Sanmati Library, Jaipur
Dashlakshan Dharma Sangrah
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श्रीदश लक्षण धर्म संग्रह। نو मिलनेका पता- पी. एम. एल. जैन मेनेजर जैनपुस्तकालय, जि. वर्धा सी. पी. समव शरणं दर्पण। इस पुस्तकमें श्रीपरि श्रीजिनचन्द्रति वासिना पंडित मेधाविना विरचित संस्कृतिक ८० छन्दामें भाषा टीका सहित श्रीअईन्त परमात्माकी अनन्त चतुष्टयादि अन्तरंग लक्ष्मी तथा वाह्य समव शरण नामक सभाका वर्णन अति सरलंताक साथ किया गया है जिसको पढनेमे परमात्माके स्वय कामले :कार अनुभव होकर जिनपूजन, जाप्य, सानायिकादि काव्योंमें चित लवलीन होकर अपूर्व आनंद उतम होने के साथ २ महान पुण्य बंध होता है प्रारंभ में समव शरणका स्वरुप समझने के लिए वहाँत बड़ी प्रस्तावना लिखी गई है पुस्तक सफेद, मोटे, चिकने कागजपर सुंदर और मोटे टादरमें जगप्रसिद्ध निर्णय सागर प्रेसमें प्रकाशित कराई है । मूल्य सिर्फ चार आने डा. म. -॥ डेढ आना । श्रीजिनेन्द्र दर्शन पाठ। अर्थ व शिधि सहित इसमें श्रीजिनमंदिरमें प्रवेश करनेकी विधि, काशी निवासी पं. बिन्द्रावनजी रचित अहन्त स्तोत्र, संस्कृत दर्शन पाठ, पं. दौलतरामजी कृत भाषा दर्शन स्तोत्र, तथा कान २ द्रव्यले कर दर्शन करना प्रत्येक द्रव्यका इलोक मन्त्र विधान, प्राकृत भाषामें पञ्चपरमयी स्तोत्र, जिनवाणीको स्तुतिय प्रार्थना रात्रिको दंप धूपस आरती करनंक लिये आरती पाठ व जिन देवसे अन्त प्रार्थना आदि विषय संग्रह किय गये हैं प्रत्येक संस्कृत प्राकृत स्तोत्र व फुटकर श्लोक मन्त्रोंका भाषा अर्थ वडी सरल्तके 'साथ लिखा गया हैं पुस्तक सफेद मोटे चिकने कागजपर मुंदर और मोटे अक्षरों में निर्णय सागर प्रसमें प्रकाशित कराई है इतनी उत्तम पुस्तक होनेपर भी सर्व साधारण सुभीत के लिये मूल्य फि ढाई आन रक्खा है ! डा. म. अहिदा । ( इकठ्ठीनेवालाको किफायत ) एकही किरमको एक साथ पुस्तकें लेनेस ५ के मूल्य ६ दशक १० '० के मूल्य १३११५ के मूल्य मे २० और २० के मूल्यमें २५ तथा ५० के मूल्यमें १०० प्रतियां भेजा जावगी । पता- पी एस. एल. जैन मेनेजर जैन धर्ष पुस्तकालय : जि. वर्धा सी. पी. १ ॥ीपरमाननगः । (अथ । श्रीमद्रयधु कविविरचिता अर्थ सहित) दशलाक्षणिक जयमाला Mon अथ प्रथम उत्तम क्षमा धर्म वर्णन। . उत्तम खम महर अजय सञ्चउ पुण सउच्च संजम मुनी । चाउवि आकिंचण भवभय बंचण वंभ चेह धम्म अखओं ॥२॥ अर्थात- ( उत्तम ग्लम महउ अजय सन्चर ) उत्तम अमा. उत्तममादव, उत्तमार्जब, उत्नमसन्य (पुण सञ्च मंजम मुनओ चाड) और उत्तमसाँच, उत्तमसंयम, उत्तमतप, उत्तमन्याग, (विभा- किंचण बंभचरु धम्मजु अखआ) उत्तम आकिञ्चन्य उत्तम ब्राह्मचर्य ये (दश ) आत्माके अक्षय धर्म हैं ॥ २ ॥ येन कनाऽपि दुष्टेन पीडितेनापि कुत्राचित् क्षमा त्याच्या न भव्येन वग योक्षाभिलाषिणा ॥२॥ “अर्थात- (कुत्रचिन् यनकन अपि दुष्टन पीडिननअपि ) कहींपर जिस किसी दुष्ट के द्वारा पीडा होनपरभी (म्बर्गमोक्षाऽभि- लापिणा भन्यन ) वर्ग और मोक्षक अभिलापी भन्यजविको (भगानन्याया) क्षमाका याग कमी नाही ना ना १ ॥ भावार्थ किमी दृष्ट पुरुषकं अपशब्द कहन मारनपाटन शरीर का धान करने परभा जी कोच नही करना, कमांका पर जानकर (:) . उसका समता भाव पूर्वक्र (हप विपादर्गहत) महना मो नम अमा नामजीपका पहला स्वभाव (धर्म) है ॥१॥ मानक्रयाय (अहंकार.) को छोडकर नम्रीमृत परिणाम हाना मा उनम मादब नाम जवि का स्वभाव (धर्म) है ॥२॥ मायाचार्ग के परिणामों को दृरकरते हुवे जो सरल परिणामांका होना वही उत्तम आनंब नाम जीवका तीसरा स्वभाव (धर्म) है ॥३॥ सत्यवचन, बोलना मो उत्तम सत्यनाम जविका चौथा स्वभाव (धर्म) है. ॥४॥ लाभका छोडना ही उत्तम शौचनाम जीवका पांचवा न्यभाय । धर्म) है तथा व्यवहार में स्नान आदि करनको भी शौच कहा है ॥ ५ ॥ छः कायके जांबांकी रक्षा करना तथा पांच इन्द्रियों को विषयों में प्रवृत होनेसे रोकना मा उत्तम संयम नाम जीवका छटास्वभाव (धर्म) है ॥ ६॥ कायोत्सर्गादिक (शरीरमं ममन्वछोड गुद्धात्मतत्वका विचार करना सी उत्तम तप नाम जीवका सातवां म्वभाव (धर्म) है ॥ ७ ॥ आहार, औपध, अभय, ज्ञान इसप्रकार चार प्रकार के दान उत्तम भावोंके साथ करना उत्तम त्याग नाम जीवका आठयां म्वभाव (धर्म) है ॥ ८॥ बाह्य दशप्रकारके और अन्नग्ग चौदह प्रकार के परिग्रहांका त्याग करना सी उत्तम आकिंचन्य नाम जांब का नौवां स्वभाव (धर्म) है ॥ ५॥ काम सेवनका त्याग अंथवा जीव के स्वरूप चिन्तत्रनमें लीन होजाना मा उत्तम ब्रह्मचर्य नाम नाम जीवका दशवां स्वभाव (धर्म) है इन सब में उत्तम विशेषण सम्यक्त सहिन (जैनधर्म का पूर्ण अद्धान ) होने के लिये दिया है।
अथ प्रथम उनमक्षमा धर्म वर्णन।
उनप खमनिहुलाययसारी । उत्तम खम जम्मा दहितार्ग।
उनम बम स्यणन र धागे । उनम ग्यम दुग्गड दह हार्ग ।। ||
अर्थात ----( उतम बमनिह लाय अमारी) नानालांकीमें उनम
श्रमाही सब धाम मार है। (उत्तम बम जम्मा दहिनारी) उनम
क्षमा जन्ममरणरूपी समुद्रसे पार करने वाली ह ( उत्तम बम ग्यण-
जयधारी) उत्तमक्षमा सम्यग्दहीन सम्यग्नान मम्यक चारित्र इन
नीनारन्नोंके धारण करनेवाली है अर्थात् जहां उत्तम क्षमा होती है.
वहारत्नत्रय होने ही हैं (उनम ग्वम दुग्गइ दुहहारी) उनम क्षमा
नरकादि दुर्गति लमस्त दुःखोंका हरण करनेवाली है. ॥ ३ ॥
उत्तम खग गुणगणसहयारी । उत्तमखम मुणिविन्दपयारी ॥
उत्तम खम बृहयणचिन्तामणि । उनम बम संपन्जड थिरमणि ॥
अर्थात्-(उत्तम वम गुणगणसहयाग ) उत्तम श्रमा गुण ममहा-
के साथ रहनेवाली है अर्थान उत्तमक्षमाके होनने अनेक गुण प्रगट
होजाते है ( उत्तम बम मुणिविंदपयार्ग) यह उनमक्षमा मुनियों को
बड़ी प्यारी हैं श्रेष्ठमुनिजन इम्कापालन करते हैं (उनमग्बम बुदयण
चिन्तामणि ) यह उत्तमक्षमा विद्वानोक लिय चिन्तामणि है अर्थान
चिन्तामणिरत्नके समान इच्छितपदाथोंक देनेवाली है। इमीनरह
विद्वज्जनाको उत्तमक्षमाम इन्छिन ज्ञानादिक प्राप्त होते है. (उनम
खमपजविरमणि) एमयिह जत्नमक्षमाचिनकी एकापना हानने
उत्पन्न होनी है ॥४॥
उत्तगग्वम महिणिजसयलजाण । उत्तमयम मिन्छन तमामाणि ।
Ciह असमन्यह दोष खामेजइ । नहि समन्यदणकामिन्नइ ॥ ॥
(४) महि, आवासण वयण साहज्जड़ । जहि परदासण जणि भासिनः ।। जहिं चेयणगुण चित्तधरिजाइ । नहिंउन पप जिण भासिनः ॥६॥ अर्थान--(उनमग्यम महिणिज सबलजणि ) बह जत्तम क्षमा समस्त लोकमें पूजित है ( उत्तम ग्यमामन्छन तमोमणि ) और मिथ्या- त्यापी अन्धकारके दूर करने के लिय मगिक समान है। जैसे प्रका- शमान मणिसे अन्धकार दूर होजाना है, उसीतरह उजमश्रमास मि- ध्यात्व दूर होकर सम्यकत्व प्रगट होता है। ( जहअसमत्वह दोप म्वमिजइ) जहां असमर्थ जीवोंक दोपक्षमा किये जाते है । जह असमत्वह णउसिज्जइ ) जहां असमधाक ऊपर क्रोध नहीं किया जाता, (जहिं आकोलण वयण सहि जइ) जहां आक्रोश बचनोंका, (गालीगलौज आदिका ) सहन किया जाता है, (जाहपरदोन जणिभासिज्जइ ) जहां दूसरे के दोष प्रगट नहीं किये जाते ( जहिं- चयन गुणचित्त धरिजइ ). जहां चित्तने आत्माना चैतन्यगुण धारंग किया जाता है (तहिं उत्तम नमानिण भासिन्जा) यहां ही उनम लगा होती है जैसा श्रीजिनेन्द्र देवने कहा है ॥५॥६॥ . घना-इयउरम खमंजुय गरयुगवगणय केवलणाण लहेमिथिक हुइ सिद्धणिरंजण भवदह भजण अगाणय रिसिपुंगमजि चि॥२॥ अान-जिसका निम्पण उपर कर चुके हैं. (इस इनम खमजुय ) असी उत्तम क्षमाकं धारण करणेवाल पुरुपको ! पर. सुरखगणुय केवलगाण लहेवि थिंक भवदुह मंजण अगणिय रिसि- पुंगमजी चिरु सिद्ध णिरंजन हुइ) मनुष्य देव विद्याधर मभी नमस्कार करते हैं और वह अचल केवल ज्ञानको पाकर अनेक रिपियों में श्रेष्ठ, संसारके दुखोंसे रहित होता हवा निरंजन सिद्ध होता है और वहांके अनंत सुख अनंत कालं तक भोगता रहता है इसलिये सवको उत्तम क्षमा धारण करणा चाहिये ॥७॥ यहां विशेप इतना है क्रोध वैरीका जीतना है सोही उत्तम क्षमा हे योगामार वैग म जावक नियाम करने के स्थान ना गंगार मन्नापभाव. निराकुलतामाव. नाकों दाध करना अनि ममान : अधांत नम्यग्दर्शनादिग्पालनका भंडारको दन्ध कर है. याका नष्ट करे है अपयशाम्प कालिमाको बढाव है. म अधर्मका विचार नष्ट होजाय है ांधीक अपना मन बचनशाय आपकं या नहीं रहे है । यहुत कालहनी प्रातिको अणमात्रमें बिगाड महान वैर उत्पन्न करे है क्रोध ए राक्षसके वश होय सो अनन्ध वचन लांश निन्दा भील चांडालादिकनकं बोलन योज वचन बोल है । क्रोधी नमन धर्म लोप है कांधी हाय तब पितान मारडाले है माताको पुत्रों बीको बालकको म्वामीको सेवकको मित्रको मार प्राण रहित करे. है । अरतीत्र क्रोधी आपका हूं वियतें शबने मरण कर है न मकान तथा पर्वतादिकनने पतन कर है कुछमें गिर पडे हे क्रोधीको कोज प्रकार प्रतीति नहीं जाननी । क्रोधी है सायम गज नुन्य क्रोधी होय सो,प्रथमतो अपना ज्ञान दर्शन श्रमादिक गुणनको धाने है पछि कर्मक. वशते अन्यका घान होय वा नहीं होय शोधक प्रभा- चनं महातपन्त्री दिगम्बर मुनिह धर्म ने भृष्ट होच नरक गये हैं। यो क्रोध है मा दाऊ लोकका नाश करे है महा पाप बंध फागण नरक पहुचाये है बुद्धि भ्रष्ट कर है, निर्दयों करदेव है अन्यकुन अ. कारको भुलाय कृन धनी करे हैं नान कोष समान पाप नहीं इन लोकमें प्रोधादिक पापसमान अपना बान करनेवाला अन्य नहीं है। जो लोकमें पुन्यवान हैं महा भाग्य हैं जिनका दार लोक सुवरना है निनहीं क्षमानामा गुण प्रगट हाय श्रमा जो पृथ्वी नाकी ज्या महनेका न्वभाव हाय नो क्षमा अर नम्बक न्वपरको हित अहिनको नमाझि करि जी अनमर्थन करि किया ह'उपन्वनको श्राप ममर्थ हाय करके राग द्वेप गहिन हुवा मह है बिकारी नही होय नाको उत्तम क्षमा बाहिय है। यहां उत्तम बाद मायमान महिन हानेको कारण है। अगम अमा नास्यमें नाई नम आमा गंगा, समुद्र नाग्नेवाली है उजम क्षमा है लोग्नत्रयको धारण करणवादी (६) है उनम क्षमा दुगनिक दुग्यनिको हग्नवाला है. जिनवं क्षमा होय निरंक नरक अगतियञ्च दाऊगनिनमें गगन नही होय है म क्षमाके साथ अनेकगुणनके समूह प्रगट होय है. मुनीश्वग्नकों तो अतिप्यारी उत्तम श्रमा है उत्तम क्षमा लाभको नानीजन चिन्ता- माणि रत्न माने हैं अरउतम क्षमाही मनकी उम्मलता करे है. क्षमा गुणविना मनकी उज्जलना अरस्थिरता कदाचित ही नहीं होय है बांछित सिद्ध करनेवाली एक क्षमाही है। यहां क्रोधके जीतनको गमा विचार करना चाहिये यदि कोई आपक्वं दुर्वचनादिकर दुखिनकरे गाली दे चोर कहै अन्यायी, पापी, दुराचारी, दुष्ट, नीच, दोगला, चांडाल, पापी, कृतनी, ऐसे अनेक दुवंचन कहे नो ज्ञानी पुरुप ऐसा चिन्तवन करे है जो याका में अपराध किया है कि नहीं किया है। जो में याका अपराध किया तथा राग द्वेष मोहका वशने कोई बात करि दुखाया है तदि तो में अपराधी हैं मांकों गालीदनाधिकार देना नांच चोर कपटां अधर्मीकहना न्यायह । मोर्चा इस सिवाय भी दंड देता सोभी ठीक है में अपराध किया है मोको गाली सुन रोप नहीं करना हो उचित है। अपराधी को नरक में दंड भोगना पड़े है तातें मेरा निमित्त सों याको दुखनया तदि क्लेशिन होय दुवचन कहे है एसा विचारकर क्लेशित नहीं होय क्षमाही कर है । अरजो दुवचन कहन वाला मंद कपायी होय तो आपजाय क्षमा ग्रहण करावने को कहै भोकृपाल ! में अज्ञानी प्रमादके वस वाकमायके बस हाय आप. का चित्तको दुखाया सो अबमें अपराध माफ कराऊं हूं आइन्दा सा कार्य भूलकरभी नहीं करूंगा एकबार भलजाय ताकी भूलको महन्त पुरुप माफ करें हैं अरजो आगला न्यायरहित नीव कपाया होय तो उमम अपराध माफ करानेको जाय नहीं कालान्तरमें क्रोध उपशान्त हुआ पीछे माफ करावे । अरजा आप अपराध नहीं किया अरईपा भावतें केवल दुष्टताते आपको दुर्वचन कहै तथा अनेक दोष लगाव तो ज्ञानी किंचित संक्लेश नहीं करें ऐसा विचार जो में याकाधन हया होय तथा जमी जायगा खोसी होय तथा इसकी जीविका बिगाड़ी हाय ९ युगला माई हाय नी माका पत्रानाप करना उचित है अरजी अपगय नहीं किया नदि माकों ऋछ फिकर नहीं करना । यो दुर्वचन कोई मा नाम को कई है नया कुलको कई है. नो नाम मंग न्याय नही जानि कुलादि मंग जम्प नहीं में नो शायक (जाननेवाला) जिस्को कह सा में नहीं। में हूं निकांवचन पहुंच नहीं इन बाम्न माका श्रमा ग्रहण करनाही श्रेष्ट है । बहुरि जो यो दुवचन कह है. सा मुखयाका, अभि प्राययाका, जिन्हा वन्न आष्टयाका. अर शब्द उपच्या नाका श्रवण करमें जो विकारको प्रात हो ना यह मंग बड़ा अज्ञानता है । बहुरि इंपीवान दुष्ट पुरुप जो मोको गाली द मो स्वभाव करि देखिये ना गाली कोई वन्नुही नहीं है मेरे कहीं भी गाली लगी नहीं पात्र है अयस्तुमें ट्रेन लेनका व्यवहार ज्ञानयान पुरुप कम संकल्प करें । बहुनि जो माका चार कहे अन्यायी कपटी अधर्मी इन्यादिक कह नहां असा विचार कर जोह आत्मन ! . अनकवार चार हुआ अनेक जन्ममें व्यभिचारी चारी अमक्ष भक्षी भील चांडाल चमार गोला बांदा कुकर शूकर गया इन्यादिक निबंध नया अधर्मी पापी ऋतनी हाय हाव आया अर मनार में भ्रमण करता अनेक बार हाऊंगा अब तो कृकर शुकर चार चाडाल करे ताको सुनकर क्लशित होना बड़ी अज्ञानता है अथग ये बुध जन दुवचन कहें हैं नो इस्का अपराध नहीं हमाग बांधा पुर्व जन्म न कर्मका उदय है ना इन्क दुबचन कहनक द्वारकर हमारे कर्मका निजरा होय है मा हमार बडा लाभ है इनका यह भी उपकार है. जो ये दुर्वचन कहनवाले अपने पुण्यममूहका ना दोष कहने काग नान कर है अरमर किये पापांका दृर को है पम उपकार्ग मंजाम रोय कर ना मर समान काई अधम नहीं है। वहरि या ना मांका दुर्वचनही कन्या है मान्या नी नहीं पकरि मारने लग जाय ऋोधी ना अपने की पुत्र पुत्री कालादिकको मार है मा गांको मान्या ही यही बड़ा लाभ है. भाजी दुष्ट आपका मार भी नी गा विचार जो माको मान्याही प्राण सहन नौ नहीं किया चुनी (८) आपका मरण नहीं गिनकरकं भी अन्यको मार है यही मेरे लाभ है । अर जो प्राण रहितही करे तो असा विचार जो एक बार मर- नाही है क्रमका वरण चुक्या । हम यहां ही कर्मके प्राण रहित भये हमारा धर्म तो नष्ट नहीं भया । प्राण धारण तो धमहीन सफल है ये द्रव्य प्राण तो पुद्गलमय हैं मरा ज्ञान दर्शन श्रमादि नर्व य भाव प्राण है इनका घात क्रोध करि नहीं भया इस समान मेरे लाभ नहीं है । बहुरि जो कल्याणम्प कार्म हैं तिनमें अनेक विन आय ही है जो मेरे विघ्न आया सो ठीकही है। में नो अब समभावको आश्रय कर्म अर जो उपद्रव आवतमें क्षमाछाडि विकारको प्राम होऊंगा तो मोका देखि अन्यमंद ज्ञानी तथा कायर, त्यागी तपम्वी धर्माते शिथिल हो जायंगे तो मेरा जन्म केवल अन्य के संशक अर्थही भया नथा में वीतराग धर्म धारण करके हू क्रांधी विकारी दुर्वचनी होऊ तो मोको देखि अन्य हू क्रोधमे प्रवर्तन लग जाय तब धर्मकी मादा भंग कर पापकी परिपाटी चलानेवाला मंही प्रधान भया नाते क्षमा गुण प्राण जाते भी धन अभिमान नष्ट हान भी मांका छोडना उचित नहीं । बहुरि पूर्वमें अशुभ कर्म उपजाया नाका फल मही भोगूगा अन्य जे जन हैं ते सब निमित्त मात्र हैं इनके निमि- त्तते. पाप उदय नहीं आता तो अन्यके निमित्ततं आता । उदयमें आया कर्म तो फल दिये बिना टलता नहीं बहुरि येलौकिक अझानी मेरे विपें कोधित होय दुर्वचनादिक करि उपद्रव करे हैं अर जो में भी इको दुर्वचनादि करि उत्तर करं नो में तत्वज्ञानी अर ये अज्ञानी दोऊ समान भया हमारा तत्वज्ञानी पना निरर्थक भया । न्याय मार्गने उदयमें आया मेरा पाप कर्म ताको सन्मुख होते कोन विवेकी अपना आत्माको क्रोधादिकनके बस करे । भो आत्मन पूर्व वांध्या जो अमाता कर्म नाका अव उदय आया नाकों इलाज रहित अरोक जानि करक समभावन तं सहो जो लोशित हाय भागोग तो असाताकों तो भोगोहीगे अर नवीन असाताका बंध और करोगे तातें होनहार दुखने निःशंकित होव समभावनेही सही ये दुष्टजन -- ।
(९) अभ्यास वहीत है अपना सामर्थ करके मेरे रोपम्प अग्निको प्रचलितकरि मेरा समभाप लन्पदाको दग्ध किया चाहे हैं अब यहां असाय- धान हाय क्षमाको छोड दूंगा तो अवश्यही समताभाव नष्ट करके धर्म और यशका नाश करनेवाला हो जाऊंगा नाने दुनिका संसर्गमें सावधान रहना उचित है । ज्ञानी मनुष्य तो नहीं सहा जाय असर संशको उत्पन्न होते ह पूर्व कर्मका नाश होना जानि हपिनहीं हाय है जो बचन कंटक निकरि बेध्या जोमें क्षमा छोडि दूंगा तो क्रोधी अरमें समान भया अरजो बैरी नाना प्रकारका दुर्वचन मारण पीडन करके मेरा इलाज नहीं करे तो में संचय किये अशुभ कर्म तिनंत कैसे छूटता ताते बैरी हूं हमारा उपकार किया है अथवा तात विवेकी होय जो जिन आगमके प्रशादतं सनता भावका किया ताकी परीक्षा लेनको ये वैरीप परीक्षा स्थान प्रगट भया है सो मेरे भावनिकी परीक्षा करिये परीक्षा करनेको ही कम उदय भये . हैं जो समभावकी मादको भेद करिजा में नमें रोप कर तो व.न ननका धारक हूं में सम भावको नई प्राप्त होय शोधल्य अग्निम भस्म होय जाऊं। में वीतरागक मागम प्रवर्तन करनेवाला संसारकी स्थिति छनम उद्यमी अर. मेगही चित्त जो द्रोहको प्राप्त होजाय तो संसारके मार्ग में प्रवर्तते मिच्या ग्रीनके समान मभी भया अर जो दुष्ट जननको न्याय धर्मन्प मार्ग समझाय अर क्षमा ग्रहण कराया जो नहीं समझेअर श्रमा ग्रहण नहीं करे तो ज्ञानी जन उससे रोप नहीं करे । जैसा विष दूर करनेवाला वैद्य कोईका विय दूर करनेको अनेक अनेक औषधादि देव विप दृर क्रिया चा है भर वाका विष दूर नहीं होय तो वैद्य आप विष नहीं साय है जो याका विष दूर नहीं भया तो महूं विप भक्षण करि म सा न्याय नहीं है तला ज्ञानी जनह दुष्टजन की पहली दुष्टताकी जाति पिछाने जोये दुष्टता छांडेगा वा नहीं छोडेगा वा अधिक दुटतां धरेगा ऐसा विचार विपरीत परिणमता दिख ताकी ती उपदेशही नहीं देना अर कुछ समयन लायक योजता दीखे ना न्याय वचन हित मितत्प काना अर दुटता नहाँ छोडे तो आप कोधी नहीं होना जो मोको दुर्वचनादि उपद्रव कर (१०) नहीं कम्पायमान करें तो में उपशम भाव करि धर्मका शरणा कम ग्रहण करता ताते जो मोको पीडा करनेवाला हूं माको पापने भयभीत करि धर्मसों सम्बन्धं कराया है तात पीडा करनेवाला हूं मैग प्रमादी पना छुडाय बडा उपकार किया है। बहुरि जगतमें केतक उपकार्ग तो ऐसे है जो अन्य जनके सुख होन निमित्त अपना · शरीरको छोड हैं अर धनको छोडे है तो मेरे दुर्वचन बंधनादिक सहनमें कहा जायगा मोको दुर्वचन कहेही अन्यको मुख होजाय तो मेरे रहा हानि है ? बहुरिजो अपनेको पीडा करनेवालने रोप नहीं कम तो बैंकनों पुण्यका नाश होय है अर मेरे आत्माक हितकी सिद्धि होय है आ पांडा करन वाले रोप करूं तो मेरे आत्माकै हितका नाश होय दुर्गति दाय इस लिये प्राणोंका नाश होते हूं दुनिप्रति क्षमा करनाही एक हित सत्पुरुष कहे हैं तात आत्म कल्याणकी सिद्धाके अर्थ क्षमाही ग्रहण कर अथवा दुष्ट न करि दुर्वचनादिक पीडा करने त मेरे जो अमा प्रगट भई सो मेरे पुण्यका उयते या परीक्षा भूमि प्रगट भई है जो में इतना कालते वीतरागका धर्म धारण किया सो अब क्रोधादिकका निमित्तने साम्य भाव रह्या ऐसी परीक्षा करं । बहुरि सोई साम्य भाव प्रामा योज्ञ है . सोही कल्याण कारण है जो मारने के इच्छुक नियों निकरि मलीन नहीं किया गया । बहुरि चिरकालने अभ्यास किया शास्त्र करके अर साम्य भाव करके कहा साध्य है यो प्रयोजन पक्षा व्यर्थ हो जाय है धैर्य तो सोही प्रशंसा योज हैं जो दुष्टनिक कुवचनादि होते नहीं छूटे दृढ रहे उपद्रव आये विना तो समस्त जन सत्य शांच क्षमाके धारक बन रहे है जैसे चंदनकं वृक्षको कुहाड़ा काटे तोभी कुहा. डेका मुखको सुगंधही करे तैसे जाकी प्रवृत्ति होच सोही सिद्धिको साध्या है । बहुरि अन्यकरि किया उपसर्गते वा स्वयमेव आया उपसर्ग तिनकरि जाका चित कलुपित नहीं होय सो अविनाशी संपदाको प्रार होय है । अज्ञानी हैं ते अपने भावन करि पूर्व किया पाप फार ताके अर्थि तो रोप नहीं कर अर जो कर्मके फल बाहा निमित्त तिन प्रति को करे है । जिस कर्मका नाशतें मेरा संसारका सन्ताप नष्ट होजाय भो फर्म स्वयमेव भोग्यातो बांछित सिद्ध भया । बहुरियो संसार रूप यन (११) अनन्न संघशन करिभन्या है इसमें वसनवालाक नानाप्रकारके दुख नहीं सहन योजह कहा ? संसारमें नो दुखही है जो इस संसार में सम्यग्ज्ञान विवेक रहित अरजिन सिद्धान्त द्वेष करनेवाले आमहानिर्दयों अपरलोकके हितके अर्थ जिनके बुद्धि नहीं अरक्रांवरूप आर्मि फरि प्रज्वलिन अर दुधता करि सहित विपयनकी लोलुपता करि अंघटनाही महाअभिमानी कृतघ्नी असे बहुत दुष्टजन नहीं होत ती मजल बुद्धि के धारक सत्पुरुष वृततपाचरण करिमोक्षके अर्थ उद्यम कैसे करते ? असे क्रोधी दुर्वचन बोलन हार हटगाही अन्यायमार्गानिकी अधिकता देखकरकेही सत्पुरुष वीतरागी भये हैं अरजोम बडे पुण्यके प्रभावत परमात्माका स्वरूपको ज्ञाता भयो अरसर्वज्ञकरिडप देश्यापदार्थनिका हूं निर्णयरुपजाण्या अरसंसारके परिभ्रमणादिकते भभीत होय वीतराग मार्गमें भीप्रवर्तन किया अबभी जो क्रोधके वश होऊंगा तो मेरा ज्ञान चारित्र समस्त निष्फल,होयगा अरधर्मका अपयश करावनहारा होय दुर्गतिका पात्र होऊंगा । बहुरि औरभी पद्मनंदि मुनि कहा है ज मूर्ख जनकरि बाधा पीडा अरकोधक वचन अरहारय अपमानादिक होते भी जो उत्तमपुरुपनका मन विकारको प्राप्त नहीं होय जाको उत्तमक्षमा कहिये है सो क्षमा मोक्ष मार्गमें प्रवतते पुमपके परमसहायताको प्राप्त होय है । विवेकी चिन्तवन करे है हमतो रागद्वेपादि मलरहित उम्मल मन करितियां अन्यलोक हमको खोटा कहो तधा भला कहाँ हमको कहा प्रयोजन है। वांतराग धर्मके धारकनको तो अपने 'आत्माको शुद्धपना साधने योज्ञ है । जो हमारा परिणाम दोष सहित. है और कोऊ हिन हम कोभला कहा तो भला नहीं हो जावेंगे अर. हमारा परिणाम दोप रहित है और कोई हमको बैर. बुद्धित खोटा क्या तो हम खोटा नहीं हो जावंगे फलतो अपनी जैसी चणा आचरण होयगा तैसा प्राप्त होयगा जैसे कोऊ काचको रत्न कह दिया तोभी मोलतो रत्नही पायेगा काचखंडका वहांन धनको न देवे । बहुरि दुष्ट- जन हैं जाकाती स्वभाव परके दोप कहाहू नहीं होय तोभी परके दोप कह्या विना मुखको प्राप्त नहीं होय तान दुष्टजन है, सो मेरमाही अविद्यमानभी दोप लोकमै घरघरमें समस्त मनुष्यान प्रति प्रगट कार (१२) सुखी होउ अरजो धनका अर्थी है सो सर्वस्वग्रहणकर सुखी होउ अरजो वैी प्राणहरणका अर्थी है सोशीघ्रही प्राणहरण असे अरस्थानको अर्थी है. सो स्थान हरोमें मध्यस्थ रागद्वेप रहित हूं समस्त जगतके प्राणीके किसी प्रकार दुखमति होउ यहमें घोपणा करि कहूं क्योंकि मग जीवित तो आयुकर्मके आधीन है अरधनका तथा स्थानका जावना रहना पुण्यपापके आधीन है हमारे किसी अन्पजीवसे बैराविरोधनहीं है सबके प्रतिक्षमा है । बहुरि हे आत्मन् जे मिथ्या दृष्टी अर दुष्टता अर. हित अहितको विवेक रहित मूढ असे मनुष्यनि करि किये जे दुर्वचनादि उपद्रवनितें अस्थिर हुआ वाधाको मानि लेशित हो रहा है सो तीन लोकका चूडामणि भगवान वीतराग है ताहि नहीं जाना है कहा ? तथा वीदराग धर्मकी उपासना नहीं कियी कहा? तथा लोकनिको मूर्ख नहीं जान्या कहा ? मोही मिष्टया दृष्टि मूढनिमें ज्ञानता विपरी- तही होय है कनिके वसि है तातें इनमें क्षमाही ग्रहण करना योन है। क्षमा है सो इस लोकमै परम शरण है माताकी ज्यों रक्षा करन- वाली है वहौत कहा कहिये जिन धर्मका सूल क्षमा है याके अधार सकल गुण हैं कर्म निर्जराको कारण है हजारों उपद्रव दूरकरनेवाली है यातें धन जाते । जीवितव्य जाते हू क्षमाको छांडना योज्ञ नहीं है । कोऊ दुष्टता करि आपको प्राणरहित करे तिसकालमें हूँ कटुक बचन- मति कहो जो मारनेवालेकोभी अन्तर्गति वैर छोडि जैसे कहो जो आपतो हमारे रक्षकही हो परंतु हमारा मरण आय पहुंचा तदि आप कहा करो हमारे पापकर्मका उदय आगया तोभी हमारा वडा भाग्य है जो आप सारिखे महापुरुषानिके हस्तादिकत हमारा मरण होय अरजो हम सारिखे 'अपराधीको आप दंड नहीं द्यो तो मार्गमलीन हो जाय और हम अपराधको फल नरक तिर्पञ्च गतिमें आगे भोगते सो आप हमको ऋण रहित किया आपसे वैर विराव मन वचन कार्यते छोडि क्षमा ग्रहण करूं हूं और आपभी मुझे अपराधको दंड देव क्षमा ग्रहण करो ये रोगादिक कष्टको भोग करि अति दुखते मरण करतो सो धर्मका -
(१३)
शरणन, रग रहित होच सजनाकी कृपा सहित मग्णकरम्गू यस प्रकार
मारनेवाल सौभी बग्त्याग समभाव करना ना उत्तन अना। इन
प्रकार क्षमा धर्मका वर्णन किया ॥ १ ॥
अथ मार्दव धर्म वर्णन.
मृदुत्वं सर्वभूनंषु काय जीवन संर्वदा ।
काठिन्यं त्यज्यतनित्यं धर्म बुद्धिं विजानता ॥ ? ||
अर्थात्--(धर्म बुद्धि विज्ञानता ) जो जीव धर्म बुद्धिको जानते
है अंस जीवोंको उचित हैं कि (सई भृतेषु जीवेन सर्वदा मृदुत्वं )
वसमस्त जीवमि सदा मृदुता र अर्थात् अपने परिणाम सदा कोमल
रक्ख ( काठिन्यं त्यज्यत नित्य ) और कठिण परिणामांका सदा त्याग
करें ।। १ ॥
महवभवयदृणु माणणिकंदणु दयधम्महु मूलजि विमट !
सम्वहि हिययारउ गुणगणसारउ निसर वओसंजम सयलु ॥ २ ॥
अर्थात्-( महब भवमहणु
३) यह मार्दव धर्म जन्म मरणम्प
संसारका नाश करने वाला है ( माणणिकंदणु ) मान कयायको सर्वधा
दूर कर देने वाला है ( दयधम्म जुमूल ) दयाधर्मका मूल कारण ६
(विमुलु ) एक अक्षय और निर्मल गुण है (गुणगणसार) आत्माक
समस्त गुमि सारभूत गुण यही है (तिसच आनंजमसयल) इस
मार्दव धर्मके होते हुए ही समस्त वृत और संजन साल मन है ॥ २ ॥
मद्दर माणकसाय विहंडणु । गहार पंचदिय मणुदंडणु ॥
महउ धम्मेकरुणा बली । पसरह चित्त महीणि वल्ली ॥ ३ ॥
(१४) अर्थात्-- ( महड मापणकसाय विहंडणु) मार्दव धर्म मान कपायको नाश करनेवाला है ( महउ पंचेदिय मणदंङगु) नथा पांचो इन्द्रिय और मनको निग्रह करनेवाला भी मार्दव धर्म है ( महर धम्मे २ रुणावल्ली पसरइ चित्त मही हिणवल्ली ) इस मार्दव धर्मके प्रसादसही इस मनुष्यकी चित्तरूपा पृथ्वीमं नवीन करणारूप घेल फैलती है भावार्थ-अहिंसा धर्मका कारण करुणा है कौर करुणा मादत्र धर्मखदा होती है ॥ ३ ॥ मदर मिणवर भति पयासह । गदउ कुमइ पसरुणिण्णासइ ॥ महवेण बहुविग: पबहुइ । महत्रेण निणिवह उहहुइ ॥ ४ ॥ अर्थात्-( मद्दउ जिणवर भत्तिपवासइ ) मार्दव मंस जिनेन्द्र देवकी भक्ति प्रकाश होती है (मदर कुमइपसरु पिण्णासइ) और मार्दव धर्म कुमति के प्रसारको नाश करता है अर्थात् मार्दव धर्म होते एकुमति नहीं रहने पाती ( महवेण बहुविणय पब ) दर्शन, ज्ञान, चारित्र विनय और व्यवहार विनय मार्दव धर्मसही बढती है ( महवेण जिणिवइरु उहठुइ , और मार्दव धर्मस लोक अनेक तरहके घरभी दूर हाजोत है ॥ ४॥ महवेण परिणाम विमुद्धि महवेण विहुलो यह सिद्धी ! महवेण दोचिहु तउ सोहइ महवेण णरतिजग विमोहइ ॥५॥ अर्थात्-( महवेण परिणाम विसुद्धी ) मार्दव धासि आत्मा परिणाम अत्यंन्ज निर्मल हो जाते हैं ( महवेण विहुलोय सिद्धी ) माईव धर्मसे इस लोक तथा परलोक सम्बन्धी कार्य सिद्धी होती है (मद्दवण दोविहु तउ सोहइ ) आभ्यन्तर तप और वाह्यतप दोनों मार्दव धर्मसही सोभायमान होते हैं ( महवेण णरतिमनग विमोदइ ) मार्दव धर्मकी असी महिमा है कि इसके होते हुए मनुष्य तीनो जगतको मोहित करलेता है ।। ५॥
(१५) .. महउ जिण सासणि जाणिजइ !-अश्यापरसरूच भासिज्ज ॥ महार दोस असेस णिवारइ । महउँ जम्मर अहि उत्तारइ ॥ ६ ॥ अर्थात्-( महउ जिण सासण जाणिजइ ) एक जैन शासनहीं असा है कि जिसमें मार्दव धर्म जाना जाता है अर्थात दुसरे मताम अस उत्तम धर्मकी गणना भी नहीं की है और आत्मासे मिन्न पुलादिकका स्वरुप जाना जाता और निश्चय किया जाता है ( महउ दोल असेस णिवारइ ) एकही मार्दव गुणके होनेले दूसरे समस्त दोष दूर होजाते हैं ( मदर जम्मउ अहि उतारइ ) यह मार्दव धर्म ही जन्म मरणरूपसमुद्र से जीवोंको पार कर देता है ॥ ६ ॥ घता-सम्मदसण अंगु महउ परिणामु जिमुणहु । इयपारियाणि विचित मद मुम्पउ अमलधुनः ॥ ७ ॥ अर्थात्-( सम्मदसण अंगु मन्नु परिणामुनिमुणहु) यह माईवधर्म आत्माका एक परिणाम है और सम्याग्दर्शनका अंग है । (इय परियाणि विचित्ते मद्दधम्महु अमल थुणहु) इस लिथे औसाजानकर अपने चित्तमें इस निर्मल भादव धर्मको धारण करो और सदा इसकी स्तुति करते रहो || ७ ॥ यहां विशेष असा जानना चाहिये उत्तम मार्दव नाम धर्म (आत्मका स्वभाव ) का स्वरूप असा है जो मान . कपायकरि आत्माम . कठोरता होय है तिस कठोरताका अभाव होनेसे जो कोमलता होय सो मार्दव नाम आत्माका गुण है । और आत्माका तथा मान कवायका स्वरुप अनुभव कर मानमदका छोडना तो उत्तम मार्दव नाम गुण है। मानकपालतो संसारम भ्रमणका कारण है और मार्दव संसारके परि- भ्रमणका नाश करनेवाला है। यह मादव गुण या धर्मका. कारण अभिमानीके दया धर्मका मूल हीते अभाव जानना कठोर परिणामीतो निर्दवीही होय मार्दव गुण सब जीवों के हित करनेवाला है। जिन जीवोंके मार्दव गुण है तिनहीका व्रत पालना संजम धारणा ज्ञानका अभ्यास करना सफल है अभिमानीका निष्फल है । सार्दव नाम गुग कपायका (क्रोधमान, माया, लोभ ) नाश करनेवाला अपश्च इन्द्रिय तथा मनको वश करनेवाला है मादव धर्मके प्रसाद चित्ता भूमिन करुणा रुपी वेल नवीन फैले है मार्दव गुण करकही जिनेन्द्र भगवान तथा शास्त्रनिमें भक्तिका प्रकाश होय है मदसहितके जिनेन्द्र भगवशनक गुणों में प्रीति नहीं होय है मार्दव गुणकार अमनि ज्ञानका नाश होय है कुमति नहीं फैले है अभिमानीके अनेक कुबुद्धि उपने है मार्दव गुणकर वडा विनय प्रवत है माईब गुण करके बहुत कालका वर्गहू वैर छांडे है । मान घटे तब परिणामनकी उजलता होय कोमल परिणाम करकही दोनो लोककी सिद्धी होय कोमल परिणामीका इस लोकम सुयशा होय है परलोकमें स्वर्गगतिकी प्राप्ति होय है कोमल परिणाम करकही अन्तरंग बहिरंग तप शोभायमान होय है अभिमानीका तप भी निन्दायोज्ञ है कोमल परिणामोमें तीन जगतके जीवोंका मन जाय नान होय है मार्दव करिके ही जिनेन्द्रका शासन जानिये है माईय करिक ही अपना परकास्वरुपका अनुभव होय है कठोर परिणामी आपा परका विक नही होय और मार्दव करके ही समस्त दोपनिका नाश होय है मार्दव परिणाम संसार समुद्र ते पार करे है । इसलिये मार्दव परिणामको सभ्यग्दर्शनका अंगजान निर्मल मार्दव धर्मका स्तवन करो । संसारी जीवोंके अनादि कालका मिथ्या दर्शनका उदय होरहा है तिल कारण ते पाय बुद्धी हुआ ( शरीर अपना रुप समझना ) जातिको मुलक विद्याको वलकों ऐश्वर्यको रुपको तपको धनको अपना स्वरुपमानि इनका गर्भ रुप होय रहा है जिसको यह ज्ञान नही है कि ये जाति कुलादिक समस्त कर्मके उदयके आधीन पुद्गलके विकार है विनाशीक है में अविनाशीज्ञान स्वभाव अमूर्तिक हूं में अनादि कालने अनेकजाति कुल वल ऐश्वयादिक पाय पाय छोडे है में अब कोनों आपा धारण कर समस्त धन योवन इन्द्रियाधीन ज्ञानादिक विनाशीक है क्षणभंगुर है इनका गर्व करना संसार परिभ्रमणका कारण है । इस संसारमें स्वर्ग लोकका महारिद्धीका धारक देव भी मरकर एक समयमें एक इन्द्रिय (१७) 1 आय उपजे है तथाकूकर शूकर चांडालादिक पर्यायको प्राप्त हो जाय है तथा चक्रवर्ति नवनिधी चवदह रत्रका धारक . एक समयमें मरि सप्तम नरकका नारकी होजाय है तथा वलभद्र नारायणका ऐश्वर्य नष्ट हो गया अन्य की कहा कथा है जिनकी हजारों देव सेवा करते थे तिनके पुण्यका क्षय होते कोई एक मनुष्य भी पानी पिलानेवाला नहीं रहा अन्य पुण्य रहित जीव कैसे मदोन्मत बन रहे हैं। बहुरिजे उत्तम- तपश्वरण करनेमें उद्यमी हैं । बहुरिजे उत्तम दानी है ते भी अपने आत्माको अतिनीचा माने हैं तिनके मार्दव धर्म होय है यह विनयवान- पना तथा मदरहितपना समस्तधर्मका मूल है समस्त सम्यग्ज्ञानादिगुणको आधार है जो सम्यग्दर्शनादिगुणनका लाभ चाहो हो अरउन्नल यश चाहो हो तो मदनिको त्यागि कोमल पणा ग्रहण करो मद दूर हुए बिना विनयादिक गुण, वचनको मिष्टता, पूज्यपुरुषनासत्कार, दान सन्मानगुण एक भी प्राप्त नहीं होयगा । अभिमानीकी समस्त निंदाकरे, हैं अभिमानीका समस्त लोक अध: पतन चाहे हैं। स्वामी भी अभिमानी सेवकको त्यागे है अभिमानीको गुरूजन विद्या देनेमें उत्साह रहित होय हैं अपना सेवक परान्मुख हो जाय मित्र भाई हितू पडौसी याका अधः पतन ही चाहे हैं पिता. गुरु उपाध्यायतो पुत्रको शिष्यको विनयवन्त देखकर ही आनंदित होय हैं । अविनयी अभिमानी पुत्र तथा शिष्य बडे पुरुषनके मनको भी सन्तापितकरै है क्यों कि पुत्रका तथा शिष्यका तथा सेवकका तो यही धर्म है जो नवीन कार्य करना होय सो पिता गुरूस्वामीकी आज्ञालेय करे तथा आज्ञाका अवसर नमिले तो अवसर देखि शीघ्रजना वे येही विनय है येही भक्ति है जिसके मस्तक ऊपरगुरु विराजे ते धन्य भाग हैं विनयवन्त अभिमान रहित पुरुष हैं ते समस्त कायं गुरुनको जनायदे हैं वे पुरुष धन्य है जो इस कलिकालमें मानर. हित कोमल परिणाम करि समस्त लोकमें प्रवते हैं । जो उतम पुरुष है ते बालक, वृद्ध में निर्धनमें रोगिीनमें बुद्धि रहित मूखीनमें तथा जाति कुलादिहान पुंरुपोंमें भी यथा योज्ञ प्रिय वचन आदर सत्कार स्थानदान कदा चिचतनहीं, चूके है प्रिय वचन ही कहं उत्तम पुरुष उद्धतताका वचन तथा उद्धतताका वस्त्र आभरण नहीं पहरे उद्धत (१८) पणाका तथा परके अपमानका कारण देन लेन विवाहादि व्यवहार काव्य उद्धत होय अभिमाना पनाका चलना बैठना बोलना आदि दूरहीत छोटे हे तिस पुरुष लोकमें पूज्य मार्दव गुण होय है । धन पावना कर. पावना ज्ञान पावना विद्या कला चतुराई पावना ऐश्वर्म्य पावना वळ पावना जाति कुलादि उत्तम गुण जगन्मान्यता पावना जिनका सफल है जो उद्धतता रहित अभिमान रहित नम्रता सहित विनय सहित प्रवर्ने हैं अपने मनमें आपको सबते लघुमानता कर्मके आर्यान जाने हैं सो कैसे गर्व करे नहीं करे । ऐसा जानभो भव्यजन हो सम्यग्दर्शनका अंग इस धर्मको जाणि चित्तके विपे ध्यान करो स्तवन करो इस प्रकार मार्दव धर्मका वर्णन किया। अथ आर्जव धर्म वर्णन । a आजवं क्रियते सम्यग्दुष्ट बुद्धिश्च त्वज्यते । पाप चिन्तान कर्तव्या श्रावकै धर्म चिन्तकः ॥ १ ॥ अर्थात्-(श्रावकै धर्मचिन्तकै ) धर्मका चिन्तवन करनेवाले श्रावकोंको उचित है कि ( आर्जवं क्रियते सम्यक् ) वे अपने परिणाम सदा सरल रक्खें और ( दुष्ट वुद्धिश्च त्यज्यवे ) दुष्ट बुद्धिका सदा त्याग करें तथा ( पाप चिन्तान कर्तव्या) कभी पापरुप कायोंका चिन्तवन न करें यही उत्तम आर्जव धर्म है ॥ १ ॥ घम्भहुवरलक्रवण अजवथिरमणु दुरियविहंडणु मुहजणु । तंइत्यजिकिज्जइ तंपालिजइ तंणिसुणिजयरवयजण ॥ २ ॥ अर्थात-(धम्महुवरलक्षणअज्जव) धर्मकाउत्तमलमण आज वही है अर्थात मन बचन कायकीसरलताका नाम अर्जव धर्म है (घिरमणु)
.
(१९)
यह आर्जव धर्म स्थिर मनसे किया जाता है (दुरियविहंडणु) समस्त
पापोंको दूर करनेवाला (सुहजणणु) और सुखके देनेवाला यह
आर्जव धर्मही है। इसलिये समस्त कोकेक्षयकरनेवाले (तं इत्यजि-
किज्जइ ) इस आर्जव धर्मके सेवनकी इच्छा करो (तंपालिजइ ) पालन
करो.( तंणिमुणिज्नइखयजणणु) और ध्यानसे सुनो ॥ २ ॥
जारिसुणियचित्तिहचिंत्तिजइ, तारिसुअणहपुणभासिज्जइ ।
किजइपुण तारिमु मुहसुचणु । तंअजवगुण मुणहअणचंचणु ।।
( अर्थात-(जारिसुणियचित्तिहचिंत्तिज्जइ ) 'जोजीव जैसा
अपने चित्तमें चिंन्तवन करें ( तारिसुअणहुंपुण भासिनइ ) वैसाही
दुसरेके लिये कहै ( किन्जइ ) और फिर वैसाही करें (पुणतारि सुसुह-
संचणु तंअजवगुणमुणहअवचणु ) उसकोही समस्तमुखोंका संचय कर-
नेवाला वंचकतारहित आर्जव गुणजानो ( भावार्थ सरलपरिरिणामोंसे मन
वचन कायकी एकसी क्रिया करके जो दुसरेको धोका नहीं देना वही
आर्जव गुण है ॥ ३ ॥
माया सल्लमणहुणिस्मारहु अज्जवधम्मपवित्त वियारहु ।
बउतउमाया वियहुणिरत्यउ अजउसिवपूरपंथ हुसत्थर ॥ ४ ॥
अर्थात-मोभव्यजनो ( मायासल्लमणहुणिस्मारहु ) अपने चित्तसे
मायाशल्यको निकालकर (अजवधम्मुपविक्त वियारउ) इस पवित्र आर्जन
धर्मका विचार करो (वउतउ माया वियहुणिरत्थहु ) मायावी अर्थात
कपटकरनेवाले पुरुपके व्रत करना आदि सभी व्यर्थ है ( अजउ सिवपुर-
पंथउसतउ ) और यह आर्जव धर्ममोक्ष जानेके लिये सहायकहें ।
भावार्थ माया एक शल्य है । शल्यवाणको कहते हैं। हृदयमें, चुभा हुआ
वाण जैसे दुखदाई होता है उसी तरह मायाभी दुखदायक है इस लिये
मायाको चित्तसे निकालकर मोक्षके देनेवाले इस आर्जव धर्मका चितवन
करो ॥ ४ ॥
(२०) - जत्यकुटिल परिणाम इंडिजाइ, तहअनवधम्मजूंसपज्जइ। दसणणाणसरुवअखंडर । परमअतिंदिय मुखकरंडड ॥ ५ ॥ अर्थात-(जत्यकुटिलपरिणामछदिन्नइ) जहां कुटिल परिणा- मोका त्याग किया जाता है (तहअनवयम्म[संपनइ) वही आनंद धर्मउप्तन्न होता है अर्थात कुटिल परिणामोंका त्याग करनाही आजब धर्म है (दसणणाणसस्त्रअखंडर परमआतिदि यमुस्वकरंडर ) आत्मामें जो इस चैतन्यके असे प्रचंड भाव होते हैं जो किसन्यग्दर्शन स्वरूप है, ज्ञानस्वरुप है, अवि नाशिक, अतिंद्रिय, पाम मुखके म्यान मृत है ।।३।। अप्पेअप्पहु भवउतरंडर एरिमुचेयणभाव पयंडः । अजवेण वइरिउमणभई सोपुणअजयम्भउ नव्मइ ।। ६ ॥ अर्थात--(अध्येअप्पहु भवउतरंडर ) औरआरमाको इस संसारस तारनेवाले हैं (परिसुचेयणभाव पयंडर ) वे परिणाम आजव धर्मसही प्राप्त होते हैं (अजवेण वइरिउणबुन्मइ सोशमन उधम्मउ लम्बइ ) और आर्जव धर्मके होनेसे शत्रुका मनी झोभित हो जाता है भावार्थ सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक चरित्र आर्जव धर्मनेही प्राप्त होते हैं यही आर्जव धर्म संसारसे पार कर देनेवाला है और इस लोकभी शत्रु आदिकसे बचानेवाला है ॥ ६ ॥ घता अनउपरमप्पर गयसंकप्पर विम्मिजिसासर अभओ। तंणिरु झाइज्जइ संसउहिज्जइपाविजइजइअचलपी ।। अर्थाद-(अनउपरमप्पड गयसंकप्पर विमित्जुसासउअभओ) भत्र निश्चय नयसे. आर्जवका स्वरूप कहते है कि संकल्परहित नित्यऔर अभय स्वरूप जो परमात्मा है वही आर्जव है (तंणिरुझाइनइ संमहिनह) ऐसे परमात्माका संशय रहित चाहिये (पाविनाइजइ अचलपओ) इसीसे ध्यान करनेसे मचल पद ध्यान करना (२१) अर्थात् मोक्षकी प्राप्ति होती है ॥ ७ ॥ यहां विशप ऐसा समझना चाहिये कि धर्मका श्रेष्ठ लक्षण आर्जव है आर्जव नाम सरलताका है मन बचन कायकी कुटिलताका दूर करना सो आर्जव नाम आत्माका स्वभाव (धर्म ) है । आर्जव धर्म है सो पापोंके नाश करनेवाला है और सुख उत्पन्न करनेवाला है इस वास्ते कुटिलता छांडि कमों के क्षय करने वाला आर्जव धर्मका धारण करा । कुटिलता है सो अशुभ कर्मोका बंध करनेवाला है । जगतमें अति निघहै इस वास्ते आत्माके हित चाहने वाले पुरुषोंको इस पवित्र आर्जव धर्मका अवलंबन करना उचित है । जैसा आपके चित्तमें चिन्तवन करिये तैसाही अन्यको कहना अर तैसा ही वाह्य काय करि प्रवर्तन करना सो सुखका उत्पन्न . करनेवाला आर्जव धर्म है। हे भव्य जीवो ? माया चार रूप शल्य मनते निकालो उज्वल पवित्र आजब धर्मका वारम्बार विचार करो मायाचारी का व्रत तप संजम समस्त ध्यर्थ है आर्जव धर्म निर्वाणके मार्गको सहाई है जहां कुटिल वचन नहीं बोले तहां आर्जव धर्म प्राप्त होय है । यह. आनव धर्म है सो दर्शन ज्ञान चारित्रको अखंड स्वरुप है. और अतिंद्रिय सुखका पिटारा है आर्जव धर्मके प्रभावकरि अतिन्द्रिय अविनाशी सुखको प्राप्त होय है संसाररुप समुद्रके तिरिवेको जहाजरुप आर्जवही है । जिस समय मायाचारी प्रगट हाजाय उस समय चिरकालकी प्रीतिभी क्षण मात्रमें नष्ट होजाय है जेसै कांजीते दुग्ध फटि जाय है और मायाचारी अपने कपटको वहौत छिपावतेभी हुवे विना नहीं रहै है। पर जीवनिकी चुगली करै वा दोप प्रकाश ते आपही प्रगट हो जाय हैं मायाचार करना है सो अपनी प्रतीतिका बिगाडना है धर्मका बिगाडना मायाचारीके समस्त हितू जन बिना कोई अपराध किये भी वैग हो जाय है जो व्रती, त्यागी, तपस्वी होय ओर जांका एकवार भी कपट प्रगट हो जाय ताको समस्त लोक अधर्मी मान कोई भी प्रतीति नहीं करें कपटी पुरुषकी माता भी प्रतीति नहीं प्रगट , ( २२) करे कपटी तो मित्रद्रोही स्वामी द्रोही धर्म द्रोही कृतघ्नी है और यह जिनेन्द्र का धर्म छल कपट रहित है जैसे टेढे म्यानमें सीधा खडा प्रवेश नहीं करे तैसे कपट करि वक्र परिणामीका हृदयमें जिनेन्द्रका आर्जव कहिये सरल धर्म प्रवेश नहीं कर सके हैं। कपटी जीवका दोऊ लोक नष्ट हो जाय है इस वास्ते जो यश, धर्म प्रतीति चाहो हो तो मायाचार का त्याग कर आर्जव धर्म धारण करो कपट रहित जीवकी वैरी भी प्रशंसा करे है कपट रहित सरल चितजो अपराधभी किया होय तो दंड देने योज्ञ नहीं होय है आर्जव धर्मका धारकतो परमात्माका अपने अनुभवमें वारम्बार चिन्तवन करता है कपाय जीतनेका सन्तोष धारनेफा संकल्प कर है जगतके छलनका दृरहीते त्याग करे है आत्माको असहाय चैतन्य मात्र जाने है जो धन सम्पदा कुटुम्बादिकनको अपनावे सोही कपट छलकर ठगाई करे इस वास्ते जो आत्माको संसार परि- भ्रमणमें छुडाय परद्रव्यनिते भिन्न आपको असहाय जाने सो धन, जीवित व्यके अर्थ कपट कदा चित नहीं करे. इस लिये जो आत्माको संसार परिभ्रमणते छुडाया चाहो हो तो मायाचारको परिहार आर्जव धर्म धारण करो। इस प्रकार आर्जव धर्म वर्णन हुआ ॥ ३ ॥ अर्थ चतुर्थ सत्यधर्म वर्णन. असत्यसवर्था त्याज्यं दुष्ट वाक्यंच सर्वदा । परनिन्दा न कर्तव्या भव्येनापिच सर्वदा ॥ १ ॥ अर्थात्-(भव्येन अपि ) भव्य पुरुषको (सर्वदा असत्यं सर्वथा त्याज्यं ) सदैव असत्यका सर्वथा त्याग करना चाहिये ( चदुष्ट
(२३)
वाक्यंसर्वदा परनिन्दान कर्तव्या.) और गाली गलौज · आदि दुष्ट वच-
नौका सर्वथा त्याग करना चाहिये |
दय धम्मह कारण दोस णिवारण इह भव परमव सुक्खयरु ।
सञ्चुजिवयणुल्लउ भवणिअतुल्लउ बोलिजइ विसयास धरु ॥२॥
अर्थात--(दय धम्मह कारण) सत्य वचन
मूल कारण है (दोसणिवारइ) समस्त दोषांका दूर करनेवाला है
( इयभव परभव सुक्खयरु ) इस भव तथा परभवमें सुख देनेवाला है।
दया धर्मका
(सच्चुजिवयणुल्लउ) वचनों में उत्कृष्ट वचन सत्य वचनहीं है।
(भवणं अतुल्लंउ) सत्य वंचन संसारमें निरुप मेय है ।।
अर्थात-सत्यवचनकी तुलना किसीके भी साथ नहीं कर सके
वोलिनइ विसयास धरु तथा विश्वासके स्थान भूत ऐसे सत्य वचन
सदा बोलने चाहिये ॥ २ ॥
सच्चुजिसव्वधम्मह पहाण, सच्चाजमाहिय लिगरओ विहाण ।
सच्चाज संहार समुदसेउ | सच्चुजि सव्वह मणमुक्खहेड ॥२॥
अर्थात--( सच्चुजिसबह धम्मह पहाण ) सत्य धर्मही समस्त
धर्मों में प्रधान धर्म है ( सच्चाजमाहयाल गरओविहाण ) इस भूमंडली
सत्य धर्मका विधानही उत्कृष्ट कहा है ( सच्चुजि संसारं समुद्दसेउ)
सत्य धर्मही संसार समुद्रसे पार होनेके लिये पुल है अर्थात् संसारसे
पार करनेका कारण है (सच्चुजिसबह मणु सुक्खहेउ) और सत्य
धर्मही समस्त जीवोके.चित्तको सुख देनेवाला है ॥३॥
( २४ ) सच्चेण जिसोहइ मणुवजम्म । सच्चेण पवितउ पुण्ण कर्म सच्चेण सयलगुणगण महंत । सच्चेणतियस सेवा वहन्ति ॥ ४ ॥ सच्चेण अणुव्वय महवयाइ । सच्चेण विणासइ आवयाइ ॥ ५ ॥ अर्थात ( सचेण जिसोहइ मणुवजम्म ) यह मनुष्म जन्म सत्यसे. ही शोभायमान होता है ( सच्चेणपवितउ पुण्याकम्म ) और सत्यसे ही पवित्र पुण्य कमोंका संचय होता है । ( सच्चेण सयल गुणगण महन्ति इस सत्य धर्मसे अन्यसमस्त गुणोंका समूह पूज्या जाता है अर्थात सत्य धर्मके होनेसे अन्यगुणोकी महिमा बढती है ( सञ्चेणतियस सेवा वहन्ति ) और इस सत्य धर्मसे ही स्वर्ग निवासी देव गण मनुष्योंकी सेवा करते हैं (सचेण अणुक्य महवयाइ ) इस सत्य धर्मके होते हुये अनुव्रत और महाव्रत पालन हो सक्ते हैं ( सचेण विणासइ आवयाइ ) और सत्यधर्मसे ही समस्त आपत्तियां नाश हो जाती हैं ४॥६॥ हियमिय भासिज्जइ णिचभासि । णविभासिज्जड पर दुइपयासि ।। परवाहायर भासहुम भव्य । सच्चुजि तंछंहहु विगइगव्य ॥६॥ अर्थात अब व्यवहार सत्य धर्मका स्वरुप कहते है कि, भोभव्य जीवो ? ( हियमिय भासिज्नंइणिञ्चभास ) सदा हितरुप और परि- मित बचन कहो ( णविभासिज्जइपर दुहपयासि ) दूसरेको दुःख पहुंचाने वाले बचन कभीमत कहो ( परबाहायर भासहुमभन्न ) और न दूसरेको कि सीतरहकी बाधा करने वाले बचन कहो (सच्चुजितं छंड उविगयगब्ब) गर्व रहित उपर्युक्त वचनोका त्याग करो यही सत्य धर्म है । सच्चुजिपरमप्पउ अथिइक । सोभावउभवतम दलणअक्क । रुधिज्जइमणवय कायगुति । खणिफिटइ संसार अति । अर्थात (सच्चुजिपरमप्पल अथिइक्क । सोभावउंभवतम दलणअक) (२५) सन्साररुप अन्धकारको नाश करनेके लिये सूर्यके समान जो एक पुर- मात्मा है वही सत्य धर्म. हैं असा चितवन करों ( मंधिन्नई मणवयका- यगुत्ति ) और मन, बचन कायको क्रियाका रोकना अर्थात मनोगुप्ति वचन. गुप्ति कायगुप्तिका पालन करना भी सत्य धर्म है [जवणकिट्टइ संसार अति ] क्योंकि यह गुप्तिरुपधर्म जिस क्षणमें होता है उसी सम- यम संसारके समस्त दुख दूर हो जाते हैं । यह निश्चय सत्यका स्वरूप जानना ।।.७. ॥ । घत्ता-सच्चुजिधम्मफलेण, केवलणाण लहेइजणु.। तंपालहुभो भव्य मणहुम अयलियइ हुवयणु ॥ ६ ॥ अर्थात (सच्चुजिधम्मफलेण-केवलणाण. लहेइजणु) भो भव्य इस. सत्य धर्मके फलसे. मनुष्योंको केवल ज्ञानकी प्राप्ति होती है । (संपाल- हुभो भन्न मणहुम अयलियउड़ वयणु ) इस लिये इस सत्य धर्मका पालन करना चाहिये और मिथ्यावचन.कभी नहीं बोलना चाहिये ||८|| यहां विशेष: ऐसा है कि यह सत्य वचन है सोही धर्म है यह सत्य.धर्म दयाः धर्मका मूल कारण है. अनेक दोपोंका दूर करनेवाला है. इस भक्मे तथा परभवमें सुखका करनेवाला है सब जीवोंके विश्वास करनेका, कारण है समस्त धर्मके मध्य सत्य वचन प्रधान है सत्य है सो संसार, समुद्रके पार उतारनेको जहाज है.समस्त विधानमें सत्य है सो वडा विधान है समस्त सुखका कारण सत्यही है सत्यवचनसेही मनुष्य- जन्म शोभायमाण होय है सत्यकरकेही समस्त पुण्य कर्म. उज्जल होय: जो , पुण्यके ऊंचे कार्य किये जाते हैं तिनको उजलता विना नहीं होती है सत्य करि समस्त गुणोंका समूह महिमाको प्राप्त होता है सत्यके प्रभाव करिदेव भी सेवा करते हैं, सत्य करकेही अणु, व्रत महावत होते हैं सत्य बिना व्रत संजम · नष्ट हो जाते हैं सत्य करि. समस्त आपदाओंका नाश होता है इस वास्ते जो वचन बोलो सो. अपना परका हित रुप कहो प्रमाणीक कहो किसीके दुख उपजे ऐसा; वचन मत कहो परजीवोंको दुख . उत्पन्न करनेवाला सत्य वचन भी सत्यः उपजा (२६) मत बोलो गवरहित कहो, परमात्माके अस्तित्व फहनेवाला बचन कहो नास्तिकोंके बचन पाप पुण्य स्वर्ग 'नरकका अभाव कहनेवाला वचन मत कहो यहां ऐसा परमागमका उपदेश जानना चाहिये-यह जीय अनंतानंतकाल तौनिगोदमही रहा तहां वचन रूपकर्म वर्गणाही ग्रहण नही करी क्योकि पृथ्वी काय, अपकाय, तेजकाय, वायु काय वनस्पतिकाय इनके मध्य असंख्यात काल अनंतकाल रहा तहां जीभ इन्द्रियही नहीं पाई तहां बोलनेकी शक्तिही नहीं पाई अर जो विकल चतुष्को तथा पञ्चेन्द्रियतिध्वनमें उपज्या तहां जिव्हा इन्द्रिय- पाई तौभी अक्षर स्वरुप शंख उच्चारण करनेका । सामर्थ नहीं हुआ एक मनुष्य पनामें वचन बोलने की शक्ति प्रगट होय । है। ऐसे दुर्लभ वचनको असत्य बोलि विगाड देना सो वडा अनर्थ है मनुष्य जन्मकी महिमा तो एक वचनहाँसे हैं नेत्र, कर्ण, नाशिका, जिव्हा तो ढोरतियञ्च केभी होते हैं खाना, पीना, काम मोगादिक पुण्य पापके अनुकूल ढोरोंकोभी प्राप्त होते हैं आभरण वखादिक कूकरा वानर गधा घोड़ा ऊंट बलध इत्यादिक नको भी मिलते हैं परन्तु बचन कहने की शक्ति श्रवण करने की शक्ती तथा उत्तर देनेकी शक्ति तथा पढने पढानेका कारण वचन तो मनुष्य जन्ममें ही है अर मनुष्य जन्म पाय भी जिसने वचन विगाड दिया उसने समस्त जन्म विगाड दिया । बहुगि मनुष्य जन्ममें जो लेना देना कहना मुनना धीज प्रतीत धर्म कर्म प्रीति- वैर इत्यादि जो प्रवृतिरुप और निवृतरुप कार्य हैं वे सब बचनके आधीन हैं अर जिसने बचनकोही दूपित कर दिया उसने मनुष्य जन्मका समस्त व्यवहार विंगाड दृपित कर दिया इस वास्ते प्राण जातेभी बचनको दूषित मत करो । वहुरि जिन शासनमें कहा जो चार प्रकारका असंत्य वचन ताका त्याग करो जो विद्यमान अर्थका निषेध करना सो प्रथम असत्य है जैसे कर्म भूमिका मनुष्य तिर्यचका अकाल मृत्यु नहीं होय ऐसा वचन असत्य है क्योंकि देव नारकी तथा भोग भूमिका मनुष्य विर्यचका तो आयुकी स्थिति वांधी उतनी भोग करही मरण करे है अर कर्म भूमिका मनुष्यतिर्यंच निका आयु है सो विषके भक्षण करि तथा ताड़न मारन छेदन भेदन बंधनादि वेदना करि .
-- - ते (२७). तथा रोगको तीव्र वेदना करि तथा देहमें रुधिरका नाश होने करि. तयां मनुष्य तिर्यञ्च तथा भयंकरि देव करि, उत्पन्न किया भय करि तथा विजली पडने और स्वचक्र तथापर चक्र आदिके भय करि तथा शखका घातः करि पर्वतादिकन ते पतन करि अति पवन जल, कलह, विसम्वादा. 'दिकते उपज्या क्लेश करि तथा. धूमादिक करि स्वासोच्छासका रुकन करि तथा आहारपानादिक . करि. आयुका नाश होय है । आयुकी दीर्घस्थितिहू विष भक्षण, रक्तक्षय, भय शखघात, संक्लेश, स्वासोवासका निरोध. करि अन्नपानका अभाव.करि तत्काल. नाशको प्राप्त होयही है। कितनेही लोग कहे हैं कि आयुपुर्ण हुए बिना मर्ण नहीं होय तिम्का उत्तर करे हैं जो बाह्य निमितसे आयु नहीं | छिद तो विष भक्षण कोन परान्मुख होता अर विष ख़ानेवालको उगाल काहेको कराते अर शस्त्रघात. करनेवाले ते भय करि काहेको भागते अर सर्प, सिंह व्याघ्र हस्थी तथा दुष्ट मनुष्य तिर्यश्चादिकनको, दूरहीते. काहेको छोड़ते और नदी समुद्र क्ष बावडीमें तथा अग्निकी ज्वालामें पडनेते कोन भय करता अर रोगका इलाज क्यों करते इसवास्ते बहुत . कहने, करि कहा जो,आयुघात होनेका बाह्य कारण मिल जाय तो आयुका पात : होयही जाय यह निश्चय है । बहुरि आयुकर्मके समान और कर्म भी बाह्य कारण मिलनेसे. उदयमें आवही हैं. समस्त जीवोंके पुण्यपाप कर्म सत्ताम विद्यमानः है.. बाह्य . द्रव्य. क्षेत्र . कालभावादि पूर्ण सामिग्री मिले कर्म अपना रस देतेही हैं बाह्य निमित्त नहीं : मिले. ती उदयमें नहीं आवे तथा रस विनादियही निर्जर हैं । वहुरि.जो. असद्भूतको; प्रगट करना सो..दूसरा असत्य है जैसे देवनिके अकाल मृत्यु कहना देवनिके भोजन प्रासादि रुस कहना कह वा देवनको मांस भक्षी कहना तथा मनुष्यनीके साथ देवोंका . काम.. सेवन तथा देवांगनाके साथ मनुष्यनिका काम सेवन इत्यादि कहना सो दूसरा असत्य है । बहुरि वस्तुके स्वरुपको अन्य विपरीत स्वरुप कहना सो . तीसरा असत्य है। गर्हित बचनका तीन भेद हैं गर्हित, सावद्य, आप्रिय, तिनमें, पैशून्य हास्य कर्कस, : असमंजस, प्रलपित इत्यादि और भीसूत्र विरुद्ध वचन सोगर्हित वचन है। तिनमें जो परके विद्यामान तथा अविद्यमान दोषोंको पीठ, पीछे ..
- (२८) कहना तथा परके धनका विनाश जीविकाका. प्राणनिका नाश जिस बचनते होजाय तथा जगतमें निंद्य होजाय अपवाद होजाय : असा वचन कहना सोगार्हत नाम असत्यः 'वचनः है । बहुरि हास्य लिया मंड वचन तथा सुननेवालेनिके पापमें प्रीति , उपजावनेवाले बचन सोहास्य नाम गर्हित 'वचन है । तथा दूसरेसे कहे कि तू ढीट है मूर्ख है अज्ञानी है इत्यादि कर्कस वचन है । तथा देश कालके योज्ञ नहीं जिससे आपके तथा अन्यके महा दुख उपजे सो असमंजस वचन है । तथा विनाप्रयोजन धीठ पनाने वकवाद करना सो प्रलपित वचन है तथा जिस वचन करि जीवका .घात होजाय देश लुट जाय देशमें अनेक प्रकार उपद्रव होजाय तथा देशका स्वामीके महा वैर उत्पन्न होजाय तया ग्राममें घरमें अग्नि लग जाय घर घल जाय वनमें अग्नि लग जाय तथा कलह विसम्वाद युद्ध प्रगट होजाय तथा विपादिक करि मरिजाय तथा वैर बंध जाय तथाछ: कायके जीवनिके घातका आरम्भ होजाय महाहिंसा में प्रवृति होजाय सोसावध वचन है तथा परको चोर कहना व्यभिचारी कहना सोसमस्त सावध वचन. दुर्गतिके कारण त्यागने योज्ञ है। अब आप्रिय बचन त्यागने योज्ञ प्राण जाते भी नहीं कहना अप्रिय वचनके भेद जैसे जनाना-कर्कशा, कुटुका, परुपा, निष्टुरा, परकोपिनी, मध्यकृशा, अभिमानिनी, अनयंकरी,. छेदकरी भूत वध करी ये महापाप करनेवाली महानिंद्य. दश भापायें सत्यवादी त्याग करे है । तू मूर्ख है वलध है ढोर हैरे मूर्ख तू क्या समझ सक्ता है ये कर्कशा भाषा है तू कुजाति है नीच जाति अधर्मी महा पापी है तू स्पर्शने योज्ञ नहीं तेरा मुख देखें वडा अनर्थ है इत्यादि उद्वेग करने- वाली कटु भाषा है । तू आचार भ्रष्ट भ्रष्टाचारी है महा दुष्ट है इत्यादि मर्म छेदनेवाली परुषा भापा है । तुझे मार डालूंगा तेरा नाक काट डालूंगा मस्तक काट डालूंगा तुझे खाजाऊंगा इत्यादि निष्टुरा भापा रेनिर्लज्ज वर्ण शंकर तेरा जांतिकुल आचारका ठिकाना नहीं तेरा कहा तप तुकुंशील हंसने योज्ञ है महा निन्द्य अभक्ष भक्षण करनेवाला है तेरा नाम लिया कुलं लजित होय है इत्यादिक परकोपिनी भाषां है । तथा जिस बचनके सुननेसे हाडनिकोशालि : नष्ट - है अपना होजाय सामर्थ्य नष्ट होजाय सो मध्य कुंशा भापा है, तथा लोगों में अपना गुणं प्रगट करना परके दोप दोप कहना कुलजाति रुपबल विज्ञानादिक मंद लिये जो वचनं बोलना सो अभि- माननी भापा हैं । वहुरिशील खंडन करनेवाली अर विद्वेश करनेवाली अनयकरी भापा है । तथा जो वीर्य्यशील गुणादिकनके निर्मूल करने वाली असत्य दोष प्रगट करनेवाली जगतमें झूठा कलंक प्रगट करनेवाली छेदकरी भापा है । जिस वचन करि अशुभ वेदना प्रगट हो जाय 'अथवा प्राणोंका नाश करनेवाली भूत बधकरी भाषा है । ये दश प्रकार निंद्य वचन त्यागने योज्ञ है तथा स्त्रीनके हाव भाव बिलास विभ्रम रुप 'क्रीडा व्यभिचारादिकनकी कथा कामके जगानेवाली ब्रह्मचर्यका नाश करनेवाली. स्त्रीनकी कथा तथा भोजन पानमें राग करानेवाली 'भोजनकी कथा तथा मिथ्या छटी कुलंगीनकी कथा तथा धन उपार्जन करनेकी कथा तथा वैरी दुनिके तिरस्कार करनेकी कथा तथा हिंसाको पुष्ठ करनेवाले वेद स्मृति पुराणादिक कुशास्त्रनिकी कथा कहने योज्ञ नहीं सुनने योज्ञ नहीं पाप बंधके करनेवाली अप्रिय भाषा त्यागने योज्ञ है । हे ज्ञानी पुरुपों! ये चार प्रकारकी निंद्य भापा हास्यकरि क्रोध करि लोभ करि मद करि भय करि द्वेश करि कदाचित मत कहो अपना परका हित रुपही वचन बोलो इस जीवके जैसा सुख हित रुप, अर्थ संयुक्त मिष्ट वचन करे है निराकुल करे है आताप हरे है तैसा सुखकारी आताप हरनेवाला चन्द्रक्रांतिमणी जल चंदन मुक्ताफलादिक कोई भी पदार्थ नहीं है और जहां अपने ते धर्मकी रक्षा होती होय जीवोंका उपकार होता होय तहां विना पुछे भी बोलना अर जहां आपका तथा अन्यका हित नहीं होय तही मौन संहितही रहना उचित है । तथा सत्य वचन बोलने ते सर्व विद्या सिद्ध होय है। जहां विद्या देनेवाला सत्य वादी होय तथा सीखनेवाला भी सत्यवादी होय तिसके समस्त विद्यायें सिद्ध होती हैं अनन्त कर्मोंकी निर्जरा होय है सत्यके प्रभावते अमिजल विपसिंह सर्प दुष्ट देव मनुष्यादिक बाधा नहीं कर सक्ते हैं । सत्यके प्रभावते देव भी वश हो जाते हैं प्रीति प्रतीति दृढ़ होय. है सत्यवादी माता समान विश्वास करने योज्ञ होय है गुरुकी ज्यों पूज्य होय है (३०) मित्रके समान प्रिय होय है उज्जल यशको प्राप्त होता है तपसंयमादि समस्त सत्य वचनते शोभाको प्राप्त होते है जैसे विप मिलनेसे मिष्ट भोजन का नाश होय है अन्याय करि धर्मको यशका नाश होय तैसे असत्य वचनित अहिंसादि समस्त गुणोंका नाश होय है तथा असत्य वचननें अप्रतीति अकीर्ति अपवाद अपने वा अन्यके संकेश, अरति, कलह, वैर, भय, शोक, वध, बंधन, मरण, जिव्हा छेद, सर्वस्त्र हरण, चंदी ग्रहमें प्रवेश. दुर्व्यान, अममृत्यु, व्रत, तपशील संजमका नाश नर- कादि दुर्गतिमें गमन भगवानकी आज्ञाको भंग परमागमते परान्मुखता घोर पापका आश्रव इत्यादि हजारों दोप प्रगट होते हैं । इस वास्ते हे ज्ञानी जनहो ? लोको प्रिय हित मधुर वचन बहोत भन्या है सुंदर शब्दोंकी कमी नहीं फिर निंद्य वचन क्यों बोलते हो ? रे-तू इत्यादिक नाच पुरुपोंके बोलनेके वचन प्राण जाते भी मत कहो अधमपना उत्तम पना तौ वचनहींतें जान्या जाय है नीच पुरुषों के घोलनेके निंद्य वचन- को छोड़ि प्रिय हित मधुर पथ्य धर्म सहित वचन कहो जो अन्यको दुःखदेने वाला वचन कहें हैं तथा झूठा कलंक लगावे हैं तिनके पापत इहाही बुद्धि भ्रष्ट होय है । जीभ गल जाय है तालवा फटि जाय है। आंधा हो जाय पग नष्ट होजाय दुनितें मरि 'नर्कतिर्यंचादि कुगतिका पात्र होय है अर सत्यके प्रभावते यहां उज्जल यश बचनको सिद्धी द्वाद. शांगादि श्रुतका ज्ञान पायकरि फिर इन्द्रादिक महर्दिक देव होय तीर्थ- करादि उत्तम पद पाय निर्वाण जाय है इस वास्ते उत्तम सत्य धर्महीको धारण करो इस प्रकार सत्य धर्मका वर्णन किया ॥ ४ ॥ अथ पंचम शौच धर्म वर्णन. (५) बाह्यमाम्यन्तरंचापि मनो वाकाय शुद्धिभिः ।। शुचितेन सदा भाव्यं पापभीतैः सुश्रावकैः ।। १ ।। अर्थात-(पापभीतः सुश्रावकैः ) जो महा श्रावक पापसे भय भीत हैं । उनको (मनो वाकाय शुद्धिमीः ) मन वचन कायकी शुद्धता पूर्वक ( वाह्यमाम्यन्तरंचापि ) वाह्य शरीरादि और आम्यन्तर आत्माको (. ३१) . (सदा शुचितेन भाव्यं ) सदा उज्वल रखना चाहिये यही शौच धर्म है ॥ १॥ संउचजिधम्मंगउ तजिअमंगर भिण्णगड उव उग्गमओ ।। जरमरग विणासणु तिजगपयासणु झाइज्जइ अहिणिलिाज धुओ२ अर्थात-( सउचजिधम्मंगउ तंजिअमंगउ ) यह शौच धर्म अभंग धर्मका एक अंग है ( भिणंगउ ) शरीरसे भिन्न है अर्थात यह शौच शरीरादिक के स्नानसे भिन्न रुप है ( उव उग्गमओ ) यह शौच धर्म ज्ञान दर्शन रुप उपयोग स्वरुप है ( जरमरणविणासणु ) जन्मजरामरणादि- कका नाश करनेवाला है -(तिजगपयासणु ) . और तीनो जगतका प्रकाश करनेवाला है (झाइजइ अहणिसिनिधुओ ) इसलिये इस धर्मका निश्चय रुपसे अहर्निसध्यान करना चाहिये २. '. धम्मसउच्च होई मणसुद्धई । धम्म सउच्च वयण घण गिद्धइ ।। धम्म सउच्च लोह वज्जतंउ | धम्म सउच्च सुतवयहिजंतउँ ।। ३ ॥. अर्थात्--(धम्मसउच्च होई मण सुद्धई ) मनको अत्यंत शुद्ध रख. नेसे यह उत्तम शौच धर्म होता है । (धस्मसउच्च वयण घणं गिद्धइ) और यही शौच धर्म शास्त्र रूपी धनकी अत्यंत गृद्धता करनेसे होता । अर्थात शास्त्र ज्ञानकी वृद्धि होनेसेही शौच धर्मका पालन होता है (धम्मसउच्च लोहुवनंतउ ). यह शौच धर्म उसी मनुष्यक होता है जिसने लोभ कपायका त्याग : कर दिया है (धम्म संउच्चसुतवयहि जंतउ ) जो श्रेष्ट तप करनेके मार्गमें जा रहा है उसके यह शौच धर्म होता है ।। :३ ॥ धम्मसउच्च वमव यधारणु । धम्मसउच्च मयदृणिवारणु ।। धम्मसउच्च जिणायम भणणे । धम्मसउच्च सुगुण अणुमणणे ॥४ अर्थात-(धस्मसउच्चवं भवयधारण) ब्रह्मचर्य व्रतका धारण करना शौच धर्म हैं (धम्मसउच्च .मयदुनिवारण ) और , ज्ञान, पूजा, (३२) - कुल, जाति, वल, रिद्धिः तप,, और शरीरका मद निवारण करना अर्थात इन आठों मदोंका न करनाही शौच धर्म है। (धम्मसउच्च जि-. णायम भणणे ) जैन शास्त्रोंके पठन पाठन करनेसे शौच धर्मका पालन होता है । (धम्मसउच्च सुगुण अणुमणणे ) और उत्तम उत्तम गुणोंके मनन करने व विचार करनेसे शौच धर्म होता है ॥ ४ ॥ धम्मसउच्चसल्ल कयचाये । धम्मस उच्चसुणिम्मलभाये ।। धम्मसउच्च कपाय अहावे । धम्मसउच्चण लिप्पई पावे ॥५॥ अर्थात-(धम्मस उच्चस लकयचाये ) माया मिथ्या निदान इन तीनों शल्योंके त्याग करनेसे शौच धर्म है । (धम्मस उच्चसुणिम्मल' माये ) तथा आत्माके निर्मल परिणाम होनेसे शौच धर्म है। (धम्मस उच्चस कपाय अहावे ) क्रोध, मान, माया, लोभ इन चारों कपायोंके अभाव होनेसे शौच धर्म होता है । (धम्मस उच्चण लिप्पईपावे ) तथा पाप रुप यकसे लिप्त न होनाही शौच धर्म है ॥ ६ ॥ अहवाजिणवरपुज्ज विहाणे, णिम्मलफासुयजलकयण्हाने तपिसउच्च गिहच्छहमासिउ, णविमुणिवरह कहिवलोयासिउ ६ अर्थात्-अव निश्चय शौचका कथन करके आचार्य लौकिक शौचकहते हैं (अहवा जिनवरपुज्यविहाणे ) अथवाजिनेन्द्र देवके पुजादिक विधानोंमें (णिम्मफालफासुयजलकयव्हाणे) निर्मल प्रासुकजलसे जो स्नान करना है ( तंपितउच्चगिहच्छहमासिउ) वहभी ग्रहस्थोंके लिये शौच धर्मक हा है (णविमुणिवरहकहिवलोयासिउ) लोकमें प्रचलित स्नानादिक शौच गृहस्थैकिही लिये है मुनियोंके लिये नहीं है ।। ६ ।। भनुमाणिविअणिच्चु धम्म सउच्च पालिज्जइ एयग्गमणि । ... सुहमग्गसहायउ सिवपयदायउ अण्णमिचिंतइ : किंपिरवणि अथोत.(मउमुणिवि अणिचु ) इस संसारको अनित्य जान कर (धम्मसउच्च मालिज्नई एयग्गमाण .) एकाग्र मनसे इस शौच धर्मका पालन करो (सुहमग्गसहायउ.) यह शौच धर्म शुममागका सहाय करने. वाला - ..
है (सिवपयदायन ) और मोनका देने वाला है (अण्मचिंतइकिपि- खाण) इसलिये इसको छोटकर अन्य किसीका क्षण भरभी चिन्तवन मत करो | इसीका चिन्तबन अनिशि करना चाहिये ॥ ७ ॥ यहां विशप इतना समझना चाहिये कि शौच नाम पवित्रता तथा उजलताका है जो वहिरात्मा देहकी उन्नलता स्नानादि करनेको शौच कहे हैं सोसप्तशतुमय मलमूत्रका भस्या ऐसा जो यह शरीर सो जलसे धोने करि शुचिपनाको प्राप्त नहीं होय है जैसे मलका बनाया मलका भस्या घट जलसे शुद्ध नहीं होता है तैसे शरीरभी उन्जल जलस शुद्ध नही होय शुचिमानना वृथा है तथा शौचधर्मतो आत्माकोरजलकरनेसे होता है आत्मा लोभ करि हिंसाकर अत्यन्त मलिन हो रहा है सो आत्मा लोभ मलके दूर होनेसे पवित्र होता है जो अपने आत्माको देहसे भिन्न ज्ञानोपयोग दर्शनोपयोगमय अखंड अविनाशी जन्मजरामरण रहित तीन लोक वनिसमस्त पदार्थानका प्रकाशक इत्यादि गुण न युक्त सदा-. काल अनुभव करे है ध्यावे है उसके. शौच धर्म होय है । तथा मनको मायाचार लोभादिक रहित उनल करना ताक शौच धर्म होय है जिस्कामन काम लोभादिक करि मलिन होय तिस पुरुषके शौच धर्म नहीं होय है तथा धनकी लंपटता जो अति गृद्धिता तिसके त्यागसे शौच धर्म होय है तथा परिग्रहकी ममताको छोड़ि इन्द्रियनि विषय- निका त्याग करि तपश्वरणके मार्ग प्रवर्तन करना सो शौच धर्म है तथा ब्रह्मचर्य धारण करना सो शौच धर्म है | तथा अष्टमढ़ कर रहित विनयवानपना सो शौच धर्म है अभिमानी मद सहित होय सो महामलिन है ताकै शौच धर्म कैसे होय । तथा वीतराग सर्वत्रका परमागमका अनुभव करने कर अन्तर्गत मिथ्यात्र कपायादिक मलका धोवना सो शौचधर्म है । उतमगुणांकी अनुमोदना करि शौचधर्म हो य है । परिणामोंमें उत्तम पुरुपोंके गुणोंका चितवन करि आत्मा उज्जल होय है कषाय मलका अभाव करि उत्तम शौचधर्म होय है। आत्माको पाप करि लिप्त नहीं होने देना सो. शांचधर्म है जो समभाव सन्तोष भाव रुप जल करि तीन लोभके पुंजको घोवे है तथा भोजनमें अति (३४) लम्पटता रहित है उसके निर्मल शौचधर्म होय है क्योंकि भोजनका लम्पटी अति अधम है अरवाद्य वस्तुको भी खाय है हीनाचारी होय है भोजनका अति लम्पटीके लज्जा नष्ट हो जाती है क्योंकि संसारमें जिव्हा इन्द्रिय अर उपस्थ इन्द्रियके वशीभूत हुवे जीव आपामुलि नर्क तिर्यञ्च गतिके कारण महानिंद्य परिणामनिको प्राप्त होय है । संसारमैएर धनकी वाञ्छा परस्त्रीकी वब्छा परभोजनकी अति लम्पटता परि- णामोंको मलिन करने वाली है इनकी बांछते रहित होय अपने आत्मा- की संसार पतनते रक्षा करो। आत्माकी सलीनतातो जीव हिंसासे अरपरन परस्त्रीकी वाञ्छासे है जो परखी परधनके इच्छक अरजीव घातके करने वाले हैं वे कोटि तीर्थनमें स्नान करो समस्त तीर्थोकी वंदना करो तथा कोटि दान करो कोटि वर्ष तप को समत्त शाका पठन पाठन करो तो भी उनके शुद्धता कदाचित नहीं होय । अमक्ष भक्षण करने वालोंका अर अन्यायके विषय तथा धनके भोगने वालोंक परिणाम अस मलिन होय है जो कोटि वार धर्मका उपदेश अरसमस्त सिद्धान्तोंकी शिक्षा वहौत वर्ष श्रवण करते भी कदाचित भी हृदयमें प्रवेश नहीं करे है सो प्रत्यक्ष देखिये हैं जिनको पचास पचास वर्प शास्त्र श्रवण करते व्यतीत हो गये तो भी धर्मके स्वरूपा ज्ञान जिनको नहीं है सो समस्त अन्याय धन अर अभक्ष भक्षणका फल है. इस वास्ते जो अपने आत्माका शौच चाहो हो तो अन्यायका धन ग्रहण मति करो अमक्ष भक्षण मत करो परकस्त्रिीकी अभिलापा मत करो। तथा परमात्माके ध्यानसे शौच है अहिंसा सत्य अचौर्य ब्रह्मचर्य परि ग्रहके त्यागसे शौच धर्म है । जो पंच पापोंमें प्रवर्तन. करने वाले हैं ते सदा काल मलीन हैं जो परके उप कारको लोपे हैं वे कृतघ्नी महा मलीन हैं जो गुरुद्रोही स्वाद्रिोही मित्रद्रोही उपकारको लोपो वाले हैं तिन के पापका सन्तान असंख्यात मत्रोंमें कोटि तिधोंमे स्नानकर दानकरि दूर नहीं होय है विश्वासघाती सदा मलिन है इस वास्ते भगवानके परमागमकी आज्ञा प्रमाण शुद्ध सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्रकार आत्नाको शुचिकरो क्रोधादिकपायका निग्रहकरि
(३५)
उतमक्षमा दिगुणधारणकर आत्माको उज्जल की समस्तव्यवहार कपट-
रहित उचल करो परका विभव रोश्वर्य्य उज्जलयश उत्तमविद्यादि
प्रभावदेखि अदेविसका भावरूप भलीनता छोडि शौचधर्म अंगीकार
करो दूसरे के पुण्यका उदय देखि विपादीमत होउ इस मनुष्य पावके
तथा इन्द्रियबल ज्ञान आयु सम्पदादिकोको अनित्य क्षणभंगुरजान
एकाग्रचित्तकरि अपने स्वरूम में दृष्टिधार अशुभ भावनिका अभावकरि
आत्माको शुचि करो। शौचही मोक्षका मार्ग है शौचही मोक्षका दाता
है। इसप्रकार शौचनामा पञ्चम धर्मका वर्णन किया ॥ ६ ॥
अथ पष्टम संयम धर्म वर्णन ६,
संयम द्विविधलोके कथित मुनिपुंगवः
पालनीयं पुनन्दिते भव्यजीवेन सददा २
अर्थात्--( झुनिपुग ) मुनित्रोंमें श्रेष्ट असंगणधरादिक देवीने
(लोके संयमंद्विविध कथितं ) लोकमें संयम दो प्रकार एक बाह्यसंयम
दूसरा आम्यन्तर समय कहा है (अन्य जीवेन सर्वदा पुनश्चित्ते
पालनीयः) सोमव्यजीवों को अपने चितमें दोनो प्रकार का संजम पालन
करना चाहिये ॥ १ ॥
संजमुजणि दुलहु तंपाविलहु जोछडइ पुणमूह मई
सोमपाइ भवावाल जरसरणावलि किं पासइ पुणगई॥२॥
अर्थात्-- ( संजम जणि दुल्लह ) इस संसारमें संयम का प्राप्त
होना अत्यन्त दुर्लभ है ( तंपाविल्लहु जोछंडहि पुण मूढमई) इसलिये
इस संजमको पाकर जो छोड देता है वह महामूर्ख है ( सोभमइ भवा-
वलि जरमरणावलि ) और वह जन्ममरण की संततिरुप संसार की
अगणित परंपरा में चिरकाल तक परिभूमण करता है ( किंपावसइ
पुण सुगई। और इस तरह संजम रहित संसारमें परिभ्मण करते हुए
को श्रेष्टगति फिर कैसे मिल सक्ती है ? कमी नहीं, इसलिये संयम को
पाकर फिर नहीं छोड़ना चाहिये ॥ २ ॥
(३६)
संजमु पञ्चेदिय दंडणेण । संजमु जिकसाय विहंडणेण
संजमु तवदुद्धर धारणेण | संजमुरसचाय वियारणेण ॥३॥
अर्थात्--( संयम पर्चेदिय दंडणेण ) स्पर्शनरसन वाण चक्षु
और श्रोत्र इन पांचो इन्द्रियों को वश करने से संजम होता है ( संजमु
जिकसाय विहंडणेण ) कोधादिकपायों के खंडन करने अर्थात नाश
करनेसे संयम होता है (संजमु तव दुद्धरधारणण) दुर्द्धर (जो कठिनता
से धारण किया जाय) तपके धारण करनेसे (संयम ग्सचाइ वियारणेण)
और तिक्त, कटु, कपाय, मधुर आदि करसोंके - त्याग करनेसे उत्तम
संयम धर्म प्राप्त होता है ॥ ३ ॥
संयमु मणपसरहथंभणेण । संयमुगुरु कायकिलेसणेण
संयमुउववास विजभणेण। संयमु मणुपरिगह चायएण ॥४॥
अर्थात--(संयमु मण पसरइ थंभणेण ) चंचल मनका प्रसार
रोकनेसें संजम होता है ( संयम गुरुकार्याकलेसणण ) अत्यन्त काया
कलेश करनेसे संयम होता है (संयमुउबवास विजभणण) उपावास
वेला तेला आदि करनेसे संयम होता है (संयमु मणुपरिगह चायएण )
और मनके परिग्रह अर्थात आम्यन्तर परिग्रह के त्याग करनेसे संजम
होता है ॥ ४ ॥
संयमु तसथावर रक्खणेण । संयमुसतत्यपरिक्खणेण
संजमु तणु जोयणियं तणेण। संजमु बहुगमण चयंतणेण ॥४॥
अर्थात्--( संयम तसथावर रक्खणेण ) त्रस और स्थावरजीवो
की रक्षा करनेसे संयम होता है ( संजमु सुतत्यपरिक्खणण) सूत्रों के
अर्थ की परीक्षा करनेसे अर्थात् पठन पाठन और विचचन करनेसे संयम
होता है (संजमु तणुजोणियन्त णेण ) काय योग के व्यापार का
निरोध करनेसे संयम होता है ( संजमु बहुगमण चयंतणेण ) और
अधिक गमन का त्याग अर्थात् थोडा परिमित गमन करनेसे मसिंजम
होता है ॥ ५ ॥
(३७) संजमु अणु कंपकुणंत एण । संयमुपरमत्यवियाग्णेण संयमुपोसइ दसणहुपंथु । संजमुनिच्छय णरुमोक्खपंच ॥६॥ अर्थात्--( संयमु अणुकंपकुणतएण ) अनुकम्पा अर्थात् दया करनेसे संयम होता है ( संयमुपरमत्थवियारणेण ) और परमार्थका विचार करनेसे संयम होता है ( संयमुपोस हदसण हुपंथ ) यह संयम सम्पग्दर्शनके मार्ग को पृष्ट करता है संयमु निच्छयण रुमोक्खपंथ ) और निश्चय नयसे मनुष्य के लिये मोक्ष का मार्ग संयम ही है ॥६॥ संयमु विणुणरभव सयलु मुण्ण । संयमु विणदुम्गइ जियउ पण संयमु विणघडियम इच्छनाउ । संयमु विणविहलिय अत्यि आउ ॥७॥ अर्थात्-(संयमु विणणरभवसयलसुण्ण ) विना संयम के मनुष्य जन्म ही व्यर्थ है अर्थात् संजम धारण करणे के लिये इन्द्रादिक देव मनुष्य पयोपानेकी इच्छा करते हैं इसलिये मनुष्य जन्म को पाकर जो संजम धारण नहीं किया तो उस का यह जन्म व्यर्थ ही गया (संयमु विणुदुग्गइ जियउपणण) इसी संजम के विना यह जीव सदा दुर्गति में उप्तन्न होता है इस लिये इस जीवको सदा असा चिन्तवन करना चाहिये किसयम विनय डेयम इच्छजाड) विना संजम के मेरी एक घडी भी व्यर्थ न जावे क्योंकि (संयमविणविहुलिय अस्थि आर) विना संयमक यह आयुभी निष्फल है ॥ ७ ॥ इहभवि परभविसंजमुसरणु हुजउ जिणणाहें भणियं दुग्गइ सरसोसण खरकिरगोसण जेण भवारिविसमु हथिओ । अर्थात्- ( जिणणाहेंभणिय) श्रीजिनेन्द्र देवने असा कहा है ( इहभवपरमव संजम सरणु ) मनुष्य को इस भवतथापर भवमें संजम ही शरण है ( दुग्गइ सरसोसणरवरकिरणोसण ) दुर्गतिरुप सरोवर के शोपण करने के लिये यह तीन सूर्य की किरण समान है (जेण भवारि (३८) विसम हणिओ ) संसार रूपी विगम शत्रु इग्ली संजर द्वार। नाश किया जाता है ॥८॥ यहां विशप काहे है कि संयमका असा लक्षण जानना जी अहिंसा कहिये हिंसा को त्याग दयारत रहना हिनामिन पम्य प्रिय सत्य वचन बोलना परके धनमें बाछांका अभाम करना कुशीलका छोडना परिप्रहका त्याग करना ये पांच मत है सो इन पांच पापनिका एक दश लाग सो अणुनत है सवाल त्याग सामावत है इन पश्च व्रती को हद धारण करना अर पंच समिति का पलना तिनमें गमन की शुद्धता या समिति है वचन शुद्धता सौभाषा समिति है लिपि शुद्ध भोजन करना लागणा समिति है शरीर के उपकरणादि ननत टि साथि बना धरना सो आदान निक्षपणा समिति है गलमूत्र कपादित मल नया अन्य जीवन को ग्लानि वाधादिक गहीं उपने जस क्षत्री यणा मो प्रतिष्ठा- पना समिति है इन पंच समितियों का पालना भरनोमा नानमायाम इनचार कपायों का निराह करना र मन बचन लायकी अशुग प्रवृति ये दंड है इन तीन दंडनि का त्याग काना अर. शिव निम दांडती पञ्च इन्द्रियों को वश करना जीतना सो संजम है। भाव.थं पंचनता का घारण पंच समितिका पालन क.पायनिका निग्रह निता त्याग इन्द्रियों के विनय को श्रीजिनेन्द्र के पामागम में संयम कदा हामी संजाम बहुत दुर्लभ है जिनके पूर्व के पनि अशुभ कर्मानका अतिभवपना होते मनुष्य जन्म उत्तम जाति इन्द्रिय परिपूर्णता निरोगता सपायोंकी मंदता होय अर उत्तम संगति अर जिनेन्द्रक आमाका सेवन अर सांचे गुरुओं का संयोग सम्पग्दर्शनादि अनेक दुर्लभ सामिपी का संनोग होय तव संसार देह भोगनित अति विरक्तता के भारक मनुष्क अप्रत्याख्याना- वरणके क्षणो पशमंतं तो देश संजम होय अर निस्के आयाख्यान और प्रत्याख्यान दोनो कपााँडा क्षयोपशम होय तिस पुरुपके जाल संजम होय इस कारण संजम पावना महान दुर्लभ है। नरकगति देवगति तिर्यञ्चगतिमें तो संयम होय नहीं किसी विश्व के देशवत अपनी पर्याय माफिक कदाचित होय है और मनुष्य पांवमें भी नाच कुलादिकमें (३९) अधम देशोंमें इन्द्रिय विकल अज्ञानी रोगी दरिद्री अन्यायमा विपया ऽनुरागी तीन कपायी निंद्य कर्मी मिथ्या दृष्टियो संजम कदाचित नहीं होय हे इस वास्ते संजमका पाना अति दुर्लभ है असे संयम को भीपाय कोई मूढ बुद्धी विषयन कालोलुपी होय छोडे है तो उनन्त काल जन्म मरण करता संसार परिभ्रमण करे है। संयम पायकर जो छोडे है विगाडे है तिसके अनन्त काल निगेद में परिभ्रमण सस्थ वरोंमें भ्रमण करना होय सुगति नहीं होय संयम पाय विगाड़ने समान अन्य अनर्थ नहीं है विपयों कालोभी होय करि जो संयम को बिगाडे है सो एक कौडी में चिन्तामणि रत्नवेचे है तथा इंघनके अर्थ कल्प वृक्षको छेदे है विपयोंका सुख है सो मुख नहीं सुखाभास है ऋण भंगुर है नरकों के घोर दुःखोका कारण है. किंपाककल जैसे जीभका स्पर्श मात्र मीठा लगता है पीछे घोर दुःख महादाह सन्ताप देय सरण को प्राप्त करे हैं इसी प्रकार भोग कि श्चित्मा वकालतो अन्नानी जीवोंको भ्रमसे सुख सा भासे है फिर अनंत काल अनन्त भवोंमें घोर दुःखोंका भोगना है इस कारण संयम की परम रक्षा करो पांच इन्द्रियोंको विपयनिके संबंध ते रोकनेते संयम होय है कपार्यों का खंडन करि संयम होय दुद्धरतपका धारण करि संमय होय है रसोंका त्यागकर संयम होय मनक प्रसर के रोकने करि संयम होय है महान काय लेशनिके सहने करि संयम होय है उपवासादि अनशन तपकरि संयम होय है मनमें परिग्रहकी लाल साका त्याग करि संयम होय है त्रसथावर जीवोंकी रक्षा करना सोही संयम है मनके विकल्पोंके रोकने कार तथा प्रमादतें वचन की प्रवृत्तिके रोकने करि संजम होय है। शरीर के अंगपंगके प्रवर्तन को रोकने करि संयम होय है । वहुत गमन के रोकने कीर संयम होय है। बहुरि दयारुप परिणाम क्ररि संयम होता है परमार्थका विचार करके तथा परमात्मा का ध्यान करके संयम होय है संयम करके ही सम्पग्दर्शन पुष्ट होय है संयम ही मोक्ष का मार्ग है. संयम विना मनुष्य भवशून्य है गुणरहित है संयम विना यह जीव अनेक दुर्गतोंको प्राप्त हुआ है संयम विना देहका धारना वुद्धिका पावना ज्ञानका आराधन करना समस्त वृथा (४०) भष के है संयम विना दीक्षा धारना व्रत धारना मुंडमुंडावना नग्न रहना धारणा ये समस्त वृथा हैं क्योंकि संयम दोय प्रकार है इन्द्रिय सयम प्राण संयम जिसकी इन्द्रियां विषयोंसे नहीं रूकी अर जिसके छ कार्य जीवोंकी विराधना नहीं टही तिसके वाह्य परीपह सहना तावरण करना दीक्षा लेना वृथा हैं संसार में दुःखित जीवोंको संयम विना कोई अन्य शरण नहीं है ज्ञानी पुरुप तो सदा असा विचार करे हैं जो संयम बिना एक घडी भी मत जावो संयम विना आयु निष्फल है यह संयम है सो इस भवमें अर परभवने शरण है दुर्गतिरुष सरोवर के शोपण करने को सूर्य्य है संयम करके ही संसार रुपी विषम वर्गका नाश होय है संसार परिभ्रमण का नाश विना संजम के नहीं होय ऐसा नियम है अर जो अन्त रंगमें तो क.पायों करि आत्माको मलीन नहीं होने देय है अर वाह्य यत्न'ऽचारी हुआ प्रमाद रहित प्रवर्ते है तिसके संयम होय है इस प्रकार संयम धर्मका वर्णन समाप्त हुआ । अथ सप्तम तप धर्म वर्णन (७) द्वादशं द्विविधचैत्र वाह्याम्यन्तर भेदतः स्वयं शक्ति प्रमाणन कियते धर्म वेदिभिः ॥ १ ॥ . अर्थात्--( द्वादशं द्विविधंचैव वाह्याम्यान्तर भेदतः ) आम्यं तरके छ: वाह्य के छः जैसे तप बारह प्रकार है तथा वाह्य और आम्य- न्तर के भेदस तप दो प्रकार है (धर्म वेदिभिः ) धर्मके जानने वाले भन्य पुरुषों को ( स्वयं शक्ति प्रमाणेन · यह उत्तम तप अपनी अपनी शक्तिके अनुसार करना चाहिये ॥ १ ॥ गरभवपावेप्पिणु तच्चुमुणेप्पिणु खचिवि पंचेदिय समणु णिन्वेउ पमंडिवि संगइ छडिवि तउ किन्जइ जाएवि वणु ॥२॥ अर्थात-( णरभवपावेप्पिणु सञ्चमुणेपिणु ) मनुष्य भव कोपाकर समस्त तत्वों का ज्ञान सम्पादन करना चाहिये ( खंचि विपञ्चदिय (४१) समणु णिव्वउ ) और पाञ्चो इन्द्रिय और मनके व्यापारको रोककर ( पमंडिवि संगइछंडिवि ) वैराक्ष धारणकर समस्त परिग्रह छोडना चाहिये ( तउ किजउ जाएविवणु ) और पश्चात वनमें जाकर 'यह उत्तम तप करना चाहिये ।। २ ।। तंतउ जहिं संगइ छडिजइ । तंतर जाहिभएणु विखडिजइ तंतउ जहि णग्गत्तणुदीसइ । तंतउनहिं गिरकंदरि णिवसइ ॥३॥ अर्थात्-( तंतउ जहिसंगइ छडिजइ ) वह तप जहा बाह्य और आभ्यन्तर परिग्रह का त्याग किया जाता दे वहीं होता है (तंत उ जहिं भयणु विखडिजइ) वह तप जहां कामदेव वश में किया जाता है वहां होता है ( तंतउ. जहिंणगातणु दीसइ ) वह तप वही है जहां साक्षात् दिगम्बर पना दिखाई पडे अर्थत् विना दिगम्बर . मुद्राके तप होनहीं सक्ता ( तंतउ जहं निरिकंदर णिवसइ ) और नय वही है जिसके करने में पहाड की गुफाओं में निवास करना पडै ॥ ३ ॥ तंतउ जहिं उपसा सहिजइ । तंतउ जहिरायाइ जिणिजइ तंतउ जहिंभिक्खइ भुंजिष्टइ । सावयगेह कलियगमिज्जइ ॥४॥ अर्थात् --( तंतउ जहिउपसग्ग सहिज्जइ ) जिसमें अनेक प्रकारके उपसर्ग सहन किये जाते हैं वही तप है ( तंतउ जहिरागादि जिणिजइ ) तप वह है ज. रागादि विभाव परिणाम क्षय होते हैं ( तंतउ जहि भिक्खइ भुजिंजइ सावयगेहिं कलियगमिज्जइ ) और जिस्में योज्ञ कालमें श्रावक के घर जाकर मिक्षा भोजन किया ज.ता है वही तप है ॥ ४ ॥ तंतउ जत्थ समिदिपरिपालणु । तंतउ गुति तयहि णिहालगु तंतउ जहिं अप्पापर बुज्झइ । तंतउ जहिं भवमाणु गिउज्झइ ।।५।। अर्थत्-(तंतउ जत्य समिदि परिपालणु) जिस्में पांचों समि- तियों का पालन किया जाता है वह तप है तथा ( तंतउ गुतितयहि (४२) णिहालणु ) जिस्में मनोगुप्ति बचन गुप्ति काय गुप्तिका पालन किया जाता है वह तप है (तंतउ जहिं अध्या पर बुझइ) जिसमें आत्मा और आत्मा से भिन्न शरीरादि पुद्रलोका ज्ञान होता है वह तप है ( तंतउ जहिं भवमाणु जिउज्झइ) और जिस्म संसार के बढाने वाले मान माया लोभादिक का त्याग किया जाता है वह तप है ॥५॥ तंतउ जहिं सतरुव मुनिज्जा । तंतउ जहं कम्महगण खिज्जा तंतर जहिं सुरपति पयासहिं । पवरणस्य भवियण पयासइ ॥६॥ अर्थात्-- ( तंतउ जहिं सखरुव मुणिचाइ ) जिस्में केवल आत्मा के स्वरुपका ज्ञान होता है उस तप कहते है ( तंतउ नहिं सम्म हँगा खिजइ) जिस्में निखिल कर्मों के समूह नाश होते हैं उस को तप कहते हैं ( तंतउ जसुरभत्ति पयासइ ) तब वही है जिसकी इन्द्रादिक देवभी भक्ति प्रगट करें स्तुतिकरें ( पक्य णत्य भवियणहँ यमासइ) तथा पुरुषों के उपकारके लिये जो शास्त्रोको व शाशोंके अर्थको सुनाना पढ़ना पढाना भी तप है ॥ ६ ॥ नेणतवेकेबलुजिउपज्जाइ । सासइ मुखणिच संपज्जइ ॥ ७ ॥ अर्थात्--(जेणतो केवलुजिउपाइ ) तप वही प्रशंसनीय है कि जिसके द्वारा केवल ज्ञान ही उतन्न हो (सासइ सुवखणि संपन्नइ) और नित्य अविनाशी मोक्ष सुखकी प्राप्ति हो ॥ ७ ॥ बारहविस्तववर दुग्गइ पहहरू संपुजिजाइ थिरमणण मच्छरु मइ छडिवि करणइ दंडिवि तंपिधारजइ नाउरविणा॥७॥ अर्थात्- ( वारदविह तववर दुग्गइ पहहरु ) यह श्रेष्ठ बारह प्रकार तप दुर्गतियों के मार्ग को हरण करने वाला है (तंपुजिजा थिरमणणे ) इसलिये स्थिरमनसे इसकी पूजा करनी चाहिये ( मच्छरुमा छडिवि करणइदंडिवि ) तथा मत्सरता और मद को छोड़कर पांचों (४३) इन्द्रियोंको वश करके ( तंपिधरिजइ गउरविणा) यह उत्तम तप गोवाहित पुरुषों को धारण करना चाहिये ॥ ८ ॥ यहां विशप जैसा है इच्छाका निरोध करना सो तप है तप चार आराधना ॲमें प्रधान है जैसे सोनको तपानेकर जब सोला ताव लगै तर समस्त मल छोडि शुद्ध होय है तैसे आत्मा भी द्वादश प्रकार तप के प्रभाव करि कर्म मल रहित शुद्ध होय है अज्ञानी मिथ्या दृष्टी तो देहको पञ्च अग्नि कर तपाये हैं तथा अनेक प्रकार कायके क्लेशको तप कहै है सो तप नहीं है। कायको दग्ध किये मार लिये कहा होय मिथ्या दृष्टि ज्ञान पूर्वक आत्माको कर्मके वंध ते छुडाना नहीं जाने है । कर्ममल कलंक रहित आत्नातो भेद विज्ञान पूर्वक अपने आत्माका खभा- वको अर राग द्वेष मोहादिरूप भाबकर्म रुप मैलको भिन्न देखे हैं जिससे राग द्वेष मोहरुप मल दूर होजाय अर शुद्ध ज्ञान दर्शन मय आत्मा भिन्न होजाय सो तप है याही त गाहै हैं मनुष्य भवपाय जो स्वपर तत्वका जाना है तो मन सहित पञ्च इन्द्रियनको गेकि विपयानते विरक्त होय समस्त परिग्रहको छांडि बंधके करने वाली राग द्वेप मय प्रवृत्ति छोडि पांपका आलम्बन छूटने के अर्थ ममता नष्ट करने को वनमें जाना सो तप है | जैसा तप धन्य पापोंके होय है संसारी जीवों के ममता रुप वढी फांसी है सो ममता रूप जालमें फंसा हुआ धोर कर्म को करता महा पापका बंधकर रोगादिककी तीन वेदना अर स्त्री पुत्रादि समस्त कुटुम्ब का तथा परिग्रहका त्रियोगादिक ते उपजा तीच आर्त ध्यानते मरण पाय दुर्गतियों के घोर दुखो को, जाय प्राप्त होय है। तपोवन को जाय प्राप्त होना महान दुर्लभ है तपतो कोई महा भाग्य पुरुप पापों से विरक्त होय समस्त स्त्री पुत्र धनादिकतं ममत्व छोड परम धर्मके धारक वीतगग निग्रंथ गुरुओंके चरण का शरण पावे है तथा गुरुओं को पाय करि जिसके अशुभ कर्मका उदय अतिमंद होय सम्यक्त रुप सूर्यका उदय प्रगट होय अर जिसके संसार शरीर भोगोंसे विरक्तता उपजी होय सो तपग्रहण करे है अरजी असे दुद्धर तपको धारण करके भी कोई पापी विपयोंकी वांच्छा करिं वि डे है तिसके अनंतानंत कालमें (४४) भी फिर तप नहीं प्राप्त होय है इस कारण मनुष्य भव पाय तत्वाका स्वरूप जानि मन सहित पञ्च इन्द्रियोंको रोकि वैग़ज्ञ न्य होय समस्त संगको छोडि वनमें एकाकी ध्यान में लीन हुवा तिष्ट्र मो तप है। जहां परिग्रहमें ममता नष्ट होय बांछा रहिन तिष्ठना तथा प्रचंड कामका खंडन करना सो बड़ा तप है। जहां निन्न दिगम्बररूप धारि शीतकी आतापी पवनकी वकि तथा डांतमांसमच्छर मक्षिका मधु मक्षिका सर्प बिच्छू इत्यादिकते अजी घोर वेदना को कोरे अंगपर सहना सो तप है । अर जो निर्जन पर्वतों की निर्जन गुफाओं में भयंकर पर्वतोंके के दगडाम तथासिंह व्यान ल्याली चीता गड हनीन करच्याप्न घोर वनें में निवास करना सो नप है । तथा दृष्ट ती म्लेच्छ चोर शिकारी मनुप्य तिर्यञ्च अर दुष्यन्तग विदेवों कृत घोर उपसगाँस कम्पायमान नही होना धोरवीर पनाते कायरता छोड़ि वैर विरोध छोड़ि समता भावते परल माका ध्यान में लीन हुआ सहना सातप है । तथा समस्त जीवोंको उलझावने वाले राग द्वेपाको जीतना नष्ट करना सो तर है। तथा जो याचना रहित भिक्षाके अवसग्म श्रावकका घर, नवधा भक्ति- कर हाथमें रक्खा खारा अलूना कडवा बाटा लूरवा चीकना रस नीरसतिसमें लोलुपता र संक्लेश हित निदापि प्रागुरु आधार एक वार भक्षण करना सी तप है। तथा जो पांच समितियांका पालना अर मन वचन कायको चलायमान नहीं करना अपना राप द्वेष रहित आत्माका अनुभवन करना स! तप है। जो स्वपर तत्वकी कथनीका निर्णय करना चार अनुयोगोका अभ्यासकरि धर्म सहित बाल व्यतीत करना सो तप है । तथा अभिमान छोडि विनयरूप प्रवर्तना कपट छोडि सरल परिणाम धारना क्रोध छोडि क्षमा ग्रहण करना लोभ त्याग निर्वाञ्छक होना सो तप है । जिससे कम के समूहको नाश कर आत्मा स्वाधीन होजाय सो तप है । जो सूबके अर्थका प्रकाश करना व्याख्यान आपनि रन्तर अभ्यास करे अन्यको अभ्यास करावे सो तप है । तपस्विन का देव तथा इन्द्र स्तवन भक्ती करे हैं तपकरि केवल ज्ञान प्रसन्न होयं है तपका अचिन्य प्रभाव है तपके मांहि परिणाम होना अति दुर्लभ है
(४५)
नरक तिर्यञ्च देवों में तपकी योजना हीनही एक मनुष्य गतिमें ही होय
मनुष्य गतिमें भी उतम कुल जाति बल बुद्धि इन्द्रियों की पूर्णता जिसके
होय तथा गगादिकों की मन्दता जिसके होय तथा विपयोंकी लालसा
जिसके नष्ट हुई होय तिस पुरुपके होय है अर तप द्वादश प्रकार है
जिसकी जैसी शक्ति होय तिस प्रमाण धारण करो बालककरो वृद्ध करो
धनाढ्य करो निर्धन करो वलवान को निर्वल करो साहाय सहित होय
सो करो सहाय रहित होयसो को भगवान करि निरूपण किया तप
किसीके भी करनेको अशक्य नहीं है। जिससे वायुपित कफादिकों का
प्रकोपन ही होय रोगकी वृद्धि नही होय जैसे शरीर रत्नत्रशको सहकारी
वना रहै तैसे अपना संहनन बल वीर्य देख तपकरो। तथा देशकाल
आहारकी योज्ञता देखि तप करो | जैसे तपमें उत्साह बढ़तो रहे परि-
णामोंमें उज्ज्वलता वढती जाय तैसे तपकरो तथा जो इच्छाका निरोध
करि विषयों में राग घटावना सो तप है तपही से जीवका कल्याण होय
है काम, निद्रा, प्रमाद को नष्ट कानेवाला है इस कारण मद छोड़ि वारह
प्रकार तपमें जैसा जैसा करनेको सामर्थ होय तैसा ही तपकरो इस
प्रकार तप धर्मका वर्णन किया..
अथ अष्टम त्याग धर्म वर्णन (6)
चतुर्विधाय संघाय दानं चैव चतुर्विधम्
दातव्यं सर्वदा सद्भिश्चिन्तकैः पारलौकिकः ॥ १ ॥
अर्थात्--( दानं चैव चतुर्विधम् ) आहार दान, ऑपघ दान,
अभयदान, ज्ञानदान असे दान चार प्रकारका है (चिन्तकैः पार-
लौकिक सद्भिः) सो परलोकका चिन्तवन करनेवाले सनोको उक्त
चारों प्रकारका दान ( चतुर्विधाय संघाय ) मुनि-अर्जिका, श्रावक,
श्रावका, असे चार प्रकारके संघके लिये (सर्वदा दातव्यं) हमेशा
देना चाहिये ॥ १॥
(४६) चाविधम्मंगउ तंजिअहंगर पियसतिय मुंतिइ जण हु पतह सुपवित्तहँ तवगुग जुतह परगइ संचल तं शुणहु ॥ २ ॥ अर्थात्---( चाउविधम्मंग ) दान देना भी धर्मका एक अंग है ( तंजिअहंगउ णिय सत्तिय सुत्तिइ जणहु ) इसलिये इस को भक्ति पूर्वक अपनी शक्तिके अनुसार पूर्ण रीतिसे करना चाहिये ( तव गुण जुतह फतह सपवितह ) और गुणों सहित असे पान तथा सुपात्रके लिये सदा करना चाहिये ( परगइ संबलु तंमुणाहु) दान देना ही परगतिके लिये पाथेय (मार्गमें खानेयोन पदार्थ) है जैसा जानो ॥ २॥ चाए अब गुणगण जिउहाइ । चाएणिमाल किति पयट्टइ चाए अरिगण पणवहिपाए । चाए भोगभूमिसूरजाए । ३ ॥ अर्थात्-( चाए अब गुणगश जिउछुइ ) दान देनेसे अवगुणोंका समूह सहज ही नाश होजाता है ( चापणिम्मल कि तिपयट्टइ । दान देनेसे चारों ओर निर्भल किति फैलती है (चाए अरिंगण पथवहिपाए ) दान देनेले शत्रु समूह भी पैरोपर पडकर नमस्कार करता है (चाए भोग भूमि सुय जाए) और दान देनेसे भोग भूमिके सुख मिलते हैं ॥ ३ ॥ चाए विहिजइ णिच्युजि विणयं । सुह बयणइ भासे पुणपणय अभयदान दिजउ पहलाउ । जिमणारसे परमव दुह पारउ !! ४ ॥ अर्थात्-( चाए विहिजइ णिच्चुजिविणयं ) दान देनेमें नित्यही विनय प्रगट करना चाहिये (सुहवयणइ भासे पुणपणयं) और प्रेम पूर्वक शुभ वचन कहने चाहिये ( अभयदान दिज्जउ पहि- लांउ ) चारों दानोंमें सबसे प्रथम अभयदान देना चाहिये (जिम- णासे परभव दुह पारहू ) जिससे परभवके समस्त दुःख समूहोंका नाश होवे अर्थान् परभवके दुख दूर करनेवाला अभयदान ही इसलिये यह प्रथम अर्थात् प्रधान दान कहा गया है ॥ ४ ॥ ॥ sho (४७) , सत्यदाण वीयजपुग किमाई । णिम्मलगाण जण सांकना ओसह दिजइ रोय विगासणु । काविणपिच्छइ बाहिपयासणु ।।२।। अर्थ-(सत्पदान बीजय पुणकिजइ दूसरा दान शास्त्रदान अर्थात शास्त्र प्रदान करना, विद्यापढाना, पढ़ते हुग को सहायता करना, पाठशाला खोलना आदि करना चाहिये जिससे निर्भल ज्ञानकी प्राप्ति हो ( णिम्मलणाण जेग पविज्जइ) क्योंकि शाम्य दान बाविचादानसे निर्भल केवल नानकी प्रानि होती है (ओलह दिज्जिइ रोग विणालणु ) तीसरा समस्त रोगोंको नाश करनेवाला औपषदान देना चाहिये (कद्दविणपिच्छइ बाहिपासणु) की जिलसे किसी प्रकार की आधि व्याधि उप्तन्न नहो अर्थात् औपधि दान देनेसे सब आधि व्याधि रोगाविक दूर होजाते है ।। ५ ।। आह.रेवणरिद्धि पबलइ । उविउ चाउ जिएहु पबष्टइ अहबा दुष्पयिप्पा चाए । चाउजिपहु गगहु समवाये ॥ ६ ॥ अर्थात्-(आहारे धणरिद्धि पबइ ) आहार वान देनेसे धन रिद्धि आदिककी वृद्धि होती है ( चउविचाउ जिण्हु पवठ्ठइ) इस प्रकार अभयदान शानदान औपधदान और आहार दान ये चारों ही दान देने चाहिये । यह व्यवहार दान कहा । ( अह्वा दुट्ट त्रियप्पह चाप ) अब अथवा करके निश्चय त्याग का स्वरूप कहते दुष्ट विकल्पांका (चाउजिएड मुणहुसमवाए ) साम्यपरिणामों सेजो त्याग करना है वही उत्तम साग है असा जानना ॥ ६॥ पता दुहियहिं दिजइ दाणुकिज्जइ माशु जि गणु यण दयभावियइ अभंगदंसणु चिंतइभवियणहं ॥ ७ ॥ अर्थात- (दुहियहिं दिज्जइ ) संसारमें जो तुली जीव हैं उनको दान देना चाहिये ( दाणुकिज्जइ माणुजिगुणगणहं ) ओरजो गुणी पुरुप हैं अर्थात् जो सम्यग्दर्शनादि गुणोकर सहित हैं उनका विशेष सत्कार करना चाहिये (दयभावियइ ) समस्त जीवोंपर (४८) अटल दयाकी भावना होनी चाहिये (अमंग दसणुचिंत्तह भवियणह) और भव्यजनोंके दर्शनकी सदा अभिलापा रखनी चाहिये यही त्याग धर्म है ।। ७॥ यहां विशेप त्यागका स्वरूप अस जानना जोधन सम्पदादिक परिग्रहको कर्मका उदय जनित पराधीन विनाशाकअर अभिमानक उप्तन्न करनेवाला तृष्णाको बढानेवाला राग दंपकी तीवना करनवाला आरम्भकी तीव्रता करनेवाला हिंसादिक पश्च पापोंका मूल जान उत्तम पुरुप इसको अंगीकार ही नहीं किया ते धन्य हैं। किसीने इसको अंगीकारकर हालाहलविप समान जान पुराननिकके समान त्याग किया उनकी अचिन्त्य महिमा है । अरकोई जीवोंक तीन राग भाव मंद हुआ नहीं इस बास्ते सर्व प्रकार त्यागनेको समर्थ नहीं अर सराग धर्ममें मचि धारे है अर पापांसे जयभीत हैं त इस धनको उत्तम पात्रोंके उपकारके आर्थ दान लगांव हैं अर जोधर्म सेवन करनेवाले निर्धन अन हैं तिनका अन्न बत्रादिक उपकार करनेमें धन लगाये हैं तथा धर्मके आयतन जिन मंदिगदिकॉमें जिन सिद्धान्त लिखाय देनेमें तथा उपकरणोंमें पूजनादिक प्रभाव नांगमें लगावे हैं तथा दुःखितदरिद्री रोगीनके उपकारमें तन मन धन कम- णावान होय लगावे हैं तेधन जतिव्य को सफल करे हैं। दान है सोधर्मका अंग है इस वास्ते अपनी शक्ती प्रमान भक्तिकर गुणांके धारक उज्जल पात्रोंको दान देना है सो परलोकको जावते महान सुख सामिग्री लेजाना है सोनिर्विघ्न स्वर्गको तथा भोग भूमिको प्राप्त करनेवाला जानो । दानकी महिमा तो अज्ञानी बालगोपालभी कहै हैं कि जो पूर्व भवमें दान दिया है सो नाना प्रकार मुख सामिग्री पावे है अर देगा सो पावेगा इस वास्ते सम्पदाका बाञ्छक होय सो दान देने में ही अनुएग करो। अरजो दान करनेमें उद्यमी नहीं केवल मरण पर्यन्त धनका सञ्चय करनेमें उद्यमी हैं ते यहांभी तीन आर्त परिणामतें मरणकर सादि दुष्टतिर्यञ्च गतिपाय नर्क निगोद गतिको जाय प्राप्त होय है। धनक्या साथ जायगा धन पावना तो ४२. दान-हीते सफल है दान रहितका धनघोर दुखोंकी परिपाटीका कारण है अर कृपण इहांभी घोर निन्दाको पाव है, कृपण का नाम भी लोक नही कहै हैं कृपण सूमका नाम लोक अमंगल माने है अर जिसमें अनेक प्रकार अवगुण दोप भी होय तो दानी का दोष ढकि जाय है दानीका दोप दूर भागे है दान करही निर्मल कीर्ति जगत में प्रसिद्ध होय है । देने करि बैरी भी चरणोंको नम- स्कार करता है । दान देने तें वैरी वर छोडे हैं अपना हित करने वाला मित्र हो जाय है जगत में दान ही वडा धर्म है थोडासा दान भी सत्यार्थ भक्तिकर करनेवाला भोगभूमिका तीन पल्य' पर्यन्त भोग भोगि देव लोक जाय है देनाही जगत में ऊंचा है दान देना विनय संयुक्त स्नेहका वचनं सहित होय देना चाहिये अर दानी है ते असा अभिमान नहीं करे हैं जो हम इसका उपकार करे हैं। दानी तो पात्रको अपना महान उपकार करने वाला माने है जो लोभ रुप अंध कृपमें पडने का उपकार पात्रविनाकोन करे पात्रों के विना लोभी पुरुषोंका लोभ नहीं छूटता अर पात्रविना संसार के उद्धार करने वाला दान कैसे बनता । इस वास्ते धर्मात्मा पुरुपोंके तो पात्रोंके मिलने समान अरदान देने समान अन्य कोई आनंद नहीं है बड़ा पना ज्ञानीपना धनाढ्य पना पाया है तो दान में ही उद्यम करों। छह कायके जीवोंको अभयदान दो अभक्षका त्यागकर वहु आरंभके घटानेके करि देखिसोधि मेलना धरना यताचार विना निर्दयी होय नहीं प्रवर्तना किसी प्राणी मात्रको मन वचन कायसे दुःखित मत करो । दुःखी जीवोंकी करुणा ही करो येही गृहस्थके अभयदान है क्योंकि संसारमें जन्म मरण रोग शोक वियोग दरिद्र आदि सन्ता- पका पात्र नहीं होवोगे । तथा संसार के बढानेवाले हिंसाको पुष्ट करनेवाले तथा मिथ्या धर्मकी प्ररुपणा करनेवाले तथा युद्ध शाख श्रृंगारशास्त्रं माया चारके शास्त्र वैद्यक शास्त्र रस रसायण मंत्र जंत्र मारण वशी करणादि शास्त्र महापाप के प्ररुपक हैं इनको अति दूरते. ही त्गाग भगवान वीतराग सर्वज्ञ का कह्यां दया धर्म · का उपदेश (५०) देनेवाला स्याद्वदरूप अनेकान्त का प्रकाश करनेवाले नय प्रमाण करि तत्वार्थ की प्ररूपणा करनेवाले शान्त्रीको अपने आत्माको पढनेपढ़ान करि आत्माके उद्धार के अर्थ अपने अर्थ दान करो । अपनी सन्तान को ज्ञान दान करो तथा अन्य धर्म बुद्धी धर्मके गंचक इन्च्छक तिनको शास्त्र दान करो ज्ञानके इच्छक है ते ज्ञान दानके अधि पाठशाला स्थापन करे हैं क्योंकि धर्मका स्तम्भ ज्ञान ही है। जहां ज्ञान दान होगा तहां ही धर्म रहेगा इस वास्त ज्ञान दानमें प्रवर्तन करो । ज्ञान दानके प्रभावतें निर्मल केवल ज्ञानकों पाये है। तथा रोगका नाश करवेवाला प्रामुक औषधिका दान करो औषध दान चडा उपकारक है अर रोगीकों नीधी तय्यार औषध मिले हैं नाका चडा आनंद है निर्धन होय तथा जिसके टहल करनेवाला नहीं होय तिसको औपध बनी हुई मिल जाय तो निधान (बजाना ) के लाभ समान माने है औषध लेय निरोग होय है सो समन्त बन नप संयम पाले है ज्ञानका अभ्यास कर है औपध दान करने बालेक चात्सल्प गुण स्थितिकरणगुण निर्विचिकित्सागुण इत्यादि अनेक गुण प्रगट होय है औपध दानके प्रभावतें रोग रहित देवांका क्रियक शरीर पावै है । तथा आहार दान समस्त दानों में प्रधान है प्राणीकी जीवन शक्ति बल बुद्धि ये समस्तगुण आहार विना नष्ट होजाते हैं जिन्होने आहार दिया तिन्होंने जीवन शक्ति समस्त दाना । आहार दानही से मुनिश्रावक का सकल धर्म प्रवत है. आहार विना मार्ग भृष्ट होजाय आहार है सो समस्त रोगोका नाश करनेवाला है जो आहार दान देना है सोमिथ्या दृष्टीभी भोग भूमिमें कल्प वृक्षाका दशांग भोगकों असंख्यात काल भोगे अरक्षुधा कृपादिककी वाधां रहित हुआ आवले प्रमान तीन दिनके आन्तरे भोजन करे । समस्त दुःखक्ले शरहित असंख्यात वर्प सुख भोग देव लोकमें जाय उपन्न होता है इस वास्ते धनको पाय चार प्रकारके दान देने में प्रवर्तन करो । अरजो निर्धन हैं तेभी अपने भोजनमें ते जितना वने तितना दान करो आपको आधा पेट भोजन मिले उसमेंस भी. पास दोय
(५१)
प्रास दुखित भुखित जीवों का देओ । तथामिष्ट बचन बोलनेका
वड़ा दान है आदर सत्कार विनय करना स्थान देना कूशल पूछना
ये महा दान हैं तथा दुष्ट विकल्पोंका त्याग करो पापोंमें प्रवृत्तिका
त्याग करी चार कपायों का याग करो विकथा करने का त्याग करो
परके दोप सत्य असत्य कदाचित मत कहो तया अन्यायका धन
ग्रहण करनेका दूरही ते त्याग करो हे ज्ञानी जन हो जो अपने
हितके इच्छक होतो दुःखितजीवों को तो दान करो अ सम्यग्दर्शन
सम्यज्ञानादि गुणों के धारकोंका महाविनय सन्मान करो समस्त
जीवोंमें दयाकरो मिथ्या दर्शनका त्यागकरो रागद्वेष मोहके धारक
कुदेव अर आरम्भ परिग्रह के धारक भेषधारी अर हिंसाकै पोपक
रागद्वेषकों पुष्ट करनेवाले मिथ्या दृष्टी नके शास्त्र इनकों वंदना
स्तवन प्रसंशा करनेका त्याग करी कोध मान माया लोभ इनके
निग्रह करनेमें बड़ा उद्यम करो क्लेश करनेके कारण अप्रिय वचन
गाली के वचन अपमान के वचन मद सहित कदाचित मत कहो
इत्यादि जो परके दुःखके कारण तथा अपना यशकों नष्ट करनेवाला
धर्मको नष्ट करनेवाला मन वचन कायके प्रवर्तन का त्याग करो
इस प्रकार त्याग धर्मका वर्णन किया ॥ ८ ॥
अथ नवम आकिञ्चन्य धर्म वर्णन (९)
चतुर्विंशति संख्यातो यः परिग्रह भेदतः
तस्य संख्या प्रकर्तव्यातृष्णारहित चेतसः ॥१॥
अर्थात्- यः परिग्रह भेदतः चतुर्विशति संख्यातः) जो
वाह्य और आम्यन्तरके भेदसे परिग्रह चौवीस प्रकार कहा है (तस्य
तृष्णा रहितचे तसा संख्या प्रकर्तव्या) उसका नियम तृष्णारहित
चित होकर करना चाहिये ॥ १॥
, (५२) आकिञ्चणभावहु अप्पहुझावहु देहलुभिण्णउणाणमऊ णिरु वमगयवण्णउ मुह संयण्णउ परम अतिदिय विगयभयो ।॥२॥ अर्थात्--( देहहुभिण्णउ णाणमओ णिरुवमगव वण्णउ मुद् संपण्णउ ) शरीरसे भिन्न, ज्ञानस्वरूप, उपमारहित, वर्णगन्धादिर- हित, सुखसेसम्पन्न, परमअतिंद्रिय, (विगयभंओ) और भयसे रहित (आकिञ्चण भावहु अप्पहु ज्झावहु ) आत्माका ध्यान करो और यही अर्थात् शुद्ध आत्माका ध्यान करना ही आकिञ्चन्य धर्म है जैसा चिन्तवन करो ।। २ ॥ आकिञ्चशु वउ संगणिवित, आकिञ्चणुवन मुह झाणसति आकिंचणु वउ चियलियममत्ति आकिंचण त्यणचयपवित ॥३॥ अथोत्--( आकिंचणु वउसंगहॅणिवित ) समस्त परिग्रहका त्याग करना आकिञ्चन्य व्रत है । (आकिञ्चणु वः सुह झाणसति) तथा आत्मामें शुभ ध्याकी शक्ती प्रगट होना सो आफिश्चन्य व्रत है ( आकिञ्चण वड सुहलुहझाणसति ) ममत्व परिणामोंका त्याग करना अर्थात् चेतन अचेतनात्म द्रव्योंके अर्जन रक्षणादिककी इच्छा का त्याग करना आकिञ्चन्य व्रत ई ( आकिञ्चणल्यणतयपवित्त) और रत्नत्रय अर्थात् सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यकूचारित्र की प्रवृत्ति करना अर्थात् इनको धारण करना आकिञ्चन्य व्रत है ॥ ३ ॥ आकिञ्चणु आउचिय इचित, पसरंतउ इन्दियवणुविक्ति आकिञ्चणुदेहह हचतु । आकिञ्चणजे भत्रमुह विरत ।। ४ ।। अर्थात-( आंकिञ्चणु आउभियइचित ) विचित्र इन्द्रियरुपी बनमें यथेच्छ विहार करते हुवे मनको संकुचित करना अर्थात् मनकी प्रवृत्तिको रोकना सो आकिंचन्य व्रत है ( आफिंचणु देहहुणेहचतु) तथा शरीरसे स्नेह (मभत्वपरिणाम ) छोड़ना आकिञ्चन्य धर्म है (आकिंचणजंभव सुहविरत ) और संसारके मुखोंसे विरक्त होना .
(५३)
अर्थात् संसारक सुखांका और उनके साधनोंका त्याग करना सो
आकिंचन्य व्रत है ॥ ४॥
तिणयत्तपरिग्गह जत्थणस्थि आकिंचणसो णियमेण आत्य
अप्पा परमत्यविचारसत्ति पड्डिजइ जिंह परमेटिभत्ति ॥ ५ ॥
अर्थात्-(तिणमित्तपरिग्गह जत्यिणस्थि ) जहां त्रणमात्र भी
परिग्रह नहीं है (आकिञ्चणुसोणियमेण अस्थि ) वहीं नियमसे
आकिञ्चन्य व्रत होता है ( अप्पापरमत्थविचार सति ) जहां परमार्थ
अर्थात शुद्ध आत्माके विचार करनेकी शक्ति प्रगट होती है (पडिजइ
जिहिं परमेट्ठिभत्ति ) तथा जहां पञ्चपर मेष्ठी की ।क्त पढ़ी जाती
है. वहीं आकिञ्चन्य व्रत जानना ॥ ५ ॥
छंडिजइ जाहिं संकप्पगुट ! भोयणुवंधिज्जइ जहिं अनिट
आकिंचणुधम्मु जिएम होय । तंझाइज णिरु इत्थ लोय ॥६॥
अर्थात-छंडिज्जइ जहिं संकप्प दुइ) जहां दुष्ट संकल्पों
का त्याग किया जाता है ( भोयण बंधिज्जइ जहिअणि? ) और
अंनिष्ट नीरस भोजन ग्रहण किये जाते हैं. (.आकिंचणु . धम्मुजिएम
होय ) वहीं आकिंचण धर्म होता है ( तंझाइजइ णिम् इत्यलोय )
इस लोकमें निरन्तर इसीका ध्यान किया जाता है ।। ६ ।।
एयहु जि पहावे लद्धसहावे तित्थेसर सिवणयरगया
गयकाम वियारा पुण निसिसारा वंदणिजतेतेण सया ॥ ७ ॥
अर्थात्--(एयहुजिपहावे लद्धसहावें ) इसी आकिञ्चन्य धर्म
के.प्रभावसे और इसीकी सहायतासे (वित्थेसर सिधणयरगया )
इसीकी सहायतासे श्रीतीर्थकर परमदेव मोक्ष पधारे हैं (गयकाम-
वियाए पुण रिसिसारा ) तथा और भी जो कामदेवके विकारोंसे
रहितं रिपीश्वर हैं ( बंदणिज्जते तेणसया) इसी आकिंचन्यके प्रभा-
चसे सदा बंदनीय और पूज्य होते हैं ॥ ७ ॥
(.५.४) इसका विशेष स्वरूप असा है जो अपना ज्ञान दर्शन मयः स्वरुप विना अन्यकिञ्चित् मात्र भी हमारा नहीं है में किसी अन्य द्रव्यका नहीं हूं मेरा कोई अन्य द्रव्य नहीं है असे अनुभवको आकिञ्चन्य कहिये हैं । भो आत्मन अपने आत्माको देहत भिन्न अर ज्ञानमय अन्य द्रव्यकी उपमारहित अरम्पर्शरसगंधवर्ण रहित तथा अपना स्वाधीन ज्ञाना नंद सुंख करपूर्ण परम अति द्रिय भय रहित असा अनुभव करो। भावार्थ-यह देह है सो में नहीं देह तोरस रुधिर हांड मांस चाम मय जड अचेतन है। में इस दहते अत्यन्त भिन्न हूं ये ब्राह्मण क्षत्रिया दिजातिकुल देह के है मेरे नहीं है ये बी पुरुप नपुंसक आद लिंगदेह के हैं मरे नहीं है ये गोरापन सावलापना राजापना रंकपना स्वामीपनासे वकपना पंडितपना मूर्खपना इत्यादि समस्त रचना कर्मका उदय जनित देहके हैं में तो ज्ञायकहूं ये देह का संबंधी मेरा स्वरूप अन्य व्यकी उपमा रहित है ताता ठंडाः नरम कठोर लूखा चीकना हलका भारी अष्ट प्रकार म्पर्श हैं ते. हमारा रुप नहीं युगल खाटा मीठा कड़वा कपायला चिरपरा पञ्च प्रकार रस अर सुगंध दुर्गध दाय प्रकारका गंध अर काला पीलाह रास्वेत रक्त येपञ्च वर्ण मेरा स्वरूप नहीं पुलका है मेरा स्वभावतो सुख करि परिपूर्ण है परन्तु कर्मके आधीन दुख करि व्याप्त हो रहाहूं मेरा स्वरूप इन्द्रिय रहित अतिन्द्रिय है इन्दियों पुगल मय कर्मकर की हुई मैं समस्त भय रहित अविनाशी अखंड आदि अन्त रहित शुद्ध, ज्ञान स्वभावहूं परन्तु अनादि काल से जैसे मुवर्ण और पापाण मिल रहा है तैसे तथा श्रीर नारज्यों को करि अनादि कालतें मिल रहाहूं तिनमें भी मिथ्यात्व नाम कर्म के उदय करि अपने स्वरुपका ज्ञान रहित होय देहादिक पर हव्यों को अपना स्वरुप जानि अनन्त कालमें परिभ्रमण किया अव कोई किंचिन् आवरणादिकके दूर होनेसे श्रीगुरुओंका उपदे श्यापर मागमके प्रशा- दसे अपना अर परका स्वरुपका ज्ञान हुआ है जैस रत्नोंका व्यापारी जडे हुवे पञ्चवर्ण रत्ने के आभरणोंमें गुरुकी कृपामे. अर निरन्तर के रूप है ये (५५) अभ्याससे मिल्या हुआ भी डाक कारंग अर माणिक्य कारगको अर तोलको मालकों भिन्न भिन्न जाने है तैसे पर मागमका निरन्तर अभ्यासते मेरा ज्ञान स्वभावमें मेल्या हुआ राग द्वेष मोह कामादिक मेलको भिन्न जाण्या है अर मेरे ज्ञान स्वभावकों भिन्न जाना है इस वास्ते अव जैसे राग द्वेष मोहभाव आदिकर्मोमें और कोंके उदयते उपजे विनाशीक शरीर परवार धन संपदादि परिग्रहमें ममत्व बुद्धि मेरे जैसे फिर अन्य जन्ममें भी नहीं उपजे तैसे आकिञ्चन्यभाऊं यह आकि- चन्यभावना अनादिकालतें नहीं उपजी समस्त पप्पांवोंको अपना रुपमान्या तथा राग द्वेप मोह क्रोध कामादि भाव कर्म कृत विकार थे तिनको आपरुप अनुभव कार विपरीत भावासे घोर कर्म बंध किया अवमें आकिञ्चिन्य भावनामें विघ्नका नाश करने वाला पञ्च परमगुरुओंका शरणतें आकिञ्चन्य ही निर्विघ्न बाहू हूं और त्रैलोक्य में कोई भी अन्यवस्तुकी वांछा नहीं करूं। यह आश्चिन्य भाव नाही संसार समुद्रसे तारने को जहाज होउ । जो परिग्रहको महा- बंध जानि छोड़ना सो आकिंचन है जिसके आकिञ्चन्य पणा होय तिसके परिग्रहमें वांछा नहीं रहे आत्मध्यानमें लीनता होय है देहादिक बाह्य भेपमें आपा नहीं रहै है अर अपना स्वरूप जो रत्न त्रयतामें प्रवृति होय हैं इन्द्रियोंके विपयामें दौडता मन मकि जाता है देहसे स्नेह छुटि जाय है सांसारीक देवांका सुख इन्द्र अहमिन्द्र चक्रवर्तिओंका सुख भी दुख दीखे है । इनमें वांछा कैसे करें ! परि- ग्रह रत्न सुवर्ण राज्य ऐश्वर्य श्री पुत्रादिकों को जीर्णत्रणमें जैसे ममता रहित छोड़ने में विचार नहीं तैसे परिग्रह छोडे है। आकि- चन्यते तो परम वीतराग पणा है जिनके संसारका अन्त आगया तिनके होंय है जिसके आकिंचन्य पणा होय तिसकें परमार्थ जो शुद्ध आत्मा तिसके विचारने की शक्ति प्रगट होयही अर पञ्चपर- मेष्ठीमें भक्ति होय ही अर दुष्ट विकल्पोंका नाश हाय ही अर इष्टः अनिष्ट भोजनमें राग द्वेप नष्ट होजाय है केवल उदर रुप खाडा भरना अन्य रस नीरम भोजनमें विचार जाता रहे हैं समस्त धर्मोमें
(५६)
प्रधान धर्म आकिञ्चन्य ही मोक्ष्यका समागम निकट करावने वाला
है अनादि कालसे जितने सिद्ध हुए हैं त आकिञ्चन्थसे ही हुवे हैं
अर आगे जोजो तीर्थ करादि सिद्ध होयगे त आकिञ्चन्य धर्म
प्रधान करि साधुजनोके ही होय है तथापि एक देश धर्मका धारक
गृहस्थ उस धर्मके ग्रहण करणेकी इच्छा करे है अर गृह चारामें मंद
रागी होय अति विरक्त होय है प्रमाणीक परिग्रह धारे है आगामी
वांछा रहित है अन्यायका धन परिग्रह कदाचित ग्रहण नहीं करे है
अल्प परिग्रहमें अति सन्तोष होय रहैं परिग्रहको दुग्यका दनवाला
अर अत्यन्त अस्थिरमाने है तिसके ही आकिश्चन्य भावना होय है
इस प्रकार आकिञ्चन्य धर्मका वर्णन किया ।
अथ दशम ब्रह्मचर्य धर्म वर्णन (१०)
नवधा सर्वदापाल्यं शीलसन्तोप धारिमिः
भेदाभेदेन संयुक्त रुग्दुरुणां प्रशादतः ॥ १ ॥
अर्थात-(शीलसन्तोपधारिमिः ) शील और सन्ते के भारण
.रनेवाले भव्य जीवोंको ( सग्दुरुणा प्रशादत ) अष्ट गुरुओंके प्रशादसे
(भेदा भेदेन संयुक्तं सर्वदांपाल्यं ) भेद तथा अमेद रुपनी प्रकारका
ब्रह्मचर्य सदापालन करना चाहिये ॥ १ ॥
वंभव्बउ दुद्ध रधारिजइ वरुफेडिजइ विसयासणिरु
तियसुक्ख इरतउ मणुकर भत्तउ तेजिभव्य रक्खेहुधिरु ॥ २ ॥
अर्थात्-- हे भव्यजीवो ( बंभवदुद्धरु ) ब्रह्मचर्य्यनतमहा दुद्धर
है (धारिजइ वरुफेडिजइ विसयासणिक ) इसलिये विपयोंकी आसा-
दुरकर इसको भले प्रकार अवश्य धारण करना चाहिये (तिय सुक्ख.
इरतउ मणुकरमत्तउ तंजि भवरक्खेहुधिरु ) और स्त्री सुखमें लीन हुए
मदोन्मत मनरुपी हार्थासे रक्षा करके स्थिर करना चाहिये ॥ २ ॥
(५७) चित भूमि भयणु जिउप्पज्जड़ । तेणजिरीडिउ करड़ अकन्नड़ तियह शरीरइ णिदियसेवइ । णिय परणारिण मूढउ चेयइ ॥३॥ अति-चित्तभूमिमयणी उपनइ ) कामदेव चितरूपी भूमिमे उप्तन्न होता ( तेणजिपीडइकरइ अकजइ ) उससे पीडित हुआ मनुष्य अन्याय और अकार्य करता है (तियह शरीरिय मिडियसेवइ ) स्त्रियों के अत्यन्त निदित शरीरको सेवन करता है (णियपरणार णमृढइ वेयइ ) और वह मूर्ख फिर त्वऔर परस्त्री कोभी नहीं देखता ॥ ३ ॥ णिवहइ णरइ महादुख जइ । सोहीणु जिवंभवट भंजड़ इय जाणेप्पिणु मणवयकाएवंभचेरु पालहु अणुगए ॥ ४ ॥ अर्थात्-( णिवडइ णरड़ महादुख जइ सोहीणु जिव भब्बर भंजइ ) जो ब्रह्मचर्य व्रतका पालन नहीं करता वह नीच जीव नरकमें पड़कर महादुःख भोगता है ( इयजाणेप्पिा मनवयकाये बंभचेर पालय अणुराये ) असा जानकर ब्रह्मचर्य व्रतको मन बचन कायके द्वारा प्रेम पूर्वक पालन करो ॥ ४ ॥ तेण सह जिलब्बइ भवपारउ । वभंविणवउतउ जिअसार वंभवण विणकायलेसो । विहलसयल मांसयइ जिणेसो ॥५॥ अर्थात्--( तेणसहुजि लब्भइ भवपारउ ) समस्त जीव इस ब्रह्म चर्यके होने से ही संसार समुद्रसे पार हेते हैं (वभविणवउतउनि असारउ) ब्रह्मचर्यके विना व्रतकग्ना तप करना सवळ्यर्थ है (बंभत्रण विणकाय किलेसो) और ब्रह्मचर्यके बिना सब काय ला (विहलसयल भासयइ जिणेसो ) व्यर्थ है ऐसा श्रीजिनेन्द्र देवने कहा है ॥ ५ ॥ वाहिर फरसेंदिय सुखरवई । परमवंभु आमंतर पिक्खहु एणउवाए लब्भइ सिमहरु । इमस्यच बहुमणइ विणइयरु।। ६ ।। अर्थात्- ( वाहिरफरमेंद्रिय मुखरवहु ) बाह्यस्पर्शन इन्द्रियसे आत्माकी रक्षा करो अर्थात उपसे बचो ( पन्मवंभु अक्षरपिक्खहु ) और .
(५८) आत्मा ही ब्रह्मचर्यको देखो ( रग्ण उवाए लन्मइ सिवहरु ) इसी उपा- यसे अर्थात् आत्मामें लीन होनेसे मोक्षकी प्राप्ति होती है ( इमरय धू वहुभणइ विणइयर ) ऐसे ग्इ नामकवि अतिशय विनयके साथ बारम्बार कहते हैं ॥ ६ ॥ पत्ता जिणणाह महिजड़ मुणिपणमिजद दहलकखणु पालियइ जिम भोखमसिंह मुय भवविणय जुय होलिव मण इह करइ थिरु ॥ ७ ॥ अर्थात---(जिणणाह महिनइ ) श्रीजिनेन्द्र देवी इस दसलन णिक धर्मकी महिमा वर्णन करते हैं (मुणिपणमिन्नइ ) और श्रीमुनिराज भी इसको प्रणा करते है (दहलक्खण पालियइणि ) इसलिय होभव्य हो इसका नित्य पालन करो ( भोखम सिंह मुय भन्न विणय जुय होलिब मण इह करइ थिा ) और अतिशय विनय सहित असी श्रीलम- सिंह की पुत्री होली के समान अपने चितको स्थिर का भावार्थ आचा. येने होलीका दृष्टान्त दिया है । होली श्रीखेमसिंहकी पुत्री थी इसने मन बनन कारा पूर्वक दशलक्षणक व्रत पालन किये थे । इन व्रतोंका पालन जैसा होलीने किये वैसा ही भव्य जीव पालन करे असा आचार्य का आशीर्वाद है ! ७ ॥ यहां विशप स्वरूप असा जानना कि समस्त विपयों में अनुराग छांडके ब्रह्म जो ज्ञायक स्वभाक आत्म ताम जी चा कहिये प्रवृत्ति सो ब्रह्मचर्य है । हे ज्ञानी जन हो यह ब्रह्मचर्य नाम प्रत बडा दुद्धा है हरेक जीव विषयोंके वश हाते संते आत्म ज्ञान से रहित है वे इसको धारनेको समर्थ नहीं है जो मनुष्योंमें देवाके समान है ते पुरुप धारण करने को समर्थ है अन्यरंक विपर्योकी लालसाके धारक ब्रह्मचर्य धारण करनेको समर्थ नहीं हैं यह ब्रह्मचर्य व्रत महादुद्धर है जिसके ब्रह्मचर्य होय तिसके समस्त इन्द्रिय अर कपायोंका जीतना सुलभ है। हे भव्यजीव हो स्त्रीयोंके सुखमें रागी जो मनरुप मदोन्मत हस्ती तिसको वैगज्ञ भान- नामें रोक करिके अर विषयोंकी आशाका अभाव करके दुद्धर ग्रामचर्य (६९) धारण करो यह काम है सो चितरूपी भूमिमें उत्पन्न होता है इसकी पीडा कर नहीं करने योन पाप असे करे है क्योंकि यह काम मनको मथन करे है मनका ज्ञान को नष्ट करे है इसीसे इसको मन्मथ कहिये ज्ञान नष्ट हो जाय तव ही स्त्रीनका महादुर्गन्ध निन्द्य शरीरको गगी हुआ सेवन करता है अर काम करि अंधा होजाय तब महा अनीत को प्राप्त होय अपनी तथा परकी नारीका विचार नहीं कर है। जो इस अन्यायतें में यहां ही मारा जाऊंगा राजा का तीघ्र दंड होयगा यश मलीन होयगा. धर्म भ्रष्ट होजाऊंगा सत्यार्थ बुद्धी नष्ट हो जायगी मरण करि नरकों के घोर दुख असंख्यात काल पर्यन्त भोग फिर असंख्यात तिर्यञ्च निके घोर दुःख रुप अनेक भवपाय कुमानुषों में अंधा लूला कूबड़ा दरिद्री इन्द्रिय विकल बहग गूगा चांडाल भील चमारोंके नीच कुलों में उत्पन्न हो फिर स स्थावरोंमें अनन्त काल परिभ्रमण करूंगा असा सत्य विचार कामीके नहीं उपजे है । इस कामके नाम ही जगत के जीवोंको प्रगट करे हैं । कं कहिये खोटा दर्प अर्थात् गर्व उप जावे इस कारण कंदर्प काहये है । अति काम नाजो बांछा उपजाय दुःखितकरे ताते इसको काम कहिये । इस करि अनेक तिर्यञ्चोंके तथा मनुष्योंके भवोंमें लड़लड़ मरे है ताते मार कहिये है । सम्वरको वैरी तातें संवरारि कहिये । ब्रह्म जो तय संजम तिसर्ते सुवति जो चलायमान करे तात ब्रह्मसु कहिये है इत्यादि अनेक दोषोंके नाम ही कहै हैं यह जान मन वचन कायसे अनु- गग करि ब्रह्मचर्य व्रत पालन करो । ब्रह्मचर्य सहित ही संसार के पार जावोगे । ब्रह्मचर्य विना समस्त व्रत तप असार है ब्रह्मचर्य विना समस्त काय क्लेश निष्फल है वाह्य जो स्पर्शन इन्द्रियका मुखसे विरक्त होय अभ्यन्तर परमात्म स्वरूप आत्माताकी उजलता देखो। जिस तरह अपना आत्मा काम के गग करि मलीन नहीं होय उस तरह यल कगे। ब्रह्मचर्य करही दोनो लोक भूपित होय हैं तथा जो शीलकी रक्षा चाहो हो उजल यश चाहो हो अर धर्म चाही हो अर अपनी प्रतिष्ठः चाहो तो चितम परमागम की शिक्षा इस प्रकार धारण करो स्त्रीयों की कया मत श्रवण करो मत कहो स्त्रीयों का राग रंग कौतूहल चष्टा मत देखो (.६०) ये मेला देखना परिणाम विगाडे हैं । व्यामेचारी पुरुषोंकी संगति करना भांगजन्दा मादकवस्तु भक्षण करना ताम्बूल तथा पुष्प माला अतर. फुलेलादि शोलभंग व्रत भंगके कारण दूर ही से टालो गीतन्टत्यादि कामो द्दीपन के कारणों का त्याग करो रात्रि भक्षण टालो विकार करने का कारण लोक विरुद्ध, वत्र आभरण मत पहरो एकान में किसी भी श्री मात्र का संसर्ग मतकरी रसना इन्द्रियकी लम्पटता छोडो जिहा की लम्पटता के साथ हजागे दोप उत्पन्न होते है इस कारण समस्त ऊंचा 'पणो यश धर्म नष्ट होजाय है जिन्हा इन्द्रियका लम्पटीक सन्तोष नष्ट होजाय समभावको स्वप्नमें भी नहीं जाने लोक व्यवहार नष्ट होजाय ब्रह्मचर्य भंग होजाय । इस कारण आत्माके हितक इच्छुक पुरुप एक ब्रह्मचर्यकी रक्षा करो इस प्रकार धर्मके दश लक्षण सर्वज्ञ भगवान कहे हैं । जिन पुरुप यह दश चिन्ह प्रगट होय वहही धर्मात्मा है उत्तम क्षमादिकोंके घातक धर्मके वैरी कोध आदि है तिनत अनेक दोष उपजे है तिनकी भावना करो अर क्षमादिकों में अनेक गुण है तिनकी भावना वारम्बार भावो । जो श्रमा है सो अपने प्राणों की रक्षा है धनकी रक्षा है यशको रक्षा है धर्मको रक्षा है तशील संयमसत्यकी रक्षा एक क्षमा ही से है कलहके घोर दुखों से अपनी रक्षा एक आमा ही करे है समस्त उपद्रव तथा पैरते क्षमा ही रक्षा करे है । बहुरि क्रोध है सौधर्म अर्थ काम मोक्षका मृने नाश को है अपने प्राणोंका नाश करे है । क्रोधसे प्रचंड रौद्र ध्यान प्रग : होय है कोधी एक क्षणमात्र में आपमरि जाय है 'फूबा, बावडा, नदी, तालाब, समुद्र में डूब मर है शस्त्र घात विष भक्षण झंपापात अदि अनेक कुकर्म करि आत्मघात करे है। अन्यके मारनेकी क्रोधोके दया नही होय है क्रोधी होय सो अपने पिताको पुत्रको भ्राताको मित्रको स्वामीकों सेवक को गुरुको एक क्षण मात्रमें मारे है क्रोधी घोर नर्कोका पात्र है क्रोधी महाभयं कर है समस्त धर्मका नाश करने वाला है। कोधीके सत्य वचन नहीं होय है ! आपको अर धर्मकों सम- भावी ढग्य करनेवाला कुवचन रुप अग्निको उगले है मोधी होयसो धर्मात्मा संयमी शीलवान मुनि अर श्रावकों को चोरी अन्याई झूठे दोप है (६१) कलंक लगाया दूपित करें. है क्रोधके प्रभावतें ज्ञान कुज्ञान होय है आच- रण विपरीत होजाय है श्रद्धान भ्रष्ट होजाय है अन्यायमें प्रवृत होजाय है नीतिका नाश होय है अति हठी होय विपरीत मार्गका प्रवर्तक होय. है धर्म अधर्म उपकार अपकारका विचार रहित कृतनी होय है इस कारण वीतराग धर्म के अर्थी होतो क्रोध भावको कदाचित मति प्राप्त. होओ । तथा मादव जो कठोरता रहित कोमल परिणामी जीवमें गुरुओं का बड़ा अनुराग प्रवत है मार्दव परिणामीको साधु पुरुष भी साधु मान इस कारण कठोरता रहित पुरुष ही नानका पात्र होय है मान रहित कोमल परिणामीकों जैसा गुण ग्रहण कराया चाहै तथा जैसी कला सिखाया चाहै तैसी कला गुण प्राप्त हो जाय है समस्त धर्मका मूल समस्त विद्यका मूल विनय है वियवान समस्त जीवोंको प्रिय होता है अन्य गुण जिसमें नहीं हाय सो पुरुप भी विनयते मान्य होय है विनय परम आभूण है कोमल परिणामी में ही दया बसे है मार्दवते स्वर्ग लोक की अभ्युदय सम्पदा निर्वाणकी अविनाशी सम्पदा प्राप्त होय है अर कठोर परिणामी को शिक्षा नहीं लगे है साधु पुस्प है तिनका परिणाम भी अविनयी कठोर परिणामीको दूरहीत यागा चाहै है जैसे पापाणमें जल प्रवेश नहीं करे तैसे सग्दुरुओंका उपदेश कठोर पुरुषका हृदयमें प्रवेश नहीं करे है जातें जो पापाण काष्टादिक भी नरमाई लिये होय ताका जो बालबाल मात्रभी जहां घड्याचा है छील्या चाहै तहां वाल मात्र ही उत्तर आवे तब जैसी मूरत बनाया चाहे तैसे ही वन है अर कोमलता रहित में जहां टांची लगावे तहां चिड़क उतर दरपडै शिल्पीका अभिप्राय माफक घडाईमें नहीं आवे तैसे कठोर परिणामी को यथावत् शिक्षा नहीं लागे । अभिमानी किसीको भी प्रिय नहीं लागे अभिमानी का समस्त सोक विनाकारण बैरी होजाय है अर परलोकमें अतिनीच मनुष्य तिर्यञ्चों में असंख्यात काल नाना तिरस्कार का पात्र होय है इस कारण कठोरता त्यागि मादव भावना ही निरन्तर धारण करो । बहुरि कपट समस्त अनर्थों का मूल है प्रीति अर प्रतीत का नाश करनेवाला है कपटीमें असत्य, छल निर्दयता विश्वास घातादि समस्त दोप बसे हैं कपटी गुण नहीं समस्त दोप ही दोष पास कर है मायाचारी इस लोकमें महा अपयश को पाय तियश्च नरकादि गतियाम असंख्यात काल भ्रमण करे। मायाचार रहित आर्जव धर्मका धारको समन्त गुण बसे । समस्त लोकों फो प्रीति अर प्रतीतका कारण है परलोभ देवों करि पूज्य इन्द्र, प्रत्य- न्द्रादि होय है इस कारण सरल परिणाम ही आत्माका हित है । अर सत्यवादीमें समस्त गुण तिष्टे हैं सदाकाल कपटादि दोप रहित जगतम मान्यताको भी प्राप्त होय है अर परलोकमें अनेक देवमनुप्यादिक जिसकी आज्ञा मस्तक ऊपर धारण करे हैं अर असत्यवादी यहांही अपवाद निंदा करने योग्य होय है समस्तक अप्रतीतिका कारण है गांवव मित्रादिक भी अवज्ञा करि छोटे हैं राजाओंकर जिन्हा च्छेद सर्वस्त्र हरणादिक दंड पाव है अर परलोकमै तिर्यञ्चगति में बचन रहित एकेन्द्रिय विकल यादि संख्यात पय्यपि धारण करे है इस कारण सत्य धर्मका धारण करना ही श्रेष्ट है । वहुरि जिसका शुचि आचरण होय साही जगतम पृत्य है शुचि नाम पवित्रता उजलता का है जिसका आहार बिहागादिक समस्त प्रवृति हिंसादिक रहित हिंसाका भयते यत्नाचार सहित होय अर अन्यके धनम अन्यकी स्त्री कदाचित स्वप्नमें भी वांछान ही होय वह ही उन्जल आच- रणका धारक है तिसही को जगत पूज्य नाने है निली भी का समस्त लोक विश्वास करे हैं वह ही लोको उत्तम है अर्द्ध लोकका पात्र लोभ गहितका बड़ा उज्जल यश प्रगटे है लोभी महामलीन समस्त दापों का पात्र है निन्द्य कर्ममें लोभी की प्रीति होय है लोभीके ग्रास अग्राम खाद्य अखाद्यकृत्य अकृत्यका विचार ही नहीं होय है इहां भी लोकम निंदा धर्म ते पराङ्मुखता निर्दयता प्रगट देखिये है लोभी धर्म अर्थ काम को नष्ट करि कुमरण करि दुर्गति जाय है लोभीका हलयमें गुण अव- काश नहीं पाते है इस लोक परलोको लोभीको अचिन्त्य लेश दुःख प्राप्त होय है इस कारण शांच धर्म धारण करना ही श्रेष्ठ है। बहुरि संयमही आत्माकाहित है इस लोकम संयमका धारक समस्त लोक- निके बंदने योज्ञ होय समस्त पापों करि नहीं लिपे करि नहीं लिपे है इसका इस लोक तथा परलोकमें अचिन्त्य महिमा है अर असंयमी है सो प्राण निकाघात (६३) अविपयोंमें अनुराग करि अशुभ कार्मका बंध कर है. इस कारण संयम धर्म ही जीवका हित है । बहुरि तप है सो कर्मके संवर निर्जरा करनेका प्रधान कारण है नपही आत्माको कर्म मल रहित करें तपके प्रमावत यहाही अनेक रिद्धी प्रगट होय है तपका अचिन्त्य प्रभाव है तप विना काम निद्राको कोन मारे तपबिना वांछा का कोन मारे इन्द्रियनके विपय नका मारनेमें तपही समर्थ है आशा रुप पिशाचणी तपही से मारी जाय है काम का विजय तपही से होय है तपका साधन करनेवाला परीपह उपसर्ग आवतें भी रत्न त्रय धर्मतें नहीं छूटे है इस कारण तप धर्म धारण करनाही परम कल्याण है तपविना संसारतें छूटना नहीं है जाते चक्रीपना का राज्य छांडि तप धारें सो त्रैलोक्यम वंदन योन पूज्य होय है अर तपको छोड़ि राज्यग्रहण करे सो अतिनिंद्य थुथुकार करने योज्ञ होय है. तृणतें भी लघु होय इस कारण प्रैलोक्यमें तप समान महान अन्य नहीं । वहुरि परिग्रह समान भार नहीं जितने दुःख दुान लश वैर वियोग शोक भय अपमान हैं ते समस्त परिग्रहके इच्छुके हैं जैसे जैसे परिग्रह ते परिणाम निराला होय तैसे तैसे खेद रहित होय है जैसे बड़े भारकरि दु:खित पुरुप भार रहित होय तव सुखित होय तैसे परि- प्रहकी वासना मिटे सुखित होय है समस्त दुःख अर समस्त पापोंके उपजावनेवाला यह परिग्रहही है जैसे नदियों करि समुद्र तृप्ति नहीं होय और ईंधन करि, अग्मितृप्त नहीं होय है आशाम्पी खाडानिधिनते नहीं भरै तो अन्य सम्पदाते कैसे भरें अर यो यों परिग्रहकी आशाका त्याग, कगे त्यात्यों भरता चला जाय इस कारण समस्त दुःख दूर करने को,त्यागही समर्थ इत्यागहीसे अन्तरङ्ग बहिरङ्ग वन्धनते रहित होय अनंत सुखके धारक हो ओगे परिग्रहके बंधनमें बंधे जीव परिग्रह त्यागते ही छुटि मुक्ति होय इस कारण त्याग धर्म धारण करना ही अष्ट है। वहुरि. हे आत्मन् यह स्त्री पुत्र धन धान्य देह गज्य ऐश्वर्यादिकनमें एक परमाणु मात्रभी तुह्मारा नहीं हैं ये पुग्दल दुव्य हैं जड़ है विनाशीक है अचेतन है इनपर द्रव्यनमें " अहं ! ऐसा संकल्प तीत्र दर्शन मोहका उदयविना कोंन करावे इसपर द्रव्यमें आत्म संकल्प मेरे कदाचित मत ...
(६४) होउ में अकिञ्चन्य हूं। या आकिञ्चन्य भावनाके प्रभावते कर्म कालेप हित यहाही समस्त बंध रहित हुआ तिष्ट है साक्षात् निर्वाणका कारण आञ्चिन्य धर्मही धारण करो । बहुरि कुशील महा पाप है संसार परि- भ्रमणका नीज ब्रह्मचर्यके पालनेवाले से हिंसादिक पापोंका प्रचार दूर भागे है समस्त गुणांकी सम्पदा इसमें बसे है जितेंद्रियता प्रगट होय है ब्रह्मचर्य से कुल जात्यादिक विभूसित होय हैं परलोक में अनेक रिद्धी के धारक महर्द्धिक देव होय है। इस प्रकार भगवान अर्हन्त देवक मुखारविन्दतं प्रगट हुआ दशलक्षण धर्म आत्माका. स्वभाव है परवस्तु नहीं है क्रोधादिक कर्मजनित उपाधित दूर होते. स्वयमेव आत्माका स्वभाव प्रगट होय है क्रोधके अभावतें क्षमा मानके अभावते मार्दव मायाके आभावते आर्जव लोमके अभाव तें शौच असत्यके अभावते सत्य धर्म कपायों के अभावते संयमगुण इच्छाके अभावते तप गुण प्रगट होय है परमेंममता अभावते त्याग धर्म होय है पाद्रव्यों से भिन्न अपने आत्माका अनुभव आञ्चिन्य धर्म प्रगट होय है। वेदनिके अभावते आत्म- स्वरुपमें प्रवतिते ब्रह्मचर्य धर्म प्रगट होय है यह दश प्रकारधर्म आत्माका स्वभाव है धन करि मोल आवे नहीं आकाशमें पातालमें दिशामें विदिशामें पहाडभै जलमें तीर्थमें मंदिरमें कहीं धन्या नहीं आत्माका निज स्वभाव है या कालाभ सम्यग्ज्ञान श्रद्धानसे होय है अर ऐसा सुगम है जो बालक वृद्ध युवा धनवान निर्धन चलवान निर्बल सहाय सहित असहाय रोगी निरोगी समस्त के धारण करने में आवने योग्य स्वाधीन है धर्मके धारनेमें कुछ खेद क्लेश कदाचित है नहीं दुलभ है नहीं कुछ बोझ उठाना है नहीं दूर देश जाना नहीं तुधा तृपा शीत उष्म वेदनाका आवना नहीं किसीका विसम्वाद झगड़ा है नहीं अत्यन्त सुगम समस्त क्लेश दुःख रहित स्वाधीन आत्माका.ही सत्य परिणमन है । इस कारण समस्त संसार परिभ्रमणते छुटि अनन्त ज्ञान सुख वार्य का धारक सिद्ध अवस्था याका फल है इस प्रकार दश लक्षण धर्मका सक्षेप वर्णन समाप्त हुआ । समाप्त.
वैश्योंकी हालतका फोटू । जैन, जातिके सुप्रसीद्ध कवि वां ज्योती प्रशादजी कृत यह प्रथम उरदूमें छपाथा अब हिंदी में प्रकाशित कराया है वर्तमानमें जन जाति व जैन धर्मकी अवनति दशाका फोटू अति उत्तमताके साथ दर्शाया है मूल्य एक आना। नोट:-एक साथ श्रीजिनेन्द्र दर्शन पाठ. समवशरण दर्पण, वय कामको हालतका फोह. दशलक्षण धर्म संग्रह. चारों पुस्तकें लेनेसे । डाक महसूल माफ तथा एक प्रकारकी ५ पुस्तकें लेनेसे ६ पुस्तकें भज दी जायेगी। नोट:-हमारे पुस्तकालयसे ग्रंथ मंगाने वालोको एक रुपियास चार रुपिया तक आना फी रुपिया पांच रुपैसे दश रु तक तीन आना रुपिया कमीशन दिया जाता है ज्यादाके लिये पत्र व्यवहार करना चाहिये ६ पद्मपुराणजी वचनिका महान ग्रंथ.६ ) हरिवंश पुराणजी व चनिका महान ग्रंथ ५) पार्शपुराण सुम्बईका छपा ११ ) पांडव पुराण २) यशोधर चरित्र २] जिनदत्त चरित्र १] प्रद्युम्न चरित्रं २] पुष्याश्रव कथा कोश महान मंथ ३] आराधना सार कथा कोप ३) सुक्रमाल चरित्र १] जैन कथा संग्रह १] चारदान कथावाडी) शील कथाभाय छंद वंद्य 1-] दोनिसिभोजन कथा वडी व छोटी ०] दर्शनिकया ।-] खट पाहुइ १। रत्नकरंड श्रावका चार सदा सुखजी कृत ४ ] धर्म संग्रह श्रावकाचार २] वमुनंदी आवका चार ॥] रत्नकरंड श्रा. सान्थयार्थ । ] परमात्मा प्रकाश )। गानेकी पुस्तके-जैनपद संग्रह दौलतराम कृत ।-] जैन पद संग्रह मृधरदास कृत !- ] मंगतराय भजन माला -1] जोती प्रदि भजन -] न्यामत भजनमाला -] बालक भजन - जिनेन्द्र गुणायन -] कुंजविलास - ) कजरीसग्रह] प्रभुविलास ] जा उपदेशी गायन =11) कमल श्री, (निशिभोजन निपेध नाटक]-] मनोवती [दर्शन कथा नाटक ] +] कृष्ण चरित्र नाटक = ] इन तीनो नाटकों में वहांत वढिया ३ गाने हैं जैन नाटक मंडलिया प्रायः इन्ही नाटकोंको खेला करती हैं। अन्य पुस्तके-छः टाला संग्रह द्यानत, बुधजन, दौलत, तीनों पाठोंकी इकी एक पुस्तक वार हमादनासंग्रह ] ॥ श्रीनेमिनाथका व्याहला, पश्नोतर, वरिमासादि राजुल- नोपाठ 1-] तत्वार्थ सुत्रमूल सम्पूर्ण भूदरजनशतकथसहित ] भक्ताभरमापा कठिन शब्दोंके अर्थ सहित सातावारेमासा संग्रह -) प्रतिमाचालीसी ) ॥ जन १६ आरती संग्रह 61. भापासूक्तिमुक्तावली ...)द्रव्य संग्रह वडी टीका 1) शेठ मुदर्शन कथा ) देवपूजा अर्थ सहित नियनियमपूजा देवशान्त्रागुरु शुद्ध संस्कृत पूजातथा भाषापूजा al) चारचोवी सी पाट ४] तरहदीप पूजा विधान २॥ भाषारजा संग्रह 1) चौबीस माहाराजका पाठ
१
निन्द्रावनजी कृत अलंकातीत्र ) चतुर्विशतिधारति नगन्युगो
सर) सं. चारपान ।) रत्नपचीसी टदिशेनपान) पुरुषाया-
जगायअवहित 1) बिहार )। पंचमंगल ) ॥ आलोचनांसानिन नर.
संस्कृत अर्थसहित ) णमोकार मंत्राला अर्थपृin) पो लागि दि.
'गवर जनमुनि -) दलकानालजी महाराज - Tinni
स्वागतासी मामध चालानी ट! काममा) कन्या :-
दहानती वाजाबाइपमह ) पान वान)
जोगिना रनमाला In) शिक्षाजकरी ॥ परिवार पास
चावानी riii . दयेन्द्रमादमी भारानि आर शेयी.
H, जन्म यात्रा. बाकी
भाग नया का छापा जिम दमन और ar, Meraica
हैं 1.1 नानाथ यात्रा नगानका पना---
पी. र. एल. जैन मनजर
।
RAM
पुस्तकालय
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सो.
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