Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Vipaak Sutra
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विपाकसूत्र
(हिन्दी अनुवाद)
moERONOR
अनुवादक
पूज्यपाद विद्वद्वर्य मुनिवर्य वीरपुत्र श्री आनन्द सागरजी महाराज.
-
प्रकाशक
श्री हिन्दी जैनागम प्रकाशक सुमति कार्यालय-कोटा राजपूताना.
धीर सम्बत् २४६२
विक्रम सम्वत् १९९२
सन् १९३५
शुभ संदेश. विपाक ॥४॥ अनुत्तरोक्वाई, उपवाई, अंतगडदशा आदि छपरहे हैं तथा अन्य सूत्रों को छपाने का व ५०० जगह अमूल्य भेट देने का प्रबन्ध होरहा है। इस उद्देश की पूर्ति के लिये १५०००)का सहायता फण्टकी योजना की है उसमें उपदेश देकर सहायता दिलवाने वालों के शुभ नाम ये हैं- गणाधीश श्रीमान् हरिसागरजी महाराजके उपदेशसे लगभग १५००) सहायता फण्डमें तथा उववाई सूत्र छपवाने में १०००), श्रीमान् मंगलसागरजी म० के उपदेश से १००)विपाकमें, श्रीमती साध्वीजी चन्दन श्रीजी के उ० से २००), श्रीमतीजतनश्रीजी के उ० से २००), श्रीमती प्रताप श्रीजी के उ० से १००), श्रीमती दया श्रीजी के उ० से १००), श्रीमती प्रमोद श्रीजी के उ० से १००), श्रीमती देव श्रीजी के उ० से १००), श्रीमती प्रेम श्रीजी के उपदेशसे १००) सहायता फंडमें व २००) विपाक सूत्र में, श्रीमती ज्ञान श्रीजी के उ० से २००), श्रीमती गुण श्रीजी के उ० से १००), श्रीमती कनक श्रीजी के उ० से ६०), श्रीमान् दीवान बहादुर सेठ केशरी सिंहजी १००). इस प्रकार भर गये है और मुंबई, कलकत्ता, बीकानेर आदिमें भरानेका प्रयत्न शुरू है इसमें से कुछ रकम सेठ जी के यहाँ आकर जमा हो चुकी है और वाकी आने वाली है इसका विशेष विवरण दूसरे पत्र में छापा जायेगा। इन अनुवादक महाशयों को और सहाय दाता उपदेशक महाशयों को हम वारम्बार धन्यवाद देते हुए बड़ा उपकार मानते है और आशा करते है कि भविष्य में भी सूत्रों के अनुवाद में तथा सहायता फण्ड में यथोचित्त सहायता देकर ज्ञान दान के लाभ के भागी बनें और हमारे उत्साह को बढ़ाते रहें । मिति कार्तिक शुदी ८ सम्बत् १९९२ निवेदक.- चन्दनमल रीखवदास लूणिया सेक्रेटरी तारीख ४ नवम्बर सन् १९३५ श्री हिन्दी नागम प्रकाशक सुमति कार्यालय जैन प्रेस, कोटा.
मेरा
वक्तव्य
विपाक
सूत्र
* मेरा वक्तव्य *
मेरे लिये यह अत्यन्त हर्ष का विषय है कि जिनागम की सेवा करने मे मैं भाग्यशाली हो सका हूँ; यद्यपि यह स्पष्ट है कि
सूत्र का अनुवाद तो एक निष्णात ( काबिल-कुशल) महात्मा ही कर सकता है; तथापि सूत्र भक्ति के विवश होकर मेरे जैसे
अल्पात्मा ने इस ग्यारहवें अङ्ग 'विपाक सूत्र' का हिन्दी अनुवाद करने का सहास किया है.
आगमोदय समिति द्वारा प्रकाशित सूत्र पर से यह अनुवाद किया गया है, यह दुःख की बात है कि समिति से प्रकाशित
सूत्र में कई जगह गलतियाँ दृष्टिगोचर होती है- शुद्धकर्ता ने असावधानी से इसका संशोधन किया प्रतीत होता है। संभव है कि अन्य
सूत्रों की भी यही परिस्थिति हो.
॥५॥
विपाक
आमुख
यह सूत्र दो विभागों में विभक्त होकर वीस अध्ययनों से शोभित है- दुःख विपाक नामक पहिले विभाग में दस पुण्यहीन जीवों
के जीवन-चरित्र सभ्य संसार को सहसा जागृत कर कर्तव्य परायण बनादेते हैं; और सुख विपाक नामक दूसरे विभाग में दस पुण्यशाली
जीवों के जीवन चरित्र सद्धर्म की आचरणा करने को लालायित करते हैं; यस इन दो श्रुतस्कंधों में (विभागों में) यह ग्रन्थ पूर्ण हुवा है.
यह ग्रन्थ " श्री हिन्दी जैनागम प्रकाशक सुमति कार्यालय कोटा-राजपूताना " से प्रकाशित होरहा है, इस कार्यालय के
संस्थापक पूज्यपाद महोपाध्याय श्री सुमतिसागर जी महाराज तथा सुनिमहोदय पं० श्री मणिसागर जी महाराज अनेक कष्ट
सहन करके भी दृढता पूर्वक प्रकाशन कार्य सम्पादन कर रहे हैं, यह आपका उपकार प्रशंसनीय है, खासकर विद्वद्वर्य - प्रकृति
भद्र-उद्यमी-प्रेमी और मिलनसार पूज्य श्री मणिसागर जी महाराज का अथाह परिश्रम भूरि २ धन्यवाद के पात्र है.
इसका शोधन कार्य यद्यपि ध्यान पूर्वक किया गया है तदपि दृष्टि दोष से वा प्रेसमैन की असावधानी से त्रुटियाँ रहजाना
संभव है, पाठक महानुभाव सुधारकर वॉचें, यह मेरी प्रार्थना है-इस आगम का साद्योपान्त ( शुरू से आरवीर तक ) मनन पूर्वक
बाँचने वा श्रवण करने का मेरा अनुरोध है ।
सैलाना (मालवा)
आपका विनीत-
श्रावण पूर्णिमा-बुधवार
शुभं भूयात.
२४६१-१९९२-१९३५
मुनि महेन्द्र सागर.
॥८॥
विपाक विपाक-सूत्र हिन्दी अनुवाद विषयानु- क्रमणिका सूत्र विषयानुक्रमणिका مع RCHI-10-2020 नं० नं० १ १ प्रथमश्रुत स्कन्ध दुःख विपाक * पहिला अध्ययन * * पहिला अध्ययन * विषयों के नाम. पृष्टाङ्क विषयों के नाम. पृष्टाङ्क मङ्गलाचरण ४ मृगापुत्र १४ उत्थान एक जन्मान्ध पुरुष प्रभु के निकट १६ पीठिका- गौतम गणधर की मृगापुत्र देखने की अभिलापा २० १ श्री सुधर्म स्वामी गणधर म० का पदार्पण ४ गौतम गणधर मृगादेवी के घर पर २२ २ जम्बू स्वामी के गुणानुवाद और प्रश्नोत्सुकता ६ मृगापुत्र देखने को तलघर में प्रवेश ३ सुधर्म स्वामी से पृच्छा और उनका प्रत्युत्तर ११ गौतमस्वामी का करुणाभाव २ ३. ७ ॥ ९॥ ८
विपाक
नं०
विषयों के नाम.
पृष्टांक
५१ दगाबाजी का नमूना
१६४
५२ अभमसेन के लिये गणधर महागज की भारिपृच्छा
महावीर भगवन्त का उत्तर
१६६
५३ उपसहार
नं०
विपयों के नाम.
६० परमात्मा
परमात्मा ने शकट का भविष्य फरमाया
६१ उपसहार-
पृष्टांक
१८५
१८९
विषयानु-
क्रमणिका
॥१२॥
-
®चाथा अध्ययन
५४ शकट - पात्रों का परिचय
१७१
भगवन्त का पदार्पण गौतम गणधर की पृच्छा १७४
५६ शकट का पूर्वभव प्रभु फरमाते हैं-पापचर्या में-
अलमस्तता
१७५
५७ सेट के घर पुत्र का जन्मोत्सव-घर से निर्वासन १७९
५८ वेश्यागमन और तिरस्कार
१८१
५९ प्रधान का कोप-शकट की दुर्दशा १८३
® पांचवॉ अध्ययन
६२ वृहस्पतिदत्त-सामान्य परिचय
६३ भगवन्त का पदार्पण एक दयापात्र की पृच्छा-
बृहस्पतिदेव का जुल्मी पूर्वभव
६४ शतानीक राजा का मरण और उदायन कुमार-
का राज्यारोहण
१९७
६५ विश्वास से भयंकर परिणाम
१९९
६६ अनाचार का फल
२००
६७ अंतिम पृच्छा और उसका खुलासा २०१
६८ उपसंहार
२०३
॥१२॥
विपाक छटा अध्ययन * सातवाँ अध्ययन विपयानु- क्रमणिका नंबर ॥१३॥ विषयों के नाम पृष्टांक ७८ नंबर विषयों के नाम पृष्टांक ६९ नन्दिवर्धन अथवा नन्दिसेन-अध्ययन का बीजक २०४ ७० गौतमस्वामी ने एक अत्यन्त दयाजनक दृश्य देखा प्रभु से पृच्छा और प्रत्युत्तर २०६ ७१ नन्दिवर्धन का पूर्वभव २०९ ७२ कोतवाल के पास दंड देने की सामग्रियाँ २१० ७३ घोर दण्ड दिये जाने की योजनाएँ २१४ ७४ पापी कोतवाल की दुर्गति २१९ ७५ लोभांधता से पुत्र का पिता के प्रति जुल्मी विचार- उग्रपाप का प्रत्यक्ष फल २२१ ७६ आखिरी खुलासा २२५ उपसहार । २२७ उम्बरदत्त २२८ ७९ गौतम स्वामी एक दुःखी भिखारी को देखते हैं २२९ ८० गौतम स्वामी उस भिखारी के विषय में पृच्छा करते हैं-भगवन्त खुलासा पूर्वक पूर्वभव फरमाते हैं २३५ ८१ धनवन्तरी वैद्य का पापोपदेश-नरक गतिकी प्राप्ति २३९ ८२ गंगदत्ता ने यक्ष की मानता की-पुत्रफल की आप्ति २४२ ८३ गंगदत्ता को मोजमजा करने का दोहला उत्पम हुवा २५० ८४ पुत्रका जन्म-माता पिता का विरह-कष्टमय २५२ ८५ अन्तिम पृच्छा और उस का बढ़िया खुलासा २५४ ॥१३॥ भिखारी दशा विपाक विषयानु- द्वितीय श्रुतस्कन्ध-सुखविपाक ® पहिला अध्ययन ७ क्रमणिका ॥१६॥ का पदार्पण नंबर विषयों के नाम. पृष्टांक ११८ उत्थानिका ३२९ ११९ सुबाहु कुमार-संक्षिप्त परिचय ३३२ १२० सुबाहु कुमार का जन्म-विवाह और एश आराम ३३३ १२१ भगवन्त का पदार्पण कुमार का व्रत ग्रहण करना ३३६ १२२ कुमार के लिये गणधर महाराज की पृच्छा ३४० १२३ भगवान् का प्रत्युत्तर पूर्वभव का बयान १२४ तपोधन मुनि को सुमुख गाथापति का पूर्णभाव से दान देना-दान से अपूर्व लाम ३४५ नंबर विषयों के नाम पृष्टांक १२५ दीक्षा का प्रश्न-भगवन्त का विहार-कुमार का जानपन ३५१ १२६ दीक्षा के लिये कुमार की पूर्ण अभिलापा-भगवन्त ३५३ १२७ प्रभु की देशना का श्रवण-पूर्ण प्रेम से दीक्षा का अङ्गीकार और उसका यथार्थ पालन ३५७ १२८ कुमार को ज्ञान सम्पादन-परभव में प्रस्थान १२९ सुबाहु कुमार का अन्तिम सुन्दर निर्णय १३० उपसंहार ३६३ ® दूसरा अध्ययन ॥१६॥ १३१ भद्रनन्दी कुमार ३६४ विपाक नंबर विषयों के नाम. पृष्टांक | नंबर विषयों के नाम. पृष्टांक विषयानु- क्रमणिका सूत्र ® तीसरा अध्ययन ® ® सातवाँ अध्ययन ® ॥१७॥ 20- १३२ सुजात कुमार चौथा अध्ययन १३६ महाबल कुमार ३७२ ® आठवा अध्ययन 3 ३६८ १३३ सुवासव कुमार ॐ पाचवा अध्ययन ® ३७४ १३७ भद्रनन्दी कुमार 8 नवा अध्ययन ® १३४ जिनदास कुमार ३६९ 3 छटा अध्ययन 9 ३७५ १३८ महाचन्द्र कुमार ॥१७॥ १३५ धनपति कुमार ३७१ विपाक नंबर विषयों के नाम पृष्टांक ® दसवाँ अध्ययन विषयानु- क्रमणिका ॥१८॥ १३९ वरदत्त कुमार १४० उपसंहार १४१ परिसमाप्त १४२ ग्रन्थ का उपसंहार १४३ टीकाकार का निवेदन १४४ टीकाकार का परिचय १४५ प्रशस्तिका ३७६ ३७९ ३८० ३८१ ३८२ ३८२ ३८३ 3 भूल सुधार प्रेसमेन की गलती से व दृष्टिदोष से रही हुई भूलों का सुधार निम्नावित है- १ पृष्ट ३९ लाइन ३ के ब्रेकेट में (आठ २ कोस) चाहिये. २ पृष्ट ५६ मूल की दूसरी लाइन के आगे छूटगया- मूल-भारहे वासे वेड्ढगिरिपायमूले सहिकुलंसी सीहत्ताए पञ्चायाहिति, से णं तत्थ सीहे भविस्सत्ति अहम्मिए जाव साहसिए सुबहुं पावं जाव समजिणति जाव समजिणत्ता काल मासे कालं किच्चा। ३ पृष्ट ६८ की टिप्पणी में - उन्मान की व्याख्या कल्पसूत्र की कल्पदुम कलिका और सुबोधिनी टीका वगैरः से जानाना-ऐसा चाहिये ॥१८॥ ॥ समाप्त। शान्ति. V A.S
पारण पूपा jaयोनी विनयन्त्री जी म. की शिष्या नि चियाश्रीक
गर सूत्रहे
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श्री विपाक सूत्र
हिन्दी अनुवाद
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अनुवादक-प्रखरवक्ता वीरपुत्र श्री आनन्द सागरजी महाराज.
(मङ्गलाचरण)
वन्दन हो अरिहन्त को । सिद्ध-साधु आधार ॥ हिन्दी विपाक सूत्र की। सुन्दर रचना सार ॥१॥
विपाक
दुः-वि.
पीठिका
॥४॥
पीठिका
श्री सुधर्म स्वामी गणधर महाराज का पदार्पण के
मूल-तेणं कालेणं तेणं समएणं चंपा णामं णयरी होत्था, वण्णओ, पुन्न भद्दे चेइए-तेणं कालेणं तेणं
मएणं समणस्स भगवओ महावीरस्स अन्तेवासी अज्ज सुहम्मे णामं अणगारे जाइ सपन्ने वण्णओ, चउदस्स
पुवी चउनाणोवगए पंचहि अणगारसएहिं सद्धिं संपरिवुडे पुवाणुपुत्विं जाव जेणेव पुण्णभद्दे चेइए अहाप-
डिरूवं जाव विहरइ, परिसा निग्गया, धम्म सोच्चा, निसम्म जामेव दिसं पाउभूया तामेव दिसं पडिगया।
अधी-उस काल उससमय में चम्पा नामकी नगरी थी, उसका वर्णन करना x पूर्णभद्र नामका उद्यान था,
४ वापिवप्रविहारवर्णवनिता वाग्मी वन वाटिका । विद्वबाह्मण वादिवारिविवुधा वैश्या वणिग्वाहिनी ॥
विद्यावीरविवेकवित्तविनयो वाचंयमो वल्लिका। वखं वारणवाजिवेसरवरं राज्यं च वै शोभते ॥१॥
एक चरित्र पर से-
भावार्थ-वावड़ियाँ, शहरपना, देवमन्दिर, चारोंवर्ण, सुन्दर खियाँ, गुणी, वनस्लंड, वगीचियॉ, विद्वान्, ब्राह्मण (भिक्षुक नही), विवाद
॥४॥
दु:-वि.
विपाक
पीठिका
॥५॥
उस काल उस समय श्रमण भगवान महावीर स्वामी के शिष्य आर्य सुधर्म नामके महा मुनीश्वर जाति सम्पन्न
यानी उब कुलके थे, उनका वर्णन करना, वे चौदह पूर्वधारी, चार ज्ञानयुक्त, पांच सौ मुनियों से परिवृत, क्रमशः
(ग्रामानुग्राम विचरते हुए) यावत् जहां पर पूर्णभद्र नामका यक्ष मन्दिर है उस उद्यान में यथाप्रतिरूप (मुनियों के
योग्य) आश्रय ग्रहण करके रहे-पर्षदा बाहर निकली, धर्म सुना, सुनकर जिस दिशा से प्रकट हुई थी (आई थी)
उस दिशा में वापिस चली गई।
सूचना-मूल का अर्थ करने के पश्चात् जिस २ पद का या वाक्य का टीकाकार महाराज ने विशेष अर्थ किया
है वह प्रकाशित करेंगे, जहां पर मूल और टीका का समान अर्थ होगा वहां पर टीकार्य में प्रायः नहीं लिख्वा
जायगा; इस नियम का पालन सर्वत्र होगा।
टीकार्थः-'णंकार' वाक्य का अलङ्कार भूत है, 'एकार' प्राकृत भाषा से उत्पन्न है-काल और समय एकार्थी हैं, फिर पृथक्
कहने में विशेषता क्या है ? उत्तर में विदित हो कि इस में समान्य विशेष की विशेषता है-यहां पर वर्तमान अवसर्पिणी (पतन काल
करने वाले वादि, सरस्वती महादेवी, पंडित, गणिका, व्यापारी, नदियाँ, विद्या, वीर, विवेक, धन, विनय, मुनिवर, वेले, वस, हाथी, घोड़े
खचर और श्रेष्ठराज्य, इस नगरी में शोभते थे, अर्थात् यह नगरी इन वस्तुओं से शोभिता थी।
॥५॥
विपाक दुः-वि. पीठिका सूत्र ॥८॥ वजऋषभ नाराच संघयण * से पद्धित हैं, ये दोनों विशेषण आगम में प्रसिद्ध है-सुवर्ण खण्ड के घसने से कसोटी पर रेखा समान चमक दार और कमल के गर्भ समान गौर वर्ण वाले है-'उग्रतवे' उग्रतपस्वी-तपस्या में दूसरे से परास्त नहीं हो सके ऐसे तप के धारी 'दित्त तवे' दिप्त तपस्वी-अग्निके माफिक देदिप्यमान्; अर्थात् कर्म रूपी वन को दहन करने में ज्वलन्त तेज रूप तपको धारण करने वाले 'तत्ततवे' तप्त तपस्वी-तपको तपाने वाले यानी उनने इस तरह का तय किया है कि जिसके द्वारा कमों को संतप्त कर उस ही तप से अपनी आत्मा को तप स्वरूप संतप्त की है, जिससे अन्य के लिये वह तप अछूत होगया है, अर्थात् वैसा तप नहीं कर सकते 'महातवे' प्रशस्त तपस्वी या महा तपस्वी-'उराले' उदार या प्रधान, वा भीम तपकर्ता-अतिकष्ट मय तप करने से समीप वासी कमजोरों को भय उत्पन्न करने वाले. 'घोर तपस्सी' उग्र तपस्वी-'घोरे' निर्दय-परिपहादि शत्रुओं के नाश करने में निर्दय-'घोर गुणे' भयंकर गुण के धारी- दूसरे कठिनता से आचरण कर सकें ऐसे गुण के धारी 'पोर बंभचेरवासी' भयंकर ब्रह्मचर्य में बसने वाले असक्त लोग जिस की दुःख पूर्वक आचरणा कर सकें ऐसे उग्र ब्रह्मचर्य के पालक 'उच्छूट सरीरे' शरीर के त्यागी-शरीर के उपचार का त्याग करने से शरीर त्यागी हैं 'सखित्त विउल तेउलेस्से' संक्षेप और विपुल तेजो लेश्या वाले शरीर के अन्तरगत रहने से संक्षेप और अनेक योजन प्रमाण क्षेत्र * मरकटबद्ध पर कसा हुवा पाटा उस पर ठोकी हुई नील के समान मास, हाड़ और नसों की जुड़ी हुई मजबूती के बराबर मजबूत याँधेको 'वज ऋषभ नाराच संघयण' कहते है। ।।८॥
दु:-वि. पीठिका . विपाक ॥९॥ . में में रही हुई वस्तुओं को जलाने में समर्थ इससे विस्तार वाली तेजोलेश्या+ के धारी 'उड्ढंजाणु' ऊँचे घुटने वाले-शुद्ध पृथ्वी के आसन का त्याग होने से और कटासन का अभाव होने से कुकुड़ आसन से रहे हुवे 'अहो सिरो' नीचे शिरवाले-ऊँची और तिर्की दृष्टि के अभावि 'झाण कोट्ठोवगए' ध्यानरूप कोठार मैं प्राप्त हुवे-संयम तप से आत्म भावना करते हुवे जम्बू स्वामी विचरते हैं। इस प्रकार का दृश्य जानना. तदनन्तर- १ 'जाय सड्ढे ' श्रद्धावाले-इच्छित अर्थ को श्रवण करने की वॉच्छा मे प्रवृत्तमान् ‘जाव' यावत् शब्द से इस तरह जानना- २'जाय संसए' शंसय वाले-अनिर्णित अर्थ यानी पदार्थ पर शंसयवान् ३ 'जाय कोउहल्ले' कुतुहल वाले-श्रवण करने की उत्सुकता प्रवृत्तमान-१' उपन्न सड्ढे ' उत्पन्न श्रद्धा वाले-पहिले नही थी और पीछे श्रद्धा उत्पन्न हुई. २' उपन्न संसए' उत्पन्न शंसय वाले–पहिले नही था और पीछे शंसय उत्पन्न हुआ ३ 'उपन्न कोउहल्ले' उत्पन्न कुतुहल वाले-पहिले नहीं था और पीछे कुतुहल उत्पन्न हुआ- १ 'संजाय सड्ढे' सम्यक् श्रद्धावाले-अच्छी तरह से प्रवर्ती है श्रद्धा जिसकी. २ 'संजाय संसए' सम्यक् शंसय वाले-अच्छी तरह प्रवृत्त हुवा है शंसय जिसको. ३ 'संजाय कोउहल्ले सम्यक् कुतुहल वाले-अच्छी तरह प्रवृत्त हुवा है कुतुहल जिसको-१ 'समुपन्न सड्ढे ' सम्यग् उत्पन्न श्रद्धावाले–पहिले नहीं थी और पीछे अच्छी तरह उत्पन्न हुई है इच्छित पदार्थ को श्रवण करने की इच्छा जिसकी 'समुप्पन्न संसए' सम्यग् उत्पन्न शंसय वाले–पहिले नही था और पीछे अच्छी तरह उत्पन्न हुवा है शंसय जिसको. ३ 'समुपन्न कोउहल्ले' . ॥९॥ + अमुक विशिष्ट तपसे उत्पन्न हुई लब्धि विशेष को 'तेजोलेश्या' कहने है। ---
विपाक
दुः-वि.
पीठिका
सूत्र
॥ १२ ॥
मियापुत्ते १ य उज्झियते २ । अभग्ग ३ सगडे ४ वहस्सइ ५ नंदी ६ ॥
उंवर ७ सोरिय दत्ते ८ य । देवदत्ता ९ य अंजुया १० ॥१॥
जइणं भंते ! समणे णं आइगरे णं तित्थयरे णं जाव संपत्ते णं दुहविवागाणं दस अज्झयणा पन्नत्ता,
तंजहा-१ मिया पुत्तेय जाव १० अंजुया; पढमस्स णं भंते ! अज्झयणस्ल दुह विवागाणं समणे णं जाव
सम्पत्ते णं के अट्टे पन्नत्ते ? तते णं से सुहम्मे अणगारे जम्बू अणगारं एवं वयासी-
अर्थ-हे भगवन्त ! (पूज्य गुरुदेव ! ) श्रमण भगवन्त महावीर देव यावत् सम्प्राप्त हुए यानी मोक्ष को पधारे
उन्होंने दसम अंग प्रश्नप्याकरण का यह अर्थ (जो आपने पूर्व में फरमाया ) प्रकाशित किया तो हे भगवन्त !
ग्यारहवे अंग विपाक सूत्र का श्रमण भगवन्त महावीर देव यावत् मोक्ष पधारे ने क्या अर्थ फरमाया ? तब आर्य
सुधर्म अणगार ने जम्बू अणगार को इस प्रकार कहा-इस तरह निश्चय करके हे जम्बू ! श्रमण भगवन्त यावत्
मोक्ष को पधारे ने ग्यारहवें अंग विपाक सूत्र के दो श्रुतस्कध (ज्ञान के जत्थे) फरमाये; वे इस प्रकार हैं-१ दुःख
विपाक २ सुख विपाक. हे भदन्त ! जो श्रमण भगवन्त यावत् मोक्ष को पधारे ने ग्यारहवें अंग विपाक सूत्र के दो
श्रुत स्कंध फरमाये, तद्यथा-१ दुःख विपाक २ सुख विपाक तो हे प्रभो! पहिले श्रुत स्कंध दुःख विपाक के कितने
।
॥१२॥
विपाक
दुः-वि.
पीठिका
सूत्र
॥१३॥
अध्ययन फरमाये ? तब आर्य सुधर्म अणगार ने जम्बू अणगार को ऐसा कथन किया इस प्रकार निश्चय करके हे
जम्बू ! श्रमण भगवन्त धर्म के आदि कर्ता [अपने शासन में ] तीर्थ के (चतुर्विधि संघ के) संस्थापक यावत् मोक्ष
को पधारे उनने दुःख विपाक के दस अध्ययन फरमाये; वे ये हैं-
(१) मृगापुत्र (२) उज्झितक (३) अभग्न (४) शकट (५) वृहस्पतिदत्त (६) नन्दि (७) उम्बर (८) शौरिकदत्त
९ देवदत्त १० अंजू .
हे भदन्त ! श्रमण भगवन्त आदिकर्ता, तीर्थकर्ता, यावत् मोक्ष को पधारे हुए ने दुःख विपाक के दस अध्य-
यन फरमाये हैं. तद्यथा-१ मृगापुत्र, (यावत्) १० अंजू तो हे प्रभो! दुःख विपाक के पहिले अध्ययन का श्रमण
भगवन्त यावत् मोक्ष पधारे ने क्या अर्थ फरमाया ? तब उन सुधर्म मुनीश्वर ने जम्बू अणगार के प्रति इस प्रकार
प्रकाशित किया-
टीकार्थ-'दुह विवागा ' दुःख विपाकाः- पाप कर्मों के फल, दुखों के हेतुभूत होने से दुःखों के यानी पाप कर्मों के फलों का
बयान जिसमे हो वह 'दुःख विपाक' कहा जाता है-वर्णानुसार न्याय से (अक्षरानुसार न्याय से-पहिले दकार और पीछे सकार) दुःख
विपाक पहिला श्रुतस्कन्ध और सुख विपाक दूसरा श्रुतस्कन्ध ग्रहण करना.
'मियउत्ते' इत्यादि गाथा का विशेषार्थ इस तरह है :- १ मृगापुत्र नाम के राज पुत्र के बयान से संकलित अध्ययन 'मृगापुत्र
॥१३॥
विपाक दुः-वे. पहिला सूत्र अध्ययन ॥१६॥ मृगापुत्र नामका लड़का था, जन्म से अंधा, जन्म से गूंगा, जन्म से बहरा, जन्म से पांगला, हुंडक संस्थान (गोल मोल गह) वाला और वायु (यादी) की प्रकृति वाला था, उस राजपुत्र के हाथ, पैर, कान, आंख और नाक नहीं थे; उसके अंगोपांग की आकृति चिन्ह मात्र ही थी। टीकार्थ-'एवं' इस प्रकार-कथन किये जाने वाले प्रकार से. 'खलु' वाक्य के अलंकार भूत है. 'सव्योउय वण्णओ' सर्व ऋतुओं के पुष्पों से भरा हुआ नन्दन वनके समान, इत्यादि उद्यान का वर्णन करना. 'चिराइए' बहुत काल से शुरूआत है जिसकी इत्यादि वर्णन सहित कहना चाहिये; जिस तरह पूर्णभद्र चैत्य का चयान उववाई सूत्र में है. 'अहीण वण्णओ' अहीन यानी पूर्ण पंचेन्द्री वाला शरीर, वर्णन करना चाहिये. 'जाइ अंधे' जन्म काल से ही लेकर अंधा. 'झुंडे' हुंडक-शरीर के सर्व अवयव प्रमाण रहित यानी गोलमोल गट्ट. 'वायव्ये जिसको वायु हो. 'आगई आगई मित्ते' अंग के अवयों की आकृति आकार मात्र थी; अथात् उचित स्वरूप नहीं था। एक जन्मान्ध पुरुष प्रभु के निकट मूल-तते णं सा मिया देवी तं मिया पुत्तं दारगं रहसियसि भूमिघरांस रहसएणं भत्तपाणे णं
विपाक
सूत्र
अध्ययन
॥१७॥
पडिजागरमाणी २ विहरई, [सू० २] तत्थण मियग्गामे णगरे एगे जातिअंधे पुरिसे परिवसइ, से णं एगेणं / दुः-वि.
सचक्खु तेणं पुरिसेणं पुरओ दंडएणं पग़ढिजमाणे २ फुट्टहडाहडसीसे मच्छियाचडगर पहकरेणं अपिणज्ज पहिला
माणमग्गे मियग्गामे नयरे मेहे २ कालूण वडियाए वित्तिं कप्पेमाणे विहरइ । तेणं कालेणं तेणं समएणं समणं
भगवं महावीरं जाव समोसरिए, जाव परिसा निग्गया तएणं से विजए खत्तिए इमिसे कहाए लढे समाणे
जहा कोणिये तहा निगते, जाव पज्जुवासइ, तते .णं से ज़ाइअंधे पुरिसे तं महया जणसद्धं जाव सुणोत्तातं
पुरिसं एवं वयासि- किन्नं देवाणुप्पिया ! अज्ज मियग्गामे णयरे इंदमहेइ वा जाव निग्गच्छई !, तते णं से
पुरिसे तं जाइअंध पुरिसं एवं वयासि-
अर्थ-उस के बाद उस मृगादेवी ने उस मृगापुत्र लड़के को गुप्त तलघर (भोयरा) में रख्वा, गुप्तपने आहार
पानी से पोषण करने में सावधान होती हुई रहती थी-उस मृगाग्राम नगर में एक जन्मान्ध पुरुष रहता था, वह
एक सूझते पुरुष द्वारा लकड़ी से आगे २ खिंचाता हुआ चलता था; इस के मस्तक के केश टूटे हुवे और अत्यन्त
विखरे हुवे थे, मख्वियों का विस्तार वाला समूह उसके मार्ग का साथी था यानी मख्खियाँ भिन भिनाती थी;
मृगाग्राम नगर के अन्दर घर २ पर दयामय आजीवका करता हुवा रहता था उस काल उस समय में श्रमण भगवन्त
॥१७॥
विपाक पहिला अध्ययन ॥.२०॥ "एवं खलु देवाणुप्पिया.! समणे भगवं महावीरे जाव इह समागते इह संपत्ते इहेव मियग्गामे गगरे मृगवणुजाणे अहापडिरूवं उग्गहं उग्गिमिहत्ता संजमेणं तवसा अप्पाणं भावे माणे विहरति" निश्चय कर के इस प्रकार हे देवानुप्रिय! श्रमण भगवन्त महावीर यहां पर पधारे है, यहां सप्राप्त हुवे है, इस ही मृगाग्राम नगर के मृगवन नाम के उद्यान में यथाप्रतिरूप यानी त्यागी को शोभे वैसे अवग्रह को अवग्रहित करके संजम और तप से आत्म भावना करते हुवे विचरते है-इसलिये ये सब लोग जाते हैं-'विजयस्स तीसेय धम्म इससे यह मालूम होता है-"विजयस्स रनो तीसेय महइ महालियाते परिसाए विवित्तं धम्म माइक्वइ जहा जीवा वमंति" विजय राजा के पास और बढ़ी पर्पदा के सामने विविध प्रकार का धर्म कहा, जिस तरह जीव कर्मों को वांधते है-'जाइअंधे' जन्म से लेकर अन्धा! वह तो चक्षुरोगादि से भी हो सकता है, इसलिये कहते हैं-'जाय अंधारुवे' शुरु से ही नेत्रों की उत्पत्ति नहीं होने से अंधापन उत्पन्न होगया है 'कुत्सिताङ्गं रूपं घृणित है शरीर का रूप जिसका. I 'गौतम गणधर की मृगापुत्र देखने की अभिलाषा । ॥२०॥ मूल-तेणं कालेणं तेणं समएणं समणस्स जेट्टे अन्तेवासी इन्दभूति नामं अणगारे जाव विहरइ, ततेणं
विपाक
पहिला
सूत्र
अध्ययन
॥२१॥
से भगवं गोयमे तं जाइअंध पुरिसं पासइ २ ता जायसड्ढे जाव एवं वयासी-अत्थिणं भंते ! केई पुरिसे जाति-
अंधे जातिअंधारूवे ? हंता अस्थि; कहएणं भंते ! से पुरिसे जातिअंधे जातिअंधारूवे ? एवं खल्लु गोयमा !
इहेव मियग्गामे नगरे विजयस्स खत्तियस्स पुत्ते मियादेवीए अत्तए मियापुत्ते नामं दारए जातिअंधे जाति-
अंधारूवे, नत्थिणं तस्स दारगस्स जाव आगतिमित्ते, ततेणं सा मियादेवी जाव पडिजागामाणी २ विहरति ।
ततेणं से भगवं गोयमे समणं भगवं महावीरं वंदइ नमसति २ ता एवं वयासी-इच्छामिणं भंते ! अहं तुन्भे हिं
अब्भणुनाए समाणे मियापुत्तं दारगं पासित्तए, अहासुहं देवाणुप्पिया! तते णं-
अर्थ-उस काल उस समय में श्रमण भगवन्त के बड़े शिष्य इन्द्रभूति नाम के अनगार यावत् विचरते हैं,
तब उन भगवान् गौतम ने उस जातिअंध पुरुष को देखा, देखकर श्रद्धा उत्पन्न हुई यानी पूछने की इच्छा उत्पन्न
हुई यावत् इस प्रकार बोले- हे परमात्मन् ! कोइ पुरुष जन्मांध और कुत्सित अंगरूप नेत्र का अंधापन वाला होता
है क्या ? भगवान् ने कहा- हां ! होता है; हे प्रभो ! वह किस तरह जातिअंध और जातिअंध रूपवाला होता है ?
इस प्रकार निश्चय करके हे गौतम ! इस ही मृगाग्राम नगर के अन्दर विजय क्षत्री का पुत्र और मगादेवी का
॥२१॥
विपाक
दु:-वि.
सूत्र
पहिला
.
॥२४॥
अध्ययन
रहित-ये क्रिया विशेषण में जानना-भ्रान्ति रहित धूसर प्रमाण * काय प्रमाण भूमिभाग जिसमें देखाजाय ऐसी दृष्टि से ईर्या समिति
को शोधते पधारे. 'ई' गमन तत्संबंधी मार्ग को भी ईर्या कहते हैं. 'जेणेव' जिस प्रदेश में 'हट्ट जाव' हर्षित यावत् शब्द से हर्षित,
तुष्ठित, आनन्दित, इत्यादि ये शब्द एकार्थी समझना. 'हव्वति' शीघ्र.
मूल-सा मियादेवी मियापुत्तस्स दारगस्स अणुमग्ग जायते चत्तारिपुत्ते सव्वालंकार विभूसिए करेति
२ ता भगवतो गोयमस्स पादेसु पाडेति २ त्ता एवं वयासी-एए णं भंते! मम पुत्ते पासह, तते णं से भगवं
गोयमे मियादेवीं एवं वयासी-नोखल्लु देवाणुप्पिया ! अहं एए तव पुत्ते पासिउं हव्वमागते, तत्थ गंजे से
तव जेहे मियापुत्ते दारऐ जाइअंधे जाइअंधारूवे जं णं तुमं रहस्सियंसी भूमिधरंसी रहस्सिएणं भत्तपाणे णं
* गाड़ी के जुड़े प्रमाण या शरीर प्रमाण को 'धूसर प्रमाण घोलते है-यहा पर यदि कोइ शंका करे कि देह प्रमाण यानी साड़ी तीन
हाथ प्रमाण की नपति का क्या मालूम पड़े, क्या गज लेकर मापता जाय ? उत्तर में विदित हो कि शानियों का अनुभव स्वयं माप का
गज है! अपनी जमीन पर पड़ती हुई अन्तर रहित दृष्टि ठीक शरीर प्रमाण ही गिरती है, इस का अनुभव आज भी हो सकता है-इस
'र्या समिती' में वाह्य लाभ तो प्रत्यक्ष जीवों की रक्षा व अपनी निरायाधता दिखाई देती है, मगर आत्मिक एक महान् लाभ यह है कि
दृष्टि का विषय कब्जे में छोजाने से मानसिक विशुद्धता और मनोवेग मर्यादित हो जाता है, इसकी व्याख्या गुरुदेवों से जानना.
॥२४॥
विपाक
दुः-वि.
पहिला
अध्ययन
सूत्र
॥२५॥
पडिजागरमाणी २ विहरसि त णं अहं पासिउं हव्वमागए, तते णं सा मियादेवी भगवं गोयमं एवं वयासी-से
केणं गोयमा ! से तहारूवे णाणी वा तवस्सी वा जेणं तव एसमढे मम ताव रहस्सिकए तुभं हव्वमक्खाए
जओणं तुन्भे जाणह ! तते णं भगवं गोयमे मियादेवीं एवं वयासी-एवं खल्लु देवाणुप्पिया ! मम धम्मायरिए
समणे भगवं महावीरे जतो णं अहं जाणामि, जावं च णं मियादेवी भगवया गोयमेण सद्धिं एयमटं संलवति
तावं चणं मियापुत्तस्स दारग्गस्स भत्तवेला जाया यावि होत्था; ततेणं सामियादेवी भगवं गोयम एवं वयासी-
अर्थ-उस मृगादेवी ने मृगापुत्र लड़के के पीछे जन्मे हुवे चार पुत्रों को सर्व आभूषणों से भूषित किये, करके
भगवान् गौतम के चरणों में झुकाये (नमाये) झुकाकर इस प्रकार बोली-अहो भगवन्त ! इन मेरे पुत्रों को देखो!
तब उन भगवान् गौतम ने मृगादेवी को इस क़दर कहा-निश्चय करके हे देवानुप्रिये ! मैं इन तुमारे पुत्रों को देखने
के लिये शीघ्र नहीं आया है; परन्तु जो वह तेरा बड़ा लड़का मृगापुत्र जातिअंध जातिअंधरूप, जिसको तुम येजान
तलघर में रखकर छुपे हुए आहार पानी से वारंवार पोषण करती हुई रहती हो, उस पुत्र को मैं शीघ देखने आया
हूँ, तब वह मृगादेवी भगवान् गौतम को इस प्रकार कहती है-हे प्रभो ! वे कौन हैं ज्ञानी वा तपस्वी जिनने यह
मेरी गुप्त हक़ीकत आपको शीघ्र कही! जिससे आप जानते हो ! तब भगवान् गौतम ने मृगादेवी को इस तरह
॥ २५॥
विपाक
सूत्र
यानी पूर्वभव में. 'दुश्वर्णानां' हिंसादि दुष्ट चरित्र के हेतुभूत. 'दुप्पडिकंताण' यहां पर. दुः शब्द अभाव अर्थ में है इससे प्रायश्चित
की प्राप्ति वगैरा से उदय को निवृत्त नहीं किये हुवे, यह अर्थ समझना. 'असुभाणं' असुख के हेतुभूत. 'पावाणं' दुष्ट स्वभाव रूप
'कम्माणं' ज्ञानावर्णी आदि कर्मों को भोग रहा है।
दुः-वि.
'पहिला
अध्ययन
॥३२॥
12929
290
भगवन्त से मृगापुत्र सम्बंधी वातचीत
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मूल-एवं खलु अहं तुम्भेहिं अभुणुण्णाए समाणे मियग्गामं नगरं मझमझेण अणुप्पविसामि जे-
व मियाए देवीए गेहे तेणेव उवागते, ततेणं सा मियादेवी ममं एजमणं पासइ २ त्ता हट्टा तं चेव सव्वं जाव
पूयं च सोणियं च आहारेति, ततेणं मम इमे अज्झथिए समुप्पज्जित्था-अहोणं! इमे दारए पुरा ० जाव विहरइ
[सू० ४ ] से णं भंते ! पुरिसे पुव्वभवे के आसि ? [किं नामए वा किं गोए वा] कयरंसिग्गामंसि वा नयरं-
॥३२॥
विपाक
दुः-वि.
पहिला
अध्ययन
॥३३॥
सिवा किंवा दचा किंवा भोच्चा किंवा समायरित्ता केसि वा पुरा जाव विहरति ? गोयमाइ समणे भगवं महावीरे
भगवं गोयमं एवं वयासी-
अर्थ- इस प्रकार निश्चय करके मैं आप की आज्ञा प्राप्त कर मृगागाम नगर के बीचोंबीच प्रवेश करता हुवा
जहां मृगादेवी का घर है वहाँ पहुँचा, तब मृगादेवी ने मुझे आता हुवा देखा, देखकर हर्षित हुई ( मेरे को मृगा-
पुत्र बताया) यावत् रसी और लोही का आहार करता है, यह सर्व हकीक़त कही; तदन्तर मुझे ऐसा विचार उत्पन्न
हुवा-अहो इस लड़के ने पहिले (किन पाप कर्मों को बांधे हैं ) यावत् रहता है. हे भगवन्त ! यह पुरुष पूर्वभव में
कौन था [क्या नाम व क्या गौत्र था ?] किस गाम व किस नगर में रहता था? क्या दान देकर, क्या भोग भोग-
कर, क्या आचरण करके, किस प्रकार पहिले (पूर्व में पाप कर्मादि प्राप्त किये ) यावत् रहता है ? हे गौतम ! इस
प्रकार आमन्त्रण करके भगवन्त महावीर स्वामी ने गणधर गौतम को इस तरह फरमाया-
टीकार्थ-'पुव्व भवे के आसि' पूर्व भव में कौन था? इससे इस प्रकार जानना-"कि नामेए वा किं गोत्तए वा" नाम-जैसी
इच्छा वैसा नाम, गौत्रं-यथार्थ कुल. 'जाव' यावत् शब्द से "पोराणाणं, दुचिन्नाणं, दुपडिकंताणं असुहाणं पावाणं कम्माणं पावगं फल-
वित्तिविसेसं पच्चणुब्भवमाणे विहरइ" + इसका अर्थ इकतीसवें पेज मे लिखा जा चुका है + 'गोयमाइ' गौतम! इस कदर आमन्त्रण किया.
-
॥३३॥
विपाक
दुः-वि.
पहिला,
अध्ययन
॥३६॥
को देखता है यानी ग्रहण करने की बुद्धि से देखता है वह अधर्मप्रेक्षक समझना. इस ही लिये अधर्मप्ररञ्जनः- अधर्म का रागी है, इस
से अधर्मसमुदाचारः-अधर्म की आचरणा है जिसकी सो अधर्माचारी जानना. अधर्म से यानी हिंसादि से वृत्ति करता हुवा यानी
आजीविका करता हुवा; दुःशील:- अच्छे स्वभाव से हीन. दुर्बतच-बतरहित. दुष्प्रत्यानन्दः-साधुदर्शानादि से आनन्दित नहीं, ऐसा
वह राठोड़ था-'आहेचचं अधिपतिकर्म, यावत् करण से ऐसा जानना-"पोरेवचं सामित्तं भट्टित्तं महत्तरगतं आणाइ सरसेणावचं
कारेमाणे" इसमें पुरोवर्तित्व-अग्रेसरपन. स्वामित्व-नायकता. भर्तृत्व-पोपकपन महत्तरकत्वं-उत्तमता. आज्ञेश्वरस्य-आज्ञा का प्रधान
पन है जिस का ऐसे स्वामी का सेनापतित्व 'कारयन्-दूसरे नौकरों से कराता हुवा और आप पालता हुवा रहता है.
इकाई राठोड़ का जुल्म
मूल-तए णं से इक्काई विजयवद्धमाणस्स खेडस्स पंचगाम सयाई बहूहिं करेहि य भरेहि य विद्धीहि
य उक्कोडाहि य पराभवेहि य दिजेहि य भेजेहीय कुंतेहि य लंछपोसेहि य आलीवणेहि य पंथ कोहेहि य
उविलेमाणे २ विहम्मेमाणे २ तज्जेमाणे २ तालेमाणे २ निद्धणे करेमाणे २ विहरति ।
॥३६॥
विपाक
दुः-वि.
पहिला
अध्ययन
॥३७॥
-
अर्थ-तदनन्तर वह इक्काई राठोड़ विजयवर्धमान खेड़े के पांच सो गामों को (गाम के लोगों को) बहुत करी
से, करों की वृद्धि से, अधिक गुना बढ़ाने से, रिस्वत (लांच) से, दबाने से, ज्यादे व्याज लेने से, दंडद्रव्य से, देने
की शर्त से, चोरों के पोषण से, ग्रामादि जलाने से, मुसाफिरों को मारपीट से, बाधा पहूँचाता हुवा, आचार भ्रष्ट
कराता हुवा, तर्जना कराता हुवा (डराता हुवा) चाबुक, लपाट आदि से मारता हुवा और निर्धन करता हुवा रहता है.
टीकार्थ- 'करेहि य ' करैः-खेत बगैरा की पैदाइस में राज को देने की वस्तुओ से. 'भरेहि य' करों की अधिकता से. 'विद्धीहि य'
वृद्धिभिः-किसानो को दिया हुवा अनाज दुगुना-तिगुना लेने से कहीं पर 'वृत्तिभिः' ऐसा भी उल्लेख है, वृत्तयः-राजा के नौकरों
की आजिविका से. (किसानों के पास से अमुक कापा वगैरा आजिविका दिलाई जाती है) 'उक्कोडाहि य' लञ्चाभिः-रिस्वतों से
'पराभएहि य' पराभवैः-दबाने से 'देजेहि य' दातव्यैः-देनदार से ज्यादे व्याज लेने से. 'भेजेहि य' भेद्यैः-मारामारी के अपराध
गाम के लोगों पर जो दण्डद्रव्य डालने में आता है; अथवा कास्तकारो के पास से जो दंडद्रव्य लिया जाता है उससे. 'कुंतेहि य
कुन्तकम् -इतना धन तूं मुझे देना इस शर्त से नौकर को देश वगैरी देने से. 'लंछपोसेहि य' लञ्छपोषाः-चौर लोग संभवते हैं उनका
पोपण करने से. 'आलीवणेहि य' व्याकुल लोगों को ठगने के लिये गाम बगैरा जला देने से. 'पंथकोट्टेहि य' सार्थधातैः- रास्तागिरों
मारने से. 'उवीलेमाणे ' अवपीलयन्-बाधा-पीड़ा पहूँचाता हुवा. 'विहम्मेमाणे विधर्मयन्-अपने आचारो से भ्रष्ट कराता हुवा
'तजमाणे' तर्जयन्-तिरस्कार करता हुवा यानी आश्रितो को ऐसा कहे-रे ! मेरी यह चीज़ नहीं देता है याद रखना, तूं ? इस तरह
डराता हुवा. 'तालेमाणे ' ताड़यन्-चाबुक, चपेटा से मारता हुवा. 'निद्धणे-करेमाणे निर्धनान् कुर्वन्-निर्धन करता हुवा रहता है.
-
.
,
॥ ३७॥
विपाक दुः-वि. . पहिला अध्ययन ॥४०॥ यंका पाउन्भूया. तंजहा- १ सासे २ कासे ३ जरे ४ दाहे । ५ कुच्छिसूले ६ भंगदरे ॥ ७ अरिसा ८ अजीरए ९ दिट्टी। १० मुद्धसूले ११ अकारए ॥१॥ १२ अच्छिवेयणा १३ कन्नवेयणा १४ कंडू १५ उदरे १६ कोढे. तते णं से इक्काई रहकूडे सोलसहि रोगायंकेहिं अभिभूए समाणे कोडंविय पुरिसे सद्दावेइ २ त्ता एवं वयासी- अर्थ-तत्पश्चात् उस इक्काई राठोड़ के किसी एक वख्त शरीर के अन्दर एक साथ सोलह रोगातङ्क (कप्ट सा- ध्यरोग) उत्पन्न हुवे. तद्यथा- १श्वास २ कास (खांसी) ३ ज्वर (बुखार) ४ दाह ५ उदरशूल ६ भंगदर ७ अर्स (मसा),८ अजीर्ण ९ नेत्र रोग १० मस्तक शूल ११ अरुचि १२ हड्डी का रोग १३ कर्णवेदना १४ खुजली · १५ जलोदर १६ कोढ. तदनन्तर उस इक्काई राठोड़ सोलह रोगातक पराभव होते हुवे ने कौटुम्विक पुरुषों को (सेवकों को) बुलाए, बुलाकर इस प्रकार कहा- टीकार्थ-'जमगसमगं' युगपत्-एक साथ. 'रोगायक' रोगा!-व्याधियॉ, वे ही आतङ्काः-कप्ट जीवन करने वाले. 'सासे 'बगरा गाथानुसार जाननाः 'जोणिसले' योनिशूल' पाठ में नहीं है, 'कुच्छिशूले' कूक्षिशूल:-पेटपीड़ा. 'भगंदले' भगन्दर 'अकारेए' अरोचकः- - ॥४०॥ . -
विपाक
दुः-वि.
पहिला
अध्ययन
॥४१॥
अरुचिकर 'अच्छिवेयणा' इत्यादि श्लोक से पृथक् है 'उदरे' जलोदर.
मूल-गच्छह णं तुब्भे देवाणुप्पिया ! विजयवद्धमाणे खेडे संघाडगतिगचउक्कचच्चरमहापहपहेसु
महया २ सद्देणं उग्घोसेमाणा २ एवं वदह-इहं खलु देवाणुप्पिया ! इक्काई रहकूडस्स सरीरगंसी सोलस
रोगायंका पाउन्भूया, तंजहा-१ सासे २ कासे ३ जरे जाव १६ कोढे, तं जो णं इच्छति देवाणुप्पिया ! विज्जो
वा विज्जपुत्तो वा जाणुओ वा जाणुयपुत्तो वा तेगिच्छी वा तेगिच्छीपुत्तो वा इक्काई रट्टकूडस्स तेसिं सोलस-
पहं रोगायंकाणं एगमवि रोगायकं उवसामित्तए तस्सणं इक्काई रट्टकूडे विपुलं अत्थसंपयाणं दलयति, दोचं पि
तञ्चपि उग्घोसह २ त्ता एयमाणत्तियं पञ्चप्पिणह ।
अर्थ- अहो देवानुप्रिय! तुम जाओ और विजयवर्धमान खेड़े के श्रृंगाटक में (सिंगोड़े के आकरवाले मार्ग में)
त्रिक में (जहां तीन रास्ते मिलते हों) चतुष्क में (जहां चार मार्ग मिलते हों) चत्वर में (चोहट्टे में) महापथ में
(राजमार्ग में-जहां बहुत लोगों का आना जाना हो) पथ में (सामान्य मार्ग में-जहां कम लोगों का आना जाना
हो) बड़े २ शब्दों में यानी जोर २ से उद्घोषणा करते हुवे ऐसा कहो- यहाँ पर (इस गाम में) निश्चय करके हे देवानु-
प्रिय ! इक्काई राठोड़ के शरीर में सोलह दुर्निवार रोग उत्पन्न हुवे हैं, वे ये हैं-१ स्वास २रवास ३ ज्वर यावत् १६
॥४१॥
विपाक
दुः-वि.
पहिला
अध्ययन
॥४४॥
अर्थ-इक्काई राठोड़ के शरीर को स्पर्श किया यानी परीक्षा की, परीक्षा करके उन रोगों का निदान (निर्णय)
परस्पर पूछा, पूछकर इक्काई राठोड़ को अभ्यंग से [तैल चोलने से] उद्वर्तन से [तेल को याहार निकाल ने से] उकाले
से [सुंठ पगरा के पानी पिलाने से] वमन से [उल्टी से] विरेचन से [दस्तो लगाने से] अवदहन से [डाम देने से]
अवस्नान से [तधा प्रकार की औषधियों मिश्रित जल द्वारा स्नान कराने से] अनुवासना से [गुदाद्वारा पेट में
तैल चढ़ाने से] वस्तिकर्म से [गुदा में यत्ती चढाने से वा चमड़े की डोरी पीट कर मस्तकादि अवयवों में तेल डालने
से] निरुह से [अनुवासना वत्] x शिरा येध से [नसों को पीदने से] तक्षण से [क्षुरादि शस्त्र द्वारा चमड़ी काटने
से प्रक्षण से [किंचित् चमड़ी काटने से] शिरोवस्ति से [मस्तक पर चमड़े की डोरी यांधकर उसमें औपधियों
से मिला
हुवा
तल टालने से] तर्पण से [तैलादि द्वारा शरीर की पुष्टि करने से] पुटपाक से (भट्टी में डाली हुई
पुट देकर तैयार की हुई औपधी से] छाल से [रोहिणी यगैरा छाल से] मूल से [वृक्ष की जड़ों से] कन्द से [जमी-
कन्द से] पत्र से [वृक्ष के पान से] पुष्प से [फूलों से ] फल से [वृक्ष के फलों से] पीज से [नानाविध यीजों से]
शिलिका से [किरात तिक्तक औपधि विशेप से] गुटिका से [गोलियां से] औपधि से [एक चीज की बनी हुई
४ अनुवासना और नियद में मात्र औपधियों का तफायत है।
* ऊपर कदा हुवा 'वस्ती कर्म' सामान्य दे, और "अनुवासना, निब्द तथा शिरोवस्ति"ये तीन इस ही के भेद है।
॥४४॥
विपाक
दुः-वि,
पहिला
अध्ययन
सूत्र
॥४५॥
दवाई से] भेषज से [अनेक चीजों से बनी हुइ दवाई से] इन दवाईयों से उन सोलह रोगों में से एक रोग भी शमन
होजाय, ऐसा उनने इच्छा करी यानी प्रयत्न किया; परन्तु वे उपशान्त करने को समर्थ न हुवे. तदनन्तर वे बहुत से
वैद्य-वैद्यपुत्र बगैरा सब उन सोलह रोगों में से एक भी रोग शान्त करने का समर्थन हुवे तब शरीर से, मन से और
दोनों से खेद प्राप्तकर जिस दिशा से प्रगट हुवे थे (आये थे) उस दिशा में वापिस चले गये.
टीकार्थ-'तच्छणेहि य' ओजार द्वारा चमड़ी पतली करने से. “पच्छणेहि य ' छोटी २ चमड़ियों को काटडालने से.. 'भैपजेहि
य' अनेक वस्तुओं के योग से तैयार हुई और पथ्यः 'संत' श्रान्ताः-शरीर के खेद से थके हुवे. 'तंत' तान्ता-मन के दुःख से. परितन्तः-
शरीर और मन दोनों श्रम से-टीका के बहुत से शब्दो के अर्थ मूल के अर्थ में आगये हैं। अतः यहां पर नहीं लिख्वे गये।
.
इक्काई राठोड़ की अन्तिम अवस्था
-
-
ज
4
मूल-ततेणं इक्काई रट्टकूडे विजेहि य ६ (विजापुत्ते य जाव तेगिच्छपुत्तो, य) पडियाइक्खिए परियार-
गपरिचत्ते-निविण्णोसहभेसज्जे सोलस रोगायंकेहिं अभिभूए समाणे रज्जे य रहे या जाव अंतेउरे य मुच्छिए रज्ज
॥४५॥
विपाक
दुः-वि.
पहिला
॥४८॥
अध्ययन
कालसमयसि कुडुवजागरियाए जागरमाणिए इमे एयारूवे अज्झथिए जाव समुप्पज्जित्या-एवं खल्लु अहं
विजयस्स खत्तियस्स पुब्बिं इट्टा ६ धेजा वेसासिया अणुमया आसी, जप्पभियं च णं मम इमे गम्भे कुच्छि-
सि गन्भत्ताए उववन्ने तप्पभिई च णं अहं विजयस्स खत्तियस्स अणिट्टा जाव अमणामा जाया यावि होत्था,
निच्छतिणं विजए खत्तिए मम नामं वा गोयं वागीणहत्तए वा किमंग पुण दस्सणं वा परिभागंवा १ तं सेयं खल्लु-
अर्ध-तय उस मृगादेवी के शरीर में वेदनाएँ उत्पन्न हुई-उज्वल यावत् ज्वलन्त वेदना प्रकट हुई, जय से
मृगापुत्र लड़का मृगादेवी की कूक्षि में गर्भपन उत्पन्न हुवा, तव से मृगादेवी विजयक्षत्री को आनिष्टा हुई, अम-
नोहरा हुई, अप्रिया हुई, अरुचिकरा हुई, अस्मृता (स्मरण में नहीं आती) हुई, तदा उस मृगादेवी को किसी एक
दिन मध्यरात्री के समय कुटुम्ब चिन्ता में (विचारणा मे) जागृत रहती को इस प्रकार आत्म संबंधी विचार यावत्
उत्पन्न हुवा-निश्चय करके इस प्रकार विजयक्षत्री को पूर्व में मैं इष्टा धी ६ [मनोहरादि छः पद] ध्येया, विश्वस-
नीया और अनुमता थी; जव से मेरा यह गर्भ कूक्षि में गर्भपने उत्पन्न हुवा है तब से मैं विजयक्षत्री को अनिष्टा
यावत् अस्मृता हुई. विजयक्षत्री मेरे नाम और गौत्र को ग्रहण करना, नहीं इच्छते हैं. तो फिर मुझे देखने या,भोगने
की तो बात ही क्या है ? इसलिये-
-
॥४८॥
विपाक
दुः--वि.
पहिला
सूत्र
-
अध्ययन
॥४९॥
.
टीकार्थ- 'पुव्वरत्तावरत्तकालसमयंसि' पूर्वरात्री [रात्री का पूर्वभाग] अपररात्री [रात्री का पिछला भाग] का भाग, उस लक्षण
वाला जो काल समय-यानी कालरूप समय. 'कुडुंब जागरियाए' कुटुम्ब विचारणा से. 'अज्झथिए''आध्यात्मिकः-निज संबंधी. यहां
पर दूसरे २ पद भी दिखाई देते हैं, वे ये हैं-'चिंतिए' स्मृतिरूपः-स्मरणरूप. 'कप्पिए' कल्पितः-बुद्धि से व्यवस्थित. 'पत्थिए'
प्रार्थितः-प्रार्थनारूप. 'मणोगए' मनोगतः-मन के अन्दर रहे हुवे वाहार अप्रकाशितः संकल्पः-आलोचित यानी विचार किया हुवा. 'इडे'
इष्टा, इत्यादि पॉचो शब्द एकार्थी पूर्ववत् जानना. 'धिजे' ध्येया-ध्याने योग्य. 'वेसासिय' विश्वसनीया-विश्वासकरने लायक. 'अणुमय'
अनुमता-अप्रियदर्शन का पीछे से भी मान्य हो. 'नाम' पारिभापिकी संज्ञा-अर्थरहित पहिचान. 'गोयं' गोत्रं-अर्थवाली संज्ञा यानी
पहिचान. 'किमंग पुण' किं पुनः-फिर क्या ? अंग शब्द आमन्त्रण में है.
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गर्भ को नष्ट करने के निष्फल उपाय
HERE XNXX
से यं खल्लु मम एयं गम्भं बहूहिँ गब्भ साडणाहि य पाडणाहि य गालणाहि य-मारणाहि
RREXKAR
॥४९॥
. - विपाक , दु:-वि. पहिला 'टीकार्थ- 'अट्ठनालीओर अष्टौनाड्यः-आठ नाड़ियॉ. 'आभितरप्पवहाउ' शरीर के अन्दर ही जो रुधिरादि बहाती हैं वे उस प्रकार कही जाती हैं. 'वाहिरप्पवहाउ' शरीर से बाहार रसी आदि जो झराती हैं वे उस तरह कही गई-इन ही सोलह नाड़ियों को विभक्त (चना) करते हैं, 'अट्टे' इत्यादि किस-तरह ये हैं कहते हैं- 'दुवे दुवे दो मवाद प्रवाह करनेवाली, दो रुधिर प्रवाह करनेवाली वे कौनसी हैं सो बताते हैं- 'कन्नंतरेसु कानों के छिद्रों में इस तरह ये चार. इस प्रकार दूसरी भी व्याख्या के योग्य है, विशेष में धमन्यः-कोठे के हाड़ों में. 'अग्गियए' अग्निकः-भस्मक नाम का वायुविकार होगया. ॥५२॥ अध्ययन - पुत्र को फिकवा देने का यत्न - मूल-तते णं सा मियादेवी अन्नया कयाई नवण्हं मासाणं बहुपड़िपुन्ना णं दारगं पयाया, जातिअंधे जाव आगइमित्ते, तते णं सा मियादेवी तं दारगं हुंडं अंधारूवं पासति २ त्ता भीया (तत्था उव्विग्गा, संजाय भया) ४ अम्माधाई सद्दावेति २त्ता एवं 'वयासी-गच्छह 'णं देवाणुप्पिया! तुमं एवं दारगं एगते उक्कु- ।। ५२ ।।
विपाक
दुः-वि.
पहिला
सूत्र
अध्ययन
॥५३॥
रुडियाए उज्झाहि, तते णं सा अम्मधाई मियादेवीए तहत्ति, एयम पडिसुणेति २ त्ता जेणेव विजयखत्तिए
तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता करयलपरिग्गहियं एवं वयासी-
अर्थ-तदनन्तर उस मृगादेवी ने नव मास प्रतिपूर्ण होने पर पुत्र को जन्म दिया, जन्मान्ध यावत् आकृति-
मात्र था, तब उस मृगादेवी ने उस लड़के को हुंड (गोलमोल) और अंधरूप देखा, देखकर डरी, त्रास को प्राप्त
हुई, उद्वेग पाई और उस को भय उत्पन्न हुवा, इससे धात्रीमाता (धाई मां) को बुलाई, बुलाकर इस प्रकार कहा-हे
देवानुप्रिये ! तुम जाओ इस लड़के को एकान्त उकेड़े पर डाल दो, पश्चात् उस धाइमाता ने प्रमाण वचन ऐसा कहा,
इस बात को सुनी सुनकरके जहां विजयक्षत्री (राजा) है वहां पर आती है, आकर हाथ जोड़कर इस प्रकार बोली-
टीकार्थ- 'जाइअंधे' जात्यन्धः-जन्मान्ध. बगैरा, यावत् करण से 'जाइमूए ' जातिमूका-जन्म गूंगा, इत्यादि जानना. 'हुंडं'
अंग के अवयव व्यवस्थित नहीं. 'अंधारूवं अन्धाकृतिः-अंधस्वरूप. 'भीया' भीता-डरी; इससे यहां पर ऐसा जानना. 'तत्था उबिग्गा
संजयभया' त्रासा उद्विग्ना संजातभया-भय की अधिकता बताने के लिये ये सब एकार्थी शब्द हैं. 'करयले ' इससे-“करयल परिग्गहियं
दसणहं मत्थए अंजलिं कटु" दोनों हथेली इक्खटीकर दस अंगुलियाँ मस्तक पर चढाकर यानी दोनों हाथ जोड़कर, ऐसा जानना.
'नवण्हं ' इससे 'मासाणं बहुपहिपुन्नाणं' नव मास सम्पूर्ण. 'जाइअंध' इत्यादि पूर्ववत.
-
.
-
॥५३॥
विपाक
दु:-वि.
सूत्र
पहिला
॥५६॥
अध्ययन
प्रमाण कर विनयपूर्वक अङ्गीकार किया, अङ्गीकार करके उस लड़के को गुप्त भूमिगृह में गुप्तपने आहार-पानी से
पोषण करती हुई रहती है. इस तरह निश्चय करके हे गौतम! मृगापुत्र नाम का लड़का पहिले बांधे हुवे पुराने यावत्
फल को भोगता हुवा रहता है ।
टीकार्थ-'पयं' प्रजा-सन्तान 'रहस्सिगयांस' राहासेके-निर्जनस्थान में. 'पुरापोराणाणं' पुरापुराणानां-पूर्वकाल में किये हुवे
इस ही लिये प्राचीन कालके यहां पर यावत् करण से 'दुचिन्नाणं दुप्पडिकंताणं' दुष्टरिति से आचरित और प्रतिक्रमण नहीं किये हुवे
(त्याग नहीं किये हुवे) इत्यादि. 'पावगं फलवित्तिविसेसं' पाप कर्म के फल को भोगता हुवा रहता है। ऐसा जानना.
.
मृगापुत्र के लिये गौतम गणधर की भावी पृच्छा
H
मूल-मियापुत्ते णं भंते ! दारए इओ कालमासे कालं किच्चा कहिं गमहिति ? कहिं उववजिहिति ?
गोयमा ! मियापुत्ते दारए छव्वीसं वासाइं परमाउयं पालइत्ता कालमासे कालं किच्चा इहेव जम्बूद्दीवे दीवे
॥५६॥
दुः-वि. विपाक पहिला अध्ययन. ॥५७॥ - अर्थ- हे भगवन्त ! मृगापुत्र सुत यहां से कालमास में काल करके कहां जायगा ? कहा उत्पन्न होगा? भगवान ने फरमाया-हे गौतम ! मृगापुत्र लड़का छवीस वर्ष की उत्कृष्ट आयुष्य पालकर कालमास में काल करके (मृत्यु के समय मरकर) इस ही जम्बूद्वीप नाम के द्वीप के अन्दर भरत क्षेत्र में वैताठ्यपर्वत की तलेटी में सिंह के कुल में सिंह- पने उत्पन्न होगा; अर्थात् वह वहां पर सिंह होगा, अधर्मी यावत् साहसिक होगा, बहुतसा पाप उपार्जन करेगा, उपार्जन करके कालमास में काल कर के- टीकार्थ-'अहम्मिए । अधर्मी, यावत् करण से ऐसा जानना -"बहुनगरनिग्गयजसे सूरे दढप्पहारी" बहुतसे नगर को उजड़ करने में सूरवीर और दृढप्रहारी. 'कालमासे । मरणावसरे-मृत्यु के समय. मूल-इमिसे रयणप्पभाए पुढवीए उक्कोस सागरोवमठिइएसु जाव उववजिहिति, सेणं ततो अणतरं उव्वहित्ता सरीसवेसु उववजिहिति, तत्थ णं कालं किच्चा दोच्चाए पुढवीए उक्कोसेणं तिन्नि सागरोवमाइं, से णं ततो अणंतरं उव्वहित्ता पक्खीसु उव्वजिहिति, तत्थ वि कालं किच्चा तच्चाए पुढवीए सत्त सागरोवमाइं, से णं ततो तयाणन्तरं सीहेसु य चोत्थीए०, उरगो पंचमी०, इत्थि छट्ठी, मणुआ० अहे सत्तमाण, ततो अणंतरं उवाहिता- - ॥५७॥ - विपाक दुः-वि. सूत्र पहिला ॥६॥ अध्ययन मूल-सुपइटपुरे नगरे गोणत्ताए पञ्चायाहिति, से णं तत्थउमुक्क जाव चालभावे, अन्नयाकयाई पढ- मपाउसांसि गंगाए महाणईए खलीय मट्टियं खणमाणे तडिए पेल्लिए समाणे कालगए तत्थेव सुपइटेपुरे नगरे सेहिकुलंसि पुमत्ताए पञ्चायाइस्संति, से णं तत्थ उमुक्क वालभावे जाव जोव्वणगमणुपत्ते तहारुवाण थेराणं अंतिए धम्मसोचा निसम्म मुंडेभवित्ता आगाराओ अणगारियं पव्वइस्सति, से गं तत्थ अणगारे भविस्सति ईरियासमिए जाव वंभयारी- अर्थ-सुप्रतिष्ठितपुर नगर के अन्दर गोपने (सांढपने) उत्पन्न होगा, वहां वह पाल्यावस्था से मुक्त होकर यावत् (युवा अवस्था) में प्राप्त होगा, किसी एक वख्त पहली वर्षाऋतु में गंगा नाम की महानदी के किनारे पर भेखड़ की मिट्टी खोदते हुवे वह भेखड़ उस पर गिरने से कालशरण होकर वहीं पर यानी सुप्रतिष्ठान नगर के अन्दर सेठ के कुल में पुत्रपने उत्पन्न होगा, वह वहां पर पालचेष्टा से मुक्त होकर यावत् जवान अवस्था में प्रवेश करेगा तय तथारूप मुनि (चाहिये वैसा साधुपन) के पास धर्म सुनेगा, सुनकर मुंडित हो गृहस्थाश्रम से अनगार रूप दीक्षा अङ्गीकार करेगा यानी गृहत्यागी साधु होगा वह ईयासामति पालता हुवा यावत् थालव्रत्मचारी होगा. टीकार्थ-'खलीणमट्टीय' ऊपर रही हुई-टूटे हुवे किनारे पर रही हुई मिट्टी. 'उमुक्क जाव' बालभाव से मुक्त होगया 48
विपाक
यावत् करण से "उमुक्कबालभाव विनयपरिणयमेत्ते जोव्वणगमणुपत्ते" एसा देखाजाता है. उसमें-विज्ञः यानी विशेष जानने वाला
कप्रत्यय एव अर्थ में आकर 'विज्ञक: ' शब्द बना; अर्थात् विज्ञक अवस्था में परिणत यानी बुद्धि आदि परिणाम से युक्त-विज्ञक परिणाम-
मात्र से सम्पन्न, इसे मुक्तवालभाव कहते हैं।
दुः-वि.
पहिला
अध्ययन
॥६१॥
पारमेश्वरी दीक्षा और मोक्ष का निर्णय
.१
मूल-से णं तत्थ बहूई वासाइं सामनपरियाई पाउणित्ता आलोइय पडिक्कंते समाहिपत्ते कालमासे
कालं किच्चा सोहम्मे कप्पे देवत्ताए उववजिहिति, सेणं ततो अणंतरं चयं चइत्ता महाविदेहे वासे जाइंकुलाइं भवति
अड्ढाइं जहा दढपइन्ने सा चेव वत्तव्वया कलाओ जाव सिज्झिहिति एवं खलु जम्बू ! समणेणं भगवया महा-
वीरेणं जाव संपत्तेणं दुहविवागा णं पढमस्स अज्झयणस्स अयमढे पन्नत्ते तिबेमि (७) ॥१॥
-
॥६१॥
विपाक
दुः-वि.
पहिला
अध्ययन
॥६४॥
वीरधर्मो विजयते.
॥६४॥
इः-वि.
दूसरा
अध्ययन
दूसरा अध्ययन
(उज्झितक)
विपाक
॥६५॥
जइ णं भंते! समणे णं जाव संपत्ते णं दुहविवागाणं पढमस्स अज्झयणस्स अयमढे पन्नत्ते,
दोच्चस्स.णं भंते ! अज्झयणस्स दुहविवागाणं समणे णं जाव संपत्ते णं के अटे पन्नत्ते ?, ततेणं से सुहम्मे अण-
गारे जम्बू अणगारं एवं वयासी-एवं खल्लु जंवू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं वाणियगामे नामं नयरे होत्था,
रिद्धिस्थिमियसमिद्धे, तस्स णं वाणियगामस्स उत्तरपुरच्छिमे दिसीभाए दूईपलासे नामं उज्जाणे होत्या, तत्थ
णं दूईपलासे सुहम्मस्स जक्खस्स जक्खाययणे होत्था, तत्थ णं वाणियगामे मित्ते नामं राया होत्था, वण्णओ,
तस्स णं मित्तस्सरन्नो सिरीनामं देवी होत्था, वण्णओ, तत्थ णं-
अर्थ-"जम्बु स्वामी ने स्वधर्म स्वामी गणधर अपने पूज्य गुरुदेव को पूछा" हे भगवन् ! जो श्रमण यावत्
(भगवन्तमहावीर ने) मोक्ष को प्राप्त हुवे ने दुःखविपाक के प्रथम अध्ययन का यह अर्थ (जो आप पूज्य श्री ने अपर
॥६५॥
विपाक दुः-वि. दूसरा सूत्र अध्ययन ॥७२॥ जानने योग्य है. 'छटुं छद्रेण जहा पनत्तीए' जिस तरह भगवती सूत्र में है वैसा यहाँ कहना "छठं छद्रेणं अणिक्वित्तेणं तवोकम्मेण अप्पाणं भावमाणे विहरति, तएणं से भगवं गोयमे छटपक्खमण पारणगंसी" अन्तर रहित छट २'के तपकर्म से आत्म भावना करते हुवे रहते हैं, तदा वे भगवान् गौतम छट क्षमण के (बेले के) पारणे के दिन "पढम" यहां पर यावत् करण से ऐसा देखा जाता "पढमाए पोरसीए सज्झायं करेति बीयाए पोरसीए झाणं झियाति तइयाए पोरसाए अतुरियमचवलममंगते मुहपोत्तियं पाडलेहेइ भाय- णवत्थाई पहिलेहेइ भायणाणि पम्मञ्जति भायणाणि उग्गाहेइ जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणामेव उवागच्छति २ त्ता समणं भगवं महावीर वंदइ नमसइ २ ता एवं वयासि-इच्छामि गं भंते ! तुज्झेहिं अव्मणुण्णाए समाणे छहक्खमणपारणगसि वाणियगामे णगरे उच्चनीयमज्झिमकुलाई घरसमुदाणस्स भिक्खायरियाए अडित्तए-अहासुहं देवाणुप्पिय मापडिबंध-तए णं भगवं गोयमे समणे णं ३ अब्भणुनाते समाणे समणस्स ३ अंतियाओ पडिनिक्खमति अतुरियमचवलमसमंते जुगतरप्पलोयणाए दिहीएपुरओरियं सोहेमाणे पहिली पहर में सज्झाय ( स्वाध्याय ) करते थे, दूसरी पहर में ध्यान ( अर्थ चितन ) करते थे, तीसरी पहर में काया और मन की चपलता रहित तथा भ्रान्ति रहित मुहपत्ति का पडिलेहण करते है, बाद भाजन-वस्त्र ( झोली-पड़ला ) पहिलेहण करते हैं, भोजन के भाजन को (पात्रों को) प्रमार्जन (पूंजन) करते है, भाजन को लेकर जहां पर श्रमण भगवन्त महावीर देव है वहां पर आते हैं, आकर के श्रमण भगवन्त महावीरदेव को वन्दन-नमस्कार करते हैं, करके इस प्रकार बोले-हे भगवन्त ! आपकी आज्ञा प्राप्त कर के छ?- ।।७२।।
क्खमणतप पारणे के लिये वाणिज गाम नगर में ऊँच-नीच और मध्यम * घरों में भिक्षा के वास्ते भ्रमण करना मैं इच्छता हूँ? भगवन्त ने
फरमाया-हे देवानुप्रिय! जैसा सुख हो वैसा करो ! स्खलना मत करो, तब भगवान् गौतम श्रमण भगवन्त महावीर देव की आज्ञा प्राप्त
कर इन के पास से रवाना होते हैं, काया-मन की चपलता रहित और अभ्रान्त दृष्टि से धूसर प्रमाण जमीन आगे आगे शोधते चलते हैं ।
दुः-वि.
दूसरा
अध्ययन
विपाक
॥७३॥
गणधर महाराज एक अद्भुत करुणाजनक दृश्य देखते हैं
-
मूल-उच्चनीय अडमाणे जेणेव रायमग्गे तेणेव ओगाढे तत्थ णं बहवे हत्थी पासइ सन्नद्धबद्धवम्मियगु-
डियउप्पीलियकच्छे उद्दामियघंटे णाणामणिरयणविविहगेविज उत्तरकंचुइज्जे पडिकप्पिए झयपडागवर पंचामेल
आरूढ हत्थारोहे गहिया उहप्पहरणे अन्ने य तत्थ बहवे आसे पासति-सन्नद्ध बद्ध-वम्मियगुडिएआविद्ध
गुडिओसारियपक्खरे उत्तरकंचुइयओचूलमुहचंडाधर चामरथासकपरिमंडियकडिए आरूढ आसारोहे गहिया
x उच्च कर्मवाला 'उच्च' मध्यमकर्म वाला 'मध्यम' और नीच कर्म वाला 'नीच' कुल का समझना-यहां पर कर्म शब्द का अर्थ
कर्तव्य जानना. जाति के साथ ऊँच-नीचादिका सम्बंध शास्त्र सम्मत नहीं है.
॥७३॥
-
विपाक
सूत्र
दुः-वि.
दूसरा
अध्ययन
॥७६॥
'सन्नद्धवद्धवम्मियगुडिए' ऊपर लिखे अनुसार व्याख्या जानना. 'आविद्धगुडे ओसारियपक्खरे' आविद्वा-डाले हुवे थे गुडा
( झुल) नाम के उपगरण जिन्हो के, ये उपगरण यद्यपि हाथियो के अङ्गरक्षा करने में रूढ हैं. तथापि अमुक देशोंकी अपेक्षा घोड़ों के
भी संभवते है. अवसारिता पक्वरा-धारण किये हैं पाखर ( शरीर के रक्षक अमुक उपगरण ) जिन्होने ऐसे वे घोड़े, उत्तरकंचुइय-
ओचूलमुह चंडाधर चामर थासगयरियमडियकाडये उत्तर कञ्चुका-शरीर के रक्षक विषेश उपगरण (पलाण) कसे हुवे थे जिन्होंके.
चोकड़ों से मुख प्रचण्डता को धारण करते थे अर्थात् होठ भयङ्कर दिखाई देते थे जिन्हों के; तथा चामरों से और काचखण्डों से
शोभित थे कटिभाग जिनके ऐसे वे अश्व थे ।
'उप्पिलियसरासणपट्टीए । उत्पिडिता-की है (लगाई गई है) प्रत्यञ्चा यानी डोरियां जिन पर एसे, शरासन पट्टिका-धनुप अथवा
भुजा पट्टिकाएँ धारण की हैं जिन्होंने ऐसे वे सुभट पुरुप थे. 'पिणिद्धगोवज्ज ' पिनद्धं- धारण किये हैं कण्ठाभूपण जिन्होंने. 'विमल-
वरवद्ध चिंधपट्टे' निर्मल उत्तम वांधे हैं चिन्हपट ( कमरपट्टे ) जिन्होने ऐसे वे पुरुप थे.
मूल-अवउडगवंधणं उक्कित्तकन्ननासं नेहतुप्पियगत्तं वज्झकक्खडियजुयनियत्थं कंठेगुणरत्त मल्लदाम
चुण्णगुंडियगत्तं चुण्णयं वज्झपाणपीयं तिलंतिलं चेव छिज्जमाणं काकणी मंसाइं खावियं तं पावं खक्खरगस एहिं
हम्ममाणं अणेगनरनारी संपरिवुडं चच्चरे चच्चरे खंडपडहराणं उग्घोसिज्जमाणं, इमं च णं एयारूवं उग्घोसणं
-
॥७६॥
विपाक दुः-वि. सूत्र दूसरा अध्ययन ॥७७॥ पडिसुणेति-नो खलु देवाणुप्पिया! उज्झियगस्स दारगस्स केइ राया वा रायपुत्तो वाअवरज्झइ अप्पणो से सयाई कम्माई अवरज्झन्ति (सू०९) अर्थ-अत्यन्त नीचा मुख रख कर पीठ के भाग से बंधा हुवा था, कान और नाक जिसके कटे हुवे थे, तैल लगाने से या पसीने से चीकना था शरीर जिसका, मारने योग्य होने से उसके दोनों हाथ कमर में बंधे हुवे थे, उसके कण्ठ में डोरे के जैसी लाल पुष्पों (कणेर के पुष्पों) की माला पहनाई गई थी, गेरु के चूर्ण से शरीर रंगा हुवा था जिसका ऐसा वह पुरुष, उसका हृदय चूर २ हो रहा था, बाह्यप्राण यानी श्वासोच्छास जिसको प्रिय थे, अर्थात् मरने में नाखुश था, तिल २ जितने काटे हुवे उसके शरीर के मांस के टुकड़े उसको खिलाये जाते थे, वह अत्यन्त पापी था, सैकड़ों चावुक उसके लगाये जारहे थे, अनेक नर-नारियाँ जिसके चोतर्फ घिरी हुई थीं, चोहट्टे २ यानी प्रत्येक मार्ग पर फूटे हुवे पटह (ढोल) से उद्घोषणा ( ढंढेरा) हो रही थी, यह इस प्रकार की आघोषणा उन्होंने (गौतमस्वामीने) सुनी-अहो देवानुप्रियाः! निश्चय करके इस उज्झितक लड़के का किसी राजा या राजपुत्र ने बिगाड़ किया नहीं; परन्तु अपने किये हुवे कर्मोंका ही बिगाड़ है यानी दोष है । टीकार्थ-'अवउडग बंधणं' अवकोटकेन बंधनं-पीठ अधोनयन से बंधित है जिसकी उसको देखा. 'उक्खितकन्ननासं' उखाड़ दिये हैं कान और नाक जिसके. 'नेहतुप्पियगतं' स्नेहस्नेहितशरीरं-चिकनाससे चिकना हुवा है शरीर जिसका. 'वज्झकक्खडियजुय ॥७७॥ A
विपाक
SEXNAXXNEXAX
भगवन्त से करुणाजनक दृश्य की पृच्छा
उज्झिकत का पूर्व भव
दुः-वि.
दूसरा
अध्ययन
॥८०॥
मूल-एवं खल्लु अहं भंते ! तुझेहिं अब्भणुनाए समाणे वाणियगामं जाव तहेव वेदेति, से णं भंते.!
पुरिसे पुत्वभवे के आसी ? जाव पञ्चणुभवमाणे विहरति ? एवं खल्ल गोयमा ! तणं कालेणं तेणं समएणं
इहेव जंबुद्दीवे २ भारहे वासे हथिणाउरे नामं नगरे होत्था, रिद्ध०, तत्थणं हत्थिणाउरे नगरे सुनंदे नामं राया
होत्था महयाहि०, तत्थ णं हत्थिणाउरे णगरे बहुमज्झदेसभाए एत्थ णं महं एगे गोमंडवए होत्था, अणे-
गखंभसयसन्निविटे पासाईए ४-
अर्थ-निश्चय करके हे भगवन्त ! मैं आपकी आज्ञा प्राप्त कर वाणिजगाम नगर में गया, यावत् तथाविध
(उपरोक्त अनुसार एक आदमी नरक जैसी) वेदना वेदता है, तो हे भदन्त ! वह पुरुष पूर्व भव में कौन था ? कि
॥८॥
विपाक दुः-वि. दूसरा अध्ययन सूत्र ॥८१॥ जो इस प्रकार की वेदना को यावत् अनुभवता हुआ रहता है ? भगवान महावीर स्वामी ने उत्तर दिया-निश्चय करके इस प्रकार हे गौतम ! उस काल उस समय के अन्दर इस ही जम्बूद्वीप नाम के द्वीप में भरत क्षेत्रान्तरगत हस्तिनापुर नामका नगर था, ऋद्धिवाला, भयमुक्त और समृद्धिवाला था; उस हस्तिनापुर नगर का सुनन्द नामका राजा था, महाहिमवन्त पर्वत के समान मुख्य था, उस हस्तिनापुर नगर के अतिशय मध्य प्रदेश में इस स्थान में एक विशाल गौमंडप (गायों के रहने का सुन्दर स्थान) था, सैंकड़ों खंभों से युक्त था, हृदय आलादक ४ (दर्शनीय-मनोहर-सुन्दर) था । टीकार्थ-'रिद्धि' यानी "रिद्धिस्थिमियसमिद्धे' इत्यादि जानना. यहां पर ऋद्ध-मकानों से वृद्धि को प्राप्त ऐसा, स्तिमित भय- वर्जित ऐसा, समृद्ध-धन, जनादियुक्त; ऐसा नगर था 'महयाहि' इससे "महयाहिमवंतमलयमदरमहिंदसारे" महाहिमवन्त, मलय; मंदर (मेरु), महिन्द्रपर्वत सदृश सारभूत, ऐसा नर नाथ था. 'पासा' इससे यहां पर-"पासाईए दरिसणिजे अमिरूवे पडिरूवे" प्रासा- दीयः- मनके प्रसन्नता का हेतुभूत, दर्शनीयः-देखने योग्य यानी जिसको देखने से नेत्र थकें नहीं, अभिरूपः-अभिमतरूप यानी सुन्दररूप, प्रतिरूपः- देखने वाले को प्रिय मालूम होता था, ऐसा गोमण्डप था. मूल-तत्थ णं बहवे णगरगोरुवाणं सणाहा य अणाहा य णगरगाविओ य णगरवसभा य णगरबलिवद्दा ॥८१॥ -------- विपाक दुः-वि. दूसरा अध्ययन ॥८४॥ सणाहाण य जाव वसभाण य ऊहेहि य थणेहि य वसणेहि य छप्पाहि य ककुहेहि य वहेहि य कन्नेहि य अच्छि- हि य नासाहि य जिब्भाहि य उठेहि य कंबलेहि य सोल्लेहि य तलिएहि य भजिएहि य परिसुक्केहि य लावणेहि य सुरं च महुं च मेरगं च जातिं च सीधुं च पसण्णं च आसाएमाणीओ विसाएमाणीओ परिभुंजेमाणीओ परि- भाएमाणीओ दोहलं विणयंति; तं जइ णं अहमवि बहूणं नगर जाव विणिज्जामित्तिकटु- अर्थ-धन्य है उन माताओं को ४ (पुण्यशालिनी हैं वे माताएँ-कृतार्थ हैं वे माताएँ-शुभ लक्षण वाली हैं। वे माताएँ) जिनके जन्म और जीवन का अच्छा फल प्राप्त हुवा है कि जिससे वे माताएँ नगर के बहुत से पशु सनाथ यावत् सांड हैं उनके उधस यानी स्तनके चींट, स्तन, अण्डकोस, पुच्छ, खंधे के शिखर (स्थूभी), खंधे, कान, नेत्र, नासिकाएँ, जीभ, होठ, कम्बल (गलेके लकटता हुवा चमड़ा ) इत्यादि शरीर के अवयव पके हुवे, तले हुवे, भुंजे हुवे, स्वयं सूखे हुवे हों उनमें नमक का संस्कार किया हो यानी मसाला डाला हो, उन सबके साथ मदिरा-सहत-जाइके पुष्प समान, धावड़ी वृक्ष से बनी हुई, द्राक्षासव वगैरा मदिरा; इन सब पदार्थों को आस्वादन करती हुई, विशषे स्वाद लेती हुई, स्वयं खाती हुई, दूसरे को देती हुई अपना दोहला पूर्ण करती है- इस तरह मैं भी नगर के बहुत पशुओं के यावत् मांसादि खाकर अपना दोहला पूर्ण करूं तो धन्य होउँ- - ८४॥
दु:-चि.
विपाक
सूत्र
अध्ययन
॥८५॥
टीकार्थ-'धन्नाओ णं ताओ अम्मयाओ' धन्य हो उन माताओं को यावत् करण से ऐसा जाना जाता है-"पुन्नाओ णं ताओ
अम्मयाओ कयत्थाओ णं ताओ अम्मयाओ कयलक्खणाओणं ताओ, तासि अम्मयाणं सुलद्धे जन्मजीविय फले" मूलके अर्थ माफिक स्पष्ट
समझ लेना-'ऊहेहि य' सॉड के स्तनो के ऊपरी भाग यानी बीटों से. 'थणेहि य' स्तनों से 'वसणेहि य' वृषणैः-अण्डकोपों
से. 'छेप्पाहि य' पुच्छैः-पूछे से. 'ककुहेहि य' ककुदैः- खंधे के शिखरों से. 'वहेहि य' वहैः-खंधों से. कान बगैरा स्पष्ट हैं-
'कंवलेहि य' सास्नाभिः-गरदन की लटकती हुई चमड़ियों से. 'सोल्लिएहि य’ पक्वैः-पके हुवे से. 'तलिएहि य' तले हुवे घी या तेल से
'भजिएहि य' भ्रष्टैः-भुंजे हुवे या सेके हुवे से. 'परिसुक्केहि य' अपने आप सूखे हुवे से. 'लावणेहि य' नमक मिलाये हुवे यानी मसाले
डाले हुवे से. सुरा-चावल, धावडे की छाल वगैरा से बनी हुई मदिरा. मधु-मक्खियो से उत्पन्न हुवा सहत. मेरकं-तालफलसे उत्पन्न
जातिः-जाई के फूल समान रंग वाला मदिरा. सिधु-गुड़ और धावड़ी से निष्पन्न. प्रसन्ना-दाख वगैरा द्रव्य से उत्पन्न, मनकी प्रसन्नता का
हेतु ऐसा मदिरा (शराव) मिले हुवे से 'आसाएमाणिओ' थोड़ा खाया जाय और बहुत फेंका जाय ऐसे सेलड़ी (सांठा) के टुकड़े,
'विसाएमाणिओ' विशेष खाया जाय और थोडा फेका जाय ऐसी खर्जुरादि ( पिंडखजूर वगैरा ) 'परिभुंजमाणिओ' सब खाया जाय
अल्प भी त्यागा नही जाय ऐसी हरी दाखें बगैरा आप खाती हुई 'परिभाएमाणिओ' दूसरे को देती हुई ऐसी माताएँ धन्य हो.
मूल-तंसि दोहलंलि अविणिज्जमाणंसि सुक्का भुक्खा निम्मंसा ओलुग्गा ओलुग्गसरीरा नित्तेया दीण-
विमणवयणा पंडुल्लइयमुहा ओमथियनयणवयणकमला जहोइयं पुप्फवत्थगंधमल्लालंकाराहारं अपरिभुजामाणी
॥८५॥
विपाक
दुः-वि.
दूसरा
अध्ययन
सूत्र
॥८८॥
टीकार्थ-'इमं चणं इत:-यहां से यानी इस वक्त. "भीमे कूडग्गाहे जेणेव उप्पला कूडग्गाही तेणेव उवागच्छति, उवागच्छित्ता
उप्पलं कूडग्गाहिणी ओहयमाण संकप्प” इत्यादि सूत्र पहिले कहे हुवे. सूत्र के अनुसार परिपूर्ण करके अध्ययन करना चाहिये पुस्तक की
सूचना मात्र से यह जानना-
मूल-ततेणं से भीमे कूडग्गाही उप्पलं भारियं एवं वयासी-मा णं तुमं देवाणुप्पिया ! ओहय झियाहि
अहन्नं तंतहा करिस्सामि जहा णं तव. दोहलस्स संपत्तीभविस्सति, ताहिं इटाहिं ५ जाव वग्गूहि समासासेति,
तते णं से भीमे कूडग्गाही अद्धरत्तकालसमयंसि एगे अबीए सन्नद्ध जाव पहरणे सयाओ गिहाओ निग्गच्छइ,
सयाओ गिहाओ निग्गच्छित्ता हत्थिणाउरे नगरे मज्झंमज्झेणं जेणेव गोमंडवे तेणेव उवागते-
अर्थ-तदनन्तर (यह सुनकर) भीम कूटग्राही ने उत्पला पत्निको इस कदर कहा-हे देवानुप्रिये ! तुम चिंतातुरा
मत होवो, मैं वह उस तरह करूँगा (वैसा उपाय करूंगा) जिस तरह तुमारे दोहलों की प्राप्ति पूर्ण हो; इस तरह इष्ट ५
(कान्त-प्रिय-मनोहर-अविस्मृत ) यावत् वाणी से उसको आश्वासन दिया; तत्पश्चात् वह भीमकूटग्राही अर्धरात्री
के काल समय एकाकी दूसरा नहीं (दूसरा साह्यक नहीं) जिरावखतर पहन कर यावत् शस्त्र हाथ में लेकर अपने
घर से निकलता है, अपने घर से निकल कर हस्तिनापुर के मध्य मध्य में जहां गोमण्डप है वहां पर प्राप्त होता है ।
-
॥८८॥
विपाक
सूत्र
दुः-वि.
दूसरा
अध्ययन
॥८९॥
ALAS
टीकार्थ-'ताहिं इटाहिं' इस से-पांच लक्षणों से ऐसा दिखाई देता है-"कंताहिं पियाहिं मणुन्नाहिं मणामाहि" ये सब पूर्ववत्
एकार्थी हैं. 'वग्गूर्हि' वाग्भिः वचनों से. 'एगे' एका-सहायता के अभाव से एकेला. 'अबीए' अद्वितीयः-दूसरा नही यानी धर्म रूप
सहायता के अभाव से. 'सनद्धबद्धवम्मियकवए । अर्थ पूर्ववत् जानना; यावत् करण से-उप्पीलियसरासणपट्टीए गहियाउहपहरणे "
अर्थ पूर्ववत्-यह अन्त में जानना ।
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8 पापी दोहला पूर्ण हुवा 8
00000000000000
मूल-बहूणं णगरगोरुवाणं जाव वसभाण य अप्पेगइयाणं ऊहे छिंदति जाव अप्पेगइयाणं कंबले छिंदति
अप्पेगइयाणं अण्णमण्णाणं अंगोवंगाणं वियंगेति २ त्ता जेणेव सए गिहे तेणेव उवागच्छति २ त्ता उपल्लाए कूट-
ग्गाहिणीए उवणेति, ततेणं सा उप्पला भारिया तेहिं बहूहिँ गोमंसेहि य सूलेहि य सुरं च आसाएमाणी तं दोहलं
विणेति, ततेणं सा उप्पल्ला कूडग्गाही संपुन्नदोहला संमाणियदोहला विणीयदोहला वोच्छिन्नदोहला संपन्नदोहला
HER
॥८९॥
विपाक
सूत्र
दुः-वि.
दूसरा
अध्ययन
॥ ९२॥
अर्थ-तदनन्तर वह पालक जन्मते ही बड़े २ शब्दों से 'घोप (अव्यक्त घोंघाट) करने लगा, विरस शब्द
करने लगा तथा चिल्लाने लगा; तब उस लड़के के चिल्लाह के शब्द सुने, सुन करके हस्तिनापुर नगर में नगर के बहुत
से जानवर यावत् सॉड भय भीत हुवे ४ (त्रास पाये-तृपातुर हुवे अत्यन्त भय पाये ) उद्वेग पाये, सर्व दिशा
और विदिशाओं में भगगये; इसके याद उस पुत्र के माता-पिता ने इस ही प्रकार का (गुणनिप्पन्न) नाम स्थापन
किया-हमारा यह लड़का जन्मते ही पड़े २ शब्दों से घोप, (चिचारिय) कठोर शब्द करने लगा और चिल्लाने लगा,
तय इस पुत्र का चिल्लाहट सुना, सुनकर हस्तिनापुर मे यहुत से नगर के जानवर यावत् भय भीत ४ हुवे; तमाम
दिशा-विदिशाओं मे पलायन करगये, इस वास्ते हमारे लडके का नाम 'गोत्रास' हो ।
.
टीकार्थ-'भीया' भीताः-डरे, इससे वहां पर "तत्था तसिया संजाय भया" त्रास पाये-तृपातुर हुवे-अतिशय भयभीत
हुवे ये सब भयकी अधिकता के कथन करने वाले एकार्थी विशेषण हैं. 'सव्वओ' तमाम दिशाओं में. 'समन्त' विदिशियों में
'विपलाइत्थ' विपलायितवन्ति-भागते हुवे अर्थात् भागे. ऐसे वे जानवर. 'अयमेयारूवं' यह इसही प्रकार कहेजाने वाला स्वरूप.
'महया २ चिच्ची महता २ चिच्चीति-जोर २ से चिल्लाता. 'आरसिय' आरसितं-अर्राटा करता; ऐसा वह लड़का. 'सोच' अवधार्य-
धारण करके यानी-सुन कर के वे जानवर घबरा जाते थे.
-
॥१२॥
विपाक
सूत्र
दुः-वि.
दूसरा
अध्ययन
॥९३॥
मूल-तते णं से गोत्तासे दारए उमुक्कबालभावे जाते यावि होत्था, तते णं से भीमे कूडग्गाहे अन्नया
कयाई कालधम्मुणा संजुते, तते णं से गोत्तासे दारए बहूणं मित्तणाइनियगसयणसंबंधिपरिजणेणं सद्धिं
संपरिबुडे रोयमाणे कंदमाणे विलवमाणे भीयस्स कूडग्गाहिस्स निहरणं करोति, निहरणं करित्ता बहूई लोइयम-
यकज्जाइं करेति, तते णं से सुनंदे राया गोत्तासं दारयं अन्नया कयाइ सयमेव कूडग्गाहित्ताए ठावेति.
अर्थ-तत्पश्चात् वह गोत्रास बालक पालभाव से (बचपन से) मुक्त हुवा यानी युवा अवस्था में प्रवेश किया,
तब वह भीमकूटग्राही किसी एक वख्त काल धर्म को प्राप्त हुवा यानी मरण शरण हुवा, तदा उस गोत्रास लड़के
ने मित्र-ज्ञातिजन-गौत्रीय-स्वजन, (मां, बाप, काका, भाई बगैरा) संबंधी (सुसराल वाले) परिजन (परिवार) के
साथ घिरे हुवे ने रुदन करते हुवे, आक्रन्द करते हुवे, विलाप करते हुवे भीमकुटग्राही की श्मसान सवारी निकाली,
तदनन्तर उस सुनन्द राजाने गोत्रास लड़के को किसी एक दिन आप खुदने कूटग्राही के स्थान पर स्थापन किया.
टीकार्थ-
XX
XX
.XX
XX
XX
॥९३॥
विपाक दुः-वि. टीकार्थ-'एयकम्मे ऐसे कर्म वाला, इस से यहां पर ऐसा जानना "एयप्पहाणे एयविजे एयसमायारे” इस का अर्थ मूलार्थ के माफिक समझना. 'अट्टदुहट्टोवगए' आतं वा आर्त ध्यान-चिन्ता उत्यादक विचार, दुर्घट-कठिनता से रोका जाय ऐसा, उपगतः- प्राप्त हुवा है जिसको ऐसा वह गोत्रास. दूसरा अध्ययन ॥९६॥ 38 30-XAZINE उझितक का जन्म-मात पिता का मरण लोगों का दुर्व्यवहार SEXXRESERVERNXNXN.SAXE मूल-तते णं सा विजयमित्तस्स सस्थवाहस्स सुभद्दा नाम भारिया जायनिन्दुया यावि होत्था, जाया जाया दारगा विणिहायमावजंति, तते णं से गोत्तासे कूडग्गाहे दोच्चाओ पुढवीओ अणंतरं उव्वट्टित्ता इहेव वाणियगामे नयरे विजयमित्तस्स सत्यवाहस्स सुभद्दाए भारियाए कुच्छिंसि पुत्तत्ताए उववन्ने, तते णं सा सुभद्दा सत्थवाही अण्णया कयाई नवण्हं मासाणं वहुपडिपुन्नाणं दारगं पयाया। || ९६॥
दुः-वि.
दूसरा
अध्ययन
विपाक
सूत्र
॥९७॥
अथ-पश्चात् उस विजयमित्र सार्थवाह के सुभद्रा नाम की भार्या जातनिन्दु (मृतक प्रसवती) थी, जो
जो लड़के उत्पन्न होते वे सब नाश होजाते थे; अर्थात् मरे हुवे बचों को जन्मती थी. उसके बाद इधर वह गोत्रास
कूटग्राही दूसरी नरक से तुरन्त निकल कर इस ही वाणिजग्राम नगर में विजयामित्र सार्थवाह की सुभद्रा पनि की
कूक्षि में अवतरा, तब उस सुभद्रा सार्थवाहिणी ने किसी एक दिन नव मास पूर्ण होने पर पुत्र को जन्म दिया।
टीकार्थ-'जायणिंदुया यावि जातनि? ना सन्तान उत्पन्न होते ही मर जाय जिसके ऐसी वह सुभद्रा है, वा और अपि ये
समर्थन के लिये हैं; इस ही को कहते हैं-जन्मते २ लड़के नष्ट हो जाते हैं यानी मरजाते हैं जिसके, ऐसा समझना.
मूल-तते णं सा सुभद्दा सत्थवाही तं दारगं जायमेत्तयं चेव एगते उक्कुरुडियाए उज्झावेइ उज्झावेत्ता
दोच्चंपि गिण्हावेइ गिण्हावेत्ता आणुपुब्वेणं सारक्खमाणी संगोवेमाणी संवड्ढेति, तते णं तस्स दारगस्स
अम्मापियरो ठिइवडियं चंदसूरदसणं च जागरियं महया इड्ढीसक्कारसमुदएणं करेंति, तते णं तस्स दारग-
स्स अम्मापियरो इक्कारसमे दिवसे निवत्ते सम्पत्ते वारसमे दिवसे इममेयारूवं गोणं गुणनिप्फन्नं नाम
धेनं करति, जम्हा णं अम्हं इमे दारए जायमित्तए चेव एगते उक्कुरुडियाए उज्झिते तम्हा णं होउ अम्हं
दारए उज्झियए न.मेणं । तते णं से उज्झियए दारए पंचधातीपरिग्गहीए तंजहा-खीरधाईए १ मजण
॥१७॥
षी खरतरगच्छीय शान मन्दिर, जयपुर
विपाक
दुः-वि.
दूसरा
अध्ययन
॥१०॥
मूल-तते णं से विजयमित्ते सत्थवाहे अन्नया कयाइं गणिमं च १ धरिमं च २ मज्जं च ३ परिच्छे-
जं च ४ चउविहं भंडगं गहाय लवणसमुदं पोयवहणेणं उवागते, तते णं से विजयमित्ते तत्थ लवणसमुद्दे
पोयविवत्तीए निवुड्डुभंडसारे अत्ताणे असरणे कालधम्मुणा संजुत्ते, तते णं तं विजयमित्तं सत्थवाहं जे जहा
वहवे ईसरतलवरमाडवियकोडुंबियइन्भसेडिसत्थवाहा लवणसमुद्दे पोयविवत्तीए छुळे निब्बुडभंडसारं काल-
धम्मुणा संजुत्तं सुणेति ते तहा हत्थनिक्खेवं च वाहिर भंडसारं च गहाय एगते अवक्कमंति.
अर्थ-तदनन्तर वह विजयमित्र सार्थवाह किसी एक वख्त १ गणिम [गिनकर येची जाय-सुपारी, नारियल
वगैराधरिम [तोलकर बेंची जाय-धी-शकर आदि] ३ मेय (माप से पेंची जाय-वस्त्र-फीता प्रभृति) ४ परिच्छेद
(परीक्षा से बेची जाय-रत्न-हीरा-पन्ना इत्यादि) वस्तुएँ यानी चार प्रकार के क्रयाणे लेकर लवण समुद्र में जहाज द्वारा
व्यापार करने गया, तब उस विजयमित्र सार्थवाह का लवण समुद्र में जहाज टूट जाने से सारभूत सर्व क्रयाणा डूय
गया, इससे वह रक्षण हीन और शरण रहित होकर काल धर्म से युक्त हुवा, यानी मरण को प्राप्त हुआ; तत्पश्चात्
विजय सार्थवाह के लिये बहुत से युवराज, कोतवाल, मंडपाधिपति, कौटुम्बिक, धनाढ्य सेठ, सार्थपति ने "लवण
समुद्र में जहाज ड्रयजाने से उसका सर्व यदिया क्रयाणा इयगया है और वह काल धर्म प्राप्त हुवा है" जैसे सुना
॥१०॥
विपाक
सूत्र
॥१०॥
वैसे ही उन्हों ने हस्तनिक्षेप ( अपने पास रक्खी हुई स्थापन यानी धरोड़) को और बहार रक्खे हुवे सारभूत
भाड (क्रयाणे ) को दबाकर एकान्त में चले गये, अर्थात् जिसके हाथ जो पड़ा सो लेगया ।
टीकार्थ--'कालघम्मुणा? मरणेन-मृत्यु से 'लवणसमुद्दपोयविवत्तियं लवणसमुद्र- मे जहाज की आपत्ति प्राप्त हुई है जिसको
ऐसा वह, उसको (मृत्युगत जानकर) 'निवुड्डभंडसारं ' डूबगया है सारभूत ऋयाणा जिसका, 'कालधम्मुणा संजुत्तर काल धर्मेणयुक्तं
कालधर्म से युक्त यानी मरगया, उनने जैसा था वैसा सुना, यह अपेक्षा योग्य है 'हत्थनिक्खेवं' हस्तनिक्षेपः-जिस द्रव्य को हाथ
में रक्खा यानी सोपा वह 'हस्त निक्षेप' कहा जाता है, 'बहिरभंडसारं च' हस्तनिक्षेप के सिवा सार वस्तुएँ लेकर एकान्त दूर चले
जाते हैं-विजयमित्रसार्थवाह की भार्या और उसके पुत्र को वे दर्शन देते हैं, अर्थात् उस धनको हरण करते हैं, ऐसा यावत् शब्द से जानना.
मूल-तते णं सा सुभद्दा सत्थवाही विजयमित्तं सत्थवाहं लवणसमुद्दे पोयविवत्तीए निब्बुड्ड काल-
धम्मुणा संजुत्तं सुणेति २ त्ता महया पइसोएणं अफ्फुण्णा समाणी परसुणियत्ताविव चंपगलता धसत्ति धर-
णीतलंसि सव्वंगेण सन्निवडिया, तते णं सा सुभद्दा सत्थवाही मुहत्तंतरेण आसत्था समाणी बहहि मित्त जाव
परिखुडा रोयमाणी कंदमाणी विलवमाणी विजयमितसत्थवाहस्स लोइयाई मयकिच्चाई करोति, तते णं सा
सुभद्दा 'सत्थवाही अन्नया कयाइं लवणसमुद्दोत्तरणं च लच्छिविणासं च पोयविगासं च पतिमरणं च अणु-
॥१०॥
विपाक
दुः-वि.
सूत्र
दूसरा
अध्ययन
||१०४॥
ग्राम नगर में त्रीकोण मार्ग पर यावत् सर्व मागाँ पर, जॅआस्थान पर, वेश्याओं के घरों पर और 'मदिरापान के
स्थानों पर (रखड़ता हुआ) सुखे २ बड़ा होने लगा। तदनन उस उज्झितक लड़के को पलात् हाथ पकड कर रोकने
वाला नहीं होने से, और वचन द्वारा भी निषेधक नहीं होने से वह स्वच्छन्द मतिवाला, अपनी इच्छानुसार
चलने वाला, मदिरा (शराय) के प्रसङ्गवाला तथा चौरी-जूंआ-वेश्या-अन्य स्त्रियों का प्रसङ्गी हुवा. उसके बाद वह
उज्झितक किसी एक वख्त कामध्वजा गणिका के साथ संलग्न हुवा यानी उसका सङ्गी हुवा, कामध्वजा गणिकाके
साथ विस्तृत और उदार मनुष्यो के भोगने योग्य भोग भोगता हुआ रहता है।
टीकार्थ-'अणोहट्टए' जो बलसे हाथ वगैरा खींचकर प्रवर्तमान् को निवारण करे वह अपघट्टक, उसका अभाव सो अनयघ-
दृक कहा जाता है. आणिवारिए । रोकने वाले से रहित था; इसही लिये 'सच्छन्दमइ स्वच्छन्दा मतिः-आपमते चलनेवाला अथवा
स्वतन्त्रमति है जिसकी वह स्वच्छन्दमति समझना. इस ही कारण 'सइरप्पयारे' स्वैर प्रचारः-नहीं निवारण करने से अपने मत्यानु-
सार प्रचार (प्रवृत्ति ) है जिसकी वह, 'वेसदारपसंगी' वेश्यादारा प्रसङ्गी-गणिका और स्त्रीका संगी अथवा वेश्या रूप जो
स्त्रियाँ उनका प्रसङ्गी. 'भोगभोगाई' भोगभोगाः-भोजन सो भोग और परिभोग (वस्त्रादि) मोगता था; भोगा-भोगके योग्य शब्दादि
(शब्द-रूप-रस-गंध-स्पर्श) वे भोग और भोगभोगा:-रुचिकर शब्दादि-उज्झितक भोगता था
मूल-तते णं तस्स विजय मित्तस्स रन्नो अन्नया कयाइं सिरीए देवीए जोणिसूले पाउन्भूए यावि
॥१०४॥
विपाक
दुः-वि.
सूत्र
॥१०५॥
अध्ययन
होत्था, नो संचाएइ विजयमित्ते राया सिरीप देवीए सद्धिं उरालाई माणुस्सगाई भोगभोगाई भुंजमाणे विह-
रित्तए । तते णं से विजयमित्ते राया अन्नया कयाइं उज्झियदारयं कामज्झयाए गणियाए गिहाओ निच्छु-
भावेति २ त्ता कामज्झयं गणियं अभितरियं ठावेति २ ता कामज्झयाए गणियाए साई उरालाई भोगभो-
गाई भुंजमाणे विहरति-
अर्थ-तत्पश्चात् विजयमित्र राजा की श्रीदेवी रानी के एकदा किसी वस्त योनिशूल [ गुप्तेन्द्री में शूलका
रोग] उत्पन्न होगया था, विजयमित्र राजा श्रीदेवी के साथ प्रधान मनुष्य योग्य भोग-परिभोग भोगने को अस-
मर्थ होता हुआ रहता है, तब उस विजयमित्र राजाने किसी एक दिन उज्झितक लड़के को कामध्वजा गणिका के
घरसे निकलवा दिया, निकलवाकर कामध्वजा वेश्या को अपने आभ्यन्तर में (रणवास में) रखली, रखकर उस
कामध्वजा पात्र के साथ उदार भोग-परिभोग भोगता हुआ रहता है।
टीकार्थ-
मूल-तते णं से उज्झियए दारए कामज्झयाए गणियाए गिहाओ निच्छुभेमाणे कामज्झयाए गणि-
याए मुच्छिए गिद्धे गाढिए अज्झोववन्ने अन्नत्थ कत्थइ सुइं च रइं च धिई अविंदमाणे तच्चित्ते तम्मणे तल्ले-
XX
XX
XX
XX
xx
॥१०५॥
विपाक
"
:-वि.
दूसरा
अध्ययन
॥१०८॥
की भावना में भावित (बसा हुआ) है, ऐसा वह उज्झितक लड़का रहता है-'अंतराणि कामध्वजा गणिका का बहुत अन्तरकाल
यानी राजा के आनेके अन्तर कालकी 'छिद्दाणि छिद्राणि-राजपरिवार की अल्पता की. 'विवराणि' अन्य मनुष्यों के अभाव की
'पडिजागरमाणे ' गवेपणा करता हुआ वह उज्झितक निवास करता था ।
SARAS
SAARE
ॐॐॐॐ
राजा के प्रकोप से उज्झितक पर घोर आफत
मूल-इमं च णं मित्ते राया पहाते जाव पायच्छित्ते सव्वालंकारविभूसिए मणुस्सवायुरापरिक्खित्ते जेणेव
कामज्झयाए गिहे तेणेव उवागच्छति २ त्ता तत्थ णं उज्झियए दारए कामज्झयाए गणियाए सद्धिं उरालाई
भोगभोगाई जाव विहरमाणं पासति २ ता आसुरुत्ते तिवलियभिउर्डि निडाले साहटु उज्झिययं दारयं पुरिसेहि
गिण्हावेइ २ त्ता अटिमुडिजाणुकोप्परपहारसंभग्गमाहितगत्तं करोति करेत्ता अवउडगबंधणं करेति २त्ता एएणं
विहाणेणं वझं आणावेति । एवं खल्लु गोयमा ! उज्झियते दारए पुरापोराणाणं कम्माणं जाव पच्चणुब्भवमाणे
॥१०८॥
विपाक दुः सूत्र ॥१०९।। विहरति (सू० १३) अर्थ-इतने में मित्रराजा स्नान कर प्रायश्चित (दुष्टस्वमादि हरण करने के लिये अमुक विधान) कर, सर्व अलंकारों से भूषित होकर, चारों ओर मनुष्यों से व्याप्त होकर जहां पर कामध्वजा गणिका का घर है वहां पर आते हैं, आकर वहां पर उज्झितक लड़के को कामध्वजा गणिका के साथ उदार भोगों को भोगता हुआ यावत् विचरण करता हुआ देखते हैं, देखकर तत्काल ऋद्धित हुवे कपाल में त्रिवल्ली (तीन सल) वाली भृकुटी चड़ाकर उज्झितक लड़के को अपने पुरुषों से पकड़ाया, पकड़ाकर यष्टि (लकड़ी) मुष्टि, घुटने और कोणियों के प्रहार से शरीर तुड़वा दिया है ( हड्डियां तुड़वा दी हैं ) अथवा दही के माफ़िक मंथन करवा दिया है, कराकर उल्टी मुस्कियों से बंधाया, बंधाकर इसही तरह उसको मारने की आज्ञा करी. इस प्रकार निश्चय करके हे गौतम ! उज्झितक लड़का पूर्व में किये हुवे पुराने कर्मों का यावत् प्रत्यक्ष अनुभव करता हुआ रहता है । टीकार्थ-'इमं चणं' इतश्चेत्यर्थः-इतने में-' हाए' स्नानं कृत्वा-स्नान करके यावत् करण से ऐसा जानना- 'कयवलिकम्मे कृत्तबलिकर्म-देवताओं को बलिविधान (पूजाका विधान ) किया. 'कयकोउय मंगलपायच्छित्ते' कृतकौतुकानि च मंगल-प्रायश्चि- तानि-किया है कौतुक मंगल और प्रायश्चित्त; अर्थात् कौतुक (स्याही-सपेत कलम आदि) मंगल (सपेत सरसों-दहि-चावल बगैरा) प्रायश्चित्त (दुष्ट स्वप्नादि के नाश के हेतु अवश्य करने योग्य विधान ) इन तीन कामों को करके वह राजा गया. 'माणुस्सवग्गुरापरि- ॥१०॥ -
विपाक
सूत्र
दुः-वि.
दूसरा
अध्ययन
॥११२॥
टीकार्थ-वानरपेल्लए' वानरडिम्भान्-चन्दर के पचों को 'तं एयकम्मे। तदेव कर्मा-उससे इस कर्मवाला; यहां पर यह
विपेश जानना "एयप्पहाणे एयाविजे एयसमुदाचारे” अर्थ मूलार्थ के माफिक करना ।
मूल-तते णं तं दारयं अम्मापियरो जायमित्तकं वद्धेहिंति नपुंसगकम्मं सिक्खावेहिति, तते णं तस्स
दारगस्स अम्मापियरो णिवत्त वारसाहस्स इमं एयारूवं णामधेनं करेंति तं०-होऊ णं पियसेणे णामं णपुं-
सए, तते णं से पियसेणे णपुंसए उमुक्कवालभावे जोवणगमणुप्पत्ते विण्णयपरियणमिते रूवेण य जोब्बणेणग
लावणेण य उक्किटे उक्केिढे सरीरे भविस्तइ ।
अर्थ-तदन्तर उस लड़के को मात पिता जन्मते ही वर्द्धितक (नपुंसक) करेंगे, नपुंसक का कर्म शिखावें गे;
पश्चात् उस लड़के के मात पिता बारह दिन व्यतीत होने पर इस कदर नाम स्थापन करंगे, तद्यथा-प्रियसेन नपुं-
सक (हमारे लड़के का) नाम हो; तब वह प्रियसेन, नपुंसक यचपन से मुक्त होकर युवा अवस्था को पाकर विज्ञान
परिणाम (कलाएँ) उपलब्ध करेगा, रूप-यौवन-लावण्य (कान्ति) से उत्कृष्ट २ शरीर वाला (अत्यन्त खूबसूरत) होगा.
टीकार्थ-बद्धेहिति' वार्द्धितकं करिष्यतः नपुंसक बनावे गा. 'उक्किटे' उत्कर्पवान्-उच्चतावाला, इससे क्या कहा गया ?
'उक्किसरीरे' उत्कृष्ट शरीरवाला।
॥११२॥
दुः-वि.
दूसरा
अध्ययन
विपाक
मूल-तते णं से पियसेणे णपुंसए इंदपुरे णगरे बहवे राइसर जाव पभिइओ बहुहि य विजापओगे-
हि य मंतचुन्नेहि य हियउड्डावणाहि य निण्हवणेहि य पण्हवणेहि य वसीकरणेहि य आभिओगिएहि य
अभिओगित्ता उरालाई माणुस्सगाई भोगभोगाई भुंजमाणे विहरिस्सति, तते णं से पियसेणे णपुंसए एयकमे०
सुबहुं पावकम्मं समजिणित्ता एक्कवीसं वाससयं परमाउयं पालइत्ता कालमासे कालंकिच्चा इमिसे रयणप्प-
भाए पुढवीए णेरइयत्ताए उववजिहिति, ततो सिरिसिवेसु सुसुमारे (संसारो) तहेव जहा पढमो० जाव पुढवी०
से गंत्तओ अणंतरं उव्वाहित्ता-
अर्थ-तत्पश्चात् वह प्रियसेन नपुंसक इन्द्रपुर नगर में बहुत से राजा यावत् सर्व जनों के विद्या प्रयोगों से
और मन्त्र तथा चूर्ण के योग से हृदय की शुन्यता करने वाले, अदृश्यता करने वाले, प्रसन्न करने वाले, वशीकरण
करने वाले, पराधीन करने वाले प्रयोगों से पराश्रित करके उदार मनुष्य संम्बधी भोग-परिभोगों को भोगता हुवा
विचरेगा, तदा वह प्रियसेन नपुंसक ऐसे कर्म वाला (कर्म करने में तत्पर-विज्ञान वाला-आचार वाला) अतिशय
पाप कर्म उपार्जन करके एकसो-इकवीस वर्ष की उत्कृष्ट आयुष्य पालकर-कालमास में काल करके इस रत्नप्रभा नाम
की पृथ्वी के अन्दर प्रथम नारकी में नेरइया-रूप उत्पन्न होगा; उसके बाद सरिसृप (नौलिया) की योनी में
सूत्र
॥११३॥
॥११६॥
विपाक
सूत्र
दु:-वि..
दूसरा
अध्ययन
॥११६॥
अध्ययन का विवरण समाप्त हुवा.
उपसंहार-इस दूसरे अध्ययन में उज्झितक की वार्तमानिक स्थिति दयापात्र है, वैश्या (गणिका-पात्र-रंडी)
गमन से किस तरह का भयंकर फल प्राप्त होता है वह इस दुर्व्यसनी की आचरणा से दीपक के समान स्पष्ट मालूम
होता है; गोत्रासक के पूर्वभव में इसने निरपराधी पशुओं की ऐसी कातिल हिंसा की कि बाँचने से ही त्रास छूटता है;
इसही से इसकी इस भवमें अवाँच्छनीय विडंबना मात्र ही नहीं हुई, किन्तु शूली पर चढाकर प्राण लिये गये,
भाविकाल में नरकादि के असह्य दुःखों को भोगेगा, अन्त में मोक्षपद प्राप्त करेगा, ऐसा भगवन्त महावीर देवने
व्यक्त किया है-महानुभावों ! इस उज्झितक के जुल्मी कर्तव्यों पर निगाह पहुँचा कर पापों से बचिये गा और इस
के अन्तिम भव के सदृश्य अनुसरणीय करणी कर परम शान्ति को प्राप्त करने का प्रयत्न कीजिये गा।
दुःख विपाक का दूसरा अध्ययन मूल-अर्थ और
टीकार्थ सहित सम्पूर्ण हुवा।
॥११३॥
विपाक
दुः-वि.
तीसरा अध्ययन *
(अभग्नसेन)
तीसरा
॥११७॥
अध्ययन
33
मूल-तच्चस्स उक्लेवो-एवं खल्लु जम्बू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं पुरिमताले णामं णगरे होत्था,
रिद्ध०, तस्स णं पुरिमतालस्स णगरस्स उत्तरपुरच्छिमे दिसीभाए एत्थ णं अमोहदसणे उज्जाणे तत्थणं अमो-
हदंसिस्स जक्खस्स जक्खाययणे होत्था, तत्थ णं पुरिमताले महब्बले नामं राया होत्था, तत्थ णं पुरिमता-
लस्स णगरस्त उत्तरपुरच्छिसे दिसीभाए देसप्पंते अडवी संठिया ।
अर्थ-तीसरे अध्ययन का उत्क्षेप (प्रस्तावना) करना-निश्चय करके इस प्रकार हे जम्बू ! उस काल उस
समय में पुरिमताल नामक नगर था, ऋद्धिवाला, निर्भय और समृद्धिवाला था; उस पुरिमताल नगर के उत्तर पूर्व
के दिशिभाग में ( इशान कोण में) यहां पर अमोघदर्शन उद्यान था, उस उद्यान में अमोघदर्शी यक्ष का यक्षा-
यतन था; उस पुरिमताल नगर में महावल नाम का राजा राज्य करता था; उस पुरिमताल नगर के इशान कोण में
॥११७॥
विपाक
दुः-वि.
सूत्र
तीसरा
॥१२॥
अध्ययन
.
था, शब्दवेधी (आवाज पर वांण फैकने वाला) था, अधर्मी था, खड्गलता में पहिले नम्बर का मल्ल था; वह वहां
पर शालाटवी चौरपल्ली में पांच सो चौरों पर आधिपत्य करता हुवा यावत् रहता था.
टीकार्थ-'विसमगिरिकंदरकोलंबसन्निविटा' पर्वत की कठिन गुफाओं के किनारे पर बसी हुई थी; कोलम्ब शब्द का अर्थ
झुकी हुई वृक्ष शाखा का अग्र भाग होता है; परन्तु यहां पर उपचार से कोलम्ब का अर्थ कन्दरा का अग्र भाग यानी किनारा कहा
है. 'वंसीकलंकपागारपरिक्खित्ता' वंशीकलङ्कप्राकारपरिक्षिप्ता-वांसों की झाड़ी से बीटी हुई थी. 'छिन्नसेलविसमप्पवायफरिहोवगूढा'
छिन्नः-जुदे टुकड़ों के अन्तर की अपेक्षा से जो पर्वत सम्बन्धी. विपमाः कठिन. प्रपाताः-खड्डे. उसकी परिखा-खाई. उससे
वेष्टिता-युक्ता थी. 'अभितरपाणीये' अन्दर पानी मिलता था. 'सुदुल्लभजलपेरंता' सुष्टुदुर्लभं जलं पर्यन्तेषु यस्याः सा-जिसके बाहर
कठिनता से जल प्राप्त होता था, ऐसी वह 'अणेग खंडी' अनेक भागने वाले पुरुषो के मार्गरूप गुप्तद्वार हैं जिसमे. 'विदियजणदि-
ननिग्गमप्पवेसा' जानने वाले लोग ही आना जाना करसकते हैं जिसमे, ऐसी वह पल्ली थी. 'सुवहुस्सवि ' सुवहोरपि-बहुत जन होने पर
भी. 'कुवियजणस्सवि' लूटा हुवा धन वापिस लेनेको आये हुवे क्रोधित लोग उस चारपल्ली को नाश नहीं कर सकते थे. 'अहम्मिए'
अधर्मिकः-अधर्म से चलता है सो. यावत् करण से 'अधम्मिढे ' अधर्मिष्टः-पाप कर्म करने के कारण अत्यन्तता से निकल गया है धर्म
जिसका. 'अधम्मक्खाई, अधर्माख्यायी-अधर्म वोलने का स्वभाव है जिसका. 'अधम्माणुए ' अधर्मानुज्ञः वा अधर्मानुगः-अधर्म
कर्तव्य का अनुमोदन हो जिसका अथवा अधर्म के पीछे चलनेवाला. 'अधम्मप्पलोई' अधर्मग्रलोकी-अधर्म ही देखने का स्वभाव
~
.
॥१२॥
विपाक
दु:-वि.
तीसरा
सूत्र
अध्ययन
॥१२॥
है जिसका. 'अधम्मपलजणे' अधर्मप्ररजन:-प्रायः अधर्म कर्मों में ही रंजित है वह-रकार-लकार का एकी भाव करके रकार के
स्थान पर लकार हुवा-'अधम्मसील समुदायारे' अधर्मशीलसमुदाचार:-अधर्म स्वभाव वाला अनुष्ठान है जिसका. 'अधम्मेणं चेच
वित्ति कप्पेमाणे विहरइ' अधर्मेणैव च वृत्तिं कल्पयन् विहरति-अधर्म से ही यानी पाप से ही अर्थात् सावद्य अनुष्ठान से ही जलाने
से-डाम लगाने से, अगता (लिङ्गछेदन) आदिकर्म से आजीविका करता हुवा रहता है. 'हणछिंदभिंद वियत्तए । हनछिन्धि-विना-
शार्थ दो टुकड़े करदो. भिन्दं विधेहि-भाले वगैरा से भेदन करो; इस प्रकार दूसरों को प्रेरित करता हुवा प्राणियों को जो नाश करावे
वह हन छिन्द भिन्द विकर्तक कहा जाता है। इनके अनुकरण रूप होने से हन इत्यादि शब्द संस्कृत में भी विरुद्ध नहीं है. 'लोहिय-
पाणी' लोहितपाणी-प्राणियो की हत्या करने से लोहि से लाल होगये हैं दोनों हाथ जिसके ऐसा वह चौरनायक. 'बहुणगरणिग्गयज-
से बहुत से नगरों में प्रसिद्ध है यश जिसका; इससे शूरवीरादि चारों विशेषण प्रकट हैं. 'आसिलहिपढममल्ले' असियष्टिः-खद्गलता.
उसमें प्रथमः-पहिला या प्रधान. मल्लः-योद्धा है, ऐसा वह 'आहेवच्चं' आधिपत्यं-आधिपतिकर्म; यावत् शब्द से "पोरेवचं सामित्तं
भट्टित्तं महत्तरगत्तं आणाइसरसेणावचं'' व्याख्या पूर्ववत् ।
मूल-तते णं से विजए चोरसेणावई बहूणं चोराण य पारदारियाण य गंठीभेयाण य संधिच्छेयाण
य खंडपट्टाण य अन्नसिं च बहूणं छिन्नभिन्न वाहिराहियाणं कुंडगे यावि होत्या, तते णं से विजए चोरसेणा-
वई पुरिमतालस्स णगरस्स उत्तरपुरच्छिमिलं जणवयं वहूहिं गामघातेहि य नगरघातेहि य गोग्गहणेहि य
॥१२॥
विपाक
दुः-वि.
सूत्र
• तीसरा
वचनों से तर्जना करता हुवा. 'तालेमाणे ताडयन्-चावुक बगैरा से मारता हुवा. 'णिच्छाणे' निस्थानं कुर्वन् । स्थान हीन करता
हुवा 'निद्धणे' निर्धनकुर्वन्-गाय, भैसादि पशुधन रहित करता हुवा, 'कप्पायं' कल्पायः कुर्वन् उचित लाभ करता हुवा यानी
प्रजा से द्रव्य लाभ करता हुवा. 'अहीण' इससे "अहीणपुन्नपंचेदियसरीरा लक्खणवंजणगुणोववए ” इसका अर्थ मूलार्थ के
माफिक जानना ।
॥१२४॥
अध्ययन
गणधर महाराज एक दयनीय दृश्य देखते हैं
मूल-तेणं कालेणं तेणं समएणं समणे भगवं महावीरे पुरिमतालनयरे समोसढे, परिसा निग्गया
रायानिग्गओं धम्मो कहिओ परिसा राया य पडिगओ, तेणं कालेणं तेणं समएणं समणस्स भगवओ महा-
वीरस्स जेट्टे अंतेवासी गोयमे जाव रायमग्गं समोगाढे, तत्थ णं वहवे हत्थी पासति बहवे आसे पुरिसे सन्नद्ध-
वद्धकवए तेसी णं पुरिसाणं मझगयं एगं पुरिसं पालति अवउडय जाव उग्घोसेजमाणं, तते णं पुरिसं राय-
पुरिसा पढमंमि चच्चरंसि निसियावेति, निसियावेत्ता-
॥१२४॥
विपाक
दुः-वि.
तीसरा
सूत्र
॥१२५॥
अध्ययन
अर्थ - उस काल उस समय में श्रमण भगवन्तमहावीर देव पुरिमताल नगर में (नगर के उद्यान में ) समय-
सरे, पर्षदा निकली, राजा भी निकले (प्रभु वंदन के लिये निकले ) प्रभु ने धर्मोपदेश दिया, पर्षदा और राजा
वापिस गये; उस काल उस समय के अन्दर श्रमण भगवान महावीर के बड़े शिष्य गौतम गणधर यावत् राज-
मार्ग में पधारे, वहां पर उनने बहुत से हाथी देखे, घोड़े देखे और जिराबख्तर पहने हुवे मनुष्य देखे, उन पुरुषों
के बीच में एक पुरुष देखा, वह उलटी मुस्कियों से बाँधा हुवा था, यावत् (नाक-कान काटे हुवे थे, शरीर पर तैल
लगाया हुवा था, इत्यादि दूसरे अध्ययन के माफिक ) पुरुषों द्वारा उद्घोषणा किया जारहा था; तदनन्तर राज-
पुरुष उस पुरुष को पहिले एक चच्चर (चौतरा) पर बैठाया, बैठा करके
टीकार्थ-'अवउडय' यावत् करण से "अवउडग वंधणबद्ध उक्खत्तकन्ननासं नेडुत्नुप्पियगत्तं' इत्यादि पूर्ववत् . अर्थ मूलार्थ
के समान जानना. 'पढमंमि चचरंसि' प्रथमे चर्चरे-पहिले चौतरे (स्थानविशेष) पर. 'निसियावंति' निवेशयन्ति-बैठाया ।
मूल-अट्ट चुल्लप्पियए अग्गओ घाएंति अग्गओ घाएत्ता कसप्पहारेहिं तालेमाणा २ कल्लुणं काक-
णिमंसाइं खाति खावेत्ता रुहिरपाणीयं च पायंति तदाणंतरं च णं दोचंसि चच्चरंसि अट्ट चुल्लमाउयाओ
अग्गओ घायंति एवं तच्चे चच्चरे अह महापिउए चउत्थे अट्ठ महामाउयाओ पंचमे पुत्ते छटे सुण्हा सत्तमे
--
॥१२५॥
-
विपाक
सूत्र
:-वि.
तीसरा
॥१२८॥
अध्ययन
-
-
करण से 'अग्गओ घाती' आगे मारते, ऐसा कहना चाहिये. 'चउत्थे। चतुर्थे चर्चरे-चौथे चौतरे पर. 'अह महामाउयाजो' अष्टौ-
पितुज्येष्ठभ्रातृजायाः अथवा मातुर्येष्ठा सपत्नी:- आठ पिताके बड़े भाईयों की पत्नियों यानी बड़ी माताऐं, अथवा माता की बड़ी
सोते. पंचमे चत्वरे-पाँचवें चोंतरे पर पुत्रों को उस पुरुष के आगे मारते हैं. पष्टे स्नुषा:-छट्टे पर पुत्र वधुओं को. सप्तमे जामातृकान्
+दुहितुर्भतॄन्- सातवें पर पुत्री के भर्तार जवांईयों को 'अट्ठमे धुयाओं' अष्टमे दुहितृः- आठवें पर पुत्रियों को. 'णवमे नत्तुए।
नवमे
नपतृन्-
नौवें पर पात्रों को वा दोहित्रों को. 'दसमे नत्तुईओ' दशमे नप्तः-पोतियों को वा दोहितियों को 'एक्कारसमे नतु
यावइ' एकादशे नप्तृकापतीन्- ग्यारहवें पर पौत्रियो के अथवा दोहित्रियों के पतियों को यानी जवाईयों को. 'बारसमे णत्तुइणीओ'
द्वादशे नप्तॄकिनी:- बारहवें पर पोते या दोहितों की भार्याओं को. 'तेरसमे पिउसियपइय' त्रयोदशे पितृष्वसापतिकान्-तेरहवें पर
भुवाओं के पतियों को यानी फूफाओ को. 'चोदसमे पिउसियाओ' चतुर्दसे पितृष्वसृः- चौदहवें पर पिता की बहनों को यानी
भुवाओं को. 'पण्णरसमे माउसियापइय' पञ्चदशे मातृष्वसुः पतिकान्-पन्द्रहवें पर माता की बहन के भारों को यानी मासाओं
को. 'सोलसमे माउसियाओ' पोडशे मातृष्वमृ:-सोलहवे पर माता की बहनों को यानी मासियों को 'सत्तरसमे मामियाओ' सप्तदशे
मातुलभार्याः-सतरहवें पर मामा की स्त्रियों मामियो को. 'अट्ठारसमे अवसेस' अष्टादशे अवशेष-अठारहवे चोतरे पर बाकी सब.
'मित्तणाइणियगसंबंधिपरियणं' मित्राणि-मित्रों को, ज्ञातयः-समान जाति वाले, निजका-मामा के पुत्र इत्यादि, सम्बंधिनः-सुसरा,
साला बगैरा, परिजनः-दास दासी आदि को बैठा कर मारते थे; इत्यादि पूर्ववत् सब जानना ।
॥१२८॥
--
दुः-वि.
तीसरा
अध्ययन
दयनीय पुरुष के विषय में गौतम स्वामी की पृच्छा
भगवन्त ने पूर्वभव फरमाया.
XXXCOXx..xcx.C+Corxxcxxx
विपाक
सूत्र
॥१२९॥
मूल-तते णं से भगवं गोयमे तं पुरिसं पासेइ २ त्ता इमे एयारूवे अज्झथिए पत्थिए समुपन्ने जाव
तहेव निग्गते एवं वयासी-एवं खलु अहन्नं भंते ! तं चैव जाव से णं भंते ! पुरिसे पुव्वभवे के आसि ? जाव
विहरति; एवं खलु गोयमा ! तेणं कालेणं तेणं समएणं इहेव जंबुद्दीवे दीवे भारहे वासे पुरिमताले नाम नयरे
होत्था, रिद्ध० तत्थणं पुरिमताले नयरे उदिओदिए नामं राया होत्था, महया० तत्थ णं पुरिमताले निन्नए
नामं अंडयवाणियए होत्था, अड्ढे जाव अपरिभूते अहम्मिए जाव दुपडियाणंदे ।
अर्थ- तदनन्तर भगवान् गौतम गणधर ने उस पुरुष को (ऊपर कहे हुवे प्रकार से) देखा, देख करके इस
प्रकार का अध्यवसाय चिंतित यानी विचार उत्पन्न हुवा (यह आदमी प्रत्यक्ष नरक जैसा दुःख भोगता है, इत्यादि)
यावत् उस ही तरह निकले (गौचरी लेकर नगर से बाहार निकले) और भगवन्त के पास आकर इस कदर निवे-
॥१२९॥
विपाक
दुः-वि.
तीसरा
अध्ययन
॥१३२॥
पत्थिका पिटकानि-बांस के बने हुवे टोकरे कागली, घूअडी, टिंटोड़ी, बगुली, मोरड़ी, कुकुड़ी, ये सब प्रसिद्ध है; अण्डे प्रतीत हैं।
मूल-तते णं से तस्स निन्नयस्स अंडवाणियस्स वहवे पुरिसा दिण्णभति० बहवे काइअंडए य जाव
कुक्कुडि अंडए य अन्नसिं च वहुणं जलयरथलयरखहयरमाईणं अंडए य तवएसु य कवल्लीसु य कंडुएसु य
भज्जणएसु य इंगालेएसु य तलिंति भजति सोल्लिंति तलेता भजंता सोल्लंता रायमग्गे अंतरावणंसी अंडयएहि
य पणिगएणं वित्तिं कप्पेमाणा विहरति; अप्पणावि य णं से निन्नयए अंडवाणियए तेहिं वहूहिँ काइय अंड-
एहि य जाव कुक्कुडिअंडएहि य सोल्लेहि य तलिएहि य भज्जेहि य सुरं च आसाएमाणे विसाएमाणे विहरति
तते णं से निन्नए अंडवाणियए एय कम्मे ४ (एयप्पहाणे एयविज्जे एयसमायारे) सुवहुं पावकम्मं समजि-
णित्ता एगं वाससहस्सं परमाउयं पालइत्ता कालमासे कालं किच्चा तच्चाए पुढवीए उक्कोस सत्तसागरोवमठि-
इएसु णेरइएसु णेरइयत्ताए उववन्ने (सू० १७).
अर्थ-तत्पश्चात् उस निन्हव अंडकवाणिक ने बहुत से लोगों को भृति (पैसे वगैरा) और भक्त (अनाज
भोजनादि) इत्यादि दिये हुवे थे जिससे वे लोग कव्वी के अंडों को यावत् कूकड़ी के अंडों को तथा अन्य बहु
जलचर-स्थलचर-गगनचर (मगरमच्छादि-गाय, भैसादि-पक्षीगण ) के अंडे तावड़ी में (सुवाली वस्तु माल
॥१३२॥
विपाक
दुर-वि.
तीसरा
अध्ययन
॥१३३॥
पुवे बगैरा तलने का भाजन) कवली के अन्दर (गुड़ादि पकाने का पात्र ) कंडके विषे (रोटी पकाने का भाजन
तवा आदि) भर्जनक में ( धाणी फोड़ने का पात्र कडायला वगैरा) अंगारे के ऊपर रखकर तैल में पुड़ी के माफिक
तलने थे, धाणी के सदृश मूंजते थे और चावल के समान पकाते थे, अथवा टुकड़े २ करते थे. तलकर, मुंजकर,
पकाकर राजमार्ग के मध्य में रही हुई अंडों की दुकानों में इन तैयार किये हुवे अंडोंको चकर अपनी आजीविका
चलाता हुवा रहता था, तथा वह निन्हव अंडवणिक स्वयं भी कागली यावत् कूकड़ी के अंडों को रांधकर, तलकर,
मुंजकर मदिरादि के साथ मिलाकर आस्वादन करता हुवा, वारंवार खाता हुवा रहता था। तदनन्तर वह निन्हव
अंडकवणिक ऐसे कर्मवाला, ऐसे ही कर्म में कटिवद्ध, ऐसे ही कर्म में विद्यावान् (कलावान् ) ऐसे ही कर्म की
आचरणा करने वाला अत्यन्त पापकर्म उपार्जन करके एक हजार वर्ष का उत्कृष्ट आयुष्य पूर्णकर, कालसमय काल-
कर तीसरी पृथ्वी के अन्दर (नरक में) उत्कृष्ट सात सागरोपम वाले नारकपने (नेरईयापने) उत्पन्न हुआ.
टीकार्थ-'तवएसु य-कवल्लीसु य-कंडसु-भज्जणएसु य + तलन्ति-भज्जन्ति-सोल्लिन्ति च + अन्तरावणंसि अंडयपणिएणं
सुरं च-तवकानि-कवल्यः-कन्दवा-भर्जनकानि कर्पराणि-तलयन्ति, पचन्ति, राध्यन्ति, खण्डशः वा कुर्वन्ति-राजमार्ग मध्यवर्तीहट्टे-
अंडकपण्येन-मदिरादिना-इन सब के अर्थ मूलार्थ के माफिक जानना.
॥१३३॥
विपाक
दुः-वि.
सूत्र
तीसरा
अध्ययन
॥१३६॥
करक उचित स्थान पर आती हैं, पुरुष वेष धारण कर, कवच पहन करके यावत् प्रहरण को गृहण कर, ढाल को हाथ
के पाखररूप धारण कर, तलवार को म्यान से थाहर निकालकर (नग्गी तलवार लेकर) वाण के भाथे को खंधे पर
लटकाकर, धनुष पर प्रत्यंचा (डोरी) चढाकर, फैकने के लिये बाणों को ऊँचे करके, दाम यानी अमुक पाश (शस्त्र
विशेष ) को लम्बा कर, अथवा दाह यानी लम्बे बांस पर बांधा हुआ दातरड़े जैसा शस्त्र विशेष को ऊँचा करके,
जंघा के ऊपर ( कमर के नीचे) घुघुरों लटकाकर, वाजिन्त्रों को शीघ्र बजवाने से, बड़े २ उत्कृष्ट महाध्वनि (आनन्द
महाध्वनि ) आकाश को मानो समुद्र गर्जारव से युक्त करती हो ऐसी शालाटवी नामकी चौरपल्ली को सर्वतः
चारों ओर (दिशा विदिशाओं में ) देखती २ और फिरती २ अपने दोहले पूर्ण करती हैं; इस लिये मैं भी उस ही
तरह यावत् दोहले को पूर्ण करूँ तो अच्छा हो-ऐसा करके यानी दोहला पूर्ण नहीं होने से यावत् (सुखागई-रूखी-
होगई-खेदपाई वगैरा) आतध्यान करने लगी.
टीकार्थ- 'जिमियभुत्तुत्तरागयाओ' जेमिताः - भोजन किया है जिन्होंने, भुक्तोत्तरं- भोजन के पश्चात् , आगताः- योग्य
स्थान पर आईं ऐसी माताएँ. 'पुरिसनेवत्थिज' कृतपुरुषनेपत्थ्याः-धारण किये हैं पुरुष के वेप जिन्होंने. 'सन्नद्ध-बद्ध' पहिने हैं।
कवच जिन्होंने; यावत् शब्द से ऐसा जानना- “सन्नद्धवद्धवम्मियकवइया उप्पीलियसरासणपट्टिया पिणद्धगेविजा विमलवरचिंधपट्टा
गहियाउहपहरणावरण" जिराबख्तर पहनी हुई, शरीर के रक्षण करने वाले कवच धारण की हुई, प्रत्यंचा चढाकर धर्नुप तैयार की इई,
॥१३६॥
दुः-वि.
विपाक
तीसरा
अध्ययन
॥१३७॥
-
गरदन के आभूषण पहनी हुई तथा निर्भल और श्रेष्ठ चिन्ह पट्ट (डोरे) बांधी हुई; ऐसी माताएँ, 'भरिएहिं ' हस्तपाशितैः- हाथ
के पड़खों से 'फलिएहिं स्फटिकैः-चलचलाट, 'निक्कट्ठाहिं' कोशकादाकृप्टैः- म्यान से बहार निकाली हुई, ऐसी 'असिहि :- खड्गैः-
तलवारों से. 'अंसागाएहिं स्कन्धमागतैः-पीठ पर बांधने से कन्धो पर आये हुवे, 'तोणेहिं वाणों की बहुलता से. 'सजीवेहि सजीवैः-
प्रत्यञ्चा चढ़ाई हुई ऐसे, 'धणूहि' कोदण्डकैः- धनुपों से. 'समुविक्खत्तेहिं सरेहि समुत्क्षिप्त णैः-छोड़ेजाने वाले नाणों से 'समुल्लासियाहिं
समुल्लासिताभिः-उंचे किये हुये, ऐसे 'दामाहि' पाशकविशेषैः-अमुक पाशकों से. कहीं पर 'दाहाहिं' - ऐसा पाठ है-लम्बे बांस के
अग्रभाग पर बांधे हुवे शस्त्र विशेष यानी दातरड़े. 'ओसारियाहिं ' प्रलम्बिताभिः- लटकती हुई, ऐसी 'उरुघंटाहि जवाघण्टिकाभिः-
जांघों की घंटियों से. 'छिप्पतूरेणं वजमाणेणं' क्षिप्रतूर्येण वाद्यमानेन - शीघ्रवाजिन्त्र बजाने से. 'महया उक्किट्टि' बड़े उत्कृष्ट, यावत्
करण से ऐसा देखा जाता है-"महया उकिहिसीहनाय बोल कलयलरवेणं" उत्कृष्टिश्च-आनन्द महाध्वनिः सिंहनादश्च-आनन्दमय उच्चस्वर,
सिंह के माफ़िक गर्जना, बोलश्च-अनक्षरध्वनिः कलकलश्च- व्यक्त वचन ऐसे लक्षण वाले वचन उनसे व्याप्त. 'समुद्दरव भूयंपिव' जलधि
शब्द प्राप्तमिव-गगन मण्डल में समुद्र के गरिव की प्राप्ति समान यानी तन्मय सद्दश. वह अटवी 'तं जइ अहंपि' तत् - तस्माद्यद्यहमपि
-उस तरह यदि मैं भी; यहां पर यावत् शब्द से ऐसा जानना- "बहुहिं मित्तणाइणियगसयणसंबंधि परियणमहिलाहिं अन्नाहिं "
बहुतसी मित्र की ज्ञाति स्वजन-सम्बंधी-परिजन की और अन्य चौरों की पत्नियो सहित. 'दोहलं विणिएजामी' दोहदं व्यपनयामि-
दोहले को पूर्ण करूं, ऐसा करके यानी इस हेतुसे 'तसि दोहलंसि तस्मिन् दोहदे - उस दोहले में यहां यावत् करण से," अविणि-
॥१३७॥
विपाक
सूत्र
तीसरा
अध्ययन
॥१४॥
मित्त जाव अण्णाहिं य वहूहिं चौरमहिलाहिं सद्धिं संपरिखुडा पहाया जाय विभूसिया विपुलं असणं ४ सुरं च
आसाएमाणा विसाएमाणा विहरइ, जिमिय भुत्तुत्तरागया पुरिसनेवत्था सन्नद्धवद्ध जाव आहिंडमाणी दोहलं
विणेति, तते णं सा खंदासिरी भारिया संपुन्न दोहला संमाणिय दोहला विणीय दोहला वोच्छिन्न दोहला संपन्न
दोहला तं गभं सुहंसुहेणं परिवहति; तते णं सा खंदसिरी चोरसेणावतिणी णवण्हं मासाणं वहुपडि
पुन्नाणं दारगं पयाया।
अर्थ -तदनन्तर वह खंदश्री भार्या विजय चौरसनापति की आज्ञा प्राप्त करती हुई हर्षित और संतोषित
होकर बहुतसी मित्रकी स्त्रियों से तथा बहुतर अन्य चौर भार्याओं से परिवृत होती हुई स्नान करके यावत् आभू-
षणों से भूपित होकर असनादि चार प्रकार के आहार और मदिरा का एमवार आस्वादन करती हुई, वारंवार स्वाद
लेती हुई विचरती है; भोजन करनेके पश्चात् उचित स्थान पर आती है, पुरुप वेश धारण करती है, कवच पहन कर
यावत् चौरपल्ली में घूम २ कर अपना दोहला पूर्ण किया, बाद वह खंदश्री भार्या समस्त मनो वांछित पूर्ण होने से
सम्पूर्ण दोहला वाली हुई, सन्मानित दोहला वाली हुई, वाँछा तृप्त होने से मुक्त दोहला वाली हुई, वॉछा के बंधन
का विच्छेद होने से विच्छेद दोहला वाली.. हुई, वाँछित भोनोंका आनन्द प्राप्त होने से संप्राप्त दोहला वाली हुई
॥१४॥
विपाक
दु:-वि.
इस तरह उस गर्भ का सुख पूर्वक पालन करती है. अनन्तर उस खंदश्री चौरसेनापत्नि ने नौ मास परिपूर्ण होने
पर पुत्र को जन्म दिया ।
टीकार्थ-
तीसरा
xx
xx
xx
xx
XX
अध्ययन
॥१४॥
ना
पुत्र का जन्मोत्सव और विवाहादि प्रसंग
पिता का मरण और नायकपद प्राप्ति
मूल-तते णं से विजयए चोरसेणावति तस्स दारगस्त महया इढिसकारसमुदएणं दसरत्तं ठिइवडियं
करेति, तते णं से विजयए चोरसेणावइ तस्स दारगस्स एक्कारसमे दिवसे विपुलं असणं ४ उवक्खडावेति
मित्तणाति० आमंतेति २त्ता जाव तस्सेव मित्तनाइ० पुरओ एवं वयासी-जम्हाणं अम्हं इमंसि दारगंसी गन्भ-
गयंसि समाणंसी इमे एयारूवे दोहले पाउन्भूते तम्हा णं होउ अम्हं दारगे अभग्गसेणे णामेणं, तते णं से
अभग्गसेणे कुमारे पंचधातीए जाव परिवड्ढइ. (सू० १८)
॥११॥
विपाक
दु:-वि.
तीसरा
अध्ययन
॥१४४॥
टीकार्थ- 'अट्ठदारियाओ' अष्टदारकाः-आठ कन्याओं. इस से यह भाव है कि- "तए णं तस्स अभग्गसेणस्स कुमारस्स
अम्मापियरो अभग्गसेणं कुमारं सोहणंसी तिहिकरण णक्खत्तमहत्तसि अट्ठहिं दारियाहिं सद्धिं एगदिवसेणं पाणिं गिहाविसु" तदनन्तर
उस अभमसेन कुमार के मात पिताने उत्तम तिथी, करण, नक्षत्र, महूर्त में आठ लड़कियों के साथ एक ही दिन में पाणि ग्रहण कराया
यानी पुत्र का विवाह किया. यावत् करण से ऐसा देखा जाता है- "तए णं तस्स अभग्गसेणस्स कुमारस्स अम्मापियरो इमं एयारूवं
पीइदाणं दलयंति" बाद उस अभमसेन कुमार को उसके मात पिताने इस प्रकार का यह प्रीतिदान दिया 'अट्ठओदाओ' अष्टको दायः,
अष्ट संख्यक दान दिया; वह इस प्रकार का है- "अट्ठ हिरण्णकोडीओ अट्ट सुवण्णकोडीओ- इत्यादि यावत् - अट पेसण
कारियाओ अमं च विपुल धणकणगरयणमणिमोत्तियसंखसिलप्पवालरत्तरयणमाइयं संतसारसावएजं" आठ क्रोड़ का बिना घड़ा सोना
यानी ची अथवा डले, आठ क्रोड़ का घड़ा हुवा सोना यानी जेवर-इत्यादि पर्यन्त आठ लाने-लेजाने वालियां और भी बहुतसा-धन
(नकद) सुवर्ण, रत्न, मणि, मोति, शंख, शिला प्रवाल, लालरत्न बगैरा; उत्तम सार भूत धन दिया. 'उप्पि भुंजई' ऊपर यानी
महल पर आनन्द भोगता है- इसका यह भावार्थ है कि- "तएणं से अभग्गसेणे कुमारे उप्पि पासायवरगते फुट्टमाणेहिं मुयंगमत्थ-
एहि वरतरुणिसंपउत्तेहिं बत्तीसइवधेहिं नाडएहिं उवगिजमाणे विउले माणुस्सए काम भोगे पचणुब्भवमाणे विहरइ” तत्पश्चात् वह अभ-
मसेन कुमार श्रेष्ठ महल के ऊपर मृदंगादि वाजिंत्रों के बजते हुवे और जवान स्त्रियों के किये हुवे बत्तीस प्रकार के नाटकों से प्रशंसा प्राप्त
करता हुवा मनुष्य संबंधी विपुल काम भोगों का अनुभव करता हुवा रहता है.
॥१४॥
विपाक
दुः-वि.
देश के लोगों का परस्पर विचार और नृपेन्द्र से प्रार्थना
तीसरा
सूत्र
अध्ययन
॥१४५॥
मूल-ततेणं से अभग्गसेणे कुमारे चोरसेणावइ जाते अहम्मिए जाव कप्पायं गेण्हति, ततेणं से जाणवया
पुरिसा अभग्गसेणेणं चोरसेणावइणा बहुगामघातावणाहिं ताविया समाणा अण्णमन्नं सद्दावेंति त्ता एवं क्यासी-
एवं खल्लु देवाणुप्पिया! अभग्गसेणे चोरसेणावइ पुरिमतालस्स णगरस्स उत्तरिल्लंजणवयं बहूहिँ गामघातेहिं जाव
निद्धणं करेमाणे विहरति, तं सेयं खलु देवाणुप्पिया ! पुरिमताले णगरे महबलस्स रन्नो एयमलु विन्नवित्तते.
अर्थ-पश्चात् वह अभग्नसेन कुमार चौरसेनापति होने पर अधर्मी हुवा यावत् कल्पायन (कर का राजधन)
ग्रहण करने लगा, बाद देश के लोग अभग्नसेन चौरसेनापति द्वारा बहुत से गांव नाश होने पर संतापित होकर
परस्पर बुलाने लगे, बुलाकर इस प्रकार कहने लगे-निश्चय करके हे देवों के वल्लभ ! अभग्नसेन चौरसेनापति पुरि-
मताल नगर के उत्तर भाग में रहे हुवे देश के बहुतेरे गामों का नाश करता हुवा यावत् निर्धन करता हुवा रहता
है; इसलिये हे देवों के प्यारे ! पुरिमताल नगर के महावल राजा को यह वृतान्त निवेदन करना श्रेयस्कर है ।
॥१९५॥
विपाक
क
दुः-वि.
तीसरा
अध्ययन
॥१४८॥
'अर्थ-तत्पश्चात् उस महायल राजा ने देशवासी पुरुषों के पास से यह बात सुन कर, हृदय में धारणकर
क्रोधाकान्त हुवा यावत् क्रोधाग्निसे धमधाते हुवे ललाट में तीन सल चढ़ाकर दंड नायक (कोतवाल) को बुलाया,
बुलाकर इस प्रकार आज्ञा करी- अहो देवों के प्रिय ! तुम जाओ सालाटवी चौरपल्ली का विनाश करो, विनाश
करके अभग्नसेन चौरसेनापति को जीते को पकड़ लो, पकड़कर मेरे पास हाजिर करो..
टीकार्थ- 'दंडं' दण्डनायकम् - कोतवाल को. 'जीवग्गाहं गेण्हाहि' जीवन्तं गृहाण-जीते को पकड़ लो.
मूल-ततेणं से दंडे तहत्ति एयमहं पडिसुणेति, ततेणं से दंडे बहूहिं पुरिसेहिं सण्णद्धबद्ध जाव पहरणेहि
सद्धिं संपरिखुडे मग्गइतेहिं फलएहिं जाव छिप्पतूरेणं वज्जमाणेणं महया जाव उक्किटिं जाव करेमाणे पुरिमतालं
णगरं मज्झं मज्झेणं निग्गच्छति २ ता जेणेव सालाडवीए चोरपल्लीए तेणेव पहारेत्थ गमणाते.
अर्थ-तब उस दंड नायक ने प्रमाण वचन' कहकर यह अर्थ धारण किया, वाद वह दंड नायक (कोतवाल) बहुत
से पुरुषों के साथ जिरावस्तर पहनकर यावत् प्रहरण (हथियार) लेकर उनके साथ रहा हुवा हाथ में पाश और भुजा पर
ढाल को स्थापन कर शीघ्र ही बजते हुवे वाजिन्त्रों के साथ उत्कृष्ट यावत् करता हुवा यांनी आनन्द ध्वनि करता हुवा
पुरिमताल नगर के बीचोबीच होकर निकला, निकलकर जहां पर सालाटवी चौरपल्ली है वहां के लिये रवाना हुवा.
॥१४८॥
विपाक
टीकार्थ-
xx
XX
xx
xx
xx
दुः-वि.
सूत्र
तीसरा
अध्ययन
॥१४९॥
चौरसेनापति को गुप्तचरों से पता लगा
रोकने का उद्दाम प्रयत्न
-
-
तते णं तस्स अभग्गसणस्स चोरसेणापतियस्स चारपुरिसा इमिसे कहाए लट्ठा समाणा
जेणेव सालाडवी चोरपल्ली जेणेव अभग्गसेणे चोरसेणावइ तेणेव उवगच्छंति २ त्ता करयल जाव एवं वयासी-
एवं खल्लु देवाणुप्पिया! पुरिमताले णगरे महब्बलेणं रन्ना महाभडचडगरेणं दंडे आणत्ते-गच्छह णं तुमे देवा-
णुप्पिया! सालाडवीं चोरपल्ली विल्लुपाहि अभग्गसेणं चोरसेणावर्ति जीवग्गाहं गेण्हाहि २ त्ता मम उवणेहि, तते
णं से दंडे महया भडचडगरेणं जेणेव सालाडवी चोरपल्ली तेणेव पहारेत्थ गमणाए।
अर्थ- तदनन्तर उस अभग्ननसेन चौरसेनापति के गुप्तचर पुरुषों को यह हकीकृत मालुम होने पर वे लोग
जहां सालाटवी चौरपल्ली है, जहां अभग्नसेन चौरसेनापति है वहां आते हैं, आकर दोनों हाथ जोड़ कर इस प्रकार
॥१४९॥
विपाक
,
दुम् वि.
तीसरा
सूत्र
अध्ययन
॥१५२॥
11
अर्थ- तदनन्तर उस अभग्नसेन चौरसेनापति ने विस्तार पूर्वक असन-पान-खादिम-स्वादिमा चार प्रकार का
भोजन तैयार कराया, तैयार कराकर ५०० चौरों के साथ स्नान किया यावत् प्रायश्चित्त (मंगल तिलकादि) कर भोजन
मंडप में विस्तृत असनादि चार प्रकार का आहार और मदिरादि का एक वार और वारंवार सेवन करता हुवा
रहता है, भोजन करने के पश्चात् उचित स्थान पर आकर आचमन (कुल्ला ) कर मुख शुद्धि करके अत्यन्त पवित्र
होकर पांच सौ चौरों के साथ आर्द्रचर्म (गीला चमड़ा) पर बैठा (मंगलार्थ बैठा) आर्द्रचर्म पर बैठकर सन्नद्धवद्ध
होकर (बख्तरादि धारण कर) यावत् आयुध और प्रहरण ( हथियार ) ग्रहण कर हाथ में पाशले ( शस्त्रविशेष)
लेकर यावत् आनन्द शब्दों से मध्यान्ह काल में शालाटवी चौरपल्ली से निकलता है, चौरपल्ली से निकलकर विषम यानी
ऊंचा-नीचा, और प्रवेश न होसके ऐसे गहन स्थान में (वृक्षोंकी झाड़ीवाले स्थानमें) मुकाम किया तथा आहार
पानी का साधन रख कर दंडनायक की प्रतीक्षा (राह) करता हुवा रहता है।
टीकार्थ-- ' मग्गइएहिं ' हस्तपाशितैः- हाथ में पाशल ग्रहण किये हुवे ऐसे. यावत् करण से 'फलिएहिं स्फटिकैः-
धारण किये हुवे ऐसे 'विसमदुग्गगहणं' विषमं नीचा-ऊंचा, दुर्ग- काठिनता से प्रवेश होसके, गहनं- दरख्तों की झाड़ी वाला स्थान.
॥१५२॥
विपाक
दु:-वि.
तीसरा
दंडनायक का पराजय
सत्र
अध्ययन
॥१५३॥
मूल-तते गं से दंडे जेणेव अभग्गसेणे चोरसेणावइ तेणेव उवागच्छति, तेणेव उवागच्छित्ता अभग्ग-
सेणेणं चोरसेणावतिणा सद्धिं संपलग्गे यावि होत्था, तते णं से अभग्गसेणे चोरसेणावइ तं दंडं खिप्पामेव हय-
महिय जाव पडिसेहिए, ततेणं से दंडे अभग्गसेणेण चोरसेणावइणा हय जाव पडिसेहिए समाणे अथामे अबले
अवीरिए अपुरिसक्कार परक्कमे अधारणिजमितिकटु जेणेव पुरिमताले गगरे जेणेव महब्बले राया तेणेव
उवागच्छति, उवागच्छित्ता करयल एवं वयासी-
अर्थ- तत्पश्चात् वह दंडनायक जहां अभग्नसेन चौरसेनापति है वहां आता है, माकर अभमसेन चौर-
सेनापति के साथ युद्ध करने लगा, बाद उस अभमसेन चौरसेनापति ने उस दंडनायक को तत्काल हत-प्रहत किया
यानी सेना का और मानका मर्दन किया यावत् प्रतिषेध किया अर्थात् संग्राम में से भगा दिया, तब वह दंडनायक
॥१५॥
विपाक
दु:-वि.
तीसरा
अध्ययन
॥१५६॥
उसको कोइभी पड़े भारी अश्वसैन्य से, हस्तिसैन्य से सुभदसैन्य से, रथसैन्य से , इस प्रकार चारों प्रकार के सैन्य
से भी साक्षात् पकड़ नहीं सकता, इसलिये साम्यनीति से (प्रीतिपूर्ण वचनों से) भेदनीति से ( स्वामी सेवक में
फूट डालने से )उपप्रदान यानी दान नीति से (इच्छित वस्तुदेने से) विश्वास देकर पकड़ने के योग्य है तथा उसके जो
आभ्यन्तर लोग (मंत्री बगैरा) विनीत होने से शिष्यसमान लोग, मित्र-ज्ञाति-निजक-स्वजन-संम्यधि-परिजन
लोगों को बहुतसाधन-सुवर्ण-रत्नरूप - उत्तम सारभूतद्रव्य देने से स्वामी से फूटकर उस के प्रीति का त्याग करेंगे;
अथवा अभमसेन चौरसेनापति को यारंवार, पड़े मतलब का-यहुमूल्य-बड़े पुरुषों के योग्य यानी राजा के योग्य
भेटना भेजने से अभमसेन चौरसेनापति विश्वास से वशिभूत होगा.
टीकार्थः-'उरंउरेणं साक्षात् - प्रत्यक्ष. 'सामेण य ' साम्येन - प्रेम उत्पन्न करने वाले वचन से. भेदेण य भेदेन - भेद से यानी
स्वामी सेवक के परस्पर अविश्वास उत्पन्न कराने से 'उवप्पयाणेण' उपप्रदानेन - इच्छित दान देने से. 'जे वि य से अभितरगा सीसग-
भमा' येऽपि च आभ्यन्तरका शिष्यक भनाः- उस अभमसेन के निकटवर्ती दीवान आदि-विनीत होने से शिष्यतुल्य; अथवा शिर्षक-
मस्तक के कवचरूप यानी निर्दोषपने शरीर रक्षा करने से वे शरीर रक्षक कहे जाते हैं, वे सब चौरसेनापति से अलग किये जाय, यह
सम्बंध जानना. 'मित्तनाइणियगे ' अर्थ मूलार्थ के माफिक. 'भिदइ' भिनत्ति- चौरसेनापति में रहा हुवा स्नेह भेदन किया जाय
अपने में प्रतिबद्धता धारण करे. ' महत्थाई ' महाप्रयोधनानि - बड़े अर्थवाले. ' महग्याई' महामूल्यानि-बहुमूल्य, महरिहाई' महतां
॥१५६॥
विपाक
योग्यानि- बड़े पुरुषों के योग्य, अथवा मह - पूजा के योग्य, अथवा महानह :- पूज्य पुरुषों के योग्य; इस प्रकार के भेटने किस के लायक
होते हैं ? उत्तर में - "रायारिहाई : राज्ञामुचितानि - राजा के योग्य होते हैं.
दुः-वि.
तीसरा
सूत्र
अध्ययन
॥१५७॥
चौरसेनापति को पकड़ने की कायरता पूर्ण योजना
मूल-तते णं से महब्बले राया अन्नया कयाइं पुरिमताले णगरे एगं महं महतिमहालियं कूडागारसालं
करेति अणेगक्खंभसयसन्निविढे पासाइए दरिसणिज्जे, तते णं से महब्बले राया अन्नया कयाइं पुरिमताले णगरे
उस्सुक्कं जाव दसरन्तं पमोयं घोसावेति २ त्ता कोडुंबिय पुरिसं सद्दावेति २ त्ता एवं वयासि- गच्छहणं तुभे
देवाणुप्पिया ! सालाडवीए चोरपल्लीए तत्थणं तुम्हे अभग्गसेणं चोरसेणावई करयल जाव एवं वयासि-एवं खलु
देवाणुप्पिया! पुरिमताले णयरे महाबलस्स रन्नो उस्सुक्के जाव दसरत्ते पमोदं उग्घोसेति तं किन्नं देवाणुप्पिया !
विउलं असणं ४ पुफ्फवत्थगंधमल्लालकारं ते इहं हव्वमाणिज्जउ उदाहु सयमेव गच्छित्ता ?
॥१५७॥
विपाक
दुः-वि.
तीसरा
अध्ययन
॥१६॥
जगराओ पडिनिक्खमंति २ त्ता णातिविकिठेहिं अद्धाणेहिं सुहेहि वसहि पायरासेहिं जेणेव सालाडवी चोरपल्ली
तेणेव उवागच्छंति २ ता अभग्गसेणं चोरसेनापति करयल जाव एवं वयासी - एवं खल्लु देवाणुप्पिया!
पुरिमताले नगरे महब्बलस्स रन्नो उस्सुक्के जाव उदाहु सयमेव गच्छित्ता ?
अर्ध- पश्चात् आज्ञाकारी पुरुषों ने महावल राजा का आदेश दोनों हाथ जोड़ कर स्वीकार किया, स्वी-
कार कर पुरिमताल नगर से रवाना होते हैं, रवाना होकर छोटी २ मंजले करते हुवेमार्ग में आराम लेते हुवे कलेवा
(शिरामण) भोजनादि करते हुवे जहां पर शालाटवी चौरपल्ली है वहां पर आते हैं, आकरके अभग्नसेन चौर-
सेनापति को दोनों कर जोड़कर यावत् इस प्रकार निवेदन करते हैं - अहो देवों के पल्लभ ! निश्चय करके इस
तरह पुरिमताल नगर के महायल राजा ने कर माफ कर यावत् ( उपरोक्त सय हकीकृत कही ) आहारादि यहां पर
ले आवे अथवा आप खुद वहां पधारेंगे ?
टीकार्थ- " उदाहु सयमेव गच्छित्ता । उताहो स्वयमेव गमिप्यास -अथवा आप स्वय आवेंगे. 'नाइविगिटेहिं ' अनत्यन्तदीधैः-
अतिलम्बे नहीं ऐसे. 'अद्धाणेहिं ' प्रयाण कैः- मुकामों से. 'सुहेहिं ' सुखैः- आराम करते हुवे. 'वसहिपायरासेहिं । वासिक प्रात-
भोजन:- भोजन, टीमन बगेरा से.
॥१६॥
विपाक दुः-वि. से मित्र-ज्ञातिजनादि परिवार के साथ स्नान किया, यावत् मर्व आभूषणों से विभूषित होकर उस असनादि चार प्रकार का आहार और मदिरा (शराब) का आस्वादन करता हुवा प्रमादी होकर (निश्चिन्त होकर) रहने लगा. टीकार्थ- सूत्र तीसरा xx XX xx xx xx अध्ययन ॥१६॥ SO . GODDDDDDQ000000p@G दगाबाजी का नमुना 0000000000000000000 मूल-तते णं से महब्बले राया कोडुंबिय पुरिसे सद्दावेति २ त्ता एवं वयासि गच्छह णं तुम्हे देवाणुाप्पिया ! पुरिमतालस्स णगरस्स दुवाराई पिहेह अभग्गसेणं चोरसेणावतिं जीवगाहं गिण्ह ममं उवणेह, तते णं से कोडुबिय पुरिसा करयल जाव पडिसुणेति २ त्ता पुरिमतालस्स णगरस्स दुवाराइं पिहेंति अभग्गसेणं चोरसेणावई , जीवगाहं गिण्हंति महब्बलस्स रण्णो उवणेति, तते णं से महब्बले राया अभग्गसेणं चोरसेणा- वई एतेणं विहाणेणं वझं आणवेति, एवं खल्लु गोयमा! अभग्गसेणे चोरसेणावइ पुरापुराणाणं जाव विहरति । ॥१६४||
विपाक
विश्वास के विवश चौरसेनापति का आगमन
दु:-वि.
तीसरा
॥१६१॥
अध्ययन
मूलः तते णं से अभग्गसेणे चोरसेणावइ ते कोडंवियपुरिसे एवं वयासि- अहन्नं देवाणुप्पिया !
पुरिमताल नगरं सयमेव गच्छामि ! ते कोडविय पुरिसे सस्कारेति पडिविसज्जेति, तते णं से अभग्गसेणे चोर-
सेणावइ बहूहि मित्त जाव परिखुडे पहाते जाव पायच्छित्ते सव्वालंकारविभूलिए सालाडवीओ चोरपल्लीओ पडि-
निक्खमति २ ता जेणेव पुरिमताले नगरे जेणेव महवल्ले राया तेणेव उवागच्छति २ त्ता करयल महब्बलं रायं
जएणं विजएणं वद्धाति २ त्ता महत्थं जाव पाहुडं उवणेति ।
अर्थ-तदनन्तर उस अभग्नसेन चौरसेनापति ने उन कौटुम्बिक पुरुषों को इस प्रकार कहा-हे देवानुप्रिय
मैं पुरिमताल नगर में खुद आउंगा ! ऐसा कह कर उन आदेशी पुरुपों का सत्कार (सन्मान ) कर यिदा किये,
बाद उस अभग्नसेन चौरसेनापति ने बहुत से मित्रों के यावत् (अन्य सब) परिवार सहित स्नान किया, यावत्
॥१६॥
-
विपाक
दुवि
तीसरा
अध्ययन
॥१६५||
अर्थ-तत्पश्चात् वह महायल राजा आदेशी पुरुषों को बुलाता है, बुलाकर इस प्रकार आज्ञा करता है-- अहो
देवों के प्रेमपात्रों ! तुम जाओ पुरिमताल नगर के दरवाजे बंद करो और अभग्नसेन चौरसेनापति को जीता पकड़
कर मेरे पास हाज़िर करो, तब उन आदेशी पुरुषों ने हाथ जोड़कर यावत् (राजा की आज्ञा) अङ्गीकार करी
करके पुरिमताल नगर के दरवाजे बंद किये और अभग्नसेन चौरसेनापति को जीता पकड़ कर,राजा के पास हाज़िर
किया * अब उस महाबल राजा ने अभग्नसेन चौरसेनापति को इस प्रकार (जिस प्रकार तुम देखकर,आये हो)
वध करने का विधान किया- इस तरह निश्चय करके हे गौतम ! यह अभमसेन चौरसेनापति पूर्वभव के उपार्जित
कर्मों को भोगता हुवा रहता है।
टीकार्थ-
xx
xx
xx
xx
xx
* राजा की पामरता-निर्बलता और अनीति का यह प्रदर्शन है.
।
॥१६५॥
विपाक
:-वि.
चौथा
सूत्र
,
॥१७६॥
अध्ययन
य वसभाण य ससयाण य सूयराण य पसयाण य. सिंघाण य हरिणाण य मयूणण य महिसाण य सतवद्धाण
य सहस्सषद्धाण य जूहाणि वाडगसि सन्निरुद्धाई चिट्ठति.
अर्थ-निश्चय करके इस प्रकार हे गौतम! उस काल उस समय के अन्दर इस ही जम्बूद्वीप' नामक द्वीप में भारत-
वर्षान्तरगत छगलपुर नामका नगर था, वहाँ पर सिंहगिरी नाम का राजा राज्य करता था, महान् हिमवन्त पर्वत
समान बड़ा था; उस छगलपुर नगर में छाणिक नामक कसाई रहता था, धनाढ्य था, अधर्मी यावत् दूसरे का नाश
कर आनन्द मानने वाला था, उस छणिक कसाई के यहुत से यकरे, भेड़ें, रोझ, ससले, सुअर, पसय (एक जात के
पशु), सिंह हिरण, मोर और पाड़े बगैरा लाखों की तादाद में झुंड के झुंड पाड़ों में बांधे हुवे और पूरे हुवे थे.
टीकार्थ-
मूल- अन्नेय तत्थ बहवे पुरिसा दिन्नभइ भत्तवेयणा बहवे य अए जाव महिसे य सारक्खमाणा संगो-
वेमाणा चिट्ठति, अन्ने य से बहवे पुरिसा अयाण य जाव गिहंसि निरुद्धा चिट्ठति, अन्ने य से वहवे पुरिसा दिन्न भइ०
वहवे सयए य सहस्से य जीवियाओ ववरोविंति मंसाई कप्पिणीकप्पियाइं करेंति छणियस्स छगलियस्स उवणेति.
xx
xx
xx
xx
xx
--
॥१७६॥
विपाक दुः-वि. चौथा सूत्र अर्थ-वहां पर अन्य बहुत से पुरुष पैसे-धी-धान्य पगैरा तनख्वाह देकर नोकर रक्खे हुवे थे, वे बहुत से बकरे यावत् भेंसों की हिफाजत (समय पर घास दाना पानी देना) और रक्षण करते हुवे रहते थे; दूसरे बहुत से लोग (नोकर) बकरों को यावत् पाड़ों को याड़ों में रोके हुवे रहते थे; दूसरे बहुत से लोग तनख्वाओं से नोकर रक्खे हुवे थे, वे सेंकड़ों और हज़ारों जानवरों को वध (क़त्ल) करते थे, उन के मांस छूरियों से टुकड़े २ करते थे और वे छणिक कसाई को सौंपते थे, अध्ययन ॥१७७॥ टीकार्थxx xx xx xx xx ॥१७७॥ मृल अन्ने य से बहवे पुरिसा ताई बहूयाइं अयमंसाइं जाव महिसमसाइं तवएसु य कवल्लीसू य कंदूएसु य भजणेसु य इंगालेसु य तलति य भन्जेति य सोल्लयंति य तलेता भजंता सोल्लंता ततो रायमग्गसि विर्ति- कप्पेमाणा विहरंति, अप्पणावि य णं से छन्नियए छगलीए तेहिं बहुविह अयमंसेहि य जाव महिसमंसेहि य सोल्लेहि य तलेहि य भजेहि य सुरं च आसाएमाणे विहरति, तते णं से छन्नीए छगलीए एयकम्मे एयप्पहाणे एयविज्जे एयसमायारे सुबहुं पावकम्मं कलीकलुसं समजिणित्ता सत्तवाससयाई परमाउयं पाल-
xx
xx
xx
xx
xx
दु:-वि.
-
विपाक
चौथा
सूत्र
अध्ययन
॥१८॥
टीकार्थ-
मूल-तए णं तं दारगं अम्मापियारो जायमेत्तं चेव सगडस्स हेट्टातो ठावेंति दोचंपि गिण्हावेति
अणुपुव्वे णं सारक्खंति संगोवेति संवड्ढेति जहा उज्झियए जाव जम्हा णं अम्हं इमे दारए जायमेत्ते चैव
सगडस्स हेट्ठा ठाविए तम्हा णं होउ णं अम्हं एस दारए सगडे नामेणं सेसं जहा उज्झियते, सुभद्दे लवण
सम्मुद्दे कालगते माया वि कालगया, से वि सयाओ गिहाओ निच्छूढे.
अर्थ-याद उस लड़के को मात-पिताने जन्मते ही एक शकट यानी गाड़े नीचे रख दिया, याद वहां से
वापिस लेलिया उस को स्तनपान कराते हुवे उपद्रवों से रक्षण करने लगे और पड़ा करने लगे; इत्यादि उज्झितक
के माफिक जानना, यावत् सय के सामने यह कहा कि-हमने अपने लड़के को जन्मते ही गाड़े के नीचे रक्खा था
वास्ते हमारे इस पुत्र का नाम 'शकट' होवो, याकी सय उज्झितक के सदृश जानना; सुभद्र लवण समुद्र मे काल
प्राप्त हुवा, क्रमशः माता भी मृत्युगत हुई, याद यह शकट भी अपने घर से. (राजा के हुकुम से) निकाला गया.
टीकार्थ-- 'सुभद्दे लवणे काल' इस का मतलब यह है कि-" सुभद्दे सत्यवाहे लवणसमुद्दे काल धम्मुणा संजुत्ते यावि होत्था"
सुभद्र सार्थवाह लवण समुद्र में काल धर्म प्राप्त हुवा.
॥१८॥
विपाक दुः-वि. चौथा सूत्र अध्ययन ॥१८१॥ PAD0000000000000DDORE वेश्या गमन और तिरष्कार EMO00000000000000 मूल-तते णं से सगडे दारए सयातो गिहाओ निच्छुढे समाणे संघाडग तहेव जाव सुदरिसणाए गणि- याए सद्धिं संपलग्गेयावि होत्था, ततेणं से सुसेणे अमच्चे तं सगडे दारगे अन्नया कयाइं सुदरिसणाए गणि- याए गिहाओ निच्छुभावेति सुदंसणियं गणियं अभितरियं ठावेति, ठावित्ता सुदरिसणाए गणियाए सद्धिं उरालाई माणुस्सगाई भोगभोगाइं भुंजमाणे विहरति । अर्थ-तब वह शकटपुत्र अपने घर से निकलने पर त्रिकोण बगैरा मार्ग पर भटकता हुवा (धुतादि खेलता हुवा ) यावत् सुदर्शना वेश्या के साथ लुब्ध हुवा, पश्चात् उस सुसेन प्रधान ने किसी एक वख्त उस शकट पुत्र को सुदर्शना गणिका के घर में से निकाल दिया, और सुदर्शनागणिका को अपने जनाने में (पत्नि रूप) स्थापन की, स्थापन करके उस गाणका के साथ मनुष्यों के योग्य काम भोगों को भोगता हुवा रहता है। ॥१८॥ २ विपाक दुः-वि. चौथा अध्ययन ॥१८४॥ अर्थ- वह प्रधान शीघ्र ही क्रोधाकान्त हुवा, यावत् क्रोधामि की ज्वाला से सर्प की तरह फूफाड़ा कर तीन सल डाल कर भृकुटि को ललाट में चढ़ा कर शकट पुत्र को पुरुषों द्वारा पकड़ाया, पकड़ा करके लकड़ी-मुष्टियों से मरम्मत कराई तथा उलटी मुस्कियों से जकड़ा कर पंधाया, बंधाकर जहां पर महाचन्द्र राजा है वहां पर आता है आकरके दोनों हाथ जोड़ कर इस प्रकार प्रार्थना करता है - निश्चय करके इस तरह हे स्वामिन् ! शकट लड़का ने मेरे जनाने में प्रवेश करने रूप मपराध (पूर्व हकीकत सय कही) किया है; तव महाचन्द्र राजा ने सुसेन अमात्य को इस प्रकार फरमाया - अहो देवों के प्यारे ! तुम चाहो उस तरह शकट पुत्र को सजा दो तब उस सुसेन मंत्री ने महाचंद्र राजा की आज्ञा प्राप्त कर शकट पुत्र को और सुदर्शना गणिका को इस प्रकार से वध करने की आज्ञा दी है; वास्ते निश्चय करके हे गौतम ! इस प्रकार शकट पुत्र पूर्वोपार्जित पाप कर्मों का अनुभव करता हुवा यानी भोगता हुवा रहता है। टीकार्थः-- ॥१८४॥ - xx xx XX xx xx * विना तहकीकात हुक्म दिया, यह राजा के अन्याय का नमूना है GENT
विपाक
दु:-वि.
परमात्माने शकट का भविष्य फरमाया
चौथा
अध्ययन
॥१८५॥
मूल-सगडेणंभंते ! दारए कालगए कहिंगच्छिहिति ? कहिं उववजिहिइ ? सगडे णं दारए गोयमा!
सत्तावणं वासाइं परमाउयं पालइत्ता अज्जेव तिभागावससे दिवसे एगं महं अओमयं तत्तसमजोइभूयं इथि
पडिमं अवयासाविते समाणे कालमासे कालं किच्चा इमिसे रयणप्पभाए पुढवीए णेरइयत्ताए उववजिहिति,
से णं ततो अणंतरं उव्वहिता रायगिहे णगरे मातंगकुलंसि जुगलत्ताए पच्चायाहिति ।
अर्थ-हे भगवन्त ! शकट लड़का काल करके कहां जायगा ! कहां उत्पन्न होगा ? प्रभु ने फरमाया-हे गौतम!
शकट लड़का सत्तावन वर्ष की पूरी उम्र को खतम कर आज ही दिन के तीसरे भाग अवशेष रहने पर एक बड़ी भारी
लोह की बनाई हुई धगधगति अग्नि समान स्त्री की प्रतिमा से आलिङ्गन कराया हुवा मरण समय मर कर इस
* नरक के चित्र का प्रमाणभूत इस भूमण्डल पर यह दृश्य था.
॥१८॥
विपाक
दुः-वि.
चौथा
अध्ययन
+
॥१८॥
xx
xx
xx
xx
-
xx
कालमासे कालं किच्चा इमिसे रयणप्पभाए पुढवीए गेरइयत्चाए, उववन्ने संसारो तहव जाव पुढवीए ।
अर्थ-बाद वह शकट पुत्र किसी एक वखत कूटप्राहीपन (कुटलाइपन-जातिविशेष) ग्रहण कर रहेगा, तब
वह शकट लड़का कूटपाही अधर्मी होगा यावत् दूसरों को दुःख देकर आनन्द मनावेगा; इस प्रकार का कर्म करता
हुवा यहुत पाप कर्म उपार्जन करके काल ममय काल कर इस रत्नप्रभा पृथ्वी में (घमा नरक में) नारकपने उत्पन्न होगा
इसही प्रकार (पहिले अध्ययन के समान ) इसका संसारकम सातवीं नरक तक जानना.
टीकार्म:-
मूल ~ से णं ततो अणंतरं उवाहित्ता वाणारसीए नयरीए मच्छत्ताए उववजिहिति, सेणं तत्थणं मच्छ-
बंधिएहिं वहिए तत्थेव वाणारसीए नयरीए सेटिकुलंसि पुत्तताए पच्चायाहिति चोहिं बुज्झे पवजा सोहम्मे कप्पे
महाविदेहे वासे सिजिहिति; निक्खेवो - दुहविवाग णं चोत्थस्स अज्जयणस्स अयमट्टे पन्नते (सू० २३)
चोत्थं अज्झयणं सम्मत्तं ॥४॥
अर्थ- तदनन्तर वह वहां से अन्तर रहित निकल कर पनारसी नगरी में मच्छपने उत्पन्न होगा, वह वहां पर
॥१८॥
दुः-वि.
विपाक
चौथा
अध्ययन
॥१८९॥
धीवरों से (मच्छीमारों से) मारा जाकर उसही याणारसी नगरी के अन्दर सेठकुल मे पुत्रपने उत्पन्न होगा, वहां
युवा अवस्था में सम्यक्त्व (समकीत-देव गुरु धर्म पर श्रद्धा) प्राप्त कर, बोध ग्रहण कर, दीक्षा अंगीकार कर सौधर्म देव-
लोक के अन्दर देव उत्पन्न होगा, वहां से च्यवकर महाविदेह में जन्म लेगा, दीक्षा लेकर मोक्ष पद प्राप्त करेगा-
इसका निक्षेप (निगमन) करना. दुःख विपाक के चौथे अध्ययन का यह अर्थ भगवन्त महावीर देव ने फरमाया-चौथा
अध्ययन समाप्त हुवा.
टीकार्थः-निक्लेवो निक्षेपः- निगमन यानी पूर्णाहूति इस तरीके से करना- “ एवं खलु जम्बू ! समणेणं भगवया महावीरे
णं चउत्थस्स अज्झयणस्स अयमढे पन्नत्ते " अर्थात् सुधर्म स्वामी फरमाते हैं - निश्चय करके इस प्रकार हे जम्बो ! श्रमण भगवन्त महावीर
देव ने चौथे अध्ययन का यह अर्थ प्रकाशित किया, इस प्रकार समाप्त सूत्र कहना चाहिये वाकी सब पहिले अध्ययन के माफिक
व्याख्या कर लेना - चौथे अध्ययन का विवरण सम्पूर्ण हुवा.
* उपसंहार ४
इस चौथे अध्ययन में सुभद्र सार्थपाह के पुत्र 'शकट ' की परिस्थिति करुणास्पद है- वैश्या गमन जैसे नि-
लेन व्यवहार के कारण अग्निसमान तप्त लोहमय पुतली से आलिंगन और उससे कुत्ते की मौत मरने का चितार
॥१८॥
विपाक
सयाणीयस्स सोमदत्ते नाम पुरोहिए होत्या रिउवेय० तम्स णं सोमदत्तस्स पुरोहियस्स वसुदत्ता नामं भारिया
होत्था तस्स णं सोमदत्तस्स पुत्ते वसुदत्ताए अत्तए वहस्सतिदत्ते नामं दारए होत्था, अहीण
दुः-वि.
पांचयाँ
अध्ययन
॥१९२॥
अर्थ-जो हे भगवन् ! चौधे अध्यन का श्रमण भगवन्त महावीरदेव ने यह अर्थ प्रकाशित किया तो पांचवें
अध्ययन का क्या अर्थ फरमाया?; यह उत्क्षेप (प्रस्तावना) कहा; इस प्रकार जम्बूस्वामी के पूछने पर स्वधर्म गणधर
देव पयान करते हैं - इस तरह निश्चय करके हे जम्बो ! उस काल उस समय में कौशाम्बी नगरी थी, ऋद्धिवाली-
निर्भय और समृद्धिवाली थी; इस नगरी के बाहर चन्द्रोत्तरण उद्यान था, श्वेतभद्र नामक यक्ष था , उस कौशाम्बी
नगरी में शतानीक नाम का राजा राज्य करता था, वह हिमवान् यगैरा जैसा बड़ा और सारभूत था, उसके मृगा-
वती पटरानी थी, उस शतानीक का लड़का और मृगादेवी का पुत्र उदायन नाम का कुमार था, सम्पूर्ण शरीर वाला
था, युवराज पद शोभित था; उस उदायन कुमार के पद्मावती नाम की भार्या थी, उस शतानीक राजा क सोम-
दत्त नामक पुरोहित था, १ यजुर्वेद २ सामवेद ३ ऋगवेद और ४ अथर्ववेद पढा हुवा था; उस सोमदत्त पुरोहित के
वसुदत्ता नाम की पति थी, उस सोमदत्त का लड़का और वसुदत्ता का आत्मज ' वृहस्पतिदत्त ' नाम का लड़का
था, उसका शरीर और इन्द्रियाँ अहीन थीं; यानी परिपूर्ण थी.
॥१९२॥
टीकार्थ:- A xx xx xx xx दुः-वि. विपाक 900 पांचवाँ अध्ययन ॥१९३॥ भगवन्त का पदार्पण-एक दयापात्र की पृच्छा बृहस्पतिदत्त का जुल्मी पूर्वभव मूल-तेणं कालेणं तेणं समएणं समणे भगवं महावीरे समोसरणं, तेणं कालेणं तेणं समएणं भग- वं गोयमे तहेव जाव रायमग्गमोगाढे, तहेव पासइ हत्थी आसे पुरिसमज्झे पुरिसं चिंता, तहेव पुच्छति पुव्व- भवं, भगवं वागरेति-एवं खल्लु गोयमा! तेणं कालेणं तेणं समएणं इहेव जम्बुद्दीवे दीवे भारहे वासे सव्वतोभद्दे नामं नयरे हात्था रिद्धस्थिमियसमिद्धे, तत्थ णं सव्वतोभद्दे नयरे जियसत्तू नाम राया, तस्सणं जियसत्तुस्स रन्ना- महसरदत्ते नाम पुरोहिए होत्था , रिउव्वेय जाव अत्थव्वण कुसले आवि होत्था. - उस काल उस समय में महावीर भगवन्त (इस नगरी के उद्यान में) समवसरे, उस काल उस समय ॥१९॥ अर्थ- 13
विपाक
दुः-वि.
पांचवॉ
अध्ययन
॥१९६॥
.
साथ युद्ध का प्रसंग आता तप २ महेश्वरदत्त पुरोहित १०८ ब्रामण पुत्रों को १०८ क्षत्रीय पुत्रों को १०८ वैश्य पुत्रों
को और १०८शद्र पुत्रों को पकड़ाता था, पकड़ा कर उनके जीते हुये के कलेजों का मांस लेकर जितशत्रु राजा के लिये
शान्ति होम करता था, इससे शत्रु सैन्य शीघ्र ही नाश होजाता या छिन्न भिन्न होजाता।
टीकार्थ- 'हिययउंडिओ' हृदय मांसपिण्डान् - कलेजों की मांसपेसियों को -निकलवाता था.
मूल-तते णं से महेसरदत्ते पुरोहिए एयकम्मे ० सुवहुं पावकम्मं समजिणित्ता तीसंवाससयं परमाउयं
पालइत्ता कालमासे कालं किच्चा पंचमीए पुढवाए उकोसेणं सत्तरस सागरोवमटिइए नरगे उववन्ने, सेणं ततो
अणंतर उवट्टित्ता इहेव कोसंविए नयरीए सोमदत्तस्स पुरोहियस्स वसुदत्ताए पुत्तत्ताए उववन्ने, तते णं तस्स
दारगस्स अम्मापियरो निवत्तवारसाहस्स इमं एयारूवं नामधेज्जं करेंति, जम्हा णं अम्हं इमे दारए सोम-
दत्तस्स पुरोहियस्स पुत्ते वसुदत्ताए अत्तए तम्हाणं होउ अम्हं दारए वहस्सइदत्ते नामेणं ।
अर्ध- पश्चात् वह महेश्वरदत्त पुरोहित इस प्रकार के कर्म वाला यानी व्यापार वाला (ऐसे ही कर्म में तत्पर-
ऐसे कर्म की कला वाला- ऐसे ही आचरण वाला) होकर पाप कर्म उपार्जन कर तीन हजार वर्ष का उत्कृष्ट
आयुष्य पालकर कालसमय काल करके पॉचवी नारकी में सत्तरह सागरोपम की उत्कृष्ट आयुष्य वाले नारकपने
॥१९६॥
विपाक
सूत्र
॥१९७॥
(नेरइयेपने) उत्पन्न हुआ, अनन्तर वह वहां से अन्तररहित निकल कर इसही कौशाम्बी नगरी में सोमदत्त पुरोहित
की पत्नि वसुदत्ता की कूक्षि में पुत्रपने उत्पन्न हुआ, तब उस यालक के मात-पिता ने बारह दिन सम्पूर्ण होने पर
इस प्रकार का (गुण-निष्पन्न ) नाम स्थापन किया - इस कारण से कि हमारा यह लड़का सोमदत्त पुरोहित का
पुत्र और वसुदत्ता का आत्मज है, उस कारण से हमारे पुत्र का नाम 'वृहस्पतिदत्त' हो.
दुः-वि.
पांचवॉ
टीकार्थ-
-
अध्ययन
xx
xx
xx
xx
XX
शतानीक राजा का मरण-और उदायन कुमार का.
राज्यारोहण
मूल-तते णं से वहस्सतिदत्ते दारएपंचधातिपरिग्गहिए जाव परिवहहि, ततेणं से वहस्सतिदत्ते उमु-
क-बालभावे जुब्वणगमणुपत्ते विण्णयपरिणयमेत्ते होत्था, से णं उदायणस्स कुमारस्स पियवालवयस्सए यात्रि
॥१९॥
विपाक -वि. पांचवॉ अध्ययन ॥२०॥ भूमिकाआ में (पाग बगीचा-क्षेत्र - तालाव- आदि में) और रणवास में इच्छाप्रमाणे आने जाने लगा; तब वह वृहस्पति दत्त पुरोहित उदायन. राजा के रानीवास मे वख्त , ये वक्त, समय - ये समय और अकाल में (इन शब्दों के अर्थ टीकार्थ से जानना) जाता था, किसी एक वक्त पद्मावति रानी के साथ आसक्त हो गया, इससे उसके साथ उदार काम भोग भोगता हुवा रहता है. टीकार्थ- 'वेलासु' अवसरेपु - भोजन, शयनादि कालों में अवेलासु' अनवसरेपु -- भोजनादि कालों से भिन्न कालों में काले' तृतीय + प्रथमप्रहरादौ - तीसरी + पहिली पहर में 'अकाले च ' मध्यान्हादौ - दिन के मध्य भाग में, यह विशेष करके अकाल कहा जाता है. 'वियाले ' संध्यायां - शायंकाल मे 'संप्पलग्गो' आसक्ता-मुग्ध+ पञ्चमाध्ययनस्य विवरणं समाप्तम्. - KARNXX अनाचार का फल ॥२०॥ *****AXSHXAXX मूल--- इमं चणं उदायणे राया पहाए जाव विभूसिए जेणेव पउमावई देवी तेणेव उवगच्छइ, वह- स्सतिदत्तं पुरोहियं पउमावई देवीए सद्धिं उरालाई भोगभोगाई भुंजमाणं पासति, पासित्ता आसुरुत्ते तिवलि विपाक दुः-वि. पांचवा अध्ययन ॥२०॥ भिउडि साहटु वहस्सतिदत्तं पुरोहियं पुरुसेहिं गिण्हावेति २ त्ता जाव एए णं विहाणेणं वझंआणाविए,एवंखल्लु गोयमा ! वहस्सतिदत्ते पुरोहिए पुरापोराणाणं जाव विहरई। अर्थ -इस अवसर में उदायन राजा स्नान करके यावत् भूषणों से भूषित होकर जहां पर पद्मावती देवी है वहां पर आता है, वहां वृहस्पतिदत्त पुरोहित को पद्मावती देवी के साथ प्रधान काम-भोग भोगता हुवा देखा, देख कर क्रोधाक्रान्त हुआ तीन सलवालो भृकुटी चढ़ा कर उस पुरोहित को राजपुरुषों द्वारा पकड़ाया, पकड़ा कर यावत् इस विधान से (जो तुम देख कर आये हो) वध करने की आज्ञा दी, निश्चय करके इस प्रकार हे गौतम ! वृहस्पतिदत्त पुरोहित पूर्व कृत कर्मों को भागता हुवा रहता है । टीकार्थ:- XX xx xx xx xx - ॥२०१॥ अन्तिम पृच्छा और उसका खुलासा हन्छ E मूल-वहस्सतिदत्ते गं भंते ! दारए इओ कालगए समाणे कहिं गच्छिहिति ? कहिं उववजिहिति ? -
-
विपाक
..
दुः-वि.
सूत्र
* छट्ठा अध्ययन
' (नन्दिवर्धन अथवा नन्दिसेन )
||२०४॥
अध्ययन
अध्ययन का बीनक
SUMANOPATIEVAND
मूल-जइणं भंते ! छहस्स उक्खेवो-एवं खल्लु जम्बू ! तेणं कालेणं तेणं समए णं महुरा नाम नयरी,
भडीरे उज्जाणे सुदंसणे जक्खे सिरीदामे राया बंधुसिरी भारिया, पुत्ते णंदिवद्धणे कुमारे अहीणे जुवराया, तस्स
सिरीदामस्स सुबंधु नामं अमचे होत्था, सामदंडभेदउवप्पयाण नीईसु पउत्तनयविहन्नु, तस्स णं सुबंधुस्स
अमञ्चस्स वहुमित्ता नामं भारिया होत्था, अमञ्चस्स बहुमित्तापुत्ते नामदारए होत्था अहीण० तस्सणं सिरीदामस्स
॥२०४॥
विपाक दुः-वि. छट्ठा अध्ययन ॥२०५॥ रपणो चित्ते नामं अलंकारीए होत्या, सिरीदामस्स रपणो चित्तं बहुविहं अलंकारियकम्मं करेमाणे सवहाणेसु य सव्वभूमियासुंय अंतेउरे य दिन्नवियारे यावि होत्था। अर्थ-~जम्बू स्वामी स्वधर्म स्वामी को पूछते हैं- हे भगवन् ! जो पाँचवें अध्ययन का इस प्रकार अर्थ फरमाया तो अब छठे अध्ययन का बयान प्रकाशित करिये ! तब सुधर्म स्वामी फरमाते हैं - इस प्रकार निश्चय करके हे जम्बो ! उस काल उस समय में मथुरा नाम की नगरी थी, भंडीर नामक उद्यान था, उसमें सुदर्शन संज्ञक यक्ष था, यहां का श्रीदाम नामक राजा और बंधुश्री नाम की भार्या ( रानी)थी, उनके नन्दिवर्धन नामक कुमार था, परि- पूर्ण शरीर वाला युवराज था, उस श्रीदाम के सुबंधु नाम का अमात्य (मंत्री) था; वह साम-दंड-भेद और दान (दाम) इन चार राजनीतियों में प्रवीण था, उस सुपंधु मंत्री के बहुमित्रा नाम की पत्नी थी, उस सुबंधु प्रधान के वहुमित्रापुत्र नाम का लड़का था, पूर्ण पंचेन्द्रीय शरीर वाला था, उस श्रीदाम राजा के चित्र नाम का अलंकार- कर्म करने वाला नापित (नाई ) था, श्रीदाम राजा का चित्र नाई आश्चर्यकारी नाना प्रकार के आलंकारिक कर्म ( मुंडन - स्नान- वस्त्र- आभूषणादि ) करता'हुवा सर्व स्थानों में, सर्व प्रदेशों में और जनाने में राजा की आज्ञा से जाता आता था। टीकार्थ-'चित्त -बहुविहं' आश्चर्यभूतं बहुप्रकार - अजीन 'नाना- प्रकार का 'अलंकारियकम्मर क्षुरकर्म-मुंडन कार्य ॥२०५॥ - -945 MMA
विपाक
-
सूत्र
दुः-वि.
छट्ठा
अध्ययन
॥२०८॥
रस भरा, कितनेक में चूर्णादि से मिश्रित जल भरा, कितनक में खारा तेल भरा; इस प्रकार तमाम तपे हुवे रसादि
भर कर बढे २ कलशों द्वारा राज्याभिषेक किया; बाद तप्तलोहमय आग्निसमान हार लोहे की संडासी से लेकर
पहनाये, फिर अर्ध हार पहनाये, तथैव ललाट का पट्टा और मुकट पहनाया-यह देख कर गौतम स्वामी को
पहिले अध्ययन की तरह विचार हुवा, भगवन्त को पूछा, प्रभु ने तथाप्रकार यावत् उत्तर दिया-
टीकार्थ- 'कलकल भरिएहिं । कलकलंभृतैः-चूर्णादिमिश्रितजल से भरे हुवे से ( कलशों से ) तपा हुवा लोहे का इत्यादि
विशेषण जानना. ' हारं पिणद्धति , हारं परिधापयन्ति- हार पहनाये ! क्या करके ? लोहमय संडासी से पकड़ करके, वहां हार अट्ठारह
सरवाला जानना 'अद्धहारं ' अर्द्धहारं-नवसरवाला हार; यावत् करणसे "तिसरियं पिणद्धति पालंब पिणद्धति कडिसुत्तयं पिणद्धति"
इत्यादि-तीन सर का हार पहनाया, झुवनक पहनाया, कन्दोरा पहनाया गया, 'पट्ट' ललाटाभरणं-ललाड़ का आभूषण. ' मउडं'
शेखरकः-शिरका मुकुट. 'चिंता तहेव ' चिन्ता तथैव- उस ही प्रकार विचार किया; अर्थात् उस पुरुष को देख कर गौतम स्वामी को
उस ही तरह विचार उत्पन्न हुवा जैसा पहिले अध्ययन में हुआ था , तथाहि - "न मे दिट्ठा नरया वा नेरइया वा, अयं पुण पुरिसे
निरयपडिरूवियं वेयणं वेएइ" मैंने नरक और नारकों को (नैरईयों को ) नहीं देखे फिर भी यह पुरुष नारक समान दुःख भोगता
प्रतीत होता है; यावत् शब्द से ऐसा जानना- "अहापज्जत्तं भत्तपाणं पडिगाहेति २ ता जेणेव समणं भगवं तेणेव उवागच्छइ" चाहिये
उतना आहार पानी ग्रहण किया, ग्रहण करके जहां श्रमण भगवन्त महावीर हैं वहां आते हैं; इत्यादि कहना चाहिये 'चागरेति
॥२०८॥
दुः-वि.
विपाक
छट्ठा
सूत्र
जन्मान्तर में यह कौन था ? ऐसा गौतम गणधर के पूछने पर भगवान् फरमाते हैं-
O
नन्दिवर्धन का पूर्व भव
अध्ययन
॥२०९॥
मूल-एवं खल्लु गोयमा! तेणं कालेणं तेणं समएणं इहेव जंबुद्दीवे दीवे भारहे वासे सीहपुरे नामं नगरे
होत्था रिद्धस्थिमियसमिद्धे, तत्थ णं सीहपुरे नयरे सीहरहे नामं राया होत्था, तस्स णं सीहरहस्स रन्नो दुजोहणे
नामे चारगपालए होत्था, अहम्मिए जाव दुप्पडियाणंदे.
अर्थ-निश्चय करके इस प्रकार हे गौतम ! उसकाल में उस समय में इस ही जम्बूद्वीप नामक द्वीप में भरतक्षेत्रा-
न्तरगत सिंहपुर नामका नगर था, रिद्धिवाला-निर्भय और समृद्धिशाली था, उस सिंहपुर नगर में सिंहरथ नामक राजा
था, उस सिंहरथ राजा के दुर्योधन नामक कोतवाल था, अधर्मी यावत् दूसरों को दुःख देकर आनंद मानने वाला था।
टीकार्थः - 'चारगपालए' गुप्तिपालका- कोतवाल.
॥२०९॥
विपाक दुः-वि. ॥२१२॥ अध्ययन , - -- की लकाईयां, घेते, आमली की सोटियाँ, कोमल चमड़े के चावुक, चमड़ा यींटी हुई सोटियां, वटवृक्षादि की छाल बींटी हुई लकड़ियाँ, इनके सिखर बंद समूह और छुट्टे ढेर उसके पास रहे हुवे थे-उस दुर्योधन कोतवाल के पास बहुतसी शिलाएँ, लकड़ियाँ, मुद्गर और कनगर यानी जहाज को जल में स्थिर करने वाले नागर नाम के पत्थर; इनके शिखर बंद ढेर और छोटे २ पुंज थे, टीकार्थः - ' हत्थु डुयाण ' अण्डूनि-काष्टादि के बने हुवे बंधन विशेष; इस तरह पादान्दुकानि- पग के बंधन विशेष. 'हडीण य' हडयः + खोटकाः- खोड़े. 'पुंज' निकरः- शिखरबंदराशी. 'निगर' राशिमात्रम् छुट्टे ढेर. 'वेणुलयाण य 'स्थूलवंशलतानां-जाड़े बांसों की वेलों के 'वेत्तलयाण य । बेत की बेलों के 'चिंच' अम्बलिकाकम्बानां-आमली की सोटियों के 'छियाण' श्लक्ष्णचर्म- कशानां-कोमल चर्म के चाबुकों के. 'कसाण य' चर्मयष्टिकानां-चमड़े से मढीहुईं लकड़ियों के. 'वायरासीणं वल्करश्मयः-बड़ बगैरा की छाल से बीटी हुई सोटियों के मार मारने को ढेर के ढेर लगे हुवे थे. 'सिलाण य' दृषदां- सिलाओं के. 'लउलाण य' लगुडा- नां-लाठियों के. 'मुग्गराण य' मुद्गराः- मुद्गरों के. 'कनंगराण य : कनङ्गराः-पानी के लिये नगर यानी जहाजों को निश्चल करने वाले पापाण वे कनगारा अथवा कानंगरा कहे जाते हैं। उनके ढेर. मूल- तस्स ण ( तए णं से ) दुज्जोहणस्स चारगस्स बहवे तंताण य वरत्ताण य वागरजाण य वाल- यसुत्तरज्जूण य पुंजानिगरा चिट्ठति - तस्स णं दुज्जोहणस्स चारगस्स बहवे अलिपत्ताण य करपत्ताण य खुर- , - ||२१२॥
विपाक सूत्र दुः-वि., छट्ठा अध्ययन ॥२१३॥ पत्ताण य कलंवचीरपत्ताण य पुजाणिगरा चिहति-तस्स णं दुज्जोहणस्स चारगस्स बहवे लोहखीलाण य कडगसक्कराण य चम्मपट्टाण य अल्लपल्लाण य पुंजा निगरा चिट्ठति-तस्स णं दुज्जोहणस्स चारगस्स बहवे सूतीण य डंभणण य कोहिल्लाण य पुंजा निगरा चिट्ठति - तस्स णं दुज्जोहणम्स चारगस्स वहवे सत्था (पच्छा) ण य पिप्पलाण य कुहाडाण य नहच्छेयणाण य दब्भत्तिणाण य पुंजा निगरा चिति. अर्थः-उस दुर्योधन कोतवाल के पास बहुत सी तांतें (महीन डोरियाँ,) जाड़ी डोरियाँ, चमड़े की डोरियॉ, पाल और सूत के रस्सों के पुंज और निकर रक्खे हुवे थे-उस दुर्योधन गुप्तिपालक के पास बहुत सी तलवारें, करवतें, उस्तरे जैसे शस्त्र और कलम्बचीर (शस्त्रविशेष) के ढेर और छुट्टे ढेर लगे हुवे थे- उस दुर्योधन चारक के पास बहुत से लोहे के खीले,वाँस की मेखें, चमड़े के पट्टे और बिच्छी की आकृती जैसे खिलियों के पुंज और निकर लगे हुवे थे- उस दुर्योधन कोतवाल के पास बहुतसी सुइयाँ, लोहे की पतली और तीखी सलियाँ तथा लोहे के छोटे २ मुद्गरों के ढेर के ढेर लगे हुवे थे-उस दुर्योधन गुप्तिपालक के पास बहुत से पृच्छनक नाम के शस्त्र छोटे २ उस्तरे, कुहाड़े, नेरणी ( नख काटने का शस्त्र) और डाभ वगैरा के पुंज-निकर लगे हुवे थे. • टीकार्थः ' असिपत्ताण य ' असीनां - तलवारों के करपत्ताण य' क्रकचानां - करवतों के. 'खुरपत्ताण य’ उस्तरों के. ॥२१३॥ -
विपाक
दु:-वि.,
सूत्र
॥२१६॥
अध्ययन
जाव सत्थोवाडियं करेति अप्पेगतिए वेणुलयाहि य- जाव वायरासीहि य हणावेति ।
अर्थ-कितनेक अपराधियों को चित्ता पटकाता था, चित्ता पटका कर घोड़े का मृत्र पिलाता था, कितनेक को
हाथी का मूत्र पिलाता, यावत् ( उपरोक्त सर्व मूत्रादि) भेड़ का मूत्र पिलाता था- कितनेक को ऊंधा पटकवा कर
सड़ २ शब्दो से वमन (उल्टी) कराता था, कितनेक को मस्तक पर उन ही मूत्र के कुंडे रखा कर दुःख देताथा-कि-
तनेक को हस्तबंधनों से बंधवाता था, कितनेक को पगबंधनों से बंधवाता था, कितनेक को हथकड़ियाँ पहिनाता
था, कितनेक को वेडियों पहनाता था, कितनेक के शरीर इकट्ठे करके (सुकड़ा कर )जकड़ कर बंधवाता था, कितनेक
को सांकलो से बंधवाता था- कितनेक के हाथ छेदन कराता था, ‘यावत् ( कितनेक के पैर-नाक - होट- जीभ-
मस्तक छेद कराता था) शस्त्र द्वारा छेदन कराता था-कितनेक को बांस की सोटियों से यावत् (वेतों से-आमली की
लकड़ियों से - चमड़े के चावुकों से- चमड़ा वींटी हुई सोटियो से) वृक्षादिक की छाल से बनी लकड़ियों से पिटवाताथा.
टीकार्थ-'अप्पेगइया णं तेणं चेव उविलं दलयति ' कितनेक को उन ही मूत्र कुंडों से (मस्तक पर रखवा कर ) तकलीफ
देता था. 'संकोडिय मोडिय' सकोचिताश्च मोटिताच - संकुचित अंग और चलिताङ्ग. 'अप्पेगइए हत्थ छिन्नए करेति ; यावत् करण
से ऐसा देखा जाता है- "पायछिन्नए एवं नक्कउट्ठजिव्भ सीसाछिन्नए" इन सब का अर्थ मूल में लिख दिया गया है - 'सत्थोवाडि-
॥२१६॥
विपाक
सूत्र
दुः-वि.
छट्ठा
अध्ययन
॥२१७॥
यए' शस्त्रावपाटितान् - तलवार बगैरा शस्त्र से विदारण किये हुवे. अप्पेगइया वेणुलयाहि' यहां पर यावत् करण से - 'वेत्तलयाहि य
चिंचलयाहि " इत्यादि. इनका अर्थ मूलार्थ में उल्लिखित है.
मूल अप्पेगइए उत्तारणए कारवेति उरे सिलं दलावेति तओ लउलं छुभावेइ २ त्ता पुरिसेहिं उ-
कंपावति अप्पेगइए तंतीहि य जाव सुत्तरज्जूहि य हत्येसु पायेसु य बंधावेति अगडसिओचूलयालंग पज्जेति
अप्पेगइए असिपत्तेहि य जाव कलंबचीरपत्तेहि य पच्छाति खारतेल्लेणं अभिंगावेति अप्पेगइए निडालेसु
य अवदूसु य कोप्परेसु य जाणुसु य खलुएसु य लोहकीलिएसु य कडसकाराओ य दलावेति अलए भंजाति
अप्पेगइए सुतीओ य दंभणाणि य हत्थंगुलियासु य पायंगुलियासु य कोहिल्लएहिं आउडावेति २ त्ता भूमि
कंडूयावेति अप्पेगइए सत्थेहि य जाव नहच्छेदणेहि य अंगं पच्छावेइ दब्भेहि य कुसेहि य उल्लवद्धेहि य
वेढावति आयबसि दलयति सुक्के समाणे चडचडस्स उप्पाडेंति ।
अर्थ-कितनेक को चित्ता कराता था फिर उनकी छातियों पर सिलाओं रखवाता था उसके ऊपर एक बडा
लक्कड़ रखा कर दोनों तर्फ पुरुषों से चिरवाता था, कितनेक को तांतों द्वारा यानी महीन डोरी से (जो कि चमड़ी
में घुस जाय ) यावत् (जाड़ी डोरी से - चमड़े की डोरी से - बाल की डोरी से ) सूत के रस्सों से हाथ-पैर बंध-
॥२१७॥
विपाक सूत्र छटा अध्ययन ॥२२०॥ xx xx xx XX xx .. अर्थ- तत्पश्चात् वह दुर्योधन कोतवाल ऐसे कृत्यों से अत्यन्त पाप कर्म यांध कर इकत्तीस सौ वर्ष की पूरी आयुप पाल कर काल समय काल करके छट्ठी पृथ्वी में (छटी नारकी मे) यावीस सागरोपम के उत्कृष्ट आयुष्य वाले नारक पने उत्पन्न हुवा. टीकार्थ- मूल-से णं ततो अणंतरं उवहित्ता इहेव महुराए णगरीए सिरीदामस्स रपणो बंधुसिरीए देवीए कुच्छिसि पुत्तत्ताए उववन्ने, तते णं बंधुसिरी णवण्हं मासाणं बहुपडिपुन्नाणं जाव दारगं पयाया, तते णं तस्स दारगस्स अम्मापियारो निव्वत्ते वारसाहे इमं एयारूवं नामधेज्नं करोति होउ णं अम्हं दारगाणं नंदिसेणे नामेणं, तते णं से नंदिसेणे कुमारे पंचधातीपरिखुडे जाव परिवुड्ढइ, तते णं से नदिसेणे कुमारे उम्मुक्कवाल भावे जाव विहरति, जोव्वणगमणुपत्ते जुवराया जाते यावि होत्था। अर्थ - तदनन्तर वह वहां से निकल कर इस ही मथुरा नगरी में श्रीदामराजा की बंधुश्री रानी की कूक्षि- में पुत्रपने उत्पन्न हुवा, वाद बंधुश्री को नौ मास परिपूर्ण होने पर यावत् पुत्र का जन्म हुवा, तब उस लड़के के मात-पिताने यारह दिन व्यतीत होने पर यह इस प्रकार का नाम रक्खा-हमारे पुत्र का नाम 'नन्दिसेन ' हो, अय २२०॥
विपाक वह नंदिसेन कुमार पांच धायमाताओं से युक्त होकर बड़ा होने लगो, तब वह नंदिसेन कुमार बाल भाव से मुक्त होकर यावत् युवा अवस्था में विचरता था और युवराज पद को प्राप्त होगया था। टीकार्थ- दुः-वि. छट्टा x xx xx xx xx अध्ययन ॥२२॥ लोभांधता से पुत्र का पिता के प्रति जुल्मी विचार उग्रपापका प्रत्यक्ष फल 22RRRRRRRRRRRRRRRRRENT TIMIRRIA PAN मूल तते णं से गंदिसेणे कुमारे रज्जे य जाव अंतेउरे य मुच्छित्ते इच्छति सिरीदामं रायं जीवियातो ववरोवित्तए सयमेव रज्जसिार कारेमाणे पालेमाणे विहरित्तए, तते णं से गंदिसेणे कुमारे सिरीदामस्सरन्नो बहुणि अंतराणि य छिद्दाणि य विवराणि य पडिजाग़रमाणे विहरति, तते णं से नंदिसेणे कुमारे सिरीदामस्स रन्नो अंतरं अलभमाणे अन्नया कयाई चित्तं अलंकारियं सदावेति २ त्ता एवं वयासी. ॥२२॥ Tiny
विपाक
दुः-वि.
छट्ठा
अध्ययन
॥२२४॥
-
xx
xx
xx
xx
अर्थ-तदनन्तर उस चित्त नामक नापित ने नन्दिसेन कुमार की यह बात सुनी तब उस के दिल में ऐसा
विचार उत्पन्न हुवा-"यदि मेरे इस विचार को राजा जान लें तो मैं नहीं जान सकता कि मुझे किस बुरी मौत
से मारें ?” इस तरह भयभीत होकर जहां पर श्रीदाम राजा है वहां पर आता है, प्राकर के श्रीदाम राजा
एकान्त में गुप्तपने हाथ जोड़कर इस तरह निवेदन किया- निश्चय करके इस प्रकार हे स्वामिन् ! नन्दिसेन
कुमार राज्य में यावत् (ऊपर का हकीकृत कही) आसक्त हुवा है, इसलिये आप को जीते को मरवा कर स्वयं राज्य
लक्ष्मी भोगता हुवा और पालता हुवा विचरना चहाता है.
टीकार्थ-
मूल-तते णं से सिरिदामे राया चित्तस्स अलंकारियस्स अंतिए एयम सोच्चा निसम्म आसुरुत्ते
जाव साहक्षु णंदिसेणं कुमारं पुरिसेहिं सद्धिं गिण्हावेति एएणं विहाणेणं वझं आणवेति, तं एवं खलु गोयमा!
णदिसेणे पुत्ते जाव विहरति.
अर्थ-पश्चात् श्रीदाम राजा ने चित्त नापित के पास से यह समाचार सुने सुनकर तत्काल क्रोधाकान्त हुवा
भृकुटी चड़ाकर नन्दिसेन कुमार को राजपुरुषो द्वारा पकड़वा लिया और इस प्रकार से (तुमने देखा उस तरह) वध
xx
॥२२४॥
विपाक
करने की आज्ञा दी, इस प्रकार निश्चय कर हे गौतम ! वह नैदिसेन पुत्र दुःखों को भोगता हुवा रहा है।
टीकार्थ--
दुः-वि.
छट्टा
xx
xx
xx
xx
xx
अध्ययन
॥२२५॥
आखरी खुलासा
मूल-नंदिसेणे कुमारे इओ चुए कालमासे कालं किच्चा कर्हि गच्छिहिइ- कहिं उववजिहि ? गौय-
मा! णंदिसेणे कुमारे सही वासाइं परमाउयं पालइत्ता कालमासे कालं किच्चा इमिसे रयणप्पभाए पुढवीए
संसारो तहेव, ततो हत्थिणाउरे णगरे मच्छत्ताए उववजिहिति, सेणं तत्थ मच्छीएहिं वधिए समाणे तत्थेव
सेहिकुले बोहिं सोहम्म कप्पे. महाविदेहे वासे सिज्झिहिति बुज्झिाहिति मुच्चिहिति परिनिविहिति सव्वदु-
क्खाणमंतं करोहिति, एवं खल्लु जंबू ! निक्खेवो-छहस्स अज्झयणस्त अयमढे पन्नत्तिबेमि । (सू० २७)
छहमज्झयण सम्मत्तं ॥६॥
॥२२५॥
विपाक
पक्ष
दु:-वि.
* सातवों अध्ययन *
(उम्बरदत्त)
सातवाँ
॥२२८॥
अध्ययन
मूल-जइ णं भंते ! उक्खेवो सत्तमस्स - एवं खलु जंवू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं पाडलसंडे
णगरे वणसंडे नाम उज्जाणे उम्बरदत्तो जक्खो, तत्थ णं पाडलसंडे णगरे सिद्धत्थे राया तत्थ णं पाडलसंडे
गरे सागरदत्ते सत्यवाहे होत्था अढे० गंगदत्ता भारिया, तस्स णं सागरदत्तस्स पुत्ते गंगदत्ताए भारियाए
अत्तए उंवरदत्ते नामं दारए होत्था अहीण जाव पंचिंदियसरीरे
अर्ध- जम्बू स्वामी सुधर्म स्वामी से प्रार्थना करते हैं कि हे भगवन् ! जो छठे अध्ययन का आपने यह अर्थ
प्रकाशित किया तो अय कृपा कर सातवें अध्ययन का उत्क्षेप (प्रस्तावना- विस्तार) फरमाईयेगा- तब सुधर्म
गणधर भगवान् इस प्रकार पोले-निश्चय करके इस कदर हे जम्यो। उस काल उस समय में पाटलखंड नाम का
॥२२८॥
विपाक
दुः-वि.
सातवा
सूत्र
नगर था, वनखण्ड नामक उद्यान था, उसमें उम्बरदत्त नाम का यक्ष था, इस नाम का यक्षायतन था, उस
पाटलखंड नगर में सिद्धार्थ संज्ञक राजा राज्य करता था, उस ही पाटलखंड नगर में सागरदत्त सार्थवाह रहता था,
वह धनाढ्य सेठ था, उसके गंगदत्ता भार्या थी, उस सागरदत्त का पुत्र और गंगदत्ता का आत्मज (जायन्दा)
उम्बरदत्त नाम का लड़का था, अहीन यावत् पूर्ण पंचेन्द्रिय शरीर वाला था.
टीकार्थ- 'जइणं भैते! जो हे भगवन् ! इत्यादि सातवें अध्ययन का उत्क्षेप (विस्तार) कहना .
अध्ययन
॥२२९॥
RSS
गौतम स्वामी एक दुःखी भिखारी को देखते हैं
RECREGREENBCNBCRACRETREG
मूल-तेणं कालेणं तेणं समएणं समोसरणं जाव परिसा पडिगया, तेणं कालेणं तेणं समएणं भगवं
गोयमे तहेव जेणेव पाडलसंडे णगरे तेणेव उवागच्छति पाडलसंडं णगरं पुरथिमिल्लेणं दुवारेणं अणुप्पविस-
ति तत्थणं पासति एग पुरिसं कच्छुल्लं कोढियं दोउयरियं भयंदरियं अरिसिल्लं कासिल्लं सासिल्लं सोगिलं
॥२२९॥
विपाक
पत्र
दु:-वि.
सातवा
॥२३२॥
अध्ययन
"भत्तपाणं आलोएइ २ ता भत्तपाणं पटिदंसह २ ता समणेणं भगवया अभणुनाए समाणे" यानी आहार पानी की आलाचना करते
है, आलोचना करके भातपानी प्रभु को दिखाते हैं, दिखा कर श्रमण भगवन्त की आज्ञा प्राप्त कर; इत्यादि जानना,
मूल-तदा भगवं गोयमं उच्चनीय जाव अडति अहापज्जत्तं गिण्हति २ ता पाडलीसंडाओ नगरा-
ओ पडिनिक्खमति २ त्ता जेणेव समणे भगवं० (शेष पाठ ऊपर के टीकार्थ में) भत्तपाणं आलोएति २ त्ता
भत्तपाणं पडिदंसेति २ त्ता समणेणं भगवया अन्भणुन्नाए समाणे जाव विलमिव पन्नगभूते (अप्पाणेणं आ-
हारमाहारेइ) संजमेणं तवसा अप्पाणं भावमाणे विहरति.
अर्थ-तय वैराग्यपद शोभित गौतम स्वामी (नगर में आहार के लिये) ऊंच-नीच यावत् (मध्यम)
घरों में भ्रमण करते थे, ज़रूरत जितना आहार लिया, लेकर पाडलीखण्ड नगर से वापिस निकलते हैं, निकलकर
जहां पर श्रमण भगवन्त. (महावीर विराजते हैं वहीं पर आते हैं आकरके) भात पानी की आलोचना करते हैं,
करके भगवन्त को आहार पानी दिखाते हैं, दिखाकर श्रमण भगवन्त की आज्ञा प्राप्तकर यावत् पिलके माफिक
यानी यिल में सर्पप्रवेशवत् (विशेष अर्थ टीकार्थ में) आपने आहार किया; पश्चात् संयम-तप से आत्मभावना
करते हुवे रहते हैं.
॥२३२॥
विपाक
सातवा
अध्ययन
॥२३॥
टीकार्थ- 'विलमिव पन्नगभूए अप्पाणणं आहारमहारेइ' अर्थ मूलार्थ के माफिक. क्या होकर ? कहते हैं कि-नाग होकर
यानी सर्प के आचार के माफिक भगवान् गौतम आहार का रसास्वाद नही करने से नही चबाते हैं इससे, किस प्रकार का आहार ?
स्पर्श नहीं करने से बिलके माफिक; तात्पर्य यह है कि-सर्प बिलको नहीं छूता हुवा उसमें अपने को प्रवेश करता है, इस ही प्रकार
गौतम स्वामी रस का स्वाद नहीं लेने के कारण आहार को जिव्हा से और दान्तों से स्पर्श नहीं करते हुवे भोजन करते हैं *.
मूल
तते णं से भगवं गोयमे दोच्चपि छडक्खमण पारणगंसि पढमाए पोरसिए सज्झाए जाव
पाडलिसंडं नगरं दाहिल्लेणं दुवारेणं अणुप्पविसति तं चेव पुरिसं पासति कच्छुल्लं तहेव जाव संजमेणं तवसा
* सर्प विल में प्रवेश करे उस तरह मुनि महात्मा आहार करें, अर्थात् बिल में प्रवेश करते समय सर्प यिल को नही छूता, ठीक उस
ही तरह मुनि गौचरी करते समय आहार का निवाला दॉतों को और जीभ को स्पर्श न हो उस तरह मुंह में रक्खे कि रखते ही गट उतर
जाय, मतलब कि रस के स्वाद का त्यागी मुनि भोजन को न दान्तों से चवावे न जबान से स्वाद ले-अगर यहां कोई शंका करे कि इस
तरह आहार करने की आशा में स्वास्थ्य रक्षा का खयाल नही रक्खा गया क्योकि बिना चबा कर खाने से अजीर्ण होगा और उससे
नानाविध रोग उत्पन्न होंगे, जिससे संयम पालने में बाधा पहुंचेगी, इत्यादि- उत्तर में निवेदन है कि तपस्वी मुनिजनों की जठराग्नि
बड़ी दिप्तिमान होती है, वास्ते चबाया हुवा और बिना चवाया हुवा सव आहार अच्छी तरह पाचन हो जाता है। अतएव स्वास्थ रक्षा में
जरा भी आपत्ति न होगी।
॥२३३॥
विपाक
पत्र
दुः-वि.
सातवाँ
-
॥२३६॥
अध्ययन
-
xx
xx
xx
xx
xx
वाला (शष सब ऊपर के अनुसार) एक पुरुष यावत् भिक्षा मांगता हुवा देखा, फिर मैने दूसरे छठक्षमण के
पारणे दक्षिण दिशा के दरवाजे में प्रवेश करते उसी तरह उसको देखा, बाद तीसरे छटक्खमण के पारणे पश्चिम
दिशा के दरवाजे में प्रवेश करते उस पुरुष को उसही कदर देखा, पश्चात् चौथे बेलेके पारणे में उत्तर दिशा के दर-
वाज़े में प्रवेश करते उस खुजली वगैरा के रोग वाले आदमी को उस ही तरह यावत् भिक्षा मांगता हुवा देखा;
उस को देख कर मुझे विचार उत्पन्न हुवा, इस प्रकार सब हकीक़त कहकर गौतम गणधर ने उस पुरुष का पूर्वभव
पूछा, तष भगवन्त महावीर स्वामी ने इस प्रकार फ़रमाया-
टीकार्थ-
मूल-एवं खल्लु गोयमा! तेणं कालेणं तेणं समएणं इहवे जम्बूदीवे दीवे भारहे वासे विजयपुरे नाम
नगरे होत्था रिद्धस्थिमियसमिद्धे०, तत्थ णं विजयपुरे णगरे कणगरहे नामं राया होत्था, तस्स णं कणगरहस्स
रनो धन्नंतरी नामं विजे होत्था, अगाउव्वेयपाठए, तंजहा-कुमार भिचं १ सालागे २ सल्लकहत्ते ३ कायेति-
गिच्छा ४ जंगोले ५ भूयविज्जे ६ रसायणे ७ वाजीकरणे ८ सिवहत्थे सुवहत्थे लहुहत्थे।
अर्थ-निश्चय करके इस प्रकार हे गौतम ! उस काल उस समय में इस ही जम्बुद्वीप नामक द्वीप में भरत-
or
॥२३६॥
विपाक
दुः-वि.
सातवा
अध्ययन
||२३७||
क्षेत्रान्तरगत विजयपुर नाम का नगर था रिद्धिवाला निर्भय और समृद्धिशाली था, उस विजयपुर नगर में कनक-
रथ नाम का राजा राज्य करता था उस कनकरथ राजा के धनवन्तरी नाम का वैद्य था, वह अष्टाङ्ग (आठ अङ्ग
वाला) आयुर्वेद पढा हुवा था. वे आठ अङ्ग इस प्रकार हैं- १ कुमारभृत्य यानी बालक का पोषण करने वाला
शास्त्र २ शालाक्य यानी शलाका (शलाई) कर्म का प्रतिपादन करने वाला शास्त्र ३ शल्यहत्य यानी शलको
याहार निकालने वाला शास्त्र ४ कायचिकित्मा यानी शरीरके रोगों का इलाज करनेवाला शास्त्र ५ जंगोल अर्थात्
ज़हर को नाश करने वाला शास्त्र ६ भूतविद्या अर्थात् भूतादि निग्रह करने वाला शास्त्र ७ रसायन यानी अमृत-
रस की प्राप्ति कराने वाला शास्त्र ८ वाजीकरण अर्थात् अश्व जैसा ताकतवर बनाने वाला शास्त्र, इस पठन के
अतिरिक्त उस का हाथ आरोग्य करने वाला, सुख करने वाला और दक्ष हाथ था- अष्टाङ्ग का विशेषार्थ टीकार्थ
में लिखा जायगा।
टीकार्थ- 'अटुंगाउव्वयेपाढए' आयुर्वेद :- वैद्यक शास्त्र 'कुमारभिच्च' कुमारभृत्यं - बालकों का पोपक, अर्थात् बच्चों के
पोषण में उत्तम शास्त्र-दूध के दोषों को शोधने वाला और दोष वाले दूध से उत्पन्न व्याधियों का नाश करने वाला. १ 'सलाग
शालाक्यं-शलाई से किये जाने वाले काम का बताने वाला शास्त्र, अर्थात् कान मुख वगैरा में होते हुवे रोगों को तथा ऊपर (कण्ठमाला-
का स्थान ) जन्तुओं में रहे हुवे.रोगों को- (शली के प्रयोग से) नाश करने वाला. २ 'सल्लहत्ते' शल्यहत्थं -शरीर के किसी भी
॥२३७॥
विपाक
सूत्र
दु:-वि.
सातवॉ
॥२४॥
अध्ययन
तलेहि य भजेहिं य सुरं च आसाए माणे विसाएमाणे विहरति ।
अर्थ-तत्पश्चात् वह धन्वन्तरी वैद्य विजयपुर नगर में कनकरथ राजा को उसके रणवास की स्त्रियों को और
दूसरे बहुतसे राजा, ईश्वर (धनाढ्य) यावत् सार्थवाह को तथा अन्य बहुतेरे दुर्यल (कमजोर) ग्लान, व्याधित
रोगी, अनाथ, सनाथ, श्रमण (गैरिकादि साधु) ब्राह्मण, सामान्य भिक्षु (भिखारी), कापालिक, कार्पटिक
चीथरे पहन कर भिक्षा मांगने वाले) इन सब रोगग्रस्तों में से कितनेक को मच्छ का मांस खाने का उपदेश देता
था;
कितनेक को काछवे का मांस, कितनेक को ग्राह का मांस, कितनेक को मगर का मांस, कितनेक को सुंसु
मार (पाड़े जैसा एक जलचर) का मांस, कितनेक को बकरे का मांस इस ही प्रकार भेड़-रोझ-सुवर - हरण-
ससले का तथा गाय का मांस, असे का मांस खाने को कहता था; कितनेक को तीतर का मांस, कितनेक को
वर्तक पक्षी का मांस-लावक (पक्षीविशेष) का मांस कबूतर का मांस-मोर का मांस खाने का कहता था; और
बहुतसे जलचर-स्थलचर-खचर (जल में चलने वाले-ज़मीन पर चलने वाले-आकाश में उड़ने वाले) के मांस
खाने का उपदेश करता था; अर्थात् औषधि रूप खाने का कहता था-आप खुद धन्वन्तरी वैद्य उन बहुत से मच्छ
के मांस यावत् मोर के मांस तथा अन्य बहुत से जलचर - स्थलचर-खचर जीवों के मांस सेककर, तलकर, भुंज-
कर, मदिरा के साथ मिला कर एक बार आस्वादन करता हुचा, वारंवार आस्वादन करता हुवा निवास करता था.
॥२४॥
विपाक दुः-वि. सातवा सूत्र - अध्ययन ॥२४॥ - - टीकार्थ- 'राइसर' इस से यहां पर थावत् शब्द से- "तलवरमाइंबियकोमुवियसेट्टी" अर्थात् कोतवाल-मण्डपनिवासी- बहुकुटुम्बी और सेठजन. 'दुबलाण य' हीनबलानां-दुर्बलों को. 'गिलाणाण य' ग्लानानां-क्षीणहर्पवाले को यानी शोक से उत्पन्न पीड़ावालों को. 'वाहियाण य' व्याथिता + व्यथिता तेषां-जिनको बहुत काल का कोढ बगैरा रोग हो और गर्मी आदि से पीड़ा- ते हों उनको. 'रोगियाणं' रोगिनां-दीर्घकाल से ज्वरादि उत्पन्न हुवे हों उनको. इस प्रकार के किनको ? 'सणाहाण य’ सनाथा- नाम् - नाथ सहितों को. 'अणाहाण य' अनाथानाम् - नाथरहितों को. 'समणाण य’ गैरिकादीनां-गैरु में रंगे हुवे कपड़े पहनने वाले साधुओं को यानी सन्यासी बगैरा को. 'भिक्खगाण य' भिक्षुकानाम् - दूसरे भिखारियों को. 'करोडियाण य' कापालिकानां हाथ में खप्पर रखकर भिक्षा मांगने वाले को. 'आउराणां चिकित्सा के योग्य न हो उनको. 'अप्पेगइयाणं मच्छमंसाई उवइसति' इस वाक्य के अनुसार आगे के वाक्य भी ग्रहण करना. मत्स्य - कच्छपादि सब मूलार्थ के माफिक जानना. मूल-तते णं से धनंतरी विज्जे एयकम्मे सुबहुं पावकम्मं समजिणित्ता बत्तीसं वाससयाई परमा- उयं पालइत्ता कालमासे कालं किच्चा छडीए पुढवीए उक्कोसेणं बावीससागरोवमाओ उववण्णे; तते णं गंग- दता भारिया जायणिंदुया यावि होत्था जाया जाया दारगा विनिधायमावजंति, तते णं तीसे गंगदत्ताए सत्यवाहीए अन्नया कयाइं पुव्वरत्तावरतकालसमयंसि कुडुंबजागरियं जागरमाणीए अयं अज्झथिए समुप्पन्ने । ॥२४॥ Mr.
विपाक
पत्र
दुः-वि.
सातवा
॥२४४॥
अध्ययन
पान से लेकर मधुर-कोमल संलाप तक सब का अर्थ मूलार्थ के अनुसार समझना- 'अपुन' अविद्यमानपुण्या-जिसके पुण्यउदय
नहीं. 'अकयपुन्न' अकृतपुण्या-जिसके पूर्व में पुण्य किये हुवे नहीं. 'अपुन्न' अपूर्णः- पूर्ण मनारेथ नहीं होने से. 'एत्तो। एते-
पां- इन नालक चेष्टाओं को. 'एगयरमवि' एकतरपि + अन्यतरदपीति- एक भी या दूसरा भी, इत्यादि.
मूल-तं सेयं खलु मम कल्ले जाव जलंते सागरदत्तं सत्यवाहं आपुच्छित्ता सुवहुं पुप्फवत्थगंधमल्ला-
लंकारं गहाय बहुमित्तणाइणियगसयणसंबंधिपरिजनमहिलाहिं सद्धिं पाडलसंडाओ णगराओ पडिनिक्खमित्ता
बहिया जेणेव उंवरदत्तस्स जक्खस्स जक्खायतणे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता तत्थ णं उंवरदत्तस्स जक्ख.
स्स महारिहं पुप्फच्चणं करेइ करेइत्ता जाणुपायवडियाए ओयावित्तए।
अर्थ वह मेरे को कल्याणकारी है कि-निश्चय करके कल यावत् सूर्योदय होने पर सागरदत्त सार्थवाह को
पूछकर बहुत से पुष्प-वस्त्र-गंध-माला-अलङ्कार लेकर के बहुत से मित्र-ज्ञाति-निजक स्वजन-सम्बंधी और
परिजन की महिलाओं के साथ पाडलखण्ड नगर से निकलकर याहार जहां उम्बरदत्त यक्ष का यक्षभुवन है वहां
जाना, जाकर वहां पर उम्बरदत्त यक्ष की बड़ों के योग्य पुष्प पूजा करूं, करके घुटनों से उनके पैर में पड़कर इस
प्रकार की मानता करूं-
॥२४४॥
.
दु:-वि
विपाक
सातवा
सूत्र
अध्ययन
॥२४५॥
टीकार्थ-'कलं' कल्यं-कल. यहां पर यावत् करणसे “पाउप्पभायाए रयणीए फुल्लुप्पलकमलकोमलुम्मितिए अहपंडुरे
पभाए" इत्यादि जानना "उटिए सहस्सरस्सिमि दिणयरे तेयसा जलंते" अर्थात् प्रातःकाल में प्रकाश होने पर, कमलपत्र विकश्वर
होने पर, हरण के नेत्र कोमलता से खुलने पर, प्रभात उज्ज्वल होने पर तथा उदयप्राप्त सहस्रकिरण सूर्यतेज से जाज्वल्यमान होने पर.
मूल-जतिणं अहं देवाणुप्पिया ! दारगं वा दारियं वा पयामि तो णं अहं तुम्भं जायं च दायं च
भायं च अक्खयणिहिं च अणुवइस्सामित्तिक? ओवाइयं ओवाइणित्तए, एवं संपेहेइ २ त्ता कल्लं जाव जलं-
ते जेणेव सागरदत्ते सत्थवाहे तेणेव उवागछति २ त्ता सागरदत्तं सत्थवाहं एवं वयासी- एवं खल्लु अहं देवा-
णुप्पिया ! तुन्भेहिं साद्धं जावं न पत्ता, तं इच्छामिणं देवाणुप्पिया तुब्भेहिं अब्भणुण्णाया जाव उवाइणित्तए,
तएणं से सागरदत्ते गंगदत्तं भारियं एवं वयासी- ममंपिणं देवाणुप्पिए ! एसचेव मणोहरे कहं णं तुमं दार-
गंवा दारियं वा पयाएजसि ? गंगदत्ताए भारियाए एयमहं अणुजाणति ।
अर्थ-हे देवानुप्रिय ! जो मैं पुत्र वा पुत्री को जन्म दूं तो मैं आपके याग की (पूजा की) अथवा यात्रा की,
दान की, भागकी (लाभ में से अमुक हिस्से की) और देव भंडार की वृद्धि करूंगी, ऐसा करके मेरीमानता माननी क-
ल्याण कारी है; ऐसा उसने विचार किया, विचार करके दूसरे दिन प्राप्तःकाल में सूर्योदय होने पर जहां सागरदत्त
॥२४५॥
विपाक
पत्र
दु:-वि.
सातवा
॥२४८॥
अध्ययन
किये, करके जहां उम्परदत्त यक्ष का यक्षायतन है वहाँ पर आती है, भाकर उम्परदत्त यक्ष को देखते ही प्रणाम
किया, करके मारपीछी को हाथ में ली, लेकर उम्बरदत्त यक्ष को मोरपीछी से प्रमार्जन किया, प्रमार्जन करके जल
धारा से स्नान कराया, कराकर पारीक- कोमल सुगंधी वन से शरीर को पूँछा यानी अंगलूहना किया, करके
यक्षप्रतिमा को सपेत वस्त्र पहनाया, पहनाकर पड़ों के योग्य पुष्पारोहण-वस्त्रारोहण-मालारोहण-गंधारोहण और
चूर्णारोहण किया अर्थात् ये सय चीजें चढ़ाई तथा धूप खेवा (दीपक किया) इत्यादि पूजन करके घुटनों के बल नीचे
झुक कर इस प्रकार योली-हे देवो के प्यारे ! जो मैं पुत्र या पुत्री को जन्म दूं तो आप की (ऊपर के अनुसार) सेवा
करूंगी ! इस प्रकार उसने मानता मानी, मानता कर जिस दिशा से आइ थी उस ही दिशा में वापिस लौट गई।
टीकार्य-'उवाइणित्तए उपयाचित्तुं- ममत 'कयकोउयमंगल' कौतुकानि-मपीतिलकादि. मङ्गलानि-दही, चावल
आदि. 'उल्लपडसाडिय' भीजावस्र पहनकर. 'पम्हल' इससे “पम्हलसुकुमालगंधकासाइयाए गायलट्ठी ओल्हइ" अर्थ मूलार्थवत्-
'एवं वयति' इस प्रकार बोली- सातवें अध्ययन का विवरण पूर्ण हुवा.
मूल-तते णं से धन्नंतरी विजे ताओ नरयाओ अणंतरं उवहित्ता इहेव जंबुद्दीवे दीवे पाडलसंडे नगरे
गंगदत्ताए भारियाए कुच्छिसी पुत्तत्ताए उववन्ने, तते णं तीसे गंगदत्ताए भारियाए तिहं मासाणं बहुपडि-
॥२४८॥
विपाक
दुः-वि.
सातवा
॥२४९॥
अध्ययन
पुन्नाणं अयमेयारूवे दोहले पाउब्भूते- धन्नाओ णं ताओ जाव फले जाओ णं विउलं असणं पाणं खाइमं
साइमं उवक्खडाति २ त्ता बहूहिं जाव परिखुडाओ तं विउलं असणं पाणं खाइमं साइमं सुरं च पुप्फ जाव
गहाय पाडलसंडं नगरं मझमझेणं पडिनिक्खमइ पडिनिक्खमित्ता जेणेव पुक्खरिणी तेणेव उवागच्छति
तेणेव उवागच्छित्ता पुक्खरिणी ओगाहिति पहाता जाव पायच्छित्ताओ तं विउलं असणं पाणं खाइमं साइमं
बहूहि मितणाइ जाव सद्धिं आसाति दोहलं विणयेति एवं संपेहेइ संपहित्ता.
अर्थ -तब वह धन्वन्तरी वैद्य का जीव उस नरक से अन्तर रहित निकलकर इस ही जम्बुद्वीप नामक द्वीप
के अन्दर पाडलसण्ड नगर में गंगदत्ता भार्या के गर्भ में उत्पन्न हुवा, बाद उस गंगदत्ता भार्या को तीन मास-
पूर्ण होने पर इस प्रकार का दोहला उत्पन्न हुवा-वे माताऍ धन्य हैं यावत् (जन्म-जीवन) सफल है कि जो बहुत
सा अशन-पान-खादिम-स्वादिम तैयार करावें, तैयार करा कर बहुतसी स्त्रियों के साथ मिल कर वह विपुल असन
पान-खादिम-स्वादिम, मदिरा तथा पुष्प वगैरा को यावत् ग्रहण कर पाडलखण्ड नगर के बीचोबीच होकर बाहर-
निकली, निकल कर जहां पुष्करिणी नाम की बाव है वहां आती है, आकर पुष्करिणी में प्रवेश करें, उस में लान
करके यावत्-प्रायश्चित कर उस असन-पान-खादिम-स्वादिम बहुतसी मित्रादि की स्त्रियों के साथ यावत् आस्वादन
॥२४९॥
विपाक सूत्र दुः-वि. सातवाँ ॥२५२॥ अध्ययन XX xx XX xx xx सार्थवाहिनी को सर्व अलंकारों से शोभित की, पश्चात् वह गंगदत्ता भार्या उन मित्रादि की और अन्य गांव की बहुत स्त्रियों के साथ उन विपुल असन-पान-खादिम-स्वादिम और मदिरा का आस्वादन करती हुई अपना दोहला पूर्ण किया, पूर्ण करके जिस दिशामें से आई थी उस ही दिशामें वापिस लौट गई। टीकार्थ- *96733303799735039 पुत्र का जन्म-माता पिता का विरह कष्टमय भिखारी दशा २ मूल-सा गंगदत्ता सत्थवाही पसत्थदोहला तं गम्भं सुहसुहणं परिवहति, तते गं सा गंगदत्ता भारिया ण्हवणं मासाणं पहुपडिपुन्नाणं जाव पयाया, ठिइवडियं जाव जम्हाणं इमे दारए उम्बरदत्तस्स जक्खस्स उववातियलद्धते तं होऊणं दारए उंबरदत्ते नामेणं, तते णं से उंबरदत्ते दारए पंचधातिपरिग्गहिए परिड्ढइ, तते णं से सागरदत्ते सत्थवाहे जहा विजयमित्ते जाव कालमासे कालं किच्चा, गंगदत्तावि, उंवरदत्ते ॥२५२॥ 23
विपाक
सूत्र
दुः-वि.
सातवाँ
अध्ययन
॥२५३॥
निच्छुढे जाव उज्झियते, तते णं तस्स उम्बरदत्तस्स दारयस्स अन्नया कयावि सरीरगंसि जमगसमगमेव सोलस
रोगायंका पाउब्भूया; तंजहा-सासे खासे जाव कोढे, तते णं से उंबरदत्ते दारए सोलसहि रोगायंकेहिं अभिभूए
समाणे सडियहत्थं जाव विहरति, एवं खल्लु गोयमा! उंबरदत्ते पुरापोराणाणं जाव पच्चणुब्भवमाणे विहरति ।
अर्थ- अच्छे दोहलेवाली वह गंगदत्ता सार्थवाहिनी अपने गर्भ को सुखे सुखे पालन करती है, तय उस
गंगदत्ता भार्या ने नौ मास परिपूर्ण होने पर यावत् पुत्र को जन्म दिया उस की स्थितिपतिका (जन्मोत्सव )
करके यावत् यह हमारा पुत्र उम्बरदत्त यक्ष की मानता मानने से प्राप्त हुवा है इस लिय इस पुत्र का नाम 'उम्बर
दत्त' हो, बाद उम्बरदत्त लड़का पाँच धाय माताओं से पालन-पोषण होता हुवा बड़ा हुआ; पश्चात् वह सागरदत्त
सार्थवाह विजयमित्र की तरह यावत् काल समय काल किया, गंगदत्ता ने भी काल किया, उज्झितक के माफिक
उम्बरदत्त घर से निकाल दिया गया, बाद उस उम्बरदत्त लड़के को किसी एक वख्त शरीर में एक साथ सोलह
* यह एक सहज प्रश्न होता है कि, जैन सिद्धान्तानुसार और आत्म-अनुभव से यह ज्ञात होता है कि देव आदि कोई भी
नहीं दे सकते कर्मानुसार ही पुत्र संयोग होता है, तो फिर उम्बरदत्त यक्षदेव की मानता से पुत्र कैसे हुआ ? उत्तर में विदित हो कि
पुत्र प्राप्ति तो कर्म संयोगानुसार होती है, किन्तु देव निमित्त भूत हो सकता है, अतः व्यवहार मे निमित्त को नैमित्तक का ( कारण
को कार्य का ) रूप दिया जाता है, इसलिये यह प्रसङ्ग बाधक नहीं हैं।
पुत्र
॥२५३॥
विपाक
C
दुः-वि.
सातवाँ
.
॥२५६॥
अध्ययन
reOp000000
उपसंहार
1000000
अर्थ-इस सातवें अध्ययन में उम्यरदत्त भिखारी का करुणापूर्ण चित्र हृदय को हिला देता है, धनवन्तरी
वैद्य के भव में पापोपदेश का असत्य परिणाम जगज्जन को जागृत करता है, आखीर मोक्ष को प्राप्त करने का
खुलासा हर्षोत्पन्न करता है- मुमुक्षों ! आप इस उम्परदत्त के पूर्व-वर्तमान और भावि भवों पर पर्यालोचन कर
अपना हित साधनक पूर्ण लक्ष रखियेगा।
दुःख विपाक का सातवाँ अध्ययन मूल-अर्थ और टीकार्थ सहित सम्पूर्ण हुवा.
॥२५६॥
विपाक
* आठवाँ अध्ययन *
(शौर्यदत्त)
दुः-वि.
आठवॉ
अध्ययन
॥२५७॥
मूल-जइ णं भंते! अहमस्स उक्खेवो-एवं खलु जम्बु ! तेणं कालेणं तेणं समएणं सोरियपुरं ण-
गरं, सोरियवंडेसगं उज्जाणं, सोरियो जक्खो, सोरियदत्तो राया तस्सणं सोरियपुरस्स णगरस्स बहिया उत्तर
पुरच्छिमे दिसौभागे एत्थ णं एगे मच्छंदवाडए होत्था, तत्थ णं समुद्ददत्ते नामं मच्छंधे परिवसति अहम्मिए
जाव दुप्पडियाणंदे, तस्स णं समुद्ददत्तस्स समुद्ददत्ता नामं भारिया होत्था अहीण० पंचेंदियसरीरा, तस्स णं
समुद्ददत्तस्स पुत्ते समुद्ददत्ता भारियाए अत्तए सोरियेदत्ते नामं दारए होत्था, अहीण पडिपुण्णपंचिंदियसरीरे.
अर्थ-जम्वुस्वामी अपने गुरुदेव स्वधर्म स्वामी को पूछते हैं-हे भगवन् ! जो सातवें अध्ययन का इस प्रकार
(ऊपर आपने फरमाया) भगवन्त महावीर देवने अर्थ फरमाया-है तो हे पूज्य! अब आप आठवें अध्ययन का उत्क्षेप
॥२५७॥
R- विपाक xx xx XX XX :-वि. आठवा मन्त्र अध्ययन ॥२६॥ टकिार्थxx x *SHEKHARELIANTARIES रोगग्रस्त की पृच्छा-भगवन्त का प्रत्युत्तर रसोइये का निर्दय कृत्य EXERIOXEXEXHSHRSCREENEXANES मूल-इमे अज्झथिए समुपन्ने, पुरापोराणाणं जाव विहरति, एवं संपेहति संहिता जेणेव समणे भगवं, जाव पुन्वभव पुच्छा, जाव वागरणं एवं खल्लु गोयमा! तेणं कालेणं तेणं समएणं इहेव जम्बूद्दीवे दीवे भारहे वासे नंदिपुरे नामंणगरे होत्था, मित्तेराया तस्स णं मितस्स रन्नो सिरीए नामं महाणसिए होत्था अहम्मिए जाव दुप्पडियाणंदे, तस्स णं सिरीयस्स महाणासियस्स बहवे मच्छिया य वागुरिया य साउणिया य दिनभत्ति- भत्तवेयणा कल्लाकल्लं बहवे सोहमच्छा य जाव पडागातिपडागे य अए य जाव महिसे य तितिरे य जाव मयूरे य जीवियाओ ववरोति सिरीयस्स महाणसियस्स उवणेति- ॥२६॥ -
दुः-वि.
आठवाँ
विपाक
अध्ययन
॥२६१॥
अर्थ-गौतम स्वामी को इस प्रकार का विचार उत्पन्न हुवा- यह पुरुष पूर्वसंचित कर्मों को यावत् भोगता
हुआ रहता है, इस कदर विचार किया, विचार करके जहां श्रमण भगवन्त महावीर विराजते हैं वहां पर गौतम
गणधर आये, यावत् प्रभु से उस पुरुष का पूर्वभव पूछा, यावत् भगवन्त ने इस प्रकार उत्तर फरमाया-निश्चय
करके इस प्रकार हे गौतम! उस काल उस समय में इसही जम्बुद्वीप नामक द्वीप में भरत क्षेत्रांतरगत नन्दिपुर
नामक नगर था; मित्र नामका राजा था, उस मित्र राजा के श्रीयक नामक रसोइया था, वह अधर्मी यावत् दूसरों
को दुःख देकर आनन्द मनाने वाला था, उस श्रीयक रसोइये के बहुत से मच्छीमार-पशुमार-पक्षीमार नोकर थे
उनको पैसे घगैरा अथवा घी-अनाज बगैरा देता था, इससे वे हमेशां छोटे २ मच्छ यावत् पताकातिपताक जाति
के मत्स्य, बकरे यावत् भेंसे, तीतर यावत् मोर इत्यादि जीवों को मारकर श्रीयक रसोइये को सोंपते थे ,
टीकार्थ-' सोहमच्छा' छोटे २ मत्स्य; इससे यहां पर यावत् करण से "खवल्लमच्छा विज्झिडिमच्छा हलिमच्छा" इत्यादि
"भणमच्छा पडाया" अर्थात खवल्लादि जाति के मच्छ, पडाग जाति के मच्छ, यह अन्त-में जानना. यह सब मच्छों के रूढिग-
म्य भेद है. 'अएय' बकरे यावत् शब्द से “एलए य रोज्झे य सूयरे य मिगेय" अर्थात् भेड़-रोझ-सुअर और हिरण. 'तित्तरे यतीतर
रावत् शब्द से "चट्टए य लावए य कुक्कुड़े य” यानी वर्तक- लावक और कुकड़े समझना.
मूल-अन्ने य से वहवे तित्तरा य जाव मयूरा य पंजरंसि सनिरुद्धा चिट्टति, अन्ने य वहवे पुरिसे दि-
॥२६॥
विपाक
दुः-वि.
आठवा
अध्ययन
॥२६४॥
अर्थ-खुद वह श्रीयक रसोइया भी बहुत से यावत् जलचर के मांस-स्थलचर के मांस-खचर के मांस
और सब तरह के मांस रस तथा हरे शाक सेके हुवे, तले हुवे, मुंजे हुवे को मदिरा के साथ आस्वादन करता हुवा
रहता था, पश्चात् वह श्रीयक रसोइया ऐसे कार्य करता हुवा यहुतर पाप कर्मों का उपार्जन कर तेतीस सौ (३३००)
वर्ष की उत्कृष्ट आयुष्य पालकर काल समय में काल करके छट्टी नरक (मघा नरक) में उत्पन्न हुवा.
टीकार्थ- 'जलयरमंसेहिं ' से लेकर 'भज्जिएहिं ' तक सब शम्दों के अर्थ मूलार्थ के माफिक समझना.
136537994378639649627963364957
शौर्यदत्त का जन्म - मातापिता का मरण
अधीश पद प्राप्ति
SEE
मूल-तते णं सा समुद्ददत्ता भारिया निन्दू यावि होत्था, जाया जाया दारगा विणिहायमावज्जति
जह गंगदत्ताए चिंता आपुच्छणा उवातियं दोहला जाव दारगं पयाता, जाव जम्हाणं अम्हं इमे दारए
सोरियस्स जक्खस्स उवाइयलद्धे तम्हाणं होउ अम्हं दारए सोरियदत्ते नामेण, तए णं से सोरियदत्ते दारए
॥२६४॥
विपाक
आठवा
पंचधाई जाव उम्मुक्कबालभावे विषणयपरिणयमित्ते जोव्वणगमणुपत्ते होत्था, तते णं से समुद्ददत्ते अन्नया दुः-वि.
कयाई कालधम्मुणा संजुत्ते, ततेणं से सोरियदत्ते बहूहि मित्तणाइ सद्धिं रोयमाणे समुद्ददत्तस्स णीहरणं करेंति २
त्ता लोइयमयाइं किच्चाई करेंति, २ त्ता अन्नया कयाई सयमेव मच्छंदमहत्तरगतं उवसंपज्जित्ताणं विहरति ।
अध्ययन
॥२६५॥
अर्थ-तदनन्तर वह समुद्रदत्ता भार्या मृतवत्सा थी, वालक उत्पन्न हो होकर मरण-शरण होजाते थे, किसी
एक दिन उसे गंगदत्ता के माफिक विचार उत्पन्न हुआ (वे मातये धन्य हैं, कृतार्थ हैं इत्यादि सातवें अध्ययन
की तरह) भार को पूछना, यक्ष की मानता लेनी, दोहला उत्पन्न होना और पुत्रका जन्म होना; सर्व गंगदत्ता
के माफिक, यावत् इसलिये हमारा यह लड़का शौर्ययक्ष की मानता से प्राप्त हुआ है उससे हमारे इस पुत्र का नाम
'शौर्यदत्त हो बाद वह शौर्यदत्त पुत्र पांच धायमाताओं से पालन-पोषण होता हुआ पाल्यावस्था से मुक्त हुआ
परिणाममात्र से कलाको प्राप्त हुआ और युवा अवस्था में प्रवेश किया, पश्चात् वह समुद्रदत्त किसी एक दिन
मृत्यु के आधीन हुआ, तब शार्यदत्त ने बहुत से मित्रादिकों के साथ रोते हुए समुद्रदत्त की सीढी निकाली, नि-
कालकर लौकिक मरणकार्य किये, करके किसी एक दिन स्वयं मत्स्यबंध (मच्छीमार) के अधिपति पदको प्राप्त
कर विचरने लगा-रहने लगा।
॥२६५॥
विपाक
दुः-वि.
आठवाँ
सूत्र
अध्ययन
॥२६८॥
.
को पकड़ते थे, पकड़कर एक काष्टवाहण में उनको भरकर किनारे पर लाकर मत्स्यों के देर लगाते थे लगाकर उन
को धूप में सुखाते थे.
टीकार्थ:-- 'एगट्टियाहिं' नौभिः-नावोंद्वारा 'दहगलणेहि' इत्यादि 'एगट्टियं भरेंति' यह अन्त रूढिगम्य है; तथापि-
हृदगलनं से लेकर गलानि पर्यन्त-सब का अर्थ मूलार्थ के अनुसार जानना. 'वक्कबंधेहिय' वल्कबंधनैः-इत्यादि का अर्थ मूला-
थवत्. 'मच्छखलए करेंति' मत्स्यपुञान् कुर्वन्ति-मच्छों के ढेर लगाते थे.
मूल--- अन्ने य से वहवे पुरिसा दिन्नभइभत्तवेयणा आयवतत्तएहिं सोलेहि य तलेहि य भज्जेहि य
रायमग्गांस वितिंकप्पेमाणा विहरंति, अप्पणा वि य णं से सोरियदत्ते बहूहि सहमच्छेहि य जाव पडागाइप-
डागेहि सोल्लेहि य भज्जेहि य सुरं च आसाएमाणे विहरति ।
अर्थ -~अन्य पहुतसे पुरुष भक्त और वेतन रूप रोजगार लेने वाले धूप में सूखे हुवे मत्स्यो को पका कर
तल कर, शेफ कर, राज मार्ग पर लेजा कर उन का व्यापार करते हुवे रहते थे; और खुद शौर्यदत्त भी यहुतसे
छोटे मत्स्यों को यावत् (उपरोक्त कथित मत्स्य प्रकार) पताकातिपताका नामक मत्स्यों को रांधे हुवे, भुंजे हुवे,
तले हुवों को मदिरा के साथ आस्वादन करता हुवा रहता था,
॥२६८॥
टीकार्थ-
xx
xx
• xx
xx
xx
विपाक
दुः-वि.
आठवॉ
अध्ययन
मच्छीमार की हिंसा का दारुण फल
॥२६९॥
मूल--तते णं तस्स सोरियदत्तस्स मच्छंधस्स अन्नया कयाइं ते मच्छे सोल्ले तले भज्जे आहारेमाणस्स
मच्छ कंटंए गलए लग्गे यावि होत्था, तए णं से सोरियमच्छंधे महयाए वेयणाए अभिभूते समाणे कोडंबिय
पुरिसे सद्दावेति २ त्ता एवं वयासी- गच्छह णं तुम्हे देवाणुप्पिया! सोरियपुरे नयरे संघाडक जाव पहेसु य
महया महया सद्देणं उग्घोसेमाणा उग्घोसेमाणा एवं वयह- एवं खल्ल देवाणुप्पिया! सोरियस्स मच्छंधस्स
मच्छकंटए गले लग्गे तं जो णं इच्छति विज्जो वा ६ (विजपुत्तो वा-जाणुओ वा-जाणुयपुत्तोवा-तेगिच्छि वा-
तेगिच्छिपुत्तोवा) सोरियमच्छियस्स मच्छकंटयं गलाओ निहरित्तते तस्सणं सोरियमच्छिए विउलं अत्थसंपया
णं दलयति ।
॥२६९॥
विपाक
दु:-वि.
-
बढ़ा निवाला ठोसना, अथवा मुख मर्दन करने को डाट के नीचे लकड़ी का टुकड़ा दाना इससे. 'शल्योद्धरण और विशल्यकरण
का अर्थ मूलार्थ समान, 'निहरित्तए' निष्काशयितुं-निकालने के लिये. 'विसोहित्तए' पूयाद्यपनेतुं-परु आदि दूर करने के वास्ते
जमाध्ययनस्य विवरणं समाप्तम्.
पत्र
आठवा
अध्ययन
॥२७२॥
अन्तिम निर्णय
5न्ह
मूल
तते णं से सोरियमच्छंधे विजपडियारनिविणे ते णं दुक्खेणं महया अभिभूते सुक्के जाव
विहरति, एवं खलु गोयमा! सोरियदत्ते पुरापोराणाणं जाव विहरति- सोरिए णं भंते! मच्छंधे इयो य काल
मासे कालं किच्चा कहिं गच्छिहिति ? कहिं उववजिहिति ? गोयमा! सत्तरिवासाइं परमाउयं पालइत्ता
कालमासे कालं किच्चा इमिसे रयणप्पभाए पुढवीए, संसारो तहेव पुढवीओ, हथिणाउरे णगरे मच्छत्ताए
उववन्ने, से णं ततो मच्छिएहिं जीवियाओ ववरोविए तत्थेव सेट्टिकुलसि बोहिं सोहम्मे कप्पे महाविदेहे
॥२७२॥
दु:-वि. विपाक आठवॉ अध्ययन ॥२७३॥ वासे सिज्झिहिति० एवं खलु जम्बू ! निक्खेवो-(२९) अहमं अज्झयणं सम्मत्तं ॥८॥ अर्थ-तदन्तर वह शौर्यदत्त मच्छीमार वैद्यादिकों की चिकित्सा से खेद पाता हुवा उस दुःख से भारी परास्त होकर शरीर से सूखा हुवा रहता है, इस तरह निश्चय हे गौतम ! शौर्यदत्त पूर्वकृत पुराने कर्मफल भोगता हुवा यावत् रहता है-गौतम स्वामी पूछते हैं-हे भगवन्त ! शौर्यदत्त मच्छीमार यहां से कालसमय काल करके कहां जायगा? कहां उत्पन्न होगा ? भगवन्त फरमाते हैं - हे गौतम! वह शौर्य मच्छीमार सत्तर वर्ष की पूर्ण आयु पाल कर इस ही रत्नप्रभा पृथ्वी में (पहिली नरक में) उत्पन्न होगा. इसका संसार भ्रमण पहिले अध्ययन के अनु- सार कहना, नरकादि में से निकल कर हस्तिनापुर नगर में मच्छपने उत्पन्न होगा, वहां मच्छीमार से मारे जाने पर उस ही नगर में सेठ के कुल में उत्पन्न होगा; वहां पर युवा अवस्था में सम्यक्त्व प्राप्त कर चारित्र ग्रहण कर सौधर्म देवलोक में देवपने उत्पन्न होगा, वहां से च्यवकर महाविदेह क्षेत्र में उत्तम कुल में उत्पन्न होगा, वहां संयम धारण कर भली भांति पालन कर केवलज्ञान प्राप्त करेगा, पश्चात् समय पर अनन्त सुखधाम मोक्षपद प्राप्त करेगा-इस कदर निश्चय हे जम्बो! भगवन्त महावीर देव ने इस प्रकार निक्षपे किया यानी इस अध्ययन का अर्थ प्रकाशित किया-आठवें अध्ययन का अर्थ सम्पूर्ण हुवा. ॥२७३॥ --- विपाक :-वि. पत्र नौवा अध्ययन ॥२७६॥ उकिहा उकिडसरीरा। अर्थ-जम्बूस्वामी स्वधर्म गणधर महाराज को पूछते हैं - हे पूज्यवर्य ! जो पाठवें अध्ययन का अर्थ परमात्मा महावीर देव ने इस प्रकार (जैसा आपने फरमाया) प्रकाशित किया है तो हे भदंत ! अब नौवें अध्ययन का उत्क्षेप (प्रस्तावना-बयान) करने की कृपा करें? गणधर भगवान् फरमाते हैं-निश्चय इस प्रकार हे जम्बो उस काल उस समय में रोहीड़ नामका नगर था, वह ऋद्धिशाली-निर्भय और समृद्धिवाला था, इस नगर के कोण में - पृथ्वीअवतंसक संज्ञक उद्यान था, उस में धरण नामका यक्ष (यक्षायतन) था, वैश्रमणदत्त राजा राज्य करता था, श्रीदेवी नाम की पटरानी थी और पुष्पनन्दी नामका कुमार था, वह युवराज पद को प्राप्त हुवा था; उस रोहिड़ नगर में दत्त नामक एक गाथापति रहता था, वह लक्ष्मीवन्त था, उस के कृष्णश्री नामकी भार्या थी, उस दत्त की पुत्री और कृष्णश्री की अङ्गजा 'देवदत्ता' नाम की लड़की थी, अहीण परिपूर्ण पंचेन्द्रीय शरीर वाली थी, यहां तक की अतिउत्कृष्ट (सुन्दर) शरीरवाली थी। , ॥२७६॥ टीकार्थxx xx xx xx xx
दुः-वि.
विपाक
नावा
सूत्र
अध्ययन
॥२७७||
SHRSHASHISHASASHTRA
एक करुणदशा वाली स्त्री को देखकर
गौतम गणधर की पृच्छा
KORESANSARIES
मूल
तेणं कालेणं तेणं समएणं सामी समोसढे जाव परिसा निग्गया, तेणं कालेणं तेणं समएणं
जेहे अंतेवासी छटक्खमण तहेव जाव रायमग्गं ओगाढे हत्थी आसे पुरिसे पासति, तसिं पुरिसाणं मज्झगयं
पासति एगं इत्थियं अवउडगवंधणं उक्खित्तकन्ननासं जाव सूले भिज्जमाणं पासति, इमे अब्भत्तिए तहेव
निग्गए जाव एवं वयासी- एसा णं भंते! इत्थिया पुवभवे का आसी ?.
अर्थ-उस काल उस समय में भगवन्त समवसरे, यावत् पर्षदा (देशना सुनकर) वापिस गई, उस काल
उस समय में परमात्मा के बड़े शिष्य ने (गौतम स्वामी ने) छट तप के पारणे राज मार्ग में प्रवेश किया, वहां
पर बहुत से हाथी-घोड़े और पुरुष देखे, उन पुरुषों के मध्य में रही हुई एक स्त्री को उल्टी मुस्कियों वाँधी हुई-
कान-नाक छेदे हुवे यावत् शूली पर चढाने को लेजाती हुई देखी, गौतम स्वामी को पूर्ववत् विचार उत्पन्न हुवा,
-
॥२७७॥
विपाक
नावा
अध्ययन
॥२८॥
दिये, वे महल अत्यन्त ऊँचे थे (विशेपार्थ टीकार्थ में) तब उस सिंहसेन कुमार को किसी एक वख्त श्यामा
प्रमुख पॉच सौ श्रेष्ठ राजकन्या के साथ एक ही दिन पाणिग्रहण कराया यानी विवाह किया, तथा पाँच सौ २
वस्तुओं का मात-पिता ने प्रीति दान दिया, (खुलासा टीकार्थ में ) तत्पश्चात् वह सिंहसेन कुमार श्यामा वगैरा.
पॉच सौ भायाओं के साथ महल के ऊपर यावत् विचरने लगा यानी क्रीड़ा करने लगा; वाद में किसी एक दिन
उस महासेन राजा के मरण-शरण होजाने पर (पूर्ववत्) श्मसान यात्रा निकाली, फिर समय पर सिंहसेन कुमार
राजा हुवा, वह बडा (हिमवंत-महालय-मंदराचल-महेन्द्र जैसा पड़ा) सार भूत हुवा।
टीकार्थः- 'अब्भुग्गय ' इस से " अभुग्गयमूसिय पहसिए चेव" अर्थात् अत्यन्त ऊँचे और प्रहसन प्रारम्भ किया हो ऐसे,
विशेष में-"मणिकणगरयणचित्ते- एगंचणं महं भवणं करिति अणेगखंभसयसन्निविट्ठ" अर्थात् मणि-सुवर्ण और रनों से विचित्र-
उन में एक बड़ा महल बनवाया जो सेंकड़ो थंभों से व्याप्त था; इत्यादि भवनवर्णक सूत्र जानना. 'पंचसयओ दाओ' पॉच सो दिये,
इससे "हिरण्यकोटि प्रभृतिनां प्रेपणकारिकान्तानं पदार्थानां पञ्चपञ्चशतानि "अर्थात् घड़ा हुवा क्रोड़ और निना पड़ा क्रोड़ सोने
(क्रोड मूल्य का सोना) से लेकर दासी पर्यन्त पाच सौ २ वस्तुएँ मात-पिता ने कुमार को दीं; और कुमारने प्रत्येक स्त्री को एक र
वस्तु वक्षीस की. 'महया ' इस से " महयाहिमवन्तमहन्तमलयमदरमहिंदसारे ” अर्थ मूलार्थ के माफिक; इत्यादि राजा का वर्णन कहना।
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॥२०८॥
विपाक
दुः-वि.
625
355
सिंहसेन राजा का अनीतिपूर्ण वर्तन
सासुओं का प्रपंची विचार
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सूत्र
नावा
अध्ययन
॥२८१॥
मूल-तए णं से सीहसेणे राया सामाए देवीए मुच्छित्ते ४ (गिद्धे-गढिए-अज्झोववन्ने) अवसेसाओ
देवीओ नो आढाति नो परिजाणाति अणाढाइज्जमाणे अपरिजाणमाणे विहरति, ततेणं तासिं एगूणगाणपंचण्हं
देवसियाणं एगूणाइं पंचमाधाइसयाई इमिसे कहाए लट्टाई समाणाइं एवं खल्लु ! सीहसेणे राया सामाए
देवीए मुच्छिए ४ अम्हं धूयाओ नो आढायति नो परिजाणंति अणाढाइज्जमाणे अपरिजाणमाणे विहरति, तं सेयं
खल्लु अम्हं सामं देवीं अग्गिपओगेण वा विसप्पओगेण वा सत्थप्पओगेण वा जीवियातो ववरोवित्तए, एवं
संपेहेति २ त्ता सामाए देवीए अंतराणि य छिद्दाणि य विवराणि य पडिजागरमाणीओ पडिजागरमाणीओ
विहरंति।
॥२८॥
विपाक दु:-वि. पत्र नावा अध्ययन ॥२८४॥ इस से रानी को कोई उपाय से मारना बगैरा) अवसरादि देखती हुई रहती है; अतः मुझे पता नहीं कि किस भयं- कर मौत से मारेगी? ऐसा विचार कर भयभीत होकर जहाँ कोपगृह (रीसाकर रहने का स्थान) है वहाँ पर आती है , आकर हतोमन वाली होकर यावत् विचारने लगी. टीकार्थ-'भीया जेणेव ' भीता यत्र-डरी जहाँ पर. "ओहय जाव ' यहाँ पर यावत् करण से ऐसा जानना- "ओह- यमणसंकप्पा भूमिगयदिट्ठिया"" करतलपल्हत्थमुही अट्टज्झाणोवगय " अर्थात् मन का विचार नाश हुवा इस से दिग्मूढ बनी भूमि पर दृष्टि रक्खी, और हथेली पर मुख लगा रक्खा, ऐसी स्थिती में रहकर यानी उदास होकर आध्यान ( दुःख विचार) करने लगी. मूल-तते णं से सीहसेणे राया इमिसे कहाए लद्धटे समाणे जेणेव कोवघरए जेणेव सामादेवी तेणेव उवागच्छति २ ता सामं देवीं ओहयमणसंकप्पा जाव पासति २ त्ता एवं वयासी- किन्नं देवाणुप्पिया ! जाव ओहयमणसंकप्पा झियासि ? ततेणं सा सामादेवी सीहसणेण रण्णा एवं वुत्ता समाणा उप्फेणओफेणीयं सीहसेणं रायं एवं वयासी एवं खलु सामी ! मम एगूणपंचसवत्तीसयाणं एगणपंच [धाइ ] माइसयाणं इमिसे कहाए लट्ठाइं समाणाइं अन्नमन्ने सदावत सद्दावेत्ता एवं वयासी- एवं खल्लु सीहसेणे राया सामाए देवीए A ॥२८॥ TAG दुः-वि. विपाक नौवॉ' अध्ययन ॥२८५॥ उवरि मुच्छिए अम्हा णं धुआ णो आढाति जाव अंतराणि अ छिद्दाणि अ विवराणि य पडिजागरमाणीओ विहरंति, तं न नजति भीया जाव झियामि । अर्थ-पश्चात् वह सिंहसेन नृप इस वृतान्त को जानने पर जहां पर कोप गृह है जहां पर श्यामा देवी है वहाँ पर आता है, आकर श्यामा देवी को हतोमन संकल्प वाली यावत् देखी, देख कर इस प्रकार बोला - अहो देववल्लभे ! क्यों तूं हतोमनवाली होकर यावत् आर्तध्यान ध्याती हो ? तब वह श्यामा देवी सिंहसेन के इस प्रकार पूछने पर क्रोध से तप्तवचनों द्वारा सिंहसेन राजा को इस कदर अर्ज की - निश्चय इस तरह हे स्वामिन् मेरी एक कम पॉच सौ (४९९) सपत्नियों की (शोकों की) एक कम पाँच सौ (४९९) धाई माताएँ इस वृतान्त को ( मेरे में आपकी आसक्ती को) जान कर परस्पर एक दूसरी को पुकारती थीं, पुकार कर परस्पर इस कदर विचार करती थीं-निश्चय इस प्रकार सिंहसेन राजा श्यामा देवी पर मुग्ध हुवा है, इस से हमारी लडकियों का आदर नहीं करता है, यावत् अन्तर-छिद्र और विवर देखती हुई जागृत होकर रहती हैं; मुझे पता नहीं कि (किस कुमौत ) मुझे मारेंगी, अतः मैं भय भीत होकर यावत् विचार करती हूँ। टीकार्थ 'उप्फेणउप्फेणीयं । सकोपोष्मवचनं यथा भवति - कोप सहित उष्ण वचन जैसा होता है वैसा इसके अनन्तर वाक्य का एक २ अक्षर पुस्तकों में मिलता है वह इस प्रकार जानना ' एवं, खलु -सामी' से लेकर ' भूमीगयट्ठिीया' तक ||२८५॥ - विपाक दुः-वि. नौवॉ सूत्र अध्ययन ॥२८८॥ तेणेव उवागच्छति २ ता तमाणत्तियं पञ्चप्पिणति, तते णं से सीहसेणेराया अन्नया कयाति एगूणगाणं पंचण्हं देवीसयाणं एगूणाई पंचमाइसयाई आमतेति, तते णं तासिं एगणापंचदेवीसयाणं एगणपंचमाइसयाई सीहसे- णे ण रन्ना आमंतियाई समाणाति सव्वालंकारविभुसियाई जहा विभवेणं जेणेव सुपइहे णगरे जेणेव सीहसेणे- राया तेणेव उवागच्छति। अर्थ:- तय उन कौटुम्बिक पुरुषों ने हाथ जोड़कर यावत् श्रवण किया, श्रवण करके सुप्रतिष्ट नगर के बाहर पश्चिम दिशा के विभाग मे एक बड़ी कुटाकार शाला यावत् वनाई, सैकड़ों स्तम्भ से शोभित दर्शनीय ४ इत्यादि तैयार कराई, बाद जहां सिंहसेन राजा था वहां आते हैं, आकर उन की उस आज्ञा को वापिस नज़र करते हैं; तदन्तर उस सिंहसेन राजा ने किसी एक वख्त एक कम पॉच सौ (४९९)रानियों को एक कम पाँच सौ उनकी माताओं को, आमंत्रण किया, तब चार सौ नवानवे रानियाँ और चार सौ नवानवे उनकी माताएँ सिंहसेन राजा की निमंत्रणा होने पर सर्व आभूषणों से भूपित होकर अपने २ वैभव सहित जहां सुप्रतिष्ट नगर है, जहां सिंहसेन राजा है वहां आती है. टीकार्थ- ॥२८८॥ xx xx xx xx xx
8C
दु:-वि.
विपाक
सूत्र
नौवा
राजा ने बनावटी सत्कार किया
अध्ययन
॥२८९॥
360606052500000606060605
5060
मूल-तते णं से सीहसेणे राया एगणपंचदेवीसयाणं एगणपंचमाइसयाणं कूडागारसालं आवासे
दलयति, तते णं से सीहसेणे राया कोडुंबियपुरीसे सद्दावेति २ त्ता एवं वयासी- गच्छह णं तुम्हे देवा-
णुप्पिया ! विउलं असणं पाणं खाइमं साइमं उवणेह, सुवहुं पुप्फवत्थगंधमल्लालंकारं च कूडागारसालं सा-
हरह य, तते णं ते कोडंबियपुरिसा तहेव जाव साहरेंति, तते णं तासिं एगूणगाणं पंचण्हं देवीसयाणं
एगणपंचमाइसयाई सव्वालंकारविभूसियाई करेंत २ त्ता तं विउलं असण ४ सुरं च आसाएमाणाई ४
[ विसाएमाणाइं- परिभाए माणाई- परिभुंजमाणाई ] गंधव्वेहि य नाडएहि य उवगीयमाणाइं विहरंति।
अर्थ-तत्पश्चात् उस सिंहसेन राजा ने चार सौ नवानवे रानियों को और चार सौ नवानवे उनकी
॥२८९॥
विपाक
दुः-वि.
नौवॉ
सूत्र
अध्ययन
॥२९२॥
मूल-तते णंसे सीहसणे राया एयकम्मे ४ [एयप्पहाणे- एयविज्जे- एयसमुद्दाचारे ] सुवहुँ पाव-
कम्मं समजिणित्ता चोत्तीसं वाससयाइं परमाउयं पालइत्ता कालमासे कालं किच्चा छट्टीय पुढवीए उक्को-
सेणं वावीससागरोवमाइं ठिइएसु उववन्न, से गं तओ अणंतरं उव्वट्टित्ता इहेव रोहडए णगरे दत्तस्स
सत्यवाहस्स कन्नसिरिए भारियाए कुच्छिसि दारियत्ताए उववन्ने, तते णं सा कन्नसिरि नवण्हं मासाणं जाव
दारियं पयाया, सुकुमालपाणिपायं (जाव ) सुरूवं, तते णं तिसे दारियाए अम्मापियारो निम्वित्तवार-
साहियाए विउलं असणं ४ जाव मित्तणाति. णाम धेनं करेंति तं होउ णं दारिया देवदत्ता णामेणं ।
अर्थ-तदनन्तर वह सिंहसेन राजा ऐसे पाप कर्म करने वाला (ऐसे कर्म में प्रधान-ऐसी विद्यावाला-ऐसे
आचार वाला ) अत्यन्त पापकर्म को उपार्जन करके चौतीस सौ (३४००) वर्ष की उत्कृष्ट आयुष्य पालकर काल
समय काल करके छट्टी नरक में वावीस सागरोपम की उत्कृष्ट स्थिति मे उत्पन्न हुवा; वह वहां से अन्तर रहित
निकल कर इसही रोहिड़ नगर में दत्त सार्थवाह की कृष्णश्री भार्या के उदर में पुत्रीपने उत्पन्न हुवा, तब उस
कृष्णश्री ने नौ मास पूर्ण होने पर यावत् लड़की को जन्म दिया, पश्चात् उस लड़की के माता-पिता ने वारह
दिन व्यतीत होने पर बहुतसा असनादि तैयार कराया यावत् मित्र-ज्ञाति आदि को जीमा कर इस तरह नाम
॥२९२॥
विपाक
सूत्र
की स्थापना करी- हमारी लड़की का नाम 'देवदत्ता' हो.
टीकार्थ-
दुः-वि.
xx
xx
xx
xx
xx
नौवाँ
अध्ययन
॥२९३॥
INESS
-
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देवदत्ता की मांगनी आडम्बरपूर्ण विवाह
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मूल-तए णं सा देवदत्ता पंचधातीपरिगहिया जाव परिवड्ढति, तते णं सा देवदत्ता दारिया उमु-
क्कवालभावा जोव्वणेण रूवेण लावण्णेण य जाव अतीव उक्किसरीरा जाया यावि होत्था, तते णं सा
देवदत्ता दारिया अन्नया कयाइं पहाया जाव विभूसिया बहूहिं खुज्जाहिं जाव परिक्खित्ता उप्पिं आगासतलगं-
सि कणगतिंदूसेणं कीलमाणी विहरइ, इमं च णं वेसमणदत्ते पहाया जाब विभूसिए आसं दुरूहित्ता बहहि
पुरिसेहिं सद्धिं सपरिखुडे आसवाहिणीयाए णिज्जायमाणे दत्तस्स गाहावइस्स गिहस्स अदूरसामंतेणं विड्वयति।
॥२९३॥
विपाक
दुः-वि.
नौवाँ
सूत्र
अभ्यन्तर सभा के पुरुषों को बुलाकर इस प्रकार फरमान करते हैं - अहो देवों के प्यारे ! तुम जाओ दत्त सार्थ-
वाह की पुत्री और कृष्णश्री भार्या की आत्मजा देवदत्ता लड़की की पुष्पनन्दी युवराज की पत्नितरीके मांग
करो ? यदि वह खुद राज्य के शुल्कवाली हो यानी उस के एवज में राज्य मांगे तो देना कबूल करना *.
टीकार्थ-'जइवि (य) सा सयं राजसुक्का ' यद्यपि वह स्वयं राज्य शुक्ला हो; यानी स्वयं राज्य प्राप्त करने की
अध्ययन
॥२९६॥
इच्छा करे.
मूल-तते णं ते अभितरहाणिज्जा पुरिसा वेसमणेणं रन्ना एवं वुत्ता समाणा हतुट्टा करयल जाव
पडिसुणेति, पडिसुणित्ता पहाया जाव सुद्धप्पावसाई संपरिवुडा जेणेव दत्तस्स गिहे तेणेव उवागच्छंति, तते
णं से दत्ते सत्थवाहे ते पुरिसे एजमाणे पासति ते पुरिसे एज्जमाणे पासित्ता हट्टतुट्ट० आसणाओ अभू-
हेइ आसणाओ अभूहित्ता सत्तकृपयाइं पच्चुगाते आसणे णं उवनिमंतेति २ ता ते पुरिसे आसत्थे वीसत्थे
सुहासणवरगए एवं वयासी-संदिसंतु णं देवाणुप्पिया ! किं आगमणप्पओयणं ? तते णं ते रायपुरिसा
* इस का कोई ऐसा अनर्यक अर्थ न करले कि उस वख्त भी' कन्या विक्रय' चलता था इस का मतलब यह है कि असक्त
मात-पिताओं को राजा लोग उन के निर्वाह के लिये कुछ वक्षीस करते थे
॥२९६॥
दुः-वि.
विपाक
मन्त्र
नौवॉ
वैश्रमण राजा
अध्ययन
॥२९७॥
दत्तं सत्थवाहं एवं वयासी
अर्थ-तदन्तर वे अभ्यन्तर सभा के पुरुष
के इस प्रकार कथन करने पर हृष्ट-पुष्ट होकर
दोनों हाथ जोड़ कर यावत् सुनते हैं यानी आज्ञा अङ्गीकार करते हैं, करके स्नान करते हैं यावत् शुद्ध वस्त्रादि
पहनकर जहां पर दत्त सार्थवाह का घर है वहां पर आये, तब उस दत्त सार्थवाह ने उन पुरुषों को चलते हुवे यानी
आते हुवे देखे, उन पुरुषों को आते हुवे देखकर हर्षित तुष्ठित होकर आसन से उठा, आसन से उठकर सात-
आठ कदम सामने गया, उनको आसन पर बैठने का निमन्त्रण किया, करके वे पुरुष शान्त-प्रशान्त हुवे और
सुखासन पर बैठे तब उसने उन को इस तरह पूछा-हे देवों के प्यारे ! आप आज्ञा करो ( फरमाओ) आप के
पधारने का प्रयोजन क्या है ? तब उन राजपुरुषों ने दत्त सार्थवाह को इस कदर कहा--
टीकार्थ-
मूल-अम्हे ण देवाणुप्पिया ! तव धूयं कण्हसिरीए अत्तयं देवदत्तं दारियं पूसनंदिस्स जुवरण्णो
भारियात्ताते वरेमो, तं जइ णं जाणासि देवाणुप्पिया ! जुत्तं वा पत्तं वा सलाहणिजं वा सरिसो वा संजोगो
दिजउ णं देवदत्ता भारिया पुसणंदिस्स जुवरपणो, भण देवाणुप्पिया ! किं दलयामो सुक्कं ? तते णं से
xx
xx
xx
xx
xx
॥२९७॥
विपाक दुः-वि. नावाँ सूत्र ॥३०॥ अध्ययन अन्दर विपुल असन-पान-खादिम - स्वादिमाहार तैयार कराये, कराकर मित्र- ज्ञातिजन आदि को आमन्त्रण किया, स्लान किया यावत् प्रायश्चित (अमुक मंगल) किया, श्रेष्ठ सुखासन पर पैठा, याद वह मित्रादि के साथ मिलकर असनादि चार आहार आस्वादनादि चार प्रकार से भोगता हुवा रहता है, जीमने के पीछे जल से चल्लु किया, सलाका से दान्त साफ कर अत्यन्त पवित्र हुवा, फिर उस ने मित्र- ज्ञाति-स्वजनादि का यहुतेरे गंध -पुष्प यावत् अलंकारों से सत्कार किया-सम्मान किया, सत्कार- सम्मान करके, देवदत्ता पुत्री को स्नान कराया, शरीर विभूषित करके एक हजार पुरुषों से उठाई गई पालखी में उसे बैठाई, बैठाकर बहुत से मित्र-ज्ञाति आदि यावत् (स्वजन - सम्बंधी - परिजन ) को साथ लेकर सर्व भाद्ध से यावत् पाजे बजते हुवे रोहीड़ नगर के वीचोबीच होकर जहां वैश्रमणदत्त राजा का घर है, जहां वैश्रमण राजा है वहां आया पाकर दोनों हाथ जोड़ कर यावत् यवाता है, बधाकर वैश्रमणदत्त राजा को देवदत्ता नाम की अपनी लड़की अर्पण की। टीकार्थ- 'आयते' आचान्तः - जल से शुद्धि यानी कुल्ले करना ' चोक्खे' चोक्षः - मुह में रहे हुवे कण नगरा करना; इस से क्या कहा गया ? 'परमसूईभूए । अत्यन्तं शुचिभूतः - अत्यन्त पवित्र हुवे. 'हायं । स्नातं - स्नान किया. यावत् करण से ऐसा जानना:-" कयवलिकम्मं कयकोउयमंगलपायच्छित्तं सव्वालंकारे" अर्थात् गृहसंबंधी देव पूजन की, कौतुक - मंगल और प्रायश्चित किया, सर्वालंकार भूपित. ' सुबहुमित्त ' बहुत से अच्छे मित्र. यावत् शब्द से - “णियगसयणसं- बंधिपरिजणेण" अर्थात् निजके-स्वजन-सम्बंधी और परिजनों से युक्त; ऐसा जानना, ॥३०॥ , विपाक दुः-वि. नौवॉ। अध्ययन ॥३०॥ मूल-ततेणं से वेसमणे राया देवदत्तं दारियं उवणियं पासति उवणियं पासित्ता हह तुट्ट० विउलं असणं ४ उवक्खडावेति उवक्खडाविता मित्तनाति० आमंत्तेति जाव सरकारेति २ त्ता पूसनंदीकुमारं देवदत्तं च दारियं पट्टयं दुरुहेति २ ता लियापीतेहिं कलसेहिं मज्जावति २ ता वरनेवत्थाई करेति करित्ता अग्गिहोमं करेति २ ता पूसणंदिकुगारं देवदताए दारियाए पाणिं गिहाति । अर्थ -अनन्तर उस वैश्रमण नृपेन्द्र ने देवदत्ता लड़की को प्राप्त हुई देखी, प्राप्त हुई देख कर हर्पित-यान- न्दित होकर विपुल असन-पान-खादिम-स्वादिम तैयार कराये, तैयार कराकर मित्र - ज्ञातिजन आदि को आमन्त्रण किया यावत् सत्कार किया, करके पुष्पनन्दीकुमार को और देवदत्ता लड़की को बाजोट पर बैठाये, बैठा कर सपेत और पीले (चान्दी के और सोने के ) कलसों से स्नान कराया, कराकर उत्तम वस्त्र वगैरा पहनाये, पहना कर अग्निहोम कराया, कराकर कुमार को देवदत्ता कुमारी के साथ हस्तमिलाप कराया, यानी विवाह कराया. टीकार्थxx ॥३.१॥ xx xx xx xx
-
दुः-वि.
विपाक
पिएहिं ' रजतस्वर्णमयैः-चान्दी-सुन्ने के बने हुवों से ।
XXX!
नावा
अध्ययन
॥३०४॥
मातेश्वरी की भक्ति में तल्लीन
హపరుగుడుమా
మారుడు
मृल-तए णं से पूसनंदी राया सिरिए देवीए मायभत्तिते यावि होत्था, कल्लाकाल्लिं जेणेव सिरि-
देवी तेणेव उवागच्छति २ त्ता सिरिए देवीए पायवडणं करेति करित्ता सयपागसहस्सपागेहिं तेल्लेहिं
अभिगावेति अहिसुहाते मंससुहाते तयासुहाते (चम्मसुहाए) रोमसुहाए चौव्विहाए संवाहणए संवाहा-
वेति सुरभिणा गंधवट्टएणं उवहावेति तिहिं उदएहिं मज्जावेति तंजहा- उसिणोदएणं सिओदएणं गंधोदएणं
विउलं असणं ४ भोयावेति सिरीए देवीए पहाताए जाव पायच्छित्ताए जिमियभुत्तुत्तरागयाए तते गं पच्छा
पहाति वा भुंजति वा उरालाई माणुस्सगाई भोगभोगाइं भुंजमाणे विहरति ।
॥३०४॥
दुः-वि.
विपाक
नौवॉ
अध्ययन
॥३०५॥
अर्थ- तदन्तर वह पुष्पनन्दी राजा श्रीदेवी के अन्दर मातृभक्ति वाला हुवा, अहर्निश जहां श्रीदेवी है
वहां आता है, आकर श्रीदेवी माता के चरणों में नमस्कार करता, करके शतपाक-सहस्रपाक तैल से (सौ वस्तुवाले
हज़ार वस्तुवाले तैल से) मालिस करता, हड़ियों को सुख देने वाला, मांस को सुख देने वाला, त्वचा को (चमड़ी को)
सुख देने वाला और रोम को सुख देने वाला; इस तरह चार प्रकार के आरामी साधनों से आराम पहूँचाता था,
बाद सुगंधी चूर्ण से शरीर को उद्वर्तन (बढाना-पुष्टकरना ) करता था, फिर तीन प्रकार के जल से स्नान कराता
था, वे जल ये हैं-१गरम जल २ ठंडा जल-३ सुगंधीजल; पीछे असनादि चार प्रकार के आहार से भोजन कराता इस
तरह श्रीदेवी स्नान कर यावत् प्रायश्चित कर भोजन करके अपने स्थान पर बैठ जाय, पश्चात् वह (पुष्पनन्दी राजा)
स्नान करे, भोजन करे और उदार मनुष्य संबंधी काम भोगों को भोगता हुवा रहता है.
टीकार्थ- 'सिरीए देविए मायामत्ते यावि होत्था' श्रीदेवी माता का बहुमानबुद्धि से भक्त था, यानी मातृभक्त था,
कल्लाकाल्लिं' प्राततिः- निरन्तर प्रभात में ' गंधवट्टएणं' गंधपूर्णेन-सुगंधी चूर्ण से 'जिमियभुत्तुत्तरागयाए ' भोजन करने के
पश्चात् स्वस्थान पर आजाती. शेष मूलार्थवत्,
॥३.५॥
|
णिज्जसि
सुहपसुत्तं
पासति
पासित्ता
दिसालोयं
करेति
करिता
जेणेव
भत्तघरे
तेणेव
उवागच्छति
२
त्ता
लोहदंडं
|
विपाक
दुः-वि.
होत्या, इमं च णं देवदत्ता देवी जेणेव सिरीदेवी तेणेव उवागच्छति २ त्ता सिरीदेवीं मज्जाइयं विरहितसय-
नावा
सूत्र
अध्ययन
॥३०८॥
परामुसति परामुसित्ता लोहदंडं तावेति तत्तं समजोइभूयं फूल्लकिंसुयसमाणं संडासएणं गहाय जेणेव सिरी-
देवी तेणेव उवागच्छति २ ता सिरीदेवीए अवाणंसि पक्खिवेति, तते णं सा सिरीदेवी महया महया सद्देणं
आरासित्ता कालधम्मुणा संजुत्ता।
अर्ध-पश्चात् वह श्रीदेवी किसी एक दिन मदिरापान करके एकान्त स्थान में शय्या पर सोती हुइ थी, इस
वख्त देवदत्ता देवी जहां श्रीदेवी है वहां आती है, आकर के श्रीदेवी को मदिरापान की हुई एकान्त में शय्या पर
मोतीहुई देखती है, देखकर दिशावलोकन करती है, करके जहां पर रसोड़ा है वहां पर आती है, आकर एक लोहे का
सलियालेती है, लेकर उस लोहदंड को अग्नि में तपाया, तपाकर अग्निसमान तथा खिलेहुवे केसुड़े के पुष्प जैसा लाल-
चोल हुवे उस दंड को संडासी से पकड़ कर जहां श्रीदेवी सोती है, वहां आती है, आकर श्रीदेवी के अपानस्थान
(योनिस्थान में) वह सलिया डाल दिया, तब वह श्रीदेवी जोर २ से चिल्लाती हुई (नत्काल) मरण शरण हुई.
* अहो ! विषयवासना की मस्तीने कितना घोर जुत्म किया !!!
॥३०८॥
दु:-वि. विपाक सूत्र नौवाँ, अध्ययन ॥३१३॥ xx xx xx xx xx शिकारी द्वारा मारे जाने पर उस ही गंगपुर नगर में सेठ के कुल में उत्पन्न होगी, वहां सम्यक्त्व प्राप्त कर चारित्र अंगीकार कर सौधर्म देवलोक में ( पहिले देव लोक में) जायगी, वहां से च्यवकर महाविदेह क्षेत्र में जन्म पाकर, दीक्षा ग्रहण कर यावत् मोक्ष को प्राप्त होगी-इस तरह निक्षेप कहना-नववें अध्ययन का अर्थ सम्पूर्ण हुवा. टीकार्थ- उपसंहार इस नौवें अध्ययन में देवदत्ता के पूर्वभव मे सिंहसेन राजा की मोहान्धता वश किये गये जुल्मों से प्राप्त घोर नरक का दर्शन प्रत्यक्ष फल है, ऐसा बताया गया है-वर्तमान भव में कामान्धता से बहू ने सास की कैसी निर्लजतापूर्ण मृत्यु की इस से उस की सीमातीत किस कदर कदर्थना हुई, उस का दृश्य दिखाया गया है - भ- विष्य में कृत कर्मों से संसार भ्रमण का दुःख प्रदार्शत किया गया है -- अन्त में पारमेश्वरी प्रव्रज्या के सहयोग से मोक्षपद प्राप्त करने का सौभाग्य प्रभुने स्पष्ट शब्दों में फरमा दिया है -मुमुक्षों ! यदि भव भ्रमण का तनिक भी भय हो तो नूतन कर्म बंधन को रोको और पूर्व कृतों का तपादिकों से क्षय करने का प्रयत्न करो; जिससे जीवन दुःख विपाक का नौवां अध्ययन मूल-अर्थ और टीकार्थ सहित सम्पूर्ण हुवा. ॥३१३॥ सफल हो.
विपाक दुः-वि. दसवॉ अध्ययन ॥३१६॥ - xx xx xx xx xx विजयमित्र राजा के घर की अशोक वाटिका के पास में (अति निकट-अति दूर नहीं ) होकर चलते हुवे उनने एक स्त्री देखी - वह शरीर में सूखी हुई थी, भूखी थी, मांस रहित थी, चलते समय उसके हाड़के खड़खड़ करते थे, उसका देह हाड़कों के ऊपर चमड़े से मढा हुवा था, उसने गीली साड़ी पहनी हुई थी; उसको कष्टकारक-करु- णाजनक और नीरस शब्द करती हुई देखी, देखकर गौतम स्वामी को उस ही तरह (पूर्ववत् ) विचार उत्पन्न हुवा और उस ही कदर भगवन्त से पृच्छा की-हे. पूज्येश्वर ! वह स्त्री (जो मैं देखकर आया हूँ) पूर्वभव में कौन थी? टीकार्थः- FRESHERSXASTHESERVE अंजूश्री का पूर्व भव PER SCAUX***XXV मूल-वागरणं- एवं खल्लु गोयमा ! तेणं कालेणं तेणं समएणं इहेव जंबुद्दीवे दीवे भारहे वासे इंदपुरे णाम णगरे होत्था, तत्थणं इंददत्ते राया, पुढवीसिरी नामं गणिया होत्था वण्णओ, तते णं सा पुढवीसिरी ॥३१६॥ , " विपाक अध्ययन ||३१७॥ गाणिया इंदपुरे णगरे बहवे राईसर जाव पभियओ बहूहिँ चुन्नपओगेहि य जाव आभिओगेत्ता उरालाई दुः-वि. माणुस्सगाई भोगभोगाई भुंजमाणा विहरति । दसवाँ अर्थ-भगवन्त ने उत्तर फरमाया-निश्चय इस प्रकार हे गौतम ! उस काल उस समय में इस ही जम्बुद्वीप नामक द्वीप में भरतक्षेत्र के अन्दर इन्द्रपुर नाम का नगर था, वहां पर इन्द्रदत्त नाम का राजा था, पृथ्वीश्री नाम की गणिका रहती थी, उस का वर्णन ( पूर्ववत् ) जानना. अनन्तर वह पृथ्वीश्री गणिका इन्द्रपुर नगर में बहुत से राजा, धनाढय यावत् सार्थवाह बगैरा को चूर्ण के प्रयोग से यावत् वश करके उनके साथ मनुष्य सम्बंधी उदार काम भोग भोगती हुई रहती है. टीकार्थः- RAVEERRHORERNETISARSHAN वेश्या का नरक में प्रस्थान-अंजू श्री का जन्म XPERIEXISAHARASH ॥३१७॥ मूल-तते णं सा पुढवीसिरी गणिया एय कम्मा ४ सुबहुं समजिणित्ता पणतीसं वाससयाई परxx XX xx XX XX
विपाक
दुः-वि.
दसवॉ
सूत्र
॥३२॥
काम भोग भोगता हुवा रहने लगा; पश्चात् किसी एक दिन अंजू देवी के योनिशूल नामका रोग उत्पन्न हुवा, तब
विजय राजा ने आदेशी पुरुषों को बुलाये, बुलाकर इस प्रकार आदेश किया-अहो देवों के प्यारे ! तुम जाओ
वर्धमान पुर नगर के त्रिकोण आदि मार्ग पर जाकर इस प्रकार कहो-
टीकार्थ-'जहा तेतली ? यथा तंतली- जिस तरह तेतली; अर्थात् ज्ञाता धर्म कथा में (छठे अंग में) तेतली पुत्र नामक
मंत्री पोट्टिला नामकी कलाद मूपिकार सेठ की पुत्री की मांगनी कर स्वयं विवाह किया; उस ही तरह विजय राजा स्वयं परणा.
दशमाध्ययनस्य विवरणं समाप्तम्.
मूल-एवं खलु देवाणुप्पिया ! विजयस्स रन्नो अंजूए देवीए जोणिसूले पाउन्भूते जो णं इत्थ
विज्जो वा ६ (विजपुत्तो वा-जाणुओ वा- जाणुयपुत्तो वा- तेगिच्छि वा- तेगिच्छिपुत्तो वा) जाव
उग्घोसेंति, तते गं ते वहवे विज्जा वा ६ इमं एयारूवं सोचा निसम्म जेणेव विजए राया तेणेव उवाग-
च्छति २ त्ता अंजूते बहवे उप्पत्तियाहिं ४ परिणामे माणा इच्छंति अंजूते देवीए जोणिसूलं उवसामित्तते
नो संचाएंति उवसामितए, तते णं ते बहवे विज्जा य ६ जाहे नो संचाएंति अंजू देवीए जोणिसूलं उव-
सामित्तते, ताहे संता तंता परितंता जामेव दिसि पाउब्भूया तामेव दिसिं पडिगया।
॥३२०॥
दुः-वि. विपाक सूत्र दसवाँ ॥३२॥ अध्ययन अर्थ-निश्चय करके इस प्रकार हे देवों के वल्लभ ! विजय मित्र राजा की अंजू रानी को योनिशूल उत्पन्न हुवा है, इसलिये यहां पर जो कोई वैद्य आदि (वैद्यपुत्र-ज्ञायक-ज्ञायककपुत्र-चिकित्सक-चिकित्सक पुत्र सब का अर्थ पहिले लिख दिया गया है) हो और वह इस व्याधि को शान्त कर सकता हो तो उसको राजा विपुल धन देगा, ऐसी उद्घोषणा करो; पश्चात् बहुत से वैद्यादि ने यह इस तरह की घोषणा सुनी, सुन कर जहां विजय राजा है वहां आते हैं, आकर के वैद्य यगैरा औत्पातादिक (वैनयिक - कार्मणिक-पारिणा- मिक) बुद्धि से विचार कर अंजू देवी का योनिशल शान्त करने को इच्छ ने लगे यानी प्रयत्न करने लगे; परन्तु वे उपशान्त नहीं कर सके, जब कि वैद्यादि अंजूदेवी का योनिशुल शमन न कर सके तब वे सब शरीर-मन और दोनों से खेदित होकर जिस दिशा से आये थे उस ही दिशा में वापिस लौट गये। टीकार्थः- मूल-तते णं सा अंजूदेवी ताए वेयणाए अभिभूता समाणा सुक्का भुक्खा निम्मंसा कट्ठाई कलुणाई विसराइं विलवती, एवं खलु गोयमा ! अंजूदेवी पुरापोराणाणं जाव विहरति । अर्थ-तदन्तर वह अंजूदेवी उस वेदना से परास्त होती हुई शरीर में सूख गई, भूख से दुर्बल होगई xx xx xx xx xx ॥३२१॥ G विपाक दु:-वि. दसवाँ अध्ययन ॥३२४॥ मुक्त होकर यानी युवा अवस्था में तथारूप (होने चाहिये वैसे ) स्थिवर + के पास पूर्ण समकीत को प्राप्त करेगा, योध धारण कर दीक्षाग्रहण करेगा, आखीर काल धर्म प्राप्त कर सौधर्म देवलोक में उत्पन्न होगा. गौतम स्वामी ने पृच्छा कि- वह देवलोक की आयुष्य क्षय करके कहां जायगा? कहां उत्पन्न होगा ? भगवन्त महावीर देव ने उत्तर दिया-हे गौतम! वह महाविदेह क्षेत्र मे उत्तम कुल में जन्मे गा, पाहिले अध्ययन के माफिक यावत् सिद्ध होगा-सर्व दुःखों का अन्त करेगा. इस प्रकार निश्चय करके हे जम्यो ! श्रमण (भगवन्त महावीर) यावत् ने (मोक्ष को पधारे ने दुःख विपाक के दसवें अध्ययन का यह अर्थ (बयान ) फरमाया. जम्बू स्वामी ने कहा-हे भगवन्त ! वह इस ही प्रकार है-हे भगवन्त ! वह इस ही प्रकार है- हर्पवशात् श्रद्धापूर्ण दो वख्त एक ही बात कही-दुःख विपाक का दसवाँ अध्ययन सम्पूर्ण हुवा १०. ॥३२४॥ + स्थिविर (वृद्ध) तीन प्रकार के होते हैं-२ आयुस्थिविर-साठवर्ष से ऊपर की उम्र वाले २ चारित्र स्थिविर-वीस वर्ष की चारित्र यर्याय से ऊपर ३ छान स्थिविर-आचारांगादि शास्त्रों के वेत्ता ये महात्मा २-३ दरजे के स्थिविर प्रतीत होते है.
दुः-वि. दसवाँ विपाक उपसंहार सूत्र अध्ययन ॥३२५॥ इस दसवें अध्ययन में अंजू श्री ने पूर्व भव में यानी वेश्या के भव में विषय वासना में आसक्त होकर अनेक राजा प्रभृतियों को ब्रह्मचर्य से भ्रष्ट किये, इस से नरक यातना भोगनी पड़ी और इस भव में योनिशल से अत्यन्त वेदना वेदन कर नरक का अतिथी बनना पड़ा; व्यभिचार का दारुण फल इस से स्पष्ट प्रतीत है अन्त में क्रमशः मोक्ष महल प्राप्त करेगी. महानुभावों ! आप अपने श्रेय के लिये व्यभिचार का त्याग कर ब्रह्मचारी बनने का सतत प्रयास करना; और अंजूश्री के समान आखीर मोक्षपद प्राप्त करने का प्रयत्न करना. ॥३२५॥ A3 दुःख विपाक का दसवाँ अध्ययन मूल - अर्थ और टीकार्थ सहित सम्पूर्ण हुआ. arwatamammmalam कन्छ6006260
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विपाक । सु.-वि. पहिला द्वितीय श्रुतस्कन्ध-सुखविपाक * उत्थानिका * अध्ययन ॥३२९॥ - मूल-तेणं कालेणं तेणं समएणं रायागहे णगरे गुणसिले चेइए सोहम्मे समोसढे जम्बू जाव पज्जूवासमणे एवं वयासी-जति णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं दुहविवाहगाणं अयमढे पण्णत्ते सुहवि- वागाणं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं के अटे पन्नत्ते ? तते णं से सोहम्मे अणगारे जंबू अणगारं एवं वयासी- एवं खल्लु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं सुहविवागाणं दस अज्झयणा पन्नत्ता; तंजहा- सुबाहु १ भद्दनंदी य २ सुजाए य ३ सुवासवे ४ ॥ ||३२९ ॥
विपाक सु.-वि. पत्र पहिला अध्ययन ॥३३२॥ होत्था सव्वोउय० तत्थ णं कयवणमालपियस्स जक्खस्स जक्खाययणे होत्था दिव्वे, तत्थ णं हथिसीसे णगरे अदीणसतू णामं राया होत्था, महता० (हिमवन्तमहन्तमलयमंदरमहिंदसारे ) तस्स णं अदीणस- तुस्स रन्नो धारणीपामोक्खा देवीसहस्स ओरोहे यावि होत्था । अर्थ-इस प्रकार निश्चय करके हे जम्यो ! उस काल उस समय मे हस्तिशिपं नाम नगर था, ऋद्धिपूर्ण निर्भय * और समृद्धिशाली था, उस हस्तिशीर्ष नगर के बाहर इशान कोण मे पुष्पकरण्डक नामका उद्यान था, सर्व ऋतुओं के पुष्पो से शोभित था, वहां पर कृतवनमालप्रिय नाम के यक्ष का यक्षमदिर था, वह बड़ा सुन्दर था, उस हस्तिशीर्ष नगर में अदीनशत्रु नाम का राजा राज्य करता था, वह बड़ा (हिमवन्त पर्वत समान महान् तथा मलयाचल पर्वत-मेरुगिरी-महेन्द्र पर्वत अथवा इन्द्र के सदृश सारभूत ) था, उस अदीनशत्रु राजा के धारणी बंगरा एक हजार रानियाँ रणवास मे थीं-यहां पर धारणी पटरानी थी, ऐसा समझना. टीकार्थ-'सबोउय ' यह इस प्रकार देखा जाता है- " सब्बोउयपुप्फफलसमिद्धे रम्मे नंदणवणप्पगासे पासाईए ४ " अर्थात् सर्व ऋतुओं के पुष्प और फलों की समृद्धिवाला, नन्दनवन ( देववन ) के समान सुन्दर और मन को प्रसन्न करने वाला ४ • जहां का राजा पूर्ण रक्षक हो और जहां की प्रजा के परस्पर प्रेम हो वह नगर 'निर्भय नगर ' कहा जाता है. ॥३३२॥ ak ( दर्शनीय -देखने से नेत्रों को श्रम न हो, अभिरूप - मनोहर रूपवाला, प्रतिरूप - दर्शक को सुन्दर मालूम हो ) ऐसा उद्यान था. सु.-वि. विपाक पहिला अध्ययन सुबाहुकुमार का जन्म-विवाह और एशआराम ॥३३३॥ - मूल-तते णं सा धारणी देवी अन्नया कयाइ तसि तारिसगंसि वासघरंसि सीहं सुमिणे पासति जहा मेहस्स जम्मणं तहा भाणियव्वं जाव सुवाहुकुमारे अलं भोगसमत्थं वा जाणंति, अम्मापियरो पंच पासायवडिंसगसयाई कराति अब्भुग्गयमूसियपहसिए भवणं एवं जहा महाबल्लस्स रन्नो, णवरं पुष्पचूला- पामोक्खाणं पंचण्हं रायवरकन्नयसयाणं एगदिवसेणं पाणिं गिहावेंति, तहेव पंचसतिओ जाव उप्पिं पासायवरगते फुट्ट जाव विहरति । अर्थ-तत्पश्चात् उस धारणी पटरानी ने किसी एक वख्त उस प्रकार के यानी राजकुटुम्ब के योग्य ऐसे के अन्दर सिंह देखा, जिस प्रकार मेघकुमार का जन्म (ज्ञाता सूत्र में) कहा है उस तरह ॥३३३॥ शयनगृह में स्वम
विपाक
सूत्र
सु.-वि.
पहिला
के ऊपर रहा हुआ 'फुट्ट' यहां पर यावत् शब्द से ऐसा देखा जाता है- " फट्टमाणेहिं मुइंगमस्थएहिं " अर्थात् मृदंग के ऊपर के पुट
मानो फटे जाते हों ऐसे जोरों से बजते थे; “ वरतरुणीसंपउत्तेहिं " वरतरुणी संप्रयुक्तैः- श्रेष्ठ स्त्रियों से युक्त. 'बत्तीसइबद्धेहिं नाडएहिं
बत्तीस पात्रो से युक्त नाटकों द्वारा नाचती थीं. " उपगिजमाणे उवलालिजमाणी माणुस्सए कामभोगे पचणुभवमाणे" ये स्त्रियाँ
उस कुमार के गुण गान करती थी, उस का लालन करती थीं यानी प्रेम उत्पन्न कराती थीं; इस प्रकार मनुष्य सम्बंधी काम भोगों
का अनुभव करता था.
अध्ययन
॥३३६॥
भगवन्त का पदार्पण-कुमार का व्रत ग्रहण करना
खान्छन्
मूल-तेणं कालेणं तेणं समएणं समणे भगवं महावीरे समोसढे, परिसा निग्गया अदीणसत्तू जहा
कोणिओ निग्गतो
सुबाहु
वि जहा जमाली तहा रहेणं निग्गते जाव धम्मो कहिओ राया परिसा गया, ततेणं
से सुबाहु कुमारे समणस्स भगवओ महावरिस्स अंतिए धम्म सोच्चा निसम्म हट्ट तुढे उहाए उट्टेति जाव
एवं वयासी-
॥३३६॥
सु.-वि.
विपाक
पहिला
सूत्र
अध्ययन
॥३३७॥
अर्थ:-उस काल उस समय में श्रमण भगवन्त महावीर देव समवसरे यानी उद्यान में पधारे, पर्पदा (प्रभु
को वन्दनार्थ) निकली, अदीनशत्रु राजा जैसे कौणिक राजा ( भगवन्त को वन्दनार्थ) गया वैसे यह भी
निकला, इस ही तरह सुबाहु कुमार भी जमाली की तरह रथ में बैठ कर निकला यावत् धर्म देशना श्रवण की, राजा
और पर्षदा अपने स्थान पर वापस लौट गई, तत्पश्चात् उस सुबाहु कुमार ने श्रमण भगवन्त महावीर देव के पास
धर्म सुन कर हृदय में धारण कर हर्षित-आनन्दित होकर खड़े होने की क्रिया से खड़ा हुवा यावत् ( भगवन्त को
चन्दन नमस्कार करके) इस प्रकार प्रार्थना की
टीकार्थ- 'जहा कूणिए । यथा कौणिकः-- कौणिक राजा की तरह; अर्थात् जैसे औपपातिक सूत्र ( उववाई सूत्र ) मे
कौणिक राजा का भगवन्त को वदन करने के लिये निकलने का बयान किया है इस प्रकार यहां भी वर्णन करना. 'सुबाहु वि
जहा जमाली तहा रहेण निग्गओ ' अर्थ मूलार्थ वत्. विशेषता में - भगवती सूत्र मे जिस तरह वर्णन किया है कि जमाली भगवन्त
का जमाई भगवन्त को वन्दन करने के लिये रथ मे बैठ कर निकला है उस ही प्रकार यह भी ( सुबाहु कुमार भी) निकला,
ऐसा जानना. यहां पर यावत् करण से ऐसा समझना- “समणस्स भगवओ महावीरस्स छत्ताइछत्तं पडागाइपडागं विजाचारणे
जंभए य देवे ओवयमाणे उप्पयमाणे य पासति पासित्ता रहाओ पच्चारुहइ पच्चोरुहित्ता समणं भगवं महावीरं वंदइ नमसइ वंदित्ता
नमंसित्ता" अर्थात् श्रमण भगवन्त महावरि देव को छत्र से छत्रित प्रातिहार्य से शोभित विद्याचारण और जृभक देवों को ऊँचे
॥३३॥
विपाक सु.-वि. पहिला अध्ययन ॥३४॥ अर्थात्- हे भगवन्त ! मैं निर्ग्रन्थ प्रवचन पर श्रद्धा करता हूँ, हे भगवन्त ! मैं निर्ग्रन्थ प्रवचन को अङ्गीकार करता हूँ, हे प्रभो ! आप देवानुप्रिय के पास बहुतसे राजा-धनवन्त - कोतवाल - मंडव गाम के अधिपति - कौटुम्बिक - सेठ - सार्थवाह वगैरा मुंडित होकर घरवार छोड़ अनगार ( मुनि-साधु ) रूप चारित्र अङ्गीकार किया है। मगर मैं ( अधन्य हूँ ) उस तरह दीक्षा लेने समर्थ नही, इसलिये मैं तो आप प्रभु के पास ५ अणुव्रत और ७ शिक्षावत रूप गृहस्थ धर्म अङ्गीकार करना चाहता हूँ ! भगवन्त महावीर देवने फरमाया- विलम्ब मत करो. ' तमेव ' इससे यह जानना- “ तमेव चाउघंट आसरहं " अर्थ मूलार्थवत्. 'जा- मेव ' इत्यादि इस प्रकार जानना- " जामेव दिसं पाउन्भूते तामेव दिसं पडिगए " अर्थ मूलार्थ के समान. . RZABARRZRSHASHAASHASHA कुमार के लिये गणधर महाराज की पृच्छा DESA***6736636736783079537 मूल--तेणं कालेणं तेणं समएणं जेटे अतेवासी इंदभूई जाव एवं वयासी-अहो णं भंते सुवाहु- कुमारे इहे इहरूबे कंते कंतरूवे पिए पियरूवे मणुन्ने मणुन्नरूवे मणामे मणामरूवे सोमे सोमरूवे सुभगे ॥३४॥ - विपाक सूत्र अध्ययन ॥३४१॥ सुभगरूवे पियदसणे सुरूवे, बहुजणस्सवि य णं भंते ! सुबाहुकुमारे इढे ५ सोमे ४ साहुजणस्सवि णं सु.-वि. य भंते ! सुबाहुकुमारे इट्टे इट्टरूवे ५ जाव सुरूवे सुबाहुणा भंते ! कुमारे णं इमा एयारूवा उराला माणु पहिला स्सरिद्धी किण्णालद्धा किण्णापत्ता किण्णा अभिसमन्नागया के वा एस आसि पुत्वभवे ? अर्थ-उस काल उस समय में बड़े शिष्य श्री इन्द्रभूति जी ने (गौतम स्वामी जी ने) भगवन्त को इस प्रकार निवेदन किया- अहो भगवन्त ! सुबाहुकुमार इष्ट है, इष्ट रूपवाला है, कान्त (इच्छने योग्य) है, कान्त स्वरूप है, प्रिय है, प्रियस्वरूप है, मनोज्ञ (मनको रुचे ऐसा ) है, मनोज्ञ रूपवाला है, मनोरम ( स्मरण से जाना जाय) मनोरम रूपवाला है ? सौम्य (शान्त दृष्टि वाला ) है, सौम्य रूप है, सुभग ( वल्लभ ) है, सुभग स्वरूप है, देखने में प्रिय है, स्वरूप वान् है, - विशेषार्थ टीकार्थ में- हे भगवन्त ! वह सुबाहु कुमार बहुत लोगों को इप्टा- दि ५ (पूर्ववत् ) है, सौम्यादि ४ (पूर्ववत् ) है, हे भगवन्त ! सुबाहु कुमार साधुजनों को ( सज्जनों को) इष्टादि ५ है, यावत् स्वरूपवान् है, हे देवाधिदेव ! सुबाहु कुमार यह इसप्रकार की ( प्रत्यक्ष मौजुद है ) प्रधान मनुष्य संबंधी सम्पदा कैसे (किस करणी से) उपार्जन की-कैसे प्राप्त करी और कैसे भोगोपभोग में काम आई तथा यह सुबाहु कुमार पूर्व भव में कौन था? इत्यादि प्रश्न किये. ॥३४१॥ टीकार्थः- 'इंदभूई' यहां पर यावत् करण से " नामं अणगारे गोयमगोत्तेण" यानी ईन्द्रभूति नाम के अनगार गौतम विपाक सु.-वि. पहिला अध्ययन ॥३४४॥ तेणं कालेण तेणं समएणं धम्मघोसा णामं थेरा जातिसंपन्ना जाव पंचहिं समणसएहिं सद्धिं संपुरिवुडा पुव्वाणुपुब्बिं चरमाणा गामाणुगामं दुइज्जमाणा जेणेव हत्थिणाउरे णगरे जेणेव सहस्संववणे तेणेव उवा- गच्छइ २ ता अहापडिरूवं उग्गहं उगिणिहत्ता णं संजमेणं तवसा अप्पाणं भावमाणा विहरन्ति । अर्थ-भगवान महावीर स्वामी फरमाते है-निश्चय इस प्रकार हे गौतम ! उस काल उस समय में इस ही जम्बू द्वीप नामक द्वीपान्तरगत भरत खण्ड में हस्तिनापुर नाम का नगर था, ऋद्धिवाला निर्भय और समृद्धि- शाली था, उस हस्तिनापुर नगर मे सुमुख नामका एक गाधापति (गर्भश्रीमन्त ) वसता था, वह पूर्ण धनाट्य था. उस काल उस समय के अन्दर धर्मघोप नामके स्थिविर (दीर्घपर्यायी साधु ) जातिसम्पन्न यावत् (जिस- तरह सुधर्म स्वामी का वर्णन किया उस तरह यहां पर कहना ) पॉच सौ साधुओं के साथ रहे हुवे पूर्वानुपूर्वी क्रमशः ) चलते हुवं ग्रामानुग्राम ( एक गांव से दूसरे गांव ) विहार करते हुवे जहां पर हस्तिनापुर नगर है जहां पर सहस्राम्रवन ( हजार आम के वृक्षो वाला वन ) वाला उद्यान है वहां पर आते हैं, आकर यथाप्रतिरूप (मुनि- यों के योग्य ) अवग्रह (मुकरर स्थान ) को ग्रहण कर संयम-तप से आत्म भावना करते हुवे रहते हैं. टीकार्थ-'जाइ संपन्ना ' जातिसंपन्न:- उत्तम जाति वाले. यहां पर यावत् करण से ऐसा देखा जाता है-" कुलसंपन्ना पलसंपन्ना विणयणाणदंसणचरित्तलजालाघवसंपन्ना ओयंसि लेयसि वचंसि जसंसी " इत्यादि. अर्थात्-उत्तम कुल वाले, बलवाले, ||३४४॥
विपाक
सु.-वि.
पहिला
सूत्र
॥३४५॥
अध्ययन
विनय-ज्ञान दर्शन-चारित्र- लजा- लघुता गुणयुक्त, प्रभावशाली, तेजस्वी, वचस्वी और यशवन्त थे. 'दुइजमाणा' द्रवन्तः
+गछन्तः-चलते हुवे.
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तपोधन मुनि को सुमुख गाथापति का पूर्ण-भावसे दान देना.
दान से अपूर्व लाभ
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मूल-तेणं कालणं तेणं समएणं धम्मघोसाणं थेराणं अंतेवासी सुदत्ते णामं अणगारे उराले जाव
लेस्से मासं मासेणं खममाणे विहरति, तए णं से सुदत्ते अणगारे मासक्खमण पारणगंसि पढमाए पोरसीए
सज्झायं करोति जहा गोयम सामी तहेव धम्मघोसे ( सुहम्मे ) थेरे आपुच्छत्ति जाव अडमाणे सुमुहस्स
गाहावतिस्स गेहे अणुप्पविटे, तए णं से सुमुहे गाहावती सुदत्तं अणगारं एन्जमाणं पासति २ ता हहेतुढे
आसणातो अब्भुट्ठति २ त्ता पायपिठाओ पञ्चारुहेति २ ता पाउयातो ओमुयति २ ता एगसाडियं उत्तरा-
॥३४५॥
विपाक
सु.-वि.
पहिला
अध्ययन
॥३४८॥
आहयाओ देवदुंदुहीओ अंतरावि य णं आकासे अहो दानमहो दानं घुढे य हत्थिणाउरे सिंघाडग जाव
पहेसु बहुजणो अन्नमन्नस्स एवं आइक्खति ४- धण्णे णं देवाणुप्पिए ! सुमुहे गाहावइ ५ [ सुकय पुन्ने
कयलक्खणे सुलद्धे णं मणुस्स जम्मे सुकयत्थ ] जाव तं धन्ने णं देवाणुप्पिया ! सुमुहे गाहावई ।
अर्थ-तत्पश्चात् उस सुमुख गाथापति ने उस प्रकार की यानी निर्दोष द्रव्य शुद्धि से (दातार शुद्धि से-
ग्राहक शुद्धि से) तीन प्रकार की करण शुद्धि से (विशेष अर्थ टीकार्थ में ) सुदत्त अनगार को प्रतिलाभते हुवे
अपना संसार परित्त * ( परिमित-अमुक हद्द में) किया, यहां पर इसने मनुष्य का आयुष्य बांधा तथा इस
वस्त इसके घर में ये पांच दिव्य प्रकट हुवे; वे ये हैं-१ पृथ्वी पर वृष्टि हुई (साड़े बारह फोड़ सोनयों की दृष्टि
हुई ). २ पांच वर्णों के पुष्पों की वर्षा हुई. ३ चेलोत्क्षेप यानी वस्त्रों की वृष्टि हुई. ४ आकाश के अन्दर देवदुंदुभी
की ध्वनि हुई. ५ आकाश में अहो दानं-अहोदानं की उद्घोषणा हुई; इस समय हस्तिनापुर नगर के त्रिकोण
यावत् राजमार्ग में बहुत से लोग परस्पर इस प्रकार बात करने लगे-अहो देवों के प्यारे ! सुमुख गाथापति धन्य
है (कृतपुण्य है-सुलक्षण वाला है-उत्तम मनुष्य जीवन प्राप्त किया है-इस की समृद्धि सफल हुई ) यावत् इससे
* जिसका जघन्य काल अन्तर मुहूर्त और उत्कृष्ट काल देशोन अर्धपुद्गलपरावर्त दो उसे 'परित्त संसार' कहते हैं
॥३४८॥
विपाक
सु.-वि.
सूत्र
पहिला
-
अध्ययन
॥३४९॥
हे देवों के वल्लभ ! वह सुमुख नाम का गाथापति धन्य है.
टीकार्थ--' तस्स सुमुहस्स ' तस्य सुमुखस्य-विभक्ति के परिणाम से यानी बदलने से 'तेन सुमुहेन । ऐसा जानना
अर्थात्
सुमुख द्वारा उससे यानी असनादि दान से. 'दव्वसुद्धणं' द्रव्यतः शुद्धेन - द्रव्य शुद्धि से यानी प्रासुक (निर्दोष) आहा-
रादि से. यहां पर अन्य पद भी हैं- " गाहयसुद्धेणं-दायगसुद्धणं " ग्राहकशुद्धेन, दायकशुद्धन-लेने वाला चारित्र गुणयुक्त
हो, इस ग्राहक शुद्धि से-देने वाला उदारतादि गुण सहित हो, इस दातार शुद्धि से. इस ही लिये कहा है- 'तिविहेणं । त्रिविधेन
उपरोक्त तीन प्रकार के लक्षणयुक्त से. 'तिकरण सुद्धेणं । त्रिकरण शुद्धन- मन, वचन, काया (विचार-वाणी-वर्तन) इस
दायक के करणत्रय की शुद्धि से. ' एवं आइक्खइ । सामान्येन आचष्टे-साधारणता से कहने लगे; यहां पर तीन पद दूसरे भी
देखे जाते हैं- ' एवं भासइ । विशेषत आचष्टे - इस कदर विशेषता से कहने लगे. ' एवं पन्नवेति- एवं परूवेति । एवं प्रज्ञापयति,
एवं प्ररूपयति - इस प्रकार प्रज्ञापना करने लगे, इस तरह प्ररूपणा करने लगे; ये दोनों पद उपरोक्त दो पदों की व्याख्या के
लिये जानना; अथवा आख्याति और भापते, ये दो शब्द प्रकट वचनों से कहते हैं और प्रज्ञापयति शब्द युक्ति से बोध करता है
एवं प्ररूपयति शब्द भेद पूर्वक कहता है. 'धने णं देवाणुप्पिया ! सुमुहे, गाहावई ' अर्थ मूलार्थ के माफिक. यहां पर यावत्
शब्द से ऐसा दिखाई देता है- " पुन्ने णं देवाणुाप्पिया ! सुमुहे गाहावई एवं कयत्थे णं कयलक्खणे णं सुद्धे णं सुमुहस्स गाहांवइस्स
जम्मजीवियफले जस्स णं इमा एयारूवा उराला माणुस्सरिद्धि लद्धा पत्ता अभिसमन्नागया; तं धन्ने णं देवाणुप्पिया ! सुमुहे गाहावइ
-
॥३४९॥
विपाक सु.-वि. पहिला अध्ययन ॥३५२॥ xx xx xx xx xx अर्थ-हे जगत पूज्य ! सुयाहु कुमार आप देवों के प्रीतिस्थान के पास गृहस्थाश्रम छोड़ कर मुनिदीक्षा लेने में समर्थ होंगे ? भगवन्त ने फरमाया-हां समर्थ होगा! तब ज्ञानी गौतम ने श्रमण भगवन्त महावीर देवको वंदन-नमस्कार किया, करके संयम-तप द्वारा आत्म-भावना करते हुवे विचरते हैं. टीकार्थ- मूल-तते णं से समणे भगवं महावीरे अन्नया कयाइ हत्थिसीसाओ णगराओ पुप्फगउज्जाणाओ कयवणमाल जक्खाययणाओ पडिणिक्खमति २ त्ता बहिया जणवयविहारं विहरति, तते णं से सुबाहु कुमारे समणोवासए जाते अभिगयजीवाजीवे जाव पडिलाभेमाणे विहरति । अर्थ-तत्पश्चात् श्रमण भगवन्त महावीर देव ने किसी एक वख्त हस्तिशिर्ष नगर से, पुष्पोद्यान से, कृतव- नमाल यक्ष के आयतन से विहार किया, करके बाहार अन्य देशों में विचरने लगे, बाद वह सुबाहु कुमार श्रम- णोपासक ( साधुओं की उपासना करने वाला-श्रावक) होने से जीवाजीव का जानने वाला हुवा, यावत् प्रतिलाभता हुवा (साधुजन को आहार - पानी बहरता हुवा) रहता है. टीकार्थ- ' अभिगय जीवाजीचे ' अर्थ मूलार्थवत्. यहां पर यावत् करण से- " उवलद्धपुनपावे" यहां से लेकर ॥३५२॥ - X0
विपाक
सूत्र
सु.-वि.
पहिला
अध्ययन
॥३५३॥
18-
अहापडिग्गहिएहिं तवोकम्मेहि अप्पाणं भावेमाणे विहरइ " तक. अर्थात् - पुण्य पाप को जानने वाला, अङ्गीकार किये गये के
अनुसार तपक्रिया से (व्रत पालन से ) आत्म भावना करता हुवा रहता है.
SHALALBASERER
48625555
दीक्षा के लिये कुमार की पूर्ण अभिलाषा
भगवन्त का पदार्पण
KHESARBASISAR
मूल-तते णं से सुबाहु कुमारे अन्नया कयाई चाउद्दसमुदिडपुषणमासिणीसु जेणेव पोसहसाला
तेणेव उवागच्छति २ ता पोसहलालं पमज्जति २ त्ता उच्चारपासवण भूमि पडिलेहति २ त्ता दब्भसंथारगं
संथरति २ ता दब्मसंथारं दुरूहइ २ त्ता अहमभत्तं पगिण्हइ २ त्ता पोसहसालाए पोसहिते अहमभत्तिएं
पोसह पडिजागरमाणे विहरति ।
अर्थ-तब वह सुबाहु कुमार कदाचित चउदस-आठम-अमावस्या-पूर्णिमा के दिन जहां पौषधशाला
॥३५३॥
विपाक
सु.-वि.
पहिला
अध्ययन
॥३५६॥
मसंवाहसंन्निवेसा" अर्थात् १ - नगर कट २ - मंडप-खेट ३ - द्रोणमुख ४ - पाटण ५ - निगमन ६-याश्रम ७ - संवाध ८ - सन्निवेस
को धन्य है. 'राइसर ' यहां पर यह जानना राइसरतलवरमाडंपियकोदंवियइन्भसेट्ठिसत्थवाहपभियओ " यानी राजा-ईश्वर-
कोतवाल --मंडपधारी-- कोटुम्निक-- धनाट्य - सेठ-सेनापति - सार्थवाह वगैरा धन्य है. ' मुंडा ' मुंडिताः-शिर मुडित, यहां पर
यावत् करण से ऐसा जानना- " भवित्ता आगाराओ अणगारियं ” गृह त्याग कर साधु हुवे. 'पुव्वाणुपुब्बि ' यावत् करण से-
चरमाणे गामणुगामं " इनका अर्थ मृलार्थ के मुआफिक.
मूल-तते णं समण भगवं महावीरे सुवाहुस्स कुमारस्स इमं एयारूवं अज्झत्थियं जाव वियाणित्ता
पुवाणुपुठि जाव दूइज्जमाणे जेणेव हत्थिसीस णगरे जेणेव पुप्फगउज्जाणे जेणेव कयवणमालपियस्ल
जक्खस्स जक्खाययणे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता आहापडिरूवं उम्गहं गिण्हित्ता संजमेणं तवसा
अप्पाणं भावमाणे विहति, परिसा राया निग्गया ।
अर्थ-तदनन्तर श्रमण भगवन्त महावीर देव सुबाहु कुमार की यह इस प्रकार की प्रार्थना को जान कर
अनुक्रम से यावत् विचरते हुवे जहां हस्तिशीर्ष नगर है, जहां पुष्पकरण्डक नाम का उद्यान है, जहां यक्ष का
१-छोटा गाम २-धूल के फिल्ले वाला गाम ३-जल आर स्थल के मार्ग वाला गाम ४-जल या स्थल दो में से एक किसी
मार्ग वाला बड़ा शहर ५-व्यापार का गाम ६-तापस लोगों का स्थान ७-पर्वत पर किल्ले के बीच का गाम ८-स्थान विशेप-पाड़ा.
॥३५६॥
विपाक
सु.-वि.
पहिला
सूत्र
xx
अध्ययन
xx
xx
xx
xx
॥३५७॥
यक्षमंदिर है वहां पर पधारे, पधार कर यथायोग्य वनपाल की आज्ञा से अवग्रह ( उपाश्रय ) को ग्रहण कर
संयम और तप से आत्म भावना करते हुवे रहते हैं. पूर्ववत् नगर से पर्षदा और राजा (प्रभु को वन्दनार्थ) निकले.
टीकार्थः-
FASAS 395********************
प्रभु की देशना का श्रवण-पूर्णप्रेम से दीक्षा का
अङ्गीकार और उसका यथार्थ पालन,
AASURESHARMAKASON
मूल-तते णं से सुबाहु कुमारे तं महया जहा पढमं तहा निग्गओ धम्मो कहिओ परिसा राया
पडिगया, तते णं से सुबाहु कुमारे समणस्स भगवतो महावीरस्स अंतिए धम्म सोच्चा, निसम्म हट्ट तुट्ट
जहा मेहे तहा अम्मापियरो आपुच्छति णिक्खमणाभिसेयो तहेव जाव अणगारे जाते ईरियासमिए जाव
बंभयारी।
॥३५७॥
विपाक
सु.-वि.
पहिला.
॥३६॥
तप ( आत्म शोधन के लिये तपस्या) से आत्मा को (देह को) शुष्क करके साट भक्त (भोजन) को अनसन से
छेद कर यानी एक मास का अनसन करके, आलोचना तथा प्रतिक्रमण (कृतपापों का प्रायश्चित अथवा कृत
पापा से वापिस फिरना) करके, समाधिपूर्वक कालमास में काल करके सौधर्म देवलोक (पहिला देवलोक ) में
देवपने उत्पन्न हुवा.
टीकार्थ-
अध्ययन
xx
xx
xx
XX
xx
सुबाहु कुमार का अन्तिम सुन्दर निर्णय
मूल-से णं ततो देवलोगाओ आउक्खएणं भवक्खएणं ठिइक्खएणं अणंतरं चयं चइत्ता माणुस्सं
विग्गहं लभिहिइ २ त्ता केवलं वोहि बुज्झिहिति २ त्ता तहारूवाणं थेराणं अंतिए मुंडे जाव पव्वइस्सति, से णं
तत्थ बहूई वासाई सामण्णं पाउणिहिइ आलोइय पडिकंते समाहि पत्ते कालगते सणतकुमारे कप्पे देवत्ताए
उबवन्ने, से णं ताओ देवलोयाओ ततो माणुस्सं पवजा वंभलोए माणुस्सं नतो महासुके ततो माणुसंततो
॥३६०॥
विपाक
सु.-वि.
पहिला
सूत्र
अध्ययन
॥३६॥
आणते देवे ततो माणुस्सं ततो आरणे देवे ततो माणुस्सं ततो सव्वदृसिद्धे, से णं ततो अणंतरं उवहित्ता
महाविदेहे वाले जाव अड्ढाइं जहा दढपइन्ने सिज्झिहिति, एवं खल्लु जम्बू ! समणेणं जाव संपत्तेणं सुह-
विवागाणं पढमस्स अज्झयणस्स अयम? पन्नत्ते. (सू०३३) पढमं अज्झयणं समत्तं ॥१॥
अर्थ-तय वह (सुबाहु का जीव) देवलोक से आयुष्य क्षय होने पर, भवक्षय होने पर, स्थिति क्षय होने
पर अन्तर रहित च्यवन के समय च्यव कर (मरकर) मनुष्य शरीर ( औदारिक शरीर ) प्राप्त करेगा, करके
सम्पूर्ण बोधिको (समकित को) प्राप्त करेगा, करके तथारूप स्थिविर मुनि के पास मुंडित होकर यावत् दीक्षा
ग्रहण करेगा; वहां पर वह बहुत वर्षों तक साधुपन पालकर, आलोचना-प्रतिक्रमण करके समाधि पूर्वक काल
धर्म प्राप्त कर सनतकुमार देवलोक में (तीसरे देवलोक में ) देवपने उत्पन्न होगा; फिर वह देवलोक से च्यवकर
मनुष्यभव प्राप्त करेगा, वहां दीक्षा लेकर ब्रह्मलोक में (पांचवें देवलोक में ) देव होगा, वहां से च्यवकर मनुष्य
भव पाकर दीक्षा लेकर महाशुक्र में (सातवें देवलोक में ) देव होगा; वहां से च्यवकर मनुष्यभव पाकर दीक्षा
लेकर आनत में (नवे देवलोक में ) देव होगा; वहां से च्यवकर मनुष्वभव प्राप्त कर, दीक्षा लेकर आरण्य में
( ग्यारहवें देवलोक में) देव होगा; वहां से च्यवकर मनुष्यभव प्राप्त कर दीक्षा ग्रहण कर सर्वार्थसिद्ध विमान
॥३६॥
विपाक
* दूसरा अध्ययन
(भद्रनन्दी कुमार)
सु.-वि.
दूसरा
॥३६४॥
अध्ययन
मूल-वितियस्स णं उक्खेवो- एवं खल्लु जम्बू ! तेण कालेणं तेणं समएणं उसभपुरे णगरे थू-
भकरंडउज्जाणे धन्नो जक्खो धणावहो राया सरस्सई देवी सुमिणदंसणं कहणं जम्मणं घालत्तणं कलाओ य
जुब्बणे पाणिग्गहणं, दाओ पासाद भोगा य जहा सुवाहुयस्स, नवरं भद्दनंदी कुमारे सिरिदेवी पामोक्खाणं
पंचसया । सामी समोसरणं सावगधम्मं पुत्रभवपुच्छा महाविदेहे वासे पुंडरीकिणी णगरी विजयते कुमारे
जुगवाहु तीत्ययरे पडिलाभिय माणुस्साउए निवद्धे इहं उपन्ने सेसं जहा सुवाहुयस्स जाव महाविदेहे
वासे सिज्झिहिति बुझिहिति मुचिहिति परिनिव्वाहिति सव्वदुक्खाणमंतं करेहिति-वितियं अज्झयणं
सम्मत्तं ॥२॥
॥३६४॥
विपाक सूत्र सु.-वि. दूसरा अध्ययन - ॥३६५॥ अर्थ-द्वितिय अध्ययन का उत्क्षेप (प्रस्तावना-बयान) करते हैं - सुधर्मस्वामी जम्ब अनगार को फरमाते हैं- इस प्रकार निश्चय हे जम्बो ! उस काल उस समय में ऋषभपुर नाम का नगर था, उसके समीप में स्तूपकरण्डक नामक उद्यान था, उसमें धन्य नामका यक्ष था, ( यक्षायतन था) उस नगर में धनावह नामक राजा राज्य कर- ता था, उसके सरस्वती नामकी पटरानी थी, उसने एक वख्त स्वम देखा, पतिदेव को कहा, पुत्र को जन्म दिया, बालकने बाल्यावस्था में कलाएँ प्राप्त की, यौवन वय में ५०० पाँच सौ कन्याओं के साथ विवाह किया, पिता जी ने प्रीतिदान दिया, ५०० महल बनवा दिये, महलों के ऊपर अपनी प्रियाओं के साथ कुमार क्रीड़ाएँ करने लगा; इत्यादि सर्व पहिले अध्ययन में प्रकाशित सुबाहु कुमार के माफिक जानना; मात्र अन्तर इतना है कि- इसका नाम भद्रनन्दी कुमार था और श्रीदेवी आदि ५०० भार्याओं थीं-किसी एक वख्त वहां पर श्रमण भगवान् महावीर देव समवसरे, उस वख्त भद्रनन्दी कुमारने प्रभु की देशना सुनकर श्रावकधर्म अङ्गीकार किया; गौतम स्वामी ने कुमार का पूर्वभव पृछा, भगवन्त ने उत्तर फरमाया कि- यह कुमार पूर्वभव में महा- विदेह क्षेत्रान्तरगत पुंडरीकिणी नगरी में विजय नामका कुमार था, युगवाहु तीर्थंकर को प्रतिलाभे थे (दान दिया था) उससे मनुष्य का आयुष्य बांधकर यहां उत्पन्न हुवे, वाकी सर्व सुबाहु कुमार की तरह यावत् (इस भव में चारित्र लेकर देव मनुष्यों के भव करके) प्रान्ते महाविदेह क्षेत्र में मनुष्य होकर चारित्र अङ्गीकार करके मोक्ष
विपाक
सु.-वि.
* चौथा अध्ययन के
(सुवासव कुमार)
चौथा
॥३६८॥
अध्ययन
मूल-चोत्थस्स उक्खेवो-विजयपुरं णगरं गंदणवणं [ मणौरमं ] उजाणं असोगो जक्खो वास-
वदत्ते राया कण्हादेवी सुवासवे कुमारे भद्दापामोक्खाणं पंचसया जाव पुत्वभवे कोसंवी णगरी धणपाले
राया वेसमणभद्दे अणगारे पडिलाभिते इह जाव सिद्धे-चोत्थं अज्झयणं सम्मत्तं ॥४॥
अर्थ-चौधे अध्ययन का उत्क्षेप करते हैं-विजयपुर नामक नगर था, नन्दनवन (मनारेम) संज्ञक उद्यान
था, उसके बाहर अशोक यक्ष ( यक्षायतन) धा, वासवदत्त राजा राज्य करता था, उसके कृष्णादेवी रानी थी
और सुवासव कुमार था, उसका भद्रा यगैरा पांच सौ कन्याओं से विवाह किया था, यावत् (प्रभु पधारे, दे-
शना सुनी, श्रावकत्रत लिये ) गौतम स्वामी के पूछने पर भगवन्त ने पूर्वभव फरमाया-कौशंबी नामकी नगरी
धी, वहां का राजा धनपाल था, उसने वैश्रमणभद्र नामक मुनि को दान दिया, इससे यहां उत्पन्न हुवा, सुबाहु
॥३६८॥
सु.-वि.
विपाक
पांचवां
सूत्र
कुमारवत् यावत् (मनुष्य और देव के भव कर चारित्र अङ्गीकार कर महाविदेह क्षेत्र में) मोक्ष प्राप्त करेगा-
चौथे अध्ययन का अर्थ सम्पूर्ण हुवा. ॥ ४ ॥
टीकार्थ-
चौथा अध्ययन समाप्त.
xx
xx
xx
xx
xx
अध्ययन
॥३६९॥
॥पॉचवां अध्ययन॥
(जिनदास कुमार)
मूल-पंचमस्स उक्खेवो- सोगंधिया नगरी नीलासोहे उजाणे सुकालो जक्खो अप्पडिहओ
राया सुकन्नादेवी महचंदे कुमारे तस्स अरहदत्ता भारिया जिणदासो पुत्तो, तित्थयरागमणं जिणदासपुव्व-
भवो, मज्झमीया णगरी मेहरहो राया सुधम्मे अणगारे पडिलाभिए जाव सिद्धे-पंचमं अज्झयणं सम्मत्तं ॥५॥
॥३६९॥
विपाक सु.-वि. सूत्र सातवां सुनी, भावकवत अङ्गीकार किये ) पूर्वभव गौतम स्वामी ने पूछा ? प्रभुने उत्तर दिया-मणिया नामकी नगरी थी, उसमे मित्र नामक राजा राज्य करता था, संभूतविजय अनगार को दान देने से यावत् (देव और मनुष्य के भवो को कर, चारित्र अङ्गीकार कर ) सुथाहुकुमार की तरह महाविदेह क्षेत्रमें मोक्ष को प्राप्त करेगा-छट्टे अध्ययन का अर्थ सम्पूर्ण हुवा. टीकार्थ- अध्ययन ॥३७२॥ xx XX xx xx XX छट्टा अध्ययन समाप्त. ॥ सातवाँ अध्ययन ॥ (महावल कुमार) ॥३७२॥ मूल-सत्तमरस उक्खेवो-महापुरं णगरं रत्तासोगं उज्जाणं रत्तयाओ जक्खो वले राया सुभद्दादेवी महब्बले कुमारे रत्तवई पामोक्खाओ पंचसया कन्ना पाणिग्गहणं तित्थयरागमणं जाव पुबभवो मणिपुरं
विपाक
सु.-वि.
सातवाँ
अध्ययन
॥३७३॥
णगरं णागदत्ते गाहावती इंदपुरे अणगारे पडिलाभिते जाव सिद्धे-सत्तमं अज्झयणं सम्मत्तं ॥७॥
अर्थ- सातवें अध्ययन का उत्क्षेप (बयान ) करते हैं- महापुर नामका नगर था, उसके बाहर रक्त-
अशोक संज्ञक उद्यान था, उसमें रक्तपाद नामक यक्ष ( यक्षायतन ) था, इस नगर में बल नामका राजा राज्य
करता था, उसके सुभद्रा नामकी रानी और महायल नामका कुमार था, रक्तवती बगरा ५०० पाँच सौ राज-
कन्याओं के साथ इस राज कुमार का विवाह हुवा था; तीर्थंकरदेव का पदार्पण हुवा यावत् (देशना सुनी, श्रावकवत
अङ्गीकार किये ) गौतम गणधर ने पूर्वभव पूछा ? प्रभु ने उत्तर बक्षा-माणपुर नामका नगर था, उसमें नागदत्त
गाथापति रहता था, उसने इन्द्रपुर नामके अनगार (साधुमहात्मा) को आहार दान दिया था उससे यावत्
(महायल कुमार हुवा, चारित्र लिया, देव-मनुष्यों के भव करके चारित्र अङ्गीकार कर सुबाहु कुमार की तरह
महाविदेह क्षेत्र में) मोक्ष जावेगा सातवें अध्ययन का अर्थ सम्पूर्ण हुवा ।
टीकार्थ-
सातवां अध्ययन समाप्त.
xx
xx
xx
xx
-
xx
॥३७३॥
विपाक सु.-वि. दसवाँ पर अध्ययन ॥३७६॥ था, उसमें पूर्णभद्र संज्ञक यक्ष था, दत्त नामक राजा राज्य करता था, रक्तवती रानी थी और महाचन्द्र नामक कुमार था, युवराज पद धारक था; श्रीकान्ताप्रमुख ५०० पाँच सौ कन्याओं के साथ उसका विवाह करदिया था, यावत् (तथिंकर देव पधारे, देशना सुनी, श्रावक व्रत अगीकार किये) गौतम गणधर ने पूर्वभव पूछा ? प्रभुने फरमाया - तिगिच्छी नामकी नगरी थी, जितशत्रु नामका राजा था, उसने धर्मवीर्य अनगार को दान दिया था, जिससे यावत् ( महाचन्द्र कुमार हुवा, चारित्र लेकर देवलोक गया, मनुष्य-देव के भव करके पाखीर चारित्र लेकर सुयाहु कुमार की तरह ) महाविदेह क्षेत्र में मोक्षपद प्राप्त करेगा- नवें अध्ययन का अर्थ सम्पूर्ण हुवा. टीकार्थ- नवां अध्ययन समाप्त. RAKAS xx xx xx xx xx दसवाँ अध्ययन * (वरदत्त कुमार ) ॥३७६॥ मूल-जति णं भंते ! दसमस्स उक्लेवो-एवं खलु जम्बू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं सायेयं
सु. वि.
दसवॉ
३
विपाक
सूत्र
अध्ययन
॥३७७॥
णामे णगरें होत्या उत्तरकुरु उजाणे पासमिओ जक्खो मित्तनंदी राया सिरीकन्ता देवी वरदत्ते कुमारे वर-
सेणपामोक्खाणं पंच देवीसया तित्थयरागमणं सावगधम्म पुव्वभवो पुच्छा सतदुवारे नगरे विमलवाहणे
राया धम्मरुचि नामं अणगारं एजमाणे पासति पासित्ता पडिलाभिते समाणे मणुस्साउते निबद्धे इहं
उपन्ने ससं जहा सुबाहुयस्स कुमारस्स चिंता जाव पवजा कप्पंतरिओ जाव सव्वदृसिद्धे ततो महाविदेहे
जहा दढपइन्नो जाव सिज्झिहिति बुज्झिहिति मुच्चिहिति परिणिवाहिति सव्वदुखाणमंतं करोहिति । एवं खल्ल
जम्बू
! समणेणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेणं सुहविवाहगाणं दसमस्स अज्झयणस्स अयमढे पन्नत्ते
सेवं भंते ! सेवं भंते ! सुहविवागा (सू० ३४ ) दसमं अज्झयणं सम्मन्तं ॥ १० ॥
अर्थ- जम्बू स्वामी ने स्वधर्म स्वामी से पूछा-जो हे पूज्य गुरुदेव ! श्रमण भगवन्त महावीर देव यावत्
मोक्ष को पधारे ने नवें अध्ययन का इस तरह बयान किया तो हे स्वामिन् ! दसवें अध्ययन का क्या अर्थ फर-
माया ? इस कदर दसवें अध्ययन का उत्क्षेप (प्रस्तावना - बयान ) करते हैं -निश्चय इस प्रकार हे जम्बो !
उस काल उस समय में साकेत नामका नगर था, उसके निकट उत्तरकुरु नामक उद्यान था, उसमें पासमिक
संज्ञक यक्ष था, ( यक्षायतन था) इस नगर मे मित्रनंदी नामका राजा राज्य करता था, उसके श्रीकान्ता देवी
॥३७७॥
विपाक
सु. वि.
समाप्त
॥३८४॥
MEHARE
हिन्दी अनुवादयुक्त विपाकसूत्र समाप्त-
ង
28
॥३८४॥
श्री आगमोदय समिति -