Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Sahadharmini
Front matter
- M अट्ठारहवाँ परिन्छेद अकाट्य प्रमाण पा चुकी थी कि रमेन्द्र की हत्या करनेवाला न है। खूनी उसके हो स्वामी उसके पुत्र कन्या के पिता है उसके सामने वेठो हुई निहत रमेन्द्र को माता है। जो उसकी भॉति अवस्था में नहीं पडा है वह भला उसकी का अनुभव कैसे कर सकता है । अत हेमांगिनी की सास भीतर से वद होती आने लगी।" सशा रहित वेहोशकी भांति हेमागिनी बोली-"आह !आप । कर ऐसी वातोंको कभी अपने मन में स्थान न दीजिएगा लोग आपके पुन का अनिष्ट करेंगे-यह असभर है।" रमेन्द्र की माँ उठकर खड़ी हो गयी और बोलीं-हेमागिनी दिन पहले एक समय तुमने मेरा सुख-शान्ति सब नष्ट दिया था। तुन्हारे हो लिए उसने आज तक भी विवाह किया। उस समय मैने तुमको कह दिया था कि यदि । जीवन कभी दुख-यातना कष्ट और सताप से श्मशान मि बन जाय तो उस समय तुम मन में समझ लेना कि तुम, पापों का दण्ड भोग स्वय पा रही हो । इस समय भी मैं वात कहती हूँ। मेरी यह बात अच्छी तरह मन में गठिया AN रख लेना। हेमागिनी का कठरोध हो गया। सचमुच ही. क्या उसके का दण्ड भोग आरम हो रहा है ? ओह ! केसी भीषण 1 r । रमेन्द्र की मां दरवाजे के पास जा वडे, ही गभीर स्वर में "तो फिर,तुम नहीं जानती हो कि मेरे बच्चे की हत्या की है?" -- हेमागिनी रुकती सॉस से वडे ही कष्ट के साथ बोली- लोग भला केले जानेंगे, ?".
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सचित्र सामाजिक उपन्यास
सहधर्मिणी
-
RASH
Els
“प्रकाशक-चौधरी एण्ड सन्स,
बुक्सेलर पण्ड पब्लिशर्स, बनारस ।
Only Cover
Anurairess Ranaron
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सहधर्मिणी todo- श्री पंचकौड़ी दे 'अनुवादक- श्रीविश्वनाथ पोखरैल "विश्व " प्रकाशक- चौधरी एण्ड संस, पब्लिशर एण्ड बुकसेलर बुलानाला, पनारस १००० - अक्तूवर १६२६ ' (मूल्य ) श्रीमहतावराय, सरस्वती प्रेस, काशी ।
सहधर्मिणी 7 पहला परिच्छेद कुमार वा पश्चिम में वकारत करते थे। वका लत करके उन्होंने बहुतसा धन कमा लिया है। इस समय वे विस्कुल वृद्ध न होने पर भी दो कारणों मे वकालत छोड, कलकत्ते में लोअर सक्यूलर रोड पर एक,सुन्दर मकान भाडे,पर ले उसी में सप- रिवार रहते हैं। उनके वकालत छोड़ने के इन दो कारणों में से पहला कारण यह है कि उनकी स्त्री.हमेशा से ही वीमार रहा करती हैं। बहुत दिन हुए उन्होंने जो खटिया पकडी सो उठने का नाम नहीं लिया। उसी प्रकार एक भाव से चारपाई पर पड़ी हुई जीवन के शेष दिन बिता रही है। पश्चिम में बहुत अधिक गरमी पड़ती है, इस कारण रोग, घटने के अतिरिक्त और भी अधिक बढ जायगा यही कहकर बड़े २ डाक्टरों ने उ हे ठरवे, मुल्क में चले जाने की सलाह दो | अत, चे उन लोगों के , परामर्शानुसार पश्चिम का रहना छोड स्त्री को लेकर कलकत्ता,आये हुए हैं । दूसरा कारण उनकी एक मात्र कन्या हेमागिनी पूर्ण: यौवना हो गई है । उसके हर एक गो, से, यौवन की, छटा फूट २ कर निकलने लग गई है । अस्तु, इस समय उसका व्याह कर डालना नितान्त ही आवश्यक है। -
२
व्याह छोटी
सहधर्मिणी
हर कुमार बाबू सदा से हो ब्रह्मोसमाज के पक्षपाती हैं-
ब्राह्मभाव उनकी नस २ में भरा हुआ है । और हिन्दू-सनातनी
धर्म की ओर उनकी किचिन्मात्र भी रुचि नहीं रहती।
पश्चिम में वे ठीक साहयों की भाति रहा करते थे। यहा भी वे
पूरे साहर हैं। वे बाल-विवाह के एकदम से हो विरोधी हैं।
उनको धारणा थी कि बाल्यावस्था में विवाह करदेने से बालक
यालिका-दोनों का भविष्य जीवन मिट्टी में मिल जाता है।
इन्हीं कारणो से उन्होंने अपनी कन्या का
उमर में नहीं किया, साथ ही उन्होंने हेमागिनी को पढा
लिखा कर सुशिक्षिता बनाने में जहा तक करना था वहाँ तक
कर लिया है। हेमागिनी सर्वांग सुन्दरी पडी ही रूपवती है।
उसका सारा शरीर बड़ा ही सुडौल मानों साचे में ढला हुआ
है। जिस प्रकार उसके शरीर का रंग व ऐब साफ गुलाब के
फल के समान है, उसी प्रकार शरीर का गढ़न भी सुन्दर और
परिपाठि पूर्ण है। साथ ही सुन्दरता में वह जिस प्रकार अपनी
जाड़ी नहीं रखती उसी प्रकार गुण में भी किसी को अपने
मुकाविले फटकने नहीं देती-अर्थात् रूपवती ओर गुणवती
दोनों ही उपमाओं को वह पूर्ण सार्थक कर रही थी। गाने
चजाने, लिखने पदने, सभी में वह पूर्ण और सर्वगुणसम्पन्ना
है । इस समय उसकी उमर सोलह वर्ष पार कर चुकी है।
अतः इस वार हर कुमार बाबू ने अपनी कन्या का विवाह कर
देना स्थिर कर लिया है।
उनकी खों आज है कल नहीं। कौन ठिकाना! वेभी
कन्या के व्याह के लिए बडो ही आतुरा हो उठी है । और इसी
लिप-सर्वदा ही वे अपने स्वाभी को उसके लिए दिक किया
करती हैं।
.
पहला परिच्छेद
हरकुमार बाबू के एक विशेष अन्तरंग मित्र अनन्त वावु
कालीपुर के जमींदार हैं। उनका एक मात्र पुत्र सतीशचन्द्र
बड़े हो सुशोल सच्चरित्र और सुशिक्षित है। बहुत दिनों से ही
उनकी इच्छा है कि सतीशचन्द्र के साथ अपनो कन्या का
व्याह करदें। सतीशचन्द्र प्राय. उनके घर आया करते थे।
चे लोग भी सभी सतीशचन्द्र को विशेष स्नेह की दृष्टि से देखते
थ। हेमागिनी के साथ भी उनका विशेष सौहार्द और आत्मीयता
हो गई थी। अपने यौवनसुलम प्रेमसे उन्हे प्यार न करने
पर भी हेमागिनी अपने माता-पिता की भाव भगी से इस बात
को भली प्रकार समझ गई थी कि एक दिन उसे अवश्य ही
सतीशचन्द्र की गृहस्वामिनी होना पड़ेगा। किन्तु हरकुमार
बाबू वा उनकी खी दोनों में से किसी ने भी कभी आज तक
इस बात की चर्चा उसके सामने नहीं की। तोमी हेमागिनी
अच्छी तरह समझ गई थी उसके पिता-माता दोनों की यही
इच्छा है । इसको सतीशचन्द्र भी जानते थे। किन्तु उन्होंने भी
आज तलक हेमागिनी को इस सबंध में कुछ नहीं कहा । किसी
के कुछ न कहने पर भी हेमागिनी इस बात को खूब समझ
गई थी और यदि मोटे हिसाब से कहा जाय तो वह इस बात
से विशेप असतुष्ट भी नहीं थी। "
सतीशचन्द्र के पिता-माता कोई नहीं हैं। वे ही इस समय
अपने पिता की, अतुल, धन-सम्पत्ति के एक मात्र अधिकारी
और बड़े भारी जमीन्दार है । खूर लिख पढकर सुशिक्षिता होने
परभी, बड़े घरकी गृहणी होने के लिए उसके अन्त करण में
एक स्वाभाविक प्रवल इच्छा हमेशा से ही जागृत हुआ करती
थी। किन्तु भाग्य का अधकार पूर्ण ओट में न मालूम क्या
छिपा है से कौन कह सकता है.। भविष्यत् की बात देवता
।
-
४ 7 . सहधर्मिणी भी नहीं जानते तो फिर मनुष्य किस तरह जान सकता है- उसकी विसात हा क्या कि विधाता'के लेख को जान सके । अंत हेमागिनी उस बात को नहीं जानती, उसके माता-पिता भी नहीं जानते थे कि भविष्य में भाग्य उन लोगों को क्या २ नाच नचावेगा। हेमागिनी सतीशचन्द्र को ठीक तरह से प्रेम करती है या नहीं इस बात को उसने एक दिन भी अपने मनसे नही पूछा। इसका प्रश्न तक' भी उसके हृदय में नहीं उठा' ! किन्तु सतीशचन्द्र के साथ उसका कभी खा व्यवहार नहीं रहा और न कभी उसने उनका अनादर हो किया। तो भी सतीशचन्द्र उसको दिल से प्यार करते हैं, इतना वह अन्छी तरह अपने मन में समझ गई थी। -- - 111 । - T1 - दूसरा परिच्छेद रकुमार वा वकालत छोडने के बाद कुछ शको और वहमी हो गये।थे। काम काज न रहने से हो अथवा अपनी स्त्रो के सदाबीमार रहने से हो जिस कारण से भी हो-उनके शरीर में कुछ "पीड़ा न रहने पर भी चे सदा सर्वदामन में समझा करते कि उनको देह व्याधि का घर हो गयी है। कारण अकारण वे व्यर्थ हो, डाक्टर को बुलाते और औषधि का सेवन करते, जिस दिन दवानि पीते,उस दिन चाय पीते । उनके "इस वहमो स्वभाव के कारण डाक्टर लोगा को अच्छी तरह दा पेसा मिल जाता ओर नौकरों कोभी मालिक के चाय पीने से कुछ न कुछ लाभ हो ही जाता था। -- ५ " दूसरा, परिच्छेद 90 . H . - हर कुमार याव की स्त्री जिस दिन कुछ अच्छी- हाती उस दिन एक आराम कुसी पर गद्दा विछातोपक पर, ढासना लगा एक रूप से चेठी रहती|| अन आज,भी वह उसी प्रकार,आराम कुसों पर बैठी हुई थी। हेमागिनी उसके , पास बैठी मोजावुन रही थी। उस समय पश्चिम आकाश को लाल वर्ण से रजित फर और सारे आकाश में अपीर छिडककर सूर्यदेव अस्ताचल की ओर ढल रहे थे। 1 सहसा,माने कन्या के मुह की ओर ताककर पूछा--"हेम। देख तो कौन आया इसी समय एक घोड़ा गाड़ी घर २ शब्द करती हुई दरवाजे पर आकर खडी हुई । वही शब्द हेमागिना की माके कान में पडा था। किन्तु कोई माया नहीं, उस शब्द की बात भी फिर उनके मन में नहीं आई। हरकुमार बाबू के चाय पीने का समय हो गया. नौकर उसी कपरे में एक छोटो सेटेवुल के ऊपर चाय का सप सामान रखकर चला गया किन्तु हर कुमार वाबू आये नहीं। उनके चाय पीने का समय कभी भी टलने नहीं पाता था, इसलिये उनकी स्त्री बड़ी ही निस्मित हुई। ओर भी कुछ देर तक आसरा देखकर उन्होंने बड़े,ही चचल भाव से कन्या को कहा-"वे वाहर पाल घर में शायद सोये पड़े तो नहीं हे हेम ! जाओस्टी देस तो आओ। हेमागिनी मोजा बुनना बदकर,उठो, और पिता की खोज में बाहर वाले घर में प्रवेश करते २५ वोली- दादा चाय- दपढी हो गयी तुम अभी भीkaif 1. हेमागिनी के मुंह की. यात मुंह ही में रह गई । हरकुमार, चाव की बगल में एक सजन-सुन्दर युवक बैठे हुए थे। वे हेमाः, - , ६ सहधर्मिणी गिनी को देखते ही मात्र सम्भ्रम उठ खडे हुए। हरकुमार चावू बोले-"रमेन्द्र बाबू ! यही मेरी एक मात्र कन्या हेम है।" हमागिनी कुछ नहीं बोली। उसकी बडी २ नीलोत्पल तुल्य कजरारी, रसीली आँखें सहसा नीचे की झुक गई । वह उसी समय फौरन उल्टे पांव जल्दी से यहाँ सोभाग गई। रमेन्द्रनाथ गरीर के लड़के हैं। उनके पिता नहीं केवल माता मात्र है। वे अपनी खुद मिहनत और बुद्धियल से छात्र- वृत्ति प्राप्त कर इस समय मेडिकल कालेज में डाक्टरी पढ़ते है। ओर कुछ थोडे दिन के बाद ही वे पास होकर डास्टर बन सकेंगे। हरकुमार या डाक्टरों को देखते ही उनका विशेष आदर भाव करते। रमेन्द्र के साथ उनका परिचय होते ही, उनका नम्रभाव, तीक्ष्ण विद्याबुद्धि और चिकित्सा-विद्या में पारदर्शिता देख उनसे उनकी विशेष प्रीति हो गई थी। रमेन्द्रनाथ कालेज पट होने से घर जा रहे थे। किन्तु हरकुमार बाबू ने उन्हें कुछ एक दिन अपने मकान पर रहने के लिए विशेष आग्रह अनुरोध किया था। इसी से रमेन्द्रनाथ उनके घर आये हुए थे। वे सिर्फ तीन चार दिन मात्र रहेंगे, कहकर आए थे। किन्तु धीरे २ एक सप्ताह दो सप्ताह कर एक महीना बीत गया ।। तब भी जार करते हुए भी उनका जाना नहीं हुआ। यह अवश्य आश्चर्य की बात है-इसमें संदेह नहीं। किन्तु इसका कारण यह था कि एक तो पहले से ही रमेन्द्रपर हरकुमार यावू का विशेष प्रेम हो गया था। दूसरे अभी रमेन्द्र पास होकर डाक्टर न होने पर भी शीघ्रही डाक्टर हो जायेंगे। उन्होंने अपनी स्त्री की बीमारी की सारी बातें रमेन्द्र से कह दी थीं। रमेन्द्र ने भी सब सुनकर नवीन औषधि की व्यवस्था कर दी। उनकी
दूसरा परिच्छेद
औषधि से उनकी स्त्री को विशेष फायदा होते दीख पड़ा। इस
कारण वे रमेन्द्र से और कुछ दिन रहने के लिए विशेष आग्रह से
अनुरोध करने लगे। हेमागिनी की माँ ने भी पति का अनुरोध
करने के लिए कहा । रमेन्द्र को भी छुट्टी ही थो-अत लाचार
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वे रह गए।
दिन पर दिन हरफुमार पावू और उनकी स्त्री दोनों
रमेन्द्रनाथ के ऊपर अधिकतर आकृष्ट होने लगे। रमेन्द्र भी
एक आदमी के ऊपर विशेष आकृष्ट हो पढे । कहना व्यर्थ होगा
कि वह आदमी और कोई नहीं हेमागिनी है।
और हेमागिनी-वह यदि सच कहा जाय तो कभी भी
सतीशचन्द्र से प्रेम नहीं कर सका । न मालूम क्यों उसके
हृदय का खिंचाव उनकी ओर हुआ ही नहीं। इस समय इस
युवती का हृदय ताजे खिले हुए फूल के समान लावण्य से भरे हुये
नम्र-सुशील सुन्दर सुपुरुप रमेन्द्र को देख उन पर मोहित
हो गया था। इसी एक महीने में रमेन्द्र के साथ एकत्र रहने से
उनकी मोहिनी मूर्ति हेमागिनी के हृदय पट पर अकित होगई।
वे कौन-कहाँ रहते हैं-यह सव हेमागिनी ने एक बार भी
उनसे नहीं पूछा । धीरे २ वह जो उनसे प्रेम करती जाती है-
उसको भी वह अच्छी तरह समझ नहीं सकी है। एक मुहूर्त
भर के लिए भी उसने उसकी चिन्ता नहीं की। उनके साथ
रहने में अच्छा लगता है-उनसे बात चीत करने में, मन
आनन्द से भर उठता -बस इतना ही यह जानती थी। इसके
सिवाय और कुछ सोचने विचारने के लिए उसको अवसर या
समय नहीं था।
किन्तु रमे द्रनाथ सब ममझ गए। हेमागिनी का-हृदय जो.
और एक हृदय के साथ मिलने के लिए धीरे २.आगे बढ़ रहा
.
ar सहधर्मिणी हेमागिनी का मुह एक दम लाल हो आया । रमेन्द्र रेशम को एक अर से पकड़ कर उसकी गाठ छुड़ाने की चेष्टा करने गे। रेशम का दूसरा सिरा हेमागिनी के हाथ ही में रहा-इस रण लाचार उनका मुंह, हेमांगिनी के बहुत ही नजदीक झुक या। इससे हेमागिनी का मुंह ओर भी लाल हो गया। रमेन्द्र भी सिर से लेकर पैर तक लाली दौड़ गई । अत को दोनों मस्तक एक दूसरे के इतना नजदीक हो गया कि मालूम ता था कि मानों दोनों की कोमल सास मिलकर एक साथ हर निकल रही हैं। वे लोग दोनों ही इस काम में इतने बेखबर हो पड़े थे कि सी समय जो एक और व्यक्ति ने उस घरमें प्रवेश किया- सको किसी ने लक्ष्य नहीं किया । सतीशचन्द्र स्तभित हो खड़े हो गये। एका एक हेमागिनो और रमेन्द्र ने चौककर मुंह ऊपर को ठाया। हेमागिनी के मुह की लाली सहसा सफेद रंग बदल गई । किन्तु धीरज को हाथ से उसने जाने नहीं दिया। इट अपने का सभालकर पूर्ववत बैठ गई। सतीशचन्द्र धीरे २ आगे बढे। रमे द्र और सतीश दोनों आमने सामने होकर खड़े होगए। दोनों की यही पहले पहल देखा-देखी है। क्योकि इन्हीं छ' सप्ताहो से सतीश अपने देश गए हुए थे। । हेमागिनी बडे ही अस्फुट स्वर में बोली-"सतीश बाबू! पे रमेन्द्र बाबू हैं।" । - दोनों ने एक दूसरे को बड़ी ही तीक्ष्ण, दृष्टि से देखा। दोनो ही ने एक दूसरे को अपने मन में पूरा प्रतिद्वदी। (रकीय) कहकर स्थिर कर लिया। दोनों की दृष्टि से उस समय एक । - है -
.
तीसरा परिच्छेद
विविध प्रकार की ज्वाला निकल रही थी। हेमागिनी बोली-
"कब आये वाया से भेंट हुई ?"
"नहीं, नौकर ने कहा कि वे इसी घरमें है।"
रमेन्द्र भन्नता के लिहाज से बोले-"वे अभी बाहर घूमने
गये हैं। शायद अभी लोटे नहीं हैं।'
सतीश उनको वातों का कुछ उत्तर न देकर हमागिनो की
ओर पल्टे। इससे रमे द्र का मुंह-आँख एक दम लाल हो
उठीं। अत वे धीरे २ उस घर से निकल कर बाहर चले गए।
सतीश ने हेमागिनी के मुंह की और टाककर पूछा--
"हेम यह आदमी कोन है"
हेमागिनी मन ही मन क्रोध से जल उठी थी। बोली-
"अभी २ कह तो दिया था कि रमेन्द्र बाबू हैं।"
हेमागिनी ने यह बात बड़े झटके और जोर के साथ कही
थी। उसकी बातों में क्रोध और विरक्ति का आभास पाया
जाता था। अपने स्वर मे हेमागिनी आप हो चौक उठी। फौरन
अपने मन को आपही सभालकर कोमल कठ से बोली-"ये
डाक्टरी पढ़ते हैं। पिता से इनकी जान पहचान होने के कारण
उन्होंने इन्हें कुछेक दिन यहा रहने के लिए कहा, इसी से ये
यहाँ रह गए हैं । पिताजी इन्हें बहुत चाहते हैं हम लोग भी-
कहते २ हेमागिनी रुक गई। फिर स्भलकर बोली- ये बड़े
सजन आदमी हैं।"
'सतीशचन्द्र ने दातो से ओठ चाटा और जरा गभीर होकर
कठिन स्वर में बोले-"आओ चलो तुम्हारी मासे भेट करलें।
वे अच्छी तो है न?" आज तक हमागिनी ने कभी भी सतीश
की वात अमान्य नहीं की थी। केवल आज यही पहले पहल
उसका हृदय उनकी वात अमान्य करने को तय्यार हुआ।
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4
मिणी
पृ० २०११
सतीश ने हेमागिनी के मुद को और ताक कर पूछा-"हेम । यह
वादमी कौन हे "
1 - - चौथा परिच्छेद १३ है। इस कारण विचारी हेमागिनी के ऊपर अभी से घर गृहस्थी का सारा भार आ“पडा है। वह यद्यपि एक दम से बालिका नहीं है तथापि सदा से पिता माता की दुलारी होने के कारण दुस, कष्ट चिन्ता किसे कहते हैं-इसे वह कभी स्वप्न में भी नहीं जानतो थी। अत बिचारी इस समय ससार की, अने) भावनाओ-चिन्ताओं से एक दम व्याकुल हो उठी है । उसके सारे-सुख' हसा सेल कृद कपूर की भॉति हवा में उड चुके हैं। मानों सुख-शान्ति उसके जीवन से असहयोग कर गये हैं। मा वीमार मरन सेज पर पड़ी हुई-पिता नहीं, भाई नहीं- कोई नजदीक का हितमित्र-जात्मीय स्वजन भी नहीं कि उसकी देख रेख करे-सहायता करे। अब बहुत दिन होगया उसे रमेन्द्र का कोई समाचार नहीं मिला । ये कहाँ है क्या करते हैं इसे भी वह नहीं जानती। -सतीश भी अब और पहले की भाँति नहीं आते। सौजन्य रक्षा के लिए आना नितान्त प्रयोजन है यह समझ कभी २ एकाध यार आया जाया करते थे । उन्होंने कभी पहले की चीती बातों का उल्लेख हेमांगिनी के सामने नहीं किया। इसी प्रकार बड़े ही कष्ट से हेमागिनी अपने दु ख के दिन काट रही थी। ऐसे ही समय एक दिन सतीशचन्द्र उन लोगों के घर आ उपस्थित हुए। वे जब कभी भी आते केवल हेदागिनी की माका हाल चाल लेने मात्र आते थे। अत आज भी वह उसी प्रकार आप हुए थे), 1, हेमागिनी को बिलकुल उदास और खिन्न देख वे उसके सामने आकर बेठ गए । कुछ क्षण तक चुप रह कर वे बोले- "हेम ! म समझता हूँ: तुम जिस कठिन अवस्था में पड़ी हुई हो उससे ससार के, अनेकों प्रकार के झंझट और भावनाओं को - ३ 1 " सहधर्मिणी सतीश के साथ मा के निकट जाना उसका हृदय नही चाहता था। अत वह जाने के लिए अस्वीकार करना ही चाहती थी फिन्तु फिर उसने अपने को,बडी मुश्किल से संभाल लिया और चुपचाप विनाकुछ कहे उनके साय धोरे २ चल पड़ी। x x . उसके दूसरे दिन रमेन्द्र हरफुमार के घर से विदा होकर चले गए। उसी दिन से सतीश के साथ मागिनी का मनमुटाव हो गया । यहाँ तक कि एक दिन तो दोनों से प्राय झगडा की तरह भी हो गया। सतीश और हेमागिनी दोनों ही ने इस बात,को समझ लिया कि उन दोनों ही, के बीच एक,चाधा आड़ की तरह आकर खड़ी हो गई है। यद्यपि रमेन्द्र का नाम दोनों में मे किसी ने भी नहीं लिया यह सत्य है किन्तु तौभी दोनों ही यह अच्छी तरह समझ गए कि यदि रमेन्द्र न, आते तो कभी भी ऐसी घटना घटने न णती। 1 क चौथा परिच्छेद, - चर्प होगया है । इन दो वर्षों में,हेमागिनी के जीवन बहुत सा परिवर्तन हो गया है.i उसकी सदा की वोमारमा अभी मी उसी अवस्था में जीती हुई अपने दुखके दिन, काट रही है। किन्तु हरकुमार वायू अब इस ताप पूर्ण संसार में नहीं है। छ महीने हो गए,अपनी वीमार स्त्री और कन्या को सदा के लिए शोक-सागर में डुबाकर महा.प्रस्थान कर चुके हैं। 11,उसकी मा ने इस बार पकवारगी,,ही खटिया पकड़ लो - १ चौथा परिच्छेद १३ है। इस कारण विचारी हेमागिनी के ऊपर अभी से घर गृहस्थी का सारा भार आ पड़ा है। वह यद्यपि, एक दम से वालिका नहीं है तथापि सदा से पिता माता की दुलारी होने के कारण दुख, कष्ट चिन्ता किसे कहते हैं-इसे वह कभी स्वप्न म भी नहीं जानती थी। अत विचारी इस समय ससार की. अने) भावनाओ-चिन्ताओं से एक दम व्याकुल हो उठी है । उसके सारे सुख हसा सेल कूद कपूर की भॉति हवा में उड चुके हैं। मानों सुख-शान्ति उसके जीवन से असहयोग कर गये हैं । मा वीमार मरन सेज पर पडी हुई-पिता नहीं, भाई नहीं- कोई नजदीक का हितमित्र-आत्मीय स्वजन भी नहीं कि उसकी देख रेख करे-सहायता करे। अव बहुत दिन होगया उसे रमेन्द्र का कोई समाचार नहीं मिला । वे कहाँ हैं-क्या करते हैं इसे भी वह नहीं जानती। सतीश भी अब ओर पहले की भाँति नहीं आते। सौजन्य रक्षा के लिए आना नितान्त प्रयोजन है यह समझ कभी २ एकाध पार आया जाया करते थे । उन्होंने कभी पहले की बीती वातों का उल्लेख हेमांगिनी के सामने नहीं किया। इसी प्रकार बड़े हो कष्ट से हेमागिनी अपने दुख के दिन काट रही थी। ऐसे ही समय एक दिन सतीशचन्द्र उन लोगों के घर आ उपस्थित हुए। वे जब कभी भी आते केवल हेमागिनी की माका हाल चाल लेने,मात्र आते थे । अत. आजाभी वह उसी प्रकार आए हुए थे। हेमागिनी को विलकुल उदास और खिन्न देख वे उसके सामने आकर,चेठ गए । कुछ क्षण तक चुप रह कर वे बोले- "हेम ! मैं समझता है. तुम जिस कठिन अवस्था में पड़ी हुई हो उससे संसार के , अनेकों प्रकार के झंझद और भावनाओं को - -- सहधर्मिणी- अफेल सिर पर वहन करना कितना कठिन काम है, यह तुम अन्छी तरह समझ गई होगी। तुम्हारी ऐसी माता के लाड प्यार में पलो हुई लड़की को एकाएक सासारिक झझटों को सिर पर उठा लेना बिलकुल असभव है।" हेमागिनी ने चौककर मुंह ऊपर को उठाया। उसका हृदय भीतर ही भीतर जार से धड़ २ करने लगा। सतीशचन्द्र वोले- 'तुम अन एक दम से बालिका नहीं हो । मेर कहने का मतलव अच्छी तरह समझ सकती हो। यदि तुम चाहनी या इच्छा करती तो मैं बहुत दिन पहले हो तुम से, व्याह कर सकता। हेम' फिन्तु तुम जानती हो कि मैं उसकी अपेक्षा तुम्हे कितना प्यार करता हूँ। तुम्हें सुखी करने के लिए में कितना व्याकुल हूँ, यह परमेश्वर क सिवाय और कौन जान सकता है।" हेमागिनी रुद कठ से बोली-"किसका अपेक्षा?" मानो एका एक हेमागिनी के कठ को किसी दानव के अलक्ष हाथ ने जोर से धर दवाया । बड़े ही कष्ट से हेनागिनी ने कहा-'आप उनकी बात क्यों उठाते हैं? वे हमारे होते ही कोन हैं, श्राप उनकी चर्चा व्यर्थ करते हैं।" मानों उसका कठ-स्वर धीरे २ धीमा होता गया । "हेम ! यदि ऐसा है तो मेरे प्रस्ताव पर सम्मत हो जाओ। मेरे प्रेम की अवहेलना मत करो। मैं आज ही विवाद को तय्यारी करता हूं। तुम तो जानतो हो हा, तुम्हारे पिता की क्या इच्छा था?" अब हेम इस बात का क्या उत्तर दे? उसने उसी समय अपने हदयाकी ओर दृष्टि डालकर टटोला,देखा-अभी भी वहाँ से ग्मेन्द्र को मूर्ति हटों नहीं है-ज्यों के त्यो उसी प्रकार अफित . . 1 - -- चौथा परिच्छेद । है जैसे कि पहले थी। किन्तु यह उससे विवाह नहीं कर सकेंगे। भला एक गरीय जिसकी जात पात का कुछ भी पता नहीं, ऐसे अज्ञात फुलशील पाले डाक्टर से वह किस प्रकार व्याह करेगी ? सतीश भारी जमीदार और धनी के पुत्र हैं। इस समय वही अपने पिता के अतुल धन-सम्पत्ति क एकमात्र अधिकारी हैं । हेमागिनी भी अपने माता पिता के एक मात्र सुख में पली हुई दुलारी पुत्री है। अत हेमागिनी कांपते कठ से वोली-"अन्छा कल तक इस बारे में सोचने के लिए मुझे समय दें।" सतीश व्यय भाव से वोले-'अच्छी बात है, यहो सही- देखना 'ना, न करना । तुम जानती हो में तुमको कितना प्यार करता हूँ। मैंने सिर्फ तुम्हारे हो लिए अब तक व्याह नही किया है । यदि तुम्ह न पाऊँगा तो सत्य कहता हूँ मैं आजन्म व्याह न करूंगा। और इस समय तुम्हारी मा और तुम सभों की देख रेख करने के लिए एक आदमी की बड़ी ही आवश्यकता है। तुम पढो-लिखी हो-बुद्धिमती हो । और अधिक मैं तुमको क्या कहूँ। बहुत देर तक हेमागिनी,चुपचाप बैठी रही। उसके बाद चौरे २ उठकर अपनी बीमार माके पास जा उपस्थित हुई । माने उसकी ओर केवल एक वार मात्र ताक कर फिर आँख मूद लिया। हेमागिनी माके पास बहुत देर तक वैठी इधर उधर करती रहो । किन्तु जो बात कहना चाहती थी वह कह नहीं सकी। बहुत देर के बाद दिल में हिम्मत बाँधकर बोली-"माँ!" माता ने नेत्र खोलकर कन्या की ओर ताका, किन्तु हेमा- गिनी कोई बात कह नहो सकी। तब मा-धीरे २ बोली- - । - । .
सहधर्मिणी क्या कहती ही वटी । कहो, । . " मा! 1. -- -- . . + "कहो, क्या है बेटी "सतीश बाबू "सतीश वावू क्या? छि. बेटी मेरे आगे तुमको लन केसी कहो बेटो क्या बात है? "वे कहते हैं कि-"इतना ही, कह कर हेमागिनी च हो गई। इस पा माने व्यन होकर कहा-"क्या कहते थे-सम विवाह की बात? तो फिर अन्छी बात तो है। बेटी! तुम क्या कहा "अभी भी मैंने कुछ नहीं कहा है। तुम से विना पूछे कह क्या सकती हूँ "सतीश के ऐसा दामाद पाने को.किसको इच्छा न होगी तुम तो जानती हो हो तुम्हारे पिता की वही इच्छा थी-मे भी इच्छा है "तब भीमा- "तब भी क्या बेटो ऐसे ज्याह में आपत्ति क्या ? - "मैं सतीश बाबू को जैसा चाहिये वेसा ठीक रुप से प्रे कर नहीं सकी हूँ। "ओह ! ये सव लडफपन की बाते हैं। विवाह होने पहले कुवारी कन्यायें इसी प्रकार कहा करती हैं. भला अप अपने पति को स्त्री प्यार ना करेगी तो कौनाकरेगा । स्त्री मा अपने स्वामी को प्रेम करती हैं। ऐसे उत्तम सर्वध में"ना, कहना बेटी । ऐसा स्वामी पाना बहुत दुर्लभ है। और सती के साथ तुम्हारा व्याह हो जाने से हम लोगों को ससार- 17 11 -- पाँचवा परिच्छेद भावनायें सब दूर हो जायेंगो-कोई कष्ट रह नही जायगा।" वही हुआ । दूसरे दिन-सतोशचन्द्र ने हेमागिनी की स्वीकृति प्राप्त करली । वे सचमुच ही हेमागिनी को हृदय से प्यार करते थे। हेमागिनी के मुंह से विवाह को सम्मति पाकर सतीशचन्द्रफा हृदय आनन्द से उथल-पुथल हो उठा, । वे शीन व्याह की तय्यारी करने लग गये। पाठक. इतने दिन के बाद सहस्त्रों घात प्रतिघात सहन कर आज दोनो हृदय एक होने के लिए अग्रसर हुए। : । । F t . ॥ - पांचवॉ परिच्छेद सार में ईश्वर की लीला समझना बड़ा ही कठिन म काम है । भाग्य मनुष्य का जो कुछ न करावे थोडा है । हेमागिनी अपने को किसी तरह भी सुखी नहीं बना सकी। वह अपने हृदय के साथ घरावर प्राणपण से घोर युद्ध करने लगी किन्तु किसी प्रकार भी वहाँ से रमेश की मोहनी मूर्ति को हटा नहीं सकी। जितना ही ब्याह का दिन निकट आने लगा वह उतना ही और भी उदास, असुसी और खिन्न हो पड़ी। अनन्त शक्तिशाली विधना की लीला बड़ी ही अद्भुत और रहस्यमयी है । ब्रह्मा के लेख को देवता भी नहीं जानते मनुष्य की तो बात ही क्या हे वह तो क्वल उसके हाथ का पुतला मात्र है। जिस रमेन्द्र की दो वर्ष से कुछ भी सवर नहीं मिली थी- हेमागिनी के व्याह के कुछ दिन पहले वही एक दिन सहसा आशातीतभाव से आ उपस्थित हुए। G 47 17 - HTT २
१८
है
सहधर्मिणी
कापते हुए हृदय और बडे ही सकोच के साथ हेमागिनी
ने रमेन्द्र से भेट की । इन दो वर्षों में भी चे उसे नहीं भूल सके।
अंत वे नतमस्तक हो चुप-चाप खड़े रहे।
इसके बाद धीरे धीरे रमेन्द्र' बोले- "पास हो कर वर्मा में
एक नोकरी पा वहीं चला गया था। इन दो वर्षों में छुट्टी एक
दिन की भी नहीं मिली।" ।
हेमागिनी बड़े ही कोमल स्वर में बोली-अपनी राजी
खुशा का "समाचार भी नहीं दिया क्यों?"
"मुझे हिम्मत नहीं हुई-आपको पत्र लिखने में मैंने साहस
नहीं किया । कौन जाने आपको शायद कुछ चुरा लगे।"
हेमागिनी ने कोई उत्तर नहीं दिया-यह चुप-चाप धरती
की ओर ताकती रही। उसमें इस समय वात करने की ताकत
नहीं थी। सिर से ले कर पैर तक उसका शरीर-थर थर काँप
रहा था। ललाट में विपाद की सिकुडने दिखाई दे रही थीं।
रमेन्द्र बोले-"अब कुछ दिन कलकत्ता रहूँगा । पया पहले
की भाँति आप लोगों के मकान में रह कर आप लोगों की सेवा
कर सकेंगा? मैं चडा आदमी नहीं हूँ-आप लोग बडे-"
इस बात से हेमांगिनी के बड़े बड़े कमल सरीखे दोनों नेत्र
आसुओं से भर आये। इसफो, देख रमेन्द्र बड़े ही व्याकुल भाव
से वोल उठे-" यह क्या? मेरी बातों से क्या आपको दुख तो
नहीं हुआ ?
हेमागिनी रुद्ध कण्ठ से बोली- नहीं नहीं, यह बात नहीं
है-मैं सुखी नहीं हूँ-".
"सुखी नहीं है ! क्योन्क्यों-आप क्या नहीं जानतीं-मैं
क्या आपको सुखी करने की चेष्टा नहीं कर सकता ? किसी
प्रकार की त्रुटि तो मुझसे नही हो गईआपकी माँ मुझे एक
.
पॉचा परिच्छेद दिन पुरस्कृत करना चाहती थीं । यदि उस समय उनके निकट मैं आपको वाहता तो आप क्या नाराज होती ?", इस पर अत्यन्त व्याकुल होकर जल्दी से हेमागिनी बोल उठी-"नही नहीं, ऐसा काम कभी न करना मेटा व्याहे ठोक हो गया है।" रमेन्द्र हताश होकर एक लम्बी सॉसखीच बोले-"व्याह ठीक हो गया है ?" हेमागिनी बड़े हो दुखित कठ के साथ घोली-"हाँ, किन्तु मे सुखी नही हूँ। आप अब और यहां न आव और न मुझसे हो भेंट करें" "वह कौन है-यौन भाग्यशाली पुरुप है-सतीश बाबू - तो नही है - - S "हॉ~-उन्ही के सग मेरा व्याह ठीक हो गया है।" "हेमागिनी ! हेमागिनी ! क्या तुम्हारे मन को मैंने नहीं जाना? मैं क्या इतना अन्धा हूँ ! और मे तुमको किस प्रकार प्यार करता हूँ--आज दो वर्ष सेवरावर तुम्हारे प्रेम में पागल हो रहा हूँ--इसको भी तुम क्या नही जानती हो? अभी भी समय है। विवाह हुआ नही है . हेमागिनी ने इस बार अपना सिर ऊपर उठाया । कहा- मे इसे अस्वीकार नही करती-म भी तुम्हें प्यार करती हूँ। तौभी तुम्हारे साथ मेरा व्याह हो नहीं सकेगा । अब कभी तुम मुझले भेट करने न आना।' "क्यो क्यो यही कहकर रमेन्द्र ने हेमागिनी के दोनो कोमल हाथ अपने हाथ में लेलिया। हेमागिनी रमेन्द्र के हाथ पर से अपना हाथ खीच लेन की चेष्ठा करने पर भी, न खीच सकी-उसके सारे । - T २० सहधर्मिणी अगों में एक प्रकार की विजली दौड़ गयी । उसके कमल सरीखे दोनों नेत्रों से जल वहने लग गया-वह थरथराती हुई.,रुद्ध कठ से-बोली-"छोड दो-छोड़ दो! मुझे अब भूल जाओ। अव कभी मुझसे न मिलना।" "अच्छा तुम्हारी यदि यही इच्छा है तो हेमागिनी ! अब विदाई दो, जाता हूँ।" रमेन्द्र ने इसके बाद वेहोश की भांति चुपचाप हेमागिनी का एक हाथ खींचकर अपनी बडकती हुई छाती के ऊपर रख कर दवा लिया और उसी समय रुकती सॉस से एक बार ललचाई ऑखो से देखकर वहाँ से चले गये । और भी कोई दूसरा ओदमी इस दृश्य को देख रहा है, यह वात हेमागिनी या रमेन्द्र दोनों में से किसी ने भी नहीं जाना। पाठक वह और कोई । नहीं सतीशचन्द्र हैं। जिनके साथ हेमांगिनी का ब्याह होनेवाला है। सतीश इस बात को जानते नहीं,थे-कभीमनमें इसकी उन्हें चिन्ता भी नहीं थी कि रमेन्द्रामागिनी के पास बैठा हे। उन्होंने अपनी आँखों के सामने जो दृश्य देखा, उससे वे कोध और ईर्ष्या से जलकर स्तम्भित हो वही जडवत् खडे, रह गये। उस समय उनमें आगे चलने की शक्तिही नहीं रह गई थी! उन्होंने उन लोगों की सारी चाते, सुन ली और सारा काम देख लिया। हाय ! जिसके साथ कुछ दिन के बाद ही नका व्याह हागा-वही दूसरे के साथ प्रेमालाप कर रही है । प्रेम की गुल- छर्रा उड़ा रही है। मारे क्रोध और ईर्ष्या से उनका शरीर सिर सेपेर तक जल उठा ! अतविना हेमागिनी से भेंट किये ही वे उल्टो पाँव पागल की भाँति जल्दी वहाँ, से बाहर निकल गये। वे न.मालूम फुव तक रास्ते में, घूमते रहे-इसका उन्हे कुछ पता on .
पाँचवॉ परिच्छेद २१ नहीं । उन्हें स्वय इसका ज्ञान नहीं रहा कि वे कहाँ जा रहे हैं और क्या कर रहे हैं। उद्देश्यहीन की भॉति इधर-उधर घुमफिर चुकने पर जब दिमाग उनका कुछ टिजानेआया तब वे धीरे धीरे मकान को लौट गये। उन्होंने यह बात अपने मन ही में दवा रक्सी, हेमागिनी से इसकी कोई चर्चा नहीं की। हेमागिनी भी जान नहीं सकी कि रमेन्द्र के साथ उसकी मुलाकात का दृश्य सतीश बाबू ने देख लिया है। अत विवाह होने पहले ही दोनों ही ने एक दूसरे से अपने मन की बात छिपा रखी। पाठक इस प्रकार के व्याह का क्या परिणाम होगा-इसे ईश्वर ही जाने । x 1- x x T । सतीशचन्द्र के साथ हेमागिनी का शुभ व्याह हो गया । सतीश स्त्री और सास दोनों को लेकर अपनी जमीदारी काली- पुर चले गये। हेमागिनी की मां को अब और अधिक दिन मरन- सेज पर तडफना नहीं पडा शीघ्र ही उनका अपने स्वामी के साथ अनन्तधाम में पुन मिलाप हो गया। उसके बाद तीन, वर्ष और बीत गया है। इस समय हेमा- गिनी एक पुन और एक कन्या की माँ है। किन्तु दिन पर दिन उसका स्वास्थ्य विगडता जाता है इसके लिए सतीशचन्द्र बडे हो सोच फिकर में पड़ गये हैं। अस्तु, बहुत सोच-विचार के बाद एक दिन उन्होने हेमागिनी के निकट वा पानी बदलने के लिये मधुपुर जाने की इच्छा प्रकट की। इस पर हेमागिनी मी राजी हो गई । अस्तु उसी समय उनकी तैयारी होने लगी।
२२ 'सहधर्मिणी " - छठवाँ परिच्छेद होना कुवार का है। जाड़े की ठण्डी ठण्डी हवा का धीरे धीरे बहना आरम्भ हो गया है । उसी • समय एक दिन सवेरे कलकत्ता से एक रेल- गाड़ी मधुपुर स्टेशन पर आ खडी हुई। मुसा- फिर गाड़ी से उतर पड़े । मुसाफिरों को उतार कर गाडी पुन भकभक करती नुई आँखों से ओर हो गई। जो लोग गाडी पर से उतरे पाठक ! वे लोग हमारे बहुत पुराने जान पहचानी है। वे और कोई नहीं पुत्र कन्या और स्त्री सहित सतीशचन्द्र है। हेमांगिनी इस समय भी पहले की तरह वही कमल-कमनीय, माधुर्य्यमयो, स्थिर यौवना सुन्दरी है। उसका सुन्दरता में अभी कोई कमी नहीं हुई है । तोभी वह इस समय पतिगृह की माल- किन है । स्वयं गृहस्थिन हुई है और उसमें यौवन को वह उ ग का भाव नहीं है। । कौन से मकान में रहेंगे-इसको सतीशचन्द्र जानते नहीं थे। रामपाल वावू नाम के एक जान-पहचानी मित्र मधु- पुर में रहते थे। अस्तु सतीश ने उन्हीं को पत्र लिखाथा। सतीश का पत्र पाकर उन्होंने छ महीने के लिए एक मकान भाड़े पर ठीक कर दिया था। वह मकान कैसा है स्टेशन से कितनी दूर पर है यह सर्व कुछ भी वे नहीं जानते थे। सतीश ने सोचा था, रामपाल बाबू स्टेशन पर मिलेंगे किन्तु देखा वे स्टेशन पर नहीं हैं। एक विल्कुल अजनवी आदमी पालकी और 'वेलगाडी लेकर उनके आसरे बैठा राह ताक रहा है। रामपाल वावू को स्टेशन पर न देस कर सतीशचन्द्र-मनही मन बड़े ही उदास और -- छठयॉ.परिच्छेद २३ विरत हुए | अपनो स्त्री से बोले-"देखता हूँ, यहाँ के लोगो में भद्रत का ज्ञान एक दम से हो नहीं है।"- हेमागिनी स्वामी की बात को भली प्रकार पुष्ट नहीं कर तकोगर्डन जग टेढोकर स्वामी की बात का उद्देश्य लेकर बोली-"हॉ-नहीं भी हो सकता है। शायद मालुम होता है किसी विशेपा काम में फंस जाते के कारण वे नहीं आ सके. हैं । निश्चय हा किसा आदमी को भेजा होगा।" ' , इसी समय एक अजनवी आदमो ने आकर सतीशचन्द्र के मुख को ओर देखा ओर पूछा-"क्या आप ही का नाम सतीश - चावू है" - . सतीशचन्द्र ने उसकी ओर देखकर कहा-"हाँ मेरा ही नाम सतीश यावृ है।" सतीशचन्द्र के चुप होते हो उस आदमी ने पुनः कहा- "रामपाल नावू सवेरे ही किसी विशेष काम से देवघर गए हुए है।मैं आप लोगो के लिए पालकी और बेल गाडी ले आया हूं।" सतीशचन्द्र इतमीनान की सास लेकर बोले-"अच्छा तो चलो कितनी दूर जाना होगा ?" "अधिक दूर नहीं--पानिया खोला तक ।” पानिया. सोला ! वह ओर कहाँ है ! सतीश अच्छी तरह समझ नहीं सके।अत नोकरा को माल असगाव गाडी में रखने को कह सो फन्या को पालकी में सवार कराया और दान को पालकी के साथ २ जाने की ताकीद फर आप पेदल हो राखाल गानू के आदमी के साथ पानिया सोला की ओर चल पड़े। नये देश, नये मकान में जाकर सारा बदोबस्त ठीक करने में सतीश को प्रायः सारा दिन चीत गया। तीसरे पहर को नये स्थान को देसने के लिए घर से थाहर हो गये। 3 - २४ सहधर्मिणी के जिस मकान में उतरे हुए थे यह बड़ा ही सुन्दर कवि कल्पना योग्य है । सामने अजया नदी भिरभिर करती बह रही है। दोनो बगल नये पल्लवों से मडित सरल तरुलताओं की शाखा प्रशाखाओं में बैठ पक्षीगण अपने मधुर गान से चारो दिशाओं को मुखरित करा रहे थे। मकान के सामनेवाले भाग में कितनी मील तक खाली जमीन दूर तक चली गयो है यह कहना कठिन है। दूर-दूर-बहुत दूर भूभाग के परे विस्तीर्ण नज़र पहुँचती है वहाँ तक वृक्षश्रेणियों की गाढी हरियाली खासा किलावदी दीवारो की तरह दीख पडती है। फिर वीच वीच में एक एक नीले गगनभेदी पहाड सिर ऊँचा किये खड़े है। मेघ और पहाड दोनो मिलकर मानो एक हो गये हैं। आस- मान में वादलों के टुकडे नीले रंग में इधर-उधर दौड कर चन्द्र देव को अपनी ओट में छिपा लेने का प्रयल प्रयत्न कर रहे हैं। इस मकान के नजदीक और भी दो-तीन मकानों के अतिरिक्त और कोई भी मकान नहीं है। और वह मकान भी सव खाली पड़े हैं। केवल एक एक माली मान उनमें रहते हैं। पता लगाने पर मालूम हुआ कि वहाँ और लोग प्राय सब ही स्टेशन और थाने के निकट या रेलवे लाइन के उस पार वास करते हैं। सतीश वावु-बड़े हो एकान्त स्थान। में आ पड़े थे। हवा पानी बदलने के लिए सचमुच ही स्थान विशेष उपयोगी है। उन्होंने इधर-उधर घूमकर दो-एका आदमियो से पूछ राखाल बाबू के मकान का पता लगा लिया । राखाल बाबू अभी अभी देवघर से लौटे आ रहे थे। उन्होंने सतीशचन्द्र को बड़े ही आदर के साथ वेठाया और कहा-"क्या कर विशेष काम के आ पड़ने से देवघराजाने को वाध्य हो गया था। अभी अभी वहाँ से वापस आ रहा हूँ। इसी कारण स्टेशन पर उपस्थित 4
-
छठवॉ परिच्छेद
२५
न हो सका ।' क्षमा कीजियेगा। अच्छा मधुपुर आपको केसा
दीख रहा है ? स्थान आपको पसंद है न?"
सतीशचन्द्र वाले-"हाँ स्थान एक दम से खराब नहीं
है-तव भी लोग यहाँ बहुत कम हैं।"
"हाँ ठीक है किन्तु अभी भी हवा-पानी बदलने के लिए
बहुत से लोग आ नहीं चुके हैं। थोड़े ही दिन के बाद आप
धीरे धीरे देखेंगे कि कितने ही लोग झुण्ड के झुण्ड वायु परि-
वर्तन के लिए यहाँ आकर जुट जायेंगे।
'जच्छा यह वताइये-यहां कोई 'अच्छे डाक्टर भी हैं ?"
"हाँ, डाक्टर का अभाव न रहेगा। रेलवे के डाक्टर---"
सतीशचन्द्र राखाल वावू को वीच ही में रोककर बोले-
"चे सब समय तो मिलेंगे नहीं"
"हॉ कभी कभी उन्हें लाइन में जाना पड़ता है अवश्य ।
तोभी एक बड़े ही अन्छे डाक्टर यहाँ प्रैक्टिस करते हैं उमर
अधिक नहीं है-"
सतीशचन्द्र ओंठ विचकाकर बोले-"कम उमरवाले डास्टर!
वे क्या अभी भी यहाँ डाक्टरी सीख रहे हैं? मैंने आपको
पहले ही लिख दिया था कि मेरी स्त्री का शरीर अच्छा नहीं
है। उस पर छोटे छोटे बच्चे लडके लडकी भी साथ में हैं।
ऐसी अवस्था में जहां किसी अच्छे डाक्टरों का अभाव हो
चहाँ हम लोगों का रहना किसी प्रकार भी हो नहीं सकता।
आपने तो लिखा था कि यहाँ खूर अच्छे डास्टर हैं'
"हाँ हम लोग उन्ह म्यूध ही अच्छा डाक्टर समझते हैं।
अभी उनको यहाँ आये फेवल दो ही वर्ष हुए हैं-वतने ही
समय में लोग उनकी बडी प्रशसा करते हैं। सब उनको
पुकारते हैं रमेन्द्र वाय-"
सहधर्मिणी । "रमेन्द्र वावू !" सतीशचन्द्र ने बड़े ही विस्मय विस्फारित नेत्रों से राखाल चाबू की ओर देखा फिर जल्दी से पूछ बैठे-"क्या नाम कहा आपने" - "रमेन्द्र बाबू "क्या-क्या-", राखाल वा ने सतीशवाको स्वर-भगी,से विस्मित हो उनके मुह की ओर तामा । सोचा, क्या सतीश आजकल कान से कम तो नहीं सुनते हैं ? अत जरा ऊँचे स्वर से वोले- "रमेन्द्रनाथ चोप, आप क्या उन्हें पहचानते हैं ?" सतीशचन्द्र न मालूम क्या कहूने जा रहे थे किन्तु फिर अपने को सम्भाल कर मृदुखर में चोले- हाँ याद तो, ऐसी ही पढ़ती है कि मैंने उनको कही देखा है। वे यहा से कितनी दूर पर रहते हैं ? 'यही पास हो मे रहते हैं-अधिक दूर नहीं है प्रयोजन पडने पर वे घर में हर समय मिल सकेंगे।" इसके बाद मधुपुर के सम्बन्ध में और भी नाना प्रकार की बात दोनों में होती रहो उसके बाद सतीशचन्द्र, विदा होकर अपने घर चले गये। मातवॉ परिच्छेद ये स्थान में आकर सभी व्यस्त हो पड़ गये। : सतीशचन्द्र की दास दासियाँ भी व्यस्त हो गई थी । लड़के की, दाई भी लड़के को . - भूल गई थी। -- फिन्तु लडको की दाई के लिए वहा उपाय नहीं था। कारण वन्चो में अभी भी स्वाधीन भाव से चलने- -
साता परिच्छेद
२७
फिरने की क्षमता नही थो इसो से वह सदा सर्वदा दाई की
गोद में ही रहने के लिए बाध्य होती । बच्चे को वहाँ न देखकर
बच्ची की दाई ने बच्चे की दाई से पूछा-"छोटे वावू कहाँहैं ?"
छोटे बच्चे के पॉच हो गये थे । और वह परों के वल धौरे
धीरे चलना फिरना भी सीख गया था । बच्ची की दाई की यह
बात सुन वच्च की दाई ने भयभीत हाकर चारों ओर नजर
घुमाकर देखा । देखा वया इधर-उधर कहीं नहीं दिखाई देता।
अत. वह घघडाकर उसकी खोज में बाहर की ओर दौड पडी।
वाहर आते ही दाई एक दम चीसकर चिल्ला उठी। उसका
चीखना सुन घर के सब लोग वाहर दोड़कर चले आये।
देखा-बरामदे की रेलिंग के ऊपर से बच्चा नीचे पत्थर के मेज
के ऊपर गिर कर बेहोश पडा है। और सिर फटकर माथे पर से
सून की धारा बह रही है।
हेमागिनी भी दोडी हुई आ गई थी। उसने जल्दी से बालक
को उठाकर गोद में ले लिया। उसके बाद अस्फुट स्वर में
बोली-बावू ! वावू कहाँ है-जल्दी बुलाओ।"
नौकर ने कहा-"वे वाहर घूमने गये हैं। किस तरफ गये
हे--कह नहीं सकता।"
"तव जा, शीघ्र एक डाक्टर को बुला ला.
उसी समय नौकर डास्टर को बुलाने दौडा । हेमागिनी
पागल की भॉति बहोश बालक को गोद में उठा-घर के भीतर
चली आई।
कुछ ही देर बाद डाक्टर आ उपस्थित हुए। वे हाफ रहे थे
जिससे मालूम होता था कि वे निश्चय ही एक सास में वार्ड
आये थे। उनके आ पहुँचने के पहले हो बालक होश में ना गया
था। उन्होंने झट बड़े ही यत से चालक का लिर धोकर उसमें
।
सहधर्मिणी + - पट्टी बाँध दी। इसके बाद बोले-"बच्चे को उठने न दीजियेगा। मैं अभी घर से एक दवा भेज देता है। कोई डर को यात नहीं है। मामूली चोट लगी है।" पाठक ! ये डाक्टर रमेन्द्रनाथ है। नौकर के मुंह से खबर पाते ही वे दौड़े आये थे। अब तक रमेन्द्र वा हेमागिनी दोनों में से किसी को भी एक दूसरे को देखने का समय या अवसर नहीं मिला था । विशेषत' हेमागिनी इस समय रमेन्द्र को विल्कुल ही भूल गई थी। आज तक उनकी याद भी उसके मनमें नहीं जायी थी। रमेन्द्र ने भी जो भाव दिखाया उससे इसके पहले कभी वे हेमागिनी को प्यार करते थे-इस प्रकार का चिह्न मान भी उनके भाव से प्रकट नहीं हुआ। रमेन्द्रवायू उठकर खड़े हो , गये। वे कोमल स्वर में बोले-“बहुत दिन के बाद आपसे भेंट हुई ?', हेम ने सिर नीचे किये ही उत्तर दिया-"मने आपको देखते ही पहचान लिया था। मैने रासालवा के मुंह से सुन लिया था कि आप लोग मधुपुर आ रहे हैं।" "वन्चे को अधिक चोट तो नही आई है न?" "नहीं कुछ नही । मामूली है । में मन में समझे हुए था कि चोट भारी लगी है । लड़कों को प्राय ऐसा ही हुआ करता है। यह आपका क्या सबसे बडा लडका है?". "हॉ, एक ओर लडकी है।" "अन्छा में अभी एक ओपधि भेज देता हूँ। उसमें का एक खुराक अभी पिला दीजिएगा। सतीशयावू को मेरा नमस्कार कह दीजियेगा।" इतना कह रमेन्द्रनाथ चले गये । उन्होंने कुछ दूर रास्ते पर जाकर पोछ। पलटकर देखा, हेमागिनी जगले पर.खडी है। इसके - 4 - -- , सातवॉ परिच्छेद बाद फिर पीछे फिर कर उन्होने नहीं देखा। वे धीरे धीरे आगे बढ रहे थे। हेमागिनी को जगले पर खडी देख वे जल्दी जल्दी पॉव बढाकर चले गये। मालूम होता है हेमागिनी ने भी उन्ह नहीं देखा। सच-मुच ही उन दोनों के मन से पहले की बात एक प्रकार से विल्कुल ही दूर हो गई थी। किन्तु एक मनुष्य ने उस बात को नहीं समझा। सतीश- चन्द्र मकान लौटे आ रहे थे। उन्होंने दूर ही से अपनी स्त्री को जगले पर खडी और रास्ते में रमेन्द्र को देखा। वे राखाल- बाबू के मुंह से रमेन्द्र का नाम सुन मन ही मन उनकी ही बातों की आलोचना करते हुए चले आ रहे थे। और वही रमेन्द्र उनकी स्त्री को मधुपुर आते न आते उनके ही मकान में उनकी अनुपस्थिति में चुपचाप छिपे छिपे उनकी स्त्री से सेट करने आया था। वह चला जा रहा है और उनकी स्त्री जगले में खडी होकर उसे देख रही है । सतीश मारे कोय के सिर से पैर तक जल उठे। रमेन्द्रबाबू उन्ह देख नहीं पाये ।। दूसरी तरफ जरूरी काम होने के कारण रास्ते में जल्दी जल्दी चलकर आँखों की ओट हो गये। सतीशचन्द्र मन ही मन-चोले-"मुझे देख, कर भाग गया। उसे मुझसे भेट करने को साहस नही नुआ, कैसे साहस होगा? अनायास ही मेरी स्त्री से चुपचाप भेट कर चला गया ओह । एक दिन की भी देर उससे सहा नहीं गया।" - इसी समय यदि कोई सतीशचन्द्र को कहता , कि सचमुच ही रमेन्द्र ने उन्हें नहीं देखा, अन्यन जरूरी काम होने के कारण जल्दी जल्दी, चले गये है तो उन्ह उस बात पर, कभी विश्वास न होता। मकान के भीतर प्रवेश करने पर भी. सतीशचन्द्र का मन . 34 ३० सहधर्मिणी नहीं बदला। उन्होने अपने स्त्री को घबडाई हुई व्याकुल और उत्कठित देखा । यधार्थ में पूछिए तो उसकी वह अवस्था अपने पुत्र के लिए हुई थी। किन्तु सतीश ने सोचा-रमेन्द्र से मंद करने के कारण ही उसका यह भाम दुआ है स्वामी को देखते हैं मात्र हेमागिनी बोल उठी-"आ गये! मैं वडी भारी विपद में पर गई थी । एक बडी भारी दुर्घटना हो गई है।" सतीशचन्द्र क्रोध के स्वर में बोले-खूब दुर्घटना हुई है जो.घटना हुई उसे में अच्छी तरह जानता हूँ-तुम्हें कहने के ज़रूरत नहीं है।" असावधानता के कारण वन्चे का चोट लगी है। इससे स्वामी गुस्से में हो गये हैं, यह सोच हेमांगिनीयोली--"विशेर भारी चोट नहीं लगी है डर की कोई बात नहीं है-रमेन्द्र' बाब ने यही बात कही हैं। वे यहां के एक नामी डाक्टर हैं अवश्य ही तुमने उन्हें यहाँ से बाहर जाते देखा होगा। क्रोध को दवाने की चेष्टा करने में सतीशचन्द्र का कठ मानों और भी बद हो गया। कुछ देर के बाद वे बोले-हॉ, हा, मैंने उसे देखा है। यहाँ वे किस लिए आथे थे" r डरती हुई हेमांगिनी बोली- मैंने उन्हे वुलाभेजाया।मैं-" जिस प्रकार बारूद में भाग के लगने से बारूद भड़क उठती है, उसी प्रकार क्रोध से जल भुनकर सतीशचन्द्र ने कहा- "तुमने चुला भेजा था ? क्यों किस लिए किस साहस से तुमने उन्हें यहाँ बुलाया था ? मेरे घर से बाहर जाते न जाते तुमने उनको घर में बुला भेजा। मालूम होता है पहले ही से तुम लोगों में भेट मुलाकात होती रही है वैसे ही आज भी हेमागिनी बड़े ही विस्मित स्वर से चोली-~"तुम यह सब
आठयाँ परिच्छेद
३.
न मालूम क्या कह रहे हो, मेरी समझ में कुछ भी आ नहीं
*
सतीशचद्र ताने के स्वर में बोले-"हां तो अब समझ कैसे
सकोगीअरे वही तुम्हारे पहले के पुराने प्रेमी रमेन्द्र की बात
कह रहा हूँ। क्या अब भी नहीं आ रही है मेरी यात। थोड़ी देर
के लिए मेरे आँखों की ओट होते ही तुमने अट अपने प्रेमी को
वुला भेजा। बड़ी अच्छी बात है। किसने तुमको इतना जल्दी
खवर पहुँचाई कि वह यहाँ रहते है । इतनी जल्दी तुम्हें वह
वात मालूम केसे हुई । नहीं नहीं तुम वरावर जानती थी कि
वह यहाँ रहते हैं, मुझसे तुमने नहीं कहा, छिपा रखा!"
हेमागिनी ने स्वामी के मुंह की ओर विस्मय विस्फारित
नेत्रों से ताका और रुद्ध कट से बोली-“यह तुम आज कैसी
बात कह रहे हो, तुम्हारा दिमाग तो खराव नहीं हो गया है ?"
अाठवाँ परिच्छेद
पंछ समय तक स्वामी ओर स्त्री दोनों ही एक
दम चुपचाप रहे । किसी के मुंह में कोई बात
नहीं। नेत्र पलक शून्य है-देह में मानो प्राण
नहीं-मानों दो मूर्ति रखी हुई हैं।
हेमागिनी निर्निमेप नेत्रों से टकटकी यांधे
धीरे धीरे वार चार स्वामी के सिर से पैर तक घूर घूर ताकने
लगी। सतीशचद्र स्थिर दृष्टि से हेमागिनी के मुंह की ओर एकटक
ताकते रहे। बहुत देर तक किसी के भी मुंह से कोई बात नहीं
निकली । अन्त में उस मौनता को भग करते हुए सतीशचंद्र ने
बात का सिलसिला उठाया। उनके नेत्रों से प्रचण्ड अग्निवाला
३२ सहधर्मिणी,, निकल रही थी और वदन में तीन हलाहल भरा था। वे बोले- देखो, तुम्हें स्पष्ट कहे देता हूँ-अर कभी यदि रमेन्द्र से छिपे छिप तुम भेट करोगी तो याद रखना फिर किसी तरह भी तुम्हारी रक्षा नही होगी-मैं तुम्हे कभा क्षमा न करूंगा। इस बात को विगुल निश्चित समन लेना।" हेमागिनी ने सिर ऊपर उठाया-उसका नारी सुलभ अभि- मान जागकर देदिप्यमान हो उठा। अमृत भरे नेत्रों से विश्व दाही आग की चिनगारियाँ फट फूटकर निकलने लगीं। अप- मान के पैरों से कुचला हुआ क्षोभ ओर क्रोध से पीपल के पत्ते भॉति उसका सर्वाह थर २ कॉपने लगा। अपमान, से छेडी हुई क्रुद्धसिंहिनी उच्च स्वर में बोली-"छिपी मुलाकात ।-छिपी मुलाकात क्या? बन्चा पत्थर पर गिरकर बेहोश हो गया। इस लिए मैंने नौकर को शीघ्र डाक्टर बुला लाने के लिए कहा, वह रमेन्द्र बाबू को जाकर बुला लाया । मैं यह नहीं जानती थी कि वे यहाँ डाक्टरी करते हैं। वे यहाँ आये और बच्चे के सिर में मलहम पट्टी लगा औषधि दे चले गये। वे यहाँ मुझसे मिलने नहीं वरन् तुम्हारे लड़के को देखने आये थे। तुम छिपे छिपे मिलना किसको कहते हो ? - इतनी बात गुस्से में कह अभिमान से भरी मानिनी-चचल दामिनी की भॉति पेर पटकती हुई उस कमरे से उठकर चली गई । पाठक, यही रमणियों की विशेषता है । कोमलता और कठोरता का विचित्र मनोहर समावेश हे जो कुसुम कोमला- गिनी फूल-के स्पर्श से ही मूञ्छित हो पड़ती है वही फिर उसी क्षण बन के समान कटोर वन,अग्नि की वर्षा करने लग जाती है।अपमानिता भामिनी छेडी हुई उत्तेजिता सिंहिनी है-मजाल क्या कि उसके सामने, पाप ताप आसके। - - Y आठयाँ परिच्छेद ३३ सतीशचन्द्र कुछ देर तक स्तम्भिन हो खड़े रहे । उसके बाद जिस कमरे में उनका पुत्र सोया हुआ था उस कमरे में उन्होंने धीरे धोरे प्रवेश किया। जो घटना वहाँ हुई थी सब एक एक करके दाई के मुंह से उन्होंने सुना। किन्तु इससे भी उनके मन की शान्ति नहीं हुई। ईयां और क्रोध ने उनके हृदय में घुसी हुई नरकाग्नि को उत्तेजित कर भडका दिया था। बहुत दिन मे जो ईर्ष्या की आग तुपार मार्जित अग्नि की भॉति धीरे धोरे धूधू कर उनके हृदय में जल रही थी आज वह'' मानो घो को आहुति पा जोर से धधक कर जल उठी। वे विवाह करके सुखी छोड असुखी नही हुए। हेमांगिनी के हृदय का भाव पहले जैसा भीक्यों न रहा हो उसे उसने कभी उनके आगे प्रकट नहीं किया । उसने हर प्रकार से उनको सुखी किया था। किन्तु ईर्ष्या ऐसीभयफरी काल सापिणि होती है कि वह एक बार हृदय में स्थान पाने से फिर सहज ही वहाँ से जाने का किसी प्रकार भी नाम नहीं लेती । आज बहुत दिन के बाद रमेन्द्र को अपनी पत्नी के पास देख मौका पाकर वही भीषण काल सर्पिगी मस्तक उठा उसने को खडी हो गई। स्वामी और स्त्री में उस दिन फिर और एक भी बात नहीं हुई । सतीशचन्द्र बाहर ही बैठक में रहे। अभिमानिनी हेमागिनी भी उनके निकट नहीं आई। दूसरे दिन सवेरे रमेन्द्रनाथ आये। उन्होंने सरल चित्त से सतीशचन्द्र से हाथ मिलाने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया। सतीशचन्द्र ने उनको देखकर भी नहीं देखा' केवल हाथ से से उन्हें बैठने का इशारा किया किन्तु 'रमेन्द्र बैठे नहीं। बोले-"नहीं काम बहुत ज़रूरी है। एक रोगो को अभी देखने जाना होगा । आपका पुत्र कैसा है?" ३ + सहधर्मिणी, उसी समय रमेन्द्र का कंठस्वर ,सुन हेमागिनी, यहाँ आ पहुँची। वह आकर बोली-"इस समय तो अच्छा मालूम होता है । सो रहना नहीं चाहता।" सतीशचन्द्र रुष्ट भाव से बोले- ऐसे लापरवाह आदमियों को मैंने और कहीं भी नहीं देखा । मैंने कह दिया है कि सर दाई नोकरों को हटा दिया जाय ।। भला ऐसी असावधानी किन काम की। कही कुदाम में लगता तो लड़के की,जान ही निकल जाती।" रमेन्द्रबाबू ने कहा-"हॉ ऐसा भी होना कोई असम्भव नहीं था । अच्छा बच्चे को दिखलाओ तो। हेमागिनी ने कहा-"इसी पास ही के मकान में सोया हुआ है । चले जाइये । मैं आती हूँ।' रमेन्द्रनाथ भीतर चले गये । हेमागिनी ने स्वामी से कहा- "आओ, तुम जावोगे नही ?"., हेमागिनी भीतर चली , गयी। कुछ देर के बाद वह और डाक्टरवायू बाहर निकल आये। रमेन्द्रनाथ ने कहा-"इस समय घशा अच्छा है। तो भी अभी उसे उठने देना किसी प्रकार भी उचित नहीं है। थोड़ा ज्वर चढ आया है। आजही ज्वर के उतर जाने की सम्भावना है। इस विषय में जरा विशेष साव- धान रहियेगा।" सतीशचन्द्र ने पूछा--"और कोई डरकी बात नहीं है न" "नही कुछ भी नहीं। तब भी उठने से ज्वर बढ जाने की सम्भावना है। अत: किसी प्रकार और एक दिन उठने, न दोजियेगा। फल सबेरे और एक बार आकर देस जाऊँगा । कोई चिन्ता की बात नही है। रमेन्द्रनाथ चले गये। उनके सरल सहज और-निष्कपट - . है -
आठवॉ परिच्छेद
भाव को देख सतीश विस्मित और ककर्तव्य विमूढ हो गये ।
अत. वे बहुत देर तक चुप लगाये बैठे रहे।
बालक के उठने से ज्वर चढ आने की सम्भावना है। इसलिये
जिसमें वह उठने न पावे इस विषय में दास दासियो को
हेमागिनी ने विशेष सावधान कर दिया था। किन्तु इतने ही में
सत्य सत्य हो बालक उठ बैठा। क्यों न उठता-दास दासियाँ
सदा से ही बेफिक और असावधान होती हैं । बच्चा सो गया
है ऐसा समझ वे लोग आपस में यतकही करने को थोड़ा बाहर
चले गये थे। उसो अवसर पर बच्चा बाहर घाम में जा खड़ा
हो गया।
कुछ देर के बाद ही , उसके रोने की आवाज से मकान
प्रतिध्वनित हो उठा । वन्चा दोनों हाथों से सिर दावकर चिल्ला
रहा था-"माथ फूटा! माया गया ! बाया दादा"
दासो कापते हृदय से दौड़ी हुई जाकर बच्चे को भीतर ले
आण। और चुप कराकर विस्तरे पर सुला दिया लेकिन पर
चन्द नही हुआ। विचारा बच्चा घर में बेहोश हो पड़ गया।
अब बाध्य होकर इस बार स्वय सतीशचन्द्र ने रमेन्द्रनाथ को
खुलासेजा।
रमेन्द्रनाथ आकर रोगी को देखते हा भ्रुकुटी चढ़ा कर
पोले-बच्चे को उठने दिया था न
जो कुछ घटना हो गया थी सतीशचन्द्र ने सब उन्हें कह
। सुनाया । सुनकर रमेन्द्रवायोले-"ओह ! बडा अन्याय
हुआ।सेर जो हो भय नहीं है। केवल थोड़ा ज्वर मात्र बढ़
1 गया है । तब भी खूप सावधानी के साथ रखना आवश्यक है।
किसी आदमी को साथ कर दीजिए । दधा अभी भेज देता है।
।
।
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६
सहधर्मिणी
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नवा परिच्छेद
वार का महीना है-न अधिक गर्मी है न जाडा।
दिन के समय आकाश में सफेद-सफेद बादलों
के टुकड़े इधर-उधर चलते-फिरते दीस पडते
हैं आकाश बादलो से घिरा रहता है। यही
कारण है कि धूप की गर्मी का कष्ट अधिक
भोगना नहीं पड़ता। रात को आकाश एक बारगी ही. मेघों
खे खाली होकर साफ हो जाता है ओर कोटि कोटि नक्षत्रों से
उज्वल हो उठता है।
} मधुपुर की प्राकृतिक शोभा बड़ी हो मनोरमा है। मानो
प्रकृति देवी परम शोभामयी होकर इस छोटे से गॉव को शोभा
की खान बना रही है नीले आकाशा के वौचसे जिस समय सफेद
बगुला कभी कभी पर फट-फटाते उड़ जाता वह दृश्य देखने में
चड़ाही चमत्कारिक मालूम होता । कभी कमी दल चांधकर
वगुलों की कतारामंडलाकार सुफेद पुष्पमाला की तरह नीले
आकाश में से उड कर जाते जाते दूर दूरान्तर की दृष्टिासीमा
की आड़ में जब तक मिलकर एक नहीं हो जाते तब तक अवा
हो एक टक उधर ही ताकते रह जाना पड़ता है। शरदऋतु का
आगमन हो चुका है। इस समय वर्पा एक दम समस्त स्थान
पर समाप्त नहीं चुकी है। कहीं-कहीं खुले हुए विशाल स्थानों
पर कुछ कुछ वृष्टि हो रही है । यह बात यहाँ से समझ.
आ जाती है । उसासमय उस ओर की शैल. सुषमा और वृक्षा:
दिकों का प्राकृतिक दृश्य मानो उदासा और फोका हो गया है।
मालमा होता है कि प्ररुति'देवो पर्दे की आड़ में चिक के
भीतर बैठ इधर का यह अभिनय दृश्य देख रही हैं। पाठक
-
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1
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नवॉ परिच्छेद
रङ्गप्रिया प्रगति देवी की लीला यही हसना-यही रोना, यही
गर्मी और यही वर्षा है।
यहां का प्रात काल बड़ाही मनोहर-है। पूर्वाकाश में जहा
आकाश पृथ्वी की ओर झुक पडा है वहाँ से ऊपा की काचन
घटा में से जिस समय सूर्यदेव धीरे धीरे उदय होने लगते हैं और
नवीन वाल रवि की कनकाफिरणधारा जिस समय गगा।।
वालुकामया पुलिन में स्वर्ण शय्या की भाँति चारो तरफ
फैल पड़तो उस समय की शोभा' कैसी अर्व है, देखते ही
बनता है।
सतीशचन्द्र के मधुपुर में आये आठ-दश दिन बीत गये
हैं । इस समय बचा बहुत कुछ अच्छा है तब भी ज्वर ने अभी
मम्पूर्ण रूप से छोडा नही है । और कोई अच्छाडाक्टर न होने
से सतीशचन्द्र रमेन्द्रनाथ को ही चार बार बुलाने के लिए बाध्य
हुए। बिल्कुल इच्छा न होने पर भी वे.रमेन्द्रनाथ का घर में
आना चन्द नहीं कर सके। प्रति दिन ही' रमेन्द्रनाथ दो-तीन
चार जा बच्चे को देस जाने लगे।
इन थोड़े दिनों में ही मधुपुर के बहुत से लोगो से उनकी
जान पहचान हो गई है। अत नित्य ही वे लोग सतीशचन्द्र से
बात-चीत करने और उनका हाल-चाल पूछने आया करते थे।
इन में से प्रफुल्ल बानू और नकी स्त्री के साथ उन लोगो फ्री
विशेष घनिष्ठता होगई थी। प्रफुल्ल या मोर उनकी पत्नी प्राय
रोजही उनके घर आया करते। बच्चे का शरीर आज बहुत कुछ
अच्छा है यह देस सतीशचन्द्र और हेमागिनी दासदासियों को
यच्चे को सावधानी से रखने के लिये कह दोनों प्रफुल्ल याबू के
मकान पर घूमने चले गये ।
tF प्रफुल्ल कुमार ने बड़े ही आदर से सतीशचन्द्र को वैठाया।
. सहधर्मिणी उनकी स्त्री हेमांगिनी को भी बडे यत और खातिरदारी से भीतर ले गयी। इधर-उधर की बातें करने के बाट प्रफुल्ल कुमार योले-'चलिये सतीशवा नर्सरी देख आवे।" सतीश मृदु हँसी हॅसफर बोले-"अच्छा तो चलिये न ।' दोनों ही नर्सरी देखने के लिए बाहर चले गये । सतीशचन्द्र और प्रफुल्ल कुमार के बाहर जाने के कुछ देर के बाद ही वहाँ डाक्टर रमेन्द्रनाथ आ उपस्थित हुए। प्रफुल्ल कुमार कहाँ गये हैं-यही बात वह नौकर से पूछ रहे थे । ठीक उसी समय सतीशचन्द्र का एक नौकर हंसते- "सते वहा अ. उपस्थि चोला-"आइये शीघ्र चलिये। देर न कीजिए।" अपने नोकर का कठ स्वर सुन भीतर से हेमांगिनी जल्दी के साथ वाहर चली आई और व्यग्रता के साथ वोली- इस प्रकार हाफते हाफ़ते दौडा हुआ आया क्यों? : मालूम होता है निश्चय ही बच्चे का दुखः वद गया है।" , . नौकर बोला-बच्चा बाबू की तबीयत न मालूम कैसी तो हो रही है। इसी से दाई ने मुझे डाक्टर बाबू के घर भेजा था। वहॉ डाक्टर बापू का नौकर बोला-"यह अभी प्रफुल्ल- बाबू के धर गये हैं। इसी कारण यहाँ दौड़ा चला हूँ.। , आह ! माता की ममता विचित्र होती है। सतीशचंद्र किस और घूमने गये हैं । यह किसी को मालूम नहीं था। बस अब और एक पल की देरी भी हेमागिनी नहीं सह सकी--उसी समय झट रमेन्द्रनाथ के साथ घर की ओर दौड़ पड़ी। उस समय मध्या हो गयी थी। निर्मल नभमडल-में विश्व- विमोहन शरद चन्द्रदेव उदय हो गये हैं प्रकृति की लाल लाल उज्वल चाँदनी सर्वत्र फैली हुई है सुख, माधुर्य और सौन्दर्य के एक साथ मनोहर मिरन में मानों विश्वसम्राज्ञी सर्वत्र प्रेम " T . .
. नवॉ परिच्छेद को विजयत्रोषमा कर रही है। ऐसे हो समय हेमागिनी ओर रमेन्द्रनाथ एक साथ सग सग जल्दी जल्दी पानियाँखोला की ओर जा रहे थे। नौकर उतना फुर्तीला नही है लाचार वह उन लोगों के बहुत पीछे पिछड़ गया था । इस गाँव के बीच राह में प्रफुल्ल कुमार और सतीशचद्र खड़े थे। उन लोगों ने हेमागिनी और रमेन्द्र को साथ साथ जाते देखा । प्रफुल्ल कुमार बोले-"मालूम होता है हम लोगों के आफ्टर ही तो हैं ? हाँ निश्चय वे ऐसे ही नाटे है । साथ में कोई स्त्री भी है । वाह खून !- सतीशचंद्र हसे । वे दूर से अपनी स्त्री को पहचान नहीं सके। इसके बाद वे लोग दोनों ही प्रफुल्ल कुमार के घर की तरफ लोट पड़े। उस समय ओर भी दो एक भले आदमी रास्ते में साथ साथ चले आ रहे थे। उन लोगों को देख प्रफुल्ल कुमार हँसते हँसते बोले-"देखिए हम लोगों के डाक्टर बानु चुपचाप डुम्बी लगाकर पानी पीते हैं । यहाँ न आकर चुपचाप एक सुन्दरी को साथ लेकर घूम रहे हैं। क्या खूप ' कैसी टट्टी की ओट में शिकार खेल रहे हैं।" उनमें से एक मनुष्य ने हँस कर कहा-"सतीश बाबू की खो तो है।" यह बात उन्होंने कोई बुरे सयाल से नहीं कहा। उन्होंने आते ही सुन लिया था कि लडक' को तबीयत खराब होने की बात सुन. हमागिनी डाक्टर के साथ मकान चली गई है। किन्तु सतीश के हृदय में यह बात मानो विष से वुझी हुई तीर की तरह चुभ गई। प्रफुल्ल कुमार ने पूछा-"वे डाक्टर के साथ चलो क्यों न . . गयो " • सहधर्मिणी । .. जो कुछ घटना घटी थी एक दूसरे मनुष्य ने सब कह सुनाया। किन्तु सतीशचन्द्र ने कोई बात नही कही। वे चुप चाप टकटकी लगाये पलक शून्य दृष्टि से गस्ते की ओर ताक रहे थे। दिगदिगन्त तक फैला हुआ. पृथ्वी का प्रान्त उज्वल चन्द्र किरण से ओत-प्रोत हो रहा था। ऊपर मेघशून्य साफ आकाश में न मालूम कितने ही तारागण हीरे के टुकड़ों की तरह चमक रहे थे। उनके बीच में चन्द्रदेव आज ऐसे' भाव से जगत् में अपनी उज्वल चांदनी फैला रहे हैं कि मानो आज अपना सर्वस्व खर्च कर अपने आपको भी स्वाहा कर डालने को तय्यार हैं। वाह्य प्राति बडी ही शोभामयी ओर आनन्द विह्वला है। वाह्य जगतः की ऐमी विमल शोमा और प्रकाश सचमुच ही सतीशचन्द्र के हृदय पद के साथ अमावस्या की गादी कालिमा से लिप्त हो उठा था। वे घेठे हुए थे । सहसा चकित होकर खडे हो गये और बोले-"मैं चलता हूँ-देखू घर में क्या हो गया है।" 12- उनके चले जाने पर एक आदमी ने कहा-सतीश बाबू अपने लड़के को बड़ा ही प्रेम करते हैं। इसी से उसकी बीमारी की बात सुनते ही कैसे धवडा गये-देखा.?" फिन्तु यथार्थ में लड़के के लिए सतीशचन्द्र का वह भाव नही हुआ था । प्रचण्ड ईयारूपी अग्नि उनके समस्त हृदय में व्याप्त होकराअपने अमोघ प्रभाव का विस्तार कर रही थी। { . कुछ देर पहले चे लडके को बहुत अच्छा देख आये थे। इतने ही में उसकी बीमारी के बढ जाने की कोई सभावना नहीं थी। इसी से उन्होने सोचा-"दोनों एक साथ एकान्त निर्जन स्थान में घूमने के लिए ही आपस में चुपचाप सलाहकर इसी वहाने चले गये हैं। लडके की बीमारी की वात विल्कुल ही 1 -- - . . - नयाँ परिच्छेद झूठी है । अत: वे क्रोध में आपे से बाहर हो मकान की ओर दौड पडे। ईर्ष्या से देवता भी राक्षस हो जाते हैं। सतीश तो केवल क्षीणदर्शी दुर्वल हृदय दानव मान है। ril मकान के पास आकर वे मकान के भीतर नहो गये। कुछ देर तक चोर की भॉति चुपचापः मकान के चारों ओर घूमते रहे । उसके बाद पांव दयाकर चुपचाप घर के भीतर जा उन्होंने धीमे स्वर में नौकर से पूछा-'तेरी मालकिन आयी है ?" उसने कहा-'हाँ डामटर बाबू के साथ आयी हैं। डाक्टर साहर बच्चे को देख रहे हैं।" इसके बाद धीरे धीरे पॉव दवाकर उन्होंने उसी घर में प्रवेश किया। देखा-उनकी स्त्री पलग.के पास खड़ी, हे । रमेन्द्र नीचे से भुककर बच्चे की नाड़ी देख रहे हैं। पहले वन्चे ने ही मत्तीशचंद्र को देखो। देखते ही-"वाया चावा" कहकर उठने की चेष्टा करने लगा। ", स्वामी को देखकर हेमागिनी बोली- "इस समय तो बच्चा बहुत अच्छा है । दाई न मालूम फ्यों इतनी घबडाई गई थी, कुछ समझ में नही आता।" सतीशचद्र रुष्ट होकर दासी की तरफ मुड़े और बोले-"तू ने व्यर्य विना समझे इतनी जल्दी डाक्टर को क्यों बुलाने भेजा" दासी बोली-"वाह क्यों न उलाने भेजती ? बच्चे को ज्वर बढ आया था यफ झक फरता था। मुझे घडा डर लगा। तुम्हारा कोई पता नही था कहाँ घूमने गये हो । और कहकर भी नही जाते कि अमुक जगह जाता है। इसी से डरकर मेंने डाक्टर को बुलाने के लिए आदमी भेजा था।" ग्मेन्द्रनाथ मुंह ऊपर को उठाकर बोले-इस फार के " " .
४२ सहधर्मिणी ज्वर में कभी २ ऐसा ही हो जाता है इसमें डरने की जरूर ही बात है। औपधियों की व्यवस्था कर रमेन्द्रनाथ वहॉ से चले गये। हेमागिनी कुछ देर तक लड़के के पलग के पास बैठ अपने सोने वाले कमरे में चली आयी। हेमागिनी के घर के भीतर प्रवेश करते ही उसी समय उस घर में सतीशचंद्र ने प्रवेश किया। दसवॉ परिच्छेद सरतीशचन्द्र ने घर के भीतर आते ही द्वार बंद कर लिया। हेमागिनी विस्मित होकर चोली-दर- ई वाजा बंद क्यो कर लिया ।" सतीशचंद्र वज्र गभीर स्वर में बोले-"जिसमें मेरी बात समाप्त होने के पहले इस घर से बाहर न जा सको इसी लिए दरवाजा बदकर लिया है। मुझे तुमसे बहुत सी बातें करनी हैं। बताओ, आज इस चॉदनी गत में अपने प्रेमी के साथ घूमकर आनन्द लेने का वृत्तान्त कैसा है मैं सुननाचाहता है। इससे पहले कई बार ऐसा हुआ है। हेमागिनी ने दरवाजे को ओर ताका । स्वामी का यह भाव देखकर वह बिना कोई बात मुह से कहे वहॉ- से उठ दूसरी ओर चली जाती। आज सहसा इस प्रकार पिंजरे में बद होना उससे सहा नही गया। वह रो पड़ी और बोली-क्यों तुम मेरे साथ ऐसा कर रहे हो ?" मैने क्या कभी कोई तुम्हारे आगे कसूर किया है ? बिना कारण व्यर्थ क्यो तुम यह. सब बाते कहते हो? मुझमें कमी क्या कोई दोप पाये हो" , -" -- । F . . दसवाँ.परिन्छेद કરે सतीशव बड़े ही कर्कश स्वर में बोले नहीं आज तलक नहीं पाया है। इसे स्वीकार करता हूँ यहाँ आने के पहले कमी पने तुम पर सदेह नहीं किया। किन्तु तुम यहाँ आकर देखता है-अपने को सभाल नहीं सकी हो । वताओ यह सब कैसी बात है! "तुम अन्याय की बात कह रहे हो । मैं तुम्हें छोड़ और किसी से भी प्रेम नहीं करती। | - "यदि वही प्रेम की विदाई का 'दृश्य खुद अपनी आखों से न देखता- 'कैसी विदाई कैसी चिदाई। क्या फिर से व्योरेवार कहकररा सुनाना होगा ? तुम क्या उसे नहीं जानती। आखों से जल बहाते वहाते जिस समय तुम अपने प्रेमी को कह रही थी कि-तुम मुझसे प्रेम न करो, मुझे भूल जाओ-और फिर उसी के साथ प्रेम के गुलछर उड़ाना । जिस समय उसने तुम्हारा हाथ अपनी छाती पर रखा था-क्या मेने यह सब अपनी ऑसों नहीं देखा है ? हेमागिनी की सॉस प्राय बद सी हो गयी थी। इससे वह कोई बात नहीं कह सकी। सतीशचद्र घोले-"यह सब अपनी आँखों से देखकर भी मैने कभी तुमको कुछ नहीं कहा । कारण में तुम्हें सबसे अधिक अपने प्राण से बढ़कर. प्यार करता है। मैं पिछली सभा बातें प्राय भूल गया था। और तुम, हेमागिनी ! हा, हतभागिनी 1 हेमागनी कातर कठ से बोली-“श्वर को सांगध साकर कहती है कि मैं यह सब भूल गयी है। ईश्वर को रुपा से मुझे इस समय दो एक खटके लडकी हो गई हैं। और तुम्हारे मित्र - !
सहधर्मिणी मैं किसी को भी नहीं जानती। फिर व्यर्थ तुम इन सर पुरानी वाते उठाकर क्यों मुझे कष्ट दे रहे हो? क्या तुम्हारे मन में तिल भर भी दया नहीं है," : ! "जिस दिन से हम लोग यहाँ आये हैं उस दिन से वह वरावर तुम्हारे पास आता है । दिन में एक बार भी नहीं सात - म , आठवार 7 १ १ - "हाँ तुम्हारे लड़के को देखने कालिप । तो क्या तुम बिना चिकित्सा के लडके को मार डालना चाहते हो.? वे यहाँ सब दिन ही डाक्टर की तरह आते हैं । इसके सिवाय-और-किसी भाव से वे कभी नहीं आते । इसे तुमने स्त्रय अपनी आँखों से क्या नहीं देखा है? . :- 'और आज तुम दोनो। लगभग आध कोश का रास्ता साथ साथ चलकर आये हो। तुम लोगो की यह चाल देखकर मैं प्राय. पागल सा हो गया हूँ-इसे क्या तुम - नहीं समझती ? उसका यह बडा सौमाग्य है कि उस समय उससे.मेरो भेट नहीं हुई-नीं तो उस समय नि मालुम क्या हो जाता कह नहीं सकता।" "तुम ज्ञानी हो, विवेकी हो, पढे लिखे सब कुछ हो और तुम्हारा यह व्यवहार ! छि क्या तुम्हें ऐसी बातें अच्छी लगती हैं ? उ होने कभी भी यहाँ आकर कोई असभ्यता या अपमान को वात नहीं कही है। वे भी ज्ञानी और पढे लिखे हैं । वे क्या नहीं जानते कि इस समय मैं दूसरे की स्त्री और लड़के लड़की की माँ हो गई है? पाठक पूछ सकते हैं कि इस समय सतीशचंद्रपया पागल हो गये हैं ? हां विल फुल पागल न होने पर भी बहुत से अशो में पागल अवश्य हैं। वे पंक दम रो पड़े। दोनों बाहुओं . . स
ग्यारहवाँ परिच्छेद
४५
सेहेमागिनी को उन्होंने लपेट लिया और छाती से सटाकर
व्याकुल हो बालक की भॉति रोने लगे।
हेमागिनी उनकी भाव-भगी देखकर डर गयी उसने स्वामी
का ऐसा भाव कभी नहीं देखा था। इससे पहले वह इतना रुष्ट
हो गयी थी कि स्वामी के निकट से चले जाने का उपक्रम कर
रही थी। किन्तु इस समय स्वामी का यह भाव देख वह उन्हें
छोडकर जा नहीं सकी। वरन अब उन्हें शान्त करने की चेष्टा
करने लगी। अब सान्त्वना देकर धीरज कौन वधावे। स्वामी को
रोते देखा हेमागिनी खुद ही रोने लगी।
उस समय सतीशचन्द्र के मन में अपनी स्त्री के प्रति जो
सदेह उत्पन्न हुआ था उसके लिए वह मन ही मन बड़े ही
लज्जित हुए । हेमागिनी की बातों से उनके मन में विश्वास
पेदा हुआ। वे शान्त हो गये। इसके बाद ऑखा के आँसू पोछ'
एक लम्बी सॉस खीच पलग के ऊपर लेट गये।
"
T
JH
ग्यारहवाँ परिच्छेद
SAR या भीपण कालसर्पिणी होती है। किसी तरह
एक बार हृदय के अन्तर में स्थान पाने से फिर
वह वहा से दूर नही होती । भला किसकी
ताकत हैकिाउसे यहा से दूर करे। इतना ही
नहीं विना अच्छी तरह जलाये वह कभी नही
छोडती । थोड़ी सी सुविधा पाते ही वह सिर उठाकर- डंक
मारने की चेष्टा करती है। सतीशचन्द्र के साथ भी ऐसा ही
हुआ । यह ईया को हृदय से दूर नहीं कर सके | तो भी बहुत
कुछ उन्होंने दमन कर लिया था अवश्य किन्तु यह समय न
.
- - सहधर्मिणी - मिलने मात्र तक । वस सामान्य सुयोग्य पाते हो. उसने अपना भीपण फण फैला ही तो दिया । अस्तु । रमेन्द्र और अपनी स्त्री के सभी कामों में वे अप सदेह करने लगे । यह सत्य है कि उन्होने अपनी स्त्री को उस सम्बन्ध में और कोई बात नहीं कही किन्तु रमेन्द्र उनकी स्त्री के साथ, यही क्यों उनके लड़के के सम्बन्ध में भी यदि कोई बात कहते तो वे मन ही मन उन्मत्त पागल-सरीखे हो जाते । अत धोरे धीरे धीरे उनके मन में इस बात का दृड विश्वास होने लगा कि उनकी स्त्री उनके आंखों में धूल झाक रमेन्द्र से मिला करती और आनन्द मनाती है। जिसने कभी चाडालिन ईया की ज्याला का सहन नहीं किया है। वह भला किस तरह सतीश- चन्द्र के हृदय की नरक-यन्त्रणा का अनुभव कर सकता है। फलत सतीशचन्द्र न मालूम कैसे हो गये । पाठक, उनकी इस अवस्था को न तो पागलपन कह सकते हैं और न खाभा- विक अवस्था। इधर बनवा दिन पर दिन अच्छा और भला चगा होने लगा। इसी कारण लाचार रमेन्द्र भी अब शायद ही कभी कभी सतीशचन्द्र के मकान आते। क्यों, कि बच्चा प्राय अच्छा हो गया है। अब उसको रोज देखने की आवश्यकता नहीं थी। अन्त में बच्चे के सम्पूर्ण रूप से, आरोग्यलाभ कर लेने पर रमेन्द्रनाथ एक दिन हँसते-हँसते बोले- अब और मेरा यहा कोई काम नहीं है । अब मैं आप लोगों से विदा ग्रहण कर सकता है।" यह कहकर रमेन्द्र चले गये। सतीशचन्द्र कुछ अनमने से होकर योले-“ओह इतने दिन के बाद विदा हुआ": . ++
ग्यारहवाँ परिच्छेद
हमागिनी ने कहा-"हाँ मैंने उन्हें बिल बनाकर भेज देने
को कह दिया है।"
उस दिन सोमवार था। मगलवार को सतीशचन्द्र आहा.
पदि के बाद बोले-"आज तक वन्चे के दुख के कारण यहाँ
का कुछ भी सर नहीं कर सका हूँ। आज इन्छा होती है कि
एक बार जाकर इधर उधर का सैर कर आऊँ।"
पच्चे के कारण जितना भी क्यों न हो अपने खुद के लिए,
अवश्य वे अधिक देर तक घर के बाहर नही रह सकते थे।
कारण उन्ह अपनी स्त्री के ऊपर भारी सदेह था । जाज रमेन्द्र.
नाथ विदा हो चले गये हैं । यह जान वे बहुत कुछ निश्चिन्त
हो गये थे। उसी साहस से आहारादि के बाद धूमने फिरने के
लिए घर से बाहर हुए ।
वे पयो अधिक देर घर को छोड बाहर नहीं रहते इस यान
को हेमागिनी अच्छी तरह समझ गयी थी। किन्तु उसने अपने
मन की बात मन ही में दवा रखी, कभी स्वामी के सामने प्रकट
नहीं किया।
दूसरे दिन भी सतीशचन्द्र खा पी चुकने के पाट घर ले
बाहर हो गये।
आज तीसरे पहर को उनकी मौसी अपने पुत्र सुधाशु के
साथ उनके मकान में आ उपस्थित हुई। वे आयेंगी यहघात पहले
उन्होंने चिट्ठी में नहीं लिखी-न कुछ सूचना दी थी। इसी से
लाचार सतीशचन्द्र को उनके जाने की बात मालूम नहीं हुई
• समस्या हो गयी तर भी सतीशचन्द्र नही लोटे। इमो समय
हेमागिनी बाहर किसी के पैर का शब्द सुन चौक उठी ओर मन
हो मन पोली-"हॉ यही वह आ रहे हैं मौसी आई है यह
सुन कर निश्चय ही वे चकित होंगे।"
.
सहधर्मिणी
किन्तु सतीशचन्द्र आये नहीं, उनके बदले में आये रमेन्द्रनाथ ।
फिर रमेन्द्र ! हमागिनी का प्राण कॉप उठा, ओह ! सतीश
चन्द्र की अनुपस्थिति में रमेन्द्र वे तो कह गये थे कि अब नही
आवेंगे। किन्तु फिर आ गये-क्यों? इस समय यदि सतीश
लौट आकर उसे रमेन्द्र के साथ देख पाये तो मला मन में क्या
सोचंगे? हेमागिनी की आँखों में एक दम अधेरा छा गया। व
सिर से पेर तक थरथर कांपने लगो और बहो हो मुश्किल है
अपने को सभालकर चुपचाप खड़ी रही।
रमेन्द्रनाथ ने पूछा-"वच्चा कैसा है ?"
{" हेमागिनी- अच्छा है । मेने उस दिन आपको कह दिया य
कि अब आपके आने की आवश्यकता नहीं है।"
रमेन्द्र ने कहा-"हा अब उसके देखने को आवश्यकता
नही है । इसी रास्ते से जा रहा था । इसी से मन में सोचा कि
एक बार जाफर उसको खवर लेता आऊँ। आज बड़ा कुहिरा
हुआ है । यहाँ कभी कभी जाडे में ऐसा ही कुहिसा होता है।
रात के इस समय एक हाथ के दूर पर भी आदमी देखना कठिन
हो जाता है।"
इतना कह वे एक कुर्सी खीचकर हेमागिनो के पास बैठ
गये। इस समय उनके मन में पहले का कोई भी भाव नही था
वे सतीशचन्द्र के मन का भाव भी न जानते थे इसी से उनके
मन में कोई सदेह नहीं था । जिस प्रकार और लोगों के साथ
चह व्यवहार करते उसी प्रकार हेमागिनी के साथ भी करते
ये। वे उसे पूर्वपरिचिता मित्र की मोति मन में समझते थे।
किन्तु उनके इस प्रकार बेठ-जाने से हेमागिनी की छाती और
भी थरथर कॉपने लगी। यदि इसी समय सतीशचन्द्र घर
लौट आवे तो क्या कहगे। अपने मन में क्या सोचेंगे?..
-
.
वारहवां परिन्छेद
अत वह रुकते कठ से बोली-"क्या एक बार बच्चे को
देसगे नही"
हेमागिनी की यह इन्छा थी कि जहाँ तक सभव हो रमेन्द्र
शीघ्र विदा होकर चले जाय । किन्तु आज रमेन्द्रनाथ ने उतनी
जल्दी विवाहोने की चेष्टा नहीं की। बोले- 'अन्छापीछे देखेंगे।"
हेमागिनी उठकर सडी हो गई थी । रमेन्द्रनाथ ने
रहा-"येठ जोयं । आपसे एक बात कहनी है।"
हेमांगिनी का सिर घूमने लगा । वह कोई भी बात मुंह से
"मह नहीं सकी। चुपचाप उनके सामने बेठ गयी। क्षण भर के
लिए उसका सिर से पेर तक थरी उठा।
रमेन्द्रनाथ बोले-"एक गोपनीय विषय में मे किली की
सलाह लेना चाहता हूं। मुझे मालूम है कि आप बडी ही
बुद्धिमती और शानवती हैं । में आपकी सलाह को सबों से
अधिक मुल्यवान समझता हूँ । इसी कारण में अपने एक सास
विषय में आपका क्या मत है, जानना चाहता हूँ।"
हेमागिनी के कठ से कोई वात वाहर नहीं निकली।, वह
निजीय पत्थर की मूर्ति की तरह चुपचाप बैठी रही।
बारहवा परिच्छेद
त कहने की चेष्टा करने पर भी हेमागिनी कोई बात
नहीं कर सकी । उसका साराशरीर इतना फॉप
रहा था कि मानो उसकी छाती भीतर होभीतर
फटी जा रही है । रमेन्द्रनाथ कोनसी बात कहना
चाहते है । उसके साथ कौनसी उन्हें सलाह
करनी है । इसी समय यदि उसके स्वामी
आ जाय।
-
। " । सहधामणी यह कोई बात नहीं कर रही है यह देख रमेन्द्रनाथ बोले-"आपने तो प्रफुल्ल वायू की लड़की को देखा है" "हाँ देखा है, बडो अच्छी लड़की हैं।" "यही अन्छी लड़की है।" "हाँ, बड़ी शान्त प्रकृति की लड़की है देसने में सुन्दर और लिखना-पढ़ना भी सूब जानती है। क्यों, उसकी बात पूछ क्या रहे हैं आप "उसके विवाह के लिए।" "क्या आप उसका सम्बन्ध कही ठीक कर रहे हैं ? "सबन्ध नहीं ठीक कर रहा हूँ वरन् स्वय ही उससे व्याह करना मैंने स्थिर कर लिया है।" हेमांगिनी ने चकित दृष्टि से उनके मुंह की ओर ताका। कुछ देर के बाद बोली-'सुशीला बड़ी अच्छी लड़की है।' रमेन्द्रनाथ ने मृदु हसी के साथ कहा-"तब विवाह उसके साथ किया जाय १ प्रफुल्ल बाबू ने स्वय यह प्रस्ताव मुझसे किया है।" हेमागिनी ने कहा-"में यह सुनकर यथार्थ ही में बड़ी सुखी हुई।" यह वात हेमागिनी ने झूठ नहीं कहा। क्योंकि व्याहकर 'रमेन्द्रनाथ के सुखी होने से हेमागिनी सत्य ही बडी सुखी होगी ओह इसी समय जगले में से अन्धकार में किसी का मुह चाहर निकला। उस मुंह का भाव बड़ा ही भयकर था। उसकी जलती हुई तेज आखों से आगे की चिनगारी निकल रही थी ।सिर के बाल काकुल इत्यादि भी बड़ी ही लापरवाई के साथ इधर-उधर विखरे हुए थे-ओट दोनों बड़े ही विचके हुपथे । ओह केस भयकर चेहरा है ! यह कोन! मनुष्य का मुह है या M । प्रेत का .
वारहवाँ परिच्छेद
हेमागिनी या रमेन्द्रनाथ दोनों में से किसी ने भी यह विभी
पिका नहीं देखी । तो भी इस मूर्ति के कण्ठ से जो अर्द्धस्फुट
शब्द उस समय बाहर निकला उसे दोनों ही ने सुनकर
चमत्कृत हो जंगले की ओर ताका । किन्तु कुछ भी वहाँ
दिखाई नहीं पड़ा ।
हमागिनी ने पूछा-"यह किसका शब्द है !"
ग्मेन्द्रनाथ बोले-"अधकार और कुहेसा इतने जोर का है
फि मालूम होता है कोई रास्ते में चलते चलते गिर पड़ा है या
ठोकर खा गया है। चलिए यन्चे को एक बार देखकर चले
जाय।"
दोनो ने जाकर बच्चे का देखा । इसके बाद रमेन्द्रनाथ
उस सूचीभेद्य अधकार और कुहिरा को देखकर हँसे ओर
योले-"आशा है रास्ते में किसी प्रकार की आपद विपद नहीं
घटेगी । कुशल-पूर्वक मकान पहुँच जा सकूँगा।"
रमेन्द्रनाथ चले गये किन्तु तव भी सतीश घर नहीं लौटे।
ऐसे हाथको हायान सुझाई पडनेवाले अधकार में उनको रास्ते
में किसी आपद-विपद का सामना तो नहीं करना पडा जितना
ही सतीशचन्द्र के लोट आने में देरी होते जाने लगी उतना ही
हेमागिनी और भी अधिक अधोर ओर उत्कठित हो उठने लगी।
धीरे धीरे इसी तरह करते दो घटे व्यतीत हो गये। अव वह
निश्चिन्त होकर रह नहीं सकी। नौकरों, को लाठी लेकर
चाव की सोज में जाने के लिए उसने आशा दी। किन्तु इसी
समय मकान के पिउलेगाले दरवाजे में से जल्दी जल्दी आकर
मकान के भीतर सतीशचन्द्र ने प्रवेश किया। उन्होंने किसी से
कुछ नहीं कहा और अधकार में अपने सास सोनेवाले कमरे में
जाकर भीतर से द्वार बद कर लिया।
७२ - सहधर्मिणी "हाँ, हम लोगों के जान पहचानी में से ही कोई है।" "उसका नाम "डाक्टर रमेन्द्रनाथ उनके मकान के दरवाजे के सामने ही कोई उनकी हत्या कर चला गया है।" इस कठिन निदारुण भयंकर समाचार से हेमागिनी के मन की जो अवस्था हुई यह वर्णनातीत है। उसका सुन्दर मुखमण्डल एकदम बेरगत होकर मुफेद हो गया। सॉस भी भीतर से बन्द होकर गले में अटक आई ! ओह कैसी भयानक बात है ! अभी आज सन्ध्या को हो रमेन्द्र उसके पास आये थे। इन्ही कुछ एक दो घण्टों के पहले वे अपने व्याह की बात कहते थे। और वही रमेन्द्र दुनिया से उठ गये ! क्या उनका अस्तित्व इतनी जल्दी संसार से लुस हो गया? क्या इस तरह अनायास ही उनकी हत्या हो गई" । - क्षणभर में ही हेमागिनी के मस्तक में हजारों चिन्ता, हजारों विभीपिकायें हवा के झोंके से तरग-मग उत्ताल की मांति उद्वेलित हो उठी । अपनी चिन्ता-सागर की तरङ्ग लहरियों को सेंभालकर स्थिर करने की शक्ति भी बिलकुल उसमें नहीं रही। मौसी बोलीं-"ये डाक्टर कौन हैं?" हेमांगिनी में इस समय चात कहने की ताकत नहीं थी। सतीशचन्द्र ने कहा-"वे यहाँ के एक अच्छे डाक्टर थे। बच्चे की दवा उन्हीं ने की थी। मैं जानता था कि वे अब मेरे घर में नहीं आवेंगे। मालूम होता है यहाँ से होकर अपने घर लौटते समय रास्ते में किसी ने उनका सून फर डाला है। बड़े अन्छे आदमी थे।" मौसी बड़े ही आश्चर्य में होकर वोली-"ऐसे अन्छे आदमी की हत्या इस प्रकार निठुरता के साथ कौन करेगा" ७३ तेरहवा परिच्छेद संक्षेप में सतीशचन्द्र ने उत्तर दिया-"भला इसको में केसे कह सकता हूँ-कौन करेगा। मौसी ।' मौसी ने फिर पूछा-"तुमने किस के मुंह से यह बात 1 सुनी सतीशचन्द्र ने कहा-"ऐसी बातं बहुन जल्ट चारों तरफ फेल जाती हैं। जिस समय में मकान आ रहा था उसी समय देखा, रास्ते में दो आदमी वडे ही घबड़ाये हुए न मालूम क्या आपस में कहा सुनी करते करते दोड़े जा रहे थे । उन्हीं लोगो से पूछने पर मालूम हुआ कि चे डाक्टर ये।" मौसी ने कहा-"फिन्तु हम लोगों के सानसामा ने सुना है कि एक मारवाडी का खून हुआ है ! सभव है कि डाम्टर के खून की वात झूठ हो।" इस पर सतीशचन्द्र सक्षेप में वही होगा" कहकर आराम कुसी पर सा गये । मौसी के साथ कौन आया है इसको भी पूछना ये भूल गये। धीरे २ सत्र दास दासीगण खा पीकर सो गए। सतीश- चन्द्र को चेयर पर ही सोते देस हेमागिनी उन्हें अकेले वहीं छोड अपने कमरे में सोने जा नहीं सकी। अत वह उसी घर में चेठ मासी के साथ बातचीत करने लगी। रात को लगभग प्राय यारह के जमल में न मालूम किसने दरवाजे पर जोर से धक्का दिया। इस आवाज से दोनो ही चौक उठीं। इतनी रात को कौन है ? विशेषत वे लोग आज हत्या- काण्ड की बात सुन चुके थे। अत सामान्य कारण से भी डर से चौंक उठते थे। मुधाशु माँ को सतीशचन्द्र के घर पहुँचाकर उसी समय अपने काका से भेट करने के लिए गिरिधी चला गया था।
७३ सहधर्मिणी काका के यहाँ उसके दो तीन दिन रहने की बात थी। सुतरा वह तो अभी लौट नहीं सकता । तव इतनी रात को दरवाजे पर कौन इतने जोर से धका मार रहा है ? उस शब्द से सतीशचन्द्र भी नींद से जागकर उठ बैठे । चौदहवाँ परिच्छेद हर के दरवाजे पर बारम्बार धाक पर धक्के की भयानक आवाज होने से नौकर चारो की भी नींद टूट गयी । तव एक ने जाकर दरवाजा खोल दिया। उसी समय सुधाशु भीतर आ उपस्थित हुआ । उसको देखते ही उसकी माँ बोल उठों--"अरे तू है ? इतनी जल्दी लौट आया क्यों ?" , सुधाशु बोला-"काका यहाँ गिरिधी में नहीं है। शहर चले गये हैं । सात आठ दिन तक नहीं लौटेंगे। इसी से मैं दूसरी गाडी से लौट आया । मला वहाँ किसके साथ रहता?" अब सतीशचन्द्र को मालूम हुया कि वह अकेली नहीं आयी हैं। आना भी असम्भर है। निश्चय ही उनके साथ सुधाशु आया है। किन्तु उनका मन दूसरे विषय की ओर इतना ला हुआ था कि उन्हें इन सब बाता के विचारने का किंचित् मात्र सी समय नहीं मिला। इस समय अब एक दो वाते उसरो पूछ लेना. नितान्त उचित है, समझ बोले-"तू ऐले अन्ध- कार में इतनी रात गये विना रास्ता भूले चला केसे आया "सुधांशु-गिरिधी से जिस लमय चना उस समय यहाँ ऐसा कुहिसा ओर अन्धकार का प्रपल राज्य होगा-इस बात को
चौदहवाँ परिन्छेद
७५
भला में कैसे जानता? तव भी यहाँ स्टेशन पर उतरकर उतना
अधिक कष्ट उठाना नही पडा।"
इस पर सतीशचन्द्र ने पूछा- क्यों कैसे?"
"ऐसे कि वहाँ आदमी लोग हाथ में लाठी और मशाल लिये
रास्ते में इधर-उधर दौड़ा-दौडी कर रहे थे। अत उन लोगों
की रोशनी से मुझे बहुत कुछ सुविधा हो गयो।"
मौसी ने कहा-"दुर कहीं का! तू इतनी रात गये इस
तरह दरवाजा पीट रहा था कि सुनकर हम लोगों के तो मारे
डर के प्राण सूख गये।"
'क्यों इतना भय किस लिये?"
"खून हो गया है।"
+
"कहाँ"
"यहीं मधुपुर में आर कहाँ।"
"ओह । इसी से मालूम हुआ लोग लाठी और मशाल हाथ
में लिये चारों तरफ दौड रहे थे। ठीक है, मैने तो यह बात ध्यान
में भी नहीं लाई थी, हॉ सतीशदादा ! किसका सून हुआ है ?"
सतीशचन्द्र बोले-"एक डाक्टर का।"
आँखें फाडकर आश्चर्य से सुधाशु योला-"ओह ! कसी
भयानक बात है।"
मौसो-"वे बच्चे को बरावर देखने आते थे। आज मी
सन्ध्या के समय यहाँ जाये हुए थे।"
सुधाशु-"क्या उन्हीं का सून हुआ है।"
मोसी-"हाँ, आज सम्ध्या के समय वे यहाँ आये थे। हम!
रमेन्द्रबाबू यहाँ से कय चले गये थे।"
सुवाशु-"क्या कहा ? रमेन्द्र यावृ ' डाक्टर रमेन्द्र यापू।
हम लोगो के रमेन्द्र यावृ तो नहीं"
1
. . ७६ सहधर्मिणी । इतना कहकर सुधांशु ने हेमागिनी के मुंह की ओर ताका ।- मौसी वोली-"हम लोगों के रमेन्द्रवावृ यह क्या, सुधाशु-"हेम वहन को मालूम है। कलकते में हेम वहन के साथ उनका परिचय था । मुझे वह वडा ही मानते थे। वहीं तो नहीं सतीशचन्द्र गीर भाव से वोले-" हाँ वही रमेन्द्र यावृ । सुधाशु-वही रमेन्द्र बाबू!जो कलकत्ते में मुझे इतना मानते और प्यार करते थे? कैसा भयानक है।" "हाँ वे ही! यहा डाक्टरी करते थे।" कह कर सतीशचन्द्र ने दूसरी ओर मुंह फेर लिया। सुधाशु का मुह एक दम से खिन्न और उदास हो गया । वह यथार्थ ही में किसी एक समय रमेन्द्रनाथ को वडा ही प्यार करता था। वह बोला-- 'क्यों हेम वहिन !' रमेन्द्र बाबू यहा है, । तुमने यह बात मुझे क्यो नहीं लिखी ? यदि मुझे मालूम हो जाता तो उनका सून होने के पहले ही मैं यहां आ पहुँचता।" मौसी वोलीं--"उनका इस तरह खून होगा इसको भला पहले से कौन जानता था सुधाशु-"वे बडे अच्छे आदमी थे, हमें तो बडा मानते थे।" मौसी-"क्या सचमुच म बड़े अन्छे आदमी थे ?" सुघाशु-"विश्वास न हो तो हेम बहिन से पूछ लो । दादा बाबू के सग यदि ब्याह न होता तो बहिन का विवाह रमेन्द्र बाबू के सग अवश्य ही होता । मैं उस समय छोटा बच्चा या किन्तु सब समझता बूझना था। देखो बड़ी वहिन, हमारी चातो से नाराज न होना ।" बुढिया के मन में पुत्र के मुह से यह बात सुनते ही पहले की बीती बात स्मरण हो आयो । वह रमेन्द्रनाथ और हेमा- र "
७७
पन्द्रा परिन्छेद
गिनी के प्रेम की बात सुनचुकी थीं। उन्होंने सुना था कि रमेन्द्र
हेमागिनी को प्यार करते और हेमागिनी भी उन्हें हृदय से चाहती
केवल गरीब समझकर हेमागिनी ने उनसे विवाह नहीं किया।
तव वही रमेन्द्र और यहाँ के यह रमेन्द्र दोनो क्या एक ही
मनुष्य है, अत बुढिया मौली के मन में जो बातें उत्पन्न हो
आयी उनके स्मरणमात्र से उनका हृदय भय से थर्रा उठा।
रात अधिक बीत चुकी थी । अतः सबके सव सोनेको चले गये।
पन्द्रहवाँ
परिच्छेद
MERO स्तर पर सोते ही सुधाशु नीद में वेखवर हो
गया। किन्तु उसकी माँ को उत्तनी जल्दी
नींद नहीं आयी। घर की एक पुरानी दाई
बैठी पान लगा रही थी। उसने मौसीको देख
कर कहा-"जब से यह बात सुनी है तब से
मारे डर के छाती धकधक कर रही है।
ऑखों में नींद का नाम नहीं है।"
मौसी ने कहा- 'यदि ओर कोई दूसरा आदमी होता तो
इतनी डरने की बात नहीं यो । उनके यहाँ से चले जाने के बाद
हो न यह भयानक काण्ड हो गया ।"
"किसके चले जाने के बाद
"डाक्टर बाबू के और किसके।"
"डास्टर यासह कौन है "
"हाँ, वही तो। तुमने क्या नही सुना? केवल मारवाडी की
वात ही मात्र मुनी थी? नही वह वात नहीं है। डाक्टर रमेन्द्र.
नाथ ही मारे गये है असल में।"
७८ सहयमिणी - +-- "डाक्टर वायू मारे गये ? किसने कहा?" "सतीश ने । पकान लौटते समय रास्ते में किसी के मुंह से यह बात सुन आये हैं।" "या ने यह बात सुनी-किमसे यह बात सुनी ? नहीं नहीं खानसामा ठीक ठीक मुन आया है-एक मारवाड़ी ही मारा गया है। यदि ऐसा न होता तो व्यर्थ लोग मारवाडी का नाम क्यों लेते "खानसामा ने सुनने में भूल की है। तुम्हारे बाबू जी जो सुन आये हैं वही ठीक है।" "नहीं उनको ही सुनने में भूल हुई है। जिस आदमी ने मारवाडी को रास्ते में मरे हुए पड़ा देखा था, खुद उसी के मुंह से खानसामा यह बात सुन आया है। तुम लोगों के सामने साहस कर वह सब बातें कह नहीं सका है । मुझसे उसने सब बात कह दी है । भला डाक्टर वात्रु पयो मारे जायेंगे ? अहा मनुष्य नही-देवता है" "हाँ सुधाशु भी यही बात कहता.त्था ।" "हाँ क्यों नही सभी रमेन्द्र बाबू को प्यार करते थे। केवल 'केवल क्या केवल हमारे बावृ साहव हो उनको फूटी आँख से भी देख नही सकते थे। बहूजी के लिए ही पहले उन लोगों में भारी झगडा था। बेटो हेम की में बहुत पुरानी दायी हूँ-सव वाते जानती हूँ । व्याह के बाद आज तक कोई ऐसी बात देखने सुनने नही आई । किन्तु यहाँ आने के बाद ही वावूजी का मिजाज मानों कुछ खराब हो गया । वे हर बातों में शक्की हो गये हैं। इसी से समझती हूं योवू उन्हीं पुरानी बातों का खयोल कर एक दम ऐसे हो गये है।" १७ , , ।
७६
,
पन्द्रहवा परिच्छेद
"विचारी हेम वसी लडकी नहीं है।'
"नही नही । वह बात नहीं कहती, पहले जो कुछ हो
किन्तु इस समय वहिन बाबूजी को हृदय से प्यार करती हैं।"
"इससे पहले भी कभी रमेन्द्र के साथ हेम की मुला-
कांत उई थी॥
"नहीं कभी नहीं हुई है। जा हो मॉजी । हमें तो यह
स्थान अच्छा नहीं लगता। यहाँ से चले जा सकने ही में
उसी रात में हमागिनी ने सोते समय स्वामी सेकहा-"अब
उस बात के कहने में कोई फल नहीं कि कहाँ ब्याह होगा।
ओ हकसा भयानक व्यापार है।"
सतोशचन्द्र क्षेवल इतना ही मात्र बोले- भयानक !
निश्चय ही भयानक
"उनका ब्याह हो जाता। प्रफुल्ल कुमार वायू की कन्या के
माथ उनके व्याह की बात हो रही थी।"
"तुम्हे छोडकर तुम्हें भुलाकर
यह बात कहने की
सतीशचन्द्र को इस समय कोई आवश्यकता नहीं थी।
अन्य समय यदि सतीशचन्द्र यह बात कहते तो हमागिनी
क्या करती नहीं कहा जा सकता। किन्तु आज के इस लोम
हर्षण व्यापार से हेमागिनी का हृदय एकबारगी ही टूट गया
था। यह बड़े ही कातर कठ ने बोली-"क्यों तुम व्यर्थ यह
सव बात कहते हो तुम्हारे पॉच पड़ती है-यह सब बातें
जाओ। मैं ईश्वर की सांगध साफर कहती है कि तुम्हारे साथ
मेरा ब्याह होने के बाद से मैंने अपने हृदय में कभी भूलकर भी
किसी और को स्थान नहीं दिया है। क्यों व्यर्थ यह सर वात
कहकर मेरे मन को कष्ट पहुँचाते हो।"
3
सहधर्मिणी
शतीशचन्द्र कुछ नहीं बोले । तव हेम पुन बोली-"आज
वे यहाँ अपने विवाह की बात कहने के लिए ही आये हुय
इस बार भी सतीशचन्द्र के मुंह से कोई बात नहीं निकली
चुपचाप पलंग पर सो गये। किन्तु उस रात को वे सो सके
या नहीं यह बात उनको छोड़ और किसी ने जाना नही।"
सवेरे सतीशचन्द्र सुधाशु को साथ लेकर बाजार की ओर
चले गये। उनके चले जाने के थोड़ी देर बाद ही वहाँ प्रफुल्ल
कुमार वाचू आ उपस्थित हुए। सतीशचन्द्र के साथ उनकी
विशेष मिन्नता हो गयी थी । "आप" न कहकर दोनों ही एक
दूसरे को "तुम" कहकर बुलाते थे। इसके अतिरिक्त सतीशचन्द्र
के घर उस प्रकार के पद का व्यवहार भी नहीं था। विशेषत
मधुपुर की स्त्रियों में पर्दे का रिवाज विल्कुल ही नहीं के परावर
था। इन्हीं सर कारणों से प्रफुल्ल वायू हेमागिनी के साथ
बेखटके चातचीत क्यिा करते थे। यहाँ आकर मौसी मी
बहुत कुछ स्वाधीन हो गयी थीं।
प्रफुल्लकुमार आते ही बोले-"ओह ! कैसी भयकर चात
है ? आप लोगों ने सुन लिया है न?" .
हेमागिनी बड़े ही दुखित स्वर में बोली-"हा वे एकदम
से मर गये हैं या भारी चोट साकर घायल मात्र हो गये हैं।"
प्रफुल्ल कुमार पडे ही उदास मुह से बोले-"चदमाश
लोग क्या कुछ वाकी रख गये हैं ?"
मौसी मा नजदीक हो वैठी हुई यो बोली-"तो फिर ठीक
रमेन्द्र बानू ही मार डाले गये हैं। सतीश भी तो यही चात
कहता था। किन्तु सानसामा कहता है-न मालूम कौन एक
मारवाडी मारा गया है।
.
.
.
1
पन्द्रहवा परिच्छेद प्रफुल्ल उसकी भी बात ठीक है । एक मारवाडी भी कल्ह ति को मारा गया है । ओह एक वारगो होदो दो सून ! मधुपुर ऐसा भयानक काण्ड और कभी भा नहीं हुआ था। मारवाड़ी राम बहुत से रुपये पैसे साथ लेकर मधुपुर आ रहे थे कि सहसा केसी ने हमलाफर उन्हें मार डाला और सय रुपया पैसा लेकर चम्पत हो गया। डाक्टर का विषयअलग है-उससे उनको हत्याका कुछ भी लगाव नही है। न मालूम किसने डाक्टर को उनके मकान के सदर दरवाजे के पास लाठी मारकर हत्या कर डाली है। मौसी-हॉ, सतीश भी यही कहता था। हेमागिनी मृदु स्वर में बोली-"मालूम होता है उनके यहाँ से चले जाने के बाद हो यह काण्ड हुआ था। प्रफुल्ल कुमारने पूछा-"क्या यहाँ कल रातको बाक्टर आयेथे? हेमा-हाँ । बच्चे को देखने आये थे । जान पड़ता है- रात के साढे सात आठ के समय वे यहा से चले गये ! प्रफुरल-निश्चय ही उसके बहुत देर के बाद वे गये है । कब यह सब काण्ड हुआ है-ठीक नहीं कहा जा सकता। बहुत रात बीत जाने पर भी जर डाक्टर घर नही लोटे तर उनका नौकर उन्हें ढूढने बाहर निकला । उन्हें कहीं न पाकर जन वह घर की ओर लौटा आ रहा था उसी समय सदर दरवाजे के पास ही एक लाश पड़ी हुई उसने देखा।" "इसके कुछ पहले सतीश को यही खबर मिली थी। प्रफुल्ल-डाक्टर के सून होने के पहले वे किस तरह सून की बात जान सर्कगे" "जर सानसामा ने आकर मारपाड़ी के गुन की यात कही तब उसने कहा था कि मारवाड़ी का खून नहीं हुआ कृपया इसक पहलेबाले ६५ ८० को ६५ पृष्ट पद। - मार डाले
है
सहधर्मिणी
पल्कि डाफ्टर का खून हुआ है। शायद कोई किसी से य
वात कहता होगा-चही वह सुनकर आया था।"
प्रफुल्ल-"रात के एक बजे पहले उनका नौकर भी जानत
नहीं था कि डाक्टर का खून दुना है। कोई भी इस बात प
विश्वास नहीं कर सका कि डाक्टर का सून हुआ
मौसी ने कहा-"सतीश ने निश्चय ही किसी से य
चात सुनी थी। नही तो वह हम लोगों से यह बात कैसे कहेगा
कहा, किस प्रकार डाक्टर बाबू मारे गये हैं, यहा तक उसन
बेखटक कह दिया था।"
इस पर प्रफुल्ल -यावृ चिन्ता करते हुए बोले- बड़े ही
आश्चर्य का विषय है, इसमें सदेह नही । कह नहीं सकता कि
सतीश चावू ने यह बात किसक मुह से सुनी थी।"
मौसी-"रास्ते में कोई दौडा जा रहा था, उसी के मुंह से
सुनी थी। उस समय रात को कितना बजा होगा? ठीक रात
के नौ बजे सतीश घर लोट आया था।"
प्रफुल्लकुमार एक दम से बोल उठे-"ओह केसी भयानक
बात है ? कही वही लोग तो नही डाक्टर की हत्या कर भागे
जा रहे थे। डाक्टर की जो हत्या हुई थी उस बात के जानने
का उस समय और किसी को कोई उपाय नहीं था। भला
कोई जाना ही, कैसे सकता है। खैर हम लोगों को अब उस
आदमी को दृढ निकालना ही होगा। जितने दिन तक रमेन्द्र
का, खुनी सजा न पाये उतने दिन तक हम लोग कोई भी
निश्चिन्त होकर रह नही सकेंगे । सतीश बाबू अवश्य ही उन
लोगों को पहचान सकेंगे।"
"वे लोग शायद किसी वाग के माली हैं।"
इसी समय सतीशचंन्द्र और सुधाशु घर लौट आये।
सोलहवा परिच्छेद
६७
सोलहवां परिच्छेद
तोशचद्र को देखते ही प्रफुल्लकुमार ने पूछा- कल
इस
रात को डाक्टर के खून की बात तुमने किसके मुंह
से सुनी थी?"
सतीश-"वही सेठ के बाग के माली निरजन
से सुनी थी।"
"निरजन के मुह से ? बस इस खूनी को पकडना ही होगा?"
सतीशचन्द्र के कोई बात कहने के पहले ही प्रफुल्लकुमार
निरजन माली की खोज में दौड पड़े।
सेठ का चाग वहा से अधिक दूर नहीं था आध घटे में हो
लौट आकर वे बोले-"वे लोग तो इस बात को इनकार करते
हैं। कहते हैं, कि उन लोगों ने डाक्टर के खून की बात कभी
कहा ही नहीं। डाक्टर मारे गये हैं यह वात कल रात भर वे
लोग नहीं जानते थे।"
सतीशचन्द्र बोले-"न मालूम क्यों वे लोग झूठ कहते हैं
नहीं जानता। मैं रात को घर लौटा आ रहा था। उन लोगों
को दौड़ते जाते देख मैंने पूछा क्या हुआ । वे बोले, "भयानक
काण्ड हो गया है डाक्टर वावू मारे गये हैं। किसी ने उनकी
हत्या की है यदि वे लोग मुझसे न कहते तो मैं यह बात फिर
और कहाँ से सुनता। उस समय मुझसे और किसी से भी मेंट
नहीं हुई। सिवा उन लोगों के।"
प्रफुल्लकुमार सदेह के भाव से चोले-"तव के लोग इस
समय या यात अस्वीकार क्यों करते हैं । निरजन बहुत दिन
से सेठ के बाग में माली का काम करता है। उसे सब कोई
अच्छा आदमी समझते हैं। यदि ऐसा न होता तो मैं समझता
।
V ६८ सहधमिणी कि वे लोग अवश्य इस खून में सम्मिलित हैं। मैं उसको तुम्हारे सामने बुला लाना चाहता है। देस तव वह उस समय केमे तुम्हारे आगे झूठ वोलने का साहस करता है।" "यों ही अनायास ही ।' प्रफुल्लकुमार फिर दौड़ पड़े। वे रमेन्द्रनाथ को विशेष प्यार करते थे। उनके साथ अपनी कन्या का विवाह करने का भी उन्होंने पक्का इरादा कर लिया था। अत. उनकी इस प्रकार एका एक मृत्यु से उनके हृदय को बड़ी भारी चोट लग गयी थी। ऐसी अवस्था में वे रमेन्द्रनाथ के खूनी को गिरफ्तार करने के लिए यदि व्याकुल हो उठे तो इसमें आश्चर्य हो क्या ? । कुछ देर के बाद ही वे बूढ़े निरजन माली को सतीशचन्द्र के सामने धर लाये । माली डरता २ वोला-"चावू ! हजूर! आपने न मालूम क्या कह दिया उसी से यह बाबू हमें यहा पकड़ लाये हैं।" सतीशचढ़ बोले-"कल रात को तुम, और एक आदमी के साथ दौड़े जा रहे थे। वहीं न तुम लोग मुझसे मिले थे। जो. माली वोला-"हाँ हजूर ! आपके पूछने पर मैंने कहा- एक आदमी मारा गया है।" सतीशचद्र प्रफुल्लकुमार के मुह की ओर ताक कर बोले- "सुना न आपने ?" इसके बाद निरजन की तरफ पलटकर बोले-"जो बात तुमने उस समय मुझसे कही थी यही बात इस समय प्रफुल्लकुमार बाबू के सामने कहो।" निरजन-"हजूर, मैंने कहा था, एक आदमो मारा गया है।" "हाँ ठीक वही।" प्रफुल्ल-"तुमने क्या यह कहा था कि डाक्टर चावू मारे गये है " , 1
सोलहवा परिच्छेद
"नहीं हुजूर ! मैं यह अवश्य कहने जा रहा था कि एक
रवाडी मारा गया है किन्तु सरकार उस बात को विना सुने ही
ले गये थे। रात को हम लोगों ने डास्टर वायु के मारे जाने की
गत सुनो ही नहीं। आज सवेरे सुना कि दो सून हुआ है।"
सतीशचद्र विस्मित होकर बोल उठे-! दो ग्वून !
वल सून!! एक साथ यह दुसरा कान ?"
प्रफुल्ल-"एक मारवाड़ी दूकानदार भी कल रात को मारा
या है। मालूम होता है मालो तुमसे उसी के खून की बात
कहने जा रहा था। कारण डाक्टर मारे गये हैं, यह बात उस
समय कोई नहीं जानता था। रात को एक के अमल में उनका
नौकर यह बात जान सका है। इसी से सोच रहा हूँ कि तुमने
उस समय और किससे यह बात सुनी कि डाक्टर मारे गये हैं।"
सतीशचन्द्र कुछ नहीं बोले ! कहने के लिए हृदने पर भी
उन्हें कोई बात नहीं मिली। कुछ देर तक वे चुप लगाये खड़े
रहे। उनकी वह मौनता बड़ी ही भयकर और सदेहजनक थी।
इस बार प्रफुल्लकुमार ने गभीर स्वर में पूछा--"सतीश ! तुमने
यह वात कल रात को किसके मुह से सुनी थी?"
इस बार भी सतीशचद्र चुप हैं । जोर २ उनकी सास चलने
लगी। बड़े ही कष्ट से अपने को सँभाल कर वे दूसरी ओर चुप.
चाप ताकते रहे । सुधाशु मौसी और दूसरे सब लोग विस्फा-
रित नेत्रों से सतीशचद्र की ओर टकटकी लगाये ताकते रहे।
सतीशचद्र समझ गये कि जो वात वे पहले मुह से कह
चुके हैं उसे अच्छी तरह ठीक बचाये रखना बड़ा ही कठिन है।
यात को बदल डालने का भी कोई उपाय नही है। मामला
धीरे २ सगीन हो रहा है। बहुत देर तक चुप रहकर अन्त को
सतीशचन्द्र ने बात करना शुरू किया-बोले-"मैं ने इसी माली
सहधर्मिणी
के मुह से ही सुना था। इस समय क्यों यह उस बात' को
इनकार कर रहा है, नहीं कह सकता।"
निरजन घोला-"हजूर! सरासर झूठ कह रहे हैं। मैंने
डाक्टर वावू की बात कल रात को नहीं सुनी। भला इसका
मैं आपसे कैसे कह कर बताऊँ । हजूर क्ल रात को सिर्फ खून
की बात सुनकर ही चले गये थे। मैं अब इस समय जा रहा हूँ
'हुजूर हुकुम पाते ही फिर सेवा में हाजिर हो जाऊँगा।"
T
.
सत्रहवां परिच्छेद
'धुपुर कोई 'वडा शहर नहीं है। ऐसे छोटे
म
गाव में एक साथ दो २ खून के हो जाने से
सारा मधुपुर में जो एक हलचल सी मच
गयी है, इसमें आश्चर्य ही क्या ? विशेषतः
जो मारे गये हैं वे दोनों ही यड़े भारी और
प्रसिद्ध मनुष्य हे । मधुपुर के बूढे बच्चे नरनारी सभी उन लोगों
को पहचानते थे। मारवाड़ी एक बड़ा भारी दूकानदार और
रमेन्द्रनाथ सब लोगों के प्रियपात्र ये। अतः उनके इस
लोमहर्पण हत्याकाण्ड से सभी को विशेष दुःख हुआ, और
शहरे भर में एक बडी भारी हलचल सी मच गयी। रात से इस
बात को छोड़ा और कोई भी वात किसी के मुह में नहीं है। वस
सवों के मुह में इसी घटना की चर्चा है।
पहले सयों ने यही सोचा था कि जिन आततायियों ने
मारवाडी की हत्या की है उन्हीं लोगों ने डाक्टर बाबू का भी सून
कर डाला है। किन्तु मारवाड़ी के रुपये पैसे सब चोरी चले गये
थे। अतः यदि वे ही रमेन्द्र की हत्या करते तो उसके पास जो
-
सत्रयाँ परिच्छेद
७१
कुछ था सब ले लिवा कर चले जाते, यों ही छोड़कर कभी न
जाते । किन्तु रमेन्द्र याबू को सोने को घडी-चेन उनके हाथ की
हीरे की अगूठी और उनके पाकेट के रुपये पेसे आदि सब कुछ
ज्यों के त्यों पडे हुए थे। एक भी चोरी नहीं गया था। इससे स्पष्ट
मालूम होता था कि पेसे को लालच से किसी ने उनकी हत्या
नहीं की है। क्योंकि यदि ऐसा होता तो वे लाग उनको अगूठी
घडी आदि कभी छोड न जाते । इस लिए सबों ने यही
खयाल किया कि जिन लोगों ने मारवाड़ी की हत्या की थी उन
लोगों ने रमेन्द्र वावू का खून नहीं किया । रमेन्द्रनाथ का खूनी
अवश्य कोई दूसरा है । अब यहाँ पर यह प्रश्न उठता है कि वह
कौन शख्स है ? उसने रमेन्द्रनाथ का क्यों सून किया? मधुपुर
में तो उनका कोई शत्रु नही था । तब फिर क्या किसी दूसरी
जगह से कोई आकर उनकी हत्या कर भाग गया। यस मधुपुर
के निवासी लोग इसी बात को लेकर हाट-बाट गली-कुचा घर
द्वार में बैठ उसको आलोचना कर रहे थे।
रमेन्द्रनाय की मृतदेह देखकर जाना गया किसी ने पीछे से
आकर उनके सिर पर लट्ठ जमायाथा। उसी चोट से ही वे
लड़खड़ा कर रास्ते के बगल में गिरपड़े थे। खूब सभव
है उनके सिर पर जो चोट लगी थी उसी से उनकी मृत्यु हुई
है । वे मर गये या जीवित है-इस बात को उनके हत्याकारी
ने पीछे लौटकर फिर देखा नही, उस समय फोरन वहाँ से
भागकर नो-दो ग्यारह हो गया।
उस जगह की मिट्टो पत्थर की तरह कडी थी। इसी से
उसके आसपास में किसी के पेर का दागभी नहां पड़ा था। कितने
आदमी उस समय वहाँ मौजूद थे-इसके भी जानने का उपाय
नही था।
.
-
७२
सहधर्मिणी
रमेन्द्रनाथ का नौकर बोला-"वह वाघ के आसरे बैठा
जाग रहाथा!रात के करीब दस वजे के अमल में बाहर उसे एक
शब्द सुनाई पड़ा था । किन्तु अन्धकार में शायद कोई चलते
चलते ठोकर साकर गिर पड़ा है सोच फिर उसने उधर उतना
ध्यान नहीं दिया। उसके बाद बहुत से लोग मारवाडी, सज्जन
को देखने के लिए वावू को बुलाने आये थे। उस समय भी
वावू घर लौट नही थे। रात का बारह वजा । तर भी बाबू
को
लौटते न देख हाथ में लालटेन लेकर बाबू को ढूढने बाहर
निकला था। बाबू को कहीं न देख वह घर लौटा आ रहा
था । मकान के पास आते हो लालटेन को रोशनी में उसने देखा,
मानों कोई रास्ते के किनारे गिरा पड़ा है। रोशनी रखकर
जब उसने अच्छी तरह देखा तो जाना कि उसके मालिक हैं।
तब उस समय भयभीत होकर उसने सबको इसकी सबर दीथी।
कहना व्यर्थ होगा कि प्रफुल्ल कुमार ने निरजन'माली और
सतोशचन्द्र के मुह से जो कुछ सुना था सबों से कह दिया।
निरजन को सब लोग पहचानते थे। उस पर सदेह करने का
कोई कारण भी नहीं था सुनरा उसकी बातों पर सहज ही कोई
अविश्वास नहीं कर सका । और सतीशचद्र बड़े आदमी ठहरे।
• यद्यपि वे अभी थोड़े दिन से ही मधुपुर आये हुए ये तथापि सब
लोग उन्हें, एक अन्छे भले आदमी कहकर जानते थे। इसलिये जो
कुछ उन्होंने बयान दिया उस पर भी किसी को अविश्वास करने
का साहस नहीं हुआ। तो भी इन दोनों आदमियों के दो
किसम की बातोंमे सभी कुछ न कुछ अवश्य विस्मित हुर। मात्र
असल कारण क्या है कोई इसको स्थिर नहीं कर सका।
जो हो, पुलिस निश्चिन्त चेठी नहीं थी। वे लोग एक साथ
इन दो खून के मामले की जाँच पड़ताल विशेष रुप से कर रहे
-
सत्रहवाँ.परिच्छेद
७३
थे । अत तीन दिन के भीतर ही पुलिस द्वारा मारवाडी के दोनो
खुनी पकड़े गये। ये दोनों ही वंडे बलवान दुपाध है । इनका
काम ही चोरी-डकेती करना है। विना कारण पुलिस ने इन
दोनों को पकड़ा नही है। मारवाडी के पास से जो कुछ चीजें
चोरी चली गयी थी पुलिस को वह सब उन लोगों के पास
मिल गयो । पुलिस ने इन लोगों के विरुद्ध और भी अनेक
प्रमाण अपनी तहकीकात से जुटा लिया था। उन सबों को यहाँ
पर लिखना इस समय विल्कुल व्यर्थ है।
पता लगाने पर मालूम हुआ कि कई दिन से ये दोनों दुपाय
मधुपुर में चकर लगा रहे थे। घूम घूम कर मौके को ढूंढ़ रहे
थे । इन लोगों के साथ दामन नाम का एक आदमी और भी
था। किन्तु पुलिस उसका कोई पता नहीं पा सकी। जो दो
आदमी पकड़े गये थे उन लोगों ने कहा कि न मालूम दामन
कहाँ चला गया वे लोग नहीं जानते ।
-मारवाडी और डॉक्टर दोनों प्राय एक ही समय मारे गये
थे यह भी एक प्रकार से अन्छी तरह सारित हो गया। लोग यह
समझ गये कि इन दुपाधों ने कभी रमेन्द्रनाथ का ग्यून नही
किया है वे दूसरे ही किसी मनुष्य द्वारा मारे गये हैं।
पुलिस मारवाडीके खूनी इन दोनो दुपाधों को गिरफ्तार कर
लेने के बाद रमे द्रनाथ के खूनी को पकड़ने की चेष्टा में विशेप
रूर से लग गयी।
इसी समय रमेन्द्रनाथ की वृद्धा माता अपने देश से मधुपुर
में आ उपस्थित हो गई। प्रफुल्ल कुमार प्रभृति अनेकों ने उन्हें
अपने यहां टिकने के लिए बहुत अनुरोध किया किन्तु वे कही
न टिक कर अपने मृत पुत्र के मकान में ही जाकर उन्होंने
आवय लिया।
सहधर्मिणी
अट्ठारहवाँ परिच्छेद
रे धीरे सगेशचन्द्र के ऊपर ही डाक्टर के खून
धी
का सदेह विशेष रूप से आ पड़ा। तब भी
मधुपुर का कोई आदमी उन पर सदेह नहीं
कर सका। कारण वे लोग यहनहीं जानते थे कि
रमेन्द्रनाथ के साथ उनकी स्त्री कापरिचय था।
और साथ ही रमेन्द्रनाथ के मन का भाव भी वे लोग जानते
नहीं थे इसी से लाचार उनके ऊपर उन लोगों का सदेह पूरी
तरह अपना जड़ नहीं जमा सका।
किन्तु हेमागिनी की बात सवों से अलग है । अपने स्वामी के
मन का भाव उनकी भयकर ईर्ष्या रमेन्द्रनाथ के ऊपर वि गतीय
क्रोध ये सभी हेमागिनी अच्छी तरह जानती थी। यही क्यों एक
दिन सतीशचन्द्र ने उसके सामने साफ कह भी दिया था कि वे
रमेन्द्र को भली भांति विधिवत शिक्षा देगे । इसके ऊपर उस
दिन सतीशचन्द्र बहुत रात गये मकान लौटे थे । और चोर की
भांति किसीसे कुछ बात न कर एक दम से सोनेवाले कमरे में
द्वार बद कर लिया था। अत में बहुत देर के बाद वे कपडा
लतो बदलकर बाहर चले आये थे । जो हो इन सब बातों से
सचमुच ही उनके ऊपर.सन्देह करने का कोई कारण नहीं था।
क्यों कि चे एक शिक्षित, चरित्रवान झानी, और अन्छे सज्जन
पुरुप सबके ऊपर वे उसके स्वामी हे। तव जिस समय उन्होंने
रमेन्द्र की हत्या की खबर दी था उस समय इस हत्या के सवधा
में कोई कुछ भी नहीं जानता था। जानने की सभावना भी
नही थी। फिर उन्होंने हो यह बात कैसे जानी ? अत' हेमा
गिनी इसी प्रकार आकाश-पाताल सोचने लगी। उसकी आँखो
अट्ठारहवाँ परिच्छेद
के सामने चारों तरफ अधकार हो अधकार दीख पड़ने लगा।
छाती भीतर ही भीतर जोर से धडधड़ करने लगी।
इसके सिवा सतोशचन्द्र हमेशा ही बाहर जाते समय
एक बड़ी सी लाठी हाथ में लेकर बाहर जाते । अत 'उस रात
को वे लाठी लेकर घर लौटे ये या नहीं इसको हेमागिनी ने देख
नहीं पाया तय भी फिर उस रात ले उसे आज तलक लाठी
दिखाई नही पडी। वह लाठी कहाँ चली गयी क्या हुआ
उन्होंने उस लाठी को फिर क्या किया? हेमागिनी ने सुना थो
कि किसी ने पीछे से उनके सिर पर लाठी मारकर उनकी हत्या
की है। स्वामी क ऊपर इस भीषण सदेह ने मानो हेमागिनी के
दिल ओ दिमाग में एक प्रचड आग का शोला जगा दिया। उसके
स्वामी ऐसा भयकर काम करेंगे इस बात को मानने के लिए
उसका मन तय्यार नहीं हुआ। किन्तु कार्य कारण के परस्पर
सयोग से सदह के घनीभूत न होने का और कोई उपाय नहीं
था। ता भी वह किसी प्रकार इस बात पर विश्वास नहीं कर
सकी। पाठक ! दाम्पत्य का ऐसा हो पवित्र बंधन होता है । यही
क्यो गुरु और इष्ट देवता की बातों में अनास्था भले ही कर
सकती है किन्तु पति का अविश्वास स्त्री कभी नहीं कर
सकती।
दूसरी दिन सतीशचन्द्र ज्यों हो घूमने के लिए बाहर निकले
त्यों ही मागिनी ने आकर झट शयनगृह का दरवाजा वन्द
कर लिया। उस हत्याकाड के दिन उसक स्वामी जो कपड़ा
पहनकर बाहर गये हुए थे वे हमेशा जिस लाठी को हाथ में
लिया करते थे वह सब कहाँ गया-क्या हुआ ? इसका पता
लगाने के लिए हेमागिनी व्याकुल हो पागल को भाति हो गई।
उसका विश्वास इस बात पर जम गया कि उसके स्वामी अवश्य
७६
-
सहधर्मिणी
उन सब चीजों को इसी घर में कहो छिपा कर रखे हुए हैं।
बहुत सभव है कि वे अपने खास वस में ही उन सब को
छिपा रखे हों । जब तक इस सबंध में सच झूठ की परीक्षा वह
कर न लेगी तब तक उसके मन को किसी प्रकार भी चैन नहीं
आवेगा यदि सत्य सत्य हो वह और अधिक दिन तक इस
अवस्था में रहेगी तो एक दम से पागल हो जायगी।
हेमांगिनी ने भीतर से दरवाजा बद कर लिया ओर घर के
कोने कोने एक एक ढूढने लगी। किन्तु वह जिस वस्तु को
दृढ रही थी वह कहो भी उसे नहीं मिली । तब फिर क्या
उसने जो सोचा है वही सत्य है ? सचमुच ही क्या उसके स्वामी
उस दिन के कपड़े लत्ते और लाठी अपने खास सदूक में छिपा
रखी है?
सतीशचन्द्र के पास बडो तीन चार सदूक थी । इन सव
सदूकों की चाभी वे स्वय अपनी जेब में रखा करते थे । हेमा-
गिनी अपनी खास चाभियों का गुच्छा लेकर उन सदूकों के
खोलने की चेष्टा करने लगी। बहुत कष्ट करने पर बहुन देर के
बाद उनमें से एक को वह खोल सकी। देखा उसमें वह सब
चीज नहीं हैं। फिर दूसरा वक्स खोला उसमें भी नही ।
उसके बाद तीसरा खोल डाला । उसीसमय माना सहसा किसी
ने उसकी छाती में जोर से धक्का दिया। उसने अपनी आँखों के
सामने चारों ओर अन्धकार हो अधकार देखा ।
३ उमी सदुक के भीतर वही लाठी दो टुकडे होकर टूटी पड़ी
है। न मालूम केसा एक काला सादाग लाठी के सिर पर पड़ा
हुआ है । ल ठो के नीचे ही वह धोती कमीज भी खून में सनी
हुई तरबतर है।
वह उसी समय धम्म से नीचे घुटना टेक बैठ पड़ी और
।
।
अट्ठारहवां परिच्छेद
मारे डर के उसका सर्वात थरयर कॉपने लग गया। उसके
खास प्रश्वास में दृष्टि में, नसनस में एक बहुत ही तीन बिजली
का प्रवाह खेल गया । तर पया सत्य सत्य ही उसके स्वामी
नरहन्ता हें ? क्या सत्य सत्य ही निरपराध बेचारे रमेन्द्र के सून
से उन्होंने अपना हाथ रग आला है ?
हेमागिनी की विचार शक्ति एकवारगी ही लुप्त हो गयी।
वह स्तम्भित और भयभीत होकर बहुत देर तक चेठो रहा। वह
क्या करता है-उसके स्वामी अवश्य ही यह जान जायगे । अव
जानकर ही क्या होगा ? अब उसका ससार में कोई किसी से
कुछ भी आस्था नहीं है । किसी का भरोसा नही । माया ममता
नही है। उसके हृदय की प्रथि छिन्न भिन्न हो गयी है। उसको
यदि कन्या-पुत्र न होते तो अब तक यह न मालूम क्या कर
डालती नहीं, कहा जा सकता।
इसी समय किसी ने दरवाजे पर जोर से धका मारा। इस
शब्द से हेमागिनी गायिद्ध हरिणी की भॉति जोर से उठ सड़ी
हुई । बाहर से घर की पुरानी दाई बोली-"कोई एक आदमी
आपसे मिलने आया है" इसका हेमागिनी ने न मालूम क्या उत्तर
दिया इसको स्वय उसने नहीं जाना । दाई फिर बोली-"कौन
तो एक आदमी आया है।"
कांपते, हुए हाथों से हेमागिनी ने सदूक को चंद किया।
इसके बाद धीरे-धीरे जाकर दरवाजा खोल दिया। दायी चोली-
"एक औरत आपसे मिलने आयी है। यह क्या ? बहिन !
तुम्हारी या केसी दशा है । तबीयत फुछ खराब तो नहीं है?
तुम्हारा मुँह आँख ऐसी, क्यों हो गयी है।
हेमागिनी ने पडे ही अस्पष्ट स्वर में कहा-"नहीं कुछ
नहीं। सिर में थोडा दर्द है। कौन औरत आयी है ? कह दो
७८ सहधर्मिणी जाफर कि मेरी तबीयत खराब है। सिर में भारी दर्द हारहा है। उसी समय दायों के पीछे से किसी ने कहा- सिर्फ दो एक बात मात्र करनी है-ज्यादा दिक न करूंगी।" स्त्री चुपचाप दायी के पीछे पीछे चली आयी थी। हेमागिनी स्त्री को देखते हो मात्र पहचान गयी थी। उनको देखते ही उसका हृदय और भी कॉप उठा। उसने अपने चारों ओर अध. कार ही अधकार देखा पाठक स्त्री और कोई नहीं रमेन्द्रनाथ की माँ हैं। कलकत्ते में एक बार रमेन्द्र को माँ से हेमागिनी की भट हुई था । ससार में इन्हीं एक गरीव माँ के सिवा रमेन्द्र का अपना कहनेवाला और कोई नहीं था। रमेन्द्रनाथ अपनी मां से कोई भी बात छिपाते नहीं थे। हेमागिनी की सभीवातें उन्होंने अपनी मां से कह दी थी। इसी से कलकत्ते में उनकी मां ने आकर हेमागिनी से एकवार भेट की थी। उसी दिन मे हेमागिनी उनसे बहुत डरती थी। क्यों डरती थी यह बात वह नही जानती। हेमागिनी रुद्ध कंठ से बोली-"आइए वैठिए । रमेन्द्र को मा आकर घर के भीतर पलग पर बेठ गयीं। जब तक दायी वहाँ से चली न गयी तब तक उन्होंने कोई बात नहीं कही । हेमागिनी को भी बात करने की ताकत नहीं थी। । दायी के चले जाने पर रमेन्द्रनाथ की मॉ बड़े ही गभीर भाव से धीरे धीरे वोलीं-"हमारे रमेन्द्र का किसने खून किया है, यही सुनने को मैं तुम्हारे पास आयी हूँ।" हेमागिनी को मालूम हुआ कि उसके पैर के नीचे की धरती धीरे धीर सरकती जा रही है। मानो किसी ने जोर से दोनों हाथो से उसका गला धर दवाया है। उनके सामनेही उसी वक्स । -- १ श्रवारहवाँ परिच्छेद ७8 के भीतर उनके पुत्र की हत्या का घोर ज्वलन्त प्रमाण छिपा हुआ रसा है । ओह ! यह कितना भयकर और कितना भीषण है। इसके सोचने की भी हेमागिनी का ताकत नहीं है। अत वह कोई भी बात अपने मुंह से नहीं कह सकी। रमेन्द्र की मॉ ने कहा-"तुम्ही ने मेरे लड़के को मार डाला है। खून किया है।" हेमागिनी अव और अधिक नहीं सह सकी रो पड़ी। उसके बाद नेत्रों से आँसू की धारा वहाते हुए बोली-"क्या मैने उनको मार डाला है । क्या यही बात कहते आप मेरे पास आयी है।" रमेन्द्र की मां-"मेरा बच्चा किस प्रकार मरा है। यह मैं सब सुन चुकी हूँ | किसने मेरे बच्चे की हत्या की है-मै रात- दिन यह बात सोच रही है। यहाँ के सभी लोग कह रहे हैं कि मेरा लड़का सभों का प्रियपात्र था सभी उसे दिल से चाहते थे। आज ही मेंने यह बात सुनी कि तुम यहाँ आयी हुयी हो। यह बात सुनते ही मेरे मन में हुआ कि जोह अब समझ में बात आ गयी कि मेरा वच्चा मेरा चाँदका टुकडा क्यों गया है । जानती हूँ-तुमने अपने हाथ से उसका खून नहीं किया-कर भी नहीं सकती। तो भी दूसरे के द्वारा उसकी हत्या करो सकती हो। क्यों यही तुमने नहीं किया है " हेमागिनी चुपचाप अपने ऊपर तीर चर्पण की तरह इन सब भयानक बातें सुनने लगी। इससे उसको क्रोध नहीं हुआ। वह चिनीत भाव से दुखित हृदय के साथ बोली-"आप ऐसी भयानक यात अपने मुंह से न निकाल | मेरे प्राण देकर भी यदि वे जीवित हो सकते तो में वह भी कर डालती-कभी पीछे म हटती।" - - सहधर्मिणी रमेन्द्र की मां तान दृष्टि से हेमागेनी के मुह की ओर ताकती रहीं । अन्त में वोली-"तुमने मेरे लड़के की सुख- शान्ति एकवारगी ही नष्ट कर डाली है। तुम उसके जीवन के साढेसाती शनिश्चर हो । इसी से उसको इस प्रकार मृत्यु में मेरा संदेह स्वभावत तुम्हारे ही ऊपर हो रहा है।" इन बातों पर भी उसे क्रोध नहीं हुआ। लज्जा और वृणा से मानो वह आप ही मरी जा रही थी उसी प्रकार के भान में बोली-"बोती हुई वातों को उभार कर मुझे और अधिक कष्ट न दीजिए । आप के लडके ने यहाँ हमारे बच्चे को रोग से प्राण रक्षा को थी । भला आपके लडके का अनिष्ट होऐसा काम मुझसे क्या हो सकेगा,- इस बार रमेन्द्र की मॉ बातो का सुर बदलकर बोली- "यह तो बताओ तुन्हें ऐसी क्यों 'देख रही है? तुम्हें हो क्या गया है ? यह शरीर की बीमारी हैं-ऐसा तो मालूम नही होता । यह तो हृद रोग (मन की बीमारी) है ! किसके लिए " हेमागिनी सरल हृदय से बोली-"आप से कोई बात नही छिपाऊँगी। आपके लडके की इस प्रकार आकस्मिक भीषण हत्या से में बड़ी हो दुखित हो रही हूँ। आप मेरी बातों का विश्वास करे-मैं उनकी मृत्यु को विपय कुछ नहीं जानती।" "और तुम्हारे स्वामी ?" "मेरे स्वामी ! वे भला उनका अनिष्ट क्यों करेंगे।" उस समय हेमागिनी के मन को अवस्था कैसी थी इसका वर्णन करना बहुत ही कठिन है उसके प्राण मानो छाती छोडकर वाहर निकल जान ही चाहते थे। रवामी की वह टूटी लाठी और खून से तर कपडो के दर्शन-इतने ही मात्र से वह एक प्रकार - 1
अट्ठारहवॉ परिच्छेद
ते अकाट्य प्रमाग पा चुकी थी कि रमेन्द्र की हत्या करनेवाला
कौन है । खूनी उसके ही स्वामी उसके पुत्र कन्या के पिता है !
और उसके सामने बैठो हुई निहत रमेन्द्र को माता है। जो
कभी उसकी भॉति अवस्था में नहीं पड़ा है वह भला उसकी
दशा का अनुभव केसे कर सकता है । अत हेमांगिनी की सास
मानों भीतर से बट होती आने लगीं।"
सशा रहित बेहोशकी भांति हेमागिनी बोली-“आह आप
कृपा कर ऐसी बातों को कभी अपने मन में स्थान न दीजिएगा ।
हम लोग आपके पुत्र का अनिष्ट करेंगे-यह असभव है।"
रमेन्द्र की मां उठकर खड़ी हो गयी और बोली-हेमागिनी
बहुत दिन पहले एक समय तुमने मेरा सुख-शान्ति सब नष्ट
कर दिया था। तुम्हारे हो लिए. उसने आज तक भी विवाह
नहीं किया । उस समय मैने तुमको कह दिया था कि यदि
तुम्हारा जीवन कभी दुस-यातना कष्ट और सताप से श्मशान
भूमि वन जाय तो उस समय तुम मन में समझ लेना कि तुम
अपने पापों का दण्ड भोग स्वय पा रही हो ! इस समय भी मैं
वही बात कहती हूँ। मेरी यह बात अच्छी तरह मन में गठिया
कर रख लेना।
हेमागिनी का कठरोध हो गया। सचमुच ही क्या उसके
पापों का दण्ड भोग जारभ हो रहा है? मोह ! केसी भीषण
समस्या है। ।।
रमेन्द्र की मां दरवाजे के पास, जा बढे ही गभीर स्वर में
बोली-"तो फिर तुम नहीं जानती, हो कि मेरे बच्चे की हत्या
किसने को है?"
हेमागिनी रुकती सांस ले पढे हो क साथ बोली-
"हम लोग गला फस जानेंगे ?"
६
-
।
सहधर्मिणी
रमेन्द्र की मॉ चली गयीं । उनके साथ जाकर उन्हें कुछ
दूर पहुँचा देना उचित है-ऐसा करने में भी उसे साहस नहीं
हुआ। वह उसी जगह धम्म से वेठ पडी। सारी पृथ्वी उसकी
आखों में चक्कर मारने लगी। एक भयकर स्वप्न विभीपिका
मानो उसके सामने जमाअत वाँध कर एकट्ठी हो गयी।
।
उन्नीसवाँ परिच्छेद
Maradesisxसी समय हेमागिनी के कानों में बाहर किसी का
पद शब्द सुनाई पड़ा। उस शब्द से उसके
प्राण एक दम कॉप उठे। फिर क्यारमेन्द्र की
मॉ लौट आ रही हैं ?
नही, इस बार वे नहीं है। हमागिनी ने एक
समाधान की सांस ली। उसी समय घर के भीतर मौसी मां
ने प्रवेश किया।
मौसी मां के भीतर आने पर भी हेमागिनी कोई बात
नहीं कह सकी । वे हेमागिनी की वगल में आ बैठ गयीं। कुछ
क्षण चुप रहकर योली-"बेटी! तुम्हारी यह शकल कैसी हो
रही है ? इस ओर भी क्या तुम्हारा कुछ ध्यान है ?
तर भी हेमांगिनी के मुंह से कोई बात निकल नहीं सकी।
उस समय उसमें वात करने की क्षमता नहीं थी।
मौसी मां धीरे धीरे बोलीं-बेटी ! यहॉ के सभी लोग
नाना प्रकार की बातें कह रहे हैं । हेम । में तुमसे दो एक बातें
करना चाहती हूं।
तो भी हेमागिनी चुप है। उसकी दृष्टि मौसीजा की ऑखा के
ऊपर लगी है, निश्चल, निस्पन्दनेत्र के साथ टकटकावधी हुई है।
T
उन्नीसवां परिच्छेद
M
मोसी बोली- देख हेम' किसने यह भयानक काम किया
और किसने नहीं किया यह सब में कुछ नहीं कहती। सतीश
ने उस दिन जो कहा था उसे यहाँ के सभी लोगों ने. अन्छी
तरह सुन लिया है इसी लिए अनेकों लोग अनेकों तरह की
बात कहते हैं । जितने मुंह उतनी तरह की बात हो रही हैं।
जिस समय रमेन्द्रनाथ के खून की बात कोई नहीं जानता था
उस समय हम लोगों के सतीश ने कैसे यह बात जान ली
कि रमेन्द्र मारे गये हैं ? केवल यही नहीं-केसे और किस
प्रकार से सून हुआ है यहाँ तक वह बता गया था। अत
जहाँ तक मैं समझती हैं यह बात न कहना ही उसके हक में
अच्छा था। मैं भी उस समय न समझ सकने के कारण प्रफुल्ल
बाबू के आगे कह बैठी थी। हम लोग स्त्री जाति ठहरी-कम
बुद्धि वाली ! न तो ज्ञान और न विचार ही हम लोगों में होता
है। इसी से बड़े बड़े लोग पहले से कहते आये हैं कि "स्त्री
बुद्धि प्रलयकरी" बुद्धि और विचार का तो हम लोगों में नाम
मान नहीं रहता। अब जो हो गया है उसका कोई उपाय नहीं
है। "बीती ताहि विसार दे आगे की सुधि ले" के अनुसार
जिसमें भविष्य में और कोई अनिष्ट न हो सके यही इस समय
करना होगा।
हतभागिनी केवल रुद्ध कठ से इतना ही बोली-"हा
भगवन् !"
"उपाय है। हेम"
"क्या उपाय है?"
"उपाय ? में और सुधाशु दोनों ही झूठ यात कहगे । जिस
समय पुलिस हम लोगो से पूछेगी-क्यो कि निश्चय ही वह
विना पूछे न छोडेगी। उस समय हम लोग एक दम बात को
४, - सहधर्मिणी उलटदगे । सतीश ने जो कहा है यह न कहेंगे। सतीश को भी हम लोगों ही की तरह बात करनी होगी!" "वे क्या कहेंगे "सुनो, सुधांशु कहेगा कि वह गिरिडी से रात को लौटते समय डाक्टर के घर के सामने से हो कर आ रहा था। उसी जगह बहुत से लोगों को एकट्टा देखकर वह भी वहाँ खड़ा हो गया। उस समय रमेन्द्र की मृतदेह उसने देख लिया था । क्या हुआ है यह सब उसने उन्हीं लोगों से सुन पाया था। उसके बाद उसी रात को हम लोगों के पास आकर उसने वह सब बातें कह सुनायी थी।" किन्तु यह सव वाते तो ठीक नहीं हैं।" "वह मैं भी जानती हूँ। किन्तु ठीक न होने पर भी इस समय सतीश को-यही कहना होगा। दूसरा कोई उपाय नही है । मैं भी कहूंगी भूलकर मैंने सतीश का नाम लिया था। खून की बात सुन कर माथा खराव हो गयाथा-ठिकाने पर नहीं था। इसीले सुधाशु का नाम न लेकर भूल से सतीश का नाम ले बेठी थी। सतीश भी भूल ही से माली की वात के साथ सुधाशु की वात ग. वडी में डाल वेठा था। वह उस समय नहीं जानता था कि एक साथ दो दो सून हो गया है। इसी से माली ने जिस सून की बात कही थीं सतीश ने उस सून को डाक्टर के सवध में ही समझ लिया था। ऐसी मूल प्राय हुआ ही ' करती है । हम सभी लोगो से भुल हो गयी थी। यह सब केवल भूल ही भूल मात्र है और कुछ नहीं है । हेम! सब बातें अच्छी तरह याद तो रहेंगी न? पुलिस के आने के पहले ही हम सबों को इस स ब में सब बातें ठीक-कर रख लेनी होगी यही उचित है।"
उन्नीसवाँ परिच्छेद ." हेमागिनी लडखड़ाती हुई अस्पष्ट स्वर में बोली-"हाँ मौसी मॉ। भगवान ने हम लोगों के भाग्य में यह भी लिख दिया था- मोसी-जाने दो इस समय उन सब बातों को। दूसरी बातो का इस समय काम नहीं है। इस समय जिसमें सतीश की रक्षा हो-हम सवो का मान सभ्रम अछूत बचे वही करना होगा। इस समय और कुछ भी सोचने विचारने की आवश्य- कना नहीं है। "और-और सुधाशु फ्या- "उसके बारे में तुम निश्चिन्त रहो ! वह ऐसा मूर्ख नहीं है। मैंने उससे सलाह करके सब ठोक कर लिया है। वह ठीक कहेगा। इसके लिए कोई भय नहीं सौभाग्य का विषय है कि उस दिन रात को सतीश नौकर चाकरों के सामने कोई बात नहीं कह बैठा। हेमागिनी कुछ नहींगोली-चुपचाप बैठी रही। मौसी माँ वोली-"देखो, सतीश को यह सब बातें कह कर अच्छी तरह समझा देना । जिसमें वह भी ठीक यही बात कहे। ऐसा होने से उसकी बातों से लोगों को जो सदेह हो रहा है वह सब दूर हो जायगा । वस सव गडवड़ी मिट जायगी । मौसी माँ चली गयी। हेमागिनी उसी जगह हाथ बांधे शून्य हृदय, पत्थर की मूर्ति की भॉति वैठी रही उसे मालूम हुआ कि मानो उसका माथा फटा जा रहा है। अत बहुत देर के बाद वहाँ से उठ बन्चे की कोठरी में जाकर सो गयी। मौसीमा ने जो यातें स्वामी से कहने को कही हैं वह अय उन्हें कैसे कहेगी । यह कहना क्या सभव है हेमागिनी सारा दिन यहा शोचती रही। सतीशचन्द्र बाहर चले गये थे। अत 1 सहधर्मिणी अकेली विस्तरे पर पड़ी वह इसो को चित्ता करने लगी। किन्तु सोचते सोचते सारा दिन बीत गया. तब भी वह कोई यात स्थिर न कर सकी। सन्ध्या को सतीशचन्द्र घर लौट आये। वे हेमांगिनी को सोती देख बोले-"या तवीअत: ज्यादा खराब तो नहीं हो गयी है ?-. हमागिनी सूखे कठ से चोली-"हाँ, कुछ खराब है।' "अच्छा तो अपने कमरे में जाकर थोडी देर सो जाओ। इससे शरीर हल्का और ठोक हो जायगा।" "नहीं यहीबहुत अच्छी तरह से हूँ।" सतीशचन्द्र सिर नीचे किये स्नेह के साथ मृदु हँसी हॅस कर हेमांगिनी के गोरे-गोरे गालों का चुम्बन लेने को तैयार हुए । हेमांगिनी बड़े ही कातर कठ से अर्द्ध स्फुट स्वर में आ नाद कर उठो और तकिये में मुंह छिपा कर रोने लगी। उस समय धीरे धीरे रात होती आ रही थी। घर के भीतर थोड़ा- थोड़ा अन्धकार जमा हो गया था। उसी अन्धकार में सतीश आसुओं से तर अस्त होते हुए चन्द्रमा की भॉति हेमागिनी का पीला मुखमडल देखपाये या नही-कह नहीं सकते ।। सतीशचन्द्र के ललाट में सिकुडन पड गयी। वह कोमल स्वर में बड़े ही दृढता के-साय वोले-"ओह । कैसा झूठा विश्वास इस सिर के भीतर आ घुसा था। मैं कहता हूँ। सम्पूर्ण भूल सम्पूर्ण भूल सिर से पैर तक केवल भूल ही भूल मात्र है । और कुछ नहीं। इसके बाद और कुछ न कह वह घर से बाहर चले गये। धीरे-धीरे सन्ध्या पूर्ण रूप से, हो गई । अन्धकारने एक पैर दो पैर करके वीरे-धीरे अपना दखल जमा लिया। सन्ध्या S -- - -
८७
वीसवाँ परिच्छेद
के बद सुविधा पाकर मौसी माँ ने आकर पूछा-"क्या तुमने
सतीश से यह सब बाते कहदी है न ?""
हेमागिनी बड़े हो खिन्न और कपित स्वर में बोली-"मौसी
माँ! तुम्ही कह देना-मं कह न सफेंगी।
वह कुछ देर चुप रह कर धीरे-धीरे बोली-"देखती हूँ
लाचार हमी को कहना पडेगा। सताश को सर वाते जान लेना
नितान्त ही उचित है।
हाय ! हेमागिनी के हृदय में जो दारुण देवासुर का द्वन्द
युद्ध मच रहा है उसे मला कौन समझ सकगा? उसके स्वामी
हत्या कारी-सूनी है। नहीं नहीं क्या ऐसा भी कभी हो सकता
है। न होगा क्यों ? प्रमाण तो बड़े ही ज्वलन्त ऑसों के सामने
है। ओह नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता। इस समय उसका
'हृपिण्ड वक्ष स्थल को भेदन कर गहर निकल पड़ने की
तयारी कर रहा था।
hou
बीसवाँ परिच्छेद,
सरे दिन इन्स्पेक्टर ने आकर 'रमेन्द्रनाथ की
HD- हत्या के सम्बन्ध में जिसे जो बात मालूम थी,
एक एक कर सयों का इजहार लेना आरम
किया। पहले ही रमेन्द्रनाथ के खानसामा
का इजहार हुआ। उसने केसे करजोर
कहाँ अपने मालिक की लाश देखी धी पक पक सभी उसने
अपने स्थान में कह सुनाया।
अपने इस नौकर को रमेन्द्रनाथ विशेष प्यार करते थे वह
अपने मालिक को मृत्यु सम्बन्ध में इजहार देते देते एक दम रो
H
-
सहधर्मिणी
पडा । उसके दोनों गालो से शराझर ऑसुओं की धारा वह कर
नीचे जमीन में गिर पड़ने लगी।
रेलके डाक्टरवा ने रमेन्द्रनाथ की लाश की ,जॉच की थी
अत. वे भी वहाँ उपस्थित थे। इन्स्पेक्टर साहब के पूछने पर
कि रमेन्द्रबाबू किस प्रकार मारे गये, वे बोले-"किसी ने पीछे
से हो का रमेन्द्रनाथ के सिर पर बडो भारी लाठी जोर से मारी
है । उसी चोट से वे तलमला कर सड़क के किनारे गिर पड़े
ये-और गिर पड़ने के साथ ही उनकी मृत्यु हो गई है,।
वहॉ से होकर इन्स्पेक्टरसाहव सतीश के मकान पर आ
उपस्थित हुए । वहाँ उन्होंने सतीशवाबू के नौकर चाकरो के मुंह
से सुना कि रमेन्द्रवायू उस रात को आठ के अमल में वहाँ से
चले गये थे। हेमागिनी ने भी इस बात को स्वीकार किया।
जर इस्पेक्टरावू ने उससे पूछा तो उस दिन की सारी घटना
कह कर घह वोली-'' डाक्टरवाबू प्रायः आठ के अमल में यहाँ
से चले गये थे।"
उसके बाद सुधाशु का बयान लिया गया । उसने
कहा--"मैं रात की गाड़ी से गिरिडी से लौटकर मधुपुर स्टेशन
होता हुआ सतीश भय्या के घर आरहा था। उस समय रात
विशेष जा चुकी थी। मालूम होता है एक बज गया था ! डाक्टर
रमेन्द्रबाबू के मकान के सामने आकर देखा-उनके मकान के
दरवाजे पर बहुत से लोग जमा हो कर बड़ा हल्ला मचा रहे हैं।
मैं मामला क्या है जानने के लिए उसी भीड़ के नजदीक जा
उपस्थिति हो गया। एक आदमी से मामला क्या है पूछने पर
वह बोला-"डाक्टरवावु मारे गये है--किसी ने उनकी हत्या
कर डाली है मधुपुर आतेही सहसा इस खून की खबर पाकर
न मालम कसा मेरा मन आपही आप भीतर दब गया। हृदय
ग
+
बीसवाँ परिच्छेद
४
खल वली मच गयी। मैं घर पहुँचतेही सब बातें सतीश भय्या
से कह दी वहाँ उस समय प्राय सभी लोग घर के उपस्थित थे
पुत्र ने जो कहा माता ने भी उस की बातों का समर्थन
किया । इन्सपेक्टरवावू के पछते ही चे बोलीं-"सुधाशु के उस
दिन आने की बात नहीं थी । एकाएक उस रात को सुधाशु को
श्राते देख मेरा प्राण भय से थर २ काप उठा था। वह आकर
बोला-"गिरिडी में काका जी नहीं हैं। इसी से मैं रात की
गाटी से ही लौट आया। स्टेशन से आते २ देसा यहा एक
खुन हुआ है वे यहा के एक अक्टर थे। नाम उनका रमेन्द्रनाथ
घोप है। इस तरह यहा एकाएक खून हो गया है सुन हम
लोग मारे डर के एक बारगी ही काठ हो गये।"
उनके चुप होते ही इन्सपेक्टर साहब ने विस्मित होकर
पूछा-"किन्तु यह बात तो आप ने प्रफुल्ल कुमार चाकू से नहीं
कही। आप ने उनसे कहा था कि रमेन्द्र वाव के खून की बात
सतीश बाबू ने हो श्राप से पहले पहल कहा था। आज फिर
यह दूसरी बात कहने का क्या कारण है "
इन्सपेक्टर की बातों के उत्तर में मौसी मा ने कहा-'दो
खून हो गया है यह बात हम लोग नहीं जानते थे। इस के
अतिरिक्त इस खून की बात सुन कर हम लोगों का एक दम
माथा चकरा गया था, होश हवाश ठिकाने नही था। इसी से
यह भूल हो गई थी उसके बाद जिस समय सुधाश ने हम
लोगों की भूल सूझा दी उस समय समझ में आया कि सून
की बात सुधाशु ने ही आकर पहले पहल हम लोगों को
कही थी।
सर के बाद अन्त में सतीशचन्द्र का इजहार हुजा वे
चोले-"मकान लौटते समय मेने निरजन माली के मुह से
.
से। ઢ ६० सहधर्मिणी सुना था कि न मालुम कौन एक आदमी मारा गया है। उसक बाद सुधासु ने आकर डाक्टर के खून की बात कही। इस इसो से लाचार न मालूम कैसी एक गडबडी सी हो गयी थी। मेरी धारणा बराबर यही थी कि निरजन माली ने ही मुझ डाक्टर के खुन की बात कही थी। एक साथ एकही रात में २ सूब हो गया है यह बात सिल्कुल ही में नहीं जानता था इसी से यह भूल मुझसे हो गयी थी। इन्सपेक्टर बाबू जिस समय सतीश वावू के मकान में इजहार लेने आये थे उस समय वहा प्रफुल्ल कुमार वावू प्रभृति कई एक भले आदमी भी उपस्थित थे। इन्सपेक्टर के चले जाने पर प्रफुल्लयुमार वावू हंसते २ सतीश चन्द्र के मुह की ओर ताक कर वोले-"तुम्हारी एक बात और माली की दूसरी बात सुन सचमुच हो में हम लोगों के मन में एक विपरीत दुर्भाव का उदय हो आया था। अव समझ गया कि तुम से ऐसी भूल क्यों हो गयी थी। ऐसी दशा में भूल विचित्र बात नहीं है। मधुपुर ऐसे छोटे शहर में एकही रात एक साथ दो २ यून हो सकेगा इस बात की कोई सहज करपना तक भी नहीं कर सकता।' सतीशचन्द्र प्रफुल्लकुमार को बीचही में रोक कर घोले-मेने माली के मुह से सुना-एक खून हो गया है उसके बाद सुधाशु आकर बोला--"डाक्टर बाबू का खून हुआ है। किसी ने उन्ह डडे से मार कर सड़क के किनारे फेंक दिया है। उसी से ही मेरे मन में हुआ था कि माली ने ही डाक्टर बाबू का नाम लिया है। और भी दूसरा सून हो गया है यह वात एकार भी मेरे मन में नहीं आयी।" - प्रफुल्लकुमार समाधान की सास लेकर बोले-इतने दिन हो जाना कोई , वीसवाँ परिच्छेद के बाद जाज मामला क्या है साफ समझ में आगया।, इतने होसे में विशेष सतुष्ट हुआ है। प्रफुल्लकुमार के चुप होते ही सतीशचन्द्र ने पूछा-"भला पुलिस डाक्टर के खून के सबंध में क्या कहती है ? वे लोग क्या यही तो नहीं कहते कि दुसाधों के दल के किसी भी यद- माश ने डाफ्टर की हत्या नही की है? प्रफु०-हो,पुलिस का कहना है कि दुसाधों के दल का कोई मी आदमी डाक्टर की हत्या कर डालेगा इसकी सभावना बहुत कम पायी जाती है। वे लोग सिर्फ पैसे के लिए ही मनुष्यों की हत्या करते है। किन्तु यहा तो डाक्टर के रुपये पैसे घड़ी चैन कुछ भी चोरी नही गया है। सब के सब उसी तरह अछूत डाक्टर की लाश क साथ पाये गये हैं । सतीशच जरा जनमना सा होकर बोले-"यह बात तो निश्चय ही है। तव डाक्टर का सून किया किसने ? - प्रफुल्लकुमार चिन्तित भाव से वोले-'स्थानीय पुलिस तो कुछ भी स्थिर न कर सकी है। सतीश यात्रु! हम लोगों ने यहा आपस में चदा कर कुछ रुपया इस्हा कर लियाहै।जोव्यक्ति डाक्टर के सूनी का पता दे सकेगा हम लोग उसी को वह ईनाम दंगे। इस पर सतीशचढ़ विशेप आग्रह के साथ बोल उठे-"मैं भी चदा देने को तैय्यार हूँ । रमेन्द्र धावूका खूनी जिसमें पकड जाय इसके लिए आप लोग मुझे जो कुछ भी करने को कहगे मैं उसे करने को सर्प तेयार हूँ। विशेषत यह इस प्रकार एक साथ एक ही रात में दो दो सून हो जाने से सभी बड़े ही भयभीत हो पड़े हैं। हमारी स्त्री तो इतनी डर गयो है कि वह अब यहां रहना ही नहीं चाहती है। पर वह कुछ नहीं । यह वताइये कि आप लोगों में किसने किसने कितना २ चदा दिया है।
६२ सहयर्मिणी प्रफु०-अभी विशेष किसी ने कुछ दिया नहीं है तब भीसयोन दश २ रुपया कर पाच सौ एकट्ठा कर लेंगे ऐसासोच रखा है। सतीशचर मृदु हैं की हंसकर बोले-"गव सौ रुपया विशेप कुछ भी नहीं है में समझताह इतने से कोई भी काम नहीं बन सकेगा। प्रफु-मधुपुर ऐसे छोटे शहर में पाच सौ चन्दा उठानाही पड़ी भारी बात है। इससे अधिक की समावना ही नहीं है। अन्छा आप के नाम कितना चन्दा लि। " सतीशचन्द्र के कण्ठ मे एक गंभीर स्वर वाहर निकला पांच हजार रुपया।" पाँच हजार रुपया ! प्रफुल्लकुमार और वहाँ दूसरे जोर लोग उपस्थित थे उन सब लोगों ने इस आशातीत कल्पना के बाहर रुपये की बात सुन बड़े ही विस्मित हो सतीशचन्द्र के मुख ओर ताफा । रमेन्द्र सतीशवाबू के होते कौन हैं कि वे उनक लिए इतना रुपया खर्च करने को तैय्यार हैं। सतीशचन्द्र उन लोगों के मन का भाव समझ कर बोले- "पाँच हजार रुपया अधिक कुछ नहीं है। डाक्टर बाबू का सूनी यदि इससे पकडा जाय तो मै सहर्ष इतना रुपया देने को तय्यार है। दिन ढल रहा है देख प्रफुल्लकुमार और दूसरे सब लोग उठ कर अपने २ घर चले गये । सतीशचन्द्र उसी जगह स्तब्ध होकर वैट रहे । उनके मन में विन्दु मात्र भी शान्ति, नही थी। सारा ससार उन्हें गाढ़े अधकार में या हुआ दीख पडा पृथ्वी उनके नेत्री के सामने पहिलं की भाँनि चकर खाने लगी। उन्हें चारों ओर केवल अपार अनन्त, सीमा हीन भीषण,महा मरु ही मात्र दिखाई पडने लगा। की - -- J
इचीसवां परिच्छेद
६३
इक्कीसवाँ परिच्छेद
सव तक सतीशचन्द्र बाहर बेठक में बैठे रहे इस
वात का स्वय उन्ह सयाल नहीं था। एकाएक
न मालुम क्या सोच कर ये झट उठ खड़े हुए
और धार २ घर के भीतर चले गये। भीतर
जाने पर उन्होंने सुना कि हेमागिनी सोने
वाले घर में सोई 'हुयी है । आज एकवार के लिए भी नही
उठी। उसका शरीर विल्कुल ही सुस्त है । अत सतीशचन्द्र ने
स्त्री को देखने के लिए धौरे २ उसी घर में प्रवेश किया
हेमांगिनी पलग पर सिड़की की ओर मुह किय अनमनी सी
होकर लेटो हुई थी। स्वामी के पैर की आहट से विचलित हो
उन्मने घबड़ा कर दरवाजे की ओर ताका। सतीशचन्द्र की
दृष्टि पत्नी के ऊपर जा पडी। उन्होंने देखा उसके सारे सुन्दर
मुस मडल में मानो एक काली विवाद की रेखा खींच गयी है
धीरे २ पत्नी के पास आकर उन्होंने पूछा-"मेने सुना है आज
सारा दिन तुम सोती रही हो। कहो कोई विशेष तकलीफ
रकलीफ तो नहीं है "
हमागिनी ने अपहो 'विषाद पूर्ण उतरे हुये शुष्क मुख
मडल को स्वामी की ओर फेर कर जरा तेज नजर से उनके
मुह की ओर देखा । उस दृष्टि की प्रखरता सतीशचन्द्र सहन
नहीं कर सके। उन्होंने अपनी दृष्टि झट नीचे की ओर कर ली।
हेमागिनी कुछ देर तक उसी एक, भाव से स्वामी के मुह की
ओर देखती रही। इसके बाद सहसा वोल उठी-'अव तुम
इस समय क्या करोगे कुछ स्थिर किये हो? मुझसे साफ कह
दो। मेरी समस्त' छाती टूट कर चूर २ होने की भांति हो
रही है।
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६४ सहधमिणी m - सतीशचन्द्र पत्नी की इन बातों का अर्थ अच्छी तरह समझ नही सके । हेमागिनी सहसा उनसे यह प्रश्न क्यों कर बैठी अत सतीशचन्द्र एक बड़ी, ही विस्मय जनक दृष्टि से स्त्री के मुह की ओर देख बोले- 'तुम्हारी इन बातो का अर्थ में अर्छ तरह समझ नही सका है। अब इस समय तुम क्या करोगे एकाएक तुम्हारे यह प्रश्न करने का मतलब क्या है हेमागिनी दातो से होठ दवा कर अपने को थोड़ा संभाल कर दृढ स्वर में बोली-"अर्थ! अर्थ तो साफ जाहिर ही है . जाने दो, अधिक कहने की जरूरत नहीं है। मैं जानती हूँ। रमेन्द्रवावू का किसने खून किया है।" पत्नी की इस बात से एक विपाद की हसी सतीशचन्द्र के मुखमडल पर मानो शुक्ल पक्ष की पचमी की धीमी चाँदनी क्षण भर के लिए मेघों से मुक्त को भाति दीख पडी। अस्तु वे सहज कठ से बोले-"तुम कुछ भी नहीं जानती।" हेमागिनी का स्वर गाढा होता आ रहा था। अतः वह उसी स्तर में बोली-"मैं तुमसे तर्क करना नहीं चाहती। मुझमें वह ताकत नहीं है। मौसी मा और सुधाशु भी जानते हैं कि रमेन्द्र का खूनी कौन है । और उसका प्रमाण इसी घर में मौजूद है।" पन्नी की इन बातों से सतीशचन्द्र का मुह एक दम पीला पड़ गया। वे बडे ही विचलित कंठ से बोल उठे-"इसी घर में वह क्या।" हेमांगिनीकी सास बडी तेजी से चल रही थी। वह एक छाती फोडने वाली लम्बी सास लेकर पोली-"तुम्हारी वही लाठी टूटी लाठी और खून से तर तुम्हारा वही कपड़ा।" पत्नी की बातों से सतीशचन्द्र का मुहमारे क्रोध के लाल हो उठा था। उन्होंने बडी ही मुश्किल से अपने को सभाला। - M
इक्कीसवां परिच्छेद
उसके बाद बडे ही कठोर स्वर में बोले- क्या चाभी चुरा
कर तुमने मेरो सन्दूक सोली थी?
हेमागिनी बडे ही धौर जोर गभीर स्वर में बोली-"हॉ में
ने मैने ही खोली थी । जाने दो उस वात को। तुम सूनी हो ।
तुमने हो रमेन्द्र बाबू की हत्या की है। अब तुम्हारे साथ एकत्र
मैं रह नहीं सकती। रहना असभव है। मेरे बाल बच्चे न होते
तो मैं कभी को यहा से चली जाती । तुम मेरे स्वामी हो मैं तुम्ह
कुछ भी नहीं कह सकती। तव भी मेरा तुमसे कातर विनती
यही है कि जितना शीघ्र हो सके तुम यहा से चले जाओ।"
सतीशन्नन्द्र सन्न होकर स्त्री की बात सुन रहे थे। वे एक
उदास हसी हसकर बोले-"आरम से लेकर अन्त तक सारा
मूलही भूल है। हेम ! विवेचना शक्ति को सो मत दो । विचार
से काम लो।
हेमागिनी के दोनों सुन्दर गालों से आसुओं की धारा यह
रह थी। वह लडखडाती जान से वोली-"जो कहती हूँ
उसे अन्छी तरह सुन लो । जाओ! देश में जाकर रहो। मैं
अपने पुत्र कन्या को लेकर पिता के घर जा रहूँगी।
सतीशचन्द्र फिर बोले-"देखो हेम! तुम बडो ही भूल
कर रही हो।"
"मैं मन ही मन यह वात स्थिर कर चुकी हूँ। में-मै-"
हेमागिनी वात खतम नहीं कर सकी। आसुओं के वेगसे उसका
गला बद होता आ रहा था। वह तकिये में मुह छिपा कर रोने
लगी। बहुत देर के बाद बड़े ही कातर कठ से बोली--"आजसे मैं
जीते जी मरी के समान हो गयी । मेरा सर्वस्व लुट गया एक दम
निराश्रया, इस विशाल विश्व ससार में अकेली हूँ । न मालूम
क्व तुम पकडे जाओ, कब तुम्हारा-ओह! केसा सर्वनाश है।"
- ६६ सहधर्मिणी हमागिनी इसके आगे और नहीं बोल सकी। न मालूम किसने उसका गला चाप दिया। सतीशचंद्र बाधा देकर बोले-"चुप! चुप । तुम जा यात सोच रही हो यह बात नहीं है। मने सून नहीं किया है में सूनी नही हूँ।" हेमागिनी कातर कठ से बोली-'मै-मैं सतीशचन्द्र उसे बोच ही में रोक कर बोले-"अच्छा ठहरो अपनी बात भी रहने दो। आज हो तुम यहा से चली जाना चाहती हो या जितने दिन तक यह मकान माडे पर लिया गया है तब तक यहा रहोगी" हेमागिनी ने स्वामी क मुह की ओर देखा। इतनी जल्दी वे उसके प्रस्ताव पर राजी हो जायगे इसको उसने सोचा नहीं था। वह कुछ देर तक स्वामी के मुह की ओर ताकती रहने के वाद न मालूम क्या कहने जा रही यो, कि सहसा आंसुओं की की झड़ी से उसका गला वध गया उसके मुह से एक भी बात बाहर नहीं निकली। वह विहल दृष्टि से स्वामी के मुह की ओर देखती रही। सतीशचद्र मृदु स्वर में बोले-"घवडाओ। नहीं। सुधाशु रहेगा मौसी मां रहेंगी। नौकर चाकर सभी रहेंगे । जब तक मकान का भाडा पूरा न हो जायातब तक तुम यही रहो । इतनी जल्दी सब के सब यहा से चले जाने से केवल लोगों का सदेह मात्र बढेगा।" सतीशचन्द्र की बात आग में तपाये हुए लोहे के फल के समान उसके कोमल कलेजे जा चुभो । हेमागिनी स्वामी की बातों के उत्तर में एक भी वात नहीं कह सकी । वह सिर्फ तकिये में मुह छिपा कर रोने लगी। अपलानो को रोने के सिवाय और 'क्या आधार, सहारा हो सकता है ? जिसके एक मात्र जीवन के साथी, इस काल, परकाल के अभिन्न वधन, हलाहल । - इपीसों परिरउंद ६७ पान कर ये है, उसका अब और क्या उपाय हे? अय और यह क्या करेगी? आत्म हत्या, बाइस दायग उस ओर क्लेश के बोझ मे छुटकारा पाने के लिए बस सिर्फ यही एक अमोघ औषध है, इसमें सदेह नही 1 फिन्तु परित्र चरित्र पतिनता, आत्महत्या क्यों करेगी। यह जानती है कि जिस गुरुतर पापों के फल से उसकी यह मनोव्यथा इसका पूर्ण मोग समाप्त हुए विना आत्महत्या से छुटकारा पाने की चेष्टा केरल मूर्खता मात्र है । देह-त्याग से क्या कर्म फल का भोग मिट जाता है। आत्म हत्या से सिर्फ और पापो का मोगमात्र बगा। फिर आत्म हत्या से लाम अस्तु, हमागिनी का जीरन इस समय अविराम दुखमय जशेप फ्लेशों का घर हो गया है। फिर उसके ऊपर मृत्यु और भी भयकर है। x x x सतीशचन्द्र इतनी जल्दी इतने सहज स्त्री पुत्र परिवार को त्याग कर भाग रहे हैं, क्यों? तब क्या वे समझ गये है कि फॉसी के तप्ते से बचने का केवल एकमात्र उपाय भाग जाना है,भागने से जान पच जायगी! उस रात को उस कुसाइत में यदि वे सबसे पहले रमेन्द्र केसून की यातकहने न जाते तो आज कोई भी उन पर सदेह न करता ! फुयों ऐसे घोर पागलपन के श होकर वे ऐसी भयकर 'मूर्सता का काम करने गये थे? इसका एकमान उत्तर है-होनहार। ब्रह्मा का लेख अमिट है। भला किसकी शक्ति है, कि उसे रोक सके। जो होने को है वह होकर ही रहेगा। सदा से ऐसा ही। होता आया है, मनुष्य की सामर्थ्य क्या है कि उसके विरुद्ध कर सके। मतोशचन्द्र घर मे बाहर जा रहे थे,ौट कर बोले- "रमेन्द्र के सूनी को जो पकड़ा दे सकेगा उसे पाच हजार रुपया इनाम देने की बात मैंने कह दी है।" . --
६८
सहधर्मिणी
हेमागिनी ने मन में समझा-उसे चिढाने के लिए ही मानी
उसके स्वामी यह बात सुना रहे हैं। मानों मरे पर और तलवार
का घाव लगाना ही उनका उद्देश्य है। वात सुनते ही उसकी
छाती फटकर टुकडे २ होने के समान हो गणे। सतीशचन्द्र
इसके बाद और एक बात भी नहीं बोल । केवल एक वार उदास
दृष्टि से पत्नी के मुह की ओर देस वे धीरे २ घर से बाहर
हो गये।
स्वामी के घर से बाहर होने के साथ ही साथ हेमागिनी का
जडीभूत हृदय और भी अवसन्न हो पड़ा, • कलेजा एक दम मुह
को आ गया। उसे चारों ओर केवल, अधकार हो अधकार
मात्र दीख पडने लगा । मोसी हेमागिनी के, मन की बात
जानती थी । सतीशचढ़ के चले जाने क कुछ देर बाद वे आकर
हेमांगिनी की बगल में बैठ गयीं। किन्तु एक भी बात उनके मुह
से नहीं निकली। उस समय हमागिनी को चेत है या नहीं।
वह जाग रहो है अथवा सोई है ! जीवन मरण के संधि-स्थल
सड़ी हो न मालूम वह क्या स्वप्न देख रही है, कौन जाने।
में
4
बाईसवाँ परिच्छेद
सी दिन गत को सतीशचंद्र कलकत्ता चले गये
क्योंकि. मधुपुर में रहना उनके लिए असंभव
हो गया था। चारा ओर से नाना प्रकार की
विभीपिकाओं ने आकर उनके समस्त प्राणों को
एकबारगी ही अशान्ति का घर.चना डाला था। इसी से थोड़ी
शान्ति पाने के लिए प्रथम सुविधा में ही वे मधुपुर छोड़ चले.
गये। हेमागिनी ने भी सोचा था कि जहाँ तक शीघ्र सभत्र
वाईसा परिच्छेद
हो वह भी मधुपुर परित्याग कर चली जायगी। किन्तु उसके
भाग्य ने ऐसा होने नहीं दिया। दूसरे दिन उसे यहे जोर का
बुखार चढ़ आया। पर चढ़ने के साथ ही साथ वह यक झक
भी करने लग गयी। घर के सभी लोग हमांगनी के लिए
घरडा गये। डर से सनों का हृदय बड़ा ही चचल हो उठा ।
उस समय यदि सुधाशु और उसकी मा वहाँ न होती तो न
मालूम क्या हो जाता। इसे केवल एक भगवान ही जान
सकते हैं।
अव रमेन्द्र बाबू हैं नहीं कि जो उसकी चिकित्सा करगे।
रसो मे लाचार रेलवे के डाक्टर यात्रु बुलाये गये।वे ही हेमागिनी
की चिकित्सा करने लगे। ज्वर के विकार में यक झक करते
समय शायद रमेन्द्र बाबू के खून के सबन्ध में हेमागिनी कोई
बात कह न बैठे और पीछे कोई उसे सुन पाये ते वडा अनर्थ'
होगा। यह सोच मौसी किसी को भी हेमांगिनी के पास जाने
नहीं देती थीं। सर्वदा चे या उनके पुत्र सुधाशु हो हेमागिनी
के पास रहा करते अत इस वार मौसी ने एक बड़े ही अनुभवी
शानी और वयोवृद्ध जननी के समान काम किया।
एक दिन घर के किसी एक विशेष काम का वन्दोवस्त
करने के लिए मौसी अपने पुत्र को हेमागिनी के पास रख कर
रोगिनी के घर से बाहर चली आयीं। उनको वहा से बाहर
चली आती देख हमागिनी की पुरानी मजदूरनी झट रोगिनी
पास जाकर बैठ गई। हेमागिनी ज्वर में बेसुध हो पड़ी
थी। अत ज्वर के झोंक में धीरे २. वहः रमेन्द्रनाथ का नाम
ने लगी। इस घटना से बेचारा सुधाशु बडा ही भयभीत
हो पडः । कारण, हेमागिनी ज्वर के वकझक में सिर्फ रमेन्द्रनाथ
का नाम मात्र ही लेती हो, यह नहीं। साथ साथ उनके खून
-
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१०० सहधर्मिणी के सवध में हो अनेकों प्रकार वे सिरस्पर की गते उसके कण्ठ से बाहर निकल आ रही थीं। उस समय सुधाशु के मन में हो रहा था कि पुरानी मजदूरनो पास में आ बैठी है। ऐसे, समय उसे चले जाने के लिए कहना भी असभव है और उसके ऊपर किसी प्रकार का विश्वास किया जाय, यह भी अनहोनी बात है। ऐसी अवस्था में जो कुछ न हो जाय थोडा है। उसी समय घर का काम समाप्त,कर मौसी ने घर के भीतर प्रवेश किया। उनको घर के भीतर आती देख पुरानी मजदूरनी झट वोल उठी-"मौसी वहिन तो ज्यर के झोंक में केवल मात्र रमेन्द्र बाबु का नाम लेकर अट सर वक रहो हैं । वावू के साथ न मालूम कैसा डाक्टर बाबू का भारी झगड़ा था। हाँ, मॉजी ! बार २ वहिन डाक्टर बाबू का नाम क्यों ले रही हैं। सत्य ही क्या डाक्टर बाबू के साथ यावू जी का भारी झगड़ा था दासी की बातों से मौसी बड़ी हो विचलित हो उठी था । किन्तु सुविशा प्रवीण गृहिणी की भॉति मन का भाव मनही में दवा- कर वे बोली-“डाक्टर बाबु यहॉ से होकर जाने के बाद ही मारे गये थे। इसी लिये ही हेम ज्वर की तरग में उनका नाम वार २ लेती है ऐसी अवस्था में ज्वर के झोंक में हेम जो डाक्टर बाब का नाम लेती है, इसमें पाश्चर्य करने की कोई वात नहीं है। इसके सिवा मनुष्य ज्वर की तरंग में न मालूम कितने, ही प्रकार के यक-झक किया करते हैं । उन सब बातों का क्या कोई अर्थ होता है ? ज्वर के प्रलाप में प्राय लोग इसी प्रकार बका करते हैं । सतीश ने कहा है, इस बार जो डाक्टर बाबू के खूनी को पकडा देगा उसे चे पाच हजार रुपया।पुरस्कार दंगे। हम लोगों का विश्वास है कि इस बार खूनी, शीघ्र ही गिरफ्तार हो जायगा।" " पाईसवाँ परिच्छेद १०१ दासी जरा मुंह बना कर बोली-"सभी लोग ऐसा ही कहते हैं। निश्चय ही उन्हीं दुसाधों के दल में से किसी एक का काम है। अच्छा मासी तुम्हाग मन क्या कहता है ?" मौसी ने उसकी हाँ में हाँ मिला कर कहा-"मेरा भी मन यही कहता है । ये लोग न कर सके, ऐसा कोई भी काम पृथ्वी में नहीं हे।" कुछ देर तक दोनों में से किसी के भी मुंह से कोई यात नहीं निकली। सहसा दासी ने फिर पूछा-"अच्छा मौसी बहिन की तबीयत इतनी खराव है और वा कलकत्ते रहते हैं। वे अभी तक भी नहीं आये! बडी ही आश्चर्य की बात है।" दासी की बातो के उत्तर में चतुर गृहिणी मौसी झट पोल उठो-"अरे कैसे आयें । तेरे यावू को तो वहिन की बीमारी की खवर हो नहीं मिली है।" । दासी बड़ी। ही आश्चर्यित होकर बोली-"सवर नहीं मिली? यह कैसी बात?" मौसी गभीर स्वर में बोली-"अभी तो उन्हें खबर देने से कोई फल होगा नहीं। व्यर्थ उनके मनको दुख मात्र होगा। वे और भी अधिक घवडा जायेंगे इसी से मेंने सुधाशु को उन्हें कोई खवर देने के लिए मना कर दिया है। हेम की तबीयत कुछ अच्छी होते ही उन्हें समाचार लिख भेजूंगी।" । मोली आते ही हेमागिनी के बगल में बैठी हुई थी इसी से लाचार दासी कुछ देर तक चुप लगाये खडी रही इसके बाद उठकर वहाँ से अपने काम में लग गई । मोसी पुत्र कीआरदेखकर बोली- 'मामला दिन पर दिन जेसा गहरा होता जा रहा है उससे मुझे और कोई भरोसा नहीं है। मारे भय के छाती मेरी दिन-रात धड २ किया करती है। सतीश-" . . । 7 4 -सहधर्मिणी, सुधाशु चुपचाप बैठ एक अंग्रेजी उपन्यास पढ रहा था। उसने अपनी माँ को वाधा देकर कहा-"माँ! तुम बुद्धिमती हा। समझदार हो । कोई बात तुमसे छिपी नहीं है। सब समझती बूझती हो । तव मैं समझता हूँ जहा तक हो इस बात की चर्चा न करना ही हम लोगों के लिए अच्छा है जो होना है वह होगा ही । भय या चिन्ता करना बिल्कुल व्यर्थ है। मौसी एक लंबी सॉसा लेकर चुपचाप बैठी रही । सुधाशु फिर से उपन्यास पढने में तन्मय हो गया । . - x x x x 'हेमागिनी के घर की अवस्था जैसी दिखाई पड़ रही थी उससे उसके,जीने की कोई आशा नहीं थी। क्योकि डाक्टर 'कह गये हैं कि यह,भयकर दिमाग को, खरावी का ज्वर है । इससे रक्षा पाना बड़ा ही कठिन है, लेकिन जिसकी परमाणु है उसको कुछ नहीं हो सकता। अत. इसी सिद्धा त के अनु सार हेमागिनी उस भयकर ज्वर से बच गई। धीरे २ दिन पर दिन वह अन्छी होने लगी । वह अभी एक दम से ही अच्छी तरह भली चंगी नहीं हो गयी है। तौभी आज चार पाच दिन से उसे जर नहीं आता वेसे ही समय वह मौसी से रोते २ बोली-"मौसी! मुझेअब यहाँ से,ले चला। यहाँ रहने से मेरी जिन्दगी बच नहीं,सकेगी। वही-बहो खुन मानो रात दिन मेरी आँखों के सामने नाच रहा है। मौली में तुम्हारे पैर पडती है । जितनी जल्दी तुमसे हो सके मुझे यहाँ से ले चला। मौसी बड़े ही कोमल स्वर में, बोली-"विः बेटी! व्यर्थ इस प्रकार क्यों घपडा रही हो? ऐसा करने से बीमारी और -भी अधिक बढ जायगी। तुम्हारा रोग थोड़ा अच्छा होते हो हम लोग यहॉ से चल जायेंगे।" - m घासमा परिच्छेद १०३ इसके बाद और भी कई एक दिन बीत गये । हेमागिनी पश्य पा रही है । यह दिन पर दिन अच्छा हानी जा रही है। अर इस बार उन लोगों के मधुपुर से चले जाने का पदोवस्त छान लगा हेमागिनी ने मोला को बुलाकर कहा-"चलो" मौसी ने जरा मुंह को भारी बनाकर कहा- 'डाक्टर कह गये हैं कि अमी भी तुम्हारी अवस्था रेल की यात्रा के लायक नहीं हुई है । आर भी दो चार दिन तुम्हारा यहाँ रहना बहुत हो उचित है।" । • लाचार आर भी कपक दिन हेमागिनी को मधुपुर रह जाने के लिए याध्य होना पड़ा। वह मधुपुर को छोड़ जाने के लिए बहुत ही व्याकुल हो उठी थी। क्योंकि यहाँ रहने से वीच २ में ग्मेन्द्र के खून की बात उसके मन के भीतर आन्दोलन मचा उठती है इस से पद उन्मादिनी की भॉति होकर घबडा उठता हे। हेमागिनी अच्छी तरह जानती थी कि यहाँ से चला जाने से भी शान्ति नहीं पायगी । कहीं जाने पर भी उसे शान्ति पाने को आशा नहीं है । यस दारुण यनणा और विभीपिकाओं के बीच रहकर अशान्ति क साथ उसे जोवन, पिताना होगा। न मालूम कौन दिन सतीशचन्द्र पकड़े जायं-कौन दिन उनका विचार हो । न मालूम कौन दिन उन्हें फाली,के तपते पर लटकना पडे इसी भय ओर सदह में इसी भीषण आतक में न मालूम कितने दिन उसे जीवन के दिन बिताना पड़े इसका काई ठिकाना नहीं। उसके बाद सभी उसे .अगुली दिखाकर कहेंगे कि यह देखो, इसी के स्वामी को खून के अपराध में फांसी हुयी है। फिर पुनकन्या को दिखा कर कहेंगे, इन्ही के बाप को फाँसी हुयो । हाय न मालुम उसके भाग्य में कितने दिन तक इस असहनीय यन्त्रणाओं का भोग भोगना यदा है। - - . - १०४ सहधर्मिणी यह सब तो हुयी बाहर की चात । हेमागिनी के हृदय अतर में जो असा यत्रणा हो रही है, उसका वर्णन करना बहुत ही कठिन है । जिसकी देह दुरारोग्य व्याधि के कारज एक दम विपाक्त होकर दुईमनीय ज्वाला से जरजर हो रही है। जिस के लिए डाक्टर की एकमात्र व्यवस्था यही रही हो कि तपाये हुए लाल २ लोहे के अगारे से छेदन करने के सिवाय उसकी पोडा की और कोई चिकित्सा नहीं वही रोगी ही सिर्फ हेमागिनी की हृदय यत्रणा समझ सकता है। अतर्दाहिनी यह यत्रणा-पल २ में मर्मस्थानों को जलाकर राख चना डालती है किन्तु बाहर कुछ भी नहीं दिखाई देती । अग्नि का ताप और ज्वालो मालूम होता है इस अन्तर्दाह की तुलना में केवल चन्दन का लेपमात्र है। हेमागिनी समझ गयी है कि वह एक प्रकार से अपनी आँखों से स्पष्ट प्रमाण पा गया है कि उसके ही स्वामी खूनी हैं । वे ही इस निन्दनीय गर्हित और पशुवत आचरण को कर बैठे हैं। साथ ही उनकी बातों से यह स्पष्ट समझ में आ जाता है कि वे इसके लिए अनुतप्त दुखित, यही क्यों, लजित मात्र भी नहीं हुए हैं। उसके स्वामी उसके इहकाल-परकाल के देवता क्या ऐसे ही पशु-प्रकृतिः के हैं ? ओह । नहीं, अब और अधिक वह इस बात को सोच नहीं सकी। उसका मात्था चकर खाने लगा । उसकी चतना एकवारगोही लुप्त हो गयी। फिर इसके बाद प्रेम और विश्वास आकर उसको प्रवोध देते-अरी। यह तू क्या सोच रही है। ऐसा भी क्या कभी हो सकता है' नहीं.२ सतीशचन्द्र ने एक उच्च कुल जन्म लिया है। वे एक सुविद्विान् सच्चरित्र और सुविवेचक है। समाज में सर्वश्रेष्ठ और सब के ऊपर तुम्हारा स्वामी पतिदेव हैं। तुमको अपने प्राणों से भी अधिक प्यार करते हैं। उनसे मला - में । -- तेईसवा परिन्छेद १०५ ऐसा गर्हित ओर नारकीय काम का होना क्या कभी सभव है ? । यह बात ! बात ही क्यों ऐसी भावना तक भी तुम्हारे चित्त में । जाग उठना क्या उचित है? निश्चय तुम्हारी आँखों ने तुम्हें ! धोखा दी है । तुम्हें भूल में डाल कर तुम्हारे चित्त को डॉवाडोल कर दिया है ऐसे ही समय फिर सदेह ने हजार मुह से आकर उसके प्रेम ओर विश्वास की जड़ में कुल्हाड़ी जमा दी। विचारी हेमागिनी इसी निदारुण आन्तरिक देवासुर द्वन्द्व से बडी ही पीड़िता हो गयी है। वह इस समय प्रचण्ड वर्षा से निक्षुब्ध उत्ताल तरग-माला से भरे हुए -महासागर की गोद में चित्त पड़ी है " -- + , तेईसवां परिच्छेद सी स्नान कर पूजा करने जा रही थी कि र ऐसे ही समय एक नौकर ने श्राकर खवर दी मौ कि प्रफुल्ल कुमार बावू आपसे एक बार मिलना चाहते हैं। नौकर की इस बात से वह मानों कुछ अवाक् हो गयी थीं। यह विस्मित भाव से बोल उठी- हमसे मिलना चाहते हैं। कौन प्रफुल्ल बाबू नौकर ने सिर हिलार उत्तर दिया-"जी हाँ। शायद कोई विशेष बात है।" विशेप बात है । उनकी छाती भीतर ही भीतर धड़ २ कर काँप उठा। वह अंगक हो नौकर के मुंह की ओर देख बोली- "हमसे उन्ह ! कौन सी ऐसी बात कहनी है दे, मोसी आ रही हैं। 1 - अच्छा जा कह .
सहधर्मिणी
नौकर चला गया। मौसी शक्ति हृदय से प्रफुल्ल, बाद
के सामने जा उपस्थित हुयी। प्रफुल्लकुमार बावू वैठक के भीतर
एक कुर्सी पर दखल जमाफर, वैठे हुए थे। मौलो को घर
के भीतर प्रवेश करते देख बोले-"सुना है कि सनीश याबू
की स्त्री इस समय अन्छी हैं। इसी लिये एक समाचार उन्हें
देने को आया है। किन्तु ऐसी अवस्था में उनको कहना उचित
है या नही , इसी को पूछने के लिए आप को बुलाया है।"
प्रफुल्लकुमार की इन बातों से मौसी का, हृदय ,और भी
थर २ कार उठा। उन्होने मृदु स्वर में पूछी-"केसी खबर ?
कोई नयी खबर है-सतीश के-"
प्रफुल्ल बाबू सिर हिलाकर बोले- नहीं २ वद्द सब कुछ
नहीं है। इतने दिन के बाद आज रमेन्द्र का सूनी पकड़ा
मौनी को उन्मुक्त नेत्रों में अन्धकार दोख पडा। ता
क्या सतीश को पुलिस ने पकड़ लिया है। उनके मुह से कोई
वात बाहर नहीं निकली। वे अचल पलक शून्य दृष्टि से एक
टक प्रफुल्लकुमार के मुह की ओर देखती रहीं । प्रफुल्लकुमार
कहने लगे-'यह खबर में स्वय ही देने आया हूँ। सतीश
बाबू ने जो णच हजार साया इनाम देने को कहा था, उसासे
ही खूनी पकड़ा गया है।"
मौली का कर स्वर काप उठा ! उन्होंने शकाकुला हृदय
प्रफुल्ल बाबू से पूछा-"यह सूनी कैसे पकड़ा गया?", ..
प्र.-"सतीश बाबू यहा से कलकत्ता पहुँचते ही वहा के
पुलिस जासूस विभाग के सर से बड़े साहा से जाकर मिले और
रमेन्द्र के खून सबंधी सारी बात सुना कर बोले कि जो शव
इस सूनी को पकडा दे सकेगा उसको वे पाच हजार रुपया
-
। तेईसवाँ परिन्छेद - इनाम देंगे। जासूस अफसर ने उनके मुह से सारी घटना सुन - एक सुचतुर जासूस कर्मचारी को खूनी को पकडने के लिए । यहा भेज दिया। यहां आने के कुछ दिन बाद ही पता लगा । कर उन्होंने रमेन्द्र के खूनी को गिरफ्तार कर लिया है। खूनी । वही दुसाधों के दल का एक आदमी, नाम उसका दामन है । और दो आदमी जय मारवाडी फी हत्या कर उसके रुपये पेसे हरण करने के लिए वहीं रास्ते के बगल में जा छिपे थे। उसी समय दामन स्वय स्वतत्र रूप से लूट मार करने के लिए डाक्टर पर आक्रमण कर बैठा तव से बदमाश वही छिपा बैठा था।" प्रफुल्लकुमार की बातों पर मौसी सम्पूर्ण रूप से विश्वास नहीं कर सकी । मानों वे मन ही मन समझ गयी, कि इसमें पुलिस ने बिल्कुल हो गलती से दामन को पकड़ा है। रमेन्द्र बाबू का , खूनी दामन नही है। अत उन्होंने 'कम्पित स्वर से फिर पूछा-'पुलिस ने कैसे जाना कि यही दामन ही रमेन्द्र बाबू का खूनी है " प्र०-"उसी पुलिस जासूस ने इन्ही दुसाधों के दल में से एक आदमी को ढूंढ कर बाहर किया और उसे. एक हजार रुपया इनाम देने का लालच दिसाया। रपये की लालच में उसने जासूस को सारी बातें कह द।।,यह आदमी अभी बिल्कुल ही छोकडा है। यद्यपि चोरोक दल में या सही तथापि अभी वह उस काम में पका नहीं हो सका है। उमर अभी उसकी बहुत ही कम है। सोलह-सत्रह से ,अधिक नहीं है !-दामन कहाँ छिपा हुआ है इसका भी पता उसी ने पुलिस को दिया। इसके वाद- पुलिस ने जाकर दामन को उसी जगह गिरफ्तार कर लिया।" इतनी बातों पर भी उनका मन इस बाता को मानने को A- . 1 --
-
११०
सहधर्मिणी
आदमी ने पीछे से आकर मुझ पर हमला किया। मैं भी अपने
को पचाने के लिए उस पर टूट पड़ा। मारामारी में उस
आदमी की लाठी टूट गयी। जब मैंने देखा कि चल में में
उससे पार नहीं पा सकूँगा तब उसी समय भाग कर अन्धकार
में गायब हो गया।"
तब हाकिम ने उससे पूछा-"वह कौन आदमी है ? यदि
तुम उसे देखपाओ तो पहचान सकोगे?" ,
दामन ने सिर हिलाकर कहा-"नही हजूर। उस दिन
रात को बडा ही भयकर अधकार था। इससे मैं अच्छी तरह
उसे देख नहीं सका। तब भी इतना अच्छी तरह समझ गया
था कि वह एक गाली भद्र सज्जन हैं।"
सब वयान सुनकर मजिस्ट्रेट ने दामन को दोरा सुपुर्द कर
दिया। दामन की इन बाता से सनीशचंद्र के मकान में अनेको
लोग अनेकों प्रकार की बातें लेकर जा पहुंचे। किन्तु तो भी
मौसी दामन को सुनी कह कर- समझ न सकी। यह विश्वास
करना भी बिल्कुल ही असंभव था। उन्होंने घर की' पुरानी
दासी को बुलाकर कहा- 'देखो अभी इन सब बातों को । हेम
के आगे न कहना । अभी उसकी हालत इन सब बातों के सुनने
योग्य नही है।"
। किन्तु दासी ने कुछ और ही रूप में समझा। वह सोचने
रगी--"हमांगिनी रमेन्द्र गवू का बड़ा ही यत्न और भक्ति
करती थी । उनका खूनी पकड़ा गया है सुन वह संतुष्ट होगी।"
इसी कारण मौसी की आदेश पर उसने कान नहीं दिया।
अत. हेमागिनी से.सारी बातें कहने का वह मौका हूँढने लगी।
-
"
1
चौपीसयाँ परिच्छेद १११ -- BAPPer . चौबीसवां परिच्छेद (जरात की गाडी से हेमागिनी कलकत्ता जायगी। सवेरे ही से नौकर चाकर दास दासियों ने माल असबाव सब बांध छाद करना आरम कर दिया है। यद्यपि हेमागिनी अभी दुर्वल है तथापि वह उठकर बैठी है। मालूम होता है यहा से चले जा सकने म वह कुछ शान्ति पायगी । यहा की हवा से मानों उसकी सॉस रुक कर दम घुटा आता है। पुरानी दासी को बुलाकर हेमागिनी ने पूछा-"कहो सर्व राधना छाना समाप्त हो गया ?" दाली-हाँ दोपहर के भीतर ही सर बाधना छांदना खतम, हो जाएगा। तो भी- 2 दासी बात कहते २ वीच ही में रुक गयी । हेमागिनी उसे इस तरह चुप होते देख उससे जरा विचलित होकर पूछा- "नोमी क्या ?"-" दासी ने जरा गभीर स्वर में कहा--"यह आदमी पकड़ा गया है।" हेमांगिनी ने दासी के 'मुह को ओर देख कर पूछा- "कोन आदमी दासी ने उत्तर दिया--"खूनी 'जिस ने डाक्टर बाबू का खून हेमागिनो बिल्कुल ही अस्पष्ट स्वर में योली-"कौन-- कौन-कौन है यह दाली-“एक दुसाध । नाम उसका दामन है। उसने सून करता खुद स्वीकार कर लिया है। उसने सिर पर लाठी मार कर डस्टर की हत्या की थी।" १ - , किया था।" -- । . , सहय यमिणी हेमागिनी बडी ही विचलित स्वर में बोल उठी-"मोसी ! को बुला दे।" मौसी यहां चली आयीं । हेमागिनी ने मोसी को जो कुछ हुआ है सब सुनाने के लिए आग्रह किया। जो कुछ कुना था हक २ कर सारी मौसी ने कहना आरम किया। इसी समय सहसा हेमागिनी आर्तनाद कर चिल्ला उठी। देखा द्वार पर खड़े सतीशचद्ग हैं। * उन्हें देखते ही मालूम होता है वे अभी २ सीधे ट्रेन से उतर कर चले आ रहे है। उनके कपड़े बिल्कुल मैले, धूल में सने हुए और ये तरतीव अङ्ग में पड़े हैं। मानों उनको इस समय पाालों को सी दशा हो रही है। वे हेमागिनों के निकट आफर बोले- "हेम । अव तो तुम्हें विश्वास हो गया न हेमागिनी क्या विश्वास करेगी कि वे सूनी नहीं, दूसरा ही कोई सूनी है। वह स्वामी के मुख की ओर विषण्ण विस्परित नेत्रो से ताकती रही। ओह ! यह कैसी दृष्टि है। देखने से जान पड़ता है कि मानों एक दारुण आर्तनाद उन्हो दोनों नेत्रों को विदीर्ण कर अभी वाहर निकल रही हैं। मौसी वोली-"सतीश । सतीश तू हो,, कह-तू ही कह कि-" "मौसी मॉ। क्या तुम भी मुझे ऐसा, पाखण्डी मन में सम- झती हो ? नहो, मौसी । यदि थोड़ा कुछ और पहले घटना स्थल पर पहुंच जा सकता तो दुसाध, कभी रमेन्द्र का खून न कर सकता। मेरे डर से ही वह दुसाध भाग गया था। -किन्तु अफसोस । सव व्यर्थ हुआ मोसी । हेम से मुझे कुछ बातें करनी-हें। जरा तुम बगलवाले घर में चली जाओ!" मौसी सतीश के ऊपर अपने लोगो के निज का अन्याय 7 - ,
चौबीसवाँ परिच्छेद
सदेह से विशप दुखित हा धोरे २ उठ कर उस घर से बाहर
चली गयीं । सतीशचद्र स्त्री के सामने चुप चाप खड़े रहे।
तव हेमागिनी सूखे कठ से बोली-
"यह क्या बताओ सत्य यात हे "
सतो०-"इस बात को क्या फिर पूछ रहो हो ?"
'तर-तर इस बात को तुमने मुझसे पहले ही क्यों
.
नहां कहा
"
"तुम्हारी इस बात का उत्तर देने के पहले मैं तुमसे एक
गत पूछता है। बताओ, यदि उस समय वात मैं तुमसे
कहता तो क्या तुम उस समय मेरी बातों का विश्वास करती?"
हेमागिनी समझ गयो बात बहुत ठीक है। इसके पहले
इसके हृदय में जिस कठिन सदेह ने जड़ जमा लिया था वह
या स्वामी के हजारो प्रकार की कसमें खाकर अस्वीकार करने
पर भी हृदय से दूर होता?
सतीशचन्द्र बोले-"मैं जानता था कि उस समय सारी
आत खोलकर साफ २ कह देने पर भी तुम्हारे मन से सदेह
कभी नहीं जायगा । इसी लिए उस समय मैंने तुमसे कोई बात
ही नहीं। केवल इतना ही कहा था कि हेम! भ्रम में पड
कर विश्वास को खो न डालना। उसके बाद तुम्हें यहा छोड
कर में असली खूनी जिसमें गिरफ्तार हो इसी चेष्टा में
रहाँ पान हजार इनाम देने की बात कह कर कलकत्ता
वला गया और यहाँ के डिटेक्टिव पुलिस को इसकी रिपोर्ट
देकर सारी बातें जना दी। इसके बाद मैंने उनसे सहा-
पता मागी और सहर्ष उन्होंने सहायता देना स्वीकार कर एक
उचतुर जासूस इस काम में तैनात भी कर दिया। मैंने तुम्हारे
रागलपन और प्रलाप की बातों पर कान नहीं दिया, तुम्हारी
८
११६
सहधर्मिणी
पच्चीसवाँ परिच्छेद
Yatratsatsहुत देर तक पति की गोद में अच्छी तरह
आनन्दाश्रुबहा
लेने के बाद वह कुछ स्वस्थ
हुई। इसके बाद पहले की भाँति व्यन कण्ठ
से स्वामी से बोली-"क्यों तुमने यह सब
वातें पहले ही मुझसे नहीं कहीं ? रमेन्द्रबाबू
की अवस्था देख आकर उसी समय क्यो नहीं तुमने सवों को
वह बातें बता दी ? सारी बातें स्पष्ट तुमने सयों को क्यों नहीं
कह दी? क्यों ऐसी निष्ठुर उदासीनता दिखाई ? यदि तुम ऐसा
करते तो मैं इतना कष्ट कभी न पाती । अपना हृदय अपने ही
खुद उखाडकर फेंकने का प्रयास कितना कठिन होता है, उसे
तुम लोग समझ नहीं सकोगे।"
सतीशचन्द्र बोले-"क्यो मैंने सब या नहीं कहीं। इसको
मैं कहता हूँ । सुनो मुझ पर लोग सन्देह करेंगे-इसी भय से सब
बात कहने का मुझे साहस नहीं हुआ। जिस समय रास्ते में
माली ने मुझसे खून की बात कही उस समय मेरे मन में हुआ
था कि वह निश्चय ही रमेन्द्र की हत्या की बात कह रहा है ।
इसी से खानसामा क मारवाड़ी के खून की बात कहने पर मेरे
मन में हुआ था कि अवश्य इसके सुनने में भूल हुई है। मार:
वाड़ी का मून नहीं हुआ है बल्कि रमेन्द्रनाथ ही दुष्टों द्वारा मारे
गये हैं।"
"क्यों तुमने ऐसा किया? इसी से हम लोग भी तुम पर
हो सन्देह कर रहे थे। मुझे कितना कष्ट भोगना पडाहै यह तुम
जान नही सकोगे-तुम मेर स्वामी देवता इस काल परकाल
के आश्रयदाता धर्म अर्थ काम मोक्ष सब कुछ मेरे तुम्ही हो ।
पश्चीसवॉ परिच्छेद
११७
तुमको मन में खूनी इत्यारा समझने के पहले ही मेरा मर जाना
कहीं सहनगुणा अधिक अच्छा है। न्तुि यह प्रशस्त राह भी
मेरा बच्चों के लिए बन्द है । ओह ! मेरी कैसी अवस्था हो गई
थो उसका अप और मैं क्या वयान करूँ। मैं जीते हुए भी मरी
के समान, चेत होते हुए भी अचेत वेसुध हो गयी थी। जिस पर
पति सन्देह करे जो अपराधिनी समझी जावे उसका जीवन
कैसा भीषण और भार है इसमो कौन समझेगा?"
इतना कहते-कहते हेमागिनी पुन रो पड़ी।
सतीशचन्द्र बोले-"सब जानता हूँ। किन्तु उपाय नहीं
था। जव तक असल खूनी गिरफ्तार न हो जाय तव तक और
तो क्या तुम भी मेरी बातों पर विश्वास न करतीं। इसीसे लाचार
मुझे चुप रह जाना पड़ा था। अब तो तुमने सब सुन लिया।
क्या अव भी कुछ सन्देह है "
"नहीं नहीं। मैं जी गयी । मेरी रक्षा करो। मैं अबला मूर्ख
निरक्षर हूँ। तुम्हारी ही गोद का आश्रय इसको है इसको
अपनी सहधर्मिणी समझ क्षमा करो।"
सतीशचन्द्र ने अपने दोनों हाथो से हेमागिनी के आसुओ
से
तर मुखमण्डल को पकडकर ऊपर उठाया और प्रेम
मे चुम्बन कर उसके आँसू पोछे । वार २ हेमागिनी को गले लगा-
कर उसके गोरे गोर गालों का चुम्वन लेने पर भी उन्हें तृप्ति नहीं
हुई। कुछ देर तक दोनों में किसी को भी बात करने की ताकत
नही थी। आखिर में सतीश ने पूछा-"क्या आज ही यहाँ से
चले जाने का निश्चय कर लिया"
"हां, रात की गाड़ी से जाने का स्थिर किया है।"
"तुम्हारा शरीर अभी भी अच्छा नही है। यदि कुछ दिन
यहाँ और रह जानोगो तो तुम्हारा शरीर विल्कुल ठीक हो जायगा।
सहधर्मिणी
पृ० स. ११७
wwgy7
'नहीं नहीं में जो गई । मेरी रक्षा रो में अपना मूर्स निरक्षर
है। इसको अपनी सहधर्मिणो समझ क्षमा करो।"
पश्चीसवॉपरिच्छेद
११७
तुमको मन में खूनी हत्यारा समझने के पहले ही मेरा मर जाना
कहीं सहस्रगुणा अधिक अच्छा है। जिन्तु यह प्रशस्त राह भी
मेरा बच्चों के लिए बन्द है । ओह ! मेरी कैसी अवस्था हो गई
थो उसका अप और मैं क्या वयान करूँ। मैं जीते हुए भी मरी
के समान, चेत होते हुए भी अचेत वेसुध हो गयी थी। जिस पर
पति सन्देह करे जो अपराधिनी समझी जावे उसका जीवन
केसा भीषण और भार है इसको कौन समझेगा?"
इतना कहते-कहते हेमागिनी पुन रो पड़ी।
सतीशचन्द्र चोले-"सब जानता हूँ। किन्तु उपाय नहीं
था । जय तक असल खूनी गिरफ्तार न हो जाय तव तक और
तो क्या तुम भी मेरी बातों पर विश्वास न करती। इसीसे लाचार
मुझे चुप रह जाना पड़ा था। अब तो तुमने सब सुन लिया।
क्या अब भी कुछ सन्देह है "
'नहीं नहीं । में जी गयी। मेरी रक्षा करो। में अवला मूर्ख
निरक्षर हूँ। तुम्हारी ही गोद का आश्रय इसको है इसको
अपनी सहधर्मिणी समझ क्षमा करो।"
सतीशचन्द्र ने अपने दोनों हाथों से हेमागिनी के आसुओं
से
तर मुखमण्डल को पकडकर ऊपर उठाया ओर सादर प्रेम
से चुम्बन कर उसके आँसू पोछे । वार २ हेमागिनी को गले लगा-
कर उसके गोरे गोर गालों का चुम्बन लेने पर भी उन्हें तृप्ति नहीं
हुई । कुछ देर तक दोनों में किसी को भी बात करने की ताकत
नहीं थी। आखिर में सतीश ने पूछा-"क्या आज ही यहां से
चले जाने का निश्चय कर लिया?"
"हां, रात की गाड़ी से जाने का स्थिर किया है।"
"तुम्हारा शरीर अभी भी अच्छा नहीं है। यदि कुछ दिन
यहाँ और रह जाभोगी तो तुम्हारा शरीर यिनुल ठीक हाजायगा।
-- सहधर्मिणी तव फिर सब लोग यहॉ से कलकत्ता लौट जायगे। कहो तुम्हारी क्या राय है?" "तुम जो कहो मेर लिये मान्य है इस समय सब स्थान मेरे लिये स्वर्ग समान मालूम दे रहा है। क्यों कि पवित्र पति की गोद में मुझे पुनः आश्रय मिला है । शायद तुमने सुना न होगा। मुझे ज्वर-विकार हो गया था।" "मे सब जानता हूँ। तुम कैसी हो इसकी मुझे रोज खवर मिलती थी।" "कौन तुम्हे खवर देता था ? मौसी तो कहती थी कि उन्होंने तुम्हें कोई भी पत्र नहीं लिखा।" “डाक्टरयावू रोज खबर भेजते थे। तुम्हारी बीमारी वढते ही मैं उसी समय दौड़ा चला आता लेकिन डाक्टर वावू रोज लिख भेजते कि यद्यपि रोग भारी है तथापि भय की कोई बात नही है । तुम्हारे आने की आवश्यकता नहीं है । तुम क्या सम- झती थी कि मैं तुम्हे भूल गया हू "नहीं २ ऐसा तो मन में मैंने कभी खयाल नहीं किया। किन्तु हमारे हृदय की बात तुम समझे नहीं हो। जिस स्थान पर मेरे प्राणों के देवता विराजमान हैं वहा रक्त वहानेवाला निष्ठुर यूनी अपना अड्डा जमायेगा । देवताओं के मन्दिर में पिचाश जाकर बैठेगा । आह ! हृदय के इस चिन्ता-सागर की तुमुल झड़ी बड़ी ही भीषण है जाने दो। अब उन सब पापो की बातों की कोई आवश्यकता नहीं है। कर्म-फल सभी को भोगना पडता है। मैंने भी भोग लिया। तब तुम ने भी विना विचारे बड़े ही अन्याय के साथ मेरे ऊपर सदेह किया था" "हाँ, ठीक है, स्वीकार करता हूँ। किन्तु अब वह सदेह मन से एक दम से ही दूर हो गया है। अब कभी यह राक्षस रूपी " . पञ्चीसवाँ परिच्छेद -देह मेरे हृदय के भीतर घुस सकगा इसकी कोई संभावना ही है। देखो, स्वामी और स्त्री एक हैं। शरीर दो होने पर नों का हृदय एक है, दोनों अभिन्न हदय हैं। सम्पद, विपद उख दुख सभी समय दम्पति अद्वैत भाव से एक दूसरे के आय लिप्त रहते हैं। स्वामी और स्त्री का अलग काम या चिन्ता नहीं है । यह वात मेरी नस २ में अन्छी तरह समायी हुई है। स विषय को में भली प्रकार जानता है। परस्पर का आत्म- पन हो गृह के दाम्पत्य जीवन में दारुण हलाहल पदा कर रेता है । आर उसी से बहुत शीघ्र सारा विश्व ससार नाश को राप्त हो जाता है। तुम मेरी पत्नी, इहकाल परकाल की अर्धा. गेनी, सहचरी और सहधर्मिणी हो। तुम पर सदेह करने से ही हम लोगों का सर्वनाश हो रहा था। मेरी बडी साध की सजायी हुयो सुन्दर सोने को गृहस्थी एकवारगी ही क्षार खार होकर मिट्टी में मिलने जा रही थी।" "भगवान साक्षी है- सतीशचन्द्र ने वीच ही में रोककर कहा-"और पॉच हजार हो क्यों यदि सारी विषय सम्पत्ति देकर भी रमेन्द्र यावू वापस लौट आयें तो यह भी करने को मैं तय्यार हूँ।" "उस रात को जो देखा था वह सब क्या तुम पुलिसों से नहीं कहोगे?" "नहीं हेम ! इन सब बातों के कहने में कोई लाम नहीं है। उस मनुष्य को मैं अंधकार में अन्छी तरह देख नहीं सका। जो मनुष्य पकड़ा गया है वही रमेन्द्र का खुनी है, इसे मैं अच्छी तरह शपथ खाकर कह नहीं सकूँगा । मैंने कलकत्ते की पुलिस को कह दिया है । और यहा उसी बात को फर कर तूल बहाने से कोई फायदा नहीं है। जो कुछ हम लोगों ने जाना " सहधर्मिणी बस वही यथेष्ट है, और किसी के जानने सुगने श्यकता नहीं है।" इसी समय वश्या वहा दौडा हुआ चला आया वावा!" कह कर शतीशचन्द्र के गले से लिपट गर ने प्रेम से गोद में उठा कर उसका चुम्बन किया। बच्चे के पीछे २ घर की पुरानी दासी आई लौट आये हैं यह वह नहीं जानती। इसी कारण होकर उनकी ओर ताकती रही। हेमागिनी ने कहा-"दासी ! चावू कहते हैं-' सतीशचद्र वीच ही में चोले-"हाँ अभी भी अन्छा नहीं है । और भी कुछ दिन तक उसका य- जरूरी है। जाओ माल असवाव सव खोल कर रखने कह दो।" . । . - H उपसंहार ज सतोशचन्द्र के घर में चहल ore तग्यारी है। आज हेमागिन ग्रा होने के उपलक्ष में लोगों 43 है। सतीशचंद्र मधुपुरवास RUAE पहचानी और मित्रगण अपन उनके घर निमत्रित होकर प्रदीप को प्रीतिभोज होगा। स्टेशन के स्टाफों के र कलकत्ते के उन प्रसिद्ध पुलिस जासूस महाशा उत्सव में सम्मिलित होने के लिए निमत्रण देकर चुला भेजा है। हेमागिनी अभी भी सम्पूर्ण रू - होकर शोभा पूर्ण हो उठा क्योंकि आज की सारी तरयारी करने हुए अपनी रुचि के अनुसार तन्मय होकर प्राणपण से लगे हुए । घर के सभी लोगों का हृदय आनन्द पर्ण है । मुहमप्रेम सतीशचद्र उसके पास आकर बैठ गये। उसे देखते ही मालूम का मीठी २ वाते है। कोठरी में हमागिनी को अकला देखकर होता है सतीश बाबू का हृदय आनन्द के आवेग ने नाच उठता है। दोनों नेत्र प्रेम पूरित ओर मुंह में हसी थिरक उठती है। ये बोले-"आज बडे ही आनन्द का दिन है हम! आज मानो हम पुन विवाह के रात कोहपर में अपनी प्राणप्रिया नयी "किन्तु क्या? अब और किन्तु 'शब्द मुह से न निकालो मेरा मन न मालूम भीतर से कैसा हो उठता है। एक बार इसी उपसहार १२१ लाभ नहीं कर सकी है। रोगमुक्त हो जाने पर भी कमजोरी अधिक है तो भी आनन्द की उमग में शय्या त्याग यह इधर उधर देख भाल कर रही है । मोसी और सुधाश के साथ वह भी सर्वत्र सर विषय में नाना प्रकार के आदेश उपदेश दे रही है। आज उसके प्राण उत्साह पूर्ण है। हृदय प्रफुल्ल हे। सुन्दर मुखमडल पूर्णमासी के पूर्ण चन्द्र की भाँति उज्ज्वल और हास्य मय है ।वीच २ में कभी २ थकावट या क्लान्ति मालूम होने पर हाल घर में जाकर सोफे पर लेट विश्राम कर लेती। धीरे धीरे सध्या हुई । ठीक इसी समय सतीशचद्र से पहले किए हुए यदोवस्त के मुताविक घर में सर्वत्र रोशनी जगमगा उठी। अंत मकान साज सजावट और रोशनी से दिन की तरह झकाझक में सतीशचद्र और घर के सभी लोग आनन्द और प्रेम में भरे थे दूल्हिन के साथ केलि रस विहार करने जा रहे हैं। किन्तु के लिए तुमसे एक बात छिपाने में कितना कठिन भीषण दण्ड भोग भोगना पड़ा।" किन्तु न मालूम १२२ सहधर्मिणी "ठीक बात है हेम ! हम दोनों में परस्पर कोई भी वात छिपाने की नही है। चोरी लुमा हो सुधामय दाम्पत्य जीवन में महा हलाहल विष ढाल देती है । मैं यह अच्छी तरह समझ गया है- नस २ में यह बात मेरे भली भांति वैठ गया है। मेरे फिन्तु कहने का यह मतलब नहीं है। में यह कहने जा रहा था कि हम लोगों के इसी प्रीति भोज में डाक्टर रमेन्द्रनाथ यदि उप- स्थित होने तो और न मालूम कितना आनन्द होता। रमेन्द्र बाबू ने हम लोगों के लिए कितना परिश्रम किया है यदि रमेन्द्र या उस प्रकार प्राण देकर चिकिरला न करते तो क्या बच्चे को उस भयकर रोग से हम लोग बचा सकते और मैं ईर्ष्या में अन्धा होकर उनके सारे कामों में दोप निकाल वेठता था। उनके पवित्र ददय के संबंध में न मालुम कितने ही कुविचार ओर वुरे भाव को मैंने हृदय में पाल रखा है। मैं ने अपने इसी गुरतर पापों का ही समुचित दण्ड मोगा है, और कुछ नहीं।" एकाएक विस्मित और भयविह्वल कण्ठ से हेमागिनी आर्तनाद कर उठी-"कौन, कौन, आप हैं-र-" इतना कहने के साथ ही हेमागिनी सोफे के ऊपर मूर्छित हो गिर पडी। सतीश- चद्र बड़े ही धवराहट में जल्दी से व्याकुल हो अजलि में पानीले २ कर हेमागिनो की आँख मु हमें बराबर डालने लगे। एकाएक हेमां- गिनी को इस प्रकार मूछित होते देख सतीश बाबू बड़े ही भय- भीत हो घबड़ा गये थेऔर किसी ओर भी उनकी दृष्टि नहीं थी। कैसा आश्चर्य है। सत्य सत्य ही रमेन्द्र वाचूने कमरे में प्रवेश किया। धीरे २ आगे बढकर नाड़ी परीक्षा के लिए, उन्होंने हेमागिनी का हाथ पकड़ लिया। एकाएक सतीश बाबू की दृष्टि उन पर जा पडी। डर, विस्मय और आनन्द से उनकी बोली वद हो गयी। --
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उपरहार
१२३
रमेन्द्रनाथ सय समझ कर बोले- 'घबडाइये नहीं, मै मरा
नहीं जीता है। आज आपके इस उत्सव और प्रति भोज की
लालच छोडन सफने के कारण वरावर चला आ रहा हूं। डर
या घवराहट को हृदय में स्थान न दीजिए सतीश वावू ये
अभी होश में आ जायगी।"
सतीशचन्द्र बोले- आपको मैं क्या कह कर पुकारूँ
समझ नहीं सका हूँ और न कोई ऐसा शब्द ही मुझे मालूम है
कि जिसे आपके योग्य उपयोग में लाऊँ। में आपके आगे वडा
हो अपराधो हुँ । यह मेरा बडा ही सौभाग्य है कि मुझे आपका
पुन दर्शन प्राप्त हुआ धन्य भगवान !"
रमेन्द्र-'कुछ भी नहीं सतीशगावू | सब केवल भूल ही
भूल है । आपने भूल की थी । मुझसे भूल हो गई थी। आपको
पत्नी ने भी भूल की थी। भूल हो भूल ने सबों को इस बखेड़े
में डाल दिया है और कुछ नही । इसी से हम सबों ने अपना-
अपना समुचित भोगदण्ड भोग लिया है। सबको अपने किये
का फल मिल चुका है। अब इस बार हम सबों का भ्रम दूर हो
गया है। आशा है इस बार हम सभी लोग आनन्द का उपयोग
कर सुखी होगे।
"इसमें सदेह नही में बडे भारी विषम भ्रम में पड़ा हुआ
था। इसको मै अन्छी तरह समझ गया हूँ। हमसे भी भूल हो
गई थी यह सत्य है। किन्तु आपसे कौनसी भूल हो गयी थी
डाक्टरबाबू
"मैंने कौनसी भूल को थो? ओह ! एक मेरी ही इस
विषम भूल के कारण आप लोगों को और विचारे मधुपुरवालों
को व्यर्थ इतना कष्ट भोगना पड़ा है। पीछे से एकाएक लाठी
की चोट सिर पर आ लगने से मै एकबारगी हो बेहोश होकर
"
देख कर १२४ सहधर्मिणी गिर पड़ा था । उसके बाद कुछ होश में आते ही आपको सामने मैं एकदम अवाक और मुर्दे के समान हो गया। मनमें समझा कि आपने ही मुझे लाठी मारी है। नहीं तो मुझे वैसी दशा में फक आप क्यों फौरन भाग जाते । हठात् आपने क्यो ऐसा राक्षसी आचरण किया इस बात को उस समय मै जल्दी से समझ नहीं सका । किन्तु श्रापके चले जाने पर आपके व्याह के पूर्व की बातें सभी एक एक कर मेरे मन में याद हो आने लगी । और मै भली-भांति समझ गया कि इसी विषम ईर्ष्या में अन्धा होकर अपने मन में इस प्रकार लाठो मारकर हत्या करने का उपाय रचा है। यह भाव मन में उदय होते ही सलार से मुझे बड़ी विरक्ति हो गयी। क्षमा कीजियेगा सतीश- घावू आपके ऊपर भी मेरी वडी घृणा हो गई । क्योकि मैं जानता था कि आप अपनी स्त्री को प्राण से अधिक प्यार करते हैं । जो अपनी पत्नी को इस तरह प्राणों से अधिक प्यार करता है वह क्या इस प्रकार उस पर परपुरुष की आसक्ति का सन्देह कभी कर सकता है ? कारण, सच्चे-प्रेम और चाहना में क्षमा शक्ति नहीं होती। जव कामासक्ति हुई तब फिर सच्चे प्रेम का नाम कहाँ रहा । अत' उसमें ईर्ष्या चा सन्देह का स्थान ही नहीं है। जो हो मेने आपको बडे ही नीच और सकीर्ण हृदय का कह- कर अपने मन में स्थिर कर लिया।" सतीशचन्द्र बीच ही में वाधा देकर बोले-"आपकी धारणा बहुत हो ठीक थो-डाक्टरचाबू मैिं पहले हेम को यथार्थ रूर से ठीक तरह प्रेम नहीं करता था। केवल उसके बाहरी रूपजमोह में ही पड़ा हुआ काम चासना की तृप्ति का मार्ग हूँढ रहा था । इसी से पद पद पर ईर्ष्या सन्देह औरद्वेष ने आकर मुझे पशुसे भी बदतर बना डाला था। और तो क्या डास्टरवाव!, म पहले उपसहार १२५ यह भी नहीं जानता था कि दाम्पत्य जोन क्या है और सहध- मिणी किसे कहते हैं। केवल भोग आर कामवासना की परि तृप्ति हो जीवन का उद्देश्य समझे हुए था। इतने दिन के बाद आँख खुली है। सहधर्मिणी को पहचान गया हूं। हाँ कहिए रमेन्द्रवायू ! उसके बाद रमेन्द्र-उसंपाद मेंने मन में सोचा, यदि फिरम आपलोगों के सामने दिखाई दूंगा तो केवल इस समय आपकी ईया और भी क्रोध में बदल जायगी ओर साध्वी हेमागेना के दुख कष्ट तथा अशान्ति की सीमा नहीं रहेगी। उसके बदले यदि मैं जितने दिन तक आप लोग मधुपुर में वास करेंगे उतने दिन तक अन्यत्र कहीं आप लोगो से अविदित होकर रहगा तो मुझे मरा हुआ समझ आप निश्चिन्त होकर रहेंगे आपकी स्त्री को भी कमी अशान्ति का कोई कारण नहीं रहेगा। किन्तु मेरे भाग जाने से यह अनेको मुंह अनेकों बातें उठेगी ओर सती सधवी हेमागिनी के सम्बन्ध भी लोग नाना प्रकार की बातें कह सकेंगे इससे अशान्ति ही केवल वढेगी, कम न होगी। इसीसे मेंने जेर से सिर्फ दस रुपये का नोट मात्र लेकर (उस दिन मेरे पास बहुत से रुपये थे) अपनी पोशाक इत्यादि सारे कपडे फेंक दिये और एक वही गिरा हुआ मैला फटा कपडा पहन कर गिरिधर की राह चल कर अदृश्य हो गया।" सतीश-"यह केसे? आपकी लाश को मधुपुरवालों ने अपनी आँखों देखी थी । पुलिस की भली-भांति परीक्षा होकर मशान में वह जला भी दी गयी थी? सबों ने आपकी मृतदेह की अच्छी तरह पहचान लिया था।" रमेन्द्र--"हाँ यह सब ठीक है। किन्तु विस्मित न हजिए १२४ सहधर्मिणी गिर पड़ा था। उसके बाद कुछ होश में आते ही आपको सामने देख कर मैं एकदम अवाक और मुर्दे के समान हो गया । मनमें समझा कि आपने ही मुझे लाठी मारी है। नहीं तो मुझे वैसी दशा में फेंक आप क्यों फौरन भाग जाते । हठात् आपने क्यो ऐसा राक्षसी आचरण किया इस बात को उस समय मैं जल्दी से समझ नही सका । किन्तु अापके चले जाने पर आपके व्याह के पूर्व की बातें सभी एक एक कर मेरे मन में याद हो आने लगी । और मैं भली-भांति समझ गया कि इसी विषम ईर्ष्या में अन्धा होकर अपने मन में इस प्रकार लाठो मारकर हत्या करने का उपाय रचा है। यह भाव मन में उदय होते ही ससार से मुझे बड़ी विरक्ति हो गयी। क्षमा कीजियेगा सतीश- पावू । आपके ऊपर भी मेरी वडी घृणा हो गई। क्योकि मैं जानता था कि आप अपनी स्त्री को प्राण से अधिक प्यार करते हैं । जो अपनी पत्नी को इस तरह प्राणों से अधिक प्यार करता है वह क्या इस प्रकार उस पर परपुरुप की आसक्ति का सन्देह कभी कर सकता है ? कारण, सच्चे-प्रेम और क्षमा शक्ति नहीं होती। जब कामासक्ति हुई तब फिर सच्चे प्रेम का नाम कहाँ रहा। अत उसमें ईर्ष्या वा सन्देह का स्थान ही नहीं है। जो हो मैंने आपको बडे ही नीच और सकीर्ण हृदय का कह- कर अपने मन में स्थिर कर लिया।" सतीशचन्द्र बीच ही में बाधा देकर बोले-"आपकी धारणा यहुत हो ठीक थो-डाक्टरयावू मि पहले हेम को यथार्थ रूप से ठीक तरह प्रेम नही करता था। केवल उसके बाहरी रूपजमोह में ही पड़ा हुआ काम-वासना की तृप्ति का मार्ग ढूंढ रहा था । इसी से पद पद पर ईर्ष्या सन्देह और द्वेष ने आकर मुझे पशुसे भी घदतर बना डाला था। और तो क्या डाक्टरवावृ' मैं पहले चाहना में उपसहार यह भी नहीं जानता था कि दाम्पत्य जीन क्या है और सहध- मिणी किसे कहते हैं। केवल भोग आर कामवासना की परि तृप्ति ही जीवन का उद्देश्य समझे हुए था। इतने दिन के बाद आँख खुली है । सहधर्मिणी को पहचान गया हूं। हाँ कहिए रमेन्द्रवा ! उसके बाद रमेन्द्र-उसके बाद मैंने मन में सोचा, यदि फिर मै आपलोगों के सामने दिखाई दूंगा तो केवल इस समय आपकी ईर्ष्या और भी क्रोध में बदल जायगी और साध्वी हेमागिना के दुख कष्ट तथा अशान्ति की सीमा नहीं रहेगी। उसके बदले यदि मै जितने दिन तक आप लोग मधुपुर में वास करेंगे उतने दिन तक अन्यत्र कहीं आप लोगो से अविदित होकर रहूगा तो मुझे मरा हुआ समझ आप निश्चित होकर रहेंगे आपकी स्त्री को भी कभी अशान्ति का कोई कारण नहीं रहगा। किन्तु मेरे भाग जाने से यह अनेकों मुंह अनेकों बाते उठेगी और सती मधवी हेमागिनी के सम्बन्ध भी लोग नाना प्रकार की बात कह सकेंगे इससे अशान्ति ही केवल वढेगी, कम न होगी। इसीसे मेंने जेब से सिर्फ दस रुपये का नोट मात्र लेकर (उस दिन इत्यादि सारे कपड़े फेंक दिये और एक वही गिरा हुआ मैला फटा कपड़ा पहन कर गिरिधर की राह चल कर अदृश्य हो गया।" पास बहुत से रुपये थे) अपनी पोशाक सतीश-"यह कैसे? आपकी लाश को मधुपुरवालों ने अपनी आँखों देखी थी । पुलिस को भली भांति परीक्षा होकर मशान में वह जला भी दी गयी थी? सयों ने आपकी मृतदेह की अच्छी तरह पहचान लिया था।" रमेन्द्र-"हाँ यह सब ठीक है।। ति विस्मित न हुजिए - सहधर्मिणी सतीशमा । यह सयोग की बात है। यहाँ एक काकताली संयोग आ पडा था।" सतीश-"कैसे ? ओह डाक्टर बाबू यह केसा रहस्य का पर्दा आप उठा रहे हैं ? क्या ऐसा भी कभी हो सकता है।" ठीक इसी समय कलकत्ते के नामी जासूस सतीशचन्द्र का निमत्रण पाकर वहाँ आ उपस्थित हुए। उन्होंने रमेन्द्रनाथ को देराते ही पाकेट से एक फोटो तस्वीर,वाहर निकाली और कुछ देर तक उसे ध्यान से देखते रहे। उसके बाद बोले-"माफ कीजिएगा सतीशवा ।" इसके बाद फौरन रमेन्द्रनाथ की तरफ पलट कर बोले- "हरेन्द्र विश्वास में तुमको सरकार की आशा से कानून के अनु- सार वाग बाजार की श्रीमती विलासित्नी की हत्या के अपराध में गिरफ्तार करता हूँ ।" इतना कहकर उन्होने रमेन्द्रनाथ का दाहिना हाथ मजबूती से पकड लिया। रमेन्द्रनाथ चुप हैं। सतीशच द्र के विस्मय की सीमा नहीं रही। वे अवाक हो बैठे रहे । इसी समय हेमागिनी भी सपूर्ण रूप से होश में आ गयी और प्रफुल्लकुमार प्रभृति अन्यान्य निमत्रित गण भी वहाँ आकर पहुँच गये। इधर बहुत देर से हेमागिनी, और सतीश- चन्द्र को न देख कर मौसी और सुधाशु भी उन लोगों को ढूढते हुए उसी हाल घर में आ उपस्थित हुए। सभी रमेन्द्रनाथ को सामने खड़ा देखकर एक दम डर विस्मय और आनन्द से अधीर हो अवाक हो गये। फिर पुलिस जासूस के हाथ में रमेन्द्रनाथ का दाहिना हाथ मजबूती से पकड़ा हुआ देख और भी उन लोगो के विस्मय की सीमा न रही। मामला क्या है जानने के लिए सबो ने कौतुहल पूर्ण दृष्टि से-रमेन्द्रनाथ के मुंह की ओर देखा। ।
उपसहार
१२७
रमेन्द्र-डिटेविटवसाहब ! घबडइये नहीं। आप लोग इस
रहस्य के किनारे तक भी आ नही सके हैं। मैंने जब देखा कि
मेरी ही लाश को यथा रोति जला-जुला कर सब लोग घर लौट
गये तर उस समय अपने को उसी तरह मरा हुआ मशहूर कर
तमाशा देसने को मेरे मन में एक विशेष आग्रह जाग उठा ।
घटना सदा से ही रहयस्मय होती आयी है। यह सभी जानते हैं।
मुझे पंछे पता लगा कि ठीक मेरी तरह शकल का और 'दूसरे
एक आदमी की लाश मेरे त्यागे हुए कपड़ों से सन्जित, ठीक
जिस स्थान पर मैं पड़ा था उसी स्थान पर ही मेरे नौकर को
देख पड़ी थी। लाश का सारा मुंह खून से तर मिट्टी में सना
हुआ था जिससे कोई यह नहीं जान सका कि वह लाश मेरी
नहीं किसी दूसरे की है । विशेषत उसकी नाक के ऊपर लाठी
का जो घाव पड़ा हुआ था उससे भी उसकी नाक काअस्तित्व
मिट गया था। इसी से लाचार उस लाश को किसी और दूसरे
की कहकर कोई सदेह नहीं कर सका।
सतीश०-डाक्टर बाबू! देखता हूँ आप एक विचित्र अद्भुत
कहानी गढकर कह रहे हैं। ऐसी घटना तो बडे अद्भुत
जासूसी उपन्यासों में भी सुनी और पढी नही गयी है।
रमेन्द्र-"यह घटना सच्ची होने पर भी जासूसों के अद्भुत
कल्पनामय उपन्यासो को मात कर गयी है, यह सत्य है। मैंने
विशेष पता लगाकर जाना कि हरेन्द्र विश्वास नामक ठीक
मेरी ही शकल का एक और आदमी कलकत्ते के वागवाजार से
चूच जेवर गहने पहनी हुई एक विधवा भद्र महिला को फुसला-
कर जामतला महल्ले में ले आया। इसके बाद कुछ दिन तक
दोनों स्त्री पुरुप के भाव में बहा रहते थे। एकाएक न मालम
किस कारण से दोना में कहा सुनी हो गई। ओर ठीक हम
सहधर्मिणी - सतीशगवू । यह सयोग की बात है। यहाँ एक काकताली सयोग आ पड़ा था।" सतीश-"कैसे ? ओह डाक्टरवावू यह कैसा रहस्य का पर्दा आप उठा रहे हैं क्या ऐसा भी कभी हो सकता है।" ठीक इसी समय कलकत्ते के नामी जासूस सतोशचन्द्र का निमत्रण पाकर वहाँ आ उपस्थित हुए। उन्होंने रमेन्द्रनाथ को देखते ही पाकेट से एक फोटो तस्वीर बाहर निकाली और कुछ देर तक उसे ध्यान से देखते रहे। उसके बाद बोले-"माफ कीजिएगा सतीशवा।" इसके बाद फौरन रमेन्द्रनाथ की तरफ पलट कर बोले- "हरेन्द्र विश्वास मैं तुमको सरकार की आज्ञा से कानून के अनुः सार वाग बाजार को श्रीमती विलासिनी की हत्या के अपराध में गिरफ्तार कराता हूं।" इतना कहकर उन्होने रमेन्द्रनाथ का दाहिना हाथ मजबूती से पकड लिया। रमेन्द्रनाथ चुप हैं। सतीशचन्द्र के विस्मय की सीमा नही रही। वे अवाक हो बैठे रहे । इसी समय हेमांगिनी भी सपूर्ण रूप से होश में आ गयी और प्रफुल्लकुमार प्रभृति अन्यान्य निमत्रित गण भी वहाँ आकर पहुँच गये। इधर बहुत देर से हेमागिनी और सतीश- चन्द्र को न देख कर मौसी और सुधाशु भी उन लोगों को ढूढते हुए उसी हाल घर में आ उपस्थित हुए । सभी रमेन्द्रनाथ को सामने खड़ा देखकर एक दम डर विस्मय 'और आनन्द से अधीर हो अवाक हो गये। फिर पुलिस जासूस के हाथ में रमेन्द्रनाथ का दाहिना हाथ मजबूती से पकड़ा हुआ देख ओर भी उन लोगो के विस्मय की सीमा नरही ! मामला क्या है जानने के लिए सबों ने कौतुहल पूर्ण दृष्टि से रमेन्द्रनाथ के मुंह की ओर देखा।
उपसहार
૨૨
रमेन्द्र-डिटेक्टिवसाहय ! घबडइये नहीं। आप लोग इस
रहस्य के किनारे तक भी आ नही सके हैं। मैने जब देखा कि
मेरी ही लाश को यथा रीति जला-जुला कर सब लोग घर लौट
गये तर उस समय अपने को उसी तरह मरा हुआ मशहूर कर
वमाशा देखने को मेरे मन में एक विशेष आग्रह जाग उठा ।
घटना सदा से हो रहयस्मय होती आयी है। यह सभी जानते हैं।
मुझे पंछे पता लगा कि ठीक मेरी तरह शकल का और 'दूसरे
पक आदमी की लाश मेरे त्यागे हुए कपडों से सजित, ठीक
निस स्थान पर मैं पडा या उसी स्थान पर ही मेरे नौकर को
देख पड़ी थी। लाश का सारा मुंह ग्यून से तर मिट्टी में सना
हुआ था जिससे कोई यह नहीं जान सका कि वह लाश मेरी
नहीं किसी दूसरे की है । विशेषत उसकी नाक के ऊपर लाठी
का जो घाव पड़ा हुआ था उससे भी उसकी नाक काअस्तित्व
मिट गया था। इसी से लाचार उस लाश को किसी और दूसरे
को कहकर कोई सदेह नहीं कर सका ।
सतीश० डाक्टर बाबू ! देखता हूँ आप एक विचित्र अद्भुत
कहानी गढकर कह रहे हैं। ऐसी घटना तो बडे अद्भुत
जासूसी उपन्यासों में भी मुनो और पढी नही गयी है।
रमेन्द्र-"यह घटना सच्ची होने पर भी जासूसों के अद्भुत
कल्पनामय उपन्यासो को मात कर गयी है, यह सत्य है। मैंने
विशेष पता लगाकर जाना कि हरेन्द्र विश्वास नामक ठीक
मेरी ही शकल का एक और आदमी कलकत्ते के वागवाजार से
पूव जेवर गहने पहनी हुई एक विधवा भद्र महिला को फुसला-
कर जामतला महल्ले में ले आया। इसके बाद कुछ दिन तक
दोनों स्त्री पुरुष के भाव में बहा रहते थे। एकापक न मालम
किस कारण से दोना में कहा सुनी हो गई। ओर ठीक हम
१२८
सहधर्मिणी
लोगों की घटना के दिनही हरेन्द्र विश्वाससध्याको अपनीप्रणयिनी
की हत्या कर उसके सारे जेवर गहने, नकद रूपये पैसे लेकर
चलता हुआ। इसके बाद सयोग से पैदल मधुपुर आते आते
रास्ते में इन्ही दुसाधों के हाथ वह मारा गया। जब पुन लौट
कर दुसाधों ने मुझे वहा नहीं देखा तव उसी हरेन्द्र विश्वास
को ही मेरी पोशाक पहना कर वहा रख दिया।"
सती-ओह ! बड़ी ही अद्भुत कहानी है इसने तो
आरव्योप-यास को भी मात कर दिया है। तव दुसाधों क ऐसा
करने का उद्देश्य क्या है?"
रमे द्र-दुसाध लोग बड़े ही चालबाज ओर धूर्त डाकू हैं।
पुलिस की ऑखो में धूल झोंकने हो के लिए उन लोगों ने ऐसा
किया था। उन लोगों ने समझा मेरी लाश कोई वहा से हटा
कर दूसरी जगह ले गया है। और यह नई लाश ठीक मेरी
शकल की और विदेशी है। इसके हत्याकाण्ड को कोई जानता
भी नहीं है। सुतरा मेरी पोशाक पहनाकर रख देने से कोई
सहज ही दूसरा व्यक्ति कहकर पकड़ नहीं सकेगा। इस तरह
एक खून सहज ही छिप जायगा । आखिर में हुआ भी ऐसा ही
अत. लोगों ने हरेन्द्र की लाश को हो मेरी लाश समझ जलों
जुलाकर गगाविसर्जन कर डाला। इस प्रकार एक और हत्या
दवदवाकर अधकार हो में छिप गई।"
पुलिस जासूस बड़े हो लजित होकर बार बार रमेन्द्र नाथ
से क्षमा को भीख मांगने लगे। अपने जीवन में ऐसी भूल उनसे
कभी नही हुई थी। वे बोले-"मैंने अनेको जटिल से जटिल
खून
के मुकदमें को हाथ में लेकर हत्याकारी को गिरफ्तार
किया। पड़े २ रहस्य जाल को सुलझाकर खूनी का पता
लगाया। किन्तु अपने जीवन में ऐसी भूल कभी नहीं हुई थी।
१२६ उपसहार अत उन्होंने उसी दिन से जासूसी काम छोड देने की प्रतिक्षा कर ली । वोले-"आज से जासूसी धधा कभी न करूँगा " कहना व्यर्थ होगा कि उस दिन रमेन्द्रनाथ को प्रत्येक व्यक्ति से अलग २ अपनी आत्मकहानी अनेक बार कहनी पडो थी । अन्त में उन्होने सतीश यात्रु और हेमागिनी की भूल सुमाकर उनके हृदय से भ्रम का पर्दा हटा दिया वे सब जान वृझकर ही आज प्रीति भोज के दिन यहा आ उपस्थित सुतरा उस दिन का प्रीतिभोज सम्पूर्ण रूप से सबों के लिए वडा हो मोतिपट और आनन्द का विषय हो गया था। हेमागिनी के यत्न और उत्साह से शीघ्र ही प्रफुल्ल बाबू की कन्या के साथ रमेन्द्रनाथ का शुभ विवाह हो गया। इस विवाह में हेमागिनी ने सुशीला को एक हीरे का जड़ाऊ कठा उपहार दिया था। उसमें यह मोटो खुदा हुआ था "पति विहीन नारी जीवन व्यर्थ अकाय जाता है। धन सम्पति स्वर्गपदारथ सही तुच्छ लखाता है।" सतीशचन्द्र ने भी एक गले का हार और घड़ी चेन रमेन्द्रनाथ को उपहार दिया । उसमें भी यह यह अकित था-"अई भार्यामनुप्यस्य भार्या श्रेष्ठतमः सखा ॥ अर्थात्-स्रो भार्या के रूप में पुरुष की अद्धांगिनी कहलाती है। और मिनों में सबसे श्रेष्ठ मित्र तथा दह काल परकाल की सच्ची सहचरी होती है।" रमेन्द्र की वृद्धामा ने दम्पतो को जाशीर्वाद देते २ मन में मारे आनन्द के फूली न समाती थी। अत उन्हाने हृदय खोलकर पड़ी ही प्रसन्नता के साथ हेमा गिनी को आशीर्वाद दिया-"बेटो ! तुम अपने पती की सब्जी सहधर्मिणी हो। तुम्हारा सुझाग सदा अचल रहे।" . समाप्त 在
मित्रमंडल ग्रन्थमाला के
स्थायी ग्राहकों के लिये नियम
(१.) स्थायी ग्राहक बनने की प्रवेश-फीस सिर्फ ॥) है।
(२) पुस्तके प्रकाशित होते ही १५ दिन पहले दाम
आदि का "सूचना-पत्र" भेज देने के बाद स्थायी ग्राहको
को २५) सैकडा कमीशन काटकर वी० पी० द्वारा भेज दी
जाती हैं।
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(३) जो पुस्तक माला मे अलग निकलती हैं, उन पर
भी स्थायो ग्राहकों को २५) सैकडा कमीशन दिया जाता है।
(४) स्थायी ग्राहक चाहे जिस पुस्तक की, चाहे जितनी
प्रतियाँ और चाहे जब, ऊपर-लिखे कमीशन पर, मंगा
सकते हैं।
(५) बाहर की-सब छापाखानों की-सव पुस्तकें
स्थायी प्राहको कोरुपया कमीशन पर मिलती हैं।
(६) स्थायी प्राहक की भूल से धी० पी० लोट आने पर
डाक खर्च उनको ही देना पडता है, और दो बार वी० पी०
लोट आने पर स्थायी प्राहकों की सूची से उनका नाम काट
दिया जाता है।
माला की छपी पुस्तकें
(१) विश्रामबाग-यह पुस्तक प्रसिद्ध कादम्बरीकार
मिस्टर रिनाल्ड के "मे मिडिस्टन के" आधार पर पूर्वीय ढङ्ग
पर लिखी गई है। रिनाल के नाविल्स कितने. रोचक होते है
यह पाठकों पर निदित ही है। तिस पर यह पुस्तक पूर्वीय ढंग
की होने से और भी रोचक हो गई है। सामाजिक जीवन का
वर्णन इतना, भावपूर्ण चित्रित किया गया है कि एक बार हाथ
में लेकर समाप्त करना ही पड़ता है। मूल्य १)
(२) अजेयतारा-मराठो के प्रसिद्ध कादम्बरी लेखक
श्रीमान् आपटे के ऐतिहासिक कादम्बरी 'अजिंक्यतारो' का
हिन्दी अनुवाद है। पुस्तक इतनी मनोरञ्जक है कि ज्यों ज्यो
आप पढते जाइयेएगा त्यो त्यों आपकी उत्सुकता घढती जावेगी।
अन्त में पुस्तक समाप्त करने पर ही आपको चैन मिलेगा।
पृष्ट-सरया ३५२, मूल्य १॥)
(३) बिलासिनी या'चुर की राख..
वैदिक धर्म को पुतिन शिक्षा से पवित्रा हृदय चम्पा एक
जोदार की लडकी है। त्रिवेणी स्नान के समय मार्ग अष्ट
होकर वह दुराचारियो के हाथ में पड़ जाती है । अनेक
प्रलोभनों तथा अत्याचारों से पीड़ित होने पर भी यह
केसे
अपने पतिव्रत धर्म की रक्षा करती है। विलासिनी मिशन
स्कूल में मेमों के हाथ के नीचे शिक्षा पाई हुई एक बड़े भारी
संकी लैंड की है । 'दासियों के द्वारा थोड़े से प्रलोभन से
यह केसे भ्रष्ट होकर अपने कुल को कलकित करती है ! आत
फल के साधु महन्त कैसे नीच और पतित होते है। अमीडो
लडके शिक्षा के अनाव से कैसे
भ्रष्ट चरित्र होकर लोक-परलोक
दोनों का नाश करते हैं। 'बड़े घरों की दाइयां न्याओं को
केले कुपथ पर आरूह करती हैं ।-एक स्त्री के रहते चुढीती में
- अन्य युवती कन्या से विवाह करने पर कैसा मीपण परि
णाम होता है, इत्यादि अने बातों का चित्रण ऐसी योग्यता के
साथ किया गया है कि पुस्तक हाथ से नहीं छूटती ।, ऐसी
मचित्र पुस्तक का मूध केवल १॥ मात्र,
- -~May सरल संस्कृत प्रवेशिका-- op "सस्कृत में प्रवेश करने के लिए इससे बढकर अभी तक कोई पुस्तक हिन्दी भाषा में नहीं लिखी गई थी । भाषा में यह एक अद्वितीय पुस्तक है, प्रथर-मध्यमा के विद्यार्थियों के लिए यह एक सजीवनी बूटी है। इसी उपयोगिता इसी से प्रकट होती है कि छपकर तैयार होते ही, प्राय १००० कापियाँ हाथोहाध चिफ गई। 5 वर्ष के लड़के को भी यह पुस्तक सम- मकर पढ़ा सकते हैं। प्रथम भाग का मूल्या) द्वितीय भाग मेसमें है. १७८ : 07rh (५) वेद और पशुयज्ञ-अापक विनोद- विदारीराय ने "पियों को खान-पान" नामक पुस्तक लिख- किर ऋषियों पर गाय, वेल, सूअर, घोडा आदि खाने का क्लक गाया था। इसी पुस्तक को खण्डन बड़े बड़े पुए प्रमाणों द्वारा उक्त पुस्तक में किया गया है, धर्मप्राण हिन्दुओं को इसकी एक एक कापी अपने पास रखनी चाहिए। यह वैष्णवों के बड़े काम की है। मूल्य ।। (६) स्वामी दयानन्द का,संसार परे जादू-पापडत जेम्मनी के हाथ की लिखी हुई है। जिसमें दिखलाया गया है कि स्वामीजी का प्रसाद देशदेशान्तर के विद्वानों पर कैसा पड़ा है और पाश्चात्य विद्वानों को उन पर कैसो बद्धा गोमूह' ' ATI - (७) सनातन वैदिक वर्णव्यवस्था- पुराण, शास्त्र, स्मृति, इतिहास प्राचीन ग्रन्थों के आधार पर यह पुस्तक बड़ी ही योग्यता से लिखी गई है। आज तक किसी ने इसके सण्डन का साहस नहीं दिया। एक बार पढ लेने पर वर्णव्यवस्था का रहस्य मालूम हो जायगा । नया मंस्करण छप रहा है । मूल्य ३) (८) सप्त-सोपान-राजपूताने के वीर राज- पूतों के सम्बन्ध में सात गल्प हैं जिन्हें पढते ही रगों में खून जोश मारने लगता है। हिन्दी के प्रसिद्ध विद्वान् लाला भग- वानदीनीने इस पुस्तक को नवयुवकों के लिए अत्यतापयाना लिखा है । मूल्य !) (8) अपराधिनी-इस पुस्तक के मूल लेखक ग साहित्य में सर्वोच्च स्थान पाये हुए सिद्धहस्त उपन्यास लेखक श्रीयुत या० हरिसाधन मुखोपाध्यायजी है। आपके उप- न्यास कैसे होते हैं। इसके कहने की हम आवश्यकता नहीं समझते। कारण कि हिन्दी भपा-भाषी आपसे चिर परिचित हैं। पुस्तक कितनी शिक्षाप्रद है इसका अनुमान आप इसी से लगा सकते हैं कि बैंगला में इसके तीन सस्करण हो चुके हैं। स्त्रियों के योग्य बड़ी ही उत्तम पुस्तक है। इसको पढते ही समाज की नवीन घटना का विशेष सामजस्य का पता लग जाता है। पात्रों का चरित्र चित्रण, भी रतना अच्छा है कि पढते ही चित्त प्रफुल्लित हो जाता है । मूल्य ११) के लगभग पुस्तक मिलने का पता- चौधरी एण्ड सन्स, बनारस ।
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