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Karmkandchandrika
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ओ३म्
कर्मकाण्डचन्द्रिका
Y"
जिसको
श्रीमान् सेठ जयनारायण रामचन्द्र पोदार
ने
वैदिककर्मकाण्ड के प्रचारार्थ
श्रीयुत पण्डित देवदत्तशर्मा
द्वारा
संग्रह कराके
प्रकाशित किया
अगन्नाथ प्रिंटिंग पर्स, राजघाट, काशी
सम्वत् १६७६ वि, सन् १८२३ ई०
द्वितीय संस्करण २०००
[बर पाना
धाधू सूर्यनारायणजी द्वारा जगन्नाथ मिंटिङ्ग वर्क्स राजघाट-काशी
में मुद्रित और पं० देवदत्तशर्मा पो० कर्णवास
जिला-बुलन्दशहर द्वारा प्रकाशित ॥
भूमिका 1- . प्राचीन समय में वेद और श्राय॑जाति का ऐसा सम्बन्ध था जैसा जीव तथा शरीर का है, वेद इस जाति का आत्मा और यह उसके कर्मकाण्ड का साधनभूत शरीर और शरीर शरीरीभाव से.दोनों में एकात्मता थी। "विजोनीद्यार्थ्यामन्ये च दस्यका ऋग०१? ५१ । - इस वेदवाक्य के अनुसार वेदिक लोग ही आर्य कहलाले थे, इनसे भिन्न दस्यु-अनार्य थे, इसी आशय से गीता में कृष्णजी ने कहा है कि "अनार्यजुष्टमस्वयंमकीर्तिकरमर्जुन हे अर्जुन! तू अनार्यता को छोड़, यह अनायंता नरकपात का हेतु और श्रकीर्ति के देने वाली है, अस्तु- इस अनार्यता रूपी नरक से निकालने का सौभाग्य महर्षि स्वामी दया- नन्दसरस्वतीजी को ही प्राप्त है जिन्होंने ऐसे विकट समय में भारतीय सन्तान के निर्जीव शरीर में फिर वेदरूप जीवात्मा का सञ्चार और भूमण्डल में वेद भगवान का प्रचार किया, उक्त वेदप्रचार के लिये मनु भगवान ने यह लिखा है कि:- योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् । सजीवन्नेव शुद्रित्वमाशुगच्छति सान्वयः॥ मनु०२।१६. अर्थ-जो चेद को न पढ़कर अन्यत्र श्रम करता है वह अपने जीवन में ही पुत्र पौत्र सहित शुद्रभाव को शीघ्र ही प्राप्त होजाता है, "शुचादवतीति शूद्रा-जो शोक से डरकर भागे अर्थात् भयभीत रहे उसका नाम "शुद्रा है, वास्तव में जव से आर्यजाति ने वेद के अध्ययन को छोड़ दिया तभी से उलमें शुद्रत्व का भाव आगया, आजकाल जितनी पद्धतियें पाई जाती हैं वह प्रायः वेदों से भिन्न ग्रन्थों का आश्रय करती हैं और प्राचीन समय में मनु श्रादि धर्मशास्त्र केवल एकमात्र वेद को अवलम्बन करते थे, जैसाकि मनुजी एक स्थल में लिखते हैं कि:- या वेदवाह्या स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः । 'सर्वास्ता निष्फला: मेत्य तमो निष्ठा हि ताः स्मृताः॥ मनु० १२५ , . अर्थ-जो वेद से वाय अर्थात् वेदविरुद्ध स्मृति अथवा अन्य ग्रन्थ हैं वे सव निष्फल, असत्य-अन्धकाररूप इस लोक और परलोक में दुःखदायक हैं, ऐसे ग्रन्थ सदा अप्रमाण माने जाते थे परन्तु आज वह समय आगया कि जो लोग बड़े बड़े कर्मकाण्डी कहलाते हैं वे जब अपनी श्रद्धा भक्ति से उपासना और पूजा पाठ करते हैं तो उनमें स्यात् ही कोई मन्त्र वेद का आवा हो, इसी कारण नित्य प्रातःपठनीय पुरुषसूक्त तथा विष्णुसूकादि सूक्तों को भी लोग अर्थ नहीं जानते, यदि कोई वेद' का श्रद्धालु वेद के पुरुष सूक्तोदि सूक्तों का प्रातःकाल उठकर पाठ भी करता है तो वह उनके अर्थ नहीं जानता, इसलिये इस बात की अत्यन्त आवश्यकता है कि नित्यकर्म में आने वाले वेद के सूक्तों का कोई सरल हिन्दी में सुन्दर भाष्य हो, जिसको पढ़कर सर्वसाधारण लाभ उठायें। यद्यपि श्राह्निकचन्द्रिका, गायत्रीव्याख्या तथा संस्कारचन्द्रिका आदि अन्धों में कई एक सूक्तों के भाष्य संस्कृत तथा भाषा में पाये जाते हैं तथापि इन में उनका विनियोग यथावस्थित नहीं, संस्कारचन्द्रिका में विनियोग ठीक है परन्तु उपासना योग्य सूतों तथा कर्मकाण्डोपयोगी सूक्तों का विस्तृत भाष्य नहीं, इसलिये इस ग्रन्थ में हमने स्तुतिप्रार्थनोपासना, स्वस्तिवाचन, शान्तिप्रकरण, पुरुषसूक्त, विष्णुसूक्त और नित्यकर्तव्य पांचो यचों की विधि सहित भाषा कराके सर्वसाधारण के हितार्थ ऐसा सुगम कर दिया है कि प्रत्येक वेधर्मानुयायी इसको पढ़कर लाभ उठा सकता है, विशेष कर मारवाड़ी भाइयों से हमारी प्रार्थना है कि वे अपने नित्यकर्मों में वेदमन्त्रों का पाठ अवश्य किया करें, क्योंकि यह पति स्पष्ट है कि वेदपाठ से अपूर्व पुण्यों की प्राप्ति होती और इससे अविद्यारूपी पक कलङ्क निवृत्त होता है। आजकल जब हम वेदानुयायी हिन्दूमात्र के प्राचार व्यवहार पर दृष्टि डालते हैं तो उनमें वेद का पठन-पाठन बहुत ही न्यून पाते हैं, घटुत क्या यहां तक वेद की न्यूनता पाई जाती है कि बहुत से हिन्दू प्रातःकाल उठ- फर एक वेद मन्त्र का भी पाठ नहीं करते, और न सन्ध्या अग्निहोत्रादि नित्य- कर्तव्य कर्मों का अनुष्ठान करते हैं जिनका न करना पाप और करने में सर्वत्र पुण्य विधान किया है, जिसकी विधि आगे ब्रह्मयज्ञ के साथ विस्तार पूर्वक लिखी है और वहीं । यह भी भलेप्रकार दर्शाया है कि मनुष्य प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में जागे और उस समय उठकर अपने धर्म का चिन्तन करे, तदनन्तर इस शरीर को पीड़ा देने घाले अविद्यादि पांच क्लेशों का चिन्तन करे तथा उन क्लेशों का मूल जो पूर्वजन्मकृत अशुभ कर्म हैं उनका भी अनुसन्धान करे और वेद का तत्व जो एकमात्र ईश्वर है उसकी उपासना करता हुआ वेद का सार जो "ओ३म" है उसका ध्यान करे, वेद में "प्रातरग्नि प्रातरिन्द्रं हवामहे" और "सायं सायं नो ग्रहपति यादि अनेक मंत्र पाये जाते हैं जिनमें प्रातः और सायंकाल की सन्ध्या का भलेप्रकार विधान किया है, अस्तु हमारा मुख्य प्रयोजन ईश्वर को वर्णन करने वाले सूक्कों की ओर हष्टि दिलाना है, इसी अभिप्राय से हमने इस ग्रन्थ में प्रातः सायं पठनीय वेदसूक्तों तथा नित्यकर्तव्य कर्मों का संग्रह कराके प्रकाशित किया है। आजकल पार्यजाति का प्रवाह प्रायः काव्य, नोटक, कथा, कहानी, अलंकार, शृङ्गार तथा उपन्यास ग्रंथों की ओर बह रहा है, इसलिये हमने इस प्रवाह से चित्तवृत्ति हटाकर पुरुषों को भगवत्परायण बनाने के लिये. इस कर्मकाण्डप्रधान ग्रन्थ का संग्रह कराया है। इसमें केवल उपासना और ईश्वर का ध्यान ही नहीं किन्तु पुरुष को उद्योगी और कर्मयोगी बनाने के लिये वेद के उत्तमोत्तम उपदेशरत्नों का संग्रह भी कराया है, जैसाकि "मोषु वरुण मृन्मयं गृह राजन्नहं गमम् । मृला सुक्षत्र प्रलया ऋग्० ७ १६018 इस मन्त्र में परमात्मा से यह प्रार्थना कीगई है कि हे सर्वव्यापक परमात्मन् !श्राप हमें मिट्टी के घर मत दें किन्तु हमको ऐश्वर्य वाले घर दें ताकि हम ऐश्वर्य सम्पन्न होकर आपके ऐश्वर्य को प्राप्त हो । इस मन्त्र का आशय यह है कि दरिद्र पुरुष उस परमात्मा के परमै. श्वर्य को प्राप्त नहीं होते वे अपने दरिद से आलसी बनकर प्रतिदिन परमात्मै- श्वर्य से विमुख रहते हैं, इसलिये परमात्मा से परम ऐश्वर्य की प्रार्थना अवश्य करनी चाहिये, इसी अभिमाय से दारिदध की निन्दा करते हुए महाभारत वनपर्व में युधिष्ठिर ने यह कथन किया है कि "मुझे राज्य से च्युत होने का इतना शोक नहीं जितना निर्धन होने के कारण मेरे घर से अर्थियों के निराश होकर लौट जाने का शोक है। अर्थात् जब ब्राह्मण, साधु तथा संन्यासियों को मैं भोजन नहीं करासकता और नाही उनके विद्याविषयक मनोरथ पूर्ण करने में समर्थ हूं तो मेरे जीने का क्या फल । इस स्थल में धर्मराज युधिष्ठिर ने दरिद्र की अत्यन्त निन्दा की है कि जो पुरुष दरिद्र है वह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन मनुष्यजन्म के चारों फलों से वञ्चित रहता है, इसलिये मनुष्य को दरिद्र के दूर करने का उद्योग सदैव करना चाहिये और वह उद्योग वेदपाठ तथा घेद के स्वाध्याय के विना कदापि नहीं होसकता। या यों कहो कि कर्मयोगी पुरुष के बिना दरिद्रता की जड़ को कोई नहीं काट सकता और वह दरिद्रता की जड़ महामोह है अर्थात् मोह के वशीभूत होकर जो पुरुष अपने क्षुद्र ग्रामों में पा निर्जल प्रदेशों में पड़े रहते हैं वे कदापि .. उन्नति नहीं करसकते, इसलिये कर्मयोगी पुरुष को चाहिये कि सबसे पहिले शानरूपी खड्ग से मोहजालरूपी लता को छेदन करे अर्धा इस लता की को ज्ञानरूपी शस्त्र से काटे, यहां ज्ञान और कर्मरूपी शस्त्र दोनों को ५ - . जड़ ... आवश्यकता है, इसीलिये हमने इस "कर्मकाण्डचन्द्रिका" में कर्मकाण्ड और शानकाण्ड दोनों का संयह कराया है, जिससे पुरुष ज्ञानयोगी और कर्मयोगी बनकर उद्योगी बने । अधिक क्या कृष्णजी गीता में यह कथन करते हैं कि... "नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तमा गी०४।३६ हे अर्जुन ! जो पुरुष पंचयज्ञ नहीं करता और अमावस्था तथा पूर्ण- मासी को भी यज्ञ नहीं करता वह इस लोक के भी सुखों को नहीं भोग सकता परलोक की तो कथा ही क्या ॥ इसी अभिप्राय से आन्हिकचन्द्रिका, संस्कारचन्द्रिका तथा संस्कारविधि आदि वेदिक ग्रन्थों के आधार पर श्रीयुत पं०देवदत्तशर्मा ने हमारी प्रेरणा से इस ग्रन्थ को संग्रह किया और हमने वेदानुयायी मनुष्यमाश के लिये इसको प्रकाशित कराया है, यह कोई साम्प्रदायिक प्रन्थ नहीं किन्तु यह वैदिक ग्रन्थ है इसलिये प्रत्येक चैदिकधर्मी का इसके पठनपाठन में पूर्ण अधिकार है, अतएव हमारी प्रत्येक वैदिकधर्मी से विनय है कि रागद्वेष को छोड़कर इसका अध्ययन करें। विशेषकर मारवाडीसाइयों से यह विनय है कि वह अपने 'नित्यकर्म के लिये इस पुस्तक को अपनी पाठ्य पुस्तक बनायें । विनीत- जयनारायण रामचन्द्र पोद्दार कलकता।
ॐ ॥ अथेश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासनाः ॥ ॥ माहं ब्रह्म निराकुर्यां मामा ब्रह्म- निराकरोदनिराकरणमस्तु । हे संसार के यात्रीलोगो। उपरोक्त ऋषि वाक्य हम सबको उपदेश करता है कि परमात्मा ने मेरा त्याग नहीं किया, मैं भी उनका परित्याग नहीं करूंगा, अर्थात् परमपिता परमात्मा मेरा निरन्तर अन्नवस्त्रादि द्वारा पालन पोषण तथा रक्षण करते हैं, मैं भी उनकी प्राशा निरन्तर पालन करता हुआ संसार में यात्रा करूंगा- . इसलिये प्यारे भाइयो! आओ, हम सब मिलकर उस परमपिता परमात्मा के गुण कीर्तन करते हुए उनकी शरण में जाय और उनसे प्रार्थना करें कि हे प्राणनाथ प्रभो! तुम्हारी कैसी अद्भुत महिमा है, तुम्हारे अनन्त ऐश्वर्य को कौन जान सकता है, तुम्हारे शासन में असंख्यताब्रह्माण्ड अपनी २ मर्यादा में चलकर तुम्हारी महिमा को महान् कर रहे हैं, और इस ब्रह्मण्ड में असंख्यात जीव जन्तु आपके आश्रित जीवन निर्वाह कर रहे हैं, तुम सयको अन्न और जल देते हो, क्षणभर भी किसी को नहीं भुलाते, तुम स्वयं अनन्त हो, तुम्हारा प्रेम अनन्त है, तुम्हारी दया अनन्त है, तुम्हारी महिमा अनन्त है,, तुम सबके स्वामी और अन्तर्यामी हो। हे सच्चिदानन्द अन्तर्यामिन् प्रभो! हम सब पतित दीन दुःखी तुम्हारे द्वार पर आये हैं, हमारे हृदयरूपी नेत्र खोल दो किहम तुम्हारे प्रेममय स्वरूप को अवलोकन कर तृप्त हों, हे दयामय ! हम अपने दुष्ट संकल्पों को संसार से २ कर्मकाण्डचन्द्रिका छिपाये रहते हैं परन्तु श्राप से छिपे हुए नहीं हैं, तुम उन सयको देखते हुए भी हमारा त्याग नहीं करते, हमारे उन सब पापों को जानकर भी हमको अपनी शरण में लेते हो. धन्य हो, धन्य हो, धन्य हो प्रभो! तुम्हारी दया अपरम्पार है। हे दयामय | हम अपने अज्ञान से पापी वनकर तुम्हारी शरण में भान पड़े हैं, तुम्हारे बिना कौन है जो हमको इस पापपिशाच से बचाकर पुण्य का मार्ग दिखलावे, तुम्हारा नाम पतितपावन है, तुम गिरे हुओं का सहारा हो, तुम्हारी शरण लेकर पापी पुण्यात्मा बन जाता, निर्चल बलवान हो जांता, और संतप्त हृदय शान्त होता है, इस श्राशा,से हम अपना मलिन दव लेकर तुम्हारे द्वार पर आये हैं, हमारा मलिन हृदय तुम्हारे सामने है, तुम शुसस्वरूप हो हमारे हृदय का मैल दूर करो और अपनी प्रकाशमयी ज्योति का प्रकाश करो कि हम जहां और जिस अवस्था में रहें तुम्हारे होकर रहे, तुम्हारी महिमा का विस्तार करे, तुम्हारा हो नाम उच्चारण करें, तुम्हारी प्राज्ञा का पालन करें, तुम्ही को प्रणाम करें, तुम्हारी ही पूजा, भकि और तुम्हारा विश्वास तथा प्रेम हमारे जीवन का लक्ष्य हो, हम हाथ जोड़ कर यही मिक्षा मांगते हैं यही दानदो, तुम्हारे यहां से कोई खाली हाथ नहीं फिरता, क्योंकि तुम्हारा भाण्डार अटूर है ।। विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव । यद्भद्रंतन त्रासुव ॥ यजु०३०१३ पदा०—(सवितः ) हे सकल जगत् के उत्पत्तिकर्ता, समग्र ऐश्वर्य युक्त (देव) शुद्धस्वरूप, सब सुखों के दाता परमेश्वर, श्राप कृपा करके (नः) हमारे (विश्वानि ) सम्पूर्ण ( दुरितानि) दुर्गुण, दुव्र्यसन तथा दुःखों का (पराव ) दुर कर दीजिये, और (यत्) जो (भद्रं) कल्याणकारक गुण, कर्म, स्वभावं तथा पदार्थ हैं (तत्) वह सब हमको (श्राव ) प्राप्त कीजिये । भावा०- हे दिव्यशक्ति सम्पन्न परमेश्वर ! श्राप हमारे सम्पूर्ण पाप फर्मों को दूर करके पुण्य कर्मों में हमारा प्रवेश करें अर्थात् हमको पाप कमों से छुड़ाकर शुभ कर्मों के करने की सामर्थ्य प्रदान कीजिये। हिरण्यगर्भः समवर्तताने भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं चामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ यजु० १३३४ है ईश्वर स्तुति पदा०-(हिरण्यगर्भः) जो प्रकाशस्वरूप और जिसने प्रकाश करने हारे सूर्य चन्द्रमादि पदार्थ उत्पन्न करके धारण किये हुए हैं, जो (भूतस्य) उत्पन्न हुए सम्पूर्ण जगत् का (जातः) प्रसिद्ध ( पतिः) स्वामी (एकः) एक ही चेतन स्वरूप (आसीत् ) था, जो (अंग्रे) लव जगत् के उत्पन्न होने से पूर्व (समवर्तत) वर्तमान् था (ला) सो ( इमाम् ) इस (पृथिवी) पृथिवी (उत ) और (यां) सूर्यादिको को (दाधार ) धारण कर रहा है, हम लोग उस (कस्मै) सुख स्वरूप (देवाय) शुद्ध परमात्मा के लिये ( हविषा) ग्रहण करने योग्य योगाभ्यास और अति प्रेम से (विधेम ) विशेष भक्ति किया करें। भावा-जो जगत्पिता परमात्मा सृष्टि से प्रथम एक था और जिसने इस सम्पूर्ण जगत् को अपनी सामर्थ्य से उत्पन्न करके धारण किया हुआ वही परमात्मा हम सब को वेदविहित कर्मों द्वारा मन, वाणी से पूजनीय है। य श्रोत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः । यस्यच्छायाऽमृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ यजु०२५। १३ पदा०-(यः ) जो (आत्मदाः) आत्मज्ञान का दाता (बलदाः ) शरीर, आत्मा तथा समाज के बल का देने हारा (यस्य) जिसकी (विश्वे) सव (देवाः) विद्वान् लोग (उपासते) उपासना करते हैं और (यस्य) जिसका ( प्रशिर्ष) प्रत्यक्ष सत्यस्वरूप शासन तथा न्याय अर्थात् शिक्षा को मानते हैं (यस्य ) जिसका (छाया) श्राश्रय ही (अमृतं ) मोक्ष सुखदायक है (यस्य) जिसका. न मानना अर्थात् भक्ति न करना ही (मृत्युः)मृत्यु आदि दान को हेतु है, हम लोग उस ( कस्मै) सुखस्वरूप (देवाय) सकल शान के देने हारे परमात्मा की प्राप्ति के लिये ( हविषा) श्रात्मा तथा अन्तः करण से (विधेम) भक्ति अर्थात् उसी की आशा पालन करने में तत्पर रहें। भावा०-जो-परमात्मा सबका जीवनदाता, बुद्धियल, बाहुवल तथा धनवल, इन तीनो बलों का देने वाला, जिसकी आज्ञा में सब जड़ चेतन पदार्थ हैं और जिसके अधीन सबकी मुक्ति तथा मृत्यु है, यही परमात्मा हम सब को घेदविहित कर्मों द्वारा, तथा मन, घाणी से पूजनीय है। यः प्राणतो निमिषतो महित्वैक . इदाजाः य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम ।। यजु०२३।३. .' . जगतो बभूव ।
। कर्मकाण्डचदिन्का , पदा०-(यः) मी (प्राणतः) प्राण वाले और (निमिपतः) अप्रा- णिप (जगतः) जगत् का (महित्वा) अपनी अनन्त महिमा से ( एक पत्) एक ही (राजा) विराजमान राजा (बभूव) है (यः) जो (अस्थ): इस (द्विपदः) मनुष्यादि और (चतुष्पदः) गौ श्रादि प्राणियों के शरीर की (ईश) रचना करता है, हम उस (कस्मै ) सुखस्वरूप (देवाय ) सकल ऐश्वर्य के देने हारे परमात्मा के लिये ( हविषा) अंपनी सकल उत्तम सामग्री से (विधेम) विशेष भक्ति करें। भावास मन्त्र का श्राशय यह है कि जो अपनी अनन्त महिमा से इस चराचर जगत् का एक ही स्वामी है और जिसने द्विपद-मनुष्यादि प्राणी तथा चतुष्पद-गौ श्रादि प्राणियों को उत्पन्न किया है वही सकल ऐश्वर्यसम्पन्न परमात्मा हमारा पूजनीय इष्ट देव है। येन द्यौरुया पृथिवी च दृढा येन स्वः स्तभितं येन नाकः । यो अन्तरिक्ष रजसो विमानः कस्में देवाय हविषा विधेम ॥ यजु०३।६ पदा०-( येन ) जिस परमात्मा ने (उग्रा) तीक्ष्ण स्वभाष पाले (धौः) सूर्य्यादि (च) और (पृथिवी) भूमि का (दृढा) धारण (येन ) जिस जगदीश्वर ने (स्वः) सुख को (स्तभितम् ), धारण और (येन) जिस ईश्वर ने (नाकः ) दु:खरहित मोक्ष को धारण किया है (यः)जो (अन्त. रिक्ष) आकाश में (रजसः) सब लोकलोकान्तरों को (विमानः) विशेष मानयुक अर्थात् जैसे आकाश में पक्षी उड़ते हैं वैसे सब लोकों का निर्माण करता और भ्रमण कराता है, हम लोग उस (कस्मै ) मुखदायक ( देवाय) कामना करने योग्य परब्रह्म की प्राप्ति के लिये (हविषा) सब सामर्थ्य से (विधेम) विशेष भक्ति करें। भावा-जिस परमात्मा ने अपनी महत्ता से इस घड़े धुलोक तथा पृथिवी लोक को धारण किया हुआ है, जो मोक्ष तथा सुख का स्वामी है और जो आकाश में अनेक लोकलोकान्तरों को निर्माण करके नियम में रखता है वही हमारा पूजनीय पिता उपासना करने योग्य है। प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वाजातानि परिता बभूव । यर कामारते हुमरतको अस्तु वयं स्याम पतयो रयीएम् ॥ भग०१०। १२१ । १० ईश्वर स्तुति . पदा०-(प्रजापते) हे सब प्रजा के स्वामी परमात्मा (त्वत्) आपसे (अन्य) भिन्न दुसरा कोई (ता) उन (एतानि ) इन (विश्वा) सब (जा- तानि) उत्पन्न हुए जड़चेतनादिको को (न) नहीं (परि, बभूव) तिरस्कार करता अर्थात् आप सर्वोपरि हैं (यत्कामाः) जिस २ पदार्थ की कामना वाले हम लोग (ते । आपका (जुडुमः) आश्रय लेवें और वाञ्छा करें (तत् ) उस २ की कामना (नः) हमारी सिद्ध (अस्तु) होवे, जिससे (वयं) हम लोग (रयीणाम् ) धनैश्वयों के (पतयः) स्वामी (स्याम) होवे ॥ भावा-हे प्रजापते ! श्राप ही इस जगत् के स्वामी हैं, आपके बिना अन्य कोई नहीं है, आप ऐसी कृपा करें कि हम सब आपकी प्रजा आपकी माशानुसार जिस २ फल की कामना से काम करते हैं वह २.हमारी कामनायें पूर्ण हो और हम स्वाधीन धनों के स्वामी बने । 1 - स नो वन्धुर्जनितास विधाताधामानि वेद भुवनानि विश्वा। . यत्र देवा अमृतमानशानास्तृतीयेधामन्नध्यैरयन्ता। यजु० ३२ ॥१० पदा०-हे मनुष्यो। (सः) वह परमात्मा (नः) अपने लोगों को (बन्धुः) भ्राता के समान सुखदायक (जनिता ) सकल जगत् का उत्पादक (स) वह (विधाता) सब कामों का पूर्ण करने हारा विश्वा) सम्पूर्ण (भुवनानि) लोकमात्र और (धामानि) नाम, स्थान तथा जन्मों को (घेद) जानता है, और (यत्र ) जिस (तृतीये) सांसारिक सुख दुःख से रहित नित्यानन्दयुक्त (धामन् ) मोक्षस्वरूपधारण करने हारे परमात्मा में' (अमृत) मोक्ष को (आनशानाः) प्राप्त होके (देवाः) विद्वान् लोग ( अध्यैरयन्त) स्वेच्छापूर्वक विचरते हैं वही परमात्मा अपना गुरु, प्राचार्य, राजा और न्यायाधीश है, अपने लोग मिल के सदा उसकी भक्ति किया करें। भावा० है मनुष्यो! वह परमात्मा हमारा बन्धु, पिता, हमारे सब। कामों को पूर्ण करने वाला, सम्पूर्ण लोक लोकान्तर तथा स्थानों को जानने पाला, षह दिव्य स्वरूप, नित्यानन्दयुक्त, विद्वानों को प्राप्त होने ,योग्य और जो सदा मोक्षस्वरूप है, वही हमारा गुरु, आचार्य, राजा तथा न्यायाधीश है, हम सबको उसी की उपासना करनी योग्य है। अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देववयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्यन्ते नम नम उक्ति विधेम ॥ यजु०१०।१६ ।
. कर्मकाण्डचन्द्रिका पदा०-(अग्ने ) हे स्वप्रकाश ज्ञानस्वरूप सब जगत् के प्रकाशं करने . हारे (देव) सकल सुखदाता परमेश्वर श्राप जिससे (विद्वान्) सम्पूर्ण विद्या. युक्त हैं, कृपा करके (अस्मान् ) हम लोगों को ( राये) विद्वान वा राज्यादि पेश्वर्य की प्राप्ति के लिये (सुपथा) अच्छे धर्मयुक्त प्राप्त लोगों के मार्ग से (विश्वानि) सम्पूर्ण (वयुनानि ) प्रज्ञान और उत्तम कर्म (नय) प्राप्त कराइये और (अस्मत् ) हमसे (जुहुराणं) कुटिलतायुक्त (एनः) पापरूप कर्म को (युयोधि) दूर कीजिये, इस कारण हम लोग (ते) आपकी (भूयि- ठाम् ) बहुत प्रकार की स्तुतिरूप (नम उति) नम्रतापूर्वक प्रशंसा (विधेम) सदा किया करें और सर्वदा आनन्द में रहें। भावा०-हे सर्वशक्तिसम्पन्नप्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! आप हमारे सब कों तथा मनोरथों को जानते हुए हम सबको देशात्मोन्नति के लिये शुभमार्ग से चलायें और हमसे सम्पूर्ण पापों को दूर करें, हम श्रापको वारंवार मन, वाणी तथा शरीर से प्रणाम करते हैं ॥ इतीश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासनाप्रकरणम् अथ स्वस्तिवाचनम् 183rm- " अग्निमीडे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ॥ १ ॥ ऋग्० १।१।१ पदा०-(पुरोहितं) पूर्व से ही जगत् को धारण करने वाले (यज्ञस्य) हवन, विद्यादि दान तथा शिल्प क्रिया के (देव)प्रकाशक (ऋत्विजम् ) प्रत्येक ऋतु में पूजनीय (होतारं) जगत् के सुन्दर पदार्थों को देने वाले (रत्नधातमम) उत्तम रत्नादिको के धारण करने वाले ( अग्नि) प्रकाशस्वरूप परमात्मा की मैं उपासक (ईडे) स्तुति करता हूं। भावा०—हे ज्ञानस्वरूप परमात्मन् ! आप सृष्टि के प्रारम्भ से ही इस सम्पूर्ण जगत् को धारण करके पालन पोषण कर रहे हैं, आप यज्ञादि क्रियाओं के प्रकाशक तथा जगत् के उत्तमोत्तम पदार्थों के दाता हो मनुष्यमात्र के पूजनीय अर्थात् उपासना करने योग्य हो । स नः पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव । सचस्वा नः स्वस्तस्ये ॥२॥ ऋग्० १ । १ ।। पदा०-(अग्ने) हे ज्ञानस्वरूप परमेश्वर ( सः) लोकवेद प्रसिद्ध आप (सूनवे, पिता, इव) पिता पुत्र के लिये जैसे, ( नः) हमारे लिये (सूपायनो, भवं ) सुख के हेतु पदार्थों की प्राप्ति कराने वाले हों, और (नः) हम लोगों का ( स्वस्तये) कल्याण के लिये (सचस्व) मेल कराये। भावा०हे हमारे परमपिता परमात्मन् ! जैसे पिता पुत्र को शिक्षा करताहुआ उसके लिये आवश्यक पदार्थों का संग्रह करता है उसी प्रकार भाप भी हमारे सुख के साधक पदार्थों को उपलब्ध कराये और ऐसी कृपा करें कि हम सब परस्पर एक दूसरे को मित्रता की दृष्टि से देखें जिससे हम शीघ्र ही कल्याण को प्राप्त हो । स्वस्तिनो मिमीतामश्विना भगः स्वस्तिदेव्यदितिरनर्वणः स्वस्तिपूषा असुरो दधातुनःस्वस्ति द्यावापृथिवी सुचेतुना।३ ऋग०५ । ५२।११ , कर्मकाण्डचन्द्रिका पदा०-(अश्विना) अध्यापक तथा उपदेशक (मः) हमारे लिये (स्वस्वि, मिमीतां) कल्याणकारी हो (भगः) ऐश्वर्यसम्पन्न आप चा वायु (स्वस्ति) सुखकारक हो (अदितिः) अखण्डित (देवी) दिव्यगुण युक्त विधुतविद्या ( अनमः ) ऐश्वर्य्यरहित हम लोगों के लिये कल्याणकारी हो (पूषा) पुष्टिकारक (असुरः) प्राणों के देने वाले मेघादि (स्वस्ति, धातु) कल्याण को देखें (धावा, पृथिवी) अन्तरिक्ष तथा पृथिवी (सुचेतुना) विज्ञान से युक्त होकर (नः) हमारे लिये (स्वस्ति) सुखदायक हो। । भावा०-हे हमारे परमपिता जगदीश्वर ! श्राप ऐसी कृपा करें कि हमारे अध्यापक तथा उपदेशक महात्मा अपने सदुपदेश द्वारा हमारी प्रात्मा को बलवान् बनावे, हे ऐश्वर्यसम्पन्न पिता | यह आपके रचे हुए वायु, जल तथा अग्नि श्रादि दिव्य पदार्थ हमारे लिये सुखकारक हो, श्राप मेधों. द्वारा। सदा हमारे प्राणों की रक्षा करें और हमारा निवास स्थान पृथिवी तथा महान् श्राफाश जिसमें हम अपनी क्रिया करते हैं यह हमारे लिये सुखदायक हो। स्वस्तये वायुमुपद्रवामहै सोमं स्वस्ति भुवनस्य यस्पतिः । बृहस्पतिं सर्वगणं स्वस्तये स्वस्तय श्रादित्यासो भवन्तु नः॥४॥ अंग्० ५१५२ । १२ पदा०-हे परमात्मन् ! श्रापकी कृपा से (श्रादित्यासः) वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य धारण करने वाले ब्रह्मचारी (नः) हम लोगों के मध्य में (स्वस्तये, भवन्तु) कल्याणार्थ उत्पन्न हो (यः)जो (स्वस्तये) शान्ति के लिये हमें (वायु) वायुविद्या का (उप, ब्रवाम ) भलेप्रकार उपदेश करें (सोमं ) ऐश्वर्य हमारे लिये फल्याणकारी हो ! श्राप (भुवनस्य, पतिः ) सम्पूर्ण संसार की रक्षा करने- वाले तथा ( वृहस्पति ) वेदवाणी के स्वामी होने से (सर्वगणं) सम्पूर्ण गण = समूह अापका (स्वस्तये ) कल्याण के लिये श्राश्नयस करते हैं भावा०-हे सकल विद्यानों के निधि भगवन् ! श्राप ऐसी कृपा करें कि हम लोग ब्रह्मवर्यादि आश्रमों का पूर्णतया पालन करते हुए शारीरिक तथा आत्मिक उन्नति द्वारा संसार का उपकार करने वाले हो, जो जल तथा वायु आदि तत्वों की विद्या को पूर्णतया जानकर हमारे लिये उनका उपदेश करें ताकि हम उनको उपयोग में लाकर ऐश्वर्यसम्पन्न हो, हे हमारे पिता परमे. स्वर! आपकी कृपा से हम लोग वेदविद्या का अध्ययन करते हुए शान्त्यादि. पुणे वाले हो, हे प्रभो!संसार के सम्पूर्ण प्राण प्रापही से कल्याण की प्राशा करते हैं, क्योंकि आप कल्याएस्वरूप हैं ।
। स्वस्तिवाचनम् विश्वेदेवा नो अद्या स्वस्तये वैश्वानरो वसुरग्निः स्वस्तये। देवा अवन्त्वृभवः स्वस्तये स्वस्ति नो रुद्रः पात्वंहसः॥५॥ . पदा०-हे परमात्मन् ! ( अद्य) प्राजयज्ञ के दिन ( नः) हमारे (स्वस्तये) आनन्द के लिये (विश्वेदेवाः) सब विद्वान् लोग हो, और (वैश्वा. नस) सब मनुष्यों को उपयोगी तथा सर्वत्र व्यापक (अग्निः) अग्नि (स्व. स्तये) मंगल के लिये हो, (ऋभवः) विशिष्ट मेधावी (देवाः ) विद्वान् लोग (अवन्तु ) हमारी रक्षा करें, और (नः) हमारे ( स्वस्तये) कल्याण के लिये (रुद्रः) दुष्टों को रुलाने वाले श्राप (अंहसः) पापरूप अपराध से (स्वस्ति, पातु) शान्तिपूर्वक हमारी रक्षा करें। भावा०-हे यज्ञपति परमेश्वर आपकी कृपा से हम सब यज्ञों के करने वाले हो, सम्पुर्ण याज्ञिक विद्वान् हमारे यश में सम्मिलित होकर हमें नाना विद्याओं का उपदेश करें जिससे हम आनन्दित हो, और यह भौतिकाग्नि. जो यज्ञ का मुख्यसाधन है वह हमारे लिये कल्याणकारी हो, मेधावी विद्वान् पुरुष अपने सदुपदेश द्वारा दुष्कर्मों से हमको सदाबचावें, और हे रुद्ररूप परमेश्वर! आप हमारे पापरुप अपराधों से हमारा सर्वनाश न करें किन्तु पाप फल देकर भी हमारी रक्षा करें। स्वस्ति मित्रावरुणो स्वस्ति पथ्ये रेवति । स्वस्ति न इन्द्रश्चाग्निश्च स्वस्ति नो अदिते कृधि ॥६॥ पदा०-(अदिते ) हे अस्खण्डितविद्यायुक्त परमेश्वर (न:) हमारे लिये (स्वस्ति) कल्याण (कृधि ) करो' (च) और (इन्द्रः) वायु (च) और (अग्निः) विधुत् (नः) हमारे लिये (स्वस्ति) कल्याणदायक हो (पथ्ये, 'रेवति) धनादिसम्पनशुभमार्ग में हमारे लिये (स्वरति). कल्याण हो, और (मित्रावरुणा)माण तथा उदानवायु (नः)हमारे लिये (स्वस्ति)सुखकारी हो। भावा०-हे सर्वविद्याओं के निधि परमात्मन् ! आप हमारे लिये सुखदायक हो और वायु, विद्युत् तथा धनादि ऐश्वर्य हमारे लिये कल्याण- दायक हो। हे भगवन् | आप ऐसी कृपा करें कि प्राणवायु तथा उदानवायु हमारे शरीर में यथावस्थित वतै जिससे हमें काई क्लेश प्राप्त न हो। स्वस्ति पन्थामनुचरेम सूर्याचन्द्रमसाविव । पुनर्ददताघ्नता जानता सङ्गमेमहि ॥७॥ ऋग०५५२।३ . .
कर्मकाण्डचन्द्रिका पदा०-हे परमेश्वर हम लोग (पन्थां) मार्ग में (स्वस्ति) शनन्द- पूर्वक (अनुचरेम ) विचरें (सूर्याचन्द्रमसाविष) जैसे सूर्य तथा चन्द्रमा बिना किसी उपद्रव के विचरते हैं, (पुनः) फिर (ददता) सहायता देने वाले (अघ्नता) किसी को दुःख न देने वाले (जानता) शानसम्पन्न बन्धु श्रादिको के साथ (संगमेमहि ) मिलकर व ॥ भावा-हे परमपिता परमेश्वर ! जैसे सूर्य तथा चन्द्रमा निरुपद्रव अपने नियम का पालन करते हुए विचरते हैं इसी प्रकार हम लोग भी नि. विघ्न शुभ मार्ग में चलकर अपनी अभीष्ट सिद्धि को प्राप्त हों, और हे भग. वन् ! आप ऐसी कृपा करें कि हम लोग एक दूसरे को मित्रता की दृष्टि से देखते हुए परस्पर सहायक हों। . ये देवानां यज्ञिया यज्ञियानां मनोर्यजत्रा अमृता ऋतज्ञाः । तेनो रासन्तासुरुगायमद्य यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः || . पदा०-(ये)जो (यशियानां, देवानां) यज्ञ के योग्य विद्वानों के बीच में (यशियाः) यज्ञोपयोगी हैं, और ( मनोर्यजत्राः) मननशील पुरुषों के साथ संगति करने वाले (श्रमताः ) जीवन्मुक जैसे (ऋतशाः) सत्यशानी हैं (ते) वे श्राप लोग (अद्य)आजम्याग दिन में ( उरु गोयं) बहुत कीर्तिवाले विद्या- बोध को (नः) हमारे लिये ( रासन्तां) देखें और ( यूयं) आप सय (स्वस्तिभिः) कल्याणकारी पदार्थों से (सदा) सब काल में (नः). हमारी (पात) रक्षा करें। भावा-परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे याज्ञिक पुरुषो! तुम अपने यशों में मननशील, सत्यवादी तथा ब्रह्मज्ञानसम्पन्न पुरुषों को सत्कारपूर्वक घुलाओ, और उनसे प्रार्थना करो कि हे भगवन् ! आप हमें ब्रहाविद्या का उपदेश करें जिससे सव काल में हमारी रक्षा हो । येभ्यो माता मधुमत्पिन्वते पयः पीयूपं धारदितिरद्रिवर्हाः। उक्थशुष्मान् वृषभरान्स्वप्नसस्तां आदित्यांअनुमदास्वस्तये ।। पदा०-( येभ्यः) जिन प्रादित्य ब्रह्मचारियों के लिये ( माता )सष को निर्माण करमे वाली पूथिवी ( मधुमत, पयः) माधुर्ययुक्त दुग्धादि पदार्थ (पिन्वते) देती है और (अदितिः) नखण्डनीय (अद्रिवः) मेघों से बढ़ा हुआ (द्यौः) अन्तरिक्ष लोक (पीयूष) सुन्दर जलादि सेचन करता है, उन (उक्थशुष्मान ) अत्यन्त बलवाले (वृषसरान ) यक्ष द्वारा वतिr ar and स्वस्तिवाचनम् ११ (स्वप्मल:) शोभन कर्मवाले (तान, आदित्यान् ) उत आदित्यब्रह्मचारियों को ( स्वस्तये) उपद्रव न होने के लिये (अनुमद) प्राप्त कराइये ॥ भावा-इस मंत्र में परमात्मा से यह प्रार्थना कीगई है कि हे भग- घन् । जिन आदित्य ब्रह्मचारियों को मातारूप पृथिवी अनेक पुष्टिकारक पदार्थ : खाने को देती और अन्तरिक्ष लोक पवित्र जलों की वर्षा द्वारा जिन्हें तप्त करता है उन घेदोक्त कर्म करने वाले ब्रह्मचारियों को आप सब उपद्रवों से रक्षा करें ताकि यह ब्रह्मविद्या के उपदेश द्वारा हमारे जीवन को उच्च बना सम्राजो ये सुवृधो यज्ञमाययुरपरिहता दधिरे दिविक्षयम् । तांश्राविवास नमसा सुवृक्तिमिर्महोत्रादित्यांअदितिस्वस्तये१० पदा०-(सम्राजः) अपने तेज से भलेप्रकार विराजमान (सुवृधः) शामादि से सम्पन्न ( ये, देवाः)जो विद्वान लोग ( यज्ञ') यज्ञ को (माययुः) प्राप्त होते, और जो (अपरिहताः ) किसी से भी पीड़ित न होने वाले देवता लोग (दिवि) धुलोकवर्ती घड़ेर स्थानों में (क्षयं ) नियास (दधिरे) करते हैं (तान् ) उन (महो, आदित्यान् ) गुणों से अधिक आदित्य ब्रह्मचारियों और (अदिति) अखण्डीय आत्मविधा को (नमसा ) हव्यान के साथ और (सुवृक्तिभिः) उत्तम स्तुतियों के साथ (स्वस्तये) कल्याण के लिये (आ,विधास) सेवन करात्रो॥ नृचक्षसोअनिमिषन्तो अर्हणा बृहद्देवासो अमृतत्वमानशुः। ज्योतीस्था अहिमाया अनागसो दिवोवाणं वसते स्वस्तयो११ पदा०-(नृचक्षसः ) कर्मकारी मनुष्यों के द्रष्टा ( अनिमिषन्तः) आलस्यरहित (ग्रहणः) लोगों के पूजनीय ( देवासः)विद्वान लोग जो (बृहत्) बड़े (अमृतत्वं) अमृत को ( पानशुः) प्राप्त, और (ज्योतीरथाः) सुन्दर प्रकाशमय यानों से युक्त हैं (अहिमाया) जिनकी धुद्धि को कोई दवा नहीं संकता, ऐसे (अनागसः) पापरहित वह आदित्य ब्रह्मचारी जो (दिवः)अंत. रिक्ष लोक के (वाणं) ऊंचे देश को (वसते) ज्ञानादि द्वारा व्याप्त करते घह (स्वस्तये) हमारे लिये कल्याणकारी हों। भावा०-हे सर्वद्रष्टा तथा सबके पूजनीय परमात्मन् ! जीवन्मुक्त विद्वान् लोग जिनकी बुद्धि को कोई अतिक्रमण नहीं करसकता, ऐसे पाप रहित आदित्य प्रदाचारी, सो अपने शानद्वारा अंतरिक्ष लोकपर्यन्त व्याप्त हो रहे, हैं अर्थात् विद्या द्वारा लोक लोकान्तरों में जिनका यश विस्तृत होरहा है वे हैं १२ कर्मकाण्डयन्द्रिका अपने सदुपदेशों से हमें पवित्र करें अर्थात् हमारे लिये विद्या तथा धर्म का- उपदेश करते हुए हमें सदाचारी बनावें ताकि हस सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करें। 1- भावा-हे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डपति परमात्मन् ! आपकी इस सृष्टि में ज्ञानसम्पन्न बड़े २ विद्वान् यज्ञों द्वारा आपका पूजन करते और आपके इस विस्तृत राज्य में पृथिवी से लेकर घ लोक पर्यन्त दिव्यगुणों से सुभूपित अनेक मनुष्य तथा सूर्य चन्द्रमादि निवास करते हुए आपकी महिमा को दर्शाते और आप नियमपूर्वक सबका रक्षण तथा पालन पोषण करते हैं, हे दयामय ! हम पर ऐसी दया करो कि हव्यानके साथ आदित्य ब्रह्मचारी हमें प्राप्त हो और घे वेदविधा के उपदेशों द्वारा हमारा सदा कल्याण करें। कोवःस्तोमं राधति यंजुजोषथ विश्वे देवासो मनुषों यतिष्ठन। को वोऽध्वरं तुविजाता अरं करयो नः पर्षदत्यहःस्वस्तये ॥१२॥ पदा०-( विश्वे, देवासः) हे सम्पूर्ण विद्वानो ! (यं, जुजोषध) जिल स्तुति समूह का तुम सेवन करते हो उस (स्तोस) सामवेदोक्त स्तुतिसमूह को (वः) तुम लोगों के मध्य में (कः) कौन (राधति) बनाता, और (तुविजाताः) हे अनेक प्रकार के जन्म वाले (मनुषः) मननशील विद्वान् लोगों! ( यतिष्ठन) जितने तुम लोग स्थित हो (वः) तुम सब के बीच में (का) कौन (अध्वरं) को (अरम् , करत) अलंकृत करता है (यः) जो यश (नः) हमारे (अंह) पाप को (अति) हटाकर (स्वस्तये) कल्याण के लिये (पर्षत् ) प्रवृत्त होता है। यक्ष: . भावा०-इस मंत्र में पूर्वपक्ष विधि ले प्रश्नोत्तर की रीति पर परमात्मा ने यह भाव भरा है कि हे विद्वानो! जिन स्तुति विधायक वाक्यों से तुम परमात्मा की स्तुति करते हो उन स्तुतिवाक्यों को तुम में से कौन बनाता और यज्ञ को कौन अलंकृत करता है, जो या तुम्हारे पापों को निवृत करके तुम्हें कल्याण का मार्ग दिखलाता है अर्थात् सामवेदोक्त स्तुति वाक्यों का कर्ता और यज्ञ की विधि बतलाने वाला कौन है ? (इसका उत्तर वेद में यथास्थान यह दिया है कि यह दोनों भाव उसी परमात्मा से आते हैं जो हमारा पूजक , पिता तथा हमारे कर्मों का द्रष्टा है)। येभ्यो होत्रांप्रथमामायेजे मनुःसमिद्धाग्निर्मनसा सप्तहोतृभिः। त आदित्या अभयं शर्म यच्छत सुगानःकर्तसुपथा स्वस्तये।। पदा०-(येभ्यः) जिन आदित्य ब्रह्मचारियों के लिये ( समिद्धाग्निः).
- स्वस्तिवाचनम् अग्निहोत्री (मनुः) मननशील विद्वान (मनसा) मन से (सप्तहोतृभिः) सात- होताओंसे (प्रथमां ) मुख्य (होत्री) यज्ञ को (प्रायेज ) करता है (ते, आदि- त्याः) वे आदित्य ब्रह्मचारी (अभयं, शर्म ) भय रहित सुख को ( यच्छत) देवें, और (नः) हमारे (स्वस्तये) कल्याण के लिये (सुपथा) शोभन वैदिक मार्गों को (सुगा) भले प्रकार प्राप्तव्य (कर्त) करें। भावाo-इस मंत्र का आशय यह है कि जिन आदित्य ब्रह्मचारियों के सन्मानार्थ मनस्वी विद्वान् बड़े २ यश करते हैं वह ब्रह्मचारी हमारे कल्याण .. के लिये उस पवित्र वैदिकधर्म का उपदेश करें जिससे मनुष्य जन्म के फल चतुष्टय की प्राप्ति होती है, या यों कहो कि वह ब्रह्मचारी हमें उस परंज्योति तथा दिव्यगुणसम्पन्न परमात्मा का उपदेश करें जिसको प्राप्त होकर पुरुष निर्भय हुश्रा स्वेच्छाचारी होकर विचरता है। य ईशिरे भुवनस्य प्रचेतसो विश्वस्य स्थातुर्जगतश्चमन्तवः। ते नःकृतादकृतादेन सस्पर्यद्या देवासः पिपृता स्वस्तये॥१४॥ पदा०-(ये, देवासः ) जो विद्वान् लोग (प्रचेतसः) उत्तम शान घाले (मन्तवः) लघ के जानने वाले (स्थातुः) स्थावर (च) और ( जगतः) जंगम (विश्वस्य, भुवनस्य ) सब लोक के ( ईशिरे) स्वामी बनते हैं, (ते) वे (अद्य) आज (स्वस्तये ) कल्याण के लिये (कृतात्) किये हुए और (प्रक- तात्) नहीं किये हुए (एनसः) पाप से (परि, पिपृत) पार करें। भावा०-हमारे विचार में यदि यह मंत्र ईश्वरपरक लगाया जाय तो बड़े उच्चादर्श का बोधक प्रतीत होता है, जैसाकि हे दिव्यज्योति परमात्मन् ! आप अपने उत्तम ज्ञान से सबके जाननेवाले और स्थावर तथा जंगम सब विश्ववर्ग के स्वामी हैं, हे भगवन् ! आप हमें सव प्रकार के पापों से बचा- कर कल्याण की ओर लेजायें अर्थात् जिन पापों के करने की सम्भावना है उनसे आप हमारी रक्षा करें। भरेष्विन्द्रं सुहवं हवामहेंऽहोमुचं सुकृतं दैव्यं जनम् । अग्नि मित्रंवरुणं सातये भगंद्यावापृथिवी मरुतः स्वस्तये ॥१५॥ . पदा०-हे ईश्वर!(अहोमुचं) पाप के इटाने वाले (सुहवं) जिसका बुलाना अच्छा हो ऐसे (इन्द्रम् ) शक्तिशाली विद्वान् को (भरेषु) संग्रामों में (हवामहे ) अपनी रक्षा के लिये बुलावें, और (सुकृतम्) श्रेष्ठ कर्म वाले (दैव्यं) आस्तिक (जनम् ) पुरुष को, धुलावें, और (सातये) अन्नादि लाभ कर्मकाण्डचन्द्रिका . . के लिये (स्वस्तये ) अनुपद्रव के लिये (अग्नि) अग्निविद्या को (मित्र) प्राणविद्या को (भगम्, वरुणम् ) सेवनीय जल विद्या को, और (द्यावापृथिवी) अन्तरिक्ष तथा पृथिवी की विद्या को (मरुतः) वायुविद्या को, (हम सेवन करें)। सावा०-हे परमात्मन् ! आप ऐसी कृपा करें कि बड़े २ शक्तिसम्पन्न विद्वान् पुरुष जो पाप से सर्वथो पृथक् हैं वे इस संसार रूप संग्राम में आकर हमारी रक्षा करें, और शान्तिपूर्वक जीवन निर्वाह के लिये अग्नि तथा जल आदिकों की विधानों को भलेप्रकार जानें, अर्थात् प्राण, अपानादिको की विद्या को जानकर सदा नीरोग रहें। और जल, घायु आदिको की विद्या द्वारा. यानादिकों को रचकर ऐश्वर्य सम्पन्न हो। सुत्रामाणं पृथिवीं घामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसमसवन्तीमारहेमा स्वस्तये ॥ १६ ॥ पदा०-(सुत्रामाणं ) भलेप्रकार रक्षा करने वाली (पृथिवी) लम्बी चौड़ी (अनेहर्स) उपद्रवरहित ( सुशर्मा )अच्छा सुखदेने वाली (अदिति) जो न टूट सके (सुप्रणीतिम् ) जो भले प्रकार बनाई गई है (द्याम् ) अन्तरि- क्षलोकस्थ ( स्थरित्राम् ) सुन्दर यन्त्रों से युक्त (अनवन्तीम् ) दृढ़ (देवी, नावं ) विद्युत्सम्बन्धी नौका के ऊपर अर्थात् विमान के ऊपर हम लोग (स्वस्तये)सुख के लिये (श्रारहम.) चढ़े। भावा-इस मंत्र में प्रकाशयान का वर्णन किया गया है। परमात्मा उपदेश करते हैं कि तुम लोम जो यान वनाो वह कैसा हो? भले प्रकार रक्षा करने वाला, विस्तृत. सब उपद्रवों से रहित, सुखपूर्वक बैठने योग्य, जिल में सव कला यंत्र सुन्दर तथा ऐसे दृढ़ लगे हो जो टूट न सके, इत्यादि सुरक्षित विमान में बैठकर तुम लोग सुखपूर्वक विचरो॥ विश्वे यजत्रा अधिवोचतोतये त्रायध्वं नो दुरेवायो अभिडतः।। सत्यया वो देवहत्या हुवेम शृण्वतो देवा अवसे स्वस्तये ॥१७॥ पदा०-(विश्वे, यजत्राः) हे पूजनीय विद्वानो ! (ऊतये) हमारी रक्षा के लिये (अधिवोचत) आप उपदेश करें, और (अभिहुतः ) पीड़ा देने वाली (दुरवायाः) दुर्गति से (नः') हमारी (त्रायध्वं) रक्षा करो (देवाः)हे विद्वान् लोगों !(एवतः) हमारी स्तुति सुंगने वाले आपको (सत्यया)सची (यः) तुम्हारी (देवहत्या) देवताओं के योग्य स्तुति से हम (अवसे) शत्रुओं से रक्षा करने के लिये और (स्वस्तये) सुख के लिये (हुचेम) बुलाया करें।
. स्वस्तिवाचनम् भाषा०--हे वेदविद्या के ज्ञाता विद्वानो! आप वेदों के उपदेश द्वारा हमारी रक्षा करें अर्थात् हमको दुष्कर्मों से हटाकर शुमकर्मों में लगा जिससे हम पीड़ा देने वाली दुर्गति को प्राप्त न हो। हे स्तुति के योग्य विद्वानो ! हम आपका आह्वान करते हैं, कृपा करके आप आइये, और आकर हमें सदुपदेश कीजिये जिससे हम वेदानुकूल आचरण करते हुए, सुख को प्राप्त हों। अपामीवामप विश्वामनाहुतिमपाराति दुर्विदत्रामघायतः। आरे देवा द्वेषो अस्मधु योतनोरुणःशर्म यच्छता स्वस्तये॥१८!! पदा०-(देवाः) 'हे विद्वान् लोगो ! (अपामीयां) रोगादिको को (अप) पृथक् करो (विश्वाम् ) सव (अमाहुति ) मनुष्यों की देवताओं के न चुलाने की धुद्धि को (अप) पृथक् करो (श्ररातिम् ) लोभ बुद्धि को (अप) पृथक् करो (अघायतः) पाप की इच्छा करने वाले शत्रु की (दुर्विदनाम्) दुष्ट बुद्धि को दूर करो (द्वेषः) द्वेष करने वाले सवों को (अस्मत् ) हमसे (आर) दूर (युयोतन ) पृथक् करो (ना) हमारे लिये ( उरु, शर्म ) बहुत सुख (स्वस्तये) कल्याण के लिये ( यच्छत [ देओ। भावा०-हे घेदविद्या के अनुशीजन करने वाले विद्वानो। आप अपने उपदेशों द्वारा हमें शारीरक उन्नति का प्रकार घतला जिससे हम रोगादिको से रहित होकर स्वस्थ रह सकें, हमें विद्वानों के सत्कार करने का उपदेश करे, हम लोग मोह से पृथक रहें, हमसे द्वेष करने वाले शत्रुओं की बुद्धियों को सन्मार्ग में लगाओ, ताकि वह हमको शत्रु की दृष्टि से न देखे । हे विद्वजनो! हम प्रार्थना करते हैं आप अपनी कृपा से हमें कल्याण का मार्ग बतलाचे जिस- का अवलम्बन कर सुख से जीवन व्यतीत करें। अरिष्टः स मत्तों विश्व एधते.प प्रजाभिर्जायते धर्मणस्परि। यमादित्यासोनयथा सुनीतिभिरति विश्वानिदुरिता स्वस्तयो१६ पदा०-(श्रादित्यासः) हे आदित्य ब्रह्मचारियो । (यम् ) जिन पुरुषों को (एनीतिभिः) अच्छी नीतियों से (विश्वानि, दुरिता) सब पापों को (अति ) उल्लङ्घन करके (नयथ) सन्मार्ग में प्रवृत्तं करते हो ( साविश्वः मतः) चे सब पुरुप (अरिष्टः) किसी से पीड़ित न होकर (एधते) बढ़ते हैं, और (धर्मणः) धर्मानुष्ठान के (परि) पीछे (प्रजामिः) पुत्रपौत्रादिको से (प्र, जायते)सलेप्रकार प्रकट होते हैं । मावा--परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे ब्रह्मचारियो ! तुम प्रजाजनों को , .
कर्मकाण्डचन्द्रिका सदुपदेश करो जिससे वे पापों से निवृत्त होकर' सन्मार्ग में प्रवृत्त हो, वे धर्मानुष्ठान करते हुए पुत्र पौत्रादिकों से वृद्धि को प्राप्त हो और उनमें वह शक्ति उत्पन्न करो जिससे वे सब क्लेशों से पृथक रहकर सुख से अपना जीवन व्यतीत करें। यं देवासोऽवथ वाजसातौ यं शूरसाता मरुतो हिते धने । प्रातांवाणं स्थमिन्द्रसानसिमरिष्यन्तमा रुहेमा स्वस्तये ॥२०॥ पदा०-( मरुतो, देवासः ) हे मितभाषी देवता विद्वान् लोगों! (घाजसातौ) अन्न के लाभ के लिये (यं, रथम् ) जिल रमणीय गमनसा- धन वाष्पयानादि की (अवथ) रक्षा करते हो, और (हिते, धने) रखे हुए धन के कारण (शूरसाता) संग्राम में जिस रथ की रक्षा करते हो (इन्द्रसा. नलिम्) बड़े यन्त्रकला के विद्वानों से भी सेवनीय (प्रातर्यावाणम् ) प्रातः- काल से ही गमन करने वाले उसी रथ पर हम (स्वस्तये) कल्याण के लिये (प्रारहेम) चढ़े। भावा०--परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे उपयुक्त भाषण करने वाले विद्वानो! तुम लोग पदार्थविद्या-साइल का उपदेश करते हुए वाप्पयान तथा जलादि यानों के निर्माण का प्रकार वर्णन करो जिससे पार्थविद्या की रक्षा द्वारा कलाकौशल के निर्माण में सुगमता हो, हे युद्धविधा के शाता विद्वानो! तुम युद्ध के लिये बड़े २ कला यंत्रों से सुदृढ़ यान निर्माण कराम्रो, जो बैठने में कटदायक न हो और जिनपर चढ़कर सुगमता से शत्रुओं कोविजय कर सकें। स्वस्ति नः पथ्यासु धन्वसुस्वस्त्यप्मुवृजने स्वर्वति। स्वस्ति नः पुत्रकृथेषु योनिषु स्वस्ति राये मरुतो दधातन ॥२१॥ + पदा०-(मरुतः) मितभाषी विद्वान् लोगो ! (नः)हमारे लिये(पथ्यासु) मार्ग के योग्य अर्थात् जलसहित देशो में (स्वस्ति) कल्याण करो, और (धन्वर) जलरहित देशों में (स्वस्ति ) जल की उत्पत्तिरूप कल्याण करो, और (अप्सु) जलों में कल्याण करो और ( स्वर्वति) सब श्रायुधों से युक्त (वृजने) शत्रुओं को दवाने वालो सेना में (स्वस्ति) कल्याण करो, और (नः) हमारे (पुत्रः कथेषु) पुत्रों के करने वाले ( योनिषु ) उत्पत्ति स्थानों में (स्वस्ति ) कल्याण करो, और (राये) गवादि धन के लिये कल्याण को (दधातन) धारण करो। -परमात्मा आज्ञा देते हैं कि हे प्रजाजनो! तुम लोग उपर्युक्त विद्वानों से इस प्रकार प्रार्थना करो कि हे भगवन् ! श्राप हमें ऐसे उपाय तथा वह भावा० स्वस्तिवाचनम् १७ 'विद्या सिखलायें जिससे जलीयप्रदेशों, जलरहित देशों तथा जलों में अपना कल्याण देखें, और सब अस्त्रशस्त्र सहित शत्रुओं की सेना का विजय कर सके, हे सब विद्याओं के जानने वाले विद्वानों | आप हमें बलवान् पुत्रों के उत्पन्न करने और धनादि ऐश्वर्यसम्पन्न होने का उपदेश करें जिससे हमलोग समर्थ होकर अपने कार्यों को विधियत् कर सकें। स्वस्तिरिद्धिप्रपथे श्रेष्ठारेक्णस्वत्यभि या- वाममेति । सा नो अमा सो अरणे निपातु स्वावेशा भवतु देवगोपा ॥२२॥ ऋग०१०। ६३ । पदा०-(या)ो पृथिषी, जाने वालों के (प्रपथे) अच्छे मार्ग के लिये (स्वस्तिः, इत, हि) कल्याणकारी ही होती है, और जो ( श्रेष्ठा ) अति सुन्दर (रेक्णस्वती) धन वाली है तथा (वामम् ) सेपन के योग्य यक्ष को (अभि, एति ) प्राप्त होती है (सा) वही पृथिवी (नः) हमारे (भमा ) गृह की (नि, पातु) रक्षा करे (सा, 3) वह पृथिवी (अरणे) वनादि देशों में हमारी रक्षिका हो, और (देव गोपा) विद्वान लोग जिसके रक्षक हैं ऐसी वह पृथिवी हमारे लिये (स्वावेशा) अच्छे स्थानवाली (भवतु) हो। भावा०-हे परमात्मन् ! आप कृपा करके हमारे लिये बिस्तृित सुन्दर मागीवाली, अनादि विविध प्रकार के धन उत्पन्न करने वाली, यज्ञ के सेवन करने योग्य, पनादि में जिसका सुप्रबन्ध हो, जिसमें विद्वानों द्वारा उत्तम गृह पनाये जासके और सब प्रकार से निर्विधन हो, ऐसी भूमि हमें प्राप्त करायें, यह हमारी प्रार्थना है ।। इषे वोर्जेत्वा वायवस्थ देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मण आप्यायध्वमध्न्या इन्द्राय भागं प्रजोवतीरनमीवा अयक्ष्मा मा वस्तेन ईशत माघशसोध्रुवा अस्मिन् गोपतौ स्यात बहीर्यजमानस्य पशून्पाहि ॥ २३ ॥ यजु० १ १ पदा०-हे ईश्वर ! (इषे) अनादि इष्ट पदार्थों के लिये (त्या) तुमको (प्राधयाम इतिशेषः) श्रियण करते हैं, और (ऊर्जे) बलादि के लिये (त्वा) तुमको श्राश्रयण करते हैं । हे वत्स जीवो ! तुम (वायवः) वायु सदृश पराक्रम करनेवाले (स्थ) हो ( सविता, देवः)सष जगत् का उत्पादक देव ( श्रेष्ठतमाय, कर्मणे) यशरूप श्रेष्ठ कर्मों के लिये (वा) तुम सबों को (प्रार्पयतु) सम्बई करे, उस यश द्वारा (इन्द्राय, भागं) अपने ऐश्वर्य के भाग को (आप्यायध्वम् ) - . - कर्मकाण्डचन्द्रिका पढ़ाओ, यज्ञ सम्पादन के लिये (अन्याः) मारने योग्य (प्रजावतीः) बछड़ों.. सहित (अनमोवाः)याधिविशेषों से रहित (नयक्षमाः) यम, तपेदिक आदि बड़े रोगों से शल्य "गौर्य सम्पादन करो" (वः) तुम लोगों के शीच जो (स्तेनः) चौर्यादि दुष्टगुण सम्पन्न हो, वह उन गौवों का (मा, ईशत ) मालिक न बने, और (अध शंसः) अन्य पापी मी (मा) उनका रक्षक न हो, ऐसा यत्न करो जिससे (वह्वीः, ध्रुवाः) बहुत सी चिरकाल पर्यन्त रहने वाली गीय ( अस्मिन् गोपतो) निर्दुष्ट गोरक्षक के पास (स्यात् ) बनी रहे, और परमात्मा से.. प्रार्थना करो कि (यजमानस्य) यज्ञ करने वाले के पशुओं की हे ईश्वर! (पाहि ) रक्षा कर। भावा०-हेपरमपिता परमात्मन् ! आप हमारा पालन पोषण करते. हुए हमें शारीरिक, भात्मिक तथा सामाजिक बल प्रदान करें जिससे हम निरा- लस होकर यशादि कर्मों में प्रवृत रहें, अपने ऐश्वर्य को बढ़ावे, और सदा पूजनीय तथा नीरोग गौर्य प्रापकी कृपा से हमें प्राप्त हो जिनके दुग्ध तथा घृतादि द्वारा हम लोग यज्ञ का सम्पादन करें। हे भगवन् ! ऐसी कृपा करो कि हमारा यज्ञ का साधक पश्वादि धन नाश न हो, और दुष्ट पापी तथा हिंसक लोग कदापि इस धन के स्वामी न हो जिससे यह धन चिरकाल. पर्यन्त स्थिर रहे। , . श्रानोभद्राः क्रतवोयन्तु विश्वतोऽदब्धासोऽअपरीतास उद्भिदः। देवानो यथो सदमिदवृधे प्रसन्नपायुवो रक्षितारो दिवे दिवे । पदा०-हे ईश्वर! (नः) हमको (भद्राः) स्तुति के योग्य ( ऋतवा) संकल्प (श्रा, यान्तु ) प्राप्त हों ( विश्वतः) सब ओर से (अध्धालः) किसी से अधिनित (अपरीतासः) सर्वोत्तम ( उद्भिदः) दुःखनाशक ( देवाः ) विद्वान् लोग (यथा ) जैसे (ना) हमारी (सदम्) सभा में वा सर्वदा (वृधे, एव) वृद्धि के लिये ही (असन् ) हो, वैसे ही (दिचे दिवे) प्रतिदिन (अप्रोयुवो, रक्षि- तार:).प्रमादशून्य रक्षा करने चाले बनायो। भावा०, हे जगदीश्वर ! श्राप ऐसी कृपा करें कि हमारे संकल्प सदा भद्र हो अर्थात् हम लोग किसी का अनिष्ट चिन्तन न करते हुए सदैव परोप- कार में प्रवृत रहें । हम सर्वकाल विद्वानों का सत्संग कर, वे विद्वान् हमारे शुभचिन्तक हों, और प्रमाद रहित होकर हमें वैदिक पथ पर चलाये जिससे. हमारा मनुष्य जन्म सफल हो, यह हमारी श्राप से प्रार्थना है देवानां भद्रा सुमतिजूयतां देवानांरातिरभिनो निवर्त्ततां । देवानासख्यमुपसेदिमो वयं देवा न आयुःप्रतिरन्तु जीवसे ॥
१४ स्वस्तिवाचनम् पदा०-हे भगवन् ! (ऋजूयतां) सरलतया आचरण करने वाले (देवानाम् ) विद्वानों को (भद्रा) कल्याण करने वाली (सुमतिः) अच्छी बुद्धि, (न:) इमको (अभि, निधर्तताम् ) प्राप्त हो, और (देवानां, रातिः) विद्वानों का विद्यादि पदार्थों का दान “प्राप्त हो" (देवानां ) विद्वानों के (सख्यम् ) मित्र भाव को (वयं) हम लोग (उपसेदिम) प्राप्त हो, जिससे वे (देवाः) विद्वान लोग (ना) हमारी (प्रायुः) अवस्था को (जीवसे) दीर्घकालपर्यान्त जीने के लिये (प्र, तिरन्तु)पढ़ावें। भाषा०-इस मंत्र में विद्वानों के सत्संग द्वारा आयुवृद्धि की प्रार्थना की गई है कि हे परमपिता परमात्मा [आप ऐसी रुपा करें किसदाचारी विद्वानों की कल्याणकारक शुमबुद्धि हमें प्राप्त हो, अर्थात् हम लोग कर्मकाण्डी, अनु- छानी तथा परमात्मपरायण विद्वानों के अनुगामी हो, और उनसे सदा मैत्री भाव से पते जिससे वे प्रसन्न हो दीर्घजीवी होने का उपदेश करे, यायों कहो कि । चे हमें ब्रह्मचर्य पालन करने की विधिवतलावें जिससे हम पूर्ण आयु वाले हो। तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियं जिन्वमवसे हूमहेवयम् । पूषा नो यथा वेदसामसद्वृधेरक्षिता पायुरदव्यः स्वस्तये॥२६॥ पदा०-(वयं) हम लोग ( ईशानम् ) ऐश्वर्यवाले (जगतस्तस्थुषस्पति) चर और अचर जगत् के पति ( धियं, जिन्वम् ) धुद्धि से प्रसन्न करने वाले परमात्मा की (अपसे) अपनी रक्षा के लिये (हमहे ) स्तुति करते हैं, (यथा) जैसे कि वह (पूषा) पुष्टिकर्ता ( वेदसाम् ) धनों की (वृधे) वृद्धि के लिये (असत् ) हो, ( रक्षिता) सामान्यतया रक्षक, और (पायुः) विशेषतयारक्षक .(अदब्धः) कार्यों का साधक परमात्मा (स्वस्तये ) कल्याण के लिये हो "धैसे ही हम स्तुति करते हैं"। . भावा- हम लोग ऐश्वर्यसम्पन्न, चराचर जगत् के स्वामी तथा मेधाबुद्धि द्वारा प्राप्त होने योग्य परमात्मा की स्तुति करते हैं, ताकि वह पुष्टि कारक पदार्थों से हमारी रक्षा करें, और सक कालों में रक्षक परमात्मा विशेष- सया हमारे कार्यों को सिद्ध करते हुए सदा कल्याणकारी हो । स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्तिनस्ताक्ष्यों अरिष्टनेमिःस्वस्तिनोबृहस्पतिर्दधातु ।। पदा०-(वृद्धभवाः) बहुत कीर्ति वाला (इन्द्रः) परमेश्वयंयुक्त ईश्वर (ना) हमारे लिये ( स्वस्ति) कल्याण फो (धातु) स्थापन फरे, और ।
कर्मकाण्डचन्द्रिका (पूषा) पुष्टि करने वालो (विश्ववेदाः) सर्वज्ञाता ईश्वर (ना) हमारे लिपे . (स्वस्ति) कल्याण को धारण करे, (तायः) तीक्ष्ण तेजस्वी (अरिष्टनेमिः). दुःखहर्ता ईश्वर (न.) हमारा ( स्वस्ति) कल्याण करे, (वृहस्पतिः) बड़े २ पदार्थों का पति (नः) हमारे लिये (स्वस्ति) कल्याण को धारण करे। भाषा०-अतुलकीर्तिवाला; परमैश्वर्यसम्पन्न, सर्व चराचर जगत् को पुष्ट करने वाला, सर्वज्ञाता, तेजस्वी, सव दुःखों को दूर करके सुख देने वाला और सब पदार्थों का स्वामी परमात्मा हमारे लिये कल्याणकारी हो ॥ भद्रं कर्णेभिःशृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवासस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः ॥२८॥ यजु० २५१४-१५०१०१६-२८ पदा०-हे ( यजत्राः) संग करने योग्य (देवाः) विद्वान् लोगो। हम (कर्णेभिः) कानों से (भद्रम् ) अनुकूल ही (शृणुयाम ) सुर्ने (अक्षभिः) नेत्रों से (भद्रम् ) अच्छी वस्तुओं का (पश्येम) देखें, (स्थिरैरङ्गैः) अगों से (तुष्टुवांसः) आपकी स्तुति करने वाले हम लोग (तनूभिः) शरीरों से या भार्यादि के साथ ( देवहितम् ) विद्वानों के लिये कल्याणकारी (यद्, आयुः) जो आयु है इस को (व्यशेमहि ) अच्छे प्रकार प्राप्त हो। भावा०-हे सर्वरक्षक परमात्मन् ! श्राप ,ऐसी कृपा करें कि हम लोग विद्वानों का संग करते हुए प्रतिदिन भद्र ही सुने, और भद्र ही देखें, अर्थात् कोई अनिष्ट श्रवण तथा दर्शन हमें न हो, हमलोग ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए दृढ़ अंगों वाले हों, और पूर्ण आयु प्राप्त कर अपने अभीष्ट फलों को उपलब्ध करें॥ अग्न आयाहि वीतये गृणानो हव्यदातये । निहोता ससि बर्हिषि ॥२६॥ पदार-हे (अग्ने ) प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! ( वीतये) कान्ति तेजोविशेष के लिये (गृणानः) प्रशंसित हुए नाप ( हव्यदातये) देवताओं के लिये हव्य देने को (आयाहि) प्राप्त हूजिये ( होता) सव पदार्थों के ग्रहण करने वाले आप (बर्हिषि) यज्ञादि शुभ कार्यों में स्मरणादि द्वारा हमारे हृदयों में (नि, सरिसस्थित हजिये। भावा०-हे प्रकाशस्वरूप परमेश्वर ! श्राप दिव्यज्योतिर्मयं होने से 'सच"उपासनीय तथा देवताओं के पालन पोषण करने योग्य हो, श्रापही ३ ३ ३ २ ३ ६ ३ १ 'स्वस्तिवाचनम् सब पदार्थों के स्वामी और आप ही यज्ञादि शुभ कार्यों में पूजन करने योग्य हो, कृपाकरके आप हमारे शुभ कार्यों में सहायक हो ताकि हम सम्पूर्ण वैदिक कर्मों को निर्विघ्नतापूर्वक करते हुए श्रापको प्राप्त हो । त्वमग्ने यज्ञानाँहोता विश्वेषाथहितः । देवेभिर्मानुषे जने॥ सा० छन्द० प्रा०प्रपा०म०१।२ पैदा०-हे (अग्ने) पूजनीयेश्वर ! (त्वं)तू (विश्वेषां यज्ञानाम् ) छोटे बड़े सय यशों का (होता ) उपदेष्टा है, (देवेभिः) विद्वान् पुरुषों से (मानुषे, जने ) विचारशील पुरुषों में भक्त्युत्पादन द्वारा तुम (हितः) स्थित किये जाते हो। भावा० सबके पूजनीय परमात्मन् ! आप सब यशो के उपदेष्टा होने से विद्वान् पुरुषों द्वारा सेवनीय तथा सत्कारार्ह हो, आपके भक्तजन वैदिक धाणियों द्वारा श्रापका कीर्तन करते हुए संसारी जनों में आपकी महिमा प्रकट करते हैं। ये त्रिपप्ताः परियन्ति विश्वा रूपाणि विभ्रतः। वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे ॥ ३१ ।। अथर्व का०१ धर्ग०१ अनु०१प्रपा० १ मं०१ पदा०-(निषताः ) तीन रजस्, तमस् और सत्त्वगुण तथा सात- ग्रह, अथवा तीन-सात अर्थात् ५ महाभूत, ५. ज्ञानेन्द्रिय, ५ प्राण, ५ कर्मेन्द्रिय, १अन्तःकरण (ये) जो ( विश्वा, रूपाणि ) सब चराचरात्मक वस्तुओं को (विभ्रतः) अभिमत फल देकर, पोषण करते हुए (परि, यन्ति ) यथोचित लोटपोट होते रहते हैं (तेषाम् ) उनके सम्बन्धी ( मे, तन्वः) मेरे शरीर में (वला) बलों को (अध) आज ( वाचस्पतिः) वेदात्मकवाणी का पति परमेश्वर (दधातु) धारण करे। भावा०-हे घेदवाणी के पति परमेश्वर ! ये ऊपर, कथन किये हुए . इक्कीस सब चराचर संसार का पोषण करते हुए अपने व्यापार में सदा प्रवृत्त रहकर शारीरक यात्रा में सहायक होते हैं, इसलिये आपसे प्रार्थना है कि कृपा करके आप हमारे शरीरों में बल प्रदान करें ताकि हम अपने कार्यों को विधि- वत् करते हुए अंततः आपको प्राप्त हो। इति स्वस्ति वाचनम् अथ शान्ति प्रकरणम् शन्न इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शन्न इन्द्रावरुणा रातहव्या । शमिन्द्रासोमा सुवितायशंयोः शन्न इन्द्रापूषणावाजसातौ ।११ पदा०-(इन्द्राग्नी) विद्युत् और अग्नि (अवेभिः) रक्षणादि द्वारा (ना) हमारे लिये (शम् ) सुखकारक ( भवताम् ) हो (रातहल्या) ग्रहणयोग्य वस्तु जिन्होंने दी हैं ऐसे ( इन्द्रावरुणा) विजलो तथा जल (नः) हमारे लिये (शम् ) सुखकारक हो (इन्द्रासोमा ) विद्युत् और ओषधिगण (सुविताय ) ऐश्वर्या के लिये और (शंयोः) शान्तिहेतुक तथा विषयहेतुक सुख के लिये (शम्) प्रसन्नतादायक हो (इन्द्रापूषणा) विद्युत् और वायु (नः ) हमारे लिये (वाजसातौ ) युद्ध में चा अनलास विषय में ( शम्) कल्याणकारक हो। भावा-इस मंत्र में शान्ति की प्रार्थना कीगई है कि हे परमपिता परमात्मन् ! आपके दिये हुए पदार्थ हमें शान्तिदायक और सुखबर्द्धक हो अर्थात् विद्युत्, अग्नि, जल, ओषधियों का समूह और वायु जिनके आश्रित हमारा जीवन निर्भर है ये सब हमें शान्ति और सुख के देने वाले हों।. शन्नो भगःशमुनः शंसों अस्तु शन्नः पुरन्धि शमुसन्तुरायः। शन्नः सत्यस्यसुयमस्य शंसः शन्नोअर्यमा पुरुजातो अस्तु।२॥ पदा०-(नः) हमारे लिये ( भगः) ऐश्वर्या (शम्) सुखदायक हो, और : (नः) हमारे लिये (शंलः) प्रशंसा (शम्, 3) शान्ति के लिये ही (अस्तु) हो, हमारे लिये (पुरन्धि) बहुत बुद्धि (शम् ) सुखकारक हो, (रायः) धन (शम, उ) शान्ति के लिये ही ( सन्तु.) हो, (सुयमस्य) अच्छे नियम से युक्त (सत्यस्य ) सत्य का ( शंसः) कथन (ना.) हमको (शम् ) सुखकारक, हो, (नः ) हमारे लिये (पुरुजातः) बहुत पुरुषों में प्रसिद्ध (अर्यमा) न्यायाधीश (शम् ) सुख देने वाला (अस्तु) हो। लावा०-हे भगवन् ! आपका दिया हुआ ऐश्वयं हमारे लिये सुख- दायक हो, आपकी कृपा से हमें प्राप्त हुई प्रतिष्ठा तथा लब पदार्थों को यथा- .:. त् जानने का शान, अनेक प्रकार का धस और सत्यभाषण हमारे लिये - शान्ति प्रकरणम् २३ शान्तिदायक हो, हे न्यायकारी जगदीश्वर ! सब प्रजा पर शासन करने वाला न्यायाधीश आपकी कृपा से हमारे लिये सुखदायक हो- शन्नोधाताशमुधर्ती नोअस्तु शन्न उरूची भवतु स्वधाभिः। शं रोदसी बृहतीशंनोअद्रिः शंनो देवानां सुहवानि सन्तु ॥३॥ . पदा०-(न:) हमको (धाता) पोषक ‘लब वस्तु (शम् ) शान्ति- कारक हो (धर्ता) धारक सब वस्तु (शम्, उ) शान्ति के लिये ही (ना) हमारे लिये (अस्तु) हो (ना) हमारे लिये ही ( उरूची) पृथिवी (स्वधा- भिः) अनादि पदार्थों से (शम् ) कल्याण कारक (भवतु) हो (बृहती) बड़ी (रोदसी) अन्तरिक्ष सहित पृथिवा षा प्रकाशसहित अन्तरिक्ष (शम् ) शान्ति देने वाली हो (अद्रिः) मेघ (नः) हमारे लिये (शम् ) सुखकारक हो, और (ना) हमारे लिये (देवानाम् ) विद्वानों के ( सुहवानि ) शोभन आह्वान (शम् ) सुखकारक (सन्तु) हों। भावा०-हे परमात्मन् ! हमारे पालक, पोषक तथा धारक पदार्थ हमें शान्तिदायक हो, अन्नादि पदार्थों को उत्पन्न करनेवाली यह पृथिवी, अन्त- रिक्ष और प्रकाशयुक्त धुलोक हमारे लिये सुखदायक हो, सब ओषधियों को पुष्ट करनेवाली वृष्टि हमारेलिये शान्ति देने वाली हो, और हमें सदुपदेश कर वैदिकमर्यादा पर स्थित रखनेवाले विद्वानों का हमारे यहां लदा आगमन होता रहे जिससे हम सुख ही सुख अनुभव करें। शन्नोअग्निज्योतिरनीकोअस्तुशन्नोमित्रावरुणावश्विनाशम् । शन्नः सुकृतां सुकृतानि सन्तु शन्न इपिरो अभिवातु वातः ।। पदा०--(ज्योतिरनीका) प्रकाश ही है धनीक मुख वा सेना की नाई जिसका ऐसा (अग्निः) अग्नि (नः ) हमको (शम् ) सुखकारक (अस्तु) हो (मित्रावरुणौ)प्राण तथा उदाने वायु (नः) हमको ( शम्) मुखका- रक हो (अश्विना) उपदेशक और अध्यापक (शम् ) सुख पहुंचाने वाले हो (सुकतानि) धर्मावरण (नः) हमको (शम् ) मुख देने वाले (सन्तु) हों । (नः) हमारे लिये (इपिरः) गमनशील (पातः) वायु (शम्) सुख देता हुश्रा (अभिवातु)बहे। भावा०-हे सुखस्वरूप तथा हमको सुख देने वाले जगदीश्वर यह सेना की नाई विस्तृत ज्योति वाली अग्नि यज्ञों द्वारा हमें सुखदायक हो, प्राण देते तथा उदानादि वायुओं का हम पर कभी कोप न हो अर्थावं वे हमारे सदा क २४ कर्मकाण्डचन्द्रिका अनुकूल हों, हमारे उपदेशक तथा अध्यापक अपने सदुपदेश द्वारा हमें सुख पहुंचावें, हम सदा धर्मात्माओं के धर्माचरण ग्रहण करते हुए धार्मिक बने, और बहता हुश्रा वायु हमारे लिये शान्तिदायक हो । शन्नो द्यावापृथिवी पूर्वहूतौ शमन्तरिक्षं दृशये नो अस्तु शंन श्रोषधीनिनो भवन्तु शंनो रजसस्पतिरस्तु जिष्णुः।५ पदा०-( द्यावापृथिवी ) विद्युत् और भूमि (पूर्वहूतौ ) पूर्व पुरुषों की प्रशंसा जिसमें हो ऐसी क्रियायें (ना) हमारे लिये (शम् ) शान्तिदायक हो (अन्तरिक्षं) अन्तरिक्ष लोक ( इशये) ज्ञानसम्पत्ति के लिये (नः) हमारे लिये (शम् ) शान्तिदायक (अस्तु ) हो (ओषधीः) ओषधियां और (वनिनः) वृक्ष (शम् ) सुखकारक ('नः) हमारे लिये (भवन्तु) हों (रजसस्पतिः) रजोलोक का पति (जिष्णुः ) जयशील महापुरुष (नः) हमारे लिये (शम् ) सुख देनेवाला (अस्तु) हो । भावा०-घुलोक, पृथिवीलोक तथा अन्तरिक्षलोक ज्ञानसम्पत्ति के लिये हमें सुखदायक हों, अर्थात् जैसे हमारे पूर्व पुरुषा इन लोकों का ज्ञान सम्पादन करते हुए ऐश्वर्य सम्पन हो सुख को प्राप्त हुए, इसी प्रकार हम भी इनका ज्ञान उपलब्ध करते हुए सुखी हो. हम प्रत्येक ओषधि तथा वृक्षों के गुण- ज्ञाता हो ताकि वह हमारे लिये शान्ति दें, और हमारे रज वोर्य को पुष्ट करते हुए हमें सुखकारक हों। .. शन्न इन्द्रो वसुभिर्देवो अस्तु शमादित्येमिर्वरुणः सुशंसः । शन्नो रुद्रो रुद्रेभिर्जलाषः शंनस्त्वष्टाग्नाभिरिह शृणोतु ॥ ६॥ . .. पदा०-(देवः) दिव्यगुणयुक्त (इन्द्रः) सूर्य (वसुभिः) धनादि पदार्थों के साथ (नः) हमारे लिये (शम् ) सुखकारक (अस्तु) हो (आदित्येभिः) संघल्लरीय मासों के साथ (सुशंसः ) शोभन प्रशंसा वाला (घरुणः) जलस- मुदाय ( शम् ) सुखकारक हो ( जलापः) शान्तिस्वरूप ( रुद्रः) परमात्मा (रुद्रेमिः) दुष्टों को दण्ड देने वाले अपने गुणों के साथ (नः) हमारे लिये (शम् ) सुख देने वाला हो (स्वष्टा ) विवेचक विद्वान् (ग्नासिः) वाणियों से "नेति वाङ नाम निघण्टौ० ११ ११" (इह ) इस संसार में (शम् )सुखमय उपदेशो को (नः) हमारे लिये (शृणोतु) सुनावें, "अन्तर्भावितण्यर्थः" । भाषा०—दिव्यगुणयुक्त, सवका प्रकाशक, अन्नादि धनों का उत्पन्न करने.. वाला सूर्य और अन्नादि पदार्थ हमारे लिये सुखदायकं हो, जल समुदाय शान्तिपकरणम् २५ हमारेलिये सुखकारी हो, संवत्सर, मास, दिन शान्तिकारक हो, दुष्टों को दण्ड देने और श्रेष्ठो का पालन करने वालो परमात्मा सब ओर से हमारी रक्षा करे, और प्रत्येक पदार्थ की विवेचना करने वाले विद्वान अपनी मनोहर बागियों से हमको सदुपदेश श्रवण कराते हुए हमारी आत्मा को शान्ति प्रदान करें। शंनः सोमो भवतु ब्रह्म शंनः शंनो ग्रावाणःशमु सन्तु यज्ञाः। शंनः स्वरूणां मितयो भवन्तु शंनः प्रस्वः शम्वस्तु वेदिः ॥ पदा०-(ना) हमारेलिये (सोमः )चन्द्रमा (शम् ) सुखकारक ( भवतु) हो (ना) हमारे लिये (ब्रह्म ) अनादि रूप तत्व (शम् ) शान्तिदायक हो (प्रावाणः ) शुभ कार्यों के साधनभूत प्रस्तर-पत्थर (नः) हमको (शम् ) सुख देने वाले हो ( यज्ञाः) सब प्रकार के यज्ञ (शम्, उ) शान्ति ही के लिये (सन्तु) हो ( स्वरुणां) यज्ञस्तम्भों के (मितयः) परिमाण (न:) हमको (शम् ) सुखदायक ( भवन्तु ) हो (नः) हमको (प्रस्वः) ओषधियां (शम् ) सुख देने वाली हो (वेदिः) यश की वेदि-कुण्डादिक (शम्, 3) शान्ति ही के लिये (अस्तु) हो। भावा--- -सौम्यगुणसम्पन तथा अन्नादि पदार्थों के उत्पन्न करने और उनमें रसों का संचार करने वाला चन्द्रमा हमारे लिये सुखकारक हो । हेपरमा- त्मन् ! हमारे कार्यों के साधक पत्थर श्रादि फाठिन्यप्रधान पदार्थ हमें सुखदायक हो और सर्वाङ्गों सहित यश हमारे लिये शान्तिदायक हो । शंनः सूर्य उरुचक्षो उदेतु शंनश्चतस्रः प्रदिशो भवन्तु । शंनः पर्वता ध्रुवयो मवन्तु शंनः सिन्धवः शमु सन्त्वापः ।।८।। पदा०-उरुचक्षाः) बहुत तेज हैं जिसके ऐसा (सर्यः) सूर्य (नः) हमारेलिये (शम् ) सुखपूर्वक (उद्, पतु) उदय को प्राप्त हो (चत्तस्रः) चारों (प्रदिशः) पूर्वादि बड़ी दिशायें चा ऐशानी आदि प्रदिशायें (ना) हमारेलिये (शम् ) सुख करने वाली ( भवन्तु ) हो ( पर्वताः) पर्वत (ध्रुवया ) स्थिर और (शम् ) सुखदायक (नः) हमारे लिये (भवन्तु) हो, और (नः) हमारे लिये (सिन्धयः) नदियां वा समुद्र (शम्) शान्ति. दायक हो ( आपः ) जल मात्र वा प्राण (शम् उ) शान्ति के लिये ही (सन्तु), हों। भावा०-हे हमारे रक्षक परमात्मन् ! इस तेजोपुंज सूर्य का उदय होना हमारे लिये शान्तिदायक हो, दिशा, उपदिशा, स्थिर पर्वत, समुद्र तथा नदियां अर्थात् जलपात्रं हमारे लिये सुखदायक तथा शान्ति देने वाले हो । .
२६ कर्मकाण्डचन्द्रिका शन्नो अदितिर्भवतु व्रतेभिः शंनो भवन्तु मरुतः स्वर्काः । शन्नो विष्णुः शमुपूपानो प्रस्तुशंनो भवित्रंशम्बस्तु वायुll पदा०-( व्रतेभिः) सत्कर्मों के साथ ( अदितिः ) विदुपी मातायें (नः) हमारेलिये (शम् ) शान्तिदायक ( भवन्तु ). हाँ ( स्वीः ) शोभन विचार वाले ( मरुतः) मितभापो विद्वान् लोग (नः) हमारे लिये (शम्) शान्ति देने वाले (भवन्तु ) हों (विष्णुः ) व्यापक ईश्वर (मः ) हमको (शम्) शान्याधायक हो (पूपा) पुष्टिकारक ब्रह्मचर्यादि व्यवहार (नः) हमको (शम्, उ)शान्ति के लिये ही (अस्तु) हो (भवित्रम् ) अन्तरिक्ष वा जल अथवा भवितव्य (नः) हमको (शम् ) सुखकारक हो (वायुः) पवन (शम्, उ) शान्ति ही के लिये (अस्तु) हो। भावा०- हे सारे संसार को शान्ति देने वाले भगवन् ! सत्कौवाली हमारी . विदुषी मातायें तथा विचारशील विद्वान् पुल्प हमारे लिये मुख उत्पन्न करने घाले हो, हमारे आत्मा तथा शरीर को पुष्ट करने वाला ब्रह्मचर्य हमको शान्तिदायक हो और अन्तरिक्षस्थ जल तथा पवन सदा ही हमारे स्वास्थ्य के रक्षक हो ताकि हम अपना अभीष्टफल प्राप्त कर सकें। शंनो देवः सविता त्रायमाणः शंनो भवन्तूपसो विभातीः। शंनःपर्जन्यो भवतु प्रजाभ्यः शंनःक्षेत्रस्य पतिरस्तु शुम्भुः॥१०॥ पदा:-( सविता)सवात्पादक (देवः ) परमेश्वर (त्रायमाणः) रक्षा करता हुश्रा (न:) हमारे लिये (शम् ) सुखकारक हो (उपलः) प्रभात पेक्षायें (विभाती) विशेप दीप्ति वाली (नः) हमारे लिये (शम् ) सुखका.. रक (भवन्तु ) हो ( पर्जन्यः) मेघ (नः) हमको और (प्रजाभ्यः) संसार के लिये (शम्, भवतु) कल्याणकारी हो (क्षेत्रस्य) जगत्प क्षेत्रका (पतिः) स्वामी (शम्भुः सब को सुख देने वाला (नः) हमारेलिये (शम् ) शान्ति- कारी (वस्तु) हो। मावा०-सब को उत्पन्न करने वाला, सयका स्वामी तथा सबको सुख देने घाला प्रभु ! हमें सुख देता. हुश्रा हमारे लिये शान्तिकारक हो, देदीप्यमान प्रभा- तवेलायें हमारे लिये सुखकारक हो और मेघमालायें सम्पूर्ण संसार का कल्याण, करती हुई हमारे लिये शान्तिदायक हों। . शंनो देवो विश्वदेवा भवन्तु शं सरस्वती सह धीभिरस्तु ।
२७ शान्तिप्रकरणम् शमभिषाचःशमु रातिषाचःशंनोदिव्याः पार्थिवाः शन्नो अप्याः॥ पदा०-(देवाः) दिव्यगुणयुक्त (विश्वदेवाः ) समस्त विद्वान् (ना) हमारे लिये (शम्, भवन्तु )सुख देने वाले हों (सरस्वती.) विद्या, सुशिक्षा- युक्त वाणी (धीभिः) उत्तम बुद्धियों के (सह) साथ (शम्, अस्तु) सुखका- रिणी हो (अभिषाच:) यज्ञके सेवक वा आत्मदर्शी (शम् ) शान्तिदायक हों (रातिषाचः) विद्याधनादि के दान का सेवन करने वाले (शम्, उ) शान्ति ही के लिये हो (दिव्याः) सुन्दर (पार्थिवाः) पृथिवी के पदार्थ (नः) हमारे . . लिये (शम् ) सुखद हो (अप्याः) जल मेंपैदा होने वाले (नः) हमारे . लिये (शम् ) सुखद हों। भावा०-हे सर्वनियन्ता जगदीश्वर ! वेदविधा से सुभूषित विद्वान् पुरुष हमारे लिये उत्तम उपदेशों द्वारा सुखप्रद हो, सदाचार सम्पन्न तथा बुद्धि सम्पत्ति वाले पुरुषों को प्राप्त हुई वेदवाणो हमें शान्तिदायक हो, आत्म- दर्शी याशिक महात्मा हममें शान्ति का संचार करें, दान के महत्व को जान कर अनुष्ठान करने वाले पुरुष शान्तिदायक हों, और पृथिवीस्थ तथा जलीय पदार्थ हमारे लिये सुख देने वाले हो । शंनः सत्यस्य पतयो भवन्तु शंनो अर्वन्तः शमु सन्तु गावः। शंन ऋभवःसुकृतः सुहस्ताःशंनो भवन्तु पितरो हवेषु ॥१२॥ . पदा०-(सत्यस्य, पतयः ) सत्यभाषणादि व्यवहार के पालक (नः) हमारे लिये (शम्, भवन्तु) सुखकारी हो (अर्धन्तः) उत्तम घोड़े (नः) हमको (शम् ) सुखद हो (गावः) गौयें (शम्, 'उ) शान्ति ही के लिये (सन्तु) हो (ऋभवः) श्रेष्ठबुद्धिवाले (सुकृतः) धर्मात्मा (सुहस्ताः) अच्छे कामों में हाथ देने वाले (नः) हमारे लिये (शम् ) सुखद हो (हवेषु)हव- नादिसत्कर्मों में (पितरः) माता पिता आदि (नः) हमारे लिये (शम् ) सु. खकारक (भवन्तु) हों। भावा० -हे परमात्मन् ! आपकी कृपा से सत्यवक्ता पुरुष सत्य का उपदेश करते हुए हमारे लिये शान्तिदायक हो, घोड़े तथा दुग्धनवित मौर्य , हमें सुखकारी हो, वेदविहित कर्म करने वाले धार्मिक पुरुष और हमारे माता, पिता तथा प्राचार्यादि वृद्ध पुरुष हमारे यज्ञादि सत्कर्मों में सम्मिलित होकर हमें सुखप्रद उपदेश करें, जिससे हमारे हृदय में शान्ति विराजमान हो अर्थात् उनका आगमन हमारे लिये शान्तिदायक हो ।
कर्मकाण्डचन्द्रिका शंनो अजएकपाद्देवो अस्तु शंनोऽहिर्बुध्न्यः शं समुद्रः । शंनो अपानपात्पेरुरस्तु शंनः पृश्निर्भवतु देवगोपाः ॥१३|| ग० मं०७ सू० ३५ मं०१-१३ पदा०-(एकपात्) जगतरूप एक पादवाला अर्थात् जिसके एक अंश में सब जगत् है वह अनन्तस्वरूप (अजः) अजन्मा (देवः) ईश्वर (न) हमारे (शम् ) कल्याण के लिये (अस्तु) हो (बुध्न्यः, अहिः) अन्त. रिक्ष में पैदा होने वाला मेघ (नः) हमारे (शम् ) कल्याण के लिये हो ( समुद्रः) सागर (शम् ) सुखकारी हो (पाम् ) जलों की (नपात् ) नौका ' (नः ) हमको (शम्, पेरुः) सुखपूर्वक पार लगाने वाली (अस्तु) हो ( देव. गोपाः ) देव रक्षक हैं जिस में ऐसा (पृश्निः) अन्तरिक्षस्थल (नः) हमको (शम्, भवतु ) सुख कारक हो। भावा०-यह सम्पूर्ण जगत् जिसके एका पाद-भाग में स्थित है और तीन पाद अमृत हैं, वह अनन्तस्वरूप तथा अजन्मा ईश्वर हमारा कल्याण करे, अन्तरिक्ष में उत्पन्न होने वाला मेघ, महान् समुद्र, जलों से पार करने वाली नौका, और यह अन्तरिक्षस्थल, हे भगवन् ! आपकी कृपा से सुखदायफ तथा शान्तिप्रद हो॥ इन्द्रो विश्वस्य राजति शंनोअस्तु द्विपदे शंचतुष्पदे ॥१४॥ पदा०-हे जगदीश्वर ! जो आप ( इन्द्रः) बिजली के तुल्य (विश्वस्य) संसार के बीच ( राजति ) प्रकाशमान हैं, उन आपकी कृपा से (नः) हमारे (द्विपदः) पुत्रादि के लिये (शम् ) सुख (अस्तुं ) होवे, और हमारे (चतु- पदे)गौ आदि के लिये (शम् ) सुख होवे। भावा०-हे विद्युत् समान सारे ब्रह्माण्ड में प्रकाशमान परमात्मन् ! आपकी कृपा से पुत्र पौत्रादि हमारा परिवार सुखपूर्वक हो, अर्थात् वह सदा शान्ति द्वारा ही अपना जीवन व्यतीत करे । और हमारी गौ आदि धन सदा सुस्त्रपूर्वक रहे, ऐसी कृपा करो ।। शंनो वातः पवताशनस्तपतु सूर्यः । शं नः कनिक्रदद्देवः पर्जन्योऽअभिवर्षतु ॥ १५ ॥ पदा०-हे परमेश्वर ! (वातः) पवन (नः) हमारे लिये (शम् ) सुखकारी (पवताम् ), चले (सूर्यः) सूर्य (नः) हमारे लिये (शम् ) सुखकारी (तपतु) तपे (कनिक) अत्यन्त शब्द करता हुआ (देवः) शान्तिप्रकरणम् २६ उत्तमगुणयुक्त विधुत्रूप अग्नि (नः ) हमारे लिये ( शम् ) कल्याणकारी हो, और (पर्जन्यः) मेघ हमारे लिये (अभि, वर्षतु) भले प्रकार वर्षा करे। भावा०-हे दीनों पर दया करने वाले जगदीश्वर! आप ऐसी कृपा करें कि पधन हमारे लिये शान्तिदायफ चले, तपता हुआ सूर्य सुख दे, अग्नि हमारे लिये कल्याणकारी हो और भले प्रकार वर्षा करते हुए मेघ हमें शान्ति- दायक हों॥ अहानि शं भवन्तु नः शर्थ रात्रीः प्रतिधीयताम् । शन इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शंन इन्द्रावरुणा रातहव्या । शंन इन्द्रापूषणा वाजसातौ शमिन्द्रा सोमा सुविताय शंयोः ॥१६॥ पदा०-हे परमेश्वर ! (अबोभिः) रक्षा आदि के साथ (शंयोः) सुख की (सुविताय ) प्रेरणा के लिये (नः) हमारे शर्थ (अहानि) दिन (शम् ) सुखकारी (भवन्तु) हो ( रात्रीः) रातें ( शम्) कल्याण के ( प्रति ) प्रति (धोयताम् ) हमको धारण करें। ( इन्द्राग्नी) बिजली और प्रत्यक्ष अग्नि (नः) हमारे लिये (शम् ) सुखकारी ( भवताम् ) होवें । ( रातहल्या) ग्रहण करने योग्य सुख जिन से प्राप्त हुना वे ( इन्द्रावरुणा ) विद्युत् और जल (नः) हमारे लिये (शम् ) सुखकारी हो। ( वाजसातौ) अन्नों के सेवन के हेतु संग्राम में ( इन्द्रापूषणा ) विद्युत् और पृथिवी (नः) हमारे लिये (शम् ) सुखकारी हो । (इन्द्रासोमा) बिजली और औषधियां (शम् ) सुख- कारिणी हो। भावा०-हे हमारी रक्षा करने वाले पिता परमात्मन् ! आप ऐसी कृपा करें कि यह दिन और रात्रि हमारे लिये सुखदायक हो, अर्थात् दिन और रातों में भी हम श्राप ही की आज्ञा का पालन करते हुए विचरें, दुःख के देने वाला कोई पाप कर्म हमसे न हो । विधुत, भौतिकाग्नि, और पदार्थविद्या द्वारा सिद्ध किया हुश्रा विद्युत्, तथा जल, अन्नों को सेवन करने योग्य बनाने वाला विद्युत्, तथा पृथिवी, और हमारे जीवन का आधार विजली तथा औषधियां हमारे लिये सुख तथा शान्तिदायक हो। शन्नो देवीरभिष्टय आपो.भवन्तु पीतये। शंयोरभिसवन्तु नः॥ १७ ॥ . . . पदा०-हे जगदीश्वरं! (अभिष्टये) इंटसुख की सिद्धि के लिये, (पीतये) पीने के अर्थ, (देवी)दिव्य उत्तम (आपः) जल (नः) हमको (शम्) कर्मकाण्डचन्द्रिका सुखकारी ( भवन्तु) होवें । और वे (नः) हमारे लिये (शंयों).सुख की वृष्टि (अभिन्नवन्तु) सब ओर से करें। भावा०-हे दिव्यगुणसम्पन्न परमात्मन् ! आप हमारे लिये सुखकारी हों, और हमको इष्टसुख प्राप्त करायें। हे सर्वव्यापक जगदीश्वर ! आप अपनी कृपा से हमें पूर्णानन्द का भागी बनायें, और हम सब ओर से शान्ति ही देखें, हमारा चित्त कमी प्रशान्त न हो। योःशान्तिरन्तरिक्ष शान्तिः पथिवी शान्तिरापः शान्ति- रोषधयः शान्तिर्वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिब्रह्म शान्तिः सर्व शान्तिःशान्तिरेव शान्तिः सामा शान्तिरेधि।। पदा०-हे परमेश्वर ! (द्यौः) प्रकाशयुक्तसूर्यादि, (अतिरिक्षम् ) सूर्य और पृथिवी के बीच का लोक, (पृथिवी) भूमि, (आपः ) जल, (ोपधयः) सोमलता आदि औषधियां वनस्पतिचट आदि वृक्ष, (विश्वेदेवाः) सब विद्वान् लोग (ब्रह्म) घेद (सर्वम् ) सव वस्तु (शान्तिः) शान्ति-मुखकारी, निरुपद्रव हो । शान्ति शब्द का प्रत्येक शब्द के साथ मंत्र में अन्वय है। (शान्तिरेव, शान्तिः) स्वयं शान्ति भी सुखदायिनी हो, और (सा) वह (शान्तिः) (मा) मुझको (एधि) प्राप्त हो । 'भाषा०-हे शान्तिस्वरूप परमात्मन् ! प्रकाशमान सूर्य, चन्द्रमादि अथवा धुलोफ, अन्तरिक्षलोक और पृथिवीलोक, जल, औषधियां, वनस्पति, सब विद्वान् पुरुष, ब्रह्म-प्रकृति और हमसे सम्बन्ध रखने वाले सम्पूर्ण पदार्थ हमारे लिये सुखदायक हो । वह शान्ति भी शान्तिदायक हो। और हे भगवन् । यह शान्ति मुझे प्राप्त हो ॥ तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रभुञ्चरत् । पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शत, भृणुयाम शरदः शतं प्रबवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतंभूयश्च शरदः शतात् ॥१६॥ यजु०३६।२४ पदा०-हे सूर्य्यवत् प्रकाशक परमेश्वर ! श्राप ( देवहितम् ) विद्वानों के हितकारी (शुक्रम् ) शुद्ध (चक्षुः ) नेत्रतुल्य सब के दिखाने वाले (पुरस्तात्) अनादि काल से (उद्, चरत् ) अच्छी तरह सयकेशाता हैं, (तत्)उन आपको हम (शतं, शरदः) सौ वर्ष तक (पश्येम ) ज्ञान द्वारा देखें, और आपकी कृपासे (शतं शरदः) सौ वर्ष तक (जीवेम) हम जी, (शतं शरदः) सौ वर्ष तक शान्तिप्रकरणम् . (णुयाम ) सच्छास्त्रों को सुनें, (शतं शरदः) सौ वर्षपर्यन्त (प्रव्रयाम) पढ़ावें वा उपदेश करें, और (शतं शरदः) सौवर्ष तक (अदीनाः) दीनता रहित (स्याम) हो, (च) और (शतात्, शरदः) सौ वर्ष से (भूयः) अधिक भी देखें, जीचे, सुमें और अदीन रहे। भावा-हे हमारे द्रष्टा परमेश्वर ! आप विद्वानों के हितकारी, शुद्ध स्वरूप. उत्कृष्टता से सर्वत्र परिपूर्ण, और अनादि काल से आप हमारे सब कर्मों के ज्ञाता हैं. श्राप ऐसी कृपा करें कि हम सौ वर्ष तक श्रापको ज्ञानदृष्टि से मनन करते रहें, आपकी आशा का पालन करते हुए सौ वर्ष तक जीवं, सौ वर्ष तक आपका गुणकीर्तन सुनें, सौ वर्ष पर्यन्त वेदों के सदुपदेश सुनें और करें । हे भगवन् ! ऐसी कृपा करो कि हम सौ वर्ष तक अदीन हो, और यदि सौ वर्ष से अधिक भी जीवें तो इसी प्रकार देखें, सुने और अदीन रहें। यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति । दूरं गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥ २० ॥ . . पदा०—हे जगदीश्वर ! आपकी कृपा से (यत्) जो (देवम् ) दिव्य गुणों से युक्त, (दूरं गमम् ) दूर दूर जाने वाला वा पदार्थों को ग्रहण करने वाला, (ज्योतिपाम् ) विषयों के प्रकाशक चक्षरादि इन्द्रियों का (ज्योतिः) प्रकाश करने वाला, (पकम्) अकेला (जाग्रतः) जागने वाले के (दूरम्) दूर २(उत्पति) अधिकतया भागता है। (उ) ओर (तत्) वह (सुप्तस्य) सोते हुए को (तथा, एव) उसी प्रकार (पति) प्राप्त होता है । (तत्) वह ( मे ) मेरा ( मनः) मन (शिवसंकल्पम् ) अच्छे अच्छे विचार वाला ( अस्तु ) हो । भावा०-हे हमारे मन तथा इन्द्रियों के स्वामी परमात्मन् ! हमारा चंचल मन दूर २ जाकर पदार्थों को ग्रहण करने वाला, चतरादि इन्द्रियों का प्रकाशक जो संयम करते हुए भी दूर २ भागता और असंयमी पुरुषों को भी उसी प्रकार प्राप्त होता है, वह मेरा मन श्रापकी कृपा से शुभसंकल्पोंवाला हो, अर्थात् उसमें कोई पापमय विकार उत्पण न हो। येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः। यदपूर्व यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥ पदा०-हे जगत्पते । जिस मन से (अपसः) सत्कर्मनिष्ठ (मनीषिणः) मन को दमन करने वाले, (धीराः) ध्यान करने वाले बुद्धिमान् लोग, ('यशे) अग्निहोत्रादि धार्मिक कार्यों में, और (विदथेषु) वैज्ञानिक तथा युद्धादि व्यव- .
३२ कर्मकाण्डचन्द्रिका हारों में (कर्माणि) इष्टकर्मों को (करवन्ति) करते हैं, और (यत्) जो (अपूर्वम् ): अद्भुत (प्रजाना) प्राणिमात्र के (अन्तः) भीतर (यक्षम्) मिला हुआ है। (तत्) वह (मे) मेरा (मनः) मन (शिवसंकल्पम् ) श्रेष्टसंकल्पवाला (प्रस्तु) हो । भावा०-हे सर्वद्रष्टा परमेश्वर ! मन को दमन करते हुए ध्यान करने वाले सत्कर्मी पुरुप जिस मन से यज्ञादि इष्टकर्म करके प्राणी मात्र को सुख पहुंचाते, और जिससे वैज्ञानिक लोग कलाकौशल द्वाराअनेक व्यवहारोंमें प्रवृत्त होते हैं, वह हमारा विचित्र मन जो प्राणीमात्र के भीतर रमा हुआ है, उत्तम, संकल्प वाला हो॥ यत्पज्ञानमुत चेतो धृतिश्चयज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु । यस्मान्न ऋते किंचन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु । पदा०-हे प्रभो ! (यत् ) जो (प्रज्ञानम् ) बुद्धिका उत्पादक, ( उत) और (चेतः) स्मृति का साधन, (धृतिः) धैर्यास्वरूप, (च) और (प्रजासु) मनुष्यों के (अन्तः) भीतर (अमृत) नाशरहित .( ज्योतिः) प्रकाशस्वरूप है, (यस्मात् ) जिसके (ऋते,) बिना (किम् , चन ) कोई भी ( कर्म ) काम (न, क्रियते ) नहीं किया जाता, (तत्) वह ( मे) मेरा (मनः ) मन (शिवसंकल्पम् ) शुद्धविधार वाला (अस्तु ) हो । भावा-हे अन्तर्यामी परमात्मन् ! श्राप ऐसी कृपा करें कि हमारा मन जो ज्ञान को सदा स्फूर्ति देने वाला, स्मृतिरूप ज्ञान का उत्पादक, धीरता का साधक, और जो हमारे भीतर नित्य प्रकाशमान है, जिसकी प्रेरणा के विना मनुष्य किसी काम में प्रवृत्त नहीं हो सकता, वह मेरा मन पवित्र भावों वाला हो। येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत्परिगृहीतममृतेनसर्वम् । येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मेमनः शिवसंकल्पमस्तु ॥२३॥ पदा०-हे सर्वेश्वर ! (येन, अमृतेन) नाशरहित परमात्मा से मिले हुए जिस मन से (भूतं, भुवनं, भविष्यत्, सर्वमिदं, परिगृहीतम् ) भूत, वर्तमान भविष्यत् यह सब जाना जाता है, और (येन) जिससे (सप्तहोता) सात होता वाला ( यज्ञः) अग्निष्टोमादि यज्ञ "अग्नियोम में सात होता वैठते हैं (तायते) विस्तृत किया जाता है, (तत्) वह मेरा (मनः) मन (शिवसंकल्पम् ) मुक्ति आदि शुभ पदार्थों के विचार वाला (अस्तु) हो ।
३ . शान्तिप्रकरणम् भावा-हे परमात्मन् ! आपकी कृपा से यह नाशरहित-अविनाशी मन जो तीनों कालों का शारक अर्थात् भूत, वर्तमान तथा भविष्यत् का जनाने वाला, और सातहोताओं वाले अग्निष्टोमादि विस्तृत यज्ञों, तथा अन्य यड़े २ शुभ कार्यो का चिन्तन करने वाला है. वह मेरा मन सदा उत्तम विचारों में ही प्रवृत्त रहे जिससे मनुष्यजन्म के फलचतुष्टय की प्राप्ति हो । यस्मिन्नचः सामयजूषि यस्मिन्प्रतिष्ठितारथनाभाविवाराः। यस्मिंश्चित्तथं सर्वमोतं प्रजानांतन्मेमनः शिवसंकल्पमस्तु॥२४॥ पदा०-हे अखिलोत्पादक !(यस्मिन् ) जिस शुद्ध मन में (ऋचा, साम ) ऋग्वेद और साम वेद तथा (यस्मिन् ) जिस में (यजूंषि) यजुर्वेद और "अथर्ववेद भी" (रथनाभाविवाराः) रथ की नाभि पहिये के बीच के काष्ठ में अरा जैसे (प्रतिष्ठिताः) स्थित हैं। और ( यस्मिन् ) जिसमें (प्रजा- नाम् ) प्राणियों का (सर्वम् ) समग्न (चित्तम् ) ज्ञान (श्रोतम् ) सूत में मणियों के समान सम्बद्ध है, (तत्) वह (मे) मेरा (मनः) मन (शिवसंकल्पम्) वेदादि सत्यशास्त्री के प्रचाररूप संकल्प वाला (अस्तु) हो। भावा०-हे शानदाता परमात्मन् ! आप ऐसी कृपा करें कि हमारा पह पवित्र मन जिसमें ऋग यजु० साम तथा अथर्व० चारों वेद रथ की नामि में अरा के समान स्थित हैं, और जिस में प्रजाओं का सम्पूर्ण ज्ञान सूत्र पुरोये हुए मणिकाओं के समान ओत प्रोत हो रहा है, वह मेरा मन शुभसंकल्प वाला, अर्थात् वेदिकमर्यादानुसार चलने वाला हो । सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यानेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिनइव । हृत्पतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥२५॥ यजु० अ० ३४ म०९-६ पदा०-(यत् ) जो मन ( मनुष्यान् ) मनुष्यों को, (सुपारथिः अश्वानि) अच्छा सारथि घोड़ों को जैसे, (नेनीयते) अतिशय करके "इधर उधर" ले जाता है, और जो मन. अच्छा सारथि (अभी शुभिः) रस्सियों से (बाजिन इव ) वेग वाले घोड़ों को जैसे, (यमयतीतिशेषः) मनुष्यों को नियम में रखता है, और (यत् ) जो (हृत, प्रतिष्ठं हृदय में स्थित है. (अजिरम् ) जरा रहित है, (जविष्ठम् ) अतिशय गमनशील है (तत्)वह (मे) मेरा (मनः) मन (शिवसंकल्पम् ) शुद्धसंकल्पवाला (अस्तु) हो। भावा०-हे भगवन् !'जैसे उत्तम सारथि बलवान् घोड़ों को निग्रह करता हुआ अपने पथ में स्थिर रखतात् है, अथ विगवान् घोड़ो को रासों । . - ५ कर्मकाण्डचन्द्रिका द्वारा स्वाधीन रखता हुश्रा इधर उधर विचलित नहीं होने देता, इसी प्रकार मन मनुष्यों को नियम में रखता है, अर्थात् इन्द्रियरूप रासों को नियम में रखता हुश्रा मनुष्य को शुभमोर्ग पर चलाता है, जो हृदय में स्थित, जरावस्था से रहित, और जो अतिशय गमनशील है, वह मेरा मन वैदिकभावो में स्थिर शुभसंकल्प वाला हो॥ ३ २ स नः पवस्व शङ्गवेशंजनाय शमर्वते। शर्थ राजन्नोषधीभ्यः।। साम० उत्तराचिके प्रपा० १ मं०३। पदा०-( राजन् ) हे सर्वत्र प्रकाशमान परमात्मन् ! (सः) प्रसिद्ध आप (ना) हमारे (गवे) गौत्रादि दूध देने वाले पशुओं के लिये (शम् ) : सुखकारक हो, ( जनाय) मनुष्यमात्र के लिये (शम् ) शान्ति देने वाले हो, (अर्वते) घोड़े आदि सवारी के काम में आने वाले पशुओं के लिये (शम् ) सुखकारक हो, (औषधीभ्यः ) गेहूं श्रादि औषधियों के लिये हमें (शम्, पवस्व) शान्ति दीजिये। भावा०-हे सर्वव्यापक सर्वेश्वर परमात्मन् ! आप हमारे दूध देनेवाले गौ आदि पशुओं तथा घोड़े श्रादि वाहनों के लिये सुखकारक हों, अर्थात् हमारे सुख के साधन उक्त पशुओं की वृद्धि करते हुए हमें आनन्दित करें। गेहूं आदि हमारे खाद्य पदार्थ अधिकता से उत्पन्न हो, जो शुद्ध और नीरोग रखने वाले हो। हे भगवन् ! आप मनुष्यमात्र को शान्ति प्रदान करें जिस से हम आप के दिये हुए वैदिकज्ञान का सदा अनुष्ठान करते हुए अपने जीवन को उच्च बनावें। अभयं नः करत्यन्तरिक्षमभयं द्यावापृथिवी उभे इमे। अभयं पश्चादभयं पुरस्तादुत्तरोदधरोदभयं नो अस्तु ॥२७॥ ५ पदा०-हे भगवन् ! (अन्तरिक्षम् ) अन्तरिक्ष लोक (नः) हमारेलिये (अभयम् ) निर्भयता को (करति) करे, (उभे, इमे )ये दोनों (द्यावापृथिवी) विद्युत् और पृथिवी (अभयम् ) निर्भयता करे, (पश्चात् ) पीछे से (अभयम् ) भय न हो, (पुरस्तात् ) श्रागे से ( अभयम् ) भय न हो, (उत्तरात् , अधरात् ) ऊंचे और नीचे से (नः) हमको (अभयम्, श्रस्तु) भय न हो। भावा०-हे अभयप्रद परमात्मन् ! आप ऐसी कृपा करें कि धुलोक, अन्तरिक्षलोक तथा पृथ्वीलोक हमारेलिये भवरहित हो, और आगे पीछे तथा ऊपर, नीचे से हम निर्भय होकर आपके ज्ञान का अनुसन्धान करते हुए शान्ति- पूर्वक जीवन व्यतीत करें।
शान्तिभकरणम् अभयं मित्रादभयममित्रादभयं ज्ञातादभयं परोक्षात् । अभयं नक्तमभयं दिवानः सर्वानाशामम मित्रं भवन्तु॥२८॥ अथर्व कां०१8 सू०१५ मं० ५-६ पदा-हे जगत्पते ! हमें (मित्रात्) मित्र से (अभयम् ) भय न हो, (अमित्रात )-शत्रु से (अभयम् ) भय न हो, (शातात् ) जाने हुए पदार्थ से (अभयम् ) भय न हो, (परोक्षात्) न जाने हुए पदार्थ से (अभयम् ) भय न हो; (नः) हमें (नकम् ) रात्रि में (अभयम् ) भय न हो, (दिवा) दिन में (अभयम् ) भय न हो, (सर्वाः) सव (श्राशाः) दिशायें (मम, मित्र) मेरी मित्र (भवन्तु) हो।' भावा०-हे सर्वनियन्ता जगत्पते परमात्मन् ! आप ऐसी कृपा करें कि मित्र, उदासीन तथा शत्रु से हमें कभी भय न हो, ज्ञात तथा अज्ञात पदार्थ से भयरहित हो, दिन और रात्रि हमें अभयप्रद हो, और हे भगवन् ! आप की कृपा से दो दिशाये हमैं अभय देने वाली और शान्तिदायक हो।। इति शान्तिप्रकरणम् .
पुरुषसूक्त - अब परमात्मा के विराटस्वरूप का वर्णन करते हैं:- सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिथं सर्वतः स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥ १ ॥ यजु० ३११ हे परमात्मन् ! सम्पूर्ण संसारस्थ मनुष्यों के शिर श्रापही के श्राभ्यन्तर होने से आप सहन शिरों वाले कहलाते हैं, एवं आप सहस्राक्ष हैं अर्थात् सब प्राणियों के चक्षु आपकी सत्ता से ही निमेष, उन्मेष को प्राप्त होते हैं, श्राप सहस्रपात हैं अर्थात् लहन प्रकार से गतिशील हैं, श्राप सम्पूर्ण लोक लोकान्तरों को अपने स्वरूप धारण करते हुए सूक्ष्म और स्थूल संसार को एक देश में रखकर सर्वत्र च्यापक हैं, आप सवको पूर्ण करते हैं, इसलिये श्राप पूर्णपुरुष हैं, हे परमात्मन् ! आप अपने "विराटस्वरुप का ज्ञान हमको दीजिये ताकि हम आपके विराट्स्वरूप को जानकर ब्रह्मपद को प्राप्त हो । इस मंत्र में पुरुष और पुरुष के अङ्गों का रूपकालङ्कार बांधकर विराट स्वरूप का वर्णन किया गया है, इससे कोई पुरुषविशेष अभिप्रेत नहीं । पुरुष एवेदर्थ सर्वं यदभूतं यच्च भाव्यम्। उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥ २ ॥ हे परमात्मन् ! जो कुछ इस ब्रह्माण्ड में हुआ, होगा वा है, वह सब मापके पूर्णस्वरूप ले बाहर नहीं, इस संसार के सब जीव जो भौतिक पदार्थों के आधार पर अपने प्राणों को स्थिर करते हैं, उनको अमृत दान देने , पुरुषसूक्त ३७ वाले आप ही हैं, हे परमात्मन् ! आप अपने अमृतस्वरूप को शाम देकर हमको भी अमृत कीजिये। अविद्या आदि क्लेशो से जीव बारबार इस संसार में जन्मता और मरता है, आपके अमृतपद को प्राप्त होकर ही जीव अमर होसकता है अन्यथा नहीं, हे.परमात्मन् ! आप अपने अमृतपद से हमको मृत्यु के भयों से बचाइये, श्राप "अमृततत्व-मुक्तिपद के ईश्वर हैं, हम तुच्छ जीव अन्नादि पदार्थों से प्राण धारण करते हैं, आप हमको मुक्तिरूपफल प्रदान करके अमृतभाष को प्रास कीजिये, यह हमारी आपसे वारवार प्रार्थना है । एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्च पूरुषः । पादोस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥३॥ हे परमात्मन् ! यह जो कुछ चराचर ब्रह्माण्ड है अर्थात् कोटानकोटि सूर्य, चन्द्र, तारागण श्रादि लोकलोकान्तर हैं ये सब आपकी महिमा है, पर आप इस महिमा ले बहुत बड़े हैं, इस धुलोक में आपका अमृतस्वरूप सर्वत्र परिपूर्ण होरहा है और ये ब्रह्माण्ड उसके एक देश में हैं, जिसप्रकार इस विस्तृत आकाश में एक तृण एकदेशी होता है, इसी प्रकार आपके स्वरूप के एकदेश में कोरानकोटि ब्रह्माण्ड स्थिर हैं। तात्पर्य यह है कि प्रकृति तथा जीव यह दोनों ही परमात्मा के एकदेश में स्थिर हैं, जीवात्मा सूक्ष्मस्वरूप ले चेतनसत्ता से स्थिर है और प्रकृति सूक्ष्मरूप से जड़सत्ता से स्थिर है, यह दोनों परमात्मा के स्वरूप में अंशरूप हैं, इन अंशों को लेकर परमात्मा को अंशी भी कहा जाता है, इसी अभिप्राय ले जीव को परमात्मा का अंश कथन किया है, और इसी मंत्र के आधार पर गीता में श्रीकृष्णजी कथन करते हैं कि “ममैवांशो जीवलोके । जीवभूतः सनातन: अनादि जीव ईश्वर का अंश है। . 1 त्रिपादूर्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत् पुनः । ततो विष्वळ्यक्रामत्साशनानशने अभि ॥ ४ ॥ परमात्मा संसाररूपी तीनो पादों से ऊपर है, उसका पाद अमृत और संसार मरणधर्मा अर्थात् मरने जन्मने वाला है, सजीव तथा निर्जीव दोनों प्रकार के प्राकृत पदार्थ और तीसरा जीवात्मा ये तीनों पाद परमात्मा के एक- देश में स्थित हैं, परमात्मा उक्त मायिक भावों से रहित, सदा एकरस, नित्य, , - कर्मकाण्डचन्द्रिका शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वभाव है, इसलिये हे जिज्ञासु जनो! तुम उसके जानने की इच्छा करो और एकमान उसी की उपासना में प्रवृत्त रहो। इस वेद मंत्र के श्राशय को कृष्णजी ने गीता० १०४२ में यो वर्णन किया । है कि "विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगता-इस सम्पूर्ण संसार को परमात्मा ने अपने एक देश में स्तम्भन किया हुआ है, इसी का नाम सर्वात्मवाद है अर्थात् सोलहकला पूर्ण परमात्माउक्त तीनों पादोसे कहलाता है, क्योंकि पांच भूत, पांच प्राण, चतुष्टय अन्तःकरण, इच्छा और श्रद्धा इन सोलह कलाओं से सम्पूर्ण परमात्मा कहलाता है, कोई साकार वा मूर्तिमान होकर परमात्मा सोलहकला सम्पूर्ण नहीं होता किन्तु वह सदैव सोलह कला सम्पूर्ण रहता है, इसका वर्णन षोडश कला वाले पुरुष के निरूपण में "प्रश्नोपनिषद में भली भांति किया गया है और इसी के वर्णन में यजुर्वेद का यह मन्त्र है जिसमें वर्णन किया है कि यस्मान्नजातःपरो अन्योऽअस्ति याविवेशभुवनानिविश्वा। प्रजापतिःप्रजयासर्थराणस्त्रीणिज्योतीथषि सच तेस षोडशी। जिस परमात्मा के सदृश कोई अन्य नहीं वह परमात्मा सम्पूर्ण ब्रह्माण्डो में व्यापक है। उसीको सोलहला सम्पूर्ण कहते हैं। कृष्णजी ने इसी वेद मंत्र के आधार पर यह कहा है कि "एकांशेन स्थितो जगता-परमात्मा के एक अंश में सम्पूर्ण संसार स्थिर है। अब उक्त परमात्मा से वेदों की उत्पत्ति कथन करते हैं:- तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत. ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दाऽसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥ ६ ॥ उसी परमात्मा से ऋग, यजु, साम, अथर्व ये चारो वेद प्रकट हुए, यहां यक्ष नाम परमात्मा का है, क्योकि परमात्मा सव के पूजा योग्य है, इसलिये उसको "यज्ञ" कहा गया है,जो कई एक लोग यह कहते हैं कि "ऋग्वेद ही सब से प्रथम बना अन्य वेद ऋग्वेद के समय में न धेग उनको इस मंत्र से यह शिक्षा लेनी चाहिये कि यदि ऋग्वेद के समय में साम तथा यञ्जन पुरुषसूक्त थे तो ऋग्वेद में साम, यजु का नाम कैसे आया ? इस युक्ति से स्पष्ट सिद्ध है कि चार वेद एक ही काल में परमात्मा ने प्रकट किये भिन्न २ काल में नहीं। हे चेदानुयायी पुरुपो! जिस परमात्मा ने मनुष्यजन्म के फलचतुष्टय की सिद्धि अर्थात् धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के लिये चारो वेदों का प्रकाश किया है उस परमात्मा का सायं प्रातः सदैव स्मरण करना चाहिये। . तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः । गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माजाता अजावयः ॥ ७ ॥ उसी पूर्ण परमात्मा से गतिशील प्राणी तथा उसी परमात्मा से अन्य गौ आदि पशु उत्पन हुए अर्थात् जिस परमात्मा ने सर्वोत्तम वेदरूपी ज्ञान प्रदान किया है उसी ने इस संसार को भी उत्पन्न किया है, इसलिये उसकी श्राशा के विरुद्ध इस संसार में आचार व्यवहार करना उचित नहीं, या यों कहो कि उसकी आज्ञा का पालन करना ही अमृत पद की प्राप्ति और विरुद्ध चलना ही घोर दुःख को प्राप्त करना है ।। कई एक लोग इसमें यह आशंका करते हैं कि वेद में मनुष्यों की उत्पत्ति का कथन नहीं, उनको यह स्मरण रखना चाहिये कि"जज्ञिरेस्वधया दिवोनर ऋग० में मनुष्यों की उत्पत्ति स्पष्ट वर्णन की गई है, इसलिये यहां उनकी उत्पत्ति का वर्णन नहीं किया, अन्य युति यह है कि चौथे मंत्र में सामान्यरूप से प्राणीमात्र की उत्पत्ति कथन की है और यहां विशेषरूप से गौ आदि पूज्य पशुओं की उत्पत्ति इसलिये वर्णन की है कि इनके घृत दुग्धादि पदार्थ यज्ञ में विशेषरूप से उपयोगी हैं, इसलिये इनका यहां विशेषरूप से वर्णन किया है। अब यज्ञ करने का प्रकार कथन करते हैं:-' - तं यज्ञं बर्हिषि प्रौचन्पुरुषं जातमग्रतः । तेन देवा अयजन्त साध्याऋषयश्च ये ॥ ८॥ (देवाः ) जो विद्वान् पुरुष उस परमात्मदेव को जो सब से प्रथम सिद्ध अनादि अनन्त है, अपने हृदयरूपी (बर्हिषि) पालन पर स्थान देते हुए (अयजन्त ) ज्ञानरूपी यज्ञ करते और साध्यासाध्यसाधन सम्पन्नं योगी लोग १० कर्मकाण्डचन्दिका और वेदार्थवेत्ता ऋषि लोग उक्त ज्ञानयज्ञ द्वारा ही परमात्मा का उपासन करते हैं वह सफल मनोरथ होकर सुख का अनुभव करते और अन्ततः पर- मात्मा को प्राप्त होते हैं, इसीका नाम शास्त्र में ज्ञानयज्ञ है। इसी वेदमंत्र के आधार पर कृष्णजी गीता०४३३ में कथन करते हैं किः--- श्रेयान् द्रव्यमयाद्यज्ञाद ज्ञानयज्ञः परंतप । सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञानेपरिसमाप्यते ।। हे अर्जुन ! द्रव्यरूपी यज्ञसे ज्ञानयज्ञ श्रेष्ट है, हे पार्थ! सब कर्म नियम- पूर्वक ज्ञान में समाप्त होजाते हैं । यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् । मुखं किमस्यासीकिंवाहू किमूरूपादा उच्यते ॥६॥ " जो इस चराचर ब्रह्माण्ड के धारण करने वाला विराट् पुरुष है उसकी कल्पना किस प्रकार की जासकती है अर्थात् उसका मुख क्या है ? वाहू, ऊस तथा पाद क्या हैं ? इस मंत्र में उसके मूर्तिमान होने का प्रश्न किया गया है, या यों कहो कि जब वह मूर्तिमान् है तो उसके मुख, भुजा, जंघा तथा पैर कौन ले हैं ? इस प्रश्न का उत्तर इस आगेके मंत्र में इस प्रकार दिया है कि:- "ब्राह्मणोस्य मुखमासीदबाहू राजन्यः कृतः। ऊरूलदस्य यदैश्यः पद्भ्या २ शूद्रो अजायत ॥१०॥ ब्राह्मण इस विराट् पुरुष का मुख क्षत्रिय राजा लोग भुजाएं, वैश्य ऊस. और शूद्र पादस्थानीय हैं अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र चारो वर्णों को मिलाफर यह विराट पुरुप है, या यों कहो कि इन चारो यौँ से भिन्न उसकी और कोई मूर्ति नहीं। तात्पर्य यह है कि जिस देश में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रये चारो वर्ण मुखादि अवयचों के समान मिले रहते हैं उस देश और धर्म की रक्षा परमात्मा अवश्यमेव करते हैं, इस मंत्र में परमात्मा का यह उपदेश है कि हे मनुष्यो! तुम उक्त चार अंगों के समान एक दूसरे के रक्षक नबो,
पुरुपसूक्त
४१.
जिसमकार मुख का काम ज्ञानेन्द्रियों छारा सम्पूर्ण शरीर की रक्षा करना,
भुजाओं का काम बलद्वारा अपने श्रापको बचाना तथा दुष्टों का निग्रह करना
है एवं ऊरूजांधों का काम अपने वल से देशदेशान्तरों में जाकर धनरूप बल
को उपार्जन करना है और शद्रों का काम पैरों के समान तीनों वर्गों को सेवा-
धर्म से सहारा देना है, इस प्रकार चारो वर्ण परस्पर सहायक बने, इस रूपक
से परमात्मा ने चारोवणों का वर्णन किया है, या यों कहो कि इस विराट पुरुष
के मुख श्रादि सामों से वों की.उत्पत्ति का रूपक बांधा है, इस विषय का
आगे के मंत्र में इस प्रकार वर्णन किया है कि-
चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षाः सूर्यो अजायत ।
श्रोत्रादायुश्च प्राणश्व मुखादग्निरजायत ॥११॥
परमात्मा के (मनसः) शानेन्द्रिय प्रधान सामर्थ्य से (चन्द्रमा) आल्हा-
दक पदार्थ उत्पन्न हुए (वक्षोः) अभिव्यक करने वाले सामर्थ्य से सूर्य
(श्रोगात् ) आकाशरूप सामर्थ्य सें वायु और प्राण उत्पन्न हुए और मुख.
अग्निःउत्पन्न हुई।
इस मंत्र से परमात्मा के प्रकृतिरूप सामर्थ्य को कारण बताकर उसके
सस्वादि गुणों से चन्द्रमा, सूर्य आदि पाल्हादक पदार्थों की उत्पत्ति कथन की
है, इसका यह भी तात्पर्य है कि उसके मुखादि अवयव कल्पित हैं वास्त-
विक नहीं, यदि वास्तविक होते तो मुख से अग्नि की उत्पत्ति के अर्थ यह
होते कि ब्राह्मण से अग्नि उत्पश हुई, क्योकि पूर्व मंत्र में ब्राह्मण को मुख
कथन किया है।
तात्पर्य यह है कि परमात्मा ने इस चराचर ब्रह्माण्ड को उत्पन्न किया
और उसके स्वरूप में भौतिक सय वस्तुओं का कारण प्रकृतिरूप सामर्थ्य है
उसी से सब पदार्थ उत्पन्न होते हैं, इसमें परमात्मा ने विराट् पुरुष के ज्ञान
के लिये शानयक्ष का उपदेश किया है कि हे जिज्ञासु पुरुषो ! तुम सूर्य,
चन्द्रमा, वायु, आकाशादि सब बृहत् वस्तुओं को बृहस्पति परमात्मा की
विभूति समझो।
-
अब उस विभूति को प्रकारान्तर से वर्णन करते हैं:-
नाभ्या आसीदन्तरिक्षथं शीष्णोंद्यौः समवर्तत ।
पद्भ्यांभूमिर्दिशःश्रोत्रात्तथालोको अकल्पयन् ॥१२॥
४२ कर्मकाण्डचन्द्रिका (नाभ्याः) उसके बन्धनरूप सामर्थ्य से अन्तरिक्षलोक उत्पन्न हुना, शिर से देवलोक, पैरों से भूमि और श्रोत्र से दिशाओं तथा लोक लोकान्तरों की कल्पना कीगई। परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यो ! तुम यह समझो कि अन्तरिक्ष लोक जिसमें सूर्य, चन्द्र श्रादि ग्रह, उपग्रह विद्यमान हैं यह अन्तरिक्ष : लोक परमात्मा के प्रांकर्षणरूप सामर्थ्य से उत्पन्न हुआ है, इसलिये यह लोक लोकान्तरों को आकर्षित करता है, एवं शिररूप सामर्थ्य से धुलोक, इसीप्रकार भूमि आदि लोकों की उत्पत्ति हुई, यहां भी रूपकालङ्कार द्वारा सब प्राकृत पदार्थों का अङ्गप्रत्यङ्गरूप से वर्णन किया है। अब उक्त ज्ञानयज्ञ की सामग्री वर्णन करते हैं:- यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत । वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः ॥१३॥ जव विद्वान् पुरुष ज्ञानयज्ञ करते हैं तो पुरुष =परमात्मा को हवि कल्पना करते, वसन्त ऋतु को आज्यम् =घी, एवं ग्रीष्मऋतु का इन्धन स्थानीय कल्पना करके वर्ष को यज्ञमण्डप बनाकर ज्ञानयज्ञ करते हैं। भाव यह है कि काल को यज्ञ का मण्डप तथा वसन्तादि ऋतुत्रों को यज्ञ के साधन की सामग्री बनाकर और पुरुष परमात्मा को विषय रखकर ज्ञानी लोग यज्ञ करते हैं, इसी का नाम ज्ञानयज्ञ है । . सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्तसमिधः कृताः । देवा यद्यज्ञं तन्वाना अवघ्नन्पुरुषं पशुम् ॥१४॥ इस यज्ञ के गायच्यादि सात छन्द सूत्र के समान हैं और महत्तत्व से . लेकर विशति प्रकृति के विकार, महत्तत्व १, अहङ्कार २,५. सूक्ष्म भूत, ५ स्थूल भूत-१२, पांच ज्ञानेन्द्रिय १७ और विकृतावस्थापन सत्व, रज, तम ये तीनों प्रकृति के गुण और एक इन सबका कारण प्रकृति यह सब मिलकर इक्कीस हुए, जो इस ज्ञानयक्ष की समिध हैं, इस यज्ञ में (देवाः ) विद्वान् लोग (पुरुष). परमात्मा पुरुष को (अवनन् ) ज्ञान का विषय बनाते हैं।
पुरुषसूक्त. ४६ इसका नाम पुरुषयज्ञ है अर्थात् परमात्माकपी पुरुष जो सम्पुर्ण लोकलोकान्तरों का अधिष्ठान है उसको द्रष्टव्य बनाकर इस यज्ञ में एकमात्र पूर्णपुरुष की उपासना कीजाती है, यहां द्रष्टव्य के अर्थ आखों से देखने के नहीं किन्तु ज्ञानदृष्टि से देखने के हैं, जैसाकि "एकवानुद्रष्टव्यमेत- दममेयं ध्रुवम्॥ वृहदा० ४।२० "मनसैवानुद्रष्टव्यंनेइनानास्तिकिञ्चना कठ०४।११ इत्यादि वाक्यों में परमात्मा को ज्ञानगोचर करना वर्णन किया है। कई एक लोग इसके यह अर्थ करते हैं कि इस यज्ञ में परमात्मा को पशुरूप फल्पना करके (अवधन ) बध किया जाता है, इस अर्थ में असंगति यह है कि विराट् पुरुष का वध क्या? और उसको कौन बध करसकता है ? और जब घध न हुआ तो पशु के साथ रूपकालङ्कार कैसे ? क्योंकि पशु के साथ परमात्मा का हननादि क्रियाओं में कोई सादृश्य नहीं पाया जाता, इसलिये पशु के अर्थ यहां द्रष्टव्य.के हैं किसी पशुविशेष के नहीं ॥ ? अब इस यज्ञरूपी पुरुष को सम्पूर्ण धर्मों का आधार कथन करते हैं:- यज्ञेन यज्ञमयजन्तदेवास्तानिधर्माणिप्रथमान्यासन्। तेहनाकं महिमानसचन्तयत्रपूर्वेसाध्याःसन्तिदेवाः ।। १५ ।। यझेन-ज्ञानरूपी यज्ञ से, यज्ञ-परमात्मा की उपासना करना विद्वान् पुरुष मुण्यधर्म मानते हैं, अनुष्ठानी विद्वान् लोग इसी धर्म का सेवन करते और इसी से सर्वोपरि सुख को लाभ करते हैं, पूर्वकाल के योगी लोग इसी का सेवन करते थे। इस मंत्र में परमात्मा ने प्राचीन और नवीन विद्वानों का दृष्टान्त देकर इस बात को स्पष्ट किया है कि सब से मुख्य धर्म ज्ञानयज्ञ है, जो पुरुष शान- यश नहीं करते वह धर्म के मर्म को नहीं जानसकते। हे जिज्ञासु जनो! तुम्हें चाहिये कि तुम ज्ञानयज्ञ के याजक बनकर धार्मिक बनो, पुरुषसूक्त में परमात्मा ने धार्मिक बनने का विस्तृत उपदेश किया है और इस उपदेश में इस बात को स्पष्ट किया है कि तुम सर्वव्यापक पूर्ण पुरुष को ध्यान का .विषय बनाकर पुरुषयज्ञ करो, इसी का नाम ब्रह्मयज्ञ, नयश वा ब्रह्मोपासना है। -- - - . कर्मकाण्डचन्द्रिका जो लोग इन मंत्रों से पशुयज्ञ का प्रतिनिधि नरमेधयज्ञ निकालते है यह अत्यन्त भूल करते हैं, क्योकि इस सूक्त में पशुयज्ञ का कहीं नाम तक नहीं पाया जाता और इस सूक्त में ब्रह्मविधा का विस्तारपूर्वक -वर्णन है "सहस्त्र- शीर्षा पुरुषयह वाक्य सर्वशक्तिमान परमात्मा का वर्णन करता है, जिस प्रकार "सहस्रशृङ्गोषभः यः समुद्रादुदाचरत्। ऋग्० ७५६७ यह मंत्र सूर्य को अनन्त किरणों वाला वर्णन करता है, सिर के अर्थ उक्त वाक्य में अज के नहीं किन्तु ब्रह्माश्रित शक्ति के हैं, इसी प्रकार "सहस्रशीपइसके अर्थ भी . ब्राझ की अनन्त शक्तियों के हैं किसी अङ्गविशेष के नहीं। अधिक क्या, इस सूक्त को किसी ने अङ्गप्रत्यङ्ग के वर्णन में लगाया है, किसी ने नरमेध में लगाया और कई एक लोगों ने बहुत नवीन समय में आकर इसका अर्घ्य और आचमनीय जड़ वस्तुओं में विनियोग किया है, वास्तव में इस सूक्त का विनियोग परमात्मा के महत्व वर्णन में है, जैसा कि "एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्च पूरूपः यजु० ३१६३ इत्यादि मंत्रों में पूर्व वर्णन कर आये हैं। यह बात सर्वसम्मत है कि पुरुषसूक्तादि सूक्त वेद के महत्व को वर्णन करते हैं, इन सूक्तो के पढ़ने से बड़े से बड़ा प्रतिपक्षी भी वेदों के महत्व के आगे शिर झुका देता है, और यह कहता है कि जिस वेद में इस प्रकार दार्थ- निक भावों का वर्णन है उसको प्राकृत लोगों की पुस्तक अर्थात् अवोध लोगों की पुस्तक कौन कहसकता है। दुराग्रह के वशीभूत होकर कई एक लोग पुरुषसूक्त पर यह प्रश्न करते हैं कि इस सूक्त में जो ब्राह्मण आदि वों का वर्णन है, इससे प्रतीत होता है कि यह लक्त पीछे से मिलाया गया है ? ॥ इसका हम इतना ही उत्तर देते हैं कि यह सूक्त चारो वेदों में पाया जाता है, यदि कोई मिलाता तो एक में था दो मैं मिलातो सब में कैसे ॥ अन्य युक्ति यह है कि इस सूक्त की संस्कृत की बनावट वैदिक समय को पाई जाती है, इसलिये इसके मिले हुए होने का कोई नाम भी नहीं ले सकता, यदि कोई यही कहे कि ब्राह्मणादि वर्णों का वर्णन मन्वादिस्मृतिप्रति. पाच ही है अतएव मिला हुआ प्रतीत होता है ? उसका उत्तर यह है कि स्मृतियों के समय से पूर्व वेद के कई एक स्थलों में ब्राह्मणादि वर्गों का वर्णन स्पष्ट पाया जाता है। अधिक विस्तार से क्या "न मृत्युरासीदमृतंनतहि ऋग०१०।१२६२ इत्यादि सूक्ष्म विषयों का वर्णन जिन सूकों में पाया जाता है उन सूक्तों . 4
४५
-
पुरुषसूक्त
के साथ पुरुषसूक्त का मिलान है अर्थात् इस सूक्त में भी सक्ष्म भावों
का वर्णन है।
जो लोग वेदों को जंगली समय के मनुष्यों की कृति कहा करते हैं
अथवा बहुत से दिव्यशक्तिवाले देवों की कृति कहा करते हैं, 'उनको इन सूक्कों
से शिक्षा लेनी चाहिये कि जब इन सूक्तों में ऐसे साहित्य का वर्णन है जो
मनुष्य की शक्ति से सर्वथा बाहर है तो फिर वेदों के मनुष्यक्त होने की शङ्का
ही कैसे हो सकती है, और तो क्या सायण आदि भाष्यकार जो प्रायः वेदों
को देवतापरक बतलाते हैं वे भी इन सूक्तों में आकर इनका देवता परमात्मा
वर्णन करते और मुक्तकण्ठ से कहते हैं. कि "नासदासीनो सदासीन"
ऋग् १० १२४ा आदिसृष्टि में प्रकृति को अवस्था ऐसी थी कि न उसे सत्
कहा जाता था और न असत् कहा जाता था. इस साइंस का वर्णन परमात्मा से
भिन्न अन्य कोई नहीं कर सकता, यह कहकर उन्हों ने भी परमात्मा को ही वेद
की रचना करने वाला कथन किया है।
सच भी यही प्रतीत होता है कि अव आज कल भी प्रकृति के निरूपण
में लोग असमर्थ हैं जय कि साइन्स, फिलासफी और दार्शनिक विद्याओं का
प्रबल प्रवाह यह रहा है तो कौन कहसकता है कि श्रादिसृष्टि में अशिक्षित
लोगों ने ऐसे सूक्तो को रख लिया, इस तर्क से यही सिद्ध होता है कि आदि
सृष्टि में परमात्मा ने ही वेदरूपी ब्रह्मविद्या को स्वयं अपने आप प्रकट
किया, श्रस्तु-
अष वेद के महत्व निरूपण में सूक्त के अर्थ करते हैं:-
नासदासीनो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परोयत्।
किमावरीवः कुहु कस्य शर्मन्नभःकिमासीद्गहनं गभीरम् ॥१॥
प्रलयकाल में प्रकृति सत्-कार्यरूप में न थी और न उस समय
अत्यन्त असत् थी अर्थात् अपनी कारणावस्था में विद्यमान थी, उस समय
प्रकृति ( रजः) रजोगुण के भाव में न थी और नाही शून्य के समान
तीनो गुणों से रहित थी किन्तु एक ऐसी अवस्था में थी जिसकोन किसी वस्तु
के ढकने वाली कहा जाता था और न जलरूप कहा जाता था किन्तु कारण-
रूप एक सूक्ष्मावस्था में थी । .
नमत्युरासीदमृतं न तर्हि नं रात्र्या अह्नः आसीत्लकेतः ।
श्रानीदवात स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्नपरः किंचनास ॥२॥
कर्मकाण्डचन्द्रिका न उस समय मृत्यु थी और न कोई अमर कहा जाता था और न दिन रात के चिन्ह रूपसूर्य चन्द्रमा थे, उस समय एक निश्चेष्ट स्वधा धारण करने वाली शक्ति के साथ अद्वितीय ब्रह्म था, उससे भिन्न अन्य कुछ भी न था । तम प्रासीत्तमसागढ़मग्रे प्रकेतं सलिलं सर्वमा इदं । तुच्छेनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतकम् ।।३।। उस प्रलयावस्था में सब कुछ अन्धकार से ढका हुआ धा, और सब कुछ परमात्मा के सामर्थ्य में विद्यमान था। कामस्तदग्रे समवर्त्तताधिमनसोरेतः प्रथमं यदासीत् । सतो वन्धुमसति निरविंदन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा ॥४॥ जव परमात्मा की इच्छा लुष्टि रचने की हुई तो उसने अपनी प्रकृति रूपी सामर्थ्य से इस चराचरे ब्रह्माण्ड को रचा और सव से प्रथम मनीपा- महत्तत्व ( प्रकृति के प्रथम विकार ) को उत्पन्न किया, तदन्तर उससे सर्वत्र फैलनेवाली रश्मिरूप प्रकृति की कार्य्यावस्था को उत्पन्न किया. तद. नन्तर स्थूल भूतों के सूक्ष्मकारण-शब्द, स्पर्श, रुप, रस, गन्ध इन पांच तन्मात्री को रचा, जिस परमात्मा की रचना इस प्रकार गूढ़ है उसकी कृति को कौन जानसकता है, इस भाव को नीचे के मंत्र में निरुपण करते हैं:- को अद्धा वेद क इहप्रवोचत्कुत श्राजाता कुत इयं विसृष्टिः । अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यत आबभूव ।।५।। निश्चयपूर्वक कौन कह सकता है कि जिस प्रकृति से यह ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ है उसका वास्तविक रुप क्या है क्योंकि ऋषि मुनि जितने विद्वान् हुए हैं वे सब इस सृष्टि की रचना के अनन्तर ही हुए हैं, इसलिये ये सब इसकी रचना के वर्णन में मूक हैं। इयं विसृष्टियंत आवभूव यदि वा दधे यदि वा न । यो अस्याध्यक्षः परमेव्योमन्सो अङ्गवेद यदि वा न वेद ॥६॥ यह सृष्टि जिसप्रकार उत्पन्न हुई और जिस प्रकार स्थिर है तथा जिस प्रकार प्रलय को प्राप्त होगी, इसके तत्व को ईश्वर से भिन्न अन्य कोई नहीं जानता इसी अभिप्राय से उपनिषत्कर्ता ऋषियों ने कहा है कि "यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तदि- जिज्ञासख तद्ब्रह्मा तैत्ति० ३१- जिससे इस सृष्टि की उत्पचि, स्थिति और - ४७ पुरुषसूक्त प्रलय होती है वह ब्रह्म है, इस प्रकार ब्रह्म का निरूपण जो उपनिषदों में पाया जाता है तथा "जन्माद्यस्य यतः व्र० स० १।१।२ में जिस ब्रह्मविद्या का निरूपण किया है वह सब वेदों में पाई जाती है, इसलिये ब्रह्मविद्या का सर्वोपरि भाण्डार वेद ही है, कोई अन्य पुस्तक नहीं । वेदों में शङ्का होने का कारण यह हुआ कि हिरण्यगर्भादि सूक्को के अर्थ कई एक लोगों ने बिगाड़ कर लिख दिये हैं कि 'वेद उस समय का वर्णन करता है जिस समय (हिरण्य ) सुवर्णधातु. लोगों को ज्ञात हुई, यह अर्थ सर्वथा मिथ्या है, क्योंकि हिरण्यगर्भ के अर्थ-जिसके गर्भ में सूर्य, चन्द्रमा आदि सब । पदार्थ विद्यमान हैं उसको "हिरण्यगर्भ" कहते हैं, हिरण्य नाम सूर्य, चन्द्रमा आदि पदार्थों का है अथवा हिरण्य नाम प्रकृति का है अर्थात् प्रकृति के ये चरा. : चर कार्या कोटानकोटि ब्रह्माण्ड जिसके भीतर हो उसको "हिरण्यगर्भ" कहते हैं, इस प्रकार यह सूक्तब्रह्मविद्या का निरूपण करता है किसीप्राकृतभावका नहीं। -- विष्णुसूक्त परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति । उभे ते विझ रजसी पृथिव्याविष्णो देव त्वं परमस्य वित्से ।। भग: ७६ विष्णो देव हे सर्वव्यापक दिन्यस्वरूप परमात्मन् ! श्राप सूक्ष्म से सूदम ". परब्रह्म के स्वरूप को धारण किये हुए हैं, तुम्हारे वास्तविक स्वरूप को काई ठीक २ नहीं जान सकता. तुम्ही पृथिवीलोक तथा द्युलोक श्रादि सव भुवनों के स्वामी हो, आप से भिन्न इस संसार को एकदेशी बनाकर स्थिर होने वाला कोई पदार्थ नहीं, केवल आपही सर्वोपरि विष्णु-व्यापक स्वरूप ब्रह्म है । इस मंत्र में परमात्मा ने यह उपदेश किया है कि हे जिज्ञासु जनो! तुम लोग उस परमपुरुष की उपासना तथा प्रार्थना करो जो एकमात्र सबका प्राधार, सबका नियन्ता, सवको नियम में रखने वाला, और जो सबका पालक, पोषक तथा रक्षक है। न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमंतमाप । उदस्तम्ना नाकमृष्यं वृहतं दार्थ प्राची ककुभं पृथिव्या ॥२॥ विष्णो = हे व्यापक परमात्मन् ! महिन्न = तुम्हारे महत्व को कोई भी नहीं पासकता, न कोई ऐसो शक्ति उत्पन्न हुई, नहै, औरन होगी जो तुन्हारेमहत्व को पोसके, मापने अपनी शक्ति से लोकलोकान्तरों कोधारण किया हुश्रा है अर्थात् कोटानकोटि ब्रह्माण्ड आपकी आकर्षणशक्ति से भ्रमण करते और 'विकर्षणशक्ति से प्रलय को प्राप्त होते हैं, तुम सजातीय, विजातीय, स्वगतभेद शून्य हो, और नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव हो । इस मंत्र में परमात्मा ने अपनी विभूति का महत्व दर्शाया है, आस्तिक लोग इस विभूति के महत्व को देखकर परमात्मा के महत्व के आगे सिर झुकावे. हैं, और नास्तिक लोग अपने अज्ञान के कारण इस महत्व का दर्शन नहीं कर सकते, भतएव अनेक प्रकार की वेदनातथा दुःखों को प्राप्त होकर मनुष्य जीवन व्यर्य व्यतीत करते हैं।
4 विष्णुमुक्त ४६ इदं विष्णुविचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूढमस्य पांसुरे ॥ ऋग्० १।२०१७ विष्णु व्यापक परमात्मा ने इस जगत् को पृथिवी, अन्तरिक्ष और प्रकाश- मय सूर्यमण्डल, इन तीन प्रकार से रचा है, इन तीनों प्रकारों में सब चराचर ब्रह्माण्ड श्राजाते हैं और उस ज्योतिखरूप परमात्मा ने अपने विष्णुपद को उक्त तीनों पदों में भलीभांति दर्शाया है परन्तु अज्ञानतिमिरान्ध लोग उसकी महिमा को नहीं देनते किन्तु विपयवासनासरित में बहकर अनर्थरूप सागर में जा गिरते हैं, इसी अभिप्राय से परमात्मा ने कहा है कि "समूढमस्य पांसुरेश रजोमय धूलि में यह पद गूढ़ है अर्थात् जिस प्रकार धूलि में मिली हुई वस्तु को कोई पुरुष ढूंढ नहीं सकता एवं परमात्मा का परमपद भी इस मायामय- धूलि में मिला हुआ है, इसलिये बिना साधनसम्पत्ति के कोई पुरुप इस विष्णु- पद को नहीं पासकता अर्थात् प्रकृति के तीनों गुण पुरुष को त्रिगुण रज्जु के समान-तिगुनी करके घटीहुई दृढ़ रस्सी के समान बांधते हैं और इन तीनों गुणों से बंधे हुए पुरुप ईश्वरीय राज्य की स्वतंत्रता को अनुभव नहीं कर- सकते किन्तु दिन रात इसी रज्जु से बंधे हुए प्रकृतिरूप खंटे चहुं ओर घूमते रहते हैं, ईश्वरदत्त स्वतन्त्रता को कदापि लाभ नहीं करसकते ॥ इस विषय में किसी विरक्तपुरुष की यह उक्ति है कि:- पशवोऽपि पलायन्ते बन्धनान्मोचितो भुवि । बन्धनं किं मनुष्यस्य यस्मान्नैष पलायते ॥ पशु भी खूटे से बोल देने से भाग जाते हैं पर पुरुष अपने मनोरथ रूप खूटे से बंधा हुआ नहीं भोगसकता, या यों कहो कि रजोगुण से बंधा हुआ पुरुष स्वतन्त्रता का लाभ नहीं करसकता ॥ इसी अभिप्राय से श्रीकृष्णजी ने गीता में कहा है कि "मम माया दुर- त्यया- ईश्वर की माया का अतिक्रमण करना अतिकठिन है, इसी माया के वशीभूत होकर पुरुप विष्णुपद को भूल जाते हैं। "समूढमस्य पांसुरे" के यह भी अर्थ है कि अन्तरिक्षस्थ रेणुओं में कोटानकोटि ब्रह्माण्ड छिपे हुए हैं जिनको यथावत् जान लेना मनुष्य की शक्ति से सर्वथा बाहर है, इसलिये मनुष्य को चाहिये कि परमात्मपरायण होकर उसके महत्व का चिन्तन करे । इसी अभिप्राय से "उत्तिष्ठताव पश्यतेन्द्रस्य भागम् ऋग०१०।१८०३ .
कर्मकाण्डचन्द्रिका इत्यादि मंत्रों में यह कथन किया है कि हे जिज्ञासु जनों ! तुम उठो, और पर मात्मा के ऐश्वर्य को देखो, परमात्मा बार चार मनुष्य को योधन करते ताकि मनुप्य परमात्मपरायण होकर कल्याण को प्राप्त हों, इसी भाव को कठ० ३३१४ में इस प्रकार वर्णन किया है कि:- उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत । तुरस्य धारी निशिता दुरत्यया दुर्ग प्रथस्तत् कवयो वदन्ति ।। मुमुक्षु मनो! उठो जागो और अपने श्रेष्ठ उपदेशकों को प्राप्त होकर तत्वज्ञान को प्राप्त होगी, क्योंकि जिस संसार में तुमने चलना है वह बड़ा दुर्गम है, फिर कैसा है, छुरे की धार के समान अति तीक्ष्ण है ।। यह श्राशय उपनिषद्वत्ता ऋषि ने उक्त मंत्र से लिया है, इससे स्पष्ट सिद्ध है कि झानकाण्डोपनिप, वेदों से लिये गये हैं, किसी अन्य स्थान से नहीं 11. अव धर्म को धारण करने का उपदेश करते हैं:---- त्रीणि पदा विचक्रमे विष्णुर्गोपी अदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन् ॥ गु० १ । २२ । १८ विष्णु-जो सम्पूर्ण संसार में व्यापक, सवका रक्षक, जीवों के कर्मों को -मरण करने वाला और जो सबको स्वकर्मानुसार फल देनेवाला है उस पर मात्मा ने तीन प्रकार से इस सृष्टि को रचा, जैसाकि पूर्व वर्णन कर आये हैं। इसके दूसरे अर्थ यह भी होते हैं कि भूत, भविष्यत् , वर्तमान । उत्तम, , मध्यम, मन्द । कार्य, सूक्ष्म और स्थूल ये तीनों शरीर । जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तथा भूः, भुवः और स्वः इत्यादि तीन २ वस्तुओं को परमात्मा में ही निर्माण करके इन धर्मों को धारण किया है अर्थात्.परमात्मा की रचना से भूत, भविष्यत् और वर्तमान इन तीनों बालों का व्यवहार हुश्रा, उसी ने जाग्रत्, और सुषुप्ति को रचा, और जब प्रलय होता है तो सुषुप्ति और सृष्टि समय जाग्रत् । भी उनीसे होते हैं, इस भाव को मनु ने वर्णन किया है, कि- यदा स देवो जागर्ति तदेदं चेष्टते जगत् । यदा स्वपिति शान्तात्मा तदा सर्व निमीलिति ॥ मनु०१६ ४३ अर्थ-जव वह देवं जागता है तव यह जगत् चेष्टा करता और जब घई ग्रान्तकप परमामा लाता है तब सत्र जगत् चेष्टारहित होता है; अधिक क्या रखत .
विष्णुसूक्त जाग्रत् तथा सुपुति आदि अनेकविध धर्मों के धारण करने से परमात्मा को सव.धर्मों का अधिकरण कथन किया गया है । विष्णोः कार्माणि पश्यत यतो ब्रतानि पस्पशे । इन्द्रस्य युज्यः सखो ॥ ऋग्० १॥२२ । १६ हे पुरुपो ! तुम विष्णोः व्यापक परमात्मा के कर्माणि कार्यों को पश्यत-देखो जिनके देखने से तुम में व्रतधारण को शक्ति उत्पन्न होगी, क्योंकि घही व्यापक परमात्मा ऐश्वर्य का योग्य सखा अर्थात् ऐश्वयं देने वाला है । भाव यह है कि जो पुरुष परमात्मा की दृष्टि में किसी व्रत को धारण करते हैं वही ऐश्वर्यसम्पन्न होते हैं अन्य नहीं, जो ब्रह्मचर्य व्रत को धारण करते हैं वह वीर्यलाभ तथा विद्यारूपी वल को प्राप्त होते हैं, जो तपरूप बत धारण करते हैं वह तपस्वी और तेजस्वी बनते हैं, एवं अनन्त प्रकार के प्रत हैं जिनके धारण करने का विधान परमात्मा ने उक्त मंत्र से किया है। मति अब परमात्मा के स्वरूपज्ञान का वर्णन करते हैं:- तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः दिवीव चक्षुराततम्।ऋग्० १ । २२।२० उस व्यापक परमात्मा के स्वरूप को विद्वान् लोग देखते हैं, जिसकारगर निर्मल आकाश में व्याप्त हुआ चक्षु सम्पूर्ण वस्तुओं को विषय करता है इसीप्रकार अपने विद्यारूपी चतुनो से विद्वान् लोग उसके स्वरूप का साक्षात्कार करते हैं। तदिप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते । विष्णोर्यत्परमं पदम् ॥ ऋग्० १ । २२ ॥ २१ वुद्धिमान लोग जो परमात्मा के विषय में जागते हैं अर्थात उसकी आशा पालन करते हैं वह परमात्मा के परमपद को प्रकाशित पदार्थ के समान प्रकाश करते हैं अर्थात् जिन्होंने विद्यारूपी प्रकाश से अशानरूपी अन्धकार को निवृत्त किया है वही परमात्मा के स्वरूप का साक्षात्कार करते हुए अन्य लोगों के लिये उसका उपदेश करते हैं । इरावती धेनुमती हि भूतं सूर्यवसिनी मनुषे दशस्या । व्यस्तभ्ना रोदसी विष्णवेते दाधर्थ पृथिवीमभितोमयूखैः॥ . ऋग०७।६।३ ५२ कर्मकाण्डचन्द्रिका हे परमात्मन् ! आपने नानाविध रत्नों के देने वाली पृथिवी को मनुष्यों के लिये उत्पन्न करके अपने ऐश्वर्य की ज्योतियों द्वारा इस ब्रह्माण्ड को नाना प्रकार से विभूषित किया पुश्रा है, हे भगवान् । अाप अपनी प्रकाशित ज्योतियों से हमारे हृदय रूपी बन्दिर के तिमिर को नाश करके हमारे लिये लोक तथा परलोक के ऐश्वयों को प्रदान करें ।। अब परमात्मप्राप्ति का वर्णन करते हैं:- त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्द्धनम् । - उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीयमाऽमृतात् ॥ ऋग्०७1481 १२. हम लोग उस सर्वशक्तिमत् परब्रह्मा की उपासना करें जो त्र्यम्यक- इस. संसार की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय का करने वाला सुगन्धि- जिसका यश सुगन्ध के समान सर्वत्र फैला हुआ है, जो पुष्टिवर्धनं इस संसार में प्रत्येक पदार्थ को पुष्ट करनेवाला और जिसके तत्वशान ले पुरुष इस संसाररूप स्नेहलता से उर्वारुक-फल के समान पृथक् होजाता हैं. अर्थात् जिसप्रकार खर्बजा पककर अपनी बेल. से स्वयं अलग होजाता है एवं भगवत् कृपा से ज्ञानी लोग इस संसाररुप स्नेहवल्ली ले पृथक् होजाते हैं, इस अवस्था में न उनको कोई कष्ट होता और नाही उनके बन्धन के हेतु: रूप सम्बन्धियों को कोई वेदना होती है, इसी का नाम मृत्यु को जीतना था अमृतभाव और इसी का नाम जीवन्मुक्ति है ॥ इस मंत्र के अर्थ यह भी हैं कि हे जगदीश्वर! मोऽमृतात्-हमको अमृत- भाव से कदापि बिरक्त न करें किन्तु हम लदैव अमृतभाव के जिज्ञासु बने रहे। परमात्मा ने उक्त मंत्र में मुक्ति और वैराग्य का उपदेश किया है कि मुक्त पुरुप सदाचार ले सौवर्ष पर्यन्त, जीवन धारण करते हुए बिना किसी कष्ट से खचूंजे के समान परिपक्क अवस्था को प्राप्त होकर इस संसार को छोड़े और अपरिपक-अवस्था अर्थात् अकालमृत्यु को कदापि प्राप्त न हो। इस मन्त्र में परमात्मा ने अकालमृत्यु के जीतने का उपदेश किया है कि जो लोग अमृतपद को समझकर अपने अमृतभाव को नहीं त्यागते उनकी अकालमृत्यु कदापि नहीं होती। "व्यम्कंग के अर्थ कई टीकाकारों ने भिन्न प्रकार से किये हैं. कित्ती ने तीन नेत्रों चाले रुद्र के किये है, किसी ने ब्रह्मा, विष्णु, शिव इन तीन देवी के उत्पन्न करनेवाले देव.के किये हैं, किसी ने उस्पति, स्थिति, प्रलय इन तीनो %D अमृतात्हमें विष्णुसूक्तः । ५३ भावों के कर्ता परब्रह्म के किये हैं, वास्तव में व्यम्बक के अर्थ तीन प्रकार की शक्तिवाले परब्रह्म के ही हैं, क्योंकि "तिस्त्रः अम्बा यस्य स त्र्यम्बका निसकी तीन शक्ति हो उसको त्रयम्बका फहते हैं । इस मन्त्र का मुक्त पुरुष की प्रार्थना में विनियोग है किसी अन्य कर्म में नहीं किन्तु व्यापक ब्रह्म की उपासना में इस मन्त्र को विनियुक्त करना चाहिये, या यों कहो कि भूः, भुवः स्वः इन तीनो लोकों के निर्माता का नाम यहां 'व्यम्बका है। फई एक लोग यहां यह आशंका करते हैं कि "मा अमृतः मुक्ति से पृथक् मत कर, इससे पाया जाता है कि परमात्मा मुक्त पुरुपों का भी स्वामी है, इसलिये यह कथन कियागया है कि तू मुक्ति अवस्था से हमें मत लौटा, इसका उत्तर यह है कि जब परमात्मा सर्वस्वामी है तो सुक्तपुरुष उसके ऐश्वर्य से थाहर नहीं, इसलिये मुक्त पुरुष का ऐश्वर्य सीमावद्ध अन्तवाला है। कई एक टीकाकार इसके यह भी अर्थ करते हैं कि "अमृत अर्थ यहां स्वर्ग के हैं इसलिये स्वर्गसुख भोगने और सुंत्यु से रहित होने की उक्त मंत्र में प्रार्थना है, और कोई इसके यह भी अर्थ करते हैं कि "श्रा अमृतात्" = अमृत की अवस्था तक हमको परमात्मा मोक्ष सुख से वियुक्त न करें, यहां "रामर्यादा के अर्थों में हैं अर्थात् मुक्ति की सीमा पर्यन्त परमात्मा हमको अमृत मुस्न का भागी बनाये, पश्चात् हम योगी जनों के समान आकर फिर संसार का उद्धार करें अर्थात् हम लोग मर्यादापुरुषोत्तम पुरुषों के समान जन्म लाभ करें, यह प्रार्थना है। स्मरण रहे कि परमात्म त्राज्ञापालन तथा उसकी उपासना के बिना मनुष्य कदापि अमृत सुख का लाभ नहीं करसकता और न इस संसार में सद्गति को प्राप्त होसकता है, अमृत पद उन्हीं पुरुषों को प्राप्त होता है जो शुद्ध हृदय से बेदप्रतिपादित कर्मों का अनुष्ठान करते हुए परमात्मज्ञान को उपलब्ध करते हैं। या यों कहो कि वेदादि सत्यशास्त्रों का अध्ययन, उपासनारूप तपश्चर्या और धारणा, ध्यान तथा समाधि द्वारा परमात्मचिन्तन करने से पुरुष की आत्मा पवित्र होकर उस पद को प्राप्त होती है जिसको वेद ने अमृत कहा है, ,इसीलिये वेद और ऋषि महर्षियों ने आत्मा की पवित्रता के लिये सन्ध्या अग्निहोत्रादि पांच यशो का विधान किया है अर्थात् इन यों का अनुष्ठान- करना ही पुरुष को उत्कृत्य करता है, अतएव सुख की इच्छा वाले मनुष्यमान का कर्तव्य है कि वह वेदप्रतिपादित कर्मों का पालन करते हुए अभ्युदय- .
कर्मकाएटचन्द्रिका लांसारिक ऐश्वर्य तथा निःश्रेयस अमृतपद को प्राप्त हो, जैसाकि वेभंग घान् उपदेश करते हैं कि- प्रति वा स्तोमैरीलते वसिष्ठा उपव॑धः सुभगे तुष्टुवांसः। गानेत्री वाजपली न उच्छोषः सुजाते प्रथमो जरस्व ।। ऋग०७१७६।६ अर्थ-हे मनुप्यो । (सुभगे)सौभाग्य को प्राप्त करानेवाली ( उपः) उपा समय में (बुधः) जागो, और ( स्तोमैः ) यक्षों द्वारा (त्वा, प्रति), पर- मात्म प्रति (ईलते) स्तुति प्रार्थना करो, क्योंकि ( गवां, नेत्री) यह उपाकाल इन्द्रियों को संयम में रखने के कारण (तुष्टुवांसः) स्तुति योन्प है, फिर कैसा है ( वाजपत्नी) अन्नादि ऐश्वर्य का स्वामी और इसी के सेवन से पुरुष उच्छ) देदीप्यमान होता तथा बल बुद्धि को घृद्धि और दीर्घायु होती है, यही , मनुष्य को प्रथम सेवनीय है जो (स्वजाते) उन्नादर्श की ओर लेजाता, और . (अरस्त्र ) अवगुणों का नाशक है अर्थात् उपाकाल में जागने वाले अमृत सुत्र को प्राप्त होते हैं, इसी भाव को भगवान मनु ने इस प्रकार उद्धृत किया है कि:- ब्राह्ममुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थों चानुचिन्तयेत् । कायक्लेशांश्च तन्मूलान् वेदतत्वार्थमेव च ।। मनु०६२ अर्थ- हे मनुष्यो ! ( ब्राह्ममुहूर्ते) ब्रह्ममुहूर्त = उपाकाल में (बुध्येत ) उठो जागो (घ) और (धर्मार्थों ) धर्म तथा अर्थ का (अनुचिन्तयेत् ) चिन्तन करो और (कायक्लेशान ) शारीरक श्राधि व्याधि तथा (तन्मूलान् ) उनके मूलभूत पुण्य पापको लोचते हुए (वेदतत्वार्थ) वेद के तत्वार्थ को विचारो। भाव यह है कि सुख की कामना वाला पुरुष पनि के चौथे पहर दो, घड़ी रांत रहने पर उठे और उठकर धर्म निश्रेयल की लिद्धि ता अर्थ ऐश्वर्यशाली होने का उपाय सोचता हुश्रा अपनी शारीरक अवस्था पर पूर्ण- तया ध्यान रखे, क्योंकि शारीरक व्याधि ग्रसित पुरुष कदापि तपस्वी नहीं हो सकता और तप के बिना ऐश्वर्य तथा निःश्रेयस की प्राप्ति कदापि नहीं होती, इसीलिये मनु उपदेश करते हैं कि प्रथम शारीरक उन्नति करते हुए वेद के तस्थ को विचारो अर्थात् अपने कर्तव्य का पालन करो, जिसकी विधि इस प्रकार है कि पुरुष प्रातःकाता में जागे और प्रथम शौच, दन्तधावन तथा स्नानादि से निवृत्त होकर ध का चिन्तन करे अर्थात् संध्या, अग्निहोत्र' में प्रात्त हो, फिर अर्थ-धर्मपूर्वक धन उपार्जन करने का उपाय सोचे जो ५५ :- विष्णुसुक्क परिवार पालन के लिये अत्यावश्यक है परन्तु धन का उपार्जन धर्मपूर्वक करे, क्योंकि अधर्म ले कमाया हुआ धन कुल तथा कीर्ति का नाशक और दुःखका. देनेवाला होता है, इसलिये अधर्म से धन कमाने की चेष्टा न करे। शव प्रथम ग्रह्मयक्ष सन्ध्या का विधान करते हुए " सन्ध्या शब्द पर विचार करते हैं अर्थात् "सम्" और "ध्य। इन दो पदों के जोड़ने और उनके अंत में "श्रा प्रत्यय लगाने से "सन्ध्या शब्द बनता है, "सम्" का अर्थ भलीभांति तथा "ध्या का अर्थ ध्यान करना है और "श्रा प्रत्यय यहां "in के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है सो भलीभांति ध्यान कियाजाय जिसमें उसका नाम "सन्ध्याग है अर्थात् रात्रि और दिन की जो सायं तथा प्रातः दो सन्धियां होती हैं इन्हीं दो सन्धियों में परमात्मा का ध्यान करना "सन्ध्याग फहाता है और वेदों में भी इन्हीं दोनों कालों में सन्ध्या करना लिखा है, जैसाकिः- उपत्वाग्ने दिवेदिवे दोषावस्तद्धिया वयम् । नमो भरंत एमसि ॥ साम० भ० १ सं० २ ०४. अर्थ-(अग्ने) मार्गदर्शक परमात्मन् ! (वयम् ) हमलोंग (धिया) मन से (नमः, भरन्तः) नमस्कार करते हुए (दिवे दिवे) प्रति दिन (दोपा- वस्तः) सायं तथा प्रातः (.त्वा) आपकी ( उप, एमसि) उपासना करें। भाव यह है कि हे शानदाता परमात्मन् ! आप ऐसा दृढ़ ज्ञान और श्रद्धाभकि हमको प्रदान करें कि हम लोग प्रति दिन सायं प्रातः विनय से भर- पूर होकर मन बुद्धि द्वारा आपकी समीपत्ता प्राप्त करें अर्थात् हम लोग प्रति. दिन दोनों काल सन्ध्या करने में तत्पर रहें । प्रात:काल की सन्ध्या का समय कम से कम दो घड़ी रात रहे से सूर्योदय तक और सायंकाल की सन्ध्या का समय सूर्यास्त से तारों के दर्शन पर्यन्त है, क्योंकि मंत्रों के अर्थों पर भलेप्रकार विचार करके सन्ध्या करने में घण्टे से भी अधिक समय लगता है, इसलिये ब्रह्ममुहर्तकाल में उठकर ही सन्ध्योपालन के लिये तैयार होना चाहिये। .
सल्ध्या-विधि - सन्ध्या प्रारम्भ करने से पहिले शारीरक और मानसिक शुद्धि करनी चाहिये, शरीर की शुद्धि के लिये प्रातःकाल वस्ती से बाहर कुछ दूर निकल जॉय और वहीं मलमूत्रादि का त्याग कर किसी कुएं शानदी नाले पर दन्त- धावन करने के पश्चात् शरीर को भले प्रकार मलकर स्नान करें और आंखों पर ताजा जल छिड़कें, यदि वाहर न जा सके तो घर में ही शौचादि से निवृत्त होकर स्नानादि द्वारा शरीर को शुद्ध करना चाहिये। जब इस प्रकार शरीर की शुद्धि हो चुके वकिली पक्षान्त स्थान में वैठकर मन को रागद्वेषादि दूषित वृत्तियों ले यत्नपूर्वक हटाकर ईश्वर के सत्यादि गुणों के चिन्तन में लगावें, इसी का नाम मानसिक शुद्धि है, जैसाकि- अद्भिर्गात्राणि शुद्धयन्ति मनः सत्येन शुद्धयति । विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिानेन शुद्धयति ।। मनु० १०. अर्थ जल से शरीर शुद्ध होता, सत्यभाषण करने से सन शुद्ध होता, विधा तथा तपले जीवात्मा और ज्ञान से बुद्धि शुद्ध होती है। शारीरक शुदि की अपेक्षा मानसिक-अन्तःकरण की शुद्धि अत्याव- श्यक है, क्योंकि यही परमेश्वर की प्राप्ति का मुख्य साधन है, यदि कभी शा- रीरक शुद्धि न होलके तो भी सध्या प्रश्य करनी चाहिये, क्योंकि सन्ध्या न करने में पाप होता है। सन्ध्योपासना प्रारम्भ करते समय तर से पहिले - "आचमन मन्त्री पढ़कर तीन बार नाचमन करे अर्थात् दायें दक्षिण ाथ की हथेली में जल लेकर तीनचार पीवें जो कराठ के नीचे हृदय तक पहुंच जाय, इससे कार में कफ और पित्त की निवृत्ति होती है । : फिर इन्द्रियस्पर्श मन्त्रों द्वारा इन्द्रियों का स्पर्श करके मार्जन-मन्त्र पढ़कर मध्यमा और अनामिका अंगुलियों के प्रभाग से शिर आदि ब्रहो पर जल छिड़कें ताकि आलस्य दूर होकर प्राणायाम करने के लिये चित्त स्वस्थ होजाय । मार्जन करने के पश्चात् "प्राणायाम मन्त्र पढ़कर प्राणायाम इस प्रकार करें की प्रथम श्वास को इतपूर्वक बाहर निकाल कर बड़ीं इतनी देर.
ब्रह्मयज्ञः से न्यून . 'ठहरायें कि मन्त्र का जप मन में एकवार अवश्य होजाय, फिर श्वास को धीरे २ भीतर खीचकर उसी प्रकार मन्त्र का एक बार जप करें, यह एक प्राणायाम हुआ, ऐसे न्यून तीन प्राणायाम करने चाहिये, जव अभ्यास करते २ एक श्वास में एक बार जप सहज में होने लगे तब दो और फिर तीन चार यार मन्त्रों के जप का अभ्यास करें, इससे अधिक भी अभ्यास करते २ पुरुष समाधि तक पहुंच सकता है, परन्तु जितना सुगमता से होसके उतना ही करना चाहिये, क्योंकि हठात् अधिक करने से रोगग्रस्त होजाना सम्भव है। विधिपूर्वक प्राणायाम करने से शारीरक तथा मानसिक अशुद्धि का नाश होकर ज्ञानका प्रकाश होता है, जैसाकि मनु महाराज ने भी वर्णन किया है कि दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः। तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात् ।। अर्थ-जैसे सुवर्ण आदि धातु अग्नि में तपाने से शुद्ध होजाते हैं वैसेही प्राणायाम करने से मन श्रादि इन्द्रियों के दोष नाश होकर निर्मल होजाती हैं। प्राणायाम के उपरान्त "अघमर्षण "मनसापरिक्रमा तथा "उप- स्थान" आदि मन्त्रों से परमेश्वर की प्रार्थना उपासना करें और, अन्त में अपने इस कर्तव्य को ईश्वरापण करके "नमः शम्भवाय यह "नमस्कार मन्त्र पढ़कर ईश्वर को प्रणाम करके सन्ध्या समाप्त करें। 1 अथ ब्रह्मयज्ञः प्रारभ्यते आचमनमंत्र: ओं शन्नोदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये । शंयोरभिस्रवन्तुनः॥ १॥ यजु० ३६।१३ पदा०--(देवी) दिव्यगुणस्वरूप परमात्मा (नः) हमारे लिये (शम् ) सुखकारक (भवन्तु) हो (अभिष्टये) हमारी इच्छायें पूर्ण हो और(न:) हम पर (पीतये) पूर्णानन्द की प्राप्ति के लिये (अभि) सब ओर से (शंयोः) सुख को (नवन्तु) वर्षा करे। भावा०-हे सर्वव्यापक तथा सर्वप्रकाशक परमात्मन् । आप मनो- वांछित अानन्द की प्राप्ति के लिये कल्याणकारी हो और हम पर सब ओर से सुख की वृष्टि करें। ।
कर्मकाण्डचन्द्रिका उक्त मंत्र के प्रारम्भ में जो "श्रोश्म्पढ़ा गया है, यह परमात्मा के सत्र नामों में मुख्य नाम है, जिसके संक्षिप्त अर्थ यह हैं कि जो परमात्मा के ध्यान करने वालों की सब दुःखों से रक्षा करे उसको "ओ३म्" कहते हैं ॥. यह "ओम्' शब्द अउम्, इन वीन अक्षरों से बना है "कार" का अर्थ विराट्, अग्नि तथा विश्व है अर्थात् सब के प्रकाशक को "विराट्य शानस्वरूप तथा सर्वव्यापक को "अग्नि और सबके आश्रय तथा सय ब्रह्माण्डों में प्रविष्ट को विवशकहते हैं । "उकार का अर्थ हिरण्यगर्भ, वायु तथा तैजसादि हैं अर्थात् सूर्यादि ज्योति जिसके गर्भ-श्राधित हो उसको "हिरण्यगर्भ अनन्त बलवान् तथा सयका धारण करने वाला होने से "वायु"और प्रकाशस्वरूप तथा सवका प्रका- शक होने से परमात्मा का नाम "तेजस" है। "मकार का अर्थ ईश्वर, आदित्य तथा प्राज्ञ हैं अर्थात् सर्वशक्तिमान तथो न्यायक्षारी को "ईश्वर" नाशरहित को "आदित्य और ज्ञानस्वरूप तथा सर्वज्ञ परमात्मा को "प्राज्ञा कहते हैं । इस एक नाम में परमात्मा के अनेक नाम श्राजाते हैं. इसलिये "पोइम्। शब्दवाची परमात्मा के गुणों को सन्मुख रखकर "ओ३म्" नाम का जप करना विशेष फलदायक है। इन्द्रियस्पर्श मंत्राः ओं• वाक्वाक्, प्रो. प्राणः प्राणः, ओं. चक्षुः चक्षुः, ओं० श्रोत्रं श्रोत्रम् , ओं० नाभिः, ओं० हृदयम् , ओं. कराठः, ओं• शिरः, ओ० वाहुभ्यां यशोवलम्, ओं• करतलकरपृष्ठे ॥३॥ पदा०-हे रक्षक परमात्मन् ! वाक्, वाक्.) वाणी और उसके अधिष्ठान का (प्राणः, प्राणः) प्राण और उसके अधिष्ठान को ( चक्षुः. अनुः) नेत्र और उसके अधिष्ठान को (ज्ञोत्रं, क्षोत्रम् ) कान और श्रवणशक्ति को (नाभिः) नाभि को.(हृदयम् ) हृदय को (कएठः) कएठ को (शिरः) शिर को (बाहुभ्याम्) बाहों को (करतलकरपृष्ठे ) ऊपर नीचे हाथों को (यशोबलम् ) यश और बल दें। भावा०-हे अन्तर्यामी परमात्मन् ! मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि वाक्, प्राण, नेत्र, श्रोत्र, नाभि, दृदय, कराड, शिर, वाहु और हाय आदि से 'Y8.1 । ब्रह्मयज्ञः कदापि पाप न करूं, और आप कृपाफरके, मेरे सव अङ्ग और उपाङ्गो को कीर्ति तथा बल प्रदान करें। स्मरण रहे कि उक्त वाक्यों के पढ़ते समय जिस २ अंग का जिस क्रम सेनाम आवे उसको उसी क्रम से छूते जावे ॥ मार्जनमंत्राः ओं० भूः पुनातु शिरसि । ओं० भुवः पुनात नेत्रयोः । ओं० स्वः पुनातु कण्ठे । ओं० . महः पुनातु हृदये । ओं. जनः पुनातु नाभ्याम् । ओं. तपः पुनातु पादयोः। ओं सत्यं पुनातु पुनः शिरसि । ओं खं ब्रह्म पुनातु सर्वत्र ॥३॥ पदा०-(भूः) सत्यस्वरूप तथा सबका जीवनाधार परमात्मा (शिरसि) शिर पर (पुनातु) पवित्र करे (भुवः) अपने सेवकों को सुखदाता प्रभु (नेत्रयो, पुनातु) दोनों नेत्रों को पवित्र करे (स्वः) सर्वव्यापक, सबको नियम में रखने वाला तथा सबका आधार परमात्मा (कराठे, पुनातु ) कण्ठ को पवित्र करे (महः) सब से बड़ा तथा सबका पूज्य देव (हृदये, पुनातु) हृदय को पवित्र करे (जनः) सर्व जगत् का उत्पादक पिता ( नाभ्यां, पुनातु ) नाभि को पवित्र करे (तपः) दुष्टों का दण्डदाता तथा ज्ञानस्वरूप परमेश्वर ( पादयोः, पुनातु) पाओं को पवित्रं करे (सत्यम् ) अविनाशी प्रभु (पुनः शिरसि, पुनातु) फिर शिर को पवित्र करे (खं, ब्रह्म) श्राकाशवत् व्यापक, सब से बड़ा जगदीश्वर ( सर्वत्र, पुनोतु) सब स्थानों को पवित्र करें। इन मंत्रों के पढ़ते समय जिस २ अङ्ग का नाम आवे उस २ अङ्ग पर मध्यमा तथा अनामिका अंगुलियों से जल छिड़कते जावें जिससे आलस दूर होकर परमात्मा में चित्तवृत्ति का निरोध हो । माणायाममंत्राः ओं भः । ओं भुवः। ओं स्वः । औं महः । ओं जनः। ओं तपः। श्रओं सत्यम् ॥ ४॥ पदा०-हे भगवन् ! श्राप (भूः) सद्प तथा चैतन्यस्वरूप ( भुवः) सुखदायक (स्व:) आनन्दमय (महः) सब से बड़े तथा सर्वपूज्य (जनः) सबके जनक-पिता (तपः) दुष्टों को दण्डदाता और सब को जानने वाले (सत्यम् ) अविनाशी हो। .
कर्मकाण्डचन्द्रिका इस मंत्र का जप और इसके अर्थ का विचार मन में करते हुए न्यून से न्यून तीन प्राणायाम करें, जिसका प्रकार पीछे सन्ध्याविधि में लिख आये हैं। अघमर्पणमंत्राः ओं• ऋतञ्च सत्यञ्चाभीद्धातपसोऽध्यजायत ।। ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः ॥ ५ ॥ ऋग० मार पदा०-( ऋतम् ) वेद (च) और (सत्यम् ) कार्यरूप प्रकृति (अभि, इछात्, तपसः) सव ओर से प्रकाशमान, ज्ञानस्वरूप परमात्मा से (अध्य- जायत) उत्पन्न हुए (ततः) उसी प्रभु से (रात्री) रात्रि (अजायत) उत्पन्न हुई (ततः) उसी परमात्मा के अनन्त सामर्थ्य से (समुद्रः, अर्णवः ) मेघ. मण्डल तथा समुद्र उत्पन्न हुश्रा ।। ओं० समुद्रादर्णवादधि सम्वत्सरो अजायत । अहो रात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी ।। ६ ।। ऋग० EPIBER पदा०-(समुद्रात्, अर्णवात् , अधि) उस मेघमण्डल तथा समुद्र के पश्चात् (सस्यत्सरो, अजायत) सम्बत्सर-चर्प उत्पन्न हुश्रा (विश्वस्य मिषतः) इस क्रियात्मक जगत् को (वशी) वश में रखने वाले प्रभु ने (अहोरामाणि) दिन और रात को (विधत् ) बनाया ॥ ओं. सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् । दिवञ्चपृथिवीञ्चान्तरिक्षमथो स्वः ॥७॥ ऋग् ERIE३ पदा०--(धाता) सवके धारण पोषण करने वाले परमात्मा ने (सूर्याचन्द्रमसी) सूर्य तथा चन्द्रमा को ( यथा पूर्वम् ) पहले जैसे (अक- ल्पयत्) बनाये (दिवम् ) द्युलोक (पृथिवा) पृथिवी लोक (अन्तरिक्ष) अन्तरिक्ष लोक (अथो) और (स्वः) अन्य प्रकाशमान तथा प्रकाशरहित लोकलोकान्तरों को भी बनाया रचा ॥ . पूर्वोक्त तीनों अधमर्पण मन्त्रों का भावार्थ यह है कि सृष्टि की आदि मैं सदा जगत् को धारण करनेवाले ईश्वर के सामर्थ्य और सहज स्वभाव से जगत् उत्पन्न होता, तत्पश्चात् अग्नि आदि चार ऋषियों द्वारा ऋगादि चार i.. .
१ ब्रह्मयज्ञः वेदों का प्रकाश हुआ करता है और फिर प्रलय भी उसी ईश्वर के सामर्थ्य से होती है, उसी परमपिता सर्वान्तर्यामी परमात्मा की प्राज्ञापालन करने से पापों का क्षय होकर सुख की प्राप्ति होती है, इसी से इनका नाम "अघमर्षण मन्त्र है अर्थात् "अघा नाम पापों से "मर्पण। शुक्त कर परमात्मा में श्रद्रा भक्ति उत्पन्न कराने वाले मंत्रों को, "अघमर्षण मंत्र कहते हैं । वार २ सृष्टि उत्पन्न करने में ईश्वर का तात्पर्य जीवों के पाप पुण्य का फल भुगाना है जो उसके स्वभाव से ही सदा होतारहता है, जैसाकि "स्वाभा- विकी ज्ञानबलक्रिया च॥ इत्यादि वाक्यों में वर्णन किया है कि यह सब उसके स्वभाव से ही सदा होता रहता है, उसको किसी विशेष प्रयत्न की भाव- श्यकता नहीं होती। स्मरण रहे कि परमेश्वर अपनी अन्तर्यामिता से सब के पाप पुण्य यथावत् देखता हुआ उनका फल ठीक न्यायपूर्वक देता है, इसलिये हमें उचित है कि हम मन, वाणि तथा कर्म से कभी भी कोई पाप न करें। अब निम्नलिखित ६ परिक्रमा मत्रों में परमात्मा को सब दिशाओं में उपस्थित मानकर यह प्रार्थना कीगई है कि हे परमपिता परमात्मन् ! आप हमारी सव ओर से रक्षा करें जैसा*:-- मनसापरिक्रमामन्त्राः ओं० प्राचीदिगग्निरधिपतिरसितोरक्षिताऽऽदित्या इषवः । तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु । योऽस्मान् देष्टि यं वयं द्विष्मस्तंवो जम्भे दध्मः ॥ ८॥ अथर्व० ३२६२७११ पदा--(प्राचीदिक) पूर्वदिशा अथवा जिस ओर अपना मुख हो उस ओर (अग्निः) ज्ञानस्वरूप सर्वज्ञ परमात्मा ( अधिपतिः) जो सब जगत् का स्वामी (असितः) बन्धनरहित ( रक्षिता) हमारी रक्षा करने वाला है .(श्रादित्या, इषवः ) जिसके बाण सूर्य की किरण समान हैं (तेभ्यः, नमः, अधिपतिभ्यः) उन सब गुणों के अधिपति परमपिता परमात्मा को हम लोग बारंवार नमस्कार करते हैं (रक्षितृभ्यः, नमः, इषुभ्यः, नमः, एभ्यः, अस्तु) जो ईश्वर के गुण जगत् की रक्षा करने वाले और पापियों को बाणों के समान, पीड़ा देने वाले हैं उनको 'हमारा नमस्कार हो (यः अस्मान् , द्वेष्टि) जो प्राणी हमसे द्वेष करते हैं अथवो ( यम्, वयम् द्विष्मः ) जिन धार्मिकों से कर्मकाण्डचन्द्रिका हम द्वेष करते हैं (तं, वो, जम्भे, दध्मः ) उन सबके बुरेभावों को उन किरण. समान वाणों के मुख में देकर दग्ध करते हैं, ताकि न हमसे कोई और करे और न हम किली प्राणी ले वैर करें किन्तु हम सब मिलकर परस्पर मित्रता.. पूर्वक वर्त। ओं• दक्षिणादिगिन्द्रोऽधिपतिस्तिरश्चिराजी रक्षिता पितर इषवः । तेभ्यो (शेष पूर्ववत् ) अधर्व०२६२७।२ पदा०-(दक्षिणा, दि) दतिल-दाहनी और (इन्द्रः) परमैश्वर्य- वान् (अधिपतिः)राजा (तिरश्चि, राजी) तिरछे-वेदविरुद्ध चलने वाले दुष्ट- जनों के समूह से (पितरः, इषवः) शानी पुरुषों के सत्य उपदेशरूप यायों द्वारा ( रक्षिता) हमारी रक्षा करने वाला है अर्थात् उनके कुसंगरूप हानि से हमें बचाने वाला है, उसके लिये हमारा नमस्कार हो । (शेष पूर्ववत् ) ओं० प्रतीचीदिग्वरुणोऽधिपतिः पृदाकू रिक्षतान्नमिषवः ॥१॥ तेभ्यो (शेष पूर्ववत् ) अथर्व शिक्षा२७॥३ पदा०-(प्रतीची, दिक् ) पश्चिम दिशा वा पीठ की ओर (वरुणः) ग्रहण करने योग्य, सर्वोत्तम (अधिपतिः) परमात्मा रूपी राजा (पृदाकू) विषधारी जीवों से (अन्नं, इपः ) प्रौपद्यल्प घाणों द्वारा ( रक्षिता ) रक्षा करता है, उसके लिये हमारा नमस्कार हो ॥ (शेष पूर्ववत् ) ओं• उदीचीदिक् सोमोऽधिपतिः स्वजोरक्षिता शनिरिषवः ॥ ११ ॥ तेभ्यो. (शेष पूर्ववत् ) अथर्व०३६२४ पदा--(उदीची, दिक) उत्तर दिशा वा घाई ओर (लोमः) शान्ति- स्वरूप (अधिपतिः) राजा (स्वजः) सदा अजन्मा है जो (शनिः, इषवः) विजुली रूप वाणों द्वारा ( रक्षिता) हमारी रक्षा करता है, उसके लिये हमारा नमस्कार हों।। (शेष पूर्ववत् ) ओं. ध्रुवादिग्विष्णुरधिपतिः कल्माषग्रीवो रक्षिता वीरुध इपवः ॥१२॥ तेम्यो० (शेष पूर्ववत् ) अथर्व०३।६।२७।५ - ब्रह्मयज्ञः पदा०-(ध्रुवा, दिक् ) नीचे पृथिवी की ओर (विष्णुः, अधिपतिः) व्यापक परमात्मा (कल्माष, ग्रीवः) हरित रंगवाले वृक्ष जिसकी ग्रीवा के समान और (पीरुध, इषवः ) लतायें जिसके बाणों के समान हैं वह प्रभु (रक्षिता) हमारी रक्षा करता है. उस परमात्मदेव को हमारा नमस्कार हो । (शेष पूर्ववत्) औ• ऊर्धादिग्बृहस्पतिरधिपतिःश्वित्रोरक्षिता वर्षमिषवः ॥१३॥ तेभ्यो० (शेष पूर्ववत् ) अथर्व०३२६ २७।६ , पदा-(ऊर्धा, दिक्) ऊपर प्रकाश की ओर (बृहस्पतिः, अधि. पतिः) सयसे घड़ा परमात्मारूपी राजा (वित्रः) सव भयानक रोगों से (रक्षिता) हमारी रक्षा करने वाला और ( वर्ष, इषवः ) वर्षा जिसके बाणों के समान है, उस प्रभु को हमारा नमस्कार हो ॥ (शेष पूर्ववत् ) भावा-(१)माचीदिक्-पूर्वदिशा को यहां प्रथम इसलिये गिना है कि झानेन्द्रियों का प्रायः इसी ओर प्रवाह है, प्राची के अर्थ केवल पूर्वदिशा के नहीं किन्तु मुख के ओर की दिशा के हैं इसी श्रमिप्राय से यहां अग्नि परमात्मा के तेजस्वी गुण को अधिपति माना गया है और उसको बन्धन रहित इसलिये कहा गया है कि परमात्मा का तेज किसी बन्धन में नहीं और घही सबकी रक्षा करने वाला है-श्रादित्य को इषुओं के समान इस अभिप्राय से कहा है कि परमात्मा के तेज का सूचक जैसा सूर्य है वैसा अन्य कोई पदार्थ नहीं और सूर्य अपनी किरणों रूप वाणों द्वारा दुष्कर्मी पुरुषों को दुःख प्रदान करता और सत्कर्मी पुरुषों के लिये सुख का प्रदाता है, अंत में अधिपति और इषुओं को नमः इसलिये कहा है कि परमात्मा और उसका ऐश्वर्य सत्कार के योग्य है, अधिक क्या जो पुरुप प्राचीदिक् प्रवाहिनी ज्ञानेन्द्रियों के प्रवाह को अपने घशीभूत करलेता है वही संसार में अभ्युदय तथा मोक्षसुख का भागी होता है। (२) "दक्षिणादिका से तात्पर्य्य दक्षिण भुजा का है, इसका इन्द्र अधि- पति इसलिये कथन किया गया है कि इस अंग में विद्युत्शक्ति वा वल अधिक होता है और इसीलिये यह सब प्रकार के विषमगति धाले विघ्न तथा शत्रुओं से. रक्षा करता और यह अंग कर्मप्रधान है, इसलिये पितर-विज्ञानी पुरुषों को इसको रक्षक माना गया है, क्योंकि जहां ज्ञान के अधीन कर्म रहता है अर्थात् झानपूर्वक कर्म कियाजाता है वहां कोई विघ्न नहीं होता ।
कर्मकाण्डचन्द्रिका (३)-"प्रतीचीदिका के अर्थ मुख से पीछे है अर्थात् 'हरीर के पृष्टभागस्थ अंगप्रत्यकों में जो नाड़ी नस हैं उनका अधिपति वरुण इसलिये माना गया है कि जिसप्रकार शरीरस्थ पृष्ठभाग के नाड़ी नसों ने सम्पूर्ण शरीर का सुदृढ़ किया हुआ है इसी प्रकार वसण-परमात्मा सब प्रकार से हमको श्राच्छा- दन करता है। "पृदाकूरक्षिता" का तात्पर्य यह है कि बड़े • अजगररूप शत्रुओंके प्रहारों से भी उक्त अंग की परमात्मा सुढ़ता के कारण रक्षा करता है और अन्न को इघु इस दिशा की रक्षा के लिये इस अभिप्राय से माना है कि जो पुरुष अन्नाद हैं अर्थात् अन्न के भोगने में लमर्थ हैं उनके लिये अन्न इस भाग की इघुओं के समान रक्षा करता है । (४)-"उदीचीदिका जो 'उक्त तीनों अंगों से मिन अंग: वामान है उसका सोमगुणप्रधान परमात्मा स्वामी है अर्थात् जिलप्रकार पर मात्मा के सोमगुण में शान्ति विराजमान है इसी प्रकार इस अंग में भी स्वतः सिद्ध शान्ति विराजमान है "स्वजरी को रक्षिता इस श्रग का इललिये माना गया है कि शान्तगुण किसी कारण ले अभिव्यक्ति में नहीं आता किन्तु वह परमात्मा का स्वरूपभूत गुण है, इसलिये उल गुण को रक्षक भी नैमित्तिक नहीं किन्तु स्वतःसिद्ध है ।। तात्पर्य यह है कि एक परमात्मा का स्वरूपभूत गुण है और एक तटस्थ गुण है, तटस्थ वह कहलाता है जो किसी निमित्त से प्रकट होता है, यहां उस तटस्थ गुण से भिन्न बरमूनगुण को रक्षक माना गया है, और अशनिचत्र को यहां इषु इस अभिप्राय ले कथन किया है कि जो कोई परमा. स्मा के स्वतःसिद्ध शान्तिगुण में प्राकर विघ्न डालता है उस पर इधुनों के समान वग्नपात होता है अर्थात् शान्ति को स्थापन करने वाली विद्युदशक्ति उस दुष्ट का विनाश करती है। ()-"ध्रुवादिक" से तात्पर्य शरीर के अधो अंग का है, इसका विष्णु अधिपति इसलिये माना गया है कि शरीर की नाड़ियों द्वारा रस इस अंग में पहुंचकर सर्वाधिकरण विष्णु परमात्मा की कृपा से अधिपतिरूप होकर आधिराजमान होते हैं, और चित्रित विचित्रित ग्रीवा वाली नाड़ियों को रक्षिता इस अभिप्राय से माना है कि वह लय मिलकर पादप्रदेश में-ऐली दृढ़ता देती हैं कि मानो रक्षक के समान स्थिर होजाती हैं और वीरुध-लतानों के समान जोनका तान वितान है वह मनुष्य की रक्षा के लिये इधुनों के समान . ब्रह्मयज्ञः है अर्थात् जिसप्रकार इषु वाण विघ्नों से रक्षा करते हैं इसी प्रकार पादप्रदेशस्थ नाड़ी नस के बन्धन भी विनों से रक्षा करते हैं। (६)-"ऊर्धादिका का तात्पर्य शरीर के सर्वोपरि उच्च प्रदेश शिरसे है, इसका वृहस्पति अधिपति इसलिये माना गया है कि जिस प्रकार मनुष्य का शिर सप शारीरक ऐश्वव्यों का पति है इसी प्रकार वृहस्पति परमात्मा भी सब ऐश्वर्यों का स्वामी है और "श्वित्रसव प्रकार के रोगों से रक्षा करनेवाला परमात्मा इसका रक्षक है और वर्ष =वृष्टि के समान अन्नादि रसों को बहाने घाले नाड़ी नस शिर की रक्षा के लिये विराजमान हैं। तात्पर्य यह है कि शिरोभाग से वृष्टि के समान धरते हुए रस सम्पूर्ण शरीर की रक्षा और पुष्टि करते हैं, भाव यह है कि शरीर के प्राच्यादि छत्रों अंगों की रक्षा इस मनसापरिक्रमा में अभिप्रेत है, इन मन्त्रों के पाठ-समय मनुष्य को अपने छों अंगों की रक्षा पर सष्टि डालनी चाहिये, जिसप्रकार शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिप ये छ अंग वेद की रक्षा करते हैं इसीप्रकार धर्म की रक्षा के लिये शरीर के छुओं अंगों की रक्षा यहां वर्णन कीगई है और जिसप्रकार नीति के छ अंग राष्ट्र की रक्षा करते हैं इसीप्रकार यहां प्राच्यादि दिशाओं के अधिपति और रक्षक मिलकर इस वृहत्ब्रह्माण्ड की रक्षा करते हैं, इन मनलापरिक्रमा के मन्त्रों में शरीर की रक्षा तथा राष्ट्र की रक्षा. इत्यादि अनेक रक्षायै विराट् पुरुष के ध्यान द्वारा वर्णन कीगई हैं कि मनुष्य इन दिशा उपदिशाओं में चित्त की वृत्ति फेरकर सब ओर से अपनी रक्षा करे. उपस्थानमन्त्रा ओं उदयंतमसस्परिस्वः पश्यन्त उत्तरम् । देवं देवत्रा सूर्यमगन्मज्योतिरुत्तमम् ॥ ४ ॥ यजु०३५।१४ पदा०-हे परमात्मदेव! श्राप (तमसा, परि) अज्ञानरूप अन्धकार से परे (स्व:) प्रानन्दस्वरूप (पश्यन्त, उत्तरम् ) प्रलय के पीछे भी सदा वर्त: मान (देवं, देवत्रा ) प्रकाशकों में प्रकाशक (सूख्य ) चराचर का आत्मा (ज्योतिः, उत्तमम् ) स्वयंप्रकाश, सर्वोत्तम श्रापको (वयं) हम लोग र उत्, अगन्म) प्राप्त हों, आप हमारी रक्षा करें । भावा०-जोपरमात्मा मानरूप अन्धकार,से परे, आनन्दस्वरूप, नित्य, परमानन्द दाता, परमदेव, चराचर को आत्मा, स्वयंप्रकाश और जो सर्वोत्तम है उसको हम श्रद्धापूर्वक शानचक्षु से देखते हुए प्राप्त हो। , कर्मकाण्डचन्द्रिका. ओं उदत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः। दृशे विश्वाय सूर्यम् ॥ १५ ॥ यजु० ३३ ॥ ३१ पदा०-(उत,, वहन्ति, केतवः) वेदश्रुति, जगद्रचना तथा सृष्टि- नियमरूप किरणे (विध्याय, शे) सयको दर्शाने के लिये (दे) सब देवों के देव (सूर्य) सर्योत्पादक (त्ये) श्रापको प्रकाशित करते हैं, क्योंकि (जातवेदसं) ऋगादि चारो वेद श्रापसे ही प्रकट हुए हैं ।' भावा-इस मंत्र का भाव यह है कि वेदश्रुति, जगत्रचना और सृष्टि- नियमरूप किरणें विश्वविद्या को दर्शाने के लिये उसी परमात्मा को प्रकाशित करती हैं जो जातवेदा है अर्थात् जिससे चारो वेद तथा प्रकृति प्रकाशित हुई और जो सब जगत् का उत्पादक है, वह देव हमारे लिये सुखकारी हो । ओं चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुमित्रस्यवरुणस्याग्नेः । आपाद्यावापृथिवीअन्तरिक्ष सूर्यप्रात्माजगतस्तस्थुपश्च- स्वाहा ॥ १६ ॥ यजु० १३॥ २७ पदा०-हे भगवन् ! श्राप (चित्रं ) अद्भुत स्वरूप हैं (देवानां ) विद्वानों के हदय में सदा (उत्. अगात् ) विराजमान (अनीकं) बलस्वरूप हैं (मित्रस्य) मित्र-भक (घरुणस्य ) श्रेष्ठ-पुरुप (अग्नेः) अग्नि, इन सबके (चक्षुः) प्रकाशक हैं (जगतः, तस्थुषः) जङ्गम तथा स्थावर संसार के (आत्मा) आत्मा (सूर्यः) प्रकाशक हैं (द्यावा, पृथिवी, अन्तरिक्ष) धुलोक, पृथिवी- लोक तथा मध्यलोक को (श्रामा ) सब ओर से व्याप्त कर रहे हैं ।। भावा-वह परमात्मदेव जो अद्भुन, थलस्वरूप तथा स्वयंप्रकाश, सर्व... मित्र और श्रेष्ठ पुरुषों का प्रकाशक तथा बिजुली का भी प्रकाशक और जङ्गम तथा स्थावर जगत् में व्यापक तथा विद्वानों के हृदय में भलीभांति प्राप्त है, और जो प्रकाशमान तथा प्रकाशरहित लोकों और उनके मध्यस्थ लोकों का धारण तथा रक्षण करने वाला है वह प्रभु हमारे लिये कल्याणकारी हो । ओं तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् । पश्येम शरदः शतंजीवेम शरदः शतः शृणुं- .याम शरदः शतं प्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् ॥ १७ ॥ यजुः ३६।१४ 4 ब्रह्मयज्ञः, . . पदा०-(तत्) वह परमात्मा जो (चक्षुः) सर्वद्रष्टा (देव, हित) विद्वानों का हितकारी (पुरस्तात् ) सृष्टि से पहले भी वर्तमान (शुक्र) शुद्धस्वरूप, और (उत्, चरत् ) उत्कृष्टता से सर्वव्यापक-है, उसकी कृपा से हमलोग (शतं, शरदः) सौ वर्ष (पश्येम) देखें (शतं, शरदः, जीवेम) सौ घर्ष जीवें (शतं, शरदः, गृणुयाम) सौ वर्ष सुने (शतं, शरदः, प्रव्रवाम) सौ वर्ष उपदेश करें और सुने (अदीनाः, स्याम ) हम स्वतन्त्र हो (च) और (भूयः, शरदः, शतात) सौ वर्ष से अधिक भी देखें, सुने, जीवें, स्वतन्त्र हो और उपदेश करें। भावा०--यह परमात्मा जो सबका द्रष्टा, विद्वानों का हितकारी, सृष्टि से पूर्व विद्यमान, पवित्र और उत्कृष्टता से व्यापक है उसकी कृपा से हमलोग. सौ वर्ष तक स्वतन्त्र जी, सौ वर्ष तक सृष्टि रचना द्वारा उसका दर्शन करते रहें, सौ वर्ष तक उसके गुणकीर्तन करते तथा सुनते रहे, और जो सौ वर्ष से अधिक जीवें तो इसी प्रकार जीवे, ऐसी कृपा करो ॥ गायत्री-गुरुमन्त्र: ओं भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यम्भर्गोदेवस्य- धीमहि । धियो योनः प्रचोदयात् ॥१८ ॥ यजु० ३६ । ३ पदा०-(भूः) प्राणों से प्यारा (भुवः) दुःखविनाशक (स्वः) सुख- स्वरूप (सवितुः) सब जगत् को उत्पन्न करने वाले (तत्) उस (भर्गः) पापनाशक ( घरेण्यं ) पूजनीयतम-सर्वोपरि पूजनीय (देवस्य) देव का (धीमहि) हम ध्यान करते हैं (यः)जो (ना) हमारी (धिव:) बुद्धियों को (प्रचोदयात् ) सदा उत्तम कामो में लगावे अर्थात् शुभमार्ग में चलावे॥ भावा०-जगत्पिता, सर्वोत्तम, उपासनीय, विज्ञानस्वरूप, दिव्यगुण- युक्त, सयके आत्माओं में प्रकाश.करने वाला और सब सुखों का दाता जो परमात्मा है उसको हम प्रेमभक्ति से अपने हृदय में धारण करें ताकि वह हमारी बुद्धियों को उत्तम धर्मयुक्त कामों में लगावे॥ नमस्कार मंत्रः श्रों नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च ॥रहा यज०१६। ४१ पदा०-(शं-भवाय च, मयो-भवाय च) कल्याण तथा सुख के देने वाले परमात्मा को (नमः) नमस्कार है.(शंकरास च, भवस्कराय च) मंगलस्वरूप कर्मकाण्डचन्द्रिका संथा मंगलदाता आपको (नमः) नमस्कार है (शिवाय च, शिवतराय च) कल्या. एस्थरूप और अत्यन्त कल्याणस्वरूप आपको ( नमः) हमारा नमस्कार है || . भावा०-हे सुखस्वरूप तथा सुखदाता परमात्मन् ! आपको हमारा नमस्कार हो, 'हे मंगलस्वरूप तथा मंगलदाता परमेश्वर ! आपको हमारा. नमस्कार हो, हे कल्याणस्वरूप और कल्याणदाता परमात्मन् ! आपको हमारा नमस्कार हो। स्मारण रहे कि पूर्वोक मन्त्री से परमेश्वर की उपासना करने के पश्चात् अपने शुभकमों को इस प्रार्थना के साथ ईश्वर समर्पण करें कि हे दयानिधे परमेश्वर | जो २ उत्तम काम हम आपको कृपा से करते है यह सब आपके अर्पण हैं, दया करो कि हम आपको प्राप्त होकर मनुष्यजीवन के .धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षरूप फलचतुष्टय को प्राप्त हो। इति सन्ध्योपासनविधिः समाप्त: अथ देवयज्ञः प्रारभ्यते १-देवयज्ञ का नाम ही अग्निहोत्र है और इसी के पर्यायवाची होम तथा हवन शब्द हैं। २-अग्ति और होन इन दो शब्दों के मिलने से "अग्निहोत्रम् शब्द बना है, अग्नि का अर्थ ज्ञानस्वरूप ईश्वर और होत्र का अर्थ दान है, अतएव जो दान ईश्वर ईश्वरीय प्रजा के निमित्त दियाजाय उसका नाम "अग्निहोत्र" है, और यह प्रत्यक्ष है कि हवन मैं जिन पदार्थों की आहुतियां दी जाती हैं वह पदार्थ अग्नि के स्पर्श से छिन्न भिन्न होकर वायु को शुद्ध करते हुए मेघमण्डल तक पहुंचते और वाजल को शुद्ध करते हैं जिससे पृथ्वी के सब ‘पदार्थ शुद्ध उत्पन्न होकर प्राणीमात्र को सुख पहुंचाते हैं और यही ईश्वर के निमित्त दान देना कहाता है। ३- विद्वानों का संग और उनकी सेवा तथा दिव्यगुणों का धारण और सत्यविद्या की उन्नति करना भी "देवयज्ञा कहाता है । ४-जैसे सन्ध्या को दोनों काल विधान है वैसे ही हवन भी दोनों काल भवश्य कर्तव्य है, जैसाकि:- (१) ओं सायं सायं गृहपतिरनो अग्नि प्रातः 18 देवयज्ञः प्रातः सोमनस्य दाता। वसोर्वसोर्वसुदान एधी वयं त्वेन धानास तनवं पुषम् ॥ अथर्व० १६॥७॥३ अर्थ-हे घर की रक्षक अग्नि ! तू हमको प्रतिदिन सायंकाल से प्रातःकाल तक सुख देने वाली हो, हे सुखदाता अग्नि ! तू हमको उत्तम २ पदार्थों के प्राप्त कराने वाली हो, ताकि हम तुझको प्रज्वलित करते हुए शरीर को पुष्ट करें। (२) प्रातः प्रातहपतिनों अग्निः सायं सायं सोमनस्य दाता वसोर्वसोर्वसुदान एधीन्धानास्त्वा शतहिमा ऋधम ॥ अथर्व० १६६४ अर्थ-हे घर की रक्षक अग्नि! तू हमको प्रतिदिन प्रातः से सायंकाल तक मुख देने वाली हो, हे सुखदाता अग्नि! त् हमको उत्तम २ पदार्थ प्राप्त कराने वाली हो, हम तुझको प्रज्वलित करते हुए ऋद्धि सिद्धिं को प्राप्त हो । भाव यह है कि हे अग्ने प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! शाप ऐसी कृपा करें कि हमलोग अग्निहोत्र तथा उपासना करते हुए "शतहिमा = सौ हिम ऋतु अर्थात् सौवर्ष पर्यन्त "ऋधम - धनादि पदार्थों से वृद्धि को प्राप्त हो । या यों कहो कि हे परमात्मन् ! आप ऐसी कृपा करें कि हम सौवर्ष पर्यन्त अग्निहोत्रादि कर्म करते हुए सदा लाभ ही लास देखें हमारी हानि कभी न हो। हवन करने का समय प्रातः सूर्योदय से पीछे और लायंकाल सूर्यास्त से पहिले २ है, इवन स्त्री पुरुषं दोनों मिलकर करें, यदि किसी कारण से कमी दोनों न करसकें तो एकही दोनों की ओर से दुगुना हवन करे । हवनपात्र निम्नलिखित हवनपान घर में उपस्थित रहें:- (१) चौकोन " हवनकुंड " जा किसी धातु धा मिट्टी का बारह या सोलह अंगुल लस्था चौड़ा और उतना ही गहरा हो, परन्तु तला इससे चौथाई हो॥ (३) "आज्यस्थाली = वृत रखने का पात्र, जो चौड़े मुंह वाला बना हुआ हो जिसमें से घृताहुती सुगमता से देसकें। (३) "चरस्थाली = सामग्री रखने का पात्र जो धातु अथवा लकड़ी का हो कर्मकाण्डचन्द्रिका (४) "आचमनी, यह शुद्ध धातु का हो जिसमें एक बूंट जल श्रासके। (५) एक "जलपात्र। जिसमें जल और प्राचमनी रखी जाती है। (६) "सुवा, धातु अथवा काकड़ी का हो जिसकी लम्बाई १६ अंगुल और गहराई अंगूठे की गांठ के बराबर हो जिसमें ६ माशे घी श्रासके, क्योंकि कम से कम ६माशे घी की एक बाहुती देनी चाहिये। (७) प्रोक्षणी पात्रा जो तांबे आदि धातु का हो, इससे वेदी के चारो ओर जल छिड़का जातो है ॥ (%) "उदकपात्र, जो कांसी का हो, इसमें कुछ जल भरकर पास रखा जाता है ताकि घृताहुती का शेष "इदन्नमम कहने के समय उसमें छोड़ते जावे, यह घृत हवन के समाप्त होने पर जल से पृथक करके शरीर पर मालिश करने से अनेक रोगों का नाशक और खाने से सुखदायक होता है। (8) एक "चिमटा भी लोहे का पास रहे ॥ हवन के लिये कुछ इकट्ठा धृत शोधकर रख छोडें जिसमें १ लेर पोछे एक रत्ती कस्तूरी और एक माशा केसर पिसी हुई मिली हो । समिधा हर्षन के लिये पलाश, छोकर, पीपल, बड़, गूलर और वेल आदि लकड़ी के छोटे बड़े टुकड़े हवनकुण्ड के परिमाण से कटवा रखें, परन्तु पहिले भले.. प्रकार देख ले कि लकड़ी को कीड़ा न लगा हो और न मलिन हो, समिधाओं को यशशाला के पूर्व में रखें। सामग्री हवन की सामग्री में फेसर, कस्तूरी, लोग, इलायचा, जायफल, जावित्री, बादाम आदि के लिवाय और सब पदार्थ समभाग हो, एक सेर सामग्री में कस्तूरी १ रती और केसर १ माशा डाली जाय और अन्य वस्तुयें चौथाई हों, सामग्री के सव पदार्थों को अच्छी तरह देख भाल कर कूटना चाहिये ताकि दुर्गन्धित वस्तु उनमें मिली न रहे, प्रत्येक माहुती में घी वा अन्य चरु न्यून से न्यून ६ माशे और अधिक से अधिक छटांक भर हो, अधिक चरु. वा घृत की आहुति देने से वह भलेनकार नहीं जलता किन्तु, कच्चा रहकर निष्फल जाता है। - . , देवयज्ञः सामग्री के पदार्थ (१)सुगन्धित पदार्थ-कस्तूरी, केसर, कपूर, अगर, तगर, श्वेत. चन्दन, वालछड़, कपूरकचरी, छिलूरा, लौंग, इलायची, जायफल, जावित्री, धूपलकड़ आदि। (२) पुष्टिकारक पदार्थ-घृत, दुग्ध, बादाम, गिरी, पिश्ता, छुहारा, दाख, चिरोजी मादि। (३) मिष्ट पदार्थ--त्रांड़, शहद आदि । (३) रोगनाशक पदार्थ-गिलोय, तज,नीलोफर,मुलट्ठो,पिचपापड़ा आदि । यह सब पदार्थ धुद्धि तथा बलवर्द्धक और नीरोगता प्राप्त करानेवाले हैं। हवनविधि सायं प्रातः अग्निहोत्र करते समय पूर्वोक शुद्ध किये हुए धृत में से छटांक या अधिक जितनी सामर्थ्य हो लेकर किसी शुद्ध स्थान में पूर्व की ओर मुख करके बैठे और जल, सामग्रो, सब-हवनीय. पदार्थ तथा युवा आदि सय पात्र पास रस्त्रलें ॥ फिर घृत को तपाकर थोडासा सामग्री में मिला और शेष आहुतियों के लिये अलग रहने दें, जब इस प्रकार हवन करने के लिये तैयार होजायं तव निम्नलिखित तीन मन्त्रों से प्रथम तीन आचमन करें:-- (१.) ओं अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा । अर्थ-अमृतस्वरूप परमात्मा जो.मृत्यु के भयरूप समुद्र से तरने के लिये उत्तम नौका है वह हमारा कल्याणकारी हो। (२) ओ अमृतापिधानमसि स्वाहा । अर्थ--अमृतस्वरूप परमात्मा जो सबका धारण करनेवाला है वह हमारे लिये कल्याणकारी हो । (३) ओं सत्यं यशः श्रीमयि श्रीः श्रयतां स्वाहा । अर्थ--सत्यस्वरूप परमात्मा जो मेरा यश तथा ऐश्वर्य और जो सब पेश्वव्यों का ऐश्वर्य है वह परमात्मा कल्याणकारी हो । तत्पश्चात् बायें हाथ में जल लेकर दहने हाथ से निम्नलिखित सात मन्त्रों द्वारा अंग स्पर्श करें:-- [१] अओं वाङ्मऽश्रोस्येऽस्तु । इसले मुख ७२ . कर्मकाण्डचन्द्रिका [२ ] ओं नसोमें प्रोणोऽस्तु । इल्लले नालिका के दोनों छिद्र [३] ओं अणोर्मे चक्षुरस्तु । - इससे दोनों श्रांखें [४] ओ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु। इससे दोनों कान [५] ओं वाहोंमें बलमस्त । इससे दोनों बाहु, [६] ओं ऊर्वोमोजोऽस्तु । इससे दोनों जंघा [७] ओं अरिष्टानि मे अङ्गानितनस्तन्वामे सहसन्तु। इससे सव अंगों पर जल छिड़के पुनः चन्दन, पलाश श्रादि श्रेष्ठ लकड़ी के छोटे २ टुकड़े करके हवन कुण्ड में चिनकर फिर घृतका दीएक जलायें और "ओ भूर्भुवः स्वः" मन्त्र पढ़कर उस दीपक से एक टुकड़ा कपूर का जलाकर जुवा में स्खें और निम्नलिखित मन्त्र पढ़ कर अग्न्याधान अर्थात् कुण्ड में अग्नि स्थापन करें:- अग्न्याधानमन्त्री ओं भूर्भुवः स्वद्यौखि भूम्ना पृथिवीवव्वरिम्णा । तस्यास्ते पृथिवी देवयजनि पृष्ठेऽग्निमन्नादभन्नाद्यायादधे ॥ यजु०.३५ अर्थ-जिलप्रकार सूर्य, भूमि, अन्तरिक्ष तथा दिव्यलोकों में और पृथ्वी अपनी पीठ पर अपने २ ऐश्वर्य से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष पदार्थों का यज्ञ-हवन करते हैं उसी प्रकार में भी अन्न भक्षण करने वाली अग्नि के लिये भक्षण करने योग्य अन्न को देवयज्ञ स्थान में भलेप्रकार स्थापन करके सदा यज्ञ किया करूं। फिर नीचे लिखा मात्र पढ़कर अग्नि प्रज्वलित करें:- ओं उदबुध्यस्वाग्नेप्रति जागृहित्वमिष्टापूर्ते ससृजेथामयं च। अस्मिन्सधस्थेऽध्युत्तरस्मिन् विश्वेदेवा यजमानश्च सीदत ।। यजु०१५ । ५४ देवरना ७३ अर्थ-हे अग्ने ! तू उत्तमता से प्रकाशित हो ताकि ये सब स्त्री पुरुष अविद्यारूप निद्रा से जागकर इष्ट और अपूर्त कयों को भलेप्रकार सिद्ध करें, और हे अग्नेमानस्वरूप परमात्मन् ! आप ऐसी कृपा करें कि सब विद्वान् तथा यजमान इस स्थान पर शव और प्रागे भी उन्नति करते हुए स्थिर रहे। जव अग्नि समिधाओं में प्रविष्ट होने लगे तब चन्दन, पलाश शादि लकड़ी के आठ २ अंगुल लम्बे तीन टुकड़े धी में भिगोकर प्रथम एक समिधा नीचे लिखे मन्त्र से प्रज्वलित अग्नि में चढ़ायः-- समिधाधान मन्त्राः ( १ ) ऑसमिधाग्नि दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम् । आस्मिन् हव्या जुहोतन स्वाहा ॥ इदमग्नये- इदन्नमम ॥ यजु०३ । १ ( इससे एक) अर्थ-हे विद्वानो ! समिधा से अग्नि को प्रज्वलित करके जैसे अतिथि की सेवा करते हैं वैसे ही धृत से अग्नि की सेवा करो अर्थात् इसमें उत्तम हवि की शाहुति दो ताकि वह हमारे लिये कल्याणकारी हो । ( २ ) ओं सुसमिद्धाय शोचिषे घृतं तीव्र जुहोतन। अग्नये जोतवेदसे स्वाहा ।। इंदमग्नये जातवेदसे इदन्नमम ॥ यजु० ३ १ २ ( इससे दूसरी) अर्थ-हे मनुष्यो ! अच्छे प्रकार प्रज्वलित होकर शुद्ध करने वाली अग्नि जो सव पदार्थों में विद्यमान तथा सम्पूर्ण रोगों के निवारण करने वाली है उसको समिधाओं से प्रज्वलित करके उसमें उत्तम गुणयुक्त घृत और मिष्टादि पदार्थों की प्राहुति दें ताकि वह हमारे लिये सुखदायक हो। (३) ओं तन्त्वासमिद्भिरगिरो घृतेन वर्द्धयामसि । बृहच्छोचाय विष्ठय स्वाहा ।। इदमग्नयेऽङ्गिरसे इदन्नमम ।। यजु०३ । ३ (इससे तीसरी) * विद्वानों का सत्कार. ईश्वर का श्राराधन, सत्पुरुषों का संग तथा विद्यादि का दान देना "इष्टकर्मा और पूर्णप्रल, ब्रह्मवर्या, विद्या की सफलता तथा पूर्णयुवावस्था होने के साधनों को उपलब्ध करना " अपूर्त कहाते हैं। "कर्म . कर्मकाण्डचन्द्रिका अर्थ-सवको यथायोग्य भाग पहुंचाने घाली तथा पदार्थों के छेदन भेदन करने में अति बलवान् और जो बड़ी तेजवान् है उस अग्नि को हम लोग काष्ठ की समिधाओं और घृत से प्रदीप्त कर उसमें पवित्र हषि की आहुति दे ताकि वह हमारे लिये मंगलकारी हो। ज्ञात होकि "स्वाहा शब्द का अर्थ कल्याणकारी है अर्थात् प्रज्वलित अग्नि में उत्तम हवि की दीहुई बाहुतियां हमारे लिये कल्याणकारी हो ॥ मन्त्रों के अन्त में "इदन्नममा पदों का अर्थ यह है कि हम लोग जो, हवनादि उत्तम कर्म करते हैं वह अपने लिये नहीं किन्तु लव संसार के लाभार्थ हैं, अधिक क्या यह हवन ही सच्चा दान है जो यजमान, यज्ञकर्ता तथा प्रजा को कल्याण का देने वाला है । पुनः इस मंत्र को एक २ वार पढ़कर पांव धृताहुति :- ओं अयं त इध्म प्रात्मा जातवेदस्तेनेभ्यस्व वर्धस्व चेद्ध- वर्धय चास्मान् प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय स्वाहा । इदमग्नये जातवेदसे इदन्नमम ।। अर्थ-हे जातवेदारिन ! यह उपरोक्त इन्धन = समिधायें तेरी श्रात्मा ध्याप्ति का स्थान हैं, इस इन्धन से तू प्रदीप्त होकर बढ़ और हमको प्रजा, पशु, धार्मिक तेज तथा अन्नादि पदार्थों से समृद्ध कर, हम तुझमें हवन करते हैं, यह हवन अग्नि " और " जातवेदा" = परमेश्वर के निमित्त है मेरे लिये नहीं । फिर प्राक्षणी पात्र में जल भरकर निम्नलिखित मन्त्रों से कुण्ड के चारो और जल सेचन करें: (१) ओं अदितेऽनुमन्यस्व ॥ (इससे पूर्व दिशा में ) ( २ ) ओं अनुमतेऽनुमन्यस्व ।। (इससे पश्चिम में) ( ३.) ओं सरस्वत्यनुमन्यस्व ।। ( इससे उत्तर में) ( ४ ) ओं देव सवितः प्रसुव यज्ञं प्रसुव यज्ञपति भगाय । दिव्योगंधर्वः केतपूः केतनः पुनातु वाचस्पतिर्वाचं नः स्वदतु यक्षु०३०।१ इससे दक्षिण वा सव दिशाओं में) . ॥
देवयज्ञः अर्थ-हे दिव्यगुणयुक्त जगदुत्पादक परमात्मन् ! श्राप दिव्य गुणों को प्राप्ति के लिये हमारे प्रेरक हो, हे यशपति ईश्वर! ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये हमको यज्ञ की प्रेरणा करें, हे उत्तमगुणयुक्त औषधियों के रक्षक ! हमारी आरोग्यता को पवित्र करें, हे गंधर्व वाणी के पति परमात्मन् ! हमारी वाणी को रसदायक करें जिससे हम संसार में सबके मित्र हो। इसके पश्चात् अंगूठे और मध्यमा तथा अनामिका अंगुलियों से सुवा पकड़कर नीचे लिखे मन्त्रों से आहुति दें:- प्रातःकाल के इवनमंत्र (१) ओं सूर्योज्योतिज्योतिः सूर्यः स्वाहा ॥ यजु० ३ । । अर्ध-हे प्रकाशस्वरूप ! हे प्रकाशमान लोकों के प्रकाशक परमात्मन् ! आप हमारे लिये कल्याणकारी हो । (२) ओं सूर्योवों ज्योतिवर्चः स्वाहा ॥ यजु० ३। ६ अर्थ-हे विद्यास्वरूप ! तेजस्वरुप तथा सर्वविद्याओं के प्रकाशक पर- मात्मदेव ! आप हमारे लिये कल्याणकारी हो। (३) ओं ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा ॥ यजु ३।६ अर्थ-हे स्वयंप्रकाश, जगत्प्रकाशक परमात्मन् ! भाप मूर्तिमान सूर्य्या- दिकों के भी प्रकाशक हैं, अतएव आप हमारे लिये कल्याणकारी हो । (४) ओं सजूदेवेन सवित्रा सजूरुषसेन्द्रवत्या जुषाणः सूर्योवेत्तु स्वाहा ॥ अर्थ हे प्रकाशस्वरूप, जगत्पिता परमात्मन् ! आप प्रातःकाल सूर्य की ज्योति का प्रकाश करके हमको विद्यादि सद्गुणों की प्राप्ति करायें और घह सूर्य हमारे लिये कल्याणकारी हो । (५) ओं भरग्नये प्राणाय स्वाहा ॥ अर्थ-प्राणों से प्यारा परमात्मा ज्ञानप्रकाश और प्राणरक्षा * के लिये हमारा कल्याणकारी हो। F - शात हो कि मनुष्य शरीर में पांच प्राय और पांच उपप्राण काम करते ह, जैसाकि:- (१) "माण चायुगजो हृदय में रहकर मुख से भीतर बाहर पाता जाता और भोजन को भीतर लेजाता है। .
कर्मकाण्डचन्द्रिका (६) ओं भुवायवे अपानाय स्वाहा ।। अर्थ-दुःखनिवारक परमामा बलवृद्धि और अपानरक्षा के लिये कल्याणकारी हो। (७)ओं स्वरादित्याय व्यांनाय स्वाहा ।। अर्थ-सुखस्वरूप परमात्मा ज्ञानवृद्धि और व्यानरक्षा के लिये कल्याणकारी हो। (८) श्री भर्भुवः स्वरग्निवायवादित्येभ्यः प्राणापान- व्यानेभ्यः स्वाहा ।। अर्थ प्रणों से प्यार, दुःम्बनिवारक, सुन्दस्वाप परमात्मा वल और ज्ञानवृद्धि के लिये प्राण, अपान तशा ध्यान की रक्षा करते हुए हमारे लिये कल्याणकारी हो। ( ६ ) ओं आपो ज्योतिरसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवःस्वरों स्वाहा ॥ अर्थ-शान्तस्वरूप. प्रकाशस्वरूप, रस तथा अमृतस्वरूप. महान् , प्राणों से प्यारा, दुःख निवारक तथा सुस्वस्वरूप परमात्मा कल्याणकारी दी। -- (२) अपान वायुजो गुदा में रहता और मल मूत्र को बाहर . निकलता है। .' (३) "समान वायुग-जो नाभि में रहता और जठराग्नि की सहायता से खान पान के रस को फोक से पृथक् करता है। (8) "उदान वायु जो करठ में रहता और प्राण को बाहर निक्षा- लता है, बोलना तथा गाना भी इसी से होता है । (५) "व्यान वायुग-जो सर्व शरीर में रहकर रलों को सब जगह पहुंचाता, पसीना लाता और रुधिर को घुमाता हैं, यह पांच प्राण, और:- (१) "नाग वायु-जो डकार लाता तथा वमन कराता है । (२) "कूर्म वायुस-जिससे पलको का झपकना और अंगों का सिकु- इना तथा फैलना होता है। (३)"क्रिकल वायुशन्जो छींक लाता और क्षुधा लगाता है । .(४) "देवदत्त वायु-जो अवाही लाता है। (4) "धनञ्जय वायुस-जो जीवित अवस्था में स्मरण कराता और मृत्यु पश्चात् शरीर को फुलाता है, यह पांच उपप्राण हैं। :- ७७ . पितृयज्ञः (१०)ओं सर्व वै पूर्णस्वाहा ।। अर्थ-अब यह यज्ञ पूर्ण हुआ, हे परमपिता परमात्मन् ! आप हमें ऐसी शक्ति प्रदान करें कि हम लोग प्रतिदिन सायं प्रातः इसी प्रकार श्रद्धापूर्वक हवन समाप्त कियां करें॥ सायंकाल के हवनमन्त्र (१) ओं अग्निज्योतिज्योतिरग्निः स्वाहो ॥ यजु० ३।६ अर्थ-अग्नि परमात्मा, ज्योतिः परमात्मा, प्रकाशमय परमात्मा और ज्ञानस्वरूप परमात्मा हमारे लिये कल्याणकारी हो।। (२) ओं अग्निर्व!ज्योतिर्वचःस्वाहा ।। यजु० ॥ अर्थ -तेजस्वी तथा तेजोमय परमात्मा, जयोतिर्मय परमात्मा और तेज- स्वरूप परमात्मा हमारा कल्याणकारी हो । (३) ओं अग्निज्योतिज्योतिरग्निः स्वाहा ॥ यजु० ३।६ अर्थ-इस मंत्र का अर्थ ऊपर लिख आये हैं, इसका मन से उच्चारण करके श्राहुति दें। (६) ओं सजूदेवेन सवित्रा सजूरात्र्येन्द्रवत्या जुषाणो अग्निर्वेत्तु स्वाहा ॥ यजु० ३।१० अर्थ-जो प्रकाशस्वरूप, जगत्पिता परमात्मा रात्रि के समय चन्द्रमा की ज्योति का प्रकाश करके हमको विद्यादि सद्गुणों में प्रेरता है वह परमात्मा हमारा कल्याणकारी हो। (५) से (१०) तक वही पांच मन्त्र हैं जो प्रातःकाल के हवन मन्त्रों में लिख आये हैं। इति देवयज्ञः समाप्तः ) अथ पितृयज्ञःप्रारभ्यते पितृयज्ञ को "श्राद्ध" और "तर्पण" भी कहते हैं, "श्राद्ध" शब्द श्रत् धातु से बना है जो सत्य का वाचक है, जिस कृत्य से सत्य का ग्रहण किया जाय वह "श्रद्धा" तथा श्रद्धापूर्वक सेवा करने का नाम "श्राद्ध और कर्मकाण्डचन्द्रिका जिस कर्म से माता पितादि जीवित पितरों को तृप्त-सुखयुक्त किया जाय वह "तर्पण। कहाता है। तर्पण तथा श्राद्ध विद्यमान और प्रत्यक्ष पितरों का ही होसकता है मृतको का नहीं, क्योंकि मिलाप हु: बिना सेवा नहीं होसकती और मिलाप जीतों का ही होना सम्भव है मतकों का नहीं, अतएव यहां "पित" शब्द से जीवित माता पिता श्रादि पितरों का ही अहण सार्थक होने से उन्हीं के लिये परमात्मा से प्रार्थना कीगई है कि:- ओं ऊर्जवहन्तिरमृतं घृतं पयः कीलालं परिनुतं स्वधास्थ तर्पयत मे पितॄन् ॥ यजु० २।३४ अर्थ-हे परमात्मन् ! घल पराक्रम देनेवाले उत्तम रसयुक्त घृत, दुग्ध, पक्काम और रस चूते हुर पके फल मेरे पितृ-पिता आदि पितरों को प्राप्त कराके तर्पयत्-तृप्त करें जिससे वह सदा प्रसन्न होकर मुझको सत्योपदेश करते रहे। "पितर शब्द से पिता, माता, पितामह, मातामह शादि तथा श्राचार्य, विद्वान् और अवस्था तथा ज्ञानवृद्ध माननीय पुरुपों का ग्रहण है ।। एक "महापितृयज्ञ" भी होता है जिसमें नीचे लिखे आठ प्रकार के पितरों की सेवा का विधान किया है, जैसाकिः-- (१) "सोमसदा=ब्रह्मविद्या के जानने वाले। (२) "अग्निवात-कलाकौशल विद्या के ज्ञाता । (३) “वहिषद-कृषि विद्या के वेता। "सोमपाश धनस्पतियों और औषधियों के गुण को जानने वोले। (1) "हविर्भुजग-हवन विधि के पूर्ण वेता। (६) आज्यपा-दूध देने और भार उठाने वाले पशुओं का पालन, पोषण और रोगनिवृत्ति की विद्या जानने वाले। (७) "मुकालिना-ब्रह्मविद्या का उपदेश करने वाले। (5) "यमराजा-न्याय व्यवस्था वांधने, पक्षपात् छोड़कर न्याय करने वाले और आप शुद्धावरण रखनेवाले राजकीयपुरुष, इनकी. सेवा तथा आशापालन करना भी "पितृयक्ष' कहाता है ।। इति पिठ्यज्ञः समाप्त
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अथ भूतयज्ञः प्रारभ्यते
-
"भूतयज्ञ" का ही दूसरा नाम "वलिवैश्वदेव यज्ञा है, इसमें (१) कुत्ते
(२) पतित (३) भङ्गो आदि चाण्डाल (४) कुष्ठी आदि पापरोगी (५) कौवे
(६) चिउंटी आदि कृमो कीटादिको के लिये दाल, भात, रोटो श्रादि की छ:
बलि दी जाती हैं, जिसमें प्रमाण यह है कि:-
अहरहर्बलिमित्ते हरन्तोऽश्वायेव तिष्ठतेघासममे ।
रायस्पोषेणसमिषा मदन्तोमाते अग्ने प्रतिवेशारिषाम् ॥
अथर्व '०१६ । ७।७
अर्थ-हे अग्नि परमेश्वर ! जिस प्रकार शुभ इच्छा से हम लोग घोड़े
के आगे खाने योग्य पदार्थ धरते हैं उसी प्रकार शुभ इच्छा से आपको आज्ञा-
नुसार नित्य प्रति बलिवैश्वदेव कर्म को प्राप्त होवें और आप ऐसी कृपा करें कि
सब प्रकार का ऐश्वर्या, लक्ष्मी, घी, दूध आदि पुष्टिकारक पदार्थों से हम लोग
सदा आनन्दित रहे, हे परमगुरो अग्ने परमेश्वर ! हम लोग आपकी आज्ञा के
'विरुद्ध कभी न चले और न अन्याय से किसो प्राणो को पीड़ित करें किन्तु
सबको अपना मिश्र समझकर उनके साथ हित करते हुए उनके पालन
पोषण में सदा तत्पर रहे।
(१) ओं श्वभ्यो नमः (२) ओं पतितेभ्यो नमः
(३) ओं श्वपाभ्यो नमः (४) ओं पापरोगिभ्यो नमः
( ५ ) ओं वायसेभ्यो नमः (६) ओं कृमिभ्यो नमः ।।
घर में बने हुए अन्न में से ऊपर लिखे मंत्रों द्वारा छः भाग निकालकर
पूर्वोक्त चाण्डालादि को देदें, और घृत तथा मिष्टान्नमिश्रित भात, यदि भात न
बना हो तो खारी और लवणान के सिवाय जो कुछ बना हो उसको दश प्राहु-
तियां जो एक २ प्रास के समान हो आगे लिखे दश मन्त्रों से अग्नि पर चढ़ावे.
जो.चूल्हे से निकालकर अलग रखी होः
.(१) ओं अग्नये स्वाहा ।।
(२) ओं सोमाय स्वाहा.॥
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कर्मकाण्डचन्द्रिका
(३)
ओं अग्नीपोमाय स्वाहा !
(४) ओं विश्वेभ्योदेवेभ्यः स्वाहा ॥
(५) ओं धन्वन्तयें स्वाहां ॥
(६) ओं कुह्व स्वाहा।
(७) ओं मनुमत्यै स्वाहा ॥
(८) ओं प्रजापतये स्वाहा ।।
(६) ओं सहद्यावापृथिवीभ्यां स्वाहा । . :
(१०) ओं स्विष्टकृते स्वाहा ॥
तत्पश्चात् निम्नलिखित सोलह मंत्रों से दिशायें आदि के लिये सोलह वलि
पत्तल पर श्रथवा थाली में धरें, यदि बलि धरते समय कोई अतिथि भाजाय तो
उसी को बलि का अन्न निलादें नहीं तो इसकी भो अग्नि में श्रादुतियां देदें ।
ओं सानुगायेन्द्राय नमः ।
अर्थ--इन्द्र-ईश्वर के अनुयायी ऐश्वर्ययुक्त पुरुषों को नमस्कार हो ।
- (पूर्व दिशा के लिये)
(२) ओं सानुगाय यमाय नमः ।
अर्थ--यम-ईश्वर अनु गयी सांसारिक न्यायधीशों को नमस्कार हो ।
(दक्षिण दिशा के लिये)।
(३) ओं सानुगाय वरुणाय नमः !
अर्थ-ईश्वर मक्तों को नमस्कार हो ( पश्चिम दिशा के लिये)।
(8) ओं सानुगाय सोमाय नमः ।
अर्थ-पुण्यात्माओं को नमस्कार हो ( उत्तर दिशा के लिये )।
(५) ओं मरुट्यो नमः ।
अर्थ-प्राणपति ईश्वर को नमस्कार हो (द्वार के लिये)।
(६) ओं अद्भ्यो नमः।
अर्थ-सर्वव्यापक ईश्वर को नमस्कार हो (जल के लिये)।
(७) ओं वनस्पतिभ्यो नमः ।
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। भूतयज्ञः अर्थ-वनस्पतिया के स्वामी ईश्वर को नमस्कार हो (मूसल और ऊखल के लिये)। () ओं श्रियै नमः। अर्थ--सर्व पूजनीय और ऐश्वर्ययुक्त ईश्वर को नमस्कार हो (ईशान- उत्तर पूर्व के बीच की, दिशा के लिये)। . . (६) ओं भद्रकाल्यै नमः। अर्थ-कल्याणकारक ईश्वरीय शक्ति को नमस्कोर हो (नैऋत-दक्षिण और पश्चिम के वीच की दिशा के लिये)। (१०) ओं ब्रह्मपतये नमः। अर्थ-वेद के स्वामी ईश्वर को नमस्कार हो। (११) ओं वास्तुपतय नमः। अर्थ-वास्तुपति ईश्वर को नमस्कारहो (इन दो मंत्रों से मध्य के लिये)। (१२) ओं विश्वेभ्यो देवेभ्यः नमः। अर्थ-विश्वपति और स्वयंप्रकाश ईश्वर को नमस्कार हो। (१३) ओं दिवाचरेभ्यो भूतेभ्यो नमः । अर्थ-दिन में विचरने वाले प्राणियों का सत्कार हो। (१४) ओं नक्तंचारिभ्यो भतेभ्यो नमः । अर्थ--रात्रि को विचरने वाले प्राणियों का सत्कार हो (इन तीन मंत्रों से ऊपर के लिये)। (१५) ओं सर्वात्मभतये नमः। अर्थ-सर्वव्यापक ईश्वरीख सत्ता को नमस्कार हो (इससे पीछे की ओर)। (१६) ओं पितृभ्यःस्वधायिभ्य नमः । अर्थ--शानियों और स्वधा-हविदान के अधिकारियों को नमस्कार हो (इससे दक्षिण की ओर)। इति भूतयज्ञः समासः . ।
- कर्मकाण्डचन्द्रिका अथ नृयज्ञः प्रारभ्यते train नृयज्ञ को ही "अतिथियज्ञा कहते हैं, जो विद्वान्, परोपकारी, जिते. न्द्रिय, सत्यवादी, छल कपट रहित, धार्मिक पुरुष देशाटन करता हुआ अकस्मात् घर आजाय उसको "अतिथि कहते हैं, ऐले अतिथि का सत्कार करके उससे सत्योपदेश ग्रहण करना "अतिथियज्ञ कहाता है, इसमें अनेक बदिक प्रमाण हैं, परन्तु यहां संक्षेप से अथर्ववेद के दो मन्त्र लिखते हैं:- (१) ओं तद्यस्यैवं विद्वान् नात्योऽतिथिहानागच्छेत ॥ अथर्व० १५ १.११ १२११ (२) ओं स्वयमेनमभ्युदेत्य व्रयाद् व्रात्यक्वावासीळ- त्योदकं व्रात्य तर्पयन्तु। व्रात्य यथा ते प्रियं तथास्तु, जात्य यथा ते वशस्तथास्तु । ब्रात्य यथा ते निकामस्तथास्त्विति ।। अथर्व ०१५।११।२१३ अर्थ-इन मंत्रों का भाव यह है कि जब पूर्वोक्त उत्तम गुणयुक्त विद्वान् अकस्मात् अपने घर पाजाय तव गृहस्थ स्वयं उठकर आदरपूर्वक उसको मिले और उत्तम आसन पर विटाकर पूछे कि "हे व्रात्य-उत्तम पुरुष ! आपका निवासस्थान कहां है, हे ब्रायं ! जल लीजिये, हाथ मुंह धोइये, हे व्रात्य ! हम लोग प्रेमभाव से श्रापको तृप्त करेंगे, हे व्रात्य ! जो पदार्थ आपको प्रिय हों वही हम उपस्थित कर, हे नात्य ! जैसी श्रापक्षी इच्छा हो वही हम पूर्ण करेंगे, हे व्रात्य ! जैसी आपकी कामना हो वैसा ही होगा। ऐसे सतोगुणी और सत्कर्मी अतिथि आजकल दुर्लभ हैं, इनके अभाव में जो विद्वान् भार्य पुरुष घर में बाजायं उनका श्रद्धापूर्वक यथायोग्य आदर सन्मान करके उनसे सत्योपदेशं ग्रहण करना "तृयज्ञम जानना चाहिये । इति तृयज्ञः समाप्तः यह वैदिक पांच यज्ञ हैं जिनका विधिपूर्वक अनुष्ठान करने वाला पुरुष पवित्र होकर उस उचपद को प्राप्त होता है जिसको "व्यम्बकं यजामहे मंत्र में वर्णन किया है, इन्हीं का अनुष्ठान करनेवाला सांसारिक ऐश्वर्य पाता और अन्ततः निःश्रेयस को प्राप्त करता है, इसलिये प्रत्येक वैदिकधर्मी का कर्तव्य है 'कि वह निरालस होकर उक्त यज्ञों का पालन करे । समाप्तश्वायं ग्रन्थः
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EEEEEEEEEEEEEER ओ३म् वेदधर्मानुयायी पुरुषों को विदित हो कि श्री पं० आर्यमुनिजी महाराज महर्षि श्री १०८ स्वामी दयानन्दसरस्वतीजी से अपूर्ण रहे हुए ऋग्वेदधाग्य को चिरकाल से यहां काशी में पूर्ण कर रहे हैं जिसके दो माइल छपकर तैयार है अर्थात् "सप्तम मण्डल भू०२||) " और "नवममण्डल" मृग ७) है, "अष्टममण्डला जो बहुत बड़ा और विवादास्पद है, यह कई कारणों से वीच में रहगया था जो अब निरन्तर छप रहा है जिसका "प्रथमखएडा छपकर तैयार है, ०२) यह भाष्य अनेक शिक्षाओं से पूर्ण होने के कारण प्रत्येक वैदिकधर्मी का कर्तव्य है कि इसका मंगाकर स्वाध्याय द्वारा अपना जीवन उच्चधनाचें ॥ उपनिपदार्यभाष्य "प्रथमभाग जिसमें ईश,केन, कट आदि आठ उपनिषदों का पद पदाथ सहित सरल भाषा में विस्तारपूर्वक भाष्य है, काशी में दूसरीवार छपकर तैयार है, मू० सजिन्द ४) "द्वितीयभाग" जिसमें "छान्दोग्य, तथा "वृहदारण्यकाका भाष्य १, छपकर तयार है, इस द्वितीयात्ति में इन दोनों उपनिषदों के भाष्य को पृथक् २ कर दिया है, क्योंकि यह दोनों बड़े २ उपनिषद हैं, छान्दोग्य का मू० २) और वृहदारण्यक का मू० २॥) है, अधिक क्या ब्रह्मविद्याप्रधान दशोपनिषदों पर भारतवर्ष में ऐसा भाष्य कहीं नहीं छपा, भाशा है ब्रह्मविद्या के जिज्ञासु पुरुष उपनिषदों को मंगाकर अवश्य अध्ययन करेंगे। (१) योगार्यभाष्य द्वितीयात्ति-११) (२) भीष्मपितामह का जीवनचरित्र और शरशय्यासमय का सदुपदेश ॥) इनके अतिरिक्त पं०प्रार्यमुनिजी कृत सम्पूर्ण ग्रन्थ नीचे लिले पते पर मिलते हैं। भवन्धका- वेदभाष्य कार्यालय बनारस सिटी 13-SEEEEEEEEED
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