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Iishaavaasyoopanishhada

2005/09/2

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ईशावास्योपनिषद्
AKMA
गीताप्रेस, गोरखपुर
ARAT
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मुख्य पचीस पैसे

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ईशावास्योपनिषद
सानुवाद शाङ्करभाष्यसहित
गीताप्रेस, गोरखपुर
DONATED TO
TTO CENTRAL LIBRARY

प्रकाशक
मोतीलाल जालान
गीताप्रेस, गोरखपुर
C
सं०
सं०
१९९२ से २०२१ तक ६७,२५.
२०२४ बारहवाँ संस्करण
१०,०००
२०२६ तेरहवाँ संस्करण
१०,०००
सं०
कुल ८७,२५०
मूल्य पचीस पैसे
पता-गीताप्रेस,
गीताप्रेस, पो० गीताप्रेस ( गोरखपुर )

नम्र निवेदन वेदके शीर्षस्थानीय भागका नाम वेदान्त है। यह वेदान्त ही ब्रह्मविद्या है। ब्रह्मविद्या ही सवत्र समत्वका दर्शन कराती है, ब्रह्मविद्यासे ही अज्ञानकी ग्रन्थियाँ कटती हैं, ब्रह्मविद्यासे ही कर्म- चाञ्चल्य सुसंयत और चित्त अन्तर्मुखी होता है। ब्रह्मविद्यासे ही 'मिथ्या अनुभूतिका विनाश और परम सत्यको उपलब्धि होती है । ब्रह्मविद्यासे ही एकात्मरसप्रत्ययसार अवाङ्मनसगोचर स्वयंप्रकाश विज्ञानस्वरूप चेतनानन्दघन रसकवन ब्रह्मकी प्राप्ति होती है। इस ब्रह्मविद्याका प्रतिपादन वेदके जिस अत्युच्च शिरोभागमें है, उसीका नाम उपनिषद् है। इन्हीं उपनिषदोंके मन्त्रोंका समन्वय और इनकी मीमांसा भगवान् वेदव्यासने ब्रह्मसूत्र में की है और इन्हीं उपनिषद्पी गौओंसे गोपालनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने सुधी भोक्ताओं के लिये गीतामृतरूपी दुग्धका दोहन किया था। इसीलिये उपनिषद् , ब्रह्मसूत्र और श्रीमद्भगवद्गीता प्रस्थानत्रयी कहलाते हैं और भारतके प्रायः सभी आचार्योने इसी प्रस्थानत्रयोके प्रकाशसे सत्यका अन्वेषण किया है। और प्रायः सभीने इनपर अपने-अपने भाष्य लिखे हैं। अपने-अपने स्थानमें सभी आचार्योंके भाष्य उपादेय है, परंतु अद्वैत वेदान्तका प्रतिपादन करनेवाले भाष्योंमें भगवान् श्रीशङ्कराचार्यका भाष्य सर्वोपरि माना जाता है । उपनिषदोंपर तो दूसरे आचार्योके भाष्य हैं भी थोड़े ही । भगवान्की कृपासे आज कुछ उपनिषदोंके उसी शाङ्करभाष्यका भाषानुवाद प्रकाश करनेका सौभाग्य गीताप्रेसको प्राप्त हुआ है। आशा है, ब्रह्मविद्याके जिज्ञासु अधिकारी पाठक इससे लाभ उठावेंगे।

( ४ ) प्रथम तो यह विषय ही इतना कठिन है कि जो ब्रह्मनिष्ठ और श्रोत्रिय गुरुके मुखसे श्रद्धापूर्वक सुनने और मनन करनेपर ही शुद्धान्तःकरण पुरुषकी समझमें आता है । फिर शाङ्करभाष्य भी कठिन है । अतएव इसके अनुवादमें जहाँ-जहाँ त्रुटियाँ रह गयी हों उन्हें विद्वान् पुरुष कृपा करके बतला देनेकी कपा करेगे तो अनुवादक और प्रकाशक कृतज्ञतापूर्वक अगले संस्कारणमें यथासाध्य उनका संशोधन करनेकी चेष्टा करेंगे । अनुवादक महोदयने उपनिषदोंके शाङ्करभाष्यके अनुवादककी जगह अपना नाम प्रकाश करनेकी शील और संकोचवश आज्ञा' नहीं दी, इसीलिये उनका नाम प्रकाशित नहीं किया गया है । वास्तव में ब्रह्मविद्या इस प्रकार प्रकाशित करनेकी वस्तु भी नहीं है। इसलिये ऋषियोंने इसमें दोनों ओर से अधिकारकी आवश्यकता बतलायी है । परनु समयके प्रभावसे प्रकाशन आवश्यक हो गया । बंगला और मराठी आदि भाषाओं में कई अनुवाद हैं। परंतु हिंदीमें सरल अनुवाद कम मूल्य में शायद ही मिलता है। इसीलिये गीताप्रेसने इसके प्रकाशनका यह प्रयत्न किया है । विद्वज्जन इसके लिये क्षमा करेंगे। प्रकाशक.

प्रस्तावना यह बात संसारके प्रायः सभी विचारकों को मान्य है कि मनुष्य- को आत्यन्तिक शान्ति बाह्य भोगोंसे प्राप्त नहीं हो सकती। इसके लिये तो उसे किसी अनन्त और निर्बाध-सुखस्वरूप सत्ताको ही शरण लेनी पड़ेगी। उस अनन्त सुखसमुद्रकी उपलब्धि ही संसारके समस्त दार्शनिकोंका ध्रुव लक्ष्य रहा है । उसका भिन्न-भिन्न प्रकार से अनुभव करनेके कारण ही विभिन्न मतवादोंकी सृष्टि हुई है । संसार- के उस एकमात्र मूलतत्त्वकी शोध अनादिकालसे होती आयी है। इस विषयमें सभी देशी और विदेशी विद्वान् सहमत हैं कि इसका निर्णय करनेवाले सबसे प्राचीन ग्रन्य वेद हैं। वेद अनादि हैं। वे कब रचे गये और कौन उनका रचयिता था--इसका आजतक कोई संतोषजनक निर्णय नहीं हो सका। विषयकी दृष्टि से वेदोंके तीन भाग हैं, जो तीन काण्ड कहलाते हैंकर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड और ज्ञानकाण्ड । विश्वके मूलतत्त्व- का विचार ज्ञानकाण्डमें किया गया है; कर्म और उपासना उस तत्त्वको उपलब्ध करनेकी योग्यता प्रदान करते हैं । इसलिये वे साधनस्वरूप हैं और ज्ञान सिद्धान्त है । वेदके ज्ञानकाण्डका ही नाम उपनिषद् है। इन्हें वेदान्त या आम्नायमस्तक कहकर भी पुकारा जाता है । अतः यह बात निर्विवाद सिद्ध है कि ब्रह्मविद्याके आदिस्रोत उपनिषद् ही हैं। उपनिषदोंका महत्त्व वैदिकमतावलम्बियोंको ही मान्य हो- ऐसी बात नहीं है । न जाने कितने विधर्मी और विदेशी महानुभाव भी इनको गम्भीरता, मधुरता और तात्त्विकतापर मुग्ध हो चुके हैं। मंसूर, सर्मद, फैजो, बुल्लाशाह और दाराशिकोह आदि महानुभावोंने इस्लामधर्मावलम्बी होकर भी औपनिषद् सिद्धान्तको ही अपने जीवनका सर्वस्व बनाया था। मंसूर और सर्मदने तो सिर देकर भी इस सिद्धान्तको छोड़ना पसंद नहीं किया । पश्चिमीय Ten ( ६ ) विद्वानोंमें भी मैक्समूलर, शोपेनहर और गोल्डस्टकर आदि ऐसे अनेकों महानुभाव हो गये हैं, जिन्होंने उपनिषदोंके महत्त्वको मुक्तकण्ठसे स्वीकार किया है। मैक्समूलर साहब (Prof. Max Muller ) कहते हैं - 'The Upanishads are the...- sources of...the Vedant philosphy, a svstem in which human spec.- lation seems to me to have reached its very ac ne.' अर्थात् उपनिषद् वेदान्तदर्शनके आदिस्रोत हैं और ये ऐसे निबन्ध हैं जिनमें मुझे मानवी भावना अपने उच्चतम शिखरपर पहुँच गयो मालूम होती है। शोपेनहर (Schopenhauer ) का कथन है- 'In the world there is no study......so benef cal and so e! vating as that of Upanishads.....( they ) are a product of the highest wisdom......it is distined sooner or later to become the faith of the people.' अर्थात् सारे संमारमें ऐसा कोई स्वाध्याय नहीं है जो उपनिपदोंके समान उपयोगी और उन्नतिकी ओर ले जानवाला हो। वे उच्चतम बुद्धकी उपज हैं । आगे या पीछे एक दिन ऐसा होना ही है कि यहो जनताका धर्म होगा। डाक्टर गोल्डस्टकर ( Dr Goldstuker ) कहते है- The Vedant is the sublimest machinery set into motion by oriental thought.' अर्थात वेदान्त सबसे ऊँचे दर्जेका यन्त्र है, जिसे पूर्वोप विचारधाराने प्रवृत्त किया है। इस प्रकार हम देखते हैं कि उपनिषदोंका महत्त्व अन्य मतावलम्बियों एवं विदेशियोंको भी कम मान्य नहीं है । वास्तवमें ब्रह्मविद्याकी ऐसी ही महिमा है। जिसने इस अमृतका पान किया वह निहाल हो गया; उसे न कुछ कर्तव्य है और न कुछ प्राप्तव्य । * यहाँ जो पश्चिमीय विद्वानों के मत उद्धृत किये हैं वे 'कल्याण' वर्ष ७ की आठवीं संख्याके 'ब्रह्मविद्या रहस्य' नामक लेखसे लिये हैं।

- (७) ब्रह्माकार वृत्तिका कितना महत्व है इसका वर्णन करते हुए वेदान्त- सिद्धान्तमुक्तावलीकार उपत करते हैं- कुलं पवित्रं जननी कृतार्था वसुन्धरा पुण्यवती च तेन । अपारसञ्चित्सुखसागरेऽस्मिल्लीनं परे ब्रह्मणि यस्य चेतः ॥ अर्थात् 'जिसका मन उस अपार सच्चिदानन्दसमुद्र परब्रह्म में लीन हो गया है उसका कुल पवित्र हो जाता है, माता कृतकृत्य हो जाती है और उसके कारण पृथ्वी भी पुण्यवती हो जाती है।' ब्रह्मवेत्ताको दृष्टिमें सारा संसार सच्चिदानन्दस्वरूप हो जाता है, असत् जड और दुःख उसे प्रतीत ही नहीं होता। उसकी दृष्टिमें तो द्रष्टा, दृश्य और दृष्टिका भी भेद नहीं रहता, वह तो एक निश्चल, निर्बाध और निष्कल चिदानन्दघन सत्तामात्र रह जाता है । उसके द्वारा जो कुछ कार्य होते हैं वह दूसरोंकी ही दृष्टि में होते हैं, उसकी दृष्टि में तो न कोई कार्य है और न उसका करनेवाला ही। सुवर्णके आभूषणादि भेद बहिर्मुख पुरुषोंको दृष्टि में होते हैं, सुवर्णके तात्त्विक स्वरूपको देखनेवाला उन्हें कभी नहीं देखता । बाह्यदर्शी लोग कहते हैं कि जलमें तरङ्ग उठती हैं; किंतु भला जलने उन्हें कब देखा है ? मृत्तिकासे बननेवाले घट-शरावादि व्यवहारी लोगों- की दृष्टि में ही बनते हैं । तत्त्वदर्शीको दृष्टिमें तो वह आगे-पीछे और बीच में भी केवल मन्मात्र ही है । अस्तु । उपनिषदें साक्षात् कामधेनु हैं। ब्रह्मसूत्रोंकी रचना भी इन्हींके वाक्यों और शब्दोंकी सङ्गति लगानेके लिये हुई है तथा श्रीमद्भगवद्गीता भी गोपालनन्दनद्वारा दुहा हुआ इन्हींका दूध है । भारतवर्ष में जितने आस्तिक सम्प्रदाय हैं उन सबके आधार ये ही तीन ग्रन्थर न हैं । ये प्रस्थानत्रयी कहलाते हैं । प्रायः सभी सम्प्रदायोंके आचार्योने इनकी विवेचनात्मक व्याख्या लिखकर अपने मत स्थापित किये हैं । अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैत, द्वैत और शिवावत आदि सभी सम्प्रदायोंकी आधारशिला ये ही ग्रन्थरत्न हैं। अपने-अपने विचारानुसार आचार्योने उनमें अपने ही सिद्धान्तको झाँकी की है । अद्वैतवादके प्रधान आचार्य भगवान् शङ्कराचार्य हैं। उनके भाष्यको गम्भीरता, विद्वत्ता, स्फुटता और प्रामाणिकता सभीने स्वीकार की है। उनकी प्रसन्न गम्भीर लेखनी- का वास्तविक रसास्वाद तो वे ही कर सकते हैं जो सब प्रकार साधनसम्पन्न, अद्वैतनिष्ठ तथा संस्कृत वाङ्मयके प्रौढ़ विद्वान् हैं तथापि जिन्हें यह सौभाग्य प्राप्त नहीं है उनमेंसे बहुत-से महानुभाव, जो उनके अबाध्य सिद्धान्तपर मुग्ध होकर उनके चरणोंपर निछावर हो चुके हैं, उनकी वाणीका भावमात्र जानने- के लिये निरन्तर उत्सुक रहते हैं। उनके साथ स्वयं भी उस भावका अवगाहन करने के लिये ही मैने भगवानके उपनिषद्भाष्यका भावार्थ लिखनेका दुःसाहस किया है । यद्यपि मैं किसी प्रकार इस महान कार्यको हाथ में लेनेकी योग्यता नहीं रखता तो भी जिसकी इच्छासे सम्पूर्ण प्राणी अहनिश भिन्न-भिन्न कार्यों में लगे रहते हैं उस सर्वान्तर्यामी जगन्नाटचसूत्रधरने ही मुझे भी इसमें जोड़ किया। मेरी इस चपलतासे यदि कुछ महानुभावोंका मनोरञ्जन हो सका तो मैं इस प्रयासको सफल समझंगा। इस समय प्रायः एक सौ बारह उपनिषदें प्रसिद्ध हैं, परंतु भगवान शङ्कराचार्य तथा अन्य आचार्योने भी अधिकतर आरम्भको दस-बारह उपनिषदोंपर ही भाष्य लिखे हैं। इससे यह नहीं समझना चाहिये कि अन्य उपनिषदें अप्रामाणिक हैं, क्योंकि उनमें- से बहुत-सी उपनिषदोंके वाक्य स्वयं भगवान्ने भी अपने भाष्यों में उद्धृत किये है । इससे उनकी प्राचीनता और प्रामाणिकता स्पष्टतया सिद्ध होती है। उपनिषदोंमें यह सबसे पहली ईशावास्योपनिषद् है । यह उपनिषद् शुक्लयजु.संहिताका-जिसे वाजसनेयीसंहिता भी कहते -चालीसवाँ अध्याय है। इससे पहले उनतालीस अध्यायों में कर्म- काण्डका निरूपण है। यह उस काण्डका अन्तिम अध्याय है और इसमें ज्ञानकाण्डका निरूपण किया गया है । इसका प्रयम मन्त्र 'ईशा वास्यम्' इत्यादि होने के कारण इस उपनिषद्का नाम भी 'ईशावास्य हो गया है। आकारमें बहुत छोटी होनेपर भी इसका महत्त्व एव प्रामाण्य सर्वसम्मत है । भगवान् हमें इसका तात्पर्य समझनेकी बुद्धि प्रदान करें, जिससे हम सच्चे सुखकी उपलब्धि कर सकें। अनुवादक

ROYEESLIMNANE
* श्रीगुरवे नमः *
भगवन् !
लीजिये ! यह उपनिषद्भाष्यका अनुवाद अापकी
ही बाह्य और श्रान्तरिक प्रेरणाका फल है; अत: इसे
अापहीके परम
पवित्र करकमलोंमें
करता हूँ।
सादर समर्पित
आपका ही
एक चरणरजानुचर
बल

विषय-सूची पृष्ठ ... - R.. ... - २६ २८ विषय १. शान्तिपाठ २. सम्बन्ध-भाष्य ३. सर्वत्र भगवदृष्टिका उपदेश ४. मनुष्यत्वाभिमानीके लिये कर्मविधि ५. अज्ञानीकी निन्दा ६. आत्माका स्वरूप ७. अभेददीकी स्थिति ८. आत्मनिरूपण ९. ज्ञानमार्ग और कर्ममार्ग १०. कर्म और उपासनाका समुच्चय ११. कर्म और उपासनाके समुच्चयका फल १२. व्यक्त और अव्यक्त उपासनाका समुच्चय १३. व्यक्त और अव्यक्त उपासनाके फल १४. उपासनाकी मार्गयाचना १५. मरणोन्मुख उपासककी प्रार्थना १६. ग्रन्थार्थविवेचन १७. शान्तिपाठः ... ... ... ... ... ... ... ३८ ... ... ४३ . ५०

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भगवान श्रीशङ्कराचार्य

तत्सद्ब्रह्मणे नमः
इंशावास्योपनिषद्
मन्त्रार्थ, शाकरभाष्य और भाष्यार्थसहित
ईशिता सर्वभूतानां सर्वभूतमयश्न
ईशावास्येन सम्बोध्यमीश्वरं तं नमाम्यहम् ।।
शान्तिपाठ
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
ॐ वह ( परब्रह्म ) पूर्ण है और यह ( कार्यब्रह्म) भी पूर्ण है;
क्योंकि पूर्णसे पूर्णकी ही उत्पत्ति होती है । तथा [प्रलयकालमें ]
पूर्ण [ कार्यब्रह्म] का पूर्णत्व लेकर ( अपनेमें लीन करके ) पूर्ण
[ परब्रह्म ] हो बच रहता है। त्रिविध तापकी शान्ति हो।

१२ ईशावास्योपनिषद् सम्बन्ध-भाष्य ईशा वास्यमित्यादयो मन्त्राः 'ईशा वास्यम्' आदि मन्त्रोंका मन्त्राणा- कर्मस्व विनियुक्ताः । कर्ममें विनियोग नहीं है; क्योंकि वे आत्माके यथार्थ स्वरूपका प्रति- मीशादि- तेषामकर्मशेषस्यात्मनो पादन करनेवाले हैं जो कि कर्मका विनियोगः याथात्म्यप्रकाशकत्वात्। शेष नहीं है । आत्माका यथार्थ याथात्म्यं चात्मनः शुद्धत्वा- | स्वरूप शुद्धत्व, निष्पापत्व, एकत्व, पापविद्धत्वैकत्वनित्यत्वाशरीरत्व- नित्यत्व, अशरीरत्व और सर्वगतत्व आदि है जो आगे कहा जानवाला सर्वगतत्वादि वक्ष्यमाणम् । तच्च है। इसका कर्म से विरोध है; अत: कर्मणा विरुध्येतेति युक्त एवेषां इन मन्त्रोंका कर्ममे विनियोग न कर्मस्वविनियोगः। होना ठीक हा है। न ह्येवलक्षणमात्मनो याथा- आत्माका ऐसे लक्षणोवाला यथार्थ स्वरूप उत्पाद्य', विकार्य२, आप्य: त्म्यमुत्पाद्यं विकार्यमाप्यं संस्कार्य और संस्कार्य अथवा कर्ता-भोक्ता- कर्तुभोक्तुरूपं वा येन कर्म- | रूप नही है, जिससे कि वह कर्मका शेषता स्यात् । सर्वासामुपनिप- शेप हो सके। सम्पूर्ण उपनिषदों- की परिसमाप्ति आत्माके यथार्थ दामात्मयाथात्म्यनिरूपणेनैव स्वरूपका निरूपण करने में हो हाती उपक्षयात् । गीतानां मोक्षधर्माणां है तथा गीता और मोक्षधर्मों का चैवंपरत्वात् । तस्मादात्मनोऽने- | भी इसी में तात्पर्य है । अत: आत्मा- कत्वकर्तृत्वभोक्तृत्वादि चाशुद्ध- के सामान्य लोगोंको बुद्धिसे सिद्ध होनेवाले अनेकत्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्व स्वपापविद्धत्वादि चोपादाय | तथा अशुद्धत्व और पापमयत्वको १-उत्पन्न किया जाने योग्य, जैसे पुरोडाश आदि । २-विकारयोग्य, जैसे सोम आदि । ३. बलवान् करने अथवा प्राप्त करने योग्य, जैसे मन्त्रादि । ४-संस्कारयोग्य, जैसे ब्रीहि आदि कर्म के शेष भूत पदार्थों में इन धर्मोंका रहना आवश्यक है। आत्मामें ऐसा कोई धर्म नहीं है। इसलिये वह कर्मशेष नहीं हो सकता ।

शाङ्करभाष्यार्थ कर्मणि , लोकबुद्धिसिद्धं कर्माणि विहि- | लेकर ही कर्मो का विधान किया तानि । गया है। यो हि कर्मफलेनार्थी दृष्टेन कर्माधिकारके ज्ञाताओंका भी ब्रह्मवर्चसादिनादृष्टेन | यही कथन है कि जो पुरुष ब्रह्मतेज कय स्वगादिना च द्विजा आदि दृष्ट और स्वर्ग आदि अदृष्ट अधिकारः कर्मफलोंका इच्छुक है और 'मैं तिरहं न काणकुब्जत्वाचनधि- । द्विजाति हूँ तथा कर्मके अनधिकार- कारप्रयोजकधर्मवानित्यात्मानं सूचक कानेपन, कुबड़ेपन आदि मन्यते सोऽधिक्रियते कर्मस्विति धर्मोसे युक्त नहीं हूँ' ऐसा अपनेको ह्यधिकारविदो वदन्ति । मानता है, वही कर्मका अधिकारी है। तम्मादेते मन्त्रा आत्मनो याथा अत: ये मन्त्र आत्माके यथार्थ स्वरूपका प्रकाश करके आत्म- अनन्य त्म्यप्रकाशनेन आत्म-सम्बन्धी स्वाभाविक अज्ञानको नदृष्टयन विषयं स्वाभाविकमज्ञानं निवृत्त करते हुए संसारके शोक- मोहादि धर्मोके विच्छेदके साधन- निवर्तयन्तः शोकमोहादिसंसार- स्वरूप आत्मैकत्वादि विज्ञानको धर्मविच्छित्तिसाधनमात्मैकत्वा- ही उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार जिनके [ मुमुक्षु-रूप] अधिकारी, दिविज्ञानमुत्पादयन्ति । इत्येव- [आत्मैक्यरूप] विषय, [प्रतिपाद्य- प्रतिपादकरूप } सम्बन्ध और मुक्ताधिकार्यभिधेयसम्बन्धप्रयो- [ अज्ञान निवृत्ति तथा परमानन्द- जनान्मन्त्रान्संक्षेपतो व्याख्या- प्राप्तिरूप प्रयोजनका ऊपर उल्लेख हो चुका है, उन मन्त्रोंकी अब हम स्यामः। संक्षेपसे व्याख्या करेंगे।

ईशावास्योपनिषद् [मन्त्र १ सर्वत्र भगदृष्टिका उपदेश ॐ ईशा वास्यमिद ५सर्वं यस्किञ्च जगत्यांजगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥१॥ जगत्में जो कुछ स्थावर-जङ्गम संसार है, वह सब ईश्वरके द्वारा आच्छादनीय है [ अर्थात् उसे भगवत्स्वरूप अनुभव करना चाहिये ] । उसके त्याग-भावसे तू अपना पालन कर; किसीके धनकी इच्छा न कर ॥१॥ ईशा ईष्ट इतीट् तेनेशा । ईशिता जो ईशन ( शासन ) करे उसे ईट् कहते हैं; उसका तृतीयान्त रूप परमेश्वरः परमात्मा सर्वस्य । 'ईशा' है। सबका ईशन करनेवाला स हि सर्वमीष्टे सर्वजन्तुनामात्मा । परमेश्वर परमात्मा है। वही सब जीवोंका आत्मा होकर अन्तर्यामि- सन्प्रत्यगात्मतया तेन स्वेन रूपसे सबका ईशन करता है। रूपेणात्मनेशा वास्यमाच्छाद- उस अपने स्वरूपभूत आत्मा ईशसे सव वास्य-आच्छादन करने- नीयम् । योग्य है। किम् ? इदं सर्व यत्किञ्च क्या [ आच्छादन करनेयोग्य यत्किचिजगत्या. पृथिव्यां है ] ? यह सब जो कुछ जगती अर्थात् पृथ्वीमें जगत् ( स्थावर- जगत्तत्सर्व स्वेनात्मना ईशेन जङ्गम प्राणिवर्ग ] है वह सब अपने प्रत्यगात्मतयाहमेवेद सर्वमिति | आत्मा ईश्वरसे--अन्तर्यामिरूपसे परमार्थसत्यरूपेणानृतमिदं सर्व | यह सब कुछ मैं ही हूँ-ऐसा जानकर अपने परमार्थसत्यस्वरूप परमात्मा- चराचरमाच्छादनीयं स्वेन से यह सम्पूर्ण मिथ्याभूत चराचर परमात्मना। आच्छादन करनेयोग्य है।

मन्त्र १] शाङ्करभाष्यार्थ १५ यथा चन्दनागर्वादेरुदकादि जिस प्रकार चन्दन और अगरु आदिकी, जल आदिके सम्बन्धसे सम्बन्धजक्लेदादिजमौपाधिक गीलेपन आदिके कारण उत्पन्न हुई 'दौर्गन्ध्यं तत्स्वरूपनिघर्षणेन | औपाधिक दुर्गन्धि उन (चन्दनादि) के स्वरूपको घिसनेसे उनके आच्छाद्यते स्वेन पारमार्थिकेन पारमार्थिक गन्धसे आच्छादित हो गन्धेन । तद्वदेव हि स्वात्मनि जाती है, उसी प्रकार अपने आत्मा- में आरोपित स्वाभाविक कर्तृत्व- अध्यस्तं स्वाभाविकं कर्तृत्व- भोक्तृत्व आदि लक्षणोंवाला द्वैतरूप भोक्तृत्वादिलक्षणं जगद्वैतरूपं | जगत् जगतीमें यानी पृथिवीमे- जगत्यां पृथिव्याम् , जगत्यामिति | 'जगत्याम्' यह शब्द [ स्थावर- जङ्गम सभीका] उपलक्षण कराने- उपलक्षणार्थत्वात्सर्वमेव नामरूप- | वाला होनेसे-इस परमार्थ सत्य- कर्माख्यं विकारजातं परमार्थ- | स्वरूप आत्माकी भावनासे नामरूप और कर्ममय सारा ही विकारजात सत्यात्मभावनया त्यक्तं स्यात् ।। परित्यक्त हो जाता है। एवमीश्वरात्मभावनया युक्तस्य इस प्रकार जो, ईश्वर ही चराचर जगत्का आत्मा हे-ऐसी पुत्राधेषणात्रयसं- भावनासे युक्त है, उसका पुत्रादि न्यांस एवाधिकारो | तीनों एषणाओंके त्यागमे ही अधिकार है-कर्ममें नही। उसके न कर्मसु । तेन त्यक्तेन त्यक्त अर्थात् त्यागसे [ आत्माका त्यागेनेत्यर्थः। न हि त्यक्तो पालन कर । त्यागा हुआ अथवा मृतः .पुत्रो वा भृत्यो वा मरा हुआ पुत्र या सेवक, अपने आत्मसम्बन्धिताया अभावात् | सम्बन्धका अभाव हो जानेके कारण आत्मानं पालयति अतस्त्यागेन | अपना पालन नहीं करता; अत: इत्ययमेव वेदार्थः-भुञ्जीथाः | त्यागसे—यही इस श्रुतिका अर्थ पालयेथाः। है-भोग यानी पालन कर । - अत्म नष्ठस्य न्याग एवम् अधिकारः १६ ईशावास्योपनिषद् [ मन्त्र २ एवं त्यक्तषणस्त्वं मा गृधः इस प्रकार एषणाओंसे रहित गृधिमाकासां मा कार्षीधन- | होकर तू गर्द्ध अर्थात् धनविषयक विषयाम् कस्यस्विद्धनं कस्य- आकाङ्क्षा न कर। किसीके धनकी चित्परस्य स्वस्य वा धनं मा अर्थात् अपने या पराये किसीके भी कालीरित्यर्थः । स्विदित्यनर्थको धनकी इच्छा न कर । यहाँ 'स्वित्' निपातः। यह अर्थरहित निपात है। अथवा मा गृधः। कस्मात ? | धन भला किसका है ? इस प्रकार अथवा आकाक्षा न कर, क्योंकि कस्यस्विद्धनमित्याक्षेपार्थो न इसका आक्षेपसूचक अर्थ भी हो सकता है अर्थात् धन किसीका भी कस्यचिद्धनमस्ति यद्गृध्येत । | नही है जो उसकी इच्छा को जाय। यह सब आत्मा ही है- इस प्रकार आत्मैवेदं सर्वमितीश्वरभावनया ईश्वरभावनासे यह सभी परित्यक्त सर्व त्यक्तमत आत्मन एवेदं हो जाता है। अत: यह सब आत्मा- से उत्पन्न हुआ तथा सब कुछ आत्म- सर्वमात्मैव च सर्वमतो मिथ्या- रूप ही होनेके कारण मिथ्यापदार्थ- विषयक आकाङ्क्षा न विषयां गृधिमा कार्षीरित्यर्थः।१।। ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ १॥ कर- मनुष्यत्वाभिमानी के लिये कर्मविधि एवमात्मविदः पुत्रायेषणा इस प्रकार उपर्युक्त श्रुतिका यही तात्पर्य है कि आत्मवेत्ताको यसंन्यासेनात्मज्ञाननिष्ठतयात्मा पुत्रादि एषणात्रयका त्याग करते रक्षितव्य इत्येष वेदार्थः। अथ ज्ञाननिष्ठ रहकर ही आत्माकी रक्षा करनी चाहिये। इतरस्यानात्मज्ञतया आत्मग्रहणाय आत्मतत्त्वका ग्रहण करनेमें असमर्थ दूसरा अनात्मज्ञ पुरुष है उसके लिये अशक्तस्येदमुपदिशति मन्त्रः- यह दूसरा मन्त्र उपदेश करता है- अब जो - मन्त्र २] शाङ्करभाष्यार्थ कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत" समाः । एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥२॥ इस लोकमें कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीनेकी इच्छा करे । इस प्रकार मनुष्यत्वका अभिमान रखनेवाले तेरे लिये इसके सिवा और कोई मार्ग नही है, जिससे तुझे [ अशुभ ] कर्मका लेप न हो ॥२॥ +- कुर्वन्नेव इह निवर्तयन्नेव! इस लोकमें अग्निहोत्रादि कर्म कर्माण्यग्निहोत्रादीनि जिजीविषे- करते हुए ही सौतक अर्थात् मौ वर्षों- ज्जीवितुमिच्छेच्छतं शतसङ्ख्याकाः तक जीनेकी इच्छा क । पुरुषकी बड़ी से बड़ी आधु इतनी ही समाः संवत्सरान् । तावद्धि । बतलायी गयो है। अत: उन प्राप्त पुरुषस्य परमायुर्निरूपितम् । हुई आयुका अनुवाद करते हुए यह तथा च प्राप्तानुवादेन यज्जिजी- विधान किया है कि यदि मौ वर्ष विषेच्छतं वर्षाणि तत् कुर्वन्नेव जीनेको इच्छा करे तो कर्म करते कर्माणीत्येतद्विधीयते । हुए ही जीना चाहे। एवमेवम्प्रकारेण त्वयि इस तरह, इस प्रकार जीनेकी जिजीविषति नरे नरमात्राभि- इच्छा करनेवाले तुझ मनुष्य- मनुष्यत्वमात्रका अभिमान करने- मानिनीत एतस्मादग्निहोत्रादीनि वालेके लिये इस अर्थात् अग्नि- कर्माणि कुर्वतो वर्तमानात्प्रका- होत्रादि कर्म करते हुए हो [ आयु रादन्यथा प्रकारान्तरं नास्ति बितानेके ] वर्तमान प्रकारसे भिन्न येन प्रकारेणाशुभं कर्म न लिप्यते और कोई ऐसा प्रकार नहीं है, जिससे अशुभ कर्मका लेप न हो कर्मणा न लिप्यत इत्यर्थः । । अर्थात् जिससे वह पुरुष कर्मसे ई.उ०२- १८ ईशावास्योपनिषद् [ मन्त्र २ विषेत् । ज्ञानकर्म- निष्ठेति । अतः शास्त्रविहितानि कर्माण्य-। लिप्त न हो। अत: अग्निहोत्र आदि निहोत्रादीनि कुर्वन्नेव जिजी- शास्त्रविहित कर्मोंको करते हुए ही जीनेकी इच्छा करे। कथं पुनरिदमवगम्यते पूर्व०-यह कैसे जाना गया कि पूर्वेण संन्यासिनो पूर्व मन्त्रसे संन्यासीकी ज्ञान निष्ठाका समुच्चय- ज्ञाननिष्ठोक्ता द्विती- तथा द्वितीय मन्त्रस संन्यासमें मुण्डनन्- येन तदशक्तस्य कर्म- | असमर्थ पुरुषकी कर्मनिष्ठाका वर्णन किया गया है ? उच्यते; ज्ञानकर्मणोविरोधं सिद्धान्ती०-कहते है, क्या तुम्हें स्मरण नही है कि जैसा पहले पर्वतवदकम्प्यं यथोक्तं न स्मरसि (सम्बन्ध-भाष्यमें ) कह चुके है ज्ञान और कर्मका विरोध पर्वतके समान किम् ? इहाप्युक्तं 'यो हि जिजी- अविचल है। यहाँ भी 'जो जीनेकी इच्छा करे वह कर्म करते हुए ही विषेत् स कर्म कुर्वन्' 'ईशा- जीना चाहे ]' तथा 'यह सब वास्यमिदं सर्वम्' 'तेन त्यक्तेन | ईश्वरसे आच्छादन करने योग्य है' 'उस ( चराचर जगत् ) के त्याग- भुञ्जीथा' 'मा गृधः कस्यस्वि- द्वारा आत्माकी रक्षा कर' 'किसीके धनकी इच्छा न कर'इत्यादि वाक्यों- द्धनम्' इति च । 'न जीविते से [कर्मी और संन्यासीकी निष्ठाओं- का भेद ही ] निरूपण किया है। मरणे वा गृधिं कुर्वीतारण्यमिया-| तथा 'जीवन या मरणका लोभ न करे, वनको चला जाय-यही वेदकी दिति च पदम्; ततो न पुनरियात्' | मर्यादा है। और फिर वहाँसे घर न लौटे' इस वाक्यसे भो [ज्ञाननिष्ठ- इति संन्यासशासनात् । उभयोः के लिये ] संन्यासका ही विधान किया है। आगे इन दोनों निष्ठाओं- फलभेदं च वक्ष्यति । के फलका भेद भी बतलायेंगे।

मन्त्र ३]
शाङ्करभाष्यार्थ
इमौ द्वावेव पन्थानावनुनि-
ये दोनों ही मार्ग सृष्टिके आरम्भ-
क्रान्ततरौ भवतः क्रियापथश्चैव से परम्परागत हैं। इनमें पहले
पुरस्तात्संन्यासश्चोचरेण । निवृ- | कर्ममार्ग है और पीछे संन्यास ।
तिमार्गेण एषणात्रयस्य त्यागः।
[संन्यासरूप] निवृत्तिमार्गसे तीनों
तयोः संन्यासपथ एवाति- | एपणाओंका त्याग किया जाता है।
रेचयति । “न्यास एवात्यरेच- | इन दोनोंमें संन्यासमार्ग ही उत्कर्ष
यत्" इति च तैत्तिरीयके। प्राप्त करता है। तैत्तिरीय श्रुतिमें
"द्वाविमावथ पन्थानौ
भी कहा है कि "संन्यास ही
उत्कृष्टताको प्राप्त हुआ।" वेदाचार्य
यत्र वेदाः प्रतिष्ठिताः।
भगवान् व्यासने भी बहुत सोच-
प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो
विचारकर ही अपने पुत्रसे यह
निवृत्तश्च विभावितः ॥" निश्चित बात कही है- "जिनमें वेद
( महा० या० २४१ । ६) प्रतिष्ठित हैं ऐसे ये दो ही मार्ग हैं-
इत्यादि
पुत्राय
विचार्य
एक तो प्रवृत्तिलक्षण धर्ममार्ग और
निश्चितमुक्तं व्यासेन वेदाचार्येण दूसरा अच्छी तरह भावना किया
भगवता । विभागश्चानयोः
| हुआ निवृत्तिमार्ग है।'' इन दोनोंका
दर्शयिष्यामः ॥२॥ विभाग हम आगे दिखलायेंगे ॥२॥
अज्ञानीकी निन्दा
अथेदानीमविद्वन्निन्दार्थोऽयं अब अज्ञानीको निन्दा करने के
लिये यह [ तीसरा ] मन्त्र आरम्भ
मन्त्र आरम्यते-
किया जाता है-
असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः ।
तास्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ।।३।।
वे असुरसम्बन्धी लोक आत्माके अदर्शनरूप अज्ञानसे आच्छादित
हैं। जो कोई भी आत्माका हनन करनेवाले लोग हैं वे मरने के अनन्तर
उन्हें प्राप्त होते हैं ॥३॥

२०
ईशावास्योपनिषद्
[ मन्त्र ३
असुर्याः परमात्मभावमद्वयम-
अद्वय परमात्मभावकी अपेक्षासे
पेक्ष्य देवादयोऽप्यसुरास्तेषाञ्च | देवता आदि भी असुर ही है।
स्वभूता लोका असुर्या नाम । | उनके सम्पत्ति-स्वरूप लोक 'असुर्य'
नामशब्दोऽनर्थको निपातः। हैं। 'नाम' शब्द अर्थहीन निपात है।
ते लोकाः कर्मफलानि ।
जिनमें कर्मफलोंका लोकन-
लोक्यन्ते दृश्यन्ते भुज्यन्त इति
दर्शन यानी भोग होता है, वे
लोक अर्थात् जन्म ( योनियाँ)
जन्मानि । अन्धेनादर्शनात्म-
अन्ध-अदर्शनात्मक तम यानी
केनाज्ञानेन तमसावृता आच्छा- अज्ञानसे आच्छादित हैं। वे इस
दिताः
तानस्थावरान्तान्प्रेत्य
शरीरको छोड़कर अपने कर्म और
त्यक्त्वेमं देहम भिगच्छन्ति यथा- | ज्ञानके अनुसार उन [ब्रह्मासे लेकर ]
कर्म
यथाश्रुतम् ।
स्थावरपर्यन्त योनियों में ही जाते हैं।
आत्मानं नन्तीत्यात्महनः।
जो कोई आत्माका घात (नाश)
करते हैं, वे आत्मघाती हैं। वे लोग
के ते जनाः येऽविद्वांसः। कथं
कौन हैं ? जो अज्ञानी हैं। वे सर्वदा
त आत्मानं नित्यं हिंसन्ति । | अपने आत्माकी किस प्रकार हिंसा
अविद्यादोषेण विद्यमानस्यात्मनः | करते हैं ? अविद्यारूप दोपके कारण
अपने नित्यमिद्ध आत्माका तिर-
तिरस्करणात् । विद्यमानस्य
स्कार करनेसे [ अज्ञानी जीवोंकी
आत्मनो यत्कार्य फलमजराम- दृष्टिमें ] नित्य विद्यमान आत्माका
रत्वादिसंवेदनलक्षणं तद्धतस्येव अजरामरत्वादिज्ञानरूप कार्य यानी
तिरोभृतं भवतीति प्राकृता-
फल मरे हुएके समान तिरोभूत
रहता है, इसलिये प्राकृत अज्ञानी-
विद्वांसोजना आत्महन उच्यन्ते।
जन आत्मघाती कहे जाते हैं । इस
तेन ह्यात्महननदोषेण संसरन्ति | आत्मघातरूप दोषके कारण ही वे
ते॥ ३॥
जन्म-मरणको प्राप्त होते है ॥३॥

मन्त्र ४] शाङ्करभाष्यार्थ २१ प्रात्माका स्वरूप यस्यात्मनो हननादविद्वांसः जिस आत्माका हनन करनेसे अज्ञानीलोग जन्म-मरणरूप संसार- संसरन्ति तद्विपर्ययेण विद्वांसो को प्राप्त होते हैं और उसके विपरीत जना मुच्यन्ते ते नात्महनः तत् ज्ञानीलोग मुक्त हो जाते हैं-वे आत्म- घाती नहीं होते-वह आत्मतत्त्व कीदृशमात्मतत्त्वमित्युच्यते कैसा है ? सो बतलाया जाता है- अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्षत् । तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति।। - वह आत्मतत्त्व अपने स्वरूपसे विचलित न होनेवाला, एक तथा मनसे भी तीव्र गतिवाला है। इसे इन्द्रियाँ प्राप्त नहीं कर सकीं ? क्योंकि यह उन सबसे पहले ( आगे ) गया हुआ ( विद्यमान ) है। वह स्थिर होनेपर भी अन्य सब गतिशीलोंको अतिक्रमण कर जाता है। उसके रहते हुए हो [ अर्थात् उसकी सत्तामें ही ] वायु समस्त प्राणियोंके प्रवृत्ति- रूप कर्मोका विभाग करता है ।। ४ ।। अनेजत् न एजत् । एजा जो चलनेवाला न हो उसे 'अनेजत्' कहते हैं; क्योंकि कम्पने, कम्पनं चलनं स्वावस्था- | 'एज़ कम्पने' [ इस धातुसूत्रसे ] प्रच्युतिस्तद्वर्जितं सर्वदैकरूपमि- | 'एज्' धातुका अर्थ कम्पन है। इस प्रकार [ वह आत्मतत्त्व ] कम्पन- त्यर्थः। तच्चैकं सर्वभूतेषु मनसः चलन अर्थात् अपनी अवस्थासे च्युत होनेसे रहित है यानी सदा एक- सङ्कल्पादिलक्षणाद् जवीयो! रूप है। वह एक ही सब प्राणियों में वर्तमान है तथा सङ्कल्पादिरूप मन- जववत्तरम् । से भी जवीय-अधिक वेगवान् है।

२२ ईशावास्योपनिषद् [ मन्त्र ४ कथं विरुद्धमुच्यते ध्रुवं पू०-यह विरुद्ध बात कैसे निश्चलमिदं मनसो जवीय | कही जाती है कि वह आत्मतत्त्व ध्रुव एवं निश्चल है तथा मनसे भी इति च । अधिक वेगवान् है ? नैष दोषः। निरुपाध्युपाधि सिद्धा ती-यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि निरुपाधिक और सोपा- विधि- मत्त्वेनोपपत्तेः । तत्र धिकरूपसे यह विरुद्ध कथन भी बन परिहारः निरुपाधिकेन म्वेन | सकता है। उस अवस्थामे अपने निरुपाधिकरूपसे तो 'अविचल' रूपेणोच्यते अनेजदेकमिति और 'एक'-ऐसा कहा जाता है मनसोऽन्तःकरणस्य सङ्कल्प- तथा अन्त:करणकी मनरूप सङ्कला. विकल्पात्मिका उपाधिका अनुवर्तन विकल्पलक्षणस्योपाधेरनुवर्तनाद् करनेके कारण [ मनसे भी अधिक इह देहस्थस्य मनसो ब्रह्म- | वेगवान् कहा गया है ] इस लोक- में देहस्थ मनवा ब्रह्मलोक आदि लोकादिदूरगमनं मङ्कल्पेन क्षण- दूर देशोंमे सङ्कल्परूपसे एक क्षणमे मात्रावतीत्यतो मनसो ही गमन हो जाता है, अतः मनका अत्यन्त वेगवत्त्व तो. लोकमें प्रसिद्ध जविष्ठत्वं लोके प्रसिद्धम् । तस्मिन् ही है; किन्तु उस मनके ब्रह्मलोका दि. मनसि ब्रह्मलोकादीन्द्रतं गच्छति में बड़ी शीघ्रतासे पहुँचनेपर वहाँ आत्मचैतन्यका अवभास पहलेहीले सति प्रथमं प्राप्त हवात्मचैतन्या- पहुंचा हुआ-सा अनुभव किया जाता वभासो गृह्यतेऽतो मनमो जवीय है। इसीसे 'वह मनसे भी अधिक इत्याह। वेगवान् है' ऐसा श्रुति कहती है । नैनद्देवा द्योतनाद्देवाश्चक्षुरा- जिसका प्रकरण चल रहा है ऐसे इस आत्मतत्त्वको देवगण भी दीनीन्द्रियाण्येतत्प्रकृतमात्मतत्त्वं । प्राप्त अर्थात् उपलब्ध नहीं कर सके।

मन्त्र ४] शाङ्करभाष्यार्थ २३ नाप्नुवन्न प्राप्तवन्तः । तेभ्यो। विषयोंका द्योतन (प्रकाश) करनेके कारण चक्षु आदि इन्द्रियां ही 'देव' मनो जवीयः मनोव्यापार-] हैं। उन इन्द्रियोंसे तो मन ही वेगवान् है, अत: [ आत्मा तथा व्यवहितत्वाद् आमासमात्रमपि इन्द्रियोंके बीचमें ] मनोव्यापारका आत्मनो नैव देवानां विषयी-| व्यवधान रहनेके कारण आत्माका तो आभासमात्र भी इन्द्रियोंका भवति । विषय नहीं होता। यस्माज्जवनान्मनसोऽपि पूर्व क्योंकि आकाशके समान व्यापक मर्पत पूर्वमेव गतं व्योम- | होनेके कारण वह वेगवान् मनसे भी पहले ही गया हुआ है । वह सर्व- वद्वयापित्वात् सर्वव्यापि तदा- व्यापी आत्मतत्त्व अपने निरुपाधिक त्मतत्त्वं सवसंसारधर्मवर्जितं स्वेन | स्वरूपसे सम्पूर्ण संसार-धर्मोसे निरुपाधिकेन स्वरूपेणाविक्रिय- रहित तथा अविक्रिय होकर ही मेव सदुपाधिकृताः सर्वाः संसार- | उपाधिकृत संपूर्ण सांसारिक विकारोंको अनुभव कता है और विक्रिया अनुभवतीत्यविवेकिनां अविवेकी मूढ़ पुरुषोंको प्रत्येक मूढानामनेकमिव च प्रतिदेहं शरीरमें अनेक-सा प्रतीत होता है प्रत्यवभासत इत्येतदाह । इसीसे श्रुतिने ऐसा कहा है। तद्धावतो द्रुतं गच्छतोऽन्या- वह दौड़ते अर्थात् तेजीसे चलते हुए, आत्मासे भिन्न अन्य मन, वाणी नात्मविलक्षणान्मनोवागिन्द्रिय- और इन्द्रिय आदिका अतिक्रमण प्रभृतीनत्येति अतीत्य गच्छति | कर जाता है-मानो उन्हें पार करके चला जाता है। 'इव' का इव । इवार्थ स्वयमेव दर्शयति | भावार्थ श्रुति 'तिष्ठत्' (ठहरनेवाला) तिष्ठदिति स्वयमविक्रियमेव | इस पदसे स्वयं ही दिखला रही है। अर्थात् स्वयं अविकारी रहकर ही सदित्यर्थः। दूसरोंको पार कर जाता है।

२४ ईशावास्योपनिषद् [ मन्त्र ५ तस्मिन्नात्मतत्वे सति नित्य उस नित्यचेतन्यस्वरूप आत्म- चैतन्यस्वभावे मातरिश्वा मातरि तत्त्वके वर्तमान रहते हुए ही जो अन्तरिक्षे श्वयति गच्छतीति मातरि अर्थात् अन्तरिक्षमें सञ्चार- गमन करता है, वह मातरिश्वा-वायु, मातरिश्वा वायुः सर्वप्राणभृत् जो समस्त प्राणोंका पोषक और क्रियात्मको यदाश्रयाणि कार्य- | क्रियारूप है, जिसके अधीन ये सारे कग्णजातानि यस्मिन्नोतानि शरीर और इन्द्रिय हैं तथा जिसमें ये प्रोतानि च यत्सूत्रसंज्ञकं सर्वस्य | सब ओत-प्रोत हैं और जो सूत्रसंज्ञक जगतो विधारयित स मातरिश्वा; तत्त्व निखिल जगत्का विधाता है, अपः कर्माणि प्राणिनां चेष्टा- वह मातरिश्वा अप् अर्थात् प्राणियोंके लक्षणानि, अग्न्यादित्यपर्जन्या- चेष्टारूप कर्म यानी अग्नि, सूर्य और दीनां ज्वलनदहनप्रकाशाभिवर्ष- | मेघ आदिके ज्वलन-दहन, प्रकाशन णादिलक्षणानि दधाति विभजति | एवं वर्षा आदि कर्म विभक्त करता इत्यर्थः। है, ऐसा इसका भावार्थ है। धारयतीति वा "भीषास्मा- अथवा "इसके भयसे वायु चलता द्वातः पवते" ( तै० उ० २।८। है" इत्यादि [भाववालो] श्रुतियोंके अनुसार 'दधाति'का अर्थ धारण १) इत्यादिश्रुतिभ्यः । सर्वा हि करता है' ऐसा जानो । क्योंकि कार्यकरणादिविक्रिया नित्यचैत- | शरीर और इन्द्रिय आदि सभी विकार सबके अधिष्ठानस्वरूप नित्य न्यात्मस्वरूपे सर्वास्पदभूते सत्येव चैतन्य आत्मतत्त्वके विद्यमान रहते भवन्तीत्यर्थः ॥४॥ ही होते हैं ॥ ४॥ न मन्त्राणां जामितास्तीति मन्त्रोंको आलस नहीं होता, अत: पहले मन्त्रद्वारा कहे हुए अर्थको ही फिर कहते हैं। पूर्वमन्त्रोक्तमप्यर्थ पुनराह-

मन्त्र ५]
शाङ्करभाष्यार्थ
२५
तदेजति तन्नेजति तद्दूरे तद्वन्तिके ।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः॥५॥
वह आत्मतत्त्व चलता है और नहीं भी चलता। वह दूर है और
समीप भी है। वह सबके अन्तर्गत है और वही इस सबके बाहर
भी है ॥ ५॥
तदात्मतत्त्वं यत्प्रकृतं तदेजति जिसका प्रकरण है वह आत्मतत्त्व
चलति तदेव च नैजति स्वतो | एजन करता-चलता है, वही स्वयं
नैव चलति स्वतोऽचलमेव सत्
नहीं भी चलता अर्थात् स्वयं अवल
चलतीवेत्यर्थः। किञ्च तद्रे वर्ष- | रहकर हो चलता हुआ-सा जान
पड़ता है । यही नहीं, वह दूर भी है;
कोटिशतैरप्यविदुषामप्राप्यत्वाद् | अज्ञानियोंको सैकड़ों-करोड़ वर्षों में
दूर इव । तद् उ अन्तिके इति | भी अप्राप्य होनेके कारण दूर-जैसा
च्छेदः। तद्वन्तिके समीपेऽत्य- | है। [ 'तद्वन्तिके'का ] तद् उ
अन्ति-
न्तमेव विदुषामात्मत्वान केवलं
के-ऐसा पदच्छेद करना चाहिये।
वही अन्तिक अत्यन्त समीप भो हे
दूरेऽन्तिके च। तदन्तरभ्यन्तरेऽस्य | अर्थात् केवल दूर ही नहीं विद्वानों का
सर्वस्य “य आत्मा सर्वान्तरः" | आत्मा होनेके कारण समीप भो है ।
( बृ० उ० ३ । ४ । १) इति | भी है जैसा कि "जो आत्मा सर्वान्तर
वह इस सबके अन्तर यानो भोतर
श्रुतेः अस्य सर्वस्य जगतो नाम- | है" इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है।
रूपक्रियात्मकस्य तदु अपि सर्वस्य | आकाशके समान व्यापक होनेके
अस्य बाह्यतो व्यापकत्वादाकाश-
कारण वह इस नाम-रूप और
क्रियात्मक सम्पूर्ण जगत्के बाहर
वनिरतिशयसूक्ष्मत्वाद् अन्तः ।
तथा सूक्ष्मरूप होनेसे इसके भीतर
"प्रज्ञानघन एव" (बृ. उ०४। भी है। और श्रुतिके "प्रज्ञानघन
ही है" इस कथनके अनुसार वह
५।१३) इति च शासनानिरन्तरं
निरन्तर ( बाहर-भीतरके भेदको
च ॥५॥
त्याग कर सर्वत्र ) ही है ॥ ५ ॥

२६ ईशावास्योपनिषद् [ मन्त्र ६ अभेददीकी स्थिति यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥६॥ जो [ साधक ] सम्पूर्ण भूतोंको आत्मामें ही देखता है और समस्त भूतोंमें भी आत्माको ही देखता है , वह इस [ सार्वात्म्यदर्शन ] के कारण हो किसीसे घृणा नहीं करता ॥६॥ यः परिबाड् मुमुक्षुः सर्वाणि जो परिवाट मुमुक्षु अव्यक्तसे भृतान्यव्यक्तादीनि स्थावरान्तानि लेकर स्थावरपर्यन्त सम्पूर्ण भूतोंको आत्मामें ही देखता है अर्थात् उन्हें आत्मन्येवानुपश्यत्यात्मव्यति- आत्मासे पृथक् नहीं देखता तथा रिक्तानि न पश्यतीत्यर्थः, सर्व- उन सम्पूर्ण भूतोंमें भी आत्माको भूतेषु च तेष्वेव चात्मानं तेषाम् देखता है अर्थात् उन भूतोंके आत्मा- अपि भूतानां स्वमात्मानमात्म- | को भी अपना ही आत्मा जानता है यानी यह समझता है कि जिस प्रकार त्वेन यथास्य देहस्य कायकरण- मैं इस देहके कार्य (भूत) और करण सङ्गातस्यात्मा अहं सर्वप्रत्यय- | (इन्द्रिय ) संघातका आत्मा और साक्षिभूतश्चेतयिता केवलो इसकी समस्त प्रतीतियोंका साक्षी, निर्गुणोऽनेनैव स्वरूपेणाव्यक्ता- चेतयिता, केवलऔर निर्गुण हूँ उसी प्रकार अपने इसी रूपसे अव्यक्तसे दीनां स्थावरान्तानामहमेवात्मेति लेकर स्थावरपर्यन्त सम्पूर्ण भूतोंका सर्वभूतेषु चात्मानं निर्विशेष आत्मा भी मैं ही हूँ। इस प्रकार जो यस्त्वनुपश्यति स ततस्तस्मादेव | सब भूतोंमें अपने निविशेष आत्म- स्वरूपको ही देखता है, वह उस दर्शनान्न विजुगुप्सते विजुगुप्सां आत्म-दर्शनके कारण ही किसीसे घृणां न करोति । जुगुप्सा यानी घृणा नहीं करता।

मन्त्र ७] शाङ्करभाष्यार्थ २७ प्राप्तस्यैवानुवादोऽयम् । सर्वा यह प्राप्त वस्तुका हो अनुवाद है। सभी प्रकारकी घृणा अपनेसे हि घृणात्मनोऽन्यदृष्टं पश्यतो भिन्न किमी दूषित पदार्थको देखने- भवति, आत्मानमेवात्यन्तविशुद्धं निरन्तर अपने अत्यन्त विशुद्ध आत्म- वाले पुरुषको ही होती है, जो निरन्तरं पश्यतो न घृणानिमित्तम् स्वरूपको ही देखनेवाला है, उसकी दृष्टिमें घृणाका निभित्तभूत कोई अर्थान्तरमस्तीति प्राप्तमेव । ततो : अन्य पदार्थ है ही नहीं; यह बात स्वतः प्राप्त हो जाती है। इसीलिये न विजुगुप्सत इति ॥ ६॥ वह किसीसे घृणा नहीं करता॥६।। इममेवार्थमन्योऽपि मन्त्र इसी बातको दूसरा मन्त्र भी आह- कहता है: यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥७॥ जिस समय ज्ञानी पुरुषके लिये सब भून आत्मा हो हो गये, उम समय एकत्व देखनेवाले उस विद्वान् को क्या शोक और क्या मोह हो सकता है ॥७॥ यस्मिन्काले यथोक्तात्मनि वा जिम समय अथवा जिस पूर्वोक्त तान्येव भूतानि सर्वाणि परमा- आत्मस्वरूपमें परमार्थतत्त्वको जाननेवाले पुरुषकी दृष्टिमे वे ही र्थात्मदर्शनादात्मैवाभूद् आत्मैव सब भूत परमार्थ आत्मस्वरूपके संवृतः परमार्थवस्तु विजानतः | दर्शनसे आत्मा ही हो गये अर्थात् आत्मभावको ही प्राप्त हो गये, उस तत्र तस्मिन्काले तत्रात्मनि समय अथवा उस आत्मामें क्या मोह वा को मोहः का शोकः । और क्या शोक रह सकता है. ?

२८ ईशावास्योपनिषद् [ मन्त्र ८ शोकश्च मोहश्च कामकर्मबीजम् | शोक और मोह तो कामना और कर्मके बीजको न जाननेवालेको हो अजानतो भवति । न त्वात्मैकत्वं | हुआ करते हैं, जो आकाशवे समान आत्माका विशुद्ध एकत्व विशुद्धं गगनोपमं पश्यतः । देखनेवाला है, उसको नहीं होते। को मोहः कः शोक इति 'क्या मोह और क्या शोक ?' शोकमोहयोरविद्याकार्ययोराक्षेपेण | इस प्रकार अविद्याके कार्यस्वरूप शोक और मोहको आक्षेपरूप असम्भवप्रदर्शनात सकारणस्य असम्भवता दिखलाकर कारणसहित संसारस्यात्यन्तमेवोच्छेदः प्रद- संसारका अत्यन्त ही उच्छेद प्रदर्शित शिंतो भवति ।। ७॥ किया गया है ।। ७ ॥ आत्मनिरूपण योऽयमतीतैर्मन्त्रैरुक्त आत्मा उपर्युक्त मन्त्रोंसे जिस आत्माका स स्वेन रूपेण किंलक्षण इत्याहार्य वर्णन किया गया है, वह अपने स्वरूपसे कैसे लक्षणोंवाला है, इस मन्त्रः-- बातको यह मन्त्र बतलाता है- स पर्यगाच्छु क्रमकायमत्रणमस्नाविर५ शुद्धमपाप- विद्धम् । कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥८॥ . वह आत्मा सवंगत, .शुद्ध, अशरीरी, अक्षत, स्नायुसे रहित, निर्मल, अपापहत, सर्वद्रष्टा, सर्वज्ञ, सर्वोत्कृष्ट और स्वयम्भू (स्वयं ही होनेवाला) है। उसीने नित्यसिद्ध संवत्सर नामक प्रजापतियोंके लिये यथायोग्य रीतिसे अर्थों (कर्तव्यों अथवा पदार्थों ) का विभाग किया है।८॥

मन्त्र ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ २६ स यथोक्त आत्मा पर्यगात्परि वह पूर्वोक्त आत्मा पर्यगात् परि सब ओर अगात्-गया हुआ है समन्तादगाद्गतवानाकाशवव्यापी अर्थात् आकाशके समान सर्व- इत्यर्थः । शुक्र शुद्ध ज्योतिष्म- | व्यापक है, शुक्र-शुद्ध-ज्योतिष्मान् होप्तिमानित्यर्थः । अकायमशरीरो यानी दीप्तिवाला है; अकाय- अशरीरी अर्थात् लिङ्ग-शरीरसे रहित लिङ्गशरीरवर्जित इत्यर्थः । अत्रणम् है; अव्रण यानी अक्षत है; अक्षतम् । अनाविरं स्नावाः, अस्नाविर है, जिसमें स्नायु अर्थात् शिरा यस्मिन्न विद्यन्त इत्यस्ना- शिराएं न हों उसे अस्नाविर कहते विरम् । अत्रणमनाविरमित्याभ्यां हैं। अव्रण और अस्नाविर-इन दो शरीरका प्रति- स्थूलशरीरप्रतिषेधः । शुद्धं बेध किया गया है । तथा शुद्ध, निर्मलमविद्यामलरहितमिति निर्मल यानी अविद्यारूप मलसे कारणशरीरप्रतिषेधः । अपापविद्धं रहित है-इससे कारण शरीरका प्रतिषेध किया गया है। अपापविद्ध- धर्माधर्मादिपापवर्जितम् । धर्म-अधर्मरूप पापसे रहित है विशेषणोंसे स्थूल शुक्रमित्यादीनि वचांसि 'शुक्रम्' इत्यादि (नपुंसकलिङ्ग) पुल्लिङ्गत्वेन परिणेयानि । स वचनोंको पुल्लिङ्गमें परिणत कर लेना चाहिये; क्योंकि ‘स पर्यगात्' पर्यगादित्युपक्रम्य कविमनीषी- इस पदसे आरम्भ करके 'कवि: त्यादिना पुंल्लिङ्गत्वेनोप- मनीषी' आदि शब्दोंद्वारा पुंल्लिग- संहारात् । रूपसे ही उपसंहार किया है। कविः क्रान्तदर्शी सर्वदृक् । कवि क्रान्तदर्शीक्ष्यानी सर्वक "नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा" (बृ. उ० है। जैसा कि श्रुति कहती है-"इससे * क्रान्तका अर्थ अतीत है, अतः कान्तदर्शीका अर्थ अतीतद्रष्टा हुआ । यहाँ अतीतकालको तीनो कालोंका उपलक्षण मानकर भाष्यकारने क्रान्तदर्शीका अर्थ सर्वदृक् अर्थात् सर्वद्रष्टा किया है ।

३० ईशावास्योपनिषद् [ मन्त्र ३ । ८ । ११) इत्यादिश्रुतेः । अन्य कोई और द्रष्टा नहीं है।" मनीषी मनस ईपिता सर्वज्ञ | मनीषी-मनका ईशन करनेवाला ईश्वर इत्यर्थः। परिभूः सर्वेषां | अर्थात् सर्वज्ञ ईश्वर। परिभू-सबके पर्युपरि भवतीति परिभूः । परि अर्थात् ऊपर है इसलिये परिभू है। स्वयम्भू-स्वयं ही होता है स्वयम्भूः स्वयमेव भवतीति । [ इसलिये स्वयम्भू है ] । अथवा येषामुपरि भवति यश्वोपरि भवति | जिनके ऊपर है और जो ऊपर है स सर्वः स्वयमेव भवतीति | वह सब स्वयं ही है, इसलिये स्वयम्भूः। स्वयम्भू है। स नित्यमुक्त ईश्वरो याथा उस नित्यमुक्त ईश्वरने सर्वज्ञ होने- तथ्यतः सर्वज्ञत्वाद्यथातथाभावो | के कारण यथाभूत कर्म, फल और याथातथ्यं तस्माद्यथाभूतकर्मफल- | पदार्थोका याथातथ्य विधान किया साधनके अनुसार अर्थो-कर्त्तव्य- साधनतोऽर्थान् कर्त्तव्यपदार्थान् | अर्थात् यथायोग्य रीतिसे उनका विभाग किया। यथा तथाके भावको व्यदधाद्विहितवान् यथानुरूप याथातथ्य कहते हैं । [ उसने ] व्यभजदित्यर्थः, शाश्वतीम्यो शाश्वत-नित्य समाओं अर्थात् संवत्सर नामक प्रजापतियोंको नित्याभ्यः समाभ्यः संवत्सराख्ये- [ उनकी योग्यताके अनुसार पृथक्- भ्यः प्रजापतिभ्य इत्यर्थः ॥८॥ पृथक कर्तव्य बाँट दिये ] ॥ ८॥ ज्ञानमार्ग और कर्ममार्ग अत्रायेन मन्त्रेण सर्वेषणापरि- यहाँ 'ईशावास्यमिदं सर्व...."मा त्यागेन ज्ञाननिष्ठोक्ता प्रथमो | गृधः कस्यस्विद्धनम्” इस प्रथम मन्त्र- द्वारा सम्पूर्ण एषणाओंके त्यागपूर्वक वेदार्थः "ईशावास्यमिदं सर्व ज्ञाननिष्ठाका वर्णन किया है, यही मा गृधः कस्यस्विद्धनम्" इति वेदका प्रथम अर्थ है। तथा जो मन्त्र ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१ अज्ञानां अज्ञानां जिजीविषूणां ज्ञाननि-) अज्ञानी और जीवित रहनेकी इच्छा- ष्ठासम्भवे "कुर्वन्नेवेह कर्माणि | वाले हैं उनके लिये ज्ञाननिष्ठा सम्भव न होनेपर "कुर्वन्नेवेह कर्माणि... 'जिजीविषेत्" इति कर्म- जिजीविषेत्" इत्यादि मन्त्रसे कर्म- निष्ठोक्ता द्वितीयो वेदार्थः। निष्ठा कही है। यह दूसरा वेदार्थ है। अनयोश्च निष्ठयोविभागो उपर्युक्त मन्त्रोंद्वारा दिखलाया मन्त्रप्रदर्शितयोबृहदा- | हुआ इन निष्ठाओंका विभाग बृह- रण्यकेपि प्रदर्शितः | दारण्यकमें भी दिखाया है । ' उसने कर्मनिष्ठा "सोऽकामयत जाया में | इच्छा की कि मेरे पत्नी हो' इत्यादि स्यात्" (बृ० उ० १।४। १७) | वाक्योंसे यह सिद्ध होता है कि 'कर्म इत्यादिना अज्ञस्य कामिनः | अज्ञानी और सकाम पुरुषके लिये कर्माणोति । “मन एवास्यात्मा हो हैं।' “मन ही इसका आत्मा है, वाग्जाया" (बृ. उ. १ । ४ ।। वाणी स्त्री है" इत्यादि वचनसे भी १७) इत्यादिवचनाद् अज्ञत्वं कर्मनिष्ठका अज्ञानी और सकाम कामित्वं च कर्मनिष्ठस्य निश्चित- | होना तो निश्चितरूपसे जाना जाता मवगम्यते । तथा च तत्फलं | है। तथा उसीका फल सप्तान्न सर्ग सप्तान्नसर्गस्तेष्वात्मभावेनात्मस्व- है। उसमें आत्मभावना करनेसे ही रूपावस्थानम् । आत्माकी [अनात्मरूपसे] स्थिति है। जायावेषणात्रयसंन्यासेन च आत्मज्ञानियों के लिये तो वहाँ हमको यह आत्मलोक ही सम्पादन माख्यनिष्ठा प्रातिकूल्येनात्मस्वरूप- करना हे वे हम प्रजाको लेकर क्या निष्ठेव दर्शिता "किं प्रजया | करेंगे" इत्यादि वाक्यसे जायादि । ज्ञानिना आत्मविदां कर्मनिष्ठा- (बृहदारण्यकोपनिषद्में ) "जिन * व्रीहि-यवादि-ये मनुष्य के अन्न हैं, हुत-प्रहुत-ये दोनों देवताओके अन्न हैं; मन, वाणी और प्राण-ये आत्माके अन्न है तथा दुग्ध पशुओंका अन्न है । यह सात प्रकारके अन्नकी सृष्टि कमका ही फल यहाँ 'जाया' (स्त्री) शब्दसे 'पुत्र' उपलक्षित होता है, अत: 'जायादि एषगा' का तात्पर्य 'पुत्रादि-एषणात्रय' समझना चाहिये । है ।

ईशावास्योपनिषद्
[ मन्त्र
करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं | तीन एषणाओंके त्यागपूर्वक कम-
निष्ठाके विरुद्ध आत्म-स्वरूपमें स्थिर
लोकः" (बृ० उ०४।४।२२)
रहना ही दिखलाया है। जो ज्ञान-
इत्यादिना । ये तु ज्ञाननिष्ठाः
निष्ठ संन्यासी हैं उन्हें हो 'असुर्या
संन्यासिनस्तेभ्योऽसुर्या नाम त नाम ते लोकाः' यहाँसे लेकर 'स
इत्यादिना अविद्वन्निन्दाद्वारण | पर्यगात्' इत्यादितकके मन्त्रोंसे
आत्मनो याथात्म्यं स पर्यगात् अज्ञानीको निन्दा करते हुए आत्मा-
के यथार्थ स्वरूपका उपदेश किया
इत्येतदन्तैमन्त्रैरुपदिष्टम् । ते
है। इस आत्मनिष्ठामे उन्हींका
ह्यत्राधिकृता न कामिन इति । अधिकार है, सकाम पुरुषोंका नहीं।
तथा च श्वेताश्वतराणा मन्त्रो- इसी प्रकार श्वेताश्वतर-मन्त्रोपनि-
पनिषदि "अत्याश्रमिभ्यः परमं पद्मे भी "ऋषिसमूहसे भली प्रकार
पवित्रं प्रोवाच सम्यगृषिसङ्घ-
सेवित इस परम पवित्र आत्मज्ञानका
उत्तम ( संन्यास ) आश्रमवालोंको
जुष्टम्" ( श्वे० उ० ६ । २१)| उपदेश किया" इत्यादि रूपसे
इत्यादि विभज्योक्तम् । इसका पृथक् उपदेश किया है-
ये तु कर्मिणः कर्मनिष्ठाः जो कर्मनिष्ठ कर्मठ लोग कर्म
कर्म कुर्वन्त एव जिजीविषवस्तेभ्य | करते हुए ही जीवित रहना चाहते
इदमुच्यते-
हैं उनसे यह कहा जाता है-
,
-
-
कर्म और उपासनाका समुच्चय
अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।
ततो भूय इव ते ततो य उ विद्यायाश्रताः॥६॥
जो अविद्या ( कर्म ) की उपासना करते हैं वे [ अविद्यारूप ] घोर
अन्धकारमें प्रवेश करते हैं और जो विद्या ( उपासना ) में ही रत हैं वे
मानो उससे भी अधिक अन्धकारमें प्रवेश करते हैं ॥ ६ ॥

मन्त्र ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३ कथं पुनरेवमवगम्यते न तु पूर्व० - यह कैसे ज्ञात होता है कि [ यह विधि कर्मनिष्ठोंके हो लिये हे ] सबके लिये नहीं है ? सर्वेषाम् इति । ज्ञान उच्यते-अकामिनः साध्य सिद्धान्ती-बतलाते हैं, [सुनो साधनभेदोपमर्दैन 'यस्मिन्स- | निष्काम पुरुषके लिये जो 'यस्मिन् र्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजा- सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्व- नतः। तत्र को मोहः कः शोक मनुपश्यतः' इस मन्त्रसे साध्य और एकत्वमनुपश्यतः' इति यदात्मै- साधनके भेदका निराकरण करते कत्वविज्ञानम् [ उक्तम् ] तन्न हुए आत्माके एकत्वका प्रतिपादन किया है, उसे कोई भी केनचित्कर्मणा ज्ञानान्तरेण वा विचारवान् किसी भी कर्म या अन्य ह्यमूढः समुच्चिचीपति । इह तु| ज्ञानके साथ मिलाना नहीं चाहेगा। समुच्चिचीषया अविद्वदादिनिन्दा यहाँ तो समुच्चयकी इच्छासे ही अविद्वान् आदिकी निन्दा की है। क्रियते । तत्र च यस्य येन अत: न्याय और शास्त्रके अनुसार समुच्चयः सम्भवति न्यायतः जिसका जिसके साथ समुच्चय हो शास्त्रतो वा तदिहोच्यते यदैवं | सकता है, वही यहां कहा गया है वित्तं देवताविषयं ज्ञानं कर्म- | सो कर्मके सम्बन्धीरूपसे यहाँ देव वित्त सम्बन्धित्वेनोपन्यस्तं न परमा- अर्थात् देवतासम्बन्धी ज्ञानका हो उल्लेख हआहे-परमात्मज्ञानका नही; त्मज्ञानम् । “विद्यया देवलोकः" | क्योंकि "विद्यासे देवलोक प्राप्त होता (वृ० उ०१।५।१६) इति है" [ऐसा इस ज्ञानका आत्मज्ञानसे] पृथक्फलश्रवणात् । तयोर्ज्ञान- पृथक् फल सुना गया है । उन ज्ञान और कर्म मेंसे, यहाँ जो एक- कर्मणोरिह एकैकानुष्ठाननिन्दा एकके अनुष्ठानको निन्दा की है वह समुच्चिचीपया न निन्दापरैव समुच्चयके अभिप्रायसे है, निन्दाके - ईशावास्योपनिषद् [ मन्त्र ६ एकैकस्य पृथक्फलश्रवणात् | हो लिये नहीं; क्योंकि "उस पदपर "विद्ययातदारोहन्ति""विद्यया विद्या ( देवताजान ) से आरूढ़ होते हैं" "विद्यासे देवलोककी प्राप्ति देवलोकः" (बृ० उ० ११५ । होती है" "वहाँ दक्षिणमार्गसे १६) “न तत्र दक्षिणा यन्ति" | जानेवाले नहीं पहुँचते" "कर्मसे "कर्मणा पितृलोकः" (बृ० उ० | पितृलोक मिलता है' इत्यादि एक- एकका पृथक् फल बतलानेवाली १।५। १६) इति । न हि शास्त्र- श्रुतियाँ भी मिलती हैं; और शास्त्र- विहितं किश्चिदकर्तव्यता- | विहित कोई भी बात अकर्तव्य नहीं मियात् । हो सकती। तत्र अन्धन्तमः अदर्शनात्मक उनमें वे तो अज्ञानरूप अन्धकार. तमः प्रविशन्ति । के ? येऽविद्यां में प्रवेश करते हैं। कौन ? जो अविद्या-विद्यासे अन्य अविद्या विद्याया अन्या अविद्या तां कर्म अर्थात् कर्म यानी केवल अग्नि- इत्यर्थः, कर्मणो विद्याविरोधि- होत्रादिरूप अविद्याहीकी उपासना करते हैं अर्थात् तत्पर होकर त्वात् , तामविद्यामग्निहोत्रादि- कर्मका ही अनुष्ठान करते रहते लक्षणामेव केवलामुपासते तत्परा: हैं; क्योंकि कर्म विद्या (आत्म- सन्तोऽनुतिष्ठन्तीत्यभिप्रायः । ज्ञान ) के विरोधो हैं [ इसलिये उन्हें अविद्या कहा गया है ] । ततस्तस्मादन्धात्मकात्तमसो भूय तथा उस अन्धकारसे भी कहीं इव बहुतरमेव ते तमः प्रविशन्ति, | अधिक अन्धकारमें वे प्रवेश करते के? कर्म हित्वा ये उ ये तु विद्या- हैं, कौन ? जो कर्म करना छोड़कर यामेव देवताज्ञान एव रताः केवल विद्या यानी देवताज्ञानमें ही रत-अनुरक्त हैं। विद्या और कर्मके अभिरताः। तत्रावान्तरफलभेदं अवान्तर फल-भेदको ही इसके विद्याकर्मणोः समुच्चयकारणमाह; | समुच्चयका कारण बतलाते हैं;

मन्त्र १०] शाङ्करभाष्यार्थ ३५ अन्यथा फलवदफलवतोः। नहीं तो एक-दूसरेके समीप हुए फलयुक्त और फलहीन परस्पर अङ्ग और अङ्गी हो जायेंगे [अर्थात् फल- सन्निहितयोरङ्गाङ्गितैव स्याद् युक्ततो अङ्गी(मुख्य) हो जायगा तथा फलहीन अङ्ग (गौण) समझा जायगा] इत्यर्थः ॥९॥ यही इसका अभिप्राय है ॥ ६ ॥ कर्म और उपासनाके समुच्चय का फल अन्यदेवाहुर्विद्ययान्यदाहुरविद्यया. इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥१०॥ विद्या ( देवताज्ञान ) से और हो फल बतलाया गया है तथा अविद्या ( कर्म ) से और हो फल बतलाया है । ऐसा हमने बुद्धिमान् पुरुषोंसे सुना है, जिन्होंने हमारे प्रति उसको व्याख्या की थी॥ १० ॥ अन्यत्पृथगेव विद्यया क्रियते "विद्यासे देवलोक प्राप्त होता है" "विद्यासे उसपर आरूढ़ होते फलमित्याहुर्वदन्ति । “विद्यया हैं" ऐसी श्रुतियोंके अनुसार वेद- देवलोकः" (बृ० उ० १।५।१६) वेत्तालोग कहते हैं कि विद्यासे और "विद्यया तदारोहन्ति" इति श्रुतेः। ही फल मिलता है। तथा “कर्मसे अन्यदाहुरविद्यग्ना कर्मणा क्रियते पितृलोक मिलता है" इस श्रुतिके "कर्मणा पितृलोकः" (बृ. उ०१॥ अनुसार, अविद्या यानी कर्मसे और हो फल होता है-ऐसा उनका ५।१६) इति श्रुतेः । इत्येवं शुश्रुम | कथन है। ऐसे हमने धीर अर्थात् श्रुतवन्तो वयं धीराणां धीमतां बुद्धिमानोंके वचन सुने हैं, जिन वचनम् । ये आचार्या नोऽस्मभ्यं आचार्योने हमसे उस कर्म तथा तत्कर्म च ज्ञानं च विचचक्षिरे ज्ञानका विख्यान किया था अर्थात् उनकी व्याख्या की थी। तात्पर्य व्याख्यातवन्तस्तेषामयमागमः यह है कि यह उनका परम्परागत पारम्पर्यागत इत्यर्थः ॥ १० । ! आगम है ।। १० ।।

ईशावास्योपनिषद् [ मन्त्र १२ विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभय सह । अविद्यया मृत्यु तीर्खा विद्ययामृतमश्नुते ॥११॥ जो विद्या और अविद्या - इन दोनोंको ही एक साथ जानता है, वह अविद्यासे मृत्युको पार करके विद्यासे अमरत्व प्राप्त कर लेता है ॥११॥ यत एवमतो विद्यां चाविद्यां क्योंकि ऐसा है इसलिये विद्या और अविद्या अर्थात् च देवताज्ञानं कर्म चेत्यर्थः देवताज्ञान और कर्म-इन दोनोंको यस्तदेतदुभयं सहैकेन पुरुषेण | जो एक साथ एक ही पुरुषसे अनुष्ठेयं वेद तस्यैवं समुच्चय- अनुष्टान किये जानेयोग्य जानता है, इस प्रकार समुच्चय करनेवाले को कारिण एव एकपुरुषार्थसम्बन्धः ही एक पुरुषार्थका सम्बन्ध क्रमशः क्रमेण स्यादित्युच्यते । होता है-यही अब कहा जाता है। अविद्ययाकर्मणाअग्निहोत्रा अविद्या अर्थात् अग्निहोत्रादि दिना मृत्यु स्वाभाविकं कर्म कर्मसे मृत्यु यानी 'मृत्यु' शब्दवाच्य स्वाभाविक ( व्यावहारिक ) कर्म ज्ञानं च मृत्युशब्दवाच्यमुमयं और ज्ञान- इन दोनों को तरकर- तीवा अतिक्रम्य विद्यया देवता- पार करके विद्या अर्थात् देवताज्ञान- ज्ञानेनामृतं देवतात्मभावमश्नुते अमृत यानी देवतात्मभावको प्राप्त हो जाता है। देवत्वभावको जो प्राप्नोति । तद्धयमृतमुच्यते प्राप्त होना है, वही अमृत कहा यद्देवतात्मगमनम् ॥ ११ ॥ जाता है ।। ११॥ से अव व्यक्त अव्यक्त व्यक्त और अव्यक्त उपासनाका समुच्चय अधुना व्याकृताव्याकृतोणा- और सनयाः समुच्चिचीषया प्रत्येक उपासनाओंका समुच्चय करनेकी निन्दाच्यते । | इच्छासे प्रत्येककी निन्दाको जाती है।

मन्त्र १२]
शाङ्करभाष्यार्थ
३७
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्या रताः ।। १२॥
जो असम्भूति ( अव्यक्त प्रकृति ) की उपासना करते हैं, वे घोर
अन्धकारमें प्रवेश करते हैं और जो सम्भूति ( कार्यब्रह्ममें ) रत है, वे
मानो उन से भी अधिक अन्धकारमें प्रवेश करते हैं ।। १२ ।।
अन्धं तमः प्रविशन्ति ये जो असम्भूतिकी उपासना
करते हैं, वे घोर अन्धकारमें प्रवेश
असम्भूति सम्भवनं सम्भूतिः सा करते है । सम्भवन ( उत्पन्न होने )
यस्य कार्यस्य सा सम्भूतिः तस्या का नाम सम्भूति है। वह जिस
कार्यका धर्म है, उसे 'सम्भूति'
अन्या असम्भूतिः प्रकृतिः कहते है। उससे अन्य असम्भूति-
कारणमविद्या अव्याकृताख्या प्रकृति-कारण अथवा अव्याकृत
नामकी अविद्या है। उस असम्भुति
तामसम्भूतिमव्याकृताख्यां प्रकृति
यानी अव्याकृत नामवाली प्रकृति-
कारणमविद्यां कामकर्मवीज-! कारण अर्थात् अज्ञानात्मिका अविद्या-
की जो कि कामना ओर कर्मकी
भूतामदर्शनात्मिकामुपासते ये ते
बीज है, जो लोग उपासना करते है,
तदनुरूपमेवान्धं तमोऽदर्शना- व उसके अनुरूप ही अज्ञानरूप घोर
अन्धकारमें प्रवेश करते है तथा
त्मकं प्रविशन्ति । ततस्तस्मादपि |
जो सम्भूति यानी हिरण्यगर्भ नामक
भूयो बहुतरमिव तमः प्रविशन्ति
कार्यब्रह्ममें रत हैं, वे तो उससे भी
य उ सम्भूत्यां कार्यब्रह्मणि
गहरे-मानो अधिकतर अन्धकारमें
हिरण्यगर्भाये रताः ॥ १२॥ प्रवेश करते हैं ॥ १२ ॥

३८
ईशावास्योपनिषद्
[ मन्त्र १३
.
व्यक्त और अव्यक्त उपासनाके फल
अधुनोभयोरुपासनयोः समु अब उन दोनों उपासनाओंके
समुच्चयका कारणरूप जो उन
दोनोंके फलोंका भेद है, उसका
चयकारणमवयवफलभेदमाह- | वर्णन किया जाता है-
अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात् ।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ।।१३।।
कार्यब्रह्मकी उपासनासे और ही फल बतलाया गया है; तथा
अव्यक्तोपासनासे और ही फल बतलाया है। ऐसा हमने बुद्धिमानोसे
सुना है, जिन्होने हमारे प्रति उसकी व्याख्या की थी। १३ ।।
अन्यदेव पृथगेवाहुः फलं || सम्भूति अर्थात् कार्यब्रह्मकी
उपासनासे प्राप्त होनेवाला अणि-
सम्भवात्सम्भूतेः कार्यब्रह्मोपास-
मादि ऐश्वर्यरूप और ही फल वन-
नादणिमाद्यैश्वर्यलक्षणं व्याख्यात- लाया अर्थात् बखान दिया है।
तथा असम्भूति यानी अव्याकृतसे
वन्त इत्यर्थः । तथा चान्यदाहुः
अर्थात् अव्याकृत प्रकृतिकी उपा-
असम्भवादसम्भृतेरव्याकृताद् सनासे और ही फल बतलाया है;
जिसे पहले 'अन्धन्तमः प्रविशन्ति'
अव्याकृतोपासनात् । यदुक्तमन्ध-
आदि वाक्यसे वह चुके हैं तथा
न्तमः प्रविशन्तीति प्रकृतिलय इति पौराणिक लोग जिस प्रकृतिलय
च पौराणिकैरुच्यत इत्येवं शुश्रुम
कहते हैं-ऐसा हमने धीरों (बुद्धि-
मानों) का कथन सुना है, जिन्होंने
धीराणां वचनं ये नस्तद्विवच- हमसे उनका वर्णन किया था
अर्थात् व्यक्त और अव्यक्त
क्षिरे व्याकृताव्याकृतोपासनफलं
उपासनाओंके फलका व्याख्यान
व्याख्यातवन्त इत्यर्थः ॥१३॥ किया था ॥ १३ ॥

मन्त्र १४] शाङ्करभाष्यार्थ ३६ यत एवमतः समुचयः सम्भू- क्योंकि ऐसा है, इसलिये सम्भूति और असम्भूतिकी उपास- नाओंका समुच्चय उचित ही है। त्यसम्भूत्युपासनयोयुक्त एवैक- इसके सिवा एक पुरुषार्थमूलक होनेसे भी उनका समुच्चय होना पुरुषार्थत्वाच्चेत्याह ठीक है-यही आगे कहते हैं- सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभय सह । विनाशेन मृत्यु तीर्खा सम्भूत्यामृतमश्नुते॥१४॥ जो असम्भूति और कार्यब्रह्म-इन दोनोंको साथ-साथ जानता है; वह कार्यब्रह्मकी उपासनासे मृत्युको पार करके असम्भूतिके द्वारा [प्रकृतिलयरूप ] अमरत्व प्राप्त कर लेता है ॥ १४ ।। सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वे- जो पुरुष असम्भूति और विनाश- इन दोनोंकी उपासनाके समुच्चयको दोभय ५सह विनाशो धर्मो यस्य जानता है वह-जिसके कार्यका कार्यस्य स तेन धर्मिणा अभेदेन | धर्म विनाश है और उस धर्मीसे अभेद होनेके कारण जो स्वयं भी उच्यते विनाश इति, तेन विनाश कहा जाता है-उस विनाश- तदुपासनेनानैश्वर्यमधर्मकामादि- | से अर्थात् उसकी उपासनासे अधर्म तथा कामना आदि दोषोंसे उत्पन्न दोषजातं च मृत्युं तीवा-हिरण्य- अनैश्वर्यरूप मृत्युको पार करके गर्भोपासनेन ह्यणिमादिप्राप्तिः, क्योंकि हिरण्यगर्भकी उपासनासे अणिमादि ऐश्वर्यकी प्राप्तिरूप फल फलम्,तेनानैश्वर्यादिमृन्युमतीत्य ही मिलता है, अतः उससे अनैश्वर्य आदि मृत्युको पार करके- असम्भूत्या अव्याकृतोपासनया असम्भूति-अव्यक्तोपासनासे प्रकृति- अमृतं प्रकृतिलयलक्षणमश्नुते । लयरूप अमृत प्राप्त कर लेता है। . - ४० ईशावास्योपनिषद् [ मन्त्र १५ सम्भूतिं च विनाशं चेत्यत्रा 'सम्भूति च विनाशं च' इस पदसमूहमें प्रकृतिलयरूप फल वर्णलोपेन निर्देशो द्रष्टव्यः प्रकृति-बतलानेवाली श्रुतिके अनुरोधसे अवर्णके लोपपूर्वक निर्देश हुआं लयफलश्रुत्यनुरोधात् ॥ १४ ॥| समझना चाहिये ॐ ॥ १४ ॥ त्यागरूप उपासककी मार्गयाचना मानुषदैववित्तसाध्यं फलं शास्त्रके बतलाये हुए प्रकृतिलय- पर्यन्त समस्त फल [ गौ, भूमि और भागमोक्ष- शास्त्रलक्षणं प्रकृति- सुवर्ण आदि ] मानुष सम्पत्ति तथा विवेक लयान्तम् । एतावती | देवताज्ञानरूप दैवी सम्पत्तिसे संसारगतिः अतः सम्पन्न होनेवाले हैं । यहाँतक संसारकी गति है। इससे आगे परं पूर्वोक्तमात्मैवाभूद्विजानत | पहले 'आत्मैवाभूद्विजानतः' इस इति सर्वात्मभाव एव सर्वैषणा- ( सातवें मन्त्र ) में बतलाया हुआ संन्यासज्ञाननिष्ठाफलम् । एवं | सम्पूर्ण एषणाओंके संन्यासका फल सर्वात्मभाव हो है। द्विप्रकारः प्रवृत्तिनिवृत्तिलक्षणो इस प्रकार यहाँ प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप वेदार्थोऽत्र प्रकाशितः । तत्र | दो प्रकारका वेदार्थ प्रकाशित प्रवृत्तिलक्षणस्य वेदार्थस्य विधि- | किया है। उनमें विधि-प्रतिषेधरूप प्रतिषेधलक्षणस्य कृत्स्नस्य प्रका-, सम्पूर्ण प्रवृत्तिलक्षण वेदार्थका प्रकाश करनेमें प्रवर्ग्यपर्यन्त ब्राह्मण- शने प्रवान्तं ब्राह्मणमुपयुक्तम्। भाग उपयोगी है तथा निवृत्ति- निवृत्तिलक्षणस्य वेदार्थस्य प्रका- लक्षण वेदार्थको अभिव्यक्त करनेमें शनेऽत ऊर्ध्व बृहदारण्यक- इससे आगे बृहदारण्यकका उपयोग मुपयुक्तम् । किया जाता है। • अर्थात् 'असम्भूति' को ही 'सम्भूति' कहा है-ऐसा जानना चाहिये।

मन्त्र १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१ स तत्र निषेकादिश्मशानान्तं उनमें जो पुरुष गर्भाधानसे लेकर मरणपर्यन्त कर्म करते हुए ही जीवित कर्म कुर्वन् जिजीविषेद्यो विद्यया रहना चाहता है, उसे अपरब्रह्म- सहापरब्रह्मविषययातदुक्तं विद्यां | विषयक विद्या के साथ ही ( जीवित रहना चाहिये ) जैसा कि कहा है- चाविद्यां च यस्तद्वेदोभय सह । विद्या और अविद्या दोनोंको साथ- अविद्यया मृत्युं तीर्थ्या विद्यया- साथ जानता है । वह अविद्या (कर्म) से मृत्युको पार करके विद्या ( देवता- मृतमश्नुते' इति । ज्ञान ) से अमृत प्राप्त कर लेता है। तत्र केन मार्गेणामृतत्व अब अमृतत्व किस मार्गसे प्राप्त देवयानमार्ग- मश्नुत इत्युच्यते । करता है ? सो बतलाते हैं। वह याचनम् तद्यत्तत्सत्यमसौ जो सत्य है वही यह आदित्य है। जो इस आदित्यमण्डलमें पुरुष है आदित्यो य एष एतस्मिन्मण्डले | तथा जो पुरुष दक्षिण नेत्रमे हे, व दोनों पुरुषो यश्चायं दक्षिणेऽक्षन्पुरुष ही सत्य हैं । जो उस ब्रह्मकी उपासना एतदुभय सत्यम् । ब्रह्मोपासीनो करनेवाला और शास्त्रोक्त कर्म करने- यथोक्तकर्मकृच्च यः सोऽन्तकाले वाला है, वह अन्तकाल उपस्थित होनेपर [ इस आदित्यमण्डलस्थ ] प्राप्ते सत्यात्मानमात्मनः प्राप्ति- आत्मासे 'हिरण्मयेन पात्रेण०' इस द्वारं याचते 'हिरण्मयेन पात्रेण' मन्त्र के द्वारा इस प्रकार आत्मप्राप्तिके इति । द्वारकी याचना करता है- हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥१५॥ आदित्यमण्डलस्थ ब्रह्मका मुख ज्योतिर्मय पात्रसे ढका हुआ है। हे पूषन् ! मुझ सत्यधर्मीको आत्माकी उपलब्धि करानेके लिये उघाड़ ॥१५॥ , दे ४२ ईशावास्योपनिषद् [ मन्त्र १६ हिरण्मयमिव हिरण्मयं ज्योति जोसोनेका-सा हो उसे 'हिरण्मय' मयमित्येतत् । तेन पात्रेणेव कहते हैं, अर्थात् जो ज्योतिर्मय है उस ढकनेरूप पात्रसे ही आदित्य- अपिधानभूतेन सत्यस्यैवादित्य- मण्डलमें स्थित सत्य अर्थात् ब्रह्मका मण्डलस्थस्य ब्रह्मणोऽपिहितम् ! मुखद्वार छिपा हुआ है । हे पूषन् ! आच्छादितं मुखं द्वारम् । तत्त्वं | सत्यको उपासना करनेके कारण जिसका सत्य ही धर्म है ऐसा मैं हे पूषन्नपावृण्वपसारय सत्यस्य | सत्यधर्मा हूँ उस मेरे प्रति अथवा उपासनान्सत्यं धर्मों यस्य मम | यथार्थ धर्मका अनुष्ठान करनेवाले मेरे सोऽहं सत्यधर्मा तस्मै प्रति दृष्टि अर्थात् अपने सत्यस्वरूप- मह्यमथवा को उपलब्धिके लिये तू उसे उघाड़ यथाभूतस्य धर्मस्यानुष्ठात्रे दृष्टये दे-[ उस पात्रको ] सामनेसे तव सत्यात्मन उपलब्धये ॥१५॥ हटा दे ।। १५ ।। पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन्समूह तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्तं पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥ १६ ॥ हे जात्पोषक सूर्य ! हे एकाको गमन करनेवाले ! हे यम ( संसारका नियमन करनेवाले ) हे सूर्य (प्राण और रसका शोषण करनेवाले ) ! हे प्रजापतिनन्दन ! तू अपनी किरणोंको हटा ले ( अपने तेजको समेट ले )। तेरा जो अतिशय कल्याणमय रूप है, उसे मैं देखता हूँ। यह जो आदित्यमण्डलस्थ पुरुष है, वह मैं हूँ ॥ १६ ॥ हे पूषन् ! जगतः पोषणात्पूषा हे पूषन् ! जगत्का पोषण रविस्तथैक एव ऋषति गच्छति करनेके कारण सूर्य पूषा है। वह अकेला ही चलता है इत्येकर्षिः-हे एकर्षे ! तथा | इसलिये एकर्षि है-हे एकर्षे !

मन्त्र १७] शाङ्करभाष्यार्थ ४३ सर्वस्य संयमनाद्यमा-हे यम ! | सबका नियमन करनेके कारण यम तथा रश्मीनां प्राणानां रसानाश्च | है हे यम ! किरण, प्राण, और स्वीकरणात् सूर्य:-हे सूर्य ! प्रजा- रसोंको स्वीकार करनेके कारण सूर्य पतेरपत्यं प्राजापत्यः-हे प्राजा- है-हे सूर्य ! प्रजापतिका पुत्र होनेसे प्राजापत्य है-हे प्राजापत्य ! पत्य ! व्यूह विगमय रश्मी- | अपनी किरणोंको दूर कर। अपने तेज न्स्वान् । समूह एकीकुरु उपसंहर | यानी सन्तप्त करनेवाली ज्योतिको ते तेजस्तापकं ज्योतिः। पुञ्जीभूत एकत्रित अर्थात् शान्त कर। यत्ते तव रूपं कल्याणतमम् तेरा जो अत्यन्त कल्याणमय अत्यन्तशोभनं तत्ते तवात्मनः | अर्थात् परम सुन्दर स्वरूप है, उसे तुझ आत्माकी कृपासे मैं देखता हूँ प्रसादात् पश्यामि । किश्चाहं न तथा यह बात मैं तुझसे सेवकके तु त्वां भृत्यवद्याचे योऽसावा- | समान याचना नहीं करता; क्योंकि दित्यमण्डलस्थो व्याहत्यवयवः | यह जो व्याहृतिरूप अगोंवाला' आदित्यमण्डलस्थ पुरुष है-जो पुरुषः पुरुषाकारत्वात्पूर्ण वानेन पुरुषाकार होनेसे अथवा जो प्राण प्राणबुद्ध्यात्मना जगत्समस्त- और बुद्धिरूपसे समस्त जगत्को मिति पुरुषः पुरि शयनाद्वा पूर्ण किये हुए हैं या जो शरीररूप पुरमे शयन करनेके कारण पुरुष पुरुषः सोऽहमस्मि भवामि।।१६।। है- वह मै ही हूँ । १६ ।। मरणोन्मुख उपासकर्की प्रार्थना वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्त शरीरम्। ॐक्रतो स्मर कृत:स्मर क्रतो स्मर कृत स्मर ॥१७!। . १-'तस्य भूरिति शिरः, भुव इति बाहू, सुवरिति प्रतिष्ठा' (बृ० उ० ५।५।३) अर्थात् उसका 'भूः' यह शिर है, 'भुवः' यह भुजाएँ हैं तथा 'सुवः' यह प्रतिष्ठा (चरण) हैं।

ईशावास्योपनिषद् [ मन्त्र १७ अब मेरा प्राण सर्वात्मक वायुरूप सूत्रात्माको प्राप्त हो और यह शरीर भस्मशेष हो जाय। हे मेरे संकल्पात्मक मन ! अब तू स्मरण कर, अपने किये हुएको स्मरण कर, अब तू स्मरण कर, अपने किये हुएको स्मरण कर ॥ १७॥ अथेदानी मम मरिष्यतो अपनअध्यात्मपरिच्छेदको त्यागकर -- अब मुझ मरनेवालेका वायु-प्राण अपने अध्यात्मपरिच्छेदको मागकर वायुः प्राणोऽध्यात्मपरिच्छेदं अधिदेवरूप सर्वात्मक वायुरूप हित्वाधिदेवतात्मानं सर्वात्मक- | अमृत यानी सूत्रात्माको प्राप्त हो मनिलममृतं सूत्रात्मानं प्रतिपद्य- | इस प्रकार इसवाक्य मे 'प्रतिपय माम्' यह क्रियापद जोड़ लेना चाहिये। तामिति वाक्यशेषः । लिङ्ग चेदं यहाँ यह समझना चाहिये कि ज्ञान ज्ञानकर्मसंस्कृतमुत्क्रामस्विति और कर्मके संस्कारोंसे युक्त यह लिङ्ग देह उत्क्रमण करे; क्योकि द्रष्टव्यम् , मार्ग याचनसामर्थ्यात्।। इस [श्रुतिसे ] मार्ग की याचना का अथेदं शरीरमग्नौ हुतं भस्मान्तं गयी है। तथा अब यह शरीर अग्नि- में होम कर दिये जानेपर भस्म दोष भूयात् । हो जाय। ओमिति यथोपासनम् ॐप्रती- 'ॐ' ऐसा कहकर यहाँ लपा: कात्मकत्वात्सत्यात्मकमग्न्याख्यं सनाके अनुसार सत्यस्वरूप अग्नि- ब्रह्माभेदेनोच्यते । हे क्रतो सङ्क- गया है; क्योंकि 'ॐ' उनका प्रतीक संज्ञक ब्रह्म ही अभेदरूपसे कहा ल्पात्मक स्मर यन्मम स्मर्तव्यं है। हे क्रतो ! संकल्पात्मक मन ! तू तस्य कालोऽयं प्रत्युपस्थितोऽतः इस समय जो मेरा स्मरणीय हे उसका स्मरण कर; अब यह उमका स्मर । एतावन्तं कालं भावितं समय उपस्थित हो गया है, अतः तू कृतमग्रे स्मर यन्मया बाल्य- स्मरण कर। बाल्यावस्थासे लेकर इतने कालतक मैंने जिम कर्मका प्रभृत्यनुष्ठितं कर्म तच्च स्मर । पहले अनुष्ठान किया है उसका भी क्रतो स्मर कृतं स्मरेति पुनर्वचन- स्मरण कर। 'क्रतो स्मर कृतं स्मर' वहाँ ( 'स्मर' पदकी ) पुनरुक्ति मादरार्थम् ॥ १७ ॥ आदरके लिये है ॥ १७॥ !

मन्त्र १८] शाङ्करभाष्यार्थ पुनरन्येन मन्त्रेण मार्ग याचते-- पुनः दूसरे मन्त्रसे मार्गकी याचना करता है- अंग्ने नय सुपथाराये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्। युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनोभूयिष्ठां तेनमःउक्तिं विधेम।१८। हे अग्ने ! हमें कर्मफलभोगके लिये सन्मार्गसे ले चल। हे देव ! तू समस्त ज्ञान और कर्मोको जाननेवाला है। हमारे पाषण्डपूर्ण पापोंको नष्ट कर । हम तेरे लिये अनेकों नमस्कार करते हैं ॥१८॥ . हे अग्ने ! नय गमय सुपथा हे अग्ने ! मुझे सुपथ अर्थात् शोभनेन मार्गेण । सुपथेति सुन्दर मार्गसे ले चल। यहाँ 'सुपथा' विशेषणं दक्षिणमार्गनिवृत्त्यर्थम् । यह विशेषण दक्षिणमार्गकी निवृत्ति- निविण्णोऽहं दक्षिणेन मार्गेण | के लिये है। मैं आवागमनरूप गतागतलक्षणेनातो याचे त्वां दक्षिणमार्गसे ऊब गया हूँ. अत: पुनः पुनर्गमनागमनजितेन | तुझसे प्रार्थना करता हूँ कि यथोक्त शोमनेन पथा नय। राये धनाय कर्मफलविशिष्ट हमलोगोंको हमारे सम्पूर्ण कम अथवा ज्ञानोंको जानने- कर्मफलमोगायेत्यर्थः, अस्मान्य- वाले हे देव ! तू 'राये'- धनके लिये थोक्तधर्मफलविशिष्टान् विश्वानि | अर्थात् कर्मफल-भोगके निमित्त सर्वाणि हे देव वयुनानि कर्माणि | पुनः पुनः आने-जानेसे रहित शुभ- प्रज्ञानानि वा विद्वाञ्जानन् । मार्गसे ले चल। किञ्च युयोधि वियोजय तथा तू हमसे कुटिल अर्थात् विनाशय अस्मदस्मत्तो जुहुराणं | वञ्चनात्मक पापोंको 'युयोधि'- वियुक्त कर दे यानी उनका नाश कुटिलं वञ्चनात्मकमेनः पापम् । कर दे। तब हम विशुद्ध होकर उनका ततो वयं विशुद्धाः सन्त इष्टं इष्ट प्राप्त कर लेंगे-यह इसका प्राप्स्याम इत्यभिप्रायः। किन्तु | अभिप्राय है। किन्तु इस समय हम ईशावास्योपनिषद् [ मन्त्र १८ वयमिदानीं ते न शक्नुमः तेरी परिचर्या ( सेवा ) करनेमें समर्थ परिचर्या कर्तुम्। भूयिष्ठा बहुतरां नहीं हैं । अतः हम तेरे लिये बहुत- ते तुभ्यं नम उक्तिं नमस्कार- सी नमः-उक्ति यानी नमस्कार-वचन वचनं विधेम नमस्कारेण परि- विधान करते हैं अर्थात् नमस्कारसे चरेम इत्यर्थः। ही तेरी परिचर्या करते हैं । ग्रन्थार्थ-विवेचन 'अविद्यया मृत्यु तीर्वा 'अविद्या (कर्म) से मृत्युको पार कर विद्या ( देवता-ज्ञान ) से विद्ययामृतमश्नुते।' (ई० उ०११) अमृत प्राप्त करता है।' 'विनाश 'विनाशेन मृत्युं तीर्खासम्भूत्या- | ( कार्यब्रह्मकी उपासना ) से मृत्यु. को पार कर असम्भूति (अव्यक्तकी मृतमश्नुते' (ई० उ० १४) इति | उपासना ) से अमृत लाभ करता श्रुत्वा केचित्संशयं कुर्वन्ति । | हे'-ऐसा सुनकर कुछ लोगोंको संशय हो जाता है। अत: उसकी अतस्तन्निराकरणार्थ संक्षेपतो निवृत्ति के लिये हम संक्षेपसे विचार विचारणां करिष्यामः। तत्र तावकिनिमित्तः संशय अच्छा तो, यहाँ किस निमित्त- को लेकर संशय होता है ? इसपर इत्युच्यते । कहते हैं- विद्याशब्देन मुख्या परमात्म पूर्व-यहाँ "विद्या' शब्दसे मुख्य परमार्थविद्या तथा 'अमृत' विद्यैव कस्मान्न गृह्यतेऽमृतत्वञ्च। | शब्दसे अमृतत्व ही क्यों नहीं लिया जाता? ननूक्तायाः परमात्मविद्यायाः सिद्धान्ती-ऊपर बतलायी हुई परमार्थविद्या और कर्मका परस्पर कर्मणश्च विरोधात्समुच्चयानुप- विरोध होनेके कारण पत्तिः। समुच्चय नहीं हो सकता। करते है- उनका मन्त्र १८] शाङ्करभाष्यार्थ सत्यम् । विरोधस्तु नाव पूर्व०-ठीक है, परन्तु इनका विरोध या अविरोध तो शास्त्र- गम्यते विरोधाविरोधयोः शास्त्र- प्रमाणसे ही सिद्ध हो सकता है; अतः ( यहाँ शास्त्र-विधि होनेके प्रमाणकत्वात् । यथाविद्यानुष्ठानं कारण ) इनका विरोध नहीं जान विद्योपासनत्र शास्त्रप्रमाणक] पड़ता। जिस प्रकार अविद्याका अनुष्ठान और विद्याकी उपासना तथा तद्विरोधाविरोधावपि । शास्त्रप्रमाणसे सिद्ध है उसी प्रकार उनके विरोध और अविरोध भी हैं। यथा च न हिंस्यात्सर्वा भूतानीति | जैसे सभी प्राणियोंकी हिंसा न करे' शास्त्रादवगतं पुनः शास्त्रेणैव | यह बात शास्त्रसे जानी जाती है और फिर 'यज्ञमें पशुकी हिंसा करे' बाध्यतेऽध्वरे पशुं हिंस्यादिति । इस शास्त्र-विधिसे ही बाधित भी हो जाती है, वैसे ही विद्या और एवं विद्याविद्ययोरपि स्यात् । अविद्याके सम्बन्धमें भी हो सकता विद्याकर्मणोश्च समुच्चयः । है। और इस प्रकार विद्या तथा कर्मका समुच्चय हो जायगा। न “दूरमेते विपरीते विधूची सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि श्रुति कहती है-"जिनकी गति भिन्न- अविद्या या च विद्या" (क० उ० भिन्न है, वे विद्या और कर्म सर्वथा १।२।४) इति श्रुतेः। विपरीत हैं।" विद्यां चाविद्यां चेति वचना पूर्व-किन्तु 'विद्यां चाविद्यां च' इस वाक्यके अनुसार इन दोनों का दविरोध इति चेत् ? अविरोध है न? न; हेतुस्वरूपफलविरोधात्। सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि उनके हेतु, स्वरूप और फलोंमें विरोध है। विद्याविद्याविरोधाविरोधयो पूर्व-विद्या और अविद्या तथा .

४० ईशावास्योपनिषद् [ मन्त्र १८ विद्ये इति चेत् ? विकल्पासम्भवात्समुच्चयविधाना-| विरोध और अविरोध इनमे विकल्प तो हो नहीं सकता. तथा इनके समुच्चयका विधान किया गया है. दविरोध एवेति चेत् ? इसलिये इनका अविरोध ही है- ऐसा मानें तो? न; सहसम्भवानुपपत्तेः। सिद्धान्ती-नहीं, क्योंक इन दोनोंका साथ रहना सम्भव नही है। क्रमेणैकाश्रये स्यातां विद्या- पूर्व०-यदि ऐसा माने नि विद्या और अविद्या क्रमसे एक प्राश्रयमें रहनेवाली हैं, तो? न; विद्योत्पत्तौ अविद्याया सिद्धान्ती-नहीं, क्यों न विद्या- के उत्पन्न हो जानेपर अविद्याका ह्यस्तत्वात्तदाश्रयेऽविद्यानुपपत्तेः। नाश हो जाता है और फिर उसी आश्रयमें अविद्याकी उत नही न ह्यग्निरुष्णः प्रकाशश्चेति हो सकती। 'अग्नि उष्ण और प्रकाशस्वरूप है' इस ज्ञानके उत्पन्न विज्ञानोत्पत्ती यस्मिन्नाश्रये होनेपर जिस [चित्तरूप ] आश्रय- तदुत्पन्नं तस्मिन्नेवाश्रये शीतो-1 में यह उत्पन्न हुआ है उसीमें अग्नि शीतल और अप्रकाशमय है-ऐसा ऽग्निरप्रकाशो वेत्यविद्याया उत्प अज्ञान नहीं हो सकता; अधिक क्या इस विषयमें उस पुरुषको कोई त्तिर्नापि संशयोऽज्ञानं वा संशयोऽज्ञानं वा सन्देह अथवा भ्रम भी नहीं हो • क्योंकि विद्या-अविद्या तथा विरोध-अविरोध ये सिद्ध वस्तुएँ है। जो बात पुरुषके अधीन होती है अर्थात् जिसे पुरुष कर सकता है उसीमें विकल्प भी हो मकता है। जैसे 'सूर्योदयके अनन्तर हवन करे'-इस विधिमें यह विकल्प हो सकता है कि सूर्योदयसे पहले करे या पीछे, 'पान्तु सूर्य है' इस बातमें सूर्य है या नहीं-ऐसा कोई विकल्प नहीं हो सकता; क्योंकि सूर्यका होना या न होना किसी पुरूपविशेषके अधीन नहीं है।

मन्त्र १८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९ "यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवा- | सकता। ज्ञानीके लिये शोक-मोहादि- भूद्विजानतः। तत्र को मोहः कः को असम्भव बतलानेवाली 'यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मेवाभूद्विजानतः । शोक एकत्वमनुपश्यतः” ( ई० तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनु- उ०७) इति शोकमोहाद्यसम्भव- पश्यतः" इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध श्रुतेः । अविद्यासम्भवात्तदुपा- | होता है। इस प्रकार अविद्याके असम्भव हो जानेपर उसके आश्रयसे दानस्य कर्मणोऽप्यनुपपत्तिम् होनेवाले कर्म भी नहीं हो सकते- अवोचाम। यह बात हम पहले ही कह चुके हैं। अमृतमश्नुत इत्यापेक्षिकम् यहाँ जो कहा गया है कि अमृतको प्राप्त होता है सो आपेक्षिक अमृतम् । विद्याशब्देन परमा- | अमृत समझना चाहिये । यदि 'विद्या' शब्दसे परमात्मविद्या ली त्मविद्याग्रहणे हिरण्मयेनेत्यादिना जाय तो 'हिरण्मयेन' इत्यादि मन्त्रोंसे द्वारमार्गादियाचनमनुपपन्नं स्यात् मार्गादिवी याचना नहीं बन सकती। इसलिये यहाँ उपासनाके साथ ही तस्मादुपासनया समुच्चयो न [ कर्मका ] समुच्चय किया गया परमात्मविज्ञानेनेति यथाम्मा- है परमात्मज्ञान के साथ नही। इस प्रकार दन मन्नोंवा वही अर्थ है भिर्व्याख्यात एवं मन्त्राणामथे | जैसा कि हमने व्याख्यान किया है। ऐसा कहकर हम विराम लेते इत्युपरम्यते ॥ १८॥ हैं ॥१८॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीशङ्कर- भगवतः कृतावीशावास्योप- निषद्भाष्यं सम्पूर्णम् । ॥ हरित ॐ तत्सत् ॥

शान्तिपाठः
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं
पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय
पूर्णमेवावशिष्यते
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
.
S

श्रीहरिः मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका मन्त्राङ्क: पृष्ठम् ... ३ ३ ९ ३२ ... ... ar १२ ३७ ३८ ... ४ २१ ... मन्त्रप्रतीकानि असुर्या नाम ते लोकाः अन्धन्तमः प्रविशन्ति अन्यदेवाहुर्विद्ययान्यदाहुः अन्धं तमः प्रविशन्ति अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुः अग्ने नय सुपथा राये अनेजदेकं मनसो जवीयः ॐ ईशा वास्यमिदं सर्वम् कुर्वन्नेवेह कर्माणि तदेजति तन्नेजति पूषन्नेक यम सूर्य यस्तु सर्वाणि भूतानि यस्मिन्सर्वाणि भूतानि वायुरनिलममृतमथेठम् विद्यां चाविद्यां च स पर्यगाच्छुक्रमकायमत्रणम् सम्भूति च विनाशं च हिरण्मयेन पात्रण १ २ ... 6 ... २५ ४२ ... ... ७ ... २७ १७ ११ ... ... .. 6 २८ - ४१

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Iishaavaasyoopanishhada
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Iishaavaasyoopanishhada
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Published
2005/09/2
Publisher
Geetha Press , Gorakpur .
Language
Sanskrit
Pages
62
Library
Donar
Classification
Poetry. Poems. Verse
Keywords
Geetha Press
DLI number
495844
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