Government College, Kota

The Jaiminya Or Talavakara Upanishad Brahmana

Datta, Bhagavad · 2012/04

PDF Proofread

Front matter

QUE DATE SLIP
GOVT. COLLEGE, LIBRARY
KOTA (Roj)
Students can retain library books only for two
weeks at the most
BORROWERS
No
DUE DTATE
SIGNATUAE

POBRUARY 1981 1: Nondir:
THE JAIMINIYA OR TALAVAKARA
UPANISHAD BRAHMANA.
DEVANAGARI TEXT WITH INDEXES.
PREPARED FROM THE EDITION, IN ROMAN SCRIPT
SHRI HANNS OERTEL PH. D.
.
BY
PANDIT RAPIA DEVA, B. A.
WITH
AN INTRODUCTION ON THE HISTORY OF SAMALEDA LITERATURE.
BY
BHAGAVAD DATTA.
FIRST EDITION,
1,000 Cegies.
}
dains, C., & PS,
La (D.Doling
Stillixhe,

दयानन्द महाविद्यालय संस्कृत-ग्रन्थमाला।
अनेक विद्वानों की सहायता से ।
भगवद्दत्त
संस्कृताध्यापक वा अध्यक्ष अनुसन्धान विभाग
दयानन्द महाविद्यालय, लाहौर द्वारा
सम्पादित ।
अन्याङ्क३॥

श्रीमद्दयानन्द महाविद्यालय संस्कृतप्रन्थमाला स. ३
33333333333"
ओ३म्
जैमिनीय उपनिषदाह्मणम्
अथवा
तलवकार-उपनिपद्राह्मणम्।
पं० रामदेव बी० ए०
श्रीमान हन्नस अर्टेल, पी० एच०डी०
महाशयस्य
रोमनलिपि-संस्करणात् देवनागयाम् लिपिकृतम् ।
भगवद्दत्त
संस्कृताध्यापक दयानन्दकालेज, लाहौर,
लिखित
भूमिका-सहितम।
---
प्रार्य सम्बत् १२६०५५३०२० ।
विक्रम सं० १९७७
सन् १९२११०॥
दयानन्दाद ३८।
प्रथमावृत्ति १००० प्रति
मूल्य २..
FEECEEEEEEEEEEEEEEEEEEE FEEEEEEEEEEEE
पं.भैरवप्रमार के प्रवन्ध विद्याप्रकाश प्रेसचाइमा लाहौर में छपा।

Printed by Bhairo Prasada,
MANAGER. VIDYA PRAKASHA PRESS. I ADORE.
AND PUBLISHED CY
THE RESEARCH DEPARTMENT. D A Y COLLEGE. I. AHORA
The Publications of this sémes can also be had of -
1. JIESSTS LUZIC & Co,
46 Great Ruxell Street,
Lona 1'. ('
2 Lala Moti Lal Binarsi Dass, The Punjab
Sanshut Book Depot, Sul Mittha Bazar, Lalior,
3. Lula Meh Chand Laclılımı Das, sanskrit
Booksellers, Said Mittha Bazar, Lahore,
4. Pt. Wazır ('h inil, Vedic Book Depot, Nolan
Lal Rouil, Laborc

मोम भूमिका । सामवेदीय वाङ्मय का इतिहास । परमात्मा से सामवेद का प्रादुर्भाव । तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जमिरे । छन्दांसि जहिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत । १०१००सायजु ३७॥ मा० ॥१२॥४॥ रसम्यापक सर्वपूश्य परमसे अग्वेद, सामवेद प्रादुर्भूत होते हैं।प्रथर्ववेद प्रसिद होता है उस से, यजुर्वेद उस से प्रकट इमा। (पूर्वपक्ष) 'ब' प्रादि पद पहुवचनान्त हैं, प्रतः इनका प्रय सम्वेद भादि कैसे हुमा १ इनका प्रयं तो यही है कि मचाएं, साममन्त्र और द ग्रपन्न हुए । (उत्तरपक्ष) यह सत्य है, कि 'असः, सामामि, भोर 'बन्दॉसि' पद बापचनात हैं, पर साथ ही बजः पद एकचन में मी है। यदि तुम्हारी पात मानी जाये तो 'यजः' पर से तुम नया प्रमिपाय लोगे? (पूर्वपक्ष) 'पञ.' पद यहां जात्यर्य में पकवचन होता दुमा भी यजुमन्त्रों का बोधफ है, पजुर्वेद का नहीं। (उत्तरपष) यह पात यहां म घटेगी क्योंकि छन्दांसि परपर पूर्व विधार किसी और परिणाम पर जाता है। देखो ! बन्दॉसि पर यहां किन्हीं मन्त्र विरोपों का बोधक नहीं है। दवानन्द सरस्वती

मे इसी पर विचार करते हुए लिखा है-वेदाना गायत्र्यादिच्छन्दा
ऽन्धितत्वात्पुमश्छन्दासोतिपद चतुर्यस्यायर्ववेदस्योत्पति शापयतो.
स्वपधेयम्। (अ०भाग्यभू वेदोत्पउिचि०) अर्थात् 'वेदों में सय मन्त्र
गायत्र्यादि छन्दों से युक्त ही है, फिर (छन्दांसि ) इस पद के फहने
से धोया जो प्रयवेद है उस की उत्पत्ति का प्रकाश हाता है।
प्रन्यया 'छन्दांसि का यहा पोई प्रयोजन नहीं। इस अर्थ में अन्य
प्रमाण मी देखो।
(१)"ऋचाम्
यजुपा
सान्नाम्
मर्याणा
...गायत्र च्छन्दः।
वैष्टुभ छन्दः।
...जागत च्छन्दः।
..सर्वाराि छन्दासि।"
गो ग्रा० १२११२॥
वैदिक विचार में यह मुममिर है कि प्रायेद गायत्री छन्द
सम्बन्धी हे [यद्यपि यह मनुसन्धेय है कि ऋग्वेद में गायत्री(२०५०)
की प्रपेचा विएप (४२५३) क्यों अधिक है ? ] यजुर्वेद मिएप् छन्द
सम्बन्धी और सामवेदजगती छन्द सम्बन्धा है । प्रय रहा अययंद,
सो यह पूर्वोक गापामण के प्रमाणानुसार सा-छन्द सम्बन्धी
।उसफाकिसी एक छन्द से सम्बन्ध विशेष नहीं । यही पारण है
कि उपस्थित मन्त्र में इन्दॉसि पद से अर्थवेदफा ग्रहण होता है।
(२) प्रस्तुन मात्र सम्बन्धी एक अन्य यात भी ध्यान दने योग्य
है।प्रपद में यह मात्र निम्नलिसिन सफार म प्राया है-
तस्माद्यनात् सर्वहुत कच. सामानि जज्ञिरे ।
छन्दो ह जमिरे तस्माद यजुस्तस्मादजायत ।
भय. १९॥१३॥

यहां 'छन्दांसि के स्थान में 'इन्दो ह' पाठ है। इस प्रकार पाठ में भेद कर देने से परमात्मा ने मन्त्रों द्वारा ही अन्य मन्त्रों का व्याख्यान कर दिया है। यह मन्न उन्नीसवें फाण्ड का है, और यद्यपि पञ्चपरतिका की भूमिका में लिखे अनुसार हम अभी तक इस फायड के सिंहितान्तर्गत होने के विषय में कुछ नहीं कह सकते, फिर भी यह तो रूप को स्वीकार करना पड़ेगा कि पहुवचनान्त 'इन्दाँसि' पद का अर्थ एकवचन 'छन्द' अर्थात् (पूर्व प्रमाणों की रष्टि से) अथर्ववेद ही है। रहा क्रियापद 'जधिरे । सो वह व्यत्यय ही समझना चाहिये, यद्यपि ऐसे व्यत्ययों के उदाहरण सम्प्राप्त वैदिक प्रन्यों में अत्यल्प मिले हैं। पूर्वोद्धृत अथर्ववेद के मन्त्रों से निश्चय होता है कि 'छन्दांसि' भादि पदों का अर्थ एक वचन में ही है। ऐसी अवस्था में यजः पद मी यजुः मन्त्रों का जाति-वाचक न रहेगा। इस विषय में अन्य प्रमाण देखो- (३) यस्मादृचो अपातक्षन यजुर्यस्मादपातन् । सामानि यस्य लोमान्यपर्वा शिरसो मुखं स्कम्भं तं ब्रूहि कतमःस्विदेवसः ।। भयर्ष २०७।२०॥ इस प्रमाण में 'यजुः' पद एकवचन में है, और प्रथयाङ्गिरस स्पष्ट ही प्रावेद का घोतक है । अतएव 'ऋचः' और 'सामानि पदों फा भर्य भी झुग्वेद और सामवेद ही होना चाहिये। विवारान्तर्गत "तस्माद्यहात्" ० १.IEolt मन्त्र की प्पास्या में सत्पव्रत सामायमी भयीपरिचय तथा निरुकालोचन में विपते हैं कि 'सामवेद छन्द भोर गान दो भागों याला है । सो छन्द भाग का प्रहमा इन्दोसि पद से और गान मागका प्रहप सामानि पद से करना चाहिये। इसका कुछ सगडन तो हरिप्रसाद होने दसर्वस्य के उपोद्धात पृ०१५पर फिया है । यद्यपि हम उनके विचार-कम से सहमत नहीं, तथापि उन के इस परिणाम के कि गान भाग तो मूबसंहिता का गेय-रूपान्तर ही है, अनुकूल सम्मति रयतेइस गान माग के लिये फहीं अन्यत्र मन्त्रों में सामाति' मा साम' पर प्रयुक्त बुमा होता तो सत्यमत जी का पव फुड ठहर सकता; पर ऐसा नहीं, प्रतः उनकापच निराधार होने से सम्मान सत्यप्रत जी के पक्ष को एक बात कुछ प्राभय दे सकती है, बपि यह इन्हों ने स्वयं महीलिखीमपर्वयेदीय पिप्पलाद शाखामें 'मामानि पस्य बोमानि' के स्थान में 'छन्दांसि यस्य नोमानि' पाठ भावा है ।रेसी दशा में सस्पयत कह सकता था कि 'छन्दांसि' पर 'सामामि' का पर्यापयाधी है, और सामवेद के छन्द माग का घोतक है। यह बात भी सत्य नहीं ठहरती क्योंकि 'सामानि' मादि पर जैसा मागे चल कर मोर मी विदित हो जायगर सामयेर पापक हैं। पैसा कोई बन्दधेद है नहीं, भोर 'बन्द' पद पवेद पाची सिर हो चुका है, अतः पिप्पलाद का पाठ जब तक किस शामा के अन्य खिमित प्रायन मिल (जो कि बहुत कम सम्भव १)मगुरु ही कहा जाएगा। विदेशीय (पारसीक) भाषा में छन्द का अर्थ । मापा-विज्ञानी जानते है फि कन्द शब्द ही पारसीक माग में जन्य बना है। यही जन्द पारसीमा का धर्मपन्य है।स में अपन पुरोहितों का नाम भी कई बार पाया है। हाग के मता. नुसार तो इस में पाया दुभा पफ मन्त्र भी भयवंधेद का प्रथम मन्त्र है। इस प्रकार प्रतीत होता है ज़िन्दका अपर्षयेद से सम्मम्भ- विरोष है, प्रतएष बन्द शप फा भर्य पूर्वोत्त मन्त्र में भयर हरी युषियुक है। ऐमी पणा में 'सामानि मारि पर भी सामवेद पादि के पारक।

ब्राह्मणग्रन्थों में सामानि पद का अर्थ | (१) सामवेद आदित्यातू (पे० २५५७) (२) प्रादित्यारसामानि (कोची. १०) (३) सूर्यात् सामवेदः (श० ११३०८) (४) सामान्यादित्यात (शॉ० उ० ४११७१२) (५) सामवेद मादित्यात् (जै० उ०मा० ३१५७) (६) सामवेदोऽमुष्मात् (पदि०४१) (७) आदित्यात सामवेदम् (गोश६) इन सात प्रमाणों में से दूसरे और चौथेप्रमाण में 'सामानि' पदमाया है, अन्य पांच प्रमाणों में सामवेद । ये ब्राह्मणवाक्य एक प्रकार से पूर्वोक्त घेद मन्त्रों की व्याख्या में ही कहे गये है। इन में अधिकांश स्थलों में सामवेद का प्रयोग बता रहा है कि प्राचीन प्रमादि ऋषियों की रष्टि में भी इन स्थलों में 'सामानि' पद से सामवेद का ही अभिप्राय होता था। अतएव तस्माचशात्" मन्त्र का इस लेख के प्रारम्भ में किया हुआ अर्थ ही सत्य है, और दूसरा नहीं। इस मन्त्र का यही अर्थ अपि दयानन्द सरस्वती ने अपने अनेक प्रन्यों में किया है। हम ने तो उसी का उदरणमान दिया है। इस कल्पारम्भ में सामवेद सव से प्रथम किस को प्राप्त हुआ ? पूर्व लेख से यह स्पष्ट होगया होगा कि सामवेदादि येद् उसी या-स्कम्भ-परश्य से प्राप्त हुए । यहां यह विवाद नहीं उठाया जायगा कि येद-शान क्यों परमात्मा का है! इसे किसी अन्य अपसर पर खंगा। यहां प्रघ यही निर्णय फरना है कि इसकत्सा- रम्म में सामवेद फिसी एफ म्पति को परमात्मा से प्राप्त उमा वा भनेफों को।

अनेकों को प्राश हुग्रा, ऐसा मानने वाले बहुत थोड़े हैं। उन के पक्ष में फोई प्रमाण भी नहीं है । जा यह मानते हैं कि सामवेद किसी एक व्यक्ति को परमात्मा से प्रान टुया, ये दा भागों में रिभक्त हो जाते हैं। एक भाग वालों का मत है कि सामवेद अग्नि के अधिपाता देव को प्राप्त हुा । उसी से मन्त्र द्रष्टा ऋषियों को प्राप्त हुमा । दूसरे माग घालों का मत है कि मनुष्य देह धारी अग्नि स्मृषि को प्राप्त हुआ जो इस फरपारम्भ में अमवुनि दृष्टि का एक सभासद पाइस पर विचार- । (१) अग्नि मादि द्रव्यों का कोई चेतन जी अधिष्ठाता है अर्थात् इनको स्वशारीरवत् बनाये है, पेमा घेद में कहीं नहीं माया। हां, अग्निनिरदेव का नाम ता सन्न प्रसिद है । इस फा विशेष ध्यास्यान भगवान् दयानन्द सरम्पती की ऋग्वेदादिमाप्य- भूमिका में मिल सफ्ता है। इसी पक्ष के पगहन में 'जड़ाग्नि से ऋग्वेद का प्रकाश हुमा' इस पा सरडन हो जाता है। धारण कि जड़ को शान होना असम्भव है। (२) दूसरे मत में भी एक भारी मापत्ति प्राति है । पूर्वोक्त ग्रामणप्रन्यों के सात प्रमाणों में मुर्यातमादित्यात = प्रमुप्मात् पद भाषे हैं। इस पर- (पूर्वपच) यदि सूर्यादि मनुष्य देहधारियों के नाम होते तो उन के पयाय प्रादित्य आदि और 'यायु का पर्याय “योग्य पयते' शतः ११॥शासन माते । प्रामण प्रन्यो में "अमुमात्' प्रयोग स्पष्ट इसी सूर्य के लिये पाया है । और यायु यदि कोई मानय समाज का सदस्य पा तो क्या यह “योऽय परते" प्रधांत "जो यह यहता" ऐसा ही पा? क्या मनुष्य मी परन समान याष्ट्रते है।

(उत्तर पक्ष) प्राचीन संस्कृत वाङ्मय के न जानने का ही कारण है कि ऐसे पूर्वपत वडे होते हैं । देखो महाभारत को- (क) यहां फर्ण के समीप उस के पिता सूर्य का श्राना लिया है । यह सूर्य कोई देवता न था, प्रत्युत मनुष्य देहधारी व्यक्ति ही था। उस के निझलिखित नाम महाभारत वनपर्व अध्याय ३०१ में प्राये हैं। अभिमायमयो शाला महेन्द्रस्य विभावसुः । कुण्डलार्थे महाराज मूर्यः कर्णमुपागतः ॥६॥ स्वमान्ते निशि राजेन्द्र दर्शयामास रश्मिवान । कृपया परयाऽऽविष्टः पुत्रस्नेहाच भारत |८|| ब्राह्मणो वेदविद्भूत्वा सूर्यो योगद्धिरूपवान् ॥६॥ अहं तात सहस्रांशुः सौहृदात्त्वां निर्दशये ॥२२॥ इस का संक्षिप्त अभिप्राय यह है कि योगसिद्धि-समन्वित सूर्य महात्मा ब्राह्मण वेप में रात्रि के अन्तिम प्रहर में करणं के जागने पर उसके समीप पाया। उस सूर्य के यहां कई नाम पाये है जो सूर्य शब्द के पर्याय है,यथा विभावसु-रहिमवान-सहस्रांशु ! प्रय रामायण पर किश्चित ध्यान दो- (ख) वाल्मीकिरामायण में वानर जाति: फा सुविख्यात वर्णन है। वहां भी मुगि पाल्मीकि वानर शब्द के अनेक पर्याय उस जाति के लिये प्रयोग में लाते हैं। ध्यान रहे कि मिथ्या-कथा युत विवरण को छोड़ कर वानर जाति मानचेतर जाति सिद्ध नहीं हो सकती । और सत्य तो यह है कि (क) और (ख) स्थलों में सूर्य और वानर के प्रमश पर्याय-प्रयोग को देख कर ही मध्यम कालीन लोगों ने इन्हें देवता था पशु मान लिया था। अन्त में ब्राह्मण प्रन्दों के वाक्य-प्रयोग पर भी ध्यान देना चाहिये- (ग) तैत्तिरीयग्राह्मण शमें नचिकेता की कथा प्राई है। वहां उस फा जिस भृषि से प्रश्नोत्तर छुआ, उस फा नाम मृत्यु ही कहा है। कठोपनिषद् में भी यही कथा पढ़े विस्तार से माई है। पहां मूष ऐतिहासिक फया के साथ २ कुछ अलङ्कार भाग मिश्रित करके मोपनिषद-भाव अधिक खोखा गया है। परसब से अधिक विषारणीय यह है कि यहां मृत्यु प्रापि के को दूसरे भी नाम दिये गये हैं। ये सब नाम मृत्यु शम्द के पाययवाची है, या "पम १२५ पन्तक १२२६। (घ) वेद के ऋषियों के नो फां ऐसे नाम सघांनुक्रमणी में पाये जसे “अग्नि पायक" मृ० १०।१४०॥ अनिस्तापसम्म १०१५॥ यहां विशेष्य विशेपण भाव से ये समानार्थक शन प्रयुक्त हुए हैं। इन पूर्वोक्त प्रमाणों से यही निश्चित होता है कि पात प्राचीन काल में व्यक्ति विशेषों के नामों के यदि कोई पर्याय होतो. मी उसी के नाम के लिये प्रयुक्त हो जाते थे। और जैसे महामारत में 'सूर्य' को 'रश्मियान्' धादि कहा है वैसे ही शतपप मापय में 'यायु' को 'योऽय पयते' कह दिया गया है । प्रतपय पापण मादि भन्यों के पूर्वोक्त सात प्रमाणों में "मादित्य" मनुष्य देहधारी भूपिदेव है, कोई जर या जर सूर्य का प्रविष्ठाता देय नहीं । इसी प्रादित्य-सूर्य-रवि के मन में इस कल्पारम्म के समय सत्र से पहले परमात्मा ने सामधेद का प्रकाश किया । उसी ने ममा मादि को पढ़ाया और फिर यह घेद सर्वत्र फैखता गया। पबिंशाण में जो "अमुनान प्रयोग भाया है उसका पही ममि माय है मनुष्य शरीर में शिर स्थान मादित्य था सूर्य सम्बन्धी है। सूर्य अपि को समाधिस्थ दशा में शिर पी नादियों में मन के जाने से हम ये का मान होता था, मतःपार प्रयोग प्रा गया।

- " सामवेद की शाखाएं। आर्यावर्त में सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर दीर्घ कालपर्यन्त लोकिक और वैदिफ भाषा का बहुत प्रचार रहा । उस समय वेदादि शास्त्र प्राज फल की अपेक्षा अल्पपरिश्रम से ही समझे जाते थे। तब प्रव. चनकर्ता भाचार्य वा ऋषि अपने शिष्यों के लाभार्थ कठिन वैदिक शब्दों के स्थान में अन्य सरल पैदिक शब्द प्रयुक्त करके प्रथया पुछ २ व्याख्या फरके पढ़ाया करते थे। उतने से ही शिष्य यथार्थ अभिप्राय समझ लेते थे। तब किन्हीं विस्तृतभाष्यों की आवश्यकता न थी । यही अपि-प्रवचन था जो पीछे शाखा प्रादि नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसी प्रवचन के सम्बन्ध में भाष्यकार पतजलि मुनि ने लिखा है- न हि च्छन्दांसि क्रियन्ते । निसानि च्छन्दांसीति । यद्यप्पयों निसो या त्वसौ वर्णानुपूर्वी सानिया । तद्नेदाच्चैतद्वति काठकं कालापकं मौदकं पैप्पलादकमिति । "४।३।१०१॥ अर्थात् वेद तो क्या, साधारण-ग्रन्थों के समान शाखाएं भी बनाई नहीं गई । इनका शब्दार्थ नित्य है । हां,मर्थ के नित्य होते हुए भी वर्णानुपूर्वी अनित्य है । इसी के भेद से ऋषियों ने नित्य वेदार्थ खोला है । और इसी भेद से काठक आदि अनेक शाखाएं हुई हैं। (प्रश्न) मूल समवेद जिस वी भागे शाखाएं वर्मी अय कहां है ? उस में ऋग्वेदीय चापं न होनी चाहिये । अब तो जितने ग्रन्थ सामवेद के नाम से मिलते है उन सब में ऋग भाग सम्मिलित है। (उत्तर) मूल सामवेद या तो अवश्य क्योंकि विना इस के माम शाखाएं बनती से, और प्रवचन किस का होता ? उसी मूल फा वर्णन ऋग्वेदादि वेदों और ऐतरेय आदि ब्राह्मणों में आया है। वह मूल भी प्रतीत होता है, प्रवचन के बल से पीछे ऋषि-विशेष फे नाम से प्रसिद्ध हो गया। ऋग्वेदीय ऋचाएं सामवेद में न ची (१०) ग्रेन न हैं । हम यह कह सकते हैं कि ऋग्वेद और सामवेद के अमेक मन्त्र सदश हैं। उन्हीं मन्त्रों का पारिभाषिक नाम 'भृक्' भी कर्ता परमात्मा ने प्रयोजन विशेष के लिर ये समान मन्त्र दो वेदों में रुचे हैं । मिथ्या इतिहास प्रचारक जा लेखक हमारे इस पथन को नहीं मानते उन्हें हम ग्रांद का एक मन्त्र बताते है- गायत्रेण प्रति मिमीते अर्कमण साम त्रैष्टुभेन वारम् । सकेन घारू द्विपदा चतुप्पदाक्षरेण मिमते सप्त वाणीः॥ ऋ०१।१४।२४॥ सुप्रसिद्धपक मौ चौमट सूक्त का यह चौबीसवा मन्त्र है। उन पूर्वपक्षी रेखकों के मतानुसार प्रथम मण्डलीय होने से यद्यपि यह मन्न अत्यन्त पुराना नहीं तथापि बहुत नया भी नहीं है। इस मस्त्र में भी स्पष्ट ही साम में ऋचामा का होना जताया गया है। अर्थ इस पा प्रतीच सरल है । पूर्व लिखा जा चुका है कि ऋग्वेद गायत्री छन्द प्रधान और यजुर्वेद त्रिष्टुप् छन्द प्रधान है। अर्क पद मन्त्र या ऋचा का भी पर्यायवाची है । प्रतएव म.प्रार्थ यह है- गायत्री छन्द स अब अवामृग्येद फा (जगदीश्वर) प्रतिमान घरता है । चामे से सामवेद का। त्रिष्टुप छन्द से बाप-यजुर्वेद का। यजु मन्त्रों से वाक्-अथर्ववेदया। [जा ऐसी] सात छन्द युक्त वेद वाणी का मान करते है [ कृतरत्य होते है। इम से पूर्वपक्षियों को भी मानना पड़ेगा कि ऋचाप या अग्वेदीय मन्त्रों जैसे मन्त्र बहुत पुराने काल से सामवेद में चले भाते है । हम पूर्व पता चुके है कि भायेतिहासानुसार मामवेद प्रारम्भ से ही सहितारूप में चला पा रहा है, प्रत इस दृष्टि मे जासत्य दी है मादि सृष्टि से मामयेद में ऋचा चल्ली भाती हैं। जा ध्यत्तिा चामों का साम गाठ से पृयक जानें, मानों,वह दिक पाङ्मय के इतिहास से आश है।

शाखा-विभाग। अध रहा शाखा-विभाग पर विचार। इस पर प्रकाश डालने वाला कोई प्रति प्राचीन ग्रन्थ हमारे पास विद्यमान नहीं । एक चरण-घ्यूह ग्रन्थ ही रह गया है । यह विक्रम से पांच,छ सौ वर्ष पूर्व का ही प्रतीत होता है । इस में पाठभेद का बाहुल्य है।नीचे उसी की साक्षी उपस्थित की जाती है। चरणव्यूह की साक्षी। शौनकीय परिशिष्ट। अथर्व-परिशिष्ट। सामवेदस्य क्लि सहसभेदा भवन्ति। तत्र सामवेदस्य शाखासहस्रमासीत् । एष्वनध्यायेवधीयानारते शतातुपने- अनध्यायेष्वधीयाना सर्वे ते शक्रेण याभिहता। विनिहत प्रविलीना] तत्र चिदवा- शिष्टा. प्रचरन्ति । तद्यथा । शेषान्याख्यास्याम । तत्र राणायनीया (१) राणायनीयाः (२) साद्य- नां सतभेदा भवन्ति । (१) राणाय- मुना * (३) कालापाः (४) महा नोयाः (२) शाध्यमुग्राः*(३) का- कालापाः (७) कौथुमाः(६) लाग- लोपा (४) महाकालोपा (५) लाङ्ग- लिकाश्चेति । लायनाः (६) शार्दूलाः (७) कौथु- माधेति । महिदास प्रदर्भित प्रकारान्तर । तत्र कौयुमाना पड्भेदा भरन्ति । कीयुमाना पड्भेदा भवन्ति । तघया। (1) फौथुमाः। (२) प्रासुरापणाः (१) सारायणीयाः (२) घातराय- (३) धातायना (४) प्राचविद्वैन- णीया (३) चैतधृताः (१) प्राचीना मृतः (५) प्राचीनयोग्याः (e) (५) तेजसाः (६) भनिष्टकाश्चेति । मैगमीयाः। * सात्यमुना नाम अधिक युक्त है । महाभाष्य १11८ ॥ पर ऐसा ही पाठ है।

( १२ ) जहां सैकडों साम-शाखाओं के नाम विलुप्त हो गये हैं वहा विद्यमान नामों में भी पाठ भेद के कारण एक घड़ा अन्तर पड़ गया है। पूर्वोक्त शास्त्रानामों के पढ़ने से यह यात सुस्पष्ट हो जाती है। घरणन्यूह के टीकाकारमहिदास ने निज व्यास्या में कुछ अन्य नाम भी दिये हैं। उन्हीं का पाठभेद स्वामी हरिप्रसाद जी के वेदस्वस्थ के पृष्ठ १७२ पर मिलता है । पता नहीं उन्हों ने स्व-धाद्ध से पाठ संशोधन किया है अथवा किसी लिखित ग्रन्थ के आधार पर ये नाम दिये है । तथापि हम उनके पाठभेदों को कोष्ठी में रख फर महिदास के पाठ जो संवत् ११५ के काश-संस्करण में छपे है, नीचे देते हैं। (९) थासुरायणीया (२) पासुरायणीया (३) वार्तान्तरेया [पार्तान्तवेया] (४) प्राञ्जल [प्राञ्जला ] (५) ऋग्नविधा. [ ऋग्वर्ण- भेदाः] (६) प्राचीनयोग्या. [७ शानयोग्या] (७) राणायनीयाश्चेति । तत्र राणायनीयानां नव भेदा भवन्ति । (१) राणायनीया (२)शाट्या. यनीया (३) शाट्यमुनाः [सात्वला ] (४) खल्बला (५) महाखल्मलाः (९) बागलाः (७) पौधुगा. (८) गौतमा (२) जैमिनीयायेति । पतकालि मुनि फरते । "सहनयमा सामवेद.” (महामाय फील हार्न सं० भाग १, पृ.९) मर्यात 'सहन शास्त्रा याला साम घेद है।' उन्हीं सहनशामासों में से कुवेक फा उल्लेख पूर्योद्भुत । घरणव्यूह के पाठों में है ! चरणव्यूह से शासा-नाश-ति- हास में तथ्य की रिस पक्षमा पत होना सम्भय है। सदनु- सार घी या किसी विद्युत् प्रकोप धाले दिन किसी सामशास्त्रीय प्रध्यापक ने अपनी शापा का पाठ किया होगा। यह इन्द्रसूर्य के घनन्तड़ित की धारा से अपने प्राण नष्ट कर बैठा होगा। साथ ही १ . १-काशी मेस्सरण में किसी अट-पाट को रेलकर कोधुमी, गोनमी पाहै।

प्स के मन्ध विनष्ट हो गये होंगे। परन्तु यह सब दूर की कल्पना प्रतीत होती है । चतुतः कालक्रम से ही ये सव शाखाएं लुप्त होती गई होंगी। सम्याप्त तीन गासाएं। सम्प्रति सामवेद की तीन शाखाएं ही प्रसिद्ध है । चरणव्यूह में भी इन्हीं का उल्लेख है । 'गुर्जरदेशे कौधुमी प्रसिसा । काटके जैमिनी मसिद्धा। महाराष्ट्रदेश राणायनीया प्रसिद्धति।" अर्थात् गुजरात में कीथमी, काटक में जैमिनी और महाराष्ट्र में राणाय- नीय शाखा प्रसिद्ध है। पूर्वोक्त तीन शाखाओं में से कौथुमी शाखा ही सम्पति मूल सामवेद माना जाता है। इस का एक कारण तो इस का समस्त भारत में अत्यन्त प्रसिद्ध होना है। अन्य प्रयल कारणों की मागे सरोज होनी चाहिये। इस सामवेद के पाट व्राह्मण हम तक पहुंचे हैं। (१)ताण्ड्य महा- ब्राह्मण अथवा पञ्चविंशमाह्मण अथवा प्रौढ ब्राह्मण अथवा छान्दोग्य माहाण (विवलियोथीका इण्डिफा संस्करण संवत् १८२७-३०)। (२) पड्विंशगाह्मण (जीवानन्द सं०१८८१ सन् तथा "विज्ञापनमाम्य- सहितम्," एच. एफ. ईलसिंह सम्पादित, लीडन १९०८)1 (३) सामविधानप्राह्मए (ए० सी० बर्नेल सम्पादित १८८० सन्, लण्डन, तथा सत्यप्रत सामा० सम्पा० सं० १९५१) । (8) प्राय बाह्मण (५० सीयल सम्पा२१८७७ सन्, लण्डन,तथा सत्यवतमा० सम्पा० * अलबेस्नी लिखता है कि 'उस रे काल से कुछ पूर्व ही कश्मीर के वसुफ नामक ब्राह्मण ने वेदों को लिपिरत करने की प्रथा चलाई थी।' (अलवेस्नी का भारत।भाग दूसरा। श्रीमतरामस्त अनुवाद! सन् १९२०.३१)। इमें इस बात पर विश्वास नहीं।

सं० १९४८)। (५) देवताध्याय या दैवत ब्राह्मण (ए० सी० पर्नेल सम्पा० सन् १८७३ तथा जीवानन्द सन् १८८१) (4) उपनिपद ब्राह्मण-(क) मन्त्रवाह्मण ( सत्यव्रतसा० सम्पाः स. १९४७ तथा प्रयम प्रपाठकमान फे० स्टोर सम्पा० १८०१) (स) घान्दोग्योप- निषद् ( अनेक संस्करण निकल चुके हैं।। (७) सहितोपनिन्द ५० मी० बर्नेल सन् १८७१ ) 1 (८) घशनादाण (ए० सी. पर्नेल सम्पा १८७३ तथा सत्यव्रत सा० स. १९४६)। कई विद्वानों का मत है कि वस्तुतः सामनाह्मण एक ही है। घह सम्प्रति चार भागों में पिमल हो गया है । (१) पचीस अध्या- यात्मक पञ्चविंशवाह्मण (२) पञ्च अध्यायात्मक पदिशाबाह्मण (३) अष्ट अध्यायात्मक छान्दोग्योपनिषद् (७) दो अध्यारमफ गद्य- फर्म-प्रधान मन्मनाक्षण | साग ब्राह्मण चाळीस अध्याय युक्त था। अन्य पांच जाह्मरा अनुवादाणमात्र है। जब तक सामवेद सम्बन्धी अनेक अन्यों के शुद्ध थैज्ञानिक संस्करण न छप जावें, तब तक इस निग्य पर पूछ कहना हमारे लिये प्रयुक्त है । इस पायिवार सभी होसकता है जय इन ब्राह्मण-ग्रन्थों का माखनिरूपण हो जाये। ताराड्यवाह्मण की प्राचीनता । अष्टाध्यायी ४१२१३ा पर एय यातिक है "चरण सम्बन्धेन निधाम लत्तणोऽए।" इस पर लिखते हुए पतझलिगुनि चरणसम्बन्धी नौ (९) पृपियों को निरास-विचार से तीन भागों में बांटते है। "पय प्राच्या । प्रय उदीच्याः। प्रयो माध्यमा ।" काशिकाफार रस राक्य पो ध्यान में रखकर भ्रष्टा०४।३।१०४॥ पर लिखता P-शम्पायनान्तयासिनो नन ।" मागे चलकर यह बुध प्राचीन फारिकाए उद्धृत घरना है। उन में मे पथ पा अर्ध माग यह है- 1 चाभारुणिताएड्याश्च मध्यमीयास्त्रयोऽपरे ।। अर्थात् चाभ,थारुणि और तागड्य तीनों वैशम्पायन-शिष्य माध्यम-मध्यम भूमिनियासी थे। इन तीनों के अपने २ चरण थे। इन में मेतागयों की शाखा प्रारम्भ से कौथुमी ही चली आ रही है। इस का कुछ पता पाणिनीय गणपाठ से लगता है। वहां हारा३७ पर यह तीन गण भी दिये हैं। "कठकालापाः। काठकौथुमाः। कौथुमलौकाक्षा!" हम फह चुके हैं कि कट और तागा प्रादि सतीर्थ्य-एक गुरु के शिष्य थे। उन में से कठों की अपनी शाखा थी, परन्तु ताण्ड्यों का अपना चरण ही था । इस लिये गण में कट और तारख्य दोनों की शाखाओं का परिचय देने के लिये “ कउकौथुमा " कहा है । इस कथन में एक बात ध्यान देने योग्य है । सामविधान ब्राह्मण के अन्त में जो कृषि परम्पग दी है यहां ताण्ड्य का गुरु प्राजापत्यविधि से वादरायण कहा है । यथा- सोऽयं प्राजापत्यो विधिस्तमिमं प्रजापतिवृहस्पतये प्रोवाच । वृहस्पति रदाय । नारदो विष्वक्सेनाय । विष्वक्सेनो व्यासाय पाराशाय ।व्यासः पाराशर्यों जैमिनये। जैमिनिः पौप्पिण्ड्याय। पौष्पिगड्यः पाराशायणाय । पाराशर्यायणो यादरायणाय । चादरायणस्ताण्डिशाव्यायनिभ्याम्। ताबिडशाय्यायनिनौवहुभ्यः।। पफ ताण्ड्य का वर्णन शतपथब्राह्मण १।२।२५ में आया है- "अथ ह स्माह तागड्यः।" अतः इतना निश्चित है कि चाहे ताण्डय कोई भी हो, है यह अतिप्राचीन । तब उस की संहिता क्यों फौथुम हुई और मूल सामवेद क्यों फौधुम कहलाया ? इस के विचार के लिए बड़े परिश्रम की आवश्यकता है। सूत्रों का विवरण निमलिखित प्रकार से है। (१) मथफकल्पसूत्र (१६) अथवा आयफ्ल्प (डबल्यू. फारेण्ड सम्पा० सन् १९०८)। (२) तुद्रसून आयकरप या परिशिष्ट ही है (रसी के उत्तर भाग में छपा है ) । (३) लास्यायन श्रौतसूत्र ( विय० इण्डि० स० १२८)। (४) गोभिलीय गृह्यसून (झाएर सम्पा० १८९४ तत् तथा वियर इण्डि०, द्वि० स०, सन् १९०८) । (५) श्रास्फरप परिशिष्ट, गोभिल अथवा यसिष्ठहत (विव० इण्डि द्वि० स० सन् १९०६)। (६) फर्ममदीप प्रथया छन्दागगृधपरिशिष्ट (धर्मशास्त्रलग्रह सन् १८७६,जीयानन्द सस्करण के पूर्वाध पृ०६०३-६४८ तक,पात्यायन स्मृति या कात्यायनविरचित कर्मप्रदीप के नाग से छपा है । तथा प्रथम प्रपाठफ फन्डरसम्पार हरे रसन तथा बिपिड में सन् १८०और वि० प्रपाठक स. हालगईन सम्पा हरे सन १८८०)। (७) गृह्यासंग्रह, गामिल पुत्रकृत (लूमफील्ड द्वारा2 DM G Tol ३५ में सम्पा० तथा बिया इपिड द्वि० सन् १२१.) । (८) पञ्च- विधसूत्र ( सत्यवतसा सम्पा० तथा रि० जीमन सम्पादित १९९३ ग्रेसला)। शिक्षाप्रन्थों में तीन शिक्षा प्रसिर है। (१) नारदीय शिक्षा (सत्यव्रतसा० स० दत्तात्रेय सम्पा चाहौर सन् १० तपा शितासग्रह काशी में सन् १८२३)। (२) दोमशीय शिक्षा (शिक्षा सग्रह स०) (३) गौतमीयशिक्षा (शिक्षा सग्रह स०)। प्रातिशाख्यों में निम्नलिखित ग्रन्थ है। (१) अक्तन्त्र (ए०सी० यर्नेल सम्पा. १८७१)।() सामतन्त्र (दयानन्द महाविद्यालय के लालचन्द पुस्तयाजय में इस को एक प्रतिखिपि है जामदास गवनमेगट के समाह के पफ प्रत्य से कराई गई थी)। (३) पुष्पसूत्र या पुलमूत्र (रिजीमा सम्पादित)। सुख चाँदर (१४) ग्रन्थों का हम ने ऊपर उल्लेख पिया है। इन के प्रतिरित भठतास (२८) और अन्य ! उन सब के नामादि ( १७ ) जैमिनीय संहिता (von Dr W.Caland, Bieslu, 1917) पृ० १३-१५ पर देखो। २. राणायनीय शाखा। इस शाखा की मंहिता अभी तक नहीं छपी। इस के सूत्र अन्य निम्नलिखित हैं। (१) द्राशायण श्रौतसूत्र (कुछ भाग रियूटर सम्पादित लण्डन १२०४ सन्)। (२) खादिरगृह्यसूत्र अथवा द्राखायणगृह्यसूत्र (मैसूर राज्य संस्थत ग्रन्थमाला १९१३सन् तथा मानन्दाथम पूना सन्१९९४)। (३) गौतमपितृमेदसून (कालेण्ड सम्पा० लाईपज़िग १८८६ सन् । (४) गौतमस्मृति (स्मृतिसमुघय, पूना )। राणायमीय-शामा सम्बन्धी इतने अन्धों का वर्णन करके डामर पालेण्ड महाशय एक विचार उपस्थित करते है । वह इतना प्रावश्यक है कि हम उस का अनुवाद दिये विना नहीं रह सकते- परन्तु इन सब ग्रन्थों का राणायनीय-शापा सम्बन्धी होना भनिश्चित ही है। कम्मंप्रदीप पर प्राशार्क का भाष्य है। उस में वह यताता है फिगोभिलसूत्र फौयमों का ही गृह्यसून नहीं प्रत्युत राणाय- नीयों का भी है। हेमादिभी अपने श्राद्धफल्प में तीन बार(पृ०१४२४, १४६०,१४६८) गोभिल को राणापनीय सूत्रकृत् कहता है। यदि यह बात मान ली जावे तोखादिरगृद्यसन राणायनीयों का सूत्र नहीं रह सकता । प्रस्तु, दक्षिण भारत में शारदलों के एक खादिर गृह्यसूत्र को विद्यमानता फही जाती है । ( देखो Report on a. search for Sanskrit mss in the Bonilay Presidency 1892-95, by A V. Kathavate Bombay, 1901, 10.79 ) | शारदूल भी सामवेद की एक शाखा है। अब यही खादिर गृह्यसूत्र शारदूख सामगों के सादिर सूत्र से कुछ पाठभेदों को छोड़ के माय मिलता " ( १८ ) यताया जाता है। हेमाद्रि के काल में शार्दूल शाखा फी ऐतिहा श्वला भटूट थी, यह भी श्राइफल्प से ज्ञात होना है। उस में (१० १०७८) पर, यह वेद के उन मागों का उल्लेख करता है जो मारणों के भोजन-समय शार्दूल-शाखा बालों को गाने वाहिये । अतएव यह स्पष्ट है कि कम से कम खादिरगृह्यसूत्र में मुखत शादलों सम्बन्धी गृहकर्म थे। परन्तु एफ और ऐतिह्य भी स्वादिर- सूत्र सम्बन्धी है। मैसूर में १८८१ स्न् में पठभूपरा माय सहित जो गृह्यरत छपा है उस में अनेक पार गौतमगृह्यसूत्र का उन्नेस है । उस में जितने भी पाक्य गोतम के नाम से दिये गये है, घे सप हमारे सादिरगृहालूत्र में मिलते है । इसके अतिरिक्त जैसा हम पूर्व कह चुके है, हमारे पास एफ गौतम पितृमेधसूध हे, एक गौतम धर्मसूत्र (स्टैनज़लर सम्पा० बगडन १८७६ ) * और एक स्मृति मी है। ये सर गौतमों के अन्य भी हो सकते है कि जो सामवेद का गौस भाग हम ने विद्वान् पाठकों के विचागर्थ श्री कालेगड-प्रदर्शित ये सब पत उमृत पर दिये हैं। अपनी सम्मति पिसी और समय पर प्रकाशित करेंगे। जैमिनीय शाखा। इस शासा के निम्नलिखित अन्य भव तक प्रकाशित हो चुके है। (१) जैमिनीय सहिता (Dr W Ciland s edition, Breslan, 1007)। (२) जैमिनीय-भाह्मण (इस के अनेक सण्ड हुन्नस अटेंन ने पाश्चात्य अनुसन्धान पत्रों में प्रकाशित किये हैं। अन्य उपयोगी खगहों का अधिकांप भाग भन्यरूप मेंप गयाह-Das Timinaya Brahmana In Auswahal, Amsterdam, 1919) हस्तलिपित सामग्री के अपर्याप्त होने से यह एग्रामण ममी पूरा नहीं कप सफा )। (३) जैमिनीय-उपनिषद्माण (मर्यात् गायघ्युपनिषद्, * इसके दो भारतीय माकरण निकल चुके हैं (1) ममा (१) मदाम।

पूर्वोक्त ब्राह्मण का उत्तर भाग है । हन्नस अप्रैल सम्पा० १८२४ सन्) (४) माय-ब्राह्मण (५० सी० पर्नेल सम्पा० मंगलोर १८७८)। (५) जैमिनीय श्रौतसूत्र अग्निष्टोम-प्रफरण (डी: गॅस्ट्रा सम्पा लाईडन सन् १९०६)* 1 (६) जैमिनीय-गृह्यसूत्र (edited by Dr. W. Caland, Amsterdam, 1905) जैमिनीय-ब्राह्मण । 'शौनकादिन्यश्छन्दसि।" ४३१०६ के गण में पाणिनि "तलवफार" शब्द पढ़ते हैं। इसी तलवकार ऋषि के नाम पर तलवकार शाखा प्रसिद्ध थी। उसी का भय जैमिनि-शाखा नाम हो गया है। इसका कारण प्रभी पूर्णतया ज्ञात नहीं। संहिता के समान ब्राह्मण को भी अब जैमिनीय ब्राह्मण कहते है। श्री शङ्कराचार्य केनोपनिषद् भाष्य के प्रारम्भ में लिखते है- 'फेनेपितम्" इत्यायोपनिपापनाधिपया वक्तव्येति नवमस्या- ध्यायस्यारम्भः । प्रागेतस्मारकर्माण्यशेषतः परिसमापितानि समस्त- फर्माश्रयभूतस्य च प्राणस्योपासगान्युक्तानि फर्मागसामविषयाणि च । भनन्तरं च गायत्रसामविषय दर्शनं यशान्तमुकम् । (अर्थ) केनेपितम्" से प्रारम्भ होने वाली, परवाविषय के फइने पालो उपनिषद् कही जानी चाहिये। यह नवम् अध्याय का प्रारम्भ है । इस से पूर्व (पाठ) अध्यायों में यज्ञ कर्म पूरे कहे गये है। प्राणोपासना भी फही गई है। सत्पश्चात् गायत्रसाम और पंश कहा गया है।" तलवफार ब्राह्मण का यह वर्णन शङ्कर ने किया है। जैमिनीयतामण जो सम्प्रति मिलता है उसका अध्यायक्रम *जैमिनीय प्रौतसूत्र समप्र सभाध्य पड़ोदा राजकीय प्रन्यमाला में शीघ्र ही छपेगा। +जैमिनीय गृह्यसूत्र का कालेएड सम्पादित भारतीय संस्करण ला. मोतीलाल वनारसीदास सदमिट्टा बाजार लाहौर द्वारा शीत्र प्रकाशित किया जायगा ।

शङ्कर प्रदर्शिन प्रध्यायक्रम से विभिन्न है । प्रथम तीन अध्याय है। पश्चात उपनिषद् ब्राह्मण प्रारम्म होता है। उम में चार अध्याय है। फेन उपनिषद् चतुर्याध्याय के अटारहवें खगह से प्रारम्म होता है, और इकोस पर समात हो जाता है । वंश इस से पूर्व ही समाप्त हा जाता है। सात सयड इस से भागे और है। सो सारे मिल के ग्राह्मण के सात अध्याय होते है। यदि आप- ग्रामण मी मिला लिया जाता सारे प्राट अध्याय होते है। सम्मन ह और प्रन्य मिलने पर इस बात का निर्णय हो जाये। उपनिपद् ब्राह्मण । उपनिषद् प्राहाय को हनस अटेंल महाशय ने अमेरेफन प्रारिऐपटल मासायटी पे जर्नल स. १५ में रोमन-लिपि मे सम्पादित किया था । मेरे कहने पर पण्डित रामदेव जी ने उसी से इस का देवनागरी संस्मरण तय्यार किया था।वही भय यहां छापा गया है। हस्तलिखित सामग्री। जिस हस्तलिखित सामग्री में अटेंल ने अपना संस्करण तय्यार किया था उस पा उम्लेप उस ने अपनी भूमिपा में इस प्रकार दिया है- A. पर्नेन के नोटानुमार जो लपेटने याले फागज पर है, यह हस्तलेख "मखायार हस्तलेख में नाल दिया गया," १८७८ सन् में । अन्त में यह लिखता है "मूल की तिथि, बुल्लम १०४०-१८६४ सन् । पणमट के हस्तलेप में।" B तालपत्रों पर जिगे नत्य से, लगभग ३०० वर्षपूर्व विखा गया, तिनेरली से प्राम, परन्तु पहले प्रलेप्पी से खाया गया था ।" इस के पाटभेद ही दिये गये हैं। C यर्नेल फे हाथ की रामनलिपि में पिया हुमाग्रन्थ । यह इस पर ममाप्त हो जाता है।

A प्रन्य का पाठ और B के पाटभेद ग्रन्थाक्षरों में हरियाय फागज पर हैं। ये प्रो० जानवरे द्वारा रामन में किरय घे,प्रो. फापी प्रो० विटने ने मूल से मिला ली थी। उन्हों ने C.के पाचनः भी दे दिये थे। इसी कापी से यह संस्करण तय्यार किया गया। मूल प्रव इण्डिया प्राफिस लण्डन के पुस्तकालय में है। हस्तलेखों में ऐसा शीर्षक है तलवकारब्राह्मणे उपनिषदामणम् । अनुयाक, खण्ड और फपिडकादि के दिमाग विषय में श्रीअर्टल ने यह लिखा है । "वाक्यों (कण्डिकानों) के अङ्क दने में हस्तलेख असायधान और प्रसङ्गत हैं । A. अनुपाफ और खण्डविभाग नहीं देता, परन्तु प्रत्येक अध्याय की फण्डिकानों पर क्रमशः अङ्क देता है। मेने अनुयाफ और खगड विभागों में B. और C.की प्रथया फण्डिफानों के अड्डों में तीनों हस्तलेखों को साधारण अशुद्धियों मौर विलोपों का लिखना उपयोगी नहीं समझा। अध्याय २१से A. और B. अङ्का का नया प्रकार (कण्डिकाओं की समाप्ति पर) प्रारम्भ करते हैं । तथापि तीन पहली करिडकाएं (२३१-३) छोड़ते हैं, और २४ को २ लिपते हैं । पर इस के पश्चात् नियमपूर्वक अर्थात २५५ इत्यादि, लिखकर तृतीय अध्याय के अन्त तक जाते हैं, ३।४-५७ । B. में अङ्कः देने के एफ और फ्रम के भी अवशेष हैं । यमं तीसरे अध्याय की प्रथम तीन कण्डिकाओं पर और अड़ों के साथ प्रमशः ५६,५७ प्रौर ५८ लिसा है। B में ३३१८ पर ७०,३।२२ पर ७३, ३३२ पर ७६ के मङ्क अधिक हैं । इन अन्तिम तीन अनुवाकों की गणना स्पष्ट ही इस अध्याय के प्रथम तीन से विभिन्न है । साथ ही मूली फण्डिकामों के क्रम से मी भिन्न है। "तीनों हस्तलेस एकही सदोष मूल से भाए हैं। तीनों में बहुत सामान्य सूटपाठ है। विराम, अक्षर-विन्यास और सन्धि-सम्बन्धी ( २२ ) यातों में भी ये सावधानी से लिगे गए है। मैंने इन बातों के ठीक करने में स्वतन्त्रता वती है। सव स्थलों में, जो केवल अपर-यिन्यास सम्बन्धी नहीं है, मैंने हस्तलेखों के पाठ भेद पृष्ठ के नीचे दिये हैं। निर्देशों की सरलता के लिये मैने प्रत्येक अध्याय में निरर्थक अनुवाक विभाग का ध्यान न करते हुए क्रमश खण्डाङ्क देदिया है । हस्त लेखों में पपिडकामों पर कोई अद्ध नहीं तथापि मैंने यह दे दिया है। अमरेकन सस्करण के पल में अटेंस महाशय ने चार सूचिया दी है । [१] भारश्यक शब्दों और ऋषि नामों आदि की सूची। [२] निर्वचनों की सूची । [३] व्याकरण सम्बधी प्रयाजनीय स्थल । [७] उद्धरणों की सूची । हमने प्रथम सूची में से पि नाम पृथक करके उनकी सूची देदी है। अन्य शब्दों का इस लिए नहीं दिया कि दयानन्द महाविद्यालय के अनुसन्धान दिमाग की ओर से उपलध ग्राह्मणों भादि की एक विस्तृत सूची तय्यार हो रही है। उसम ये शब र भन्य शब्द भी आयेंगे, मत उनको यहा सापना भावश्यप नहीं समझा । सूचिया (२) और (1) मी इमने देदी है। तीसरी का हम भार्यापीय पण्डितों पे लिए प्रनाययक ममझते है। . ५० रामदेव ने पाठभेदों को देने के लिपे A.BC के प्यारे नहीं दिये।सो धावश्यक होने पर भी यह रह गये है। पहले फामों में उन्हों ने Onitted के स्थान में 'मोम्" दिया था। मैंने मागे घल पर उस फे म्यान में सस्त शाद 'नास्ति' कर दिया है। यह संस्थत शब्द हाने मे पतदेशीय जनों के लिये अधिक उपयोगी है। भर्टेल ने प्रत्येक स्वर सन्धि पर 'काम' का चिह्न दिया हुमा पा रामदेय जी ने उस के स्थान में '' चिह्न दे दिया था । सस्कृत में यह मनायश्यक है प्रत' दूसरे फार्म से मैंने इसे भी हग दिया है।

। ( २३ ) जेमिनीय उपनिपदब्राह्मण के सम्बन्ध में विशेप वक्तव्य । जैसा पूर्व लिखा जा चुका है, यह ब्राह्मण, वृहद् जैमिनीय ब्राह्मण का एफ भागमात्र है। इस का मूल नाम "गायत्र उपनिषद् जि. उ० प्रा०४।७ के अन्त में यही नाम माया है। यह नाम है भी सार्थक, क्योंकि इन सारे अध्यायों में गायन साम का ही वर्णन है । उसी से अमृत अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति जताई गई है। जै० उ०मा० ३४० के प्रारम्भ में यही कहा गया है- तदेतदमृतं गायत्रम् । एतेन वै प्रजापतिरमृतत्वमगच्छदेतेन देवा एतेनर्पयः ॥२॥ अर्थात् यह यही अमृत गायत्र (साम) है। इसी से प्रजापति मुक्त हुआ, इसी से (अन्य) विद्वान्, इसी से मन्यार्य द्रष्टा (ऋषि)। इस ब्राह्मण में दो स्थलों पर अर्थात् ३२४०-४२॥ और ४।१६,१७॥ पर टोपश परम्पराए आई है । अन्तिम वंश परम्परा पहली से कुछ ही अन्य नाम रखती है । यह है भी छोरी । पहली का भारम्म 'ब्रह्म" से होता है । (२) ग्रह्म ने (२) प्रजापति के लिये। उसने (३) परमेष्ठी के लिये । उसने (४) देवसविता के लिये इत्यादि। शतपथब्राह्मण (माध्यन्दिन) में भी दशम कागड की समाति पर और चौदहवें काण्ड के अन्त से कुछ पहले दो भूपि यथा- चलिया प्राई है। पूर्वली में बताया गया है कि स्वयम्भु ब्रह्म ने प्रजा- पति को विद्या पढ़ाई, और उत्तरली में कहा है कि परमेष्ठी को। १० उ० मा में एक रूप से इन दोनों का मेल है। अर्थात् प्रह, प्रजापति, भौर परमेष्ठी यद्यपि समकालीन पे, तयापि गायत्र साम का रहस्य ब्रह्म मे स्वय परमेष्ठी को नहीं बताया, प्रत्युत यह उस मक प्रजापति द्वारा प्राया।

जैमिनीय ब्राह्मण कोई नया ब्राह्मण नहीं । शतपथ ब्रा के दिः वय में बहा से लेकर अपने माप (घय) तक १८ नाम है। जै. उ० प्रा० के प्रथम वश में ब्राह से घर येपदिचत दा. गुप्त लौहित्य तक ५७ नाम है । प्रत्येक ब्राह्मण के सथ वों को मिला कर और यदि कुछ नाम छुट गये है ता उनका स्थान छोड़ कर भी ब्रह्म से मृपियों की एक जैसी सरया हाजायगी। इस से प्रतीत होता है कि प्रार्यावर्त के इतिहास में प्राणों के साजन का समय प्राय एफ ही था । ब्रह्मा से जो अनेक विधायें अनेकों कुलों में चली आई थीं, वही इतिहासयुक्त करके प्राय एक फाल में एकत्र कर ली गई। जैमिनीय ब्राह्मण भी उसी समय सकलित हुया। जब यह मान्य छप रहा था, तब श्रीमान् पारेण्ड महाशय ने मुझे पर लिखा कि वे अप्रैल के कई पाठ शुद्ध कर देंगे। तब मैने उन्हें मुद्रित७२ पृष्ठ भेज दिये थे। उन्होंने उनके हाशिये पर सशोधन कर दिया है । यह भूमिया के अन्त में छाप दिया गया है । अगले पृष्ठों का साधन फिर भी छापा जायगा । इस परिश्रम के लिए जो उन्होंने स्वय मेरा, भ्यान उधर खेंच फर किया है, मैं उन पा अत्यन्त अनुगृहीत। इस ग्रन्य के प्रफ प० विश्ववन्धु एम० ए० शास्त्री, तथा ५० हसराज पुस्तकाध्यक्ष लालचन्द पुस्तकालय ने देवे है। इन दानों महाशयों का मी मैं वृत्त । परमदयामय भगवाद सपनी पा से इन हृदय पार प्रन्धों के प्रचार में मेरी सहायता करें। इत्योम् दयानन्द महाविद्यालय लालचन्द पुस्तकालय लाहौर भगयत्त भाय, समान्ति स. १९७७ ७ Www ६, ४ श्री कालेण्ड-प्रदर्शित सटिप्पण पाठ संशोधन । प्रकाशित पाट सशोधित पाट पृ० १२ तिच्यादेवमे० सिध्यतैवमे हेपा खला पाखला उतैपाखला उतपासला ५. प्रति यस्य प्रत्यस्य हस्तले पाठ शुद्ध है। देखो पाठभेन। लोष्ठो लोटो ळयित्या पनि ळयित्वापनि वर्ज ववृजे बहुभू. वहोर्भू च वेद वावेद पदमृते यदन्चे देवा देवाः कस्मादु कस्माउ सप्ताहोरात्रा सप्त होनाः अभिपयक्त अभिपर्यस्त ३ उञ्चा [उच्चा] ह[स्म] च० २ तद्यद्वै यद्यद्वै प्रजापतिर्वा वेद अग्र प्रजापति वेदमन ४१, १२ मुनोति सनोति ५३. ૨ सर्क सर्व ५३, भयतन भयतना ५८, ३ ०पुनीचं न पूनावै पुनीध्यमपूतावै १५ ययाच पपाच or पपर्च * The mss (Gmntha) aare ववृज or धग्रज which nearly is the same in Grantha. If the Sandhi is effaced we vught to return वजे । । इदमायतना Is a bahurrihr compound. पाठभेद जो नीचे दिया है, यह ठीक है। Must be corrupt. ६ है चै० ४०० शुद्धिपत्रम् । पं. अशुद्ध ५ सिंहिक ८.६६ ११ अग्नि शुद्ध सहि सूर्य ३ सा ०सा- यत्पर नद B मामूल प. यत्परतद शामूलप. श्रेयस पनि श्रय स U0 ६३ घाट वाड् • पाणी पानो ११ गुण्यामु रना मणाति म्यगम्य युप्मान ग्ता स्पृणाति स्वर्गस्य १८० स Eliahlalh2 bllah TOUTATTOO ओ३म् जैमिनीय-उपनिषद्-ब्राह्मणाम् ३ ४ प्रजापति; इदं त्रयेण वेदेनोऽजयद् यदस्येऽदं जित तत् ॥ १॥ स ऐक्षतेऽत्यं चेद्वा अन्य देश अनेन वेदेन यक्ष्यन्त इमां पाव ते जिति जेप्यन्ति ये ऽयम्मम । इन्त त्रयस्य वेदस्य रस- मादढा इति ॥ २ ॥ स भूरित्येपर्वेदस्य रसमादत्त । सेऽयम्पृ- थिव्यभवत् । तस्य यो रसः प्राणेदत् सोऽग्निरभवद्रसस्य रस: ॥ ३ ॥ भुव इत्पेर यजुर्वेदस्य रसमादत्त । तदिदमन्तरिक्षमा भवत् । तस्त्र यो रसः प्राणेद स वायुरभद्रसस्य रसः॥४॥ सरित्येा सामोदस्य रसमादत्त । सोऽसौ धौरभवत् । तस्य यो रसः पादत् स आदित्योऽभवठसस्य रसः॥ ५॥अथेऽस्ये- Sपाऽतरस्य रसं नाऽशनोटादातुप ओमित्येतस्यैऽव ॥६॥ सेऽयं वागभवत् । मोमेन नामेऽपातम्या उमाण परसः॥७॥ तान्येतान्याहो । अष्टाक्षरा गायत्री गायत साम। ब्रह्मा उ गायत्री। तद् ब्रह्माऽभिसंपद्यते। अष्टागफाः पशबस्तेनो पगव्यम ॥८॥१,' प्रथमेऽनुवाके प्रथमः गण्डः । १.६पेन 21 ।

५ स यद ओमिति मो.ग्निर्वागिति पृथिच्योमिति यापुर्या- गित्यन्तरितमे मित्यादित्यो वानिति धारोमिति प्राणो वागिदेव वाक् ॥ ॥ स य एवं विद्वानदायत्यामित्येवाऽनिमादाय पृथि च्याम्मतिद्वापयत्योमित्येव वायुमादायाऽन्तरिक्षे मतिष्ठापयत्यो- मियाऽदित्यमादाय दिवि प्रतिष्ठापयत्योमित्येव मायमाढाय वाचि मातेप्टापयति ॥ ॥ तद्देऽनच्छलना गायनं गायन्त्यो- वा३ च् प्रोगान् प्रधा३च् हुम्मा प्रोवा इति ।। ३ ।। नदु है तत्पराद इयाऽनायुप्यम इव। सदायोचाऽपां चानुपम गेयम || पदै वायुः पराइ एव पर्वत तीयेन (स ) । स पुरस्ताद्वाति स दक्षिणतस्स पश्चात्म उत्तरतस्स उपरिष्टात्स सी दिशोऽनुस- वाति ॥ ५॥ तदेतदाहुरिदानी वा अयमितोऽसीदयेऽत्याद्वाती ऽति। स यद्रेप्माणं जनमानो निवेष्टमानो वाति क्षपादेव विभ्यत् ॥६॥ यदु हवा प्रापः पराचीरेन प्रस्तास्स्यन्दरन् तापेरस्ताः। यदवासि कुर्वाणा निोटमाना पापीन एनमाना यन्ति क्षयादेव विभ्यताः । तदेवदायोश्चऽवाऽपा चाऽनु पर्म गेयम || प्रयोऽनुवाके द्वितीय खण्ड.। २.१मन्तरीदः। २ मापा । ३ याची । ४ छेद कीज-१५ चारपसंद, पुरा७रिष्ठात् ।८सीत! स्यनमानी. जमानी। १७चम ११ यद्, यद् १२ गहसि । .

गोवा मोवा ओवा हुम्भा ओवा इति करोत्येव । एताभ्यां सर्वमायुरेति ॥ १ ॥ स यथा वृक्षमामणराक्रममाण इयादे- वमेवेऽते द्वे-वे देवते संधापेऽमां लोकान् रोहन्न ते ॥२॥ एक उ एव मृत्युरन्वेत्यशनयेऽव ॥ ३ ॥ अथ हिङ्करोति । चन्द्रमा वै हिङ्कारोऽनमु वे चन्द्रमाः । अन्नेनाऽशनयां नन्ति ॥४॥ तां-तामशनयामनेन हत्तोऽमित्येनमेवाऽऽदित्य समयापति मुच्यते । एतदेव दिवश्किटम् ॥ ५॥ यथा ख वानस स्स्यालयस्य वैज्वमे- तदिवश्छिदम् । तद्रश्मिभिस्सरनं दृश्यते ॥ ६॥ यदायत्रस्योऽऽ- हिरातदमृतम् तदात्मानं दध्यादयो यनमानम् । अय यदिौरान सामोऽश्च तस्य मातेहारात् ॥७॥ स यथाऽदिरा- पालज्यन् यया निनानिस्संहज्येत यया तीरे तीरमा- सिध्यादेौजदक्षरमेताभिर्देवताभिस्संसृज्यते ॥ ८॥१,३॥ प्रयमेऽनुशके तृतीय खण्ड । तं वा एतं हिङ्कारं हिम्भा इति हिङ्कुर्वन्ति । श्री भाः । असो वा आदित्यो भा इति ॥ ॥ एतं ह वा एतं न्यङ्गमन गर्भ ३.१ भव र ऐ ३ अक्रम ४ इति ५ त्या, त्य नस ७ रसस्य भरपदू, तद् (१)१० रान् । ४.१भेम्२ गम।

७
इसि । यद् इति खीणाम् जनन निगच्छति तस्मारतो ग्रामगा
विकल्पो जायतेऽतिव्यापी राजन्यश्रः ॥ २॥ एत ह पा
एत न्यामनु रपभ दी । यद् इति निगच्छति तस्गाचतः पुरयो
पलीपर्दो दुहाना धेनुरक्षा दशवाजी जायन्ते ।। ३ ॥ एत हवा
एत न्यन्नमन गर्दभ इति । यद् इति निगच्छति तस्मात्स पापीया-
ज्यमीषु जगति नम्मादम्य पारीयतश्रेयो जायतेऽश्वतरो वा.
ऽ धागे ।। ४ । एन र पा एत न्यामनु कुन इति । यद् इति
निगति तस्मात् मानायसनपिराज्ञः समाति ॥ ५॥ तहे-
उनमेके हिवार हिसा ओग इति रहियेच हिन्ति । रहि
वे श्री. श्री सातो हिडार इति ॥ ६ ॥ स य एन तर
ग्रूपानहिन्यिा अय श्रियमति पापीयान् भविष्यति ।
स यदा ये प्रियतेऽयाग्नी प्रास्तो भवति ।
तिमेचतमरिप्यत्पनोरनम्मासिष्यन्ति" इति तथा हैऽस्यात्
॥ ७ ॥ तस्माद् है त हिवार हि वो इत्यन्त रिवैवाऽऽत्मन्न.
जयेत् । तथा ह न यहिया श्रिय कुरुते मर्गमायुरेति॥८॥',४
प्रयमेऽनुगाके चतुर्ध सण्ड ।
४३रित्रण ४ जायत इति य५ यपत् य इति' अधिप ८
नास्थ्यएम माध्यस + प्रोम याराम तत्र प्रयाद १०
रहिये प्रोम् । [यनोऽनि
,

४ ४ सा हैऽपा खला देवतागधन्तोऽतिष्ठति । इदं वै त्वमत्र पापपकर्णेऽऽऽप्यसि । यो व पुण्यकृत् स्यात् स इहेऽयादिति ॥॥ स रूपादपश्यो वै तं तबदहं तटकरवं तद्वै मा त्वं नाऽका- रपिप्यस्तं रे तस्य कर्ताऽगीति ॥ सा ह वेद सत्यम्माऽऽहे- जति । सत्यं हेऽपा देवता । सा ह तस्य नेऽऽशे यदेनमपसेधेद सत्यमुपैजाहयते ॥ ३ ॥ अथ होऽवाचऽऽक्ष्वाको वा वाणो- सुक्ता वा सात्यकी तैषा रुला देवताऽपसेधुमेव प्रियतेऽ- म्ये दिगः ॥४॥ एतद् ] दियोऽन्तः । तदिमे द्यावापृथिवी भश्लिप्यतः । यावती व वैदिस्तारतीऽयम्पृथिवी । तद्यत्रैतञ्चा- त्वाल खान तत्सम्मति स दिव आकाशः ।।५॥ तद्वहिप्पवमाने स्तुयपाने मनसोहीयात् ॥ ६॥ स ययोऽच्छ्रायम्मति यस्य अपयेतेऽयमेवैतया देवतयेदमगृतमभिपयेति यत्राऽयमिदं तपती- ति ॥ ७ ॥ श्रय होवाच-1८, १, ४ ॥ प्रथमेऽनुगाके पञ्चम. खण्ड । गोपलो वार्ण: क एतमादित्यमहति समयेऽतुम् । दुरावा एप एतत् तपति न्यड् । तेन वा एतम्पूर्वेण सामपथस्तदेव मनसा- ११ १२ ५. १ 'ऽति' अधिक २ त्वद् ३ अर्क ४ स ५ सत्यम्महे ८ मतम् अक्षको ८सत्यकीर्त भ१० धृय ११ प्रत्यस्य १२ ऽतलय।

१ 5 हत्यो परिष्टा देतस्पैतस्मिन्नमृते निदध्यादिति ॥१॥ तद् । होगाच शाट्यायनिस्समययाऽतदनं वस्तद्वेद । यद्येवा भापो या भभितो यद्वायुं स एप उपद्वयते रश्मीन्या एप तदेतस्मै व्यूह- तोति ॥ ॥ अथ होगाचाऽत्रुग्यो जानश्रुतयो यत्र वा एप एतत् तपत्येतदेवामृतम् । एतदै प्रामोति ततो मृत्युना पाप्मना च्यावतते ॥ ॥ वस्तद्वंद यत्परेणाऽदित्यमन्तरिक्षमिदमना- नयनमारेगा ।। - ॥ प्रथैनाऽमृतम् । एतदेव मा यूयम्भाप- पिप्यथ । एतदेवाह नातिमन्य इति ॥५॥ तान्येतान्यष्टौ । अष्टादरा गापनी । गायनं साम । नाम उ गायनी । तदु ब्रह्मा- भिसम्पयते अष्टायफाः पशास्तेनो पशुच्यम् ॥१॥६॥ प्रथमेनुपाके पष्ठ खण्ड । ता पता भष्टो देवताः । एतारदिदं सर्वम् । ते फरोति ॥॥ स नै लोके पाप्मने भ्रातृव्यापाराश कुर्यात् ' मनसैन निर्भजे ॥०॥ तदेतचाऽभ्ननूच्यते । "चत्वारि वाक् परिभिता पदानि तानि विद्याह्मणाये मनापिमाः। -- ६.१पाम्प २ तप, त३ स्थप्रयो५माम बाचा (1) उलुक्यो, जलस्यो बहसपरोबर प्रविषय १०, प्रापिए ११ यत ।

- गुहा त्रीणि निहिता नेऽङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति" इति ॥३॥ तद् यानि तानि गुडात्रीणि निहिता नेऽङ्गपती (st)sम एव ते लोकाः॥४॥ तुरीयं वाचो मनुप्या पदन्तीति । चतुर्भाग हदै तुरीयं वाचः । सर्वयास्य याचा सर्वैरेभिर्लोस्सणात्य कृतम्भ- पति य एवं वेद॥ ५॥ स यथादमानमारवण मृत्वा लोप्ठो विध्वं- सत एवमेव स विध्वंसते य एवं विद्वाँसमुपपदति ॥ ६ ॥ प्रथमेऽनुपके सप्तमः खण्डः। भर.मोऽनुवारस्समाप्तः॥ मजापतिर्वा इदं त्रयेण वेदेनाऽजयद्यदायेद जितं तत् ॥३॥ स ऐततेत्य चेदा अन्ये देवा अनेन वेदेन यक्ष्यन्त इमां वाच ते नितिं जेप्यन्ति येऽयम्मम ॥ १॥ इन्तेऽमं त्रयं वेदम्पीयानीति ।। ३ ।। स इमं त्रयं वेदमपीळयत । तस्य पीळयम्नेव मेवाक्षरं ना- शक्नोत् पीलयितुमोमिति यदेतत् ॥ ४ ॥ एष उ ह वाव सरसः । सरसा ह वा एवंविदस्त्रयीविद्या भवति ॥५॥ स इमं रसम्पी- ७.१ तानि २ नो, मोम ३ गयन्ति ४ तानि ५ थोम् हत्या छोटोभोम् एवम् विश्वंसते । स एपो...उपयदन्ति । १.नेर-दा, ६३ को मं ।

૧૨ १३ 9F १७ यित्वा पनिधायोऽर्थोऽवत् ॥६॥तं द्रवन्तं चत्वारो देवाना- मन्मपश्मन्निन्द्रश्चन्द्रो रुद्रस्समुद्रः। तस्मादेतेश्रेष्ठादेवानाम एते ही- नमन्वपश्यन् ।। ७॥ सयोऽयं रस मासीत्तदेव तपोऽभवत् ॥८॥ त इमं रसं देवा अन्वक्षन्त । तेऽभ्यपप्यन्त स लपो वा अभूदिनि ॥६॥ दममु वै त्रयं वेदम्मरीमृशित्वा तस्मिन्नेतदेवाक्षरमपोळित- मविन्दन्नोमिति यदेतत् ॥ १०॥ एप उ ह वार सरसः । तेनै- नम्मायुक्न् । यथा मधुना लाजान् प्रयुयादेवम् ॥११॥ तेऽभ्य- तप्यन्त । तेपां तप्यमानानामाप्यायत वेदः। तेऽनेन चतपसाऽपीनेन च वेदेन तामु एव नितिमजयन् याम्प्रजापतिरगयत् । न एते सर्व एव प्रजापनिमात्रा प्रया३म् अयम इति ॥ २॥ तस्मात्तप्यमा- नस्य भूयसी कीतिर्भवति भूयो यशः । स य एतदेवं वेदेवभेषा- ऽपीनेन वेदेन यजते। यदो यानयत्येवमेवाऽपोन वेदेन यानयति ॥ १३ ॥ नस्य हेतस्य नैर काचनाऽतिरस्ति य एवं वेद । स य एवैनमुपवदति सातिमृन्छति ॥ ४ ॥ हितीनुमा प्रयम. सार। छोयो ७ सेन स्मन् पच रोभ्यर २० यम्-११ पीळित, ना २ स १३ प्राय ४ ययाद ५ग सेन सनी १६ या-पान यो T- २०पर गो-२ - ३ मन १९ २३ । तदाहुर्यदोवा श्रीवा इति गीयते काभवति क सामेति ॥१॥ोम इति च साय यामिन्यून् । प्रोमिति मनो यागिति पार । प्रोमिति माणे वागित्येव बाद । ओमिता चागिति सबै देवाः । तदे- तदिन्द्रमा सर्वे देवा अनुपन्ति !, · । भोमित्यनदेवाक्षरम् । एतेन वै.संसवे परस्येन्द्र हमजीत । एतेन ह वै तददो दालभ्य प्राजफे- शिनामिन्ट चार्ज । योगिन्यतेनेवाऽऽनिनाय ॥३॥तान्यतान्यष्टौ। अष्टाक्षरा गायत्री। गायत्रं साग। ब्रल उगायत्री। तदु ब्रह्माभिराम्प- यते । अष्टाशफाः पशवस्तेनो पशव्यम ॥४ातस्यैतानि नामानीन्द्रः कर्माक्षितिरमृतं ज्योमान्तो वाचः । बहु यस्सर्वं सर्वस्मा- दुनरं ज्योतिः।ऋतं सत्यं विज्ञानं विवाचनमप्रतिवाच्यम् । पूर्व सरसर्वा याक् । सर्वमिदमपि धेनुः पिन्वते परागक श0 हितीयेऽनुवाके द्वितीय. सगड.। सा पृथक्सनिलं कामयाक्षिति माणसहितं चतुश्श्रोत्र वाक्प्रभृतम्मनसा व्याप्त हृदयान ब्राह्मणभक्त मन्नशुभं वर्षपवित्रं ४ १. पया।२ प्रोगात (=ोग ३?) ३. र। १.अह-५-शीन-शम-1६. यमज । ७ वनिनाय - चीति -हिर 1१०.विजिशा-११-यः। २ सारे-तुधोञ्-३-दयोग्र-18. भ्रफ्यम्, भ्रम, भृत्रम् ।

ट गोमग म्पृथिव्युपरं तपम्तनु वरणपरियतनमिन्द्र श्रेष्टं सहस्राक्षर- मधुतपारममृत दुहाना सर्वान् इमॉलोकानभिषिक्षरतीति ॥१॥ तदेतत् सत्य मतर यढोम् इति । तस्मिन्नापः प्रतिष्टिता अप्नु पृथिवी पृथिव्यामिमे लोकाः ॥२॥ यथा मूल्या पनागानि सन्तृगणानि स्युरेवमेतनातरेमे लोकारस् तृरागाः ॥॥ तदिदमिमान प्रतिविम्य दशया क्षरात शतथा सहमधाऽयुतधा प्रवुतरा (नियुतधा) ऽव॒दधा न्यदया निसरी पद्ममतिनि- च्योमान्तः ॥ ८॥ यायो विप्यन्दमानः पर:-परोपरीयान् भव- त्येवमेतदक्षरम्परः-परोवरीयो भवति ॥५॥ ते ते लोका जनाएर श्रिताः । इम एव प्रयोदशमासाः ॥६॥ स य एव विद्वानुदायति स एवमेवैतॉलोवानतिवदति । भोमित्येतेनाक्षरेगा- मुमादित्यम्मुख आपत्ते । एप हा एतदक्षरम ॥७॥ तस्प सर्वमाप्तम्भाति सी जित न हाऽम्य कश्चन कामोऽनासो भाति य एव वेद ॥८॥ तद्ध पृथुन्या दिव्यान नात्यान पपन्छ । ५ पयंद-18-1 । श्रामिति । ८-प्नु । प्राम,'पद' और दशधा के मध्य स्थान रिन है। १०नियु-११ निसर्गच,निम्वर्यदाच । १२-नान् । १३ थोम् । पर परो १५ ॥१५ तसिास पन १७ ॥

१८ १९ ( १ ) स्थूणां दिवस्तम्भनी सूर्य माहुरन्तरिक्ष सूर्यः पृथिवीप्रतिष्ठः । अप्सु भूमीशिश्यिरे भूरिभाराः किं स्विन्महीधितिष्ठन्त्याप इति ॥ ॥ते ह प्रत्यूचुस् • स्थूणामेव दिवस्तम्भनी सूर्य माहुरन्तरिते सूर्यः पृथिवीपतिष्ठः । अासु भूमीशिश्यिरे भूरि- भारास्सत्यम्महीरधितिष्ठन्त्याप इति ॥ १० ॥ मोमित्येतदेवाक्षरं सत्यम् । तदेतदापोऽधितिष्ठन्ति॥११॥२१०।। द्वितीयेऽनुवाके तृतीयः सण्ड । द्विनीयोऽनुवाकरसमाप्तः । प्रजापतिः प्रजा असृजन ।ता एनं स्रष्टा अनकाशिनाराभित- स्समन्तम्पर्यविशन् ॥१॥ ता अब्रवीत् किंकायास्स्थेति । अन्नाथ- कामा इत्पन्नुवन।।२॥सोऽब्रवीदेकं चै वेदमन्नायमति सामैच तदः प्रयच्छानीति । तन्नः प्रयच्छेत्पवन ॥३॥ सोऽब्रवीदिमान्य परान् भूयिष्ठमुपजीवामः । एभ्यः प्रथमम्पदास्यामीति ॥४॥ तेभ्यो हिङ्कारम्पायच्छन् । तस्मात्पशवो हिड्तरिकतो विजिज्ञास- १८-मिश् । १६ शिशिरे। २० प्रथित् । १. या १२. पाम्-१३ पृय-४ -स्तो।

५ माना इस चरन्ति ॥शा प्रस्तावमगुप्येभ्यः । तस्मादु ते रतुक्त इवेदम्मे भविष्यत्यदो मे भविष्यतीति ॥६॥ शादि क्योभ्यः। तस्मात् तान्पाददामान्युपापपातमिव चरन्ति जाहीथं देवेभ्यो ऽमृतम् । तस्मातेऽमृताः ॥८॥ प्रतिहारगारण्येभ्यः पशुभ्यः । तस्मात्ते प्रतिहताहन्तस्यमाना झ चरन्ति ॥६॥ १४॥ तृत येऽनुपाचे प्रथम खण्ड । उपद्रव गन्धर्वाप्सरोभ्यः । तस्मात्त उपद्रव गृहन्त इन चरन्ति ॥१॥ निधनम्पितृभ्यः । तस्मादु ते निधनसस्थाः ॥२॥ तघदेभ्यस्ता साम प्रायच्छदेतमभ्यस्दादित्यम्नायच्छन् ॥३॥ स यदनुदितस्सहिड्तारोऽयोंदितः प्रस्ताव पासगवमादिमा यन्दिन उदीयोऽपराहणः प्रतिहारो यदुपात्तमय लोहितायनि स उपयो ऽसमित एव निधनम् ॥४॥ स एप सलिसिसमा नयदेप सरस्सपस्तस्मादेप एव साम । स ह वै सामवित् स साम वेद य एर पेट ॥ ॥ ते ऽधुपन दृरे वा इदमस्मत् । तद कुरु ५ स्तुवतेव16 प्रतिहतास् । ७ सात (?) म (!) यमाना तातास्यमाना। १-प्रापसरेभ्य | अोदित् ।३मादित्य ४ द्विवार ससामघेद' देता है।

६ यनोपजीवामेति ॥६॥ तहतूनभ्यत्यनयत् । स वसन्तमेव हिड्तार- मकराग्रीष्मम्मरतार व मुद्रीय श्रदम्पत्तिहार रेमन्त नियनम् । मासार्थमासापेर सप्तामानकरोत् ॥७॥ तेऽब्रुवनेटीयो न्यावेतर्हि । तत्रेव यत्रोपजीनामेति ॥८॥ तत् पर्जन्यमभ्यत्यनयत् । स पुरोगातमेव हिद्वारमकरोत् ॥६॥ १२॥ तृतायऽनुवाके द्वितीय सण्ड । ५ जीमूना प्रस्ताव स्तनयित्नुमुद्रीय विद्युतम्मतिहार वृष्टि निधनम् । यष्टात्मजाश्चोपपयश्च जायन्ते ते सप्तम्यादकरोत ॥१॥ तेऽनुग्नेदीयोन्यावहि । तत्रत्र कुरु यनोपजीवामेति ।।२।। तद्यज्ञमभ्यत्यनयत् । स यजूंप्येव हिड्तारमकरोडचः प्रस्ताव सामान्युद्गीथ स्तोमम्प्रतिहार छन्दो निधनम् । स्वाहाकारवपद- कारावेव सप्तमारकरोत् ॥३॥ तेऽगुवन् नेदीयो न्वावैताह । तत्रेय कुरु यत्रोपजीवामेति ॥४॥ तत्पुरुपमभ्यत्यनयत् । स मन एव हिवारमकरोदाचम्पम्तापम्माणमुद्गीथ चक्षुःप्रतिहार श्रोत्रनिधनम् रेवश्चय प्रजा च सप्तमावकरोत् ॥५॥ तेऽब्रुवनन वा एनत्तद- ५-म इति ।६ कर-1७ प्रस्ताव । वर्षा उहीथ , शरत्प्रतिहार श्राम शरदम्पनिहारम् । २ प्रतारम् -तिर । ३सपतम्-४म इति । ५ अभ्यत्यत्यन-I ( १४ ) कार्यवोपजीविष्याम इति ॥६॥ स विद्यादहमेव सामास्मि मग्येता देवता इति ॥७॥ १ ॥ १३॥ तृतीयेऽनुवाके तृनीय प्रगड । न ह दरे देवतस्स्यात् ! याबद्ध वा प्रात्मना देवानुपान्ते तावदस्मै देवा भवन्ति ॥ ॥ अथ य एतदेवं वेदाऽमैत्र सामाऽस्मि मग्यतारा देवता इत्ये हाऽस्मिनतास्सर्वा देवता भवन्ति । तदेतद्देवश्रुत्साम । सर्ग ह वै देवताइएवन्त्य- विदम्पुण्याय सावे । ता एनम्पुण्यमेव साधु कारयन्ति ॥३॥ स ह स्माऽऽह मुचित्तश्शैलनो चो यज्ञकामो मामेव स गीताम् । तत एवंऽन यज्ञ उपनस्यति । एकविर हुदायन्नं सर्वा देवता अनुसंतृप्यन्ति । ता अस्य तृप्तास्तथा कुरिप्पन्ति यथैऽन यन्त्र उपनस्यतीति ||४|| तृतीयेऽनुवा चतुर्य खण्ड । तृतीयोग्नुनपस्समान । देवा वै संग लोकमैप्सन् । तं न पाना नाऽऽसीना न तिष्ठन्तो न धावन्तो नर केनचन कर्मणाऽऽप्नुवन् ॥ ॥ से देवाः प्रजापतिमुपागात वगैरे लोक मंप्सिम । तं न शयाना १ देयत ।२ मोम् ।३ एम्मा ४ देभित् । देवत् पयशृत्त । ५-न! १-शाना।२-त्यो । ३ उपाय-1 ४ ( १५ ) नाऽऽसीना न तिष्ठन्तो न धावन्तो नैव केनननकर्मग्गाऽऽपाम । तथा नोऽनुशाधि यथा स्वर्ग लोकमाप्नुयामेऽति ॥२॥ तानब्रवीत साम्नाऽनृचेन स्वर्ग लोकम्मयानेऽति । ते साम्नाऽनृचेन स्वर्ग लोकम्पायन ॥ ३ ॥ प्रया उमे साम्नाऽगुरिति । तस्मात्प्रसाम तस्मादु प्रसाम्पन्नमति ॥४॥ देवा वै स्वर्ग लोकमायन् । त एता- न्यूक्पदानि शरीराणि धून्वन्त आयन् । तेस्वर्गलोकमजयन॥५॥ तान्या दिवः प्रकीर्णान्यशेरन् । अथेऽमानि प्रजापतिब्रक्पदानि शरीराणि सञ्चित्याऽभ्यचत् । यदभ्यर्वना एव!ऽभवन् ॥६॥ १ चतुर्थे नुवाके प्रथमः खण्डः। सैवर्गभवदियमेव श्रीः । अतो देवा अभवन् ॥१॥ अधेऽपामिमाममुरारिश्रयमविन्दन्द्र । तदेवाऽऽमुरमभवत् ||२|| ते देवा अनुवन् या वै नश्रीरभूदविदन्त तामसुरः । कथं न्वेपा- मिमांश्रियम्पुनरेव ज्येऽति ॥३॥तेऽब्रुवन्नृच्येव साम गायामेति । ४ प्रयामे। ५ प्रयाते, प्रधामे, प्रयामे I लोकंमप्रायत् । ७ इसके याद पुरगड़ पड़ है।५ के पूर्व यह सय में लिखा है 'तएतान्य॒क्पदानि शरीराणि धून्वन्त प्रायन् (न्ययन् )। ते स्वर्गलोकमजयन् (-अत्)। प्रयमानि प्रजापतिर ...ताप्योंग्मयन् ।८ यत् । प्रोम् । ते वर्ग अजयन्, यहांअधिक है। १० प्रोम् । यद्...... । ११ भोम् ।ता एच। १पासू-1 २ तद् । ३ एवा । ४ विन्दन्त ।५ अय।

( १६ ) ५ ११ ૧૨ १३ ते पुनः प्रत्याद्रुत्याचे सामाऽगायन । सेनाऽस्माल्लोकाट- मुराननुदन्त ॥४॥ तद्वै माध्यन्दिने च सपने तृतीयसरने च नचाऽपराधोऽस्ति । स यत्ते चि गायनि लेगाऽरभालोकाद द्विपतम्भ्रावृष्यं नुते । पाथ यदमृते देवतामु मातरसवन नापति बेन स्वर्ग लोकमेनि ५|| प्रगापति लाग्नेऽमांजितिमजयद्याऽरये ऽयं जितिन्ताम् । स वगै लोकमारोहत ॥६॥ ते देवाः प्रजापति- मुपेत्याऽवस्मभ्यमपीऽदं साम प्रयन्छेति । तथेति । तदे स्सार मायन्तु ॥७॥ तदेनानिदं राम संग लोकं नाकागयत बोढुम ॥८॥ ते देवाः प्रजापति सुपेल्याऽनुवन् यद्र नम्साम मादा इदं व नालवर्ग लोकं न कामयने वोटुमिति ॥६॥ तदै पाप्पना संसजती।कोग्य पाप्मेति । ऋगिति । तहना समयजन् ॥२०॥ तदिदम्मजापतेर्गयमाणमनिष्ट्रनिटं वै मा तत्पाप्मना सम- साक्षुरिति । गोमागीयस्त्वतेन न्यावर्तयाद्वयेव स पाप्मना याता इति ।।११॥ स य एतचा मानस्सबने न्यावर्तयति च्ये स पाप्मना वो ॥१२॥ १।१६।। चतुर्थेऽनुगके द्वितीय पण्ड । दुच्चस । गीत-1-पराधी-चिनृत्ते । ११ तम् । १२ भर-1१३ न कामायने, न कामयते । १४ फामाय-, मामय,। १५-1 १६ पय। १॥

( १७ ) नवार्यदोवा पोवा इति गीयते कात्रभवति क सामेति।। प्रस्तुवनेयाष्टाभिरक्षरैः प्रस्तौति । अष्टाक्षरा गायत्री । अक्षरमतरें ध्यक्षम । तचतुर्विंशतिस्सम्पद्यन्ते। चतुर्विशसक्षरागायत्री ॥२॥ तामताम्प्रस्तावनचमाप्त्वा या श्रीर्याऽपचितिर्यस्वर्गोलोको यद्यशों यदन्नाचं नान्यागायमान भास्ते ॥३॥ ॥१७॥ चतुर्थेऽनुवाके तृतीय. यण्ड । १ ૨ ३ प्रजापतिर्देवानसजन । तान् मृत्युः पाप्मान्वसृज्यत ॥२॥ ने देवा प्रजापतिमुपेयात्रुवन् कस्मादु नोऽसष्ठा मृत्युचेन्नः पाप्मा- नमन्ववस्रक्ष्यन्नासियेति ॥२॥ तानववीच्छन्दसि सम्भरत । तानि यथायतनम्मविशत ततो मृत्युना पाप्मना व्यावस्ययेति ॥३॥ वसवो गायत्री समभरन् । तां ते प्राविशन् । तान् साऽच्छादयत् ॥ ४॥ मद्रास्त्रिष्टुभं समभरन् । तां ते माविशन् । तान् साऽच्छाद- यत् ॥५॥ प्रादिसा जगतीं समभरन् । तां ते प्राविशन् । तान् साऽच्छादयत् ।।६।। विश्वेदेवा अनुष्टुभं समभरन्। तांते माविशन् । तान् साऽच्छादयत् ॥७॥ तान् अस्यामृच्यस्वरायाम्मृत्युनिरजा- १ प्रस्तावेनस्तयेन ।। १ ता, ताः।२ करमा । ३-था । ४-सक्षन्न् । ५-शन् । ६-याश्य, यत्स्य-७च्छाद्, याम् ।

१. ( १८ ) नाद्यथा मणौ मरिगमूत्रम्परिपश्येदेवम ॥८॥ ते स्वरम्प्राविशन् । तान् खरे सतो न निग्जानात् । स्वरस्य तु घोपेणाऽन्त || त प्रोमिसेतदेवातरं समारोहन् । एतदेवाक्षरं नयीविद्या । यददो ऽमृतं तपति वत्मपय ततो मृत्युना पाप्मना व्यावर्तन्त ॥१०॥ एवमेवैवं विद्वान् प्रोम्सितदेवाक्षरं समारुह्य यददोऽमृतं तपति नत्मपय ततो मृत्युना पाप्मना व्यावर्तनेऽयो यस्यैनं विद्वानुगा- यति ॥१२॥१६॥ चतुर्थेऽनुवाके चतुर्थ खण्ड । चतुर्थोऽनुवाकम्समाम ।। . अधैतदेकविशं साम ॥२॥ तस्य अय्यर विद्या हिङ्कारः । अनिर्वायुरसावादिस एप प्रस्तावः । इम एच लोका आदिः । तेषु हीदं लोकेषु सर्वमादिनम् । श्रद्धा यशो दक्षिणा एपउहीयः। दिशोऽयान्तरदिश प्राकाश एप तिहारः। प्रापः प्रजा भोपपय एप उपद्रयः । चन्द्रमा नवनाणि पितर एतविधनम ॥२॥ तदेनदेकविंशं साम । स य एवमेतदेकविंशं साम वैदेतेन हास्य ८-चैन । नास्ति । १० प्रो। ११-पेद । १२ एदो, भो। १।२ थायायुर् । ३ येषु । ४-मा।

सर्वेणोद्रीतम्भवसेतस्माद्रेव सर्वस्मादायते य एव विद्वांसमुप- वदति ॥११॥ पश्चमाऽनुवारसमाप्त । इदमेवेदमग्रेऽन्तरिक्षमासीत् । तदेवाप्येतहि ॥१॥ तदेतदन्तरित य एवाऽयम्पयत एतदेवान्तरिक्षमा एप हवा अन्तरिक्षनामांगा एप उ एवैप विततः तद्यथा काष्टेन पनाशे पिप्कन्धे स्यातापक्षण या चक्रावतेनमो लोकौ विष्कयौ पातम्मिन्निदं सर्वमन्तः । तद्यस्मिन्निदं सर्वमन्तम्तस्मादन्तर्यक्षम । अन्तर्य डवै नायैतत् । तदन्तरिक्षमिति परोक्षमाचक्षते॥१तद्यया मूताःप्रवद्धाः प्रलम्थे- रने हैतस्मिन्सर्वे लोकाः प्रबद्धाः मलम्बन्ते ॥५॥ तस्यैनस्य साम्नम्तिख आगात्रीण्यागीतानि पविभूतपयतमः प्रतिष्ठा दश प्रगास्सप्त संस्था द्वौ स्तोभावक रूपम् ॥६॥ तयास्तिस्र आगा इम ते लोकाः ॥७॥ अथ यानि (श्रीगय) मागीतान्यनिर्वायुरसा ५-अम् । ६ प्रावृच्योते। १-१-२ अधिक है ' एप ह वा अन्तर्रादम् । ३ एवम् । ४ नास्ति । ५-दोना-1६ नवम् । ७ एतन १८ नास्ति। तद् . अन्तत् । नास्ति।१०-चन्दनस-नस् । १२ अगमा । १३ एक- रैपम, एकरूपम् । २४ तो। ..

१ २ वादिर एतान्यागीतानि । न ह्वै कांचनश्रियमपराप्नोति य एवं वेद ॥२॥ पऽनुवा प्रथम पगः। अथ याप्पइ विभृतय ऋतरस्ते ॥१॥ अथ याश्चतस्रः प्रतिष्ठा इमा एप ताश्चतस्रोटिशः ॥२॥ अथ ये दश प्रगा इम एव ते दश प्राणाः ॥३॥ अथ यारसा संस्था या एवैतारसप्ताहोरानाःमाची- चपदकुर्वन्ति ता एव ताः ॥ ॥ अथ यो हो रनोभावहोराने एर- ते ॥शा अथ यदेकरूपं कर्मव तन । कर्मणा हीदं सर्व पिक्रियते ॥६॥ तस्यतस्य सान्नोदेवा आजिमारन् । स गजापतिहरसा हिङ्कारमुदनयदग्निम्तेजसा प्रस्ताव रूपेगा बृहस्पतिरहीय स्वधया पितरः प्रतिहारं वीर्येणेन्द्रोनिधनम् ॥७॥ अथेतरे देवा अन्तरिता इवासन् । त इन्द्रमपन् तर वयं स्माऽनुन एतस्मिन् सामना- भनेति॥८॥तेभ्यस्वरम्मायच्छत् ।तम्मनापतिरववीतयेत्यमकः । सर्व वा एभ्यस्साम मादाः । एतारद्वार साम यारान् स्वरः ऋग्गा एपर्ने स्पराद्वतीति ॥६॥ सोऽब्रवीत् पुनर्वामहमेषामेत रसमादा- स्य इति । तानपीऽदुप मा गायत । अभि मा स्वरतति । तघेति १नास्ति । सप्त "एतास । २-मा। ३ वर्ष-1 ४ घद् । ५रपि । ६-७ तायय । -रम । मघर-1१० एपी, एरोम् ।

( २१ ) ११ ॥१०॥ तमुपागायन् । तमभ्यस्वरन् । तेम्पुनारसमादत॥११॥ ११२१॥ पप्टेऽनुवाके द्विनीय सण्ड । स यथा मधुधाने मधुनाळीभिर्म-वासिञ्चादेवमेव तत्सामन् पुना रसमासिश्चत् ॥॥ तस्मादु ह नोऽपगायेत् । इन्द्र एप यदुद्दाता । स यथा सामीपां रसमादत्त एवमेप तेषां रसमादत्ते || कामं ह तु यजमान उपगायेद्यजमानस्य हि तद्गवसथो ब्रह्म- चार्याचार्योक्तः ॥॥ तदु वा प्राहुरपैर गायेत् । दिशो छुपागा- यन् दिशाम सलोकतां जयतीति ॥४॥ ते य एवेमे मुख्याः प्राणा एत एवोद्गातारश्चो पगातारश्च । इमे ह त्रय उद्गातार इम उ चन्दार उपगातारः ।।५॥ तस्मादु चतुर एवोऽपगातॄन कुर्वीत। तस्मादुहोऽपगातॄन् मयभिमशेविदास्स्थश्रोनं मे माहिंसिप्टेति ॥६॥ स यस्स रस आसीद्य एवायम्पवत एप एव स रसः॥७॥स यथा मध्यालोपमयादिति ह स्माह मुचित्तश्शैलन एवमेतस्य रसस्यात्मान- म्पूरयतास एवोद्गातात्मानंच यजमानंचामृतत्वं गमयतीति।।८॥१२२ पठेऽनुवाके तृतीय सयड । पष्ठोऽनुवाकस्समाप्त । ११-ता। १-धुवने। २ 'स' अधिक पढ़ो। ३-यत् । ४-शम् । ५ एर्य । दय1७ऽद्गा--तृन् । ८-तुन् ।

२ ६ ( २२ ) अयमेरेदमग्र आकाश आसीत् । स उ एवाप्येनहि ॥2॥ स यस्स आकागो वागेव सा । तस्मादाकाशादाम्बदति ॥२॥ तामेतां वाचम्प्रजापतिरभ्यपीळयत् । तस्या अभिपीळितायै रसः मागोदत् । त एवेमे लोका अभान ॥३॥स इमॉ लोकानभ्यपीळयत् । तेपामभिपीळितानां रसः प्राणेदत् । ता एवैता देवता मभवनाम- वायुरसावादिस इति || स एता देवता अभ्यपीळयत् । तासामभिपीकिनानां रसः पाणे इत् । सा त्रयीविद्याभवत् ॥शा स त्रयी विद्यामभ्यपीळ पत्। तस्या अभिपीळिनायै रसापारोदत् । ता एवंता व्याहृतयो ऽभरन भूर्भुवस्स्वरिति ॥६॥ स एता व्या- हतीरभ्यपीळयत् । तामामभिपीन्तिानां रसः पाणेदत् । तदेतद- क्षरमभवदोमिति यदेतद् ॥७॥ स एतदक्षरमभ्यपीळयत् । तस्या- ऽभिपीन्तिस्य रसः प्राणेदत् ||८|| १२३॥ सप्तमेऽनुवाके प्रथमः स्वगडः। तदक्षरदेव । यदक्षरदेव तस्मादक्षरम् ॥२॥ यद्रेवाक्षरं ना. तीयत तस्मादक्षयम् । अतयं ह वै नामतत् । तदारमिति १. पता या । २ रसम् ।३ 'स प्रयीम् रसम् (!) प्राणेदत्' अधिक है। ४ नाम्नि। ५-प्रा । नास्ति । स प्रयीम माणेदत् । -मा १-या।

। ( २३ परोक्षमाचक्षते ॥२॥ नद्ध तदेक ओमिति गायन्ति । तत्तथा न गायेत । ईश्वरो हैनदेतेन रसेनान्तर्धातोः । अथो हे वैवम्भवत प्रोमिति । यो इन्यु के गायन्ति । तदु ह तन्न गीतम् । नैव तथा गायेत् । ओं इसेव गायेत् । तदेनदेतेन रसेन सन्दधाति॥३॥ तदेत रसं तर्पयति । रसस्तृप्तोऽक्षरं तर्पयति । अक्षरं तृप्तं व्याहृती स्तर्पयति । व्याहृतयस्तृप्तावेदॉस्तर्पयन्ति । वेदास्तृप्ता देवतास्तर्प- यन्ति । देवतास्तृप्तालोकाँस्तर्पयन्तिा लोकास्तृप्ता अक्षरं तर्पयन्ति। अक्षरं तृप्तं वाचं तपर्यति । वाक् तृप्ताकाशं तर्पयति । आकाशस्तृप्तः प्रजास्तर्पयति । तृप्यति प्रजया पशुभिर्य एतदेवं वेदायो यस्यैवं विद्वानुदायाते ॥४॥ १॥२४॥ सप्तमेऽनुवाके द्वितीय खगड | सप्तमोऽनुवाफस्समाप्तः । 44 अयमेवेदमग्र आकाश आसीत् स उ एवाप्येतहि ॥१॥ स यस्स आकाश आदिस एव स । एतस्मिन् ( ) उदिते सर्व- मिदमाकाशते ॥२॥ तस्य मामृतयोवें तीराणि समुद्र एव । २ या-1३-थे । ४ द्ध, द्वै । ५ नास्ति । ६ नि-1७ ने एव । प्रो। अक्षरं ....."चाचं तर्पयति यह पाठ नहीं । १०-यन्ति । ११ वाफसू । १२ गायति । १६ (!)।२ सुदिते । ३ धैर्य । ४ तरणी ।

. ७ तयत्समुद्रेण परिगृहीतं तन्मृत्योराप्तमय यत्परं तदमृतम् ॥३॥ स यो ह स समुद्रो य एवायम्परत एप एव स समुद्रः । एतं हि संद्रयन्तं सर्वाणि भूतान्यनुसंवन्ति ।।४।। तस्य द्यावापृथिवी एव रोधसी । अथ यथा नयां कंसानि वा महीणानि स्युस्ससि बै- व मस्यायम्पार्थिवस्समुद्रः ॥५॥ स एप पार एव समुद्रस्योदेति । स उद्यन्नेव वायोः पृष्ट आक्रमते । सोऽमृतादेवोदति । अमृतमनु- संघरति । अमृते प्रतिष्ठितः ॥६॥ तस्येन त्रिदूपम्मृसोरनाप्त शुक्ल कृष्णम्पुरुषः ॥७॥ तद्यन्धुलं तद्वाचोरूपाचोडमेमयोः । सा या सा वारक सा । अथ योऽनिर्मृत्युस्सः ॥८॥ अथ यत्कृष्णं तदपां रूपमन्नस्य मनसोयजपः । तथास्ता आपोऽन्नं तत् । अथ यन्मनो १४ १५ यजुएत् ।।। अथ यः पुरुपस्स प्राणस्तत्साम तहह्म तदमृतम् । १ स यः माणस्तसाम । अथ यहह्म तदमृतम् ॥१०॥१॥२५॥ अष्टमेनुयाफे प्रथमः खण्डः। अथाध्यात्मम् । इदमेव चनुखिन्छुळे कृष्णम्पुरुषः ॥२॥ तअच्छुलं तद्वाची रूपमचोऽग्नेर्पयोः । सा या सा वाक् सा । ५-यह-।-ने-७ अनुद-या।स्न्याम् । १० पसा- नि । ११ प्रहीणहीनि । १२ अधिक है 'सस्'म । १३ प्रतिनिष्ठता। १४ पापग्, याम् । १५ त् । १६ अन्नमस्य । १७ नास्ति, तपा.-पः पुरुषस्॥ १मृत् । २ अधिक 'मा'" भय योऽमित्युस्मः ॥२॥ अथ यत्कृष्णं तदपा रूपमन्नस्य मनसो यजुषः । तपास्ता प्रापोऽभवत् । अय यन्मनो यजुष्टत् ॥३॥ भप या पुरुषस्स माणस्तत्साम तद्ब्रह्म तदमृतम् । स यः प्राण- स्तत्साम । अय यह तदमृतम् ॥४॥ सैऽपोऽत्क्रान्तिब्रह्मणः । प्रधानः पराकान्तिः ॥शा सा या साऽऽक्रान्तिर्वियुदेव सा । स यदेव विद्युतो विद्योतमानाय श्येतं रूपम्भवति तद्वाचो रूपमृचो- प्रेमसोः ॥६॥ यदेव विद्युतस्संद्रवन्यै नीलं रूपम्भवति तदा रूपमन्नस्य मनसो यजुपः ॥७॥ य एवैप विद्युति पुरुपस्स माण- स्तसाम तद्ब्रह्म तदमृतम् । स या माणस्तत्साम । अघ यस तदमृतम् ||८||२६|| अष्टमेनुवाके द्वितीय अपड. । स ईपोऽमृतेन परिस्टो मृत्युमध्यास्तेऽनं कृत्वा ॥२॥ अयै- ऽप एव पुरुषो योऽयं चतुपि । य प्रादिसे सोऽतिपुरुषः । यो विद्युति स परमपुरुषः ।।२।। एते ह वाव त्रयः पुरुषाः। आ हास्यैते जायन्ते ॥३॥ स योऽयं चक्षुप्पेपोऽनुरुपो नाम । अन्वन श्रेष ३-पो । स (!)।५-त् । ५ नास्ति । ९ चैतं ।।८। -मा। १-ती।२-यो। योयापार-वत्र । ५ ह।

( २ )
सर्वाणि स्पाणि । तमनुरूप इत्युपासीत । अन्यश्चि हनं सर्वागि
रूपाणि भवन्ति ॥॥ य आदिसे स मतिस्पः । प्रसङ्येप
सर्वाणि रूपाणि । तम्पतिरूप इत्युपासीत । मसाथ देने सर्वाणि
रूपाणि भवन्ति ॥५यो विद्युति स सर्वरूपः । सर्वाणि ह्येतस्मिन्
रूपाणि । ते सरस इत्युपासीन । सर्वागिण हाऽस्मिन् रूपाणि
भवन्ति ।।६।। एते ह घाय ग्रयः पुरुषाः । आ हाऽस्यते नायन्ते य
एतदेवं वेटायो यस्यैवं विद्वानुमायति ||७|| ११२७||
मटमेऽनुयाके तृतीय सायद । अष्टमोऽनुयामाम्मान' |
--
अयमेवेदमत्र प्राकाश आसीत् । स उ एवाप्येतहि ॥३।। स
यस्स भाका इन्द्र एव सः । स यस इन्द्र एप एव स य एप
एवं तपति । स एप सतरपियस्तुविष्मान् ॥ ॥तस्य वाड्मयो
रश्मिः पाङ् मतिस्तिः । सा पा सा यागनिरसः । स दशया
भदति शतधा सहलमाऽतथा तथा निझुलधाऽयुदधा न्यर्बुदया
निसर्वया पनमजितियोमर ॥स-एप एनस्य रश्मिा-
E-Tी, यी । ७ नम् । ८ प्रत्यं । अधिक
'सपाधि 'नास्तिनां रूपाणि ।
१ नास्ति । २ भर-३ गिया। ४-ति । ५-त, स्सोम्-

ग्भूत्वा सर्वान्यामु प्रनाम प्रसवस्थितः । म यः कश्च ददसेतस्थन रश्मिना वदति ||४|| अथ मनोमयो दक्षिणा प्रतिष्ठितः । तद्य- तन्मनश्चन्द्रमास्सः । स दशधा भवति।शाराएप एतस्य रश्मिर्मनी भूत्वा सर्वाम्म मु प्रजामु प्रसाम्थितः । स यः कश्चमनुत एतस्यैव रश्मिना मनुते ।।६॥ अथ चतुर्मयः प्रसार प्रतिष्टितः। तद्यत्तश्चतु- रादित्यस्सः । स दशधा भवति ॥७॥ स एप एतस्य रश्मिचतु- भूला सर्वास्वामु प्रजामु प्रसवम्मितःस यः कश्च पश्यखेतस्यैव रश्मिना पश्यति॥८॥अथ श्रोनमयउदद प्रतिष्ठिनः । तद्यत्तच्छोत्रं दिशस्ताः । स दशा भवति । स एप एतस्य रश्मिश्रोत्र- म्भूत्वा सर्वास्वामु प्रजामु प्रसवस्थितः। स यः कश्च भृणोसेनस्यैव १ रश्मिना शृणोति ||१०||१८|| नम्मेऽनुराके प्रथम पण्ड । अथ माणमय ऊर्वः प्रतिष्ठितः । स यम्म पाणो वायुम्सः । स दशाभानि ॥१॥ स एप पतस्य गदिमः पागोभूत्वा सर्वान्यामु मजामु प्रसवस्थितः । स यः पश्य प्राणिस्तस्यैव रश्मिना मारिणति २ ६ पश्यति । ७ पश्यति । ८ नास्ति । दक्षणा । १० मन्यम् । ११ चतुम-1१२-य । १३ पलित 1१४ त, नास्ति। १५प्रत्यवस्थित ॥ -स्य-२नास्ति।

( २८ ) ७ ॥२॥ अथाऽसुमयस्तियन प्रतिष्ठितः । स ह स ईशानो नाम । स दशधा भवति ॥३॥स एप एतस्य रश्मिरमुर्भूत्वा सर्वासानु मजाम प्रसवस्थितः । स यः कश्चाऽगुमानेतस्यैव रश्मिनाऽमुमान् ॥१॥ अयाऽन्नमयोऽर्वाद प्रतिष्ठितः । तद्यत्तदन्नमापस्ताः । स दशधा भवात शतधा सहस्रधाऽयुतधा प्रयुतधा निस्तथाऽर्बुदधान्ययुदधा निखर्वधा पममक्षितियोमान्तः ॥शासएप एतस्य रविमरन्नम्भूत्वा सर्वास्थामु मजामु प्रसवस्थितः । स यः कश्चाश्नासतस्यैव रश्मिना- शाति॥६॥सएप सप्तरग्मिदृषभस्तुविष्मान् । तदेतदृचाऽभ्यनुच्यते यस्सप्तरश्मिपभस्तुविष्मानवासृजत्सर्तये सप्तसिन्धून् । योरोहिणमस्फुरदज्रवाहुयोमारोहन्त मजनासइंद्रइति ॥७॥ यस्मातमिरिति । सप्त येत आदिसस्य रम्मयः । पम इति । एप होवाऽऽमाम्पनानामृपमः।तुविष्मानिति । महीयेऽया स्यपा ।।८।। अवारजन सर्त सप्तसिन्घनिति । सप्तपसिन्धवः । १५ ३ स्थान बाली है 'स...' १४-यन्ति । ५ यत् ' के पश्चात् 'नतनुदं नाम' पाठ है, 'तदनम्" स नहीं है । ६ दन्नम्। ७ तेदा, न । ८ निम्याचम, निग्नबंधान । ९ मन १० सामास्त्र ११ नास्ति तदनद् कृपभस्तुविष्मान् । १२ रो- १३-४। १४-१।१५ मध्ये।

१६ ( २६ ) तैरिदं सर्व सितम् । वद्यदेतैरिदं सर्व सितं तरमात्सिन्धवः ॥सा यो रोहिणमस्फुरद्वजवाइरिदि । एप (हि) रौहिणमस्फुरद्वजवाहः ॥१०॥धामारोहन्तं सजनासइन्द्र इति । एप हीन्द्रः॥११॥२॥ नवमेनुवाके द्वितीयः खपड। तद्यथा गिरिम्पन्यानस्समुदियुरिति इस्माऽऽह शाट्यायनि- रेयमेत आदियस्य रश्मय एतमादिसं सर्वतोऽपियन्ति । स है विद्वानोमिसाददान एतरेतस्यरश्मिभिरेतमादिसंसर्वतोऽप्यति॥२॥ तदेतत् सर्वतो द्वारमनिषेध साम । अन्यतोद्वार ऽनदेक एवा- भ्रमुपासते । अतोऽन्यथाविद्युः ॥२॥ अथ य एतदेवं वेद स एवैतत् सर्वतो द्वारमनिपे, सामवेद ॥३॥सा एपा विद्युत् । (यद) एतन्मण्डलं समन्तम्परिपतति तरसाम । अथ यत्परमतिभाति स पुण्यकृसाथै रसः । तमभ्यतिमुच्यते ॥४॥ तदेतदभ्रातृव्य साम । न ह वा इन्द्रः कंचन भ्रातृव्यम्पश्यते । स यथेन्द्रो न कंचन भ्रातृव्यम्पश्यत एवमेव न कंचन भ्रातृव्यम्पश्यते य एतदेवं वेदायो यस्यैवं विद्वानुदायति ॥५॥ ११३०।। नयमेऽनुगके तृतीय. खण्ड.1 नयमोऽनुवाकस्समाप्तः । १६ स्थान वाली है-हन-बाजा, हत्तं । १ एवम् । २ तिप्रतिषियन्ति।३ अनुप्-१४ नास्ति। ५नत, त। ६मास्ति। ७ पनाव, पना । ८गम्। पतो। १० विदुः । १५-एवि।

३ अयमेवेदमन्न आकाश आसीत् । स उ एवाऽप्येतहि । स यस्स आकाश इन्द्र एव सः । स यस्सइन्द्रस्सामवतत्।।२।। तस्यै- तस्य साम्न इयमेव प्राचीदिग्विटर इयम्मत्ताय इयमादिरियमुद्री- थोऽसौ प्रतिहारोऽन्तरिक्षमुपश्य इयमैवनिधनम् ॥२॥ तदेतत्सप्त- विध साम । स य एवमेतत्सप्तवियं साम वेद यत्विचामाच्यादिशि या देवता ये मनुप्या ये पशयो यदन्नाचं उत्सवै हिसारेणामोति ॥शा अथ यद्दक्षिणायां दिशि तत्सर्व मस्तावेनाप्नोति ॥४॥ अथ यत्पतीच्यां दिशि तत्सर्वमादिनाप्नोति ॥शा अथ यदुदीच्यांदिशि तत्सर्वमुद्रीयेनामोति ।।६।। अथ यदमुप्यां दिशिनरसम्पितिदारेगा- मोति ॥७॥ अथ यदन्तरिक्ष तर्पमुपयेणानोति ॥८॥ अय यदस्यां दिशि या देवता ये मनुप्या ये पशवो यदन्नाद्यं तत्सर्न निधनेनामोति || सी हैवाऽस्याऽऽसम्भरति सर्व नितं न हा. ऽस्य कश्चन कामोनातो भवति य एवं वेद ॥१०॥ स यद्धकिञ्च किश्चैवं विद्वानेषु लोकेषु कुरुते म्वस्य हैव तत्स्वतः कुरते । तदे- नहचाऽभ्यनुच्यते ॥३३॥ १॥३१॥ दशामेऽनुचाके प्रथम खण्डः। १ दीर । २-८- ३ एत् । ४ 'मनुप्या' अधिक है '५-चा। ६ यहां चौथा श्लोक (मन्त्र) अधिक है और माय ही प्रतिहारण 'प्रस्तायेन' के स्थान में प्रव्यात् 'प्रधिक हाम'दक्षिणायांदिशि।

१ ३ यद् द्याव इन्द्र ते गतं शतम्भूमीस्त स्युः। नत्या वञिन्त्सहस्रं सूर्या अनजातमष्ट रोदसी दति ॥१॥ यद् घात इन्द्र ते शतं शतम्भूमीरवरसुरिति । यच्च तंद्यावरस्युश्शत- म्भृन्याताच एप एकाकाशे ज्यायान् ॥॥नत्वा वचिन्त्सहस्रं मूर्गा प्रन्विनि । न ह्येतं सहस्र चन सूर्या अनु ॥३॥ न जातमष्ट रोदसी इति । न हेतं जान रोदन्ति । इमे ह वाव रोदसीताभ्या- मेप एवामाशो ज्यायान् ! निस्किन येवते अन्तः ॥४॥स यस्स आगरा इन एरा । सगस्सइन्द्र एप एव स य एपतपति ॥५॥ स एपोऽभ्रामगतिमुच्यमान एति । तद्यथोऽभ्राण्यतिमुच्यमान एवमेव स जन्मात्यापनोऽतिमुच्यमान एति य एवं वेदायो यस्यैवं विद्वानुदायति ॥६॥ १॥३२॥ दशमेनुमा द्वितीय पण्ड । दशमोऽनुषाकस्समाप्त । रिलाल तुमा । साहनीयमिन्द्रस्तृतीयम्प्रजापति- स्कृती रामनग्य चतुर्थः पाठः॥ न प्रभस प्राणोऽथ य इन्द्र- १ नाता-या।३ नाति । ४-यन् । ५ नास्ति, स-स। ६ स्थान खाली 'य' तक। ७-मानय, यमानर ॥ १भित्- .

स्सा वागय य: मजापतिस्तन्मनोनिमेव चतुर्थः पादः ॥२॥ मन एव हिङ्कारो वाक्मस्तावः माण उद्गीथोडममेव चतुर्थः पादः ॥३॥ करीसेव वाचा नयति माणेन गमयति मनसा। नदेवनिरुद्धं यन्मनः। तेन यत्र कामयने तदात्मानं च यजमानं च दधाति ॥४॥ अयाधि- दैवतम् । चन्द्रमा एव हिलारोऽमिः प्रस्ताव भादिस जगीय भाष एव चतुर्थः पादः । तद्धि प्रराक्षमन्नम् ||२|| ता वा एता देवता अमावास्यां रात्रि संयन्ति । चन्द्रमा अमावास्यां रात्रिमादिसम्प- विशत्यादित्योऽग्निम् ॥ ६ ॥ तयसंयन्ति तस्मात्साम । स हवे सामवित्स साम वेद य एवं वेद ।।७। तासां वा एतासां देवतानामे- कैकैव देवता साम भवति ॥८॥ एप एवादित्यत्रिटच्चतुष्पादश्मयों मण्डलम्पुरुषः । रइमय एव हिद्वारः । तस्मात्ते प्रथमत एवोधत- म्तायन्ते । मण्डलम्पस्तावः पुरुप उद्गीथो या एता भापोऽन्तस्स एव चतुर्थः पादः ॥सा एवमेव चन्द्रमसो रदमयो मगढलम्पुरुषः । रश्मय एव विकारो मण्डलम्प्रस्तावः पुरुप उद्गीयो या एता भापोऽन्त स्स एव चतुर्यः पादः॥२॥ चत्वार्यन्यानि चत्वार्यन्यानि । तान्यष्ठौ। अष्टाक्षरा गायत्री गायत्रं साम ब्रह्म उ गायत्री । तदु ब्रह्माऽभि- सम्पद्यते । प्रशाशफाः पशवम्तनोपशव्यम् ॥११॥ १३॥ पफादशेऽनुवाके प्रथम घपडः। ७ २-यत्-1३-प्रमा-मारसय-हि-मानास्तिापदार-त्री । ૨ ૨ . अथाऽध्यात्मम् इदमेव चतुस्विटचतुष्पाच्छुलं कृप्रतम्पुरुषः। शुक्लमेव हिद्वारः कृष्णम्प्रस्तावः पुरुप उद्गीथो या इमा प्रापोऽन्तम्स एव चतुर्थः पादः॥१॥इदमादिसस्यायनमिदं चन्द्रमसः। चत्वारीमानि चत्वारीमानि । तान्यष्टौ। अष्टाक्षरा गायत्री। गायत्रं साम ब्रह्म उगा- यत्री। तदु ब्रह्माभिसम्पद्यते । अष्टाशफाः पशवस्तनोपशव्यम्॥२॥ स यो ऽयम्पवते स एप एव प्रजापतिः । तदेव साम।तस्यायं देवो योऽयं चक्षुपि पुरुपः । स एप आहुतिमतिमयोत्क्रान्तः॥३॥ अथ यावेतौ चन्द्रमाश्चादियश्च यावेतावप्मु दृश्येने एतावेतयोर्देवौ ॥४॥ पद वा इदमाहुर्देवानां देवा इसते हते । त एत आहुतिमतिमसो- रक्रान्ताः ॥५॥ तद पृथुर्वन्यो दिव्यान्त्रायान्पमच्छ येभिर्वात इपितः प्रवाति ये ददन्ते पञ्च दिशस्समीचीः । य पाहुतीत्यमन्यन्त देवा अपां नेतारः कतमे तां- सनिति॥६॥ते ह मत्यूचु रिमामेपाम्पृथिवीं वस्तएको- अन्तरिक्षम्पको बभूव। दिवमेको ददते यो विधर्ता विश्वा आशाः प्रतिरक्षन्त्यन्य इति ॥७॥इमामेपाम्पृथिवीं १-पाद्-२ नास्ति । ३त्यते।४ पता उ।५ तान् । ६ एभिर् । ७ दशम. दशासरत्यम्-1१० पराङ् ।११-ईद-११२-बत्ता। १३ अन्य।

(.३४) वस्त एक इसग्निर्हसः॥पाअन्तरिक्षम्पयकोवभूवेतिवापुई समासा दिवमेको ददते यो विधतेऽसादियो इ सः ॥२०॥ विश्वा आशाः प्रतिरक्षन्सन्य इति । एता ह वै देवता विश्वा आशाः प्रतिरक्षन्ति चन्द्रमा नक्षत्राणीति । ता एतास्सामैव ससोव्यूढोऽभायाय ॥१३॥ १॥३४॥ एकादरोग्नुबाके द्वितीयः खण्डः। एकादशोऽनुवाफस्समाप्तः । अर्थतत्साम । तदाहुस्संवत्सर एव सामेति ॥२॥ तस्य वसन्त एच डिड्कारः। तस्मात्पशवो वसन्ता हिडरिकतस्समुदायन्ति ॥२॥ प्रीमः प्रजारः । अनिरुत्तो प्रस्तावोऽनिरुक्त मृतूनां ग्रीष्मः ॥३॥ वा उदीयः । उदिव वै वर्षगायति ॥४॥ शम्मतिहारः। शरद ह खलु वै भूयिष्टा प्रोपचयः पच्यन्ते ॥शाहेमन्तो निधनम् । निधनकता इव वै हेमन्मना भवन्ति ॥६॥ तावतावन्तौ संधत्तः। एतदन्वनन्तस्संवत्सरः। तस्यैतावन्तौ यद्धेमन्तश्चवसन्तश्च । एतदनु ग्रामस्थान्ती समेनः । एतदनु निष्कस्यान्ती समेतः। एतदन्वहि - गान्पहिसाये ॥७तद्यया हवे निष्कासमन्तं ग्रीवा अभिपर्यक्त १४ विधतें, विधत्ते । १५ अन्न-'-'-याया। १-फरिघुनार, परिकतम् । २ नानि । ३-तत् । ४ मवत्न ५धी-र-यत।

(३५) एवमनन्तं साम । स य एवमेतदनन्तं साम वेदानन्ततामेव जयात ॥८॥ १॥३॥ द्वादशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । भयैतत्पनन्य साम । तस्य पुरोवात एव हिड्तारः । भय य- दभ्राणि सम्प्लावयति स प्रस्तावः अययद स्तनयति स उगीयः । भय यद्विद्योतते स मतिहारः। अथ पर्पति तनिधनम् ॥१॥ तदेतत्पनन्ये साम । स य एवमेतत्पर्जन्ये साम वेद वर्षको हास्मै पर्जन्यो भवति ॥२॥ अर्थतत् पुरुष साम । तस्यायमेव हिड्तारो- ऽयम्भस्तावोऽयमुद्रीयोऽयम्मतिहार इदं निधनम् ॥शातदेतत्पुरुषे साम । स य एवमेतत्पुरुपे साम वेदोऽऽध एव प्रजया पशुभिरा- रोहन्नेति ॥४॥ य उ एनलसम्वेद ये प्रसञ्चो लोकास्ताञ्जपति । वस्यायमेव हिवारोऽयम्प्रस्ताघोऽयमुद्गीयोऽयम्मतिहार इदं निधनम् । ये मसभो लोकास्ताभयति ॥५॥ य उ एनत्तिर्यग्वेद ये तिर्यो लोकास्ताभयति।तस्यलोमैव हिवारस्वरमस्तावो मांसमुद्रीयोऽस्थि प्रतिहारो मजानिधनम्।।६।।तस्प त्रीण्याविर्गायतिमस्तावम्मतिहार ७ऽनन्ताम्। ५-य-२-पो।३ प्रज्ञा । ४-नै । ५ नास्ति । । एन, एनं । ७-युच्-'म' अधिक है। ८ लार-९हिफारं ॥

निधनम् । तस्मात्पुरुषस्प त्रीण्यस्थीन्याविर्दन्ताश्च याश्चनखाः। ये तिर्यञ्चो लोकास्तालयति ॥७॥ य उ एनत्संयग्वेद ये सम्पञ्चो लोकास्ताभयति । तस्य मन एव हिद्वारोवारपस्तानःमाण उद्गीय- श्चतुः प्रतिहार श्रोत्रं निधनम् । ये सम्यञ्चोलोकास्तामति॥६॥ अथैतद्देवतास साम । तस्य वायुरेव हिङ्कारोऽमिः प्रस्ताव प्रादिस उदीयश्चन्द्रमा प्रतिहारो दिश एव निधनम्।।सातदेतद्देवतासु साम । स य एतमेतद्देवतामुसाम वेद देवतानामेवसलोकतां नयति ॥१०॥ ११३६॥ द्वादशेऽनुवाके द्वितीय खण्ड । तस्पतास्तिसमागा माग्नेयेकैन्द्रयकार्यपदेव्येका॥१॥सा या मन्द्रा साऽऽग्नेयी । तया भातस्सवनस्योद्नेयम् । आग्नेयं वै भातस्स- वनमानेयोऽयं लोकः। स्वयाऽऽगया भातस्सयनस्योऽडापत्यूनोतीमं लोकम् ॥२॥ अथ या घोपिण्युपब्दिमती सैऽऽन्द्री । तया माध्य- न्दिनस्य सपनस्योदेयम् । एन्द्रं वै माध्यन्दिनं सपन मैन्द्रोऽसी लोकः । स्वयाऽऽगया माध्यन्दिनस्य सवनस्योद्गायत्पृभोसमुलोकम ॥३॥ अथ यां वीडयन्निव प्रथयन्निव गायात सा वैश्वदेवी । तया १ऐट-२न्द । ३ नास्ति, सा" 'ऽद् । ४ मैंनधी। ५ नास्ति मय...... "खोकम् 1६-अदी-के लिये स्थान पाली है। ७-०दिन । -तिम । रया, 'घोषिणयु', भी लिखा है।

१० ११ १२ तृतीयसवनस्योद्देयम् । वैश्वदेवं पै तृतीयसवनं वैश्वदेवोऽयमन्तरा- लोकः । स्वयाऽऽगया तृतीयसवनस्योद्गायत्पृधोतीममन्तरालोकम् ॥४॥ प्रयो उचा खल्लाहु रेकर्यवाऽऽगयोद्नेयं यदेवास्यमध्यं वाच इति । तद्यया वैवाचाव्यायच्छमान उहायति तदेवास्यमध्यं वाचः। तया वा एतया याचा सर्वा वाच उपगच्छति। अव्यासिक्तामेकस्थां श्रियग्नोति य एवं वेद ॥२॥ अथ या क्रौञ्चा सा पाईस्पसा । स यो ब्रह्मवर्चसकामस्स्यात्स तयोगायेत् । तद्ब्रह्म वै बृहस्पतिः । तद्वै ब्रह्मवर्चसमनोति तथा ब्रह्मवर्चसीभवति ।।६।।प्रय ह चैकिता- नेय एकस्यैव साम्न आगां गायति गायत्रस्यैव तदनवानं गेयम् । तव सान्न एवा मतिहारादनवानं गेयम् । तत्प्राणो वै गायत्रम् । तद्वै प्राणमृनोति । तया ह सर्वमायुरोति ॥७॥ १॥३७॥ द्वादशेऽनुवाके तृतीयः खण्ड । अथ ह ब्रह्मदत्तं चैकितानेयमुद्गायन्तं कुरव उपोदुरुज्जहिहि साम दालभ्येऽति ॥२॥ स होपोद्यमानो नितरां जगौ । तं होचुः किमुपोद्यमानो नितरामगासीरिते ॥२॥ स होवाचेदं वै लोमध्ये- १०-यन्ति । ११ ताया। १२ स, नास्ति । १३ 'वै गायत्रम् नीचे से ले के अधिक लिखा है । १४ 'सानस्' अधिक है। १ तश् । २ उन्निहि।३ सोमे ।

( ३८ ) तदेववत्मत्युपश्टएमः । तस्मादु ये नएतदुपावादिपुलोमशानीऽव तेषा दमशानानि भवितारः । अथ वयमुदेव गातारस्म इति ॥शप्रिय हराना नवनिर्गलूनसमा कायण शामूल पर्णाभ्यामुत्थितम्पम- उर्चाऽsगाता शालावसा३ सान्नाः इति ।। ।। नैव राजन्नति होवाच न साम्नेति । तद्यूय ताई मर्व एव पणाग्या भविष्यय य एव विद्राँसोऽगायतेति॥शाययद्धावयचाच साम्नाचा गाम- ति धीतेन वै तयातयान्नामलाकागडेना गातेति नॉस्तदवक्ष्यत् । तद तदुवाच खरेग चैव हिवारेण चागामेति ॥ ३८|| मादशेऽनुवाके चतुर्थ अपड। भयहससाधिवाकश्चतरपिस्मसयज्ञम्पौलुपितमुवाच माचीन- योगति मम चंद्र व साम विद्वान् सानात्विज्य करिष्यसि नैव ताई पुनदीक्षामभि यातासीति । मुहूदींनी ह्यात ॥१॥ स होवाच यो वै साम्नश्श्रिय विद्वान्साम्नाऽऽविज्य करोति श्रीमानेव भवति । मनोवार साम्नश्रीरिति ॥२॥यो वै साना प्रतिष्ठा विद्वान्साना- विज्य करोति प्रसेव तिष्ठति । वाग्वाव साम्नः प्रतिष्ठति ॥३॥ ४-उपाय- ५-पुल् । ६-तार । ७ गदनसम, गुळिनसम् । सपणाया। १०च भागमे । १म ।२-दी।३ मा। ।

यो वै साम्नमुवर्ण विद्वान् साम्नाऽऽविज्यं करोसध्यस्य गृहे मुवर्ण गम्पते । प्राणो वाव साम्नस्सुवर्णमिति॥४॥ यो वे साम्नो ऽपचितिं विद्वान्साम्नाविज्यं करोसपचितिमानेव भवति । चतु- घाव साम्नोऽपचितिरिति ॥शा यो वै साम्नश्श्रुतिं विद्वान्साम्ना- ऽऽविज्यं करोति श्रुतिमानेव भवति । श्रोत्रं वाव साम्नश्रुतिरिति ॥६॥१३॥ मादशेऽनुवाके पञ्चमः खण्डः । द्वादशोऽनुवाफस्समाप्तः। चत्वारिवाक्परिमिता पदानि तानि विदुर्गाह्मणा ये मनीषिणः । यहा त्रीणि निहिता नेऽङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्तीति ॥१॥ वागेव साम । वाचा हि साप गायति । वागेवोऽक्यम्। वाचा शुक्यं शंसति । वागेव यजुः । वाचा हि यजुरनुवर्तते ॥२|| सप- किचार्वाचीनम्ब्रह्मणस्तद्वागेवर्सर्वम्।भय यदन्यत्रब्रह्मोपदिश्यते। भैव हि तेनाऽऽविज्यं करोति । परोक्षणैव तु कृतम्भवति ॥२॥ ७ ४-हो। १-हानि । २-हितानी । ३ नास्ति। -- ५पापं । ने। ७मास्ति।

(४) तस्याएतस्यै वाचो मनः पादश्चतुः पादश्श्रोत्रम्पादोषागेव चतुर्थः पादः ॥४॥ तयदै मनसा ध्यापति तदाचा पदनियतुपा पश्यति तदाचा वदति । यच्छोत्रेण टणोते तद्वाचा वदति ॥॥ तयदे- तत्सर्वं वाचमेवाऽभिसमपति तस्मादागेव साम। स ह वै सामवित्स साम वेद य एवं वेद ॥६तस्या एतस्यै वाचः माणा एवानः । एषु हीदं सर्वपमूतति ॥७॥ १॥४०॥ प्रयोदशेऽनुवाकप्रथमः खगडः। तेन तेनाऽमुना देवा जीवन्ति पितरो जीवन्ति मनुष्या जी- वन्ति पशवो जीवन्ति गन्धर्वाप्सरसो जीवन्ति सर्वमिदंजीवति ॥११॥ तदाहुदसुनेदं सर्व जीवति कस्साम्नोमुरिनि ।प्राण इर्ति धूयात् । माणो ह वाव साम्नोऽमः ॥२॥ स एपमाणो वाचि प्रतिष्टितो वागु माणे प्रतिष्ठिता। सावतावेचमन्योऽन्यस्मिन्मतिष्ठिती । प्रतितिष्टांत य एवं वेद ॥३॥ तदेतत्वाऽभ्यनच्यते- ८'चतुर्थ' अधिक है। स्वादू। १० भ्रुणाति । ११ हिसम- १२-४ । १३ 'प्रसूते' के परे 'एषु ही सर्व सूतेऽति' सय में लिखा है (नानि 'ति)॥ १-तीति । २ यदा।३ पेने। ४'इ' अधिक है। ५-ये । मायतन प्रतिष्ठितः।

१० अदितिर्योरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः। विश्वे देवा अदितिः पञ्चजना अदिति- र्जातमदितिर्जनित्वम् ।। इति ॥४॥ अदितिौरदितिरन्तरितमिति । एषा वै घोरेपाऽन्तरिक्षम् ॥५॥ अदितिर्माता स पिता स पुत्र इति । एपावै मातपा पितैपा पुनः ॥६॥ विधेटेवा अदितिः पञ्चजना इति ।येदेवा असुरेभ्यः पूर्वे पश्चजना पासन य एवासावादिसे पुरुपो यश्चन्द्रमसि यो विद्युति योऽमु योऽयमनमन्तरेप एव ते । तठेव ॥७॥ अदिति- तिमदितिर्ननित्वमिति। एपा होव जातमेपा जनितम् ॥८॥४॥ प्रयोदशेनुयाके द्वितीयः खण्डः। प्रयोदशोऽनुवाफरसमाप्तः। ० मारुणिई वासिष्ठं चैकिनानेयम्ब्रह्मचर्यमुपेयाय ।तं होवाचा- उनानासि सौम्य गौतम यदिदं वयं चैकितानेयास्सामैवोपास्महे । का त्वं देवतामुपास्स इति । सामैव भगवन्त इति होऽवाच ॥१॥ ह पाच्छ यदनो तदेत्या३ इति । ज्योतिर्वा एतस्य सानोयद्वयं ८-रीक्स-1 नास्ति, अदितिर्माता"" अदितिरन्तरिक्षम् । १.-.। ११-यो । १२-धैर् । १३-यम् । १४ इतिर, इति । १ (वाचा) प्राज । र यो३-माह-इति । ४-सनहीं 1५-पत।ता।

( ४२ ) सामोऽपास्मह इति ॥२॥ यधिव्या तदेयाः इति । मतिष्ठा या एपा तस्य सान्नो यद्वय सामोपास्मह इति ॥३॥ यदप्यु तद्वेस्था३ इति । शान्तिर्वा एपा तस्य सानो यद्वय सामोपास्मह इति ॥॥ यदन्तरिते तद्वत्याः इति । आत्मा वा एप तस्य सानो यद्वय सामोपास्मह इति ।।५।। यदायो तदेयाः इनि । श्रीएपा तस्य साम्नो यद्य सामोऽपास्मह इति ॥६॥ यदित्तु तद्वेन्या३ इति । प्तिर्वा एपा तस्य सानो यद्वय सामोपास्मह इति पायदिन तद्वेस्था३ इति । विभृतिर्वा एपा तस्य साम्नो यद वय सामोपा- स्मह इति ॥८॥१२॥ ३ १२ चतुर्दशेग्नुपाके प्रथम पगा। यदादिये तद्वेश्या३ इति । तेजा या एतत्तस्य साम्नो यद्वय सामोपास्मह इति ॥२॥ यञ्चन्द्रमसि तदेया३ इति । भा वा एपा तस्य साम्नो यद्वय सामोपास्मह इति ॥२॥ यत्रतत्रेषु तद्वेत्या३ इति । पझा वा एपा तस्य साम्नो यद्य सामोपास्मह इति ॥३॥ यदन्ने तवस्या३ इति । रेनो वा एतत्तस्य साम्नो यद्वयसामोपास्मह । ३ इति। ७ हाशिया पर लिखा है। पतस्य | नास्ति यद् १० नास्ति सानो इप 1 -दा । १२ नास्तिप १नास्ति । २ प्रजा । ३ नास्ति, पात' में 'त'।

. १० ११ ( ४३ ) इति ॥४॥ यत्पशुपु तदेया३ इति । यशो वा एतत्तस्य सामो यद्रय सामोपाप्मह इति ॥५॥ यदृचि तया३ इति । स्तोमो वा एप तस्य साम्नो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥६।। यद्यपि तद्वेस्था३ इति । कर्म वा एतत्तस्य साम्नो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥७॥ अथ किं उपास्स इति । अक्षरमिति । कतमत्तदक्षरमिति । यत्क्षरनाक्षीयते- ति । कतम तरनाक्षीयतेति । इति ॥८॥ तमस्स इन्द्र इति । योऽतनमत इति । कतमस्स योऽक्षत्रमत इति । इयं देवतेति होवाच योऽय चतुपि पुरुष एप इन्द्र एप प्रजापतिः ।(स) समः पृथिव्या सम आकोशन समोदिवा समस्सर्वेण भूतेन । एप परो दिवो दीप्यते । एप एवेदं सर्वमित्युपासितव्यः ॥१०॥ सय एनदेव वेद ज्योतिष्मान् प्रतिष्ठावान्यन्तिमानात्मवान्छीमान् व्याप्तिमान् निभृतिमांस्तेजस्वी भागन् प्रज्ञावावेतस्सी यशस्वी स्तोमान् कर्मपानक्षरवानिन्द्रियवान् सामन्चीभवति ॥१॥ तद्वे- तहचाऽभ्यनूच्यते ॥१२॥ १३॥ चतुर्दशमेऽनुयाके द्वितीय खण्ड । ४ नास्ति।५यो। ६ स्ते-७ 'स्स के लिये स्थान छोडा है। -दूर अक्षर । १०-१ । ११ इन्द्रमत् । १२ सो । १३ नास्ति । १४५ ! १५ दिन्य-1 १-सीतन्य । १७-ची । १८ स्तोमान् । gus - ( ४४ ) रूप-रूपम्प्रतिरूपोबभूव तदस्य रूपम्प्रतिचक्षणाय। इन्द्रोमायाभिःपुरुरूप ईयते युक्ताह्यस्य हरयश्शतादश।। इति ॥ारूप-रूपम्पतिरूपोयमूनि । रूपं-रूपं होपप्रतिरूपोवभूष ॥२॥ तदस्य रूपम्पातचक्षणायेति । प्रतिचक्षणाय हाऽस्यैतद्रूपम ॥३।। इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयत इति । मायाभिहींपे एतत्पुरु रूप ईयते ।।४|| युक्ता हास्य हरयाशता दशेति । सहस्त्र हैत प्रादि- सस्य रश्मयः । तेऽस्य युक्तास्तरिदं सर्वं हरति । तद्यदेतैरिदै सर्व हरति तस्मादरयः ॥५॥ रूपं रूपम्मघवा बोभवीति मायाः कृण्वानः परितन्वं स्वाम् । त्रिर्यदिवः परि मुहूर्तमागात् वैमन्त्रैरन्तुपा ऋतावेति ॥६॥ रूप-रूपम्मघवा चोभवीतीति । रूप-रूप प मघवा योमपीति || मायाः करवानः परि तन्वं स्वामिति । पायाभिपएतत्वा तनुं,गोपायति ॥८॥ त्रिदिवः परिमुहर्तमागादिति । त्रिदं वा एष एतस्य मुहूर्तस्पेमाम्पृषिधी समन्त: पर्यंतीमा: प्रजास्संचनाण: सास्वैमन्त्रैरनूतुपाऋतावति अन्तुपा श्रेषएतहताश।।१०।१४४ चतुर्दशेऽनुवाके हतीय खण्डः। १ पुषरपपुरुरूपार रम्यते।-या ४-पमा५-पमा रमीयते। ७ नास्सि, हरयय" ""स्य । ८ म' भधिक है। मुई-१० नास्ति, इति । १९ पुनः विना अपरूप..."धीतीप्रति (1)। १२फवा। १३-भि । १४ १५ नाशि १५ प्रति। १७ नाना ( ४५ ) तद्ध पृथुर्वेन्यो दिव्यान्यासान्पप्रच्छ- इन्द्रमुक्थमृचमुद्गीथमाहुर्ब्रह्म साम प्राणं व्यानम् । मनोयाचक्षुरपानमाहुश्श्रोत्रं श्रोत्रिया बहुधावदन्ती- ति ॥२॥ ते प्रत्यूचुः- अपय एते मन्त्रकृत पुराना पुनराजायन्ते वेदानां गुप्यकम् । ते वै विदामो वैन्य तदन्ति समानम्पुरुषम्दहुधा निविष्टम्, इति ॥२॥ इमा हवा तद्देवता अय्यां विणयामिमा समानामभ्येक आप- यन्ति नै । यो ह वातदेवं वेद स एवंतां देवतां सम्प्रति वेद ॥३॥ स एप इन्द्र उदीयः । स यदैप इन्द्र उदीय आगच्छति नैवोद्गातुश्योपगातॄणां च विज्ञायते । इत एवोऽऽधस्वरुदेति । स उपरि मूों लेलायति ॥४॥ स वियादगमदिन्द्रो नेह कश्चन पाप्मा न्यद्गः परिशेक्ष्यत इति । तस्मिन् ह न कश्चन पाप्मा न्यङ्गः परिशिष्यते ॥शा तदेतदभ्रातृन्यं साम । न ह वा इन्द्रः कंचन भ्रातृव्यम्पश्यते।सययेन्द्रोन कंचनभ्रातृन्यम्पश्यत एवमेव न कंचन भ्रातृप्यम्पश्यते य एतदेवं वेदायोयस्यैवं विद्वानुद्गायति॥१४॥ चतुर्दशेऽनुवाके चतुर्य र चतुर्दयोग्नुषाकस्समाप्तः । ३ १-पदम । ९ नो।३ अर्या, ४ मां।५-ना। म्य।७हये। ८य घे। उन्-1१०'ति' भधिककरो।११ ध्यो। १२स्वर।परिपे-1 - १ ५ प्रजापतिर्वा वेद अग्र आसीत्। सोऽकामयत बहुस्स्याम्पमोयेय भूमानं गच्छयमिति ॥१॥ स पोड़गवाऽऽन्मानं व्यकुरत भद्रं च समाप्तिश्चाऽऽभूतिश्च सम्मृतिश्च भूतं च सर्व चरूपं चाऽपरिमितं च श्रीश्च यशश्च नाम चाऽग्रे च सजाताश्च पयश्चमहीयाच रसश्च ॥२|| तबाददं हृदयमस्य तन् । ततस्संवत्सरमजत । तदस्य संवत्सरोऽनूपतियुते ॥३॥ समामिः कर्मास्य तत् । कर्मणा हि समामोति । तत ऋतूनरजत । तदस्यतवोऽनूपतिष्ठन्ते ॥४॥मा- भूतिरन्नमस्य तत् । ( नन् ) चतुर्धा भवति । ततो मासानर्धमा- सानहोरात्राण्युपसोऽरजत। तदस्य मासा अर्धमासा अहोरागाण्यु- पसोऽनूपतिष्ठन्ते ॥५॥ सम्भूती रेतोऽस्य तद्। रेतसो हि सम्भव- ति ।। १४६) पथदशेऽनुवाके प्रथम सयड । ततश्चन्द्रमसमजत । तदस्य चन्द्रमा अनूपतिष्ठते । तस्मात्स रेतसः प्रतिरूपः ॥१॥ भूतम्भाणोऽस्य सः । ततो वायुमगृजत । तदस्य वायुरनूपतिष्ठते॥२॥ मिपामोऽस्य सः। ततः पशूनसृजन । तदस्य पशवोऽनुपतिष्ठन्ने ॥३।। रूपं न्यानोऽस्य सः । ततः प्रजा १।२-यों । ३-मन्ते । ४ 'त' अधिक है । ५ तद् । मास्तिर चर्चा, मर्धा। -ति,-ता, त। १-त । २-४ । ३ रुपरायो।

(४७ ) असजत। तदस्य प्रजा अनृपतिष्ठन्ते । तस्मादामु प्रमासु रूपाण्य- धिगम्यन्ते ॥४॥ अपरिमितम्मनोऽस्य तत् । ततो दिशोऽसृजत । तदस्य दिशोऽनूपतिष्टन्ते । तस्माता अपरिमिताः।अपरिमितमिव हि मनः ॥ श्रीर्वागस्य सा । ततस्समुद्रमसृजत । तदस्य समुद्रो- ऽनृपनिटते ॥६॥ यगस्तपोऽस्य तत् । ततोऽनिमसृजत । तदस्या- ऽनिरनृपतिष्ठते । तस्मात्स मयितादिव सन्तप्तादिव जायते ॥७॥ ६ ७ नाम चतुरस्य तत् ॥८॥ १४७|| पञ्चदशेऽनुधाके द्वितीयः खण्डः । तन आदिसमरजत । तदस्पादिसोऽनृपतिष्ठते ॥२॥ अग्र- म्मूर्धास्य सः । ततो दिवमसृजत । तदस्य द्यौरनूपतिष्यते ।।२।। सजाता अङ्गान्यस्य तानि । अ.हिं सह जायते । ततो वनस्पती- नरजत । तदस्य वनस्पतयोऽनूपतिष्ठन्ते ॥३॥ पयो लोमान्यस्य तानि । तत प्रोपधीरसृजतातदस्यौपधयोनूपतिष्ठन्ते ॥४॥ महीया- माँसान्यस्य तानि । मॉसहिं सह महीयते । ततो वयाँस्यस्जत । तदस्य वयाँस्यनूपतिष्ठन्ते। तस्मात्तानि प्रपतिप्यूनि।प्रपतिप्णूनी- ४-यते । ५ नास्ति, ततो 'तस्मात् । (नाति ७ तस्या। ८मथितामिद, मथितिताद् ॥ १ अंगान्य, अंगहान्य, अङ्गं । २ ता ।३ गैर् । ४ नास्ति, पयो......"अनूपतिष्ठन्ते । ममिया, महिया। ईसा ५ - ।

(४८) १५ महामाँसानि ॥५रसो मज्जाऽस्य सः । ततः पृथिवीपरजत। सदस्य पृथिव्यनूपतिष्ठते ॥६॥ स हैवं पोशधाऽऽत्मानं विकस साथै समैत् । तत्साध समेतत् तत्साम्नस्सामत्वम् खास एवेप हिरण्मयः पुरुष उदतिष्ठत्मजाना जनिता ||१४|| पभवशेऽनुवाके तृतीयः खण्डः। देवासुरा अस्पर्धन्त । ते देवापनापतिमुपायायायामाऽसु- रानिति ।।१।। सोऽग्रवीन्न वै मां यूयं वित्य नाऽसुराः । यदै मां यूयं विद्यात ततो वै यूयमेव स्यात पराऽमुराभवेयुरिति ॥२॥ तदै यूहोऽसघुवन । सोऽब्रवीत्पुरुषः मनापतिस्सामेसि मोऽपाद्धवम् । ततो चै यूयमेव भविष्यय पराऽसुरा भविष्यन्नीतिशा तम्पुरुषः प्रजापतिस्सामेऽत्युपासत । ततो वै देवा अभवन् पराऽसुराः । स यो हैवं विद्वान्पुरुषः प्रजापतिस्सामेऽत्युपास्ते भवसात्मना परास्य दिपन भ्रातृय्यो भवति ॥४॥ ॥४॥ पञ्चदशेऽनुषाफे चतुर्थ सयडः । पञ्चदशोऽनुराफस्समासः | ७ महीम- ८ मरज्या । सन्ते । १० समेत; मत्पश्चात्, 'तपत्साधं समता (!) पुनः ६।११ अयिता। १पत्य ।२-पैत। ३-हि।

देवा वै विजिग्याना अब्रुवन्द्रितीयं करवामहै । माऽद्वितीया भूमेति । तेऽघुवन सामा द्वितीय करवामहै । सामै नो द्वितीय- मस्विति ॥२१॥ त इमे द्यावापृथिवीअब्रुवन् समेत साम मजनयत- मिति ॥२|| सोऽसावस्या अधीभत्सत । सोऽब्रवीद्धहु वा एतस्यां किं चकि च कुर्वन्यधिष्ठीवन्यधिचरन्यध्यासते । पुनीतन्वेनामपूता वा इति ॥३॥ ते गाथामव॒न्त्वया पुनामेति । किं ततस्स्यादिति । शतसनिस्स्या इति । तथेति । ते गाथयाऽपुनन् । तस्मादुत गाथया शतं मुनोति ॥४॥ ते कुम्च्यामनुवन् त्वया पुनामेति । किं तंत- १९११५ स्स्यादिति । शतसनिस्स्या इति । तथेति । ते कुम्ब्यपा- पुनन् । तस्मादुत कुम्ब्यया शतं सुनोति ॥५॥ते नाराशंसीमन्नु- वन वया पुनामेति । किं तत्स्स्यादिति । शनसनिस्स्या इति । तयेति । ते नारासँस्याऽपुनन् । तस्मादुत नारासँस्या शतं सुनोति ॥६॥ ते रैभीमत्रुवन् त्वया पुनामेति । किं ततस्स्यादिति ।शतस- निस्स्या इति । तथेति । ते रेभ्पा पुनन् । तस्मादुत रैभ्या शत ज १२ १० १.पिजिज्ञाना । २ वा । ३सा ] ४ अधीहत- ५-छिय-1. -नि-नी । ७-म्य-1८''पुन. 1 लिखा है। तेन । १० शतनी। ११-भिम् । १२ त॥

मुनोनि |७|| मेयम्पृना । अयाऽमुमरवीदह नै किं च विच पुमाँश्चगति । वमनुनीप्पेनि ॥८॥१॥५०॥ पाशमा प्रथम यगड । 5 सलिनाऽपुनीन । पृतानि द ग तस्य सामानि पृता कचः प्रतानि यपि पृतमनृक्तम्पृत नाम्मरतियएस वेद ॥१॥ ते समेस साम प्राजनयताम् । तत्समेस साम माजनयता तत्सा- प्रस्सामन्यम् ॥२॥ तदिट साम सृष्टमट उत्क्रम्य लेलायटतिष्टत। तस्य सर्व देवा ममन्दिन आसन्मम ममेति ॥३॥ तेऽनुन्नीद- म्भनामा इति । नस्य विभागे न समपाटपन । तान्प्रजापतिर- प्रपीदप्त । मम मा एतत् । अहमेव वो विभक्ष्यामीति ॥३॥ सोऽमिमनमीच वै मे ज्येष्ठ पुत्राणाममि । त्वम्मथमो टगीप्वति ॥।॥ मोऽब्रवीन्मन्द्र सानो गोऽन्नामिति । स य एतदायाद- बाद एव सोऽसन्मामु स टेरानामृच्छाध एव विद्वाँसमेनदायन्त- मुपवद्रादिति ॥६॥ प्रचन्द्रमननीत्वमनुरणीप्वति ॥ सोऽध- " કરે १३ नम्। -स-- एलयना । २-याम् | ३ - ४-मत् 1५ मे । (बीदम' के लिय स्थान नाली है, पीदा 1 ७ मपिण्य-1८ भिषम् । गायत्राच।१०ीमान् | ११ अथ।१२ मोमम ।

( ५१ ) १. वीदुग्र सानो रणे श्रियमिति । स य एतद्गायाच्क्रीमानेव सोऽस- न्मामु स देवानामृच्छाद्य एवं विद्रॉसमेतगायन्तमुपवदादिति ॥८॥ अय सोममब्रवीत्त्वमनुवृणीश्वेति ॥शा सोऽब्रवीद्वल्गु सानो वृणे नियमिति । स य एतदायात्मिय एव स कोर्नेः प्रियश्चतुपः प्रिय- स्सर्वेपामसन् मामु स देवानामृच्छाद्य एवं विद्रॉसमेतद्वापन्तमुप- वदादिति ॥१०॥ अथ बृहस्पतिमब्रवीत्त्वमनुवृणीप्पेति ॥११॥ सोऽनवीनौचं सानो वृणे ब्रह्मवर्चसमिति । स य एतद्दायाब्रह्म- वर्चस्येव सोऽसन्मामु स देवानामृच्छाद्य एवं विद्रॉसमेतद्रायन्तमुप- वदादिति ॥२॥२५॥ पोटशेऽनुवाके द्वितीय खरड । प्रय विमान देवानन्नवीयूपमनुरणीयमिति॥॥तेऽनुवन्यैश्च- देव सानो दृणीमहे मजनमिति।सय एनहायात्मजावाने सोऽस- दस्मानु देवानामृच्छाद्य एवं विद्वांसमेतढ़ायन्तमुपवनादिति ॥२॥ प्रय पशूननवीयूयमनुदृणीध्वमिनि ॥शा तेऽनुसन्धायुर्वा भस्माक- मी।सएवनो वरिप्यत इति ते वायुश्च परात्रश्चानुवनिरुक्तं सानो १३ यागु। १४ प्रियम् । १५ नास्ति,सय ''सोऽब्रवीद में। १६ गायत्रच । १७ नास्ति। १८ -1 १'म' भधिक है । २ नीचे से 'च सघायु' अधिक रेता है। ३ यार । ४ भनिर-1 5 ( ५२ ) वृणीमहे पशव्यमिति । स य एतदायात्पशुमानेव सोऽसदस्मामु म स वायुं च देवानामृच्छाद्य एवं विद्वाँसमेतद्गायन्तमुपवदादिविता अथ प्रजापतिर नवीदरमनुवरिष्य इति ॥॥ सोऽत्रवीदनिरुक्तं सानो वृणे स्वमिति । स य एतदायात्स्वर्गलोक एव सोसन्मामु स देवानामृच्छाद्य एवं विद्वाँसमेतद्गायन्तमुपबदादिति ॥६॥ प्रय वरुणमब्रवीचमनुवृणीप्वति ॥५॥ सोऽक्वीद्यवो न कश्चना- ऽवृत तदहम्परिहरिष्य इति। किमिति । पध्वान्त सानोरणेऽपश- व्यमिति । स य एतदायादपशुरेव सोऽसन्मामुस देवानामृच्छाय एतद्वायादिति ॥८॥ तानि वा एतान्यष्टौ गीतागीतानि साम्नः । इमान्यु ह वै सप्तगीतानि । अथेयमेव वारण्यागाऽगीता ॥सास यांह को चै विद्वानेतासां सप्तानामागानां गायति गीतमेवास्य भवत्येतानु कागानाध्नोति य एताधु यामाः। अधेमामेव वारणी- मागां न गायेत् ॥१०॥ ११५२॥ पोडशेऽनुवाके तृतीय सपडः । पोडशोऽनुगाकरसमानः । २ १३ ५-युय । 'इति' तक शेर नहीं खिसा । ति।८स्वर्गम् । समुत् । २०-इम्य्-य-यत। ११ भपक्षमातम, अपमातम् । १२ पा-1१३ दाद । १४-घ, स्थ। १५-- । ११मामा। १७ नौर- निमोति ॥

द्वयं वावेदमन आसीत्सवासच ॥॥ तयोर्यत् सत् तत्साम तन्मनस्स प्राणः। अथ यदसत्सर्क सा वाक् सोपानः॥२॥ तयन्मनश्चमागश्च तत्समानम् । प्रथयावाक्चापानश्चतत्समानम्। इदमायननम्मनश्च प्राणश्चेदमायननं नाम चापानश्च । तस्मात्पुमा- दक्षिणतो योपामुपोते ॥३॥ सेयमृगस्मिन् सामन् मिथुनमै- ग्छत । तामहच्छत् का त्यमसीति । साहमस्मीत्यत्रवीत् । अथ या अहममोऽस्मीति ॥४॥ तद्यत्सा चाऽमश्चतन् सामाऽभवत् तत्साम्नरसामत्वम ॥शा तौ चै सम्भवावेति । नेत्यत्रवीत्वसा वै मम समस्यन्यत्र मिथुनमिच्छस्वति॥ासाऽब्रवीन वैतं विन्दा- मियेन सम्भवेयम् । त्वयैव सम्भवानीति । सावै पुनीष्वत्यप्रवीत्। भपूना या असीति ॥७॥ सापुनीत यदिदं विप्रा वदन्ति तेन । सोऽत्रवीत्स्वेदम्भविष्यतीतिमत्यूहेत्यप्रवीत्।धीर्वा एपामजाना जीपनं वा एतद्भविष्यतीति । तथेति । तत्मत्यौहत। तस्मादेपाधीरेव मनानां जीवनमेव ॥८॥ पुनीप्वेत्यप्रवीत् । साऽपुनीत गाथया साऽपुनीत कुम्ब्यया साऽपुनीत नारागॅस्या साऽपुनीत पुराणेति- १ म्यफ-भस्म्यदप भवितेऽति, (शम्त्य) भवितेति । -ना। ३ उपयशेते । ४-म । ५ सम्मयेत् । यम्। 'या' अधिक है।७प्रा, रिमा । परवेररयन् । १०-भ-, 'या' अधिक है।

( ५४ ) १२ हासेम सापुनीत यदिदमाढाय नाऽऽगायन्ति तेन ||१|| साऽन. वीत्केदम्भविष्यतीति । प्रत्यदत्यनमीद । धरी एमा । मनाना जीवन वा एतद्भविष्यतीति । तथेति । तत्सत्यौहत् । तस्मादेपा धीरमजाना जीवनम्वेवापुनीजपेत्यनवीतशा५३|| सप्तदशेऽनुवाक प्रथम खण्ड । सा मानाऽपुनीत । तस्यादुत ब्रह्मचारी मधु नाश्नीयाद्वेदस्य पना शति । दाम हवाचार्यदत्तमनीयात् ॥१॥ अथर्क मामा- अबीरहु वै किं च किं च पुमाँश्चरति 1 त्वमनुपुनीप्वेति । स भरण्डकेणेनाऽपुनीत । पृतानि ह वा अस्य सामानि पूता चः पूतानि यपि पूतमनूक्तम्पूत सर्वम्भवति य एव वेद॥॥ ताभ्या सदो मिथुनाय पर्यश्रयम् । तस्गादुपरसधीया गाने सदसि न पायीत । अत्र होताारसा उपासथीया रानि सदसि सम्भवतः । स यथा श्रेय स उपोष्टर हि शसंदीश्वरोऽनुलनः पराभवितोः ३३॥ भयो पाहुम्हातुर्मुखे सम्भवतः । उद्गातुरेव मुख - . नेते- ११मम् | १२ मादायना, प्रादायना ।। १ सारे पद या पुनर्सेय है। २ स 'कामम' फे स्थान में। मा सबंध है।३हरुपडणेना भरगड, भवगडपणेना-पन् । ५-धीपाप, शीयाम् । रन् । ७ योत, येत।८-३-1,अद् । १० नुनुनय, अनुनुहन- १२ . १६ १५ वेति ॥४॥ तदु या आहुः काममेयोगातुर्मुखमीक्षेत । उपवसधीयामे- वैतां रात्रि सदसि न भयीन । अत्र धेरैनावमामे उपवस्थीयां रात्रि सदसि सम्भवत इति ॥५॥ वां सम्भविष्यन्नाहामोऽहम- स्मि सावं सा त्वमस्यमोऽहम् । सा मामनुव्रता भूत्वा प्रजाःपन- नयावहै । एहि सम्भवापहा इति ॥६॥ तां सम्भवन्नत्यरिच्यत सोऽब्रवीन वै लाउनुभवामि । विगइ भूत्वा प्रजनयानेति । तथेति ॥७॥ तो विराइभूत्वा प्राजनयताम् । हिङ्कारश्चाहावश्च प्रस्तावश्च प्रथमा चोहीयश्च मध्यमा च प्रतिहारथोत्तमा च निपनं च पटकारश्चै पिराइ भृत्वा पाजनयताम् । ते अमुमजनयतां योऽसौ तपति । ते व्यद्रवताम् ॥८॥२५४॥ सप्तदशेऽनुवाके द्वितीय स्रगड । पदव्यभृन्मध्यभूदिति । तस्मादाहुर्मधुपुत्र डारे तस्मादुतस्त्रियो मधु नाऽश्नन्ति पुत्राणामिदं व्रतं चराम इति वदन्तीः ॥२॥ तदयं तृचोऽनुश्रयत । इयमेव गायत्र्यन्तरितं त्रिष्टुबसौ जगती । तस्यैतलचः ॥३|| स उपरिष्टात्सामाऽध्याहितं तपति । ११ न । १२-यो-1 १३ रण' अधिक है। १४-- १५ संभयत । १६ प्रात्यरिच्यते । १७] । १८ च । एवम् । १६ पॅज-1 २० व्यहप्ताम,म्यध्यताम, व्यहपताम् (१)। १ मा । २ इदम् । ३-- २० सोऽध्रुव उवासीदलेलायदिन । स नोवोऽनपत् ॥५॥ स देवा- नववीदुन्मा गायतेति । किं ततस्स्यादिति । श्रियं का प्रयच्छेयम् । मामिह रहतेनि ॥५॥ तयेति । तमुदगायन् । समेतदवाइन् । तेभ्यश्श्रियम्पायच्छत् । सैपा देवानांश्रीपाततएतद्धस्तपति। स नार्वाटतपत् ॥७॥ स ऋपीनप्रवीदनु मा गायतेति । किं ततस्स्यादिति । श्रियं यः प्रयच्छेयम् । मामिहदेहतात यातयति। तमन्वगायन् । तमेतदनाहन्। तेभ्यरिश्रयम्मायच्छत् । सपाऋषीणां श्रीः ॥६॥ तत एतदर्वाङ् तपति । स न तिर्यह अतपत् ॥१०॥ स गवर्वाप्सरसोऽब्रवीदामा गायतेति । किं ततस्यादिति । श्रियं वः प्रयच्छेयम् । मामिहदेहेतात ॥३१॥ तथेति। तमागायन। तमेतदवाऽहहन् । तेभ्यरिश्रयम्पायच्छत् । सैपा गन्धर्वाप्सरसा श्रीः ॥२॥ तत एतन् तिर्यरतपति ॥१३॥ तानि वा एतानि त्रीणि साम्न उहीतमनुगीतमागीतम् । तद्ययेदं चयमागापोढ़ायाम एनदुद्दीतम् । भय यद्ययागीतं तदनुगीतम् । अथ यत्किचेति सा- म्नस्तदागीतम् । एतानि होव त्रीणि साम्नः ||१४|| ॥५॥ सप्तदशेऽनुयाके तृतीयः खण्यः । सप्तदशोऽनुवाकस्समाप्तः। ४ स्-५-! ५ दुहेते।६ उदगात्। ७-इत्। तप्-तिय्यंदू । १० त । ११ तियद । १२ भागयो, मागेयो-1१३-धम् ।

( ५७ ) १ ३ आपो वा इदमग्रे महत्सलिलमासीत् । समिरूमिमस्कन्दत् । ततो हिरण्मयो कुक्ष्या समभवतां ते एवसामे ॥१॥ सेयगृगिदं सामाभ्यप्नवत । तामन्छत का त्वमसीति । साहमस्मीसबवीत् । अय वा अहममोस्मीति। तद्यत्मा चाऽमश्च तत्साम्नस्सामत्वम्॥२॥ तो वै सम्भवावति । नेसनवीवसा वै मम त्वमसि । अन्यत्र मिथुनमिच्छति ॥३॥ मा पराप्लवत मिथुनमिच्छमाना । सा समास्सहस्रं सप्ततीः पर्यप्नवत ||४|| तदेप इलोकः- वी स्मैवाऽग्रेसचरतीच्छन्ती सलिले पतिम् । ममाम्महत समती ततोऽजायत पदयत, इति ॥१॥ असौ या आदियः पश्यतः । एप एव तदजायत । एतेन हि पश्यति ॥६॥ साऽवित्त्वान्यप्लवत । साऽब्रवीन्नवैतविन्दामि येन सम्भवेयम् । त्वयैव सम्भवानीति ॥७॥सा वै द्वितीयामिच्छ- स्वखनवीन वै मैकोऽयंस्यसीति । सा द्वितीयां वित्ता न्यप्नवत || (तृतीयाम् ) इच्छस्खैवेसनवीनो वाव मा द्वे उद्यस्यथ इति । सा तृतीयां वित्वा न्यप्नवत । सोऽब्रवीदत्र वैमोऽस्ययति ९ १५ १६१७ १-२ । २ कुश्यौ । ३ येप । ४ कैसा-५ घल-1 ६ पपरा-1 ७ सम्ती । -ति । पश्यः । १० तम् । ११ पित्वा । १२ नास्ति 'न्यप्तयत । १३-यम् । १४ धै। १५ वा । १६ स्थान घोड़ा हुधा है, । १७ अम्-१८-स्यपी । सा"

( ५८ )
२०
३१
Y
। स यदेकया ग्रे समवदत तस्मादेकचें साम । अथ यद्वे अपा-
संधत्तस्माइयोन कुन्ति । अयं यत् तिसभिस्समपादयत्
तस्माइ
तृबैसाम॥१०॥ता अग्रवीरपुनीध्वंन पृतावस्येति ।।१२।। ५६॥
अादशेऽनुवाके प्रथम' सयड ।
सा गायत्री गाथयाऽपुनीत नारास्यानिष्टुंबभ्या जगती ।
भीमम्मत मनमपावधिपतेति । तस्मादीपलापियो वा एताः।पियो
या इमा मनमपावधिपतति । तस्मादु मामलाः । तस्मादु गायता
नानीयात् । मनेन होते जीवन्ति ॥१॥ अथर्क सामाऽमवीदह
किं च किं च पुमाँश्चरति । त्वमनुपुनीप्वति । स ऊर्ध्वगणेना-
पुनीत ॥२॥ पूतानि ह वा अस्य सामानि पूता ऋचः पूतानि
यपि पूनमनूक्तम्पूतं सम्भिाति य एवं वेद ॥३॥ ताभ्यां
दिशी मिथुनाय पाहन् । तां सम्भविष्यनहयता मोऽहमस्मि सा
त्वं सा सगस्यमोऽहमिति ॥४॥ तामतदुभयतो वाचायरिच्यत
हिङ्कारेण पुरस्तात्म्तोमेन मध्यतो नियनेनोपरिष्टात् । प्रतितिस्रो
ब्राह्मयायनीस्सदृशी रिच्यते य एवं वेद ॥शा तयोयरसम्भवतो-
१-पद्-२० तिन-1२१ सम्प-1
१-स्यात् । २ ५। ३-थे।४-ता । ५नी-
11-तानी ।
-ता। नूकस १०-पन्य । १९ अपचयन, महयन्त । १२ साम
१३-१४ स्याप्यते।

१९ रूवश्शूपोऽद्रवत् (प्राणास्) ते । ते प्राणा एवौ• अद्रयन् ।।६।। सोसावादिसस्स एप एष उदग्निरेव गी चन्द्रमा पच धम् । सामान्येव उच्च एवं गी यब्रूप्येव थमिसधिदेवतम् ॥७॥ अथा- ध्यात्मम् । प्राण एव उद्बागेत्र गी मन एव थम् । स एपोऽधिदेवतं चाऽध्यात्म चोद्गीयः ।। स य एवमेतदधिदेवतं चाऽध्यात्म चोही वेदैतेन हास्य सणोद्गीतम्भवसेतस्माद् एव सर्वस्मादा- च्यते य एवं विद्वाँसमुपवदति ॥६॥ १॥५७|| अष्टादशेऽनुवाके द्वितीय सण्ड । तयदिदमाहुः क उदगासीरिति क एतमादिसमगासीरिति ६ वा एतत्पृच्छन्ति ॥१॥ एतं ह वा एतं त्रय्या विद्यया गायन्ति । यथा वीणागाथिनो गापयेयुरेवम् ॥२॥स एप हदः कामानाम्पों यन्मनः । तम्यैपा कुल्या यद्वाक् ॥३॥ तद्यथा वा अपो हृदात्कु ल्ययोऽपरामुपनयन्येवमेवैतन्मनसोऽधि वाचोहाता यजमानम् यस्य कामान् प्रयच्छति ॥१॥स य उद्गातारं दक्षिणाभिराराधयति १५ चु-1 १६ द्र-1 १७ ऽद्धा-1 १८ गीय-1 १८-गीय- २० भवत्येति, भवन्ति । १-सो। २ प्रच्हन्यं । ३ नृय्या । ४-गायिनो, गाय-1 ५ हृद- ६ फूल-1७ यत् । चात् । न । १० प्रदो । ११-न्य, पन्ते, -पन्त्य । १२-ना। १३ दक्षिणोमि । १४ राध ૧૨ (६०) १५ २० तं सा कुल्योऽपधावति । य उ एनं नाऽऽराधयति स उ तामाप- हन्ति ॥शा अय वा अतः प्रत्तिश्चैव प्रतिग्रहश्च । तद्भूममिति में प्रदीयते । तद्वाचा यजमानाय प्रदेयम्मनसाऽऽत्मने । तथा ह सर्व न प्रयच्छति ।।६।। तद्यदिदं सम्भवतो रेतोऽसिन्यत तदशयत् । यथा हिरण्यमविकृतं लैलायदेवम् ||७|| तस्य सर्वे देवा ममविन आसन्मम ममेति । तेऽनुवन्नीदं करयामहा इति । तेऽध्रुव,यो वा इदमस्मत् । प्रात्मभिरबनविकरवामहा इति ॥८॥ तदात्मभिरेव च्यकुर्वत । तेषां वायुरेय हिङ्कार प्रासाऽनिः प्रस्ताव इन्द्र आदि- स्सोमवृहस्पती उद्गीथोऽश्विनी प्रतिहारो विधे देवा उपद्रवः मजापतिरेव निधनम् ॥ एता वै सर्वा देवता एता हिरण्यम् । अस्य सर्वाभिर्देवताभिस्स्तुतम्भवति य एवं वेद । एताभ्य उ एक्स सर्वाभ्योदेवताभ्याश्यते यएवं विद्वाँसमुपवदति॥१०॥ १५८।। 'मटादशेऽनुवाके तृतीयः सगड । अथ ह ब्रह्मदत्तश्चकितानेयः कुजगामाऽभिमतारिण काक्ष- सेनिम् । स हाऽस्मै मधुपर्क ययाच ॥५॥ अथ हास्य वैमपय पुरो- २३ २४ . १५ अध । १६ प्रतिश् । १७ धु-१८ मात्- १६ सिध्य्- २० दश-1२१ अपि-मपितृनं । २२ या ।२३ सोमाय-बार हिरयम् ।। १फ-, भारन् । २ एफ में यहां हि समाप्ति है।न्य ।

७ हितोऽन्ते निपसाद शौनकः । त हाऽनामन्त्र्य मधुपर्कम्पपी ॥२॥ स होवाच कि विद्वान्नो दालभ्याऽनामध्य मधुपर्कम्पियसीति । सामौर्यम्भपद्येति होवाच ॥३॥ त ह तत्रैव पप्रच्छ यद्वा यौ तद्वेत्या ३इति । हिवारो वा अस्य स इति ॥४॥ यदनौ तद्वेस्था३- इति । प्रस्तावो वा अस्य स इति ॥५॥ यदिन्द्रे तद्वेस्थाइइति । प्राढिर्वा अस्य स इति ॥६॥ यत्सोमबृहस्पयोस्तद्वेत्याइति । उद्- गीथो वा अस्य स इति ॥७॥ यदश्विनोस्तद्वेत्या३इति । प्रतिहारो वा अस्य स इति ॥८॥ यद्विश्वेषु देवेषु तस्याइति । उपद्रवो वा अस्य स इति ॥६॥ यत्प्रजापती तद्वन्याइति । निधन वा अस्य तदिति होवाच । आयं वा अस्य तद्वन्धुता वा अस्य सेति ॥१०॥ स होवाच नमस्तेऽस्तु भगवो विद्वानपा मधुपर्कमिति ॥११॥ अथ हेतरः पप्रच्छ कि देवस सामवैर्यम्मपद्योति । यद्देवसा- मु स्तुवत इति होवाच तद्देवसमिति ॥२॥ तदेतत् साम्वेव मत्युक्तम् । च्याप्ति; अस्यैपति होवाच येवेति । मेदं ते नमो. ऽकर्मति होगाच । मै नोऽतिपातीरिति॥१३॥ स होवाचा:प्रक्ष्यं १० ११ १२ १३ ४-मन्त्र 1५ सामवैया, 'र' रहित । ६ तत 1 ७ सोमाय- ८'द' का पुनलेस । ९ नास्ति । १० अव्य । ११-वत्या | १२ सामवैय्या | १३-उत्तम् ।

४ पाव वा देवतामपदयं वाव त्वा देवतायै देवताः । वाग्देवसं साम पाचो मनो देवता मनसः पशवः पशूनामोपधय भोपधीनामापः । तदेतदयो जातं सामाऽशु मतिष्ठितमिति ॥१४॥ १।५।। मष्टादशेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः। देवामुरा अस्पर्धन्त । ते देवा मनसोदगायन । तदेपाममुरा अभिदुःस पाप्मना समजन् । तस्माइडु किं च किं च मनसा ध्यायति । पुण्यं चैनेन ध्यायति पापं च ||२|| ते वाचौदगायन। नां तथैवाकुर्वन् । तस्मादहु कि च किं च वाचा बदति । सत्य चैनपा वदसमृतं च ॥२॥ ते चतुपोदगायत् । तत्तथैवा कुर्वन् तस्मादहु किं च किं च चतुपा पश्यति । दर्शनीयं चनेन पश्यस दर्शनीयं च ॥३॥ ते श्रोत्रेणोदगायन् । तत्तथैवाऽकुर्वन् । तस्माद्दु किं च किं च श्रोत्रेण भृणोति । श्रवणीयं चैनैन शृणोत्यश्रवणीय च॥४तेऽपानेनोदगायन् । तं तथैवाकुर्वन् । तस्मादहु किंच किं चाऽपानेन जिघ्रति । मुरभि चैनेन जिनति दुर्गन्धि च ॥शा से माणेनोदगायन् । प्रथामुरा भाद्रयस्तया करिप्याग इति पन्यमानाः ॥६॥ स यथाऽस्मानमृत्वा लोप्टो विसतवमेवाऽसुरा १४ म्यो। १ऽगाय-1 २-२च्य प्रयवा-दत्य । ३-सज्-४ य । ५पूर र-स्या ७ । नास्ति । -गात् । C ध्यध्वसन्त । स एपोऽश्माऽऽखणं यत्माणः ॥७॥ स यथाऽश्मान- गखणमृत्वा तोटो विध्वसत एवमेव स विध्वंसते य एवं विद्वा- समुपपदति ॥८॥१६॥ अष्टादशेऽनुवाकै पक्षमः खण्डः । अष्टादशोऽनुवाकस्समातः । [इति प्रथमोऽध्यायः।] -:० १० सते, पन्ता । ११-णों । १२ पापणेम् ।

[अथ द्वितीयोऽध्यायः ।। ३ देवानां वै पटुदगातार आसन वाक् च मनश्च नत्तुश्च ओत्रं चापानश्च माणश्च ॥१॥ तेभियन्त तेनोद्गात्रा दीक्षामहे येनाऽपहर मृत्युमपहस पाप्मानं स्वर्गलोकमियायेति ॥२॥ तेऽब्रुयन् वाचोद्गात्रा दीक्षामहा इति । ते याचोदगात्राऽदीक्षन्त । सयदेव याचा वदति तदात्मन आगायदय य इतरे कामास्तान्देवेभ्यः॥३॥ ताम्पाप्माऽन्वसृज्यन । स यदेव याचा पापं वदति स एव स पाप्मा ॥४॥ तेऽत्रुवन् न वै नोऽयम् मृत्यु न पाप्मानमसवाक्षीत्। मनसोदगात्रा दीक्षामहा इति ।।५।। ते मनसोडात्राऽदीक्षन्त । स यदेव मनसा ध्यायति तदात्मन पागायदय यइतर कामास्तान्देवे- भ्यः ॥६॥ तत्पाप्माऽन्यज्यत । स यदेव मनसा पापं ध्यायति स एव स पाप्मा ||७|| तेऽनुवन् नो न्वाव नोऽयम् मृत्यु न पाप्मानमसवाक्षीत् । चतुपोहाना दीक्षामहा इति ॥ाते चक्षुपो- दानाद्रीवन्त । स यदेव चतुपा पश्यति तदात्मन ागायदय य इतरे कामास्तान्देवेभ्यः || तत्पाप्माऽन्वलन्यत । स यदेव चतुपा पापम्पश्यति ( स एव स पाप्मा) ३०|| तेऽत्रुवन्नोन्वार 1-मा२'य'अधिक है।३-त्यु।४प्रवीन् । ५न्याभवत्य-1-मान्- ७ नोऽयम्मृत्यं न पाप्मानमसवासी । श्रोत्रणोद्गात्रा दीक्षामहा इति ॥१२॥ ते श्रोत्रणोदानाऽदीक्षन्त । स यदेव श्रीरेण शृणोति तदात्मन धागायदय य इतरे कामास्तान्देवेभ्यः ॥१२॥ तत्पाप्मा- ऽन्यज्यत । स यदेव ओत्रेण पापं णोति स एव स पाप्मा ॥१॥ तेऽब्रुवन्नो न्वाव नोऽयम् मृत्यु न पाप्मानमसवाक्षीत् । अपानेनोहात्रा दीक्षामहा इति ॥१४॥ तेपामेनोगात्राऽदीक्षन्त । स यदेवाऽपानेना पानिति तदात्मन आगायदय य इतरे कामा- स्तान्देवेभ्यः ||१|| सम्पाप्मा:वरज्यत । स यदेवाऽपानेन पापं गन्धमपानिति स एव स पाप्मा ०६ तेऽनुवन्नोन्याय नोऽय- म्मृत्युं न पाप्मानमसरातीत् । प्राणेनोद्गात्रा दीक्षामहा इति॥१७॥ ते प्राणेनोदात्राऽदीक्षन्त । स यदेव प्राणेन मारिणति तदात्मन आगायदय यइतरेकामाम्तान्देवेभ्यः|| ||तम्पाप्मानान्वरज्यत । न होतेन प्राणन पापं वदति न पापं ध्यापति न पापम्पश्यति न पापं रणोते न पापं गन्यमपानिति ॥६॥तेनाऽपदृस मृत्युमपहस पाप्मान स्वर्ग लोकमायन । अपहस हैव मृत्युमपहस पाप्मानं स्वर्ग लोकमति य एवं वेद ॥२०॥२१॥ प्रयमेनुवाके प्रथमः सपहः । भारत।

सा या सा पागासीत्सोऽनिरभवत् ॥ अय यत्नम्मान मासीत् स चन्द्रमा प्रभात ||२|| अय यतरतुरासीत् स मादियोऽभवत् ॥३॥ अथ यत्तच्छोन्मासीना इमा विशोऽभरन् । ताउएव निश्वदेवा गाशा अथयस्सोऽपान मासीत्स गृहस्पतिरभवत्। यस्ये पाची वृइसे पतिस्तस्मादहरपतिः ॥५॥ अथ यस्स मारा आसीत्स मजारतिरभर।स एप पुत्री मनावानुलो यमाणः। सस्य स्वर एवं प्रमाः । प्रजारान्भवति य एवं वेद ॥६॥ तेहेनके मसलमेर गापन्ति प्राणामाणाभागाः हुम्भा भोवा इति ॥७॥ तदु होवाच गाव्य पनिस्तत एतमहति पसदं गातुम् । यद्वार घाचा परोति तदेतदेवाऽस्य रुतम्भवतीति ॥८॥ अथ या मत १ सानोरेय मनातिः । स यद्धिदरोखभ्यर तेन क्रन्दति । भय यत्मस्तायैव तेन प्लाते । प्रथ याटिमादरत एव तेनसिञ्चति । प्रय यदुदायति रेत एष तेन सिक्त सम्भाव पति । भय पत्सति- हरति रेत पर तेन सम्भूतनवर्षयति । अथ यदुरवाते रेत पर तेन प्रदं हिरोति । अथ यनिग्नमुपातेरेत एव तेन सितम्मन- १ यत् । २ मतम, भय। ३ पर्वते । ४६।५-भ- नास्ति यति। मय यत्पतिहरति।

नयति । सैपरसानीः प्रनातिः ॥8स य एवमेनामुक्सानोः प्रजाति वेद प्र हैनमुक्सामनी जनयतः ॥१०॥ २२।। प्रयोगके द्विनीयः सः। प्रथमोऽनुवाकररूमातः॥ एप एवेदमन ग्रासीय एप तपति । स एप सर्वेषाम्भूतानां तेनो हर इन्द्रिय वीर्यमादायो उदकामत ॥१॥ सोऽकामयत- कमेगाऽक्षरं स्वादु मृदु देवानां वनामेति ॥२॥ स तपोऽतप्यत । स तप तोफतरनमात ॥३॥ तं देवाचर्प पश्चोपसमैप्सन् । अर्थपोऽमरान्नूतहनोऽरजतस्य पाप्मनोऽननाममाय ॥४॥ तं पाचोपसमैप्सन् । ते वाचं समारोहन् । तेपां वाच-पर्यादत्त । तस्मात्पर्याद ता वा । स च नया वदसनृतं च ॥शा तन:- नसोपसमेप्सन् । ते मनस्समारोहन् । तेपाम्मनः पादत्त । तस्मात्पर्यादत्तम्मन[:]म् ! पुण्यं च होनेन ध्यायति पापं च ॥६॥ तं चतुओसोन्तत् । ने चतुप्समारोहन् । तेषां चतुः पर्यादन। ন আযাব चतुः। दर्शनीयं च ह्यनेन पश्यत्यदर्शनीयं च ॥७॥ ६ सन:, सान। रस ।२-या । ३ मदु । ४ नास्ति । ५ एति । ऐवा । ७ 'उमेवानाम् ' पूर्व से पुनः है। ८ परयचं ।

तं श्रीरणोपसमप्सन् । ते श्रोत्रं समारोहन । तेपोम्पादत्त । तस्मात्पर्यात्तं श्रोत्रम् । श्रवणीयं चनेन गोयश्रवणीयं च ।। मपाननोपप्तीप्सम् । तेऽपान समारोहन् । नेपामपानम्पर्यादत्त। तस्मात्पर्यानोऽपानः । मुरभि च धनेन जित्राति दुर्गन्धि च ॥ तम्मानोपममेप्सन । नन्नाणेनोपसमाप्नुवन् ॥१०॥ अथाऽमुरा गृतहन आठवन्म हयिप्याग इति मन्यमानाः ॥१॥ स यथा- इमानमा लोप्टो निवसतैवमेवाऽमुरा प्यध्वसन्त । स एपोडरमा- .खयो पत्मागः ॥॥ स यथाऽरमानमारुणमृत्ता लोप्टो विध्वंसत एवमेव स विधंसते य एतं विद्वांसमुपपदति ।।.शा द्वतीय नुराक प्रयम.ग्मण्डः । स एप यशोटीसाग्र उट्टीयो यत्माणः। एप हीदं सर्व वशेकुरते ॥ ॥ वनी भाति यश सान्कुग्ने य एवं वेद । अस्प द्यसायग्रे दीप्यते अमुप्प वासः ॥शात हैतमुट्ठीयं शाध्यायनिराचष्टे वशी दीप्ताय इति । दीप्ताया ह वा अस्य कीर्तिवति य एवं वेद ॥३॥ माभूतिरिति कारीगढयः प्राणं वा अनुमजाः पशर मामन्ति । स य एउमेतमा निरिन्युपास्त ऐमाणेन मजया पशुभिर्भवति॥१॥ पयांत, पर्याप्त १ए त ईई सर्व घशेकुरते ऐसा पाठ देते हैं। शो। ३ मुर-मत। ४ सम्मारिति सात्ययज्ञयः । प्राण वा अनुमजाः पशवस्सम्भवन्तिा स य एवमेत सन्भूतिरित्युपारते समे [य] माणेन मजया पशुभि- भाति ॥३॥ प्रभुतिरिति शेन सः । प्राण वा अनुजाः पशवः प्रभवन्ति । स य एउमेतम्मभूतिरित्युपास्ते और प्राणेन मजया पशुभिर्भवति ॥६॥ मृतिरिति भाल्लपिनः । पाणं वा अनुजाः पशको भान्ति । स य एवमेतम्भूतिरित्युपास्ते भात्येव प्राणेन प्रनमा पशुभिः ॥१॥ प्रारोधोऽनपरुद्ध इति पार्णर्शलनः । एप हान्यमपरणद्धि नैतमन्यः । एप हवाऽस्य द्विपन्तम्भ्रातृव्यम- परुणाद्ध य एवं वेद माना द्वितीयेऽनुगके द्वितीय खण्ड । एकवार इत्यारुणेयः । एको ोवैप वीरो यत्माणः । आ हा ऽस्यको वीरोवीर्यपामायते य एव वेदशाएक्पुत्र इति चैकितानेयः। एको होवैप पुत्रो यत्माणः ॥२॥ स उ एव द्विपुत्र इति । द्वौ हि भाणापानौ ॥३॥ स उ एव त्रिपुत्र इति । त्रयो हि माणोऽपानी व्यानः ॥४॥ स उ एव चतुप्पुत्र इति । चत्वारो हि माणोऽपानो ५-भूर् । शलि-७ पजया' अधिक है। भूर् ।९अवरोद्धा। १०-पद्वि । ११ से । १०-त । १३-धीन्- १-छ। र त्य। ३-एय, एफो फेस्थान में सर्वत्र पका'४-५ । ५हिए- २ (७०) च्यानस्समानः 1:शा स उ एक पञ्चपुत्र इति । पञ्च हिमाणोऽपानो न्यानस्समानोऽवानः ||६|| स उएर पट्युत्र इति । पहि माणो- सानो च्यानस्समानोऽवान उदानः ॥७॥ स उ एव सप्तपुत्र इति सप्तधीमे शीर्षण्याः पाणः ॥८॥ स उ एव नवपुत्र इति सप्तहि शोषण्याः माणा द्वापाचौ ॥३॥ स उ एव दशपुत्र इति । सप्त- गोपए माणा द्वापाचौ नाभ्यां दशमः ॥ ०॥ स उ एर बहुपुत्र इति । एतस्य होयं सम्मिनाः॥१०॥ एतं हस्म वैतदुद्दीथं वि.सः पूर्वेप्रारूयाः दानागानि आहुः पति ते पुत्रानागास्याम इति ॥१॥ द्विर्त येऽनुवाके तृत या सपडः। स याद यादेवनामागायेति माण उदीय दान रिदानेननसा ध्याये । रको हि माणः । एकोहाड याऽऽजायने ।। स यदि तूपाही म भागायेति माणउद्गीथ इत्येव विद्वान्दो मनसा ध्याये । द्वौइमाणापानौ दो गाऽस्याऽऽनायो।२।।स यदि चूयाजोन्म मा- मायोति पाणरहोय इत्येव विद्रास्त्रीन्यनसाध्यायेन यो हिमायो -ना। अभि-मर घमसुत्र । १० यम, दयम् । ११-गेन ॥ १ऐष्-२ श्यो। ३'प्यानः' अधिक है। ४'स यास्यामा- पम्त प्रधिको। ५मन।

६ ऽपानोपान । यो हैवाऽस्याऽऽजायन्से ॥३॥स यदि यातुरोग भागायेति प्राणा उद्गीथ इत्या विद्वॉश्चतुरो मनरा यायेत् । चन्वारो हिमाणोऽपानो च्यानस्समान । चत्वारो हास्याऽऽनायन्ते ॥४॥ त यदिछूयारपञ्च म अगायेति प्राणहीयइत्येव विद्वान्पच मनसा ध्यायेत् ।पञ्चहिमाणोऽप नो व्यानरसमानोऽवानः। पञ्च वाजया जायन्ते ॥५।। स यदि ब्रूयात् परम आगायेतिवाणउद्गीय इत्येर विमान परमतता धाये। पाई पणो पाने व्यानस्लमानोडान उदानः।पढ्य ऽस्याऽऽजायन्ते ॥६॥ स यदि यात्सहमागा- येति प्राणउद्गीय इत्येय विद्वान् सामनसा ध्यायेत् । सप्त हमे शे परयःमाण ।सा हेवाSEऽनायो॥७॥ स यदि ब्यानव म मागायेति माण उद्गीथ इत्येव विद्वान्नव मनसा ध्यायेत् । स्प्स शीर्पण्याः प्रणा द्वाश्याची । नव हैवाऽस्याऽऽजायन्ते ॥८॥स यदियादश म पागायति माणउद्गीथ इत्येव विद्वादशं मनसा ध्यायेत् । सप्त शीरियाःमाणा द्वापराचौनाभ्या दश्मा दश हैवा अयाजायन्तेपास यदिव्यासहरन्म मागायेति प्राणाद्गीय इत्येव विद्वान सहरुन्मनसा ध्यायेव ।सहस्र हेत मादित्परत्ययः । तस्य पुत्र. । सहस्रदेवाऽस्याऽऽजायन्ते ॥१॥ एव वतमुट्टीय समास्तिोस यदि न्यानम्। भारदा।१०।११ ह । .

३ १३ म्परादणार कक्षावाँस्त्रसदस्युरिति पूर्वमहाराजाश्रोत्रियास्सह- सपुत्रमुपनिपेदुः। ते ह सर्व एव सहस्रपुत्रा प्रामुः॥१॥सय एवैवं वेद सहन हैवाऽस्य पुना भवन्ति ||१०॥ २१॥ द्वितीयेऽनुवाके चतुर्थ खण्ड । द्वितीयोऽनुयावरसमाप्त । ९ शर्यातो वै मानः पाच्या स्थल्यामयनत । तस्मिन् हभूता- न्युद्गीथेऽपित्वमापरे ।।१।। तं देवा बृहस्पतिनोदगाना दीक्षामहा इति पुरस्तादागन्छन्नयं त उद्गायत्तिति । चमेनाऽऽजट्रिषेण पितरो दक्षिणतोऽयं त उद्गायरित्युशनसा काव्येनाऽमुस: पश्चादय त उद्गायत्तिसपास्येनाऽऽगिरसेन मनुप्या उत्तरतो- s त उद्गायचिति ॥२॥ स हैतांचके इन्तनात पृच्छानि कियतो वा एक ईशे कियत एकः कियत एक इति॥शासहोताच बृहस्पति यन्मेत्वमुद्गायः किं ततस्स्यादिति ॥ स होवाच देथे- वेव श्रीम्स्यादेवेषीशा स्वर्गमुत्वालोकं गमयेयमिति ॥ प्रय होगच वम्बमाद्विपम्पन्मेवमुद्गायः किं ततस्स्यादिति ॥६॥ स १२ ऑन् । १३ यद्। १य्या- २ स्थानम् । ३ मयत । ४ऽपिसमम् । ५ ऐशिरे। बिम्ब-1 ७ दक्षणतो। कास्ना । १-२१० पचात । ११ मयांहस्सेना, महिस्येना। १२झिय । १३ ति ।१४ ध्रिपम्प्रधिरः है। १५ नास्ति, स होवाच ततस्स्यादिति। १३ .....

१८ ૨૦ २१ ૨૨ होवाच पितृप्येव श्रीस्स्यासितृप्तीशा स्वर्गमु त्वांलोकं गमयेयमिति ॥७॥अथ होताचोशनसं काव्यं यन्मे त्वमुद्गायः किं ततस्स्यादिति ॥८स होवाचाऽमुरेप्वेव श्रीस्स्यादमुरेप्वीशा स्वर्गमुत्वां लोकं गमयपमिति॥ अथ होवाचाऽयास्यमागिरसं यन्मे त्वमुद्गायेः किं ततस्स्यादिनि ॥१०॥ स होवाच देवानेव देवलोके दध्याम्मनुप्या- न्मनुष्यलोके पितॄन पितृलोके नुदेयाऽस्माल्लोकादसरान स्वर्गमु त्वां लोकं गमययामिति ॥२भारा॥ तृतीयेऽनुवाके प्रथम खण्डः। स होवाच त्वं मे भगव उद्गाय य एतस्य सर्वस्य यशो[ऽसीति ॥२॥ तस्य हाऽयास्य एवोज्जगौ । तस्मादुद्गाता रत उत्तरतो निवेशनं लिप्सेत । एतद नाऽऽरुद्ध निवेशनं यदुत्तरतः ॥२॥ उत्तरत भागतो यास्य भागिरसशर्यातस्य मानवस्योलगौ । स प्राणेन देवान्देवलोके दधादपानेन मनुप्यान्मनुष्यलोके व्यानेन पितॄन् पितृलोके हिङ्कारेण वजेणास्माल्लोकादपुराननुदत ॥३॥ सान होवाच दूरं गच्छतेति । स दरो ह नाम लोकः। तं ह जग्मुः। त एतेऽसुरा असम्भाव्यम्पराभूताः ||४|| छन्दोभिरेव पाचा १८ य । १७ जे । १८-शाः १९ न्वं । २०-ध्यात् । २९-हॅन्। २२ अधिक है। २३ है ।। १-शस । २-तृन् । ३असोयम्- - शर्यातम्मान स्वर्ग लोकं गमयांचकार ॥शाते होचुरमुरा एतत पैदाम यो नोज्यामित्यमधत्तेति । तत प्रागच्छन् । तमेसाऽपश्यन् ।।६।। तेऽब्रुवनयं वा आस्य इति । यदब्रुवन्नयं वा प्रास्य इति तस्मादय- मास्यः । अयमास्यो हवं नामैपः । तमयास्य इति परोतमाच- सते ॥७॥ स प्राणो वा प्रयास्यः । माणो वा एनान् स नुनुदे ।।८।। स य एवं विद्वानुदायति प्राणेनैव देवान्देवलोके यासपानेन मनुप्यान्मनुष्यलोके व्यानेन पितॄन् पितृलोके हिलारणेव वजेणाऽस्माल्लोकाविपन्तम्भ्रातृव्यं नुटते ॥६॥२८॥ मृतीयेऽनुवाके द्वितीय स्वपड । तं ह ध्यादरं गच्छति । स यमेव लोकमहरा अगस्त है। गच्छति ॥२॥छन्दोभिरेव वाचा यजमान स्वर्गलोकं गमयति ॥२॥ ता एता व्याहृतयः मेयोत वाण इति] भूर्भुवस्वरित्य[उदिति]||३|| सबसेति तत्माणस्तदयलोकतदिम लोकमस्मिनोकामनति॥४॥ एसपानस्तदसौ लोकस्तद, लोकममुप्निलोक भाभनति ॥५॥ पागिति तद्ब्रह्म तदिदमन्तरिक्षम ॥६॥ भूर्भुवस्सरिति सा प्रयी- विद्या 10 उदिति सोऽसावादियः । तघदुदित्युदिव श्लेष- ४ॉय्या-1५16-उस । -प्रसो। पान्-16 पाहिए- १०-पान् ॥ १-या।२ स्या- ३ सत् ।

( ७५ ) यति ॥८॥ तद्यदेकमेवाभिसम्पद्यते तस्मादेकवीरः । एको ह तु सन्नीरो वीर्यवान् भवति । आहाऽस्यैको वीरो वीर्यवान जायते य एवं वेद ।।। तदु होताच शाध्यायनिर्वहुपुत्र एप उगीय इसे- चोपासितव्यम् । वयो ह्येत प्रादिस रश्मयस्तऽस्य पुत्राः । तस्मा- दहुपुत्र एप उद्गीथ इसेवोपासितव्यमिति ॥२०॥६॥ तृतीयेऽनुवाके सृतीय खण्डः । तृतीयोऽनुवाकस्समाप्तः । मिया २ देवामुरास्समयतन्तेयाहुः । न ह वै तद्देवासुरास्सम्येतिरे । प्रजापतिश्च ह वै तन्मृत्युश्च सम्येताते ।।२।। तस्य ह प्रजापतेर्देवाः पुत्रा अन्त भानुः । तेधियन्त तेनोदात्रा दीक्षामहै येना- ऽपहस मृत्युमपहस पाप्मानं स्वर्ग लोकमियामेति ॥२॥ तेऽब्रुवन्वा- चोद्गात्रा दीक्षामहा इति ॥३॥ ते वाचोहात्राऽदीक्षन्त । तेभ्य इदं वागागायद्यदिदं वाचा वदति यदिदं वाचा भुञ्जते ॥४॥ ताम्पाप्माऽन्वरज्यत।सयदेव वाचा पापंवदति स एव सपाप्मा॥१॥ तेऽनुवन् न वै नोऽयम्मृत्यु न पाप्मानमसवाक्षीत् । मनसोद्गात्रा दीक्षापहा इति ॥६॥ ते मनसोद्वाना दीक्षन्त । तेभ्य इदम्मन ४श्यप-1५-ए।६-यावान् ।७-ए (इत्य)।८मादित्यस्यारत ॥ १-याय । २' मोद्गात्रा दीक्षामहा इति' अधिक है पर 'ते' और 'भ्य' के बीच बाल रन से फाटा गया है । ३ प्रवत्य- गाययदिदम्मनसा ध्यायति यदिदम्मनसा मुझते ॥७॥ तत्पा- प्माऽन्वसृज्यत । स यदेव मनसा पापं ध्यायति स एव स पाप्मा ॥८॥ तेऽब्रुवन्नोन्वाव नोऽयं मृत्यु न पाप्मानमसवाक्षीत् । चतुपोगात्रा दीक्षामहा इति । ते चतुपोहात्राऽदीक्षन्त । तेभ्य इदं चतुरागायद्यदिदं चतुपा पश्यति यदिदं चतुपा भुमते ।।१०।। तत्पाप्माऽन्वसृज्यत । स यदेव चतुपा पापम्पश्यति स एव स पाप्मा ॥१॥ तेऽघुवन्नोन्वार नोऽयम्मृत्यु न पाप्मा- नमसवाक्षीत् । श्रोत्रणोदात्रा दीक्षामहा इति ॥१२॥ ते श्रोत्रेणो- द्वात्राऽदीक्षन्त । तेभ्य इदं श्रोत्रमागायद्यदिदं श्रोत्रेण मृणोति यदिदं श्रोत्रेण भुनते ॥१३॥ तत्पाप्माऽन्वसृज्यत । स यदेव श्रोत्रेण पापं शृणोति स एव स पाप्मा ॥१४॥ तेवनोन्वाब नोऽयं मृत्यु न पाप्पानमसवादीन् । पाखेनौगात्रा दीवामहा इति ॥१शा ते प्राणेनोगात्राऽदीतन्त । तेभ्य इदं मारा भामाय- यदिदं प्राणन प्राणिति यदिदं प्राणेन भुझते ॥१६॥ तम्पाप्मा- ऽन्वएज्यत । स यदेव प्राणेन[ पापं माणिति स एव स पाप्मा॥१७॥तेऽनुवमोन्वाव नोऽयं मृत्युं न पाप्पानमसवाक्षीद। अनेन मुख्येन प्राणेनोगात्रा दीदामहा इति ॥१८॥ तेऽनेन ४-न्यु । ५'म' अधिक है। ने।

(७) मुख्येन पाणेनोगात्राऽदीक्षन्त ॥१॥ सोऽब्रवीन्मृत्युरेष एषां स उद्गाता येन मृत्युपसेप्यन्तीति ॥२०॥ न होतेन प्राणेन पापं वदति न पापं ध्यायति न पापम्पश्यति न पापं शृणोति न पापं गन्धमपानिति ॥२२॥ तेनाऽपहस मृत्युमपहस पाप्मानं स्वर्ग लोकमायन् । अपहस हैव मृत्युमपहस पाप्मानं स्वर्ग लोकमेति य एवं वेद ॥२२॥२॥१०॥ चतुर्थेऽनुवाके प्रथम सण्डः। स यथा हत्वा प्रमृगातीयादेवमेवैतम्मृत्युमत्यायन् ॥१॥ स वाचम्मयमामत्यवहत् । ताम्परेण मृत्यु न्यदधाद । सोऽमिर- भवत् ||२|| अथ मनोऽत्यवहत् । तत्परेण मृत्यं न्यदधात् । स चन्द्रमा भभवन ॥३॥अथ चतुरत्यवहत् । तत्परेण मृत्यु न्यदधाव। स भादित्पोऽभवत् ॥॥ अय श्रोत्रमत्यवहत् । तत्परेण मृत्यु न्यधात् । ता इमा दिशोऽभवन् । ता उ एव विधे देवाः ॥५॥ अथ प्राणमत्यवहत । तम्परेण मृत्यु न्यदयात् । स वायुर- मवत ॥६॥ अथाऽऽत्मने केवलमेवाऽन्नाद्यमागायत् ॥७॥ स एप २ ७-यमू८िगमयन् । १स अधिक है, 'प्रत्यायन्' के स्थान में-यत् ।२-यु। ३-न् । ४६था। .

। १० (७८) एवाऽयास्यः । प्रास्य धीयते । तस्मदयास्यः । यतया ऽयम] प्रास्य रमते तस्मादेवाऽयास्यः ॥८।। स एप एवाऽऽगिरसः। अतो हीमान्यनानि रसं लभन्ते । तस्मादाङ्गिरसः । यद्वैवपा- मङ्गानां रसस्तस्मा द्वेवाऽऽगिरमः ॥ ते देवा अनुवन् केवलं चा प्रात्मनेऽन्नाद्यमागासीः। अनु न एतास्मिननाथ भामज । एवंदस्याऽनामयत्वमस्तीति ॥१०॥ तं वै पविशति । स वा प्रकाशान् कुरुप्येति । स इमान् प्राणानाकाशनकुरुत ॥११॥ ते वागेव भूताऽग्निः माविशन्मनो भूत्वा चन्द्रमाश्चतुर्भूता ऽऽदित्यदश्रोत्रम्भूत्वा दिशा प्राणो भूत्वा वायुः ॥१२॥ एषा वै देवी परिपची सभा देवी संसद ॥१३॥ गच्छति ह वा एतां देवीम्परिपदं दैवीं समां देवीं संसदं य एवं वेद ॥१४॥२॥११॥ चतुर्थेऽनुवाफे द्वितीयः खण्डः। यत्रो ह वैक चैता देवता निस्पृशन्ति न हैव तत्र कश्चन पाप्मान्यतः परिशिप्यते ॥११॥ स विद्यान्नेह कश्चन पाप्मान्यद्गः परिशेक्ष्यते सर्वमेवता देवताः पाप्मानं निपक्ष्यतीति । तया हैव ५प्रासे । यति । ७ पगें। ८स्वीर-श्यास्य । १० अंड-1 ११ प्रः । १२ मामयत्यम् । १३ असी । १४ प्राकाचात् । १२ माशासनम | १९ फस्त । १७ नास्ति।१८ची-॥ १।२।३एएमाए।

६ ७ भवात ॥२॥ य उ ह वा एवंषिदमृच्छति यर्थता देवता ऋत्वा नीयादेवं न्येति । एतामु हवेनं देवतामु प्रपन्नमेतामु वसन्तमुप- वदति ॥३॥ तस्य हैतस्य नैव काचनाऽऽतिरस्ति य एवं वेद । य एवैनमुपवदाति स आतिमाईति सय एनमयदेव तादेवता १२ उपसत्य यूयादयम्माऽऽरत् स इमामाति न्येविति। तां देवाति न्येति ॥शा यारटावासा उ हास्यमे प्राणाअस्मिलोक एतावदा- १५ १६ पासा उहाऽस्यता देवता अमुप्मिलोके भवन्ति ॥६॥ तस्मादु हैवं विद्वानवा रहताय विभीयानालोकताय । एता मे देवता भस्मिलोके गृहान् करिष्यन्ति । एता प्रमुप्निलोके भवन्ति । वस्मादु लोकम्मदास्यन्तीति ।१७॥ तस्मादु हैवं विद्वान्नैवाऽगृहतायै विभीयाना लोकतायै । एता मे देवता अस्मिँलोके गृहेभ्यो पृहान करिष्यन्ति स्वेभ्य आयतनेभ्य इति हैव विद्याद् [एता] देवता भमुप्पिलोके सोकम्भदास्यन्तीते ॥८॥ तस्मादु है। ५-विद्या विद६ दुच्छति ७ नेति । ८-तीर् । प्रानि । १. एम् । ११ रात् । १२ अत्ति १३-दावशा। १४ प्रह-१५अस्मिन् । १९ प्रयदा-1१७'मायतनेम्य' अधिक है। १९५व ता ।।

(८०) विद्यावापृहतायै विभीयानाऽलोकतायै एता म एतदुमय संनस्यन्तीति हैव नियात् । तया देव भवति ॥६॥२॥१२॥ चतुर्थेऽनुवाके तृतीय खण्डः । चतुर्थोऽनुवाफ्स्समाप्तः। देवा वै ब्रह्मणो वत्सेन वाचमदुहुन् । अनिई वै ब्रह्मणो वत्सः॥१॥सा या साराग्वीर तद । अथ योऽमिर्मत्युस्सः ।।२।। तापेनां वाचं यथा धेनुं वत्सेनेोपमृज्य पत्ता दुहीतैवमेव देवा वाचं सर्वान्कामानदुहन ॥मा दुहे ह वै वाचं सर्वान्कामान्य एवं वेद । स हैपोऽनानृतो वाचं देवीमुदिन्ये वद वद वदेति ॥४॥ तयदिह पुरुषस्य पापं कृतम्भवति तदाविष्करोति । यदिदैनदपि रहसीब कुर्वन्मन्यतेऽय हैनदाविरेव करोति । तस्माद्वाव पापं न कुर्यात् ॥।॥२॥१३॥ पश्चमेऽनुवाके प्रथमः सपडः। एप उ ह वाव देवानां नेदिष्ठमुपचयों यदग्निः ॥१॥ ते साघूपचरेद । य एनमस्मिलोके साघूपचरति तमेपोमुप्पिनौके १पस्तेन, पत्सेन । २ वक्ष-३-२४ जहे । ५ उदिग्धे । प्रमिह । ७-त। ८ अय्- 'एर उहा' दूसरे अनुपाफ का यहां अधिक है। १घरति।

{ ८१) साधूपचरति । अथ य एनमस्मिलोके नाऽऽद्रियते तमेपोऽमुस्मि- लोके नाऽद्रियते । तस्माता अग्नि साधूपचरेत् ॥२॥ तं नैव हस्तान्या स्पृशेभ पादान दण्डेन ॥३॥ इस्ताभ्यां स्पृशति यदस्याऽन्तिकमवनेनिक्ते । अथ पदभिमसारयति तत्पादा- भ्याम ||शा स एनमास्पृष्ट ईश्वरो दुर्धायां धातोः । तस्माद्वा भनि साधूपचरति । मुधायां हैवैनं दधाति ।।६।१४॥ पञ्चमेऽनुवाके द्वितीय सण्ड । एप उ ह चाय देवानाम्महाशनतमो यदामिः ॥शा तम वत्पपददानोऽश्नीयात् । यो वै महाशनाननत्पनातीश्वारो हैनम- भिपतोः। पूतिमित्र हानीयात् ।।२।। अयो इप्रोक्तेऽशने यात् समिन्स्वाऽमिमिति । स यथा प्रोक्तेऽशने श्रेयाँसम्परिचवैः यात्तादृक् तत् ।।३।। एतदु ह वाव साम यद्वाक् । यो वै चतु- स्साम श्रोत्रं सामेत्युपास्ते न ह तेन करोति ॥४॥ अथ य मादित्यस्साम चन्द्रमास्सामेत्युपास्ते न हैव न करोति ॥५॥ अथ यो वाक् सामेत्युपास्त स एवाऽनुष्ठया साम वेद । वाचा हि २ तपडेनम, सपनम् । १F-1 २ ददासीनो । ३ भनिए( प्रताः । ४-र । ५ इवमिव । ६ मी-- ७ तम् । ८ना । यद् । ५ ७ e

सानाऽऽत्विज्यं क्रियते ॥६॥ स यो पाचस्वरो जायते सोड
निर्वाग्वत्र वाक् । तथा साम भवति ॥७॥ स य एवमेतदे-
कपा साम भवद्वेवं हतदेकया साम भवतीत्येकष श्रेष्ठस्स्वा-
नाम्भवति ॥८॥ तस्मादु हेचविदमेव सानाऽऽविग्यं कारयेत ।
सह वाव साम वेद य एवं वेद शा॥
पक्षमेऽनुवाके तृतीयः खयडः पयमोऽनुपापरसमाप्तः॥

[तृतीयोऽध्यायः।] एका ह वाव करना देवतार्धदेवता एवान्याः । अयमेष योऽयम्पवते ॥३॥ एए एक सर्वेषां देवानां ग्रहाः ॥२॥ स हैशो- ऽस्तं नाम । अस्तमिति हेह पश्चाबहानाचक्षते॥३॥स यदादियो- ऽस्तमगादिति ग्रहानगादिति दैतत् । तेन सोसर्वः। स एतमेवा- ऽप्यति ॥४॥ अस्तं चन्द्रमा एति । तेन सोऽसर्वस एतमेवाप्ये- ति ॥५॥ अम्तं नक्षत्राणि यन्ति । तेन तान्यसर्वाणि । तान्यतमेवाऽपियन्ति ॥६॥ अन्वमिर्गच्छति । तेन सोसर्वः।स एतमेवाऽप्यति ॥७॥ एसहः । एति रात्रिः । तेन ते असवें । ते एतमवा पीतः ॥८॥ मुन्ति दिशो न वै ता रानिम्मशायन्ते । तेन ता असः । ता एतमेवाऽपियन्ति ॥शा वर्पति च पनन्य उच्च गृह्णाति । तेन सोसवः । स एतमेवाप्यते ॥१०॥क्षीयन्त आप एवमोपश्प एवं वनस्पतयः । तेन तान्यसर्वाणि । तान्येतमेवापियन्ति ॥११॥ तयदेतत्सर्व वायुमेवाऽप्येति तस्मादा- । १पचा ।२-२.३-ताः १४ तास साम वेद'अधिक है। ६५-, प्रोपा-1 पुरेव साम ।।१२।। स ह वै सामरित्स [कृल्न] साम वेद य एवं वेद ।।१३।। प्रयाऽध्यात्मम् । न वे स्वपन याचा वदति । सेयमेव माणमप्येति ।।१४|| न मनसा च्यापति । तदिदमेव मारणमप्ये- ति ॥१५॥ न चतुपा पश्यति । तदिदमेच मागमप्यति ॥१६॥ न श्रोत्रेण शृणोति । तदिदमेव माणमप्येति ।।१७।। तदेतत्सर्व- माणमेवाऽमिसमेति तस्मालाण एव साम ॥१८॥ स ह वै सापवित्स कृत्लं साम वेद य एवं वेद ॥१६॥ तयदिदमाहुन पताऽध वातीनि[स] ईतत्पुरुपान्तनिरमते स पूर्णरखेदमान आस्ते ॥२०॥ तद्ध शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च[कानसेनिम्] ब्राह्मण परिवेविष्यमाणा उपायबान |२||३२॥ प्रथमेऽनुयाके प्रथमः खण्डः। जौह विभिने । तं ह नाऽऽददाते को या कोवति मन्यमानी 1॥२॥ तो होपनगी। महान्मनयनुगे देव एक कस्म जगार मुवनस्य गोपा । त काय न विगानमयोऽमिमारिन् पापा निविष्टम् ।। १२ १३ --- --७ मम 1-यति। -मिने।१०-ण।१-यार १२रिया-1 १३-प्राजा शिम- २ वा ३ सो ! ४ फालय [५ निविन्दम् ।

૨૦ ૨) ૨૨ इति ॥२॥ स होयाचाऽभिमतारीमं या मपय प्रतिबृहीति । त्वया वा अयम्प्रत्युच्य इति ॥३॥ तं ह मत्युवाच- प्रात्मा देवानामुत मर्त्यांना हिरण्यदन्तो रपसो न सूनु । महान्तमस्य महिमानमाहुरनद्यमानो यदद तमति ।। इति ॥४॥ महात्मनश्चतुरो [देव] एक इति । वाग्वा प्रमिः। स महात्मा देवः। स यत्र स्वपिति तद्वाचम्पाणो गिरति ॥१॥ मनश्चन्द्रमास्स महात्मा देवः । स यत्र स्वपिति तन्मनः प्राणो गिरति ॥६॥ चक्षुरादित्यस्स महात्मा देवः । स यत्र स्वपिति तचतुः माणो गिरति ॥७॥ श्रोनं दिशस्ता महात्मानो देवाः । स यत्र स्वपिति तच्छोनं माणो गिरतिपातयन्महात्मनश्चतुरो देव एक इत्येतद्ध तत् ॥६॥ कस्स जगारेति । प्रजापति कास हैतज्जगार ॥१०॥ भुवनस्य गोपा इति । स उ वाव भुवनस्य गोपाः ॥११॥त कापयन विजानन्त्येक इति। न होतमेके विजानन्ति॥१२॥ अभिमतारिन् वहुधा निविष्टमिति । बहुधा होवैप निविष्टो यत्माणः ॥१॥ प्रात्मा देवानामुत मानामिति । आत्मा ह्येप देवाना- ६ म(म)म, मा। ७ घय्या, यय्या । अया। वाय। १०-युग्थे। २१ ऽति । १२-याच । १३ मत्य्-1 १४ परसो । १५ नु । १६ ममि- १७ यदि । १८ दतम, दैतम् । १६ अति । २० पाश, पा । २१ या । २२ स्पतिपिति । २३-ज, इसके पश्चात् प्रा । २४ अर् ।२५ महात्मा अधिक है । २९ क । २७ सो । २९जगेर-स-पध1३०-भो। ૨૬ ૨૭ .२६ (५) मुत मयानाम ||४] हिरण्यदन्तो रपसो न सुनुरिति । न श्रेष सूनुः । बनुल्या ह्येष सन्न मनुः ।।२।। महान्नमस्य माहिमानमा- दुरिति । महान्तं तस्य महिमानमाहुः ॥१६॥ अनद्यमानो पददन्तमचति । अनयमानो रोपोऽदन्तमति ॥१७॥३२॥ प्रथमेनुकाके द्वितीयः सपहार तस्यैप श्रीरात्मा समुदायदसावादियः । तस्माद्गायत्रस्य स्तोत्रे णाऽवान्यानेरिया प्रक्रिया इति ॥।॥ स एप एवोक्यम् । यत्पुरस्तादवामिति तदेतदुक्यरय शिरो यद्दक्षिणतरस दक्षिण पक्षो यदुत्तरतस्स उत्तरः पक्षो यत्पश्चावतित ]पुच्छम् ॥२॥ अयमेव माण उक्यस्यामा । स य एवमेतमुक्यस्याऽऽत्मानमात्मन्प्रतिष्ठित वेद स हाऽमुप्पिं लोके सागस्सतनुम्[सर्वम् सम्भवति ॥शा शश्वद्ध वा अमुबिनाके यदिदमुरुपस्पाण्ढी शिनं कण नासिके यत्किं चाऽनस्थिकं न सम्भवति ॥४॥ भय य एवमेतमुफ्षस्या- ऽऽत्मानमात्मन्मतिष्ठितं वेद स हैवा मुष्मिनोके सागस्सतनुस्सर्व- स्सम्भातिशासदतवैवामिनमुक्पम् । तदन्नं वै विश्वम्माणो मित्रम् ३६-से । ३२ नम् । ३३म् । ३४ प्रादुर् । पौर 'इति महान्त घेतस्य महिमाहुः' अधिक है।३४ अन्तर । ३९ सनर-॥ १ समाद-यच-३या इति। नयः । ५सद् । एतत् । ७सांगतम् । प्र I प्रयन १३ (८७) ६ तद विश्वामित्रश्श्रमेण तपसा वतचर्येणेन्द्रस्य प्रियं धामो- पजगाम || तस्मा उ हैतत्मोवाच यदिदम्पनुप्यानागतम् ॥ वद स उपनिषसाद ज्योतिरेतदुक्थमिति ॥॥ ज्योतिरिति ? मतरे प्राण इति दे अन्ममिति द्वे। तदतेदन एषप्रतिष्ठितम् ।।२०॥ भय हैन जमदनिरुपनिषसादाऽऽपुरेतदुक्थमिति ॥३१॥ आयुरिति दे अतरे प्राण इति दे अन्नमिति द्वै । तदेतदन्न एव मतिष्ठितं ॥१२॥ भय हैन वसिष्ठ उपनिषसाद गौरेतदुक्यमिति । तदेतदन्नमेव । प्रमं हि गौः ॥१३॥ सदाहुर्यदस्य माणस्य पुरुपदशरीरमय केना- उन्य प्राणाशरीरवन्तो मवन्तीति ॥१४॥ स व्यायद्वाचा वदति पदाचशरीरं यन्मनसा ध्यायति तन्मनसशरीरं यचतुपा पश्यति सवपश्मरीरं यच्छोत्रेण शृणोति तन्धोत्रस्य शरीरम् । एवमु हाऽन्ये माणासरीरवन्तो मवन्तीति ॥१॥३२॥ प्रयमेनुयाफे दतीयः खण्डः। तदेतदुक्यं सप्तविधम् । शस्पते स्तोत्रियोऽनुरूपो धाय्या गायस्मूक्तं निवित्परिघानीया ॥ १॥ इयमैच स्तोत्रियो १०-११ तद् । १२ उत्ए-1 १३ (-सार) गेर, जयगौर । १५-५ । १५ उद् । १९न्येन। १ मम्मर भधिक है।र-नीयम्मास्ति।

( ८८ ) प्रमिग्नुरूपो वायु(य्याऽन्तरिक्षम्यगायो चौरमूक्तमादित्यो निवित्। तस्माद्रह्वचा जदित निविदमघीयन्ते । प्रादित्यो हि निवित् । दिशा परिघानीयेत्यधिदेवतम् ॥२॥ अयाध्यात्मम् । प्रात्मैव तोत्रियः प्रजाऽनुरूपः प्राणो धाया मनः प्रगायशिरस्यूकं चतुर्निविच्छोत्रम्परिघानीया ॥३॥ तद्धतदेके त्रिष्टुभा परिदधत्य- नुष्टभके । त्रिष्टुभात्वय परिदध्यात् ।।४॥ तदेतदेक एता व्याहृती- रमिव्याहृत्य गसन्ति महान्मया समपत्त देवो देव्या समधत्त ग्रह्म बामपया समयच । तत्समयस समधनेति ॥५॥ तस्मा- दिदानीम्पुरुषस्य शरीराणि प्रतिसंहितानि । पुरुपो ह्येतदुक्यम् ॥६॥ महान्मद्या समयत्तेति । अग्नि महानियमेव मही जा देवो देव्या समधत्तेति । वायु देवोऽन्तरिक्ष देवी ॥८॥ ब्रह्मा ब्राह्मएया समपत्तेति । आदित्यो वै ब्रह्म द्यौग्राह्मणी ।। तासां वा एतासां देवतानां योईगोर्देवतयोर्नव-नवाक्षराणि सम्पयन्ते एतादमे लोकास्त्रिणवा भवन्ति ॥२०॥ तद्ब्रह्म वै मिटत् । तद्ब्रह्माभिच्याहृत्य शंसन्ति । एप उ एव जोमस्सोऽनुचरः॥२॥ १३ . ४ दास्या, दाा । ५ प्राग-1 ६ पायऱ्या । ७-धानी-1 ८ तदुपयम् अधिक है (हाशिये में)।।९-य। १०-माधा।१९ दानि। १२-या। १३-मो।१४-यो । १५-ौ । १-को । १७ पा।१८ मा।

( 6 ) यदिममाहुरेकस्तोम इत्ययमेव योऽयम्पवते । एपोऽधिदेवतम् । प्राणोऽध्यात्मम् । तस्य गरीरमनुचरः ॥१२॥ तद्यथा ह वै मणौ मणिमूत्रं सम्मोतं स्याद-॥१३॥३॥४॥ प्रयमेऽनुवाके चतुर्थ खण्ड । एवं हैतस्मिन्सर्वमिदं सम्मोतं गन्धर्वाप्सरसः पशवो मनुष्याः॥२॥तद्ध मुअस्सामश्रवसः प्रययौ । तस्मै ह श्वाजनिवे- श्या प्रेयाय ॥२॥ तस्य हान्तरितात्पतित्वा नवनीतपिण्ड उरासे निपपान। तं हाऽऽदायाऽनुदौ॥शाततोहैव स्तोमंददर्शाऽन्तरिक्ष विततम्बहुशोभमानम् । तस्यो ह युक्तिं ददर्श ॥४॥ वहिप्परमान- मासय टोत्र वियि प्राण्य इति कुर्यात् टीत्र गृहित्र अपान्य इति वाचा । दिदौवातिभ्यं शुश्रूषेतैव कर्णाभ्याम् । स्वगदम्म- नोयुक्तम् ॥५॥ तद्यत्र वा इपुरत्यग्रो भवति न वै स ततो हिनस्ति तदु वा एतं नोपाप्नुयात् । प इत्यवाऽपान्यात । तद्यथा विम्बेन मृगमानयेदेवमेनमेतया देवतयाऽनयति । स युक्तः करोति । एप एपापि युक्तः ॥६॥३२॥ प्रयमेऽनुवाके पञ्चमः खण्ड प्रथमोऽनुवाकस्समाप्त । १४ १६-रन्तम्॥ १एवम् (पया) के पहले पश्चम ६० काद्वि०वास्य।२ मौज-३ साहरा-४ तमस्मै । ५ प्रोयाय । तेतो ७-मा-इ। टीन्त्र, पहला प्रसरळ मी हो।९ गृहिस्त्र।११मस्ति। हनस्ति। श्यद । १३-यो।१४-ति।

१२ योऽसौ साम्नः प्रतिवेदन हास्मै दीयते ॥१॥ ददा इति ह या अपमामीप्यते तथेति वायुः परते हन्तेति चन्द्रमा प्रोमित्या- दित्यः ॥२॥ एपा ह वै साम्नः प्रत्तिः । एतां ह वै सान्नः मचिं मुदक्षिणः क्षमिविदां चकार ||३॥ तां हैतां होतुर्वाजन्ये गायेन्म- प्रावरुणस्य वा तां ददा३ तथा३ हन्ता हिम्भा ओवा इति । म ह वा अस्मै दीयते ॥४॥ [सी] ऽप्यन्यान् बहनुपर्युपरि य एवमेतां साम्नः मत्ति वेद ॥५॥ य उ ह वा प्रवन्धुर्वन्धुमत्साम वेद यत्र हाऽप्येनं न विदुयंत्र रोपन्ति यत्र परीवचक्षते तद्धाऽपि अष्ठधमाधिपत्पमन्नायम्पुरोधाम्पति ॥६॥ प्रामई या प्रबन्धुर्यन्धुमत्साम । कस्माद्वा धेनं दार्वोः कस्याद्वा परित्य मन्यन्ति स श्रेष्ठयायाऽऽधिपत्यापाऽनाधाय पुरोधार्य जायते ॥७॥ स यत्र ह वा अप्पेवविदं न विदुर्यत्र रोपन्ति या परीव- चतते तद्धाऽपि श्रेष्ठयमाधिपत्यमन्नाद्यम्पुरोधाम्पति।शिक्षा द्वितीपेऽनुयाफे प्रयमः सण्ड । स्वयमु तत्र यत्रैनं विदुः॥धासुदक्षिणा हवै क्षमिःमानीनशा- लिर्जावाली ते इ सब्रह्मचारिण प्रामुः।।२॥ते हैमे बहु जप्यस्य १ प्रति । २ तदान, पदान् ।३ प्रक्ति, प्रवृतिः । ५ नौं । 'हन्सा३' अधिक है । ७ नास्ति । ८ अप्य । -न्य । १०-उप । ११-घु। १२-धा। १३ धेष्ठ- १४-माये । १५ परेिं। १-शालिर् । २ है। .

१४ चाऽभ्यस्य चाऽनचिरे प्राचीनशालिञ्च जावाली च ॥ अथ ह स्म मुदतिमा तैमियदेव यज्ञस्यानो यत्सुविदितं तद्ध स्मैव पृच्छति ॥५॥ त उ ह वा अपोदिता व्याक्रोशमानाश्चरुन्शूद्रो दुरनूचान इति ह स्म मुदक्षिणं क्षेमिमाक्रोशन्ति प्राचीनशालिव नागलौ च ॥५॥ स ह स्माह मुदक्षिणः क्षैमियन भूयिष्ठाः कुरुपञ्चालास्स्मागता भवितारस्तन्न एपसंवादो नाऽनुपदृष्टे शूद्रा इव संवदिप्यामह इति॥६॥ता उ हवै जावालौ दिदीक्षाते शुक्रश्च गोश्रुश्च । तयोई प्राचीनशालित उदाता ॥७॥ स तद्ध मुदक्षिणो अनुबुयुधे जावालौ हाऽदीक्षिपातामिति । स ह संग्रहीतारमुवाचा- जनयस्वारे जावालौ हाऽदीक्षिपातां तद्गमिष्याव इति॥२७॥ द्वितीयेऽनुवाके द्वितीय खण्डः । तस्य ह ज्ञातिका अश्रुमुखा इवाऽऽसुरन्यतरां वा अयमुपागादिति ॥१॥ अथ ह स्म वै यः पुराब्रह्मवायं वदत्यन्य- तरामुपागादिति ह स्मेनम्मन्यन्ते । अयो हस्मैनम्मृस्मिवैवोपासते ॥२॥ तं इ संग्रहीतोवाचाय यद्गरावस्ते ताभ्यां न कुशलं २है। ३ सच्-४-शालाश।५-ण प्य्--प्रा।७चोरुन् । -मा! अकोश-1 १० खीरा । ११-पतिष्य- १२ दद्दी-1१३-स। १४ प्र-1 १५संसं-1 १५ दिदीक्ष-1 १७-यास्वा । १-म्।

५ (२) कत्थमात्योति ॥३॥ मोमिति होवाच गन्तव्यम्म भावार्यस्मय- मानमन्यवेति ॥४॥ स ह रथमास्थाय प्रधावांचकार । तं ह स्म प्रतीक्षन्ते ॥शा के जानीतेति । मुदक्षिण इति । न वै नूनं स इदमभ्यवेयादिति । स एवेति ॥६॥ स ह सोपानादेवाऽन्तर्वेद्यव- स्थायोबाचाऽगन्वित्थं गृहपता३ इति । १ ह नाऽन्दतिष्ठा- सत् । स होवाचाऽनृत्याता म एपि। कृष्णाजिनोऽसीति । तादिमे कुस्पचाला अविदुरनूत्थातैव त इति होचुः ॥७॥ तं ह कनीयान्भ्रातोवाचाऽनुत्तिष्ठ । भगव उद्गातारमिति । ते हा ऽभूत्तस्थौ ||८|| स होवाच निर्ब गृहपते पुरुपो जायते । पितुरेवाग्रेधि जायतेऽय मातुरथ यज्ञात् ॥ त्रिवेव नियत इति। सयद वा एनमेतत्पिता योन्या रेतोभृतं सिञ्चति-॥१०॥शप) द्वितीयेऽनुगके तृतीय खण्ड । तत्मयमम्म्रियते ॥२॥ सन्धीमा वै तमो योनिः । लोहि- तस्तोको वा वै स तदामात्यपां या स्तोकः । किं हि स तदा- मवति ॥२॥ स यस्तां देवतां वेद यां च स ततोऽनुसम्माति या २ - ३ प्राचर्-1 ४ सूट-1 ५-३म् | ८-ऊदा- ७ म । ८ इति अधिक है। ग्राती। १० पा । ११ मनुतिष्ठ । १२ घिर । १३ थ, ऊ । १४ नास्ति । १५ वियत ॥ १ भन्य-१२ यो । ३ म्।

१० चैनं तम्मृत्युमविवइति स उद्गाता मृत्युमतिवहतीति ॥३॥ अय य एनमेतद्दीक्षयन्ति ताहितीयम्नियते । यपन्ति केशरमणि । निकृन्तन्ति नखान ! मत्यञ्जन्त्यनानि । प्रत्यचत्यङ्गुलीः । अपोऽपवेष्ठित प्रास्ते । न जुहोति । न यजते । न योपित चरति । अमानुपी वाचं वदति । मृतस्य पावैप तदा रूपम्भवति ॥४॥ स यस्ता दैवतां वेद यां च स ततोऽनुसम्भवति या चनं तम्मृत्युमतिवहति स उदाता मृत्युमतिवहतीति ॥५॥ मय य एनमेतदस्माल्लोकात्मेतचित्यामादधति तद् तृतीयम्म्रियते।।।स यस्ता देवतां वेद यां च स ततोऽनुसम्भवति या चैनं तम्मृत्यु- मतिवहति स उद्गाता मृत्युमतिवहतीति ||७|| एतावदैवोक्ता स्थमास्थाय प्रधावयांचकार ॥८॥ तं ह जाबालम्मत्येत कनीयान् भ्रातोवाच कॉम्भपाञ्द्रको वाचमवादीति । हस्तिना गाधर्मपी- रिति ॥॥ हैवैनं तच्छशंस यः कयमवोचद्गगव इति। यस्त्रयाणा- म्मृत्यूनां साम्नाऽतिवाहं वेद सउद्गाता मृत्युमतिवद्दताति ॥१०॥शक्षा द्वितीयेऽनुयाके चतुर्थः सगडः । ४ चे। ५ दि-द-मजत्य् । ७ पज्- ८ भव- ६ यौए-१.स। ११का अधिक है । १२ यन्तम् । १३-सीति । १४ या । १५यहतीति अधिक है। १६-१॥

५ १३ ते दार भगवस्ते पितोहातारममन्यतेति होवाच । तदुइ भाचीनशाला विदुर्य एपामयं रत उद्गाताऽऽस । तस्मिन् ह ना- ऽनुविदुः ॥२॥ ते होचुरनुधावत काररियमिति । ते हाऽनु- सखः । ते ह काण्डवियमुद्गातारं चक्रिरे ब्रह्माणम्प्राचीन- शालिम ॥२॥ तं हायवेक्ष्योवाचवमेष ब्राह्मणो मोपाय पादाय नाऽग्लायत् । स नाऽणु सान्नोऽन्विन्धत्तीति । प्रति वने तचक्रे ॥३॥ स यद्ध वा एनमेतत्पिता योन्या रेतो भूतं सिच- रयादित्यो हैन तयोन्या रेतो भूतं सिञ्चति । स हाऽस्य सत्र मृत्योरी मा भयो यदेनमेतत्पिता योन्यां रेतो भूतं सिथति तद पाव स ततोऽनुसम्मवाने प्राणं च । यदा होव रेतस्सिक्तं भाण प्राविशत्यय तत्सम्भवति ॥१॥ अथो यदेवेनमेतहीलयन्त्य- मि वैनं तयोन्यां रेतो भूतै सिञ्चति । स हैवाऽस्य तत्र मृत्योरी l भयो यामेवैतां वैसर्जनीयामाहुतिमध्वर्यु होति वामेव स ततोऽनुसम्भवति छन्दांसि चैव ॥७॥ अथ य एनमे- १-ए । २ विपुर । ३ सः । फान्स्याययम् । ५-न। ग्राहायम । ७-पेदया। बीच-1 सरणम् । १० नास्निा११-। ११-श्री १५'अयोवाच अधिक है । १४ 'भयो य एनमेतदी. प..."तप्रमृत्योरी' भधिक है । १५ 'यो पदेनमे- तहीचपन्ति अधिक है। १६ भासि । १५ १७ १७ १७ १८ तदस्माल्लोकात्लेनं चित्यागादधति चन्द्रमा हैवैनं तद्योन्या रेतो भूतं सिञ्चति । स उ हैवाऽस्य तत्र मृत्योरीशे॥८॥अथो यदेचैन- मतदस्मालोकाव मेतं चित्यामादधत्यथो या एवैता अवोक्षणी- या आपस्ता एव स ततोऽनुसम्भवति प्राणम्धेव । माणो ह्यापः ॥ तं ह वा एवंविदुहाता यजमानमोमित्यतेनाक्षरेणाऽऽदित्यम्मृत्यु- पतिवहति वागित्यग्नि हुमिति वायुम्भा इति चन्द्रमसम् ॥१०॥ तान् वा एतान्मृत्यून् साम्रोदाताऽऽस्मानं च यजमानं चाऽति- वहत्योमित्येतेनातरेण प्राणेनाऽमुनाऽऽदित्येन ।।११॥ तस्यैप श्लोकः-- उनषा ज्येष्ठ उत वा किनष्ठ उतैपाम्पुर उत वा पितेषाम् । एको ह देवी मनसि प्रविर पूर्वो ह ज स उ गर्भेऽन्त- इति ॥१२॥ तद्यदेशोऽभ्युक्त इममेव पुरुपं योऽयमाछन्ना ऽन्तरोमित्येतेनवातरेणमाणेनैवाऽमुनेवाऽदित्येन[...]॥२३॥०१० द्वितीयेऽनुवाके पशमः खण्डः द्वितीयोऽनुषाकस्समाप्तः ।। बिह वै पुरुषो म्रियते निर्जायते ।। ।। स हैतदेव प्रथमम्मियते यदेसरिसक्तं सम्भूतम्भवति । स माणमेवाऽभिसम्भवति। माशाम- १. १७-भान् । १८ वन्तीति । १८ सा 1२० जेष्ठ ! २९ । २१मछान् ॥ १हे । २'स हेतदेवप्रयाम्घ्रिपते निर्जायते अधिक है। इसम्- १. मिजायते ॥२॥ अथतद्वितीयस्त्रियते यदीक्षते । स धन्दास्येवा- ऽभिसम्भवति । दक्षिणामभिजायते ||३|| प्रथेतत् तृतीयम्म्रियते यन्प्रियते । स श्रद्धामेवाऽभिसम्भवति । लोक्मभिजायते ॥४॥ तदेतत् पाद्वायत्रं गायति । तस्य प्रथमयाऽऽष्टतममेव लोक जयति यदु चास्मिलोके । तदेतेन चेनम्याणेन समर्पयति यमभिसम्भवसेता चास्मा माशाम प्रयच्छति यामभिगायते ॥५॥ अथ द्वितीययारते- दमेवाऽन्तारद जयति यदु चान्तारेते । तदेतेश्चनं छन्दोभिस्स- मपति यान्यभिप्तम्भवति । एतां चास्मै दक्षिणाम्मयच्चति याम- मिमापते ॥६॥ अथ तृतीययाऽऽयता गुमेर लोरम् जयति यदु पाऽमुप्लिोके । तदेतया चैनं श्रद्धया समर्पयति ययौनमतच्छ्रद्ध- पामार यादधति समयमितो भविष्यतीति । एतं चास्मै लो- कम्पयच्छाले यमभिजायते ॥७॥३॥ तृतीयेऽनुराने प्रथम स्थण्ड । एतदै तिमभिरादिरिमाँच लोकाअयस्तैश्चनम्भूनेस्समध्य- ति यान्यभिसम्भवति ॥१॥ अथ या प्रतो हिड्वारस्यैव। त ह स्वर्गे लोके सन्नम्मृत्युरन्वेराशगया ॥ ॥ श्री एपा प्रजापतिरसानो प्रोव । ५-मात्रिय-७-मन्ति । ८इम-(!)। -मृध-1 १. 'न्यमिसम्मयति' अधिक है हाल रग से कटा हुआ । ११ च । १२.मा । १३.मा। १ यो-२-मृष-1३ नास्ति ४ सितम् । ५ अनेति । श्री। ११ ३ ( १२ यदिशारः । तमिदुदान श्रिया प्रजापविना हिङ्कारेण मृत्युमपसेध- त्ति ||३|) हुम्नेसिह गाऽत्र नु गा यौनधनमान इति हैतद ।।४।। स यया श्रेयसा सिद्धः पापीयान् प्रतिविजत एवं देवाऽस्मान्मृत्युः पाप्मा प्रतिविजते ॥५ययाइ चन्द्रमा वै मा मास: । एप हवै मा मासः। तस्मान्मेयाह । भा इति हैतत्परोक्षणेव। यस्माद्वेव मेसाह यद्वेव मेसाईताने त्रीणि । तस्मान्मेति याद ॥६॥३१२|| तृतीयेऽनुगके द्वितीय खपडः। हुम्मा इति ब्रह्मवर्चसकामस्य । भातीय हि ब्रह्मवर्चसम् ||२|| हुम्छौ इति पYझामस्थ । यो इति ह पशवो वाश्यन्ते ॥२॥ हुम् यगिति श्रीकामस्य । पगितेि श्रियम्पणायन्ति ॥३॥ हुम् मा भोवा इसेतदेवोपगीतम् ॥४॥ महदिवाऽभिपरिवर्तयन् गाये- दिति ह स्माऽऽह नाको महाग्रामो महानिवेशो भवतीति । स यया स्थाणुमायचेतरेण वेतरेण वा परियायात् तादृक्तत् ॥शा तदु होवाच शाध्यायनिः कस्मै कामाय स्थायुमर्पयेत् । अथोपगीतमे- वैतत् । नैवैतदाहिनेति ॥६॥ [इति] नु हिड्नराणाम् । अय वा पद् । ८ ' इति अधिक है।-विच-- १० ए एवम् । ११माग । १२ पेव ॥ १ था। २ धिंक- सु!३-या, अयित्वा । ४ रेर १५पया। ६ तेंदू । ७ पाद-८हिडाकन ५ । प्रमो निधनमेव । श्रोत्री इति दे अक्षरे । अन्तो वै सानो निग्न- मन्तस्यों लोकानामन्तो व्राम्य विष्टपम् ॥७॥ तमेतद्गाता यजमानमोमिसेवेनातरेणान्ते खर्गे लोके दधाति ॥८॥ य उ हवा अपक्षो वृक्षाग्रं गच्छसव वै स ततः पद्यते । अर परे पत्ती वृक्षाग्रे यसियारायो यत्तुरपारायामाम्त न चै सानोऽप्रपद्यते । पक्षाभ्यां हि संयन प्रास्ते ॥६तमेननुहाता यजमा- नमोमिन्यतेनावरेण स्वरपदं कृत्वान्ते स्वर्ग लोके दधाति । स यया पदयविभ्यदासीयमेव स्पर्गे लोगैविभ्यदानण्याचरति ॥१०॥ ते ह वा एने अक्षर देवलोकश्चन मनुप्यनोकश्च । आदि- यश्च ह वा एते अक्षरे चन्द्रमाश्च ||१|| आदिस एव देवलोक- श्चन्द्रमा मनुप्योरः । प्रोमिसादित यागिति चन्द्रमाः गा तमैतहाना पजमानमोमिसनेनातरेणाऽऽसिं देवलोक गमय- नि।३.३॥ तीये पाक हनीय वयष्ट। तंहागतम्छनि कम्त्वमसीति । स यो ह नाना वा गो- श्रेण या मते तं हा यस्तेऽयम्पय्यात्माऽभूदेष ते स इति ॥ हिमयत । १०-यो।११-२॥

४ ७ तस्मिन् हाऽऽत्मन् मतिपत् ] तमनरस्सम्पदार्यपद्गृहीतमपकन्ति । तस्य हाहोराने लोकमानुनः ॥२॥ तस्मा उ हैतेन प्रब्रुवीत को- ऽहमस्मि मुवस्त्रम् । स वा खम्प स्वरगामिति ॥३॥ को ह वै प्रजापतिरथ हैवंविदेव सुवर्गः । स हि मुर्गच्छति ॥४॥ त हा- ऽऽह यस्त्वमसि सोऽहमस्मि योऽहमस्मि स लमस्येहीति || स एतमेव मुस्तरसम्प्रविशति ! यदु ह वा अस्मिल्लोके मनुष्या यजन्ते यत्साधु कुर्वन्ति तदेपामूर्ध्वमन्नाद्यमुत्सीदति । तदमुं चन्द्रमसम्मनुप्पलोकम्पविशति ॥६॥ तस्येदम्मानुपनिकाशन- मण्डमुदरेऽन्तरसम्भरति । तस्योर्वमनायमुत्सीदति स्तनावमि स यदाजायतेऽथाऽस्मै माता स्तनमन्नाद्यम्प्रयच्छति ॥७॥ प्रजातो ह पै तारत्पुरुपो यावन्न यजते स यज्ञेनैव जायते । स ययाण्ड म्पथमनिभिएणमेवमेव ||८|| तदा ते ह वा एवविदुझाता यन- मानमोमित्येतेनाऽक्षरेणाऽऽदित्यं देवलोकं गमयति । चागि- स्यस्मा उत्तरेणाऽक्षरेण चन्द्रमसमन्नाद्यमक्षितिम्पयच्छति ॥६॥ अथ यस्यैतदविद्वानुगायति न हैवैन देवलोकं गमयति नो २ त । ३ सेन । ४-घर- चीत् । ५-गम् । ६ सुस्वर्-,-म् । ७ जायन्तास-1-2।१०-प-निक-इसके पश्चात् इदमा ११ प्रदे। १२ स्व-1 १३-नाच । १४ जायते। १५-स । १६-यदिति। १७ ना । १७ ॥

२. (१०) एनमनायेन समर्धयात ॥१०॥ स यथाऽण्डं विदिग्धं शयीता- उन्नाद्यमलभमानमेवमेव विदिग्धशतेन्नाद्यमलभमानः ॥१॥ तस्मादु हैवंविदमेवोढ़ापयेत । एवंविदिइयोद्गातारीत इतः मतिमृणुयात् ॥१२॥१४॥ सृतीयेऽनुयाके चतुर्य खण्ड । तृतीयोऽनुवाषरसमाप्तः । वागिति हेन्द्रो विश्वामित्रायोक्यमुवाच । तदेतद्विश्वामित्रा उपासते वाचमेव ॥शा मनुई वसिष्ठाय ब्रह्मत्वमुवाच । वस्मादा. हुासिष्ठभेव ब्रह्मोति ॥२॥ तदु वा पाहुरेवंत्रिदेव ब्रह्मा । क उ एवंविदं वासिष्टमहतीति |॥३॥ प्रजापतिः प्राजिजनिपत । स तपोऽतप्यत । स ऐक्षत हन्त नु मतिष्ठां जनयवतो याःप्रजारसदये ता एतदेव प्रतिष्ठास्यन्ति नाप्रतिष्ठाश्चरन्तीः प्रदपिप्यन्त इति ॥४॥ स इमं लोकमजनयदन्तरिक्षलोकममुं लोकमिति । तानिमास्त्री नोकामनयित्वाऽभ्यश्राम्यत् ॥शा तान् समतपत् । तेभ्यस्तो- भ्यसीणि शुक्राण्युदायनाग्निः पृथिव्या वायुरन्तरिक्षादादियो दिवः ॥६॥ स एतानि शुकागि पुनरभ्यरातिपत तेभ्यस्संतप्तेभ्य १८मृध-१-मा।२०-ग्रा.!२१-थुणु- १।२ उत्य-1 ३ जाये, जनये । ४-५ ताम् I-मु। ७मममयन् ।दस्माईन्।

स्त्रीएयेव शुक्राण्युदायन्नृग्वेद एवाऽमेयजुर्वेदो पायोस्सामवेद आदिसात् ।।७। स एतााने शुक्राणि पुनरभ्यवाऽतपत् । तेभ्य- संतमेभ्यस्त्रीपयेव शुक्राणयुदायभूरिसवग्वेदागुव इति यजुर्वेदा- स्वरिति सामवेदानदेव ॥८॥ तद्ध वै म्यै विद्यायै शुक्रम् । एतापदिदं सर्वम् । स यो वै त्रयों विणं विदुपो लोकस्सोऽस्य लोको भवति य एवं वेद ||३२ चतुर्थेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। अयं वाव यज्ञो योऽयम्पवते । तस्य वाक् च मनश्च वर्तन्यो। याचा च होप एतन्मनसा च वर्तते ॥१॥ तस्य होताऽध्वर्युरुदाते- सन्यतरां वाचा वर्तनि संस्कुर्वन्ति ! तस्मात्ते वाचा कुर्वन्ति । ब्रह्मैव मनसाऽन्यतराम् । तस्मात्स तूणीमास्ते ॥२॥ स यद्ध सो- ऽपि स्तूयमाने वा शस्यमाने वा वावद्यमान आसीताऽन्यतगमेवा- ऽस्यापि तदि स वाचा वर्तनि संस्कुर्यात् ॥३॥ स यथा पुरुष एकपाद्यम् भ्रपन्नति रयो वैकचत्रो वर्तमान एवमेव तहिं यज्ञो भ्रेपन्नेति ॥४॥ एतद्ध तद्विद्वान् ब्राह्मण ज्वाच ब्रह्माणम्भातरनु- १०-म॥ -मान् । २५-३-नाश्त ।

५ ११२ १३ वाद उपाकने वा वद्यमानमासीनमः वा इमे तहि यज्ञस्याऽन्दर- गुरिति । अध हि ते तहि यज्ञस्याऽन्तरीयुः ॥५॥ तस्माद्ब्रह्मा भातरनुराक उपाकृते याचंयम नासीताऽऽपरिघानीयाया प्रा वपट् कारादितरेपां स्तुत रास्ताणामस्थायै पवमानानाम् ||६|| स यथा पुरुष उभया पाद्यन् भ्रेप न न्यति रथो योभयानको- वर्तमान एवमेहि यसो भ्रमं न न्येति ॥॥१६॥ चतुर्थेऽनुवाके द्वितीयः सएडः । स यदि यक्ष ऋक्नोभ्रेपनियाद्रमण प्रयूतेसाहुः । अथ यदि पनुष्टो ब्रह्मणे पत्तेसाहुः । अथ यदि सामतो ब्रह्मणे प्रतेसाहुः। प्रय यद्यनुपस्मृतात् कुत इदमजनीति ब्रह्मणे प्रवृत्तसेवाहुः ॥२॥ स ब्रह्मा माइ उदेस स्रवणाऽऽग्नीध्र प्राज्यं जुट्ठयार्भुवस्स्सरिसे- तामियातिभिः ॥२॥ एतावैव्याहृतयस्सर्वपायश्चिचयाताया लवणेन मुरण संदध्याद सुवर्णेन रजतं रजतेन पु प्रपुया लोहायसं सोडायसेन काणायस काणायसेन दारु दारु च धर्म ४ द ५-मोर' घासू-द्विवार पढ़ा गया है । ७-न् । ८-गु- न्युः । १०-ॐ । ११-पाद् ।१२ यद् । १३ ॥ १२- पोरय।४ प्रन्द, प्रा 1५ विदघ-|-यु ९ १३ १३१४१५१६ च श्लेष्मण वर्मय विद्वांतत्सर्व भिपज्यवि ॥३॥ तदाहुर्यदहीपीन्मे प्रहान्मेऽग्रहीदिसध्वर्यवे दक्षिणानयन्शसीन्मे वपद् अकर्म इति होत्र उद्गासीन्म इत्युदात्रेऽध किं चनुपे ब्रह्मणे तृष्णीमासीनाय समावतीरेवतरैत्रिम्भिदक्षिणा नगन्तीति frei स ब्रूयादर्ध- भाग्य वै स यज्ञस्या ह्येप याम्य वहतीति । अर्धा ह स्म बैं 'पुरा ब्रह्मणे दक्षिणा नयन्तीति । अर्धा इतरेभ्य ऋत्विाभ्यः ।।।। तस्यैप श्लोको- मयीदम्मन्ये भुवनादि सर्पम, मयि लोका मयि दिशतमः। मयादम्मन्ये निमिषयदेजति, मन्याप स्रोषधयश्च सर्वा, इति ॥६॥ मपीदम्मन्ये भुवनादि सर्वमिवेविदं ह वावेदं सर्वम्भुवनमन्या- पत्तम् ॥७॥ मयि लोका मयि दिशश्चतस इसेवंविदेि ह वावलोका एवंविदि दिशश्चतस्रः ॥८॥ मपीदम्मन्ये निमिपद्यदेजति मग्याप भोपधयश्च सर्वा इसेवविदि हवावेदं सर्वम्भुवनम्मतिष्ठितम् ।।६।। तस्मादु हैवंविदमेव ब्रह्माणं कुर्वीत । स ह वाव ब्रह्मा य एवं वेद ।।१०॥१७॥ चतुर्थेऽनुवाके तृतीया सपड । ८श्येप्म (सभ्यात) ण कोष्ठ लाल रंग में फटा हुमारि-पप् । १०भरण । ११ मय । २० एवं' गास्ति । २१क्षाशांसीन् । १२-रे । १३-भाद।१४ नास्ति।१५ यै । १६५।१७मतिही । १८-६।१९ एष ।

. प्रय वा भतस्स्तोमभागानगमेवाऽनुमन्त्राः ॥२॥ सदैतदेके तोमभांगरेवानुमन्यन्ते । तत्तया न कुर्याद ॥२॥ देवेन सवित्रा मसूतः प्रस्तोतदेवेभ्यो वाचमिप्येत्यु केऽनुमन्त्रयन्ते सविता वै देवानाम्पसविता सवित्रा प्रमूना इदमनु मन्त्रयामह इति वदन्तः। नषु नया न कुर्यात् ||३|| भूर्भुवस्स्वरित्यु हैकेऽनुमन्त्रयन्त एपा के याविण त्रय्य वद विषयोऽनुमन्त्रयामह इति वदन्तः । तदु तथा नो एवं कुर्यात् ॥ ४॥ भोमिसेवानुमन्त्रयेत ॥५॥ अथैप पसिष्ठस्यैकस्तोमभागानुमन्त्रः । तेन हैतेन वसिष्ठः प्रजातिकापो- अनुमन्त्रयां चक्रे देवेन सविता प्रमूनः प्रस्तोतर्देवेभ्यो वाचमिप्य मूर्भुवस्वरोमिति । ततो वै स बहुः मजया पशुभिःमाजायत ॥६॥ स एव तेन वसिष्ठस्यैकतोम भागानुमन्त्रेणाऽनुमन्त्रपेत बहुरेव मनपा पराभिः प्रनायो । इ लेवस्थितिरोमिसेवाऽनुमन्त्रपेत ॥७॥शचा चतुर्थेऽनुवाके चतुर्थ अपड। १ तोमा-२नु । ३ कुर्नाद । ४५ मे 'ए'खाल में कटा, ए । प्रेय्ये ।सरन्याया। १०-हु । १९-जाया। १२ प्राज-1 १३ वलाम्-१४-यते । १५ इय । १६ पथम ।

४ अयप चाचा यजमुद्गृह्णाति। यदाह सोमः पवत इति वोपावर्त- ध्वमिति वा बाचैव तद्वाचो वजं विगृह्यते वाचस्सत्येनातिमुच्यते । सस्मादोमित्यैवाऽनुमन्त्रयेत ॥१॥ देवा या अनया प्रय्या [विद्यया) सरसयोर्धारस्वर्ग लोकमुदकामन । ते मनुप्पा- शामन्यागमाद्विभ्यतस्त्रयं वेदमपीलयन् ॥शा तस्य पीलयन्त एकमेवाक्षरं नाऽशक्नुवन्पीलयितुमोमिति यदेतत् ॥३॥ एप उ हवाव सरसः । सरसाद वा एवंविदस्यी विद्या भवति ॥४॥ स यां ह वै त्रय्या विद्यया सरसया जितिं जयति यामृद्धिगधोति जयति तां जितिमनोति तागृद्धि य एवं घेद ॥५॥ एतद्ध वा प्रक्षरं प्रय्यै विद्यायै प्रतिष्ठा । ओमिति वै होता प्रतिष्ठित ओमित्य- ध्वयुरोमित्युद्गाता | एतद्ध वा अक्षरं वेदानां त्रिविष्टपम् । एतस्मिन्वा अक्षर प्रविजो यजमानमाधाय स्वर्गे लोके समुहन्ति तस्मादोमित्येवानुमन्त्रयेद ५११६] चतुयेंऽनुषाके पञ्चमः खण्डः । चतुर्थोऽनुपाकस्समाप्तः। गुहासि देवोऽस्युपवास्युप तं वायस्थ योऽस्मान्दृष्टि यं च वर्य दिप्मामाहेनासि बहुलामिवृहत्यास रोहिण्यस्यपभासि॥२॥ १५।२-में। ३ विम्- ४ र ५ प्रतिष्ठाह-ए। १ देवास्मि ।२ । ३ यस्विामहिका! ४ १४ सम्भूदेवोऽसि समहम्भूयासम् । माभूतिरस्याभूयासम् । मूतिरसि भूयासम् ॥३॥ यास्ते प्रजा उपदिशा नाई तर ताः पयोमे । उपते सा दिशामि ॥४॥ नाम मे शरीरम्मै प्रतिष्ठा मे । तन्मे त्वयि तन्मे मोऽपहया इतीमाम्पृथिवीयवोचत् ||५|| तमियमागतम्पृथिवी प्रतिनन्दत्ययं ते भगवो लोकः । स ह नावय लोक इति ॥६॥ यद्वार मे त्वयीत्याह तदाव मे पुनर्देहीति ॥७किं नु ते मयोति । नाम मे शरीरम्मे प्रतिष्ठा मे । तन्मे त्वयि तन्मे पुनर्देहीति । तदस्मा इसम्पृथिवी पुनर्ददाति ॥८|| तामाह म मा वहेति । किमभीति । प्रणिमिति तमग्निमभिमवहति ॥ मोऽग्निमाहा- भिनिदस्यमिजय्यासम् । लोकजिदसि लोकं जय्यासम् । अतिरस्पन्नमद्यासम् । अन्नादो भवति यस्त्वैवं वेद ॥१०॥ सम्भूदेवोऽसि समहम्भूयासम् । भाभूतिरस्याभूयासम् । भूविरसि भूयासम् ॥११॥ यास्ते मजा उपदिष्टा नाहं तर ताः पमि । सप ते ता दिशामि ॥१गा तपो मे तेजो मेऽनम्मे वाह मे तन्मे त्वयि । तन्मे मोऽपहया इत्यग्निमयोचद ॥१शा त तयवाऽऽगत- + ५भाभूरिति । स । ७ मधी । ८ म। -हन्ति । १० प्रमिजिद दो यार भाया है । ११ जय- १२-पार । १३ तस्मा । ५ भस्मा।

१२ (१०) मामः प्रतिनन्दत्वयं ते भगवो लोकस्सह नावयं लोक इति ॥१४॥ यदाय मे त्वयीत्याहु तगाव मे पुनर्देहीति ॥१५॥ किं नु ते मयीति । तपो मे तेजो मेन्नम्मे वाङ् मे । तन्मे त्वाये । तन्मे पुनर्देहीति । तद अस्मा भनिए॒नर्ददाति ॥१६॥ तमाह म मा वहेति ॥१७॥३॥२०॥ पचमनुधाके प्रथम खपडः। किमभीति । वायुमिति । तं वायुमभिमवहति ॥१॥ सवायु- माह यत्पुरस्ताद्वाप्तीन्द्रो राजा भूतो वासियदक्षिणतोवासीशानो भूतो वासि । यत्पश्चाद्वासि वरुणो राजा भूतो वासि । यदुत्तरतो चासि सोमो राजा भूतो बासि । यदुपरिष्टादववासि मजापतिर्भूतो- विवासि ॥२॥वासोऽस्येकवायोऽनवसृष्टौदेवानाम्बिसमप्यया ॥३॥ तव प्रनास्तवापथयस्तवाऽपो विचलितमनुविचलन्ति ॥४॥ सम्भू- देवोऽसि समहम्भृयासम् । प्राभूतिरस्याभूयासम् । भूतिरसि भूयासम ॥५॥ याने मना उपदिष्टानाऽहं तव ताः पर्येमि । उप ते ता दिशामि ॥६॥ प्राणापाणौ मे श्रुतम्मै । तन्मे त्वपि । तन्मे मोऽपष्टया इति वायुमवोचत् ॥७॥ तं तथैवागतं वायुः प्रतिनन्दसयं ते भगवो लोकः । स ह नाक्यं लोक इति ॥८॥ यद्वार मे त्वयी- १५प-२४-३-स।। (म) घधि ।५सर। प्राणानौ ७पयी।

(c) सार तद्वाव मे पुनर्देहीति | किं नु ते मयीति । माणापानी मे श्रुतम्मे । तन्मे त्वयि । तन्मे पुनर्देहीति । तदस्मै वायुः पुन- ददाति ।।१०॥ तमाह प्रमा बहेति । किमभीति । अन्तरिक्षलोक- मिति । तमत्तरिक्षलोकमभिप्रवहति ॥११॥ तं तयैवागतमन्तरिक्ष मोकः प्रति नन्दसर्य हे भगवो लोकः । स ह नावयं लोक इति ॥२२॥ यद्वाष मे लयीसाह तद्वार मे पुनर्देहीति ॥२३॥ किं नु ते मयीति । अयम्म भाकानः स मे त्वपि । तन्मे पुनर्देहीति। तमस्मा पाकाशमन्तरित मोकः पुर्नर्ददाति ॥१४तमाह प्रमा यहति शश२१॥ पभमेऽनुयाके द्वितीय स्वगतः। किमभीति । दिश इति । तं दिशोऽभिप्रवहति ॥१॥ तं तय- वागतं दिशा मतिनन्दययं ते भगवो लोकः । स ह नोऽयं सोक इति ॥२।। यद्वाव मे युप्मास्विसाह तद्वार मे पुनर्दति ॥३॥ किं नु ऽस्मास्थिति श्रोत्रमिति तदस्मै श्रोत्रं दिया पुनर्ददति ॥४॥ वा माह म मा वहतेति । किमभीति । अहोरात्रपोलोकमिति । ---तमहोराग्योलोंकमभिमवहन्ति ॥ तं तथैवागतपहोरात्र पति- नन्दतोऽयं ते भगवो लोकसहनोऽयं लोक झते ॥६॥ यद्वार १ ।२-पति॥

मे युवयोरिसाहतद्वाब मे पुनर्दसमिति ॥७॥ किं नु त प्रावयोरिति । अतितिरिति । तामस्मा अक्षितिमहोरात्रे पुनर्दचः ॥८॥ से पाए ममा यहतमिति ॥२२॥ पञ्चमेनुयाके तृतीयः समः। किमभीति । भर्धमासानिति । तमर्धमासानभिमवहतः ॥१॥ तं तथैवागतमर्धमासाः प्रतिनन्दन्ययं ते भगवो लोकः । सह नोऽयं लोक इति ॥२॥ यद्वार मे युप्माखिसाह तद्वाय मे पुनर्दले. ति ॥३॥ किं नु तेऽस्माखिति । इमानि तुद्राणि पाणि । सानि मे युप्मा । तानि मे प्रति संधत्तेति । तान्यस्यार्धमासाः पुनः प्रति संदति ॥४॥ तानाह प्र मा वहतेति । किमभीति । मासा- निति । तम्मासानभिमवहन्ति ॥॥ तं तथैवागतम्मासाः प्रतिनन्दन्सयं ते भगवो लोकः । स ह नोऽयं सोक इति ॥६॥ पदाव मे युष्माखिसाह तद्वाब मे पुनर्दत्तेति ||७) किं नु तेऽस्मा- खिति । इमानि स्यूलानि पर्वाणि । तानि मे युप्मामु । तानि मे प्रति संयत्तेति । तान्यस्य मासा: पुनः प्रति संदयति ॥८॥ तानाह म मा वहतेति शRNI पसमेनुवाके चतुर्यः अपर। १बालि।र-पति। धाति, बाल रंग से शोपा मारे।

किमभौति । निति । तमृतूनभिषवहन्ति ॥२॥ तं धैयाऽऽगतमृतवः प्रतिनन्दन्त्ययं ते भगवो लोकः । स ह नोऽयं लोक इति ॥२॥ यद्वाय मे युप्मास्त्रित्याह तद्वाव मे पुनर्दति ॥३॥ किं नु तेऽस्मास्विति । इमानि ज्यायांसि पर्वाणि । तानि मे युप्मामु तानि प्रतिसंवत्तति । तान्यस्यतयः पुनः प्रतिसंदधति ॥४॥ तानाहमा पहतेति । फिमभीति । संवत्सरमिति । तं संवत्सरमभिमवहन्ति ॥५॥ तं तथैवाऽऽगतं संवत्सरः प्रतिनन्द- त्ययं ते भगवो लोकः । स ह नावयं लोक इति ॥६।। यद्वाब में त्वयीत्याह तद्वाब मे पुनर्देति ॥७॥ किं नु ते मयीति । अयम्म प्रात्मा । स मे त्वाये तन्मे पुनर्देहीति । तमस्मा प्रात्मानं संवत्सरः पुनर्ददाति ||८|| तमाह ममा वहेति ॥२४॥ पश्चमेऽनुवाके पञ्चम सगड.। किमभीति । दिव्यान् गन्धर्वानिति तं दिव्यान गन्धर्वानभि- प्रवदति ॥३॥ त तयैवाऽऽगतं दिव्या गन्धर्वाः प्रतिनन्दन्त्ययं ते भगवो लोकः । स ह नोऽयं लोक इति ॥२॥ यद्वार में युप्मा- स्वित्याह तद्वार मे पुनदत्तेति ॥३॥ किं नु तेऽस्मास्विति । .. ने-२ त्वधी । ३यने ।। ता . गन्धो मे मोदो मे ममोदो में । तन्मे युष्मांसु । तन्में पुनर्दनैति तदस्म दिव्या गन्धर्वाः पुनर्ददप्ति ||४|| तानाह प्र मा वद्दतेति । किमभीति । अप्सरस इति । तमपसरसोभिप्रवहन्ति ॥५॥ तं तथैवागतमप्सरसः प्रतिनन्दन्त्ययं ते भगवो लोकः सहनोऽयं सोक इति ॥६॥ यद्वाव मे युप्मास्वित्याह तद्वाव मे पुनर्दत्तेत्ति ॥णा किं नु तेऽस्मास्विति । हसो मे क्रीला मे मिथुनम्मे । तन्मे युप्यासु । तन्मे पुनर्दचति । तदस्मा अप्सरसः पुनर्ददति ॥८॥ ता पाह प्रमा वहतेति ॥॥२२॥ पञ्चमेऽनुवाके पष्ठः खंगड । किमभीति । दिवामिति । तं दिवमभिमवहन्ति शातं तथैवाऽगतं चौः प्रतिनन्दसयं ते भगवो लोकः । स ह नाक्यं लोक इति ॥२॥ यद्वाव में त्वयीसाह तद्वार मे पुनर्देहीति ।।३।। किं न ते मयीति । तृप्तिरिबि । सकृत्तसेव होपा - तामस्मै तृप्ति यौः पुनर्ददाति ॥४॥ तमाह म मा बहेति । किमभीति । देवानिति। तं देवानभिमवहाते ॥५॥ तं तयैवांऽऽगते देवाः प्रतिनन्दन्ययं ते भगवो लोकः । स ह नोऽयं लोक इति ॥६॥ यावें मैं युप्माखि- २ गन्धयों । ३ युयद् ॥

(२) साह तद्वार मे पुनर्दचेति ॥७॥ किं नु तेऽस्मासिति । अमृतमिति। तदस्मा प्रपतं देवाः पुनर्ददातापातानाह ममावहतेति।।३।२६|| पञ्चमेऽनुयाके सप्तम सगरः। किमभीति । प्रादिसमिति । तमादिसमभिमवहन्ति ॥१३॥ स मादिसमाह विभूः पुरस्तात्सम्पत् पश्चात । सम्यह त्वमसि । समीचो मनुष्यानरोपी रुपतस्त पिः पाप्मानं हन्ति । अपहत- पाप्मा मवति यस्त्वां वेट १२|| सम्मुर्देवोऽसि समहम्भूयासम् । प्राभूतिरस्पाभूयासम् । भूतिरसि भूयासम् ॥३३॥ यास्त्र प्रमा उपदिष्टा ना तर ताः पर्येमि । उप ते तादिशामि॥४॥मोजो में पलम्मे चतु, तन्मे त्वयि तन्मे मोऽपहयाइयादिसममोचताशा तं तवा गनपादियः प्रतिनन्दसयं ते भगवो सोकः । स ह नावयं लोक इति ॥ यदाव में वपीसाह तद्वार मे पुनर्देही- ति किं नु ते मयीति । भोजो में घसम्मे चतुर्मे । तन्मे पपि । तन्मे पुनदेहीति । तदस्मा भादिराः पुनर्ददाति ॥८॥ तमाह ममा वहति । किममीति । चन्द्रमसमिति तं पन्द्रमसमभि. २-दाति । १-या।२ सम्मेद । ३घरोतिषि 'ति' खाव से पटा हुआ है। १४त् । ५ एपम। -भूति । ७ भूविर 1८ गता ! मास्मि । १०वीपी.वी दीवि । ११ रन मवहति ॥ स चन्द्रमसमाह ससस्य पन्या न वा जहाति । अमृतस्य पन्या न वा जहाति ॥१०॥ नवो नो भवसि जाय- मानो भरो नाम ब्रामण उपास्से। तस्माते ससा उभये देवमनुप्या भन्नायम्भरन्ति । अभादो भवति यस्त्वैवं वेद ॥१शासम्भूवो- ऽसि समहम्भूयासम् । आभूति स्याभूयासम् । भूतिरसि भूयासम् ॥१२॥ यास्ते प्रजा उपदिष्टा नाहं तव ताः पर्येमि । १५.६ उप ते ता दिशामि ॥१३॥ मनो मे रेतो मे मना मे पुनस्सम्भू- तिम तन्मे त्वयि तन्मे मोऽपहथा इति चन्द्रमसमवोचत् ॥१४॥ ते तथैवाऽऽगतं चन्द्रमाः मतिनन्दसयं ते भगवो लोकः । सह नावयं लोक इति॥१५॥यद्वाव मे त्वयीसाह वद्वाव मे पुनर्देहीति॥१६॥ किं नु ते मयीति । मनो मे रतो मे प्रना मे पुनस्सम्भूति। तन्मे वयि । तन्मे पुनर्देहीति । तदस्मै चन्द्रमाः पुनर्ददति ॥१७॥ तमाह प्र मा बहेति ॥१८॥२७|| पचमेनुवाके टमः सण्डः। किमभीति । ब्रह्मणो लोकमिति । तमादिसमभिमवहति ॥१॥ स प्रादिसमाह म मा बहेति । किमभीति । ब्रह्मणो लोकमिति । ११ चन्-1 १२ या ! १३-मास । १४ नास्ति, अमृतस्य परषा ......देवोऽसि समहम् । १५-ति । १८ मे, म । १७किंव। १मधमो। २ प्राह- .......

( ११४ ) ५ ते चन्द्रमसममिमाहति । स एवमो देवने अनुसंवरति || एपोऽन्तोऽतः परः प्रयाहो नास्ति । यानु काँचाऽता माची लोका- नभ्यवादिप्म ते सर्व प्रामा मन्ति ते जिलास्तेप्वस्य सर्वेषु काम- चारो भवति य एवं वेद । स यदि कामरेन पुनरिहाऽऽजाये- पैति यस्मिन् कुलेभिभ्यादि ब्राह्मणकुले यदि राजकुले सस्मिनानायते । म एनमैव लौकम्पुनः मजान नभ्यारोडनेति ॥४॥ तदु होवाच शाध्यायनिहुव्याहितो या भयम्बहुशो लोकः। एतस्य * कामाय न बुवते [वा] श्राम्यन्ति वाक एतत्लास्य पुनरिया- त्रैव स्यादिति ॥२८॥ पसमेऽनुवार नरम खगडः । पचमोऽनुवाकरसमाप्तः । उच्चैदया ह कोपयेयः कौरव्यो रामास । तस्य ह केसी दाभ्यः पाचालो राजा स्वसीय पास । तो हाऽन्यान्यस्य मिया- वासतुः ॥३॥ स होचरश्रयाः कोपर्ययोऽस्माल्लोकात प्रेयाय । तस्मिन् ह प्रेते केशी दाभ्योऽरमये मृगयां चवाराऽपिगं पिनिनी- ३-अन्ति, 1 ४ 'एकात्मभिप्रयति । मायहेति । किमीऽति । प्रसया लोकामिति देते धनु संचरति अधिक है। ५ऽस्मि । -दिछ। ७ पुरावा' अधिक है। थूवत्ते। १० 'चा' अधिक है। १-पथ्-२फाय-1 केशी,फेश्य। ४ स्वनी-- ५'गालाय रख में कदा दुमा अधिक है।

८ . १२ माणः ॥२॥ स ह तथैव पल्ययमानो मृगान् सरनारे- बाँचश्श्रवस कौपयेपमधिजगाम भात होवाच दृप्यामि सी:- जानामीति । न प्यसीति होवाच जानासि । स एवास्मि यम्मा मन्यस इति ॥४॥ अय यद्गव आहुरिति होवाच य भाविर्भव- त्यन्यास्य लोकमुपयन्तीत्यय कथमशको म आविर्भवितुमिति ॥५॥ भोमिति होवाच यदा चै तस्य लोकस्य गोप्तारमविदेऽवस्त प्रावि. रभूवमापियं चास्य विनेष्याम्पनु चैनं सिप्यामीति ।।६॥ तथा मगव इति होवाच । तं वै नुवा परिष्वजा इति । तं स्म परिप्वनमानो यया धूम वापीयादा वाकाशं वायचि वाऽपोवै ह स्मैन व्येति । न ह स्मेनम्परिप्वगायोपलभते ॥७॥३॥२६॥ पोग्नुपाके प्रथम खण्डः। स होवाच यदै ते पुरा रूपमासीतत्ते रूपम् । न तु त्वा परि- बगायोपन डाने ॥ ॥ मोमिति होवाच बामणो यै मे साप विद्वान सानोहायत् । स मे शरीरेण साना शरीराण्यधुनोत् । वयस्य नै फिल साम विद्वान मान्नोद्गायति देवतानामेव मनोक्ता गमयतीति ॥२॥ पतङ्गः भाजापत्य इति होवाच प्रजापतेः प्रियः प्रस्म-1 ७ ऽवैध --1८यभित । १० वा। ११हे । १२ ॥ १बा२ने । ३-गोयो । ४ालमते । ५-पारए । ૨ ६ पुत्र भास । स तस्मा एतत् सामानवीत् । तेन स ऋषीणामुद- गायत् । त एत पयो धूतशरीरा इति ॥शा एतनी एवं साम्नति होवाच प्रजापतिर्देवानामुदगायत् । त एन उपरि देवा धूतवारीरा इति । ४॥ तस्मिन् हैनमनुशास । तं हानुगिष्यो- पाच यस्स्मवैतव साम विद्यात स स्मैव त उद्गायत्विति ॥शा स शानुशिष्ट भाजगाम । स ह स्म कुरुपञ्चालानाम्ब्राह्मणानुपष्ट- उमानश्चरनि ॥६॥३०॥ पठेनुवाके द्वितीयः खण्डः। न्यूटरछन्दसा वै द्वादशाहेन यक्ष्यमाणोऽस्मि । स यो वस्तत्साम बंद यदह वेद स एव म उदास्यति । मीमांसध्यमिति ॥१॥ तस्मै है मीर्मासमानानामेकश्चन [ न] सम्प्रत्यभिदधाति ॥२॥ स ह तथैव पत्ययमानश्मशाने पावन वाऽऽतशिया- नमुपाचावयांचकार । तंह चायमानः प्रजहीं ॥ तं हो. वाच कोऽसीति । ब्राह्मणोऽस्मि मातृदो मान इति ॥ स कि वेत्यति । सामेति ॥५॥ भोमिति होवाच । प्यूदन्छन्दसा है द्वादशाहेन यक्ष्यमाणोऽस्मि।स याद तत्साम येत्य यदहं वेद व- भा । ७।८।।१०-पाने- १-चम्-२ यदि त्वम४ि घेत्या५श्मशूनाम्याचसाधीन । पपारसायान,जायान {१०-धमन १२ यदह पत्य' अधिक है।

१५ १९ मेव म उदास्यासे । मीमांसस्त्रोत ॥६॥ तरम ह मीमांसमानस्त- देव सम्प्रत्यभिदधौ ॥७॥ तं होवाचाऽयम्न उदास्यतीति ॥८॥ तस्मै ह कुरुपञ्चालानाम्ब्राह्मणा अम्यन्त प्राहुरेषु ह वा अयं कुल्येषु सत्सूहास्यति । कस्मा अयमलमिति ॥ ६॥ अलम् मामिति इस्माऽह । सैवाऽलम्मस्याऽलम मतायद्गतस्य हान- मेवोजगी। तस्मादानम्पैलानोदातेत्याख्यापयन्ति ॥१०॥३॥३२॥ परेनुवाके तृतीय खण्ड.। तद्ध सात्यकीर्ता पाईयों वयं देवतामुपारमह एकमेव वयं तस्यै देवतायै रूपं गव्यादिशाम एक वाहन एक हस्तिन्येकम्पुरुप एकं सर्वेषु भूतेषु। तस्या एवेदं देवतायै सर्व रूपमिति॥२॥ तदेतदेकमेव रूपम्माण एव । यावद्ध येव प्राणेन प्राणिति ताक्टूपम्भवति सटू- पम्भवति ॥२॥ तदय यदा माण उत्क्रामात दावत्र भृतोऽनर्य: ३ परिशिप्यते न किचन रूपम् ||शा तस्यान्तरात्मा तपः । वस्मा- तप्यमानस्योष्णतरप्राणो भवति ॥४॥ तपसोन्तरात्मामिः। स निरुक्तः । तत्मात्स दहाते ॥५॥ अथाधिदेवतम् । इयमेवैपा १२-ति से ठीक किया हुअा १३ ''अधिक है।१४ नास्ति'इति। १५-पान्च-१६यासू-१७ कुलेषु । १८ ऽगास-1१६ मणम।२० न्य इसकेमागे'म' लाल रंगमेकटा हुमा है ।२१ म'भधिक है।२२ एयोn १पद् । २ एपो। १-२ । ४-१ः । ५ दति । (-देय--10-1 ७ देवत्ता योऽयमयते । तस्मि तरिमन्नापोऽन्तः । तदन्नम् । सो. पुरून उयासितव्यः । यस्मिन्नापोऽन्तस्तेनाऽरुतः ॥ तस्या- न्तरात्मा तपम् । तस्मादप आतपत्युष्णतरः पवते |७]] तपसो- ऽन्तरात्मा विद्युत्। स निरक्तः । तस्मात्सोऽपि दहति ॥८॥ तानि पा एतानि चत्वारि साम प्राणो वाइमनस्स्वरः। स एप प्रायो पाचा करोति मनो नेत्रः । तस्य स्वर एव मनाः। प्रजावान् मवति य एवं वेद ॥६॥३॥३२॥ पठेऽनुवाके चतुर्पः खयड। स यो वायुः प्राण एप सः । योऽमिवांगेव सा । यश्चन्द्रमा मन एव तद् । य आदित्यस्स्वर एव सः । तस्मादतमादित्यमाहु- स्स्वर पतीनि ॥२॥ स यो ह वा अमूवता उपास्ते या अमूरधि- देवतं दुपा वा एता दुरनुसम्पाप्या इव । कस्तदेयता अनु या सम्माप्नुयान या ॥ ॥ अथ य एना अध्यात्ममुपास्ते स हा. ऽन्तिदेवो भवति । नियन्तीय वा इत एता। [२] अस्य वा एतारीरस्य सह प्राणेन नियन्नि । क उ एव तद्वेद ययेता अनु दा सम्माणुयान || अथ य एना उभयीरकथा भव- 'तानि वासितम्या (1) बदस्मिनापान्तम्-तस्मात्सोऽपि पनि प्यारा पाया है। १य11-6-माशाचा। ५।९ उमेधीर। ४ ५ -- १० ११ न्तीवेद स एवानुष्ठथा सामवेद सभा तदाहुः पादशमात्राद्वा इत एता कान 7 मारा- स्वयं उपर्युपरि वर्तन इति ॥३॥ अथ हक प्राशनुग्गुलाना इत एता एकम्भवन्तीति । अतो वायन्तारास्वयं उपपिरि वर्तत इति ॥६॥ स एप ब्राह्मण प्रावन । स य समेतन्माण पावत वेदाभ्यनम्मजाः पशव ग्रावर्तन्ते सर्वमायुगो |॥७॥ स यो हैवं विद्वानमाणेन प्राण्याऽपानेनाऽपान्य मनसेता उभयोः- घता आत्मन्येत्य मुख आधते तस्य सर्वमाहम्भवति सबै जितम्। न हास्य कश्चन कामोऽनाप्तो भवनि य एष वेद ||३|| पठेनुवाके पश्चम खण्ड । तदेतन्मियुन यद्वाक्च प्राणश्च । मियुनसरसामे । भाचतुर वाव मिथुनम्प्रजननम् ॥१॥ तद्यत्राद्ध माह सोमः पर्वत इति वोपावर्तध्वमिति वा तत्सहैव पाचा मनसा प्राणेन म्यरेण हिङ्- कुर्वन्ति । तद् हिड्वारेण मिथुन क्रियते ॥२॥ सहैव वाचा मनसा प्राणेन खरेण निधनमुपयन्ति । तनियनेन मिथुन क्रियते ॥३॥ तत्सप्तविध साम्नः । सप्तकृत्व उद्गाताऽऽत्मान च यजमान च शरीरात्मजनयति ॥४॥ यादृशस्यो ह वै रेतो भाति तादृश ७-८वय्य। -र)1१०- इद । ११ ब्रह्मान । १पाप। २-कार। ३-मा।

( १२० ) सम्भवति यदि वै पुरुपस्य पुरप एव यदि गोगौरव यद्यवस्याश्य एव यदि मृगस्य मृगएर यस्यारेतो भवति तदेव सम्भवति ।।। तय ह वै सुवर्ण हिरण्यमग्नी प्रास्यमान कल्याणतरंकल्याण- तरम्भवति एवमेर पल्माणतरेण कल्याणतरेणात्मना सम्भाति प एव वेद ॥६॥ तदेवदचाभ्यनूच्यते ॥७॥३४॥ पष्ठेऽनुघाके पष्ट रायड पतङ्गमक्तमसुरस्य मायया हृदा पश्यन्ति मनसा विपश्चितः । समुद्रे अन्तः कवयो विचक्षते मरीची- नाम्पद मिच्छन्ति वेधस इति ।।२॥ पतझमक्तमिति । पाणो वे पतगः । पतनि रोप्वनेप्यति रथमुदीक्षते । पतग इवाचक्षते ॥॥ अमुरस्य माययति । मनो या अमुरम् । तदथमुपु रमते । तस्यैप माययाकः ॥३॥ हुदा पश्यन्ति मनसा विपश्चित इति । हदैव होते पश्यन्ति यन्मनसा विपश्चितः ||४|| समुद्रे अन्तः कवयो चक्षत इति । पुरपो चै समुद्र एवंविद उ कवयः । त इमाम्पु- रुपेन्तर्वाचं विचक्षते ॥शा मरीचीनाम्पदमिच्छन्ति वेधस इति । मरीच्य इव वा एता देवता यदनिर्वायुरादिखश्चन्द्रमाः॥६॥ नह ४ऋच्या।५-स्या- १प्रत्तम । २-ना । ३-४ मा पर्ष । ७सा ( १२१ ) वा एतासां देवनानाम्पदानि पदेनो ह वै पुनर्मत्युरन्वेति ॥१॥ तदेवदनन्वितं साम पुनर्मत्सुना । प्रति पुनर्पदं तरति य एवं वेदनाशा पठेन्नुवाके सप्तमःखगह। पतङ्गो वाचम्मनसा विभर्ति तां गन्धर्वोऽवदर्भ अन्तः। तां द्योतमानां स्वर्यम्मनापामृतस्य पदे कवयो निपान्ति इति ॥शा पतनो वाचम्मनसा विमतीति । माणो वै पतङ्गः।स इमां वाचम्मनसा विमति ॥२॥ तां गन्ययोजदहमें अन्तरिति । प्राणो वै गन्धर्वः पुरुषगर्भः। सइमाम्पुम्पेनचं वदति ॥३॥ तां धोनमानां स्वयम्मनीपामिति । खर्या दोषा मनीपा यदाक् ।।४।। कृतस्य पदे कवयो निपान्तीति । मनो वाऋतमेवंविदट कवयः। मोमिसेनदेवाक्षस्मृतम् । तेन पहचम्मीमासन्ते यजुर्यत्साम वदेनां निपान्ति ॥शा३२३॥ पटेऽनुवाकोटम-सएडा । ५-मो। २-मा।३ पदनि ! ४ भम्त्न ५-माह'यत्ताम के प्रागे भोमित्ये-सतर' है।

( १२२) अपश्यं गोपामनिपयमानमा च परा च पथिभिश्वरन्तरम् । स सधीचीस्ल विपूचर्विसान या वरवत्ति भुवनेष्यन्त इति ॥१॥ अपश्यं गोपामनिपधमानमिति । प्राणो वै गोपाः । स हद मर्वम- निपद्यमानो गोपायति ॥२॥ आ च परा च पथिभिश्चरन्तामति । तये च ह वा इमे प्राणा अमी च रश्मय एतैई वा एप एतदा च परा च पथिभिश्वरति ॥३॥ स सभीचोस्स विपूचीसान इति । सधीचीश्च होप एतद्विपूचीश्च प्रजा बस्ते ॥४|| आ वरीवत्ति भुवने- श्वन्तरिति । एप होवैपु भुवनेश्वन्तरावरीवति ॥५॥ स एप इन्द्र उद्गीथः । स यदैप इन्द्र उद्गीथ आगच्छति नैवोद्गातुश्चोपगातॄणां च विज्ञायते । इत एवोर्धस्वरुदेति । सउपरि मृो लेलायति॥६॥ स विद्यादागमदिन्द्रो नेह कश्चन पाप्पा न्यद्गः परिशेक्ष्यत इति । तस्मिन् ह न कश्चन पाप्मा न्यगः परिशिप्यते ॥७॥ तदेतद- भ्रातृव्यं साम । न ह वा इन्द्रः कंचन भ्रातृन्यम्पश्यते । स यथेन्द्रो न कंचन भ्रातृव्यम्पश्यत एवमेर [न] कंचन भ्रातृव्य- पश्यते य एतदेवं वेदायो यस्यैवं विद्वानुहायति ॥८॥२३॥ पप्ठेऽनुयाके नयम खण्ड । पष्टोऽनुयायस्समाप्त || १-रोच-सपाद के प्रारम्भ में भर्ति ऐसामधिक है।२ सस्ते। -तृण-1 व ५भागाद् । परिणे-1 ७ एन । ८ -1 S प्रजापतिम्ब्रह्माऽसृजत । तमपश्यममुखमरजत ॥शा तमम- पश्यममुख शयानम्ब्रह्माऽऽविशत् । पुरुप्यं तत् । पाणौ वै ब्रह्म । प्राणो वावैनं तदाविशत् ।।२॥ स उदतिष्ठत प्रजानां जनयिता। तं रतस्यन्वसचन्त ॥३॥ तमेतदेव साम गायन्नत्रायत। यद्गायन- त्रायत तदायत्रस्य गायत्रत्वम् ॥४॥ बायत एनं सर्वस्मात्पाप्मनो मुच्यते य एवं वेद ॥शा तमुपाऽस्मै गायता नर इत्यूचाऽऽश्रव- णीयेनोपागायन ॥६॥ यदुपाऽस्मै गायता नर इति तैन गायत्रम- भवत् । तस्मादेपैव प्रतिपत्कार्या ॥७॥ पवमानायेन्दावा अभि देवमिया-हुम-भाक्षाता इति पोडशाक्षराण्यभ्यगायन्त। पोडशकलं पै ब्रह्म । कलाश एवैनं तद्ब्रह्माविशत् ।।८॥ तदेतचतुर्विंशसक्षरं गायत्रम् । अष्टाक्षरः प्रस्तावः । पोडशाक्षरंगीतं तच्चतुर्विंशतिस्स- म्पद्यन्ते । चतुर्विशवर्धमासस्संवत्सरः । संवत्सरस्साम पता ऋचश्शरीरेण मृत्युरन्वैतत् । तयच्छरीरवत्तन्मसोराप्तम्। भय यद- शरीरं तदमृतम् । तस्याऽशरीरेण सान्ना शरीराण्यधूनोद ॥१०॥ १४ २ २३॥ सप्तमेऽनुवाके प्रथमः खण्ड। १ मुख्-१२ अप्रत्-३-८।४-मास्य्।५ अनुसच्- ६ गा- यन।७ थवसीय-८पंगा-1 १०-लाम् । ११ भास्तू-1 १२ तम् । १३-यत । १४-सास् ॥

( १२४ ) मोवाश्चोवाइयोवा३५ हुम्भा भोग इति पोडाक्षरा- एयभ्यगायत । पोडशकलो वै पुरुषः । कलाश एवास्य तच्छरी- राण्यघूनोत् ॥शा स एपोपहतपाप्मा घृतशरीरः । तदेविक्रया- रतियुदासंगायसो इत्युदास । मा इति भारद्यात् । वागिति तग्रन । तदिदन्तरितं सोऽयं वायुः पवते । हुमिति चन्द्रमाः। भा इसादिसः ।।२।। एतस्प ह वा इदमक्षरस्प तोर्भातीसाच. तते ॥३॥ एतस्य ह वा इदमक्षरस्य ऋतौरभ्रमियाचक्षते ॥४॥ एतस्य ह वा इटमक्षरस्य धातोः कुभ्रमियाचक्षते ॥२॥ एतस्य ६ वा इदमक्षरस्य प्रतोश्शुभ्रमियाचक्षते ॥६॥ एतस्प हवा इदमक्षरस्य तौटेप इसाचक्षते ॥७॥ एतस्य ह वा इदमतरस्य तोर्दर्भ इसाचक्षते ॥८॥ एतस्य वा इदमतरस्प क्रतीयों मातीसाचक्षते ॥६॥ एतस्य ह वा इदमक्षरस्य अतोसम्भवती- साचतते ॥१०॥ तयत्किं च भा३ इति च भा३ इति च तदेत- न्मियुनं गायत्रम । प मिथुनेन जायते य एवं वेद ॥११॥ G . २॥ सप्तमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । ४-ख। ५ १-या ।र कृत्-३ सर्वत्र ऐसा पाठ (भ, सम्भवती। ७य भैती ।।

{ १२५ ) तदेतदमृतं गायनम् । एतेन चे प्रजापतिरमृत चमगच्छदेतेन देवा एतेनर्पयः ॥१॥ तदेतद्ब्रह्म मनापतयेऽनवीन मजापतिः परमेष्टिने माजापसाय परमेष्ठी प्राजापसो देवाय सवित्रे देवस्सविता- ऽप्रयेनिरिन्द्रायेन्द्रः काश्यपाय काश्यप ऋश्यशृङ्गाय काश्यपाप श्यशृगःकाश्यपो देवतरसैश्यावसायनापकाश्यपाप देववराश्या- वसायनः काश्यपश्श्रुपाय वाहृयाय काश्यपाय श्रुपो बाझेयः का. श्यप इन्द्रोताय देवापाय धौनकायेन्द्रोतो देवापाशीनको तय ऐन्द्रोतये शौनकाय तिरेन्द्रोतिश्शीनकः पुलुपाय माचीनयोग्याय पुलुपः माचीनयोग्यस्ससयज्ञाय पौलुपये प्राचीनयोग्याय सस- यज्ञः पौलुपिः माचीनयोग्यस्सोमशुप्माय सासपज्ञाय प्राचीन- योग्याप सोमशुष्मस्सासयशिः प्राचीनयोग्यो हत्याशयापाडल्ल- केयाप माराटपाय राने हत्स्वाशय भालकेयो मााटपो राजा जनश्रुताय कापिझयाय जनभुनः कारिड्वयस्सायकाय जानश्रुते- याय कारिट्ययाय सायको जानश्रुतेयः कारिड्यो नगरिणे जानववेयाय काण्ड्वियाय नगरी जानश्रुतेयः कारिड्वयश्शदाय १: फाइपयो' अधिक है। २६यायसाय । ३ भूषो, शूषो । ४, पारने । ५ इन्द्रात-1 ६-पिश् । ७ नोप-1 ८ स सात्यायधिः प्राचीनयग्यो हत्या' अधिफ है । जानुथ्-, जामश्न-1 १०शिरा-1 ६ १.

( १२६ ) ३ वाट्यायनय आत्रेयाय शशाध्यायनिरायो रामाय भातुजाते. याय वयाघ्रपद्याय रामः कातुजातयो पेयायपद्यः-२॥३०॥ सप्तमेऽनुयाके तृतीयः खण्डः। -रामाय बाभ्रव्याय शवो वाभ्रन्यो दक्षाय कासायनय आत्रेयाय दतः कासायनिरात्रेयः कसाय वारकये कँसो वाराकि पोष्टपादाय वारक्याय मोष्टपादो चारवयः फँसाय वारस्याय फैसो वारक्यो जयन्ताय वारक्याय जयन्तो वारक्यः कुबेराय वारन्याय कुवेरो वारक्यो जयन्ताय बारक्याय जयन्तो वारक्यो जनश्रुताय वारक्याय जनश्रुतो पारक्यस्मुदत्ताय पाराशर्याय मुदत्तः पाराशर्योऽपाहायोनराय पाराशर्यायाऽपाद उत्तरः पारा- शर्यो विपश्चिते शकुनिमित्राय पाराशर्याय विपश्चिच्छकुनिमित्रः पाराशयों जयन्ताय पारागर्याय जयन्तः पारागर्य:-||२||३|| सप्तमेऽनुवाके चतुर्थः सपडः । श्यामनयन्ताय लोहिसाय श्यामजयन्तो लोहिसः पति- गुप्ताय लोहिसाय पल्लिगुप्तो लौहिसस्ससश्रवसे लौहिसाय सर- ११-नाब। १-नाय, कात्यानय-1२ घर-1३ -1 ४ सुदधा, सुदरताय। ५भए (1), भाष-11 १बोह- ૨ (१२७ ) श्रवा लौहिसः कृप्यधृतये सासकये कृष्णातस्सासाकश्श्याम- मुजयन्ताय लौहिसाय श्याममुजयन्तो लौहिसः कृष्णदत्ताय लौहिसाय कृष्णदत्तो लौहिसो मित्रभृतये लौहिलाय मित्रभूति लाहिसश्यामजयन्ताय लौदिसाय श्यामजयन्तो लौसिस्त्रि- वेदाय कृपाराताय लौहिसाय त्रिवेदः कृष्णरातो लौहित्यो यशखिने जयन्ताय लौहित्याय यशस्वीजयन्तो लौहित्यो जयकाय लौहित्याय जयको लौहित्यः कृष्णराताय लीहत्याय कृष्णरातो सौहित्यो दतजयन्ताय लौहित्याय दक्षजयन्तो लौहित्यो विपश्चिते दृढजयन्ताय लौहित्याय विपश्चिदृढजयन्तो लौहित्यो पश्चिताय दाईजयन्तये दृढजयन्ताय लौहित्याय वैपश्चितो दाई- जयन्तिदजयन्तो लौहित्यो वैपश्चिताय दाईजयन्तये गुप्ताय लौहित्याय ॥१॥ तदेतदमृतं गायत्रमथ यान्यन्यानि गीतानि काम्यान्येव तानि काम्यान्येव तानि ॥२॥४२॥ सप्तमेऽनुयाके पश्चम खपडः सप्तमोऽनुवाफस्समातः॥ ४ २-ति । ३ 'श्यामजयन्तो लोहित्याय' अधिक है। ४ वैविप्- - (१२८ ) [चतुर्थोऽध्यायः] घेताचो दर्यतो हरिनीलोऽसि हरितस्पृशस्समानबुद्धो मा हिंसीः । न मां वं वेस प्रव ॥१॥ यदभ्यवचरणोऽभ्यपि स्वपन्तम्पुरुपमकोविदमश्ममयेन वर्मणा वरणोऽन्तर्दधातु मा॥२॥ यदभ्यवचरणोऽभ्यवैपि सपन्तम्पुरुपमको विदमयस्मयेन वर्मणा वरुणोऽन्तर्दधातु मा ॥३॥ यदभ्यवचरणोऽभ्यपि स्वपन्तम्पु- रुपमकोविदं लोहमयेन वर्मणा वरुणोऽन्तर्दधातु मा ॥४॥ यदभ्यवचरणोऽभ्यवैपि स्वपन्तम्पुरुपमकोविदं रजतमयेन वर्मणा वरुणोऽन्तर्दधातु मा ॥५॥ यदभ्यवचरणोऽभ्यपि वपन्तम्पुर- पमकोविदं मुवर्णमयेन वर्मणा वरुणोऽन्तर्दधातु मा ॥६॥ आयुर्माता मति: पिता नमस्त आविशोषण । महो नामाऽसि विश्वायुम्तस्मै ते विश्वाहा नमो नमस्ताम्राय नमो वरुणाय नमो जिघांसते ॥७॥ यक्ष्म राजन्मा मां हिंसीः । गजन् यक्ष्म मा हिंसीः । तयोस्संविदानयोस्सर्वमायुर- यान्यहम् ॥८॥४ प्रथमोऽनुवाकस्समाप्त । १-णा । २ इति मन्ममयन 1३ भयाएप। ४ संदेप है। ५मातन 18-चाहाय । ७रुमाय।९॥ ६ ७ ९ ( १२६) पुरुषो वै यज्ञः ॥२॥ तस्य यानि चतुर्विशातिर्वाणि तत्मान- स्सवनम् । चतुर्विशत्यक्षरा गायत्री । गायत्रम्मातस्सवनम् IRII सदसूनाम् । माणा वै वसवः । माणा हीदं सर्व वस्वाददते ॥३॥ म यधेनमेतस्मिन् काल उपतपदुपद्रवेत्स ब्रूयात्माणो यसब इदम्मे मातस्सवन माध्यन्दिनेन सक्नेनानुसंतनुतेति । अगदो हैव भवति ॥४॥ अय यानि चतुश्चत्वारिंशत वर्षाणि तन्माध्यन्द्रिनं सवनम् । चतुश्चत्वारिंशदक्षरा त्रिष्टुप् । त्रैष्टुमं माध्यन्दिनं सवनम् ॥शा ताणाम् । माणा वै रुद्राः प्राणा हीदं सर्व रोदयन्ति ॥६॥ स ययेनमेतस्मिन् काल उपतपदुपद्रवेत स दूयात्साणा रद्रा इदम्मे माध्यन्दिन सवनं तृतीयसक्नेनानुसंत- नुवेति । अगदो हैच भवति ॥७॥ भर यान्यष्टाचत्वारिंशतं वर्षाणि तद तृतीयसवनम् । अष्टाचत्वारिंशदतरा जगती । जागत तृतीयसवनम् । तदादिसानाम् । पाणा वा मादित्याः । माणा हीदं सर्वमाददते ॥शास योनमेतस्मिन् काल उपतपदु- पद्रवेत्स ब्रूयात्माणा मादित्या इदम्मे तृतीयसवनमायुपानु- सतनुतेति । अगदो हैव भवति ।।१०।। एतद् तदिद्वान् ब्राह्मण १-ति । २-४ । ३ अधिक है। ४ धर्माणि ।

( १३०) उवाच माहिदास ऐतरेय उपतपति किमिदमुपतपसि योऽहमनेनो- पतपता न प्रेप्यामीति । स ह पोडशशतं वर्षाणि जिजीव । प्रह पोटशुशतं वर्षाणि जीवति नैनम्माणस्साम्यायुपो जहाति य एवं वेद ॥४॥ द्वितीयोऽनुवाफस्समाप्त व्यायुपं कश्यपस्य जमदमेस्व्यायुपम्। त्रीण्यमृतस्य पुष्पाणि त्रीण्यापि मेऽकृणोः ॥१॥ सनो मयोभूः पितवाविशस्त्र शान्तिको यम्तनुवै स्पोनः ॥२॥ येऽमयः पुरीष्याः प्रिविष्टाः पृथिवीमनु । तेपां त्वमस्युत्तमः प्र णो जीवातवेसुव ॥३१॥३॥ तृतीयोऽनुवाकस्समाप्त । अरण्यस्य वन्सोऽसि विश्वनापा विश्वाभिरक्षणोसाम्पक्ची- ऽसि वरणस्य दुतोऽन्तर्धिनाम ॥२॥ यया त्वममृतोमत्येभ्योन्तहितो- ऽस्येवं लमस्मानपायुभ्योऽन्तहि। अन्तधिरसिनेनेभ्यः||१४|| चतुर्थोऽनुयाक्रसमाप्त । ५ सम्य ॥ १त्रियाय । २ श्रीग! ३ प्रायदि। ४ ता । ५ चतोका । य।७-यो।८प्रा। १ यिश्वोन्-!२-धमा ।३ धनाम । ४ त।मम्यो। - ३ ४ घ्युपि सविता भवस्युदेष्यन् विपारुद्यन्पुरुष उदितो बृहस्पति- रभिभयन्मयवेन्द्रो वैकुण्टो माध्यन्दिने भगोऽपराह्न उग्रो देवोलो- हितायन्नस्तमिते यमो भवसि ॥१अनमु सोमो राजा निशाया- म्पित्रराजस्म्यमे मनुप्यान्मविशसि पयसा पशून् ।।२।। विरात्रे भवो भवस्पपररात्रेऽगिरा अग्निहोत्रवेलायाम्भृगुः ।।३।। तस्य ददे- तदेव मण्डलमूधः । तस्यैतौ स्तनौ यद्वाक् च प्राणश्च । ताभ्या- म्मेधुक्ष्वाऽध्यायम्ब्रह्मचर्यम्मनाम्पशृन् स्वर्ग लोकं सजातवन- स्याम् ।।४। एता आशिप प्रायासे ( मूर्भुवस्वःोजदेते शुक्रमा- दिश। तदात्मन्दधै ॥५॥४॥५॥ पञ्चमोऽनुवाकस्समास। मगरयो बच्चाको राजा कामप्रेण यज्ञेन यक्ष्यमाण प्रास॥२॥ तदु ह कुरपश्चालानाम्ब्राह्मणा ऊचुर्भगेरथो ह या भयमैलाको राजा काममेण यज्ञेन यक्ष्यमाणः । एतेन कयांवदिप्याम इति ॥२॥ तं हाऽभ्येयुः । तेभ्यो हाऽभ्यागतेभ्योऽपचिनीश्चकार ॥३॥ अथ हैपां स भाग पावत्राजोप्वा केशश्मश्रूणि नखानिकृत्याऽज्ये- १-प्रो । २पराहेण । ३-ज । ४ त । ५-य । ६ आसिप। ७ प्रादिप ॥ १-पाच्न २ यचम्- ३पततेन । ४ 'मा' अधिक है। २ उपत्वा (१३२) नाऽभ्यज्य दण्डोपानहम्बिभ्रत् ॥४॥ तान् होवाच ब्राह्मणा भगवन्तः कतमो वस्तदेद ययाजश्रावितमत्याश्राविते देवान् गच्उत्त इति ॥शा अय होवाच कतमो पस्तद्वेद यदिदुपस्सगाता मुहोता स्वध्वर्युस्मुमानुपविदाजायत इति ॥६॥ भय होवाच कतमो वस्तद्वेद यच्छन्दांसि प्रयुज्यन्ते यत्तानि सर्वाणि संस्तुतान्यभि- सम्पद्यन्त इव ॥७॥ अथ होवाच कतमो वस्तद्वेद यया गायच्या उत्तमे अक्षरे पुनर्यज्ञमपिगच्छत इति ॥८॥ अय होवाच कतमो वस्तद्वेद यया दक्षिणाः प्रतिग्रहीता न हिंसन्तीति || पष्ठेऽनुवाके प्रथम अपड'। एतान हैनान् पञ्च प्रश्नान् पप्रच्छ ॥१॥ तेषां ह कुरुपचा- लानाम्बको दालभ्योऽनूचान पास ॥२॥ स होवाच यथाऽश्रा- वितप्रसाश्राविवे देवान् गच्छत इति प्राच्यों वै राजन् दिश्या- श्रावितमसाभाविते देवान् गन्तः । वस्मात्माइतिष्ठनाश्रावयति पान विष्ठन्मत्पाश्रारपतीति ॥शा भय होवाच यदिदुपस्माता मुहोता स्पध्वर्युस्सुमानुपविदाजायत इति यो नै मनुष्यस्य सम्भूति वेदेति होवाच तस्य सूदाता मुद्दोवा स्वध्वर्युस्मुमानुपवि- रे ज्या॥ १-पान-२ अस्म-1३ सम-1 ६ मच्- (१३३ ) दानायत इति माणा उ ह वाव राजन् मनुष्यस्य सम्भूतिरैवेति ॥४॥ अय होताच यच्छन्दांसि प्रयुज्यन्ते यत्तानि सर्वाणि संस्तुतान्यभिसम्पधन्त इति गायत्रीमु इ वाव राजन् सर्वाणि छन्दांसि संस्तुतान्यभिसम्पद्यन्त इति ॥शा पथ होवाच पया गायत्र्या उत्तमे अक्षरे पुनर्यज्ञमपिगच्छत इति वपदकारेणो ह वाव राजन गायच्या उत्तमे अक्षरे पुनर्यज्ञमपिगच्छत इति ॥६॥ भय होवाच यथा दक्षिणाः प्रतिगृहीता नहिंसन्तीति-||७॥४७॥ पठेनुवाफे द्वितीयः खण्डः। -यो वै गायत्र्यै मुख वेदेति होवाच तं दक्षिणा पतिगृहीता न हिंसन्तीति ॥२॥ अमिह वार राजन् गायत्रीमुखम् । तस्माघदमावभ्यादयाति मूयानेव स तेन भवति वर्धते । एष- मेवैवं विद्वान्याह्मणः मतिगृहन्भूयानेव भवति वर्धत उ एवेति ॥२॥ स होवाचाऽनूचानो वै किलाऽयम्बामण भास ! बामहमनेन यज्ञेनैपीति ॥३॥ तस्य वै ते तयोद्गास्पामीति होवाच यथे- करादेव भूत्वा स्वर्ग लोकमेप्यसीति ॥४॥ तस्मा एतेन गाय- प्रेणोद्गीथेनोजगी । स हैकराडेव भूत्वा स्वर्ग लोकमियाय । ४ सम्भूतिधुर, सम्भूतिर।५।। १ भदन-1-पॅन् । ३गायत्र सो। - तेम हैतेनैकाडेव भूला स्वर्ग लोकमेति [य एव वेद] || ओं या इति द्वे प्रक्षरे । ओं वा इति चतुर्थे । ओं वा इति पष्टे । हुम्भा ओं वागित्यष्टमे ॥६॥ तेन हैतेन प्रतीदर्शोऽस्य भयदस्या- जसमात्यस्योजगी ॥७॥ तं होवाच कि त आगास्यामीति । स होवाच हरीमे देवाचा कागापेति । तथेति । ती हास्मा भाजगी। तो हैनमाजग्मतुः ॥८॥ स वा एप उदीयः कामानां सम्पदों वाश्चों वाश्चों वा३च् हुम् भा ओं वागिवि।सानो हैव स तनुर- मतस्सम्भवति य एतदेव वेदायो यस्यैवं विद्वानुहायति || पप्ठेनुयाये तृतीय सण्ड । पष्टोऽनुवाक्रसमाप्त ॥ पुरुपो वै यज्ञः पुरुपो होहीयः । अथैत एवं मृत्यवो यद- निर्वायुरादित्यश्चन्द्रमाः ॥१॥ ते ह पुरुपं जायमानमेव मृत्युपचिर- भिदधति। तस्य वाचमेवानिरभिदधाति प्राणं वायु चतुरादित्या- श्रोत्रं चन्द्रमाः ॥२॥ तदाहुस्स वा उदाता यो यजमानस्य माणे- भ्योऽधि मृत्युपाशानुन्मुञ्चतीति ॥३॥ तयस्यैवं विद्वान् प्रस्तौति य एवास्प वाचि मृत्युपाशस्तमेस्पोन्मुञ्चति ॥४!! अय यस्पैर ४ तोन 1५-शे । सपद् ॥ . १भवा ।२यजा-३ उमुन्- विदानुगायति य एवास्य माणे मृत्युपाशस्तमेवास्योन्मुञ्चति ॥शा अय यस्यैवं विद्वान् प्रविहरति य एवास्य चतुपि मृत्युपाशस्तमे- वास्योन्मुञ्चति ॥६॥ अथ यस्यैवं विद्वानिधनमुपैति य एवास्य श्रोत्रे मृत्युपाशस्तमेवास्योन्मुञ्चति ॥७॥ एवं वा एवंविदुगावा यजमानस्य प्राणेभ्योऽधिमृत्युपाशानुन्मुञ्चति ॥८॥ तदाहुस्स चा उगाता यो यजमानस्य प्राणेभ्योऽधिमृत्युपाशानुन्पुन्याथैनं साझं सतर्नु सर्वमृत्योस्पृणातीति ॥६॥४॥ प्ससमेनुबाके प्रथमः खण्डः। तद्यस्यैवं विद्वानहिकरोति य एवास्य लोमा मृत्युपाशस्त- स्मादेवनं स्पृणाति ॥१॥ अय यस्यैवं विद्वान् प्रस्तौति य एवास्य त्वाचे मृत्युपाशस्तस्मादेवैनं स्पृणाति ॥२॥ अथ यस्यैवं विद्वाना- दिपादत्ते य एवास्य माँसेपु मृत्युपाशस्तस्मादेवैनं स्पृणाति ॥३॥ प्रय यस्यैवं विद्वानुदायति य एवास्य नावसु मृत्युपाशस्तस्मा- देवनं स्पृणाति ॥४॥ अय यस्यैवं विद्वान्प्रतिहरति य एवास्यानेषु मसपाशस्तस्मादेवैनं स्मृणाति ॥शामय यस्यैवं विद्वानुपद्रवति य एवास्यास्यिपु मृत्युपाशस्तस्मादेवनं स्मृणाति ॥६॥ अथ यस्यैवं ४-द्वा । ५ उद्गायति । ६ माणे । ७ नास्ति। प्रतिहरति । १क्च-1२पा।

( १३६) विद्वान् निधनमुपैति य एवास्य मन्जसु मृत्युपाशस्स तस्मादेवनं स्पृणाति ॥७॥ एवं वा एवंविदुद्गाता यजमानस्य प्राणेभ्येऽधि- मृत्युपाशानुन्मुच्यापैन सानं सतर्नु सर्वमृत्योस्सपृणाति ।।तदा- हुस्स वा उद्गाता यो यजमानस्य प्राणेभ्योऽधिमृत्युपाशानुन्मुच्यायन साई सतनुं सर्वपसोस्स्मृत्वा स्वर्ग लोके सप्तधा दधातीति ।।६।। स वा एप इन्द्र वैमृध उद्यन् भवति सवितोदितो मित्रस्संगवकास इन्द्रो वैकुण्ठो मध्यन्दिने समावर्तमानशर्व उग्रो देवो लोहितायन प्रजापतिरेव संवेशेऽसमितः ॥२०॥ तद्यस्यैवं विद्वान् हिरोति य एवास्योधतस्स्यगों लोकस्तस्मिनेनं दधाति ॥१॥ भय यस्यैवं विद्वान् प्रस्तौति य पदास्योदित स्वर्गों लोकस्तस्मिन्नेवैनं दधाति ॥१२॥ अथ यस्यैवं विद्वानादिमादत्ते य एवास्य संगवकाले खो लोकस्तस्मिन्नेवैनं दधाति ।।१शा भय यस्पैवं विद्वानुदायति य एवास्य मध्यन्दिन खगों सोकस्तस्मिोवैनं दधाति ॥शामथ यस्सर्व विद्वान मतिहरति य एवारपापराहे स्वर्गों सोकस्तस्मिो- यनं दधाति ॥शा अय यस्यैवं विज्ञानुपद्रवति य एवास्पात- यतस्स्वर्गो लोकस्तस्मिनवेनं दधाति ॥१६॥ अथ यस्यैवं विद्वामि- ३ सम्भवक-४-ए-मोजनायां गमा-मामान ७स।पेया।

९ धनमुपैति य एवास्यास्तमिते स्वर्गो लोकतस्मिन्नेवैनं दधाति ॥२७|| एवं वा एवविदुहाता यजमानस्य प्राणेभ्योऽधिमृत्युपाशानुन्मु- च्याङ्कन सार सतनु सर्वमृत्योम्स्मृत्वा स्वर्गे लोके सप्तधा दवाति ॥१८॥१०॥ सप्तमेऽनुचाके द्वितीय सपड । सप्तमोऽनुवाकस्समाप्त । पड् ढ वै देवतास्स्वयम्भुषोऽनिर्मापुरसापादित्यः प्राणोऽन्न वाक् ॥२॥ ताश्श्रेष्ठ्य व्यवदन्ताऽहं श्रेष्ठाऽस्म्प श्रेष्ठोऽस्म्य्? स्मि] मां श्रियमुपाध्यमिति ॥२॥ सा भन्योन्यस्य श्रेष्टवायै नाऽतिष्ठन्त ! सा भन्नुवन वा अन्योन्यस्ये श्रेष्ठतायै विधाम एता सम्मप्रवामहे यथा श्रेष्ठास्सम इति ॥३॥ ता प्रमियनुवन्कय त्वश्रेष्टोऽसीति॥४॥ सोऽब्रवीदहं देवानाम्मुखमम्पहमन्यासाम्प्रजानाम् । मयाऽहुतयो सूयन्ते । भह देपानामा विकरोम्यहम्मनुष्याणाम् ।।५।। स यन्न स्याममुखा एव देवारस्युरमुखा भन्या मनाः। नाऽऽहुतयो हूयेरन् । न देवानामन्न विक्रियेत न मनुष्याणाम् ॥६॥ तत इद सर्वम्परा- सप्त १पढ । २ । ३-था । ४-ठे । ५वद्- धैप-1 ७ प्रान्या-1 है । पत । १० त्या । ११-कार-1 १२ भ। १३ इयन्ते (1) लिप कर एयरन () किया गया।१४-ए।

भीतता न किचन परिशिष्यतेति || स्वयेति चुनो किंचन परिशिप्येत यत् सन स्थाप्रति ॥६॥ अथ वायुमनुव- न्कयमुलं श्रेष्ठोऽसीनि ॥६॥ सोऽनवीद देवानाम्मामोऽस्म्यह- मन्यासाम्मनानाम् । यस्मादहमुस्कामामि ततरस प्रसरते ॥१०॥ स यदहं न स्यां तत इदं सर्वपराभवेत्ततोगसिंचन परिशिष्यते- ति ॥११॥ एकमेवेति होनवर विपन परिशियात यावं न स्या इति ||१२||12.00 प्रष्टमेऽनुवाके प्रथम खगडः। अथादित्यमनुवन् कथमु वं श्रेष्ठोऽसीति || सोऽब्रवीद- हमेवोद्यान्नहर्भवाम्यहमस्तयन्रानिः । मया चतुपा कर्माणि क्रियाते। स यदहं न स्यां नैवाहस्यान्न रात्रिः। न कर्याणि क्रिरे रन् ।।२।। तत इदं सर्वम्परामरतो न किन परिशिष्यतेति ।।३। एवमति होचुवेह किंचन परिशिप्येत यावं न रया इति ॥४॥ अथ प्रासमवन कथा श्रेष्ठोऽसीति ॥६सोडवीतलासो माजिदीप्यते । माणो भूत्वा चाउराकार.मनुमति । प्रायो मृत्वादिस उदेति । प्राणादनम्प्राणाद्वान् ।।६।। स यदहं न स्यां तत १५-ये। १६ या १७ श्रदम् । १८ वह ॥ १ईन । २।३ उछ । ४५नत () ३ ५ ७ इदं सर्वम्पगमरेत्तनो न किंचन परिशिष्येनति ॥७॥ एवमेवेति होचुनवेह किंचन परिशिष्येत यत्वं न स्या इति ॥८॥ अथान- मनुमन् कथा व श्रेष्ठमसीति ॥२॥ तदनवीनगपि प्रतिष्ठायानिर्दी- प्यते । गयि प्रतिष्ठाय बायुगकाममनुविभवति । मयि प्रतिष्ठाया- दिरा उदति । मदेव पाणो मद्राक ॥१०॥ स यदहं न स्यां रत इद पराभवेचतो न किंचन परिशिष्यतति ।।११।। एवमेवेति होचुवेह किचन परिशिष्येत यत्वं न स्या इति ॥१२॥ अथ वाचमनुवन् कथमु त्वं श्रेष्ठासीति । साबवीन्मयैवेदं विज्ञायते मयाऽदः । म यदहं न स्या नवेदं विज्ञायेत नादः ॥१४॥ तत इदं सर्वम्परामरेन् नवेह किंचन परिशिप्यतेति ॥१॥ एयमेवे- ति होचुनोह फिंचन परिशिष्यत यत्त्वं न स्या इति ||१६||२|| अटमेऽनुवाके द्वितीयः पगडः। ता अाननेता वै किल सर्वा देवताः । एकैकामेवानुस्यः । स यन्नु नस्सर्वासां देवतानामेकाचन न स्यात्तत इदं सर्वम्परा- भवेत्ततो न किंचन परिशिष्येत । हन्त साथै समेस यन्छेष्ठं - - ६ सय करते है । 'स (!न के स्थान में स्या इति' यहां तक छोड़ दिया है । ७ इ-त्य (!) संक्षिप्त दिया है ! -शिप्यातुर ॥ १-२साम्- ar नीचर वाचतार समायन् । चिदा भन्नुवन् यानि नो दरारे दयानपावपाप्प रद्ध- पर गयो पापादादिसे पारोऽने चाचि । लन रोचमेवाति॥३॥ एसनेर- उस । शिरलस पर्पमनपहतपाप्पा- नरक कामदार गुदमदरम् । युरित्यस्य नावर शा एत्पादित्यस्पाऽमृतमपत्पाप्म ज्ञानपावरम् ॥६॥ मैति मरका सम । रोत्यस्य मर्त्यमनपहत STRETTEवपाप गुदमरमानमित्यस्प हस्सा वाचोऽस्तमपहतपाप्म युद्ध- भार समाजापाक्षरम् ॥॥ ता एतानि दात्यामप्पपावाप्प सुदेष्व- गावालदिले मारोने वाचि । तेनाप- र । ममन)। येन ।स। MORRRR'देशपोस्त'धिम पर लाल रङ्ग सर-मासु ।

१ (१४१) हत्य मृत्युमपदत्य पाप्मानं स्वर्ग लोकमायन् ॥१०॥ अपहत्य मृत्यु- मपदत्य पाप्मानं स्वर्ग लोकमेति य एवं वेद ॥११॥४|१३|| अष्टमेनुयाके तृतीय. सपः। ता ब्रह्माऽब्रुवन्वयि प्रतिष्ठायैतमुघच्छामेति । ता ब्रह्माऽब्रवी- दास्येन प्राणेन युष्मानास्पेन मापेन मामुपाभवायेति ॥१॥ ता एतेन माणेनौकारेण वाच्यकारमभिनिमेष्यन्त्यो रिकाराद्भका- रमोकारेण वाचमनुस्वरन्त्य उभाभ्याम्माणाभ्यां गायत्रमगायमो- पाश्चोवारचोवाश्च् हुम् मा वो वा इति ॥२॥ स यथोमया- पदी प्रवितिष्ठत्येवमेव स्वर्गे लोके मत्यतिष्ठन् । मति स्वर्ग लोके तिष्ठति य एवं वेद ॥३॥ य उ ह वा एवं विदस्माल्लोकात्मति स प्राण एव भूत्वा वायुपप्येति वायोरध्यधारयभ्रेभ्योऽधि दृष्टि दृष्टयवेये सोकमनुविभवति ॥४॥ कृपयो र सबमासां चक्रिरे । ते पुनः पुनर्बही भिवंडीभिः प्रतिपादस्वर्गस्य लोकस्य द्वार नानुचन युधिरे ॥२॥ श्रमेण तपसा व्रतचर्येणेन्द्रमवरुरु- घिरे ॥६॥ तं होचूस्वर्ग के लोकप्सिम । ते पुनः पुनर्वहीमि- चंद्वीभिः पतिपदिस्स्वर्गस्य लोकस्य द्वारं नानुचनाऽभुत्स्महि । समास्यनेन ।२-मा-मान् ।३-प्रत् । ४५-५-- पेप्सिटु । ७'यहोमिर' अधिक है। भूत-१० मेपन्त-1 (१४२) तथा नोऽनुशापि यश वर्गस्य लोकस्य द्वारमनुमज्ञायाऽनातास्वस्ति संवत्सरस्योहचं गता स्वर्ग लोकमियामेति ॥ तान होताच को वस्स्थविरतम इझते ॥८॥४॥१४॥ माष्टमेऽनुवाके चतुर्थ खण्ड । अहमियगस्त्यः ॥३॥ स वा एहीति होवाच तस्मै वै नेऽई तदक्ष्यामि यदिदाँसरस्वर्गस्य लोकस्य द्वारमनुमज्ञायाऽनाारसम्ति संवत्सरस्योरचं गत्वा स्वर्ग लोकमेप्यति ॥२॥ तस्मा एतं गायत्रस्योद्रीयमुपनिपदमपृतमुवाचाऽग्नी चायावादित्ये प्राणेऽने वाचि ॥३॥ ततो वै ते स्वगस्य लोकस्य द्वारमनुमझायाऽनार्ता- सस्वस्ति संवत्सरस्योहचं गत्वा स्वर्ग लोकमायन् ॥१॥ एवमेयैवं विद्वान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारमनुमज्ञायाऽनातस्स्वन्ति संवत्सर- स्योहचं गत्वा स्वर्ग लोकमेति ॥॥४॥१५॥ प्रष्टमेनुघाके पञ्चम सण्ड । भटमोऽनुवाकग्समाप्त ॥ एवं वा एतं गायत्रस्योद्रीयमुपनिपदममृतमिन्द्रोऽगस्त्यायो- वाचा गस्त्य इपाय श्यावाश्चय इपश्श्यावाश्चिौपृक्तये गौक्ति- ६ 'अहमित्य () अधिक है। १ नास्ति । २-क्षामि । ३ 'द्वारमय' अधिक है। घाय ।। १-गीत-12-मायो।

५ घालायनाय ज्वालापनदशाव्यायनये शाय्यायनी रामाय कातु. जानेवाय याघ्रपघायरामः कातुजातेयावयाघ्रपद्यः-11-६ नयमेऽनुवाके प्रथम पण्ड । -शहाय याभ्रव्याय शलो गभ्रव्यो दक्षाय कात्यायनय मारेयाय दक्षः कात्यायनिरात्रेयः साय वारक्याय कसो वार- क्यम्मुगवाय शारिडल्याय सुयशम्शाण्डिल्योऽपिदचाय शागिह- ख्यायाऽदित्तदशाण्डिल्यरसुयज्ञाय शाण्डिल्याय मुयक्ष शाण्डि- ल्यो जयन्ताय वारशय जयन्तो वारक्यो जनश्रुताय वारस्याय जनश्रुतो वारक्या सुदनाय पाराशर्याय ॥१॥ सैपा शाट्यायनी गायत्रस्योगनिपदेवयुपासितव्या ॥२॥४॥१७॥ नामेऽनुपा द्वितीय खण्ड । नत्रमऽनुवाकरसमाप्त ॥ केनेपिनम्नति नेपितम्मनः केन प्राणः प्रथमः प्रति युक्तः । फेनेपितां पाचाममा वदान्त चतुश्नोत्र क उ देवो युनक्ति ॥२॥ श्रोनरय ओमनसो मनो यद् वाचो हवाचं स उ प्राणस्य प्राणः । चतुपश्चनुरनिमुच्य धीराः मेयाऽस्माल्लोकादमृता भान्ति ॥२॥ ३ या-1४-माये। ५चाय्या-॥ १-माय । २- ३-प्रो, और 'जनश्रुताय वारफ्याय जनथुते (1) वारक्यसू' अधिक है। -मो।

( १४४ ) न तत्र चतुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनः । न विधन विनानीमो यथैतदनुशिष्यात् ॥३॥ अन्यदेव तद् विदितादयो प्रविदितादपि । इति शुश्रुम पूर्वेषां ये मस्तव्यायचक्षिरे ॥४॥ यद् वाचाऽनभ्युदितं येन वागम्युद्यते । तदेव ब्रह्म तं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥५॥ यन्मनसा न मनुते येनाऽऽदुर्मनो मतम् । तदेव ब्रह्म वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥६॥ यचतुपा न पश्यति येन चपि पश्यति । तदेव ब्रह्म तं विदि नेदं यदिदमुपासते ॥७॥ पन्छोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥८॥ यत् प्राणेन न पाणिति येन प्राणः मणीयते । तदेव ब्रह्म वं विदि नेदं यदिदमुपासते ॥१८॥ दशमेऽनुवाके प्रथम सण्डः। यदि मन्यसे मुवेदेति दहमेरापि ननं लं वेस ब्रह्मणो रूपं यदस्य वं पदस्प देवेषु । अथ नु मीमांस्यमेव ते मन्येऽविदितम् ॥ १॥ १ विदु । २-भ । ३ वे अधिक है । ४-शिप- ५-5-1 ६ मन्यो । ७ मतेम् । ८ नश् । उतानुक्त है। १०-गीति ॥

5 नाऽहम्मन्ये मुवेदेति नो न वेदेति वेद च । यो नस्तद् वेद तद्देद नो न वेदेति वेद च ॥२॥ यस्याऽमतं तस्य मतम्मतं यस्य न वेदै सः। अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥३॥ पतियोधविदितम्मतममृतत्वं हि विन्दते । मात्मना विन्दते वीर्य विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥४॥ इह चेदवेदीदय ससमस्ति । न चेदिहाऽवेदीन्महतीविनष्टिः । भूतेषु-भूतेषु विविच्यधीराः प्रेशाऽस्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥४॥१६ दशमेनुघाके द्वितीय खगड । ब्रह्म हदेवेभ्यो विजिग्ये।हस्य ब्रह्मणो विनये देवा अमहीयन्त। त ऐक्षन्ताऽस्माकमेवाऽयविगया। अस्माकमेाऽयमहिमेति ॥शा तद्वैपां रिजशौ । तेभ्यो ह प्रादुर्दभूव । सन म्यनानन्त किमिदं यक्षमिति ॥२॥ तेऽमिम वनातवेद एतद् विनानीहि किमेतद् यक्षमिति [ तयेति ॥३॥ तदेण्यटक । समभ्यवदत् कोऽसीति । प्रतिको सहमस्मीलनवीजातवेदा वा महमस्मीति ॥ तस्मि- १ भम्-12-चित्- १-प्रत । २-म् । ३ऽहम् ।

४ ( १४६ ) स्त्वयि किं वीर्यमिति । अपीदं सर्वं दहेयम् यदिदम्पृधिच्यामिति ।।शा तस्मै तृणं निदधावेतद्दति। तदुपपेयाय सर्वनवेनातन शशाक दग्धुम्। स तत एव निवते नेनदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥६॥ अय वायुमद्रुवन् वायवेतद विजानीहि किमेतद् यक्षमिति तथेति।।। तदभ्यद्रवत् । तमभ्यवदव कोऽसीति । वायुर्वा अहमस्मीसनवी- न्मातरिया वा अहमस्मीति ॥ तस्मिंस्त्वयि कि चीयमिति । प्रपीदं सर्वभादवीय यदिदम्पृथिव्यामिति ॥ तस्मै तृणं निदधावेतदादरोति । तदुपरेयाय सर्वजवेन । तन्न शशाका- दातुम् सत्तएव निववृते ननदशक विज्ञातुं यदेतयक्षमिति॥१०॥ श्रयेन्द्रमापन मघवनेराद् विजानीहि किमेतद् यतमिति । तथेति। तदभ्यद्रवत् । तस्मात् तिरोऽदधे ॥११॥ स तस्मिन्नेवाऽऽकाशे स्त्रियमानगाम बहु शोभमानामुमा हैमवत्तीम् । तां होवाच किमेतद यक्षमिति ॥१२॥४॥२०॥ दशमेऽनुचाके तृतीय.खपड । ब्रक्षेति होवाच ब्रह्मणो वा एतद् विजये महीयर इति । ततो देव विदांचकार ब्रह्मेति ॥१॥ तस्माद्वा एते देवा प्रतितरामि- ४-म । ५नियत । ६ म् (t)।

५ ६ ២ ( १४७ ) चान्यान् देवान् यदग्निर्वायुरिन्द्रः । ते होननेदिष्ठम्पस्पृथुस्स होना प्रथमो विदांचकार ब्रह्मोति ॥२॥ तस्माद् वा इन्द्रोऽतितरामिवा- न्यान् देवान् । स होनन्नेदिष्टम्पस्पर्श स घेन प्रथमो विदांचकार ब्रहोति ॥३॥ तस्यैप आदेशो यदेतद् वियुसो व्यगुतदार इति । न्यमिपदा३ । इसधिदेवतम् ॥४॥ अथाऽध्यात्मम् । यदेनद् गच्छत्तीय च मनोऽनेन चैनदुपस्मरसभीक्ष्णं संकल्मः ॥६॥ तद्ध तदनं नाम । तद्वनमित्युपासितव्यम् । स य एतदेवं वेदाऽभिदनं सर्वाणि भूतानि संवाञ्छन्ति ।।६। उपनिषदम्भो यूहीति । उक्ता त उपनिषत् । ब्राह्मी वाच त उपनिपदमवूमेति ॥७॥ तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदासर्वाङ्गाणि सयमायतनम् ॥८॥ यो वा एतामेवं वेदाऽपहस पाप्मानमनन्ते स्वर्ग लोकेऽज्येये प्रतितिष्ठति ॥२१॥ ९ दशमेऽनुवाफे चतुर्थ खण्डः । दशमोऽनुवाकरसमाप्तः॥ १ नेदिप्मा,नैदिपुम्।२ते । ३ अन् । ४ विशु।५ इती३.६ मी । ७ सुफ् । सम्यत्तन्ति ।यो । १०-५॥

६ (१४८ ) पाशा वा इदमग्र आसीद्भविष्यदेव । बदभवत् । ता आपो- ऽभवन ॥२॥ तास्तपोऽवप्पन्त । तास्तपस्तेपाना मुस्सिसेव प्राची: प्राश्वसन् । स वाव प्राणोऽभवतु ||२|| ताः प्राण्याऽपानन् । स वा अपानोऽभवत् ॥३॥ ता अमान्य व्यानन । स वाव व्यानो- ऽभवत् ॥४॥ ता ध्यान्य समानन् । स वाव समानोऽभवत् ॥५॥ तास्समान्योदानन् । स वा उदानोऽभवत् ॥६॥ तदिदमेकमेव सधमाधमासीदविविक्तम ॥७॥ स नामरूपमकुरुत । तेनैनध- विनम् । वि ह पाप्मनो विच्यते य एवं वेद ॥८॥ सदसौ वा आदियः प्राणोनिरपान आपो न्यानो दिशसमानश्चन्द्रमा उदानः ॥६॥ तद्वा एतदेकममवत्सासा एव । स य एवमेतदेकम्भ- बद्वेदैवं हैतदेकया भवतीसेकथैव श्रेष्ठस्स्वानाम्भवति ॥१०॥ तदान भाणो वागिति थिदी वायुर्वं भाणो वागित्यन्तरिक्षमा- दित्यो वै प्राणो वागिति धौर्दिसो वैपालो वागिति श्रोत्रं चन्द्रमा वे प्राणो वागिति मनः पुमान्दै प्राणे वागिति स्वी॥११॥ तस्येदं सृष्टं शिथिलम्भुवनमासीदपर्याप्तम् ॥१२॥ स मनोरूपमकुरुत । १'प्राशा घा' का पुनः पाठ है । २ येद् । ३ भपान । ४५-५-मादम् । -रेपम् । -विनोत् । भम्। उपा-१० स्न-1 तेन तत्पर्यानोव । दृढ़ ह दा अस्येदं सृष्टमशिफ्लिम्भुक्नम्पर्या- सम्भवति य एवं वेद ॥१॥२२॥ एकादशेऽनुवाके प्रथम खण्ड सैपाचतुर्धा विहिता श्रीरुद्रीयस्सामाक्य ज्येष्टब्राह्मणम् ।।५।। प्राणो वावोद्वाग्गी स उद्गीथः ।।२।। प्राणो वावामो वाक् सा तत्साम ॥३॥ माणो चाव को वाक् तदर्यम् ॥४॥ प्राणो वाव ज्येष्ठो चाग्वाह्मणं तज्ज्येष्ठवाह्मणम् ॥॥ उपनिषदम्भो हीति । उक्ता त उपनिषधस्य ते धातब उक्ताः । त्रिधातु विपु पाव व उपनिषदमब्रूमेति ॥ ६ ॥ एतच्कुल कृष्णं तानं सामवर्ण इति ह स्माह यदैव शुक्लकृष्णे ताम्रो वर्णोऽभ्यति स वै ते घड्ने दशम मानुपमिति त्रिधातु । स ऐक्षत क म उत्तानाय शयानायेमा देवता बलि हरेयुरिति ।[७४।२३।। एकादशेऽनुवाके द्वितीय सएड ॥ स पुरुपमेव प्रपदनायाऽत्रणीत ||२|| तम्पुरस्तात्ससञ्चम्मा- G १साश् । २ विहीता।३प्रगी ,गी १४ यू१५-११-पद् । जन्दा।८। स्त। १० दश्श्, ए के पूर्व एफ भतर पदा नहीं जासा, कदाचित् करा है। ११ मानाय ।।

२ ( १५० ) विशन् । तस्मा उरुरभवत् । तदुरस उरस्त्वम् ||२|| तस्मा अत्रसद एता देवता पनि हन्ति ॥३॥ वाचमनुहरन्तीमनिरस्मै पनि हरति ॥४॥ मनोऽनुहरचन्द्रमा अस्मै वलि हरति ॥ चतुरनु- हरदादेयोऽस्म वान हरति ॥६॥ श्रोत्रमनुहरादशोऽस्म पनि हरन्ति ॥७॥ पाणमनुहरन्तं वायुरस्मै पलिं हरति ॥८तस्यैते निप्याताः पन्या बलिवाहना इमे प्राणाः । एवं रेत निप्खाताः पन्या बलिवाहनास्सर्वतोऽपियन्ति प्राणा य एवं वेद || सा हैपा ब्रह्मासन्दीपास्ता । प्रा हास्म ब्रह्मासन्दी हरन्सधि ह ब्रह्मासन्दी रोहति य एवं वेद ॥१.०॥ तदेतद् ब्रह्मयशर श्रिया परिहम् । ब्रह्म ह तु सन् यशसा श्रिया परिष्टदो भवति य एवं वेद ॥११॥ तस्यैप प्रादेशी योऽयं दक्षिणेऽक्षनन्तः । तस्य पच्छुकं तहां रूपं यत्कृष्णं सत्सान्नां यदेव ताम्रमित्र बभ्रुरिच तयजपाम् ||१२|| य एवायं चक्षुपि पुम्प एष इन्द्र एप पना. पतिस्तमः पृषिच्या सम आकाशेन समो दिवा समस्सग मृतेन । एप परो दिवो दीप्यते । एप एवेदं सामित्युपाति- ७ तव्यम् ॥११॥२४॥ एकादशेऽनुवाके हतीयः सपहः। १अदिशारा।यलि यालाऽपय।५हरति।६-शामाजिरी (१५१ ) समाऽसञ्चाऽसच सच वाक् च मनश्च [ मनश्च] वार च चतुश्च श्रोत्र च श्रोत्र च चतुश्च श्रद्धा च तपश्च तपश्च श्रद्धा च तानि पोडश॥१॥ पोडशफलम्ब्रह्मोस य एवमेतद पोडशकलम्ब्रह्म वेद तमेवैतत् पोडशकलम्नलाऽप्यति ॥२वेदो ब्रह्म तस्य ससमायतन शमः प्रतिष्टा दमश्च ॥३॥ तद्यथा श्वः भैष्यन् पापात्कर्मणो जुगुप्सेतैवमेवाऽहरहः पापात्कर्मणो जुगुप्सेताss कालाव ॥४॥ अथैपा दशपदी विराट् ॥शा दश पुरुपे स्वर्ग- नरकाणि । तान्येन वगै गतानि वगै गमयन्ति नरक गतानि नरक गमयन्ति ॥६॥४॥२॥ एकादशेऽनुवाके चतुर्थ खण्ड । मनो नरको दाइ नरकः प्राणो नरकश्च चतुर्नरकदश्रोनं नरकस्त्वहनरको हस्तौ नरको गुद नरकशिश्न नरकः पादौ नरकः ॥१॥मनसा परीक्ष्याणि वेदेति वेद ॥२॥ वाचा रसान्वेदेतिवेद ॥३॥ पाणेन गन्धान्वेदेति वेद ॥४॥ चतुपा रूपाणि वेदेति वेद ॥शा श्रोत्रेण शब्दान्वेदेति वेद || बचा सस्पर्शान्वे- देति वेद वा हस्ताभ्या कर्माणि वेदेति वेद ।।८।। उदरेणा- १--प्रश्॥

ऽशनयों वेदेति वेद ॥६॥ शिश्नेन रामान्वेदेति भेद ॥१०॥ पादाभ्यामध्वनो वेदेति वेद ||१|| प्लक्षस्य प्रास्रवणस्प प्रादेशमात्रादुदन तत्पृथिव्यै मध्यम् । अथ यौते सप्तर्पयस्तद्दिवो मध्यम् ॥१२॥ अथ यत्रैत ऊपास्तत्पृथिव्यै हृदयम् । अथ पदे- तत्कृष्णं चन्द्रमासे तद्दिवो हृदयम् ॥१३॥ स य एषमेते धावा- पृथिव्योमध्ये च हृदये च वेद नाकामोऽस्माल्लोकात्मति ॥१४॥ नमोऽतिसामाऽतुरेताय धृतराष्ट्राय पाशुश्रवसाय ये च पाणं रक्षन्ति ते मा रक्षन्तु । स्वम्ति । कर्मेति गाईपसरशम इसाह- वनीयोदम इसन्वाहार्यपचनः ॥१४॥२६॥ एकादशेऽनुवाके पञ्चमः भण्डः । एकादयानुवाफस्समाप्त. ६ ७ कस्सविता ! का सावित्री । अग्निरेव सविता । पृथिवी सावित्री ॥२॥ स पत्राऽनिस्तत्पृथिची यत्र वा पृथिवी तदामि। ते द्वे योनी । तदेकम्मियुनम् ॥२॥ कस्सविता । का सावित्री । वरुण एव सविता । मापस्सावित्री |||| स यत्र वरुणस्तदापो यत्र वाऽऽपस्तद्द्वरुणः । ते देयोनी । [ तदेकम्मिधुनम् ] ॥४॥ २-घद् । ३-कोमो । ४-सामय-सामाय । पान्जुश्-से ठीक फिया हुमा है । ७-मय् ॥

२ ३ ( १५३ ) कस्सविता । का सावित्री । वायुरेव सविता । आकाशस्सावित्री || स यत्र वायुस्तढाकागो यत्र वाऽऽकाशस्तद्रायुः । ते दे योनी । तदेकम्मिथुनम् ॥६ ! कस्सविता का सावित्री ! यज्ञ एत्र सविता । छन्दांसि सावित्री ॥७॥ स यत्र यज्ञस्तच्छन्दांसि यय वा छन्दांसि तयज्ञः । ते ३ योनी । तदेकम्मिथुनम् ॥८॥ कस्सविता का सावित्री स्तनयित्नुरेच सविता । विद्युत् सावित्री H॥ स यत्र स्तनायित्नुस्तद्विद्युद्यत्र या विद्युत् तत्स्तनयित्नुः । ते देयोनी । तदेकम्मिथुनम् ॥१०॥ कस्सविता । का सावित्री । मादित्य एव सविता। धौस्सावित्री॥१॥ स यत्रादिसस्तद्यौर्या रा चौस्तदादियः । ते २ योनी । तदेकम्मिथुनम् ।।१२।। कस्सविताका सावित्री । चन्द्र एव सविता । नक्षत्राणि सावित्री ॥१३॥ स पत्र चन्द्रम्तनक्षत्राणि पत्र वा नक्षत्राणि तचन्द्रः। ते देयोनी । तढेकम्मिथुनम् ||१४|| क्सविता । का सावित्री । मन एव सविता । वाक सावित्री ॥१॥ स यत्र मनस्तद्वाग्यत्र [वा] वास् तन्मनः । ते वै योनी । तदेकम्मिथुनम् ॥१६॥ कस्स- विना । का सावित्री । पुरुष {एवं] सविता । स्त्री सावित्री । स या पुरुषस्तत् स्त्री यत्र वा स्त्री तत्पुरुषः। ते योनी। तदेकम्मि- युनम् ॥१७॥४॥२७॥ द्वादशेऽनुवाके प्रथम खण्ड । २.fm. हैि. - 9 तस्या एप प्रथमः पादो भूस्तत्सवितुर्वरेरायमिति । अगि वरेग्यम् । मापो व घरेण्यम । चन्द्रमा वरेण्यम ॥२॥ तस्या एप द्वितीयः पादो भगायो भुवो भर्गो देवस्य धीमहीति । अनि भगः।पादियो चै भर्गः । चन्द्रमा भर्गः। तस्या एप तृतीयः पाढस्स्वधियो यो नः प्रचोदयादति । यज्ञो वै प्रचोदयनि । स्त्री पुरुषश्च मजनयतः ॥ भूर्भुवतत्सवितुर्वरेण्यम्भर्गो देवस्य धीमहीति । अनि भर्गः । प्रादियों ने भगः । चन्द्रमा वै भर्गः ॥४॥ स्वधियो यो नः प्रचोदयादिति । यज्ञा वै प्रचोदयति । स्त्री चधै पुरुपच मजनयतः ॥५॥ भूर्भुम्सम्तव सवितुर्वरेण्यम्भगों देवम्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयादित यो वा एना सावित्री- मेवं वेदाऽप पुग्मन्यु तरनि साविच्या एर सलारुतां जपति सावित्र्या एव सलोकतां जयाते ॥६॥४॥२८॥ द्वादशेऽनुपा द्वितीय ग्वगड । द्वादशोऽनुनाफरममाप्तः । इत्युपनिषद्रामाणं ममाप्तम् ॥ १-स। २'यो प्रचोदयात । स्त्री से ये पुरषश्च प्रजनयत' भाभिष मरो।

१-ऋषि-नामों की सूची। वं. से वरा का अभिमान है। भगस्त्य, ४ारशरावं अतिसाम एतुरेत, ४१२६१२५॥ अनुचका सात्यकीर्त, १२॥ अभयद श्रासमात्य ४.८॥ अमितारी, ३१११२१॥२१२,३,१३॥ अभिप्रतारी फातसंनि ५६१॥३६॥२१॥ ययास्य, २०८७८॥११1८) भयास्य पानिरम, २७१२,६॥१३॥ अपाद उत्तर पागशर्य ४२११॥ प. आशिरस, ससा सो प्रयास्य मां। भाजकेशी, ११॥३॥ भाजद्विया, गो यम्स प्रा. भादगार, देसो पार था। मांनय, दवो दक्ष कात्यायनि मा,सद शाट्यायनि प्रा। प्रारणि. १।४।१॥ प्रारणेय, २११॥ धामायण, देखी गळूनस प्रा। भाइकेय, देपो हरस्वाशय प्रा। भासमात्य, देख। अमयद प्रा० । इन्द्रीत देवाप शौनक, ३४०१॥ । इप प्यावाश्यि, ४१६॥ पं० उन्नयस कापयेय, २२२६१,२,३॥

.) उत्तर, देखो प्रापाट उ०पाराशयं । समा मयती, अ२०१॥ बलुक्य (१) जानश्रुतेय, १।६।३॥ पसन पाव्य शा२,६॥ प्पा काश्यप,3010 घल। पतुरत (१) देखी अतिसाम एक एघाय, देवो भगेरथ पे। पदाफ वार्ण, शश पनरेय देसो महिदाम। मन्द्रोति, देशो इति प.सोनका कार धारकी रग॥ ३० । कस बारक्य ३॥ ४२ ॥१॥ पक्षीयन्त शा॥ पश्यप, ४॥३१ फाचसेनि देखा अभिप्रतारी का । फापरविय ३।१०।२॥ देसा जनश्रुत फामगरी जानभनेय गा। सायफ जाननुतेय का। पान्यायनि, देखो दत फा० माय । कापेय, ३५१२१२॥ देखो शौनप 101 पारगति, राय भाग्य, देखो उशन पा। पाश्यप ३४२ व. देशो मृया कागदेवता. पावसायम या। ग्रुप पाहेप पान कुर धारक्य, ३४११॥ ०। गुरु (पक्ष्य.) (पहुय०)११३८।१॥ देखो कौरव । कुरुपवाजा, GIRIGIoERIENDR|| WAT नौदिय ३१॥ २० । देयो त्रिवेद हिरण ।

याधृति सात्यफि, अउस॥ । कृपारात नौहित्य, अशा २० । ठेली शिव का मोहत्य ! मी द.भ्य, सि१,२॥ कोपयेय, देखो उनलयः। कातुजातेय, देसो राम मा वैयाघ्रपद्य । तमि, देखा सुदक्षिणा गालनस भाकायण, ३९|| गन्धर्याप्सरस ,श४१५।१०,११॥३५॥ गुप्त, देखो वपश्चित दार्दजयन्ति गु० लौहित्य । गोयल वानी, राधा गोधु (जावाल), ३७॥ गौतम (भारुणि) १९४२२१॥ गौपुक्ति, १५१०। पिनानेय, ११३७७॥२२॥२॥ (बहुव०) ११४९३१॥ देखो प्रादत्त चावासिष्ठ च। बैनरथि, देसी सत्याधिवाफ चै०। जनश्रुन फाएड्विय, श०२॥ । जनयुत पारक्य, ३५१०९७१।०। समान, ३२३३५९॥४॥३३॥ अयफ मोहित्य, ३४॥1 भयन्त, देखो यशस्थी जा लौहित्य । अयन्त पाराशर्य, ३४२१॥ जपन्त धारक्य, ३३॥ ०। (इस नाम के दो व्यक्ति) ४१७११॥401 जानथुत, देयो नगरी जा० पाएड्विय । जाननुनेय, देखो उलुक्ष्य जा० । सापक जा काएशिय। नामा, 1|| (डिय०) ३७१२,३,५७,८॥ देखो गोश्चमक , घलि, ११३८ ज्यालायन, ४१६॥ यं। असदस्यु. २०१२॥ निवेद रुपारात लौहित्य, २२४२॥१॥ यः। दक्ष कात्यायनि प्रालेय, ३४१२। दक्षजयन्त लोहित्य, ३१४२६॥ वं! दाजयन्ति, दसो पश्चित दा० गुन क्षौहित्य, चित दा० स्वा यन्त लौहित्य। दाभ्य, देपो पं.शी दाम दाल्भ्य (ब्रह्मदत्त चकितानेय), ११३८१॥५॥ दालभ्य खो वरदान एलजयन्त, देगा विपश्चित दा लौहित्य, पश्चित दाजयाम . धादित्य । पति ऐन्द्रोति शोनक, Ratn०। देयतरस श्यावसायन काश्यप, ३।४।२।।। दंषाप, देखो इन्द्रोत दे शौनक । धृतराष्ट्र, ४॥२६॥१॥ नगरी जामश्रुतेय पायव्यय, ३४०॥ नाक, ३.१६॥ पतङ्क प्राजापत्य,३०१३॥ परमेष्ठी प्राजापत्य, ३३४ागाचा पनिगुत खोहित्य, ४० 'पाराशय, देखो प्रपाट उत्तर पा । जयन्त पा०विपधित शनि- मिम पार । सुदत्त पा। पायुथरस, १२६१५॥ पाणं जम, सामा पुलुप प्राचीनयोग्य, ३४२ पृथु धैन्य, ११९०८॥३४॥६॥४५॥१॥ पलुषि, देखो सत्यया पो०प्राचीनयोग्य : पोलुपित देखो सत्यय पो० ।। प्रतीदर्श ४८ प्राचीनयोग्य, १३॥ देखो पुलु प्रा० । सत्ययन सौवधिमा सोमशुप्म सात्यज्ञि प्रा०। प्राचीनशाल (यदुन०), ३३१०।। प्राचीनशाल, ३७२३५७॥१०॥१॥ प्राजापत्य, देसो परमेष्ठी प्रा। प्रातृदभार, ३१३॥ प्रावरण, दयो प्लत प्रा। प्रोटगर वारस्य, २४॥ प्लव मायरया, ४॥२६१०॥ पफ दाल्भ्य,१३३॥४७ धम्य आजद्विप, RU पानव्य, देखा शन या ग्रहादत्त वैक्सिानेय, ११३८६५९॥ मगेरय पंक्ष्याक, ४४१,२२ माल, देखो प्रातर मा। भाषित (बदुव०), २२४७॥ मनु, ३१२ महिनास पेमरेय, २०११ मातरिश्चन, ४१२८ माय, देखो शायर्यात मा. मित्रभूति लाहित्य ३२४२११॥ ३० - मुज सामधषस, ३॥ यशस्वी जयन्त नौहित्य, ३१४२॥१॥ राम कातुजातेय वयाघ्रपद्य, शशा०। ४ १६॥ पंग रोहिण, २७,१०॥ लौहित्य, देखो कृष्णदत्त लौ०, कृष्णरात लौर, जयफ लो०, नियद कृष्णरात लौ०, दत्त जयन्त लो०, पलिगुप्त जो, मिनभूति ली. याम्बी जयन्त बोर, विपश्चित् दृढजयन्त लो०, चैपश्चित दादजयन्ति गुप्त लौ०, पश्चित दादजयन्ति रदजयन्त लौर, श्यामजयन्त लौः, श्यामसुजयन्त कौर, सत्यधवस्त लो। वसिष्ठ, २२१३॥१श-॥१८॥६.७॥ तुल० वासिष्ठ । वारफि, देखो फंस वा। वारक्य, देखो कंस वा, कुबेर यार, जनश्रुत घा०, जयन्त बा. प्रोष्टपाद पा०। घाणं, देखो पेक्ष्याक वा०, गोयल धा। यासिष्ठ चैकितानेय, १२४२।६।। याइय, देखो धुप चा० काश्यप । विपश्चित् ढजयन्त लौहित्य, १४२११॥ वं। विपधित् शकुनिमित्र पाराशर्य, २४॥ घे० । विश्वामित्र, ३।६७॥११॥ (यहुव०) ३२११॥ तुल० पैश्वामित्र कुण्ठ (इन्द्र), ४११०१०॥ म्य, शशा देखो पृथु । पधित दादजयन्ति गुप्त लौहित्य, ३।४।१॥ ० । धेपचित दादजयन्ति हदजन्त नीहित्य, ४२ ०। मुघ (इन्द्रो,४१०१॥ घेवायपत्त, मेलो राजानेय धे।

.. शकुनिमित्र, देखो विपश्चित् शापागशर्थ । शह याभ्रव्य, ३३८११॥ यं १॥ शङ्ग शाट्याति प्रात्रेय, ३४०११॥4॥ शर्य, ४.१११०॥ शर्यात मानर, २१७१॥३३,५॥ शाध्यायनि, १६२॥३३१॥२॥२८॥४॥३॥११०३११३६॥८॥ ४११ ० १७॥ ०। देखो शङ्ग शा. प्रात्रेय। शाण्डिल्य, देखो मुयन शा। शालावत्य, १३८ शुक्र (जावाल), ३७१७ शैलन (बहुव०),१२।३।रादेखो पापणं शक सुचित है। शौनक, २५६१२॥ देखो इन्द्रोत हैवाप शो, इति पन्दोनि शौ। शौनक कापेय, राना श्यामजयन्त लौहित्य (इस नाम के दो व्यक्ति), ३ ४२४० श्यामसुजयन्त लोहित्य, ३१४२॥१ ॥। श्यावसायन, देखी देवतरस श्या० काश्यप । श्यापाश्वि, देखो इश श्या। शुष याय काश्यप, ३२४०११॥ २० । भ्याजनि (पक वैश्य), ३५२॥ सत्ययक्ष पौलुपित, २३११ सत्ययक्ष पौलुपि प्राचीनयोग्य, ३३४०२॥ वं। सत्यश्रयसू लौहित्य, १४२२१॥ सत्याधियाक चैनरथि, १२३॥१॥ सात्यकि, देखो कृष्णधृति सा। सारपफीत (पहुव०), २३२१॥ देखो अनुपक्ता सा० ॥ सात्ययहि (पहुव०), साशा देखो सोमशुष्म सा० प्राचीनयोग्य।

सामप्रवस, देखो मुन्न सा। सापक जानश्रुतेय काशित, ३'३० वं० । सुचित्त शबन, ११॥ सुदक्षिणा, ३१७८८६) (देयो सुदक्षिण मि) सुदक्षिण तमि, ३।६।३॥७,४५.६॥ (देसो सुददिए। सुदत्त पाराशर्य, ३१४१ ॥४॥९७२॥ सुयश शाण्डिल्य, ११॥ मोमवृहस्पति (द्विच०), १२५८/En सोमशुष्म सात्ययशि प्राचीनयोग्य, ३।४।२। हरस्याशय पालकेय, ३।१०।२॥ वं० हमवती, देखो उमा है। २-निर्वचनादि सूची। मदर, २४॥६॥४ाथा॥ देवधुत् , २१॥ ४३॥ पतङ्ग, ३॥३०॥ भन्तरिक्ष, २०६॥ पश्यत, ११५६ादा प्रयास्य, रामा७॥११॥ प्रतिहार, १।१२।सा अपर्य, ४ा२३॥ प्रसाम, प्रसामि, शर५ अमु, १४०॥७॥ प्रस्ताव, ९।११॥ मसुर,३३३५॥३॥ वृहस्पति, २२२॥५॥ भाङ्गिरल, २०१ भीमल, १७ प्रादि, १२११७॥१२॥ मधुपुन, १२५॥ मादित्य, Reu महीया, ११४॥ रद,४ाशा उरस, ४४ाशा रोदसी, ३४३२४ मृच, ११५॥६॥ यसु,शश॥ गायत्र, ३1३८ चावामित्र, २३॥ प्रायन,३३३जा .

शतसनि, ANOR
सजात, १९८३
समुद्र, १२५॥
सामन, १३३७॥ ४०॥४॥२॥१३॥२॥ १२॥५॥ ११५३५॥
५६।२॥धारश
सिन्धु, रस
सुवर्ग, ३३१४४॥
हरि, २४४॥
३-(क) मृचादिसूची।
अदितिधारदिति , १२४११॥ ० रास१०॥
अपश्यं गोपामनिपथमानाम, ३४३७३१॥ ०१११६४॥३१॥
प्रात्मा देवानामुत मानाम, ३१२१४॥ तुशां० उ० ४३३२७॥
प्रायुर्माता मति. पिता, १७॥
इन्द्रमुक्यमृचम, १४५॥१॥
इमामेपारपृथिवीम, १२३४॥७॥ प्रय०९०८३६॥
उत्तयां ज्येष्ठः, ३३१०।१२॥ अथ० १०१८२८॥
उपास्मै गायत, ३२३६, ० १९११॥
भूषय एते मन्चकृत , ११४५॥२॥
चत्वारिधान परिमिता, ११७३४०११० १० ११६४४५॥
तत्सवितुर्धरेण्यम, ४॥२८॥१॥ ० ३२१२२१०॥
घ्यायुपं कश्यपस्य, ४॥३१॥ तुल०, ०२८७
नवो नयो भवसि, ३।२७११॥ तुल०, पृ० १०५४।१।।
पतहमकम, ३६३५४० २०११७७१||
पतझो याचम्मनसा, ३६३६॥२॥ ० १०.१७७१२॥
मयीदं मन्ये भुवनादि, ३१७६।।
महात्मनश्चतुरो देव , २२॥ तुल० मा० उ०४॥३॥६॥

(१०)
यदाषा इन्द्र मे शनम्, १२३२।१॥ ऋ००५॥
यस्सप्तरहिमवृषभ, IRRIGI ऋ११२१२॥
पेऽप्रयः पुरीया, य० १८६७।।
येमिर्यात इपित, १२३४॥ अध० २००३५॥
कर्प-रूपम्प्रतिरूप., शा०६७॥
रूप-कपम्मघवा, २४४६|| ०३५३२॥
समो मयोभू, ४॥३२॥
सयदा घे म्रियते, शो
श्री स्मैवाऽग्रे, १५॥
स्थूणां दिवस्तम्मनीम, १।१०।।
(ख)
प्रमिजिदस्यमिजय्यासम्, ३॥२०॥१०॥
प्रमोऽहमस्मि, (दीर्घपाठ), १Reten (संक्षिप्त), ५७॥
प्रत्ययस्य घन्सोसि, ४॥
उपायत्तध्यम, ३२१६॥१॥३२॥
गुहासि देयोऽसि, २०
दिशस्था श्रोत्रम्, श२२२६॥
देपेन सयिका, २१८३.६॥
पुरुष प्रजापति,
श४३,४॥
प्राणा३प्राणा३ प्राणा३,२७t
महाग्मया समधन,३४॥
पत्पुरस्ताद्वासीन्द्रः, ३१२११॥
पिमूः पुरस्तात्सम्पत, ३३२७॥
म्युपि सविता भपति, ४५॥
श्वेताभ्यो दातो, ३१॥
सस्यस्प पापा ३२॥१०॥
सोमः पवते, २११॥३४॥२॥

The Jaiminya Or Talavakara Upanishad Brahmana

Author
Datta, Bhagavad
Title
The Jaiminya Or Talavakara Upanishad Brahmana
File name
The Jaiminya Or Talavakara Upanishad Brahmana
Text
OCR done
Citation
1921
Published
2012/04
Publisher
Lahore, Bhairo Prasada
Language
Sanskrit
Pages
196
Library
Government College, Kota
Classification
Literature
DLI number
407775
Barcode
99999990303686.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
aW7ULTZzDsG
Download PDF

The Jaiminya Or Talavakara Upanishad Brahmana