओं को जाननेवाले अतीन्द्रिय ज्ञानियोंने ईश्वर का स्वरूप
।
अथवा ईश्वर के स्वभाव का जो वर्णन किया
है, उस पर से हम इस निष्कर्ष पर पहुच सकते
हैं कि, ईश्वर कमा होगा?
साधारण रीति से देखा जाय तो, ईश्वर और
जगत् का स्वरूप मिन्न मिन्न दार्शनिकोंने मिन्न
मिम रीति से दिखलाया है । और यह भी सत्य
है कि, कोई भी धर्मानुयायी एक ईश्वर की वो
उपासना अवश्य ही करता है, फिर चाहे उसके
नाम भले ही अलग अलग लिये जाते हों।
उदाहरणार्थ, जैसा कि एक कविने ईश्वर की
प्रार्थना करते हुए कहा है.-
मं शैवः समुपासते 'शिव' इति,
'ब्रह्मेति वेदान्तिनो।
वुद्धा 'वुड । इति, प्रमाणपटव
'कत 'ति नैयायिका ॥
'अईन् ' इत्यय जैनशासनरता
कर्मेति मीमांसका।
-
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पास निमिणराम गFिAt
ग गुणाभ
माला गा vिi
रोजिनी पाममा
अषद शिमोगा माग
मौर जिम में पा गुम हो पियाम ,
ईश्वरावरून
ऐसे ईश्वर को चाहे वह ब्रह्मा, विष्णु या हरि, हर,
जिन इनमें से कोई भी हो, उसे मेरा नमस्कार है।
प्रसिद्ध जैनाचार्य हेमचन्द्राचार्य, महाराजा
कुमारपाल के साथ 'सोमनाथ ' गय और
एक जैनाचार्य होते हुए सोमनाथ के मन्दिर में
जाकर उन्होंने प्रार्थना करते हुए कहा-
यत्र तत्र समये यया तथा,
योसि सोऽस्यभिद्यया यया तया।
वीतदोपकलुप स चेत् भवान्
एक एव भगवन् ! नमोऽस्तु ते ।
अर्थात् हे मगवन् ! किमी भी समय,
किसी भी स्थिति में और किसी भी नाम में
आप हो, किन्तु आप समस्त दोषों से रहित हैं,
इसलिये है मगरन् ! मेरा आपको नमस्कार है।
कहने का तात्पर्य यह है कि, ईश्वर को
किसी भी नाम से और किसी भी स्वरूप में
मिम मिन दर्शनकार मानते हों, लेकिन मानते
तो यापही और यह भी स्पष्ट है कि सभी
उरो रासार समिरत, राग-देप, शरीर दया
कियाओं मे रदिव मानते हैं।
जैन शासकारोंने ईधर का ताप अपना
सण इस प्रकार पतलाया है।
मझो जिप्सरागादिदोपहरोफ्याजिता
पास्थितायादी च देयोऽहन परमेश्वरः।
अपात् जो सर्वश है, रागदेम, मोह,
मत्सर इत्यादि दुर्गुणों से दूर है, वीनों रोको के
प्रागी जिसको मते हैं और जो यपापित सत्य
सरय पदार्थों का प्रशासक है वहीं देव ३, बहन
है और परमेघर है।
हमारा विचार है कि इमर को मानने
पाला इरएक व्यक्ति पर के इन लक्षणों में
किसी प्रकार का मतमेद नहीं उत्पन करेगा।
जैनाचापोंने ईश्वर का 'महादेच' के नाम
से भी पुकारा है, इसलिये कि 'देव' दो प्रकार
के माने गये हैं। एक 'लौकिक' दूसरे लोकातर । नैन दर्शनों में लौकिक देव चार प्रकार के माने गये हैं। १-मवनपति २-वाणव्यन्तर ३-ज्योतिष ४-चैमानिक यहाँ इनका विवेचन अप्रासगिक है। भईन्-ईवर-परमात्मा को लोकोचर देव कहा है । ईश्वर सघ देवों का मी देव है । इसलिये उसे 'महादेव' कहा है । एक आचार्य महा देव की स्तुति करते हुए तथा उनके गुणों-स्व. भाव का निरूपण करते हुए कहते है:- यस्य सक्लेषजननो रागो नास्त्येव सर्वथा, न च द्वेषोऽपि सत्वेषु शमेन्धनदवानलः । न च मोहोपि सद्ज्ञानच्छादनोशुद्ध- वृत्तकृत,
रंकार
प्रिलोस्थायातमादिमा महादेयाम उच्यो
यो पीतरागा मर्यतो धमाश्वतमुम्बर
जिष्टकर्मकररातीत. मर्पया निष्फलस्तथा।
यापूय मर्यदयाना या ध्येया सर्वपोगिना
य सामर्य नातीना महादेर स उच्यते।
अर्थात् जिममें हनीपादक 'राग'सर्वथा
नहीं है, जीयों को शातिरूपी लाहियों
को प्रज्वलिन बरनाला दावानल फ
समान 'प' नहीं है, पिममें शुद्ध शान को
लोप करनेवाला और अशुद्ध प्रवियों में डालने.
वाला 'मोह' मी नहीं है तीनों लोकों में
जिमी महिमा फैली हुई है. उसका नाम है
महादेव। जो भीतराग है, जो सर्वश है,
जो शाश्वत सुमों का मोक्ता है, जो समस्त
कर्मों मे परे है, जो पलाओं पेष्टा -से
रहित है, समस्त देवताओं का जो पल्प है,
समस्त योगियों का लोप है और समस्त
ईश्वरका स्वरूप
नैतिक नियमों का जो स्रष्टा है, उसीका नाम
है। महादेव ।।
ऐमे महादेव को नमस्कार करते हुए
एचभूताय शान्ताय कृतकृत्याय धीमते,
महादेवाय सतत सम्यक्भक्त्या नमोनमः ।।
अर्थात् इस प्रकार के शान्त, कृतकृत्य
और महाबानी महादेव को सम्पूर्ण भक्तिपूर्वक
निरन्तर ही मेरा नमस्कार है।
जैनधर्म के सिद्धान्तानुसार उपर्युक्त
वक्तव्य को पढ़ने के बाद कोई भी नहीं कह
सकता कि, जैन धर्म अनीश्वरवादी है । अर्थात्
जैन ईश्वर को नहीं मानते । पल्कि ईश्वर के
उपर्युक्त स्वरूप को पढकर ईश्वरवादी अथवा
अनीश्वरवादी दोनों को ही यह मानना पड़ेगा
कि सचमुच 'ईश्वर' का यही वास्तविक
स्वरूप है।
अन्य ईश्वरयादियों की अपेक्षा अनधर्म
ईघर की मान्यता में सिवनी मिमता रखता,
उसका दिग्दर्शन हम आगे करेंगे। यहां मिर्फ
इतना ही कहेंगे कि, उ रोग ईयर को राम
देप रहित, असन, मरूप, निरिश्रय एष सषिदा
नन्दमय स्वरूप आदि विशेषणों में पुरु मानते
हुए मी, ईघर को एक ऐसी स्थिति में रख देखें
हैं, जिसके कारण ईघर में उपर्युक्त सधण रहवे
ही नहीं अर्थात् परस्सर विरोधी बातें सही
हो जाती है। ऐसा क्पों है इसका स्पष्टीकरण
हम आगे करेंगे, किन्तु इतना तो अवश्य है कि,
ईश्वर को माननेवाले जैन और जैनेर, ईपर
का जो स्वरूप दिसलाते उममें कोई मिलता
नहीं। समी स्वीकार करते हैं कि ईसर समस्त
कर्मों से रहिव, रागदप से रहित, मोह ममत्व
से रहिव, क्रियाओं और इच्छाओं मे रहित एवं
सरीर से मी रहित है।
ईश्वर का अवतार
गीताजी में एक श्लोक है-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।।
अभ्युत्थानधर्मस्य तदात्मानम् सृजाम्यहम् ॥
इस श्लोक के आधार पर कुछ लोग मान
रहे हैं कि, जब धर्म की ग्लानि होती है और
अधर्म का प्रचार होता है, तब ईश्वर इस मानव
लोक में अवतार धारण करके आता है।
यहाँ यह विषय विचारणीय है। ईश्वर के
स्वरूप का वर्णन हम पहिले करचुके हैं । ईश्वर
कर्मों के आवरण से सर्वथा विमुक्त है, वह अतन
है, अरूप है, बन्धनों से रहित है, इच्छाओं और
क्रियाओं से रहित है, रागद्वेष से परे है ऐसी
.
विधा
हालत में ईश्वर किमी मी कारणवश अवतार को
कैमे धारण कर सकता है?
इस समार में नीर परिभ्रमण कर
रहे हैं, सुख दुखों को भोग रहे हैं, इसका
कारण क्या है ? इसका कारण आत्मा पर
लगे हुए कर्म है। यह पात पहिले हम कह
चुके हैं। उन फर्मों से जब आत्मा सर्वथा मुक्त
होजाता है, तभी वह शुद्ध निरजन, निराकार,
ज्योति स्वरूप अथरा कहिये कि शुद्ध सचिदानन्द
मय बन जाता है। ऐसे शुद्धात्मा को पुनर्जन्म
लेने का कोई कारण नहीं रहता। कहा गया
कि, कारण के बिना कार्य की उत्पत्ति नहीं होती।
मसार में परिभ्रमण करने और एक स्थान से
दूसरे स्थान में, आत्मा के जाने का कारण है
कर्म । और कर्म का ईश्वर में है अभार । फिर
ईश्वर जगत में अवतार ले, यह कैमे माना जा
सकता है ? जरा सोचिये-
-
इधरका अवतार - im 1 । दग्धेवीजे यथारयन्त प्रादुर्भ भवति नारा। कर्मधीजे तयादाधेनरोहति भवारा॥ अर्थाद पोज के सर्वथा जल जाने पर, अकुर उत्पन्न नहीं होते ठीक उसी प्रकार कर्म- रूपी बीज के जल जाने पर' ससाररूपी अकुर उत्पन्न नहीं होसकता। यहाँ एक प्रश्न उपस्थित होता है। समय समय पर महापुरुष इस जगत में पैदा होते हैं और सासारिक जीवों को सन्मार्ग दिख. लाते हैं, ये कौन है ? सच बात यह है कि, इस प्रकार उत्पन्न होनेवाले जीव परमात्मा या ईश्वर नहीं, क्योंकि ईश्वर को तो ससार में आने का कोई कारण ही नहीं। वे महापुरुष भी हमारे से हो ममार की गतियों में परिम्रमण करनेवाले जीव ही हैं । वे ईश्वर नहीं-परमात्मा नहीं, किन्तु ने परमात्मा से कुछ निम्न श्रेणी के प्रमावशाली जीव हैं, जो ससार में उत्पन्न होकर अपने
कामों से बगव के पास के लिये महान पुरु-
पापुक फार्य करते है । इस प्रकार के वक्त के
समार्गदर्शक मनते हैं । इमीलिये हम उनसे
अवतारी पुरुष मानते हैं। यदि यता परमात्मा
भरतार धारण परके मारे तो फिर इस समार
के भावों में और उस में अन्तर ही पपा रहा।
ससार में रहनेगाला जीव जैसे सुख और दुख
का अनुमत्र करता है, उसी तरह ईयर पदि सस
और दागका अनुभव करने के लिपे ससारमें अपसार
ले तो यह सोचना मी कितना अनोखाएव विचित्र
है। जिसे रागदप नहीं, मोह नहीं, अपूर्णता
नहीं वह किस प्रकार ममार में जासकता है।
हम यहाँ पर पाठकों को एक चित्र की
याद दिलाते है जो " कल्याण
मासिक के
इश्वरीक " में प्रकाशित हुआ था । उस चित्र
में नीचे की ओर ससार की भूमिका दिखाई गई
है और उससे ऊपर ईश्वर' स्थान की पल्पना
"
.
ईश्वका भवतार
-----
-
।
--
.
की गई है और यह समझाया गया है कि, उस
स्थान पर पहुचा हुआ आत्मा फिर ससार में नहीं
आता । किन्तु उससे कुछ ही नीचे एक और
भूमिका चित्रित करते हुए यह बतलाया गया है
कि ईश्वर के स्थान के नजदीक ही इस दुमरी
भूमिका से जीव, जगत के के लिये
आते है और जगत् को सन्मार्ग दिखाकर उस
भूमिका को प्राप्त करलेते हैं जो ईश्वर के लिये
प्रतिष्ठित है।
इस पर से यह स्पष्ट है कि स्वत ईश्वर
नहीं, किन्तु ईश्वर के करीब पहुचे हुए अन्य
जीनों की अपेक्षा अधिक शुद्ध आत्मा अपने
पाकी के थोडे से कर्मों का क्षय करने के लिये
ससार में आते हैं और लोकोपकार द्वारा इन कर्मों
का क्षय करके मुक्ति को प्राप्त करते हुए ईश्वर
की ज्योति में मिल जाते हैं।
शास्त्रीय दृष्टि से देखा जाय तो मनुष्य
४
जन्म को देवताओं में भी उत्कृष्ट माना गया है।
पयोंकि मनुष्यलोक में मुक्ति प्राप्त करने की जो
सामग्री है, यह अन्य स्थान में नहीं है। देवता,
समृद्धि और भोगविलाम में मले ही मनुष्यों से
ऊचे हो, किन्तु भोगविलास के आधिक्य से ये
मी तो रागद्वपी है। इसलिये मनुष्यजन्म में
आये विना उनकी मुक्ति कैमे होसकती है ? उन
देवताओं में से कोई मनुष्पजन्म में आकर,
उत्तम कार्योद्वारा, महापुरुप बन जाता है और
लोग उसको 'महापुरप' किंवा 'ईश्वर ,
मान लेता है। क्योंकि वे जन्म से न तो
महापुरुष' होते हैं, न अपतार ही । मसार
में आर जो अद्भुत शक्तियों को प्राप्त करते हैं,
जगत पर महान उपकार करते हुए जगत के
दुसरों को निर्मूल करते है, जगत को मन्मार्ग
दिसलाते हैं, जगत के लिये सय दुखों को उठाते
हैं और इस प्रकार अपने कर्तव्यों को पूरा करके
इश्वरका अवतार
जगत से विदा होजाते है, इमलिए उन्हें जगत
महापुरुष अथवा अवतार कहता है।
इन बातों में स्पष्ट है कि ईश्वर अवतार
धारण नहीं करता।
ईश्वर और जगत् अभी तक के विवेचन पर से यह स्पष्ट हो गया कि, ईश्वर अवतार को धारण नहीं करते और ईश्वर किसी का भला बुरा भी नहीं करते। तो फिर यह समझ लेना भी आवश्यक होजाता है कि ईश्वर और जगत का क्या सरध है ? इस विषय पर हम विचार करें, उपक पूर्व " जगद क्या वस्तु है ?" यह समझ लेना भी आवश्यक है । यद्यपि इस विषय में पहिले थोडासा लिसा जा चुका है, तथापि प्रसगोपात यहाँ भी कुछ कह देना अनुपयोगी न होगा। जगत् ' शन्द इतना प्रचलित है कि, इसके विषय में विशेष विवेचन करने की आव- । .
ईश्वर सौर नगद ३ श्यकता नहीं है। हम पहिले कह ही चुके हैं कि जगत में जितने भी पदार्थ देखे जात हैं, वे साधारणतया दो भागों में विभक्त किये जा सकते हैं । एक चेतन दूसरा जड। चेतन और जड़ की व्याख्या हम पहिले करचुके हैं। इन दोनों पदार्थों के सम्मुचय व्यवहार का नाम है जगत् । पृथ्वी, पानी, तेन, वायु, वनस्पति, देव, मनुष्य, तिच, सूर्य, चन्द्र, तारे, ग्रह, नक्षत्र आदि सभी पदाथो का समावेश जगत् में होता है । अब हम ईश्वर और जगत के मम्बन्ध पर विचार करें। सम्बन्ध हमेशा दो पदार्थों का होना है। और सम्बन्ध कई प्रकार के होते हैं। आधार- आधेयभार, जन्य-जनकमान, पूज्य-पूजकमाव आदि अनेक प्रकार के सम्बन्ध होते हैं । आधार- आधेयभाव सम्बन्ध तो ईश्वर और जगत में किमी प्रकार स्थापित हो ही नहीं सकता। ईश्वर
स्वावा
और जगत् का सम्बन्ध सिर्फ पूज्य-पूजनभाव
सम्बन्ध होसक्ता है । जन्य-जनकमाव सम्बन्ध
यदि माना जाय, तो जगन् जन्य और ईश्वर
जनक हुआ अर्थात् ईश्वरने जगत् को उत्पन्न
किया, यह अर्थ होसक्ता है, किन्तु ऐसा मानने
में कई प्रकार के दोप मामने आते हैं।
जगत् की उत्पत्ति के विषय में कई प्रकार
के मत ममार में प्रचलित हैं बल्कि परिस्थिति
ऐसी होगई है कि, जिसकी बुद्धि में जो आता
है वही कल्पना का एक ढाचा खडाकर देता है।
कुछ उदाहरण देखिये
कोई कहता है कि मूर्तियाँ तीन भागों में
विभक्त हुई हैं । १ हरि, २ शिव और ३ ब्रह्मा ।
शभु जगत का बीज है, कृष्ण जगत् के कर्ता हैं
और ब्रमा क्रिया है। कुछ लोग कहते है कि विष्णु
से इस जगत् की उत्पत्ति हुई है। कुछ लोग कहते
है जगत् काल-कृत है, ईश्वर की प्रेरणा से उत्पन्न
-
इश्वर और जगत्
हुआ है और कुछ लोग जगत की उत्पत्ति ब्रह्मा
से मानते हैं। कुछ प्रकृति के अनुक्रम से मानते
है। कुछ दैव मे और कुछ स्वभाव से मानते हैं।
कोई अक्षर से मानते हैं तो कोई अन्डे से मानते
हैं। कुछ पचभूत के विकार मे मानते हैं, तो
कुछ ऐसे भी है जो उसे अनेक-रूप-सम्पन्न
मानते हैं। मानवीकल्पना का कोई ठिकाना
नहीं । इन समस्त कल्पनाओं का यदि विवेचन
किया जाय तो एक बड़ा पुस्तक तैयार होजाय ।
इमलिये इनमें से एकाद मत पर हो हम दृष्टिपात
करते हैं । मनुस्मृति के प्रथम अध्याय के ८
श्लोक में कहा है-
साभिभ्याय शरीरात्स्वात्
सिमक्षु विविधा प्रजाः।
अप एव ससर्जादौ
तासुधीजमवासृजत् ।
अर्थात् भिन्न भिन्न प्रकार की प्रजा को
ईश्वरधार
उत्पम करने की इच्छा रमनेताले ईश्वरने अपने
शारीर स ध्यान करके पहिले पानी उत्पन्न किया
और उनमें बीज डाला।
आश्चय की पाद तो यह है कि पानी को
उत्पन्न कर के रसा कहाँ? यह तो मनुस्मृतिकारने
पताया ही नहीं। बिना आधार के आधेय रह
कैसे सकता है ? कहा गया है कि शरीर से
ध्यान किया । जप ईश्वर को शरीर ही नहीं, तो
फिर शरीर से ध्यान किया कैसे ? आगे चलिये।
मनुजी महाराज कहते हैं “जो शक्तिरूप चीन
डाला था, उसका अन्डा होगया। उस अन्डे से
जगत् के पितामह ब्रह्माजी उत्पन्न हुए। फिर
फिर यह कि भगवान उस अन्डे में एक वर्ष
पर्यन्त रहे और फिर उन्होंने सप अपना ध्यान
करके उम अण्डे के दो टुक्ड किये । एक टुकडा
स्वर्ग' बना, दूसरा टुकडा 'पृथ्वी' पना,
और जा बीच में रहा उसका नाम 'आकाश
हुआ।
इम और बाद इस विषय में एक दो बात आर विचार- पीय हैं। कहा गया है कि भगवानने पहिले 'पानी' उत्पन्न किया, मो फिर उस पानी के ठहरने के लिये जमीन तो पश्य ही होना चाहिये, किन्तु ऐमा हुआ नहीं । पानी में स्थित अण्डा जब फूटा, तर उसका एक अश 'पृथ्वी' रूप होगया-यह कितनी अस्वाभाषिक एवं आचर्यजनक बात है? एक बात और ब्रह्माजी एक वर्ष अण्डे में रहे । ब्रह्मा के एक वर्ष का अर्थ भी जान- लेना जरूरी है। हमारे एक करोड और वीस लाख वर्ष के परावर ब्रह्मानी का एक दिन और उत्तने हो वर्ष के बराबर ब्रह्माजी की एक राति होती है अर्थात् हमारे दो करोड और चालीस लास पर्प के बराबर ब्रह्माजी का एक अहोरात होता है । अब इसे ३६० से गुणा करिये । बस जो गुणन फल प्राप्त हा, यही ब्रह्माजी का एक वर्ष । अर्थात् हमारे आठ अरव, चौंसठ
-
।
वों के परापर मनाजी का एक वर्षमा मत
स्प यह कि इतने वर्ष प्रभानी अण्डे में रहे
यह क्ल्पना हमारी नहीं है, पाठक चाहें तो
मनुस्मृति देखकर इत्मीनान कर सकते हैं।
हम सिर्फ यही पतगना चाहते है कि, उपर्युक्त
कल्पनाओं में जगत की उत्पत्ति का कोई भी
बुद्धिजय भार उत्पन्न नहीं होमकता । इस प्रकार
भला जगत की उत्पचि सम्माय होमानी है
जब ईश्वग्ने अपने शरीर से जगत को उत्तम
करने की इच्छा की तो फिर पहिले पानी उत्पन्न
परना और फिर उसमें अण्डा स्थापित करके
आठ अश्य चौमठ करोड़ वर्ष तक उममें रहना
कतई अस्वाभाविक प्रदर्थ कपोनापित प्रतीत
होता है । जैस पानी उत्पन्न किया, वैसे ही अन्य
पदार्थों को भी पना डालते । यह सारी कल्पनाएँ
पुद्धि की फसोटी पर कमने योग्य ही हैं। पर
इतना समय और स्थान कहाँ ?
एक और अनोखी मात देखिये। मनु-
इपर और जगत्
नमति के प्रथम अन्याय में एक तरफ तो जगत
की उत्पचि के विषय में उपर्युक्त करसना की गई,
साप ही पहिले अध्याय के ३२ श्लोक में यह
भी कह दिया
द्विधा कृत्यात्मनो देशमर्धन पुम्पोऽभवत् ।
अर्धन नारी सम्पास विराजमसृजत् प्रमु ।
अर्थाद उन्होंने अपने शरीर के दो टुकडे
किये । आधे शरीर में पुरुष और आधे से स्त्री
उत्पन्न की । उस स्त्रीने मैथुन की सज्ञा की।
अमाजीने मैधुनद्वारा चिराट् पुरुष पैदा किया ।
विज्ञान के जमाने में ऐमी उत्पधि कोई स्वीकार
कर माना हैशास्त्र, मुक्ति और अनुमरदन
तीनों से जो पात मिद होती हो, वही पात
प्रामाणिक और स्वीकार करने योग्य होनी
पाहिये । शास्त्रों में वर्णित होते हुए भी आर
वह तर्क और अनुभव से सिद्ध नहीं होती तो
बद स्वीकार करने पोप नहीं मानी जामती ।
जगत् से ईश्वर की निर्लिप्तता
भिन्न भिन्न मतनादियोंने जात और घिर
का सम्मथ दिखलाते हुए जगत् की उत्पति
ईश्वर से भले ही मानी हा, परन्तु वास्तव में वा
ठीक नहीं है । अर्यात् जगत् को ईश्वरने पनापा
और जगत् की प्रत्येक मिपा में ईघर का इस्त
क्षेप है, ये भावें घर के स्वरूप के साथ रिल
कुल सम्म ध नहीं रखती। यह निमय है कि
ईश्वर में फरीत्व को माननेगले यह कहगे कि
संसार में प्रेमी कोई भी यस्तु नहीं जो बिना
बनाये ही यनगई हो । छोरी में छोटी वस्तु भी
बिना पनाये नहीं पन सकती-कोई न कोई ते
उसका उत्पादक होता ही है।
जगत् से ईश्वर की निसता
निस्सदेह, इस बात को मानते हुए, हमें
यह विचार करना आवश्यक है कि जिन वस्तुओं
की उत्पत्ति क्सिीके द्वारा होना हम स्वीकार
करते हैं, उन वस्तुओं को उत्पन्न करनेवाला
अशरीर है या सशरीर १। ऐसी कोई भी वस्तु
नहीं देखी जाती, जो बिना शरीर, पिना इच्छा,
और पिना साधन के उत्पन्न होगई हो । ईश्वरने
जगत को बनाया, ऐसा माननेवाले भी मुक्त
हृदय से इस बात को स्वीकार करते है कि ईश्वर
अशरीरी है । अशरीरी पदार्थ किमी वस्तु का
निर्माण कैसे कर सकता है ? अर्थात् अरूप
ईश्वर ऐसे विराट जगत की उत्पत्ति कैसे कर
सस्ता है ? मरे, पिना साधन के साध्य सिद्ध
नहीं होता । कुम्हार को साधारण मा घडा पनाने
के लिये भी मिट्टी, पानी, चाक और दण्ड आदि
सामग्री की आवश्यकता होती है। फिर भिन्न
मिन्न प्रकार की वस्तुए और भिन्न भिन्न समार
मय इस जगत् को बनाने के लिये, ईश्वर को
१२
इंघरबार
क्या किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं पड़ी
होगी ? सच बात तो यह है कि जब ईश्वर को
शरीर ही नहीं है तब अन्य माधनों का प्रश्न
उठाना ही बेसूद है।
एक और बात । कोई भी प्रगति पिना
इच्छा के नहीं होती। छोटे से छोटा ही
कार्य क्यों न हो, किन्तु पिना इन्छा उम
में प्रवृत्ति कभी नहीं होती । पहिले इच्छा-
मानसिक विचार और पाद में क्रिया । इश्वरने
जब जगत को पनाया, तो पहिले पनाने की
इच्छा का होना आवश्यक हुआ । और इच्छा,
यह तो रागद्वेष का परिणाम है। मानसिक
भाग्ना का नाम है इच्छा । जब ईश्वर को राग
द्वैप नहीं-मानसिक भावना नहीं तो फिर उसकी
प्रवृत्ति कमी १ ईश्वर में यदि इच्छा मानी जाय,
तो वह रागद्वेपी हुआ। और रागद्वेष इश्वर में
है नहीं, यह तो प्रसिद्ध ही है। यदि उसमें
रागद्वेष है, तो ससार के जीवों में और उसमें
जगत् से ईथर ही निर्लेप्तता
कपा अन्तर है? ईश्वर में राग, द्वेष, प्रेम, क्रोध
आदि नहीं है इसीलिये वह ईश्वर है । ऐमी
हालत में परमात्मा जगत को निर्माण करता
है, यह कैसे मानलिया जाय?
एक प्रश्न यह भी है कि, ईश्वर ने इस
जगत को बनाया, तो कर बनाया
१ और यदि
नहीं पनाया तो इस जगत के स्थान में और क्या
चीज थी ? पृथ्वी, पानी, तेज, वायु, सूर्य, चन्द्र,
नक्षत्र, तारे, पशु, पक्षी, मनुष्य, कीट, वनस्पति,
सुख, दुःख आदि कुछ भी नहीं था, तब फिर वह
अक्ला ईश्वर कैमा था? क्योंकि यह पात तो
अनेक पार कही जा चुकी हैं कि, शब्द मात्र
सापेक्ष हैं। जय जगत नहीं, तो ईश्वर का व्यव
हार नहीं होसस्ता । जब कोई वस्तु ही नहीं थी,
तो ईश्वर फिमका ? जब माल ही नहीं तो मालिक
कैसा ? पूजक नहीं तो पूज्य किम का? पुन नहीं
तो पिता किमका ? इसी प्रकार जप जगत नहीं
ईपरवा
तो ईश्वर किसका ? शास्त्रकारों का कथन है -
"प्रयोजनमनुद्दीश्य मन्दोऽपि न प्रवर्तते"
अर्थात् प्रयोजन के पिना कोई भी प्रवृत्ति नहीं
होती । ईश्वर को क्या प्रयोजन था जो उसने
इस जगत को पनाया ? मनुष्य व्यापार करता
है पैसे कमाने के प्रयोजन से । ससार की जितनी
भी प्रवृत्तियों हो रही है, वे सब प्रयोजन से ही
हा रही है। छोटे बच्चे परसाद के दिनों में
गीली मिट्टी के मकान बनाते है। लोग कहेंगे
कि, ये बिना प्रयोजन ही बनाते है। परन्तु ऐसा
नहीं है। आनन्द, प्रमोद यही इसका प्रयोजन हैं।
इधर
ने किस प्रयोजन से जगत को बनाया ?
क्रीडा मान के लिये बनाया, ऐमा कहना भी
अनुचित हैं । क्योंकि ईश्वर जैमी महान शक्ति
भी क्रीडा करे, यह कहना उसके साथ अन्याय
करना है।
एक और बात । ससार का कोई भी पदार्थ
जगत् से ईश्वर को निर्लिप्तता
स्वभाव से विरुद्ध निर्माण नहीं होता। पत्थर में
कमी घास नहीं उगेगा। जौ को यो कर कभी गेहु
उत्पन्न नहीं किये जासकते । ईश्वर के स्वरूप में
और जगत के स्वरूप में बहुत अन्तर है। इसलिये
भी ईश्वर से जगत की उत्पत्ति मानना निरर्थक है।
इन सारी बातों का विचार करते हुए
यह स्पष्ट है कि जगत की उत्पत्ति में ईश्वर
का कोई भाग नहीं। क्योंकि निमो रागद्वेप
नहीं, जिसको इच्छा नहीं, प्रयोजन नहीं, पाल
चेटा नहीं, क्रीडा नहीं, विनोद नहीं, शरीर नहीं,
ऐसा ईश्वर जगत को उत्पन्न करे, यह बिलकुल
मानने योग्य पात नहीं। इसीलिये जगत और
ईश्वर का सम्बन्ध जन्य-जना प्रमन्ध भी नहा।
जयरि-ईश्वर, ससार के प्रत्येक पदार्थ,
बल्कि ममार की प्रत्येक घटना से निर्लिप्त है
तो फिर प्रत्येक घटना में इश्वर का नाम क्यों
+
लिया जाता है ? जप ईश्वर किमी भी कार्य
में दखल नहीं दता. सुख दुप नहीं देता, किमी
वस्तु की उत्पत्ति नहीं करता तो फिर आपालवृद्ध
सभी लोग हरएक कार्य में ईश्वर का नाम क्यों
लेते है ? लडका मर गया तो कहा जाता है-
ईश्वर की मरजी । मुस दुस हुआ ता ईश्वर की
मरजी। नफा नुस्मान हुआना इश्वर की मरजी।
यह क्यों ? इसका उत्तर माधा और सहज ही है।
केवल इश्वर के प्रति पिनय दिपलाननाली यह भापा
है । इश्वर हमारे पूज्य है, मशक्तिमान है.
हमारे पिता है, इमलिये अपनी लघुना दिसलाने
क लिये ही प्रत्येक कार्य में हम ईश्वर का नाम
लेते है। किमी गृहस्थ के पास एक माधु जाता
है, वह ब्रह्मचारी है, महात्मा है । उमीके आंगन
एक लडका रोल रहा है । । माधु गृहस्थ से
पूछता है-" यह लडका किमका है?"
गृहस्थ
जवार देता है-" महाराज, आपका ही है।"
क्या यह बात मत्य है ? क्या ब्रह्मचारी साधु
3
यत् से ईश्वर की निलिप्तता
६७
लडके का पिता होमरूना है ? नहीं। यह एक
लघुता है । पट के प्रति नम्रता दिखलाना उम
गहस्थ का धर्म है। "मेरा लडका कहना
उसके लिये अभिमान होता, इमलिये ऐसी मुहा-
वरे की भाषा या यों कहिये लघुता-नम्रता की
भाषा दुनिया में प्रचलिा है। ईश्वर का नाम
लेने में भी यही विनय, नम्र या मुहावरा
जो पूछ कह लीनिये काम कर रहा है। इस
में वास्तविकता युछ भी नहीं।
जर यह निश्चय होचुका कि, ससार की
उत्पति ईश्वर करता नहीं, समार की किसी मी
घटना में ईश्वर का हस्तक्षेप नहीं, सुस दुस की
क्रिया में ईश्वर का भाग नहीं वा फिर मसार में
जो कुछ हो रहा है, जा घटनाए पनती हैं, म
का कारण है १ पदार्थों का स्वभाव ।
-
पदार्थों का स्वभाव
जगत क्या चीन है ? यह पहिले दिख
लाया जा चुस है । अनन्त पदायों के समूह
का नाम है जगत । यह जगत अनादि सिद्ध है।
जिस तरह ईश्वर अनादि सिद्ध है, और है भी,
उसी प्रकार यह जगत भी अनादि काल से ही
है। किसी समय ईश्वर नहीं था, ऐसा नहीं
और किमी समय जगत नहीं था, ऐसा भी नहीं
कहने का तात्पर्य यह है कि दोनों अनादि कार
से है। इम जगत के प्रत्येक पदार्थ का स्वमा
उत्पत्ति, स्थिति और विनाश धर्मी है। ए
साधारण दीपक से लगाकर आकाश पर्यन
मभी पदार्थों में नित्यत्व और अनित्यत्व दो
पार्यों का स्वभाव
१
।
,
ही है। द्रव्य की अपेक्षा मे यह जगत नित्य है
पार पर्याय की अपेक्षा से अनित्य भी है । जगत ही
क्यों ? जगत का प्रत्येक पदार्थ नित्य और अनित्य
धर्मी है। कोई भी पदार्थ न तो एकान्त नित्य
हा है और न एकान्त अनित्य ही।
अब हम इस बात का विचार करेंगे कि
यह नित्य और अनित्य क्या है ? शास्त्रकारी ने
'नित्य' का लक्षण इस प्रकार किया है -
"अप्रच्युतानुत्पन्नस्थिरेकरूपम् निन्यत्तम्"
अर्थात् जो कभी नाश नहीं होता, उत्पन्न
नहीं होता और स्थिर-एकही रूप है, उसका नाम
नित्य । इस मे विपरीत, जिमका नाश होता है,
उसका नाम है ' अनित्य' । जैन शास्त्रकारों
न 'नित्य' का लक्षण यो दिसलाया है-"तद
भागाव्यय नित्यम्" अर्थात् जो अपने मात्र में
नाश नहीं होता, उसका नाम है नित्य । अर्थाद
वस्तु जैसी है उसी हालत में रहे, उसका
ईशाया-
नाम है नित्य । ससार में जो पदार्थ है ये अपेक्षा
मे नित्य और आनित्य दोनों धर्मवाले हैं।
उदाहरण लीजिय । यह आत्मा इस शरीर को
छोडकर जाता है तब इस शरीर रूपी पर्याय का
नाश होजाता है। यह जिम शरीर में प्रवेश
करता है उस शरीर की उत्पचि हुई, किन्तु जो
आगे आत्म द्रव्य था, वह तो ज्यों का त्यों कायम
है। कहने का तात्पर्य यह है गि-हम शरीर के
परिवर्तन की अपेक्षा से आत्मा को नित्य और
अनित्य माना गया है। सुपर्ण के हार को गला
कर चूडिया बनाई, परिणामत हार का नाश
हुआ, और चूडियों की उत्पत्ति हुई, फिन्तु सुवर्ण
द्रव्य फिर भी कायम रहा । इन आकारों की
अपेक्षा से इससे नित्य और अनित्य दोनों कह
सस्ते है । इस प्रकार ससार के प्रत्येक पदार्थ
में नित्यत्व और अनित्यत्र धर्म विद्यमान हैं।
इसी लिये जैन शास्त्रकारो ने पदार्थों का लक्षण
"उत्पाद-व्यय-धोव्ययुक्त सत्
माना है।
पायों का समाव
9
मनुष्य का शरीर जल कर राम हो जाता है।
हम कहते हैं उसका नाश हुआ। बेशक, जिस
शरीर को हम देख रहे थे, उसका नाश हुआ
और उसके परमाणु रारा के रूप में परिवर्तित
हा गये । परिणाम शरीर का नारा होकर राख
की उत्पचि हुई और उसके परमाणु कायम रहे ।
अब यह निश्चय हो गया कि-जगत का
प्रत्येक पदार्थ नित्य भी है और अनित्य भी है।
और उमका मूल द्रव्य कायम रहता है। जो परमाणु
स्वरूप है । जगत का कोई भी पदार्थ सर्वथा पहिले
नहीं था और याद में उत्पन्न हुआ ऐसा नही
कहा जायेगा। हाँ, रूपान्तर अवश्य हाता है,
किन्तु मूल पस्तु तो अवश्य हो कायम रहती है।
पदार्थों के समाव के अनुसार सब कुछ
पनता हो रहता है। सूर्य को पूर्व से पश्चिम में
खींचनेवाला क्या कोई व्यक्ति है ? मोरके पलों
के ऊपर क्या किमी चित्रकार ने चित्रण किया
७२
है ? दिन के बाद रात और रात के पाद दिन
पनानेगाला क्या कोई व्यक्ति है ? तुओं के
परिवर्तन क्या कोई व्यक्ति करता है। गर्भ में
आया हुआ जीव धीरे धीरे बढता है, कलेपन
चनता जाता है, क्या उसका शरीर कोई व्यत्ति
मिट्ट लगा कर चढाता जाता है ? नहीं, यह सब
स्वभार बरा ही होता रहता है। वस्तु मात्र अप
अपने समानानुमार क्रिया करती रहती है । इस
लिये न ता इश्वर की जरुरत है, न किमी अन्न
वस्तु की । गीता के पाचवे अध्याय में स्पष्ट ।
कहा है:-
न कर्तृत्व न कर्माणि लोकरप मृजति प्रभुः
न कर्मफलसयोग स्वभावस्तु प्रवर्तते ।
नादत्ते कस्यचित्पाप न चव सुकृत प्रभु
अज्ञानेनावृत ज्ञान तेन मुद्धन्ति जन्तव
अर्थात् परमात्मा जगत को पनाता नहीं
लोगों के कर्मों को उत्पन्न करता नहीं, फर्मों
पदों का समाव ७१ फल का सयोग करता नहीं, किन्तु यह सब स्व- मात्र से ही होरहा है । किमी के पुण्य पाप के उत्तरदायी नहीं । अनान मे ज्ञान आवृत्त होने के कारण समार के जीर भ्रममें पड़ जाते हैं अर्थात् ममार के समस्त पदाथो का स्वभाव ही ऐसा है, जिसके कारण सय क्रियाएँ स्य ही होती रहती हैं। ! अग्नि का समाव है उष्णता, पानी का स मार है शीतलवा, नायु का समार है गति- शीलता, इसी प्रकार सभी पदार्थों में अपने अपने स्वमात्र विद्यमान हैं। मभी पदार्थ अपने अपने सभावों के अनुमार क्रियाएँ करते रहते है। इसी लिये कहा गया है-"पत्थु सहानो धम्मो" अर्थात् वस्तु का स्वभाव ही उसका धर्म है।
-
-११-
कर्म का प्राधान्य
समार के पदार्थ अपने अपने समावों के
अनुसार भले ही गतिशील हों, परन्तु इस
जगत में जो कुछ विचित्रता देगी जाती है,
उसका उत्तरदायित्व क्सि पर है ? समार में
सुरा, दुस, धर्म, अधर्म, सन्जनता, दुर्जनता,
वैमन, दारिद्रय, रोग एच शोष आदि नाना प्रकार
की विचित्रवाए दिसाइ दे ही है। यह सारी
विचित्रताए कैसे हो रही हैं ? किमी को तो एक
दर्जन मन्तान और किमी को एक भी नहीं।
एक मनुष्य मेहनत करके मर मिटता है, फिर
मा कुछ प्राप्त नहीं कर पाता, दूसरा मिना परि
श्रम मौज उडाता है । एक मनुष्य शरीर के
कम का प्राधान्य
बहुत कुछ सभालते हुए भी हमेशा बीमार ही
बना रहता है. दूसरा शरीर की ओर से कतई
लापरवाह होते हुए भी ख्य हृष्टपुष्ट रहता है।
किमी को हजारों कोशिशों के बाद पुत्रप्राप्ति
होती हैं, लस्नि होते ही मर जाता है। यह सारी
विचित्रताए फैमे होरही है ? क्या इसमे भी ईश्वर
का हाथ है ? नहा । क्या ईश्वर ससार को इस
प्रकार नचा सकता है ? अगर यह सन ईश्वर ही
करता है, तो यह भी मानना पडेगा कि, यदि
किसीने मिमी का खून किया तो वह भी ईश्वरने
ही करवाया । आथर्य है कि ईश्वर खून करवाता
भी है और उमी सूनी को फामी पर भी चढवा
देता है । यह सब क्या है ? इसलिये यह पात
निश्चित है कि ममार की फिसी भी प्रवृचि में
ईश्वर का हस्तक्षेप नहीं । इन प्रवृत्तियों का मूल
कारण जीर के किये हुए शुभाशुभ 'कर्म'
ही है । जो जैसे कर्म करता है, उसीके अनुसार
सुख अथवा दुःरा पाता है।
परवार
जीव मन, वचन और कापा में जो कुछ
प्रवृत्ति करता है उसके परिणामम्यम्प शुम और
अशुभ फमों का उपार्जन करता है । इस अनन्त
आकार में अनन्त परमाणु भर पडे हैं । मन,
वचन और पापा की प्रकृति के कारण ही,
जीप, आशश में से ऐमे परिमाणुओ को
ग्रहण करता है जिनका 'कर्म' कहते हैं ।
शुभ और अशुम दोनों प्रकार के होते है । जहाँ
किया है, यहाँ कर्म है । क्रिया का फल 'कर्म'
है। कर्मों का सम्बन्ध आत्मा के माध है। जिस
प्रकार के कर्म होते है और जर उनमा परिपाक
होता है, उसी प्रकार से उपयुक्त समपो में,
उन कर्मों का फल भोगना पडना है।
फर्म भी स्वभाव गुणयुक्त होते हैं। स्व.
मारानुसार ही जीव को फलप्राप्ति होती है।
कर्मों के फल देने के लिये किसी न्यायाधीश की
आवश्यकता नहीं, क्योंकि कमों का स्वमार ही
क्म का प्राधान्य
ऐसा है कि स्वय फलोत्पत्ति होती रहती है।
" आवरणों का स्वरूप " में कहा जाचुका है कि
तूम्मे का स्वभार पानी में तैरने का होता है।
यदि उस पर मिट्टी का लप किया जाय तो वही
तूम्बा पानी में डूब जाता है । लोहचुम्बक को
प्रेरणा करने की जरूरत नहीं है कि, वह
लोह को अपनी ओर खींचे, परन्तु उसका स्वभार
ही ऐसा ह कि वह लोहे को अपने आप अपनी
तरफ सींचेगा। बस यही कर्मों का स्वमाव ह ।
कर्मों का प्राधान्य कितना जबरदस्त है
यह बात ममार के अनेक अनुभवों से प्रतीत
होती रहती है । रामचन्द्रजी जैसे महापुरुष को
वशिष्ठ ऋपि जैसे उनके गुरुने राजतिलक का
मुहूर्त दिया, किन्तु उसी मुहूर्त में उसको बनवास
जाना पड़ा । इमिलिये तो शास्त्रकारोंने कहा है।-
कर्मणो हि प्रधानत्व
किं कुर्वन्ति शुभाग्रहाः ।
पवाद NA- वशिष्टदत्तलग्नोऽपि राम मनजितो पने। अथात् रामनन्दनी जमे पुरुषोत्तम, बल्कि यों कहना चाहिय कि, हिंदुओं की मान्य- वानुमार एक अवतारी पुरुष के ऊपर ईश्वर का इतना प्रकोप होमकता है ? परन्तु मा नहीं है । उपर्युक्त श्लोक में ही कह दिया गया है कि विश्व में फर्म का ही प्राधान्य है। कर्म को यदलने के लिये स्तिने ही उचम प्रह क्यों न हो, पर ये क्या कर मकते है ? स्वय राम. चन्द्रजी उस समय विचार करत हैं। यचिन्तित तदिर दूरतर प्रयाति, यच्चेतसा न गणित तदिदाभ्युपैनि । पातर्मवामि वसुधाविपचमावर्ती। मोह प्रजामि विपिन जटिलस्तपस्वी । अर्थात् जिस का मैंने स्वप्न में भी विचार नाह किया था, वही मेरे सामने उपस्थित है।
कर्म का प्राधा य
७९
और जिम श में विचार कर रहा था, वह मुझसे
दूर होगया। सुबह होते ही मैं चक्रपती राजा
बनूगा, यह बात तो दूर रही, एक जटाधारी
तपस्वी होकर आन मुझे पननाम जाना पड़ रहा
है । यह सर कर्मों की ही लीला है।
मबुद्धि को दुर्बुद्धि में परिणत करने
पाले भी कर्म ही है। हमी लिये कहा गया है-
" शुद्धि कर्मानुसारिणी
क्या रामचन्द्रजी
नहीं समझते थे कि समार म सुवर्ण का मृग भी
कहीं होता है ? क्या पाण्डव नहीं जानते थे कि
जुआ खेलना महापाप है ? किन्तु जानते हुए
भी कुचुद्धि का ही उन्हों ने ननुमरण किया।
यह सब कर्म का ही परिणाम है। कर्म का
प्राधान्य प्रदर्शित करनेवाले अनेक वाक्य हिन्दु
और जैन शास्त्रों में मिलते है।
"तस्मै नमः कर्मणे"
" भाग्यम् सर्वत्र कारणम्
८०
फर्मायत्तम् फल पुसाम्'
"
न चलतीय भाषिनी फर्मरेसा"
"कर्मव शुदमतयो गृणनित"
" फलति कपाल, न भूपाल ।"
"कर्मणो दि प्रधानत्यम्
पाँच कारण
ससार की प्रत्येक क्रिया में-सुख दुास
में कर्म का प्राधान्य है, यह पात हम देस चुके
परन्तु उसके साथ ही साथ अन्य भी
कारण है, यह पात भूलना नहीं चाहिये । जैन
शास्त्रों में किसी भी कार्य की उत्पत्ति में ५ कारण
माने गये हैं। १-काल,२समाय, ३ नियति,
४ पुरुषार्थ और ५ कर्म । इन पांचों कारणों
का समन्वय होने से ही किसी भी कार्य की
उत्पत्ति होती है । जो लोग यह कहते हैं कि,
जनी 'कर्मवादी' हैं और कर्मवादी होने के
कारण ही वे पुरुषार्थहीन होगये हैं, ठीक नहीं
.
है। कर्म के साथ पुरपाय का भी प्राधान्य है।
इनमें खास करके पुरुषार्थ और कम ये दो ऐसे
कारण हैं कि, उनका कार्य-कारण भाव सम्बन्ध
परावर रहता ही है । जैसे अण्डे के बिना मुर्गी
नहीं और मुर्गी के बिना अण्डा नहीं । मे ही
ही पुरुषार्थ के पिना कर्म नहीं, और कर्म
के पिना पुरुषार्थ नहीं । पुरुषार्थ से फर्म की
उत्पत्ति हाती है और कर्म के अनुसार
पुस्पार्थ होता है । काई भी कार्य तमी सम्पन
होगा, जब उसका समय आवेगा । पुरुषार्थ
कितना भी किया जाय, साथ ही कर्म भी किया
जाय, परतु पिना 'समय' आये यह कार्य
होही नहीं सस्ता । रोग मिटनेवाला अपश्य है,
और दवा भी जारी है, लेकिन रोग उसी समय
मिटेगा जर उसका चक्क आवेगा । भाग्य में
अवश्य है कि सन्तान हो, और उसके निमित्त
पुरुषार्थ भी किया, किन्तु समय आने पर ही
न्तिानोत्पचि होगी । इसी प्रकार कार्य की
पांच कारण
उत्पचि में स्वभाव भी कारण है | चाहे जितनी
लकडी जला डालिये, पर पई (कठ्ठा) मूग कमी
गलेगा ही नहीं, क्योंकि उसका स्वभाव गलने
का नहीं है। इसी प्रकार 'नियति' भी कारण
है, जिसको मरितव्यता कहा जाता है । मनुप्प
चाहता है कि मुझे पुत्र हो, किन्तु भवितव्यता
नहीं है, तो पुत्रोत्पत्ति असमत्र है। और यदि
पुन जन्मा मी तो वह मरा हुआ होगा। यह
भवितव्यता का परिणाम है । पुरुषार्थ तो प्रसिद्ध
ही है । पिना पुरुषार्थ के संसार का कौनमा
कार्य मिद्ध हो सकता है ? स्त्री का स्वमार है
सन्तानोत्पत्ति करना । समय भी है, कर्म भी है
कि उसे सन्तान हो, किन्तु यदि पुरुष मयोग
न हो तो होही कैसे मकेगा ? भाग्य की प्रधानता
तो हम पहिले ही दिखा चुके है। कर्म के
रोल ससार में प्रतिक्षण स्थान स्थान में देखें
जाते हैं। सुख के लिये प्रयत्न करते हुए भी
सुख नहीं मिलता, बरिक दुर ही मिलता है।
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.
पूज्य
की
पूजा
हम पहिले दिखला चुके है कि ईश्वर
और जगत का सम्बन्ध जन्य-जनक भार सम्ब
न्ध नहीं है, न मित्रता का ही सम्बन्ध है।
यदि ईश्वर और जगत का सम्बन्ध है तो
पूज्य-पूजक '-भार सम्पन्ध है । ईश्वर
पूज्य क्यों है ? यह आरम में हम दिखला चुके
हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाचुका है कि
ईश्वर क्या है ? और उसका स्वरूप क्या है?
हमारे आत्मा की अपेक्षा जो ज्यादा से ज्यादा
शुद्धात्मा हो, वही हमारे लिये पूज्य है।
उपयहार में भी देखा जाता है कि, जो बडे होते
हैं वे पूज्य दृष्टि से देखे जाते हैं। ईश्वर हम
ईपरवाद
लाम की आशा से दौडधूप करते हुए भी लाम
प्राप्त करना तो दूर रहा, उल्टी हानि हो जाती है।
इससे सिद्ध है कि, ये सारी बातें 'कर्म' पर
ही आश्रित हैं।
उपर्युक्त पाचों कारणों के मिलने पर ही
किसी कार्य की उत्पत्ति होती है । इसमें ईश्वर
की प्रेरणा या उसके दसल की कोई जरूरत नहीं।
अपने अपने स्वभावानुसार सब होता रहता है ।
-
पूज्य
की
पूजा
हम पहिले दिखला चुके हैं कि ईश्वर
और जगत का सम्बन्ध जन्य-जनक मान सम्म
न्ध नहीं है, न मित्रता का ही सम्पध है।
यदि ईश्वर और जगत का सम्बन्ध है तो
पूज्य-पूजक'-मार मम्बन्ध है । ईश्वर
पूज्य क्यों है ? यह आरम में हम दिसला चुके
हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाचुका है कि
ईश्वर क्या है ? और उसका स्वरूप क्या है ?
हमारे आत्मा की अपेक्षा जो ज्यादा से ज्यादा
शुद्वात्मा हो, यही हमारे लिये पूज्य है।
व्यवहार में भी देखा जाता है कि, जो बडे होते
हैं वे पूज्य दृष्टि से देखे जाते हैं। ईश्वर हम
इयरवा
से अधिक शुद्ध है, अधिक ही नहीं, वह तो
परम शुद्ध है । सम्पूर्ण है, हम अपूर्ण हैं । ईश्वर
मर्वशक्तिमान है, हम अल्प शक्ति हैं। ईश्वर
मर्वज्ञ है, हम अल्पज्ञ हैं, इसीलिये ईश्वर हमारे
लिय पूज्य है।
ईश्वर हमको इम लिये मी पूज्य है कि,
वह हममे अनन्त गुना गुणवान है । उसमें एक
भी दोप नहीं, इस लिये वह हमारा आदर्श भी
है । माधुओं को पूज्य क्यों मानते हैं ? वे कुछ
लेते-देते नो नहीं, किन्तु गृहस्थों से चे अधिक
गुण-सम्पन है-पवित्र है । इस लिये पूज्य हैं।
जैस साधु कुछ लेते-देते नहीं, वैसे ही ईश्वर कुछ
लेते देते नहीं, फिर भी जैसे साधु पूज्य हैं, वैसे
ही ईश्वर भी पूज्य है।
जो पूज्य होता है, उसकी पूजा करना
आवश्यक है। पूज्य, पूजक और पूजा-इन तीनों
में परस्पर सम्बन्ध है । जब ये तीनों एकत्रित
होजाते हैं, तर ही पूज्य पूजक का सम्बन्ध
पूज्य की पूजा
८७
सार्थक होता है । यहाँ यह शका हो सकती है
फि, जय ईश्वर कुछ लेते देते ही नहीं, फिमी के
हानि लाम में सम्मिलित होते ही नहीं तो फिर
उनकी पूजा क्यों करनी चाहिये ? इसका जवाब
तो सीधा ही है।
पहिले यह जान लेना आवश्यक है कि
हमारे जीवन का ध्येय क्या है ? हम क्या प्राप्त
करना चाहते है ? इसका उचर एक ही है और
वह है-परम सुस । हम इस चौरासी लास
योनियों के चकर से छूटना चाहते हैं । हम
जन्म, जरा के दुख से मुक्त होना चाहते हैं।
अन्य प्रकार से यों कहना चाहिये कि हम ईश्वर
होना चाहते हैं-हमारे आत्मा को ईश्वर की
ज्योति में मिलाना चाहते हैं। अगर ऐसा ही
है तो हमको ईश्वर की पूजा, भक्ति और उपा-
सना करना जरूरी हैं। क्यों कि यह स्वामाविक
नियम है कि जिससे जिसकी आवश्यकता होती
है वह उसीके पास जाता है, जिसके पास
८८
ईएलान
वस्तु होती है। नौकरी की इच्छा रखनेशला
किमी सेठ या आफिमर के पास जायेगा । साधु
पनने की इच्छा रखनेवाला साधु सन्त के पाम
जायेगा। विद्यामिलापी विज्ञान के पास जायेगा,
विषयी वेश्या के पास जागा । हमें वीतराग
होना हे-शुद्ध होना है-इंचर होना है। इसलिये
हमको उन्हीं की भाक्त-मेया करनी चाहिये,
जो वीतराग है-परम गुद्ध है-ईश्वर है।
-
फल-प्राप्ति का आधार
हमने पहिले ही बता दिया है कि ईश्वर
कुछ लेते देते नहीं। जब यह स्थिति है तो फिर
ईश्वर की उपासना-भक्ति करने मे फल प्राप्त
कैसे होगा ? क्योंकि वह तो कुछ देंगे
कुछ देंगे नहीं।
परन्तु हम यहाँ यह भूल जाते हैं कि, किमी भी
क्रिया के फल का आधार हमारे अन्त करण की
भावना पर निर्भर है । देखिये, एक मनुष्य वेश्या
के घर जाता है, हम कहते है वह नरक में
जायगा । क्या वेश्या उसे नरक में मेनती है ?
नहीं, वेश्या को तो नरक का ज्ञान भी नहीं,
किन्तु मनुष्य का उमके वहाँ जाने से अन्तःकरण
मलिन होता है, यही दु'स और दुर्गति का कारण
९०
पर
है। किमी किमी गरीर को दान किपा, र
कहेंग कि, दानी स्वर्ग में जावेगा-गगी होगा तो
क्या दानी यो मर्गमे यह गरीय भेज देगा।
कभी नहीं। दान देने क ममय उस दावा
दिल में जो दया, इमली उत्पम होती है, उगी
से उगो पुप्प होता है। उम पुग्य का-सुमो
का यह उपानी करता है, परिणामता उसका
हदय पवित्र होनाता है और यह वर्ग में जाना
है और सुगी होता है।
सुग दुर के पास पग्न का साधन केरल
हृदय की परियता और अपवित्रता पर निर्भर है।
इसलिये कहा गया "मन एर मनुष्याणां पारण
पन्धमोधयो' अर्थात हरक कार्यमें मन के असे
परिणाम होते हैं, बसे ही कमी का पचन और
मुक्ति होती है। सर तो इन पानी से अलग है,
रागदेप से रहित है, किन्तु जिस किपा में जैसा
हमारा हृदय होगा-भावना होगी-शुद्धता होगी
उसी प्रकार से फल की प्राति होगी। मन वचन,
फल-प्राप्ति का आधार
और काया की प्रवृचियों से शुमाशुभ कर्म
उपार्जन होते है । शुमाशुम कर्म अपने अपने
स्वभावानुसार सुख दुस प्रदान करते हैं।
इस पर से यह सिद्ध हुआ कि वीतराग दशा
को प्राप्त करने के लिये हृदय की शुद्धता जली
है। और हृदय की शुद्धि क लिये ईश्वर की उपा
सना-भक्ति आवश्यक है। ईसर हमें कुछ दे
चाहे न दे, हम हमारी अन्तःकरण की शुद्धि क.
अनुसार फल जरूर प्राप्त करेंगे। इसीलिये ईश्वर
की भक्ति परमानश्यक है।
स्मरण-भक्ति
ईघर-मक्ति किम प्रसार करनी चाहिये,
धाका भी विचार करना आवश्यक है।
ईघर अरूपी है, अदृश्य है । ऐमे ईधर
की भक्ति या उपामना कम की नाप? ईयर
की भक्ति हमारे रिचार में नान प्रकार में हो
सकती है। १ स्मरण, दान और ३ सान मे।
इन तीनों गेदों में से रिमी एक, दो या सीनों
प्रकार से मक्ति की जामवती। मक्ति का
अर्थ हे बहुमान, आदर, सवार इत्यादि।
हमारी पूज्य पस्तु के प्रति किमी भी
प्रकार का आदर या सम्मान दिखलाने का नाम
है मक्ति । फिर चाहे वह स्मरण या दर्शन या
দমনকি स्पर्शन द्वारा ही क्यों न हो । पहिले स्मरण भक्ति को ही लीजिये। किसी भी पूज्य पुरुष का शुद्ध भार से स्मरण करना, यह उसका बहुमान है-भक्ति है । भूतकाल में जितने भी महापुरुप हो गये हैं, सतियाँ होगई है, इन सवका हम स्मरण करते है, प्रात: काल उठकर उनका नाम लेते है, यही हमारी उनके प्रति भक्ति है। स्मरण करने से हमारा भक्तिमार उनके प्रति रढता है, हमें उनके गुण याद आते हैं, हमें उनके जैसे होने की प्रेरणा मिलती है। शास्त्रकाराने ईश्वर का स्मरण करने के लिये चार प्रकार दिसलाये है.- रूपस्थं च पदस्य च पिंडस्थ रूपवर्जितम् । ध्यान चतुर्विध मोक्त ससारार्णवतारकम् ।। अर्थात् रूपस्थ, पदस्थ, पिंडस्थ और रूपातीत । इन चारों प्रकारों का ध्यान ससार- रूपी समुद्र से पार उतार देता है। योगी ईश्वर का ध्यान करने के पहिले रूप को देखते है,
९४
पाद में नाम से परमात्मा का स्मरण करते हैं।
तपथात् पिण्ड में पान करते हुए परमान
रूप बन जाते है और अन्त में रूपातीत होवान
हैं। हग बैमे अल्पति मानों के लिये गर में
पहिले परमात्मा का स्मरण' पाना बहुत
ही जरूरी है । स्मरण से शुद्ध भावना होती है
और जैसी भावना होती है येसी ही सिद्धि प्राप्त
होती है। क्योंकि वहा भी है-
यादृशी भावना यस्प सिद्धिर्भवनिताहशी।
यहां एक यात विचारणीय है। ईघर तो
अरूपी है, अनाम है फिर उसका स्मरण कैसे
किया जाप ? जबतक मनुष्य इतना ऊचा पानी
न मने कि किसी का नाम या आलम्बन लिये
चिना भी स्मरण कर सके, तपतक यह ईश्वर का
स्मरण करने के लिये कोई भी नाम लेसफना
है। नाम पुछ भी हा, किन्तु हमारा लक्ष्य
शक्तिमान परमात्मा ही होना चाहिये, जो ईश्वर
सर्व
स्मरण-मति
पद को प्राप्त होचुका है। इसीलिये महापुरुपो
ने ईश्वर की स्तुतिकरते हुए कहा हैं-
यस्य निखिलाश्च दोपा
न सन्ति, मर्वे गुणाश्च विद्यन्ते ।
प्रमा चा विष्णु
हरो जिनो या नमस्तस्मै॥
अर्थात् जिसके समस्त दोष नष्ट होगये है,
और जिसमें समस्त गुण ही विद्यमान हैं, ऐसे
चाहे प्रहा हो, विष्णु हो, हर हो या जिन हो,
कोई भी कयों न हो, उसको मेरा नमस्कार है।
इसी प्रकार आचार्यश्री हेमचन्द्राचार्य ने सोमनाथ
के मदिर में जाकर यही प्रार्थना की थी।
यत्र तत्र समये, यथा तथा,
योऽसि सोऽस्यभिघया यया तया।
चीतदोपालुपः स चेत् भयान
एक एव मगयसमोऽस्तु ते ।
अर्थात् हे प्रभो ! आप किमी भी समय
में, किमी भी स्थिति में और फिमी मी नाम से
साद
पुकारे जाने हो, पान्तु आप ही एक ऐसे है, जो
दुर्गुणो की पलुपता से दूर हैं। इस लिए हे
भगवन् ! आप फी मेरा नमस्कार है।
कहने का आशय यह है रि-नाम र
भी लिया जाय, किन्तु यदि हम गुणों की ही
पूजा करना चाहते हैं, तो हमें प्रसफा ही स्मरण
करना चाहिये । और यदि वह शुर भाव से
किया जाय तो अवश्य ही उमसे हृदय की शुद्धि
होगी । महापुरुषों के नाम स्मरण से अपश्य
हमारा हृदय पवित होता है, भावनाए शुद्ध होती
हैं, उनके गुणों का आदर रोता है और हमें
यथेष्ट प्रेरणा मिलती है।
यद्यपि नाम बड़ है, किन्तु जड़ में भी
ऐसी शक्ति विधमान है, जिमसे हमारे हृदय
जागृति उत्पन्न होती है, पारिफ धीरे धीरे हमारी
आत्मिक शक्ति मी विकसित होजाती हैं।
में
--
दर्शन और स्पर्शन का महत्त्व
ईश्वर की स्मरण मक्ति हम देस चुके ।
अब इसमे भी अधिक महत्त्वपूर्ण दर्शन और
स्पर्शन भक्तिपर हम विचार करगा हम एक वस्तु
का नाम लेते है, उममे हमारा सम्बन्ध स्थापित
होता है, फिर हम उसे देखते हैं तो हमारा
उसके प्रति प्रेम आग्भ होजाता है और उसके
पाद क्रमशः हम उसे स्पर्श करते हैं, जिससे
उसके प्रति हमारा प्रेम उत्चरोचर बढता जाता
है। यह हरएक मनुष्य के लिये स्वानुमर की
बात है । जिस चीज की इच्छा होती है उसका
नाम लेना-स्मरण करना, बाद में उसे दखना
इवरवाद
और अन्त में उसका स्पर्श करना-यही इच्छा
पूर्ति की पराकाष्टा है । ससार म प्रत्येक
मनुष्य को इस बात का अनुभव होता ही है।
एक उदाहरण लिजिए ।
कल्पना कीजिये, फिसी एक गृहस्थ का
लडमा विलायत गया है। बरसों बीत गये, उसका
कोई समाचार नहीं । मातापिता उसको भूल
गये
है। वर्षों के बाद अकस्मात् पिता के पास एक
पोस्टमार्ड आता है। अक्षरों के देखते ही मालूम
हुआ कि उसाक पुत्र का पत्र है । पिताको
ख्य हर्ष होता है । पुत्र की बहुत याद आती है।
मानों पुत्र की सम्पूर्ण आकृति उसफ सामने
खडी होजाती है । पुत्र के प्रति उसका वात्सल्प
जागृत होजाता है । पोस्ट कार्ड के पढने से
मालूम हुआ कि पहिली अप्रैल को वह अपने
घर आयेगा । यद्यपि पहिली अप्रेल का आने में
अभी ८ दिन बाकी है। परन्तु वे ८ दिन पिता
को इसी भावना में-हर्ष में-व्यतीत होजाते हैं
दर्शन और स्पर्शन का माल
२९
कि मेरा पुत्र आरहा है और उसे में देखूगा ।
पहिली अप्रेल के दिन ठीक समय पर वह स्टेशन
पर पहुचता है, गाडी के आते ही दोनों की
चारों आरों एक होती है। पिता का हर्प समाता
नहीं-नोमरोम उसका प्रसन्न होजाता है । गाडी
पाम चला जाता है। पुन गाडी से उतर कर
पिता के चरणों में गिर जाता है, दोनों भुजाओं को
पफडकर पिता पुन को छाती से लगाता है,
मस्तक पर चुम्बन करता है-दोनों हर्प में फूट
फूट कर रोते हैं।
म्मरण की अपेक्षा दर्शन और स्पर्शन
में कितना महत्व है यह समझना अब कठिन
नहीं । इसीलिये हम कहते हैं कि ईश्वर की भक्ति
स्मरण से की जाय । परन्तु इससे भी अधिक
आनन्द प्राप्त करना है-ईशर क ननदीक विशेष
रूप मे जाना है तो हमें दर्शन और स्पर्शन मक्ति
का भी अबलम्बन लेना चाहिये ।
१००
यहा एक शका अवश्य हो सकती है। पर यह
कहा जाता है कि ईश्वर अरूपी है सर फिर
उसका दर्शन और स्पशन मा! मूर्व पदार्थ के
दर्शन और पर्या हो सकते है परन्तु जो सर्पमा
अदृश्य और अरूपी पदार्थ है उनके दर्शन और
'उनका स्पर्शन में हो सकता है ? इसका समा
धान अगले प्रारणमें पदिए ।
"
मूर्तिमय जगत्
प्रकृतिने हमारे लिये ऐसे नियम बना
रख हैं कि ससार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं,
जिमके लिये मनुष्य को निराश होना पड़े।
अदृश्य, अगोचर, अरूपी व ओं का दर्शन और
स्पर्शन करने का भी साधन विद्यमान है आर
वह है मूर्ति । कैमी भी वस्तु क्यों न हो, हम
मूर्ति के द्वारा हमारी कार्यप्तिद्धि कर मरने
हैं। आवश्यकता है तो मात्र हृदय की भावना
की । मूर्ति इम जिस तरह के मार
स्थापित करेंगे, उमी प्रकार के फल की प्रामि
हम कर मरते हैं। ममार का व्यवहार मूर्ति के
ऊपर ही चल रहा है, वरिफ यों कहना
इश्वरवाद
कि, यह जगत ही मूर्तिमय है । हम दुनिया
म एक दूसरे को देखते हैं, यह सब मूर्ति नहीं
तो और क्या है ? मिन मिन देशासीयों की
पहिचान, राजा और रक की पहिचान, साधु
और गृहस्थ की पहिचान, रोगी और निरोगी
की पहिचान, विशाल देशों की पहिचान आदि-
ये सब किस आधार से होती है? एक मात्र
मृति पर से । गृहस्थ की गृहस्थी और साधु की
माधुता किस प्रकार प्रत्यक्ष होती है। एक मात्र
उसके वेश से । वेश से ही स्पष्ट होजाता है कि
यह साधु है या गृहस्थ । विशाल भारत का ज्ञान
छोटे बच्चे को क्राना है और चार दीवारों के
चीच में बैठकर कराना है। इसके लिये भारत
का नक्षा ही साधनस्त है । यह नक्षा मूर्ति नहीं
तो और क्या है ? दीवार पर लगे हुए मिन
भिन्न चित्रों को देसकर हम कहते हैं कि,
यह तो कोई यहादुर आदमी है, यह तो कोई तपस्वी
यह तो कोई विषयी आदमी है । यह सारी
भूतिमय जगत्
बाते हमको कौन सिता रहा है ? एक मात्र
मूर्ति । जरा और आगे बढय । जिस वस्तु
का हम नाम नहीं ले सकते, उसको समझाने के
लिये भी अगर कोई साधन है तो मात्र मूर्ति
ही । ५२७ म स ५२७ घटाने से शेष
कुछ भी नहीं रहता । परन्तु "कुछ नहीं"
को समझाने के लिये भी हमको मूर्ति ही की
शरण लेनी पडेगी । “कुछ नहीं" की मूर्ति है
शून्य । विदेश में चल जाइए । वहाँकी मापा
हम नहीं जानते । हम प्याम और भएर लगी है।
हम उस देश वामी से हमारा कार्य सिद्ध करना
चाहते हैं । उस समय भृस और तृपा की
भावना की मूर्ति बनाकर हम उसके सामने खडी
करेंगे । एक हाथ मुह पर और दूसरा हाथ पेट
पर रसपर हम पतलायेंगे । वह झट समझ
जायगा कि इसे अन्न और पानी की जरूरत है।
भगवान महावीर, युद्ध, राम, कृष्ण, शकराचार्य
और ऐसे और भी महापुरुप जो आज से
१०४
इसापार
या हजारों वप पूर्व हो चूके हैं उनके उपदेशों के
परमाणु आकाश में फैल गये हैं परन्तु आज भी
हम यह कह रहे है कि, यह भगवान महावीर
की वाणी है, यह महात्मा बुद्ध का वचन है
इत्यादि । उस वाणी का प्रतिपिम्न-मूर्ति-या उसे
जो कुछ भी कहना चाह कहिये, यही उनके
शास्त्र हैं। गुरु के आसन को, चाहे वह लकडी
का हो या कपडे का, शिष्य उमे बहुमान की
दृष्टि मे ही देखता है, उसका आदर करता है वह
ममझना है यह आमन नहीं, पल्कि गुरु ही हैं।
पिता के चित्र को दिपलाते हुए लडका
यही रहगा कि, ये मेरी माता है, य मेरे पिता
है । कागज और स्याहा के होते हुए मातापिता
की भावना से ही उनके चित्रों को मान देता है।
ये सारी बातें स्पष्ट कर देती हैं कि सारा जगत्
मूर्तिमय है और सारा व्यवहार मूर्ति से ही हो
रहा है।
-
-
मूर्तिपूजा
मूर्त किंवा अमूर्त समी पदार्थों क लिये हमें
मूर्ति की जरूरत है । हृदय के भार भी मूर्ति के
द्वारा ही प्रकट किये जामकते हैं। इमी प्रकार
जिम ईश्वर की हम पूजा करना चाहते हैं वह
अरूपी और अदृश्य होते हुए भी, हम मूर्ति के
द्वारा ही उसका दर्शन और स्पर्शन कर मकते
है । जो आत्मा मोक्ष को प्राप्त कर चुका है, वह
अरूपी होते हुए भी, मनुष्य लोक म से ही
ईश्वर की ज्योति में मिला है । इमी अपेक्षा से
अपने आलम्पन के लिये उनकी मूर्ति बनाकर
उनकी पूजा हम करनी चाहिये । मूर्तिपूजा, यह
मूर्तिपूजा नहीं है, किन्तु मूर्ति "क द्वारा इश्य
इववाद
।
की पूजा है । पूज्य की पूना है । मूर्तिपूजा करने
के समय काई यह भावना नहीं करता कि,
"यह तो मकराने का पत्थर है । इमे मकराने
से निकाला, जयपुर क पाजार में ले गये
और कारीगरों न हथाड ठोक ठाक कर उसे
आकार किया' । नहीं, मूर्तिपूजा के समय
उस मूर्ति म प्रभु का-अपने पूज्य व्यक्ति का
आरोप करके ही उसकी पूजा की जाती है ।
प्राणप्रतिष्ठा द्वारा उसका नामकरण किया
जाता है । बाद में, हमारी बुद्धि उस मूर्ति में
मूर्ति रूप नहीं रहती, किन्तु प्रभु रूप हो जाती
है। हमारी भावना उसको प्रभु स्वरूप ही देखती
है । किसी भी वस्तु म मनुष्य जिस प्रकार
की अपनी मारना को स्थिर करेगा, उसी
प्रकार क फल की प्राप्ति होती है। भावना
ही फल को देती है। द्रोणाचार्य के पास
एकलव्य पाणविद्या सीसने को जाता है, द्रोणाचार्य
इन्कार करते हैं। एकलव्य की श्रद्धा थी द्रोणाचार्य
पर और उसका निश्चय था कि मैं धनुर्विद्या
T- १०७ । मूर्तिपूमा सीखूगा तो द्रोणाचार्य ही से। गीली मिट्टी से मनुष्य का पुतला बना कर उसमें द्रोणकी श्रद्धास्थापित कर स्वय चाणविद्या भीखता है। अर्जुन से बहुत आगे बढजाता है और वह दावे के साथ कहता है कि मैं चाण विद्या द्रोणाचार्य से ही सीसा है। जब लोग यह कहते है कि द्रोणाचार्य ने तुम्हें नहीं सिखाया, तब वह अपने झोपडे में रसे हुए पुतले को दिखाकर कहता है कि, 'मेरे द्रोणा चार्य ये हैं और इन्हीं से मैन बाणविद्या सीखी है। कहने की आवश्यकता नहीं कि, भावना में ही भगवान है । किसी भी पदार्थ में जिस प्रकार की भावना स्थापित की जाय, उसी प्रकार के फल की प्राप्ति होती है। एक घर में पाच स्त्रियाँ हों, लेकिन पाचों में मनुष्य की बुद्धि मिन्न भिन्न प्रकार की होती है । एक में मातृत्व बुद्धि, दुसरी में पत्नी की, तीसरी में बहिन की। स्त्री एक समान होते हुए भी घर के पुरुष की बुद्धि, भावना के अनुसार ही रहती है और
विवाद
प्राप्ति हाती है । इसी प्रकार मूर्ति में भी हमारी
मावना प्रभु की है । राम, कृष्ण, महावीर आदि
नाम लेकर उनकी प्रार्थना करनेवाले की भावना
शहर के राम, कृष्ण, महावीर नामधारी व्यक्तियों
से नहीं होती, किन्तु उनसे होती है, जो
हजारों वर्ष पूर्व महापुरुष होगये है । महात्मा
गांधीजी की समाधि पर हजारों लोग जाते
है, वहा गांधीजी कहां हैं? परन्तु गांधीनी
के अग्निमस्कार का स्थान, या गाधीजी की
स्मृति राता है, उनके गुणो की याद दिलाता
है। इस लिए श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान भी
पवित्र है । इसी प्रकार चित्र, फोटू इत्यादि।
एक यात अवश्य है। महापुरुषों की या भगरान
की काल्पनिक मूर्ति-चिर आदि ऐमे होने चाहिए
जिससे हमारी मनोवृत्तिया किसी अन्य विकार
की तरफ न झुकें । हम पहिले दिसला चूके हैं
कि मूर्ति की आकृति का प्रभाव हमारे दिल पर
आश्य ही होता है । जैसी मूर्ति होगी, वैसे ही
- on मूर्तिपूजा विचार हमारे दिल में आगे। हमारा उद्देश है ईश्वर की मूर्ति से | ईश्वर वीतराग है, निर्विकार है मूर्ति भी उमी प्रकार की होनी चाहिये, जिसको देखकर हमारे अन्दर वीतरागता का मान प्रकट हो और हमारे मनोविकार उसे देखते ही शान्त होजावें। ईश्वर का ध्यान करने के लिये हमको मूर्ति के आलम्बन की आवश्यकता है। ध्याता, ध्यान और ध्येय-इम त्रिपुटी की एकता के निना कोई कार्य सिद्ध नहीं होता। जबतक कि निरालम्बन ध्यान करने की शक्ति हम में उत्पन्न न हो, तबतक किमी न किसी का आलम्बन लेना मनुष्य के लिये आवश्यक है और वह 'आ- लम्बन वीतराग भाव को उत्पन्न कगनेवाली मूर्ति का ही श्रेष्ठ है। एक अथवा दूसरे रूप से हरएक धर्मनाले मूर्तिपूजा कर रहे हैं । यूरोप में जाइये, हरजगह वीर पुरुषों की, पूर्व पुरुषों आदर्श राजाओं की मूर्तियाँ बनी हुई -
-
ईश्वरवाद
मेला लगता है, पुष्प चढाये जाते हैं, बहुमान होता
हैं। यह मूर्तिपूजा नहीं तो और क्या है?
मुसलमाना की मस्जिदों को देखिये । वे एक
प्रकार की मूर्तियाँ नहीं तो और क्या है ? मका
शरीफ की तरफ नजर करके नमाज पढना यह
क्या दिसला रहा है ? कनस्तानों के ऊपर धूप
दीप लगाना, यह क्या है ? पारसी लोग अग्नि
को कितना महत्व देते हैं ? आर्यसमाजी दयानन्द
सरस्वती के चित्रों का कितना आदर करते
हैं ? गाडी में रखकर उस फोटो का जुलुस
कालता, सामीजी की जय पुकारना, फूल हार
चढाना-यह मूर्तिपूजा नहीं तो और क्या है ?
जैन समाज क स्थानकवासी भाई गुरुओं की
तस्वीरें पर घर में रसते हैं, काम पडने पर
अन्य देव-देवीयों के पास जाकर सिर झुकाते
है, श्रीफल नैवेद्यादि चढाते हैं । यह सब मूर्ति
पूजा नहीं तो और क्या है ? ईसाई लोग क्राइस्ट
के चित्र को कितना बहुमान देते हैं ? चर्च उनके
मन्दिर नहीं तो और क्या है ?
नी
।
मूर्तिप्ता
पूजा पूजा ही है। किसी भी वस्तु का आदर
या बहुमान करना यह पूजा नहीं तो और क्या
है ? जिसके प्रति हमारी श्रद्धा है, जिसका हम
पूज्य समझ रहे हैं, उसकी किमी भी चीज
या उसके चित्र क पहुमान करना आदर
करना-यह मूर्तिपूजा क सिवाय और क्या है ?
राष्ट्र के पिता महात्मा गाधीजी के निधन
होने के बाद उनकी प्रत्यक चीज आदरपूर्वक रक्खी
गई, उनकी मूर्तिया का आयोजना जगह जगह
हो रही ह यह सब पूज्य की पूजा मूर्तिपूजा नहीं
ता और क्या है ? कागज काचत्र भी हमारे लिए
पूज्य है, आदरणीय है अगर उसी वस्तु का कोई
अपमान करता है, तिरस्कार करता है तो हमें
कितना दु:ख हाता है ? कागज और स्याही से
बने चित्र का कोई तिरस्कार करे तो हमें क्यों
दुम होना चाहिये । परन्तु नहीं, उस चित्र
को हम चित्र नहीं समजत ! उसको हम
पूज्य देव या गुरु समजते हैं।
मूर्तिपूजा के भेद
पिछले प्रकरणों में हम यह पतला चुके हैं
कि ईश्वर की भक्ति स्मरण से, दर्शन से और
स्पर्शन से होती है। जिस प्रकार नामद्वारा स्मरण
करके ईश्वर की पूजा की जाती है पैसे ही मूर्ति
के द्वारा दर्शन और पर्शन कर के पूजा करना
मनुष्य मात्र के लिये जरूरी है, और इन तीनों
प्रकारों से पूजा करनेाला अत्यधिक आनन्द की
प्राप्ति कर सकता है। क्योंकि मूर्ति में हमारी
मारना ईश्वर ही की है, न कि मूर्ति की।
प्रभु की पूजा दो प्रकार से होती है-एक
द्रव्य पूजा और दुसरी भावपूजा । पूजा करने में
मुख्य तो श्रद्धा ही है। मनुष्य की जैसी श्रद्धा
।
मूर्तिपूजा के भेद
होगी, वैसी ही वह अपने पूज्य की पूजा कर
सकता है। पिता के चार लडकों में उसके गुन.
रने के बाद सिर्फ एक लडका पिता को याद करके
अपनी भक्ति प्रदर्शित करता है, दूसरा स्मरण
भी करता है, साथ ही पिता की तस्वीर को
घर में रखकर दशन भी करता है। तीसरा उस
तस्वीर को स्पर्श करके अपने कपाल पर हाथ
रखता है । चौथा, जो कुछ सामग्री होती है,
वह पिता की तस्वीर के सामने नैवेद्य रूप
धर, पाद में भोजन करता है । चारों में
पिता के प्रति भक्ति अश्य है, लेकिन अपनी
अपनी भावना और श्रद्धा के अनुसार ही
उसका प्रदर्शन दिखलाते हैं । उसी प्रकार
प्रभु की पूजा करने वाले भी द्रव्य और भाव
दो प्रकार स पूजा कर सकते हैं। द्रव्यपूजा वह
है जिसमें भक्त अपने उपयोग में आनेवाला
चीज भक्तिपूर्वक प्रभु के समक्ष रखे। और
श्शावाद
पूतना वह है जिम में भक्त प्रभु के समक्ष
पैठ प्रभु की स्तुति-प्रार्थना करे । गृहस्थों के
लिये यह दोनों-द्रव्य और भार पूजा-उचित है।
ससार की ऐसी कोई भी क्रिया नहीं है,
जिसमें कुछ न कुछ आरम न होता हो-क्रिया न
लगती हो । प्रभुपूजा करने में एकेन्द्रिय-पानी-
विगैरः जीवों की अनिवार्य हिंसा अवश्य होती
है । परन्तु जो गृहस्थ गृहस्थाश्रम में रहते है,
उनका कौनसा ऐमा काय है जिसमें अनिवार्य
एकेन्द्रिय जीवों की हिंसा न होती हो । परिक
ससारत्यागी साधु भी उपदेशों के निमित्त विहा
रादि करने में जीवों की हिंसा से सर्वथा नहीं बच
सकते। हमें तो मात्र करना है लामालाम का
विचार । पचास हजार के व्यापार में अगर दस
पांच हजार का फायदा हो और एफदो हजार
कस्टम ड्यूटी के देने भी पढ़ें, तो यह नुकमान
नुकमान नहीं गिना जायेगा। साधु उपदेश
देते हैं, वो गिरती है, फिर भी गृहस्थ उस
।
-
मर्तिपूजा के भद
पानी में उपदेश सुनने को जाते हैं। पानी के
जीवों की हिंसा होते हुए गृहस्थ लोग उपदेश
का लाभ उठाने जाते हैं और माधु भी अपना
कर्तव्य ममझ कर लोककल्याण की भाग्ना से
उपदेश करते ही हैं। क्योंकि जहाँ क्रिया है.
यहाँ कम है, लेकिन कर्म का आत्मा के साथ
जो बन्धन है, यह तो परिणाम-भारना क
अनुमार ही होता है। छोटी या बडी. धार्मिक
या सासारिक, शारीरिक, मानसिक या याचिक
किमी भी प्रकार की क्रिया माधु करे या
गृहस्थ करे, कर्म आश्य होता है। लेकिन उसके
बन्धन का आधार परिणाम-अभिप्राय-के ऊपर
है । अगर हमारा इरादा पूरा नहीं है, तो हम
उस कर्म का पन्धन चैमा नहीं होगा जैमा
कि दुष्ट बुद्धि से इच्छाक कोई काम किया
जाता है। हाथ में खेलाते हुए मित्र का वधा
अकस्मात् हाथ मे छूट जाय, और गिरका
आप किन्तु पेलानमाला खूनी नहीं
इयरवाद
जाता। उनके ऊपर खून का आरोप नहीं
हो सकता । एक मनुष्य किसी को मारने के
लिये उसके पीछे दौडता है, माना कि वह
मनुष्य उसके हाथ न चढ सका, और उसे
चोट भी न पहुचा सका । फिर भी पुलिस
उमे गिरफतार करेगी और रसून के इरादे का
जुर्म लगाकर उस पर मामला चलायेगी । इसी
प्रकार किसी भी धार्मिक क्रिया में जैसा हमारा
परिणाम होगा, वैसी ही हमको फल की प्राप्ति
होगी। जैसे क्रिया में कर्म और परिणाम के अनु
सार बन्धन दिखलाया गया है, इसी प्रकार
किसी भी धर्मरिया में धर्म के फल की प्राप्ति
हमारे अभिप्राय के ऊपर आधार रखती है
आभिप्राय का मतलब है खयाल, विचार
किमी भी क्रिया को करते हुए, हमें खुप
विचार रखने की आवश्यकता है । हमें निरर्थक
बिना प्रपोजन स्वार्थान्ध होकर धर्म के निमित
भी किसी जीव को सताने का कोई हक नहीं
मूर्तिपूजा के मद है। अनावश्यक जितनी मी क्रियाएं की जायें, उनमें फायदे के बदले नुकमान ही है । धर्म के बदले अधर्म है । इसी लिये त्यागी साधुओं को भी अपनी प्रत्येक क्रिया में उपयोग-सपाल- विचार रखने को कहा गया है और अगर इसी उपयोग से क्रियाए की जाय तो उनको दोप नहीं लगे। श्रीदशवकालिक सूत्र में शिष्य गुरु से प्रश्न करता है - कह चरे कह चिट्टे ? कह मासे' कह सण ? कह भुजतो भासतो? पाव कम्म न यधइ । अर्थात् हे भगवन् ! मैं कैसे चलू ? कैसे पैठ ? कैसे सोऊ ? कैमे खडा होऊ ? कैमे साऊ ? और कैसे बोलू १ जिससे मुझे पाप न लगे ? क्योंकि ये कार्य अनिवार्य करने वो पढते ही हैं। गुरु इसका एक ही उपाय दिसलाते हुए कहते हैं। जय चरे, जय चिट्टे, जयमासे, जय सए जय भुजतो, भासतो पाव कम्म न
११८
ईश्वरवाद
अपात्-उपयोग अर्थात् अपने लिपे दूसरे
को बटन हो इसी भावनामे चलना, बैठना, सोना,
खाना, पोलना आदि क्रियाए हों, तो पाप नहीं हो
सकता। मतलब यह है कि-गृहस्थ या साधु सभी
को कुछ न कुछ ता क्रियाए करनी ही पडती हैं,
लकिन उन क्रियाओ में खूब ख्याल रख कर
विचार रखना । क्रियाएं हमेशा इसी प्रकार करना
चाहिये जिसमें अनावश्यकता का अनुभव न हो।
प्रमुपूजा में भी खूब उपयोग-विचार-रस कर पूजा
करने से अवश्य लाम होता है ।
प्रभुपूजा का एकान्त हेतु अन्तःकरण की
शुद्धि है । प्रभु की पूजा ऐहिक सुखों के
लिये नहीं, पारमाधिक सुखों के लिये होना
चाहिये । शुद्ध माग्नापूर्वक प्रभुपूजा करनेवाले के
अन्त करण की शुद्धि होती है। अन्तःकरण की
शुद्धि होना, यही धर्म है । द्रव्य पूजा के साथ
माव पूजा के लिये मन्दिर में प्रवेश करते हुए
आधि, व्याधि और उपाधि को भूल जाना चाहिये।
मूर्तिपूमा के भेद
प्रभु की प्रार्थना, उनका गुणगान, मानुपीमार से
की हुई साधना, सहे हए फाट, सकल शक्तियों
का चिंतन-यही माव पूजा में होना चाहिये ।
इसी प्रकार द्रव्य और भाव दोनों प्रकार से ईश्वर
की पूजा करना गृहस्थों के लिये परमावश्यक है।
हमारी ग्रंथमाला की पुस्तकें
.
"
.
.
.
"
.
नपर
नाम कर्वा या सपादक
२ धम षियोगमाला हिमांशुविजयजो .
३ प्रमाणमयस्वालोक
(प भोरामगोपालाचायनी की टोकायुक),११६
१९ मेनी सप्तपदार्थी
३७ धी पकवासग्रह
३९ श्रीवादण्यतया
४९ सस्कृत प्राचीन स्तयन सोच
विज्ञानविजयजी . ४
गुजराती अनुवादयुक्त सस्कत पुस्तको
८मयम्त प्रबन्ध हिमांशुविज्ञपक्षो .
२७ सुमापित पचरत्नाकर
मा १ विशालषिमयनी १ ९०
३० मई मबचन विद्याबिजयी ०६३
१ मुमापित पद्यरत्नाकर
विशालविजयजी १९
३४ मुमारित पद्यानाकर
३६ हेमच प्रवचनामृत
जयतषिजयी ०१०
૨૨૨ ५८ सुभाषित पद्यरानाकर विशालविक्षयजी ०१२ ६ . ० . CAM गुजराती पुस्तकें १ विजयधर्मति स्वर्गवास पछी विद्याविनयजी १ . ६ विनयधर्मरिना धमकुसुमो १० पायू (७५ चिचो साथे) जय तषिमयजो ३४ ११ विजयधर्मसूरि एक जीवनरेखा धीरजलाल टो शाह १२ श्रावकाचार विद्याविनयजी. ३ १३ शाणी सुलसा १७. ममयने ओळखा विद्याषिजयनी १८ भा २ २७ सम्यक्ष प्रदीप मगलविजयी १८ विनयधर्मसरि पूजा २१ ब्रह्मचर्य विदशन विजपघमरिजो विद्याविजयी २३ मराषि शोमन भने तेमनी कृति २४ प्राह्मणयाश . a . , . . ५ . २२ बलाबने .
१२२ . . . . . . २५ जैनतत्वज्ञान विनयधर्मसरिजी. २६ द्रष्यप्रदीप मगरविशयनी २८ धर्मापदेश विजयधर्मसरिती० ७६ २९ सप्तभगो प्रदीप मगलविनयभी ३२ धम्मदीप ५ ४० मी अजुर प्राचीन जैन प्लेस सदोह (माषु मा २) जय तयिनयी ३ १२ ३५ मी विद्याविजयजीता व्याख्याना विद्याचिजयजी ०१० ४६ यो हिमाशुधिनयमोना लेखा ५१ जैन धम (नयो आवृति) १ ५३ मारी सिम्धयात्रा ५५ अमारा गुरुदेव रा सुनील ५६ मरिया डॉ पुरुषोत्तम त्रिपाठी १ ५७ शखेश्वर महातीर्थ मा १-२ जयतधिमयजी ६८ मौरी पात्रा विद्याविजयजी ०१०० १० सवाचित सितिसार रतिकाल फुलवर शाह १ हिन्दी-सिन्धी और अग्रेनी पुस्तके ४माघकाचार विद्याधिनयजी ५ भी विजयधर्मरिक धनकुप विद्याधिजयनी ५ Saying of Vijay Dharma Sari Dr KIAUSG 0-5-1 ००० . . .
प्रकारी पूजा ९ बिजयधर्मसरि अष्ट विधाविज्ञपनी . ५ ** A. Ideat Hook A J Sodawala २० ब्रह्मपर्य दिन प्रीयिायधमरि . ५ मेर। मेवारयात्रा प्रीषिद्याषिनयनी. ४ ३५वका बना ७ । ३७ अहिंसा २ ४१ सधोरायर (सिम्यो) पापती सो परपानी भेट ४२ धीरपदन घोरमक ४३. अहिंसा (सिंधी) पापती पश्यामो भेट ४४ पुलन मुठ (सिपी) ४७मधम (दो) विवामियजी .. ५. नयो उपाति (सिन्धी) पाघमी मा पयानी भेट by Religious Socis1 Discourses Must Vidya Vijayil 1-0-0 ४९ioak and Monarca ६२वरवाद १ ६. मोर-ग्यापानमाळा ૨૨ ૮ अन्य पुस्तके १ पामसहमहण्णय (IFT महाकाय)प हरगोविदास शेठ ७५ . २ उत्तराध्ययनसूत्र (मिकमपनी मा २ दशका) स प्रोजयत्त विजयजी ३८ मा३ मा ४ DER " . . प . . ० . . . . ৫ অশ্বথগিয়নুগলি भाष्यसहितानि उमास्वाति ६ स्यावादारनाकर मा १ धादिदेवसूरि ६ ७ मा २ मा ३ ६ ६ १० भायू मा १ जमतविजयनी १ २५ जिमपाणी (गुमराती) सुशोल १ १२ धर्मदेशमा (गुजरात) विजयधर्मसरि १ १३ तत्वार्थसत्र मा १ (विधेचनयुक्त) सुखलालको १४ An Interpretation ot Jain Ethics Dr Krauge 0-4-0 १५ The Kaleldoscope of Indian Wisdom Dr Krause 0-4-0 P& The Heritage of Indtau Wisdom 0-4-0 १७ सोनेरी सासमा भदळ नशरधानजी खरात १८ प्रभुना पथे ११ सतसमागम श्री विजयधर्मपरि प्रथमाला, शिवपुरी (ग्वालियर)
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७२
ईशरवार
है। दिन के बाद रात और रात के पाद दिन
पनानेाला क्या कोई व्यक्ति है? अतुओं का
परिवर्तन क्या कोई व्यक्ति करता है ? गर्भ में
आया हुआ जीर धीरे धीरे बढ़ता है, कलेवर
पनता जाता है, क्या उसका शरीर कोई व्यक्ति
मिट्ट लगा कर रहाता जाता है ? नहीं, यह सब
स्वभाव चश ही होता रहता है। वस्तु मात्र अपने
अपने स्वभावानुमार क्रिया करती रहती है । इसके
लिये न तो ईश्वर की जरुरत है, न किमी अन्य
वस्तु की । गीता के पाच अध्याय में स्पष्ट ई
न कर्तृत्वन कर्माणि रोकस्प मृजति प्रभुः
न कर्मफलमयोग स्वभावस्तु प्रवर्तते ।
नादत्ते कस्यचित्पाप न य सुकृत प्रभुः।
अज्ञानेनावृत ज्ञान तेन मुह्यन्ति जन्तय ।
अर्थात् परमात्मा जगत को बनाता नहीं.
लोगों के कर्मों को उत्पन्न करता नहीं, कर्मों
पदायों का समाव फल का सयोग करता नहीं, किन्तु यह सब स्व- मात्र से ही होरहा है। किमी के पुण्य पाप के उत्तरदायी नहीं। अज्ञान से ज्ञान आवृत्त होने के कारण ससार के जीर भ्रममें पड़ जाते हैं अर्थात् ममार के समस्त पदार्थों का स्वभाव ही ऐसा है, जिसके कारण सम क्रियाएँ स्वय ही होती रहती । अग्नि का समान है उष्णता, पानी का स भाव है शीतलता, वायु का स्वभाव है गति- नीला, इसी प्रकार सभी पदावों में अपने अपने स्वमात्र विद्यमान हैं। मभी पदार्थ अपने अपने समावों के अनुमार क्रियाएँ करते रहते हैं। इसी लिये कहा गया है-"पत्थु सहापो धम्मो" अर्थात् वस्तु का स्वभाव ही उसका धर्म है ।
७१
शिवार
है। दिन क पाद गत और रात के बाद दिन
पनानाला क्या कोई व्यक्ति ! तुओं का
परिवर्तन क्या कोई व्यक्ति करता है। गर्म में
आपा हुआ जीप धीरे धीरे पढना है, कलगर
यनता जाना है, क्या उसरा शरीर कोई व्यक्ति
मिट्ट लगा कर पढाता नाता है ? नहीं, यह मप
स्वभाव का ही होता रहता है। वस्तु मात्र अपने
अपन समानुमार त्रिपा परती रहती है। इसके
लिपे न ता ईघर की जरूरत है, न स्मिी अन्य
वस्तु की । गीता के पाचर अध्याय में स्पष्ट ही
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न कर्तृत्व न फमाणि रोकस्य मृजति प्रमु।।
न कर्मफलमयोग स्थभायस्तु प्रवर्तते ।
नादत्त कस्पचिपाप न चैव सुकृत प्रभु ।
अज्ञानेनावृत ज्ञान सेन मुहान्ति जन्तय ।
अर्थात् परमात्मा जगत को पनाता नहीं,
लोगों के कर्मों को उत्पन्न करता नहीं, कर्मों के
पदार्थों का स्वभाव
क्ल का सयोग करता नहीं, किन्तु यह सब स्व.
माव से ही होरहा है। किमी के पुण्य पाप के
उत्तरदायी नहीं। अतान मे जान आवृत्त होने के
शरण समार के जीर भ्रममें पड़ जाते है अर्थात्
पसार के समस्त पदार्थों का स्वभाव ही ऐसा है,
इसके कारण सर क्रियाएँ स्वय ही होती रहती
हैं। अग्नि का स्वभाव है उष्णता, पानी का स्त्र
माव है शीतलता, वायु का समाप है गति-
सीलना, इसी प्रकार सभी पदार्थों में अपने अपने
स्वभाव विद्यमान हैं। मभी पदार्थ अपने अपने
सभावों के अनुसार क्रियाएँ करते रहते हैं।
इसी लिये कहा गया है-"वत्यु सहामो धम्मो"
अर्थात् वस्तु का समान ही उमस धर्म है।