Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Ardhmagadhi Reader

Jain,banarashi Das · 2011/04

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हिन्दी
अर्धमागधी रीडर
अर्थात .
जैन प्राकृत प्रवेशिका
(प्रथम भाग)
लेखक
बनारसीदास जैन एम0 ए0
श्रोरियंटल कालेज, लाहौर.
( सम्पादक तथा अनुवादक, "स्वप्नवासवदत्तम्",
मिशन प्रेस अलाहाबाद में छपी
घोर सं०२४४७
विक्रम सं० १९७७
(सर्व अधिकार प्रत्यकर्ता के स्वाधीन )
प्रभाति ५० प्रति
[१०१)

हिन्दी अर्धमागधी रीडर के प्रथम भाग का विपयानुक्रम समपंण पत्र, चित्र श्रीमान् ए० सी० वूलनर साहिय का शादि में प्रस्तावना ... ... १ हिन्दी व्याकरण अर्धमागधी व्याकरण पत्र पाठ मियापुत्ते दार उसम निवाएं मेहे कुमारे हिन्दी अनुवाद मृगा पुत्र चालक ऋषम मगवान् का निर्वाण , ... ... ... १३ ३३ ... ४३ मेघ कुमार ४६ ... 1 मिलने का पता:- सूब चन्द जैन, संयूर ( जोंद स्टेट.) Khub Chanel Jain. Sangrmr.

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नियगुरुणं आयरियवराणं सिरि
आल्फ्रेड् कूपर वूल्नर
ALFRED COOPER WOOLNER
नामधिजाणं- लोपुरत्थ-पाईणमहाविज्ञालयझपखाणं
सवाई हियकिचाई सरिता तेसिं करकमलेसु
ससिणेहं समपिय पोत्थयं एवं
.
विणीपणं सीसेणं
बनारसीदासेणं

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प्रस्तावना. अप्रैल सन् १९१७ में स्था० श्वे. जैन फानफ्रेन्स लाहौर में भरी । उस में श्रीमन ए० सी० बूलनर भी पधारे थे। उन्हों ने अपने पण में बतलाया था कि योरुप में जैन साहित्य का प्रचार वौद्ध हित्य के प्रचार की अपेक्षा इस लिये कम है कि जैन साहित्य प्रायः धमागधी प्राकृत में है और अर्धमागधी प्राकृत सीखने के लिये कोई नाकरण या रीडर मौजूद नहीं जैसा कि बौद्ध साहित्य पढ़ने के नये पाली भाषा के कई स्याकरण और रीडर मौजूद हैं। उस समय मैं पंजाब यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी के लिये बहुत से जैन न्य खरीद कर चुका था और माफ़ी खरीद कर रहा था, इस लिये ने उसी साल अगस्त मास में श्रीमान् वूलनर साहिय से प्रार्थना की कि अपनी लाइब्रेरी में साधन काफ़ी हो गये हैं इस लिये श्राप एक "अर्धमागधी रीडर" लिख कर जैन जाति तथा अन्य विद्या नमियों की इच्छा को पूर्ण कर दीजिये ! इस पर अक्तूबर में साहिब बहादुर ने मुझे फरमाया कि "तुम अर्धमागधी रीडर लिखना प्रारम्भ कर दो। हम इसको शुद्ध करके यूनिवर्सिटी की ओर से छपवा दंगे।" साहिय यहादुर की श्राधानुसार मैं ने रीडर लिख कर अक्तूबर सन् १९१६ में उनके सामने पेश की। उन्हों ने उसे स्वीकार कर लिया और यह यूनिवर्सिटी की ओर से लाहौर में छपने लगी। परन्तु लाहौर में मूलपाठ के फेवल ३२ पृष्ठ छपे थे कि छापेखाने की गड़बड़ होने से काम बन्द करना पड़ा । वह ३२ पृष्ठ साहिब बहादुर की श्राशा लेकर इस पुस्तक में लगाए गये हैं और यूनिवर्सिटी की रीडर के लिये फिर से छप रहे हैं। पिछले चौमासे में उपाध्याय श्री आत्माराम जी के पास दिहली से एक पत्र पाया कि जैन सूत्र पढ़ने के लिये व्याकरण का फौनसा । .

--
पुस्ता पा चाहिये, माजी मेरी मामलि मन
पदाल में नो लियसमा प्रतिदिन
हरा धन नही । सासारा परमाचा भौमपन्द्रका
पारन पर टीका की सहायता रोजन प्रारत
Twitो शासन तयाराम जी परमाया
कि.दिपजी अर्धमागधी गारंग पर हिन्दी अर्धमागधी
ror irrit It imagमानि गीर मे यादगार
राग है।
मृत
गाणे में पाशाय धी भात्मा जीमे
Frfa ran लिये थे। इस मे में आणीय अनुमह मानत
Har (गुजगी भागहर)
पार पाठ
पूर्णतया शुरना
कि यह मेग पदिता प्रपरला भार कम पुग्नक का पहला
বা না যায় দে মা ঘা মারা খাই
सलिये संगय पिम में मंगनी शुद्धियों के अनिमियम
मोहापं की प्रतियां रह गई होगी। अतः पाटक गुन्द में मेरी
सधिनय प्रधना :-
पनि मति अनुसार , रयो सार के पारसी।
যুৎ এল ই হিনা , খ ম মুল মন।
भोरियंटल कालेज,
नारसी दास जैन
4
.

अर्धमागधी
रीडर
हिन्दी व्याकरण
।
.
[ यह यात स्वतः सिद्ध है कि एक भाषा के व्याकरण को
जानने वाला मनुष्य अन्य भाषाओं को बड़ी आसानी से सीख
लेता है। इसलिये अर्धमागधी भाषा का व्याकरण लिखने से
पहिले हिन्दी भाषा का संक्षिप्त व्याकरण दिया जाता है ताकि
वह पाठक जग जिन्होंने कोई व्याकरण न पढ़ा हो यह इसे
स्वयं विचार लेवें। इससे उनको अर्धमागधी का व्याकरण
समझने में कोई मुश्किल न पड़ेगी ]
१ भापा-जिस उपाय के द्वारा प्राणी अपने मन का भाव एक
दूसरे पर प्रकट करते हैं उसे भाषा कहते हैं। जैसे - योलना,
लिखना, इशारे करना, इत्यादि !
२ भापादा प्रकार की होती है १ व्यक्त और २ अध्यक्त ।
व्यक्त भाषा केवल मनुष्यों की होती है और यह भी उस समय
जब वह अपने मन का प्राशय सार्थक शब्द बोल कर या लिग्य
कर प्रकट करते हैं। अव्यक्त भाषा पशु पक्षियों की है तथा
मनुष्यों की है जय वह आंम्न या हाथ के इशारे से काम
लेते हैं।

अर्धमागधी रोडर।
व्या मापा
अशा (मनुष्यों की) | पत (पगुणों को).
। करना।
"मुझे प्यास लगी। हाथों का पुट घना गाय बैल आदि
है पानी पिलाओ" कर मुप के पास का माय माय शब्द
ऐसा योलना याला फर इशारा करना।
लिखना।
ऊपर के कोष्ठक में एक ही श्राशय तीन उपायों से प्रकट किया
गया है। हमारा प्रयोजन यहां पर ध्यय भाषा से है।
३ हिन्दी-यू तो भिन्न २ समय तथा देशों की मापापं हिन्दी के
नाम से पुकारी जाती है जैसे चन्द यरदार ( चन्द कपि) हत
पृथ्वीराज रासो को हिन्दी, तुलसीदासकृत रामायण की हिन्दी,
बिहारीलाल त बिहारी सतसई को हिन्दी इत्यादि । परन्तु
मेरा अभिप्राय हिन्दी कहने से उस मापा से है जो सरस्वती,
भारतमित्र श्रादि पत्रों तथा चन्द्रकान्ता आदि उपन्यासों में
प्रयुक्त होती है।
४ व्याकरण उस विद्या का नाम है जिस से फिमी भाषा के
शुद्ध बोलने तथा लिखने का वान प्राप्त हो। हिन्दी व्याकरण
के यह तीन अा है-१ वर्णमाला, २ शब्द प्रकरण, ३ याक्य
3
वर्णमाला..
५ वर्णमाला व्याकरण का यह अङ्ग है जिस से घों अर्थात
अक्षरों के उत्पत्ति स्थान धादि का शान हो
हिन्दी वर्णमाला के अक्षर
स्वर---अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ श्री श्री।
व्यञ्जन- क ख ग घ ङ । च छ ज झ ट ठ ड द ण ।
१

तथदधन । प फ ब भ मायरल घाशप सह। (अनुस्वार): (विसर्ग)। लिखने के लिये जो अक्षरों के सर्द्रत रखे जाते हैं उन्ह लिपि कहते हैं । इस पुस्तक की लिपि देवनागरी या नागरी फह- लाती है। ७. स्वर दो प्रकार के होते हैं, अननुनासिक और अनुनासिक अननुनासिक स्वर केवल मुख द्वारा योले जाते हैं। जैसे श्राज में 'श्रा','भोग' में श्री (ओ); 'देवी' में ए (२) और ई (1) अनुनासिक स्वर मुख और नासिंफा द्वारा बोले जाते हैं और लिखने में उनके ऊपर प्रायः चन्द्रबिन्दु का चिह्न (*) दे देते हैं जैसे औच में श्री, नीद में ई (i) इत्यादि । ८. फाल की अपेक्षा भी स्वरों के दो भेद हैं, १ हस्य २ दीर्घ । हूस्व स्वर घोलने में थोड़ा समय लगता है---जैसे अ उ, कखगघड ... दोर्घ स्वर बोलने में अधिक समय लगता है; जैसे ---श्रा ६ ए ऐ ओ श्री, आँई ऊ ए ऐ ओ श्री। हस्य स्वरों को लघु या छोटे भी कहते हैं। दीर्घ स्वरों को गुरु, लम्चे, या बड़े भी कहते हैं। ६. व्यजनों के भी अनेक भेद हैं जैसे:- फवर्गीय या कण्ट्य कहलाते हैं चछजझम चवर्गीय या तालव्य कहलाते है स्वर्गीय या मूर्धन्य कहलाते हैं तथदघन तवर्गीय या दन्त्य कहलाते हैं पफयभम पवर्गीय या श्रोप्ठ्य कहलाते हैं अन्तस्य कहलाते हैं शप स ह (:) ऊप्मन् कहलाते हैं भण न म (') अनुनासिक या नासिक्य कहलाते है, यरलय ... इत्यादि। १० स्वर के व्यवधान से रहित दो या दो से अधिक स्यानों का भमागधीरासर सम्ह संयुक्त अशर कहलाता है सस, स, स्क, यादि। ११ श्यान को भी मामा, हायु पर की एक और गुर रघर की वा मायाएं गिनी जातीदिय स्थर पाये अनुरबार, विसर्ग या कोई मयुन प्रकार होना पद गुम गिनाki रन्तु शास्त्र में पनन की मात्राएं गिनन में नही मानी, पल स्परों की मात्राएं गिनते है. दो माहासा माला सा फर में फिर, जीभ फिर मुमर माहि। मगया तो चोदिश फिर, पंसा मुमरन नादि । फवार शब्द प्रकरण १२ शब्द प्रकरण में यह वर्णन हताकिलिमपचन और विनित के कारण शन्दी में परिवर्तन होते हैं तथा एक प्रकार के से दूसरे प्रकार का शव किस तरह पनाया जाता है। हिन्दी के शन् पांच हिस्सों में घिमलाई- संज्ञा, २ पिश- पण, ३ सर्वनाम, ४ मिया ५ अध्यय। १३ मंजा-जो फिसी जीय, यस्तु या म्याग का नाम हो जैसे राम- दास, गाय, घोड़ा, चौकी, रजहरण आदि १४ गुण तथा संख्या धाची शब्द विशेषण कहलाते हैं, जैसे काला नीला, शीत, उरण, पांच, सात, आदि १५ जो शब्द किसी संशा के यदले रपया जाता है उसे सर्वनाम कहते हैं। जैसे रामदास यहां श्राया था वह (अर्थात् रामदास) किताब लेगया। यह मेरी चौकी है इस (अर्थात् चौकी) पर

हिन्दी व्याकरण।
१६ जो शब्द किसी काम के फरने यो होने को बतलाये उसे किया
कहते है; जैसे जाता है, लिखता था, पियेगा।
१७ इनके अतिरिक्त अन्य सब शब्द प्रत्यय कहलाते हैं; जैस श्रय,
नव, आज, यहां, फिर, से तक।
१- एक व्यक्ति याची शब्द को एकवचन कहते हैं, जैसे घोड़ा,
प्याला, स्त्री, लड़की ॥ एक से अधिक व्यक्तियों की संख्या
घतलाने वाले शब्द बहुवचन कहलाते हैं; जैसे घोड़े, प्याले,
स्त्रियां, लड़कियां ॥
१६ पुरुष या नर वाची शब्द पुल्लिङ्ग कहलाते हैं, जैसे घोड़ा,
लड़का, प्याला, मनुष्य ॥ स्त्री या नारी याची शब्द स्त्रीलिङ्ग
कहलाते हैं; जैसे घोड़ी, लड़की, प्यासी, स्त्री।।
२० एक वाक्य में किसी शब्द का क्रिया के साथ अथवा अन्य शब्द
के साथ जो सम्बन्ध होता है उसे उस शब्द का कारक
कहते हैं। हिन्दी में श्राठ फारक होते हैं; यथा- कर्ता, फर्म,
करण, सम्प्रदान, अपादान, सम्बन्ध, आधकरण, सम्योधन ॥
२१ क्रिया के करने वाले को कर्ता कहते हैं; जैसे राम जाता है,
लड़की सोती है। यहां राम, लड़की कर्ता है ।
२२ क्रिया के फल को कर्म कहते हैं; जैसे राम पुस्तक पढ़ता है,
सीता पानी पीती है। यहां पुस्तक और पानी कर्म है।
२३ जिस के द्वारा क्रिया की जाती है उसे करण कहते हैं; जैसे
राम ने चाकू से कलम बनाई। यह पिनसल से लिखता है।
यहां क्रिया के साधन चाकू और पिनसल करण है
२४ जिसके लिये क्रिया की जाती है उसे सम्प्रदान कहते हैं; जैसे
राम के लिए भोजन यनाओ। मुझे पुस्तक दे दो। यहां राम
और मुझे सम्प्रदान हैं।
7
॥

. अर्धमागधी रीडर - । २५ जिस स्थान या हेतु से क्रिया प्रसरती है उसे अपादान' कहते हैं, जैसे कूप अल निकालता है। चूत से पत्ते गिरते हैं। यहां कम और वृक्ष श्भपादान है २६ सम्बन्ध कारक का क्रिया के साथ साम्गन्ध नहीं होता किन्तु दो संशात्रों में स्वामित्यादि सम्मन्ध की यातन करता है जैसे राजा का नौकर, राम की पुस्तक। यहां राजा का नौकर के साथ और राम फा पुस्तक के साथ स्वामित्व सम्बन्ध है । राजा और राम स्वामी कहे जाते हैं और सम्बन्ध कारक में लिखे गए हैं। नौकर और पुस्तक उन के धन कहलाते हैं। २७ जहां पर प्रिया की जाती है उसे अधिकरण कहते हैं जैसे मैं घर में सोता , पुस्तक संदूक में रख दो। यहां घर और संदूक अधिकरण हैं। २- दूर से पुकारने या सायधान करने को सम्बोधन कहते है। जैसे राम! इधर आश्री। हे यालको! अपना काम करो। यहां राम और यालको सम्बोधन है। २६ हिन्दी में कारकों का बोध कराने के लिये शब्द के साथ कार- काव्यय लगाए जाते हैं । भिन्न २ कारकों के लिये भिन्न २ श्रत्यय लगते हैं। कारक कारकाव्यय ने फो.. ... . , ... से, द्वारा, करमे सम्प्रदान . को, के लिये निमित्त, यास्ते अपादान . श्रधिकरण सम्बोधन पर, में, है, अरे, का, के, की यीच प्रो ...

हिन्दी व्याकरण । ३० सम्योधन में शब्द के पहिले, और अन्य कारकों में शन्द के पीछे कारकास्यय लगते हैं। फारफी को विमतियां भी कहते हैं। कर्ता को प्रथमा, फर्म को द्वितीया फरण को तृतीया, सम्प्रदान को चतुर्थी, अपादान को पञ्चमी, सम्यन्ध को पष्ठी. अधिकरण को सप्तमी विभक्ति कहते है। कमी सम्योधन को अटमो विभक्ति भी कह देते हैं। ३१ फारकों का धान अर्धमागधी ध्याकरण समझने के लिये पड़ा उपयोगी है, इस लिये इसका एक और उदाहरण दिया जाता है :-इन्द्रचन्द्र ने रामस्वरूप के सन्दुक में से बच्चे के लिये टोपी निकाली। इस पापय में निकाली क्रिया है। इस किया फा करने घाला इन्द्रचन्द्र है, इस लिये इन्द्रचन्द्र कर्ता है। निकाली' क्रिया का फल टोपी पर पड़ता है इसलिये 'टोपी' कर्म है। बच्चे के लिये यह क्रिया की गई इसलिये 'या' सम्प्रदान है। सन्दुफ में से यह क्रिया प्रसरी इस लिये 'सन्दक' अपादान है। रामस्वरूप का क्रिया के साथ कुछ सम्यन्ध नहीं किन्तु सन्दूक के साथ स्वामित्व सम्बन्ध है इस लिये रामस्वरूप सम्बन्धकारक में लिखा गया और सन्दुक उसका धन ३२ बिना कारकाध्यय लगाए वाक्य का अर्थ निश्चित नहीं होता। जैसे मोहन सोहन किताब खरीदी। अब इस पाक्य का अर्थ भिन्न २ कारकाध्यय लगाने से भिन्न २ हो जावेगा; जैसे। मोहन ने सोहन से किताब खरीदी मोहन ने सोहन के लिये किताब खरीदी मोहन से सोहन ने किताब खरीदी मोहन के लिये सोहन ने किताब खरीदी हे मोहन : सोहन ने किताय खरीदी, इत्यादि इत्यादि । अभ्यास निम्न लिखित वालों के शब्दों के कारक बतलायो:-- रामचन्द्र ने गवण को मारा । आकाश में तारे चमकते उत्तरका कर्म अधिकरण 1 ४ कर्ता।

L । अर्धमागधी रीपुर । है। योधा शारों से शुओं को मारने है । साधुनों को दान देने में पुण्या होता है । यहार मगु घोटे पर से गिर पटा । पालक घोर से डर गया । जयदेय में धन- दत्ता को पुस्तक धुराली। यह लाहौरस से आया है। मकड़ी के साले में भिड़ फंस गई। दधात में माही२६ डाल दो। ब्राह्मण को अमरदी। झरनेर में जल निकाल रहा है। शेर के साथ मत संख। विशेपण । २३ संशाओं की पायत तो केवल पूर्वोक पातही जानना काफ़ी । होगा ॥ श्रय विशेषणों को लेने है। विशेषण तीन प्रकार के होते है. ~१ गुण याची, २ संख्या याची, ३ मामयाची॥ गुण वाघो जैसे - काला, नीला, तीक्षण, पड्ला, मोटा, शीतल, गरम इत्यादि। संख्यावाची जैसे चार, पांच, दस, बीस इत्यादि । क्रमवाची जैस-पहिला, दुसरा तीसरी इत्यादि । ३४ विशेषण प्रायः करके संज्ञायों के साथ प्रयुक्त होते हैं और उस समय उनके पीछे कारकाव्यय नही जाई जाते जैसे कि नीचे के उदाहरणों से प्रतीत होगा-वह इस छोटे नगर में रहता है । यह पांच प्रादमियों का घर है । पहिले साधु को दान देना चाहिए। यहां पर छोटा, मांच और पहिला ५ का द करण ७ कर्म सम्प्रदान । रफर्म भपादान ११ कर्ता १२ का १३ का १४ पचमी १५ प्रथमा १६ पंचमी १७ मम्मा १ पही १९ द्वितीमा २० प्रथमा २१ पंचमी २२ पटी २३ सामी २४ प्रथमा २५ सामी द्वितीया २६ उजु! २८ ोिण चचमी ३०मममा ११ गतीया ।

हिन्दी व्याकरण। शब्द क्रम से श्रधिकरण, सम्बन्ध और सम्प्रदान कारक द्योतन करते हैं परन्तु अपनी अपनी संज्ञाओं के साथ प्रयुक्त होने से इन के पीछे कारकाव्यय नहीं लगे। किन्तु जब यह संधाओं के बिना प्रयुक्त हो तब इन के पीछे भी फारकाव्यय लगते हैं जैसे छोटे में रहता है। पांचों का घर है। पहिले को दान देना चाहिये ।। सर्वनाम ३५ सर्वनाम अर्थात् यह शुन्द जो दूसरे शब्दों के बदले में बोले जाते हैं, सीन प्रकार के होते हैं । ३६ यह सर्वनाम जिन को बोलने वाला अपने लिये प्रयुक्त करता है उत्तम पुरुष के कहलाते हैं,जैसे - मैं, मुझको, मेरा इत्यादि। ३७ जिस के साथ यात कर रहे हों उसके लिये जो सर्यनाम आते है यह मध्यम पुरुप के कहताते हैं; जैसे--1, तुझे, तेरा इत्यादि। ३- जो शब्द ऐसे मनुष्य या वस्तु के लिये था जो बात करते समय पक्का के सामने विद्यमान न हो या जिस से यक्का सम्यो- धन करके यात न करे, प्रथम पुरुष के कहलाते हैं। जैसे- चह, उसे, उसका इत्यादि । ३६ उत्तम पुरुष के सर्वनाम को विभक्तियों या कारकों के रूप-- पहुवचन मैं, मैंने २ द्वितीया मुझे, मुझको हमें, हमको अमलीया मुझसे, मेरे द्वारा हमसे, हमारे द्वारा चतुर्थी मुझे, मुझको, मेरे लिये हमें, हमको, हमारे लिये . प्रपञ्चमी मुझसे हमसे एकवचन १प्रममा हम, हमने ७ मामी पकवचन १ प्रथमा अर्धमागधीराडर। मेरा, मेरे, मेरी हमारा, हमारे, हमारी मुझपर. में मुझमें हमपर, में, हममें,-पर इन को सम्बोधन विभक्ति नहीं पनती। ४० मध्यम पुरुष के सर्वनाम की विभक्तियां:- वहुवचन तु, तूने तुम, तुमने २ द्वितीया तुझे, तुझको तुम्हें, तुमको ३ तोया तुझसे, तेरे द्वारा तुमसे, तुम्हारे द्वारा ४ वर्षी तुझे, तुझको, तेरे लिये तुम्हें, तुमको, तुम्हारे लि ५ पशुमी तुझसे तुमसे पष्टी तेरा, तेरे, तेरी तुम्हारा, तुम्हारे, तुम्हारी . मममी तुझमें,-पर, तेरे ऊपर तुममें,-पर, तुम्हारे ऊपर ४१ प्रथम पुरुष बहुवचन यह, इसने; यह, उसने यह, इन्होंने; यह, उन्होंने २ द्वितीया यह, इसे, इसको, पह, यह, इन्हें,.. इन को; व उसे, उसको उन्हें, उनक ३ तृतीया इससे, उससे, के द्वारा इनसे, उनसे,--के द्वारा ४ चतुर्षों इसे, उसे,-को, इन्हें, उन्हें, इन उनको ५ पञ्चमी इससे, उससे इनसे, उनसे ६ वही इसका, के.की, उसका इनका, फोकी, उन-- ७ सममी इस पर...; उस पर... इनपर ...; उनपर... ४२ इनके अतिरिक्त और भी सर्वनाम होते हैं, जैसे-कौन जो, कोई एकवचन १प्रयमा ... ग . एक ८० 1R0 फोन, किसने कौन, किसे, किस को २ दि० कौन, किन्हों ने कौन, किन्हें, किन के . ४० हिन्दी व्याकरण किस से, किस के द्वारा किन से, किन के द्वारा किसे, फिस को, किस के लिये किन्हें, फिन को, फिन के लिये फिस से किन से किस का, के, की फिनका, के, की किस पर, में ५५० (10 म किन पर, में ... ... पकव बहु ५० प्र० २ द्वि० जो, जिसने जो, जिन्होंने जो, जिसे, जिसको जो, जिन्हें, जिनको रोष"कौन" के रूपों की सरह । एकप १५० कोई, किसी ने कोई २.द्वि० कोई, किसी को किसीसे . किसी के लिये इत्यादि फाई शब्द प्रायः एकवचन में ही प्रयुक्त होता है । ४० क्रिया। ४३ जो शब्द किसी काम के करने या होने का बोध कराए उसे क्रिया कहते हैं; जैसे-- यह जाता है, राम ने पानी पिया। ४४ क्रियाएं धातुओं से बनती हैं। जाता है- जा धातु से यना, पिया-पो धातु से, इसी प्रकार खा, दे, ले, चल, फिर, पढ़ सब धातु है । अर्थ की अपेक्षा धातु दो प्रकार के होते है-अकर्मक और सकर्मक। ४. अकर्मक पद धातु है जिन की क्रिया का फल कर्ता को छोड़

अर्धमागधीर
।
कर अन्य प्रम में नहीं जाता, जैसे - राम माता सीमा'
दोड़ती है। यहां माने और दोड़ने की क्रियाओं का
फल उनके का राम और सीनाको पाए भन्म कही माही
जाता इस नियं मा मार दाइ भानु सकर्मक है।
४६ सकर्मक यह धातु जिन की प्रिया का फा कर्ता को याद
सम्य वस्तु में चला आपः स - रामने पानी मिया, सीता ने
किताब पढ़ो। यहां पर पोने और पढ़ने की मियाओं के
फरल पानी और किसाय' में चले गए, इस लिये पो और
पढ़ धातु सकर्मक है
४७ काल तीन होते है भून (पीसा हुआ), २ यतमान यातमा
दुधा), ३ मयिष्यत् ( भान याला )।
४८ जिस किया से किसी काम का भूत काल में दोना सिद्ध हो
उसे भूत काल की प्रिया कहते हैं। यथा-महावीर स्वामी ने
धेणिक राजा को उपदेश दिया । राम में रायण को
जीता। मैंने अन्ध पढ़ा।
४ जिस मिया से किसी काम का वर्तमान काल में होना
सिड ही उसे पर्तमान की मिया कहते हैं यथा-साधु नपस्या
करता है। स्त्री भोजन बनाती है ।, लोग नगर को
जाते हैं। युर हो रहा है,
० जिस किया में किसी काम का भविष्यत् काल में होना
सिद्ध हो उसे भविष्यत् काल की क्रिया कहते हैं: यथा---रावण
तीर्थकर होगा। यह नगर को जावेगे। लड़ाई धन्द हो
जावेगी।
५१ इन ही तीन फालों के और भेद होने से मियानों के भी और भेद
'हो सके हैं. परन्तु उनके लिखने की कुछ प्रायश्यकता नहीं।

हिन्दी व्याकरण। २जो क्रिया किसी काम के करने की अाशा को प्रकट करे उसे आज्ञाकारी क्रिया कहते हैं। यथा-- - हे राम! तुम घर नाओ। अरे लछमन ! मेरी किताय लादो। मैं रोटी ... खालू। वह यहां बैठे। और राजा १३ कियाओं का प्रयोग दो प्रकार का होता है-१ कर्तृवाच्य और २ कर्मवाच्य । 1. जब क्रिया का कर्ता प्रथमा विभक्ति में और कर्म द्वितीया विभक्ति में लिखा जाता है तो यह प्रयोग कर्तृवाच्य कहलाता है; जैसे-साधु शास्त्र पढ़ता है । राम भोजन करता है। राजा ने पानी पिया। यहां पर साधु, राम, कर्ता हैं और प्रथमा विभक्ति में लिखे गये । शास्त्र, भोजन, पानी कम हैं और द्वितीया विभक्ति में लिखे गये। ५॥ जय किया का कर्ता तृतीया विभक्ति में और कर्म प्रथमा विभक्ति में लिखा जाये तो वह प्रयोग कर्म वाच्य कहलाता है; जैसे-साधु के द्वारा शास्त्र पढा जाता है । राम के द्वारा भोजन किया जाता है। राजा से पानी पिया गया। यहां पर साधु, राम, राजा क्रियाओं के करने वाले हैं परन्तु तृतीया विभक्ति में पाए हैं। इसी तरह शास्त्र, भोजन, पानी कम है परन्तु प्रथमा विभक्ति में आए हैं। २. निम्नलिखित क्रियाएं किस प्रकार की हैं ? १ घायु चलती है । २ आग जलती है । ३ उसका घर जलगया। ४ मह बरसेगा । ५ बच्चे को मत जगानो। ६ राम अपनी किताय पढ़ता है। २ उत्तर॥ अक० =अकर्मक,सफ० = सफर्मक,वर्त० = वर्तमान, भू-भूत, भघि० भविष्यत्, श्रा-आशाकारी ॥ १ मझ0 वर्ग २ सकतं० १ का ५०४१० मधि० ५ सक० प्रा०६सक वर्ग -

अर्धमागधी रोडर।
७ तू रोटी कर खाएगा ? रेलगाड़ी यहुत तेज़ दौड़ती
है। उसने वीर साई । १० वह कपड़ा ले जावे । ११ रावण ।
तीर्थकर बनेगा । १२ रामचन्द ने चिट्ठी लियो । १३ साधू अपने
पास धन न रयाने। १४ वह यालकरीता है। १५ नवकार मन्त्र
का जाप करो।
अधक्रिया
५६ जिन क्रियाओं का वर्णन ऊपर हुआ है उन्हें पूर्ण क्रिया कहते
है क्योंकि उनसे याश्यार्थ का पूरा बोध हो जाता है. जैसे
राम जाता है या जाता है राम कहने से । लेकिन
घह क्रियाएं जिनसे वापय अधूरा ही रहता है अर्धक्रि-
याय कहलाती हैं जैसे जाता हुआ राम, या राम
जाता हुआ । यह वाक्य पूरा नहीं है इसके सुनने से
सुनने वाले की श्राफांता बनी रहती है।
५७ अर्धक्रियाए भी कई प्रकार की है।
(क) वर्तमान अर्धक्रिया-इसके भी दो भेद हैं, यथा-
कर्तृवाच्य वर्तमान अधनिया, जैसे-
{~-जाता हुधा,
करता हुश्रा, खाता हुश्रा, पढ़ता हुश्रा, इत्यादि ।
कर्मवाच्य वर्तमान अर्धक्रिया जैसे--पढ़ा जाता हुआ.
किया जाता हुआ, खाया जाता हुश्रा, इत्यादि।
(म) भूत अर्धक्रिया हिन्दी में फेवल कर्मवाच्य में ही प्रयुक्त
होती है, जैसे-किया गया, किया हुना, मारा हुधा, मारा गया,
दिया हुश्रा, दिया गया, इत्यादि।
(ग) भविष्यत् अर्धक्रिया का प्रयोग हिन्दी में नहीं होता---
(घ, योजक अर्धक्रिया-धातु के साथ कर, के, या करके
मक भविस व०८ स0 5०१० मक० मा० ११ का
भवि०१२ ० ० १३ सझा आ०१४ प्रमय १५ मक० मा० .
--

'हिन्दीध्याकरण।
।
लगाने से यनती है जैसे - यह रोटी खाकर गया ( उसने रोटी
बाई और फिर यह चलागया , राम ने रुपया देकर फिताय
ली राम ने रपया दिया और किताय ली)।
(ङ) मूर्त अर्ध क्रिया यह है जिससे धातु का भाय प्रकट हो
और जो स्वयं किसी दूसरी किया का कर्ता या कर्म' बन सकते;
जैसे -यह लिखना नहीं जानता, दान देना बहुत
अच्छा है।
मूतं श्रधं किया प्रयोजन के अर्थ में भी प्रयुक्त होती है; यथा --
वह रोटी खाने पाया। मैं महाराज के दर्शन करने जाताहै।
अव्यय
५८ अव्यय यह शब्द है जिनमें विभक्ति, लिङ्ग पचन आदि के
कारण कोई परिवर्तन नहीं होता; यथा- --माज, कल, यहां
कहां, लेकिन, इत्यादि ।
५६ अव्यय तीन प्रकार के होते हैं। यथा-विशेपण,योजक और
भावसूचक ।
६. विशेषण अव्यय भी तीन प्रकार के होते हैं; यथा-
६१ गुणवाची जैसे-
-यह तेज दौड़ता है, तू शोन चला जा,
यह मीठा योलता है, धीरे धोरे पढ़।
६२ कालवाची जैसे-तू कब जाएगा, कल खूय मेंह यरसा।
६३ स्थानवाची जैसे-जिधर देखता हूं उघर तू ही तू है,
मैं कहां जाऊँ?
६४ योजक अव्यय शब्दों या पाकों के जोड़ने में काम पाते
--

अर्धमागधी रीडर।
है; यया-राम और कृष्ण चले गये। राजा हो या रंक, मौत
सय के सिर पर बोलती है, यालक पाया परन्तु यिना भोजन
किये ही चला गया।
६५ भावसूचक अव्यय बद्द हैं जो वक्ता के किसी भाव (फ्रोध,
हर्ष,शोक श्रादि) को प्रगट करें; जैसे -पोहो! यह था हुना,
पाहा रस पागई. हैं ! तू स्कूल से भाग भाया ।
जैसे---
वाक्य प्रकरण
६६ वाक्य प्रकरण से वार बनाने का पोध होता है। शग्दों का
ऐसा समूह, जिस से कि अर्थ का पूर्ण बोध हो जाए. और
सुनने वाले को कुछ शाकांक्षा न रहे, यावर कहलाता है । चार
के मुख्य दो ग्रह है कर्ता और क्रिया । जय किया सकर्मक
हो तो उस के साथ कर्म भी जरूर आता है।
६७ पाक्य रचना में या य के अङ्ग इस क्रम से रखे जाते हैं
जय किया अकर्मक हो तो पहिले कर्ता फिर क्रिया
---राम सोता है, देधी आई, पानी बरसा । जय किया सफर
मंक हो तो पहिले कर्ता, फिर कर्म और सब से
पोछे क्रिया रखी जाती है यथा--गम पानी पीता है. सीता
ने चिट्ठी लिखी।
चाश्य में अन्य कारकों का स्थान
६८ जच क्रिया अकर्मक हो तो अन्य कारक प्रायः फर्ता और किया
के बीच रवखे जाते हैं। जैसे राम देहली से आया है, शरीर
सरदी से कांपता है, पक्षी वृक्षों पर सोते है।
६६ जय क्रिया सकर्मक हो तो अन्य कारक प्रायः कर्ता और कर्म
के दरमियान रखने जाते हैं जैसे-यह कप से पानी भरता है,
-तू दाल के साथ रोटी खा ले। मैं ने चाक् से कलम बनाई।
+
1

.
--
अर्धमागधी व्याकरण।
अर्धमागधी
७० अर्धमागधो उस भापा का नाम है जिस में श्वेताम्बर
सम्प्रदाय के भागम ग्रन्थ अर्थात् अङ्ग, उपाङ्ग आदि सूत्र लिखें
है। साधारण जन इसको प्राकृत या मागधी भी कहते
हैं । किन्तु इन में प्राकृत तो जाति वाचक शब्द है और मागधी
व्यक्ति याचक । प्राकृत कहने से सब प्रकार की भाषाएं जो
नाटक तथा अन्य ग्रन्थ सत्तसई, गउड़यहो, सेतुबन्ध आदि
प्रयुक्त हुई हैं वह भी आ जाती है । कभी कभी प्राकृत
कहने से महाराष्ट्री नाम एक प्राकृत भाषा का बोध होता है।
मागधी कहने से मगध देश की प्राकृत भाषा का बोध होता है
जो अर्धमागधी से कुछ कुछ मिलती है।
७१ औपपातिया (ोषवाइय) सूत्र में लिखा है कि भगवान महा.
धीर अर्धमागधी भाषा में बोलते थे। उसी भाषा में धर्मोपदेश
देते थे। वह अर्धमागधी सब आर्य और अनार्य पुरुषों की
अपनी अपनी भाषा के रूप में यदल जाती थी। तथा आचार्य
हेमचन्द्र अपने व्याकरण की टीका में लिखते हैं कि पुराने
सूत्र (अर्थात् प्रह, उपाह आदि) अर्धमागधी भाषा में रचे
हुए हैं। इससे सिद्ध हुना कि सूत्रों की भाषा का असली नाम
'अर्धमागधी ही है।
.
३

६
अर्धमागधीर।
,
शब्द प्रकरण
७२ हिन्दी की तरह थर्धमागधी के शद भी पांच हिस्सों में
विभक्त है-
: संज्ञा जैसे-पासणाह पार्श्वनाथ, सांवग धावक
मिय मृग, गिध घर, इत्यादि।
२ विशेषण जैसे-किगह शपण, काला, सेय श्वेत,तिध्य
तीव, तेज, इत्यादि।
३ सर्वनाम जैसे--तुमंत्.मम मेरा,तस्स उराका, तुन्भे
तुम, श्राप, इत्यादि।
४ क्रिया जैसे- गच्छइ यह जाता है, कोई यह करता है,
वयासी यह योला, इत्यादि।
५ अव्यय जैसे- सिंग्धं शोय, अज्ज्ञ श्राज, जइ यदि,
इत्यादि।
७३ अर्धमागधी में धचन दो होते हैं.१ एकवचन, २ बहुवचन;
लिङ्ग तीन होते हैं - पुंलिङ्ग, २ नपुंसकलिङ्ग, ३ स्त्रीलिक
शब्दों का लिन नियत होता।
७४ हिन्दी की भांति यहां भी पाठ कारक होते हैं।
७५ कारको का योध कराने के लिये हिन्दी में तो शब्द के पीछे ने.
से, को, आदि कारकाव्यय लगाए जाते हैं जो शब्द से भिन्न
ही रहते हैं परन्तु अर्धमागधी में करकों का घोध शब्द पं
पीछे प्रत्यय जोड़ने से होता है जो शब्द के साथ सर्वथा मिल
जाते हैं।
।
७६ प्रत्यय-शब्द के अर्थ में परिवर्तन करने के लिये जो एक
अक्षर शब्द के साथ जोड़े जाते हैं उन्हें प्रत्यय कहते हैं; जैसे

মাঘী যােদ্ধান্তে । पुरिस शब्द का अर्थ है आदमी; इसके साथ ए जोड़ने से पुरिसे एक आदमी ने, प्रा जोड़ने से पुरिसा यहुत श्रादमियों ने, अनुस्वार जोड़ने से पुरिसं एक श्रादमी को, स्स जोड़ने से पुरिसस्स एक आदमी का इत्यादि अर्थ हो जाते है। इसी प्रकार गच्छ का अर्थ है जाना; इसके साथ इ जोड़ने से गच्छइ यह जाता है, आमि जोड़ने से गच्छामि में जाता हूं, इत्यादि अर्थ हो जाते हैं। यहां पर ए, श्रा, अनुस्वार, स्स, इ, श्रामि प्रत्यय कहलाते हैं। २७ कारक या विभक्ति बनाने के लिये अर्धमागधी में शब्दों के लिङ्ग तथा अन्तिम वर्ण के अनुसार भिन्न २ प्रत्यय जोड़े जाते हैं। और सब शब्दों के अन्तिम वर्ण स्वर ही होते हैं। सुमीते के लिये कारक बनाने में शब्दों के यह विमाग हैं- पुल्लिङ्ग शब्द जिनका अन्तिम वर्ण है नपुंसक पुल्लिङ्ग इ या उ है नपुंसक स्त्रीलिङ्ग आ, इ, ई, उ, ऊ है इतर शब्द जो उपर्युक्त नियमों से याहिर है। ७ अकारान्त पुल्लिङ्ग देव शब्द के रूप बहुवचन देवे, देवो देवा (एक) देव ने (बहुन) देवों द्वितीया देवं देवे (एक) देय को (बहुत) देवों को १ गद्य में प्रायः देवे, पद्य में बहुत बार देवो भी प्रयुक्त होता है। " " " " " " " मकवचम , प्रधमा अर्धमागधीर। लोग देयेत एक, देश के द्वारा मी दयाए. देयरस .. देवा नमी दयायो, देया देव षष्ठी मामी दयंसि, ऐये মাত্র (परदेशीका दोष (पशुसानों में देया! पर देश में मनोधन देया : देयो: घद्वारा कोसा इसी प्रकार अन्य युनिशन्दों के जिन का पिछला अशर AE रूप यनाए जाते हैं। अभ्यास के लिये कुछ शब्द:-- अड्यार इंगात पतिवार घणगार इंसर अनगार, माधु ईरवर, मानिक, मरदार प्रादुर उमाए पमुर, देवा। विशेष उद्यान, याग श्रावण परधाम चापण, दुकान पराक्रम, शकि श्रास व्य. पाड़ा ८१ प्रकारान्त नपुंसक लिङ्ग वण-वन शब्दके रूप एनयमन १० यए एक बनने बहुवचन घणाई बतबनों ने अर्धमागधी व्याकरण प पफवचन २ द्वि० पर घसाई एक बनको बहुत बनों को यासी के रूप अकारान्त पुल्लिह शब्दों की मांति होते है। ८२ इसी प्रकार कज "कार्य' फल "पल" मुह "मुख" आदि के रुप जान लेना॥ ८३ इकारान्त पुल्लिङ्ग मुणि=मुनि शब्द के रूप घवधन १० मुणी मुणीनी, मुणी एक मुनि ने पहुत मुनियों ने २ दि० मुर्णि मुणीनो, मुणी एक मुनि को यहुन मुनियों को ३० मुणिणा मुणीहि एक मुनि द्वारा बहुत मुनियों द्वारा ४ न० मुणिणे, मुणिस्स मुणीणं एक मुनि के लिये बहुत मुनियों के लिये ५ पं० मुणोत्री, मुणि मुणोहितो एक मुनि मे बहुत मुनियों से ६ प० मुणिणा, मुणिस्स मुणीण मक मुनिका वाम मुनियों का ७ स० मुणिसि मुणीनु एक मुनि में बहुत मुनियों में 40 मुणी! मुणिया! हे मुनि' हे मुनियो! ८४ उकारान्त पुल्लिङ्ग साहु-साधु के रूप घरवचन साहो, साहू, साहुणो बहुत साधुओं ने पक साधु को साह बहुत साधुओं को . . 7 पकंपाचन १ प्र० साहू एक साधु २ द्वि० साई साइयो, साह, 1 जाधमागधीरोदर। ५५० नामापा एस माधुजारा माहुणी, साहम मानि ५ प० मादयो जापु में १५, माना, मारस एकसाका ७ ग० माईमि एक गाय में में साद g मग गानों द्वारा सादर पर गागों से मिले मादिता पदुम साधुणे, साहन बहुत माधुर्यों का साहर मत मापों मागा। हे माधुपो: ८५ इकारान्त नपुसक दहि-दधि के रूप एकाधन १० दहि दही, दहीणि २लिदाह दशीर, दीपि दहियाँको शेष पुग्मिन यत् ८६ उकारान्त नपुंसक महु-मधु बहुवचन १० मह महा, महणि के एप एकापन गदद २ वि० महुं मार, मणि ग्रहदों को शेर पुल्लिा पत् ८७ प्राकारान्त स्त्रीलिङ्गमालामाला एकरनन । बहुवचन माला मालाओ, माला मामा मालाएं प्र० 1 माना 'अर्धमागधी प्याफरण। २ द्वि० मालं मालायो, माला माशा का मागायों को ३ गृ० मालाए माताहि द्वारा मातामाँ के ४ १० मालाए मालाएं मालायोसिये मालाओं के लिये मालाग्री मालाहिता मालानी से मालाप मालाणं मालाका मालाओं का मालाए मालासु माला में मालानों में सं० माले मालाश्रो! हेमाला: हेमालाओ माता से ७) ८८ इकारान्त स्त्रीलिङ्ग कुच्छि=क्षि एक वमन फुच्ची फुडि कुच्छि २ द्वि० कुक्षि को २० ४० बहुवचन कुच्छीओ, कुच्छी फुधियां कुच्छीओ, पुच्छी कुतियों को फुच्छीहिं फुचियों के द्वारा फुच्छोणं फुषियों के लिये कुच्छीहितो कुतियों में कुच्छोणे फुत्रियों का कुच्छीमु फुत्तियों में फुच्चीयो! हे कुत्तियो! कुच्छीए कुष्टि के द्वारा कुच्छीए. फुति के लिये फुच्चीयो कुषि मे फुच्छीए मुति का कुच्छिसि कुधि में कुच्छी!.. ५पं० . ७म . सं० अर्धमागधी रोडर। ८६ उकारान्त स्पोलिन घेणु = धेन, गाय १५. धन धागुनो, धणू गाथ घेणूना, घेणु २ तिर घेणु गाय को गृ घेणूप गायक ५। धेरए गायनिये ५५० धेणूत्री गायरे १० घेणुए गायका ७ म० धेणु गि गाय में सं० घेणू! धेहि गाय के द्वारा घेणं गारपोलिये धेपहिलो गारयों में धएण गारीका धंसु गारों में धेरानो रेगाrया' ८० ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग नई-नदी एक १० नई २ द्वि० नई नदी को ३० नईए 11 नईओ, नई नदियां नाओं, नई नदियों को नदी के द्वारा नईहिं . नदियों के द्वारा ४ च० नईए नदी को लिये १५० नईबी. नदी से।' नईणं नदियों के लिए नई हितो नदियों से अर्धमागधीध्याकरण। म ६० नईए नदी का मए नईए नदी में ८० नई नई नदियों का नईसु नदियों में ना: हे नदियो: ६१ अकारान्त स्त्रीलिङ्ग वहू-वधू, बहू पकव० यह ० १म बहुओं को बहू के लिये ५५० चाहओ, यह बहुएं २ द्वि" पहुं यहनी, घट्ट को ३० घहए यहि बहू कद्वारा मों के द्वारा ४० वहए यहूर्ण दों के लिये यहओ यह हितो बहू से बहुगों से प यहूणं बका वाओं का ७० घहूप चतु यहू में स० यहूओ! बहुभो ! १२ बहुत से शब्द ऐसे हैं कि जिन के कुछ रूप उपयुक्त नियमों से नहीं बनते । यह रूप प्रायः संस्कृत के ही विकृत रूप है। ऐसे रूपों को हम यहां निपात-सिद्ध कह सक्त हैं। जिन निपात-सिद्ध रूपों का प्रयोग अधिक होता है उन को नीचे के कोटक में लियते हैं। निपातसिद्ध उन शब्दों को कहते हैं जिन के बनाने के कोई साधारण नियम न हो। बहुओं में . ४ १,२ एक ५, एक य अर्धमागधी रोडर। निपातसिद्ध रूप विमति शध्द सस्कृतरूप अप्पणा ३. एक० श्राय, अप्ण श्रात्मा श्रात्मना अप्पा १,एक० श्राय, श्रप्य अात्मा नात्मा अप्पारणा थ्राय, श्राप प्रात्मा श्रात्मानः श्ररह श्ररइंत গর श्रर्हन, महन्तम् शाया १. एक श्राय त्मिा धारमा यायनी याय श्रात्मा श्रात्मनः कायसा ३, एक काय काय, देह कायेन जधा जाति जात्या तसा ३, एक तत्र तप.तपस्यो तपसा तेयसा तेय तेज, प्रताप तेजसा पियर २,एक० पिउ, पिद पिता पितरम् पिया १, एक पिउ, पिड पिता पिता पियरी १,२ बह पिउ, पिह पिता पितरः भगवं १,२, एक भगवंत भगवान् भगवान् भगवन्तम् भगवनो ६, एक भगवंत भगवान् भगवतः भगवया भगवंत भगवान् भगवता भायर भाउ, माइ भाई भ्रातरम् भाया भाउ, भाइ भाई भ्राता माया माउ, माइ माता माता १,२ एक मामंत मतिमान मतिमान् मतिमन्तम् महमनी ६, एक महमंत मतिमान मतिमतः महमया मइमंत मतिमान मतिमता मायरं २, एक माउ, माइ माता मातरम् मएसा ३, एक मन मनसा रएणा राजा रएको ६, एक राया राइ राजा राजा रायाएं २, एक राजा राजानम् रायाणी १,२एक राजा ययसा राजाना, रा. ३. एक घय वचन वचसा २, एक १, एक १, एक अर्धमागधी व्याकरण। र अभ्यास-नीचे केवायों को ध्यान से पढ़े। १. साहमाणं करो २ नरा नयरं गच्छति माधु ध्यान करता है शादमी नगर को भाते है ३. पाय दुवखस्स कारणं अस्थि ४. रामवहिती फलाई पति पाप दुख का कारण पृषों पर में फम गिरने ५. देवाणुपिया याद तुम्मे सिक्सभिकर दसयामि २ देवताओं के प्यारे : मैं पाप को गिप्प रूप भिषा देता हूं ६. श्रागी तपाइंडहर ७. मुणिण गिरि दुलहति नितिनों को जलातो है मुनि लोग पहार पर पढ़ते हैं - मरसाणं श्रोसहि याहीश्री नस्संति मनुष्यों की प्रौषधियों द्वारा व्याधियां नाश होती हैं 8. श्रायरिया सोसाएं धम्मं प्राइसंति प्राचार्य गियों को धर्म का उपदेश) कहते हैं १०. इसीण वयण पमाणं भवइ शपियों का वचन प्रमाण होता है ११ पुचरस लाभेणं जा तुहा भवति पुत्र के नाम से लोग खुश होते है १२ गिम्हाकाले नई जलागि आययेणं नरसंति गरमी के काल में नदियों के जन धूप मे नष्ट हो जाते है (सूप जाते हैं) १३ जिगणं दुबिहे धम्मे पणते, साहु धर्म सावगधम्मे य ।। मिन भगवान ने दो प्रकार का धर्म कहा है, साधु धर्म और मारक धर्म, विशेपण ६३. हिन्दी की भांति अर्धमागधी में भी विशेषण, विशेष्य (अर्थात् संज्ञा) के पहिले रक्खे जाते हैं परन्तु विशेषण के साथ भी विभक्ति के यही प्रत्यय लगते हैं जो उसके विशेष्य के साथ लगे हो जैसा कि नीचे के उदाहरणां से स्पष्ट होगा। सुभस्स कम्मरस फलं सुहं भवइ । सुभाए कम्म पयडीए । गुम (का) कर्म का फल सुख होता है । शुभ ( मे । कर्म प्रकृति मे । सुभाणं कम्माणं फलं सुहं भवइ । असुभाए कम्म पयडीए। गम (का) कमी का फन मुख होता है। प्रगम मे ।

ल अर्धमागधी रोडर। " - मुमाई फरमाई करमाणे नरे सग गधा शुभ को कामों को करता हुधा मनुष्य को प्राRE असुहि कम्मेहिं जीया नरये पति भगुभ मे कामों मे जीय नरक में पड़ते हैं नवराह मासारण। पंचमु ठाणेमुः इत्यादि मी (का महीनों का पांच में स्थानों में ४४. लेकिन जय विशेषण के साथ पिभक्ति के प्रत्यय न लगाने हाँ तो उमे पिशेष्य के साथ मिला देते हैं जैसे- सुभकामस्स । सुभकामाणं । सुभकम्माई । अनुभकम्महि । शुभ फों का गुभ फी को अगुभ कर्मों में गरमासाणं। पंचठाणेमु। मी महीनों का पाच स्थानों में कर्म का १प्र० ४० ५५० (10 ७1० " " संख्या शब्द ६५.१एग फेवल एकवचन में प्रयुक्त होता है। २ वि० ० J० एगे एगणं एगरस पगायो पास्स पगंसि नपुपगं सो० एगा एवं एगाए एगाए एमालो गाए पगाप जय एग शब्द सर्घनाम हो और उसका अर्थ "कोई" हो तर वह यहुवचन में भी प्रयुक्त होता जैसे २ दि० ० ४० एगे एगे एगेहिं पगेसि पगेहितो एगेसि पगेनु ५६.२-दो से अट्ठारह शब्द पर्यन्त बहुवचन में प्रयुक्त होते हैं १।२ दि ३४० ४५० ५० दो दो दाहिं दोगहं दोहितो दोगह दोसु. नपु। रिण दोषिण बी० दुधे दुवे दा.ति, चउ गम्भों के प्रयोग में लिङ्ग का कुछ पास नहीं रखा HIT तिगिण जपा, तमो चरणाई भी देखने में आते हैं। १० ५५० ७ म० १५० ६५० ७० " " " " " " " .

घ +- वाप्ता, " " " " " अर्धमागधी व्याकरण । जय "दो" शब्द किसीसमास के श्रादि में हो तो उसका दुया घे भी हो जाता है जैसे-दुगुण दुगना दुपय दो पैर घेई. दिय दो इन्द्रियों वाला। १७ *३ = ति पु० तश्रो तश्रो तिहिं तिरह तिहितो तिरह तीसु नपुं० तिरिए तिरिण समास के श्रादि में ति को ते भी हो जाता है- तिविहः तीन प्रकार का तेइंदिय= तीन इन्द्रियों पाला = चउ चत्तारोचत्तारो चाहिं चउगहंचउहितो चउगहचउसु चत्तारि चत्तारि चउरो चउरो समास के श्रादि में स्वर से पहिले चउ का चउर हो जाता है जैसे-चउरिदिय =चार इन्द्रियोंघाला चउप्पय = पार पैरों वाला। ६8 ५ = पंच पंच पंच पंचहि पंचण्हं पंचहितो पंचएहं पंचसु २००६=छ 19% सत्ता अट्ट नव। १०% दस । ११- एक्कारस । १२% -दुवालस,वारस।१३-तेरस । १४-चादृस,चउद्दस । १५=पएणरम । १६=सा- लस। १५सत्तरस । १८= अट्ठारस । १६-एगूरण- वीसं,एगूणबीसा,अउणवीसइ । २०=वीसं,वीसा, वोसइ ।२१एकवीस,एगवोसं। २२ -बावीसं २३-तेवोसं। २४चउवीमं । २५=पणवीस। २६-छवीसं । =सत्तवीसं । २८- अट्टा- वोसं। २९ अरणत्तीसं । ३०= तीसं। ३१% एक्कतोसं । ३२= बत्तीसं । ३३-तेत्तीसं । go चत्तालीसं। १२-बायालीसं। ४४ = चउयालीस, दोति, चउ गरदों के प्रयोग में लिङ्ग का कुछ काम नहीं रखा जाता तिरिण जणा, तनो घणाई भी देखने में से हैं। ।

न
प्रमागधा।
शयालीसं । मोगालोमं । ४८e प्रयता
लोस, पढ़यालीमं । ४६ पटणाप। ५०%
पणाम | NPaar छपगणं । ५६
अणुट्टि
१६० मट्टि 100मत्तरि।007-
सोह। 10-REE! १००८मय । १०१-मय ।
१००0-मस्स ।
१00,000=सयसहस्सा
40,000,0003
कोडि।
२०.१६ से १६ तकशों का प्रयोग सोसिंत एक यमन में होता
है परन्तु प्रथमा और निमाया यिक्ति में नपुंसक एक पचन
में भी हो जाता
क्रमवाची शब्द
१०२ १ पढम, पढमिल्ल । २ विइयाधीय,दुच, दाच ।
३ तइय, तन्। ४ धउत्प, ५ पंचम, ६ घट्ट ।
सत्तम । १६ रांगूणधोसइम, एगणवोसम । 20
वीसइम, बोस । ३० तोसइमातीस ! ४६ अणा-
पगण । २ यावत्तर । ९० सत्ताणत्य।
१०३ संख्या के पीछे प्रायः "A" जोड़ने में कामयाची शब्द यन
जाते है
१०४ स्त्रीलिह में उनके पीछे या 'आ' जोड़े जाते हैं। पदम
का स्त्रीसिह पदमा ही होता है।
अर्ध संयुक्त संग्याएं
१०५ : अह,अड्ढ ११-दिवढ्ढ। अढ्ढाइज्ज।
अधुह। ४ अपंचम अद्धछ। ६
अदमत्तमा १- पाट्टम रिडनवम।
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अर्धमागधी व्याकरण। प घार-अर्थ दोतक शब्द १०६ १ सई = एक यार । २ टुक्खुत्ता, दोखुत्तो, दोच्च- दायार ।३ तिक्युत्तो, तचं तीन बार ७ सत्तखुत्तो- सात यार ८१ तिसत्तखुत्तो-२१ चार 0 अणंत- खुत्तो -अनन्त बार। सर्वनाम १०७ उत्तम पुरुष एकवचन १प्र० श्रहं, हं मैं, मैं ने २ द्वि० मम, में यहुवचन अम्हे, धयं हम, हमने मुझे ३स मए अम्हहिं हमसे अम्ह, मो ४ च० मम, ममं मुझे ५ पं0 ममाहिती मुझसे है पर मम, मम मेरा श्रम्हेहितो हमसे श्रम्ह, मो हमारा अम्हेसु हममें 970 मर्मसि मुझमें १०० मध्यम पुरुप एकवचन पवनन तुम्भ, तुम्ह १० तुम, तं अर्धमागधीरोडर। द्विा तुम तुम्मे, यो चममें ३. तुम तुम्भेहिं, तुम्हहिं शुको सुरमे ४ च० तव, ते. तुम तुर्भ, तुम्ह ५५० तुमाहिती तुम्हिता तुझसे ६ प० तय, ते, तुम तुम्भं, नुम्ह तेरा तुम्हारा ७ स० तुमंसि तुम्भे, तुम्हे तुझमें गुममें उत्तम और मध्यम पुरुष के सर्वनामों के रूप तीनों लिङ्गों में ऐसे ही रहते हैं। १०६ प्रथम पुरुप "त" शब्द = वह पु० नपुं० स्त्री तं सा एकवचन १० से २ द्वितं ३ ० तेण तेणे तस्स ५ च० नस्स ५ ५० ताओ, तम्हा ६.प० तस्स ७ स० तसि, तमि तामो, तम्हा ताप तीसे. तायो तीसे. ताप तासे, ताप ० १० ते तस्स तसि, तमि घरचन नपु० ताई, ताणि ताई, ताणि तेहिं तेसिं तेहितो ३० तेहि ४ च० तेसिं ५ पं० तेहितो १० तेसिं स्त्री तायो तायो साहिं तासि ताहितो तासि तातु ७० तेसु तेसि तेसु अर्धमागधी व्याकरण नपं० एयाई ११० प्रथमपुरुप - "एय" शब्द - यह एकवचन पु० नपुं० श्री० १० एसे एय एसा २ द्वि० एयं एय प्रयं २० एपणं ४१० एयरस पयस्स पियाप ५५० पयायो पयाश्रो एयायो ₹० एयस्स एयस्स ‘पयाए । ७ स० पयंसि, श्यमि एयसि, एयंमि पयाप बहुवचन खो० १५० एप एयाश्री २ द्वि०पए पयाई एयाओ एपहि एयाहिं एपसिं पयासि ५५० एपहितो एपहिती एमाहितो ६५० एपसि. एपसिं प्यासि ७ स० एपसु एएसु पयासु .१११ प्रथम पुरुष "अमु" शब्द = वह इस के रूप.पुलिस, स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग में क्रमशः गुरु, घेणु और महु शब्द की तरह होते हैं । ११२ प्रथमपुरुष "इम" शब्द = यह इस के रूप "त" शब्द के रूपों की तरह होते हैं केवल प्रथमा विभक्ति के रूपों में भेद है।। प्रथमा विभक्ति के रूप नपुं०. स्त्री० एक व० इमे, अयं धमाश्य इमाई इमामो ३१० एपहि ४ च० एपसि . . . बहु प० इम ५ प्रमागधी गडर। २ ट्विानुमं तुग, यो ३) तुम तुमहि, गुम्ददि शुको बमरी ४ प तय, ने तुम तुम्म, नुम्हें ५ प0 नुमाहिती गुम्महिती सुझमें तुममे १५० तय, ते, तुम नुम्भ, तुम्हं तेरा गुम्हारा म० तुर्मास तुम्ग, तुम्हेतु तुझमें गुममें उत्तम और मध्यम पुरुष के सर्वनामों के तीनों खिों में ऐसे ही रहते है १०६ प्रथम पुरुप "त" शब्द - वह एकवचन न सा २ वि० तं ३० ते ५५० तस्स ५५० ताश्री, तम्दा ६.५० तस्स ७० तसि, नाम . १० ते २ द्वि० ते ३० तेहिं ४ च० तेसिं ५ ५० तेहिता १५० तेर्सि सेन तस्स तामो, तम्दा तस्स तंसि, तमि हुवचन नपु० ताई, ताणि ताई, ताणि तेहि सेसि तेहितो तेसिं तेनु ताप तीसे तानी तीसे, ताप तीसे, ताप स्त्री ताओ सानी साहि तासि ताहिती तासि तासु ७ स० तेसु अर्धमागधी व्याकरण। या वर्तमानकाल (कर्तृवाच्य) "पास" देख एकच में देखता हूं प्र० पु० पास पासंति वह देखता वह देखते म० पु० पाससि पासह तुम देखते हो ३० पु. पासामि पासामो हम देखते है "कर" = कर प्र० पु० कर करति वह करता म० पु० फरेसि करह तू करता है तुम करते हो उ०पु० फरेमि करमो हम करते है ११७ कुछ धातु ऐसे हैं कि जिन के रूप निपात सिद्ध होते हैं उन में से अस धातु का प्रयोग अधिक होता है इसलिये उसके रूप नीचे लिखे जाते हैं। में करता हूं एकव० प्र० पु० अस्थि संति मा पु० असि,सि 30 पु० अंसि,मि मो अर्धमागधारीदर। ११३ प्रथमपुरुप "क" शब्दं = कान .. एकापन पु० म पत्री १० २.वि० ३० केरा फेण पए ४० कस्स कीस कम्हा,फाम्रो कम्हा,कामी কান্সা ५० कस्स कीम कसि कीसे बा पचन पु० मपं० स्त्री १० काई कानी. २ द्वि० फाई कायो फेहि कोहि काहि फेसिं कसि ५० कहितो फेहितो वाहितो (१० केसि कासि ७1० केसु केतु फासु ११४ प्रथम पुरुष "य" शब्द जो, “सम्म"= सय और, दूसरा, भयर-दूसरा कयर-कौनसा; पर दूसरा इत्यादि के रूप "क" शब्द के रूपों की तरह बनते हैं। ५१ कार्सि फोसि + . क्रिया ११५ अर्धमागधी के धातु दो गणों में विभक्त हैं -पास गए और कर गण । 'पास' गण के धातुओं के पर प्रत्यय जैसे के तैसे लग जाते हैं परन्तु 'कर' गण के धातुओं और उनके प्रत्ययों के "घीय' और लगाया जाता है।

घा अर्धमागधी व्याकरण । १२१ एक और प्रकार से भी भविष्यत् काल के रूप यनते हैं। जैसे- • बहु 40 प्र० पु० पासिहिद पासिहिति वह देखेगा वह देखेंगे i. . म0 पु० पासिसि पासिहिह- तू देखेगा तुम देखोगे उ० पु० पासिक्षिमि पासिहिमो हम देखेंगे १२२ इस अवस्था में "कर" को "का" हो जाता है जैसे "काहिह" यह करेगा, "काहिसि" तू करेगा। १२३ प्रथम पुरुष एक वचन के रूपों में हि श्रीर इ दोनों मिल कर ही भी हो जाते हैं जैसे "काहिई" या "काही" २२४ निपातसिद्धः करिस्सं (धातु 'कर) मैं करू गा वोच्छं (धातु "चय"-घोल) में योगा । मैं देगा आज्ञा कारो क्रिया (कर्तृवाच्य) १२५ "पास" = देख एकद० बहुव० प्र० पु० पासउ पासंतु वह देखे धर देख 40 पु० पास,पासाहि पासह सुम देखो 30 y० पासामि पासामो में दे "कर" - कर फरतु प्रा करेउ वह को म० पु० फरेहि करेह तुम करो ७० पु फरेमि करमो हम करें धमागधीर। भूतकाल (कर्तृवाच्य) "पास" देख म २) पामिरथा 30.) उमने, वने याने का पासिम उहानि, नुमने याम देवा "कार" = कर एमवा F मा पु० 30 पु. पु. कांस्था, करिस्था फरगु, फारसु उसने, रामे था मैंने किया वाहोंने, शुमने या हमने किय ११६ निपातसिदरूपः वयासी "थय" = योल धातु से बनता है। सय पुराणों और . पचनों में यही रूप रहता है। प्रकासो "कर"-फर धातु से बनता है। सय पुरयों श्रीर पचनों में यही रूप रहता है। " भविष्यत् काल (कर्तृवाच्य) १२० भविष्यत् काल के रूप में 'पास' गण और कर गण के पातुओं में फोई भेद नहीं रहता ।। पास = देख १ एकव० प्र० पु) पालिस्सा वह देखेंगा म0 पासिस्ससि.. पासिरसंति वह देखेंगे पासिस्सह हूँ देखेगा तुम देखोगे उ०) पासिस्सामि पासिस्सामो हम देखेंगे इसी प्रकार "कर' धातु के रूप बनते हैं।

अर्धमागधी व्याकरण १३५ जय धातु के मध्य में हो तो उस अफो भा फर देते हैं जैसे-मरदह मरता है, माइग्रह मारता है, पडावर गिरता है. पाडे: यह गिराता है। कर्मवाच्य १३५ साधारण नियम फर्मयाच्य यनाने का यह है कि धातु और प्रत्यय के यीच इज लगा दो,जैसे-सुबह वह मुनता है,सुणिजा वह सुना जाता है, करे यह करता है करिज्जामि मैं किया जाता हूं, मारामि में मारता हूँ मारिजामि में मारा जाता हूं ॥ १३६ यहुत से धातुओं के कर्मयाच्यरूप निपात सिम होते हैं। परन्तु पास्तय में यह संस्कृत के ही विकृत रूप होते हैं जैसे लम्मा (सं० लभ्यते ) यह माम किया जाता है. मुश्चइ (सं० मुच्यते) यह छोड़ा जाता है, एजइ (सं० शायते) वह जाना जात है, दिजा (सं० दीयत) यह दिया जाता है। १३७ कभी कर का कीर और पास का दीस भी यन जाता है जैसे--कीरह यह किया जाता है, दीसह यह देखा जाता है। 5 -- करत करताहुआ। चरंत चलतामा ॥ अर्धक्रिया १३८ कर्तृवाच्य वर्तमान अर्धक्रिया दो प्रकार से बनती है। १धातु के साथ "अंत" जोड़ने से जैसे- पासंत देवता चिटुंत ठरताहुआ २ धातु के साथ "माए" लगाने से जैसे- पासमाण देखतापा फरेमाण करता हुमा इसी तरह चिट्ठमाण, चरमाण आदि । १३६ कर्मवाचय वर्तमान अधक्रिया बनाने के लिये धातु के कर्मघाच्य रूप के साथ श्रत या माण और जोड़ देते हैं जैसे-फरिजंत या करिजमाण किया जाता हुआ, मरिजंत या मरिजमाण मारा जाता हुआ दिजत या दिनमाण दिया जाता था, दीसंत या दीसमाण देखा जाता दुश्मा ।

अर्धमागधीरोडर।
१२७ मध्यम पुरुष एक वचन में हि की जगह सु भी हो जाता है
जैसे-कहतु तू कह सरसुरा याद कर ।
१२८ निपातसिंग प्रत्थु (धातु "यस" हो) यह हो
१२६ एक और प्रकार से प्राशाकारी क्रिया के रूप बनते हैं इस
अवस्था में "पास" और "कर' गण के धातुओं में कुछ भेद
नहीं रहता।
"पास" - देख
पासे (सि)जाति । तुम देनी
मा पु) पासेना, पासिना वह देखे पासेना, पोसिना वह
म० पु.) पासे (सि) जा पासे (सि) जाह
पासे (सि) जाहि
३० पु. पासे (सि) जा,
पास (A } मैं देखू पासे (सि) जाम हम देते।
१३१ धातु के साथ 'ए' जोड़ने से भी आशाकारी मिया के रूप
यनते हैं । यह रूप सय पुरुषों और वचनों में ऐसे ही रहते
हैं। पासे । वह त, में पह, गुम, हम ) देखे, करे (वह ह..) करे ।
.
प्रेरक धातु
द्वारा कराए
१३२ जय किसी क्रिया का कर्ता उसे अन्य पुरुष के
तब यह किया प्रेरक धातु से यानई जाती है जैसे करे-
यह करता है,करावेरे- वह कराता है. कप्परवद कादसा है, कप्पा-
घे यह कटवाता है.
अकर्मकधातु से सकर्मक धातु बनाने के
नियम
१३३ जय धातु के अन्त में 'आ" हो तो यह धातु "" जोड़ने से
सफर्मक हो जाता है जैसे-पहाइ-महाता है, पहावे-
वह नदनाता है,
ठहरता है,ठायो राता।

अर्धमागधी व्याकरण २ धातु के साथ ऊणं या इऊएं लगाने से जैसे-नाऊल मानकर, दऊणं देकर, पंधिजणं बांधकर , ३ धातु के साथ इतु लगाने से जैसे-जाणितु जानकर पंधित्तु गांधकर । E४६ यहुत से निपात सिद्ध है जैसे कट्ट, (धातु 'कर' ) करके, साह (घा० साहर ) नाकर, किया (धा० फर) करके, नया (धाना) जानकर इत्यादि । मूर्त अर्धकिया १४७ मूर्त प्रक्रिया दो प्रकार से बनती है। १ धातु के साथ इत्तए लगाने से जैसे-गच्छितए जामा, पासित्तए देखना, पुच्छिचए पूरना, फरित्तएकरना । " २ धातु के साथ उ या इउ लगाने से जैसे-दाउदेना, काउं ..,करना, पासिउ देखना. गिरिहर लेना। २५८ मूर्त प्रक्रिया प्रायः “कप्प" धातु के साथ इस तरह प्रयुक्त ' होती है-नो कप्पइ साहणं मुसावयणं भासित्तए नहीं कल्पना माधुओं को झूठ वचन बोलना अर्थात् माधुओं को झूट नहीं बोलना चाहिये, एएसि परिव्वायगाणं नो फप्पइ सोचपणाई भूसणाई धारित्तए इन परिवाजों को नहीं करूपता सोने के भूषण पहिनना अर्थात् इन परिवाजकों को सोने के भूषण नहीं पहिनने चाहिये। १४६ मूर्त प्रक्रिया प्रयोजन अर्थ में भी आती है जैसे-अहं तव 'पुतं पासिउ एत्थ नागए मैं यहां तेरा पुत्र देखने पाया हूं, नोखलु जाया ! अम्हे इच्छामी खणमपि विष्पयोग सहित हे पुत्र हम क्षण भर भी (तेरी ) जुदाई सहना नहीं चाहते। 7 H -समासप्रकरण १५० जय दो शब्द इस प्रकार से मिलाए जाते हैं कि उन के बीच 1 में कारक सम्बन्ध को घतलाने वाले अव्यय न लगाएं तो यह दोनों शब्द मिलकर एक शब्द की तरह प्रयुक्त होते हैं और ६ दर अर्धमागधी रोडर। . १४० कर्तृवात्य भूत अर्ध क्रिया पनाने के लिये कर्मवाच्य अर्घ क्रिया के साथ "व" लगा देते है। हिन्दी में इस के मुकायले का कोई रूप नहीं इस लिये इस का अर्थ भूत काल की (कर्तृवाच्य पूर्ण) किया से किया.जाता है, जैसे-रक्सिय . वते वह रक्षा करता मया। उसने रक्षा की, हसियत यह हमला भया यह हैमा १४१ कर्मवाच्य भूत अर्ध क्रिया प्रायः धातु के साथ "इय"लगाने से बनतीहै,जैसे-रविषय = (खा हुधा भक्सिय एखापा हुआ, मारिय मारा हुआ। १४२ बहुत सधातुओं के इस अर्ध क्रिया के रूप निपात सिद्ध हो है जैसे गय ( धातु गच्छ) गया हुआ, कड (धातु कर) किया हुश, दिव (धातु पास ) देखा हुमा इत्यादि । १५३ भविष्यत् अर्धक्रिया का कर्तृवाच्य में प्रयोग नहीं होता कर्मवाच्य में होता है । इस के रूप प्राय: दो प्रकार से चनते हैं- १ धातु फेसाथ "गिन'लगाने से जैसे--करणिज किया जाना. चाहिये, पूणिज प्रभा जाना चाहिये । २ धातु के साथ "इयव्य' लगाने से जैसे--पासियक्व देखा नाना चाहिये पुच्छियम्य पूछा जाना चाहिये, जाणियव्य जानना चाहिये इत्यादि। १४४ कई निपात सिद्ध होते है जैसे कायव्य किया जाना चाहिये. करना चाहिये, करने योग्य,पेज पिया जाना चाहिये, पीना चाहिये, पीने योग्य इत्यादि। योजक अर्धक्रिया १४. इस के बनाने के कई प्रकार है परन्तु यह तीन बहुत आम है। १ धातु के साध'इत्ता" लगाने से जैसे-गच्छित्ता लाकर पासिता देवार, करित्ता करके, इत्ता के स्थान में इत्ताएं भी लगाया जाता है जैसे--पासित्ताण देखकर, चाचाएं ध्ययन करके अर्धमागधी व्याकरण শ १५३ इन के अतिरिक्त एक अव्यय समास भी होता है परन्तु उसका प्रयोग यहुत कम देखने में आता है; जैसे-अणुगंग गंगा के साथ साथ, प्राणुपुचि = अनुपूर्वी के क्रम से इत्यादि ॥ १५४ समासों का आपस में अथवा शब्दों के साथ मिल कर फिर समास हो सकता है। जैसे-पंचिदियजीवा गंच इन्द्रियों वाले जोव । यहां पहिले पंचिंदिय विशेषण समास है फिर पंचिं. दिय और जीय मिल कर संशा समास हो गया। सस्थकोस. हत्थे शस्त्रों का कोशर है हाय मैं जिससे । यहां पहिले सत्यकोस संशा समास है-सत्याण कोसे-शस्त्रों का कोश,फिर सस्थ- कोस और हत्थ मिल कर विशेषण समास हो गया। सन्धिप्रकरण १५५ जब दो स्वर एक दूसरे के साथ ही आयें तो उन में कुछ :: विकार हो जाता है। उस विकार को सन्धि कहते हैं। उसके यह नियम है। १५६ जय थरे और श्र इकडे यावें तो उन दोनों के स्थान में श्रा हो जाता है जैसे-जीव+अजीव-जीवाजीव, य+अवि- यावि॥ १५७ जय श्र के परे हो और उस के पीछे अनुस्वार या संयुक्त वर्ण (दुत्त अक्खर ) हो तो श्र और श्र मिल कर अं हो जाता है जैसे- मरण+अंत-मरणत; मरण है अन्न जिसका उत्तर+अड्ढ = उत्तरढ़उत्तरार्ध', उसर का प्राधा हिस्सा १५८ जय श्र के परे हो तो दोनों को मिल कर ए हो जाता १ अरही के गीज़ारों का बस (Surgical boso) | २ यहां पर पर, कहने से दोनों प्रकार के पर्यात् छोटे बड़े अभा इई उऊ का ग्रहण किया माता है। + ३. काम, ग, घ, , प्रादि मयत व वा दुपा अयापर कह. मा अर्धमागधी रोडर। उस एक शब्द को समास कहते हैं। जैसे-जएसई (जपरस सहे = आदमी का शब्द ), भत्तपाणयेला (भत्तपाणस्स चेलाम (खाने पीने का ममय), जियलोहे (जिए लोहे जे = जीता है लोम जिसने ऐसा), सेयंवरे ( सेयं अंबरं जस्स-श्वेत कपड़ा जिमका ऐसा पर्यात् श्वेतामार)" १५१ समास दो प्रकार के होते हैं संशा और विशेषण । संज्ञा समास कई प्रकार से बनते हैं। १ जब दोनों संभाएं प्रथमा विभक्ति वाली हो। ऐसे समास प्रायः बहुवचन में आते हैं,जैसे-जीयाजीव (जीचे य अजीधेय जीव और प्रजोद ), भरपसूर्ण (नरे य पसूय नरपसूनो तेसि नरपसूर्ण- प्रादमी और पशु वनकाना पशुओं का ) ॥ २जप पहिली संथा द्वितीया से लेकर सप्तमी पर्यन्त किसी विभक्ति की हो और दूसरी संश प्रथमा विभक्ति की हो जैसे -गिहगए (गिहँ गए-घर को गया हुया, संजमसंच (संजमेण सजुत्ते सयम से सयुक), सुधम्मे (सुहाए धम्मे = मुख के लिये धर्म), चोरभयं (चोरात्रो भयं-चोर से दर पुरणफलं (पुण्णस्स फलंपुरम का फन), गीयकुसले (गीयसि कुसले गीत गाने में कुशल) ३ जय पहिला चन्द विशेषण हो और दूसरा संक्षा, और उन में विशेषण विशेष्य संबन्ध हो; जैसे-नीलुप्पलं (नीलं उप्पलं नीला काल) १५२ विशेपण समास भी कई प्रकार १ दे विशेषणों को मिलाने से, जैसे- सेयर (सेप रते -श्वेतारा) २जब दोनों शब्द इसतरह मिले कि उन में "ज" शब्द की द्वितीया से सप्तमी पर्यन्त किसी विभक्ति का सम्बन्ध हो जैसे उपरणससप (उपरणे संसए जस्स:- पैदा हुआ है स शय जिसके वंशप वाला), जियफोहे (जिए कोहे जेणं जोता है मोध जिसने = जीते हुए कोच वाला), पचिंदिप (पंच इंदियाणि जस्स-पांच इन्द्रियां जिसके पांध इन्द्रियों वाला) से धनते हैं अर्धमागधी व्याकरण। (९०) पंचम, (स्त्री०) पंचमी शंषयों; (पुं०) अय, (स्त्री०) प्रया बकरी; (पुं०) दारय, (स्त्री०) दारिया पालिका । १६५ भावप्रत्यय जय किसी शब्द के साथ त्त या-तण लगाया जाये तो उस का माय अर्थ हो जाता है जैसे-देव से देवत्त देवपना, पुत्त से पुत्तत्त पुत्रपना, पायरिय से पायरियत या श्रायरियत्तण प्राचार्यपना तफर से तकरण चोरपना ॥ १६६ स्वामित्व प्रत्यय जय किसी संशा के साथ पंत या मंत जोडा जाए तो उस का अर्थ उस घस्तु का स्वामी या उस वस्तुवाला हो जाता है जैसे-धण से धणयंत धनवाला, गुण से गुणर्यंत गुण वाला, मह से मइमंत मतियाला, पुिलमान्, इत्यादि ।। १६७ प्रत्यय और भी यहुत हैं परन्तु उन के लिपने की यहां कुछ आवश्यकता नहीं ॥ वाक्यप्रकरण १६८ गद्य लिखने में शिन्द प्रायः उसी फम से रखे जाते हैं जैसे हिन्दी गद्य लिम्बने में जैसे- देवदिराणे गच्छद। तकरे धणं चोरह। देवदा जाता है घोर धन को घुरामा अहं फूवाओ जलं कड्ढामि | मैं फूर्स मे जल निकालता हूं १६६ पद्य अर्थात् श्लोकों में शब्दों का स्थान नियत नहीं है। सुमेह मे एगग्गम घुहिं देसियं। मुना मुझमे एकाग्र मन मार्ग को जिमों से बतलाया हुणा अर्थात् जिन भगवान के कटे हुए मार्ग को मुझसे एकाग्रमन होकर मुनो। १ दियण - दत्त= दिया हुण। उमादीन, मातादीन मादि हिन्दू नाम में "टोन" शब्द प्राकृत "दिपण" शब्द मे निकला है न कि परवी "दीन" गब्द से जैसा कि मुसलमान नाम में । मार्ग

'टा
अर्धमागधी रोडर!
रायन इसिरा (य) एसिस्राएसि; समर्षि
महाकसि महंसि; महर्षि
१५६ जब य क पर इदी और उस. के परं अनुस्वार या दुध
असर हो तो और मिल कर हो जाता है जैसे:-
देवनद-देविद देवेन्द्र, देवों का रुद्र ..
महा+पढ़ी-महिदी बड़ो हि
१६० जब थके पर उहो तो दोनों मिल कर भी हो जाता
सीय+ उपग%Dसीनोदग गीतमा
महा+असप-महासय मदा जलमा, महोय
१६१ जय श्न के परै उ हो और उस के पर अनुस्वार या
दुत्त शायर हो तो अऔर उमिल कर उ हो जाते हैं जैसे-
पुरिस+उत्तम-पुरिमुत्तम उतम पुरुष
जिएण+उजाए-जिएणुजाण पुराना याग
१६२ जब अनुरयार के परे कोई घर हो तो अनुस्यार का म् हो
कर उस स्थर में मिल जाता है जैसे-
ঘ প্রাধ=গ্রসমাঘ হত থম থা শুইয় ফয়ে ই
फलं इच्छर-फलमिच्छर, यह फन पाहा
१६३ कभी कभी दो शब्दों का समास करने में, जिनमें से दूसरे
शन्द के आदि में कोई रघर हो, एफ अनुस्वार ऊपर से लगा .
दिया जाता है जो उपर्युक्त नियम से म् हो कर दूसरे शब्द
के प्रादि के रवर से मिल जाता है जैसे-~--
अग्गिय-अम्गिमिव अग्नि की तरह
दी श्रद्धा-दीहमद्धा लम्बे रास्ते वापी
प्रत्यय
१६४ स्त्री प्रत्यय जर पुखित शब्द के अन्त में हो तो अंको
है (और फी श्रा) से बदलने से यह शब्द स्त्रीलिङ्ग, हो जाता
है जैसे--(पुं० ) मुंजमाण, (स्त्री० ) भुंजमाणी भोगतो हुई;

अर्धमागधी व्याकरण। डा . साभ उठ अन्नपाणं घिणस्सर, तुम्भ किंचि न दलइस्सामो।" भन्ने पान नाश हो जाये तुझको कुछ भी न तपणे हरिएसवले घयासी, हरिकेशल मोला तुम्भे मम एवं अन्नपाणं न दलइस्सह, 'तया सुम मुझे यह अन्न पान दोगे तुम्भ अणेण जगणे कोधि लाभो न भविस्सइ" तुम्हें इस कोई न होगा तपणं ते घंभा रायकुमारे सहावेसु, उन प्राम्हणों ने राज कुमारों को खुलाया ते • राय कुमारा इर्सि तालेसु॥ राजकुमारों ने शृषि को मारा पीटा नमुकारमंतं नमस्कार मन्त्र नमो अरिहंताएं। नमो सिद्धाणं । नमस्कार हो। हन्तों कताई नमस्कार (हो) सिद्धों के साई नमो श्रायरियाणं । नमो उयज्झाया। नमस्कार (हो) प्राचार्यों के साई नमस्कार (हो) उपाध्यायों के ताई नमो लोए सध्यसाहूणं । नमस्कार (हो) सोक में सब साधुओं के साई एस पंच नमुकारी, सयपावप्पणासणे। पह पञ्ज नमस्कार (रूप मात्र, सर्व पापों का नाश करने वाला है मंगलाणं च सम्बेसि, पढमं हवह मंगलं ॥ मंगलों में से और मब में से प्रथम होता है मंगल लोगस्स उज्ज्ञायगरे लोक के उद्योत करने वाले लोगरस उज्जोयगरे, धम्म तित्थयरे लोक के उयोग करने वालों को, धर्म के लीयंक को जिनो को अरिहंते फित्तइस्स, घउदीसं पि फेवली ॥१॥ पाईन्नों को (मैं) मरारूंगा चौरीम ही धसियों को उसममजिय च चंदे, संभवमभिपंदणं च सुमई अपम को मजित को पोर(मन्दता सम्भवको अभिनन्दको और गुमतिको जिणे।

प्रमाणों को पहाल कुन एक . उयागए। ते अर्धमागधी गहरा अदा घिउले जरण भोत्ता समयमादणे। यकरके यज्ञों को खिला कर ६च्चा भुच्चा य शिट्टा य तो गच्छसि पत्तिया! । देकर वाकर पौर यह करने औरत जाता प्रयोत हे पश्यि ' मन से यज्ञ का अमल माणों को निमार, दान देकर भोग भोगकर या करके (सके पीछे तुने माना। अभ्यास ध्यान गै पो:- सोयागकुलसंभूए हरिएसयले नामं एगे मिक्सू में हरिब नामा थासी। से हरिएसयले अन्नया कयाई भित्र- वह हरिकेश पस द्वाप पगं घमणजएण्याडयं गई पाययों की पर शाला में छाया- धारिया तं तवायलर परिसोसियं पत्रमाणं पाना लोगम सपोरगम गले हुए को चाता हुमा पासित्ता उपहसि। एवं उवहसियसमा इस प्रकार हमी किया था से हरिएसयले पर्व ययासी, "परणं हिंसगा, वह हरिके गवत ল্য हिंमक अजि य इंदिया, श्रयमचारिणी धाता संति।" जितेन्द्रिय अनक्षवारों प्रख ते यंभणा हरिएसपलं पुच्छितु, ."तुम इन ब्राह्मणो ने हरिकेशन को पूछ। । के असि? केएटेणं ६६ मागए"। किस प्रमे यहां माधा है तएणं से हरिएसयले चयासी, "अहं समणे हरिशयल धोला में भिक्खू, भिक्खकाले अनस्स अट्ठा इहमागए। भिनु भित्ता के समय में अन्न के अर्थ से यहां पाया हूं নও यंभपा घयासी, "अयं भोयां बोले भोजन बंभाएं उपरखडे अत्थिा अधि पयं माधनों के लिये चाई यह . तए DILLMÄGIDIT READER, 1-87- १. मियापुत्ते दारए । नेणं फालेणं तेग मम मियागामे नाम नयरे होत्या गग्रो)। नस्ल णं मियागामस्म नयरस्स पहिया उत्तरपुरत्यिमे भाष चंदणपायये नाम उजाणे होत्या (घगणनो)। नत्य णं भस्म जस्खस्न जापाययणे होत्था (वगणो) ॥१॥ सत्य णं मियागामे नयरे विजर नामं वत्तिय राया परिच- सस्न णं विजयस्स खत्तियस्स मिया नामं देवी होत्या । तस्म जयस्स पत्तियस्म पुरी भियाए देवीए अत्तए मियापुते नामं होन्या जाइअंधे, जाइए, जाइयहिरे, जाइपंगुले टुंडे य वायये स्पि णं तस्म दारगस्स हत्या या पाया या कंगणा वा अच्छी सा वा केवल नेमि अंगोवंगाणं भागइगित्ते होत्था ॥२॥ नर णं मा मिया देवी ने मियापुत्तं दारगं रहसियसि भूमि- नरहसिरणं भत्तपाणेणं पडिजागरमाणी २ विहरइ ॥३॥ सत्य णं मियागामे नयरे एगे जाइअंघे पुरिसे परिवसह । मे -गेगणं सचायुषणं पुरिसेणं पुरनो दंडरणं पगदिजमाणे २ इडाहंडसीसे मच्च्यिाचडगरेणं अगिएजमाणमग्गे मियागाम गिहे गिहेणं फालुणं रडवडियार यिक्ति कप्पेमाणे विहरद ॥ तेणं फालेणं तेणं समरणं ममणे भगय महावीरे समीमहे । मा निग्गया । तर णं से जाइगंधपुरिमे ने महयाजणमदं पुणे नि सयमयुयं पुरिमं एवं वयानी, "किए देवाणुपिया! मज '- - अर्धमागधीरोदर पउमपहं मुपास, भिणं च चंदप्पाई यंदे ॥२॥ पचप्रम मो गुश को हिन को चोर पन्द्रप्रभ को #TRATE सुविहिं न पुष्पदंतं, सीयल-सिमस-यामुपुज्न च । सुविधिको और पुष्पदाको पत्रको प्रांगको वापरयो, विमलमपतं च जिणे, धम्मं सति •च यंदामि पिमभको अनन्तम मोमिन को धर्म को को और बदला दुधु घर च मांस, घदे मुणिमुन्धयं नमिजिए च। फुपको भर को और मनि को पन्दता शनिको ममिगिनको चोर धंदामि रिद्वनेमि, पास तह पदमागचा बताई गरिष्टनेमिको पार्शको सामानको पौर ए 'मर अभिसंधुया, -विहुय रय इभमार तुझमें स्तुति किये हुए इतर गई. कर्म कपी, मला पहीएजरभरणा धूलि को मैश जिनकी नष्ट होगया है युगवा धौर मरण मनका चउयासं पिजिवरा, तित्यपरा में पसीयंतु ॥५॥ चौधीत होमिनपर तीकर मुझपर प्रसन्न हो फित्तिय-चंदिय-महिया, जए लोगस्स उसमा सिद्धा। ...मनुति, पदना पोर पूजा किए गए जिसनेलो मे सममि है पारग-बोहि-लाम, • समाहियर मुत्तम दंतु ॥६॥ आरोग्य भीरधाम की प्राप्ति समाधिवर असम चंदेसु निम्मलयरा, सासु अहियं -पयासयरा। धन्द्रों में से अधिक निर्मिलों में "fvकांग करने वाले सागर पर गभीरा, सिद्धा" सिद्धि मम :दिसंतु ॥७॥ सो सरह बड़े गंभीर सिद्ध रिद्धि- मुझे दिखाई दिये) ARTHA-LAGADHI READER. १. मियापुत्ते दारए। तेणं फालेणं ते समएणं मियागामे नाम नयरे होत्या (वगणो)। तस्म णं मियागामस्म नयरसम बहिया उत्तरपुरथिम दिमीमाए चंदणपायये नाम उजाणे होत्या (वगणो)। नत्य णं मुहम्मस्स जाखस्स जस्खाययणे होत्था (वरणयो) ॥२॥ तत्य णं मियागामे गयरे विजए नाम खतिए राया परिस- मह । तस्सणं विजयस्म खत्तियस्स मिया नामं देवी होत्या । तस्म • रणे विजयस्स खत्तियस्स पुसे मियाए देवीए भत्तए मियापुतं नाम दारर होन्या जाइसंधे, जाइमूप, जाइवहिरे, जाइपंगुले (डे य वायये यानत्यि णं तस्स दारगस्स हत्था घा पाया वा फराणा या भन्छी या नासा पा केवलं तेसि अंगोधंगाणं आगइमित्त होत्था ॥२॥ तर णं मा मिया देवी से मियापुतं दारगं रहमियंलि भूमि- घरग्नि रहसिरणं भत्तपाणेणं पडिजागरमाणी २ विहर ॥३॥ तत्थ मियागामे नयरे एगे जाइअंधे पुरिसं परिवमह । से णं एगणं सचपखुपणं पुरिसेश पुरी इंडपणं पगदिजमाणे २ फुहहाहहमीसे मच्छ्यिाचइगरेणं अरिणामाणमग भियागाम नयर गिहे गिहणं फलुणं रडवहियार विति फन्माण विहर मणं फालेणं तेणं समएरणं ममणे भगवं महान ममोसंह। परिमा निग्गया । तर णं मे जारभंधपुरिसे से मट्याजणसई गुणे २ताने मनायं पुरिम एवं ग्रयानी, "किरण देवाणप्पिया!अन्न Magin Reatter. मियागामें नया इंटम या गंदमहेश जगणं एवं मध्यागाई मुर्णाम। गय गन्नु देवाणुप्पिया ! समण भगवं महावीर गाय ममी म"!" नए ण मे जाइअंधगि मचातुर्य पुरिम एवं धामी 'गामी गं देवाणुपिया ! अम्हे चि ममणं भगवं महावीर पर- यामामा" तए णं से जाइग्रंधपुरिम सचपा एणं पुरिसे पुरभं दंडएणं पगदिजमाणे २ जेणेव ममणे भगय महावीरे तेणेय उवा गच्छा २ तातितो प्रायाहिगां पयाणिं करेर २ ता र नमंमद जाव पज्जुवासा ! तपणं समणे भग, महावीर तीसे महामसालियार परिमा धम्मं कहेर, परिमा जामय दिमि पाउम्भूया नामेव दिमि पनि गयाचा तए णं ममणस्स मगरयो महावीरम्म जे अंतगाली भूई नाम प्रणगारे तं जााग्रंधपुरिसं पासित्ता समण मग महार्य एवं वयासी, "अस्थि णं भंते ! फेइ पुरिसे जाइभंधे जाइयधम्ये। "हना अस्थि "फर्हि णं भते ! से पुरिम जाइबंधे जालंधरुचे ?" "एवं खलु गोयमा! इहेव मियागामे नयर विजयस्म खां यस्म पुत्ते मियाए देवीए प्रत्तए मियापुत्ते नामं दारण जार जाब विहरई ॥ 1. Supply the last fion $ant :3 मियापुतं दार। सपणं से भगवं गोयमे समणं भगवं महावीर चंदर नमसर २ता पर्व चयामी, “इच्छामि णं भंते ! अहं तुम्मेहिं मम्मगुगणाए मिमाण मियापुत्तं दारयं पामित्तए" ।। "प्रदानुहं देवाणुप्पिया !" ॥२०॥ नए रणं मे भगवं गोयमे जगाय मियार देवीए गिहे सेगोय उयागच्छा र ता मियादेवि एवं घयामी, "अहं णं देवाणुप्पिए ! मय पुत्तं पामिउं हवमागए" ॥११॥ तप णं मा मियादेवी मियापुत्तम दारयस्स अणुमग्गजाप, चित्तारि पुत्ते सव्यालंकारविभूमिए करेइ २ ना भगवनो गोयमस्म पादेसु पाडे २ ता एवं पयासी, "पए णं भंते ! मम पुत्ते . (पासह ॥१२॥ . तए णं से भगवं गोयमे मियादेवि पधं वयानी, "नो खलु देवाणुप्पिए ! मह पए तय पुत्त पासिड हव्यमागए । तत्थ रणं जे से नव जेहे पुत्ते मियापुत्ते दारए जाइग्रंधे अंधरूये,जणं तुम रह- मिमि भूमिघरभि रहसिएणं भत्तपागाणं पडिजागरमाणी विहरमि ते अहं पासिउं हवमागए" ॥१३॥ तपणं सा मियादेवी भगवं गोयम एवं वयासी, "मे के रणं मते ! सहारूयेणाणी वा तवस्मी वा जेणं एयमढे सम्म रहस्सकर तुम्भं हवमक्खाय?" नरण भगवे गोयमे मियं देवि एवं वयामी, "एवं खलु दे- याणप्पिर ! मम धम्मायरिर समण भगवं महावीरे सव्यगए सभ्य- दारमी, तो ण ग्रह एपमढं जाणामि" ॥ १४ ॥ 'जाव च णं मिया देवी भगवया गोयमेणं सद्धि एयमह मल- पर नाय च णं मियापुत्तस्म दारयस्म भत्तपाणयेला जाया यायि : महान्या॥१५॥ .

..... Wheavilat keradirir नाम गागा मियादेवी भगवं गोपौ एवं पयागी,"तुम्मे को १४ मेगा मां तुभ मियापुरी माय जनम म पागाशा पारियाय का • ना सम.हम इयं गिगहा माविलग भगोया पार मारमण मामिंग भरेगा जंगेय भगवं गोयमे मंगप उITE • IT, PREमी, "या गा तुम्मे भने ! मम Par प्रतुन्न मियापुगे दाग्य उपईम* ॥ १. नए गं मा मियांची जगाय भूमिधर नगर नागरका गा चरडणं धन्य मुह बंधमागी भगां गोयम एवं पराम नुम्भ धि भने ! मुशियार मुहमा मए मां भगय गोयम मिया यो पर्व शुगेसमा मुहतियार मुहे बघा ॥ १३॥ नाए या मा मिया देवी परंगुर भूमिगत दुधार frain मन ग गंध निग्गम्दाम 3 नाम रहिमतमो पि भगि- हनगाव ॥१८॥ नए णं मियापुतं धारण तम्म मिलरम प्रमशागणम गेवणं अभिभूए समाण नमि ममगायामि मुन्छिार ना या तं ममगापाणं प्रामारण विपरिणमारा facer भर विद्धंसद | नमो पच्छा प्ययाए मोगियाएयामामलि यण पूर्व च मोगिय च पाहार ॥२०॥ नए रणं भगयो गोयमस्य न मियापुतं दारग पामिरा प्रर्यमयारूप अमात्थिर ममुप्पाजल्या, "महोणं इमै दागए पुरत फडाणं असुमाणं फम्माणं पायफलं पच्चणुभयमाण विहार न मे दिडा नरगा या नेइया या, पच्चायं रालु श्रयं पुरिसे नरय पडिरुयं येयणं पेपर" ति कट्टु मियं देघि प्रापुच्छर २ ता मिया देयीय गिहामी निरुपमा राजेणेय ममग मग महावीरे ग मियाने दारा उवागच्छा शापवं चयामी, "ग्रहं खलुभते! तुमहिं प्रभागगाए ममाणे जेणेन मियाए देवीए गिहे तेणेव उवागच्यामि जावर पाहारेइ । म णं भंते !पुरिसे पुनभये के प्रामी? किंनामए ? किंगो- यर ? किं समायरिता एवं विहरइ ?" ॥२१॥ “एवं खलु गोयमा ! इहेब जंबुद्दीवे दीवे मारहे वासे संयदु- -वारे नाम नयरे होत्था (धरणी) तत्य रणं सयदुवारे नयरे धणवई नाम राया होत्था (गणपो) तस्स ण सयदुयारस्स नयरस्स दा- हिणपुरस्थिमे दिसीभाप विजयरढमाण नाम खेडए होत्या । तस्म रणं विजयवाहमाणस्स खडस्म पंच गामसयाई भाभोएयावि होत्या ॥ २२॥ विजयचड्ढमाणे येडे एकाई नामं रहकूडे होत्था महम्मिए जाय दुप्पडियाणंदे । से एकाई रहकूडे विजयवड्ढमाणस्स खेडस्स पंच गामसयाई यहि फरेहिं भरेहि बुझ्दीहिं उक्कोडियाहिं य उचालेमाणे निद्धणे फरेमाणे विहरइ ॥२३॥ तए णं से एकाई रहफूडे विजयबढमाणस खेडस्स थाहणं राईमरतलवरमत्थवाहाणं भएणसिं च यहणं गामेल्लगपुरिमारणं बहसु फजेमु य कारणेसु य मुणेमाणे भणइ "न सुणेमि", असुर्ण माण भणइ “सुणेमि" ति । एवं पासमाणे भासमाणे गिरहमाणे जाणमाण ॥ एवं मे एकाई रहफूडे यहूं पाथफर्म पंधमाणे विह- रह॥२ नए गण मन एकाइस्म रहडस्स मरीरगसि अग्रणया फया जमगसमर्ग मोलम रोगायंका पाउम्भूया ने जहा मासे १ । म्यासे २ जरे ३ दाहे ४ कुच्छिमूले५ भगंदरे परिसए ७ मजीरपद 1. Suply the mst flom s11-20.

.inha Migrattii Reitler. दिहिमले । मुद्धमले १० अफारिए ११ अच्छियाणा १२ पगगये. यणा १३ कंडए १४ उदो १५ कोट १६ ॥२५॥ - तर गां मे एकाई रहकडे सोलमहि गंगायंकेहिं अभिभूग समागा कोईयियपुरिसे महायइ २ ता एवं ययासी, "गच्छदं गां- तुम्मे देवाणप्पिया! विजयवढमाणे खेडे सिंघाडग-तिग्र-च- चश्चर-महापसु महया २ मईणं उग्धोमेमारणा एवं ययह, 'मयं पलु देवारगुप्पिया ! एकाइसरीरगंसिसोलस रोगायंका पाउम्भूया, तं जहा सासे जाव कोठे । सं जाणं इच्छा विजे या विजपुत्ते या, जागर या जाणपुत्ते या एकाइरस रहडस्म मोलसयह रोगायंकाणं पंग- मवि रोगायकं उघसामित्तर, नरसणं एकाई रक्डे विपुलं प्रस्थ संपयाणं दलयइ । एवं दोचं पि तथं पि उग्योमेद" ॥ ते को थिय- पुरिमा तहेव फरेंति ॥२६॥ तपणं विजयवतमाणे खेडे इमं एयारूवं उग्धोसणं सोया' निसम्म यहये विना सरथकोमहरथगया सपाहि २ गिहेहितो पडि- निक्समंति २ साजणव एफाई रफूडे तेणेव उवागमति.२ शा एफाइसरीरग-परामुसनि २ ता सेसि रोगाण निदाणं पुच्छति २ चा एकाइरहस्स पहहिं प्रभगेहि, उयणहिं, सिणेहपाणेहि, चमणहि, चिरयणहि, सिंचणाहि, प्रयपहाणेहि, अणुचागोहिं, पत्थि- फम्मेहि, निरूहे हिं,. सिराबहि, तच्छोहि पच्चयोहिं,' उल्लेदि, , मूलहि, कंदेहि, पोहि.पुष्फेहि,चीपहि, सिलियाहि गुलयाहिं, प्रोसः हेहि, मेसनहिं य इच्छनि तेमि मोलवरह रोगायफाण एगमपि रोगायक उपमामिए । नो थैव ण मचापति उपसामिप॥ २७ ॥ सप रण ते यहये विजा जाहे नो मंचापति तेर्मि सोलसरह रोयंकाणं एगमवि रोगायक उयमामिारताहे संतानता परतता जामेव दिसि पाउम्भूया तामेव दिमि पडिगया ॥ २६॥ ।

मियापुत्ते दारए।
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नए णं मे एकाई रहकूडे सोलमहि रोगायकेहि अभिभूए
समाण रजे य रदंड य मुच्छइ । रज्जे पत्थमाणे अभिलसमाणे भट्ट-
दुहट्टयसट्टे अड्ढाइजाइ वाससयाइ परमाउ पालई २ कालमासे
काल किच्चा इमीसे रयणप्पमाए पुढबीए उपकोसेण सागरोवम-
टिइएसु नेरइएनु नेरइयत्ताए उयवगणे ॥ २६ ॥
से णं तो अशातर उत्तिा इहेब मियागामे नयरे मियाए
देवीए कुन्छिसि पुत्तताए उयवराणे । तए ण तीस मियाए देवीए
मरीरे वेयणा पाउम्भूया उज्जला जाव जलता। पभिईचणं मिया-
पुत्ते दारए मियाए देवीए. कुच्छिसि गम्भत्ताए उपवरणे, त पभिई
चण मियाँ देवी विजयस्स खत्तियरम अणिट्ठा, अपना अप्पिया
जाया याचि होत्था ॥३०॥
तए ण तीम मियादेवीए अन्नया कयाइ पुस्बरतावर सकाल-
समयसि फुडुपजागरियं जागरमाणीए इमे अज्झथिए समुप्पएणे,
"एन सनु अहं विजयस्म खारीयस्स पुन्वं इदहा वीमसिया प्रणुमया
मानी। ज पभिइ च सणं मम इमे गम्भ कुच्छिमि गम्भताए उववरण
त पभिइ च णं विजयस्स खत्तियस्स अहं अणिट्टा अफता जाया
यापि होत्था । न इच्छा विजए वत्तिए मम नाम च गोयं च गि-
गिहत्तए किमंग पुण दमणं या परिभोग वा फरिचए । तं संयं खलु
मम एयंगभं यहूहिं गम्भसाडणेहिं यपाडणाहय गालणेहिंय मारणे-
यि साडिसए या" । एवं मंपेहेइ २ त्ता यहणि साराणि य पाडया-
शिय निफ्षणारिण य गम्भसाडणाणि सायमाणी पीयमाणी इच्छा
गम्भ साडिसए । नो चैव रणं मे गम्भं सह या पडाया। तए ण मा
भिया देवी जाहे नों संचाएर तंगभं माडित्तए घा पाडित्तए था साहे
मला तंमा अवसवसा नं गम्भं दुंदगां परिपहर ॥३१॥

Ivlha ngaathi Reuter. भए णं मा मिया देयी नयहं मामाणं यहुपरिपुरणायां दारयं पयाया मे दाग्य जारग्रंधे जाव भागिामि । तर गणं मा मिया देवीदारगं अंधम्यं पापा २ सा भीया मम्मधाई महावर २॥ पयं ययामी, "गच्छणं चाणुप्पिए.! तुमं पयं दार्ग पने उपदियाए उमाहि* ॥ ३२ ॥ नाए । सा अम्मधाई मिपाए देयार 'नह' ति पयमट पाड- मुगा र ताजगीय विजए, पसिए सेगीय उपागधा २ ता एवं घयासी, "प पनु मामी! मिया देवी नवाई मामारणं जाय भागिह- मिल जाव भीयाममं महाहर सागययामीगन्छणं जाय उन्माद मंदिमहणं मामी! सं दारगंभहं गते उमामि उदाहमा?"॥३३॥ नप णं मे विजए यत्तिए नीम अम्मापि अंतिए यमद, मुथा सहेय मीएममाणे जगाशमियाबी गोव उपागच्छारतामिय देवि एवं ययासी, “एम देवाणुप्पिए नुम्भ पदमै गम्भ। मंजरगं तुम पयं एकरी उधारड़ियाप उम्झामि तयाणं तुम पया नोधिरामविस्मर तेणं तुम एवं दारय रहसियंसि भूमिधरमि रहसिएणं मापागंणं पडिजागरमाणी २ धिहराहि तेण तुम्भं पया यिरा भविस्सर ॥३४॥ तर ग मा मिया देवी विजयसम यत्तियस्स 'मह' ति पयः मझे विणपण पडिमुणेचा संदारगरहसियमिभूमिधरमिरहसि- पण भत्तपाणेणं पडिजागरमागी २ विहरइ ॥ एवं खलु गोयमा ! मियापुत्ते दारए पुरा पुराणाणं असुभाग फम्मा पावफलं पञ्चणुभयमा बिहरइ ॥३५॥ "मियापुत्ते ण भंते ! दारम इभा चुप ,कालमामे फालं किश्चा कहिं गहिहिह। फहिं उपजिहिह ? "गोयमा! मियापुरो दाररवायी वामाई परमाउयं पालदत्ता कालमासे कालं विचारहव जंबुद्दीये दीवे भारहे यामे यागिरिपाय- ५ . मियापुत्ते दारए। मूले मोहकुलसि मीहत्ताए उयवजिाहिइ । से ण तस्य मोहे भधि- स्सइ अहम्मिए जाय माहसिए यदुपावं ममजिणाइ । से फालमासे फालं किंचा हमीस रयणप्पभार पुढवीर उकासेण सागरोयमहि- इरसु नेरइएस्सु उयवजिहिर । से तो अणंतरं घट्टित्ता सिरिसि- येसु उपजिहिह । तयो प्रणंतर से जाई इमाई जलयरपंचिदियनि- रिक्खोणियाण मच्छकच्छभगाहामगरामारावीणः . प्रद्धतेरम जाइफुल-बोडिजोणिपमुहसंयसहस्साई तत्य एगमेगसि जोणि- विहाणं मे प्रणेगमयसहस्सखुत्तः भुजोर तत्येवं पञ्चायाइस्सरी से ण तो अणंतरं उवद्धिता एवं चउपएसु भुयपरीसप्पेसु. खेयरेसु चरिदिपसु तेईदियमु येईदिपसु वरणप्फइफडुयरुपखेसु कडुयदु- द्धि रसु पाउनेउमाऊपुढयोमु अणेगसयमहस्मखुत्तो पचाया- एस्मा ॥३६॥ से ण नो अणंतरं उहिता सुपाडपुरे गोण तार पञ्चाया- हिइ सेणं तत्थ उम्मुक्कबालभावे अनया कयाइ पढमपाउसंसि- गंगार महागईर खलीणमट्टियं खरणमाये तडए पडिर समाणे काल- मासे काल फिच्या तत्थेव सुपइटेपुरे नयरे सेट्टिकुलंसि पुत्तत्ताप पद्यायाइस्सर से णं नस्य उम्सुमधालभावे जोच्यणगमणुपत्ते तहा- रूयाणं थेराण अंतिर धम्मं सोचा निसम्म मुंडे भविता आगारानी 'अणगारिय पव्वइए सामगणपरियाग पाउणिता पालोइयपडिकते समाहिपत्ते कालमासे कालं किचा सोहम्मे कंप्पे देवताए उपजि- हिह । से णं नो अणंतरं चयइ रत्ता महाविदेहे वासे सिझिहिह ३७॥ एवं खलु ! समणेणं भगवयामहावीरेण जाच मम्पत्तएं पढ- सस्म प्रज्मयणस्म अयम पराणते त्ति मि" ।। ३८॥ रविवागमुनस्म पढमे मुयवसधे पढमं अज्मयता) " .

\ull figntit Hearler.
१
॥
२. "उमभनिव्वाग
जे मे मना तश मामपंचमे पपग्वे मायाहुले, तस्स 0 माह-
पहलम्म तेरमापकरण दमहिं प्रणगारसहस्सेहिं सपरियुडे अद्या
वयमेलमिह मि चोइसमेणं भत्तणे अपाणरण संपलियंनिसणे
पुन्यराहकालममयंमि अभिाणा नस्पत्तेणं जोगमुवागए मुसम-
दुसमार पगुणगाईए पश्यहिं सेसहिं उसमे भरडा वीइते जाध
सव्यदुक्खपहीणे॥
समयं च णं उमभे धरहा फोमलिर कालगए धीरयते, समु-:
ज्जाए य हिरागजाइ-जरा-मरण यंधणे नि बुद्धं जाव सव्वदुषण,
पहीणे तं समयं च णं सकरस देविदस्मदेवरगो. भासणे चालपाशा
तपणं से सके देविदे देवराया प्रासणे चलियं पामर २ ता
मोहिं पउजदरसा भगवतं तित्थयर श्रोहिणा प्रामाएर २ता एवं
ययासी, "परिणिव्युए ग्यलु जंयुद्धीव दीये भारहे चामे उसहे परहा
कोसलिए, में जीयमेयं तीयपटुपगणम म्यागयाणं सकाणं देवि-
द्वाण देवराईणं तित्थगराण-निश्वाणामहिम फरित्तए । ते गच्छामि
" अहपि भगवनो तित्थगररम परिगिदाणामहिमं करेमि" ति
कट्टु चउगमीईए सामाणियसाहस्सीय तायत्तसार तायत्तीसह
चाहिं लोगपालेहिं जाव चाहिं चपरासीहि भायरयखदेवसाह-
स्सीहि अगाहिं च वहति सोहम्मकप्पयामीहिं येमाणिपहिं देहि
देवाहिं च सद्धिं संपरिषुडे ताप उनिहाय देवगईए जाय तिरिय-
मसंम्वेज्जाणं दीवसमुदाणं माझ मज्झेणं जेणेव अठ्ठावर पवए,
भगवमी तित्थगरस्स मरीरए तेणेय उवागछह रता विमणे निरा-
गदे सुपुराणयों नित्यगरमरीरयं तिपखुत्तो पायाहिणं पया--
हिण करेंड रत्ता नश्वासपणे नाइदूरे मुस्सूममाणे पन्जुवामा ॥३॥

" . उमनियां नए गईसाणे देविदे देयराया उत्तरढलोगाहिया महायी. मषिमाणसयमहरूमाहिई मूलपाणी घामयाहणे मुरिदे प्रयरंय. रवत्थधरे जहा सके नियगपरियारेण सद्धि मंपरियुड़े उयागच्या जाव पज्जुषामदाय तए ग म देविदेदेवराया ते धहये भवणावरल्याणमंतर-जोइमि. चमाणिण देये पयं पयामी, “विप्पामेय भी देवाणुप्पिया! नंदणव- गायो सरमाई गोसीसचंदणकट्ठाई माहरह २ता मनोचिगानी रपह-एगं भगयनो नित्यगरस्स, एगं गगाहराणं, एगें प्रवसेसाणं प्रणगाराण । तयाशंतरं मी देवाणुप्पिया ! इहा मिग-उसम-तुरय- जावयालनामत्तिचित्तानो तो सिवियाओ विउव्यह" ॥ नए सके देबिदे देवराया भगवनो नित्थगरस्म विराट- जरा-मरणस्स मरीरगं मिवियाए प्रारुहेइ २ता चिगाप, ठयेइ ।। तपण ते बइये देवा गणहराणं अणगाराणं य सरीरगा सिवियाए प्रारहनि रत्ता चिगाए. ठति ॥६॥ नय णं से सके देविदे देवराया अग्गियुमारे देवे सदाइ २ ता एवं घयासी, "खिप्पामेय मी देवाणुप्पिया ! तित्यगरचिगाए गणहर-भणगार-चिगाए य अगणिकाय विउध्याह" ॥ नपण ते अग्गिकुमारा देया अगणिकायं पिउध्यति ॥ तर ण धाउकुमारा देया घाउफार्य विउच्चति, अगणिकायं उजालेति, तिन्यगरसरीरगं गणहरसरोरगाई प्रणगारसरीरंगाई च झामेति ॥ नए ण ते देवा सव्वामु चिगामु अगस्तुरकं घयं महुंच माहरति॥

Inlignihif Nearler, सए गणं महफुमारा देया नाश्री विगाभी पीदपणं निया- तए णं से मक देयिंदे देयराया भगयो तित्यगरस्म उप- रिलं दाहिण मकह गिहा माणे देविंद देवराया उपरिलं पा मफई गिगहा, चमरे प्रमुरिद अमुरराया हेद्विानं दाहिणं सफर गिगहा, बली यारोयदि पारायणपया हिािनं पागे सफई गिगहर, अयमेमा गयणया-जाय येमा.रणया देया जहारिहं अयमे. माई अंगमंगाई फेर जिगामतीए, फेर जीयमेयं ति कटु, धम्मा ति फटु गिगहति ॥१०॥ मरण से मजे देयिंदे देवराया ने देय पचं ययामी, "मापा- मेय मी देवाणुप्पिया! मध्यरयणामए महामहालए तो चेहयों पारेह- मगो निगरस्म चिगाए, गं गारचिंगाप, गं अवमसाणं शणगाराणं चिगाए" ॥ ते देवा नहेच करेंति ॥१६॥ तए ण ते मध्ये देवा अहवाहियं महिम करेति रक्षा अणेच साई २ विमारलाई जेणेव साई २ मवालि गाय मानाममाश्रो जेणेच मया २ माणगायबमा गय उयागच्छति २सा बाराम- पसु गोलममुग्गपसु जिणसकहानी पखिति २त्ता अहिं यरेहि महहिं च गंधेहि अति ॥१२॥ (जपवरणनी) : मेहे युमारे। 18 ३. मेहे कुमारे सेणं फालेणं तेणं समए चंपा नामं नपरी होत्या (वरणमओ) ॥ नीसे णं चंपाए नयरीए पहिया उत्तरपुत्यिमे दिसीमाप इत्य णं पुण्णभद्दे नामं चेइए होत्था (वराणो)॥ तत्थ गा चंपाए नगरीर, फोगिर नामं राया होत्या (वरणओ) ॥१॥ तेणं कालेणं तेण समपणं समणसम भगवो महावीरस्स अंतेवामी प्रज्जसुहम्मे नाम थेरेजाइसंपरायणे यल-स्व-विणय-गाण- दसण-चरित-लाघव-संपएणे प्रोयंसी तेयंसी यचंसी जर्मसी जिय- कोहे जियमाणे जियमाए जियलोहे जिइंदिए जियनिद्दे जियपरीसहे जापियासा-मरणभय-विप्पमुफे तयप्पहाणे गुणप्पहाणे एवं करण- चरण-णिग्गह-णिच्छय-अजय-मद्दय-लाधव-खंति-गुत्ति-मुत्ति-विजा- मंत-यंभचेर-यय-णय-णियम-सञ्च-सोय-णाण-दसण-चरित-प्पहाणे भोराले घोरे घोरव्यए घोरवंभचेरवासी उच्छूढसरीरे सखित्त-विउल- तेयलेसेचउद्दसपुच्ची चउपाणावगएपंचर्हि अणगारसहिंसद्धि संप- रिबुडे पुच्याणुपुदि चरमाणे गामाणुगामं दूइजमाणेसुहं सुहेणं विहर- माणे जेणंय चपा नयरी जेणेव पुण्णमहे चेइए तेणामेय उवागच्छर रत्ता प्रहापडिरूयं उग्गहं उग्गिण्हइ २त्ता संजमेण तवसा अप्पाणं भावेमाण घिहर ॥२॥ (तए ण चंपाए नयरीए परिसा निग्गया। कोणियो निग्गयो। धम्मी कहियो । परिसा जामेव दिसि पाउम्भूया नामेव दिसिं पडिगया ।) तेणं फालेर तेण समएणं अजसुहम्मस्स अणगारस्म जेहे भनयू नाम अणगारे कासवगोत्ते सत्तुस्सेहे प्रजमुह- 4.

Vitth Marathi lettlem. 1 मम्म परम्म अामार्मन जाप महागिर झालायगर मंजमंग नयमा प्रापाग मागेमागविहार ना में जयभगागारे जायमइसे जाप मगर जाय उध मंजायगड ३ उपमदये ३ र २मा जगभय मनमुहम्मे परे मंगामेव उयाग २ भदम्म निपयुक्त मापाहियों पयाणि पगना पंदर नर्ममा २सा भनसुहम्मदर घरस्म नपामगो नादूरे गुसम्ममागो नर्मममा भभिमु पंजलि' विगणया पम्जुयाममा पयं पयामी, "ग भने ममगोणं भग- यया महायोग प्राइगरेगां नित्यगोगा मयं मधुरंगां लोगगादेगा लंगपविणं लोगपन यगरण अभयदएणं मरणदणं सादा मगद धम्मदप धम्मदेगा. धम्मयरचानचयहिगाा শ্বঙ্কিাযশামঘা সি সায় যুক্ত হবে मुनेगां मायगेण तिगणणं मारपणं मिय-मयल-मय-मान-मापय- মামা-মাঘ মামষ গন্তবাস মময়াঁ চান अयम पागल, छहसम गां भंगस्म भंते नायाचम्मकहाण के प्रस्ट पपणते ? ..", "प खलु जेवू ! ममण भगधया महावीरे घटसर अंग- समदा मुयघा पगण सा तं जहा नायाणि य धम्म हाम्रो य॥३॥ जाण भैते! ममण भगवया महापोरण घट्टस भेगसम दो सुयखंधा पगणना पढमस्स ग मते ! मुयपंधम्म फर अन्म- यणा पण्णता ? "पपं सलु जयूममणेणं भगवया महावीरेणं नायागं अंग- गायीसमयमा पण सात जहा उरिखतगार मंधाडेर अंडे३ कुम्मेट य मेलगेर । तुंग्रह य रोहिणी मली माईदीर चंदमाई१० ।

मेहेकुमारे। 17 य ॥१|| दायहवे११ उदगगाए २ मंडु१३ तेय ली१४ विय। मंदिर फले१५ अमरकंफा१६ आइएगणे१७ मंसुमाई १८ य ॥२॥ प्रयरे ये पुंड- रीर१६ गाए. एरण पीमिमें" ॥ २६ ॥ ५॥ "जाणं भंते!समोणं भगवयामहावीरेण नायाणं एगुगवीस अझयगा। परमाता पढमस्स गं भंते अभयणास्स 'के भट्ठे पएगाते" ? एवं खलु जंवू ! तेशां फालेग तेणं समएमां इहेव जंयुद्दीये दीये मारहे घासे दाहिणभरहे रायगिहे नाम नयरे होत्था (वरमा) गुणसिलए चेइए. (वयरगो) ॥ तत्थ णं रायगिहे 'नयरे सेगिय नाम राया होत्था (यण्णाम्रो) ।। तस्स ां सेशियरम रंगणी नंदा नाम देवी होत्था (वएणी)॥ तस्मा सेशियस्स रगगो पुस नंदाप देवीर अतए अभए नाम कुमार होत्था अहीगा जायमरूये। सेगियस्स रगणा सबकजसु लद्धपञ्चप, तस्स रजं च रददं च फोसं च फोटठागारं च घलं च वाहणं च पुरं च अंतेउरं च सयमेव समुपेत्रमाणे विहरइ॥६॥ तप ग तस्स सेणियस्स रपणो धारिणी नामं देवी होत्था । सा धारिणी देवी अपणया कयाई पुत्रर तायर फालसमयंसि सय- रिणमि सुतजागरा प्राहीरमाणी २५ महं सत्तुस्सेई रययकूड- संगिणहं नहयलंसि सोमागारं लीलायत जंमायंतं गयं मुहमंतिगयं पासित्ताणं पडियुद्धाहतुट्ठा समारणी तं सुमिणं उग्गिएहइ २त्ता सयणिजानी उठेर २त्ता अतुरियमचवलं रायहंससरिसीए गए जेणमेव सेणिर राया तेणमेव उवागरछह २त्ता सेणियं रायं इटाहिं केनाहिं पियाहिं गिराहिं पडियोहेइ २ ता सेणियण रराणा अम्मरगुरणाया ममाणी नाणामणिरयणचिनसि भद्दासणंसि निसीयइ २ ता पासत्था पीसत्था मत्थए अंजलि फट्टु एवं चयासी, ."एवं सलु अहं देवाणुप्पिया! आज तंसि तारिसगंमि सयरिणमि Indit-Magadhi Rentley. सुसजागग नियगययणमइययंतं गयं सुमिगो पामिना पडिबुद्धा॥ तपयरसणं मुमिणरस देवाणुपिया के फलनिमसे भविस्सा?"ntu नए गण से मेरगर राग धारिशीर देवीर अंतिए पयमई मंया निमम्म हातुरठे समाणेनं सुमिणं उम्गिणहर २त्ता ईहें अगुपविमद अप्परणो माभाविण मयुबरण बुद्धिविगएणणे नस्स मुमिग्णस्म अत्याग्गहं परेइ २ ता धारिणि देयिं प्रणवूहमाणे एवं वयासी, "भाराले गा तुमे देवाणुप्पिर ! सुमिगो दिठे। कालाण रणं तुम देवाणुप्पिए! मुमिग विठ। अत्यलाभी देवाणुपिए पुलामी देवाणुप्पिए ! मुफ्ग्वलामी देवाणुप्पिए ! एवं सलु नगह मासा यहुपडिपुराणाणे प्रमाणं राईदियाणे विकशाणं अहं कुल- के कुलबडंसयं दारयं पयाहिमि । सेमि य णं दारर उन्मुक्याल. भावे सूरे पीरे राया भविस्मद । तं प्रारंग-तुदि-बीहाउ-पाहाण- करपणे तुमे देवी ! मुमिण दिन्छे" ति फट्टु भुजोर अणुचूहे ।।८।। तए " सा धारिणी देवी लेणिपणं रगणा पं धुता समायो. हदटतुट्टा मयंसि सयणिबंमि निनीयइ २ ता पवं वयासी “मा मेये उसमे पहाणे मंगले सुमिणे असोहि पारसुमिणेहिं पडेहम्मिहिइ" ति कट्टु देवगुरुजणमंयाहिं पमस्थाहिं धम्मियाहि कहाहि सुमि.. जागरियं पडिजागरमाणी विहर ॥॥ तए णं से मेणिय राया पच्चूसकालसमयसि विहियसत्य- फुमले सुमिणपाढए सहायेइ २ ता धारिगोए देवीए दिठरस मुमि- एस्स फल पुच्छह ॥१०॥ *एवं पुन्छिया समाणा ते सुमिरपाढगा सुमिणमत्थाई उचा. रेमाण एवं पयासी, "एवं खलु सामी ! अम्हं मुमिणसत्यंसि पाया- लीसं सुमिण सीस महामुमिण वायत्तरि सध्यमुमिमा दिदठा। तत्य सामी! अरहनमायरी या चबायटिमायरो या भरहनसि वा चम . मेहे कुमारे बहिमि या गम्भं धकमाणमि एएसि. नीसाए महा सुमिरणागों इमे घउद्दस महासुमिणे पामि तागं पडिबुझति ने जहा, गय-वसह- मह प्रभिलेयदाम-मसि-दिसायरं उभय कुंभं । पउममर-सागर-कि- माण-भवरण-रमणुश्चयं निहिं च ॥१॥ तत्थ णं सामी ! मंडलियमायरो मंडलियसि गम्भ वा.माणमि परमिं चदसगह महासुमिणार अगरणयरं गं महा-सुमिगां पासिताणं पडियुज्झति । में श्रीराले गं सामी ! धारिगर देवीए सुमिणे दिठे। एवं पलु सामी ! नवगई मामागं बहुपरिपुगगाण धारिणी देवी एग दारयं पयाहिह से वि य दारए रज्जबई राया भविस्मइ, अरणगारे या भावियप्पा" ॥ ११ ॥ नए ण तीमे धारिणीए देवीए दोसु मामंसु विडतेसु तइप मासे बट्टमारण तस्म गम्भस्स दोहलकालसमयंसि अयमेयालये अकालमेहेसुदहले पाउभवित्था; "धगणाओं तानी अम्मयाना, पुरानी तानो अम्मयाओ, जानो गो मेहेनु अम्भुगएसु हथि- रयणं दुरूढायो सच्चयो ममता अाहिंडमाणीओ डोहलं विणेति, ते णं अहषि मेहेसु अभुगएमु जाव डोहलं विणेमि" ॥ १२ ॥ नए रणं सा धारिणी देवी संसि दोहलंमि अविरिणज्जमामि यसंपत्तदोहला असंपुगग्णदोहला सुका भुक्खा निम्मंसा दुग्यला जाया ॥१३॥ तए ण धारिणीय देवीर अंगपडियारियानो अन्भिनरियायो दामचेडियायो जग्गध मेणिर राया तेणेव उवागच्छति २त्ता एवं चयासी,"एवं खलु सामी ! फि पि अन धारिणी देवी सुक्का भुक्खा अदृझाणोधगया झियाया" ॥ १४॥ तए गा मे मेणिर राया जेणेय धारिणी देवी तेणेय उवागच्छा २त्तात एवं क्यानी "किगण नुमं देवाणुप्पिए ! प्रहमाणोचगया मियायसि?"

18 Im Vligubi luulis तप.गा साधारिणी या पयासी. "प पर मामी मम प्रयया ये प्रयासमेहम पहले पारम्भ ॥ १५, नए गा से मेगिर गयानं धारिगिधि पधयानी"माणं तुम देवाणुपए ! महाभाझियादि,महापरिरसामिजहाणार अयमैया भयानदंलापही विस" Men नप गण से मगिर राया मम नाम पु.मार महाग २ चयामी "ए मनु पुता मय गुममायाप धारिणीप यार अफान- मेंहंतु दाहले पारम्भूपातम्मोहलरम भाई उचापदि उपसि रि- दमाणे भाइयमएभपाम मिायामि ॥१७॥ सए गो में अमर कुमार सेणिय रायप, ययासी, "माणं तुम्मे सामो! एयं मियाद । अयंतहा परिरमाम जरा मा चुमार- पाप धारिणीए देवीए अफालदाह लस्म गोरहसंपका मदि- स्सई" ॥१८॥ नए गई सरस अभयकुमारस्म भयमेयारू भएमपप समुप्प- जित्या,"णा ननुमका माणुस्सएगा उयारणं मम घुम्नमाउयारधारि- गीप देवीए अफालदोहलस्म मनोरहमपति परिसए नमत्य दिये उयाप । अस्थि मम मोम्मफप्पगमी पुग्यासंगाए देये महटिए 'य महासुपसे । ते संय मलु ममं पोसहमालाए पीसहियरम यमया- रिस्स एगस्स प्रयीयस्स दरमसंथारंचगयस्म अहममत परिगगिहसा पुश्यसंगनियं देवमणसीवरेमाणस्स विहरिसएतिएणं पुण्यसंगाप देने मम घुलमाउयापधारिणीप देवीए कालमेहेमुदोहलं पिणेहि। एवं संपेहे। २त्ता ঘাষনমুন্নি २त्ता पन्ध- पडिलेहेर महकुमार। तए णं से पुथ्वसंगतिए देये अभयरम' कुमारस्स ग्रंमिए पाउ म्भूए । अभपणं कुमारेणं अम्भहिरममाणे अकालमहे पिउव्या ॥२०॥ तए रणं सा धारिणी देवी अफालमेहेन दोहल सम्म विणे २ प्ता नवराई मामाणं पडिपुगणागां मेहं नाम दाम्यं पयाया। नपण नस्म मेहस्स फुमारस्म अम्मापियरो प्रणुपुयेणं नाम- करणं च पजेमणं च परफमा च चोलापणयं च महया २ इइदीए फरिम ॥२१॥ तए णं तं मेहं कुमारं तस्स अम्मापियरी गम्भहमे घासे सोह- णसि निहि-करणा-मुष्टुत्तमि फलायरियस्स उवणेति । तए णं से कलायरिए मेहं कुमार लेहाइयाश्रो गणियप्पहागानो वायत्तरि फलानो मुत्तो प्रत्यो करणी य मिक्वाइ, तं जहा. लेहं १ गणिय २ रुचं ३ ४ गीय ५ वाइयं ६ सरगयं ७ पोक्षरगयं ८ समतालं जूयं १० जणवायं ११ पाढयं १२ अहावयं १३ पोरेफत्तं १४ दगमट्टियं १५ अण्णविहिं १६ पाणविहिं १७ घत्यविहिं १८ विले- घणचिहि २५ सयणविहिं २० अजं २१ पहेलियं २२ मागहियं २३ इथियलपखणं २४ गाई २५ गीइय २६ सिलोय २७ हिरएणजुत्ति २८ सुघण्णजुति २८ चुरणजुत्ति ३० प्राभरणयिहिं ३१ तरुणी- पडिफम्म २१ पुरिसलक्खणं ३३ हयलक्षणं ३४ गयलफ्षणं ३५ गोणालयखणं ३६ फुफ्फुडलक्खण ३७ छत्तवपखरण ३८ दंडलपवणं ३६ प्रसिलपखणं ४० मणिलपवणं ४१ फागणिलफ्नय ४२ पत्थु- विजं ४३ संधारमाणं ४४ नगरमाणं ४५ वूहं ४६ पद्धिवृहं ४७ चारं ४८ पडिचाई ४६ चकावूहं ५० गरुलचूहं ५१ सगडवूह ५२ जुद्धं ५३ णिजुद्ध ५४ जुद्धाइजुद्धं ५५ अहिजुद्ध ५६ मुडिजुद्धं .५७ याहुजुर ५८ लयाजुद्ध ५८ साथं १० करपवायं १धणुव्येयं ९२ हिरण- 1 । Inhaliguli livadler. । पाग ८३ सुवरणपाग६४ मुत्तम्बड ६५ घट्टखेडं गालियाखेड ६७ पत्तच्छेनं ६७ कड़गच्छ मजीव ७०निज्जीचं७१ सउगाख्यं ७२|| तए ण से कलायरिर मेहं कुमारं पतामो फलानी सिफ्पाविता अम्मापिऊण अंनिए उवणेइ ॥ २२ ॥ नए णं तस्स मेहस्म अम्मापियर ने पलायरिय महि य- गाह विपुलेशा मधमलालेकारणं मकारेति २ ताघिउले जावियारि पीइदा दलयंति २ ता पडिदिमजेति ॥ नर णं से मेहे कुमार पावत्तरिषजापंदिर एवंगलुरुपडियं हिर भधारमविहिप्पगारंदेमीभाषाविमार जार ॥ २३ ॥ गए णं नस्म मेहस्म कुमारस्म अम्मादियरो महणे म तिहि- करण-मुहुर्तमि मेह कुमारं सरिसेहितो रायफुलैहितं. प्रगिल्लियाहिं प्रहहिं रायपरफागणाहिं सद्धि पाणि गिगहायम् ॥ २४ ॥ नए गा मे मेहे सुमारे उपिपासायघरगर हमाणेहिं मुइंगमत्थ- पहिं घरतरगणीसंपउत्तेहिं यतीमध्यद्धपहिं नाडएहि उयगिजमाण २ उवलालिजमाण र विउले कामभीए पशणुभवमाणे विहरद ॥२५॥ तेण कालेणं तेगां ममरण समगो भगवं महावीर पुन्याशापुचि चरमाणे गामाणुगामं दृइजमारणे सुहे मुरण चिहरमा जेणामेय, गयगिहे नयरे गुणमिलरचेहए तेणामेव उवागन्छरजाय विश्रद ॥२८॥ तए गां से मेहे कुमारे पंचुइजपुरिसस्स अतिर समगरस भग- वो महावीरस्स प्रागमणपवित्ति सोया निसम्म हतुढे फाई- चियपुरिसे सहायेई २त्ता पचं धयामी, "विप्पामेव भी देवाणुपिया! चाउघंटे ग्रासरहं जुत्तमेत्य उपहवेह" ॥ २७ ॥ .

मेहे कुमारे ।
21
तए ण से मेहे कुमारे चाउघंट आसरहं दुरूहे समाणे जेगामेव
समण भगध महावीरे तेणामेव उवागच्छा जाब विणयणं पज्जुवा-
सद ॥ तए ण समणे भगवं महावीरे मेहस्स कुमाररस तीसे य मह-
इमहालियाप परिमार विचित्तं धम्ममाइक्खर ॥ २८ ॥
तप गां से मेहे फुमारे समणस्म भगवनो महाररस प्रतिए
धम्म संचाणिसम्म हतुढे जेणामेव अम्मापियरी तेरणामेव उवा-
गच्छा रा अम्मापिऊगा पायब करेइ २ सा पयं पयामी,"एवं
पतु अम्मयाभो ! मप मम्णम भगवछो महापरिरम अंतिर धम्म
निसंते से वियणं धम्मे इच्छिा पांडच्छि अभिरुर । तं इच्छामि णं
अम्मयानो! तुहि प्रभागरणाए ससाणे नमणस्स भगवो महा-
- धीरस्स अंतिर मुंडे भविताणं प्रागार.श्री अणगारिय पचहत्तर"॥२६॥
तए णं सा धारिणी देवी तमणिडं अकंतं अप्पिय फरसं गिर
सोच्चा तप्पमाणी संयमाणी बिलयमाणी मेहं कुमार एवं घयासी
"तुम सि जाया ! अम्हं एगे पुत्ते इहे कंते पिए | नो खलु जाया !
अम्हे इच्छामो खरणमधि विष्पोगं सहित्तए । भुंजाहि ताव जाया !
माणुस्सप भोगे जाव ययं जीवामी । तो पच्छा अम्हेहिं कालग-
पहिं परिणयवर निरवयग्वे परिवइस्ससि" ॥ ३०॥
तपणं से मेहे कुमारे अम्मापिऊहिं एवं युत्ते समाणे एवं घयामी,
"तहेवणं तं अम्मो! जयण तुम्भे ममं वयह । एवं खलु अम्मयानो!
मागुस्सर मवे अधुघे अणियप प्रसासए दमणमय-उवद्दयाभिभूए
बिजलयाचंचले अणिञ्चे जलविंदुले लचवले कुसग्गजलबिंदु-
सनि संझम्भरागसरिसे मुविणदसणे चमे पच्छा पुरं च अयरस
विप्पजहणिजे ।से के णं जाणइ अम्मयाओ ! के पुचि गमणाए के
पच्छा गमणाप तं इच्छामि णं जाय पन्यासए" ॥ ३१ ॥

. . Irlha sliguthi Refer, नए ण सम्म मोहम्म कुमारस्म भम्मापियर जाह गगी मंचा- पंति मे कुमारं यहहि बिमयाणुलोमादि भाययगाहि य पगणार. गाहिं प्रायधि नप या पगणविसर पाताहे विमयपशिलाहि मंजमा भागकारियाहि य पण्णवणादि गगापेमागा ६ पयामी, "रम गा गाया!णि पायगो मो, अण हो. यलिए. परिपु. ग. संमुझे, सादगग मिदिमाग, मुनिमागे, मध्यपहाण मांग, महीय गन्तदिटिटग, युरो इस धारण, लं.धम्या व जया चायच्या, यानुसारयलाइयनाग्मप. गाव परिमायगमगा- याप, महा ममुद्दोच भुयाहिं दुसरे, ममिधारय मंचरियथ्य । रणी खन्नु फापर जाया ! मागाणं नि:गंधा घामपा मिएया,फीय-गडे या. टविरया,राए या नियमन या, बदलिया. भत्ते, या नाग्मन या, गिलाणमते था. मूलमायणे 'या. पदभी. यणे धा, फलमायगा या, योयभायणे पा. परियगोयणे पा भोतए चा पायय या ॥ तुम चगो जाया! मुहमचिए । य ग दुहममु- चिए शाल मीय शालं उगहणालं म्हं गाल पियासं गाल वाय- पित्तिय-मंएिगायाइय-वियिह रोगायंफ उचावर गामफटके याचीम परीसह यमग उदिपणे सम्म पहियासिसए ॥ तं भुंजाहि ताव जाया जाय परिवइम्समि ॥३२॥ तपणं से मेहे फुमारे अम्मापिऊहिं एयं थुत्ने समारों भम्मा. .पियरो एवं ययासी "तहेव ण ने अम्मयामो .जय गं तुम्मे मम वयह ॥ स खलु निग्गेथे पाचयणे शिविणाणं कायराणं फापुरि- साणं इहलोगपडियद्धाणं परलं.गनिप्पियासारणं दुरणुचरे पायय- जस्म । णो चेव णं धीरस्म एल्य फिघि दुसरं करणयाए ॥ . इच्छामि जाय पम्बइ तर ॥ ३३ ॥ तए ण तस्स मेहम्स कुमारस्त अम्मापियरो त एवं पयासी "इशामो तावं जाया ! पगदिवसमयि तय रायसिरि पासप्तए"। 1. Supply the irst froin 30. . - .

मेहे यामारे। नपण से मेहे पुमारे तुमिणीय सनिष्ट ॥३४॥ नए ण मे सेणिर राया फोदुयियपुरिसे, सहायइ २६ पर ययामी, "खिप्पामेय मी देवाणुपिया! मेहरम कुमारस्म मदन्यं महारिहं महग्य विग्नं गयामिसेय उपहचा" ॥ तए ते कोमुनि यरिता ताहय उपहवेति ॥ ३५ ॥ मए गां मे सेगिर राया पहहिं गणणायगेहि दंडणायगेहि मपरियुडे मेहं कुमारं अट्ठसयाग सोगिणयाणं फलसा जलेदि रायाभिसे णं अभिनिचमाणे एवं पयासी “जय २ गदा ! जय २ भद्दा ! भई ते ; अजयं जिणाहि, जियं पालयाहि, जियमज्झे घमाहि" सिकटु जयसह पउंजाइ॥ तपणं से मेहे राया जार ॥३६॥ तर णं तस्स मेहस्स रगणा अम्मापियरो एवं चयामी "भण जाया ! कि ते दलयामो कि ते पवच्छामो?" तर णं से मेहे राया अम्मापियरो पधं ययासी इच्छामि गां अम्मया! कुत्तियावगायो रयहरणं पडिग्गहं च प्राणियं काम- घयं च सहावितर" ।। ३७ ॥ सए णं से सेणिर राया कोडुयियपुरिसा सहावेर २ ता पर्व वयासी "गच्छहणं तुम्भे देवाणुप्पिया! सिरिघरानो तिरिणसय- महस्साई गहाय दोहिं सयसहस्सेहि फुत्तियारणामोरयहरणं पढि- गहं च उवणेह, एगणं मयमहस्सेणं कामययं सहायेह" ।। नए णं ते फोडुबियपुरिमा तहेव करेंनि ॥ ३८ ॥ तए णं मे फासवे सेणियं रायं करयलमंजलि कटु एवं चयासी, "संदिमह णं देवाणुप्पिया! मए कराणज्जे" । - Ilhi-Vinuthi Reuler, तप रण में मंशिर राया कामवयं पचं दयामी, “गरकाहि तुम देवाणुपिया ! मुरमिणा गंधदएणं निके धपाए परखालैहि । मेयाए चउप्प.लाए पौत्तीए मुहं बधित्ता मेहकुमारस्म चउरंगुल- बजे निक्खमणपाउगो केम्प कप्पाहि" ".. नए णं से यामवे तहेब फेमे कापड ॥ ३८ ॥ तर, गो मेहकुमारस्म माया महारिहण, इमलरमण-पद्ध- माडपण अग्गकेसे पडिच्छा २ता सुरभिणा गंध दरगा- परखालेर २ता मरमेण गोमीमचरण चचायं दलयर २त्ता सेयाए' पात्तीय यधंड रत्ता एयरणसमुन्गसि पक्षिधर ॥ पारिधारा-हि- एणमुत्तालिपगासाई अंमई विरिणग्मुयमाणी २ रे.यमागी २ कंदमाणी २ एवं धयामी, “एस णं अम्हं, मेहकुमारस्स प्रभुदपसु य उस्सवेसु य अपच्छिमे दरिमणे भविहिर" ति फटु उस्सीसामूले रो॥४॥ नए गा तस्स मेहस्म कुमारस्म अम्मापियर उत्तरावरमा सीहासणं.ग्याति, मेहं. पु.मारं दंञ्च पि त 'मिसेयापीयरहि . फलसहि रहावति रत्ता पम्हलसुकुमालाए गंधकासाइयाए साडि 'याए गायाई लुनि.२ मा मरग्मेण गेमीमचंदणेणं गाया अणु- लिपति र त्ता णासा-गोसाम-वाय-नोज हसलक्खगामा यि संति हार विगति श्रद्धहारं पिगति एवं एगावति मुत्तावलि कामावलि रयणालि जाच दिव्यं सुमगणदामं पिणद्धति॥४॥ तए ण मेहे कुंमार मैटिम घेडिम-पूरिम-मंजेइमणं चन्दिा हेणं मलेगणं कप्पम्मखं पिव अलीकयमरीरं करेंति ॥ ४२ ॥ तए मे मीणए राया कोडबियपुरिस महावई २ ता एवं ययामी "विप्पामेव भी देवाणुप्पिया ! अगागबममयसारिणविद्हें पुरिसमहसपाहिणि मीयं उमट्श्वेह ॥ - A ,

25
मेहे कुमार
नरणं से कोईदियपुरिसा नीगं उवहति ॥४॥
तप मेहे पुमारे सीयं दुराहइ २ चा सीहासणवरराए पुर-
म्याभिमुहे निसीयह ॥४
करणं तस्स मेहस्त कुमारमल माया रहाया फयलिकामा
अप्पमहग्घाभरणालंकियसरीरा सीय दुल्हा २ता मेहरंस कुमारस्स
दाहिणापासे सीहासांसि निसीया ॥४॥
सए से सस्स मेहस्म पुमारस्म पिया कोचियपुरिसे सहा-
घेह रता एवं पयासी, "विप्पामेव भो देवासुप्पिया ! सरिसाणं
सरिस तयाण मरिमययाणं फोडुधियवरतरणाणं महसस
महावेह"।
सपणं से कोडंपियवरतरुणा महाविया समाणा सेणियं
रायं एवं घयासी, “संदिसह यं देवाणुप्पिया ! जगणं अम्हेहि कर-
णिज" ॥
नए णं से सेणिए राया ते कोडंपियवरतरुणे एवं घयासी,
"गच्छह गा देवाणुप्पिया ! मेहस्स कुमारस्स पुरिससहस्सपाहणं
सीय परिवहह" ॥ ने तहेव परिजहंति ॥६॥
तप, गं रास्स मेहत कुमार है सोय दुमदस्म समारणस्स
इसे अमंगलया सप्पढमयाए पुरनो महारणपुधीर संपटिया, त
जहा, सोत्थिय-सिरिवच्छ-दावत-यसमाएग-भद्दासण-फलस-
मच्छ दप्पण॥
तपण पहषे अत्यत्थिया नहिं प्रवाहि फंताहिं गिराहिमणवरयं
अभिगना एवं ययासी “जवर नंदा, जयरभदा"
सप णं ससस मेदस्म कुमारस्त श्रम्मापियरो मेहे फुमारं पुरणी
पाटु जेणामेव समणे भगयं महाधीरे तेरणमेव उवगच्छति २ सा
नियुत्तोप्रायाहिणं पयाहिणं फरेंनियंदति नमसंतिरत्ता एवं चयासी,
'एस ण देथा भम्ह एगे पुत्ते ई फेते पिए । म जहर
॥४७॥

26 Ardha-Nagarh Neuer नामय उप्पले या पउमे या कुमुदेश्या के जाप मोसु मंदिर नो पलिप्पर पंफरपण,पयामेय मेहे कुमारे फार्मर जाए भोगसु मय- टिप नो पलिप्पा मोगरपां । एम णं देयाणुपिया ! समार-मन- विगे, भीए जम्मजरामरणाणं, मायाप्पियाण अंनिए मुंडे मविता प्रागारामो भणगारियं पञ्चासत अम्हे देवाणियाग मिस्सभिवानं यतयामा,पटिगुणं येयागप्पियामिम्मभिम" treet सप णं ममणे भगवं महावीरे मेहकुमारस मम्मापिहिं पपं धुत्ते ममाणे पयमद सम्म पडिसुगर ॥२॥ मए णे मे मेहे पुमारे ममस्म भगवमी महावीरम्य अंति- यामी उत्तरपुरस्थिमं दिमिमार्ग अयंगमे २ ता समय, श्रागर- गामालालंकार मुया ॥२०॥ तए मेहकुमाररम माया हंसलग्नगणं पडसाढएगी भाभ- रगमलालंकार पहिच्छा २सा अभूणि विणिम्मुयमागी यमार्ण पर्व ययासी, “जायच्यं जाया ! घडियव्य जाया [ अम्सिगी णों पगारव्यं । श्रम्ह पि एपमेय मग्गे भयउ",त्ति कटु मेहकुमारस्त अम्मापियरो समणं भगवं महावीर वदति नमसति २ ता जामेय दिसि पाउम्भूया तामेव दिसि पडिगया ॥५१॥ तए ण से मेहे कुमारे पंचमुट्ठियं लोय करेड.२ चा जेणमेय समणे भगवं महार्यारे तेणमेव उवागचा रा प ययासी, "भा- लिते ण भंते ! लोए जराए मरणण य ॥ से जहा नामए केइ गाहा.' या भागारंसि फियायमाणंसि जे सत्य भंडे अप्पभारे मोलगुरुप त गहाय मायाए एगत प्रयकमइ, 'एस मे गिरछारिप समाणे पच्छा पुरा य लोए हियाए सुहाएमयिस्सईएघा मेव मम विएगे पायार- भडे इहे ते पिर, एस में निच्छारिप ममाणे समारचोच्छेयकरे भविस्मात इच्छामि ण देवाणुप्पियहि सयमेव पच्याविर, सयमेय मेहे युमारे सिरसाविळ, सयमय मायारलगोयर-विणय घेणाय चरण-करण- जायामायाउत्तियं धर्म माइपिवई". ॥५२॥ तपणं समणे भायं महावीरे मेहे फुमार सयमेय पव्यायेर सय- मेव जाय धम्ममाइपखइ. "एवं देवाणुप्पिया ! गर्तव्यं, एयं चिट्टियध्वं, एवं निसीयव्यं, तयहियवं, भुजियव्यं, भासियव्यं ॥५३॥ जं दिवस च ण मेहे सुमारे प्रागाराम्रो अगागारियं पट्याइए तस्म दिवसस्स पुव्यावरगहफालसमयंसि समणाणं निग्गयाएं जहारिह सेजासंथारगेसु विभजमाणेसु मेहस्स कुमारस्स दारमूले सेजासंधारण जाए ॥४॥ नए णं समया निगंथा पुव्यर सावरतकालममयंसि घायणाए य पुच्छणार य उग्रारस्स य पासवणस्स अइगच्छमाणा य निग्ग- च्यमाणा य अप्पेगइया मेहं फुमारं हत्येसुं संघट्टति पर्व पापमुं सीसे ग पाणं कायंसि। एवं महालियं च न रयणि मेहे पु:मारे णो संचारह खणमवि मच्छिणिमीलित्तए ॥५॥ तपणं सा मेहस्स कुमारस्स अयमेयारूचे अज्झथिए समुपजित्था, "ध्य स्खलु अई सेण्यिस्म रगणो पुत्ते, धारिणीप देवीए प्रसर, मेहे कुमारे । तं जया णं अहं प्रागारमझे घसामितया णं मम ममरणा निगंथा आढायति मकारेंति 1 पमिदं च णं अहं अरणगारिय पब्वाइप ते पभिड च मम समणा निग्गंथा णो आढायंति णो सकारति अदुत्तरं च णं समरणा निग्गंथा पुव्यरत्तापरत जाय मम संघटृति णो संचारमि खणमपि अच्छि निमीलितए ते सेयं खलु मम फलं पाउप्पभाए रयणोएसमणभगवं महावीर प्रापुच्चित्त पुणरचि प्रागारमझे वसित्प," त्ति फटु एवं संपेहेइ २.चा अष्टः दुहट्ट यसष्ट-माणसगए णिरयपडिरूवियं च तं रयणि -पयेइ.२ ता 1. Supply the rest from the procecling section, . .

Atdha-Jigadhi Reatles. या पाउप्पभाए रमणीए जेरणामंत्र समणे मग मारे तेणार उवागछा जाव पग्जचामा ॥५॥ तपणं 'मेहा" ह समसे भगर्व महापारे मेहं कुमार पवंचयासी “से गाणं तुमं पुन्यावर तशालसमयसि समयहिं निग्गयहिं वायरणार य पुच्छणाय उगव भागार मन्झ बसिराए । गुणं ऐसढे मम ?" "हता । अह मम "एवं बलु महा ! तुम इनी नर्थ भये येयइलगिरिपायमुले हन्थिराया होत्या। नत्थं गं तुम प्रगण्या क्या गिम्हाकालसमयसि जेहा. मुलमासे दणदवजातापलितमु सणंतमु धमाउलासु दिसासु मड- लवाप. च्च परिम्नमते तत्थे संजायभर धारहिं हत्थीहि मंपरिघुटे दिसं.दिन्नं विपनाइत्था ॥५॥ तपणे ता मेदा ! तं वगध पासित्ता अयमेयास्ये अझ- स्थिय सगुप्पज्जित्या. "काहिं ण मरणे भए अयमयारूवे अग्गिसंभव अणुभूयपुवं"।तपणे तप मेहा ! लेसाहि विसुज्झमाणीहि मुमेरो परिणामेण तयारणिजाणं पारमाणं सोपसमेणं गाइसरण सनु पजित्था । तर णं तुम मेहा ! एयम मम्म भनिससि "एवं सतु मए प्रती भये अयमेयासवे अग्गिगम समभुर" ॥५॥ तपणे तुम मेदा ! प्रयमेयास् अज्झस्थिर सगुष्पग्जित्था, त सेय पातु मम इयाणि गंगाए मदाणईए दाहिणिलंसि विझ- गिरिपायमूले देवग्गिसंताणकारगाहा मपणं हे महामहालयं कट्ट एवं संपेहेमि २ ता पंग महं मंडलं धारसि जत्य गनणे चा पत्तं धा या घटए'चा लया या साणे या रक्वं था, तं सचे तिक्खुत्तो धारिणय २ पापणं उद्धरेसि, हन्थेणं गिराहद २ता पगते पाडमि। मंडलं घाइत्तए -- .. 1 Supply, the rest fiom $ 55 and 56.

मेह फुमारे सर णं तुम मेहा ! तस्सेघ मंडलस्स अदूरसामंते इत्थीयां आहेवयं भुंजमाणे विहरसि ॥५६॥ तए पं प्रगणया फयाई गिम्हाकालसमयसि. जेहामूले मासंसि पायव-संघस-समुहिएणं नुक-तण पत्त-मास्यसंगीयि- पणं पणद-जालासंपलितेसु वर्णतेसु अगणे यहचे सीहा य घग्या यदीया यरिन्छा य चित्तया यसियाला यससया य जेणेव से मंडले तेणेव उयागच्छति २ सा अग्गिभयाभिविठ्ठया एगो पिलधम्मेणं चिटति तुम पि मेहा ! तसि चेव मंडले तेहिं यहूहिं सीहेहिं जाय ससएहि सदि पगो चिजधम्मेण चिट्ठसि ॥६॥ लए तुमे मेहा ! पापणं गत्तं कंडुइस्सामि त्ति कटु पाए उपिखास्सिचणं अन्तरे श्रगणहिं य पलधतन्नेहि महिं पचा- इजमाणे २ ५गे मसा अपविढे । तए र तुम मेहा ! गाय फंडु- इसा पुणरधि पायं निपिसविस्सामि त्ति कटु तं ससयं च अगुप- विट्ठं पाससिर ना पाणाणुकंपाए भूयाणुकंपाए से पाए अंतरा चेय संधारिएको चेव निक्खित्ते । नए णं तुमे मेहा ! नाए पाणारणुकंपाए मणुस्साउए यछे ॥ तपण से वणवे अढाइजमाई राईदियाई तंवणं झामेड ।। तए ऐसे वगणदये णिप उधरणसमायो उवसंतेणिज्जाए याचि होत्था ॥६॥ तपणं ते यहवे मीहा जाव मसया त चरणदवं उपसंतं धि- झायं पासंति २ ता अग्गिमयविप्पमुक्का छुहाए पिवासाए परिभूया समाणा ताो मंडलानो पडिनिक्खमंति २ ता दिसोदिसं विप्प- सरित्था ॥२॥ तए ग तुम मेहा ! जुएरो जरा-जजरिय हे तसि चेव मंड- लंसि चिन्हर धरणितलंमि संणिवडिए । नपणं मेहा! तव सरी- रगसि उचलायेयणा पाउन्भूया । तप णं तुमं महा ! तं उज्जलं वेषणं तिगिण राईदियाई घेपमाणे पगं पाससयं परमाउयं पाल-

Artha Màgubi Render
इत्ता इहेय जयुहीये दीये भारहे यासे रायगिहे नयरे सेणियस्सरगणों
धारिणीय देवीए कुच्छिसि कुमारत्ताए पचाया ॥ ३ ॥
तए णं तुम मेहा! प्राणुपुब्वेणं गम्भवासाम्रो नियंते समाणे
उग्मुख्यालमाये जोवणगं अणुपत्ते मम मंतिए मुंडे भवित्ता प्रागा-
राम्रो अरणगारिय पव्याइए ॥६४॥
तं जाणं तुमे मेहा ! तिरिक्खजाणिमुचागपणं प्रप्पडिल-
सम्मत रयणणं से पाए. पाणाणुकंपाए अंतरा चेव संधारिए शो
चैव णं णितिरो किमंग पुरण तुम मेहा !इयाणि विउलफुलसमुम्भवे
लापंचिंपिए एवं उदाण-यल-चीरिय-पुरिसकार-परकम-संजुत्ते
मम अंतिए पचाए समणाएं निग्गंधाणं रात्री घायणाए य
पुच्छणाप जाय निगच्छमाणाणं पायसंवट्टणागणो सम्मं सहेसि
तितिक्खसि अहिग्रासेसि ?" ॥६॥
तरण सरस मेहस्स भणगारस्म समणस्स भगवो महा-
वीरस्स अंतिए एयमझें सोचा निलम्म सुभेहिं परिणामेहि पसन्थेहिं
भवसाहिं जाइसरणे समुप्पगणे । तर ग से मेहे अणगारे
एयम सम्म अभिसमेइ ।।
तर णं समणे भगवं महावीरे अनया कयाई यहिया जणवय-
बिहार विहरद॥
तपणं से मेहे अगागारे विविहेणं नवोफम्मेणं अपाणं भावे-
माणे विहर।।
तपणं से मेहे.अणगारे तेणं उरालेणं विपुलेण तपोकम्मेणं
मुके भुक्ले लुक्खे निम्मंसः निस्सोगिए फिसे धमणिसंतए जाए
यावि होत्था जीवं जीवेणं गच्छद जोय जीचेयं चिठ्ठइ. भासं
भासिता गिलाद भासं भासमाणे गिलाइ भासं, भासिस्सामि ति
गिजाह में जहा नामय इंगालसगढिया इवा कठसगडिया इचा
पतसगडिया इथा संसदं गच्छा ससई चिट्ठापयामेव मेहे कुमारे
समदं गच्छा ससई चिट्टा ॥६॥

+ - मेह कुमार तो फालगं लेणं समरणं ममगा भावं महापारे रायोगः नयरेसमासने तए णं तस्स मेहस्स भणगाररम राम्रो पुधर सायरस- फालसमयमि धम्मजागरियं जागरमागास प्रयमयारूपे घरमाथिए समुपजित्या "एवं खलु अहं इमेणं उरालगा तयोफम्मेणं जाप' ससंह चिहामि ॥त अस्थि जाय मे उहागणयन्मे यले पीरिए सद्धा- चिर-सवेगे जाय य में धम्मायरिए धम्मांधएसए समगो- भगवं महायोरे पिहरद ताय मे सेयं फलं पाउन्भूयाए रयणीए समणेणं भगवया महाघोरणं अभगणुगायसमाारस मयमेव पंच महव्य- याई पारोहित्ता गोयमाइप समणे निग्गथे निग्गंधीयो य खामिता तहास्येहि थेरेहि मद्धि विउलपव्ययं सरिणये २ दुरूहिता पयमेव मेहघणमपिणगास पुढधिसिलापट्ट्यं पडिलेहित्ता संलेहणाभूसणा- भूसियम्स गत्तपाणपडियाइक्खियम फालं प्रणयकंखमाणस्स- विहरिता" एवं महेइ २ सापालं पाउम्भूयाए रयणीपजेणेव समयो भगय महावीरे तेणय उवागच्छा २त्ता तिखुत्तो मायाहिणं पया- हिणं फरेड जाय पन्जुवासइ ॥१७॥ तपणा समणे भगवं महावीरे मेहं श्रागारं एवं घयासी "से गुण तय मेहा ! रामओ पुष्परतावरत्तकालसमयंसि जाव 2 कार्य भगायकसमाणस्स विहरित्तए ? से पूरणं मेहा ! अढे समठे ?" ॥ "हंता ! अत्थि" ॥६॥ तरण से मेहे प्रणगारे समणेणं भगवया महावीरेणं अम्म- राणुणाए समाणे सयमेव पंच महन्ययाई भारोहेइ जाय फालं या घफंखमाणे विहर HERE तए णं ते थेरा भगवंता मेहस्स प्रणगारस्स अगिलाण यावडियं करेंति। । तर गं से मेहे प्रणगारे दुवालम पासाह 1. Supply the rest from $ 66. 2. Supply the rest from the preceeding section, Anti-Vivaht liccler मामगणपरियागपाणिता मामिया मलहणारया मिला मठिमलाई असामणार ना छाजोदयपरिमन रियर ममाहिपत्ते प्राणपुस्यगण फासगए #aan मए गीते थेरा भगयंता मे प्रागार पालग पासविता परिशिध्यात्तिर्य यामागं फॉमिक धायरम गिगहनि २मा जेय ममगा भगर महापार मेगय उयागमंसिरपयं ययामी "प जलु देवासुयियाग अंगली गेहे नाम यमगारे पगिइनहर विणीप में मां देवाणुम्पिदि भाभगाए ममाणे जाय अणुपुलेसा कानगए। एस सी देवाणुपिया! मेहार प्रागाराम मायारमंडर" ॥5॥ मरगा मग गोयमे समणं भगय महावीर एवं पयामी, “मे . सा भंते ! हे भागारे कालमासे माख किया सहिं गए कार्ड उववर?"R "पर्व सातु गोपमा! मम अरोधासी मेहे नामं भगागार विजर महाधिमागो देवत्ताए उचयपणे । "एस गो भंते ! मह देषतामो देवोगाभो कहिं गच्छिविह फहि उपनिक्षिा ?" गोयमा ! महाधिवेहे यासे सिझिहा, युमिहिर परिसिया- हिर संघापमाण असं काहि" ॥२॥ एप सा समय भगप्रया महावीरेग अप्पोभनिमित्त पढमस पायरयास अयम पगणते ति येमि ॥ पदमं अज्झय सम्म। महुरेहिं निहिं वयहि चोययंति शायरिया । मीसे कहिंचि सलिए जह मेहमुर्णि महावीरो ॥१॥३॥ (नायाधम्ममहामुनम्म परमे सुयर्मधे पडर्म भरमयां) १ बालक मृगापुत्र १. उस काल उस समय में मृगग्राम नामा नगर था। (वर्णन ) । उस मृगग्राम नगर के बाहिर पूर्वोत्तर दिशा अंर्थात् ईशान कोणं में चन्दनपादप नाम 'उद्यान थां ॥ ('वर्णन)। यहां सुधर्म यक्ष का यक्षमन्दिर था (घर्णन , || - २. उस मृगग्राम नगर में विजय नामा क्षत्रिय राजा रहता-था। उस विजय क्षत्रिय की मृगा नामा राणी थी। उस विजय क्षत्रिय. का पुत्र मृगा राणी का श्रात्मजर मृगापुन नामा यालक था जो जन्म से ही अन्धा, जन्म से ही गूंगा, जन्म से हो पहिरा, जन्म से ही लंगड़ा, कुब्ज और यातुल था। न तो उस बालक के हाथ थे, न पैर, न कान, नाख, न नाफ; फेवल उन अङ्ग उपायों की श्राकृति ( चिह्न ) मात्र थे । ३. ध वह मृगा राणी. उस मृगापुत्र बालक की गुप्त भोरे३ में गुप्त अन्न पानी से रक्षा करती हुई रहने लगी। ४. उस मृगग्राम नगर में जन्म से अन्धा एक पुरुष रहता था। एक संचंक्षु५ पुरप से लकड़ी द्वारा श्रागे ले जाया हुश्रा यह (अन्धा) जिस के सिर के बाल विखरे हुए थे और जिस के मार्ग में पीछे (१) मृगापुत्र, मृगालोढा या मृगालोदिया के नाम से भी प्रसिद्ध है क्यों कि .. उस के शरीर का प्राकार मांस के गोल पिप जैसा था। *देखो नोद (११) मगर सादिक का वर्णन जैसा मोपपातिक सूत्र में है वैसा ही यहां दोहराना चाहिये । (२) मान्मज अपनी भास्मा अथवा शरीर से उत्पन्न हुभा पुत्र । राजाओं के अनेक राशियां होने के कारण जिस राणी के पुत्र पुत्री का वर्णन हो, उस रापी का नाम भी लिख देते हैं। (३) स० भूमिगृहक-प्रा० भूमिघरभ-भूरहरण, महरा, भोहरा, मोरा। (४) थार में प्राय वर्तमान काल की क्रिया होती है परन्तु का अनुवाद भूत काल से किया जाता है। (५) स० सच --मा० सचक्षु-पं० मुजाखा। . JN हिन्दी में उस.

। अर्धमागधी रीडर। मक्खियां, चटकर उड़े पाते थे, मृगग्राम नगर में घर घर फरणा भरे रोने से अपनी वृत्ति बनाता हुआ रहता था । ५. उस काल उस समय श्रमण भगवान महावीर पधारे। परिपत् निकली (अर्थात् लोग उपदेश सुनने गप)। तय वह जन्म से अन्धा पुरुष लोगों के उस बड़े शन्द को सुन कर सचनु पुरुष से यू बोला कि "हं देवताओं के प्यारे ! क्या आज मृगग्राम नगर में इन्द्र का महोत्सय है या स्कन्द का महोत्सव है, जो लोगों का शोर सुनता हूं?" "हे देयताओं के प्यारे ! श्रमण भगवान महावीर इस जगह पधारे हैं।" ६. तब वह जन्म से अन्धा पुरुष सघतु पुरुष से यूं बोला, "हे देवताओं के प्यारे ! चलो हम भी श्रमण भगवान महावीर के दर्शन करें"। ७. तब सचक्षु पुरुष से लकड़ी के द्वार आगे ले जाया हुमा यह अन्धा पुरुप जिधर थमण भगवान् महावीर थे उधर आया, और तीन बार आदक्षिण प्रदक्षिणा करके वन्दना नमस्कार किया और (चरणों में ) बैठ गया । तय श्रमण भगवान महावीर ने उस घड़ी सभा को धर्म का उपदेश दिया । सभा जिस ओर से आई थी उसी ओर • चली गई। ... 2 (६) घटकर एक प्रकार की मक्खी होती है। (७) माज फल भी रस प्रकार के अन्धे भिखारी बहे २ नगरों में देखे जाते हैं। (८) देवादुप्पिय = (पाशी ) देवानपिए - देवानां प्रियः कोमल निम- न्त्रण में प्रयुक्त होता था पर पीछे से इस का अर्थ उनटा होगया और जालम भर्य में प्रयुक्त होने लगा। (९) पादक्षियं प्रदहिवं भावान के दक्षिण और से प्रारम्भ कर के हम प्रकार उन के गिर्द घूमना कि अपना दक्षिण हाच सदा भगवान को भोर रहे। (१०) उपदेश का विस्तृत वर्णन भोपपातिक सूत्र में है।

पालक मृगापुत्र। ६. तप श्रमण भगवान महावीर के सप से घड़े शिष्य इन्द्रभूति (गौतम ) नामा साधु उस जन्म से अन्धे पुरुष को देख कर धमण भगवान महावीर से यूं योले, "हे भगवन् ! या कोई ऐसा मनुष्य है जो जन्म से अन्धा और अन्धरूप हो?" "कहां है हे भगयन् ! वह जन्म से अन्धा अन्धरूप पुरुप !" "हे गौतम ! इसी मृगग्राम नगर में विजय क्षत्रिय का पुत्र मृगा राणी का पात्मज मृगापुत्र नाम यालक जन्म से अन्धा इत्यादि १० तव भगवान गौतम श्रमण भगवान महावीर से यूंयोले "हे भग- धन् ! श्राप से श्राशा पा कर मैं मृगापुत्र बालक को देखना चाहता हूं।" "हे देवताओं के प्यारे ! जैसे तुम्हारी इच्छा ।" १९ तय ये भगवान् गौतम जिधर मृगा राणी का घर था उधर आए और मृगा राणी से यूं घोले “हे देवताओं की प्यारी ! मैं तेरा पुत्र देखने को यहां१२ आया हूं।" १२ तब उस मृगा राणी ने चारों पुत्रों को जो मृगापुत्र बालक के छोटे भाई थे सब अलकारों से विभूषित किया और भगवान् गौतम के चरणों में डाल दिया और ऐसे कहा, "यह लो भग- वन् ! मेरे चारों पुत्रों को देख लें।" २३ तय भगवान गौतम मृगाराणी से यूं घोले,"हे देवतों की प्यारी! मैं तेरे इन पुत्रों को देखने यहां नहीं पाया। यह जो तेरो सब से बड़ा पुन मृगापुत्र बालक है जो जन्म से अन्धा अन्धरूप है (११) जैन मनो में वर्ष म शैली नियत प्रकार की है। नगर, त्य, रामा पादिक का जो वर्णन औषपातिक सूत्र में है अतर अशा यही वर्णन दूसरी जगह जब जरूरत हो रख दिया जाता है। परन्तु लिखने के कष्ट से बचने के लिये उस दन का केवल आदि और अन्तिम शब्द लिख कर बाको घन के स्थान में जाप जहां तक लिख देते है। (१२) हष्य राष्द का अर्थ टीकाकार “शोन" करते हैं परन्तु ऐसा प्रती हस-कि इस का अर्थ म्यान वाची "यहाँ" है। + अर्धमागधीरीडर। और जिस को गुम भोरे में गुम अन्न पानी से पालनी है तिस को देखने में यहां आया है। १४ तय यह मृगा राणी भगवान् गौतम में यूं योली "ह भगवन् ! ऐसा कौन हानी या तपस्यी है जिस मे श्रध्दी सरह गुप्त रपती हुई यह पात पाप को झट कर दी?" तय भगवान् गौतम मृगा गणो से यू योले " हे देवता की प्यारी ! मेरे धर्मा. चार्य और धर्मापदेशफ श्रमण भगवान् महावीर सर्वत्र सयं. पी है। उन से मैंने इस यात को जाना है। १५ जितने में मृगा राणी भगवान् गौतम के साथ यह पार्तालाप फरती रही उतने में मृगापुत्र पालक के बन्न पानी का समय भी हो गया॥ १६ तय यह मृगा राणी भगयान गौतम से यूं योली, "हे भगयन् ! आप यहां ही टहरे जय तक कि मैं आप को मृगापुर यालक दिखलाती हूं।" यह कह कर जिधर रसोई (अन्न पानी का घर ) ची उधर आई, कपड़े पदले, और एक लकड़ी की गाड़ी लेकर उसे ग्यूप अन्न, पान, सादिमा और स्वादिमा वस्तुओं से भरा, भरकर जिधर भगवान् गौतम थे भाई और यूं चोली, "आइये भगवन् ! आप मेरे पीछे चलिये, ताकि मैं आप को मृगापुन यालक दिखाहूँ"। १७ तय यह मृगा राणी जिधर भोरा था उघर आई और चौहरे कपड़े से मुंह यांघती हुई भगयान् गौतम से योती "याप भी . भगवन् ! मुखयस्त्रिका४ से मुंह यांध ले . तय मृगा राणी के यूं फहने पर भगवान् गौतम ने मुखयस्त्रिका से मुंह बांध लिया। १८ तप उस मृगाराणी ने मुंद (परली तरफ) मोड़ कर भोरे का दर- (१३) अन्न भोजन, रोटी ; पान = ध, शर्वत, चाय, सम्सी आदि। खादिम मिठाई, मेवा, म्यादिमांग, सुपारी, पान, तम्बाकू। (१४) मुंह के प्रागे रखने का या बांधने का कपड़ा, रुमाल ॥ यह वह पाठ है जिसे पुजेरे ( देहरा बासी। मुंह पर पट्टी न बांधने की सिद्धि में इंडियों (स्थानकवामियों को दिखाते हैं।

बालक मृगापुत्र। वाज़ा खोला; उस में से ऐसी गन्ध निकली जैसी किसी मरे हुए सांप की हो बल्कि उस से भी धुरी। तब मृगापुत्र यालक उस बहुत अन्न पानी की गन्ध से अभिभूत हुश्रा हुआ उस अन्न पान में मूर्छित और गृधित होगया। • तय उस अन्न पान का स्वाद बदल गया और शीघ्र ही विध्वंस हो गया। उस के पीछे यह पूत (राध) और रुधिर में बदल गया। यह (मृगापुत्र ) उस पूत और मधिर को भी खा गया। १ तप मृगापुत्र बालक को देख कर भगवान् गौतम को इस प्रकार का विचार उप्तन्न हुश्रा, अहो ! यह चालक पूर्वजन्म में किये हुए युरे कर्मों के पापरूपी फल को भोग रहा है, यद्यपि मैं ने नरक या नारकी नहीं देखे परं प्रत्यक्ष यह मनुष्य नरफ के समान दुःख भोग रहा है"। यह कह कर मृगा रानी से विदा हो कर, मृगा रानी के घर से निकल जिस तरफ़ भगवान महावीर थे उस तरफ आए और यूं बोले, "हे भगवन् ! आप से श्राशा प्राप्त करके मैं जिधर मृगा रानी का घर था उधर पाया यावत् (मृगापुत्र रुधिर राध ) खागया। हे भगवन् ! वह मनुष्य पूर्व भव में कौन था? किस नाम वाला था ? किस गोत्र घाला था? उस क्या किया था जो उसका यह हाल है?" २२ है गौतम ! इसी जंबुद्वीप के भारतवर्ष में शतद्वार नामा एक नगर था ( वर्णन )। उस शतद्वार नगर में धनपति नाम राजा था (वर्णन)। उस शतद्वार नगर के पूर्व दक्षिण की दिशा के हिस्से में विजयवर्धमान नामा एक खेड़ा था। उस विजयवर्धमान खेड़े का श्राभांग पांच सौ ग्रामों का था। २३ विजयवर्धमान खेड़े में एकाई नाम राष्ट्रकूट१६ था जो अधर्मी शोर खोटे कामों में आनन्द मानता था । यह एकाई राष्ट्रकूट विज. यवर्धमान खेड़े के पांच सौ ग्रामों को यहुत से फरों द्वारा, भरी (१५) बाको पाठ सूत्र ११-२०तक में से पड़ो। {१६) राष्ट्र राज्य, कूट- धोदी राम की ब्रोटी-पफसर, हाकिम । (१३) महम्म। !

समागधीरोटर मास. नदियों जरा वीर सामरिया दाग तंग करता एमा, निर्धन करता हुमा पिहरसा या २४ तर यह एई राद पितपयमान कपाल से मरदार, राम और सपा और और पहन राय पुरण के कार्यों में और कामों में सुगा मा करना m"मैं मदी सुनता और न सुनता मा सहता था मैं गुनगा"। इसी प्रकार देशता दुरया, पालना मा रोगासा, जागता था, उलटा दो कहना था । म तरह उस एमां गटाने बहुत से पाप कर्म का पन्य किया। २. जर एक एफर उस एका राय कर के शरीर में यक धारणी ही मौलह रोगव्याधियां प्राटदरे असे-पास रोग, पासी, पर, दास, पेट का द, मगर, पामीर, यदलमी, रटिग्रस, मस्तपः शुल, आकारित, योग का दर्द, कान का पर्व समसी, अलोदर धीर फोहर २६ सप यह एका रा र सोलह रोग प्याधियों में अभिभूत टुया फुटुम्प के आदमियो२० को खुला फर ऐसे कहता भया, "हे देवनाओं के प्यारी : तुम ज्ञानी, पिमययर्धमान पे में जो चाररत चीफ प्रादि यहां पर अंचे शव उद्घोषण करते हुए कहो कि है देयताओं के प्यार । एकाई राष्ट्र फूट के शरीर में सोलह रोग भात पंदा हो गये है यथा- श्यासयायत् कोद। इस लिये यदि कोई येय या वैध पुनर, छानकर या शानकपुष एकाई राट फूट के इन सोलह रोग पातलो में में एक रोग प्रात को भी अच्छा करना चाहता है तो एकाई राष्ट्र फूट उस को यहुन सा धन माल देगा। इसी प्रकार दूसरी. (१८) पादी, रिगवत (१८) भोजन में शामि। (३०) नौका पाकर। (२१) मघाटा हरता, त्रिम जहां तोन रस्ते मिलते हैं, 'मक मोक, पुराहा, महापपड़ी सहा (11) जानकार, मियाना। ma- पस्वर चालक मृगापुत्रं। चार भा तीसरी बार भी उद्घोषण फरो"। उन फुटुम्य के आदमियों ने पैसे ही किया। २७ तब विजय वर्धमान खेड़े में इस प्रकार की उद्घोषणा फो. सुन कर के बहुत से चैद्य शस्त्रकोश२६ हाथों में ले फर अपने २ घर से निकले, जिधर एकाई राष्ट्र कूट था उधर श्राए, श्राकर एकाई के शरीर की परीक्षा की, फिर उन रोगों के कारण पूछे और एकाई राष्ट्र कूट के उन सोलह रोग श्रातहों में से एक को भी बहुत सी मालिशों से, तेलों के पिलाने से, धमन कराने वाली औषधियों से, जुलाबों से, सीचने से२५, अपस्नानों से२६, अनुपानों से२७, वस्ति कर्म से२८, निरूह से२६, नस काटने से, तच्छने से, पच्छने से, छिलके जड़े फन्दमूल पत्त फूल बीज खिलाने से, शिलिका३० गुडिका३१ श्रीपध भपज वगैरह से दूर करना चाहते थे। परन्तु दूर न कर सके। २८ तय यह सारे वैद्य जय उन सोलह रोग पातकों में से एक को भी दूर न कर सके, थके हारे, जिधर से आए थे उधर ही चले गये ।। २६ तय यह एकाई राष्ट्र कूट उन सोलह रोग प्रातकों से पीड़ित राज्य में राष्ट्र में मूञ्छित हो गया। राज्य की प्रार्थना अभिलापा फरता हुआ दुःख से बात ध्यान के घश हुश्रा हुश्रा अढाई सौ (२५०) वर्ष की पूर्ण आयु भोग कर फालमास३२ में फाल कर के इसी रत्न प्रमा पृथ्वी के उत्कृष्ट एक सागरोपम स्थिति वाले नार. कियों में नारकी पने पैदा हुश्रा॥ ३० यह इस के पश्चात् वहां से वापिस श्राफर यही मृग ग्राम नगर (२४) Surgical box, औजारों सया दवाइयों का डम्या । (३५) छीटे देने से। (२६) भाप भाटि में स्नान कराना। करने वाली दवा Tonic (२८) पानी घड़ा कर सम्मादियां साफ करना। (३९) गुदा में तेल धढ़ा कर शोध वापना Euema. (३०) सित्ताइयां (३) गोलियां (३२) मृत्यु का समय, (२७) कमजोरी ५० अर्धमागधीराहर। में मृगा रानी को कुक्षि में पुत्र पने उत्पन्न दुप्रा । सय उस मृगा रानी के शरीर में पड़ी सहत यावत् तेज चंदना मरुट हुई। अव से मृगापुत्र यालक मृगा रानी की कुक्षि में गर्भपने पाया तब से लेकर मृगारानी विजय क्षत्रिय को अनिष्ट, प्रशान्त, श्रप्रिय लगने लगी। ३१ तय उस मृगा रानी को रात के पहिले भाग में फिसी समय कुटुम्य जागरण४ करती हुई को यह ध्यान पाया, "मैं पहिले विजय क्षत्रिय को प्यारी, विश्वास्य और अनुमत थी । जय से लेकर यह गर्म मेरी फुक्षि में गर्भपने आया है तब से लेकर में विजय क्षत्रिय को अनिष्ट श्रीर मकान्त हो गई। नही चाहता है विजय क्षत्रिय मेरा नाम या गोधनाम३५ लेना भी फिर दर्शन या परिभोग फरने का तो कहना हो पा है। इस लिये यह मेरे लिये अच्छा होगा कि मैं इस गर्भ को अनेक गर्भसानों से,गर्म पातनौ से,गर्भगालनों से और गर्भमारणों से नाश फरदूं। यह निश्चय कर के बहुत से सारे, फहवे, तीदण गर्भसाइनो को खाती हुई पीती हुई उस गर्भ को साड़ना चाहती है। लेकिन यह गर्भन ही सड़ता है न ही गिरता है। तो यह मृगा रानी जय उस गर्भ को साइने या गिराने को समर्थ न हुई, थकी हारी येवस उस गर्भ को बड़े दुःस के साथ परिवहन करने लगी। ३२ तब नौ महीनों के पूरा होने पर मृगा गनी के एक बालक पैदा हुधा जो कि जन्मही से अन्धा यावत् प्राकृति मान था । तब यह मृगा रानी उस अन्धरूप यालक को देख कर डर गई और अपनी अम्बधानी को घुला फर कहने लगी कि हे देवताओं (१३) जैन मूत्रों में एक ही अचं पाले बहुत से शम्दरममा आते (३४) मुदम्ब सम्बन्धि एपालों में जागती हुई। (११) पहिले हिन्दोस्तान में भी गोत्र नाम प्रधान हुआ करता था। जैसे गौतम, पतञ्जलि वगैरह । यह नाम उस कुल में पैदा हुई सत्र व्यक्तियों का समान नाम हुधा करता था, विशेष नाम भिक्षर होते ये जैसे मान कान पितायत में है। (१६) जिप्त ने मृगा रानी को पाला या ।।

. पालक मृगापुन की प्यारी ! इस बालक को एकान्त में किसी रूड़ी (कूड़े के ढेर, पर फेंक श्रायो। ३३ सय उस अम्बधात्रों ने "अच्छा फह कर मृगा रानी के वचन को खीकार किया और जिधर विजय क्षत्रिय था उधर आई और चोली, 'हे सामिन् ! मृगा दंघी के नौ महीने पूरे होने पर यावत् प्राकृति मात्र था यावत् डर गई ३७। मुझे बुला कर फहा जानो, इसको फेंक पाओ । इस घास्ते हे स्वामिन् ! श्रापं आ दें कि इसको एकान्त में रूडी पर फेक भाऊं या न ॥ ३४ तब यह विजय क्षत्रिय श्रमबधापी के पास से इस बात को सुग कर उसी प्रकार डरा हुआ मृगा रानी की भोर भाकर बोला, "हे देवताओं की प्यारी ! यह तुम्हारा पहिला गर्भ है। शगर तुम इसको एकान्त में रूडी पर फेंक दोगी तो तुम्हारी सन्ताग स्थिर न होगी। इसलिये तुम इस बालक को गुप्त भोरे में अन्न पानी से पालो इस तरह तुम्हारी सन्तान स्थिर रहेगी। ३५ तय मृगा रानी ने "अच्छा" कह कर विजय क्षत्रिय के उस बचन को स्वीकार किया और उस यालक को गुप्त भोरे में गुप्त अन्न पानी से पालने लगी। इस प्रकार हे गौतम : मृगापुत्र पालक अपने पुराने अशुभ को के पाप फल को भोग रहा है। ३६ “हे भगवन् ! मृगापुत्र बालक कालमास में काल करके कहां जाएगा? कहां पैदा होगा?" "हे गौतम ! भृगापुत्र बालक वाईस सालकी पूर्ण आयु भोग फर काल मास में काल करके इसी जाद्वीप के भारतवर्ष में घेता- ढयगिरि पर्वत के मूल में सिंह कुल में सिंहपने उत्पन्न होगा। यह यहां पर सिंह होगा, अधर्मी यावत् साहसिक, बहुत पाप फमावेगा। तब कारा मास में काल करके इसी रत्नप्रभा पृथ्य में ३७) देखो पिला भूत्र।

प्रमागधीरोदर एक सागरोपम स्थिति पाले गारकियों में पैदा होगा। इस पथात् यहां से पापिस श्राफर यहाजलघर पंचेन्द्रिय तिय योनियों के मच्छ, कच्छप, प्रह, मकर मार आदि की सादे पार लार जाति फुल, कोटि योनि प्रमुख हैं उन में से एक एक योकि में अनेक लाग यार फिर फिर जन्म संगा।फिर यहां से पापिस श्राफर इसी तरह पं.पायों में, मुहमा ( सपदि ) में, मेयर ( पक्षी आदि , में, चतुरिन्द्रियों में, पिइन्द्रियों में दिइन्द्रियों में पनस्पति के कसये वृक्षों में, फहये दूध पाले वृक्षों में घायु, रोजा अप, पृथ्वी काय के जीयों में अनेश लाल यार पैदा होगा। ३७ पद से पापिस पाकर सुप्रतिधपुर में बैल पने उर पर होगा। य. यहां पाल्यायस्या को उस फर एक दफा पर्श ऋतु माराम गहा मदा नदी के किनारे की मिट्टी को पौदता हुना किनार गिर जाने पर काल मास मैं काग फरफ उसी सुप्रतिष्ठपुर नमः में प्रेष्ठि कुल में पुन पने उत्पन्न होगा। यहां पर यह घाल्यावस्थ को उलाश कर चोपन अवस्था को प्रात हो कर तथास्य विर के पास धर्म सुन कर मुण्डिन दो कर गृहम्पी३८ से साधु या कर श्रमण पर्याय ( माधुपर्न) को पाल कर, आलोचना श्री प्रतिक्रमण करके, समाधियुक्त, फाल मास में काल करके सी धर्म कल्प में देवता पने उत्पन्न होगा। यहां से श्ययन करके मह विदेह क्षत्र में सिद्ध होगा। ३८ इस प्रकार हे जम्बू ! श्रमण भगवान् महावीर यायत् समाप्त प्रथम अध्ययन का यह अर्थ कहा है। यह में फहता है। (विपाक सूत्र के प्रथम श्रुतस्कन्ध का प्रथम अध्ययन (३८) अर्थात् समुद्र की उपमा पासा काल का परिमाण । १०००००००००००००० पल्यापम । एक योजन लम्बा चौडा गहिरा कूमौ बारीक पाल के टुकड़ों दया कर भरा जाग. फिर एक टुकड़ा मौ रस पीछे निकाला जाए। जितन देर में वह कूर्ण स्वाती हो, उतना ही काल एक पल्यापम होता है। () अमारघा, आगार =घर सम्बन्धि, गृहस्थी; अनगार - जिसका घर हो, साधु। (५०) देवताओं के मरने को यवना भूना कहते है।

अपम भगवान का निर्धारण ४३ २. ऋपात भगवान का निर्वाण १. यह जो हेमन्त ऋतु का तीसरा मास, पांचयां पक्ष माघ वदि है उस माधवदि की तेरहवीं तिथि को दस हजार साधुओं से परि- वृत अष्टापद पर्वत के शिखर पर निर्जल चौदहा उपवास के साथ,पर्य श्रासन में बैठे हुए दिन के पूर्व भाग में अभिजित् नक्षत्र का योग आने पर, सुषम दुपम श्रार के नवासी (६) पक्षों के शेष रहते हुए बहन भगवान ऋषभ देव ने काल किया यावत् सर्व दुःसों से रहित हो गए। २. जिस समय कोसल निवासी अरहन्त ऋपभ भगवान ने काल किया, और जन्म जरा मरण रूपी घन्धनों से छूट गए तथा सिद्ध, युद्ध और सब दुःखों से रहित हुए उस समय देवेन्द्र देव- राज शक.फा आसन हिला॥ ३. तय देवेन्द्र देवराज शक ने अपने शासन को हिला दम्य अवधि शान का प्रयोग किया और तीर्थकर भगवन्त तक अवधि धान पहुंचा कर२ कहा "श्री हो ! जम्बुद्वीप के भारत घर्ष में कोसल निवासी अरहन्त ऋषभ भगवान का निर्वाण हुया है। चूकि अतीत, वर्तमान और अनागत देवेन्द्र देवराज शकों का यह परम्परा धर्म है कि तीर्थकरों की निर्वाण महिमा करें, इस घास्ते में भी जाऊं और भगवान तीर्थंकर की निर्वाण महिमा फर्क; यह कह कर चौरासी हजार सामानिक देवतानों से, तेतीस तायत्तीसकर देवताओं से, चार लोक पालो से यावत् चारों और के चौरासी हजार प्रात्मरक्षक देवताओं से, और बहुत से सौधर्म कल्प वासी, चैमानिक देवता देवियों से घिरा हुआ उस उत्कृष्ट देव गति से यावत् असंख्य द्वीप समुन्द्रों के बीचों बीच जिधर भ्रष्टापद पर्वत (१) जैन शास्त्र में एक बरस की तीन मौसिमें भी कही है जैसे बरसात { मायन, भादों, असोज, कानक) हेमन्त ( मरदी)ोर ग्रोम (गरमी)। (२) अर्थात् अवधि ज्ञान से भगवान को देखा। (३) यह देवता पूर्व जन्म में ३३ प्रारक ये जो एक जैसी धर्म क्रिया करके देवता पने इन का घर्शन भगवती सूत्र में है।

। अर्धमागधारीहर। पर भगवान् तीर्थकर का शरीर था उधर आया और उदास, निरानन्द और अश्रुपूर्ण नेत्रों वाला तीर्थंकर के शरीर को तीन शार पादक्षिण प्रदक्षिणा करके न यहुत निकट न बहुत दूर सेवा करता हुया बैठ गया। ४ तय ईशान नामा देवेन्द्र देवराज उत्तरार्ध लोक का स्वामी महा- ईस लाग्य विमानों का मालिक, हाथ में शल धारण किये थैल पर चढ़ा दुथा सुरेन्द्र, साफ सुथर वात्र पहिरे हुए शक की तरह अपने परिवार के साथ आया यायत् यैठ गया !' ५ तब शक नामा देवेन्द्र देवराजा उग बहुत से भवनपति, व्यन्तर, ज्योतिषी, वैमानिक देवों को इस प्रकार योला, "ह देवताओं के प्यारो ! शीन ही नन्दन वन से सरस गोसीस और चन्दन की लकड़ी ले पानी और तीन चिखाएं- पनामो- एक भगवान तीर्थंकर के लिये, एक गणधरों के लिये, और एक बाकी साधुओं के लिये । उसके पश्चात् है देवताओं के प्यारो ! मृग, पैल, घोड़े यावत् जंगली बेली पत्तों से चिनित तीन पालकियां बनानी ॥ ६ तप शक्र नामा देवेन्द्र देवराज ने जरा मरण से रहित हुप सीध- कर भगवान् के शरीर को पालकी में डाल कर चिखा पर रख , दिया । सब उन यहुत से देवताओं ने गणधर और साधुओं के शरीर को पालकी में डाल कर चिखा पर रख दिया। ७ सय उस शुक्र नामा देवेन्द्र देवराज में अग्नि कुमार देवताओं को धुला कर कहा "हे देवताओं के प्यारो शीघ्र ही तीर्थकर की चिरा में और गयाधर और साधुओं की चिषा में अग्निकाय विधि (उत्पन्न करी) तव उन अग्नि कुमार देवतानी ने अग्नि फाय विकुर्ची - तब धायु कुमार देवताओं ने वायु विकुतों, अग्निकाय की उद्दीपन किया, तीर्थंकर के शरीर को, गणधर और साधुओं के शरीरों को जला दिया। 18) एक प्रकार की चन्दन की लकड़ी। (५) देव शक्ति (जाद) मे धम् मनाने को "विकुर्वना' कहते हैं। ।

४१
ऋषभ भगयान का निर्याण।
। तब उन देवताओं ने सब चिसानों में अगम, नुरुक, घी और
राहद डाला॥
तर मेघ कुमार देवों ने उन चिलाओं का क्षीर समुद्र के
पानी से युझा दिया।
१० तब उस शक नामा देवेन्द्र देघराज ने तीर्थकर भगवान् की
ऊपर की दाहिनी डाढा ले ली। ईशान नामा देवेन्द्र देवराज ने
ऊपर की चामी डाढा ली। चमर नामा सुरेन्द्र असुरराजा ने
नावे की दाहिनी डाढा ली। यली नामा चैरोचनेन्द्र वैरोचन
राजा ने नीचे की वामी डाढा ली । घाकी के भवन पति यावत्
वैमानिक देवताओं ने यथा योग्य बाकी के शरीर के अङ्ग लिये,
किसी ने जिन भगवान की भक्ति करके, किसी ने परम्परा का
श्राचार समझ कर और किसी ने धर्म समझ कर ।।
११ तय उस शक नामा देवेन्द्र देवराज ने उन देवों को कहा "शीघ्र
ही हे देवताओं के प्यारो : सर्व रस्न मय चैत्य स्तूप बनायो-
एक तीर्थकर भगवान् की चिखा पर, एक गणधरी की चिया
पर और एक पाकी साधुओं की चिखा पर । उन देवों ने वैसे ही
किया।
१२ तब उन सय देयों ने श्राट दिन का महोत्सव करके जिधर अपने
विमान, भवन, सभा और मानधक चैत्यस्तम्भ थे उधर आकर
यजमयी गोल डब्बों में जिन भगवान् की डादाओं को डाल दिया
और यदिया सुन्दर माला और धूप से उन की पूजा की।
जम्बुद्धीप प्राप्ति)
.
(६) स्तूप एक प्रकार की मढी होती थी जो पौधों और जैनियों में बहुत प्रमे
जाते थे। जैन स्तूप मथुरा में मिला है, यौद्ध स्तूप तो हिन्दोस्तान भर में
मिलते हैं।
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अधमागधी रोडर। ३ मेघकुमार १ उस काल उस समय में चंपा नामा नगरी थी। (वर्णन) । उस चंपा नगरी के वाहिर पूर्वोत्तर दिशि अर्थात् ईशान कोण में पूर्ण- भद्र या पुण्यभद्र । नामा चैत्य था ( यणेन ) । यहां चंपा नगरी में फोनिका नामा राजा था (वर्णन )। २ उस काल उस समय में भ्रमण भगवान महावीर के शिष्य आर्य सुधर्मा नाम स्थविर जाति से संपन्न, पल, रूप, विनय, शान, दर्शन, चारित्र नथा लाघय सं संपन्न, श्रोजस्वी, तेजस्वी, पर्चस्ची, यशस्वी, क्रोध को जीते हुए, मान को जीते हुए, माया को जीते हुए, लोम को जीते हुए, इन्द्रियों की जीते हुए, निद्रा को जीते हुए, परीपहों को जीते हुए, जीने की श्राशा और मरने के भय से रहित, तप में प्रधान, गुण में प्रधान इसी प्रकार करण, चरण, निग्रह, निश्चय, श्रार्जय, मार्दय, लाघव, क्षमा,गुप्ति, मुक्ति, विद्या, मन्न, ब्रह्मचर्य, वेद, नय, नियम, सत्य, शौच. शान, दर्शन तथा चारित्र में प्रधान, उदार, घोर, घोरबती, घोर ब्रह्मचर्य वासी, शरीर में निर्मोही, सारी तेजु लेश्यार को शरीर में संकोचे हुए, चौदह पर्व धारी, चार शान के धरता, पांच सौ साधुश्री से परिवृत, श्रागे ही भागे चलते हुए, ग्राम से ग्राम को जाते हुए मुख पूर्वक विहार करते हुए जिधर चंपा नगरी थी, जिधर पूर्णभद्र चैत्य था, उधर आए । श्राकर यथायोग्य स्थान प्राप्त करके संयम और तप में श्रात्मा को पवित्र करते हुए रहने लगे। ३ (तय चंपा नगरी से परिषदा निकली। कोनिक निकला। धर्म कहा गया। परिषदा जिस दिशा से श्राई थी, उसी दिशा को चली गई।) (१) कोनिक पा कूनिक जिमका दूसरा ना अजातशत्रु पा. जैन, बौद्ध साहित्य में बहुत पति है। पुराणों में भी इस का नाम शाता है। (२) एक प्रकार की प्रति जिसे शरीर से निकाल कर उसके साथ दूसरे को भन्म कर सई। यह तपस्या करने से प्राप्त होती है।

.. मेघकुमार । उस काल उस समय में प्रायं सुधर्मा नाम साधु के घड़े शिष्य आयं जम्बू नाग साधु काश्यप गोत्रीय, सात हाथ ऊंचे, आर्य सुधर्मा स्थविर के न ही दूर न ही निकट, जानू ऊंचे और सिर नीचे किये हुप, ध्यान रूपी कोठे में गए हुए संयम और तप से मात्मा को शुद्ध कर रहे थे। ४ तब यह जम्बू साधु श्रद्धा घाले, संशय चाले, कुतूहल वाले उठे जिधर आर्य सुधर्मा स्थविर थे उधर पाए और आर्य सुधर्मा स्थविर को तीन चार भादक्षिण प्रदक्षिणा कर यन्दना नमस्कार कर फे, प्रार्य गुधर्मा स्थविर के न यहुत निफट और न यहुत दूर सेवा करते हुए, नमस्कार करते हुए, सन्मुख हो कर, हाथ जोड़ फर, यिनय के साथ सेवा करते हुए बोले कि 'हे महाराज : यदि श्रमण भगवान महावीर ने जो कि आदि के करने वाले हैं, तीर्थ के करने वाले है, स्वय संबुद्ध हैं, त्रिलोकी के माथ हैं, त्रिलोकी के प्रदीर है, त्रिलोकी के उद्योत करने वाले हैं, अभय दान देने वाले हैं, शरण देने वाले है, चक्षु देने वाले हैं, मार्ग देने घाले हैं, धर्म देने वाले हैं, धर्म के उपदेशक हैं, उत्तम धर्म रूपी पृथ्वी के चक्रवर्ती है, उत्तम, अप्रतिहत्त ज्ञान दर्शन के धारी हैं, (फम रूपी चैरियों को ) जीतने वाले हैं, ( दूसरों का ) जिताने घाले हैं, (श्राप ) युद्ध हैं, (औरों को ) योध कराने वाले हैं, (आप) मुक्त है, औरों को ) मुक्त कराने वाले हैं, ( स्वयं ) तरे हुए हैं, । औरों को ) तारने वाले हैं, जिन्हों ने सुखदाई, अचल, दुःस्वरहित, अनन्त, अक्षय, बाधा पीडा रहित, अपुनरावर्तक शाश्वत स्थान को प्राप्त किया है, अगर उन्हों ने पांचचे अङ्ग ( भगवती) का यह अर्थ निरूपण किया है तो महाराज ! छटे अङ्ग शाताधर्मकथा का क्या अर्थ कहा है। हे जम्यू ! श्रमण भगवान महावीर ने छठे श्रङ्ग के दो श्रुतस्कन्ध कहे हैं, सात और धर्मकथा। 14 (३) मास = दृष्टान्त, किमी धर्म सम्बन्धि गुण या अवगुण को स्पष्ट रूप में वन करने के लिये दृशान्त, कथा या उपमा।

1. अर्धमागधी गहर। "महाराज ! अगर भ्रमण भषयान् महावीर ने छठे भर के दो ध्रुत • स्कन्ध कई ई.मा महाराज : पहिले श्रुतस्कन्ध के कितने अध्ययन . है जम्यू : भ्रमण भगवान महावीर ने पातों के उनीस समापन कद है जमे १ उरिक्षाप्त शास. २ संघाड़ा, प्रारकर्मपशेलक. ६ सम्मा रोहिणी, मही, ६ मापन्दी, १० चन्द्रमा, ११ दाय इय · पृक्ष । १२ उदक पानी, सात, १३ मॅरया, १४ तेतली, १५ नन्दि फस, १६ अमर कंका, ३७ प्राकीया जाति या घोटा मुममा दारिफा और १६ पुण्डरीक बात यह उन्नीस शात है। ६ हे महाराज ! चगर थमा भगवान् महावीर ने पानी के उन्नास अध्ययन कर है, तो महाराज! पहिले अध्ययन का अर्थ है जम्यू ! उस काल उस समय में इसी जरयुद्वीप के भारत वर्ष के दक्षिण भारत में राजगृह नाम नगर था ( धगंग)। गुग्ण शिलफ नाम चैत्य धापर्णन }। पहाराजगृह नगर में अंपिक नामा राजा था। वर्णन)। उस श्रेणिक राजा की नन्दा नाम रानी थी (वर्णन । उस श्रेणिक राजा का पुत्र नन्दा रानी का प्रारमज अभय नाम कुमार था ( सय गुणों में पूर्ण गायत् रूप. चान् । धेणिक राजा को सय कार्यों में उस पर विश्वास था। यह उसके राज्य की, राष्ट्र की, कोश की, महल की, सेना की, चाहनों की, नगर की, अन्तःपुर की स्वयमेव वयरदारी करता दुप्रा रहता था। घय उस श्रेषिक राजा की धारिणी नामा रानी थी। एक घार रात्रि के पहिले भाग में धारिणी रानी जब कि यह अपनी सेज पर कुछ साई कुछ जागती हुई ऊंघ रही थी एक बड़े सात हाथ ऊंचे, चांदी के पर्वत की भांति श्येत, पायाश में सुन्दरसा के साथ सेलते हुए दौड़ते हुए दाधी को अपने मुंह में जाते हुए (४) उठाया हुा । मेघ कुमार ने हाथी के भय में पैर उठाए जा पा रम से रमजान दृष्टान्त का नाम अतिसाहुसा, देखो मूत्र ६॥

. मेयकुमार। को देखकर जाग पड़ी । इष्ट तुष्ट होकर उस स्थान को दिल में धारण फरफे अपनी खेज पर से उठी और राजहंस जैसीधीर और शान्त गति के साथ जिधर श्रेणिक राजा था उधर आई श्राकर श्रेणिक राजा को इए, कान्त श्रोर प्रिय पचनों से जगाया। श्रेणिक राजा से आशा प्राप्त करके नाना मणि रत्नों से चित्रित भद्रासन पर बैठ गई और आश्वस्त विश्वस्त होकर मस्तक पर अलि करके इस प्रकार बोली,"हे देवताओं के प्यारे ! श्राज उस ऐसी सेज पर पुछ साती कुछ जागती हुई स्थम में अपने मुंह में हाथी को जाते हुए देख कर मैं जाग पड़ी। अव हे देवताओं के प्यारे ! इस स्थान का पया विशेष फल होगा? तय यह श्रेणिक राजा उस धारिणी रानी के पास से यह पात सुन कर हए तुष्ट हुया उस स्थान को दिल में धारण करके उस पर विचार में मन हुआ और अपने स्वाभाविकमति पूर्वक विज्ञान से उस स्वप्न के अर्थ का निश्चय किया और धारिणी रानी को यधाई देता हुन्ना इस प्रकार पोला, "हे देवताओं की प्यारी ! तुमने बड़ा उदार स्वप्न देखा है, बड़ा मङ्गलकारी स्वप्न देखा है। है देवतानी की प्यारी ! तुम्हें धन का लाभ होगा, तुम्हें पुत्र का लाभ होगा, सुख का लाभ होगा। नौ महीनों के पूरे होने पर साढ़े सात दिन रात बीतने पर हमारे कुल के झगडे रूप, हमारे कुल के भूषण रूप पालक को जनेगी और यह बालक बाल्यावस्था को उत्सव फर शर पीर राजो होगा। इस लिये आरोग्य, तुधि,दीर्घायु कल्याणकारक तुम ने हे देवी! स्वप्न देखा है। इस तरह यार २ उस को बधाई देता रहा। है तब वह धारिणी रानी श्रेणिक राजा से इस प्रकार उत्तर दी हुई दृष्ठ तुष्ट अपनी सेज पर बैठ गई और यू चोली कि, "मत यह मेरा उत्तम, प्रधान और मंगतीक स्वप्न दूसरे खोटे स्यशों से काटा जाप," यह विचार कर के देव गुरु सम्बन्धी गुम और धार्मिक कथाओं से स्वमजागरण जागती रही। ५ गर्भवती त्री को स्वत माना और दोहल (या विशेष ) का होना उसको प्रया बहुत पुरानी है। ७ HTTी राहा ML TRनिक गाने पिपिए गानों में गम ए पर पर सामान यानों को मुलाया और मारिली रानी देर मार पदर या भारत उपाए करने पर पाली, तमिर हमारे शास्त्रातील साभार न महास्यास मदत हप है মান! গুলো কী মাসা, ঘাসেবা ক্ষা গ্যালয় या पानी गाने पर इन लोग हमसे पद शोर महापयन देकर जाग पडती मोहा, बेस, मिद, अभिरे मामा, म्य, , Trम, कमालों का तालाय. नागर,पिमाग, गपन, नोकरीर (afrr की! থা। তিনি ' মালিঙ্কা * মাং মাস্ক ঃ में लाने पर हम बीदद महास्था में में महारयम को देश कर जाग पडती हैं।सलिये शामिन् ! भारिली रानी में पड़ा उदार गाया है। गिधय से यागिन् ! मी महीनों में पं दोगे पर धारिगी रानी एक बालक पंदा दोगा धार पर यासक मी या तो राज्य का पति रामा होगा या पवित्र धारमा पाला माणु।" १२ सय उस धारिती रानी को दो मशीनों के गुजर शुकने पर और तीसरा महीना लगने पर उम गर्भक दोहक समय में इस प्रकार का अकाल मेरों में दोहला उपस गुमा, धन्य है पद माताएं, पवित्र है यह माना जो मेघों के उदप होने पर हरित रन पर चढ़ी हुई सय तरफ घूमती दुई अपने दोहसे को पूर्ण करती है। इसलिये में भी मेघोंके उदय होने पर यात दोहले को पूर्ण कर। २३ राम यह धारिणी रानी उस दोहल के मार्ग रहने पर समाप्त दोदला असंपूर्ण दोहला गुन्नीगुर,भूपी गुरे, परासी तुपली हो गई। २४ तय उसधारिणी रानी के परिचारक और माध्यन्तरिक सदा- घटफ जिधर कि राजा पा र आए, या कर पोसे, "हे स्वामिन् । श्राग,धारिणी रानी यूपी भूषी पारध्यान में येटी हुई कुछ सोच रही है।" एकप्रकार का बड़ा राजा।

उस मेघकुमार। ५१ १५ तय यह श्रेणिक राजा जिधर धारिणी थी उधर पाया, धीर से पूछा, हे देवताओं की प्यारी ! आतंध्यान में घेटी हुई तुम क्या सोच रही हो?" तप यह धारिणी रानी योली, "हे स्यामिन् ! मुझ को इस प्रकार का अकाल मेघों में दोहला उत्पन्न हुआ है।" १६ तय यह श्रेणिक राजा धारिणी रानी को बोला, "हे देवताओं की पारी ! तुम आर्तध्यान मत ध्याश्रो, मैं ऐसा यत्न करूंगा जिससे कि तुम्हारे इस अकाल दोहले की मनोरथ संपत्ति हो जावेगी। मेघों के १७ तय उस श्रेणिक राजा ने अभय नाम कुमार को बुला कर कहा, "हे पुत्र ! तेरी सौतेली माता धारिणी रानी को श्रय विषय दोहला उत्पन्न हुआ है । उपायों द्वारा उस देहले की पूर्ति को न देखता हुआ टूटे हुए मन के संकल्प याला मैं इस फिफर १८ तय यह अभयकुमार श्रेणिक राजा को ऐसे बोला कि "हे पिता जी! आप यह फिकर मत करें। मैं ऐसा यत्न करूगा जिससे कि मेरी सौतेली माता धारिणी रानी के अकाल मेघों में दोहले की मनोरथ संपत्ति हो जाये।" १६ तय उस श्रमय कुमार के मन में इस प्रकार का संकल्प उठा, निधय है कि मेरी सौतेली माता धारिणी रानी के अकाल मेघों के दाहले की मनोरथ संपत्ति दिव्य उपाय के बिना मानुपिक उपाय से नहीं हो सकती। मेरा पूर्वजन्म का मित्र सौभ्य कल्पवासी देवता घड़ी ऋद्धि संपत्ति वाला है। इसलिये मुझे मुनासिय है कि पोपध- शाला में पोपध लेकर ब्रह्मचर्य धारण करके अकेला, बिना किसी दूसरे साथी के, दर्भ के संथारे पर बैठा हुआ, अष्टम भक्त का व्रत प्रहण करके, पूर्व जन्म के मित्र देवता को मन में याद करता हुआ बैठा रहं, तय यह पूर्व जन्म का मित्र देवता मेरी सौतेली माता धारिणी देवी के अकाल मेघों में दोहले को पूर्ण करेगा।" इस प्रकार विचार करके पोषधशाला में झाडू दिया, पाखाने पेशाव की जगह अर्थात् रट्टी को साफ़ किया, दर्भ के संथारे पर पेंट, . अर्धमागधीरोदर 'मरम मत का पत से, पूर्व जन्म के मिन देयता को मन में याद फरता दुधा रहने लगा २० सय चार पूर्व जन्म झा मित्र येषता अगपकुमार के पास प्रकर या और उसने अमय कुमार की मार्धमा पर मकाल मयों को दिया। २१ सप उस धारिणी गनी ने अकाल मेघों में थाने दाहस को मायक प्रकार पूर्ण किया और नी महीने पूरे होने पर उस मेष मामा पालक पैदा हुआ। तय उस मेय कुमार के माता पिता ने मम पूर्पक गाम कर पेज. मण, पपचंकमण- घोर मुगठन संस्कार यही दिक साथ किये। +- २२ सय मेधकुमार के माता पिता उसको गर्भ से चाटये साल में शुभ तिथि करण मुर्ति में फला प्राचार्य के पास लेगए । तप उस फला. आचार्य ने मेघकुमार को लेपनादि, गणित प्रधान जिन में ऐसी यहचर फलाए सूत्र सहित, अर्थ सहित तथा प्रिया सहित सिरा. ला जैसे लिखना, २गणित, कपर, ४ मृत्य. ५ गीग, ६ याजन्तर, ७ स्वरगान, ढोलक, टेने (समताल), १० श्रा, ११ पाने, .१२ सार पासा, १३ अापद (चौपड़), १४ नार पनाना, १५ पानी मिट्टी मिलाना, १६ अन्न विधि, १७ पाग यिधि, १८ यरत्र पिधि, २६ विलेपन विधि, २० शयन विधि, २१ भार्या छन्द यनाना, २२ प्रद्दे- लिका, २३ मागधी रचना, २४ रखी लक्षण, २स गाथा रचना, २६ गीति रचना, २७ श्लोक रचना, २० हिरण्य जड़ना, २६ सुवर्ण जड़ना, ३० चूनियां जड़ना, ३१ याभरण विधि, ३२ तगणी मतिफर्म अर्थात् युवतियों को घेर रचना, ३३ पुरष लक्षण, ३४ घोड़े के लक्षण, ३५ हस्ति लक्षण, ३६ गाय के लक्षण, ३७ पुषउट लक्षण, ३-छा लक्षण, ३६दएट लक्षण, ४० तलयार के लक्षण, ४१ मणियों के लक्षण, ४२ कौड़ियों के लक्षण, ४३ वास्तु विद्या ( घर धनागा), ७पालक को अन्न खिसाना । बालक को पनलि पंकड़ कर चलाना । पतीन पर्थ टोका कारों ने किये ११ मांग भरना । पित्र दनाना रुपये पैसे को परखना।

पू३ - मेघकुमार। ४४ सेना के डेरों का माप, ४५ नगर का माप, ४६ व्यूह रचना, ४७ प्रति व्यूह रचना, ४८ चार रचना, ६ प्रतिचार रचना, ५० चक्र प्यूह रचना, ५१ गरुड व्यूह रचना, ५२ शकर व्यूह रचना, ५३ युद्ध, ५४ नियुद्ध, ५५ युद्धायुद्धी,५६ हड्डियों१० का युद्ध, ५७ मुष्टि युद्ध, भुजा का युद्ध, ५६ लता का युद्ध, ६० वाण चलाना, ६१ तलवार चलाना, ६२ धनुर्वेद, ६३ हिरण्य पाक, ६४ सुवर्ण पाक, ६५ धागों का खेल, ६६ वट्टी का खेल, ६७ नालिका का खेल, ६८ पत्तों पर चित्र खोदना ६६ कड़ो पर चित्र खोदना, ७० सजीव११, ७१ निजीव१२, ७२ शकुन विचार ( पक्षियों का स्वर) १३ तय यह कलाप्राचार्य मेघ कुमार को कलाए सिखा कर माता पिता के पास लाया। २३ तय मेध कुमार के माता पिता ने उस कला प्राचार्य का मधुर वचनों से और बहुत जे सुगन्धित माल्यालंकारों से सत्कार किया और बहुत सा जीवित के अनुसार प्रीति दान देकर विसर्जन . किया। तय यह मेघकुमार बहत्तर कला में पगिडत होगया; सोए हुए उस के नौ१४ श्रम जाग पड़े और यह अठारह प्रकार की देशी भाषाओं में विशारद (चतुर) हो गया। २४ तब उस मेघकुमार के माता पिता ने शुभ तिथि करण मुहूर्त में मेघकुमार का अपने जैसे राज कुलों में से लाई हुई आठ राज कन्याओं के साथ विवाह कर दिया। २५ तय (एक दिन ) यह मेधकुमार उत्तम प्रासाद के ऊपर बैठा हुआ, यजते हुए मृदलों के साथ, तथा उत्तम युवतियों द्वारा १० फूहनी या मुझे मार के लड़ना । १मरे हुए को जीधित करना। मुरदा सा बनाना। ११ इन ७२ फागाची को विस्तार मेध्यारया कहीं नहीं मिलती। १४ दो भात, दो फान, दो नागिका, निहा त्वचा और मन (टीका) . '. . अर्धमागधी रीडर। प्रिंयुक्त यचीस प्रकार के नाटकों के साथ यहलाया जाना हुआ * अनेक काम भोगों को अनुभय कर रहा था। = २६ उस काल उस समय में श्रमण भगवान् महायीर आगे ही आगे . चलते हुए, प्राम ग्राम फिरते हुए, सुन पूर्वक विहार करते हुए जिधर राजगृह नगर में गुणशिलफ चैत्य था उधर पाए। २७ तय उस मेघकुमार ने कंचुकी के पास से श्रमण भगवान् महा. .! थोर के आने का हाल सुनकर हट तुष्ट हो कर घर के नौकरों को 'थुला कर कहा,"शीघ्र ही हे देवताओं के प्यारो! चार घंटियों याला %; घोड़ों का रथ जोड़ कर यहां लानी। २८ तय यह मेघकुमार चार घंटियों घाले घोड़ों के रथ पर चढ़ा : हुआ जिधर श्रमण भगवान महावीर थे उधर पाया यावत् विनय के साथ बैठ गया। उप थमण भगवान महावीर ने मेधकुमार को और उस यही परिपदा को विचित्र धर्म का उपदेश किया। २६ तप मेधकुमार श्रमण भगवान महावीर के पास से धर्म सुन फर दृष्ट तुष्ट हुआ और माता पिता की ओर आया, श्राकर माता पिता को पालागन किया और बोला, “हे माता पिता जी ! मैन श्रमण भगवान् मदधीर के पास से धर्म सुना है और यह धर्म इष्ट और चिकर है। इस लिये हे माता पिता जी! श्राप से प्राशा पाकर भ्रमण भगवान महावीर के पास मुण्डित होकर गृहस्थी से साधु बनना चाहता हूं।" ३० तब यह धारिणी रानी उस अनिष्ट श्रकान्त और अप्रिय वयन को सुन कर ताप करनी हुई, सोच करती हुई और रोती हुई यु थोली, "हे पुत्र! तू हमारा एक ही लड़का है जो इट, कान्त और प्रिय है । हे पुत्र! हम तेरा वियोग एक क्षण भात्र भी नहीं सह सक्त ! इसलिये हे पुत्र ! जय तक हम जीते हैं मानुप भोगों को भोगी। इस के पश्चात् जय हम काल कर जाये तब पकी उमर में निरपेक्ष दीक्षा ले लेना।" ३१ तय यह मेघकुमार माता पिता के यह वचन सुन कर योला, "हे माता पिता जी! जो कुछ थाप मुझे कहते हैं सो ठीक है। परन्तु हे माता पिता जी ! यह मानुष भव अध्रुव है, अनियत है, ।

मेषकुमार। अनित्य है, सैकड़ों व्यसन और उपद्रयों से अभिभूत, बिजली की तरह चंचल, अनित्य है, जलपिन्टु को तरह लोल और चपल है, पुथा के अग्र भाग में लगे हुए यिन्दु के समान ( सघः पाति) है, सन्ध्या के मेघों की लाली की तरह (विनश्वर) है, स्वप्न की तरह ( मिथ्या ) है, पीछे घा पहिले प्रयश्य ही छोड़ना पड़ेगा। हे माता पिता जी : कौन जानता है कि फिस ने पहिले जाना है. किस ने पीछे जाना है, इस लिये मैं यापत् दीक्षा लेना चहता।" - तय जय उस मेघयुमार के माता पिता विषयानुकूल अनेक सम- भौतियों और उपदेशों द्वारा मेघकुमार को समझा न सके तय यह विषयों के प्रतिकूल और संमय में भय और उहग कराने पाले उपदेशों के द्वारा इस प्रकार बोले, "हे पुत्र ! यह जो निम्रन्यों का प्रवचन है सो सञ्चा है, अनुत्तर है, फेवली प्रणीत है, परिपूर्ण है, शुद्ध है, (शंका रूपी) शल्यों को काटने वाला है, सिद्धि का मार्ग है, मुक्ति का मार्ग है, सब दुःखों से रहित यह मार्ग है, सर्प की क्याई एकान्त दृष्टि वाला है, उस्तरे को न्याई एक धार वाला है, लोहे के दाने चवाने की न्याई (कसिन ) है, रेत के ग्रास की न्याई नीरस है. गङ्गा नदी के प्रवाह के प्रतिकूल जाने की तरह मुश्किल है, महा समुद्र की तरह भुजाओं करके दुस्तर है. तलवार की धार के ऊपर चलने की तरह है। हे पुत्र ! श्रमण निग्रंथों को श्राधाकर्मी आहार, उद्देशिक आहार, (साधु के निमित्त) खरीदा हुआ या बनाया हुश्रा, (दूर) रक्खा हुया, सजाया हुश्रा, दुर्भिक्षा५ का श्राहार, बलिय१६ आहार, 'कान्तार१७ आहार, योमार साधु का भोजन, मूल, कन्द, फल, बीज या हरी का भोजन खाना पीना नहीं कल्पता । तू तो हे पुत्र ! सुखों में पला है दुःखों से बिल्कुल अनभिज्ञ है । तू सरदी को, गरमी को, भूक को, प्यास को, घात पित्त तथा संनिपात के अनेक प्रकार १५ दुर्मिस पड़ने पर जो भूखों फो अन्न बांटा जाता है। १६ बरखा न होती तो लोग भन्न दान करते हैं ताकि परखा हो जाए, - १० जेगल या अदवि में जाते हुए पपिक जो अन्न अपने साथ ले जाते है। .

। अर्धमागधी रोडर। करोग मानकों को, योटे पड़े इन्द्रियों के दामों को, साप हुए पास उपसर्ग और परोपही को अच्छी तरह सहन करने के समर्थ नहीं है। इसलिये ई पुनसय तक भाग यायत् दीसा से लेना। ३३ तय यह मंघकुमार मात पिता के पसा कहने पर शाला, "ह माता पिता जी : जो कुछ भाप मुमे पाहत है, ठीक है। राम कृपण, कानर, फापुरुष, इस लोक में प्रतिपक्ष और परलोक से चिमुरा ऐसे मारत जन के लिये नियों का धर्म पालना बहुत फटिग है परन्तु धीर पुरुष को इसे पालना कुछ कठिन नदी इस लिये में चादता यायनू दीक्षा ले लूं। ३४ तय मेधकुमार के माता पिता उसे यू पोहो "हे पुत्र : धम तेरी एक दिन की भी राज्यधी देखना चाहते हैं (अर्थात तू राजा यन जा, चाई एक ही दिन राज करना )।" तय मेपकुमार गुप हो गया। ३५ तय उस |णिक राजा ने घर के नौकरों को बुला कर ये कहा, "हे देवताओं के प्यारो : मंधकुमार का बहुत धन दालन के साथ सूब राज्याभिषेक करो।" तय उन घर के मौकरी ने घेसे ही किया। ३६ तप यह णिक राजा बहुत से गणनायक तथा दण्डनायकों से घिरा हुआ मंघकुमार को एक सौ पाठ सुवर्णमयी घड़ों के जल से राज्याभिषेक के तौर पर नहलाता हुआ माला, “हे नंद ! तुम्हारी जय हो। हे भद्र ! तुम्हारी जय हो। तुम्हारा कल्याए हो । न जीते हुए (देश) को जीतो । जीते हुए (देश) को पालो। जीते हुए (देश) के बीच में रहो" उस ने इस प्रकार अय शब्द का प्रयोग किया। तय चह मेघ (कुमार) राजा हो गया। ३७ तय उस मेघराजा के माता पिता योले, "कहाँ बेटा ! का तुम्हें देवे?" सब यह मेघ राजा माता पिता से ऐसे धोला - - . मेयकुमार। जी! मैं कुत्रिका की दुकान से,रजोहरण और उपकरणों१८ को मंगवाना तथा नाई को बुलवाना चाहता हूं।" E- तय उस थेणिक राजा ने नौकरों को बुला कर कहा है देवताओं के प्यारो! तुम जायो, सजाने में से तीन लाख रुपये या मुहरें) ले कर दो लाख से फुधिक की दुकान से रजाहरण और उपकरण ले आना, और एक लाख से नाई को घुला लायो। तय उन नौकरों ने घसा ही किया। १६ तय उस नाई ने श्रेणिक राजा को हाथ जोड़ कर कहा, "हे. स्वामिन् ! श्राशा करिये, मुझे पया करना है।" तय उस श्रेणिक राजा ने नाई को कहा, "हे देवताओं के प्यारे! जाओ, तुम सुगन्धित पानी से अपने हाथ पाओं धोनी । सफेद चौहरे कपड़े से मुंह को बांध कर मेघकुमार के चार अडगुल छोड़ कर निष्क्रमण२० के लिये केशों को काटो।" तय उस नाई ने उसी प्रकार केशों को काटा। ४० तय मेघकुमार की माता ने कीमती हंसचित्रित कपड़े के टुकड़े में अगले केशों को लिया, सुगन्धित पानी से धोया, सरस गोशी- पचन्दन के छोटे दिये---देकर सफेद कपड़े में बांधा और रल- मय डबे में डाल दिया। पानी को धारा अथवा इटी हुई मोतियों की माला के प्रकाश वाले प्रांमुत्रों को वहाती हुई, रोती हुई, विल- फती हुई यूं चोली "मेघकुमार का जलसों में तेहयारों में हमें यह अन्तिम दर्शन होगा" यह कह कर (बालों को) सिरहाने के नीचे रख लिया । ४१ तय मेघकुमार के माता पिता ने उत्तर को दलयां एक सिंहासन चनवाया, मेघकुमार को दो तीन बार सफेद और पीले घड़ों से नहलाया, उस के श्रङ्गों को खुरदार कोमल सुगन्धित रंगदार तौलिये से पोंछा, सरस गोशीर्ष चन्दन के साथ श्रहों पर लेप १८ देवतामों की ऐसी दुकान जिस में तीन लोक को वीजे मिल सकी है। १६ पात्र, पर भादि। २० संसार से निकलना २१ अपच्छिम-म अन्तिम । शुभ अवसर होने मे पश्चिम 'प्राविरी के लिये अपश्चिम 'नखिरी' कहा है। .

T . .4 अर्धमागधी रीडर किया और माक की सांस की हपा से उड़ जाने याला हसचित्रित कपड़ा उसे पहनाया, हार, अधंहार, इसी प्रकार पशलाड़ी मोतियों की माला, सुनहरी माता, रलो को माला, पारन दिप्य फूलों की मासा उसे पहनाई। ४२ र मेयमार को प्रयिमर, पेएिमर, पूरिमर और सांयो. गिकार इन चार प्रकार के फूलों के भूपयों से कल्पना को सरद अलंरत शरीर याला कर दिया। ४३ संघ उस धेणिक राजा में घर के नौकरों को पुसा कर फहा, "ई देयताओं के प्यारो ! सैकड़ों स्तम्मो थाली और हजार भादमियों करके उठाए जाने के योग्य ऐसी शियिका अर्थात् पालकी लानी । नय यह घर के नीकर पालकी ले पाये। ४५ तय यह मेघयुमार पालकी में चढ़ कर उत्तम सिंहासन के ऊपर पूर्व की ओर मुंह करको बैठ गया। ४५ तय उस मेयकुमार की माता धान कर, यतिकर्म फरफ, थोड़े और यदुत माल पाले भूषणों से अपने शरीर को अलंकृत करके पासको में चढ़ी और मेघकुमार को दाएं तरफ सिंहासन पर पेठ गई। ४६ तय मेघकुमार के पिता ने घर के नौकरों को घुला कर कहा, "हे देवताओं के प्यारो: एक जैसे, समान रूप और समान धप याले ऐसे घर के मौकरों में से एक हज़ार उत्तम युवकों को थुला लायो।" तव यह युलाए हुए उत्तम युपक श्रेणिक राजा को कहने लगे, "हे स्वामिन् ! हमें भाशा दीजिए कि हमें पया करना है।" तप यह श्रेणिक राजा उन उत्तम युवकों को बोला कि,"हे देयताओं के प्यारो! मेघकुमार की हज़ार थादमियों करके उठाने योग्य पासपी को उठानी।" उन्हों ने से ही उठा ली। ४७ सय मेधकुमार के पालकी में चढ़ जाने पर यह पाठ मंगलक सय से पहिले उस के आगे चले जेसे स्वस्तिकर३, श्रीवरस२४, नन्दा- पत२४ , यर्द्धमानक२४, भद्रासन, कलश, मत्स और दर्पण । - २२ फूलों के भूषण बनाने के प्रकार विशेष २१ साथिया, मातिया २४ साथिये की भांति के प्राकार विशेष । , .

। मेघकुमार। ५४ त्य यहुत से धन के अर्थी (फ़कीर, मिनारी) इष्ट और कान्त मोठे पचनों से लगातार उसकी स्तुति करते हुए यूयोले, "हे नन्द : आप की जय हो। हे भद ! नाप की जय हो।" - तय मेघ कुमार के माता पिता मेघ कुमार को आगे करके जिधर श्रमण भगवान् महावीर थे उधर पाए, तीन घार श्रादक्षिण प्रदक्षिणा की और यन्दना नमस्कार करके घोले, "हे देवताओं के प्यारे ! यह हमारा एक ही पुत्र इष्ट, कान्त, और प्रिय है। जैसे उत्पल या पन या फमल कीचड में उत्पन्न होता है और जल में वृद्धि पाता है लेकिन कीचड की रज.से नहीं लिपड़ता इसी प्रकार मेधकुमार कामो में उत्पन्न हुना, भोगों में पला तो भी भोगों को मेल से नहीं लिवड़ा । हे देवताओं के प्यार ! यह संसार के भय से उद्विग्न, जन्म, जरा और मरण से डरा हुआ, श्राप के पास मुण्डित होकर गृहस्थी से साधु बनना चाहता है इस लिये हम आप को शिष्य की भिक्षा देते हैं। श्राप शिष्य- भिक्षा को स्वीकार करें।" ४६ तब श्रमण भगवान महावीर ने मेघकुमार के माता पिता के ऐसा कहने पर उन की प्रार्थना को अच्छी तरह स्वीकार किया। ५० तय यह मेघकुमार श्रमण भगवान् महावीर के पास से पूर्वोत्तर दिशि में गया और स्वयं ही पामरण अलंकारों को उतारा। ५१ तय मेघकुमार की माता ने इस चित्रित कपड़े के टुकडे में श्राभरण अलंकारों को लिया और आंसू गिराती हुई और रोती हुई यू बोली, "हे पुत्र ! तुमने यत्ल करना । तुम ने कोशिश करनी। इस विषय में प्रमाद नहीं करना । हमारा भी यही रास्ता होये," यह कह कर मेघ कुमार के माता-पिता ने श्रमण भगवान महावीर को यन्दना नमस्कार किया और फिर जिस तरफ से आए थे उसी तरफ चले गए। ५२ सय मेघकुमार पंच मुष्टि२६ लोच करके श्रमण भगवान महावीर की ओर श्राकर बोला, "हे महाराज! यह संसार जरा और मरण से लिप्त है। जैसे कोई गृहपति घर में भाग लगने पर २५ इन्द्रियों के विषय २६ बालों को पांच मुट्टियों में उखाड़ डाला। .

. । अर्धमागधी रीडर। जो वस्तु थोडे भार घाली और यहुत मोल वाली होती से लेकर अपनी जान के साथ एक तरफ चला जाता है कि यह यस्तु निकाली हुई आगे पीछे इस लोक में हितकर और सुख फर होगी। इसी प्रकार मुझे भी चारित्र रूपी वस्तु इट कात और प्रिय है, यह यचाया हुश्रा संसार का नाश करने पाला होगा। इस लिए मैं चाहता हूं कि मुझे आप ही स्वयं दीक्षा द, स्यय शिक्षा, स्वयं आचार, गोचरी, धिनय, चरण, फरण, यात्रा, मात्रा की वृत्ति रूप धर्म का उपदेश करें।" । तय श्रमण भमयान् महावीर ने मेघकुमार को स्वयमेव दीक्षा दो यावत् स्वयमेव धर्म का यू उपदेश दिया, "हे देवताओं के प्यारे ! इस प्रकार चलना चाहिये, इस प्रकार हैरना चाहिये, इस प्रकार बैठना चाहिये, लेटना चाहिये, खाना चाहिये, बोलना चाहिये।" । जिस दिन मेधकुमार गृहस्थी से साधु यना, उस दिन पिछले प्रहर के पूर्व भाग में श्रमण निर्गन्धों के यथायोग्य शय्या संस्तारक "यांटने पर मेघकुमार का द्वार के मूल में (अर्थात् देहली के "पास) शय्या संस्तारफ टुश्रा। तय श्रमण निम्रन्थ रात्रि के पहिले प्रहर के पिछले भाग में याचने के लिये या पूछने के लिये या पाखाना पेशाय के लिये श्राते जाते हुए कोई मेघकुमार के हाथों से टकराता था इसी प्रकार पैरों से, सिर से, पेट से, शरीर से। इस तरह उस सारी । रात भर मेघकुमार एक क्षण भर भी अांखें बन्द न कर सफा (अर्थात् सो न सका)। तव मेघफुमार को इस प्रकार का ख्याल आया, मैं श्रेणिक राजा का पुत्र, धारिणी रानी का श्रात्मज, मेघकुमार हूं। जय मैं घर में रहता था तब मुझ को भ्रमण निर्ग्रन्थ श्रादर सत्कार देते थे। लेकिन जब से मैं साधु बना हूं तब से लेकर श्रमण निर्गन्ध न मुझे श्रादर देते हैं न सत्कार करते हैं यरिक भ्रमण निन्ध रात्रि के पहिले प्रहर के पिछले भाग में यावत् मुझ से टकराते रहे, और मैं क्षण भर भी अांखें चन्द न कर सका । इस 7.

. मेघकुमार। लिये मुझे मुनासिब है कि फल गत्रि के (पीसने पर प्रभात हो जाने पर श्रमण भगवान् महावीर फी आशा लेकर फिर घर में रहूं।" यह निश्चय करके बात ध्यान के घश दुखी मन याले उस ने नरक जैसी उस रात को पिताया और अगले दिन रात के । पीतने पर ) प्रभात होने पर जिधर श्रमण भगवान् महावीर थे उधर श्राया यावत् बैठ गया। १७ तय श्रमण भगवान् महावीर मेघफुमार को "हे मेघ !" ऐसा कह कर बोले, “निश्चय करके तू रात्रि के पहिले पहर के पिछले भाग में थमण निर्ग्रन्थों द्वारा पाचना के लिये या पूछने के लिये यापत् घर में रहं२० । क्या यह यात ठीक है?" "हे भगवन् ! यह यात ठीक है।" "हे मेघ : इस से पहिले तीसरे जन्म में तू चैतादय-पर्यत के पाद मूल में हाथियों का राजा था। वहां पर एक दफा गरमी की मौसिम के समय जेठ२८ के महीने में दावानल की ज्वालाओं से जंगलों के मालिप्त होने पर तथा दिशाओं के धूमायुरल होने पर वायरोले की तरह घूमता हुश्रा, डरा हुश्रा और भयभीत तू बहुत से हाथियों से घिरा हुआ एक दिशा से दूसरी दिशा में दौड़ता फिरता था। प्रम तय उस दायानल को देखकर हे मेघ ! तुझे यह ख्याल श्राया "मैं समझता कि मैंने इस प्रकार की अग्नि का उत्पाद कहीं न कही पहिले देखा हुआ है।" तय हे मेघ ! लेश्या के शुद्ध होने से, परि- णाम शुभ होने से, तथा उस ( जातिस्मरण) के श्रापरणीय कर्मों के क्षयोपशम होने से तुझे जातिस्मरण शान पैदा होगया। तय है मेघ ! तूने इस यात को अच्छी तरह समझा "सचमुच मैंने पिछले जन्म में इस प्रकार की अग्नि का उपद्रव देखा है।" पर तय हे मेघ ! तुझे यह ख्याल आया, "इसलिये मुनासिप है कि २७ देखो पिछला सूत्र। अर्थात् जिस मास की पूर्णिमा का चांद ज्येष्ठा वा मृप्ता नक्षत्र में २ जंगल को आग जो बांसी वगैरह को रगड़ से स्वयं प्रगट हो जाती है। रहता है।

अर्धमागधी रीडर। मैं गंगा महानदी के दक्षिण तीर पर विन्ध्या पर्वत के पाद- मूल में दावानल से बचने के लिये अपने यूथ३० के साथ एक बड़ा घेरा३१ डाल लू।" यह निश्चय करके तूने एक यहा घेरा डाला ! जहां जहां तृण, पत्र, काष्ठ, कण्टक घेले, ठुएठ या वृक्ष थे यह सब तूने तीन बार हिला कर पात्रों के साथ उखाड़ डाले और सूई के साथ पकड़ कर एक तरफ फेंक दिये। तव तू हे मेघ ! उसी मण्डल (धेरै) के निकट हाधियों का राज्य भोगता हुआ रहने लगा। ६० तब एक दफा गरमी की मौसिम के समय जेठ के महीने में वृक्षों के संघर्ष से उठी हुई, सूखे तृण, पत्ते और हवा के सयोग से दीप्त हुई दावानल की ज्यालाओं से जंगलों के भर जाने पर यहुत से दूसरे सिंह, व्याघ्र ( शेर), रीछ, चीते, गीदड़ बार शशक, जिधर यह तेरा मण्डल था उधर आए श्रोर अग्नि के भय से डरे हुए एक बिल पासियों के धर्म से रहने लगे। तू भी हे मेघ ! उसी मण्डल में उन यहुत से सिंह यायत् शशकों के साथ एक ही पिल घासियों के धर्म से रहने लगा। ६१ तब तूने हे मेघ ! इस ख्याल से कि पैर से अपने शरीर को खुज- लाऊं एक पैर उठाया । उस अन्तर३३ ( जगह, स्थान ) में दूसरे पतवान् जन्तुओं से भींचा हुआ एक शशक आगया। तय है मेध ! शरीर का खुजला कर फिर जब तू पैर नीचे रखने को या तो तून उस ( अन्तरे में ) श्राप हुए शशक को देखा और प्राणियों की अनुकंपा से, जीवों की अनुकंपा से तूने यह पैर अाकाश में ही उठाए रक्खा, (पृथ्वी पर ) नहीं टिकाया । तय हे मेघ : उस प्राणों की अनुकंपा सेतू ने मनुष्य आयु का यन्ध किया। . 10 समूह। ३१ वृक्षों को काट कर साफ की हुई जगह ताकि ममें भाग न पाए। जहां एन्धन न होगा, वहां भाग नहीं लगेगी। ३२ अर्थात् प्रेम पूर्वक। पैर उठाने से खाली की हुई जगह ।

मेयकुमार। तब यह दावानल अढ़ाई रात दिन तक उस यन को जलाता - तव अन्त को यह दावानल बुझ३४ गया। ६२ तब यह सारे सिंह यावत् शशक उस दावानल को युझा देख अग्नि के भय से रहित, और भूक प्यास से सताए हुए उस मण्डल से निकल कर सय दिशाओं में भाग गए। ६३ तप तू हे मेघ ! जीर्ण हुआ हुश्रा और बुढ़ापे से जर्जरित शरीर धाला उसी मण्डल में बिजली गिरने से - मर कर भूमि तल पर गिर पड़ा । तब हे मेघ ! तेरे शरीर में बड़ी सख्त घेदना प्रकट हुई। तय हे मेघ ! तू उस सख्त घेदना को तीन दिन रात भोगता हुमा एक सौ गरस की पूर्ण श्रायु पाल फर इसी जंयु- द्वीप भरत क्षेत्र के राजगृह नगर में श्रेणिक राजा की धारिणी रानी की कूख में कुमार पने उत्पन्न हुआ। ६४ तब तू हे मेघ ! फ्रेम से गर्भवास (कूख) से निकल घाख्या- घस्था को उल्लंघ कर, यौवन को प्राप्त कर मेरे पास मुण्डित हो गृहस्य से साधु बना। .६५ तय यदि हे मेघ ! तिथंच योनि में गए हुए और सम्यवत्व रूपी रत्न को न प्राप्त किये हुए तू ने प्राणियों की अनुकपा से यह (अपना ) पैर आकाश में ही उठाए रखा, और (पृथ्वी पर ) नहीं टिकाया तो क्यों फिर अब हे मेघ ! घडे कुल में उत्पन्न हो कर, पंचेन्द्रिय पना प्राप्त फर एवं शक्ति, बल, वीर्य, पुरुषकार, परा- कम से संयुक्त हो कर और मेरे पास दीक्षा लेकर रात को पाचना के लिये या पूछने के लिये जाते ( आते ) श्रमण निनन्धों के पैरों के संघहों को सम्यक प्रकार नहीं सहता?" ६६ तय श्रमण भगवान् महावीर के पास यह बात सुन कर परि- रणामों के शुभ होने से और अध्यवसायों के प्रशस्त होने से मेघ- कुमार को जाति स्मरण शान पैदा हो गया। तय उस मेघकुमार ने इस यात को अच्छी तरह समझा। ३४ घारौं शब्दों का मर्थ "या" मा है। ) अर्धमागधी रोडर। नय पफ'समय श्रमण भगवान् महावीर ने याहिर जनपद में विहार किया अर्थात् ग्रामों में विचरने लगे। तय यह मेघ अनगार अनेक प्रकार की तपश्चर्यायो से अपनी प्रात्मा को शुद्ध करने लगा। तयं यह मेघ अनगार पड़ी भारी तपश्चर्या से सुखा, भूपा, सा, निर्मासं, लह रहित, श, नाड़ियों का जाल 'सा ही हो गया । जीव यल से चलता है. जीय पत से हैरता है। भाषा घोल कर थक जाता है। भाषा बोलता हुमा थक जाता है। भाषा घोलूगा इस ख्याल मात्र से थक जाता है । जैसे कोयलो की भरी हुई गाड़ी, अथवा काठ से भरी हुई गाड़ी अथवा सूखे.) पत्तों से भरी हुई गाड़ी शन्द करतो हुई चलती है शब्द करती हुई ठरती है इसी प्रकार मेघकुमार भी शब्द करता हुया चलता है, शब्द करता हुआ ठरता है। उस काल उस समय में श्रमण भगवान् महावीर राजगृह नगर में समोसरे (अर्थात् पधारे)। तय उस मेधकुमार को रात के पहिले महर के पिछले भाग में धर्म जागरण जागते हुए यह ख्याल थाया. "इस प्रकार में ..इस पड़ी तपश्चर्या से यावत् शब्द करता हुशारता है। इसलिये : जब तक मुझ में शक्ति, यल, वीर्य, श्रद्धा, धृति, संवेग है और अब तक मेरे धर्माचार्य धर्मोपदेशक श्रमण भगवान् महावीर विचरते हैं तब तक मुझे मुनासिब है कि कलही रात के ( बीतने पर) प्रमात हो जाने पर श्रमण भगवान महावीर से अाशा पाकर स्वयं ही पांच महावन धारण कर फे, गौतम आदि श्रमण निर्मयों को खमा कर, तथारूप स्थविरों के साथ विपुल पर्वत पर धीरे २ चढ़ फर स्वयं ही बादलों के समूह जैसे ( काली) मिट्टी पत्थर चबूतरे को साफ करके, संलेखना इंसना से शुद्ध होकर, खाना पीना छोड़ कर, मृत्यु की आकांक्षा न करता हुना विचरू," ऐसा डान कर अगले दिन प्रभात होने पर श्रमए भग- ३५ बुझे हुए भगार । शरीर की निर्मलता का फैमा पर फोटोचा है। - मेघकुमार। धान महावीर की ओर आकर तीन चार श्रादक्षिण प्रदिक्षणा करके यावत् बैठ गया। ६८ तय श्रमण भगवान् महावीर मेघकुमार को यू' घोले, "संच मुच हे मेघ ! तुझे रात्रि के पहिले पहर के पिछले भाग यावत् काल को श्राकांक्षा न करता हुआ विचरूं३७ । क्या मेघ ! यह बात ठीक है?" " हां महाराज! ठीक है।" ६६ तब वह मेघ अनगार श्रमण भगवान महावीर से श्राशा.पा कर स्वयमेव पांच महाप्रतों को धारण करके यावत् मृत्यु को श्राको क्षा न करता हुआ विचरने लगा। ७० तब वह स्थविर भगवन्त मेघ अनगार की गिलानी रहित सेवा करने लगे। तब वह मेघ अनगार वारह बरस थमयों का चारित्र पाल फर, मासिकसंलेखना से आत्मा को शुद्ध करके साठ भोजन घेलानों को अनशन३८ से बिता कर,श्रालोचना प्रति फ्रमण करके, (मिथ्यात्व रूपी ) शल्य निकाल कर, समाधि को प्राप्त हो, कम से काल कर गया। ७१ तव उन स्थविर भगवन्तों ने मेघकुमार को मरा हुश्रा देख कर मृत्यु सम्बन्धि कायोत्सर्ग किया । उस के उपकरण लेकर श्रमण भगवान महावीर की ओर श्राफर यू चोले, "श्राप का शिष्य मेघ नामा अनगार जो प्रकृति से भद्र और विनीत था यह श्राप से आशा पाकर यावत् कम से काल कर गया। हे देवताओं के प्यारे! यह मेघ अनगार के उपकरण है।' तय भगवान् गौतम श्रमण भगवान महावीर को यू बोले, "हे महाराज ! यह मेघ अनगार काल मास में काल करके कहां गया, कहां पैदा हुश्रा ?" "हे गौतम ! मेरा शिष्य मेध नामा अनगार विजय महाविमान में देवता पने उत्पन्न हुना है।" ३० देखो पिछला सूत्र । सन माना, भूके रहना। .

ए
अर्धमागधी रोड
यह मेरा दयनापन में यलोर. में से कहा
Rit: कम उत्पनगा
"दे गौतम ! महा विदेश दान में सिद्ध होगा, बुरा होगा, निधार
मात करेगा, सय दुःपों का मन करेगा।"
जर इस प्रकार सम्म् ' घमण भगवान महावीर ने स्नान करनी
हुई । पारमा को उपालम्भ देने के लिये इस पदिका ता अध्ययन
फा यह अर्थ कहा। मैं यह कहता।
॥ प्रथम अपयन समाप्त ॥
किसी विषय में स्मलित होने पर शियों को श्राचार्य मोटे
और चतुर यवनों से इसी प्रकार धीरज देते है जैसे महावीर
ने मेघ मुनि को दी।
॥ इति थी जगताधर्मकपासूध के पहिले थुतस्कन्ध फापदिला अध्यपन ।

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Ardhmagadhi Reader

Author
Jain,banarashi Das
Title
Ardhmagadhi Reader
File name
Ardhmagadhi Reader
Text
OCR done
Citation
1920
Published
2011/04
Publisher
Alahbaad,mission Press
Language
Sanskrit
Pages
126
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
552392
Barcode
4990010033128.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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