Bharatiy Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Maha Pari Nirwan Sutra

Rahul · 2010/11

PDF Proofread

Front matter

प्रकाशक- अध्यक्ष, साहित्य-सस्थान राजस्थान विश्व विद्यापीठ, उदयपुर मुद्रक व्यवस्थापक विद्यापीठ प्रेस, उदयपुर ( ३३ ) ! - - . Pos यो भेद । गच्छ आनन्द | त वद- आवुस चुन्द । सम्मुखात मया बुद्धस्य सम्मुखाद् प्रतिगृहीतं- चुन्द । लाभाय ते पिंडपातो महाफलविपाकायेती।" अथ आनन्दो बुद्धस्याज्ञा उपादाय तत्रोपसक्रम्य चुन्दम् अवोचत्-"सम्मुखात् मया बुद्वस्य श्रुत मया प्रतिगृहीत बुद्धोऽवोचत, लाभाय चुन्दस्य पिडपातो महाफलविपाकाय । तत् किं निश्चित्य ? य च पिंडपात परिभुज्य बुद्धोऽनुतरा सम्यकसंबोधिं अभिसबुद्ध , य च परिभुज्य परिनिर्वाति, इमो द्वौ पिंडपाती समानृशसौ, अनयो न भेद चुन्दस्य भक्त भुक्त्वा हि तस्य गेहे मया अतम् । आवाधा स्पृवान् बुद्ध प्रवृद्धा मारणतिकाम् ॥४॥ १८॥ मुक्तस्य च शूकरमार्दवेन व्याधि प्रवृद्धा उदपादि शास्तु । विरेचन मानो भगवानवोचत् गच्छाम्यह कुशीनारानगरम् ।।४६।। १६ * अथ खलु भगवान् तदा उत्थाय आसनात् स्तो क च अग्रे गत्वा उपसत्र म्य एकस्मिन वृक्षमूले आनन्द अवोचत् । "पृष्ठ में आनन्द | आग्लायते, प्रज्ञापय निषीदनम् ।" "एव"- इति प्रत्युवाच आनन्द शिन च प्रज्ञापयामास निपीदन, तथागतो न्यपोदत् । आनन्दोऽपि अभिवाद्य बुद्धस्य पादो एकमन्त न्यपोहत । तस्मिन् समये पुल्कसौ मल्लपुत्रो' नाम आराडस्य धावक कुशी पावाय मार्ग प्रतिपन्नो भवति । अपश्यन् स बुद्ध अन्यतरस्मिन् वृक्षमले नि दृष्टवा च रोजो मल्ल शान्तेन्द्रिय अनुत्तर सवरचित महानाग इव सुपरिशुद्ध निर्मल सौमनस्यजातो वुद्ध समुपगम्य शिरसा बुद्वस्य पादौ अभिवाद्य एकर दत् अवाचच्च बुद्ध "आश्चर्य भगवन् शान्तेन प्रबजीता सुम्वविहारेन विहरन्ति । शटकसतानी पावतो गतानि नापश्यन् न चाचणेत् । एकदा भन्ते । अन्तरा च कुशीनगर अन्तराच पावा उभयोर्नगरयो मार्गे वृक्षमूले १ क यह दोनो गाथाये पाली मे भी थोडे से भेद से मौजूद पाली में पुककस मल्लपुत्त नाम है ।

महा परिनिर्वाण सूत्र . - ( राहुल साकृत्यायन ) [ मार त के प्रसिद्ध और अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान महा पण्डित राहुल सांकृत्यायन ने प्रस्तुत पुस्तक 'महा परि निर्वाण सूत्र' एक साल पूर्व 'शोध- पत्रिका में प्रकाशनार्थ भेजी थी, परतु उस समय इसका प्रकाशन नहीं किया जा सका और इसके साथ वाली दूसरी पुस्तक महावदान सूत्र प्रथम' का प्रकाशन कर दिया गया था। 'महा परिनिर्वाण सूत्र' और 'महावदान सूत्र प्रथम' को श्री राहुलजी ने चीनी मापा से प्राप्त किया है। हजारों वर्षों पूर्व जिन ग्रन्थों की की रचना हमारे इस देश में की थी, काल के प्रवाह में अधिकांश खो गई और अाज हमें हमारे ही मन्यों को फिर से प्राप्त करने के लिये देश विदेशों की खाक छाननी पड़ती है। महा पण्डित राहुलजी ने इस क्षेत्र में देश और साहित्य की अनुपम सेवा को है। चीनी भाषा से प्राप्त कर सस्कृत में इसका फिर से अनुवाद किया है। इसी प्रकार से अगर शोध-खोज की नाय और हमारी दृष्टि व्यापक रूप से फैल जाय तो जिस प्रकार चीनी से यह पुस्तक खोजी गई है, उसी प्रकार मिश्र, यूनान धादि एशियायी देशों के अतिरिक्त योरोपीय देशों में मी हमारी प्राचीन साहित्यिक निधि प्राप्त हो सकती है। A प्रस्तु पुस्तक का 'शोध-पत्रिका' में तो प्रकाशन किया ही जारहा है परन्तु इसकी अलग से पुस्तक के रूप में मी कुछ प्रतियाँ निकाली जारही है। महा- पण्डित श्री राहुलजी इसके लिये अमिनदनीय है। -~-सम्पादक] भारत की विशाल साहित्यिक निधिका एक काफी महत्वपूर्ण भाग मूल से लुप्त होकर अब चीनों और तिब्बती भाषा के अनुवादों में ही सुरतित है ( २३ ) " सक, दु खेषु न दुर्मना, सुखेषु न सुमना , सहते सर्वं पृथिवीमिव । तस्मादुच्यते श्रमण इति ।" कुमारोऽवदत्-"साधु, अय मार्ग सत्य विषयेषु सम्यग् भयदर्शक, उत्तम प्रणीत परिशुद्धोऽकर्कश, अत्रास्ति आनन्द । अथासौ आज्ञापयत् सारथि -"उपनय रथ तस्योपकठम् । " तदा कुमार श्रमण अपृच्छत्-"अवहार्य श्मश्रकेशं, चीवरवसान आदाय पात्र के प्रार्थयसे?" " श्रमण प्रत्युवाच-“य प्रत्रजति गेहात् स इच्छति दमयितु चित्त चैतसिक, सदा विरत विषयरागात्, सर्वेषु सत्त्वेषु करुणाय मानोऽविहिंसमान , यन्नचित्त' शात एव मार्गे भवति सावधान !" कुमार उवाच-"साधु, अय परम सत्त्यमार्ग, अथाज्ञापयत् सारथिं त्वरित (कुमार ) -आदाय ये महाघ वस्त्रं रथ च प्रतिनीयाहि महाराजस्य (पार्वे) । अहं इदानी अवहार्य श्मश्रुकेश, परिवास्य त्रिचीवर प्रव्रज्य अगाराद अनुयु जे (च) मार्गम् । तत् किवि श्रित्य ? इच्छामि दमयितु चित्तं चेतसिक परिहरामि दूरत विपय रजम् । परिशुद्धेन आत्मना वसत् पर्येध्ये मार्गविद्याम् ।" तदा सारथि शीग्रमगच्छत् पितु राज्ञ (समीपे ) प्रत्यावर्त्तयितु कुमारस्य आरोहरणथं वस्त्र च । तत पश्चात् कुमारोऽवहार्य श्मश्रुकेश परिवास्य त्रिचीवर प्राबजत् अगारात्, अन्वयुजत मार्गम् । 'बुद्ध उवाच- सचेत् भिनव ? कुमारो दृष्ट्वा जीणं व्याधित पुरुपं, अज्ञा- सीद् ' (अस्ति) लोके दुख', दृष्ट्वा च मृतं पुरुप, (तस्य ) लोके चिनराग प्रश्रब्ध , दृष्ट्वा च श्रमण सर्वशो महाजागृतोऽवातरत् रथात् । तस्मिन् काले पदे पदे तत्र सुखाभिभूत दुर ( अक्षिपद ) वधन, इइमस्ति सत्त्य गृहात् प्रव्रज्या, अस्ति सत्य निष्कमण । प्रशृण्वन् देशे मनुष्या-"कुमारोऽवहार्य श्मश्रुकेश धर्म (पर) श्रादाद्य श्रादाय पात्र अगारात् प्रत्रजितोऽनुयुक्तो मार्गम् "सर्वेऽन्यमन्य अवान्-" प्रद्धा ( २ ) के रूप सांस्कृतिक इतिहास तथा विचारधारा को समझने के लिये यह जोड़नेवाली कड़ियाँ हैं। एक समय सैकड़ों वर्प लगाकर भारतीयों और उनके चीनी या तिव्वती सहायकों ने लग कर-इस विशाल साहित्य को अनुवाद मे तैयार किया। समय जल्दी ही आयेगा, जव कि हमे अपनी इस साहित्य-निवि को फिरसे अनुवाद करके अपनी भारती भाषा में लाना होगा । चीनी भाषा मे भारतीय साहित्य का अनुवाद-कार्य ईसा की प्रथम शताब्दी मे क्या-ये मो-यडू ( काश्यपमात) के द्वारा आरम्भ हुआ और काश्यप ६७ ई० मे भारत से चीन पहुंचे थे। उस समय से जो अनुवादो का कार्य आरम्भ हुआ, वह १३ वीं शतान्दी के अन्त ( मगोल सम्राट कुवि ले रगनके समय ) तक चलता रहा । ६७-१३०० ई० तक जिन ग्रन्थो का अनुवाद हुआ था, उनमें से बहुत-से अत्र प्राप्य नहीं है, लेकिन अब भी साढे चौदह सौ ग्रन्थ मौजूद हैं, जिनको बत्तीस अक्षर के श्लोकों मे गिनने पर उनकी सख्या साढे तैतीस लाख श्लोक या तीस-बत्तीस महाभारत के बराबर है । इन ग्रन्थो को सूत्र, विनय और अभिधर्म- पिटक के तीन भागों में विभक्त किया गया है, यापि पिटक के भीतर "बुद्वचरित" जैसे कान्यों को भी शामिल कर लिया गया है। तीनो पिटको के ग्रन्य महायान और हीनयान व भेद के अनुसार निम्न मर या योर परिमाण मे है- . । -- -- ( २५ ) पहायतनप्रत्ययात् स्पर्शः, स्पर्शप्रत्ययात् वेदना, वेदनाप्रत्ययात् तृष्णा, तृष्णाप्रत्ययाद उपादानं, उपादनप्रत्ययाद भवः, भवप्रत्ययाद् जातिः, जातिप्रत्ययाद् बराव्याधि-मरणशोक-परिदेव दुःख दौर्मनस्यम्, इद केवलं दु खस्कन्ध., जातिप्र- त्ययाच्च भव-अयमस्ति दुखस्य समुदय । दुखस्कंधसमुदये समाधीयमाने बोधिसत्त्वस्य उद्पादि ज्ञानं, उद्पादि (तु, उद्पादि विद्या, उद्पादि आलोक , उद्पादि ऋद्धि उदपादि साक्षात्कारः। तस्मिन् काले बोधिसत्त्व पुनरात्मनि समाधात्, यो निशोऽचिन्तयत् कस्य अमावे न जरामरणं, कस्य निरोधाद जरामरणनिरोध ? तत प्रज्ञयाऽभिसमायात जातेर- मावे न जरामरण, जातिनिषेधाद् जरामरणनिरोध , भवस्याभावे न जाति , भवनिरोधाद् जातिनिरोध , उपादानस्याभावे न भव , उपादाननिरोधाद् भवनिरोध , तृष्णाया अमावे न उपादान, तृष्णानिरोधाद उपादाननिरोध । वेदनाया अभावे तृष्णा, वेदना निरोधात् तृष्णानिरोध । स्पर्शस्य अभावे न वेदना, स्पर्शनिरोधाद् वेदनानिरोध' । षडायतनस्याभावे न स्पर्श, षडायतननिरोधात् स्पर्शनिरोध । नामरुपस्याभावे न षडायतनं, नामरुपनिरोधात् षडायतननिरोधः । विज्ञानस्याभावे न नामरुप, विज्ञाननिरोधात् नामरुपनिरोधः। सस्कारस्याभावे न विज्ञानं, संस्कार- निरोधाद् विज्ञाननिरोध । अविद्याया अभावे न संस्कार, अविद्यानिरोधात् सस्कारनिरोध । अय अस्ति अविद्यानिरोधात् सस्कारनिरोधः, संस्कार निरोधाद विज्ञाननिरोध ,विज्ञाननिरोधात् नामरुपनिरोध', नामरुपनिरोधात् बडायतन निरोध, पढायतननिरोधात् स्पर्शनिरोध', स्पर्शनिरोधाद वेदनानिरोध, तृष्णानिरोध ,तृष्णानिरोधाद उपादाननिरोधः,उपादाननिरोधाद भवनिरोध ,भवनि- रोधाट जातिनिरोध , जातिनिरोधाद जरामरणशोकपरिदेवदु स दौर्मनस्यनिरोध'। बोधिसत्त्व' समाधात्। दुख स्कन्धनिरोधकाले उद्पादि ज्ञान, उद्पादि चनु, उद्पादि विद्या, उपादि आलोक , उदपादि ऋद्धि , उदपादि प्रज्ञा, उदपादि साक्षात्कार । तस्मिन् काले बोधिसत्त्तः प्रतिलोमक्रमण अभिसमायात्, द्वादश हेतुप्रत्य- यान् यथाभूत अज्ञासीत् यथाभूत ज्ञात्वा तत्रैव तस्मिन् श्रासने (तेस्य ) प्रभूत् अनुत्तर सम्यक् सवुद्ध' ।'

। २ ) ५४५ में सूत्रों का क्रम भी एक-सा नहीं है, और न पाठ ही एक-सा है, तो भी यह मालूम होता है, कि पालि दीघनिकाय और सस्कृत दीर्घागम एक ही स्रोत से निकले हैं। शायद पालि-स्रोत अपेक्षाकृत अधिक पुराना या महायान से पहले अठारह वौद्ध सम्प्रदाय ( निकाय ) भारत में प्रचलित थे, जिसमें एक निकाय की एक शाखा धर्म- गुप्तिक भी थी। सम्भवत बुद्धयश ने उसी के दीर्घागम का यहा अनुवाद किया । बुद्धयश कावुल (कुभा) के भिक्षु विद्वान् थे, उस समय काबुल सास्कृतिक और धार्मिक तौर से भारत का अभिन्न अंग था। बुद्धयश जन्म ३३८ ई० मे हुआ था, ४०० ई० के आस पास वह चीन मे जा ४००-४१३ ई० के बीच राजधानी छाड -आन् मे रह कर उन्होंने निम्न चार अन्थों का सस्कृत से चीनी में अनुवाद किया- १. आकाशगर्भ बोधिसत्व सूत्र सन० ननजियो सूचीपत्र संख्या ६८ २. दीर्घागम ३ धर्मगुप्त-विनय १११७ ४ धर्मगुप्त-प्रातिमोक्ष बुद्धयश द्वारा अनुवादित दीर्घागम प्राय तेरह हजार श्लोकों के बराबर है। उसीका दूसरा सूत्र यह "महापरिनिर्वाण-सूत्र" है। इस सूत्र के एक से अधिक अनुवाद हुये थे। यह महा परिणिर्वाण सूत्र जहाँ हीनयान त्रिपिटक के दीर्घागम या दीघनिकाय का एक सूत्र है, वहाँ महायान का अपना अलग और बहुत विशाल महापरिनिर्वाण सून भी मौजूद है। आज जिस सम्प्रदाय ( निकाय ) का एक समय भारत में बहुत प्रचार था, उसका नाम और पिटक दोनों ही विस्मृत हो चुके हैं। लेकिन सौभाग्य से चीनी अनुवाद में विस्मृत हीनयान "मध्यमागम" (५४२), "एकोत्तरागम" (५४७), "सयुक्तागम" (५४४) और "दीर्घागम" ( ५४५) चीनी अनुवाद में मौजूद है। इनके अतिरिक्त विनय पिटक और त्रिपिटक के वृहत्भाष्य (विभापायें ) भी मौजूद हैं, इन प्रथों से हमारे मास्कृतिक इतिहास पर बहुत प्रकाश पडता है, इसे कहने की आवश्यकता नहीं । बुद्धयश ने उस समय चीन में जाकर हमारे इस महान् सास्कृतिक काम को किया, जब कि भारत मे गुम-घश के सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का शासन था और जिस समय कालिदास और दिग्नाग जैसी प्रतिभायें भारत में अपना " ( ४ ) चमत्कार दिखला रही थीं । इन्हीं के समय फाहियान भारत की यात्रा के लिये आया। दीर्वागम के दो-तीन सूत्रों का अनुवाद आज से बीस वर्ष पहले मैंने किया था। उस समय चीन-भापा और साहित्य की ओर बढ़ने का मेरा ख्याल था। मेरा ज्ञान उस समय पाँच सौ अक्षरों (शब्द-सकेतों) से अधिक नहीं था, लेकिन उसी समय लका में चीनी विद्वान् वाड्-मो-लम् मेरे साथ रहते थे हम दोनों आपस में विद्या-विनिमय करते थे। उन्हें बड़ी प्रसन्नता होती, यदि हमारे स्वयुक्त परिश्रम का फल यह “महापरिणिर्वाण सूत्र" को उन्होंने प्रकाशित देखा होता । थोडे ही दिनों बाद क्षयरोग से घुल-घुल कर मरने की जगह उन्होंने लका के समुद्र मे डूब कर अपना प्राण दे दिया। आज उनकै अकृतिम स्वभाव, सौहार्द, विद्या प्रेम और साथ ही जल्दी ही गरम होकर ठडा हो जाना-एक-एक बात की स्मृति दिल में टीस पैदा करती है। चाहे देर से ही हो इस चीनी से हुये सस्कृत के पुनरनुवादका छपना दूसरों को उस कर्त्तव्य की ओर प्रेरणा देगा, जा कि चीनी और तिब्बती भाषा से अपनी विद्या निधियों को भारतीय वेप में लाने का हमारे सामने है। -राहुल साकृत्यायन महापरिनिर्वाण सूत्रम् एव मया श्रुत-एकस्मिन् समये भगवान् राजगृहे विहरति गृकृटपर्वते माई सार्धद्वादश शत-भिक्षुण महासपेन । तेन (ख) समयन राना भाग जानन नवी गित Tो नि ।

( ५ ) उपादाय च राज्ञ आज्ञा वर्षकारो महामात्य अभिरुह्य भद्र यानं (रत्नशकट) निरगात् गृध्रकूट पर्वतम् । उपसंक्रम्य तत् स्थान यानात् प्रत्यवरूह्य पदातिक एव यत्र भगवान् तत्र उपसकान्त पृष्टवा च अल्पावाधां.. एक अन्त न्यपीदत् । निपएणश्च स भगवन्त अवोचत् "राजा मागधोऽजातशत्रु यदते भगवत. (बुद्धस्य ) पादौ, अल्पावाधां बलं प्रांशु विहारं पृच्छति सगौरवं सामिलापम् । वदति च "भन्ते । महाधिका महावला महानुभावाश्च वृज्जयः मा नानुवर्ततन्ते । अहं अभियातुकामइमान् कथं च भगवान् अनुमन्यते ॥ तस्मिन् काले आनन्दोऽपि भगवत पृष्टतः स्थितो भवति व्यजनमादाय भगवन्त व्यजमान' । भगवान् आमंत्रयामास- किमिति ते आनन्द । श्रुतं वृज्जय.' अभीक्ष्णं सनिपतन्ति, सन्निपत्य च मिथ सम्पादयति कृत्यम् ? श्रुत एतद् ( भन्ते )-प्रत्यवोचद् आनन्द । पुनरपि अयोचद् बुद्ध' "यावदेव एतद् वृद्विरेख वृज्जीनां नो परिहाणि , तान्चिर सुरक्षितोऽसौ जनपद न शक्यो ऽभियातु पराजयाय । (२) किमिति त आनन्द । श्रत वृजजय न कुर्वते महल्लोकेभ्यो दहरेभ्यश्च भयम् । "श्रुतं एतद्-प्रत्यवोचद् आनन्द' । यावदेव आनन्द महल्लका दहरा च समगाः वृद्धिरेव वृजीनां नो परिहाणि. तापच्चिर सुरतितोऽसौ जनपदः न शक्य अभियातु पराजयाय । (३) किमिति आनन्द । श्रुतज्जय' अप्रज्ञप्त धर्म न प्रज्ञापयन्ति प्रज्ञप्त च न समुच्छिन्दन्ति ?" "श्रुत एतद्"-प्रत्यवोचद् मानन्द यावद् एच एतद् आनन्द ..भूयोऽपि वृद्धिरेव वृज्जीनां न परिहारिण , तावच्चिर सुरक्षितोऽसौ देश न शक्य अभियातु पराजयाय । ( ४ ) किमिति त श्रानन्द । श्रुत वृज्जय उपचरन्ति मातापितरौ सत्यकुर्वन्ति मानयन्ति, अनुसरन्ति च आचार्यान् महल्लकान् ?" - १ पालि त्रिपिटका के "दीघनिकाय" का यह सोलहवा सूर है।

( ६ ) "तं एतद्"-प्रत्यवोचद् आनन्द । (५) किमिति त आनन्द | श्रुत वृज्जय सत्कुर्वन्ति मानयति चैत्यानि ( देवालयान् ) देवान् ?" (६) किमिति तं आनन्द । श्रुत, जय यास्ता कुलस्त्रिय परिशुद्धा अमला , ताभि यावत् क्रीडायामपि न प्रहसन्ति मुधा वदन्ति ? (७) किमिति त आनन्द | श्रु त वृजय उपतिष्ठन्त श्रमणान् मानयन्ति, धाश्च रक्षा वरण गुप्ति सविद वति, न कदापि पीडयन्ति ?" अथ वर्पकारो महामात्य वुद्ध अवोचत् "चेद एकैकेनापि एतेषा वर्माणा समन्वागतान् जनान्, न शक्य अभियातु , किं पुन सप्तभि धर्म" अयाचत स अवकाश प्रक्रमाय । बुद्धोऽवाचत्-साधु, यस्य त्व काल मन्यसे । अथ ( खलु ) वर्पकार उत्थाय आसनाद् बुद्वस्य त्रि प्रदक्षिणा कृत्वा वदित्वा च प्रकान्त अचिरप्रकान्ते च तस्मिन् वुद्ध आनन्द आमत्रयामास-"गच्छ व आनन्द । यावत भिक्षव राजगृह उपनिमित्य विहरति, तान् सर्वान् , उपस्थानशालाया (धर्मशालाया) सन्निपातय । एव (भन्ते )-प्रत्यवोचद् आनन्द । अब स गत्वा राजगृह सगृह्य तान् सर्वान् भितुन उपस्थानशालाया मन्निपातया- मास, 'प्रयोचत च भगवन्न-सन्निपतितो भन्ते । भिनुमघ , यम्य भगवान काल मन्यते श्रय भगवान उन्याय सनाद् गत्वा उपस्थानशालाया प्रज्ञात अामने न्यपीटत् तान भित्त श्च श्रामत्रपामाम । समरो भिनय । अपरिहारियान वर्मान देक्ष्यामि। स, मासु, सुचिन्नत भगवना, एतन्येव वान पति ने भिना प्रत्य गणपन । भगवान एनट अवाचत-तेन मत माग्नमि इम्त । द्ध पाचन त'न भिन्न-पसदमे अपरिहा गया पना -(१) प्रथम उच्यते पनि मनिसान ,मनमा, मनमो मध्यान्न पारत मटलका हाच मम्मोद सन', न २ वर्ष पद () टिन य उच्ने रहरामा ( ७ ) - महल्लकानां च परस्परं सम्मोदन, सम्माननं अनुगमनं नाननुगमनम् । यावत् च दहरा महल्लका च परस्परं सम्मोदमाना , न अय धर्म शल्यः परिहापयितुम् । (३) तृतीय उच्यते--आचरणं प्रज्ञप्तस्य धर्मस्य न तु अप्रज्ञप्तस्य । यावत् दहराश्च महल्लेका च परस्परं सम्मोदमाना , न अयं धर्म शक्य परिहापयितुम् । (४) चतुर्थ उच्यते-ये ते भवन्ति भिक्षव प्रतिवला' सघपितर' प्राज्ञा तान् सर्वे मानयन्ति अनुवर्त्तन्ते । यावत् । (२) पचम उच्यते-सवरचित्तचैतसिकाना गौरवं माननं परमम् यावत् ० । (६) पष्ठ. अपरिहाणोय. धर्म उच्यते-परिशुद्ध आचरण ब्रह्मचर्य काम-राग-लोभाना- मननुवर्तनम् । यावत् ०। (७)सप्तम उच्यते-प्रथम अन्ये पश्चात् अह, जातरूंपरजतेपु (रूप्यके) अलोभ । यावत् । बुद्ध अवोचत तान् भिजून-पुनश्चापरे ऽपि भवन्ति सप्त अपरिहाणीया. धर्मा - (१) प्रथम -अणुमात्रेषु वस्तुपु, न सौमनस्य नानाभाव , तावद्वृद्धि. एव अस्य धर्मस्य नो परिहाणि । (२) द्वितीय -~यत् तस्य सौमनस्य तूप्णीमावेन संप्रलापाएम' । (३) तृतीय. यदसौ ने भवति निद्रा राम. न च कुसीती। (४) चतुर्थ. यद सौ न भवति भेदक. निरर्थक (वस्तु) प्रलपन् । (५) पंचम -यदसौ मुधा (व्यर्थ) न श्लाघते आत्मानम् । (६)षष्ठः यदसौ न भवति पापसहाय । (७) सप्तम.- यदसौ विहरति पर्वत वन प्रस्थेपु एकाकी। एवं भिक्षव' । वृद्धि भवति धर्मस्य, न परिहाणि । पुनश्च अवोचत् भगवन्-ि"भिक्षयः । अपरे च भवन्ति सप्त इमे धर्मा., ये वृद्धि धर्मस्य नो परिहाणि । कतमे सप्त ? (१) प्रथम -यद सौ श्राद्ध भवति, श्रद्दधाति तथागतस्य परम सत्यै परमा ..परिपूर्णा बोधि । (२) द्वितीय -यदसौ हीमान् भवति, जानाति आत्ममिथ्यात्वम् । (३) तृतीय -यदसौ अपनपी भवति अपत्रपति पापकर्मण । (४) चतुर्थ-यदसौ बहुश्रुत लभते आचरितु उच्चावाच कुशल सा गभीरं प्रणीत परिशुद्ध विमल परिपूर्ण ब्रह्मचर्यम् । (५) पंचम -यदसौ प्रारब्ध वीर्यो भवति प्रधाने, अकुशल विहाय कुशले वीर्य प्रारमते, न तत् परिज- हाति। (६) पष्ठ ---यदसौ स्मृतिं भावयति न च विस्मरति पूर्व (शिक्षितं) शिक्षा- पदम् । ( ७ ) सप्तम –यटसौ विद्या भावयति जानाति च उत्साद-निरोधं धर्माणा, अनुगच्छति आर्यमूलं सर्वेपा दुःखकारणाना अन्तकरम् । यावद् इमे सप्न धर्मा , वद्धि एव तावत् न परिहारिणः।"

( ८ ) घम - पुनश्च अवोचत् बुद्ध -"भिक्षव । अपरेच भवन्ति सप्त धर्मा , ये वृद्धिरेव भवति विरूढि नो परिहाणि । कतमे सप्त? (१) प्रथम -बुद्ध बहुमानम् । (२) द्वितीय - धर्मे बहुमानम् ( ३) तृतीय - सघे० । (४) चतुर्थ - शीले० । (५) पचम समाधौ० । (६) पष्ठ -मातापित्रो सबहुमान अनुवर्त्तनम् (७) सप्तम अप्रमादे बहुमानम् एवं इमे सप्तधर्मा , यै वृद्धि एव भवति धर्मस्य नौ परिहाणि ।" पुनश्च अवोचद् बुद्ध -"भिक्षव । अपरे च भवन्ति सप्त धर्मा यै वृद्धिरे धर्मस्य नो परिहाणि ? ( १ ) प्रथम -भावयति कायेऽशुचिम् । (२) द्वितीय भावयति भोजनेऽशुचिम् । ( ३)तृतीय -न अस्य सौमनस्य लोके । (४) चतुर्थ नित्य अनुस्मरति मृत्युसज्ञाम् । (५) पचम उत्पादयति अनित्यसज्ञाम् । (६) पष्ठ -अनित्ये दुख-सज्ञाम, (७) सप्तम -दुःखेच अनातयासज्ञाम् । इमे ते सप्त धर्मा ।" - - अवोचद् बुद्ध -"भिनव । अपरेच भवन्ति सात धर्मा 101 (१) प्रथम - सबोध्य ग भावयति प्रविविक्ते, काम-राग-लोभेपु अनलिप्त असस्कृत स्वभाव । (२) द्वितीय -धर्म-विचय सबोध्य ग भावयति । ( ३) तृतीय -चोर्यसबोध्य ग० (४) चतुर्थ-प्रीतिसबोंध्यग 10 (५) पचम -प्रथदिवसवोध्यग०। (६) पप्ठ - समाधिसम्बोध्यग । (७) सप्तम उपेक्षा ( आरक्षा ) सबो ध्यग भावयति । इमै ते सप्त धर्मा 10" अबोचद बुद्ध "भिक्षव । भवन्ति पट् अपिरहाणीया धर्मा कतमे पट ? (१) प्रथम भितयो मैत्र रायकर्म समुपस्थापयन्ति, न भेद उपस्थापयन्ति सघे । (२) द्वितीय –मेत्र वाम प्रत्युपस्थापयन्ति न च पम्प वन्ति । ( ३ ) तृतीय -मैत्र मनस्कर्म, न व्यापाचिन उपम्यापयनि।। (४) चतुर्थ --ये ते लाभा परिशुद्वा भोनागा न तेपा मोऽ-प्रतिविमनाना भोगिनो भवन्ति । (५) पचम यानि तानि । 'नानि विटानि अन्द्रिा अशरलगन जामपाणि नुनियागि तानि भावयन, या मा टि पा निया गाया मम्या दपनयाय ना च । पट धर्मा 11 रट-निन्, ' अरे च भवन्ति पट अपरिहाणीया वर्मा, मे १.९ ट ( भपति नो परल । (१) प्रथम --वृद अमरनि । (:":- , - | 777 . 17. । ।

(६) - " पचम --~-दान । (६) पष्ठ -देवान् अनुस्मरति । इमा पड् अनुस्मृती भावयति । ० । एमि पड्भि धर्मे समन्वागातस्य वृद्धि भवति नो परिहाणि । अथ भगवान राजगृह यथा भिरक्त विहत्य आनन्द आमत्रयामास-"सशामय पात्रश्चीवर आयाम आनन्द पाटलिपुत्र नगरम् एव ( भन्ते)-प्रत्युवाच । अथ भगवान् निवास्य पात्रश्चीवर श्रादाय सार्द्ध महता भिनु मधेन प्रकान्त मगधेषु अनुपूर्वेण पाटलि ग्राम अवसृत्य पाटलि वृक्ष मूले न्यपीदत् अशृण्वन् (खलु ) उपासका -बुद्भ' (किल ) महता सधेन दूरात् पाटलि ग्राम अनु प्राप्त पाटलि वृक्षस्य मूले निपएण । अथ (खलु ) त प्रामात् निष्क्रम्य दूरत अपश्यन् भगवन्त पाटलि वृक्ष मूले स्थित भासमान अनुतम शान्तेन्द्रिय सुसयत अग्य महानागोपम परिशुद्ध विगत रजोमल यथा जल द्वात्रिंशल्लक्षणा शीति व्यजनै समलकृत कायम् । दृष्ट्वा च सौ मनस्यजाता ते यत्र बुद्ध स्थित तत्र गत्या शिरसा पादौ अभिवाद्य एक न्यपीदन् । अथ खलु भगवान् श्रानु पूर्वेण धर्म अदिशत तेभ्य लाभ प्रदर्शयन् श्रुत्वाच चुद्व भापित धर्म ते उपासका बुद्ध अवोचन्- 'इच्छामो भन्ते । गन्तु शरण वुद्धस्य धर्मस्य आर्य सघस्य च, अनु नानातु भगवान् अनुकप उपादाय । उपासका वय अद्यतोऽये प्राणाति पाताद् विरता अदत्ता- दानाद् विरता कामेषु मिथयाचाराद् विरता सुरापानाद् विरता शील आचरन्त न तद् विस्मरिष्याम । अधिवासयतु नो भगवान् सार्द्ध महता भिक्षु सघेन भक्त-दान अवलोकयतु च अनुकप उपादाय ।" अध्यवासीत् च भगवान् तूष्णी मावेन । अथ ( खलु ) त उपासका उत्थाय आसनाद् बुद्ध अभिवाद्य त्रि प्रदक्षिण कृत्वा चागमन् । तथा गताय आवसयागार ममार्ण्य श्रासनानि प्रज्ञाप्य उदक संस्थाप्य, प्रज्चात्य गध-प्रदीप आस्तीर्य भद्रामन (रत्नासन ) दान सविधाय भगवन्त उपसंक्रम्य ऊचु- "निष्ठित (सस्तृत) भन्ते । दानं (आवसथागारं) यस्य इदानी भगवान विरता मृपावादाद् काल मन्यते" ( १० ) अथ ( खलु ) भगवान् उत्थाय आसनाद्. विवास्य पात्रचीवर आदाय साध महा सधेन आवसथ उपसकान्त पादौ प्रक्षाल्य परिमार्य हस्वौ आसवे न्गपीदन् । भिक्षत्राऽपि वाम पार्वे न्यपीदन, उपासकाश्च दक्षिण पार्श्वे न्यपीदन् । अथ भगवान् तान् उपासकान् आमत्रयामास पच इमे गृहपतय । आदिवो दु शीलम्य शीलविपत्ते । कतमे पच १ (१) प्रथम -लुब्ध चितस्य तृष्णा न परिपूर्यते। द्वितीय - लच्च भोग प्रतिदिन निगच्छति ।" ( ३ ) तृतीय -यामेव परिषद गन्छति न मानितो भवति ( ४ ) चतुर्थ - लोके तस्य पापफ कीर्ति शब्द अ युद्गन्चति ( ५ ) पचम -कायस्य भेदात् परम्म- रणान निरये उपपद्यते । पुनश्च अवोचद् भगवान तान् उपामकान- "पंच इम गृहपनय । आनृशमा शील पत शील सपभे । कतत्ते नाम पच ? (१) प्रथम -यथा काम लाभी भवति भोगस्य ( कामस्य ) ( २ ) द्वितीय -वृद्वि- रेव भवति भागस्य नो परिहाणि । ( 3 ) तृतीय -यामेव मनुष्य परिपद गछति, मानिता भाति मनाप । ( ४ ) चतुथ-लोक नम्य कल्याण कीर्ति शब्द अयुद्- गति ( ५ ) पचम --कायायभेदान् परम्मरणान स्वर्ग लोके उपपयते " अब भगवान निति अवरात्रे उपासकान अयोचत-यूय अपि प्रति गन्दत । अब त पापा प्राय युद्धम्य अनुनात्रि पर्दाक्षगण कृत्वापाटी अभिवाय - प्रसन्ना श्रय (ग्दन ) भगवान प्रति सक्दयने स्थित रात्रे पश्चिमे यामे प्रत्यूप ममये रियन वनपा शिदन प्रपश्यन मरला देवता वान्न परिगृहणात महशारया दना मना रन' नंदा दवा चम्न परिगृहगानि । “3 ) 17 नपान शाला पमत्रभ्य प्रनतं जामन न्यपीटत। F- - , " = त्रि- - १) मनन्ट । पष्ट मा नगरमाश्यति ।" यानम् सत्र सतत । P17 र ना मारत ना 4 1 ( ११ ) -- -- . बुद्ध उवाच-"मापन आनन्द यथा अस्य नगरस्य देवे साधे समय भवति श्रह आनन्द । पश्चिमाया रात्रौ प्रत्यूष समये उत्थाय प्रविमल्लयनान दिव्येन चनुपा अपश्य सबहुला देवता वास्तूनि परिगृहणन्ती-महेशाख्या मध्यमा नीचा च परिगृह्णन्ती । यस्मिन् आनन्द । प्रदेशे महेशाख्या देवता वास्तूनि परिगृहणन्ति तत्र राना निवेशनानि सुख समृद्घाचि भविष्यति, यत्र मध्यमा देवता वास्तूनि पर- गृहणन्ति तत्र मध्यमाचा मनुष्याणा निवेशनानि, यत्र नीचा देवता वास्तूनि परि- गृहणन्ति, तत्र नीचाना मनुष्याणा निवेशवानि भविष्यन्ति । वहु अल्प वा पुण्य प्रत्येक अनु गच्छति । इद आनन्द | पाटलिपुत्र भविष्यति आर्य आयतन मनुष्यावास वणिक- पथ , देश धर्मस्य सत्यस्य आर्जवस्य च । इह अप वगर सर्वतोऽविनाश्य भविष्यति । अस्य (बलु) आनन्द । त्रय अन्तराया भविष्यन्ति । प्रथम-महद् उदकम जलौघ द्वितीय-महाग्नि । तृतीय-अन्तर्-वहिर्धामिय गनुष्याणा भट ! तदेव विनश्यति इद नगरम्। अथ ( खलु ) पाटनि पुत्रका उपासका तस्या रात्रौ दान ( भोजन ) प्रतिपाय बुद्ध उपसंक्रम्य अवोचन् "निष्ठित भन्ते भक्त , यस्य इदानीं भगवान काल मन्यते ।" अथ (खलु ) पाटलि पुत्रका उपासका स्त्र हस्तत खादनीयन परिवारयामासु सतर्पयामासु । निष्ठित भवते जल प्राचार्य अन्यतम नीचं पास गृहीत्वा बुद्धस्य पुरत न्यपीदन् । अथ भगवान् तान आमत्रयामास - १ यस्मिन् प्रदेशे कल्पते वास पडित जाविक । शीलवतो भोलयन्ति सयतान् ब्रह्मचर्यक ।। यावत्र देवत्ता आसन् कुशना तुष्टिमानसा । ता पूजिता पूजयन्ति मानयति च मानिता दानेन मैत्रयाच सानुक पचित्ता देवता स्तुता , सदा भवन्ति कुशलेन सम. न्वागता नोऽकुशलेन । अथ भगवान् आदिश्य धर्म तान् गृहपतीन् उत्थाय आसनान प्रान्त साध महता भिक्षु सधेन । तदावर्प कारश्च महामात्य भवत पृष्ठ अनुबद्धो भवति । तस्य ण्य १ पाली में यह गाथा कम में है, किन्तु चीनी में गय ! - ( १२ ) " अथ भवति । "येनाद्यश्रमणा गौतमो नगर द्वारेण निष्क्रमिष्यति, तद् गौतमद्वार नाम भविष्यति येन तीयन गगा नदी तरिष्यति, तद् गौतम तीर्थ नाम भविष्यति । भगवान् निष्क्रस्य पाटलि पुत्रात् नदी तीर उपसक्रान्त तस्मिन समये नदी तीरे सबहुला मनुष्यानाव श्रारूह्य तरन्ति, केचन रडुप कूल वा समारूह्य नदी तरन्ती । अथ खलु महान सघो यथा बलवान् पुरुप समिजित वाहु प्रसारयेत् तथा क्षिप्रमगमत् पर तीरम एतदर्थ विदित्वा तस्या वेलाया भगवान् गाथयाऽवोचत- बुद्वोऽस्तिष्र्णवे नावचारी दुर्गा नदी तारयति धर्म सेतु । महारथी तस्य रथेन देवा मनुप्या तरनि ॥ १ ॥ स्वय छिन्न प्रथि तीर्णतट उत्थित शाप । शमि तान्तरल छिन्न बन्धन निर्वाणं प्रति पयते ॥ २ || अथ भगवान पृज्जिपु चरमाण कोटि प्राम उपसक्रम्य एकस्मिन् वृत्तमुले स्थितोऽवोचत तान भितुन "चत्वार इमे भिनव । वर्मा गम्भीरा । तमे चत्वार ? (१) प्रथम अार्य शीलम । ( २ ) द्वितीय --ग्रार्या समाधि ( ३ तृतीय -आया प्रजा । (४) चतुर्थ यार्या विमुक्ति । इमे पर्मा गम्भीरा सदमा प्रणिता पोवा । पाच भिक्षव । अनुरोधात दीर्घरात्र मघापित मानन मम च युग्माकच ।" प्रय (म्द तु) भगवान एन मयं विदित्वा गाथा (दान) याच (उ-नयामाम) शील समाधि प्रताच वितिचा यनुनरा दति अट्ठा अभिनाय दुख म्यान्तररा गना ।। ३ ।। (बनु ) भगवान कोटि प्रामे यथा भिरस्न विन्य अपोचट मानन्- - I" सारन्ट नादिशाम । 17 . २ रन पर आनट । मान नि, 75 7 च पर रमा मरता लिनु गत निपु का ननन- या जिनसामा विदरति । पने नाम चिन तिर अमृत- ( २ र र । ( : - (7 -7 ) ( ) तीर च, नार (दिन ), ( " न T () 1 7 - ।

( १३ ) पष्ठ पो-य-लु कटिष्यम.), (७) सप्तम पो-तु-लु (भद्र ) (८) अप्टम' वु-पो-तु (सुभद्र ), (8) नवम तुष्ट (तु-लि-सि-तु, (१०) दशम सन्तुष्ट (व-यु- लि) (११) एकादश बु-सु ( नन्द.), (१२) द्वादश. व-सु-तु-लु ( सुदत्त नाम इत्येव- मादय जना इदानी कालकृता भवन्ति तेषा का गति' क सपराय.? अपरेच सन्ति पचाशत जना, कालंकृता अपरेच पचशत् जना कालकृता, तेपा का गति क सपराय ?" एतत् मनसि कृत्वा उत्थाय प्रति सॅल्लायन स्थानात् उपसक्रम्य भगवत पादौ शिरसा अभिवाद्य एक मन्त न्यषीदत् अवोचत् च भगवन्त- प्रति सॅल्लीनस्य मे भन्ते । मनसि एतद् अभूत-इह नादिका ग्रामे साढ इत्येव मादयः- द्वादश उपासका कालवृता । अपरेच पचाशत जना कालकृता । अपरेच पचशत जना कालकृता तेषा का गति क सम्पराय । व्या करोतु में भन्ते । अनुकम्पा उपादाय। वुद्ध उवाच-साढ इत्येवमादय आनन्द । द्वादश जना छित्वापच अवर- भागीयानि सयोजनानि कालकृता औपपातुका तत्र स्वर्गे परिनिर्वायिन अनावृति धर्माण । अपरेच पचाशजना कालवृता त्रयाणा सयोजनाना परिक्षयाद् रागद्वश मोहानां तनुत्वात् सकृदागमिन सकृदेवइमं लोक आगम्य दु खस्यान्त करिष्यन्ति । सातिरेका पचशतजना नादिकाया कालकृता त्रयाणा सयोजनाना परिक्षयात् स्रोत मापन्ना अविनिपात धर्माण नियता सबोधिपरायणा सप्तकृत्व इम लोक आगम्य दु खस्यान्त करिष्यन्ति । अनाश्चर्य स्खलु पुन ते एतद् आनन्द । यत् मनुष्य काल कुर्यात तदा तथागत उपसक्रम्य प्रक्ष्यथ, विहिंसा चैपा स्वय व स्यात् तथा गतस्यच ।" "सत्य भन्ते । एवमेतत् । प्रत्युवाच श्रानन्द । बुद्ध उवाच-"तस्मात् ते आनन्द । धर्मादर्श नाम धर्मापर्याय देक्ष्यामि येन समन्वागता आर्यश्रावका आत्मना एवन्याकुयु जाति निवासम् । छित्वातिसून अकुशल पथान स्त्रोत आपत्ति तान् लभते, सप्त परम इमलोक आगम्य दुम्वस्यान्त करिप्यति । शन्कोति च स एव व्याकर्तुम् । तेन आनन्द । श्रय धर्मादर्श उच्यते । श्रार्य श्रावक बुद्वे प्रवेत्य प्रमादेन समन्वागतो भवति श्रदधाति बुद्धस्तथागत भगवान् अर्हन् सम्यक सवुद्ध दशगुण सपन्न इति । धर्मे प्रसन्न श्रदधाति .. " ।

पन्न स्वाख्यातो धर्म सां दृष्टि क अकालिक निर्वाणो पनयिक प्रत्यात्म वेदितव्य विजैरिति सघे प्रसन्न श्रदधाति सु प्रतिपन्न भगवत श्रावक सघ ऋजु प्रतिपन्न न्याय प्रति- सा मीची प्रतिपन्न' मार्गफल प्रतिपन्न धर्मकाय परिपूर्ण यदि द चत्वारि पुरूप युगानि अष्टौ पुरूप पुद्गला स्रोत आपत्ति प्रतिपन्नक स्रोत आपन्नक , सकृदा- गामिता प्रतिपन्नक सकृदागामी, अनागामिता प्रतिपन्नक , अनागामी, अनागामी, अर्हत्व प्रतिपन्नक अर्हन । एव तथा गतस्य आर्य सघ आह्वानीय प्राघुणेय पुण्यक्षेत्र लोकस्य आर्य कान्तै शीलै समन्वागत असडै अच्छिद्र । अशवले अफल्मपै विज्ञप्रशस्तै समावि सवर्तनिकै । अय खलु स आनन्द । धर्मादर्श येन आर्य श्रावका जानीयु जाति निवास त्रयाण अकुशल पथाना अन्त कृत्वा स्रोत आपन्न , सप्त परमनियत दु खस्यान्त करिप्यति इति व्याकंतु अल स ।" श्रय भगवान नादिकाया यथा भिरक्त विहत्य आनन्द आमत्रयामास- "यायाम अानन्द 'वैशात्या देशे।" "एव" इति । वात अथ भगवान निवारय पात्र चीवर आदाय महता भित्तु सधेन सा नादि वेगात्या प्रान्त । तत्र एकस्मिन वृक्ष मृले निपएण । अश्रणोत् ( सलु ) आम्रपाली गरिणवा = 'बुद्ध श्रावकै सा अनु प्राप्त वैशाल्या एफस्मिन वृक्ष मूले निपएण ।" अब सा भद्र यान अभिम्ह्म प्रायासीन् बुद्धस्य मति के प्रगदानार्थम् । दूरत एव अतरा ( मार्ग )अपश्यत् भगवन्त सम्यगुत्त दर्शन शा तेन्द्रिय, द्वात्रिंशत् लक्षण परिपूर्ण नक्षत्रपु चन्द्रमिव । -ष्ट्वा च दृष्ट तुष्टा यानात् प्रत्यवम्य पाति का भगरत समकम्य शिरमा पान। अभिवाग एक मन्त न्यपीटत् ।

( १५ ) भगवॉश्च अध्यवासयत् तुष्णीभावेन् । अथ ( खलु ) सा तुष्णीभावेन भगवतोऽधिवासन विदित्वा उत्थाय आसनात् शिरसा पादौ अभिवाद्य बुद्धस्य प्रदक्षिण कृत्वा प्रक्राता । अचिरप्रक्रान्ताया तस्या बुद्ध आनन्द आमत्रयामास-आयाम आनन्द । साधं व तस्या वने ।" "एव भन्ते ' आनद । - अथ बुद्ध उत्थाय आमनात् पात्र-चीवर आदाय सहस्र द्विशतपचाशत् परि- मितेन भिक्षुसंघेन साधं तस्या वन अवासरत् । अश्रृण्वन् ( खलु ) वैशालिका लिच्छ- वय -""बुद्ध (किल) आम्रपालि वने विहरति ।” अथ ते भद्राणि याना न-हरित यान ( रथ ) हरिताश्व वस्त्र-च्छत्र ध्वज परिवारै सर्व हरितानी सर्वनीलपीतलौ हिताव- दातानि पचवर्णानि पचशत यानानि रथ-वस्त्र वशेषु समानानि अभिरुह्य अगमम् भगवन्त द्रष्टुकामा । अथ (खलु) आम्रपाली बुद्धस्य दशनात् गेहं प्रत्यावर्तन्ती अन्तरा मार्गे क्षिप्र गच्छन्ति रथेन तैपां रथ ध्वज छत्र च प्रतिवर्तयामास । अथ रथिन (लिच्छवय ) व्याजहरु-"किन्ते अम्बिके । वलं यद् मार्गा दूरतो न चरित्वा घढ- यसि नो रथ ध्वस यसिच ध्वजछत्रम् सा प्रत्युवाच-"यथाहि मे आर्या । बुद्ध निमत्रित. श्वस्तनाय भक्ताय, यामि गेह भक्त उपसम्पादयितु, तस्माद् क्षिप्र गच्छन्ति नाशकव स्थान परिवर्य गन्तुम् ।" अथ ते उच -दे हि है आम्रपालि | एत भक्त प्रथम अस्माभिर्दातव्य, वयन्ते दास्याम शत सहस्र, रजत कार्षापणरम् ।" सा प्रत्युवाच-"प्रथम निमत्रितो भगवान् न शक्ता दातुम अथ ते रथिन पुनरूचु -"इतो ऽपि अधिक ते दास्याम पोड़शगुण शतसहस्र सुवर्ण कार्पापण, देहि न प्रथमम् ।" सा उवास-"न दास्यामि, न शक्यं दातु इद निमत्रणम् ।" अथ ते रथिन ऊचु -"इह ते दास्याम राष्ट्रधनस्य मध्य (अर्थ) भाग देहि न प्रथम निमत्रणम।"

( १६ ) सा प्रत्युवाच-सचेत् आर्या सम्पूर्ण राष्ट्रधन दास्यथ नाह तावद् गृहोप्यामि भगवान् हि विहरति मम उद्याने, प्रथमं मे निमत्रित भगवान् निश्चित एतत् न कादपि दास्यामि ।" अथ ( खलु ) ते रथिका परस्पर-हस्त चालयन्त उदश्वसन् “जिता वत भो । एतया दारीकया, वचिता वय प्रथम पुण्यत ।" अथ ते पुरस्तात् सरलेन पथा प्रायु तस्या उद्यानै अपश्यत् खलु भगवान् तानि पचशत रथिकान रय अश्वै अनेक दशसहस्र मार्ग परिपूर्य आगच्छत । दृष्ट्वा च भिक्षुन् श्रामत्रयामास- "येप वो भितव उद्याने क्रीड़ारताना महानुभावाना देवाना त्रायास्त्रि पाना द्रष्टु कामता अवलोफयय ते सहशा एते उपसहरय भिक्षव । सयतचित्ताना एतेषा महानुभा- वताम कथ भिक्षव । चित्त सयन भवति इह भिक्षु अध्यात्म काये कायानुपश्यी विहरति आतापी सप्रजानन स्मृतिमान न मृट-स्मृति विनीय लोके अभिध्या दौमनस्य बहिर्वा काये यायानुपश्मी विहरति आतापी सप्रजानन स्मृतिमान न मूढस्मृति चिनीय लोके ग्रभिध्या दोर्मनस्य, अध्यात्मवाही कायानुपुश्यी जातापी मप्रनानन स्मृतिमान विनीय लोरे पिया दीपनस्य देनाया - चित्ते ८ वर्म यु बनानुसभी आतापो मप्र जानन स्मृतिमान ।

( १७ ) भगवाश्च एव प्रभया लोके । यथा प्रभास्वर आकाशे प्रभासते । अथ तानि पचरथिकशतानि परिज गृहु आसनानि बुद्धश्च केवल तत्र सघे प्रभया प्रभासमान । तस्मिन् काले तस्या परिपदी पिड्- कु (पेंग्य ) नाम ब्राहमण निपएणो भवति । अथ स उत्थाय आसनाद् दक्षिणा सविवृत्य दक्षिणजानु पृथिव्या पातयित्वा यत्र भगवान् तत्र अजलिं प्रणामप्य गाथागिरमापत- ईक्ष्वाकु राजा गुणेन लभते कुशल फलम् । काये रत्नमुक्ताचर्मधारी भगवान् स्वकोत्तर ।। ४ ।। ईपिथेन चालयन त्रिसाहस्री यथा हिमगिरौ प्रभा । यथा फुल्ल पद्मपुष्प मधुगवि सुसूक्ष्मसुन्दरम ।। ५ ।। इहापश्य बुद्धस्या प्रभा, सूर्यो यथा प्रथमोदित । चद्रो यथा घरति नभसि मेद्यजालैर्विनिमुक्ते ॥ ६ ॥ प्रभासते तथागतो पश्यति ज्ञान ज्योतिपा यथान्धकारे पश्यत्युत्कया।। ७ ।। ददाति संघ स्वप्रभया चनु नाशयति विचिकित्सा जनस्य । अथ पचरथिक शतानि (लिच्छवय ) उपभ्रुत्य इमा । ब्राहमण उचु "पुनरपि वद ।" अथ पैग्य पुरस्ताद बुद्धस्य पुन' अन्वभाप्त । पचरथिकशतानि च गाथा भ्रत्वा एकेक रत्नण्ट पेंग्याय प्रादात । विसर्जयामाम, प्रति जग्राह च बुद्धो अनुकम्पा उपादाय । तस्मिन् काले भगवान् उवाच तान् वैशालिकान रथिकान्- लोके भवति पच रत्नानि सुदुर्लभानि कतमानि पच ? ( ? ) प्रथम सुदुर्लभ तथागतस्य प्रादुर्भावो लोके ( २ ) द्वितीय- तथागतो धर्म दिशति जनेभ्य इद अपि सुदुर्लभ मनुष्याणाम् । (३)तृतीय- तथागतो धर्म दिशति शक्नोति त श्रद्धया जातु इट अपि दुर्लभ मनुष्याणाम् ।। ० ॥ (४) चतुर्थम्- तथागतो धर्म दिशति, शक्नोति, त उद्गृहीतुम् ।। ० ॥ (५) १चम- सम्मुर आगत भय अन्तराय जानाति विपरिण- मयितुम ।। ० । इमानि पच रत्नानि सुदुर्लभानि ल्भेके ।" अथ पचशतरथिका श्रुत्वा बुद्धदेशिता देशना आत्तमनम वुद्व ऊचु - "अधिवासयतु भवान् श्यरतन नो भक्त साव सर्वे श्रायके गाथा अथ पैंग्य त रत्नपट तथागताय - ( १८ ) वुद्ध उवाच रथिकान- "प्रागेव वो निमत्रितोऽह प्रतिगृहीत मे आम्रपालि- गणिकाया श्वस्तनम् निमत्रणम् ।" अथ तानि पचशतरथिका प्रागेव निमत्रितो बुद्धोऽम्रपालिकया इति हस्त चाल्यन्त परस्पर उचु - "इच्छामो दान दातु तथागताय वचिता स्म प्रथम एव तया गणिकया ।" अथ गणिकया ।" अथ ते उत्थाय आसनाद् बुद्धस्य पादौ अभिवाद्य त्रि प्रदक्षिण कृत्वा प्रतिनिवृत्ता । अथ ( खलु ) आम्र पाली गणिका तस्या रात्रौ विविध दान (भोजन) सपाद्य द्वितीयस्मिन् दिने उपसक्रम्य भगवन्त काल आरोचयामास । अथ भगवान् निवास्य पात्र-चीवर आदाय साधं सहस्र द्विशत पचाशद्-भिक्षुभि पश्चात् पुरत परिवारित तस्या निमत्रण स्थान उपसकाम्य आसन उपागृहणात् । अथ आम्रपाली गणिका प्रणीतेन खादनीयेन भगवन्त सतर्पयामास भिक्षुसघ च । भक्तं च निष्ठित अपनीतपत्रपाणी च भगवति गणिका सुवर्णभृ गारक समादाय हस्तौ जलन प्रक्षाल्य उवाच युद्ध -"अस्या वैशाल्या सर्वेपा उद्याने ममेव प्रणीततरम् । प्रतिगृह्णातु में इद तथागतोऽनुकपा उपादाय " बुद्ध वाच गणिका- " देहि इद उद्यान बुद्ध प्रमुग्माय चातुर्दिश सघाय नत नि नि त्रिय ? तथागतस्य यानि भवति उद्यान, वन, कोष्ठक गेह , चीवर पात्र परवस्तृनि, रात दानानि तानि के नापी मारेण, शकण, ब्रह्मणा महेशान्येन वल देवन न शक्यानि परिगृहीतुम । सातद् उद्यान ( आराम ) बुद्ध प्रमुग्बाय चातुर्दिशाय भितुमघाय दिदी प्रति माह च तद भगवान अनुपा पाय वोचत् च गायया । र मीनलस्य फ्लोगानग्य । ...न तपारामारा ( १६ ) . दानकथां, शोलकथा, स्वर्गकथा कामेषु आदिनव अपकार सक्लेशं कुशलस्य प्रधानात् । यदा भगवान् अज्ञातीत तां कल्यचित्तां, मृदुचिता, विनीवरणचित्ता, उदग्रचित्ता, प्रसन्नचित्तां सूक्ष्मनीवरण-स्कंध विलयनसुकरचित्ता, अथ बुद्वानां समुत्कर्षिकां धर्म- देशना तस्यै अदिशत-दुख आर्यसत्य, दुखसमुदयः, दु.खनिरोध , दुःखनिर्गमा पेक्षितम् आर्य सत्यमिति । अथ तद् यथापि नाम शुद्ध कंवल अपगतकालक सम्यगेव रजन प्रतिगृहणीयात् एवमेव आम्रपालिगणिकाया' तस्मिन् एव आसने विरजं विमल सर्वधर्मेपु धर्मेन्द्रियं धर्मचक्षु उपादि । अथ सा दृष्ठधर्मा प्राप्त धर्मा विदितधर्मा पर्यवगाढधर्मा वैशारद्यप्राप्ता, अपायेऽविनिपातधर्मा अभयप्राप्ता बुद्ध अवोचत्- एषाऽह बुद्धं शरण गच्छामि, धर्म शरण गच्छामि, सघं शरण गच्छामि, द्वितीय- मपि०, तृतीय मपि बुद्ध शरणं० । उपासिकां नां भगवान् धारयतु अद्यतोऽग्रे पाण्यु- पेतां शरण गतां यावज्जीव प्राणातिपात-दत्चादान काम-मिथ्याचार-मृषागद-मद्यपान विरताम् । अथ सा भगवत पच शिलानी लब्ध्वा विरता पूर्वव्यवसायेभ्य क्षीणमला उत्थाय आसनात बुद्ध अभिवाद्य प्रक्रान्ता। अथ भगवान् वैशाल्यां यथाभिरक्त विहत्य आनद आमत्रयामास-"याम आनद । वेणुवनम् ।" "एवं इति श्रानन्द प्रत्युवाच । अथनिवास्य पात्रचीवरमादाय सार्धं तेन संघेन अनुगम्यमान भगवान् प्रक्रान्तों वृज्जिते पु वेणु वने (वेणु ग्राम के )। अश्रृणोत्त खलु विशतयो ( १ ) नाम ब्राह्मण-बुद्धः किल सर्वेन सधेन सार्व उपसकान्तोस्मिन एव वेणुवने । अथ सोऽ चिंतयत्-"अय खलु श्रमणोगौतम तस्य गुण चतुर्पदिनु श्रूयते दशलक्षण परिपूर्ण । स इम लोकं सदेवक श्रमण ब्राइमणों प्रजा साक्षात्कृत्य धर्म दिशिति आदिकल्याण मध्य कल्यान पर्यवसान पर्यवसान कल्याण सार्थ सव्यजनं गभीर केवल परिपूर्ण ब्रह्मचर्य प्रकाशयति साधु खलु पुन तथा रूपाणा महतां दर्शन भवति । अथ स ब्राह्मण यत्र वेणुवन तत्र उपसक्रमत । उपसकम्य भगवन्तं अभिवाद्य एकमन्त न्यपीदत् । भगवान् आनुपूर्वेण तस्मै धर्म अदिशन् सम- दर्शयत् समाहर्पयत्। ब्राह्मणश्च हा तुष्टो भगवन्त न्यमत्रयत्-"अधिवामयतु मे . समारक ब्रह्मक स स्त्रय ( २० ) गृहे भगवान श्वरतनाय भक्ताय साध भिक्षुसधेन ।” अध्यवासयद् बुद्ध तूणीभावेन । अथ खलु ब्राह्मणे भगवतोऽ धिवासन विदित्वा उत्थाय आसनाद् भगवन्त अभिवाद्य प्रदक्षिण कृत्वा प्राक्रमत । अब खलु ब्राह्मण तस्या रात्री सादनीय भक्त प्रतिपाना काल आरोचयामास- "कालो भदन्त । निप्ठित भक्त यस्येदानी भगवान ( आर्य ) काल मन्यते ।" अथ भगवान् निवास्य पात्र-चीवर आदाय भिक्षु सवेन परिवारित उपस क्रमत तस्य निवेशन उपादाय अामन च न्यपीदत् । अथ खलु ब्राह्मणो बुद्वप्रमुख भिक्षुमघ नानाविवेन प्रणीतेन सादनीयन भोजनीयेन ममतपर्यत् । भुक्त भोजने प्रक्षालिन पात्रपाणी (भगरति) अन्यतर नीच आमन गृहीत्या बुद्धस्य पुरता न्ययोदन् । अथ भगवान त ब्राह्मण गायाभिरध्यमापत- सचेत करोति अन्नपान चीन शयनीयवस्तु । ददाति शीलवद् न्योनरेभ्य तेन लभत महाफ्लम ।। १२ ।। तम्माद् वपन शन परलार परिमोगाय । पुग्य अम्ति मनापार मन्याना प्रारनाय ।। १३ ॥ gya ति सदस्य नारा च नियम । สโนส जी नाग मा ने वेप जायत ।। १।। घाममा यसप्रग(भगवान) न्याय यामनात प्राममन । पना तिन ननपरे दमन ( नमून) मिनः टनभा । वुद नान- आमत्र - नाना 17बनान मचान मिना -प.यान शालायाम ।" -1-। 1 (न , -47 ( २१ ) अथ ते भिक्षव लब्ध्वाऽनुज्ञा प्रक्रान्ता । बुद्ध एव केवल साधं आनन्देन ग्रीष्माणा (वर्षाणां) कालेऽवसत् । मध्ये ग्रीष्म वुद्धस्य काये खर आवाध उपागच्छत, सर्वस्मिन काये बाहा वेदना । अथ खलु भगवत एतद् अभूत्-"अह इदानी आबाधित सवस्मिन काये (मे) बाढा वेदना, श्रावकाश्च इह, न मे खलु एतत् प्रतिरूपयोऽह अना- मत्र्य उपस्थाकान् अनवलोक्य भिक्षुसघ परिनिर्वायेयम् । यन्नून अह इमा आवाध वीर्येण प्रतिप्रणाम्य जीवित सस्कार अधिष्ठाय विहरेय” इति । " अथ भगवान् विहारात् निष्क्रम्य प्रच्छायाया न्यपीदत । अथ आनन्दो दृष्ट्वा बुद्ध उपसक्रम्य एतदवोचत्- "दृष्टो मे भदन्त भगवत प्राशु मुख तु स्तोक आहत इव भवति ।" पुनरपि आनन्दोऽवोचत="अपि च मे भन्ते । मधुरकजात इव कायो, दिशापि न में प्रख्यायन्ते, धर्मा अपि मे न प्रतिभान्ति भगवतो ग्लानतया । अपि च मे भन्ते । अभूत काचिद् आश्वासमात्र-न तावत् भगवान परिनिर्वास्यति । लोकचतुर्न निरोत्स्यति महाधर्मोन विनश्यति, यावत् न भगवान् भिक्षुसघ आरभ्य किंचिदेव उदाहरति । बुद्ध आनन्द उवाच: "किं पुन आनन्द भिक्षुसघो मयि प्रत्याशसति ? यस्य पुन आनन्द एवं स्यात अह भिक्षु सध परिधारयामि इति वा ममोहोशिको भिक्षुसघ इति वा स नू नं आनन्द भिक्षुसघ आरभ्य किंचिदेव उदाहरेत् । तथागतस्य खलु आनन्द- एव न भवति' अह भिनुसघ परिधारयामि । किं आनन्द' तथागतो भिनुसघ आरभ्य किंचिदेव उदाहरिष्यति देशित आनन्द । मयाधर्मो ऽ नतर अवाह्य कृत्वा । नास्ति आनद । तथा गतस्य धर्मेपु आचार्यमुष्टि । अह खलु पुन. आनन्द । एतर्हि जीर्णो वृद्धो महल्लकोऽध्वगतो वयोऽनुप्राप्त आर्शितिक मे वयो वर्तते । तद् यथाऽपि आनन्द । जर्जरशकट उपायेन वेधमिश्रकेन याप्यते एवमेव खलु आनन्द । वेधमिश्रकेन मन्ये तया गतस्य कायो याप्यते । यस्मिन् आनन्द । समये तथा गत सवनिमित्ताना अमनसिकारात् एकत्याना वेदनाना निरोधाद् अनिमित्त चेत समावि उपसम्पद्य विहरति, प्राशुतर आनन्द । तस्मिन् समये में कायो भवति । तस्माद ही आनन्द | आत्मद्वीपाविहरथ आत्मशरणा अनन्यश- रणा धर्म द्वीपा धर्मशरणा अनन्यशरणा । कथ च आनन्द । भिनुरात्मद्वीपो विहरति धर्मद्वीपोऽनन्यद्वीप १ आत्मशरणोऽ धर्मशरणो नन्यशरण ? आनन्दभिन्नु साये - ( २२ ) -- , कायानुपश्यी विहरति । आतापी सम्प्रजानन् स्मृतिमान् विनीय लोकेऽभिध्यदोर्मनस्य वेदनासु ० चित्त पु० धर्मेपु धर्मोनुपश्यी विहरति ० । एव खलु आनन्द । भिक्षुरात्म- द्वीपो ० । ये केचिद् आनन्द । (भिक्षव) एतर्हि वा वा अत्ययेन आत्मद्वीपा विहरिष्यन्ति अनन्यशरणा धर्म द्वीपा धर्मशरणा अनन्यशरणा भावयितार नमतप्रा मे ते आनन्द । भिक्षयो भविष्यन्ति ये केचित शिक्षाकामा इति ।" अथ खलु भगवान् अवोचत्= "आनन्द । गच्छाव चापालचैत्य ।" "एव भन्ते " प्रत्युवाच । अथ तथागत उत्थायनिपास्य पात्रचीवर आदाय गत्वा एकस्मिन वृक्षमूलेऽवोचत् प्रसारयानन्द । न्यपीद न पृष्ठ मे ग्लागते, इच्छामि इहस्थातुम् "एव" इति प्रत्युवाच अानन्द । अथक्षिप्र स प्रज्ञापयामास निपीदनम, तथागतश्च प्रजप्त आसने न्यपीदन् । अब आनन्द एक क्षुद्रक निषीदन आस्तीर्य बुद्धस्य पुरत उपाविशत् । वुद्वोऽयोचन यस्य कस्यचिद् अानन्द । चत्वार ऋद्विपादा भाविता बहुलिकृता परिचिता सुसमारब्धा समाहिता स आकाक्षमाण कल्प वा तिठेत् कल्पावशेप वा । बुद्वस्य खलु श्रानन्द । चत्वार ऋद्विपादा भाविता आकाक्षमाण आनन्द । तथागत कल्प वा तिटेत क पावशेष वा बहुजनहिताय बहुजनमुम्बाय अर्थाय हिताय देव मनुष्याणाम । तस्मिन सन यानन्द तुणी अभूत् न प्रत्यवोचत् । द्वितीयमपि तृतीयमपि बुट्ठोऽवोचत्र "यम्य कम्यचिद् आनन्द चत्वार यदपाय - । पुनश्च तुणी अभृत यथा स मारेण पर्यु त्थित चित पर नगर बुट त्रि निमित्नानि प्राकाशयत न च स प्रतिवेवितु शक्त । वदनन- . ८ जानो टाः नता पाय याय ग्रामनाद् अभिवाय बुद्वस्य ५.टोन न त विविक्त चिन्तय पान । - (३) -- - स्वक आचार्यकं उदगृह्य आचनिष्याति देक्ष्यति प्रज्ञापयिष्यति प्रस्थापयिष्यति विवरिष्यति विभजिष्यति उत्तानीकरिष्यन्ति उत्पन्न परप्रवाद सह धर्मेण सुनिगृहीत निगृह्य सप्रातिहार्य धर्म देक्ष्यति" "एतहिं खलु पुन भन्ते । भिक्षवो भगवत श्रावका व्यक्ता०। भाषिता च खलु पुन भन्ते । भगवता एपा वाचा न तावद् अह पाप्मन् निर्वास्यामी यावत मे भिक्षुण्य न श्राविका ० १ ० उपासका न श्रावका ०।० उपासिका न श्राविका भविष्यन्ति व्यक्ता । एतर्हि खलु भन्ते । उपासिका भगवत श्राविका व्यक्ता ० धर्मानुधर्म प्रतिपन्ना ब्रह्मचर्य दिशन्ति सर्वेभ्यो देव मनुष्येभ्य सप्रातिहार्यम् ।" पुनश्च अवोचत मार पाप्मा • “एकदा बुद्ध उरूवेलाया नद्या नैरजनाया तीरे अजपाल न्यग्रोध वृत्तमूले विहरति प्रथमाभिसंवुद्ध । तस्मिन् कालेऽहं उपसक्रम्य भगवत सन्तिकेऽवोच .."परिनिर्वातु तथागत , परिनिर्वाणकाल इदानी क्षिप्र परिनि- तु । तस्मिन् काले तथागतो। माम्ऽवोचत् तिष्ठ तिष्ठ पम्मिन् । स्वय अह जानामि काल, तथागत इदानी न परिनिर्वास्यति, यावत् ० । एतर्हि सम्यक् काल , कथ न परिनिर्वाति? एव उक्त बुद्धो ऽ वोचत- “तिष्ट तिष्ट पाप्मन् । बुद्ध स्वय जानाति काल, न चिरेण एव, इत त्रयाण मासाना अत्ययेन पूर्वोत्पादस्याने कुशीनगरे शालवने यमक शालयो परिनिर्वास्यति ।” अथ मारो ऽ चिन्तयत्- "न भवति बुद्धाना 5 मोघ वचन, एतर्हि अवश्य परिनिर्वास्यतीति हृष्टतुष्टो ऽन्तर्धाय च प्रक्रान्त । अथ बुद्ध चापाल चैत्ये स्मरन् सम्प्रजानन आयु सस्कारं विससर्ज । तस्मिश्च काले महा भूमी चालो ऽ भूत देशै मुनुष्याण न कोऽपि अभीत । हस्तेन चीवर निवास्य बुद्ध प्रादर्शयत् महाज्योति यत्र ज्योतिपि मान्धकारनेश तत्र न कस्यापि अजाम प्रकाशस्य सर्वे ऽ लभन्त दृष्टु ज्योति । तस्मिन् काले भगवान उदान उदानयाचकार- सस्कृता सस्कृतयो क्रिययो सस्कारमिदानी अवासृजम् । समाहित पक्षी यथा निर्गत ॥१५॥ अथ खलु आर्यस्य आनन्दस्य काये लोमहो जात'। स शीन भगवत सतिके उपसक्रम्य शिरसा ऽ भिवाद्य पादौ एक मन्त स्थित्वा बुद्ध अवोचत्- "आश्चर्य भगवन् । भूमिचाल एतादश । को नु अस्य हेतु (को नु) प्रत्यय ? - अध्यात्मरत ( २४ ) बुद्वो 5 वोचत्- "इह खलु श्रानद । अष्टौ हेतु प्रत्यया लोके भूमिचालस्य । फत में ऽष्टौ ? (१) इय पृथिवी उदके प्रतिष्ठिता, उदक वाते प्रतिष्ठित वात आकाशस्थो भवति, भवति आकाशश्च महाबाते, यदा महावात स्वय कम्पते, अथ उदक कम्पते, उदक कम्पित सर्वा पृथिवीं कम्पयति । अय अस्ति प्रथम हेतु प्रत्यय । (२) पुनश्चापर आनन्द । भिनुर्वा भितुणि या मार्गप्राप्त ऋद्विमान् चेतोवशित्वप्राप्त देवो वा महानुभाव तस्य च परोत्ता पृथिवीसना भाविता भवति अप्रमाणा च अप्रसरया, म इच्छति आत्मनो बल सपरिक्षितु तदा सर्ग पृथिवी कम्पते । अय अस्ति द्वितीय । (३) पुश्चापर आनन्द । बोधिसत्व तुपितात् कायात न्यवित्वा रमरन मप्रजानन् अमूटो मातृक्षो असक्रमते, तदा पृथिव्या महाकम्पो भवति । अय अस्ति तृतीय । ( ४ ) पुनश्चापर आनन्द । यदा बोधिसत्य स्मरन सप्रजानन् अमुटो मातृक्षित दक्षिणपात् निक्रमति, तदा । (५) पुनश्चपार आनन्द । बोविसत्व प्रथमा अनुत्तरा सम्यक सबोधिं अभिसवुध्यति, तदा । (६) पुनश्चापर आनन्द बुद्व प्रथमाभिमबुद्ध अनुत्तर धर्मचक्र प्रवर्तयति रेनापि मारेण, देवेन यमग्ण ब्राह्मणे , सर्वे देव लोके मनुष्ये वा अप्रवयं तदा ! (७ ) पुनश्चपर अानन्द | बुद्वो दिवा उपसमाग्य स्मरन् मप्रजानन श्रायु ससकार जीवित सामता अर म जति, तदा, । (८) पुनश्चापर पदा आनन्द । जनप निर्वाणघातो च परिनिर्वाति, तन। पृथिव्या महापो भवति । पर पति यटम हेतुप्रयय दमे खलु अष्टो हेतु प्रत्यया भूमिचालस्य । तस्मिन वाले सामान गापारि भारत ।

( २५ ) तत्र मार द्विपदोत्तमो घोधिसत्व शतपुण्य लक्षण । अवक्रमते मातृकुर्दि भूमिकप ॥२१॥ दश मासान् मातृकुतो शेते पर्यके नाग इव । यदानिष्क्रमते दक्षिण पार्वात् भूमिकंप ० ॥२२॥ कौमार्ये यथा बुद्धो निरोध्य सस्कार वधनम् । जित्वा सखेय भलमत मार्ग भूमिकप ० ॥२३॥ प्रवर्तयति धर्मचक मृगदावकानने । जित्वा मार्गवलेन भूमिकंप ॥२४॥ वह्वा याचत मारदेवो 'बुद्ध परिनिर्वात्विति' । बुद्धोऽवसृजति जीवित भूमिकप ० ॥२५॥ नरोत्तमौ महाविनायक शास्तान्तिमभव क्षीणायु । दुष्प्रकप्यो लभते (यदा) लभते (यदा) निर्वाण भूमिकंप ० ।। २६ ।। शुद्धाभोऽवदत् प्रत्ययान् भूमिकपस्य ह्यष्ठधा। चान्यश्च भवति भूमिकपस्तदा भवेत् ।। २७ ।। अथ खलु वुद्धोऽवोचत्-अष्टौ खलु इमा आनन्द । परिपद कतमा अष्टौ ? (१) प्रथमा क्षत्रीयपरिषद् (२) द्वितीया ब्राह्मण-परिपद् (३) तरतीया ग्रहपति-परिपद्, (४) चतुर्थी श्रमण-परिषद् (५) पचमी चातुर्महाराजिक परिषद् (६) पष्ठोत्रा- यस्त्रिश परिषद (७) सप्तमी मार परिषद्, (८) ब्रह्मदेव परिषद् । अभिजानामि खलु पुन अह आनन्द । क्षत्रियपरिपद उपसक्रान्त तत्रापि मया सन्निपष्णपूर्व चैव सल्लपितपूर्वञ्च साक्षात् च समापादित पूर्वम् । तत्र उद्देशेक तेषां वर्णो भवति स्वरो भवति तत श्रेष्ठतरा मेव स्वरो भवति । ते स्वागतवचनेन मॉ विसर्जयन्ति नचाई व स्वागवचनेनताम् । ते यथा भाषन्ते, अह च तथा भापितु शक्नोमि । अह आनन्द । धर्मयार कथया तान् सम दर्शयं समादपय समाहर्पयम् । अथ तेभ्य अन्तर धाम । ते न जानन्ति-"को नु खलु अय देवो वा मनुष्यो वा” इति । एव यावत् पेय्याल-ब्रह्म परिपद उपसक्रान्त असख्येयाम् अय " ( बुद्धभापिते दीर्घाग द्वितीयो भाग यहा लिग्ना है प्रथम सूत्र "महाप्रदान सूत्र" के साथ प्रथम भाग समाप्त हुआ था)।

( २६ ) अथ भगवान् अवोचत्- “एव सूक्ष्म सुन्दरो दुर्लभो आश्चर्याद्भुतापूर्वो- धर्म । तथागत एव अल अधिगन्तु इम धर्मम् । पुनश्चावोचत् बुद्ध -"तथागत आनन्द । सजानिते वेदनानाभुदय स्थिति निरो- वच, सज्ञाना० स्पर्शाना अय च तथागतस्य आश्चर्याद्-मुता पूर्वो धर्म वेदना च वो भावयितव्या ।" अथ भगवान् अवोचत्-"आयाव आनन्द । गधचेत्य-कुटागारशालाया । एव भन्ते ।" तत्र च गत्वा ( भगवान् ) एकस्मिन् वृक्षमूले प्रज्ञप्त आसने न्यपीदत् । अथ बुद्वोऽवोचत-"गच्छ त्व आनन्द । यावन्तो भिक्षव गव चैत्यस्य दक्षिण तो वामतो वा विहरन्ति तान् सर्वान् , भिक्षुन् उपस्थानशालाया मन्निपातय । श्रथ अानन्द 'एव मिति प्रति श्रुत्य सर्वान् भिक्षु उपस्थान शालाया सान्नपात्य- बुद्व एतद अवोचत-"सन्निपतितो भन्ते । महासघ , यस्य इदानी आर्य काल मन्यते " - व अब पलु है भगवान उपस्थानशालाया उपसक्रम्य प्रजप्त श्रासने न्यपीदत अवो चत च "टमे वो भिक्षव ये मया धर्मा अभिताय देशिता । ये च वमा मया स्वय साक्षात्कृत्य आयाँ सम्यन्मयोचिंद अभिसबुढा तं ही नाम-चन्वारि स्मृति प्रस्थानानि चत्वारी सम्यम्प्रधानानि, चत्वार द्विपादा पच इन्द्रियाणि, पच बलानि, सप्त योध्यगासि, पार्योष्टागिको मार्ग । पलु वर्मा सावुक -दगृहीतव्यना आसेपयिनमा यह लीवर्नव्या अनुत्पाय विवाद समानाचार निरोदरिभता तत्र मम में मारवय मयो यपिगमाय अन्योन्य सपटपने भविट" । इन मामा नाय घय मानान्त्य देशिता ? नाम मीनान न नार-सत्र स्त्र र पाकरण • गाथा २, (वर्मपद ) बुटमन- - ११५ मापन | अनुन बन न पृव བ : ༩ བ - . 451 - 127173 - 77 - मेनिया 'युद्वमापिने उपमा तन बद ८) दिनदिर्न पत्र ।

No text on this page.

( २८ ) न पुनश्च पापमा अवोचत- “एकदा बुद्ध उरुबैलाया नद्या नैरंजनाया स्तीरे अजपालन्यग्रोव वृक्षमूले विहरति प्रथमाभिसबुद्ध ०। कय न परिनिर्वाति ? तस्मिन काले तथागतोऽवोचत्-- "तिष्ठ तिष्ठ पाप्मन् | अह स्वय जानामि काल, चिरेणैव इत त्रयाण मसाना अत्ययेन परिनिर्वास्यति ।" अथ मारो०' हटतुष्टो- ऽन्तर्धार्य प्रक्रान्त अधिरप्रकान्त च मारेऽह तदा तत्र चापालचैत्ये० आयु सस्कार व्यसृज तस्मिंश्च काले महाभूमिचालोऽभूत । तस्मिन् काले इद उदान उदानयम् अथ आयुप्मान् आनद उत्थाय आसनाद् दक्षिणास उत्तरामघ कृत्व। दक्षिण जानु मडल भूमौ प्रतिष्ठाप्य दीर्घ प्रणिपत्य अजलिं बुद्व अवोचत्- "तिष्टतु भन्ते । भगवान कल्प मा परिनिर्वातु सर्वसत्व हिताय हिताय देवम- नुप्याणाति । भगवान तुप्णी न प्रत्युवाच । एव(आनन्द )यावत् तृतीय बुद्ध अवोचत् । अथ बुद्ध श्रानन्द अवोचत- "अद्दधासित्व आनन्द । तथागतस्य बाधिं न वेति । - "एव भन्ते । सत्य प्रददामि ।" में यम्य बुद्धोऽवोचत- "अददवासि तर्हि किं यावत् तृतीयक अभिनी पीटयसि ?" समुदान एतद् भन्ते । बुद्वस्य अत सम्मुग्वाद् बुद्वस्य गृहित वस्यचिद आन- । चन्वार ऋद्धि पादा भाविता बलि कृता परिचिता मुममा- रव्या साहिता समाहातमारा कपा निष्टं न कन्यावशेष वा । निष्ठतु भन्त । भगवान तमो विनाशाय वजन हिताय दिनार लाभाय देवमनु'याणा ।"

( २६ ) । त्व तथागत स्ववचन विप्रतीप करोतु । नैतत् स्थान विद्यते । यथा कश्चित् आढ्योत्तमो मल्लक भुक्त भुमौ वमेत, सक्ष्यति स तत् भुक्त परावर्त्य पुन भतितुम ?" "नैव भन्ते ।” इति प्रत्युवाच आनन्द । "तथागतोऽपि अवसृष्ट वान्त भोजन इव कथ तत् वचन परावर्तयितु शक्ष्यति ॥ पुनरपि बुद्धऽवोचत्- "आयाव अनन्द । आम्र ग्रामम्" अथ ससमेत्य पात्रचीवरं महता संघेनानुगम्यमान भगवान वृज्जिपु प्रक्रान्त येन आम्रपाम तत्रावासरत् तत्र च विहरति एकस्मिन् गिरिवने । तत्रापि भगवान सर्वा परिपद दिशति-- "इति शील, इति समाधिः, इति प्रज्ञा। शीलपरिभाविता समाधि महाफला भवति महानृशसा, समाधिपरिभाविता प्रज्ञा महाफला भवति महानृशसा, प्रज्ञा परिभावितं चित सम्यगेव पासवै. विमुच्यते(आस्रवा) तद्यथा,कामा- स्रवा भावानवा दृष्टयास्रवा । अविद्यास्रवा' विमुक्ति लामाद् जायते विभुक्ति ज्ञान, क्षीणा जाती मृत्युश्च, उपित ब्रह्मचर्य, कृतं करणीय तेन स न लभते पुनर्भवम् ।” अथ खलु आम्रग्रामे यथाभिरक्त विहृत्य भगवान् श्रवोचत्- आयाव आनन्द । जम्बूग्राम 1010 ? हस्तिग्राम ०० पो-लो-पो (वेणुव) ग्रामं ०० भोगनगरम् । अथ भगवान् निवास्य पात्रचीवर आदाय महता सधेन अनुगम्य मानो येन स नितम तत्रोपसृत्य भोगनगरस्य उतरत शिशपायने विहरति । तत्रखलु बुद्धो भितून आमत्रयामास- "देक्ष्यामि वो भिक्षव । चतुरो महाप्रदेशान् धर्मान् तान् शृण्वन्तु साधु मनसि कुर्वन्तु ।" "एव भगवन्” इति ते भित्र प्रत्यवोचत् । . । "कतमे चत्वार ? (१) इह भिक्षत्र । भितुर्वदेत् अह आर्या । अमुकस्मिन् अमुकस्मिन् ग्रामे, अमुकस्मिन राष्ट्र सम्मुम्वाद बुद्धस्य एतत् श्रुत, सम्मुखाद् प्रतिगृहीत-अय धर्म अय विनय इद शासनम् । - नगरे, * पाली में आनद-चैत्य ।

( ३० ) - . एतत् श्रुत्वा न अभिनधिनतव्य न प्रतिक्रोशितव्यम् । तस्य सत्यासत्यपरिक्षार्थ आद्यन्ततो तच्च सूत्रे विनये धर्मे च अवतारयितव्यम् । तत् चैत् न सूत्रे न विनये न वर्म वतरति तर्हि तस्मै वक्तव्य- "इद न बुद्वस्य भापित, युष्माकमेव दुर्गृहितम् । तत् किं निश्रित्य ? उक्तपूर्व धर्मेण विरुध्यति । युष्माभिश्च आयुष्मन् ? (आर्यपुरूप) न एतत् सुगृहीत न प्रतिपन्नम् । मा वदतु एतत् मनुष्ये न्य, त्यक्तव्यहीदम् । तच्चेत् तस्य वचन सूत्रे विनये धर्मे च अवतिर्यते, तर्हि तस्मै वक्तव्य- युष्माफ इद वचन सत्य, बुदन इद दिष्टम् । तत् किं नि श्चित्य ? युप्माभि भापितपूर्व इद वचन सूत्रे विनये धर्मे च अवतरति । एतद् अायुग्मन् । युग्माभि उद्गृहीतव्य प्रतिपत्तव्य मनुप्येषु विस्तारयितव्य भापितव्य न परित्यक्तव्यम अयमस्ति प्रथमो महाप्रदेशो धर्मस्य । (२) पुनश्चापर भिक्षुरेव वदेत-"अमुकस्मिन् प्रामे अमुक स्मिन् नगरे यमुक स्मिन जन पदे सघो विहरति सार्थ वह अ त स्थविरै । तस्य सम्मुम्बाद् इद श्रुत सम्मुखात प्रतिगृहीत - श्रय धर्म । अयमस्ति द्वितीय महापदेशो वर्मस्य । (३) पुनश्चापर- भितुरेव वदेन - "भिक्षवो विहरन्ति धर्मवरा विनमवारा विनयकर्मवारा । तेपा मे सम्मुग्वाद् दद अत । मूत्र विनये वर्मेच न अवतरति । अब तम्में वक्तव्य"- मा क्ययन्तु इट टु अन व मबहुने यो भिनुम्यो दुर्गहीतम् ।। (५) पुनश्चापर- भिनुरेव वदत्-- अमुकम्मिन ग्रामक एक स्थविरा ( भिक्षु ) विहरति धर्मपरा विनयवरा विनयरर्म पर तन्य में मम्मुवाद् इद श्रत । अयमग्नि चतुर्या महाप्रदेशी यमस्य । अब लगवान नान नगर य पाभिरक्त विन्त्य भायं अानन्ट ग्रामत्रयामाम - मात्रानन्द वानरम z- ༢་པས། ( ३१ ) अथ खलु चुन्द कारपुत्र वस्त्र निवास्य भगवन्त उपसक्रम्य शिरसा पादौ अभिवाद्य एकमन्त, न्यपीदत् । बुद्ध' चुद कारपुत्रं आनुपुर्येण धर्म्यया कथया समदर्शयत् समादपयत् समुदतेजयत् समाहर्षयत । अथ ग्वलु चु दो भगवतो देशनया धर्मे प्रसन्न सप्रहर्षितो भगवन्त एतद् अवोचत् “अधिवासयतु में भन्ते । श्वस्तन मक्तं साध भिक्षुमधेन ।" अधिवासयाचकार भगवान् तूष्णीभावेन । अथ खलु चुन्द कारपुत्रो भगवतोऽधिवासन विदित्वा उत्थाय आसनात् बुद्ध अभिवाद्य प्रकान्त । अथ खलुचुद तस्या रात्री श्वस्तन खादनीय भोजनीय प्रतिपाद्य भगवन्त उपसक्रम्य काल आरोचयामास-"निष्ठित भक्त यस्येदानी आर्य काल मन्यते " अथ भगवान् निवास्य पात्रचीवरं आदाय महता भिक्षुसंघेन अनुगम्यमान तस्य गेह उपसक्रम्य प्रज्ञप्त आसनेन्यषोदत् । अथ चु द. कर्मारपुत्र ओदन त्रिवर्षशुकर- मार्दव लोके दुर्लभ भोजन बुद्धाय संघाय च पर्यवेशयत् । बुद्धोऽवचोत चुन्द-"मा- परिवेशय इदं मार्दवं भिनुभ्य ।" चुन्द प्राप्य बुद्धस्य आज्ञां तेभ्यो तत् न प्रत्य- पादयत् । अथ तस्मिन् संघ एको भवति मल्लको भिनु अगारात् वृद्ध प्रत्रजित स आसनस्योपरि(निषण्ण पात्रेणमार्दव अपिवत् । अथ चु द भुक्तेषु सर्वेषु पात्रतोऽपनीत- पणिपु स्वच्छ प्रक्षालनीय जल अदात वुद्ध 1 गाथयारपृच्छत-पृच्छामि महाप्रज्ञ सबुद्ध द्विपदोत्तमम् । बुशल सारथिन उत्तम वशिन "लोके श्रमणा भवन्ति के ॥ ३३ (६)१ अथ भगवान् गाथाभि प्रत्युवाच- यथा त्व पृच्छसीमे, श्रमणा संति चतुर्विधा । अधिमुक्तिन समा तेपा भेदस्तेषा तु ज्ञायताम् ॥ ३४ ॥ (७) । एको भावयते मार्गमुत्तम द्वितीय सुदैशिको तदर्थस्य । तृतीयो मार्गानुगो विहरति, चतुर्थो मार्ग मलिनीकरोति ॥ ३५ ॥ (८) । मार्गो सुदिष्ट तेन मार्गार्थ । अनुवसति मार्गे त्यो मागे मलकर ॥३६ ।। (६)। भोक्ता दहति कटक प्रविशति निर्वाण तीर्णविचिकित्स । उतिष्ठेते देवमनुष्यहिते दिशतिमार्गभिममनुत्तमम् ।। ३७ ।। (१०)। कर्म विमत मार्गदेशनम् । कारुण्येन विनोदित सदेहोऽय स्वाख्यातो मार्ग ॥ ३८ ॥ (११)। ह्यनुत्तरो लव्य स्वात्यात प्रथम ( ३२ ) अन्त सत्य सुव्याकृत धर्मपद मार्गमनुआति स्वाजीवायै । दूराद अपश्यत संदेहस्थान मार्गानुगाऽऽजीवा नाम || ३६ ।। (१२)। तिष्ठति दुष्टता बहि शुक्लो विशुद्ध इव । मिथ्या अयमस्ति मार्गमलकर ॥४०॥ (१३)। योऽस्ति कुशलोऽकुशल । शुद्वश्चा शुद्ध एव वा । दृश्यते सु दरो वहि, ताम्रमिव स्वर्णाक्तम ॥४१॥ (१४)। पृथग्जना शसति त न त्यजति श्रद्वामलम् ॥ ४२ ॥ (१५ )। पुरुप कोऽपि सघधरोऽन्त कलुपो वहि शुद्ध । दर्शयते दुप्टपदचिन्ह वस्तु च निदधात्यनवधानम् ।। ४३ ॥ (१६)। न पश्येद् वाह्य रूप पश्यति तत्क्षण समन्यते । दर्शयति कुहना मिथ्या पदचिन्ह वस्तुतो निदधा मित्यसयमम् ॥४४॥ (१७) अथ चुन्द कर्मारपुत्र एक नीच श्रासन प्रादाय वुद्वस्य पुरतो न्यपीदत् । अथ वुद्ध श्रानुपृर्येण धर्म्यया कथया त सदर्य समादाय सप्रहार्य सघेनानुगम्यमान प्रकान्त । अध पलु भगवान् अन्तरामार्ग एकस्मिन वृनमूले स्थित श्रानन्द प्रामत्रया- भास-"खरावेदना पृष्ठ में जाग्लायते, प्रज्ञापय निपीदनम् ए इत्युक वा म निपीदन प्रतापयामास। भगवान् प्रत्ता आसने न्यपीदन् । नय नानन्ोपि एक नीच पासन गृही. या उद्धस्य पुरतो न्यपोरन । बुट्टो नोचत- ( ३४ ) । न्यषीदत् । अथ खलु पचमात्राणि शकटशतानि तस्य पार्श्वतोऽतिकातीनी शकटनिोप निर्घोषयन्ति, अवलोकितानि तेननतु श्रुतानि । अथ ग्बलु अन्यतर पुरूपो ऽपृच्छत् ममाचार्य-अपि भन्ते । इत पचमात्राणि शकटशतानि अतिक्रातानि दृष्टानि भवता ?" "न खलु अपश्य" इति प्रत्युवाच । पुनर पृच्छत्-"श्रुतानि?" "न अशृण्व"-इति प्रत्युवाच । पुनरपि स अपृच्छन्- अपि भन्ते ? भवान् इहैव स्थितो अन्यत्र वा ? इहैवस्थित इति प्रत्युवाच पुनर पृच्छत किं भन्ते । उद्बुद ?"उद्बुद्व इति प्रत्युवाच । पुनर पृच्छन-किं सुप्त न सुप्त भु इति प्रत्युवाच । तस्य पुरुपस्य एतद् अभूत -आश्चर्य । अदभुत भो । शान्तेन वत भो। प्रजिताविहारेण विहरन्ति यत्र ही सज्ञी समान । शकटनिर्घोप न पश्येन न पुन शब्द शृणुयात् । अथ ममाचार्यो- ऽवोश्चत-"पूर्व पच मात्राणि शफट शतानि एतेन मार्गण अतिक्रान्नानि, तथापि न शफट निर्घोप अश्रृण्वम कथ अन्योऽत्रणोत् ? अध पुल्कसोऽ भिवाद्य समोद्य प्रकान्त । बुद्ध तदा पुल्कम आमत्रयामास तक मन्यतरोज । क्तमन्नु टुप्कतर दुरभिमभवतर वा यो वा सज्ञी समान अनेरेपा शरटाना निर्घोप न गृणुयात, इत्येतयो कतमन्तु टुप्परतरम ?" रोजो बुद्ध अवोचत-मम दम सहस्राण शक्टाना निर्योप स्यावरण 4 समान स्यात् । अनि निपोपस्या अषणेन । यथा हि कठोम्या शनिनि!पर उ पृपियाराशमा प्ररम्भमन्य न अपण एव अस्ति दुरतरम ।" उद्धा बोचत पुन- प्रातुमाग्रामे मिहारामि बुमागारे नदा अम्मान पनि देव निमिटा ननिकन मी निजात ।नम्मिन खलु समये अह बुमागारात् निदा ! - र पुर नन्मात मदाननकायान मम म्यान उपमतम्य yि FM वारिन । न आपोच मित्र - -7 , म पुस्पा ट एन-न्य पुन मते ' पत्र 4म पुन अपचन-चार वन भो टन स" :--17 विटा-ि, नि; " - 73 मन- 7 भगत नत्र मान और - 1717 4 ( ३५ ) मे भन्ते । दुष्य तस्मिन् समये पुल्कस शृ गिवर्ण कनकपित दुष्ययुग शत सहस्राधं उपनाम्य आसनाद् उत्थाय अजलिं प्रणाम्य बुद्ध अवोचत्-~" इद भगवान् प्रतिगृहणातु।" बुद्धोऽवोचत् पुल्कस-"तेनहि एकेन मां अच्छादय एकेन आनन्दम् ।" अथ पुल्कसो बुद्धस्य आदेश प्रतिगृह्य एकं तथागताय अदाद् एक च आनन्दाय । प्रत्यगृहणात् च बुद्धोऽनुकपा उपादाय अथ पुल्कसो' बुद्धस्य पादौ अभ्यवदत । बुद्ध एक पाश्वासीन आनुव्र्येण धर्म अदिशत् प्राकाशयत् धर्म नृशसा समाहर्पच्च. (तद) यथा-दानकथा शीलकथा स्वर्गकथा कामानां आदिनत्र अपकार सक्लेश पासवाण निरोध नैष्क्रम्मस्य आनृशसाम् । यदा बुद्धोरऽज्ञासीत् पुल्कस मल्लपुत्रं कल्पचित्त मृदुचित विनोवरणचित्त प्रसन्नचित अथ बुद्धाना धर्मदेशनाम पुल्कसाय प्रकाशयामास । दु ख आर्यसत्य दु खसमुदय, दु खनिरोध दुःख निरोध मार्गसत्यं(च)। यथा शुद्ध वस्त्रंसम्यगेव रजन प्रतिगृहणीयात् एवमेव शुद्ध चित्तस्य पुल्ककसस्य तस्मिन्नेव श्रासने विरजं वीतमल धर्मचक्षु रूदपादि-यतकिंचित् समुदय धर्म सर्व तद निरोधधर्म इति । अथ खलु पुलकस' अविनिपातिकोऽभय प्राप्तो भगवन्त अवोचत् एषोऽह बुद्ध शरण गच्छामि, धर्म शरण गच्छामि, सघ शरण गच्छामि, उपासक मा तथागतो धारयतु अद्यप्रभृति पाण्युपेत यावज्जीव प्राणातिपात विरत अदत्तादानविरत, काम मिथ्याचारविरत, मद्य पान विरत, मृपावादविरत, गृहणातु मा भगवान् सद्धर्मे उपासकम् ।" पुनश्च स भगवन्त अवोचत्- “यदा च भगवान् चारिका चरमाण पावानगर उपसक मेत, उपसक्रमतु में गेहे प्रतिगृहणातु पान भोजनं शयनासन सूप भैषज्य च भगवते प्रदत्त भवेत । भगवान् कुल (में) उपगच्छतु। बुद्धोऽवोचत-"साधु ते वचन !" अथ पुल्कसो भगवता दृष्ट धर्म प्रदर्शित धर्म हट तुष्ट उत्थाय आसनात् शिरसा भगवत पादौ अभिवाद्य प्रक्रान्त । अचिर प्रक्रान्ते च तस्मिन् आनन्द तत् शृ गिवर्ण दूष्य तथागताय उपनामयामास, प्रत्यगृहणात् च तथागतोऽनुकपा उपादाय न्यवासयच्च शरीरे। तस्मिन् समये भगवत रूप प्रत्यन्त पर्यवदात, इन्द्रि- याणि परिशुद्धानि मुखवर्ण प्रसन्न । अथ आयुष्मत आनन्दस्य एतद भूत पंच- विशति वत्सरेभ्य उपतिष्ठामि भगवन्त, न मे पूर्वं बुद्धस्य मुखवर्ण एव प्रभाभास्वरे ( ३६ ) दुष्ट यथा इदानीम् । अथ स उत्थाय आसनाद् वाम जानु पृथिव्या निपात्य अजलि प्रणाम्य बुद्ध अवोचत्-"पचविशतिसरेभ्योऽह भगवन्त उपतिष्ठामि न च (मे) पूर्व बुद्धस्य छविवर्णं एव प्रभास्वरो दृष्ट यथा इदानी न जाने किकारण कोवार्थोस्येति श्रोतुकाम ?" बुद्धोऽवोचत- "इह अानन्द । द्वयो कालयो अत्यत तथागतस्य काय पर्यवदातो ऽनन्य साधारण (१) प्रथम झाल यदा च बुद्धोऽनुतरा सम्यक सवोधि अभिसबुद्धः (२) द्वितीय काल यदा अनुपादिशेपे निर्वाणे परिनिर्वाति एतयो कालयो पानद । तथागतस्य वर्ण प्रभास्वर अनन्यसाधारण ।" तस्मिन् (एव) काले भगवान् गाययाऽध्यभाप्त- - थ गिवर्ण युग मृष्ट पुल्कसो ह्यभ्यहारयत् । तेन चान्दादित शास्ता हैमवर्णोऽभ्यशोभत ।। ४७ ।। (२०) अथ स्वन्तु बुद्धोऽवोचत्- “दघ मे त्व आनन्द पानीय अाहर । पिपासितो ऽस्मि ।” अानन्दोऽवोचत्- 'दानी भन्ते । पचमात्राणि शक्टशतानि उत्स्रोतो ऽतिमातानि, तन चन्दिन्न उदक आविल अपरिशुद्ध पाद प्रक्षालनीय तु पानीयम एक यावत तृतीय भगवान अवोचन "दर मे त्व ग्रानद । पानीय माटर पिसासिनोस्मि । नयी वाचत- 'टर नन्ले । सपा नी विदारेन्टोटका शातो का, मो, नत्र नावान पानप च पश्यति मात्रा व नालयिायति ।' न मार निरास टेपना द्र मार्ग:ति सद्वा प्रमन्ना -74 - 411 4 27 व च दोनुपमान २P 4 J - पंचमात्राणि शकटशतानि उत्स्रोत परतोर गतानि । तेराविल कृतमुदक न पानीय इति विभेमि ।।५०।। (२३) नदी ककुत्सा स्यति नातिदूर श्रच्छोदका शीतशुद्धोदका च । तत्र गत्वा पानीय भवेन प्रक्षालनीय च गात्राणाम् ॥५१॥ (२४) हिमगिरिवासिनी देवताऽथ प्रादात् जल तथागताय । पीत्वा जल प्राप्य वल जनेपु सिंहपथाद् अगच्छत् ।।५२।। (२५) तस्मिन् जले वसति नागदेव , स्वच्छे शुद्धे नीरजे च । आर्यो नलान्तरूप सगौरव ककुत्साया पारगत ॥५३॥ (२६) अथ खलु भगवान् ककुत्सा नदी समुपक्रम्य पीत्वा प्रक्षाल्य गात्रं सधेन सह गच्छन् अध्वान मार्गे प्रतिपन्न एकस्मिन् वृक्षमूले आयुष्मन्त चुन्दक आमत्रयाचकार- इघमे त्वं चतुर्गुणा सघाटी प्रज्ञापय पृष्ठ मे ग्लायते, निपत्स्यामि ।" "एवं भन्ते ।" इति प्रतिश्रुत्य आयुष्मान् चुन्दर प्रज्ञापयाचकार सघाटी, भगवांश्च तस्योपरि न्यपीदत् । आयुष्मान् चुन्दकोऽभिवाद्य एक मन्त निपएणो युद्धम- वोचत् --"परिनिर्वातुकामोऽह परिनिर्वातुकामोऽऽह ।” बुद्धस्त अवोचत्-“यस्य त्व- काल मन्यसे । अथ भगवान् गाथामिरवोचत्-- गत्वा हि बुद्धी नदी ककुत्सा अच्छोदका शातोदकां विप्रसन्नाम् । अवगाह्य शास्ता ह्यक्लान्तरूप स्नात्वापर पारमुततार ।।५४।। (७) पुरस्कृतो भिक्षुसघस्य मध्य आमत्रयत् चुन्दक नाम भिनुम् । "अह इदानीमतिक्लान्तरूप त्व क्षिप्र सस्तर ह्यासन में" ||५|| (२८) आज्ञापित चुन्द (सघाटी) चतुगुणा समास्तरत् क्षिप्रमेव । न्यपद्यत शास्त्रा ह्याक्लान्तरूप चुन्दोऽपि सन्मुखे न्यपीदत् ।।५६।। (६) अथायोचद भगवन्त चुन्दो निर्वातु कामोऽहनिर्वाणम् । अरागादवेष स्थान गमिष्यामह तत् पदम् ॥५७|| (३०) अतस्यैयानाम् पुण्याना नदी पुरूपोऽनुत्तर तमुवाच । "कृत ते करणीय जानासीदानीमेतस्य कालम् ॥५८।। ( ३१) बुद्वस्याधिवासन चुन्दो द्विगुणोत्साहेन । विनाश्य निरवशेष सरकार परिनिवृतो यथाग्निनिवृत ॥ (३०) दृष्टया ( ३८ ) अथ आनन्द उत्थाय प्रासनाद् बुद्ध अवोचत्- "परिनिवृते बुद्व भगवत शरीरे कथ प्रतिपत्तव्यम्" ? ।। बुद्व उवाच- "अव्यावृता भवथ अानन्द | यूय घटथ स्वीये करणीये । बुद्ध अभिप्रसन्ना जना हृष्टा स्वय तत् करिष्यन्ति ।" अथ आनन्दो द्वितीयमपि तृतीयमपि अपृच्छन-"परिनिवृत्त बुद्धे भगवत शरीरे कय प्रतिपतव्यम्।" बुद्धोऽयोचत-बुद्वस्य शरीरे तथा प्रतिपतव्य यथा चावर्तिन आर्यस्य राज शरीरे ।" आनन्द पुनरपि अोचत् - "कय चकातिन आर्यस्य शरीरे प्रतिपयते ।" बुद्व-आनन्द अपोचत-आर्यस्य राज शरीर प्रथम मुगप जलेन स्नापयन्ति, तस्य शरीर अहतेन कार्पासेन वेप्टयन्ति बन्नति शरीर पचभिमर्द'यशने । पुनश्चापर वेष्टयित्वा तत शरीर सुवर्ण द्रोण्या तेल परिपूर्णाया प्रक्षिप्य ता सुवर्णद्रोणी प्रक्षिपन्ति द्वितीयरमा आयस्था द्रोण्या चदनपटालादितायाम । पुनश्चापर डिगुण नद् प्रसिद्ध नाना गन्धमाप्ट तनुपरिटान प्रयाग चिताया आदहन्ति । ममा तो तम्या शरीगणि चिन्वन्ति चतुर्माहप स्तूप स्थापयन्ति न च उधारयन्ति । तत्र पान्या धर्म- राजस्य स्तृप नष्टवा चित्त प्रमापियति सम्यग् उपदेशतो बहुलायिन भविष्यन्ति । पर मानन्द ' स चेन वादय शरीर मे प्रथम मुग व जलेन स्नपनीय नान वापसिन नन परिवेष्टपिता न च शरीर पचभिग्यशने । पुनश्चापर स्पादित शरीर पर दो परिपायाम न न्याय मुद्रागी द्वितीयम्या ' गा; या पाच चन्दनराटनाचा विचार अन्न हि द्विगुणा होम ::-" परिण्ट ट प्रान्माला तर मन्यन । नत मत्रीय ( ३६ ) तूष्णीं यूय आनन्द । भवथ चिन्तयथ स्वीय करणीयम् । लोका अभिप्रसन्ना स्वय हृष्टा. तत् करिष्यन्ति ।।६।। (३४) आनद पुनरपृच्छत् बुद्ध प्रत्युवाच चक्रवर्तिशवक्रियाम् । "तथा प्रतिपत्तव्य तथागत शरीर दुष्यै संवेष्टय द्रोण्या ॥६॥ (३५) चतुष्पथे स्थाय स्तूप. लाभाय सर्वसत्वानाम । अभिवाद्य जना सर्वे लप्स्यन्तेऽसख्येयानि पुण्यानि ॥६३।। (३६) बुद्धोऽवोचत् "चत्वार अानन्द । पुरुषा नोके स्तूपार्दा गधपुष्पध्वजनृत्यगि- तार्हा । कतमे चत्वार । (१) प्रथम तथागत. स्तूपाई (२) द्वितीय प्रत्येक बुद्ध स्तूपाई. (३) तृतीय तथागत श्रावक (४) चतुर्थ चक्रवर्ती राजा च । इम आनद । चत्वार पुरुषा स्तुपार्दा गन्धपुष्पनृत्यगिताहीं ।" तस्मिन् काले भगवान् गाथाभ्या अवोचत्- "बुद्ध प्रथम स्तूपार्ह प्रत्येक वुद्ध श्रावकश्च । आर्यो राजा चक्रवर्ती शास्ता नेता चातुर्दिशस्वामी ॥६४॥ (३७) इमे चत्वारो दानार्हा इति व्याकरोत् तथागतः । बुद्ध प्रत्येक श्रावको राजा च चक्रवर्ती स्तूपाहीं ॥६५॥ (३८) अथ भगवान् अवोचत्-पायाव आनन्द । कुशी नगरे मल्लानां अन्तरेण कशालयो । एव"-इति प्रत्यूवाच आनन्द' । अथ खलु भगवान् महता भिक्षु सधेन सार्व अध्यानमार्ग प्रतिपन्नो भवति । दा एको ब्राह्मण कुशीनगरात् पावानगर गच्छन् मार्गे दुरतो भगवन्त अभिरूप शान्तेन्द्रिय अपश्यत् । दृष्टवा च अभिप्रसन्नचित्त' स्वय उपसंक्रम्य बुद्धत्य सन्तिके अभिवाद्य एकमन्तं निपएणो बुद्ध अवोचत्-"अहं हि वसामि इतोनातीदूर एकस्मिन् प्रामे अधिवासयतु मे गौतम ! रात्रिवास, प्रात भक्त परिसमाप्य नगर उपमक्रमतु ।" बुद्वोऽवोचत-"अल ब्राह्मण । अल इदानी ते दानेन निष्टितो में भक्त काल ।" ब्राह्मणो यावत् तृतीय अयाचत । बुद्ध गधापूर्व प्रत्ययोचत, पुनश्च अवदत् "त्व आनन्द । पश्चात् ब्राह्मण एन अर्थ वद ।" - -- (४०) अथ ब्रह्मो बुद्धस्य वचन श्रुत्वा आनन्द उपमक्रम्य अभिवाद्य च एकमन्त स्थितोऽवोचत्-"भन्ते आनन्द । अह इतो नातिदूर एकस्मिन ग्रामे धमामि, अधि- वासयतु गौतम तत्र रात्रिवास प्रात भक्त परिसमाप्य नगर उपसक्रमतु।" आनन्द प्रत्युवाच-"अल ब्राह्मण | अल इदानो ते दानेन । पुनश्च ब्राह्मणो यावत् तृतीय अयाचत । आनन्द प्रत्युवाच-'काल अय ग्रीप्माणा उपण ग्रामश्च ते दूरवर्ती, भगवान् हि आक्लान्त न कमाई।" अथ एतमेवार्य विदित्या भगवान गाथाभि अवोचत्- विशुद्ध चित्त पथि उपागान आग्लान्त यमकशालाभिमुग्यम् । दूराद् अपश्यद् युद्ध ब्राह्मण निप्रमुपागम्य शिरमाऽभिवदत ।।६६।। (३६) दत समीपे ग्रामो मेऽनुरूपया वसतु एकरात्रम् । करोमि लघुदान प्रयातु ॥६७।। (४०) पाक्लान्तो ब्राहाण । मे शरीर दूर माग न गन्तुमर्ह । अपलोक्य भाडागारिक पृष्टत व वक्तुमर्हसि एनमम ।।६८।। (४१) वृद्धस्याना उपागमद् यानद अधिवासातु में ग्राम गन्तु मुक्त्वा गन्यतु ॥६।। (१२) चाचानन्द ग्रीन कालो गन्तुर्मह । त्रि निमन मनोरयो मनोरयो दुबी दुर्गनाऽमतुष्ट ।।७०|| (१३) मात्रा में माना 6 परिपन माना अन्थिरा सदा । दना यसमारो रन नापति में शरीरम ।।७.५1 (1) ) में nt निवागतानिन । निरिमानो1510 (1) प्रात अय तन्नगर प्राग स सतिकै । प्रात यन्तमल न न (४१ ) - भूमौ अकालपुपाणि अवाकिरत । तदा भगवान् अवोचत्- "इय मे आनन्द । यमकशालयो देवताऽ कालपुष्प पूजयति । न च एतावता तथागतस्य पूजा भवति ।" आनन्दोऽवोचत्- यो ही श्रानन्द | पुरूषो धर्मानुधर्म प्रति पन्नो नुधर्म चारी भवति साहि तेन तथागतस्य पूजा कता उच्यते ।" आनन्दोऽवोचत् “कथ तर्हिभन्ते । तथागतस्य पूजा भवति " बुद्धोऽवोचत् - योहि आनन्द | पुरूषो धर्मानुधर्म प्रति पन्नोऽनुधर्म चारि भवति तेन तथा गतस्य पूजा कृता उच्यते । अथ एनमेव अर्थ विदित्वा बुद्धो गाथाभिरवोचत्- यमकशालयोर्मध्ये प्रतिसल्लीनो बुद्धोऽकम्पचित्त । वृतदेवता परिशुद्धमानसाऽवाकिरत पुष्पाणि बुद्धस्यो परि ।।७३।। (४६) उवाच बुद्ध वचन आनन्दः का तर्हि पूजा । उपलभ्य धर्ममयाचरेत(यत)तद् दोघे पुष्प भवति सा पूजा ।।७४।। (१७) चक्रोपममरूण पुष्पमाकिर्ण (तेन) न भवति बुद्ध पूजा । स्कधधात्वायतनानि नात्माऽतो न पूजोच्यते सा ॥७५|| (४८) तस्मिन् काले आयुष्मान् उपवानो भगवत पुरत स्थित भवति बुद्धं व्यजमान अथ बुद्ध त अवोचत "मा मेपुरत तिष्ठ ।" आनन्द तुष्णी स्वयं चिन्तयामास"अयं खलु आयुष्मान् उपवानो दीर्घरात्र बुद्धस्य उपस्थाक सतिकावचर' सत्कारा पेक्षोऽभूत । एतर्हि पश्चिमे काले तथागत' सेवातोऽसन्तुष्टोऽपसारयति त सेवात । को हि पुन हेतु कस्मात एव करोति " अथ श्रानन्द चीवरं ससमेत्य उपसक्रम्रा भगवन्त एव अवोचत् .. "भयं भन्ते ! उपवानो दीर्घरात्र बुद्धम्य उपस्थाक सतिकावचर कोहि हेतु कस्मात् एव कगेति। बुद्धोऽवोचत्-'आनद । कुशीनगरात् समन्तत धाम दक्षिणत यावद् द्वादश योजनानि सर्वत्र महेशाख्या देवता वास परि गृहीतवत्य , नास्ति रिक्तं स्थानं । इमा महेशाख्या देवता उदध्यायन्ति "कथं अयं भिक्षु बुद्वस्य पुरत स्थित । अद्य व बुद्धोनाचिरेण नस्यति, इच्छामो वय सर्वादेवता(भगवन्त)द्रष्टुम् । - . .

(४२) " अय तु महेशाख्यो भिन्नु दर्शन वारयति, नच लभामहे तथागत वदितुम् । अयं हेतु आनन्द । येन अपेहीति मया उक्तम् ।" "आनदो बुद्ध अवोचत "अनेन भन्ते' ? आर्य भिक्षुणा पूर्व किं पुण्य अर्जित किं कर्म आचीर्ण, येनएतर्हि एव महेशाख्योस्ति ।" "बुद्धोऽवोचत्-एकनवतिकल्पत पूर्व आनन्द । लोकेऽभूदबुद्ध विपश्यी नाम । तदाऽयम् भिक्षु श्रद्धाप्रसन्न तस्य भगवत चैत्यस्य प्रकाशनाय तृणोल्काहस्ते- ऽधारयत् । अय हेतु अय प्रत्यय येन अय महेशास्य पालोकेन व्याप्नोति अष्टविशति देवलोक, नास्य (कोऽपि) समसम देवलोकेषु ।' अथ आनन्द उत्थाय श्रासनाद् दक्षिणासविवृत्य एकास उतरासग कृत्वा जानु निपात्य अजलिं कृत्वा बुद्ध एव अवोचत भन्ते । मा परिनिर्वातु बुद्ध अस्मिन क्षुद्र के नगर के शाखानगर के उज्जगत के खडिताया भूमौ सतिहि अन्यानि महानगराणि, तद्यथा चम्पा महानगरी, वैशाली नगरी, राजगृह नगर, साकेत नगर, श्रावस्ती नगरी, को शाबी नगरी, वारणसी नगरी, तत्र बहुजना बुद्ध चधर्मच अभिप्रसन्ना (ते) बुद्ध परिनिवृत बुद्धस्य शरीराणी पूजयिष्यन्ति सत्करिप्यति ।" - बुद्धोऽवोचत "अल अनद ' मा एव वद, मा एव वद इद नगर तुद्रक उज्जगलकम् । यतो हि भूतपूर्व अस्मिन् नगरे राजा ( अभन्) मुदर्शनो के नाम | ता दय नगरी कुशावती देयेण अशिनीयोजनानी विस्तारेण द्विशताशीति योजनानि (अमृत)। तदा (च) दय मुभिना ऋद्वा सीता रहुन नाकीणा | मप्रभि प्राकार परिच प दर दर नगरी ( अभूत ) मावि शर्ट-पाकीर्णा मध्ये तामा नगर्या च लवमाना रन्नघटा अपच (अम्य) पोम्प या पारा निवान र श६ - नंदन च डानश पोम्प नगन्य परि गोपुर उभेदेन हा- कौम्प मच टप पंप मायामन विशन गम्प मुवर्णमयम्य नगरम्य रोचक दृार सपनर नरम्य मर द्वार, चंदमयन्य नगरम्य व टूर कर र मन द्वारम तम्य नगरम्य रकमा चरने नं 'पु या चत्वारि - . तत्र तत्र 1 M मासुगमन मन (निनि 3 Fr स :ज है। ।

(४३) रत्नानि उपयुक्तानि । सुवर्णमये रौप्यमयी घटा, रोग्यमये गोपुरे सुवर्णमयी घटा । तस्यरत्नमय्या परिखाया सप्तविधानि कमलानि आरोहन्ति-उत्पलपुष्प, पदम पुष्प कुमुद पुष्पं पुडरीक पुष्प अधस्तात् । तलेऽस्य नगरस्य सुवर्णवालुका विकीर्णा । उभयो. पार्श्वयो रोपिता तालवृक्षा येषरां सुवर्णमया' स्कन्धा रौप्यमयानि पत्राणि पुष्पाणि फलानी च । रौप्यमयानां वृक्षाणा च सुवर्णमयानि पत्राणि पुष्पाणि फलानि स्फटिक मयाना वृक्षणां च वैदूर्यमयानि पत्राणि पुष्पाणि फलानि । तालवृक्षाणा मध्ये भवन्ति नाना पुष्करिण्य. शातजला अक्षार परिशुद्धा निर्मला चतुरत्नेष्टकाभि विरचिता' मध्ये च स्थापिता सुवर्णनि श्रेण्या रौप्यमय्य पद्धतय रौप्यम्यया नि श्रेण्या सुवर्ण मय्य पद्धतय वैदूर्यमय्यां नि श्रेण्यां स्फटिकमयी निः श्रेणिवेदिका यथा च पद्धति । परित परिधारिताश्च वेष्टन्य । "तस्मिन् नगरे सर्वत्र आरोहन्ति तालवृक्षा' तत्र सुवर्णमयानां वृक्षाणां रोप्यमयानि पत्राणि पुष्पाणि फलानि च रौप्यमयान वृक्षाण सुवर्णमयानि पत्राणि०, स्फटिकमयानां० वैदुर्यमयानि वैदुर्यमयाना० स्फटिकमयानि (पत्राणि ) पुष्पाणि फलानि च । वृक्षाणा मध्ये च गवन्ति चतुर्विधा रत्नपुष्करिण्य (यासु) आरोहन्ति चतुर्विधानि पुष्पाणि तस्य नगरस्य रथ्या वीथयश्च सुनिर्मिता । (ताल ) पतिभ्य वातेरिताभ्य पुष्पाणि मार्गपार्वे विकीर्णानि भवन्ति । मन्दः चातुर्दिशो मारूत उत्कम्पयति च रत्नवृक्षान् निर्गमयति च दिव्य सगीतमित्र वल्गु स्वरम् । तस्मिन् नगरे जना स्त्रिय पुरुषा हीना महान्त' च सव्रजन्ति आत्मनो मोदाय वृक्षाणा मध्ये । सा च नगरी सदा समन्विता (भवति ) शएख शब्दै. हरित शब्द अश्वशब्दै रथशकै पीवथ-खादय-तीथ शब्दै (इनि) दशभि शन्दै । "तस्मिन काले राजा महासुदर्शन सप्तभि रत्नै समन्वागत चतसभि मद्धिभि चतुरत राजा भवति । कतमानि तस्य सप्त रत्नानि । (१) प्रथम सुवर्णमय चकरत्नं, (२) द्वितीय श्वेत हस्ति-रत्न ( ३ ) तृतीय रोहदश्वरत्न, (४) चतुर्थ दिव्यमुक्ता रत्न, (५)पचम अभिरूप स्त्रीरत्न, (६) पष्ठ गृहपतिरत्न (७) सप्तम परिणायकरत्नम्। (१) कथ च राज्ञ' महा सुदर्शनस्य सुवर्णमय चक्ररत्न अभून् ? तदा ही पचदश्या पूर्णमास्या राज स्नानोपलिप्तस्य सुन्दरीभि परिवारितस्य प्रासादव व रगतस्य चक्ररत्न (४४) प्रादुरभूत सनेमिक सहस्रार भास्वरवर्णपरिपूर्ण देवशिल्पिना कृत वर्णनातीत शुद्धसुवर्णमय परिवेघेन चतुर्दशपौरूपम् । अथ राज्ञा महासुदशनस्य मनसि एव अभूत् श्रुत मया पूर्व पूर्वजेभ्य वृद्धभ्य क्षत्रियस्य ही राज्ञ मूर्वाभिषिक्तस्य पचदश्या पुर्णिमाया गधोदक स्नातस्य सुन्दरिभि परिवारितस्य प्रासादवरगतस्य सम्मुखे स्वय सुवर्णमय चक्र यदा प्रादुर्भवति सहस्रार भास्वरवर्ण परिपूर्ण देव शिल्पिना कृत लोकोत्तर परिशुद्ध सुवर्णमय परिवेधेन चतुर्दशपौरूप तदा हि स उच्यते। आर्य च राजा चक्रवर्तीति एतहि राजा चक्रवर्ती २ यत्र अह शपस्यामि इद चक्ररत्नम् ।" "अथ राजा महासुदर्शन चतुरगिनी सेना आमनयामास-अभि गन्थ भणे । चक रत्न दक्षिणा संविवृत्य कृत्वा जानु निपात्य भूमौ दक्षिणेन हस्तेन सुवर्णमय चक्र स्पृस्टवा वदथ-चक्रस्य प्राकृत नियम अनुल्लघ्य अदेशकमेण पूर्वाभि मुस प्रवर्त्तताम् । अध परावृत्ति काले राजा सुदर्शन चतुरगिनी सेना सुवर्णमय चत्ररत्नभि मुस प्रेपयामास । दिव्यनायकस्य चक्रस्य चतु स्थिति प्रदेशेषु राजा रथ स्था- पयामास । तस्मिन् काले पूर्वस्या दिशि लघुभूपाला महाराज आयान्त दृष्टवा सौवर्ण मये पात्रं रोयत दुल रोयमये पात्रे सुवर्णमय नडुल निवाय राज्ञाना उपमनग्य शिरसाऽभिवाटा अवोचन-स्वागत ते महारान । दय ऋद्धा म्फीता बहुजना कोण दशदिगता भूमि , अस्मिन शान्तिमये काले च वय दया वधुतापरवशा भक्ता सदा श्रानान वर्तिन भविष्यामि । यथा पार्यो राना अनुशास्ति न यथा देश यथाकाल तद् वयसरियाम ।। एकास उत्तरा सघ राग मन तान लशुनपान श्राद 'अन भद्र जना । यययन्म नाम्यय तत् पनी म ( ल ) २ सादर शान अनुरनय मा कुम्य व्यापार मा - चर५ देश अमर न वो नमशनन व प्रति रान नो एन अनुगन्यतो यावत पूर्वमागर समान का 'ना Pिrनर पाचम' किस खरा विश च चत्र ता रानानी पिपरिक १ .

( ४५ ) - अथ राजा सुदर्शन सुवर्णमय चक्र अनुगच्छन् यावत चतु समुद्रा सुखेन जनान् अनुशास्य यदा स्वकजनपदे कुशावतीनगर प्रतिनिवृत तदा सुवर्णमय चकरत्न अपि आगत्य प्रासाद द्वारे अर्यावकाशेऽतिष्ठत् । राजा महासुदर्शन हरतुष्ट आह -अद्धा इद मे सुवर्णमय चक्ररत्न शुभ निमित अहहि एतहि सत्य आर्यो राजा चक्रवर्ती (ति) इदमेव अभूत् तस्य सुवर्ण मय चक्ररत्नम् । (२) कथ पुनः अभूदु राज्ञो महासुदर्शनस्य श्वेत हस्तिरत्न ? तदा राजो महा- सुदर्शनस्य प्रासावरगतस्य प्रातरेव अभिमुखे सहज हस्तिरत्न प्रादुरभूत । तस्य केशा सर्चष्वेता सप्तपु स्थानेषु सुप्रतिष्ठित वली विहाय सगम । वर्गोंकित तस्य शिर श्रुद्र सुशिरा नातिसुवर्णपरिपूर्णा पड् दन्ता' | त दृष्ट्वा राजा आह "भद्रक वत मे इद हस्तिरत्न यावत् सुदान्त चेद् अभविष्यत् राजरथे च योजित भवेत् ।” अथ स हस्ति दान्त सर्वे. गुणे पुर्णोऽभूत । तदा राजा महासुदर्शन वयं विमृश्य हस्तिन अभिरूह्य पूर्वाह्न समय नगरात निर्गत्य यावत चतु समुद्र सर्वत्र गत्वा भोजनकाले प्रत्यागत । तदा राजा सुदर्शनो दृष्टतुष्ट एव अाह-इट ही मे श्वेत हस्तिरत्न शुभनिमितम् । सत्यमेव इदानी अह आर्यो राजा , चकवर्ती इद च मे हस्तिरत्नम् ।" (३) कथ राज्ञो महासुदर्शनस्य रोहित अश्वरल प्रादुरनूत । राज्ञो महा सुदर्शनस्य प्रासाद वर निशष्णस्य प्रात रेव सहज अश्व रत्न प्रादुर्भूत तस्य अश्वस्य पुरस्तिम भाग रक्तहरितवर्ण पुच्छशिर कठेपुरता केशावलवान् काकवद् विहायसगम' च । अथ राजा त दृष्टवा आह-"भद्रकवत इद अश्वरत्न सुदान्त रयोयोजित च अभविष्यत" अथ स दान्त सर्वे गुणे परिपूर्ण अभवत् । तदा राजा सुदर्शन स्वय विमृश्य अश्वरल समारुय पूर्वाहणसमय नगरात निर्गत्ययावन चतु समुद्र सर्वत्र गत्या भोजन काले प्रत्यागत । अथ राजा सुदर्शनो हृष्ट तुष्ट आह-"इद हि मे रोहित अश्वरल शुभनिमित्त सत्यमेव इहानी अह आर्यो राजा चक्रवती इद च मे रोहित अश्व रत्नम्। (४) कथ राज्ञो महासुदर्शनस्य दिव्य मुक्तारत्नम् ? राजो महा-सुदर्शस्य प्रासादव- निपरणस्य अभिमुखे प्रातरेव सहज दिव्य मुक्तारत्न (मणिरत्नं ) प्रादुरभूत शुभ्र अच्छ निर्मलम् । अथ राना तद् दृष्टया आह-“भद्रकावत् इय मुन्ना, मा चेत भास्वर। अन्त, प्रासाद प्राकाशयिष्यत् ।' अब राजा सुदर्शन स्वय विमृश्य चतुरगोनो ( ४६ ) । सेना सन्नह्य तद् मुक्ता रत्न ध्वजाने समारोग्य रात्र्यधकारे प्रायात | नगराद् बहि त्रिंशद् योजन नगरे च जना तेन मुक्ताभासेन दिवेति कथयन्त कांतानी चक्र । अथ राजा सुदर्शनो हृष्टतुष्ट आह-''इद मे एतहि सहज दिव्य मुक्ता रत्न शुभनिमित सत्यमेव इदानी अह राजा चक्रवर्ती इद च मे दिव्य मुक्तारत्नम् ।' (५) कथ पुन राज्ञो महासुदर्शनस्य स्त्रीरत्नम्, उदा तस्य स्त्रीरत्न प्रादुरभूद् अभि- रूप दर्शनीय प्रासादिक परमया वर्णपुष्कलतया समन्वागतम् नातिदीर्घ नातिहस्व नातिस्थूल नातिकृश नात्यवदात नातिकृष्ण नातिकठिन नातिकोमल, शीते तस्या (स्त्रिय ) गाज्ञाणि उष्णानि उष्णे गात्राणि शीतानि तस्या कायलोमकूपत चदन- गव मुखत उत्पलगव स्वर कोमल गति भद्रा । सा हि राज्ञ पूर्वोथायिनी पश्चान्नि- पातिनी किंकारगवेपिणी । राजा सुदर्शनश्च तस्या परिशुद्व-चित अरागचित्त , अना- सक्तचित । तदा राजा सुदर्शनो हृष्ट तुप्ट एव आह-इद मे एतहि सहज स्त्रीरत्न शुभनिमित सत्यमेव इदानी अह राजा चक्रवर्ती इद चे मे स्त्रीरत्नम् । (६) कथ पुन राज्ञ सुदर्शनस्य गृहपतिरत्नम् ? प्रादुर्भूते गृहपतिरत्ने स्वय सहज रत्ननिधान असख्येय वन च प्रादुरभूत | गृहपते कर्मविपाकेन दिव्य चक्षु जात येन पृथिव्या निहित सस्वामिक अस्वामिक च सर्वनिविं पश्यति, जात्वा च सस्यामिक परिनति अस्वामिक च उपलभयति राज्ञ उपयोगाय । अथ गृहपतिरत्न राजान उपसम्म्य आह-"अल्पोतमुको भव महाराज । देयेपु अह स्वय करणींच परिप्यामि .'' अथ राजा सुदर्शन गृहपतिरत्न मीमास्मानोऽल कृत्वा नाव श्रादिश्य जलऽयगाय गृहपतिरत्न अवाचन । अर्थो मे गृहपते सुवर्ण निपिना क्षि। मे देहि ।" गृह पनि प्रत्युपाच-"तन स्लोर विरमतु तेऽयं नुवर्णन यावत् तर आमादयान ? राना च पनि साह-"मल दानीमेर प्रिया में सुवर्गन तद उपानय । अथ परिन राजा मातिए नव नोकापा आनन्य दगिन इन्तन र समन्य ।

(७) कथं पुन राज्ञो महासुदर्शनस्य परिणायक ( सेनापति ) रत्नम् । तदा राज्ञ परिणायकरत्न प्रादुरभूत् स च परिणायक पंडित,व्यक्त एकक प्रतिवल विनिश्चेतुम । स राजान उपसक्रम्य एव आह-सति अभियाने महाराज | अल्पोत्सुको भव । अहं ते करणीय करिष्यामि ।' अथ राना महासुदर्शन परिणायफरल मीसांसमान चतुरगिनी सेना आकार्य तं एव अाह तेन त्व एतहि असंचिता सेनां संगृहाण संचिता च विमजस्व असरलां च सरलां विधेही सरलां च शिथिला विधेहि, आगता च गता च स्थिताम् ।" अथ परिणायकरत्न राज्ञो वचन उपश्रुत्य आज्ञाप्य चतुरगिनी सेनां असंचितां समचिनोत, सचिता व्यभजत असरला साल्यक्रोत, सरला अशिथिलयत आगतां गता, गता च स्थितां व्यधात । अथ राजा सुदर्शनो हृष्टतुष्ट एव आह- "इद मे सहज परिणायकरत्न शुभनिर्मित सत्यमेव इदानी अह आर्यो राजा चक्रवर्ती । इद च मेडिस्त परिणायकरत्नम् । "एतानी आनद । आर्यस्य राज्ञ' चक्रवर्तिन सुदर्शनस्य सप्त रत्नानि । "का पुन सति तस्य चतस्रो ऋद्धय ? (१) स राजा सुदर्शन अभूत दीर्घायु नाकाले मरणधर्मा अन्यै. असमसम' (२) कायेन स बलवान् अना- वाधिक अन्यै असमसम । (३) स अभूत अभिरुपो दर्शनीय' अन्यै असमसम (४) तस्य कोशागार परिपूर्ण पर्यापन्न अन्यै असमसम् । "इमानी भवन्ति मार्यस्य राज्ञ चक्रवर्तिनः सप्त रत्नादि चतस्रश्च ऋद्धय ।" "राजा आनद । सुदर्शन तदा रथेन उद्यान गन्तु आमय सारथिं अवोचत्-साधुक त्व रथ नय सेखेन गमनाय ।' तत् कस्मात् ? यथा अह सुखेन चिरतंर जनपदजमान् पञ्चेय मा च जनपदजना कप्टेन मा पश्येयु । जनाश्च सारथिं अवोचत्-तेन अत्वरमाण' व गच्छ यथा वय आय राजान पश्येम अभिरूपम । तदा ही आनद । जानपदिका राज्ञ सुदर्शनस्य प्रिया मनापा भवन्ति यथा पितु प्रिय पुत्र जानापदि- काना च राजा प्रियो भवति यथा पुत्राणा पिता । ते प्रभून सा पतय दुर्लभ रत्न दातु राज्ञ आरोचपामासु-प्रतिगहणातु नो दानम् । राजा तान् प्रत्युवाच ममापि अस्ति सापतेय । यूय एव इतो हरथ । अन्यदा च राज्ञो मनमि एव अभूत यन्नु अह एतहि प्रासाद मापयेचं, कालेन काल यात्रा समये तद् जानपदिकानां गन्तव्यस्थान भविष्यति ।' तेच रानान सुदर्शन अवोचन- वय हि एतहि राज' . अल मो।

( ४८ ) अथ प्रासाद मापयाम । एव उक्तो राजा तान् उवाच-विचारित मयावो व-विचारित मयावो दान प्रतिग्रहविषये ममाऽपि अस्ति वहु सामतेयम् ।' अथ जानपदिका पुन राजान अवोचन्-इच्छामो वय राज्ञे प्रसाद मापयितुम् राजा जनान् प्रत्युवाच-यथा काम कुरुथ राज्ञ आदेश उपलभ्य जनै चतुरशीतीशकटसहस्र सुवर्ण आनीय कुशावत्या नगर्या धमप्रासाद मापयितु उपक्रान्तम् । तदा देवेपु विश्व- कर्मा देवपुत्र स्वभनसि चिन्तयामास-यन्नु अह राक्षे सुदर्शनाय वर्मप्रसाद मापयेयम । तदा आनद । विश्वकर्मा देवपुत्र धर्मप्रासीद मापयाचकार । आयामेन पष्ठि- योजन विस्तारेण त्रिंशद्योजन, चतुर्विधै रत्नैरसमल कृतम् । तस्य सौपानानि सप्तविधैं रत्न कुम्भै मस्मृतानि । तस्मिन् वर्मप्रासादेऽभूवन चतुरशीनि स्तम्भ सहस्राणि-सुवर्णमये स्तम्भे रोग्यमग फलक, रोग्यमये, स्तम्भे सुवर्णमय, फलक, वैदर्यमये स्तम्भ स्फटिकमय फ्लक्म । स्तम्भाना प्रासादस्य च परित चतुर्विधानि सोपानानि परिक्षितानि चतुरत्नमयानि। मोपानफल कानि च चतुरत्नमयानि । तस्मिन् वर्म-प्रासादे चतुरशीति कुटागार सहमाणि-रत्नमये- कृटागार, सुवर्णमय फलक, रोग्यमये द्वारि रोयनय कुटागार, मुघणमये द्वारि स्फटिक मयः, वेदृर्यमय टागारम। द्वारि च तया सुवर्णमये कुटागारे रोग्यमय पर्यन रोयमये स्टागारे सुवर्णमय पर्यः । तत्र सुगवि मुर्ग तन्तुभि उत्त पान्तरण, मटिर मये, वेदृर्य मयः, यमः, टागारे पयकोऽपि तपा। म प्र.नया प्रभामने, जनाना नेत्र मय दर जानाममान न पाप त काट मनमि पर प्रासाद मनन । स रात पत्शनास 7 जमन यन्न :

( ४८ ) , प्रासाद मापयाम ।' एव उक्तो राजा तान् उवाच-'विचारित मया वो दान-प्रतिग्रह- विषये, ममाऽपि अस्ति बहु सामतेयम् ।' ,अथ जानपदिका पुन राजान अबोचन्- 'इच्छामों वय राज्ञे प्रासादं मापयितुम् ।' राजा जनान् प्रत्युवाच 'यथाकाम कुरूथ ।' अथ राज्ञ आदेश उपलभ्य जनै चतुरशीतिशकटसहस्त्रः सुवर्ण आनीय कुशावत्या नगर्या धर्मप्रासाद मापयितु उपक्रान्तम् तदा देवेषु विश्वकर्मा देवपुत्रः स्वमनसि चिन्तयामास-'यन्नु अह राज्ञे सुदर्शनाय धर्मप्रसाद मापयेयम्' । तदा श्रानद । विश्वकर्मा देवपुत्र वर्मप्रासाद मापयाचकार आयामेन प्रष्ठियोजनं विस्तारण त्रिंशद्योजन, चतुर्विधै रत्नेस्लमलंकृतम् । तस्य सोपानानि सप्तविधे. रत्नकुम्भ सस्तृतानि । तस्मिन् धर्मप्रासादेऽभूवन चतुरशीतिस्तम्भमहस्राणि-सुवर्णमये स्तम्भे रौप्यमय फलक, रौप्यमये स्तम्भे सुवर्णमय फलक, वैदूर्यमये स्तम्भे स्फटिकमय फलकम् । स्तम्भाना प्रासादस्य च परित चतुर्विधानि सोपानानि परिक्षिप्तानि चतूर- लमयानि । सोपानफलकानि च चतूरत्नमयानि । तस्मिन् धर्मप्रासादे चतुरशीति- कूटागारसहस्राणिरत्नमये कूटागारे०, सुवर्णमय फलकं, रौप्यमये द्वारि रौप्यमय कूटीगार, सुवर्णमये द्वारि स्फटिकमयं , वैदूर्यमय झूटागारम् । द्वारि च तथा सुवर्णमये कूटागारे रौप्यमय पर्यक , रौप्यमये कूटागारे सुवर्षमय पर्यक । तत्र सुगधि सुवर्ण- तन्तुभि उक्त श्रास्तरण, स्फटिकमये, बैदूर्यमय वैदूर्यमये कूटागारे पर्यकोऽपि तथा । स प्रासाद प्रभया प्रभासते, जनाना, नेत्रै सूर्य इव आभासमान न कोऽपि त दुष्ट शक्नुयात् । अथ राज्ञः सुदर्शनस्य मनमि एव अभूत्-'यन्नु अह अस्य प्रासादस्य परित' मापयेय तालवन पुष्करिणी च ' तदा राजा मापयामास (ताल ) वन आयामेन एफयोजनम् । पुनश्च तस्य मनसि अभूत्-'यन्नु धर्मप्रसादस्य पुरस्तात् मापयेय धर्मपुष्करिणी । अथ स क्षिप्र ता मापयामाम आयामेन् एकयोजना. तस्या उदक स्वच्छ परिशुद्ध निर्मलम् । तम्या तल च चतूरत्नमयीभि इष्टकामि. चित्त, पुष्करिणी च (मा) पीतसुवर्णमय श्वेतरौप्यमये , स्कटिकमयै , वैदूर्यमय च चतुर्वणे सोपानै परिक्षिप्ता, चतुर्मीरले संस्कृता । तस्या पुष्करिण्या उद्रके प्ररूढानि नानाविधानि पुष्पाणि, तद्यथा-उत्सलानि, पद्मानि, कुमुदानि, पुंडरीकानि, चाति तेभ्य सूक्ष्मो गध' प्रसरति च स चतम्म्पु दिन्नु। तस्या पुष्करिण्या चतुपु पार्येषु भूमौ उत्पद्यन्ते अपमित ( ? ) पुष्पाणि चपक- पुष्पाणिः पाटल-पुप्पाणि, सुमतु (?) पाणि नोकपाणि, तकुमलि (१) - -- ( ५० ) पुष्पाणि । मनुष्या पश्यति पुष्करिणीं तस्या, प्रविश्य, प्रक्षाल्य स्नात्वा (च) मोदमाना शैत्य विनोदयति । यथाकाम यस्य पानेन काम तस्मै पान दियते, अहारेण काम तस्मै अहार , परिधानेन , यानेन ०, अश्वन ०, सुगधिपुष्पै ०, रूप्यकेन , निधिना ०, न तु जनाना कामनाविरुद्धेन । तदा आनद राज्ञ सुदर्शनस्य उपोसथनागराजप्रमुखानि चतुरशीतिनाग- सहस्राणि सुपर्णरोग्यालकाराणि मुक्तारत्नाभूषितानि, बलाहकाश्वराजप्रमुखानि चतुरशोत्यश्वसहस्राणि सुवर्णरोग्याल काराणि मुक्तारत्नभूपितानि, चतुरशीतिरथ- सहस्राणि सुवर्णचक्ररत्नप्रमुग्वानि सिंहचर्मपरिवृतानि चतुरनाल कृतानि, दिव्यमुक्ता प्रमुखानि चतुरशीतिम मुक्तासहस्त्राणि सुभद्रादेवीप्रमुग्वाति चतुरशीतिस्त्रीसहस्राणि, गृहपतिरत्नप्रमुग्वानि चतुरशीतिगृहपतिसहस्राणि, परिणायकरत्नप्रमुखानि चतुरशीति त्रियसहस्राणि, फुशारतोनगरप्रमुग्नानि चतुरशीति नगरसहस्राणि, धर्मप्रमादप्रमुखानि चतुरशीतिप्रसादसहस्राणि, महाव्यूहप्रमुपानि चतुरशीतिकृटागारसहस्राणि । चतुरशीतिपर्यक सहस्राणि अभूवन् पीनमुवर्णमयानि श्वेतरो यमयानि नानारत्नमयानि बलास्तृतानि गोचस्तृितानि, प्रतिका०. पटलिका०, क्दतीमृगास्तृतानि प्रत्यस्तराणि सोत्तरच्छदानि। चतुरशीतिवमोटिमहराणि अभूवन गोणक्वाणि नौम? कोपयः काशिरः सापासिकः। चतुरशीति स्थालिपाकसहस्राणि अहट अभिहार्यन्त स्म प्रतिस्थालिपार भिन्न अाम्बाद । तम्मिन अानन्द । मिये राज सुनना चतुरणीति नागसम्म शि अभूपन । राना चाई (१) नागाम्द अतिप्रगे उशाप्तीनगरी तो निर्गय चतु म पुदपर्यन्ता सा पृथिवी परितम्य झाले परावृत्य ( ५१ ) , चतुरशीतिप्रासादसहस्रषु धर्मप्रासादे राजा सदा वसति । चतुरशीतिकूटागारसहन पु महान्यूहकूटागारे राजा सर्वदा धसति । चतुरशीतिपर्यकसहस्र पु स्फटिकपर्यके ध्यायमानो राजा सदा वसति । चतुरशीतिवस्त्रकोटिसहस्रषु सुसूक्ष्म रत्नाखचित-वस्त्रं झिया अपत्रपया च परिधते । चतुरशीतिस्थालिपाकसहस्रषु प्राकृतं तडुल संतुष्टमना राजां सदा भुक्ते । राज्ञ उपस्थाने चतुरशीतिनागसहस्राणि धावति परस्पर समर्दयन्ति तै जनानां अपरिमाणा क्षतिं श्रुत्वा राज्ञो मनसि एव अभूत- इमे नागा सदा उपतिष्टन्ते, येन महतो क्षति इत , पर वर्षशतस्य अत्ययेन श्रागच्छतु एको नाग । एव वर्षशतस्य अत्ययेन एकैकस्य पुन चक्र आरम्येत 18 अथ बुद्धोऽवोचत-"तदा आनंद । राज्ञो मनसि एच अभूत-कस्य नु इद मे कर्मणो विपाक फलवा ? कस्य कुशलमूलस्य एतर्हि एष विपाकोपलम्भ येनाह एव महर्षिक १ अथ राज्ञ एव अभूत त्रयाणां खलु हेतुप्रत्ययाना पुण्यकर्मणा एप विपाकः । कतमेपात्रयाणा ? (१) प्रथमं दान, (२) द्वितीय शील, (३) तृतीय ध्यान एतेषां हेतुप्रत्ययना महाविपाकस्य एहि उपलम्मः। अथ राला एप मर्नास ? चिन्तया मास मया एतर्हि उपलब्धो मानुष. कुशलविपाक’ पुनरपि लप्स्यदिव्यकर्मविपाक सचेत् आत्मान दमयन् नि शन्दे विविक्ते स्थाने दूरं एकाकी विहरन मार्ग भावयेयम् । अथ खलु राजा स्त्रीरत्न सुभद्रा पाहूय ता अवोचत् मया एतर्हि उपलब्धो मानुपक कुशल-विपाक पुनश्चलप्स्ये दिव्य कर्मविपाक सचेत् आत्मान दमयन् नि शब्दे विविक्ते स्थाने दूर एकाकी विहरन् मार्ग भावयेयम् ।" "अथ साऽवोचत् - एव यथा महाराज प्राज्ञापयति ।" "अथ राजा अनापयामाम मास्तु में अन्तर्वहिवो उपस्थानम् अथ राजा धर्मप्रासादाद उत्थाय सुवर्ण महाव्यूह कूटागार प्रविश्य रौप्यमये राजपय के निपएण विविक्त एव कामैः पापं अकुशल सविर्तक सविचार विवेकज प्रीतिसुख प्रथम ध्यान उपसपद्य विजहार । वितर्क विचारयो उपशमात् अध्यात्म सप्रसादन चित्तस्य एकोदिभाव अवितर्क अविचार समाधिज प्रोतिसुख द्वितीय " * यहाँपर "बुद्धभापितस्य दीर्घागमसूत्रस्य तृतीय भाषावार" समाप्त । तथा "प्रथमभागे परिनिर्वाण सूत्रे तृतीयस्य द्वितीय " प्रारम्भ हुआ।

( ५२ ) ध्यान उपसपद्य प्रीते विरागस्य च उपेक्षक स्मरन् सप्रजानन् सुख च कायेन सर्वेदयामास यत् तद् अायों पाचक्षन्ते स्मृतिमान सुखविहारीति तृतीय ध्यान उपसपद्य विजहार सुखस्य दु खस्य च प्रहाणात् पूर्वमेव सौमनस्य दौर्मनस्ययो अस्तगमाद् अदु ख असुख उपेक्षा स्मृति पारिशुद्धिं चतुर्थं ध्यान उपसपद्य विजहार । अथ राजा सुदर्शनो रौप्पमयाद राजपर्यकाद् उत्थाय महा व्यूह कूटागार उपसगम्य वैदूर्यमये पर्यके सन्निपएण मैत्री सहगतेन चेतसा विपुलेन एका दिश अपरा दिश च सर्वथा सर्वत्र अद्वितीयन अप्रमाणेन अद्रोहेण अव्यापादेन अवरेण चेतसा विजहार । एव करुणा मुदितोपेक्षासहगतेन चेतसा च विजहार । "अथ सलु स्त्रीरत्नस्य सुभद्रादेव्या मनसि एतद् अभूत-चिरदृष्टो नो- राजा यन्नु एतर्हि उपसक्रमेय (त) उपस्थातुम । अथ स्त्रीरत्न सुभद्रा चतुरशीतिसुन्द रीसहस्राणि आमत्रयामास- एथ यूय स्नाय सुगविना उदफेन, पीतानि च वस्त्राणि प्रासेपयध, चिदृष्टो नो महाराज , तस्य दर्शनाय उपसक्रमिग्याम । एव श्रुत्वा सर्वा स्त्रिय स्नात्वा परिशुद्धानि वस्त्राणि प्रारोपयामासु । अथ वीरत्न सुभद्रा परिणा- 'कल्पय न मत्रिन । चतुरगिनो सेना चिरदृष्टो नो राजा, तस्य दर्शनाय उपसमियामः ।' श्रय परिणायकरत्न मत्री चतुरगिनी मेना र पयित्वा वीरत्न प्रतिवेदयामाम- पिता देवि चतुरगिनी सेना, यस्य इनानी काल मन्यसे श्रय करन्न मुभद्रा चनुरशीनिमुन्नरीमदम चतुरगि या च सेनया ममन्विता वर्णनान -मन्ना। परप- वोलाइन प्राय यते म्म । एन्वा च गदर राना वारमान र मदा 'द्वार मात्र आनन्य त्रनिष्टत नया च वीरत्न - यमरत्न यामत्रयामास ( ५३ ) इमानि ते देव । श्वेतनागप्रमुखानि चतुरशीतिनागसहस्राणि सुवर्णरौप्यलकारशृंखला- समन्वितानि राज्ञः मुक्तारत्नानि । अत्र त्व देव छन्दं जनय परस्पर प्रमोदस्व, दास- परिजनसहस्राणि बलाहकाश्वराजप्रमुखानि चतुरशीत्यश्वसहस्राणि, चकरत्नप्रमु- खानि चतुरशीतिरथसहस्राणि, दिव्यमुक्तारत्नप्रमुखानि चतुरशीति मुक्तासह- स्राणि, स्त्रीरत्नसुभद्राप्रमुखानि चतुरशीतिस्त्रीसहस्राणि, गृहपतिरत्नप्रमुखानि, चतुरशीतिगृहपतिसहस्राणि, परिणायकरत्नप्रमुखानि चतुरशीतिक्षत्रियसहस्राणि फुशावति प्रमुखानि चतुरशीति नगरसहस्राणि धर्मप्रसाद-प्रमुखानि चतुरशीतिप्रा- सादसहस्राणि महाव्यूहप्रमुखानि चतुरशीतिकूटागारसहस्राणि रत्नालकृतासनप्रमुखानि चतुरशीतिपर्यकसहस्राणि मजुवस्त्रप्रमुखानि चतुरशीति गोणकास्तरणसहस्राणि एतानि हि दुर्लभानि ते देव । नानाविधानिरत्नानि (तानि) विसृज्य मा त्व देव ! जीवितं उत्स्सूज | अन त्वं देव । छद जनय परस्पर मोदस्व मा त्वं जीवितं उत्तृज दासपरिजनसहस्राणि परित्यज्य ! अथ राजा सुदर्शन स्त्रीरत्न सुभद्रा प्रत्यवोचत्- 'दीर्घरात्र त्वं देवि । मे समुदाचरः इष्टै कान्तै मनापै अपरूवैः शन्नै कथ एतर्हि एव शब्द वदसि देवी राजान अवोचत-'मा देव मे वचन अष्टिं जानीहि । राजा देवी अवोचत्- 'यानि ते देवि । उक्तानि नागाश्व रत्नरथ सुवर्णचक्र प्रासाद कूटागार पर्यफवस्त्र स्थाली पाकासनानि तानि न नित्यानि न चिरस्थितिकानि । अथापि त्वं मा समुतजयसि तिष्ठेति । किं नु ते एतद् आनुच्छविकम् ? राजा देवीं भवोचत्- "यानि त्वया देवि । उक्तानि नागाश्व० स्थालिपाकानि सर्वाणि तानि न नित्यानि न चिरस्थितिकानि। मा तत्र छन्द जनय आत्मन क्लेशायः । तत् कस्मात् । राजो जीवित न चिरस्थितिकम् । प्राणिनो जन्म मरण- समन्वागतम् अवश्यम् तस्य नानाभाव , यतो हि जातस्य इह सर्वदा जीवितसक्षय । प्रियस्य सरक्षण इति सन्मानाज्ञानुवर्तनाभि प्राणेय अवोच ।" अथ आनन्द । श्रुत्वा एतद् राज्ञो वचन देवी प्रारोदीत् विमोच्य च अभूणि पुन एतद् श्रवोचत्- 'नागाफ्व० स्थालीपाकानि सर्वाणि न नित्यानि न चिरस्थि- तिकानि, न तत्र छन्दो जनयितव्य आत्मन क्लेशाय । तत् कस्मात ? राम्रो जीवित न चिर स्थास्यति जीवितम्य जन्म मरणसमन्वागत । अवश्य भावी विप्रयोग ।

यद् हि इह जात तत् सदा जीवतु इति प्रजहि राग मार्ग सरक्षणाय ।' तस्मिन् आनन्द । स्त्रीरत्ने इमान् शब्दान् श्रतवति न चिरेण राजासुदर्शन काल अकरोत यथा हि बलवान् पुरूष मुक्तस्य सुभोजनस्य अक्लेशेन वमन कुर्याद्, एवमेव मृत्वा स सप्तमें ब्रह्मलोके उदपद्यत | मृतस्य राज्ञ सुदर्शनस्य सप्तमे दिवसे न चिरेणैव चक्ररत्न मुक्तारल च अन्तरधाता नागरल अश्वरत्न, स्त्रीरत्न, गृहपतिरत्न, परिणायकरल तु तस्मिनेव दिवसे काल अकार्यु । नगर पुष्करिणी धर्मप्रासाद' कूटागार रत्नालकृत पर्यक सुवर्णतालवन च यथा पृथीवी यथा काष्ठ तथा अन्य थात्व यु । मार्ग च बुद्ध आनद अवोचत्- "इमे आनद । सस्कृता धर्मा अध्रुवा विपरिणामिन , अवश्य एषा विनाश । रागस्य लोभस्य च न तृप्ति । पृथग्जनाना मनसि राग लोभ च तृप्ति विना तिष्ठत । केवल विना तिष्ठत । केवल आर्य प्रज्ञया लब्ध्वा सत्यदृष्टिं तुष्टो भवति । अह श्रानन्द । पूर्वत अभिजानामि इम प्रदेशम् । पडवारम् अत्र आर्यराजा चक्रवर्ती भूत्वाऽह मृत अस्थीनि च मेऽत्र उत्सृष्टानि । एतर्हि अह अनुत्तर सम्यक सवुद्धो भूत्वा पुन जीवित उत्सृजामि शरीराणि च मेऽत्र अवशिष्यन्ते । इत परम हि नास्ति मे जाति मरण न स्थाने निदहनम्। इद मे पश्चिम शरीररधान नास्ति मे पुनर्भव ।" अब भगरान कुशीनगरम्य उपवर्तने शालवने अन्तरा यमक शालयो निर्वाणो पगत आनद अमोचन । गन्द त्व आनन्द । कुशी नगर प्रविश्य मन्लान पारोचय, जानीध प्रार्या । अयम यरात्रों शानवने अन्तरा यमकशालयो तथागतस्य परिनियांग भविपनि । अभिकम व पृन्दय यस्मिन् विपये वो विचिस्सिा, मम्मु एतदि लभध नवा नववार मा पश्चाद् विनिमारिणो भवेया ।

(५५.) - अथ आनन्द अश्रूणि विमुञ्चन उवाच. "अहवो हितकामनयां-भागतो युष्मान् कथयितु जानीय अद्य-मध्यरात्रौ तथागत · परिनिर्वास्यति अभिक्रमथ पृच्छथ विचिकित्सा सम्मुखे लभध्वं अववाद एतस्मिन्नेव समये मा पश्चाद् विप्रतिसारियो भवेथा । श्रत्वा (च) एतद् वचन मल्ला उच्चे क्रन्दन्ति छिन्नपातं प्रपतति भूमौ श्रावर्तन्ते विवर्तन्ते, पुन सज्ञा लब्ध्वा छिन्नमुलो भग्नशाखो वृक्ष इव पतत सनंदति "बुद्धाः (भगवान) परिनिर्वास्यति । कथं अतिक्षिप्रं बुद्ध परिनिर्वास्यति, कथ सुगत. अतितिनं परिनिर्वास्यति । सत्वा विनश्यति लोकचक्षुरन्तर्धास्यति ।" श्रथ आनन्दो मल्लान् अश्वासयन अवोचत् "अल अल माशोचथ दश- साहस्यां लोकधातौ न किमपि ज्ञायते मरण विना । सर्वदा सस्कृता तिष्ठन्वितिच्छय तत् न लभ्य इति किं वुद्धेन नाख्यानम् १ सर्वस्य सप्रयोगस्य अवश्यं विप्रयोग. जातस्यहि ध्रुवो मृत्यु.।" अथ मल्ला परस्पर अवोचन्-गच्छामो पय सपरिवारा पचावदातदुष्यशते (सह) यमकशालयों प्रदेशे " अथ मल्ला गृह गत्वा सपरिवारा अवदातान्दुष्यान गृहीत्वा कुशीनगराई निर्गम्य' अन्तरा यमकशालयो रूपसंक्रान्ताः । तदा (च) आयुष्मान् आनन्द चिंतयामास बहव इमे जना स चेद् अहं एकमेक बुद्धस्य दर्शनाय नयामि अवदित एव इह बुद्धः परिनिर्वास्यति । यन्नु अह एतईि पूर्वरात्री एकस्मिन् समये एव बुद्धस्य दर्शनाय पचमल्लशतानि सपरिवाराणि उपनीय भगवत पादौ शिरसा वदापयेयमिति । 'तत' एकमन्त स्थित आनन्द - बुद्ध अवोचत् अमुकेऽमुके मल्ला' सपरिवारा' भगवन्तं वन्दन्ते कुशलस्य बुध्ये अकुशलस्य क्षयाय ।' बुद्धोऽवोचत्- “कष्ट व इह आगमने, दीर्घायुपो भवन्तु निरावाधिका निष्पीडिता " अथ आनन्द एव मल्लान् सपरिवारान् उपनीय भगवन्त चदापयामास । शिरसा भगवत. पादौ - वदित्वा च मल्ला एकमन्त न्यपोदन् । अथ भगवान् अनित्यता जगत प्रादर्शयत् । । देशनालाभेन हूप्रतुष्टा धर्मप्रवेण आल्हादिता पचदुण्यशतानि भगवत प्रादु बुद्धश्चते तानि स्वीकार - (५६ ) अथ मल्ला उत्थाय आसनाद् बुद्ध अभिवाद्य निष्क्रान्ता' । तस्मिन् समये कुशीनगरे सुभद्रो नाम ब्राह्मण प्रतिवसतिस्म वयसा विंशोत्तर- शसवत्सरो वृद्धो यहुप्रज्ञ । अशृणोत् स 'अद्य रात्रौ श्रमणो गौतमोऽन्तरा यमकशा- लयो परिनिर्वास्यति' । तस्य मनसि अभूत्-"अस्ति च मे धर्मे विचिकित्सा, यां गौतम एव मे भाव ज्ञातु प्रभवति । एतर्हि समय तत्र गन्तुम्" । अथ तस्यां (एर ) रात्री कुशीनगरात् निर्गम्य स ( यत्र ) यमकशालयो स्थान यत्र घ आनन्द तत्र उपसक्रम्य अभिवाद्य च ( एकमन्त स्थित ) एकमन्त स्थित (च) त अानद एव अवोचत्-'श्रुत मे, श्रमणो गौतम अद्य व रात्रौ परिनिर्वास्यतीति प्रष्ट अनागत "फ प्रश्न प्रष्टुम । अस्ति मे काक्षाधर्म , लभेय गौतम द्रष्टु सकृद् विचारयितु मे प्रश्न लभेय द्रष्टु अवकाशम ।' निषेधयन आनन्द प्रत्युवाच-"अल अल सुभद्र । अस्ति भगवत (बुद्वस्य) फाय आवाधा मा पीडय भगवन्तम पुनरपि सुभद्र द्वितोय तृतीय अपि निरचनात् । अव गणोत तथागत् -'लोके ज्वरपुपपवन कदाचिदेव दीर्घकालेन तथागतस्य उत्पाद इनि प्रष्टु काता मे निरारयितु आगतोऽत्र । अपाश कुमक्षण दर्शनाय ।' प्रानन्द यथापन निषेधयन प्रत्युषाच-'भगवत काय श्रावाचा, मा पीटय ।' पय युटोऽवाचन-'मल जानद । मा सुभद्र वारय, लभतामोऽत्र वाता- निवारण, न भवन में पीटा। म चत योग्यति धर्मम श्राताम्यति ।' श्रद आन- सुभद्र भोचन-'यत व उद दाटु इयमि, जानीहि (त), असाश ।

( ५७ ) । बुद्धोऽवोचत्- "अल सुभद्र ! अल एतेन विवादेन । यद् अह जानामि तत् ते भाषिष्ये, शृणु गभीर धर्म साधुक मनसि कुरु ।" सुभद्रोऽलभत अववाद, बुद्ध' त अवोचत्- "यस्मिन् धर्म आर्योऽनांगिको मार्गो नास्ति, तत्र प्रथम श्रमणो न लभ्यते, द्वितीय तृतीय चतुर्थ श्रमणोऽपि न लभ्यते । यास्मिन् सुभद्रः | धर्म आर्योऽष्टागिको मार्ग. तत्र प्रथम, श्रमणो लभ्यते, द्वितीय, तृतीय , चतुर्थ श्रमणोऽपि लभ्यते । अत्रैव सुभद्र । मे धर्मऽस्ति आर्यो- ऽष्टागिको मार्ग, तेन अत्र प्रथम श्रमण उपलभ्यते, द्वितीय, तृतीयः, चतुर्थ श्रमणेऽपि उपलभ्यते । अबौद्धा. ( तीथिका ) अन्ये संघा शून्या. श्रमणै ।" तस्मिन् काले भगवान् सुभद्र गाथयाऽवोचत्- एकोनविंशद्वयसी सुभद्र, यत् प्रात्रज किंकुशतागवेपी । बुद्धोऽभव कालत एष यस्माद् वर्षाणि पचाशसमाधिकानि ॥ ७६ (४६)। शील समाधि प्रज्ञा च केवल धन भाव्यते । धर्मन्यायपुतो नास्ति श्रमणो बहिरप्यत ।। ७७ (५०) ।। बुद्ध सुभद्रं "अवोचत्- "भिक्षव चेद् आत्मान सयम्य विहरेयु , अशून्य स्याद् अय लोकोऽईद्धि । तस्मिन् काले सुभद्र आनंद ' अवोचत्-"श्रमणे गौतम ब्रह्मचर्य चरता एतर्हि महत फलस्य अधिगमाय अनुष्ठेयम् । युष्माभि आनद । तथागत ब्रह्मचर्य अनुष्ठित लभ्येत च( वो) महाफलम् । मया च योयं दृष्ट, तथागते ; काता च पृप्टा, तदपि स्यात महाफलाधिगमाय । एतर्हि तथागतोऽन्तेवासीव मां श्रादिष्टवान् ।" अथ स भगवन्त अवोचत्-"लभेयाह भन्ते । वुद्धस्य धर्मे प्रव्रज्यां लभेयाह उप- सम्पदाम " वुद्धोऽवोचत्-',य (खलु ) सुभद्र। अन्यीर्थक् ब्राह्मण मम धर्मे ब्रह्म- चर्य वाचति वस्तु स परिविसति चतुरो मासान् तत दृष्ट्वा तस्य पुरुष्व आचरण, परीक्ष्य तस्य भाव, अनुरूपा मलप्रसादरहितता वृत्तिं च भिक्षव' मम धर्मे प्रत्रा- जयन्ति । शील सुभद्र । पुरुषस्य मूलमिति जानीहि । तत सुभद्रोऽवोचत्- "अबौद्वचेद् अन्यतीथिको बुद्धस्य धर्मे चतुरो मासान् परिवसति, तस्य पुरुषस्य आचरण दृष्ट्वा तस्य भाव अनुरुपा मलप्रमादरहिता वृत्ति १ भगवन्त-पालि मे ( ५८ ) च परीक्ष्य प्रव्रज्या दीयते, अह तर्हि अनुरूपया मलप्रसादरहित या वृत्या सेवमान फत्वारि सवत्सराणि परिवसिष्यामि, अथ लभेयाह प्रव्रज्याम् ।” बुद्ध सुभद्र अवोचत्-"मया पूर्व पुरुष अधिकृत्य उक्तम् । सुभद्रोऽथ तस्या एव रात्रौ अलभत प्रव्रज्या उपसम्पदा ब्रह्मचर्ये, दृष्ट एव धर्मे ( काये ) स्वय अभिज्ञाय व्याजहार-तस्य क्षीण जाति-मरण उषित तेम ब्रह्मचर्य कृत करणीय, उपलब्धा प्रज्ञा नाऽभूत तस्य पुनर्भव । तस्या एव रात्रौ न चिरेण स अर्हन बुद्धस्य निर्वाणात् प्रथम अभूत् तथागतस्य पश्चिमोऽन्तेषासी । तस्मिन् काले आयुष्मान् आनद पर्यक आलव्य बुदस्य पृष्ठत क्रन्दमान रुदन स्थिनो वदति-नाह यात्मजित, तथागत च परिनिर्वाति । कथ अतिक्षिप्र भगवान् निर्वाति १ कथ अतिक्षिप्र महाधर्मोऽन्तहीयते ? अहो वत । अतिक्षिप्र असख्यया सत्त्वा चिरनप्टा भविष्यति अन्तहिते लोकचक्षुपि । लब्ध्वाऽ पि बुद्ध अनुरुपक ( इदानीमपि ) अह शैक्ष्यभूमिस्थ , अकृतकरणीय , बुद्धश्च निर्वाति ।" जानन अपि भगवान साभिप्राय अपृच्छत-"कुत्रास्ते एतर्हि आनदा भिक्ष ?" भिक्षव तधागत अबोचन-'बुद्धस्य पृष्ठत पर्यक आलव्य क्रन्दमान आनन्दो भिक्षु तिष्ठति-"नाह आत्माजित बुद्धश्च निर्वाति ।" बुदऽवोचत्-'अल शानद । मा शुच मा परि देवय, टोरात्र ते आनद मैंनेगा श्रद्वयन अप्रमाणेन कायकर्मा मैत्रेण वायर्मणा मैत्रेगा शब्द पन मनमर्मग्गा अ प्रत्यु पस्थित । पुरषोऽ मि त्व अान- देवेप मारनगणो मा बागायो वा न कोऽपि पुरपेन त्वया मममम । प्रधान अनुर व प्रायमि न चिरेण मार्गम् ।'

रुपता अस्ति चक्रवर्तीति अतृप्या भवति । राजा चक्रवर्ती यदा तिष्ठति निषीदति उत्तिष्ठति शेते वा, तदा देशाभ्यतरे अमात्यजना सर्वे उपसंक्रमन्ति राज्ञो दर्शनेन च आत्तमनसो भापितेनाऽपि आत्तमनस अभिरूपता विलोकनेनाऽपि अतृप्ता भवन्ति । राज्ञ चक्रवर्तिन इमे चत्वार आश्चर्यामृताधर्मा एतर्हि आनदेऽपि मे सति । "इमे ऽपि चत्वारोविशेषाानदे । कतमे चत्वारो धर्मा पानदे १ सचेद् भिन्नु परिपदि आनद उपसकामति दर्शनेन सा आत्तमना भवति, धर्मभाषते, तर्हि श्रुत्वा आत्तमना भवति । तस्य रूपदर्शनेन तस्य धर्माववादश्रवणेन अतृप्ता एव भवति । पुनश्च आनद स चेद् भिक्षुणिपरिपदि०१० उपासकपरिपदि०१० उपासि. कापरिषदि वा उपसकामति दर्शनेन आत्तमना, धर्म भापते चेत् श्रवणेनाऽपि आत्तमना अभिरूपदर्शनेन धर्मदेशनाश्रवणेन (च) अतृप्ता भवति । इमे संति आनदे चत्वार आश्चर्याद भुता धर्मा । अथ आयुष्मान् आनंदो दक्षिणासं ईपद् विवृत्य दक्षिणजानु न भूमी निपात्य बुद्ध अवोचत्- “पूर्व भगवन् चतुभ्यो दिग्भ्य श्रमणा बहुप्रज्ञा सूत्र-विनय- पडिता शुद्धशीला सुकर्माण उपसक्रामति भगवन्त पर्युपासनाय । अह स्वय अभिवाद्य तान् अपि अभिवादापयामि पर्युपासापयामि । परिनिट ते युद्धे ते पुन दर्शनं न लब्ध्वा किं करिष्यन्ति ? बुद्धोऽवोचत्- "अल्पोत्सुका आनद ! यूय भवथ । चत्वारि इमानि आनंद । कुलपुत्राणा दर्शनीयानि स्थानानि । कतमानि चत्वारि १- (१) इह वुद्वो जात इति प्रथम श्राद्धाना कुलपुत्राणा सर्वेजनीय दर्शनीय प्रथम स्थान, यद् दृष्ट्वा स्मृत्वा अविस्मृत्य मनसि ते श्रद्धा उत्पादयिष्यति । (0) इह बुद्ध प्रथम मार्ग उपलब्धवान् इति द्वितीय स्थान सर्वजनीय दृष्ट्वा स्मृत्वा अविस्मृत्य मनसि श्रद्वा उत्पादयिष्यति । (३) इह वुद्धेन धर्मचक्र प्रवर्तित० इति तृतीय स्थान सवेजनीय दृष्ट्वा स्मृत्वा अविस्मृ'य मनसि श्रद्धा० उत्पादयिष्यति। (४) इह बुद्ध परिनिर्वृत इति चतुर्थ स्थानं सर्वजनीय दृष्ट्या स्मृत्वा अविस्मृत्य मनसि श्रद्धा उत्पादयिष्यन्ति परि निवृत्ते मयि कुलपुत्रा कुलकुमारिकाश्च 'इह बुद्धो जात' इति अनुस्मृत्य पुण्यलाभिन , 'इह बुद्धेन मार्ग उपलब्धो दिव्यशक्तिश्च , 'इह धर्मचक्र प्रवर्तित लोकाना विमुक्तये', 'इह बुद्ध धर्म अवस्थाप्य परिनिर्वृतः इति ते उपमक्रमिष्यति । इमानि स्थानानि उपागम्य तूपाना विहाराणा पूजां च कृत्वा ग लगने ( ६० ) - . अथ बुद्ध आनंद अवोचत्- 'मयि परिनिवृते श्रागार विहाय चतुर्मार्गापेक्षा शाक्यकुलोद्गता अनायासेन प्रव्रज्यालाभिनों भवेयु । अन्यतीथिका ब्राह्मणा अपि प्रव्रज्यार्थमागता. चतुर्णा मासाना परिवास विना अनागार्यो प्रव्रज्या न लभेरन् । तत् कस्मात् ? भिन्न हि तेपा आचार्यक, अपरिवासे तेपा पूर्वा दृष्टि उत्पद्यत ।” अथ अानन्दो दीर्घ अभिवाद्य अजलिं प्रणाम्य बुद्व अवोचत्- 'परिनिवृते बुद्धे अशुश्रू पुणा छन्नेन भिक्षुणा सह कय वत्तितव्यम् ?" बुद्धोऽवोचत् "मयि परिनित त आनद । स चेत छन्नो नानुरूप आचरेत् नादेश पालयेत, तर्हि युग्माभि सभ्य तस्य ब्रह्मदडो दातव्य सर्व तुभि नाऽसौ वक्तव्य , न चानुशासिाव्य ।" अथ अानद पुन बुद्ध अमोचत~ "परिनिवृते बुद्धे स चेत् मातृप्रामी दर्शनार्य उपसकमेत ताम्भिरसह, कथ प्रतिपत्तव्यम । बुद्धोऽयोचत- "अदर्शन आनद । श्रानन्द पुनरवोचन-"दर्शन चेत् कय प्रनिनव्यम ?" बुद्धोऽवाचत- 'अनालाप परस्परम ।" आनन्द पुनरवाचन- 'आलापश्चेत् क्य प्रतिपत्तव्यम् ?" बुद्धोऽ-वाचन-श्रामन चित्त पर्यवदापितव्यम् । स्याद् आनन्द युग्माक 'परिनित उद्धे न पुन न शान्ता तायी ।' न वन्नु एब द्रष्टव्यम । बोविलाभन प्रभृति यो मा धर्म मन पिनयश्च देशित , सर्वोऽग्नि शास्ता । ग्राकानमागा आनट । इन पर मप नद्रानन्द्रामा भिनगानि मम मनतु । म भिना परम्पर मम्मोदमाना श्रापारात एमय पर मनमाना अनुमो-माना अम्मिन धर्म पिटरतु ।

- - वाहु निस्सार्य सदाऽापे ते भिक्षय तूष्णो श्रभूवन । श्रथ आनद बुद्ध अवोचत-"एवं दृष्ट्या अहं प्रसन्न , अस्मिन् सघे सर्व एव अभिप्रसन्ना., नास्ति एकस्याऽपि भिक्षो बुद्ध धर्मे सधे वा कांक्षा, मार्ग वा विचिकित्सा। बुद्धोऽवोचत्-अहं अपि पानंद । स्वयं जानामि, एतर्हि अस्मिन् सघे य. पश्चिमकः मिनु स द्रष्टमार्ग स्रोतआपन्नः अविनिपातधर्मा सप्तकृत्व' म परम भागम्य दु खस्यान्त करिष्यति ।" अथ खलु भगवान् तदा व्याकरोत्-"द्वादश श्रावकशतानि लप्स्यन्ते मार्फलम् ।" अथ भगवान् उत्तरासंगत' सुवर्ण वर्ण बाहुं निस्सार्य तान् भिजून अवोचस्'- "तधागतस्य दर्शन लोके कदाचिदेव भवति यथा दुबरपुप्पं कदाचिदेव प्रादुर्भवति । अथ इममेव अर्थ विदित्वा भगवान् गाथयाऽवोचत- अरुण वर्ण बुद्धः प्रादुरकरोद् अद्भुत निमित्तम् । आगतुका. संस्कारा अनित्या उत्पद्य विनश्यन्ति मा प्रमादेथा. ॥ ७८(५१) ।। तस्माद् भिक्षव' अप्रमादेन समादपयध । नाह प्रामद, तेन सम्यक सबुद्ध असख्येयगुण जात' "व्ययधर्मा. सस्कारा', अप्रमादेन सम्पादयेथा -इय अस्ति तथागतस्य पश्चिमा वाग् । अथ खलु भगवान् प्रथमं ध्यान समापद्यत, प्रथमाद् ध्यानाद' उत्थाय द्वितीयं ध्यान समापद्यत, द्वितोयाद ध्यानाद् उत्थाय तृतीय ध्यानं तृतीयाद् 'ध्यानाद उत्थाय चतुर्थ ध्यान समापद्यत, चतुर्थाद ध्यानाद् उत्थाय शून्यायतन-श्राफाशानत्यायतन ध्यान [ समापत्ति ] समापद्यत, शून्यायतन ध्यानाद् उत्थाय विजानायतनध्यान (समापत्ति) समापद्यत, विज्ञानध्यानाद् उत्थाय आकिंचन्यायतन ध्यान (समापत्ति) समापद्यत आकिंचन्या यतन ध्यानाद उत्घाय नैव संझाना संज्ञायतानं ध्यान ( समापत्ति) समापद्यत, नैव समाना संमायतन ध्यानाट् उत्थाय समावेदायितनिरोधं समापद्यत । अथ विलु आनद आयुष्मन्त अनुरुद्ध अपृच्छत परिनिर्वृति. भन्ते । भगवान इति । अनुरुद्धोऽवोचत् न आनंद, भगवान् एतर्हि, समावेदयित निरोध समापन्न मया पूर्व युद्धात् श्रुत-चतुर्य ध्यानेभ्य उत्थाय तथागत परि निर्वातीति । अथ भगवान् संज्ञावेदयित निरोध ध्यानात् (० समापत्त) उत्थाय नैव सज्ञाना समायतनं ध्यानं ममापद्यत, नैव समाना सजायतन ध्यानाद् उत्थाय आकिंचन्य समापद्यत t . -- . ध्यान, विज्ञानायतनध्यानाद् उत्थाय आकाशायतन ध्यान, आकाशायतनध्य उन्याय चतुर्थ ध्यान, चतुर्थाद् ध्यानात् उत्थाय तृतीय ध्यान, तृतीयाद् ध्य उत्थाय द्वितीय ध्यान द्वितीयाद ध्यानात उत्याय प्रथम ध्यान समापद्यत, प्रथ ध्यानात् उत्थाय द्वितीय ध्यानः चतुर्य ध्यान समापात, चतुर्थात् ध्यानात् समु भगवान् परिनित । तस्मिन काले महाभूमिचालोऽभूत, देवेषु मानुषेषु महाभय उदपादि, भवेषु नारकेपु सूर्ये चन्द्रमसिं ( च ) अवभासोऽभूत् । अनवभासितानि स्था अपि महावभास अलभन्त, सर्वे परस्पर अपश्यन् परस्पर समवदन्-"अमुक । अत्र जात , अमुक पुरुप अत्र जात । अय अवभास सर्वत्र देवावभासत प्रणीत ।तस्मिन् काले तुपित देवालोकाद दिव्याना मदार पुप्पाणा उत्पल पुष्पाणा पुप्पाणा कुमुद पुराणा पुण्डरीक पुग्पाणा वृष्टि तथागतस्य सघस्य च उपरि अ रियाना पुनश्च मुचिलिन ( पुष्पाणा ) वृष्टि वुद्वस्य सघस्य च उपरि जाता। परिनित दं ब्रह्मादेवराज आकाशे ( स्थित ) आन्या गाये अभापत | मर्व र निनाम्यन्ति भूता लोके समुन्द्रयम । अयंताटशो वृद्धो लोरे यप्रति पुटगल ||७६ ।। ५२ ।। तथागतो महावीरो भया दिव्य शक्तिमान । चिरस्थितिमोऽपि भगवान परमे तर्हि परि नित ॥८॥५३।। Cशमा देवानामिन्नी गाया भापत ( ६३ ) . अथ भिक्षुः उपचान गाथा अभापत- अप्रमत्तेन चित्तेन स्वयं संयम्य प्रज्ञा मनुतिष्ठति । अद्वेषश्चासल्लीनो विरागाद् न घनुत्तर' ॥४॥५॥ अथ भिक्षुरानदो गाथा प्रभाषत- देव मानुषयो भीषणक तदासीत् लोमहर्षणम् । सकारवरोपेतो यदा बुद्ध सुनित. ॥श५८।। अथ वीरा देवता च गाथां अभाषत-~ तायिना वचितो लोक. सत्वा नित्य तमोवृता । न. पुनर्बुद्ध द्रक्ष्यति शाक्य सिंह नरवीरम् ॥८६॥६।। अथ गुह्य संकेतवलो जन च गाथा अभाषत- नाय लोको न परो ब्रह्मलोको देवा मानवा च । न पुनर्बुद्ध द्रक्ष्यन्ति शाक्य सिंह नरवीरम् ।।७।६०॥ अथ बुद्धमाता महामाया गाथा अभापत- जातो बुद्धो लु विनी वने मार्गस्तस्य सुविस्तृत । मूलस्थान परावृत्तो त्यक्त्वा काय अनित्यकम् ||८||६|| अथ यमक शालदेवता गाथा अभापत- युद्धे भविष्यति कदा पुनरकालकुसुमवृष्टि । पूर्ण पुण्यो दशबल तथा गतो (हि) निवृतः ||८||६|| अथ शालवन देवता गाथां अभापत- शुभ धन्यमिद स्थान बुद्धोऽत्र समजायत । प्रवीति धर्मचक्र' इह चात्र सुनिवृत EDIT६३} अथ देवराजश्च गाथा अभापत- तथागतोऽनुत्तर सदावोचदनित्यताम् । दवात् सत्वान् मोचयित्यान्त्ये निर्वाण माविशत्||१||६|| अथ त्रास्त्रिशायिन्-ली) देवराजश्च गाया अमापत- , सदा कोटिषु कल्पेषु मार्गो भवत्यनुत्तर । बात मन्लान मोचयित्वाइन्टो निर्वागामाविशत ॥६॥ - प्रज' - ग्रथ ग्रीष्मदेवराजो गाथां अभापत- पश्चिम चीवर मिद छादयति तथा गतकायम् । सवुद्ध परिनिवृते चोवर कस्य दीयताम् ।।६।।६६।। अथ तुपित देव राजश्च गाथा अभाषत- अत्राय पश्चिम काय स्कधायतन विनश्यति । वेदना न सुपाऽदुग्वा न च मृत्युजरादु खम ||६४||६७|| श्रथ स्वनिर्मित वश वर्ति देवराजश्च गाया अभाषत- बुद्वोऽस्याम पर रानौ शयानो दक्षिण पार्च । प्रतस्मिन्नेव शालवने शाक्य सिंह सुनिवृति ||६||६८।। अध परिनिर्मित वशवति देवराजश्च गाया अभापत- लोको नित्य तमस्यति चद्र पतति तारक राज । आवृणोति ह्ययनित्यता प्रजा मर्य मु निवते ।।६६।६।। श्रध भितवाच गाधे श्रभाषन्त- वृबुदोपमरे काये भगुरे , सुग्वी भवेत् । वनसायो ऽपि बदम्य सोऽनित्य इव नष्ट भाफ ।।६७||७०।। वन कायश्च युद्वाना तेया नव्या निवर्तिता ||८||७१।। परिनितु बुद्ध त भिनव बन्त परिदेवयन्तो भृमी प्रपनति आवर्नन्ने आत्मान अमय स वाप कोनि । तथागत परिनिर्वत । क्य भगवान अतिशिप परिनिर्वन ।। वय अनिनिप्र महावर्मोऽतदिन । कय अनिनिय मन्वाना चिरविनाश । - मा परिनिर्वृत' • छिन्न सर्प इव आवर्तन्ते विवर्तन्ते, किं कर्तव्यमिति न जानति । एतस्मिन् काले देवता अपि सर्वत्र आकाशे परि धावन्त्य ०." अथ ते भिक्षव यावत् प्रात सर्घा रात्रि धा कथा अकथयन् । अनुरुद्ध अानंद आमंत्रयामास-गच्छ कुशी नगरं प्रविश्य मल्तान आरोचय-परिनिर्वृतो भगवान् यस्ये दानी कालं मन्यध्वे । अथ आनंद उत्थाय वुद्धस्य पादौ अभिवाद्य एकेन भिक्षुणा साध क्रन्दमान. नगर प्राविशन् । तत्र अपश्यत् पंचमल्ल शतानि सस्थागारे सन्निपतितानि फेनचित करणीयेन ते मल्ला आनद आगत दृष्टा उत्थाय सम्मोद्य पादौ अभिवाद्य स्थिता आनद भवोचन् "कथ भन्ते एतहि अतिप्ररा श्रागत " श्रानद प्रत्युवाच-"हितकामो व एतर्हि प्रातरागत. तथागतो ऽतीतायां रात्री परिनिर्वृति इति जानीथ, यस्येदानी काल मन्यध्वे " अथ एद वचन श्रुत्वा मल्लेषु न कोऽपिय न क्रन्दति, अश्रूणि विमोचयन् न वदति “कथ अतिक्षिण बुद्ध परिनिर्वृत ! कथ अतिप्रिलोकचनुरन्तिहितम् ।। आनन्द तान प्रत्युवाच-"अल अल भद्रमुखा शोचथा. । यत् जात सस्कृतं तत् मा रूज्यतु मा विनश्यतु इति कुतोऽत्र लभ्यं । प्रागेव बुद्धन श्राख्यातं-'जातस्य ध्रुवो मृत्यु सर्वे. प्रिय विप्र योग न सदा स्थिति । अथ ते मल्ला एकमेक ऊचुः तेन सर्वे सन्निपत्य सर्वेण गधमालेन बहुविधेन नृत्यगीतेन च साधं गच्छेम यमक शालयो (स्थानम् ) " शरीर पूजयन्त एक दिनं व्यतिनामप्य बुद्धस्य शरीर पर्यके संस्थाप्यमल्ल- कुमारै' चतुष्कोणत पर्य के उत्थाप्य धूपंधूपयत पुष्पाणि विकिदन्तो नृत्येन गीतेन पूजयन्त पुरस्तिमेन द्वारेण नगर प्रविश्य वीथिषु जानपदिकै जनै सक्रियमाण शरीर (गृहीत्वा ) पश्चिमेन द्वारेण नगरात निष्क्रम्य उच्चविशेप स्थाने धस्याम इति विनि- श्चित्य मल्ला स्वमह उपगम्य गधमाल चादाय नाना विप्रेन नृत्यगीतेन साधे यमक शालयो स्थाने ( बुद्धस्य ) शरीर पूजयन्त एक दिन व्यनिनामयामासु । बुद्धस्य शरीर पर्यफ आरोप्य मल्ला पर्यफ उच्चारयिष्याम इति । विचार्य पर्यक उच्चारयितुम् ना शक्नुवन । तदा आयुष्मान् अनुरुद्धो मल्लान् अवोचत-"अल पो मा श्रायासयथ अन्यथा एतर्हि देवताना अभिप्राय पर्यकोच्चारणे १' मल्ला अवोचन्-"को देवताना अभिप्राय एहि पर्यकोत्त्चारणे ?"

- - अथ ग्रीष्मदेवराजो गाथां अभापत- पश्चिम चीवर मिद छादयति तथा गतकायम् । सबुद्धे परिनिवृते चीवर कस्य दीयताम् ।।१३॥६६॥ अथ तुषित देव राजश्च गाथा अभाषत- अत्राय पश्चिम काय स्कधायतन विनश्यति । वेदना न सुरवाऽदुवा न च मृत्युजरादु खम ||६४||६७|| श्रय स्वनिर्मित वश वति देवराजश्च गाथा अभाषत- बुद्वोऽस्याम पर रात्रौ शयानो दक्षिण पावें । एतस्मिन्नेव शालवने शाक्य सिंह सुनिवृत ||५||६८।। अथ परिनिर्मित वशवति देवराजश्च गाथा अभाषत- लोको नित्य तमस्यति चद्र पतति तारक राज । आवृणोति ह्ययनित्यता प्रज्ञा सर्य मु निवृते ।।६६।६६।। श्रथ भिक्षश्च गाथे श्रमापन्त- बुद्बुदोपमके काये भगुरे क, सुखी भवेत् । वनमायो ऽपि बुद्वम्य सोऽनित्य इव नए भाक ।।६७||७|| वम कायश्च बुदाना ते या नन्या निवर्तिता ||६||७|| परिनिर्वृतु बुढे त भिनव कन्त परिदेवयन्तो भृमी प्रपतति आवर्तन्ते आत्मान अमयम्य स वाग्प क्रोशनि । तथागत परिनित । क्य भगवान अतिशिप परिनित ।। कय अनिनिप्र महाधर्मोऽन्नति । कय अतिक्षित मन्याना चिरविनाश । लोचन चिनम् । ते लिन्न मनो भग्नशाम्बो महावृत इव दिन्न सर्यद्रय ( ६५ ) परिनिवृत. • छिन्न सर्प इव भावर्तन्ते विवर्तन्ते, किं कर्तव्यमिति न जानति । एतस्मिन् काले देवता अपि सर्वत्र आकाशे परि धावन्त्य, ०" अथ ते भिक्षव' यावत् प्रात सर्वा रात्रि धा कथा अकथयन् । अनुरुद्ध श्रानंदं आमंत्रयामास--गच्छ कुशी नगर प्रविश्य मल्लान श्रारोचय-'परिनिर्वृतो भगवान् यस्ये दानी काल मन्यध्वे । अथ अानंद उत्थाय बुद्धस्य पादौ अभिवाद्य एकेन भिक्षुणा सार्धं क्रन्दमान' नगर प्राविशन । तत्र अपश्यत् पंचमल्ल शतानि सस्थागारे सन्निपतितानि केनचित करणीयेन ते मल्ला आनद आगत दृष्टा उत्थाय सम्मोद्य पादौ अभिवाद्य स्थिता मानद भवोचन "कथ भन्ते एतहि अतिप्रग श्रागत ?" आनद प्रत्युवाच-"हितकामो व एतर्हि प्रातरागत तथागतो ऽतीताया रात्री परिनिर्वृत इति जानीथ, यस्येदानी काल मन्यध्वे " अथ एद वचन श्रुत्वा मल्लेषु न कोऽपिय न क्रन्दति, अश्रूणि विमोचयन् न वदति “कथं अतिक्षिा बुद्ध परिनिर्वृत ! कथ अतिक्षिप्र लोकचक्षुरन्तिर्हितम् ।। आनन्द तान प्रत्युवाच-"अल अल भद्रमुखा शोचथा । येत् जात संस्कृत तत् मा रूज्यतु मा विनश्यतु इति कुतोऽत्र लभ्यं । प्रागेव बुद्धन आख्यात-'जातस्य ध्रुवो मृत्यु सर्वे प्रिय विप्र योग न सदा स्थिति । अथ ते मल्ला एकमेक ऊचुः तेन सर्वे सन्निपत्य सर्वेण गंधमालेन बहुविधेन नृत्यगीतेन च साधं गच्छेम यमक शालयो (स्थानम् )।" शरीर पूजयन्त एकं दिनं व्यतिनामप्य बुद्धस्य शरीर पर्य के संस्थाप्यमल्ल- कुमार चतुष्कोणत पर्यके उत्थाप्य धूपधूपयत पुष्पाणि विकिदन्तो नृत्येन गीतेन पूजयन्त पुरस्तिमेन द्वारेण नगर प्रविश्य वोथिपु जानपदिकै जनै सक्रियमाण शरीर (गृहीत्वा ) पश्चिमेन द्वारेण नगरात् निष्क्रम्य उच्चविशेष स्थाने धस्याम इति विनि- श्चित्य मल्ला स्वग्रह उपगम्य गधमाल चादाय नाना विधेन नृत्यगोतेन साधं यमक शालयो स्थाने ( बुद्धस्य ) शरीर पूजयन्त एक दिन व्यनिनामयामासु । बुद्धस्य शरीर पर्यक प्रारोप्य मल्जा पर्यक उच्चारयिष्याम इति । विचार्य पर्यक उच्चारयितुम् ना शक्नुवन । तदा श्रायुप्मान् अनुरुद्धो मल्लान् अवोचत-"अल यो मा आयासयथ अन्यथा एतहि देवताना अभिप्राय पर्यकोच्चारणे ?' मल्ला अयोचन्-"को देवताना - अ ( ६६ ) धक्ष्याम इति अनुरुद्धोऽवोचत्-वय (भगवत ) शरीर गधेन माल्येन नृत्येन गीतेन सत्कुर्वन्त एक दिन व्यतिनाम्य बुद्धस्य शरीर पर्यक आरोग्य वोऽभिप्राय । सात दिनानि गधेन माल्येन नृत्येन गीतेन च सत्कृत्य पूजयित्वा बुद्धस्य शरीर पर्यंक आरोग्य मल्लकुमारै पर्थक चतुष्कोणत उत्था'य धूप धूपयत पुष्पाणि विकिरन्त विकिरन्तो नृत्येन गीतेन च शरीर सत्कुर्यन्त पुरस्तिमेन द्वारेण नगर प्रविश्य वीथिपु जान पदिकै जनै सक्रियमाण उत्तरेण द्वारेण नगरात निष्क- म्य नदी हि ण्यवती उप सक्रम्य मुकुट व धने चैत्ये धक्ष्याम' इति अय देवताना अभिप्राय येन पर्यको नोच्चरति । मल्ला अवोचन्–'साधु भन्ते, यथा देवताना अभिप्राय तदैव भवतु ।" अथ मल्ला एकमेक ऊचु -'आयाम वय नगर प्रविश्य रथ्या वीथीश्च सस्कृत्य मार्गाश्च सम्माय॑ उदकेन निपिन्य धूप धूपयित्वा इहागम्य सप्त दिनानि शरीर पूजयिष्याम अथ मल्ला सहैव नगर र या वीथीश्च सस्कृत्य मार्गच सम्मायं धूप धूपयित्वा नगरात निक्रम्य यमक शालयो स्थान उपसक्रम्य गध पुप्पै नृत्येन गीतेन शरीर पृजयन्त सादिनानि व्यतिनामयामामु तत मायाह्न समये बुद्वस्य शरीर उथाय पय निवाय मल्लकुमार चतुर्यु कोणेषु ग्वाह्य ध्वज सह धूपयन्त पुष्पाणि विकिरन्तो नानाविधेन नृत्येन गीतन पुरस्तात् पश्वाच्च अनुगन्चन्त स गौरव निन्यु । तस्मिन काल शरीरस्य उपरि वायन्त्रिशा देवा मदार पुष्पाणि उत्पल ० पद्मः कुमुद० पु डरीक पुष्पाणि दिव्य नि चदन वाट चगोनि र यामु मार्गषु सर्वत्र विकिरति दिव्यानि गीतानि च देवता गायति । श्रम ना १ मा उ वृ -तन अन मानुपै मगीत दिव्येन सगीते नव शरीरम्य पूना नातु ।

( ६७ ) आनद. प्रत्युषाच-"सम्मुखात् मया बुद्धस्य श्रुतं सम्मुःखात् बुद्धस्य प्रतिगृहीत तथा गतस्य शरीरे तथा प्रतिपत्तव्य यथा राज्ञ चक्रवर्तिन शरीरे प्रति पद्यते ।" पुनश्च त आनद अवोचन्-"कथां भन्ते । राज्ञ. चक्रवर्तिन. शरीरे प्रति पद्यते " स प्रत्युवाच-"आर्यस्य राक्ष. शरीर प्रथम गधोदकेन स्नपयति, तस्य शरीर । नवेन कार्यासेन वेष्ठयति, पचभि युगशतैः दुष्यै परिवेष्ठयंति । वेष्टयित्वा शरीर सुवर्ण द्रोण्या निधाय वैलेन पूरयित्वा तां सुवर्ण द्रोणी उत्थाय द्वितीयस्यां आयस्या महा द्रोण्या प्रतिपय तांच गध चंदन द्रोण्यां प्रतिष्य अन्तर्वहिरुभयथा सर्व गधानां चितक कृत्वा तस्योपरि धापयति । समाहार्य च शरीराणि (अस्थीनि) चार्तुमहापथे स्तूप कारयति स्तंभ उच्छरापयति चित्राणि लवयंति । (ये) ते पथिका राज स्तूप द्रक्ष्यति शासने चित्त प्रसादयिष्यन्ति । (तत् तेषा) बहु हिताय भविष्यति । भानन्द । युष्माभि में शरीरं पूर्व गधोदकेन स्नपयितव्य नवेन कार्पासेन शरीर वेष्टयित्वा पंचभि दुष्य युग शतै च परि वेष्ट्य तच्छरीरं सुवर्ण द्रोण्यां सस्थाप्य तैलेन पूरयित्वा उत्थाप्य ( ता) सुवर्ण द्रोणी अपरस्या आयस्या महा द्रोण्यां प्रतिपय ( तां च ) चंदन काष्ठेन आवृत्य अतर्वहिरुभयथा सर्व गंधान चितक कृत्वा तस्यो परि तत् ( शरीर ) धापयितव्य समाहार्य च शरीरागिण (अस्थीनि ) चातुर्महापथे स्तूप कारयितव्यः स्तम्भ उच्छ- रापयितव्य चित्राणि लम्बायतण्यानि । (ये) ते पथिका वुद्धस्य स्तूपं द्रक्ष्यन्ति तथा- गतस्य धर्मराज मार्गे चित प्रसादयिष्यन्ति । ते पुण्यलाभिनो भविष्यति, काल कृत्वा स्वर्ग लप्स्यन्ते प्राप्स्यन्ते च मार्ग (प्राप्त) जनम् ।" अथ (ते) मल्ला एकमेक अवोचन्- "तेन हि वय नगर गत्वा समा. हरेम चितक साधनानि गध पुष्पाणि कार्पासानि शव द्रोणी तैलं श्वेतानि दुष्य (युगा) नि" अथ मल्ला सहेव नगर प्रविष्य चितकसाधनानि समाहृत्य मुकुट वधन चैत्य उपसक्रम्य परिशुद्धेन गयोदकेन बुद्धस्य शरीर स्नपयित्वा नवेन कार्पासेन शरीरं परिवेष्टय पचभि दुष्य (युग) शते. तद् वेष्ठयित्वा सुवर्ण द्रोण्या निधाय तेलेन प्रपूर्य (ता) सुवर्ण द्रोणी उत्याप्य अपरस्यां महा द्रोण्या प्रतिग्य ता च चन्दन काष्ठ द्रोण्या निधाय (ता) अन्तर्वहिरुभयथा सर्वगवाना चितक कृत्या .

(६८ ) अथ लो- ऊ (१) नाम मल्लाना महाराजो महोल्का गृहीत्वा 'बुद्व-शरीर अग्नि दास्याम' इति अग्नि अदात, न चाग्नि प्रज्ज्वलित । अथ अन्येऽपि केचन मल्ल प्रमुखा उपगम्य अग्नि अदु , न पुन अग्नि प्रज्ज्वलित । अथ (आयुष्मान्) अनुरुद्धो मल्लान् अवोचत- पानात . अल अल भद्रमुखा, यूय ज्यालयथ, न च अग्नि ज्वलति देवताना अभिप्रायेण " मल्लाश्चाऽपृच्छन्- “क (पुन ) भदन्त, देवताना अभिप्राय , येन अग्नि न ज्वलति ? ता अनुरुद्वोऽवोचत- देवता अभिप्रयति यत् (आयुष्मान् ) महाकाश्यप सावं पचमात्रै श्राफशते जनपद (चारिका ) चरमाण एतहि अर्धमार्ग प्रतिपन्न , तेन न जलेत् अग्नि यावद् ( आयुष्मान् महाकाश्यप ) बुद्धस्य शरीर न पश्येत । एनमभिप्राय विदित्वा देवतानानुमन्यन्ते अग्ने ज्वलनम् । मल्लाश्च तेषा अभिप्राय अनुमत श्रवाछन । तदा (आयुग्मान् ) महा काश्यप साधं पचभि भिनुशते पावाकुशीनगरयो अर्व मार्ग प्रतिपन्नो भवति । अध ( ग्मनु ) मार्गऽ न्यतर निग्रंथ श्रावक मन्दारपुष्प आदाय आगच्छति । अथ (आयुप्मान ) महाकाश्यप दूरत एव आगन्यन्त निम्रन्थ द्रष्ट्वा उपसक्रम्य अपृच्छत-स्त प्रागन्टमि? म प्रयुवाच- कुशीनगरात अागन्छामि ।" ( श्रायुमान) राश्यप पुन अन्दन अपि ( आवम) नानामि (६६ ) , - अथ तस्यां परिषदि सुभद्र. नाम शाक्य पुत्र (अभूत स) तान् भिक्षून निवार्य अवोचत्- अल आवुसा. । मा शोचथा , परिनिवृते भगवति सुमुक्ता. घय । तेन स्थविरेण महा श्रमणेन सर्वदा वयं उपद्रु ता अभूम- इद व' लप्यते इदं व न क्लप्यत इति । इतः परं क्य यदिच्छाम. तत् करिष्याम । तत् श्रुत्वा ( आयुष्मान् ) महाकाश्यप दुखी दुर्मना तान् भिजून अवोचत- "क्षिप्र सहरत पात्र चीवर गच्छेम इदानी यमक शालयो श्रादहनात् पूर्व एव पश्येम बुद्ध | भगवन्तम् ] अथ ते भिक्षव. श्रुत्वा महाकाश्यपस्य वचनं उत्थाय ( आयुष्मान्त ) काश्यप अन्वगच्छन्, उपसंक्रम्य च कुशीनगर नया हिरण्यवत्या तीरे दिव्य मुकुट (मुकुट वधन ) चैत्य उपगता । अथ ते (आयुष्मन्त ) आनन्द अभिवाय एक मन्त स्थिता आनद अबोचन्- इच्छाम एक पार्श्व शरीरस्य द्रष्टु, तद् अदग्ध शक्यं च । आनद प्रत्युवाच--"अदग्धमपि दुष्कर द्रष्टु यत बुद्धस्य शरीर गधोदकेन स्नपयित्वा पचभि कार्पास दुष्य शतैः च परिवेष्टय सुवर्ण द्रोण्या आयस्यां दोण्यां सुगध चदन काष्ठ चितके च प्रक्षिप्य अन्तर्वहिर्धा आच्छाद्य स्थापितम् । तेन बुद्धस्य शरीर दुष्करं द्रष्टुम् ।” (आयुष्मान् महा ) काश्यप त्रि अपृच्छत् श्रानद' च तथैव प्रत्युवाच- "बुद्धस्य शरीर दुष्कर द्रष्टुम् ।" अथ ( आयुष्मान् ) महा काश्यप गध चितक उप संकान्तः । तस्मिन् काले द्विगुण द्रोण्यभ्यन्तरे निक्षिप्तस्य वुद्ध शरीरात् भिन्न वर्गों पादौ निर्गती। द्रष्ट्वा च (भायुष्मान् ) काश्यप साश्चर्य आनंद अपृच्छत्-बुद्धस्य शरीरं सुवर्ण वर्ण पादी कथं भिन्न वर्णी" आनन्द प्रत्यवोचत-"पूर्व एका दुखिता वृद्धा माता उपसंक्रम्य हस्तेन बुद्धस्य पादौ स्पृष्टवती, तस्या अभूणि च तयोरुगरि पतितानि, तेन (एतौ) भिन्न वौँ ।” श्रुत्वाच तत् काश्यप. अनाचमना गध चितके उपस्थापित बुद्ध शरीर अवदत । तस्मिन एव काले चतुर्विधा परिपद् देवताश्च उपरि एकदैव अभ्यवादयन्त । तदेव (च) बुद्धस्य पादौ अन्तहिती।

( ७० ) अथ (आयुष्मान् ) महाकाश्यप चितक त्रि प्रदक्षिणी कृत्य गाथाभि उवाच- वुद्धोऽसमसमो लोके प्रजाया यो यनुत्तर. । वन्दे हमिहाद्य नर, यो ह्य प्रतिम प्रजया ||७२ ।। श्रमण मनुपम श्रेष्ठ वीतमल हि (तम् ) । छिन्न तृष्णा शाख मुनि महर्षि देवमर्त्ययो ॥१००॥७३॥ नरेव प्रतिम वीर वन्देऽह ( त नरोत्तमम्) । सहायो गमनेऽतुल शास्तार विरागणम् ।।१०१।।७४।। निर्मल विरज चैव वन्देऽह ( त नरोत्तमम् ) । नाशयित्वाऽऽसवत्रय शून्ये शाति सुखावहम् ।।१०२।।७५।। अद्वयमतुल (त हि ) वन्दे दश बलोत्तमम् । सुगततमति श्रेष्ठ द्विपद श्रेष्ठ मुत्तमम ॥१०३।।७६।। चतुरार्य सत्याभिज वन्दे ज्ञानेन तायिनम् । श्रमणमद्वितीय (त) पापनुद धर्मनायकम् ॥१०४||७७|| निवृत त वन्देह नर पुगवाम । अमोधन विरजस्व सर्वदा शान्त मानसम ॥१०५||७८।। प्रक्षालिन रजो जल्य वन्देऽहममजमायेम । प्रमाने त्र गभीरममृतमिति ।।१०६||६|| दलभ दुवर ध्यान वन्देऽहमतुल ( नरम ) । सिं- सटश नटत निर्भय बलमयुतम ||१०||८|| चतु प्रति पर मारजित वन्देऽह तत महान महाशील गुण सम्पन्नेन( गीयमाना ) ममामामु चतमपु गाया मु (') टम्म चितरे पत अग्नि प्रचलित ।। पटा च ) माता मेक उचु 'साय (वन में ) अग्नि दिन त्र प्रवननि, टाकर पाला निर्माण, म शरीर बिनशन ! उन । चा ) नल 'न निघापय नम --- टार दिनात माचिद उनदेवता बुद्धशामने * पिका, निर बुद्ध-चिकम्य अग्नि । PTE: कनभ्य मन्नात द्वादश " "འུ, के युद्धम्म सर पवन म । नत शीत गन्या भगवन्त अनन्त -- - ॐनम ( ७१ ) अशृण्वन ( अथ) पावयका मल्ला -"परिनिवृतो बुद्ध यमकशालयोः ।। तेऽचिन्तयन्-“वय अपि गत्वा शरीर भाग गृहणीयाम् । वय अपिस्व के जन पदे स्तूप कृत्वा पूजयिष्याम " अथ पावयका मल्ला' सजितया चतुरगिण्या सेनया- हस्तिसेनया, अश्व सेनया, रथ सेनया, पदाति सेनया च सार्धं कुशीनगरे दूत प्रेषयामासु. 'बुद्ध भगवान् अत्र स्थाने परि निवृत । स न अपि शास्ता सत्करणीय इति पय अपि अर्हाम अस्थिभाग लन्धु , वय अपि स्वके जनपदे स्तूप उत्थाप्य पूजयिष्याम ।" कुशीनगर राज प्रत्योवचत्- “एवमेव सत्य यथा यूयं वदथ । भगवान् तु अत्र ( अस्माक) क्षेत्रे परिनिवृतः। अस्माक जना स्वय पूजयिष्यन्ति दुष्कर लव्धु भद्रमुखै याचित शरीर भाग ।" अशृण्वन् अथ अलकसका बुलय , राम ग्रामका कोलय , वेष्ठ द्वीपका ब्राह्मण परिषद् कापिलवास्तवा शाक्य गण जना "परिनिवृत तथागत कुशी नगरे अन्तरा यमक शालयो ।" - अथ सर्वेषा जनपदाना च राजान (01) अजात शत्रु च चतुरगिनी सेना- हस्ति सेना, अश्वसेना, रथ सेना पदाति सेना च उपादाय गगानदी उत्तीर्य द्रोण ब्राह्मण आज्ञापयामास- "कुशी नगर प्रविष्य मम नाम्ना मल्लान् अभिवाद्य असावाधता प्राशु विहारता च पृच्छ, कथय च, सर्वदा वय प्राति वेशिकै सह सम्मोदमाना अविवमाना परस्पर सत्कुर्वन्त. अवसाम । श्रुत मया तथागत वो जनपदे परिनिर्वृत । अनुत्तर (स) न देव . तेन दूरत आगता (वय) लब्ध्वा अस्थिभागं स्व जनपद प्रति निवृत्य स्तूप उत्थाप्य पूजयिष्याम इति । तं चेद मे दास्यथ सर्वेषां जनपदाना महापे रत्ने (तत्र) वय अपि व सहभागिन स्याम" अथ द्रोण ब्रह्मण लब्ध्वा राज आदेश तद् नगर गत्वा मल्लान् आच- "महाराज मागध अनेक वार पृच्छति व असा बाधतां प्राशुविहारतां च कथयति च सर्वदा वय-प्राति वेशिर्के सह सम्मोदमाना अविवदमाना परस्पर सत्कुर्वन्त ( ७२ ) अथ मजा द्रोणं ब्राह्मण अवोचन - एष मेव सत्य यथात्ववद सि । भगवन् तु अत्र (अस्माक ) क्षेत्रे परिनिर्वत । अस्माक जना स्वय पूजयिष्यति । दुष्कर लन्धु राज्ञा याचित शरीर भाग अथ सर्वेषा जन पदाना राजान मत्रिभि सह दूरत समागत्य विवाद प्रारो- पयामासु --"वयं दूरत आगता शाति पुरस्सर साभिवादन व याचामहे शरीर भाग। त चेद न दास्यथ इह (न ) चतुरगिनी सेना जीवित शरीर वा न किमपि मन्यते । अलाभे चलात (त) गृहीप्याम ।" तस्मिन् काले दुशीनगरस्य जना सर्व अमात्यै सह सन्निपत्य गाथाभ्या अयोचन- - दूरादागत्य राजानोऽभिवादन्तेऽतिनम्रकम् । तथागतकायशेष वो दातु नोत्सहामहे ॥१०८।१८१|| अंपयति भटान ते चेत ते भवति हि नो न किम । जीवितव्येन युध्यामोऽत्र नान्ति हि (नो) भयम् ।। ०६।२२।। तस्मिन काने द्रोण ब्राहाण तान जनान् अवोचत्-“दीर्घरात्र भद्रमुख युद्धस्य सम्मुखे लम्या धर्म देशना नान्तिवाद च ( व ) मनमिच निवापित -सर्वे सत्या भवन्तु सना शान्तान्मान इति । स्थ तईि बुद्ध शरीर आरम्य विवाद परस्पर सरदार ? तपा तेन परिन्यत शरीर ला कामा । तेन इह शरीर विभज्य लमध्वम ना सई दनि जवाचन निप्र च त पिरिचय च । 7 (नास्ट) एनदि किनानपिनु अति ?' सचन- द्रोए (न ) हिनावानी, ( म न ) न्यायत विभपताम् ।" 14. राम दास प्रान्शिन ( तेन दि प्रादाण ) व न बुद्ध शरीर 17 या उसमाम्य ( भगवत ) शरीर 17 एक मन्ना याययित्वा दूत ३. रानान भनान शन समय रदार प्रन्या (यय च) न चिर (अत्र ) आगच्छतु इति एता पूजनीया आल्हादिनी उज्ज्वलतारक सहशां तथागतस्य दष्टा विभाजन समाप्ति काले स्वय अह ते दास्यामि ।" अथ स उपादाय द्रोणस्य वचन राजान अजात शत्रु उपसंक्रम्य अवोचत्- "द्रोणः ( देव 1 ) ब्राह्मण अनेक पर्यायेण व शरीरस्य अल्पा वाघता प्राशु विहारतां च पृच्छति, न चिरेण इह आगच्छतु" इति च वारं वारं कथयति, इमा पूजनीयां आल्हादिनी उज्ज्वल तारक सदृशां तथा गतस्य दंष्ट्रा विभाजन काले स्वय अह ते दास्यामि ।" .. अगार . अथ द्रोण एकेन कुम्भेन शरीराणि अष्टधा सम सुविभक्तानि विभज्य तान् सघान् अवोचत्-‘लभेय अह ( इमं ) कुम्भम् ।" वय शरीरेषु पूजा स्तूप उत्थाप- यिष्याम इति विनिश्चित्य ते क्षिप्र ददु त (कुम ब्राह्मणाय )। अथ पिप्पलिवन ग्रामिका ( मौर्या आगत्य ) सघं अबोचन्-भूमौ अवशिष्ट नो ददत तस्य उपरि पूजा स्तूप निर्मास्याम इति । अथ ते त भदु । अथ कुशीनगर का (मल्ला.) लब्ध्वा शरीर भागं के जनपदे पूजा स्तूपं उत्थापयामासु , पावेयका अल्ल कल्पका , राम ग्रामका , वेष्ट द्वीपका., कापिलवास्तवा' वैशालिका च (०)। राजा मागध. अजात शत्रु लब्ध्वा शरीर भागं स्वक जनपदं प्रति निवृत्य पूजा स्तूपान् उत्यापयामासु । द्रोण ब्राह्मण. च शरीर कुम्भ गृहीत्वा प्रति निवृत्य स्तूप उत्थापयामास । पावेयकाश्च मल्ला अगार गृहीत्वा अगारेस्तूपं निर्मा- पयामासु । तस्मिन् काले तथागतस्य शरीरे अष्टौ स्तूपा निर्मिता अभूवन् , नवम कुम्म स्तूप. दशम अगार स्तूप., एकादश (च) जन्म कालिके केशे । कस्मिन् काले बुद्ध जात ? कस्मिन् काले अभिनिष्क्रान्त ? कस्मिन् काले मार्ग अभि सम्वुद्ध ? कस्मिन् च काले परिनिवृत १ विशाखा नक्षत्रे तथागत जात , विशाखानक्षत्र गृहाद अभि निष्कान्त , विशाखानक्षत्रे मार्ग अभि सबुद्ध., विशाखा नक्षत्रे च परिनित । कदा जातो द्विपदोत्तम कदा तपोवन गत । कदा प्राप्त अनुत्तर मार्ग कदा च निर्वाण नगर प्रविष्ट ॥११०।८।। विशाखा नक्षत्रे जातो द्विपदोत्तम , विशाखा नक्षत्रे तपोवनगत । विशाला नक्षत्रे प्राप्तोऽनुत्तर मार्ग, विशाखा नक्षत्रे च निर्वाण नगर प्रनिष्टः ॥११शाम४॥ . ,

( ७४ )
अष्टमें दिवसे जात तथागत अष्टमे :दिवसे बुद्ध गृहाद् अभि निष्क्रान्त ।
अष्टमे दिवसे प्राप्त बोधि अष्टमे दिवसे( च ) परिनिर्वृत ।
जातोऽष्टमे दिवसे द्विपदोत्तमोऽष्टमे दिवसे तपोवन गत ।
अष्टमे दिवसेऽभि सबुद्रोऽष्टमे दिवसे च निर्वाण पुरप्रविष्ट ॥११२॥८५।।
द्वितीये मासे जात तथागत , द्वितीये मासे
गृहाद्
अभिनिष्क्रान्त । द्वितीये
मासे बाधि प्राप्त द्वितीयेमासेच परिनित ।
द्वितीये मासे जातो द्विपदोत्तम , तिीये मासे तपोवन गत ।
द्वितीये मासेऽभि मयुद्व दितीये मासे च निर्वाण पुरप्रविष्ट ॥११३।।६।।
शालपुष्पं रति समृद्ध नावणे प्रभास्वरे ।
तस्य मुले जन्मस्थान (तत्रैव) तथागत परिनिवृत ॥११४||८||
नितो महाफम्णो वहु जनाभि वदित ।
सर्व भय विनिमुक्त निर्वाण च प्राप्तवान ।।१६५।।८।।
इति बुद्धभापित दीर्घागम सृचे प्रय चतुर्य ।

No text on this page.

- साहित्य-संस्थान, राजस्थान विश्व विद्यापीठ, उदयपुर प्रकाशित साहित्य- १ पृथ्वीराज रासो, भाग १, २, ३ व ४ सम्पादक-कविराव मोहनसिंह मूल्य प्रति पुस्तक १०) २ अोझा निबन्ध संग्रह, भाग १, २, ३ व ४ स्व. म. गौरीशकर हीराचन्द योभा ३ राजस्थान में हिन्दी के हस्तलिखित ग्रन्थों की खोज, भाग २ श्री अगरचन्द नाहटा ४ राजस्थान में हिन्दी के हस्तलिखित ग्रन्थों की खोज, भाग ३ श्री उदयसिंह भटनागर एम० ए० राजस्थान में हिन्दी के हस्तलिखित ग्रन्थों की खोज भाग ४ श्री यगरचन्द नाहटा ६ पूर्व आधुनिक राजस्थान श्री महाराजकुमार टॉ० रघुवीरसिंह एम० ए०, डी. लिट. एल एल० वा. मूल्य अजिल्द ६), सजिल्द ७) आचार्य चाणक्य (नाटक) श्री जनार्दनराय नागर एम० ए०, साहि यरत्न, विद्यालकार तुलसीदास (काव्य) भी स हैयालाल श्रोभा एम० ए० ह राजस्थानी भाषा टॉ० मुनीतिकुमार चाटा एम० ए०, ६० नया चीन मी एकमराज मेहता वी० ए०, एल एन० बी० ११ मालवी कहावते, भाग १ नौ रतनलाल मेहता बी. 10, -ल. बी. १. राजस्थानी भीलों की नहाने व शब्द मोप १३ प्रदिनिवासी भील मृन्य BID 1 रन १४ भनी लोन १५ राम्बानी दोगनी मय ३) •६ : ' रागमन ।) १६ - ? :- ), भाग =), भा।३.१.) मूल्य २॥ - मूल्य ११) टी. लिट. मूल्य २) मूल्य 110 मृल्य २) मृय २) मग २) मूग २॥ प

No text on this page.

No text on this page.

अथ-महावदान-सूत्र प्रथम
[ाल निवासिना बुद्ध यशसा (४०३-४१३ ई०) चीनी-मापायां धनुदितं तदिद
महापण्डित राहुल साकृत्यायनेन
पुनरनूदितम् ]

No text on this page.

अथ महावदान-सूत्रं प्रथमम् [कायुल निवासिना बुद्धयशसा (४०३-४१३ ई.) चीन माषायां अनूदित तदिद राहुल सांकृत्यायनेन पुनरनूदितम्] एव मया श्रुतं- एकस्मिन् समये वुद्ध' श्रावस्थ्या देशे ( विहरति ), 'पुष्प- वनशालाया महता भिक्षुसधेन च साद्ध अर्द्धत्रयोदशजनशतेन । तस्मि समये संबहुला भिक्षवः पिण्डचारात्प्रतिक्रान्ता., पुष्पवनशालायां अन्योन्यं कथा सवदन्ति, एके हि आर्या भिक्षव'-(यानि) अनुत्तराणि प्रणीतानि भवन्ति अत्याश्चर्याणि ऋद्धयः दुरंगमानि वीर्याणि बलानि उदाराणि महान्ति, तानि अतीतानि अनेकविधानि जानाति बुद्ध. निर्वाण प्रविष्टाना छिन्नदृष्टि सयोजनवधनाना अकथकथीना, जानाति च तेषा बुद्धानां संख्या प्रमाण नाम-गोत्र- शब्दं, जाति, वश, कुल, तेषा पान भोजनं, दोय अल्प श्रायुः, सुखा दुखा वेदनाम् । तथाच ते बुद्धा एवशीला एवधर्या एवप्रज्ञा एव प्रतिभा एव स्थितिका । यथा त आर्या तथागता अभवन् कुशलाऽव्याकृतधर्मस्वभावा, यथार्थं जानाति । देवा आगत्य वदन्ति (तेन ) जानाति इमं अर्थम् । तस्मिन काले भगवान् प्रतिसँल्लयने स्थित दिव्येन श्रोत्रेण विशुद्धन पर्यवदाते- ' पा-काररिकुटिकायाम् । २ या-कारेरिमडलमाला।

( २ ) "साधु । साधु ।। ना श्रावीत् तेपां भिक्षणा एव सवादम् । अथासनादुत्थाय उपसक्रम्य पुष्पवनशाला न्यपीदत् च प्रज्ञय श्रासने । तस्मिकाले जानन् अपि अर्थ अप्राक्षीत् वचन तान भिजून- "भिक्षव 'यूय कस्या कथाया इह सन्निपतिता ?" तदाते भितव इद वस्त्वभूद् ( इति ) अयोचन । तदा भगवान् अवो चतान् भिन्- यूय श्रद्वया अगार विहाय मार्ग भावयथ, सर्व करणीयम् । तत्र भवताव करणीये । प्रथम नाम आर्या धर्म-कथा, द्वितीय नाम श्रार्य तूष्णी-भाव । युज्यते युप्माक एव सवाद तथागत औदारिकेन महता ऋयनुभाववलेन जानाति सर्व अतीतानेककल्प वस्तु । शक्य सजानीतु धर्मस्वभाव , तस्मात् जानाति । यतश्च देवा आगत्य वदति ततो जानाति । वुद्धस्तदा गाधाभिरवोचत्-- भिक्षवो धर्मशालाया मन्निपतिता समूचुरार्यकथा सवादम् । प्रति सल्लयनगर्ने स्थितम्तयागतो दिव्येन श्रोत्रेणानासीत् सर्वम् ।। १ ।। सूर्य प्रभो लोकानोको बुद्रो सविविच्य मविविच्य धर्मवात्वर्थम् । जानाति प्रतीतमाययं, त्रय, परिनिवृताना बुद्वानाम् ।।२॥ ताति कुल, सवंदन जन्म भोग च जानाति । श्राश्रित्य तानि तानि म्यानानि,परिशुद्वन चनुपा प्रवेदयति सर्वमथ ॥ ३ ॥ नाना देवा महावी पेदना , अन्युटारमुसापाग । प्रवन्ति बुद्धाना परिनितानाम् ॥४॥ प्रपत्यन्नि वन नाम गोत्र दुखित शकुनिम्बर सर्व जानाति । देव मनु पाए। अनुनर श्रेट सनानाति प्रतीतान बुद्वान् ॥ ५॥ "चाच च नगन भिन्न- नाम यागन्य मा त्रय,

)
सु साधु, भगवान् भाषतां इदानी कथा, उद्गृहीष्याम आचरिष्यामो (व) तद् ।"
बुद्ध उवाच तान् भितन्-
"श्रृणुत, श्रृणुत, सुष्टु मनसिकुरुत इदं, अहं वो भाषिष्ये, पृथक् व्याख्या-
स्वामि"
अथ ते भिक्षव समन्वमन्यन्त अववादं श्रोतुम् ।
बुद्धः प्रत्युवाच तान् भितन्-
"अतीत एकनवतितमे कल्पे तदाऽभूत् विपश्यी नाम बुद्ध' तथागतोऽर्हन् ,
प्रादुरभूत् लोके । पुनश्च परं भिक्षवः । अतीत एकत्रिंशे कल्पेऽभूत् शिखी नाम बुद्धः
तथागतोऽर्हन् , प्रादुरभूत लोके । पुनश्च परं भिक्षवः ! तत्रैकत्रिंशे कल्पेऽभूत्
विश्वभूर्नाम बुद्धः तथागतोऽर्हन्, प्रादुरभूत् लोके । अस्मिन् भद्रकल्पेऽभूत्
ककुच्छन्दो नाम बुद्धः; कोनागमनो नाम च बुद्ध ; काश्यपो नाम च बुद्धः ।
अस्मिन्नेव भद्रकल्पेऽई उ पन्न' सम्यक्-संबुद्ध ।"
बुद्धोऽथ गाथाभिरुवाच-
"एकनवतितमेऽतीते कल्पेऽभूत विपश्यी बुद्ध ।
तत एकत्रिंशे कल्पेऽभूत् बुद्ध.
शिखीनाम ॥ ६॥
तत्र तस्मिन् कल्प
आगात् विश्वभूस्तथागतः ।
इहास्मिन् भद्रकल्पेऽनेकासंख्येये
अभूवन् चत्वारो महर्षयः सत्वान् धनुकम्प्य आजम्मु ।
क्रकुच्छन्दः कोनागमन' काश्यप' शाक्यमुनि." ॥ ८ ॥
"जानीत यूयं, विपश्यिनो बुद्धस्य काले मनुष्याणां श्रायु अशितिवर्ष
सहस्रम् । शिखिनो बुद्धस्यकाले मनुष्याणां आयुः सप्ततिवर्षसहस्रम । विश्वभ्वो
बुद्धम्य काले मनुष्याणां आयुः त्रिंशद्वर्पसहस्रम् । काश्यप बुद्धस्य काले मनुष्याणा
श्रायु' विंशतिवर्षसहस्रम् । एतर्हि माय्यागते लोके मनुष्याणां आयु’ वर्षशतं
अल्पना गत भूय' प्रक्षीय ।"
तदा बुद्धो गाथाभिरप्युवाच-
विपश्यिकाले नराणां आयु. चतुराशीतिसहस्रम् ।
शिखि बुद्धस्य काले मनुष्यायुः सप्ततिवर्षसहस्रम ॥ ६ ॥

( ४ ) विश्वभूकाले मनुष्यायु पष्ठिवर्षसहस्रम् । क्रकुच्छन्दकाले मनुष्यायु चत्वारिंशद्वर्षसहस्रम् ॥१०॥ कोनागमस्यकाले मनुष्यायु त्रिंशद्वर्पसहस्रम् । वुद्वकाले मनुष्यायु विंशद्वर्षसहस्रम् ॥ ११ ॥ तथैतर्हि मे काले मनुष्यायु नाविक शतात्" ॥ काश्यप "विपश्यी बुद्ध भागात् क्षत्रिय गोत्रेण कौडिन्य । शिखी बुद्ध , विश्वभू बुद्ध अपि गोत्रेण तथा | क्रकुच्छन्द बुद्व आसीद ब्राह्मण गोत्रेण काश्यप कोनागमनो वुद्व ,काश्यपो बुद्ध अपि कुलेन गोत्रेण तथा । अह एतर्हि तथागतोऽर्हन अम्मि कुलेन क्षत्रिय , गोत्रनाम्ना च वदन्ति गोत्रनाम्ना च वदन्ति गौत ( इति ) वुद्वस्तदागाथाभिरुवाच- विपश्यी तयागत, शिवी, विश्वभू ।। १२ ।। दमे त्रय सम्यक् मबुद्व आसन गोत्रेण कौण्डिन्या ।। अन्य त्रय तथागता यामन गोत्रेण काश्यपा ॥ १३ ॥ अह इदानी अनुत्तर श्रेष्ठ , शाम्ता सर्वेपा मन्वानाम् ।। देव-मनुप्यादीना वशी गोतमो नाम ।। १४ ॥ पवमा त्रय सम्यक्-मबुद्धा यामन् वशेन क्षत्रिया । अन्तता त्रय तथागता ग्रामन् वशेन ब्राह्मणा ।। १५ ।। यहनिटानी अन्ना श्रेष्ट बी अम्मि क्षत्रिय ॥

१ तदा तस्मिन् स्थाने प्राप सबोधिमनुत्तराम् । शिखी पुण्डरीकवृक्षे प्राप' मार्ग निरोधं ससमुदयम् ।। १७ ।। विश्वभूः तथागतो निषद्य शालवृक्षाधः । लेमे विमोक्षज्ञानं ऋद्धिं अप्रतिहताम् ॥ १८॥ क्रकुच्छन्दस्तथागतो निपद्य शिरीषवृक्षाधः । सर्वे विशुद्ध प्रज्ञा विगतक्लेशा विगतग्राहा ॥१६॥ कोनागमो मुनि निषद्योदुम्वरवृक्षस्याध.। तत्रैव तस्मिन् स्थाने परिजहौ सर्वं रागं दु ख सौमनस्यम् ॥ २० ॥ काश्यपस्तथागतो निषद्य न्यग्रोधवृक्षाधः । तत्रैव तस्मिन् स्थाने परिजही सर्व ससमुदयम् ।। २१ ।। अह एतर्हि शाक्यनरो निषद्याऽश्वत्थवृक्षे । तथागतो दशवलोऽनुत्तरो परिजही सर्वान् संस्कृतानर्थान् ।। २२ ॥ विध्वस्य मारपरिषदसर्वपरिषत्सु दिशाभि महालोकम् । बुद्धा वीर्यबल (युता ) भासमाना प्रभया परिजहुम्तम. ।। २३ ॥ पृथक्पृथक् निषद्य नानावृक्षेषु तत्राभूवन संवुद्धा. । "विपश्यी तथागतः त्रिषु सन्निपातेषु दिदेश धर्मम् । प्रथमे आवक सन्नि- पातेऽभूवन् अष्टषष्ठिपुरुषशतसहस्र, द्वितीये श्रावक सन्निपातेऽभूवन् पुरुषशतसहस्रं, तृतीये श्रावकसन्निपातेऽशीतिपुरुष सहस्रम् । शिखी तथागतोऽपि त्रिपु सन्निपातेपु दिदेश धर्मम् । प्रथमे श्रावकसन्निपातेऽभूवन् पुरुपशतसहस्र, द्वितीये श्रावक-सन्निपा- तेऽभूवन् अशीतिपुरुषसहस्र , तृतीये श्रावकसन्निपातेऽभूवन् सप्ततिपुरुषसहस्रम् । विश्वभूः तथागतो द्वयो. सन्निपातयो दिदेश धर्मम् । प्रथमे श्रावकसन्निपातेऽभूवन् सप्ततिपुरुष सहस्र ,द्वितीये श्रावक सन्निपातेऽभूवनषष्ठिपुरुप सहस्रम् । कुकुच्छन्दस्त- थागत एकस्मिन् सन्निपाते दिदेश धर्मम् । श्रावका चत्वारिंशत्पुरुपसहस्रम् । कोनागमस्तथागत एकम्मिन् सन्निपाते दिदेश धर्मम् । श्रावका' त्रिंशत्पुरुपसहस्रम् । काश्यपस्तयागत एकस्मिन् सन्निपाते दिदेश धर्मम् । श्रावका विंशत्पुरुपसहस्रम् । अहं एतर्हि एकस्मिन सन्निपाते धर्ममदिशम् । श्रावका श्रद्धत्रयोदशपुरुप-शतम् ।" सप्त 1 १ पोम इतिपाठ ।

विनायको शास्ता सत्त्वप्रभावक एकस्मिन् श्रावकसघसन्निपाते। कोनागमस्तथागतोऽनुत्तरोऽप्येवम् ॥ २६ ॥ अरुणाभ काचनपर्णकाय सर्वाकार परिपूर्ण । एकस्मिन् श्रविकसंघसन्निपाते दिदेश प्रणीत उत्तम धर्मम् ॥ ३०॥ काश्यपो द्विदायाद एकमना असमूढचित्त । द्विर्भापी अनाकुलितादुर्वल एकस्मिन् श्रावकसघसन्तिपाते ॥ ३१ ॥ कारुणिक उपशातिचित्त शाक्यवश श्रमणोत्तम । देव देवोऽतिश्रेष्ठोऽह एकस्मिन् श्रावकसघसन्निपाते ॥ ३२ ।। तस्मिन् समागमेऽह समदर्शय अथं अदिश सुविशुद्ध वादम् । चित्ते नित्य सुख-सौमनस्यी आम्रवक्षयश्च भवक्षय ॥ ३३ ॥ विपश्यी शिखी त्रिपु विश्वभू बुद्ध चत्वारो वुद्धा एकैकस्मिन् ऋपिसमागमे दिदिशु ॥३४॥ "तदा विपश्यिबुद्धस्याभूता द्वौ श्रावको एक 'खण्डो नाम-द्वितीय २ यशो नाग । सर्व श्रावकाना प्रथमो। शिखिबुद्धस्याऽभूता द्वौ श्रावक सभवो नाम सर्वेपा श्रावकाना प्रथमो अग्रौ । विश्वभू बुद्वभ्याभूना द्वौ श्रावको, एक सोणो नाम, द्वितीय उत्तरो नाम, सर्वेपा श्रावकाना प्रथमो। क्रकुन्छन्द बुद्वात्याऽभूता द्वौ श्रावो, एक सनीवो नाम, द्वितीय विधुरो नाम, मर्वपा श्रावकाना प्रथमौ । कोनागम बुद्धस्याभूता द्वौ श्रावको, एक भूयोमो नाम, द्वितीय 'उत्तरो नाम मर्वपा प्रावकाना प्रथमौ । काश्यप बुद्धम्याभूना वो आवको, एक तिग्योनाम, द्वितीयो भारद्वाजो नाम-सर्वत्रावसाना प्रथमौ । एतर्हि मम द्वौ बावरी, एक मारिपुत्रो नाम, द्वितीयो मौद्गल्यायनो नाम, सर्वेपा श्रावकाना प्रथम | बुद्धस्तदा गाधाभिस्वाच- द्वयो ।

( ७ ) श्रावको ॥ ३७॥ श्रावकौ ॥ काश्यपस्य १ संजय-विधुरी क्रकुच्छन्दस्य श्रावको । भूयोसोत्तरी कोनागमस्य तिष्य-भारद्वाजौ सारिपुत्र मोद्गल्यायनौ ममस्तोऽग्र श्रावको ।। ३८ ॥ "विपश्यिनो बुद्धस्योपस्थाक शिष्योऽभूत अशोको नाम । शिखिवुद्धस्योप- स्थाक शिष्यः क्षेमकरो नाम । विश्वभूबुद्धस्योपस्थाकशिष्य उपशान्तो नाम । ऋकुच्छन्द बुद्धस्य उपस्थाक शिष्योऽभूत् सुवुद्धि नाम । कोनागम वुद्धस्योपस्थाक श्रावकोऽभूत् स्वस्तिजो नाम । काश्यपबुद्धस्याभूत् उपस्थाक श्रावकः सुभवः' नाम । ममोपस्थाक श्रावक आनन्दोनाम । " बुद्धस्तदा गाथाभिरुवाच- अशोकश्च क्षेमकर उपशान्तः सुबुद्धिः । स्वस्तिजः सुभवश्चानन्दो भवति सप्तमः ॥ ३६॥ एते सन्तिबुद्धोपस्थाक मर्वार्थाधिकार-परिपूर्णाः । रात्रिन्दिवं अतद्रिता आत्महिते परहिते ॥ ४० ॥ ते सप्त कुशलाः श्रावकाः प्राप्ताः बुद्धस्य-वाम दक्षिणम् । प्रीताश्चोपस्थाकाः शान्ता निरुद्धाः परिनिवृताः ॥ ४१ ।। विपश्यि बुद्धस्या पुत्रोऽभूत वर्ग-भिङ नाम; शिखिवुद्धस्य पुत्रोऽभूतू अप्रमाणो नाम, विश्वभूबुद्धस्य पुत्रोऽभूत वरबोधिर्नाम; क्रकुच्छन्द वुद्वस्य पुत्रोऽभूत् उज्जयो' नाम; कोनामग बुद्धस्य पुत्रोऽभूत् समववादको नाम् काश्यप वुद्धस्य पुत्रोऽभूत प्रसेनो नाम; एतर्हि मम पुत्रोऽस्ति राहुलो नाम !" बुधस्तदागाथाभिरुवाच- Squire ting अप्रमाणौ पुत्रौ वरबोधिश्च संजय । समववादक प्रसेन. च राहुल सप्तम' ॥ ४२ ।। इमे ते महद्धिका. पुत्रा सर्वे वुद्धकुलोपगा.४ । १ सर्वमित्र इति पा। २ उपरि-विजय इति शब्दार्थ ।

( ८ ) , नगर विदितवर्मा...दाना , आर्यधर्म (च ) निर्भया ॥ ४३ ॥ "विपश्यि बुद्वस्य पिता वन्धुमान्, क्षत्रिय राजवंश, माता वन्धुमती नाम, राजधानी बन्धुमती नाम नगरी ।" बुद्वस्तदा गाथयोवाच- विपश्यिन पिता बन्धु , माता वन्धुमती (तथा)। वन्धुमन्नगर तत्र बुद्वो धर्म समादिशत् ॥ ४४ ॥ "शिखिवुद्वस्य पिताऽरुणो नाम क्षत्रियो राजकुलीन , माता प्रभावती नाम, राजधानी अरुणवती नाम ।" वुद्धम्तदा ग थयोवाच- "शिखिनो जनकोऽरुणो माता नाम प्रभावती । अरुणवती शीलवलेन परशत्रुजित ॥ ४५ ॥" "विश्वभूवुद्धस्य पिता सुप्रीतो नाम क्षत्रियो राजवशिक , माता यशोवती नाम, नगर अनुपम नाम ।" बुद्धस्तटा गाथयोवाच- "विश्वभू बुद्धजनक सुप्रीत नावशिक । माता यशोवती (नाम) नगर नाम (हिग्रनृपमम् ।। ४६ ।। "कुच्छन्द बुद्धम्य पिता 'मजुशीलो नाम, ब्राह्मवशिक , माता विशाया नाम, मो नाम रानाऽनुगतो राजा, मवती नाम हि नगरम । बुदृस्तदा गाययोवाच- मनु शीनो द्विज (तात) विशाया नाम जननी । दमो नाम राजा (ब) वमति नेमवतीपुरे ॥ ५ ॥ सोनागम बुद्धम्य पिता महाशीन्दी नाम बाग , माता ‘पिनया नाम: तदा गना शुभो नाम पन्थार , गन नामत शुभवी नाम नगग्म ।' .

बुद्धस्तदा गाथयोवाच- "विजया जननी नाम महाशील द्विजः (पिता)। शुभो नाम (तदा ) राजा वसति शुभवती पुरे ॥ ४८ ।। "काश्यपवुद्धस्य पिता ब्रह्यशीलो नाम, ब्राह्मणवंशिकः, माता धनवती नाम । तस्मिन् काले एकिकी नाम राजा (उपस्थाक:) राजधानी वाराणसी नाम नगरम् ।" बुद्धस्तस्मिन् काले गाथयोवाच- "माता धनवती नाम ब्रह्मशीलो ()द्विजः (पिता) । तदा राजा (२)किकी नाम पुरी वाराणसी (तथा)। ४६ || "मम पिता शुद्धोदनो नाम क्षत्रियो राजवंशिकः, माता महामायानाम, राजधानी कपिलवस्तु नाम नगरम् । बुद्धस्तदा गाथयोवाच-- "महामायेति जननी पिता शुद्धोदनो नृपः । बहु धनजने देशे ताभ्यां जातोह (आत्मजः) ॥५० ।। "इसे ते सन्ति बुद्धाः । (ते) हेतु प्रयत्यतः नाम-गोत्र-कुलानां गत्यायु- स्थानतः कथ अभवन् ( इति ) इदं श्रुत्वा विज्ञः पुरुषो हेतु प्रत्ययतः च न( भवति) सुप्रीति प्रामोद्यप्राप्तः सुख- सौमनस्य चित्तः । तस्मिन् काले भगवान् प्रोवाच तान् भिषन-- अभिलपाम्यहं इदानीं पूर्वनिवासज्ञानं वक्त अतीतानां बुद्धानां विषये; इच्छेत यूयं श्रोतुं न (वेति )" ? । ब्राह्मण-इति शन्दा २ पोरोपो-इति चीनोग्चारम् । ३ कपिलव इति ची। ४ पत्रिय ची। ५ बहुधने वहजने ( ११ ) ते भिक्षव प्रत्यूचु - " "एतस्येव इदानीं काल । सुखेनेच्छाम श्रोतुम् । , वुद्ध उवाच तान्- "साधु । साधु । । भिक्षव । सुष्ठुमनसि करोय तद् अह वो विमज्य भाषिष्ये । भिक्षवः । विज्ञातव्या तेपा बुद्धाना धर्मता । विपश्यी बोधिसत्त्व तुषित देवर-लोकगत् च्युतोऽवाक्रमत् मातृकुक्षौ, दक्षिणपार्श्वत प्रविश्य, सप्रजान् अमूढ । तत्र तदा पृथ्वी समकपत, महान्तोऽवभासा प्राकाशन्त, सर्व-लोकधातु अवमासयन्त , यत्र चन्द्रसूयो न प्राप्नुत , (तत्) सर्व स्थान आच्छादयन्त उदारेण अवमासेन । निरय-सत्वा ( अपि ) एकैकस्यान्योन्य पश्यन्ति, सजानन्ति स्वकीया स्थिति तदाऽस्मिन् श्रवभासे । पुनश्चपर-दृश्यन्ते मार-प्रासादा सर्वे देवा शक्रो ब्रह्मा श्रमणा ब्राह्मणा चान्ये सत्त्वा सर्वे श्राच्छादिता उदारेणावभासेन। सर्वे देवलोका स्वभावतोऽदर्शना श्रवभासन्ते । वुद्धस्तदा गाथाभ्यामुवाच- नभस्यालम्बते मेघो भाति विद्युत् अधोदिवि । विपश्यी भासयन भासा कुती चापि समाविशत् ।। ५१ ।। सूर्येन्द्रनुपगतमायनावृत कुक्षौ तिष्ठति विशदोऽम्रक्षित ,इति वर्मता सर्वबुद्वानम् ।। ५२ ।। "भिक्षव । सर्वे विज्ञेय सर्वबुद्धाना वर्मता । विपश्यी बोधिमत्व तदा स्मरन् सप्रजानन् श्रमूढो मातृकुनी अवाक्रमत् । चत्वारो देवपुत्रा खद्ग हस्ते गृहीत्वा रत्तति तन्य मातरम् | मनुष्या अमनुष्याश्च न प्रभवन्ति विहिमितुम् । प्रायमम्ति शाश्वनो धर्म (धर्मता)।' प्रभासा । दृद्धस्तदा गाथाभिस्वाच- चतुर्दिश चत्वारो देवपुत्रा ईश्वग बशिन । देवानामिण शत्रए प्रपिता मुरनितो बोधिमन्च ।। ५३ ।। करामि पारो निन्ध अनिर्गच्छन्तो रक्षन्ति । मनपा श्रमदा न हिपन्नि, दर मर्वेपा बुद्धाना वर्मना ।। ५ ।।

( १० ) देवा अवभासमाना रक्षन्ति, देवकन्या यथा रक्ष्यते देवेषु । सुखसम्पन्ने फुले, इयं सर्वेषां बुद्धानां धर्मता" ।।१५।। उवाच च- "भिक्षवः । सर्वेषां बुद्धाना धर्मता (एषा) । विपश्यी घोधिसत्त्वं तुषितात् देवलोकात् मातृकुक्षौ विज्ञानं अवाक्रमत स्मरन् संप्रजानन् असंमूढः । मातुःकाय. ( सदा ) क्षेसुरमं क्षितो असंवाधितः; प्रज्ञा पद्धते । मातावलोकयंती स्वयं पश्यति गर्मम् । बोधिसत्त्वस्य काय: सर्वेन्द्रियपरिपूर्ण, यथालोहितं सुवर्णचूर्णं मल-रजोविरहितं, चक्षुष्मन्त. पुरुषः तत् तथा पश्यन्ति परिशुद्ध स्फटिके अन्तर्वहि. परिशुद्धं स्वच्छं, सर्वावरण-कलुषविरहितम् । भिक्षवः । सर्वं इदं अस्ति वुद्वानां धर्मता।" तस्मिन् काले भगवान् गाथाभ्या उवाच- "यथाशुमो वैदुर्यमणि' सूर्यचंद्र प्रमेव स्वयं । जातिमान , (तथा) तिष्ठति मातृकुक्षौ, तस्य माताऽसंवाधा ॥ ५६ ।। प्रज्ञया भवति वर्द्वमाना, सुवर्णविवं गर्भ पश्यति । गर्भिणी सुसुखिनी, इयं बुद्धाना धर्मता ॥ ५७॥ - बुद्ध उवाच- "भिक्षव. । विपश्यिनि वोधिसत्त्वे तुषितान देवलोकात् च्यवित्वा मातृकुर्दि अवक्रमति स्मरति सप्रजानति अमूढे, मातुर्मनः न सर्वरोगचिचं, न रागा- ऽग्निना तत परिदग्धं (भवति ) । इयं अस्ति सर्वबुद्धानां धर्मता ।" तस्मिन् काले च भगवान् गाथाभ्यां उवाच- "बोधिसत्त्वे तिष्ठति मातृकुतिं देवदेवे पुण्यसयुते । तन्मातुश्चित्त शुचि निर्मलं सर्वरोगचिन्ता विरहितम् ।। ५८ ।। सर्वकामरागेच्छयाऽमलिनमसमुपगतम् । नभवति कामाग्निना दह्यमानं, सर्व बुद्धानां माता नित्यं परिशुद्धा ॥ell बुद्ध उवाच- "भित्तव । बुद्धाना धर्मता (एपा ।। ( यदा ) विपश्यी घोधिसत्व प्रथम तुषित देवलोकात् च्यवित्वाऽवाक्रमत् मातृकुतौ स्मरन संप्रजानन् अमूढः । तस्य माता ( १२ ) समाचरति पंचशीलं, ब्रह्मचर्य पूर्ण शुद्ध निर्मलम् गृहाति । अतिश्रद्वा दयापन्नाऽनुकं- पिका सर्वकुशलकारिणी सुखिनी निर्भया । काय विहाय जिवितात् च्यवित्वा उत्पद्यते तुषितेपु देवेषु । इय अस्ति धर्मता ।" तस्मिन् काले च भगवान् गाथयोवाच- "समाचरति मानुपे उत्तमे काये वीर्य-शील परिपूर्णा । पश्चात् गृह्णाति देवकाय इद प्रत्यया नाम बुद्वमाता ॥ ६० ॥ बुद्व उवाच- "भिक्षव । एपा वुद्वाना धर्मता । विपश्यी बोधिसत्त्व स्वोपपत्तिकाले दक्षिणपार्श्वतो निश्चक्राम | पृथिविकपोऽभूत् , अवभासेन सर्व अवभासितम । प्रथम-गर्भप्रवेशकाले तमोमय स्थान ( अपि ) न (किमपि ) अवभासेन अनाच्छा. दितम् । एपाऽस्ति धर्मता । ग्रय तस्मिन् काले च भगवान् गाथाभ्या उवाच- राजपुत्रोपपत्तौ पृथिवी चकपे महदभ्वभामेन न किमप्यनाच्छादितम् । धातुश्च पतेवातु ऊवमधश्च सर्वा दिश ॥६१ ।। भासमानो प्रभा ददाति शुद्धन हेतुना, परिपूर्णो देवकायो । प्रशातो भवति शुदवाक् उच्यते बोधिसत्त्वो नाम" ।। ६२ ।। वृद्ध उवाच- "भिनव । (पा) बुद्धाना वर्मता । विपश्यी वो धमत्त्व नत्र स्वोपपत्तिकाले दक्षिणपार्श्वनो निश्चक्राम म्मरन् सपनानन् अमूढ । तदा बोविमत्त्वमाता (अभृत् ) हस्ते वृक्षशाखा गगीवानिपण्णाऽनिपन्ना । तदा चचारो देवपुत्रा हने गृहरात्वा गपचन, नत्र मातु पुरम्नात् अम्थु बटमाना-माधु । देवमात । दानी उसपन्न आईपुत्र , मा पारप दुर्मनस्ताम | पानि मता।" नरिमन दाने च भगवान गाययोवाच- माता अनिपरा - निपन्ना भी नमान्ना ब्रह्मचारिणी । प्रगति वर निलम देवमनु नि वन (पुजन)" || ६३

( १३ )
कायः परिशुद्धोऽम्रक्षित मलेन श्लेष्मणा । यथा भवति हिमजन (?)-परिशोधिता
प्रभास्वरा मुक्ता श्वेत-कौपेयोपरि निक्षिप्ता न म्रक्षते उमयत शुद्धत्त्वात् , बोधि-
सत्त्वोऽपि गर्भ एवम् । इय अस्ति धर्मता।"
तस्मिन् काले च भगवान गाथयोवाच-
"यथा शुद्वा प्रभास्वरामुक्ता कोषेये निक्षिप्ताऽम्रक्षिता ।
वोधिसत्त्वो गर्भ निष्क्राति काले (तथा) परिशुद्धोऽम्रक्षितः ॥ ६४ ॥
-
-
बुद्ध उवाच-
"भिक्षव । एपा बुद्धाना धर्मता । विपश्यी बोधिसत्त्व तत्र स्वोपपत्तिकाले
दक्षिणपार्श्वतो निश्चक्राम स्मरन् संप्रजानन् अमूढ । दक्षिणपार्वतो निष्क्रम्य
भूमौ निपत्त्यागमत् सप्तपदानि । अमनुष्या अग्रहीपु तदा । सर्वतो विलोक्य
चतुर्दिशं, उत्थाप्य हस्त च भापते- ऊर्च देवात् अधो देवात् अहमेव अस्मि अग्रा,
इच्छामि विमोचयितु सत्त्वान् जाति-जराव्याधि-मरणत । एषा वर्मता।"
तस्मिन् काले भगवान् गाथाभिरुवाच-
"सिंहो यथा गच्छति विलोकयन् सर्वत चतुर्दिशम् ।
निपत्त्यभूमौ नरसिंहोऽप्येवं सप्तपदानि अगमत् ।। ६५ ।।
महानागो यथागच्छति विलोकयन् सर्वत चतुर्दिशम् ।
निपत्त्यभूमौ नरनागोऽप्येवं
सप्तपदान्यगमत् ॥६६॥
द्विपदोत्तम उपपत्तिकाले सुख अगमत सप्तपदानि ।
विलोक्य चतुर्दिश ननाद-नाशयिष्यामि जाति-मृत्यु-दुःखम् ।। ६७ ।।
स्व प्रथमोपपत्तिकाले स्वत न उत्तम (न) उत्तम (न) उत्तमच ।
पश्यामि, जातिमृत्युमूलं अयं सर्वान्तिम काय ॥६॥
,
भगवानुवाच-
"भिक्षव । एपा बुद्धाना धर्मता । विपश्यिनो बोधिसत्त्वस्य स्मरत' सप्रज्ञान-
तोऽमूंदस्य दक्षिणपार्श्वत , निष्क्रातस्य स्वोपपत्तिकाले द्वे स्रोतसी प्रादुरभूता, एक
शीवल एक उष्ण , तस्य स्नापनार्थम् । एपा धर्मता।"
तस्मिन् काले भगवान् गाथाभ्यामुवाच-
द्विपदोत्तमत्योपपत्तिकाले स्वयं निश्चक्रमतु स्रोतसी दे ।
योधिसत्वोपयोगार्थ
सर्वनेत्रमलापयत्
परिशुद्धम् ॥ ६॥

, द्व स्रोतसी स्वयमुद्भिन्ने,तत्र जल सुपरिशुद्ध निर्मलम् । एक उष्ण एक शुद्वशीतल सर्वप्रज्ञ (तत ) अस्नापयन् ॥ ७० ॥ प्रथमो राजकुमारो जात ( इति ) बन्धुमान् राजा नैमित्तिकान् सर्वविद्या- 1 =मत्रा )-चार्यान आमत्र्य आज्ञापयाचकार-पश्यत राजकुमार, बुध्यत तस्य भाग्यं दौर्भाग्य । तदा ते नैमित्तिकाचार्या प्राप्य आज्ञा ( तस्मिन् ) क्षणे उपमृत्य अवतार्यवस्त्र, अपश्यन् सपूर्णानि लक्षणानि । (अथ) व्याचक्र वचनं यस्य भवन्ति इमानि लक्षणानि द्व एव गती ( तस्य ) हि युक्त, निस्सशयम् । सचेत् श्रागारे वसति राजा भविष्यति चक्रवर्ती चतुणा लोकाना, चतुरगसेनासपन्नो करिष्यति सद्वर्मेण राज्य, न अन्यायेन, लोक अनुकपमान , तस्य सप्त रत्नानि (निधय ) श्रागच्छन्ति । (पर ) सहस्र पुत्रा शूरा वलिन वाह्यशत्रुजये समर्था । सेना दड अनुपयुज्य पृथिवीं शमेन ( शास्ति ) । सचेत् अभिनिप्फम्य आगारात , शिक्षते मार्ग, सवुद्धो भविष्यति दशवल परिपूर्ण । तदा ते नैमित्तिका प्राचार्या राजान एव वचन ऊचु - ( महा.) राज । उत्पन्नस्ते पुत्रो द्वात्रिंशल्लक्षण-सहित द्व' गती (अस्य ) युक्त अवश्य निस्सशय । (अय चेत् ) ग्रागारे वसति भविष्यति चक्रवर्ती प्रार्यराजा। स चेत् प्रागारात् निष्क्रमति अवश्य भविष्यति मबुद्ध दश- वलपरिपूर्ण । " युद्धस्तदा गाथामिरवाच- "शतपुण्यो राजमुत प्रमूत , निमित्ताचार्या उचुरेतत् । ययेद भवति ग्रये, गती द्वे युक्त निम्मशयम् ।। ७१ ।। सचेदय इच्छति गेह (-वास ) गना भविष्यति चक्रवर्ती । सतरन्नत्ताभी रत्नानि उपगमिष्यन्ति ।। ७२ ।। मत्सुवर्ण । -मर ) सम्रारमपूर्ण, परित मुवर्ण जाल पग्म । टपनममयं सर्वग नम्मात् दिव्यचा नामास्ति || ७३ ।। सुसरत सपनानुसर च्चो विशागे श्वेतो यथा हिम । । याराश मननसम द्वितीय नाम रम्निग्नम ।। .. || स्वय रानान ) चन + ( १५ ) रुपं शब्दः गंधोरस. स्पर्शः न (अस्ति) समोऽस्याः किंचिद् । सर्वांगनाना प्रथमा (चसैषा ) (इदं ) पंचमं रनसमुच्यते ॥ ७७ ॥ लमते राजा वैदुर्यरत्र मुक्ता हरितपाषणं (sed) च सर्वरत्नम् । सन्तुष्टश्च लभते ( इदं ) षष्ठं रत्न समुच्यते ॥ ७८ ॥ राजा चक्रवर्ती यथेच्छति सेना द्रुत (तथा ) यात्यायाति । राजा चक्रवर्ती यथानु तं इच्छति सेना (-पति.) यात्याति । राजेच्छानुसार द्रुत (इद) सप्तमं रत्न समुच्यते ॥ ७ ॥ इमानि सप्त रखानि यानि चक्र हस्ती शुद्धश्वेतोऽश्व. (च)। वैदुर्यमणि मुक्ता स्त्री ( च ) सेनापत्ति'रन्नं भवति सप्तमम् ॥ ८० ।। तान् पश्यत्यक्लान्त पचकामगुणान् स्वय भुजमान । गन इव खंडित रज्जुबंधनो निष्क्रम्यागारात् भवदिबुद्ध ॥ ८१ ॥ राज्ञो भवति तादृश पुत्रो द्विपदोत्तम. नर (ोत्तम ) । तिष्ठति लोके प्रवर्त्य धर्मचक्र मार्गगुणोष्वप्रमादी ।।२।। तस्मिन् काले पिता राजा साग्रहं भूय त्रि पुनः अप्राक्षीत् लक्षणाचार्यान्- “यूय पुनरपि पश्यत कुमारस्य द्वात्रिंशत् लक्षणानि । वेषा नामादि किम् ?' तदासर्वे लक्षणाचार्या एकवारं विवृत्त्य कुमारस्य वस्त्रं अवादिषुः "द्वात्रिंशत् लक्षणानि (इमानि)-प्रथम-पादासम सुखकर ,पादतलं सम परिपूर्ण भूमौ सुखगमम् । द्वितीय-पादतल लांछित चक्रणसहस्रारेण परिपूर्णेन,दीप्यमानमन्यो- ऽन्यम् । तृतीय-हस्तपादागुलयोराज हसस्येव । तुर्थ-चहस्त-पादा मृदुका दिव्यवस्त्रस्येव पंचम-हस्तपादागुलयो दीर्घा सूक्ष्मा ( लीना ) अप्रतिमा । पष्ठ-पादपाणिरायता दश्यतेऽक्लाता । सप्तम-एरिणजघऊर्ध्वमध. ऋजु. । अष्टम कु चितनद्ध अस्थि,अस्थि- सधिः अन्योन्य-सयुक्ता अर्गलयोजनस्येव । नवम-कोपावहित वस्ति-गुह्य अगजातं अश्व (-स्य ) इव गुह्यम् । दशमं- स्थितक परिमृशति पाणिना जानुकं उपरि। एकादशम-- एककलोमकूप , एकैकानि लोमानि जातानि अस्यलोमानि दक्षिणा- वर्तानि अजननील-( Rec ) वर्णानि । द्वादशम- केशा दक्षिणावर्तकजाता- सुवर्णवर्णा कुंडलिता । त्रयोदशम- काय सुवर्ण वर्ण., चतुर्दशम- छविः सूक्ष्मा १ परिणायक् इति पाल्याम् ।

( १६ ) सप्तदश-कायो मृदुका नोपलिप्यते रजोजल्येन । पचदशम-- उभयस्कंध समवर्त सुपरिमडल । पोडश वक्षो भवति स्वस्तिफाक्षरम् दीर्घ पुरुष द्विगुण । अष्टादश- सप्तसु स्थानेषु सम-परिपूर्ण । ऊनविंश-कायो दीर्घाऽऽयाम समानो 'न्यग्रोधवृक्षस्येव । विंश-सिंह-पूर्वाग काय । एकविंश-सम- वक्षो भाग सन्नद्व सिंहस्येव । द्वाविंश-मुखे चत्त्वारिंशद्वन्ता । त्रयोविंश-समनद्ध समसम । चतुर्विंश- लग्नदन्तोऽविवर (-दन्त ) । पचविंश-शुद्वश्वेता भाम्बर- दन्त । पड़विंश-सुपरिशुद्वकठ , यन्नानारस भुक्ते न किमपि अप्राशु । सप्तविंश- प्रभूतजिद्दो वाम दक्षिण कणं ( जिह्वया ) लेढि । अष्टाविंश-बच्छ विम्पष्ट-ब्रह्म- स्वर | ऊनत्रिंश- अभिनीलवर्णनेत्र । शि- वृपभराजस्येव ऊर्ध्वमय उभयतो दीर्घनेत्र । एकत्रिंश-केशा विशाल-म्वन्या भास्वरा मृदुम्निग्ध सूक्षा एक वितम्ति ( ? ) दीर्घायता , मुक्तास्तदा दक्षिणावतो करविकाया रान्मुक्ताया इव | द्वात्रिंश- शीर्प भवति मासपुज (-गणीपम् ) ।" . न्यग्रो वृक्ष इव तदा गाथाभिमवाच वचनम । सुप्रतिष्ठित मृढपादो न गते भुवि चिदर्शनम् । सहवार (चक्र) लनणालकृत उच्चनवणं न किंचित् अपरिपूर्णम् ।। ८३ ॥ दीघायतमममम । तथागतोऽभूतो भवति गोपनीय वम्ति अवगुन्यम ॥८४ || मणि सुवर्णभूपितकाय सर्वलन परम्पग्मच । विदरगनायव ( नातु) मतिन ||५|| दियवर्णोऽनिमृट नियन्त्रण प्रकृत्त्यान्दादित । मृगावगे रस्म "काय , पुरिएया प्रथमनिकात पुष्पमिर || ८६॥ गना तान ननणाचार्यान पन्छ । तन'गाचाग मगाम्ब , प्रभापरि पकार -चार योनिच्च नगा प्रसार - पादतले दृश्यते चक्रलक्षण, तत्स्वरो यथा करवी कूजनम् । जान्वाकृति' लक्षण संयुता पूर्वकर्मभिर्निर्मिता ॥ ८ ॥ हस्तःपरिमडलपूर्ण सुदर भृमु नेत्रे समुचिते विशाले । पुरुषसिंह उत्तमवलानुभावोऽप्रतमः ॥ १० ॥ तस्य हनुः रथचतुरस्र सु दर सिंहस्येवकल्पते शय्याम् । चत्वारिंशद् दंता चतुरस्राः समुचिता ससक्ता मध्येऽतन्तरालाः ॥ ६१ ॥ ब्रह्मस्वरोऽनन्यसंगतः प्रत्ययानुगा दुरान्तिकात् आयान्ति । समस्थितो न वक्रकाय', हस्ताभ्या परिमृषति जानुम् ॥ १२ ॥ हस्तःसम-समुचितो मृदु सुलक्षण पूर्णम्य नरोत्तमस्य । एकैकच्छिदं एक लोमजात , हस्तपादौ जम्ललक्षणौ ॥ १३ ॥ मासजूट', अभिनीलनेत्र ,उर्ध्वमधउभयतो नेऽजनम् । उमौ स्कंधौ समवर्तपूर्णी, द्वात्रिंशत् लक्षणानि पूर्णानि ।। ६४ ॥ पादपाणिं नोच्चनीचा, एणीजंघः सुदरः ऋजु. । देवदेव श्रागत इह गजइव छिन्नरज्जुवंधनः ।। ६५ ।। दुःखात् विमोक्तु सत्त्वान् जाति-जग व्याधिमरणस्थानात् । तेन करुणा चित्तेनातो वक्ष्यति सत्त्य चतुष्टमम् ।। ६६ ।। दिशन् धर्मपदस्यार्थं सत्त्वाना सेवा करोत्यनुत्तमम् " | बुद्ध उवाच-भिक्षव । विपश्यिवोधिसत्त्वस्य उपपत्तिकाले शीतोष्ण-वात वर्षात आरक्षार्थ एव हस्ते श्वेतच्छत्र गृहीत्वा देवा आकाशोपरि स्थिता " - बुद्धरतदा गाथयोवाच- "नरेष्वभूतो भवतीह जातो द्विपदानामुत्तम ।। ६७ ।। सर्वे देवा गौरवचित्तयुक्ता उपरथानं उपस्थुि रनच्छत्रव्यजने"। तस्मिन् काले पिता राजाऽजात् चतन्त्रो धात्री प्रथमा क्षीरपायिका, द्वितीया स्नापिका, तृतीया गधलेपिका, चतुर्थी क्रीडापिका । सुखेन सह पोपयंति अप्रमादम्। तदा गाथयोवाच- "क्षीरपायिका करुणा स्नेहसान्विता जातं पुत्रं अथ पोपयन्ति ॥८॥ एका क्षीरं पाययति स्लपयत्येका, द्वेगविलेपिका क्रीडायिके । - ( १८ ) - एन लोके ( चा) ऽनुत्तमो गंध ( तेन) लिंपति नरोत्तमम् " || ६ || ( यदा ) दहरोऽभूत देशजना विलोकयति (त) अतृप्तभावेन । तदा गाथयोवाच- वहुजनै मानितो लालित प्रत्यग्रकृत स्वर्णप्रतिमा यथा । पुरुपा स्त्रिय सर्वेऽतृप्तदशा विलोकयन्ति ॥१०॥ घाल्यकाले देशजना सर्वे एकत समादाय महाघ पुष्प इव विलोकयन्ति । तथा गाथयोवाच- "द्विपदोत्तमस्य जातकाले बहुजनाना मानितो मनाय । श्रादाय सर्वे वारेण धारयन्ति विलोकयन्ति महाघसुगधपुप्पमिव ॥१०१॥ वोधिसन्चो जन्मकाल स्वनेत्र त्रयस्त्रिशै देवैरिव स्वनेत्र न निमिपति । यस्मात विगत- प पश्यति, तस्मात् विपश्यी इति नाम प्राप । तदा गार य'घाच- "देवाना 'देवो न निमिपति देवा वायम्बिशा यथा । पश्यन् रप सम्यक् विपश्यति तम्मात् विपश्यी नाम ( उच्यते ) ॥ १०२ ।। वोधिसत्त्वस्य जन्मकाले तस्य म्वर शुद्ध मृदु , गभीर', यथा कल- विक पतिस्वर , तदा गाथयोवाच- हिमगिरिपक्षी यथा निपीय पुष्परस च गायति । तस्य द्विपदोत्तमम्याऽपि स्वर (नया) स्पष्ट " ॥ १०३ ॥ बोधिसत्त्वस्य जन्मकाले (तत्य ) दर विलोकनेऽल नेत्र एक योजन पश्यति । तदा गाथयांवाच- शुद्धर्मविपावन दिव्यो नवन उत्तमम् । बोधिसत्वो (हि) नेत्रण परिपश्यत्येक्योननम् ।। १७ ॥ योपिमन्य स्पनिकाला प्रायः शन व नि, महाप्रीत 'शालाया कमेनि मार्ग सिवा उन नुसार गुपकोनितो टग्नन्ना। ता ( युद्ध ) गाथा. निरमाशि- प्राय ( १६ ) स , शिशुभावेऽवसत् प्रणीतशालायां अकरोत् मार्ग प्रभवन स लोकम् । पश्यति सर्वान् व्यवहारान् ततो विपश्यी नाम (सौ ) ॥ १०५ ।। विपुल विशाल विशुद्ध प्रज्ञोऽतिगंभीरो यथा समुद्रः। इष्टस्तत्र कुर्वन् प्रज्ञाविवृद्धिम् ॥१०६॥ तस्मिन् काले बोधिसत्त्व ऐच्छद् वहिर्गन्तु दर्शनार्थाय, अवोचत् (च) सारथिः “योजय अश्वं रनमये रथे, गच्छमोऽथ चक्रमन्त उद्यानं द्रष्टुम्" भृत्योऽ य त्वरित उपयोजनं समाप्य प्रत्यावर्त्य अवोचत् "इदानीं यस्य ) सम्यक् कालो- ऽस्ति । " कुमारे. तदा रन रथं प्रारुढ' तदुद्यानगेहं गच्छन् अन्तरा मार्गेऽपश्यत् एकं जीणं पुरुपं गलितसितदत्त', वलितमुखं, वनकायं दडपरायण दुर्वल प्रवेपमान (पथि ) गच्छन्तम् ( दृष्ट्वा च ) कुमारोऽपृच्छद् भृत्यः "कोयं अस्ति पुरुषः ? " स प्रत्युवाच "अयमस्ति जीर्ण मनुष्य । पुनः अपृच्छत्-किमिति जरा अस्ति ? प्रत्युवाच-"जीर्णं आयुः जातं निःशेष आयुः, ( अनेन) न बहु जोवितव्यं, तस्मादुच्यत एष जीर्ण ।" पुनरपि कुमारोऽपृच्छत्-"अहमपि भविष्यामि एतस्माद् दु खादवतीत ? प्रत्युवाच-"श्रम, जातस्य भवति ध्रुव जरा, न (तां) विना हीना वा प्रणीता ।" तदा दुखी दुर्मना कुमार त्वरितमुवाच भृत्यं-"नीयाहि पश्चाद् रथ (मत् ) प्रासादम्। -- (अथ कुमार.) तूष्णीं प्रध्यायमानोऽचिन्तयत् 'इद जरादु-ख प्राप्स्यते माम् ।" बुद्धस्तदा गाथाभिरध्यभापतः-- दृष्ट्वा जरा जीवितं समापयिष्यति (इति) दुर्वलस्य दण्डेन गच्छतः ।। बोधिसत्त्वोऽचिंतयदात्मनि "अह नातीत इमामापदम्" ॥ १०७ ।। तस्मिन् काले पित्रा राज्ञा पुनरलंकृते प्रासादे सुन्दर्यः कुमार्य. (प्रे पता. त) प्रसादयितुम । बोधिसत्त्वस्तदा गाथाभिरध्यभाषत -

( २० )
वर्धयामास पच कामगुणान्, इच्छा न कुया निष्क्रमणस्य गेहात्" ।। १०८ ।।
पुनश्च पश्चात् कुमार प्राज्ञापयामास सारथिं-
"योजयरथ निष्क्रमिष्यामि विहाराय ।"
अथ तस्य मार्गे समगच्छद एको व्यावित पुरुप कायेन शिथिल महोदर
कृष्णमुख (स्व-) मूत्रकरीपे शयान । न पुरुपा प्रेक्षते त, (स हि) अतिग्लान
मुखतो भापितु न समर्थ । (दृष्ट्वा च त कुमार ) पप्रन्छ सारथिं-- "कोऽयमस्ति
पुरुप ?"
प्रत्युवाच-- "अयमस्ति व्याधित पुरुप ।"
“वद किमिति व्याधित ?"
प्रत्युवाच-- "व्याधित ( स ) य पीडित टुखित ।" मरिष्यति न चिरेण,
तस्मादुच्यतेऽसौ व्यापित इति ।"
पुनम्बाच-- "कच्चिदर अपि न अस्मा' टु खादतीत ?"
प्रत्युवाच- "याम, जातम्य भवनि व्याधि, न ता विना हीना वा
प्रणीता ।"
तत मार उवाच दर्मता -" वदमि चेत् मारथि नीयाहि पश्चात्
रध प्रासाद ताणीम् ।"
( अथ ) ध्यायमानोऽचिंतयत् । अय व्याधितोट ग्बी, अहमपि भविष्यामि
(तधा)। बोधिसत्व १ नदा गाया भापत
अपयन चिरन्यापित नर वर्ग तम्य पान तम।
पर नामचिन्त्य 'यह च नानीन मापनम ।। १०८ ||
पिता रानात पुनरात माग- सन्नि विद्यागर निकाल कुमागे
नाना पुताचा परा"म् ।
M

( २१ ) स चोवाच-" (यान-) रुढ समगच्छत् व्याधित नरं, तस्मात् न प्राप्तमन (तुष्ट)। - अथ पिता राजाऽऽत्मनि तूष्णीं अचिन्तयत् । एकदा लक्षणचिंतका व्या- चक्रे निष्क्रमिष्यति (कुमार ) गेहात् । अद्य न सुमना, किमेतद् एवं भविष्यति पुनरपि करोमि उपायम् । वर्धयामि कन्या , यथा तासा गीतेन प्रसन्न चित्तोऽसौ न निष्क्रमेद गृहात् । श्रथ पुनरपि अलंकृते प्रासादभवने त प्रसादितु सुदर्य कुमार्यो नियुक्ता । 'तदाबोधिसत्त्वो गाथयोवाच रूप-शब्द-गध-रस-स्प्रष्टन्यान् प्रणीतान् उत्तमान् प्रासादिकान् । उपभुक्ते बोधिसत्त्व तथा पूर्व कृतपुण्यो यस्मात् ॥ ११० ॥ अथ पुनरपि अन्यस्मिन् काले कुमार श्राज्ञापयत् सारथिं- "योजय रथ, निर्गमिष्यामि विहाराय ।" अथास्य मार्गे समापतत् एको मृत पुरुष नानावर्णामि पताकाभि-पुरत पश्चाच्च नीयमान । सवधिन ज्ञातय ग्रामवासिनश्च अतिकरुण क्रदत परिदेव- यन्त नयन्तित बहिर्नगरात् । कुमार पुनरपृच्छत्- "कोयमस्ति पुरुष ?" प्रत्युवाच-"अयमस्ति मृत पुरुष ।" अपृच्छत"कोऽस्ति मृतो नाम " प्रत्युवाच-"मृतोऽसौ निरुद्धो लोके । वात प्रथम, अग्नि पश्चात्, सर्वाणि इन्द्रियाणि त्यजति मृत, अन्यदा फुलात् निर्गमयन्ति । तस्मादुच्यतेऽसौ मृत इति ।" पुनरपि कुमार पप्रच्छ सारिंथ-"अह अपि ( एवं ) भविष्यामि, कच्चिद अनतीतोऽह इमा श्रापदम् ।" प्रत्युवाच-"श्राम, लातम्य हि ब्रु वो मृत्यु न ( त विना · भवति हीन प्रणीतो (वा)।" , तत कुमारः अनाप्तमना असुमना उवाच सारथि- "नीया हि रथ पश्चात् प्रासाद ।" १ "युद्ध" इति मापान्तरे

( २२ )
शात तूष्णीभूतो ऽचिन्तयत् चिन्तयन् स 'अय मृत्युदुख, अहमपि भवि-
ज्यामि (एव)।' तस्मिन काले वुद्वोऽध्यभाषत गाथया
प्रथम अपश्यत् नर म्रियमाण, प्रज्ञासिपत् स पुनर्जायत इति'
तूष्णीं शातोऽचिन्तयत् अात्मनि अहं (अपि ) अनतीत इमा आपदमिति ।।
तदा पुनरपृच्छत् पिता राजा सारथिं "कच्चित् न कुमार प्राप्तमना वहिर्गत ?"
प्रत्युवाच-"नाप्तमना
पुनरपृच्छत् तस्य कारणम, (स) प्रत्युवाच
--"मार्गे समागात् मृत पुरुष , तस्मान्नाप्तमना ।"
अथ पिता राजा तृष्णी श्रात्मनि अचिंतयत एकदा लक्षणाचार्या व्याचक
लक्षण कुमारम्य निकमिा यति गृहात् । यद्य न सुमना , अह पुनरपि विधास्ये-
ऽस्योपायम । वर्षयाचकार ना कन्या प्रसादयन्तु तम्य चित्तमिति, यथा न निक्रमेत्
गेहात् ।
-
अय पुनरपि अलकारयामाम प्रासादभवन,
नियोजयामास कन्या
प्रासादयितुम' बुद्धस्तत्र गाथयोवाच
कौमार्य भवति सु दरीभि कुमारिभि परिवारित ।
पचभोगान नु जमान
शको यया देवेन्द्रोऽमी ॥ ११२ ।।
अब अन्येय पुनगतापयन सारथिं ( कुमार )
- पोजय र वहिर्गमनाय ।"
अन्नरामार्ग समागमत अपश्यन चानी एक
अमग परिपाय चीपर

( २४ ) अय मार्ग सत्त्य, यस्यात् कुमार प्राव्रजत् पर्यवर्जयत् च राज्य सम्मानपद विशेषत " अथ चतुराशीति सहस्र मनुष्याणा देशत्य गत्वा कुमारस्यान्तिक अयाच्चन्त श्रावका भवितु अगारात् प्रव्रजितु, अनुयोक्त मार्गे । तदा बुद्वो गाथयाऽभापत प्रतिनिवृत्तोऽभ्युपागमत् गभीर वर्ममुनमम् तेश्रुत्वाऽनुजग्मु प्रव्रजितु दूर हि रागानेस्ववनागारात् रहिता सर्ववधन ।। ११३ ॥ अथ कुमारस्तढा ययाविध अन्वजानत । तै मा चरति सर्वत्र ग्रामाद् ग्राम जनपदाद् जनपद सर्वत्र ( वर्म) देशयन् । स प्राप्य तत् स्थान न किमपि गौरव ( अभिकक्षितेस्त ) , मनुष्याश्च, प्रत्यय चनुष्टयेन उपतिष्ठति । बोधिसत्त्वोऽ चिन्तयत् अह हि परिपदा विहरन् सर्वत्र जनपदे मनुष्य सकीर्ण , इद न मे प्रतिरुप यन्नु ग्रह विहाय इमा परिपद, प्रविविक्त स्थान विहरामि, तत्र मार्ग पूरयिष्यामि वाहितम् ।' अथ प्रविविक्त स्थान एकाकी अन्वयु जत मार्गे, अकरोत् च चिन्ता " (पृच्छ वत रे ) सत्वा अनुकपनीया , सदा तम परायणा लवा काय सातक भगुर, जायते जीर्यन्ते व्याधिमन्त श्र यवन्ते, सर्व दु ग्व उपपद्यन्ते च्युता इतो जायते तत्र, ततो जायतेऽत्र । एतत्प्रत्ययात् अय दुपसन्ध । (तस्मिन् ) ससरमाण सवावमान श्रनत ( कालम् ) क्वाह मानापरिष्यामि दुबम्पन्ध, निम्ध्येत ( में ) जाति जग-मरणम । श्रथ तन्य मनमि अभवत जातिमरगा सुत किंप्रत्यय चभवति ? तन प्रक्षाप अपश्चन् कुन -जानितो भवति जगमरण, जातिरम्ति जराम- - ( २६ ) तस्मिन् काले (भगवान् ) बुद्धो गाथाभिरध्यभापत . इदं वचो वोच (द) गणे, श्रृणुत यूय कुशला । अतीतेऽपश्यन् बोधिसत्त्वः बोधिसत्त्वः पूर्वाश्रुत धर्मम् ॥ ११४ ॥ कस्य प्रत्ययाट जरामरण, कस्य हेतोश्च भवति । एवं सम्यग् दृष्ट्वा जानीथ तस्यसमुदयो जातित ॥ ११५ ।। कस्य प्रत्ययाद, जातिसमुदयः कस्य हेतोश्च भवतीद वस्तु । एव मनसि कृत्वा जानीथ, भवाद जाति समुदय ॥ ११६ ॥ तत्तत् उपादान उपादाय पर्यायेण पुन वर्धते । तस्मात् तथागता अवदन् 'उपादान अस्ति भवस्य हेतुप्रत्यय ॥ ११७ ।। गभीरमलाकुशलनिकायो वातो वहति यथा न परिशुद्ध । एव उपादानलक्षण-हेतुरेषा जायते तृपणा ।। ११८ ।। ततो वेदना जायते, उपपद्यते दु खसमुदयो यत । रागस्य हेतु प्रत्ययाद , सुखदु स अन्योन्य संगतम् ।। ११६ ।। वदनासमुदय फस्य प्रत्यया हेतु कश्च भवति वेदनाया एव चिंतयित्वाऽशासीद वेदना जायते स्पर्शत ॥ १२० ।। स्पर्श समुदय कस्य प्रत्ययाद , हेतु कश्च भवति स्पर्शस्य । एव चिंतयित्वाऽतासीत् सर्श जायते पडायतनत ॥ १२१ ।। पटायतनसमुदय कम्य प्रत्ययाद हेतु कश्च भवति पडायतनस्य । एव चितयित्वाऽामात पटायतनतायत नामरूपत ॥ १२२ ॥ नामरपनमुदय रस्य प्रत्ययान तु पश्च भवति नामरूपस्य । जायन विज्ञानत ।। १२३ ।। विनानम ८५ पम्प प्रत्ययान बिहार पास मम्मारत ॥ १२ ॥ सन्कार सम्म राव नामाप ( २७ ) तस्माद अनित्यं दुःखं पंडितैरुपछेदनात् ।। १२७ ।। स घेद अविद्या निरुध्यति तदा न भवति संस्कार । सचे द न भवति संस्कार , न भवति विज्ञानं तदा ॥ १२८ ।। विज्ञानस्य नित्त्यरोध चेत्, न भवति नामरुपकम् ।। नामरूपं निरुद्धचेत् , न भवति सर्वमायतनम् ।। १२६ ॥ आयतनाना नित्यरोधे न भवति स्पर्श तदा। स्पर्शस्य नित्यनिरोधे तु न भवति वेदना तदा ॥ १३० ।। वेदना ।नत्यरोधे तु, न भवति तृष्णा तदा । तृष्णा नित्यरोधे तु, न भवति उपादानं तदा ॥ १३१ ।। उपादान नित्यरोधे तु, न भवति भवस्तदा । भव नित्यनिरोधे तु न भवति जातिस्तदा ।। १३२ ॥ जातेनित्यनिरोधे तु, न जरा-ज्याधि-दुःखकम् । सर्वेषां सर्वथा क्षये, पडितस्तेन उच्यते ॥ १३३ ॥ द्वादश प्रत्यया अतिगमीरा दुर्दशा (च) विज्ञातुम । बुद्धा एवालंसंबोद्धं हेतुरस्ति नास्ति वा ॥ १३४ ॥ आत्मना ज्ञायमाने तु नायतनानि भवंति (हि) । गंभीरं हेतुप्रत्ययं दृष्टा नरो न पर स्पृहयत्याचार्यम् ॥ १३५ ॥ शक्त स्कन्ध-धात्वायतने वहिः फामी न रागवान् । लामो सर्वदानाना परिशुद्ध प्रतिफल दायकस्य ॥ १३६ ।। लब्ध चेत् चतुर्भाणकं लमते तत्र ध्रुव प्रतिवेदनम् । शक्तः वधनग्रंथीनां स्कघाना छेत्तु अप्रमादत ॥ १३७ ॥ रुप-वेदना-सज्ञा-सस्कार-विज्ञानानि जीर्णपुराण रथो यथा । सत्यं इमधर्म पश्यति चेत् तदा भवति सम्यक् सवुद्ध' ॥ १३८ ॥ शकुनो यथा उड्डयते नभे शक्नोति पूर्व अपर चानुवातम् । छित्वा पाशान् बोधिसत्त्वोऽगुरुवस्त्रमिष डयते वातम् ।। १३६ ॥ विपश्यो तत्रोपशान्तः अभिसमबुध्यत तन सर्वधर्मान् । जरामरणं किंप्रत्ययो भवति, तत् केन निरुप्यति ।। १४० ॥ स इदं साक्षतत् कृत्य जात शुद्धनिर्मलप्रन । अज्ञासीत जरामरणं जाते, जरामरण निरोधो जाति निरोधतः॥ १४१ ॥ ।

( २८ ) विपश्यी बुद्धः प्रथमाभिसबुद्व तस्मिन् काले प्रायेण द्वाभ्या विहाराभ्या वेहरति । मैत्री (:) विहारेण उपेक्षाविहारेण वा, बुद्धस्तदा गाथाभिरध्यभाषत- तथागतोऽसमसम प्रायेणान्वयु जत द्वियोर्विहारयो । मैत्र्याचोपेक्षयाच ऋपिमुक्त पारगत ॥ १४२ ॥ तस्य चित्तमलभत स्वस्य भाव छित्वा सर्वपाशान् । श्रारुह्य शैल पश्यति चतुर्दिश, तस्माद, विपश्यी समुच्यते ॥ १४३ ॥ महाज्ञानालोकेन तमो विनाश्य यथा स्वच्छया आदर्श । लोकस्यानाशयत् मोहान्तराय क्षीण जातिजरामरणदु खम् ॥ १४४ ॥ विपश्यी बुद्व प्रविविक्ते म्याने पुनरिद अचिन्तयत् 'प्राप्तो मयाऽतिगभीरो- ऽद्भुतो दुज्ञेयो दुर्दशोऽनुत्तरो धर्म प्रहाण निरोध अन्तरायोपशामक पडितर्वेद- नीय न पृथग्जन लभ्य । यत सत्त्वा नानाविभक्तिका नानाष्टिका नानाग्राहिणो नानाशिक्षा ततस्ते नानादृष्टिका । प्रत्येक ते सुसविपयसमन्वागता प्रत्येक ते चर्या- चित्ता , तम्मात् ते न ज्ञातु शक्नोति इम अतिगभीर हेतुप्रत्यय, भूयो दुर्नेय तृष्णा क्षय निर्वाणम । श्रह चत् तेपा देशेय, ते नृन न तान्यति, भविष्यति च मे केवल क्लमयो विहिसा।' एव चिन्तयित्वा तृणीभूतो न उवाद धर्मम् । अथ ब्रह्मा देवराजोऽज्ञासीत् विपश्यितथागतस्य चिन्न अचिन्तयत्- - - 'नश्यति वत र, अयलोर , विनश्यति बत रे शीत अय लोर । विपश्यी बुट्टो लद वा गभार अणु एत धर्म न चेन्चति देशिनुम् । (अथ ) म यथा बनवान् पुस्प बाहद्रा मोचयेत , एव या देवप्रामारत तन नण अागम्यावातिष्टद, बदम्य समन्न, शिरमा पाटो वदित्वा निष्टत एम मन्तम । अय बगा देवरानी दक्षिण नानु पृथिन्या न्यापदिच' ननिदपा.वोचद बुद्रम - दन्तु भगमान गनु पर्मनाम । मनि टगनी दमे मच्या गप. झा नन्दिया मारवचिना पन यानातागे पियनि परतीमाद rཏཱ་ན निगट याप, यरिग कुशलान् मागत ।"

( ६ ) । सूको देशयितु धर्मम्, अमित असंख्येय कल्प पूर्वगत आतापी प्रहितात्माऽप्रमत्तो व्यहरं अनुत्तर (ब्रह्म- ) चर्य, अजाध्यगच्छं दुर्लभमेत धर्मम् । स चेद् वदेय क्रोधनं अन्य सत्व, तभून अनुगृहीत भवेत् । ( तच्च ) भवेत में क्लमथो विहिंसा । अयं धर्मोऽगुरद्भुत., लोकतो विप्रतीय । सत्वा कामरता अज्ञा अवाटा, नालं ज्ञातु देशनां (मे)। ब्रह्मराज । एव पश्यामि अहमत्र सेन तूष्णी, नेच्छामि धर्म देशितु (हमम् )।" "सचेद अथ ब्रह्मा देवराजा पुनर्यमाचे हृदयात् प्रार्थयन् सकरुण यावत् तृतीय- भगवान् न दिशति धर्म, नश्यति वतरे । श्रय लोक , कृच्छ्वत रे नेच्छति भगवान् अकाले देशयितुम् । अथ सत्वाऽधोगमिष्यति अपरांगतिम् । तदा भगवान श्रत्वाऽभित्रार्थयमानस्य ब्रह्मराजस्य त्रि याचना, अथ वुद्धच- क्षुणाऽपश्यत् लोके-सत्वा समन्वागताः क्लेशेन म्थूलेन अणुना, तीक्ष्णमदेन्द्रिया सुखेनदुखेन वा विनेया । सुखविनेया ये विभ्यति परलोकाद् । तस्मादल निरोधयितु अकुशलधर्म उत्पन्न कुशलगतिका । यथा ( पुन ) उत्पलिन्य पद्मिन्यो वा कुमु- दिन्य पु ढरीकिरणे ( वा सरसि ) भवति मलिने पके जायमानाः। (तत्रैकत्या) न यावद जल, अन्या तिष्ठति अत्युद्गम्य जलालेन साई , अन्या वा भवति वहिर्ज- लाद | नोत्फुल्ला अपि सर्वा जलेन अनुपलिप्ता, सुखेन विकासनीया , सत्वा अपि लोक एवम्। अथवा भगवान् उवाचब्रह्मराज-"अनुकपा उपादयते देशयिष्यामि इदानी अमृतधर्मद्वार, धर्ममित्र गभोरं अद्भुत दुर्विनेयम् । इदानीं ये श्राद्धा , प्रसन्ना , तेपा देशयामि, न तु विवदमानना उपद्रुतानाम् । अनुपकारक तेभ्यो देशनम। अथ ब्रह्मराजो बुद्धेनोपगृहीता प्रार्थनाम इति मंतुष्ट उत्थाय प्रदक्षिणा कृत्या बुद्धम्य पादौ त्रिवार शिरसा वदिन्वा तत्क्षण अन्तरधात् । अचिर प्रमान्ते तस्मिन् अथ तथागत' तूष्णी श्रात्मन्य चिन्तयन्'-कं प्रथम देशयं धर्मम्' । अधा- चिन्तयदात्मनि 'प्रतियसतश्च बधुमती नगरे कुमारो यश महामात्यपुत्र तिस्यश्च । ताभ्यां विवृणुया अमृतधर्मद्वारम् ।' १ सद इति पाया ( ३० ) अथ भगवान यथा बलवान पुरुष समिजेत विभिजेतवा ( प्रसारित ) बाहु, तथा हि तत्क्षण मार्ग वृक्षे १ अन्तर्धाय यत्र वधुमती नगरे वधु (मठो ) राज्ञो मृग- दाववने प्रज्ञप्त आसने न्यपीदत् । अथ बद्धो गायथाऽ भाषत- सिंहो यथा स्मच्छन्द परिक्रमते वने । एव बुद्धोऽपि परिक्रमतेऽव्याइतगाति ॥ १४५ ।। (श्रथ ) विपश्यी बुद्ध आमत्रते स्त्र उद्यानपाल- “प्रविश्य नगर वद राजपुत्र यशस ( खड) महामात्य पुत्र तिष्य च कच्चित् न जानाति ( भवान) निपश्यी बुद्ध इदानी वसति मृगदाववने, इच्छेयु यूय द्रष्टुम् । ( यस्य इदानी ) कालो मन्यते (स्वामी)। अथ उद्यानपाल श्रादेश लटध्वा यत्र तयोद्वयो पुरुपयो स्थान तत्राऽगमत् , अवोचच्च बुद्धस्यादेशम् | तन्छ त्वा उभौ उपमक्तातौ बुद्धम्य स्थानम् । (उपमक म्य च) शिरसा बदित्वा ( बुद्धस्य ) पादौ एकमत्त न्यपीदताम् । तयोर्बु द्वोऽऽनुपूर्येण धर्म प्रकाशयामास सुसेन उद्गाइयित , तद् यथा दानक्था, शीलकया स्वर्गोपत्तिक्या, कामाना श्रवकार, सक्लेशस्य उर्वायव भूम्यत्तगयन्य प्रज्ञाण विनिर्गम अत्यण सुदर परिशुद्ध प्रथमम । यदा भगवान् अपश्यत् तयोरुभयो चित्तचेत मृद् उदग्र प्रमन्न हष्ट सद्धर्मग्रहण समर्थ, अथ ताभ्या देशयामास दुप पार्यमत्त्य त्याचकार घोपयाचकार, टु य समुद्रयार्यसत्य, दृम्बनिरो पार्यमत्य, द पनिरोपगामिनी प्रतिपद श्रार्यसत्त्यच । प्रथ राजपुत्रम्य यशम तिष्यम्म' च महामान्यपुत्रम्य ताम्मिन्नवासन बातमन्न विरन परिशुद्ध बमंचनुम्दयादि, ताथा शुद वा मुग्न गृहीयाद वर्णम। .

( ३१ ) भगवा (तस्मिन् ) समये गाथाभिध्यभाषत- तुष्टचित्त समुत्थाय प्राशंसत तथागतम् । विपश्यी भूत्वा वुद्धोऽनुत्तर धर्मचक्रप्रावर्तयत् ।। १४६॥ तोतिराज उपपन्न (?) उपाक्रमत् वंधुपुरीम् । यशस्तिष्ययो कृते प्रावतयत चतुःसत्त्यधर्म चक्रम् ।। १४७ ।। अथ लब्ध्वा यशस्तिप्यौ युद्धस्य देशनाम् । परिशुद्ध धर्मचक्र ब्रह्मचर्यमनुत्तरम् ।। १४८ ।। अथ देवा त्रायस्त्रिंश शक्रश्च देवानामिंद्र । हृष्टतुष्टा मिथ ऊचु सर्वैर्देवैर श्रु तम् ॥ १४ ॥ बुद्ध जानो लोके प्रावर्तयद धर्मचक्रमनुत्तरम् । वृद्धि देवाना सर्वेपा असुराणा च परिहाणिः ।। १५० ।। उत्थाय विश्वश्रावा नाम ऋपिः दुखेज्ञानं लोकतो विराग. । सर्वेषु धर्मेष्वात्मस्थित प्रावर्त्तयत्प्रज्ञया धर्मचक्रम् ।। १५१ ।। अभावयत् समसमै धर्मे. अवशिष्ठ चित्तं निर्मलम् । परिज्ञातु जाति-मरणान्तरायं प्रावर्त्तयत प्रज्ञया धर्मचक्रम् ॥ १५२ ।। निरोधाय दुःखस्य विरागाय च सर्वदोषाणा निष्कामो आत्मस्थितिम् । राग-लोभ-सौमनस्य वर्जित प्रावयित् प्रनया धर्मचक्रम् ॥ १५३ ॥ श्रेष्ठो नराणा सवुद्धो द्विपदामुत्तयो वशी। सर्ववचिनिमुक्त प्रावर्त्तयत् प्रज्ञया धर्मचक्रम् ॥ १५४ ।। देशयन्कुशल नानाऽऽचार्यकमारशत्रोविजेता । विगत सर्वैरकुशले प्रावर्नयत् प्रज्ञया धर्मचक्रम् ।। १५५ ।। निरास्रवो मारजितो सर्वेन्द्रिये श्वपरिश्रान्त । क्षीणास्रवो विगतमारपाश प्रावर्त्तयत् प्रजया धर्मचक्रम् ।। १५६ ।। सचेत् शिक्षेत निश्चिनुयान् सर्वान् धर्मान् श्रनात्मत' । अयमस्ति धर्मे पूत्तर. प्रावतयत् ।। १५७॥ नेच्छति यत श्राजीवलाम श्रपि न याचते यश । सत्त्वेपु तेषु करुणायमान प्रावर्तयत्। ।। १५८ ।। लभत ( ३२ ) । दृष्ट्रवा सत्त्वान् दुखान्तरायमग्नान् जराव्याधि-मृत्युभि पीडितान् । एताभि तिस्रभि दुर्गतिभि प्रावर्त्तयत्। ॥ १५ ॥ क्षीण रागद्वपमोह प्रहीणतृष्णा मूल । अचलश्च विमुक्तौ प्रावत यत्० ॥ १६०॥ आत्मा (हि) जेतु दुर्जयोऽकरोद् जिन आत्मजयम् । दु ख जेतु अजयत् मार प्रावर्त्तयत् ॥ १६१ ।। अनुत्तर धर्मचक्रमिद बुद्ध एव तदा प्रवत्तयितुमलम् । सर्वे -देवशत्रुमार-ब्रह्मभि नाल दुष्प्रवर्त्यम् ॥ १६२ ।। सवद्ध प्रवर्तित धर्मचक्र हिताय देव-मनुष्याणाम् । एतान् देव-मनुप्यान्शास्ताऽतारयत् परपारम् ।। १६३ ।। तदा राजपुत्रो यशो महामात्यपुत्रो मिन-च चापश्यता वर्म, अलभता फल अमृपाभूत परिपूर्ण अभयम् । अथ तो उचतु बुद्ध एतद वचर- "इच्छाब तथा- गतस्य सुपरिशुद्ध धर्मविनये ब्रह्मचर्य चरितम ।" बुद्ध उवाच- "माधु, एता भिक्ष , मम वर्मे परिशुद्ध अात्मनि स्थितो चरता ( ब्रह्मचर्य ) सम्यग्टु खक्षयाय ।" तस्मिन वाले दो जनो अलभता उपमपदम् । उपसम्पाटा तथागतो नचिरेग प्रादरकगेत निर्माय त्रीणि वस्तुनि, ताथा प्रथम द्विपाद इति, द्वितीय परचित्त- नान दति, तृती। च शिना-शीन इति । तदा अलभता अनाम्वा चेनोविमुक्ति अविचिकिन्न प्रतनाम । तमिन कान बरामती नगरेगोन महानन - हो भनी प्रवर सगागत शिन्ते । बोधि.) मागें याताय चीवर परिशुद पा- च भाव , ना गम । (प्रय न म परम्पर उच - मटा मार एप माग पत्र की बात पनिट र मसारम।" - ( ३३ ) सूदमं प्रणीतं परिशुद्धं अनुचरं भावम् । यदा भगवान् अपश्यत तं महाजनं मृदु- चित्तं श्राद्ध प्रसन्न हृष्टतुष्ट भव्यं सद्धर्मनाभाय, अथ तं अदेशयत् दुखं प्रार्य सत्यं संवदमान. सविभजमान', प्रकाशयत्, व्याकरोच्च दुःख समुदयं श्रआर्यसत्यं, दुःखनिरोधं आर्यसत्य, दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपदं आर्यसत्यम् । अथ तत् चतुराशीतिजनसहस्र तस्मिन्नेवासनेऽलभत परिशुद्ध धर्मचक्षु.ऽ, तद्यथाऽवदातं वस्त्र' सम्यग् गृह्णीयाद वर्णम् । अपश्यत अलभत च फल पूर्ण अभय अमृपाद्वारेण । ar अथ ऽवदन् बुद्ध च इद वचन- "इच्छामो वय तथागतस्य सुपरिशुद्ध धर्मविनये ब्रह्मचर्य चरितुम् ।" बुद्ध उवाच-"साधु, एप भिक्षव मम धर्म आत्मस्थिता चरथ (ब्रह्मचर्य ) सम्यग्दु क्षयाय " अथ चतुराशीतिजनसहस्र अलभत उपसपदम् । उपसपाद्य च तथागता नचिरेण पर्यपूरयत् भगवत त्रिवस्तुका शिक्षा, तत्र प्रथम उच्यते ऋद्विपाद , द्वितीय उच्यते परचित्तज्ञानं, तृतीयमुच्यते शिक्षा शीलम । अथ ते ऽलभन्त अनास्रवा चेतो- विमुक्तिं अविचिकित्स प्रज्ञतां चतुराशीतिसहस्रं जना । अथ अश्रृण्वन् वंधुमतीजना । "बुद्धो (भगवान् ) मृगदावे प्रावर्त्तयद अनुत्तर धर्मचक्र कैनापि श्रमणेन ब्राह्मणेन देवेन मारेण ब्रह्मणा च अप्रावय॑म ।" तदा वधुमतीवासिन उपसचक्रम. तत् स्यान, यत्र भगवान् स्थित', उपसक्रम्य च शिरसा वदित्वा (भगवत ) पादौ एकमन्तं न्यपीदन् । तदा चुद्धो गाथयाऽभापत- यथा याचन्ते शरणात् प्रदीप्रात् शीघ्र कामयन्तो विरोध स्थानम् । एव जनास्त्रोऽपिशीघ्र उपजन्म त तथागतम् ।। १६४ ।। अपिचैव, तस्मिन् काले बंधुमत्या अभवत् त्रिशताष्ट चत्वारिंशत् नहर महाभिनुसघः । यशो भिन्नु मिन्-चा भिनुश्च तस्मिन मधे उद्गम्य आकाशं कायात् निष्कासयामासतु जल अग्नि ( यमकमातिहार्य ), अदर्शाताच वर्द्धि ( ३४ ) तस्मिन काले तथागत तूष्णी स्वचित्त उवाच- अस्मिन् नगरे च भवति भिशताष्टचत्वारिंशत्स इस्र महाभिक्षुसघ, यन्तु अह प्रेयेय द्वौ द्वौ प्रत्येक स्थान पष्ट सवत्सरे च प्रत्यावर्त्तन नगरे तेपा, देशयतु च ते परिपूर्ण शीलम् ।" श्रज्ञासीत् च तथागतस्य चित्त सहापति ब्रह्मा (सि-तु-ब्रह्म-देवो ), अथ यथा बलवान् पुरुप समिर्जित वाहु प्रसारयेत् , तथा तस्माद् देवलोकात निक्रम्य उपाक्रमत् इहात्र भगवत पुर शिरसा वादेत्या एकमन्त अतिष्ठत एकमन्त स्थित्वा च उवाच बुद्व- "एवमेव भगवन् , अम्मिन वधुमती नगरे बहुभिनुमत्र , युक्त सर्वपा मवि- भाग सर्वत्र चारिका च क, पटसु सवत्सरेपु प्रत्यावर्तन चास्मिन नगरे । देशयतु परिपूर्ण ब्रह्मचर्य प्रारक्षिप्यामिच तत्र छिद्र न लाभ गवेपयत् ।" तदा तथागतो देवम्य वचन अत्वा तृणी अन्ननापीत् । दाटवा नागी अनुजानन् वुद्वस्य मि०च- वा दंवो वदित्वा बुद्धम्य पाटी तत् क्षण अन्त गायब देवलोक प्रत्यावर्त्तत । न चिरंग तस्य गमनाट वृदो तान भिनन् वाच- इदानी अम्मिन नगर निनुमपो वह , परितो गन्त चारिकार्य, पराणा सवत्सराणा पश्चात् मागच्दन शील ( प्रानिमोन ) नेटुम् । तदा त निन्य राय बुदृम्य वचन पान-चीवर ग्रादाय वनित्या च बुद भगमन । तस्मिन् काम बुट्टो गायया पाच- ( ३५ ) - “परिपूर्णानि षट् सवत्सराणि, प्रत्यावर्त्तध्व प्रातिमोक्ष उद्दष्टुम् ।" अथ ते भिक्षव प्रतिश्रुत्य देवस्य वचन पात्रचीवर आदाय प्रत्यागमन् वधु- मतीनगरे, गताश्च मृगदावे ( पत्र ) विहरति विपश्यी बुद्व , शिरसा वदित्वा बुद्धस्य पादौ एकमन्त न्यपीढन् । तस्मिन् काले बुद्धो गाथयाऽध्यभापत यथा हत्थी सुविरीत' कामनामनु गच्छति । एव सघ (सुविनीत ) शिक्षा अनुप्रत्यावर्तते ॥ १६६ ।। तस्मिन् काले तथागतो महत सघस्य पुरत ऊवं वाते पयंकं प्रामुज्य न्यपीदत् , अदिशत् च प्रातिमोक्षसूत्र, क्षाति प्रथम अदिशद् बुद्वो निर्वाणं-न भवति केश-श्मश्चवहारेण मुडोऽथ भ्रमण । तस्मिन् काले सि-त-बुइ-देव उपागम्य बुद्वस्य नातिदूरे गाथाभिर भापत स्तोमनवचन- तथागतो महाप्रन्न सूक्ष्माद्भुतवलोत्तम । सम्यग्भावनापरि पूर्णोऽभवत् मम्यक् सवुद्व ॥ १६७ ॥ सत्त्वेष्वनुकपया लोके परिपूर्ण मार्गम् । चतुणा आर्यसत्त्याना श्रावकेभ्य समदिशत || १६८ ।। दुःख दु खसमुदय च दुखनिरोध-सत्त्य (च) । आर्य यष्टागिक मार्ग प्राप्य स्थान सुरक्षितम् ॥ १६६ ॥ विपश्यी वुद प्रादुर्भूय लोकं सघमध्ये । सूर्यो यथा (स्व) प्रभया प्रभासते ॥ १७ ॥ तत्रैवान्तरधात् । तस्मिन् काले भगवान् उवाच तान् भिक्षत्- "मम ( एव ) स्वचित्तेऽभूत्-पूर्व एकदा राजगृहे गृध्रटपर्वतेऽभूवम् । तदा मम चित्त इद अभूत्-य योऽपि मम उपस्थान ऋच्छति त-चु-हि-देव परिवर्ण, सचेद जायते देवपु, न पुनरागमिप्यतीह । पुनरपि भिनव , उदा मम चित्त इद अभूत्-इच्छामि अह यावत् देवेषु उपरि गन्तुम् अथ 'ग्रह चया बलवान् पुरुप सम्मिजित वाहु प्रसरयेत् ( प्रसारित वा समिजेत् तस्मिन्नेव ) काले इतो निर्गम्य प्राटरभव ते देवा । अथ ते सर्वे देवा मा इष्टु 'प्रागदा तत्र । (श्रागन्य ) च इमा गाथा उत्क्वा ( ३६ ) शिरसा वंदित्वा एकमन्त स्थिता ऊचुश्च इद वचन-'वय सर्वे श्रावका विपश्यिन तथागतम्य, तस्माद् वुढ देशनार्थं आगता इह । (अथ ) आदिशद बुद्बो हेतु प्रत्यय साद्यन्त पुन ( भविष्यति ) शिखी वुद्ध , विश्वभू बुद्व क्रकु सघ , कोना गमनो वुद्व , काश्यपो बुद्ध , शाक्यमुनि बुद्व । सर्व इमे भवन्ति शास्तार । श्रह एतद्दशनार्थं श्रागत इह । अवदन च ते बुद्वा सहेतु-प्रत्यय साद्यन्त, जाता (च) अकनिष्टलोके च एवम् । तस्मिन् काल बुद्धो गाथामिरभापत- पुरुपो यथा बलवान् बाद ममिजेत प्रमारयेत् । अह अकरव ऋद्विविध गन्त अकनिष्ठ देवेषु ॥ १७१ ।। सप्तम महाम्वर्ग' जित्वा उभय मारम् । अपश्यन् अनन्ता देवा अवदन कृत्वा नलिम् ।। १७२ ।। या श-तु-वृत्त शक शास्तारम गणोत् । सुलक्षगा पुण्य सुदर्शन देवा ।। ७३ ॥ पद्मपुष्प जलेन । तथा भगवान अनावो गत मुदर्शने ।। १७ ।। सर्यो यथा प्रथम उदगत परिशुद्धो नाविन । प्रभाय पा शरदिन्दो प्राप्त परममनुत्तम एकम || १७५ ।। दमैप पचस्वावमयेषु सर्व जायन्ते शुटरमाण । शुचित्ता तत पागन्य न कलेश प्रान वति ते ।। १७६।। परिटचित्तमागन्ध मन्वा ढन्य यारा । यथा नोनियत

Maha Pari Nirwan Sutra

Author
Rahul
Title
Maha Pari Nirwan Sutra
File name
Maha Pari Nirwan Sutra
Text
OCR done
Citation
1954
Published
2010/11
Publisher
Udhyapur,sahitya Sansthan Rajasthan Vishw Vidhyapith
Language
Sanskrit
Pages
119
Library
Bharatiy Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
DLI number
325852
Barcode
99999990007732.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
a5EXhiR2YUA
Download PDF

Maha Pari Nirwan Sutra