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2011/03

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चुनाव प्रोमीलाल इलाहावादी

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रक मुहल्ले के एक मिरे पर अच्छी दशा में छोटी मी पुरानी इमारत के कार मराठा लहरा रहा था। इमारत के माथे पर दम फीट लम्बा और चार फीट चौड़ा एक माइनबोर्ड लगा हुआ था। काली जमीन पर लाल अारी में लिखा था 'कार्यालम मता पार्टी'। यह इमारत सड़क में पचास फीट हट कर बनी हुई थी । इमारत के प्रागे धाम का एक टुकड़ा छूटा हुना या । धाम की कटाई यद्यपि हो चुकी थी, परन्नु उसकी मनह ममतल नहीं थी। कही-कहीं घाम गादा लन्त्री थी, कहीं छोटी और कही विल्कुल ही माफ थी। इमारत में घुमने के लिए दो फाटक थे उसके दोनों प्रोर विरदी इंटे गडी हुई थी । कहीं-कहीं यह ईट दायें-बायें गिरी-पड़ी थी। इमारत पर मफेदी हो चुकी थी फिर भी दीवारों की गन्दगी मफेदी की पतली मी तह में से झांक रही थी। देखने में इमारत विधवा औरत की तरह दिखाई पड़ती थी, हां यह अलग बात थी कि कभी-कभी जरूरत पड़ने पर इसे मनाया भी जाता था। रात के समय जब विजली के बल्ब जगमगा उठने और रग-बिरंगे कागजों की मण्डियां लहराने लगती नो सत्ता पार्टी की यह वियवानुमा इमारत दुल्हन मी दिखाई देने लगती। इस ममय मुबह के माढे दम बज चुके थे और दो-मंजिली इमारत के ऊपर के कमरे में कुछ मर्दाना हंसी के स्वर गूंज रहे थे। उस समय वहां तीन आदमी बैठे इधर-उधर की गप्प हाँक रहे थे। पता नहीं उन्होंने किस बात पर कहकहे लगाये थे, फिर अनायास ही उनमें से एक बहुत गम्भीर होकर वोला-~~'यार चुप रहो, अपने नेतागण आते ही होंगे।' दूसरा बोला-'इसमें घबराने की क्या बात है ? इतने ऊँचे कमरे में से दूर से प्राता हुग्रा आदमी दिखाई दे जाता है । नेतागण दबे पाँव हमारे सिर पर थोड़े ही या धमकेंगे। वह तो दूर ही से पाते दिखाई दे जायेंगे। कई लोग उनके माथ होंगे।' इनने में गोपाल ने, जो कि खिड़की के पास ही खड़ा था, शोर मचा दिया-~~-'अरे वकवास वन्द करो । नेता जी आ रहे हैं ।' मचमुच ही नेता जी वहाँ पहुँचने वाले थे। उनका असली नाम मदनसिंह ठाकुर था। वे ठाकुरों के खानदान के थे इसलिए वह भी ठाकुर कहलाते थे। दोहरा बदन, कद न बहुत ऊँचा और न छोटा, रंग खूब खिलता हुआ और उनके गालों पर लाली झलकती थी। नाक-नक्शा अच्छा था, बुढ़ापे में भी इस बात का पता चलता था कि जवानी के जमाने में अच्छे रोवदार यादमी रहे होंगे। उनके बाप-दादा और खान- दान के दूसरे पुरुप लम्बी-लम्बी मूंछे रखते थे। परन्तु ठाकुर साहब ने केवल जवानी में तनी हुई मूंछे रखी थीं। उन दिनों वह पहलवानी भी करते थे, परन्तु जब वह नेता बने तो यह सारे काम छोड़ दिये यहाँ तक कि मूंछे भी सफाचट करा दी। कहने वाले कहते थे कि जवानी में वह प्रांखों में मुरमा भी लगाते थे और कल्ले में सदा चार-छ: पान दवाये रखते थे। अब उन्होंने सुरमा लगाना तो छोड़ दिया था लेकिन पान म्यूब खाते थे। पान की लत के कारण उनके करीव-करीव सभी दांत .

३ । उसड़ गये थे, उन्होंने बनावटी दांतो का मेट लगवा रखा था। सिर के वाल भव भी अंग्रेजी ढंग से कटे थे, अन्तर केवल यह था कि जवानी में खूब लम्बी जुल्फें रसते थे, और अब उन्होंने बाल काफी छोटे करा दिये थे। इस उम्न में भी उनके बाल उड़े नहीं थे। मारे बाल ज्यों के त्यों मौजूद थे उनका रंग तो सफेद हो चुका था लेकिन काला करने के लिए विजाब इस्तेमाल करते थे। चेहरा भरा था, फिर भी नाक की जड़ से दोनो ओर लकीरें गालों की भोर बढ़ रही थी हमने तो ऐसा नगता जैसे इनसे जैसा पुश-मिजाज आदमी नहीं होगा और जब क्रोध में पाते तो अधरों की दशा देखने लायक हो जाती। इसीलिए उनका अपनी पार्टी में बहा रोत्र था। राजनैतिक जानकारी के अतिरिन उनका व्यक्तिगत दवदवा भी काफी था। दूसरे पाने वाले लोग उनने तीन-चार कदम पीछे हटकर चले पा रहे थे। उनका रोब ऐमा था कि किसी का इतना साहम नहीं होता या कि बिना किसी कारण के उनके साथ सटके खडा हो जाय । इम समय केवल अनिता उनके बगल में चली पा रही थी। अनिता का रंग गहरा गेहुँप्रा था। गरीर खूध मुडौल और सीधा था। गर्दन ऊँची और चेहरे की बनावट तथा नाक-नक्शा सुन्दर था। आँखे बहुत बड़ी-बडी उभरी हुई और तीखी थी। जब वह अपनी काली काली पुतलियां घुमाती तो जिधर देखती उधर ही एक रोचसा छा जाता । वही ठाकुर माहब की सेक्रेट्री थी। सद्दर के माधारण वस्रो में भी उसके लम्बे, मुडौल गरीर की मुन्दरता साफ दिखाई दे रही थी। ठाकुर साहब भनिता को कहाँ से उहा लाये थे, इसके बारे में निश्चित रूप से कोई कुछ नहीं बता सकता था। कई किस्म की प्रफ- वाहें जन्दर फनी हुई थीं। लोग यहाँ तक भी कहते थे कि उन्हीं के इलाके में एक पामिन से किसी ठाकुर की यारी लग गई। अनिता उन दोनों के मिलाव का ही नतीजा थी। पासिन भी बहुत अच्छी थी और वह ठाकुर भी हजारों में एक था। यह तो मानी हुई बात है कि वेमेल जातियों की सन्तान और भी अधिक सुन्दर होती है। कहते हैं कि जब ठाकुर साहब के बुरे दिन आ गये तो अनिता की मां को खर्च के लिए पूरा रुपया भी नहीं दे पाते थे फिर भी अनिता की मां उनने अच्छा व्यवहार करती रही। ठाकुर मदन सिंह को असलियत का कुछ जान था । जब अनिता की मां पर ज्यादा बुढ़ापा आ गया और वह बिल्कुल ही गक्तिहीन हो गई तो ठाकुर मदन सिंह ने किसी और गाँव में उसके रहने-सहने का प्रवन्ध कर दिया और अनिता की जिम्मेदारी अपने सिर पर ले ली। अनिता की मां का चाल-चलन खराव नहीं था । वह तो अनिता के पिता को अपना पति मानती रही। हालांकि उन दोनों की गादी नहीं हुई थी। ठाकुर मदन सिंह और अनिता का सम्बन्ध किसी तरह भी खराब नहीं था। दोनों की आयु में भी जमीन-पासमान का अन्तर था । अनिता ने अभी अट्टारहवें वर्ष में कदम रखा था और मदन सिंह बूढ़े हो चुके थे । उनका शरीर ढल गया था लेकिन सीने का फुलाव अब भी काफी था और कन्चे भी काफी चौड़े थे। अनिता अपनी शोख आँखों ने कभी-कभी तो ठायुर साहब के चौढ़े सीने को टकटकी बांधकर यों देखने लगती जैसे वह कोई देव-पुरुप हाँ । या फिर, कौन जाने स्त्री के मन की गहराई की। उसकी मां ने भी तो बाली उम्र में अपने ने बहुत काफी बढ़े ठाकुर को दिल दे दिया था। लेग धूप में चलते-चलते ठाकुर साहब फाटक पर पाकर रुक गये । उनके मात्र अनिता भी रुक गई। अनिता की रेशमी वालों की नागिन .

५ मी लम्बी चोटी का फूटना थोडी देर भूमकर रह गया। एकाएक किमी विचार के कारण ठाकुर साहब रक गये थे। उन्होंने अपनी प्रमों से इशारा करके पीछे पाने वाले भादमियों में से दो को अपने निकट बुलाया । वे दोनों मट प्रागे वढे और हाय जोड़कर खड़े हो गये । ठाकुर माहब भारी स्थर मे बोले-'अच्छा तो क्या मवर है?' 'मय ठीक है जी।'-उनमें से एक ने उत्तर दिया। पौर बाकी बातें भी उमी ने की। अब ठाकुर साहब ने धूप की पोर. पीठ पर ली और उनकी प्रांतों का चुन्यापन भी दूर हो गया। अपनी दुड़ी को ली से रगड़ते हुए वोले-'देसो वाग मिह सुनाव में अब केवल कुछ दिन रह गये हैं। मालूम है ना "जी हां।' 'हमारी तैयारी में जो थोडी-बहुन मर रह गई है, यह पूरी हो जानी चाहिए।' 'अवश्य ।' ठाकुर माहब उन्हें अपने दफ्तर में नहीं ले जाना चाढे थे। वे देहाती कर्मचारी थे भौर ठाकुर माहव नहीं चाहते थे कि उनके दफ्तर में जो बैठक होने जा रही थी उसमें वे माग लें क्योंकि वहाँ कई ऐमी वात भी होने वाली थी जो देहाती कर्मचारियों के कानों तक पहुँचनी ठीक नहीं थी। इसीलिए ठाकुर माहब फाटक पर खडे-बडे जरूरी बातें कर लेना चाहते थे । चुनांचे उन्होंने अपने स्वर में जरा रोब पैदा करते हुए कहा-'बाग सिंह मैं समझता था कि तुम कोई माम मदर लामोगे या कम मे कम कोई नया मुझाय दोगे, परनु तुम्हारे मुंह में कोई ऐसी बात नहीं मुन रहा है।'

६ बाग मिह कुछ हड़बड़ा गया क्योंकि वह सुझाव देने तो पाया था लेकिन ठाकुर साहब के रोव के कारण अभी तक कुछ कह नहीं पाया था। वह उचित मौके की तलाश में था, चुनांचे उसने मौका उचित समझकर कहा---'ठाकुर साहव मैं सोच रहा था कि जरा पाराम से बैठे तो बात हो।' यह सुनकर ठाकुर साहब कुछ विगड़ गये और ऊँचे स्वर में बोले- 'भई तुम लोग भी अजीव श्रादमी हो । मेरे पास पाराम से बैठने का समय नहीं है और वाग सिंह अच्छी तरह समझ लो कि हम सब के लिए भाराम हराम है।' ठाकुर साहब के विगड़े हुए तेवर देख कर बाग सिंह सहम गया । ठाकुर साहब फिर बोले-~~-'जो बात कहनी है, बस खड़े-खड़े कह तुम इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते कि आज-कल मैं कितना व्यस्त है।' मदन सिंह महान नेता थे, भला उनके सामने बाग सिंह की क्या हैसियत थी। बेचारा हकला गया और उसके मुंह से एक-दो बेतुकी आवाज निकलकर रह गई । तब उसने आँखों से अनिता की ओर इशारा किया । इस इशारे का अर्थ समझते हुए ठाकुर साहब ने कहा-'तुम इनकी फिक्र मत करो। जो बात कहनी है फौरन कह दो। अच्छी तरह समझ लो कि अब जब कि चुनाव में केवल कुछ दिन रह गये हैं, हममें से किसी को एक पल भी नष्ट नहीं करना चाहिए। हां तो कहो।' बाग सिंह ने दोनों हाथ जोड़ कर कहा--'देखिये एक कप्ट आपको सहना पड़ेगा। 'केसा कप्ट?' बाग सिंह युछ संकोच में पड़ गया। शायद वह सोच रहा था कि

७
अपने मन की बात कहे या नहीं। भाखिर में उसने बात कह ही दी-
'मेरे ख्याल में आप स्वयं हमारे इलाके का दौरा करे तो बहुत
अच्छा है।'
'सो तो है ही । ख्वामस्वाह संकोच में पड़े हुए थे। तुम्हारे मुझाव
मे पहले ही हम दौरा करने का प्रोग्राम बना चुके थे। जरा मोचो तो
कि हमारे दौरे के बिना कुछ हो सकता है।'
'जी हाँ वही तो मैं भी कहता है।'
बाग सिंह की मूर्खता पर ठाकुर साहब ने धीरे से अपने माथे पर
बल मारा जिसका अर्थ न तो वाग सिंह ममझा और न उमके साथी,
परन्तु अनिता समझ गई तभी तो उसके लाल होठो पर मुस्कराहट मेलने
लगी।
बाग सिंह बोला-'पापका वाव तक पाने का विचार है ? मुझे कुछ
तैयारियां भी तो करनी पडेगी।'
इस बात का उत्तर ठाकुर साहब ने मीधा वाग मिह को नहीं
दिया। उन्होंने अनिता की ओर देखते हुए कहा-'
1-'अनिता?'
'जी।'
ठाकुर साहब कुछ कहने से पहले सोच मे डूब गये। उनक चौडे
माये पर गहरे बल पड़ गये। तब उन्होंने कुछ फैसला करके कहना शुरू
किया-'हो तो अनिता?
'जी हाँ।'-अनिता ने फिर उत्तर दिया।
'तुम्हारे पाम तो मेरे सारे कार्यक्रम की रूप-रेखा तैयार है ।'
'जी हो।'
'माज दोपहर को फुरसत मिलने पर मुझे याद दिला देना, ताकि
बाग सिंह के इलाके के दौरा का प्रोग्राम बनाया जा सके ।'

'अच्छा जी।' 'देखो भूलना नहीं क्योंकि मेरे दिमाग से कोई वात उतर जाती है नो फिर एक सिरे से ही गायब हो जाती है। वेहतर तो यही होगा कि तुम इस बात को लिख लो।' 'आप निश्चिन्त रहिये मैं इतनी जल्दी भूलने वाली नहीं। यह कहकर अनिता मुस्करायी तो उसके सफेद-सफेद दांत चमक उठे । ठाकुर माहब के सामने इतनी निडरता से कोई बात कहने का किसी और का साहस नहीं हो सकता था। इसका कारण यह नहीं था कि ठाकुर साहब से उसका बहुत ज्यादा बेतकल्लुफी का सम्बन्ध था। बल्कि अभी उसकी उम्र ही इतनी कम थी कि वह बिना किसी संकोच के बात कह देती थी। अव ठाकुर साहब ने बाग सिंह की ओर देखते हुए कहा-'वस, यह वात भी हो गई और दो-तीन दिन के अन्दर-अन्दर पत्र द्वारा तुमको पूरी सूचना पहुँच जायगी। ठीक है ?' 'जी हां, जी हाँ।' ठाकुर साहब के साथ जो और लोग थे, वह सड़क के दूसरे किनारे पेड़ की छांव तले खड़े हो गये थे ताकि ठाकुर साहब जरूरी बातें कर सकें। वह इस प्रतीक्षा में थे कि बाग सिंह वहाँ से टले तो वे ठाकुर साहब के पास पहुँच जायें । यह समझ कर कि वाग सिंह से उनकी बात-चीत पूरी हो चुकी, ठाकुर नाव फाटक के अन्दर घूमे तो उन्होंने कनखियों से देखा कि बाग सिंह अब भी उनकी ओर कदम बढ़ा रहा है। वह फिर रुक गये और उनके माथे पर गहरे बल पड़ गये । जरा भारी स्वर में बोले-'सभी कोई और बात है क्या?' - & "जी हो।' 'तो भई कह डालो ना । स्वामख्वाह समय नष्ट हो रहा है।' 'बात"बात तो केवल यह है कि...।' अब एक ऐमी समस्या आ गई थी जिसके बारे में बाग सिंह भनिता. के मामने कुछ नहीं कहना चाहता था। अब मामला उन लोफरों और गुण्टों का या जिनसे काम लिये बिना या जिनकी सहायता बिना नेता लोगों की नेतागीरी बहुत दिनो नहीं चल सकती। उन्हीं को खिलाने- पिलाने के लिए कुछ न कुछ करने की जरूरत थी। शराब और गोश्त नी दावती के अतिरिक्त उन लोगों को नकद रुपया भी देना पड़ता था । हर राजनीतिक पार्टी की तरह सत्ता पार्टी को भी गुण्डे पालने पड़ते पे। यह गुण्डे अपना महत्व अच्छी तरह समझते थे, इसलिए उनका दिमाग हवा में रहता था। उनके होमले इतने बड़े हुए थे कि किसी भी भले भादमी की पगडी उछालने में उन्हें कोई मंकोच नहीं होता था। वाग मिह भेद की यह बात कहने के लिए ठाकुर साहब के बहुत ही निकट खिसक गया और उनके कान तक मुंह ले जाकर फुसफुमाते हुए बोला-'कुछ रुपये की भी जरूरत होगी।' एक क्षण में ही ठाकुर साहब सब धुंछ भांप गये। वह इस तरह चौके जैसे बहुत ही महत्वपूर्ण बात उनके दिमाग से उतर गई हो। फौरन ही हाथ बढ़ाकर बाज सिंह के कन्धे पर रख दिया और बोले- 'दूब याद दिलाया । मैं तो इस बात को बिल्कुल ही भूल गया था।' ठाकुर साहब की इस बात से वाग मिह का सीना फूल गया। नथुने फड़काते हुए बोला-'जी,ऐमा तो हो ही जाता है। चौबीस घण्टो में प्रापको कान मुजाने की तो फुर्मत नहीं मिलती, भला मापसे ऐमी छोटी-छोटी बातें कैसे याद रह मवती हैं ?' ।

१० ठाकुर साहब ने बाग सिंह की यह खुशामद भरी बातें सुनी-अनसुनी कर दी । वह तो अपने ही विचारों में डूबे हुए थे। एकाएक कुछ सोच कर उन्होंने बाग सिंह का कन्धा दबाया और बोले-~-'तुम्हारे पास कोई भरोसे का श्रादमी है ? बाग सिंह समझ नहीं पाया कि ठाकुर साहब को कैसे पादमी की जरूरत थी । भरोसे के श्रादमी तो कई थे लेकिन यह भी तो पता चलना चाहिए कि काम किस प्रकार का था, क्योंकि उसी के अनुसार आदमी को काम सौंपा जा सकता है । ठाकुर साहब भी एक घाघ थे। वह बाग सिंह के मन की दशा भाँप गये फिर भी बोले-'मेरा मतलब है कि कोई ऐसा प्रादमी चाहिए जिस पर रुपये-पैसे का भरोसा किया जाय ।' ठाकुर साहब ने भी बाग सिंह के कान में बात फुसफुसा कर कही थी। इससे बाग सिंह को बड़ा गर्व महसूस हो रहा था। जो लोग उन्हें देख रहे थे वह इस काना-फूसी से यह महसूस किये बिना कैसे रह सकते थे कि बाग सिंह ठाकुर साहब का बड़ा ही खास श्रादमी था। ठाकुर साहब की बात सुन कर उसने बड़ी फुर्ती से आँखें झपकायीं और अपने पास खड़े प्रादमी की ओर इशारा करके बोला-'यह भी अपनी पार्टी के पादमी हैं, इन पर रुपये-पैसे के मामले में पूरा भरोगा किया जा सकता है।' बाग सिंह की बात सुनकर ठाकुर साहब ने एक नजर पास खड़े यादमी पर डाली तो उसने दोनों हाथ जोड़कर सिर नीचे को झुका ‘लिया। ठाकुर साहब फिर अपना मुंह बाग सिंह के कान तक ले गये और कुसफुसा कर बोले-'काफी मोटी रकम होगी।' .

'जी वह तो मैं जानता है।' 'तो फिर..?' 'पाप चिन्ता न कीजिये यह तो अपने भरोसे का मादमी है इसे लाखों रुपया भी मौपा जा सकता है।' ठाकुर साहब ने इतमीनान की मांस लेकर कहा-'यह बात है तो यस परसो तक फिर इसे हमारे पास भेज देना और हम सारी रकम इसके हवाले कर देंगे।' बाग मिह का मन हो रहा था कि वह उनसे रकम के बारे में बात- चीत करे परन्तु उसकी हिम्मत छूट गई । उसने सोचा कि कहीं ऐमा न हो कि ठाकुर माहब क्रोध मे आ जाय और इस तरह बनी-वनाई बात विगड़ जाय । ठाकुर साहब भी कच्ची कौडियो नही सेले धे । जो सोच- सान बाग सिंह के मन में चल रही थी उन्होंने उगका अनुमान लगा लिया और फिर बाग सिंह के कन्धे पर थपकी लगाते हुए धीरे से बोले- जितनी रकम सम्भव हो सकेगी, मैं भेज दूगा। यदि अधिक धन की जरूरत हो तो मुझे पत्र द्वारा सूचित कर देना ।' बाग सिंह पर इस बात का गहरा प्रभाव पडा । वाग सिंह ने भी दांत निकाल कर हंस दिया। उसके साथी से भी न रहा गया, यह भी हंसा। जब वे दोनो वहाँ से चले तो मारे खुशी के उनके पांव धरती पर नहीं पड रहे थे । लगता था मानो उन्हे कोई छिपा हुप्रा खजाना मिल गया है । दूर पेड़ की छांव तले खडे लोगो की भोर उन्होंने प्रकह कर देखा और फिर पसीना पोंछते हुए वस के अड्डे की ओर चल दिये। उनसे फुर्सत पाकर ठाकुर साहब ने दूमरे लोगो को इगारे मे बुलाया। वे लपक कर उनके पास पहुंचे तो ठाकुर साह्य ने अपनी कलाई की घड़ी पर नजर डालते हुए कहा-'अब मेरे पाग मुश्किल में -- बाकी प्रादमी तो पहले से ही अन्दर जा चुके थे । रामू सिर पकड़ कर दरवाजे के निकट ही स्टूल पर बैठ गया । उसे बड़ा दुःख हो रहा था। वह अपनी तकदीर को कोसने लगा कि जिस समय गोपाल और किशन अनिता से चुहल कर रहे होंगे, उस समय उसे ठाकुर साहब के दरवाजे की पहरेदारी करनी पड़ेगी। किसी कर्मचारी में इतना साहस नहीं था कि अनिता से चुहलबाजी कर सके, खास कर ये तीनों तो किसी गिनती में ही नहीं थे। फिर भी जब कभी उन्हें घड़ी दो घड़ी अनिता की खुशामद करने का मौका मिल जाता और वह इनकी मूर्खता की किसी बात पर मुस्करा भी देती तो यह इसी में मुग्ध हो जाते। कमरे में खड़े-खड़े किशन और गोपाल को मालूम हो गया कि ठाकुर साहब अभी दूसरे कमरे में पधार रहे हैं। परन्तु उन्हें इस बात का पता नहीं था कि अनिता कुछ देर के लिए उन्हीं के पास पा रही है । जब वह फुर्ती से ठाकुर साहब के लम्बे-चौड़े फे मवाले फोटो को हार पहना चुके और धूप जला चुके तो अनिता को कमरे में प्रवेश करते देख कर उन दोनों की बांछे खिल उठीं। दोनों हाथ जोड़ कर और खूब नीचे को झुक कर उन्होंने इतनी नम्रता से नमस्ते की जैसे कहीं की महारानी कमरे में श्राई हों, और यह दोनों महारानी के दास हो। 'कुमारी जी, नमस्ते।' 'नमस्ते, कुमारी जी।' उन दोनों खुशामदो टट्टों का स्वर कमरे में गूंजा। अनिता अपने जन्म से चाहे जो कुछ भी थी, लेकिन उसका व्यवहार छोटे-बड़े से ऐसे ही होता था जैसे वह किसी ऊँचे घराने की महिला हो । न वह किसी महान् व्यक्ति के सामने घबराती थी और न साधारण प्रादमियों से शरमाती थी । सैकड़ों मर्द उसे किम नजर में देसते हैं, उसने कभी इस बात की फिक्र नहीं की। वह अपने माप में ही मग्न रहती । भय भी उसने यह जानने की कोशिश नहीं की कि दो मामूली कर्मचारी उसे कैसी भूखो नजरो से देख रहे थे। मर्दो की इस पादत से यह विलकुल बेपरवाह हो चुकी थी। चुनांचे नमस्कार का उत्तर देते हुए मुस्करा कर बोली- 'कहिये, पाप लोग पानंद से तो हैं ?' 'जी विल्कुल ।' 'जी बिल्कुल फिर उन दोनो ने भागे-पीछे एक से ही शब्द कहे । अनिता ने अपनी मोटी-मोटी आँखों से सारे कमरे का निरीक्षण किया । उमको यह भी ड्यूटी थी कि वह अपने नीचे काम करने वाले कर्मचारियों के काम को देखें, यदि कोई खराबी हो तो उसे ठीक करवा ले । अनिता की नजर ठाकुर साहब की बडे फोटो पर भी रुकी । फेम पर फूलो की माला और फोटो के सामने धूप सुलगती देख कर उमने इतमीनान की साम ली। इतने मे ही गोपाल कुर्सी ले पाया और किशन उसे झाडते-पोंछने हुए बोला-'पधारिये कुमारी जी।' अनिता ने एक नजर धुर्मी पर डाली और फिर दीवार के साथ रणे हुए बडे तस्त-पोश की पोर वढी, जिस पर उजली चादर बिछी थी और दीवार के साय-माथ कुछ गाव-तकिये लगे थे। अनिता ने धीमे स्वर मे कहा-'कुमी रहने दो, मैं तस्ल-पोग पर ही बैठूगी । कुर्सी पर बैठने में कुछ मजा नही माता । हम देशी लोग है इमलिए देशी ढङ्ग से बैठने मे ही हमे पाराम मिलता इतना कह कर अनिता तस्ल-पोग पर जा बैठी, मोर कोहनी गाव- तकिये पर टेक कर उसने अपने पांव माडी मे ढंक लिये।

Ur
-
किशन बोला- 'कुमारी जी, हम तो आप को ऊपर से देख रहे
थे। आप काफी देर तक तो फाटक के पास ही खड़ी रहीं।'
यह बात सुनकर अनिता ने अपनी आँखें उठाई और किसान और
गोपाल की ओर यों देखा जैसे वह छोटे-छोटे बुद्ध बच्चे हों । और फिर
चेतकल्लुफी से मुस्करा कर बोली-~-'अच्छा तो आप देख रहे थे
ऊपर से ?'
'जी...''जी हाँ।'
'अच्छा ! मैंने तो आप लोगों को नहीं देखा।'
किशन---'हम खिड़की में ही तो खड़े थे।'
अनिता-'श्रोह ! तो यह बात है !'
गोपाल--'जी, यही बात थी। यदि आप अपर को नजर उठाती
तो आपको हम खिड़की में ही दिख जाते ।'
अनिता-~~'मुझे क्या मालूम था कि आप लोग खिड़की में खड़े थे।
मैं समझी थी कि आप लोग अपने काम में जुटे होंगे।'
अनिता ने उन पर चोट की। यह सुनकर वे दोनों घबरा गये कि
-अनिता ने अगर ठाकुर साह से उनकी शिकायत कर दी तो वह उनकी
चमड़ी उधेड़ देंगे। किशन को यात मूझी तो फौरन ही वोला-'कुमारी
जी, हम तो अपना काम समाप्त कर चुके थे और पाप ही की प्रतीक्षा
कर रहे थे।'
उनकी यह बात सुनकर अनिता अपनी इस चोट का मन ही मन में
आनन्द लेती रही । गोपाल और किगन घबराहट में आपस में इशारे-
इशारे में बातें कर रहे थे । अनिता कनखियों से सब कुछ देख रही थी,
और उनकी इस दशा का मजा ले रही थी।
.

आप यह,
इशारों-इशारो मे कुछ नय करके गोपाल उमकी और बढ़ा मोर
दोनों हाथ जोड कर बोला-'एक बात यहूँ ?'
अंनिता---'हाँ, कहो।'
गोपाल ने प्रोठ को यूक से गीला करते हुए कहा---'कुमारी जी,
वात ठाकुर माहब गे न कहियेगा।
अनिता ने जान-बूझ कर वुद्ध वनते हुए पूछा-'कौन सी बात ?'
गोपाल—'यही कि हम लोग पिडकी में बड़े थे।'
अनिता ने अनजान बनकर पूछा-'अरे । खिडकी में खड़े होने मे
क्या होता है ?'
इतने में किशन पागे बढ कर बोला-'होता तो कुछ नहीं परन्तु
आप तो जानती ही हैं कि ठाकुर माहब का गुस्मा कितना तेज है।
आपने उनसे कुछ कह दिया तो हमें डांट पड जायगी।'
अनिता पल भर चुप रही, फिर कन्धो को हिला कर बोली- मेरी
ममझ में नहीं पाता कि खिडकी में सडे होने में बुराई क्या है ?'
किशन-'जी बुराई तो कुछ नही परन्तु फिर भी हमारी विनती
यही है कि माप उनमे कुछ न कहे ।'
'ठीक है । तुम नहीं चाहते तो मैं उनसे नही बताऊंगी।'
इनना मुन कर उन दोनो ने इतमीनान की मांस ली। अनिता को
वह बिल्कुल जोकर ही दिखाई देते थे, इसीलिए तो वह उनकी बातो का
मजा ले रही थी।
गोपाल और किशन को हादिक इच्छा रहती कि उन्हे किमी रोज
भनिता में बातचीत करने का मौका मिल जाय । एक आध बात तो
हो ही जाती थी परन्तु माज उन्हें बहुत अच्छा मौका मिला था । वह
अधिक से अधिक बातें कर लेना चाहते थे।
२

१८ -- वैसे तो उनकी वेतुकी बातें सुनने की अनिता के पास फुर्सत ही नहीं थी, परन्तु चूंकि इस समय वह फुर्सत में थी इसलिए उसने सोचा कि चलो थोड़ी देर तक इन मूरों की बात का ही मजा लिया जाय । ठाकुर साहब के दरवाजे पर बैठे-बैठे रामू को किशन और गोपाल की बातें और अनिता की हल्की हँसी की आवाजें सुनाई दे रही थी। उसके पेट में भी मरोड़ उठ रहे थे । काश ! इस समय वह भी अनिता के पास बैठ कर उसकी मीठी-मीठी बातें सुन सकता और उसकी प्यारी-प्यारी शक्ल देख सकता । वह सोच रहा था कि न जाने उसने क्या पाप किया था कि जो ठाकुर साहब ने उसे अपने दरवाजे पर ही बैठा लिया । अनिता से बातें करने का आज कैसा सुनहरा मौका मिला था जिसका वह लाभ भी नहीं उठा सकता था। उसी तरह वह अपने मन में कुढ़ रहा था कि अन्दर से ठाकुर साहब की भारी आवाज सुनाई दी-'रामू !' रामू ने उछल कर जवाब दिया--'पाया ठाकुर साहब ।' अन्दर पहुँचा तो ठाकुर साहब ने कहा-~-'देखो रामू, पनवाड़ी की दुकान से सब के लिए एक-एक बोतल कोकोकोला और पान लगवाकर ले पायो। हाँ, कुमारी जी से भी पूछ लेना । यदि उन्हें भी प्यास लगी हो तो एक कोकोकोला उनके लिए भी लेते आना।' यह सुनकर रामू की बांछे खिल गई । आखिर भगवान ने उसकी प्रार्थना सुन ली और उसे अनिता से दो बातें करने का मौका मिल गया। वह भागा हुआ बड़े कमरे में पहुंचा और जाते ही दोनों हाथ जोड़ कार बोला-'नमस्ते कुमारी जी।'

१६
उसे देख कर भनिता हमी । मन में रहने लगी-तो यह तीसरा
वुद भी पा गया । फिर बोली-'क्या बात है रामू ? इसने वौसलाये
हए क्यों हो ?'
'जी मुझे ठाकुर साहब ने भेजा है ।'
'अच्छा, तो क्या कहा है उन्होंने ?'
'जी बात यह है कि उन्होंने सबके लिए कोकोकोला मँगवाया है
और उन्होंने कहा था कि भार से भी पूरब लू वया पार कोकाकोला
'पियेंगी?'
अनिता-'नहीं।'
गमू उदास मन से कोकोकोना और पान लेने चला गया।

दो ठाकुर साहव महान् नेता थे। उन्होंने अनिता के रहने का प्रवन्ध कुछ दिनों के लिए एक होस्टल में कर दिया था। और उसे दो कमरे दिला दिये थे । अनिता सुवह नौ बजे तक ठाकुर साहब के मकान पर पहुँच जाती और उन्हीं के साथ दफ्तर चली जाती। शाम को साढ़े पाँच बजे उसे छुट्टी मिल जाती और वह अपने होस्टल वापस चली जाती थी। वहाँ मुंह-हाथ धोकर चाय पीती फिर थोड़ा-बहुत टहलने के लिए बाहर निकल जाती। अक्सर उसके साथ होस्टल की एक न एक लड़की होती। कभी-कभी ऐसा भी दिन या जाता कि उसे किसी का साथ न मिलता । ऐसे मौके पर वह या तो बाजार से अपने लिए छोटी-मोटी चीज खरीदने चली जाती थी या पास की नदी के किनारे टहलने चली जाती । नदी किनारे काफी रौनक रहती थी। वहाँ बहुत से लोग अपने बाल-बच्चों सहित टहलने जाते थे। इसलिए वहाँ अकेले घूमने में कोई डर की बात नहीं थी। अक्सर ठाकुर साहब रात को भी एक-डेढ़ घण्टे के लिए अनिता को बुला लेते । खाना खा चुकने के बाद नौ बजे तक अनिता ठाकुर साहब की भेजी हुई कार में वैठ कर उनके मकान तक चली जाती । ठाकुर साहब उसे सारे जरूरी २१ काम बता देते, जिनका भुगतान करके माहे दस या ग्यारह के माम-पाग ठाकुर साहब की कार में बैठ कर यह लोट पाती। एक शाम जब कि अनिता को कोई साथ नहीं मिला तो वह अकेली ही नदी की पोर चल दी। नदी होस्टल से कुछ ज्यादा दूर नहीं थी। यही दो या ढाई फर्लाङ्ग का फासला होगा। वहीं पहुंची तो सदा की तरह बाल-बच्चेदार लोग भी पाये हुए थे जिनमें स्त्रियां भी थी। वहां लोग अपने काम मे काम रसते थे, कोई किसी से पूछ-ताय नहीं करता था। चाहे कोई प्रवेला हो, चाहे किसी गायी या वाल- बच्चो सहित, हर कोई अपने पाप मे मग्न रहता था। अनिता नदी के किनारे जाकर रुक गई । जिस स्थान पर यह सही थी वहाँ से कुछ दूर तक भूमि काफी ढालू थी इमसे मागे नदी की फैली हुई जमीन थी। सूर्य प्रस्त हो चुका था और दूमरे किनारे पर सड़े हुए पेड़ धुन्धले से दिखाई दे रहे थे। जव सूर्य मस्त होने को होता तो नदी के पानी में आकाश की लाली झलकने लगती। पौर रगीन वादलो का दृश्य पानी मे भी दिखाई देने लगता । परन्तु इस समय मूर्य की लाली गायब हो चुकी थी इसलिए नदी का पानी स्लेटी रंग का दिखाई दे रहा था। मनिता इस वातावरण में चुपचाप खडी थी कि इतने में पीछे से पावाज माई-'मरे माप ?' अनिता को प्रावाज कुछ जानी-पहचानी सी लगी। उमने जरा घूमकर देखा तो वायू भरविन्द कुमार सढे नजर भाये, जो उम ममय दोनो हाथ जोड़ कर भनिता को नमस्कार कर रहे थे। मरविन्द कुमार 'कुली पार्टी के नेता थे। उनको मायु छत्तीम-मेंतीस वर्ष के लगभग होगी। कद जरा निकलता हुअा था, बदन एकहरा लेकिन . हो मजबूत थी। हाथ देहातियों की तरह बड़े-बड़े, और अंगुलियाँ लम्बी या मोटी थीं। चेहरे की हड्डियां भी चौड़ी थीं। माथा छोटा, मौहें नी, कल्ले पिचके हुए, दाँत जरा बड़े, रंग गेहुंआ, ठुड्डी जरा चौड़ी और आगे को निकली थी, ऊँची गर्दन थी। सिर के बाल खूब घने, मोटे गौर काले थे। इस समय सदा की तरह वह लम्बा सा कुर्ता पहने हुए थे, कुर्ता खद्दर का और चौड़े मोहरे का पाजामा भी खद्दर का ही था। अनिता उन्हें पहचानती थी क्योंकि वे दोनों राजनीति के मैदान के सिपाही थे । यह अलग बात थी कि अनिता सत्ता पार्टी में थी और अरविन्द कुमार कुली पार्टी के बड़े नेता थे। अनिता ने नमस्ते का उत्तर दिया तो कुमार साहब ने दो कदम आगे बढ़ कर पूछा-'अनिता जी, आप यहाँ कैसे ?' कुछ कहते-कहते अनिता रुक गई। उसने सोचा कि यदि उसने बता दिया कि वह तो हर रोज ही इधर घूमने आती है तो उसकी मुसीवत हो जायगी। यह जानती थी कि. कुमार साहब बड़ी चिपकू किस्म के आदमी हैं। यदि उन्हें पता चल गया कि वह वहां हर रोज आती है, तो वह उसे बोर करने के लिए हर रोज वहाँ पहुँच जाया करेंगे। चुनांचे यह सम्हल कर बोली-'आज शाम फुर्सत थी, कोई और काम करने को नहीं था इसलिए सोचा, कि चलो नदी तक टहल ग्राऊं। इतने में कुमार साहब उसके वरावर पाकर खड़े हो गये और दांत निकालते हुए बोले-'यह तो आपने बहुत अच्छा किया । मुझसे पूछिये तो आपको यहां हर रोज पाना चाहिए, क्योंकि थोड़ा-बहुत टहलना स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी है।' .

पनिताने वात बनाते हुए कहा-'मार टीक ही कहते हैं, परन्तु क्या किया जाय, पूर्मन नही मिलती है।' इम पर कुमार जी ने दोनों हाय कार उठाते हुए कहा-'जी नहीं में पारकी यह बात मानने को तैयार नहीं हूँ। पार युद ही बनाइये कि गांधी जी से प्रपिक व्यस्त और कौन होगा, परन्तु यह नो टहलने के लिए ममय जरूर निकालते थे। भजी उनको गोखले जी से भी वही बम धनती रहती थी। गांधी जी उन दिनों बहुन अधिक प्रसिद्ध तो नहीं थे, परन्तु उन्होंने उस समय तक अपने नियम बना लिये थे । वह खुद गोसते जी से अनुरोध करते रहते कि वह दिनी प्रकार का व्यायाम जरूर करें पोंकि गौसले माहब का स्वास्थ हमेगा हीमराव रहता था। गोवन जी ने अधिक काम का बहाना लगा कर कभी व्यायाम नहीं किया। गांधी जी ने भी उनके इस बहाने को कभी स्वीकार नहीं किया। अनिता तो जानती ही थी वि कुमार मार की जुबान बटुन चलती है । बात करने का कोई वहाना होना चाहिए । दम उमी पर कुमार मात्र एक भाषण दे डालन । उनी वातं मुनकर अनिता जान-बूझ कर सुर रही क्योकि वह जानती थी कि यदि उसने कोई उनर दिया तो कुमार माह की बातों की गाडी फिर चानू हो जायगी । परन्तु कुमार जैसे नैना इन मामूली चुप्पियों के सामने हथियार डारने वाले नही थे। पल भर कर कर उन्होंने फिर बोलना शुरू कर दिया-'मार नो पदी. लिमी महिला है, प्रारो गमकाना नो मूर्य को चिगग दिखाने वाली बात है। अनिता गमन गई कि उनके चुर रन पर कुमार साहब उनका पीछा छोडने वाले नहीं थे। बुधन वृध उत्तर देना उरूरी था। राना च कर वह मुस्करा दी और धीरे से बोली-'मैं आपकी बात से हमत हूँ। अब मैं इस बात की कोशिश करूँगी कि यदि शाम को नहीं को सुबह के समय व्हल लिया करूं।' अपनी बात मनवाकर कुमार साहब खुश हुए और चहक कर वोले-'यह सुन कर मुझे बहुत खुशी हुई कि आप मुझसे सहमत हैं। देखिये ना आपका जीवन संघर्ष का जीवन है। कभी यह काम करना, कभी वह काम करना । दिमागी मेहनत आपको अलग करनी पड़ती है। इसलिए अपना स्वास्थ्य बनाये रखना आपके लिए बहुत ही जरूरी है। यदि संध्या को समय नहीं मिलता तो सुबह के वक्त ही थोड़ा-बहुत घूमा कीजिये। मुबह की हवा तो संध्या की हवा से और भी ज्यादा अच्छी होती है।' 'पाप ठीक कहते हैं।' यदि अनिता उनसे सहमत न होती तो कुमार साहव घण्टों इसी विषय पर बात करते चले जाते । परन्तु उसके सहमत हो जाने से उनकी बातों की चलती हुई गाड़ी रुक जाती । शायद उन्हें अनिता के स्वास्थ्य की भी इतनी फिक्र नहीं थी, हो सकता है कि ऐसी सुन्दर लड़की को देख कर कई बार उनका मन चाहा हो कि उससे बातें करें । अाज मौका मिलने पर वह कैसे चूक सकते थे। वातों का सिलसिला समाप्त हो गया तो कुमार साहब को यों लन जैसे प्रनिता किसी बहाने से खिसक जायगी। वह यह नहीं चाहते थे सुनांचे जल्दी में और कोई बात नहीं सूझी तो वोले-'अनिता जी, से थोड़ी दूर पर जाकर एक छोटा रेस्टोरेण्ट हैं। रेस्टोरेण्ट भी है, एक खपरैल का सुला हुया कमरा है जो देखने में केवल वरामद लगता है। उसके सामने नदी की अोर एक काफी बड़ा चबूतरा है पर नाम के समय बुमियां और मेन लगा दी जाती 1 रेस्टोरेण्ट वेशा मामूली सा है, परन्तु यहाँ की चाय बहुत बढ़िया होती है । माप एक वार पो लें तो सुद ही मान जायेगी। कहिये तो वहाँ चलें, माघ-गौन घटा बैठ कर पाय पिये और कुछ गप-दाप का मजा उठायें। अनिता ने कभी सोचा भी नहीं था कि कुमार साहव इन प्रकार का गुझाव देंगे। यह जल्दी में कुछ फैमला न कर सकी कि उसे उनके माय जाना चाहिए या नहीं । इतना तो वह जानती थी कि ठाकुर साहब को पता चल भी जाय तो वह बुरा नहीं मानेगे । भला, युरा मानते भी मंगे? वह अच्छी तरह जानते थे कि अनिता उनकी मुट्ठी में है और उनमें कट कर उसका कोई भविष्य हो ही नहीं सकता। पनिता को इस तरह सोच में ड्वे देख कर कुमार मात्र बोले- परे, पाप विस मोच मे डूब गई। मनिता चौक कर बोली-"जी कोई सास बात तो नही सोच रही है। कुमार-'शायद आप यह समझती हो कि मैं दूसरी पार्टी का आदमी हूँ और पाप दूमरी पार्टी की । अनिता जी, राजनीति में तो ऐसी बातें चलती रहती हैं । चाहे हमारी पार्टियों का कितना भी विरोध हो परन्तु यह तो असंभव है कि मैं ठाकुर साहब को चाय पर बुलाऊँ तो वे इन्कार कर दें, या वह मुझे बुलायें तो मैं इन्कार कर दूं। इस संसार सब कुछ चलता है। पार्टी बाजी भी चलती है और एक दूसरे के मामाजिक संबंध भी चालू रहते हैं।' मनिता सिर हिला कर बोली-'नही कुमार साहब । मेरे चुप रहने का अर्थ भाप गलत ममझे; ऐमा विचार तो मेरे मन में कोई नहीं पाया।"

२६ - कुमार साहब खुश होकर बोले- 'तो चलिये फिर ।' 'चलिये।' वे दोनों बातें करते हुए रेस्टोरेण्ट की ओर बढ़े । वहाँ पहुँच कर अनिता ने देखा कि कुमार साहब ने वात सच ही कही थी। नदी की सतह से कुछ ऊपर सीमेण्ट का वड़ा सा चबूतरा था, वहाँ बैठने पर चारों ओर से ठण्डी हवा पाती थी। चबूतरे के तीन तरफ सीमेण्ट का दो फीट ऊँचा जंगला बना हुआ था। वे दोनों एक कोने में छोटी सी भेज के निकट कुर्सी पर बैठ गये । वहाँ बैठे-बैठे नदी में तैरने वाली नोकामों को वह देख सकते थे, और मल्लाहों के गीत भी सुन सकते थे । मन ही मन में अनिता ने उस रेस्टोरेण्ट को इतना पसन्द किया कि उसने निश्चय कर लिया कि वह हर रोज संध्या की चाय उसी जगह पिया करेगी। फिर उसे ख्याल आया कि यदि कुमार साहव का हर रोज उधर का चक्कर लगता होगा तो बड़ी परेशानी होगी क्योंकि वह अपनी किसी सखी के साथ बैठ कर चुपचाप चाय नहीं पी सकेगी। मन का संदेह दूर करने के लिए उसने प्रश्न कर डाला---'कुमार साहब, आपको यह जगह इतनी पसन्द है तो, श्राप यहाँ हर रोज ही माते होगे? 'अनिता जी मेरी इतनी किस्मत कहाँ ! यह नेतागीरी का काम ऐसा है कि मैं रोज शाम के समय आ नहीं सकता। हाँ कभी दूसरे- तीसरे महीने शहर के इस भाग में चला पाऊँ तो यहाँ चाय जरूर पीता है। यह सुनकर अनिता के मन से वोझ सा उत्तर गया। कुमार साहब ने चैरे को बुला कर चाय का आर्डर दिया।

कुमार साहय अभी विद्यार्थी ही ये जब उन्हे राजनीति में दित- चस्पी पैदा हो गई। कालेज और यूनिवसिटी में भी यह कोई न कोई पार्टी बना कर हडवोंग मचाते रहते थे। पड़ने-लिखने में उनका कोई ध्यान नहीं था। एक बड़ा भाई था जो कारोबार करता था और अपने बाल-बच्चों सहित पाराम से जीवन व्यतीत करता था। कुमार माहय ने न कोई काम किया और न शादी की । वह तो मजदूरी पोर कुलियों की पार्टी बना कर हड्ताले करामा करते थे, और इस बात को स्वप्न देखा करते थे कि एक रोज जब उनकी पार्टी दूसरी सब पार्टियों को इरा देगी तो वह देश के सबगे बढ़े नेता कहलायेंगे और मुख मन्त्री बनेंगे। उनकी इन हरवती का नतीजा यह निकला कि उनकी मोटी दो यहनों की शादी भी पढे भाई को करनी पड़ी। उनका बाप तो बचपन में ही मर चुका था, येवल मां थी जो मदा अपने बड़े बेटे के साथ रहती पो । यद्यपि उन्होंने अपना जीवन पार्टी को अर्पण कर दिया था, और गगार को दूसरी चीजो से मुंह मोड लिया था, फिर भी कभी-कभी अनिता जेमी लड़की को देखकर उनके दिल मे गुदगुदी होने लगती । प्राज तो उन्हें इस बात का भी मौका मिल गया था कि वह अनिता से अकेले में बैठ पर बातें करें। अपने मन में यह समझते थे कि भनिना का ठाकुर गाहब के पहलू में नहीं, बल्कि उनके अपने पहलू में था । प्रापिर अनिता गरीब घर की लहकी थी, और ऐमी जाति मे मम्बन्ध रखती दो कि जिसे समाज में अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता था । परन्तु अपने मन की यह बाते वह भुल कर नहीं कह मकते थे। आखिर वह भी तो छोटे-मोटे नेता थे, पीर इस बात को समझते थे कि अपना दृष्टिकोण दूसरे के प्रागे रखने का ढङ्गमा होना चाहिए । इस समय यह कोई भी ऐसी बात कहना नही स्थान - २८. चाहते थे जिससे अनिता भड़क जाय और भविष्य में उनसे बात करने से भी कतराने लगे। अभी तो वह अनिता को यह विश्वास दिलाना चाहते थे कि वह बड़े ऊँचे विचारों के मनुष्य और ऊँची श्रेणी के नेता हैं। इसका सीधा-सादा तरीका यह था कि वह वेकार की आलोचना न करें, और ठाकुर साहब तथा उनकी पार्टी का विरोध न करें क्योंकि इसका यह परिणाम हो सकता था कि वह अनिता की नजर से गिर जाते। वह इतना अच्छी तरह समझते थे कि यदि आज वह अनिता मन के पर अपना अच्छा प्रभाव डालने में सफल हो गये तो आगे बड़ी सुविधा होगी। चाय पाने तक दोनों पर मौन छाया रहा। अनिता अपने मन में सोच रही थी कि राजनीति की बातें न चले तो अच्छा है, क्योंकि इस समय वह हल्की-फुल्की बातें करने की मूड में थी। वह अपने मन में जल्दी-जल्दी सोचने लगी कि वह खुद ही कोई ऐसी वात शुरू कर दे, वरना नेता जी की गाड़ी चल निकलेगी। जल्दी में कुछ नहीं सूझा तो वोली-'आप क्या इसी शहर में रहते हैं ? मेरा अर्थ है कि आपके मां- वाप इसी शहर के थे ?' 'जी हाँ। ऐसा ही समझिये । वैसे तो मेरे पिता जी की देहात में छोटी-मोटी जमीदारी थी, परन्तु वे शहर में आकर नौकरी करने लगे, इसलिए हमें आप इसी शहर का ही समझे। 'आपका जन्म तो गांव में ही हुया होगा।' 'जी नहीं। मेरा जन्म यहीं हुआ है। हाँ मेरे बड़े भाई साहब का जन्म गांव में हुआ था।' इतना कह कर कुमार साहब ने अपने खानदान के सम्बन्ध में कुछ, और बातें भी बताईं। अनिता ने पूछा-'आपके बाल-बच्चे भी यहीं रहते हैं ?

२६ 'याल-बच्चे?' 'अजी... .""बाल-बच्चे कैसे ? मेरी तो अभी गादी ही नहीं हुई। 'चाय का एक छोटा मा पूंट भर कर पनिता ने प्याला मुंह में अलग हृदाया, और कुछ पाश्चर्य प्रकट करती हुई वोली-'परे ! क्या आपने अभी तक शादी ही नहीं की।" कुमार गाय ने गोचा कि कहीं अनिता यह न समझ बैठे कि विमी कारण उनकी मादी हो ही नही माती, चुनांचे वह जल्दी में बोले-'रिदते तो यहुन पाते रहे मैंने गादी की ही नहीं।' 'क्यों?' अनिता को इन बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी लेकिन वह मन में गुग थी कि जैसी हल्की-फुली यात वह चाहती थी वैसी ही हो रही है। उपर न जाने क्यों कुमार साह्न भी युग थे कि यह विषय चाल निकला है। शायद वह पनिता को अच्छी तरह समझा देना चाहते थे कि अभी उनके मन का मिहामन मूना ही पड़ा है, और यह भी कि यदि योई लड़की चाहे नो उम मिहासन पर विराजमान हो गस्ती थी। अनिता फिर मुम्बरा कर बोली-'आपने शादी की क्यो नही ?' 'अब क्या बताऊँ ? मैं उग ममय गादी को कोई महत्व नहीं देना था। और मैंने अपना जीवन जनता के लिए अर्पण कर दिया था।' अनिता होशियार सहकी थी। उसने बढे मजे की बात पूरी- 'मच्या तो प्रय मापका इनके बारे में क्या विचार है ?' 'किनके बारे में? 'यही गादी, पत्नी मादि के बारे में ।' पनिता की यह यात मुनकर कुमार के मन में गुदगुदी मी होने मगी। पहले तो कुछ गर्मा गये, फिर बोले-'देखिये उन दिनों नो - ३२ कुमार साहब फिर खुश हो गये। उन्हें लगा कि यह बात तो अनिता ने यों ही कह दी थी, वरना उसके मन में तो कोई और ही बात है। वह क्या बात है, यह कुमार साहब अच्छी तरह समझते थे । उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि अनिता इतनी जल्दी बेतकल्लुफ हो जायगी । उनके मन में एक तूफान सा आ गया, लेकिन उन्होंने अपने आपको सम्भालने की पूरी-पूरी कोशिश की, क्योंकि उन्हें इस बात का भी डर लगा हुआ था कि कहीं इस मौके पर उनसे जरा सी भी भूल हो गई तो यह खूबसूरत चिड़िया उनके हाथ से निकल जायगी। उनको इस तरह तुप देख कर अनिता ने पूछा--'पाप खामोग क्यों हो गये ? क्या आपको मेरा सुझाव पसन्द नहीं आया ?' 'जी नहीं, भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है ? जब आप स्वयं दिलचस्पी ले रही हैं तो भला मैं उसमें टाँग अड़ाने वाला कौन हूँ?' 'तो फिर मुझे इस बात की इजाजत है कि मैं आपके लिए कोई अच्छी लड़की ढूंढ़ निकालूं ?' कुमार साहब को इन बातों में बड़ा आनन्द आ रहा था, फौरन ही बोले-'हाँ-हाँ, आप अवश्य तलाश कीजिये ।' 'वैसे आप निश्चिन्त रहिये, जब मैं कोई लड़की ढूंढ़ लूंगी तो 'आपकी उससे मुलाकात भी करा दूंगी, ताकि श्राप दोनों एक दूसरे को 'पसन्द कर लें।' कुमार साहब ने मन में सोचा कि अनिता दूसरी लड़की का बहाना बना कर दर-असल अपने ही दिल की बात कह रही है । जव अनिता खुद ही अपने मन की बात कह रही थी तो फिर उन्हें अपनी ओर से कुरेद करने की क्या जरूरत है ? सभी लड़कियाँ शर्मीली होती हैं, इस- लिए अनिता का इतनी बातें कह देना ही काफी है। आज की बात - जहाँ को तहाँ रह जानी पाहिए । अव तो प्रनिता भविष्य में फिर इस बात को मागे घड़ायेगी ही। यह सब कुछ सोच पर उन्होंने कहा- 'अनिता जी, मुझे मालूम नहीं था कि माप मेरो इम ममस्या में इतनी गहरी दिलचसी लेंगी। इसलिए में यह मब घुध पाप ही पर घोड़ना है, जो पापका जी पाहे गो कीजिये ।' वात यहाँ तक प?चकर रुक गई । मब अनिता को समझ में कुछ नहीं पा रहा था कि वह और किम विषय पर यात शुरू करे। उधर कुमार माय भी इस मोन से परेगान थे। यह डरते थे कि यदि कोई बात-चीत न हुई तो अनिता वहाँ मे चलने का मुझाव दे देगी । इम- लिए यो ही बात मोड़ने के लिए कह दिया-'अनिता जी आपके लिए भी मेरा एक मुझाव है । कहिये तो अपना मुझाव पापी मागे रस ?' भनिता घबरा गई कि कहीं कुमार साहब उसकी शादी की बात न धेड़ दें। परन्तु कुमार साहब इतने मूसं नहीं थे, उन्होंने केवल यही कहा-'मेरा मुझाय यह है कि पाप दूसरी पार्टियो से भी सम्बन्ध स्थापित करें। 'कुमार माह्य मुझे इन सब बातो से क्या लेना है ? ठाकुर मार जो काम यह देते हैं मो में कर देती है। मुझे राजनीति की बातों में, कोई विदोष दिलपस्पी नहीं है।' 'चाहे मापो दिलचसी न हो, परन्तु इस क्षेत्र में मार मा तो चुकी हैं। इसलिए दूसरी पार्टियो के बारे मे मौर उनके दृष्टिकोण के बारे में पापको कुछ न कुछ जान सो होना ही चाहिए । प्रन्दा, यह तो बताइये कि मार कभी मेहर वावा से मिली हैं ?' .

३४ 'वह बड़े अच्छे अादमी हैं। मेहर बावा 'मानवता पार्टी के नेता हैं । उम्र सत्तर के पास-पास है। आप उनसे भी मिलिये और दूसरे नेताओं से भी भेंट कीजिये ।' इसके बाद कुमार साहब ने काफी लम्बा भापण दिया । अनिता ने पीछा छुड़ाने के लिए कह दिया कि आप कहते हैं तो जरूर मैं मिलूंगी।

तीन उनमार कुमार माहव की अनिता के दो वाद-चंड दुरे, मन में याद रखने वारी तो एक नो दात नहीं थी, और न अनिता को यह वा याद रहो। परन्तु मानदला पा के नेता महर वादा के बारे में जो कुछ कुमार ने कहा या दह से नहीं ली। मट्टर बाबा का नाम मन पहले भी मुना था । परन्तु उनके दार में कुछ अधिक जाने की जरूरत महसूस नहीं हुई। उनने अददारों में मेहर दारा करे कोड़ा-बहुत पट्टानी या, लेकिन उपने की इस बात की जरूरत नहीं महमून की कि महर बादा के विचार और मिटान्न क्या है? परन्तु कुमार माहब की प्रदान हर बाबा कीना मुन कर उन नद किया किोि गत्र द उनका नाम सुनने बानी। महा बाबा नान में ही एक माय, नहसून हाउन अन्दवारों ने छोन पंटो नी देन्द्र थे। यादी मन ना एक दुसरे को गालियां दे रहँदै थे, और एक दुनो की बहुत ही रोचता करते रहत थे, परन्तु उसने किसी पुल को हर बादा के दार में मनु- वित बन्द कह नही मुना था । उनले सही अनुमान लाल तिवाद किसी का मेहर बाबा से राजनैतिक मामलों में कितना भी मतभेद हो लेकिन व्यक्तिगत रूप में सभी उन्हें मान देते थे। उस रात इसी प्रकार की बातें सोचते-सोचते वह सो गई। दूसरे दिन जब वह ठाकुर साहब के यहां पहुंची तो वह कुछ और लोगों के साथ विचार-विनिमय कर रहे थे। उस समय अनिता ने ठाकुर साहब के चेहरे का निरीक्षण किया। उनके चेहरे के नाक-नक्शे से साफ दिखाई पड़ता था कि ठाकुर साहब किसी खास समस्या में गम्भीरता से विचार-विनिमय कर रहे हैं । इसी प्रकार के विचार प्रा-जा रहे थे कि इतने में जो लोग ठाकुर साहब के पास बैठे थे वे उठ कर चले गये। अब कमरे में उन दोनों के सिवा और कोई नहीं रह गया था। एकाएक ठाकुर साहब ने भारी स्वर में कहा-'अनिता !' अनिता यों चौंकी जैसे उन्होंने उसके मन के विचार समझ लिये हों, हालांकि उस वक्त ठाकुर साहब उसकी श्रोर देख भी नहीं रहे थे। अनिता ने तुरन्त उत्तर दिया-'जी!' 'इधर पायो।' अनिता को लगा कि आज ठाकुर साहब के स्वर में थोड़ी सी कठो- रता पा गई थी, वह अब भी उसकी ओर नहीं देख रहे थे। अनिता उठकर उनके निकट जा वेठी, और फिर बोली-'जी।' ठाकुर साहव का चेहरा काफी गम्भीर हो रहा था बिलकुल वैसा ही जैसा कि किसी को डाटते समय हो जाता था । अनिता ने अपने दिमाग पर जोर डाल कर सोचा लेकिन वह समझ नहीं पाई कि उससे ऐसी कौन सी भूल हो गई थी जिसके कारण ठाकुर साहब को उस पर क्रोध पा रहा है।

ठाकुर साहब फिर बोले-'तुम कल शाम कहाँ थौं ?'
ठाकुर माहव से अनिता को इस प्रकार के प्रश्न की माशा नहीं
थी। वह ऐमी हड़बड़ा गई कि पल भर को वह बिलकुल ही भूल गई कि
पिछली शाम वह कहां थी? फिर एकाएक सारी बात याद मा गई ।
वह कुमार साहब के साय थो परन्तु उत्तर में उसने केवल इतना ही
कहा-'कल शाम में नदी के किनारे घूमने चली गई थी।'
'साय और कौन था?'
ठाकुर साहब का भारी स्वर सुनकर अनिता समझ गई कि उन्हे
कुमार साहब के बारे में पता चल गया है, इसलिए उस बात को
छिपाना अच्छा नहीं होगा। वैसे भी अनिता के मन में कोई चोर नहीं
था । उमने यह समझ कर मुलाकात की थी कि ठाकुर साहब इसे
पसन्द नही करेंगे। उसने साफ-साफ कह दिया-'अक्सर तो मैं एक न
एक महली को साथ ले जाती हूँ परन्तु कल कोई नही मिला इसलिए
अकेली ही चली गई।
'तो?'
'वहां कुमार साहब से भेंट हो गई थी।'
'कौन कुमार साहब ?'
अनिता समझ गई कि ठाकुर साहब भूठ-मूठ को अनजान बन रहे
हैं । बोली-'वही कुली पार्टी के नेता।'
'तुम उन्हें कब से जानती हो ?'
'कल से पहले तो मैं उनके बारे मे कुछ भी नहीं जानती थी, सिवा
इसके कि वह भी एक पार्टी के नेता थे। व्यक्तिगत रूप में मेरी उनकी
मुलाकात कभी नहीं हुई।
।

और जव बहुत अव ठाकुर साहब ने पहली बार नजर उठाकर उसकी ओर देखा। उनकी आँखें लाल थीं, गुस्से के कारण नहीं, बल्कि रोज संध्या के समय शराब पीने की वजह से उनकी आँखें सदा ही लाल रहती थी यानी विना क्रोध के भी लाल, क्रोध आता था तो वह दहकता हुया अंगारा बन जाती थीं। अनिता ने फिर विश्वास दिलाते हुए कहा-'ठाकुर साहब मैं आप को सच्चे दिल से बता रही हूँ कि कुमार साहव से मेरी कल से पहले कभी मुलाकात नहीं हुई। हाँ यों ही किसी जल्से में उन्हें देख लिया हो, या एकाध बातें हो गई हों, तो उसकी कसम मैं खा नहीं सकती। कल भी हमारी मुलाकात हरगिज न होती, परन्तु वह इत्तफाक से वहाँ पहुँच गये । मैं तो उनसे पीछा छुड़ाना चाहती थी परन्तु वह तो हाथ धोकर मेरे पीछे ही पड़ गये। उन्होंने एक प्याला चाय भी पिलाया और वे सिर-पैर की बातें करते रहे।' इतना सुन कर ठाकुर साहब हँस दिये। उन्हें खुश देख कर अनिता को भी कुछ इतमिनान हुआ और उसकी घबराहट दूर होने लगी। ठाकुर साहब फिर बोले-'क्या-क्या बातें हुई थी ?' जिस ढंग से उन्होंने यह प्रश्न किया था उससे अनिता को लगा कि वे कुरेद करने के विचार से नहीं पूछ रहे थे, बल्कि साधारण ढंग से ही वात कर रहे हैं। अनिता मुस्करा कर बोली-~'बातें तो बड़ी मजे की हुईं। ठाकुर साहब ने दिलचस्पी लेते हुए कहा-'अच्छा ! हम भी तो सुनें कि ऐसी क्या वातें हुई ? 'इतना तो मैं जानती थी कि वे बड़े बातूनी हैं और खासकर उनके राजनीति के विषय पर भाषण देने से मुझे बहुत ही डर लग रहा था ।'

ठाकुर माहब इन वार में नुम हो गये क्योंकि इससे पता चलता था कि अनिता को पुती पार्टी को नीति में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह हेमकर बोले-'तुमने उन्हें टालने की कोशिश नहीं की ?' 'जी कोशिग तो की, परतु प्रार तो जानठे ही हैं कि वह टलने वाले असामी नहीं हैं।' 'यह तो तुम ठीक कहती हो, वह ही दिर किस्म का आदमी है। उसकी इस भादन से तो मच्छे-अच्दै लोन कतराठे हैं। नना एक लड़की क्यों न घबरायेगी? 'जी हाँ ! मैंने विषय का रुख बदलने के लिए उनके निजी बातें शुरू कर दी। उनके नानदान और गृहस्थी के बारे में, माय ही मन माम तौर पर उनकी मादी का प्रश्न भी उठाया। यह मुनकर टाकुर माहब को दुध और मना आया, गहरी दिन- चम्पी मते हुए उन्होंने पूछा-'अच्छा नो इनवे दार में उसने या कहा ?' 'जब मन उनके बाल-बच्चों के बारे में पूछा तो उन्होंन बनाया कि बड़े भाई माहब की शादी हो चुकी है, परन्तु मैं..."।' इस तरह अनिता ने मारी बातें दवा दी। ठाकुर मार उनकी दातों का प्रानन्द लेने रहे। अन्त में जरा में गम्भीर होकर बोले- 'अनिता, तुम समझदार लड़की हो इसलिए मैं नुन्हें किसी ने मिलने- सुनने से मना करने की जरूरत नहीं समझता है । वन देवल इस बात का ख्याल रखो कि नुम मेरे नाय काम करती हो और मैं एक पार्टी का बड़ा नेना है, इसलिए तुमने कोई एनी हरकत नहीं होनी चाहिए और न तुम्हारे मुंह में कोई ऐनी बातं निकलनी चाहिए दिमने हमारी पार्टी को बदनामी हो या हमारा कोई मंद भूल जान।'

पहले तो अनिता डर गई थी, परन्तु उनकी पूरी बात सुनकर उसे मिनान हो गया कि उन्हें इस बात पर क्रोध नहीं आया। इसके थ ही अनिता यह भी समझ गई कि उसे इस धोखे में नहीं रहना हिए कि ठाकुर साहव को उसकी किसी हरकत का ज्ञान नहीं हो कता। यह ठीक है कि उन्होंने उसके पीछे जासूस नहीं लगा रखे थे, किन इस बात की सम्भावना तो सदा ही हो सकती थी कि उसकी किसी भी हरकत का ठाकुर साहब को ज्ञान हो सकता था। यह सब कुछ समझते हुए अनिता ने ठाकुर साहब की तसल्ली के लिए कहा- 'ठाकुर साहब, जैसा कि मैं पहले भी कह चुकी हूँ कि यदि आपको कोई आपत्ति हो तो मैं विना आपकी आज्ञा के कभी भी किसी से न मिलूं ।' ठाकुर साहब काफी चालाक थे। उन्होंने यही बेहतर समझा कि अनिता को ढील देकर ही रखें, ताकि वह बहुत चौकस न होने पाये । यदि उन्होंने रोक लगा दी तो इस बात का भी डर था कि अनिता चोरी-छिपे ही कोई ऐसी हरकत कर बैठे जिसका उन्हें पता भी न चलने पाये। वैसे भी अनिता ऐसी स्थिति में नहीं थी कि उनसे नाता तोड़ने की बात सोच सके । इसलिए उन्होंने बड़ी उदारता से कहा- 'नहीं अनिता, ऐसी कोई बात नहीं। तुम्हें जैसे कुमार साहव ही मिल गये थे, तो क्या तुम मेरी आज्ञा लेतो फिरोगी। तुम जहाँ जी चाहे घूमो, जिससे जी चाहे मिलो, परन्तु केवल उन बातों का ख्याल रखना जो मैंने अभी-अभी तुम्हें बताई हैं।' 'जी, बहुत अच्छा। इतने में ही ठाकुर साहब का एक आदमो अन्दर आया और ठाकुर साहव के निकट जाकर बोला-'ठाकुर साहब मैकू श्राप मिलना चाहता है।'

'कोन मैकू?'
'वही चमार ।'
'मोह, वह बुड्ढा-बुढा सा?'
'जी हां, वहीं जिसकी आयु पचास वर्ष के लगभग होगी।'
'हां, याद मा गया; अच्छा उसे अन्दर भेज दो।'
यह मुनकर वह कर्मचारी तो कमरे के बाहर चला गया और पल
मर बाद दरवाजे में मैकू की शक्ल दिखाई दी। उसका बदन एकहरा,
और डील-डौल बढ़ा था, मुंह में पान मरा था जिसका रंग उसको
वाद्यों तक फैला हुआ था। दह शक्ल में ही पूरा गुण्डा दिखाई देता
था। अन्दर पाठे ही उमने पहले तो अनिता की ओर घूरकर देखा,
और फिर ठाकुर मार के निकट पहुंचकर दोनो हाथ जोड़ते हुए केचे
स्वर में बोला--'अन्नदाता!'
कहने को तो वह ठाकुर माहब को 'अन्नदाता' यह रहा था परन्नु
उसके रंग-ढंग से लगता था कि वह भी अपने प्रारको बहुत महत्वपूर्ण
व्यक्ति नममता है।
ठाकुर माहब ने अपनी मूंछ को उंगलियों से मरोरते हुए कहा-
'प्रायो, मैकू ! कहीं कैसे प्राना हुमा ?'
उत्तर देने से पहले मैकू पांव के बल पा पर वैटने लगा तो ठाकुर
माहब बोले-'पापो मै घर बैठो ना कुर्मी पर ।'
मैं अपने बड़े-बड़े हाय हवा में उठा कर बोला-'नहीं अभदाता,
हमारे बैठने का स्थान दो अापके चरणों में ही है।'
'लगता है कि किसी खास काम ने माये हो ?'
मैकू ने बिना कुछ कहे पल भर को अनिता की ओर देखा । ठाकुर
माहब बोले-'तुम निश्चिन्त होकर कही । क्या वाल है?'

४२ अनिता को लग रहा था कि मैकू खूब पिए हुए था, क्योंकि उसकी चाल और स्वर में एक प्रकार की लड़खड़ाहट थी। मैकू बोला-~-'क्या कहें अन्नदाता आपके राज में पुलिस ने हमारे नाक में दम कर रखा है।' 'क्यों खैरियत तो है ? आखिर हुआ क्या ?' 'वात यह है अन्नदाता कि हमारे मुहल्ले में एक वाबू साहब रहते हैं । हीरा लाल उनका नाम है। उन्होंने पुलिस में मेरे छोटे लड़के की रिपोर्ट कर दी है । जिसका नतीजा यह हुआ कि पुलिस मेरे लड़के नन्हें के पीछे पड़ गई है। 'अच्छा-अच्छा, तुम्हारे उस लड़के को तो मैंने देख रखा है।' 'जी हाँ, पापने जरूर देखा होगा। अभी उसकी उम्र केवल अट्ठा- रह वर्ष की होगी, पर ऐसे हाथ-पांव निकाले हैं कि सैकड़ों में अलग पहचाना जाता है।' 'अच्छा, वही जो कसरत और कुश्ती लड़ता है ?' 'जी हाँ, विलकुल वही। 'हाँ भई, ज्वान तो अच्छा है । परन्तु उसे समझा देना जवानी -संभालकर रखने की चीज है ।' 'अन्नदाता उसकी जवानी कहाँ तक साथ देगी, जब हमारी पुलिस उसे डाँटे, फटकारे और हड़कायेगी ?' 'भई, पुलिस क्यों हड़काती है ? मेरी समझ में तो कुछ नहीं -आया।' 'क्या बतायें सरकार हीरालाल ने पुलिस में रिपोर्ट कर दी है और 'पुलिस हाथ धोकर उसके पीछे पड़ गई है। दो-तीन दिन तो इसी आँख- मिचौनी में गुजरे, नन्हें उनके हाथ ही नहीं आया; परन्तु आज वह ४३ पनवाडी की दुकान पर खड़ा वीड़ी ले रहा था तो पुलिम ने जा दबोचा और उसे थाने ले गई। मैं तो घबराया हुआ मारके पास चला पाया हूँ । अन्नदाता, नन्हें प्रापका बड़ा भक्त है । मापके वोटों के लिए अभी से उसने प्रचार शुरू कर दिया है और दिन-रात इसी कार्य में लगा रहता है। पर क्या कहूं यह पुलिग वाले बड़े जालिम होते हैं, वे तो मार- मार कर उसका मर्ता बना देंगे।' 'लेकिन मैकू, कुछ तो इसका कारण होना चाहिए? 'जी कारण क्या होता ? वम यह समझ लीजिये कि करे कोई मरे कोई। बाबू हीरालाल बड़े शरीफ खानदान के बनते हैं। उनकी एक सड़की है जो बन-ठन कर कालेज जाती है और दाये-बाये प्रांखे भी मटकाती रहती है। हर समय दो-चार आवारा उगके पीछे रहते हैं । नन्हे का कहना है कि तीन-चार रोज पहले वही लड़की पनवाड़ी की दुकान के आगे से गुजरी । नन्हे वहां पान खाने गया हुआ था। न जाने किसने लड़की को कुछ बात कह दी । बस फिर क्या था लडकी सेण्डिल उतार कर नन्हें की ओर दौड़ी। नन्हे को ताव आ गया, उसने लड़की के उठे हुए हाथ को कलाई से पकड़कर रोक दिया और सेण्डिल छीन कर दूर फेंक दो । वस अन्नदाता इतनी सी बात थी, जिसका बतंगड़ बन गया । लडका बेचारा चुप-चाप घर चला पाया, लेकिन हीरालाल को चैन नहीं पडा । वह हमारे घर आकर हमे सौ-सौ गालियां देने लगा। नन्हें ने बहुत कुछ अपने गुस्से को पिया परन्तु फिर उससे नहीं रहा गया। उसने बाहर निकल कर बाबू साहब को दो-चार हाथ दे दिये। बस फिर क्या था, बाबू जी ने डाक्टर का झूठा सर्दीफिकेट वनदा पर थाने में रिपोर्ट ठोंक दी। गरीब पादमी पर हर कोई चढ़ दौड़ता. इसीलिए पुलिस उसे पकड कर ले गई।'

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'यह कितनी देर की बात है ?'
'यही एक घण्टे पहले को।'
मैकू का लड़का नन्हें मुहल्ले का माना हुआ गुण्डा था। उससे हर
शरीफ आदमी वच कर रहता था। वह बड़ा ही हथछुट था। पराई
बहू-बेटियों से छेड़-छाड़ करने में उसे कोई संकोच नहीं होता था।
हीरालाल बाबू को तो अनिता ने भी दो-चार वार आते-जाते देखा
था। वेचारे दुबले-पतले और डरपोक आदमी थे। अनिता को तो
यह सारी कहानी विल्कुल गढ़ी हुई लगी। पर वह मुंह से कुछ नहीं
बोली, उसने सोचा कि ठाकुर साहब जो कुछ उचित समझेगे करेंगे ।
ठाकुर साहब ने उस थाने के दरोगा का नाम पूछा और फिर उसी
समय टेलीफोन उठा कर उससे बात-चीत करने लगे-'हेलो-हेलो।'
दूसरी तरफ से अावाज आई-'कोन साहब हैं ?'
'मैं ठाकुर मदन सिंह बोल रहा हूँ।'
'नमस्ते, कहिये कैसी तबियत है ?'
'अच्छी है ! आपके नाके में अभी-अभी नन्हें नाम का एक लड़का
लाया गया है।'
'जी हाँ।'
'अरे भई वह अपना आदमी है। आप किसी के झांसे में न आयें
और उसे फौरन छोड़ दें।'
'जैसा आप कहें।'
'हाँ-हाँ मेरी जिम्मेदारी है। जो होगा सो निपट लूंगा। साथ ही
मैं सुपरिण्टेण्डेण्ट साहब को भी फोन कर देता हूँ। यह तो आप जानते
ही हैं कि आपके साहब मेरे. खास मित्रों में से हैं।'
'ठीक है ठाकुर साहव ।
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४५ 'अच्छा तो पाप लडके को फौरन छोड़ दीजिये ।' 'ठीक है। 'धन्यवाद।' यह बातें करके ठाकुर साहब ने फोन का चोगा नीचे रख दिया और मैकू की ओर देखते हुए कहा-'अब तुम वेफिक्र रहो । मेरे ख्याल में तुम्हारे घर पहुंचने से पहले नन्हें भी पहुंच चुका होगा।' इतना मुनकर मैकू ने दोनों हाय उठाते हुए कहा-'अन्नदाता, आप धन्य हैं। भगवान करे पापकी गद्दी बनी रहै । मैं जाता हूँ । नमस्ते, सरकार।' 'नमस्ते । अव मैकू पहलवानो की तरह टांगे फैलाये धीरे-धीरे अकड़ कर चलता हुप्रा दरवाजे मे से बाहर निकल गया। अनिता ठाकुर साहब का यह न्याय देख कर चक्ति रह गई। शायद ठाकुर साहब उसके चेहरे से कुछ मांप गये, फौरन बोले- क्या किया जाय? यह लोग बड़े काम के प्रादमी हैं। आज हम इनको रक्षा न करेंगे तो कल को कौन हमारा साथ देगा? वोट दिलाने मे इनका हाथ होता है ।' अनिता चारी और कुछ तो न कह सकी, केवल इतना बोली- 'परन्तु ठाकुर साहब, देखने मे तो बाबू हीरालाल बेचारे बडे भले लगते हैं।' 'हो सकता है । परन्तु अनिता, भले प्रादमियो को चाहिए कि वह स्वामख्वाह दूसरों से उलझते न फिरें।' अनिता को यह बात बडी अजीब लगी। उसकी समझ में नहीं आया कि एक भला आदमी स्वामख्वाह गुण्डों के साथ क्यों उलझेगा। उसको तो इतनी हिम्मत ही नहीं हो सकती।

४६ -- यह बातें अनिता के मन में ही रहीं, अाखिर वह ठाकुर साहब से क्या कहती? इतने में ही फिर वही कर्मचारी अन्दर आया और बोला--'ठाकुर साहव देहात से बाग सिंह आया है।' वाग सिंह का नाम सुन कर ठाकुर साहब ने अपने घने नेत्र ऊपर को उठाये और भारी स्वर में वोले-'अकेला है; या कोई और भी उसके साथ है ? 'जी हाँ कोई प्राधे दर्जन आदमी उसके साथ हैं।' 'अच्छा तो उन्हें अन्दर भेज दो।' 'वहुत अच्छा।' कर्मचारी इतना कहकर बाहर गया और दूसरे ही क्षण बाग सिंह अन्दर चला आया। उसके साथ छः तगड़े सण्ड-मुशण्ड भी थे, जिनकी मूंछे तनी हुई थी और हाथों में लम्बी-लम्बी लाठियां थीं। उन्हें देख कर अनिता को बड़ा अजीव सा लगा, क्योंकि उनमें से हर एक गुण्डा दिखाई देता था। उनकी शक्ल ऐसी नहीं थी कि जिसे देख कर किसी भी भले आदमी को खुशी होती या कोई शरीफ आदमी उनका अपने घर में स्वागत करता। परन्तु उन्हें देखकर ठाकुर साहब का चेहरा खिल उठा। उन्होंने बड़ी खुशी से उनका स्वागत किया । वाग सिंह ने अपने साथियों का परिचय कराते हुए कहा---'ठाकुर साहब यह अपने ही पढ़े हैं।' ठाकुर साहब की वाँछे खिली जा रही थीं। उन्होंने बड़े गर्व से सवकी पोर बारी-बारी से नजर डाली तो बाग सिंह फिर बोला- 'इन्हें तो केवल नमूने के तौर पर अपने साथ लेता आया हूँ। आप विश्वास रखिये कि हमारे पास एक से एक पट्ठा मौजूद है।' । - ठाकुर साहब ने हाथ से इशारा करते हुए कहा-'क्यों नहीं क्यों नहीं, पापी भई बैठो मव लोग। अरे भई कोई है ? अन्दर आलमारी में पान लगे रखे हैं, उठा तो लामो । सिगरेट की प्लेट भी लेते थाना।' टाकुर साहब का एक नौकर पान और सिगरेट उठा लाया। हर पट्टे ने चार-चार पान कल्ले में दवाये, और एक-एक सिगरेट होठों में दवाकर मुलगा लिया। अब ठाकुर माहब बोले-'हाँ भई बाग सिंह, क्या खवर है ?" 'खबर तो मारी अच्छी है जी, जनता को केवल प्राप ही का' इन्तजार है। ठाकुर माह्व--'क्या कहूँ, मैं तो इतना व्यस्त रहा कि निकल ही नहीं पाया ।' वाग सिंह-'इमसे तो बड़ा नुकसान है ठाकुर साहब क्योंकि दूसरी पाटियों के नेता खूब चक्कर लगा रहे हैं।' ठाकुर माहब ने माये पर बल डाल कर पाश्चर्य में प्रा पूछा- 'चक्कर लगा रहे हैं ? मैं पूछता है बाग सिंह तुम्हारे और इन पट्ठो के होते हुए दूसरों की यह मजाल ?' वाग सिंह ने मूंछों को ताव देते हुए कहा-'जी इस तरह चक्कर लगाने में क्या होता है ? जरा जलसा करके दिखाये तो हम माने ।' 'अच्छा, तो अभी कोई जलमा-वलमा नहीं हुआ ?' वान सिंह ने सीना फुला कर कहा-'प्रजो जलमा हो ही कैसे मकता है? क्या हमने चूड़ियां पहन रखी हैं ? जरा जलसा करके तो देवे, हम उन्हें नाको चने न चदवा दें तो हमारा नाम नहीं।' टाकुर माहव चे स्वर में बोले-'गावाम ! गावाश ! बस इस बात का ख्याल रखो कि उनका कोई जलसा सफल न होने पाये।'

- - 'लेकिन बाग सिंह, यह वात मैं फिर दोहरा दूं कि किसी तरह से से हमारी मूंछ नीची नहीं होनी चाहिए । वस इतना समझ लो कि हम ठाकुर हैं, इसलिए हमारी किसी तरह से बदनामी नहीं होनी चाहिए।' बाग सिंह ने अपने सीने पर हाथ रखते हुए कहा-'आप भी ठाकुर, हम भी ठाकुर। मैं ठाकुर की इज्जत रखना खूब जानता हूँ। बस एक बार मौका तो दीजिये आप।' 'मौका तो आज ही आ गया, इसी इतवार को जलसा होगा । शामियाने, कुसियाँ, झण्डे, झण्डियाँ, लाउड स्पीकर आदि सब का प्रवन्ध हो जाना चाहिए।' 'वह तो होगा ही, परन्तु ठाकुर साहब सबसे आवश्यक बात तो आप भूल ही गये।' 'वह क्या?' 'अजी यही अपने लट्ठबाज यह सुनकर ठाकुर साहब ने मुंह फाड़ कर कहकहा लगाया और वोले-'अरे भई वह क्षेत्र है। उसके बारे में मैं क्या कह सकता हूँ? तुम जो चाहो सो करो।' इस तरह वह सब मिल-जुलकर हँसी-मजाक करते रहे। अनिता ने ठाकुर साहब को इतनी वेतकल्लुफी से हंसते हुए पहले कभी नहीं देखा था। अजीब बात यह थी कि यदि वहाँ कोई और लोग होते तो ठाकुर साहब बाग सिंह से बड़े रोव में बात करते, परन्तु अकेले में तो ऐस वेतकल्लुफ हो रहे थे जैसे वे विल्कुल एक वरावर के मित्र हो । अनि को मन में यह सोचना अच्छा तो नहीं लगा, परन्तु वे सब उसे दिखाई दे रहे थे जैसे डाकुओं का टोला बैठा कहीं डाका डालने योजना बना रहा हो। V.. तो तुम्हारा

एकाएक ठाकुर मार को कुछ याद आया नो गम्भीर स्वर में
वोले-'लेकिन वाग सिंह !!
बाग मिह भी पक्का युगामदी टू था । ठाकुर माहब की सकल
बदलती देख कर वह भी फौरन गम्भीर होकर बोला-'जी ठाकुर
साहब ।'
"मई, और सब पार्टियों से तो हम निबट लेंगे, परनु एक पार्टी
ऐसी है जिमसे निबटना कुछ कठिन लग रहा है।'
'कौन सी पार्टी?'
'मानवना पार्टी एक ऐसी है कि जिमने.....'
बाग मिह वात काटकर बोला-'ठाकुर साहब जहाँ तक हमारा
सम्बन्ध है, हम तो वहां भी लट्ठ घुमा देंगे।'
'नहीं मई, यही तो कठिनाई है। वहाँ लट्ठ घुमाना ठीक नहीं
होगा।'
"तो फिर पाप ही बताइये?'
'तुम तो जानते ही हो कि इस पार्टी के नेता मेहर दावा है । मारे
देश में उनको बड़ी मादर की दृष्टि से देखा जाता है। वह भी वहाँ
जलसा तो करेंगे ही, परन्तु यदि वहाँ पर हमने कोई लट्ठवाजी वाला
काम किया तो उससे मारी पार्टी की बडी बदनामी हो जायगी।
पब्लिक हमारा विरोध करने लगेगी। इसका प्रभाव वोटो पर भी पडेगा
इसीलिए मैं तुमको सावधान करना चाहता हूं कि उनके जलसे में इस
प्रकार का कोई हुडदंग नहीं होना चाहिए । समझे ?'
'जी ममझा । परन्नु गकुर साहब, हम उन्हें इतनी ढील कैसे दे
सकते हैं ?

५२ - 'भई देखो, इस समस्या के लिए हमें कुछ और कदम उठाने पड़ेंगे।' 'जो श्राप चाहेंगे हम वही करेंगे।' 'पहली बात तो यह है कि इस बात का पूरा-पूरा ख्याल रखा जाय कि उनके जलसे में हमारी ओर से कोई हुडदंगबाजी न होने पाये, वरना हमारे किये-कराये पर पानी फिर जायगा । यह बात मैं इसलिए दोहरा रहा हूँ ताकि तुम अपने सब श्रादमियों को अच्छी तरह समझा दो। 'जी बहुत अच्छा ।' 'हाँ, अन्दर ही अन्दर उनके कर्मचारियों को खिला-पिला कर, घूस देकर, या उन्हें कोई और लोभ देकर उनकी पार्टी से तोड़ लो। इस प्रकार के जितने सदस्य तोड़े जा सके उतना ही अच्छा है।' 'आपका मतलब यह है कि लट्ठ को छोड़कर और जिस ढंग से भी उन्हें असफल बनाया जा सके, हम बनाने की कोशिश करें।' 'तुम ठीक समझे।' हर मनुष्य को अपना-अपना उल्लू सीधा करने की फिकर होती है। वेशक बाग सिंह सच्चे दिल से ठाकुर साहब के साथ था, परन्तु वह इस मौके का फायदा उठाकर अपने हाथ भी अधिक से अधिक रंग लेना चाहता था । चुनांचे वह अपना चेहरा ठाकुर साहब के कान के पास ले जाकर बड़े खुशामदाना स्वर में बोला---'परन्तु ठाकुर साहव, इसके लिए और अधिक धन की जरूरत पड़ेगी।' ठाकुर साहव माथे पर वल डालकर बोले----'मेरी समझ में नहीं आता कि तुम बार-बार यह बात क्यों उठाते हो ?' जव हमने एक बार कह दिया कि रुपया पानी की तरह वहाया जायगा तो फिर वेकार ववराने की क्या जरूरत है ?'

५३ बाग सिंह दांत निकाल कर हँसा--'मजी ठाकुर साहब, घबराता कौन है ? आप तो राजा हे राजा। वैसे तो मेरे पास कुछ रपया है । परन्तु 'तुम वेफिकर रहो, अब तुम चलकर कुछ खामो-पिनो और अपने साथियों को भी खिलानो-पिलायो । जाते समय तुम्हें काफी धन दे दिया जायगा। यही नहीं बल्कि इस इतवार को जब मैं तुम्हारे इलाके मे पाऊँगा तो अपने माथ और भी धन लेता पाऊँगा। अरे बाग सिंह, रुपया तुम प्रांख बन्द करके खर्च करो क्योकि इसकी हमारे पास कोई कमी नहीं है । केवल याद रखने की बात यही है कि हम हारना नहीं जानते हमारी मूंछ नीची नही होनी चाहिए । भगवान ने चाहा तो आपकी ही जीत होगी। यह सुनकर ठाकुर साहब फिर बडे जोर से हंसे और दाग सिंह की पीठ पर थपकी देते हुए बोले-'अच्छा अब तुम लोग चलो।' वे मव चले गये तो ठाकुर साहब ने अनिता की मोर देखकर कहा-- 'क्या करूं काम बहुत है, परन्तु इस जनसे मे जाना भी जरूरी है । बल्कि पूरे इलाके का दौरा करना पडेगा जिसमें कम से कम दस दिन लग जायेंगे। अच्छा तुम यही रुकी रहना और जो काम मैं वता जाऊँगा उसे पूरा करके दो दिन बाद मुझसे आ मिलना, समझी ।' अनिता-'जी।' इतना कहकर ठाकुर साहब उठकर चले गये।

चार उस समय तक अनिता ने कभी इधर-उधर की बात नहीं सोची थी। न उसने ऐसी जरूरत महसूस की। वह केवल इतना ही समझती थी कि ठाकुर साहव उसके सब कुछ हैं और उसका कर्तव्य है कि जो ठाकुर साहब कहें उसे वह चुपचाप मान ले । यह दृष्टिकोण तो अब भी नहीं बदला था, परन्तु वाग सिंह से ठाकुर साहब की बात-चीत सुनकर अनिता के मन में हल्की सी कुरेद उत्पन्न हुई। पहले वह केवल यह समझती थी कि ठाकुर साहव एक महान् नेता, महान् पुरुष थे जो एक महान कार्य में जुटे हुए थे। उसे इस बात का कभी ख्याल ही नहीं आया कि राजनीति के दांव-पेंच ऐसे घटिया होते हैं कि महान् पुरुष को भी उनका सहारा लिये विना सफलता प्राप्त नहीं हो सकती। यूं कहना चाहिए कि पहले अनिता को राजनीति से कोई दिलचस्पी नहीं थी, वह तो केवल ठाकुर साहब के छोटे-मोटे कार्य कर देती थी। परन्तु उस दिन की वातों से उसे राजनीति से थोड़ी दिलचस्पी पैदा हो गई। इसक यह अर्थ नहीं था कि उसके मन में ठाकुर साहब का विरोध करने के इच्छा जागृत हुई हो, या वह स्वयं राजनीति के क्षेत्र में कोई विशे भाग लेना चाहती हो, नहीं यह सब उसके बूते का काम नहीं था।

तो केवल कुछ और अधिक बातें जानने की इच्छुक हो गई थी। पहले वह केवल अपने काम से काम रखती थी, परन्तु अब वह कुछ और भी जानना चाहती थी। राजनीति के क्षेत्र में उमने एक नाम अक्सर मुना था--मेहर बाबा का नाम । और ग्राम जनता तो मेहर वावा को मानती भी थी, परन्तु जव कुमार साहब ने उनका जिक्र किया था, तो अनिवा ने महमूम किया कि वह जरूर ही बड़े-ऊंचे स्तर के पुरुष होंगे और फिर जब बाग सिंह से बातें करते समय मेहर वावा का जिक्र पाया तो गकुर साहब भी उनके जलसे में किमी प्रकार की गवद कराने के हक में नहीं थे । जिसका अर्थ यह था कि ठाकुर माहब जैसे महान् नेता भी मेहर बाबा का अंगमान करने का साहम नहीं कर मकते थे । इन्हीं बातो को मोचकर उसके मन में मेहर बाबा के दर्शन करने की इच्छा हुई । अब ममस्या यह थी कि वह मेहर बाबा के दर्शन केले करे और उनके पास बैठकर उनको वातें कैसे मुने । यही मोचते-मोचते उसे याद पाया कि उमकी एक सहेली अक्सर मेहर बाधा का जिक्र किया करती थी । उमकी सहली का नाम उमिला था, जो अक्सर उसके माय मेर करने भी जाया करती थी। मिला भी मेहर बावा का नाम बडे प्रादर्श के माय लेतो यो। पहले तो अनिता ने कभी गहरी दिलचसी नहीं ली, परन्तु अव उमने मोचा कि यदि वह उमिला से कहे तो वह उसे मैहर बावा के पास ले जा सकती थी। मेहर वावा से मिलने का मवसे अच्दा अवमर वही हो मकता था जव ठाकुर माहब दौरे पर चले जायेंगे। वह मेहर वावा के घर जा मस्ती थी। उमिला के साथ जाने से मबसे बड़ा फायदा यह था कि यदि बाद मे ठाकुर माहब कभी पूर्व भी तो वह कह सकती थी कि उसकी महेलो मिला उमे जबरदस्ती - लिवा ले गई थी। ठाकुर साहब ने उसे मेहर बाबा से मिलने को मना तो नहीं किया था इसलिए यदि उन्हें पता भी चलेगा तो वह यही समझेंगे कि यूं ही अपनी सहेली के साथ चली गई होगी। उन्हें यह शंका तो कभी नहीं होगी कि अनिता अपनी मर्जी से मेहर वावा के पास गई होगी। x x दूसरी शाम जव अनिता की उर्मिला से मुलाकात हुई तो वे दोनों सैर करने निकलीं । वातों ही बातों में अनिता ने कहा-~-'उमिला यह मेहर वावा कौन हैं ?' उर्मिला को बड़ा आश्चर्य हुआ वह बोली-'अरे, क्या मेहर वावा को नहीं जानती ?' 'नहीं यह बात नहीं मेरा अर्थ तो केवल यह है कि मेहर बावा कैसे मनुप्य हैं ? तुम तो जानती हो कि मुझे राजनीति से कोई दिलचस्पी नहीं। सिर्फ मेरे मन में मेहर वावा को व्यक्तिगत रूप में जानने की इच्छा पैदा हुई है, क्योंकि मैंने देखा है कि बड़े-बड़े नेताओं के मन में भी उनका आदर है। 'अच्छी बात है, तुम चाहो तो मेरे साथ चल सकती हो।' 'वह तो ठीक है परन्तु मैं चाहती हूँ कि ऐसे समय पर उनके पास जाऊँ जव कि वह अकेले हों या वहाँ कम से कम लोग हों।' 'बिल्कुल अकेले तो उन्हें कोई रहने ही नहीं देता। हाँ पूजा-पाठ करते समय वह अकेले होते हैं, परन्तु उस समय तो उनसे कोई नहीं मिल सकता। उनका जो बाकी समय होता है उस समय तो कोई न कोई बैठा ही रहता है।'

अनिता कुछ सोच में हूब गई तो मिला ने पूछा-'क्या बात है ? क्या ठाकुर माहब से डर लगता है ? अरी उनकी चिन्ता न कर । पूछे. तो कह देना कि मेरी एक सखी मुझे जबरदस्ती घसीट कर ले गई थी। समझी?' उमिला की यह बात सुनकर अनिता मुस्कराने लगी क्योंकि उमिलाः ने उसके मन की ही बात कही थी। उर्मिला भी होशियार लड़की थी, वह अनिता के मुस्कराने से ही समझ गई कि यही उसके दिल का चोर था। यह उसके कन्धे पर हाथ रखकर उसे धीरे से हिलाते हुए बोली-'क्यों यही बात है न ?' मनिता ने उत्तर दिया-'भई तुम कहती तो ठीक हो। वैसे मैं तुम्ह वता दूं कि ठाकुर माहब ने मुझे किसी से मिलने-जुलने को मना नही कर रखा है, फिर भी अच्छा यही रहेगा कि उनको पता ही न चले । यदि पता चल भी जाये तो मैं तुम्हारी कही बात कह दूंगी।' 'विल्कुल ठीक । अच्छा, यह बतायो कि चलना किस रोज है ?' 'देखो, ठाकुर साहब इस शनिवार या इतवार को सुबह को यहाँ से जा रहे हैं ! वह मुझे साथ नहीं ले जायेंगे।' उर्मिला ने बीच में ही बात काट कर पूछा-'क्या तुम साथ नहीं जा रही हो? 'अजी नही, ठाकुर साहब ने कहा है कि कुछ काम रह जायगा वह निवटा कर दो दिन पीछे भा जाना।' 'तब तो बड़ा अच्छा है । मच कहती हूं अनिता, मेहर वावा बहुत ही अच्छे आदमी हैं । तुम उनसे मिलोगी तो खुश हो जानोगी। यूं तो तुमने कई नेता देखे हैं, परन्तु उन जैसा नहीं देखा होगा। देखो बुरा न मानना, उनसे मिलकर तुम ठाकुर साहब को भी भूल जानोगी।

५५ वह मनुष्य नहीं देवता हैं । उनमें चालाकी नहीं, क्रोध नहीं, झूठ और मक्कारी नहीं । इसीलिए उनके सामने बोलने में बड़े से बड़े नेता को भी हिम्मत नहीं पड़ती। जब तुम उनके कमरे में पहुँचोगी तो यूं लगेगा जैसे किसी मन्दिर में पहुंच गई हो।' अनिता ने अपनी मोटी-मोटी आँखों से मिला की ओर ज़रा गौर से देखते हुए कहा-~~'इसीलिए तो मैं भी उनके दर्शन करना चाहती परन्तु उमिला, कभी-कभी मैं सोचने लगती हूँ कि व्यक्तिगत रूप में एक संन्यासी या देवता होते हुए भी वह राजनीति की दलदल में क्यों जा फँसे?' 'केवल अपने देश और यहां की जनता का उद्धार करने के लिए। वह ऐसे संन्यास में विश्वास नहीं रखते जो संसार को त्याग कर सिर्फ अपनी भलाई के लिए गुफा में जा बैठता है, क्योंकि वैसा त्याग सरल है । मैं यह तो नहीं कहती कि वह त्याग हर कोई कर सकता है, क्योंकि वैसा त्याग भी महापुरुप ही कर सकता है, परन्तु मेहर बावा अपने देश को और यहां की जनता को संकट में देखकर रह नहीं सके । इसीलिए उन्होंने इस बात का निश्चय कर लिया कि वह संसार के बीच में रहते हुए और अपने देशवासियों के कन्धे से कन्धा मिलाकर इस देश का 'उद्धार करेंगे। मेरे ख्याल में संसार की सारी कठोरता के बीच में रहते हुए भी अपना त्याग का जीवन व्यतीत करना एक महान कार्य है ।' जमिला की इन बातों से अनिता के दिल में एक खलवली सी मत्र -गई। उसने निश्चय कर लिया कि जैसे भी हो वह मेहर बाबा के दर्शन अवश्य करेगी। मेहर बाबा के दर्शन करने के लिए उसे बहुत इन्तजार की जरूरत नहीं पड़ी । यह अलग बात थी कि इतने से दिन भी उसके लिए वर्षों ५६ से कम नहीं थे। प्रातिर वह घड़ी भी आ पहुंची। इतवार की सुबह को ठाकुर साहब दौरे पर चले गये, मोर सन्ध्या के समय दोनों महलियां मैहर वावा के प्रायम की मोर चल दी। रास्ते में उर्मिला ने बताया कि छुट्टी का दिन होने के कारण मात्र मेहर वावा के आश्रम में हर रोज से कुछ अधिक भीड़ होगी, लेकिन एक तरह से अच्छा ही है, कोंकि उतनी भीड़ में कम ही लोगों का ध्यान उनकी और जायगा । मदों के बैठने का स्थान अलग है और स्त्रियों के बैठने का अलग। वे दोनो चुपचाप जायेगी और स्त्रियों के बीच में घुम कर बैठ जायेंगी। जब वे प्राधम के निकट पहुँची तो अनिता ने देखा कि काफी बडा टुकड़ा ममतल जमीन का है, जिसके बीचोबीच पायम बना हुआ है । आश्रम में बहुत ज्यादा कमरे नही थे । चार कमरे एक मोर, और एक लम्बा सा हॉल उन क्मरो के साथ जुड़ा हुआ था । उन कमरों में मेहर बाबा और उनके कर्मचारी रहते थे, या प्राने-जाने वाले लोग भी टिके रहते, बड़े हॉल में मेहर वावा जनता को दर्शन देते और भाषण दिया । यत खपरैल को थी, और दीवारें कच्ची इंटों की। प्राम- पास जो धरती टूटी हुई थी उममें कही-कहीं फूलो के गमले रमे थे। एक कोने में तो केवल मन्जियां ही बोई जाती थी । वहाँ बहुत अच्छी नस्ल की दो गायें भी थी जो काफी दूध देती थी । इसी दूध से पाश्रम में रहने वालों की जरूरतें पूरी होती थी । उस समय मूर्य अस्त हो रहा था, और मायम के चारों पोर पानी का छिडकाव किया जा रहा था। वहाँ धूमने-फिरने वाले कर्मचारी चुपचाप अपना-अपना काम करने में मगन थे। कोई भी यादमी स्वामस्वाह दाये-ये झांकता नहीं था, न बेकार में हंसता था, और न चिल्लाता था। करते थे जब वे बरामदे के निकट पहुंची तो अनिता ने सहेली से कहा--- 'उमिला, मालूम होता है कि अभी यहाँ कोई भी नहीं पाया। हम सबसे पहले ही पहुँच गये हैं।' इतना कहते-कहते अनिता एकदम चुप हो गई, क्योंकि अब वह वरा- मदे में पहुंच चुकी थीं । जव अनिता की नज़र खिड़की से अन्दर की ओर पड़ी तो उसने देखा कि सारे का सारा हॉल भरा हुआ था। पहले तो वह समझी कि मेहर बाबा वहीं मौजूद हैं, परन्तु जब वे हॉल में घुसी तो पता चला कि मेहर बावा अभी अन्दर से आये ही नहीं थे । अनिता चकित रह गई कि पुरुष और स्त्रियों से ठसाठस भरा होने पर भी हॉल में किसी प्रकार की आवाज सुनाई नहीं दे रही है, यहाँ तक कि वह अन्दर घुसी भी तो किसी ने भी उनकी पोर आँख उठाकर नहीं देखा। वे दोनों स्त्रियों में घुस कर चुपके से बैठ गई। पहले तो अनिता को बोलने का साहस नहीं हुआ, परन्तु जब उसने देखा कि वहाँ कुछ लोग ऐसे थे जो आपस में कोई जरूरी बात एक दूसरे के कान में कह देते थे, तो फिर उससे भी न रहा गया। वह धीरे से फुसफुसाई.--'उमिला, यहाँ का वातावरण तो बड़ा अजीव है।' 'हाँ।' 'हमारे यहाँ इस संख्या का अगर बीसवाँ भाग भी हो, तो इतना शोर मचता है कि बस कुछ मत पूछो।' 'नहीं, यहाँ ऐसा नहीं होता । मेहर बावा कहते हैं कि ऊँचे प्रकार के अनुभव के लिए मनुष्य की बुद्धि में सबसे पहले तो मौन छा जाना चाहिए । उनका कहना है कि भिन्न-भिन्न विचार एक दूसरे से टकराते हैं तो मनुष्य के दिमाग में भी बड़े जोर का शोर होने लगता है। इस शोर का हमारी चेतना पर भी प्रभाव पड़ता है, क्योंकि इस शोर में .

हम मात्मा के आवाज को नहीं सुन पाते; और उमा नीरा रह निकलता है कि हमारी चेतना दिया मादनामों और दिशा को दलदल में धमती ही चली जाती है।' उर्मिला अनिता से चार-पांच वर्ष दही की, निरनो मुंह में ऐसे चे विचार मुनकर मनिता को बड़ा पाप मा, मौके पतिता ने पहले कभी ऐनी बातें नहीं सुनी थी। अमिता सारे पर निवा फिर कुछ नहीं बोली, क्योंकि तिा क्जिी खान कसरत के दोचना हो बुरा समझा जाता था। उरचार बैठ कर अनिता दवी-दमोनरों ने पूरे हॉल का निख करने लगी। दीवारों पर केवल महागुरों के चित्र नो हुर।हार के एक और धरती से कुछ क्षेचा भोर का तन्दा-चौड़ा घरा बना हुआ था जो इस समय उजली चादर के देका हुमा का। यहां कुछ गाव-तक्वि भी पड़े थे । मेहर बादा के बैठने स्थान पर पूलमार आसन विद्या हुआ था। अनिता अपनी सखी से पूछना चाहती थी कि हर बाया कद वक पधारेंगे, परन्तु फिर उसने सोचा कि इसनी लनुज्ञा दिखाने के यह जल्दी आने से दो रहे, उन्हें तो दिन समय माना है जो कप पारे। यूं तो मेहर या योझे ही देर में पहुंचने का अनुमा के कारण अनिता की बहननरनी पर लन्दा लगा। पर हर वादा माने की थे तो मार हॉल में तो सनी मच गई, कोई हिला नहीं, कोई दोला नहीं, किरनी पनिता को लगा कि देनी जी की तरह मेहर बाबा के दर्शनों के लिए उन्क हो रहे है। एकाएक ही सबकी प्रति कठों, पोर हार में सुनने वाले दरवाजे पर लग गई 1 मेहर बादा ने पहले दो कर्मचारी मार,शाद उन्हीं के ६२ पाने से लोग समझ गये कि भव मेहर वाया भी पाने को हैं। हाल में प्रपेश करने से पहले मेहर गाबा दरपापो पर ही रमा गये। निताने बो ध्यान से उगगी और देखा । उनका पाद परा. सा लम्बाही था, और शरीर गरा-गरा परन्तु फूला हुआ नहीं गा । उन्होंने गेरुये रंग की धोती पहन रखी थी और गेरुगे रंग गीही एा नादर भोक रखी थी। धोती उन घुटनों तक पहुँगती थी, और नायर में से उनका योगा मला, और दोनों बाण दिखाई दे रहे थे । सिर पर गंज नहीं था, रागी चाल मौजूद थे परन्तु बिल्कुल सफेद और फैले-पोले । उनी गाथे में एग खारा प्रकार की मग थी, और लगता था जैसे उनकी प्राखों से पानी की गुहार हो रही हो । उनकी छोटी-छोटी राफेद दादी भी और नी रोगटी हुई सय गं भी । दरवाजे में सहे- उन्होंने पूरे हॉल में एक दृष्टि दौड़ाई, और सब लोगों ने दोनों हाथ जोर गार प्रणाम किया। इस पर गेहर बाधा ने भी दोनों हाथ जोड़ दिये और गल गर भगाने के बाद यह नपे-तुले गारगों से आगे बढ़े और राहज ही अपने पासन पर विराजमान हो गगे। जन गह बैठे तो चादर उनको बदन से सिराम बार भी शागिरी और उन दोनों गानो, सीना और बाषा नंगे हो गये । उनका रंग तो तविकी भांति था, और लगता था जैसे उसमें भी मार की दम हो । कुछ देर तक यह पालथी मारे गुपचाप बैठे रहे। उन दोनों हाथ उन दोनों घुटनों पर थे। मगर विल्कुल सीपी, गान्धे एका सनिगाको तरह जरा पीछे को हटे हुए, और सीना पारा सा मागे गो निकाला हुमा । गर्दन सीधी और लास बन्द थी । ' लगता था जरी या गा ही गर में प्रार्थना कर रहे हों। धीरे से मेहर बाबा की प्राण युली । मेहर वादा कुछ देर वक युराचार बैठे प्रश्न सामने की ओर देखते रहे। वह किमी व्यक्ति या दिमी वस्तु को नहीं देख रहे थे; बल्कि यूं लगता था जैसे वह दूर, बहुत दूर देव रहे हों। लोगों के कान, विशेषकर अनिता के कान, मेहर वावा का स्वर सुनने के लिए बेचैन हो रहे थे। पाखिर मेहर बाबा ने बोलना शुरू किया- 'मेरे प्यारे भाइयो, बहनों और पुत्रियो ! 'पाप मनी लोग जानते हैं कि अब देश के चुनाव में एक महीने से भी कम समय रह गया है । मुझे राजनीति में व्यक्तिगत रूप में कोई दिल- चसी नहीं है । यह बात मैं पहले भी कई बार दोहरा चुका है, परनु जब मैं देखता हूँ कि इसी सुनाव में जीतने वाले व्यक्ति कल जनता की विस्मन के मालिक बनगे, तों में यह सोचने पर मजबूर हो जाता हूँ कि हमारे देश की जनता की किस्मत कैसे लोगो के हाथ में होनी चाहिए, और ने लोगों के हाथ में नहीं होनी चाहिए । "हर रोज की नरह अाज भी इस हॉल में सदा आने वाले सम्बनी के अतिरिक्त कुछ सदन आज पहली बार पाये होंगे। मेरी इस बात में उनके मन में प्रश्न उठेगा कि क्या मेहर वावा ही यरने प्रापको मवमें अच्छा समझते हैं, और वग मेहर बादा अपने आपको ही इस योम्प ममन्ते है कि उन्हें वोट दिये जायें ? उनका यह मोचना स्वाभाविक ही है । न केवल दनको वल्कि देश के हर व्यक्ति को ऐसा प्रश्न उठाने का अधिकार है और इस बात का भी अधिकार है कि दे मुमने इस प्रश्न का उत्तर भी मांगें । यदि मैं इसका उत्तर नहीं दे पाता तो इसका अर्थ यही हो मरता है कि मैं भी कोई गोलमाल कर रहा हूँ। मैं भी पद पाने का - . 'इस प्रश्न का, या इस आपत्ति का मेरे पास कोई उत्तर है भी या "नहीं । उत्तर तो है, परन्तु मेरा यह उत्तर आपके मन को ठीक लगता है या नहीं इसका फैसला आप ही पर है। मेरा उत्तर यह है कि हमारे देश में लोकतन्त्र है। यहाँ का राज्य चलाने वाला मेहर बावा नहीं, या -मेहर वावा की पार्टी नहीं । वल्कि कोई भी पार्टी नहीं और कोई भी नेता नहीं । यहाँ का राज्य चलाने वाले स्वयं आप हैं, यहाँ को जनता है। 'अब मैं फिर अपने प्रश्न की ओर आता हूँ। मेरे पास उसका उत्तर यह है कि इस बात का निर्णय आप करें कि वोट किसे मिलना चाहिए। मेहर बावा और उसकी पार्टी को, या महान् पार्टी को, या बेड़ा गर्क पार्टी को, या जनता उद्धार पार्टी को, या सत्ता पार्टी को। मैं केवल इतना कहता हूँ, और केवल इतना ही चाहता हूँ कि इस देश के शासन में ठीक प्रकार के लोग पहुँचें, और गलत लोग वहाँ जाकर देश को आगे बढ़ाने के बजाय पीछे की ओर न ढकेल दें । आप से बेहतर अपने नेताओं को कौन समझ सकता है ? मेरा केवल श्राप से इतना ही अनुरोध है कि आप सही व्यक्तियों को चुनें, उन्हीं को वोट दें, उन्हीं के हाथ में देश की वागडोर दें और वे कौन व्यक्ति होने चाहिए; इसका निर्णय आप स्वयं ही कर सकते हैं । आप हर एक को ठोंक वजा कर देखिये। किसी की सूरत और किसी की बातों में मत आइये वल्कि अपनी बुद्धि से काम लीजिये। यह समस्या ऐसी नहीं है कि जिसमें आप किसी का भी लिहाज करें, चाहे वह मेहर वावा हो या कोई और । 'जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूँ कि अब चुनाव सिर पर पहुँच चुके हैं, सभी पार्टियाँ अपना-अपना जोर लगायेंगी, सभी नेता दौरा करेंगे और अपनी-अपनी पार्टी का दृष्टिकोण बतायेंगे। यह सब कुछ ५ हमारी पार्टी भी करेगी, में भी करूंगा पोर मैं केवल मापसे एक ही बात कहूंगा-जागते रहो ! जागते रहो !! जागते रहो !!! इतना कह कर मेहर बावा चुर हो गये, परन्तु उनका स्वर हॉल मे अब भी गूंज रहा था, और लोगों के कानो में गूंज रहा था । उस स्वर में एक बड़ी नदी का सा बहाव था, और उनके एक-एक शब्द में तडप थी। उनके चुप हो थाने पर भी उनके स्वर और पाब्दों का जादू हॉल में बैठे हुए व्यक्तियों पर छाया रहा। कुछ देर तक हॉल मे से कुछ लोग उठ-उठ कर मेहर दावा के पास जाते रहे, वे धीमे-धीमे कुछ बाते भी करते । धीरे-धीरे लोग विदा होने लगे, यहाँ तक कि सभी लोग चले गये। हॉल में केवल अनिता और उमिला वैठी रह गई। मेहर बाबा उठकर जाने लगे तो बाई तरफ उन्हें दो युवतियां दिखाई दी। वह उमिला को पहचानते थे । देखते ही मुस्करा दिये और पूछने लगे-'कहो बेटी उमिला, तुम अभी गई नही ?' उमिला उठ खड़ी हुई और हाय जोड़ कर बोली-'मेहर वावा, मैं तो शायद चली ही जाती, परन्तु मेरी मखी आज खास तौर पर प्राप के दर्शनों के लिए प्राई थी। उसकी बड़ी इच्छा है कि आप से दो बाते भी कर सके । इसीलिए हमने तय किया कि हम दोनो बैठी रहे, यदि पाप का ध्यान हमारी ओर हुप्रा और मापने हमे बुला लिया तो बातें कर लेगे, नही तो लौट जायेंगे।' मेहर याबा ने हँस कर कहा-'वाह ! इतनी लम्बी-चौडी बाते मोचने की क्या जरूरत थी? जैसे तुम मेरी बेटी, वैसे ही यह भी.....।' । ५ मिला ने जल्दी से सखी का नाम बताते हुए कहा---'इसका नाम अनिता है।' मेहर वावा---'हाँ तो अनिता भी हमारी ही बेटी है। किसी भी बेटी को पिता से मिलने में इतना संकोच करने की आवश्यकता नहीं।' इतना कह कर मेहर बावा उठते-उठते फिर वैठ गये ! उर्मिला- अनिता भी उठकर चबूतरे पर उनके निकट जा बैठीं । मेहर वावा के इशारे पर दूसरे कर्मचारी वहाँ से चले गये। चूंकि मेहर बाबा के पास कुछ लोग बिलकुल निजी समस्याएँ लेकर भी आ जाया करते थे, ताकि अनिता की भी यदि कोई निजी समस्या हो तो वह खोल कर बता सके । मिला इस बात को समझ गई। वह बोली-'मेहर बाबा.! अनिता की कोई निजी समस्या नहीं है। आजकल यह ठाकुर साहव के पास ही रहती है, उन्हीं का काम करती है।' मेहर वावा.---'कौन ठाकुर साहब ? वही सत्ता पर्टी वाले ठाकुर मदन सिंह जी।' उमिला--'जी हाँ वही ।' इस तरह से उनकी बातचीत का सिलसिला प्रारम्भ हुआ । किसी खास विषय पर बात नहीं हुई, केवल इधर-उधर की बात होती रही। तव मेहर बावा ने कहा-'अनिता बेटी, तुम दोनों आज मेरे साथ चाय पिये बिना नहीं जा सकती।' कुछ ही देर में चमकते हुए छोटे-छोटे गिलासों में चाय आ गई। दोनों सखियों ने चाय भी पी और मेहर वावा की मीठी-मीठी बातें भी सुनी । फिर पन्द्रह-बीस मिनट की बैठक के बाद वे दोनों मेहर बावा की प्राज्ञा लेकर वापस चली आई।

पाँच जिस तरह कोई स्वादिष्ट वस्तु खा लेने के बाद कुछ देर तक उसी का मना मुंह में रहता है, इसी तरह मेहर वावा से मुलाकात ममाप्त हो जाने के बाद भी अनिता ने यूं महसूस किया कि जैसे अब भी वह उन्ही के पास बैठी हो । मेहर बावा से मुलाकात एक ऐसी घटना थी कि जिसे वह जीवन भर भुला नहीं सकती थी। न जाने मेहर वावा में ऐसी क्या शक्ति थी कि वह सीधे उसके मन में उतर गये थे। हर एक को यही महमूस होता था कि पहली मुलाकात में मेहर वावा उनके दिल में समा जाते थे। वैसे देखने मे यो नही लगता था, क्योकि मेहर वावा किसी तरह भी दूसरो पर प्रभाव डालने की चेष्टा नहीं करते थे, फिर भी न जाने कैसे होता था कि जिससे मिलने उसके मन में अपना स्थान बना अब तो भविष्य मे बहुत जल्दी मेहर वावा के दर्शन होने की प्राशा मही थी इसलिए अनिता उस मुलाकात को स्मरण करके अपना मन धुश कर लेती थी । बल्कि कहना चाहिए कि जब भी वह उस मुलाकात की कल्पना करती तभी उसे एक बहुत ही गहरा प्रानन्द प्राप्त होता। दो ही दिन में ठाकुर साहब का अधूरा काम ममात करके मनिता को उनके पास पहुँचना था। चुनांचे उसने अपना सारा समय उसी काम को समाप्त करने में लगा दिया। इधर उसे फुर्सत हुई और उधर वह ठाकुर साहब के पास पहुँचने के लिए रेलगाड़ी में सवार हो गई । गाड़ी में बैठी चली जा रही थी। चार ही घण्टे में वह उस स्टेशन पर पहुँचने वाली थी, जहाँ पर उसे उत्तरना था । परन्तु उसका मन पीछे रह गया था, उसी पाश्रम में जहाँ उसने मेहर बाबा के दर्शन किये थे। अाखिर जब वह भुलायां स्टेशन पर उतरी तो उसने देखा कि वहाँ रामू पीर गोपाल खड़े हैं । ज्यों ही वह अपने डिब्बे से उतरी उन दोनों ने हाथ जोड़कर नमस्ते की। अनिता ने पाश्चर्य से पूछा-~'अरे तुम लोग यहाँ क्या कर रहे हो ?' रामू अपने साथी की ओर देखते हुए बोला-~-'लो गोपाल ! जिनकी सेवा के लिए हम यहाँ उपस्थित हुए हैं, वही पूछ रही हैं कि तुम यहाँ कसे ?' 'मेरी सेवा ?'-~-अनिता ने आश्चर्य में प्रा पूछा। 'जी हाँ ।' प्रवकी गोपाल ने उत्तर देते हुए कहा-'हमें ठाकुर साहब ने आपका स्वागत करने और साथ लिवाने के लिए भेजा है।' 'अच्छा'तो यह बात है ?' 'जी हाँ । ..... यही बात है।' अनिता यह तो भूल ही गई थी कि स्टेशन से उतर कर वह ठाकुर साहव तक कोसे पहुँनेगी । उसने यह तो अनुमान ही नहीं लगाया था कि भुला एक छोटा सा देहाती स्टेशन होगा। यह समझ बैठी थी कि भुला एक कस्वा तो होगा ही।

उमे इस तरह पाश्चर्य में देखकर गोपाल उसके मन की दगा समझते हुए बोला-'अनिता जी यह गहर नहीं है, देहान है, देहात !' अनिता उन्हें ज्यादा मुंह नहीं लगाया करती थी इसलिए उसने सुपचाप उँगली से अपने सामान की ओर इशाग किया मोर धुद टिक्ट लेकर फाटक की ओर बढ़ी । गोपाल और रामू उसका सामान उठाये उसके पीछे-पीछे चले । स्टेशन से बाहर निकल कर अनिता बहुत हैरान हुई, क्योंकि दूर तक कोई प्रावादी नहीं दिखाई दे रही थी । उमने पलट कर देखते हुए कहा--परे गोपाल, यहाँ तो कोई गांव भी नहीं दिखाई 'गांव यहां से दूर है जी।..."कम में कम छः सात मील !' अनिता का दिमाग चककर खा गया, उमने हाथ मलते हुए कहा- 'लेकिन हम वहाँ पहुँचेंगे कैमे ? यहाँ तो कोई सवारी भी नहीं दिखाई देती । न रिवगा, न तांगा, न इक्का ।' इस पर रामू ने हाथ उठाकर अंगुली से इशारा करते हुए कहा- 'वह दैगिये, उधर उस पेड़ के नीचे ।' अनिता ने सोचा कि गकुर साहब ने भी यह जोकर खूब पाल रखे हैं । उधर देखते हुए बोली- 'क्या है वहाँ ?' 'ध्यान से देखिये जी । वहाँ वैलगाटी खडी है ।' अनिता का जन्म देहात में ही हुअा था, परन्तु वह काफी समय से शहर में रहने की मादी हो चुकी थी। वह हैरान होकर बोली-'तो क्या हमें चैलगाड़ी में जाना होगा? 'जी हो । रास्ता ही ऐमा है कि उम पर वैलगाडी ही जा सकती है । यहाँ तो बड़े-बडे नेता जो वेवल कार में बैठने के आदी होते हैं , बैलगाडी में ही घूमते-फिरते हैं।'

७० - अनिता को बड़ी उलझन हुई। वह जरा विगड़े स्वर में बोली- 'अच्छा-अच्छा, बेकार की बातें मत बनायो । चलो, बैलगाड़ी में सामान रखो।' अनिता के विगड़े तेवर देखकर वे दोनों डर गये कि कहीं उसने ठाकुर साहब से शिकायत कर दी तो वे उन दोनों का भुर्ता बना देंगे। जरा दूर पेड़ की छाँव में बैलगाड़ी खड़ी थी, वे तीनों उसी की ओर चल दिये। । रामू और गोपाल ने मिलकर उसका सामान बेलगाड़ी में रखा और उसके लिए एक गद्दा बिछा कर बोला-'पाइये वैठिये ।' अनिता बिना कुछ बोले पाकर बैठ गई । गोपाल बैलगाड़ी हाँकने के लिए आगे जा बैठा और रामू भी गोपाल की वगल में बैठ गया। अनिता बहुत देर तक क्रोध में न रह सकी क्योंकि जब बैलगाड़ी ठुमुक-ठुमुक करती हुई सेतों के बीच में से चल निकली तो खुली हवा और खेतों की हरियाली देखकर अनिता की तबियत खुश हो गई। दिन ढल रहा था, यद्यपि सूरज के डूबने में काफी समय बाकी था। इधर-उधर के दृश्य देखकर अनिता को अपने वचपन की याद मा गई, जब वह ऐसे ही खेतों में घूमा करती थी। इसके साथ ही आगे बैठे दोनों जोकर भी चुप रहने वाले कहाँ थे। रामू बोला---'क्यों अनिता जी, अव आपको वैलगाड़ी से उलझन तो नहीं हो रही ?' अनिता ने कुछ उत्तर नहीं दिया था कि गोपाल बोला-'अरे उलझन तो हम होने ही नहीं देंगे। अभी जरा समतल रास्ता प्राये तो मैं बैलगाड़ी को इस तेजी से भगाऊँगा कि अनिता जी कार की भी सवारी भूल जायेंगी।' .

हुआ भी यही । मागे जाकर रास्ता गमतल हो गया नो गोपाल ने दोनों बैलो को ललकारा। वह मरपट भागे । उनके गले में बंधी हुई घंटियों का मंगीत वातावरण में गूंज उठा। यह सब देखकर अनिता का मन भी नाचने लगा और उसके होठों पर मुस्कराहट मेलने लगी। इनने में रामू बोला-'भनिता जी यदि आपको प्यास लगे तो बताइयेगा।' अनिता को आश्चर्य हुअा, बोली-'प्याम तो मुझे लगी है परन्तु मैंने यह सोच कर कि यहाँ पानी कहां मिलेगा कुछ नहीं कहा।' रामू ने खिलखिला कर हम दिया-'मनी यही नो पापको भूल थी । स्वामस्वाह इतनी देर से प्यामी वैठी हैं । अजी देखिये तो सही मैं आपको वह पानी पिलाऊँगा कि पाप महर का कोकोकोला भी भूल जायेंगी।' अनिता ने सोचा कि यह भी इस जोकर का कोई मजाक ही है। परन्तु रामू मजाक नही कर रहा था । उसने खद्दर के उजले और गोले अंगोछे में लिपटी हुई एक मुगही निकाली जिसे देखते ही अनिता के कलेजे में ठंडक पह गई । कैमी गुलाबी गुलाबी मी मुराही थी, लम्बी गर्दन वाली । रामू ने एक कोरा कुल्हड उठाया और उसे मुराही के पानी में अच्छी तरह धोकर भरा और अनिता की ओर बढ़ा दिया । अनिता ने कुल्हड़ हाप में पकडा तो उमकी ठंडक मे वह मग्न हो गई। जब उमने पहला चूंट पिया तो उसे पाकई वहा प्राश्चर्य हुअा, क्योंकि पानी बहल ही ठंडा था। वह मुश होकर बोली-'अरे रामू नेरी मुराही के पानी ने तो गचमुच ही कोकोकोला भी मान कर दिया है।' और वह हंस पडो।

७२ 'प्रया, यह सुन गर रामू मारे सुशी गे वगलें बजाने लगा। बोला-'तो पाप गया समझी थीं कि मैं झूठ बोल रहा हूँ ?' 'नहीं भूठ तो नहीं समझी थी, परन्तु तुम ठहरे जोकर । मैंने सोचा गि यूं ही मजाक न गर रहे हो।' 'सी-ली-गो', रामू ने हंसते हुए कहा---'अनिता जी, एक बात याद रखिये गि मेरी सूरत जोकरों वाली जरूर है परन्तु मैं मजागा नहीं गरता । तो यह बात है तो फिर एक और कुल्हड़ भर दो।' यह कहते-कहते अनिता ने कुल्हड़ उसकी ओर बढ़ाया और उसने सुराही टेही करो उसमें फिर से पानी भर दिया । उस समय यह बड़ा सुरा था, गहने लगा---'अनिता जी हमें तो ठागुर साहब ने फल ही गाह दिया था कि हमें आपको लाने के लिए स्टेशन पर जाना होगा। मैंने उसी समय इस कोरी सुराही को खूब अच्छी तरह से धो-धाकर इसमें पानी भर दिगा, और ऊपर से एक साफ कपड़े का टुकड़ा ढाँच दिया । रात भर सुराही खुली हवा में पड़ी रही । और जव हग स्टेशन को जाने लगे तो मैंने अंगोला गीला करके इरा पर लपेट दिया। रास्ते भर हवा खा-सा पार सुराही का पानी शीर ठंडा हो गया । इस समय गु कितना असा लग रहा है कि मेरी यह सारी मेहनत अकारथ नहीं गई गयोंकि आपनो सुराही का यह पानी पसंद आ गया।' रागू की बात सुनगार वह सोचने लगी कि इन सीधे-सादे लोगों के मन में भी कितना सच्चा प्रेम है, सेवा-भाव है, जो भाग तौर पर पढ़े- लिरो लोगों में दिखाई नहीं देता। सारा रास्ता हसी-सुखी और बात-चीत में कटा । बीच-बीच में अनिता ने फिर पानी पिया । जब दूर से उन्हें मंजिल दिखाई दी जहाँ बड़े-बडे भामियाने लगे हुए थे, तो अनिता ने रामू से पूछा-'क्यो रामू तुम्हारी मुराही के ठण्डे पानी से मैं जरा मुंह धो लू तो तुम्हें बुरा तो नहीं लगेगा?' यह मुन कर रामू गद-गद हो उठा । जीवन भर उसने अपना ऐमा महत्व नहीं महसूस किया था। आज उसे कितनी खुशी हो रही थी कि अनिता जैसो मुन्दरी युवती की वह कुछ न कुछ सेवा कर रहा है । चहक कर बोला-'अनिता जी, यह भी कोई पूछने की बात है । लाइये मैं सुराही से पानी उडेलता हूँ, आप मुंह-हाथ धो लीजिये।' यह कह कर रामू गाड़ी के पिछली ओर चला माया । उसने मुक कर खड़े होते हुए सुराही का पानी उँडेला । अनिता हाथ में पानी लेकर मुंह पर छोटे मारने लगी। मुंह-हाथ धोकर अनिता ने अपने झोले मे से प्लास्टिक की एक छोटी-सी कंघी निकाली और एक नन्हा-सा दर्पण ले कर वालों में कंधी. करने लगी। बैलगाड़ी के हिलने-डुलने से दर्पण भी हिल जाता था। यह देखकर रामू ने गोपाल से कहा-'यार, थोडी देर के लिए गाडी रोक दो।' गोपाल ने गाडी रोक दी, और अनिता ने वडे इतमिनान से अपने बाल ठीक किये, गर्दन का पसीना पोछा और तैयार हो कर बैठ । गई। बैलगाड़ी उन शामियानो के निकट पहुँची । जव अनिता के कानो मे यह मावाज पड़ी कि अनिता जी मा गई तो उसे आश्चर्य हुआ ! वह नहीं जानती थी कि यहाँ भी कई लोग उसके नाम से ७२ 'अच्छा, यह सुन कर रामू मारे खुशी के वगले वजाने लगा। बोला-'तो आप क्या समझी थीं कि मैं झूठ बोल रहा हूँ ?' 'नहीं झूठ तो नहीं समझी थी, परन्तु तुम ठहरे जोकर । मैंने सोचा कि यूं ही मजाक न कर रहे हो।' 'खी-खी-खो', रामू ने हँसते हुए कहा-'अनिता जी, एक बात याद रखिये कि मेरी सूरत जोकरों वाली जरूर है परन्तु मैं मजाक नहीं करता।' तो यह बात है तो फिर एक और कुल्हड़ भर दो।' यह कहते-कहते अनिता ने कुल्हड़ उसकी ओर बढ़ाया और उसने सुराही टेढ़ी करके उसमें फिर से पानी भर दिया। उस समय वह बड़ा खुश था, कहने लगा-'अनिता जी हमें तो ठाकुर साहब ने कल ही कह दिया था कि हमें आपको लाने के लिए स्टेशन पर जाना होगा। मैंने उसी समय इस कोरी सुराही को खूब अच्छी तरह से धो-धाकर इसमें पानी भर दिया, और ऊपर से एक साफ कपड़े का टुकड़ा ढाँक दिया। रात भर सुराही खुली हवा में पड़ी रही । और जव हम स्टेशन को जाने लगे तो मैंने अंगोछा गीला करके इस पर लपेट दिया। रास्ते भर हवा खा-खा कर सुराही का पानी और ठंडा हो गया। इस समय मुझे कितना अच्छा लग रहा है कि मेरी यह सारी मेहनत अकार: नहीं गई क्योंकि आपको सुराही का यह पानी पसंद आ गया।' रामू की बात सुनकर वह सोचने लगी कि इन सीधे-सादे लोगों मन में भी कितना सच्चा प्रेम है, सेवा-भाव है, जो आम तौर पर प लिखे लोगों में दिखाई नहीं देता। सारा रास्ता हँसी-खुशी और बात-चीत में कटा। बीच-बीच अनिता ने फिर पानी पिया । जव दूर से उन्हें मंजिल दिखाई दी ७३. बड़े-बडे गामियाने लगे हुए थे, तो अनिता ने रामू में पूछा-'बयों रामू तुम्हारी मुराही के ठण्डे पानी से मैं जरा मुंह धो लू तो तुम्हें बुरा तो नहीं लगेगा?' यह मुन कर रामू गद-गद हो उठा । जीवन भर उसने अपना ऐसा महत्व नहीं महसूस किया था। आज उसे कितनी खुशी हो रही थी कि अनिता जैसी सुन्दरी युवती की वह कुछ न कुछ सेवा कर रहा है । चहक कर बोला-'अनिता जी, यह भी कोई पूछने की बात है । लाइये मैं सुराही से पानी उँडेलता हूँ, आप मुंह-हाथ धोः लीजिये। यह कह कर रामू गाड़ी के पिछली और चला पाया। उसने भूक कर खडे होते हुए सुराही का पानी उँडेला । अनिता हाथ में पानी लेकर मुंह पर छोटे मारने लगी। मुंह-हाथ धोकर अनिता ने अपने झोले मे से प्लास्टिक की एक छोटी-मी कंघी निकाली और एक नन्हा-सा दर्पण ले कर बालों में कंधी. करने लगी । बैलगाड़ी के हिलने-जुलने से दर्पण भी हिल जाता था। यह देखकर रामू ने गोपाल से कहा-'यार, थोड़ी देर के लिए गाड़ी रोक दी। गोपाल ने गाड़ी रोक दी, और अनिता ने बडे इतमिनान से अपने वाल ठीक किये, गर्दन का पसीना पोंछा और तैयार हो कर बैठ गई। बैलगाड़ी उन शामियानो के निकट पहुँची । जव अनिता के कानों में यह आवाज पड़ी कि अनिता जो भा गई तो उसे आश्चर्य हुआ। वह नहीं जानती थी कि यहां भी कई लोग उसके नाम से

७४
वाकिफ थे फिर उसने मन में सोचा कि चाहे ठाकुर साहब ने किसी से
इस बात का जिकर न भी किया हो, परन्तु इन जोकरों ने तो जरूर
उसे मशहूर कर दिया होगा।
वह बैलगाड़ी से उतरी तो उसका सामान रामू ने सम्भाला और
गोपाल उसे लेकर उस तम्बू की ओर बढ़ा जहाँ ठाकुर साहब ने डेरा
‘जमा रखा था।
वह तम्बू में घुसी तो ठाकुर साहब एक तख्तपोश पर बैठे कुछ
कागज देख रहे थे। इसने दोनों हाथ जोड़ कर नमस्ते की। अावाज
सुनकर ठाकुर साहब ने सिर ऊपर उठा कर उसकी ओर देखा-'यो,
'तुम आ गई अनिता ?'
'जी।'
'रास्ते में कोई तकलीफ तो नहीं हुई ?'
'जी नहीं। केवल चार घंटे का तो सफर था।'
'नहीं मेरा मतलब यह है कि स्टेशन से यहाँ तक पहुँचने में तो कोई
कष्ट नहीं हुआ?'
'जी नहीं।'
'अच्छा जो काम मैं तुम्हें सौंप आया था, वह सब ठीक हो
गया?
'जी हाँ।
'क्या किया जाये, यहाँ से स्टेशन तक बेलगाड़ी के सिवा और
कोई सवारी ही नहीं है।'
'जी मैं तो बड़े आराम से चली आई।'
1 'तव ठीक है। हाँ, देखो अनिता । मैंने तुम्हारे रहने का प्रबन्ध
में नहीं किया है। मैंने सोचा कि यहां खुले खेतों में तुम्हें शायद
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आराम महसूस न हो। तुम्हारे रहने का प्रबन्ध गांव के ही एक अच्छे बडे कमरे में कर दिया गया है। अभी तुम वहाँ जा कर नाश्ता- वास्ता करो। और फिर कुछ पाराम भी कर लेना, ताकि रात के जलसे के लिए तुम ताजा-दम हो जायो।' अब एकाएक अनिता को स्याल पाया तो उसने दाये-बाये देखते हुए कहा-'अरे, मेरा सामान कहां चला गया ?' गोपाल ने तम्ब के अन्दर झांकते हुए कहा-'वह तो रामू उम कमरे में ले गया है।' ठाकुर साहब बोले-'ठीक है, गोपाल, इन्हें भी वही ले जानो।' गोपाल मुंह से कुछ नहीं बोला, वह धीरे-धीरे आगे-मागे चला भौर अनिता उसके पीछे-पीछे बढी । पण्डाल से थोडी दूर पर गांव के सिरे पर ही वह कमरा बना हुमा था। दीवाले मिट्टी को थी पोर उस पर खपरैल पड़ी हुई थी। आगे एक छोटा सा चबूतरा बना था जो धरती से एक फुट ऊँचा और डेढ फुट चौडा था। अनिता दरवाजे में घुसी तो उसने देखा कि कमरा खासा बडा है है और उसमे जरूरत के सामानो के अलावा और कुछ नही था । दीवार के एक तरफ छोटी-सी चारपाई थी जिस पर उजली चादर विछी थी। माय एक तकिया भी था । एक ओर पानी की सुराही थी । बहुत पुराने ढंग की एक लोहे की कुर्सी भी थी। कमरे का फर्श कच्चा था परन्तु उसमें चार खिड़कियां होने के कारण हवा खूब पाती थी। खिडकियों के आगे कोई पर्दा नही लगा था, परन्तु धरती से खिडकियां ऊंची होने के कारण बाहर के लोग चलते-फिरते अन्दर झांक नहीं सकते थे। अनिता पहले ही मुंह-हाथ धो चुकी थी, इसलिए जब रामू ने पूछा-'माप हाय मुंह धोयेगी क्या ?' - ७६ 'नहीं, यह काम तो मैंने बैलगाड़ी में ही कर लिया था। हाँ कुछ देर रुक कर कपड़े बदल लूंगी, क्योंकि ठाकुर साहब ने कहा था कि मुझे रात के जलसे में भाग लेना पड़ेगा।' 'तो फिर आप नाश्ता करके कुछ देर चारपाई पर आराम कर लीजिये । जव ठाकुर साहब खुद ही हममें से किसी को भेजेंगे तो आप चली आइयेगा।' अनिता ने दायें-बायें नजर दौड़ा कर देखा तो खाने-पीने की कोई वस्तु दिखाई नहीं दी, और न ही इसका कोई प्रवन्ध नजर आया। वह कुछ परेशान सी होकर बोली -'रामू नाश्ता-पानी कैसे होगा ? यहाँ तो कुछ भी नहीं दिखाई देता।' 'अजी यहाँ क्या दिखाई दे ? यह आपके रहने का कमरा है, कोई रसोई घर तो है नहीं।' 'सो तो ठीक है परन्तु यह चीजें पायेंगी कहाँ से ?' 'यहाँ तो लंगर लगा हुआ है । पण्डाल के एक ओर हलवाई बैठा है । मिठाई, नमकीन, पूरी, कचौड़ी, भाजी, चाय, सोडा आदि सभी चीजों का अच्छा-खाशा प्रवन्ध है । अच्छा छोड़िये इन बातों को आप बताइये तो सही कि आप लेमन पियेंगी या गर्म-गर्म चाय ? मिठाई और नमकीन तो मैं वैसे ही लेकर आऊँगा।' 'अच्छा तो चाय ही ले आना। वर्फ वाला लेमन पी कर तो और प्यास लगेगी। उससे तो तुम्हारी सुराही का पानी ही अच्छा था।' 'पापका यह विचार तो विल्कुल ठीक है । इस समय नाश्ते के साथ पहले आप सुराही का पानी पी लीजियेगा और अन्त में गर्म-गर्म चाय का एक प्याला ।' 'अच्छा यही ठीक रहेगा।' ।

'तो मैं जाता हूँ।' इतनी देर तक गोल भी दरवाजे मे सहा रहा । जाते-जाते रामू ने उससे कहा-'यार कपड़ों का सूटकेस चारपाई के नीचे खिसका देना।' रामू चला गया और गोपाल ने उसके कयनानुसार मूटकम चार- पाई के नीचे खिसका दिया। अनिता बोली-'गोपाल चारपाई पर विधी हुई चादर और तकिया लपेटकर एक ओर रख दो, या उनको वापस कर देना जिनका यह मामान है और मेरा विस्तर खोलकर चारपाई पर विद्या दो।' इतना कह कर अनिता तो चारपाई से उठ कर एक पोर खड़ी हो गई और गोपाल ने तकिये को चादर में लपेटकर एक पोर डाल दिया। फिर अनिता का विस्तर विधाते समय वह सोचने लगा कि यह अच्छा मौका है । मनिता से दो-चार बातें कर लेनी चाहिए, वह कुछ देर सोचता रहा कि किम विषय पर बात शुरू करे, फिर बोला- 'अनिता जी, आप तो दो दिन अलग रही, इतने में ही यहां बडे-बड़े तमाशे हो गये ।' अनिता जानती थी कि उनमें से हर कोई उससे बातें करने के लिए कोई न कोई विषय ढूंढ निकालता था, वह मुस्कराकर बोली-'क्या- क्या हो गया गोपाल ?' 'मापने कुछ नही मुना क्या ?' 'नहीं तो।' 'प्रखबारों में तो पढ़ा होगा।' 'मखवार देखती तो रहती हूँ परन्तु न जाने तुम किसके बारे में कह रहे हो । कुछ वतामो तो पता चले ।' .

- अव गोपाल ने खूब अांखें मटकाते हुए कहा-'अजी यहाँ तो फौजदारी हो गई, लड़ाई-दंगा हुआ। और कई जलसों में हुडदंग भी मची।' अनिता को इस बात का तो पता था कि ठाकुर साहब और उनके आदमी इस प्रकार की खिचड़ी पकाया करते थे। परन्तु अभी तक उसे इस बात का पता नहीं चला था कि ऐसे दंगे हो भी चुके हैं। उसने दिलचस्पी लेते हुए पूछा-'क्या हमारे जलसे में भी हुड़दंग हुई ?' 'जी नहीं, भला हमारे जलसे में गड़बड़ कैसे हो सकती थी । ठाकुर साहव का ऐसा रोव है कि यहां पर एक चिड़िया भी नहीं फड़फड़ा सकती। वैसे तो हमारी पार्टी कोई गुण्डों की पार्टी तो नहीं है ।' 'गुण्डों की पार्टियां कौन सी हैं ?' 'यही महान् पार्टी, बेड़ा गर्क पार्टी, जनता उद्धार पार्टी प्रादि । सच पूछिये तो यह सब की सब गुण्डा पार्टी हैं।' 'अच्छा !' अनिता ने जानबूझ कर बुद्धू बनते हुए कहा---'मुझे तो इस बात का कुछ ज्ञान ही नहीं था। अच्छा यह तो वतायो कि हुमा क्या ?" 'अजी क्या पूछती हैं, इन सव का एक जलसा भी सफल न हो पाया। जहाँ कहीं भी उन्होंने जलसे किये वहीं लोगों ने ईंटें-पत्थर फेंके । बेचारों को हर जगह भागते ही बना।' यह बातें हो ही रही थीं कि रामू वहाँ आ पहुँचा। उसके साथ हलवाई का एक लड़का भी था। एक थाली में कुछ मिठाई, नमकीन और चाय आदि रखी थी और थाली साफ-सुथरे लाल अंगोछे से ढंकी हुई थी। कमरे में घुसते समय उसने गोपाल की बात सुन ली थी।

पालों को लोहे की कुर्मी पर रददा हुए उनने पूछा-'का बाउ चल रही पी गई? गोसाल उन इने उल्दी प्रा डा पर मुम नहीं था, पीर में बोला-'बुध नहीं, मैं इन्हें दता रहा था कि दूसरी मी पार्टियों के इन अनल रहे। रान युग होकर बोला-'हाँ अनिता बी ममी का मुंह काला हो. गया वेदन हमारा ही जलना मल रहा 1 का यह सब सदर असवार में पारनं नही पट्टी? अनिता ने उत्तर दिया-'नहीं मैंने तो कुछ नहीं पढ़ा ।' 'हो माता है कि मनी कोई मदर प्रकामित न हुई हो, परन्तु. धीरे-धीरे मब बदरें अन्नदारों में भाजायगी।' प्रनिदा को वह मद प्रोग्राम याद आ गये डो ठाकुर साहब नै बाग सिंह के माप मिलकर बनाये थे। पन नर को मरी प्रांसों के मागे गुरुडों को नट्टवाडी और मृन-मराव का चित्र धूम गया । उसका इतना डी सराव हुमा वि नारदा करने को मन नहीं हुआ। परन्तु व नो नगी ही थी और फिर टनने मन में यह भी सोचा कि राजनीति के क्षेत्र में यह सब कुछ तो होता ही रहेगा। यदि वह इतना घबराने लगी तो उमका माना-पीना और मोना दूभर हो जायेगा। यह सब कुछ मोच-समन कर उसने धीरे-धीरे नाश्ता किता। खाने की सब चीजें दिन्न ताजी और देगी पी में बनी थी, इसलिए उसे खाने में वडा पानन्द प्रात हुमा । माय-माय दह मुराही का ठण्डा पानी भी पोती रही। रामू के मुनाव के अनुसार दिल्युल अन्त में उसने गरमा-गरम नार के दो प्यार भी पी डाले । अब वह ताजा-दम हो गई और उसकी थगन भी दूर हो गई । जितनी देर तक वह नारता करती रही गोपाल और रामू वहीं खड़े इधर-उधर की हाँकते रहे। अनिता ने सोच रखा था कि वह उनसे कह देगी कि अब वे चले जायें ताकि वह आराम कर सके। परन्तु यह कहने की जरूरत नहीं पड़ी, क्योंकि खाली वर्तन उठाते समय रामू ने खुद ही कह दिया-'अच्छा जी, हम जाते हैं, आप अन्दर से दरवाजा वन्द कर लीजिये, क्योंकि खिड़कियों में से यहाँ बहुत मजे की हवा पाती है।' 'ठीक है; परन्तु इस बात का ख्याल रखना कि जव ठाकुर साहब बुलायें तो मुझे पाकर बता देना।' 'जो हाँ, आप उसकी चिन्ता न कीजिये। अभी तो काफी देर है। जलसा कहीं आठ बजे शुरू होगा। ठाकुर साहब आपको अधिक से अधिक पन्द्रह-वीस मिनट पहले बुला लेंगे। अभी तो आप निश्चिन्त होकर आराम कीजिये।' उनके बाहर निकल जाने पर अनिता ने अन्दर से कुण्डी चढ़ा ली। उसने चारपाई के निकट वाली खिड़की भी वन्द कर •दी, ताकि खास तौर पर कोई झाँकना भी चाहे तो झाँक न पाये। वह विस्तरे पर लेटी तो उसे पता भी नहीं चला कि कब उसकी आँख लग गई। एक तो वह सफर करके भाई थी दूसरे ठण्डी-ठण्डी हवा के झोंकों ने उसे परियों के देश में पहुंचा दिया। एकाएक ही वह हड़बड़ा कर जागी। वह समझ नहीं पाई कि वह 'कितनी देर तक पड़ी सोती रही, क्योंकि उस समय कमरे में अंधेरा छाया हुआ था; अलवत्ता खिड़कियों में से बाहर का प्रकाश दिखाई दे रहा था। - वह जल्दी से उठी और दरवाजा गोबर देवा तो पण्डाल की और वही गरमा-गरमी दिखाई दी। गैस हण्डे उगमग-जगमग कर रहे थे। लोगों के वॉलने और चिल्लाने का गोर वहाँ तक पहुँच रहा था, यद्यपि कोई वात मनम में नहीं पाती थी। यह देख कर वह सीटी, उसने अपने तकिये के नीचे में एक छोटी मी टार्च निकाली जिसे वह मदा अपने पास रखा करती थी। पहले उसने नोचा कि कमरे में रखी नानटेन यो जला ले, परन्तु फिर उमने नय किया कि टार्च तो है ही, कों न पहले माडी निकालकर पहन ले । यह मोच कर उसने चारपाई के नीचे रखे मूटकेम को धनीटकर बाहर निकाला और टार्च की रोगनी में खोल कर ए साड़ी और चलाउन निकालकर चारपाई पर रखा नब उसने टार्च बुझा दी। मुती विरियों के कारण कमरे में घना अंधेरा नही या बल्कि बहुत ही फोरा मा प्रकाम हो रहा था, परन्तु ऐमा नहीं कि वाहर वालों को अन्दर की चीज माफ तौर पर दिखाई दे मकै । उमने एक बार फिर दरवाजा बन्द करके मुवह वाली माडी उतारी और फिर नया पेटी कोट, नई गाड़ी और ब्लाउज पहनकर तैयार हो गई। यह काम तुका तो उमने लानटेन जलाई और दरवाजा खोल दिया। पहले तो वह बिस्तर पर हाय पर हाथ रख कर बैठ गई; फिर ਉੱਥੇ एकाएक स्याल आया कि ठाकुर माहब जब बुनायेंगे तो वह अपने कुछ कागज भी अवश्य देखेंगे, नाकि उनको तसल्ली हो जाय कि उमने माग काम ठीक-ठीक किया है या नहीं। यह स्याल प्रात ही वह उठी, और भूटकेस में में प्लास्टिक का बैग निकाला । वह वैग लेकर विम्नर पर बैठ गई और लालटेन अपने पास कुर्मी पर रम ली। बैग में से मद कागज निकाल कर उमने उनको । च पड़ताल की। इतने में ही रामू उसे लेने आ गया। उसने एक न रुक कर रामू की तरफ देखा और वोली-'बस दो मिनट ! हाँ ह तो बताओ कि वाहर से दरवाजे को लगाने का कोई ताला भी है ना नहीं, क्योंकि सूटकेस में मेरे कपड़ों के अतिरिक्त ठाकुर साहब के जरूरी कागजात भी पड़े हैं ?' इस पर रामू ने एक बड़ा सा पुराना ताला दिखाते हुए कहा- 'ताले का प्रवन्ध मैंने कर दिया है। आप चिन्ता मत कीजिये । यह न समझिये कि ताला पुराना है। पुराना जरूर है परन्तु अलीगढ़ का बना हुया है इस पर चाहे हथौड़े भी पड़ते रहें पर टूटने वाला नहीं।' अनिता से रामू अक्सर यही कहता था कि 'चिन्ता मत कीजिये' अब तो फिर उसके मुंह से यही शब्द सुनकर वह अपने आप ही मुस्करा दी। उसने पुराने कागज एक फाइल में लगा कर फाइल सूटकेस में रख दी और नये कागज प्लास्टिक के बैग में डालकर चलने को तैयार हो गई। दरवाजे से बाहर निकली तो पल भर को रुकी ताकि रामू ताला लगा ले । रामू ने ताला लगाकर प्लास्टिक के वैग की ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा--'यह मुझे दे दीजिये।' 'नहीं रहने दो। विल्कुल हल्का तो है ही।' 'नहीं, यह अच्छा नहीं लगता। कहीं ठाकुर साहब ने देख लिय कि मैं आपके साथ खाली हाथ चला आ रहा हूँ, तो मुझे डाँट पड़ेगी। अव अनिता और कुछ नहीं बोली। उसने वैग रामू के हवाले किय और खुद सहज भाव से चलती हुई ठाकुर साहव के तम्बू में पहुंची। समय कुछ खास-खास लोग उनके पास बैठे थे । अनिता को देखते ठाकुर साहब ने उन सज्जनों से कहा-'अच्छा, आपकी हमारी वात .

समाप्त हो चुकी । अब पाप जा सकते हैं । मुझे अनिता से भी बातचीत करनी है।' वे मय उठ खड़े हुए। उनमे वाग सिंह भी था। चलते-चलते वाग सिंह ने घूम कर उनको मोर देखा और बोला-~-'ठाकुर साहब प्रय जलमा प्रारम्भ होने में भी अधिक समय नहीं है । जलसा पाप ही के भाषण में शुरू होगा, दूसरों को जो कुछ कहना है, वह तो वे बाद में कन्हेंगे।' ठाकुर साहब ने तिपाई पर रखी हुई छोटी सी टाइम-पीस पर एक नजर डाली मोर बोले-'हा-हाँ, अधिक से अधिक मैं दस-पन्द्रह । मिनट में फुर्सत पा जाऊँगा । जो कागज में अनिता के हवाले कर पाया था मव उन्ही की जांच-पड़ताल करनी है।' बाग सिंह ने फिर धीमे स्वर में पूछा-'अगर आप कहे तो कुछ देर में किमी को प्रापके पास भेज दे। कही काम में व्यस्त होकर पापको अधिक समय न लग जाय ।' 'यह भी ठीक है, तो दस मिनट में किसी को भेज देना । परन्तु इतना याद रहे कि मेरे पहुंचने से पहले मब तैयारी हो जानी चाहिए । मुझे वहाँ वैकार बैठना न पडे ।' 'जी नहीं, भला यह कैसे हो सकता है।' पल भर बाद वे दोनो अकेले रह गये । रामू भी थैला वहाँ रय कर जा चुका था । ठाकुर साहब ने दोनो हाथो को हथेलियां मलने हुए कहा-'हो तो लामो मे उन कागजो पर एक नजर टाल लं।' अनिता ने बैग की जिा खीच कर बोला और कागज बाहर निकाल कर उन्हें बारी-बारी से ठाकुर साहब की ओर बढाना शुरू कर दिया।

८४ ठाकुर साहब को सदा ही अनिता का काम देखकर बड़ी खुशी होती थी। अधिक पढ़ी-लिखी न होने पर भी वह उनके जरूरी कागजों के महत्व को खूब समझती थी, और कभी ऐसा नहीं हुआ कि ठाकुर साहब ने कहा कुछ हो और अनिता ने कुछ और ही कर दिया हो । दफ्तर के दूसरे लोगों से उन्हें इस प्रकार की शिकायत अक्सर हो जाती थी, परन्तु अनिता के काम में आज तक वह कोई ऐसी गलती नहीं निकाल सके। अब भी उन कागजों को देखते-देखते उन्हें इस बात की बड़ी खुशी हुई। जब वह कागज देख रहे थे तो अनिता दवी नजरों से उनकी ओर देखती रही । वेशक ठाकुर साहब पहले वाले ही ठाकुर साहब थे । उनका वही जाना-पहचाना नाक-नक्शा था परन्तु फिर भी अनिता को वह पहले की अपेक्षा कुछ बदले लगते थे। उनमें क्या परिवर्तन हुआ था यह वह नहीं कह सकती थी परन्तु वह सोच जरूर रही थी। फिर एकाएक उसे ख्याल आया कि कहीं उसकी आँखों में तो कोई फरक नहीं आ गया । इस ख्याल के आते ही सनसनी की एक लहर उसके शरीर में दौड़ गई। हाँ, शायद यही बात थी । शायद यह मेहर बाबा से भेंट करने का नतीजा था। मुस्कराते-मुस्कराते ठाकुर साहब विना अनिता की ओर देखते हुए बोले--'अनिता।' 'जी'...अनिता अपने विचारों से चौंकी और हड़बड़ाकर बोली। अब ठाकुर साहब ने सिर उठा कर उसकी ओर देखा और कहा- 'मैं तुमसे बहुत खुश हूं।' यह सुनकर अनिता ने सुख की सांस ली क्योंकि वह तो घबरा ही गई थी। उसे यूं लगा था जैसे ठाकुर साहब ने उसके मन के विचारों को भांप लिया हो। ठाकुर साहब फिर बोले-'तुम्हारा काम बहुत ही

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माफ-सुपरा होता है। दूसरों का काम देवरर कई बार मुझे सन्न
होने लगती है । में वोवला डाता हूँ परन्तु तुमने पाउनु मुके शिकायत
का मौका नहीं दिया।'
टाकुर माह के यह गन्द ननार मनिता को माने मन में बड़ी
शान्ति मी महनून हुई। रमने मोचा कि ठाकुर साहब मचमुच ही वह
प्रच्दै मनुर हैं । यह अलग बात थी कि राजनीति के कामों में उन्हें
कभी उल्टी-मोयी हरकते भी दरनी पट जाती हैं। कम में कम उस
पर तो वह बहुत ही मेहरवान थे।
इतने में टाकुर साहब ने घड़ी की और देव दर वहा लो यह
काम तो पांच ही मिनट में मनुम हो गया। मैंने दस-बारह मिनट का
अनुमान लगाया था, परनु इतना कम ममय इसलिए लगा कर यह
काम तुम्हारा किया हुआ था।'
अनिता को और अधिक भी हुई क्योंकि वहत कम लोग ठाकुर
माह की प्रगंमा प्राप्त कर पाते थे । ठाकुर साहब फिर दोने-'मेरे
ध्यान में मनी लोग पण्डाल मे पट्टेच, मुके होने क्योंकि उनका गोर यहाँ
तक मुनाई दे रहा है।
'डी हो, जद में पा रही थी ननी मारा पण्डाल नचासच मरा
हुपा दिखाई देता या।'
'मच्छा मेर, कोई बात नहीं, हमने उनसे यह तो दिया ही है।
कोई न कोई दुसाने मा जायगा।'
इनना यहकर ठाकुर माल उठे और ददि-बाय मारते हुए बोले-
'मरे स्थान में यह टोगो कुछ मैत्री मी हो गई है की, तुम्हे वैवी
मगती है।'

८६ अनिता ने टोपी को जरा ध्यान से देखते हुए उत्तर दिया--'यूं तो कुछ पता नहीं चलता परन्तु किनारे-किनारे पर हल्की सी चिकनाई दिखाई दे रही है। श्राप इतनी सोच में क्यों पड़ गये हैं ? दूसरी टोपी पहन लीजियेन।' 'ठीक पाहती हो अच्छा, तुम्हीं निकाल दो।' अनिता ने उठकर ठाकुर साहब का सूटयेरा खोला और उसमें रखी पाधी दर्जन टोपियों में से देख-भालो एक अच्छी टोपी निकाल दी। ठागुर साहब ने तिपाई पर रणे शीशे में चेहरा देखते हुए टोपी को बड़े कायदे से सिर पर रखा। वह टोपी को पागे-पीछे से हिला-जुलाकर ठीक कर ही रहे थे कि इतने में बाग सिंह ने पाकर पाहा'पाश्ये ठाकुर साहब, समय हो गया।' ठाकुर साहब ने पीरो में ही देखते हुए पूछा---'राव, तैयारी हो गई ? राय लोग मंच पर पहुँच गये ?' जी हाँ । अब सिवा पापके किसी और की प्रतीक्षा नहीं हो । 'अचछा तो तुम चलो मैं पा रहा हूँ।' बाग सिंह चला गया। ठाकुर साहब ने एक बड़ा सा कागज अनिता की ओर बढ़ाते हुए सहा---'लो अनिता इसे भी अपने बैग में रख लो जब मैं भाषण देने लगू तो इसे निकालकर मेरे प्रागे रख देना । जो भाषण मैं श्राज देने जा रहा है उसकी टिप्पणियां इसी पर लिखी हैं।' अनिता ने चुपचाप बह लागण अपने बैग में रख लिया। ठाकुर साहब ने शीशे में अन्तिम दृष्टि डालते हुए रुमाल से मुंह पोंछा शौर फिर अचकन के बटन दुरुस्त करते हुए वह तम्बू के बाहर निगाले और अनिता उनके पीछे-पीछे हो ली।

मचमुच ही पण्डाल पचाखच भरा हुआ था। गव की प्रौख उन्ही की ओर लगी हुई थी। जब ठाकुर माहब ने मंच पर पैर रखा तो पण्डाल तालियो से गूंज उठा, प्राधे से अधिक लोग उठकर बड़े हो गये । तालियां बजनी ही चली गई। ठाकुर गाह्य पच्ची तरह जानते थे कि इस भीड मे काफी संख्या में उनके अपने पिट्ट, भी थे जो पहले बनाई हुई योजना के अनुसार जोर-जोर से तालियो पोटे जा रहे थे, उनकी तालियां समाप्त होने में नहीं पा रही थी और उनके देखा-देवी दूमरे लोग भी तालियां बजाये जा रहे थे। इतने समय तक ठाकुर साहब दोनो हाथ जोडे भौर आये मंद यूं पडे रहे, जैगे प्राकारा में देवता लोग उन पर फूलो की वर्षा पर रहे हो। बाग गिह को इतना तो मालूम था कि उसके घर के मारे फिमी को फिमी प्रकार की गडवड करने का साहम नही हो गकता, फिर भी उसने कई लट्टयाज पण्डाल के मास-पाम खडे कर रखे थे। यापिर तालियां समाप्त हुई और फिर ठाकुर मदन सिंह की जय- जयकार से सारा पण्डाल गूंज उठा । ठाकुर साहब नहाते हुए कोय की तरह गदगद होकर नीचे को मुके और एक गाव-तविये से पीठ लगा कर बैठ गये। उनके बैठते ही उस इलाके के चौधरी माहब उठार गडे हो गये। उन्होंने मूब ढीली-हाली उजली धोती पहन रखी थी और बुली-मुनी भास्तीनो याला ढीला-ढाला कुर्ता पहन रगा था। मिर के बाल अधिकतर मफेद हो नुके थे और ठुड्डी के नीचे एक मोर छुट्टी दिपाई दे रही थी। उनकी धनी मोर लम्बी मंद पी गो क्यूतर के परो की तरह फैली हुई उनके मुंह पर अपनी रा-छाया माने हुए थी। उनके हाथ में मोटी लकड़ी का खूटा था जिसे उन्होंने बाँह पर लटकाकर दोनों हाथ उठाये और जनता को चुप रहने का इशारा किया। किसी कर्मचारी ने माइक्रोफोन की गर्दन ऊपर उठानी चाही तो. उन्होंने उसे रोकते हुए कहा-~-'रहने दो भई मुझे दो मिनट तो बोलना ही है, जरा चिल्ला कर वोल लूंगा।' उनकी इस बात पर आस-पास बैठे हुए सभी लोग हँस दिये । तालियां बजनी वन्द हुईं तो उन्होंने कहना शुरू किया--'सज्जनो! आज तो बहुत ही सुन्दर, बहुत ही पवित्र और बहुत ही भाग्यवान दिन है कि जब हमारे बीच में ठाकुर मदन सिंह जी पधारे हैं । ठाकुर साहब की प्रशंसा करना सूर्य को दोपक दिखाने वाली बात है । आखिर इस देश में, खासकर हमारे इलाके में कौन ऐसा अभागा व्यक्ति होगा जिसने ठाकुर साहब का नाम न सुना हो; जो यह न जानता हो कि ठाकुर साहब ने अपने प्यारे देश को स्वतन्त्र कराने के लिए हँसी-खुशी जेल की मुसीबतें और दुःख सहन किये। उन्होंने अपना सब कुछ त्याग करके, अपनी जमींदारी, अपनी कोठियाँ, कहना चाहिए अपना सब कुछ देश को अर्पण कर दिया। आज उनका नाम बड़े गर्व से लिया जाता है। हमारे इलाके के एक-एक बच्चे के मन में उनके लिए गहरे आदर का भाव है। उनका नाम लेते ही हमारे सिर पादर से मुक जाते हैं और हमारे सीने गौरव से तन जाते हैं । तो कहने का अर्थ यह है कि उनका परिचय देने की कोई जरूरत नहीं है । इस समय आप भी उनके मुख से कुछ शब्द सुनने के लिए उत्सुक हो रहे होंगे ! मैं अपने महान् नेता और भाप सज्जनों के बीच में अधिक समय तक दीवार बनकर खड़ा नहीं रहना चाहता।' .

२६ यहाँ पहुँच कर चौधरी साहब ने अपना हाथ प्राकाम की मोर उठाते हुए और भी ऊँचे गरजदार स्वर में कहा-'हाँ मैं पापको याद दिला हूँ कि चुनाव शुरू होने में अब ज्यादा दिन नही रह गये । सायद यह कहने की जरूरत नहीं कि हमारा वोट किम पार्टी और किस नेता को जायेगा । हाँ तो एक बार मेरे साथ ऊँचे स्वर में कहिये, ठाकुर मदन सिंह की....... 'जय'-मारी जनता ने गवा फाड़ कर वहा । चौधरी माहब फिर बोले-'हमारा वोट किम पार्टी को जायेगा ?' 'मत्ता पार्टी को'-- जनता ने फिर ऊँचे ही स्वर में उत्तर दिया। प्रव चौधरी साहब ने मुट्ठी कस कर हवा में लहराते हुए गरजदार' मावाज मे कहा-'हमारा वोट किम नेता को जायेगा ?' 'टार मदन सिंह जी को'---जनता ने तीसरी बार गला फाड कर उत्तर दिया। प्रय चौधरी साहब ने नयने फुना कर दाय-बाये देखा और अपने भारी-भरकम शरीर को मञ्च पर गिरने से बाल-बाल बनाते हुए वे बैठ गये। एक बार फिर वातावरण में तालियां गूंजने लगी। ठाकुर साहब खुश थे, दाग मिह खुश था, क्योकि वे जानते थे कि उनके पिट्ट अपने प्रोग्राम में कितने सफल हो रहे है । तालियां बजाने और नारे लगाने में पहल वहीं करते थे और फिर भेडो की वहाँ कोई कमी भी नहीं थी। बहुत से लोगो को यह भी पता था कि यदि उनमे से विमी के गले से भरपूर मावाज न निकली तो बाद में उसने गले की अच्छी तरह मालिस कर दी जायगी।

गह राव कुछ हो गुगा तो ठाकुर गाव बिल्कुल कबूतर बने जरा आगे को खिसका भाये, किसी ने माइक्रोफोन को हिला-जुला कर उनके मुंह को निगाट खिरागा दिया। कुछ देर तक ठाकुर साहब अग्निं मूंदे बैठे रहे । खुले सेतों की हवा आते-जाते उनकी मूंछों के बालों को हिला रही थी। उस समय उनके होठों पर मुस्कराहट थी, और चेहरे पर इतना भोलापन दिखाई देता था जैसे खानदानी काबूतर की सन्तान हो । सारी जनता कान धागे को बढ़ाये उनकी बातें सुनने को लिए बेचैन हो रही थी और ठाकुर साहब अपने विचारों को एकत्रित कर रहे थे। आखिर उन्होंने बहुत ही मध्यग स्वर में बोलना शुरू किया। उनका बोलने का यही ढंग था। प्रारम्भ में बड़े धीमे और मध्यम स्वर में गात शुरू करते और थोड़ी देर बाद गरम हो जाने पर उनके गले में से भारी और ऊँचा स्वर निकलने लगता, गर्दन की नसें फूल जाती, अाँखें लाल हो जाती, और मुंह से थून उड़ने लगता। उन्होंने इतना धीगे- धीमे बोलना शुरू किया कि लोगों को अपने कानों के पीछे हाथ रख- रख कर उनको मुंह से निकले हुए शब्दों को पकड़ना पड़ा । वह बोले---- 'भाइयो और बहनो ! अभी-अभी में शर्म के मारे धरती में गड़ा जा रहा था। मैं सोच रहा था कि धरती फाट जाये और मैं उसमें समा जाऊँ । शायद भापको पाश्चर्य हो, कि मेरा इस तरह सोचने का कारण गया शा? इराना उत्तर बड़ा सीधा है। मैं अपने इन कानों से सुन रहा था गि, चौधरी साहब किस तरह मेरी प्रशंसा कर रहे थे, और किस तरह भाग तालियां बजा-बजा गार श्रीर नारे लगा-लगा कर उनकी हर बात का समर्थन कर रहे थे । मुझे इसी पर शर्ग पा रही है। प्राप कहेंगे कि इसमें शर्म की क्या बात थी, क्योंकि चौधरी साहब ने तो एक बात भी गलत नहीं गाही । यहाँ पर मैं भापका विरोध नहीं कर समता ।

६१ मैं स्वीकार करता हूँ कि उन्होंने जो कुछ भी कहा उसका एक-एक गम्द बिल्कुल ठीक था। फिर भी मैं आपरो कहना चाहता हूँ कि जिम मनुष्य ने अपने प्रापको उम्र भर अपने देश का तुच्छ सेवक, और उम देश की जनता का अपने आपको एक तुच्छ दास समझा हो, भला उसे अपनी प्रशंसा भरे शब्द मुन कर शर्म नही पायेगी तो और क्या होगा? मैं प्रापसे पूछता हूं कि मेरे लिए यह स्वामाविक ही था या नहीं कि मैं मोचूं कि जमीन फट जाये और मैं उसमे समा जाऊ।' अन्तिम शब्द कहते-कहते ठाकुर साहब का ग्वर नूब ऊँचा उठ चुका था, और उनके गले को नमे कुछ-कुछ फूल माई यो । बाग सिंह पहले से ही समझे हुए था कि इस मौके पर क्या करना है । चुनांचे उनके इशारे पर मारे पिझुप्रो ने जोर-जोर से तालियां बजानी शुरू कर दी। इतनो वाने तो ठाकुर माहब ने भूमिका के तौर पर जबानी हो कह दी थी, अनिता ने उनकी याज्ञानुसार उनका दिया हुप्रा बागज चुपके से उनके प्रागे डेस्क पर रख दिया । ठाकुर माहब ने कन- बियों से उस कागज की और देगा और फिर सिर कार उठा कर बोलना शुरु किया-'तो सज्जनो, जब हम जेल की काल-कोठरी में पढे गड़ रहे थे, तब हमने स्वप्न में भी यह बात नहीं गोची थी कि प्राज जिस जनता की खातिर हमने अपने जीवन के हर मुख का बलिदान दिया है, कल को यही जनता हमें देश के राज्य की बागडोर सम्भालने को कहेगी। देश ने स्वतन्यता प्राप्त की, जनता के उत्साह और हमारे बलिदान के फलस्वरूप विदेशी राज्य समाप्त हुया, और मेकडो वर्ष के बाद हमारा देश गुलामी की जजीरे नोट कर एक बार फिर दुनियाँ के म्वतन्त्र देशों के माथ यन्ये गे कन्धा मिला कर खड़ा हो गया।

उन्होंने महसूस किया कि उनका यह जलसा सचमुच ही बहुत सफल ठाकर साहब के भापरण के बाद और भी छोटे-बड़े नेताओं ने भाषण दिये । परन्तु ठाकुर साहब और उनके खास-खास साथियों को वाद में होने वाले भापरणों से ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी, फिर भी उतनी देर तक ठाकुर साहब बैठे रहे ताकि उनके उठ जाने से जलसा उथल-पुथल न हो जाय । आखिरकार जलसा समाप्त हुआ। पाँच-दस मिनट तक लोगों ने ठाकुर साहब को घेरे में लिये रखा। वह उनसे इधर-उधर की बात-चीत करते रहे । वास्तव में वह ठाकुर साहब का निकट से दर्शन करना चाहते थे । ठाकुर साहब की महानता किस बात में थी, इसका उन्हें कुछ ज्ञान नहीं था । इतना लम्बा भापण हो जाने पर भी उनके पल्ले कुछ नहीं पड़ा था। यह सम्भव भी नहीं था, क्योंकि ठाकुर साहब और उनके साथी उन विपयों पर बात-चीत करते रहे जिनका उन सीधे-सादे लोगों को कुछ भी ज्ञान नहीं था। उनके लिए यह सब हवाई वातें थीं, जिनका कोई सिर-पैर उन्हें दिखाई नहीं देता था। वह तो केवल इतना जानते थे कि बड़ी जोरदार बातें हुई। ठाकुर साहब जेल में गये थे, इसलिए वह महान थे। उनके कथनानुसार देश बड़ी उन्नति कर रहा था, इसलिए लोगों ने भी मान लिया कि देश सचमुच ही बड़ी उन्नति कर रहा है। परन्तु यदि उनसे पूछा जाता कि वह यह वतायें कि देश की उन्नति किस तरह हो रही थी, तो वह निश्चय ही बगलें झाँकने लगते । वह तो केवल भेड़-बकरी की तरह नेताओं के पीछे-पीछे चलने वाले लोग थे। आज एक नेता ने एक बात कही तो वह मान ली, कल दूसरे नेता ने दूसरी बात कही तो वह भी मान ली।

किमी तरह जनता के घेरे में ने निस्ल कर ठाकुर गाव भरने तम्बू तक पहुंचे। उनके पिट्ठ मोयी-मादी जनता को समझा रहे कि इम समय उनके महान् नेता उनको मेवा करके थक गये हैं । लोगों ने यह बात मान ली और उनसे पीछा छुदा कर याग गिढ् और ठाकुर साहब के दूसरे जाम-साम गुर्ने अन्दर घुमे चोर उन्होंने नारीफों के पुल बांध दिये। 'डाकुर माहब, यम गजव कर दिया आपने ।' 'पारने नो कमाल कर दिया ठाकुर मात्र ।' "रया रंग जमाया है भाग्ने ।' 'बम जी, अब यहाँ विनी और का रंग जमने वाला नहीं है।' 'अपने भाषण की मुस्मात ऐमी की कि बम बुध न पूछिये । पाज नर हमने मैकडो नापण मुने, परन्तु ऐमा मुन्दर भाषण कभी नहीं मृना था।' 'प्रजी शुरू से प्राबिर तक एक-एक शब्द मोतियो में तोलने लायन था।' नव पिठू ठाकुर माहब को धेरे में लिये एक से एक बहार बाने बना रहे थे और ठार माहब पाराम-कुर्सी पर बैठे मुम्करा रहे थे। उनको पांगे मुंदी हुई थी । टांग प्रकही हुई और पात्र फैलाये हा यो लगते थे जैसे वह किमी प्रत्यार्ड में पिनी वडे पहलवान को चारो गाने चिन करके माये हो। प्रापिर चुगामद की बाते करके जब लोग पक हुवे तो टाकुर माहब ने मह फाट पर नम्वी मी जमुहाई लो और बोले-'प्रजी इतनी तारीफ भी रिम काम की, जनता की मेदा करना तो हमारा एनप्य ६४ उन्होंने महसूस किया कि उनका यह जलसा सचमुच ही बहुत सफल रहा। ठाकुर साहब के भाषण के बाद और भी छोटे-बड़े नेताओं ने भाषण दिये । परन्तु ठाकुर साहब और उनके खास-खास साथियों को बाद में होने वाले भाषणों से ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी, फिर भी उतनी देर तक ठाकुर साहब बैठे रहे ताकि उनके उठ जाने से जलसा उथल-पुथल न हो जाय । आखिरकार जलसा समाप्त हुआ। पाँच-दस मिनट तक लोगों ने ठाकुर साहब को घेरे में लिये रखा। वह उनसे इधर-उधर की वात-चीत करते रहे । वास्तव में वह ठाकुर साहव का निकट से दर्शन करना चाहते थे । ठाकुर साहब की महानता किस बात में थी, इसका उन्हें कुछ ज्ञान नहीं था । इतना लम्बा भापरण हो जाने पर भी उनके पल्ले कुछ नहीं पड़ा था। यह सम्भव भी नहीं था, क्योंकि ठाकुर साहब और उनके साथी उन विषयों पर बात-चीत करते रहे जिनका उन सीधे-सादे लोगों को कुछ भी ज्ञान नहीं था । उनके लिए यह सव हवाई बातें थीं, जिनका कोई सिर-पैर उन्हें दिखाई नहीं देता था। वह तो केवल इतना जानते थे कि बड़ी जोरदार बातें हुई । ठाकुर साहब जेल में गये थे, इसलिए वह महान् थे । उनके कथनानुसार देश बड़ी उन्नति कर रहा था, इसलिए लोगों ने भी मान लिया कि देश सचमुच ही बड़ी उन्नति कर रहा है। परन्तु यदि उनसे पूछा जाता कि वह यह बतायें कि देश की उन्नति किस तरह हो रही थी, तो वह निश्चय ही बगलें झाँकने लगते । वह तो केवल भेड़-बकरी की तरह नेताओं के पीछे-पीछे चलने वाले लोग थे। आज एक नेता ने एक बात कही तो वह मान ली, कल दूसरे नेता ने दूसरी बात कही तो वह भी मान ली।

६५
किमी तरह जनता के घेरे में से निकल कर ठाकुर गाहब अपने
तम्यू तक पहुंचे। उनके पिट्ठ गोपी-गादी जनता को समझा रहे थे कि
दम ममय उनके महान् नेता उनको मेवा करके थक गये हैं।
लोगों ने यह बातें मान ली और उनसे पीछा छुदा कर याग गिह
भोर.
ठाकुर साहब के दूसरे साम-दाम गुर्गे अन्दर घुमे और उन्होंने
नारीफों के पुल बांध दिये।
'ठाकुर माहय, बम गजब कर दिया प्रापन ।'
'मापने नो कमाल कर दिया ठाकुर माहय ।'
'क्या रंग जमाया है पारने ।'
'बम जी, अब यहाँ किमी पौर का रंग जमने वाला नहीं है।'
'मापने भाषण की गुरुपात ऐमी को शिमग कुछ न पूछिये । पान
नक हमने मैकडों मापण मुने, परन्तु ऐमा मुन्दर भाषण कभी नहीं
मुना था।'
'प्रजी
शुरू में पामिर तक एक-एक शब्द मोतियों में तोलने
लायक था।'
नत्र पिद् ठाकुर साहब को घेरे में लिये एक में एक बढ़कर याने
दना रहे थे और ठाकुर गाहब पाराम-कुर्गों पर वैदे मुस्करा रहे थे।
उनकी प्रोगे मुंदी हुई थी 1 टोग पाटी हुई और वात्र फैलाये यो
गगने थे जैसे वह किसी अन्ना में किसी बड़े पहलवान को चारों गान
निन परक माय हो।
प्रागिर गुमामद
को वान करके. जय योग पर हुये तो टारर
गाय ने मुंह फार कर लम्बी मी जमुहाई नी और बोले-'प्रजी इननी
नागरुनी किम काम की, जनता की सेवा करना दो हमारा पर्तव्य

है। अव हमें खुशियाँ ही न मनाते रहना चाहिए बल्कि आगे की योजना भी तैयार करनी चाहिए हालाँकि मैं बहुत थक गया हूँ फिर भी काम "तो करना ही होगा। उनकी यह बात सुनते ही चार श्रादमी उठे । दो ने उनके बाजू और कन्वे दवाने शुरू कर दिये और दो ने उनकी एक-एक टाँग सहलानी शुरू कर दी। ठाकुर साहव आनन्द में आ वोले--'अनिता जरा लगे हाथों मेरे सिर पर तेल की मालिश भी कर दो।

छः कुछ ही दिनी में ठाकुर साहब अपना दोरा ममाप्त करपे याग नोट माये । अपने हेड माफिग में बैठ कर उन्होंने मास-यास मलाहारो से राय-मशविरा किया और बोले-'मेरे विचार में तो हमारा दौरा बहुत ही सफल रहा। एक मलाहकारही जी, भला यह भी कोई कहने की बात है ? पापके इलाके भर मे डके बज गये हैं।' ठाकुर माहब ~'वह तो ठीक है लेकिन मैं मोचता है.........।' दूसरा सलाहकार-'माफ कीजिये ठाकुर माहब यदि मार मोचने है कि अब कुली पार्टी या महान् पार्टी, या वेडा गर्न पार्टी, या जनना मुबार पार्टी मादि की दाल गल सकती है तो मैं प्रापसे महमत नहीं ठाकुर साहब-~-'वह तो मैं भी जानता है, परन्तु गच्ची बात यह है कि मुझे मानवता पार्टी से थोडा डर है।' तीमरा मलाहकार--'यदि पाप कहे तो मेहर बाबा के जलने में भी यह हुडदंग मचाई जाय कि वहां पर एक भी प्रादमी किने न पाये।

ठाकुर साहब ने सिर पर हाथ फेरते हुए कहा--'नहीं-नहीं ऐसा दम उठाने से तो हमारा नाम ही बदनाम हो जायगा । हमें ऐसी भूल- भी नहीं करनी चाहिए।' चौथा सलाहकार-'चलिये मैंने आपकी बातें मान ली परन्तु इसका कोई उपाय भी तो होना चाहिए।' ठाकुर साहब तो कुछ नहीं बोले, अलबत्ता पांचवें सलाहकार ने सिर आगे बढ़ा कर कहा-'ठाकुर साहब मुझे एक बात सूझी है । ठाकुर साहब-'वह क्या ?' पाँचवाँ सलाहकार-'मेरे विचार में मेहर वावा की पार्टी में अपना एक जासूस घुसेड़ दिया जाय ।' 'जासूस ।' इतना कहकर ठाकुर साहव और भी जोर-जोर से सिर खुजाने लगे। फिर उन्हें एकाएक अनिता का ख्याल आया तो वह जरा. सीधे होकर बैठ गये और बोले- 'बात तो कुछ मन को भाती है । लेकिन सवाल तो यह है कि ऐसा कौन हो जिसे जासूस बनाकर वहाँ भेजा जाय ?' सव लोग सोच में पड़ गये । तव ठाकुर साहब बोले----अच्छा यह तो वताइये कि इस काम के लिए अनिता कैसी रहेगी ?' यह सुन कर सबके चेहरे खिल उठे, उन सवों ने हामी भरी । ठाकुर साहव बोले-'अच्छा तो आप लोग चलिये, मैं अभी अनिता के बुलाकर इस सम्बन्ध में बात-चीत करता हूँ।' सब लोगों ने उनकी इस राय को पसन्द किया और वहाँ से उठक चले गये। ठाकुर साहब ने अनिता को बुला भेजा। जव अनिता आकर नमस्ते की तो उन्होंने हाथ के इशारे से अपने निकट ही तर पोश पर बैठने को कहा। वह बैठ गई तो ठाकुर साहब कुछ सोच ६६ पड गये। भनिता ममझदार थी, परन्तु इसके साथ ही यह कम-उमर और भोली थी। ठाकुर साहब को उगसे यह तिकड़मदानी की बातें करने में संकोच हो रहा था। उन्होंने इससे पहले कभी उमसे ऐसी बातें नहीं की थी। काफी सोच-विचार के बाद उन्हें कहना पड़ा, क्योंकि मनिता उनकी ओर टकटकी यघि देख रही थी। उन्होंने सोचा कि सीधी बात न कहकर जरा हेर-फेर से अपना प्रोग्राम बताया जाय । सुनांचे वह हंसकर बोले-'कोई खास बात नहीं थी, मात्र सारा दिन मैं इतना व्यस्त रहा कि तुमसे बात करने का मौका ही नहीं मिल सका । पव एकाएक स्याल पाया कि माज तुमसे तो कोई बात ही नहीं हुई। यह मुन कर मनिता बच्चों की तरह शरमा गयी। उसके दिल में ऐसा कोई शक नही हुमा कि ठाकुर साहब हेर-फेर करके उमसे कुछ भौर कहने जा रहे हैं । दुनिया चाहे कुछ भी कहे परन्तु ठाकुर साहब का अनिता से वही मम्बन्ध था जो एक बुजुर्ग का अपने से छोटे के साथ होना चाहिए । भनिता ने भी पाज तक उनके व्यवहार में कोई ऐगी- सी बात नहीं पाई थी। चुनारे इस समय भी उनकी बात सुनकर मनिता को ऐसे ही लगा जैसे वह अपने पिता की प्यार भरी बात गुन रही हो । भनिता की प्रासे मुक गई पौर वह मपनी उंगलियों में गाडी का कोना मसलने लगी। ठाकुर साह्य फिर बोले-'प्रनिना, मभी लोग कहते हैं कि हमारा यह दौरा बहुत ही सफल रहा, क्यो तुम्हारा क्या म्यान है?' ठाकुर माहव का प्यार भरा व्यवहार देखकर पनिता यह बात भूल गई कि उन्ही के पिट्ठमो ने दूसरी पार्टियों के जनमो मे हुड्दग मचावर उन्हें असफल बना दिया था। पिछले कुछ दिनो मे उगन यह १०० सोचकर अपने मन को तसल्ली दे दी थी कि अाखिर राजनीति की बातों को ठाकुर साहव उससे बेहतर समझते हैं। यदि वह किसी चीज को आवश्यक समझकर करें तो उसे इस बात का अधिकार नहीं था कि वह स्वामख्वाह अपने मन में उल्टी-सीधी वातें सोचे। उसने खुश होकर उत्तर दिया--'लोग झूठ थोड़े ही बोलते हैं। जब सूर्य प्रकाश में चम- कता है तो सारा संसार देख लेता है । मुझसे भी हर एक ने भापकी सफलता का जिकर किया।' यह तो केवल ठाकुर साहब ही जानते थे कि इस सफलता को प्राप्त करने के लिए उन्हें क्या-क्या पापड़ बेलने पड़े, भला यह भोली-भाली लड़को उनके हथकण्डों की तह में कैसे पहुँच सकती थी। एक बार तो ठाकुर साहब के मन को यह सोचकर अच्छा नहीं लगा कि वह ऐसी सीधी-सादी लड़की के भोलेपन का नाजायज फायदा उठावें । परन्तु उन्हें फिर ख्याल आया कि उसका यह भोलापन ही तो उसका सबसे बड़ा हथियार था, क्योंकि यदि यह दूसरी पार्टी में भी घुस जाय तो इसके भोलेपन के कारण किसी को इस पर शक नहीं हो सकता। उन्होंने भी मन में सोच लिया कि राजनीति में सब कुछ चलता है। उन्हें अंग्रेजी की कहावत याद आ गई कि प्रेम और लड़ाई के क्षेत्र में किसी भी हथियार का प्रयोग अनुचित नहीं । ठाकुर साहब ने इधर- उधर की कुछ और वातें करने के बाद अनायास ही प्रश्न किया- 'अनिता, तुमने मेहर बावा का तो नाम सुना होगा ?' अनिता चौंकी, फिर धीमे से बोली-~'जी हाँ।' 'कभी उनसे मिली भी हो या नहीं ?' यह सुनकर अनिता के हाथ-पांव फूल गये। उसने सोचा कि क्या कहीं वहां जाने की सूचना भी ठाकुर साहब तक पहुंच चुकी ? - .

१०१
.
ठाकुर साहब की शक्ल मे ऐया तो नहीं लग रहा था। जो भी हो,
अनिता ने गोचा कि भूठ बोलना किमी तरह भी ठीक नहीं होगा।
प्रालिर इसकी जरूरत भी क्या है ? ठाकुर साहब ने कभी उसे इस बात
से मना तो नहीं किया था। वह धीमे से बोली-'जी हाँ ! एक
बार।'
"अच्छा, मैं समझा था शायद तुम कभी न मिली हो ।'
'जी. मैं शायद कभी न मिलती लेकिन मौका ही एमा पड़
गया था।'
'मच्छा?'
'जी हाँ, मेरी एक ससी है मिला।'
'क्या यह उनकी पार्टी में काम करती है ?'
'जो यह तो मैं नहीं कह मकती। मुझे इससे कोई दिलचस्पी भी
नहीं लेकिन एक रोज शाम के समय यह मुझे घमीटकर ले गई।'
'तो नया हमा? इसमें कोई बुराई की बात तो नहीं ।'
'जी हो, यही वह भी कह रही थी।'
'वैसे नगे मेहर वादा?'
'वह तो बिल्कुल साधु हैं।'
'तुमने ठीक वहा, उनके दो रूप है, एक माधु का पोर दूसरा
राजनीतिज्ञ का। परन्तु इससे मेरा यह मतलब नहीं है कि यह बहु-
रुपिये है। नहीं, वह बडे उच्च-कोटि के मनुष्य हैं, रही राजनीति की
बात, तो यह एक अलग चीज है । पाने-अपने विचारों को फैलाने का
हर एक को अधिकार है।
टाकुर साहब ने यह बात इसलिए यही कि भनिता के मन में मेहर
बाबा के प्रति जो मादर की भावना है उसको ठेग न लगे । उन्होंने फिर

१०२ इना शुरू किया-'अनिता तुम अभी बच्ची हो और राजनीति के र-फेर को नहीं समझती । परन्तु तुम्हें इतना तो मालूम होना चाहिए के हमारे देश में कई पाटियाँ हैं जिनके अपने-अपने आदर्श और उद्देश्य है, वह एक दूसरे का विरोध भी करती हैं; इसलिए कि यदि जनता उनसे सहमत हो तो चुनाव में उन्हें वोट देकर देश का राज्य चलाने के लिए गद्दियाँ प्राप्त कर सकें । अव यह जनता के हाथ में है कि वह किसे चुने और किसको न चुने ।' ठाकुर साहब ऊँचे स्तर की बातें कह तो रहे थे, परन्तु वह उन प्रादमियों में से थे जो अपना उल्लू सीधा करने के लिए कठोर से कठोर काम करने से भी बाज नहीं पाते । परन्तु वह यह भी जानते थे कि अनिता जैसी भोली-भाली लड़की से काम लेने के लिए कुछ न कुछ हेर- फेर करना पड़ेगा। बातें करते समय वह अनिता के चेहरे को बड़े ध्यान से देखते रहे । वह चुप हुए तो अनिता ने कहा-'पाप ठीक ही कहते हैं । बात यह है कि मैं राजनीति की समस्याओं को नहीं समझती। मेरा मतलब है कि मैं उनकी गहराई तक नहीं पहुँच पाती, क्योंकि मुझे इस विपय से कोई खास दिलचस्पी नहीं है।' 'वह तो ठीक है परन्तु मेरे साथ रह कर तुमको कुछ न कुछ दिल- चस्पी लेनी ही पड़ेगी, क्योंकि मैं तो राजनीति के क्षेत्र में हूँ।' अनिता ने झुकी आँखों को पल भर के लिए उठाया, वह ठाकुर साहब के चेहरे से अन्दाज लगाना चाहती थी कि कहीं उन्हें क्रोध तो नहीं पा रहा है । परन्तु ऐसी कोई बात नहीं थी। ठाकुर साहब क चेहरा शान्त था, वह उसी मीठे स्वर में बोले-'तुम मेरा मतलब समः गई न?' - 'जी हो, मेरी तो यही बोगिन रहती है कि पार जो बार मुझे मो उमे में टोक ढंग में कर मडूं।' "हाँ-ही, वह तो मैं जानता है पार फिर मैं तुममे कितनी बार पर भी नुका है कि तुम्हारा काम मुझे गदा ही बट्टन पमन्द प्राता है । हो, अनिता एक बात याद मा गई।' 'क्या?' 'अपने मलाहकारों को अनुमति में मैंने तुम्हारे लिए एक काम गोला है।' 'भार पहिये में जरूर करूंगी।' ठाकुर माहब पल भर कोर्स और फिर बोले-'देवो भनिना, मेरे ख्याल में तुम मेहर वावा के पाम पाला-जाना शुरू कर दी।' अनिता ने चोक कर गिर उठाया नो ठाकुर माह्य योले-'देवो, जहा तक मेहर वाचा के माधु होने का गम्बन्ध है मैं उनका बड़ा भादर करता है और मेरी इच्छा है कि तुम भी उनका पादर करी। परन्तु जहाँ तक उनकी गजनीति का सम्बन्ध है यहाँ हमारा उनमें कुछ मन- भेद है,गमझी?' 'जी हो।' 'मैं चाहता हूँ कि उनके इन विचारों और प्रोग्रामों के बारे में जानकारी प्राप्त करके तुम मुझे पूरी सूचना दे दिया करो। याद रखो कि राजनीति के क्षेत्र में मेहर चाया माधु होते हुए भी हमारी मालोचना जार करते हैं, यहत ही पडी मालोचना करते हैं, मौर यह हमे विगी प्रवार को छूट देने को तैयार नहीं । इसीलिए हमें राज- नीति के क्षेत्र में उनसे टकार लेनी ही पड़ेगी । तुम कि मेरे माय हो मिलिए तुम्हारा पत्तव्य है कि जो भी तुमसे बन गत वर हमारे लिए फरी।"

१०४ 'यही, कि ठाकुर साहब ने अपना सुझाव ऐसे ढंग से रखा था कि अनिता को पीछा छुड़ाना असंभव हो गया । यह ठीक है कि मेहर वावा साधु थे, परन्तु इसके साथ-साथ वह राजनीतिज्ञ भी तो थे । सचमुच वह दूसरी पाटियों की आलोचना करने से पीछे नहीं हटते थे। वह चुनाव जीतने के लिए जलसे भी कर रहे थे, और लोगों से वोटों की मांग भी कर रहे थे । अनिता ज्यादा गहराई तक नहीं सोच सकी, उसने उलझे हुए अन्दाज में पूछा-'मुझे क्या करना होगा?' तुम उनके जलसों में जानो उनकी सब बातें सुनो, इधर- उधर से भी जो कुछ पता चले सब की रिपोर्ट तैयार करके मुझ तक पहुँचा दो। अनिता को यह काम कुछ कठिन नहीं लगा और न सरसरी नजर से उसे इसमें कोई बुराई दिखाई दी। आखिर ठाकुर साहब का भी तो उस पर बहुत अहसान था । वह उनके सिवा किसी और का सहारा भी तो नहीं ले सकती थी। ठाकुर साहब फिर बोले-'घबराने की कोई बात नहीं, अव कुछ ही दिनों में चुनाव होने वाले हैं, बस चुनाव तक तुम्हें यह काम करना होगा, उसके बाद इसकी कोई जरूरत नहीं रहेगी।' अनिता ने कोई आपत्ति नहीं की, इसलिए कुछ देर तक ठाकुर साहब उसे कई और वातें समझाते रहे । अन्त में ठाकुर साहब से विदा होकर जब वह घर पर खाना खाकर लेटी तो यह सोच कर कि अव उसे मेहर बाबा के यहाँ जाने में आज्ञा नहीं लेनी पड़ेगी, वह खुश थी। इस खुशी में वह इस बात को भी भूल गई कि उनके यहाँ वह जासूसी करने जाया करेगी, जैसा कि ठाकुर साहब ने उससे कहा था । अनिता ने यह भी एक सरल सी बात समझी । आखिर मेहर वावा जो कुछ कहते थे वह चोरी-छिपी तो नहीं कहते थे उनके यहाँ जो बात होती थी इक की चोट होनी थी। राजनीति का प्रर्य वह यह नहीं मममंत थे कि दूसरों को धोखा दिया जाय या उनमे भूट बोला जाय । इसलिए उनकी किसी बात को ठाकुर माहब तक पहुँचाना पासान बात है । भनिता अपने मन में यही समझी दि भगवान ने इमी बहाने में उगे मेहर वाया के निकट रहने का मौका दिया है। जब यह इसी तरह विम्तर पर लेटी-लेटी अपने विचारों के बहापों मे वहनी जा रही थी तो अचानक ही किमी के दरवाजा मटमटाने को प्रावाज सुनाई दी । उसने लेटे-लेटे ऊँचे स्वर में पूरा-'कौन है ?' 'म । मो गई वया?' यह उमिला पी पावाज थी । जव मनिता ने उमड़ी आवाज पह-- बानी तो उसे बडी मुभी हुई। उचल कर बिस्तर में उठी पोर भट मे पिया गोल दिये । उर्मिला अन्दर पाई तो वह जोर ने माप, उमर गले में लिपट गई। उर्मिला को उसके इस तरह लिपटने में प्रवम्भा हुमा, बोली- 'यो री माज तो वही मुग दियाई दे रही है । यता तो किम कारण इतना प्यार उमड़ पाया है ? कही विमो से प्रेम तो नही हो गया है ?' मनिता उमकी यह बात सुन कर कुछ में, भौर कहने लगी- 'मुझे तो प्यार तुम्ही से है। परन्तु सुगी इस बात की है कि मात्र तुम बडे मौके पर माई हो। 'स्यों, वेमा मौका ? मैं कुछ ममझी नहीं ।' "एगी मोई वाम बात नहीं है जिसे समझाने की जरूरत पटे। पात्र जरा मैं स्वी हुई थी, ममझ में नहीं मा रहा था रि क्या कम, क्या न कर ? इतने में ही तुम्हारी मावाज सुनाई दी, जिसे मुन कर मुझे इतनी गुनी हुई कि तुम इसका पन्दाजा नहीं लगा माती । प्रच्या छोडो इन तों को, पायो बैठो-बैठना क्या, अायो दोनों बहनें बिस्तर पर लेट र बातें करें।' दूसरे ही पल दोनों एक दूसरे की ओर मुंह करके लेट गई और चाँहें एक दूसरी के गले में डाल दीं। उर्मिला की समझ में तो कुछ नहीं पाया कि अव अनिता इतना प्रेम क्यों जता रही है लेकिन फिर उसने मन में यही नतीजा निकाला कि हो सकता है कि आज अनिता का मूड ही ऐसा हो रहा हो । उसने यह भी सोचा कि चूंकि अनिता कुछ दिनों के लिए ठाकुर साहब के साथ बाहर चली गई थी, इसलिए आज सखी से मुलाकात होने पर उसे कुछ अधिक खुशी हो रही हो। पहले तो उमिला उसके दौरे के बारे में बातचीत करती रही, फिर एकाएक बोली- 'परी अनिता, मेहर वावा से मुलाकात के बाद तो तू एकदम ही बाहर चली गई थी, मैं तुझसे यह भी नहीं पूछ पाई कि मेहर बाबा के यहाँ फिर कभी चलोगी या नहीं।' उमिला ने यह बात भी अनिता के मन की कही थी । चुनांचे अनिता चहक कर बोली--'क्यों नहीं चलेंगे जी । सच पूछो तो एक बार मिल कर बार-बार मिलने को जी चाहता है।' 'परन्तु कहीं तुम्हारे ठाकुर साहब को कोई आपत्ति हुई तो।' 'नहीं, मैंने उन्हें बता दिया है कि मैं अपनी एक सखी के साः मेहर बाबा के दर्शन करने चली गई थी।' 'अच्छा, तो फिर ठाकुर साहब विगड़े तो नहीं ? उन्होंने तुमसे । कहा तो नहीं ?' 'कुछ नहीं कहा, वस इतना ही बोले कि मेहर बाबा बड़े महा हैं। उनके पास जाने में कोई हर्ज नहीं है।' उर्मिला की जगह कोई और होता तो शायद उसे इस बात प .

सा हो जाता कि ठार माद जैसे पाप नेना ने पनिता में यह थात यूं ही नहीं वह दी होगी, जरूर इसका युध कारण होगा। परन्तु उमिला भी मासिर सीपी-मादो सड़की थी इसलिए उसे कुछ गक नहीं हुआ। उमने केवल यही मोचा कि मेहर दावा बूढे हैं पोर बिल्वन माघु इयलिए उनके पान भाने-जाने में ठाएर माहब ने कोई भारति नहीं उठाई होगी । वह युग होकर बोली-'मैं तो पहले ही करती थी, न जाने सुम क्यों मरी जा रही थी ?' 'अब क्या कहूँ उमिला, ठाकुर साहब ने मेरे सिर पर हाथ रगा है, उन्होंने मुझे महारा दिया है, उनका व्यवहार मदा ही एक पिता का मा रहा है, तुम्ही बनामो मुझे उनमे हर के तो रह्ना ही चाहिए । या कम मे कम ऐसी कोई हन नहीं करनी चाहिए कि जिससे उनके मन को दुःम हो।' 'वह सब तो ठीक है, परन्तु हम लड़क्यिों की राजनीति में नया मतलव ? तुमने जो काम वह करवाते हैं मो नुम कर ही देती हो बम, पौर तुम्हें क्या करना है ? 'हो, यही मेरी मूल थी, जब तक मुझे ठाकुर माहब के विचारों का पता न चलता, तब तक मैं क्या कह गवती थी।' 'छोडो भी इन बातों को अब यह वनामो कि मेहर पाबा के पास चनने का कब प्रोग्राम है ? 'जब तुम कहो।' 'सो कल ही चलो।' 'चलो।' 'पसी बात?' "विजुल पनी बात ।'

'यह न हो कि कल को तुम्हारा मन डोल जाय ।' .
'नहीं जी मन कैसे डोलेगा, कल चलने बालक तो......,
अनिता रुक गई, तो उर्मिला बोली-'तुम कुछ कहते-कहते रुक
क्यों गई?'
'नहीं, यूं ही।'
'अच्छा तो श्रव हमसे भी छिपाने लगी।'
अनिता ने प्यार से हल्की-सी चपत उर्मिला के मुंह पर लगाते हुए
कहा---'मला तुमसे क्या छिपाना ? और फिर छिपाने की बात भी
क्या है ?
'मैं कहती हूँ कि यह बात है तो फिर बगलें क्यों झांक रही हो?
मन की बात कह दो न?'
'बात इतनी ही थी कि ठाकुर साहब के साथ दौरा करने में बड़ा
मजा आया । मैं सोच रही थी कि मेहर बावा भी तो चुनाव के सम्बन्ध
में दौरे पर जायेंगे।'
'हां-हां, मेरे ख्याल में वह शीघ्र ही जाने वाले हैं। तो क्या
तुम्हारा मन हो रहा है कि तुम भी उनके साथ दौरे पर चलो।'
'हां, जी तो यही चाहता है ।'
'परन्तु ?'
'अव क्या कहूँ ?'
'शायद ठाकुर साहब का डर होगा।'
'जी नहीं, अव उनका कोई डर नहीं। उन्होंने तो मुझे कह दिया
है कि तुम काफी काम कर चुकी हो, इसलिए चाहो तो दस-पन्द्रह दिनः
की छटी मना लो।'

१०६ 'मच्या तो यह बात है। फिर भड़चन क्या है ? मैं तो पहले से म्ही मैहर बावा के साथ जाने का प्रोग्राम बनाये हुए हैं।' 'तब तो और भी मजा भायेगा परन्तु"।' अनिता ने यह बात पूब उछल कर कही भोर फिर उसका सिर कुछ निराशा से भुक गया। 'यह परन्तु, परन्तु पैया लगा रखी है तुमने ?' 'मेहर बावा मुझे अपने माय ले जाना स्वीकार करेंगे या नहीं ?' "उनकी बात छोडी । कल ही उनसे मिलने चलेंगे, तो मैं उनसे मह दूंगी कि मैं अपने माय तुम्हें भी ले जा रही हूँ।' 'मगर कही उन्होंने मना किया कि यह तो ठाकुर माहब के पारा रहती है तो?' 'मजी छोड़ो इन बातो को, तुम मेहर यावा को समझी ही नहीं। उनके दिमाग में ऐसी बात मा ही नहीं सकती। उनके पास कई लोग ऐसे भी माते हैं जिनका ठाकुर माह से भी सम्बन्ध है, लेकिन मेहर चाया उनसे भी उसी स्नेह से मिलते हैं।' इसके बाद दोनों सखियो का अच्छा सा प्रोग्राम बनना यहा, पौर वे यह मोप-मोच कर गुम होती रही कि जब थे मेहर यावा के साप दौरे पर जायेंगी तो कितना मजा मायेगा। x x दूमरे दिन वे दोनो मेहर यावा के यहाँ पहुँची । उस दिन वे पान- बुझ कर देर मे गई ताकि मेहर वाया के पास कोई न रहे। पब तो मनिता को भी ठाकुर गाहब पास जाना जरूरी नहीं था, कोकि भय तो पहली प्य टी उगकी यही लगी थी कि वह मेहर बाबा के भाग- पाग मंडराती रहे । जब वे पहुंची तो पाकई मेहर बाबा के पास कोई पौर नहीं था।

-'तुम कुछ
'यह न हो कि कल को तुम्हारा मन डोल जाय ।'
'नहीं जी मन कैसे डोलेगा, कल चलेंगे बल्कि मैं तो...
अनिता रुक गई, तो उमिला बोली-
कहते-कहते रुक
क्यों गई ?'
'नहीं, यूं ही।'
'अच्छा तो अब हमसे भी छिपाने लगी।'
अनिता ने प्यार से हल्की-सी चपत उर्मिला के मुंह पर लगाते हुए
कहा-'भला तुमसे क्या छिपाना ? और फिर छिपाने की बात भी
क्या है ?
'मैं कहती हूँ कि यह बात है तो फिर बगलें क्यों झांक रही हो ?
मन की बात कह दो न ?'
'बात इतनी ही थी कि ठाकुर साहब के साथ दौरा करने में बड़ा
मजा आया। मैं सोच रही थी कि मेहर वावा भी तो चुनाव के सम्बन्ध
में दौरे पर जायेंगे।'
'हां-हां, मेरे ख्याल में वह शीघ्र ही जाने वाले हैं। तो क्या
तुम्हारा मन हो रहा है कि तुम भी उनके साथ दौरे पर चलो।'
'हां, जी तो यही चाहता है।'
'परन्तु ?'
'अव क्या कहूं ?'
'शायद ठाकुर साहब का डर होगा।'
'जी नहीं, अव उनका कोई डर नहीं। उन्होंने तो मुझे कह दिया
है कि तुम काफी काम कर चुकी हो, इसलिए चाहो तो दस-पन्द्रह दिन
की छुट्टी मना लो।'

'प्रच्छा तो यह बात है। फिर अड़चन क्या है ? मैं तो पहले से ही मेहर वाया के साथ जाने का प्रोग्राम बनाये हुए हैं।' 'तब तो और भी मजा आयेगा परन्तु" ' अनिता ने यह बात सूब उछल कर कही और फिर उसका सिर कुछ निराशा से झुक गया। 'यह परन्तु, परन्तु क्या लगा रखी है तुमने?' 'मेहर बाबा मुझे अपने माय ले जाना स्वीकार करेंगे या नहीं ?' 'उनकी बात छोडो । कल ही उनसे मिलने चलेगे, तो मैं उनसे मह दूंगी कि मैं अपने साथ तुम्हें भी ले जा रही है।' 'मगर कही उन्होंने मना किया कि यह तो ठाकुर माहब के पास रहती है तो?' 'अजी छोडो इन बातो को, तुम मेहर वावा को समझी ही नहीं। उनके दिमाग मे ऐमी वात पा ही नही सकती। उनके पास कई लोग ऐसे भी पाते हैं जिनका ठाकुर माहब से भी सम्बन्ध है, लेकिन मेहर बावा उनसे भी उसी स्नेह से मिलते हैं।' इसके बाद दोनो सखियो का अच्छा सा प्रोग्राम वनता रहा, और वे यह सोच-सोच कर मुश होती रही कि जब वे मेहर बाबा के साथ दौरे पर जायेगी तो कितना मजा भायेगा। x x X x दूसरे दिन वे दोनो मेहर बावा के यहाँ पहुँची। उस दिन वे बान- बूझ कर देर से गई ताकि मेहर याबा के पास कोई न रहे। अब तो अनिता को भी ठाकुर साहब के पास जाना जरूरी नहीं था, क्योकि भव तो पहली ड्यूटी उसकी यही लगी थी कि वह मेहर बाबा के माम- पास मंडराती रहे। जब वे पहुंची तो वाकई मेहर वावा के पास कोई और नहीं था।

११० AAR वे दोनों उनके निकट जा बैठीं और उन्हें देखते ही मेहर बाबा बोले- 'यह अनिता बेटी ही है न ?' उमिला-'जी हो, पहले भी तो एक बार आ चुकी है।' मेहर बाबा-'हाँ वह तो मुझे याद है लेकिन फिर भी मैंने लिया।' अनिता को मेहर वावा के साथ बैठकर उसी अनोखी शान्ति का अनुभव हुआ जो कि पहली बार हुआ था। मेहर बाबा के बात करने के ढंग में किसी प्रकार का संकोच नहीं था। न कोई हेर-फेर दिखाई देता था। यूं लगता था जैसे वह उन दोनों को अपनी बेटियां ही सम- झते हों । बातों-बातों में मेहर बावा बोले-~~-'बेटी संजोग की बात है, मैंने अभी तक चाय नहीं पी है, आज फिर हम लोग इकट्ठे ही चाय पिगंगे।' अनिता ने चुपके से उर्मिला के कान में कुछ कहा तो मेहर बाबा ने उसे यह हरकत करते देख लिया, मुस्कराकर बोले-~-'यह हमारी बेटी । क्या कह रही है तुम्हारे कान में उमिला?' मिला खिलखिला कर हँसते हुए बोली-'कह रही है कि आज मेहर बाबा को हम खुद चाय बनाकर पिलायेंगे।' मेहर वाया ने पीछे को सिर फेर कर जोर का कहकहा लगाया और बोले-~~-'क्यों नहीं, क्यों नहीं ? लेकिन बेटी चाय के पानी में तुलसी की गुछ पत्ती जरूर डाल देना ।' दोनों सखियाँ उठकर थोड़ी दूर बने रसोई घर में चली गई और दस मिनट बाद चाय तैयार करके ले आई। मेहर बाबा ने पहला चूंट भरते ही कहा---'मा हा-हा ! मेरी बेटी अनिता ने कैसी. स्वादिष्ट चाय बनायी है। जी चाहता है कि हर रोज इसी विटिया के पूछा। हाथ की बनी हुई चाय पिया करूं। परन्तु यह कैने हो सकता है ? यदि मुझे यही रहना होता तो शायद मेरे मन को यह इच्छा पूरी हो जाती, लेकिन मैं तो शीघ्र ही दौरे पर जाने वाला हूँ।' उर्मिला ने प्रनिता को चाके से कोहनी मारकर इशारे ही इशारे में ममना दिया कि अपना मुझाव रखने का यही मुनहरा मौका है । तब वह उनकी ओर देखते हुए बोली-मिहर वावा, यह काम इतना अस- म्भव नहीं जितना मार ममझते हैं । भारको मैंने बताया नहीं कि अनिता भी हमारे साथ चल रही है । मैं इसे अपने साथ ले जा रही है।' 'मच ?'-मेहर बाबा ने पुगी और पाश्चर्य के मिले-जुले स्वर में उमिला बोली-'केवल भारकी आज्ञा लेना चाहती है।' महर वावा-'वाह बेटी इसमें माना की क्या जरूरत हैं ? जैसे तुम मेरी बेटी, वैनी ही अनिता भी मेरी बेटी है।' कुछ देर बातचीत करने के बाद दोनो सखियाँ वहाँ से बहुत खुश- युग वापस लौटी और फिर उन्होंने दोरे पर जाने की तैयारी शुरू कर दी। x दुमरे ही रोज सुबह अनिता ने ठाकुर साहब को यह खवर सुनाई तो वह मारे मुशी के उछल पडे बोले-'मरी अनिता, तुमने इतनी जल्दी. वाम बना लिया ? मेहर बाबा ने तुम्हे साथ ले जाने में कोई आपत्ति नहीं उठाई? 'जी नहीं।' ठाकुर साहब ने सोचा कि उनका मन्दाना ठीक ही था। मानक इतनी भोली-भाली दिखाई देती है कि इस पर मेहर बाबा को कोई हो भी नही सकता। x x ११२ । अनिता बोली-'असल में मुझे अपनी सहेली उर्मिला की बड़ी सहा- यता मिली । यदि उसका साथ न मिलता तो मैं इतनी सरलता में यह काम न पार पाती। गह कहते-कहते अनिता की प्रात्मा ने उसे धीमे से डांटा, परन्तु असल बात यही थी कि उसे मेहर बाबा के निकट रहने का शौक था। उनके पास रह कर उसे अजीब सी गान्ति मिलती थी । इस समय उनके पास रहने का और कोई तरीका भी तो नहीं था। अभी तक अनिता का मन बंटा हुआ था, एक पोर ठाकुर साहब थे जो इस संसार में उसके राव कुछ थे और दूसरी ओर गेहर बाबा थे जो साक्षात शान्ति ने मवतार थे । अनिता के मन में कोई पाप नहीं था, वह मेहर बावा को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुंचाना चाहती थी। अव ठाकुर साहब उसे कुछ शोर गुर भी समझाते रहे। ठाकुर • साहव का भी बात करने का ढंग ऐसा था कि जिगरी अनिता यह गह- सूस न करे कि यह गेहर बावा के विगन थे, बलिला यह समझे नि व्यक्ति- गत रूप में उनके मन में मेहर वावा ताबड़ा सम्मान हो । बद तो केवल राजनीति के क्षेत्र में ही अलग विचार रखते हों। x प्रासिर एक रोज अनिता और उमिला मेहर बाबा के साथ दोरे •पर रवाना हो गई। इस दौरे के सिलसिले में ये सब उस स्थान पर भी पहुँचे जहाँ ठाकुर साहब कुछ दिन पहले भाषण दे चुके थे । अनिता तो जानती ही थी कि ठाकुर साहब ने जलसे में उनके पिट्ठू भी बहुत बड़ी संख्या में थे जो देहातियों को पेर-घार गार वहाँ ले पाये थे, परन्तु मेहर बाबा के बारे में इस बात की कल्पना नहीं की जा सकती थी। फिर भी अनिता ने देखा कि उरा रोज यहाँ थाने पालों की संख्या ठाकुर साहब X X . - :

११३ के जलसे से दुगुनी थी। जिसका नतीजा यह निकला कि शामियानों के बाहर खेतों में वाम गाड़ दिये गये मोर उनके कार लाउड स्पीकर बांध दिये गये, ताकि जो लोग पण्डाल में न ममा म वह सेतो में नी महर वावा का भाषण सुन सके । आज फिर वैमे ही गैस की हण्डियां जल रही थी, जंगल में मंगल हो रहा था और वहाँ एक मो लट्टवाज नही खडा था । अाखिर मेहर याया के भाषण का समय आ पहुंचा । उन्होंने किनी को इस बात की प्राजा नहीं दी कि वह खुशामद भरे गन्दों में उनका परिचय कराये । वह स्वयं ही यूं भाषण देने लगे- 'भाइयों वेटो और बेटियो, 'मुझे बहुत मुशी है कि मैं आज आपके मम्मुख पाना दृष्टि- कोण रमने जा रहा हूँ। हो सकता है मेरा इस तरह भापण देना आपको कुछ अजीब सा लगे वोकि मैं प्रापसे यह नही रहूंगा कि मैं प्रापका तुच्छ मेवक हैं और सिर्फ आपको मेवा के स्याल मे त्याग का जीवन बिता रहा हूं क्योंकि ऐसा कहना महान् भूठ होगा। मही बात तो यह है कि मैं अपनी प्रात्मा की शुद्धि के लिए ऐना जीवन यतीत कर रहा हूँ। मैं हमेगा गरीब था और हूँ । न मैंने पार लोगों की मेवा के लिए अपनी जायदाद ही वो है और न पापकी खातिर जेल ही गया हूँ। एक वार जेल अवश्य जाना पड़ा था, वह भी अपने देश को गुलामी की जंजीरो से प्राजाद कराने के हंतु । यह नो मनुष्य होने के नाते मेरा कर्तव्य था। गायद पार में से भी बहुत मार जेल गये वह यहीं तक पहुंचे थे कि मारा पण्डाल नालियों की आवाज में मूंज उठा । मेहर बावा ने अपने दोनो बालू उठाकर हाय फेला दिये और जनता से अनुरोध करने लगे कि वह चुप हो जाय । मागे जनता ८ - बावा कुछ उनको अनुरोध पर चुप हो गई, तब वह बोले-'देखिए मैं आप से प्रार्थना करता है कि यदि अब किसी व्यक्ति ने तालियां बजाई तो मैं अपना भापण विना पूरा किये ही चला जाऊँगा।' उनकी यह चेतावनी सुनकर सारी जनता में खामोशी छा गई । मेहर देर मौन रहने के बाद फिर यूं भाषण देने लगे-'पाप जानते ही होंगे कि हमारे महान् नेता हर बात कल पर टाल देते हैं। मेरा कहने का अर्थ यह है कि इतना समय बीत जाने पर अनाज की देश में कोई कमी नहीं होगी, इस पंचवर्षीय योजना के बाद सब चीजें सस्ती हो जायेंगी। अगली पंचवर्षीय योजना के बाद देश के हर नागरिक के पान अपना घर होगा। इतना समय गुजर जाने पर देश के हर प्राणी को पहनने के लिए कपड़े मिल सकेंगे। इस तरह से हर काग कल पर टलता जा रहा है । महीनों गुजरे, वर्षों गुजर गये । परन्तु इनका कल अभी तक नहीं पाया, और न पायेगा। 'अब मैं अपने दूसरे देशवासियों के साथ मिलकर यह पूछना चाहता कि वह कल आयेगा भी या नहीं। मैं दावे से कहता हूँ इन महान् नेताओं का कोई उद्देश्य नहीं है । पूछता कि यदि वे सच्चे देश- भक्त हैं तो अपना दृष्टिकोण जनता के आगे रखें और फिर बिना किसी अनुचित दबाव के उन्हीं पर यह बात छोड़ दें कि वह उनको पार्टी को वोट दे । इन लोभियों को इतना भी नहीं मालूम है कि जब पुरे का पूरा देश आगे बढ़ेगा तो वे भी सब के साथ आगे बढ़ जायेंगे। बढ़े दुःख रो कहना पड़ता है कि ऐसा होता नहीं । जब अपने आपको नेवर नाहलाने वाले ये नेता अपना उल्लू सीधा करते हैं तो उन्हें अपने नोने वालों को साथ मिलाना पड़ता है। जनता का सारा रुपया जो गोजनाओं पर खर्च होना चाहिए उस धन का काफी बड़ा हिस्सा नेता मैं ११५ और इनके पिट्ट, प्रापम में बांट लेते हैं। शिकायत करें तो किममे करे दुखड़ा रोये तो किमके पागे रोये । मोचने की बात है। जिसके पास आप शिकायत ले कर जायगे वह पहले से प्रापका माल हजम विये बैठा होगा । पाप चोसेंगे, चिल्लायेंगे, वह आपसे उल्टी-सोधी या बना कर पापको शान्त कर देगा ।पार शान्त होकर घर बैठ रहेंगे और देग में उल्टी गंगा ज्यों की त्यों वहती रहेगी। हमारे इन देश भक्तों की महान् कला है वाते वनाना । पाप उनकी बाते सुनकर गद्गद हो उठते हैं । आप समझते हैं कि इस मंमार में मार से अधिक कोई भी भाग्य- वान नही क्योंकि प्रापको ऐसे उच्चकोटि के नेता मिले हैं जो दिन- रात अापके गम में घुले जा रहे हैं। मजे की बात तो यह है कि ऐसे नेता अपने जेल जाने का भी खूब प्रचार करते है और उमका पूरा-पूरा लाभ उठाते हैं । जैसे जेल जाना भी कोई डिप्लोमा प्राप्त करना है। दो-चार साल बडे पाराम से जेल में काट पाये तो गोया बहुत बड़ा तीर्थ कर पाये । अब वे प्राने देश से, अपनी जनता से, जेल जाने की कीमत पमूल कर रहे हैं । जेल जाने के नाम पर अपने गरीव देशवानियों को निचोड़कर उनका सून चूम रहे हैं। पूछता कि क्या विदेगियो ने जेल में कोई ऐमा स्कूल या कोई ऐमा कालेज खोला था जिममे इस बात की शिक्षा दी जाती थी कि एक स्वतन्त्र देश की समस्याएँ के.थे हल की जाती हैं, या राज्य का मामन कैमे किया जाता है ? न जाने जेल से लौट कर पाने वाला हमारा हर नेता अपने पापको देश का गासन चलाने में निपुण क्यों समझना है । प्राज हर बडा नेता चाहता है कि वह कार की सवारी करता रहे, उसके घरो मे रेसमी परदे लटकते रहें, लोग उमे मुक-मुक कर मलाम करते रहें और वह देश का मेवक कहलाता रहे । यही कारण है यि जो एक बार गद्दी पर बैठने का मजा ले लेता है वह उमर मैं । . भर उसे छोड़ना नहीं चाहता । चाहे इसके लिए उसे कैसे-कैसे पापड़ वेलने पड़ें। चाहे गुण्डों का सहारा लेना पड़े चाहे देश की लुटिया डुबोनी पड़े। इसका नतीजा यह है कि देश में गुण्डों की संख्या बढ़ती जा रही है । वे गुण्डे भले लोगों की पगड़ियाँ उछालते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि 'सइयाँ भये कोतवाल अब डर काहे का' । यदि पुलिस उन्हें पकड़ कर जेल में बन्द भी कर दे तो उनके सेवक यही महान् नेता फौरन ही उन्हें जेलखाने से निकलवा लेंगे। 'जहाँ तक भापरणों का सम्बन्ध है, दिन रात पूंजी-पतियों को गालियां दी जा रही हैं। समाजवाद का आदर्श आपके सामने रखा जा रहा है । परन्तु राज पूंजीपतियों का ही है । मैं देख रहा हूँ, और मेरे साथ आप देख रहे हैं कि जब से देश स्वतन्त्र हुआ है तब से अमीर, और अमीर हो गये हैं, तथा गरीव, और गरीब हो गये हैं। देखा श्रापने, यह है हमारे समाजवाद का चमत्कार ।' वैसे इन महान नेतानों की बातें सुनो तो हैरानी होती है । संसार के ऊँचे से ऊँचे आदर्शो पर भापण देने में शेर हैं। एक कहावत है कि मनुष्य का जीवन साधारण होना चाहिए, परन्तु उसके विचार ऊँ रे होने चाहिए । लेकिन यहाँ पर उल्टी बात है। देश के इन सेवकों को बड़े पाराम का जीवन व्यतीत करने की जरूरत महसूस होती है, और उसी हिसाव से उनके विचार बहुत ही गिरे हुए होते हैं। सारी शिक्षा दूसरों के लिये हैं। वे इस देश के रहने वालों से इस बात की आशा रखते हैं कि वे देश के हित के लिये जीवन के हर सुख और हर पाराम का बलिदान कर दें। श्राप से वादा किया जाता है कि आपके बच्चों का भविष्य बहुत उज्जवल होगा। फिर उन बच्चों से वादा किया जायगा कि उनके बच्चों का भविष्य बहुत उज्जवल होगा । वस इसी तरह यह चक्कर चलता रहेगा। दूसरे लोग नेताओं के मापण मुन-सुनकर खुश होते रहेंगे और यह नेता-देश के हित में घुलने वाले मेवा-दुनिया भर की ऐश करते रहेंगे। मतलब यह कि सारी मिक्षा केवल दूमरी के लिए है और नेता लोगों को इस शिक्षा की कोई जरूरत नहीं है क्योकि उन्होंने तो पहले ही त्याग का जीवन व्यतीत किया है । 'पार ऐसे स्वार्थी नेताग्रो से क्या इस बात की पापा रखते हैं कि पार का देश आगे बढ़ेगा और आप मुसी होंगे? अब मैं पापस अन्तिम वान यह कहना चाहता हूँ कि अगर आप सच्चे देश-भक्त हैं और पाप चाहते हैं कि आपका देश आगे बढ़े, दुनिया में नाम पैदा करें, आपके बच्चे मुवी हो, उनका भविष्य उज्ज्वल हो, तो प्राज से प्राप मेरे साथ इस बात की कमम बायें कि आप अब मूठे भाषणों के चक्कर मे या मिर्फ अपनी लालच के चक्कर में अपना या अपने माथियों का वोट हरगिज ऐमी पार्टियों को नहीं देंगे जिनका जिक्र में अभी कर चुका हूँ । पार पाज से इस बात के लिए प्रयत्नशील होंगे कि अापका वोट सही व्यक्ति को मिले चाहे वह किमी भी पार्टी का हो। अगर मारने मेरे कहे अनुसार ऐमा किया तो एक दिन ऐसा जरूर पायेगा जब हम मुसी होंगे । अव प्राण मुझमे कह सकते हैं कि बहुत से अच्छे नेता दूसरो पार्टियों में भी हैं जो इम काबिल हैं कि उन्हें वोट देना चाहिए । मैं प्रापको इस बात से सह- मत है, आप उन्हें अवश्य वोट दें। माथ ही उनसे प्रार्थना करें कि वह मन मिलकर एक प्रादर्भ पार्टीको जन्म दें और उनका नाम 'मानवता पार्टी' रवा । जिसका उद्देश्य ही जनना की मदद करना, अपने दा को आगे बढाना है । अच्छा अब में प्रापसे विदा होता है । जय हिन्द ।" महर बाबा का भापण ममाप्त हुमा । जितनी देर तक वह बोलते रहे मव लोगों पर मौन छाया रहा । भाषण ममाप्त होने पर लोगो ने खूब तालियां बजाई और बाद में मेहर बाबा की जय के नारे गूंजते रहे। मेहर वावा का दौरा बहुत सफल रहा। जब वह लौट कर वापस आये तो उनकी धूम मच गई और उनकी शोहरत उनके आने से पहले ही वहां पहुंच गई। ठाकुर साहब यह सब बातें सुनते रहे, मन ही मन में उन्हें बुरा तो लगता रहा परन्तु उन्होंने अपने चेहरे से कोई बात जाहिर नहीं होने दी। वह अनिता के लौटने की प्रतीक्षा करते रहे ताकि उनको पूरी रिपोर्ट मिल जाये और श्रांखों-देखा हाल मालूम हो सके। आखिर जय मेहर बावा वापस पहुँच गये तो अनिता अपनी पूरी रिपोर्ट देने के लिए ठाकुर साहब के पास पहुंची। सुबह का समय था, हवा में ठण्डक थी, और ठाकुर साहब अपने मकान के ऊपर वाले कमरे में बैठे थे । उस कमरे में बहुत सी खिड़कियां होने से कमरा काफी हवादार था । सफेद साड़ी और सफेद चोली पहने, माथे पर छोटी सी लाल बिन्दिया लगाये जब अनिता ने ठाकुर साहब को दोनों हाथ जोड़ कर नमस्ते की तो ठाकुर साहब ने लिखते-लिखते सिर ऊपर उठाकर देखा । अनिता को अपने सामने पाकर ठाकुर साहब का चेहरा खिल उठा । अपने फाउण्टेन पेन से ठुड्डी बजाते हुए बोले-~~-'अनिता, तुम कब लौटीं? 'कल रात ही वापस आई हूँ।' 'कहो, इतने दिन अच्छी तो रहीं ?' 'जी हाँ।' 'छुट्टियां मजे में वीत गई न ?' कुछ लोग पास बैठे हुए थे, ठाकुर साहब ने उन्हीं को सुनाने के लिए यह बात कही थी । भनिना नौ उनका मतलब मनन गई, बोली- 'जी हां, कासी पाराम दिन नया मुझे।' 'इनौलिए तो मैंने तुमने कहा था । माप दौर में नुमने बनायी मेहनत की थी, इसलिए नुन्हें कुछ दिनों तक माराम करना चाहिट। अच्छा, अब नुम दगल वाने कमरे में देठो, मुझे इन नन्जनों में कुछ बातचीत करती है, फिर फुर्म में उन्हें प्राद का राम बवाळंगा। 'दहा अन्या', कह कर अनिता दुसर कमरे में चली गई। अव ठाकुर माहब ने जल्दी-जल्दी यहां पर बैठे लोगों को निपटाना, क्योंकि वह जानते थे कि पात्र अनिता उन्हें अपनी पूरी सिोर्ट देनी और वह स्वदं नी मब कुछ जानने में लिए उन्मुक हो रहे थे। दूसरे कमरे में अनिता अपनी लिनी हुई रिसोर्ट को कही-दही ने इटा-पुलट कर पढ़ने लगी। उसने कई बार रिपोर्ट लिख कर मारे कागज एक फाइस में रख लिय। टमन नब भारत का नार काफी दिनार के माय लिया था। वह घोड़ी देर नक उरमरी नजर ने उन रिपोर्ट को देवती रही यहाँ व किटासुर माहब ने उने मादान दी। वह जल्दी में उठी और माडी का पल्लू मन्नानते हुए ठाकुर बाद पाम पहुँची। उस समय दर अकले थे। ठाकुर साहब ने उसे बैठने का इशारा करते हुए कहा-'हां अनिना, बैठ जामो, में मारी सिोर्ट मुनने के लिए वेचैन हैं।' अनिता ने वह फाइल आगे बढ़ाते हुए कहा-'मैंने मारी रिवर्ट लिन दी है और वह सब इन फाइल में है । मन मोचा दिवानी मुझे मत्र कुछ याद नहीं रहेगा इसीलिए हर रोग की पूरी रिपोर्ट लिखकर इम फाइन में जमा कर दी है।' ठाकुर माहब नेहाय वढा कर फाइल ने ली और उमे मील कर बर-उधर से पढ़ते रहे । उसमें हर भापरण की तारीख लिखी थी और सके नीचे पूरा भाषण लिखा था। यह भाषण मेहर बाबा के भाषणों का एक-एक शब्द तो नहीं पेश करता था, परन्तु उनका कोई ऐसा विचार नहीं था जो अनिता ने लिख न लिया हो । थोड़ा बहुत पढ़ने से ठाकुर साहब को इस बात का अन्दाजा हो गया कि यह रिपोर्ट बड़े काम की चीज थी। उन्होंने फाइल वन्द करके एक ओर रख दी और फिर कहने लगे-'यह तो तुमने बहुत अच्छा किया जो तुमने यह रिपोर्ट तैयार कर दी। इसे मैं इत्मिनान से पढ़ सकता हूँ। इसे पढ़ लेने के बाद तुमसे वातें तो होंगी ही, परन्तु इस समय भी मैं तुमसे कुछ जवानी बातें करना चाहता हूँ।' 'बहुत अच्छा । आप जो पूछना चाहें पूछ लें।' 'अनिता पहले यह तो बताओ कि तुम्हारे विचार में मेहर वावा के जलसे हमसे ज्यादा सफल रहे या कम ।' अनिता जल्दी से इस बात का कोई उत्तर न दे सकी। उसके पास इसका उत्तर था, परन्तु वह कुछ झिझक गई। ठाकुर साहब शायद उसके मन की बात भांप गये। उन्होंने दूसरे ढंग से वात शुरू की- 'अच्छा यह वताओ कि तुम्हारे ख्याल में मेहर वावा के जलसे सफल रहे या नहीं।' 'जी हाँ, वहुत सफल रहे ।' 'तुमने शब्द 'बहुत' का प्रयोग किया है जिसका मतलब यह हुआ कि उनके जलसे सफल नहीं, बहुत सफल रहे । क्यों, यही बात है न ? 'जी हाँ । आप बुरा न मानियेगा, क्योंकि मेरा तो यही कर्तव्य कि आपको बिल्कुल सही रिपोर्ट दें।' 'विल्कुल-विल्कुल, इसमें बुरा मानने की क्या बात है ? तुर .

बिल्कुल ठीक बात कही । यदि तुम मुझे गलत रिपोर्ट दोगी तो मैं अंधेरे में रह जाऊँगा । अगर तुम सब बाते ठीक-ठीक कह दोगी तो मुझे उमसे नई राह मिलेगी तभी मैं अपना अगला कदम ठीक में उठा मर्केगा। मेरे पाम मेरी मुशामद करने वालों की कोई कमी नहीं है, फिर भी मैंने उन्हें यह काम नहीं मापा क्योंकि मुझे इस बात का इर था कि कही मुके बुरा करने को उन्होंने झूठ-मूठ की वार्ते वह दी तो मेरा मारा काम ही विगड़ जायगा ।। सच्ची रिपोर्ट के लिए ही तो मैंने तुम्हे इस काम पर लगाया था।' 'फिर तो ठाकुर माहब मैं यह बता देना चाहती हूँ कि उनके जलसों में हमारे जलमो की अपेक्षा दुगुने या इमसे भी अधिक लोग आते थे।" 'अच्छा । इसका मतलब यह हुआ कि मेहर बावा हममे ज्यादा मफल रहे। 'जी हां, लगता तो ऐसे ही है।' अब ठाकुर माहब इधर-उधर को कुछ और बातें पूछते रहे, फिर वह अनिता की पीठ पर प्यार से हल्की सी थपकी देते बोले- 'अच्छा अव तुम जाकर पाराम करो। अब मारा दिन कोई और काम नहीं होगा । रात को खाना साने के बाद प्रा जाना, उस समय तक मैं तुम्हारी यह पूरी रिपोर्ट भी पह लगा। फिर और जो बातें पूछनी होगी पूछ लूंगा।' अनिता जाने लगी तो ठाकुर माहब ने फिर प्रावाज दी। अनिता दरवाजे के निकट ही एक गई। टमने घूमकर देखा तो ठाकुर माहब बोले-~-'शायद कहने की जरूरत तो नहीं, परन्तु इस बात का ग्वाम म्याल रखना कि और किसी से इम रिपोर्ट का पता न हो और न तुम इस विषय मे किमी से बात-चीन ही करना।'

१२२ गये। 'जी अच्छा।' अनिता तो चली गई और ठाकुर साहब काफी परेशान से होकर 'जिस तस्तपोश पर बैठे थे उसी पर लेट गये । एक गाव-तकिया उन्होंने सिर के नीचे रख लिया और दूसरा वगल में दवा लिया और छत की पोर देखते हुए अपने विचारों में डूव · इतने में ही एक कर्मचारी ने आकर बताया-'नीचे शुक्ल जी पाये हैं।' शुक्ल जी उन्हीं के पार्टी के आदमी थे और उनके बड़े ही गहरे मित्र भी थे। यह सुनकर ठाकुर साहव जरा ऊपर को उठे और गाव- तकिया पीठ के नीचे खिसका कर अघलेटे से हो गये । उन्होंने अपनी आँखें ऊपर को उठाकर कहा---'अरे तो तुम उन्हें अपने साथ ही ले पाते ।' 'जी....."जी वह खुद ही नहीं आये। उन्होंने कहा कि पहले देख लो कि कहीं ठाकुर साहब सो न रहे हों ।' ठाकुर साहब जरा विगड़ कर वोले-~-'अरे मूर्ख, यह सोने का कौन सा वक्त है ? जाओ उन्हें फौरन अपर ले पायो ।' थोड़ी ही देर में शुक्ल जी पान चवाते हुए ऊपर आ गये । ठाकुर साहब ने उसी तरह अघलेटे में ही हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा-'पात्रो शुक्ल वाबू । तुमने कमाल कर दिया, नीचे क्यों रुके रहे ?' 'भई मैंने सोचा कि अाजकल तो पापको रात में भी काम करना पड़ता है, इसलिए जब भी मौका मिलता होगा थोड़ा सो लेते होंगे?' 'नहीं, मैं कुछ देर के लिए लेटा जरूर था, शायद इसी से उस

१२३
.
फिर हंस कर रह
श्रादमी को धोसा हो गया। वह समझा में पड़ा गो रहा हूँ। मेर छोड़ो
इन बातो को। कहो कैसे पाना हुआ ? क्या कोई नई मयर है ?'
शुक्ल जी • वही तख्त पर बेतकल्लुफी से बैठते हुए बोले-'नई
हमारे पास तो कोई नई खबर नहीं है, परन्तु लगता है कि तुमने कोई
नई खबर जरूर सुनी है।'
'मैंने ?'-ठाकुर माहब ने अपनी ओर इशारा करते हुए पूछा।
गये
'ठाकुर माहब, मुझे झांसा मत दीजिये । हमे आपकी सकल से ही
मन का अन्दाजा लगा लेते हैं। सच बतानो न पाखिर बात क्या है ?'
ठाकुर साहब कोई बात छिपाना नहीं चाहते थे परन्तु उन्हे इम
चात का स्याल ही नहीं रहा था कि कुछ देर पहले उनकी जो बातें
अनिता से हुई थी, उमका प्रभाव अभी तक उनके चेहरे पर है । प्रय
उन्हे याद आ गया तो बोले-'अच्छा तो क्या मचमुच मेरे चेहरे से
उदासी की झलक दिखाई देती है
'हो भई भला मुझे मजाक करने की क्या जरूरत है ?'
ठाकुर साहब ने हाथ उठाकर अपने सिर पर फेरते हुए कहा-
'हो मकता है।'
"इसका कारण?'
'भई कारण क्या बताऊँ, अभी तुम्हारे पान में पहले कुछ सज्जनो
से बातचीत हो रही थी। पता चला कि मेहर बाबा को अपने दौरे में
बड़ी मफलता प्राप्त हुई।
'इसका सबूत ?'
'सवून तो यही है कि उनके हर जलसे अपने से ज्यादा सफल रहे।'
.'वम?
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१२४ - ठाकुर साहब ने जरा आश्चर्य से मित्र की ओर देखा और फिर बोले-'क्यों, इससे बड़ा और क्या सबूत हो सकता है ?' यह सुनकर शुक्ल जी हँस दिये और फिर मित्र की पीठ पर हाय मारते हुए बोले-'ठाकुर, कभी-कभी तो तुम बड़ी भोली बातें करने लगते हो?' 'तो क्या तुम समझते हो कि मैं झूठ बोल रहा हूँ ?' 'नहीं भई, मैं कब कहता हूँ।' 'या तुम यह समझते होगे कि मैं यूं ही सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास कर रहा हूँ। नहीं, यह बात नहीं है । अब तुमसे क्या छिपाना ? मैंने एक खास प्रादमी मेहर वावा के पीछे लगा रखा है जिसने उनके हर जलसे में भाग लिया और हर बात को बड़े ध्यान से सुना और जलसे के हर पहलू को गौर से देखा । यह देखो उसी की रिपोर्ट हैं ।' 'भई मुझे इस रिपोर्ट से इन्कार तो नहीं।' 'तो फिर?' 'सीधी सी बात है।' 'वह क्या ? 'वह यह कि ठाकुर केवल राजनीतिज्ञ हैं, और मेहर वावा साधु 'मैं समझा नहीं । वह साधु ही सही परन्तु राजनीति के क्षेत्र में तो मुझसे टक्कर ले रहे हैं।' 'तुम मुझे यह बतानो कि इस क्षेत्र में क्या तुमसे कोई और टक्कर नहीं ले रहा है ? क्या तुम्हारे लिए यह कोई नई बात है ?' 'हाँ, वह तो सब ठीक है परन्तु सोचने की बात तो यह है कि...।' शुक्ल जी ने बात काटते हुए कहा-'तुम्हारा अर्थ यह है कि मेहर बाबा के जलसे में तुमसे दुगुनी संख्या में लोग पाये थे। मैं यह ।" ? - १२५ भी मानने को तैयार हूँ कि वे दुगुनी नही बल्कि तिगुनी, चौगुनी संख्या में माये थे । परन्तु इससे होता क्या है ?' ठाकुर साहब चकित रह गये, बोले-'अजीब बात करते हो, तुम्हारा मतलब है इगमे कोई फर्क ही नहीं पड़ता ?' 'विल्कुल नहीं।' 'वह कैसे? 'इसलिए कि हमारे देश में साधुओं और संन्यासियों की पूजा करने वालो की संख्या कुछ कम नहीं है । तुम अच्छी तरह समझ लो कि दस मे से नौ आदमी तो केवल साधु बाबा के दर्शन करने ही भाये होगे । न जाने उनमे कितनी संख्या तो औरतो की ही रही होगी । बस वह साघु महाराज के दर्शन करने चले आये और दर्शन पाकर लौट गये।' ठाकुर साहब को शुक्ल जी की वातो मे कुछ सार तो दिखाई दिया फिर भी उनका संदेह पूरे तौर पर दूर नहीं हुआ। कहने लगे- 'तुम्हारी वात को मुठला तो नहीं सकता।' 'अरे तुम झुठलानोगे क्या ? मैंने तुम्हे सारी असलियत बता दी है।' 'वह तो ठीक है परन्तु वही साधु जब वोट मांगेगा तो क्या जनता......?' 'इसका मतलब यह है ठाकुर, कि तुम्हे इतना भी नहीं मालूम कि एक राजनीतिज्ञ के नाते तुम्हारा जनता में क्या स्थान है, इम इलाके में क्या स्थान है । वैसे भी लोगो के दिलो पर तुम्हारा दवदवा है। वे जानते हैं कि वे वेशक मेहर वावा के पांव छूने रहे परन्तु उन्हें वोट ठाकुर साहब को ही देना होगा।' यह सुनकर ठाकुर माह्य की टूटी हुई आगाएं फिर से बंध गई। वह समझ गये कि शुक्ल जी ने काफी गहरी बात कही है जो सारहीन च लोग बन्द कमरे में बैठ गये और ठाकुर साहव ने सबके सामने छोटा T भाषण देते हुए कहा-'देखिये मेहर वावा के दौरा करने से हमारी काफी निन्दा हुई है । मुझे यह भी खबर मिली है कि मेहर बाबा के जलसों में भाग लेने वालों की संख्या हमारे जलसों से कहीं ज्यादा थी। मैं तो इस सोच में पड़ गया हूँ कि मेहर बाबा ज्यादा लोकप्रिय हैं और उन्हें वोट भी हमसे अधिक मिलेंगे परन्तु मेरे एक मित्र ने मुझसे सहमत न होकर कहा कि मेहर वावा एक साधु के तौर पर लोगों में बहुत लोकप्रिय चाहे अवश्य हों, परन्तु एक राजनीतिज्ञ के रूप में उनको लोग इतना नहीं मानते जितना मुझे मानते हैं । खैर, वह तो जो हैं सो हैं, प्रव एक नई मुसीवत हमारे लिए यह खड़ी हो गई है कि मेहर वावा की कड़ी आलोचना के कारण ऊपर से नीचे तक यह बात फैल गई है कि हम पैसे के जोर से वोट लेने की कोशिश कर रहे हैं । इस समय चुनाव सिर पर पहुंच चुका है । हमारी पार्टी की यह वदनामी हमें ले डूवेगी । मुश्किल तो यह पा खड़ी हुई है कि अब हम इस बदनामी के धब्बे को कैसे धोयें ?' वाग सिंह ने मूंछों को ताव देते हुए कहा-'ठाकुर साहब, मेरो राम तो यह है कि जो लोग मेहर बाबा के कहने में आकर हमारी बदनार कर रहे हैं उन्हें इस बात का अच्छी तरह मज़ा चखाया जाय ।' ठाकुर साहब उसकी बात काटते हुए बोले-'नहीं बाग सिंह, इसका मौका नहीं है।' एक दूसरे अधेड़ उमर के सज्जन बोले-'ठाकुर साहब हम यह तो देख रहे हैं कि अव कुली पार्टी और बेड़ा गर्क पार्टी आदि के काफी हिम्मत बढ़ गई है। वह देहातों में जाकर हमारी बद १२६ कर रहे हैं । पहले जो काम वह अपनी मभानो में नहीं कर पाये, वही काम अब कर रहे हैं। ठाकुर माहब बोले-'आपका कहना बिल्कुल ठीक है । हाँ मुश्किल तो यह है कि अब हम इन पाटियो का दिमाग दुरुस्त करने की कोशिश करे, तो उसका बहुत ही दुरा असर सुनाव पर पड़ेगा । लेकिन मुझे इन छोटी-छोटी पाटियो की इतनो चिन्ता नहीं है क्योंकि ये चाहे कुछ भी करे, सुनाव में हम नहीं हरा सकते । चिन्ता तो केवल इस बात की है कि हमारी इतनी बदनामी हो जाने के कारण यही मानवता पार्टी हममे अधिक वोट न ले जाये । मैंने आप सब को इसीलिए बुलाया है कि आप लोगों के सलाह-मशविरे से इस बिगड़ती हुई समस्या को विचाने की कोशिश की जाय । इसलिए पाप कृपया मुझे सुझाव दीजिये कि मुझको कौन सा कदम उठाना चाहिए और कौन सा नहीं।' एक बूढे सज्जन बोले-'मेरे विचार से हमे कुछ परचे छपवाने चाहिए । उसमे इस बात का जिक्र होना चाहिए कि हमारे शत्रु हमे स्वामम्वाह बदनाम कर रहे हैं । उनको इस तोहमत मे न तो कोई सार है, न मच्चाई । सत्ता पार्टी का कभी भी यह उद्देश्य नही रहा कि वह जबरन दवाव डालकर जनता से वोट प्राप्त करे । इसके बाद काफी विस्तार से अपने उद्देश्यो और नीतियो का जिक्र होना चाहिए। अन्त में फिर इसी वात पर जोर देना चाहिए कि जनता को चाहिए कि हमारे शत्रुओं से होशियार रहे और उनके गलत प्रचार पर विल्कुल ध्यान न दे।' ठाकुर साहब-'सुझाव तो अच्छा है। मेरे विचार मे प्राज हो यह परचा लिखकर शाम तक प्रेम में दे देना चाहिए ताकि कल तक हजारों परचे छप कर तैयार हो जाये और परसों तक पूरे क्षेत्र १३० में बांट दिये जायें । अच्छा यह बात तो तय हो गई, अब कोई सज्जन और कोई सुझाव देना चाहें तो दे दें।' एक सज्जन ने फिर कहा---'ठाकुर साहब, है तो जरा झंझट का काम, परन्तु यदि आप करने को तैयार हों तो मैं भी अपना सुझाव दे दूं?' ठाकुर साहब-~-'जरूर-जरूर, ..मैं झंझट से नहीं डरता, यदि आपका सुझाव अच्छा हुआ तो मैं सब कुछ करने को तैयार हूँ।' वही सज्जन-'तो मेरी राय यह है कि आप फिर एक बार गाँव- गाँव में जाकर चक्कर लगायें। कोई जलसा न करें, बल्कि घर-घर जाकर लोगों से मिलकर बड़ी नम्रता से समझायें कि दूसरी पार्टी वाले आप पर झूठी तोहमतें लगा रहे हैं।' एक और सज्जन बोले-~~-'मैं इस सुझाव का समर्थन करता जब लोग अपने महान नेता को अपने घर में पाया देखेंगे तो उनके मन पर बहुत ही अच्छा प्रभाव पड़ेगा।' एक तीसरे सज्जन वोले-'सुझाव तो अच्छा ही है, परन्तु ठाकुर साहब आप एक बार पूरे क्षेत्र का दौरा तो कर ही चुके हैं, अव फिर आपको मेहनत करनी पड़ेगी। यदि आप ऐसा कर सके तो मेरे ख्याल में इसका बहुत अच्छा प्रभाव पड़ सकता है।' ठाकुर साहब ने पल भर सोच कर कहा-'सुझाव तो मुझे भी पसन्द है। रही मेहनत की बात, उससे मैं नहीं घबराता। मेरे ख्याल में पहले इश्तहार छपवा कर बाँट दिये जायें, और फिर मैं अपने दौरे शुरू कर दूं। क्यों, ठीक है न ?' सवने हाँ में हाँ मिलाई। अब वाग सिंह को एक सुझाव सूझा, वह.बोला-'ठाकुर साहब, एक बात मेरे मन में भी आई है।' ।

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ठाकुर साहब मुस्करा कर बोले-'तुम भी कह दो, परन्तु इस बार
का ख्याल रखना कि कोई लट्ठ घुमाने का प्रोग्राम न यता देना।'
'जी नहीं।' वाग सिंह ने कुछ झेप कर वहा ।
'हाँ तो बतानो तुम्हारा क्या सुझाव है ?'
"मेरा मुझाव यह है कि जब तक परने का रहे है और जय
तक मार बाहर नहीं जाते, उमसे पहले ही अपने शेर ने सास-साथ
लोगो को यहां बुला लिया जाय और उनके वोटरों के हिगार से 4
नगद दे दिया जाय।
यह मुन कर सबने कहकहा लगाया और उनमे गे दोतीन रामो
ने कहा-'बात तो मोटी सी है परन्तु यह मानना पड़ेगा किोमा
बुरी नहीं । राजनीति के काम में हर ढंग से अपना उरागीमा
की कोगिग करनी चाहिए।'
ठाकुर मार ने वाण सिंह से कहा---'परल्यु पहको भी होता
है कि परसों तक पूरे क्षेत्र के खास-साग सोग पग जाय।'
बाग मिह-'माप कहिये तो मैं सही समोर-पारगे
माऊँ।'
सबकी राय से तीनो योजनाएं स्वीकार कर ली गई।
सब लोग चले गये तो ठाकुर साहब ने फौरत निता मो मुना
कर परचे का मजमून बनवाया और प्रेग पारी को पुस म me
कर दी कि कल शाम तक सब पर छप जाने पाहिए।
अब क्या या, फिर एक यार गरमा-गरमी शुरू हो गई पूरे लिए
परचे छप गये और रातों-रास उन्हे योटो पो गिा देशाता में भिजता
दिया गया। तीसरे दिन प्रीति-भोग भी हपा, मोगाणी राम TARA
चौथे दिन ठाकुर साहय फिर दौरे पर निकल गये।

आठ । चुनाव शुरू हो गये थे ठाकुर साहब ने इतनी मेहनत की कि थकान के कारण थोड़े से बीमार पड़ गये । डाक्टरों ने उन्हें पाराम करने की सलाह दी । मजबूरन ठाकुर साहब दो दिन विस्तर पर लेटे रहे। उनका शरीर शक्तिशाली था । इसलिए दो दिन ही आराम करने से वह ठीक हो गये और एक बार फिर उठ खड़े हुए। ठाकुर साहब के यहाँ तो अफरा-तफरी मची रहती थी। चौबीसों घण्टे उनका मूड विगड़ा रहता था, जैसे इस चुनाव से उनके लिये जिन्दगी और मौत का सवाल पैदा हो गया हो । परन्तु मेहर वावा के आश्रम में ऐसी कोई बात नहीं दिखाई देती थी। अव अनिता वहाँ जाती तो मेहर बाबा के चरण छू लेती। मेहर बावा प्यार से उसके . सिर पर हाथ रख कर आशीर्वाद देते और अक्सर पूछते----'कहो बेटी, तुम्हारा स्वास्थ्य तो ठीक है ना?' 'जी विल्कुल ठीक है।' यहाँ पर मेहर बाबा के चरित्र का एक और उज्जवल पहलू दिखाई देता है। वह अनिता से कभी सत्ता पार्टी या उसके प्रोग्रामों के बारे में नहीं पूछते थे । यदि उसका जिक्र आ भी जाता तो वह बात ।

पलट कर किसी और ही विषय पर बोलने लगते और पूछो-'क्यों अनिता बेटी, प्राज मेहर बाबा को अपने हाथ से चाय बनाकर नहीं पिलाप्रोगी?' अनिता उठ कर चाय बनाने चली जाती। इधर मेहर बावा के आश्रम का तो यह वातावरण था और उघर ठाकुर साहब के यहां बिल्कुल ही भिन्न वातावरण या । यूं तो ठाकुर साहब वैमे ही काफी गुस्सेवर आदमी थे, परन्तु अाजकल तो उनका पारा हर समय ही चदा रहता था। शायद रात को नीद भी नहीं पाती थी तभी तो उनकी अांखो में लाली सी झलकती रहती थी। किसी से बात करते तो काट खाने को दौडते । ऐसी हालत में अनिता यह सोचने पर मजबूर हो जाती कि मेहर बाबा और ठाकुर साहब के दृष्टिकोण मे कितना अन्तर है। मेहर बावा की दृष्टि मे जो फैलाव था, जो विशालता थी वह ठाकुर साहब के पास नहीं थी । इसीलिए तो उनका इतना बुरा हाल हो रहा था। पूरे देश मे हर पार्टी अपना-अपना प्रचार कर रही थी। ठाकुर साहब ने भी कोई कसर नहीं छोडी । वह पागलो की तरह अपने इलाके मे भागते रहे। वह बार-बार अपने साथियो से कहते कि इस चुनाव मे हमारी जीत होनी ही चाहिए । उघर मेहर बाबा को हार-जीत से कोई दिलचस्पी ही नहीं थी। उनका तो बार-बार यही कहना था कि किसी एक व्यक्ति की न हार होगी न जोत, जो हार-जीत होगी वह जनता को होगी। वह अनिता से कहते कि प्राज- कल जिन नेतानो ने गद्दियाँ सम्भाल रखी हैं, न जाने वह इन गद्दियों से क्यो चिपके रहना चाहते हैं ? यह तो लोकनल है, यदि जनता .

१३४ X x . कसी को गद्दी पर न रखना चाहे तो उसे जबरदस्ती चिपके रहने की या जरूरत है ? यदि वे सच्चे सेवक हैं, तो वे हर हालत में सेवा कर सकते हैं, गद्दी पर रह कर भी और गद्दी छोड़ कर भी। X आखिर बड़े शोर-शरावे, धींगा-मुश्ती, खींच-तान और लड़न्त- भिड़न्त के बाद चुनाव समाप्त हुए और अब लोग चुनाव के नतीजे का इन्तजार कर रहे थे। आखिर एक रोज यह खबर फैल गई कि उनके इलाके में मेहर बाबा को जीत हुई है।

पहले तो ठाकुर साहब को विश्वास ही नहीं हुमा, परन्तु दूसरे दिन जब अखवारो में यह खबर पहले पेज पर छपी तो ठाकुर साहब मारे गुस्से के बिल्कुल पागल से हो गये और उन्होंने अपने सास-खास लोफरो और गुण्डो को बुलाकर बन्द कमरे मे उनसे बातचीत की। उनमे वाग सिंह तो था ही, उसके अतिरिक्त हर गांव के चुने हुए गुण्डे वहां मौजूद थे । इस मीटिंग मे उन्होने अपने समझदार मित्रो में से किसी को भी नही बुलाया था। वहाँ एक भी ऐसा प्रादमी नही था जो उन्हे मच्छी राय दे सके । वहाँ तो केवल वही कर्ता-धर्ता थे, बाको जितने लोग थे उनका केवल यही काम था कि वह ठाकुर माहब को हां मे हां मिलाये। कमरे के सब दरवाजे बन्द कर लिये गये और जितने लोग वहां बैठे थे उन्हें ठाकुर साहब की शक्ल से ही अन्दाजा हो गया कि आज उनकी खैरियत नहीं। ठाकुर साहब खद्दर का उजला कुर्ता और उजली धोती पहने, माये पर तिलक लगाये, तत्तपोश पर चार-पाच गाव-तकियो के सहारे बैठे हुए थे। किसी तकिये के साथ उन्होंने पोठ लगा रखी थी, किमी पर - कोहनी जमा रखी थी और किसी पर टाँग फैला रख रखी थी। उस समय उनकी आँखें अंगारों की तरह दहक रही थीं। इसी मौके पर उन्हें खबर दी गई कि अनिता पाई है। उन्होंने उसे अन्दर बुलवा लिया और उसे घूर कर देखते हुए पूछा-'क्या बात है ?' अनिता यह प्रश्न सुनकर हैरान रह गई और उनकी शकल देखकर . कुछ सहम गई। यूं तो वहाँ बैठे हुए हर गुण्डे की ऐसी शकल थी कि कहीं अकेले में भेंट हो जाती तो अनिता का दम ही निकल जाता। ठाकुर साहब की बात भी उसे अजीब लगी, क्योंकि वह तो हर-रोज की तरह अपनी ड्यूटी पर पहुंची थी, वह समझती थी कि ठाकुर साहब हर-रोज की तरह उसे कुछ काम बता देंगे। ठाकुर साहब अपने प्रश्न के उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे थे। अनिता डरते-डरते बोली-~-'जी मैं काम पर आई हूँ। मैंने सोचा आपके दर्शन कर लूं, यदि कोई काम हो तो मैं कर दूं। यदि आप अभी व्यस्त हों तो मैं दूसरे कमरे में बैठ जाती हूँ।' ठाकुर साहब कुछ देर तक उसकी ओर देखते रहे और फिर बोले---'आज कोई काम नहीं है । इन्तजार करने की भी जरूरत नहीं । तुम घर जा सकती हो।' अनिता चुपचाप लौटने लगी, तो फिर उसने डरते-डरते 'दुवारा पूछा---'रात को खाना खाने के बाद आ जाऊँगी।' 'पा जाना। यूँ लगता था जैसे ठाकुर साहव उससे पीछा छुड़ाना चाहते थे । वह चुपचाप चलो आई और उसके निकलते ही दरवाजा फिर वन्द हो गया। सब लोग बिल्कुल खामोश थे और ठाकुर साहब के मुंह से कुछ x x मुनना चाहते थे। अाखिर ठाकुर साह ने बडे क्रोध भरे स्वर में कहा- 'तुम सब उल्लू के पट्टे हो ।' सब लोग ठाकुर साहब की ओर देखते रहे । किसी ने प्रांख उठाने का माहस नहीं किया । यो लगता था जैसे वे ठाकुर साहब की वात मे सहमत हो । जैसे वे सचमुच ही खानदानी उल्लू के पट्टे हो । ठाकुर साहब फिर वोले-'बाग सिंह इस मेहर बाबा ने तो हमारी लोटिया डुबो दी और हमे कही का नहीं रक्खा ।' बाग सिंह-'ठाकर माहव आप देखते रहिये अगर हम न रहे तो मेहर बावा भी न....।' ठाकुर साह्य बोले-'जैसा चाहो करो। मैं तो वरवाद हो गया है। तुम मय निक्कमे हो।' इसी तरह के वाद-विवाद के बाद उन लोफरों की मभा समाप्त हुई। रात जव अनिता ठाकुर साहब के पास पहुंची तो उसने देखा कि उनका चेहरा बिल्कुल पत्थर की भांति हो रहा था। उनकी गाल से किमो भी भाव का पता नहीं चलता था। यूं लगता था जैसे अव उनके मन में कोई भी भावना नहीं है । या यू कहना ज्यादा ठीक होगा कि अब उनके मन में केवल एक ही भावना थी, एक ही दृढ निश्चय या जिमके बारे में वह कुछ नही जानती थी। उस रात ठाकुर माहब ने फिर कह दिया कि प्रान कोई काम नही है। अनिता लौट प्राई और विस्तर पर लेट कर बहुत देर तक मोचती रही कि चुनाव में हार जाने से ठाकुर माहब इतने निराश क्यो हो गये थे। वह नही जानती थी कि ठाकुर माहव इतने निराश नहीं हुए थे जितने कि बौखला गये थे। वह मोचने लगी कि ठाकुर माहब और मेहर याया में कितना अन्तर है । मेहर यावा को अपनी जीत को कोई १३० खुशी नहीं थी। वह बड़े गम्भीर हो गये थे, कहते थे-~~-'जनता ने मुझे चुनकर मुझ पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी डाल दी है। मैं महसूस करता कि अब तक तो मैं केवल बातें करता रहा हूँ, अब कुछ काम करने का मौका आया है। भगवान ही अब मेरी इज्जत रख सकता है।' x x X m x प्राज उनके स्वागत के लिए बहुत बड़े जलसे की तैयारियां हो रही थी। एक खुले मैदान में जिसके चारों ओर ऊँचे-ऊँचे पेड़ थे वहीं इस सम्मेलन का प्रवन्ध किया गया था। उस मैदान के बीच में एक ऊँचा सा चबूतरा था, उसी पर गद्दे और चादरें विछाकर खास-खास नेताओं के बैठने का प्रबन्ध किया गया था । शामियाने लगाने की जरूरत नहीं समझी गई, क्योंकि मौसम अच्छा था, न बहुत गर्मी न सर्दी । आकाश पर तारे चमक रहे थे। चबूतरे के आगे काफी दूर तक धरती में वाँस गाड़ दिये गये थे, उन पर विजली के बल्ब और लाउड स्पीकर लगे हुए थे। धीरे-धीरे जनता आनी शुरू हो गई और लगभग एक घण्टे तक मैदान में लाखों लोग जमा हो गये। अन्त में नेता लोग पाये उनमें मेहर वावा भी थे। अनिता भी वहां पहुंची, क्योंकि अभी तक ठाकुर साहब ने उसे उनके यहाँ आने-जाने को मना नहीं किया था । वास्तव में तो उसका अपना ही मन चाहता था कि वह उस जलसे में जरूर भाग ले । इसके साथ ही उसने अपने मन को यह तसल्ली भी दी कि वह ठाकुर साहब को इस जलसे की रिपोर्ट भी पहुंचा देगी, ताकि यदि किसी ने शिकायत की भी हो तो वह कह सके कि आपने मेरी जो ड्यूटी लगाई है, वही तो मैं कर रही हूँ। जब आप मना कर देंगे तो मैं नहीं जाऊँगी।

१३६ मेहर यावा को देखते ही लोगों ने उनकी जय-जय के नारे लगाने गुरू कर दिये । बहुत देर तक नारों से मैदान गूंजता रहा। लोगों में बहुत ही उत्साह था ! गोर समान हुया तो मानवना पार्टी के एक मनन ने जो काफी बूढे थे उठकर कार्यवाही शुरू करते हुए कहा- 'भाइयो .और वह्नी, आज आपको इतनी संन्या में यहाँ इवढे दंसकर जो हर्ष मुझे हो रहा है उमरा आप अन्दात्रा नहीं लगा सक्ने । यह पाप ही का प्रताप है कि ग्राज मानवता पार्टी की जीत हुई है। दरअसल मानवता पार्टी की जीत पार ही की जीन है। विशेषकर मेहर बावा वो आपके इस चुनाव में बहुत गम्भीर हो गये हैं। वह समझते हैं कि आपने उनका चुनाव करके वेगक उनका मान बढ़ाया है, परन्तु इनके माथ हो नापने उनकी जिम्मेदारी भी बहुत बढ़ा दी है। पापक मामने हर पार्टी के उद्देस्य और उनकी मेवाएं मौजूद थी, मापने उन्हें जाँचा, तोला और परखा। अल में पारने मानवता पार्टी को ही इस योग्य ममका । अब मैं चाहता है कि मैहर वावा स्वयं ही भापके सामने अपने विचार रखे। यूं तो पार उनके विचार जानते ही हैं, परन्तु इस समय वह प्रापको धन्यवाद भी देगे और भविष्य के लिए अपना कार्यक्रम भी बतायेंगे।' इतना कहकर वह मज्जन नी बैठ गये और मेहर दावा धीरे-धीरे उठकर बडे हुए ताकि सब लोग उन्हें देव मके। उनके सटे होने ही फिर नालियां बजनी शुरू हुई । वह तालियां बजाना पमन्द नहीं करते थे परन्नु दन ममय लोगों के उत्साह को वैसे रोक मरने सारी जन्ता चुप हो गई। हाथ उठाएर लोगो को नृप रहने का मत दिया तो वे चुप. हो गये।

१४० मेहर वावा ने अपने कन्धे पर पड़ी चादर को सम्भालते हुए बोलना शुरू किया---'भाइयो तया बहनो ! इतने में ही एक बड़े जोर के धमाके की आवाज हुई, फिर धमाका, फिर तीसरी बार धमाका । पहले धमाके पर मेहर वावा खड़े रहे, दूसरे धमाके पर वह लड़. खड़ा गये और तीसरे पर गिर पड़े। यह तीन गोलियां चलने की आवाज थी जो मैदान के सिरे वाले ऊँचे पेड़ों के मुण्ड में एक शाखा पर बैठकर चलाई गई थी। लोगों में खड़बड़ी के साथ-साथ हलचल मच गई। मंच पर बैठे लोग एकदम आगे को वढ़े । अनिता भी चबूतरे के पास ही धरती पर बैठी थी, वह एकदम उठकर मेहर बाबा के पास पहुंची लेकिन मेहर बाबा की आँखें पथरा चुकी थीं। उनकी आँखें देखकर अनिता को ठाकुर साहब का चेहरा याद पा 1 और उसकी मोटी-मोटी आँखों से आँसू वह निकले ।

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Chonav
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Chonav
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2011/03
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Sanskrit
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139
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