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Rudrasthadhyayi
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॥ श्रीः॥ श्रीयजुर्वेदीय- रुद्राष्टाध्यायी। मुरादाबादनिवासियजुर्वेदभाष्यकारविद्यावारिधि- श्रीपण्डितज्वालाप्रसादमिश्रकृत- संस्कृतार्यभाषाभाष्यसमन्विता । सा च कै खेमराज-श्रीकृष्णदासश्रेष्टिना * मुम्बय्यां * स्वकीये "श्रीवेङ्कटेश्वर” (स्टीम् ) मुद्रणयन्त्रालये मुद्रयित्वा प्रकाशिता । संवत् २०१३, शके १८७८.
मुद्रक और प्रकाशक- खेमराज श्रीकृष्णदास, मालिक-"श्रीवेटेश्वर," स्टीम् प्रेस, बम्बई. नष्पाद सर्वाधिकार "श्रीवेङ्कटवर" मन्त्रालयायवाचीन है।
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पं० ज्वालाप्रसादमिश्र.
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समर्पणपत्रम् । श्रीयुत सर्वगुणसम्पन्न अखण्ड प्रौढप्रताप गोब्राह्मणप्रतिपालक श्रीमन्महाराजाधिराज नेकनामदार ठाकुर साहब श्री १०८ श्रीठाकुर हरिसिंहजी बहादुर महोदय स्वस्थान श्री “धौल” काठियावाड़ की सेवामें यह ग्रंथ सादर समर्पित है। अनुगृहीत- पंडित ज्वालाप्रसाद मिश्र, मुरादाबाद. संवत् १९६७
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CHOTI श्रीठाकुर-हरिसिंहजी बहादुर.
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भूमिका a सम्पूर्णलगत्में वेदकी महिमा कौन नहीं जानता, वेद ही सम्पूर्णज्ञानका भंडार है सर्वज्ञ परमात्माका स्वरूपही वेद है, उपनिषद, स्मृति, पुराण, मीमांसासूत्रादिमें वेदकी महा- प्रशंसा पाईजाती है, पाराशरस्मृतिमें लिखा है.-"वेदो नारायणः साक्षात्म्वयम्भूरिति शुश्रुमा, वेद साक्षात् नारायण स्वयम्भू ही है, ब्राह्मण भागमें भी वेद परमात्माका निःश्वसित कहा हैं-"अरे मैत्रेयि अभ्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदः” इति शत- पथ० जब कि वेद, नारायणम्प नारायणप्रेरित अपौरुषेय और अनादि है और अनन्न- कल्पोंके पहले भी विद्यमान था इसमें अनेक प्रमाण हैं तब यह सम्पूर्ण धार्मिक पुरुषोंकी श्रद्धाकी सामग्री है इसमें शंका ही क्या है । वेद अपने धर्मका मूलग्रंथ है, प्रवृत्ति लक्षण निवृत्ति लक्षण धर्म वेदमें विद्यमान हैं प्रवृत्तिलक्षणवाला धर्म, जिन पुरुषोंको वैराग्य नहीं है उनको क्रमक्रमसे निष्काम कर्मों का बोध कराकर उनसे मनशुद्धि करके निवृत्तिकी ओर ले जाता है, और निवृत्ति लक्षणवाला धर्म ज्ञान वैराग्यरूप होकर साक्षात् मोक्षका साधनरूप होता है, निवृत्तिलक्षणवाले धर्ममें भी ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, और संन्यस्त इन आश्रमोंकी व्यवस्था है ब्रह्मचर्य आश्रममें वेदविद्याके ज्ञानकी प्राप्ति, सन्ध्या, अग्निहोत्र, देवपूजा आदि वैदिककर्मोको करते हुए आचार्यकी सेवा करना मुख्य कर्तव्य है, इस आश्रमकी सम्पूर्णरीति पालन करनेसे इन्द्रिय और अन्तःकरण अपने वशमें होते हैं, पहले आश्रममें ही यदि जीवनपर्यन्त ब्रह्मचर्यकी इच्छा करे और नैष्ठिक ब्रह्मचारी होकर वेदाभ्यास और योग साधन करे तो भी मोक्ष मागमें पहुं- चता है. इस आश्रमके उपरान्त ही चतुर्थ आश्रम संन्यास ग्रहणकैर संसारसे निवृत्त होजाय, यदि इन्द्रिय संयम नहीं हुआ है तो शक्तिके अनुसार आचार्यको दक्षिणा देकर प्रसन्नता- पूर्वक पिताक घर आकर विवाह करके गृहस्थ आश्रममें वेदमें कहे धोका अनुष्ठान करता रहे। गृहस्थाश्रममें पडकर जिससे मन, विषयलोलुप होकर अधोगतिको प्राप्त न हो, और अपनी वृत्तियोंको स्वच्छ रखसकै इसके निमित्त रुद्रका अनुष्ठान करना मुख्य और उत्कृष्ट • साधन है यह रुद्रानुष्ठान ही प्रवृत्ति मार्गसे निवृत्ति मार्गको प्राप्त कराने में समर्थ है। जिस प्रकार दूधर्मेसे मक्खन निकाल लिया जाता है इसी प्रकार द्विजातियोंके कल्याणके निमित्त यह रुद्राष्टाध्यायी वेदका साररूप महात्माओंने संग्रह की है, इसमें कुछ (२) भूमिका। भी संदेह नहीं कि इसमें गृहस्थ धर्म, राजधर्म ज्ञान, वैराग्य, शान्ति. ईश्वरस्तुति आदि अनेक सर्वोत्तमविषयोंका वर्णन है। बदमंत्रों का विनियोग, अर्थ. ऋषियोंका स्मरणादि जाननेका माहात्म्य ब्राह्मण और अनुक्रमणिकामें विशेषरूपसे वर्णन किया है. अर्थ और विनियोगको जानकर जो कार्य किया जायगा वह कल्पवृक्षकी समान विशेषरूपसे फलदायक होता है इससे अर्थका ज्ञान अवश्य होना चाहिये । जैसे "हे रुद्र : झन् दुःख द्रावयति रुद्रः । यद्वा- रुगतौ' ये गत्यर्थास्त ज्ञानार्थाः रवणं रुत् ज्ञानम् भावे विप् तुगागमः । रुत् ज्ञानं राति ददाति रुद्रः ज्ञानप्रदः । वडा-पापिनो नरान् दुःखभोगेन रोदयति रुद्रः।" इस प्रकार अर्थके ज्ञानसे विशेष प्रतिपत्ति होनेसे श्रुतिमें भी विशेषफल प्रतिपादन किया है [ उतत्वः पश्यन्न :ददर्शवाचमुतत्वः शृण्वन्न शृणोत्येनाम् उतोत्वस्मै तन्वं विसले जायेव पत्य उशती सुवासाः ] इत्यादि मंत्रोंमें अर्थज्ञा- नकी प्रशंसा सुनी है, और [ यदू गृहीतमविज्ञातं निगदेनैवशब्द्यते । अनन्नाविवशुष्कधोनत- ज्ज्वलतिकर्हिचित् ] इत्यादि वाक्योंके द्वारा अर्थ न जाननेकी निन्दा सुनी है । दूसरा वचन भी निरुक्तमें लिखा है । स्थाणुरयं भारहारः किलाभूदधीत्य वेदं न विजानाति योऽर्थम्. योऽर्थज्ञ इतः सकलं भद्मश्नुने नाकमेति ज्ञानविधूतपाप्मा ] अर्थात्-जो वेद पढकर उसका अथ नहीं जानता वह ढूंढकी समान भार ढोनेवाला है । और जो अर्थको जानता है वह सब कल्याणोंको प्राप्त होता है । और पापरहित हो वैकुण्ठको प्राप्त होता है. इन वचनोंसे अर्थका जानना सम्पूर्ण कल्याणोंका करनेवाला है । जो कहते हैं कि "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः इस वचनसे पाठ मानसे ही कमानुष्ठानमें सफलता होजाती हैं यह सत्य है. परन्तु अर्थज्ञा- नसे विशेष वीर्यवान् होता है, इससे अर्थज्ञान अवश्य होना चाहिये । इस विषयमें बहुतसे प्रमाण हैं, जिनका यहां लिखना हम उचित नहीं समझते वेदार्थ ज्ञानके निमित्त शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिषकी आवश्यकता होती है। पर भाष्योंमें ये सब सुलभ होजाते हैं, इस कारण हमने संस्कृत और भाषा इन दो प्रकारोंसे रुद्राष्टाध्यायीका. भाष्य आरंभ किया है। उपनिषदस्मृति, पुराण आदिमें रुद्रजापका विशेष माहात्म्य वर्णन किया है मोक्षकी- प्राप्ति, पापनाश, आरोग्य आयुष्यकी प्राप्ति, रुद्रजापसे होती है। जावाल उपनिषद्में लिखा है- अथ हैनं ब्रह्मचारिण ऊचुः किंजप्येनैवामृतत्वमश्नुतः इति बहीति । स होवाच याज्ञवल्क्यः शतरुद्रियेण इति ] अर्थ ब्रह्मचारियोंने याज्ञवल्क्यऋ- पिस प्रश्न किया कि क्या जपनेसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया कि. शतरुद्रियके जपसे। कैवल्य उपनिषद्में लिखा है--[ यः शतरुद्रियमधीते सोमिप्तो भवति स्वर्णस्ते- यात्पूतो भवति सुरापानात्पूतो भवति ब्रह्महत्यातः पूतो भवति कृत्याकृत्यात्पूतो . भूमिका। (३) भवति तस्मादविमुक्तमाश्रितो भवति अत्याश्रमी सर्वदा सकृद्वा जपेदनेन ज्ञानमाप्नोति संसारार्णवनाशनं ' तस्मादेवं विदित्वैनं कैवल्यं फलमश्नुते' इत्याह शातातरः। अर्थ जो शतरुद्रिय पाठ करता है वह जैसे अग्निसे निकाले पदार्थ सुवर्ण आदि पवित्र होजाते हैं, तद्वत् पवित्र होताहै, सोनेकी चोरीके पापसे छूट जाताहै, सुराशनके पापसे रहित होताहै, ब्रह्महत्यासे पवित्र होताहै, कृत्याऋत्यसे पवित्र होता है आश्रमत्यागो भी एकबार पाठमात्रसे पवित्र होताहै, इसके नपसे ज्ञानकी प्राप्ति होतीहै संसारसागरसे पार होजाताहै ! इसकारण इसको जानकर कैवल्यकी प्राप्ति होतीहै इसप्रकार शातातप कहतेहैं । [स्तेयं कृत्वा गुरुदारांश्च गत्वा. मधं पीत्वा ब्रह्महत्यां च धृत्वा । भस्मच्छन्नो' भस्मशय्याशयानो रुद्राध्यायी मुच्यते सर्वपापैरिति ] अर्थ सुवर्णकी चोरी, गुरुस्त्रीमें गमन, मद्यपान, ब्रह्महत्यादि पाप करके सर्वांगमें भस्म लेपन करके भस्ममें शयन करनेवाला रुद्राध्यायीके पाठसे सब पापोंसे छूट जाता है । याज्ञवल्क्य कहतेहैं [ सुरापः स्वर्णहारी च रुद्रनापी जले स्थितः । सहस्रशीर्षाजापो च मुच्यते सर्वकिल्बिषः । ] अर्थात-मद्य पीनेवाला सुवर्णकी चोरी करनेवाला जो जलमें स्थित होकर रुद्राध्यायका जप करता है, तथा सहस्र शीर्षा इस अध्यायको पढताहै, वह सबपापोंस छूट जाताहै। तथा च- रुद्रैकादशिनी जत्वा तदव विशुध्यति ] अर्थात्-एकादश बार रुद्रजापसे उसीदिन शुद्ध होजाताहै । महात्माशङ्खजी कहतेहैं [ स्वणस्तयी रुद्राध्यायी मुच्यते । ] अर्थात् सुवर्णस्तयों रुद्राध्यायके पाठसे मुक्त होताहै । तथा च वायुपुराणे- यश्व रुद्राअपेन्नित्यं ध्यायमानो महेश्वरम् ॥ यश्च सागरपर्यन्तां सशैलवनकाननाम् ॥ १ ॥ सर्वान्नात्मगुणोपेतां सुवृक्षजलशोभिताम् ।। दद्यात्काञ्चनसंयुक्तां भूमि चौषधिसंयुताम् ।। तस्मादप्यधिकं तस्य सकृद्रुदजपाद्भवेत् ॥ २ ॥ मम भावं समुत्सृज्य यस्तु रुद्राक्षपेत्सदा ।। स तेनैव च देहेन रुद्रः संजायते ध्रुवम् ॥ ३ ॥" अर्थ-वायुपुराणमें लिखाहै जो महेश्वरका ध्यान करताहुआ एकबार रुद्रीका जप करताहै उसको, जो शैल वन काननके सहित, सबश्रेष्ठगुणोंसे युक्त, अच्छे वृक्ष और जलोंसे शोभित, सुवर्ण और ओषधि सहित, समुद्रपर्यंत पृथिवीको दान करताहै उससे भी अधिक फल होताहै । अर्थात् रुद्रीजपका फल इससे विशेषहै । और जो ममत्वको छोड़कर सदा रुद्रदेवका जप करताहै वह उसीदेहसे निश्चय रुद्र होजाता है।
१४) भूमिका। • चमकं नमकं चैव पौरुषसूक्तं तथैव च ।। नित्यं त्रयं प्रयुञ्जानो ब्रह्मलोके महीयते ॥ १ ॥ चमकं नमकं होतॄन्पुरुषसूक्तं जपेत्सदा ॥ प्रविशेत्स महादेवं गृहं गृहपतिर्यथा ॥ २ ॥ भम्मदिग्धशरीरस्तु भन्मशायी जितेन्द्रिथः ॥ सनतं रुद्रजाप्योऽसौ परांमुक्तिमवाप्स्यति ॥ ३ ॥ गेगवान्पापवांश्चैव रुद्रं जप्त्वा जितेन्द्रियः ॥ रोगात्पापाद्विनिर्मुक्तो ह्यतुलं सुखमश्नुते ।। ४ ॥ अथे--चमकनामक अध्याय तथा पुरुषसूक्त तीनवार जपनेसे ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा पाताहै । जो चमक नमक तथा पुरुषसूक्तका सहा जप करतेहैं, वह महादेवमें से प्रवेश कराते हैं जैसे गृहपति अपने घरमें प्रवेश करजाताहै ।। २ ।। शरीरमें भन्म लगानेसे, भस्ममें शयनकरनेसे, जितेन्द्रिय होकर निरन्तर रुद्राध्यायका पाठकर - नेसे मनुष्य मुक्त होजाताहै ॥ ३ ॥ और जो रोगी तथा पापी भी जितेन्द्रिय होकर रुद्राध्यायका पाठ करे तो रोग और पापसे निवृत्त होकर महामुग्यको प्राप्त होताहै ॥ ४॥ आहच शंख रहसि कृतानां महापातकानामपि शतरुद्रियं प्रायश्चित्तमिति । अर्थ-शंग्वऋषि कहतेहैं कि गुप्तमहापातकोंकाभी प्रायश्चित्त शतरुद्रियका जपहै । शतरुद्रिय इसका नाम इसकारण है कि रुद्रदेवता १०० संख्यावाले हैं यह रुद्रोप- निषदू है इसमें शिवात्मकब्रह्मका निरूपण हैं। ब्रह्मके तीन रूप हैं एक तो कार्यरूप सबका उपादानकारण सर्वात्मक, दूसरा सृष्टिस्थितिसंहारनिमित्तक पुरुषनामवाला, तीसरा अविद्यासे परे निर्गुण निरञ्जन सन्य ज्ञान आनन्दके लक्षणवाला, यह रुद्रके मुख्यस्वरूप है। इस ग्रंथमें ब्रह्मके सगुण निर्गुण दोनोंप्रकारके रूपोंका वर्णन है, परमात्माकी उपासना, भक्तिमहिमा, शान्ति, पुत्रपौत्रादिकी वृद्धि, नीरोगता, यज्ञिय पदार्थ आदि कितनीही वस्तुओंका वर्णन है इसके पाठसे पाठकोंको यह भलीप्रकारसे विदित हो जायगा, कि यह मंत्र विभागरूप ग्रन्थ अल्प कालका नहीं है । जब कि उपनिषदोंमें स्मृति पुराणोंमें इसके पाठका माहात्म्य वर्णन किया है तब प्राचीन समयमें ही यह यजुर्वेदसे कार्यके योग्य संग्रह हो चुका था इसमें कोई सन्देह नहीं है। जिस प्रकार पूजा पाठके गुटके विद्वान् महात्मा अपने पास रखते हैं इसी प्रकार त्रिवर्णमात्रको यह ग्रंथ अपने पास रखना चाहिये । यद्यपि संस्कृत भाष्य तथा टीकों सहित है पर भूमिका। यह ग्रंथ एक दो जगह प्रकाशित हुआ उसमें सर्व साधारणकी उपयोगिता न होनेके कारण हमने उन त्रुटियोंको इसमेंसे दूर करके द्विज मात्रके उपयोगी इस ग्रन्थको बना दिया है। इसका क्रम इस प्रकारसे रखा है कि पहले मन्त्र, फिर उसका ऋषिछन्द-देवता तथा विनियोग. संस्कृत में पदार्थके सहित मन्त्रभाध्य, पीछे भाषामें सरलार्थ वर्णन किया है । साथमें इस बात का भी विचार रक्खा है कि अपनी ओरसे भाषामें भी पदोंको नहीं वढाया है. हमने यही इसमें विचार रक्खा है कि जिससे भाषामें भी वेदके मन्त्रोंका अर्थ ऐसा रहना चाहिये कि जिससे वेदार्थका विज्ञान भली प्रकार होजाय । इसी शैलीसे यजुर्वेदीय उपासनाकाण्ड तथा मंत्रार्थ दीपिका यह और दो ग्रंथ तैयार हो रहे हैं, और आशा है कि वह बहुत शीघ्र तैयार हो जायेंगे । एक बात हमको यहां विशेष रूपसे और कहना है, वह यह है कि इस समय भी देशमें पंडितोंकी कमी नहीं है तथा अनुवादके ग्रंथ भी तैयार होते हैं पर जहांतक हम देखते है बहुत कम तैयार होते हैं, हां जिनके पास कुछ मसाला है वह केवल अपना महत्त्व- विधायक ग्रंथ बनाकर छपा देते हैं जिससे धार्मिक समूहोंको कोई लाभ नहीं पहुंचता, देखिये महाराजा बुकने सायणाचार्यजीसे वेदोंका भाष्य कराकर कितना जगत्का उपकार किया है, अब भी श्रीमानोंके, नरपतियोंके दूसरे कार्योंमें सहस्रों नहीं लक्षों रुपये व्यय होते हैं यदि थोडा भी श्रीमानोंकी कृपादृष्टि इधर होजाय और चारों वेदों, ब्राह्मण भागोंका रहस्योंके. सहित हिन्दी भाषामें अनुवाद होजाय तो जगत्का कितना उपकार हो सकता है, जगन्में वेदोंका महत्त्व बहुत शीघ्र प्रकाशित हो सकता है । महामण्डलके नेताओंका ध्यान हम इस ओर आकर्षित करते हैं, कि, आप लोगोंने प्रयाग जैसे पवित्र तीर्थराजमें कुम्भपर क्या क्या प्रतिज्ञायें की थीं, काशीमें ब्रह्मचारी आश्रम खोलनेको कहा था, शास्त्र प्रचार विभागसे वैदिक ग्रंथोंके निकालनेकी प्रतिज्ञा की थी, धर्म- वक्ताओंको मूल सहायक समझकर उनके उत्साह वृद्धिका प्रण किया था धर्म सभाओंको लाभ पहुँचानेका वचन दिया था, आजतक उसमेंसे एक बात भी हुई ? एक भी नहीं, केवल आशाही आशा शब्द सुनाई आये यदि ऊपरी बात छोड़कर, कर्तव्य पालन किया जाय तो बहुत कुछ उपकार हो सकता है, यदि कोई अपने पुरुषार्थसे कोई कार्य करै और दूसरा उसके अपना कर्तव्य बतावै तो यह भुलावा या पालसीके सिवाय और क्या है ? हां यदि शास्त्रप्रचार, विद्याप्रचार, धर्मप्रचारमें हम वैश्यवंशावतंस देश हितैषी धर्मप्रचार निरत श्रेष्ठी श्रीयुत खेमराज श्रीकृष्णदासजी महोदय मालिक " श्रीवेंकटेश्वर " यन्त्रालयको सहस्रों धन्यवाद दें तो भी उनके लिये वह थोडे हैं, कारण कि आपने (६) भूमिका। बहुतसा धन व्यय कर तथा परिश्रम उठाकर पुरातन उपयोगी ग्रन्थोंकी खोज कर सर्व साधारणके उपकारके निमित्त भाषानुवाद सहित अनेक ग्रन्थोंको प्रकाशित किया है और कर रहे हैं, हम परमात्मासे चाहते हैं प्रार्थना करते हैं कि, उक्त सेठजी दीर्घायु होकर पुत्र पौत्रोंकी तथा लक्ष्मीकी वृद्धिके सहित संसारका उपकार करते हुए चार पदार्थों के भागी हों। उन्हीं सर्वगुण सम्पन्न सेठजीके लिये मैंने यह परमोपयोगी ग्रन्थ निर्माण करके सब प्रकारके सत्त्वसहित प्रकाश करनेको समर्पण कर दिया है, इसके प्रकाशादि करनेके वही अधिकारी हैं। यहां यह कह देना भी परम उपयोगी है कि इस भाष्य अनुवादमें श्रीसायणाचार्य, श्रीमहीधर और श्रीउब्बटजीके भाष्योंसे बहुत कुछ संग्रह किया है । इस प्रकारसे यह ग्रंथ पाठकोंके अवलोकनार्थ उपस्थित है, यदि इसमें कोई त्रुष्टि रह गई हो तो पाठकगण अपनी उदारतासे उसे क्षमा कर सूचना देंगे तो दूसरी वारमें ठीक कर दी जायगी। - सज्जनोंका अनुगृहीत- ज्वालाप्रसाद मिश्र, आषाढकृष्ण १३ दिनदारपुरा संवत् १९६६ मुरादाबाद.
॥ श्रीः॥ अथ पूजाप्रयोगः। आचम्य प्राणानायम्य नमस्कारं कुर्यात् । श्रीमन्महागणाधिपतये नमः । इष्टदेवताभ्यो नमः । श्रीमदुमामहेश्वराभ्यां नमः । कुलदेवताभ्यो नमः । सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः ॥ सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः ।। लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः ।। १ ।। धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ॥ द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ।। २ । विद्यारम्भे विवाहं च प्रवेशे निर्गमे तथा ।। संग्राम सङ्कटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥ ३ ॥ शुक्लाम्बरधरं देवं शुक्लवर्णश्चतुर्भुजन् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ ४ ॥ अभीप्सितार्थसिद्धयर्थ पूजितो यः सुरासुरैः ।। सर्वविघ्नहरस्तस्मै गणाधिपतये नमः ॥ ५ ॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तु ते ॥ ६ ॥ सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम् ।। येषां हृदिस्थो भगवान्मङ्गलायतन हरिः ।। ७ । लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः ।। येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः ॥ ८ ॥ सर्वेष्वारम्भकार्येषु त्रयस्त्रिभुवनेश्वराः ॥ देवा दिशन्तु नः सिद्धिं ब्रह्मेशानजनार्दनाः ॥ ९ ॥ विनायकं गुरुं भानुं ब्रह्मविष्णु महेश्वरान् ॥ सरस्वतीं प्रणम्यादौ सर्वकार्यार्थसिद्धये ॥१०॥ अथ सङ्कल्पः। ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य नागो "द्वितीये परार्द्ध श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे आर्यावर्तान्तर्गतब्रह्मावतकदेशे बौद्ध:वतारे अमुकनामसंवत्सरे अमुकायने अकौं अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकवासरे अमुकतिथी अमुकनक्षत्रे अमुकराशिस्थिते चन्द्रे अमुकराशिस्थिते भास्करे शेपेषु ग्रहेषु यथास्था नस्थितेषु सत्सु एवंगुणविशिष्टायां पुण्यतिथी ममात्मनः श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थम्, सकलकामनासंसिद्धयर्थम्. सर्वत्र यशोविजय (८) पूजाप्रयोगः। लाभाडिप्राप्त्यर्थम्, जन्मजन्मान्तरदुरितोपशमनाथम् . मम सभार्यम्य सपुत्रम्य सबान्धवम्याग्विन- लकुटुम्ब सहितन्य सपशोः समन्तभयव्याधिजरापीडामृत्युपरिहारद्वारा आयुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्ध्यर्थ तथा मम जन्मराशेः सकाशाद्ये केचिद्विरुद्धचतुर्थाष्टमद्वादशस्थानस्थितक्रूरग्रहास्तैम्सूचिनं सूच- विष्यमाणं च यत्सवारिष्टं तद्विनाशद्वारा एकादशस्थानस्थितवच्छुभफलप्राप्त्यर्थम् पुत्रपौत्रादि- सन्ततेरविच्छिन्नवृद्ध्यर्थमाधिदैविकाधिभौतिकाध्यात्मिकत्रिविधतापोपशमनार्थ धर्मार्थकाममोक्ष- फलप्राप्त्यर्थ रुद्राभिषेकानन्तरं श्रीरुद्राष्टकम्य पाठमहं करिष्ये । अथ रुद्राभिषेकप्रकारः। ॐ यजायत इत्यादिभिावभ्राडित्यनुवाकान्तैः पञ्चभिरङ्गमन्त्रैः पूर्वमभिषेकः । भूः ॐ भुवः स्वः ॐनमस्ते रुद्रेत्यादिना तमेषां जम्भे दध्मः । ॐभूः भुवः *म्वः ॐइत्यन्तेनाष्टप्रणवयुक्तेन रुद्राध्यायेन रुद्राध्यायेन चाभिषेकः । ॐवयठं सोमत्यष्ट- भिः चण्डिकाभिश्च कामेवानां तु सप्तकाण्डिकाभिरिति विशेषः । ॐ उग्रश्चंति तिमृभिः मनभिवा रुद्रजटानानी भिधति परशुरामाइयः निर्मूलत्वान्नेति देवयाज्ञिकादयः ॥ ॐबाजश्च मे इत्यष्टानुवाकात्मकेन चेति देवयाज्ञिकाः । महच्छिरसाभिषेकपझेन चमकानुवाकैरभिषेकः । चमकानुवाकरभिषेकपक्ष तु न महच्छिर साभिषेक इत्यपरे । ॐऋचं वाचं प्रपद्य इति शान्त्ययायेन शान्तिकरणम् । ॐशान्तिरिति त्रिरुच्चारणं वा इत्येको रुद्राभिषेकप्रकारः ।। अथापरप्रकारः । ॐ यज्जाग्रत इत्यादिभिर्नमस्ते रुद्रेति रौद्राध्यायान्तैः षड्भिरङ्गमंत्रः पूर्वमभिषेकः । ॐभूः ॐ भुवः । ॐबः ॐनमस्ते रुद्रेत्यादिना तमेषां जम्भे दध्मः ॐभूः ॐभुवावः ओमित्यन्तेनाष्टप्रणवयुक्तेन रौद्राध्यायेनाभिषिच्य ॐवयर्ट.० सोमेत्यष्टभिः कण्डिकाभिरभिषेकः । ॐउग्रश्चेति तिसृभिः सप्तभिर्वा । महच्छिरो रुद्रजटाभ्यामभिषेकाऽभाव- पक्षे तु बाजध म इत्यष्टानुवाकेनाभिषेकः । ॐऋचं वाचमिति शान्त्यव्यायेन पक्षद्वयेऽपि शांतिकरणम् । ॐशांतिरिति त्रिरुचारणं वा इति द्वितीयप्रकारः । बृहत्पाराशरस्मृतिमते तु-पञ्चाङ्गमन्त्रपूर्वकरौद्राध्यायस्येव जपोन्ते च शान्तिकरणमित्यय-. मेव रुद्रजमो न तु पुनरन्यस्य कस्यचिन्मंत्रस्य जप इति विशेषः एवमभिषिच्य षट्षष्टिील. मूक्तं च पुनः षोडषऋचो जपेत् । एष ते द्वे नमस्ते द्वे नतं विद्वयमेव च । मीढुष्टमेति चत्वारि ह्यतच्च शनमद्रियम् । नीलसूक्तं वय:.० सोमेत्यष्टौ । इति तृतीयप्रकारः ।
ॐ श्रीवेदपुरुषाय नमः। अथ रुद्राष्टाध्यायी। भाष्यसहिता। ★ अथ प्रथमोऽध्यायः। मन्त्रः। हरि ॐ ॥ गणानान्वागणपति:हवामहेप्रियाणान्त्वा प्रियपति:हवामहेनिधीनान्त्वानिधिपति:हवामहेव . सोमम ॥ आह मंजानिग धमात्त्वमजासिगर्भ धम् ॥१॥ ॐ गणानां त्वेत्यस्य प्रजापतिक्रषिः । आर्षी बृहती छन्दः। लिङ्गोक्ता देवता । अश्वप्रक्रमणे विनियोगः । बसोममेत्यस्य साम्रीपंक्तिश्छन्दः । महिष्या अश्वसमीपे संवेशने विनियोगः ॥१॥ भाष्यम्-हे ब्रह्मणस्पते वयम् ( गणनाम् ) गणानां मध्ये ( गणपतिम् ) गणाकूष्माण्डा दयः तेषां पालकम् । यद्वा-गणनीयानां पदार्थसमूहानां स्वामिनम् (त्वा ) त्वाम् ( हवामहे) आह्वयामः । ( प्रियाणाम् ) वल्लभानामिष्टमित्रादीनां मध्ये (प्रियपतिम् ) प्रियस्य पालकम् ( त्वा ) त्वाम् ( हवामहे ) आह्वयामः । (निधीनाम् ) निधयः पद्मादयः निधीनां मध्ये ( निधिपतिम् ) सुखनिधेः पालकम् ( त्वा ) त्वाम् ( हवामहे ) आहृयामः । विनोपशमाय भायर्यादिप्रियलाभाय च त्वाम् आह्वयामीति वाक्यार्थः ( वसो ) वसत्यस्मिन्सर्वं जगद्वा यत्र वसति स वसुः तत्सम्बुद्धौं हे वसो सर्वस्वभूतदेव ! त्वम् ( मम ) मम पालको भूया इति शेषः । हे प्रजापते ( गर्भधम् गर्भं दधातीति गर्भधं गर्भधारकं रेतः । अर्थात् कर्मफलप्रजननसामर्थ्यवारक श्रद्धाख्यमुदकम् 'रेत उदकनामसु पठितम्' [ निघं० १।१२। ( आ अजानि) आकृष्य 1 वै (२) रुद्राष्टाध्यायी [प्रथमो- क्षिपामि श्रद्धया स्वीकृत्य फलोन्मुखीकरोमि (त्वम् ) त्वञ्च ( गर्भधम् ) रेतः श्रद्धाख्यमुदकम् ( आ अजासि ) श्रद्धयाकृष्य क्षिपसि श्रद्धयाकृष्टा देवताः कर्मफलप्रदानमवश्यं कुर्वन्ति [अजु० अ० २३ मं० १९] प्रमाणानि-गणानान्त्वागणपतिठ हवामह इति पत्न्यः परियन्त्यपहुवत एवास्मा एत' दतोन्ये वास्मै हुवतेऽथो धुवत एवैनं त्रिः परियन्ति त्रयो वा इमे लोका एभिरेवैनं लोक- धुंवते . त्रिः पुनः परियन्नि षट् सम्पद्यन्ते षड्वाऽऋतव ऋतुभिरेवैनं धुवते ४ अप वा एतेभ्यः प्राणाः कामन्ति ये यज्ञे धुन्वनं तन्वते नवकृत्वा परियन्ति नव प्राणाः प्राणानेवा- स्मन्दधते नभ्यः प्राणाः अपक्रामन्याहमजानि गर्भवमात्वमजासि गर्भधमिति प्रजा वै पशवो गर्भः प्रजामेव पशूनात्मन्धत्ते [ श० कां० १३ अ० २ ब्रा०.२ कं० ४-५ ] गणानान्त्वा गणपतिं हवामहे ब्रह्मणसत्यं ब्रह्म वै ब्रह्मणस्पतिर्ब्रह्मणैवेनं तद्भिषज्यति [ एतरे० पं० १ कं० २१ ] राष्ट्रमश्वमेधोज्योतिरेव तद्राष्ट्रे दधाति [ श० कां० १३ अ० २ ब्रा २ कं०१६] अयं मन्त्रः संहितायामश्वमेधप्रस्तावे पठितस्तत्राश्वस्तुतिरस्य मन्त्रस्य वाच्योर्थः । स च यजमानपत्नीनां परिक्रमन्तीनां कौणामतो वयमिति बहुवचनान्तेनास्मदो निर्देशः । सद्भावेऽपि वह्वीनां पत्नीनां यस्य न स्यात्पुत्रोत्पादनन्तेनाप्यस्य कर्तव्यता ज्ञायते ॥ १ ॥ भाषार्थ-हे प्रजापते गणपते हम कूप्माण्डादि गणोंके मध्य में गणपतिरूपसे वा गणनीय. पदार्थोके मध्यमें स्वामीरूपसे आपको बुलाते हैं, प्यारे इष्टमित्रादिके मध्य में प्रियजनोंके पालक आपको बुलातेहैं, पद्मादिनिधियोंके मध्यमें सुखनिधिक पालक आपको हम बुलाते हैं, आशय यह कि विघ्नशान्ति और भार्यादि प्रियजनोंके लाभके निमित्त हम आपकी स्तुति करते हैं । हे हमारे सर्वस्वधन तुम हमारे पालक हो “ अहं त्वया अजानि" आपने हमको प्रगट किया है मैं गर्भसे उत्पन्न हूं आप अज अविनाशी सब जगको गर्भद्वारा प्रगट करते हो. जीव गर्भद्वारा प्रगट होताहै और आप स्वतंत्रतासे प्रगट हुएहो, और तुमसे सब जगत प्रगट होताहै । १ यजुर्वेद औत कर्मानुष्ठानमें यह मंत्र अश्वमेध प्रकरणोंमें प्रजातिरूप अश्वकी स्तुतिमें हैं, इससे राजामें क्षात्रतेज और वैश्यमें वैश्यत्व वृद्धिको प्राप्त होता है, और जिस सार्वभौम महीपाल के सन्तान न हो अश्वमेध यज्ञसे उसके सन्तान होती है, इस अनुष्ठानमें महिषी पुत्रवती होती है इस अनुष्ठानमें इस कण्डिकाके पहले तीन मंत्रोंसे पत्नी तीन प्रद- क्षिणा करे, तीन प्रकार इस भांति प्रदक्षिणा करनेसे प्रजापति देवताके ध्यानसे मानों त्रिलो- कीकी परिक्रमा की, फिर तीन परिक्रमा करनेसे छह होती हैं. ऐसा करनेसे, मानो छह ऋतुओंसे समृद्धि की, फिर तीसरे मंत्रसे तीन परिक्रमा करनेसे, मानों नौ प्राण आत्मामें धारण किये जाते हैं, फिर वे प्राण दृढ होजाते हैं, वह जो अश्व विश्वकी परिक्रमा कर आया है उसके प्रभावसे पत्नीमें दृढप्राणवाला पुत्र चक्रवर्ती होता है उस प्राणवलके सम्पादन उपरान्त पत्नी “आहमजानि०" इस मंत्रार्थको धारण करै। अध्यात्ममें प्रजापशु गर्भ है प्रजापशुंम आत्माको धारण किया जाता है, परिक्रमाके समय पत्नीद्वारा उच्चरितमंत्रार्थ- हे देवगणोंके मध्यमें गणरूपसे पालक ! आपको हम बुलाती हैं, प्रियोंके मध्य में प्रियोंके पालक अथवा सबसे अधिक होनेसे आत्मा ही प्रियपति है कारण कि, आत्माके निमित्त सवको त्याग देना होता है,इससे प्रियपति आपको हम बुलाबी हैं, ; सुख निधियोंके मध्य में वा विद्या आदि पोषण करनेवालोंके मध्यमें सुख निधिके पालक आपको हम बुलाती हैं, हे ऽध्यायः १] भाष्यसहिता। (३) प्रजापते ! व्यापक होकर सब जगतमें निवास करनेके कारण तुम मेरे पालक हूजिये । ( अगले मंत्रसे अश्वका स्पर्श कर परमेश्वरसे प्रार्थना है ) में गर्भ धारण करानेवाले रेत अर्थात् कर्मफल उत्पन्न करनेकी सामर्थ्य धारण करनेवाले श्रद्धा नामक जलको सब प्रकारस आकर्षण करती हूं, अर्थात् श्रद्धासे स्वीकार करके फलके उन्मुख करती हूं, आप गर्भ धारग कराते अर्थात् श्रद्धा नामक जलको आकर्षण कर उत्सर्ग अर्थात् फलोन्मुख करते हो । अपना गर्भके समान सब संसारकी धारक प्रीतिक धारण करनेवाले वा अपनी शक्तिसे जगन्हें अनादि कारण गर्भके धारण करनेवाले, वा सम्पूर्ण मूर्तिमान पदार्थोकी रचना करनेवाले आपको सब प्रकारसे सन्मुख करती हूं, सब जगतके तत्त्वोंमें गर्भरूप बीजको धारण करने- वाले आप सब प्रकार जानते वा सन्मुख होते हो ॥ १ ॥ मन्त्रः। गायत्रीत्रिष्टुब्जगत्यनुष्टुप्पङ्क्तयासह॥ दृहत्युष्णिांक कुप्सूचीभि शम्म्यन्तुत्वा ॥२॥ ॐ गायत्रीत्यस्य प्रजापतिऋषिः । उष्णिक् छन्दः । अश्वो देवता । अश्वशरीरे रेखाकरणे विनियोगः ॥२॥ भाष्यम्-हे अश्व (गायत्री ) गायत्री ( त्रिगुप् । त्रिष्टुप् (जगती) जगती (अनुष्टुप्) अनुष्टुप् (पंक्त्या सह ) पंक्त्या सह (बृहती) बृहती ( उष्णिहा सह) उष्णिहा सह ( ककुप् ) ककुप् एतानि छन्दा सि (सूचीभिः) एताभिः सूचीभिः (त्वा) त्वाम् (शम्यन्तु) संस्कुर्वन्तु"विशो वै सूच्यो राष्ट्रमश्वमेधो विशंचैवास्मिन् राष्ट्रे समीची दधति' [श० १३ । २ । १०२] अश्वो यत ईश्वरो वा अश्वः [१३ ।। ३ । ८ । ८] [यजु२३ ३३ ] ॥२॥ भाषार्थ हे अश्वरूप देव ! गायत्री अर्थात् गानेवालेका रक्षक गायत्री छन्द, तीनों तापोंका रोधक त्रिष्टुप् छन्द, जगत्में विस्तीर्ण जगती छन्द, संसारका दुःखरोधक अनुष्टुप्, पंक्ति छन्दके साथ बृहती, प्रभात प्रियकारी उष्णिक् छन्द, अच्छे पदार्थोंवाला ककुप छन्द, सूचियों द्वारा तुमको शान्त करे । प्रजाका नाम पक्षान्तरमें सूची राष्ट्र अश्वमेध है यही राज्यको शान्त रखती है ॥२॥ ब्रह्मस्तुतिपक्षमें-गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती, अनुष्टुप्, पक्ति, बृहती, उष्णिक्, ककुप, छन्द, इन सबक द्वारा सब दिशाओंमें सुन्दर उक्तियों के द्वारा सब कोई आपकी स्तुति प्रार्थना करते हैं ॥२॥ २४ अक्षरका गायत्री छन्द, विष्टुप् ४४ का, जगती ४८, अनुष्टुप् ३२, बृहती ३६, डणिक २८, पंक्ति ४० अक्षरका होता है ।।२।। .
(४) रुद्राष्टाध्यायी- [प्रथमो- क मन्त्रः । हिपदायाश्चतुष्पदात्रिपदायाश्चषट्पदा ॥ विच्छे न्दायाश्चसच्छन्दात्सूचीभि शम्म्यन्तुत्त्वा ॥३॥ ॐद्विपदेत्यस्य प्रजापतिषिः । अनुष्टुप् छन्दः । अखो देवता वि० पू० ॥३॥ भाष्यम् ( द्विपदाः ) द्वे पदे यासां ता द्विपदाः ( याः ) याः ( चतुष्पदा ) चतुष्पदाः (याः याः ) त्रिपदाः ( त्रिपदाः ) याः ( याः ) षट्पदाः) षट्पदाः (याः) (विच्छन्दाः) विगतं छन्दो याभ्यस्ताः छन्दोलक्षणहीनाः (याः) (सच्छन्दाः) छन्दो लक्षणयुताः ता. सर्वाः छन्दोलक्षणजातयः (सूचीभिः ) सूचीभिः (वा) त्वाम् ( शम्यन्तु ) संस्कुर्वन्तु यजु० २३ । ३४ ] ॥३॥: भाषार्थ-दो पदोंवाले, जो चार पदोवाले, तीन चरणोंवाल और जो छह पदोंवाले, तथा छन्द लक्षणोंस हीन और जो छन्द लक्षणोंसे युक्त छन्द हैं वे सब छन्द सूची द्वारा तुमको शान्त करेंवा संस्कार करें । अर्थान्-इन छन्दोंके उच्चारणसे तुममें शान्ति विराज- मान हो। हे भगवन् ! दुपाये ( पक्षी और मनुष्यादि), चौपाये, तीन पदोंवाले, पराधीन और स्वाधीन सवही सुन्दर उक्तियोंसे आपकी प्रार्थना करते हैं ॥३॥ मन्त्रः । सहस्तौमासुहच्छन्दसऽआवृत-सहप्प्रमाऽऋषयः सप्तदैव्या ॥ पूर्वेषाम्पन्थामनुदृश्यधीराऽअन्या लैभिरेरत्थ्योनरश्मीन् ॥ ४॥ ॐसहस्तोमा इत्यस्य याज्ञवल्क्य ऋषिः त्रिष्टुप् छन्दः पयो देवता पाठे विनियोगः ॥ ४॥ भाष्यम्- ( सहस्तोमाः) स्तोमैः त्रिवृत्पञ्चदशादिभिः सह वर्तमानाः सहस्तोमाः (सहच्छन्दसः) गायत्र्यादिभिः छन्दोभिः सह वर्तमानाः ( आवृतः ) आवर्तमानाः ( सहप्रमाः) प्रमितिः प्रमा यज्ञस्येयत्ता परिज्ञानं तेन सह वर्तमानाः ( देव्याः ) देवस्थ- ऽध्याय १.] भाष्यसहिना। (५) - प्रजापतेः सम्बन्धिनः ( ऋषयः ) द्रष्टारः ( सप्त ) सप्तसंख्याकाः शीर्षण्याः । यद्वा-मरीचि- प्रमुखाः सप्तर्षयः होत्रादयः सप्त वषट्कर्तारो वा एते ( पूर्वेषाम् ) पूर्वपुरुषाणानङ्गिरः प्रभृतीनां विश्वसृजां देवानां वा ( पन्थाम् ) अनुष्ठानमार्गम् ( अनुदृश्य ) क्रमेण ज्ञात्वा ( धीराः) धीमन्तः सन्तः ( अन्वालेभिरे ) क्रमेणाग्व्यवन्तः; यागाऽनुष्ठानेप्रवृता इत्यर्थः । (न) यथा ( रथ्यः) न्थेन युक्ताः रथस्य नेतारः सूताः ( रश्मीन् ) रथे अश्वनियोजनार्थान् प्रग्रहान् सम्यग्रथन्य नयनाय हस्तेनान्वारभन्ते । यद्वा, दैव्याः सप्तर्षयः, देवस्य प्रजापतेः इमे देव्याः प्रजापतिप्राणाभिमानिनः सप्तर्षयः भरद्वाजकश्यगौतमात्रिवसिष्ठविश्वामित्रनमदग्निसंज्ञाः अन्या- लेभिरे नृटवन्तः सृष्टियज्ञमिति शेषः । किं कृत्वा, पूर्वेषां पन्थानमनुदृश्य-अधस्तनकल्पोत्पन्ना- नामवरिताधिकाराणां मार्ग विलोक्य पूर्वकल्पोत्पन्नैर्ऋषिभिर्यथा सृष्टं तथा नृष्टवन्त इत्यर्थः सूर्याचन्द्रमप्तौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्' इति श्रुतेः । कथमिव रथ्यो न रश्मीन् नकार उपमार्थः । रथी यथा इष्टदेशप्राप्त्यर्थ प्रथमं रश्मीन्प्रग्रहानालभते स्पृशति मृजति वा. तथा तेपि ऋष्टियज्ञं सृष्टवन्तः । किम्भूता ऋषयः स्तोमसहिताः गायत्र्यादिभिः सहिताः । आकृतः) आवृतशब्देन कर्मोच्यते सहावृतः कर्मसहिताः श्रद्धासत्यप्रधानानां कर्मणासनुष्ठातारः ( सहप्रमाः) प्रमाणे प्रमा तत्सहिताः शब्दप्रमाणपरीक्षणतत्तराः (धीनः । धीमन्त: [ यजु० ३४ । ४९] ॥ ४ ॥ आषार्थ-शब्दप्रमाणके जाननेवाले धीर 'त्रिवृत्पंचदशादि स्तोम' गायत्र्यादि छन्द और यनका परिमाण इनके सहित वर्तमान देवप्रजापतिके सम्बन्धी सप्तऋषिस्थानिक चक्षुआदिक (चक्षुबैजमदग्निः ऋषिरिति श्रुतेः) अथवा मरीचिआदिक अपने पूर्वज अङ्गिराआदिक महर्षि- यों का अनुष्ठित समझ कर सर्वज्ञकी समान यज्ञमें प्रवृत्त हुए, घोडोंकी लगाम पकड़कर सारथि रथको भलीप्रकार चलाता है, अथवा प्रजापतिके प्राणाभिमानी सप्तऋपि- भरद्वाज, कश्यप, गौतम, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वामित्र, और जमदग्निके पूर्वकल्पमें उत्पन्न हुए ऋषियों के मार्गो का अनुसरण करके इस सृष्टियनका आरंभ किया अर्थात् जैसे पूर्वकल्पने सृष्टि हुई थी उसी प्रकार सृष्टि की, जैसे रथी घोडोंको वशमें रखनेके लिये पहलेही लगाम बनाता है, इसी प्रकार सृष्टिकार्यको सुशृङ्खलाके लिये सबसे पहले यह ऋषि प्रगट हुए और मुष्टि कार्य किया ।। ४॥ मन्त्रः । यजाग्ग्रतोदूरमुदैतिदैवन्तदुसुप्तस्यतथैवैति ॥ दूरङ्गमज्योतिषायोतिरेकन्तन्मेमन-शिवसङ्क ल्पमस्तु ॥५॥ ॐ यदित्यस्य याज्ञवल्क्य ऋषिः । त्रिष्टुप् छन्दः । मनो ॥ देवता । पाठे विनियोगः ॥५॥ जैसे रथयुक्त (६) रुद्राष्टाध्यायी- प्रथमो- भाष्यम्--(यत्) यन्मनः (जाग्रतः) जानतः पुरुषस्य (दूरम् उदैति) उद्गच्छति चक्षुराद्यपे. क्षया मनो दूरगामीत्यर्थः । यच्च (देवम् ) दीव्यति प्रकाशते देवो विज्ञानात्मा तत्र भवं देवमात्मग्राहकमित्यर्थः ( तत उ) यदः स्थाने तच्छब्दः उकारश्चार्थः । यच्च मनः (सुप्तस्य ) मुसभ्य : ( तथैव एति ) यथा गतं तथैव पुनरागच्छति, यच्च (दूरंगमम् ) दूरंगच्छतीति दूनगमम्. अतीतानागतवर्तमानविप्रकृष्टव्यवहितपदार्थानां ग्राहकमित्यर्थः । यच्च मनः ( ज्योति. पाम् ) प्रकाशकानां श्रोत्रादीन्द्रियाणाम् ( एकं ज्योतिः ) प्रकाशकं प्रवर्तकमित्यर्थः । प्रव- तितान्येव श्रोत्रादीन्द्रियाणि स्वविषये प्रवर्तन्त आत्मा मनसा संयुज्यते मन इन्द्रियेणेन्द्रिय मथेनेति न्यायोक्तमनः सम्बन्धमन्तरा तेषामप्रवृत्तेः ( तत् ) तादृशम् ( मे ) मम ( मनः) मनः (शिवसङ्कल्पम् ) शिवः कल्याणकारी धर्मविषयः सङ्कलो यस्य तादृशम् ( अस्तु ) भवतु मन्मनसि सदा धर्म एव भवतु न कदाचित्पापमित्यर्थः । [ यजु० ३४ । १] ॥ ५ ॥ भाषार्थ-जो मन, जागते पुरुषका चक्षुआदिकी अपेक्षासे दूर प्राप्त होता है जो गुति- मान् वा प्रकाशक देव विज्ञानात्माका ग्राहक है, वही सोते हुए पुरुषके उसी प्रकारसे सुषुप्ति अवस्थामें फिर आगमन करता है, जो दूर जानेवाला या अतीत-भविष्य वर्तमान-विप्रकृष्ट व्यवहित पदाथोंका ग्रहण करनेवाला है, और जो प्रकाशक श्रोत्रादि इन्द्रियों की एक ज्योति हैं. अर्थात् सम्पूर्ण इन्द्रियोंका चालक है, आत्मा मनसे, मन इन्द्रियसे, इन्द्रिय पदाथोंसे संयोग करती है, विना इसके कुछ प्रवृत्ति नहीं होती, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प- वाला धर्म विषयमें तत्पर हो मेरे मनमें कभी पाप न हो धर्मही सदा प्रवृत्त हो ॥५॥ मन्त्रः। येनकम्मा॑ण्यपसौमनीषिणोयज्ञेकृण्वन्तिविदथेषु धीरा ॥ यदंपूर्वय्यक्षमन्तप्प्रजानान्तन्मे मन-शिवसङ्कल्पमस्तु ॥६॥ ॐ येनेत्यस्य ऋष्यादिविनियोगः पूर्ववत् ॥ ६॥ भाष्यम्-(अपसः) अप इति कर्मनाम" [नियं० २।१] अपो विद्यते येषां ते अपस्विनः कर्मवन्तः सदा कर्मनिष्ठा इत्यर्थः । (धीराः) धीमन्तः ( मनीषिणः) मेधाविनः ( यज्ञे ) यज्ञकर्मणि (येन) मनसा सता (कम्माणि) कर्माणि (कृण्वन्ति) कुर्वन्ति मनःस्वास्थ्य विना कर्माप्रवृत्तेः केषु सत्सु (विदथेषु ) ज्ञानेषु सत्सु विद्यन्ते ज्ञायन्ते तानि विदथानि तेषु यज्ञसम्बन्धिनां हविरादिपदार्थानां ज्ञानेषु सस्वित्यर्थः । (यत्) यच्च मनः (अपूर्वम् ) न विद्यते पूर्वमिन्द्रियं यस्मात्तदपूर्वम् इन्द्रियेभ्यः पूर्व मनसः सृष्टेः । यद्वा अपूर्वमनपरमबाह्यमित्यु- क्तरपूर्वमात्मरूपमित्यर्थः । यच्च (यक्षम् ) यष्टुं शक्तं यक्षम् यच्च (प्रजानाम् ) प्रजायन्ते इति
ऽध्यायः १.]
भाष्य सहिता।
(७)
प्रजास्तासां प्राणिमात्राणाम् ( अन्तः) शरीरमध्य आस्ते इतरेन्द्रियाणि बहिष्ठानि मनस्त्वन्तरि
न्द्रियमित्यर्थः । तादृशं मे मनः शिवसङ्कल्पमस्त्विति व्याख्यातम् [ यजु० ३४।२] ॥ ६ ॥
भाषार्थ-कर्मानुष्ठानमें तत्पर बुद्धिसम्पन्न मेधावी; यज्ञमें जिस मनसे उत्तमकाँको
करते हैं जो प्राणिमात्रके शरीरमध्यमें स्थित है अर्थात् इंद्रियवाह्य और मन अन्तर में स्थित है
यज्ञ सम्बन्धि हवि आदि पदाथोंके ज्ञानमें जो अद्भुत वा सवसे प्रथम वा आत्मरूप पूजनीय-
भावसे स्थित है वह मेरा मन कल्याणकारी धर्मविषयक संकल्पवाला हो ॥ ६ ॥
मन्त्रः।
यत्प्रज्ञानमुतचेतोधृतिश्चयज्ज्योतिरन्तरमृतम्
जासु॥ यस्म्मान्नऽऋतेकिञ्चनकम्मैक्रियतेतन्मे
मन-शिवसङ्कल्प्पमस्तु ॥७॥
ॐ यत्प्रज्ञानमित्यस्य ऋष्यादिविनियोगः पूर्वतत् ॥ ७॥
भाष्यम्-( यत् ) मनः (प्रज्ञानम् ) विशेषेण ज्ञानजनकम् (उत) अपि यन्मनः
(चेतः ) चेतयाति सम्यग् ज्ञापयति तच्चेतः 'चिती संज्ञाने' सामान्यविशेषज्ञानजनकमित्यर्थः।
च) यच्च मनः (धृतिः) धैर्यरूपं मनस्येव धैर्योत्पत्तेर्मनसि धैर्यमुपर्यते ( यत् ) यच्च
(अमृतम् ) आमरणधार्म आत्मरूपत्वात् (प्रजासु) जनेषु ( अन्तः) अन्तवर्तमानं सत्
(ज्योतिः) सन्द्रियाणां प्रकाशकमुक्तमपि पुनरुच्यते ( यम्मात् ) मनसः (ऋते ) विना
(किञ्चन ) किमपि (कर्म) कर्म (न क्रियते ) जनैः सर्वकर्मसु प्राणिनां मनः पूर्व प्रवृत्तेः
मनःस्वास्थ्यं विना कर्मा भावादित्यर्थः (तन्मे मनः) इति व्याख्यातम् [यजु० ३४।३]||७||
भाषार्थ-जो मन विशेषकर ज्ञानका उत्पन्न करनेवाला है और भलीप्रकारसे सामान्य-
विशेष-ज्ञानका प्रगट करनेवाला, चित्स्वरूप और धैर्यरूप है, आत्मरूप होनेसे अविनाशी
जो प्राणियों के मध्यमें अन्तर वर्तमान प्रकाशक है, जिस मनके विना कुछभी कार्य नहीं किया
जाता वह मेरा मन कल्याणकार्यमें संकल्पवाला हो ॥७॥
मन्त्रः ॥
येनेदम्भूतम्भुवनम्भविष्ष्यत्परिंगृहीतममृतेनस
वम् ॥ येनयज्ञस्तायतेसप्तहोतातहमेमन शिव
सङ्कल्प्पमस्तु ॥ ८॥
ॐ येनेदमित्यस्य ऋष्यादिविनियोगः पूर्ववत् ॥ ८॥
(८)
रुद्राष्टाध्यायी-
[प्रथमो-
भाष्यम्-(येन) (अमृतेन ) शाश्वतेन मुक्ति रय॑न्तं श्रोत्रादीनि नश्यन्ति मनस्त्वनश्वरमि.
त्यर्थः । मनसा ( इदम् । ( सर्वम् ) सम्पूर्णम् ( भूतम् ) भूतकालसम्बन्धि वस्तु (भुवनम् )
भवतीति भुवनं वर्तमानकालसम्बन्धि. ( भविष्यत् ) भविष्यतीति भविष्यत् (परिगृहीतम् )
सर्वतो ज्ञातं भवति त्रिकालसम्बद्धवस्तुषु मनः प्रवर्तत इत्यर्थः । श्रोत्रादीनि तु प्रत्यक्षमेव
गृहमन ( येन ) मनसा ( सप्तहोता ) सप्तहोतारो देवानामाहातारो होतृमैत्रावरुणादयो यत्र स
सतहोता अरिनष्टोमे सप्त होतारो भवन्ति । ( यज्ञः) अग्निष्टोमादिः (तायते) विस्तार्यते
१. तन्मे मनः) इति व्याख्यातम् [ यजु० ३४।४ ] ॥ ८ ॥
भाषार्थ-जिस अविनाशी मनसे ( मुक्तिर्यन्त रहनेसे मनको अविनाशी कहा) यह
सम्पूर्ण भूतकालसम्बन्धि वस्तु, वर्तमान कालसम्बन्धी, होनेवाले कालसम्बन्धी पदार्थ ग्रहण
किये जाते हैं, (त्रिकालसम्बन्धी वस्तुओंमें मन प्रवृत्त होता है ) जिसकेद्वारा सात होता
होतृ-मैत्रावरुणादि-बाला अग्निष्टोम यज्ञ विस्तार किया जाता है वह मेरा मन कल्याणकारी
संकल्पवाला हो।॥ ८॥
यस्म्मिन्नचल्सामयजूषियस्म्मिन्प्रतिष्ठितारथ
नाभाविवारा ॥ यस्म्मॅिश्चित्तसर्चमोति॑म्प्रजा
नान्तन्न्मेमन शिवसङ्कल्प्पमस्तु ॥९॥
ॐ यस्मिन्नित्यस्य ऋष्यादिविनियोगः पूर्ववत् ॥ ९॥
भाष्यम्-(यम्मिन् ) मनसि (ऋचः) ऋचः (प्रतिष्ठिताः) स्थिताः ( यस्मिन् ) मनसि
(साम) सामानि प्रतिष्ठितानि ( यजू पि ) यजुत्राःप्र० मनसः स्वास्थ्य एव वेदत्रयीस्फूर्ते
मनसि शब्दमात्रस्य प्रतिष्ठितत्वम् (रथनाभौ) रथचक्रनाभौ मध्ये (इव) यथा (आराः) आराः
प्रतिष्ठिताः तद्वच्छन्दजालं मनसि । किञ्च (प्रजानाम्) प्रकृतीनाम् (सर्वम् ) सर्वम् (चित्तम्)
ज्ञानं सर्वपदार्थविषयि ज्ञान ( यस्मिन् ) मनसि ( ओतम् ) प्रोतं निक्षिप्तं तन्तुसन्ततिः पटे इव
सर्व ज्ञानं मनसि निहितम्, तन्मे मनः (शिवसंकल्पम् ) शान्तव्यापारम् ( अस्तु) भवतु
[यजु० ३४५] ॥ ९ ॥
भाषार्थ:-जिस मनमें ऋचाएँ अर्थात् ऋग्वेद स्थित है, जिसमें साम और यजुः स्थित हैं
मनकीही स्वस्थतासे वेदत्रयकी स्फूति होती है । जिस प्रकार रथचक्रकी नाभिमें आरे स्थित
हैं इसी प्रकार मनमें शब्दजाल स्थित है, प्रजाओंका सब ज्ञान जिसमें, पटमें तन्तुके समान
ओतप्रोत है, वह मेरा मन कल्याणकारी कार्यमें संकल्पवान हो ॥९॥
उध्यायः १]
भाष्यसहिता।
(९)
सुषारथिरश्वानिवयन्मनुष्ष्यान्नेनीयतेभीशुभि
बाजिनऽइव ॥ हृत्प्रतिष्ठैय्यदजिरञ्जविष्ठन्तन्मे
मन-शिवसङ्कल्प्पमस्तु ॥ १०॥
इतिसर्छ हितायांसइपाठेप्रथमोऽध्यायः ॥ १॥
ॐ सुषारथिरित्यस्य ऋष्यादिविनियोगः पूर्ववत् ॥ १० ॥
भाष्यम्-(यत्) मनः ( मनुष्यान् ) नरान् ( ननीयते ) अत्यर्थमितस्ततो नयति
भनुष्यग्रहणं प्राणिमात्रोपलक्षणम् ( इव ) यथा (मुषारथिः) शोभनः सारथिः ( अभीशुभिः )
अग्रहः ( वाजिनः ) वेगयुक्तान् ( अश्वान् ) अश्वान् नेनीयते । यद्वा तत्र दृष्टान्तः (सुषारथिः)
शोभनः सारथिर्यन्ता ( इव ) यथा ( अश्वान् ) अश्वान् कशया ( नेनीयते ) नेनीयते
द्वितीयो दृष्टान्तः ( इव ) यथा सुसारथिः ( अभीशुभिः) प्रग्रहैः ( वाजिनः ) अश्वान्ने
नीयत इत्यनुषङ्गः । उपमाद्वयं प्रथमायां नयनं द्वितीयायां नियनम् । तथा मनः प्रवर्तयति
नियच्छति च नरानित्यर्थः (यत्) यच्च मनः (अजिरम् ) जरारहित बाल्ययौवनस्थाविरेषु मन-
सस्तदवस्थत्वात् यच्च (जविष्ठम् ) अतिनववद्वेगवत् जविष्ठम् "न वै वातात्किञ्चनाशीयोम्ति
न मनसः किञ्चनाशीयोस्ति' इति श्रुतेः । यच्च मनः (हृत्प्रतिष्ठम्) हृदि प्रतिष्ठा स्थितिर्यस्य
तत् हवेव मनः उपलभ्यते (तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ) इति व्याख्यातम्
[ यजु० ३४।६] ॥१०॥
भाषार्थ-जो मन, मनुष्यादि जीवोंको इधर उधर लेजाता है, अर्थात-अनकी प्रेरणासेही
प्राणी कार्यों में प्रवृत्त होते हैं, जैसे अच्छा सारथि लगामद्वारा वेगवान् घोडोंको लेजाता है,
जो मन बाल्य, युवा और जरासे रहित अतिशय वेगवान् तुल्य हृदयमें स्थित है, अर्थात्-
जैसे सारथी लगामकी सहायतासे घोडोंको यथेच्छास्थलमें प्राप्त करता है, इसी प्रकार चक्षु
आदि इंद्रियोंको अवलम्बन करके मनुष्यादिके शरीरके अंगप्रत्यंगको बारंवार विविध विष-
बोंमें प्रेरण करता है, जो जरारहित और हृदयमें स्थित है वह मेरा मन कल्याणकार्यमें
सङ्कल्पवाला हो॥१०॥
इति श्रीरुद्राष्टके मुरादाबादनिवासि-पण्डितज्वालाप्रसाद मिश्रकृतसंस्कृतार्य-
भाषाभाष्यसमन्वितः प्रथमोऽध्यायः ॥ १॥
-
(१०)
रुद्राष्टाध्यायी-
[द्वितीयो-
अथ द्वितीयोऽध्यायः।
मन्त्रः।
सहस्रशीर्षापुरुषल्सहस्राक्षसहस्रपात् ॥ सभृमि
सर्वतस्मृत्वात्यतिष्ठदशाङ्गुलम् ॥ १ ॥
ॐ सहस्रशीर्षत्यस्य नारायण ऋषिः । निच्युदाय॑नुष्टुप
छन्दः । पुरुषो देवता । स्तुतिकरणे विनियोगः ॥१॥
भाष्यम्-( सहस्रशीर्षा ) सहस्रमसंख्यानि सर्वप्राणिशिरांसि यस्य सः । सर्वस्थूलाङ्गोप-
लक्षणार्थमिदम् । ( सहस्राक्षः ) सहस्रमसंख्यान्यक्षीणि यस्य सः । सर्वज्ञानेन्द्रियोपलक्षणार्थ-
मिदम् । ( सहस्रपात् ) सहस्रं पादा यस्य सः । सर्वकर्मेन्द्रियोपलक्षणार्थमिदम् । एवंभूतः सः
(पुरुषः ) पूर्षु शेतेऽवतिष्ठते तस्मात्सुरुषोऽव्यक्तादपि परः साक्षी चेता परमात्मा ( भूमिम् )
पृथिव्यादिपंचभूतात्मकं सर्व भूमिमित्युपलक्षणं भूतानां ( सर्वतः ) विश्वतः ( स्मृत्वा ) परि-
वेष्टय नाभितः (दशांगुलम् ) दशांगुलपरिमितं देशम् ( अत्यतिष्ठत् ) अतिक्रम्य व्यवस्थितः।
हृदयदेशेऽतिष्ठत् स्थितोऽस्ति स एवैकस्तत्तद्देवतानामरूपैरुपास्यः । “सोयं विज्ञानमयः पुरुषः
प्राणिषु हइयं ज्योतिः" इति । दशांगुलमित्युपलक्षणं ब्रह्माण्डाहिरपि व्याप्यावस्थित इत्यर्थः ।
। यजुर्वेदीयकत्रिंशोध्यायः । ॥ १ ॥
भाषार्थ-अव्यक्त-महदादिसे विलक्षण, चेतन, अतियों में प्रसिद्ध, सब प्राणियों की सम-
ष्टिरूप ब्रह्माण्ड रूप देहयुक्त विराट् है वही अनन्तशिरोंसे युक्त है, जितने सब प्राणियों के शिरहै व
सब उसके शिरके अन्तर्वति होनेसे वह अनन्तशिर संपन्न है । सहस्रों नेत्रोंसे युक्त होनेसे
सहस्राक्ष अर्थात् सव ज्ञानेन्द्रिय संपन्न है । सहस्रों चरणोंसे युक्त अर्थात् कर्मेन्द्रिय संपन्न
होनेसे यह सहस्रपात् है वह पुरुष ब्रह्माण्ड गोलकरूप भूमिको वा पंचभूतों को तिर्यक् ऊर्ध्व;
नीचे, सब ओरसे व्याप्त करके दश अंगुल परिमित देशको अतिक्रमण करके स्थित हुआ है।
दशांगुल ब्रह्माण्डका उपलक्षण है, अर्थात् ब्रह्माण्डसे वाहर भी सब ओर व्याप्त होकर स्थित
है अथवा नाभिके स्थानसे दश अंगुल अतिक्रमण करके हृदयमें स्थित है, (“ सोयं विज्ञान-
मयः प्राणेषु हृद्यन्तज्योतिः" इति श्रुतेः ) विज्ञानात्मा, हृदयमें कर्मफल भुगानेके निमित्त अव-
स्थान करता है ( द्वासुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते तयोरन्यापिप्पलं स्वाद.
त्यनभन्नन्यो अभिचाकशीति" ऋग्वेदः) इन लोकों में पूर्ण करने और शयन करनेसे वह
पुरुष है ॥१॥
मन्त्रः।
पुरुषऽएवेदर्छसर्वस्यद्भुतयचभावयम् ॥ उतामृत
त्त्वस्येशांनोयदन्ननातिरोहति ॥३॥
ऽध्यायः २ भाष्यसहिता (११ ॐ पुरुष इत्यस्य ना० ऋ० । निच्यदार्षीजगतीछन्दः । पुरु- पो देवता । वि० पू० ॥२॥ भाष्यम्--( इदम् ) यत्किंचिद्वर्तमानकालीनं ( यदूभूतम् ) यहतीतकालीनं ( यच ) ( भाव्यम् ) भविष्यत्कालीनं तत् ( सर्वम् ) सम्पूर्णम् ( पुरुष एव ) परमात्माएव यथास्मि- न्कल्पे वर्तमानाः प्राणिदेहाः सर्वेपि विराट्रपुरुषम्यावयवाः तथैवातीतागामिनोरपि कल्पयोर्द्रष्ट- व्यमिति भावः । ( उत ) अपि ( अमृतत्वम्य ) देवत्वस्य (ईशानः ) स्वामी स पुरुषः ( यत् ) यस्मात् ( अन्नेन ) प्राणिनां भोग्येनान्नेन फलेन निमित्तभूतेन (अतिरोहति ) स्वीयां कारणावस्थामतिक्रम्य परिदृश्यमानां जगढवस्थां प्राप्नोति । तम्पात्पुरुष एव प्राणिनां कर्मफल- भोगाय जगढ़वस्थास्वीकारान्नेदं तत्य वस्तुत्वमित्यर्थः । अमृतत्वस्यामरणधर्मस्येशानः मुक्तेरीश:. यो हि मोक्षेश्वरो नासौ म्रियत इत्यर्थः ॥ २ ॥ भाषार्थ--जो यह वर्तमान जगत् है, जो अतीत जगत् और जो जो भविष्य जगत् है वह संपूर्ण पुरुपही है अर्थान् जैसे इस कल्पमें र्तमान प्राणियोंके देह विराट् पुरुषके अवयव हैं वैसे ही अतीत और आनेवाले कल्पों के भी जानने और जो कि प्राणियोंके भाग्यसे वा अन्नरूप फलके निमित्तसे अपनी कारण अवस्थाको अतिक्रमण करके जगत्की अवस्थाको प्राप्त होता है ( अथवा अन्नक निमित्त जो संपूर्ण अतिरोहण जन्म मृत्यु होती है, उस संबन्धमें अमृतत्त्र देने में ईश्वर ही है ) अर्थात् प्राणियोंके कर्मफल भुगानेको जगत्की अवस्था स्वीकार करता है । यदि कहो कि जो सब पुरुष है तो परिणामी भी हो सकता है इसपर कहते हैं- मरण धर्म रहित मुक्तिका अधिपति अर्थात् संपूर्ण जीवोंका जो कि ब्रह्मासे स्तम्ब पर्यन्त हैं। उनका अधिपति पुरुष ही है, अर्थात् यही प्राणिगणको देवता करते हैं जिस कारण कि प्राणिगणके भोगोंके निमित्त अपनी कारण अवस्थ परित्याग पूर्वक कार्यावस्था अर्थात् जगत्को स्वीकार करते हैं ॥ १ ॥ विशेष-भगवान् यदि स्वयं इस प्रकार अचिन्त्य शक्ति द्वारा जगत् अवस्थाको प्राप्त न हो तो यह जगत् किसीके संबन्ध में स्वर्ग और किसीके संबन्धमें नरक रूप होजाय तो एकही वस्तु के लिये स्वर्ग नरकत्वरूप विरुद्ध धर्मका प्रकाश असंभव है । अनीश्वरवादी कहेंगे प्रकृ- तिका स्वभाव है, परन्तु आस्तिकगण कहेंगे जिसको नास्तिक प्रकृतिका स्वभाव कहते हैं: उसीको हम ईश्वरकी अचिन्त्य शक्ति कहते हैं ॥२॥ मन्त्रः। एतावानस्यमहिमातोज्यायाँश्चपुरुषः ॥ पादौस्य विश्वाभृतानित्रिपादस्यामृतन्दिवि ॥ ३ ॥ ॐ एतावानस्येत्यस्य नारायण ऋषिः । निच्यदायॆनुष्टुप्- छन्दः । पुरुषो देवता । वि० पू० ॥ ३ ।।
) (१२) रुद्राष्टाध्यायी- [द्वितीयो-- भाष्यम्- (एतावान् ) अतीतानागतवर्तमानरूपं जगद्यावदम्ति सर्वोपि ( अस्य ) पुरुषस्य ( महिमा) स्वकीयसार्थ्यविशेषः न तु नस्य वास्तवं स्वरूपम् (च) पुरुषः ( अतः ) अतो महिन्नपि । व्यायान् ) अतिशयेन अधिकः ( अभ्य ) पुरुषम्य (विश्वा) सर्वाणि ( भूतानि ) कालत्रयवन नि प्राणिजातानि (पादः) चतुर्थांशः ( अभ्य ) पुरुषम्य अवशिष्टम् ( त्रिपात् ) त्रिपादस्वरूपम् ( अमृतम् ) विनाशः हितं सत् (दिवि ) द्योतनात्मके प्रकाशम्वरूपे व्यवति- छत इति शेषः । यद्वा त्रिपाद् विज्ञान मयानंदरूपं दिवि विद्योतने स्वमहिन्नि स्वर्ण द्वारे -ज्यातिष्ठतीत्यर्थः । यद्वा--योगिध्येयं तदेव त्रिपात् दिवि सत्यसंकल्यादौ गुणे स्थितमित्यर्थः॥३॥ भाषार्थ-अतीत, अनागत. वर्तमान कालसे सम्बद्ध जितना जगत है यह सब इस पुरु- पकी सामर्थ्य विशेष विभूति है । वास्तविक स्वरूप नहीं है, और पुरुप तो इस महिमावाले जगन्से अतिशय अधिक है, संपूर्ण तीन कालोंमें वर्तनेवाले प्राणी समूह इस पुरुषका चतुर्थांश है । इस परमात्माका अवशिष्ट त्रिवान स्वरूप विनाश रहित प्रकाशात्मक अपने स्वरूपमें स्थित है। यद्यपि (सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ) इस तैत्तिरीयारण्यकके वचनसे ब्रह्मकी इयचा कोई निरूपण नहीं र सकता तो भी उमकी अपेक्षा यह जात् अति अल्प है, इस कारण भादरूपसे निम्मा क्रिया है ॥३॥ मन्त्रः। त्रिपार्द्धऽउदैत्पुरुषत्पादौस्येहाभवत्पुनः ॥ ततो विष्ष्वब्यक्रामत्साशनानशनेऽअभि ॥ ४ ॥ ॐ त्रिपादूर्द्ध इत्यस्य नारायण ऋषिः आयनुष्टुप् छन्दः । वि० पू० ॥४॥ भाष्यम्-(त्रिपात् ) योऽयं त्रिपात् ( पुरुषः) संसारपर्शरहितः ब्रह्मस्वरूपः ( ऊर्ध्वः) अस्मात् अज्ञानकार्यात् संसारात् बहिनोऽत्रत्यै- गुणदोषैरस्पृष्ट उत्कण (उदैत् ) स्थितवान् वा पादत्रयस्वरूप ऋग्यजुःसोमलक्षणो भगवानादित्यः सोऽभ्यु दैत् कर्मबन्धनानां स्थावरजंग- मादीनामुपरिभूतः ( अस्य ) (पादः ) लेशः (इह) मायायां (पुनः) पुनरपि ( अभिवत् ) सृष्टिसंहाराभ्यां पुनःपुनरागच्छति (ततः) मायायामागत्यानन्तरम् (विष्वङ्) देवतिर्यगादिरू- पेण विविधः सन् (साशनानशने ) साशनं भोजनादिव्यवहारोपेतं चेतनं प्राणिजातं लक्ष्यते, अनशनं तद्रहितमचेतनं गिरिनद्यादिकं तदुभयं यथा स्यात्तथा ( अभि) स्वयमेव विविधो भूत्वा (व्यक्रामत्) व्याप्तवान् ।॥ ४ ॥ भाषा--जो यह तीनपादयुक्त संसारस्पर्शरहित ब्रह्मा, इस अज्ञानकाय संसारस बहि- भूत अर्थान्-इसके गुणदोषोंसे अस्पृष्ट होकर उत्कृष्टतास स्थित हुआ है, इसका लेशरूप जगत् इस मायामें फिर प्राप्त होता हुआ. अर्थात्-वृष्टि संहार द्वारा बारंबार आगमन करता हुआ (विष्टभ्याहमिदं कृरलमेकांशेन स्थितो जगन) मायामें आनेके उपरान्त देवतिर्यगादिमें
ऽध्यायः २ ]
भाष्यसहिता।
(१३)
विविधरूप होकर अशनादिव्यवहारयुक्त चेतनप्राणिसमूह इससे रहित गिरिनदी आदिक
अर्थात्-स्थावर जंगमको देखकर व्याप्त करता हुआ । अर्थात् इन सबको निर्माण कर इनमें
प्रवेश कर अनेक रूपसे व्याप्त हुआ ॥४॥
ततौबिराडजायतविराजोऽअधिपूरुषः ॥ सजा
तोऽअत्यरिच्यतपश्चामिमीपुरः ॥५॥
ॐ तत इत्यस्य ना० ऋ० शेषम्पूर्ववत् ॥५॥
भाष्यम्--(ततः ) अनन्तरमादिपुरुषात् ( विराट् ) ब्रह्माण्डदेहः ( अजायत ) उत्पन्न
( विरानः) विविधानि राजन्ते वस्तून्यत्रेति विराटू ( अधि) देहस्योपरि तमेव देहमधिकरणं
कृत्वा (पुरुषः ) तदेहाभिमानी कश्चित्पुमानजायत योऽयं सर्ववेदान्तवेद्यः परमात्मा स एव
स्वकीयमायया बिराड्देहं ब्रह्माण्डरूपं सृष्ट्वा तत्र जीवरूपेग प्रविश्य ब्रह्माण्डाभिमानी देवतात्मा
जीवोऽभवत् (सः) विराट् पुरुषः (जातः ) जातः सन् (अत्यरिच्यत ) अतिरिक्तोऽभूत् ।
विराडतिरिक्तो देवतियङ्मनुष्यादिरूपोऽभूत् (पश्चात् ) देवादिजीवभावादूचं (भूतिम् )
ससर्जेति शेषः अनन्तरं तेषां जीवानां पुरःपूर्यन्ते सप्तभिर्धातुभिरिति पुरः शरीराणि ससर्ज ॥५॥
भाषार्थ-इसके उपरान्त उस आदिषुरुषसे ब्रह्माण्डदेह-जिसमें अनेक प्रकारकी वस्तु
विराजमान होती हैं वह प्रकट हुआ, विराट् देहके ऊपर उसी देहको अधिकरण करके उस
देहका अभिमानी एकही पुरुष हुआ, अर्थात्-संपूर्ण वेदान्तसे जानने योग्य परमात्मा अपनी
मायासे विगट देह ब्रह्माण्डकी रचना कर उसमें जीवरूपसे प्रवेश करके उसका अभिमानी
देवतात्मा जीवरूप हुआ, और वह विराट्पुरुष प्रगट होकर अतिरिक्त-देवता, तिर्यङ्,
मनुप्यादिरूप हुआ, देवादि जीवभावके उपरान्त भूमिकी रचना करता हुआ, भूमि रचनाके
उपरान्त उन जीवोंके सात धातुओंसे पूर्ण होनेवाले शरीरों की रचना करता हुआ ॥५॥
मन्त्रः।
तस्म्माद्यज्ञात्सर्वंहुत सम्भृतम्पृषदाज्यम् ॥ परों
स्ताँश्चक्केवायच्यानारण्याग्ग्राम्म्याश्चये ॥ ६ ॥
ॐ तस्मादित्यस्य नारायण ऋषिः । आर्चीपंक्तिश्छन्दः ।
पुरुषो देवता । वि० पू० ॥६॥
(१४)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ द्वितीयो--
भाष्यम्-(तम्मात् ) ( सर्वहुतः ) ( सर्वात्मकः) पुरुषो यस्मिन् यज्ञे हूयते सोयं सर्वहुतः
तादृशात्तस्मात् पूर्वोक्तात् मानसात् ( यज्ञात् ) पुरुषमेधाख्ययज्ञरूपात् सर्वव्यापकात् पुरुषचतुर्थ-
पादात् ( पृषदाज्यम् ) दधिमिश्रमाज्यं (सम्भृतम् ) समुत्पन्नम् भोगजातं सर्व सम्पादितमि-
त्यर्थः । तथा (तान् ) ( वायव्यान् ) वायुदेवताकान् (पशून् ) पशून् ( चक्रे) उत्पादितवान्
(ये) आरण्याः (हरिणादयः) च (ग्राम्याः ) छागादयः तानपि चक्रे ॥ ६ ॥
भाषार्थ-उससे सर्वात्मा पुरुष जिस यज्ञमें हवन द्वारा पूजे जाते हैं, उस पुरुषमेध यज्ञ-
से दधिमिश्रित घृत संपादित हुआ, दधि आज्य आदि भोग्यजात वस्तु पुरुपद्वारा प्रकट हुई,
और उस पुरुषने उन वायुदेवतावाले पशुओंको उत्पन्न किया “ अन्तरिक्षदेवत्या खलुः वै
पशवः” इति श्रुतेः जो वनके
पशु हरिण आदि और ग्रामके
पशु
गौ अश्व आदिक हैं ॥६॥
विशेष:-लर्व विश्व ( संसार ) पुरुष यज्ञमें आहुत हुए, उस मानस यागको सर्वहुत
कहते हैं, सर्व प्रथम दधिघृतादि वस्तु प्रगट हुई, यहाँ दधिघृतादि भोग्य वस्तुसे वृक्षोंके रस
विशेष जानने यह घृत, दधि उपलक्षण हैं । पर्वतवासी योगीगण इन्हीं वृक्षों के पृषदाज्य-
स्वरूप अन्नफलों को भोजन कर क्षुधा तृष्णा निवृत्त करते हैं, यहाँ दधि घृतसे उत्पन्न होनेवाले
जीवोंके खाद्यपदार्थकी सृष्टि जाननी, कोई कहते हैं-उस सर्वहुत यज्ञपुरुषद्वारा दधिमिश्रित
घृत संपादित हुआ, उससे ग्रामचारी अरण्यचारी और (च) कहनेसे नभश्चारी जीव उत्पन्न
हुए । इस स्थलमें यथार्थ कर्तृत्व ब्रह्मको मानकर ब्रह्मसे अस्मदादिपर्यन्त यथार्थ कर्तृत्व नहीं
है ऐसा दिखाया है । इसीसे कहा है कि उससे प्रगट हुए ॥ ६॥
मन्त्रः ।
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतऽऋचसामानिजज्ञिरे॥ छन्दा
सिजज्ञिरेतसम्माद्यजुस्तस्म्मादजायत ॥ ७॥
ॐ तस्मादित्यस्य नारायण ऋषिः आय॑नुष्टुप् । पुरुषो
देवता । वि० पू० ॥ ७॥
भाष्यम्-(तस्मात् ) ( सर्वहुतः ) सर्वै यमानात् ( यज्ञात् ) यज्ञपुरुषात् ( ऋचः )
ऋग्वेदाः ( सामानि) सामवेदाः ( जज्ञिरे ) जाताः (तत्मात्. (पुरुषात् ) छन्दा-
सि) गायत्रीप्रभृतीनि ( जज्ञिरे ) जाताः (तस्मात् ) ब्रह्मणः ( यजुः) यजुरपि
( अजायत ) जात इत्यर्थः ॥ ७ ॥
भाषार्थ-उस सर्वहुत यज्ञपुरुषसे ऋक्, साम, उत्पन्न हुए। उसीसे छन्द अथर्वमन्त्र
प्रकट हुए, उससे यज्ञात्मक यजुः प्रगट हुआ ॥ ७ ॥
मन्त्रः।
तस्म्मादश्वाऽअजायन्तयेकेचौभयादत॥ गावो
हजज्ञिरेतस्म्मात्तस्म्माजाताऽअंजावया ॥८॥
- अध्यायः २] भाष्यसहिता। (१५) ॐ तस्मादित्यस्य नारायण ऋषिः । निच्यदायॆनुष्टुप् छंदः। पुरुषो दे० वि० पू० ॥८॥ भाष्यम्-(तस्मात् ) ( यज्ञात् ) सर्वरूपयज्ञरूपात् ( अश्वाः ) अश्वा ( अजायन्त ) प्रकटीभूताः (च) (ये के ) ( उभयादतः ) अश्वव्यतिरिक्ता गर्दभादय ऊर्ध्वाधो भागयो- दन्तयुक्तास्तेपि अजायन्त ( ह ) प्रसिद्धौ ( तस्मात् ) पुरुषात् ( गावः) गावश्च (जज्ञिरे ) अजायन्त ( तस्मात् ) सर्वव्यापकात् ( अनावयः ) अजा अवयश्च अजाः छागाः अवयो मेषाश्च ( जाताः ) जज्ञिरे । अत्र कण्डिकात्रये यत्किंचिद्धविरात्मकं विध्यर्थवादमन्त्राश्रया वेदाश्च पुरुषोत्तमात्पुरुषमेधयज्ञस्वरूपादेव सर्व नातमिति वाक्यार्थः ॥ ८ ॥ भाषार्थ-उस यज्ञपुरुषसे घोड़े उत्पन्न हुए और जो कोई घोड़ोंसे अतिरिक्त गर्दनादि तथा ऊपरनीचे के दाँतोंसे युक्त हैं वे उत्पन्न हुए, प्रसिद्ध है कि उस यज्ञपुरुषये गौएं प्रकट हुई, उसीसे भेड बकरी उत्पन्न हुईं ॥८॥ विशेष-पूर्वमंत्रमें सामान्यतासे आरण्य और ग्रामके पशु उत्पन्न होने कहे, इस मंत्रमें यज्ञका साधक विशेष पशुओं का निरूपण किया है। ब्राह्मण भागमें उनके चिह्न भी लिखे हैं । (स्थूलपृषतीमाग्निवारुणीमनड्वाहीमालभेत) अर्थ-जिसका शरीर हृष्ट पुष्ट गोल बड़े बडे चिह्नोंसे युक्त हो, नेत्र सूर्य और अग्निके समान रक्तवर्ण हों, उस गौको यज्ञ के धृत दुग्धके निमित्त ग्रहण करके फिर प्रदान करदे । इत्यादि यहाँ यज्ञिय पशुओं का वर्णन किया है, इससे पहिले ६ मंत्रोंसे इसमें भेद है ॥ ८ ॥ मन्त्रः। तंय्यज्ञम्बुर्हिषि प्रौक्षन्पुरुषञ्जातमैग्ग्रतः ॥ तेन देवाऽयजन्तसाध्याऽऋषयश्चये ॥ ९॥ ॐ तं यज्ञमित्यस्यादिपूर्ववत् ॥९॥ भाष्यम्-( अग्रतः ) ( जातम् ) सृष्टेः पूर्व जातम्, पुरुषत्वेनोत्पन्नं ( तम् ) ( यज्ञम् ) मज्ञसाधनभूतम् ( पुरुषम् ) यज्ञपुरुषं पशुत्वभावनया यूपे बद्धं (बर्हिषि ) मानसे यज्ञे (प्रौक्षन् ) प्रोक्षितवन्तः मानसयागं निष्पादितवन्तः (तेन ) पुरुषेण : ( साध्याः ) सृष्टिसाध- नयोग्याः प्रजापतिप्रभृतयः ( देवाः ) निर्जराः (च) ( ऋषयः ) मंत्रद्रष्टारः (अयजन्त) यागं कृतवन्तः । अत्र कारणे कार्योपचारात् यज्ञेन यज्ञसाधनमभिधीयते प्रौक्षन् ग्रहणं सकल- संस्कारोपलक्षणार्थ तथा च पुरुषं पृषदाज्यादिरूपं यज्ञसाधनभूतं प्रोक्षणादिसंस्कारैः संस्कृत्य तेन पृषदाज्यादिरूपेण देवा यागं कृतवन्त इति वाक्यार्थः ॥ ९ ॥ भावार्थ-सृष्टिके पूर्व में प्रकट हुए अर्थात्-पुरुषरूपसे प्रादुर्भूत उस यज्ञसाधनभूत पुरुषको मानसयज्ञमें प्रोक्षणादि संस्कारोंसे संस्कार करते हुए, उसी पुरुषसे जो साध्य देवगण रुद्राष्टाध्यायी- [द्वितीयो- और ऋषि अर्थात् सृष्टिसाधनयोग्य प्रजापति और उनके अनुकूल मंत्रद्रष्टा ऋषि मानस- यागको निप्पन्न करते हुए ॥ ९॥ मन्त्रः। यत्पुरुषध्यदधुत्कतिधाध्यकल्पयन् ॥ मुखङ्किम स्यासी त्किम्बाइकिमूरूपादाऽउच्यते ॥ १० ॥ ॐ यत्पुरुषमित्यस्य नारायण ऋषिः । नि० छं। पुरुषो दे० । वि० पू० ॥ १० ॥ भाष्यन्-- यत् ) यदा ( पुरुषं ) विरारूड्पं (व्यदधुः) प्रजापतेः प्राणरूपा देवाः संकल्पनोत्पादितवन्तः ( तदा । तस्मिन्काले ( कतिधा ) कतिभिः प्रकारैः ( व्यकश्ययन् ) विविधं कल्पितवन्तः ( अभ्य ) पुरुषम्य (मुखम् ) मुखम् ( किम् आसीत् ) किमासीत् ( कौ बाहू ) को वाहू अभूताम् (किम् ) ( ऊरू) को ऊरू (पादौ) कौ च पादौ (उच्यते ) पादावपि किमास्तामित्यर्थः । पुरुषावयवनिरूपणे द्विवचनम् ॥ १० ॥ भाषार्थ-प्रश्नोत्तर रूपसे ब्राह्मणादिकी सृष्टि कहते हैं-प्रजापतिके प्राणरूप देवता तथा साध्य गणादि जिस समय विराट् पुरुषको संकल्प द्वारा प्रकट करते हुए उस समय कितने प्रकारसे कल्पना करते हुए अर्थात्-पूर्ण करते हुए इस पुरुषका मुख क्या हुआ, क्या भुजा.. क्या जंघा, कौन चरण कहे जाते हैं ॥१०॥ विशेष-पहिले सामान्य प्रश्न और मुखादि विशेष प्रश्न हैं, अर्थात्-देवगण सृष्टिके निमित्त मानसाग विस्तार करके जिस समय निज अमोघ संकल्प द्वारा विराट् पुरुषको मृजन करते हुए उस समय यह विराट् कितने प्रकारसे पूर्ण हुआ, क्या पदार्थ उसका मुख बाहु ऊरू और चरण हुआ । तात्पर्य यह है कि-ऋषियोंने मानसयागमें सूक्ष्म दृष्टि से ब्रह्मरूप प्रजापतिके मुख वाहू आदि अङ्गोंका अवलोकन किया और उसमें ब्राह्मणादि जातिका दर्शन किया ॥ १०॥ ) ब्राह्मणोस्यमुखैमासीद्वाहूराजन्य कृतः ॥ ऊरू तदस्ययद्देश्य पुयाएंशूद्रोऽअंजायत ॥ ११ ॥ ॐ ब्राह्मणोस्येत्यस्य वि० पू० ॥ ११ ॥ भाष्यम्--ब्राह्मण इति पूर्वकण्डिकायां स्तुत्यर्थ विकल्पः कृतः आकांक्षोत्थापनाया स्तुतिमाह-( ब्राह्मणः) ब्राह्मणत्वजातिविशिष्टः पुरुषः ( अस्य ) प्रजापतेः ( मुखम् ) मुखम्, ऽध्यायः २] भाष्यसहिता। ( आसीत् ) मुखादुत्पन्नः ( राजन्यः क्षत्रियः (बाहू कृतः) वाहुत्वेन निष्पादितः ( अस्य) प्रजापतेः ( यत् ) यौ ( ऊरू ) ( तद् वैश्यः ) तद्रूपो वैश्यः सम्पन्नः ऊरुभ्यांमुत्पन्न इत्यर्थः । ( पद्भयाम् ) पादाभ्यां (शूद्रः) शूद्रत्वजातिमान् पुरुषः (अजायत ) उत्पन्नः । अयमेव ब्राह्मणादिचतुष्टयरूप इति वाक्यार्थः । अयमेव कृष्णयजुःसहितायां सप्तमकाण्डे स मुखत- त्रिवृत्तं निरमिमीत इत्यादौ विस्पष्टमानातः ॥ ११ ॥ भाषार्थ-ब्राह्मणत्व जाति विशिष्ट पुरुष इस प्रजापतिका मुख हुआ, अर्थात्--मुखसे उत्पन्न हुआ । क्षत्रियत्व जाति विशिष्ट पुरुष बाहुरूपसे निष्पादित हुआ, अर्थात्-भुजाओस्ने प्रकट हुआ । इसकी जो जंघा हैं वह वैश्य हुआ, चरणोंसे शूद्रजाति विशिष्ट पुरुष उत्पन्न हुआ, मुखादिसे ब्राह्मणों की उत्पत्ति कृष्णयजुःके सप्तम कांडमें लिखी है, (स मुखतस्त्रिवृतं निरमिमीत ) तथा ( तिसृभिरस्तुवतब्रह्मासृज्यत [१४ । २८ यजुः०]) इस प्रकार स्पष्ट लिखी है, इसीसे सायणाचार्य और महीधरने इसी प्रकार अर्थ किया है यहां कल्पना और उत्पन्न होना दो शब्द इस कारण आये हैं कि, पुरुप मेधमें जो सर्व जाति के पुरुष बैठे हैं उनको विराट् रूपसे मानना कल्पना है और सृष्टि पक्ष में उत्पत्ति है इससे दो शब्द आये हैं ॥११॥ मन्त्रः। चन्द्रमामनसोजातश्चक्षोत्सूर्योऽअजायत ॥ श्रोत्रावायुश्चप्प्राणश्चमुखांदग्निरजायत ॥ १२ ॥ ॐ चन्द्रमा इत्यस्य नारायण ऋ । आय॑नुष्टुप् छं । पुरुषो देवता । वि० पू० ॥ १२ ॥ भाष्यम्--अस्य प्रजापते. ( मनसः) सकाशात् ( चन्द्रमाः) शशी ( जातः ) उत्पन्नः ( चक्षोः ) चक्षुषः ( सूर्यः) सूर्यः ( अजायत ) उत्पन्नः (च ) ( श्रोत्रात् ) कर्णविवरात् ( वायुः ) पवनः ( प्राणश्च ) प्राणोऽपि ( मुखात् ) आस्यात् ( अग्निः ) वह्निः (अजायत) उत्पन्नः । अन्यत्र चन्द्रमाः सूर्यो बाहुभ्यो मनश्चक्षुः श्रोत्रेभ्य इति चन्द्रमः प्रभृतीनामुत्पत्तिरिति सृष्टिक्रमः । अत्र तु अचिन्त्यमहिन्नि पुरुषे मनश्चक्षुः श्रोत्रेभ्यश्चन्द्रमः प्रभृतीनामुत्पत्तिक्रम इति विपरीतोऽथः स्तुतिरिति वाक्यार्थः ॥ १२ ॥ भाषार्थ-जैसे गौआदि, ब्राह्मणादि उससे उत्पन्न हुए हैं, इसी प्रकार उसके मनसे चन्द्रमा प्रगट हुआ है, चक्षुओंसे सूर्य प्रगट हुआ है, श्रोत्रसे वायु और प्राण प्रगट हुए और मुखसे अग्नि प्रगट हुई ॥ १२ ॥ विशेष-यह जो अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्रमा लक्षित होते हैं इनमें चेतनता है वा नहीं इसका विचार इस प्रकार जानना कि, इनमें अधिष्ठित होकर विराट्रका अंश (शक्ति) चेतनवस्तु है, जिसको चन्द्र कहते हैं, वह चन्द्र देवताके रहनेका एक प्रधान गोलक इसी प्रकार दृश्यमान सूर्य, अग्नि भी सूर्य और अग्निदेवताके रहनेके प्रधान स्थान है, इसी प्रकार. २ (१८) रुद्राष्टाध्यायी-- [द्वितीयो- सब देवताओंमें जान लेना । इन संपूर्ण देवताओके प्रधान स्थान एक एक गोला होकर भी इनके संपूर्ण अंश अपने अपने कारणस्थानमें अधिष्ठातृदेवता होकर अवस्थान करते हैं जिस प्रकार जलका प्रधान स्थान समुद्र होकर भी उसके किंचित् २ अंश तव जीवों में हैं, इसी प्रकार विराट्के मनसे समष्टि चन्द्र हुआ उसके कुछ २ अंश कारणस्थान मनमें स्थित हो अधिष्ठातृ देववारूपसे अवस्थान करते हैं अधिष्ठातृदेवता ही अधिष्ठानका चालक होता है । इसी प्रकार सूर्यका भी प्रधानस्थान यह दृश्यमान सूर्यलोक वा सूर्य गोलक होकर भी उसके किंचित् अंश हमारे चक्षुओंमें आकर अधिष्ठातृदेवतारूप होकर रहते हैं जिससे हम देखते हैं। अंधका अधिष्ठातृदेवता विदारूप है, इसी प्रकार अग्निदेवताका प्रधानस्थान अन्तरिक्ष, हा और जठर यह तीन हैं तो भी अपने किंचित् अंशसे अपने कारणस्थान (हमारे मुखम स्थित वाक्-इंद्रिय में स्थित होकर अधिष्ठातृदेवता होकर अवस्थान करते हैं. इसी प्रकार संपूर्ण देवताओंमें जानना मंत्रब्राह्मणमें जहाँ (मृदब्रवीत् आपोऽब्रुवन् ) ऐसा आता है वा (तेहेमेप्राणाअहंश्रेयसेविवदमान ब्रह्मजग्मुः। कौषीतकी०) वे प्राणादिक अपनी श्रेष्ठतासंपा- करते प्रजापतिके समीप जाकर कहने लगे ऐसे स्थलोंमें यही जानना कि, यह जडके संबोधन नहीं किन्तु उनके अधिष्ठातृदवता है, सो प्रारंभमें भी कह चुक है, पिछला आधा (मुखादिंद्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत ) ऐसा है मुखसे अग्नि और ब्राह्मण दोनोंकी उत्पत्ति है इस कारण दोनोंमें आहुति होती है ॥ १२ ॥ मन्त्रः। नाभ्याऽआसीदन्तरिक्षठशीष्र्णोद्यौसमवर्तत ॥ पद्भ्याम्भ्रमिर्दिशत्श्रोत्रात्तालोका 5 अंकल्प्प यन् ॥ १३ ॥ ॐ नाभ्या इत्यस्य विनियोगः पूर्ववत् ॥ १३ ॥ भाष्यम्-(नाभ्याः ) प्रजापतेनीभेः ( अन्तरिक्षम् ) आकाशम् ( आसीत् ) उत्पन्नम् (शीर्णः) शिरसः ( द्यौः) द्युलोकः (समवर्तत ) उत्पन्नः (पद्भयाम् ) पादाभ्यां (भूमिः) पृथिवी (श्रोत्रात् ) कर्णात् (दिशः ) दिश उत्पन्नाः (तथा) इत्थम् (लोकान् ) अन्त- रिक्षादीन् (अकल्लयन् ) देवा उत्पादितवन्तः देवमनुष्यादिनिखिलस्थावरजङ्गमादित्रैलोक्यमक- सयन्नित्यर्थः ॥ १३ ॥ भाषार्थ-नाभिसे अंतरिक्ष हुआ, शिरसे स्वर्ग प्रकट हुआ, चरणोंसे पृथिवी, श्रोत्रोसे संपूर्ण दिशाएँ उत्पन्न हुई, उसी प्रकार भूरादिलोकोंको पूर्वोक्त कल्पना करते हुए, वा विगट् देहसे कल्पना करते हुए ॥ १३ ॥ विशेष अन्तरिक्ष देवताका प्रधानद्वार अन्तरिक्ष लोक है, तो भी उसका किंचित् अंश हम जीवगणोंके नाभिस्थान में रहकर शरीर गोलकका केन्द्ररूप हुआ है, मस्तक झुलोक इसके कहनेसे प्रकाशात्मक देवताका बोध जानना, मस्तिष्कमें वह प्रकाशात्मक देवता होकर अवस्थान करते हैं, यह देवता यदि क्षणमात्रको भी तिरोधान होजाय तो शरीरमें स्थित रक्तकणिका और धमनी सब अबल होजावें और रुधिरके जमनेस तत्काल जीवनमूर्छा .
ऽध्यायः २] भाष्यसहिता। (१९) . और अंधकारसे व्याप्त होजाय, यदि यह युदेवता पुनर्वार आगमन न करै तो फिर जीवन नहीं होता, अर्थात् मृत्यु होजाती है. योगीजन चक्षु मूंदकर भ्रूमध्यमें इसी किरणका दर्शन करते हैं, वह किरण इस दिवदेव देवताके मस्तिष्कसे आई हुई प्रकाशमात्र है जिनके मस्त- कमें यह क्षणक्षण में आविभीव और तिरोभाव होती है, वह पुरुष अस्थिरमति और संपूर्ण कार्यों में अस्थिर होता है, उन्माद इसका ही प्रधान कारण है । यह मस्तकका अधिष्ठातृदेवता है, प्रगट और तिरोहित होता है, चरणोंसे भूमि हुई भूमिको आधारशक्ति जानना, आधार शक्ति और भूमि एकही बात है, भूमिदेवता अपने कारण पादयुगलमें किंचित् अवस्थित हुई है इसीसे दोनों चरणोंमें सब शरीरों के वहन करनेकी सामर्थ्य है,यदि भूमिदेवता चरणों क्षणकालको भी तिरोहित होवे तो यह शरीर गिरजाय, अतिशैशव और अतिवार्धक्य यह इन दोनोंपादोंमें गूढभावसे अवस्थान करते हैं, श्रोत्रसे दश दिशाएँ हुई, दिग्देवता अपने कारण श्रोत्रइन्द्रियमें कुछ अंशसे स्थित होकर अधिष्ठातृदेवतारूपसे विराजते हैं। हम देखते हैं इसी दिशा में अपने कर्ण स्थापन करें सब ओर सुनेंगे इसका कारण क्या ? यह सब दिशाओंमें व्यापी दिग्देवताका अधिष्ठान मात्रही इसका कारण है ॥ १३ ॥ मन्त्रः । यत्पुरुषेणहविषादेवायज्ञमतन्वत ॥ वसन्तोस्या सीदाज्यङ्ग्रीष्म्मऽइध्मल्शरद्वविः ॥ १४ ॥ ॐ यत्पुरुषेणेत्यस्य नारायण ऋषिः। निच्यदाय॑नुष्टुप् छन्दः। यज्ञो दे० । वि० पू० ॥ १४ ॥ भाष्यम-(यत् ) यदा पूर्वोक्तक्रमणैव शरीरेषूत्पन्नेषु सत्सु (देवाः) उत्तसृष्टिसिद्ध्यर्थ बाह्यद्रव्यस्यानुत्पन्नत्वेन हविरन्तरासंभवात् पुरुषस्वरूपमेव मनसा हविष्ट्वेन संकल्प्य ( पुरुषेण ) पुरुषाख्येण ( हविषा ) हविर्भूतेन ( यज्ञम् ) मानसं यज्ञम् ( अतन्वत ) अतनिषत, तदानीम् ( वसन्तः) वसन्तर्तुः ( अस्य ) यज्ञस्य ( आज्यम् ) घृतम् (आसीत् ) अभूत् (प्रोष्मः ) ग्रीष्मर्तुः ( इध्मः ) समिद्विशेषः आसीत् (शरत्.) शरद ः ( हविः) हविरासीत् । एवं पुरुषस्य हविःसामान्यरूपत्वेन संकल्पोऽनन्तरं वसन्तादीनामाज्यादि विशेष- रूपत्वेन संकल्प इति ज्ञातव्यम् ॥ १४ ॥ भार्थ-जिस समय पूर्वोक्त क्रमसे देव शरीरोंके होनेपर देवताओंने उत्तर सृष्टिके सिद्ध करनेके निमित्त वाह्य द्रव्य उत्पन्न न होनेके कारण पुरुष स्वरूपको ही मनसे हवि द्वारा संकल्प कर उस पुरुषरूप हविरा मानस यज्ञको विस्तार किया, उस समय वसन्त ऋतु इस यज्ञकी घृतरूप कल्पना हुई, ग्रीष्मऋतु समिधू और शरद ऋतु हचि हुई, प्रथम पुरुषको हवि सामान्य रूपसे संकल्प करके फिर वसन्तादिकी आज्य विशेष रूपसे कल्पना की है, यजुःमें कण्डिकाव्यत्यय है, अक्में इसके उपरान्त "तं यन्नम् " ९, फिर * ज्ञात् " ६, फिर “ सप्तास्यासन् " हैं ॥ १४ ॥ तस्माद्य- .
(२.)
रुद्राष्टाध्यायी-
[द्वितीयो--
मन्त्रः ।
सप्तास्यासन्परिधयस्त्रिसुप्तसमिधः कृताः ॥
देवायद्यज्ञन्तन्वानाऽअबध्नन्पुरुषम्पशुम् ॥१५॥
ॐ सप्तास्यासनित्यस्य नारायण ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । यज्ञो
देवता । वि० पू० ॥ १५॥
भाष्यम्-( अभ्य ) सांकल्पिकस्य यज्ञम्य ( सप्त ) गायन्यादीनि सप्त छन्दांसि ( परि
वयः ) ऐष्टिकस्याहवनीयस्य त्रयः परिधयः उत्तरवेडिकास्त्रय आदित्यश्च सप्तमः परिधिः प्रति
निधिः पुरुषम्य यज्ञस्य परिधयः भूमिवेष्टनानि सप्तसागरा आसन्निति वा (त्रिःसप्त) एकविंशतिः
द्वादश मासाः पञ्चतंवत्रय इमे लोका असावादित्य एकविंश इति एते पदार्थाः सप्त. छन्दांसि
सप्त उपच्छन्दांसि सप्त व्याहृतयश्च वा । एतानि ( समिधः कृताः) या दास्युक्तमत्वेन भाविता:
( यत् ) यदा ( देवाः ) प्रजापतिः प्राणेन्द्रियरूपाः ( यज्ञम् , मानसं यज्ञं ( तन्वानाः)
कुर्वाणाः (पुरुषम् ) विराट् पुरुषमेव ( पशुम् ) पशुत्वेन ( अबध्नन् ) भावितवन्तः ॥ १५ ॥
भाषार्थ-जिस समय पूर्वोक्त देवताओं अर्थात् प्रजापतिके प्राण इन्द्रियके अधिष्ठाता-
ओने मानस यज्ञको विस्तार करते हुए विराट् पुरुषको पशूरूपसे भावित करके वांधा तब इस
संकल्पित यज्ञकी सात गायत्री आदि छन्द परिधी हुई,ऐष्टिक आहवनीयकी तीन,उत्तग्वेदीकी
तीन आदित्य सातवी परिधीं हुई,यह प्रतिनिधि रूप है (तथाच श्रुतिः "गुप्त्यैवाअभितःपरिधयो
भवन्त्यथैतत्सूर्यमेव पुरस्तागोतारं करोति । इति तत एते आदित्य सहिताःसप्त परिधयोऽत्र सप्त-
च्छन्दोरूपाः "इक्कीस समिधाओंकी अर्थात् बारह महीने पांचऋतु तीनलोक और यह आदित्य
यह इस यज्ञमें काष्ट रूपसे भावित किये गये, अथवा सात क्षीरादि समुद्र यज्ञकी परिधी हुई।
कारण कि--भरत खण्डमें यज्ञ होते हैं और गायत्री आदि मात अति जगतो आदि सात और
कृत्यादि सात यह इक्कीस छन्द इसके समिधारूप हुए यही इस ब्रह्माण्डके और शरीरके आव-
रण हैं इन्हींसे स्थिति है ॥ १५॥
मन्त्रः ।
यज्ञेनयज्ञमयजन्तदेवास्तानिधम्माणिप्पथमाया
सन् ॥ तेहुनाकम्महिमान-सचन्तयत्रपूर्वैसा
ध्ध्या सन्तिदेवा ॥ १६ ॥
ॐ यज्ञेनेत्यस्य नारायण ऋषिः ब्राहयुष्णिक छं० यज्ञो देव-
ता। वि० पू० ॥ १६॥
उच्यायः २] भाष्यसहिता। (२१) भाष्यम्-( देवाः ) प्रजापतिप्रागरूपाः सिद्धसंकल्पाः ( यज्ञन ) यथोक्तेन यज्ञसाधन भूतेन संकल्पेन सामग्र्या वा ( यजम् ) पुरुषं यज्ञम्वरूपं प्रजापति विष्णु वेति । "यज्ञो विष्णुः" इति श्रुतेः । अयजन्त ) पूजितवन्तः (तानि ) ते । धर्माणि) धर्माः ( प्रथमानि ) मुख्यानि ( आसन् ) अभवन् । अन्यत्र तद्दर्शनमसभावितमेवेत्यर्थः । ( यत्र ) यम्मिन् विगट्- प्राप्तिरूपे नाके (पूर्व ) पूर्व ( साध्याः ; साध्यादयो देवाः ( सन्ति ) वर्तन्ते तम् ( नाकम् ) विराप्राप्तिरूपं स्वर्ग ( ह ) निश्चयेन (ते ) ( महिमानः ) नदुपासकाः ( सचन्ते ) समव- यन्ति प्राप्नुवन्ति । इति पुरुषसूक्तानुवाकः ॥ १६ ॥ भाषार्थ-सिद्ध संकल्प देवता मानस यज्ञसे यज्ञ म्वरूप प्रजापतिका पूजन करते हुए, वे यज्ञ पुरुप पूजन सम्बंधि धर्म वा जगद्रूप विकारों के धारण करनेवाले मुख्य हुए अर्थान् उसके फलसे चिरन्तन धर्म प्रथम हाए । ग्रहांतक सृष्टि प्रतिपादक सूक्तभाग है । अगला उपा- सनारूप फलानुवादक भाग कहते हैं, जिस विराट् प्राप्तिरूप स्वर्गमं पुरातन विराट् उपाधि- साधक देवता स्थित रहते हैं, विराट् प्रातिरूप म्वर्गको ही वे उपासक महात्मा प्राप्त होते हैं, सृष्टिका प्रवाह नित्य दिखाया। (“ सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्" इति) ॥१६॥ अथोत्तरनारायणम् । मन्त्रः । अन्य सम्भृतत्पृथिव्यैरसांचविश्वकर्मणुल समवर्त्तताग्ने ॥ तस्यत्वष्टाविदधुपमैतितन्म त्यस्यदेवत्वमाजानमग्ये ॥ १७॥ ॐ अद्भय इत्यस्य नारायण ऋषिः भुरिणा|त्रिष्टुप्छन्दः । आदित्यो दे० । सूर्योपस्थाने वि० ॥ १७ ॥ भाष्यम्-(पृथिव्यै ) पृथिव्या अनि (च) ( अद्भधः) जलात् (सम्भृतः) पुष्टः अत्र पृथिवीपई पंचभूतोपलक्षणार्थं तेन पंचभूतोत्पत्तिपूर्वकाल एव सम्भृतः पुष्ट इत्यर्थः । विश्वकर्मणः) विश्वं कर्म यस्य तस्य कालस्य ( रसात् ) प्रीतियों रसः (अग्रे) प्रथम (समवर्तत ) समर्भवत् । यदा विश्वकर्मणो जगन्निर्माणेच्छाऽभूत्तदैव समवर्तत इत्यर्थः । भूतपंचकस्य कालस्य सर्व प्रति कारणत्वात् पुरुषमेधयाजिनो लिंगशरीरे पंचभूतानि तुष्टानि कालश्च । ततस्तुष्टेभ्यः कश्चिद्रसविशेषफलरूप उत्तमजन्मप्रद उत्पन्नः वेत्यर्थः । (तस्य) रसस्य ( रूपं ) तद्रूपं ( विदधत् ) धारयन् ( त्वष्टा ) आदित्यः ( एति ) प्रत्यहमुदयं करोति । ( अग्रे) प्रथमं ( मर्त्यस्य ) मनुष्यस्य सनतस्य पुरुषमेधयाजिनः ( आजानम् ) मुख्यम् ( तत् ) ( देवत्वम् ) सूर्यरूपेण-तस्मात्तस्यादित्यस्य तद्रूपं मण्डलाकारं मर्त्यस्य . १ (२२) रुद्राष्टाध्यायी- [द्वितीयों- मनुष्याणां सृष्टितोऽपि अग्रे पूर्व देवत्वं विदधत् धारयत एति वेत्यर्थः । द्विविधाः देवाः कर्मदेवाः आजानदेवाश्व-उत्कृष्टेन कर्मणा देवत्वंप्राप्ताः कर्मदेवाः सृष्टयादावुत्पन्ना आजानदेवाः ॥ १७ ॥ भाषार्थ-पृथिवी आदि सृष्टि के निमित्त अथवा पृथिवीसे और जलोंसे पृथिवीके ग्रहण करनेसे पंच भूतका ग्रहण है, अर्थात् पंचभूतोंसे जो रस पुष्ट हुआ, और जिसका विश्व कम है उस कालकी प्रीतिका रस सबसे प्रथम होता हुआ, पंचभूत और काल इन सबके प्रति कारण होनेसे पुरुष मेधयाजीके लिङ्ग शरीरम पांचभूत और काल तुष्ट होते हैं, उनके तुष्ट होनेसे कोई रस फल विशेष उत्तम जन्मका देनेवाला उत्पन्न हुआ। उस रसको रूप धारण करता हुआ आदित्य प्रतिदिन उदय करता है, प्रथम मनुष्यरूप उस पुरुष मेधयाजीके सूर्य- रूपसे मुख्य उस देवत्वको प्राप्त करता है, दो प्रकारके देवता होते हैं-कर्मदेव और आजान देव. कर्मसे देवत्वको प्राप्त हुए कर्मदेव, सृष्टिकी आदिमें उत्पन्न हुए आजानदेव होते हैं, कर्म- देवोंसे सौगुणा अधिक आनन्द आजान देवताओंको होता है (ते कर्मदेवेभ्यः श्रेष्ठाः ये शर्त कर्मदेवानामानन्दाः स एक आजान देवानामानन्दः' इति श्रुतेः 1)[बृहदारण्यक ४।१।३५।] पुरुषमेधयाजी पूर्व कल्पमें आदित्य रूपको प्राप्त हुआ स्तुति किया है ॥ १७ ॥ विशेष-पृथिवी आदि सृष्टि के निमित्त उसके द्वारा जलसे रस हुआ। वही सब जग- न्का उपादान स्वरूप है, उससे ही यह समस्त जगत् जो आगे वर्तमान था उसकी सृष्टि हुई, तब इस जगत्के रूप विधानार्थ त्वष्टाकी सृष्टि हुई, उन्होंने इस मर्त्यभुवनमें कर्मदेवत्व प्रगट किया। मुक्तपक्षमें-पुरुष मेधयाजीके कर्मसे फलरूप रस प्रगट होता है। वह कर्म- फलका देनेवाला यह सूर्य है, वह पुरुष सूर्यमें गमन कर आदित्य रूपको प्राप्त होजाता है ।। और यही मुक्तिका मार्ग है सो आगे प्रगट करते हैं ॥ १७ ॥ मन्त्रः । वेदाहमेतम्पुरुषम्महान्तमादित्यवर्णन्तमसंह पुर स्तात् ॥ तमेवावदित्वातिमृत्युमेतिनान्य पन्था विद्यतेयनाय ॥ १८॥ ॐ वेदाहमित्यस्य नाराण ऋषिः । निच्य॒दा त्रिष्टुप् छं० पुरुषो दे० । वि पू० ॥ १८ ॥ भाष्यम्-( अहम् ) ( एतम् ) ( महान्तम् ) सर्वोत्कृष्टम् ( आदित्यवर्णम् ) सूर्य- सदृशम् उपमान्तराभावात् स्वोपमम् ( तमसः ) अंधकारस्य ( परस्तात् ) दूरतरम् तमारोहि- तमित्यर्थः । तमाशब्देनाविद्योच्यते ( पुरुषम् ) सूर्यमण्डलस्थं (वेद) जानामि (तम् ) आदित्यम् ( एव ) विदित्वा ) ज्ञात्वा ( मृत्युम् ) मरणाम् ( अत्येलि ) अतिक्रामति परं ब्रह्म गच्छति (अयनाय ) आश्रयाय ( अन्यः ) द्वितीयः ( पन्था ) मार्गः (न विद्यते ) ऽध्यायः २] भाष्यसहिता। (२३) नास्ति । पुनरावृत्तये मोक्षाय अन्यः पन्था न विद्यते तथा चायमेव पुरुषो ध्यानगम्यो जातो मोक्षं ददातीति वाक्यार्थः । यथा आदित्यः स्वप्रकाशकः पनरापि प्रकाशयति तथाऽयमपि स्वप्रकाशब्रह्मरूपी जगदपि प्रकाशयतीत्यर्थः ॥ १८ ॥ भाषार्थ-मैं इस. सबसे उत्कृष्ट आदित्यरूप और उपमा न होनेसे अपनी ही समान अन्धकारसे परे अन्धकाररूपी अविद्यासे दूर पुरुषको जानता हूँ, उसही आदित्यको जानकर मृत्युको आक्रमण करता है, अर्थात् परमब्रह्मको प्राप्त होता है, आश्रयके निमित्त दूसरा मार्ग नहीं है, सूर्यमण्डल के अन्तमें आत्मरूप पुरुषको ही जानकर मुक्ति होती है ॥ १८ ॥ विशेष-उस कारणरूप सबसे उत्कृष्ट जगदीश्वर आदित्यवर्ण विद्या प्रकाशक परमे- श्वरके ज्ञानसे ही मनुष्य की मुक्ति होती है. यही देवयान मार्ग कहाता है, इसके सिवाय मुक्तिका दूसरा मार्ग नहीं है, इसीसे आत्मा तदाकार होता है उस समय जो ईश्वरकी महिमा उसको वह जानता है ॥१८॥ मन्त्रः । प्रजाप॑तिश्चरतिगम्भै अन्तरजायमानोबहुधावि जायते ॥ तस्ययोनिम्पारश्यन्तिधीरास्तस्मिन्ह तस्त्थुर्भुवनानिविश्वा ॥१९॥ ॐ प्रजापतिरित्यस्य नारायणः ऋषिः । भुरिगार्षी त्रिष्टुप् छ । पुरुषो देवता । वि० पू० ॥ १९ ॥ भाष्यम्-( प्रजापतिः) प्रजानां पतिः ( अन्तः) अन्तर्हदि स्थितः सन् (गर्भ ) मध्ये ( चरति ) प्रविशति प्राणिनां मध्ये जीवात्मकरूपतया वसतीत्यर्थः । ( अनायमानः) नित्यत्वादनुत्पत्तिधर्माऽपि (बहुधा) बहुप्रकारेण कार्यकारणरूपेण ( जायते ) स्थावरजङ्गमा- स्मकदेहेषु जन्म लभेते, यद्वाऽजायमानोपि गर्भ बहुधा विजायते रामादिशरीरेणेत्यर्थः । मायया प्रपञ्चरूपेणोत्पद्यत इति वा । ( धीराः ) ब्रह्मविदः ( तस्य ) प्रजापतेः ( योनि) स्थान स्वरूपम् ( परिपश्यन्ति ) अहं ब्रह्मास्मीति जानन्ति व्यानेन सम्यगुपलक्ष्यन्त इत्यर्थः । (ह ) ( तस्मिन् ) तस्मिन्नेव ब्रह्मणि ( विश्वा ) सर्वाणि ( भुवनानि) भूतजातानि ( तस्थुः) स्थितानि स्वर्गमृत्युपातालाद्रिस्थितानि सर्व तदात्मकमेवेत्यर्थः ॥ १९ ॥ भाषार्थ-सर्वात्मा प्रजापति अन्तर्हृदयमें स्थित हुआ प्रत्येक गर्भके मध्यमें प्रविष्ट होताहै ! उत्पन्न न होनेवाला और नित्य होकर भी अनेक प्रकार कार्यकारणरूपसे उत्पन्न होता है, अर्थात् मायाद्वारा प्रपंचरूपसे रामादिशरीर धर उत्पन्न होता है, ब्रह्मके ज्ञाता उस प्रजापक्केि स्थानस्वरूपको देखते हैं, (अहं ब्रह्मास्मीति ) इसप्रकारसे जानते हैं. संपूर्ण भूतसमूह प्राणी उसीकारणात्मा ब्रह्ममें स्थित हैं अर्थात् संपूर्ण जगत् तदात्मक है, आशय यह कि सर्वत्र पर- मात्मा स्थित है, वही सबमें व्याप्त होकर अजन्मा होकर भी अनेकरूप धारण करताहै।।१९।।
(२४)
रुद्राष्टाध्यायी-
[द्वितीयो-
मन्त्रः।
योदेवेभ्य॑ऽआतपतियो देवानाम्पुरोहित ॥ पूर्वोयो-
देवेब्योजातोनमोस्चायवामये ॥ २० ॥
ॐ यो देवेभ्य इत्यस्य नारायण ऋ० । आयनुष्टुप् छं।
पुरुषो दे० । वि० पू० ॥२०॥
भाष्यम्-( यः ) प्रजापतिरादित्यरूपः ( देवेभ्यः ) देवानां प्रयोजनाय ( आत-
पति ) आ समन्ताद्भावेन धोतते ( यः ) ( देवानाम् ) अमराणाम् (पुरोहितः )
कार्येष्वत्रे नोतः देवानां हविर्दानाय पूर्वमग्निरूपेगाधीयत इत्यभिप्रायः । ( यः) (देवेभ्यः )
देवेभ्यः सकाशात् ( पूर्वः ) ( जातः ) उत्पन्नः तस्मै ( रुचाय ) रोचमानाय (ब्राह्मये )
ब्रह्मभूताय ब्रह्मण अपत्यं ब्राझिः तस्मै, ब्रह्मावयवभूताय वेत्यर्थः ( नमः ) नमोस्तु ॥ २० ॥
भाषार्थ-जो आदित्यरूप प्रजापति देवताओं के निमित्त सब ओरसे प्रकाशित होता है.
जो देवताओंका सब कायोंमें अग्रणी है, वा प्रथम हितकर तथा पूज्य है, जो सब देवताओं से
प्रथम प्रगट हुआ है उस दीप्यमान ब्रह्मके अवयव रूपके निमित्त नमस्कार है ॥ २० ॥
विशेष-जो सूर्यरूपसे सब देवताओं को तपाते, जो अग्निरूपसे देवताओंके पुरोहित
जो कारण जलसे सबसे पूर्व प्रगट हुए हैं उन ब्राह्मो कान्तिमानके निमित्त नमस्कार है।।२०।।
मन्त्रः ।
रुचम्बाहमञ्जनयन्तोदेवाऽअग्रेतदेब्रुवन् । यस्त्वे
वम्ब्राहमणोविद्यात्तस्य॑देवाऽअसन्वर्शे ॥ २१ ॥
ॐ रुचमित्यस्य नारायण ऋ० । आय॑नुष्टुप् छं० । पुरुषो
देवता । वि० पू० ॥२१॥
भाष्यम्-( देवाः ) ब्रह्मादयः यद्वा दीप्यमानाः प्राणाः (रुचम् ) शोभनम् (ब्राह्मम् )
ब्रह्मणोऽपत्यमादित्यन् ( जनवन्तः) उत्सादयन्तः (अग्रे) प्रथमम् (तत्) (अब्रुवन् )
अयमेवास्माकं मुख्य इत्युक्तवन्तः । किं च हे पुरुषोत्तम (यः) (ब्राह्मणः) ब्राह्मणः (त्वा)
त्वाम् ( एवम् ) उक्तविधिना ( विद्यात् ) जानीयात् (तस्य ) आदित्योपासकस्य ब्राह्म-
णस्य ( देवाः) देवगणाः ( वशे ) इच्छायाम् ( असन् ) भवन्ति । आदित्योपासको जग-
त्पूज्यो भवति तथा च सहस्रशीर्षेत्यादिग्रन्थतोऽर्थतश्चाधीत्य यो ब्राह्मणः पुरुषोतम बानाति
ब्रह्मादयः देवास्तस्याभिलषितान्सम्पादयन्तीति वाक्यार्थः ॥ २१ ॥
ऽध्यायः २]
भाप्यसहिता।
(२५)
भाषार्थ-दीप्रिमान इन्द्रियोंके देवता शोभन ब्रह्म ज्योतिरूप आदित्यको प्रगट करते
हुए प्रथम वह वाणी बोलते हुए हे आदित्य ! जो ब्राह्मण तुमको उक्त प्रकारसे प्रगट हुआ
अजरामर जाने उस आदित्य उपासनावाले ब्राह्मण के देवता वशमें होते हैं ।। २१ ॥
मन्त्रः॥
श्रीश्चंतेलक्ष्म्मीश्चपकन्यावहोरात्रेपार्श्वनक्षत्राणि
रूपमश्विनौऽध्यात्तम् ॥ इष्ष्णन्निषाणामुम॑ऽइ
घाणसर्वलोकम्मऽइषाण ॥ २२ ॥
इतिसहितायांरुद्रपाठेहितीयोऽध्यायः ॥२॥
ॐ श्रीश्च त इत्यस्य नारायण ऋ० ।निच्यदार्षीत्रिष्टुप् छं० ।
पुरुषो देवता । वि० पू० ॥ २२ ॥
भाष्यम्--हे देव पुरुषोत्तम ( श्रीः ) श्रीयतेऽनया श्रीः सम्पत्तिः (च) ( लक्ष्मीः)
सौन्दर्यम् ( ते ) तव (पन्यौ ) जायास्थानीये ( च ) ( अहोरात्रे ) अहोरात्रे ( पार्श्व )
पार्श्वस्थानीये । अहः शब्दः परब्रह्मपरः तस्य विद्यात्मकत्वेन प्रकाशरूपत्वात् रात्रिशब्दः
-संसारपरः प्रकृतिपरः तम्याविद्यात्मकत्वेन प्रकाशरूपत्वात् एतेन धर्मार्थकामात्मकः संसार: मोक्षश्च
श्रीपरमेश्वरपाश्वऽद्वयमित्युक्तं भवति । ( नक्षत्राणि ) गगनगास्ताराः ( रूपम् ) तव मूर्तिः
( अश्विनौ ) द्यावापृथिव्यौ (व्यात्तम् ) विकासितमुखम्थानीये विवृतं मुग्वमित्यर्थः ।
( इष्णन् ) कर्मफलमिच्छन् सन् ( इषाण ) गच्छ अनुगृहाण ( अमुम् ) परलोकम् ( मे )
( इषाण ) मम परलोकः समीचीनोऽस्तु मे इमं लोकं भार्यापुत्रजनादिकभिषाण न केवलम,
किन्तु भूरादिसप्तलोकम् इषाणायं वाक्यार्थः । ( सर्वम् ) पशुपुत्रादिधनयुक्तमिह लोकं मवर्ग-
मोक्षादिकमिच्छितवान्छामात्रेणैव सर्व (मे ) मह्यम् ( इषाण ) इच्छेत्यर्थः । सर्वात्मकोऽहं
भवेयमितीच्छेत्यर्थः ॥ २२ ॥
भाषार्थ हे स्वप्रकाशस्वरूप ! श्री जिसके द्वारा संपूर्णजन आश्रणीय होते हैं, और
जिसके द्वारा देखा जाता है सौन्दर्य रूप लक्ष्मी आपकी स्त्रीस्थानीय है और दिनरात पाश्व-
स्थानीय हैं आकाशमें स्थित नक्षत्र आपके रूप हैं कारण कि तुम्हारे ही तेजसे प्रकाशित हैं
द्यावापृथिवी तुम्हारे मुखस्थानमें व्याप्त हैं (“अश्विनौ द्यावापृथिव्यौ इम हीदसर्वमश्नु-
वाताम" इति श्रुतेः ।) कर्मफल की इच्छा करते इच्छा करो, परलोककी मेरे निमित्त इच्छा
करो अर्थात् मेरे निमित्त परलोक समीचीन हो ऐसी अमोघ इच्छा हो सबलोकात्मक मैं
होजाऊँ; अर्थात् मुक्त होजाऊँ. ऐसी मेरे निमित्त इच्छा करो ॥ २२ ॥
[२६) रुद्राष्टाध्यायी- [ तृतीयों-- सरलार्थ-मनुप्योंको इस प्रकार ब्रह्मवोध लाभ करना चाहिये कि हे देव ! श्री औ लक्ष्मी शोभा कान्ति और संपत्ति यह तुम्हारी पत्नीरूप हैं, दिनरात तुम्हारे दोनों पार्श्वचार तुम्हारे रूपसे नक्षत्र रूपवान् है, द्यावापृथिवी तुम्हारे शरीरके रक्षकरूपसे सावधानतारे तुमको दृष्टिपूर्वक व्याप्त करके स्थित हैं, यदि तुम इच्छा करो तो यह लोक तुम्हारी इच्छ नुगत है, सवलोकही तुम्हारी इच्छानुगत हैं. मुझ उपासकको ब्रह्मप्राप्ति हो, मैं सर्वत्र आपके अनुभव करूँ, यह आदित्यमें ब्रह्मउपासना है ॥ २२ ॥ इति श्रीनाष्टके पण्डितज्वालाप्रसादमिश्रकृतसंस्कृतार्यभाषाभाष्यसमन्वितो द्वितीयोऽध्यायः ॥ २॥ अथ तृतीयोऽध्यायः। मन्त्रः। आशुशिशांनोव्षभोनभीमोर्घनाघुनक्षोभण श्चर्षणीनाम् ॥ सङ्क्रन्दनौनिमिष एकवीरशत सेनाऽअजयत्साकमिन्द्रः ॥१॥ ॐ आशुरित्यस्याप्रतिरथ ऋषिः आर्षी त्रिष्टुप्० इन्द्रो देवता जपे विनियोगः ॥ १॥ भाष्यम्-( आशुः ) शीघ्रकारी व्यापको वा (शिशानः) शातनकर्ता ( वृषभः) वृषभः । न • इव ( भीमः ) भयानकः ( धनाधनः ) घातकः शत्रूणां हन्ता ( चर्षणीनाम् ) मनुष्याणाम् ( क्षोभणः) सञ्चालकः ( संक्रन्दनः ) सम्यक् क्रन्दयिता प्राणिनामाकर्षेण प्रहारेण वा ( अनिमिषः) अप्रमादी चक्षुर्निमेषरहितः सर्वदा स्वयज्ञगमनयुद्धादिकार्येष्वनलस इत्यर्थः । (एकवीरः ) विक्रान्तः असाहाय्येन कार्यक्षम इत्यर्थः । (इन्द्रः) इन्द्रो देवता ( शतं. सेनाः) वह्वीः सेनाः (साकम् ) एकदैव ( अजयत् ) जितवान् [ यजु० १७ । ३३ ] ॥१. भाषार्थ-शीघ्रगामी, वज्रकी तीक्ष्णकारी वर्षणशीलकी उपमावाला, भयकारी,शत्रुओंका अतिशय घातक, वा वृष्टि करने में मेघरूप, मनुष्योंके क्षोभका हेतु, बारंवार गर्जन करने- वाला, अथवा शत्रुओका आह्वान करनेवाला, देवता होनेसे पलक न लगानेवाला अत्यन्त सावन वा निरंतर जाग्रत् वा ऊपर २ विद्युत्प्रकाशयुक्त एक अद्वितीय वीर इंद्रनामसे प्रसिद्धने साथही एक सौ सौ शत्रु सेनाको जय किया है, इस मंत्रके विशेषण अवतारोंमें भी घटते हैं तथा इस मन्त्र सेनानायकके गुणोंका भी वर्णन है कि, वह इस प्रकारका होना चाहिये ॥१॥ मन्त्रः। सङ्क्रन्दनेनानिमिषेणं जिष्ष्णुनायुत्कारेणंदु ऽध्यायः २] भाष्यसहिता। (२७) च्यवनेनधृष्ष्णुना ॥ तदिन्द्रेणजयततत्संहद्ध य्यधौनरऽइपुंहस्तेनवष्ष्णा ॥२॥ ॐ सङ्क्रन्दनेनेत्यस्याप्रतिरथ ऋषिः । विराबाहयनुष्टुप्० इन्द्रो दे० वि० पू० ॥२॥ भाष्यम्-( युधः ) हे योद्धारः ( नरः ) हे मनुष्याः (धृष्णुना ) प्रसहनशीलेन ( संक्रन्दनेन ) शब्दकारिणा ( युत्कारेण ) युद्धकारिणा (अनिमिषेण ) निमेषरहितेन एकचित्तेन वा ( इषुहस्तेन ) बाणपाणिना (जिष्णुना ) जयशीलेन ( दुश्च्यवनेन ) अप्रच्युतस्वभावेन ( वृष्णा ) वर्षणशीलेन ( इन्द्रेण ) इन्द्रेण ( तत्.) तद्युद्धं ( जयत) जयत (तत्.) शत्रु- बलम् (सहवम् )अभिभवत ॥ २ ॥ भाषार्थ--हे युद्ध करनेवाले मनुष्यो प्रगल्भ भय रहित शब्द करनेवाले, बहुत युद्ध करने-- वाले, एकचित्त, वाण हाथमें धारण किये, जयशील अजय्य, कामनाओंके वर्षानेवाले, इन्द्रके प्रभावसे उस शत्रुसेनाका जय करो और उस शत्रुसेनाको वशीकरके विनाश करो। सेना- नायकोंको यह मंत्र पढकर इन्द्रकी सहायतासे युक्त हो युद्ध करना चाहिये [यजुक १७१३४] ॥२॥ मन्त्रः । सऽइए हस्तै सनिषङ्गिभिवंशीसस्रष्टासयुधऽऽइ न्द्रोगणेनं ॥ सर्टसृष्टजित्सोमपाहिशख़यंग्यध न्याप्रतिहिताभिरस्ता ॥३॥ ॐसऽइषुहस्तैरित्यस्य अप्रतिरथ ऋषिः। आर्षीत्रिष्टुप् । इन्द्रो देवता वि० पू० ॥३॥ भाष्यम्-( सः ) ( वशी ) जितेन्द्रियः कान्तोवा ( इषुहस्तैः ) बाणहस्तैः (निषङ्गि- भिः ) निषङ्गः खड्गः तद्वद्भिः भटैः ( संस्रष्टा ) एकीभवनशील: सः) (गणेन) शत्रुसंधेन) युधः युद्धकर्ता ( स इन्द्रः ) इन्द्रः ( संसृष्टजित् ) संसृष्टान् शत्रून जयति ( सोमपाः ) सोमस्य पाता ( बाहुशर्डी) बाहुबलोपेतः ( उपधन्वा ) उद्यतधन्वा (प्रतिहिताभिः ) प्रेरिताभिरिषुभिः ( अस्ता) मारयिता । ईदृशेनेन्द्रेण जयेति सम्बन्धः । [यजु० १७।३५ ] ॥ ३ ॥ भाषार्थ-वह जितेन्द्रिय वा शत्रुओंको वश करनेवाला अथवा मनोहर सर्वजनोंका प्रिय, अथवा स्वतंत्र वा शत्रुओका ऐश्वर्य ग्रहण करनेवाला बाण हायमें लिये धनुष धारियोंसे युद्धके निमित्त संसर्ग करनेवाला, वह शत्रु समूहोंसे युद्ध करनेवाला है, वह इन्द्र युद्धके निमित्त (२८) रुद्राष्टाध्यायी- [ तृतीयो- संगत हुए शत्रुओका जीतनेवाला, यजमानों के यज्ञमें सोमपान करनेवाला, बाहुओंके बल युक्त, उत्कृष्ट धनुषवाला, अपने धनुषसे प्रेरित वाणोंसे शत्रुओपर चलता है वह इन्द्र हमा - रक्षा करे।। ३॥ मन्त्रः। वृहस्प्पतेपरिंदीयारथनरक्षोहामित्रों ॥ २ ॥ अपवार्धमानः ॥ प्रभञ्जन्त्सेनाप्प्रमृणो युधा जयन्नुस्माकमेद्धयवितारथानाम् ॥ ४ ॥ ॐ बृहस्पत इत्यस्याप्रतिरथ ऋषिः।आपी त्रिष्टुप् छ ।बृहस्पति देवता । वि० पू० ॥४॥ भाष्यम्- हम्पते ) वृहतांपते पालयितः देव ( रक्षोहा ) रक्षसां हन्ता ( रथेन : ( परिदीयाः , परिगच्छ ( अमित्रान् ) शत्रून् ( अपबाधमानः ) सर्वतो नाशयन् (सेनाः ) शत्रुसम्बधिनी: सेनाः ( प्रभञ्जन् ) प्रकर्षेण नाशयन् (युधा) युद्धेन (प्रमृणः ) प्रमईकान (जयन् ) जयन् ( अस्माकम् ) (स्थानाम् ) रथानाम् ( अविता ) गोप्ता ( एधि ) भव [ यजु० १७१३६ ॥४॥ भाषार्थ--वाणीके पति व्याकरण कर्ता होनेसे इन्द्रका नाम बृहस्पति है, अथवा उनके पुरोहित वृहस्पतिका सम्बोधन है, हे बृहस्पते, ! तुम राक्षसों वा विघ्नोंके नष्ट करनेवाले हो र थके द्वारा सब ओर गमन करते शत्रुओंको पीडा देते हुए शत्रुओं की सेनाको अतिशय पीडा करते हुए युद्धसे हिंसाकारियोंको जय करते हुए हमारे रथों के रक्षक हो ।। ४ ।। मन्त्रः। बलविज्ञायस्स्थविर प्रवीरल्सहस्वान्याजी सह मानऽउग्रः ॥ अभिवीरोऽअभिसत्त्वा सहोजा जैमिन्द्ररथमातिष्ठगोवित् ॥ ५ ॐ बलविज्ञाय इत्यस्याप्रतिरथ ऋपिः । आषी त्रिष्टुप् छन्दः । -इन्द्रो दे० वि० पू० ॥५॥ भाष्यम्-( इन्द्र ) हे इन्द्र त्वम् ( बलविज्ञायः ) सर्वभूतबलं विजानातीति बलविज्ञायः ( स्थविरः ) सर्वानुशासकः सर्वमान्यश्चिरन्तनो वा ( प्रवीरः )
(
ऽध्यायः ३
भाष्यसहिता।
(२९)
प्रकृष्टो वीरः ( सहस्वान् ) बलवान् । वानी) वाजमान् ‘वाजमन्नम् ( उग्रः ।
उद्भूर्णबलः ( अभिवीरः ) वोरमभिलक्षीकृत्य गच्छतीत्यभिवीरः अभिगता वीरा
वीर्यवन्तोऽनुचरा यस्य सः
सः तथोक्तः । ( अभिसत्त्वा ) सत्वमभितिष्ठति सः
( सहोजाः ) बलाज्जातः (गोवित् ) स्तुतिज्ञाता ( सहमानः ) शत्रू णामभिभविता ( जैत्रम् )
जयशीलम् ( रथम् ) रथम् आतिष्ठ ) अस्य साहाय्यार्थमारोढुमर्हसि (यजु० १७३७] ॥५॥
भाषार्थ-ह इन्द्र तुम दूसरों का बल जाननेवाल: पुरातन. सबके
अनुशासन करनेवाले,
अतिशयशूर, महाबलिष्ठ, अन्नवान्, युद्धमें क्रूर. सब ओर वीरोंसे युक्त, सब ओर परिचार-
कोंसे युक्त, वलसे ही उत्पन्न, स्तुतिको जाननेवाले, शत्रुओंके तिरस्कारकर्ता हो: अपने जय-
शील रथमें आरोहण करो ॥५॥
मन्त्रः ।
गोत्रभिदङ्गोविदंबज्ञबाहुञ्जय॑न्तुमज्म्मप्प्रमृण
न्तमोजसा ॥ इमर्छसंजाताऽअनुवीरयहमिन्द्रर्छ
सखायोऽअनुसरभद्धम् ॥ ६ ॥
ॐ गोत्रभिदमित्यस्य अप्रतिस्थ ऋषिः । भूरिगार्षी त्रिष्टुप् छः ।
इन्द्रो देवता । वि० पू० ॥६॥
।। अज्मेति युद्धनाम्
भाष्यम्--( सजाताः ) सहोत्पन्ना योद्धारः । सखायः) परस्परं सखिभूता यूयं ( इमम् )
( गोत्रभिदम् ) वृष्टयर्थ मेघ भिनत्ति तं पर्वतानां भेत्तरं वा ( गोविदम् ) पण्डितम् ( वज्र-
बाहुम् ) वज्रहस्तम् ( अज्म जयन्तम् ) संग्रामं जयन्तम्
[नियं० २ । १७ । ४३ ]" (ओजसा ) बलेन ( प्रमृणन्तम् ) मईयन्तम् (इन्द्रम् )
देवेन्द्रन् ( अनुवीरयध्वम् ) वीरकर्म युद्धं कुरुध्वम् (: अनुसंरभध्वम् ) अनुगम्य संरंभ
कुरुत [ यजु० १७ । ३८ ] ।।६।।
भाषार्थ--हे समान जन्मवाले देवताओं ! इस असुर लोकके नाशक वा मेघके भेदन
करनेवाले देववाणीके ज्ञाता, पंडित. हाथमें वज्र धारण करनेवाले, संग्रामके जीतनेवाले,
बलसे शत्रुओंको मारनेवाले, इन्द्रको वीर कर्मका उत्साह दिवाओ, और इस वेग करनेवालेके
उपरान्त तुम वेग करो ॥६॥
मन्त्रः ।
त्रा
रिन्द्रः ॥ दुश्च्यवन तनाषायुद्धयोस्म्माकर्छ
सेनाऽअवतुष्प्रयत्सु ॥७॥
रुद्राष्टाध्यायी-
। तृतीयो-
(
ॐ अभिगोत्राणीत्यस्याप्रतिरथ ऋषिः । निच्यदार्षी त्रिष्टुप्०
इन्द्रो देवता । वि० पू० ॥ ७॥
भाष्यम्-( अदयः ) निस्वासः नियो वा ( वीरः ) विक्रान्तः ( शतमन्युः ) बहुयः
बहुक्रोधो वा ( दुश्च्यवनः ) अन्यैरचाल्यः (पृतनापाट् ) शत्रुसेनानामभिभविता (अयुध्यः
सम्प्रहर्तुमशक्यः ( इन्द्रः ) ऐश्वर्ययुक्तदेवः .( युत्सु ) संग्रामेषु ( गोत्राणि ) अनाणि असुर
कुलानि वा ( सहसा ) वलेन ( अभिगाहमानः ) प्रविशन् ( अस्माकम् ) ( सेनाः) चम्
(प्रावतु ) रक्षतु ! यजु० १७ । ३९] ॥ ७ ॥
भाषार्थ-शत्रुओंपर दया रहित, विक्रान्त, अनेक प्रकारके क्रोधयुक्त, वा शतयज्ञकर्ता
जिसको कोई च्यावित न कर सके, अजेय संग्राममें सेनाको सहकर तिरस्कार करनेवाला
"जिसके संग कोई युद्ध नहीं कर सकता, सो इन्द्र युद्धोंमें असुर कुलोको वा मेघ वृन्दोंको एव
-साथही विलोडित करता हुआ हमारी सेनाकी रक्षा करै ॥ ७ ॥
मन्त्रः।
इन्द्रऽआसान्नेताहस्पतिर्दक्षिणायज्ञःपुर एतुसो
म ॥ देवसेनानामभिभञ्जतीनाञ्जयन्तीनाम्म
रुतौयन्त्वग्ग्रंम् ॥ ८॥
ॐ इन्द्र इत्यस्य अप्रतिरथ ऋषिः । ब्राह्मयुष्णिक छं० । इन्द्रो
देवता । वि० पू० ॥ ८॥
भाष्यम्- ( आसाम् ) अस्मत्सहायार्थमागतानाम् ( देवसेनानाम् ) व्यूहरचनानाम्
(इन्द्रः) देवेन्द्रः ( नेता ) नायकः अस्तु (बृहस्पतिः)बृहस्पतिः (पुरः ) पुरस्तात् (एतु)
आगच्छतु ( दक्षिणा ) दक्षिणस्यां दिशि ( यज्ञः ) यज्ञः ( सोमः ) सोमः ( पुर एतु ) अग्रे
आगच्छतु यद्वा दक्षिणायज्ञः सोमः पुर एतु पेनानाम् । किम्भूतानाम् ( अभिभञ्जतीनाम् )
शत्रून् मर्दयन्तीनाम् ( जयन्तीनाम् ) विजयमा नानाम् तासाम् ( मरुतः) मरुद्गणः ( अग्रम् )
सेनाप्रभागम् ( यन्तु ) गच्छतु [ यजु० १७ । ४० ] ॥ ८ ॥
भाषार्थ-वृहस्पति, इन्द्र, इन शत्रुओंको मदन करनेवाली विजयशील देवसेनाओंके
शिक्षक वा पालक हैं, यज्ञपुरुष विष्णु वा यज्ञ सोम दक्षिणा आगे गमन करें, गणदेवता
सेनाके अग्रभागमें गमन करें । अथवा विष्णु दक्षिण ओरसे रक्षाको गमन करें, वा यज्ञ सोम
दक्षिणाका फल जयको प्राप्त करें, यही प्रकार सेना चलानेका है ॥ ८॥
अध्यायः ३] भाष्यसहिता। (३१) ) मन्त्रः। इन्द्रस्यवृष्णोवरुणस्यराज्ञऽआदित्यानाम्मरुता शऽउग्यम् ॥ महामनसाम्भुवनच्च्यवाना छो|देवानाञ्जयतामुदस्स्थात् ॥९॥ ॐ इन्द्रस्येत्यस्य अप्रतिरथ ऋषिः। आर्षी त्रिष्टुप् छन्दः । इन्द्रादयो देवताः । वि० पू० ॥ ९॥ भाष्यम्-( वृष्णः ) वर्षतुः ( इन्द्रस्य ) देवेन्द्रस्य ( राज्ञः ) ( वरुणस्य ) वरुणदेवस्य ( आदित्यानाम् ) आदित्यसंज्ञकानाम् ( मरुताम् ) मरुद्गणानाम् ( शर्द्धः ) हस्त्यश्वपदान्त- लक्षणं बलम् ( उग्रम् ) उद्गीर्णायुधं यथा स्यात्तथा उद्बभूव ( जयताम् ) जयशालिनाम् । ( महामनसाम् ) उत्कृष्टचित्तानाम् ( भुवनच्यवानाम् ) भुवनच्यवनसमर्थानाम् ( देवानाम् ) देवतानाम् (घोषः ) जितेजितमिति शब्दः (उदस्थात् ) उत्तिष्ठति [ यजु० १७१४१ ॥९॥ भाषार्थ-महामन अर्थात युद्ध में स्थिरचित्त, लोकनाशकी सामर्थ्यवाले, जयशील देवता बारह आदित्य मरुद्गणों और कामनाकी वर्षा करनेवाले इन्द्र और राजा वरुणका उत्कृष्ट बल अर्थात् गज, तुरंग, रथ, पैदलोंकी सेनाका देवबलकी जय यह शब्द सम्यक् प्रकारसे हुआ, अर्थात् देवताओंकी बलप्रकाशक उग्रवज्रध्वनि सर्वदा समुत्थित होती है । सेनानाय- कोंको इन देवताओंका स्मरण कर जयशब्दपूर्वक सेना चलानी चाहिये ॥९॥ मन्त्रः। उद्धर्षयमघवन्नायुधान्युत्सत्त्वनाम्मामकानाम्म- नासि ॥ उदृत्रहन्वाजिनांबार्जिनान्युट्ट्यांना अयताँय्यन्तुघोषाः ॥ १०॥ ॐ उद्धर्षयेत्यस्य अप्रतिरथ ऋषिः । ब्रास्युष्णिक छन्दः । इन्द्रो देवता । वि० पू० ॥ १० ॥ भाष्यम्-(भगवान् ) हे इन्द्र (आयुधानि) अस्मदीयानि शस्त्राणि ( उद्धर्षय ) उद्तहर्षाणि कुरु प्रहरणेषूद्युक्तानि भवन्त्वित्यर्थः । (मामकानाम् ) अस्मदीयानाम् (सत्त्वानाम् ) सैनिकानाम् ( मना सि ) चेतांसि (उत् ) उद्धर्षय (वृत्रहन् ) है. देवेन्द्र ( वाजि- - (३४) रुद्राष्टाध्यायी- तृतीयो- ॐ प्रेत इत्यस्याप्रतिरथ ऋषिः । विराडार्ण्यनुष्टुप् छन्दः । योधा देवता । वीरोत्तेजने विनियोगः ॥ १४॥ भाष्यम्-( नरः) हे मनुष्याः नेतारः संग्रामस्य निर्वोढारो योद्धारः (प्रेत ) प्रकर्षण गच्छत गत्वा च (जयत ) प्रतिभटान् जयत (इन्द्रः ) इन्द्रः ( वः ) युष्माकम् ( शर्म कल्याणम् ( यच्छतु ) ददातु, किंच (वः ) भवताम् (बाहवः) भुजाः ( उग्राः ) उद्गुण- बलाः ( सन्तु ) भवन्तु । तथा ( अनाधृष्याः) अन्यैरनभिभाव्याः ( यथा ) यथा यूयम् (असथ ) भविष्यथ तथा वो बाहवः उग्राः सन्तु । [ यजु० १७।४६ ] ॥१४॥ भाषार्थ-हे हमारे योधामनुष्यों शत्रुओंकी सेनापर शीघ्रतासे जाओ, और विजय प्राप्त करो अवश्य जय होगी. इन्द्र तुमको जयसे प्राप्त हुए सुखको प्रदान करें, तुम्हारी भुजायें उद्गुर्णायुधवाली हृष्ट पुष्ट हों, जिससे तुम किसीसे भी तिरस्कार न पानेवाले हो।। १४ ॥ मन्त्रः। असौम्यासेनामस्तस्परेषामब्भ्यैतिनऽ ओज॑सा स्प्पर्द्धमाना ॥ ताङ्गहततमसापव्रतेनयथामीऽ अन्योऽअन्यन्नजानन् ॥ १५॥ ॐ असौ या इत्यस्य अप्रतिरथ ऋषिः । निच्यदार्षी त्रिष्टुप् छ । मरुतो देवता सेनोत्तेजने विनियोगः ॥ १५॥ भाष्यम्-( मरुतः ) हे मरुतः ( असौ या सेना वाहिनी ) ( नः ) अस्मान् (ओजसा) बलेन ( स्पर्द्धमाना) स्पृहायुक्ता (परेषां ) शत्रणां ( अभ्येति ) अभिमुखमेति (ताम् ) सेनाम् ( अपव्रतेन ) अपगतकर्मणा "व्रतमिति कर्मनाम" [ निघं० २।१।७ ] ( तमसा ) अंधकारेण तथा (गृहत ) व्याप्नुत (यथा ) येन ( अमी) योद्धारः (अन्यः अन्यम् ) अन्योऽन्यम् (न जानन् ) न जानीयुरित्यर्थः । [ यजु० १७।४७ ] ।। १९ ॥ भाषार्थ-हे मारुतो! वा हे सेनानायक गण ! जो यह शत्रुओंकी सेना बलसे स्पर्धा करती हुई हमारे सन्मुख आगमन करती है, उस सेनाको कर्मरहित अन्धकारसे इस प्रकार आच्छा- दित करो, कि जिस प्रकार यह शत्रु सेनाके लोग परस्पर नहीं जानते हुए परस्पर अस्त्र चलाकर नष्ट हों।॥ १५॥ [ यत्रबाणासुम्पतन्तिकुमाराविशिखाऽईव ॥ तन्न व्यायः ३ भाष्यसहिता। (३५) ऽइन्द्रोदृहस्पतिरदितित्शम्मयच्छतुविश्वाहाशमैं यच्छतु ॥ १६॥ ॐ यत्रेत्यस्य अप्रतिरथ ऋषिः । पंक्तिश्छन्दः । ब्रह्मणस्पति- रदितिश्च देवते । प्रार्थने विनि० ॥ १६ ॥ भाष्यम्-( यत्र ) संग्रामे (विशिखाः) मुण्डिताः (कुमाराः) बालकाः (इव) ( बाणाः) शराः ( सम्पतन्ति ) सम्यक्तया पतन्ति (तत्) तत्र (इन्द्रः) इन्द्रः ( बृहस्पतिः ) बृहतां पतिः ( अदितिः ) देवमाता ( शर्म , सुखम् (नः) अस्माकम् ( यच्छतु ) ददातु ( विश्वाहा ) सर्वदा ( शर्म ) सुखम् ( यच्छतु ) ददातु पुनरुक्तिरादासा [ यजु० १७ । ४८] ॥ १६ ॥ भाषार्थ-जिस रणक्षेत्र में वीर गणोंके छोडे हुए बाण इधर उधर गिरते हैं, जिस प्रकार शिखारहित बालटूरियोंवाले छोटे बालक चपलताके कारण इधर उधर फिरते हैं, उस युद्धमें बृहस्पति देवता अथवा मन्त्रोंके पालक विजयके उचित मन्त्रोंकी जाननेवाली देवमाता अथवा अखण्डित शक्ति इन्द्र हमको कल्याणप्रदान करे, वह सम्पूर्ण शत्रुओंको मारनेवाला कल्याण प्रदान करें ॥१६॥ मन्त्रः। मम्मीणितेवमणाच्छादयामिसोमस्वाराजामृते नानुवस्ताम् ॥ उरोबरीयोवरुणस्तेकृणोतुजयन्त । न्वादेवामदन्तु ॥ १७ ॥ इति सहितायां रुद्रजाप्ये तृती- योऽध्यायः ॥३॥ ॐ मर्माणीत्यस्य अप्रतिरथ ऋषिः । त्रिष्टुप् छन्दः । सोम- वरुणो देवते । कवचप्रच्छते विनियोगः ॥ १७॥ भाष्यम्-हे राजन् (ते) त्वदीयानि (मर्माणि ) येषु स्थानेषु विद्धः सद्यो प्रियते तानि मर्माणि ( वर्मणा ) मंत्रपूतेन कचेवन (छादयामि ). आच्छादनं करोमि (सोमः राजा ) सोमराजा (त्वा ) त्वाम् (अनु) छादनानन्तरम् (अमृतेन ) अमृतरूपेण द्रव्येण (वस्ताम् ) आच्छादयतु ( वरुणः ) वरुणदेवोऽपि (ते) तव वर्म (उरोर्वरीय ) उत्कृष्टादप्युत्कृष्टम् ---
(३६)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ चतुर्थों-
( कृणोतु ) करोतु ( जयन्तम् ) जयशालिनन (त्वा) न्वान (देवाः , देवाः (अनुमदन्तु.)
प्रहर्षयन्तु । यजु० १७ । १२ ।। १७ !!
भाषार्थ-हे राजन् मैं कवचसे आपके मर्मस्थानोंको [कि जिनके छिन्न होनेसे शीव्रही
मरण होता है | आच्छादन करता हूं: राजा सोम आपको अमृतसे आच्छादन करे, और
वरुण आपके वर्मको उत्तमोत्तम करे, तथा देवता आपको विजय पाता देखकर आनन्द
युक्त हो ॥ १७॥
इत्यप्रतिरथसूक्तम् ।
इति श्रीरुद्राटक पण्डितज्वालाप्रसादनिश्रकृतसंकृतार्यभाषाभाष्यसमन्वितस्तृतीयोऽध्यायः ॥ ३॥
अथ चतुर्थोऽध्यायः।
विन्ध्राइहत्पिबतुसोम्म्यम्मद्धायुधंद्यज्ञप॑ताव
विहृतम् ॥ बातजूतोयोऽअभिरक्षतिक्मनाप्र
जापुपोषपुरुधाविराजति ॥१॥
ॐ विभ्राडित्यस्य विभ्राऋपिः। जगती छन्दः । सूर्यो
देवता । सौर्यपुरोरुकमंत्रपाठे विनियोगः ॥ १॥
भाष्यम्-( विभ्राट् ) विशेषेण लाजते डीप्यत इति विभ्राट् सूर्यः (बृहन् ) महत्
( सोम्यम् ) सोममयम् ( मधु ) मधु ( पिबतु ) पिबतु किकुर्वन् ( यज्ञपतौ) यजमाने
( अविहुतम् ) अकुटिलम् ( आयुः ) ( दधत् ) स्थापयत् ( यः ) सूर्यः (वातजूतः )
महावायुना प्रेर्यमाणः सन् ( त्मना ) आत्मना स्वयमेव ( अभिरक्षति ) सर्वं जगदधिपश्यन्
पालयति " राशिचक्रम्य वायुप्रेर्यत्वात् सूर्यस्यापि तत्प्रेर्यत्वम्
सः सूर्यः (प्रजाः) प्रजाः
( पुपोष ) वृष्टयादिप्रदानेन पोषयति ( पुरुधा ) बहुधा (विराजति ) विशेषेण दीप्यते च ॥
[ यजु० ३३ । ३० ] ॥ १ ॥
भावार्थ-विशेष दीप्तिमान् सूर्य देवता यजमानमें अखण्ड आयुको स्थापन करते हुए
बडे स्वादुरससे युक्त सोमरूप हविको पान करो, जो सूर्य्य वायुसे प्रेरित आत्माद्वारा प्रजाकी
रक्षा करता वा पालता है पुष्ट करता है वह अनेक प्रकारसे विराजमान होता है। आशय
यह कि- जो अधिक कान्तिमान् सूर्य परमात्माके नियमसे वायुवेगसे निरन्तर भ्रमण करते
प्रजा वर्गकी रक्षा करते हैं पोषण करते हैं और चन्द्र नक्षत्रादिकी ज्योतिरूपसे अनेक रूपसे
विराजमान हैंवह आज इस अति मधुर अधिक सोम रसका पान करें और यजमानकी
आयुकी वृद्धि करें ॥१॥
उध्यायः ४] भाष्यसहिता। (३७) मन्त्रः। उद्धृत्यञ्जातवेदसन्देवबहन्तिकेतव ॥ दृशेवि श्वायसूर्य्यम् ॥ २॥ ॐ उदत्यमित्यस्य प्रस्कण्व ऋषिः । भुरिगाी गायत्री छन्द । सुर्यो देवता । आज्येन शालाद्वायै नौ हवने विनियोगः ॥२॥ भाष्यम्-( केतवः ) सूर्यरश्मयः सूर्याश्वा वा ( जातवेदसम् ) अग्नितेजोमयं यद्वाजातं वेदः कर्मफलं यस्मात् ( त्यम् ) प्रसिद्ध तम् ( सूर्य देवम् ) द्योतमानं सूर्यम् (विश्वाय ) विश्वस्य ( दृशे ) दर्शनाय ( उद्वहन्ति ) ऊर्ध्वं वहन्ति ॥ २ ॥ भाषार्थ-ब्रह्मज्योति इस जातवेदस सूर्य देवताको सब संसारको दर्शन क्रिया सम्पादन करनेके निमित्त ऊर्श्वभाग में निरन्तर वहन करती है। अथवा उदयको प्राप्त हुए अग्निके समान समस्त प्राणियों का कार्य करनेवाले संसारके सब पदार्थोंके दर्शनके निमित्त जिसने सूर्यको प्रकाशित किया है उस परमात्माकी विद्वान पुरुप उपासना करते हैं ॥ २ ॥ मन्त्रः। येनापावकचक्षसाभुरण्यन्तञ्जनीं ॥ २॥ऽअनु ववरुणपश्यसि ॥३॥ ॐ येनेत्यस्य प्रस्कण्व ऋषिः । गायत्री छन्दः । सूर्यो देवता । वि० पू० ॥३॥ भाष्यम्-(पावक ) हे शोधक (वरुण) अनिष्टनिवारक सूर्य ( त्वम् ) त्वम् ( येन) येन ( चक्षसा) दर्शनेन ( जनान् ) जातान् प्राणिनः (भुरण्यन्तम् ) धारयन्तं पोषयन्तं वेमं लोकं येन चक्षसा प्रकाशेन ( अनुपश्यसि ) अनुक्रमेण प्रकाशयसि तेन ज्ञानेन अमानपि भरण्यतः पश्येत्यर्थः ॥ [ यजु० ३३ । ३२ ] ॥ ३ ॥ भाषार्थ-हे पावक ! अर्थात् सबके शुद्ध करनेवाले वरुणदेव ! इस सब ब्रह्माण्डको अपनी ज्योतिसे आच्छादन करके स्थित हुए तुम जिस सूर्यरूप ज्योतिसे वा अनुग्रहरूप इष्टिसे उस सुपर्ण रूपको देखते हो अर्थात् सर्वमेधयाजीको पक्षीके समान शीघ्रतासे स्वर्गमें गमन करते देखते हो उसी दृष्टिसे हम अपने जनोंको भी सब प्रकारसे देखिये ।।३।। मन्त्रः। दैव्यावद्ध'ऽआगंतरी रथैनसूयंत्वचा ॥ मद्धा
(३८)
रुद्राष्टाध्यायी-
[चतुर्थों-
यज्ञर्छसमाथे ॥ तम्प्रत्नथायंवेनश्चित्रन्देवा
नाम् ॥ ४॥
ॐ देव्यावित्यस्य प्रस्कण्व ऋषिः । गायत्री छन्दः । दैव्याव-
धर्य देवते । वि० पू० ॥४॥
भाष्यम् -( दैव्यौ ) देवनामिमौ दैव्यौ ( अध्व! ) हे अश्विनौ युवाम् (सूर्यत्वचा )
सूर्यदीप्तिमता ( रथेन ) रथेन ( आगतम् ) आगच्छतम् एत्यच (मध्वा ) मधुस्वादवता
हविषा सोमपुरोडाशदध्यादिना ( यज्ञम् ) अस्मद्यज्ञम् (समञ्जाथे ) संरक्षयतम्, बहूनि हवींषिः
कुरुत । " तम्प्रत्नथा ७ । १२ । अयम्वेनः ७ । १६ चित्रन्देवानाम् ७ । ४३ तिस्रः
प्रतीकोक्ताः" [ यजु० ३३ । ३३ ] ॥ ४ ॥
भाषार्थ-हे दिव्य अश्विनीकुमार आप सूर्यके समान कान्तिमान् रथके द्वारा आइये
मधुर हवि सोमपुरोडाश दधि आदिद्वारा यज्ञको सींचकर बहुत हविवाला करो। दूसरे
पक्षमें सूर्य कान्तिरूप रथमें आरूढ हुए, यह दिनरात्रिरूप अध्वर्यु अग्निष्टोमादि यज्ञके और
सृष्टिरूप महायज्ञके सम्पादक हैं ॥४॥
१
मन्त्रः।
तम्प्रत्कथापूर्वथाविश्वथेमाज्येष्ठतांतिम्बर्हिषद
खर्विदम् ॥ प्रतीची बृजनन्दोहसेधनिमाशु-
अयन्तुमनुयासुबईसे ॥५॥
ॐ ततम्प्रत्कथा इत्यस्य अवत्सार ऋषिः । निच्यदार्षी जगती
छन्दः । विश्वेदेवा देवता । शुक्रग्रहग्रहणे विनियोगः ॥५॥
भाष्यम्-(प्रतकथाः ) पुरातना यजमाना इव (पूर्वथाः ) अस्मदीयाः पूर्वं यथा
( विश्वथा ) विश्व सर्वे पाणिनो यथा (इमथा ) इदानीं वर्तमाना यजमाना यथे-
न्द्रस्य स्तुत्या फलं लभन्ते हे अन्तरात्मन् ( ज्येष्ठता तिम् ) उत्कृष्टविस्तारमथवा प्रशस्यम्
( बर्हिषदम् ) बर्हिषि तिष्ठन्तम् (स्वर्विदम् ) सर्वज्ञ सर्वस्य लंभयितारं फलं भावयितारं
(प्रतीचीनम् ) आत्मनोऽभिमुखम् (वृजनम् ) बलवन्तम् ( आशुम् ) शीघ्रगामिनम्
(जयन्तम् ) सर्वमभिभवन्तम् (धुनिम् ) कम्पयितारं शत्रूमामिति शेषः । इन्द्रं स्तुत्या साध-
नेन ( दोहसे ) पूरयमि (यासु) स्तुतिषु (बर्द्धसे ) प्रवृद्धो भवसि वर्द्धयसि वेन्द्रं यथा स्तु-
त्येति यास्विति व्यत्ययेन वचनम् । [ यजु० ७.१२ ] ॥ ५ ॥
ऽध्यायः ४]
भाष्यसहिता।
(३९)
भाषार्थ हे इन्द्र ! जो कि तुम, हमसे प्रतिकूल गमन करनेवाले आलस्य अश्रद्धा आदिको
हमसे रिक्त अर्थात् विनाश करते हो जिन क्रियाओंमें आपके अनुग्रहसे शत्रुओंको कम्पित
करते, शीघ्रकारी सम्यक् अनुष्ठानसे और यजमानोंसे अधिक इस यजमानके पीछे सोमपान
और स्तुतिसे जो तुम वृद्धिको प्राप्त होते हो उन क्रियाओं में सर्वश्रेष्ट उस तुमको हम स्तुति
करते हैं । जैसे पुरातन भृगु आदिने, पूर्व पितर आदिने, अतीत यजमानोंने, इस समयके यज.
मानोंने तुम्हारी स्तुति की है उसी प्रकार हम करते हैं । जो कि तुम सर्व ज्येष्ठ यज्ञके सन्नि-
धानमें स्थित यजमानके देने योग्य स्वर्गको जानते हो।॥५॥
मन्त्रः।
अयवेनश्चौदयत्पृश्निगर्भाज्ज्योतिर्जरायूर्ज-
सोविमाने ॥ इममपासङ्गमेसूय॑स्यशिशुन्नबि
प्रामति रिहन्ति ॥६॥
ॐ अयम्वेन इत्यस्यावत्सारः कश्यप ऋषिः । निच्यदार्षी
त्रिष्टुप् । सोमो दे । मन्थीग्रहणे वि० ॥६॥
भाष्यम्-( ज्योतिर्जरायुः ) ज्योतिर्विद्युल्लक्षणं जरायुः वेष्टनं यस्य सः । ( अयम् )
( वेनः) कान्तश्चन्द्रः (रजसः ) उदकस्य ( विमाने ) निर्माणकाले ग्रीष्मान्ते प्राप्ते ( पृश्नि-
गर्भाः ) अपः ( चोदयत् ) प्रेरयति पृश्नि(लोक आदित्यो वा गर्भोऽवस्थानं यासां ताः धुलो-
कस्था रविस्था वा अपो वर्षति (विप्राः) विद्वांसो ब्राह्मणाः ( इमम् ) ( सोमम् ) सोमम्
( अपाम् ) (सूर्यस्य ) देवस्य ( संगमे) संगमेसति (शिशु न ) बालमिव ( मतिभिः)
मतिपूर्वाभिर्वाग्भिः (रिहन्ति ) स्तुवन्ति । “आपो अपां सूर्यस्य च संगमे गृह्यन्ते ता वै वह-
न्तीनां स्यन्दमानानां दिवा गृह्णीयात्" इति श्रुतेः। [ यजु० ७।१६ ] ॥ ६ ॥
भाषार्थ-यह अनुपम कान्तिमान् चन्द्रदेवता जलवर्षण करनेके निमित्त उद्यत होकर
पृश्निगर्भ ( पृश्निशब्दसे सूर्य और दुलोक लेने ) पृथिवीके समस्त रस सूर्यको किरणोसे
खींचकर द्युलोकमें मेघरूपसे बढ़ते हुए काल पायकर वर्षते हैं । अतएव इस स्थान में इस मेघ-
रूप गर्भके पिता सूर्य और माता द्युलोक हैं, और ज्योतिर्जरायु (ज्योति बिजली, सो यहांपर
जरायु-गर्भवेष्टन है) वृष्टिको प्रेरण करते हैं, विद्वान् लोग जल संगमके विषयमें इनको
सूर्यका प्रियपुत्र समझकर स्तुति किया करते हैं ॥६॥
मन्त्रः।
चित्रन्देवानामुदंगादीकञ्चक्षुमित्रस्यवरुणस्या
ग्ने ॥ आप्पाद्यावापृथिवीऽअन्तरिक्षठसूय॑ऽआ
माजगंतस्तस्त्थुषश्च ॥७॥
(४०)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ चतुर्थों-
ॐ चित्रमित्यस्य कुत्स ऋषिः । भुरिगार्षी त्रिष्टुप् छन्दः ।
मूर्यो देवता । शालादायऽयो हवने विनियोगः॥७॥
भाष्यम्-( देवानाम् ) दीव्यन्तीति देवा रश्मयस्तेषां देवजनानानेव वा ( अनीकम्
तेजः समूहरूपम् (चित्रम् ) आश्चर्यकरम् ( मित्रम्य ) वरुणस्य ( अग्नेः) त्रयाणां देवानाम्
चक्षुः) उपलक्षितानां जगतां चक्षुः असौ सूर्यः ( उद्गात् ) उदितो बभूव उदयं प्राप्य च
छावापृथिवी) दिवं पृथिवीम् ( अंतरिक्षम् ) आकाशम् ( आप्राः ) स्वकीयेन तेजसा आ
सनन्तादापूरितवान् । ईहाभूतमण्डलान्तर्वर्ती ( सूर्यः ) सूर्यदेवोऽन्तर्यामितया सर्वस्य प्रेरकः
परमात्मा ( जगतः) जंगमस्य (तस्थुषः) स्थायरस्य ( आत्मा ) स्वरूपभूतः सकलसंसारम-
योऽयमेव सूर्य इत्यर्थः ॥ [ यजु०७।४२] ॥ ७ ॥
भाषार्थ-अहो ! क्या आश्चर्य है, यह किरण पुंज देवता प्रतिदिन ही उदित होते
भूलोकसे द्युलोकतक तीनों लोकोंमें अपनी किरणों का जाल विस्तार करके समस्त संसारके
नेत्ररूप होकर प्रकाशमान होरहे हैं, यह स्थावर जंगम समस्त पदार्थोके जीवन और सूर्य-
नामसे प्रसिद्ध हैं, इन देवताके निमित्त दिया हुआ यह हवि सुन्दर प्रकारसे ग्रहण किया
जाय ॥७॥
मन्त्रः।
आनाइडांभिर्वेदथै मुशस्तिविश्वानर सवितादे-
वरंतु ॥ अपियायवानोमत्सथानोविश्चार्ग-
दभिपित्त्वेमनीषा ॥ ८॥
ॐ आन इडाभिरित्यस्यागस्त्य ऋषिः । त्रिष्टुप् छं० । सविता
देवताः । वि० पू० ॥ ८॥
भाष्यम्-(विश्वानरः ) विश्ववर्तिनो जनान् सत एवं रक्षकः ( सविता) (देवः)
प्रेरको देवः (नः ) अस्माकम् (विदथे) यज्ञे (सुशस्तिभि-) शोभनशंसनहेतुभूतेः ( इडाभिः)
यज्ञकारणभूताभिः इडाभक्षणेन सुशस्ति शोभना शस्ति प्रशंसा यस्यां क्रियायां तथा यथा सर्वे
इडां भक्षयन्ति तथा (आ एतु ) आगच्छतु । सूर्यमुक्त्वा देवानाह-(युवानः ) हे जरा-
रहिता देवाः ( अपि) निश्चितम् ( अभिपित्वे ) आगमनकाले ( यथा ) येन प्रकारेण
( मत्सथ ) यूयं तृप्यथ तथा ( नः ) अस्माकम् ( विश्वम् ) सर्वम् ( जगत् ) पुत्रगवादिकम्
(मनीषा ) मनीषया बुद्ध्या तर्पयथ । यथा भवद्भिस्तृप्तिः क्रियते तथास्मत्प्रजास्तर्पणीया
इत्यर्थः [ यजु० ३३ । ३४ ] ॥ ८ ॥
'ऽध्यायः ४] भाष्यसहिता । (४१) भाषार्थ-सब प्राणियों का हितकारी सबका प्रेरक देव हमारे सुन्दर अन्नोंद्वारा प्रशंसा- युक्त यज्ञगृहमें आगमन करें, अर्थात् अन्नोंसे सुन्दर प्रशंसासंपन्न यज्ञगृहमें आगमन करें । हे देवताओ जरारहित तुम आगमन कालमें जिस प्रकारसे हो वैसे तृप्त होकर हमारे संपूर्ण जंगम पुत्र गौ आदिको बुद्धिपूर्वक सब प्रकार तृप्त करो ॥ ८॥ विशेष-अथवा विश्वके हितकारी सविता देवता, प्रदिदिन अपने नियमसे उदित होकर इस सृष्टियज्ञमें अन्नउत्पन्नकी प्रशंसा लाभ करते हैं । उस अन्नसे हम देवताओंको तृप्त करते हैं, वे हमारे परिवारकोतृप्त करें ॥ ८॥ मन्त्रः। यदुद्यकचवृत्रहन्नुदाऽअभिसूर्य ॥ सवन्तदिन्द्र तेवशे ॥९॥ ॐ यदद्येत्यस्य श्रुतकक्षसुकक्षी ऋषी । गायत्री छन्दः । सूर्यों देवता । वि० पू० ॥९॥ भाष्यम्-( वृत्रहन् ) वृत्रस्यामावरकम्य मेवस्य हन्तः ( सूर्य ) हे सूर्यात्मकेन्द्र ( अद्य ) अस्मिन्दिने ( यत् कच्च ) यत्किञ्चित्सदार्थजातम् ( अभि ) अभिमुखीकृस्य ( उदगाः ) प्रादु- भूतोसि ( इन्द्र ) हे ऐश्वर्यसम्पन्न (तत्सर्वम् ) स्थावरजंगमात्मकं जगत् (ते ) तव ( वशे ) त्वदधीनं भवति । उदिते सूर्ये त्वदधीनं प्राक्कर्म कुर्वन्ति जुति च । [यजु० ३३ । ३५] ॥९॥ भाषार्थ-हे अंधकारके नाशक ! हे ऐश्वर्ययुक्त सूर्यदेव ! आज जो कहीं किसी प्रदेशम उदय होते हो वह सब तुम्हारे वशमें हैं अर्थात् जो लोक मूर्यके प्रकाशसे प्रकाशित हैं उनकी स्थिति सूर्यके ही आधीन है ।। ९ ।। तरणिर्विश्वदर्शतोज्ज्योतिष्कृदसिसूर्य ॥ विश्व माभांसिरोचनम् ॥ १० ॥ ॐ तरणिरित्यस्य प्रस्कण्व ऋपिः । गायत्री छन्दः । सूर्यो देवता । वि० पु० ॥ १० ॥ भाष्यम्-(सूर्य ) हे सूर्य त्वम् (तरणिः ) तरिता अन्येन गन्तुमशक्यस्य महतोऽध्वनो गन्तासि तथा च स्मर्यते-"योजनानां सहस्र द्वे द्वे शते द्वे च योजने । एकेन निमिषार्द्धन क्रममाण नमोऽस्तु ते " ॥ यद्वा उपासकान् रोगात्तारयसि ( विश्वदर्शतः ) विश्वः सवै 'प्राणिभिर्दर्शनीयः । यद्वा-विश्वं सकलभूतजातं दर्शतः दृष्टव्यं प्रकाश्यं येन सः तथोक्त:
(४२)
रुद्राष्टाध्यायी-
[चतुर्थों-
(ज्योतिष्कृत् ) प्रकाशस्य कर्ता । यद्वा-चन्द्रादीनां रात्रौ प्रकाशयिता ( असि ) असि
(विश्वम् ) व्याप्तम् (रोचनम् ) रोचमानमन्तरिक्षमासमन्तात् (भासि) प्रकाशयसि । यद्वा-हे.
सूर्य अन्तर्यामितया सर्वस्य प्रेरक परमात्मन् त्वम् तरगिः संसाराब्धेः तारकोसि यस्मात्त्वं
विश्वदर्शनः । विश्वैः सर्वैर्मुमुक्षुभिदर्शितः द्रष्टव्यः साक्षात्कर्तव्य इत्यर्थः । 'ज्योतिष्कृत्'सूर्यादेः
कर्ता ईदृशस्त्वं चिद्रूपतया 'विश्व' सर्व दृश्य जातं 'रोचनं ' दीप्यमानं यथा भवति तथा
( आभासि ) प्रकाशयसि चैतन्यस्फुरणे हि सर्व जगदृश्यते । “तमेव भान्तमनु भाति सर्वम्!'
इत्यादि श्रुतेः । [ यजु. ३३ । ३६ ] ॥ १० ॥
भाषार्थ-हे सूर्यदेव ! आप महामार्ग में गमन करनेवाले, अथवा उपासकोंके रोग दूर
करनेवाले सब प्राणियोंके दर्शनयोग्य; अथवा-दृश्यवर्गके प्रकाशक हो। अथवा-चन्द्रादिकमें
भी आपहीका प्रकाश है, आपही उनके प्रकाशक हैं, आपही दीप्यमान अन्तरिक्षका प्रकाश
करते हो। अथवा-अन्तर्यामी रूपसे प्रेरक हे परमात्मन् ! संसारसागरसे आपही पार लगाने--
वाले हैं। इस कारण सम्पूर्ण मुमुक्षु जनोंसे आपही देखनेयोग्य हैं। इससे आपही साक्षात
करनेके योग्य हैं ॥ १०॥
तत्सूर्यस्यदेवत्वन्तन्महित्वम्मद्धयाकर्लोवितंत-
ठसञ्जभार ॥ यदेदयुक्तहरित-सुधस्थादादात्री-
वासंस्तनुतेसिमस्म्मै ॥ ११ ॥
ॐ तत्सूय॒त्यस्य कुत्स ऋषिः । त्रिष्टुप् छन्दः । सूर्यो देवता
वि० पू० ॥१३॥
भाष्यम्--( सूर्यस्य ) सर्वप्रेरकस्य आदित्यस्य (तत्) (देवत्वम्) ईश्वरत्वम् ( महित्वम् )
महत्त्वम् माहात्म्यञ्च यत् ( कर्तोः ) कमणोः ( मध्या) मध्ये (विततम्.) विस्तीर्ण स्वकीयं
रश्मिजालम् ( सञ्जभार) अस्तं गच्छन्नस्माल्लोकात्स्वात्मनि उपसंहरति ( यदा) यस्मिन्नेव
काले ( हरितः ) रसहरणशीलान् स्वरश्मीन् हरिद्वर्णानश्वान्वा ( सधस्थात् ) सहस्थानादस्मा •
त्पार्थिवाल्लोकादादाय ( ईत् ) एव ( अयुक्त ) अन्यत्र संयुक्तान् करोति । यद्वा यदा असौ
स्वरश्मीनश्वान् 'सधस्यात् ' सह तिष्ठत्यस्मिन्नेिति सधस्थो रथस्तस्मादयुक्त अमुश्चत् (आत्)
अनन्तरमेव ( रात्री ) निशा (वासः ) आच्छादयितृतमः ( सिमस्मैः) सर्वस्मै ( तनुते )
विस्तारयति । एवमेक आदित्यसहितं ज्योतिरन्यत्र तमः आदित्यप्रभावाद्वसतीत्यभिप्रायः ।
[ यजु० ३३ ॥ ३७] ॥ ११ ॥
ऽव्यायः ४.] भाष्यसहिता। (४३) भाषार्थ--सूर्यका वही देवत्व है वही महत्त्व है, कि जो ईश्वरके कार्य श्रेष्ठ जगत्के मध्यम स्थित होकर विस्तीर्ण किये ग्रह मंडलको अपनी किरणों द्वारा अथवा अपने आकर्षणसे निज कक्षोंमें नियमित रखते हैं, जबही हरितवर्णकी रश्मियोंसे युक्त आकाश मंडलसे अपने युक्त करते हैं, अर्थात्--जब यह संध्याकालमें किरणोंको आकाशसे अपनी युक्त करते हैं तब रात सबके निमित्त वस्त्रको विस्तार करती है । अर्थात-अन्धकारसे आच्छाद करती है, अथवा-- जिस समय यह रथारोहण कर गमन करते हैं, रात्रि अपने सीमान्तमें वस्त्राच्छादन करती है। अर्थात्-रात्रिरूपी अन्धकार दिशाओंके मध्यमें गमन करता है ॥ ११ ।। मन्त्रः। तन्मित्रस्यवरुणस्याभिचक्षेसूयॊरूपङ्कणुतेद्योरु पस्थे । अनन्तमन्यदृशदस्यपाज-कृष्णमन्य- द्धरितत्सम्भरन्ति ॥ १२॥ ॐ तन्मित्रस्येत्यस्य विनियोगः पूर्ववत ॥ १२॥ भाष्यम्--( सूर्यः ) आदित्यः ( योः ) द्युलोकस्व ( उपस्थे ) सङ्गमे ( मित्रस्य ) मित्र- देवस्य (वरुणस्य ) वरुणदेवस्य (तत्) (रूपम् ) रूपम्, ( कृणुते ) कुरुते येन रूपेण जनान् ( अभिचक्षे ) अभिचष्टे पश्यति. मित्ररूपेण सुकृतिनोऽनुगृह्णति, वरुणरूपेण दुष्कृतिनो निगृह्णातीत्यर्थः । ( अस्य ) सूर्यस्य ( अन्यत् ) एकम् ( पाजः ) रूपम् ( अन- न्तम् ) कालतो देशतस्तथा परिच्छेद्यम् ( रुशत् ) शुक्लं दीप्यमानं जरामरणाद्ययुक्तं विज्ञानघ- नानन्दमयमित्यर्थः । ( अन्यत् ) ( कृष्णम् ) द्वैतलक्षणं रूपम् ( हरितः ) दिश इन्द्रियवृत्तयो वा ( सम्भरन्ति ) धारयन्ति । इन्द्रियग्राह्यं द्वैतरूपमे शुद्धं चैतन्यमद्वैतमिति द्वे रूपे सूर्यस्यः सगुणं निर्गुणं ब्रह्म सूर्य एवेत्यर्थः । [ यजु० ३३ । ३८ ] ॥ १२ ॥ भावार्थ--सूर्य द्युलोककी गोदी में मित्र और वरुणका वह रूप करता है जिससे मनुष्योंको देखता है अर्थात्-मित्ररूपसे पुण्यात्माओंपर अनुग्रह करता, वरुण रूपसे पापियोंको निग्रह करता है, इस सूर्यका एक रूप देशकालसे अपरिच्छेद्य शुक्ल दीप्यमान विज्ञानधनानन्द ब्रह्म ही है । एक कृष्णवर्ण द्वैतलक्षणवाला रूप है उसको दिशा वा इन्द्रियवृत्ति धारण करती है। अर्थात्-इन्द्रियग्राह्य द्वैतरूप है । एक शुद्धचैतन्य है इसकारण ब्रह्मके सगुण निर्गुण दो रूप कहे हैं ॥ १२॥ विशेष अद्वैतरूप मित्र अर्थात्-उत्तरायण दिन है, इसमें पुण्यात्मा गमन करते हैं, कृष्ण दक्षिणायन रात्रि है, इसमें पापियोंको वरुणरूपसे निग्रह करता है ॥ १२॥ मन्त्रः। वण्ण्महाँ ॥ २ ॥ऽ असिसूर्य्यवादित्यमहाँ-
१४४)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ चतुर्थों-
२॥ऽसि ॥ महस्तेस्तोमहिमापनस्यतेद्वा
देवमहाँ २॥ऽअसि ॥ १३ ॥
ॐ बण्महानित्यस्य जमदग्निपिः । बृहती छन्दः । सूर
देवता । वि० पू० ॥ १३ ॥
भाष्यम्- सूर्य ) हे सूर्य वं ( बट) सत्यन ( महान् ) तेजसाविकः ( असि
महदसि ब्रह्मेत्यर्थः । ( आदित्य ) हे आदित्य (बद ) सत्यम् ( महान् असि ) बलेना-
कोमि । किञ्च-- महः ) महतः ( सतः) ( ते ) तब ( महिमा ) महाभाग्यम् (पनम्यते
सर्वैः प्रागिभिः स्तूयते पूज्यते वा, अतः ( देव ) हे देव दानक्रीडादियुक्त (अद्धा ) तत्त्व
( महान् असि वीर्येणाऽप्यधिकोऽसि अभ्यासे भृयांसमर्थमन्यत् यथा दर्शनीयोऽर्थनीयो न पुन
क्तिदोषः। यनु० ३३ । ३९ ॥१३॥
भाषार्थ--हे जगत्को अपने अपने कार्यमें प्रेरण करनेवाले सूर्यरूप परमात्मन् ! सत्य
आप सबसे अधिक हो, हे आदित्य ! सबके ग्रहण करनेवाले सत्यही आप बडे हो, ब
होनेसे आपकी महिमा लोकोंसे स्तुति की जाती है, हे दीप्यमान परमान्मन् ! सत्यही हु
सवसे श्रेष्ठ हो. आदरके निमित्त पुनरुक्ति है ॥ १३ ॥
मन्त्रः।
बदसूर्य्यश्श्रवसामुहाँ ॥ २॥ऽअसिसुत्रादेवमहाँ
२॥ऽसि ॥ महादेवानामसुर्य-पुरोहितोवि-
मुज्ज्योतिरदांब्भ्यम् ॥ १४ ॥
ॐ बट्सूर्यैत्यस्य जमदग्निपिः । सतोबृहती छन्दः
सूर्यो दे । वि० पू० ॥ १४
भाष्यम्- सूर्य ) हे सूर्य (वह ) सत्यम् ( श्रवसा ) श्रवणीयेन बलेन ( महान्असि
सर्वाधिकोसि ( देव ) हे द्योतमान् ( सत्रा ) सत्यम् ( पहानसि) अधिकोऽसि किश्च-( महा
स्वकीयमहत्त्वेन ( देवानाम् ) सुराणां मध्ये (अमुर्व्यः) असुराणां हन्ता । यद्वा-असुरस्याम्ती
असुरः प्राणस्तस्मै हितः प्राणिनां हित इत्यर्थः । (पुरोहितः) प्रथमपूज्यः (विभुः) व्यापक
ते (ज्योतिः ) तेजः (अदाभ्यम् ) केनाप्यहिंस्यम् । यद्वा-अनुपहिस्यज्ज्योतिः विज्ञानघनानन्त
सयमित्यर्थः । [ यजु० ३३१४०] ॥ १४ ॥
ऽध्यायः ४ ]
भाष्यसहिता।
(४५)
भाषार्थ-हे सूर्य ! आप सत्यही धन वा यशसे वा अन्न के प्रकट करनेसे श्रेष्ठ हो, हे
दीप्यमान प्राणियों के हितकारी देवताओंके मध्यमें अग्रस्थापित अर्थात्-सव कार्यों में प्रथम-
पूज्य अर्थात्-प्रथम तुमको अर्घदान करनेपर पीछे दूसरे देवताओंकी पूजामें अधिकार है,
व्यापक उपमारहित किसीसे न रुकनेवाले तेजसे युक्त आप यज्ञद्वारा महत्वसे अधिक श्रेष्ठ
हो, अर्थात्-तुम माहात्म्यके प्रभावसे एककाल में सर्व देशव्यापी प्रतिद्वन्द्वीशून्य ज्योति
विस्तार करते प्राणिमात्रके हितकारीस्वरूपसे सबके आगे पूजनीय हो ॥ १४ ॥
मन्त्रः ।
श्रायन्तऽइवसुर्यविश्वेदिन्द्रस्यभक्षत ॥ वसूनि-
जातेजनमानऽओजसा प्रतिभागन्नदीधिम॥१५॥
ॐ श्रायन्त इत्यस्य नृमेध ऋषिः । बृहती छन्दः । सूर्यों
देवता । वि० पू० ॥ १५॥
• भाष्यम्-हे अस्मदीया जनाः यथा सूर्यरश्मयः ( सूर्यम् ) सूर्यम् ( श्रायन्त इव )
समाश्रिताः सूर्य भजन्ते तथा (इन्द्रस्य ) इन्द्रसम्बन्धीनि, इन्द्रानुज्ञातानि (विश्वेत् )
विश्वानि धनानि ( भक्षत ) भजत ( वसूनि) धनानि पुत्रपौत्रप्रपौत्रादौ ( जनमाने ) जनिष्य-
माणे भविष्यत्काले ( ओजसा ) बलेन ज्ञानसमुच्चयकारितया (प्रतिभागम् ) ( न) नकार
उपमार्थोयः प्रतिपुरुपं भागमिव (दीधिमः ) स्थापयामः । इन्द्रः यानि वनि बलेन जनिष्य-
माणानि करोति पित्र्यम्भागमिव तानि धनानि प्रतिधारयमेत्यर्थः । [यजु०३३।४१] ॥१५||
भाषार्थ-सूर्यको आश्रय करती हुई किरणें हो इन्द्रके संपूर्ण धन अर्थत् वृष्टि धान्य-
निष्पादक सम्पत्तिको सेवन करती भक्षण करती है, अर्थात् विभाग करके प्राणियोंको देती
हैं। आशय यह कि, सूर्यकी किरणें इन्द्रकी दीहुई वृष्टिको भूमिमें विभाग करती हैं। और
हम उन धनों को पुत्रादिके उत्पन्न होने अपने भागके समान तेजके सहित धारण वा
स्थापन करते हैं ।। १५॥
सरलार्थ-हम सूर्यको आश्रय करके जिससे विश्वाधिपति परम पिताके विषय भोगमें
समर्थ होते हैं, उनके उत्सृष्ट वा उत्सृज्यमान संपूर्ण संपत्तिमें भी मनके बलपूर्वक अपने २
प्राप्तभागमें अधिकार किये हैं. अर्थात्-सूर्यकी सहायतासे ही सब कार्यको प्रवृत्ति होती है ।
आशय यह कि-भूमिअधिकारीके भाग्यके अनुसार न्यूनाधिक वर्णन करते हैं ।। १५ ।।
मन्त्रः॥
अद्यादेवाऽउदितासूय्यस्युनिरहसपिपृतानिर-
वद्यात् ॥ तन्नौमित्रोवरुणोमामहन्तामादंतिसि-
न्धु-पृथिवीऽउतद्यौ ॥ १६ ॥
(४६)
रुद्राष्टाध्यायी-
[चतुर्थो-
ॐ अद्येत्यस्य कुत्स ऋषिः । त्रिष्टुप् छन्दः। देवा देवता दध्ना
दित्यग्रहश्रयणे विनियोगः ॥ १६॥
भाष्यम्-( देवाः ) हे द्योतमानाः सूयरश्मयः ( अद्या) अस्मिन्काले ( सूर्यम्य
आदित्यस्य ( उदिता) उदयकालीनाः उदये सति इतस्ततः प्रसरन्तो यूयमस्मात् ( अश्हस
पापात् (निष्पिपृतः ) निर्मुञ्चत ( अवद्यात् ) दुर्यशसोऽपि निर्मुञ्चत । यदिदमम्माभिरुक्त
(नः) अस्मदीयम् (तत्) ( मित्रः) अहरभिमानी देवः ( वरुणः ) अनिष्टानां निवार
यिता राज्यभिमानी ( अदितिः । अखण्डनीया देवमाता (सिन्धुः) स्यन्दनशीलोदकाभिमान
देवता (पृथिवी) भूलोकस्याधिष्ठात्री ( द्यौः) हलोकाभिमानी (उत) समुच्चये ( मा
-माम् ( महन्ताम् ) पूजयन्तु अनुमन्यतामिति । यजु० ३३१४२ ] ॥ १६ ॥
भाषार्थ-हे रश्मियोंमें स्थित देवताओ ! आज अब सूर्य का उदय हमको पापसे तथ
दुर्यशसे पृथक करें, मित्र, वरुणदेवता, देवमाता, सिन्धुनदी, पृथिवी और स्वर्ग इस हमा
वचनको अनुमोदन करे ॥ १६ ।।
मन्त्रः।
आकृष्णेनुरजसावर्तमानोनिवेशयन्नमृतम्मत्य॑ञ्च॥
हिरण्ययेनसवितारथेनादेवोर्यातिभुवनानिप-
श्यन् ॥ १७॥
इति सर्छहितायांरुद्दपाठेचतुर्थोऽध्यायः॥४॥
ॐ आकृष्णेन इत्यस्य हिरण्यस्तूप ऋषिः । त्रिष्टुप् छन्दः ।
सविता देवता । सावित्रग्रहग्रहणे वि० ॥ १७॥
भाष्यम्-( सविता ) देवानां प्रसविता ( देवः ) स्तुतिदीप्तिक्रीडायुक्तः ( कृष्णेन ,
कृष्णवर्णेन ( रजसा ) लोकेत ' लोका रजांभ्युच्यन्ते' अन्तरिक्षलोको हि सूर्यागमनात्पुर
कृष्णवर्णो भवति तेनान्तरिक्षमार्गेण ( आवर्तमानः ) पुनः पुनरागच्छन् ( अमृतम् ) देवम
(मय॑म् ) मनुष्यम् ( च ) (निवेशयम् ( स्वस्वव्यापारे स्थापयम् । यद्वा-'अमृतम् ' मरणर-
हितं प्राणं मर्त्यम् ' मरणसहितं शरीरं च 'निवेशयन् ' स्थापयन् (भुवनानि) सर्वान् लोकान
( अपश्यन् ) अवेक्षमाणः प्रकाशयन्नित्यर्थः । (हिरण्येन ) सुवर्णनिर्मितेन ( रथेन) यानेन
(आयाति ) अस्मत्समीपमागच्छति । भुवनवर्तिलोकान् पुण्यपापकर्तन् क्षिपन्निरीक्षमाणः यः
सविता देवः देवमनुष्यव्यापारस्थापकः यश्च पुण्यपापसाक्षी तस्यार्चादिकमुचितमिति वाक्यार्थः ।
[ बबु० ३३ ॥१३॥ १७ ॥
उध्यायः ५] भाष्यसहिता। (४१) भाषार्थ--सवके प्रेरण करनेवाले सविता देवता सुवर्णमय रथम आरूढ होकर कृष्णवर्ण रात्रि लक्षणवाले अन्तरिक्ष मार्गमें पुनरावर्तन क्रमसे भ्रमण करते देवादि और मनुप्यादिको अपने अपने व्यापार में स्थापन करते सम्पूर्ण भुवनोंको देखते हुए आगमन करते हैं। अथवा सबलोकोंको प्रकाश करते आगमन करते हैं। आशय यह कि भुवनवीं लोकों के पुण्य पापको शीघ्रतासे निरीक्षण करते हुए पुण्यपापके साक्षी यह सविता देवता हैं इनकी उपासना पूजा उचित है ॥ १७ ॥ इति श्रीरुद्राष्टके मुरादाबादनिवासी-पंडितज्वालाप्रसादमिश्रकृतसंस्कृतार्य- भाषाभाष्यसमन्वितश्चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ अथ पञ्चमोऽध्यायः। मन्त्रः। ॐ नमस्तेरुमन्यवऽउतोतइपवनमः ॥ बाहु- भ्यामुततेनमः ॥ १॥ ॐ नमस्त इत्यस्य परमेष्ठी ऋषिः। गायत्री छन्दः। रुद्रो दे। पाठे विनियोगः ॥ १॥ भाष्यम्-हे रुद्र ! यद्रोदनं रु दुःखं द्रावयति रुद्रः। यद्वा-रुद्रमुपशान्तयति, ये गत्य- स्तेि ज्ञानार्थाः । रवणं रुत् ज्ञानं भावे विप् तुगागमः । रुत् ज्ञानं राति ददातीति रुद्रः मोहनिवारकः परमेश्वरः । यद्वा-पापिनो जनान् दुःखभोगेन रोदयतीति रुद्रः जगच्छासकः । हे रुद्र ( ते ) तव ( मन्यवे ) रोषाय ( नमः ) नमस्कारोऽस्तु, ( उत ) अपि (ते) तव ( इषवे ) शराय ( नमः ) नमस्कारोऽस्तु ( उत) अपि च (ते) तव (बाहुभ्याम् ) भुजाभ्याम् ( नमः ) नमः तव क्रोधवाणहस्ता अस्मच्छत्रुष्वेव पतन्तु नास्मास्वित्यर्थः । [ यजुर्वेदीयषोडशोऽध्यायः] ॥ १ ॥ भाषार्थ- हे दुखके दूर करने अथवा ज्ञानके देनेवाले अथवा पापीजनोंको उनका कर्मफल देकर रुलानेवाले रुद्रदेव ! आपके क्रोधके निमित्त नमस्कार है । और तुम्हारे बाणोंके निमित्त नमस्कार है । और तुम्हारी दोनों भुजाओंके निमित्त नमस्कार है, अर्थात् हे रुद्रदेव ! आपका क्रोध और बाणधारी हस्त शत्रुओंपर पड़े हमको शान्ति हो ॥१॥ विशेष-तत्ववादी मेघोंके अन्तर शक्तिमय रुद्रका निवास कहते हैं । कि गर्जना उनका क्रोध है । उल्कापात वाण हैं, समुद्र में उठे तरंग एक भुजा, और महाघारा वर्षा उनकी दूसरी भुजा-रूप है । उसस शत्रुओं का अनिष्ट हो, और हमको मंगल हो । अथवा-पापियोंके नाशको तुम बाण और क्रोधरूप हो। इस अध्यायमें परमेश्वरका सगुणनिर्गुणरूप उपदेवोपासनासे वर्णन किया है । १ ॥
(४८) रुद्राष्टाध्यायी-- [पञ्चम मन्त्रः। याते रुद्रशिवातुनूरघोरापापकाशिनी ॥ तयान- स्तुन्वाशन्तमयागिरिशन्ताभिचाकशीहि ॥२॥ ॐ यात इत्यस्य परमेष्ठी ऋपिः । आर्षी स्वराडनुष्टुप्छन्दः रुद्रो दे० । वि० पू० ॥२॥ भाष्यम्-( रुद्र ) हे देव ( या ) ( ते ) तव ( अबोरा ) सौम्या (अपापकाशिनी पापमम्मुखकाशयति प्रकाशयति पापकाशिनी न पापकाशिनी या भक्तानाम् पुण्यफलमेर ददानि न पापफलमित्यर्थः । (शिवा) शान्ता मङ्गरूपा ( तनूः) शरीरमस्ति (गिरिशन्त कैलासवासी गिरी कैलास स्थितः प्राणिनां शं सुखं विस्तारयति वा गिरि वाचि स्थितः ३ तनोति वा गिरी मेघ स्थितो वृष्टिद्वारेण शं तनोति वा गिरौ शेते गिरिशः । अमति गच्छति जानातीति वा अन्तः सर्वज्ञः, अमगतौ' भनने शब्द कतरि क्तः । गिरिशश्चासावन्त गिरिशन्नम्तत्सम्वुद्धिः शकन्ध्वादित्वात्पररूपम् । (तया ) ( शन्तमया ) मुखतमया (तन्वा शरीरेण ( नः ) अस्मान् ( अभिचाकशीहि ) अभिपश्य ॥ २ ॥ भाषार्थ-कैलास पर्वतपर स्थित होकर प्राणियोंके सुखको विस्तार करनेवाले अथव वाणीमें स्थित होकर सुखका विस्तार करनेवाल; अथवा मेघमें स्थित होकर वर्षा आदि रूपसे मुखको विस्तार करनेवाले, वा पर्वतपर शयन करनेवाले सर्वज्ञ, हे रुद्र ! जो तुम्हार शान्त मंगलरूप विषमतारहित-होनेसे सौम्य पापफलको न देकर पुण्यफलका ही देनेवाल शरीर है, उस सुखभरे शरीरसे हमको अवलोकन कीजिये ॥२॥ विशेष-जो सर्वव्यापी आत्माका भी आत्मा है दृश्य अदृश्य संपूर्ण शरीरोंमें उसर्क स्थिति है केवल तत्व विचारवाले कहते हैं कि इस स्थलमें रुद्रका मेघोदयरूप शरीर देखने की प्रार्थना है, किन्तु जिससे गृहपतन और बाहकी प्राप्ति हो उसके उदयकी प्रार्थना नह है. किन्तु जिसके उदयसे कृषि आदिकी उन्नति हो उसीकी प्रार्थना है । यहां भद्रका कल्याण मय शरीर और कैलासवास होनेसे शिवका विग्रह भी कथन किया है, अथवा हे रुद्र आपका कल्याणकारी विस्तार मनोहर है, पापोंको दूर करके हमको महासुख दो। इससे सगुण ब्रह्मप्रतिपादित है ॥२॥ मन्त्रः । यामिषुङ्गिरिशन्तहस्तैबिभर्फास्तवेशिवाङ्गिरित्र- ताकुमाहिसी पुरुषञ्जगत् ॥ ३ ॥ ॐ यामिषुमित्यस्य परमेष्ठी ऋषिः । विराडार्ण्यनुष्टुप् छं० । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥३॥ .
।
ऽध्यायः५
भाष्यसहिता।
(४९)
भाष्यम्-( गिरिशन्त ) देव .( याम् ) ( इषुम् ) शम्म् ( अम्नवे) शत्रूत् क्षेप्तुं
( हस्ते ) करे ( बिभर्षि ) धारयसि ( गिरित्र ) गिरी कैलासे स्थित्वा भूतानि त्रायते इति
तत्सम्बुद्धिः (ताम् ) वाणम् (शिवाम् ) कल्याणकारिणी ( कुरु ) किञ्च (पुरुषम् ) पुत्र-
पौत्रादिकम् ( जगत् ) जंगममन्यदपि गवाश्चादिकम् ( माहिz.सीः ) मावधीः सर्वथाऽस्मद्देहे
शान्ति कुर्वित्यर्थः ॥ ३ ॥
भाषार्थ-हे वेदवाणी में स्थित ! वा पर्वतपर उदित मेघवृन्दके अन्तर स्थित होकर जग-
नका कल्याण करनेवाले कैलास वा वेदवाणी में स्थित होकर प्राणियोकी रक्षा करनेवाले तुम
जिस बाणको शत्रुओंके नाश वा प्रलयमें जगत्के अन्त करनेको हाथमें धारण करते हो, हे
रक्षक ! उस बाणको कल्याणकारी करो। पुत्र पौत्र आदि जगत्के गवाश्वादिको मत मारो,
अर्थात् अकालमें हमको और इस संपूर्ण जगत्को नष्ट मत करो ॥ ३ ॥
विशेष-गिरिशृङ्गमें जो रहते हैं निम्नभागके मेघोपद्रव उनका अनिष्ट नहीं कर सकते
इस निमित्त अधश्वारी दुर्घटनाके अन्तर स्थित देवताको गिरित्र कहते हैं । यह तत्ववादी जन
कहते हैं ॥३॥
मन्त्रः॥
शिवेनवर्चसात्वागिरिशाच्छाबदामसि ॥ यथा-
नुत्सर्वमिज्जगदयक्ष्मठेसुमनाऽअसत् ॥ ४ ॥
ॐ शिवनेत्यस्य परमेष्ठी ऋषिः । निच्यदायॆनु० रु० दे० ।
वि० पू० ॥ ४॥
भाष्यम् (गिरिश ) गिरौ कैलासे शेते गिरिशः तत्सम्बुद्धौ हे गिरिश (शिवेन )
मंगलरूपेण ( वचसा ) वचनेन ( त्या ) त्वाम् ( अच्छ) प्राप्तुम् ( वदामसि ) बदाम:
प्रार्थयामहे ( नः ) अस्माकम् ( सर्वम् ) सम्पूर्णम् ( जगत् ) जंगमं मनुष्यपश्वादि (यथा)
येन प्रकारेण ( अयक्ष्मम् ( व्याधिरहितम् (सुमनः) शोभनं मनः ( असत् ) तथा
कुर्वित्यर्थः ॥ ४ ॥
भाषार्थ-हे वेदवचन वा कैलासमें शयन करनेवाले ! मंगलस्तुतिरूप वचनसे तुमको
प्राप्त होनेको हम प्रार्थना करते हैं। हमको सबही जंगम, मनुष्य, पशु आदि जिस प्रकार
नीरोग शुभ मनवाला होवे सो करो, अर्थात् यह जगत् स्वस्थ और रोगरहित हो। यही
आपसे हमारी प्रार्थना है सो स्वीकार करो॥ ४॥
विशेष-जिसका उदय सर्वदा ही पर्वतपृष्ठपर देखा जाता है, ऐसे मेघके अन्तर स्थित
देवताको गिरिश कहते हैं, यह तत्त्ववादी जनोंका कथन है । तात्पर्य यह है कि रुद्रदेवता
सर्वत्र विद्यमान हैं वह जगत्में मंगल करें प्रजामें कोई रोग न हो॥४॥
(५०)
रुद्राष्टाध्यायी-
पञ्चमो-
मन्त्रः।
अईयवोचदधिवक्ताप्रथमोदैच्योभिषक
अहीचसञ्जिम्भयन्त्सर्वांश्चयातुधान्यो धुरा-
ची परांसुव ॥ ५॥
ॐ अव्यवोचदित्यस्य प्रजापतिऋषिः । भुरिगाी बृहती
छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥५॥
भाष्यम्- अविवक्ता ) अविवदनशीलः निगमकथनतत्परः ( प्रथमः ) पूज्यत्वात्सर्वेषां
मुख्यः ( दैव्यः , देवेभ्यो हितः ( भिषक ) मरणेनैव रोगनाशको रुद्रः ( अध्यवोचत् ) मां
सर्वाधिकं वदति, अयं याजकः सर्वाधिको भवत्विति । परोक्षमुक्त्वा प्रत्यक्षमाह--हे रुद्र ! (च)
( सर्वान् ) सम्पूर्णान् ( अहान् ) सर्पव्याघ्रादीन् ( जम्भयन् ) विनाशयन् ( सर्वाः) समस्ताः
। अधराचीः ) अधोधोगमनशीलाः ( यातुधान्यः) राक्षसीः (च) (परासुव ) अस्मत्तो
दूरीकुरु ॥ ५॥
भाषार्थ-अधिक वदनशील सर्वदा निगम कथन करनेवाले, सब देवताओंमें मुख्य,
खूजनीय, देवताओं के हितकारी, स्मरणसे ही संसार तथा जन्म मरणके रोगनाशक रुद्र हमको
मवसे अधिक कहें, अर्थात् सबसे अधिक करें । और सब सर्प व्याघ्र आदिको विनाश करते
हुए संपूर्ण अधोगमनशील राक्षसी आदिको भी हमसे दूर करो॥५॥
अध्यात्म-परमात्मा, हमको महावाक्यका उपदेश करो, और सर्पके समान डसनेवाले
काम आदिको नाश करो, और अधोगमनशील काम कलारूपी राक्षसियोंको दूर करो, अथवा
संपूर्ण विद्याओंके कहनेसे ही यह सबमें श्रेष्ठ गिने जाते हैं, इसीसे दिव्य गुणयुक्त ज्ञानसे
सबके संसारी रोगके दूर करनेवाले हैं ॥५॥
जड़वादी कहते हैं कि, गर्जन ही प्रधान शब्द है । अतिवृष्टि होनेसे वरादि रोग और
सपाका प्रादुर्भाव होता है इनसे मृत्युसंख्या अधिक होनेकी संभावना है, प्रेतभय उपस्थित न
हो इस कारण तीनों भयक निवारण करनेके निमित्त रुद्रदेवसे प्रार्थना है ॥५॥
मन्त्रः।
॥.
असौयस्ताम्रोऽअसुणउतबभ्रुःसुमङ्गलं
येचैनसुद्राऽअभितोदिक्षुश्रिता संहस्रशोवैषा-
हेडईमहे ॥६॥
. उध्यायः ५] भाष्यसहिता। ५१) ॐ असौ य इत्यस्य प्रजापतिऋषिः । विराडापी पंक्तिश्छन्दः । रुद्रो दे० । वि० पू० ॥६॥ भाष्यम्-आदित्यरूपेणाऽत्र रुद्रः स्तूयते--( यः असौ ) प्रत्यक्षो रुद्रो रविरूपश्च ( ताम्रः ) उदयेऽत्यन्तरक्तवर्णः (च अरुणः ) अरुणरूपः ( उत ) अपि ( वचः) अम्नकाले पिंगलवर्णः (सुमंगलः ) शोभनानि मंगलानि यस्य सः । सूर्योदये सर्वमंगलप्रवर्तनात् क्रमेणैतानि रूपाणि दधातीत्यभिप्रायः । अथवा असौ यस्ताम्रः अरुणः सुमंगलः प्रयोननवशात् नानारूपाणि करोति (च) पुनः (ये) (सहस्रशः) सहस्रशः संख्याः ( रुद्राः) रुद्राः ( एनम् ) ( अभितः ) सर्वतः ( दिक्षु ) प्राच्यादि दिक्षु ( श्रिता ) आश्रिताः ( एपाम् ) रुद्राणाम् ( हेडः ) अम्मदपराधजं क्रोधम् ( ईमहे ) भक्त्या निवारयामः ॥ ६ ॥ भाषार्थ-और जो यह प्रत्यक्ष रुद्र सूर्यरूप उदय समयमें अत्यन्त लालवर्ण, अस्तके समय रक्तवर्ण और मध्याह्न समयमें पिंगलवर्ण मंगलरूप काँका उदय में विस्तार करनेवाले हैं, और जो सहसों रुद्रांशरूप वा किरणरूपसे इनके सब ओर दिशाओंमें स्थित है, अर्थात् जो सब नहरों देवता नक्षत्र मंडल इन देवताके दशों दिशाओं में देदीप्यमान है इन्हींका क्रोध 'हम भक्ति द्वारा निवारण करते हैं ॥ ६॥ मन्त्रः । असोयोवसप्पैतिनीलग्रीवोविलोहितः॥ उतैन डोपाऽअदृश्श्रन्नदृश्श्रन्नदहार्यः सदृष्टोमंडया- तिनः ॥७॥ ॐ असौ य इत्यस्य प्रजापतिऋषिः । विराडार्षी पंक्तिश्छ- न्दः । रुदो देवता । वि० पू० ॥७॥ भाष्यम्-( यः ) ( असौ ) आदित्यरूपः ( नीलग्रीवः ) विषधारणेन नीला ग्रीवा कण्ठो यस्य अस्तमये नीलकण्ठ इव लक्ष्यः ( उत ) ( विलोहितः) रक्तः ( अवसर्पति ) उदयास्तमयौ कुर्वनिरन्तरं गच्छति ( एनम् ) रुद्रम् ( गोपाः ) गोपालाः वेदोक्तसंस्कारहीनाः ( अदृश्रन् ) पश्यन्ति ( उदाहार्यः) जलहारिण्यो योषित अपि ( अश्रन् ) पश्यन्ति (सः ) शंकरः ( दृष्टः) दृष्टः सन् (नः) अस्मान् ( मृडयाति) सुखयतु ॥ ७ ॥ भाषार्थ-जोयह विष धारणसे नीलग्रीव वा अम्त समयम नीलकण्ठके समान और विशेष रक्तवर्ण आदित्य रूपसे उदय अस्त करते निरन्तर गमन करते हैं, इनको वेदोक्त संस्कारहीन गोपालतक देखते हैं, जल ले जानेवाली नारी भी दर्शन करती हैं, वह रुद्र दर्शन पथमें प्राप्त होते ही हमको सुखी करें । सूर्यमें नीलिमा आकाशकी नीलतासे कही है । गोष्ठम गोपाल;
(५२) रुद्राष्टाध्यायी- [ पञ्चमो- नदी आदि तीरपर पनिहारी इनकी शोभा अतिशय देखती हैं । पक्षान्तरमें-इन्द्रियगोलकोंक: रक्षक इन्द्रिय शक्ति गोप; और अमृतकी प्रान करनेवाली प्रज्ञाशक्ति उदकहारी हैं ॥७॥ नमोस्तुनीलग्ग्रीवायसहस्राक्षायमीटु ॥ अथो- येऽअस्यसत्त्वानोहन्तेभ्योकरन्नमः ॥ ८॥ ॐ नमोस्त्वित्यस्य। प्रजापतिऋषिः। निच्यदाय॑नुष्टप् छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ८ ॥ भाष्यम-(नीलग्रीवाय ) नीलकण्ठाय (सहस्राक्षाय ) सहनमक्षीणि यस्य इन्द्रस्वरूपिणि (मीढुषे )वृष्टिकत्रं पर्जन्यरूपाय ( नमः ) ननस्कारः ( अस्तु ) भवतु ( अथो) अपि ( अस्य ) रुद्रम्य ( ये ) ( सत्त्वानः) प्राणिनः सेवकाः सन्ति ( तेभ्यः ) ( अहम् ) स्तुतिकता ( नमः ) नमस्कार ( अकरम् ) करोमि ॥ ८ ॥ भाषार्थ-नीलकण्ठ, सहस्रनेत्र, सब जगत्को देखनेवाले, अथवा इन्द्रस्वरूप वा बहुरश्मि रूप सेचनमें समर्थ पर्जन्यरूप रुद्रके निमित्त नमस्कार हो । और इस रुद्रदेवताके जो अनु चरविशष है, मेषादि राशि हैं, उनके निमित्त म नमस्कार करता हूं । तात्पर्य यह-यह सबही शिवरूप हैं सबमें रुद्र वर्तमान हैं ॥ ८ ॥ मन्त्रः। प्रमुञ्चधन्वनस्त्वमुभयोराक्तन्योाम् ॥ याश्च- तेहस्तऽइषवल्पराताभंगवोवप ॥९॥ ॐ प्रमुञ्चेत्यस्य प्रजापतिऋषिः । भुरिगायष्णिक छन्दः । रुदो देवता । वि० पू० ॥९॥ भाष्यम्--(भगवः) हे भगवन् परमैश्वर्यसम्पन्न (धन्वनः ) धनुषः ( उभयोः ) द्वयोः ( आल्योंक) कोटयोः स्थिताम् (ज्याम् ) मौर्वीम् (त्वं ) ( प्रमुञ्च) दूरीकुरु (च) ( याः) (ते ) तव ( हस्ते करे ( इषकः ) बाणाः सन्ति ( ताः) शरान् ( परावप ) पराक्षिप ॥९॥ भाषार्थ-हे षडैश्वर्य सम्पन्न भगवन् । आप धनुषकी दोनों कोटियोंमें स्थित ज्याको दूर करो अर्थात् उतारलो। और जो आपके हाथमे बाण हैं उनको दूर त्यागदो हमारे निमित्त सौम्यमूर्ति होजाओ। हमारे लिये किसी प्रकारका रोग शोक न हो यही आपसे मार्थना है ॥९॥ ) ऽध्यायः ५.] भाप्यसहिता। (५३) मन्त्रः। विज्यन्धनु कपर्दिनोविशल्योवाणवाँ २॥ ऽउत ॥ अनैशन्नस्ययाऽइषवऽआभुरस्यनि षधिः ॥ १०॥ ॐ विज्यन्धनुरित्यस्य प्रजापतिक्रषिः भुरिगार्ण्यनुष्टुप्छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ १० ॥ भाप्यम्--( कपर्दिनः ) कपर्दो जटाजूटोऽस्यास्तीति कपदौ तस्य रुद्रस्य ( धनुः) शरासनम् (विज्यम् ) मौरिहितमस्तु (उत ) च बाणवान् इषुधिः (विशल्यः) विफ- लोऽस्तु ( अस्य ) रुद्रस्य ( याः ) ( इषवः ) शराः ताः ( अनेशन् ) नश्यन्तु ( अस्य) रुद्रस्य ( निषंगधिः) कोशः सः (आभुः) खड्गरहितोऽस्तु । मुद्र अन्मान्प्रति न्यस्तसर्व- शस्त्रोऽस्त्वित्यर्थः ॥ १० ॥ भाषार्थ-जटाजूटधारी रुद्रका धनुप ज्यारहित हो, और तरकस भालवाले बाणोंसे रीता हो, इन देवताके जो बाण हैं वे अदर्शनको प्राप्त हो, इनके खङ्ग रखनेका कोश रीता हो अर्थात् सद्र हमारे प्रति सर्वथा न्यस्तशस्त्र हो ॥१०॥ मन्त्रः। यातेहेतिम्मढिष्टमहस्तैबभूवतेधनुः ॥ तयास्मा- विश्वतस्त्वमयुक्ष्मयापरिभुज ॥ ११ ॥ ॐ यात इत्यस्य प्रजापतिक्रपिः । निच्युदनुष्टुप्छन्दः। रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ११ ॥ भाष्यम्--( मीढुष्टम ) सेकृतम वववुक (ते) तव हस्ते ( या ) ( हेतिः ) धनूरूपमायुध- मस्ति (ते हस्ते ) करे ( धनुः ) धनुः (बभूव ) अस्ति ( तया ) धनूरूपया ( अयक्ष्मया ) 'निरुपद्रवया दृढया हेत्या ( विश्वतः ) सर्वतः ( अस्मान् ) नः ( परिभुज ) परिपालय ॥११॥ भाषार्थ हे अत्यन्त ज्ञानामृत वा वर्षासे सींचनेवाले तुम्हारे हाथमे जो आयुध है, आपके हाथमें जो धनुष है उस उपद्रवरहित धनुषरून हेतिसे आप सब ओरसे हमको पालन करो, अर्थात् आप वर्षा करनेवाले अखको ही धारण कीजिये किन्तु उससे कोई उपद्रव न हो।।११
(५४)
रुद्राष्टाध्यायी
। पञ्चमो-
मन्त्रः ।
परितेधन्वनोहेतिरस्म्मान्छृणक्तुविश्वतः ॥अथो
यऽईषुधिस्तवारेऽअस्म्मन्निधेहितम् ॥ १२ ॥
ॐ परीत्यस्य प्रजापतिक्रपिः । निच्यदाय॑नुष्टुप्छन्दः। रुद्रो-
देवता । वि० पू० ॥ १२ ॥
भाप्यम-हं रुद्र ते ) नव ( धन्वनः । धनुः सम्बन्धि ( हेतिः ) आयुधन् (विश्वतः)
सर्वतः (अम्मान) परिवृगक्तु । त्यजतु अथो ( अपि च ) यः (तब) (इपुधिः) कोशोस्ति
( तम् अम्मत् ) सकाशात् ( आरे) दूरे ( निधेहि ) स्थापय ॥ १२ ॥
भाषार्थ-हे रुद्र ! तुम्हारे धनुपसंबंधी आयुध सव ओरसे हमको त्यागन करे, और जो
तुम्हारा तरकस है उसको हमारे निकट से दूर स्थापन करो । आशय यह कि, हमारे कर्मों-
द्वारा जो व्याधि होती हैं वह तुम्हारी सत्तासे हैं सो हमको कष्ट न दें ॥ १२ ॥
मन्त्रः ।
अवतत्त्यधनुष्ठसहस्राक्षशतेषुधे ॥ निशीयंशु
ल्यानाम्मुखांशिवोन-सुमनाभव ॥ १३ ॥
ॐ अवतत्त्येत्यस्य प्रजापतिऋषिः । निष्यदाय॑नुष्टुप् छन्दः ।
रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ १३॥
भाष्यम्-( सहस्राक्ष ) सहस्रमाणि यस्य तत्सम्बुद्धौ (शतेषुधे ) शतमिघुधयो यस्य
तलम्वुद्धौ ( त्वम् ) ( धनुः) शरासनम् ( अवतत्य ) अपज्याकं कृत्वा ( शल्यानाम् )
शराणान् ( मुखाः ) अग्राणि (निशीर्य ) शीणानि कृत्वा (नः ) अस्मान्मति ( शिवः)
शान्तः (सुमनाः ) शोभनचित्तश्च ( भव ) अनुगृहाणेत्यर्थः ॥ १३ ॥
भाषार्थ-हे विराट् ! हे सहस्रनेत्र ! हे सहस्रोंतरकमवाले ! तुम धनुषको ज्यारहितः
करो और बाणोंके मुख (भाल) निकालकर हमको शान्त, शोभनचित्त हो अर्थात् हमपर
कृपा करो ॥१३॥
मन्त्रः।
नमस्तु आयुधायानांततायधृष्ण्णवें ॥उभाभ्या
मुततेनमोबाहुभ्यान्तधन्वने ॥ १४ ॥
ऽध्यायः ५] भाष्यसहिना। (५५) ॐ नमस्त इत्यस्य प्रजापतिऋषिः । भुरिगाप्युष्णिक् छन्दः रुद्रो देवता० । वि० पू० ॥१४॥ भाष्यम्-हे रुद्र (ते) तव ( अनातताय) धनुष्यनारोपिताय ) आयुधाय) बागाय ( नमः ) नमोऽस्तु ( ते ) तव (धृष्णवे ) धर्षणशीलाय रिपून हन्तुं प्रगल्भाय ( धन्वने धनुषेऽपि ( नमः ) नतिरस्तु ( उत ) च ( ते ) तव (आभ्याम् ) द्वाभ्याम् । बाहुभ्याम् . ( नमः) भुजाभ्याम् ( नमः ) नमस्कारोऽस्तु ॥ १४ ॥ भाषार्थ-हे रुद्र! आपके धनुषपर न चढाये हुए बाणके निमित्त नमस्कार है, आपके दोनों बाहुओं के निमित्त और आपके शत्रुमारनेमें प्रगल्भ धनुष के निमित्त नमस्कार है।।१४ मन्त्रः । मानौमहान्तमुतमानौऽअर्भकम्मानऽउक्षन्तमु- तमान उक्षितम् ॥ मानौवधीलपितरम्मोतमात- रम्मान-प्रियास्तयोरुद्ररीरिषः ॥ १५ ॥ ॐ मानो महान्त इत्यस्य कुत्स ऋषिः । निच्यदार्षी जगती छन्दः । रुद्रो० दे० । वि० पू० ॥ १५ ॥ भाष्यम्-हे रुद्र (नः ) अस्माकम् (महान्तम् ) वृद्धं गुरुपितृव्यादिकम् (मावधीः ) मा हिंसीः ( उत ) अपि (नः) अस्माकम् (अर्भकम्) बालकम् (मा) मावधीः (नः) अम्मा- कम् ( उक्षन्तम् ) सिञ्चन्तं तरुणम् (मा) मावधीः ( उत ) अपि (नः ) अम्माकम् ( उक्षितम् ) सिक्तं गर्भस्थम् (मा ) मावत्री: ( नः ) अस्माकम् ( पितरम् ) जनकम् ( मा) मावधीः ( उत )अपि ( नः ) ( मातरम् ) जननीम् (मा) मावधीः (नः) अस्माकम् (प्रियाः ) बल्लभाः ( तन्वः ) पुत्रपौत्ररूपाणि शरीराणि ( मा रीरिषः ) मा हिंसीः ॥१५॥ भाषार्थ-हे रुद्र ! हमारे वृद्ध गुरु पितृव्य आदिको वर्मानुसार मत मारो। और हमारे बालकको मत मारो, हमारे तरुणको मत मारो और हमारे गर्भस्थ बालकको मत मारो, हमारे पिताको मत मारो, और हमारी माताको मत मारा, हमारे प्यारे शरीर पुत्र पौत्र आदिको मत मारो। आशय यह कि, यदि कर्मानुसार उनकी आयु पूरी होगई हो तो भी आपकी कृपा होनी चाहिये ॥१५॥ मन्त्रः । मानस्तोकेतनयमान आयुषिमानोगोषमानोऽअ रुद्राष्टाध्यायी- [पञ्चमो- श्वेषुरीरिष८ ॥ मानौवीरान्द्रभामिनौवधीहवि- मन्तत्सदमित्त्वाहवामहे ॥ १६ ॥ ॐ मानस्तोक इत्यस्य कुत्स ऋषिः । निच्यूदार्षी जगती छन्दः । रुद्रो दे० । वि० इ० ॥ १६॥ भाष्यम्-हे रुद्र (नः; अन्नाकन् । नो पुत्र (ननये ) पौत्रे ( मा रीरिषः ) मा हिंसीः ( नः आयुषि जीवन । मा; ना हिलीः ( नः ( गोषु ) धेनुषु ( मा ) मा हिंसीः (नः) (अश्वेपु) तुरगेषु (ना) मा हिंसाः (नः भानिनः) क्रोधयुतान् ( वीरान् ) भृत्यान् ( मावधीः ना हिंमी: । विष्मन्तः ) हविर्युक्ताः ( सदमित् ) सदैव ( त्वा) ( हवामहे ) वयं यागायायामः । त्वदेकशरणा वयमित्यर्थः ।। १६ ॥ भाषार्थ-हे रुद्र ! हमारे पौत्र पुत्रको मत मारो, हमारी आयुको मत नष्ट करो, हमारी गौओंमें प्रहार मत करो, हमारे घोडोंमें प्रहार मत करो, हमारे क्रोधयुक्त वीरपुरुषों को मत मारो हवियुक्त निरन्तर आपको हम यज्ञके निमित्त आह्वाहन करते हैं। अर्थात् आपकी ही शरण हैं । तात्पर्य यह है कि-ईश्वर रुद्र किसोको नहीं मारते पर कर्मानुसार रोगादिमें अपनी शक्तिकी प्रेरणा करते हैं उन पापोसे अनिष्ट न होने की प्रार्थना है ॥ १६ ॥ मन्त्रः । नमोहिरण्यवाहवेसेनाध्यदिशाञ्चपतये नमोनमा वृक्षेब्भ्योहरिकेशेभ्यस्पशूनाम्पतयेनमोनम-श प्पिञ्जरायविषमतेपथीनाम्पतयेनमोनमोह- रिकेशायोपवीतिनैपुष्टानाम्पतयेनमोनमोबब्ब्लु शायं ॥ १७ ॥ ॐ नम इत्यस्य कुत्स ऋषिः । निच्युदतिधृतिश्छन्दः । रुद्रो देवता । जपे विनियोगः ॥ १७ ॥ भाष्यम्-(हिरण्यवाहवे ) हिरण्यमाभरणरूपं वाहोर्यस्य स हिरण्यबाहुः तस्मै (सेनान्ये) सेनां नयतीति सेनानीः तस्मै ( नमः ) रुद्राय नमः (च) (विशांपतये ) पालकाय रुद्राय (नमः ) नमः (हरिकेशेभ्यः ) हरितवर्णाः केशाः पर्णरूपाः येषां ते हरिकेशास्तेभ्यः (वृक्षेभ्यः)
ऽध्यायः ५]
भाष्यसहिता।
(५७)
वृक्षरूपरुद्रेभ्यः ( नमः ) नमः ( पशूनाम् जवानान् ( पतये ) पालकाय रुद्राय ( नमः )
नमः ( त्विषीमते ) विषिर्दीप्तिरस्यास्ति तम्भ (शपिञ्जराय ) शष्पं बालतृणं तद्वपिनराय
भीतरक्तवर्णाय रुद्राय ( नमः ) नमोऽस्तु, ( पीनाम् ) मार्गाणां पालकाय रुद्राय ( नमः )
नमः ( हरिकेशाय ) नीलवर्णकेशाय जरारहिताय ( उपवीतिने) मंगलार्थयज्ञोपवीतधारिणे
रुद्राय ( नमः ) नतिरस्तु (पुष्टानाम् ) गुणपूर्णानां नराणाम् ( पतये ) पालकाय न्वामिने
( नमः ) नमोऽस्तु ॥ १७ ॥
भाषार्थ-भुजाओंमें सुवर्ण धारण करनेवाले महाबाहु सेनापालक मंद्रक निमित्त नमन्कार
है, दिशाओंके अधिपति अर्थात् समस्त जगन्को अपनी भुजाओंके नीचे रक्षा करनेवाले सेना-
पतिक निमित्त भी नमस्कार है, पर्णरूप हरे वालोबाले वृक्षरूप रुद्रोंके विमित्त बारंवार नम-
स्कार है, जीवोंके पालन करनेवाले रुद्रक निमित्त नमस्कार है, कान्तिमान् बालतृणवत् पीत-
वर्ण वाले रुद्र के निमित्त नमस्कार है, मागोंके पालन करनेवाले रुद्रके निमित्त नमस्कार है,
मंगलके निमित्त उपवीत धारण करनेवाले नीलवर्ण केश वा जरारहित रुद्रके निमित्त नमस्कार
है, गुणपूर्ण मनुष्योंके स्वामी रुद्रके निमित्त नमन्कार है ॥ १७ ॥
तात्पर्य--तात्पर्य यह-सव मार्गाम शान्तरूप रुद्र ह, अश्वत्थादि वृथोपर जैस आकाश
वेल आदि निर्मूल लता होती हैं तद्वत् यज्ञोपवीत धारे है विना रुद्रके किसीकी स्थिति नहीं
हो सकती इसे रुद्र सबके स्वामी पालक कहाते हैं।॥ १७ ॥
मन्त्रः।
नौवब्भ्लुशायव्याधिनेन्नानाम्पतयेनमो नमोभ
वस्यहेत्यैजगताम्पतयेनमोनमोस्टायांततायिने-
क्षेत्राणाम्पतयेनमोनम-सुतायाहन्त्यैवनानाम्प-
तयेनमोनमोरोहिताय ॥ १८
ॐ नम इत्यस्य कुत्स ऋषिः । निच्यदष्टिश्छन्दः । रुदो
देवता । वि० पू० ॥ १८॥
भाष्यम्-( बभ्लुशाय ) कपिलवर्णाय यद्वा-बिभर्ति रुद्रमिति बलुईषभस्तस्मिन् शेते स
बभ्लुशस्तस्मै रुद्राय ( नमः ) नमः ( व्याधिने ) विध्यति शत्रूनितिव्याधी तस्मै रुद्राय नम:
( अन्नानाम् ) धान्यानाम् (पतये ) पालकाय ( नमः) नमः भवस्य ( संसारम्य ) (हेत्यै)
आयुधाय संसारनिदर्तकाय रुद्राय ( नमः ) नतिरस्तु ( जगतां पतये ) पालकाय रुद्राय (नमः)
नमः ( आततायिने) आततेन विस्तृतेन धनुषा सह एति गच्छतीति आततायी उद्यतायुध-
स्तस्मै रुद्राय (नमः ) नमः (क्षेत्राणाम् ) देहानाम् ( पतये ) रक्षकाय पालकाय ( नमः )
नमः ( अहन्त्रे ) न हन्तीति- अहन्ति--तस्मै (सूताय) सारथये तद्रूपाय ( नमः ) नमः ( वना-
नाम् ) अरण्यानाम् ( पतये) पालकाय ( नमः) नमोस्तु ॥ १८ ॥
(५८)
रुद्राष्टाध्यायी--
[पञ्चमो-
भाषार्थ-कपिलवर्ण वा वृषभपर स्थित होनेवाले शत्रुओं को वेधनेवाले व्याधिरूप रुद्रः
नमन्कार है । अन्नोंके पालक रुद्रके निमित्त नमस्कार है, संसारके आयुध अर्थात् संसार निव
तक रुद्रके निमित्त नमस्कार है, संसारके पालक मुद्रके निमित्त नमस्कार हे अद्यत आयुधवार
भद्रके निभिन नमस्कार हैं. देहों के पालन ग्नेवाले न्द्र के निमित्त नमस्कार है, नहीं मारा
वाले. पापसे रक्षक प्रधान सारथी रूपके निमित्न नमस्कार हैं, वनों के पालकके निमिर
नमस्कार है ॥ १८॥
विवरण-रोगियों का रक्तह्रास होनेवर जो वर्ण होता है उसको वभ्लुश कहते हैं ॥१८॥
मन्त्रः।
नमोरोहितायस्थपतयेवृक्षाणांपतयेनमो नमोंभु-
बुन्तयेवारिखस्कृतायौषधीनाम्पतयेनमोनो म-
न्त्रिणेवाणिजायकक्षाणाम्पतयेनमोनमऽउच्चैग्धों
पायाकुन्दयतेपत्तीनाम्पतयेनमोनम कृत्स्ना-
--
य ॥ १९॥
ॐ नम इत्यस्य कुत्स ऋषिः । विराडतिधृतिश्छन्दः । रुद्रो
देवता । जपे विनियोगः ॥ १९ ॥
भाष:म्-(रोहिताय ) लोहितवर्णाय (स्थपतये ) स्थातिहादिकर्ता विश्वकर्मरूपेण
तस्मै ( नमः) नतिरस्तु ( वृक्षाणाम् ) तरूणाम् ( पतये) पालकाय ( नमः ) नमः ( भुव-
न्तये ) भूमण्डल विस्तारकारिणे ( वारिवस्कृताय ) स्थानभोग्यकराय ( नमः ) नमोस्तु (ओष-
धीनाम् ग्राम्यारण्यानामोषधीनाम् ( पतये ) पालकाय ( नमः ) नमोऽस्तु ( मंत्रिणे ) सचि-
वरूपिणे ( वाणिजाय ) व्यापारकत्रे रुद्राय ( नमः ) नमोऽस्तु ( कक्षाणाम् ) वनोत्पन्ना
गुल्मवीरुषादयः कक्षास्तेषाम् ( पतये ) पालकाय (नमः ) नमोऽस्तु (उच्चैः घोषाय )
युद्धे महाशब्दाय (आक्रन्दयते ) रिपुरोदकाय ( नमः ) नमोऽस्तु (पत्तीनाम् ) पदातीनाम्
(पतये ) पालकाय ( नमः ) नमोऽस्तु ॥ १९ ॥
भाषायः-लोहितवर्ण गृहादिकर्ता विश्वकर्मरूपके निमित्त नमस्कार है, वृक्षोंके पालकके
निमित्त नमस्कार है, भूमंडल के विस्तार करनेवाले स्थानभोग्य करनेवाले के निमित्त नमस्कार
है. ग्राम्य और आरण्य औषधियोंके पालक निमित्त नमस्कार है, आलोचनमें कुशल व्यापार
कर्ताओं रूपमें स्थितके निमित्त नमस्कार है, उनके गुल्मवीरुधादिके निमित्त नमस्कार है,
शत्रुओंको रुलानेवाले, युद्ध में बडा उग्र शब्द करनेवाले रुद्रके निमित्त नमस्कार है, एक रथ,
एक हाथी, तीन घोड़े, पांच पैदल का नाम पत्ति है। इस प्रकार सनाविशेषके पालक रुद्र के
निमित्त नगरकार है ॥ १९॥
भाष्यसहिता। ऽव्यायः ५ (५९) विशेष स्थपति-शब्दसै गृह आदि निर्माण करनेवाले इनके मनमें सदा ही इष्टकाकी चिन्ता लगी रहती है. इस कारण इनका अन्तरदेवता लोहितवर्ण कहा है, कारण कि इष्टका लाल होती हैं ॥१९॥ मन्त्रः। नम-कृत्स्नायुतयाधावतेसत्त्वानाम्पतये नमुल्सह मानायनिध्याधिन आध्याधिनीनाम्पतयेनमो- नौनिषङ्गिणककुभायंस्तेनानाम्पतयेनमोनमो- निचेरवैपरिचरायारण्यानाम्पतयेनमोनमोब- ते ॥ २० ॥ ॐ नम इत्यस्य कुत्स ऋषिः अतिधृतिश्छन्दः। रुद्रो देवता । वि० पू० ॥२०॥ भाष्यम्-( कृत्स्नायतया ) कृत्स्नं समग्रमायतं विस्तृतम् अर्थाद्धनुर्यस्य स कृत्स्नायत स्तस्य भावः कृत्स्नायतता तया आकर्णपूर्णधनुट्वेन (धावते ) युद्धे शीघ्रं गच्छते रुद्रायः ( नमः ) नतिरस्तु । अथवा कृत्स्नः सर्व आयो लाभो यस्य सः कृत्स्नायस्तस्य भावः कृत्स्ना- यता तया ( धावते ) सर्वलाभप्रापकत्वेन धावते ( सत्त्वानाम् ) शरणागतानां प्राणिनाम् ( पतये ) पालकाय ( नमः) नमोऽस्तु ( सहमानाय ) अभिभवनशीलाय (निन्याधिने ) नितरां विध्यति हन्ति शत्रूनिति निव्याधी तस्मै (नमः ) नमः ( आव्याधिनीनाम् ) आ समन्ताद्विध्यन्तीत्याव्याधिन्यः शूरसेनास्तासाम् ( पतये ) पालकाय (नमः ) नमः (निवङ्गिणे) खड्गयुक्ताय ( ककुभाय ) महते रुद्राय नमः ( स्तेनानाम् ) गुप्तचोराणाम् ( पतये ) पालकाय ( नमः) नमः (निचेरवे) नितरां चेहः निचेरुः तस्मै (परिचराय) परितः चरतीति परिचरस्तस्मै ( नमः) नमः ( अरण्यानाम् ) वनानाम् (पतये ) पालकाय (नमः) नतिरस्तु ।। २० ॥ भाषार्थ-जो हमारी रक्षाक निमित्त कर्णपर्यन्त धनुष बैंचकर धावमान होते हैं, उन रुद्र के निमित्त नमस्कार है, अथवा सबलाभ प्राप्त करानेवालेके निमित्त नमस्कार है, शरणमें आये हुए प्राणियों के पालक रुद्र के निमित्त नमस्कार है, शत्रुओं का तिरस्कार करनेवाले, शत्रुओंको अधिक मारनेवाले के निमित्त नमस्कार है, सब प्रकारसे प्रहार करनेवाली शूरसेना- ओं के पालकके निमित्त नमस्कार है, उपद्रवकारियोंपर खड्ग चलानेवाले महान रुद्रके निमित्त नमस्कार है, गुप्तधनहारी जनों के सबरूप होनेसे पालन करनेवाले के निमित्त नमस्कार है, अपहारकी वृद्धिसे निरन्तर फिरनेवाले तथा आपण स्थानमें हरणकी इच्छासे फिरनेवालों (गठकटों ) के अन्तर्यामी के निमित्त नमस्कार है, वनों के पालन करनेवाले के निमित्त नम- स्कार है।॥ २० ॥ -
(६०)
रुद्राष्टाध्यायी-
। पञ्चमो-
विवरण-जगत्भरमें सर्वात्मा रुद्र है, इस कारणसे सोनादि भी रुद्ररूप लिखें
तेनादिके शरीरम जीव ईश्वर इन दो रूपोंसे ईश्वर स्थित हैं, जीवरूप स्तेनादि शब्दवार
है, ईश्वर रुद्ररूपसे लक्षित है-जैसे शाखाके अग्रसे चन्द्रमाको दिखाते हैं इस प्रकार लक्ष्य
की विवक्षाले मंत्रोंम लौकिक शब्द लिखे हैं ॥ २० ॥
मन्त्रः।
नमोबञ्चते परिवञ्चतस्तायूनाम्पतयेनमोनमोनि-
षङ्गिण इषुधिमतेतस्कराणाम्पतयेनमोनमःमृ-
कायिभ्योजिघासद्भ्यो मुष्ण्णुताम्पतयेन-
मोनमोसिमझ्योनक्तञ्चरद्भ्योविकृन्तानाम्प
तयेनसः ॥२१॥
ॐ ननो वञ्चत इत्यस्य कुत्स ऋषिः । निच्युदतिधृतिश्छंदः
रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ २१ ॥
भाष्यम्-( वश्चते ) बञ्चति प्रतारयति तम्मै, वा गमनशीलाय रुद्राय ( नमः । नमोऽम्
(परिवञ्चते ) सर्वतो गमनशीलाय वा सर्वव्यवहारे धनापहवः परिवञ्चनम् । गुप्तचौर
द्विविधाः रात्री वेश्मनि खातादिना द्रव्यहारः स्वीया एवाऽहनिशं ज्ञातारो हतारश्च पूर्व
रतेना उत्तरे स्तायवः तेषाम् ( पतये ) पालकाय ( नमः ) नमोऽस्तु ( निषङ्गिण) खगिने
इषुधि मते ) इयुधिस्तूणस्तत्सहिताय ( नमः ) नमोऽस्तु ( तस्कराणाम् ) प्रकटचोराणाम्
( पतये ) पालकाय ( नमः ) नमोस्तु ( मुकायिभ्यः ) सुकेण वज्रेण सह यन्ति गच्छन्तीत्ये-
वंशीलाः मृकायिणः तेभ्यः (जियां सद्भयः ) हन्तुमिच्छद्भयः तेभ्यो रुद्रेभ्यः (नमः ) नमोस्तु
(मुष्णताम् ) क्षेत्रादिषु धान्यानामपहतारो मुष्णन्तस्तेषाम् (पतये ) पालकाय ( नमः)
नमोस्तु ( असिमभूयः) असियुक्तेभ्यः (नक्तञ्चरद्भयः ) रात्रौ गच्छद्भयः रुद्रेभ्यः (नमः) नमो-
स्तु (विकृन्तानां ) विकर्तनशीलानाम् (पतये ) पालकाय ( नमः ) नमोस्तु ॥२१॥
भाषार्थ-ठगोंके अन्तर्यामी के निमित्त, स्वामी को अपना विश्वास दिलाकर व्यवहारमं
“उनको वंचन करनेवालों के साक्षी के निमित्त नमस्कार है, गुप्त चोरोंके पालक के निमित्त नम-
स्कार है, खड्सधारी, वाणधारीके अर्थात्--उपद्रव करनेवाले के शान्त करनेवालों के निमित्त
नमस्कार है, प्रकाश चोरों के पालकक निमित्त नमस्कार है, वन लेकर चलनेवाले हत्याकारी
जनोंके अन्तर्यामी वा उनके रूप रुद्रों के निमित्त नमस्कार है, क्षेत्र आदिसे धनादिके हरण
करनेवालोंके पालन करनेवाले रुद्रके निमित्त नमस्कार है, खड्गधारी रात्रि फिरनेवाले
दस्युगणोंके हृदयमें स्थितके निमित्त नमस्कार है, छेदन करके पराया धन हरनेवाले दस्यु-
गणके पालन करनेवालेके निमित्त नमस्कार है ॥ १२॥
ऽध्यायः ५ भाष्यसहिता। मन्त्रः। नमऽउष्ण्णीषिणगिरिचरायकुलुच्चानाम्पतयेन- मोनमऽइघुमद्भ्योधन्यायिभ्यश्चवोनमोनमऽ- आतन्यानेभ्य॑ प्रतिदानेब्भ्यश्चवोनमोनमऽ आयच्छंझ्योस्यद्भ्यश्चवोनमोनमौविसृज- दयः ॥२२॥ ॐ नम उष्णीपिण इत्यस्य कुत्स । निच्यदष्टि ऋषिश्छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ २२ ॥ भाष्यम् -( उष्णोषिणे ) उष्णीषं शिरोवेष्टनमम्यास्तीत्युष्णीषी तस्मै (गिरिचराय )) गिरौ चरति पर्वतसंचारिणे ( नमः ) नमोऽस्तु ( कुलुश्चानाम् ) कुं भूमि क्षेत्र- गृहादिरूपां लुञ्चन्ति हरन्ति कुलुच्चाः तेषाम् ( पतये ) पालकाय ( नमः ) नमोस्तु ( इषुमद्भयः ) जनान भाषयितुं बाणधारिणस्तेभ्यो रुद्रेभ्यः ( नमः ) नमोऽस्तु (च) अपि (धन्वा यिभ्यः )ह रुद्राः धनुर्धारिभ्यः ( वः ) युष्मभ्यम् (नमः) नमोऽस्तु (आतन्वानेभ्यः) आतन्वन्त्यारोपयन्ति ज्यां धनुषीत्यातन्वानास्तद्रूपेभ्यः ( नमः ) नमोस्तु (च) आपि ( प्रतिदघानेभ्यः ) प्रतिदधते सन्दधते बाणं धनुषीति सन्दधाना स्तेभ्यः (वो) युष्मभ्यम् ( नमः ) नमोऽस्तु ( आय. च्छद्भयः ) आयच्छन्त्याकर्षन्ति धषि ते आयच्छन्तस्तेभ्यः (नमः ) नमः (च .) अपि ( अस्यद्भयः ) अभ्यन्ति क्षिपन्ति बाणानित्यस्यन्तस्तेभ्यः (वः ) युष्मद्भयः ( नमः ) नमोऽस्तु ॥ २२ ॥ भाषार्थ-उप्णीष (पगड़ी) धारण करनेवाले सभ्यगण ग्रामों में विचरनेवाले, शून्य- मस्तक गिरि वनमें फिरनेवाले दोनों प्रकार दलोंके हृदयमें स्थित रुद्रके निमित्त नमस्कार है, छल बल कौशलसे दूसरोंकी गृह भूमि आदि हरण करनेवालोंके पालकके निमित्त नमस्कार है, मनुष्योंके डरानेको बाण धारण करनेवाले और धनुष साथ लेकर चलानेवाले वा कुलुञ्च- गणोंके दमनार्थ बाणधारी आप रुद्रके निमित्त नमस्कार है. कुलुचोंके दमनार्थ धनुषपर ज्या आरोपण करनेवाले के निमित्त नमस्कार है, और धनुषपर बाण चढानेवाले आपके निमित्त नमस्कार है, कुलंचोंके दमनके निमित्त धनुषको आकर्षण करनेवालेके निमित्त नमस्कार है, और बाणोंके निक्षेप करनेवाले आपके निमित्त नमस्कार है ॥ २२ ।। मन्त्रः॥ नौविसृजद्भ्यो विद्धययश्चवोनमो नमः - --- रुद्राष्टाध्यायी- [पञ्चमो- स्वपोजाग्रद्भ्यश्चवोनमोनमत्शानेभ्यऽआ सीनभ्यश्चवोनमोनमस्तिष्टद्योधावयश्चवो नमोनमःसभाब्भ्यः ॥ २३ ॥ ॐ नमो विमृजय इत्यस्य कुन्स ऋषिः । निच्यदतिजगत छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ २३ ॥ भाष्यम्-- विजयः : विमुञ्चन्ति वाणानारष्विति विमृजन्तः तभ्यः ( नमः) (च अपि ( विध्ययः । शत्रून् ताडयद्भवः ( वः युप्मभ्यम् ( नमः ) नमोऽस्तु (स्वपङ्ग्यः स्वप्नावस्थामनुभवद्भयः । जाग्रड्यश्च : जाग्रहवम्यावन्तम्तेभ्यो (वः ) युष्माकम् नमोऽस्तु (शयानेभ्यः) लुपुत्यवस्थावद्भयः च आसीनेभ्यः) आसते ते आसीनाः तेभ्यश्च (वो नमः ) नमोऽस्तु ( तिष्ठन्यः स्थितिं कुर्वन्यः (नमः नमोऽस्तु ( धावद्भ्यः ) धावन्ति ते धावन्तो वेगवद्गतयम्तेभ्यः । वो नमः नमोऽस्तु परमेद्वैतप्रतिपादनाय स्तुतिः ।। २३॥ भाषार्थ-पापियोंके दमनार्थ बाण त्यागनेवालेके निमित्त नमस्कार है, और शत्रुओंके लक्ष्य वेधनेवाले आपके निमित्त नमस्कार है, और जाग्रत् अवस्थाके अनुभवी आपके निमित्त नमस्कार है, सुषुप्ति अवस्थावालों के अन्तरमें स्थित आपके निमित्त नमस्कार है, वैठे हुओंके अन्तरमें स्थित आपके निमित्त नमस्कार है, वेगवान् गतिवालों के अन्तरमें स्थित आपके निमित्त नमस्कार है ॥२३॥ मन्त्रः नमसभाब्भ्य-सभापतिब्भ्यश्चवोनमो नमो- श्वेभ्योश्वपतिब्भ्यश्चवोनमोनमंऽआध्याधि- अभ्योविविद्धयन्तीभ्यश्चवोनमोनमऽउर्ग- णाब्भ्यस्तुरीहुतीब्भ्यश्च्चवो न मोनोगणे- भ्यः ॥२४॥ ॐ नमः सभाभ्य इत्यस्य कुत्स ऋषिः । शकरी छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥२४॥ भाष्यम्--( सभाभ्यः ) सभारूपेभ्यः रुद्रेभ्यः (नमः) नमोऽस्तु (च सभापतिभ्यः) सभ याः पतिभ्यः ( वो नमः ) नमोऽस्तु सभादिपु रुद्रदृष्टिः कर्तव्ये तात्पर्यम् ।
ऽध्यायः ५.] भाष्यसहिता। (६३) ( अश्वेभ्यः) अश्वास्तुरगास्तेभ्यः ( नमः) नमोऽस्तु ( अश्वपतिभ्यः', अश्वानां पतिभ्यः ( वो नमः ) नमोऽस्तु ( आव्याधिनीभ्यः ) आविष्यन्तीत्याव्याधिन्यः सेनास्ताभ्यः ( नमः ) नमः ( च ) अपि (विविध्यन्तीभ्यः ) विशेषेण विध्यन्तीति विविध्यन्त्यः ताभ्यः । वो नमः ) नमोऽस्तु (उगणाय ) उत्कृष्टा गणाः भृत्यसमूहाः यासां ताः उगणा ब्रह्मादयः मातर- स्ताभ्यः ( नमः ) नमोऽस्तु (च) अपि ( तृठः हतीभ्यः ) हन्तुं समर्थाः दुर्गादयस्ताभ्यः (बो नमः) नमोऽस्तु ॥ २४ ॥ भाषार्थ-अब वातसंज्ञक रुद्र जो रुद्रलोकमें निवास करते हैं, अद्वेत प्रतिपादनके निमित्त उनका वर्णन करते हैं-समारूप रुद्रके निमित्त नमस्कार है, सभा आदिमें मद्रष्टि करनी चाहिये । और सभापतिरूप आपके निमित्त नमस्कार है, प्रत्येक अश्वोंके अन्तरमें स्थित आपके निमित्त नमस्कार है, और अश्वों के अधिपति आपके निमित्त नमस्कार है, देव मेना- ओंमें स्थित आपके निमित्त नमस्कार है, और विशेषकर वेधनेवाली देव सेनाओंमें स्थित आपके निमित्त नमस्कार है, उत्कृष्ट भृत्व समूहवाली ब्राह्मी आदि माता वा सेनामें स्थित रुद्रके निमित्त नमस्कार है, और युद्ध में प्रहार करनेवाले दुर्गादिमें स्थित आपके निमित्त नमस्कार है ।। २४॥ मन्त्रः। - नमोगणेब्भ्योगणपतिब्भ्यश्चवोनमोनमो बाते भ्यो बातपतिब्भ्यश्चवोनमोनमोगृत्सैब्भ्यो गृसंपतिभ्यश्चवो नमोनमोविरूपेभ्योविश्व रूपेभ्यश्चवोनमोनमल्सेनाब्भ्यः ॥ २५ ॥ ॐ नमो गणेभ्य इत्यस्य कुत्स ऋषिः । भुरिकूछक्करी छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ २५ ॥ भाष्यम्-( गणेभ्यः } गणः समूहः तत्स्वरूपेभ्यः ( नमः) नमः ( गणपतिभ्यश्च ) गणपालकास्तेभ्यश्च (वो नमः ) नमस्कारः, (बातेभ्यः ) नानाजातीयानां संघास्तेभ्यः ( नमः ) नमः (च) ( व्रातपतिभ्यः) ब्रातपालकास्तेभ्यः (वः ) ( नमः ) नमः (गृत्सेभ्यः ) गृत्सा मेधाविनस्तेभ्यः ( नमः) नमः (च) गृत्सपतयस्तत्पालकास्तेभ्यः (वः ) युष्माकम् ( नमः ) नमः (विरूपेभ्यः ) नग्न मुण्डजटिलादयस्तेभ्यः ( नमः ) नमः ( विश्वरूपेभ्यः ) नानाविधं रूपं येषान्ते विश्वरूपास्तुरङ्गवदनहयग्रीवादयस्तेभ्यः वः) ( नमः) नमः ॥ २५ ॥ भाषार्थ-देवानुचर भूनविशेषोंके निमित्त नमस्कार है, गणोंके अधिपति आपके निमित्त नमस्कार है, विशेष गण अथवा अनेक जातियोंके समूहके निमित्त नमस्कार है, वातगणों के .
(६४)
रुद्राष्टाध्यायी-
[पञ्चमो
अधिपति आपके निमित्त नमस्कार है. बुद्धिमानों के अथवा विषय लंपटके निमित्त नमस्कार
और बुद्धिमानोंके रक्षक आपके निमित्त नमस्कार है, नग्न-मुण्ड-जटिलादि--विकृतरू
निमित्त वा विविध रूपवालोंके निमित्त नमस्कार है, सर्वस्वरूप नानाविधरूप वर तुरंगव
हयग्रीवादि रूप आपके निमित्त नमस्कार है ॥ २५ ॥
मन्त्रः ।
नमल्सेनाभ्यल्सेनानिब्भ्यश्चवोनमोनमा रथि-
भ्योऽअरथेभ्यश्चवोनमी नमक्षत्तब्भ्य सङ्ग
हीतृभ्यश्चवोनमोनमामहन्योऽअभकेन्भ्यश्च
वोनमः ॥ २६ ॥
ॐ नमः सेनाभ्य इत्यस्य कुत्स ऋषिः । भुरिगतिजगत
छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ २६ ॥
माप्यम्- ( सेनाभ्यः चमूम्वरूपेभ्यः (नमः ) नमः ( च ) ( सेनानिभ्यः) सेनान्नय
नीति सेनान्यः तेभ्यः (वः ) ( नमः ) नमः (रथिभ्यः) रथा येषां तेरथिनस्तेभ्यः ( नमः
नमः (च) ( अरथेभ्यः ) रथवर्जिता योद्धारस्तेभ्यः ( वो नमः ) नमः। ( क्षतृभ्यः ) रथा
नामधिष्ठातारस्तेभ्यः ( नमः ) (च) ( संग्रहीतृभ्यः ) संग्रहीतारः सारथयस्तेभ्यः (वं
ननः) नमः ( महद्भयः ) जातिविद्यादिभिरुत्क्रष्टास्तेभ्यः (च ) ( अर्भकेभ्यः) प्रमाणादि
भिरल्पास्तेभ्यः ( वो नमः) नमः ।। २६ ।।
भाषार्थ-सेनारूपके निमित्त नमस्कार है, सेनापतिरूप आपके निमित्त नमस्कार है
प्रशंसित रथवालोंके निमित्त नमस्कार है, रथहीन आपके निमित्त नमस्कार है, रथके अधि-
टातृके अन्तरमें स्थितके निमित्त नमस्कार है, और सारथियों के अन्तरमें स्थित वा रणसामर्य
अहणकर्ता आपके निमित्त नमस्कार है, जाति, विद्या और ऐश्वर्यमें उत्कृष्ट पूज्यरूपके निमित्त
नमस्कार है, प्रमाणादि अल्परूप आपके निमित्त नमस्कार है ॥ २६ ।।
नमस्तक्षब्भ्योरथकारेभ्यश्चवोनमोनम कुला
लेब्भ्यस्कारेभ्यश्चवोनमोनमोनिषादेब्भ्यः
पुञ्जिष्टेब्भ्यश्चवोनमो नमः श्वनिब्भ्योमृगयु-
ब्भ्यश्चवोनमोनमल्श्वभ्यः ॥ २७ ॥
ऽध्याय: ५] भाष्यसहिता। (६५) ॐ नमस्तक्षभ्य इत्यस्य कुत्स ऋषिः । निच्यच्छकरी छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ २७ भाष्यम्-(तक्षभ्यः) तक्षाणः शिल्पजातयस्तेभ्यः (नमः ) नमः (च) ( स्थकारेभ्यः रथं कुर्वन्तीति रथकारास्तेभ्यः ( वः ) ( नमः ) नमः ( कुलालेभ्यः ) कुंभकारेभ्यः ( नमः । नमः ( च ) कारेभ्यः लोहकारेभ्यः (वो नमः ) नमोऽस्तु (निषादेभ्यः) भिल्लेभ्यः (नमः) नमः (च) (पुञ्जिष्ठेभ्यः ) पुक्कसादिभ्यः (वो नमः ) नमोऽस्तु (श्वनिभ्यः ) शुनो नयन्तःन्ति श्वन्यन्तेभ्यः ( नमः ) नमोऽस्तु ( च ) ( मृगयुभ्यः ) मृगान् कामयन्त इति लुब्धकास्तेभ्य: (वो नमः ) नमोऽस्तु ॥ २७ ॥ भाषार्थ-काष्ठकी शिल्प विद्याके जाननेवालोंमें व्याप्तके निमित्त नमस्कार, और विमान रथ निर्माणकारी उत्कृष्ट तक्षाके अन्तरमें स्थित आपको नमस्कार है, प्रशंसित मृत्तिकाके पात्र बनानेवालोंमें स्थितके निमित्त नमस्कार, और लोहेके शस्त्र बनानेवालोंमें स्थितके निमिन नमस्कार है. गिरिचारी भील आदिमें स्थित रुद्रके निमित्त नमस्कार, और पक्षिघातक पुल्कस आदि वा संकीर्ण जातियों के अन्तरमें स्थित व्याप्त आपके निमित्त नमस्कार है, कुत्तों के गलेम रम्सी बांधकर धारण करनेवालोंके अन्तरको जाननेवालेके निमित्त नमस्कार है, मृगोकर कामनावाले व्याधों के अन्तर स्थित आपको नमस्कार है ।। २७ ।। मन्त्रः । नमुस्श्वभ्यश्वप॑तिब्भ्यश्चवोनमोनमौभवायच रुवायंचनमःशुर्वायंचपशुपतयेच नमोनीलग्री- वायचशितिकण्ठायचनमःकपर्दिनें ॥२८॥ ॐ नमः श्वभ्य इत्यस्य कुत्स ऋषिः । आर्षी जगती छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ २८ ॥ भाष्यम्-( श्वभ्यः ) कुकुररूपेभ्यः ( नमः ) नमोऽस्तुः ( च ) (श्वपतिभ्यः) श्वपाल- केभ्यः (वः) युष्मभ्यम् ( नमः ) नमोऽस्तु इत उत्तरं रुद्रनामानि ( च ) (भवाय) भवन्ति उत्पद्यन्ते जन्तवोऽस्मादिति भवस्तस्मै ( नमः ) नमोस्तु ( च रुद्राय ) रु दुःख दावयतीति रुद्रस्तस्मै ( नमः ) नमोस्तु (च) (शर्वाय ) पापहारिणे ( नमः ) नमोस्तु (च) ( पशुपतये ) जीवानां पालकाय वा अज्ञान् पाति क्षतीति पशुपतिस्तस्मै ( नमः) नमोस्तु (च.) ( नीलग्रीवाय ) नीला श्यामा श्रीवा यस्य स तस्मै (शितिकण्ठाय ) शितिः श्वेतः कण्ठो नीलातिरिक्तभागो यस्य शितिकण्ठस्तस्मै ( नमः) नमोस्तु ॥ २८ ॥ ५ - (६६) रुद्राष्टाध्यायी- [पञ्चमो- भाषार्थ-कुक्कुरों के अन्तर में स्थितके निमित्त नमस्कार है, कुक्कुरोंके अधिपति किरा बोके अन्तरमें स्थित आपके निमित्त नमस्कार है, ( यह पूजावाचक वः-शब्द है, उभयतो नमस्कार वाले मंत्र पूर्ण हुए। अब नमस्कारोपक्रम मंत्र लिखते हैं ) और जिनसे सब जगत् उत्पन्न होता है उनके निमिन नमस्कार है, दुःख दूर करनेवाले देवके निमित्त नमस्कार है और पार के नाश करनेवाले निमित्त नमस्कार है, प्राणियोंके अधिपतिके निमित्त नमस्कार है, नीलवर्ण ग्रौत्रावाले अथवा नीलवर्ण आकाशमै उदित मूर्य में स्थितके निमित्त नमस्कार है नीलकण्ठवाले वा मेघसहित आकाशम उदित हुए सूर्यके अन्तरमें स्थितके निमित्त नमस्कार है ।। २८ ।। मन्त्रः । नम कपर्दिनैचव्युप्तकेशायनमःसहस्राक्षायच शतर्धचनेच ॥ नमौगिरिशयायच शिपिविष्टा- यचनमामीढुष्टमायचेर्युमतेचनमोह्रस्वाय ॥२९॥ ॐ नमः कपर्दिन इत्यस्य कुत्स ऋषिः भुरिगतिजनती छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ २९ ॥ भाष्यम्-( कपाने ) जटाजूटधारिणे ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (व्युप्तकेशाय' मुण्डितकेशाय ( नमः ) नमोस्तु ( च ) ( सहस्राक्षाय ) वहुनेत्राय ( च ) (शतधन्वने) बधन्वने ( नमः ) नमोस्तु ( च ) ( गिरिशयाय) गिरौ शेते गिरिशयस्तम्मै (च) (शिपि- विष्ठाय ) विष्णुरूपाय यद्वा-शिपिषु पशुपु विष्टः प्रविष्टः 'पशवो वै शिपिः' इति श्रुतेः त्र) ( मीढुष्टमाय ) सेक्तृप्तमाय यूने परिणामहीनाय (च) ( इषुमते ) शरयुक्ताय (नमः) नमोस्तु ॥ २९ ॥ भाषार्थ-जटाजूटधारीके निमित्त भी नमस्कार है, मुण्डित केश के निमित्त नमम्कार है, और सहस्रलोचन इन्द्ररूपके निमित्त नमस्कार है, बहुत धनुष धारण करनेवालेके निमित्त नमस्कार और सब प्राणियों के अन्तर व्यापक विष्णुरूपके निमित्त नमस्कार है, (“ विष्णुः शिपिविष्टः” इति श्रुतेः । अथवा पशवो वै शिपिः इति श्रुतेः ) वसुगणोंमें व्याप्तके निमित्त नमस्कार है, ( अयवा यज्ञो वै शिपिः ) यज्ञमें अधिष्ठातृ देवतारूपसे प्रविष्ट अथवा शिपिः आदित्य मंडलमें स्थित (“शियोऽत्रर श्मय उच्यन्ते तैराविष्टो भवति" इति) क. निमित्त नमस्कार है। और तृप्तिकर्ता मेघरूपसे तृप्तिकर्ता वा चार पदार्थों की वर्षा करन- चालेके निमित्त और बाणधारीके निमित्त नमस्कार है ॥२९॥ मन्त्रः । नमोह्रस्वायचबामनाय॑चनमौबहुतेचवर्षीयसेच अध्यायः ५] भाप्यसहिता। (६०) नमोबुद्धायचसुधेचनमोग्ग्र्यायच प्रथमार्यच नमऽआशवें ॥ ३०॥ ॐ नमो ह्रस्वायत्यस्य कुत्स ऋषिः । विराडार्षी त्रिष्टुप् छन्दः। रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ३० ॥ भाष्यम् ( ह्रस्वाय ) लघुप्रमाणकः हस्तः तम्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (वामनाय) संकुचितावयवाय ( च ) (बृहते ) हन् प्रौढाइन्टम्मै च ( वर्षीयसे , वर्षीयानतिशयेन वृद्धम्तम्मै ( नमः ) नमोस्तु ( च ) ( वृद्धाय । वृद्वा वयसाधिकम्तन (च) ( सवृधे ) वर्धन्ते विद्याविनयादिगुणस्ते वृधः पण्डिताः किए तैः सह वर्तत इति सवृत् तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु ( च ) ) अग्र्याय ) जगतामग्रे भवः अग्र्यम्तम्ने (च) (प्रथमाय ) मुख्याय नमः) नमोस्तु ॥ ३० ॥ भाषार्थ अल शरीरक निमित्त भी नमन्कार है । और संकुचित अवयत्रमें व्याप्तके 'निमित्त नमस्कार है, प्रौढाङ्गके निमित्त नमस्कार है, अतिवृद्धिके निमित्त नमस्कार है: अव- म्यामें अधिको निमित्तनमस्कार हे विद्याविनय आदि गुणयुक्त पंडितों के साथ वर्तनवालेयुवाके निमिन नमस्कार है । और मुख्य सब जातमें प्रथम प्रादुर्भाव होनेवाले के निमित्त नमस्कार है, सबमें प्रथम मुख्यके निमिन नमस्कार है ।। ३० ।। विशेष-आशय यह कि. जब सृष्टि नहीं थी तब आप थे, आप सबसे प्रथम और अश्य कहे जाते हैं आपको नमस्कार है ।। ३ ।। मन्त्रः। नमऽआशवैचाजिरायचनमल्शीग्घ्यायचशी न्यायचनमऽऊयायचाववन्यायचनमौनादे यायचद्दीप्यायच ॥ ३१ ॥ ॐ नम आशव इत्यस्य कुत्स ऋषिः। स्वराडार्षी पंक्तिश्छन्दः। रुदो देवता । वि० पू० ॥ ३१ ॥ भाष्यम्-( आशवे ) जगद्व्यापिने ( च ) ( अजिराय) गतिशीलाय (नमः) नमोस्तु (च) ( शीध्याय ) वेगवद्वस्तुनि भवः शीघ्यः तस्मै (च) (शीभ्याय) शोभते कत्थते इति शीभ आत्मश्लाघी पचायच तत्र भव इति छान्दसो यत्प्रत्ययः । शीभो जलप्रवाहो वा शीमाक्षिपो वा तत्र भवाय ( ननः ) नमोऽस्तु (च) ( ऊम्याय.) कल्लोलेषु भवः ऊर्म्य (६८) रुद्राष्टाध्यायो- पञ्चमो- तमन : च ) ( अवम्वन्याय ) अर्वाचीनं गच्छन् उनकम्य स्वनो ध्वनिः आवम्वनः तत्र भवाय ( नमः नमः ( च ) ( नादेयाय ) नद्यां भवो नादेयम्तम्मै ( च ) (द्वीप्याय ) द्वीपे भवो द्वी-यस्तम्भ ( नमः) नमोस्तु ॥ ३१ ॥ भाषार्थ-जगन्-व्यापकके निमित्त भी नमस्कार है. गतिशीलके निमित्त सर्वत्र व्यापके निमित्त नमस्कार है, और वेगवाली वस्तुओं में विद्यमान और जलप्रवाहमें विद्यमान आत्म- साधी वा आत्मरूपके निमित्त नमस्कार हैं. जलतरंग में होनेवाले और स्थिर जलोंमें विद्यमानके निमित्त नमस्कार है, नदी में होनेवालेके निमित्त और द्वीप अर्थात् टापूमें. होनेवालेक निमित्त नमस्कार है ।। ३१ ।। गूढार्थ-प्राणों के पुष्ट करनेवाले अन्तःकरण चतुष्टयके पुष्ट करनेवाले शीघ्रगमनादि बुख की प्राप्तिकी लहरें. शब्दादिका सुनना. शब्द करना, इत्यादि शक्तियोंके दाता आपको नमस्कार है, द्वीप द्वीपान्तरोंड़ी शक्ति देनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ३१ ॥ मन्त्रः । नमौज्येष्ठायचकनिष्ठायचनम-पूर्वजाय चापर- जायचनमोमध्यमायचापगल्ब्भार्यचनमाजघु- न्यायचबुद्ध्यायचनमल्सोभ्याय ॥ ३२ ॐ नमो ज्येष्ठायेत्यस्य कुत्स ऋषिः । स्वराडार्षी त्रिष्टुप छन्दः । रुद्रो देवता। वि० पू० ॥ ३२ ॥ भाष्यम्-( ज्येष्ठाय ) अत्यन्तं प्रशस्यो ज्येष्ठस्तस्मै ( च ) ( कनिष्ठाय ) अत्यन्त युवाऽल्पो वा कनिष्ठस्तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च) ( पूर्वजाय ) पूर्व जगदादौ हिरण्यगर्भ- रूपेणोत्पन्नः पूर्वजस्तस्मै ( च ) ( अपरजाय ) अपरस्मिन्काले प्रलये कालाग्निरूपेण जातः अपरजस्तस्मै ( नमः ) नमः ( च ) (मध्यमाय ) मध्ये भवों मध्यमस्तस्मै देवतिर्यगादिरूपणे ( अपगलभाय ) अव्युत्पन्नेन्द्रियरूयाय, वा एकगर्भान्तरितोऽपगरमस्तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु ( च ; ( जघन्याय ) जघनं गवादीनां पश्चाद्भागस्तत्र भवो जघन्यस्तम्मै (च) (बध्याय) वुन वृक्षादिमूले भवो बुध्न्यस्तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु ॥ ३२ ॥ भाषार्थ अति प्रशस्य ज्येष्टरूपके निमित्त और अतियुवा वा कनिष्ठरूपके निमित्त नम- स्कार है, (अर्थात् मृष्टिके आरम्भमें जो प्रथम उत्पन्न हुआ तिसके अन्तरमें भी विद्यमान और उसके पीछे जो कुछ हो रहा है उस सबके हृदयमें भी विद्यमान होनेसे ज्येष्ठ कनिष्ठरूप है) और जगत्के आदिमें हिरण्यगर्भरूपसे उत्पन्न और प्रलयकालमें कालाग्निरूपसे होनेवालेके निमित्त नमस्कार है । और सृष्टि संहारके अनन्तर देवतिर्यगादिरूपसे होनेवालेके निमित्त नमस्कार है, (अर्थात् प्रथम गर्भाधानमें बालकके रक्षकरूपसे उस बालकके आत्माका आर कहोर गर्भ में वास करके उस बालकके साथ ही उत्पन्न होता है, तिसके उपरान्त गर्भाधान उन्यायः ५] भाष्य लहिता। (६९) भी और गर्भमें भी इमी प्रकार इसको प्रथम द्वितीय तथा संपूर्ण ही सन्तान कहा जाता है ) और अप्रगल्भ अव्युत्पन्न इंद्रिय प्रकाश रहित अण्डरूपके निमित्त नमस्कार और गवादिक पश्चाद्भागम होनेवाले स्वेदज कृमि कीट आदिम वर्तमानके निमिन नमस्कार है: तथा वृक्षादिके मूलमें होनेवाल के निमित्त नमस्कार है ॥ ३२ ॥ विशेष-यह अवयव विधायक नमस्कार है॥३२॥ मन्त्रः। नमल्सोभ्यायचप्प्रतिसर्यायचनमोयाम्म्याय- चक्षेप्यायचनमश्लोक्क्यायचावसाच्यायचन मऽउर्घायचखल्ल्यांयचनमोवन्याय ॥ ३३ ॥ ॐ नमः सोभ्यायेत्यस्य कुत्स ऋषिः । आर्षी त्रिष्टुप्छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ३३॥ भाष्यम्-(सोभ्याय ) सोभं गन्धर्वनगरं तत्र भवम्तम्मै यद्वा- सोभ्यः उमाभ्यां पुण्यपा- याभ्यां सहितः मनुष्यलोकस्तत्र भवः सोभ्यस्तस्मै ( च ) ( प्रतिसाय ) प्रतिसरो विवा- होचिंत हत्तसूत्रमभिचारो वा तत्र भवस्तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु ( च ) ( याम्याय ) पापिनां नरकार्तिदाता तम्मै ( च ) (क्षेम्याय ) क्षेमे कुशले भवः क्षेम्यस्तम्मै ( नमः ) नमोऽस्तु ( च ) ( श्लोक्याय ) श्लोका वैदिकमंत्रा यशो वा तत्र भवः श्लोक्यस्तस्मै ( च ) ( अवसा- न्याय ) अवसानं समाप्तिर्वेदान्तो वा तत्र भवः तस्मै (नमः) नमोऽस्तु (च ) ( उर्वय्याय ) उर्वरा सर्वसस्याढ्या भूमिस्मत्र धान्यरूपेण भवस्तस्मै (च) ( खल्याय ) खलो वान्यविवे- चनदेशस्तत्र भवस्तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु ॥ ३३ ॥ भाषार्थ-गन्धर्वनगरमें होनेवाले अथवा पुण्यपाप सहित वर्तमान मनुष्य लोकमें होने- वाले ( "पुण्येन पुण्यलोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यां मनुष्यलोकम्" इति) अथवा पृथिवी लोकमें उत्पन्न होनेके समय जन्मे बालकके अन्तर देवतारूपके निमित्त भी नमस्कार है, और विवाहादि कार्यमें हाथमें बंधे मंगलसूत्र में विद्यमानके निमित्त नमस्कार है । और पापियोंको दुःख देनेको यममें वर्तमान और कुशलमें होनेवाले वा परलोक गये हुए प्राणीके कल्याणमें विद्यमानके निमित्त नमस्कार है, और इस संसारमें यश प्रचारके कारण भूत वा वैदिक मंत्ररूपी यज्ञमें होनेवालेको और वेदान्तमे स्थित वा जिसके प्रसादसे प्राणी जन्म मृत्युसे छुट कार। पाता है उसके निमित्त नमस्कार है, उपजाऊ भूमिमें उत्पन्न हुए धान्यादिके अन्तरमें भी विद्यमानके निमित्त नमस्कार है और धान्य विवेचन देशमें होनेवालेके निमित्त नम- स्कार है ।। ३३॥ मन्त्रः। नमोबन्यायचकक्ष्यायचनम-श्रुवायंच प्रति- (७०) रुद्राष्टाध्यायी-- [ पञ्चमा-- श्रवायचनमऽआशुषेणायचाशुस्थायचनमल्शू- रायचावभेदिनैचनमोविलिम्म ॥ ३४ ॥ ॐ नमोवन्यायेत्यस्य कुत्स ऋषिः । स्वराडार्षी त्रिष्टुप् छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥३४॥ भाष्यम्--( वन्याय ) वन वृक्षानिरूपण भयो बन्यन्तम्मै (च) नमः । नमोस्तु (च) ( कयाय ) कक्षं तृणं वल्ली वा तत्र भवः कश्यम्तम्मै नमः नमोस्तु । च । श्रवाय ) शब्दरूपाय (च): प्रतिश्रयाय प्रतिशब्दरूपाय नमः नमोऽस्तु । च) आशुषेणाय आशु शीत्रा सेना यस्य सः तम्म ( च । आशुरथाय) शीघ्रो रथो यस्य सः आशुरथ. म्नमै ( नमः) नमः (च) (शूराय ) युद्धधीराय । च)) अवभेदिने ) अवभेदी अर्वा- चीन भत्तुं शीलमस्यति अवभेदी तम्मै ( नमः) नमोऽस्तु ॥ ३४ ॥ भाषार्थ-वनमें वृक्षादिरूपसे होनेवालेके निमित्त वा घरमें विद्यमानको भी नमस्कार है, और तृणवल्ली में होनेवालेके निमित्त नमस्कार है, शब्दरूप वा ध्वनिमें वर्तमानके निमित्त नम- स्कार है, और प्रतिध्वनिमें विद्यमानके निमित्त नमस्कार है, शीघ्र चलनेवाली सेनाकी श्रेणी में विद्यमानके निमित्त नमस्कार है, और शीत्र चलनेवाले रथों की श्रेणीमें विद्यमानके निमित्त नमन्कार है, युद्ध विशारदोंके हृदय में विद्यमानके निमित्त, और शत्रुका हृदय वेधनेवाले शस्त्र में भी विद्यमानके निमित्त नमस्कार है ॥ ३४ ॥ मन्त्रः। नमोबिल्म्मि चकवचिनचनमामिणेंचवरूथि नैचनम-श्रुताय॑चश्रुतसेनायचुनौदुन्दुभ्याय- चाहनुयायचुनौधृष्णवे ॥ ३५॥ ॐ नमो बिल्मिन इत्यस्य कुत्स ऋषिः । स्वराडार्षी त्रिष्टुप छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ३५॥ भाष्यम्--( बिल्मिने ) बिल्ममस्यास्तीति बिल्मी, विल्मं शिरस्त्राणमस्यास्तीति बिल्मी तस्मै (च) (कवचिने ) पटस्यूतं कार्पासगर्भ देहरक्षकं कवचं तदस्यास्तीति तस्मै ( नमः) नमोन्तु ( च ) ( वर्मिणे ) लोहमयं शरीररक्षक वर्म तदस्यास्तीति तस्मै (च) ( वरूथिने) वस्था रथगुप्तिवा सोऽभ्यस्तीति वरूथी तस्मै ( नमः ) नमोस्तु (च) ( श्रुताय ) प्रसि- द्धय (च) (श्रतसेनाय ) श्रुता प्रसिद्धा सेना यस्य स श्रुतसेनः तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु
(७१
ऽध्याय: ५]
भाष्यसहिता।
(च ) ( दुन्दुभ्याय ) दुन्दुभौ भवः दुन्दुभ्यस्तम्मै ( च ) ( आहनन्याय ) आहनने भक
आहनन्यः तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु ॥ ३५ ॥
भाषार्थ-शिरस्त्राण धारण करनेवाले निमिन नमस्कार है, वा बेलपत्र धारणसे प्रसन्न
होनेवालके निमित्त नमागर है । और देहावरण म्यूत अंगरखा कवच धारण करनेवाले के
निमित्त नमस्कार है, बख्तर धारण करनेवालके निमित्त नमस्कार है, रथका गोपनस्थान वा
हाथीके ऊपरकी अम्बारीमें विदामानके निमित्त नमस्कार है। और प्रसिद्धके निमित्त नम-
स्कार है, प्रसिद्ध सेनावाले के निमित्त भी नमस्कार हैं। और रणके बाजेमें विद्यमानके निमित्त
और वाद्य साधन दण्ड आदिमें होनेवालेके निमित्त नमस्कार है ॥ ३५ ॥
भावार्थ--यह संसार बिल्वके तुल्य है, इसमें जलके तुल्य आपकी शीतल वेदवाणी है,
आप कवचके समान मायासे ऐसे ढके हैं जिस प्रकार शरीर बख्तरसे आच्छादित होता है,
सद्गुण सत्यविज्ञान धनादि सेनारूप हैं, जिससे पापादिशत्रु भागते हैं, आपका यश वेदा.
दिमें बहुत प्रकारसे सुना है, इसीसे वेदको श्रुति कहते हैं वह दोषरूपी शत्रुके निवारण कर-
नेकी सेना है, उसके शब्द दुन्दुभी हैं, जिस सेनासे पापादि शत्रुओंका हनन होता है ऐसे
आपके निमित्त नमस्कार है ॥ ३५॥
मन्त्रः।
नौधृष्णवैचप्प्रमशाय॑चनमौनिषङ्गिणेंचेषुधिम
सूचनमस्तीक्ष्णेषवेचायुधिनैचनम-स्वायुधायच-
सुधन्वनेच ॥ ३६॥
ॐ नमोधृष्णव इत्यस्य कुत्स ऋषिः। भुरिगार्षी पंक्तिश्छन्दः।
रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ३६॥
भाष्यम्-( च ) ( धृष्णवे ) धृष्णुः प्रगल्भः तस्मै (नमो) नमोऽस्तु (च) (प्रमृशाय )
पंडिताय नमः ( च ) ( निषङ्गिणे ) खड्गयुताय ( च ) ( इषुधिमते ) तूणयुताय ( नमः)
नमोऽस्तु ( च ) ( तीक्ष्णेषवे ) तीक्ष्णा असह्या इषवो वाणा यस्य सः तीक्ष्णेषुस्तस्मै (च)
( आयुधिने ) आयुधधारिणे ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (स्वायुधाय ) शोभनायुधाय (च)
( सुधन्वने ) शोभनधनुषे ( नमः ) नमोस्तु ।। ३६ ॥
भाषार्थ-प्रगल्भरूप अपने पक्षकी रक्षा करनेवाले के निमित्त ननस्कार है, विचारशील
पंडिवरूप वा विपक्षदलन करनेवाले के निमित्त नमस्कार है । और खङ्गधारीके निमित्त नम-
स्कार है, तरकसयुक्तके निमित्त नमस्कार है, तीक्ष्णबाणधारीके निमित्त और मुद्रादि आयुध
धारण करनेवाले के निमित्त नमस्कार है, शोभन आयुध, त्रिशूल, लोह, शिलादि धारण करने
वालेके निमित्त नमस्कार है । और पिनाक श्रेष्ठ धनुषधारीके निमित्त नमस्कार है ॥ ३६॥
(७२)
रुद्राष्टाध्यायी-
[पचमो-
मन्त्रः।
नमस्रुत्यायचुपत्थ्यायचनमल्काट्यायचुनीप्य
यचनमल्कुल्ल्यायचसरस्यायचनौनादेयायचबै
शन्तायचनमस्कूप्याय ॥ ३७॥
ॐ नमःखुत्यायेत्यस्य कुत्स ऋषिः निवृदार्षी त्रिष्टुप्छन्दः ।
रुद्रो देवता । वि० पू० ॥३७॥
भाष्यम्-( च ) (वृत्याय ) श्रुतिः नद्याः क्षुद्रप्रवाहम्मत्र भवः मुत्यस्तस्मै (च,
( पथ्याय ) पथि भवः पथ्यः तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च ) ( काट्याय ) काटे
भवः काटयः कुत्सितम् अति काटःविषममार्गः तत्र भवः काटयः तस्मै० (च) (नीन्याय
नीचीच्छन्त्यापो यत्र स नीपः निन्नभूमिः तत्र भवः तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च)
( कुल्याय ) कुल्या अल्ला कृत्रिमा सरित् कुलेषु देहेषु वाऽन्तर्यामिरूपेण भवः कुल्यः तस्मै
(च) ( सरस्याय ) मासि भवः सरस्यः त० ( नमः ) नमः (च) (नादेयाय) नशं
भवो नादेवः तस्मै नहाजलरूयाय ( च ) वैशन्ताय ) वेशन्तोऽल्पतरः तत्र भवः वैशन्तः
नम्मै ( नमः ) नमोस्तु ॥ ३७ ॥
भाषार्थ-क्षुद्रमार्ग ग्रामकी बाटमें स्थितके निमित्त और राजमार्गमें होनेवालेके निमित्त
नमस्कार है, दुर्गम मार्ग में स्थितके निमित्त और पर्वतके नीचेभागमें स्थितके निमित्त नमस्कार
है, नहर के मार्गमें स्थितके निमित्त वा देहोंमें अन्तर्यामीरूपसे स्थितके और सरोवरों में होने,
बाले के निमित्त नमस्कार है, नदीम जलरूपसे स्थिवके निमित्त और अल्पसरोवर गोष्पदादिके
जलमं स्थितके निमित्त नमस्कार है ।। ३७ ।।
गर्भिताशय-वेद ही सबके निमित्त सुगम मार्ग है, इसमें चलनेसे दुःखादि नहीं
सताते कारण कि इसमें कंटक नहीं हैं । और छोटे बडे सरोवररूप जो आश्रमोका वर्णन है
उनके द्वारा आप प्राप्त होते हो।। ३७ ।।
मन्त्रः।
नमस्कूप्यायचावट्यायचनमोवीट्योय चात-
प्यायचनमोमेग्घ्यायचविद्युत्त्यायचनमोवा
यचावायचनमोवात्याय ॥३८॥
ऽध्याय: ५] भाप्यसहिता। (७३) ॐ नमः कूप्यायेत्यस्य कुत्स ऋषिः । भुरिगार्षी पंक्तिश्छन्दः । रुदो देवता । वि० पू० ॥ ३८ ॥ भाष्यम्- ( च ) ( कूप्याय ) कूपे भवः कूप्यः तस्मै (च) ( अवट्याय ) अवटे गर्ते भवः अवश्यः तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (वीध्याय) विशेषण इधं निर्मल शरदर तत्र भवो वोध्यः । यद्वा-विगतं इधो दीप्तिर्यस्मात्स वीधीः धनागमः तत्र भवाय (च) ( आतप्याय) आतपे भवः आतप्यः त० ( ननः ) नमोऽस्तु ( च ) ( मेध्याय ) मेघे भवः मेथ्यः तस्मै ( च ) ( विद्युताय ) विद्युति भवः विद्युत्यः त० (नमः ) नमोऽस्तु (च) ( वष्ाय ) वर्षे भवो वर्ण्यः त० (च) ( अवाय ) अवर्षे भवोऽवय॒स्तस्मै ( नमः ) नमोस्नु ॥ ३८ ॥ भाषार्थ--कृपमें होनेवाले के निमिन और गर्त में होनेवालेके निमित्त नमस्कार है. और महाप्रकाश वा घोर अन्धकारमें स्थितके निमिन और धूप वा प्रकाशमें होनेवालेके निमिन नमस्कार है मेघमें होनेवाले के निमित्त और विजलीमें होनेवाले के निमित्त नमस्कार है । और वर्षाकी धारामें स्थितके निमित्त, नथा वृष्टि के प्रतिबंध होनेवालेके निमित्त नमस्कार है ॥३८।। मन्त्रः। नमोबात्यायचरेष्म्म्यायचनमौवास्तुच्यायचवा- स्तुपायचनमल्सोमायचढायचनमस्ताम्रायंचारु- णायचनम-शुङ्गवै ॥ ३९॥ ॐ नमो वात्यामेत्यस्य कुत्स ऋषिः । स्वराडापी पंक्तिः श्छन्दः रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ३९ ॥ भाष्यम्-( च ) और (वात्याय ) वाते भवः वात्यः तस्मै० (च) (म्याय ) रिष्यन्ते नश्यन्ति भूतान्यत्रेति रेष्मा प्रलयकालः तत्र भवः रेश्म्यः तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च) ( वास्तव्याय ) वास्तु गृहं तत्र भवः वास्तव्यः तस्मै (च) ( वास्तुपाय) वास्तु गृहं पाति वास्तुपः तस्मै (नमः ) नमोस्तु (च) ( सोमाय ) उमासहितः सोमस्तस्मै० (च) (रुद्राय ) दुःखनाशकाय ( नमः) नमोस्तु ( च ) ( ताम्राय ) उदयाद्रविरूपेण त० (च) ( अरुगाय ) अरुणरूपाय ( नमः) नमोऽस्तु ॥ ३९ ॥ भाषार्थ-वायुप्रवाहमें होनेवाले के निमित्त नमन्कार है, और प्रलयकी पवनमें होनेवालेके निमित्तं नमस्कार है । वास्तुगृहमें होनेवाले के निमित्त और वास्तुगृहके पालनेवालेके निमित्त नमस्कार है । चन्द्रमामें स्थितके निमित्त वा उमासहितक निमित्त, और दुःखनाशक रुद्ररूप बा अग्निरूपके निमित्त नकस्कार है । सायंकालके सूर्यमें स्थित के निमित्त प्रभातकालीन सूर्य में
A
(७४)
रुद्राष्टाध्यायी-
[पञ्चमो-
स्थितके निमित्त नमस्कार है वा उदयकालीन ताम्र और उदयकालके उपरान्त कुछ रक्ताप
सूर्यमें स्थितके निमिन नमस्कार है ।। ३१ ।।
आशय-वायुआदि के परमाणुओंको एकत्र कर पंचीकरणकी रीतिस इस संसारकी संपूर्ण
वस्तुओंके रचनेवाल और सबके रक्षक सोम यव आदिक उत्पादक पापादि दोष निवारणको
भयानकरूप अग्निसे तप्रधातु के समान शुद्ध रजोगुणसे संसार उत्पादकके निमित्त नम-
स्कार है ।। ३९॥
मन्त्रः।
नम-शुङ्गवैचपशुपतयेचनमऽउग्यायचभी
मायंचनमोग्ग्रेवधायचरेवधार्यचनमाहुन्त्रेचह-
नीयसेचनमौवृक्षेभ्यो हरिकेशेभ्योनमस्ता
राय ॥४०॥
ॐ नमः शङ्गव इत्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिर्देवा ऋषयः । भुरि-
गतिशकरी छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ४० ॥
भाष्यम्-( शङ्गवे ) शं मुखं गमयतीत्ति शङ्गुः सुखरूपा गावो वाचो वेदरूपा यस्येति
वा त० (च) ( पशुपतये ) प्राणिनां पालकाय ( नमः) नमोस्तु ( च ) ( उग्राय )
शत्रून् हन्तुमुदगर्णयुधाय ( च ) ( भीमाय ) भीमः शत्रुभयोत्पादकः तम्मै ( नमः ) नमोस्तु.
( च ) ( अग्रे वधाय ) अग्रे स्थितो हन्तीति अग्रेववः त० (च) (दूरे वधाय ) दूरे
स्थितो हन्तीति दूरेवधः त० ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (हन्त्रे ) हननकर्ते लोके यो हन्ति
तद्रूपेग रुद्र एव हन्तीत्यर्थः । ( च ) ( हनीयसे ) अतिशयहननकर्डे (नमः) नमोस्तु (च)
( हरिकेशेभ्यः ) ( हरिता वर्णा केशा इव येषां तेभ्यः (वृक्षेभ्यः) कल्पतरुरूपेभ्यः ( नमः )
(च) ( ताराय) तारयति संसारमिति तारः तस्मै नमः ( नमोऽस्तु ॥ ४० ॥
भाषार्थ-कल्याणरूप देववाणीवाले के निमित्त नमस्कार है, और प्राणियों के पालकके
निमित्त नमस्कार है, शत्रुओं के मारनेको कठिन आयुध उठाये कठिन अन्तःकरणवालेके
निमित्त और शत्रुभय उत्पादक भयानक दर्शनके निमित्त नमस्कार है, सन्मुखके शत्रुका
वध करनेवाले के निमित्त और दूरके शत्रुका वध करनेवाले के निमित्त नमस्कार है, मारने.
वालेके रूपमें स्थित स्थावर पदार्थके लयकारीके निमित्त नमस्कार और अतिशयहन्ता सदाको
मृत्युका अभाव करनेवाले के निमित्त नमस्कार है, हरे पत्तरूप केशवाले कल्पतरुरूपके
निमित्त नमस्कार है, संघारके तारनेवाले ॐकाररूपके निमित्त नमस्कार है॥४०॥
ऽन्यायः ५] भाप्यसहिता (७५) मन्त्रः॥ नम शम्भवायचमयोभवायचनम-शङ्करायचम यस्स्करायंचनम-शिवायंचशिवतरायच ॥४१॥ ॐ नमः शम्भवायेत्यस्य परमेष्टी ऋषिः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥४१॥ माप्यम- ( शम्भवाय ) शं भवत्यस्मादिति शम्भवः । यद्वा--शं मुग्वरूपश्चासौ भवः संसाररूपश्च मुक्तिरूपो भवरूपश्च आनन्दविज्ञानघनरूपश्च तम्मै ( नमः ) नमोस्तु (च) ( मयोभवाय ) मुम्वरूपाय ' च ) (शङ्कराय) शं करोतीति शङ्करः लौकिकंसुखकराय (नमः नमोऽस्तु ( च ) मयस्कराय ) मयः मोक्षसुखं करोतीति मयस्करस्तम्मे (च) (शिवाय ) कल्याणरूपाय ( नमः ) नमः (च) (शिवतराय ) निर्विकाराय निरतिशयसर्वबीजायः भक्तानपि निष्पापान् करोतीत्यर्थः । तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु ॥ ४१ ।। भाषार्थ-इस लोकके कल्याणकारी जिनसे सुख होता है अथवा सुखरूप, संसाररूप और मुक्तिरूपके निमित्त नमस्कार है, संसारमुखदाता पारलौकिक कल्याणके आकार के निमित्त नमस्कार है, लौकिकसुख करनेवालेके निमित्त नमस्कार है और मोक्षसुख करने- वाले के निमित्त नमस्कार है, कल्याणरूप निष्पापके निमित्त नमस्कार है और भक्तोंके अत्यन्त कल्याणकारक तथा निष्पाप करनेवाले के निमित्त नमस्कार है। विशेष-स्रक्चंदनादि रूपसे लौकिकसुख शास्त्रज्ञानसे मोक्षसुख देनेवाले हैं ॥४१॥ मन्त्रः॥ नमल्पा-यचावाव्यचनमः प्रतरणायचोत्तरं णायचनमस्तीर्थ्यांयचकूल्यायचनमशष्प्याय चुफेन्यायचनम-सिकत्त्याय ॥ ४२ ॥ ॐ नमः पार्यायेत्यस्य परमेष्टी प्रजापतिर्देवा ऋषयः । निच्यदार्षी त्रिष्टुप् छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ४२ ॥ भाष्यम्-(च) ( पार्याय ) पारे भवः पार्यः संसाराब्धेः परतीरे जीवन्मुक्त रूपेण वा भवः पार्यः त० (च) ( अवार्य य) अास्तीरे संसारमध्ये संसारित्वेन भव आवार्यः त० ( नमः) नमोऽस्तु (च) (प्रारणाय ) प्रकरण मंत्रजपादिन पापतरणहेतुर्वा प्रतरति येन प्रतरगं नौकादि लघुद्रव्यं तत्र भवः त० (च) ( उत्तर-
(७६)
रुद्राष्टाध्यायो-
। पञ्चमो.-
गाय ) उत्कृष्टेन तत्त्वज्ञानेन संसारतरणहेतुरुत्तरणं वा उत्तरति अनेनेन्युत्तरणं तीरः
तत्र भवः त० ( नमः; नमः (च, तीर्थ्याय तीर्थ प्रधागादो भवः तीर्थ्य न.
(च) (कृल्याय ) कूले तटे भवः कूल्यः न ( नमः ) नमोऽस्तु (त्र शन्याय )
शष्पे शरतृणे भवः शष्प्यः तम्नै (च); ( फैन्याय ने भवः फेन्यः तम्मै ( नमः )
नमोऽस्तु ॥ ४२ ॥
भाषार्थ-समुद्रके पारमें भी विद्यमान अथवा संसारसागरक परंपारम जीवन्मुक्तम्पसे
वर्तमान के निमिन और सागरके इसपारमें भी विद्यमान वा संसारमध्यवर्ती के निमित्त नम-
स्कार है,जहाजमें विद्यमान वा अतिमंत्र जपादिसे पापके हारनेके कारण के निमित्त और डोंगमें
भी विद्यमान वा उत्कृष्ट तत्त्वज्ञानसे संसारसागरके पारकरनेवालेके निमित्त नमस्कार है,
सागरआदिक गभमें वा तीर्थ प्रयाग पुष्करआदिमें विद्यमानके निमित्त और जलप्रणाली वा
'किनारोंमें प्रगटहोनेवालेके निमित्त नमस्कार है: गंगादिके तटम उत्पन्न कुश अंकुरादिमें विद्य-
मानके निमित्त और सागरादिके फेनमें होनवालके निमित्त नमस्कारहै ।। ४२ ।।
मन्त्रः।
नमःसिकत्त्यायचप्प्रवाहृयायचनम-किर्टशि-
लायचक्षयणायचुनम कपर्दिनेचपुलस्तयेचन-
मऽइरिण्यायचप्प्रपत्त्थ्यायचनमोजज्याय॥४३॥
ॐ नमः सिकत्यायेत्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिदेवादय ऋषयः ।
जगती छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ४३ ॥
)
भाष्यम् -(च) (सिकत्याय ) सिकतासु भवः सिकन्यः नः (च) (प्रवाह्याय)
प्रवाह स्रोतसि भवः प्रवाह्यः त० (नमः ) नमोऽस्तु (च) (कि शिलाय ) कुत्सिताः क्षुद्राः
शिलाः शर्करारूपाः पाषाणा यत्र प्रदेशे स किंशिलः तद्रूपाय ( च ) ( क्षयणाय ) क्षियन्त्य-
'स्मिन्नाप इति क्षयणस्त ० ( नमः ) नमोऽस्तु (च) ( कपर्दिने ) जटाजूटयुक्ताय ( च )
( पुलस्तये ) पुरोडने तिष्ठति पुल स्तिः । यद्रा-पूर्षु शरीरेषु अस्ति सत्ता यम्य स गुलम्तिः
सर्वान्तयामी त० ( नमः । नमोऽस्तु ( च ) इरिण्याय ) झरणे भवः इरिण्यः त० (च)
( प्रपथ्याय) प्रकृष्टः पन्थाः प्रपन्थो बहुसेवितो मार्गस्तत्र भवः प्रपथ्यः त० ( नमः)
नमोऽस्तु ॥ ४३ ॥
भाषार्थ--दीआदिकी रेतीम विद्यमान और नदीआदि के प्रवाहमें होनेवाले रु निमित्त
नमस्कार है, नदीआदिके भीतर वृक्षकंकरादिमें विद्यमान वा क्षुद्र पाषाणकी शर्करायुक्त
स्थान में स्थितके निमित्त और स्थिरजलमें विद्यमानके निमित्त नमस्कार है, जटाजूटयुक्त वा
घूमतेहुए जलमें विद्यमान और पुरजलमें विद्यमान अथवा शरीरोंमें अन्तर्यामीरूपसे विद्य-
मानके निमित्त और तृणरहित ऊपरभूमिमें विद्यमान और बहुसेवित मार्ग वा नालोंमें
विद्यमानके निमित्त नमस्कार है॥ ४३ ॥
ऽध्यायः ५]
भाष्यसहिता।
(७७)
)
मन्त्रः।
नमोबज्ज्यायचुगोष्ठयायचनमस्तल्प्प्यायचगे-
हायचनमौहृदय्यायचनिवेष्प्यायचनमल्का-
घ्यायचगहरेष्ठायचनमाशुष्क्याय ॥४४॥
ॐ नमो व्रज्यायेत्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिक्रषिः । आर्षी त्रिष्टुप्
छन्दः । रुद्रो दे० । वि० पू० ॥४४॥
भाष्यम-(च) (ज्याय ) बजे गोसमूहे भवः व्रज्यः त० (च) ( गोष्ठयाय)
गावस्तिष्ठन्ति यत्रेति गोष्ठः तत्रभवो गोष्ठयस्तस्मै ० ( नमः ) नमोस्तु ( च ) (तल्प्याय)
तल्पं शय्या तत्र भवस्तल्या त० (च) ( गेह्याय) गेहे भवो गेह्यः त० (नमः) नमोऽस्तु
(च) हृदय्याय ) हृदये भवो हृदथ्यो जीवस्त० (च) (निवेष्प्याय) निवेष्प्य आवतों
नीहारजलं वा तत्र भवो निवेष्प्यः त० ( नमः) नमोऽस्तु ( च ) ( काटयाय ) काटे भवः
काटयः काटः कूपः कुत्सितमटन्ति गच्छन्ति जना यत्र स काटो दुर्गारण्यदेशस्तत्र भवः त.
( च ) (गहरेष्ठाय ) गह्वरे विषमे गिरिगुहादौ गम्भीरे जले वा तिष्ठतीति गहरेष्ठः त०.
( नमः ) नमोऽस्तु ॥ ४४ ॥
भाषार्थ-गोचारणस्थानमें विद्यमान औरगोठमें विद्यमानके निमित्त नमस्कार है।शय्यामें:
विद्यमानके निमित्त और घरमें विराजमानके निमित्त नमस्कार है, हृदयम जीवरूपसे स्थितके
निमित्त और हिमसमूहमे विराजमानके निमित्त नमस्कार है, दुर्गम मार्गमें विराजमानके:
निमित्त और गिरिगुहा वा गंभीरजलमें विराजमानके निमित्त नमस्कार है ।। ४४ ॥
मन्त्रः।
नमशुष्क्यायचहरित्यायचनम पासुन
व्यायचरजस्यायचनमोलोप्प्यायचोल्ल
प्प्यायचनमऽऊयायचसूर्यांयचनम-प-
पर्णाय ॥ ४५ ॥
ॐ नमः शुष्क्यायेत्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिवां देवा ।
निच्यदार्षी त्रिष्टुप् छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥१५॥
(७८) रुद्राष्टाध्यायो- [पश्चनो- भाष्यम-(च, शुक्याय शुष्क मष्ठादी भवः शुष्क्यस्त (च) ( हारत्याय ) आर्द्र काष्ठादी भवः हरित्यः त ! नमः) नमोऽस्तु : च पांसव्याय) पांसुषु धूलिषु भवः पांसव्यः त० (च) ( रजम्याय) रजनि गुणे परगे वा भवः रजम्यः त० ( नमः ) नमोऽस्तु ( च ) (लोयाय ) लोपे भवः लोभ्यः न ( च ( उलप्याय) उलपा वल्पना- दितृणविशेषास्तत्र भवः उलप्यः तनमः ) नमोऽस्नु च ) ( अन्याय ) ऊल्या भूमौ भवः ऊर्व्यः तु० (च) ( सूर्याय ) शोभनः ऊर्यः कसानलः तत्र भवः तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु ॥ ४५॥ भाषार्थ-मूखे काष्ठादि में विराजमान के निमित्त और हरे पत्ते आदिमें विराजमान के निमित्त नमस्कार है, धूरिमें विराजमानके निमित्त और रजोगुण वा पुष्पधूरीम विराज- मानके निमित्त नमस्कार है, अगम्यदेश में विराजनके निमित्त और वल्लजादि तृणमें विराजमानके निमित्त नमस्कार है, भूमि वा वडवानलम विराजमानके निमित और महा. प्रलयकी अग्निमें विराजमानके निमित्त नमस्कार है ।। ४५ ।। मन्त्रः नमन्पुर्णायचपर्णशुदाय॑चनमऽउद्गुरमाणाय चाभिघ्नतेचनमऽआखिदतेच प्रखिदतेचनमऽइ घुकृद्भ्योधनुष्कृयश्चवोनमोनमोव किरिके भ्यौदेवाना:हृदयेभ्योनौविचिन्वत्केब्भ्योन मौविक्षिणत्केब्भ्योनमऽआनिर्हतेब्भ्यः ॥ ४६ ॥ ॐ नमः पयेत्यस्य परमेष्ठी ऋ० स्वराट् प्रकृतिश्छन्दः रुदो देवता । वि० पू० ॥ ४६॥ भाष्यम्-( च ) ( पाय ) पत्ररूपाय च ) (पर्णशदाय ) पतितपणावस्थानक! ( नमः ) नमोऽस्तु ( च ) ( उद्गुरमागाय ) उद्यमशीलाय ( च ) ( अभिन्नते ) अभिहन्ति शनित्यभिन्नन् त० ( नमः ) नमोस्तु (च) ( आखिदते ) आसमंतात् खिद्यते दैन्यं करो. त्यभक्तानामित्याखिइन् त० ( च ) (प्रग्विदते प्रकर्षेण खेदयति पापिनामिति प्रखिदन् त. ( नमः ) नमोस्तु ( च ) ( इषुद्यः ) ये इषवो बाणान् कुर्वन्ति तेभ्यः (च) (धनुष्कृद्भयः) ये यूयं धनुष्कृतस्तेभ्यः ( वः ) ( नमः ) नमोऽस्तु वो युष्मदादेशात्प्रत्यक्षा एते रुद्रा तिम्रोऽ शीतयो रुद्राः समाप्ताः । एवं चत्वारिंशदधिकशतद्वयमन्त्रैरुद्रस्य सर्वात्मत्वमुक्तम् । इदानीं राणां हृदयभूतानाममिवायुसूर्याणां सम्बन्धीनि यजूसि उच्यन्ते (वः ) युप्मभ्यम् ( नमः ) नमोऽस्तु केभ्यः (किरिकेभ्यः ) कुर्वन्तीदं जगवृष्टयादिद्वारेणेति किरिकाःवाय्वमि- ऽध्यायः५.] भाष्यसहिता। ७९) सूर्याः किंभूतेभ्यः ( देवानां हृदयेभ्यः ) देवानामग्निवायुसूर्याणां हृदयभूता इत्यर्थः । ( नपः ) नमोऽस्तु ( विचिन्वत्केभ्यः ) विचिन्वन्ति पृथक्कुर्वन्ति धर्मकारिणं पापकारिणं चेति विचि- न्वत्काः तेभ्यः ( नमः ) नमोऽस्तु ( विक्षिणकेभ्यः ) विविधं क्षिण्वन्ति हिंसन्ति पापमिति विक्षिणकाम्तेभ्योऽयादिभ्यो नमः ( आनिर्हतभ्यः । आ ममन्तान्निर्गताः सर्गादौ लोकेभ्यः इत्यानिहतास्तेभ्यो नमः । हन्तिर्गत्यर्थः । तेभ्यस्तप्तभ्यस्त्रीणि ज्योतीयजायन्तानियों यवते सूर्यः") इति श्रुतेः ।। ४६ ॥ भाषार्थ-पर्णमें विद्यमान के निमित्त और पर्णपतित पस्थित देशरूप वा पर्णमें उत्पन्न कीटादिमें भी विद्यमानके निमित्त नमस्कार है, निरन्तर उद्यमी उत्पन्न करनेवाले के निमित्त और शत्रुओके संहारके निमित्त नमस्कार है, अभक्तों को मना दुःखदाता त्रिविधतापके प्रेर- कके निमित्त और त्रिविध तापके उत्पन्नकर्ता वा पापियोंको अतिदुःखदायीके निमित्त नम- -स्कार है, बाणको उत्पन्न करनेवालेके निमित्त और धनुषके करनेवाले रुद्ररूप आपके निमिन नमस्कार है ( युष्मदादेशसे यह प्रत्यक्ष रुप्त हैं, यहाँ २४० पूर्ण हुए ) ( यहांतक भद्रकी प्रधानता कहकर अब प्रधानभूत अग्नि वायु सूर्य्यादि रूपसे वर्णन करते हैं ) प्रथम यजु १४ ना और तीन सात अक्षरके व्याहृतिसंज्ञक हैं, जो देवताओंके हृदयम्वरूप प्रधान अग्नि सूर्यके हृदयरूप वृष्टयादि द्वारा जगत्को सृजन करते हैं, ऐसे आपके निमित्त नमस्कार है, जो देवता देवताओंके हृदयम्वरूप हैं, जो वृष्टि आदिसे जगन्का पालन करते. जो धर्मा मा और पापात्माओंके पृथक करते हैं उन अग्नि, वायु और मूर्यके हृदयरूपके निमित्त नमस्कार है, विविधपापोंको दृरकरनेवाले अग्नि आदि निमित्त नमस्कार है, अर्थात् जो देवताओंका हृदयम्वरूप विक्षिणक वृष्टि आदिसे जगत्का संहार करतेहैं अग्नि वायु सूर्यके हृदयस्वरूप हैं उनके निमित्त बारबार नमस्कार है सृष्टि की आदिमें होनेवाले रुद्रावतारोंके निमित्त नम- स्कार है अर्थात् जो देवताओंका हृदयस्वरूप आनिहत "काल प्राप्त होनेसे स्वयं भी गान होजाता है" वा जो सृष्टिकी आदिमें होते हैं इससे आनित कहते हैं जो अग्नि, वायु और मूर्यका भी हृदयस्वरूप है, उसको बार बार नमस्कार है ।। ४६ ।। मन्त्रः । द्वापेऽअन्धसम्प्पते दरिंद्रनीललोहित॥ आसा- प्रजानामेषाम्पशूनाम्माभेर्मारोङमोचन कि- ञ्चनाममत् ॥ ४७॥ ॐ द्राप इत्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिऋषिः । भुरिगार्षी बृहती न्दः । रुदो देवता । वि ० पू० ॥ १७ ॥ भाष्यम्-(द्रापे) द्रा कुत्सायां गतौ च द्रापयाति द्रापि पापकारिणां कुत्सितां गति नयतीत्यर्थः ( अन्धसस्पते ) सोमस्य पालक (दरिद्र) हे निष्परिग्रह (नीललोहित ) कण्ठे नीलोऽन्यत्र लोहितः शिव ( नः ) अस्माकम् ( आसाम् प्रजानाम् ) पुत्रादीनाम् (एषाम् )
(८०)
रुद्राष्टाध्यायी-
पञ्चमी-
देव
(पशूनाम् ) अस्मदीयानां गवादीनान् । नाभः) मा भैषीः भयं मा कुरु (ना रोक् । भङ्गं
मा कापीः (च) (किञ्चन ) अपत्यादि (मा) (आममत् ) मा भीः मा रुग्णं कुरु ॥४॥
भाषार्थ-हे पापियोंकी दुर्गति करनेवाले . हे सोमके पालक ! अद्वितीय होनेसे सहाय-
शुन्य निप्परिग्रह हे नील और लोहित एक अंश नील दूसरा लाल शुक्ल कृष्ण उभयात्मक
वा कंठमें नील अन्यत्र लोहित शिव ! हमारे इन पुत्र पौत्रादि और इन पशुओंको मत भय
करो तथा प्रजा पशुओं का भंग मत करो और किसी प्रकार भी हम तथा हमारी प्रजा पशुको
मत रुग्ण करो सब प्रकार प्रजापशुमें मंगल करो ॥ ४७ ।।
मन्त्रः।
हुमारुद्रायतवसैकपर्दिनैक्षयवीरायप्रभरामहेम-
ती॥यथाशमसहिपदेचतुष्पदेविश्व॑म्पुष्टङ्ग्रामेऽ
अस्मिन्ननातुरम् ॥ ४८॥
ॐ इमारुद्रायत्यस्य कुत्स ऋषिः । आर्षी जगती छं० । रुद्रो
० । वि० पू० ॥ ४८॥
माष्यम्-( यथा ) येन प्रकारेण (द्विपदे ) पुत्रादये (चतुष्पदे ) गवादिपशवे । शम् )
मुखम् भवतु तथा ( अस्मिन् ) (ग्रामे ) वासस्थाने (विश्वम् ) सर्व प्राणिजातम् ( पुष्टम् )
समृद्धम् ( अनातरम् ) निरुपद्रवम् ( असत् ) भवत् तेन प्रकारेण वयम् ( इमाः) अस्मदीया-
(मतीः ) बुद्धीः (तवसे ) महत (कपर्दिने ) जटिलाय (क्षयद्वीराय ) क्षयन्तो निवसन्तो
वीराः शूरा यत्र स क्षयद्वीरस्तस्मै क्षयन्तो नश्यन्तो वीरा रिपवो यस्मादिति वा (रुद्राय ) रुद्रदे--
वाय (प्रभरामहं ) समर्पयामः ॥ ४८॥
भाषार्थ-जिस प्रकार पुत्रादिमें गवादि पशुओंमें सुखकी प्राप्ति हो तथा इस ग्राम,
संपूर्ण प्राणिसमूह पुष्ट उपद्रवरहित हों उसी प्रकार हम इन अपनी बुद्धियोंका महाबली
जटिलशूरवीरोंके निवासभूत रुद्रदेवताके निमित्त समर्पण करते हैं ॥४८॥
मन्त्रः।
यातेरुद्रशिवातनू शिवाविश्वाहाभेषजी॥ शिवा
स्तस्यभेषजीतयांनोमृडजीवसे ॥ ४९ ॥
ॐ याते रुद्र इत्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिर्वा देवा ऋषयः । आ
य॑नुष्टुप् छं० । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ १९ ॥
ऽध्यायः ५]] भाप्यसहिता। (८१) भाष्यम्-( रुद्र) हे शंकर ( या ) (ते) तव (शिवा) शान्ता (विश्वाहा) सर्वदा (शिवा ) कल्याणकारिणी (भेषजी ) औषधरूपा संसारव्याधिनिवर्तका तथा (रुतस्य) व्याधेः (शिवा) समीचीना (भेषजी ) निवर्तकौषधिः (तनूः) शरीरमस्ति (तया) (तन्वा) शरी- रेण शक्त्या वा (नः ) अस्मान् (जीवसे ) जीवितुम् (मृड ) सुखय ।। ४९ ॥ भाषार्थ-हे शंकर! जो आपकी शान्त निरंतर कल्याणकारिणी औषधिरूप संसारको व्याधि निवृत्त करनेवाली तथा शरीरव्याधिको समीचीन औषधीरूप शरीर वा शक्ति है उस शक्तिसे हमारे जीवनको सुखी करो॥ ४९ ॥ भावार्थ-हे रुद्र ! तुम्हारी कल्याणरूपिणी जो तनू सबके कल्याणसाधनी जो सब रोगोंकी महौषधि है उस तनुक द्वारा हमको सुखी करो॥ ४९ ॥ मन्त्रः। परिनोरुद्रस्य॑हेतिवणक्तुपरिवेषस्यदुर्मतिरघा- योः ॥ अवस्थिरामघवन्यस्तनुष्वमीदवस्तोका यतनयायमृड ॥५०॥ ॐ परिन इत्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिर्दैवा ऋ०। आर्षी त्रिष्टुप् छं० । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥५०॥ भाष्यम्--(रुद्रस्य ) शिवस्य ( हेतिः ) आयुधम् (नः) अस्मान् (परिवृणक्तु) परिवर्तयतु ( त्वेषस्य ) क्रुद्धस्य ( अघायोः) पापशीलस्य ( दुर्मतिः ) दुष्टा मतिोहश्चास्मान (परि ) परिवृणक्त ( मीदवः ) सेक्तः ( मघवद्भयः) मघं हविलक्षणं धनं विद्यते येषां ते यजमानास्तदर्थः यजमानानां भयनिवृत्तये (स्थिरा ) स्थिराणि दृढानि धनूंषि (अवतनुष्व) अवतारय ज्यारहितानि कुरु किञ्च ( तोकाय ) पुत्राय (तनयाव) पौत्राय (मृड) सुखय ॥५०॥ भाषार्थ-रुद्रके संपूर्ण आयुध हमको परित्याग करें। पापियोंपर क्रोधित अर्थात् कोपन स्वभाव दण्डदने की इच्छावाली दुर्मति हमको सबप्रकार त्यागकरें । हे अभिलषितफल प्रद! हविरूप धनसे युक्त यजमानोंके भय दूरकरनेको दृढधनुषोंको ज्याहीन करो, हमारे पुत्र पौत्रादिको सुख दो ॥ ५० ॥ मीढुष्टमशिव॑तमशिवोनन्सुमनाभव ॥ परमेड़- क्षऽआयुधन्निधायुकृतिवसानऽआचरपिनांकुम्बि भ्रदागहि ॥५१॥ ६
(८२)
रुद्राष्टाध्यायी-
[पञ्चमो-
ॐ मीढुष्टम इत्यस्य परमेष्ठो प्रजापतिर्देवा ऋ० । निच्य॒दार्षी
यवमध्या त्रिष्टुम् । रुद्रो दे । वि० पू० ॥ ५१ ॥
भाष्यम्- ( मीढुष्टम ) सेक्तृतम (शिवतम् ) हे अत्यन्त कल्याणकर्तः (नः) अस्मा-
कम् (शिव:) शान्तः (मुमनाः) हृष्टचित्तः (भव) भवतु (परमे) दूरस्थे उन्नते वा
( वृक्षे) वटादौ (आयुधम् ) त्रिशूलादिकं (निधाय ) संस्थाप्य (कृतिवसानः) चर्म परि-
दधानः सन् (आचर) आगच्छ तपश्चरेति वा । पिनाकम् ) धनुः (विभ्रत्) (आगहि
आगच्छ ज्याशरहीनं धनुर्मानं शोभायें धारयत्नागच्छेत्यर्थः ।। ५१ ॥
भाषार्थ-हे अतिशय फलप्रदाता ! हे अत्यन्त कल्याणकर्ता ! हमको शान्त सुन्दरमनवाले
हो दूरस्थित वा ऊचे वृक्षपर अपना त्रिशूल रखकर मृगचर्म धारणकिय आगमन कीजिये वा
नप कौजिये, पिनाक धनुषको धारण किये आगमन करो अर्थात् ज्या और बाणोंसे हीन
धनुष शोभाके निमित धारणकिये आइये ॥५१॥
भावार्थ-भाव यह कि, संसाररूपी वृक्षपर पापोंके संहारकी शक्तिको फैलाकर कार्य-
कारिणी शक्तिसे वशकर हमारी रक्षा करो, इस मंत्रका तात्पर्य बढा गूढहै, इसमें संसारियोंके
निमित्त शस्त्रहै,मुमुक्षओंके निमित्त अभयहे इत्यादि तपस्वी महात्माओंके जानने योग्यहै।।५१॥
मन्त्रः ।
विकिरिद्रविलोहितनमस्तेऽअस्तुभगवः ॥ यास्त
सहस्रम्हेतयोन्यमम्मन्निवपन्तताः ॥५२॥
ॐ विकिरिद्रेत्यस्य परमेष्ठी प्र० ऋ० । आय॑नुष्टुप् । रुद्रो
दे । वि० पू० ॥ १२॥
भाष्यम्-(विकिरिद्र) विविध घातामुपद्रवं द्रावयत्तीति विकिरिद्रः तत्सम्बुद्धौ हे विक-
रिद्र (विलोहित ) विगतकलुषभाव (भगवः) हे भगवन् (ते) (नमः) नमः (अस्तु ) अस्तु
(सा)(ते)( सहस्ररी हेतयः) असंख्यान्यायुधानि सन्ति (ताः) तानि (अस्मत् )( अन्यम् )
असव्यतिरिक्तम् (निवपन्तु) प्रन्तु ॥ ५२ ।।
भाषार्थ-हे अनेकउपद्रवनाशकरनेवाले ! हे शुद्धस्वरूपभगवन् । आपके निमित्त नम
स्कार हो तुम्हारे जो सहस्रों शस्त्र है वे हमको छोड़कर और कहीं उद्रषियोपर पड़ें
(विलोहितका अर्थ अत्यन्त रक्तवर्ण संहारमूर्ति भी है ) ॥ ५२ ॥
मन्त्रः।
॥
सुहस्राणिसहस्रशोबाह्वोस्तर्वहेतयं ॥ तासामी-
शानोभगवत्पराचीनामुखाकृधि ॥ ५३ ॥
ऽध्यायः ५]
भाष्यसहिता।
(८३)
ॐ सहस्राणीत्यस्य परमेष्ठी प्रजा० ऋ० । निच्यदाय॑नुष्टुप
छन्दः । रुद्रो दे० । वि० पू० ॥५३॥
भाष्यम्--(भगवः ) हे षड्गुणैश्वर्यसम्पन्न (तव ) ( बाह्वोः ) हस्तयोः (सहस्राणि )
असंख्यातानि (सहस्रशः) सहस्रशः (हेतयः) आयुधानि सन्ति (ईशानः) जगन्नाथस्त्वम्
( तासाम् ) हेतीनाम् (मुखाः) मुखानि (पराचीनाः) अस्मत्तः पराङ्मुखानि (कृषि) कुरु ॥५३॥
भाषार्थ-हे भगवन् ! षडैश्वर्यसंपन्न ! आपकी भुजाओंमें बहुत प्रकारके सहस्रों खङ्ग
शूलादि आयुध हैं, जगत्के पति आप उन संहारकारी आयुधोके मुख हमसे पराङ्मुख
कीजिये ॥५३॥
भावार्थ-दृश्यादृश्य जितने बाहुयुगलह वह सबही उनके हैं वा सबहीमें उनकी सत्ता
है आशय यह कि पापोंके द्वारा प्राणी दुःख पातेहैं आप उन पापोंको नीचे मुख कीजिये
और हमको सुखी कीजिये ।। ५३ ।।
असङ्ख्यातासहस्राणियेरुद्दाऽअधिभूम्याम् ॥
तेषासहस्रयोजनेवधन्यानितमसि ॥ ५४॥
ॐ असंख्याता इत्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिऋषिः। विराडार्ण्य-
नुष्टुप् । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ५४॥
भाष्यम्-( असंख्यातासहस्राणि ) असंख्यातानि सहस्राणि अमितानि (ये ) रुद्राः
( भूभ्याम् ) भूमेः ( अघि ) उपरि स्थिताः (तेषाम् ) रुद्राणाम् (धन्वानि) धनूंधि
( सहस्रयोजने ) सहस्राणि योजनानि यसिंस्तादृशे पथि सहस्रयोजनव्यवहिते मार्गे (अव-
तन्मः अवतारयामः ॥ ५४ ॥
भाषार्थ-जो असंख्य सहस्रों रुद्र भूमिके ऊपर स्थित हैं, उनके धनुष सहस्र योजन
दूर यह मंत्र पढकर प्रार्थनाके बलसे डालकर अभय होते हैं, इस मंत्रसे रुद्रका असंख्यत्व वा
असंख्य वस्तुमें एक रुद्रका व्यापकत्व सिद्ध हुआ ॥ ५४ ॥
मन्त्रः ।
अस्म्मिन्महत्यर्णवेन्तरिक्षेभवाऽअधितेषा
सह० ॥ ५५॥
अस्मिनित्यस्य परमेष्ठी प्रजापति । भुरिगाष्र्युष्णि।
रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ५५॥
(८४) रुद्राष्टाध्यायी- [पञ्चमो-- भाष्यम्-( अन्तरिक्षस्था रुद्रा उच्यन्ते ( अस्मिन् । अस्मिन् ( महति ) विशाले ( अणवे ) अांसि जलानि विद्यन्ते यत्र तदर्णवम् । मेघाधारत्वात् ( अन्तरिक्षे) अन्तरिक्ष (अधि) अधिश्रित्य ये (भवाः) रुद्राः सन्ति तेषां धन्वान्यवतन्मसीति पूर्ववत् ॥ ५५ भाषार्थ-अंतरिक्षके रुद्रों का वर्णन करते हैं इस अंतरिक्षम और बड़े सागर अर्थात् आकाश गंगा नामसे प्रसिद्ध नक्षत्रपुंज धाराप्रवाहमें आश्रय करके जो रुद्र स्थित हैं उनके संपूर्ण धनुष मंबवलसे सहस्रयोजन दूर ज्यारहित कर डालते हैं ।। ५५ ।। गूढाशय-इस बडे संसाररूपी ससुद्रमें उत्पन्न हुए जीवों के हृदय अन्तरमें जो ज्ञानयुक्त परमेश स्थित है उस असंख्यात फलदाताका विचार करो ।। ५५ ।। मन्त्रः । नीलग्रीवा शितिकण्ठादिवरुद्दाऽउपश्थिताल। तेषां ॥५६॥ ॐ नीलग्रीवा इत्यस्य परमेष्ठी प्रजापति । निच्यदाय॑नुष्टुपू०॥ रुद्रो दे। वि० पू० ॥५६॥ भाष्यम्-धुलोकस्थिता रुद्रा उच्यन्ते(नीलग्रीवाः)कृष्णकण्ठाः(शितिकण्ठाः) श्वेतकण्ठाश्चः (रुद्राः ) ये रुद्राः (दिवम्) धुलोकम् (उपश्रिताः) उपरिस्थिताः तेषामित्यादि पूर्ववत् ॥५६॥ भाषार्थ-गुलोक स्थित रुद्रोंका वर्णन । नीलग्रीवावाले श्वेतकंठवाले विषभक्षणसे कितनाएक कण्ठ श्वेत और कितनाएक नील अथवा निर्मल आकाश और मेवसहित आक शमें चन्द्रतारादिमें वर्तमान जो रुद्र धुलोकमें आश्रय किये हुए हैं उनके सब धनुष सहन- योजन दूर मंत्रबलसे निक्षेप करते हैं ।। ५६ ॥ नीलग्ग्रीवा शितिकण्ठात्शुर्वाऽअधक्षमात्रा तेषां ॥ ५७॥ ॐ नीलग्रीवा इत्यस्य परमेष्ठी प्रजापति । निच्यदाय॒- नुष्टुप् । रुद्रो दे । वि० पू० ॥ ५७ ॥ भाष्यम्-पातालस्था रुद्रा उच्यन्ते ( नीलग्रीवाः ) कृष्णग्रीवाः (शितिकण्ठाः ), श्वत- ग्रीवाः ये (शर्वाः ) रुद्राः ( अधः) अधोभागे ( क्षमाचराः) पाताले वर्तमानाः ( तेषाम् ) तेषामित्यादि पूर्ववत् ॥ ५७ ॥ भाषार्थ-पाताल स्थित रुद्रोंका वर्णन । नील गर्दनवाले, खेतकंठवाले जो शर्वनामक रुद्र नीचे पाताल में स्थित हैं, उनके सब धनुष सहस्रयोजन दूर मंत्रबलसे निक्षेप करते हैं ।।५।।
ऽध्यायः ५] भाष्यसहिता। (८५) मन्त्रः। येवृक्षेषुशष्पिञ्जरानीलग्रीवाविलोहिताः॥ तेषा०॥५८॥ ॐ ये वृक्षेष्वित्यस्य परमेष्टी प्रजापतिऋषिः। निच्यदाय॑नुष्टुप छन्दः । रुद्रो देवता वि० पू० ॥ ५८ ॥ भाष्यम्-- (ये) शपिञ्जराः ) शष्या इव पिञ्जरवर्णाः हरितवर्णाः ( नीलग्रीवाः ) नीलकण्ठाः (विलोहिताः) विशेषेण रक्तवर्णाः विगतकलुषभावा वा (वृशेषु अश्वत्थादिषु स्थिता: तेषामित्यादि पूर्ववत् लोहितशब्देन धातव उच्यते तेन त्वग्लोहितमञ्जादियुक्ता इत्यर्थः॥५८!! भाषार्थ--जो हरितवर्ण नीलग्रीवावाले विशेष रक्तवर्ण अथवा लेजोमय शरीरवाले वृक्षोंमें अर्थात् पत्त शाखा कोंपल आदिमें वर्तमान हैं, उनके संपूर्ण धनुष सहस्रयोजन दूर मंत्र बलसे निक्षेप करते हैं ।। ५८ ॥ मन्त्रः। येभृतानामधिपतयोविशिखास कपर्दिन आतेषां ॥५९॥ ॐ ये भूतानामित्यस्य परमेष्ठी प्रजापति । आय॑नुष्टुप् । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ५९॥ भाष्यम्--(ये) रुद्राः ( भूतानाम् ) देवविशेषाणाम् ( अधिपतयः) अन्तर्हितशरीराः सन्तो मनुष्योपद्रवकराभूतास्तेषां पालकाः ( विशिखासः ) शिखारहिता मुण्डा इत्यर्थः (कपर्दिनः ) अन्ये जटाजूटयुताः तेषामित्यादिपूर्ववत् ।। ५९ ॥ भाषार्थ-जो रुद्र देव विशेषों के अधिपति हैं अर्थात् अन्तर्हित शरीर होकर मनुष्योंमें उपद्रव करनेवाले भूतोंके पालक हैं, तथा शिखाहीन मुण्डित शिर जो जटाजूटसे युक्त हैं, उनके संपूर्ण धनुष सहस्रयोजन दूर प्रक्षेप करते हैं ॥ ५९॥ मन्त्रः। येपुथाम्दैथिरक्षय ऐलसदाऽआयुयुधः ॥ तेषा० ॥६०॥ ॐ ये पथामित्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिऋषिः । आय॑नुष्टुपू छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥६० ॥ भाष्यम्--(ये) ये रुद्राः ( पथाम् ) लौकिकवैदिकमार्गाणाम् ( पथिरक्षयः) अधिपतयः तथा पथिरक्षसः (ऐलभृतः ) इलानामन्नानां समूहः ऐलं ये विनति ते । यद्वा इला पृथिवी
(८६)
रुद्राष्टाध्यायी-
[पञ्चमो-
तस्या इदमैलमन्नं तद्विभ्रति ते एलभृतः अन्नैर्जन्तूनां पोषका इत्यर्थः । (आयुयुधः ) याक-
जीवयुद्धकाः । आयुरेव जीवनं पाणौ कृत्य युध्यन्ति तेषामित्यादि पूर्ववत् ॥ ६० ॥
भाषाय-जो लौकिक वैदिक मार्गोंके अधिपति, मागोंक पालक, राज्य शासनकारी वा
अन्नके धारक अथवा अन्नसे प्राणियोंको पुष्ट करनेवाले जीवनपर्यन्त युद्ध करनेमें रत हैं उनके
सब धनुष सहस्रयोजन दूर निक्षेप करते हैं ।। ६० ।।
मन्त्रः।
येतीनिष्पचरन्तिसृकाहस्तानिषङ्गिणः॥तेषा०॥६१॥
ॐ ये तीर्थानीत्यस्य परमेष्टी प्रजापतिर्ऋषिः। निच्यदाय॑नु-
ष्टुप्० । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ६ ॥
भाष्यम्-( ये ) रुद्राः (सृकाहस्ताः ) सुकेत्यायुधनाम सृका आयुधानि हस्ते येषां ते
(निषङ्गिणः ) निषङ्गा खड्गा हस्ते येषां ते (तीर्थानि) प्रयागकाश्यादीनि (प्रचरन्ति)
गच्छन्ति तेषामित्यादि पूर्ववत् ।। ६१ ॥
भाषार्थ-जो रुद्र आयुध विशेष (ढाल) हाथमें लिये बथा खड्न धारण किये, काशी-
प्रयागादि तीर्थोंमें फिरते हैं वा जो तीर्थोंका तथा धर्मका प्रचार करते हैं, उनके संपूर्ण धनुष
सहस्र योजन दूर निक्षेप करते हैं ॥ ६१ ॥
मन्त्रः।
येन्नैषुविविद्धयन्तिपात्रेषुपिबतोजनान् ॥ तेषा० ॥६॥
ॐ येनेष्वित्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिर्देवा ऋ० । विराडायनु-
ष्टुप् छ०। रुदो देवता । वि० पू०॥ ६२॥
भाष्यम्-( ये ) रुद्राः ( अन्नेषु) भुज्यमानेषु (जनान् ) प्राणिजातान् (विविद्धयन्ति )
विशेषेण ताडयन्ति धातुवैषम्यं कृत्वा रोगानुत्पादयन्तीत्यर्थः । तथा(पात्रेषु)पात्रस्थक्षीरोदकादिषु
स्थिताः सन्तः (पिवतः) क्षीरादिपानं कुर्वतो जनान् विविद्धयन्ति तेषामित्यदि पूर्ववत् ॥६२॥
भाषार्थ-जो रुद्र अन्नभोजन करने में प्राणियों को विशेष करके ताडन करते हैं अर्थात्
धातुकी विषमता कर रोगोंको उत्पन्न करते हैं, पात्रोंमें जल दूध आदि पीते हुए जनोंके कुत्सित
जल आदिसे रोगप्रसिद्ध करते हैं,उनके संपूर्ण धनुषोंकोसहस्रयोजन दूर निक्षेप करते हैं।।६२॥
मन्त्रः।
यऽएतावन्तश्चभुयाईसश्चदिशौसठ्ठावितस्त्थिरोगतेषा.
॥६३॥
ऽध्यायः ५]
भाष्यसहिता।
(८७)
ॐ य इत्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिर्दैवा ऋषयः । निच्य॒दार्ण्यनु-
ष्टुप् छ० । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ६३ ॥
भाष्यम्-(च) (ये) (रुद्राः) रुद्राः ( एतावन्तः) एतत्प्रमाणं येषां ते (च)
( भूयांसः ) अतिशयेन बहवो भूयांसः (दिशः ) दश दिशः (वितस्थिरे ) आश्रिताः दश
दिशो व्याप्य स्थितास्तेषामित्यादि पूर्ववत् ॥ ६३ ॥
भाषार्थ-और जो रुद्र इन दशोदिशाओम अथवा इतने और इन कहे हुओसे भी अधिक
सम्पूर्ण दिशाओम आश्रित हैं अर्थात जिनके दर्शन हमको नहीं होते और जिनका दर्शन इन
मंत्रोंमें नहीं हुआ उनके संपूर्ण धनुष सहस्रयोजनको दूरीपर मंत्रबलसे निक्षेप करते हैं ॥६३॥
मन्त्रः।
नमोस्तुरुद्देब्भ्योयेदिवियेषाँवर्षमिषवः ॥ तेब्भ्यो
दशप्पाचीईशदक्षिणादशप्रतीचीईशोदींचीद्द-
शो ः ॥ तेब्भ्योनमोऽअस्तु तेनोवन्तुतेनाम
डयन्तुतेयन्गुिष्म्मोयश्चनोद्वेष्टितमेषाञ्जम्भैद-
ध्मः॥६४॥
ॐ नमोस्त्वित्यस्य परमेष्टी प्रजापतिर्ऋषिः । निच्यवृति-
श्छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ६४ ॥
भाष्यम्-त्रिलोकःस्था रुद्रा उच्यन्ते-(ये ) (रुद्राः ( दिवि ) धुलोके वर्तन्ते ( येषाम् )
रुद्राणाम् (वर्षम् ) वृष्टिरेव (इषवः ) शराः आयुधस्थानीया वृष्टिः ( तेभ्यः) ( रुद्रेभ्यः)
( नमोऽस्तु ) नमस्कारोऽस्तु ( तेभ्यः ) रुद्रेभ्यः (दश प्राची: ) दशसंख्याकाः प्राचीः प्राग-
भिमुखाः अङ्गुलीः कुर्व इति शेषः । (दश दक्षिणाः ) दक्षिणाभिमुखाः दशा मुलीः कुर्वे (दश
प्रतीचीः ) प्रत्यङ्मुखाः दशाड्डलीः कुर्वे (दशोदीचीः) उदीचीः उदङमुखाः दशाङ्गुलीः
(दशोर्ध्वाः ) उपरि दशाङ्गुलीः कुर्वे, अनलिं बवा सर्वदिक्षु नमस्करोमीत्यर्थः । ( नमः)
नमोऽस्तु (ते ) रुद्राः (नः ) अस्मान् ( अवन्तु ) रक्षन्तु (ते) (नः) अस्मान् (मृडयन्त)
मुखयन्तु ( ते ) रुद्राः ( यम् ) पुरुषम् (द्विष्मः ) द्वेषं कुर्मः (च) (यः) पुरुषः (नः)
अस्मान् (द्वेष्टि ) द्वेषं करोति (तम् ) पुरुषम् (एषाम् ) पूर्वोक्तानां रुद्राणाम् (जम्भे)
दंष्ट्राकराले मुखे ( दध्मः ) स्थापयामः । अस्मद्विषमस्मद्देष्यं च नरं पूर्वोक्ता रुद्रा भक्षयन्तु
भस्माश्चावन्तु चेत्यर्थः ॥ ६ ॥
[पञ्चमो-- (८८) रुद्राष्टाध्यायी- भाषार्थ-जो रुद्र दुलोकमें विद्यमान है,जिन मद्रोंके वृष्टि ही वाण हैं उन रुद्रों के निमित्त नमस्कार है, उन रुद्रों के निमित्त पूर्वदिशामें दश अंगुली हो करके अर्थात् हाथ जोडकर, दक्षिणाम दश अंगुली होकर, पश्चिममें दशअंगुली होकर. उत्तरमें दशअंगुली होकर, ऊर्वमें दशअंगुली अर्थात् कर जोड़कर प्रार्थना करता हूं, उनके निमिन नमस्कार हो, वै रुद्र हमारी रक्षा करें, वे हमको सुखी करें, वे रुद्र जिससे हम द्वेष करते हैं और जो हमसे द्वेष करता है उनको इन रुद्रों के गढ़में स्थापन करते हैं । ६४ ।। भावार्थ--जो देवता द्युलोकम, जिनके वाण वृष्टिहैं अर्थात् वृष्टि द्वारा सृजन पालन और अतिवृष्टि से संहार किया करते हैं, सब दिशाओंमें उनको हाथ जोड़कर प्रणाम करतेहैं ॥६४|| मन्त्रः। नौस्तुरुदेब्भ्योयेन्तरिक्षयेषाँबात इषवः ॥ तेभ्योदशप्राचीर्दशदक्षिणादर्शप्प्रतीची- ईशोदींचीर्दशो ः ॥ तेब्भ्योनोऽअस्तु- तेनौवन्तुतेनौमृडयन्तुतेयन्विष्मम्मोयश्च- नोद्वेष्टितमैषाञ्जम्भैदध्म ॥ ६५ ॥ ॐ नमोस्त्वित्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिऋषिः । धृतिश्छन्दः । रुद्धो देवता । वि० पू० ॥६५ ॥ भाष्यम्-( रुद्रेभ्यः ) रुद्रेभ्यः ( नमोस्तु ) नमस्कारोऽस्तु (ये ) (अन्तरिक्षे) अन्त- रिक्ष वर्तन्ते (येषाम् ) रुद्राणाम् ( वातः) वायुः (इषक:) आयुधस्थानीयः कुवातेनानं विनाश्य वातरोगं वोत्पाद्य जनान् नन्ति तेभ्योऽन्तरिक्षस्थेभ्यो रुद्रेभ्यो नमः। शेषं पूर्ववत्।।६५|| भाषार्थ-उन रुद्रोंके निमित्त नमस्कार हो, जो रुद्र अन्तरिक्षम विद्यमान हैं जिनके बाण पवन हैं अर्थात् पवनद्वारा जो सृजन, पालन और आंधी आदिसे संहार करते हैं उनके निमित्त नमस्कार है, शेष पूर्ववत् ॥ ६५ ॥ मन्त्रः। नमोस्तुरुदेभ्योयेथिव्याय्येषामन्नमिर्षवः तेभ्योदशप्पाचीईशंदक्षिणादर्श प्रतीचीईशो दींचीर्दशो : ॥ तेब्भ्योनमोऽअस्तुतेनौवन्तुते
ध्यायः६]
भाष्यसाहिता।
(८९)
नौमृडयन्तुतेयन्दुिष्म्मोयश्चनोवेष्टितमैषाञ्जम्मै
दध्मः॥६६॥
इतिसरीहितायांरुद्दपाठेपञ्चमोऽध्यायः॥५॥
ॐ नमो स्त्वित्यस्य परमेष्टी प्रजापतिर्वा देवा ऋषयः । धृति-
श्छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ६६ ॥
भाष्यम्- ( रुद्रेभ्यः ) रुद्रेभ्यः ( नमः ) नमस्कारः (ये ) रुद्राः (पृथिव्याम् )
भूभ्याम् वर्तन्ते (येषाम्) (इषवः) वाणाः (अन्नम् ) अदनीयं वस्तु आयुधम् अयथान्न भक्षणे
चौर्ये वा प्रवर्त्य रोगमुत्पाद्य जनान् नन्ति तेभ्यो नमः तेऽस्मानवन्तु शेषम्पूर्ववत् ॥ ६६ ॥
भाषार्थ-उन रुद्रों के निमित्त नमस्कार है, जो रुद्र पृथिवीमें स्थित हैं, जिनकेत्राण अन्न
हैं, जो अन्नद्वारा ही सृजन, पालन और मिथ महारविहारसे रोग उत्पन्न कर प्राणियों का
संहार करतेहैं, उनके निमित्त नमस्कार है, शेष पूर्वके समान ॥६६॥
भावार्थ-जिस समय मनुष्यको रुद्रका सर्वभाव विदित होजाय और उसकीदृष्टि में यह
भाव समाजाय कि, यह सबकुछ रुद्रद्वारा होरहाहै वही शंकर रुद्र नीललोहित कपर्दी आदि
अनेकनामों को कार्यानुसार धारणकररहाहै उसझेसिवाय कुछ नहींहै तब वह अद्वैतनिष्ठ होता
है और रुद्रकी महिमाको प्राप्त हो जीवन्मुक्त होकर विचारता है । इस प्रकार इस षोडश
अध्यायमें रुद्रदेवताका संपूर्ण जगत्में अधिकार वर्णन किया है अर्थात् संपूर्ण जगत्में वह
परमात्मा रुद्ररूपसे व्याप्त है कोई स्थान उससे भिन्न नहीं है इसी कारण स्थावर जंगम सव-
हीको प्रणाम किया है, इष्टअनिष्ट सब इसीके द्वारा होताहै, त्रिलोकी उत्पत्ति, पालन प्रलय
सब रुद्रसे ही होतीहै, (एको रुद्रो न द्वितीयः) इस श्रुतिके अनुसार एक अद्वैतरुद्रका प्रति
पादन होताहै, वेदानुसार उनकीउपासना करनी चाहिये, रुद्रकी उपासनासे सब उपद्रव दूर
होकर चारों पदार्थोंकी प्राप्ति होती है इसका पाठ करनेसे सब मनोरथ सिद्ध होते हैं ॥६६॥
इति श्रीरुद्राष्टके-पंडितज्वालाप्रसादमिश्रकृतसंस्कृतार्य भाषाभाष्यसमन्वितपंचमोऽध्यायः ॥ ५॥
अथ षष्ठोऽध्यायः।
मन्त्रः।
हरिः ॐ बुठसोमव्रतेतवुमनस्तनूषुविभ्रतः ॥
प्र॒जावन्तत्सचेमहि ॥ १॥
ॐ वठसोम इत्यस्य बन्धुऋषिः । गायत्रीछन्दः । सोमो
देवता । दक्षिणाग्न्युपस्थाने विनियोगः ॥१॥
(९०) रुद्राष्टाध्यायी- [ षष्ठो- भाष्यम्-(सोम ) हे सोमदेव (वयम् । बन्ध्वादयः ( तव ते ) त्वदीयकर्मणि वर्तमानाः ( तनूषु ) त्वदीयेष्वङ्गेषु जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यादिषु ( मनः) मनः (बिभतः ) धार- यन्तः (प्रजावन्तः) पुत्रपौत्रादिभिर्युक्ताः सन्तः (सचेमहि) सङ्गच्छेमहि । [यजु०३।५६] ॥१॥ भाषार्थ-हे सोम ! (पितृयज्ञका सोमदेवता है " सोमायपितृमते स्वधा " इस मंत्रसे हवि दीजातीहै) हम यजमान तेरे व्रतसंबंधिकर्ममें वर्तमानहुए आपके शरीरावयवमें वा जाग्रत् , स्वप्न, सुषुप्तिमें मन धारण करते वा लगाये हुए आपहीकी कृपासे पुत्रपौत्रादिसे युक्तहुए हम सेवन करतेहैं वा सदा तुम्हारे संबंधवाले हैं ॥ १॥ मन्त्रः। एषतेस्द्रभाग सहस्वस्राम्बिकयातञ्जुषस्व स्वाहै- पत्रद्वभागऽआखुस्तपशुः ॥ २॥ ॐ एषत इत्यस्य बन्धुऋषिः । प्राजापत्या बृहती छन्दः । रुद्रो देवता । अवदानहोमे विनियोगः ॥२॥ भाष्यम्-(रुद्र ) हे रुद्र (एषः ) अस्माभिरुपकीर्यमाणोऽतिरिक्तः पुरोडाशः (ते) तव ( स्वता) भगिन्या ( अम्बिकया ) अम्बिकानाम्न्या (सह ) (भागः) भजनीयः स्वीकर्तुं योग्यः "अम्बिका ह वै नामास्य स्वसा" इत्यादिश्रुतेः । (तम् ) पुरोडाशम् (जुषस्व ) सेवस्व ( स्वाहा ) सुहुतमस्तु । अतः परमाखूत्किरं परिकिरति ( रुद्र) हे रुद्र (एषः ) अस्माभिरुपकीर्यमाणोऽतिरिक्तः पुरोडाशः (ते) तव (भागः ) अंशः तथा (ते) तव ( आखुः ) मूषकः ( पशुः) पशुत्वेन समर्पितः । आख़ुदानेन तुष्टो रुद्रस्तयाs- म्बिकया यजमानपशून्न मारयतीत्यर्थः । [ यजु० ३।५७ ] ॥२॥ भाषार्थ--विरोधियोंको, पापियोंको, अधर्मियोंको, अन्यायियोंको उनके कर्मका फल देकर रुलानेवाले हे रुद्रदेवता ! तुम्हारी भगिनी अम्बिकाके साथ यह हमसे दिया हुआ पुरो- डाश स्वीकार करनेके योग्य है इस पुरोडाशको सेवन करो हे रुद्र ! हमारे द्वारा अवकीर्ण (बखरा) हुआ यह पुरोडाश तुम्हारे सेवनीय है तथा आपका बिलमध्यमें रहनेवाला मूसा (चूहा ) रक्षणीय पशु है, इस कारण शेष भाग इसको भी देते हैं ॥२॥ विशेष अम्बिका-नामकी रुद्रवी बहन है, उसके साथ रुद्रदेव विरोधियोंके मारनेकी इच्छा करते हैं, सो इस क्रूर देवता अम्बिकाके साथ उसे मारते हैं, वह अम्बिका शरदरूप हो जरादिक उत्पन्न कर उस विरोधीको मारती है, रुद्र अम्बिकाकी उग्रता इस हविसे शान्त होती है । केवल तत्त्ववादी कहते हैं-रुद्रशद मेघगर्जना आदि कारण विद्युदग्नि विशेष है । अम्बिका शब्दका प्रकृत अथ गमनशील अर्थात् जगत् है यही शरदूरूपसे रुद्रकी भगिनी होकर कार्य साधन करती है । रुद्राध्यायम मेघ ऋतु आदिमें भी रुद्रका निधास लिखा है, इससे यह भी हो सकता है मेघनिर्माण होनेसे शरहतु प्राप्त होती है, वहीं उनकी भगिनीरूप है, प्राचीन कालमें शरदसे ही नवीनवर्ष प्रारंभ होता था और एक वर्ष बीतनेसे शरीरमें परिवर्तन होता है वही जरा है । अथवा शरद में वर्षाके उपरान्त एक नवीन ज्वर प्रारंभ होता है जो बडा कष्ट करता है । इसको ही अम्बिकाकृत जरा कहते हैं, इसमें बहुधा मनुष्य
ऽध्यायः ६]
भाष्यसहिता।
(९१).
असावधानीसे मृतक होजाते हैं इसके निमित्त हवन अवश्य करना चाहिये और इन्हीं रोगोंकी
शान्तिके निमित्त चातुर्मासके अन्तर्गत यह भी हवन है, इस समय भी शरत्कालमें नवदुर्गा-
ओंमें जो हवन होता है वह अम्बिकादेवीका ही विधान है परन्तु घर घर होनेसे बहुत उप-
कार हो सकता है, इस मंत्रमें वडा गूढ तत्त्व है बुद्धिमान् इसमेंसे बहुत कुछ जान सकते हैं.
इस कारण दिग्दर्शन मात्र लिखा है ॥२॥
मन्त्रः।
अवरुद्रमंदीमयवदेवन्त्र्यम्बकम्॥ यथा नोबु-
स्यसस्करद्यानुलश्रेयसुस्करद्यानो व्यवसाय-
यात् ॥३॥
ॐ अवरुदमित्यस्य बन्धुऋषिः । विराटू पंक्तिश्छन्दः । रुद्रो
देवता । जपे विनियोगः ॥३॥
भाष्यम्-(रुद्रम्--अव ) असौ रुद्र इति मनसा तम् अवगत्य (अदीमहि ) त्वदनु-
ग्रहादन्नं भक्षयेम । तथा (व्यम्बकम् ) त्रीणि अम्बकानि नेत्राणि यस्य तादृशं देवम् (अव)
अवगत्यादीमहीत्यनुवर्तते । यद्वाऽन्यदेवताभ्यः पृथक्कृत्य रुद्रमहीमहि अद्यामो भोजयामः ।
( यथा ) येन प्रकारेण (नः) अस्मान् (वस्यसः) वस्तृतरान् वसनशीलान् ( करत् )
असौ कुर्यात् ( यथा) येन प्रकारेण ( नः ) अस्मान् (श्रेयसः करत् ) ज्ञातिषु प्रशास्यत.
रान् कुर्यात् । ( यथा ) यथा च (नः ) अस्मान् ( व्यवसाययात् ) सर्वेषु कार्येषु निश्चय--
युक्तान् कुर्यात् तथैनं जपाम इत्यर्थः । [ यजु० ३ । ५८] ॥ ३ ॥
भाषार्थ-पापियोंको रुलानेवाले तीन नेत्र वा भुलोक, अन्तरिक्ष लोक, द्युलोकरूप वा
गमनशील वा जिनके नेत्रसे तीनलोक प्रकाशित होते हैं वा जिनके नेत्र प्रकाशसे तीनलोक
आकृष्ट होते हैं अथवा तीन वेद, तीन काल, आधि दैविक आध्यात्मिक, आधिभौविक ही
जिनके नेत्र हैं ऐसे सर्गादिसे क्रीड़ा करनेवाले शत्रुजेला प्राणियों में आत्मरूपसे वर्तमान युति-
मान् स्तोत्रोंसे स्तुति किये हुए रुद्रदेवकी और देवताओंसे पृथक् कर वा उत्कृष्ट जानकर सब
दुःख नाश करते हैं वा उनके अनुग्रहसे अन्न भक्षण करते हैं वा त्रिनेत्र जानकर उनको भाग
देते हैं जिस प्रकार हमको वह उत्तम प्रकारसे निवास करनेवाले करें, जिस प्रकार हमको
ज्ञातियों में श्रेष्ठतर करें, जिस प्रकार हमको सब कार्योंमें निश्चययुक्त करें, इस प्रकार इनका.
जप करते हैं (आशीर्वाद है)॥३॥
तत्त्वविचार-जिनकी अम्बिका भगिनी है वह ञ्यंबक होते हैं, तीन लोकमें गमन
होनेसे अम्बिका विद्युदग्नि विशेष रुद्रदेवताकी भगिनीस्थानीय है ॥ ३॥
भाषार्थ-तीन कालोंमें एकरसरूप परमात्माका भजन करना सबको उचित है वह रुद्र
रूपसे प्रार्थनीय है धनसंपत्ति वही देवता है, वेजकी वृद्धि वही करता है ॥३॥
(९२) रुद्राष्टाध्यायी- [ षष्ठो- - मन्त्रः॥ भेषजमास। भेषजङ्गवेश्वायुपुरुषायभेषजम् । मुखम्मेषार्यमेष्ष्यै ॥ ४॥ ॐ भेषजमसीत्यस्य बन्धुर्ऋषिः । स्वराङ्गायत्री छन्दः । रुद्रो देवता । जपे विनियोगः ॥ ४ ॥ भाष्यम् हे रुद्र त्वम् ( भेषजम् ) औषधवत्सर्वोपद्रवनिवारकः ( असि ) सर्वप्राणिन "हितकारी भवसि, अतः प्रार्थयामि, अस्मदीयेभ्यः ( गवे ) ( अश्वायः) (पुरुषाय ) ( भेषत्रम् सर्वव्याधिनिवारकमौपधं देहि ( मेपायमेध्यै ) ( मुखम् ) क्षेमं देहीति शेषः ।सुहितं खेभ्यः प्राणेभ्यः इति सुखम् । अनेन मन्त्रेण गृहपशूनां क्षेमप्राप्तिभवति [ यजु० ३ । ५९ ] ॥४॥ भाषार्थ-हे रुद्र ! आप औषधवन संपूर्ण उपद्रवों के निवारण करनेवाले हो इस कारण हमारे गौ, घोडे, पुत्र, पौत्र, भ्राता और परिजनों के निमित्त सब रोग दूर करनेको औषधि दो वा औषधिरूप प्रकाश करो, तथा मेष मेषी आदि पशुओं के उपद्रव रहित जीवनके निमित्त सुखदायक अपना भेषज स्वरूप प्रकाश करो ( इस मंत्रसे घरके पशुओं की क्षमप्राप्ति होती है ) ॥ ५॥ विशेष-पदार्थ विद्यावाले यहां विद्यन्का अर्थ करके कहते हैं कि. विद्युत् कितनी उत्कृष्ट भेषज है, यह भेषजके व्यवसायी ही विशेषरूपसे जान सकते हैं ॥ ४॥ मन्त्रः। व्यम्बकंव्यजामहेसुगन्धिम्पुष्टिवाईनम् ॥ उवा- रुकमिवबन्धनान्मृत्योर्मुक्षीयमामृतात् ॥त्र्यम्ब- कॅम्यजामहेसुगन्धिम्पतिवेदनम् ॥ उर्वारुकर्मि- वबन्धनादितोमुक्षीयमामुतः ॥५ ॐ त्र्यम्बकमित्यस्य वशिष्ट ऋषिः । वाझाली त्रिष्टुप् छन्दः। रुद्रो देवता । परिक्रमणे विनियोगः ॥५॥ भाष्यम्-(सुगन्धिम् ) दिव्यगंधोपेतं मर्त्यधर्महीनम् ( पुष्टिवर्धनम् ) धनधान्यादि पुष्टे - बर्द्धयितारम् (व्यम्बकम् ) नेत्रत्रयोपेतं शिवम् ( यजामहे ) पूजयामः । ततो रुद्रप्रसादात् ( मृत्योः ) अपमृत्योः संसारमृत्योश्च (मुक्षीय ) मुक्तो भूयासम् ( अमृतात् ) स्वर्गरूपान्मु-
.
ऽध्यायः ६
भाष्यसहिता।
(९३)
क्तिरूपाच्च ( मा ) मुक्तो मा भूयासम् अभ्युदयनिःश्रेयसरूपात् फलद्वयान्मम शो माभू
दित्यर्थः । मृत्योर्मोचने दृष्टान्तः ( इव ) यथा (उर्वारुकम कर्कन्ध्वादेः फलमत्यन्तपक्वं सद
( बन्धनात् ) वृन्तात् स्वयमेव मुच्यते तद्वत् त्र्यम्बकप्रसादेन मुक्तो भूयासम् । यजमानसम्ब
न्धिन्यः कुमार्योपि त्र्यम्बकमंत्रेणामिं त्रिः परियन्ति ( पतिवेदनम् ) पतिं वेदयतीति तं भर्तुर्ल
भयितारं ( सुगन्धिम् ) दिव्यगंधियुक्तं ( त्र्यम्बकम् ) देवं शिवम् (यजामहं ) पूजयाम
( इतः ) मातृपितृभातृवर्गान् ( मुक्षीय ) मुक्ता भूयासम् ( उतः ) विवाहादूर्व भविष्यतः
पत्युः (मा) मुक्ता मा भूयासम् । जनकस्य गोत्रं गृहं च परित्यज्य पत्युगोत्रे गृहं च सर्वदा
व्यम्बकप्रसादात् वसामीत्यर्थः । सा यदित इत्याह-ज्ञातिभ्यस्तदाह-मामुत इति पतिभ्यस्त.
दाहेति २।६।२।१४ श्रुतेरितोऽमुतः शब्दाभ्यां पितृपतिवर्गों ग्राह्यौ । [ यजु० ३ । ६०
"समुद्दिश्य महादेवं त्र्यम्बकं त्र्यम्बकेत्यूचा । एतत्पर्वशतं कृत्वा जीवेद्वर्षशतं सुखी ॥ १ ॥
त्रिरात्रं नियतोपोष्य श्रपयेत्यायसं चरुम् । तेनाहुतिशतं पूर्ण जुहुयाच्छंसितवतः ॥२॥" ॥५॥
भाषार्थ-दिव्यगंधसे युक्त, मर्त्यधर्महीन उभयलोगोंके फलदाता धनधान्यादिसें पुष्टि
बढ़ानेवाले पूर्वोक्तनेत्रत्रयसंपन्न शिवशंकरका पूजन करतहे, वह रुद्र हमको मृत्यु, अपमृत्यू
वा संसार के मरणसे मुक्त करै वा छुड़ावै, जिसप्रकार अपने बंधनसे पकेहुए कर्कटीफल
अर्थात जैसे पकफल अपनी ग्रंथिस टूटकर भूपतित होताहै इसप्रकार शिवकी कृपासे जन्म
मरणबंधनसे चिरमुक्त होजाऊं और स्वर्गरूपमुक्तिसे न छूटू । अभ्युदय निश्रेयसरूप दोनो
फलसे भ्रष्ट न होऊ, पतिके प्राप्तकरानेवालेवा संपूर्णगुणसंपन्नसुन्दरपतिके विधान करनेवाले
दिव्ययश सौरभपूर्ण धर्माधर्मके ज्ञाता व्यंवकदेव शिवको पूजन करतीहूँ, जैसे उर्वारुकफल
बंधनसे छूटजाताहै इसप्रकार इस माता पिता भ्रातृवगसे वा इनके गोत्रसे छूटकर विवाह
उपरान्त पतिके समीपसे मत छुटाओ । आशय यह कि पिताके गोत्र और घरको छोड़कर
पतिके गोत्र और घरमें शिवजीके प्रसादसे सदा निवास करें ॥५॥
विशेष-पहला मंत्रही महामृत्युंजय कहलाताहै इसको विधिपूर्वक शिवपूजन करके जप
करनेसे अपमृत्यु निवारण होतीहै इसमें संदेह नहीं, और इस मंत्रसे यह भी विदित होताहे
कि मुक्त होकर फिर संसार में नहीं आता इस मंत्रसे तीनदिनवक व्रत कर चरुकी सौ
आहुति दे तो १०० वर्ष जियें ॥५॥
.
एतत्तै । रुद्वावसन्ते पुरोमूजवतोतीहि ॥ अर्व-
ततधन्वापिनाकवासुरुकृत्तिवासाऽअहिर्छसन्नाशि
वोतीहि ॥६॥
ॐ एतत्त इत्यस्य वशिष्ठ ऋषिः । भुरिगास्तारपंक्तिश्छन्दः ।
रुद्रो देवता । वंशयष्टिसंसर्जने विनियोगः ॥६॥
रुद्राष्टाध्यायी- षष्ठो- भाष्यम्-( रुद्र ) हे रुद्र ( एतत् ते ( तव ) अवसम् ( हविःशेषाख्यं भोज्यम् “अव- सशब्देन देशान्तरं गच्छतो मार्गमध्ये तटाकादिसमीपे भोक्तव्य ओदनविशेष उच्यते' तेन सहितस्त्वम् ( मूजवतः ) पर्वतात् “मूजवान्नाम कश्चित्पर्वतो रुद्रस्य वासस्थानम्" (परः) परभागवती सन् (अतीहि ) अतिक्रम्य गच्छ कीदृशस्त्वम् ( अवततधन्वा ) अवरोपितध- नुष्कः । अस्मद्विरोधिनां त्वया निवारितत्वादित उर्व धनुषि ज्यासमारोपणस्य पयोजनाभावा- दवरोपणमेवेदानी युक्तं तथा (पिनाकवासः ) पिनाकाख्यं त्वदीयं धनुरावम्त सर्वत आच्छा- दरतीति पिनाकवासः यथा धनुर्दृष्ट्वापाणिनो न विभ्यति तथा त्वदीयं धनुर्वस्त्रादिना प्रच्छाय गच्छेत्यर्थः । हे रुद्र त्वम् (कृत्तिवासाः ) चाम्बरः ( नः ) अस्मान् (अहिंसन् ) हिंसा- मकुर्वम् (शिवः) अस्मदीयपूजया सन्तुष्टः कोपरहितो भूत्वा ( अतीहि ) पर्वतमतिक्रम्य गच्छ। यजु० ३६१ ॥ ६ ॥ भाषार्थ-हे उक्तगुणसंपन्न महादेव ! यह आपका हविःशेषाख्य भोजन है (देशान्तरको जाते हुए मार्ग में जो तडागादिके समीप बैठकर ओदन आदि भक्ष्य खाया जाता है उसे अवस कहते हैं ) इसके साथ तुम हमारे विरोधियोंके निवारण होनेसे ज्या उतारेहुए धनुषको प्ले अपने पिनाक धनुषको वस्त्रमें छिपाये मूजवान् नाम पर्वतके परभागवर्ती होकर गमन करो अर्थात् इस अपने भागको लेकर दीर्घ गन्तव्यपथ अतिक्रमण कर अपने निवासभूत मुंजवान् नाम पर्वतके शिखरपर उपस्थित हो अथवा तुम्हारा निरन्तर विस्तृत धनुष है तुम अपने तेजसे स्वर्गपर्यन्त आच्छन्न करके गमन करनेमें समर्थ हो तुमको किसी प्रकारकी सहायताकी आवश्यकता नहीं (धनुष छिपाकर जानेका कारण यह कि प्राणी भयभीत न हो अर्थात् रुद्रने अपना धनुष अब उतार लिया) हे रुद्र ! तुम चाम्बर धारण किये हो बा संपूर्ण प्राणियोंके अन्तर रहनेसे चाम्बरधारी हो हमारी हिंसा न करते अर्थात् हमारी सब शारीरिक विपत्को अतिक्रम कर रक्षाके अभिप्रायसे हमारी पूजासे सन्तुष्ट वा कोप- रहित होनेके कारण कल्याणस्वरूप होकर अपने स्थानमें निवास करो वा पर्वको अतिक्रम करजाओ॥६॥ विशेष-शिवके धनुषका नाम पिनाक है गजचर्म धारण करनेसे कृत्तिवास हैं पौरा- णिक पदार्थविद्यावाले कहते हैं पर्वतके ऊपर मेघोंके उदय होनेसे सदा इन्द्रधनुष देखाजाता है। इसकारण वहाँ हो रुद्रका निवासस्थान कथन किया है विद्युत्म संपूर्ण शरीरके चर्मा- न्तरवर्ती है इस कारण रुद्रको विद्यत्म होनेसे कृत्तिवास और महादेव कहा है ॥६॥ मन्त्रः॥ त्र्यायुषञ्जमदग्नेस्कश्यपस्यत्त्र्यायुषम् ॥ यद्देवेषुत्र्या- युषन्तन्नोऽअस्तुल्यायुषम् ॥ ७॥ ॐ त्र्यायुषमित्यस्य नारायण ऋषिः । उष्णिक छन्दः । रुदो देवता । वपनादौ जपे विनियोगः ॥ ७॥ भाष्यम्-( जमदः) मुनेः (त्र्यायुषम् ) त्रयाणां बाल्ययौवनस्थाविरामामायुषां समा, हारस्यायुषम् । तथा (कश्यपस्य ) एतन्नामकस्य प्रजापतेः सम्बन्धि यत् (त्र्यायुषम् ) ऽध्यायः ३] भाष्यसहिता। (९५) व्यायुषम् । तथा ( देवेषु ) इन्द्रादिषु ( यत् ) यत् ( घ्यायुषम् ) व्यायुषमस्ति (तत्) तत्सर्वम् (त्र्यायुषम् ) घ्यायुषम् (नः ) अस्माकं यजमानानम् ( अस्तु) भूयात् जमदग्न्या- दीनां बाल्यादिषु यादृशं चरितं तादृशन्नो भूयादित्यर्थः । [ यजु० ३ । ६२] ॥ ७ ॥ भाषार्थ हे रुद्र ! जमदग्निऋषिकी जो बाल्य यौवन वृद्धावस्था है तथा कश्यप प्रजा- पतिकी जैसी तीनों अवस्थाएँ हैं जैसे देवगणकी अवस्थाके चरित्र हैं वह सब व्यायुष मुझ यजमानको प्राप्त हो अर्थात् इन पूर्वोक्त महा-माओंकेसे चरित्र हमारे होजाय ॥ ७ ॥ शिवोनामांसिस्वधितिस्तेपितानमस्तेऽअस्तुमा- माहिर्छसी ॥ निवर्तयारम्पायुषेन्नाद्यायप्रजनना यरायस्प्पोायसुष्प्रजास्त्वार्यसुवीर्य्याय ॥ ८॥ इति सर्टहितायां स्हपाठे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ ॐ शिवोनामासीत्यस्य नारायण ऋषिः । भुरिग्जगती छन्दः। क्षुरग्रहणे वपने च विनियोगः ॥ ८ ॥ भाष्यम्-हे क्षुर त्वम् ( नाम ) नाम्ना ( शिवः ) शान्तः ( असि ) असि (स्वधितिः) -वजम् (ते) तव (पिता) पिता (ते) तुभ्यम् ( नमः ) नमः ( अस्तु ) भवतु (मा) माम् ( माहि सीः ) मा नाशय । हे यजमान त्वाम् ( निर्वतयामि ) मुण्डयामि किमर्थम् ( आयुषे ) जीवनाय ( अन्नाधाय ) अन्नभक्षणाय (प्रजननाय ) सन्तानाय (रायस्पोषाय) रायो धनं तस्य पोषाय पुष्टये ( सुप्रजास्त्वाय ) शोभनापत्यतायै (सुवीर्याय ) शोभनसा- माय [ यजु० ३ । ६३ ] ॥ ८॥ भाषार्थ-सर्वव्यापी होनेसे क्षुरमें व्याप्त क्षुराधिष्ठित देव ! तुम नाम करके शान्तस्वभाव कल्याणकारण हो वन तुम्हारा पालक रक्षक है तुम्हारे निमित्त नमस्कार है मुझको मत "आघात करना । हे यजमान ! इस क्रियाके फलसे जीवनके निमित्त अन्नादि भक्षणके निमित्त बहुत प्रजा बहुत धन पुष्टि उत्कृष्ट प्रजननसामर्थ्य प्रशंसनीय बलकी प्राप्तिके निमित्त मुण्डन करता हूं0॥८॥ इति श्रीदाष्टके पण्डितज्वालाप्रसादमिश्रकृतसंस्कृतार्थभाषाभाध्यममन्वितःषष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ 8 किसी २ रुद्राष्टकम यह दो मंत्र विशेष देखे जाते हैं। नतम्बिदाथयऽइमाजजानाभ्ययुष्म्माकुमन्तरम्बभूव ॥ नीहारेण प्राताजल्प्यांचामृतृपंऽउक्थशासश्चरन्ति ?
(९६)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ सप्तम-
अथ सप्तमोऽध्यायः।
मन्त्रः॥
हरिः ॐ उग्ग्रश्च भीमश्चध्वान्तश्चधुनिश्च ।।
सासङ्खाश्चाभियुग्वार्चविक्षिपत्स्वाहा ॥ १॥
ॐ उग्रश्चेत्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिर्ऋषिः । गायत्री छन्दः ।
मरुतो देवताः । अरण्ये विमुखपुरोडाशहोमे वि० ॥ १॥
भाष्यन- ( उग्रः) उत्कृष्टः (च) (भीमः ) विभेत्यस्मादसौ भीमः (च) (धान्तः)
ध्वनति शब्दं करोतीति ध्वान्तः (च) (धुनिः) धूनयति कंपयति शनिति धुनिः (च)
( सासवान् ) सहतेः शत्रूनभिभवति स सहान् (च) (अभियुग्वा) अभियुनक्ति अस्मत्संमुख
योगं प्राप्नोत्यभियुग्वा (च) (विक्षिपः) विविधं क्षिपति रिपूनिति विक्षिपः एते उग्रादिनामकाः
सप्त मरुतः तेभ्यः (स्वाहा ) सुहुतमस्तु [ यजु० ३९७] ॥ १ ॥
भाषार्थ-उत्कृष्ट क्रोधनस्वभाव और जिससे भय लगे भयानक स्वभाव और ध्वनि-
कारी और शत्रुओंको कम्पानेवाले और सबके तिरस्कारम समर्थ तथा सबवस्तुओंके सहित,
योगवाले और प्राणीके शरीरबुद्धिआदि और वृक्षशाखादिक्षेपणकारी वा शत्रुओंके नाशक
वायुदेवताको प्रीतिके निमित्त यह आहुति देते हैं भलोप्रकार गृहीत हो ॥१॥
भावार्थ-जिस परमात्माने इस सबजगत्को उत्पन्न किया है वह तुमसे भिन्न होकर
तुम्हारे हृदय में स्थित है । तुम जो अबान और वृथाजल्पनामें प्रवृत्त हो और पुत्रपौत्रला.
भादिसे तृप्त तथा स्वर्गफललाममात्रके लिये यज्ञानुष्ठान करते विचरण करते हो, इसकारण
उसका तत्त्व अवगत नहीं होता, वह निष्काम कर्म और तत्त्वविचारसे ध्यानमें आता है ॥१॥
मन्त्रः
--
विश्वकर्माहयजनिष्टदेवऽआदिद्गन्धर्वोऽअभव-
द्वितीय ॥ तृतीय-पिताजनितौषधीनामुपाङ्ग-
अँध्यदधात्पुरुत्रा ॥२॥
.
भाषार्थ-विश्वकर्माने प्रथम देवगणकी सृष्टि की, गन्धर्वगण उसकी दूसरी सृष्टि है,
पर्जन्य उसकी तीसरी सृष्टि है, यह औषधियोंके उत्पादक पर्जन्य अनेक स्थलोंमें गर्भधारण
करते हैं ॥२॥
ऽध्यायः ७]
भाष्यसहिता।
(९७३
अग्निहृदयेनाशनिठहृदयाग्ग्रेणपशुपतिङ्कृत्स्न-
हृदयेनभवंय्यका ॥ शर्बम्मतस्नाभ्य मीशान-
म्मन्न्युनामहादेवमन्तत्पर्शयेनोग्ग्रन्देवंबनिष्टु-
नविशिष्ठहनु शिङ्गीनिकोश्याब्भ्याम् ॥ २॥
ॐ अग्निमित्यस्य प्रजापतिक्रषिः। भुरिग्ब्राह्मी त्रिष्टुप् छन्दः ।
यजमानो देवता। अश्वाङ्गदेवताभ्यश्चतुर्गृहीताज्याहुतिदाने वि०२
भाष्यम्-(हृदयेन ) अंगेन (अग्निम् ) अग्निदेवं प्रीणामि (हृदयाग्रेण ) हृदयस्याग्रभा-
गेन ( अशनिम्) अशनि देवं प्रीणामि (कृत्वहृदयेन ) समग्रहृदयेन (पशुपतिम् ) पशुपति
देवम् (यना ) यकृता (भवम् ) भवं देवम् (मत्स्नाभ्याम् ) मत्स्ने हृदयास्थिविशेषौ
वाभ्याम् ( शवम् ) शर्व देवम् ( मन्युना ) अश्वसम्बन्धिक्रोधेन (ईशानम् ) ईशानं देवम्
(अन्तः पशव्येन) अन्तर्वर्तमानेन पर्शव्येन पार्धास्थिसम्बन्धिना मांसेन ( महादेवम् ) महा-
देवम् (वनिष्टुना) वनिष्टुः स्थूलान्त्रं तेन (उग्रं देवम् ) उग्रं देवम् (वशिष्ठहनुः ) वशिष्ठस्य
देवस्य हनुः कपोलैकदेशो ज्ञातव्यः । अथवा वसिष्ठाया हनुः कपोलाधोदेशः 'तत्परा हनुः
इत्यमरः । वसिष्ठहन्वा (कोश्याभ्याम् ) कोशो हृदयकोशः तत्स्थाभ्यां मांसपिण्डाभ्यां च
शिंगीनि ) शिंगिसंज्ञानि दैवतानि प्रीणामि [ यजु० ३९।८] ॥ २ ॥
भाषार्थ-हृदयद्वारा अग्निदेवताको प्रसन्न करताहूँ १, हृदयके अग्रभागसे अशनिदेव
ताको २, संपूर्णहृदयसे पशुपतिदेवताको ३, यकृत् ( कालखंड ) द्वारा प्रभवदेवताको प्रसन्न
करताहूँ ४; हृदयास्थिविशेषद्वारा शर्वदेवताको प्रसन्न करताहूँ ५, क्रोधाधारद्वारा ईशानदेव-
ताको प्रसन्न करताहूँ ६, पार्वअस्थिके मध्यगतमांससे महादेवको प्रसन्न करता हूँ ७, स्थूला-
न्त्रसे उग्रदेवको प्रसन्न करता हूँ ८, कपोलके एकदेश वा अधोदेश और हृदय-
कोशमें स्थित मांसपिण्डद्वारा शिङ्गो देवताको प्रसन्नकरताहूँ ९, (हनुद्वारा वशिष्ठको प्रसन्न
करताहूँ, ऐसा भी किसीका मत है १०) ॥२॥
मन्त्रः ।
उग्रॅल्लोहितेन मित्र:सौव्रत्त्येनसुइन्दौर्बत्येनेन्द्रम्प
क्रीडेनमस्तोबलैनसाद्धयानाप्रमुदा॥भवस्यकण्ठ्य
ठरुद्स्यन्तिल्पाश्र्व्यम्महादेवस्ययकृच्छवस्यवनिष्ठुरूप
शुपतत्पुरीतत् ॥ ३॥
(९८)
रुद्राष्टाध्यायी-
[सप्तमो-
ॐ उग्रमित्यस्य प्रजापतिक्रषिः। निच्यद्राझी त्रिष्टुप् छन्दः ।
यजमानो देवता । वि० पू० ॥ ३ ॥
भाष्यम्-( लोहितेन ) अनृजा (उग्रम् ) उग्रं देवं प्रीणामि ( सौत्रत्येन ) शोभनं व्रतं
कर्म यस्य सः सुव्रतस्तस्य भावः सौत्रत्यं शोभनगत्यादिकर्मकर्तृत्वं तेन ( मित्रम् ) मित्रं देवं
श्रीणामि (दौत्येन ) दुष्टं स्खलनोच्छलनादि व्रतं यस्य स दुव्रतः तम्य भावो दौत्यं तेन
(रुद्रन ) रुद्रं देवं प्रीणामि ( प्रक्रीडेन) प्रकृष्टं क्रीडनं प्रक्रीडः तेन ( इन्द्रम् ) इन्द्रं देवं
प्रीणानि ( वलेन) सामर्थ्येन ( मरुतः ) मरुतो देवान् पी० प्रमुदा) प्रकृष्टा मुत् हर्षः
प्रमुत् तया (साध्यान् ) साध्यान्देवान् प्री० (भवस्य ) अत्र षष्ठयन्तो देवः अंग प्रथमान्तम्
भवदेवस्य ( कण्ठयम् ) कण्ठे भवं मांसमस्तु विभक्तिव्यत्ययो वा कण्ठ्येन भवं देवं प्रीणामि ।
एवमग्रेऽपि ( अन्तः पार्श्वम् ) पार्श्वस्यान्तर्मध्ये भवं मांसमन्तः पार्श्वम् ( रुद्रस्य ) रुद्रस्यास्तु
(यकृत् ) कालखण्डम् ( महादेवस्य ) महादेवस्यास्तु ( वनिष्ठुः) स्थूलान्त्रम् ( शर्वस्य)
शर्वस्यास्तु (पुरीतत् ) हृदयाच्छादकमन्त्रम् (पशुपतेः) पशुपतेदेवम्यास्तु [यजु०३९।९॥३॥
भाषार्थ-लोहितद्वारा उग्रदेवनाको प्रसन्न करताहूँ १, श्रेष्टगत्यादि कर्म करनेवालेसे
मित्रदेवताको प्रसन्न करता हूँ २, जो शरीरका शोणित दुर्ऋत्य करनेको प्रवृत्त होता है उससे
रुद्रदेवताको प्रसन्न करता हूँ ३, क्रीडा करनेमें समर्थ रक्तद्वारा इन्द्रको प्रसन्न करता हूँ ४,
बलप्रकाशमें समर्थ रक्तद्वारा मरुतोंको प्रसन्न करता हूँ ५, प्रसन्नता करनेवालेद्वारा साध्य-
देवताको प्रसन्न करता हूँ६, कंठमें होनेवालेसे भवदेवताको प्रसन्न करता हूँ, पार्श्वकी
मध्यरक्तिमासे रुद्रको प्रसन्न करता हूँ ८. यकृन्के रक्तद्वारा महादेवको प्रसन्न करता हूँ ९,
स्थूलान्त्रद्वारा शर्वदेवताको प्रसन्न करता हूँ १०, हृदयाच्छादक नाडीकी रक्तिमासे पशुपतिको
प्रसन्न करता हूँ ११, अर्थात् सांग देवताओंके हैं इससे सर्वस्वत्याग है ममत्व कुछ नहीं है।
इसमें स्थानगत रुधिरके गुण कहे हैं ॥ ३ ॥
मन्त्रः।
लोमभ्यत्स्वाहा लोमब्भ्यस्वाहात्युचे स्वाहां-
खुचेस्वाहालोहितायुस्वाहालोहितायुस्वाहामेदा-
भ्युत्स्वाहामेदोभ्यत्स्वाहा ॥ मासेब्भ्यत्स्वा-
हामाईसेब्भ्युत्स्वाहास्नावब्भ्यत्स्वाहास्नावब्भ्यः
स्वाहास्त्थब्भ्यत्स्वाहास्त्थब्भ्य स्वाहांमजब्भ्यस्-
स्वाहांमजब्भ्यत्स्वाहा॥रेतसेस्वाहापायवेस्वाहा॥४॥
उव्यायः ७ ।
भाष्यसहिता।
(९९)
ॐ लोमभ्य इत्यस्य पंचाक्षरमंत्राणां प्रजापतिक्रषिः । देवी
पङ्क्तिश्छन्दः । अङ्गानि देवता । चतुरक्षरमन्त्राणां दैवी बृहती.
षडक्षरमन्त्राणां दैवी त्रिष्टुप् । अष्टाक्षरमन्त्राणां देवी त्रिष्टुपू०
प्रायश्चित्ताहुतिदानेविनियोगः ॥ ४॥
भाष्यम्-लोमभ्यः स्वाहेति प्रायश्चिन्नाहुतयो द्विचत्वारिंशल्लोमादीन्यंगानि ( लोमन्यः
स्वाहा ) लोमानि जुहोमीत्यर्थः । ( त्वचे, त्वचे (लोहिताय) लोहिताय ( मेदोभ्यः )
मेदोधातुविशेषः ( मांसेभ्यः ) मांसेभ्यः ( नावभ्यः ) स्नावानः स्नायवो नसाः ( अस्थभ्यः )
अस्थिभ्यः ( मज्जभ्यः ) मज्जा षष्ठो धातुः (रेतसे ) रेतो वीर्यम् ( पायवे) पायुर्गुदम् ।
यजु० ३९ । १०] ॥ ४ ॥
भाषार्थ-लोमोंके निमित्त सुहृत हो १, व्यष्टिलोमोंके निमित्त सुहुत हो २, त्वचाके
निमित्त मुहुत हो ३, व्यष्टिखचाके निमित्त सुहुव हो ४, लोहितके निमित्त मुहुत हो ५
लोहितके निमित्त मुहुत हो ६, मेढ़के निमित्त सुहुत हो ७, मेदके० ८५ मांसके निमित्त सुहुत हो
९, मांसके० १०, स्नायुओंके निमित्त सुहुत हो ११, स्नायुके निमित्त० १२, अस्थियोंके निमित्त
सुहुत हो १३, अस्थियोंके० १४, मजाके निमित्त श्रेष्ठ होम हो १५, मज्जाके निमित्त मुहुन
हो १६, वीर्यके निमित्त बहुत हो १७, गुदाके निमित्त सुहुत हो १८ ॥ ४ ॥
-
आयासायस्वाहा प्रायासायुस्वाहासंय्यासायस्वाहा
बियासायस्वाहोद्यासायस्वाहा ॥ शुचेस्वाहाशोचते
स्वाहाशोचमानायस्वाहाशोकायुस्वाहा ॥ ५ ॥
ॐ आयासायेत्यस्य विनियोगः पूर्ववत् ॥ ५ ॥
भाष्यम्-(आयासाय ) आयासादयो देवविशेषाः प्रायासाय संयासाय वियासाय
उद्यासाय शुचे, शोचते, शोचमानाय, शोकाय, देवविशेषाय (स्वाहा) सुइतनस्तु !
[ यजु० ३९।११ ॥ ५ ॥
भाषार्थ-आयास देवताके निमित्त सुहुत हो १, प्रायासके निमित्त सुहृत हो २, संयास-
देवताके निमित्त मुहुत हो ३, वियासदेवताके निमित्त सुहुत हो ४, उद्यासदेवताके निमित्त
हो ५, शुचदेवताके निमित्त सुहुत हो ६, शोचत्देवताके निमित्त सुहुत हो ७, शोच-
मानके निमित्त सुहुत हो ८, शोकके निमित्त सुहुत हो ।। ९ ॥५॥
विशेष-देहपरिश्रमको भोग हो, इन्द्रियपरिश्रमको भोग हो, मानसपरिश्रमको भोग
हो, वुद्धिपरिश्रमको भोग हो, प्राणपरिश्रमको भोग हो, यह आयासादि पांचोंका अर्थ है॥५॥
(१००)
रुद्राष्टाध्यायी-
-
[सप्तमो-
मन्त्रः ।
तपसेस्वाहा तप्प्यतेस्वाहातप्प्यमानायस्वाहात-
प्प्तायस्वाहांघायस्वाहा ॥ निष्कृत्यैस्वाहाप्पा
यश्चित्त्यैस्वाभेिषजायस्वाहा ॥ ६ ॥
ॐ तपस इत्यस्य विनियोगः पूर्ववत् ॥ ६॥
भाष्यम्-( तपसे ) तप्यते, तप्यमानाय, तप्ताय, धमाय, निष्कृत्यै, प्रायश्चित्त्यै, भष-
जाय, स्वाहा । [ यजु० ३९।१२ ] ॥ ६ ॥
भाषार्थ-तपके निमित्त सुहृत हो१ , तप्यत्के निमित्त सुहुत हो २, लप्यमानके निमित्त
सुहुत हो ३, तप्तके निमित्त सुहुत हो ४, धर्मके निमित्त मुहुत हो ५, निष्कृतिके निमित्त
हो ६. प्रायश्चित्त के निमित्त मुहुत हो ७, भेषजके निमिन भोगसमर्पण हो ॥ ८॥६॥
मन्त्रः ।
युमायस्वाहान्तकायस्वाहामृत्यवेस्वाहा ॥ ब्रह्मणे
स्वाहाब्रह्महत्यायैस्वाहाविञ्चैब्भ्योदेवेन्भ्युत्स्वाहा
द्यावापृथिवीभ्याधस्वाहा ॥७॥
इतिसहितायांरुद्दपाठेसप्तमोऽध्यायः ॥७॥
ॐ यमायेति विनियोगः पूर्ववत् ॥ ७॥
भाष्यम्-( यमाय ) प्रेतपतये ( अन्तकाय ) कालाय ( मृत्यवे ) मृत्युनामकाय
('ब्रह्मणे ) परमात्मने ( ब्रह्महत्यायै) ब्रह्महत्याय (विश्वेभ्यो देवेभ्यः ) एतेभ्यो देवेभ्यः
( स्वाहा ) मुहुतमस्तु ( द्यावापृथिवीभ्याम् ) द्यावापृथिवीभ्याम् (स्वाहा ) सुहुतमस्तु ।।
इत्यन्तामाहुतिं जुहुयात् [ यजुः ३९।१३] ॥ ७ ॥
भाषार्थ-यमके निमित्त सुहुत हो १, अन्तकके निमित्त सुहुत हो २, मृत्युके निमित्त
बहुत हो ३, ब्रह्मके निमित्त सुहुत हो, ४, ब्रह्महत्या निमित्त सुहुत हो ५, संपूर्ण देवताओंके
निमित्त सुहुत हो ६, भूलोकसे द्युलोकपर्यन्त जितने देवता हैं उन सबकी प्रीतिक निमित्त यह
शेष पूर्णाहुति दीजाती है भलीप्रकारसे गृहीत हो॥७॥
इति श्रीरुद्राष्टके पं० ज्वालाप्रसादमिश्रकृतसंस्कृतार्यभाषाभाष्यसमन्वितः सप्तमोऽध्यायः॥ ७ ॥
इध्यायः ८]
भाष्यसहिना।
(१०१)
अथाष्टमोऽध्यायः।
मन्त्रः।
हरिः ॐ ॥ बाजश्च मेप्रसवश्चमेप्रयतिश्चमेप्र-
सितिश्चमेधीतिश्चमेक्रतुश्चमेस्वरश्चमेश्लोक-
श्चमेश्वश्चमेश्श्रुतिश्चमेज्योतिश्चमेस्वश्चमे
यज्ञेनकल्प्पन्ताम् ॥ १॥
ॐ वाजश्च म इत्यस्य देवा ऋषयः । शकरीछन्दः अग्निदेवता।
वसो(राहुतिहोमे विनि० ॥ १ ॥
भाष्यम्-यजमान आज्यसंस्कृत्यार्थपरिमाणया महत्यौदुम्बर्या बुचा महता वर्ग पंचवारं
गृहीतमाज्यमरण्येनूच्ये पुरोडाशे तदुपरि सन्ततं विच्छिन्नधारं यथातथा वसोधारासंज्ञानाहुति
जुहोति । घृतेमिप्राप्ते सति वानवेत्यादिहोममंत्राम्भाः । चकाराः समुच्चयार्थाः । ( वाजः)
अन्नम् ( प्रसवः ) अन्नदानाभ्यनुज्ञा दीयतां भुज्यतामिति, (प्रयतिः ) शुद्धिः (प्रसितिः )
बन्धनमन्नविषयौत्सुक्यम् (धीतिः ) ध्यानम् ( ऋतुः ) सङ्कल्पो यज्ञो वा (बरः) साधु-
शब्दः ( श्लोकः ) पद्यवन्धः स्तुतिर्वा ( श्रवः) वेदमन्त्राः श्रवणसामर्थ्य वा (श्रुतिः)
ब्राह्मणम् श्रवणसामर्थ्य वा (ज्योतिः) प्रकाशः ( स्वः ) स्वर्गः एते (मे ) मम ( यज्ञेन )
यज्ञेन ( कल्पन्ताम् ) सम्पन्ना भवन्तु । स यज्ञो वाजादीनां दातास्मभ्यं भवत्वित्यर्थः । एवमग्रे
सर्वत्र । [ यजु० १८११] ॥ १॥
भाषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवगण मेरे निमित्त अन्न और मेरे निमिन (दीयतां भुज्य-
ताम् ) इस प्रकार अन्नदानकी अनुज्ञा और मेरे निमित्तः शुद्धि अन्न विषयक उत्सुकता,
ध्यान विचार और संकल्प वा यज्ञ और साधुशब्द, पद्यबंधन वा स्तुति और वेदमन्त्रोंका
श्रवण वा उसकी सामर्थ्य, ब्राह्मणश्रवणकी सामथ्र्य, प्रकाश और स्वर्ग प्राप्त करें, अर्थात्
यज्ञके फलसे यह सब पदार्थ हमको प्राप्त हो ॥१॥
प्राणश्चमेपानश्चमे यानश्चमेसुश्चमेचित्तञ्चमऽ-
आधीतञ्चमेवाश्चमेमनश्चमेचक्षुश्चमेश्श्रोत्रञ्च-
मेदाश्चमेबलञ्चमेयशेनकल्प्पन्ताम् ॥ २॥
(१०४)
रुद्राष्टाध्यायी--
[अष्टमो-
ऋतञ्चमेमृतञ्चमेयुक्ष्मञ्चमेनामयच्चमेजीबातुश्च-
मैदीर्घायुत्वञ्चमेनमित्रञ्चमेर्भयञ्चमेसुखञ्चमेशर्य-
नश्चमेसृषाश्चमेसुदिनञ्चमेयुजेनकल्प्पन्ताम्॥६॥
ॐ ऋतमित्यस्य देवा ऋषयः । भुरिगतिशकरी छं० । अग्नि-
देवता । वि० पू० ॥६॥
भाष्यम्--( ऋतम् ) यशादिकर्म ( अमृतम् ) तत्फलभूतं स्वर्गादि ( अयक्ष्मः ) यक्ष्म-
गोऽभावोऽयक्ष्मं धातुक्षयादिरोगाभावः ( अनामयत् ) सामान्यव्याधिराहित्यम् (जीवातु:)
व्याधिनाशकमौषधम् ( दीर्घायुत्वम् ) बहुकालमायुः ( अनमित्रम् ) शत्रुराहित्यम् ( अभयम् )
भीतिरहित्यम् (मुखम् ) आनन्दः (शयनम् ) संस्कृता शय्या (सूषाः ) शोभन उषः
स्नानसंध्यादियुक्तः प्रातः कालः (मुदिनम् ) यज्ञदानाध्ययनादियुक्तं सर्व दिनम् एते (मे)
मम ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ) सिध्यन्तु [ यजु० १८।६] ॥ ६ ॥
भाषार्थ-यज्ञादि कर्म, उसका फल स्वर्गादि, धातुक्षयादि रोगका अभाव, सामान्य
व्याधिका अभाव, व्याधिनाशक औषधि, दीर्घायु, शत्रुओं का अभाव, निर्भयता, आनन्द,
सजाई हुई सेज, संध्यावंदनादि युक्त सुप्रभात और यज्ञदानाध्ययनादि युक्त संपूर्ण दिन इस
यज्ञके फलसे देवता यह सब मेरे निमित्त प्रदान करें ॥६॥
.
मन्त्रः।
युन्तार्चमेधुर्ताचमेक्षेमश्चमेधृतिश्चमे विश्वञ्चमे
महंश्चमेसविचमेज्ञा–श्चमेसूश्चमेप्रसूश्चमेसीरंञ्च
मेलयश्चमेयशेनकल्प्पन्ताम् ॥ ७ ॥
ॐ यन्ताचेत्यस्य देवा ऋषयः । निच्युदतिजगती छन्दः
अग्निदेवता । वि० पू० ॥७॥
भाष्यम्-( यन्ता ) अश्वादेनियन्ता ( धर्ता ) पोषकः पित्रादिः (क्षेमः ) विद्यामान-
घनस्य रक्षणशक्तिः ( धृतिः ) आपत्स्वपि स्थिरचित्तत्वम् (विश्वम् ) सर्वानुकूल्यम् ( महः)
पूजा (संवित् ) वेदशास्त्रादिज्ञानम् (ज्ञात्रम् ) विज्ञानसामर्थ्यम् (सूः) पुत्रादिप्रेरणसामर्थ्यम्
(प्रसूः) पुत्रोत्पत्त्यादिसामर्थ्यम् (सीरम् ) हलादि कृषिकृतधान्यनिष्पत्तिः (लयः) कृषिप्रति -
बन्धनिवृत्तिः। एते (मे) मम ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ) सम्पद्यन्ताम् । [यजु० १८७ ] ॥७॥
ऽध्यायः८ ] भाष्यसहिता। (१०५) भाषार्थ-अश्वआदिका नियन्तृत्व, प्रजाकी पालन शक्ति, विद्यमान धनकी रक्षण शक्ति, आपत्तिमें भी स्थिरचित्तता, सबकी अनुकूलता, पूजासत्कार, वेदशास्त्रादिका ज्ञान, विज्ञानकी सामर्थ्य, आज्ञा प्रदान वा पुत्रादि प्रेरणकी सामर्थ्य, पुत्रोत्पत्ति आढिकी सामर्थ्य, कृषि आदिके उपयोगी हलादि वा कृषिकृत धान्यकी प्राप्ति और कृषिके प्रतिबंधकी निवृत्ति, अनावृष्टिका 'अभाव यह सब यज्ञ द्वारा अर्थात् इस यज्ञके फलसे मेरे निमित्त देवता प्रदान करें ॥ ७ ॥ मन्त्रः । शंचमेमयश्चमेप्रियञ्चमेनुकामश्चमेकामश्चमे सौमनसश्चमभगश्चमेद्रविणञ्चमेभञ्चमेश्रेयश्च मेवसीयश्चमेयशश्चमेयज्ञेन॑कल्प्पन्ताम् ॥ ८॥ ॐ शमित्यस्य देवा ऋषयः । विराट् शक्वरी छन्दः । अग्गिर्दै- बता । वि० पू० ॥ ८॥ भाष्यम्-(शम् ) ऐहिकं सुखम् ( मयः ) आमुहिमकं सुखम् ( प्रियम् ) प्रीत्युत्पादकं वस्तु ( अनुकामः ) अनुकूलयत्नसाध्यः पदार्थः ( कामः ) विषयभोगजनितं सुखम् (सौम- नसः ) मनःस्वास्थ्यकरो वन्धुवर्गः ( भगः) सौभाग्यम् ( द्रविणम् ) धनम् (भद्रम् ) ऐहिक कल्याणम् (श्रेयः) पारलौकिकम् (वसीयः) निवासयोग्यो वसुमान् गृहादिः (यशः) कीर्तिः । एते (मे) मम ( यज्ञेन कमन्ताम् ) क्लप्ता भवन्तु । [यजु०१८1८] ॥८॥ लोकका सुख, प्रीति आदिकी उत्पादक वस्तु, अनुकूल यत्नसे साध्य पदार्थ, विषय भोगजनित मुख, मनके स्वास्थ्यकारी बंधुवर्ग, सौभाग्य, धन, इस लोकका कल्याण, पारलौकिक कल्याण, निवास योग्य धनयुक्त गृहादि और कीर्ति यह सब मेरे निमित्त देवता यज्ञके फलसे प्रदान करें। ८॥ मन्त्रः। ऊर्चमसूताचमेपर्यश्चमरसंश्चमेघृतञ्चमेमधु- चमेसग्धिश्चमेसपीतिश्चमेकृषिश्चमेवष्टिश्चम जैवञ्चमऽऔद्यिश्चमेयज्ञेनंकल्प्पन्ताम् ॥ ९ ॥ ॐ उक्चेत्यस्य देवा ऋषयः । शक्करी छन्दः । अग्निदेवता । वि० पू० ॥९॥ भाष्यम्- ( उर्च ) अन्नम् (सूनृता) प्रिया सत्या वाक ( पयः ) दुग्धम् ( रसः ) सारः (घृतम् ) आज्यम् ( मधु ) क्षौद्रम् ( सन्धिः ) बन्धुभिः सह भोजनम् (सपीतिः भाषार्थ-इस परलोकका सुख,
(१०६)
रुद्राष्टाध्यायी-
[अष्टमो-
बन्धुभिः सह पानन ( कृषिः ) तत्कृतधान्यसिद्धिः ( वृष्टिः ) धान्यनिष्पादिकानुकूला (जैत्रम्
जयसामर्थ्य (औद्भियम्) आम्रादिवृक्षोत्पत्तिः एते मम यज्ञेन कल्पन्ताम् यजु०१९।९॥९॥
भावार्थ-अन्न, प्रिय सत्यवाक्य, वृध, दुग्धसार, घृत, शहत वा मधुर पदार्थ; बांधवोंके
साथ एकत्र भोजन, बंधुजनोंके साथ एकत्र पान, कृषिद्वारा धान्यसिद्धि, धान्य उत्पन्न होनेकी
अनुकूल वृष्टि, जयकी सामर्थ्य और आम्रादि वृक्षोंकी उत्पत्ति, यह सब इस यज्ञके फलसे.
देवता मेरे निमित्त प्रदान करें ॥ ९ ॥
मन्त्रः।
रयिश्चमेरायश्चमेपुष्टश्चमेपुष्टिश्चमेविभुचमेप्रभु
चमेपूर्णञ्चमेपूर्णतरञ्चमेकुर्यवञ्चमेक्षितञ्चुमेन्नञ्चुमे
झुंचमेयज्ञेनेकल्प्पन्ताम् ॥ १०
ॐ रयिश्चेत्यस्य देवा ऋपयः । निच्यच्छकरी छन्दः । अनि-
देवता । वि० पू० ॥१०॥
भाष्यम्--( रयिः ) सुवर्णम् : रायः ) मुक्तादिमणयः ( पुष्टम् ) धनपोषः ( पुष्टिः )
शरीरपोषकः ( विभुः) व्याप्तिसानर्थ्यम् (प्रभुः ) ऐश्वर्यम् ( पूर्णन् ) धनपुत्रादि बाहुल्यम
( पूर्णतरम् ) अत्यन्तं पूर्ण पूर्णतः गजदुरगादि बाहुल्यम् ( कुयवम् ) कुत्सितधान्यमपि
( अक्षितम् ) क्षयहीनं धान्यादि ( अन्नम् ) ओदनादि (शुत् ) भुक्तानपरिपाकः एते
(यजन कल्पन्ताम् ) सम्पन्ना भवन्तु । यजु० १८११०] ॥ १० ॥
भाषार्थ-सुवर्ण, मोतीआदि, धनकी पुष्टि, शरीरकी पुष्टता, व्याप्तिसामर्थ्य, ऐश्वर्य वा
प्रभुताकी सामर्थ्य. धनपुत्रादिकी बहुतायत, गजतुरंगआदिकी बहुतायत, निकृष्टयव वा निकृ-
ष्टयवोंसे मिले ब्रीहि आदि अन्न, क्ष्यहीन धान्यादि, चावल. भात आदि, और भोजनकिये
अन्नपाक, यह सव मरे निमित्त इस यज्ञके फलसे देवता कल्पना करें ॥ १० ॥
वित्तञ्चमेवेद्यश्चमेभूतञ्चमेभविष्ष्यचमेसुगञ्चमेसु-
पत्थ्यञ्चमऽऋद्धञ्चमऽऋद्धिश्चमेकृप्तञ्चमेक्लप्तिश्च
मेमतिश्चममुमतिश्चयज्ञेनकल्प्पन्ताम् ॥११॥
ॐ वित्तमित्यस्य देवा ऋषयः । भुरिक्छक्करी छन्दः। अग्निः-
वता । वि० पू० ॥ ११ ॥
ऽध्यायः ८]
भाष्यसहिता!
(१०७)
भाष्यम्-( वित्तम् ) पूर्वलब्धं धनन् ( वेद्यम् ) लब्यव्यम् । भूतम् ) पूर्वसिद्ध क्षेत्रादि
(भविष्यत् ) सम्पत्स्यमानं क्षेत्रादि ( सुगम् ) सुखेन गम्यते यत्र तल्सुगं सुगन्यो देशः
(सुपथ्यम् ) शोभनं हितम् ( ऋद्धम् ) समृद्धं यज्ञफलम् ( ऋद्धिः ) यज्ञादिसमृद्धिः
(क्लप्तम् ) कार्यक्षेमं द्रव्यादि ( क्लप्तिः ) म्वकार्यसामथ्यंम् ( मनिः) पदार्थमात्रनिश्चयः
(सुमतिः) दुर्बट कार्यादिषु निश्चयः एते (में) मम ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ) सम्पद्यन्ताम् ।
[यजु० १८.११] ॥ ११ ॥
भाषार्थ-पूर्वलब्ध धन, संपद्यमान धन: पूर्वसिद्ध क्षेत्रादि, भविष्यकालमें होनेवाले
क्षेत्रादि, सुखगम्य देश वा सुखबोधको सामर्थ्य शोभनहित: समृद्धयज्ञका फल, यज्ञादिकी
समृद्धि कार्य साधक अपर्याप्त धन द्रव्य, व कार्यसाधनसामी. पदार्थमात्रका निश्चय और
दुर्घटकार्याडिका निश्चय यह सब मेरे निमित्त इस यज्ञके फलमे देवता प्रदान करें ।। ११॥.
मन्त्रः।
बीहयश्चमेयवाश्चमेमाषाश्चमेतिलाश्चमे मुद्दा
श्चमेखल्वाश्चमेप्रियङ्गवश्चमेणवश्चमेश्यामा
काश्चमेनीवारांश्चमेगोधूमाश्चमेमसूरांश्चमेयज्ञे
नकल्प्पन्ताम् ॥ १२॥
ॐ ब्रीहय इत्यस्य देवा ऋषयः । भुरिगतिशक्करी छन्दः ।
अग्निदेवता। वि० पू० ॥ १२॥
भाष्यम्-(व्रीहयः) ब्रीहयः ( यवाः ) यवाः ( माषाः)
माषाः (तिलाः)
तिलाः ( मुगाः) मुद्दाः ( खल्वाः ) चणकाः लङ्गाश्च (प्रियंगवः ) कंगवः प्रसिद्धाः
( अणवः ) चीनकाः (श्यामाकाः ) तृणधान्यानि ग्राम्याणि कोद्रवत्वेन प्रसिद्धानिः
( नीवाराः ) तृणधान्यान्यरण्यानि ( गोधूमाः ) गोधूमाः ( मसूराः ) मसूराश्च एते
धान्यविशेषाः (मे ) मम ( यज्ञेन कल्यन्ताम् ) सम्पद्यन्ताम् । [ यजु० १८।१२ ॥१२॥
भाषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको ब्रीहिधान्य प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे
देवतालोग मुझको जौ प्रदान करें, इस यज्ञके फलते देवतालोग मुझको उडद प्रदान करें, इस
यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको तिल प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको मूंग
प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको चना प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग
मुझको कंगनी प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको चीनक तंदुल प्रदान करें, इस
यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको तृणधान्य श्यामाक प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग
मुझको नीवार धान्य प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको गेहूँ प्रदान करें, इस
यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको मसूर प्रदान करें, ॥ १२ ॥
(१०८)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ अष्टमो-
-
मन्त्रः।
अश्म्माचमेमृत्तिकाचमेगिरयश्चमेपर्वताश्चमेसिकता
श्चमेवनस्प्पतयश्चमेहिरण्यञ्चमेयश्चमेश्यामञ्चमेलो
हञ्चमेसीसंञ्चमेत्रऍचमेयज्ञेनंकल्प्पन्ताम् ॥१३॥
ॐ अश्मेत्यस्य देवा ऋषयः । भुग्गितिशकरी छन्दः । अग्नि-
देवता । वि० पू० ॥ १३ ॥
(त्रपु
भाष्यम्-(अश्मा ) पाषाणः ( मृत्तिका ) प्रशस्ता मृत् (मिरयः ) क्षुद्रपर्वताः गोव-
र्द्धनार्बुदरेवतकादयः ( पर्वताः ) महान्तो मंदाहिमाळ्यादयः (सिकताः ) शर्कराः (वनस्प-
तयः ) पुष्पं विना फलवन्तः पनसोदुम्बरादयः (हिरण्यम् ) सुवर्णम् रजतंवा ( अयः )
लोहम् ( श्यामम् ) नाम्रलोहम् ( लोहम् ) लोहं कालायसम् (सीसम् ) सीसं प्रसिद्धम्
) रंगम् एते कार्यविशेषेषु ( मे ) मम ( यज्ञेन कल्यन्ताम् ) सम्पद्यन्ताम्
( यजु० १८ । १३ ] ॥ १३ ॥
भाषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवता लोग मुझको पाषाण प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे
देवता लोग मुझको श्रेष्ठ मृत्तिका प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको छोटे पर्वत
प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवता लोग मुझको मन्दरादि बडे पर्वत प्रदान करें, इस
फलसे देवता लोग मुझको बाल प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवता लोग मुझको वनस्पति
प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवता लोग मुझको सुवर्ण प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवता
लोग मुझको लोहा प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवता लोग मुझको तांबा प्रदान करें, इस
यज्ञके फलसे देवता लोग मुझको काँसी प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवता लोग मुझको
सीसा प्रदान करें, इस यज्ञके फलस देवता लोग मुझको रांग प्रदान करें अर्थान् मनुष्योंको इन
वस्तुओंसे कार्य कौशल करके अपनी उन्नति करनी चाहिये ॥ १३ ॥
मन्त्रः।
अग्निश्चमऽआपश्चमेवीरुधश्च्चमऽओषधयश्च्चमेकृष्ट
पच्याश्च्चमेकृष्टपच्याश्च्चमेग्राम्म्याश्चमेपशवआर-
गण्याश्चमेवित्तञ्चमेवित्तिश्चमेभृतञ्चमुभृतिश्च्चमेयज्ञे
नकल्प्पन्ताम् ॥ १४ ॥
ॐ अमिरित्यस्य देवा ऋषयः । निच्यदष्टिश्छन्दः । अनिदै-
वता । वि० पू० ॥१४॥
ऽध्यायः ८ भाप्यसहिता। (१०९) भाष्यम्-( अग्निः पृथिवीस्थो वह्निः ( आप.) अन्तरिक्षस्थानि जलानि ( वीरुधः) गुल्माः ( ओषधयः) फलपाकान्ताः (कृष्टपच्याः) भूमिकर्षणबीजवापादिकर्मभिनिष्पाद्या ओषधयः ( अकृष्टपच्याः ) स्वयमेवोत्पद्यमानाः नीवारगवेधुकादयः ( ग्रान्याः) ग्राम भवाः ( पशवः) गोऽश्वमहिषाजाविगदभाष्ट्रादयः (आरण्याः) अरण्ये भवाः पशवः हस्तिसिंहशरभमृग- गवयमर्कटादयः (वित्तम्) पूर्वलब्धम् (वित्तिः) भाविलाभः (भूतम् ) जालपुत्रादिकम् ( भूतिः) ऐश्वयं स्वार्जितम् । एतानि ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ) सम्पद्यन्ताम् [ यजु० १८।१४।। १४ ॥ भाषार्थ-इस यज्ञकं फलसे देवतालोग मुझको अग्निकी अनुकूलता प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको जलकी अनुकूलता प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको लता प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको फल पकनेतक रहनेवाली औषधि प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको जोतने वोनेसे प्राप्त होनवाली औषधि प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको स्वयं उत्पन्न होनेवाले नीवार गवेधुकादि प्रदान करें. इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको बिडालादि प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको हाथि आदि प्रदान करें; इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको पूर्वलब्ध प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको होनहार लाभ प्रदान करें; इस यज्ञके फलसे देवता लोग मुझको विद्यमान पुत्रादि प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको ऐश्वर्य प्रदान करें ॥ १४ ॥ मन्त्रः। वसुचमेवसतिश्चमेकम्र्मंचमेशक्तिश्च्चमेच्चमऽए- मैश्च्चमऽइत्याचमेगतिश्च्चमेयशेनकल्प्पन्ताम् ॥१५॥ ॐ वसुचेत्यस्य देवा ऋषयः । विराडार्षी बृहती छं० । अग्नि- देवता । वि० पू० ॥ १५ ॥ भाष्यम्- ( वसु ) बनं गवादिकम् ( वसतिः) वासस्थानं गृहम् (कर्म ) अग्निहोत्रादि ( शक्तिः ) तदनुष्ठानसामर्थ्यम् ( अर्थः ) अभिलषितः पदार्थः (एमः) प्राप्तव्योऽर्थः (इत्या) भावे क्यप् अयनमिष्टप्राप्त्युपायः (गतिः ) इष्टप्राप्तिः एते ( मे ) मम ( यज्ञेन कल्यन्ताम् ) सम्पद्यन्ताम् । [ यजु० १८१५] ॥ १५ ॥ भाषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको धन प्रदान करें: इस यज्ञक फलसे देवता लोग मुझको वासस्थान (गृह) प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अग्निहोत्रादि प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे दवतालोग मुझको उसके अनुष्ठानकी सामर्थ्य प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अभिलषित पदार्थ प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको प्राप्ति योग्य अर्थ प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको इष्टप्राप्तिका उपायः प्रदान करें. इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको इष्टकी प्राप्ति प्रदान करें ॥ १५ ॥ मन्त्रः। अग्निश्चमइन्द्रश्च्चमेसोमश्च्चमइन्द्रश्च्चमे
रुद्राष्टाध्यायी-
[ अष्टमो-
(११.)
सविताचमऽइन्द्रश्र्चमेसरस्वतीचमऽइन्द्रश्च्चमे
पूषाचमऽइन्द्रश्च्चमेसहस्पतिश्च्चमइन्द्रश्च्च
मेयज्ञेनकल्प्पन्ताम् ॥ १६ ॥
ॐ अग्निरित्यस्य देवा ऋषयः । निच्यद्राह्मी पंक्तिश्छन्दः ।
अग्निदेवता । वि० पू० ॥ १६ ॥
भाप्यम्-अथार्धेन्द्राणि जुहोलि अर्धस्येन्द्रदेवत्यत्वादर्धस्य नानादेवत्यत्वात् ( अमि)
(इन्द्रः) ( सोमः) ( इन्द्रः ) ( सविता ) ( इन्द्रः) (सरस्वती) (इन्द्रः) (पूषा )।
(इन्द्रः) ( बृहस्पतिः ) (इन्द्रः ) एन प्रसिद्धाः देवताः ( तैः ) समानभागत्वादिन्द्र एकैकय
सह पठ्यते यास्कोक्ता इन्द्रशब्दस्य नानार्थाः कार्या एवमग्रेऽपि कण्डिकाद्वये ज्ञातव्यम्
एते कल्पन्ताम् । [ यजु० १८ । १६ ॥ १६ ॥
भाषार्थ-इस यज्ञके फल से देवतालोग मुझको अग्निकी अनुकूलता प्रदान करें, इस यज्ञके
फलसे देवतालोग मुझको इन्द्रदेवकी अनुकूलता प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग
मुझको सोमदेवताकी अनुकूलता प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको इन्द्र प्रदान
करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको सविता प्रदान करें, इस यज्ञके फल से देवतालोग
मुझको इन्द्र प्रदान करें, यह यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको सरस्वती (वाणी) की
अनु-
कूलता प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको इन्द्र प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे
देवतालोग मुझको पूषादेवता प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको इन्द्र प्रदान
करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको बृहस्पति प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग
मुझको इन्द्रकी अनुकूलता प्रदान करें ॥ १६ ॥
मन्त्रः।
मित्रश्चमऽइन्द्रेश्चमेवरुणश्च्चमऽइन्द्रश्चमेधाता
चमऽइन्द्रश्च्चमेत्त्वष्टाचमऽइन्द्रश्च्चमेमस्तश्च्च
मइन्द्रश्च्चमविश्वैचमेदेवाऽइन्द्रश्च्चमेयझेनक-
ल्प्पन्ताम् ॥ १७॥
ॐ मित्र इत्यस्य देवा ऋषयः । विराट् शक्करी छन्दः । अग्नि-
वता । वि० पू० ॥ १७ ॥
भाष्यम्--( मित्रः ) ( वरुणः ) धाता ( त्वष्टा ) ( मरुतः) (विश्वेदेवाः ( प्रसिद्धाः )
प्रत्येकमिन्द्रः । एते ( मे ) मम (यज्ञेन कल्पन्ताम् ) सम्पधन्ताम् [यजु०१८।१७] ॥१७॥
ऽध्यायः ८]
भाष्यसहिता।
(१११)
भाषार्थ-मित्रदेवता, इन्द्र, वरुण, इन्द्र, धाता, इन्द्र, त्वष्टा, इन्द्र, मरुत, इन्द्र:
विश्वेदेवा
देवता, और इन्द्रकी अनुकूलता यह सब इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको प्रदान करें।।१७
मन्त्रः।
पृथिवीचमाइन्द्रश्च्चमेन्तरिक्षञ्चमऽइन्द्रश्च्चमे-
द्योश्चमऽइन्द्रश्च्चमेप्तमांश्चमऽइन्द्रेश्चमेनक्षत्रा-
णिचमऽइन्द्रश्चमेदिशश्चमऽइन्द्रेश्चमेयज्ञेनक
ल्पन्ताम् ॥ १८॥
ॐ पृथिवी चेत्यस्य देवा ऋषयः । भुरिक्छक्करी छ । अग्नि-
देवता । वि० पू० ॥ १८ ॥
भाष्यम्-(पृथिवी) पृथिवी ( अन्तरिक्षम् ) अन्तरिक्षम् ( द्यौः) दिवस्त्रलोक्यम्
(समाः )वर्षाधिष्ठान्यो देवताः ( नक्षत्राणि ) अश्विन्यादीनि (दिशः ) प्रागाद्याः एते ( मे )
-मम ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ) सम्पद्यन्ताम् । [ यजु० १८ १८ ] ॥१८॥
भाषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालोग .मुझको पृथिवी प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे
देवतालोग मुझको इन्द्र प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अन्तरिक्षलोक प्रदान
करें, इस यन्त्रके फलसे देवतालोग मुझको इन्द्र प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देववालोग
मुझको द्यौ प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको इन्द्र प्रदान करें, इस यज्ञके
फलसे देवतालोग मुझको वर्षाके अधिष्ठातृदेवत्ता प्रदान करें, इस यझके फलसे देवतालोग
मुझको इन्द्र प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको नक्षत्र प्रदान करें, इस यज्ञके
फलसे देवतालोग मुझको इन्द्र प्रदान करें, इस यज्ञके देवतालोग मुझको दिक् प्रदान करें, इस
यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको इन्द्र ऐश्वय प्रदान करें ॥ १८ ॥
मन्त्रः ।
अशुश्चमेरश्म्मिश्चमेदाब्भ्यश्चमेधिपति-
श्चमउपाशुश्चमेन्तर्यामश्चमऽऐन्द्रवा-
युवश्चमे मैत्रावरुणश्चमऽ आश्विनश्चमे
प्रतिष्णस्थानश्च्चमेशकश्र्चमेमन्धीचमेयुज्ञेनं
कल्प्पन्ताम् ॥ १९॥
(११२) रुद्राष्टाध्यायी- [ अष्टमो- ॐ अंशुरित्यस्य देवा ऋषयः । निच्यदत्यष्टिश्छं० । अग्निर्दे। वता । वि० पू० ॥ १९॥ भाष्यम्-अथ ग्रहान् जुहोति, अचादयः सोमग्रहविशेषाः सोमप्रकरणे प्रसिद्धाः । अंशुः ) ( रश्मिः) ( अदाभ्यः) अदाभ्यस्यैव गृह्यमाणत्वदशायां पृथकूकृत्य ग्रहणे रश्मिशब्देन निर्देशः रश्मीनां तद्ग्रहणे साधनत्वात् अह्नो रूपे सूर्यस्य रश्मिषु इति ८१४८ मंत्रलिंगात् ( अधिपतिः ) अधिपतिशब्देन निग्राह्यो विवक्षितः तस्य ज्येष्ठत्वादाधिपत्यम् । ज्येष्ठो वा एष ग्रहाणाम् ' इतिश्रुतेः ( उपांशुः ) ( अन्तर्यमः ) (ऐन्द्रवायवः ) ( मैत्रा- वरुणः) आश्विनः ) ( प्रतिप्रस्थानः ) प्रतिप्रस्थानशब्देन निग्राह्यो विविक्षितः ( शुक्रः) ( मन्थी ) एते प्रसिद्धाः ग्रहाः ( मे ) मम ( यज्ञेन) ( कल्पन्ताम् ) क्लप्ता भवन्तु । [ यजु० १८।१९] ॥ १९ ॥ भाषार्थ--इसके फलसे देवतालोग मुझको अंशु प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको रश्मि प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अदाभ्य प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको निग्राह्य प्रदान करें,इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको उपांशु प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अन्तर्याम प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको ऐन्द्रवायव ग्रह प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको मैत्रावरुण प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको आश्विन प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोंग. मुझको प्रतिप्रस्थान प्रदान करें इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको शुक्र प्रदानकरें इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको मंथीग्रह प्रदान करें, यह सब यज्ञके ग्रहपात्र हैं इनकी प्राप्ति यज्ञ करनेकी सामर्थ्य है ॥१९॥ मन्त्रः। आग्रयणश्च्चमेवैश्वदेवश्च्चमेध्रुवश्चमेवैश्वानर ३च्चमऽऐन्द्राग्नश्र्चमेमहाबैश्वदेवश्चमेमरुत्व तीयांश्चमेनिष्कॅवेल्ल्यश्चमेसावित्रश्चमेसारस्व- तश्चमेपानीवतश्चमे हारीयोजनश्चमेयज्ञेनक- ल्प्पन्ताम् ॥ २०॥ ॐ आग्रयण इत्यस्य देवा ऋषयः । निच्युदत्यष्टिश्छन्दः । अग्निदेवता । वि० पू० ॥२०॥ भाष्यम्-( आग्प्रणः ) (वैश्वदेवः ) प्रातःसवनगतः आधो वैश्वदेवः (ध्रुवः ) ध्वनाम ग्रहः (वैश्वानरः ) ( ऐन्द्रायः ) महावैश्वदेवः ) तृतीयसवनमतः ( मरुत्वतीयाः) महामरू-
ऽध्यायः ८]
भाष्यसहिता।
(११३)
त्वतीयाः (निष्कवल्यः ) सावित्रः ) ( सारस्वतः ) अभिषेचनीये सरस्वतीनामपां ग्रहणमेव
सारस्वतो ग्रहः सारस्वतं ग्रहं गृह्णातीति तत्राम्नानात् (प.त्नीवतः ) ( हारियोजनः ) एते
मम ( यजेन कल्यन्ताम् । यजु० १८।२० ॥ २० ॥
भाषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको आग्रयण ग्रह प्रदान करें,इस यज्ञके फलसे
देवतालोग मुझको वैश्वदेव प्रदान करें. इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको ध्रुवग्रह प्रदान
करें, इस यज्ञ के फल से देवतालोग मुझको वैश्वानर प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग
मुझको ऐन्द्राग्न प्रदान करें, इस यज्ञ के फलसे देवतालोग मुझको वैश्वदेव प्रदान करें, इम
यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको मरुत्वतीय प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको
निष् वा प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको सावित्र प्रदान करें, इस यज्ञके
फलसे देवतालोग मुझको सारस्वत ग्रह प्रदान करें,इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको पाल्की
वत ग्रह प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको हारियोजन ग्रह प्रदान करें ॥२०॥
मन्त्रः।
--
खुचश्चमेचममाश्चमेवायुध्यानिचमेद्रोणकलश-
श्चमेग्यावाणश्चमेधिषवणेचमेपूतभृञ्चमऽआधव-
नीयश्चमेवेदिश्चमेबर्हिश्चमेवभथश्चमेस्वगाका-
रश्चमेयज्ञेनेकल्प्पन्ताम् ॥ २१॥
ॐ स्रुच इत्यस्य देवा ऋषयः । विराट् धृतिश्छं। अग्निदेवता
वि० पू० ॥२१॥
भाष्यम्-(सुचः ) जुह्वादयः ( चमसाः) चमसानि ग्रहपात्राणि (वायव्यानि)
पात्रविशेषाः (द्रोणकलशः) (ग्रावाणः ) ( अधिषवणे ) काष्ठफलके ( पूतभृत् )
( आधवनीयः ) द्वौ सोमपात्रविशेषौ ( वेदिः) (बर्हिः) (अवभृथः ) (स्वगाकारः)
शम्युवाकः तेन यथास्वं देवतानां हविरंगीकारात् । एते ( मे ) मम ( यज्ञेन कल्पन्ताम् )
सम्पद्यन्ताम् । [ यजु. १८२१] ॥ २१ ॥
भाषार्ष-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको चुक् प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवता
लोग मुझको चमस प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको वायव्य प्रदान करें,
इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको द्रोणकलश प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग
मुझको ग्राम प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अधिषवण प्रदान करें, इस
यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको पूतभृत् प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको
आधवनीय प्रदान कर, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको वेदि प्रदान करें, इस यज्ञके
फलसे देवतालोग मुझको बहिंप्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवता लोग मुझको अवभृथ प्रदान
करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको शम्युवाकनाम प्रदान करें ॥ २१ ॥
(११६)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ अष्टमों-
म्तोमः स्वर्ग लोकमायंस्तथैवैतद्यजमानः सर्वान्कामानाप्ता युग्भिः स्तोमः स्वर्ग लोकमेति "
इत्यादि । एका च मेति सुगमम् । [ यजु० १८ । २४ ] ॥ २४ ॥
भाषार्थ-इस यज्ञ के फलसे देवतालोग मुझको एक प्रदान करें, इस यज्ञकै फलसे देवता
लोग मुझ को तीन प्रदान करें, इस यज्ञके देवतालोग मुझको पाँच प्रदान करें, इस यज्ञके
फलसे देवतालोग मुझको सात प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको नौ प्रदान
करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको ग्यारह प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग
मुझको तेरह प्रदान करें. इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको पंद्रह प्रदान करें, इस यज्ञके
फलसे देवतालोग मुझको सत्रह प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको उन्नीसप्रदान
करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको इक्कीस प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग
मुझको तेईस प्रदान करें, इस यज्ञके फल से देवतालोग मुझको पञ्चीस प्रदान करें, इस यज्ञके
फलसे देवतालोग मुझको सत्ताईस प्रदान करें. इस यज्ञ के फलसे देवतालोग मुझ को उन्तीस
प्रदान करें, इस यज्ञ के फलसे देवतालोग मुझको एकतीस प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे
देवतालोग मुझको तेंतीस प्रदान करें ॥ २४ ॥
विशेष--इस मंत्रमें गणित विद्या भी कथन की है यज-धातुका संगितकरण अर्थ होनेसे
किसी संख्याका जोड़देना और दान अर्थ से व्यय करदेना है कारण गुणन भाग वर्ग घन
मूल आदि यह सब इसीके अन्तर्गत होते हैं, संख्याके जोड़नेको योग जैसे ५+५=१० और
अनेकबार एकसी संख्याके जोड़नेको गुणन कहवेहें जैसे ४४५-२० चारको पाँच स्थानमें
जोड़नसे वीस होते हैं,चारको चौगुना किया तो चारके वर्ग सोलह हुए इसी प्रकार अन्तरसे
भाग वर्ग मूल घन आदि निष्पन्न होतेहैं, तो संख्या बुद्धिमानोंको यथायोग्य जाननी उचित
है । मूलमात्र दिखलाया है, अङ्कगणित वीजगणित आदि सब संख्याएं इससे उत्पन्न
होतीहैं ॥ २४॥
मन्त्रः।
चतस्रश्चमेष्टौचमेष्टीचममेद्वादशचमेद्वादशचमे -
षोडशचमेषोडशचमेविठशतिश्च्चमेविशतिश्च
मेचतुर्विशतिश्च मेचतुर्छिशतिश्चमेष्टाविठ
शतिश्चमेष्टाविंशतिश्चमेदार्टिशचमेहात्रि-
शचमेषइबिठशचमेषइत्रिशचमेचत्वारिशचं
मेचत्वारिशचमेचतुश्चत्वारिठशचमेचतुश्च-
वारिठशचमेष्टाचत्वारिशचमेयुज्ञेनकल्प्पन्ता-
म् ॥ २५॥
ऽध्याय: ८] भाष्यसहिता। (११७) ॐ चतस्त्रश्चेत्यस्य देवा ऋषयः । उत्कृतिश्छन्दः । अग्निदेवता । वि० पू० ॥ २५ ॥ भाष्यम-एककण्डिकया युग्मम्तोमान् जुहोति । अथ योग्यतो जुहोति चतन्त्रश्चन इति ९।३ । ३ । ४ तत्फलं स्वर्गप्राप्तिः । एतद्वै छन्द्रा स्यद्रुवन् यातयामा वा अयुजस्तोमायुग्म- भिर्वयठ.स्तोमैः स्वर्ग लोकमयामेति तथतद्यजमानो युग्मभिम्तोमैः स्वर्ग लोकमेति" इति श्रुतेः । पूर्वपूर्वमुत्तरेण सम्बन्धेनातिवृक्षारोहणवत् तथा च श्रुतिः पूर्वपूर्वमुत्तरेणोत्तरेण संयु- नक्तिः यथा वृक्षं रोहन्नुत्तरामुत्तराशाग्वा समालम्भोहेत्तादृक्तत् " इति । अत्रोक्ता संख्या संख्येयनिष्ठा । एते यज्ञेन कल्यन्ताम् । । यजु० १८ । २५ ] ॥ २५ ॥ भाषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालाग मुझको चार संख्याके स्तोम प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको आठ प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको बारह प्रदान करें, इम यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको सोलह प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको वीस प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको चौबीस प्रदान करें इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अट्ठाईस प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको बत्तीस प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको छत्तीस प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवता लोग मुझको चालीस प्रदान करें, इस यज्ञ के फलसे देवतालोग मुझको चौवालीस प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अडतालीस प्रदान करें * ॥ २५ ॥ मन्त्रः॥ त्र्यविश्चमेत्र्यवीचमेदित्यवादचमेदित्यौहीचमे- पञ्चाविश्चमेपञ्चावीचमेत्रिवत्सश्चमेत्रिवत्सार्च- मेतुर्युवादमेतुथ्योंहीचमेयज्ञेनकल्प्पन्ताम्॥३६॥ ॐ त्र्यविश्चेत्यस्य देवा ऋपयः । ब्राह्मी बृहती छन्दः । अग्नि- देवता । वि० पू० ॥२६॥ भाष्यम्-कण्डिकाद्वयं वयोहोमे विनियुक्तम् । तथा च श्रुतिः--अथवयासि जुहोति व्यविश्व म इति पशवो वै वयासि पशुभिरेवैनमेलदन्तेन प्रीणात्यथो पशुभिरवैनमेतदन्नेना- भिषिञ्चति' इति । अभिषणमासात्मकः कालः (व्यविः ) त्रयोऽवयवो यस्य व्यविः सार्धसंव- सरो वृषः तादृशी गौः ( व्यवी ) (दित्यवाद ) द्विसंवत्सरो वृषो दित्यवाट् तादृशी गौ- * एक दा तीन चार से इस बातका भाव भी सूचित होता है कि, एकास वही एक अद्वितीया ब्रह्म- शक्ति, दोसे दो सुपर्ण, तीनसे वेदत्रयी वा तीनकाल, चारसे चार वेद, पांचसे पांच बाण, छःसे . छ: ऋतु, सातसे सात सागर, आठसे आठ दिशा वा आठ लोकपाल वा आठ वसु लेने, नौसे अंक नौ इसी प्रकार आगे जानना।
(११८ रुद्राष्टाध्यायी- [ अष्टमो.- (दित्यौही ) ( पञ्चाविः ) पञ्चावयो यस्य सः पञ्चाविः । सार्द्धद्विसंवत्सरो वृषः ( पञ्चावी) ताशी गोः (त्रिवत्सः ) त्रयो वत्सा यस्य सः त्रिवत्सः त्रिवर्षो वृषः (त्रिवत्सा ) तादृशी गौः ( तुर्यवाहू ) सार्वत्रिवर्षों वृषः ( तुयाँही ) तादृशी गौः एते ( मे ) मम ( यज्ञेन कपन्ताम् ) सम्पद्यन्ताम् । [ यजु० १८।२६॥ २६ ॥ भाषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको डेढवर्षकी आयुका बछड़ा प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको डेढवर्षकी आयुकी बछिया प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको दो वर्षका वृष प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको दोवर्षकी गौं प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको ढाई वर्षका वृष प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको ढाई वर्षकी गौ प्रदान करें, इस यन्नके फलसे देवतालोग मुझको तीन वर्षका वृष प्रदान करें इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको तीन वर्षकी गाय प्रदान करें, इस पके फलसे देवतालोग मुझको साढेतीन वर्षका वृष प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको साढे तीन वर्षकी गौ प्रदान करें ॥ २६ ॥ पष्ठवाटचमेपष्ठीहीचमऽउक्षाचमेवशाचमऽऋषभ श्च्चमेवेहच्चमेनड्वॉश्च्चमेधेनुश्चमेयज्ञेनंकल्प्प न्ताम् ॥ २७॥ ॐ पष्ठवाडित्यस्य देवा ऋषयः। निच्यूद्वायुष्णिक् छन्दः अग्निदेवता । वि० पू० ॥२७॥ भाष्यम्-(पष्ठवाट् ) पष्ठं वर्षचतुष्कं वहतीति पष्ठवाट् चतुर्वर्षो वृषः (पष्ठौही) ताशा गौः ( उक्षा ) सेचनक्षमो वृषः ( वशा ) वन्ध्या गौः (ऋषभः ) अतियुवा वृषः (वेहत् ) गर्भघातिनी गौः ( अनड्वान् ) अनः शकटं वहतीत्यनड्वान् शकटवाहनक्षमोवृषः (धेनुः ) नवप्रसूता गौः एते (मे ) मम ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ) स्वस्वव्यापारसमा भवन्तु । यद्वा एते यज्ञेन मम कल्पन्ताम् । मह्यनुपभोगक्षमा भवन्त्वित्यर्थः । एवं पूर्वत्र । [ यजु० १८ा२७] ॥ २७ ॥ भाषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको चार वर्षका वृष प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको चार वर्षकी गौ प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको सेचनसमर्थ वृष प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको वन्ध्या गौ प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अतियुवा वृष प्रदान करें, इस यज्ञक फलसे देतातालोग मुझको गर्भघातिनी गौ प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको शकट (छकड़ा) वहन करनेमें समर्थ वृष प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको नवप्रस्ता गौ प्रदान करें, यह सब यज्ञके संपादन के निमित्त हैं ।। २७ ।।
ऽध्यायः ८] भाष्यसहिता। (११९ ) मन्त्रः। बाजायस्वाहाप्रसुवायुस्वाहापिजायस्वाहास्वाहाक्रत वेस्वाहावसंवेस्वाहाहपतयेस्वाहालैमुग्धायस्वाहामु- गधार्यवैन:शिनायस्वाहाविन शिनेऽआन्त्यायुनाय स्वाहान्त्यायभौवनायुस्वाहामुवनस्पपतये स्वाहाधि- पतये स्वाहाप्रजापतयेस्वाहा ॥ इयन्तुराण्म्मित्राय॑य न्तासियमनऽऊर्जेत्वावृष्टयैत्वाप्प्रजानान्त्वाधिप त्याय ॥२८॥ ॐ वाजायेत्यस्य देवा ऋषयः । पूर्वार्द्धस्याची बृहती छ । अग्निदेवता । वि० पू० ॥२८॥ भाष्यम्-अथ नामग्राहहोमः । तथा च श्रुतिः-[ अथ नामग्राहं जुहोति वाजायस्वा- हेत्येतद्वै देवाः सर्वान्कामानाप्त्वाथैतमेव प्रत्यक्षं प्रीणातीति ९।३।३।८ ] ( वाजाय ) वाजो- ऽनं तस्मै (स्वाहा ) स्वाहा वाजादीनि चैत्रादिमासानां नामानि तन्नाम गृहीत्वा होतव्यमि- त्यर्थ । अन्नप्राचुर्याच्चैत्रोऽअन्नरूपः । ( प्रसवाय ) अनुज्ञारूपाय जलक्रीडादौ अभ्यनुज्ञादा- नात्प्रसवो वैशाखः तस्मै । ( अपिजाय) अप्सु जामतऽइत्यपिजः जलक्रीडारतत्वादपिनो ज्येष्ठः तस्मै० ( क्रतवे ) यागरूपाय चातुर्मास्यादियागप्राचुर्यात् ऋतुराषाढः तस्मै० ( वसवे ) वासयति वसुः चातुर्मास्ये यात्रानिषेधाद्वसुः श्रावणः । । अहर्पतये ) दिनस्वामिने सूर्यरूपाय बापकरत्वाद्भाद्रपदस्याहर्पतित्वं तस्मै० । ( मुग्धाय ) अहे तुषारादिना मोहरूपाय दिवसाय तुषारबाहुल्यान्मुग्धमह आश्विनः। (अमुग्वाय वैन शिनाय ) विनश्यतीति विनंशी विनंश्येव वैनंशिनः स्वार्थकोऽण अल्पघटिकावत्त्वेन विनाशशीलाय कार्तिकाय स्नाननियमादिना पापना- शकत्वादमुग्धाय मोहनिवर्तकाय कार्तिकाय० ( अविनंशिने आन्त्यायनाय ) न विनश्यतीत्व विनंशी तस्मै विनाशरहिताय अन्ते सर्वेषां नाशे भवमन्त्यं तदयनं चेत्यन्त्यायनं तत्र भवः आन्त्यायनस्तस्मै । सर्वनाशेऽप्यवशिष्टायात एवाविनंशिने विष्णुरूपाय मार्गशीर्षाय "मासानां मार्गशीर्षास्मीति । भगवद्गी० १०॥३५" । (आन्त्याय भौवनाय ) भुवनानामयं भौवनः अन्ते स्वरूपे भव आन्त्यस्तस्मै । लोकस्वरूपपुष्टिकरत्वात्तत्र भवत्वं जाठराग्नेर्दीप्तिकरत्वेन पुष्टि- करत्वं पौषस्य । ( भुवनस्प पतये) भूतजातस्य पालकाय माघाय स्नानादिना पुण्यजनकत्वेन
(१२२)
रुद्राष्टाध्यायी-
[नवमो-
अथ नवमोऽध्यायः ।
मन्त्रः।
॥ हरिः ॐ ॥ ऋचंबाचम्प्रपद्येमनोयजुत्प्प्रपद्येसाम
प्पाणम्प्रपद्येचक्षुत्श्रोप्रपंद्य॥ बागोजेन्सहोजोमयि
प्राणापानौ ॥ १॥
ॐ ऋचं वाचमित्यस्य दधीच ऋषिः। जगती छन्दः ।
लिङ्गोक्ता देवता । शान्तिपाठे विनियोगः ॥ १॥
भाष्यम्-(ऋचम् ) ऋग्रूपाम् (बाचम् ) वाचम् (प्रपद्ये ) प्रविशामि शरणं
वजामि ( यजुः ) यरूपम् ( मनः ) मनः ( प्रपद्ये ) प्रविशामि ( प्राणम् ) प्राण:
रूपम् (साम) साम (प्रपद्ये ) प्रविशामि ( चक्षुः) चक्षुरिन्द्रियम् (श्रोत्रम् )
श्रोत्रेन्द्रियं च (प्रपद्ये ) प्रविशामि (वाक् ) वागिन्द्रियम् (ओजः) मानसं बलं
धाष्टर्यम् ( ओजः ) शारीरं बलम् ( प्राणापानौ ) उच्छ्वासनिश्वासवायू च एते ( सह )
एकीभूताः सन्तः ( मयि ) मयि वर्तन्ते । वागादिग्रहणं सप्तदशावययवोपलक्षणं सप्त.
सप्तदशाक्यवं प्रजापतेः लिङ्गं प्रपद्ये इत्यर्थः । त्रयीविद्यां लिंगशरीरं च प्रपन्नं प्रवग्र्यो न नाशये-
दिति भावः। [ यजु० ३६ । १] ॥ १ ॥
भाषार्थ-ऋचारूप वाणी की शरण होता हूँ. यजुःरूप मनकी शरण प्राप्त होता हूँ, प्राण-
रूप सामकी शरण होता हूँ, चक्षुइन्द्रिय, श्रोत्रइन्द्रियकी शरण होता हूँ, मनका बल शारी-
रिक कल उच्छ्वास निश्वास वायु यह स्वस्थ होकर मुझमें स्थित हों ।। १ ।।
विशेष-वागादिग्रहणसे सप्तदश अवयवका उपलक्षण है, सप्तदश अवयव युक्त प्रजा-
पतिका शरीर है, उसकी शरण होता है, त्रयीविद्यारूप लिङ्ग शरीर है, परमात्माकी कृपासें
सब अवयव बल सम्पन्न हों ॥१॥
)
मन्त्रः ॥
यन्मैछिद्रञ्चक्षुषोहृदयस्यमनसोबार्ततृणम्बहुस्प्पति
मर्मत धातु ॥ शन्नोभवतु भुवनस्ययस्प्पतिः ॥२॥
ॐ यन्म इत्यस्य दधीच ऋषिः । पंक्तिश्छन्दः । बृहस्पतिर्दै-
वता । शान्तिपाठे विनियोगः ॥२॥
ऽध्यायः ९] भाष्यसहिता। (१२३) भाष्यम--(ने) मन ( चक्षुषः ) चक्षुरिन्द्रियस्य ( यत् ) या (छिद्रम् ) अवखण्डनं: जातं प्रवर्गाचरणेन (हृदयस्य ) बुद्धेर्वा यत् छिद्रं जातम् (मनसः ) मनसः (वा) यत् ( अतितृणम् ) अतिर्हिसितम् । प्रवग्याचरणेन यच्चक्षुर्बुद्धिमन्सां व्याकुलत्वं जातम् ( बृहस्पतिः ) बृहतां पतिर्देवगुरुः ( मे ) मम ( तत् ) छिद्रमतितृणं ( दधातु ) संदधातु छिद्र निवर्तयतु ( भुवनस्य भूतजातस्य ( यः ) ( पतिः) अधिपतिः प्रवरूपो यज्ञः सः ( नः ) अस्माकम् ( शम्) मुखरूपः ( भवतु ) भवतु । बृहस्पतिना छिद्रापाकरणात्प्रवर्यः कल्याणरूपोऽस्त्यिन्यर्थः । [ यजु० ३६ । २] ॥ २ ॥ भाषार्थ-मेरी चक्षु इन्द्रियकी जो न्यूनता है परमात्मा मेरी उस न्यूनता मन बुद्धिकी व्याकुलताको निवृत्त करो, हमारे निमित्त कल्याण हो, जो संपूर्ण भुवनोंका अधिपति है वह हमको सुखरूप हो, अर्थात् त्रिभुवनके अधिपति देवता हमारा कल्याण करें ।। २॥ मन्त्रः। भूर्भुवःस्वन्तर्क्सवितुर्वरेण्यम्भर्गोदेवस्य धीमहि ॥ धियोयोन प्रचोदयात् ॥ ३॥ ॐ तत्सवितुरित्यस्य विश्वामित्र ऋषिः। निच्युद्गायत्री छन्दः। सविता देवता । वि० पू० ॥३॥ भाष्यम्-यः सविता देवः (नः) अस्माकम् ( धियः ) बुद्धीः (प्रचोदयात् ) प्रेर- येत्-( तत् तत्तस्य सर्वासु श्रुतिषु प्रसिद्धस्य ( देवस्य ) द्योतमानस्य (सवितुः ) सर्वान्तर्या- मितया प्रेरकस्य जगत्स्रष्टुः परमेश्वरस्यात्मभूतम् ( वरेण्यम् ) सर्वैपास्यतया ज्ञेयतया च सम्भ- जनीयम् ( भर्गः ) अविद्यातत्कार्ययोजनाद्भर्गः स्वयज्योतिः परब्रह्मात्मकं तेजः (धीमहि.) तद्योहं सोऽसौ योऽसौ सोहमिति वयं ध्यायेम । यद्वा-तदिति भगोविशेषणं सवितुर्देवस्य तत्तादृशं भर्गो धीमहि किं तदपेक्षायामाह-य इतीति लिंगव्यत्ययः । यद्भर्गों धिया प्रचोदयादिति तद्ध्या- येमेति समन्वयः । यद्वा--यः सविता सूर्यः ‘धियः । कर्माणि 'प्रचोदयात् ' प्रेरयति तस्य सवितुः ' सर्वस्य प्रसवितुर्देवस्य द्योतमानस्य सूर्यस्य तत्सदृश्यमानतया प्रसिद्धं वरेण्यं सर्वैः सम्भजनीयं भर्गः' पापानान्तापकन्तेजोमण्डलम् 'धीमहि ' ध्येयतया मनसा धारयेम, यद्वा भर्गः शब्देनान्नमभिधीयते । यः सविता देवो धियः प्रचोदयति तस्य प्रसादाद्भर्गोन्नादि- लक्षणं फलं धीमहि धारयामः । तस्याधारभूता भवेमेत्यर्थः । भगवान् शंकराचार्यस्तु -' अथः सर्वदेवात्मनः सर्वशक्तेः सर्वावभासकतेजोमयस्य परमात्मनः सर्वात्मकत्वद्योतनाथं सर्वात्मक त्वप्रतिपादकगायत्रीमहामन्त्रस्योपासनप्रकारः प्रकाश्यते, तत्र गायत्री प्रणवादिसप्तव्याहृत्युपेतां शिरः समेतां सर्ववेदसारमिति वदन्ति । एवं विशिष्टा गायत्री प्राणायामैरुपाम्या सपणवन्या- हृतित्रयोपेता प्रणवान्ता गायत्री जपादिभिरुपास्या तत्र शुद्धगायत्री प्रत्यक्बौक्यबोधिका
(22)
रुद्राष्टाध्यायी-
[नवमो-
ब्रह्मणा
धियो यो नः प्रचोदयात् ' इति नोऽस्माकं धियो बुद्धीः यः प्रचोदयात् प्रेरयेदिति सर्व
बुद्धिः संज्ञान्तःकरणप्रकाशकसर्वसाक्षी प्रत्यगात्मेत्युच्यते । तस्य प्रचोदयाच्छब्दनिर्दिष्ट
म्यात्मनः म्वरूपभूतं परब्रह्म तत्सवितुरित्यादिपदैनिर्दिश्यते । तत्र ॐतत्सदितिनिर्दिशो
ब्रह्मण त्रिविधः स्मृतः '' इति तच्छब्देन प्रत्यग्भूतं स्वतः सिद्धं परब्रह्मोच्यते, सवितारेति सृष्टि-
स्थितिलयलक्षणकस्य सर्वप्रपञ्चस्य समस्तद्रुतविश्वमस्याधिष्ठानं लक्ष्यते : वरेण्यमिति
सर्ववरणीयं निरतिशयानन्दरूपम् । भर्ग इत्यविद्यादिदोषभर्जनात्मकज्ञानकविषयत्वम् । देवस्येति
सर्वद्योतनात्मकाखण्डचिदेकरसम् । सविदेवस्येत्येत्यत्र षष्ठयों राहोः शिरोवद्रौपचा-
रिकः । बुद्ध्यादिसर्वदृश्यसाक्षिलक्षणं यन्मे स्वरूपन्तत्सर्वाधिष्ठानभूत परमानन्द
निरन्तसमस्तानर्थरूपं स्वप्रकाशचिदात्मकं ब्रह्मेत्येवं धीमहि ध्यायेम । एवं सति सह
म्वविवर्तजडप्रपञ्चेन रज्जुसपैन्यायेनापवादसामानाधिकरण्यरूपमेकत्वं सोय-
मिति न्यायेन सर्वसाक्षित्रत्यगात्मनो ब्रह्मणा सह तादात्म्यरूपमेकत्वंभवतीति । सर्वा-
स्मकब्रह्मवोधकोऽयं गायत्रीमंत्र: सम्पद्यते सप्तव्याहतीनामयमर्थः । भूरिति-
सन्मात्रमुच्यते, भुव इति--सम्भावयति प्रकाशयतीति व्युत्पत्त्या चिद्रूपमुच्यते सुव्रियत इति
व्युत्पत्त्या म्वरिति---युष्ठु सात्रियमाणसुखस्वरूपमुच्यते, मह इति--महीयते पूज्यत इति
व्युत्पत्त्या सर्वातिशयत्वमुच्यते, जन इति--जनयति इति जनः सकलकारणत्वमुच्यते, तप
इति-सर्वतेजोरूपत्वम्, सत्यमिति--सर्वबाधारहितत्वम् । एतदुक्तं भवति--यल्लोके स्वरूपं तदो.
कारवाच्यं ब्रह्मैव आत्मनोऽभ्य सच्चिद्रूपस्य भावादिति, अथ भूरादयः सर्वलोकाः ॐकारवाच्य-
ब्रह्मात्मकाः न तद्व्यतिरिक्तं किञ्चिदस्तीति व्याहृतयोऽपि सर्वात्मकब्रह्मबोधिकाः गायत्रीशिर-
सोऽप्ययमेवार्थः " आपोज्योतीरसो मृतं ब्रह्मभूर्भुवः स्वरोम् " आप इत्यामोतीति व्युत्पत्त्या
व्यापित्वमुच्यते । ज्योतिरितिपकाशरूपत्वम् । रस इति सर्वातिशयत्वम् । अमृतमिति--मर-
णादिसंसारनिर्मुक्तत्वं सर्वव्यापि सर्वप्रकाशकसर्वोत्कृष्टनित्यमुक्तमात्मरूपं सच्चिदानंदात्मकं
यदोङ्कारवाच्यं ब्रह्म तदमहस्मीति गायत्रीमन्त्रार्थः ।
गुहाशयब्रह्महुताशनोहं कर्तेदमंशाख्य-
हविहुतं सत् । विलीयते नेदमहं भवानीत्येषपकारस्तु विभिद्यतेऽत्र ॥ यदस्ति यद्भाति तदा-
स्मरूपं नान्यत्ततो भाति न चान्यदस्ति । स्वभावसंवित्प्रतिभाति केवला ग्राह्यं ग्रहीतेति मृङ्व
कल्पना" ॥ इति शंकरभगवतः कृतौ गायत्रीभाष्यम् । योगियाज्ञवल्क्यस्तु..
तच्छब्देन तु यच्छन्दो बोद्धव्यः सततं बुधैः ।
उदाहृते तु यच्छब्दे तच्छब्दः स्यादुदाहृतः ॥ १ ॥
सविता सर्वभूतानां सर्वभावान्प्रसूयते ।
सवनात्पावनाच्चैव सविता तेन चोच्यते ॥ २ ॥
दीव्यते क्रीडते यस्मादू द्योतते रोचते दिवि ।
तस्माद्देव इति प्रोक्तः स्तूयते सर्वदैवतैः ॥ ३ ॥
चिन्तयामो वयं भर्ग धियो यो नः प्रचोदयात् ।
धर्मार्थकाममोक्षेषु बुद्धिवृत्तीः
पुन:पुनः ॥ ४ ॥
ऽध्यायः २ भाष्यसहिता। (१२५) बस्जपाके भवेद्धातुर्यस्मात्पाचयते ह्यसौ। भाजते दीप्यते यस्माजगच्चान्ते हरत्यपि ॥ ५ ॥ कालाग्निरूपमास्थाय सप्तार्चिः सतरश्निभिः । भाजते यत्स्वरूपेग तस्माद्भर्गः स उच्यते ॥ ६ ॥ भेति भीषयते लोकान् रेति रञ्जयते प्रजाः । गत्या गच्छत्यजनं यो भगवान्भर्ग उच्यते ॥ ७ ॥ वरेण्यं वरणीयं च संसारभयभीरुभिः । आदित्यान्तर्गतं यच्च भगाख्यं वा मुमुक्षुभिः ॥ ८ ॥ जन्ममृत्युविनाशाय दुःखस्य त्रिविधस्य च । ध्यानेन पुरुषो यस्तु दृश्यः स सूर्यमण्डले ॥ ९ ॥ भाषार्थ-यह गायत्री मंत्र हो सर्वोपरि मंत्र है यही ब्रह्म की उपासना वा ध्यानका परम मंत्र है इसके सौ अर्थ मिलते हैं संस्कृतमें कई अर्थ हमने लिखे, संक्षेपसे भापार्थ लिखतेहैं । उस प्रकाशात्मक प्रेरक अन्तर्यामी विज्ञानानन्दस्वभाव, हिरण्यगर्भोपाध्यवच्छिन्न अथवा आदित्यके अन्तर स्थित पुरुष वा ब्रह्मके सबसे प्रार्थनाकियेहुए संपूर्ण पापके वा संसारके आवागमन दूर, करने में समर्थ, सत्य ज्ञान आनन्द आदि तेजको हम ध्यान करतेहैं, जो सविता देव हमारी बुद्धियों को सत्कर्म के अनुष्ठानके निमित्त प्रेरणा करताहै, जगत्के उत्पन्न करनेवाले उन परमदेवताका जो कि भूर्लोक, भुव.कम्वलॊक व्यापी भर्गहै, उनका हम ध्यान करते हैं ।।। विशेष-योगियाज्ञवल्क्यने जो अर्थ कियाहै उसका वर्णन करते हैं, उनका तेज हम ध्यान करते हैं, यहा तत् भगका विशेषण नहीं है, तथापि तत्के प्रयोगसे ही यत्का प्रयोग होजाता है, यही इस श्लोकका आशयहै, कि तत्के साथमें यत् शब्द सदा जानना ।। १॥ संपूर्ण प्राणी और संपूर्ण भावोंका उत्पन्नकर्ता सवन और पवित्र करनेसे उसे सविता कहते हैं॥ २ ॥ जिसकारण कि वह प्रकाशित होता क्रीडाकरता आकाहा में दीप्तिमान होता सब देव- ताओंसे स्तुतिको प्राप्त होता है, इस कारण उसे देव कहतेह ॥ ३॥ हम उस भर्ग तेजका ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धिवृत्तियों को बारंवार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्ररणा करताहे ॥४॥ भ्रस्ज-धातु पकाने में है जिस कारण यह पकाना शोभित दीप्तिमान् होता हुआ अन्तमें जगत्कों हरण करता है ।। ५ ।। कालाग्निरूपमें स्थित होकर अग्निसूर्यमें स्थित अपने रूपसे प्रकाशित होता है, इस कारण उसको भर्ग कहतेहैं, ॥ ६ ॥ भकारसे सबलोकोकों भयभीत करताहुवा रसे प्रजाको प्रसन्न करता है,ग से जो निरन्तरगमनागम करताहै इसकारण उसको भर्ग कह- तेहैं, परमार्थचिन्तामें सविता और भग भेद नहींहै ॥७॥ संसारके भय से भोतहुए प्राणी- जिसकी प्रार्थना करते हैं । जो यह सूर्यके अन्तगत भर्ग है इसकोमुमुक्षु-जन्म मृत्यु और दैहिक दैविक भौतिक दुःख इनके नाश करने के निमित्त ध्यान करतेहै वह पुरुष सूर्यमंडलमें ध्यान करना चाहिये ॥ ८॥ ९॥ इसप्रकार गायत्रीका माहात्म्य वर्णन करके उसीके महाप्रभावमें सात व्याहृतियोंका विशेषण जानना । किसप्रकारका वह भर्ग है ? जो भूरादि सातलोकोंको व्याप्त कर स्थित होरहाहै, अर्थात् भूः (भूमि) भुवः ( अन्तरिक्ष ) स्वः (स्वर्लोक) महः (महर्लोक) जनः (जनलोक) तपः (तपलोक) सत्यम् (सत्यलोक) इसप्रकार क्रमसे लोकों को व्याप्त करके वह भर्ग इन सातलोकोंको दीपकके समान प्रकाश करताहै। अथवा सात महाव्याहृति ही
(१२६)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ नवमो-
भूरादिका भर्गादिले भेद करके प्रकाश करती है, अर्थात् वह तेज कैसा जो ( आपो ज्योती-
रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम् ) जल, ज्योति, रस: अमृत, ब्रह्म, भूः भुवः स्वः ॐ रूप है,
उसका ध्यानकरते है।।९।।
मन्त्रः।
कानश्चित्र आभुवद्वतीसदावत्सखा । कया-
शचिष्ठयावृता ॥ ४॥
ॐ कयान इत्यस्य वामदेव ऋषिः । गायत्री छन्दः । इन्द्रो
देवता । शान्तिपाठे विनियोगः ॥४॥
भाष्यम्-( सदावृधः ) सदावर्वमानः (चित्रः ) चायनीयः पूजनीयः ( सखा ) मित्र-
भूत इन्द्रः ( किया ) ( ऊतीः ) ऊत्या अवनेन तर्पणेन प्रोणनेन वा (नः) अस्माकम्
(आभुवत् ) आभिमुल्येन भवेत् (शचिष्ठया) प्रज्ञावत्तमया प्रज्ञासहितमनुष्ठीयमानेन
( कयावृता ) केन वर्ततेन कर्मणा च अभिमुखे भवत्। शचीति कर्मनाम । इन्द्रः कया
ऊत्या अम्माकं सहाय आभिमुख्यन भवति तथा--अतिशयवत्या यागनिक्याऽस्माकं सखा
भवाति विशदार्थः । [ यजु० ३६१४ ] ॥ ४ ॥
भाषार्थ-सदा वृद्धि करनेवाले विचित्र वा पूज्य इन्द्र किस तर्पण वा प्रीतिसे किस वर्त-
मान अतिशय क्रियाद्वारा हमारे सहायक अभिमुख होता है, अर्थात् हम क्या उत्तम कर्म
करें क्या क्रिया करें जिससे परमात्मा हमारे सहायकरी हों और अपनी पालनशक्तिद्वार।
हमारे निरन्तर वृद्धिकारी सखाहों ।। ४० ।।
मन्त्रः॥
कस्त्वांसुत्योमदानाम्महिष्ठोमत्सुदन्धंसा ॥
दृढाचिदारुजेवमु ॥५॥
ॐ कस्त्वेत्यस्य वामदेव ऋषिः । गायत्री छं० । इन्द्रो देवता"
वि० पू० ॥५॥
भाष्यम्- हे इन्द्र ( मदानाम् ) मदयन्ति तानि मदानि मदजनकानि हवींषि तेषां
मध्ये (मंहिष्ठः) श्रेष्ठः अत्यन्तमदजनकः ( अन्धसः ) अन्नस्य सोमरूपस्य (कः) कः
अंशः (त्वा ) त्वाम् (मत्सत् ) माद्यति मत्तं करोति 'मदी-हर्षे येनांशेन मत्तः
सन् (दृढाचित् ) दृढान्यपि ( वसु) वसूनि धनानि कनकादीनि त्वम् (आरुने) रुजो मंगे'
आरुजसि चूर्णयसि दातुं भनक्षि भक्स्का भक्त्वा ददासीत्यर्थः । [यजु०३६५] ॥ ५ ॥
-६ ऽध्यायः २.] भाष्यसहिता। (१२७) भाषार्थ-हे परमेश्वर ! सोमरूप अन्नका कौनसा प्रसन्नताओंका अत्यन्त करनेवाला अंश आपको प्रसन्न करता है, अर्थात् सब अन्नोमें कौन सा अन्न आपको अधिक तृप्त करता है, जिस अंशसे प्रसन्न होकर आप दृढतासे रहनेवाले सुवर्णादि धनको भक्तों के निमित्त चूर्ण कर अर्थात् विभाग कर दत हो ॥ ५ ॥ मन्त्रः॥ अभीषणल्सखीनामविताजरितॄणामशतम्भवास्य- तिभिः॥६॥ ॐ अभीषुण इत्यस्य वामदेव ऋषिः । गायत्री छन्दः । इन्द्रो देवता । वि० पू० ॥ ६॥ भाष्यम्- हे इन्द्र त्वम् ( सवीनाम् ) समानख्यातीनाम् ( जरितॄणाम् ) स्तोतृणाम् ( :अविता ) रक्षिता ( शतम् ) शतेन बह्वीभिः ( ऊतिभिः ) रक्षाभिः सह (नः ) अस्माकम् (सु) सुष्ठु ( अभिभवासि ) अभिमुखो भव भक्तानां पालनाय नानारूपाणि दधासीत्यर्थः । [ यजु० ३६६ ] ॥ ६॥ भाषार्थ-हे परमेश्वर तुम मित्रोंके और स्तुति करनेवाले हम ऋत्विजोंके पालन करने वाले हो तथा हमसे भक्तों की रक्षाके निमित्त भलीप्रकार अभिमुख होनेद्वारा बहुत रूप होते हो अर्थात् अपने भक्तोंकी रक्षाके निमित्त आप सैकडों रूप धारण करते हो वा सैकडों उपाय अवलंबन करते हो ॥६॥ मन्त्रः। कयात्वन्नऽऊत्याभिष्प्रमन्दसेवृषन् ॥ कयास्तो- तृभ्यऽआभर ॥७॥ ॐ कयात्वमित्यस्य दधीच ऋषिः । गायत्री छन्दः । इन्द्रो देवता । शांन्तिपाठे वि० ॥७॥ भाष्यम्-( वृषन् ) वर्षतीति वृषा हे सेक्तः इन्द्र (कया ) ऊत्या) केन तर्पणेन हविदनिन ( नः) अस्मान् ( अभिप्रमन्दसे ) अभिमोदयसि ( कया) कया ऊत्या तृप्त्या (स्तोतृभ्यः ) स्तुतिकर्तृभ्यः यजमानेभ्यः (आभर ) आहर आहरसि धनदातुमिति शेषः । (तद्वयेन तथा वयं कुर्म इति शेषः । [ यजु० ३६७ ] ॥ ७॥ भाषार्थ-हे सब कामनाओंके वर्षानेवाले आप किस तृप्ति वा हविदानसे हमको प्रसन्न करते हो, किस ऊतिद्वारा स्तुति करनेवाले यजमानोंके निमित्त धनदान करनेको लावे हो अर्थात् क्रियावश होकर स्तुति करनेवालोंको पूर्ण मनोरथ करते हो।। ७ ।। .
(१२८) रुद्राष्टाध्यायी- [ नवमो-- मन्त्रः। इन्द्रोविश्वस्यराजति ॥ शन्नोऽअस्तुढिपदेशश्चतु प्पः ॥ ८॥ ॐ इन्द्र इत्यस्य दधीच ऋषिः । द्विपदा विराट् छन्दः । इन्द्रो देवता । वि० पू० ॥८॥ भाष्यम्-(विश्वम्य ) सर्वस्य जगतः ( इन्द्रः) परमेश्वरः महावीरः आदित्यो वा यः (राजति) देदीप्यते ( नः) अम्माकम् (द्विपदे ) द्विपदां पुत्रादीनाम् (शम् ) सुख- रूपः (अस्तु ) अस्तु ( चतुष्पदे ) चतुष्पदां गवादीनाञ्च (शम् ) सुखरूपोऽस्तु । [ यजु० ३६८॥ ८॥ भाषार्थ-सबका स्वामी परमेश्वर प्रकाश करता है, हमारे पुत्रादिम कल्याण हो, चौपा-- योंमें कल्याण हो अर्थात् परमैश्वर्यसंपन्न परमदेवता इस संपूर्ण संसारका राजा है, वह क्या द्विपद क्या चतुष्पदको निर्माण करके ही कल्याण विधान में तत्पर रहता है ॥ ८॥ मन्त्रः । शन्नोऽमित्र शंवरुणल्शन्नोभवत्वर्थ्यमा ॥ शन्न इन्द्रो बृहस्प्पतित्शन्नोविष्णुरुरुक्क्रमः ॥९॥ ॐ शन्न इत्यस्य दधीच ऋषिः । अनुष्टुप् छंदः । सूर्यो देवता शान्तिपाठे विनियोगः ॥ ९॥ भाष्यम्-( मित्रः ) मित्रो देवः मेद्यति भक्तेषु स्निह्यतीति मित्रः (नः ) अस्माकम् (शम् ) सुखरूपो भवतु (वरुणः) वरुणो देवो वृणोत्यङ्गीकरोति भक्तमिति वरुणो देवः (शम् ) सुखरूपो भवतु ( अर्यमा ) इयर्लिं गच्छति भक्तं प्रतीत्यर्यमा :( शम् ) अस्माकं सुखरूपो भवतु (इन्द्रः) देवेशः (नः ) अस्माकं सुखरूपो भवतु (बृहस्पतिः ) बृहताम्प- तिर्देवगुरुः (नः) अस्माकम् (शम् ) सुखरूपो भवतु ( उरुक्रमः ) उरुविस्तीर्णः क्रमः पादन्यासो यस्य सः (विष्णुः ) परमेश्वरः ( नः ) अस्माकम् (शम् ) सुखरूपो भवतु । [ यजु० ३६९] ॥९॥ भाषार्थ-मित्रदेवता हमारे निमित्त सुखरूप हों, भक्तके अङ्गीकार करनेवाले वरुण सुख- रूप हों, भक्तके प्रति गमनशील अर्थमा हमारे निमित्त सुख करें, देवेश हमको कल्याण करें- देवगुरु और विस्तीर्णपादन्यास वाले व्यापक विष्णु भगवान् हमारे कल्याणकारी हो ॥९॥ .
ऽध्यायः ९] भाष्यसहिता। (१२९) ) मन्त्रः । शन्नोवात-पवताथ्शन्नस्तपतुसूर्यः ॥ शनकार्न- क्ददेवपुर्जन्योऽअभिवर्षतु ॥ १० ॥ ॐ शन्न इत्यस्य दधीच ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । वातादयो देवताः । वि० पू० ॥ १० ॥ भाष्यम्-(वातः ) वायुः ( नः) अस्माकम् (शम् ) सुखकारी अपरुषः अव्याधिजन- कश्च (पवताम् ) वहताम् ( सूर्यः ) जनान् स्वस्वव्यापारेषु प्रेरयति सूर्यः (शम् ) मुख. रूपः अदहनो भेषजरूपश्च ( नः ) अस्माकम् ( तपतु ) किरणान् विस्तारयतु (पर्जन्यः) पिपर्ति पूरयति जनमिति पर्जन्यः पर्जन्येशः ( देवः ) देवः ( कनिक्रदत् ) अत्यन्तं क्रन्दतीति शब्दं कुर्वन् ( नः ) अस्माकम् (शम् ) सुखकरम् ( अभिवर्षतु ) काशनिक्षाररहितं यथातथा अभिसिञ्चतु । [ यजु० ३६.१०] ॥ १० ॥ भाषार्थ--उसकी कृपासे वायु हमको सुखरूप वहन करो, सूर्य हमको कल्याणके निमित्त ताप दान करो, मनुष्योंको जलसे तृप्त करनेवाला शब्दायमान देव हमको सुखरूप होकर वर्षा करो।॥ १०॥ मन्त्रः। अहानिशम्भवन्तुनशठरात्रीलप्प्रतिधीयताम् ॥ शन्नेऽइन्द्राग्नीभवतामोमिल्शन्नइन्द्रावरुणारात हच्या ॥ शन्नेऽइन्द्रापूषणाबाजेसातौ शमिन्द्रासो मांसुवितायशय्योः ॥ ११ ॥ ॐ अहानीत्यस्य दधीच ऋषिः । द्विपदा गायत्री छं। अहो राव्यादयो देवताः । वि० पू० ॥ ११ ॥ भाष्यम्-( अहानि ) दिनानि ( नः ) अस्माकम् (शम् ) सुखरूपाणि ( भवन्तु) भवन्तु ( रात्रीः ) रात्रीः (शम् ) सुखरूपाः अस्मासु ( प्रतिधीयताम् ) प्रतिदधातु महावीर इति शेषः । ( इन्द्राग्नी ) इन्द्रानी ( अवोभिः ) पालनैः कृत्वा ( नः ) अस्माकम् (शम् ) सुखरूपौ भवताम् (रातहव्या) रातं दत्तं हव्यं ययोस्तौ रातहव्यौ हवितृप्तौ (इन्द्रावरुणा) इन्द्रा- वरुणौ (नः ) अस्माकम् ( शम् ) शम्भवताम् ( वाजसातौ) वाजस्य अन्नस्य सातौ निमित्त भूते (इन्द्रापूषणा ) इन्द्रपूषसंज्ञौ देवौ (नः ) अस्माकम् (शम् ) सुखरूपौ भवताम् । तथा ( सुविताय ) साधुगमनाय साधुप्रसवाय वा तथा (शम् ) रोगाणां शमनाय (योः) (१३०) रुद्राष्टाध्यायी- [ नवमो- यवनाय पृथक्करणाय च नयानां रोगं भवञ्च निवर्त्य ( इन्द्रासोमा ) इन्द्रसोमौ देवी (शम् ) न्सुखरूपौ भवताम् [ यजु० ३६ | ११ ] ॥ ११ ॥ भाषार्थ-उसी परमात्मात्री कृपासे संपूर्ण दिन हमारे निमित्त कल्याणरूप हो, संपूर्ण रात्री कल्याणविधान करें, इन्द्र और अग्नि अपनी पालनाओंसे हमको सुखरूप हो, वृष्टिप्रद इन्द्र और वरुण हमको कल्याण विधान करें, अन्नको उत्पन्न करनेवाले इन्द्र और पूषा देवता हम सुखकारी हों, इन्द्र और सोमदेवता श्रेष्ठ गमन वा श्रष्ट उत्पनिले निमित्त तथा रोगों को शान्त करने के निमित्त रोग भयके पृथक्क करने के निमित्त सुन्यकारी हो अथवा सुखकारी इन्द्र मोम देवता हमको कल्याणकारी हों ॥ ११ ।। मन्त्रः। शन्नौदेवीरभिष्टय आपोभवन्तुपीतयेशय्योरभि- स्त्रवन्तुनः ॥ १२॥ ॐ शन्न इत्यस्य दधीच ऋषिः । गायत्री छं।आपो देवताः। वि० पू० ॥ १२॥ भाष्यम्-( देवीः ) देव्यः दीप्यमानाः ( आपः ) जळानि ( नः ) अस्माकम् ( अभि- ये ) अभिषेकायाभीष्टाय वा (पीतये ) पानाय ( च ) (शम् ) सुखरूपाः ( भवन्तु ) भवन्तु, अस्माकं स्नाने पाने चापः सुखयित्र्यो भवन्तु । आपः ( शंयोः ) रोगाणां शमनं भयानां यवनं पृथक्करणं च ( अभिस्रवन्तु ) (नः) अस्माकं भयरोगनाशं कुर्वन्त्वित्यर्थः [ यजु० ३६ । १२] ॥ १२ ॥ भाषार्थ-दीप्यमान जल हमारे अभिषेक अभीष्ट और पान के निमित्त सुखरूप हो. हमारे स्नान पान में जल सुखरूप हों, रोगोंके शमन और भयके पृथक्करनेमें स्रवण करें अर्थात् परमात्माके प्रसादसे जल हमको सुखकारी हों, अर्थात् उत्तम जल ग करनेको मिलें जिससे नीरोग रहै ।। १२ ।। मन्त्रः। स्योनापृथिविनोभवान्नृक्षरानिवेशनी ॥ यच्छान शर्मंसप्रथाः ॥ १३ ॥ ॐस्योनेत्यस्य मेधातिथिक्रषिः । त्रिष्टुप् छं । पृथिवी देवता। वि० पू० ॥ १३॥ भाष्यम्-( अनुक्षरा ) अक्षरः कण्टकः कन्तपो वा कण्वतेर्वा कृन्ततेर्वा स्याद्गतिकर्मण ति: [ निरुक्त० ९ । ३२ ] तद्ग्रहणं चौरदायादिदुःखनिवृत्त्यर्थम् । न सन्ति ऋक्षसः उज्यायः ९] भाष्यसहिता। (१३१) कण्टकाः दुःखदायिनो यम्यां सा अनृक्षग (निवेशिनी ) निविशन्ति जना यन्यां सा तथा । ( सप्रथाः ) प्रथनं प्रथः विस्तारः प्रथसा सह वर्तमाना सप्रथाः सर्वतः पृथुः (पृथिवि ) हे पृथिवि त्यम् ( नः । अम्माकम् ( स्योना) मुखरूपा ( भव ) भव । किञ्च (नः ) अम्मभ्यम् ( शर्म ) शरणम् ( यच्छ ) देहि [ यजु० ३३ । १३ ] ॥ १३ ॥ भाषार्थ-हे भूमि ! कंटकहीन अर्थान् दुःखदायियोंसे हीन सुखसे बैठनेयोग्य लब- ओरसे पृथु हमको सुखरूप हो, हमको कल्याण दो अर्थात् पृथिवीमें स्थित लुकोमल विस्तृत यह शय्या हमको सुखकारी हो, जल हमारे पापोंको दूर करें, वा अपूरूप परमेश्वर हमारे पापोंको भस्म करें, अथवा यह जल हमारे शरीरका मल दूर करके हमको शुचि करें ।।१३।। मन्त्रः आपोहिष्टामयोभुवस्तानऽऊर्जेदधातन ॥ महेरणा- यचक्षसे ॥ १४ ॥ ॐ आपोहिष्ठेत्यस्य सिन्धुदीप ऋषिः । गायत्री छन्दः । आपो देवताः । वि० पू० ॥ १४॥ भाष्यम्--( आपः ) हे आपो याः यूयमेव ( मयोभुवः ) मुखस्य भावयित्र्यः ( स्थ ) भवथ स्नानपानादिहेतुत्वेन सुखोत्पादकत्वमपां प्रसिद्धं तास्तादृश्यो सूर्यम् ( नः ) अस्माकम् ( ऊर्जे, रसाय ( दधातन ) स्थापयत यथा वयं सर्वस्य भोग्यस्य रसस्य भोक्तारो भवेम तथाऽस्मान्कुरुतेति भावः । किञ्च ( महे ) महते ( रणाय) रमणीयाय ( चक्षसे ) दर्शनाय चास्मान् दधातनेत्यनुवर्तते । महद्रमणीयं दर्शनं ब्रह्मसाक्षात्कारलक्षणं तदस्माकं कुरुत । ऐहिक- पारलौकिक सुखं दत्त तृचोभावः । [ यजु० ३६ । १४ ] ॥ १४ ॥ भाषार्थ-हे जलसमूह तुम मुखेक करनेवाले सुखकी भावना करनेवाले स्नानपान आदिसे सुख से उत्पादक हो। हमारे बड़े रमणीय दर्शनके निमित्त अर्थात् ब्रह्मसाक्षात्कार लक्षणयुक्त और निश्चय ही रसानुभव वा ब्रह्मानन्दके अनुभवके निमित्त हमको. स्थापन करो।॥ १४ ॥ मन्त्रः। योवःशिवतमोरसस्तस्य॑भाजयतेहनः॥ उशतीरि वमातरः ॥ १५॥ ॐ योव इत्यस्यसिन्धुदीप ऋषिः । गायात्री छं० । आपो देवता । वि० पू० ।। १५ ।। :..
(१३२) रुद्राष्टाध्यायी- [ नवमी-- भाष्यम्-हे आपः (वः ) युष्माकम् ( यः ) शिवतमः ) शान्ततमः सुखैकहे तुः (रसः) रसोऽन्ति ( इह ) अस्मिन्कर्मणि इह लोक वा स्थितान् ( नः ) अस्मान् ( तस्य ) तस्य रसस्य ( भाजयन ) भागिनः कुरुत । तत्र दृष्टान्तः (उशतीः ) उशत्या कामयमानाः प्रीतियुक्ताः (मातरः) मातरः (इव) यथा स्वकीयस्तन्यरसं वालं पाययन्ति तद्वत् यजु० ३६।१५] ॥१५॥ भाषार्थ-हे जलो ! तुम्हारा शान्तरूप सुखका एकही कारण रस इस कर्म वा इस लोकमें हैं हमको उस रसका भागी करो, प्रीतियुक्त माता जैमे अपने स्तनोंको बालकोंको पिलाती है ॥ १५ ॥ गूढार्थ:-हे परमात्मन् ! आपका जो शान्तरूप ब्रह्मानन्द है कृपा कर हमको उस अनृतका भागी करो।। १५ ।। मन्त्रः तस्म्माऽअरङ्गमामवीयस्य॒क्षयायजिन्वथ। आपों जनयंथाचन ॥ १६ ॥ ॐ तस्मा इत्यस्य सिंधुदीप ऋषिः । गायत्री छन्दः । आपो देवताः । वि० पू० ॥ १६॥ भाष्यम्--( आपः ) हे आपः यूयम् ( यस्य ) पापस्य (क्षयाय ) विनाशाय अस्मान् (जिन्वय ) प्रीणयथ ( तस्मै ) तादृशाय पापक्षयाय ( अरम् ) क्षिप्रम् (वः ) अस्मान् ( गमाय ) नमयाय वधं शिरसि प्रक्षिपामेत्यर्थः । यद्वा-( यस्य ) अन्नस्य (क्षयाय ) निवा- सार्थम् यूयमौषधीः ( जिन्वय ) तर्पयथ तस्मै तदन्नमुद्दिश्य वयम् ( अरम् ) पर्याप्तं यथा भवति तथा (वः अस्मान् (गमाम ) गच्छाम । किञ्चहे आपः ( नः ) 'अस्मान् (जनयथ च) पुत्रपौत्रादिजनने प्रयोजतेत्यर्थः । यद्वा--हे आपः वः युष्मत्सम्बन्धिनस्तस्य पर्याप्तिं वयं गमाम गच्छेम यस्य क्षयाय चतुर्थी षष्ठयर्थे । क्षयस्य निवासस्य जगतामाधारभूतस्य यस्या हुतिपरिणामभूतस्य रसस्यैकदेशेन यूयं ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं जगत् जिन्वय तर्पयथ पञ्चाहुतिपरि- णामक्रमेणेति भावः । हे आपः नोऽस्मान् तत्र भोक्तृत्वेन जनयथ उत्पादयथ ॥ १६ ॥ भाषार्थ-हे जलों ! तुम्हारे संबंधी उस रसके निमित्त हम शीघ्र प्राप्तिको चलें, जिसके निवास जगत्के आधारभूत अर्थात् आहुतिपरिणामभूत जिस रसके एकदेशसे तुम ब्रह्मासे स्तम्बपर्यन्त जगत्को तृप्त करते अर्थात् पंचाहुति के परिणामक्रमसे तृप कर प्रसन्न करतेहो और उसके भोगसे हमको उत्पन्न करतेहो, अथवा जिसके निवाससे तुम प्रसन्न होतेहो उस गुण वा रसकी प्राप्तिके निमित्त-विशेषकर हम तुम्हारे निकट प्राप्त हैं, हे जलो ! तुम हमको प्रजा उत्पन्न करनेकी सामर्थ्य दो, परमात्माकी प्रार्थना भी इसीमंत्रमें है, जिसके प्रसादसे मुक्तिका सुख प्राप्त होता है ।।१६।।
ऽध्यायः ९]
भाष्यसहिता।
(१३३)
मन्त्रः॥
चौशान्तिरन्तरिक्षठशान्ति पृथिवीशान्तिरा-
पत्शान्तिरोषधयत्शान्तिः॥ बनस्प्पतयत्शा-
न्तिर्विश्वेदेवा शान्तिर्ब्रह्मशान्तित्सर्वशान्तिः
शान्तिरेवशान्तित्सामाशान्तिरेधि ॥ १७ ॥
ॐ द्यौरित्यस्य दधीच ऋषिःशकरीछन्दः । विश्वेदेवा देवताः ।
शान्तिपाठे विनियोगः ॥ १७॥
॥
भाष्यम्--( द्यौः ) द्युलोकरूपा या (शान्तिः ) शान्तिः ( अन्तरिक्षम् ) अन्तरिक्षरूपा
च या ( शान्तिः ) शान्तिः (पृथिवी ) भूलोकरूपा या ( शान्तिः ) शान्तिः ! आपः )
जलरूपा या ( शान्तिः ) शान्तिः ( ओषधयः) ओपधिरूपा या ( शान्तिः ) ( वनस्पतयः)
वनस्पतिरूपा या शान्तिः (विश्वेदेवाः) सर्वदेवरूपा या (शान्तिः) शान्तिः (ब्रह्म )
त्रयीलक्षणपरं वा तद्रूपा या ( शान्तिः ) शान्तिः (सर्वम् ) सर्वजगद्रूपा या ( शान्तिः )
(शान्तिरेव शान्तिः ) या स्वरूपतः शान्तिः ( या ) शान्तिः (मा) मां प्रति ( एधि)
अस्तु । महावीरप्रसादात् सर्व शान्तिरूपं मां प्रत्यस्त्वित्यर्थः । यद्वा-द्यौरित्यादिषु
विभक्तिव्यत्ययः । पृथिव्यामप्स्वोषधिषु सर्वम्मिश्च या शान्तिः सा मां प्रत्यस्त्वित्यर्थः ।
यजु० ३६ । १७] ॥ १७ ॥
भाषार्थ-युलोक रूप शांति, और अन्तरिक्षरूप शांति, पृथिवीरूप शांति, जलरूप शांति
औषधिरूप शांति, वनस्पतिरूप शांति, विश्वेदेवासंबंधि शांति, वा सर्वदेवरूप शांति, त्रयी.
लक्षण युक्त शांति, सर्वजगतरूप शांति, स्वरूपसेही शांति, जो शांति है वह शांति मेरे प्रति
हो अर्थात् यह सब मुझको शान्तरूपहो ॥ १७ ॥
मन्त्रः।
हळुहमामित्रस्य॑माचक्षुषासर्वाणिभृतानिसमा
क्षन्ताम् ॥ मित्रस्याहञ्चक्षुषासर्वाणिभृतानिस
भाक्षे ॥ मित्रस्यचक्षुषासमीक्षामहे ॥ १८ ॥
ॐहत इत्यस्य दधीच ऋषिः । भुरिगार्षीजगतीछन्दः । महा-
वीरो देवता । वि० पूर्ववत् ॥ १८॥
रुद्राष्टाध्यायी-
[ नवमो-
भाष्यम्-.: दृत ) दृ विदारे विड़ीणे जराजारतेऽपि शरीर हे महावीर (ना) माम्
(ह.ह ) दृढीकुरु । यद्वा-हते बिहीणे कर्मणि मां ह अच्छिद्रं कर्म कुरु । यद्वा--ससुषिर.
स्वान् सेतृत्वाच्च दृति--शब्देन महावीरः हे दृते महावीर मां त्वं दृढीकुरु कथं दाढ्यम्,
तदाह- सर्वाणि भूतानि ) प्राणिनः ( मा) माम ( मित्रम्य ) मित्रम्य ( चक्षुषा) नत्रेण
( समीक्षन्ताम् ) सम्यक् पश्यन्तु मित्रदृष्टया सर्वे मां पश्यन्तु नारिदृष्टया सर्वेषां प्रियो
भूयासमित्यर्थः ) ( अहम् ) अहमपि ( सर्वाणि भूतानि ) प्राणिजातानि ( मित्रस्य चक्षुषा )
मित्रदृष्ट्या ( समीक्षे ) पश्यामि सर्वे मे प्रियाः सन्तु ( मित्रस्य चक्षुषा ) मित्रदृष्टय
( समीक्षामहे ) वयं पश्यामः । परस्पराद्रोहण सर्वानहिंमन्तो मित्रदृष्टया पश्याम इति
सरलार्थः । यजु० ३६।१८ ॥ १८ ॥
भाषार्थ-हे सेचनसमर्थ देव ! मुझको दृढ कीजि संपूर्ण प्राणी मुझको मित्रके नेत्रोसे
अवलोकन करें, मैं सब प्राणियों को मित्रकी चक्षुसे देखता हूँ, अर्थात् सब मुझे प्यारे हों,
अर्थात् मित्रचक्षु शान्त होती है, न मित्र किसीको मारता न मित्रको कोई मारता है, इस
प्रकार परस्पर किसीको अहित न विचारते हम मित्रकी चक्षुसे सवको अवलोकन करें ॥१८॥
हतेदृहमाज्योक्तैसन्दृशिजीव्यासञ्जयोक्तंसन्ट-
शिंजीव्यासम् ॥ १९॥
ॐ दृत इत्यस्य दधीच ऋषिः । आष्युष्णिक छन्दः । महा-
वीरो देवता । शान्तिपाठे वि० ॥ १९॥
भाष्यम्-( दृते ) हे वीर ( मा ) मां (दृह) दृढीकुरु, आदराथं पुनर्वचनम् । हे
महावीर (ते ) तव ( सन्दृशि ) सन्दर्शने अहम् (ज्योक् ) चिरम् (जीव्यासम् )
जीवयन् । पुनरुक्तिरादरार्थी हे देवेश ते सन्दृशि ज्योक् जीव्यासम् । चिरञ्जीवेयमित्यर्थः ।
[ यजु० ३६।१९ ] ।। १९ ।।
भावार्थ-हे महावीर परमदेव ! मुझको दृढ करो, तुम्हारी दृष्टिमें वा आपके दर्शनमें.
चिरकालतक मैं जीवित रहूँ, आपके दर्शन करता दीर्घकालतक मैं जीवित रहूँ ॥ १९ ॥
मन्त्रः।
नमस्तेहरसेशोचिषेनमस्तेऽअस्त्वर्चिषे ॥ अन्याँ-
स्तै अस्मत्तपन्तु तय-पावुकोअस्म्मभ्यंठशि
वोभव ॥ २०॥
(१३५
भव
.
. (स्वः) स्वगतुं त्वं (समीहसे) चेष्टसेऽतः (त) तुभ्यम् (नमोऽस्तु) नतिरस्तु । यजु
ऽध्यायः ९]
भाप्य तहिना ।
ॐ नमस्त इत्यस्य लोपामुद्रा ऋषिः । भुरिगाी बृहतीर्छ ।
अनिवता । चित्यारोहणे वि० ॥ २० ॥
भाध्यम् ( हिरण्यसकलसहितं झुकूस्थमाज्यं दधिमधुघृतकुशमुष्टियुता ) पात्री एतद्द्य-
मादायाध्वर्युश्चित्याग्निमारोहति ब्रह्मयजमानौ त्वमईक्षिणत उपविशत इति हे अमे (ते ) तक
(हरसे ) हरति सर्वरसानिति हतस्मस्मै ( शोचिषे ) शोचनहेतवे तेजसे ( नमः , नमोऽस्तु
(ते ) तव ( आर्चषे ) पदार्थप्रकाशकाय तेजसे ( नमः ) नमोऽस्तु (ते ) तव ( हेतयः
ज्वालाः ( अस्मत् ) अस्मत्सकाशात् ( अन्याः ) अन्यान्यस्मद्विरोधिनः विरुद्धाः (तपन्तु
दहन्तु एवं त्वम् (पावकः ) शोधकः सन् ( अस्मभ्यम् ) (शिवः ) कल्याणः
एतदर्थं च नमस्कृतोऽनिरस्साकं विरुद्धान् दहत्वस्माकं कल्याणाय भवित्वित्यर्थः। । यजु०
३६१२०॥ २० ॥
भाषार्थ-हे अग्ने ! तुम्हारे सब रसोंके आकर्षण करनेवाले तेजस्वरूप ज्वाला के निमित्त
नमस्कार है, तुम्हारे पदार्थ प्रकाशक तेजके निमित्त नमस्कार हो. आपकी ज्वाला हम से कम
रोको तपाओ हमको शोधक कल्याण कारक हो ॥ २० ॥
मन्त्रः।
नमस्तेअस्तुविद्युतेनमस्तेस्तनयित्नवे ॥ नमस्तेभ
गवन्नस्तुयत वन्समीहसे ॥ २१ ॥
ॐ नमस्त इत्यस्य दधीच ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । विद्युत्स्त-
नयित्नुरूपे देवते । वि० पू० ॥ २१ ।।
भाष्यम्-( भगवन् ) हे भगवन् ! हे महावीर ( विद्युते ) विद्युपाय (स्तनयित्नवे)
स्तनयित्नुः गर्जितं तद्रूपाय (ते) (नमः) नमः (अस्तु ) अस्तु ( यतः) यतः कारणात
३६।२१] ॥ २१ ॥
भाषार्थ हे भगवन् ! आपके विद्युत रूपके निमित्त नमस्कार हो, गर्जनारूप आपके
निमित्त नमस्कार है, जिस कारण स्वर्गसुख देनेको चेष्टा करते हो, इस कारण आपके निमित्त
बारंबा नमस्कार हो, अर्थात् आपके अनेक रूप हैं, आप सब प्रकार हमारे सुखके निमित्त
यत्न करते हो आपको प्रणाम है ।। २१ ।।
मन्त्रः॥
योयतत्समीहंसेतोनोऽअभयङ्कुरु ॥शन्न कुरु
प्रजाभ्योभयन्नत्पशुभ्यः ॥ २२ ॥
[१३६) रुद्राष्टाध्यायी- [ नवमो- ॐ यत इत्यस्य दधीच ऋषिः । भुरिक प्राजापत्या त्रिष्टुप छन्दः । परमात्मा देवता । वि० पू० ॥२२॥ भाष्यम्-हे महावीर ( यतः यतः ) यस्माद्यमाद्रूपान् समीहपे । यद्वा--यस्माद्यस्मादुश्वार तात्त्वम् ( समीहसे ) अस्मास्वपकर्तुश्चेष्टसे (ततः ) ततस्ततः (नः ) अस्माकम् ( अभयम् ) निर्भयम् (कुरु) कुरु किञ्च--(नः) अस्माकम् (प्रजाभ्यः) प्रजाभ्यः (शम् ) सुखम् (कुरु) कुरु (नः) अस्माकम् ( पशुभ्यः) पशुभ्यः ( अभयम् ) भीत्यभावं कुरुः । यजु ३९.२२] ॥ २२ ॥ भाषार्थ-हे भगवन् ! आप जिसजिस रूपसे चेष्टा करते हो अथवा जिसजिस दुश्चरि त्रसे हमको बचानेकी इच्छा करते हो, अथवा जिस समय हमको सब प्रकार सुख करनेके निमित्त इच्छा करते हो उस उस रूपसे वा दुश्चरित्रसे वा चेष्टासे हमको भय रहित करो हमारी प्रजाओंके निमित्त सुख करो, हमारे पशुओंके निमित्त सुख कीजिये, अर्थात् हमारी प्रजा और पशु भय रहित होकर आपके दिये हुए सुख भोगमें समर्थ हो ॥ २२ ॥ मन्त्रः। सुमित्रियानुऽआपऽओषधयाँसन्तुदुम्मित्रियास्त स्मसन्तुयोस्म्मान्दृष्टियञ्चवुयंहिष्म्मः ॥ २३ ॥ ॐ सुमित्रियान इत्यस्य दीर्घत्तमा ऋषिः । निच्यत्प्राजापत्या गायत्री छं । आपो देवताः । जलाभिमंत्रणे वि०॥२३॥ भाष्यम्-(आपः) जलानि (ओषधयः) ओषधयः (नः) अस्माकम् (सुमित्रियाः) साधुमित्रत्वेनावस्थिताः (सन्तु) भवन्तु (यः) शत्रुः (अस्मान् ) (द्वेष्टि) वरं करोति (वयं च ) वयमपि ( यम् ) शत्रुम् (द्विष्मः ) द्वेषं कुर्मः (तस्मै ) उभयात्मकाय शत्रवे आए ओषधयश्च (दुर्मित्रियाः) अमित्रत्वेनावस्थिताः सन्तु | [ यजु० ३६१२३ ] ॥ २३ ॥ भाषार्थ-हे परमेश्वर ! जल वा औषधि हमारे निमित्त सुखदायक हो, और जो हमसे द्वेष करता है.वा हम जिससे द्वेष करते हैं, उसके लिये दुःखदायक हो आशय यह कि हम तो किसीसे द्रोह करना नहीं चाहते पर जो हमसे द्वेष करते हैं तब हमारे मनमें द्वेष होता है आपकी कृपासे द्वेषी शत्रुको औषधि जल दुःखरूप हों ।। २३ ॥ मन्त्रः। तचक्षुर्देवहितम्पुरस्तांच्छुक्त्रमुच्चरत् ॥ पश्यमश रद-शुतञ्जीवेमशरद शुतर्छशृणुंयामशरद शुतं
ऽध्यायः ९]
भाष्यसहिता।
(१३७)
प्रबवामशरद शतमदीना स्यामशरद शत-
म्भूयश्चशरद शतात् ॥ २४॥
इतिसरी हितायांरुद्दपाठेशान्त्यध्यायः ॥
ॐ तच्चक्षुरित्यस्य दधीच ऋपिः । ब्राह्मी त्रिष्टुप् छन्दः । सूर्यो
देवता । वि० पू० ॥ २४ ॥
भाष्यम्-एतैमन्त्रों महावीरोऽम्माभिः स्तुतः ( तत् ) तत् ( देवहितम् ) देव-
हितं स्थापितम् । यद्व-देवानां हितं प्रियम् (शुक्रम् ) शुक्लं पापासंवृष्टं शोचिष्मद्वा
तत् (चक्षुः) जगतां नेत्रभूतमादित्यरूपम् ( पुरस्तात् ) पूर्वस्यां दिशि (उच्चरत् )
उच्चरति उदेति तस्य प्रसादात् ( शतम् ) । शरदः ) वर्षाणि ( पश्येम ) अव्याहत-
चक्षुरिन्द्रिया भवेम ( शतं शरदः ) ( जीवेम ) अपराधीनजीवना भवेम ( शतं शरदः )
शतं समाः ( शृणुयाम ) स्पष्टश्रोनेन्द्रिया भवेम ( शतं शरदः ) ( प्रबवाम ) अस्व -
'लितवागिन्द्रिया भवेम् ( शतं शरदः ) ( अदीनाः ) ( स्याम् ) न कस्याप्यने दैन्य
कुर्याम ( शतात् शरदः ) शतवर्षोपर्यपि ( भूयः च ) बहुकालं पश्येमेत्यादि योज्यम् ।
। यजुः ३६।२४ ॥ २४ ॥
भाषार्थ-वह देवताओं द्वारा स्थापित अथवा देवताओंके हितकारी जगत्के नेत्रभून
शुक्लमलसे रहित शुद्ध वा प्रकाशरूप पूर्व दिशाम उदय होता है, परमात्माके प्रसादसे सौ
शरद् पर्यन्त देखें, अर्थात् शतवर्प पर्यन्त हमारे नेत्रेन्द्रियकी गति निर्बल न हो, सौ शरद्
ऋतुओतक अपराधीन होकर जियें, सौ शरदू पर्यन्त स्पष्ट श्रोत्र इन्द्रियवाले हों, सौ शरद
पर्यन्त भी अस्खलितवाणी युक्त हों, सौ शरद् पर्यन्त दीनता रहित हों, सौ शरदोंसे अधिक
कालपर्यन्त भी देखें, सुनें और जीवित रहैं ।। २४ ॥
विशेष-इसका सूर्योपस्थानमें भी पाठ होता है, यह सब परमात्माकी प्रार्थना उपा-
सनाके मंत्र हैं ॥२४॥
इति श्रीरुद्राष्टके-पंडितज्वालाप्रसादमिश्रकृतसंस्कृतार्य भाषाभाष्यसमन्वितः शान्त्यध्यायः॥
,
॥ अथ रुद्रे स्वस्तिप्रार्थनामन्त्राऽध्यायः ॥
मन्त्रः।
हरिः ॐ ॥ स्वस्तिनऽइन्द्रौबृद्धश्रवाल्स्वस्तिन-पृ.
पाविश्ववेदाः ॥ स्वस्तिनस्तायोऽअरिष्टनेमिल्स्व-
स्तिनोवहस्प्पतिर्दधातु ॥ १॥
(१३८) रुद्राष्टाध्यायी-- [ दशमोग ॐ स्वस्तीत्यस्य गौतम ऋषिः । विराट् स्थाना त्रिष्टुप् छन्दः । विश्वेदेवा देवताः । पाठे विनियोगः॥१॥ भाष्यम्- ( विद्धश्रवाः ) वृद्धं प्रभूतं श्रवः श्रवणं स्तोत्रं हविर्लक्षणमन्नं वा यस्य तादृशः ( इन्द्रः ) इन्द्रः ( नः ) अस्माकं स्वम्तीत्यविनाशनाम ( स्वस्ति ) अविनाशं (दधातु ) विधानु ( विश्ववेदाः ) विश्वानि वेत्तीति विश्ववेदाः ! यद्वा--विश्वानि सर्ववेदवेदांसि ज्ञानानि धनानि वा यस्य तादृशः ( पूषा ) पोषको देवः ( नः ) अस्माकम् ( स्वस्ति ) स्वस्ति विदधातु ( अरिष्टनेमिः ) नेमिरित्यायुधनान । निव० २१२० ] अरिष्टोऽहिंसितो नेमिर्यस्य वा यत्सम्बन्धिनो रथनेमिर्न हिंस्यते सोरिष्टनेमिरेवम्भूतः तायः तृशभ्य पुत्र गरुत्मान् ( नः) अम्माकम् (स्वन्ति ) अविनाशं विदधातु तथा (वृहस्पतिः) देवानां पतिः पालयिता (नः) अस्माकम् (स्वस्ति ) अविनाशं विदधातु । [ यजु० २५।१९ ] ॥ १ ॥ भाषार्थ-वृद्धश्रवा ( बडीकीर्तिवाले ) इन्द्र हमारे निमित्त स्वस्ति विधान करें, सर्वज्ञपूषा हमारे निमित्त स्वस्ति विधान करें अरिष्टनेमि तार्क्ष्य ( ताय-रथ अर्थात् जो रथकी नेमिकी: अथान चक्रधारीको गति कोई भी रोकने में समर्थ नहीं है, तिसको ही अरिष्टनेमि वाय कहते- है, यह पर रथरूपसे वर्णन हुआ) हमारे निमित्त स्वस्ति विधान करें, बृहस्पति हमारे निमित्त स्वस्ति विधान करें॥१॥ मन्त्रः। अपयः पृथिव्याम्पयुऽओषधीषुपयोंदिव्यन्तरिक्षेप- यौधापय॑स्वतीप्रदिर्श सन्तुमह्यम् ॥ २॥ ॐपय इत्यस्य लुशोधानाक ऋषिः । विराट् छन्दः । अग्नि- दैवता । वि० पू० ॥२॥ भाष्यम्- हे अमे हे देव त्वम् (पृथिव्याम् ) भूम्याम् ( पयः) रसम् (धाः ) धेहि. (च) ( ओषधीषु) वनस्पतिषु ( पयः ) रसम् (धाः) स्थापय (दिवि ) स्वर्गे च (अन्तरिक्षे च (पयः) रसम् (धाः) स्थापय किञ्च ( मह्यम् ) मदय ( प्रदिशः) दिशो विदिशश्च ( पयस्वतीः) पयस्वत्यो रसयुताः सन्तु। आहुतिपरि- णामेन पृथिव्यादयो ममाभीष्टदा भवन्त्वित्यर्थः । [ यजु० १८१३६ ] ॥ २ ॥ भाषार्थ--पृथिवी देवि हमारे निमित्त (अर्थात् हमको देनेके लिये ) रस धारण करे, औषधियें भी हमारे निमित्त रस धारण करें, स्वर्ग लोक और अन्तरिक्ष लोक भी हमारे निमित्त रस धारण करें अर्थात् आहुतिके परिणामसे पृथिवी आदि हमको भगवत्कृपासे अभीष्टः देनेवाले हों ।। २॥ स्थापय ऽध्यायः १० भाप्यसहिता। (१३९ मन्त्रः। ॐ विष्णोरराटमसिविष्णोत्श्नप्नस्थोविष्ष्णो- स्यूरेसिविष्ष्णा_वोसि। वैष्णवमंसिविष्णवेत्वा॥३॥ ॐ विष्णोरराटमित्यस्यौतथ्यो दीर्घतमा ऋषिः । याजुषी उष्णिक छंदः । विष्णुदेवता। हविर्धानोपरिमण्डपकरणे वि०॥३॥ भाष्यम्-हविर्धानाख्ये द्वे शकटे दक्षिणोत्तरभागयोः स्थापयित्वा तदाबरकत्वेन परितो हविर्धानाख्यं मण्डपं कुर्यात् । स च मण्डपो विष्णुदेवताकत्वाद्विष्णुरित्युपर्यते विष्णोश्च मूर्तिधरस्य सर्वावयवसद्भावाल्ललाटाख्योऽवयवोस्ति, तद्वद्धविर्धानमण्डपस्यापि पूर्वद्वारवर्तिस्तम्भ- योर्मध्ये काचिदर्भमाला अय्यते. तां मालां तद्वन्धनाधारतियग्वंश वा सन्चोव्यं पुरुष सम्बोध्य ललाटत्वेनोपचर्यते, हे दर्भमयमालाधारवंश । त्वं (विष्णोः) विष्णुम्वेिनोपचरितम्य हवि- र्धानमण्डपस्य (रराटम् ) ललाट स्थानीयः (असि ) असि हे ग्राटयन्तौ युवाम् (विष्णोः विष्णुनामकस्य हविर्धानमण्डपस्य (श्नप्त्रेस्थः ) ओष्ठसन्धिरूपे भवथ [द्वााः परिषीव्यति लम्बजनि प्रति हतया रज्ज्वा विष्णोः स्यूरीति कात्यायनः ] हे लम्यूजनि त्वम् (विष्णोः) हविर्वानस्य (स्यूरसि) सीव्यन्तेऽननांत स्यूः सूचिरसि [ विष्णोः ध्रुवसाति ग्रन्थीकरोति ] हे रज्जुग्रन्थे त्वम् (विष्णोः) हविर्धानस्य (ध्रुवः) गन्थिः (असि) भवसि [प्राग्वंश हविर्धानं निष्ठाप्य वैष्णवमसीत्यालभत इति का०] हे हविर्धानत्वम् (वैष्णवम् ) विष्णुदेव- ताकत्वेन तत्सम्बन्धि (असि) भवसि तस्मात् (विष्णवे) विष्णुप्रीत्यर्थम् (त्वा) त्वां स्पृशामीति शेषः । [ यजु० ५।२१ ] ॥ ३ ॥ भाषार्थ--हे तिर्यक्वंशचीर ! तुम इस यज्ञिय मंडपके रराटी (द्वारके दो खंभोंपर नीचको मुखवाला अर्द्धवृत्ताकार जो तिरछा वंशचीर होता है, उसको रराटी कहते हैं, यही इस मंडपका माथारूप है ) होते हो हे रराटी प्रान्तद्वय ! तुम दोनों इस यज्ञियमंडपकी ओष्ट- संधिरूप होती हो हे लस्यूजनि ! (बडी सुई वा सूजा) तुमही इस यज्ञिय मंडपकी सूची हो, हे रस्सीकी गांठ ! तुम इस यज्ञिय मंडपकी गांठ हो,इससे दृढ होवो, हे प्रान्वंश ! पूर्वपश्चिमको लम्बा करके स्थापित बांस ! इस मंडपकी छतका प्रधान अवलंवन बडाबांस (आडा) तुम इस यज्ञिय मंडपकी छत्तके मध्यवाले प्रधान बांस हो, इस मंडपकी दृढताकी परीक्षा करनेके लिये तुमको स्पर्श करता हूँ इस मंत्रमें वंशादिमें स्थित सर्वज्ञ देवकी प्रार्थना उस उस रूपसे वर्णन की है ॥३॥ मन्त्रः । ॐ अग्निर्देवतावातोंदेवतासूर्योदेवतांचन्द्रमादे- वतावसंवोदेवतांरुद्वादेवतादित्यादेवतामस्तौदेव
--
(१४०)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ दशमो--
ताविश्वेदेवादेवतासहस्पतिर्दैवतेन्द्रौदेवताबरूं-
णोदेवता ॥ ४॥
ॐ अग्निरित्यस्य विश्वेदेव ऋषिः । भुरिग्ब्राह्मी त्रिष्टुप् छं० ।
अग्न्यादयो देवताः । इष्टकोपधाने वि० ॥ ४॥
भाष्यम्-इष्टके त्वमग्न्यादिदेवतारूपाऽसि तां त्यामुपदधामीति सर्वत्र शेषः । अग्न्या-
दीनां देवतात्वं प्रसिद्धम् । ऊग्निर्देवता वातो देवतेत्येता वै देवताश्छन्दासि नान्येवैतदुपद.
धातीति श्रुतेः । सर्व सुगमम् । [ यजु० १४।२०] ॥ ४ ॥
भाषार्थ-अग्नि देवताकी प्रार्थना करता हुआ, यह इष्टका स्थापन करता हूँ ! वायु देव-
ताका ध्यान करता हुआ यह इष्टका स्थापन करता हूँ, सूर्य देवताका ध्यान करता हुआ यह
इष्टका स्थापन करता हूँ ३, चन्द्र देवताका ध्यान करता हुआ यह इष्टका स्थापन करता हूँ ४,
वसुदेवताओं का ध्यान करता हुआ यह इष्टका स्थापन करता हूँ ५, रुद्रदेवताओंका ध्यान करता
हुआ यह इष्टका स्थापन करता हूँ ६, आदित्य देवताओंका ध्यान करता हुआ यह इष्टका
स्थापन करता हूँ ७, मरुत देवताओका ध्यान करता हुआ यह इष्ट का स्थापन करत हूँ ८,
विश्वेदेवा देवताओंका ध्यान करता हुआ यह इष्टका स्थापन करता हूँ ९, बृहस्पति देवताका
ध्यान करता हुआ यह इष्टका स्थापन करता हूँ १०, इन्द्र देवताका ध्यान करता हुआ यह इष्टका
स्थापन करता हूँ ११, वरुण देवताका ध्यान करता हुआ यह इष्टका स्थापन करता हूँ १२॥४॥
-
१
अंसद्योजातंप्रपद्यामिसद्योजातायवैनमोनमः ॥
भवेभवेनातिभवेभवस्वमांमुवोद्भवायुनमः ॥ ५॥
भाष्यम्-मेधाविनः पुरुषस्य ज्ञानोत्पादनाय महादेवसम्बन्धिषु पञ्चवक्रेषु मध्ये पश्चिम-
चक्रप्रतिपादकं मन्त्रमाह-( सद्योजातम् ) एतन्नामकं यत्पश्चिमवक्रं तद्रूपं परमेश्वरं (प्रपद्यामि)
प्राप्नोमि तादृशाय ( सद्योजाताय) महादेवाय (वै) ( नमः ) नमोस्तु हेसद्योजात ।
( भवेभवे ) तत्तजन्मनिमित्त ( मां ) माम् ( नभवस्व ) न प्रेरयेत्यर्थः । किन्तर्हि (अतिभवे)
जन्मातिलंघननिमित्त ( भवस्व ) तत्त्वज्ञानाय प्रेरय (भवोद्भवाय ) भवात्संसारात् उद्धर्बे
-सद्योजाताय ( नमः ) नमोऽस्तु ॥ ५ ॥
भाषार्थ-ज्ञान प्राप्ति के निमित्त महादेव सम्बंधि पंचमुखोंमें पश्चिममुख प्रतिपादक मंत्रका
वर्णन करते हैं, सद्योजात नामक परमेश्वरके रूपको प्राप्त होता हूँ सद्योजात के निमित्त प्रणाम है,
हे देव ! अनेक जन्मोंमें मुझे मत प्रेरण करो, किन्तु जन्मके दूर करनेके निमित्त तत्त्वज्ञानके
निमित्त मुझे प्रेरण करो।संसारके उद्धारकर्ता सद्योजातको प्रणाम है ॥५॥
ऽध्यायः १०
भाष्यसहिता।
(१४१)
मन्त्रः॥
वामदेवायनमोज्येष्टायनमः श्रेष्ठायनमौरुद्रायनमः-
कलविकरणायनमोबलविकरणायनमः ॥ ६ ॥
बलायनमोबलप्रमथनायुनमः सर्वभूतदमनायनमा-
मनोन्मनायनमः॥७॥
भाष्यम-उत्तरवक्रप्रतिपादकं मन्त्रमाह-(वामदेवायनमः) उत्तरवक्ररूपः वामदेवः तस्यैव
विग्रहविशेषाः ज्येष्ठादिनामकाः एते महादेवपीठशक्तीनां वामादीनां नवानां पतयः पुरुषाः
तेभ्यो नवभ्यो नमस्कारः अस्तु ॥ ६ ॥ ७॥
भावार्थ-उत्तरमुखका प्रतिपादक मंत्र कहते हैं-उत्तरमुखरूप वामदेवको प्रणाम है,
उसी के विन ज्येष्ठ दिनाम हैं, यह महादेवकी पीठशक्तियों के स्वामी हैं । वामदेव, ज्येष्ठ,
श्रेष्ठ, रुद्र, काल कल, विकरण, बलविकरण, बल, बलप्रमथन, सर्वभूतोंके दमनकरनेवाले,
मनोन्मनके निमित्त नमस्कार है ।। ६ ।। ७ ॥
मन्त्रः ।
अघोरेभ्योथुधोरेभ्योघोरघोरतरेभ्यः ।। सर्वेभ्यःसर्व
शर्वेभ्योनमस्तेअस्तुरुद्ररूपेभ्यः ॥ ८॥
भाष्यम- दक्षिणवक्रप्रतिपादकमन्त्रमाह--(अधोरेभ्यः) अघोरनामको दक्षिणवत्ररूपों
देवः तस्य विग्रहाः अघोराः सात्त्विकत्वेन शान्ताः अन्ये तु (घोराः ) राजसत्त्वेन उग्राः अपरे
तु तामसत्वेन (घोरतराः) घोरादपि घोरतराः (शर्व) हे शर्व परमेश्वर (ते) त्वदीयभ्यः
पूर्वोक्तेभ्यः त्रिविधेभ्यः (सर्वेभ्यः ) (रुद्ररूपेभ्यः) सर्वतः सर्वेषु देशेषु सर्वेषु च कालेषु (नमः)
नमः ( अस्तु भवतु ॥ ८ ॥
भाषार्थ-दक्षिणवप्रतिपादक मंत्र कहतेहैं-सत्त्वगुणयुक्त होनेसे अघोर, राजस होनेसे
घोर और तामससम्बन्धसे घोरतर शर्व प्रलयमें जगत्के हरनेवाले हम आपके तीनप्रकारके
रूपोंको सब देशकालमें प्रणाम करतेहैं आपके रुद्र शर्व सर्व रूपोंको नमस्कारहै ।।८।।
मन्त्रः।
तत्पुरुषाय विद्महैमहादेवायधीमहि ॥ तन्नोरुद्रःप्रचो-
दयात् ॥९॥
(१४२)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ दशमो-
भाष्यम्-प्रान्वऋदेवः तत्पुरुषनामकः द्वितीयाणे चतुर्थी । (तत्पुरुषाय ) तत्पुरुषं देवं
(विद्महे ) गुरुशास्त्रमुखाजानीमः ज्ञात्वा च ( महादेवाय ) ने महादेवं (धीमहि ) ध्यायेम
(तत्) तम्मात्कारणात् (मद्रः) देवः (नः) अम्मान (प्रचोदयात् ) ज्ञानध्यानार्थ
प्रेरयतु ॥ ९ ॥
भाषाथ-पूर्वनुखप्रतिपादक मंत्र कहतेह: तन्दुरुपदेवको गुरु शास्त्र मुग्यसे जानतेहैं,
जानकर उन महादेव का ध्यान करतेहैं, इस कारण वह कद्र हमको ज्ञान ध्यान के लिये प्रेरणा
करें।॥ ९॥
मन्त्रः।
ईशानःसर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानाम् ॥ ब्रह्मा-
धिपतिर्ब्रह्मणोधिपतिर्ब्रह्मांशिवोमअस्तुसदाशिवोम् १०॥
भायन ईशानः योयमूवक्रो देवः सोयम् (सर्वविद्यानाम् ) वेदशास्त्रादीनां चतुःप-
"ष्टिकलाविद्यानाम् (ईशानः , नियामकः तथा ( सर्वभूतानाम् ) अखिलपाणिनाम् (ईश्वरः )
नियामकः (ब्रहाधिपतिः वनवाधिकत्वेन पालकः
तथा ( ब्रह्मणः) हिरण्यगर्भस्य
(अधिपतिः ) अधिपतिः तादृशः ( ब्रह्मा ) ब्रह्मा अस्ति प्रवृद्धः परमात्मा सोयन् ( मे )
ममानुग्रहाय (शिवः ) शान्तः ( अस्तु ) अस्तु ( सदाशिवोम् स एव सदाशिवः ॐ अहं
भवामि ॥ १० ॥
भाषार्थ-ऊर्चमुखदेवका प्रतिपादक मंत्र । वेदशास्त्रादि विद्या और चौंसठकलाओं के
नियामक समस्तप्राणियोंके नियामक वेदके विशेषरूपसे पालक हिरण्यगर्भके अधिपति
ब्रह्मारूप सो परमात्मा मुझपर अनुग्रह करनेके लिय शान्तरूप हों मैं सदाशिवरूप हूं यह ६
मन्त्र तेत्तरीयारण्यकके हैं ॥१० ।।
अशिवोनामांसिस्वधितिस्तपितानमस्ते-
अस्तुमामाहिठसीत् ॥ निवर्तयाम्म्यायु-
षेन्नाद्यायप्रजननायरायस्पोषायसुप्रजास्त्वायसवी
याय ॥ ११ ॥
शिवोनामासीति व्याख्यातं रुद्राष्टके । ६। ८ मंत्रव्याख्या-
याम् ॥ ११॥
ऽध्याय १० भाष्यसहिता। (१४३) भाषार्थ-शिवोनामासि इसकी व्याख्या रुद्रीक ६ । ८ मंत्रम होगई ॥ ११ ॥ मन्त्रः। अविश्वानिदेवसवितर्दुरितानिपरासुव ॥ यद्वन्तन्नऽ आसुव ।। १२॥ ॐ विश्वानिदेवेत्यस्य नारायण ऋषिः । गायत्री छन्दः । सविता देवता । प्रार्थने वि० ॥ १२ ॥ भाष्यम्- ( देवसवितः ) हे देवसवितः ( विश्वानि ) सर्वाणि (दुरितानि ) पापानि ( परासुव ) दूरे गमय ( यत् ) यत् ( भद्रम् ) कल्याणम् (तत्) तत् ( नः ) अस्ला- प्रति ( आसुव ) आगमय ॥ १२ ॥ भाषार्थ- हे सवितादेव हमारे सब पापों को दूर करो और जो कल्याण है मो हमको प्राप्त करो ॥ १२॥ मन्त्रः। ॐ द्यो शान्तिरन्तरिक्षठशान्ति-पृथिवीशान्तिराप- शान्तिरोषधयल्शान्तिः॥वनस्प्पतयत्शान्तिर्विश्वे- देवाशान्तिब्रह्मशान्तित्सर्वशान्ति शान्तिरेवशा- न्तित्सामाशान्तिरेधि ॥ १३ ॥ ॐ द्यौःशान्तिरिति व्याख्यातम् रुद्राष्टके शान्त्यध्याये ॥१७॥ भाषार्थ-द्यौः शान्ति- इसकी व्याख्या शान्त्यध्यायके १७ मंत्रके होगई ।। १३ ॥ मन्त्रः । ॐ शान्तिः शान्तिः सुशान्तिर्भवतु सर्वारिष्टशा- न्तिर्भवतु ॥ अनेन रुद्राभिषेककर्मणा कृतेन श्रीभग- वान्भवानीशङ्करमहारुद्रः प्रीयतां न मम ॥ ॐ सदाशिवार्पणमस्तु ॥ इति स्वस्तिप्रार्थनामंत्राऽध्यायः ।।
] (१४४) रुद्राष्टाध्यायी [ दशमोऽध्यायः१०. भाषार्थ-शांतिः ३ सबप्रकारसे शांतिहो सम्पूर्ण अरिष्टोंकी शांतिहो इस रुद्राभिषेक- कमसे श्रीभगवान् भवानीशङ्कर महारुद्रप्रसन्न हों, मेरा इसमें कुछ नहीं सवशंकरकाहै. यह शिवजीके अर्पण हो। स्वस्तिप्रार्थना में मन्त्राध्याय पूर्ण हुआ। इति श्रीरुद्राष्टके मुरादाबाइनिवासि पं० ज्वालाप्रसादमिश्रकृतसंस्कृतार्य. भाषाभाष्यसमन्वितः मंत्राध्यायः । दोहा। गौरीशंकर पदकमल, प्रेमसहित हिय लाय । संस्कृत भाषातिलकसह, कीनो रुद्राध्याय ॥ १ ॥ प. सुनै कर प्रेम जो, लहैं पदारथ चार । भक्ति होय श्रीशंभुकी, जो जगमें सुखसार ॥ २ ॥ संवत् ऋतु ऋतु अंक विधु, मास आसाढ पुनीत। शुक्लपक्ष तिथि चौथ शुभ, चन्द्रवार शिवप्रीत ॥ ३ ॥ पूर्ण कियो शुभ ग्रंथ यह, सजनकहँ सुखदान । पढहिं सुनहिं कर प्रेम जो, पावहिं मोद. महान ॥ ४ ॥ ॥ समाप्तोऽयं ग्रन्थः ।। पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेंकटेश्वर" स्टीम्-प्रेस, बम्बई. गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास, "लक्ष्मीवेंकटेश्वर" स्टीम् प्रेस, कल्याण-बम्बई. T
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