Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

The Mahabharat Sauptikparv

Vedavyas, · 2012/08

PDF Proofread

Front matter

" - ४ " 19 म 7 सौप्तिक लाई कामबो १८ गान्धारी बिलाप १९ गारवारी विलाप २० गान्धारी विलाप २१ गागधारी बिलाप २२ गाम्चारी विलाप २३ मारधारी बिलाप २४ गान्धारी बिलाप २५गाधारी बिलाप २६ दाह क्रिया बजम्म India to Stri an? Bauptik Parv ७४०२ 18. Gandhari's lamentation 7402 19. ६/20. 14 ७|21. 22 ११23 11 24 14 १७ 15 17 २१|26 The Cremation Ceremony 21 ६२/27 Karan's Seennt Bath 26 " " " " " " २७ कर्णका महाभारत सौप्तिक पर्व मारायणं नमस्कृत्य नरञ्चैव नरोत्तमम् । देषां सरस्वचिव ततो जयमुदीरयेत् । सम्जय उवाच । ततस्ते सहिता वारा प्रयाता दक्षिणामुखा । उपास्तमनवेलाया शिवराभ्यासमागता ॥१॥ रिमुव्ययाहांस्त्वरिता भीता समभषस्तदा । गहन देशमा साच प्रच्छन्नान्यविशन्त ते ॥ २ ॥ सेनानिवेशमभितो नातिदमवस्थिता-निरुत्ता निशितैः शनः समन्तात् क्षतविक्षता । दीर्घमुग्णच विश्वस्पे पाखानविन तपन् । ॥ ३॥ श्रुत्वा च निनदं घोरं पाण्याना जरिणाम अनुसारमयाद्रीताः प्रमुखा. प्रायन पुनः ॥ ४ ॥ ते मुह ततो गत्वा भारतवाहा: पिपासिता नामुष्यन्त महे अध्याय १॥ श्रीनारायण नरों में उत्तम नरको और सरस्वती देवीको नमस्कार करके जाप नाम महाभारत इतिहासको वर्णन करताहूं सञ्जयवोलेइसके पीछे बहवीर एकसाथही दक्षिण ओरको चले और सूर्यास्तके समय डेरोंके पास माये ॥१॥ तब वहशीही रथों को छोडकर भयभीत हुपे और घनदेशको पाकर गुप्त निवासी हुये ।२। अपनी सेना के निवासस्थान से कुछ योदेही अन्तरपर नियत हुये तेनशनोंसे छूटेभंग चारोंओर से घायल उन बारोंने लम्बी और उष्णसासा लेकर पांडवोंकी चिन्ताकरी।।। फिर विजयाभिलाश पांडों के शेर शब्दको पुनकरपीछा करने के भयो भयभीत होकर पोछकी भारको चलदिये । ४१ वह सप' एकमहू चनकर तृपा और थकीसवारी वाले सह न सके वह वहे धनुषधारी क्रोध और प्रशान्तताके आधीन SAUPTIK PARV II. CHAPTERI. Having loired down to Narayan, to the best of males and to: Saraswali, let us speak of the history of the Victory, Sanjaya said: "Then the warriors vont tngether southwards and approached the camp at sungot. They came down from their care in terror and entored a denog forest a short distance from their camp. With rounded - Ini nichen they thought of the Pandavas Then heering --PAdavas, they receded further.

७२५४) Muhabharat (7254) बासाः क्रोधामपंधशन्नताः। राम्रो पधेन सन्तप्ता मुहूर्त समवस्थिताः । ॥ धृतराष्ट्र उपाच । अधोटे यमिदं फर्म कृतं भीमेन सत्रय । यत् स नागायुतप्राणः पुत्रो मम निपातितः॥ ६ ॥ अभ्याः सर्वभूतानां यजसंहननो युषा । पाण्डवैः समरे पुत्रो निहतो मा सजप ॥ ७॥ न दिएमभ्यतिक्रान्तुं शक्यं गावल्गणे नरः । यतू समेत्य रणे पाय: पुत्री मम निपातितः॥ ८ ॥ अद्रिसारमय ननं इदयं मम सम्जय । इतं पुत्रशतं श्रुत्वा या दीर्ण सहनषा ॥ ९॥ यं हि धमिथुन हहपुत्र भविष्यति । न हाई पाण्डपस्य विपपे घस्तुमुत्सहे ॥१० ॥ कये राहः पिता भूत्वा स्वयं राजाच संजय मेष्यभूतः प्रयत्सेयं पाण्डवेयस्य शासनात् ॥११. माशाप्य पृथिवीं सोस्थिधा मुद्धति सञ्जय । कथमय भविष्यामि यस्तो दुस्तकृत् ॥ १२ ॥ भीमस्य वाक्यानि थोतु शपयामि सजय । येन पुत्रशत पूर्णमेकेन निहतं मम ॥ १३ ॥ कृतं सत्यं पत्र और राजा के मारेशाने से दुःखी चित्त होकर एक मुहूर्ततक नियत हुपे । ५ । धृतराष्ट्र बोले है सजय भीमसेनने यह कर्म श्रद्धाके अयोग्य किया जो सदश इजार हाथी के समान मेरे पुत्रको मारा । पाहे संजय वह मेरापुत्र जो कि सब जीवासे अवश्य वजके समान हद शरीरवालाया युद्ध में पांडवों के हायसे मारागयो। के गोलगणके पुत्र संजप मनुष्यों से मारष उल्लंघन करनेके योग्य नहीं है जो मेरा पुत्र पांडवों के सम्मुख होकर मारागया।८।हे संमय निश्चय करके मेरा हृदय पत्थर है जो सौपुत्रों को मृतक मुनकर भी विदीर्ण नहीं होता । ९ । मृतक पुत्रवाला वृद्धों का मिथुन किसमकार से रहेगा मैं पांडवों के देश में निवास करने को विचार नहीं करताहूं । १० । हे संजय मैं राजाका पिता भाप राजा होकर पांडवोंका पाशवी होकर सेवकके समान कैसे कर्मकरूंगा। ११ । हेसंजय पृथ्वी पर राज्यशासन करके और सब राजाओं के मस्तकपर नियतहोकर कैसे उसकी माज्ञाका पालनकरुंगा जिसने कि मेरे पुत्रोंका एक पूरा सैकड़ा मारडाला। १५ । हे संजय वचन को न करनेवाले उस मेरे पुत्रने महात्मा विदुरजी के बचनको सत्याकिया है संजप कठिन नाश करनेवालेका मैं कैसे आज्ञावहूंगा और किस for fear of chase. But they could out go very far with their fooble bodies and tirel keasta, 47'1 h d to stop again. The great warriors, enras ed, djszati f d and corrow fal at the fall of their prince, staid there for nwhilo." Dhriuashtra said, " It griezes me to hear tbat Bbir slev my son who was like a myiiad of elephante. G. He was unglayable by othors, with body bard as vajra, yet he was alain by the Pandavas Fate is surely insurmountable; for my son fell down before the Pandavas. Buroly my heart is hard as it does not break on hearing the nows of the death of my hundred sons. How cau an old pa ir live without son t I donot think that I shall live with the Panda PAR, Bx ing a king and father of a king, how can I obey the Pandavas! 11. Haring ruled over kings and kingdom, 1 cannot obey him who dese troyed my handre l song. My son bas provod the prediction of Vidur (7255) Suptik Parv सप्तिकपत्र (०२५५) स्तस्प विदुरस्य महात्मनः । अकुर्वता वधानेन मम पुत्रेण सअप ॥१५॥ अघोण हते तात पुरे दुर्योधने मम । कृतधमा रुपो द्रौणिः किमकुर्वत सम्ञय: ५५ ॥ सञ्जय उवाच । गत्वा तु तावका राजधातिरमपस्थिताः । अपस्यन्त पनं घोरं नानादुमलता प्रतम् ॥ १६ ॥ से मुहतन्तु विभम्प लावतोयोत्तमैः । मालमनलायां समासे दुर्महवनम् ॥ १७ ॥ मानामृगगणैर्जुष्टं मानापक्षिगणावृतम् । नानादुमलता नामा ग्यालनिषितम् ॥ १८ ॥ नानातायैः समाकीर्ण नानापुष्पोपशोभितम् । पधिनीभात संडनं नीलोपल समायुतम् ॥ १९ ॥ प्रविश्य तद्वंनं घोरं बीतमाणाः समन्ततः । शाबाससमेह व्यप्रोषं दाशुस्ततः ।। २० ॥ उपेरप तु तदा राजन् न्यग्रोध ते महा रवा वार्षिपदा भेष्ठा भेंष्ठतं धनस्पतिम् ॥ २॥ तेवतीर्थ रयेयध विप्रमुष्य पवाजिनः। उपस्पृश्य यथान्याय सध्यामधासत प्रमो । २२ । तो पर्वतश्रेष्ठ प्रकार से भीमसेनके वचन मननको समर्थहूंगा । १४ ।हे संजय शर्मा से मेरे | पुत्र दुर्योधनके मरनेपर कृतवर्मा कपाचार्य और अश्वत्यामाने क्या किया । १५ । समय बोले राजा आपके बार थोड़ीदूर जाकर नियत हुये और नामकार के वृक्ष लताओंसे संयुक्त घोरबनको देखा ।१६ । उन्होंने जल पीनवाणे उत्तम घाड़ी समेत एक मूहूर्त विश्रामकरके सूर्यास्तके ममय एक ऐमे वनको पाया। जो कि नानाप्रकार के मृगसमूहोंसे सेवित मांतिभातिक पक्षीगणोंसे व्याप्त और बहुत मकारके वृक्ष लतादिकोंसे भराआहु बहुत भांतिके मोसे सेवित ।१८ १ नानामकार | के जलों से युक्त बहुत भेदके पुष्पोंसे शोभित सैकड़ों कपलनिगों से पूर्ण और नीले कमलों से संयुक्तया। १९ । इसकेपीछे चारोंओरको देखने उम वारोंने उम तब उनमें प्रवेश करके हजारों शखामों से युक्त वट वृक्षको देखा।२०। हे राजा घोर उन नरोत्तम महारथियों ने वटवृक्षको पाकर उस उत्तम वृक्ष के नीचे जाके अपनेर रथों से उतरकर घोड़ोंको छोड़ा और न्यायके अनुसार स्नानादिक करके वहसव मपनी २ संध्यावंदन में प्रवृत्तहुये। २२ । इस के पीछे ,पर्वतों में उचम by his wag'sardness Boxy cor; I obey that great desbroyer! How shall I be able to hear Bhin's voice! Wbat did Kritvarma Kripachar. sa and Ashwathama do, when my son was unjustly slain!" 15 Binjaya gaid, “ Your warriors stnod at a short distance and saw the forest of large trees and creepers. They wate-ed their horses and having estad themselvus for a while, they found the evening come upon thein in a part of the forest abounding in deor, birds, trees, creepers, serpents, water, flowers and lotus lakes. Vandering in varios directions they came under a large banyan tree, 20. Thay came down from their cars and left their horses. They made- &Ulations and p formed evening survice, In the meantime the fan disappeared and the night, nourisher of all beings, prevailed. Tt ’rás a tarii (७२५६) Mababharat (7256 मनुप्राप्त दिवाकरे। सर्वस्य जगतो धात्री शर्वरी समपद्यत ॥ २३॥ ग्रहनक्षत्रताराम. प्रकीर्णाभिरलं कृतम् । नमोशुकमिधाभाति प्रेशनीय समन्तत ॥ २४ ॥ इच्छया ते प्रय लगन्ति ये सत्वा रात्रिचारिण । दिवाचगश्च ये सत्यारते निद्रावशमागता ॥२५॥ रात्रिचराणां सत्त्वानां निघोषोभूत सुदारुज । धायाश्च प्रमुदिता घोग प्राता शर्वरी ॥ २६ ॥ तस्मिनानिमुने बोरे दु सशोकसमन्विता । कृतघी कृपो द्रौणिरूपों पविषिशु समम ॥ २७ ॥ तत्रोपषिया. शोचतो न्याघस्य समीपत । तमेवार्थमति क्रान्तं कुरुपाण्डवपो क्षयम् ॥ २८॥ निद्रया च परीताङ्ग निषाधरणीतले । श्रमेण सुहढ युक्ता विक्षता विविध शरे ॥ २९ ॥ ततो निद्रायश प्राप्ती कृपभोजी महारयो। सुखोचितापदुखाही निषणी धरणातले ॥ ३० ॥ तो तु सप्ती महाराज श्रमशोकसम निवती : महाशियनोपेतो भूमावेष हाययत् ॥३॥ क्रोधामपयश प्राप्तो द्रोणपुत्रस्तु भारत । नैव स्म स जगामा निद्रा सदिय शसन् ॥ ३२ ॥ सलेमे स तु निद्रा अस्ताचल में मूर्य के पहुचने पर सब जगत् की घात्री रात्रि वर्षमान हुइ पूर्ण ग्रह नक्षत्र और ताराओं अलंकृत चारोंओर से दर्षनीय श्राकाश स्वर्ण विन्दुओं से जटित वस्त्र के समान शोभायमान हुमा । २४ । जो रात्रि में घूमनेवाले जीव रहसक नींद के स्वाधीन बर्तमान हुये फिर रात्रि में घूमनकाले जीवों के शब्द भयानक ये मांसभक्षी राक्षस अत्पन्त प्रसन्न हुवे और घोररात्रि वर्तमान । २६ । रात्रिके उसपोर मुखमें दुखशोक से सयुक्त कृतवर्मा कृपाचार्य और अश्व- त्यामा वरावर समीप बेटे उस वटक सम्मुख कौरव और पाण्डवों के होनेवाल नाश को शोचते । २८ नींदसे पूर्णशरीर और परिश्रमसे अत्यन्त संयुक्त नानाप्रकारके पाणों से घायल पृथ्वीपर बैठ गये । २९ । इस पछि दुःखके भयोम्प और एखके घोग्य पृथ्वीपर पेठेहुये महारथी कृल्वर्मा मौर कृपाचार्य नांदके वशीभूतहुये ।।०। हे महाराज पकापट और शोकसे युक्त पूर्वसपयमें बहुमूल्य शयनोंपर सोनवाले वह दोनों अनाधों के समान पृथ्वीपर सांगये । ३१ । हे भरतवंशी क्रोध भौर प्रशान्ती में वर्तमान और सोके समान शासळेत अश्वत्थामाजी ने निद्राको नहींपाया ३२ शोकसे गलिनरूप उस पारने निद्राको नहींपाया तवउप्स मानाने उम घोरदर्शन might and the sky loohed nuif rj augled with gold dutt. Blecp pruinil. ed over creatuica and the night rovers mnude u Indeous muje Car Divorous rakshasca were glad at the prospect of that dreadful darh night. 20. Inrgol in gref and g01100, Kotvarma Anpacharya and Asliwethana sat ingethor Thinking of the great destruction of the Kauravas and Pandasas tired and slo 73, thies rat wounded with Kritvanima und Aupari arga, ninccontoned to bear such Shardana, inson tho ground 30 Full of grief and tired, the two grint Warriory accuslo nid 10 step ou precious bude slept in bire earth liko helpil 8 onde lnragul and dientifice, siglung lilo serpents, Arroty. - (72571 Sauptih Purv BI 77418 [७२५७) मानो दिम युना। श्रीक्षाच महाबाहु स्तवन घोदिशनम् ॥ ३३ । वयमाणो नोच नानासाविषषितम् । अपश्यतमहाबाहुन्धोध वायसवृतम् ॥ ३४ ॥ तत्र काकसहमाणित निशां पश्यनामयन् । भुसं स्वपरित कारतर पृथक पृ. गुगभय: ॥ ३५॥ मुनपुतेषु काके विश्रब्धेषु समन्तत: सोऽपश्यत् सासायाताल घोर दर्शनम् । ३६ ॥ महास्वनं महाकाय हव्य भुपिंगलम् । मुदोघंधानानवर मुर्ण विध गितम ॥ ३७॥ सोऽथ शमं मृ कृपया लीयमान आज.। पोधस्य तशाचा प्रार्थयामास भारत ॥ ३८ ॥ सन्निपत्य तु शाम्बायां न्यप्राधस्य विगमः। मुप्तान जभान मुवान पायसान्तकः ॥ ३९ ॥ केपाश्चिदनित् पक्षान शिव पत्ताधरणांधवाभिघरणायुधः । भणेनादरप बरपान येऽस हिप स्थिता ॥ ४० ॥ तेषां शरीरापयशारीरेध विशाम्पते: योधमण्डलस बिनकोदेखा । १३ । नानापकार के जीवों से संचित बनक पोएको देखते महावाहुने खटके दृक्षको काकों से संयुक्त देखा । ३४ । हे कौरव उस वृक्षपर हजारों काकाने गात्र तियाप्त किया और प्रयकर निवासी होकर मुख से निद्रा युक्तहो । ३५ । पाओरमे उन विश्रय काकोंके सोजानेपर उन अवस्थामाजी ने अस्माद मानेगले घोरदर्शन उलूकको देखा । ३६ । नो कि बड़ावान्दं बड़ा शारीर पातने पिङ्गलबर्ग बहुत लम्बे नख और ऊंची नाक रखनेवाला गरुड़ के 'समान तेवगामी था। ३७ । हे भरतवंशी उस गुस आनेवाले के समान पक्षी ने पृशम्द करके बटकी शाखाको पाहा। ३८ । काकोंके कालरूप उसपतीने बट उसकी शाखापर गिरकर मिलनेगले बहुत से काकों को मारा । ३९ । चरणकपी शधारीने कितनादी के पक्षसमेत शिरोंकोकाटा भार कितनोंहीके चरनोंको काटा उस बलवान ने अपने सम्मुख दीखनेवाले अनेक काकों को एक क्षणमात्र में काटा । ४० । राना उनके शरीरों के अंग भोर शरीरों से चटके वृक्षका मंडल सक भारसे उकगया । ४१ । इसके पाछे बह उल्क नकाकोंको मारकर प्रसन्न हुआ वह शत्रुओका मारनेवाला इच्छाके समान शत्रुओं को मारकर प्रसन्न हुआ। ४१ Ashwathama csild find no sleep That hrave warrior did not sleep for griel and looked on at the dreadful forest. Looking at the various creatures of the furast, he saw a great number of crows on the banyat tres sleping soundly and composedly in their nests 35, Wuíto the CROWS pero tkus eleeping, Ashwathamı saw nn ill-omenad owl creep. ing towards them, With ominous sound, large, y for body, yellow eyes, long claws and booked besk, it fiusp fast like a garur. It fler softly and stealthily to a branch of the hanyan tree and killed crows. Haring claws for weapons, it cut off the heads and wings of some and feet of others. It destroyed many of the crows in a moment, 40. The parts of their bodies covered the circular ground beneath many 4 (७२५८) Minhabharat (:2581 सन्नं सवतामयत् ॥ ॥स्तु हरया तत. काकान् कोशिको मुदितोऽभवत् । प्रतिकृय यथाका शणां सदनः ॥ ४२ ॥ तदाएषा सोप कर्म कौशिन कृतं निशि । द्वाप रुतसंकल्पोप्रोणिरकोऽम्बचिन्तयत्। ४२ ॥ उपदेशः सोनम पक्षिणा मम संयुगे। शत्रगो भय युक्तः प्रातकालश्च मे मत. मयान्तु पाण्याविनाशिनः । बलवन्तः वारसाहा लापळश्या:महारण॥४५॥ राहः सकाशाषन्तु प्रतिक्षातो पयोमा पितंगाग्निसमा तिमायापारमािरी नीम ॥ ४॥ न्यायतो युध्यमानाय प्राणत्यागो । संशयः। उपना तु भवेथिरि: शपूणच क्षणे महान् ४७॥ तत्र संशपितार्य चोयों निशवो भवेत्। जमा म.पन्ते ये शास्तविशारदा ४८ परमाप्यत्र भवेद्वार गरिन लोकादि तम् । कर्तव्य नयेण प्रण बता ॥ ॥ निन्दितानि रात्रिमं उलूकके कियेहुये उस छलयुक्त कर्मको देखकर उस छलमें संकल्पकरनेवाले अकेले अश्वत्थामाजीने विचारकिरा । ४३ । कि इस पक्षीने युद्ध में मुझको उपदेश कियाहै मेरे मतसे शत्रुओका नाशकारी समय वर्तमानमा : ४४ । अव विजयस शोभारानेवाले पराक्रमी कृतोत्मा लक्ष्य के प्राप्त करनेवाले और प्रहारकरनेवाले पाण्डा मेरे हाथ से मारने के योग्य नहीं हैं। ४५ । और मैंने राजाके सम्मुख ग्न सबके पारनेकी प्रतिज्ञाकरी पतंग और अग्निकसमान अपने नाशकरनेवाली पनि में प्रवृत्तहोकर मुझ न्याय से लड़ने वालेका निश्चय प्राणत्यागहोगा और छलकरके पड़ी सिदिसमेत शत्रुओं का बढ़ानाशहोगा। - । इसहेतुसेजो संशयात्मक अर्षक निस्संशयात्मक अर्थहोना योग्यह जो विद्यावान मनुष्य वह इसको बहुत मानते हैं ११८ । ऐसे स्थानपर जो पचनचाहे गाईत और लोकनिन्दितभी होय वा क्षत्रिय धर्मय प्रवृत्तहोनेवाले मनुष्यको भवशकरना योग्यहै ४९। अशुद्ध मन्ताबरणवाने पांडवोंने ऐसे उनसे भरेहये कर्मकिये जोकि गति और पदपदपर निन्दिता इस विषय में पूर्व समयमें न्यायक देखनेवाले धर्मका विवारकरनेवाले मुख्यताके शाता लोगोंके कहेहुये मुख्य प्रयोजन र वनेवाले श्लोक सनेजाते हैं। ५१ । शनुमों के एकनाने पथर होने और भोननकरने चले जाने और प्रशोनेपर शत्रुकी सेनाको मारना चाहिये । ५२ । जो सेना आचीरात्रिकी निद्रासमय निद्रास पाहत और the tros. The owl was much pleased at the destruction of ita enemies, the crowa. Seeing the deceitful work of the owi at night, Ashwatliama thought within himself "The bird has taught me. I think the death of the enemies is not far off. The victoring: Pandavas cannot be elain by opon warfare and I love made a vow to the king to slay thema. My mise will surely be like that of an insect falling in fre, if Caglit honestly with them. I can destroy them in great numbers by deceit and wiso men will not find fault with wo. I must act upon pornicious proverly The dec'itful Paudaras have performod various'wicked deeds and we hour many verses to the effect that we should slag enamida and their warı iets when they are tired, dispersed. orgaged in eating : 1 (19593 Sauptik PaIY सौप्तिकपर्व (७२५९] सावि हास्सितारि पदे । सोपधानि कृताग्यन पावरकतारमाना५० भस्मिनायें पुरा गीता भूषन्ते धर्मपितः । इलोका म्याथमरेमाद्रिस्तत्वार्यास्त स्वदर्शिभिः ॥५५॥ परिभाते विही वा भुत्राने पापि शत्रुभिः। प्रस्थाने का प्रवेश का प्राव्य रिपो पंचम ॥ ५२॥ निशामराव तथा नवप्रणायकम् । भित्रयो, बलं यर विधा पुकम्प पत् ॥ १३॥ स्वेष नियां पके सुप्तानां निशि मारणे। पाण्ड्ना सा पाबालदमपुत्र प्रतापमान ॥ ५४॥ स रा मतिमास्थाय विमानस्य मेहमुहुः । मुस्ता प्राधियती मातुलं मोजमेव च ५५ तो प्रबुरी महात्मानो कपभोली महा बको मोचरं प्रतिस्पेतां तत्र युकं हिया इती ॥ ५६ ॥ स मुहूर्तमिव व्यारवा वाटप विवलमावीत् । तो दुयोधनो राजा एकवीरो महाबलः। यस्पा पैरमस्माभिरा सपास ५७ ॥ एकाकी झुमिः मुदः परथे शुरविक्रमः पातितो भीम सेनेन एकादशचम्पतिः ॥ ५८. कोदरेण भुरेण मुशसमिदं रुतमा मामिति पसं शिस पादेन परिमृगता ॥ ५९॥ विनन्ति पाञ्चाला डन्ति सन्ति नाश युक्त प्रधान पृथक् २ शूरोंगली और दोभाग होनेवाली होय । ५। । उसपर मार करना चाहिय प्रतापवान अश्वत्थामाने इसप्रकार पांचालों समेत रात्रिके समय सोतेहपे पाडरों के मारने का निषय किया । ५४ । उसने निर्दयी बुद्धि में नियतहोकर बारम्बार निश्चयकरके अपने मामा और और भोनवंशी कृतवर्मा इन दोना सोनेवालोंको जगापा । ५५ । तब उनजगनेवाले महात्मामहावली लज्जायुक्त उपाचार्य और कृतवर्माने एकमुहर्तभर ध्यानकरके भाषोंसे व्याकुल नेत्रहोकर यह पत्रकहा कि वहवड़ा बलबान एकवीर राना दुर्योधन मारागा जिसके हेतुसे हमारी अनुता पागनों के साय:ई। ५७ । युद्धमें बहुत नाचों समेत ग्यारह प्रसारिणी सेनाका सामी बढे पवित्र पराक्रम वाम अकेला दुर्योधन भीमसेनके हाव मारागया । ५८ । महाराजाधिरामका शिर जो पैरों से मदनकिया यह नीच नीमसेनने बड़ा निर्दय कर्मसिया । ५९ । पांचाल देशी गनी है क्रीड़ा करत सिते हैं सैकड़ो शड्डों को बनाने और प्रसन्नचित्त दुन्दभियों को भी and walking or otherwiso at a disadvantaze. Ono pay attack an pomy at midnight or when they are divided. ”Thus glorious Ashwa. thama thought of slaying tho Pandayas and with this vier ayakened -bia anclo And Kritvarma 55. The two heroea on awakening shed tears and maid aftsr meditation:- " Brave Duryodhan for whom He made the Paodafas our onomy,.is slain. The lord of eleven akshxubinis bas fallen in fighting with Bhim. He did a wicked doed in teaching the king's head with leis foot. The Panchals are oxalting, laaghing and soanding their conchs and drums. Tbo anunds of their musical instrumento fill the air. We hear the neighing of their horses, tbgrunt of their elephants and tho leonino roara of (७२६२३ Mahabhonst (72620 तात्यांसवेहिकाया मनुष्याणानरमाविचटन्तस्मयते निवृत्तास्तुतपंपचारतः पुयाकारम्य सोपि देवेन सिध्यति तथा फर्मणः कसुरमिनिसो फलम्॥ १०॥उत्या नन्तु मनुष्याणां घाणा देवयार्जितम् । अफलं पश्यते लोके मम्पगप्युपपदितमा११॥ तमाळसा मनुण घे भवन्त्यमनस्विनः | उत्थानन्ते विगलितानातान रोषते ॥१२॥ प्रायशो हि यरोग नाफल पश्यते भुवि । भारयाच पादु कर्म रहयेन्महा कलम् । १३ ॥ चेपामउभो यदि किञ्चिद्यया । योबा मलमहत्या उशी साघुमायपि ॥ १४ ॥ शफ्नोति जीषितुं दक्षो नाममः सुखमेधते । दृश्यन्ते जोपलो के स्मिन् दक्ष मायो हितषिणः ॥१५॥ यदि पक्षः समारमात फर्मणो मामु फलम। कास्य पाच्य भषेश चिलायव्यं पाधिगछति ॥ १६ अाकर्म यो लोके पर विन्दति धिष्ठितः। स तुपकरयता पन्ति देपो भवति प्रायशः ॥ १७ ॥ एवमेतदनालय देखनेमें आते हैं। जो पाय कियाई बहमी दैवले हा सिद्ध होता है इसीप्रकार इन कर्मपालका कर्म सफल होताद । १० । सावधान : चतुर मनुष्योंका अप प्रकार से किया भा भी उधोग जो देवसे रहितई वह लोक निष्फल दिखाई देता है । ११ । मनुष्यों में जो लोग आलसी और असाहसी होने वद द्योगको युराकहते हैं उसको बुद्धिमागलोग अच्छा नहीं मानते हैं । १२ । बहुधा कियाहा कर्म इस पृथ्वीपर निष्फ दिखाई देता है फिर दुखहोताहै और कर्मको न करके घड़े फलको देखता । १३ । कर्मको न करके दैवयोगसे जो कुछ पाताहै और जो कर्म करके भी फको नहीं पाताहै वह दोनों दर्लभहैं । १४ । सावधान भार : निरालस्य मनुष्य जीवता रहनेको समय होता है और मालस्य मुक्त मनुष्प मुखसे | रद्धि नहीं पाताहै इस जीपलोक में कर्म करनेमें सावधान लोग बहुधा पदिके चाहनेवाले दिखाई देते हैं । १५ । जो कर्ममें सावधान मनष्य प्रारब्ध कर्म से कर्म फलको नहीं भोगताई उसकी कुछ निन्दा नहीं होती है जो मातदोनेके योग्य अभीष्ट को नहीं पाता है।६। और जो कर्म को न करके लोक में फसको पावा है वह निन्दित होता है और यया शत्रु होता है । १७ । भो मनुष्य इस प्रकार से इसको The vorba of mon no accomplished by both, Enterpuses become saccessful by the help of providence. 10. I be work of wise mich wher' well performed can bear no fruit without God's blessing. The luzy and unenterpusing speak ill of work and are therefore depised by tbo wise. A work dono often bears no fruit and the mind is thereby offlicted. The fruit of work, by providence alone or by prowesg alone is difficult to attain A careful and earnest worker is able to live, whila 2 inay prann finds ifs a difficulty. 15 He who dons nat gat the fruit of actions by Fate, is not to be blamed, but he who gets the fruit without work, creat 93 enomes. He who works contrary to tiis principle cautee difficult ef this ie the opinion of wise man, A Fork becomes fruit.

7263) Snuptik Parv VCTATS [७२६३) ईते यस्स्यतोन्यथा । स करोत्यात्मनोऽनयोनेप बुद्धिमतां गया। १८ ॥ होने पुरुष कारण यदि देवेन वा पुनः । कारमाध्याम्यताभ्यामुत्थानमफलं भवेत् । १९ होने पुरुषकारेग कर्म विहन सिध्यति । देवतेभ्यो नमस्फरय यस्गर्यान सम्पाहत । पक्षो राक्षिण्यसम्पमोन समोघ विहन्यते ॥ २०॥ मुम्यागीहा पुनरिय नो वृद्धानुपसेपते । मापरछति व यः श्रेयः करोति सहित वचः । २१ । उत्थपोरयाय हि सदा प्रपा बसम्मता से स्म योगे पर मल तन्मूला सिधिरुच्यते ॥ २२ ॥ वृद्धानां पवनं परषा पो युरथानं प्रपोजयेत् । उत्थानस्य फल सम्पन तदा स लभताचरात् ।२३।। रागात् क्रोधाद्भयालोमात् घोर्थानीहेत मानवः । अनशिवायमानो च स शीघ्र भ्रश्यते विपः ॥ २४ ॥ सायं दुर्योधनेनार्थो लुम्वेनादघिदर्शिना असं मन्य समारब्धो मूढ स्वादपिचिनातः ॥ २५॥ हितयुदीननाहत्य संमन्न्यासाधुभिः सह । वाय्यमाणोऽक निगदर करके इसके विपरीत कर्म करता है वह अपने भनोंको उत्पन्न करताहै यह बुद्धिमानों की नीति है । १८ । फिर जब उद्योग अथवा देवमे रहितहो तबइन होनों हेतुप्रोंसे पाप निणफलहोता है। १९ । इसलोक में उपायमे रहित किया हुमा कर्म सिद्ध नहीं होताद जो मनुष्य देवतामोंको नमस्कार करके अच्छोरीति में प्रयोजनों को चाहता है वह आलस्यमे रहित और सावधानी से संयुक्त कर्म की निष्फलता से नाशको नहीं पाताहै । २०. फिर अच्छे की इच्छा यहडेनो दोका सेवन करता है जो अपने कल्याणको पूछताहै भौर उनके हितकारी वचनों को करताहै सदैव उठ२ कर वृद्धों के अङ्गीकृत -पुरुष पूछने के योग्य है पहपुरुप अभीष्ट सिद्धकरने में बड़े तेजहैं और पूचरखनेवाली सिद्धी कहेजातहैं।२२। जो मनुष्य वृद्धों के वचनों को सुनकर उपाय में प्रक्षुराहोता है वह थोड़ेही समय में उपायके फलको अच्छीगति से पाता है जो मनुष्य गगनोध भय और लोभ से अभीटों को चाहता है वह अजितीन्द्रग और अपमान करने वाला शीवही लक्ष्मीसे रहितहोकर नाशहोताहै ।२४। सो इसलोभी और भदू-दर्शी दुर्यो पनने अज्ञामतासे यह विना विचाराहुमा असमर्थ कर्म प्रारम्भ किया और निषेध करनेवाले शुभचिन्तकों को अनादर करके नीचोंकी सलाह से बड़े गुणवान Jess without the help of providence or prosess. One cannot accomplish work without earnestness and the blessing of heaven. 20 One duing work successfully, should ask the opinion of old men. The advice of old rmer: lays a safe foundation for work. One doing a syork with the advice of old men, accomplisl eg it with but little trouble. He wbo, being avaicious and resentful, wishes to accomplish l.is work, 8000 becomes despised and loses wealth. The a varicoug 21.] careles: Duryodhan began his work foolishly and gave no hed to the advice of old won. He made the Pandavas his enemies, An ill-naturid caunt be patient and gets into trouble by the ill succoss of man 17260) ७२६०] Mistubuarat धमन्ति समान शतशो हटा नलि व दुमदुभीन वादिघावस्तुमुलो मिशनिस्व: । मिलनेरिनो धारो दिशः पूवतीय समयाना इंग माणा गानाक्षेत्र हताम । सिंहनादच शराणां भूयते समसामयम् ॥६२ . दिर्श प्राची समाधिस्य धानां गच्छा अशम् । रयनेमिस्वनाष भूपते लोमहणा; ॥६३॥ पाट्रिाग यदि कदनं छतम् । अयमेव त्रयः शिधा मास्मिन्मति वैशस ॥६५॥ कीचनागतप्राणा: केचित् अनिकोधिताः । निरताः पाण्डषोते मग कालस्य पर्यगम ॥ ६५ ॥ एपमेनेन मारुयं हि नूनं कार्येण स्वतः या हास्ये शी निष्ठा कृते कार्येऽपि दुष्करे ॥६६॥ भवतोतु पदि प्रशान मोहा पमीयते । पापत्रेऽस्मिन्महत्यय यग्नः श्रेयस्त दुच्यताम् । ६७॥ इति सौसिकपणे द्रोणिमन्त्रणापा प्रथमोध्यायः १ ॥ बनाते हैं । ६० । शड्डोंके शब्दोसयुक्त वायुसे चलायमान वानों के घोरशब्द दिशाओंको पूर्णकरते है। ६. ते घोड़े और चिहाहते हाथियों के बड़ेशम और वीरोकेभी यह सिंहनाद मनेजाते।६। पूदिशामें नियत होकरअत्पन्न प्रसन्नचित्त शनेवालों के रस नेमियोंके शब्द जो कि रोमांचके खड़े करनेवाले हैं बाभी मुनेजाते हैं । ६. पाइप लोगोंने धृतराष्ट्र के पुषोंका जो यह नाशकिया है इसहभारी नाश हम तीनशेप हैं। ६४ । कितनेही सौ हाथोके समान पराक्रमी और कितनेही सशस्त्र विद्यामों में कुशल ये वह पाण्डनों के रायसे मारेगये में समयकी विपरीतता को मानताएं । ६.५ निश्चय करके इस प्रकार के इसनेही कर्म | मूलपमेत विचार करने योग्य जैने कि कठिन कम करनेपर भी ऐमीदशाई IRE मापकी बुदियदे मोरने दुर नहो तो इसबड़े प्रयोजनके वर्चमान होनेपर सोसारा दिवकारी र मनोह उसको कहो । thoir wariors 62. We hear the rumbling of their car wheels. The Pandavas have destroyed all our warrioi8 except us three. Some of thom bad the strenght of a hundred elephants and clever in fighting. The times are changed no doubt. - 65. Surely we must give our thought to all thuss things; for we are reduced to this condition in spite of our great efforts. Let us know please, what is best to be done under tlo circumttnoes, it your intellect be not confionded with 67. dialtese, 17261) Suplik Parv सप्तिकपर्व (७२६१) कृप उवाच । श्रुतन्ते वचनं स यद्यदुक्कं स्वयाषिभो । ममापि तु वचःकिञ्चि छृणुष्वाध महाभुज ॥ २ ॥ माघधान्मानपाः सर्वे निवाः कर्मणोयोः । देधे पुरुष कारेष परं ताश्या न विद्यते ॥ २॥ न हि देवेन सिध्यन्ति कार्याप्येकेन सत्तमान धापि फर्मणफेन द्वाभ्यां सिद्धिपोगतः ॥ ३॥ ताभ्यामुभाभ्यां सर्वार्था निषद्धी हधनोत्तमाः । प्रवृत्ताश्चैष पन्त निवृनाध सर्वशः॥४॥ पर्जन्यः पर्वते यर्पन किन्नु साधयते फलम् । सृष्टोत तथा वपन किं न साधयते फलम् ॥ ५ ॥ उत्थानमा प्पदैवस्य हनुत्थानञ्च दैवतम् । व्यर्थ भयति सर्वत्र पूर्यकस्तत्र निमयः । ६ मुपृष्टे तु यथा देवे सम्यक् क्षेत्रच कर्षित । पजि महागुण भूयात्तथा सिद्धिर्हि मानुषी ॥७॥ सयौदैव विनिधित्य स्वयनव प्रवर्धते। प्राज्ञाः पुरुषकारेतु घन्तेि दाक्ष्यमास्थिता ॥ अध्याय २॥ कृपाचाय्य योले हे समर्थ जो तुमनेकहा वह तुम्हारा मववचन सुना हे महा वाहु अव मेरे कुछ वचनकोभी सुन । १ । कि प्रारब्ध और उद्योग इन दोनोंके कमों में सब बँधेहुपे हैं इनदोषातों से कछ अधिक वर्चमान नहीं है । २ । हे श्रेष्ठ अकेले देव सेही समारके कार्य पूरेनहीं होते। और न केवल उद्योगही से सिद्ध होते हैं इसदशामें दोनों के मिनसेही कार्यकी पूर्णता होतीहै । । । सबछोटे दे प्रयोजनइन्ही दोनों बातोंसे बँधे हुये और सब कार्यकारी होकर पूर्णहोते दिखाई पड़ते हैं। ४ । पनपर वर्षा करनराना पर्जन्य किस फलको सिद्ध नहीं करता है उसीपकार जोतहुये खेतमें भी किसफलको प्राप्त नहीं करताहै। ६ । प्रारब्ध को श्रेष्ठ माननेवाले उद्योग और उद्योगसे रहित प्रारब्ध भी निष्फल होताहै इन दोनों को सर्वत्र निषयकरते हैं। ६ । जैसे कि अच्छेपकार दैवकेवर्पने और खेत के जोतनेपर वीज बड़े गुणवाला होता है वसीमकार मनुष्यों का भी अभीष्ट सिद्ध करना है। ७ । इनदोनोंमें दैव बलवान है कि वह भापही विना उपायके फलदेनेको प्रत्तहोताहै इसीप्रकार सावधान और शानी मनुष्य अच्छा निश्चयकरके उपाय में महत्तहोते हैं । ८ । हे नरोत्तम मनुष्यों के सयकर्म उन दोनोंमेठी जारी और पूरेहोते CHAPTER II Kripacbarya said, " I have beard all that you said; now hear me: all men are bound by Fate and prowess; and.by nothing more. All Worbs are neither perforined by Fate alone por by prowess; b sth must bs united to accomplish deeds. All small and large works depend upon those two things ard we see ther. continuation and ead. "The rain falls on mountains and fields and gives fruits at both places. 5. Fute and prowess are truitless sithou5 each other; this is an adraitted fact, Humad enterprises depend upon fata as the hopes of a cultivator do of rain. Fate, however, 'is more powerful as it can give fruit W1:e sien engage in doing things after deep thought. without toil.

(७२६४) Mahabharat (7264) वैरं पाण्डवगणवत्तरः ॥ २६॥ पूर्वमप्यतिदुःशीलो न धेय्य कत्तुमईति । उपत्यर्थे विप नहि मित्राणां न कृतं घरः ॥ २७ ॥ अनुपत्तीमहे यत्तु यं ते पापपूरुपम् । अस्मानाप्य नयप्तस्मात्प्रातोपं दारुणो महान् ॥ २८. अनेन तु ममाद्यापि व्यसनेनोपतापिता। युतिशिन्तयतः किचित् एवं शैयो नापवुध्यते॥२९॥ मुहता तु मनुष्यण प्रष्टव्या.सुहदो जमाः । तत्रास्य धुद्धिर्मिनयतन श्रेयश्च पश्यति ॥ ३० ॥ ततोस्प मूल कारण युध्या निश्चित्य युधाः । तेत्र पृष्टा पथा इयुस्तकरव्यं तथा भवेत् ॥ ३१ ॥ ते घयं धृतराष्ट्रच गान्धारीश्च समेत्याह । उपपृच्छामहे गत्या घिदुरच नहामतिम् ॥ ३२ ॥ ते पृष्टास्तु चदेयुर्यत् श्रयो ग सानन्तरम । तदस्माभि पुनः कार्यमिति मे नैष्टिकी मतिः अनारम्मान कार्याणां गार्थः सम्पद्यते फ्यचित् ॥ ३३॥ कृते पुरुषकारे पंपां का न सिध्यति । देवेनोपहतास्ते तु मात्र कार्य विचारणा ॥ ३५॥ इति सौप्तिकपर्वणि द्रौणि कृपावादे द्वितीयाध्यायः २॥ । पांडवों से शत्रताकरी । २६ । बड़ा दुःभाष मनुष्य प्रथमही धैर्यकरनेके योग्य महीं है और अभीष्ट के पूरे न होनेपर दुःखी होताहै कि मैंने अपने मित्रोंका बचन नहीं किया । २७ । इमलोग उसपापी पुरुषके पछि चलते हैं इसहेतु से हमको भी यह भयकारी अनीतिमाप्तईइ ।२८अबतक इसदुःख से तपायेद्ये मुमचिन्ता करने चालेकी बुद्धि अपने कुछ कल्याणको नहीं जानती है । २९ । और भचेव मनुष्य से सहुज्जन पूछौ योग्यौं उसमें उसकी बुद्धि और नम्रता और उसी कल्याणको देखता है ।१० । इसस्थानपर पूंछहुये वह ज्ञानीलोग इसके काव्योंके मूलोंको वृद्धिस निश्चयकरके जैसे कहें वैसा करना चाहिये और वह उसीमकार से होगा । ३१ । हम सबलोग जाकर धृतराष्ट्र गान्धारी और बड़ेशानी विदुरजीसे मिल करके पूर्छ वह हमारे पूछने पर जो कई वह निस्सन्देह हमारा कल्याण है । ३२ । वहहिमको फिर करना चाहिये यह मेरा दृढ़मत है कार्यों के प्रारम्भ किये बिना कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होताहै । ३३ । फिर उपाय करनेपर भी जिनका कार्य पूरा नहीं होताहै यह निस्सन्देह देवके मारेइये हैं ५४ ॥ his enterpriss by not beariny to friends. , We hayo fullen in this distreas by follo viag that sinful man. I donot know yot kow to securo our safoty. An unwise man's good, and safety lies in seeking the advice of lsis friends. 30. He shoald act upon the advice of wise IVe should grek the advice of Dhritrashtra and Gandhari. We should go to wise Vidur n'so. These persons will show us the way how to proceed. Our safety lies in doing this and I am resolved to do so. Nothing is guinel' without paina aal surely they who fail are afflicted by Faro " 34. pien.

(7265) Sruptik Panv लौप्तिकपर्य (७२६५] साय उवाच । कृपस्य वचनं श्रुत्वा धर्मार्थसहितं शुभम् । अश्वत्थामा महाराज दुःखशोकसपीन्यतः ॥ १॥ इह्यमानस्तु शोकेन प्रदीप्तेनाग्निना यथा । कर मनप्ततः कत्वा ताडभी प्रत्यभाषत ॥२॥ पुरुपे पुरुषे पुद्धियां पा भवति शोभना | तुष्यति च पृथक स प्राया ते स्वया स्खयां ॥ ३ ॥ सा किमन्यते लोक सामान बुद्धिमत्तरम्। सर्पस्पारमा बहुमत सामानं प्रशंसनि ॥४॥ सर्यस्य हिस्सका प्रझा साधुवादे प्रति ठिता । परबुद्धिष निन्दति स्वा प्रशंसन्ति चासकृत् ॥ ५ ॥ शरणान्सरयोगन योगे येषां समा मतिः । बन्योन्येन च तुप्यन्ति बहुधायन्ति चासकृत् । ६॥ तस्यैव तु मनु पस्य सा सा बुद्धिस्तदा सदाकालयांगे विषय्यांसं प्राप्यागोन्यं विपते ॥ ७ ॥ विचित्रत्मात दिसानो मनुप्पाणां विशेषतः । चिरापलव्यमामाघ सा सा बुद्धिः प्रजापते ॥ ८॥ यथा । वैध कुशलो शारवाव्याधि यथाविधि अपज्य कुरते योगात् अध्याग ३॥ समय वो महाराज तय अश्मस्थामाभी कृपाचार्य के उम वचनको जो |कि अत्यन्त शुभ और धर्म भर्थसे संयुक्तथा सुनकर दु:ख शाकमे संयुक्त । । । अलित अग्निरूप के समान शोकसे प्रज्वलित होकर चित्तको निर्दय करके उन दोनोंसे बोले । ३ कि पुरुष पुरुप जोर वृद्धि होती वरी अप्ठहे घहसव प्रथक प्रथक् अपनी २ बुद्धिमे प्रसन्न रहते हैं। और सब लोकके तनुष्य अपने २ को बड़ा बुद्धिमान मानते हैं सबकी बुद्धि बहुत अगीकृत है और सब अपनी २ प्रशंसा करते हैं । ४ । सरकी निनबुद्धि अपनी उत्तमा वर्णनमें नियतहै सरेकी बुद्धिकी निन्दा करते हैं और अपनी बुद्धिकी वारम्बार प्रशंसा करते हैं ।५ । सभा में अन्य २ कारणों के वर्तमान होने से जिनलोगों की बुद्धि एकसा है वह परस्पर प्रमन्नहोते हैं और बारम्बार अपने को बहुत मानते हैं। । । उसी उसी मनुष्यकी पर वह बुद्धि जब समयके पोगसे विपरीतता को पाताई चे परस्पर विनाशको पाते हैं। ७ । मुख्यकर मनुष्यों के चित्तकी विचित्रता से चित्त की शकुलता को पाकर वह बुद्धि उत्पन्न होती है। ८ । हे मभु इप्सीमकार बड़ा सामान वैद्य बुदिके अनुसार रोगको जानकर औपधी देनेके द्वारा रोगकी निवृत्ती के लिये CHAPTER III Sanjuya said, " Henring the salutary advice of Kripacharya, Ashwat inm, in excess of grief, said to the two frarriors "Every man thinks himself wise 17 bus and pain from others.All mendo.what pleases them and praise their ORDwirdom. They praise themselves and blame olbers, 5. Those who are of the same opinion in an assembly, live bappily; : ut when they aje disunited thog meet their destruction. A difference of opinion rises out of the ficklenges of miod. A wise physician cares discases by usefal medi. Men try to arcomplish their work by thoir on wisdom and different cino (७२६४) Mahabharat (7264) वैरं पाण्डवैगंगयातरः ॥ २६ ॥ पूर्वमप्यतिदुःशीलो न धेय्ये फतुमईति । तपरपर्थे विप महि मित्राणां न कृतं पधः ॥ २७ ॥ अनुपत्तीमहे यतु घयं तं पापपूरुपम् । अस्मानाप्य जयप्तस्मात्प्रातोपं दारुणो महान् ॥ २८ ॥ अनेन तु ममाचापि व्यसनेनोपतापिता। बुद्धिशिन्तयतः किीमत् एवं श्रेयो नापबुध्यते॥२९॥ मुद्यता तु मनुष्यण प्रष्टव्या मुहदो जमा । तत्रास्प घुद्धिविनयस्तन धेयश्च पश्यति ॥ ३० ॥ ततोस्य मूल कार्याणा युध्या निश्चित्य चै युधाः। तेत्र पृष्टा पथा इयुस्तफव्यं तथा भवेत् ॥ ३१ ॥ ते घयं धृतराष्ट्रच गान्धारीञ्च समेस्यह । उपपृच्छामहे गत्या विदुरम महामतिम् ॥ ३२ ॥ ते पृष्टास्तु पदेयुर्यत् श्रयो ग शान्तरम । तदस्माभि पुनः कार्यमिति मे टिफी मतिः अनाममातु फाय्याणां गार्य सम्पद्यते क्वचित् ॥ ३३॥ कृते पुरुषकार वा कार्य न सिध्यति । देधेनोपहतास्त तु नात्र पार्य विधारणा ॥ ३४॥ इति सौप्तिकपणि द्वाणि कृपर्मवादे विनायोध्याया॥ पांडवों से शत्रताकरी । २६ । बड़ा दुःस्वभाष मनुष्य प्रथमही धैर्यकरने योग्य महीं है और अभीष्ट के पूरे न होनेपर दुःखी होता कि मैंने अपने मित्रों का वचन नहीं किया । २७ । हमलोग उत्तपापी पुरुपके पोछ चलते हैं इसहेतु से हमको भी यह भयकारी अनीतिमाप्तईइ ।२८। अबतक इसदुःवस तपाये ये मुमचिन्ता करने चालेकी बुद्धि अपने कुछ कल्याणको नहीं जानती है । २९ । और भचव मनुष्य से मुहुज्जन पूछौक योग्य, उसमें उसकी बुद्धि और नम्रताहै और उसी कल्याणको देखना है ।। । इसस्थानपर पूछहुये वह ज्ञानीलोग इसके काव्योंके मूलों को बुद्धिसे निश्चयकरके जो कहें वैसा करना चाहिये भार वह उसीमकार से होगा । ३१ । हम सबलोग जाकर धृतराष्ट्र गान्धारी और घड़ेज्ञानी विदुरजीसे मिल करके पूर्छ वह हमारे पूछने पर जो कहैं वह निस्सन्देह हमारा कल्याण है । ३२ । रहिमको फिर करना चाहिये यह मेरा दृढ़मत है कार्यों के प्रारम्भ किये बिना कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होताहै । ३३ । फिर उपाय करनेपर भी जिनका कार्यपूरा नहीं होताहै वह निस्सन्देह देवके मारेहये हैं १४ ।। his enterprisa by not hearing to friends. Wo havo fillon in this dis. treas by fu'lo ving that sinful man. I donot know yot kow to secure our safoty. An unwise man's good, and safety lies in seeking the advice of his friends. 30. He should act upon the advice of wiso IVe should seek the advice of Dhritrashtra and Gandhari, We should go to rise Vidui a'so. These persons will show us the way how to proceed. Our safety lies in doing this and I ara resolved to do 50. Nothing 18 guned without pairis ani sirrely they who fail are afflicted by Faro " 34 nmen.

- 7265) Sauptik Paly सौप्तिकपर्य (७२:५] सजय उवास। कृपस्य वचनं श्रुत्वा धर्मार्थसहितं शुभम् । अश्वत्थामा पहाराज दुःखशोकसपन्वितः ॥ १॥ वद्यमानस्तु शोकेन प्रदीप्तेनाग्गिना यथा । मनम्ततः कृत्वा तादी प्रत्यमाषत ॥ २॥ पुरुषे पुरुषे बुद्धि पा भवति शोभना । तुष्यति च पृयकस प्रश्या ते स्वास्खयां ॥ ३ ॥ स! हि मन्यते लोक आत्मांन वुद्धिमत्तरम्। सर्वस्पारमा बहुमत सर्वात्मानं प्रशंसति ॥४॥ सर्वस्य हिस्सका प्रशा साधुवादे प्रति ष्ठिता । परवुद्धिच निन्दति स्वा प्रशंसन्ति चासकृत् ॥ ५ ॥कारणान्तरयोगेन चोंगे येषां समा मतिः । भन्योन्येन च तुप्यन्ति पहुयायन्ति चासकृत् । ६॥ तस्यैव तु मनु स्य सा सा बुद्धिस्तदा तदा । पालयोंगे विषय्यासं प्राप्यामान्य विपचते ॥ ७ ॥ विचित्रत्मात् विताना मनुष्याणां विशेषतः । चित्रपलव्यमामाघ मा सा बुद्धिः प्रजापते ॥ ८॥ यथा वैद्य कुशलो ज्ञात्वाव्याधि यथाविधि । भैपज्यं कुरते योगात् अध्याय ३ ॥ समय बोर हे महाराज तब अश्वत्थामाभी कृपाचार्य के उम वचनको जो कि अत्यन्त शुभ और धर्म भर्थसे संयुक्तथा सुनकर दु:ख शोकसे संयुक्त । १ । अलित अग्निरूप के समान शोकसे प्रज्वलित होकर चित्तको निर्दय करके उन दोनो बोले कि पुरुष पुरुषों जोर बुद्धि होना वरी श्रेष्ठहै यहसत्र पथक प्रथा अपनी २ वुदिमे प्रसन्न रहते हैं। । । और सब लोकके तनुष्य अपने २ को बड़ा बुद्धिमान मानते हैं सबकी बुद्धि बहुत अगीकृत है और सब अपनी २ प्रशंसा करते हैं । ४ । सरकी निजबुद्धि अपनी उत्तमनाके वर्णनमें नियतहै दूसरेकी बुदिकी निन्दा करते हैं और अपनी बुद्धिकी वारम्बार प्रशंसा करते हैं ।५ । सभा में अन्य २ कारणों के वर्तमान होने से जिनलोगों की बुद्धि एकसा है वह परस्पर प्रसन्नहोते हैं और बारम्बार अपने को बहुत मानते हैं। । । उसी उसी मनुष्यकी का वह वुद्धि जब समयके पोगसे विपरीतता को पातीहै वे परस्पर विनाशको पात हैं । ७ । मुख्यकर मनुष्यों के चित्तकी विचित्रता से चित्त की .. राकुलता को पाकर वा वुद्धि उत्पन्न होती है। ८ । हे प्रभु इसीप्रकार बड़ा सामान वैद्य बाद अनुसार रोगको जानकर औषधी देनेके द्वारा रोगकी निवृत्त के लिये CHAPTER III Sanj4ya said, “. Henring the salutary advics of Kripacharya, Ashwat arms, excess of grief, said to the two marriage l'Every man thinks himælf wise 97 b)x3 nid op ning different from others, All men do-what pleases them and praise their os o wisdom. They praise themselves and blame others, 5. Those who are of the game opinion in an abgembly, live happily; r ut when they are disnnited they meet their deetraction. A difference of opinion rises out of the ficklenoss of mind. A wise physician cures discases by usefal medi. cino Men try lo accomplish their work by tlieir oan visdom and' in Alahabharat (726) मघवानिवदानवान् ।। २७ । अद्य तान् सहितान् सर्वान् धृष्टद्युम्नपुरोगान् । सूद यिष्यामि विक्रम्य कक्ष दीप्स दयानलः । निहत्य क्षेप पांचालानमातिनधाम सत्तन ॥२९ । पाञ्चालेषु पारगाम सूदयभधसंयुगे । पिनाकपाणिः संकुखः स्वयं रुद्र पशुधिच ॥३०॥मघा सर्व पांचालानिकृत्य च तिहत्वयापिप्यामिसंहघोरणे पाण्डुसुतास्तथा ॥ ३१ ॥ भघा सर्वाचा शुन्या भा शरीरिणीम् । प्रत्येकक शस्ले भविष्याम्यगुणः पितुः ॥ ३२ ॥ दुर्योधनस्य कर्णस भीमसैन्धमयोरपि । गमयिष्यामि पाञ्चालान पदवीमध दुर्गभाम् ॥ ३३ ॥ मध पाबालराजस्पष्ट घमास्य वे निशि । नबिरात समपियामि पशोरित्र शिरो घलात् ॥ ३॥ मध पांचा पानां शहिताना मनानिशि ! यहोम मिशिगे नाजो प्रमथियामि गौतम ॥ ३५॥ भय पावालसेनां तां निहस्प निशि सौति। तस्य मुखारघमीषष्यामिमहामते ३६ इतिश्री सौप्तिकपर्वणि प्रौणमन्त्रणायां तृतीयोऽध्याय ॥ ४ । पृतकरूप पांचाल देशिर्षाको रे में पराजपकरके और पराक्रम करके ऐसे मागा जैसे दानवों को इन्द्र मारताहै । २७ । अब उन धृष्टद्युम्न आदिक सप पांचालों को एक साथही ऐमे मागा जैसे कि अमित भघि मूख पनको हे श्रेष्ठ में युद्धर्मे पांचालों को मारकर शान्तीको पाऊंगा । २९ । अवर्षे युद्ध में पांचालों को मारता पावालोंको के भाव में ऐमाना जैसे कि पशुमोको मारते पशुओं के मध्य में क्रोधयुक्त पिनाक धनुषधारी माप रुद्रमोहोते हैं। ३० । अब अत्यन्त प्रसन्न सब पांचालीको मारकाटकर उसीमकार से युद्ध में पांडवोंकोमी पाडावान करूंगा । । अब मैं पृथ्वीको सप पांचालोंके शगरोसे पूर्णकरके प्रत्येकको मारकर पिताके ऋणसे अन्चाहूंगा । ११ । भर में पापालाको दुधिन कर्म भीष्म और जयद्रथ के कठिन मार्ग में पहुंाऊंगा। १५ । मन में राभिक समय थोड़ीदेर में पांचालोंके राजाधृष्टपुम्न के शिरको ऐसेमधूंगा जैसे कि पशुकेशिरको मईन करते हैं। ५४ हे कृपाचार्य जी भव में पांचाल देशियों के भार पाण्डवों के सोतेहुये पुत्रोंको रात्रिकेसमय युद्धभूमिमें तेजखड़गसे मधूंगा । १५ हे बड़े बुद्धिमान अब | मैं रात्रि के युद्धमें उस पवारको सेनाको मारफर कृतकृत्य होकर दुखीहुंगा ॥३५॥ lying within their t.nts. I shall de-troy them in their camp and eball do & difficult deed. I shall now slay thom as Indra does tlo danapas. 1 sliall destroy tłcm as firh does dry forest, I shall roam among them as Shiv the wilder of l’inak roanis dinong animals. 30. Having slain the Panchalu, I shall destroy the Pandavas. Having dostroyed the Panelials, 1 shall be free from the debt of my father. 1 skall cut of the licad of Dhrislıtadyumn of Panchal liho that of * beast, 1 bliall cut off the sleeping cons of the Panchals and Pandards! I ekall fatisfy ry inge by slaying tho aroje with my sharp sko d. !

- (7269) Sauptik Parv सप्तिकपर्ष (७२६९.] रुप उवाच । दिष्ट्या ते प्रतिकर्तध्ये मतियातयमव्युत। ने त्वां धारयितु शको पत्रपाणिरपि रषयम् ॥ १ ॥ अनुपास्यामहेतान्तु प्रभाते सहितामी। अद्य रात्री विभ्रम विमुजकषायज ॥२॥ महं त्वामनुयास्वामि कृतधर्माध सास्वतः । परा मभिमुखं पान्त रयाधास्थाप देशितो । ३ भावाभ्यां सहितः शवन श्यो निहन्ता समागमे । विक्रम्ब रथिनां धेट पाशालाम् सपदानुगाम् ॥ ४ ॥ शक्तस्त्वमसि विक्रम्य विभय निशामिमाम् ॥ विमानतस्तात स्वप तावलिशामिमाम् ॥ ५॥ विधान्त वधिनिद्रव मुस्यचित्तश्च मानद । समेत्य समरे शपूर पधिपति न संशयः ॥६॥ सहि स्वां रथिनां भेष्ठ प्रगृहीतधरायुधम् । जेतुमुस्लहते कश्चिदपि देवेषु पासव ५७ ।। कृपेण सहित थान्तं गुप्तश्च कृतधर्मणा । को द्रोणि युधि सरन्छ योषयेदपि देवराद A८॥ अयं नियि विश्रान्ता त्रिनिद्रा विगतज्वराः । प्रभातायां रमन्यांचे निहान अध्याय ॥ ४॥ कृपाचार्य बोले कि मारधमे बदलालेने में तेरी अविनाशी युद्धि उत्पन्नहुई है आप इन्द्रभी तेरे रोकनेको समर्थ नहीं है । १ । हमदोनों एकसायी मातःकाले के समय तेरेपीछे चलेंगे अब रात्रि कवच और वजासे पृथक होकर विश्राम करो। २। मैं और यादव कृतवर्मा अलंकृत रथोंपर सवार होकर तुझ शत्रुमा सम्मुख जानेवाले के पछि चलेंगे। ३ । हे रथियों में श्रेष्ठ मातकाल के समय तुम हम दोनों केसाय सम्मुखता पराक्रम करके शत्रु पाञ्चालों को उनके साथियों समेत मारोगे । ४ । तुप पराक्रम करके मारने को समर्थ हो इसरात्रि विश्रामकरो हे तात तुझको मागतेहुवे बहुत विलम्ब हुई तब तक इसरात्रि में शयनकरो । ५ । विश्रामयुक्त शयन से सावधान चित्त तुम युद्ध में शत्रुओं को पाकर मारोगे हे वड़ाई देनेवाले इसमें संशय नहीं है । ६ । देवताओं के मध्य में इन्द्रभीतुम रथियों में श्रेष्ठ उत्तम शस्त्रपारी के विजय करने को उत्साह नहीं करता है । ७ । कृतवर्मा में रक्षित और कृपाचार्य के साथ जानेवाले युद्धमें क्रोधयुक्त अश्वत्थामा से इन्द्र भी युद्धनहीं करसक्ता । ८ । इम रात्रि विश्रामयुक्त शयन करनेवाले तापसे CHAPTER IV Kripacharya said, " It 18 by Fate that you are resolved to take rovenge; even Indra can not deter you from your purpose. Both of us Logether, will follow you in the morning; let 119 set aside vur armour and banner and take rest for the night, Kritvarma, the Yadar, and I will follow you, destroyer of fies. Tomorrow you, accompanied by us, will destroy your Panchal foes. You have the power to slay. Take rest duriog the night; for you have not slept yet. your mina fresh after repuse, you will slay the fues without doubt. Even surrjunded by gods, Indra cannot conquer you, brzve warriors rotected by Kritvarma and followed by Kripacharya enraged Ashwa 5, With ७२७०) Muablınrat (7270) याम शात्रपान ॥ ९ ॥ तप साणि दिव्यानि मम वैव न संशयः । सात्वतोपि महे पासो निस्य युरेषु फोपिदः ॥ १०॥ ते षषं सहितास्तात सर्वान् शन समागतान् । प्रसधा समरे हत्या प्रति प्राप्स्पाम पुष्फलाम् । विश्रमव यमध्यप्रः स्वपत्रमा निशा मुखम् ॥ ११ ॥ अहम्च कृतवर्मा व त्या प्रपात नरोष्ठमम । भनुपास्याप सहिती प्रन्पिनी परतापनी । रविन खरवाया थमस्थायीशती ॥१३॥ स गत्वा शिविर तेषां नाम विधाक्प पाहये । ततः कर्तासि शनां युध्यतां कदनं महत् ॥१४॥ त्याच कदनं रोपांप्रमाते विमलेन । विहरस्थ पपा का दायित्वा महामुराद ॥ १५ ॥ त्यं हि शस्तो रणे जैतु पाञ्चालान पिनाम् । त्यसनामिष कुखः सर्वदामवसदन ४१६ ॥ मपा व सरितं संवपे गुप्तग्स कृतपर्मणा । न सहेत विभुः साक्षापाणि पि स्थयम ॥ १७॥ न चाहं समरे तात नधर्मा न चैव ह । निजिपरणे पाण्डुन ज्यपयास्पाप काहिंधित ॥ १८॥हरवा च समरे बुद्धान पाम्चान. पाण्डुभिः सह रहित प्रात काम शत्रुओं के लोगोंको मारेंगे । ९ । तेरे 'भौर मेरे दिव्यअनहें और बड़ा धनुषधारी यादव कृतवर्मा भी युद्धोंमें निस्सन्देह सावधान है। १० । हेतात हम तीनों एकसाथ मिलेहुये सब शत्रुभों को हठसे युद्ध में मारकर उत्तम मानन्द को पायेंगे तुम सावधान रोकर विश्रामकरो और इस रात्रिमें मुखपूर्वक शयनकरो । ११ । मैं और छपवर्मा धनुषधारी शत्रुओं के तपानेवाले कवचंधारी दोनों एक साथ रथपर सवार होकर तुझ शीघ चलनेवाले नरोत्तय रथी के पीछे चलेंगे ।१॥ इसके पीछे तुम उन्होंके डेरोंमें जाकर युद्ध में नामको मुनाकर युद्ध करनेवाले शाओं का बहामारी नाश करोगे । १४ । माता काल के समय उनका नाशकर के ऐमे विहारकरो जैसे कि महा असुरों को मारकर इन्द्र बिहार करता है । १५ । तुम युदमें पाञ्चालों की सेनाके विजय करनेको ऐसे समर्थहो जैसे कि सब दानवों का मारनेवाला क्रोधयुक्त इन्द्र दैत्योंकी सेनाको मारकर विहार करताहै । १६ । वजधारी समर्थ साक्षात् इन्द्रभी तुझ मेरेसाथी कृतवर्मा से रक्षित को युद्ध में नहीं सहसताह । १७ । हे तात मैं और कृतवर्मा यद्धमें पाण्डधों को विजय किये बिना कभी लौटकर नहीं मानेंगे । १८ । हम सब युद्धमें क्रोधयुक्त पांचालों समेत पांडवों tharca is ji restible in battle even by lodrs. We shall slay oup fies in the morning when our foyer has abatod after repo se at night. You and I possess divine Weapons and Kritrarms, the great Yadav archer, is clover in fighting. We three, united together, ore sure to destroy our foon, Take care to sleep for the night. Kritvarma and I, cased in armour, will follow your car. You will say them tomorrow 68 Indra doos asura. 15. You can slay the Panchal warria 8 as Irdra doos tho asure, Evon Indra cannot resist you protected and accom panied by me and britvatma ag you shall be in fight Kritvarma und I will never return without conquering the Pandavas in battle, (7271) Sauptik Puv सौप्तिकपर्व निवर्सिम्यामहे सर्वहता का स्वर्गगावयम् ॥ १९ ॥ सावायः सहायात प्रभात.षय माइवे। सत्यमेतन्महाबाहो प्रद्रवीमि तघामय ॥ १० ॥ एष मुक्तततो द्रोणिमातुलेन हित पचः । मनवीन्मातुल राजन् कोधसरतलोधनः ॥२१ ॥ मातुरस्य कुलो निद्रा मरस्यामर्षितस्प च । अचिन्तयतश्चापि कामयानस्य चा पुनः ॥ २२, दिवं सन नभातं पश्य मेध चतुष्टयम् । यस्य मागवतों में स्वप्नमनाथ माशपेत् ॥ २३॥ नाम दुःख लोकेस्मिन पितुर्वधमनुस्मरन् । दयं निरन्मेच राज्यहानि न शाम्यति ॥ २४॥ यया च निहतः पापैः पिता मम विशेषतः पित्यक्षमपि ते स सन्मे मर्माणि कुन्नति ॥ २५ दिमाशोलोके मुतमपि जीवति । द्रोणो हनेति तवाय: पाञ्चालानां प्रणाम्यहम् ॥ २६ ॥धृष्टद्युम्नमवाजी नाईजीधितुमुत्सत् । स मे पितु धंधानुध्यो पाञ्चाला ये व समताः ॥ २७ ॥ बिलापो भग्नसक्यस्थ यस्तु राहो मया को मारकर लौटेंगे अथवा मरकर स्वर्गको जायँगे। १९ । हे निष्पाप हम मात:- काल युद्धमें सब उपायों से तेरे सहायक हे महावाहु मैं यह तुझसे सत्पर ही कहताहूं । २० । हे राजा मामाजी के ऐसे हितकारी वचनोंको धुनकर शोध रक्तनेत्र अश्वत्थामाने मामाजीको उत्तगदया ।२१। किरोगी क्रोधयुक पनादिकके शोचकरनेवाल और कामी इनरोगोंको निद्रा कहाँसे दोसतीहै । २२ । अब यह क्रोध चौथाई उत्पन्न हुआहै वह चौथाई क्रोध दिनके अर्थ शयनका नाशकरताई । २३ । इसलोकमें क्या दुःखहै कि पिता के मरण को स्मरणकरता और जलता (भा मेरा हृदय अब दिन रात्रि शान्तिको नहीं पाताहै । २४ । मुरूप करके जैसे प्रकारसे मेरा पिता पापियों के हाथसे मारागया वहसव आपके नेत्र गोचर है वह मेरे मम्मों को काटताह । २५ । लोक में मुझसा मनुष्य एकमुहूर्त भी कसजीसक्ता है जोमैं पाञ्चालोंका वचन सुनता हूं कि द्रोणाचार्य मारेगये । २६ । मैं पृष्टद्युम्न को न मारकर जीवते रहनेको उत्साह नहीं कर सक्ताहूं पहमेरे पिताके मारनेसे काटने के योग्यहै और जो पांच'लदेशी इकठे हैं वह सबमी वध्यहैं । २७ । इसकेविशेष We shall return after slaying the Panda vas and the Panchala or Bhai go to paradise. Believe me, brave man, we shall help you in tomorrow's battle." Hearing the good advice of bis uncle, Ashwathamn replied in Anger, “ How can one find sleep over anger, loss of wealth and love sickness ! It is only a fourth part ofany rage developed; but it is enough to destroy my sleep at night. 113 it a small thing that I rest by night or day as 1 remember the death of my father. You have soen tow.my father was slain by those sinful men and it cata me to the quick. 25. One like me cannot live in the ro Id when one lears from tho Panchals that Drunacharya ja slain, I cannot ayiog Dbrishtadyumn. He and his lo lowers de pery death by taking part in the sluughter of my father. Besikts, whose hoart will not burn at Duryodhan's lamentations that that heard ! fiad no - live without (७२७२) Minhabharat (7272) श्रुतः । स पुनईदर्य कस्य रस्यापि न तिईहेत् ॥ २८ ॥ कस्य ह्यफरुणस्यापि नेत्राभ्या मधु नाव्रजेत् । नृपतेमग्नसक्यस्य श्रुत्या ताउम्घच. पुनः ॥ २९ ॥ पश्चाय मित्रपक्षो मे मयि जीयति निजित शोकम पद्धपत्यं पारिवंग इवाणवम्। एकाप्रमनसो मद्य तो निद्रा कुतः सुखम् ॥ ३०॥ यादेयार्जुनानांहि तानहं परिरक्षितान्। अविसह्य नमन्मन्ये महेन्द्रेणापि मातुल ॥ ३१ ॥ न चास्मि शक्त संयन्तुं फोपमेत समुत्थितम् । न त पश्यामि लासस्मिन् यो मां कोपानिपतयेत् । इति मे निश्चिता बुद्धिरेषा साधु मताच मे ॥३३॥ धार्तिकै. कथ्यमानस्तु भित्राणा मे पराभव । पाण्डबानाञ्च विजयो हृदयं दहताय मे ।। ३४ ॥ महन्तु कदनं छत्वा शत्रणामा सौप्तिक । ततो मिभागिता वेध स्पना व विगतज्वरः ॥ ३५॥ इति सौप्तिकपणि द्रौणि मात्रणायां चतुर्थो ध्यायः॥४॥ जो मैने टूटी जंघाचाले राजाका विलापमुना वह किस निदेयके भी चिचको नहीं भस्म करेगा । २८ । फिर टूटी जंघावाले राजाके उसप्रकारके वचनों को सुनकर कौनसे निर्दय मनुष्य के अश्रुपात नहीं होंगे । २९ । मेरेजावतेहये जो यह मेरामित्र पक्ष विजयकिया यह मेरे शोकको ऐसे बढ़ाताहै जैसे जलकावेग समुद्रको पढाताहै अब मेराचित्त एकाग्रदै निद्रा और मुख कहां है । ३० । हे श्रेष्ठ मैं बासु. देवनी और अर्जुनसे रक्षित उनलोगों को यहाइन्द्रत भी सहने के योग्य नहीं जान ताहूं। ३१ । और इस उठेहये क्रोकेभी रोकनेको समर्थ नहीं हूँ मैं इसलोकमें ऐसा किसीकांभी नहीं देखताहूं जो मुझको मेरेकोषसे रहित करसके इसीप्रकार साधुओं की अंगीकृत इसमेरी घुद्धिकोभी कोईनहीं लौटासक्ता । । । मेरे मित्रोंकीपराजय और पाण्डवोंकी विजय जो दूतोंने वर्णनकरी वह मेरे हृदयको भस्मकरसही है।.४१ भव में रानिके युद्ध में शत्रुओंका नाशकरके फिर तापसे रहितहोकर विश्राम शायन करूंगा १५॥ Who will not shed tears aftor hearing that prince with the broken thigh. The defeat of my friends during my life time inerosges my grief like a surge's swell My mind is made up and I can bare no repose 30 Protected by Vasu ley and Arjan they are irresistible even by indra, I cannot ehech my ning anger. None can check my anger or turn me from my purpose The news of my lısend'des' and enemies' victory burns my breast. I shall be able to find rest after slaying my enemie at night 135 1373) Siuptik Pan सौप्तिकार्ष [ ७२७३) कप उवाच । मुभूपि दुर्मेधाः पुरुषोनियतोद्रियः। नालं पंदायतुं कस्तो धमा विति मे मतिः ।। तिथेष तावन्मेधावी विनयं या न शिद्धते । न च फिरचन जानाति सोपिधमा निधयम् ॥ २॥ चिर शापि जड़. र. पण्डित पय्युपास्यह न स धर्मान् विजामाति वर्षों मपरसानिव ॥३॥ मुहसमपितं प्राप्त पाण्डतं पर्युपास्य । क्षिप्रं धमान विजानाति जिहा परसानिव श्रूयुपश्येय मेधावी पुरुषो नियतेन्द्रियः । आनीयादागमार सवान प्राद्यय न पिरोधयेत् ॥ ५ ॥ भने स्पषमानी योदुरात्मा पापपुरमा । दिधमत्स्याल्पा करोति यदु पायकम् । ६॥ नायवन्त 'तु मुहदः प्रति पेन्ति पापान । निवसन्तु लक्ष्मोशीमाळशीयनपसंते॥ ७॥ यथा बच्चाय बपितावितषियो नियम्यते । तयव महदां शक्यो न पसरवसीदति ॥ ८॥ तथैव अध्याय ५॥ अाचार्य बोले कि दुवुदी और अजितन्दिप मनुष्य धननका अभिलापी भी सम्पूर्ण धर्म अर्थ के जाननेको समर्थ नहीं है यामेरामा। १ । इसीप्रकार शाखों के स्मरा रखनेवाली बुद्धिकास्वापी पुरुष जबतक नीतिको नहीं सविताह तबतक वहभी धर्म के निश्वयको नहीं जानताहै । २ । अत्यन्त प्रदान शूरवीर मनुष्य बहत कालवक भी पापेटत के पाप्त वर्तमान सेवाकरके धोको ऐसेनहीं जानताहै जैसे कि व्यन्जनके स्वादुको चम्मच नहीं जानताहै । ३ । ज्ञानी पुरुष एक मुर्तभी सपंतितके पास बैठकर शीघही ऐसे धोको जानता है जैसे कि दाल आदिके स्वादुको जिज्ञा मानलेती है। ४ । बुद्धिमान जितेन्द्रिय और सेवाकरने वाला पुरुष सब शाखाको जानताहै और ग्राख वस्तुओं से विरोध नहीं करताहै। ५ । जो दुर्बुद्धी और पापी दुरुप है वह सच्चेमार्ग में पहुंचाने के योग्य नहीं है यह उपदेश कियेहुये कल्याणको सागकरके बहुतसे पापों को करता है। ६ शुभचिन्तक लोग सनाय पुग्पको पापस निषेध करते हैं और धनकास्वामी सपाप से खौटताहै परन्तु धनरहित पुरुष नहालौटता है । ७ । जैसेकि विषयों में प्रवृत्तचित्त पुरुष नानामकारके वचनोंसे आधीन किया जाताहै उसीमकार शुभचिन्तक मित्रसे समझाने के योग्यहै और जो योग्य नहीं है वह पीड़ापाताहै । ८ । इसी प्रकार CHAPTER V. Kiitvarma said,, I think that are boving no control over passions aunot be benefited by advice even if oor be willing to hear, and the Same is the case with one who has read the sl15'røt but po Politics, A foolish warrior cannot learn his duties in the society of learned men as the spoon does not know the flavour of thungs, but a wise leains it in an instant as the tongue does the flavour, A wise and obedient pupil baving ontrol over Passious learn14 all the books and is willing to acquire useful thinga S. An an wise aud sinful man cacnot go in tle right path and copum ts many sins by disregarding the man [७२७४ Nalıblarat (7974) मुहद प्राश कुर्वाणं को पापकम् । प्राशाः संपतिपेषन्ति पणा शक्ति पुनः पुनः ॥ ९ ॥ स कल्याण मन:करवानिपस्यात्मानमात्मना कुरु मेषचनंतात येनपश्चान्न तप्स्यसे॥१०॥ नयम जपते लोके मुहानामि धर्मतः । तयसपातशखाणा विमुक्तस्याजिनाम ॥ ११॥ ये च ब्युस्तयामीनि ये पस्युः शरणागता. षिमुक्षयंत्रा - मेवापि तिवारनाः ॥ १२॥ मा स्थान्त पाञ्चाला विमुक्त रुपमा विभो । विश्नों रजनी स प्रेता व विंचततः ॥ १३ ॥ यस्तो नपान दुखेत' पुरषोऽनुजायक स नाके मजदगांध विपुलेपये १५ ॥ सपानविदुषां मोर ठरूपमास विभुत । न च ते गातु लोकस्मिन् समूहमति किल्बिषम १५. रवं पुनः सूयर्षसमशः चोमूत उरिपने स्यो। प्रकाशे सर्वभूताना विजेतायुधि शात्रधार ॥ १६ ॥ मयम्भावितरवि स्वपि कम्मै विगाहनम शुक्ले रमिष म्पस्तं भवदिति मतिर्मम ॥ १७ ॥ शानीलांग पपकर्म करनेवाले बुद्धिमान् मित्रको सामर्थ्य के अनुसार पारम्बार निषध करते हैं । ९ । कल्याण में पिस करके और मनसे बुदिको आधीनता में करके मेरे बचनको कर जिसके कारणमे पीछे दुःस्ती नहो । १० । इस लोकमें सोनेवाले मनुष्यों का मारना और इसीप्रकार प्रमख रय और घोड़ों से रहित मनुष्पोंका मारना धर्ममे प्रशंसा नहींकिया जाताहै । ११ । जो को कि मैं तेरा जो शरणागत होय नो सलेहुपे केश होप और जो मृतक सवालो । १२ समर्थ इन सबका मारना भी निषेध हैं कवच से रहिव मृतकके समान भवेत विपास एक्त सब पाञ्चाल लोग सोतेहैं । १३ । जो कुटिलपुरुष सदसावाले उन पांचार देशियांसे मानुगाकरेगा वह अयाए बिना नौकाराले नरकरूपी समुद्र में हवेगा । १४ । तुम लोकके सब अस्त्रज्ञों में श्रेष्ठ विख्यातहो इसकोसमें कभी तुमसे छोटामा भी पाप नहीं हुआ। ५ । फिर मूर्यके समान तेजस्वी तुम मात काल के समय मर्योदय होने और सब जीवोंके मकट होनेपर पदमें शवों के लोगोंको विजय करोगे । १६ । मेरे मतसे तुझमें ऐसा निकृष्ठ और निषिद कर्म ऐसा असम्भवहै जैसेकि श्वेतरङ्गालापन रक्तवर्ण होना असम्भवई।१०। अश्वत्थामा leocons taught to him. Well wishers turn a man from sia, bat ih je the fortunate who follows their advice. It is the duty of fathful friends to offer ad rice, but he who doas not-hear it falls into difficulty. Sunilarly, wise mer finder a wise friend from falling into evil ways You should oarefully listen to my advice so that you may not full into difficulty. To slay a sleeping, unarmed and carless man ie not commendable like that of a refugee or of one with dishevelled bair or of ons whose beast in dead The Panchals are sleeping without armoar liko dead men. He who slays them in that state, will fall into bottom 109. perdition. You are a famours warrior of the world and have Dovor committed a sin. 15. Yon can slag your free in day light ।

(1275) Sauptik PIY सौप्तिकपर्व (७२७५] महत्यामावा । एषमेव तयारथ मातुल न संशयः तस्तु पुषमप सेतुः शतधा विदलीत: ॥ १८॥ प्ररयस भूमिपालान भवतामापि सतिशलो मम पिता पृष्एम्नेष पातितः । १९ ॥ कर्ण पतिते च रथस्य रथिनां वरः । उनमें व्यसने सन्नी दतो गासवधयता ॥ २०॥ तथा शान्तनबो भीमो यातशखां निरा युषः । शिपिरत पुरकृत्य तो गाडीचधाधना ॥ २१ | भिवा महेवासप्तथा आपातो रणे । जोशती शूमिपाला युयुधानेन पातितः । दुर्योधन भीमेन समेत्य गदारले। परयता मिपालानामबाण निपातितः ॥ २३ ॥ एकाको पनि सन परिक्षा मारधः । EMप गरज्याम्रो भीमसेनन पातितः ॥ २४ ॥ विनापो •भग्नसक्यस्य पोराः परिभुतः। पतिकानां ययता मे मर्माणि कन्तति ॥२५॥ रसम्याधार्मिकाः पापाः पापामा भिन्नतेतवः ताने भिन्नमयदान भवान पोलेमायाची जैसा आप करते हैं पर निस्सन्देह वैसाही है परन्तु प्रथम उन पायबोंनेही इस पर्मरूपी पुलको तोही । १८ । शस्त्र त्यागनेवाला मेरापिता राजाओं के समक्षमें भापलोमों के भी देखतेहये धृष्टद्युम्न के हायसे गिरायागया ।। १९ । रथिमि भेष्ठ कर्ण रथ चकके पृथ्वी घुमनानेपर बड़े दुःखमें डूबाहुआ उस भर्जुनके हायसे मारागया । २० । इसीमकार शस्त्र त्यागनेवाले धनुप मादिकसे रहित शान्तनुके पुत्र भीष्मभी भी शिर्खदीको भागकरके भर्जुनके हायमे मारेगये । २१ । इसीप्रकार युद्धमें शारीर स्पागने के निमित्त वैठाहुमा भूरिश्रवा राजाओं के पुकारसे ये सात्यकि के हाथसे मारागया । २२ । दुर्योधन गदासमेत भाममेनके सम्मुख रोकर रामाओंके देखते अधम्मसे मारागया । २३ । वहाँ अकेला नरोत्तम पात रधियों से घिरकर अधर्म युक्त भीमसेनके हाथ गिरायागया । २४ । मैंने दूतोंके मुखसे टूटी जंघापाले रामाका जो विलाप सुना वह मेरे मर्मस्थलों को काट ताद । १५ । उस मकारसे पांचालदेशी लोग अधर्मी और पापी जिनका कि धर्मका पुखटूट गयाहै भाप इसमकारसे उन बे पर्यादवालोंकी निन्दा न करतेहो You sbould keep aloof from such a heinons sin as the white is from thered, "To this Ashwathama replied, " You speak the truth uncle But the Pandavas havo already broken tho bridge of virtue. My father, who bad laid aride his weapons, was slain by Dhrisl. tadyumn in your own presence, Karan the bravest of warriors was slain by Arjun when tho wheel of bis car was stuck in mud, 20. Smilarly Bhishm the son of Shantanu, without a-ms and weapons, wax slajo by Arjun led by Shikbandi. In the same manner, Bhurishraya, who had expivsed himself to death in the field of battle, was slain by Satyakı in spite of the remonstrations of all the warriors, Duryodhan was unjustly bit by Rhim in the presence of all the kinge. He received an unfair blow when he was alone and the enemy surround (७२७६) Malablarat (7276) विगर्हति ॥२६ ॥ पितृहन्तनहं हल्या पाचालानी सौप्तिके | फाम फीट पतंगो वा जन्म प्राप भवामि ॥ २७ ॥ घरे घाहमनेनाव पक्षि में चिकीर्षितम् । तस्य में स्वरमाणस्प कुतो निद्रा कुतः सुखम ॥ २८ ॥ स जातः पुमांश्लोके कहिषास भविष्यति । परमे वापत्तयेता व तेषां कता मतिम ॥ १९ समय पास एक मक्त्वामहाराज द्रोणपुत्रः प्रतापपार । एकारते धोनरियाला प्राधादमिमुखः पराम् ॥ ३० ॥ समजता महालानी भोजपातायुभो। किम स्वारको पुकाः किन कार्य चिकीवितम् ॥ ११ करलायंत्रातो स्वरमा सहमरमा बमबमको चापि नापी शामिति ॥ ३२॥ नपरयामा संकरः पितृपंधमनुस्मरण । तान्या तदाखल्यो यदस्यामाविकीर्पितम् ॥ ३ ॥ त्या शतमामा पोवामा निशितः शारः म्यस्तशास्त्रो मम पिता पधुम्मन तित. ॥ष इनिधाम पतर्माण १२६ । में रात्रिक समयनिता परमें भाने पिताके बारनेवाले पाचालाकी मारकर जन्मपाकर चाहे कोर पतकमी होगा । २० । और में इसीहतुसे सीता फरताहूं कि जो यह मेरे करने की है तमु शीघ्रया करमेगालेको कडा निद्रा और सुखहै । १८ ।।यह पुरुष मन पैदा इमान होगा भो किन चाल देशियोंके मारने वह मति देकर मुंबको तौटाये । २९ । संभव मोरे महागम प्रतापवान् असत्यामाजी इनकार कहकर मार एकान्त पासको मोड़कर शत्रुओं के सम्मुखंगये।।.। साहसी वर्मा और पापाणी दोनो उससे करनेलगे कि किसनिमित्त रथको जोड़ा और क्या कर्मकरला पाये हो ।१। हे नरोत्तम तेरे साथ हम दोनों चलेंगे एकसा सुखदुःखकाले हमदोनोंपर तुमको सन्देहकरना उचित नहीं है । ३१ पिताके मरणको स्मरणकरते अस्प क्रोपयुक्त मत्थामाजी ने अपने मनका यह सत्य सस्प पिचार सनसे वर्णन किया जो उसके चित्तमें करनको हाथी । भाणोंसे लाखों शूरवीरोंको मारकर शस्त्रोंका स्पागनेवाला मेरा पिता पदमें धृष्टयुम्न के हाथमे मारागया । १४ । निश्चप करके ed him in large numbe 8. The lamentations of the king, with broken thigh, reported to me by the informers, hreak my heart ! Woy do yon not blame the Puuclials who are so law long and siufui l I shall arenge my father's death by slaying the Panchuris at night, thougla I have to be born aw jag reptiles, I am therefore in a hurry to work No eartbborn man can tua me from my losolation of elaying the Panchals• "Sanjaya cotinued, ",Having -said this, Ashwathami gan putting his horses to the car, 30. Braga Krit varma and Krip.charge said to him, " Why have you prepared your car and what will will you do? We must go along with you. Lave no su picion of us who are sour partners in weal and mor. and can find au rest b (7277) Sauptil Parv सौप्तिकपर्व (७२७७) भय वै । पुत्र पाग्यालराजस्य पाप पापेन फर्मणा ॥ ३५ ॥कयाच निहत पाप पाञ्चाल्य पशुधन्मया। शत्रण घिजितालोकानाप्नुयादिति मे मति ॥ ३६ । क्षिप्र सन्नरकपची सखड्गाबाच कार्मुको । मामास्थाय प्रतीक्षेता रयषयों परन्तपी ॥ ३७॥ इत्युक्त्वा रथमास्थाय मायाद भमुख. परान् । तमन्वगात् कृपो राजन् कृत धर्माच साखत ॥३८॥ ते प्राता उपरोषन्त परानभिमुखात्रय । इयमाना,पथा पाने समिमाव्यशाहना ॥ १९ ॥ ययुश्च शिीवर तेषा सप्रमुप्तजन विभो । वारदे शन्तु सप्राप्य द्रौणितस्थौ महारयः॥ १०॥ इति सौप्तिकपर्वणि द्रौणिपाण्डवृशिविरगमन पञ्चमोऽध्यायः ॥ मैं इसीपकार इप्तपापी धर्मके त्यागनेवाले राजा पांचाल के पुत्र धृष्टद्युम्नको पापकर्म से मारूगा । ३५ । पेरे हायसे पशुके समान माराहुआ धृष्टयुम्न किसीमकार से भी शस्त्रोंसे विजय कियाहुये कोकों को नहीं पायेगा यह मेरामतहै । १६ । कवचधारी, खड्ग और घनुपके उठानेवाले शत्रुविजयी उत्तम रय रखनवाले तुम दोनों सवारहोकर मेरा मार्गदेखो । ३७ । हेराना वह अश्वत्थामा यह कहकर स्थपर सवारहोकर शत्रुओंके सम्मुखगये कृपाचार्य और यादवकृतवर्मा उसके पछिचले । १८ शत्रुओं के सम्मुख जानेवाळे वह तीनोंऐसे शोभायमानहुपे जैसीक यज्ञमें भावाइनकादियुक्त अग्निहोतीहै । ३९ । हेसमर्थ फिरवह उनके उनहरों में गये जिसके मनुष्य अच्छी रीविसे सोरहेथे और महारयी अश्वत्थामा द्वार स्थानको पाकर निपतहुये ४० ॥ Remembering his father's death, Ashwathama, much enraged, dis. closed to them the scheme that he had formed in his mind, Faying, • Having slain millions of warriors with his sharp arrows, iny father luid aside b18 weajors and was slain by Dhrish tadyumn, I shall therefore alay the sinful son of the king of Panchal, Darishtadyumn, with unfair means 35. Slau by me like a beast, he will no longer attain the regions open to those who die fighting. This is my opinion, Cased 10 armour and armed with words and bowe, you will wait for my teurn, destroyers of foes " Having sad this, Ashwathama mounted his car and proceeded to face the enemies Kripacharya and hritvarma the Yaday followed him Warriors going towar is the enemies, looled glorious like fire They went to the camp of the alteping warriors and Apliwątbama stopped at the ontrance " 40, The three (7278) (७२७८) Malinbharat धृतराष्ट्र उवाच । द्वारदेशे ततो द्रौणिमयस्थितमवेक्ष्य तो, कुर्यता मोजरूपी किंसन्जय पदस्थ मे ॥ १॥ अय ज्यान । कृतधर्माणमाम पञ्च स महारथः। दौर्णिमन्युपरीतारमा शिविरकारमासदत् ॥ २॥ तत्र मतं महाकार्य चन्द्रार्कसाशय तिम् । सोऽपश्यत द्वारमाथिस्य तिष्ठन्त लोमहर्षणम् । ३॥ पसानधर्म यान महा रुधिरविनवम् । कृष्णाजिनोचरासनं नागयज्ञोपवीतिगम् ॥ ४ ॥ पाहुभिः स्वायत पाननानाप्रकरणोचतः । पद्धांगदमहासर्प मालामालाकुलाननम् ॥ ५ ॥ दंष्टाकराक पदनं ध्यादितास्प भयानकम । नयनाना सहनध विचित्ररमिभूषितम् ॥ ६॥ मेष |तस्प वपुः शक्र्य प्रवक्तुं वेश एय च । सर्वथा तु सदालय स्फुटयुरपि पर्वता ॥ ७ ॥ तस्यास्पनासिकाम्यान्तु भक्षणापास सर्वशः। सेनाक्षिसहस्रन्यः प्रादुरासीग्म समिरः ॥ ८॥ तथा तेजोमरीचिभ्यः शंखचक्रगदावरा. प्रादुरासन हृषीकेशाः अध्याय ६॥ “कृतराष्ट्र बोले हे संजय इसकेपीछे उनदोनों कृतवर्मा और कृपाचार्य ने द्वार स्थानपर अश्वत्थापाको निगत देखकर क्या किया उसको मुझो वर्णनकरो।।। संजयबोले कि वह महारथी अश्वत्थामा कृनार्मा और कृपाचार्य को पूछकर क्रोध से पूर्णशरीर डेरे के द्वारपरगया। २ ! उसने वहां जाकर एक जीपको देखा जो कि बड़े, शरीर वाला चन्द्रमा और सूर्य के समान महावामान द्वारपर नियत रोम हर्षण करनेवाला । ३ । ब्याघ्र चर्मधारी बड़े रुधिरको गिरानेवाले कृष्ण मृगधर्म का ओढनेपाला नागोंका यज्ञोपवीत रखनवाला । ४ । बहुनलम्बी स्थूल और नानामकारके शस्त्रों के धारण करनेवाले भुजाओं से बड़े सर्पका यानूवन्द बांधने पाला ज्वाल समूहों से व्याप्त मुख । ५ । दंष्ट्रामों से भयानक महा भयकारी फैले हुपेहजारों विचित्र नयनोंसे शोभायमानथा । ६ । उसका शरीर और पोशाकरर्णन के योग्य नहीं जिसको कि देखकर सब इशामें पर्वसभी फठजाय । - । उसके मुख नाक कान और हमारों नेत्रोंसे पड़ी २ ज्वाला निकलतीर्थी । ८। उन ज्वालानों CHAPTER VI Dhritrashtra raid, "What did Kripachurya and Kr tvarma do og seeing Ashrathama stand at the entrance' " Sanjaya said, " Harit ing tniked with them he well at the entrance of the camp und B&W there a belog glorious like the sun and the moon. He was dreadful to look at, with a tiger's hide, blood thirsty, clothed with the skin of a black antelope, ser penis fur sacred thrend, with long and muscular srms, with a huge serpent tied at his aim attended by luminous budies,' with dreadful mouth and teeth and thousands of dreadful and wonderful eyes. His body anl altire we'e dreadful boyond the power of speech, Sparks of firs came out from his mouth, nose, ears and thousands of him eyes and thousands of Janardans, adorned with conch. discua and Bace, waro lo be seen ajaid those sparks. Seeing drendial being thus stats med, Ashwathama fearlessig bid lum with (7270% Sauptik Parv मौप्तिकपर्य (७२७९ शशीय सहस्रशः ॥९ सदस्यद्भुतमातोफ्य भूतं लोकमयङ्करम् । द्रौणिरयायतो विपरसवर्षेरघाकिरत् । द्रौणिमुक्तास्मातास्तु तन्द्रा हमसत् ।। १० । उधेरिष चार्योधान पापको पड़वामुखः । अनसत्तास्तदा भूतं द्रणिमा प्रहिताछरान् ॥ ११ ॥ श्वस्यामातु संप्रेक्ष्य शरीघांस्ताभिरर्थकाम् । रयशक्तिं मुमाचास्म वानामग्निशिखा मिष ॥ १२ ॥ सा तदस्य दीप्तामा रयशकिरदीर्थव । युगान्ते सूर्यमाहत्य महो स्केष दिवश्युना ॥ १३ ॥ अथ हेमरस दिव्य खड्गमाकाशपञ्चसम । कोषात् खम वहांशु विलादीमामिवारगम् ॥ १४ ॥ ततः खड्गधर धीमान भूताय प्राणिोत्तदा । सदासाय भूतं च पिस नकुलवधपो॥ १५ ॥ तंतस कुपिता द्रौनिद्रिकेतुनिर्मा गदाम घलन्ती मारिणोत्तस्मै भूतं तामपि चाप्रवत् ॥ १६ ॥ नंतः सर्वायुधामाये लक्ष्यमाणस्ततस्ततः । अपश्यत् कृतमाकाशमनाफाश जनाईन । १७ ॥ तदनुसतम प्रकाश से शङ्ख चक्र गदापारी, हजारों श्रीकृष्ण प्रकट थे। ९ । उसबड़े अपूर्व सब मटिके भयकारीको देखकर पीड़ासे रहित अवस्थामाने उसको दिव्य प्रक्षों की वर्षासे दकदिया उस बड़े तेनरूपने अश्वत्थामाके छोडेहये पाणोंको निगला 1१०। जैसे कि बड़वामुखनाम अग्नि समुद्रके जासमूहों को निगलना है उसी प्रकार बस तेजसपने मनायामाके चलायेहुपे बाणोंको निगला । ११ । फिर अश्वत्थामा, ने उन अपने बाणसमूहों को निष्फल देखकर ज्वलित अग्निके समान प्रकाशित शक्तिको छोड़ा । १२ । वह प्रकाशमान रथ शक्ती उसको घायल करके ऐसे फट गई जैसे कि प्रलप के समय भाकाश से गिरीहुई बड़ी उल्का मूर्यको घायलकरके फटजाती है । १३ । इसके पीछे सुवर्णकी मूठ भाकाशवर्ण दिग्य खड्ग का ऐसशीघ्रतापूर्वक पियानमे निकाला जैसे कि बिलासे मकाशित सर्पकौनिकालतो । १४ । इसके पीछे बुद्धिमान्ने उत्तम खड्गको उस तेजरूपके ऊपर पलाया यह उस तेजरूपको पाकर उसके शरीरमें ऐसे चलागया जैसेकि नौला पिवरमें घुसजाता है। १५ । इसके पोछ उस क्रोषयुक्त अश्वत्थामाने इन्द्रध्वजाके समान उसमारत रूप गदाको ऊपर चलाया उम सेजरूपने उमको भी निगा 105 इसके पीछे satistial Weapous, but he swallowed ult his arrowa 10. He recerned all the arrows witbin hipself as the ocean fire svaks the waters of the Ocsan. Seeing his arrows fruitless, Ashwathama discharged at him 2 Javelin bright as fire. But tbe Javelio broke upon bit like the meteor of pralaya atter strikiog the sun. Then he drew out his goldbandled sword from the scabbard, like a tepunt from its hole. H. brow the sword at the Fonderful being and it ec tered his body like a mungoose in a hole 15. Thea Ashwathana hurled at uita bis mace, but that too, disappeared, When all his weapons wers thus exhausted, ho looked all round and saw tho wkolo sky full of Shri Krisho, Destitute of arms, Ashwathamir Baning that miraole, - -404 १८ ।कि जो ७२८०] Malıbharat (7280) रष्ट्वा द्रोणपुत्रो निरायुधः । भप्रयापतिप्तप्ततः कृपाक्यमनुस्मरन् ॥ १८ ॥ ध्रुवता मप्रिय पथ्यं सदा न शृणोति यः । स शोवत्यापदं प्राप्य पाहमतिपय ती ॥ १९॥ शाहटानविद्वान य समतीय जिघांसतिः स पपः प्रच्युतो धर्मात कुपपे प्रतिहस्पते ॥ २० ॥ गोब्राह्मणनृपसीपु सल्युर्मातुर्गुरोस्तथा। हानप्राणजहाधेषु सप्तमातोत्थि तेषु च ॥ २१ ॥ माग्मतमतेपुन शस्त्राणि निपातयेत् । इत्येवं गुराभिः पूर्वमुपदिर नृणां सदा ॥ २२ ॥ सोहमुकम्प पन्यानं शायरएं सनातनम् । ममागेंगेधमारस्य घोरामापदमागत ॥ २३ ॥ ताशापदं घोरत प्रवदन्ति मनीषिणः । यचम्प मदत त्वं पापि नियते ॥ २५ ॥ मशंक्यनेषतत क कर्म शक्तिपलादिर महि देषाद्रीयो वे मानुष'कर्म कप्यते ॥२५ मानुष्यं कुर्षः कर्म यदि देवान सिध्यति । स पप प्रच्युतो धादिपर्ष प्रतिपद्यते । प्रतिघातं प्रविहान प्रवदन्ति मनीषिणः । यदा रस्य क्रिया काचिद्यादिर निवर्तते ॥ २७ ॥ तदिदं दुष्प्रणीतेन मयं मां समुपस्थि सा शनोंके नाशवान होने पर जहां तहाँ देखनेवाले अवस्यामाने ओकाशको भी- कृष्णसे पूर्णदेखा । १७ । शास्त्रों से रहित अश्वत्थामा उमें बड़े चमत्कारको देखकर अत्यन्त दुखी और कंपाचार्य के वचन को स्मरण करते वोले पुरुप ऑमयं और परिणाम में शुभदायक मित्रों के वचनोंको नहीं निताई वह आप तिको पाकर ऐसे शोचता है जैसे कि मैं दोनोंको उल्लंघनकर भी उनके विद्ध कर्म करके जो अज्ञानी शास्त्रज्ञों को उल्लंघन करके मारना चाहताहै वह धर्म से युत होनेवाला है इसहेतुसे कुमार्गमें मारांजाता है । २० ।गौ ब्राह्मण राजा स्त्री मित्र माता गुरू निर्चल विक्षिप्त अन्धे सोनेवाले भयभीत उठेहुये मदमें उन्मत्त रो गोदिकों से अचेत और भूनादिकके भावेशसे मतवाले मनुष्यपर शस्त्र नहीं चलाने । २२ । इमप्रकार पूर्व में बड़े २ लोगों उपदेश होतेथे सो मैंने शास्त्रके बतायेहुये सनातन मार्गको उल्लघन करके कुमार्ग से कमका प्रारम्भ करके घोर आपतिको पाया।३१ बुद्धिमान लोग उस भापतको घोरकहते है जोवडे कर्मको पारम्भकरके भयमें मुखको फेरताहै । २४ । यहों वह कर्म सामर्थ्य और बलमें करने के योग्य नहीं मनुष्य का कर्म दैवप्से बडा नहीं कहाजांताह । २५ । कर्म करनेवालेका जो remen.bured the words of Kripashury rand said to himself, " He who does not give ear to the unpleasant but salutary advice of his friends, falls into mi ery and feels remorse like inyself and so do troyed by falling ito bad ways Let no one lag hanl on the cow, brahmin, king, woman finend, mother, preceptor, feeble, innd, bl nd, sl ep intoxicated sick and ghost-riden 22. rhus I have set at nought the precepts of old men and have fallen into difficulty by acting against the teachinga of scriptures A calamity is termed the worst by wise men, where 300 beginning a great work has to recede from 10 Here the work I Travu to do iš not to be accoinplished by plıysical p»vei, fut humer - --- (7281) सौप्तिकप Biuptik Par (७२८१७ सम् । महिद्रोणमुत संरये निवन कथन ॥ २८ ॥ इदमच समावृतं देवदरमि वाचतम् । मतदमिजानामि लिमयन्नपि सर्वया ॥ २९ ॥ध्रुव यमधर्मेण प्राता कलुषामतिः । तस्याः फलमिद भोर प्रतिघातापरश्यते ॥ ३०॥ तविदं देवविरितं मम संस्मेनियनम् । नाम्यत्र देवाघन्तुमिह शक्यं कथान ॥ ३१ ॥ सोऽहमघ महादे प्रपचे शरणं प्रभुम् । देवदामिद पोरं सहिमे नाशपिप्यति । ३२ ॥ पारिन देवमुमापतितनाययम । कपालमालिनं रुद्रं मगनेवारंरम ॥ ३३ ॥ सरिदेवोत्य 'गावांतपसा विक्रमेन च । तस्माउरणमध्येमि गिरिशं एलपाणिनम् ॥ ३४ ॥ इति सौप्तिकपर्वणि महाभूतदर्शने द्रोणचिन्तायां पष्टोध्यायः ॥ मनुष्य कर्म देवसे सिद्ध नहीं होताहै वह धर्ममार्ग से क्युत होकर भापत्ति को माप्त होताई। २७ । ज्ञानी पुरुष माशानको अविज्ञान कहते हैं जो इसलोक में सीकार्यको प्रारम्भ करके फिर भपसे गेड़ देता सो भन्यायसे यह भय मेरे समममें नियत मा द्रोणाचार्यका पुत्र युद्ध में किसी दशाभी मुख फेरनेवाला नहींहुआ। १८ । और यह बंदा तेजाप उत्पन्न देवदण्ड के समान सन्नद में सब प्रकारसे विचारतो हुभाभी इसको नहीं जानता।२९।निश्चयकरके जोमेरी यह पाप मुदि अधर्म प्रात उसका यह महाभयकारी फल मरग,केलिये प्रकटहै ।३०। वह रा युद्ध में मुखका फेरना बैंका रचाहुआ है यहां किसी दशामें भी कोई बात पाय करने के योग्य नहीं। ३१ । सौ में असमर्थ भार शरणकयोग्य महादेवी शरणागत होता वही मेरे इस घोर दैव दण्डका नाश करेगा । ३२ । जो कि पा, देवतामों केभी देवना, उमापति, उपाधि से रहित कपालों की माला रख- नेवाले रुद्र, भगनेत्र के मारनेवाले हर्र । ३३ । उस देवताने तप और पराक्रम से देवतामों को उस्कंघन किया इसोतुसे मैं उस गिरीश और शूल धारी की शरणा गत होवाई ।। ३४॥ prork cannot super sede a divino one 25 He whose work is not blegged by God; ſallo from the path of virtue into misory. It is a fully in the opinion of wife men i am not in the danger of giving up my enter priem. D orci arya's sun never turned fice in any battle. This glorods form is standing before me an embodiment of divine wračb, and I cannot gauge it in spite of my efforts. Surely this is the fruit of my own evil intention. 30. This defeat 18 ordained by god for me, and I can devise do remedy for it. I sball now eeek refuge of almighty Mahades and he will remove this divinh cbastroemeut. He is the god of goda and Har, who surpassed all the gods in asceticism and prowess. I shall therefore seek refuge of Girish the bearer of trideat, 34 . (७२८२ Mahabhnrat 17382 समय उपाच ।एवं स चिन्तयित्वा तु प्रोणपुत्री विशाम्पते । भरती रपोपस्या हेश प्रस: स्थित द्रोणिरुपाच । उप्रेरणापु शिष रुम् समाशानमीश्वरम् । गिरिशं यदि ये भषमायनमीश्वरम । २॥ शितिकण्ट अंश दक्षतुरंदरम। विश्वरूपं विरूपाक्ष वरूपमुमापतिम् ॥ ३॥ शानसिन रस महागणपति विमुम। खटांगधारिण रदं अटिलं प्राचारिणम् ॥ ४। स्तुतं स्तुरष स्तूपमामममा कलिया सप्तम । विलोहिन मालकण्ठमस दुनिधारणम् ॥६॥ शुदं प्रभार णमेषतःप्रतपन्तं तपोनिष्ठमनन्तं तपतांगतिम रूपं गणाध्यक्ष य पारिषद प्रियम् । धमापनेक्षितमु गौरीदपघल्लभम् । ८ । कुमारपितरंपिंग गोपालमा हनम् । तनुषाप्तसमत्युप्रमुबाभूपणापाम ॥ ९॥ परपरकप: परमं पर यस्मानवियते एपलोत्तममता विगत देशरक्षिणम् ॥ १॥ हिरण्यक सामति अध्याय ७॥ - संजय बोले हे राना वह अवस्थामा समकार अच्छेमकार विचार करके रय के बैठने स्थान उताकर नम्रता पूर्वक देवेशके सम्मुख निपत हुआ । ' । पसत्यापा बोले कि मैं अत्यन्त शुद्धचित्त से अज्ञानियों के कठिन की भेंटमे शिवजीको पूजन करताहूं जोकि उग्र, स्थाणु, शिव, रुद, शव्वं, ईशान, ईशर) गिरीश. घरद, देवमय मायन, ईशर । २ शितिकण्ठ, अन, शुक्र, दर तुरर, हर विश्वरूप, विरूपात, बहुरूप, उमापति । ३ | श्मशानवासी, स, महामणीव, विभु खनाङ्गगरी, रुद्र, नटिल, ब्रह्मचारी। ४ । स्तुत स्तुत्य स्तूयमान, अमोय, कतिरामस, विलोहित, नीलकण्ठ, असम, दुनिवारण । ५ । इन्द्र, अमरज, ब्रम, ब्रह्मचारी, व्रतब-त, तपोनिष्ठ. मनन्त, तपतांगति । ६४बहुरूप, गणाध्यक्ष विनर परिपदप्रिय, धनाध्यक्ष, क्षिनिमुख, गौरीदपवल्लभ । ८ । कुमारापेतर, पिंका | नन्दीबाहन, तनुवाप्सम, शरय. उपाभूषणतत्पर । ९ । परसेपरे जिससे कि तिम श्रेष्ठ नहीं है उत्तमवाण प्रसोंके स्वामी दिगन्त देशक्षिण । १. । CHAPTER VII Sanjaya aad. Having reflreted well, Ashwathama came down from la car and stood humbly bofora the god of forla Ho Baid, "With a pure and concentrated minnt, with a fork difficult to be done by the ignorant, I worship the great sthapu, Siiv, Rudra, Bhary, Islas Ishwar, Girish, Buad, Devbhar-bhavan, Ishwar, Shitikanth, aj, Shukri, Dikshkrituhar, Har, Vishwarup Virupaksh, Umapati, Sbmashagva8l, Dript. Mahaganpati, Viblu, Kkatwangdliari, Rudrs, Jul Brahmchara, Stat. Stutys. Stooyaman, Amogh, Krativsena, Bilohit, Nilkanth, Asthya, Durnsvaran, Indra, Brahm, Bratrent, Taponishth. Anant, Taptargat, Vaborup. Canadhyaksb, Trinetra, Parishad-prigk, Dharadhyaksh, Kshitimukh, Gayri-indayavallabb, Kntrai pillar, Piny. Na dusalan, Tanurakas, Algugra, Unabhuxhau. - अन Salupik Purr.सौप्तिकपर्ध 7283) विभूषणम् । प्रपणे शरण देष पामेण समाधिना ॥ ११ ॥ इमादापदं घौरा तरामा मुखराम । संघभूतारेण यायें शुधिमा शुचिम ॥ १२ ॥ तितस्प व्यतित हारपोद्योगाव: स्वकर्मणः। पुरस्तात् काऽधी घेदी प्रादुरासीन्महात्मनः ॥ १३ ॥ तस्यावतारामधिनमामरजायतासदिशो विदिश पञ्चज्वालाभिरभिपूरयन् : ४। दीप्तास्थापनाश्चात्र नेकपादशिगेभुजा । रत्नधित्रागधग' समुपतकराया ॥१७॥ विपशैलप्रतीकाशाः प्रादुगसन्महागणाः । श्यवराहोदयात्राभ हयगोमायुगोमुखा ॥१६॥ नामाषादिपसिनविडिता क्रुष्टगार्जित । सन्नादयन्तस्ते विश्यायायामाम माधुः ॥ १८॥ संस्तुषम्तो महादेवं मा कुर्याणा मुघच्चसः । यिषविषयो दौणि भरिमा महात्ममः । जिज्ञासमाांस्तत्तज. साप्तिपञ्च दिक्षय ॥ १८ मोन परिभालातलपीशपामप. । घोररूपा समाजग्मुभूतसंघा समन्ततः ॥ १९ हिरहरूष, मृष्टिरवक, देव चन्द्रमौर विभूषण ऐसे देवताके उत्तम ममाधि से शरमागत होताई । ११ । मष भो इमघोर कठिन आपत्तिमे उत्तीर्ण होनाऊ उप्स दशा अन शिवजी का मैं सर्मभूत वाले मे पूजन करूंमा । १२ । उस शुभकर्मी महात्मा के निश्पको योगसे जानकर भागे से समपी वेद प्रकटहुई । १।।हे राजा तब उस पेदी में पग्नि देवता प्रकट हुए उसने दिशा विशाओं को और आकाशको अपनी ज्वालामोंसे पूर्णकिया उस स्थानपर प्रकाशित मुख और नेत्र रखनेवासे बहससे घरण शिर और भुजाय ले रत्नाटित वाजवन्दधारी ऊंचा हाय करनेवाले। १५ रीप और पत्रकेवरूप यगण प्रकटहुये जोकि कुत्ता वाराह और कंटकी मूरत घोड़े वै मौर शृगाल के समान मुख रखनेवाले । १६ । सव सधिको भयभीत करने बड़े प्रकाशको उत्पन्न करते महादेवजी की स्तुति करते बढे नस्ती उस भवस्थामाके सम्मुखगपे । १७ । महात्मा अश्वत्थामाकी महिमा के बढाने के आमिलाषी और उप्तके तेजको जानना चाहते रात्रियुद्ध देखनेके उठित । १८ ।ऐसे भवानक और उग्र प्रभाववाले शूल पटिश शस्त्रोंको हाथमें रखनेवाले घोररूप भूतगण चारों रसे भापहुँचे । १९ । जोकि अपने दर्शनसे तीनों लोकोंके tatpar, above all and best fall, Pos+Bssor of go d weapons, Digar t. Deshrakshin, 10. Hiranyakavach, Srishti-raksbak, Dev. Chanda. mauli, I bop to you with all my heart. I shall wire! p Shup with the offering of my whole body, to get rid of this trouble " With these thuught in thio mind of that virtu sus man, a go'd altur ste od before him, Then god Agni, appearing on that rlter, illumined the sky and the directions. There nisu appeared glon sua fac 8 and epee, with many feet, headi, Jiweiled arms upraised, 15 I uge bodies like hills and isles, having tho appearances of dogs, hogs, camels, horser, oxen and jackals, terrifying all the world, d ffusing hght ord prajsing Mahadev. They all came before Aslı Tuthana, to glorify hini ag well us to know 1118 strength and desirous of seeing the battle at night 172841 Mahablarat (९८७ मयुमंप पेस यस्यानातान प्रक्षमा पिप न कार.महाल ॥ २ ॥ तत सेम्पेन मानण द्रोणसुत्रः प्रतापवान् । अपर महामाखुरपारमान दरद ॥ २१॥ कद्र रोवकर्माण पेट करियुत । मभिष्टुप महारमानमित्युवाचः कृताञ्जलिः ॥ २२ ॥ प्रोगिय ममाम नपाए जातमाजिरस, ले। माती भगमन प्रतिगहीबमलेम ॥ २३ ॥ मर मर मरे परमेन, सचिन भस्मादि विपारमन्नुपर्मि तवामतः ॥ १४ ॥ स्वपि सणि मतानि सर्पभने चासि पे । गुणाना प्रभामानामे करप पि विछति ॥ २५ ॥ सर्वभूताभय विमो इपितापस्थित प्रतिगृहाण मा देव यशया परे मया ॥ २६, रक्षाबोणि रास्थाय सांधेद विसापकाम संवरपारमानमा कामवान्युपाविशत ॥ २७.५ भयको उत्पन्न करें उनको देखार महाबली प्रस्थामाजी ने भी पीड़ा नहीं की ।१०। इसके पीछे बड़े कोषयुक्त मतापवान मानत्यामाने सोमदेवता से सम्म रखनेराले मन्त्र द्वारा शरीररूप भेंटको अर्पण किया । २१ प जोहये प्रश्नत्थामा उम रुद्र कर्मवाले भनेप महात्मा नी को उनके रुद्रकों मे स्तुति करके यह पवन बोले । २२ । हे सगरन् अब मैं मोगरा में उत्सन्न होनेशने इस शरीरको भात्म रूपी अग्नि, वन करताई मुझ बलिरूप को आप अंगीकार करिये । २३ । हे विश्वात्मन महादेवजी मैं इस भापति भाप की भक्ति और परम समाधि से आपके मागे अर्पण करताई । २४ । सबनीव भाप में हैं और निश्चय करके सपनोवो. में प्रापही हैं और पाप में प्रधान पुगों की ऐक्यताभी मिगतहै । । हे सर जीरोंके रक्षास्थान-समर्थ देवता मुम निपत हन्य पको स्वीकारकरो ओ शत्रु मुझो भनेय हैं। २६ । अश्वत्थामाजी -यह काकर पौर शरीरकी प्रीतिको त्यागकरके उम वेदापर जिसपर अग्नि प्रकाशितया चढकर अग्निमें प्रवेश करगपे । १७ । साक्षात् भगवान महादेवजी इसरोहुये उस ऊंचे हाय Thog bore drea iful arms and weapons and gathered there froin all sides. They could turrily the three woulds with their app araucas but Ashwathama remained firm there. Then glorio119-Ashwathama in great rage, with incantations of hymns relating to $ m, offered his own body. 21 Having praisei Rudra of dreadful prowess, • with clasped bands, he said, " I, bors in the family of Angira offer a sacri. fice of my own body.' Pray accispt ma as such, I offer tyaslf, with fall derotion, at this time of distress, All beings lpoin you and you ara surely wit in all bringe You are the best of all virtue Refuge of all beings: accept me as a victim of sacrifce, if I cannst Conquer mg foer." Buving anid tid, Ashwathama gave up all love for his ora hody and ascended the altar of burning fire fooing him thus enter file with upraised arms, Suiy said to bim with a smile, "I - 25.

1285, Sauptik Pary सौतिकपर्व { ७२८५) पूर्वघा निधेष्टं रष्ट्या हविरूपस्थितम् । अवधीद्भगवान साक्षान्महादेवो इसनिष २८ ।। सत्यशौचासवस्यागस्तपसा नियमेन साक्षास्या भक्त्या च त्याच या च वचसा तथा ॥ २९ । ययाग्दामारा. सोनाक्लिष्टकर्मणा। तस्मादिष्ट मः कृष्णादन्यो ममम पियो ३० ॥ कुता तस्य सम्मानं स्वाइच जिलासमा या । पदाला सहसा गुप्ता मपश्च पहुश. ना. ॥३१: कृतस्तस्यैव सम्मान. शिलानक्षता मया । ममिभू-स्तु कालेन नामवापि जोषितम् ॥३२॥ एक्स्या हात्मानं भगामारमनस्तनुम् । भाविवेश ददौ यात्रै विमल खड़गनुत्तमम् ॥३३॥ स्थाविष्टो भगवता भूयो जज्क्षल असा । घलयात्रामा दे देवहटेन तेजला३५ मिश्यानि भूतानि रक्षांसि च समाद्यन् । अभित. शत्रुशिविर या साक्षा देवेश्वरम् ॥ ३५॥ इति सौठिकपणि द्रौण शिविरप्रदेशे शप्तमा ध्यायः . ॥ वगक्षित हव्य रूपको नियत देखकर बोले । २८ । मैं जिसमकार पुगमकर्मा भीकृष्णानी की सत्यता पवित्रता सरलना त्याग तप नियम शान्ति भक्ति धैर्य बुद्धि और बचन में अराधन कियागया और उस श्रीकृष्ण से अधिकतम मेरा कोई प्रिय नहीं है । ३० । हे तान तुझको जाननेके मिनापी श्रीकृष्णजी का गान करनेवाले मैंने अकस्मान् चारदेशियों की रक्षाकरी और बहुतप्ती माया प्रकटकी । "पांचालदेशियों के रक्षाकरगेवाले मैने उन श्रीकृष्णजी का नस्या परन्तु अब यह पांचालदेशी काल से पराजय हुये है इससे अब इन का जीवन नहीं हैं ।३२ । भगवानने यस महात्मा से ऐसा कहकर अपने शरीरको उसमें प्रवेश किया और उसको बहुत निर्माल और उत्तम खड्ग दिया ३३१फिर भगवान के 'प्रवेशित शारीसे असत्यामाजी तेजसे ज्वलित अग्निरूप हुये और देवनाके दियहुय तेमसे युद्धमें वेगवानहुये ३४ साक्षात् ईशकसमान शत्रुके डेरे में जाननेवाले उन अश्वत्थामाजीके पीछे दृष्टिगे गुप्त जीव और राक्षस चारों ओरसे चळे ॥ ३५ ॥ was worshipped with to truths, holl.exs, etiaight forward10-8, 4.598 nition, tar, vows, devotion, patier ce and wisdom ol Sha Krushn, who does things with the greatest ease, and -urely I hold nono daili tlian Desirous of booking thesc and willing to kerp til prestige of Shri Krishn, L protected the Panchalu and produced many illusiong I had regard to the prestigo of Str Krohn in pra te tmg t'iu Panchals But the Panchals are conquered by Tuppe ond then days are numbered." Hitmg said this, Bhagwan ealerrillis bily and inade hum the presert of a gund suord. Then Ashwathami becama glorious like fire and endoed with disine energy was ready to fight. Going like Ish kar himsell into the enemy camp, Ashwathama xny followed by intable beings and rilshases him 18 " 35.

(7236 1 (७२८६) Mahabharat धृतराष्ट्र उवाच | तथा प्रयाते शिविरं द्रोणपुत्रे महारथे । कन्वित मयाची न पवर्तनाम् ॥ १॥ कश्चिन वारितो खुरक्षिी भोंपलक्षिती। मन्वानी न निवृत्तीमहाग्यो । २६ फच्चिदुन्मथ्य शिविर हत्या दुर्योधनस्य पदवीं गता परमिकारणे ॥ ३ ॥ पाचालानहनी पौरो कश्चिम क्षिती। कश्चित्ताभ्यां रुतं कर्म तम्माच पथ सजय ॥४॥ समय उवाच . प्रपाते शिीवर द्रोणपुत्रे महात्मनि । कृपश्च कृत्याच शिविरद्वारयतिष्ठताम् ॥ ५ अश्वत्थामातु तो हष्टया यत्ययन्ती महारयो । प्रहष्टः शन राजनिद ॥६॥ यत्ती भवन्ती पर्याप्ती सर्पक्षत्रस्य नाशने । किं पुनयोंधशेषस्य प्रसुप्तस्य । पतः ॥ ७॥ महं प्रो शिविरं चरिष्यामि च फालयत् । यश काश्चिदपि जीवन्मुच्येत मानतमा भवदभ्य कार्य स्यादिति मे निश्चिता मतिः॥ ८॥ इत्युक्त अध्याय ८॥ धृतराष्ट्र वोले डेरे में महारथी अश्वत्थामा के जानेपर भयो पीड़ामान कप चार्य और कृतवर्मा तो लोटकर नहीं चलेमाये । १ । कहीं नीच रक्षकों से। नहीं रोके गये और क्या उनलोगों ने उनको नहींदेखा दोनों महारथी रात्रिके को असह्य जानकर तो नहीं लौटे २ हेरेको मथकर और युद्धमें सोमक पांड को मारकर दुर्योधन की उत्तम पदवी को प्राप्तकिया । । । क्या वह दोनों पावाल देशियों के हाथ से मृतक होकर पृथ्वीपर शयन करनेवाले तो नहीं । अपचा कोई उनदोनों ने कर्म भी किया हे संजय वह सब मुझसे कही ।४। सं बोले कि ढेर में उस महात्मा अश्वत्थामा के जानेपर कृपाचार्य और कृतवर्मा के द्वारपर नियतरहे । ५ । हे राजा फिर अश्वत्थामाजी उनदोनों महाथियों । उपाय करनेवाला देखकर बडे प्रसन्न होकरयह वचन वोले । ६ । उपाय कर आप सब क्षत्रियों के नाश करने को समर्थ है मुख्यकर शेष बचे और सो शूरवीरों के मारनेको फिर क्यों नहीं सपर्थहोगे । ७ । मैं डेरेमें प्रवेश करूंगा कोलकैसमान घूमूंगा इस द्वारएर भानेवाला कोईमनुष्य भी जैसे प्रकार जीवता जानेपावे वैसाही आपको करना योग्यहै यह मेरा हद विचारहै । ८ । CHAPTER VIII Dhritrashtra said, " Did Kripacharya and Kritvarma turn bro out of fear, when Ashwathama lind entered the camp! Were they aid of the night attack and so turned back? Did they oboy Duryod! by destroying the Somaks and the Pandavas in their camp? W the two warriors sluin by the l'apchals? Did they perform any ti If an tell it to me, Sanjaya, " 4 Sanjaya paid," Kiipacharya Kritvarma hept staniling at the entrance, while Arhwnthana enter the cainp. Sreing them thus standing, Ashwathama was mil pleased and saill, ' You can destiny all the warriors by your -287 Sauptik Pary Hiſ 78 (७२८७ गविशत् द्रोण पार्धानां शिषि महत् । यद्वारणाअवस्कन्ध विहाय भयमारमनः ॥९॥ प्रविश्य महावाहुरहेशज्ञश्च तस्य ह । धृष्टद्युम्नस्य निलयं शनरभ्युपागमन् ॥१०॥ ते तु हरदा महत फर्म श्रान्ताच वलपद्रणे प्रसुप्तावैध विश्वस्तासमेत्य परिशारिता १६ ॥ मय प्रविश्य तवेदप पृष्टद्युम्नस्य भारत। पान्चाल्य शयने द्रौणिरपश्यत् हप्तमंन्तिकात् । १२ ॥ क्षोमायति महति स्पर्दयास्तरणसघृत । मल्यिचरस युक्त पेरचूर्णश्व शासिते २ १३ ॥ तं शयान महात्मानं विश्रध्धायुधामयम् । प्रबोधषत् पादेन शएनस्थ महीपते ॥ १४ ॥ 6 युध्य वरणस्पर्श मुत्थाथ रणदुर्मदः। अश्यजान अपारमा द्रोणपुग्नं महारयम् ॥१५ तमुत्पतमा शयनादश्यामा महाबलः । केशेष्या, लम्ब्य पाणियां निधिरोप महीतले ॥ १६ ॥ सपलान्तेन निषियः साध्वसन च भारत निद्रया चैध धाल्यो नाशकच्चीतुं तदा ॥ १७ ॥ तमाक्रम्य पदा राजन जो शरीरके भयको त्यागकर अन्यद्वारमें घुसकर पाएडवोंके बड़े डेरे में पहुँचे ।। के स्थानोंके जाननेशले ने सुगमता से धुम्नके डेरेको यया ।१०।द लौट सम्मुख होकर युद्धमें चागेओर दौड़नेवाले युद्धमें महाक ठन कम्मों को करके महत श्रमित होकर सोगये थे हे भरतवंशी इसके पाछे अश्वत्थामाजी ने उस धृष्ठ युम्न के उस स्थान में परेशकरके शयनपर सोतेहुये धृष्टद्युम्न को समीपसे देखा । १२ । हे राजा स्वच्छ अत्यन्त अलसी से तैयार यहुमूल्य विस्तरोंसे युक्त बड़ी उत्तम मालाओं से अलंकृतधूप चन्दन चूरेआदिश पुगन्धित बह शंपनरर सोनेवाले विश्वासी और निभय उस महात्मा धृष्टद्युम्न को चरणघास से जगाया । १४ । युद्ध दुम्मद धृष्टद्युम्न ने चरणके घातसे जागकर बड़े बुद्धिमानने महारथी अझन स्थामा को पहनाना । १५ । बहें पराक्रमी अश्वत्थामाने उस शयनसे उछलनेवाले 'धृष्टद्युम्न को हाथोंसे वालों के द्वारा पकड़ कर पृथ्वी पर रगड़ा । १६ । हेभरत वशी तब बल से उम धृष्टद्युम्नका रगड़ाहुआ बह पृष्टद्युम्न भय और निट्रासे चेष्टा करने को समर्थ नहीं हुआ । १७ । हे राजा पैरोंसे उसका कण्ठ और छातीपर why sha'l you be not able to slay these rejoaining for who are sloopjog I am about to enter the camp and to roam there like Denth and I charge you not to let any ore pgg a'ivo vat of this entrance. Ashwathama fearlessly entered the canıp by another wny, and well acquainted with all its parts, he casily found the tent of Dhrichta. dyumn. 10. All the warriors sere neieep after the toils of the day. Ashwathams entered the tent of Durish tadyumn and viewed him frim a short distance. With a kick ho awakened Dhrishtadyumn who was slerping a bkurd and fearless sleep on A expacious bed, soft and precious, well_deched with garlands aud sandal powder. awak. ening at the ble of the kick, wise and valiant Dhrishtadyuman Teeognised attrathi ma. Ho jumped from his let hd Asha up [7288 (७२८८) Mahabharat काठे चौरास चोभयोः । नदन्त लिम्फुरन्तञ्च पशुमारममारयत् ॥ १८." तुइनखस्त ख द्रौणि नातिव्य तमुदाहरव । आचार्यपुत्र शस्त्रेण जहि गा मा चिरं कृया। स्वय कृते सुकलालोकान् गच्छेथे द्विपदाम्बर ॥ १९ए मुक्त्वा तु पवनं विरराम परस्तपः मतः पाञ्चालराजस्य आशान्तो बलिना भृशम् ॥६० ।। तस्यायकान्तु तां घा संश्रुत्य द्रौणिरवयीत् । अाचार्यधातिना लोकान सन्ति कुलपसिन । तस्माच्छखेश निधन न स्वमर्हसि दुर्मते ॥ २१ पयाणवीर सिंहो मत्तमिव द्विपम् । मम सभ्यवधीत क्रुद्धः पादाष्ठीलैः सुदारुण ।। २२ ॥ तस्य धीरस्य शब्देन मार्यमाणस्य घश्मनि । भूतमेवाध्यमस्यन्तो न स्म प्रयाहरन् भपात ॥ २३ ॥ तन्तु तेनायुपाये। गमपित्या धमक्षयम । अध्यतिष्ठत तेजस्वी रथं प्राप्य मुदशनम् ॥ २४ ॥ स तस्य भवनाद्राजन् निष्क्रम्य नादयन्दिशः। रशन शिीवर प्रायान्जिमुपितो पली ॥२५॥ दवाकर पुकारते और चेष्टा करने को पशुकी भांति मारा ।१८। फिर नलों से पीढ़वान् करते उस धृष्टद्युम्नने धीरे अश्वत्थामासे कहा हे भाचार्य के पुत्र मुझसे शस्त्रने मारो विलम्ब मत करो हे द्विपादों में श्रेष्ठ मैं आपके कारण से पवित्र लोक को पाऊं । (९ । शत्रुमाका तपानेवाला बलवान से कठिन दवायाहुमा राजा पाञ्चलका पुत्र इस प्रकार के वचन को कटकर मौनहो गया। २० । इम के पाय मसत्यामा उमके उस धीरे से कहेहुये वचन को सुनकर बोले हे कुलकलकी गुको मारनेवाले के गांकनहीं हैं इमहेतुसे तुम शस्त्रने मरने के योग्य नहींहो हेदबुद्धी॥२१ मे कि सिंह मामाले हाथी की भोरको गर्जना है उसीप्रकार उस वीरसे इसका करते हुये कोधयुक्त प्रत्यःमाने कठिन एंडियोंसे मर्मस्थलोंपर घायल किया ।२५ उम मरनेवाले थरके शब्दों से महल में वह त्रियां भूतको निश्चय करनेवाली होकर भपमे नहीं चाली । २५ । वा तेजस्वी उन उपायसे उस वारको यमलोकमें पहुँचा कर और सुन्दर दर्श7 रथको पाकर नियनहुगा । ३४ । हे राजा यह समर्थ भोर पलान् शत्यमा उके डोमेनिक्कर दिशामों कोशब्दायमान करते शत्रुभ' के मारने के अमिन पी रयत समारने द्वरा टेरेको गये । २५ । इसके thamus caught line by the linir oflijs liend and brought him down on the ground. D Abrol to the ground Dhiri-htadyumu was unable to move out <f fçar am slep. Rocru-litel (Jie neck and breast of the strurgling aud miying prince with his fat and tonted him to kill like nlunst. Sortching with lo's naile, Dlırislstadyumn said to him gentis, " hill new.tha winner, son of nciaren. and malhe no deley to that I may attain gorkl regions by your Fracy best of mes!" HAI pressed by the enemj. the ruliant Panchal prince becamo silent. 20 Haring heard the slowly uttered words of tho paincc, 4: asid "I'ller Aro no good regions for deepirrbiu pacceptorcides uod tho.cforo yzu dogou deserve to die with a Wexpr. Haridy said with a (7269) सौतिकपSruptik lar मरमान तातस्मिन् द्रोण गहारा सहित रक्षिमिः सर्वः प्रणेोवितस्तदा २६॥ राजानं निहतं सदा मृगं शोकायगाः । व्याक्रोशन क्षत्रिया. सयं धृष्टद्युम्नस्य भारत । २७ ॥ तासान्तु तेन शम्देन सीपे सनियमाः। क्षिपञ्च समनहन्त किम तदिति बानुवन् ॥२८॥ भियस्तु राजन् वित्रता भारद्वाजं निरीक्ष्यताः । अब्रुवन् दोन कठन सिममायनेति ये ॥ २९ ॥ राक्षसो वा मनुष्यो या नैनं जानमिहे अयम् । हत्या पाश्चालराजानं रयर निष्ठति । ३० । वतले योधमुख्याश्च सहसा परवारयन सताततः सर्वान् रुद्र नेग व्यपोयपत् ॥ ३१ ॥ धृष्टद्युम्नञ्च दरयास ताश्चवास्य परानुगान् । अपरयच्छपने मुनमुत्तमौजसमन्तिके ॥ ३२ ॥ समप्याक्रम्य पादन कण्ठे जामिनसा । तवामारयागास चिनईम्तमरिन्धमम ॥ ३३ ॥ युधामन्युश्च संप्राप्तो महारथी अश्वत्थामाके हटनानेपर सव स्त्रियां अपने रक्षकों समेत पुकारी हे भरत. बंशी राजाको मरामा देखकर अत्यन्त दुःख सब जोकि धृष्टद्युम्नेक नौकरथे पुकारे । २७ । फिर उन्हों के शब्दों से सम्मुखंही उचम क्षत्रिय तपारहु और बोले कि यह क्या पातहै । २८ । हे राजा यह भयभीत स्त्रियां अश्वत्थामा को देसकर दुःही कंठ से बोली कि शीघ्रनायो । २९ । यह राक्षसहोय अथवा मनुष्य राय हम हमको नीं जानती हैं वह राजा पांचाल को मारकर रथपर नियत है ।10। उसके पछि उन उत्तम शूरोंने अकस्माद चागेओरसें घेरलिया उसमे उन सत्र चर्चाई करनगालेको रुद्र अस्त्र से मारा । ३१ । फिर उसने सब साधियों समेन धृष्टद्युम्न को मारकर समीपरी शपनपर सोनेवाले उत्तमोजप्तको देखा ३२॥ उसको भी पराक्रमसे कण्ठ और छाती को दवाकर उस पुकारनेवाले शत्रु विषयी को उसी प्रकार से मारा । १३ युधामन्यु उसको roar, orragind A-l wathung wounded his vital parte sith bis hard feet. The women of the houdelsuld heard the cries of the prin.cy, bat kopt quiet for fear of a goblin. Havirag slain the brave prince bo - Approached his car and drove in iš to sing the other min of the cump: 25. At the departure of Ashwathanıs the women and the attendants sa - Dhuishtadyamn alnin and cried out fur grief. The warriors awoko at their cries and asked the reason of it. The terrified women who had scen Ashwathama, Laid in grief," We donot know whether bo vas a rabshas or uno, but surely he has slain the Panchal princo Then the warri. and got upon his ca“. Nako hasłe to slay him," ore barruunded Ashwathatnr on a}} sides aa') he slow them all with tho weapon of Ruden. 31. Uaring alain Dhirisht dy unn and his followers Lo baw Iltamaujas sleeping hard by and ples bons in the namoray by big feet. Tbiaking that he was slnis by a raksbas, Yadlamanyu camo thero and poucded Ashwathams on the brease with । और 1 [७०) Malia Laut (29011 मत्या त रक्षसा हन्म । गदामुद्यम्य वेगेन हदि द्रौणिमताडयत् ॥ ३४ ॥ तमभिनुस्य जाग्राह क्षिती चनप्रताडयत् । बिस्फुरन्नञ्च पशुवधगममारयत् ॥३५ ॥ तथा स धागे हत्वा तं ततोन्यान समुपाद्रवत् । साबुप्तानेव राजेन्द्र तत्र तत्र महारथान् ॥३६॥ स्फुरतो वेपमानांश्च शभितेव परमख । तो निम्रिमादाय अधानान्यान् पृथानान् ॥३७॥ भागमो विचरमार्गानसियधिशारद । तथैव गुल्ने समेर शपामध्यगैस्मि कान् ।भारता यस्तायुधान सनि क्षगेर गयोधयत् ॥ ३८॥ योधानधान द्विपाश्चय प्राच्छिनत् म बसिना । रुधिरोक्षितपर्योग काला इवान्तकः ॥३९॥ विस्फुरमिन तेद्राणिनिशिस्योंदामेन च । आक्षोणेन चैघासेनिधारकोक्षितोमवत ॥४॥ तस्य लोहिसमिक्तस्य दीप्तखडुगस्य युध्यतः अमानुष इवाफारोपमो परमभीषणः ॥ १॥ राक्षम के हाथो मृतक म.नकर आया और वेगसे गदा को उठाकर अश्वत्थामा को हृदय पर घायल किया । ३४ ! गदा आघात से घायल होकर भी अश्वत्थामा युद्ध में कम्पायमान नहीं हुआ और उस के सम्मुख जाकर उसको भी पशुके ममान मारा । ३५ । वह बार उसको उसमकार से मारकर जहां तहाँ सोनेवाले दसरे महारथियें की ओरगया । १६ । क्रोषयुक्त ने समीपही पांचाल देशी वीरोंको दवाकर फड़कते और कांपतेहुओं को एमेमारा जैसे कि याममारने वाना पशुओं को मारताहै । ३५। इसके पीछे भागक्रमसे मार्गोको घूमते खड्ग युद्ध में कुशल भश्वत्थामाने खड्गको लेकर पृथा अन्य लोगों को मारा इस प्रकार गुल्म नाम सेनाके भाग सोनेवाले प्रशस्त्र और थकेहुये उन सब गुल्ममें वर्चमान लोगों को एक क्षण भरमें मारा। 16 । रुधिर से लिप्त सब शरीर काल सृष्टि में मन्तक के समान अश्वत्थामा ने शावरि घोड़े और हाथियों को मोरा वह प्रशत्यामा तानमार से रुधिर में लिप्त हुये उन चेष्टा करनेवालों से खड्ग पहनेवालों से और वहग के कम्पापमान होनेसे । ४० । उस रुधिर से रक्त धर्ण प्रकाशित सद्ग धारी युद्ध करनेवाले बहे भयके उत्पन्न करनेवाले अश्वत्थामा का रूप अमानुष दिखाई पड़ा । ४११ हे फौरव जो जग उठे यह भी शब्द से अचेतहुये और his mnco: The latter did not shahe with the blow of the maco and elcw his ad verary like a beaut 35. Having slain him in this 101110er ho proceeded towards other warriors who were nieoping. He slew tle sleeping Pancials like boots at a facrifice. Thos ho entered other dirisions and sl-ly the Warriors with his sword. Ho extirpat. ed the armlees and sleeping warriors in an instant. With his body deunchol in blow and losfior dreadful liko denth limsoll, 11o elew horas nal elephants alon, Bleeding from bad to foot with the blural of t 1a slain, his own wounds and the droppings of kis sword, he was drordful to bobold with his drawn errord and was superhumau in apps ramoer Those who awoko with tho noie, became inapogiblo at thom dreadful sight. Thirking him to be a rakalıns, the Warriors - - (7291 Suptik Parv सौप्तिकपर्च (७२९१) ये स्वमाप्रत कारस्य तेपि शब्दन मोहिताः । निरीक्ष्यमाणा अयोग्य होणं दृष्ट्वा प्रये प्यपुः ॥ ४२ ॥ नपं तस्य से हटा क्षत्रिया शर्षिणः। राक्षसं मन्यमानास्त नप मानिन्यमीलपन् ॥४॥ स घोररूपो व्यरत् कालपाच्छघिरे ततः । अपयद्वीपदी पुत्रानाशांच सोममान् ॥४४॥ तेन शम्देन विमस्ता धनु ईस्ना महारथाः । धृष्टद्युम्न हव भत्वाद्रीदेवा विशाम्पते। भाकिररबारमारद्वाजमातवान् ॥ ४६॥ ततस्तेन मिनादेन समवुद्धा प्रभद्रकाः। शिलीमुखै शिम्नण्डे च द्रोणपुर समाई यन् ॥ ५५ ५ मारद्वाजः स तान रमा शरमणियति । ननाद बलवन्नान मित्रांमुस्तान्महारशर Mect ततः पारसंगितु धानुसारन् । अहा ग्योपस्थायरमाणे मदुय५९ पात्रचन्द्र विमल गृहीत्या धर्म संयुगे । मगच पिपुलं दिय बातम्पपातम। द्रौपदेयानमित्य थडगेम व्यधमला । ५०. ततः स नरशाई प्रतिविमहाहवे। एक दूसरे को देखकर पाडावान् हुये । ४२ । उस शत्रु विजपी के उस रूपको देखकर उस को राक्षस मानते उन क्षत्रियों ने अपने नेत्रों के बन्द कर लिया ५५ । इसके पीछे हेरेमें काटके समान घूमते हुये चम घोररूपने शेष बचे हो द्रौपदी के पुत्र और सोमकों को देखा । ४४ । हे राजा उम शरसे भयभीत धनुष हाथमें लिये द्रौपदी के पुत्रों ने धृष्टद्युम्नको मरा था मुनबार निर्भग के समान वाणोंके समूहोंसे भवस्थामाको ढक दिया । ४६ । इसके पीछ उस शब्दसे मभद्रया नाम क्षत्रिय जागउठे शिखण्डीने शिलीमुख याणोंसे अश्वत्थामा को पीडावान किया । वह अत्यामा वागोंकी वर्षा करनेवाले उनारों को देखकर उन महाथियों को मारनका भभिलापी वड़ा बलवान् शब्दको गर्जा फिर पिनाक मा है। स्मरणकरता अत्यन्न होपयुक्त स्थमे उत्तर का शीघही सम्मुवगया । ४९ और युद्ध में हार चन्द्रमामों के दिनोंसे चित्रित निलि टाकको लकर स्वर्ण में निमित दिन्नखड्गको पकड़कर द्रौपदी के पुत्रों के सम्मुख माकर चलवान्न सबको सड्ग पायक किया । ५०। हे राजा इसके पीछे उस नरोत्तमने वपुदगें प्रीत abut their eyes. Roaning in the pump, he 89w the sons of Draupadi and the somaks. Turified at the outcry and hearing that Dhjish. tadyumn as slain, tho 8018 of Draupali come cut with their weapons and fearlessly covorod Ashwatiain with their aniows. 4G. Thus the Prabundraks aroko at the npiso an! Svibbanli wounded asl, ta. thrason with his elap arOW& Sicing tl 08 horios bliuwer their armows and desirous of sinying them, ho rearol with all his might, and remembering the death of his fat) er, be at once cane do* from his car aud freed them, Ilo took up his mady-t duned shield and bright gold-handled skont and veninded all the rons of Dramadi .50. Then that hast of men wounded Pratirinjhya on tite oide and the foll down dead on the ground. Grriou Sutr m - 1 11092} - ! (७२९२ Malibi arat मुशिदेशेऽयवो पागम् सहन्यपमधि।.१॥ मासे विधा द्रोजिन्तु सुतसोमः प्रताप:न् । पुनवासि समुधम्य दाणपुत्रमुपादयत् । ५२ । लुतलीम बासित घाह छिधा गरर्पमा पुाप्यात पाय स शिवदयोऽपता ६३ ॥ मालिन तातीको रथं चक्रेण गर्यवान हो या मुक्षि बोम बक्षस्सममानारलत्। ५४० अत्ताडपच्छवानी मुकमविजन्तुम: । स निहालो या भाग ततस्यापारकिर ॥ ५४ ॥ श्रुतकर्मातु परिध गृस्या समसाइयत् । अभिदुत्य यया द्रौलि सणे सफल भृशम् ॥ ५६ ॥ स तु ग भुफिर्माणमासो जने घगतिमा । स हो गगनमा धिमदो विकृतानन ॥ १७ ॥ता शो वारस्तु भुतकीर्तिमहारय । अश्वत्थामानमामाच शरीरघानिरत् ।५८ । समापि शीण चर्मणा प्रसिधार्यम ! सकुडल शिर कायाद्राजमानमपाहता तो मोठानिहा मह स. प्रभद्रक । मानलतो विकाको कुति समवर घातक किया वह मरकर पृथ्वी पर गिरपड़ा। मनापवान् एतसोम मानस अश्वत्थामाको छनकर खद्रको उठाके अवस्थामा के सम्मुख गया १५२ । नरोत्तम भूशयाम ने हतमोम की भुभाको सदम समेत कार कर कुक्षिपा भायम किया पइभी सदय होकर पृथ्वीपर गिरपडा किर नकुल के पुन पर कमी भासानीकने रथ को दोनों सुनामों से धुपाकर वेगमें उसको छातीपर घायलकिया। ५४। फिर उस प्राह्मणने चक्र छाईने वाले शतानीक का घायल किया यह व्याकुल के पध्वीपर गिरपहा इसके पीछे उसके सिर को काटा । ०५। फिर श्रुतकर्मा परिषको लेकर और दौर कर अश्नत्यामा सम्खं गया और दारसे युक्तधाम कुतिपर कटिन घायलरिया । ५३ फिर इस अश्वत्यामाने उत्तम खड्गते सस श्रुतकर्माको मुखपर घायलकिया गा.पान्तर और अचेत होकर पृॉपर गिरपड़ा । ५७ । फिर उसछब्दसे महारथी श्रुतकीर्ति ने अवस्थामा को पाकर बाणोंकी वर्षसे ढकदिया । ५८ । सस अश्वत्यामाने उसे की पाणवृष्ट को ढालपर रोककर कुण्डलपारी प्रकाशित शिरको शरीरसे जुदा piertad dek wathuma with a prase and fa ed dum with the draw, 80.d.. But ho cut down his swoy de l arm and younded luni na tha jib, makrog lim fall duununh tle wound 'l ben Naul's son, gloulous Shatauık huiled a cor by beel with hoth hands and but lud on thobreast, but the brahunna slow Shatanik miso, 55. Then 'Shiut halpia faced him with & club and bit him hard on the left sido che thama wounded lip on she fsce und hu fall dowu on Burth disfigured: and tensils. Shrutkarms ther. gent fortlia storer of arrows tree ashwatherna, but the utter toolk it on the sheld and userred in ndser ary's gloriouslgul, docl rd nrth en-ring, fion Then Nith fanuit weapons ho wsunfo, Shish radi and the Prabha trans and pierced tho former b tron tuo tv. Oye browo with alınıp arow to bods.

7 12931 BATEKO faoptrletare ७२९३) रिमानाप्रहरभवेली शिलीमुखेन भाप्यन सुपोर्मवि समर्पयत् ।। ६० ॥ स तु काय माविको द्रोणपुगे महाबलः शिखण्डित सम्भसाध द्विधा चिसोऽसिना, शिगि रतीया धाविष्टा परन्तपा प्रमकगणान् सानभित्रा वगवान् । पशि विराटस्य पान मंशमाय ? | द्रुपदस्य व पुत्राणां अणों महदामपिचकार करने और रहा । महावलः॥ ६३ ॥ भन्यान व पुरुषान मिस्त्याभिरत्य र व्यवसिना द्रौणिरसिमाविशारद ॥ ६४॥ सली रकारनयनां रकमाल्या लपनाम् । रक्ताम्बरधरामेका पशिहस्तांकुटुम्पिनीम ६५ ॥ दर शु. कालरात्रिन्ते गायमानामस्थिताम् । नराश्यकुजरान पाशनाघोर प्रतस्थुम । ६६ ॥ परन्तीधिविधान प्रेतान् पाशयसान घिमूईजान् । तयैद च सदा kiजम्पशना महारथान् ॥ ६७ स्वप्ने मतान्नयन्ती ता रात्रिश्चन्याम मारिप. ।१२। उसके पीछे उस पराक्रमाने सब भोरमे नानाप्रकार के शस्त्रों के द्वारा वार शिसपीको सब प्रभरकों समेत घायल किया उस शिरखगडी ने दूसरे शिलीमुखसे दोनों-कांटयों के मध्यमें घायलोकया। ६.1 फिर क्रोधसे पूर्ण उस बड़ेवतवान् प्रवत्तापाने शिखएडी को पाकर खड्गसे दोखण्ड करदिया । ६१। फिर कोषसे पूर्ण पत्रुओंका.तानेवाला तार बड़े वेगवान शिखण्डी का मारकर मभद्रकों के पर पहों के सम्धुवास और राजा विराटकी जो सेना शेष था उसपर भी दाई करने गालामा । ६२ । बड़े बलवान ने देख देखकर हुपदके पुत्र पौत्र और मित्रों काभी पर नाशकिगा। ६ । पड्ग मार्ग में कुशल भश्वस्यामाने अन्य लोगों के मी गम्ग्य जाजाकर उनको खड्ग से काटा । ६४ । उनलोगों ने रतनेत्र रक्तमाला चन्द्रनो अलंकन लाल पोशामधारी पोशहाथमें लड़के भादिक रखनेवाली अकळीकानी । ६५ । ग.नीहुई निगत कालरात्रिको देखा हेराना मनुष्य घोई और हामियों को पाशोंने बांगकर जाने के मनिलापी घोररू।। ६६ बालों के पृथक पाशों में बंधे हुये बहुतप्रकारके मृतकों के लेजानेवाले और हमी. मकार अन्य रात्रियों में । ६७ । स्वप्नावस्था में सदर वेसलाह सोतेहुये महारथियों 60. -Then in huis rago, lie cut Sithandi into two with Lussord: Having lain bin, he faced tho I'rnbrodiaks and attached the remount of the Parichiel wsitiore. He tolected tlm 50n9 arte graad sous of Drapnd fiulñ awong them and destroyed them with great force. Clóverzia sword-winxip. ho cut them dun n with 114 **ord They ear the tine! Denth with nd Londe, adorned with randal and real ditko.npean land and pronup ind hy iter affopng singing 11,& Tina rarrois l'i ojt 11 sech her su ti ir dzemn, crescita ung thadesi xiil p and bests in Inr no agal xsimpi JDY Aairatsani. my harlareneur br, runn%B f the narror her accoin faniol by Aslisatiani mbert Wit's leonine Tones 1295 . Sauptik Parvati - (७२९५ ऊरुप्तम गृहाताश्च कस्मला मितौजसः। विनदनो भृशं वस्ता:समामादन परस्परम ॥ ७८ ॥ ततो,रय पुनद्राणि रास्थितो भागनिस्वनम् । धनुपाणिः शरैरन्यान प्रेषपद समक्षयम् ॥ ७९ ॥ पुनरुत्पनतश्चापि दूरादपि नरोत्तमान् । भूरान् संपततश्चान्यात कालरात्र्यै म्यधेदयत् ॥ ८॥ तथैव स्पन्दनाग्रेण प्रमथन् स विधायति । शरवर्षध विविधरवर्ष छात्रवांस्तत ८१ : पुश्च सुविचित्रेण शतचन्द्रेण धर्मणा तेन चाकाराय तवापरत् सोसिना ॥ ८२ ॥ तथा स शिधिरं सपा द्रौणिराहवदुर्मदः । ध्यक्षोभया राजेन्द्र महांहदीमतिपः॥ ८३ ॥ उत्पसुस्तेन शब्दन योधा राजन् विच तसः । निद्रात्तांश्च भयाश्चि उपचायन्त ततस्ततः ॥ ८४ ॥ पिस्चरं चुक्रशुचाम्ये बहु तथावयन् । न च स्म प्रत्यपद्यन्त शस्त्राणि वसनानि च ॥ ८५॥ विमुक्कफेशा धान्ये नाभ्यजानन परसरम। उत्पनन्तोपतम्छ्रान्ताः फेचित्तत्र'नमस्तथा ॥८६॥ इम पाडावान हये । ७८ । इम के पीछे धनुष हाथमें लिये अश्वत्थामा ने भयकारी (थपर सवार हो कर वाणोंसे अन्य मनुष्यों को भी यमलोक में पहुंचाया । ७९ । फेर दूर से उछचते नरोत्तम आतहुये दूसरे शूरोंकोभी कालरात्रि के आधीनकिया उमी प्रकार स्थकी नोकसे मयता हुआ यह दौड़तार्था इस के पीछे बहुत प्रकार की वाण हाष्टियों से शत्रुओं के मनुष्योंपर वषी करने लगा । ८१ । फिर बड़ी चित्र मूर्य चन्द्रमा रखनयाळी दाल और उस थाकाशवर्ण खड्ग के द्वारा श्रमण करनेलगा । ८। हे राजेन्द्र उस युद्ध में दुर्मद अश्वत्थामाने उन्हों के डोको भी एमे छिन्न भि किया जैसे कि हाथी बड़े इदको करंदता है। ८३ । हेराजा प्स शब्दसे अचेत शूरवीर उठे और निद्रा और भयसे पाडावान होकर इधरउधर मे दौड़े । ८४ । इसीप्रकार असभ्य वचन कहतेहुये अन्गलोग वडे शब्दसे पुकारे और शास्त्र और वस्त्रांको नहीं पाया । ८५ । बहुत से खुलदुर्थ वाळवाले मनुष्योंने रिस्पर नहीं पहचाना तव यहां उछलतेहुये कितनेही मनुष्य थककर गिरपड़े और कितनही भ्रनण करनेलगे । ६६ । कितनही लोगोंने विष्टाकोछोड़ा people liid themselves here and there. We too, were terrified and iveted to the spot where we stood Warrior with the arrows glint from his car. He blew those them e saw comiog nens, 80. He ran bis car among thein, showering rows and crushing them under wheels Then he roamed with his Srola studieled with sang and moons, carrying the bright sword in lis ad lo upret their carap as an elephant does a lake. The waniors yolē v.th the noise and ran away bere and thero in their sleep and Othery uttered obsceno words, but could not get their arms lyd armour in the hurry of the inoment. 85. Others with dishovel. bair did not know one another. Some fell down with oxhaustiop, silo others tan hore and there. Some dropped urine Elephants Then Ashwathama slew other (7294) [७६९४) Mababliutat शुर्गोधमुख्याते प्रन्त दाणिश्च सर्वदा ॥ ६८ ॥ यतः प्रभृति संग्रामः कुरुपाण्डव सेनयोः । ततः प्रभृति तान्यामपदयन द्रोणमेव च ॥ १९ ॥ सांस्तु देवतान पूर्ण पथावाणिपातपर्व । प्रासपन संघभूनागि विगदर मैरवान्यान् ॥ ७. ६ तदा स्मृत्य से धारा दर्शन पूर्यफालिफम् । इदं तदित्यमन्यन्त देवेमोपानिपीहिताः ।। ७१ ॥ तवस्तंन निनादन प्रत्ययुध्यन्त पिन । शिघिरें पाण्डयानां शतशोऽथ सत्र ।। ७२ ॥ साच्छिना फस्यचित् पादौ अधवैध कस्यचित् ।काधिद्विमद फारमष्ट इयान्तकः ॥ ७३ ।। अत्युप्रप्रावश मदानश मृशातुरः । गजाश्वमाया वामही कामयत प्रमो ७४ । कोशता किमिदं कोऽयं काम किन्तु कृतम् । एवं तेषां सदा प्रोणिस्तका समपद्यत ॥ ७५ ॥ मोत शस्त्रशासन समान पाण्डसम्मपान् । प्राहिणोन्मृत्युलोकायदौर्णि. • प्रदरताम्बर ७६ ततस्सन्छन्दवित्रस्तो उतातस्तो भयातुग. । निद्रान्वा नरसंशाच तम तत्र, निलिल्पिरे ॥ ७ ॥ लेजानेवाली उस कालीको और उस मारनेवाले असत्यागाको उत्तम शूरवारों ने सदैव देखा ॥ ६८ ॥ जसे कि कोरधीय और पाण्डवीय सेनाका युद्ध नारीमा तबसे लेकर उस कन्याको और अश्वत्थामा को स्वप्न में देखा । ६९ । युद्धम सब सावधारियों को हराने और भयानक शब्दोको गर्नते अश्वत्थामा ने प्रथम देव से हतेहुये उन लोगोंको पीछेो गिराया । ७० । दैपसे पीड़ित उन बारोंने उसपूर्व समयके देखेहुये स्वप्नको स्मरणकरके माना कि यह वही बातहै । ०१ । पीछे पाण्डवोंक हरेमें वह सैकड़ों और हगारों धनुषधारी उस शब्दसे जागउठे ७२ कालसे प्रवृत्त मृत्यूके समान उस अवस्थामाने हिप्तीके पैरोको काटा किसी जबन को और कितने ही को कक्षिपर छेदा । ७३ । हे प्रभु कठिन मईन कियहुये शब्द करनेवाले मतताले हाथी और हाथी घोड़ों से मधेहुये भन्य मनुष्यों से पह पृथ्वी पाच्छादित होगई । ७४ । जो लोग कि इसमकार से पुकारते थे कि यह क्याहै कौन है कैसाशब्द होरहाहै उन सघ लोगोंको महार करनेवालों में श्रेष्ठ अश्वत्थामाने पाण्डवोंके नातेदार और सूजीलोग जो कि शस्त्र और करों से शीत थे उनकामी यमलोक भेजा । ७६ । इसके पीछे उस शससे अयभीत उछलते और भयमे पाडावान् निद्रासे अंधे अचनोकर बहलोग जहां तहाँ गुप्त होंगपे । ७७ । और जरुस्तम्भ मू से निपल भयभीत कठोर शब्द करते Ashwathama blew the warriols whose das a werz numbuses narriors, oftlcted by Fato, rememleied their dreams and real sed Then hundreds and thousands of archeis awoke in the Panday camp but Ashwathama, like an embodiment of Death, cut their ftel, tughs and ribs The ground was covered with tivo al rking med elephants and corpses of men crushed by elepharts'ard horses Ashwathi na slew tho Srinjie and other allips of the Pondavas ulo wer# Arling in wonder, who is it? What is this noise fu?"llon afinal of illo teapons and blind with sleep, 70 The them. with that noise, ।

172971 Sruptik Parv सीप्निापर्व (७२०७ बनुः स्याने तत्राय कालेनाभिप्रचोदिताः ॥ २६ ॥ सत्याद्वाराणि च द्वास्थानमा गुलमानि गौरिकाः। प्राद्रवन्त यथाशात कान्द्रिशीका विचेतसः ॥ १७ ॥ विप्रनष्टा वतन्योन्य नाजानन्ती तथा शिमो । कोशलतात पुति चोपहनचेतसः ॥९८ पला यतां दिशस्तेषां तानप्युरसज्य घान्धवान् । गोमनामभिरन्योन्यमाक्रन्दन्त ततो जनाः ॥ ९९ ॥ हाहाकारऽच कुर्षाणाः पृथिव्यां शेरने परे। तान युध्वा रणमोसो द्रोणपुत्रो म्पपातयत् ॥ १०० ॥ तत्रापरे घध्यमाा मुहुर्मुहुरचेतसः । शिविरानिष्पतन्ति स्म क्षत्रिया भयपीडिताः ।। १.१॥ वांथ निपततनताग्छिविराजजीवितैषिणः। कृतवर्मा कपाचघ द्वारदेशे निजातुः ।। १२ । विशनपरवान्मुकशान कृतांजलीन् । पेपमानान क्षिती भीताग्नेश कांश्चिमुच्यतान । १०३ ॥ नामुन्यत तयोः कश्चित्रि 'शांत:शिवराहीहः । कृपस्य च महाराज हार्दिक्यस्यच दुर्मः ॥ १.४ ॥ भ्यश्चेष अन्धकारसे घिरे और कालसे मेरित लोगोंने वहां उनको मारा । १६ । इसीप्रकार द्वारपाल द्वारोंको और गुल्मकाले लोग गुल्मोंको त्यागकर के भयभीत और अचेत होकर सामर्थ के भनुमार भागे । ९७। और परस्पर नाश होगये इसीपकार एक ने दूमोको नहीं पहुँचाना आने वालों को छोड़कर दिशाओं को भागते उन लोगों के मेध्यमें से देवो व्यथित चित्त मनुष्य पुकारे हे पिता हे पुत्र इसके पछि लोगोंने गोत्र और नामोसे पासपर पुकारा । ९९ । और कितने ही हाहाकार कर के वापर गिरपड़े इम असाथामा ने युद्ध में उनको जानकर रोका । १० । और बहुत से क्षत्रिय वारंवार घायल और अंग्रेस और भय से पाईवान होकर रे वाहरगने । १०१ । उन भगभात जीवन के इछावान डेरे से निकलने वालों को तापी कृपाचार्य ने द्वारस्थानपर पारा । १०२ : जिनके यन्त्र मार कवच गिर पड़े वह तुरहुये बाल हाथ जोड़े वृथ्वीपर कम्पायमान और भयभीत थे। १०॥ उनमें से किसीकोमी नहीं छोड़ा डेरेसे वाइरनिकलनेवाला कोई भी मनुष्य उनदोनोंके हाधमे बचकर नहीं गया हे महाराज भज्ञत्यापा प्रिय करने के अभिलापी उन another. The loor kırpers, and camp solung dezerted thoir posts and ran away with all their might Thoy dusts oged one another without scing. Lorving their livesinon, they dispersed in all directions and callou out fur futhois and snde in confusion. They announced their clansuod caines. Some full down on eart's with cries i diumay tind Ashtatlınma cherhed theni in their flight. 100. Many warriors, founded and insensiblo mith fear tried to go out of tho camp to Rave their lives; but they nere slnin by Kritrarma and X ripachary's win were stationed at the entrane. Thu Farriora, destitute of arms and asinone, with dishevelled hair as d clasped tands, Iny on earth, tromliling with fear. Vouc of those who tried to scopo fioin the camp for their lises, cronblo to scope froin Kripacharya and Kritvarma. To picas Ashvatbana, they act fire to camp frumos 7296 1 (७२९६) Mahabharab पुरीषवसृजन चित् फेचिन्म प्रमुखः । पन्धनानि च राजेन्द्र सच्छिद्य तुरग द्विपाः ॥ ८७ ॥ समं पर्यपतंधाग्ये फुर्वतो मादाकुलम् । तत्र फेमिनरा मीता व्यर यात महीतले । तथैध तानिपतितानपिन गजवाजिनः ॥ ८ ॥ तस्मिंस्तथा वर्तमा रक्षांसि पुरुषर्षभ । दृष्टानिध्यनदन्नु चर्मुस भरतसत्तम ॥८९॥ स शब्दः परितो राज भूतसंधैमुदायुतैः । अपूयोदशः सर्या दिवशातिमहास्यनः ॥ ९० तेषामास्वरं श्रुत्व चिषता गावाजिनः मुता. पर्यवनप्राजन् मानन्तार्शविरे जनान् ॥ २१ ॥ परिधापसिधाणोदीरितं रजः। अकरोच्छिविरे तेषां रजन्यां द्विगुणं तमः ॥ ९२ तस्मिस्तमसि सज्जारो प्रमूढाः शिीवरे जनाः । नाजानन पितरः पुत्रान् प्रहिन ना एश्च ॥ १३ ॥ गगा गजानतिक्रम्य निर्मनुष्यान या हपान । अताइय स्तथाभजस्त थामदन भारत ॥९४॥ ते भग्नाः प्रपतलिस्म निहनन्तश्च परस्परम् । चान्यान पातयिरवा सदापिषन् । ५॥ विचेतसः सनिदाच तमसा वातान कितनाही मूत्रका करदिया हे राजन्द्र हायाघाडे यन्यनोंको तोड़कर । ८ । ओरको दौड़े और कोई महाब्याकुलता उत्पन्न करनेवालहुये वहांकितनेही भादमी पृथ्यापर सोगये उसीपकार उन पड़ेहुओं को हाथी और घोडों ने किया । ८८ । हे भरतर्पण पुरुषोत्तम इसमकार उस नाशके वर्तमान होनेपर : लोग प्रसन्न होकर बरे शब्दसे गगें । ८९ हे राजा प्रसन्नचित्त जीवोंके से किया वह शब्द सर्वत्र व्यास होगया उपबड़े शब्दने सबदिशा और पूर्णकिया । ९० । उन्होंके पाड़ित शब्दोंको सुनकर-भगभीत और बन्धनों से हाधीघो डरमें मनुष्यों को खूदते मर्दन करते चारोंमोर को दौड़े । ९१ । वहाउन चारों ओर दौड़नेवालों के चरणों से उठीईई धूलन रात्रिकममय उन्होंके डेरोंगे दुई अचारको उत्पर किया । ९२ । उम अन्धकार के उत्पन्न होनेपर मनुष्य ओरसे शज्ञान हुऐ पितामोंने पुत्रोंको न जाना भाइयों ने भाइयों को. । ९१ । हाथियों ने हाथियोंको सवारों से रहित घाड़ान घोड़ोंकोदवाकर और टूटे अंगीकया सीप्रकार मदन करते परस्पपर मारतेहुपे बहसव घायल : पड़े इनकार अन्यों को भी गिराकर मर्दन किया। १५ । अचेत निद्रासे, and horros brule their ri pot and ran in u]l' directions. Some Jay on eas th ont of four and wels ern-int down by thephants loides, Dating that destruction tho rakshases roared die Ar Pocry wegs laurhlub ul{ round aid the noise xprend Through direction: 90, At the sounts of their whililiys, clephante and broha their roles nnd an army trushirgsnd trampling the per, their way. The dust rnised by their frit made the night.nl Paripo lost their s nses in that dukness: fathery diuotko thvir snus omul bruthers cliu Gut re o brothers, wounded wirplanty and the iidsilts} htnels roundel and borgen 95. In40119ıblo with slser and Julness, they slow - dark .

- 7297- Sruptik PIY सौनिकपर्व (७२२७ सध्नुः स्थानेष तनाथ कालेनाभिप्रचोदिताः ॥२६॥ त्यरत्याद्वाराणि च द्वास्थानथा गुलमानि गौमिकाः। प्राद्रवन्त यथाशक्ति कान्द्रिशीका विचेतसः ।। ९७ ॥ विप्रनष्टा चतन्योन्यं नाजामन्ती तथा विभो । कोशनस्तात पुति चोपहनचेतसः ॥ ९८ पला यता दिशस्तेषां तानप्युत्सृज्य बान्धवान् । गोत्रनामभिरन्योन्यमाक्रन्दन्त तनो जना: 11 ९९ ॥ हाहाकारञ्च कुर्षाणा: पृथिव्यां शेरले परे। तार युध्या रणमसी द्रोणपुत्री पातयत् ॥ १०० ॥ तत्रापरे पश्यमाना मुहुर्मुहुरचेतसः । शिवरानिपतन्ति स्म क्षनिया भयपडिताः ॥ १.१॥aiश्च निणततनतान्छिविराज्जीवितैषिणः । कृतवर्मा रूपाचघ द्वारदशे निगमगातुः ।। १०२ विशन करवान्मुक्तकेशान् कृतांजलीन् । क्षेपमानान क्षिती भीतानैर कांश्चिमुच्यतान । १०३ ॥ नामुम्यत तयो. कविवत्रि क्रांतः शिपिरावीः । कृपस्य च महाराज हार्दिक्यस्यच दुर्मः ॥ १.४ ॥ भ्यश्चेष अन्धकारसे घिरे और कालो मेरित लोगोंने वहां उनको मारा ! १६ । इसीप्रकार द्वारपाल द्वारोंको और गुल्मकाले लोग गुल्मोंको त्यागकर के भयभीत और अचेत होकर सामर्थ के भनुमार भागे । ९७१ मार परस्सार नाश होगये इसीमकार एक ने दूमोको नहीं पाँचाना आने वालों को छोड़कर दिशाओं को भागते उन लोगों के मेध्यमें से देवने व्यथित चित्त मनुष्य पुकारे हे पिता हे पुत्र इसके पोछ लोगों ने गोत्र और नामोसे परस्पर पुकारा । ९९ । और कितने ही हाहाकार कर के पृथ्वी पर गिरपड़े इम असायामाने युद्ध में उनको जानकर रोका । १०. । और बहुत से क्षत्रिय वारंवार घायल और अति और भयसे पीड़वान् होकर रे वाहरगो । १०१ । उन भाभीत जीवन के इच्छावान डेरे से निकलने वालों को कार्मा कपाचार्य ने द्वारस्थानपर मारा । १०२ । जिनके यन्त्र और कवच गिर पड़े रह खुले हुये वाम हाय जोड़े वृथ्वीपर कम्पायमान और भयभीत थे। १०॥ | उनसे किसीकोभी नहीं छोड़ा डेरेशे वाइरनिकलनेवाला कोई भी मनुष्य उनदोनोंके हाथमे बचकर नहीं गया हे महाराज भशयामा प्रिय करने के अभिलापी उन another The door kırpory, and camp soldiers dersted their posts and Top Ayxy rith all their might Thor drsti oged one another without seeing. Loaving their kinsinon, they dispersed in all directions and called out for fathos and sons in confusion. They announced their clans and names. Some full durn on eart's with cries of diamay und &shwatliama cher ked them their light. 100. Many Warriors, wounded and insentiblo with fear tried to go out of tho Carnp ta 83 ve their livov; but they woc plnin ly I ritrarms and Kripnchnrya who were stationed at the entrance, Thn Tarriore, destitute of arıs ani armour, with disheveiled lair A. d clasped tands, lny on carth, trenubilieg vil lent. Noue of those who tried to scopo from the camp for their lises, acre ablo to rape frora Aripacharya To plear Ashwathama, they ret fire to camp from and Kritvarma रातम thabarat. (7298) घापन्ना द्राणपुष नामयम् न देणु दातुः शिविर हुताशन ! १०५॥ तत प्रकाश शिविर पडूगेन पितृगन्दनः। अश्यायामाहागज ६६चमान्तयत । १०६ रुश्विदापतनो बार चैत । व्यदं जात रूगन जिप ॥ १०७ । काश्यिद्य धन स खड़गेन मध्ये साध्य शर्यवान् । अपानयद्रोण पुरः संरब्धास्तलकापन् । ॥ विनाश शास्त नरावारदात्तमैः । पतितरमवत् कोणी मेदिनी भरतर्षभ। १०९ । मानुपाणा सामेषु इत्तेपु पतितेषु च ।'उदातन कयाधानि ययुस्थाथ बापतन ॥ ११० • सायुधान् साङ्गदान वाधिषक शिशिच । हस्तिहस्नो पमानान इस्तान पादाच भार..:११ ॥ पृष्टान्नान शिरिपिछेनान् पाश्चमिछलिया परान् स महात्माराद्राण. कांश्चिध्यापि समुताम् ॥ ११२॥ मध्यदर्श मरानन्याधिन्छ कृपाचार्य और दुर्बुद्धी वृत्तवर्माने डेरोंके तीनोंओर आग्नलगादी । १०५ । फिर देरों के प्रज्वलिन और प्रकाशित होनेपर पिणको प्रसन्न करनेवाला, अश्वत्थामा इतलायोक समान खद्गको लर घूमने लगा । १०६ । कितनेही आनेरात और दौड़नेगल पारोंको सद्गद्वारा मोसे रहितकिया और ब्रामण श्रेष्ठ परा- क्रमी पाश्वत्थ मा ने कितनही शूरवीरों को खड्गके द्वारा मध्य से काटकर क्रोध युक्तने तिलकाण्ड के समान गिराया। १०८ । हे भरतम भगत घायल मर्मत गिरते मनुष्य घड़े और हाथियों से पृथ्वी आरछ दितईई ११०९। इशारों मनुष्यों के मरने और गिरने पर बन रुएड उठे और उठकर गिरपढे ।। १० । शख और चाजूद रखनेवाली भुनाभों समेत शिरको कार्य भोर हाधीकी मंडके समान जंघामों को और हाथ पैरों को काटा। (११॥ हे भातांशी दूटो पाठक्षि और शिरलि अन लोगों को गिराया उस महारमा अश्वत्थामा ने कितने की मनुष्यों को मुखफेरनेवाला किया । ११२ किमीको कान से स्थानपर औरकिसी को कटिस्शनपर काटा किसी को कन्धे के स्थान पर घायल करके शिरको शरीर में प्रवेश किया । १.१३ । इसमकार उम के घुमते और बहुत भादियों को मारते all si lux 105 When the city wilt thus illusine As's syathinnin tho joy of his (atlıer roamod doxturou.ly with his sword. Ilu killed the aning and running Hallory with his swurd, He cut soine in the middle and others ints pitconial. The ground war corared with | AnAn and benst", wountlet, cyng And falling down. At thofall of thousands of men, hindlean Ledies ToBe and fell dirun again. 110. lle cul darn the jeweller hands and bondy na vyoll at thighs liko tho trurha of cloprants and band, and foot. IIe cut nuder the bache, wils and heade nf others linny iFnrriors turned licki fum Ashsa. thanı. He cut the ears and trunha of fome and wounded there on tho shoulders ingling their beide enter ileir Lodil & While he was thun roaming and billing, the night became dreadful to behold. Tho .. (7299 Supiln Tarv सोप्तकपर्व (७२९५) दाम्यां फर्णनः बिमदेशे नि पान कायप्राशयपिछरः॥११३ एष विक्षरस्तस्य मिन्नतः सघनराम् । तमसा रखनी घोग धमी 'दारुणदर्शना ॥ ११४५ किचित् प्राणश्च पुरुषोहंतश्याम्प सहनशः । नाच जान भाई म १.५ , यक्षरक्षः सम की रथाश्वद्विपदारुणे । मुद्धेन द्रोणपुत्रेण सच्छिता. प्रापतन भुमि ५ ११६ ॥ मादमाये पितृमन्थे पुमानाय निशुः । चिराचुन र त् फ्री गिप्टैः कतरा११७॥ यत्कृतनप्रसुप्तामरिक्षा फरफीभ असानिध्यादि पायानामिदन पदनं कतम् । १९८ ॥ मदेवासुरगन्प्रनयन के पक्षमै. । शो विजेतुं कौनयो गता स्य बनाईनः ।। ११९ ॥ ब्रह्म: सावधाग्दांत: सर्व भूतानुकम्मकः । म स सुतंप्रमत्त पापस्तवशास्त्र मताहिम । शयन्त मुत्त के शम्घान्ति पाणे घाय ॥१२०: तदिद मः कृतं घोररक्षागि ऋचमीमः । इति लालायमानाः म्म शेरते पहनो जनाः ११॥ स्तनता मनुष्याणामपरेषाञ्च सत्ताम। समा मसात् प्राशाग्पास दस्तुमलो हो भन्मकार से यह रात्रि घोर कप महाभयानक दशन देखनेम आई । ११४ । कुछ कण्ठगत माणपाले कुछ मृतक हजारों मनुष्य हाथी और घोड़ोंसे पृथ्वी भया नफरूप देखने भाई । ११ । पक्ष राक्षसों से संयुक्त ग्य घोड़े और हाधियोंसे भवानक रूप पृथ्वीके होनेपर क्रोधयुक्त मयत्यामाक हाथसे घायलोकर पृथापा गिरपड़े । ११६ । कोई माइये को कोई पिनाओं को और पुत्रोंको पुकारत या गौर किवन हो वाले कि यद्धा क्रोधयुक्त धतगप्टके पुत्रोने भी वह कर्म कियाथ जो मिर्द या राक्षसोंने हम सोनेष लों के साथ किया पांडवों के वर्तमान होने से यह हमारा नाशकिया। १८ । वह अर्जुन अपुर गन्धर्व यन और राक्षस से भी विभप करनेके योग्य नहीं है जिसके कि रक्षक श्रीकृष्णजी । ११९ वह अर्जुन घेद ब्राह्मणों का रक्षक जितन्द्रिप भार सब जीवधारियोंपर छपाकरनेवाला हैमा पाण्डघ अर्जुन सोनेवाले मतवाले अश्त्र हाथ जोड़नेपाल खुले केश और भागनेवाले मनुष्योंको नहीं मारताहै । १२० । निर्दयी राक्षसों ने हमारा गह नाशकिया इसमकार विलाप करते हुये यहुनसे मनुष्य पृथीपर सोगये । १२ । ground looked dreadful with the dying and dual neinn bersta, 115 Full of sokshes, ia kehases, cars, horses and elephants, cut down by Ashtathama the groand was dreadful to behold Soms enllad rut their brothers, Inthers and sons, rhile others said, " The ral.el.nna bare dont the name with the sleepera as tho sous of Dhritruslitra did in daglight in the presence of the PadAFn. Having Slui Krislın for luis protecior, Arjun is invincible by Asurs, kandharone, jakohes ard inhaliace. Aijun is the protector of llic V.dra und brahmons bas control over this organs and is morcilul to all bingx. Hndors not ray to hepng medner lers, nor thee. •rh.. scol refuge ritii dishe sellid hir and jiint hands. 120. Tlecul (7 (७३००) Malhnbharat महान् । १२२ ॥ शोणितानिरिक्तायां वमुघायाच भूमिप। तमस्तुमुल घोरे क्षणे नांतरधीयत ॥ १२३ । सप्टमानानुद्विग्ननिरुत्साहान्महमशः । पपातयनराम् क्रुद्धः पशन पशपनिर्यथा ॥ १२४ ।। अन्योन्य संपरिचय शयानान् यतोऽपरान् संलीनान् मुम्मानाश्च सर्शन् द्रोणरमाधवन ।। १२९ ॥ दद्यमानान हुनाशेन पाप गानांश्च तेन । परस्पर तदा योधाननयघमसादनम् ।। १२६:॥ तस्याजन्तास्त्वयन पाण्डसनो मावलम् । गमास गजेन्द्र द्रौणि मिनिशनम् ॥ १२७ । निशाच राणा सत्यानां रात्रि सार्ण पईनी । मासीनरगजाश्यानां राद्री क्षयरी भृशम ॥१२८ तबादश्यन्त रक्षामि पिशाचाश्च पृथग्विधाः । स्वादन्तो नरमापनि निरन्तप शोणितानि च ॥ १२९ । कराला. पिगला रोद्राः शलदस्ता रजस्सला । जटिल दाम सक्थाश्च पञ्चप दामोदरा । १३० ॥ पश्चादंगुलया रुक्षा शिसपा भैरवस्थना । इसकेपछि एक मुहू तमेंही पुकारते और गर्मतेहुये अन्य मनुष्पों का वह बहुतबड़ा शब्द बन्दहोगया । ।२२ । हे राजा हघिरसे पृथाके अच्छेश्कार तरहोनेहर वह घोर मोर कठिनधूक एकक्षणशी दरहोगई । १२ ।' उसकोषयुक्तने चेष्टाकरनेवाले याकुल भार उत्साह रहित हजारों मनुष्यों को ऐसे गिराया जैमे कि पशुओं को रुद्रनी गिराते हैं । १२४१ वा भवस्यामाने पृथ्वीपर गिरहये मनुष्योंको परस्पर मिलकर भागनेवालों को और किननेही गुप्त पद्ध करनेवालों को अत्यन्त मारडाला । १२५ । सा भाग्नमे जलनेवाने और उस अश्वत्थामाके हायसे घायल उन शूरवीरों ने पास्पर यालो कमें महुँ गया । १२०॥राजा अश्वत्थापाने उसके मदभागमें पाण्डवां की बड़ी सेनाका यमलोक में पहुंचाया । १२७ । वह रात्रि राक्षसों की प्रसन्नता बढ़ानेवाली मनुष्य घोड़े और हाथियों का भय उत्पन्नकरने वालाहीकर महाकठिन नाशकारी हुई। २८ । वहां पृथ्क २ प्रकार के पिशाप गवस मनुष्यों के मांसको वात और रुधिर को पीते हुये दिखाई पड़े। १२९ । जोकि कराल पिङ्गल वर्ण पर्वताकार दांत रखनयाले धूलसे लिप्त जटाधारी लम्बे माव पांच पैर और बड़ा उदर रखनेवाले । १५० । पछिकी भोर उँगलियां रखने rahslases have destroyed us, Thus crying and lamenting, inany Warriors lay on cuth. After One time, the noro uf men and beasts subsided and the ground being well dreuched with blood, tho storm of dust fiad disappeared Lnraged Ashwathaun haid clain thousands of warriors as Kudia dnes Laste. Ho furpated tho men fallen on the ground 29 well as thosa rho puto ruoung asing or fighting froin a hiding pla v. 123, 81ng by fira ani voanlod by Aslın atlınman, ti.obaro w trriors xlo s one author. Aslıtha na dostroyed tho great l'anav ai uig during that midaglit which gave pleasure to jakshasoy and fear and I stiuctiou to on nnd binste. Pistacles and rabslaseg word soon dating thio flesh of men and draith. .

173001) सौप्तिकपर्यsruptik Parv (७३०१ घण्टाजालानवशाय नीलकण्ठा विभीषणाः ॥ १३१ ॥ सपुत्रदाराः मरा. मुर्दशा मुनिघणाः । विविधानि च रूपाण तत्रादृश्यन्त रक्षसाम् ॥ १३२॥ पात्वा च शोणितं हाः प्रानृत्यन् गणश. परे । इदं पामिद मेध्यमिदं स्मादिति चायन् ॥ १३३, मेदो मजास्थिरताना सानाऽत्र शशिता. परमांसानि स्वादन्तः फव्यादा मांसजीयिनः ॥ १३५ ॥ वसाधंधापरे पीत्या परमेधावन् विकुक्षिफ': । नानावस्त्रास्तथा गैद्राः क्रव्यादाः पिशिताशिनः । १३५ ॥ मयुतानि च तमासन्प्रयुतन्यर्युदानि च। रक्षसां घोररूपाणा महत्ता करकर्मणाम् ॥ १३६ ॥ मुदितानां वितृप्तानां तस्मिन्महति येशसे । समेतानि वन्यासन भूतानि च जनाधिप १३७ ॥ प्रत्यूपफाले शिविरात् प्रतिभन्तु मिषेष सः॥१३८॥ नृशोणितावसिक्तस्य द्रोणेरासीदसित्सहः । पाणिना सह सीरलष्ट एकीभूत इष प्रभो ।। १३९॥ दुर्गमा पदवीं गत्वा विरराजजनक्षये। युगान्ते सर्वभूतानि पाले कुखे कुरूप भयानक शब्दयाले घण्टागाल से युक्त नीलकण्ठ भप उत्पन कर 'नेवाले पुत्र त्रियोंको साथ रखनेवाले निर्दयी दुर्दर्शन और दया में रहित थे वह राक्षसों के रूपभी अनेक प्रकारके देखने में आये । १३२ । कोई सरिरको पान करके प्रसन्न चित्र होकर नृत्य करने गे और कहते थे कि यह उपमह यहपवित्र है यह स्यादैहै ।११भेजा मज्जा अस्थि और रुधिरको अच्छीरीतिसे भक्षण करने वाले रुधिरसे अच्छे प्रकार तृप्त हुये मांससे जीवनेवाले वह गक्षस अन्यलोगोंके मांस खानेसे तृप्तयो१३४इसीप्रकार नानासकारके मुखरखनेवाले कोई रुद्ररूप मांसभक्षी बड़ा उदर रवनगले राक्षम मज्जा को पान करके चारोंऔर को दौड़े। १३५ । वहाँ निर्दय कर्मी भयानकरूप बड़े राक्षसोंकी संख्या हजारों किरोड़ों और भवंदों थीं। १३६ । हे गगा उसवनाश मनन्न चित्त अत्यन्त तृप्त राक्षसोंकी यःसंख्या थी और बहुतमे भूतगण भी इकट्ठहुये । ११७ । उसने प्रातःकाल के समय उसडेरे' से निकलनाचाहा । १३८ । मनुष्य के रुधिरों से लिप्त अशत्थामा का खड्ग हायसे चिपटाहुआ एकरूप होगया हे प्रभु वह अवस्थामा दुःखसे मिलनेवाले मार्ग में जाकर मनुष्योंक नाश ऐसा शोभायमान हुआ जैसे कि मलयकाल में सवीवों को ing their blood. They lad dreadful forms, yellow colour, hugu teeth' dust stained lair, long coachs, five teo“, large b lly, t ses tui nad backward, die dful visage, with bells and net , bluo the ones, deadlul women, accompained by women and sung, crue', bud looking unmorcifuj and of various toms Some felt joy at drinking blood and danced, saying "}t in go ti, holy and delhous." They ute flesh, lat and bones and were rat.-tce with dryking blond S ne dondul Cannilale, with la o bllics, fed 6 lat and an litir aoi t''ither. 135. Tuo cruel and dreadful orislınts were tulion in number, luich was augmcnto hg & bluns. With his arm and swuid of the kamo huo, Ashinathaua wishod to goout of the camp in the morning and 132 (७३०२) Mahabharat (7302) भस्म रुघव पावकः।। १४० ॥ पयाप्रतिज्ञ तत्कर्म कृत्वा द्रौपायनिः प्रभो । दुर्गा पदी गच्छन् पितुरासीन्द्रतज्वरः ॥ १४१ । यथैव समुप्तजने शिविर प्राविशनिशि तथैव हत्या निःशद निश्चमाम नरर्थभ ॥ १४२ ॥ निष्क्रम्य शिविरासत्माताश्या सङ्गम्य वीर्यवान् । आयख्या कम तत् सर्व दृष्टः सहर्षगन् विभो ॥ १४३ ॥ तायप्पा घण्यतुस्तस्मै प्रियं प्रियकरी तदा । पाञ्चालान सजयाश्र पिनिकृत्तान् सहस्रशः। प्रीत्या चोच्चैरुदकोशस्तथैवास्फोटयस्त लान् ।। १४४ ॥ एवं विधा हिसा रात्रि सोम कान जनक्षये । प्रसुप्तानां प्रमत्तानामासीत् मुभृशदावणा १४५॥असंशयं हि कालस्य पर्यायो दुरतिक्रमः । तादृशा निहता यत्र त्यास्माकं जनक्षपम् ॥ १४६ ॥ धृतराष्ट्र उवाच । प्रागेध महत्कर्म द्रौणिरेतन्महारथःनाकरोदीदशं फस्मान्मत्पुत्रविजयेधृतः ॥ १७ ॥ अव कस्माते क्षते कर्मेद कायानसौ । द्रोणपुत्रो महेपासत्तन्मे संशितु महसि ॥ १४८ ॥ सञ्जय उवाच । तेषां नूनं भयानासी कृतवान् करुनन्दन । असान्नि भस्मकरके अग्नि शोभायपान होताहै । १४० । हे मभुवह अश्वत्थामा प्रतिज्ञा के अनुसार उस कर्मको करके पिताके दुष्माप्य मार्गको प्राप्तकरता सापसे रहिन हुआ १४१॥ वह नरोत्तम जैसे कि रात्रि में सोनेवाले लोगों के समान डेरेमें पहुँचा उसीप्रकार मारकर देरेकै निश्शब्द होनेपर डेरेसे वाहनिकला।१४२।उस डेरेमे निकल उनदोनों से मिलकर प्रसन्न और प्रसन्न करते उम पराक्रमीने उनमन कर्मको वर्णन किया हे समर्थ तवउन विजय करनेवालों ने उस प्रिय वचन को उससे वर्णन किया कि हमने डेरेसे निकलनेवाले हजारोंपांचाल और सब्जियोंको मारा वह प्रसन्नता समेत बड़े | वच्चस्तरमे पुकार और हाथकी तालियोंको वनागा । १४४ । सोते और भवेन सोमकों के नाम वहराने इप्तमकारकी कठिन और भयकारी हुई । १४५ । निरुपन्देह समपकी लोट पोट दुःखमे उल्लंघनकरनेके योग्यहै जहां कि उस मकार के वीर हमारे मनुष्योंका नाश करके मारेगये । १४६ । धृतराष्ट्र बोले कि मेरे पुत्रकी विषय प्रवृत्तचित्त महारथी अश्वत्थामाने प्रथमदी इस प्रकारके कठिन कर्म को कैत नहीं किया । १४ । उमनीच दुर्योधनके मग्नेपर उममहात्मा अश्वत्थामा ने किसहेतुमे उस कर्मको किया वह सब मुझसे कहने को योग्यहो । १४८.। संयन looked glorious liko tho line in pra'ays. 140. Hiving done the dood to avenge his father's denth, he felt clicerful. He left the camp AS noiseleos as it was s ben ho entered it at midnight. H) met his two frivnds and cheored them by relting his exploits. They also told him thr cherished nows of their own victory and laughter of tlou: Bands of Panchals and Srınjryas, They shouled fur joy and clapped their hands Tho alocping Somaka had been slaughtered during that dreadiu ught. 145. Surely the thunges of Time are hard to be paseod over; for those who had stain our men wore them pluca plain " Dhritrashtra 8711, Wl'hy did Ashwathinina not do a deed liho this though ho raesIntent ormy.niantry thyrl hado it at the 1 (7303 Sauptth Parv सौप्तिकपव । ७३०३) ध्या पार्शगंशयस्य च धीमतः 1 सात्यापि मेंदें द्रोणपुत्रेण साधितम ॥ १४९ । कोहि तेषां समक्ष तान् न्याटपि मरुत्पतिः । एतदीशक वृत्तं राजन् मुप्त बने घिमा। १५० ॥ ततो जनक्षय फरवा पाण्डवानां महा गया ! दिष्ट्या दिष्ट्रयोति चान्योन्य समेत्योचुर्महारथा ॥ १५१ ॥ पर्यघजत तो द्रोणिस्ता या संप्रतिनन्दित.। इदं हाच मुमहदाददे पाक्यमुत्तमम् । १५२ ॥ पाञ्चाला निहनाः सः द्रौपदेयाश्च सर्वशः । सोमका मास्यशेगाश्च सर्व विनिहता मया ॥ १४३ ॥ इदानी कृतकृत्या स्म याम तर मा चिरम् । यदि जीवति नो राजा तस्पै संशामहे प्रियम् ॥ १५४ ॥ इति मौप्तिकपर्वणि पांचालादिवधेऽष्टाध्याय ८॥ बोले हे कुरुंनदन निस्संदेह उस अश्वत्थामाने उन पाण्डवों के भयसे इस कम्पको नहीं किया पाण्डव केशयनी और मात्यात के वर्तमान नहोनेपर अध्यत्यामाने इस कर्म का साधन किया । १४९ । उन्हों के समक्षमें कोई मनुप्प तो क्या इन्द्रमी नहीं मारसक्ताथा हे राजा रात्रिके समय मनुष्यों के सोने पर ऐसा वृत्तान्त हुआ । १५० । फिर पाएडवों के लोगोंका कठिन नाश करके वह महारथी परस्पर मिलकर बोले कि दिप्ट्या दिष्ट्या अर्याद मुवारक मुवारकहोय । १५१ । इसके पीछे प्रसन्न कियाहुआ अश्वत्थामा उन दोनोंसे स्नेह पूर्वक मिला और प्रसन्नतासे इस उत्सम और बड़े पचनको वाला कि सब पाञ्चाल और द्रौपदी के पांचो पुत्र मारेगये शेप यचहुये सब सोमक और मत्स्य देशाभी मेरे हाथसे मारेगये । १५।। अहम काप कृत्य हैं यहाही चलें रिलम्ब मतकरो जो हमारा राजा जीवताहै हम उमेस चककर वर्णन करें । ९५४ । fall of Duryodhant Play tell me a this. " Banjnya sard, " Burely, ho did not do it before for fear of the Pandasna. He was able to perform it in the absence of the Pandarar, Kohar and Satynki. Not evon Indra can cope with thnse prisonages. He did it then tho warriors were asleep 150. Having destroyed the Pandat wrriors, the three bcrocs congratulated one another. Ashwathamna embraced the two mon joyfully and said, "11 he Panchals and the five sons of. Druupali aro slain libc the Srtnake and Natsfas (care ants happy Let us go and inform the ling rithout delay, if it be yet alive."154.

[७३०४) Mahstbuat (7:304) सञ्जय उपाध । ते हत्वा सर्वपाञ्चालाम् द्रौपदेयांश्च सर्वशः। प्रागच्छन् साहि नास्तत्र यत्र दुर्योधनो हतः॥१॥ गाला चैनमपश्यन्त चिञ्चित्प्राणं जनाधिपम् । ततो रथेग्य प्रस्कन्ध परिवस्तवात्मजम् ॥ २ ॥ तं भग्नसमर्थ राजेन्द्र कृच्छ्रमाणम सेतमम् । पमन्तं रुधिर धनादपश्यन् घसुधानहो । ३॥ त समन्ताद हुमिः श्वापदे |'दर्शनः । शालावृकगणै भैव भक्षायपद्धिरस्तिकात् ॥ ४॥ निधारयनं कृच्छ्राचान श्वापदांश्च विखादिन् । विधेटमानं महान सुभृशं गाढवंदमम ।५१ तं शपानं संथा तथा दृष्ट्वा भूमौ स्वरुधिरोक्षितम् । हनशिष्टानया बीराः शकाचा पर्यवारयन् । अश्वत्थामा छपश्चैव तया च साश्यतः ॥ ६ ॥ तनिभिः शोणितदिग्वैश्मिसान महारथैः । शुशुभे शवृतो राजा वेदी त्रिमिरियाग्नमिः ॥ ७॥ ते तं शयान संप्रेक्ष्य राजानमतथोचितम् । अविषान दुःखेन ततस्ते सरुवुन ८ ॥ चतस्तु रुधिरं हस्ते मध्याग ९॥ संजय केले कि वह तीनों मा पंजा और पांचो द्रौपदी के पुत्रों कोमार कर एकसाथही नहीं गये जहां कि घायल दुर्योधन था। १ । और जाकर कुछ शेप मागवाले राजाको देखा इसके पीछे रथोंसे उतरकर आपके पुत्रको मध्यवर्सी किया। १ । हे राजेन्द्र उन्होंने उम टूटी गंध और माणों से पीडावान् अवतार मुंबले रुधिर डालने वाले राजाका पृथ्वीपर देखा । ३ । भयानक दर्शनवाले बहुत से हिंसगीवाने युक्त और समीप से भक्षण करने के भीभनागी शूगाला दिकके समूहोंसे घिरड्ये । ४ । खाने के अभिलापी भेड़िा आदिकको दाख से रोकनेवाले पृथी पर चेष्टा करनेवाले कठिन पीड़ावान् । ५ । रुधिर से लिस उस मकार पृथ्वीपर सोनेवाले राजा दुर्योधनको देखकर मरनेसे शेपरचे शोकसे पाडावान तीनोंपीरों ने चारोंसे उसको ब्याकिया अर्थात् अश्वत्थामा, कृपाचार्य और यादव कृतवर्मा 1 ६ । रुधिरसे लिप्स वासलेनेवाले तीनों पदाथियों मे संयुक्त वह राजा ऐसे शोभायमान हुभा जोकि तीनो अग्नियोंमे वेदी शोभायमान होताहै । ७ । पीछे बहतीनों उमदशाके अयोग्प पृथ्वीपा पडेहुये राजाको देखकर असह्य दुःख समेत रोदन करनेलगे । ८ । फिर युद्धभुमि में सोनेवाले उम रानाके मुखो रुधिर CUAPTER IX Sanjaya 2:0," Baung thun the fire soce of Draupndi, the tue winias ivent to the pl.co wlicie Duryodł nn "ha lying Thoy any fuim at the point of death and went to him from their care They found inm lying on tarth, with his thigh borokon, in-eos blo in tira agonios of death and I lood onming out from his mouth many adro d'ul heat of prog, and jucini, wishing to dun our kis body, Firudd hurti. Sosin: Vur sodhan incapıblo of kerp ny volva; and other animunla ntaulistanca, isotmeo sarrior, Ashwathama, Kripaharga anl Kritya.my_came round him. Accompanied by ths threa.bloody wounded K7305 Sauptik Parv मीप्तिकपर्य ७३०५ मसानिमृग्य तम्य हि । रणे गा शयानस्य रुपण यंदेवयन् १९॥ कृप उपाच । न देवस्यातिभारित यदवं रुधिगौक्षित । एकादनाचममा शेने दुर्योधनोहतः ॥१०॥ पश्य चामीराभस्य चामीफरघिभूषिताम् । गदागदाप्रियस्यां समीपे पतितां भुधि ॥ ११ ॥ इयमेन गदा शूर न जहाति र रणे । स्वर्गाचापि प्रजन्तं ह न नहाति यश स्विनम् । १२॥ पश्यमा सह धारण जान्नदविभूषिताम् । शयाना शयने हम्य भार्यो प्रतिमतीमिय ॥ १३ । योय पूर्वाभिषिक्तानामग्रे यानः पान्तप । स हतो प्रसते गांशन परश कालस्ये पर्ययम् ॥ १४॥ येनाजो निहतो भूमावशेरत हतद्विप। स भूमी निहतः शेते कुरुराज परेरयम् ॥ १५ ॥ भयान्नमन्ति राजाना यस्य स्म शतसंघशः । सवीरश यने रोने कन्यादि परिवारितः ॥ १६ ॥ उपासन्न द्विजाः पूवमर्श हेतोयमीश्वरम् उपा सते च तं वद्य ऋव्यादामांसहेतघः ॥ १७ ॥ सम्जय उयांय । तं शयानं कुरुधेष्ठ ततो को अपने हाथों से सफाकरके करुणापूर्वक विनाप किया । ९ कृपाचार्य वोले किदेवका बड़ाभार नहीं हैं जो यह ग्यारह अक्षौहिणी सेनाका सामी राजा दुर्योधन रुधिर से लिप्त घायल हुभा पृथ्वीपर सोताहै । १० । इस सुवर्णके समान प्रकाशमान सवर्ण जटित रानाकी गदाको पृथीपर सम्मुख पड़ीहुई देखो। १।। यहगदा मन्येक युद्ध में इस शूरको त्याग नहीं करती अर्थात् वर्ग जानेवालं यश मानको नहीं त्यागकरती । १२ । सुवर्ण से अलंकृत वारकेसाथ सोनेवाली इस गदाको ऐसे देखो जने कि महलमें सोनेवाली मातिमान् भार्या को देखते हैं ।।। जो यह शत्रुका तपानेवाला मर्दाभिपिक्कों के भागे प्रधानहुमा बह घायल होकर पृथ्वीही धूलिको सर्श करताद समयकी विपरीनता को देखो। १४ । जिसके दापसे युदभूमिमें मारेंडुये शत्रु पृथ्वीपर सोनेवाले हुये वह मृतकशघुवाला यह कौरवराज शत्रुओं के हाथों माराहुंआ सोताहै। १५ । हजारों रामानों के समूह जिसके मयसे अकने ये वह पांमभक्षी जीवों से घिराहमा वीर पृथ्वीपर सोता I ग्राह्मणों ने धननिमित्त जिप्स ईश्वरकी उपासनाकी अब उसको मांसमती मांसखानेकीलये प्रशंसाकरते हैं ।१७। सज्जयय ले कि हे भरतपम उमपीछे Wat iors elho ling loukid lihu ac altar osor liich the three fires presidu. 7. Tlioywept to set the king lying in that deplora blu condit: n. Tidy wiped blood from his mouth with their handy and wept Kripnclinrya Baid, "Wolaro not much to thank Fato, for Pinca Duryodhan the ford of elorun ahshuuhints of army lies bl olin; hero on earth, 10 Hore lio« his golden maro which never left tho dgit & prince. It is lying wit'i bin Ishe an affectionate viſo To leader of hinge lies hicro on carth. Look at the changes of Timo I llaving van liia fora the Kou rav Princo lira hero struck by the enemy. 13. Heth whom thou. sands of thokings bored, sleepi on carth surrounded by beasts of prog Ho wiora, prained loy Brabwana for tho anho of his fealth is uw attended by tiels cating animals for the ele of his flush." 17.

(७३०६१ Mahi h at (78061 भरतसत्तम । सस्थामा समालोक्य करुणं पर्यदेवयत् ॥ १८ । आहुस्त्वां राजशा ईल मुख्य सबंधनुष्ताम् । धनावझोपा शिष्य स्कूणस्य च ॥ १९ ॥ कथं चिघरमद्राहीमसेनस्तानघ । छलिनं कृतिन नित्यं सत्र पापा.मषानुप॥ २० ॥ कालो नन महाराज बालेस्मिन् बलवत्तर । पश्यामो निहतं याच भीमसमेन संयुगे ॥ २१ ॥ कथं त्या सर्वधर्मज्ञ क्षुद्रः पो कोदः । निकृस्या हतधान मन्दी ननं कालो दुरत्ययः । २१ ॥ धर्मयुद्धे पण समाहूयोजसा मृधे । गदपा भीमसेनेने निभाने सक्यिनीता २३ ॥ अध%ण हनराजौ मृद्यमान पदा शिरः । ५ उपेक्षितवान् क्षुदं धिक्तमस्तु युधिष्ठिरम ॥ २५ ॥ युद्धेयपदिप्यन्ति योधा नूनं वृकोदाम । यावत स्थास्यन्ति भूतानि निकृत्या ह्यास पातितः ॥ २५ ननु रामाऽब्रवीदासमा सदा नन्दन , दुधमनमो नात गदया इति वीर्यवान् ॥२६॥ श्लाघते त्वां रिवाजो अश्वत्थामाने उस कौरवों में बेष्ठ सोतेहये दुयोधन को देखकर दयासे करुणा घिलाप किया। १८ । हे राजाभों में श्रेष्ठ तुमको सर धनुपधारियों में प्रथम बल दवन का शिष्य और युद्ध में कुरकेसमान वर्णन कियाहै। १९ 1 हे पापोंसे रहित भीमसेनने केसे तेरे छिद्रको देखा हे राजा उस पापात्माने तुझ बलवान् और, सदैव कर्मफरनेवाले को मारा । २० । हे महाराज निश्चय करके इस लोकमें काल बड़ा पराक्रमी है कि हम तुमको युद्ध में भीमसेनके हाथ से मराहमा देखते हैं । २१ । क्रोधयुक्त अज्ञानी पापी भामसनने किसमकार से तुझ सवमों के माताको छळसे मारा निश्चय काल दुःखमे उल्लंघनके योग्य है । २२ । धर्मयुद्ध में बुलाकर फिर युद्धमें अधर्मसे साथ भीमसेनकीगदा और पराक्रम से तेरी दोनों पार्टी । २।। जिसने युद्धाम में अधर्मा से घायल शिपांच से नन युक्तको देखकर ध्यान नहीं किया उस क्रोधयुक्त युधिष्ठिरको धिकारहै । २४ । निश्चयकरके शूर वारलोग युदोमें जबतक पृथ्वी वर्तमानहै तब तक भीमसेन की निन्दाकरेंगे क्योंकि तुम छलसे मारेगयेहो । २५ । हे राजा निश्चयकरके यदुनन्दन पराक्रमी वलदेवजी ने सदैव तुझसे कहा गदायुद्धकी घिद्यामें दुर्योधन के समान कोई नहीं है ।२६ । Sanjaya continued," Ashwathaina fet pity in the Kaurav prince and wept for grief, euying, " You were the foremost of Baldeva's disciples and were a famous warrior like Kuver, Hop wa, Bhim able to disar 8 Weaknos in you ! How d d he sluy you ! Barely Timae io vory powerful in t 118 sorld as no seu you elain by Bnim. How did oprag. ed, I olish and sinful Bhima slay you by deceit ! Suroly Time is hard to be over-t pped, 22, Challenged to a fair fight, he unfairly broko your thiglia To on Yudhishtbir, who basy ynu unjustly slruck down and lexhed on thio indiguity when your head was boing touched by 1out Surely biavo Len will always fpool ill of Bhim for playing you unjustly. 25, Baldor always spoke of you that you bad no . है (73075 Sauptik Pav साप्तिकपर्व (७०७ राजन संसासु भारत ।मुशिष्यो मम कौरवो गदायुद्ध इति प्रभो ॥ २७ ॥ या गीत सत्रियस्या प्रशस्तां पर्षयः । हतस्वाभिमुखस्पाजी प्रानस्वासि तां गतम् ॥ २८॥ दुधापन न शोधामि त्वामहं पूपर्पम । हुनपुत्री तु शौचामि गान्य रा पितरंच ते ॥ २९ ॥ भिक्षुको विवरिघेते शोचनी पृथिवीमिमाम् । भिगातु कृष्ण पर्जेया र्जु मचापि स्मंतिम् ॥३०॥ धर्मक्षमानिनी यो का वध्यमानमुपक्ष । । पा"Sant ते सर्वे कि पश्यन्ति मराधिप। कथं दुरबिनोस्वामित इत्यनपत्रमाः ॥ ३२ ॥ यस्य सममि गान्धारे पसवमायोधने हा प्रयानोऽभिमुखः शन् धर्मेण पुनम ३३॥ रतपुत्राहि गान्धारी निहतानिवान्यया । प्रज्ञाचक्षुध दुर्धर्ष का प्रीपास्यने ॥ ३४ ॥ धिगस्तु छायमर्माण मा रुप महारथम् । ये घन गताः सर्ग त्या रस्कृत्य पार्थिवम् । ३५ ॥ दातारं सर्यकामानां रक्षितारं प्रजाहित्रम् । यद्वय नानृ गन्छाममयां हे मंच भरतवंशी रामादुर्योधन यह बलदेवभी सभामां में तुम्हारी प्रशंसा करते हैं कि वह कौरव गदायुद्ध में मा शिप्यो । २७ । महर्षियों में युद्धभूमि में सम्पुख करनेवाले क्षत्रीकी जिमगतिको उत्तम कहा तुम उनीगर्तिको मातहो । २८ पुरुषोत्तम दुर्योधन मैं तुझ को नहीं शोचताहूं तेरोपिताको और गागरिको शोचता है जिनके कि सपुत्र मारेगये । २१ । इस पक्षीको शोनने यह भितरूप होकर इस पृथ्वीपर विचरेंगे यादव श्रीकृष्णज को भीर दुद्धी अर्जुनकोभी धिकारहोय । ३० मापको धमज जानते जिनदोनों ने तेरे घायल होनेको ध्यान नह किया रे रामा पह लग्जाराहत और सा पाण्डवभी कहेंगे कि दुर्योधन किमप्रकार से मारागया । ३२ ।हे पुरुषोत्तर दुरधन तुम धन्यवाद के योग जो तुम बहुधा धर्म से शत्रुपों के सम्मुख होकर युद्धभूमि में गये । २३ । जिसके जाति बान्धव और पुत्र मारेगो वा | गान्धारी और ज्ञानचतु रखनघाला मंजय धृतराष्ट्र देनों किस गतिको पायेगे ।१४। कृतवर्मा को मुझको और महारथी कृपाचार्य को धिकारहोय जो हम तम रामा को मागेकर के स्वर्गको नहीं गये । ३५ | जो हम तुझ सय भभीट के देने equal in mnco fighting. He prnirod you.n courts and was pr ud of haring you for his discipio. You have disi fighting and this sort of death is rcoony ended by vise men for a shati ya I dont regret your death, Duryodlian, int I mourn for your futhor and Gandhari who baro lot all tlıcır kingdom and will room liho loga B Kriebn and Arjun who call them clipe viitory08 and jol disregardal tho injury done to you. How untu the sliwni lves andnsax bronst of slaying joni! I cougratu ate jou, Duryodhnu for your sectring a rarrica's end. 33. To not rente nilIGudhati nrd und Dl:rilrashtra be reduod ulio lusse ont all ti eir kingmua! Fil on Kritrattoa, on no and on Kripuclary a, fur wc d d not fullt u you to हमारे हाथ से Fron - Mahabharat [30] घिगमाराधमान् । ३६ । कास्य नस वीर्यण मम चव पितुश्च ।। समृत्याना मा नाव्याघ्र स्तन गृहाणि च ॥ ३७ । भव प्रसादादस्माभि समिन सह घाघधे। अगता फलो मुख्या पहनो भरिदक्षिणा ॥ ३४ ॥ कुनचापीय पार प्रतिप्राम ययम् । यादर्शन पास्मत्य व गत सर्वार्थिवान् ॥ ३९ । वयोव प्रयोराजन गच्छ तं परमा गतिम। यो त नानुगच्छामस्तेन घयामहे क्याम॥४०॥ ५ सगहीनाहाना स्मरन्त सुकृतस्य ले । फिमाम सद्भया कर्ग येग वान ब्राम ॥ ४१ ॥दुःख नून कुरुथष्ट चरिण्याम हानिमाम् । हीनाना नवराछकुतः शान्ति कुत सुजम ५४२ । गत्वतस्तु महाराज समेत्य च महारथान् । यधाभ्रेष्ठ यथाज्यष्ठं पूजर्वचनान् मम् ॥४३॥ आचार्य पूजाय धान केतु मर्यवनुष्मनाम । ह मयाद्य शसेवा प्रद्युम्न नराधिप ।। १४ । परिजेश राजान वाहले के समहारथः । सैम्धन सोमसम्म पाले रक्षा और समारके पिया के पीछे नहीं जाते हैं हम नीच मनुष्योंको धिक्कार है । ३३ । हे नरोनम नौकरों सपेत कृपाचार्य के मेरे और मेरे पिताके रत्नजटित स्थान आपही के पराक्रमो ये है । ३७ । मित्र और वान्धवों समेत हम लोगों ने आपकी कपामे वहून दक्षिणावाले अतिउत्तम वहन यज्ञ प्रामकिये ३८ हए पपी कही में ऐमे मार्गपर कर्मकर्त्त हागे निम मार्गमे कि तुम सब जीवों को आगेकरके गये । १९ । हे रागा जोहमीनो तुझ परमगति पानेवाल के पीछे नहीं नतई उस हेतुमे हम भस्म होते हैं। ४० । सर्ग और अभीष्टमे रहित हमलोग उन राजामों को और तेरे शुभकर्म को स्मरण करते जिसहतस भापके पीछे नहीं जाते हैं वह हमारा के न कम्पोगा । ४१ । हे कौरवों में श्रेष्ठ रामादयोधन निश्च करके हम सब महादुखी होकर इस पृथ्वीपर विचरेंगे तुझमे पृथक होकर हमोगों को का शान्ती मोर पुस मस होसका है । ५३ । हे महाराज तुप जाकर पौर महारथियों से मिलकर मेरे वरासे ऋद्धता और उचमताफे विचारसे पूजन करना १४।। हे राजा सब घनु परियों के ध्वजारप आचार्य जी को पूज कर अव मेरे हापमे मरे हुगे धृष्युमको पर्गन काला । ४। और बड़े महारथी राजा hicaven, Fionn ut who donot accompany unii, our becelactor And protectnr! My inchei, luriprchulgA and I owo our greatners te jau Wo and our friends were able to perfo-ın rich 67cuifices hy your saco Hor an sunful men like us follow the truth clint you love todden! We barn with grief becuse o dono: fully w you to liest on 10. Dor titute of haven and clieriehed desires, no ale uudono beaux WO donot follow you. Duryodhan, rest of huulularl surely is nre reserved to lead a l fe of mur and can liare no poico nithut you Pay may kapoct to the deputed warriors wlion you mco, thom, bilo Inform Donacharya t'ie best of a lliurs that I have sluin Diretasi dyumn Cuorey my gre tinta Vuhlik Jayadrat .. Simdetta, Dhuri ७०९ -730%) Plitsgáðauptık l'ais हरिभषसमेव च । ४५ ॥ तथा पूगतानगान स्वर्ग पार्थिवसनमान् । भस्मवाक्यात परिचय पृच्छेपास्त्वमनामयम । ४६ ! खलय उचाच । इत्येषतुक्त्या रामान भग्न सक्थमचेतनम् । अश्वत्थामा समुदाय दुसरगनगमप्रवीत् ॥४७ ।। दुय्यधा जीवति संवा प्रोप्रसुन्य ऋण । सप्त पापा शेषधार्तराष्ट्रानयो पयम् ॥; ५८ ते व प्राप्तरः पञ्च पासघोष सारपनि सहर छत्याच पसारततस्त ।। ४९ म द्रौपदेया तास गुम्नस्म चारमा । पाञ्चाला निहताः सर्वे माशेपश्च भारत । ५०॥ एत कितं ५६य इनपुत्रा हि पाण्डवाः । सौनिके शिविर तेषां इत मरघाहनम् ॥ ५१ ॥ मया च पापकर्माम धम्मो महीपते । प्रविश्य शिविरं रानी गुमारेप मारित ॥५१॥ दुर्योधनस्तु तां वाचं निशम्य मनसः प्रियाम्। प्रतिलभ्य नयेत र सम्मापाच ॥५३॥न मेऽकरांसगांगयो न कर्णो म च ते पिता। यत्त्वया हनीफ, जयद्य, सोमदत्त और भूरियासे मिलना । ४५ । उसी प्रकार स्वर्ग में मयम मानेपाले अन्य २ उत्तम राजाओं को मेरे पचनसे मिलकर कुशल मंगल को पछना । ४६ । संजर बोले कि अश्वत्थामाजी उस अचेत और दही घावाले. राजाको इसमकार कहकर और सम्मुख देखकर फिर वचन को बोले । १७ । से दुर्योक्न हम भीयहो कानोंके खदायी वचनोंको सुनो कि पाण्डवों के सात मौर दुग्योधनके हमतीन शेपवई । ४८ । वह पानीभाई केशरजी और सात्यकि में तीमकार मैं शतधर्मा और तीसरे शारदन पाचार्यजी शेपहैं। ४९ । हे भरत अशी द्रौपदीके सब पुत्र पृष्टद्युम्नके सब पुत्र पांचाल और शेष योग सब मरस्य देशी मोरंगये । ५० । बदलेके कर्म को देखो और पाएहय अप्सन्तान हैं रात्रि के युद्धमें मैंने उन्होंका डेरा सत्र मनुष्योममत नाश करदिगा । ५१ । हे राजा मैने सत्र में हमें प्रवेश करके यह पापकर्ता धृटना पशु के समान मारा । ५२ । दुर्योधन प्रम वित्त मिरचको सुनकर और मन हो र यहवचन बोला ५१ shrave and other warriors when you meet them in lien en "'46 Sin jnya contingod, " Having tlius illed with the wounded hing in this strain, A Bbwathama ng air said, "Hear what is plensing to the ear, O king, if you are yet rlive: seven on the side of the Far dalas and thorou. of us are the oily aneu alivets five brothers, Kralinv and Satyali on their srdo, and kritvarmn, Knpat hanya und I on yours. Athe *ont of Draupdi, mi li lilirishtadyurnud liis cons, all the Papuhalos and tho rest of thio Matey no ne pla'n. 50. 8 e tho trork of roroiga. Tho l'andavas ute elukss; for I deatzera pll their impot Dipht, untered the camp at night tid sl-tv. piuſul Dorrel taclymenu lihen inst." Haring thenre this chrishtel nwe nuti cetringtoconarions ners, Duryodhan d, Neither Birtan nor Katha mor your fathar did fur me the thing which w201 schising with the buip of hrija charya and Kriterrm.. Ticd! .. Prerni and bibhandh Insti +M N Mahabharat (73101 उपमोमाज्यों सहितनाय ते कृतम ॥ ५४॥ स च सेनापतिः भुट्टो तसा हिना । सेन मध्ये मघयता सममात्मानमधदै ।। ५५ ॥ स्वस्ति प्राप्त भई . *सगमा पुनः । इत्येषमुक्यातणीस कुरुराजोमहामनाः ॥ १६ ॥ प्राणास मरदा नमुनुसनन् । माफ्रॉमत देिवं पुष्पा शरीर क्षितिमामिशत् ।। ५. पर निधर्म पातः पुत्रो दुर्योधनो नृप । भने यात्या रणे शरः पश्चाविनिहतः परः। ५८॥ पिपते परिपका परिपन्यव तेन्गमापुनः पुन. प्रेक्षमाणा:स्ककानहरुहू पान५५' रिपई प्रोणपुत्रस्य निशम्य करुणां गिरम । प्रत्यूषकाले शोकाः मावा .॥पषमेप क्षपो कृतः कुरुपाण्डवसेनयोः। घोरो विशमनी रोदो मिलते तप ॥ ११ ॥ सष पुत्रे गते सगै शोकास्य ममानघ । अविध प्रन मिम॥१२॥ वैशम्पायन उवाच । इति श्रुत्वा स नृपतिः पुत्रस्व निधन निषस्य वाघमुष्णश्च ततचिन्तापरोभवत् ॥६॥इति दुर्योधनप्राणत्मागेमकमोथायर, कि मेरावार्म नं भांपनी ने न कर्णने और न आपके पिताने किया जा रूपाचार्य और कृतवर्मासमेत तुमने किया । ५४ । वहनीच सेनापति समेत मारागया उसेहतु से भवमैं आपको इन्द्रके समान मानताएं । ५५ । को पामो तुम्हारा भलाहोय अवस्वर्ग में हमारा तुम्हारा फिर मिलापहोगा साहसी कौरवराज इसमकार कहकर मौनहुा । ५६ । और मित्रोंकेदुःखको करते उसबीर ने अपने प्राणों का रंगकर पवित्र स्वर्गको गया और रहा । ५७ । हेरामा इसमकार आपकेपुत्र श्योधनने मरणको पायापासूर प्रयमनाकर फिर शत्रुओं के हाथसे पारागया । ५८ । उसीप्रकार उनसेमलकर मोग फिर पिलकर राजाको वारम्बार देखते अपने अपने रोंपर सगरहये । ५। इसमकार अत्यामाके करुणारूप पचनाको सुनकर शोकसे पीड़ित वतीनों मात काल के समय नगरकी और शीघनासे चले । ६० । हेरामा मापके कुमन्त्रा इसमकार कौरव और पांडवोंका घोर और भयकारी मारनेवाला नाशपर्समान मा । ६१ । निष्पाप शोकसपादित आपके पुत्रसंगमानेपर भवन्यासऋषिका दिपाहा वह दिव्यदर्शन और दिव्पनेत्र विनाशमान हुये । ६२ । वैशम्पायनपीने किससह सनातरा पुत्रकेमरको छनकालत्री और उस ज्ञासाओंकोलेकर महापितायुक्तहमा ६१॥ Deon slvin and therefore I am as happy as Indra. May you bo Wo blall meet again in hesvon, " Having said this the brave Kaurar princa resuwed silence. 56. Cngoing grief to live frıeade, ho left thin world for lidaven tad left lug body lying there. Thus sour gon died O'king The thrco warriois luft bim thero and rode their care, ing beard the pitiable lalh of Ashwathama, thoy rodo toward the çieg at day break, Go. All Ebiy gr.at destruction was brought about by your own epil policy, hing. At the death of yeur ean, iho divine eyes, given me by Vyan, Mad their power disappeared payan said that ou learnig of 1118 aon's death, king Dhritrashir beárod long and hol sigla aud uds plunydd in the ocean of grirf, *8. Vaisharu Saaptil Parv सौप्तिकपर्व ७१७ ॥ अथ ऐपिकपर्वारम्भः॥ वैशम्पायन उवाच ।तस्पा राम्या पतीतायां धृष्टद्युम्नस्य साराये। शशंस बाप सौप्ति के कदम उत्तम् ॥ १ मत उवाच । द्रौपदेया इता राजन दुपदस्थारमनः ममता निशि विश्वस्ताः स्वपात: शिघिरे सके ॥ १॥ कृतवर्मणा नृशंसन गौत कषामबरयाम्ना व पापेन इतं व शिविरं निशि ॥ ३ प्रपतैर्नरगावामा सशिपरपसामाणि निम्तद्भिनिःशेषं ते पलं कृतम ४ विधमानरप महता पास्य परमधे । शुभवे स महान शम्दो पलस्य ता मारत. ५॥ मामेको पशिस्तु हमार सन्याम्महीपते। मुक फशिवात्मन् म्यप्रस्य कृतवर्मन.॥३॥ सत्ता वाक्यमशिवं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः। पपात मया दुर्वर्ष. पुत्रशोकसमन्वितः तम्तमपि परिजवार सात्यकि.। भीमसनोर्जुनधैव माद्रीपुत्री माण्डौ ८॥ लम्पयेतातु कौन्तेष शोकविहवलषा गिरा। जित्वा शब्द जितः अध्याय ॥ १० ॥ वैशम्पायनपोले कि उस रात्रिके व्यतीव होनेपर धृष्टद्युम्नके सारथीने युद्ध में होनेवासे नाशको धर्मगजके सम्मुख वर्णन किया । १ । सारथी बोलादेसनारा समय अपने डेरे में सोनेवाले विश्वास युक्त अचेत सोतेहुये द्रौपदी के पुत्र मुपद पुत्रों समेत मारेगये । २ । निर्दयी कृतवर्मा गौतम कृपाचार्य मोर पापी सरयामाके हाथसे रात्रिके समय भापका डेरा नाशहुभा।३। पास शक्ति मौर फरमोंसे हजारों मनुष्य घोड़े और हाथियों को मारनेवाले इन तीनों से मापकी सेना मारीगई। ४ । हे भरतवशी फरसोंसे कटतेहुये घड़ेवनकी समान प्रापकी सेना पशब्द मनेगये । ५ । हे घड़ेशानी केवल मैंभी भकेला उस सेनामेंसे बचा ईरे धर्मात्मा मैं उस दुष्ट कृतवर्मा से किसीप्रकार करके पचगया। 8 । कुन्तीका पुष अमेय परिहिर उस दुखशोक के वचनको मनकर पुत्रशोक से पुक होकर पृथ्वीपर गिरपडा । ७ । सात्यकी भीमसेन भर्नुन नकुल मौरसहदेव ने उस गिरते हुये रामाको पकर लिया । । फिर सचेत रोकर शत्रुभोंका विजय करनेवाला ('HAPTER X Voehampayan said, " At the close of that night, Dhrishtadyumna's car driver brought tho nerys of the great destructun to Yudhishthir head, "S'eeping soundly in their trots last night, the duns of Drupad and Draupadi were all s'ain by cruel Kripacba rya and Kritrat noa, who destroyed your camp by night. The thrto your med and beable with their weapons, Your army w cut with battle ares hksa large forest 5 I managed some how to scape from Kntrarpea and am the only man aliye out of tbat great force. " Yad. bishthu the son of Kuala bocame insensible with grief os hennag that and days. Bhim, Arjaa, Nakul and Sahadev satod the king Troca Harmossrxi ॥ । Mahabharat 17912] पश्चात् पय्यदेवयदाधत ॥९४ दुर्विदा गहिरानीमपि ये दिघ्यच पुष । जीपमाला आयपाये जयभाना घयं जिता ॥ १० ॥ हत्वा भातन् वयस्यांश्च पितर पुत्र' मुहम पाान् । पन्धनमात्बार पौगंध जित्ला सीन जिता वयम् ॥ ११ ॥ अगों हायंसहाश म्तधानोऽर्थदर्शन । जयोऽयमजयकारो जयस्मात् पराजयः १२॥ यसिया सप्यते पश्चादापा इव दुमति । क मन्येत मिजगं ततो शिततरः परैः ॥ १३ ॥ येषामाय पाप स्याविजयस्य मुहाध. : निजिनैरप्रमसहि विजिता जितवाशिम । १४ । कणि ' नालीकददस्य नडगाजवस्य संयुगे। चापमाहास्यरौद्रस्य ज्यात लसीनन दिन ; ॥ १५ अवस्य नासिंहस्य संप्रामेश्यपमिनः । ये ब्यमुच्चन कर्णस्य प्रमादाच इमे Kar ॥ १६ । रथहद भारवर्षोम्मिमन्तं रत्नायितं यादगयाजि युक्तम् । शकृधिमीमध्यम नागनकं शरासनावर्तमपुफेनम् ॥१७ ॥ संग्रामचन्द्रोदपमेगल ब्राणाण, ज्यातलम युधिष्ठिर शोकसे व्याकुल दुखसे पीडायान के समान विलाप करनेलमा । ९ । अर्थों की गति दुःवमे जानने के योग्य है जो दिसा रखनेवालहैं उनको भी अन्यत्नाम पराजित होकर विनय करते है विनग करनेवाले हमलोग विजय किये गये ।१०। भाई समान अयस्थानाले पिता पुत्र पिनवर्ग घान्य मन्त्री और पोयों समेत सबको मारकर भी हम दूमरों से विजय कियेगपे । १.१ । निश्वपकरके अन) अर्थरूप है सीप्रकार अनर्थ अर्थको दिखलाने बाल है यहविजग पराजयरूपहै इसहेत से पिंजयही पराजयहै । १२। जो दुर्मुद्री विजयकरके पीछ प्रापचिमें बंधे हुये के समान दुसी होता है या फिन प्रकार विजय को मान उम हेतु से शत्रु के हाथमे अत्पन्त पराजिनहै । १३ । मित्रों के नाशगे विमएका पाप जिनके निमित्त दोय.पराजिनहुये चतुर मारधान मनुष्योंकरके विजपमे शाभागमान पारमी विनय कियेगये । १४ । युद्धगें कफिनालीक नाम बाण के ममान राद रखनेवाले सङ्गको समान मिदा धनुपके समान चौड़ामुग न्द्ररूप प्रा ञ्चा और तक के समान शन वाले । १५ । जोधयुत्ता युद्धों में मुख न फेरनेशले नरोत्तम करके हाथ जो वर्ष वहमब शापीर अचात्तासे मारेगये। १६ । रथरूप इद पाण सृष्टिरुप तरङ्ग वाले वृक्षोंसे पूर्ण घोहे और सवारियों से युक्त शान्ति वा दुधारे खड्गरूप पछली ध्वजा रूप गर्ग और नक धनरारूप मगर यहे वाणरूपी फण रसनेयाले । १७ । युद्धरूप tallingdown Ho ingni to lament'lagrent loss on coming to himself " The waiye of the world ere d fficult tooderstand : the conquerors aro conquered by the conquerel. 10 H r g slain nar kınamen, friends and advisera, ws nie nt last conquerul be the cvjemy. Sirely our succers sfo lwro and intory sturned ited fhar. The foolish con queror who mourns lile u zivoralle man, is it ally not a moquerer but ono conquered by the Tip vise cou quered the corquerort who lod singel is playing their frien 1. Tre warriors having lard arrows for finge, Hords for tanktun , lors for male muki, Fornds of CICmy.

17313, Trur tit PHI1 तकपर्व मिकोषम् । ये तेरुच्चायचशस्त्रनामस्ते गजपुत्रा निहता प्रगापात् ॥ ८॥ गहि प्रमा दात् परमोस्ति कवियो नराणामिह जोरलाफे। प्रमनमर्य हि गर समामात त्यज पनधि समादिशक्ति ॥१९॥ यज समायोच्छ्रितधम्रकेतु शराचिष कोपमहास भारम | महाधनुासलनेमिघाप तनुजनानाविधशरसहोमम् ॥२०॥ महाचमुकादया मिपान महाहये भीमभयाग्निदाहमा मेहुरागुत्तायतीक्षणवेग तेगजपुत्रा निहता प्रमा दात् ।२१ । नक्षिप्रमतेन नरेण शक्य विद्या तप भीपिपुल यशो चा । पश्यामदेम निहत्य शान् सर्वाग्महेन्द्र मसमेधमानम ॥२२ । इन्द्रोपगान् पार्षिकपुत्रपात्रान् पश्या रिशषेण तान् प्रमावात् । ती समुद्र पणिज समृया सत्रा कुमद्यामिव हेलपाना ॥ २३ ॥ हि निक्षता शबाना नि सशय तपि दिध प्रपन्ना । सणान्तु सोचाम नु सानी शोकार्णव साद्य विशश्यतीति ।। ४ ।मातच पुनाश्च हानिशम्य चन्द्रोदय तीव्रता रूप किनारेवाले ज्यातल और नेमियों के शब्दवाले द्रोणाचार्यरूपा समुद्रको मिनराजकुमारों ने नानामकारके शत्ररूपी नौकाम के द्वारातरा यह प्रमाद से मारेगये । १८ । इस जीवलोक में मनुष्यों के मरणका कारण प्रमत्ततासे अधिक कोईनहीं है प्रमत्त मनुष्य को धनादिक चारोंओर से त्याग करत है और निनिता रूप अनर्थ प्रवेश होते है ।।९। तमध्वजाकी नोकमूरत उँचाई रखनेवाली पाणरूप बालावाली क्रोपरूप वायुकी तबिता रखनेवाली बडे धनुप की ज्यातल और नेमी के शब्द से युक्त कवच और नानाप्रकार के शत्ररूप हवन रखनेवाली बड़ी मेना रूप दावानल से संयुक्त खडे शस्त्ररूप कठिन सीयतावाली भीष्मरूप अग्निकी भस्मताको जिन राजकुमारोंने पंड युद्ध में सहा वह सब अचेत तासे मारेगये । २१ । प्रमत्त मनुष्यको विद्या तप धन और उत्तमति नहीं प्राप्त होमती है सावधानी से सब शत्रुओं को मारकर इसमे द्धि पानेदाळे महाइन्द्रको देखो। २३ । इन्द्र के समान राजाओगे पुत्र पौत्रादिकों को अत्यन्त अचेततासे ऐसे मराहमा देखो नमे कि धनकी द्धवाला व्यापरी समुद्र को तरकर छोटी नदी में दूरनाय ।२३ क्रोधयुक्त पुस्पों ने जो सोते वीरोंको मारा वह निसन्देहे स्वर्गको गये ba vetrings and clapomon lefue role, wha vrtu helb ca trum bittle a d whorouped caith roun Kalal s and } are leci centr gec by #int of marel falmssHINng cars for la-es sl oners of arrows.fur nares,horses for treesljarelin ondanoica lo fish,lboont 18 foi 8t rper tand.eri codiles bowo for oldies, arrows for ho dr, battle field for moonsluno, dexterity for bunl sand loud sounding with claps and bowstring, the warriors wl10 C1 Opged the ocean cf Drong with the boats of their weapons have been elain by Bapt of Faloſt iness Insensibility killy most of the people in this world Wenith lonyos an insansıblo man and ponury ovel takes hun Haring tall stw dards, arroks lihe finu es, dexterous like a etorm of wiod, sounds of bowstrings armed nous with with thio ७.१५] Mahabharat 1T3JA) पासासराज पिता पृद्धमा धुपं विमा पतिता पनि सा शाप शाकाशन यतिः ॥२५॥ तस्योग समपारयाती कथं भविष्यारयुषिता ममामामु पुत्राय प्रातमधमनाप्रमानेष नाशनेन । २६ स्येवमास परिदेवर स रामानों मल पाये। गायनामिदमार्यो समानुपक्षामिनि राजपुत्रीम् ॥१७॥मात्री मुतस्तात परियं धा धा धर्म प्रतिमस्य , गरः पयो रपेषासबमाङ्क रेषा पालराजस्य च यत्र दार: ॥२८॥ प्रस्थाप्य माद्रीसतमाजमीर जोबारिताः मादितः मनिसामानः प्रभवो मुतामामायोधन भूतगणानुषी प्रधिप्रयाशियमुनापं ददर्श पुमान् मुहर समीभ । समा समानाभिरामामा में द्रौपदी को शोचताई पत्र का पतिव्रता निवाकर किसमकार कोल्ली समुद्रमें दूवर्गइ । २४ । माई बेटे और खुद पिता रामा पांचास को सक नहर | निश्चय करके नामोहित होकर पृथ्वीपर गिरेगी शोकशे रुनहीवरीरमा द्रौपदी शुष्क होरही । २५ । मुखक योग्य या द्रौपदी पुन और मामो मरनेसे | व्याकुस अग्निसे अलती के समान उस शोकजना दुखसमुद्र पाल बोका कमी दशावाली होगी । २१ । इसप्रकार विलाप करता या कौरवराम हरि बड़ा से बोला जामा उम मन्दमागिनी रामपुत्री को उसके साल्पविरों समेत पाई लामो । २७ । नकुल धर्मकप राजाके पवनको धर्मसे भीकार कर रही सबारी से देवी द्रौपदी के उस स्थान कोगया महापर रामा चास क्रीमी या ८। नकुहका भेजकर शोकसे पीड़ावान् रोदनकरते दृषि वर उन मुद्दयासमेत पुत्रों की युद्ध भूमिको गा जाकि भूतगणों पृक्तया । २९ । उसने उस बयाण am Mulai a sur and killing enemies as fire çora * foraut, the warriors who scapud deuth for Bluishm have been døstroged by sleep. 31 A ser88 89man canast acquire knowledgs, asosticism, woalth ar.d fama Loob at Iqdra who destroyed all his foos by bio canelulnay." indem liko princps and warriors have been destroyed by want ofvigilagos like an atariciouy morchant who crossed the ocean but sinks down in a small river Tio olo ping warriors slain by Angry wen bavo surely gone to hraven; bal I am anxious for Draupadi who has fallen into the OOOAD of grief. She will lose her senses on bearing of the death of hor bro. thors and song, Her body al eady loan with grief will booomo dry, 25, Un worthy of bearing sorrows, pho will burn with the firo of grief OR honring of the death of her brothers and sons Thus langenting. YHdhinlithir ordered Nakul to fetch tapless Draupadi and the women of her mother's housebuild, Nakal rodea car and went to the place whore Draupadi and the women af Panchal wore. Having pont Nakal sbat way, Yudhiahthu with tears in bis eyes, went to visit the place - (Talil Batup IK Purv सीस्तकपर्व विभिप्रारभतोचमांगार । ३०॥ स तास्तु प्या. भृशमातको युधिष्ठिरोधर्म मनापति, प्रकाश कौरवाप्रप: पपात बाप्पी सगणो पिसा ॥१॥ शान सौतिपनि रोपपणे पुषिरानुनापेदशपो च्याप १० ॥ पास रघुना निस्तान संख्ये पुजना पत्रान् सस्तीनथामायुः बरीतामा पल जममेजय ॥ १। तमस्तस्य महान् शोक प्रादुरासन्मिहात्मनः । स्मरत. पुरोधाणा प्रावणां स्वजनस्य च ।२॥ तमथुपारपूर्णाक्ष मानमतनम सारी भासमिनाः साम्पाञ्चकिरे तदा । ३॥ ततस्तस्मिन् क्षणे फलो रचनादि RatanAणपासासुपायात परमाया .10 1 उपप्लगमा सातु सारस पुदमि में प्रवेशकरके पुत्र मुहृद और मित्रोंको पृथ्वीपर सोते पपिरस मिंग टूटे शारीर और ह्ढे शिर देखा । ३ । वह धर्मधारियों में मौर कोरो श्रेष्ठ युधिष्ठिर उनको देखकर अत्यन्त पीड़ावान सूरत उच्चस्तरमे पुकार' बोर सावियों समें मन होकर वापर गरपहा । ३९ ॥ भोपाय ११॥ मापन पति राजा जनमेजय बह युधिष्ठिर पदमें मरेहुये उन पुत्रपात्र और मित्रों को देखकर पड़े दुःखमे पूर्णचित्त हा १।इसके पीछ पेटे पोतेभाई और अपने मनुष्यों का स्मरंग करते पे उममहात्मा को वड़ाशोक उत्पन्न हुमा। तर पन्त बाहोंने इस अश्रुओंसे पूर्ण कम्पायमान और अचेत राजा को रिपात करोगी ।। सके पछि समर्थ नकुल वही पाड़ासन द्रौपदी समेत सूर्य के संगॉन प्रकावनाम रखकी सवारीसे एकक्षणमें सम्मुख भाया । ४ । तर Where his sons and kinsmen lay dead. He found then sloping on earth With bodies and heads wounded 206 ble ding Yudhishthur. the best of Kátrávds and rigtiteous man, gave a loud cry and fell down idealen Willi his companious" 31. Ho seint ni CILAPTER XI Valshampayan said to JBuILOT JM3 8. "Sceng the sons, grandsons and friendą slain in battle, I udhılsthir felt much grief "bered the depart-d xbus, grandsone, coulds and other peuplo anel by mind wus tull of sorror, His a rrowful friends cormoled him Nakul - (७३१६) Alalhubharat (731) श्रता मुराहगिम । महा विनाश पुत्राणा मांगधिमाभवत् ॥ ५ । कम्पमा मदती प्रतिनाभिमरिना । माराजानमामाय शोकात्ती व्यपढथि । ६ ॥ वर्ष पदनं तस्याः सहसा शोधाकर्षितम् । फूल रामाशाझ्याम्मगोप्रात इयांशमान 1 ततस्ता पगिता दया साम्भी सत्यविमा. शशा परिजमार भगुतपाय को, दर॥ ८.१ मा समायाप्लिमा सेन भीम्समेन भाषिमा रदनी पापपुरा हा माभ्रा सामनीत । ९ । पिट्या गमभामखिलां मायने मदाम ! आरमजान क्षत्र धर्मेण भूत्वा भनिपातितान् । १०॥ दिष्ट्या त्य पार्य कुती मरामातगामिनम्। अयार्थीि कृतस्यां सीम, न करिष्यसि ॥ १।। मारमजानू सत्रधर्मण अत्यः शरानिपातिताम् । उपप्लध्ये गया सर्दू दिष्ट्रपा पंग मरिष्यसि । १. ॥ प्रसताना घध श्रुत्वा द्रोणिना कर्मणा । शोकस्मपनि मा पा हुम शा इस पम् ॥ १३ ॥ उपप्ठवी स्थानपर वर्तमान या द्रौपदी सय पुत्रां के अमिषनाशको मुनकर बड़ी पाहायान हुई । ५ । वामे चलापमान केले के ममान कंपापमान यह द्रौपदी राजा को पाकर शोकम शोकी पीडा हाकर पृथीपर गिरपडी ।। उस.प्रफुरिइन पद्म पता के समान नेपाली द्रौपदीका मुघ आस्पात शौक से ऐसे पीडायान हुआ जैसे कि परे से ढका हुआ मूर्ग होताहे । ७ । इसके पीछे फ्रोधयुक्त सत्त पराक्रमी भामसनने दौड़कर उस गिरी हुई द्रौपदीको पड़ालया। ८ । भीमसेन से विश्वशित उम रानी तेनावनी द्रौपदीने भाइयों समे। युधिष्टि से यह वचन कहा । ९ । हे राना तुम निश्चयकरके क्षत्रीधर्म से अपने पुत्रों को यपराज के लिये देकर मारब्बसे इस सम्पूर्ण पृथ्वीको भोगोगे । १० । हे राजा तुम मारपसे कुशल हो और सब पृथ्वीको पाकर मतवाले हाथीके समान पलनेवाले अभिमन्यु को स्मरण नहीं कर मे । ११ । तुम क्षत्रीले गिरायेहुये शूरपुचों को सुनकर मारपसे मुझ समेस तुम उनको उपप्लवी स्थानपर स्मरण नहीं करेंगे । १२ । हे राजा पापकर्मी अश्वत्थामा के हाथो सोनेवालों के मारने से शोक मुझको ऐसे तपाताहै जैसे कि स्थानको अग्नि संतप्त करम है ! १।। अब मो पद में तेरे इ यने उस पापकी brought to rowlul Draupude in the cir, She was great distress on hearing of the death of her 80118 5. Shing like plantain trea moved by the wind, she fell down on tarth and was timebaible witb grief. Hor lotus like face b cine suddenly changed like the sun co veroud with dark nora Enraged Bhinsen at once run and took up fallen Draupadi, Consoled by him, she said to Yudhishthir and his brothers, " Having causi your sons to b} slam in battl, Rou are sure to rule the kingdom. 10 It s b; good luck that you ars safe Will you not lesember Abhimanyu, who usd to wa k like an ols. phant, when you will rulo (*p the w rld? Will Jou not remomber the full of your brave Agila at U paplavil Asliwathama's deatruction of the sleepers burns me like fire I shall pit on tlis very place and 617 Shuptik Parv सौप्तिकपर्छ समा पापातो द्रोणे चद्य स्थधामृधे । यिते सानुमन्यस्य युधि विक्रम्य जीवितम ॥ १४॥ इष प्रामाशिष्ये ताम्नोधात पाण्डवाः । चेत् फलमयामोति द्रौणि पापस्य कर्मणः ॥ १५ ॥ एषमुफ्त्या सर कृष्णा पाण्यं प्रत्युपाविशत् । युधिष्ठिर पामसेनी घमराजं तपस्विनी । १६॥ एष्टयोपविष्टा राजर्षि पाण्डपो महिषांनिधाम प्रत्युवाच स धर्मारमा द्रौपदीचारपर्शनाम् ॥ १७ ॥धर्म्य धर्मेण धामासात निधनं गमे । पुत्रास्ते मातरवेष सान शोषितु भईसि ॥ १८ ॥ स फल्याणि पगं दुर्ग दरं वाषिरतो गतः । सस्य व पातम संख्ये क शास्यसि सोमने ॥१९॥ द्रौपायाच। दोषपुत्रस्य सहजो मणिः शिरसि मे धुनः मिहस्य संपये से पापं पश्येय मणिमाहृतम्। राजन् शिरसि ते कृत्वा बीयमिति मे मति ॥ २० इत्युक्त्या पाण्य कृष्णा राजान चारदर्जमा । भीमसेनमधाभ्यो परमं पाक्यमनधीत् ॥ २१ ॥ प्रातुमईसि मा भीम भारत्थामा का उसके साथियों समेत जीवन हरण नहीं किया जाता है तो इसी स्थानपर शरीर त्यागने के निमित्त मासन बिछाकर वैछंगी हेपाण्डर जोमश्वत्थामा इम दुष्कर्म के फरको नहीं पाता तो निश्चय इसी मेगवास को जानों । १५ । इसके पीछे बह चुपदकी पुत्री यशवन्ती कृष्णा धर्मराज युधिष्ठिर से ऐमा कहकर भासन पर पैठगई । १६ । उस धर्मात्मा राजर्षि पाण्डवेने उस पन्दर दर्शन प्यारी पटरानी द्रौपदी को शरीर त्यागने के निमित्त आसन पर बैठाहुभा देखकर यह उत्तर दिया। १७ । कि धोकी जाननेपाली शुभ द्रौपदी यह तेरे पुत्र और भाई, धर्मरूप मरणको प्राप्तये उनका शोकाना तुमको योग्य नहीं है । १८ । के कल्याणी यह असत्यामा यहाँसे दुर्गम्प दूर बत्तको गपा हे शोभायमान सुम युद्ध | में उस के मरने को कैसे जानोगी । १९ । द्रौपदी बोली कि मैने शरीर के साथ उत्पन्न होनेवाला माग अश्वत्थामा के शिर पर बुनाई युद्ध में उम पापीको मारकर लापहुये उस मणिको देंगी । २० । हे राजा उसको भापके शिर पर धारण कर के जीऊंगी पह मेरा मतहै यह सुन्दर दर्शन द्रौपदी राजा से इसपकार कह कर । २१ । फिर भीममेन के पास आकर उत्तम यचनको बोली हे समर्थ तुपक्षमी do, if Bintul Ash wat vana and lus no implices ir until-n I shall provs my words true, if Ashwathamam not p inished. 13. Having Baid this to Yudli'shithir, Dra spadı took hur sunt there. Souing 1118 beautiful and de rest queen realy to give up her life, he sad, • Your sons and brothers have died a glorius d'eath and you must not d plore their loss. A eh yrathama la entered far away into an empire. n ibl. forest hogy will you know that boss dend "Draugaris sud, " | hear there is a gou an Ashwathatna's head, born witli tus bwly and I I shall live to sve it put it as a proof of his death, on your hold." Having said this to the king, sho turned towardo Bhim and asked his help in her ownergency, saying, “ Yju must play wish to seu . " Maliabharat. [10] सत्रधर्ममनुस्मरन् । अहित पापकर्माण शम्बर मघवानिष २२ ॥ नहि ते विक्रमे पुमानस्तीह कश्चन । भुतं रात सर्पलोफेषु परमव्यसने पपा ॥ २३ पोऽभूत्यादि पाधानां नगरे पारणापलीविडिम्पदर्शनवैध तथा स्वममघो गतिः। फीफेन भूशार्दिताम् | मातधान्कृच्छापालामी मघवानिध२५॥षपेतासापा पार्थ महाफमणि पेपुरा। तया द्रौणिममित्रन विनिहत्य मनीमध॥२६॥तथा मतिर दुक निशम्य परिदेषितम । म चामपंत कौन्तेयो मीमसेनो महापमः ॥ २७ सite मपिचित्रानमारोह मंदारयम मादाय रुचिरं चित्रं समार्गणगुणं धनुः१८ मकुक सारपि करघा द्रोणपुषषधेधृतः । विस्फार्थ नशाम्चा ॥ २१ से. हयाः पुरुषव्याघ्र घोदिता पातरंहसः । धैगन स्परिता सम्मुरमा शीघ्रगीमनः ॥३०॥ शिपिरात स्वाद्गृहीत्वा स रथस्य पदमध्युतः । द्रोणपरपसार पयो धेगेन धीर्यवान् ॥ ३१५ पविफपर्वणि द्रौणियधार्य भीमगमने एकादयोध्याय धर्मको स्मरण करते हुये मेरी रक्षाकरने के योग्यहो । २१ । उस पापकी को ऐसे मारो जैसे कि इन्द्रने शम्बर को माराथा यहां कोई दूसरा पुरुष भापके समान नहीं है । २३ । सब लोकों में सुना गयाहै कि जिसमकार पारणापत मध्यमें महामापत्ति में तुम पाण्डवोंके रसक हुये । १४ । उसीप्रकार हिडम्ब रासस के देखने में तुम गतिहुपे इसीमकार विराटनगर में कीचक के भषस पीडापान म कोभी तुमने दुःखसे ऐमे छुटाया : २५ । जैसे कि पुलोमकीपुत्री इन्द्राणी को से छुटायाथा हे पाण्डव जैसेकि पूर्वममयमें तुमने इनकोको कियाहै । २६ । रसी।। प्रकार उस मारनेवाले अपने शत्रु भवत्थामाको मारकर मुखीहो उसके पिता किये हुये बहुत प्रकारके दुःखको सुनकर । २७ । बड़े बलवान पारडम भामसेन ने नहीं सहा और स्वर्णमयी बड़े उत्तम स्थपर सबारहुआ । २८ । पाण प्रत्यंचासमेत सुन्दर जड़ाऊ धनुपको लेकर नकुलको सारथीकरके अश्वत्थामाके मारने में महत होनेवालेने । २९ । बाणसमेत अनुपको टकारकरशीघ्रही घोड़ोंकोचलायमान किया । है पुरुषोत्तम वह सहुये वायुके समान वेगवान् । ३० । शीघ्रगामी हरिमायके बारे तीग्रतासे जल्द चलदिये वह अप महापराक्रमी भीमसेन अपने से रथके बिनके लेकर तीव्रतासे अश्वत्यामाके स्थकी ओर शघिचक्षा ३१ the great sinner as India had done Shamvar. There is no man equa to you in proses. 1 have keard how ynu protectod all the l'aodavat at Baranvat. You protected then froin Hilimb. You relieved me from the fear of Kicliak at Baruavat. 25. Slay Ashwathama x1 you slow others and make me happy like the queen of ladra.' Bhip could cot bear to hear her lamentations and rode bie gold car, armed himself witli jewelled bow and arrows and having made Nakul the driver of his car, he proceeded to stay Ashwathama The swiſs horsesof Hari breed drow his car ns fast as mind and Bhimsen follow: el tho marks made lhy Ashwathama's car."3i. ॥

819 - सौप्तिकपSauptik Pary वैशम्पायन उवाच । तस्मिन् प्रपात दुई घनामुमत्तमः भिवात् पुण्डरीकाक्षः सौपुर्व युधिष्ठिाम ॥ १॥ एष पाण्डव ते भ्राता पुत्रशोकपरायणः। जिघांमुद्रीण करे एक एवाभिधापति ॥२॥ भीमः प्रियस्ते सर्पयो मातृभ्या भरसंघमा जातमध स्वं करमान्नायुषधसे ॥३॥ यसदाचष्ट पुत्राय द्रोणः परपुर जयागलं पिरो नाम दोत पृथिवीमपि ॥ ४॥ तन्महारमा महाभागः केतुः सर्वधनुष्मताम पादपदाचार्यः प्रीयमाणो धनजयन् ॥ ५॥ तं पुत्रोप्येक एवैनमन्वगदमर्षगः । प्रोवाच पुत्राय मातिहटमना इव ॥६॥ विदित चापलं घासीदारभजसस महात्मनः। वीमावास्यः लोवंशात् समुतं ततः ॥ ७. परमापोनापि न स्म तात त्यया । इसमन प्रपोलम्यं मानुषेषु विशेषतः ॥ ८ ॥ इत्युक्तवान् गुरुः पुत्र द्रोणा पक्षा मंकवाद । न त्वं जातु सता मागें स्थाति पुरुषभ ॥ ९ ॥ स तदासाय दुष्टरमा अध्याय १२॥ वैशम्पायन बोले कि उस अजेय भीमसेनके मस्थान करनेपर पादयों में थेष्ठ कीहष्णाजी कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर से वोले १२॥ हे पांडव पुत्रके शोकसे पूर्ण यह तेरा पाई पदमें अस्वत्थापा के मारनेका अभिनापी अकेलाही दौड़ताहै। । हे भरतर्षभ भयोमसेन सवभाइयों से अधिक तुनफो प्याराद अबतुम उस आपारी में फेंमहुये की क्यों नहीं रक्षाकरतहो । भा सत्रुओं के पुरके विजय करनेवाले दोणाचार्य ने प्रमशर अलका पुत्रको उपदेश किया जो पृथ्वीको भी भस्मकरसक्ता १४ । सव धनुषधारियोंके ध्वना रूप महात्मा महाभाग प्रसन्नचित्त आचा- मी ने यह अस्त्र मजुनको बतलाया क्रोधयुक्त के पुत्रने भी इससस्त्र को पाठा जो कि उससे अत्यन्त प्रसन्नचित्त नहीं ये इसहेतु से उन्हों ने उस दुईदी पुत्रकी चपलना जानकर मिखलातो दिया परन्तु सर्व धर्मज्ञ आचार्य नी राम पुत्र को शिक्षापूर्वक आज्ञादी । ७। कि हे पुत्र युद्ध में बढ़ी आपात में परभी तुझको भी यह अस्त्र छोड़ने के योग्यनहीं है पार विशेषकर मनुष्यों उपर तो कभी नछोड़ना । ८ । यह कहकर फिर पुत्रमे पह वचन कहा कितुम भी सत्पुरुषों के मार्ग में नियत नहीं होगे । ९हे पुरुपोत्तम युधिष्ठिर तव दुष्ट CHAPTER XII an said "Attho departure of invincible Bhim, Shree Krishn the best of Yuda vas said to Yudhish thir, " Full of grief for bir son's death, your brothor is going alone to slay Ash walliama. Why do you not protect Bhim who is dtarer to you than all othor brother Asliwatama lins lenrnt from his father Draacharya t ho Ate of Bralimshar weapon which is capable of destroying all the Norld. When the acharya taught that seapon t dijun, Aslıra: son of the acharys, was much enlaged, and wished He was not pleased with this cor duct of his son. He Vaishampay thama the only te lenin it, ( 7320) - - ! (७३२०) Mahabliárat पितुर्धचनमप्रियम् । निराशः सर्वकल्याणः शोकातू पय्यचरन्महीम् ॥ १०॥ ततस्तदा कुर श्रेष्ठ चमस्थ राय मारत । श्रयतद्वारकामेत्य वृष्णिणि परमाचित ११.स दाचित् समुद्रोन्ते यसन द्वारपतीमर्नु । एक एक समागम्य मामुपाचासनिधः १२॥ पंचग्रं तपः कृष्ण चरन् सत्यपराक्रम 1 अगस्त्याभारताचार्य प्रत्यपधते में पिना: ॥ १३॥ अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम देषगन्ध पूजितम् । सदध मपि वाशाई यथा पितार में तथा ॥ १५॥ अस्मत्तस्सदुपौवाय दिव्यमस्र याम । स चायनं प्रयच्छ धक रिपु हरणे ॥ १५॥ स राजन प्रीयमाणेन मयाप्युक्तः कृताञ्जलि । याबमान प्रयलेन गत्तोनं भरतर्षभ ॥ १६ ॥ देवदागंषगन्धर्ष मनुष्यपतगारगा न समा मम वायस्य संतशिनापि पिण्डिता ॥ १७ ॥ इदं धनुरियं शक्तिरिद धक्रमियं गदा । यदिच्छामि चैदस महस्तत्तहदानि से ॥ १८॥ यच्छदमोवि साधन्तुं प्रयोक्तमपि धारण तदए अनत करणवाला पिताके भमिय वचन को जानकर सब कल्याणों से निराश | होकर शोकमे पृथ्वीपर घमा ।१०। द्वारका में आकर यादों से परमपूजित होकर वप्ता वह एकममय द्वारकाके सम्मुख समुद्र के पार निवास करताहुमा अकेला ही इसकर मुझ से घोला । १२ । कि हे श्रीकृष्णनी बड़े सपको करते मरतवंशिण के आचार्य सत्यपराक्रमी मेरे पिताने जो उम ब्रमशरनाम अखको जो कि देवता और गन्धों से पूजिन हे अगस्पजीसे पापा हे शिकणजी अब वह मही मेरे भी पास जसे कि पिसा पामहै । १४ । हे यादवों में श्रेष्ठ हम उस दिव्य असा को मुझसे लेकर मुझको भी वह चकानको जो कि युद्धमें शत्रुनों का मारनेवाला है। १५ । है भरतपम राजा युधिष्ठिर वह जोड़कर बड़े उपाय पूर्वक मुझ अस्त्र मांगनेवाला हुगातर मुझ प्रसन्नचित्त ने उससे कहा कि देवता दानव, गंधर्व गनुष्प, पक्षी, सर्प यह सब मिलार भी मेरे पराक्रम के सालहवें भाग के समान नहीं हैं। १७ । यह धनुप है यह शक्ति है यह चक्र है यह गदा है इनमें से जिस मन्त्र को तुम मुझ से चाईत हो उसको मैं तुमको देताहूं । १८ । जिसको तुमउग taught him the use of it, but vaDo I him never to nize it, spocially Ayninst human beings, rien at the time of gront emergency. foretold at the pain time that his son would never bo frm on the path of the right-nur. Ill-natured Ashwathnma, finding that his Inther Fue not well-diaposod towards luim, ronied restlessly through ont the world. 10. Ho stand at Dwarka and was re procted by the Yadaras, One day he mat joe alone near the ren shore in the vicinity of Denmaba and end to me with a smile " My glorious Falher lenrnt frorr Agnety a the use of Brahmshar which is respected by gods and ganelliarsas, an! I havo sharo i thoknowledge of it with wy Inthiet. I slull teach you all about it, if you will gite me your forindeutroying di1c119 " 15. With joined palms ho asked to 10 से Hanloo 7321 Sauptik Parv सीप्तिकापर्ष ७३२१ हाण विमात्रेण मम्मे वातुममीपससि ॥ १९॥ स सुनाम साना वजनामयमस्मयम् । कोषक महामागो मत्तः स्पर्धन्मया सह ॥ २० ॥ गृहाण धक्रमित्युक्ता मया तु तर मातरम् । अग्राहोतपरय सहसा चक्रं सम्पेन पाणिना ॥ २१ ॥ मनमशक स्थानात् सञ्चालयितुमप्यत । अथेने दक्षिणनापिगृहीतुमुपचक्रमे ॥ २२ ॥ सर्वपत्नेन तेनापि मम्वमिदं ततः। ततः संघलनापि यनि-म शशाक॥२३ . उद्यन्तु वाचाल यितु द्रौणिः परमदुमणाः कृत्वा यानं परिभातः संन्यात भारत ॥ २५ । निश्चम असं सस्पदमिनायाचितसम् । महमामय सम्यिगामश्वरयानानमययम् । २५॥ यः सदेवमनुष्येषु प्रमाणं परमं गतः। गाण्डीवधवा खता-पिप्रधरकेतमः ॥ २६ ॥ प सामादेयंदवेशं शितिफण्ठमुमापतिम् । द्वन्द्वयुद्धे पराजिष्णुस्ताषयामास ण्डरम १२७ । यस्मात् प्रियतरो नास्ति ममान्य पुरुषो भुवि । नादेष यस्य मे फिी वदीप सत्ते हो और युद्ध में चलाभी सक्त हो आप जिस अखको मुझे देना चाहते हो उसके विना दियेही इनमें से जो चाहो सोलो । १९ तब मुझ से ईर्षा करनेवाले उस महाभाग ने उन्दर नाभि और हजार आरा रखने वाले बजनाम लोहमयी चक्र को पुझ मे मांगा । २० । ता मैंने भी उमी समय कह दिया कि चक्रको यो सा उस ने उठकर अकस्मात् वायें हाथ से चक्र को पकड़ लिया। २१ । परन्तु उसको स्थानपर से हटाने को समर्त्य नहीं हुआ फिर दक्षिण हाथ से भी उस को पकड़ना प्रारम्भ किया ! २३ । इसके पाछे अनेक उपापोंसे भीउसको उठा न सका । २३ । फिर बड़ा दुःखीचित्त अश्वत्थामा जब कि सब पराक्रम करने से भी उसके उठाने और हटानेको भी ममर्थ नहीं हुआ और वह उपायोंको करके यककर अलग होगया तब मैंने उस अभिलाप से चित्त उठानेवाले विमन और व्याकुल अश्वत्थामाये यह वचन कहा । २५ । कि जिस गांटीव धनुष न घोड़े और हनुमानजीको भगा रखनेवाले अर्जुनने देवता और मनुष्यों के मध्यमें बड़े प्रमाणको पाया और जिसने पूर्वपमयमें साक्षात् प्रधान देवताओं के give him my woapou, I was pleased with him and said, " Gods, gandhar vas, men, birds and serpent., all pnt together, are not equal to even tho sixteenth part of my prowess. Here are my bow, Shakti discus and mace. Select whichever of those yon like and I shall give it to you. Take whichever of these you can bent and wield, without giving me anything in return, Bearing malice against me, he asked .f mo my disous with a good nave and a thousand spokos, entirely made of iron, which I call my vajra. 20. Of courro I at once gave him permission to take it away, He held it by tbo his left hand, but could not move it from its place. Then he v-ed his right hand also but for all his efforts could not liſt it up. He was much troubled in b14 minds hen he could not lift ad move it. Being ined, he stood aloof Seeing that he was bopeless, beartless and " -- ७.२१) Mahnbi.alat 17:221 पारा मुशास्तपाः ॥ २८ ॥ तेनापि सहदा प्रहान् पधिनाश्लिष्टकर्मणा । भोक मिद साक्यं परमं मामिभाषसे (२९ ॥ ब्रह्मचर्य महधोरं धीरोद्वादशवार्षिकम् । हिम बत पाश्रमपेत्य यो मा पाजितः ॥ ३०॥ समानत किया योऽपजायत । सनतकुमारम्नेजस्वी प्रद्युम्नो नाम मे सुतः ॥३१॥ तेनाप्पेतम्मद पक्रमप्रतिम मम । नमार्धितमभन्मूढयदिदं प्रार्थित त्वया ॥ ३२॥ रामेणातिनतनो कपूर्व कदाचन । न गदेन न शाम्गेन यदिद प्राधितं यथा ॥ ३३॥ द्वारकावासमिया पवृष्ण्यन्धकमहाये । नोक्तमिदं जातु यदिदं पार्थित स्यया ॥ ३॥ मारतापाप पुत्र मानितः सयादयः । चक्रेण रथिनां श्रेष्ठ फन्नु नात युयुत्ससे ।। ३५ ॥ एक मुको मया द्रौणिर्मामिद प्रत्युषावा प्रयुज्यमने जो योतस्पकला त्वरयुग ॥३॥ ईशर शितिकण्ठ उमापति शंकरजी को इन्दनाम युद्ध में प्रसन्न किया जिससे अधिक इसपृथ्वीपर मेरा दूसरा के ई मिय नही दात्री और पुत्रादिकभी उसको देनेके अयोग्य नहीं हैं हे ब्राह्मण उस सुगमकर्मी मेरोभित्र अर्जुन मेभी प्रथम मुमासे या वचन नहीं कहा जो तुमने मुझसकहो । २१ । मैंने हिमालयकी कुक्षिमें निरव होकर बारहवर्ष वडे घोर ब्रह्मचर्य को करके तपकेद्वारा जिसको पातकिया। और जो सदैव प्राकरनेवाली विमणी में उत्पन्नामा सेजस्वी सनत्कुमार प्रसन्न नाम मेरेपुत्र नेमी इम बड़े दिग्य और युद्ध में अनुपम चक्रकी इच्छा नहीं अज्ञान जिसको तेने मांगाहै। । । उसो कभी हमारे घड़े वलदेवजी ने भी नहीं मांगाथा जो तेने मांगा है वह गद और साम्स ने भी नहीं मांमा और अन्य वृष्णी अन्धकांशी द्वारकावामी महारथियोंने भी पूर्व में इस को कभी नहीं मांगा । १४ । तुम भरतवंशियों के प्राचार्य के दुबो और सब गादों से प्रशंसनीयहो हे रथियों में श्रेष्ठ तात तुम चक्रसे किसके साथ युद्ध करोगे । ३५ । मेरे इस वचनको सुनकर अश्वत्थामा ने मुझको यह उत्तरदियाकि हे श्रीकृष्णानी मैं आपका पूजनकरके आपही के साथ लडूंगा । ३६ । मैंने देवता diatrersed, I said thlhian. 25. 'The wieldar of Gandix bunr aud fonso estor of white horses and aps banner, Arjou, who is of well tried prow«* Along gods and unen, lo ha pleased Sunkar the Lustand of Unt And god of gik him all in a duol, than whom I hold none Hea-er in the wall and shorn I would give away my wifs and son, even that o७y-rorking Ajn n vr all toy thatiing that you lave. Ho whom I got after a så vero 'ascot cisin in a Himalayan cave, and who is born olevor vow obbar vinz Kukaini, oven that glorio19 son of nine, Pradyumn nerer had ary desire to passo's this Dintellesa discus which you were foolish enough to ask of uur. 1 tas nerer requested to part with it by Balder, G ada, Samy or BDY otbor warriors of warla You, tlo con of (Lo acharya icepected by 32 (78237 Sruptuk Parv सोप्तकपर्व प्रार्थिव ते माप देवदानवपूजितम् । मजेय शमिति पिमो सत्यमेतद्मश्रीमि ते .३० ॥ रखच्चो दुर्लभ काममवाप्यैव केशव । प्रतियास्यामि गोविन्द शिघनामि पदस्थमाम् ॥ ३८ ॥ एतत् समीम भीमानामृपमेण स्घया धृतम् । चक्रमप्रतिचक्रण भावनाम्पोमिपद्यते ३९॥एतावदुक्त्वा द्रौणिमा युग्यानश्याम् धनानि मादायोपयपा काळे रत्नामि धिषिधानि च ॥ ४० ॥स सरम्मी दुरात्मा चवपळ. फर एष । दबास शिरस्तस्माद्रक्ष्यो पृषोदरः ॥ ५ ॥ हाव सौप्तिकपर्वणि ऐपिक वोग कृष्णपिप्टिरसंवादे वादशोऽध्यायः । १२ । - पौर दानोंसे पूनित भाप चक्रकी याचनाकरीई और हेममय मैं, मापसे सत्य र काताई कि अनेयहं ।।७ हेकेशवनी आपमे दुष्पाप मनोरथको न पाकर चला भाऊंगा हे गोदिनी आपमुझको कल्याण के साथ नमकारकरा ३८ मुझउत्तम और अनुपम चक्रवाके में यह भयनक रूपोंका भी भयानक चक्रधारणकिगार पृ. भीपर इसराइसको नहीं पासक्ताहै ।१९ अश्वत्थामा इमपकार मुझसे कहकर और समयपर मुझसे छोड़ेधन और भनेकप्रकार के रत्नोको लेकर हस्तिनापुरको चला- गमा ४० वह क्रोधयुक्त दुर्बुद्धी चालाक और नियोहै और ब्रह्मशरअखको मान वारे भीमसेन उसमे रक्षाके योग्गहै ॥ ४१ ॥ all the Yadaras, whom would you evo ti e weapon to fight with ? " 35. To this question of ininc ho ma le the folloriog rely, “ | sould wiru ship and fight with yon, Krishn. It was there fors that I asked if you the weapon. 1 say truly that 1 am invincible 1 came to you on aboutlets mission Bleeg 0:0 Gopind, and bid mo good bye. You potenke a dreadful and matchless weapon such Arnone el po in the world has, * Having said this to me, Ashwathama accepted frotu me & progont of liongos and wealth in precions at ines and went Akay to Rasthinapora, Hois rash, ill-ontured, ropong ful and cruel and ko.ws thouse of Bralımshar, and tbarefore Bliru is northy of Lring pretestod from him, 41..

41 (73241 - Mahobuiaret पशम्पायन उवाच । एषमुफ्त्या युर्ण सेष्ठ सवार गजन्दन । सर्षायुशवरातमा सरोद रथोत्तमम् ॥ १ ॥ युक्त परमकाम्बोजेस्तुरंगममालिमिः । मानियो पवन धुर रथपरस्य तु ॥ २ ॥ दक्षिणानस्य समी२ सम्यतेऽभवत् । पार्णिया। तस्मस्ता मेघ, पयलाहको ३॥ विशमशाना विमा रनपातुभिभूषिता । यति तेपरधे माया रजयष्टिरका ४. पेरतप, स्थितस्या प्रमामारलरश्मियाम् । तस्य सस्पयत केतुर्भुजगारिरहशत ॥ ५ ॥ मन्यारोहपोकेशः केतु. सर्वधनुमनाम मर्जुन सत्यकर्मा च कुरामो युधिष्ठिरः ॥ ६ ॥ अशी मामानी दाशाई मीमत. स्थितौ । रथस्प शाहबन्धा माविनाविध पासषम् ॥तायुपारोप्य दाशाई स्पन्दनलोकपूजितम् प्रसादेन अपापेतान् परमाश्यानधोदयात्॥ सईया सहसोरपतु हावा स्मन्नतमोत्तमम् । मास्थितं पाण्डषेपाम्पा यानामुषभेण च ॥९॥ पाता शाई तेरइयां अध्याय ५॥ वैशम्पायम योले कि पुदकषि श्रेष्ठ और सपायोंके प्रसन्न करमे पाने श्रीकृष्णमी इसमकार कहकर उम उत्तम स्थपर सपार नोकि उसमभव शत्रों से युक्त स्वर्णमयः माल धारी काम्पोमदशी घोहों जुड़ाहुभाषा और जिसके उत्तमधुर उदयध्ये पूर्ण के स्वाये । शैव्यनाम घोहने दक्षिणयक्रको उठाया और ग्रीव नाम घोडा पाईभोर हुआ और उम रथके पाषाइक मेघपुष्पलाहक नामघोडेहुपे । विश्वकर्मा के बनाई हुईरत्न और धातुसे अलंकृत दिगमौर उन्धर यष्टी रथकी धमापर मायाफे समान दिखाईपटी। प्रकाश मण्डलरूप किरण रख नेराले गरुडभी उस ममाम निपतये उस सस्पताल अगागरुहरूप दिखाईपट्टी ५ उसके पारसय पनुपपारिपोंकी पना केशवनी सत्यकर्मी भर्जुन और कामराज समिष्ठिररसपर सवारप । सीप पर्तमान दोनों महात्माओंने स्थपर सवार शाई धनुपपारी श्रीकामाको ऐमे शोभापमान किया जो किदोनों मरिधनीकुमारोंने इन्द्रको शोभित कियाथा । भीष्णनीने उन दोनोंको उस पूरित स्थपर बैठार शीघ्रतासे संयुक्त च घोड़ेको चाबुक से ताहित किंवा पाण्डा मोरगावो CHAPTER XII Vainhampayan said, 'Shri Krishn the best of war11078 and joy of tho Yadavay, having op het ar above, rode the gari air furnisled with arms and weup as, decked with gold clapleto and drawn by excellent horses of Cambry brood. It shvno liko tho rising Sun. 8.13 Sugrev, af-ghpushp and Valshik wer the four horgue that drovo the car The blandard macio by _Viel tahurira lumself, was composed of mictals and prio ous et nos, And tho 1 urs od the banner 3. Such wan the car jo which at Kobav, Yudhish thir ad Arjun The twn herovt sitting by tht wieldor of Bharat box, lookoj liho tle Aslı vilibusts nith Indra in thu muildi. Yhun the trio i pre konted in the car, Shri Krislin druro the hormes fast as garur adorn.

178231 . Sauptik Parv सौतिकपर्व ७३२५ पन्धानमश्वानां शीघ्रगामिनाम् । प्रादुगसीन्महान् शब्द, पक्षिणा परतामिय । १.. तेसमा भरख्याघ्रा क्षणेन भरतर्षन । भीमसेनं महेष्वासं समनु य घेगिता ॥११॥ कोषदीप्तन्तु कौन्तप द्विपदर्थे समुद्यतम् । नाशक्नुधन पारयितु समेत्यापि महारथाः ॥ १२॥ स तेषां प्रेक्षतामेष धीमा हसचिनाम् । यो भागीरथीफच्छं तरिभिर्मश पेगित । यत्र स्म भूयत द्रागि पहन्तामहात्मनाम ॥ १३ ॥ स ददर्श महात्मानमुद कान्ते यशस्विनम् । कृष्णद्वैपायनं व्याममासीनमृघिमिः सप्त ॥ १४ ॥ तचैवरक मणि धृताक पुराचारिणम् । रजसा ध्वस्तमासीनं ददर्श द्रौणिमन्तिफे ॥ ५॥ तमध्य धावत् कौन्तेय. प्रगृह्य सशर घनु । भीमसेनो महाशानुतिष्ठ विष्टेति पावनीत् ११६॥ सप्ट्या मामधन्धामं प्रगृशिरासनम् । नानगै पृष्ठतश्चास्य जनाईनरस्थिती । १७॥ नायितात्मा द्रौणि प्राप्तम्चेदमन्यत । स तहिव्यमदीनात्मा परमात्रमा चम श्रीकृष्णनी से सबारी युक्त उत्तम स्थको वह घोडेलेकर अक्स्पाद उड़े।९। भीकृष्णजीको लेचलनेवाले शीघ्रगामीघोहोंके ऐसे बड़ेशन्दहुये जनाले उड़तहुये पक्षियोंके वान्दोतह ।१०। हेमरतर्षभउन देगवान् नरोत्तमानेरहे धनुषधारीभामसन | को और चत्तकर क्षणभरमेंदी उसकोपापा ११॥ वह महारधी मिळकरभी उसकोधमे प्रकाशितऔर शगुप्ते युद्धकरने को सन्नद भामसेनके रोकनेको समर्थनहाहुये ।१२। पर भीमसेन उन हृदयनुपधारी श्रीमान भाइयों भौर श्रीकृष्णगी के देखनेहुये अत्प तशीघ्रगामी घेड़ोंके द्वारानीगंगाजी के तटपर गये नहानि महात्मागों के पुनोंक मारनेवाले प्रश्वयामा हुनेगयेथे ।१३ उस भीमसेनने जलके समीप महात्मा यशान पासनी को पियों ममेत बैठाहुभा देखा । १४ । और उम निईपकर्मी घृतसे मर्दिन शरीर बड़े चीरधारी धूलसे लिप्त शरीर अश्वत्थामाको भी समीप बैठाहुआ देखा । १५ । वह कुन्तीकापुत्र महाबाहु भीमसेन घनुपाणको लेकर उनके सम्मुख दौड़ा और तितर वचन कहा । १६ वह शश्वत्थामा धनुपारी भीमगेनको देख कर और पछि श्रीकृष्णजी के रयपर निगत दोनों भाइयोंको देखकर चिच से the wind I bo one of tho swatt lorsos 1t8enipled thut of a flight of of birds. 10 Tiey Eoon overtonk Bhim, but could not stop or berp him back froin his purple yf huliting with the cally. ed moving on within sight of his gloisons brothers and Su Brisbane till ho reached near the bank of thio Gonges wheio Abhw ith .na the slayor of the sons of the Pandaya's was re postoj to be. Blumeen kan Vyas and other rnship Forted near nater, ashratharon 'o, mith the body rubixd orer withi Zher Nud duct, int near t1 cm Bhim the son of Kuni, tahing up his lui a daruw, ria to rards him, saying, " Slay, piny 8 xing ibini arwed with los atida-row and followed by Shri Arun and the two brothiore, Ashwat iarna syns much distressed and lostal hops for the life The bravo inin remen's rel 1le continue 15. Valiant ७३२६॥ Mahabharat ( 7328) तयत् १८॥ जग्राह च स चेषीको द्रौणिः सव्येन पाणिनास मनमुदैरयत् ॥ १९ ॥ समुष्प माणस्तान्छरान दिध्यायुधधरान स्थितार । पति रुपान्यस्जदारुणं वयः ॥ २०॥ ॥ इत्युक्त्या राजशाईल द्रोणपुषः सर्पलोकप्रमोहार्य तदलं प्रमुमोच ॥ २१॥ सतस्तस्यामिपीका पाषक: प्रधश्वत्रिय लोकास्त्रीन कालान्तकपमोपमः ॥ २२ ॥ हति सौप्तिकपरिण ऐपिकपर्वणि ब्रह्मशिरोखत्यागे प्रयोदशोपापा १३ ॥ पडितहुये और मृत्युको पर्तमानजाना उस महासाहसीने सस दिव्य महा अस्त्रको स्मरण किया । १८ । और पाहायसे एक साकको पकड़ा और भापीत को माप्त होकर दिन्म प्रत्रको पड़ा। १४और दिन्प शसपारम पाले एन शूरों को न सहकर उस भश्वत्थामा ने क्रोषसे भपफागपन को कि यह प्रस्त्र में पाण्डषोंके नाश के निमित्त छोड़ताई । २० ।हे राजेन्द्र अश्वत्थामा ने यह कहकर सब लोक के बड़े मोहके निमित्त उस प्रसको । २१ । इसके पीछे उस सींक में काल और यमराजके समान हानालोकों भस्मफरनेवाली अग्नि समहुई ॥ २२ ।। the divine weapyn, Ho took up a piece ef broom and proncantant over it the aphorisn. Unable to bear the sight of those warriors, het uttered dreadful mords in his rage, saying, " I discharge this werpom for the destruction of tho Pandavan." Having uid, this glorious Ashit thama discharged the weapon to stepefy the world. Them deadly aparks began to come out of that broom." 22.

५.27 Bhupik Parv सोनकपर्व । ७३२०॥ शम्पायन उवाचा इङ्गिनेव दाशाईनमभिप्रायमादितः। द्रोणेवुवा महावाहुर मयभाषत: १॥ अर्द्धनार्जुन पहिव्यमलं ते विधर्तते । द्रोणोपदिष्टं तस्याय एक संप्रति पाण्डष २. मानृणामा(मनश्चैव परित्राणाय भारत विसुजैतत्त्वमप्या निवारणम् ॥ ३. केशायनमुक्तस्तु पाण्उभः एसीधा । अवातरथाः सशरं धनः॥ ४ । पूर्वमाचार्यपुभाय ततोऽनन्तरमामते । भ्रातृभ्यष सबैश्य तात्युक्त्वा परम्सपः ॥ ५॥ देवताभ्यो नमस्शार गुरुपच सर्वशः। उससळ शायनलमरण शाम्पताम।६ ॥ सतस्तदलं. सहसा मु गाण्टीयवाना। ज्या महाविघुगासामलसन्निभम !७ । तथैव द्रोणपुत्रस्य तदसं तिग्मते प्रबास महाज्वालं तेजोमण्डलसंधृतम् निर्धाता बबधासनन पेतुरुल्का अध्याय १४ ॥ शल्पायन बोले कि महाबाहु श्रीकृष्णजी ने प्रथमही से उस अश्वत्यामा के परिवारको नानकर अर्जुन से कहा । १ । कि हे पात्र भर्जुन जो सार्ष का उपदेश किया हुआ वह दिव्य अत्र पर्चमानहै उसका यह समय सांप हुमा है ।। हे भरतवंशी तुमभी इस युदाम में अपनी और अपने की रक्षा के लिये अखके रोकनेपाले उस अखको छोड़ो। ।। इसके पीछे बोके वारोंका मारनेवाला और केशवजीसे इसमकार कहाआ पाण्दय अर्जुन सपाय को लेकर शीघ्रही रथसे उतरा । ४ । वह शमों का तपानेवाला मयम शुष के लिये फिर अपने और सक भाइयों के अर्थ भलाहोप यह कहकर । ५। रिम और सब गुरुभोंके अर्थ नमस्कार करके शिवजीको ध्यान करते हुये अर्जुन उस अखको छहा और कहा कि अब से प्रल शान्तशेय। ६ । इसके पीछे स्मा गांडीय धनुषधारी से छोड़ाहुमा और प्रलपकालकी अग्नि के समान प्रामाशिव भन्न थालतरूप हुआ।७। और उसीमकार वढेरोजस्ती असत्यामा भी वह अस्त्र बलित रूपमा जो कि तेममण्टल से युक्त पड़ी माला रसने ना या । ८ । परस्सर वायुके संघटनों के बहे शब्दहुपे हजारों उरकापावहुपे CHAPTER XIV Vaishampayan said, " Knowing already tho ovil intentions of tak wathama, Siri Krishn said to Arjan, “ This is the time to do the harge the reapın giren you by Dronacharya Dixhargo it to check weapon of your adversary in order to protect yourself and your rathere. This urgal by Keshav, Arjan the destroyor of fues .camo own at once from the car trith his bow and Baying. Smaly to the son of scharya and tho Pandır brothers" he loved wa to bis proceptor and mediatsliug on Sbiv, be discharged his weaartising, To mitigate the effect of the respon. ;" Discharged by tbo wielder of Gandiv, tho weapon ahono like fire. Assuk Arrow.

पा Mahabharat F328 सदमशः । महद्भयञ्च भूतानी संघषा समजायते ॥ ९ ॥ शादममव्योम घाला मालाकुलं भृशम् । चचाल च मही कृत्स्ना सपर्वतवनमा । १० । ते घनतेजसी लोकास्तापर्यन्तो व्यवस्थिते | सहित तत्र दर्शयामासदा॥ ११ ॥ नारा संभूतात्मा भारतानो पितामहः उभी शमयितुं वो भानजयी ॥१२॥ मुंगी संर्धधर्मशासभूतविषिणी। दीप्तगारस्यमयी रजसौ ॥ १३ ॥ तदन्तरमथा कृष्यावुण यशस्विनी । आस्तामृषिवरातन ज्वलिताच पायको ॥ १४॥ प्राणगिरनाष्पी देघवानच सम्मौ । सतेज शमयितुं लोकानी हितमा म्यया १५ ॥ अपि ऊचतुः । नामा सपिद पूर्व डेप्यतीता महारा: । मनुष्येषु ते प्रमुक कथञ्चन । किमिदं खास धरि कृतवन्ती महास्यम् ॥ १६॥ सौप्तिकपर्वणि पपिपीण अर्जुनास्त्रत्यागे चतुर्दशोध्यायः १४ ॥ और जबजीयों को बड़ाभये. उत्पन्नहुआ ! ९ । शब्दायमान आकोश मालानों से बहुतन्याप्तहुआ पर्वत बन गौर हतों समेत पृथ्वी कम्पायमानाई - | इममंकार वदोनों प्रकाश लोकोंको तपातेयनियतहुये तयवहाँ उनदोनों - एक साथ दर्शनारिया ! १२ । राबजीवों के भात्मारूप भारंदजी और म पितामह व्यासजी यह दोनों महात्मा र अश्वत्थागा और अर्जुन के शान्तं उपस्थितहये । १२ । सधर्मों के ज्ञाता और समनीयों के हितकारी बड़े दोनों मुनि पहेगकोशित उनदोनों अस्त्रों के मध्यमें नियतहुये । १३ । रमपमय या यशान और अग्निके समान प्रकाशित दोनों उत्तपत्रपिनाकर । हुप। १४ । वह जीवमानोंमे अनेय देवता और दोनों के भगीकृत दोनों ऋषि लोकों की वृद्धि की इच्छामप्रलं को मेजशान्त करते हुये मध्यमें नियतये । १५. और बालेकि नानाप्रकार अस्मा ज्ञाता सर्व महारथी जो पूममय भी उत्पाहुये उन्होंने भी इभको कभीतिमी गएपपर नहीं छोड़ा वीरलोगो तुमने इस विनाशकारी मारमको क्योकिंगा १६ ।। Dos face it fro, Tiere - severe storm of wind and mefeuia fel! dun o vil a crusli, causing fear to life. The aky was c»verod with flumes of fire and the Earth Thus the two lights scrod side by, heating the world. Tive two great rishis Narad and Vyas canie to appeas the wrath of Ashwathama ani Arjun. Knoiring all and vishing good to the world, the two glorious tishis stood in midst of the two wenpyna, glorious and inviacible, bright us fire. ☺ ing the fury of both the weapons, invincible by all boing, the. riebis re.picieilliy gods and gandharvas, stooù thore and said, " Tormor irarriors who knek't'd und of all sorts of weaponb, nover Claeged this fytápanlägridse huu ih Lainga. '(v hy have you tea thin jashness Pravo non ?".10. tyama's werpm . hur trees shook. 10. r - (7929) सौप्तिपsuptik Pary पैशम्पायन उवाच । इष्टव नरशाल तापग्नितमोजमा । सजदार शर दिव्य विरमाणो धमअप ॥ १॥ उवाच भरतश्रेष्ठ स्तावृधी प्राञ्जलि नदा। प्रयुकमनमरण शाम्यतामिति धै मया ॥ २॥ सहेत परमानेस्मिन् सर्वानस्मानशपर पापकर्मा ध्रुव द्रौणि प्रवक्ष्यावस्त्रतेजसा । यदत्राहिममस्माकं लोकानाचैव सम्या । भवन्तौ देवम डाशी तथा सम्मन्तु ईय ॥ ४॥ युक्त्या महारान पुनरेव धनजय । सहाग दुकरक्तस्य देवैरपिरियुमे ॥ ५ ॥टिसृष्टस्य रण तस्य परमास्त्रस्य संगृरे। भशक पाण्डवादम्य साक्षादपि शतझतु ॥ ६॥ प्रयतंजोद्य तद्धि विसष्टमकृतात मना । म शफ्यमानतीयतु ब्रह्मचारित्रनारते ।। ७ । अर्चीर्णब्रह्मचर्यो व सपबावर्च पोपुर रितसं बानुवाचस्प मर्यान तस्य रतति ८॥ ब्रह्मचारीमती धापि दुराधा मध्याय १५ ॥ बैशम्पायन वोले हे नरोएम शीघ्रना करनेवाले अर्जुन ने भाग्न के समान मकाधित उन ऋपियों को देखकर दिव्याण को संहार करीलया अर्थ द बाग लिया ।।। हे भरतर्षभ तब वह अर्जुन हाथजोंटकर उनमृपियों से बोलाकि मैंने यह समझार शस्त्रको प्रकटकिया है कि यह भस्त्र इमप्रस्त्र से शानदोय । २ । इस उत्तम भरतके सैट भानेर निश्पकरके पापकर्मी अश्वत्थामा इमवेज मस्त्रसे हम सबको भपकरेगा ।। यहापरसदेव हमारा और कोलोंका जोहित है उसको दसतारूप मापलोग उमीमकार से अङ्गीकार करने के योग्यहो । ४ । अर्जुनने इस प्रकारसे फिर भस्त्रको लौटा युद में देवताओं सेभी उसका फिरलोटाना कठिन है।५। पांडय मंजुनके सिवाय युद्धमें साक्षात् इन्द्रभी उस छाडे हुये परम पात्र में लौटानको मर्य नहीं है । ६ । ब्रह्मचारीका प्रतरखनाले पुरुषके प्तिवाय बम तेनम उत्पन्न छेडाहुमा अल अनितेन्द्रिय से कभी मौटाने के योग्य नहीं है। अमवर्य न करनेवाला जो पुरुप भनको छोडकर फिर लौटाता है वह अस्त्र साथियों समेत उस छोडनेवाले के मस्तकको काटताहै। ८ । ब्रह्मनगरी प्रत करनेवाला CHAPTER XV Varshampagan said, “Sing the two tishis gloriogs like fire, Arjah recalled lows diving arront And with 3 nged painus he said to thea, "' 1 discharged my weapon to appease the other Surely Ashwathama will bařı us with his weapon, for have rocalled ining own. You will do whiat is good to us and to the world, divine Thus Arjun recalled the weapon and did a dood which was difficult to be achio Ted by gods. 5 Nono except Arjan, nnt upon lodra himself, récall that respon when onco dischargod Nuno except a Braboobarı would do the gloriour dred, for the weapon kils the mma no reall.it, it hd is not a Brihinchuri.'Aryan rhe Brahm hari recalled the wespar in opits of having so much to rosenge for - " srges could For Arjun was the । ७३३०) Mahabharat 78301 रमवाप्य तत् । परमासनानोपि नार्जुनोऽख यमुञ्चत ॥ ९ ॥ सस्यत्रतधरः शरी ब्रह्मचार्गच पाण्डः । गुरुपती व तेनास्त्र संप्रदागर्जुनः पुन ॥ १० ॥ द्रौणिरत्यय संप्रय नारी पुरतः स्थित न शशाक पुनर्योग्मन सासुमोजसा ॥११॥ मशक: प्रतिसंहारे परमासस्य संयुगे। दोणिनिमना राजन् देशायनमभावत ॥१२॥ उत्तमम्प समातेन प्राणवाणगीप्समा मयतवनमरसष्टं भीमसेनमवान्मुने ॥ १३ ॥ ममंत्र कत्तोनेन बासंगष्ट्र जिघांसता मिध्वाखाण भगवन् भीमसेनेन संयुगे ॥ १४ अतः समिदं ब्रह्म मयासमकतारमना । तस्य भूपोऽध सहारे कसे नाहमिहोत्सरे, १५१ विष्ट हिमपा दियमेतदवं दुरासदम । मेपापहवाति मुने बहिनतेजोऽनुमा ॥ १६॥ तार्द पाण्डायानामन्तकायाभसंहितम् । मध पाण्तमान सर जोषिता झंशयिष्यति । १७॥ कृतं पापमिदं ब्रह्मनोषाधिन बैतसा । यधमाशामा पर्वानो औरवड़े दुःखमे पाडावान् मजुन नेभी उस दुष्टभाचारको पाकर उस अस्त्रको नहीं छोगा।.९ । पाण्डव अर्जुन सरसावत करनेाला शर ब्रह्मचारी और सुरुमा था इसहेतुमे उसने उम अस्त्रका फिर लौटालिया। १.। इसके पीछे भलत्यामा भी अपने भागे नियनहुये दोनों ऋषियों को देखकर अपने बलसे उसघोर बस के फिर लौटानको समय नहीं हुआ। ११ । युद्धमें उसपरमभसके लौटाने में अस्पत्य हे दुःखीचिर अचरथामान ज्यासनीसे कहा । १२ । कि हेमुनि वही वापिसे पाडावान् और प्राणोंकी रक्षाका अभिलाषी होकर मैंने भीमसेनके भासे उसस को छोड़ा । १३ । हे भगवन के मारनेके अभिलापी भौर दुरापारी इस भीमसेन युदमें अधर्मकिया । १४ । मे प्राह्मण इनहेतुपे मुझ अज्ञानी ने इस अस्त्रको छोड़ा भव फिर उसके लौटानेको उत्साह नहीं करताहूं । १५ हे मुनि मैंने पांडवों के नाशके अर्थ ब्रह्मोनको धारणकरके इसकठिनता से सहनेके योग्य प्रस्थ को गेड़ा । १६ । पर अन पाण्डयों के नाशके लिये बहुतह प्रव यह अब सब पांडवों को भीननसे रहित करेगा । १७ । ब्राह्ममा क्रोषसे पूर्णचित्त और पदमें पागलों के मारने अभिलाषी मुझ मन जेहनेवाले ने यह पाप किया ।१८ । व्यासजी बोले obporter of true vows, brave and devoted to his p ecoptor, and thero tore he could recallthe nospon. 10. For the sakeoftsourishis Ashra. thama ton, tried his but to recall his yo pun, but was not succes ful in liu attempt. Fusling in his attempt, be said to Vyas ub เ Sixtrossoj mind, " Bong hard prussord and afraid of Bhim, I discharged the weapon to rare my life. ithim had sinned against Dargodban and slain him unfairly. I therefore discharged the werpin, but sin now unable to recall it 15. i discharged it to slay all the Pandavas in my anger, it is enlticient to slay the l'andas as and will purely des Tieu thon of life, Surely i bare committed this sin to Blay tbs Pandavas "Vjaa said, • Arjun discharged the Brahmahar by way of retaliation and dot to slay you Ho diecbarged it to mitigate bo effect 331 Sauptik Parv सौप्तिकपर्ष पास जता ॥१८पास उपाय मलं प्रक्षशिरस्तात विधान पार्षा धन अचागत्सएषा रोपेण न माशायतवाहये ।। १९ अमरेण तुरणे तव संशाम तापिसटमर्जुनेद पुन प्रतिवृत्तम् ॥२०॥ ब्रह्मास्त्र मापवावेतपदेशात् पितु या धर्मान्महाबाहु कम्पप्त धनजय. ॥ ११ ॥ एवं धृतिमतः साधो सस्त्रि शुषः सतः । समाधो. कामाचं घमास्य विकीर्यसि । २२ । म प्रमशिगे परमात्रेण वशते । समाजाश पन्यस्तता; माभिवति । २३ ॥ एगर, शाबाहुः शक्तिमामीप पाण्डवः।म बिहम्पासदसन्तु प्रजाहितचिफोर्षया ॥ २४ पायवास्था राष्ट्रच सदा संरक्ष्यमेष हि । तस्मात् सहर दिप्यं समसमेतम्मा २५ बरोक्स्तव पास्तु पार्थाः सन्तु मिरामा नबर्मण राजर्षि पापडयो विशीत । २६ ॥ मणिज्येष प्रपण्पो यस्ते शिरसि तिष्ठति । एतमादाय पानार मति दास्यन्ति पाण्डयाः । २७ द्रौणिरुषाघ । पानि रत्नम पच्चा चित्त बुद्धिमान् पाण्डष अर्जुनने युदमें जो ब्रह्मशरनाम अन छोड़ा वह क्रोधसे गेडा रे मासकैठिये नहीं छोड़ा। ११ । युद्ध में सरे अस्त्रको अपने मन से शान लेके मिलापी भमनने वहभस्र छोड़करभी फिर सोसालिया । २० । या मा माह भ म तेरे पिता उपदेशस भ्रम मनमो भी पाकर सत्रिवधर्म से कम्पायमान नहीं मा । । । इस प्रकार धैर्यधान माधु सब भनों के ज्ञाता सत्पुरुप इस मानका बारना भाई बंधुओं समेत किसलिये तुमकरना चाहते हो । १९ । हिम देशमें ममसर अब परमअनके द्वारा कियाजाताई उस देश पागपतक इन्द्र मलको नहीं परसाताद । २३ । महाप हुसर्य पांडव संसार के नीषमात्रों की सुदिको बमिलापासे इसी निमिच उस भक्षको अपने मनसे दरनहीं करता ।२४॥ परम ऐन और तुमभी सदैव रक्षा के पोग्यहो हे महाराहु इसहेमुपे तुम इस रिप भको सौगभी तेराकोष दूरहोप और पापडवोंकी कुशल होप यह राप्रापि परिव विजयकरमा नहीं चाहताडे । २६ । अवतुम उस मणिको ददो जो बेरे सिर नियत पांडप उसको लेकर तुझको मागदान देंगे । २७ : अश्वत्थामा बोले किसानों ने यो रत्न और कौरपनि भो भन्यधन इसलोफ में प्राप्त किया of your weapon and bas recalled it. 30 Haring got the knowledge of Brabmalar from your father, Arjun did not deviale froin his duts. Why do you dcirc to slay him and his brothers.. Iudra does not bring forth rain for twelve youre whon Ono Bralioslar ju destroyed by another. Valiant arjun does not uro his reapon for that purpom, though he has tbopower to du to, The Paodavas, the country you are worthy of protection and you must rocall your weapon 15 Babdao your nrath and let the Pandavas lier, They do not like to gain victory by anfair means Gice the l'unduras your head jewel your life in return." Ashwathama said, "MS and and they will sparo । Mabablaat (7021 न्यत् कौरवंदेमम् । अवाप्तयिह सेभ्यो मणिर्मम विशिष्यते ॥ २८ ॥ यमायन नास्ति शलभ्याधिक्षधाश्रयम् । दधे यो दाग यो पा मांगेभ्यो या पथना ॥ २९ ॥ न परसोगणमय म तस्करमाथा । एवं बायों मणिरयं न स्यान्य कथन Rolf पधु मे भगवानाद तन्मे कार्य मगन्त्रम् । अय मणिरयादपिका तु प्रतिपति ३॥ गर्भपु पाण्डपानाममोघ चैतदुधतम् । न घशफदिम भगवम् संहतुं पुनर पताम् ।। ३२॥ एतदनमतवैध गर्भप विएजाम्यहम् । न बाक्य भगवतोम करिमो महामुने । ३३॥ पास उपाच । एवं पुरुन चाम्या शु शुद्धः काग्यो घयानम। गर्भ पाण्याना पिसगारम । ३४॥ वैशम्पायन उवात CRAPE द्रौणिरुमाए । पापनयम. भृत्या गर्भपु प्रमुमोल । ३. इति सौप्तिकपर्वणि प्रलशिगनस्प पामगर्मियशेष पदाऽध्याप:- १. । उन्होंसे यह मेरामगिा पृथक् हे । २८ ।जिमको योचकर किमी दशा मभाशयरोग और क्षुगसम्पनी कोई भपनहीं होताहै इस संभनेवाले को देवता दाना और मपॉसभी भयनहीं है । २९ । न राक्षम के समूहों का पोरन चोरों का भय इथे प्रकार से पह उत्तम मणि है भार किमी दशाभी मुझ से त्याग करने के योग नहीं है। ३० । और जो भगवान ने मुशको आशा करीहै यह घिही भनको कर पहै यह मणि है यह मैं हूं परन्तु पहसाक । ३१ । पांडवों के ग पर गिरेगी क्योंकि यह उसम अस्त्र सफल है है भगान् इस प्रस्ट होनेवाले प्रत्रको मैं फिर नहीं लौटा सक्ता हूं । १२ । मैं इसहेतु से इस अख को पाठयों के ग पर छोड़ ता हूं हे महामुनि भापके वचनों को अवश्य करूंगा । । पासजी बोले निष्पाप इसी प्रकार करो तुमको दूसरी धुद्धि न करना चाहिये इस अस्त्रको पायहरों के ग पर छोड़कर युदमे निरतहो । ३४ । वैशम्पायन बोल इसके पोरे अश्वत्थामाजी के पषन व्यासगी के पचन को मुनकर युद्धमें समदं परम भत्रको गौंपर छोड़ा ३५ ॥ j-pol forma no pa t of the weiltn of the haurayas wid Pandisa." The posseggor of it 18 novor oppreseed by weapons, Aiol.nees or lunger He is nover in fear of gods, dunia yns and serpicula. The porsessor of it has no fear of rakshases or thieves and I donnt was to laro y oth in under any conditun: 30 I am honever bound to do your buddioss My jowol and mysell are at sour disposal But ths prioce of broom sball fall on ho pregnant women of the Panda yns; for thus sycapon Ma not fail to do its work nor 1 LAVC power to recall it Fuar bidding, great risf11g Heap in Isel tall on pregnant wonen ol the Pandavas, " Then Vyas and, " Dont as you haro said Lst your weapon full an the p egnant women and coas, fighting alia npazan fard,' llius ordorul by Vja., Ashwathami, iet lu9 espion fall on pr gnant women " 35 I shall do १ " al 33) Stiegegitauptik l'ary ( ७३३३ सम्पायन उवाच। तदसाय हपीकेशो विवष्टं पापकर्मणा । दृश्यमाण इदं वाक्य जि प्रस्पीचदा ॥१॥ विराटस्क मु पूर्व स्नुषां भाण्टीवधन्धनः । उपलव्यगता दम प्रधान ब्राह्मणोवति ॥ २॥ परिक्षीणेपु कुरुषु पुत्रस्तष भविष्यति । एनदस्य रिक्षिर गर्भस्वस्थ भविष्यति । ३॥ तस्य तदनं साघोः सत्यमेतझोपप्रति । रिक्षिदविता येषां पुनशकरः परः ॥8॥एवं ग्रुधाणं गोधिन्द सारमा प्रघांतदा। रोणि- परमसंख्यः प्रत्युषाचमुताम् ॥ ५ ॥ नितदेवं यथा स्वं पक्षपातेन केशष। व पुण्डरीकाक्ष न स मद्वाक्यमायथा । ६ । पतिप्यति तदनंहि गर्भ, तस्या मयो निम | विराट हितु-कण य व रक्षितमिच्छसि ॥ ७ । भगवानुवाच । भमोघः रमास पातस्तस्य भविष्यति । स तु गो-मृतो जातो. दीर्घमायुरवाश्यात ।। ८॥ अध्याय १६॥ शम्पायन वोरे तर श्री रुपनी पापकर्म करनेवाले प्रश्वत्थामा के छोड़े से उम गलको मानकर प्रसनहोकर अस्यामा .से यह वचनबोले १ । कि पूर्व समय नियमवान वाहाणने विराटकी पुत्री भर्जुनकी पुत्रवधू उचराको जोकि उपपुत्री स्थानपर पर्सपानथी उस्से यह कहा । २ । कि कौरवों के नाशवान होने पर वेरापुत्रहोगा इस गर्भस्थ वालकका इसीहेतुमे परीक्षितनाम होगा । ३ । उप्त माधु का पहवचन सत्य होगा परीक्षितपुत्र फिर उन्हों के देशका चलानेवाला होगा ४। तब अत्यन्त क्रोषयुक्त अक्षत्थामा ने यादवों में प्रत्यन्त श्रेष्ठ इसप्रकार कहनेवाले गोविंदनीको यह उत्तर दिया ।। कमललोचन केशवनी यहइसप्रकार नहीं है जैसे कि तुमने पक्षपातीहोकर यावचन कादि मेरा पचन मिथ्या नहींहो। हे श्रीकृष्णनी मेरा पलाया हुआ वह अस्त्र उस उत्तराके गर्भपर गिरेगा जिसको के तुम रक्षा किया चाहतेहो। श्रीभगवान बोले कि उस परम अत्रका गिरना सफलहोगा और मगहमा गर्भ नीकर वही अवस्थाको पावेगा सब ऋपिलोग तुमको नायपुरुप पापी और बारम्पार पापकर्मवाला और चालकके जीवन कानामा CHAPTER XVI Vaishampayan said, " Shri Krislin was pleased wien ho knesy the fate of Ashwathama's wenp on, and heard to hiin, • Formarly, ATow observing Brahman sail to Uttara tho wife to Ajn's son, "Trg ron will be born after the destruction of the Kuurayas and will be named Parikshit. Tharords of thy •ng , l'arikshit will be tlo po petuator of the line of tho Pandnung. syas much enraged at this lemth and sal" This can not le, lotus-yed Kishurl Your words are biu-8cd. It shali bias I have predict-d: my weapon shall fall en lo tromb of Uttara wloin you wish to prote t" Suri Gren said, 'It is truc that the we# poa shall do it. Fusk, but tbe dead child will be bronght back to --- for se lotivo Aswathama . Mababharat स्पान्तु कापुरुषं पापं पिदुः स मनीपिणः । असपापफर्माणं तस्मात्यस्य पापस्य फर्मणः फलमाप्नुहि ॥ ९ ॥ प्रीणि पर्षसहस्राणि परिम्भनि मिमाम् । मप्राप्नुपन् चित् । काचित् सम्पिद जातु केनचित् ॥ १० हायस्वदेशान् प्रधिचरिष्यसि । मधित्री हि ते जगमध्येषु सीस्थतिः । " पूयशोणिसगम्धी च दुकान्तारसंश्रयः । विधिप्यास पापात्मन् ॥१९|| यः प्राप्य परिक्षित पेदनसममाप्यच | पाच्छारछताछ स्थते ।। १३ ॥ पिदित्या परमामाणिक्षत्रधर्म नरोस्थितः ।बर्षि वर्षाणि धर्मारमा पालयिष्यति॥१४॥इसचाई महावाहुः कुरुरानो मषिष्यविपक्षिवाम दुमते ॥१५॥ महंत जीपस्पामि दग्धं शस्त्राग्मतेजसा पश्यमे सपनोवार्थ मराधम ॥ १६ ॥ध्यास उवाच । यस्मादनाहत्व कसं स्वयस्मान कर्म दारुणम पस्प सतश्चैव यस्मात्ते वृतमीहशम् ॥ १७ ॥ तस्माघदेषकीपुत्र उक्तवानुचम बधः करनेवाला जानेंगे उस कारण तुम इस पापकर्म के फलको पाकर दिठप पर्पतक इस पृथ्वीपर घूमोगे तुम एकाकी कहीं कुछ म पाते और किसीके साथ परस्पर वार्तालाप न करते निर्णन देशों में घूमोगे हे नाच निषास मनुष्यों में नहीं होगा । ११ । पाप और रुधिरकी गम्भि से युक्त, महावनों में निवास करेगा हे पापात्मा सप वीमारियों से संयुक्त होकर । १२ । शूरपरीक्षित भवस्या और वेदवतको पाकर कृपाचार्य से सप प्रमों पायेगा । १३ । फिर परममत्रों को पाकर क्षत्रिय प्रसमें नियत साठवर्षतक मुष्टिकी रक्षा करेगा । १४ । इसके पीछे वह महापाह हे दुर्घदी तेरे देखदे परीक्षितनाम राजा होगा ।१५। मै उस शस्त्रकी अग्नि से हुये को अपने तेज से जिलाऊंगा नाच मेरे सत्य भौर सपके बलको देखो जी बोले जो तुमने हपको भनादर करके यह भयकारी कर्म किया और तु! सत्पुरुप ग्राह्मणका एसा चलनहुआ इनदोनो कारणों से श्रीकृष्णजी ने जो life and will hve long. All the nalis will call yyu tiniul and blaye of infants, and as a puuisuneat of your wichednoss you will roam fo three thousand divino years. You will be shunned by all men am will paus your days in desolate places out of tho reach of runn, Your wound will give forth a bad smell and you will be Loeet with all sorts of disossos. Valiant Pariksbit will live long aud will leart tho uke of Wespons from Kripacliarya. He will rule tho earth som sixtylyears as king of the Kauravas and you will see him, all resuscitato the burnt child by my glory and you shall sce powor of my asceticism. 16. ** Because you did this dreadful dood in epito of us, coaduct ko t'ia", you will bo rojused to the condition fro told 15. 1 the truth and Vyat said, and bore.

1335 Bruprik Parv सौप्तिकपर्व धयम्से तगावि क्षत्रधर्मसषयाश्रितः ॥ १८॥ अश्वत्यामाधाच । संहव भक्ता अन स्थास्यामि पुरुम्विह । सत्यवत्मस्तु भगवानपञ्च पुरुषोत्तमः । १९ । बैश आषम उवाच । प्रायायाय मणि दीणिः पाण्डयानां महात्मनाम् । जगाम विमनास्तेषां पश्यतो धनम् । २० । पाण्डघाभावि गोविन्द पुरस्करप इतद्विषः कृष्णं द्वेषा नष नारद च महामुनिम ॥ २१ ॥ द्रोणपुत्रस्य सहज मगिमादाय सत्यराः। पदामधापन्न प्रायोक्ता मनस्विनीम ॥ २२ ॥ येशम्पायन उवाच । ततस्ते पुरुर साम्राः प्रदरनिलोपमैः । मभ्ययुः सहदाशाई शिीयर पुनरेव हि ॥ २३॥ अवतीर्य साधान्तु स्वरपाणा महारथाः । दोपदी छष्णामा मातराः स्वयम् ॥ २५ ॥ मुपेत्य मिरानन्दा दुःखशोकसमन्विताम् । परियाय व्यतिष्ठन्त पाण्डवाः सह गा. ॥ २५ ॥ ततो रानाभ्यनुशातो मीमसेनो महाबलः । प्रददौ त मणि दिव्यं पचन दिममधीत् ॥ २६ ॥ अयं भद्र तव मणि पुत्रहन्ता जितः स ते। उनष्ठ शोकमत धन कहाहै निस्सन्देह वहीदशा री होनेवाली है हम क्षत्रियधर्ममें नियतहो । संशत्यापा योले हे ब्राह्मण मैं इसलोकके मनुष्यों में आपके साथ नियत हूंगा यह भगान् पुरुषोत्तम सत्यवक्ताई। १९ । वैशम्मायनबोले कि फिर पदासमन होकर वस्थामा महात्मा पाण्डवों को माणे देकर उन सबके देखते हुये वनको गये २० । और जिनकेशत्रु मारेगपे वह पाण्डव गोविंदजी और ध्यासनी महामुनि नारदजीको भागे करके । २१ । और अश्वत्थामा के शरीरके साथ उत्पन्न होने जाली मणिको शीघ्रही उस मनस्विनी और शरीर त्यागनेके निमित्त नियम करनेवाली द्रौपदीकी ओर दौड़े । २३ । वैशम्पायन वोलीक इसके अनन्तर वा पांडव श्रीकृष्णजी समेत वायुके ममान शात्तिम घोडाके झाग फिर को गये । २१। भाप पाडावान् और शीघ्रता करनेवाले महारथियों ने रयों से उतर कर मसन्न मनवाली द्रौपदीको पाडावान् देखा । २४ । वा पाण्डव केशव जी समेत उस अप्रसन्न और दुःखशोकसे युक्त प्रौपदी के पास जाकर उस को पाकर बैठगये । २५ । इसके पीछे राजाकी पाशानुसार महाबली भीमसेन ने उस मणिको दिया और गाणेदकर यह वचन कहा । २६ । हे कर पाणी माया । मणिहै और वह सरेपुत्रों का मारनेवाला विजप किया गया शोकको छोड़ by ihrislın. You have become a kehatrya Baid, Fould stay in the porld with yon Int shr krshnistruthful. Faishampugan said that with a dejected mind, Ashwa' hamna gavolbo Saadavas his jovel and went a nag to tho forost in the prosence of all. The Pacdaras being rid of their enemius, ran forverds Draapadi, led by Govind, Vyng and Naind, and with the jowol got from Ashwa. baminThey rode thoir swift cars and went to their camp. They found Draupadi in great distress and sat lhe permition of the hit s, bravo Bhim.P.6-ODLEU lbojeVelto Drupal "Ashwathams 10 rondd hor, 25. Thea by (7836 का m . Mabubliniat एज्य सत्रधर्ममनुस्मर ॥ २७ ॥ प्रयाणे पामुदेवस्य शमायासितक्षणे । स्वधा भीरु धाक्यानि मधुघानिगि ॥ २८ ॥ नेध मे पतप सन्ति न पुना नातरोम नैव स्थमिति गोविन्द शमिच्छति राजनि ॥२९॥ उक्तवत्यसि सामाणि पुरुषोत्तमम् । क्षत्रधर्मानुरूपाणि तानि स्वस्मर्तुमईसि ॥ ३० ॥ हतो राज्यस्थ परिपश्यिफ । दुःशासनस्प रुधिरं पति विस्फुरतो मया ॥३१॥ यरस्प मानुष्यं न स्म याच्या विकसतान मित्या मुक्तो द्रोणपुत्रो माझम्पानोरणच॥३२॥ यशोऽस्य पातित टेधि शरीरमवशेषितम् विपोजिनश्च मणिना ॥ ३३ ॥ द्रोपद्युवाच । केवलानुण्यमाप्ताश्मि गुरुपुत्रो गुरुर्मम । शिरस्येत माण प्रतिषानात भारत ॥ ३४ ॥ तं गृहीत्वा ततो रामा शिरस्येवाकरोता। मिरपोरया घचमानपि ॥ ३५ ॥ ततो दिव्यं मणिधर शिरमा धारयन् प्रभु. करउठा आर क्षत्रियमका स्मरणकर । २७ । हे श्यामलाचन सन्धिकेज देवजीके यात्रा करने पर तुमनको यइवचन उनश्री कृष्णजीसे नोवे किहे । राजाको सन्धिका अभिलाषी होनेपर मेरेपति पुत्र भाई और तुम चारों में से नहींहो । २९ । तुमने क्षत्रियधर्मके योग्य वीरताके वचन पुरुषोत्तमसे कोथे . स्मरण करनेको योग्यहो । १० । राज्यका शपापी दुर्योधन मारागया मैने कटेहुये दुशासनको रुधिर पिया । ३' । शत्रुताकी अऋणताको पाया लापकरनेके अभिलाषी पुरुपोंकी निन्दाके याग्यनही अवस्थामा पराजितहोकर बामणवर्ग की दृद्धनासे छोड़ागया । ३२ । हेदेवी उसको वह पतिमहुआ शरीरशेषा उसकोमणिसे जुकिंगा और उमके सशस्त्रभी पृथ्वीपर गिरपड़े । ३१ । द्रौपदी बोली निर्दोषमैन अणनाको पायागुरूका पुत्रमेरागुरुदै भरतवंशी राजाधिष्ठिर इस परिण को शिरपर वशि। ३४ । तब राजा युधिष्ठिरन यह समझकर कि गुरुपुत्र की धारण कोई यह वस्तु है और द्रौपदीका बचनहै ऐसाजानकर उसपणिको kli, saying, "Thry 19 yon jewel, goil woman 1iuslayer of your 2009 hua batis conquered Gise up your Borrow and ridd up, ionem buning the hahati ya kuty. When Vatudoy was goin> to the 1015910D peace, you said to hun, " Don't make pract with them as long as you apil my husbands, 80114 and brother ara alive " You spole then like a hshatrya wowou and must reinember it. 30 Our onoray Dure yodlian has buen slain and I hava drunk Dushasan's blood. We bare made an end of the edeny and are not to blame Ashwathama has been defent and is no longer a brahman. He has bon excommu. nicated, Tho jewel has been tahen away from his person and be well powe have fallen." Daupadi a.id, " I bave had my reronge. The Praru's For is my cut Tic this Jewel on your hend, Ling." Yud malathic, knowing tiat it was a thing used bg bis proceptor's son and of (7337 . Sauptik Parr Alicia शुशुभे सनदा राजा सचन्द्रश पर्यतः । ३६ ॥ उसस्थौ पुत्रशोकातितः काना मनस्विनी । कृष्णवापि महाबाहुं परिणमच्छधर्मराट् ॥ ३७ ॥ इति सौप्तिकपर्वणि पिकपणि दोपदी सान्त्वने शोउपाध्याय १६ ॥ बीसे " पैशम्पायन उवाच । हतेषु सांसैन्येपु सौप्तिके ते रखिमि । शोधन युधिष्ठिगे राजा पाशादीमरमप्रवीत् ॥ १॥ कषं मु कृष्ण पान क्षुद्रणाहतकमणा। द्रोणिना निहताः सर्वे मम पुत्रीः महारथाः॥२॥तथा कलामा विकास साम्रगतयोधिन । एपदस्पामांश्चैष द्रोणपुत्रेण पतिताः ॥ ३ ॥ यस्य द्रोणी महेशासोन पावावाह पुजम् । निजगविना श्रेष्ठं घटानं कर्य नु सः । ४॥ किं नु नेन कृतं कर्म तयाधुकं लेकरशिरपर पारणकिया। इसकपीछे दिव्यमणिको धारण करताहमा प्रक्ष राजः युधिष्ठिर चन्द्रमा सेयुक्त पर्वतकेसमान शोभायमानमा ।।६। फिर पुत्रों के शोकसे पीडित मनस्विनी द्रौपदी उठखडाई भोर महाराज धर्मराजनेमी श्रीकृष्ण पूछ। ३७॥ अध्याय ।। १७॥ वैशंपायनवाले कि जो सात्रिक युद्धमें उनतीनों रथियों के हायसे सक्सेना के लोगों के मरने पर शोच करतेहुये रामा युधिष्ठिरने श्रीकृष्णजी से या वचनकहा ।। कि हे श्रीकृष्णानी इसपापी नीच और निष्फल कर्मकामे अत्यामा के हाव से मेरे सत्र मारथी पुत्र को मारेगये। २ । उसीमकार अखन महापराक्रमी लाखों से युद्ध करनेवाले दुपदके पुत्र अश्वत्थामाके हाथ से गिराये गये । ३ । बड़े धनुषधारी द्रोणाचार्य ने जिसके सुद्धमें मुख नहीं किया उस रथियों में श्रेष्ठ पृश्पुम्नको उसने कैसे मारा। ४ । नरोचम उसने इमप्रकारका कौनसा योग्य that Draupadi requested Ino to wear it, pot tho jowol on his head. Hariug worn it on his bead, Yudhishthir looked glorious like a hill over which the moon shineo, Full of sorrow for her sona' grios, Drau. pade stood up and Yudhishthit thus Addressed Shri Krishn."37, CHAPTER XVII - Vaishampayan said, " At the alaughter of all the warriors by the thros hordor, Prince Yodhishthir, in great grief, anid to Shri Krishn, " Hor were all my brarr sons dain by despicable Ashwathama the sinful wrotch whir And that areless daed! Similarly, tho xona of Draw, (१३.. Mahabharat 15838 गरम । यदेक. समरे सर्वान वीनो गुरोः मुतः ॥ ५ ॥ भगवानुवाच । ननं स देवदे बामामीभ्यरेश्वरमम्पयम् । अगाम शरण द्रोणिरेकत्तेनावपीवहम् ॥ ६ ॥ प्रसन्नादि महादेशो दद्यायमरतामपि । कार्यच गिरिशो दयाधेगेन्द्रमान जातयेव । ७॥ वेदार हिमहादेव तत्पन भरतर्षभ । यानि चास्य पुराणानि मानि विधिशानिध.८॥ मादिरेष दि भूतानां मध्यमन्तब्ध भारत | विचष्टने जगचेदं सर्वमस्व कर्मचा.. एमसिसचभूतानि ददर्श प्रथम विभुः । पितामहो प्रधान भूतानि एमा विरम ॥ १०॥ हरिशस्तयत्युक्त्या भूतानां दोषदर्षियान् । दधिको तारतेपे गायोऽमसि महातपाः ॥११ ममहान्तं नराः का प्रतीक्षशन पितामह । अष्टार सर्वभूतामा बस मस्तापग्म - १२॥ मोऽब्रवीत पितरं सृष्टता गिरिशं सुप्तमम्भ नि परिमानो कर्म किया जो अाले गुरुपुत्रने हमारे सब पुत्रादिकोंको युद्ध में मारा।५ श्रीभगवान बोले कि निचय करके , अत्यामा उस अविनाशी शिवजी के पारण में गया जोकि बडे देताओं के ईश्वरों काभी ईसरहै उम इहमे ओपने बहुतों को मारा । ६ । महादेवमी प्रमत्रहोकर देवभाग को भी देसते हैं और उसपराक्रमकोभी वह गिरीश देसताहे जितके द्वारा इन्द्रकोभी नाशकरे । ७ । हे भरतर्षभ में महादेपनी को मूलपमेंत नानताहूं और उनके जो नानाप्रकार के प्राचीन कर्म है उनको भी श्रेष्ठ रीति जानताई। ८ । हे भरतांशी यह शिव सब जीवमात्रोंका आदि मग और अन्तः और सब संमार इसी के प्रताप से चेष्टा करता है । ९ । इस प्रकार मृष्टिकी उत्पत्ति करने के प्रभिलापी समय त्रिगुणात्मक इंपरने सबके मादि तमोगुण रूप रुद्रनी को देखकर कहक जीयोंकी उतात्ति में विलम्ब न करो १० तब बढ़े तपस्सीजीयोंकि दोप जाननेवाले शिवजीने प्रङ्गीकार करके जलमें दूसकर पहतकालतक तपकिया इसपीछे ईशरने बहुतकालपर्यंत उनकी प्रतीक्षाकरके सत्र जीवकिस्सामी रमोगुणीरूप प्रजापतिको मन में उत्पम किया । १२ । यह नमें pad who rould alay hundreds of thousanda, were destroyed by binn How could he slay Dirish tadyumn whom even Diona could not oppve! By what deed he had power over my role and others. Siree Bhagiran (Krishu) Rad, " Surely. Ashwatharms sought the protection of immortal Sliv the lorù of goils, and was therefore able tn Blay so many. Mahadev, when plensed, can givo godhood. 10 can give a prowess capable of destroyiog Iudra. I know Mabadov and his deeds d Du in "he days of yoro Ho in the begioning, the mid Ils and tir end of all creat on All the world liges by his glory. Desirous ofc at ng the world the alınighty Ishwar asked Rudra to creale all beings without bulay. 10. Buv took the work on bimself and remained long merged in water to portorin asceticism. Ishwar waited long tor him and then created Prajapati from his thought " (7339 Sauptik Parr सौप्तिकपर्व ७३३९॥ स्थाबस्ततः मल्पाम्यहं प्रजाः ॥ १३ ॥ तमप्रवीत् पितानास्ति स्वदन्प. पुरषोप्रजा। स्थापरेषनले मग्नो विभन्धः कुरु वैकृतम् ॥ १४ ॥ स भूतापजत् सप्त पसादी प्रबापतीन् । वैरिम व्यकरोत् सधैं भूतमाम चतुर्विधम १५ ताः सृष्टमात्रा धिता प्रवाः सर्वाः प्रजापतिमा विमपिपयो राजन् सहसा प्रादयत्तदा ॥ १६ ॥ स भक्ष्य माणामानार्थी पितामहमुपाद्रवत् । माश्यो म भगवासातु पश्चिरासा विधीयताम ५१५ ॥ वत्तस्वाभ्यो पदावनिमोषधी. स्थायराणि च । जनमानि च भूतानि दुर्घलानि पक्चाम् ॥१८॥ विहितानाः प्रास्तास्तु जग्मुः सप्टा पधागतम् । ततो षधिरे समन् प्रतिमत्वः स्मोनिषु ॥ १९ ॥ भूतप्रामे घिरी तु तुम्टे लोकगुपबपि। उदति पाठः प्रनाबमा दर्श मः । २०, बहुरूपाः प्रजाः सृष्टा षिवृद्धाच स्वते दूपणे शिपजीको देखकर अपने पितासे बोलाकि मां हमसे प्रथम उत्पन्न होने पाग दूसरा नहीं है इसदेतसे मैं मृष्टिको उत्पन्न करताहूं। १७ । ब्रह्मामीने कहा तेरे सिवाय दूसरा पुरुष प्रथममृष्टि नहीं है यह शिवजी जल वहुये हैं विश्वास करनेवालीपष्टिको उत्पन्नकरो। उसने दक्षादिसात प्रजापतियोंको उत्पन्न किया भोर सपश्रीवाकोभी उत्पन्नाकया जिनकद्वारा इसचारकारकी खानवाले जीब समूहों को उत्पन्न किया । १५ । हे राजा तववह समृष्टि उत्पन्नहोरोही क्षुधासे माना कोकर ममापति के भक्षण करनेकी इच्छासे दौड़े । १६ । यह सभापति अपनी रक्षाके निमित्त पितामह के पासगया और कहा कि हे भगएन् उनलोगोंसे मेरी रमाके पे धनकी जीविका विचारकरो।१७। इसकेपीछे पितामहनेउनकी भीषिका केहि भन्न औषधी और स्थापरजीवदिये और पलयाम छोगोंके अर्थ चेष्टाफरनेपाले भौर निर्बल भीपदिपे । १८ावह उत्पन्न होनेवाली मुष्टि जिनके मत्यं भन्न विचार कियागयाया अपमे स्थानों को गई हे राजा इसकेपीछे अपने पत्ति स्थान माता और पिता मादिक में प्रीति करनवाल पर अनापति लोग घृद्धियुक्त इसे फिर जीपसमूहों के डिपाने और लोकगुहके भी प्रसन्नहोनेपर यह महापुरुष जसले उडे पोर न सृष्टियों को देसा । २० । बहुत रुपवाली मष्टिक लोग उत्तम Sesing Shiv merged in water, he said to his father, " Becanso I am the first-created being, I shall bring forth ali creaturel "Brahma said, "Really thoro ja no other buing torn beforo you, fur Bliv i morged in water; you may bring forth all creatures So ho brought forth the seven Prajapatis, Daksh and others, who or sught forth creatures of foar sorts. 15, All the creatures, as they were born, became oppressort with hunger and can towards the Prajapati to eat him up llo sought protection of Brahina and asked him to provide thon food. Then the grendfather created food, medicinos ond other plants as wel as weaker creatures for the use of the stronger Having got food, thiog went to their own places Tho Prajaputis loving their parents, multiplied in Mahnbharat (73105 भसा । चुरोधाभगवान कोलि सञ्चाविश्पत ॥ .२t • तत प्रविय तथा भूमी तथैव प्रस्थतिष्ठत । तमुवाबाहपयो ब्रह्मा पचोभिः शमयनिय ।। २२॥ति महिल सर्व शिकारियोन ते ।हिमचंदमुत्याय लिंग भूमी प्ररितम:२, सोन' बात जातसरम्भस्तथा लोकगुरुगुरुम । प्रजाः सृष्टाः परेणेमाः करिष्याम्यमेन वै ॥ २४ तपसाधिगत धान प्रजा मे पितामह। भोपाप परिवर्तन एवं संतसं भजाः ॥ २० ॥ एवमुक्त्वा स सक्रोधी अगाम विमना मयः । निर्मुजवता पाई तप शुमहातशः ॥२६॥ इतिथी सौतिकपर्वणि पविकपर्वणि कृष्णधुधिष्ठिर संशदे सप्तदशोऽध्यायः॥ १७ ॥ 8 | होकर प्ररने सेजसे द्धियुक्तथे तब भगवान रुद्रजी क्रोययुहुये और भपने लिंगको भीकाटकर' पृथ्वीपर इसनिमिच गिरायां ।। वह जैसे उसीपकार पृथ्यापर नियतहुमा वचनोंसे पान्त करते अविनाशी नमामी बोके । १२ हे रुद्रजीवहुव काल पर्यन मापने जल निकाम करके क्यारिया और किसनिमित्त इसलिंगको उखाड़कर पृथ्वी में नियत किया । २३ । वह लोकगुरू महाधित होकर गुरु से बोले कि यह सब मुष्टि उत्पन्न होगई। अब में इसलिंगपे क्याकरूंगा। २४ । पितामा मेरे सपने मजाके निमिष, अन्न पारामा और भोपा सदैव अपने रूपान्तरको करती हैं गा जिससे कि सटि सदैव होतीरहे । १५ । बर रिमन और कोपयुक्त य? तपसी रुद्रनी इसमकारसे कहकर. मुंजपत पहाड़ के समीप तपकरनेको गये ३६॥ lw'ge nuvobors. When the treatures vers this in irensing and Brahma was pleased in diis mind,, Si s canie out if water and saw the crhatiin 10 H:: **** the world fall of creatures and h-ing much ouraged cut usundor liio rialo orgia and dropped it on tl ceaith. It stod up erect ng soon as it was cut Jowel, Z'hen wisliing to appende his wratb Brahma said, " Wat bave you dono by 863 ying so long under wator and why have you cut and erected this organ of yours?" Then Shiv gave him the flowing reply in anger, 6. The world har.be 10 created qia epite et m Viret Pliall I do with this tl ing ?:The fuod hias been created by my own ascolicism and Qedicinal berbz will contiue to obanga forms and give nouri-liment to the worid " llaving raid this, tho great asciic, dejuoted in wil, went to perform asceticion Dour Monujwat bir from lol and unr yagya trihm-yagya and Panchbhut aorygyo. 5. Rudra Prepared thum 1) भगवानुवाच । ततो देवयुगेतीते देवा समारपयन् । य घेदप्रमाणंग विविध हुमप्सवः ॥ १॥ कल्पयामासुर से साधनानि हीपि प भागा देवताश्चैव यि द्रध्यमेव च ॥ २॥ साधे सहमजामन्यो याथातथ्येन देवताः । नाफम्परन्त स्थ स्थापोर्भाग नराधिप ॥ ३ ॥ सोऽफम्प्यमानेभागे तु कृत्तिवासा मोऽमरः। साधनमन्विच्छन् धपुरानो सससह ॥ ४ ॥ लोकया क्रियायशो गृहयत तिन पञ्च मूतमयोयता नृगनधेष पचमः॥५"लोकपञ्चै योश्च कपर्दी विदघेधनुः। मटमभूतस्य परिष्कुप्रमाः ॥वपटकारो भयज्यातुधनुषत्तस्य मारतायता नि ध पत्यारित सामनेऽभयन् ॥ ७ ॥ ततः कुरो महादेयम्त दुपादाय फार्मु मामाजगामाच तत्रैव यत्र देवाः समीजिरे ।। ८ । मतात्तकामुक हप्ट्या ब्रह्मचा मध्ययम् ।विध्य प्रषिधी देवी पर्वताश्च धम्पिरे ।।९। न यो पंचनव नाग्नि अध्याय १८ ॥ श्रीभगवान् योले कि सतयुगके अन्त होनेपर विधिक पूजनकरनेके अभिलापी पतामों ने वेदके प्रमाणमे यज्ञको विचार किया । १। फिर उन्हों ने सब साधनों ने धनेशों को भागके योग्य देवताओं को और यग्यकी द्रन्योंको कल्पना किया । राजः मूलसमेत रुद्रजी को न जाननेवाले उन देवताओं ने देवता रद्रजी भागको विचार नहीं किया ३१ यसमें देवताओंसे भागका विचार न करने पर पज के नाशको चाहनेवाले उन रुद्रजीने प्रथम धनुपको उत्पन्न किया । ४ । लोक पर, क्रियापन, पदयन, पञ्चभूत नरया, इन चारमकार के यज्ञों में यहसय जगत नियत है । ६ । रुद्रनीने लोकयश चार नरयनों से धनुपको तैयार किया उनका उत्पन्न कियाहुमा धनुष मार्गमें पांच हाथहुआ ।६। हे भरतवंशी उसधनुप की मत्यंचा वपद्कार प्रत्येक वासनारूपामा यज्ञोंके चारों अंग उसकी दृढतारूपया उप पीछे क्रोधयुक्त महादेवजी उतघनुपको ले कर वहां गये जहाँपर कि देयता लोग पझ कररहेथे । ८ । उस धनुप उठानेवाले अविनाशी ब्राह्मचारी को देखकर रात्री देवी पीडित हुई और पति कम्पायमान हुगे ।९। वायु नहीं ली और CHAPTER XVIII Sliruo Bhagwan said,. At thioclid of Silyog the gode intor.ded to posfer. 21 A sacrifice accordiog to the Velic rites in l.oncer of Bralmen They collected all tuales iuds and set apart gedla portions. flot knowing hudia well, tief declicnted nothing to him. At this, Bludru crested tlie br. to destroy the encrifice u pole. Ticno.id Lista liy four sorte ur Sacrifice Lnonn ns ..-jaksa, hry n-jagyn, It nan fise iubita in ktigth. Ito 'Tiny nay mula of Vasalhar and 17 * exceedingly strong. din on that bur Rudra month the placral scrifice. The earth and Hay utairs sluok at the s'ght of Hat in mortal Hinhmchari aunti । ७३५२1 Malinbharat (73481 जपाल धितः । ध्यभ्रमच्चापि सीयग्न दिवि नक्षममण्डलम् ॥१०॥न यो भास्कर श्थापि मोमः श्रीमुक्ताण्डल ।तिमिरे नाकुलं सर्पमाकाशवामपनम् ॥११ माम भूतास्ततो देवा विषया परेन प्रत्यभाच्च यशः स देषशास्त्रेसिरे तदा ॥१२॥ ततः स शं विव्याध रोद्रेण हदि पगिणा। अपमान्तस्ततो यनो मृगो भावा सपा घका ॥ १३॥ स तु तेनंघ स्पेण दिश ५ व्यराजत । अन्यायगानी रुद्रेण युधि ष्ठिर नमस्तले ॥ १४ ॥ अपमान्तततो पो . सशा. प्रत्यभात् मुरान् । मटसेवेत देवेषु ग प्राशायत किञ्चन . १५. यस. सचितुर्षाहू मगस्प नयने तथा । पूजस्व पशनान् कुलो धनुष्फोट्या ध्यशाराय॥ १६ ॥ माद्रपल ततो देवा यांगानि च सर्वशः । फेचि रात्रै गन्तो गनासत्र इवामपन् ॥ १७० स तु विद्राव्य तस शिति मठो पहस्पच । सभ्य धनुपाटि चरोध घिबुधास्ततः ॥ १८ ॥ ततो पागमरवता वृद्धियुक्त अग्नि ज्वलित नहीं हुई और स्वर्ग ब्याकुल नक्षत्रमण्डल भ्रमण करने नगे। १.! सूर्य और शोभायमान न्द्रमण्डल भी प्रकाशमान नहीं हुये सपमाका अन्धकार से व्याप्त हुभा । ११ । इसके पीछे कुल देवतामोंने विषयों को नहीं जोनी सब यह यज्ञ गुप्तहमा औरदेवता भयगीत हुये । १२ ६इसके पीछे उनों ने यज्ञको रुद्रयाणसे हृदएपर घायरुकिया इसके पछि यह यश मृगरूप होकरग्निसमेत भागगया। १३ युधिष्टिर फिरमह उसीरपमे रगको पाकर आकाश शोभाय मान हुभा फिर कालात्मा द्वनी से पीछा किया हुआ वह यज्ञ फलके भोगके पीछे स्वर्गस पतित हुआ १४ इसके पीउयक्षके भागने पर देवताओंका ज्ञान मकर मही हुआ और देवताओं के अचेत होगपर कुछनही जानागया १५ व्यग्यक परमेशरने सविता अर्थात् यज्ञ करनेवाले के शरीर की भुजाओंको भौर भगके नेत्रोंको प्रपाके दाँतोको पूरशक्त धनुपकी कोटि मे गिराया।१६ । इसके पाछेदवता और पोंक सब अङ्गभागे और कितनेही वहां घूमतेलुगनिर्जीवके समान हुये । १७ । धन कभी ने उस सब यज्ञको भगोसमेत भगाकर हँसकर धनुपकी कोटिको निष्कर्म करके देवताओंको रोका अर्थात् लोक और शरीरको प्रतिसे प्रथकाकिया। १८ । इसके with bom. The wid did rot Llowy, fire ceased to burn and stars began to turn round testlessly. 10. 11 sun ard the moon Jork their splendour and the shy became dail. The goda did not Low what to do in their ttuor-striken tate and tio racuficu ranisl ed. Rudia pierced tbe sacuire sul lui3 & ICH aid it ileal nnay with Ain the likeness of a de i. It stod in the sky in that shape, chased hy Rudra iti fell down azam at the lapse of its merits. The gode 1 their senses and d d not 'n w what to do. Puimeshwar cut the Atin of Suvila, the eyes of Blag and the teeth of Pousha with the I of bis buv, Tin gode scaoipered lu tenor, wlule sume b motionless line inanmil things, Suly with a smile cheeltd the, and coastd luis biog Departed from the string the 1) W 1G . - suddenly jurupu a listle Then all the gols with the sacrifico coogiat world becade satisfidand the gods eet apait lns slai Tie would was ngitated with liis anger and was rretered to equilibrium ni bis vould alay Dhrigh tad yumn and yotir 2008, Lab Athoman but that of Shir ard therefore you should not be ७३४३ १९॥ ततो 1848 का तस्य धनुसोच्छिनत् । अथ तत् सहसा राजा छि4 mins विधनु देवा दयश्रेष्ठमुपागान् । शरणं सह यहेन प्रसाद याकरोत्तमः ॥ २० ॥ ततः अमनो भगवान् स्थाप्य कोपं जलाशथे । स जपायको भया शोषयत्यनिशं प्रमो ॥ २१ ॥ मगस्य नयने य वाह च भवितुम । मादात पूक्ष दशनान् पुनयंशांव पाण्डव ॥ २२ ॥ ततः मुस्थमिदं सर्न बभूव पुनरेव हि । साणि च हवींयस्य देवा मागमकरूपयन् ॥ २३ ॥ तस्मिन् मुद्धेशरत् सर्गमस्वरूपं भुग प्रयो। प्रसभे च पुनः स्वस्थ प्रसनोस्य च वीर्यवान् ॥ २४ ॥ ततने निहताः सधैं तबः पुत्रा महारथाः। मन्ये च बहवः शरः पाञ्चालाः सपदानुगाः । २५ ॥ ग तन्मनसि कर्तव्यं न व द्रौणिमा छनम् । महादेवासादः म कुरु कार्यानन्तरम् ॥ २६ ॥ हात सौप्तिकपर्वणि ऐरिकपर्वाण कृष्णयाधीष्ठरसंवादे अष्टादशोध्यायः १८ ॥ पाने देवताओंकी कहीहुई वाणीने उनकेधनुपकी प्रत्यञ्चाको जुदाकिया इराजा फिर परपञ्चासे जुदा वह धनुप अमाव कुछ चलायमानहुआ । १९ । इसके पछि यशरोमन सब देवता उस देवताओं में श्रेष्ठ और धनुपमे रदिन ईश्वरकशिरण में गये और मने पाकरी । २० । इसपछि भगवानबोध त्रिगुणम्पको समुद्र मज्ञानचित्तमें निपतकरके प्रसन्नधुये हेमर्थ को आस्मा अग्निहोकर जमको पान करताहै । २१ । हे पाण्डव फिर मा देवताके पन्नों को और सविताको को पूषा के दानोंको और यज्ञाची दिवा अर्थात् सात्विकयज्ञ जारीहुमा १२२॥उनके पीछे या फिर सिविता और देवताओंने सब हन्यों को उसका भाग नियत किया अर्थात् मय कर्म ईशरार्पण किये गये । २।। हे युधिष्ठिर उसके क्रोधयुक्त होनेपर सब समार व्याकुहुआ और मसम होने पर फिर स्थिर हुआ वह पराक्रमी नियनी उसके ऊपर प्रसन्नद्वये । २४ । उस कारण से थापके पद सा महारथी न मोर धृष्टद्युम्न के पीछे चलनेवाले वहुतमे अन्पर र मारेगये । २५ । यह चित्त नहींधारण करना गहिये उतको भश्वत्यामाने नहीं किया अर्थात् सब ईश्वर आधीन शोक न करना चाहिये महादेवनी की प्रसन्नत से निस्सन्देह शीघ्रतापूर्वक करने योग्य व मोको करो । २६ ॥ Tefugo of Shis and he was nierciful. 20. Then io placed kig anger in the ocean of ignorant mirdr. It inte ti o mud as firo doen water. Then he rest red the links of gods and the facrifice bxgen. Tlien the प - pleasure. Siis sax plersed witli Amrathama sad thoreloso ho it fras sot the work of . worry. " 26.

महाभारत ॥ अथ जलप्रादानिकपर्व ॥ MAKE নায়লা নময় নব নবময় देवी सरस्वतीम्चद ततो जयनुदीरयत् ॥ जनमेजय उवाच हरो दुर्योधने बैच हते सैन्ये च सर्पश । धृतरादो महाराज श्रुत्या फिमकरोग्मुने ॥ १॥ तथैव कौरवो राजा धर्मपुयो महामना । कृपप्रभृतयश्चैव फिमकुर्वत ते त्रय ।। २ ॥ अश्वत्थाम्न थुत फर्भ शापादन्योन्यकारितात् । वृत्तान्त मुत्तर हि यदमारत सञ्जय ॥ ३॥ वैशम्पायन उपाच । हते पुत्रशते दीन छिन अप स्लीपर्व। अध्याय ॥ । थीनारायण और नरोत्तम नर को आर सरस्वती देवीको नमस्कार कर के फिर नपनाम इतिहाम को वर्णन करता हूं जन्मजय बोले कि हे मुनि दुर्योधन के मरने और सब सेनाके नाश होजाने पर महाराज धृतराष्ट्र ने सुनकर क्या किया। १। उसीमकार धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर ने और उन कृपाचार्यादिक तीनों ने क्या किया ।२। आपके कहने से भश्वस्थामा काम मुना परस्पर शाप देनेमे पोछका जो बचान्त संजय ने कहा उसको आप मुझसे वर्णन कीजिये ।३। वैशम्पायन योले कि सौ पुनों के मरने पर दूटी शाखाओं के दृत ममान STRIPART CHAPTERI Hiring borrel down to Narayan, Nær the best of malo beinge and Goddess Sinsirati, let us undertake the histors at the great victory. Janm*J4Ja said, " Syhint did Dintrawhtra do at the death of Duryouban and the destruction of all tho aring ? What did Indbrhthir and tho three marriors, Kripacharya nnd others do ! I have heard of tho deal of Ashwathawa, that was the state of things after ho tras euned!" Tarskampayan said " at the death of his handred Mne, [७३४६] Jfulhnilhn.at 7346) शामित्र दुमम । अशोकाभिरावृतराष्ट्र, महीपतिम् । ध्यानगमस्यमाप चिन्तया राभिम ॥ ४ ॥ यमिगम्य महा N यो चाफ्यम गीत् । शोधात महाराज 'माप्ति शोके सहायता । ५ ॥ अशा हियो नाचा यश धैग विशाम्पते । निगेयं परामती शून्या संप्री फेघला ॥६॥ गावाविण्य समानानादेश्या नराधिपाः । साहितालय पुगेण स वै निधनंगता. ॥७'पिणांपुत्राणां ज्ञातीनां महदातयाारू गाञ्चापूर्वेणोतकार्याणि कारयामा धेशम्पापन वधाच नपुनो तामात्यो हनममुहम्जनपतिमुधिधंपों पाताहतष हम ॥९॥धृतराष्ट्र दयावा तो हामात्यो हनमायु:खी नून भषिच्यामि विवरर प्रचितीनिमाम् ॥ १ ॥ किन्नु वन्धुविहीन जीवितेग माय । लूनपक्षस्व इप गेनाराजी गसर पक्षिगः ॥ ११ ॥ हुनराज्यो हान्यूलियाथ ये तदा । नमाजये । दुखी और पनसोक से पीड(बान पान मौनता युक्त चिन्तामें हवेहुये पृथ्वी के स्वामी महाराज धतराष्ट्र के पाप जाकर गजपने यह वचन कहा हे महाराज क्या शोचते हो शेकणें महागता नहीं होती है । ५। हे राजा अठारह अहिणी सेना मागगई मा यह पृथी सेना के लोगों से और राजाओं से रहित होकर मित्रों से विहीन है । ६ । क्योंकि नानादेशके रागमों ने बहुत दिशाभों से भाकर सरने अपने पुत्र के माथ नाश को पाया । ७ । भर आप अपने पुत्र पौत्र ज्ञाति मुहर और सब कौगोंके क्रिया कर्मको कराइये ८ वैशम्पायनबोले कि पुत्र पत्रारिकों के मरने से पाडावान् बडा अमेय धाराट उम शोक कारी वचन | को सुनकर पृथीपर ऐसे गिरसड़ा जो यापुसे तडित क्ष गिरपड़ताहै। ९ धृतराष्ट्रवालकि जिसके पुत्र मंत्री और राय मुज्जनमारेगये ऐसा में होकर सम्पूर्ण पृथ्वीपर विचरूं। १. अपकटे पक्षवाले पक्षा के समान मुझरव दशासे दुर्वल वांधवोंसे राहत के जीवन से क्या प्रयोजनहै हे महाभाग राज्य महज्जन और नेत्रों से रहित मैं ऐमा शोभित नहीहूंगा जैसेकि विना किरण वाला मूर्य प्रशोभित Dhrite ashtra, full of grutf, like a tree destitute of all branches, was sitting in derp ineditation und silenca Sinjaya dain; to him and sad, " What are you thinking about, Erperor ? Gi1ef can be of no help. 5. Eighteen akshadhinia lave been destroyed and the earth (has become di stitute of fairiors, pince:24 freuds, Princes of disforent lands came here and were, destroyed with your son. You have 'now :ty perform.the funeral rites of your sous, grandsons and other Bau- Dhritrasltra tell.down on the earth like a tiee up-outed by wind and said," I shall now roam on the earth destitute of sons, friends What is the use of living like a feathcı less bird is my old age ! Destitute of kingdoro, friends and eyes, I shall look io glorious like the sen without his says. I did not ect upon the advice S " Javar. a..dadvisers. 10.

हाप्राश क्षीणरहिमरियांशुमान् ॥ १ । न क्रतं सुहृदां चाश्य जामदग्न्यस्य जल्यनः । परदस्य च देवर्षेः कृष्णद्वपायनस्य च ॥१३॥ हमामध्ये घ कृष्णेन यत् धेयोभिहां मा पलं धेरैण पे राजन पुत्र संगृह्यतामिति । तम यास्यमा याम भशं तप्यामि दुर्मतिः ॥१४॥ न हि श्रीतास्मि भाप्मस्य धर्मयुक्त प्रमायितम् । दुर्योधनस्य च,तथा समस्य नई नः ॥ १५ ॥ दुःशासमषधं श्रुत्वा कर्णम य विपर्ययम् । द्राण सूर्य परामच दृदयं मे विदीयते ।। १६ ॥न स्मर म्यात्मगः किचितू पुरा समय दुष्क तम् । पस्यो फलमोह मया मूढेन भुज्यते ॥ १७ ॥ नूनं व्यपक्रम फिविचन्मपा पूर्षेषु बमम् । येम मा दु ख मागेपु पाता कर्मस युक्तधाम् ॥ १८ ॥ परिणामश्चघयसः सर्व सधूसपश्च मे । सहम्मित्रानाशय देवयोगानुपागत । फोन्वस्ति दुखिततगेमतोन्यो हिमा मुधि ॥ १॥ तम्मामय पश्यन्तु पाण्यासंशितव्रतम् । विवृत्त प्रललोफरूप शापवानमानितम् ॥ २० ॥ वैशम्पायन उवाच । तस्य लालप्यमानस्य बहुशोक होताई १२ परशुरामनी देवऋपिनारदजी पौर व्यासजी इन शुभचिन्तकोंके कहे हुये वचनोंको नहींकिया । १. सभाके मध्यमें गा कृष्णजीने मेरेकल्याणका कर ने वाला यह पचन कहाया कि डेरामा शत्रुताकोत्यागो और अपने पुत्रको वन्धन में करे। उनके वचनोंको भी न करके में दुर्बुद्धी अव कठिन दुःखको पाताई और धर्ममे संयुक्त पाप्मनी भी वचनको मुनअभागे ने नहीमुना राजाओं में दुर्यो धनका नाश वुशासन का मरण कर्णा विपरीत मरण और द्रोणाचार्यप सूर्य के ब्रहणको उनकम्, मेरा हृदय फटता है । १६ । इसमय पूर्वसमयके कियेहये अपने कुछ पापों को नहींमानताई जिसके किफगको अब मैं दुर्भागी भोग रहाई । १. 1 निघय कर के मैने पूर्व जन्मों में पड़े पाप किये है जिसके कारण से ईश्वर से सुधको दास उत्पन्न करनेवाले कम्मी में टच किया । १८ । मेरी अवस्थाका अन्तिम भाग पुन पौनादिकों का नाश भोर मुहृद बंधुओं का मरना दैवयोगी मरी से नहीं है इस ले कमें गुझो अधिक दुखी दूमरा कौन पुरुष हे । १५ । नेमात या सप पाण्डव लोग मुमती उम व्रह्मलोक के मिलने भोर पड़े मार्ग नियमापे फो दखेगे । २० ।बैशम्पागन बोले सज्जपने उम of Parashuram, Narad and Vsns, my wol wishers. Kiihn told ro to give up enmity and to cases my 831 in prison, but I did not act up on his ndricuand liaio lallon into the trouble, I did not give enr oron to the advice of Bhislim. Aly beurt bials to hear of the dentlı FDuryodhan, Dushasan, halan and D .in. 16 I donet hos for that sins of my previous life I om bem: pun rlsed. Surly 1 linse committed griei oua min, for which 1 limue fallen intro this nic great droerustinn of I inanan and fico de 111 mg o'ngo au'd nt bo cuumd but by I ato Wlucul nou fullot mixirs than me! 11.0 Patlains will un see mr preparing for the next world. " 20 Tri. TIc . ७३४८) Mohnbliniat (73481 वितन्धतः । शोकापर मोस्ट्रस सम्झयो बानमावीत ॥ २१ ॥ शाह गान् व्यपनद भुतास्ते घेदनिश्चयाः। सामागगाध विविधा वृन्पो नृपसत्तमा समय पुत्रशाकांत यवनपः पुग ॥ २२ ॥ यथा पोषनजं.दर्पमास्थिते ते मुते , नप । म घया सहा यामाम पधारितम् । घिन कृतः कश्चिल्लुब्धेन फल गृति ना ॥ २३ ।। असिनपैकवारेण स्वयुद्धपातु, विपिनम् | यशोऽवृत्तसम्पमा सतत पर्युपामिमाः । २५ ॥ यस्य दुःशानमो मन्त्री गधेपश्च दुरात्मवान् शनि श्य दुशात्मा चित्रमय दुर्मतिः । न्यध घेन सथै शल्यभूतं तं जगत् ।। २५ ॥ दुरुपयस्य भीष्मस्प गान्धारा घिदुरस्प या द्रोणस्प महाराज कृपस्य चं शरदतः ॥ २६॥ इणस्य च महाशाहो नारदस्य च धीमता । पापीणाम तथान्येषां व्यास स्या मिततेजसः । न स तेन पप तय पुप्रेम भारत ॥ २७ ॥ मयुदिरहंकारी यित्ताप करनेवाले मौर भनेक प्रकारसे शोक विस्तार करनेवाले रानाधृतराष्ट्र के शोकका दूर करनेवाला पचन कहा कि । २१। हेराजा शोकका दूरकरो तुमने बहुतमे धर्मके निधय मुने. हे राजाओं में श्रेष्ठ सुमने द्रों से भी अनेक प्रकारके शाख मुने हैं कि पूर्वसमयमें चुपके शोकसे राजासृनय के पाडावान होनेपर मुनि योने जो कहा । १३ । और मिसमकार तरुणता के अहंकारमें आपके पुत्रदुर्योधन के नियत होनेपर ऋपियोंने जोकहा उसको भी सना । २३: जोतुमने वार्तालाप करनेवाले अपने शुभचिन्तकोंके वचनों को नही अंगीकार किया रोगी और इसयुद्धी | होकर तुमनेकोई अपना प्रपोमन नहीं किया । २३१ मापने केवलं एकधाररखनेवाली तलवार के समान अपनी ही पुदिने सम कमकिये और पहा दुराचारी लोगोंको सलाहकार करने के निमित्त समीप बैठाया २४ दुश्शासन दुर्युद्धी कर्ण बड़ा दुष्ट स्मा शकुनी दुर्मति चित्रसेन और शल्य किसके मन्त्री जिस शल्पने सप जगतको भालरूप किया । २५ । हे महापाहु महाराज भरतवंशी धृतराष्ट्र भापके उस पुत्रने कौरवोंके वृद्धभीष्म पितामह, गान्धारी, विदुर, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, श्रीकृष्णजी बुद्धिमान् नारदजी भार बहेतेजस्वी व्यासजी मादिअन्य २ ऋपियोंका भीवचन नहींशिपा जोकि निर्बुद्धी महंकारी मदेव युद्धको काता निर्दयो भनेयपराक्रमी alampayan said, that Sanjays conBiled the monarch in the following worde:-ms Cuase your grief, king You have heard many religious precepts from old man as well as that which the munis said to Srinjaya who was oppressed with grief for his son. of the cages nbout your son Duryodhan's pride. You did not atterd to the advice of your well wishes and have therefors thrown yourself into misery. Like an elged sword sou were sell-trilled and kept company with wicked men lie Dushasan, Raran, Shakuni, Chitraren and Shalya the tho w of the world, Your son gave no ear to the ad vice of old Dhishim, Gandhiari, Diona, K'rija, Sbri Krishr, wise Narad. glorious Vyas and otl or sages. He was unwiss, prod, war. You &lvo heard the talk Stu Part 9 (7349) स्ये युमिति बुवन् । करो दुर्मर्षणो नित्यमसन्तुष्टश्च वीर्यवान् ।।२८ ।। श्रुतधानसि पापी सत्यपांचव निदान मुहान्नीशा सन्तो भपाहशाः ॥ २२ ॥ न धर्म सत् त कधिनित्यं युीमीत रन् । दायिता.क्षत्रियाः सर्वं शपूणां धर्मितं पर्श । ३०॥ यस्पो हि स्वमप्यासीन क्षग किचिदुतवान् । पुर्वरेण त्वया.मारतुलया न समें ति: ॥३१॥ आदावेष मनुष्येण घर्तितव्यं यथाक्षमम । यया नातीतमर्थ पै पश्चाता म पुज्यते ॥ ३२ ॥ पुत्रगृदयावया राजन् प्रिय तस्य चिकीर्षितम् । पश्चातापमिम तो न स्वं शोधितुमईसि ॥ ३३ ॥ मधु पः केवल हा प्रपात नानुपश्यति । स अटो मधुचोमेन गोचरयेवं यया भवान् ॥ ३४ ॥ अर्याल शोधन प्राप्नोति न शोधन विन्दते फलम्। व शोचन द्विपमाप्नोति न शोचन विन्दते परम् ॥ ३५॥ स्वयमुत्पाद पित्याग्नि पण परियष्टयन् । दह्यमानो मनस्तापं भजते न स पण्डित. ॥३६ ॥ त्वयैष और सदैव अशान्ततासे असंतुष्टया । २८ । तुम सदैव शास्त्रज्ञ और शास्त्र के रमरण देखनेवालेचाद्ध के सामी और सत्यवक्तादो ऐसे आप सरीखे बुद्धिमान सन्तलोग पोहको नहींपाते । २९ । सदैव युद्धको कहनेवालेने कोई उच्चम और शुभकर्म नहीं किया सब क्षत्रियोंका नाशकिया और शत्रुओंका यशवढ़ाया ॥१० । तुमभी सबके मध्यपहये परन्तु कोई उचितवात नहींकही हे अजेय तुमने स्नेह और प्रीतिकी तुला कोसमान नहीं रक्खा । ३१४ प्रारम्भमेंही मनुष्यको उचितकर्म करना इसनिमित्त योग्य है जिससे किभूतकालका प्रयोजन पश्चातापसे युक्त नहोय । ३२ । हेराजा तुमने पुत्रकी मीत से पुत्रका हित और प्रिय करना चाहनाथा फिर पीछमें इस दुःखकोपाया तुम शोचन के योग्य नहींहो ।३३। जोपुरुष केवल शहदको देखकर अपने गिरनेको नहीं देखता है वह शहदके लोभते गिराहुआ ऐसे शोचता है जैसे कियाप शोधेतह । ३४ । शोचताहुआ पुरुप न मनोरयको पाताहै न फलको पासा है न करयागकोपाताई और न ब्रह्मको पाताहै । जोपुरूप अपनेआप अग्निको उत्पन्न करके पनसे ढकता मोर जलना हुआ चित्त के दुखको धारण करता यह पपिटत नहीं। १६ पुत्र के साथ तुम्हारे वचनरूपवायुमे मेरित लोभरूपी धृतसप्तीचा loving, invincible, brave and unsatisfied. You are learned, *199 and truthful. People like you need not he fatuous He loved fighting and nover did any good, He caused the destructiou of trarriora and increased tho fame of enemies. 30 You preuded the councils, but always biag-ed on Ono aliould nla ays do what 19 proper froin tho outset in ordor to ar ad the pongs of no more misery bocarso you ivero Bo fond of jnr son And are thero'ore not worth pitsiog An avaricious man, a bo climbs np A tree for take at honey and falls down from theight, ferls remorsc hle Such aone reops no neon 1 or rise 014 bonofit. 35 Your words vro norer said what was propor. Account of fondnose You base fallen into tho H0 11 you (१३५० AN (7350) Mababluat समतेनायं पारमपायुसहरितः कोमारत व संदिगो उमलित पार्यपावकः) तस्मिन् चमिदे पतिताः शलमा मुना तानगग्निामदायान वं तुमईसि ॥ ३८ ॥ पषानुपातात् फलिलं पदन पहले मृप . अशानदष्टप्रेतद्धिन सन्ति पण्डितः ॥ ३९ ॥ पिस्फुफिला घ खेतान दन्ति किलमानधान जहीनि दुइपा पार पात्मानमारमना ॥ ४० ॥ एपमायासितस्तेम सञ्जयेम विरोभूय एषार दाये प्य परन्तप ॥ ४१॥ इति बीपीण जलपादानिकपणि धृतराष्ट्राश्यांसने प्रथमोध्याया। भायह पारस्वरूप आग्निरूप प्रज्वलित हुआहे ।। ३७ । उस अत्यन्त मग्निमें भापके पुत्र शलभनाम पक्षियोंके समानांगरें तुम वाणोंकी भग्निसे कर उनपुत्रों के शोधकरमेको योग्य नहींहो । ३८ । हेमभु जोतुम अश्रुपातात मुखको धारण करतेश पइशास्त्र के विपरीतहेपाण्डतलाग इनकीमशंसा निश्चयकरके यह ऑसू अग्निके स्फुलिङ्गो के समान मनप्योंको भरमकरते पहायुम बुद्धिसे शोकको त्यागकरके अपने चित्तको रवाधीन करो। ४० ! पैशम्पायन बोके किस महात्मा संजय से इसमकार विश्वास दियागया इसके पीछे बुद्धिसे युक्त विदुरमी रह वपन बोले ।। ४१ ॥ not a wise man who himself makec fire and is burnt by it as he hideo it with his cloth. The wind of your affectionate vord; to your 2011 fed by the ghee of your Avarice, caused the infinuation of the fire of Pandavas. Your sons fell down in its rising flau es ] he motbs and were burnt. You need aot feel any soru w for then, Your Waening the face with tears i, irreligioas ard unpraise worty. Surely these tears burn people like flames of firo. Curb yourgarf by your wisdom and control yourself, " Vaisha.npayan & ud," Thus consoled by Sariljayn, the king was thus addressed by Vidur an the following words:

7951 स्माना। Stri Parvस्त्रीपर्व वशम्पायन उ । ततोऽमृतमहापादयन् पुरुपमा विश्षीय दुरी यदुधान निधन II | विदुर उसको उत्तिष्ठ राजम् शेिपे धारयारमा -anो लोकेश्मर परा गति ॥२॥ सर्वेक्षयाम्ता निया: मान्ता समुदा गतिमोगा-सा मरणान्तञ्च जाषितम् । यदा राज्य * : एति.. म किन योस्यन्ति हिते क्षत्रिया क्षत्रियर्षमा ४॥ गुम पर कीचति । काठ प्राप्य महाराज न कश्चिदात ते " मापारि भावमध्यानि भारत | सभापनिधनान्येष तत्र का परिदे नामति न शोचन नियते नर । एप सासिद्धिक ठोके किमर्थ मुशांच सि ! 6 पति भूतानि सर्वाणि, विपिया युत। न कालस्य प्रियः अध्याय ॥२॥ मैशवाय पोरे अमृतरूपी वचनों से पुरुषोत्तम धृतराट्रको प्रसन्न करते विदु भी से मार टु' में । १ । विदुरजीवोले हेराना उठो क्यों सोतेहो बुद्धिसे ... Tीका यही निश्चयई ।। किसप मुष्टिसमूह पन्त र दयगेनेवाले ऐश्वर्य अन्न में पतनहोनेवाले मिलने पाचे मन की प्रार जीवनधी अन्तर्गे मरणरखनेवालाहै । ३ । हे भरत सो अत्र यमराजकीर और भयभीतों को आकर्षण करताहै तो हेनत्रियामभेष्ट कर पद क्षत्रिय महायुद्ध करते हैं । ४ । युद्धको न करता मरताहै और लहता मा नीषता रहता है महागज कालको पाकर कोई उमको उल्लंघन नहीं करता १५ हे भरतवशी सपनी मरम्भमें ही अभावरूप है मध्य में भावरूप और मरनेपर प्रभावरूप है ऐसे स्थानपर कौन विलाप है । ६ । शोचतामा मृतक के पीछे नहीं जा है शोचताहुआ मनुष्य नहीं मरता है इस प्रकार लोकमें किम निमिच शोध करतही । । हेकौरवोंमें भेष्ट यहकाठ नाना कारके सभीयाको आकर्षण करताहै पासका कोई प्याराहै न शत्रुहै। है CHAPTER II Vaisi enipayan kaid." Corseling Dhritrasstra with his vectarlık. Wcide, 1 dui said, "Bie ur, hoog Thy do you bloep 1 Control your Reil, fut this is the goal of all leigs Every created berg dies and every rize has a fall Thos who meet have to suffer separation, and Miſe ends in denih, Why should kshatrgas ehun ma: "ben death overtakce the Lold arri the coward ! A ronfighling med det, *hilo Olltig bor livet, a lecer escape de th 5. Wlrall the bounge dunot ex et in the begii ding and erd, and only eant in the middlo, Why thou alinid 10 scop for them! Ils de glament when you knew that one alorrents deeg rot ſolice the dead. Death over- 11.3521 . . Mnhabharat कश्चिदभ्यः कुरजचम ॥ ८॥ यथा यापुस्तृणाम्राणि संवर्सयति सर्वशः। फाळेवा यान्ति भूतानि भरतम ॥ ९॥ एकसार्यप्रयातानां सर्वेषां तत्र घस्य फाश: प्रवात्यग्रे तन का परिदेवता १०॥ न चाप्यतान तान युद्ध राजा तुमर्हति । प्रमाणं यदिशाण गतास्ते परमां गतिर ॥११॥ सर्षे सर्वे च चरितयताः । सबै चाभिमुखाः क्षीणास्तत्र का परिदेषना ॥ १२ ॥ पतिता पुनश्चादशंग गताः । न ते तय न तेषा त्वंतत्र का परिदेवा ॥ १३॥ समते स्वर्ग हत्वा च लभते यशः । उमयं नो पाहुगुण नास्ति निष्फलतारने कामदुधालोकानिन्द्र सङ्कल्पविष्यति । इन्द्रस्यातिथयो खेते भवन्ति न यदीक्षणावद्भिन तशामिन विद्यया । स्वर्ग यान्ति तमा मर्या यथा शरा ॥ १६ ॥ शरीराग्निप शूराणा जुलुस्ते शराहतीः । इयमानायराव भरतर्षभ जसेकि वायु सवतृणकी नोकोंको उलटपळटकरता है उसी कालके आधीन होतेहैं । ९ । एकसाथ भानेवाले भार वहां जानेवाले मध्य में जिसके आगे कालजाताई उसमें कौन विलाप करताहै। १० हेगना मेंमृतकहुपे इनवीरोंके शोचकरनेकोभी योग्य नहीं हो इसमें शास्त्रका प्रमाणहै । परमगतिकोपाया सब वेदपढ़नेवाले और सब अच्छे प्रकारसे व्रतकरनेवाले सम्मुखहोकर विनाशवानहुये इसमें किसवारका विलाप करना है । ११ । दृष्टिमें, आनेवाले ब्रह्मसे उत्पन्नहुये और फिर उसी दृष्टिमें न मानेवालेको पाया या भापहैं न आप उनकेहैं तब कैसा विनापहै । १३ । मृतकभी स्वर्गको पाता मरकरभी जिसको पाताहै हमलोगोंको वहदोनो बहुतगुणवालेहैं युद्धमें नहीं है ।१४ । इन्द्र देवता उनके मनोरथों के प्राप्तकरनेवाले लोकोंको बिचार गे हेपुरुषोत्तम यह सब शूरवीर लोग इन्द्र के अतिथीहोतेहै । १५ । मनुष्य बालेयज्ञ तप और विधा से उस प्रकार स्वर्गको नहीं पातेहैं जैसे विषय में उन शूरवीर तेजस्वियों में पायाहै जिन्होंने शरीररूपी भाग्नयोंमें पाणरूप takes all. He has no friends or enemies All beings are death like the blades of grass by the wind, Why do you cri all man have to die? 10. You need not larmer.t those for according to our religious books thoy have gono to Thrise who read the Vedas end observe vors have to die; what' therefore to lament 1o! They came from eternity and were in Brahm. They and you did not belong to one another; why you weep then? Both those who dre or are slain in war are alike us; there is nothing disa iventage sus is fighting. Indra will decide tlín fntu of the variors, they are to be his guests. thoka n ho p rform sacrifices will donatiups, get such regiche as obts aud lig those who d e fighting. A bshatrya bas no easier way upset who died war, . do 15. Not ayr - Sil PIP सीपथ वः॥१७॥ एवं राजस्तयाचक्षे स्वर्गपन्यानमुत्तमम । न युद्धादा किषित क्षत्रिय विद्यते ॥ १८॥ क्षत्रियास्ते महात्मानः शूराः समितिशोभनाः । आशिपं परमाप्राप्ता शाच्या सर्व एव हि ॥१९॥ मारमानमात्मनाभ्यास्य माशुचः पुरुषर्षभ । माघ लोका निमतस्वं कार्यमुमठुमईसि ॥ २० ॥ माता पितृसनाणि पुत्रदारशतानि च । संसा माभूताति कस्य ते कस्य पापम् ॥ २१॥ शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि विषसे दिवसे मदमाविशन्ति न पण्डितम् ॥ २२ ॥ न कालस्प प्रियः कश्चिम पाकुरुससम । न मध्यस्या पवित् काल सर्व कालः प्रकर्षति ॥ २३ ॥ काल: पचति भूतान कालः संहरते प्रजाः। कालः सुप्तेषु जागर्सि कालोहि दुरतिक्रमः २४ ॥ मनिरप योधनं रूपं जीवित द्रव्यसअयः । आरोग्यं जियसम्पासो गृध्येदेषु सहितः।।२५०३ जानपदिकं दुःसमेकः शोचितुमईसि । जप्यमावेन युस्येत तपास्य पोको होमा और परस्पर होमेहुये वाणोंको सहा । १७ । हेराना समकार स्वर्गके उत्तम मार्गको तुमसे कहताह इसलोकमें क्षत्रियका कुछ कर्म युद्धसे अधि के नही वर्तमानहै । १८ । युद्ध में शोभायमान उन महात्मा शूर क्षत्रियोंने बड़े अभीष्ट कलको पाया सवही शोचके अयोग्य हैं । १९ । हे पुरुषोत्तम तुम ज्ञानसे अपनेको विश्वासदेकर शोचमाकरो शोकसे विजय कियेहुये तुम करनेके योग्यकर्मके छोड़ने को योग्य नहींहो । २० । हजारों माता पिता और सैकड़ोंएत्र स्त्री संप्तारमें प्राप्तकिये वह किसके और हम किसके । २२ । प्रति दिन शोकके हजारों स्थान और मानन्द के सैंकास्थान अज्ञान में प्रवेश करतेहैं ।२२। हेकौरवोत्तम कालका कोई प्पागहै न शत्रुई वह काल किसी स्थानपरभी मध्यस्थ नहीं है काल सबको बँचताहै | २३ । काल जीवमात्रों को पकाताहै और कालही माहिको मारता? काळही सोनेवालोंके मध्य में जागताहै और कालही दुःखसे उल्लंघनके योग्य है । २१ । तरुणाईरूप वृद्धता पनसमूह भौर नारोगतापूर्वक निवास यहमष विनाश वान हैं पण्डित इनमें प्रवृत्त नहीं होताहै । २५ । अकेले तुम सब दुनियाभरे के दुःख heaven than dying in battle All the warriore slain have got good regions and are not perth lamenting for. Donot give yourself up to grief, but do what is necessary. We make thongands of fathers, mothers, eons and wives in this world and then sovor our connection A foolish man is beset with thousands of pleasures and pains every day, Deatb observes neither friendship Dor oomity, but GFertakes ali. Tune makes all beings ripe and then kills them. H. is awake when all beings are asleep and is difticult to be overcomo. Youth, age, wealth and health are all perishable; n nise man dces not set his mind on any one of them. You need not fuel sorrow for all the world, for oncs ho dies never comes back to us. not feel curry for tbose slo have died bravely; it is better not to from them. We boula (७३५१ 73545 Mahabharat न निवर्सरी ॥ २६ ॥ अशोचन प्रतिपुर्वीत यदि पश्येत् पराक्रमम् । भैपज्यमंगलम भदैतमानुचिन्मयेत् ॥ २७ ॥ चिन्त्यमानं नि व व्यनि मयथापिप्रधईते। अनिएसंप्रयो गरण मिप्रयोगात् प्रियस्य च ॥ २८॥ मनुष्या मागमायुज्यन्ने येऽपयापी मधो न मुखं पदंतनुशोसि ॥२९॥ न च नापति काय्यायाधिवासेवीपते भायामभ्यो धमावस्था प्राप्य वेशीपपी नरा: ३. असन्तुश प्रमुखम्ति सप्तोष पान्ति पणिमा । प्राया मानसं तुम हम्याहारोग्मोषधेः। एसज्ञानस्य सोमनपानेः सातामियात॥३॥शयानञ्चानुशत मिनिष्ठन्त चानुतिष्ठतिामनुथापि पावत कमपूर्व कतनाम '३२॥यस्यायनामय स्थायायत्कति शुभाशुशमातस्थांतस्यामवस्थावातफल समुपामुने ॥३३॥ पेन ऐन शर्रारंण परत फर्म फगति यः। तन तेन शेर्माण तसत् फलमुपाश्नुत ।। ३४ ॥ आत्मैव धात्मनो मिश्रमाय पिपुरमः | भाव AREE: के शायनेके योग्य नहीं होजो अभाव से मिलताहै उसका वह फिर लौटकर नही माताहै। २६ । जोपराक्रम में नाशको पात्र उसको शोचतामा मनुष्य उसकी चिकिल्लाको नहीं करता है दःखका यह इलाज है जो उसको न विचार करे ।२७। चिन्ता कियाइमा दूर नहीं होताहे और फिर फिर आधिक बढ़ताहै अभियक मिलने और मिथके वियोगमे । २८ । वह प्राइमी बड़े २ चिर के दुःखसे संयुफहोतो जोकि निर्बुद्धी है यह न अयंई नधहि न पुखद आतुम शांच करतहो । २९ वर करनेके योग्य प्रयोजनारे जुदाहोना है और धर्मअर्थ काम इनतीनों माँसे कयुतहोता अन्ग २ मुख्य धनादिक दशाको पाकर । १० । इस में असंतुष्ट लोग मोहको पाते हैं पण्डित सन्तोपको पास हैं चित्तकै दुःखको मानसे और शरीरके दुःखको प्रौषधोंसे दूरकरना चाहिये यही ज्ञानकी सामर्ष है और किसी प्रकार की कोई सामर्थ नहींहै।३११पूर्वजन्मम कियाहुमा कर्म सोतो ये मनुष्य केसायसोताद और पउनेवाले के पासनियत वैठाहोताई और दौड़तेहुयेकेपीछदौड़ता हैं।।२। जिस गिम दशामें जिम शुभाशुभ कर्मको करता है उसी उसी दशा में स फलको पाताहै। ३३ । जो जींच जिप्त शरीर से जिस २ कर्मको करताई इसी शारीर से उस उस कर्मके फलको भोगताहैं । १४ । भात्मामें अत्माही उसका माधु है मनुष्य think of thom. Grief does not abate by bruoding over it; it increases if we think of our dear ones. The fool is beset with many sorrowe; your sorrow in nselerand irreligioas, It deters us in our duties and deprives us of all andr, A disatisfied man 18 Aparicioas, while & learned man is satisfiel. We should semove mental griefs with wisdom and maladies sith medicine 31. An act done in a former life slecps, sts and runs with the doer. We reap the fruit of our deed. in the samo conditions as when we did thet. Wo suffer the punishmenta of our deeds in bodies like those in which we did thom.

Stri Parvard (73551 अक्षी कृतस्पापहत्तस्य च ॥ ३५ । शुमेन कर्मणा सो दुःख पापेमकर्मणा । कृतं मिति सर्वत्र नातं मुस्पत क्यचित् ॥३६॥ नदि पानविरुषु बहुपापेषु कर्म । लपासिषु सरजन्ते बुद्धिमतो भषद्विधाः ।। ३७ ।। इति स्लीपर्वाण जलवादानिकपणि धृतराष्ट्राध्यासने द्वितीयोध्यायः ॥ २ ॥ भूतराष्ट्र उवाच। मुभाषितमहामाय शोको विगतो मम । भूय एषतु पापयानि भोतमच्छामि तरवतः॥ १। भनिधानाप्न संसादिष्टानाच विषजनात् । कहि मामले के प्रमुच्यतेतु पण्डिताः ।२६षिदुर उपाय। यतो यतो ममा दु भात मुखाबा विप्रमुच्यते । ततस्ततो निपश्यतष्ठान्ति विष्देश दे बुधः ॥ ३ ॥ मशाश्चतमिदं सर्व । भोर मामाही प्रात्माका शव मामाही आत्माके शुभ शुभ कर्मोंका साक्षी है १२५ । शुभकर्मसे मुखको और अशुभकम से हुःखको सर्वत्र पाताहै किसी स्थान में भी विनाकिये हुये को नहीं भोगताहै । ३६ : आपकी समान बुद्धिमान मनुष्प नकमि प्रत नहीं होते हैं जोकि ज्ञान विपरीताहुत पापरखनेवाले आरमोक्षके शिकरनेवाले हैं ३७ ॥ अंध्याग ३॥ प्रवरालोले हे बड़े ज्ञानी बुम्हारे इन उत्तम वचनों से मेराशोक निहत्तहुआ रन्तु हेनि पाप में मूलसमेत इनवचनों को फिर सुना पाहताहूं। १ । पंडितलोगसे पनिषक योग और प्यारोंके वियोगसे उत्पन होनेवाले चित्तके दुःखों से कैसे छूटते । २ । विदुरजी बोले कि जिप्त जिप्त उपायसे दुःख अथवा मुखसे भी निवृत्त होसाद पुद्धिमान मनुष्य उसीउपाय इस चित्तको स्वाधीन करके शान्ती को पावे नरोग यह सब जो गानमें आताह विनाशानहै यह संसार केलेके समाद इसता सार पदार्थ वर्तमान नहीं है । ४ । जव ज्ञानी और मूर्ख धनी और The soul ie ita own friend, enomy and witness. 35. It gets happi. bere as a result of good deeds and sorrow for wiched ones. Dot Buffer without doing. Vise men libe and wicked deeds that debar the dcer from One canengage in doing you donot foolish, sinful theaven. 37. CHAPTER 111 Dhritrashtra said, " My g:ief is gone away by your good wordt, wise man. I wish to hear your words once more in detail. How can wise men get rid of the unpleasant freling arising out of the preting of enemies and separaticn of friends?” Vidur sa d, " A wide man should alienate his mind from the things which cance pleasure or pain., The world se ses mund wais nuortal; it bas no herpel like - 7356) R[aliabiarat विषमान नरर्षमा कदलीसनिमो लोकः सारोह्यस्य न विद्यते ॥ ४ ॥ यदा प्राम भूदाइच धमपन्ताय निर्मना । सबै निकृषनं ष्य स्वपति विगतस्परा निमलिरस्थि भ्रयिष्ठात्रैः स्नायुनियन्वनैः 11 के विशेष प्राश्यन्ति तत्र तेषां रजमा । येन प्रत्यक्ष गच्छयुःकुलरूपविशेषणम् । स्मादन्योन्यमिच्छन्ति घिनलब्धधिपो नगः ॥७ जीव हि मर्यातासामुसानि पियाः । कालेग विदियुज्यन्ते सलमेफ मात्राम पपानीणाजीणे धा घसं त्यपरथातु पूरपः । अन्यट्रोचयते त्रस्नमेषं देवाः शरीरिणाम ॥९॥ वैचित्रवीर्य सायं हि दुः पा याद था मुखम । प्राप्नुवन्तीहि भूतानि स्त्रक तेय कर्मणा ॥ १० ॥ कर्मणा प्राप्यते धर्गः मुखे दु'सम्पभारत । सतो वहति से मार मयशः स्वयशोऽपघा ॥ ११॥ वधाच मृण्मयं भाण्ड घका विषयते ।किश प्रक्रियमाण घा कृत्रमात्रमथापि वा ॥ १२ ॥ छिन्नं वाप्यवरोप्यन्तमवतीर्णमयापिका निद्धनी कालसे मरणको पाकर तापसे रहित सोते हैं उस स्कानपुर दूसरे मनुष्य निर्मात अथवा बहुत भास्थ रखनेवाले अंगनाड़ी और वन्यनों मे अधिऋकिस वस्तुको देखतेहैं जो उससमय कुल और रूप विशपणको नहीं पायें वहछल करनेवालेमनुष्य किसहेतुते परस्पर इच्छाकरते हैं ।। ७ पण्डितोंने शरीर धारियोंक देहको ग्रहों के समान कहाहै बहकालस मिलते हैं अर्थाद नाशकोपाते हैं केवलएकजीशमादी अपिना शीहै । ८ । जिसमकार मनुष्य पुराने कपड़ेको त्यागकरके नवीन कपड़ेको अङ्गी कार करताहै इसी प्रकार शरीरधारिपोक शरीर हैं।९। इधृतराष्ट्रप्सव मनुष्य अपने कियहुये कर्मसे मिलने के योग्य दु ख अथवा मुखको पातेहैं ।१०। हे भरतशा सब मुख और दुःख अपने कर्म से प्राप्त होते हैं उसहेतुसे यह स्वतन्त्र अथवा अस्वतन्त्र भी उस भारको उठाता । ११ • और जापट्टीकापात्र रूपको पाकर टूटता है कोई वनता कोई वाहुआ।१२। भत्रेपर रखा था वा अत्रेसे गिरकर टूटनेवाला आग शुष्क वा पकताहुआ।१३। भत्रेसे उताराहुभा उठायाहुआ वा काममें लायाईआभी टूट जाताहै इसी प्रकार शरीर धारियों के शरीर ।१४] गर्भ नियत जन्म, लेनेवाला plantaru, Well tuo Wife dou 1001, wealthy uud puur huid Test death, we find nothing left of them except a heap of bones. Family greatnuss and beauty aro of no aynil after death; why should people desire to gain their object by deceit: ise men say that tbe bodies (of 1000 are like constellations which come together at times and then disappear; the soul alone is immortal. Bodies are like clothes which ve cast off when old and and put on new ones. Our pleasures and paina are the results of our actions. 10. Man is nut indepent when ho tuas to suffer pleasure or pain as a result of his former deods. Our bodios are like earthon pots whicli assumo shapes and break down in the course of preparation, after preparation and at all other stagir. They break down after being burnt in a kiin, in transit or in 1180 nonth, a year, two yerire in youth, middle, or old age. ५७) Sti Paivarna (73571 पाप्यय वा शुष्कं पच्यमानमधापि या ॥ १३॥ अवतार्यमाणमापासादुद्धतम्चापि स्त । अयंगे परिभुज्यन्तस्य देहाः शरीरिणाम् ॥ १४॥ गर्मस्थो वा प्रसतो षा प्या दिवसान्तरः । भर्समालगोपपि मासमागतोपिया ॥ १५ ॥ संपत्सरगतो पापि संवत्सर एक धा। योपण.ऽथ स्थो सो चापि विपद्यते ॥ १६ ॥ प्रापरार्म स्तु भूतानि भवन्तिन मन्तिचाय सांसिदिफे लोके किमर्थमनुतप्यसे १७॥यथातु लेलेराजन भीडार्यमन्सतरदाउन्मोच्च निमज्जेच विञ्चित् सत्ताराधिप।१८॥ । संसारगहने उन्मन्जननिममे । कर्म भोगेन मध्यन्ते विशश्यन्ते येऽएपदुखयः ११॥ ये तु प्रासास्थिताः सत्त्वे संसारानुगतपिणः । सभागमज्ञा भूताला ते यान्ति मांगतिम् ॥२०॥ इति स्त्रीपर्वाण जलपादानिकपर्वणि धृतराष्ट्रशोकापनोदने तृतीपोध्यायः ॥ ३ । थोड़ी भवस्थाराली अदमास एकगास ।१५। एकवर्ष वा दोवर्षकी अवस्था रख बाला तरुण मध्यस्थ और ही नाशको पाता ।१६सजीव अपनेपिछले मन्मोके कर्मोंसे उत्पन्न होते और नाशको पान, इसगीत के स्वाभाविक धर्मरख नेवाले लोकमें किसहेतुसे दुःखी होने ? हेराजा जैसेकिकोई जीव क्रीड़ाके मित्त जलमें चूमताहुआ दूपता और उछलताहै। १८ उसी प्रकार मापोलोग अपने पड़े शानद्वारा उसमकार के दुर्गम संसार से पार ये जोकिवना उछलना इनदो गुणोंका रखनेवालाई जोगको उत्पत्तिक जाननेपाले संसार के अन्तके ोजनेवाले सब ज्ञानी नियतहै वह परम गतिको पातहैं ।। २० ॥ So our bodies die in wombh, after birth, at the age of a fortnight, a 16. People for those whn are natmall, mortal. Sages and rishis cross She ocean of the world like an animal which fluuts or suks down in Water at pleasure. Tlinge vise men sho seek to know the bagianing and ond of the world, reach the sublime goal.” 20 be sorry PA N - 7356) Nalisbnaiet (७३५६) विषमाने नरर्षभ । कालीसन्निभो लोकः सारोधस्य न विद्यते ॥ ४ ॥ यदा भूदार पनपन्तांप निर्मना । सबै मिरवनं प्राप्य स्पपति विज्परा अयिष्ठात्रैः स्नायुनियन्धने 1 क विशेष प्रयन्ति तत्र तेषां परेजमा : येन गच्छयु कुलरूपविशेषणम् स्मादन्योन्यमिच्छन्ति विप्रलम्धधिपो नरा. ७) जीव हिमतामादेशानि परिमाः । कालेग षिदियुज्यन्ते सत्वमेफन्तु । पणजीर्णजीर्ण पा घसंस्यपरमासु पूराषः । अन्यद्रोययसे त्रनमेषं वेदा. ॥ ९ ॥ वैचित्रवीर्य साध्यं हि दुबघा याद या मुलम । प्राप्नुवन्तीहि भूतानि स्वा तेनेय फर्मणा ॥ १०॥ कर्मणा प्राप्यते धर्मः सुखं दुसयभारत । सतो याति से भार मघराः स्वयशोऽपि वा ॥ ११ ॥धा च मृण्मयं माण्ड का विषघत । किप्रद प्रक्रियमाण घा कत्रमाप्रमथापि वा ॥ १२ ॥ छिन्न घायवरोप्रान्तमवतीर्णमयोपिया निंदनी काल मरणको पाकर तापसे रहित सोसई उस स्नानप दूसरे मनुष्य निर्मास अथवा रहत भास्थिरसनेवाले अंगनाड़ो और बन्धनों मे अधिककिस यस्तुको देखते हैं जो उस समय कुल और रूप विशेपणको नहीं पायें वहछल करनेवालेमनुष्य किसहेतुसे परस्पर इच्छाकरते हैं ।। ७ पण्डितोंने शरीर धारियोंक देहको प्रहों के समान कहादै चहकालस मिलतेहैं अर्थात् नाशकोपाते. केवल एक जीवात्माही अधिना शीहै । ८ । जिसमकार मनुष्य पुराने कपड़े को त्यागकरके नवीन कपड़ेको अङ्गी कार करताहै इसी प्रकार शरीरधारिपाक शरीर हैं।९। हेधृतराष्ट्रप्तव मनुष्य अपने कियेहुये कर्मसे मिलने के योग्य दु ख अथवा सुखको पातहैं ।१०। हे भरती सुख और दु.ख अपने कर्म से प्राप्त होतेहै उस हेतुसे यह सतन्त्र अथवा अस्वतन्त्र भी उस भारको उठाताह । १९ : और जोमट्टीकापात्र रूपको पाकर टूटता है कोई वनता कोई वाहुआ 1१२१ भरेपर रक्खाहुथा वा भवेसे गिरकर टूटनेवाला भाग शुष्क वा पकताहुआ ।१३। अवेसे उताराहुआ उठायाहुआ वा काममें लायाईआभी टूट जाताहै इसी प्रकार शरीर धारियों के शरीर १४४ गर्भगे नियत जन्म, लेनेवाला plantain, When tue wice and 1001, wealthy and pyor huatest 1 death, we find nothing left of them except a heap of bones. Fumily greatness and bonuty are of no avail after death; why should people desire to gain their object by deceit 19 19e men say that the bodies (of roep are like con-tellations which come together at times and then dmappear; the soul along is immortal, Bodies aro liko clothes which The cast off when old and ard put on new ones Our pleasures and pains are the results of our actions. 10. Man is nut indepent when he has to euler pleasure or paid as a result of his former deeds. Our bodios are like earthon pots which assumo shapes and break down the course of preparation, after preparation and at all otilor They break down after being burnt in a kiin, in transit or .

N गतिम॥२०॥ yorld, reach the sublime goal.' Shi Paivaina (73571 आप्यथ वा शुष्क पच्यमानमधापि था ॥ १३॥ यतार्यमाणमापासादुद्धतम्यापि मा परिभुज्यन्त देहाः शरीप्पिाम् ॥ १४॥ गमस्यो था प्रसूतों का प्यथ भर्समासगतो पापि मासमायातोपिया ॥ १५॥ संपत्सरगतो पापि एक बार यीपापोऽयस्थो दृसो चापि विपद्यते ॥ १६ ॥ प्रापर्म भूतानि भवन्तिन अन्तिम सांसिदिके लोके किमर्थमनुतप्यसे :१७॥यधातु कोडार्यमनुसनारदाउन्माजेच्च निमज्जेच पिञ्चित् सरगराधिप। १८॥ रगहने उन्मज्जननिमजनमे । कर्म भोगेन यध्यन्ते पिलश्यन्ते येऽपदुद्धयः । तु प्रासास्थिताः सत्त्वे संसारानुगतैषिणः। समागमज्ञा भूता ते पारित ति स्त्रीपर्वाण जलपादानिकपर्वणि धृतराष्ट्र शोकापनोदने तृतीयोध्याय।। ३ गोही अवस्थाराली बनात एकमास ।१५। एकवर्ष वा दोवर्षकी अवस्था रष तरुण मध्यस्थ और हदी नाशको पाता ।१६। सवनीव अपनेपिछतो. कोसे उत्पन होते हैं और नाशको पान, इसगीत के स्वाभाविक धर्मरख लोकमें किसहेसुसे दुःखी होतेहैं ।१७। इराजा जैसेकिकोई जीव क्रीडाके चूमताहुआ दूवता और उछलताहै। १८ उसी प्रकार महर्षोलोग अपने निकद्वारा उसमकार के दुर्गम संसार से पारहुपे नोकियना उछलना इनदो ॥ रखनेवालाई ११ जनाको उत्पत्तिक जाननेपाले संसार के अन्तके • सब ज्ञानी नियत वह परम गनिको पातेहैं ।। २० ।। lie in wombs, after birth, at the age of a fortnight, a' 16. People Those wise men who seek to know the bagianiaz 20. and are bob two years, in you thi, middle, or old Ocean of these thn are naturall, niortal. Sages and rishis cross world like an animal which fiouts or sinks down , in जसमें age. our bodies ith, a years r at pleasure end of the FCI M M[aliabi3176 (जा विश्वमा नरर्षभ । कदलीसन्निभो लोफ सारायस्य न विद्यते ॥ ४ ॥ यदा मूदाएष धमपन्तोष निर्मना । सबै मिसृधन प्राप्य स्पपन्ति विगतज्वरा। भ्रयिष्ठान स्नायुनियनधन !!क विश प्रायन्ति तत्र तेषां गरेजमा । येन गच्छयु पुलरूपविशेषणम् । स्मादन्यान्पमिच्छन्ति विप्रतधधिपो नरा ॥७॥ जीव विमरतामापानि पण्डिगा । कालेन षिदियुज्यन्ते सत्वमेकान्तु । पानीमजीणे वा घनश्यपरथातु पूरप । अन्यट्रोचयते प्रश्रमेव देशा ॥ ॥ वैचित्रवीर्य साध्यं हि दुपा याद या सुधम । प्राप्नुवन्तीहि भूतानि स्थक तेनेव कर्मणा ॥ १०॥ कर्मणा प्राप्यते धर्म मुख सयभारत । ततो पाति त भार मधश स्वपशोऽपि धा॥ ११ ॥ बधा च मृपमय भाण्ड धका विपद्यत । किशित प्रक्रियमाण था कुत्रमात्रमथापि वा ॥ १२ ॥ छिन्न चाप्यवरोप्यन्तमवतीर्णमथापि या निद्धनी कालसे मरणको पाकर तापसे रहित सोहैं उम स्नानपर दूसरे मनुष्य निर्मास अथवा बहुत भास्परखनेवाले अंगनाडी और बन्धनों से अधिककिस वस्तुको देखते हैं जो उससमय कुल और रूप विशेषणको नहीं पायें यहछल करनेवाले मनुष्य किसहेतुसे परस्पर इच्छाकरते हैं ।। ७ पण्डितोंने शरीर धारियोंक देहको अहो समान कहाहै वहकालेस मिलतेहैं अर्थात् नाशकोपाते हैं केवलएक जीवात्माही आपना शीहै । ८ । जिसमकार मनुष्य पुराने कपड़ेको त्यागकरके नवीन कपड़ेको कार करताहै इसी प्रकार शरीरधारियोंके शरीर है।९। हेधृतराष्ट्रसव मनुष्य अप कियेहुये कर्मसे मिलने के योग्य दु ख अथवा सुखको पातहैं ।१०। हे भरतदी। स मुख और दु ख अपने कर्म से प्राप्त होतेहै उस हेतुसे यह स्वतन्त्र अथवा अस्वतन भी उस भारको उठाताहै। १६ और जोपमट्टीकापात्र रूपको पाकर टूटताहै को वनता कोई वाहुआ।१२। अत्रेपर रक्खाहुभा वा भवेसे गिरकर टूटनेवाला मात्र शुष्क वा पकताहुआ।१३। भवेसे उताराहुआ उठायाहुआ वा काममें लायाहुआर्भ टूट जाताहै इसी प्रकार शरीर धारियों के शरीर ।१४। गर्भगे नियत जन्म, लेनना pluntain When tue wide and 1001, wealthy and pvor hud its death, we find nothing left of them except a leap of bones Fur greatness and beauty are of no avail after death, why should pe desire to gain their object by deceit 1V ise men say that the bo (f 1000 are like countellations which come together at times and th disappear, the soul aloners immortal Bodies are like clothes wbic) we cast off when old and ard put on new ODER Our pleasures and pains are the results of our act ons 10. Man 18 out indepent when be has to suffer pleasure or para as a result of his former deoda Dar bodias are like earthon pots which assumo shapes and break down 10 the clirso of preparation aftar prej aration and at all other stages They break down after being burnt in a kuo, in transit or in 1188 homblo all go to the region of Yam and notbing is left of hem but a . - 4 others, they apoal ull f the poor in the pride of their .) Stii Pary खपिच (73591 रिरक्षन्ति ये ध्यानपरिनिष्ठिता ॥ ९॥ न युध्यते ताव धमलोकमथागतमा मृत्यु कालेन गच्छति ।।: ॥वाग्धीनस्य च यग्मात्रमिष्टानिष्टं कृतं सूय एघारमनात्मानं घपमानमुपेक्षते ॥ ११ ॥ महो विनिम्तो लोको लोमेन च । लोमक्रोधमयोन्मत्तो नात्मानमयबुध्यो ॥१२ ॥ कुलीनत्वे च रमते दुष्कु विकुरसयन् । घनदरेण एव दद्धिान परिकुत्सपन ।। १३ ।। मूर्खामिति परा समयेक्षन । पान शिति चान्धेषां नात्मानं शास्नुमिच्छति ॥ १४ ॥ पदा मनधि धनवन्तोष निर्द्धनाः कुलीनाश्चाफुलीनाथ मनिनोचाप्यमानिनः ॥ सर्वे पितृवनं प्राप्ना स्वपन्ति विज्या निम्मेसिस्थिीयेष्ठगात्रैः स्नायु ॥ १६ ॥ कंवशेष प्रपश्यन्ति तत्र तेषां पोजना। येनं प्रत्ययगच्छेयु फुलरूप ॥ १७ ॥ सदा सर्वसमन्यस्ता. स्पन्ति धरणानले । फस्मादन्यान्यमिच्छन्ति भ कर्मों को करताई और उनका त्यागनेवाला नहीं होताहै इसी प्रकार रुष ईश्वरकेध्यान प्रवृत्त है वह अपने को तबतक चारोंभोरसे रक्षा करते हैं यह जीव मिलनेवाले यमलोक को नहीं जानताई यमदूनों से आकर्पित मृत्युको पाता है। १० । उस मौनका जो पाप पुण्य है यह दूसरे के मुख किपाहा होताई फिरभी विपपोंमें आसक्तहोकर अपनको पतनहुआ ..समाधय किगसंसार नाच लोभके आधीनतामें वर्तमानक्रोध भौर घनकमदसे प्रचेतहोकर आत्माको नहीं जानताहै । १२ । दुष्ट कुलबालोंकी Jul अपने कुलकी प्रशसा करता हुमा रमता है दरिद्रयांकी निन्दा करता गर्वमे भकारीहै । १३ । दूसरों को मूर्ख कहता है और अपनेको अच्छीरीति देखतौह दूसरोंको शिक्षा करता है परन्तु अपनको शिक्षा करना नहींचाइ । १४ । जब ज्ञानी और मूर्ख धनी और निर्दनी कुलीन अकुलीन प्रांकारी निरहंकारीमा सब पितृवन ( यमलोक ) में बत्तमीन विगत घर होकर सोत. वहाँपर दूसरे मनष्य उन्होंके निर्मास बहुत स भास्थिवाले अंग और नाडीवन्ध भपिक कुछ नहीं देखतेहैं औरजो कुल भौर रूपकी मुख्यताको नहीं पाते हैं । ना वह सबभी शारत्याग कियहेय पृथ्वीपर मोतेहैं तब दुवुद्धी मनुष्य इस Then he is in danger of evil de tres and other ca lawities. With so many difficultier, he is not satisfied with anything and good and evil deeds. But those who meditate on God, protect Rives from all sides as long as they are not summoned by death, One fallen low on account of evil desires, does not see his fall,, de, augor and other passione, * wonder that people forget thems-ives on acconnt of avarice They give themselvts prarse and wealth. call others fools and dogot look towards themselves, they preachand themselves remain in the dark, Great and lowly, proud and Dhritrashti gaid, " How can we know the wilderness of the and are then surrounded by impurities bf flesh 'andy | उसके पास एसे आनेहैं जैसे कि मांसकेपास कुत्ते आते हैं। ६ । शत्रुसंतापी | संयुक्त उमजीव धारीक पास नानाप्रकारके व्यसन अर्थात भापतियां thero trith their hends downwards and their formblood, They 7358) Mababtarnt धृतराष्ट्र उपाय। शंथ ससारगहन विशेषं घदतांघर । एतदिच्छाम माख्याहि पृच्छतः ॥ १॥ विदुर उपाच । जन्मप्रभ्रति भूतानां पूर्वमेवेह कलते घसते फिीचदन्नरम । ततः स पञ्चमेतीते मासे पा ॥२॥ ततः सर्वांगसंपूर्णो गोंधेत तुमायते । अमेध्यमध्ये घसति पने ॥३॥ ततस्तु पायुधेगेर ऊर्ध्वपादोधव शिरा योनिद्वारमुपागम्य घडून समृच्छति ॥४। पोनिसंवाहनाचघ शुकभिरन्यितः। तस्मान्मुक्तः स. न्यान् पश्यत्युपद्रवान् । गृहास्तमुपगमा सारमेया स्वामियम ।। ६ ॥ ततः फाले व्याधयश्चापि रो तथा । उपसानिनीयन्तं घपमान ग्घर्मभिः ।।७।। मिन्द्रियः पाशैः समस्थाभिरावृतम् । ध्यसनान्यपि घर्तन्ते विधिधानि वाध्यमान तैर्मयो ने तृतिमुनि सः । तदा नापति चयापं प्रकुर्वन् अध्याय ।। ४ ।। मृतराष्ट्र पोले हेवक्ताओं में श्रेष्ठ किस रीति से यह संसाररूपी पन के योग्य है मैं इसको सुना चाहता हूं आप मुझमे वर्णन कीजिये । बोले कि जन्मसे लेकर जीवधारियोंकी सव फ्रिया दिखाई देसाई इसलोक में कलल अर्थात् एकरावि निवास करनेवाले गर्भमें जीवात्मा निवास क परन्तु कुछ अन्तर है । २ । इसके पीछे पांच मास व्यतीत होनेपर उस पे मादी विचार किया अर्थात् एकराय निवासम चैतन्पकी सत्तामात्र होती पांचवें महीने में उसका पूर्ण प्रादुर्भाय होणातारै मांस रुधिरसेलिप्त अपवित्र । निवासकरता है । १ । फिर वह अपानरूप वायकी तीव्रतासे ऊंचपैर नीचे : योनिके द्वारको पाकर बड़े कष्टों को पाताहै । ५ योनाकी पीड़ा और से युक्त उस द्वारसे छूट कर संसारके दूसरे उपद्रवों को देखताहै । । । और पीछे उपासमप रोगभी उसकेपास भात हैं इसीसे जीवताहुआ होताहै। राजा इन्द्रियों के पास बन्धनों में बंधेदु संग और CHAPTER IV Pray till me all about it.” Vidur said, . From tho Leginning ** cern the nork of living beings. They lite for somethit misszable plight till they come out of the womin <ifficulty, they línve to encounter others in the in on him az dogo do a price of flesh. Discoses como to ime in the and are feet up । Coming out of Gold, Evila bia during ime. Then he is in danger of evil desires and other calamities. with so many difficoltier, he is not satisfied with anything and 4 सर्वसम यस्ता. selves from all sides as long as they are not summoned by death, others, they apoak ill .f the poor in the pride of their wealth. J Sui Pary स्त्रीप (73591 परिरक्षन्ति पे ध्यानपरिनिष्ठिता ।। ९॥ अर्गन चु.त्यने ताव धमलोकमयागतम्। पिकृभ्यश्च मृत्यु कालेन गच्छति ॥:० ॥ वाग्धीनस्थ च यम्मात्रमिष्टानिष्टं कृतं । भूय एवारमनात्मानं वध्यमानमुपेक्षते ॥ ११ ॥ अहो विनिम्तो लोको लोमेन च लोभमोधमयोन्मत्तो नात्मानमध्यने ॥ १२ ॥ कुलीनरवे च रमते दुष्कु विकुरलयन् । घनदयण हाच दरिद्वान् परिकुत्सयन् ।। १३ ॥ मूर्खानिति परा समवेक्षत । दे पान शिति चान्धेषां नात्मात शास्तुमिच्छति ॥ १४॥ पदा मुखाश्च धनवन्तोष निर्द्धनाः कुलीनाश्चाकुलीनाथ मानिनोचाप्यमानिनः सपितृवनं प्राप्ना स्वपन्ति विगतज्यराः। निम्नसिस्थिभीयेष्ठगात्रैः स्नायु ॥ १६॥ कायरोप्रपश्यन्ति तत्र तेषां पर जना । येने प्रत्यवगच्छेयु कुलरूप १७॥ पदा स्वपन्ति धरणातले। फरमादन्यान्यमिच्छन्ति कर्मों को करताहै और उनका त्यागनेवाला नहीं होताई इसी प्रकार रूप ईश्वरकेध्यान में प्रवृत्त है वह अपने को तबतक चारोंभोरसे रक्षा करत यह जीव गिलनेपाले यमलोक को नहीं जानताहै यमदूनों से आकर्षित : मृत्युको पाता है। १० । उस मौनका जो पाप पुण्य है वह दूसरे के मुख कियाइ या होताई फिरभी विषयों में आसक्त होकर अपनको पतनहुआ ध्यानकरताहारामाचर्य कियसप्सार नाच लोभके आधीनतामें वर्तमानक्रोध और धनकेमदसे अचेतहोकर आत्माको नहीं जानताहै । १२ । दुष्ट कुलवालोंकी अपने कुलकी प्रशसा करता हुआ रमता है दरिद्रियोंकी निन्दा करता गर्वमे भुईकारीहै । १।। दूसरों को मूर्ख कहना है और अपनेको अच्छारीवि 'देखतौह दूसरोंको शिक्षा करता है परन्तु अपनको शिक्षा करना नहींचाद, ११४ । जब ज्ञानी और मूर्ख धनी और निर्द्धनी कुलीन अकुलीन प्रांकारी निरहंकारीमी सव पितृवन ( यमलोक ) में वत्तमान यगत ज्वर होकर सोतेहैं वहाँपर दूसरे मनुष्य उन्होंके निर्मास बहुत से अस्थिवाले अंग और नाडीवन्ध भषिक कुछ नहीं देखतेहैं औरजी कुल और रूपकी मुख्यताको नहीं पातहैं ना यह सभी शरीरत्याग कियय पृथ्वीपर मोते हैं राव दुर्बुद्धी मनुष्य इस good and evil deeds. But those who meditate on God, protect On4 fallen low on account of evil desires, does not see his fall.. A Wonder that posple forget thems:lves on account of avarice sugor and other passions. They give theruveives praise and call others fools and dorot look towards themselves; they preachand themselves remain in the dark, Great and lowly, proud and go to the region of Yan and nothing is left of them but a . blo all 3 17860) Mahe bharat प्रलब्धमिह दुर्युषा।।१८प्रत्यक्षाच परतवमोनिशम्म श्रुति स्विमामा अनुवे स्मिन् यो धर्ममनुपालयन् । जन्मप्रमृति पतंत प्राप्नुयात् परमां गतिम् ॥ १९ ॥ सधैं विदित्वा घे पस्तत्वमनुवर्तते । स प्रमोक्षयते सर्वान् पन्यानो गनुजाधिप ॥ १० धृतराष्ट्र उवाच । यदिदं धर्मगहन वुद्धमा समनुगम्यते । एतद्विस्तरशः सर्व पु। इति वीपर्वणि जलमादानिकपणि धूतरामशोकोफ्नोपने चतुर्थोध्यायः ॥ ४॥ . मार्ग प्रशंस मे ॥ १। विदुर उवाच । अन ते वयिष्यामि नमस्कृया स्यम्मुवे। संसारगगे पदति परमर्षयः ॥ २ ॥ फनिन्महति संसारे धर्तमानो द्विजः पिता या दुर्गममुमाप्तो माराव्यादखें दुरम॥ ३ ॥ REETTEER गधार RELI लोक में किस हेतु से परस्पर छकिया जातो . 6 । परमात गार मुन। जो इस श्रुतिको मन कर इस विनाशवान् जीवलोकमै धर्मका पालन करताहुमा जन्मेसे लेकर म म करताहै नह परमगतिको पाता है जोकिइसप्रकार सयकोजानस कर तो ना.करता है । २० । अध्याय ५ ॥ धुरराष्ट्रघोले किजो यह दुष्माप्य विधिकद्वारा अच्छेमकारमाप्त होताई इम हेतुमे अब बुद्धिमार्गको च्योरे समेन मासे कहो। १ । विदुरमा घोले किड्स स्थानपर ब्रह्माजी के अर्धनमस्कार कर दिया तुममे करता, जो कि महर्षि लोग इस संसाररूपी धन धनको सरले निश्चपकार के इस बड़े संसार में कोई दिन मांसभक्षी जीयों से पूर्ण उस दुर्गम्य घनमें पहुँचाजो किवड़े शब्दवाले भयानक मांसभक्षी महाभयकारी सिंह च्याम हाधी और रीलोकसमूहोंसे नारोंभोरको व्याण with their A heap nf bnner. Wiy should fooli-li min practise decruit follon cresteres wlient they see thet ro may men/eniloved with wealth and.builty le darl on eartli. We 83 and hcm tlint he mi lenils in winthony lioin this mortal woriti, gning the highent gonl. who hnoma nll this is a vorshipper of Balır." 20. OHAPTER V Dhritrnahter gril, "Bicsus this difficult dharm can by known by vimlem alouc, pingiell me the way to wis Iom. "Vidar said," llar inco brutal dosnia Bialala, ishuli bli jou have great anges crn** who rull tor:-t of the sorki - A tun citored a forest full of tey - ८॥पञ्च St PuT 1777 (7261) मसार संपरिक्षिप्तं यत् स्म दवा नद्यमः ॥ ४॥ नदस्थ हवा हृदयमुद्वेगमर्ग त् परम् । अत्युच्छ्यश्व रोना यै विक्रियाय परत ॥ ५॥ स तद्वनं व्यनुसरन् संप्र पाषत्रितस्तत बीक्षमाणो दिश सर्वा शरण फ्ध गदिति ॥ ६॥ स तेषां छिद्रमन्धि छन् प्रत्तो भयपीडितः । न च निर्याति वै दूरं न च तैर्थिप्रयुज्यते ॥ ७ ॥ अथाप-प बनं चोरं समन्तावागुरावृतम् । बाहुभ्यां सपरिक्षिप्त निगा परमधोरया । शीर्षधरेनोंगे शैलारय समुन्नतैः । नमस्पर्शमहाघोर. परिक्षिप्त, महावनम् ॥ ९॥ पग मध्ये च तत्राभूदुदपान समावृतः । घडीभिस्तृणछन्नाभिटामिरमिसवृतः ॥ १० ॥ पपात कविजस्तत्र निगूढ़े सलिलाये । चिलग्नश्चाभवत्तस्मिन् लतासन्तानसंकुले ॥११॥ पपनस्य यथा'जातं वृन्तवमाफलम् । स तथा लम्बते तत्र ह्यध्वंपादो अप शिराः १२ ॥ अथ तत्रापि धान्योस्य भूयो जान उपटव । जपमध्ये गहानागम मत्युकाभी भयका रीया उसको देखकर इसका हृदय महागाकुल हुआकम्पार रोमांचोंसे शरीर व्याप्त हुआ वह उस वन में अच्छेप्रकार घूमनाहुआ इधर उपर को दौड़ा और मर दिशाओं को देखाया कि मेरा क्षरास्यान कहाँ होगा । ६ । इसमकार वह भस पाडावान् छिद्रों को देखता भागावह नतो दूर जाता पान उनसे बचता पाइसके पछि उसनचारोंओरको पाश युक्त घोर वनको देवा वह पाश पड़ीपोररूप स्त्रीको नामों से पकड़ा हुआथा ८ । और वहवन पांच शिर रखनेवाले पर्वतों के समान उंचे सोप्से और आकाशको स्पर्श करनेवाले वडेवतों से चारों ओरको संयुक्तथा । ९ । उस वनके मध्य में एक कूप अन्धकार से पूर्ण तृणसे ढकी हुई दृढ़वाल्लयोंमे संयुक्तया वह द्विज उस गुप्त कूपमें गिरपड़ा भौर लवाभोंक फैलावमे पूर्ण उस कूपमें छिपगया । ११ । जमे किटन वंशमें उत्पन्न होनेवाला बड़ा फल खा में लगामा होताहै उमी प्रकार वह दिन ऊंचपैर नीच पिरवाला होकर उसमे लटका। १२ । फिर उमी प्रकारसे उसका दमरा उपद्रव where lions, tigers, clophants and bears were p esent in large numbers suffiment to terrify even death His heart was much troubled at the right of them and the hair of bis body stond on end 5 He rar in all directions to seek a place of refuge in the forert. He ranon much terrified looking for bolx. llc did not g far out of the pince, for he saw a dreadful not xp-oid all round and held by a dread. The placo sas full of fire beuel serprots huge as moon. taine and tall trous touching the shs. There was a dark teil in the middle of tho forest agered sith grass and creepera. 10. He fell down in that well and was lud under cre jungs like a fruit among tho bianchics of a tres He He lay suspended titre lied din nwards met anothise calamity there, for at tinh turu of it to owain power berta of prey. ful roman.

. करनेवाले 11362] Mallabharat पश्यत महायलम् । रूपवीनाहवेलायामपश्यतमहागजम् ॥ १३ ॥ परानं व द्विषट्कपदचारिणम् । फ्रमेण परिसपन्तं धन्लीवृक्षसमावृतम् ॥१४॥ तस्य प्रशान्यासु वृक्षशाजापलीम्पतः । नानाला मधुकरा घोररूपा भयावहाः। आरतम संध्य पूर्वमेव के निजा ॥ १५ ॥ भूयो भूयः समीहन्ते मधूनि भरतर्षभ । सानी पानि भूतानां गेर्या लो विप्रकुष्यते ॥ १६ ॥ ते मधूनां पहुधा धाराः प्रसूवतांतदा। आलम्बमानः स मान धारा पियात सर्वदा॥१७॥ न चास्य तृष्णा विरला पियमान सङ्कटे। अनीपतात तदा नित्यमतः स पुनः पुनः • १८ ॥ म चास्त्र जीवित राशन निर्वेदः समज यत । तत्रैव च मनुष्यस्य जीविताशाः प्रतिष्ठिता। छष्णा श्वेता वृक्षं कुट्टयन्ति च मूधिका ' १९ ॥ व्यालेश्च वनदुगांतेरिया च परमोप्रया । भी उत्पन्नहुमा किकूपके मध्पर्म बड़ बलवान सर्पको देखा और मुखमंकनकप किनारेपर पेऐबड़े हाथीको देखा।११ जोकिलामुखवाला और वारह परक वाला ओत शामवर्ण क्रमसेचलनेपाका सहारनौर वरिलयोंसे ढकाापारा १४॥ इस के पाछे शाखामों पर लटकनेवाले मामा मारा रूपरखेगवाले श्वेतवर्ण घोर और बड़ेभयके उत्पन प्रथमही घाबनाकर सन्तानके द्वारा वृद्धि पापाले भौरे शहदको इकट्स का निवास करते हैं । १५ । हेभरतपभ यह भौरे वारम्बार जापारियों के सादिरसों की इच्छा करते हैं जिन्होंसे चालक आकर्पण कियेजाते हैं । १६ । उन रोंकी कड़ी धारा सदैस गिरतीई तव लटकताप्रावह जीव सदन धाराओं को पानकरताहै ।१७ संकटमें भी इस पानकरनेवाले की इच्छापूर्णनहींहुई वह अतृप्तहोकर सदेष वारम्बार उनको गहतीहै । १८ राजा भोवन में उसकी प्रमोति नहीं उत्पन्नाई उसमें मनुष्य के जीवनकी भाशा नियतहै श्वेत कृष्ण रंगवाले चूहे (रात्रि दिन उस वृक्षरूपी मापुर्दाको काटतेहैं। दुर्गम्य बनकेपास बहुतसे सर्प और बड़ी उनकी (पदावस्था ) और कूपके नीचे सर्प ( मृत्यू ) और रूपके मुखपर हाथी ( पूर्णful serpent, whilo ut the mouth of it he saw a huge elephant with six muthi, twelve fect, black and white colour and covered with trces creepers 14, Then he saw humming beus which yathered in large numbers and multiplied, inak hanging on a large low a hive of ing boneg. 15. They sit on tu-talul things such as please children. A stroam of sweet matter dropped from the hive and the panded there drank of it. Fallen in such tidublo he remaing unsatiefied. is yet hopeful, b'ack mich, day and night, aro gnawing way the roo's of the tree of his lilo, Thoro nro numnous sarpants in tro forest, with the dreadful Berpent below at the bottom of the well, and the elephant at the mouth, 20. There is a great foar of tho fall of the t and mansu9- म. is not tirol of lifu and White and woman, thet treaon 1368 Mahabharat हारच नागेन बोना है फुजरेण च । २० ॥ वृक्षमताताच्च भ मार्षिक भ्यश्च पाच म् । मधुलोमाधुरः षष्ठमाहुमद्भयम् ॥ २१ ॥ एवं स घसते तत्र क्षिप्तः संसार बागरे । मय जीषिताशायां निदमुपगच्छाति ॥ २२ ॥ इवि नापीण जलप्रादानिकपशि धृतगशाकापनोपने पंचमोध्यायः ॥ ५॥ भाना प्रतराष्ट्र उवाच ! अहो सलु महदुखं यास सस्प ह । कथं तस्य रहित विषा पदताम्बर ॥ १ ॥ स देशः पच नु यत्रासी बसते धास्ट्रटे। कथं वा स पिम् येत नरस्तस्मान्महामयात् ॥ २६ पत मे समाय साधु घाम तदा । कृपामे महती जा तस्यायुद्ध रणेमहि ॥ ३ ॥ विदुर रवाच । उपमाममिदं राजन् मोक्षषि हिरवारकम् ।कृत हिन्दते पेन परलोषेषु heneध्यते कान्तारं महास वर्ष) और वृक्ष के गिरने से भय और चोंसे पांचवां भयई भौर शहदके लोभसे जयको कहा । २१ । इसप्रकार संसार सागरमें पड़ाहुआ यह भीष पर्तमान होगी और जीपनकी माशामें पैराग्यको नहीं पाताहै ॥ २१ ॥ अभ्याग ६ ॥ धृतराष्ट्र पोले कि बहामाश्चर्य है कि निमय यहादुःखहै और उसकी स्थिति भी एस स्पदै देयकामोंमें श्रेष्ठ उसमें उसकी माति भौर वाप्ति किसप्रकार से है । बादेवा कहा जिसमें यह जीय धर्मसंकटमें निवास करता है और वह मनुष्य उप्त बड़े भासे केसे देगा । ३ । यह सत्र मुझमे कही यह बहुत अच्छाहे तब हमकाम में लामेंगे निथप उससे छुटामे के लिये मेरे ऊपर पट्टीकृपा उत्पन्न हुई है। ३ । विदुरनी षोले हे गणा मोल पाइनपाले पुरुषों ने यह दृष्टांत वर्णन किया मिस से कि मनुष्य परलोक में मुन्दर गतिको पाया है।४ । नो वह महावन कहानाता account of the mice and tlio consequent loss of the stream of honey. Tbas lies man in the occan of tho world and yet he does not sover his raind from the hope of lifo " 32. CUAPTER VI Dhritrastin erid, "I am souch amazed to hear thine man, aliliough ho is betot with so many troubles dox Brot like to 8050r bis connection from tho world. Pray explain this. M'here ia tho place the soul lives in and how can Inan getard of the fcart Pmy tell trail. It is 11362] पश्यत । - Maliahliaiat महायलम् । पपीनाहवेलायामपश्यतमहागजम् ।। १३ ॥ षड्यन्त्र व द्विषट्कादचारिणम् । क्रमेण परिसपन्तं धन्लीवृक्षसमावृतम् ॥१४॥ तस्य प्रशान्यासु वृक्षशानाधलम्पितः । नानाला मधुकरा घोररूपा भयापहा । आसते म संपत्य पूरमेय के निजा ॥ १५॥ भूयो भूयः समीहन्ते मधूनि भरतर्षभ । सानी पानि भूतानां र्याली विप्रकुष्यते ॥ १६ ॥ तेषां मधूनां पहुधा धाराः प्रसूवतांतदा। आलम्बमानः स मान धारा पिति सर्वदा॥१७॥ न चास्य तृष्णा विरला पिवमानस्य सङ्कटे। अगीमा तदा नित्यमताः स पुनः पुनः . १८ ॥ म चार जीविते गजर निर्वेदः समज यत । तत्रेय च मनुष्य जीविताशाः प्रतिष्ठिताः । छष्णा श्वेता वृक्षं कुट्टयन्ति च मूधिका · १९ ॥ व्यालेश्च धन दुगान्तेरिश्रया च परमोग्रवा । भी उत्पन्न हुमा किकूपके मध्यमं वड़ बलवान को देखा और मुखवंकन किनारेपर ऐऐबड़े हाथीको देखा।११ जोकिलामुखवाला और बारह वरण वाला शेत शामवर्मा क्रमसेचलने वाला समडावन मौर वरियों से कामाचा ॥१४॥ इस के पाछे क्डी शाखामों पर लटकनेले माना रूपरखेनवाळे श्वेतवर्ण घोर और बड़ेभयके उत्पर करनेवाले और प्रथमही घाबनाकर सन्तानके द्वारा वृद्धि पापाले भौरे शहदको इकट्ल काले निवास करतेहैं । १५ । हेभरतर्षभ वह भौरे वारम्बार जोशारियों के सादिक्षसों की इच्छा करते हैं जिन्होंसे वालक आकर्षण कियेजातेहैं । १६ 1 उन रसौकी पड़ी धारा सदैव गिरतीई तब लटकताअावह जीव सदैव धाराओं को पानकरमा १७ संकटमें भी इस पानकरनेवाले की इच्छापूर्णनहींहुई वह अतृप्तहोकर सदैव कारम्बार उमको चाहताहै । १८ । हेराजा जीवन में उसको अप्रोति नहीं उत्पन्नई उसी मनुष्य के जीवनकी भाशा नियतहै श्वत कृष्ण रंगवाले चूहे ( रा दिन )उस वृक्षरूपी भायुद्दको काटतेहैं। दुर्गम्प वन्केपास बहुतसे सर्प और बड़ी उग्रजी (पृद्धावस्था ) और कूपके नीचे सर्प ( मृत्यू ) और कूपके मुखपर हाथी ( पूर्णful serpent, while nt the mouth of it he saw a huge elephant rrith six mutthi, twelre fect, black and white colour and coverid with trees 14, Then ho say humming beas which gathered in large numbers and multiplied, mako hanging in a large low a hive of ing honey. 15. They sit on tn-tslul things such as please children. A stream of sweet 'matter dropped from thio hive and tlie pended there drank of it. Fallen in such troublo he remnaing unsatisfied. is yet hopeful, White and black mice, day and night, ara ynuwing may the roos of the trec of liis lilo, Thoro nro num si ous shiponts ia t'ho furusi, with the dreadful the serpent below at the bottom of the well, and the olephant at the mouth, 20, There is a great foar of the fall of tho and creepers mansus. HA is not tirol of lifu and woman, trcu on 063 Mahabharat (७३६३० सच नागेन बौना है फुजरंण च । २० ॥ वृक्षमताताच्च भयं मर्षियश्च पञ्च म् । मनुलोमाधुकरैः षष्टमाहुमहद्भयम् ॥ २१ ॥ एवं स घसते तत्र क्षिप्तः संसार गरे । नप भीषिताशायां निदमुपगच्छति । २२ ॥ विनापीण जसमादानिकपर्वयि धृतराष्ट्रशोकापनोपने पंचमोध्यायः ॥ ५॥ प्रतराष्ट्र उवाच । अहो पलु महदु खं कृछ्यास तस्य ह । कथं तस्य रनिम्तन हिषा पदताम्बर ॥ १ ॥ स देशः पव नु पचासी वससे स्टूट । कथं पास पिम् येत नरस्तस्मान्महाभयात् ॥ २१ पत में समापय साधु घाम तदा । कृपामे परती जावा तस्यायुद्ध रणमामि॥३॥वदु' उषाघ । उपमाममिदं राजन् मोक्षषि द्विारमा कुकृतं हिदते येन परलोधुमान सध्यते यस कान्तारं महास वर्ष) और वृक्ष के गिरने से भयहै और नहोंसे पांचां भयई और शहदके लोभसे अरेमयको कहा । २१ । इसप्रकार संसार सागरमें पड़ाहुआ यह जीव वर्गमान होगी और जीवनकी भाशा में वैराग्यको नहीं पाताई ॥ २१ !! अभ्याय६॥ पृतराष्ट्र पोले कि बड़ामाश्चर्य है कि निश्चय बहादुःखहै और उसकी स्थिति भी इस पद हेषक्तामों में श्रेष्ठ उसमें उसकी माति और वाप्ति किसप्रकार से है ? पादेश कहा जिसमें यह जीय धर्मसंकटमें निवास करता है और वह मनुष्य उत्त बड़े भगसे केसेगा । ३। यह सब मुझमे कही यह बहुत अच्छाहै तब हमकाम में लागे निधन समे हटाने के लिये मेरे ऊपर बड़ी कृपा उत्पन्न हुई है। ३ । विदुरनी पोले हे गणा मोत चाहनपाले पुरुषों ने यह दृष्टांत वर्णन किया निस से कि मनुष्प परसोफ में सुन्दर गतिको पाता है .४ । नो वह महावन कहाजाता accoult of the nice and the consequent locs of the stream of honey. Thas lies man in the ocean of the world and yet be does not sever his mind from the hope of life - 22. CHAPTER VI Dhritrasbtin said, “I am rouch amazed to bear that man, although he is beset with so many troubles does not like to so før bis connection from tbe Forld. Pray explain this. lives in and how can man getud of the feari Pray tell me all. It is Il'ere is the place the soul Stal Puvस्त्रोपर्व 736 सार एव सः । षनं दुर्गहिप घेत ससारगम हि तत् ॥ येते कथिता माता व्याधयस्त प्रकीर्तिताः । पासा नारी वृहत्काया अधितिष्ठान तत्र ॥६॥ तामास्त जगंप्राज्ञा वर्णरूपविनाशिनीम् । यस्ता पो नृपो स तु देवः शरीरिणाम बता यसतेऽधस्तान्महाहि फाल एव सः। अन्नकः सर्वभूतानां देहिनां सहासी ॥८॥ कूरमध्ये तु या जाता पल्ली पत्र व मानध:प्रताने सम्मो सग्मा जीविताशा शारि णाम ।९॥ स पस्तु सीना त पृशं परिलति । षडयफ्रः कुञ्जरो रामम् स संदत्सर. स्मृतः॥१०॥ पगुम्मार घो माला पारा द्वादश कीर्तिताः । ये तु वृक्ष निक तन्ति मुषि का. पगास्तथा । ११ । रापहागि म्यादुर्भतामा परिचितकाते थे मधुकरास्तत्र कामास्ते परिकीर्तिताः ॥१२॥ वास्तु तातो धाराः सन्ति मानि है वही महा संमारी और मो पद दुर्गगवन है यही संसारघन है।५ । नो सर्प सुमसे वहीरोग है वहाँ पहे शरीरवाली जो भी निवास करती है । । । उसको शानियोंने वर्णरूपकी नाश करनेवाली रामावस्था कहा है हे रामा हामी पी वह शरीरधारियोंका शरीरहे । ७ । गौर जो वासर्प सस कूपके भीतर निवास करताहै वहींकाल है यह सब भूनोंका नाशकरनेवाला और भावात्माभों का हरमे पालीहै । ८ । और कूपकमध्य में जीवन्ली उत्पन्नईई वह मनुष्य उसके विस्तार में लटकताहै वही शरीरघारियोंके जीवनकी आशा है । ९ । और कूपके मुखपर जोछः मुम्बबाला हाथी वृक्ष की शाखाओं के चारोंओर चेष्टा करता है वहीपूर्ण वर्ष । १० । उस के छा मुखऋतु और बारह चरण महीने कहेहैं उसी प्रकार को चूहे वृक्षको काटवे । ११ । उनको विचारवान पुरुषों ने दिन रात्रि कहा उसमें जो 4६ भोरे हैं वह नाना इच्छा कहा ! १२ । और जोवह शहदकी बहुतसी धारा good to hear and beneficial. "Vidur said, "Tois precept is giron by those who wi-h to gain salvation and a good state in the next world. The forest mentioned abovo is the world. 5. The borpoots aro diseasos, the large-siz.d woman is the old ago which removes beauty of person; the wall is the body and the largo serpont at the bottom is Death which destroyos all. The creper in the middle of the rell, supporting the man, is the hope of life. The six-headed elephant moving round the treo is the your. 10. Itasir ruouths are the seasins; thu tivelyo feet aro tlo months; the mico which ent away the roots of the tree a e drys And nights and the black bees are tho cldly desires Thu Etrean of honey is tho eap of doiros in Stri Parvस्त्रीपर्य (7325 म् । तास्नुफामासार विद्याप तज्जन्ति मानधा ॥ १३ ॥ एवं संसारपक्रस्य परि । विदुवा । येन संसारच पाशाशिउन्दन्ति बुधाः ॥१४॥ वनीपर्वणि जलपादानिकलीग ताशोकापनापने पष्ठोध्यायः ॥ ६ ॥ धृतराष्ट्र उवाच । गहोमिीदतमारपानं मघता तत्सदर्शिना। भूप' एव तु मे हपः हत्या घागमृत तप ११ ॥ विदुर उवाच शृण भय प्रवक्ष्यामि मार्गस्यैतस्य विस्तरमा छुत्वा विप्रमुच्यन्ते संसारेश्यो विलक्षणा ॥२॥ यथा तु पुरुषो राजन् दघिमध्यान मास्थित । क्वचित क्वविच्छमाच्छ्रान्त. कुरुते धाममेव च ॥३॥ एव ससारपाये गर्भवासेसु मारत । कुर्वन्ति दुवुधा वास मुच्यन्ते तत्र पण्डिता ॥ तस्मादध्यानमे पिरतीहै उनको काम रसनानो जिसमें मनुष्य डूबतहै। १३॥जिन्होंने इसमकार संसार चक्रकी गतिकोनाना निमय करके वहमनुष्य संसार चक्र पाशको काटते हैं १४॥ अध्याय ७॥ धृतराष्ट्र वोले हे पहात्माततदशी आपने मोक्ष देनेवाली कथा कही उसको आप फिर मुप्पता ममेत कहो मैं सुनना चाहता हूं । । । विदुरजी बोले मुनो में फिर उह मार्गके कपको कहताहूं जिसको सुनकर ज्ञानीलोग संसारसे छूटतेहैं ।२। हे राजा जैसे कि बड़े माग नियत मनुष्य, जहां तहां थककर निवास करता है ।। हे भरतवंशी उमीप्रकार अज्ञानी मनुष्प संसाग्में सृष्टिरूप गर्भ में वारम्बार निशस को करताहै। ४ । भर शानीग शीघ्र जाते हैं इस हेतुसे शास्त्रज्ञ लोगों which men aredrow-1 T203e who know the curse of the wheel of the world, cut away the bonds " 14 V dur sad, CHAPTER TII Dlutrashtra euid," You have pointed out the ray to selvat on Pray explam it once u ra 1 113h to heal of it." " Hesr once moro thio arc unt of the way leadin; to salvation. A foolish man stays m carious births duke one stajkağ at different stages whon tired me yourucy torcst of t 19 world soon or. One endowed with gyan crosses this dega W150 men bare tin due to non .-.11 (७३. [[7856] Mahablarat तमाहु शास्त्रविदो जनाः ! तत् संसारगहन वनयापुर्मनीषिणः ॥५॥ सोऽयं समावों तस्यांना भरतर्षभ । चराणां स्यापरणाणार नमृध्पत्तत्र पण्डित ॥ ६ शरिर मानसाचैत्र माना ये तु व्याधयः । प्रत्यक्षाश्च परोक्षाच ते फथिताः ॥ ७ ॥ क्लिस्यमानास्थ नित्य पार्यमाण भारत । महापालद्विजन्त्यल्पयुक्षयः ॥ ८ ॥ यथापि तर्षिमुच्येत ध्याधिभिः पुरुपानृप । पोत्येष त पश्चाजरा रुविनाशिनी ।। ९ ॥ शादरुपासपर्शगन्धेश्च विविधरपि मन्जमानं महापळे निरालम्बे समन्ततः । १ ।। संपत्सरसबो मासाः कया करोगास्योपयुञ्जन्ति रूपमायुस्तथैव च ॥ ११ । पते कालस्य गिधनो जानन्ति दुर्बुवाः । धात्रामिलिसिवान्याहु सर्व भूतानि कर्मणा-। १९ ६ रथः भूतानां समाहुस्तु सारथिम् । इन्द्रियाणि हयानाहुः कर्म धुद्धिश्च रश्मयः ॥ ११ ने इसको मार्ग कहाहै और जिन ज्ञानियों ने निम संसारको पनपन कहो पुरुषोत्तम यह इर स्यावर और जङ्गमजीवोंका चलायमान चक्र है पण्डित इच्छा नहीं करताहै । ६ । शरीरधारियों के शरीर और चित्तसे सम्बन्ध चाले जो रोगहें उनको ज्ञानी लोग गुप्त और प्रकट रूप सर्प कहते हैं । ७१ भरतवंशी निर्बुद्धी मनुष्प उन्होंने दुःखपोचाले और घायल होकरभी अपने की सोते माकुलताको नहींपाते हैं के राजा जप मनुष्य उन रोगोभी छूटता है तब उस पुरुषको रूपकी विनाश करनेपाली जरामवस्था दवाती है । ९ । जोकि शन्द, रूप, रस, स्पर्श और नानामकार की गन्धियों से भी निरापार पड़ी कीप चारों भोरसे हुवाहमा है पूर्ण वर्ष छातु पारह महीने दोनों पक्ष दिनरात और उनकी सन्धियां यह सब क्रमपूर्वक उसके रूप और अवस्थाको नाम करते हैं ॥११॥ यह काळकी निषि है दुर्मुदी लोग उनको नहीं मानते हैं सब जीवोंको उनके कर्म से विरका लिखामा का है । १२ । शरीरधारियोंका देहस्थहै चिन्ता सारथी है इन्दिप घोड़े हैं और कर्मयुद्धी उस स्थकी बागडोर है । १३ । जो पुरुष उन फनेवाल घोड़ोंक पाछे दौड़वाई वह इस संसारचक्रमे पक्रके समान घूमता है ।१४। tho wheel which moves the living and lifeless creatoros. which attack living beings huve been called ger pents by thia wise, The fool, though attacked by them is not distressed in his inind, and whion he is freed from hucli distaser, old age overtakow lume. Ho i® stuck in a deep mine, and duys, nights, fortnights, I CABOUs and youte decreuse tho porivd of bis hfe. 10. Fooltel nien donot know tho treasure of true. It is said that God gives being the roward of tucir deeds. The body of beings is a cur; anxitty is its driver, organs Ovidus 010 its heges and wisdom is its tince. He who runs after thio huibs, turns tround with the wlicel. Tho discasos of Ho who curta them with wir.

Stri Parvergå 7367 योनां यो पंग पावतामनुघापनि । स तु संसारचक्रीस्मन् वयद परिवति १५ ॥ यस्तात् संयमते वुया संयतो न निवर्तने । स तु संसारच स्मिन् पक्रयत् परिवर्तित ।।१५ ॥ यं तु संसारचक्रेऽस्मिन् चक्रातू परिषचने। अममाण न मुह्यन्ति संसारे न समन्ति ते । संधारे भ्रमतां राजन ! दुःख सतवि जायते ॥ १६ ॥ तस्मादस्य निवृत्यर्य यत्नमेय वरेयुधः। उपेक्षा नात्र कन्य तशास्त्र: प्रवर्तते ॥ १७ ॥ यतेन्द्रियो नरो राजन् क्रोधलोमनिराकृतः। सन्तुष्टः सत्यवादो यः.सशान्तिमीधगच्छति ॥ १८ ॥ याम्पमाई रयं न मुद्यन्ते येन दुर्बुधा चतुतघुल मेवैतदु न भवति भारत ॥ १९ ॥ साधुः परमदुखाना बुखि पज्यमाचरेत् जानौषधमधाप्यौह दपारं महौष धम् । २० । न विझमो न चाप्यों न मि न सुद्ध ना तथान्मोचयते दुःसाधधात्मा स्थिरसंथमः ॥ २१ ॥ तस्मान्म मदास्थाय शील को जिनन्द्रिय उनको बुद्धिसे आधीन करताई बाचक समान प्रमनेवाले इस संसार पक्रय लौटकर नहीं भाताई।१५। वह संसार में भी घूमते हैं परन्तु घूमतेहुये मोदको नहीं पाते हैं वही दुःख संसार के घूमनेवालों के लिये भी उत्पन होताई । १६ । सि हेतुसे झनीको उचितहै कि इस संप्तार से छूटनका अपायकरे इसमें कभीभूल और देर नकर नी चाहिये नहींतो सैकड़ों शाखावाला वृक्ष वृद्धिको नाता १७ राजा जो पुरुष जितेन्द्रिय क्रोध लोभसरहित सन्तोपी और सत्यवक्ताहै वहशांनी को पाताहै । १८ । हे भरतवंशी यहभी कहाहै कि पश्चात्ताप करनेमे दुखहोवाहै (शानी वड़े दुखोंकी औपधी ज्ञानको ही समझे । १९ । इसलोकमें जितोन्द्रिय मनुष्य वही दुष्पाष्य ज्ञानरूपी महाऔषधीको पाकर दुखिरूपी वड़ेगेगको उससे काटे १२० । घोर दुःखसे वैसे नमो पराकम छुड़ाताहै नधन मिंत्रौर :सुहृद्गण छुड़ातेहैं अमे कि जितेन्द्रियात्मा छुडाताहै । २१ । हे भरतवंशी इसकारण से सवनावाकी मातिय नियत होकर सुन्दर प्रकृतिको पाकर नितीन्द्रयपन त्याग और सावधानीको माप्तकर यह तीनोवा के घोडहैं । २२ राजाजीपुरुष मृत्यु के भयको त्यागकरके dom, dues not come back. 15, He turns with the wheel, but does tout lene selges with it. A wise mao should try to release himself from the world without idlegess and mistake or there shall be raised from it a tree háring hundreds of branches He who las control over senses, who is free from avarice, and who is satisfied and truthful, geta peace of mind. Remorse givee pain and gyan is the medicine of all pains. One having control over organs, having got the great medicines of giyan, should cat away all disease with it. 20. Neither pro wers, nor wealth or fi enor gire clief fum frưuble ne does the contacturer senses. Let one therefore love all the world with control of tenger, re signalied and carel aluees s bich are to buiktb of Bral.m. He wla girc tp all fear 17868) Mahnblutat मापध भारत । वस्त्यागोऽप्रमादश्च ते त्रयो तह्मणो हयाः॥ २ ॥ युक्ता स्थितो पो मानमे रपे । त्यक्त्वा मृत्युभयं गजन मामला स गच्छति । समयं सर्वभूतेम्पोयो ददाति महीपते । स गति पर स्थान विनो. ॥ २४ ॥ न तत् सुसाने नोपांग्रश्च नित्यश । श्रमयस्य दिशनेन पत फल पानरः ॥ २५॥ नहात्मनः मियतरं लिचित् भूतेषु निश्चितम् । अनिष्ट भरणं नाम भारत । तस्मात् सयपु भूतषु दया कोऱ्या विपश्चिता ॥ २६ ॥ मायुक्ता बुधिजालेन संवृताः । मममहष्टयो मन्दा भ्राम्यन्ते तत्र तत्र ह । टया धीरानजन्ति ब्रह्मसात्मताम् ॥ २७ ॥ इति श्रीपर्शण जलमादानिकपर्वाणे धृतराष्ट्रशोकापनोदने सप्तमोध्यायः ॥ शीतल किरणोंसे युक्त चित्तरूपी रथार नियतहै वह ब्रह्मलोकको पाताहै। और जो पाप सबनीयों को निर्भयता देताहै वह सर्वव्यापी परमेश्वर के उस स्थापित है जोकिमायाकी उपाधियों से रहित है। २४ । मनुष्यजो देनेलपाताह वाहनारोंयज्ञ और सदैव जनों के भीकरने से नहीं पासक्ताहै। जीवोंम भारमा से माधक कोई प्यारा नहीं है भरतवंशी साजीवोंका अप्रिय नामहै इसहेतुसे ज्ञानीको सवजीवोंपर दयाकरना चाहिये । २६ । नानामकारके युक्त भज्ञान के जालसे ढके हुये भल्पदृष्टी निर्बुद्धी मनुष्य जहाँतही घूमते है २० सूक्ष्मदृष्टिवाले हानी सनातनवमको पातेहैं ॥ २७ । - of of death and stands on the car of mind with cold rays gets the reg of Braho. He wie se llaves others from fear, goes to the region the Dinnipresent who je free from all bleinienes a merit which & mid gets 18 not obtainable by thousands of sacrifices and vows. 25 Nothingsdearer than self, and nothing is noro death, therefore one shoulike merenful to all. Flish men, in the Meshes of quorance roimhcre and there, whilo syanis obtain the region of Blalim ** 27 Alrerso than . Sui Pars नाच 17369 वैशम्पायन उवाच । विदुरस्य तु तवा निशन्य कुरुसत्तमायुप्रशोकामिसप्तन्तः ana भाव मूर्छिः ॥ १॥ तं तथापतित भूमौ निःसन्न प्रेक्ष्य वा-गः । कृष्णपाय व क्षत्ता च विदुरस्तथा । सम्मका मुहदश्वान्ये वास्था ये चास सम्मताः ।२ लेग मनशीतेन तालवृन्तश्च मारत । पस्पश्व करेगांत्र राज्यमानाश्च पलाः। चाप तु चिरं कालं धृतराष्ट्रं तथागतम् ॥ ४॥ अथ दीर्घस्य कालस्य लघसंझो गादीपतिः । पिललाप चिरं कालं पुप्राविभिरमिप्लाः ॥ ५ ॥ धिगस्तु बलु मानुष्य भानुमंच परिबारम् । यतो मलानि दुःखानि सर्मपन्ति मुहुर्मुहु ॥ ६ । पुत्रनाशेऽर्य मारे च शातिसम्पन्धिनामय । प्राप्यते सुमहदुःछ विवाग्निप्रातिमं विभो ॥ ७॥ येन वस्ति गात्राणि येन प्रशा विनश्यति । यनामिभूत रु मरण बहु मन्यते । ८ ॥ तविद प्रसंन माप्तं मया भाग्यविपर्यायाद । पस्यान्त न विगच्छ मि बने प्राणरिप अध्याय।। वैशम्पायन वोले किरानाघृतराष्ट्र विदुरजी के इसवचनकोमुनकर पुत्रशोक से इस्त्री और मूर्मावान होकर पृथ्वीपर गिरपड़ा । । । सब वान्या व्यामजी विदुरजी सव अन्य मुहद द्वारपाल और जोर उसके अङ्गीकृत थे उन सबने उस प्रकार पृथ्वीपर पड़ेदुये अचा उस धनराष्ट्र को देखकर पुखदाई शीतल जलसे छिड़का और पंखोंसे हयाकरी और उपायों से चैतन्य करतेहुये उन लोगोंने हाथोंसे शरीर को स्पर्श किया इसके पीछे उसदशायाळे धृतराष्ट्रको बहुत देरतक विश्वासकगय । फिर बहुत देरके पाछे सचेतताको पानेवाचे यह पुत्रशोक से युक्त गजा धृतराष्ट्र बहुव देस्तक विलाप करनेवाला हुआ। ५ । निश्चय करके मनुष्योंमें जन्म को और भरलोकों में परिग्रहको धिक्कार जिप्तमे कि दुखकामूल बारम्बार उत्पन्न होताहै। समई पुत्र धन ज्ञानवाले और नानेदारों का भी नाश होता है । निमसे अभंग भस्महोकर घुद्धिकाभी नाशहोताह और निमसे भयभीत मनुष्य मरणको बहुत मानताहै । ८ । सोयह दुव मारपके विपरीततासे मैंने पायाई माण स्पागके सिवाय उमक अन्तको अन्तकिमी प्रकारसे नहींपागहूं ।९। में उसी प्रकारकरूगा हे ग्रामणों में श्रेष्ठ व्यासनी देखो उसधृतराष्ट्र ने बड़े ग्रह्मज्ञानी महात्मा CHAPTIR VIII Vaishampayan said, "Having heard the scords of Vidar, Dbritrashtra fell down on carth senseless for the grief of liis sons. All tho kingmen with Vyas, Vidar, Sanjaya and other friends sprit kled cold water over him and 'fanned him. Thos tried their leat to bring hiin to conscioueness and touched his body with their handa, consoling hira Thieu comurg to consciousner, he lamented long the death of Ina song • Fie on ms and an my manhood, "erred he, fir all this is a 8 urce of (mull. The destruction of sons, Nealth Ani liesmon is liko poʻson or fire. Limbs of the body barn with all the thule. 5 ८ तब्बी 17370 Mahabbmat वात् । ९ ॥ तच गई फरियामि अथे। दिसमनम । इत्युक्त्वा तु महात्मानं गिरं प्रमागितमम् ॥ १०॥ धृतराष्ट्रोऽमम्मदः शो परमं गतः । भभून राजासी शापयानो महीपते । ११ ॥ नसतनं या गणनः प्रभुः पुत्र शोकाभिमनन्तप्त पुत्र पचनसप्रवीत् ॥ १२ ॥ व्यास उयाय । धाराष्ट्र मराबादी यत्या पक्षासाश्रृणु । श्रागनासे मेवायी धर्माधकुशलः प्रमो॥ १३वधि दित किविद्वेविनम्प परन्तप । भनित्यतादि मायामा विजानासि संशयः॥ १४॥ अधुये जीवलोके च स्थाने चाशंघने सति । जीगिने मरणान्त कस्पावलि भारत ॥ १५ ॥ प्रत्यक्षं तप राभेद रस्यास्य समुन्द्रयः। पुत्र ते कारण त्या बाल योगेन कारितः ॥ १६ ॥ अवश्यं भवितव्ये व कुरूणां वैससे नृप । करजान चोचति तान् शरान गतान् परमिकां गतिम ॥ १७ ॥ जानताच महाबाहो पिरोए महात्मना। पितासे यह कहकर अचेताको पाकेबड़े शोकको पापा अर्थात् वह राजा वरा ध्यानकरताहुआ मौनगया । प्रभु साहनी उमेर नाचनको.कुमार पुत्रशोकसे दुखी अपने पुत्रसे यह वचन वाले । १५ । हेमदाबाहु वृतराष्ट्र जोपा जसको मुनो तुम शास्त्रज्ञ और शास्त्रों के स्मरगा रखेनवाले बुदिक सामी औरपर्ण अर्थमें भी कुशलहो । १३ । हे शत्रु भोंके तपानेवाले तुनने कोई बात भवाब नही है हे बड़े ज्ञानी तुम जीवधारियों की अनित्यनाको जानते हो हे भरतकी इस विनाशवान् जीवलोकमें विनाशवान निवास स्थान के होनेपर जीवन और मृत्युमें किस निमित्त शोचते हो । १५ । हे राजन्द्र इस शत्रुता की प्रत्यक्षता आपके दृष्टिगोचर है कालयोगसे आपके पुत्रका कारण बनाकर सबमारेकये ।१६॥ हेराजा कौरवोंको अवश्य भावी नाश होनेपर उनपरगनि पाने वाले वारों को किस हेतुसे शौचतेदो । १७ । हेमहावाहु राजाधृतराष्ट्र मैंने और दुद्धिमान् विदुरने की रावप्रकार से सन्धिमें उपाय किया । १८ । बहुतकाळत्तक उद्योम करनेवाले किसी जीयसेभी देवका रचाहुआ मार्ग मेरेमामे बन्दकरने के योग्यनहीं है. । १९ । मैंने अपने नेत्रों के समक्षमें देवताओंका जाकार्य सुना मैं उसको उसी प्रकारसे कहताई जिससे कि तेरी स्थिर बुदिहोय । २० । थकावट से रहित में एकसमय बड़ी शीघ्र grief and wisdom is destruyed, causing one to dosire for death. I have got through all thiy trouble by the viocissitude of Time and see no relief except in death. I shall die, Vyas. " 10 Hiving said shis to Vyas, Doritrashtia again fainted and backing silent. Vyas was much affected with his sorrow and sait, - Hlear ms, Dhritrashtra, for your are learned and wise and have experience of the world. Nothing is bidden from yor, destr yer of foco. You k. Oy the mortal nature of beings. Why doyou griers at death? 15. You knew of the enmity. Allmen were slain on account of your son. Bat the destrtoliop of .

. Sthi Pur स्नापर्ष (72711 पनि संयरमेन शम ति जनेश्वर । १८७ ग घ देयकृती मार्गः शया भूतन म विपरताधि चिरं कालं भियन्तुमिीन मे मतिः॥ १९ ॥ देवतनां हि यत् कार्य मया प्रत्यक्षतः थुप्तम् । तत्ह समयक्ष्यामि कथं स्थैर्य भवेत्तय ॥ २० ॥ पुरा परि सोचातःसमामेन्ट्री जितपलम । अपश्यं तन च तदा समतान् दिर्धापस २१ मारद महबबादि सर्वे देवर्पयोगध। तत्र चापि मचा दृष्ट्वा पृथिवी पृधिवापत ॥ २६ ॥ बाईमुपसमाप्ता देताना समीपत. एएमय सदा यात्री देषाम ह समागताम् १२शावत् कार्यममयुष्माभित्रंह्मण सदने तदा प्रतिक्षात महाभागास्तम.लीनं संविघीय ताम् ।। २४ तस्मातद्वचन धुरथा यिष्णुलोक नमाकृतः । उपप धाक्य प्रहसन पृथिवीं देघर्ष सदि ॥२५॥धृतगष्ट्रस्य पुत्राणां यस्तु ज्येष्ठ शतस्य वै। दुरोंचन इतिस्पात.स से कारी करिष्यामि ॥२६२ तश्च प्राप्य महीपाले कृतप्पा भरियाव । तस्त्रार्थ पृथि वालीचभा में गपा और सब इकट्ठे हुये देवत जोका देखा । २१ । राजा पदापर मैंने नारदादिक जय देवमृपियों को और पृथीकोमी देखा । २२ । पह तर निसार अपने कार्यके निमित्त इन्द्रादिक देवतामोंके सम्मुख पर्षमानहुपे सब पृष्षी दे समीपनाकर उन इकट्ठे देवताओं से कहा । २१ । कि हेमहाभ ग देवता होगो बाप लोगोंने ब्रलोक निम मेरे कार्य करने की प्रतिज्ञाकी है उसको शीघ्र करो । ५४ । कजित विष्णुमी देसमामें उसके उमवचनको, उनकर हँसतेहुये व पृथ्वीनयह मन पोले । २५ । धृतराप के सौ वेटोंमें घड़ा बेटादुर्योधन नामसे पासिदेह वारा कार्य करेगा। २६ । उस रामाको पाकर अभीष्ट माप्तकरेगी उसके पोषकुरुक्षेत्रमें इकठहोनेवाले और राघोंसे प्रहार करनेवाले राजालोग पर सर मारेंगे हे देवी इसके पीछेयुद्ध में तेरे नारफानाशहोगा। २८ । हे शोभा पान शीघ्र अपनस्थानको जावो और सृष्टिको धारण करो । २९ । राजाओंमें the Kauravas was una voidable, say do you grieve for those who have gut good regions ? l as well as Vidur tried our best to make peace. Tho decres of Kate cannot be annulled by Ang hunian effort. For your satufaction I tell you what I myoelf saw in the assemb'y of gods. 20. Once I went to the conrt of Indra without being tired Thero I eat Nard and other risbıs as well as our Earth. All the gods were Rasombled thore for their rop-ctive b 181101sesmpproached the gods and thus addhesned them, ". Mahe hasto. O gods, to fulfil tho promise you miulo rogardug me in the region of Brabm. Vishnu, rospocted by the world, said to her with a smile, . dhan the oldest son of Dhritrashtra will do thy Hork. will gain your abiet thu roste van : the assembled' hings full figl.t at Kurukshotra and shall relieve you of your buiden. Go to your place and hoep on supporting the world." our son Duryodlian was burn . She tben Duryo. 26 You ..

(७६७२) (7372) falubhairt चौपाला: कुरुक्षे मागता ॥२७॥ भन्योन्य पातयिष्यातही प्रहरिणः । सतने गिदिद देषि मारहगुधि नाशनम् ॥ २८ ॥ उघ्रि स्व स्थान को धारय शोभने ॥२९॥ पएम से मुमो राजन् तोषसंरकरणात् । कलेरंशः समुत्पको गान्धार्या जरे नृप ॥ ३०॥ अमर्षा घपलश्चापि शोधनो दुष्प्रसादनः । देवोगाव समुत्पमा भ्रातरवाश्य साप्ताः ॥ ३१॥ शनिम्मातुलधैव कर्ण परमः सका। समुत्पन्नापतीशाय पृथिव्यां सरिता ।। १२॥ शो जोयत राजा तास जना गोस् । धमो घम्हांयाति स्वामी वार्मिको मधेत ॥ ३३ ॥ याममा गुण दोषाभ्यां भृत्याः स्युनास संपाय.! दुष्टं राजनासाथ गतास्त ताणार ३५१ कर मर्थ महाबाहो गारदी पे सत्त्वचित् । गारमापराधात् पुप्रास्ते विनष्टाः पृथिवीपते । तान् शोचस्थ राजेन्द्र न हि शोकेऽस्ति कारणम ॥५॥मनि पाण्डम पराभ्पन्ति भारत । पुनातच दुरात्मानो परिवं पातिता मही॥ २६ ॥ मारने व माने श्रेष्ठ राजा मृतगटू संसारके नाशके कारण से बह तेरापुत्र कलियुग अंश गापारी में उत्पन्न हुभाया । . ० . जोकि प्रशान्त चपल मोहा अभ्यासी और दुसले पराजय होनेवालाधा देवगोगते उसके भाईभी उनी प्रकार उत्पन्न हुपे ।।।। और मामा शकुनी मोर वैज्ञानिक और वह राणालोग संसारक नाशके नि- मिच उत्पन्नहुये । ३२ जैसा राना उत्पा होता है उसप्रकार के उसके भादमी भी उत्पन्नहोते जास्वामी धर्मका अभ्यासी होताईउस दशाम भधर्म भा धर्मताको पाताहै । १३ । स्वामियोंके गुण दोषों से निस्सन्देह उत्तीप्रकार के नौकर चाकर होंगे हेरामा तेरे पुत्र दुष्टराजाको पाकर इस संसार सेगये हे महाबाहु नारदी इसप्रयोजनको मुरूपता समेत जानते हैं देगरतवंशी तेरे पुत्र प्रऐन अपराधसे नपाए उनका शोचमतकर । ३५ । पाण्डव थोडाभी अपराध नहींकरते जिन्हीकेहावसमा सब संसार मारागया । १६ । मेरा भलाहोय प्रथमही राजसूयपक्षमें मारदीने घिष्टिरकी सभा वर्णन कियाथा ३७ । फि हे कुन्तीके पुत्र गुधिष्ठिर कुछकाल पीछ कौरव और पाण्डन परस्पर सम्मुख होकर नाशको पायेंगे जो सेरे करने के योग्य of Kali and Gandhari to destroy the world 30. He was diseatisfied, rash and invincible. His brothers too, were of his mind. His uncle Shakuni, his friend Karan and other princes too were born to destroy tho world. The Subjects are like him, while, they speedily take this bad habit. Thy sons d-parted from the world for the fault of thy son who was their king Narad kno158 this well. Thy sons were destroyed by their faults Be not guicyed for them, 35 The Pandavas have committed no lault in destroying the world Narad had ford. told it at the Rajsuya facrifico of Yudliislitbir that the Kauravas apd Stri Parv सीर्ष (1373, मेषम सशयः । युधिष्ठिरस समिती राजसूये निधेदितम् ॥ ३७॥ पाण्या' रासमासा परस्परम | म भविष्यन्ति कान्सेय पचेकरयं तदार ॥२८॥ सस्य वधः भुत्वा तदाशोपन्त पाण्डा । एवं ते सर्घमात्यानं देवगुध बनातनम् ३९॥ कय ते शोकनाश' शत्प्राण ! पदा प्रमो स्नश्च पापडपमेप क्षारक्षा पनि विधिम् ॥४०॥ एष पार्यों गवाहो पूर्वमेष मया शुतः । कधिनो धर्मराज जिये कत्तमे ॥ ११ ॥ पसित पापमपा गुही निषेविते । अधिप्रहे फारगाणा पन्तु बलवत्तरम् ॥ निकमणीपो लिपिधी राजम् पापन । एतान्तस्य । भूतेन स्थावरेण सन या भयान् धर्मपरो पत्र विधि भारत ।मुद्यते माणिनां बात्या गतिधोगतिमेव च ॥ ४४ ॥ यान्तु शोफेम सन्तप्त मुधमान मार्नुहु। भवायुधिष्ठिये राजा माणानपि परित्यजेत् ॥ ४५ ॥ एमालुनित्यशो धीरतियोनि गतेष्वपि । स स्वपि राजेन्द्र पनि करिम्पति ४६ मम चैध नियोगेन विधे सायनिवसनात् । पाषामा कारुण्यात् प्राणान्धारय भारत ॥ ४॥ एवं से पता है उसको कर। 11 पाहबोंने नारदनी के पचनको मुनकर शोचि कियाय देवताओं की गुप्त और सनातन बातें मैंने सुझसे कहीं। १९ । भवतू अपने माणों पर दया और पाण्डयों पर प्रतिकर जिससे किदेयके कर्मको मानकर सेरा शोक दररोय । ४० । हेमहाराह पहबारा मैंने प्रथही पुनीथी जो किधराजके उत्तम राजमूबया में कही गईथी मुझसे गुप्त पातके कहनेपर धर्मके पुत्रनेकौरवों के दि नहाने में पार किये परन्तु देव वड़ा प्रवलहै । ४२ । हेराजा कालकी रची हुई जो सनातन विधि यह इमलोकौ किमी जीवधारी से उन्लंघन करने के पोग्य नहीं है । ४३ । भरतयंशी पर्मात्मा पाप माणिगों की गति और प्रगतियोंको भी जानकर इनमें अचेत होतेहो धर्मात्मा । ४४ । राजा युधिष्ठिर सुपको शोक से दुखी और वारवार अचेन होनेराला मानकर अपने प्राणों को भान्याग करसका है। ४५ । वह धैर्यवान सदैव पसु पक्षियोंपरभी दपाका करनेत्रालाई हेराजेन्द्र वह तुमपर कैसकृपानहीं करेगा । १६ । हे भरतपंशी मेरी प्रामारो देवके उल्लंघन न होने से और पाण्डाकी दयासे माणों को धारण करो । ४७ । इसमकार लोक में the Pandavas would be destroyed by the hand of each other, and the Pandavas were sorry for it I bave kuld you that secret of gods Now feel mercy on your own life and love the Pandavas so that grief mag abute by the knowledge that it was the work of God 40 your was already aware of the words Yudhishthir. Knowing this secret from me, Yudtishthir make peace, but the anpulled by any one. course of living beings. Yudhishthir may lose his life told at the Rusus a bacrifice of tried to working of Fate is powerful. It can not be You lose your senses, though you know the Knowing you in such 45. He is merciful to beasts and distress of mud, (७१ . 117374) Mahnbharat नस्य लोके कीर्तिमधिपति । धनार्यः गमहत्ता तप्तं स्यान्च तपधिराव । ॥ पुत्रशोक समुत्पन्न हुताशंज्यलिंत यथा । प्रशाम्भता महाराज गिर्यापय ॥ ४९ ॥ वैशम्पायन उवाच।। तत् श्रुत्वा तम्य पचा व्यासस्यामिततेजसः । समनुपाप धृतराष्ट्रोऽभ्यभाषत । ५. ॥ महता शोफजालेग प्रणुनोस्मि द्विोहम। मात्मानमयबुध्यामि मुह्यानो गहुमुटु.॥५. " दन्तु यचनं श्रुत्वा तब देवभिपोग जम् । धारयिष्याम्यहं प्राधान् घटिणे न तु सौचितम् ।। ५२ ॥ एतत् शुत्वा व व्यासः सत्यवतीमुतः। धाराप्दप राह तान्तरधीयत ॥ ५३॥ इति स्त्रीपर्वणि जलमादानिकपण धृतरा शोकापनोपनेअष्टमाध्यायः ॥ ८ ॥ सुक्ष वर्तमान रहनेवाले की कीर्तिहोगी भोर हेतात पहा धर्म मार बहुकाना तपाहुआ तप मातहोगा। १८ । हेमहाराज ज्वलितरूप अग्निके समान उत्पम होने पाले पुत्रशोकको ज्ञानरूपी जलमे शान्त करने के योग्यहो । ४९ वैशम्पायन गोरे किधृतराष्ट्र उन बड़ेतेनस्त्री गासनी के इस वचनको सुनकर एके मुहूर्व अरो प्रकार ध्यानकरके कहा ॥५०॥ किहे विजोत्तम मैं पड़े शोक जालसे कठिन काषा पारम्बार अचेत होता सचेतता में महीं आगाहूं। ५१ । देवकी भाशाले उत्पा होनेवाले आपके इसवचनको मुनकर मैं प्राणोंको धारण करूंगा और शोच करणे मत्त नहीं हूंगा । ५३ । हेरामेन्द्र सत्पत्ती के पत्र व्यासजी धृतराष्ट्र के इसपचनको मुनकर उसस्थानमें अन्तर्दान होगये । ५३ ।। birds, why should lo not be kind to you ? Having regard to my words, the power of Fute and pity towards the Pandavas, you should austain your.life. You will tbus be famous in the world and will attait greal marit. You should queach the firs of your grief by the water of wisdon," Vaishnmpayan said that having hard the words of glorious Vyes, Dhritrashtra thought for some time and said. 50 " ! am too much pressed by grief aud ngain and again lose my senses, bat I shall live to obey you and shall not plunge in grief. " Hariog hoard these words, Vyas disappeared then and there." 53 Stri Parv सापय (7275) अनमेजय उवाच । गते भगति मासे धृतराष्ट्रो महीपतिः। फिमचेपत विप्र याख्यातुमईसि ॥ १॥ तथैव कौरो राजा धर्माणी महामनाः । कृपप्रभृतय किमकुर्वत ते त्रयः ॥ १ सघायाम्नः श्रुतं कर्म ज्ञापशान्योन्यकारितः वृत्त अनरं हि यदभापत समयः ॥ ३ ॥ वैशम्पायन उवाच ।इते दुर्योधनेचैघ हते न्ये च सर्वशः । सञ्जयो विगतज्ञो धृतराष्ट्रमुपस्थितः ॥ ४ ॥ सञ्जय उवाच । नागभ्य नानादेशेभ्यो नानाजनपदेश्यरा। पितृलोकं गता गजन सये तव सुतेः सह i५ पुत्राणामय पौत्राणां पितृणाञ्च महीपते ।आनुपूर्वेण सर्वेषां प्रेतकाणि कारय ॥ ६ ॥ वैशम्पायन उवाच । तन्छूया पचन घोर सञ्जयस्थ महीपतिः। गता हरिष निविष्टो न्यपतत् पृथिंधीनले ॥ ७ । तं शयानमुपागम्य पृथिव्यां पृथिवीपतिम। विदुरः सर्वधर्मन इदं वचनमब्रवीत् ॥८॥ उत्तिष्ठ राजन् कि शेपे मा शुधो भातर्पमः। अध्याय ९॥ जनमे जय बोले हे ब्रह्मापे भगवान व्यासजी के जानेपर गजा धृतराष्ट्र ने या किया वह मुझमे कहनेको योग्यहो । १। उसीमकार धर्मपुत्र वहे साहसी रामा युधिष्ठिर और कृपाचार्यादिक तीनोंने क्या किया अश्वत्थामा का कर्ममुना भौर परस्पर दियाहुआ शाप समा अब आप उस पूर्व वृतान्तको कहिये जिसको सम्मपने कहाहै ।।। वैशम्पायन वाले कि दुर्योधन के और सब सेनाके मरनेपर अचेत सन्जय धृतराष्ट्र केपास आये ।।। हे राजा सव राजा नाना देशोते आकर विपके पुत्रों समेत पितृलोकाको गये ५ । हेराजा पुत्र पौत्र और पिता आदिक जो रणभूमि में मरहें उनसव के कर्मोंको क्रमपूर्वक करायो । ६ । वैशम्पायन बोले राजाधृतराष्ट्र सञ्जयके उसघार वपनको सुनकर निर्जीवके समाननिश्चष्टदोकर पृथ्वीपर गिगपड़ा। ७ सब धमाके ज्ञाता विदुरजो उस पृथ्वीपर सानेवाले रानाके पास पाकर इन वचनको वोले । ८ । हे भरतर्षभ लोकेश्वर रानाधृतराष्ट्र उठांशोच CHAPTER IX Janmojaya said. “ What did Dhritrashtra do at the rieparture of Vyas ! Pray tell me all that ha as well as hravo Yadhishthir and the three warriors, Kripacberya and others did. I have board the exploits nf Abhs watbama and the mutual curves, pray tell me what happened next as you heard it from Sunjaya." Vaista'upayan said, " At the destruction of Daryodhan and his arrus Sarjaya camo to Dhritrashtra and said, " All the princes who haì come bere from various countries to the region of Yam; perfrom the bºquits of your sung, grandsons and elders who died in the war." Vaisimpapan says that on hearing the heart rending words of Sanjaya, Danitragh tra fell down on the earth like and inanimate thing. 7. Vidur rhe virtuous coms to him and said, " Rise up Dhritrashtra and be not grioyad. This is the have gone 67 376] Mahabharat एषाथै सर्वसत्त्वानो लोकेश्वर परागति ॥क्षत्रियाम्ते महात्मान भरा भना । आशिष परमां पाप्तान शोच्या सर्व एव हि ॥१०॥आत्मनात्मानमाश्वास्थ मा शुः पुरुषर्षभ । नाद्य शोकाभिभूतस्त्वं कार्यमुसा हसि ॥ ११ ॥ इति स्त्रीपणि जलपादानिकपर्वणि धृतराष्ट्रशोकापनोदने नवमोध्यायः ॥ वैशम्पायन उवाच । पितुरस्य तु ताफ्यं श्रुत्वा तु भरतर्षभ । युज्यता यानी त्युक्त्वा पुनर्वचनमनधीत् ॥ १।। तिप्रमानय गान्धारी सर्याश्च भरतत्रियः । वधू मुपादाय याश्चान्यास्तत्र घोषितः ॥ २॥ एघमुक्त्वा स धर्मात्मा विदुर धर्मवित्तमम शोफीपप्रतिक्षानो यानमेवान्यपद्यत ॥ ३॥ गान्धारी पुत्रशोकात मबचन कोधिता सह कुन्त्या पतो राजा सह प्रीमिरुपादयत् ॥ ४ ताः समासाध राजानं मतकरी सर भीवधारियों की यही परमगतिहे । ९ । उन महात्मा शूर और युद्धको शोभा देनाले क्षत्रियों ने परमगान को पाया यह सब शोधक योग्य नहीं है। हे पुरुप सम चि मे चित्तको विश्वास देकर शोच मारो भव शेमें रखेहुयेतुम करना योग्य जलदानादिक क्रियाके त्यागने के योग्य नहींहो । ११॥ अध्याय १०॥ वैशम्पायन बोले कि पुरुषोत्तम धृतराष्ट्र विदुरजी के उस बचन को सुनकर सवारी तैयार करो यद कहकर फिर वचनको वोला । ११ बधू कुन्नी आदि जन्म समस्त्रिपोंको लेकर गापारी समेत सब भरतलाशयों की त्रिपों को शनिनामा । २ । वह धर्मात्मा शोकमे हतचित्त बुद्धिमान धृतगष्ट घड़े धम्मवान् विदुरजी से इस प्रकार कहकर सवारीपर सवार थे। पात के वचनम चलायमान शोकसे पीड़िग गान्धरी कुन्नी और अन्य सब स्त्रियों समेत वहां गया जहां राजातराणे 1 ४ । अत्यन्त शोकयुक्त वह स्त्रियां राजाको पाकर परस्पर वार्तालाप करकेच end of all the livin, linga. The great warriors, whu HI TO heaven, are not worth sorrow Curh yourself with wisdom and bo nol grieved. Dunnt lezve tho obs q 1103 uudono on account of gono to ggraf11 your :- CHAPTER I. Vnichampionn naid that on herring tho words of Vidur, Diritti ehtsa ordered in m'n to insho carringes roily and to bring forsto and other women with Gandhari and the wron.ch of tho family, and sons, they made a great noise, Crying out and running hither 17 7377 (७३७० -- .. Stri Parvोपर्व 'धोक्सविता : मायामान्योऽयमीयुः सा भृशमुच्च कुशुम्ततःn५ | ताः समाया मात् सता तायश्चातरः स्वयम् । अगाठीः समांगत्व ततोऽसौ निग्यो पुरात ॥1॥ ततः प्रणादाज सपु पुरुधेश्मयु । माकुमार पुरं स मच्छोकमर्पितम HILो वा नापः पुरा देवगणैरपि । पृथग्जनेन दृश्यन्ते तास्तदा निहतेषराः ॥८॥ प्रकी य्य केशान् सन्नुभान् भूषणान्यथमुख्यष एकवखरग नार्य्यः परिपेतुर मायवत् ॥९॥ वेतपतिस्पेभयो गृश्यसास्यपाक्रमन् । गुहान शेवानां पृषत्यो हतयूथप : ॥१०॥ तान्युतीर्णानि नारीणां तदा वृन्दान्यासः । शोकायन माजम् किशोरीणामिवाङ्गो । ११ प्रगृह्य पाइन् कोशन्नयः पुत्रान् मातन् पितृनगि । पर्शयातीय तारस्म युगान्ते लोकसंक्षपम १२. विलपन्यो रुदनपश्च धावमागा और बड़े उच्चस्तर से पुकारी । ६। उन त्रिपोंसे अधिक पाडावान उन विदुरमी ने आंसुओं से पूर्ण उन स्त्रियों को अच्छी रीति से विश्वास कराया और पाक यों में बैठाकर बाहरचले ।६। इसके पीछे कौरवों के सब स्थानों में बड़ाशब्द उत्पन्न हुभा और सब नगर लड़कों से वृद्धोंतक शोकसे पाडावान्हुआ । । पूर्व समयमें जो त्रिगं देवसमूहों से भी नहीं देखीगई थीं वह सब विधवा सी अन्यर मनुष्यों से भी देखीगई। शिरके वालोंको फैलाकर और सुन्दर भूषणों को उतार कर एक बस रखनेवाली स्त्रियां अनाय के समान बाहर निकली बह स्रियां श्वेत पर्वतों के समान यों से ऐसे निकली जैसे कि पहाड़ों की गुफाओं मे ऐमी हिरणी निकलें जिनके कि गूथप हिरण मारेगये हों। १० : हे राजा तब उन स्त्रियों के बड़े समूह शोकसे पीड़ावान ऐसे चछे जैसे कि घोड़ियों के बच्चे | मैदान में निकलेत हैं । ११ । भुनामों को पकड़ कर पिता भाई और शवों को भीपुकारती हुई प्रलयकालीन संसार के नाशकी दिखलानेवाली हुई । १२ । विलाप करते रोते जहां तहां दौड़ते शोकसे हतज्ञान उन स्त्रियोंन करने के योग्य कर्मको After this h, mountod his car. Summoned by Dhritrashtra, Gandhari, Kunti and other women came there. women went on talking and crying. 5. More full of grief thnn thire women and with tears in his eyes, he consoled them and made them ride on palangains. Thers were great lamenta tiods in the hvuses of th) Kiuruvai and th: city people, young and old, showed signs of grief. The women, who were not visible even to gods, came out in the presence of all men in their widows' we.ds. They went on trith dishellaved hair, destitute of ornaments, with only one cloth on the body, like those having no guardians, They came out of their white houses like a herd of female deer whose stag is slain. 10 They went on cryiug liks fouls Calling out the names of fathers, brothers The enrrowful 17378] Maliabhaint स्तनस्पतः। शोकेनामाइतमानाः कत्तयन प्रजमिरे १३ || डॉ जग्मु.पुरा नाम सखीनामपि योपित । पकवलाध निर्लजमा चणा पुरतोऽभवन् ॥ १५ ॥ पपई सुरक्षोपु शोकपाश्यासंयस्तदा शोकविना गजवक्षन्त परस्पाम ॥ १५ ॥ वाभि परिष्कृतो राजा रुदतीभिः सहनश नियणे नगरादानस्तूर्णमायोधन प्रति। शिल्पिनो वणिज इ ई पतित पार्थिव पुरस्कृत्य निर्वयनगरानी । १.५ ।। तासां विकोशमानानामातीनां कुरुक्षरे । प्रादुरासीन्महान् शम्दो अथवा भुवनान्युन ।। १८ ॥ युगान्तकाले समाप्ने भूतानांदयतामिन ! अमावः स्थादयं प्राप्त इति भूनानि भेनिरे ॥ १९ ॥ भुशमुद्विग्नमनसस्ते पारा कुरुक्षये प्रामोशस्त महा रज स्वनरक्तस्तदा भृशम् । २० ॥ इति स्त्रीपाण जलभ'द निकाणि सत्र कधृतराष्ट्रस्म पुरान्निाणेदशरोध्यायः१० नहीं जाना । १३ । पूर्वानमय में जिन खिोंने सखियों की भी लज्जाको पायाथा वह एक वस्न रखनेवाली विना परदेवाली स्त्रियां सासों के आगे चिली । १४॥ हेराजा जिन्होंने वहुत थोड़े शोकों में परस्पर विश्वात कराया तब उन बोकसे व्याकुल स्त्रियोंने परस्परदेखा । १५ । उन रोनबाली हजागें स्त्रियों से घिराहुमा महा दुखी धृतराष्ट् नगरसे चलकर शीघ्रही मैदानमेंगया । १६ । शिल्पी न्यापारी वैश्य और सब कों से निर्वाह करनेवाल वह सब राजाको प्रागे करके नगरसे वाहर निकले । १७ · कौरवों के नाशमें उन पीड़ावान औरकारनेवालों के बड़ेशब्द सब भवनोको पीड़ावान करते प्रकटहुगे । १८ । जस किमलयकाल वर्तमान होनेपर भस्महोनेवाले जीवोंका नाशहोना उमीप्रकार इस नामका भीहोना जीवन माना । १९ । हेमहाराज इस कोरबौं के नाशहोनेपर अत्यन्त व्याकुल चित्त बड़े प्रतिमान वह पुरवासी कठिलनासे पुकारे ॥ २० ॥ -- and thther, thuy did not know what to do Those woman who were abashed even before their playmates, nos went on unveiled bofore their mutlier--'n-law. They who wore companions in their grief now looked at ono Anoth-i. 15. Sirrounded by thousands of weeping wou n, Dhritrashtra went out in open air. Artirani, merchantey tinders and others followed their hing. Lomenting tho destruction of the Kaur stay, their noiso was heard fai and sido, They thought thint the great destruction of the sarriors hud been lihotlint pralay. I ho citizons lamented the great destruction of the Kauravas and cried with a great noiro." 20.

र & iPay सगर्व (7379 शम्पायन उवाच । क्रोशमा ततो गत्या दहशस्ता महारथान् । शारतं कृप गर्षि कतवर्माण मेषयः॥१॥ ते तु वैष गजार प्रनावक्षुपमीसम्म । भभुकण्ठा निवपाप दस्तमिदमघुपन् ।। २ । सुतस्तव महाराज कृत्वा पार्म सुदुष्करम् । गत परो राजनलोफ महीपतिः ॥ ३ ॥ दुर्योधनवन्तान्मुक्ता घरमेय प्रयो रथाः । मिन्वय परिक्षीण सैन्य ते भरतर्षभ ४ ॥ इत्येवमुक्त्वा गजानं कृप शासनस्ततः। पारी पुषशोकातीमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ५॥ अमीना युध्ममानाने घमन्त शमग पवीरफर्माणि कुमाः पुत्रास्ते निधर्म गताः ॥ ६ ॥ धुत्र साप्प लोफारसे गि समनिनितान् । भारधरं देवमाया विचरन्त्यारा इथ ॥ ७ ॥ नहि कंधे रामा ध्वमान संगमुखः। शोण निधन प्राप्तो मच पधित काजलि । ८roilet भियस्याहुः पुराणाः परमां गतिम् । शस्त्रेण निधन सरये तम शांचि अध्याय ।।१। शम्पारन वोले कि फिर एककोश नाकर उन कृपाचार्य अश्वत्थामा और Banा महारार्थियोंकोदेखा । १ वह शोकके अश्रुनोंसे पूर्णकण्ठ से रोदन करतेशान समेत्र रखनेवाले अपनेस्वामी रानाको देखनेही बहुत श्वास लेकर गहवचन बोले १३। महाराज रामाधृतराष्ट्र आपका पुत्र यड़े कठिन कर्मको करके साथियों समेत इन्द्रलोकको गपा । । ।भरतर्षभ दुर्योधनकी सनामें से हम तीन रथीवन है मेषसत्र आपकी सेना नाशहोगई । ४ इसके पीछे शारद्वन कृपाचार्य राजासे यह कहकर पुत्र शोकस पाडापान गान्धारी से यह वचन बोले कि निर्भप युद्ध करने पाके शत्रुओं के बहुत समूहोंको मारनेवाले वीर लोग के कर्मों को करके तेरेपुत्रोंने मरणकोपापानिय प करकेवरात्रोंसे पिजयीकपहुये निर्मल लोकोको पाकर और प्रकाशमान शरीरमें निय तहोकर देवताओंदे समान पिहारकरत आउनशूरोंमें कोई शूर पीर मुखफेरनेवाला नहीं हुआ किन्तु शस्त्रों से मरणको पाया और हाथ जोड़कर किसी भी नाश को नहींपाया । ८ । प्राचीन वृद्धों ने CHAPTER XI Vaishampayan said, " Atter going away a mile, Kripac harya, Ashwathama and Kritvarma met one another. With their voice choked with tear, they sa iy the Siind king and said to him with bighs O king, has gone to the region of Indra along with tiis companions. Out of that largo army we three are only alive, the rest are destroyeil." Then Kripacharya said to corrosful Gandhari, “Thy song died after doing brave deels and saying many foos. Barely they have got pure regions and roam thero in luminous bodies like gods. None of them torned back from fight. They xll died by weapons and nono sul plicated for life veiled the best by the wise and therefore you should not be grieved . Yout song Such biod of death Las been (७१८० [7380 Mahabi.n.at तुमर्हसि ॥ ९॥ चापि शत्रुपनेपासम्म राधि पारा । श्रृणु बल कामस्माभि रषत्थागपुरोगमः ॥ १०॥ अधण इत अाभौमसमेन ते मुनम । सप्तं शिविरमा विश्य पाच कृतम् । ११ ॥ पाघ्याला गिहनाः सबै प्रष्टद्युम्नपुरेरोगमा I वस्थात्मजा द्रौपदेयाश्च पानिता ॥ १५ ॥ तया निरासा मा पुशवगनमो मायाम रणे स्मातुं न हि शक्पामझे घमः ।। १३ ॥ स हि जग मवेशासाः क्षिपणे पन्ति पाण्डवाः । समर्थप्रशमापशायर प्रतिनिर्षियः । १४॥ राजस्वमनुजानीहि देमात बोत्तमम् । ष्टान्तं पर वापि वसा धर्म: केपलम् ॥ १५॥ इत्व मुफ्त्या राजानं कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् । कृपश्च तिमी प द्रोणध भारत ॥ १६॥ अपेक्षमाणा राजानं धृता मनीषिणम् कामनुमहात्मानस्तू णभश्यामचोदयार" ने इसमकार युद्ध में शास्त्रों से क्षत्रिय के मणको परमगाम कहा इस हेतुमे वह शोधकरके याम्प नहीं हैं ।९ । हे राजा उन्होंके भाव पासषभी एक्षिक नहीं है अश्वत्थामा आदिक हमकोगों ने जो किया उसको सुमो । १० । मधर्मक साथ भीमसनके हाथ से तेरे पुत्रको पराहुमा नकर हमलोगों ने सोबेहपे लोगो से पुक हेरेको पाकर प गडवीय शूरवीरोंका नाश किया । ११ । सब पांचाल जिनका प्रभारी धृष्टयुम्नया उन सबको मारा रामानुपद के और डोपदी । सब पुत्रोंको भी मारा । १२ । इसीत से हम युद्ध में तेरेपुर के शत्रुसमा का नाश करके माने हैं इम हेतुसे हम सामों यहां नियोने को समय नहीं। । १३ । वह शूरवीर पांडव महावनुपगरी क्रोध भापीन शनाका बदला लेने के भमिलापी हमार्ग खोज में शीघ्रता से पाते हैं। राजा तुम आझादो और बड़े धैर्य में नियत हो मारब्ध के अन्तपर होनेवाली मृत्युको और शुद्ध क्षत्रिय धर्मको भी विचारो। १५॥ हे भरतवंशी छपाचार्य कृतवर्मा भोर भत्र स्थामा इन तीनों ने इस प्रकार राजा से कहकर गौर प्रदक्षिणा करके । १५ । for thens, Treir enerus the l'andavas too, aro not increasing. Hear what we did to them. 10. Hearing that your ton was urjustly alain by Bhim, wo destroyed the camp of the sleepure, all the Panchala lieaded by Dhırishtadyumn,, all the sons of Drupad and Draupadi were slain by us, flaving aloin the enemies of vo haro fled from before them and therefore can stay hero with you no longer. Tho Pandavas beck revenge and aro coming after us Let us go, king. Be conforted, thinking of death and the holy duties of kaliatryas Having and this, the things arricca nent "Tound tho king and then muird their towards the Ganges, looking agnin and again at the bing. 17, Guing farquay from t.at son your " 16 livres 10 tri Pary लीग (7381 कम्प सुराजन् सर्व एव महारथाः। आमन्त्र्यान्योन्यनुहिम्नासिधा से प्रययुस्ता लगाम हास्तिनपुर कपः शाग्रस्तदा। स्वमेव राष्ट. हार्दिक्यो प्रीणिोखा पो ॥ १९ ॥ पद प्रयदुरा वक्षमाणाः परस्परम् । अवार्ताः पाण्डुपुत्राणामा. स्या महात्मनाम् ॥ २० ॥ समेत्य धीरा राजानं तदात्वनुदिने रयो । विप्रजाभुहा पथेमारन्दमाः ॥ २१ ॥ समासाद्य वैद्राणि पाण्डुपुत्रा महारथा. 1. पन्त रणे राजन् विक्रम्य तदनन्तरम् ॥ २२ ॥ हावित्रीपर्वाण जळपादानिकपशि एका दशोध्यायः ॥ ११॥. दमाने रामामृतराष्ट्र को देखते अपेन डों को गंगाजी को और चलायमान पा। १७ । हे राजा वन का महारथी दर जाकर परस्पर विदाहोकर व्याकुल च तीनों तीन ओरको चलदिये । १८ । उनमें से शारदत कृराचार्य : हस्तिना रको और लार्मा अपने देशको और अत्यामान्यासनी के भाभम को गये १९ । इसरीति में यह बार उन महात्मा पांडवोंका अपराध करके भरसे पाडावान रस्सर देखते हुये चलदिये । २० । वह शत्रु बैजयी महात्मा वीर सूर्योदयसे ही इच्छानुसार चाहिये । २१ । हे राजा कृतवर्मा और कृपाचार्य से अब थामा के जुदेयोनेपर उनम्हार वादों ने होणाचार्य के पुत्रको पाकर शहर राकम करके युद्धमें विनय हिना २२ ॥ place, the thice warriors took leavs of one another, Kripacharya going towards Hasthionpur, Kritvirnia to 1.18 own couatry and Ashwathame to the hermitage of Vyas Thus they went away in different directions for fear of the Pandavas whon they had so offend. ed. They went on their waye before day breako Ou tuo separation of Kripacharya and Knitvxima frobi Ashwathama, the l'andavas mot the son of Drona and conquered him. " 17382) N - . A Maliabiarat धेसम्पायन उपाय । मेषु तेषु सैन्येषु धर्मराज युधिष्ठिरः । शुश्रुये पितर गियर्यान्त नागसावपात् ॥ १॥ सोऽऽपयात प्रशोफातः पुत्रशोकपरिप्लुतम् । शोष गान महाराज प्रातृभिः सहितस्तदा ॥ २ ॥ मन्दीरमानो धारण दाशाण महात्मना । युयुधानेन घसघा तशा धैय युयुग्सुना ॥ ३ ॥ तमन्धयाद मुदुमाता द्रौपदी शोकक पिता । सह पाञ्चालरोपिद्भिर्यास्त प्रासन मागताः ॥ ४॥ स गङ्गामनुसृन्दानि भरतसत्तम ।फुररीणामियानां क्रोशमीना पदर्श च ॥ ५ ॥ ताभिः परितो कोशम्तीभिः सहस्रशः । ऊर्यवाहुभिराची रुदागि: प्रियाशियः ॥ ६॥ कानु शता राय नु सत्यानृशंसता । पदावधीत पितृन म्रारान् गुरूनपत्रान भारयिया कयं द्रोण मम पि पितामह । मनमायाहो हत्या धापि प्रयम् ॥ ८॥ किं नु राज्येन ते फार्म पितम् भ्रातृन् पश्यतः। अभियुध अध्याय १५ ॥ बैशम्पायन पोले कि सब सेनागों के मरनेपर धर्मराज युधिष्ठिरने । पुरसे निकलेहुये अपने दापताको चना ।। हे महाराज सव पुत्रशोकसे यह युधिष्ठिर भाइयों समेत उप पुत्रशोक से पूर्ण बड़ी चिन्तावाले धृतराष्ट्र ओरचला । २। महात्मायोर पीकृष्णजी सात्यकी और युयुत्सु इनतीनों समेत चला ।३। और बड़े दुःखने पीड़ित शोको इपीहुई द्रौपदी पांचादीलाकी धनीधयों समेन-जो वहां आतीयी उसके पीछे चनी । १६ भरतर्षभ सपने गंगाजीके समीप कुररी पक्षी के समान पीडिहोकर पुकारती हुई सियों के समूहों को देखा। ५. उन पुकारनेवाली ऊररको हाथ महापीड़ित इनामेय प्रपिय पचनों समेत रोनेवाली हजारों खिषों से वह राजाधृतगष्ट्र घिराहुआ था कि अब राजा युधिष्ठिरकी । दया और धर्मशता कहां है जो पिना भाई भित्र और गुरुओं के पुत्रोंको भाषारा १७। हे महाबाहु द्रोणाचार्य मष्मिपितामइ और जयद्रथको भी मरवाकर सेराचिष फैसाहुआ । ८ । हे भरतवंशी पित्रा भाई और द्रौपदी के पुत्र और अजेय अभिः CHAPTER X11 Vaishampayan said, " At the destruction of the armies Yudhishthir heard that old Dhritrashtra had come out, and himself distrereed witli grief, he went towards thiul, with Shree Krishn, Satyaki and Ynyutsa. Merged in excessive grief, Draupadi followed the l'anobal roman. She saw the group of women crying like a foul near the Ganges. Dhritrashtra was surrounded with the women who were thius lamenting "Yudl:ishth ir has slain fathers, brothers, freinde and preceptor's sonk; where ts his justice gonet 7. How does the fool aftur getting Dropa, Bliishia and Jayadrath killed. How will lie rulo whøu fathers, brothers, and the sotis of Draupadi and Abhimanyu Yndhiahtlur cntered the bovy of t11090 la mionting * are no more! " - Stri Parvीर्ष (7383, परेयांश्च भारत ॥ ९॥ यतीत्य ता महायाः मोशन्तीः कुरीरिव । वषादे पिता चेष्टं धर्मराजो युधिष्ठिर ॥ १०॥ ततोऽभिधाय पितरं धर्मेणामित्रकर्षणाः न्यवेदयात मानि पाण्यानेरि सर्वशः ॥ ११ । तदात्मजान्त करणं पिता पुत्रषघाहितः । अनीय आण: शोकातः पाण्डवं परिपस्पंज ॥ १२ ॥ धर्मराज परिस्यज्य सवयित्वास परित । दुधारमा भीमन्दिच्छन् दिक्षरिय-प -पाधकः ॥१३"सकोपप पिकस्तस्यहोर प्रयुसमरितः । भीमसेनमम दावं दियक्ष रिष दृश्यते॥१४.. तस्य संकल्पमानाय भीम प्रत्याभं हरि भीमप्राक्षिप्य पाणिभ्यां प्रश्दी मागमायनम् ॥ १५॥ प्रागव तु महा विधुंध्या तस्वैङ्गित हरि सम्बिधान महाप्राजस्तन चके जनाईनः ॥ १६॥ ग्रही स्वैव पाणिभ्यां भीमसनायस्मयम् । घमा पलवनाजा मन्यमानो कोदरम । १७॥ भागायुनवलप्राणः स राजा भीमगायसम् । भरवा घिमयितोरस्कः सुनाव हयां मन्युको न देखनेवाले तुझको राज्य से कौनप्रयोजन है । ९ । हे महाबाहु धर्मरान युधिष्ठिर ने कुररी पक्षी के समान पुकारनेवालीउन स्त्रिगोंको उल्लंघन करके ताऊ नीको दण्डवतकरी । १० । इसके पीछे शत्रुओं के विजयकरने वाले ने नमस्कार करके अपने नामको कहा और उनसव पांडवोंने भी अपना नाम वर्णन किया । ११ । पिता और पुत्रोंके मरनेसे पीडाबान और अप्रसभ शोकदुःखीं धृतराष्ट्र अपने पुगेके नाश करनेवाले उसयुधिष्ठिर से स्नेह पूर्वक मिला । १२ । हे भरत वही धर्मराजमे मिलकर और विश्वास देकर फिर जलानेयाले 'अग्निरे समान दुएत्मा ने भीमसेनको चाहा । १३ । शोकम्प वायुमे चलायमान उसके क्रोधकी वह आमि भीपसेनरूपी वनको जलाने की अभिलापिणी दिदि पड़ी ।१४। हे | राजा हरिने भीमसेनके पिप में उसके अशुभ संकल्पको जानकर प्रथमही सुगमकर्मी भीकृष्णजी ने वह मूर्ति मँगालीथी १५ । बड़े बुद्धिमान श्रीकृष्णनीने प्रथमही उसकीचष्टासे माटहोनेवाले वृत्तान्त को जानकर और भीममेनको हाथोंसे रोककर लोहेका भीमसेन , धृतरापू के हाथ में देदिया । १६ । उन लोहे के भीमसेन को हाथोंसे पकड़ कर उसको भीमसेन मान कर वलयान राजा ने तोड़ डाला । १७ ॥ साठ हजार हाथी के वल समान उस वलवान् राजान लोहे के भीमसेन को तोड़ 10. He announc. ladies and prostrated himself beloru Dhritrashit a. ed bis own nannt and so did the other l'andavas, Grieved for the denth of bis 6018 nohappy Dhritra htra received Yudhishthir the destroyer of his bodi affectionatols. After embracing liim, the ene ragad prince desired to einbrace Bhim Fanned by tbe wind of grief, the fire ct his rage roomed to consume the forest of Bhim's body Being aware of his evil intention, wise and enes working Krinlu had absonely sent for an iron stutoe. 15. Knowing what was go og to happen, wise Shri Krishn held Bhim back with his hands and gave the iron Bhim into the arms of Dbritrashtra Thinking the statue to bo 17384) Mabablarat m मुखास् ॥ १८॥ ततः पपात मेदिग्यां तय रुधिरोक्षिनः । प्रपिताप्रशिखर : ष हुमः: १९ ॥ प्रत्यगृहलाच तं घिद्वान् मूतों गायल्गणिस्तदा । शमपन साधयाग्निध ॥ २० ॥ स तु कापं ममुत्सृज्य गतायुगहात्मना हा तित्रुकोश नृपः शोफममन्यितः ।। २१ ॥ तं विदित्वा गतक्रोध भीमसेनेवधादितम वासुदेषो घरः पुंसामिद घचनममधीत ॥ २२॥ मा शुलो धनरा; त्वं नैष भीमरवा हतः । गायसीमतिमा होपात्या राजीनपातिता ॥ २३॥ त्वां क्रोधवशमाप विदित्वा मरतर्षभ । मयापटः कौन्तेया मृत्योर्दष्ट्रान्तरं गतः ॥ २ nनहित राजमाईल कडे तुल्योऽस्ति कश्चन । कः सहेत मदाबाहो पाएधिग्रहणं नरः ॥ २५ ॥ प्राप्य जीवन कश्रिख मुच्यते । एवं वाहनन्तरं प्राप्य तय जीवेश कश्चन । २५ पुण या तेसो प्रतिमा कारितापसी ॥भीमस्य संप कौरमाधोपहता भया ।। २७ कर घायल छातीने मुख से रूधिको गिराया । 14. I इस के पीछे इसी रुधिरसे भराष्ट्रमा पृथ्वीपर ऐसे गिरपड़ा जैसे कि प्रफुल्लितनोक शाखा पारिजातनाम वृत्त गिरता है । १९ । तर बुदिगान संजय ने उसको और शामक विश्वास कराताहुआ उसमे बेला म गफार मतकरो । ' फिर यह बड़ा साइमी क्रोपसे पृथक और रहितहोकर शोकसे पुक्क गना भीमान यह शब्द कहके पुकाग। २१। उसको भीमसेनके मारनेसे पाहावान भोर क्रोधमे रहित जानकर पुरुषोत्तम यामुदेवजी इम वचनको बोले । १२ हे समर्थ धृतराष्ट्र शोचमत करो यह भीमसेन तुम्हारे हायसे नहीं मारागया तुमने या लोकी मूर्तिीगराई है। २१ । भरतर्षभ तुमको कोषक वशीभूत देखकर की हाद में गयाहुआ भीममेन मैंने खैना । १४ । हे राजाओं में श्रेष्ठ कोई तेरे समान बलवान नहीं है हेमहावाहु कौन मनुष्य तेरी भुनाओं के पकड़ने को सह सक्ताई । २५ । जैसे कि मृत्युको प्राप्त होकर कोई जानता नहीं छूटताहै इसीप्रकार तेरी गानों के मध्यको पाकर कोई जीवता नहीं रहता है । २६ । हे कौरव जिस हेतुमे भापके पुत्रने भीमसेन की जो यह लोहेको मूर्ति बनाई वही मूर्ति मैत तेरे मास वर्तमान करी। २७ । हे राजेन्द्र पुत्रशोक से दुखी तेरा चित्तधर्म से Bhim, tha puuvel fel king broke it mo piecas, though in doing so le cut lug breast ar.d dru.ppur blood from the mouth. He fell down on carth bleeding like a blo vzning tre: 19189 Sanjiga held him, saying gently." You should not do 20. The brave king, when his Anger was gong, was filled with remorse for slaging Bhim. Seeing thiut he was no longer in an angry mnood but folt grief for Bhin, Vairudor raid, "Be not grievod, Dlzritrashtra. You havo not slaia Bhima af.d only forokda an iron staiu: Swaing you in angry mood..! diagge Phim out of the jtws +3f death, You are unrquellod in atrený he: none coald cupe out safe from the । B0. grasp your arms. - 25.

Str Pur EXION (72851 धोकाभिसम्तापायौदहनं मन.! सदाराजेन्द्र तेन वं ममिसन निघांससि २८ स्वेत क्षमं राजन् न्यास्त्वं यदवृकोदरम् । न हिपुत्रा महाराज जीवयुस्ते मम ॥ २९ ॥ तस्मापद करमस्मभिनन्यमानःशम प्रति। अनुमन्यस्व तत् सर्व शाके मनः कृपाः॥३०॥ इति सोपविजलपादानिकपण आयप्तमीमभंगेद्वादशो ध्यायः१२ -- सम्पायन उवाच तत एरमुपातिष्ठन् शौचार्य परिचा का: । छत शौचं पुनम भवाय मधुमदनः ॥ १ ॥ राजनधीता घेदात शास्त्राणि विविधानि च । श्रुनानि च पुराणानिराधमा केवलाः॥२. विद्वान् महाप्राज्ञः समर्थः सन् बलावले । मात्मापरावाद मा कृषो कोपनहार ॥ ३ ॥ उरवा तदेवाई भीमदोणी पृथा हुभाया उम हेतुप्ते तुम भीममेन को मारना चाहते थे । २८॥ हे राजा यह मापको बोम्य नहीं है जो तुम भीमसेन को मारा चाइतरो क्योंकि आपके पुत्र मापु पूर्ण होनान के कारण से किमी दशा में भी जीवते नहीं रहसक्ते घे ॥२९॥ इस हेतुसे सन्धिको अंगीकार करनेवाले हम लोगों ने सन्धि के विषय में जो कर्म संसारको ध्यान करो शोकमें चित्तमें मतकरी ३० ॥ अध्याय १३॥ वैशंपायन बोले कि इस के अनन्तर नौकरलोग स्नान कराने के निमित्त इस के पास आकर वर्चमान इये मधुसूदनजी इस स्नानमे निवृत्त होनेवाले राजा से बोले कि हे राजा तुम ने बेद और नाना प्रकार के शान पड़ें पुराणों समेत शुद राजधर्मों को एना। २ इस प्रकार पंडित और बड़े ज्ञानी बलाबल में समर्थ None can scape with lifo tiem your deally clutches. I made use of the lion status of Bhim nude by Duryodhar. Grieved for your son you had deviated from the path of right and wished to slay Bhim This was not worthy of you, for your son had bis days numbered and could live no longer. Think of our exertiotia, which we did in bru ging about peace, and grieve no more. 300. CHAPTER XIII Varshampayan said, "Then servants came to Dh'itrashtra to help him in Sathing, and when he had done bathing, Shri Krishn thos addressed him, " You bar learnt religiong bonhe and learnt the nuties of kings.

[386) Mahabharat (१८) च भारत । पिपुरः सागचव वन्तु राजन्न तत् रागाः ॥ ४॥ म वार्यमाणो मारमा कमकायमा तदा । पाण्डामधिकं जानन् पले शौर्य कीरव ॥ ५ ॥ राजा हि य: स्थिानः स दायझने । पेशाक लरिमागच पयः स विन्दनि ६ ॥ उच्वमानस्तु । यो गृष्णान न हिताहिये । आपदः समनुप्राय ससोचत्यगोरिथः ॥ ७॥ ततोगतान समक्षा भारत राजस्व अपि धयात्मा दुर्योधनाशे स्थि ।। ॥ ८ ॥ पा-मापधादापनस्यत् कि भीम जियांसास । तस्मात् समच्छ का स्वं स्यमगुस्मृता दुसता . ९ ॥ यस्नु ता साईया धुरा पण. लीमानयत् सभाम् स तो भीमसेनन धेरै प्रतिजिपिता १. ॥ आरमनोजतकम पश्य पुत्रस्य च दुरात्मन । गदनामीण पापना परित्याग परन्तप ॥ ११ ॥ वैशम्पा यन नवाच । एषमुक्त. स कृष्णेन स स म थिए। उपाष देवकीपुत्रं धृतराष्ट्री महीपतिः ॥१२॥ एतमादागाहो या पदारमाधय । पत्रस्नेवश्च धर्मात्मन् धेषाम्मा होकर तुम अपी अपराध ऐन क्रोधकोहिप निमित्त करनेहो भरतवंशी तभी मैंने भीमने द्रोणाचार्यने और संजयन, भी तुमसे कहाया परन्तु हेराजा तुमने उस पचनको नहीं किया ।४ । हे कौरव उमसमय पांडवोको बल और वीरतामें बाधिक ज नत और पारम्बार निपधे कियेहुये भी तुमने हमारे वतनको महीं किया। जो नियत बुद्धि राजा आप दोपों समत देशकालके विभाग को विचारता है पर परम कल्याण को पाता है । हित अनहित में मानाया हुआ ओ पुस करयाण वचनको अंगोक र नहीं करता है वह अनीने में नियत अपत्तिमा पाकर चिता है। ७ । हे राजा इस हेतुमे विपरीत चननेवाले अपने को देखो टोंके क्वानों से विपरीत चिनवाले तुम दुर्योधन की साधीनता में नियत हुये और अपनेही आराधमे आपात में फैमे मो तुम भीममेनको क्यों मारना चाहतेहो इस हेतु तुम अपने क्रोधको दूरकरो और अपने दुष्ट काँका स्मरण करो। जिस बीच न ईपी से उस द्रौपदी को सभा में बुलाया वह शत्रुता को बदला लेने के प्रभि लापी भमिसेन के हाथ से मारागया। १० अपनी और अपने दुरात्मा पुत्रकीमा दिगी को देखो जो तुमने निरपराधी पांडवों को साग किया। ११ । वैशम्पा पन वोले हेननमेजय श्रीकृष्णनी के इमप्रकार के सत्य वचनों सुनकर उस रामा धृतराष्ट्र ने देवकी नन्दनसे कहा । १२ । हे महावाहु माधानी जो पाप कहते हैं Buing so learned and powerful, you sh nld not h va indulged in anger You did not are upon the advise given you by Bhishm, Drona, sanjaye and myself. You' kadw the great strength of the Pandarts and yet you were obdurate. 5. llappy is thy king who ncte according to the riquisitinni oftuoe and pluce, but he who does not mind the ndrico of h14 faithlul friends, falls into trouble. You acted wroirzly in as nuch as you disregarded the counsel of old mon and Tere controlled by -Daryodhan. You brought misory on yourself. Why do you wish to 7387 मध्यम 10] Stri Puvोपर्थ मालयन १२ ॥ दिष्ट्या तु पुरुषव्याघ्रोपळPान त्यविक्रमः। घरगुती नागात् भीमोबाइबरं मम ॥ १४ ॥ इदानीम्हगेषागो गतमन्युर्गमस्या गंद पार स्ममिछामि माघ । १५ । इतं पापिन्द्र गुपुगिसेपु 2 Img पेशव तिचाप्ययतिएते । २६॥ रतन धमाल माद्याश्च पुत्री पधारोपण गात्र. प्रदम् गेंशानावास्म फ्ल्यायमुधाच चैनान् ॥ १८॥ विजीवन नलमादानिकण कृतगटकोपविमोचने प्रपादशपापः ।। १३ । . म सर यया है परन्तु पदा बलवान पुपकी प्रीति ने मुझको धर्यसे पृथक् कर दिया ।।१९ हे श्रीकृष्ण की पारम्पकी नाहि कि तुममे रक्षित घलवान् सत्य पराकमी मीमतेनरी सुनाफे मध्यको नहीं आया । १४ । हे माधवजी अर से रति विमतम्बर में माले पार पाण्डपको देखा चाहत.ह महा रामानों के और धुमों के मग्नेपर मेरे मुव और प्रीति पांडवों में नियत भने हैं ।१५। इसके पीछे तहत रोतेहुये उस राणा ने सन सुन्दर अंगनाले भीमसेन बाल और पुरुषों में बड़े वीर नकुल और सहदेव को भी अगों से स्पर्श किया गौर नोंको विश्वास देकर कल्याण के वचन कहे १७ ॥ blay Bhim ! Remor-your anger and recall your wicked deeds. Fhim only revenged the wiong dono to Draupadi in the court by that do picable eon of yourf. 10. Lok at your tranugressions and those of Your son in ousting the Pandir "l'archamp'yan says that on h-aring the words of Shri Krohr, Dlırıtrashtra this addressed him," You are right, Madhav, but it was th • enternal love wh ch took away my conatancy. It was by good luck that you guarded B run and goved him from coming within the grasp of my arms. I am now quite free from anger aud wish to see him lore is concentrated in the Pandavas. " Then with tears in his eyes, the king touched the bodies of Blum, Arjan. Nskul and He spoke to them kindly anil blessed them » At the fall of the kings and sons my Sabadev.

- . 17389] Nullarat (७३८८ धेशपालम सधाय । श्रमराष्ट्रानुतावास्ततने का तर.. गान्धारा मरकंशयाः ॥ १॥ ततो पारखा तामित्र तक पुशिविरम , TONE पुत्रशोफार्ता श तुमछनिम्तिा २ तस्या. मामाभप्राय विदिया, पानी प्रति । ऋमिर पुनः प्रागवतमपुष ३ गलायामुपस्मय पुग शाचे । तरे एमुपपरे पनि नाच.... दिन नभुमा पंजा मनमानु । च । सर्व प्राणभता मा ल त साधत ५ सलामीत का लबादी महासणाः । शागतालमयाक्षिप्य मातमरियम् ॥ नकोस. पायो गामारि शममाप्मुहि । यो मिलमामेत मृण : बोस उक्तास्पष्टादशाहानि पुत्रेण अपमिच्छता शिवमार्शल माध्यमानामभिः अध्याय ।१४।। 'वैशम्पायन बोले कि इसके पो पतराष्ट्र से प्राशा लेकर और पास भाई केशवनी समेत ग.न्वारी के पाप्तगरे । इसके पीछे पुत्रों के शोकसे पोस नान निर्दी गाधारी ने उन मृतक शत्रुनाले युधिष्ठिर को पास माया एका जानकर साप देना पाहा • २। बामपि प्रथमही पांडवों के विषय में उसके पार रूप चित्त के निधारको भानकर सावधानहुवे ।। और चित्र के समान बीघ्रगामी होकर वह महर्षी श्रीगंगानी के पवित्र और गलित अलमें स्नान आचमन करके उप्त स्थानपर भा पहुंचे मोर दिप नेत्रशुत भरो विसे देखते उस गि ने वहां सव जीयों के चित्त वृत्तान्तको माना । . शाप समर्पको निरादर करके कालकी शान्तिको पर्सन करके वह महातपस्वी कल्पनाही ऋषि पुष से वोस। ६ । कि हे गान्धारी पांडर के अपर क्रोष करना चाहिये अपने शाप वचनो रोककर इस मेरे पचनको सुनो। ७ । अठारह दिनतक पिप मिलापी पुत्रने काहै कि हे माता शत्रुषों के साथ मुजरा करनेवाले को शुम भाशीर्वाद CHAPTER XIV Vaishampagan said, “ Then by Dhritrashtra's permissiwn the Papa dar brothers. with Keshay, went to Gandbari, Distressed with grief for her song, she intended to curse Yudhishthir. Knowing of her evil intention towards the Pandevas, Vyas made" hauts, after bathing in and sipping the water of the Gadges, hs came there. With his divi no eyo he saw through the minds of those who were present there. 5. Speak ing ill of curses and recommending peace of mind, he said to Gandhari, " Donot let your anger fall on the Pandar, Donot curas bim, but bear me; during tho oighteen day s of war, your son desirous o victory asked you to bless him, but on all occa ions you said that victors slould fall on the side of dharm. I can neror think that your words to hiru Bir Parv स्त्रीय (73891 : सा तथा भव्यमानावंहाले काले जयपिणा! उक्तवत्यसि गागरि पतो स्ततोय ॥ ९॥ चाप्यतीतो गागरिकाचं ते वितधामहम । स्मरामि गापमाणा नया प्राणिहिता हासि।विप्रो तुमुले 'राय गत्या परमसंशयम् । जिते पाप नेयुद्धे नूनं धर्मस्ततोऽधिक ११-१ क्षमाशीला पुरा भत्या साध नक्षम्से कथम् । धर्म ने यो धर्मस्ततो जय "स्य धर्म परिस्मृत्यबाचचोका मन वनि । कोप संयच्छ गाधारिषभ-सरपधादिनि ॥ १३ APEETर्युवाच "भगक नाभ्यस्यामि नैतानिच्छामि श्यत । पुत्रशोकेन तु चला-मनो यिहरलतीव भे ॥१४॥ यैिव कुश या एसिताया गया तथैम धुतराणा रक्षितया यथा मया । १५ ॥ दुर्योधनापरापेन शकुने सोयलस्य प। कर्ण दु शासनायाञ्च वृत्तोऽयं कुरुसक्षय ।।१६ ॥ नापराध्यति वीभत्सुन च पार्थो वृकोदर । नकुल सहदेवो धा दो । ८ । हे गान्धारी-उम विजपा भिलापी से समय २ पर मार्थनाकरी हुई तुमने कहा कि जियर धर्म है उधरही विजय है । ९ । हे गान्धारी में पूर्व समय में तुझ दुर्योधन के शम-आशीर्वाद से प्रसन्न करनेवाले के कहेहुये पचन का मिथ्या स्मरण नहीं करताहं तुम उस प्रकारकी समाधि धारण करनेवाली, हो १० इसी से राजामों क कठिन युद्ध में पारको पाकर पांडवों मे युद्ध में निस्मन्दंड विजयको पाया निश्चय करके उधरही धर्म अधिक है। ११ । पूर्व समय में ऐसी क्षमावान होकर भर किस हेतुधे तू क्षमा नहीं करती है हे धर्मकी जाननेपाली भी को त्यागा-जिधर धर्म है, उधरही विजय है ।१२। हे मनस्विनी सत्यवक्ता गांधारी, अपने धर्मका और. कहेहूय, वचनको मरण करके क्रोधकोरोको और , इस दशा वाली मतहो । १।। गान्धारीने कहा हे भगवन मैं गुणमें दोषनहीं, लगातीहूं, और ननका नाशवान होना नहीं चाहती हूं । १४ । परन्तु पुत्रशोकसे मेरा चित्त भान्त पाकुल होताहै ।। ४१ जिप्रकार पाडय कुन्तीसे रक्षा के योग्य है, उसीमकार मुझ । भी हैं और जैसे मुझमे रक्षा के योग्य हैं उसीमकार धृतराष्ट्र से हैं ।१५।दुर्योधन शकुनी कर्ण और दुइशासन के अपराधसे यह कौरवों का नाश हुआ। १६ 10. The Pandavas were victorious, no doubt, acrord merciful, why do you withhold Victory has taller ing to thy predictions and dharm must be on their side. Beidy Ever | words, you should not behave thus, truthfal Gandhari,"shad, I donot find fault, where there is none, and donot want their destiuc tion, My mind huwevel 13 distressed with grief for ipy ons They deserve as much protectido fiow me as from Kunti: Thu Panda vas equally deserve protection from Dhritrashtra 15 The great destruction of thu Kauravas was bronzbt abuut by Duryodhan, Shakuni, Karan The Pndaras unvedone nowrong. The Kaurayas : were wiong your pardon ! Give up injustice.. on the side of juetice . Redenlering your own .- and Dashasan.

17300] Mahabharat (७३९० देव जानु युधिष्ठिरः ११७ युपमानार करण्याः कृतमामापरस्परम् । मिहता सहि ताधाम्यस्ता नास्यामेराम ॥ १८ ॥ किन्तु कर्माकरोनोमो वासुदेवस्य पश्यतः । दुर्योधनं समाय गदायुये महामनाः ।। ११ ॥शिक्षपापविनामा परम्त धारा रणे । यो नाश्या प्राधान् तम्मे कोपमयत् ॥ २० ॥ कषं मु धर्म धर्मो. समु विध महारममि । रपमयुरारोगरा प्राणहेनोः कथम्मन ॥ २१ ॥ इति स्लीपण जन्मपादानिकपणि गान्पागसान्तनायां चतुर्दशोध्यायः १४॥ में अर्जुन भीममेन नकुल सहदेव और युधिष्ठिरका भी कुछ अपराध नहीं है। यह परस्पर युद्ध करनेवाले अहंकारी कौरव एकसाथ अन्य २ लोगों के हाथ मारेगमे वह मेरा अमिय नहीं है। १८ परन्तु पामदेवजी के देखत हुये भीमसेन ने कैमा ककिया कि बड़े साहसी ने गदायुद्ध में दुर्योधनको बुलाकरके और शिक्षामें अधिक जानकर युद्धमें अनेक रीतिसे यूमनेवाले को । २० । नाभिकेनीचे घायल किया इस बात को सुनकर मैंने कोधको बढ़ाया । २१ । वह श्रवीर युद्धमें माणों के अर्थ किती दशा में भी धर्मको नहीं सागवामांकि धर्मज्ञ महात्मागों से उपदेश किया गया है ।॥ २२॥ tell down fighting la the pride of their power. But why did Bhimn do suori a dued in the presence of Vasudev ? He challenged Duryodhan to fight with the mace and then struck lum below the nusel was the cause of my anger. A well-advised Warrior never sets aside justies under any sircu mstarcas, " 21. This anjust deed. Formerly Duryodban conquered Yudhishthir unjustly पायब उपाय . Stri Parvसीपर्व (159 तछुरवा बयन तस्या भीमसेनीय भीतपत् । गान्धारी माय पर रखा सानुनयं तदा मामो यदि षा धर्मखासासत्र मया कृतः । मामानं अनुमान तम्मेख सन्तुमहीस धर्मण पुत्रस्ते पतितोसी महावसान क्या केनधिबातमतो.विषममाना # ३ ॥ अधर्मण जित: पूर्व तेज बापि युधिष्ठिरः। Haate सदेव तो विषममाचरम 1 सैन्यस्यैको पशिष्टोयं गदायुरेनवार्य बान्। माहवा नहरेदाज्यामति व तत् कृतं मया ॥ ५॥ राजगुर्मान पानालीमेक खा रजस्थलाम् । भवत्या विदित संवेंगुक्कंगन पत् मुततप: ६ ॥ दुर्योधनमसं अाम शक्याभूः सायली भोमस्माभिरत ताकतं मया ॥ तथाप्य मियमस्माकं पुत्रस्त समुदापरत द्रौपद्या यत् समामा सायमूहमदर्शयत् ॥ ८॥ सदैव सध्यासोमा दुराचारोग्य ते मुतः धर्मराजाप्रपा र स्पिता- म समयेतदा अध्याय १५ ॥ वैशम्पायन वोगक तब भीमसेन उसके उसनको मुनकर भयभीमके समान भनता के साथ गांवारी से.यह वचनबोला । १। हे माता धर्महोप वा अधर्महोय अपने शरीरकी रक्षा अभिलापी मैने भय से था ऐसाकिया पापउस मेरे अपराध को क्षमाकरने के योग्यहो । १ । यह बड़ा बलवान भापका पुत्र धर्म युद्ध मारा किसी के साथ लड़ने के योग्य नहींया इस हेतुसे मैंने विपरीय कर्म किया ! ३ ! पूर्व समयमें उस दुर्योधन ने अधर्म के द्वारा युधिष्ठिर को विजय किया और हम सदैव ठगेगये इस कारण से मैंने विपरीत ककिया । ४ । सेना के मध्य प्रकला | शेष चाहुआ यह पक्रिमी कदाचिंद गदा युद्धसे मुझको मारकर राज्यको नलेले इस हेतुसे मैंने यह कर्मकिया। ५ । भापको सब विदित है कि मापके पुरने एका बना रजस्वला राजपुत्री द्रौपदीसे जो वचन कहाया इसमे दुर्योधनको विनामारे हुपे सामरों समेत निष्कण्टक पृथ्वी हमसे भोगने के योग नहीपी इन बातोंको रियार कर मैंने यह कर्मकिया । ७ : उमीमकार आपके पुत्र ने हमारे अमियको भी किपा जो समाके मध्यमे द्रौपदीको वाममाया दिखलाई 1 ८ । की वा CHAPTER XV Vaishampayan said that on hearing the words of Gandhari, Dirúm did it in self-defetice, and I ask your marvon, mother. Your powerful bumbly spoke to høre saying. Whether it be justice of injustice, i and we were cheated again and again this was the soting against rule. I did it fest, ber night slay mo and take op- kittg. dom, in spite of the destruction of all his army, 5. You knop well hew Durgudban dragged Draupadi and we did not think it worth oar wbilo to enjoy the kingdom witboat slasidg him. He Lad disroa-on of my - . [:3940 Mahabharat पता नुशंसोऽई तप देवि युधिष्ठिरः । शापाईः पुषिधीना हेतु शरणमा नहि मे जीवियोन राज्येन धन या ताशा सुमो इत्यस्यमा दुह ॥ २७ तमेव धादेनं मीत सत्रिकर्षगत नदा। नोगा किनिद्राम्बारानिया सारममशम ॥ २८ ॥ तस्यावनतदेहस्प पादयोर्विपतिप्यता । युधिष्ठिरस्य गोमा दधिदर्शिनी ॥ २९ मत्यप्राणि दरशेग पहातोण सातन. समा तो दर्शनीयनमो नमः ॥ ३० ॥ ताहरा चाजुतोSAIमुदेषस्य पृष्ठतःसग मानास्तानिमतच भारत । गान्धारी विगतमीधा साम्यषामा मातृवत् ॥ ५॥ तया ते समनुहाता मारकरमातरम । म उम्त सहिना : पृथों पूलपातः । ॥ १२॥ चिरस्पना मा पुत्रान पुत्राविमिरमिला। वासमादेवी बनेगा वृत्य पे मुखम् । ३३ । ननो पास मम्साघे या माता शो नाशका मूल निर्दी होकर शापके योग्य हु मुझको शाप दे । २६ । उस मार के मुज्जनों को मारकर मुन्न अज्ञानी मुट्टदों में शत्रुता करनेवाले को जीवन और राज्यमे कौन प्रयोजन रेत कठिन थापा लेनेवाली गान्धारी उम इस प्रकार बोलने वाळ भयभीत समीप पहुंचनेपाले से कुछ नहीं बोली । २८ । रस दूरदर्शी देवीने उसके शरीर परणों में गिरने के अभिलापी राजा विवि की हाथ की उंगलियों की नोक को पटान्तर के भीतर से देखा उस से दर्शन के योग्य नख वाला वह राजा युधिष्ठिर कुनखा होगया । ३० । अर्जुन उमको देखकर सामुदेवजी के पीछे चलागणा भरतशी इस प्रकार पर उपर स चेष्टा करनेवाले उन पांडवों को क्रोधसैरहिन गान्धारी ने माता के समान विकास कराया। १ । उमातुसे आता पायडये वह बड़े वक्षस्थलवाले पांग एक सायही उस वीरों को उत्पन करनेवाली कुन्नीमाता के पास नये । ११॥ पुत्रों के विषयमें चिचरे खेदयुक्त उस देवी ने बहुत कालके पीके अपने पुत्रोंको देखकर बस से मुखको ढककर भश्रुपान किये २० इस पीछे कुन्तीने पुवासमेत a trembling body went to her and said in a sweet voice, " Hors l api, Yudhishunr the destroyer of re ur son and the root of the destruct. on of their fur I deserve it. 26. Haying destroyed friends, why should I live to rule the kingdom !" Heaving deep sighs, Gandhari gave no reply to ludhiahthir who'had approached her in grout fear She looked from behind her veil at the finger Yidhishthir, who was kn oling at her feet, and tie bonatiful nails were destroyed. 20 At the Aljun crept behind Shree Krishna Gandhari curbed her anger and consoled ile terrified Pandaria like a mothor, They took leave of her and wert to Kunt. Sceng ber sons after a long time, distressed Kanti ccvered her face under cloth aad wept With eyes fall of tears, she saw then covered with scars of wold Curst ne neule of (72351 - - was sure to happen as Vidur had foretold when he Bay Shri Krishna's wounds Dopot be Stri Paryma विपरिविक्षता ॥ ३४६ सा सामेकशः वाम् संस्पृशम्ती पुनः पुनः । भम्मको सामाग्रौपदीच सात्मजाम् । रुदन्तीमय पाशाली ददर्श पतिता भुवि ॥ ३५ ॥ पपुवामा पात्रात ते स सीमासहिता गत धाभिगम्ति परमा तपस्विमीम | फिग्नु गल्यम कार्य विहीनाया सुतर्मम ॥ ३६ : सा नापासपामास या पृयमरोषमाम् । उत्पाथ यात्रसेनी तु स्वती शोषकर्षिताम् । ६७ ॥ तव सहिता पानि पुग्नुगता नृप मियाछत गान्धारी भासमातंतरा सपमा सामुवाबाय गान्धारी सह पध्या पशम्विनाम | मैथं पुप्रीति दु जाती का मामपि दुषिताम् ॥ ३९ ॥ मा लोकषिमाशोऽयं कालपर्यायधोदितः । भवश्य मापी संप्रातः स्वमाषालोमहर्षण ॥४०॥ तत् समनुप्राप्त विदुरस्प बचो मास् । wiमयामन्य गोगामीपम्मिनहाय प्यतीनेम विशेषत्रमा अश्रुपानों को करके उनको शवमहा से बहुत प्रकार करके घायन देखा । १।। इन पुत्रों को पृथक र स्पर्शकरने दुःखरे पाडावान उस कुन्तीने मृतक पुत्र काली बोपदी को शोचा और पृथ्वीपर पड़ी रोवतीहुई द्रौपदीको देखा। १५ । द्रोपदी पोसीमा सेरे सब अभिमन्यु समेत पौन कौगये अब वह बहुत काल से तुम बस्विनीको देखकर तेरे पास नहीं पाते है मुझ पुत्रों से रहित को राज्य से कौनसा प्रयोजन है। ३६ । द्रौपदी के इस वचन को सुनकर बड़े नेत्र वाली कुन्ती ने रसको विश्वास कराया अर्थात् उस शोक पीड़ित रोदन करनेवाली प्रोपदी को उठाकर उसको और सब पुत्रों को साथलेकर बड़ी पाडावान् कुन्ती गापारी के पास गई।१८। वैशम्पायन बोले कि तब गान्धारी तर बहू समेत चामेवाली मुन्ती से धोली हे बेटी इस प्रकार न करना चाहिये तू मुझ दुःखीको भी देख में भापतीहूं कि यह संसारका नाशपमपकी विपरीततासे प्रकटहुमा है १४0 और रोपांच सा करनेवाली अवश्य पोनहार स्वभाव से वर्तमान हुई यह विदुरमी का वह पड़ा वचन सम्मुखभाया । ४१ । निसको कि उस बड़े आदिमानने भीकृष्णकी शिक्षा से निष्फल होनेपर कहाया इस अपरिहाय्यार्थी She touched them cne by one and was grieved for Draupadi whom ahe saw lying on earth. 35. Draupädı 8910, " Where are Abhimanyu and other grandsons of yours? They have come to see you. What shay I do with the kingdom without my sons? "Haring heard the words of Druupadi, large-oyad Kuuti coneoled her. She took her sons and Draupadi to Gandhari. Vaisha mpayan saye that Gendbani thus spoke to Konti and her daughter-limlapp jou abould not do sa daughter, Inot at wo truction was brought about by the vicceitude of time. 40. All this counsol go for nothing I think this great dexo sorry for that which was inovit StriPary स्त्रीय 111397) गशिर सजीराफामद्भुतं लोमहर्षणम् ॥ ४ ॥ अस्थिकेशपरिस्तीर्ण गणितीयपरिएछु म। शरीरसाहनर्षिनिकीर्ण समन्नतः ॥५॥ गजाश्यरथयोधानामा रुधिरा शरशिरस्यापदेव शिरोमणः ।। ६ ।। गजाश्चनरनागिषां निस्वनेरमि एवम् । भूगोलवककाकोलकर कोकनिषेवितम् ॥ ७॥ रशंसा पुरुपादानी मोदन कुर कलम । अविवामिः शिवाशिय नाविद गृध्रसेवितम् ॥ ८ ॥ ततो व्यासाभ्यनुज्ञातो प्राप्नो महीपतिः पाण्डुपुत्राश्च ते स युधिष्ठिरपुरोगमा:॥९॥ वासुदेवं पुरस्कृत्य तिवन्धुम्य पार्थिवम् । कुरस्त्रियः समासाध जग्मुरामायोधन प्रति ।। १० । समासाद्य पक्षेत्र तालियों निहतेश्वरः । अपश्यन्त हतास्तत्र जातन् पुत्रानु पितान् पतीन १९॥ ग्यामिपमाणान् | गोमायुवलवायसैः । भूतैः पिशाच रक्षोभर्विविध निशाचरी । ९२५ रुद्रामीडनिम हटवा तदा विशसन स्त्रियः। महाहे योय याने यो रोपहर्पण करनेवालीधी देखाहार्यात अस्थिकेश मनासे युक्त रुधिर समूइसे पूर्ण हजारों शरीरों से चारोंभोरको आच्छादित । पाहायी घोड़े एए और सवारों के रुधिर समूह से युक्त शरीरों से पृथक् शिरों के समूहोस पूर्ण । ६ . हाथी घोड़ेमनुष्य और खियोंके शब्दों से पाप्त भृगाक, वक, काकोल, कैक और कागों से सपित ७ । मनुष्य के खानेवाले राक्षप्तोंकी प्रसन्न करनेवाली कुररनाम पक्षियों में वित भृगालों के अशुभ शब्दों से शब्दायमान और गिद्धों से सचिवथी।८। इसके पीछे व्यासनी से आज्ञा पाया हुप्रा राजा धृतराष्ट्र और वह सब पाण्डव जिनका भगवती युधिष्ठिरथा । ९ । वासुदेवजी को और जिसके बन्धु मारेगये उस राजाको भागेकर सब कौरवीय स्त्रियों को साथ लेकर युद्धभूमि में गये १०वहाँ विधवा स्त्रियों ने कुरुक्षेत्रको पाकर उन मुनक भाई एपिता और सुदोको देखा । ११ । जोकि कच्चे मांस खानेवाले शृगाल, काग भूत, पिशाच, राक्षस और नानामकार के निशाचरों से खाये हुये थे। १२ । रुद्रजी के क्रीडास्थान के समान mind's'éyo the fatal field of bartls lying far froris that place. Sagras Sovered with bones, hair, fat, blood .and thousands ot corpkes, with elephants, horses, cars and the blood of horsemen whose bead were cat asunder. Full of the crits of elephants, horses, men and women, sounding in jackals, crows and valtares, pleasing to the nianseating zaksbases; resounding with the sounds of the birds of prey and jackals. Then by the order of gas, king Dhritraslatra and the Pandavas led by Yudhishthir, vith Vosudov and the women went to ilo, kiçid of battle. 10. The widowed ironen saw there the slain brothers reons, fathers and friends eaten by jackals, crowy 8, rakshases and night-royere Seeing the place like the pleasure ground of Badra, the, grying somen came down from their CHIE. The worien othe family of Bhaara N |1098) Mahnbharat (०३९८ विमोशनयो निपेतिरे ॥ १३ ॥ महत्पूर्व पश्यन्त्यो दु खाता मातलियः । स्थलसम्पाम्पतवापराभुपि ॥ १४ ॥ थान्तानाम्नाप्पयाम्पासा मासीत घेतना पायारपुर वाणां कृपणं तदमम्महत् ॥१५॥ दुःसोपहतविताम: तादनुनादितम् । राष्ट्रायोधनमत्युग्न धर्मया मुबलारमजा ।। १६ ॥ ततः सा काममामध्य पुरुषोसमम् । कुरुणा शसं इष्टया दुखावचनमब्रवीत् ॥ १७ पश्यैताः पुरीकाक्ष पाभे नितश्चगा। प्रकीर्णकेश्यः कोशवः कुरर्थ माधष॥१८॥ ममत्वमिसमागम्य स्माया भरतर्षगार। यूथशो शम्यभामा, भ्रातुम् पिठन पसीन् ॥ १९ ॥ पारसूभिर्महापादोहनपुत्राभिरावनम् । विरुप पत्नीमिहतवाराभिरावृतम् ॥ २०॥ शोभित पुरसम्पत्रिभीष्मकणाभिमम्युभिः । परस्येश पलनिरिष पायकः । २१ । कान्दनः कषदिव्यमणिमिस महात्मा निवास स्थानको देखकर पुकारता मुई खियां बहुमूल्य ससारेया से उमरी । भरतवंशियों की मां दस्त से पाहामान पूर्व में कभी न देखें ये देखकर कोई शारीरों पर गिरी भार कोई पृथ्वीपर गिरनेवाली हुई। १।। और कौरवोंकी उन अनाथ और थकी विरों को कुछ चेतनहीं रहा यह दुःख हुआ । १५ । यह घश भारी युःखितचिन स्त्रियों से चारोंओरको शब्दायमान पड़ी भयानकरूप युद्धमिलो देखकर । १६ । फिर पुरुषोचम भी कृष्णजी को सपक्ष में फरक इसे पचन को बोली १७।हे कमालोचन जी इन विधवा शिरके बालों को फैलानवाली कुररी के समान पुकारनेवाली मेरी पुत्रवधुओं को देखो । १८ । यह स्त्रियां पृथक् २ पुत्र भाई पिता और मुादीको मिलती पतियों के गुणोंको याद करती पृथक २ दौड़नेवाली हैं । १९ महाराज यह रणभूमि बोरोंके चत्पन्न करने वाली और मृतक पुत्रपाली स्त्रियों से। संयुक्त है कहीं उनवीरों की खिगों से संयुक्त है जिनके कि पार भर्चा मारेगये । २० । कहीं ज्वलित अग्नि के समान पुरुषोत्तम कर्ण, भीष्म अभिमन्यु द्रोणा चार्य, सुपर और शल्प मे शोभायमान है। २१ । महात्माओं के स्वर्णमयी निष्कमाणि बाजूवन्द केयूर और मालाओं से अलंकृत । २२ । much distressed at the unwonted scene of destruction fell down on the corpses or bare earth. Tha helpless women of the Panchals and Kauravas lost their senses with the excess of grief. 15. Virtuous Gandhari seeing the ground made dieadful by the presence of the cryo ing women thus addressed Shri Krishn:- * Lonks at widowed daughters-in-law crying loud with diabevelled hair. lamenting for their sons, brothers, fathers, kinsmen and husbands, The field of battle is full of women whose song and, husbands are dead. Here and there are lying gloroas Karan, Bhishm, Abhimanyu, Drona, Drupad and shulya. The golden armours, ornamente, diaderms and my They are Btri Parvीपर्व लकेपरैः नरिमन समलकतम २२ ॥ दारया मिष्टाभिा शक्तिभिः परिध सहगम विनितीणेः सशरं शरासने ॥२३॥ प्रग्यावसंधे सहितैस्तिष्ठन्द्रि विचित् । क्वचिदमोडमानध शयानर चिरों ॥ २४ ॥ एतदेवगिधं संपश्यायोषनं विभो । पयमाना हिवामि गोफेनाहं बनाईन ॥ २५ ॥ पाउंचा "कुरुणा विनाशे मधुसूदन । पञ्चानामिष भूतानाम पथमचिन्तयम् ॥ २६ ॥ सुपर्णाश्च गृधाश्च विकाशमुक्षिनान् । निगृह्य फरचेषमा भक्षयन्ति महस्रशः जयदयस्य कर्णस्य तथैव द्रोणगीमयो. । अभिमन्याविनाशश्च कम्तिवि ईति ॥ २८ ॥ शवनान्युधिताः स मुनि पिमलानि च। विपक्षास्तेय यसुधा पित मधिशेरते ॥२९॥ इति दुःजतरं किं नु फेशप प्रतिभाति मे । नामाचरितं पापं मपा पु जामम् ॥ ३० ॥ वा पश्यामि इतान पुत्रान् पीनान मा केशय । एषमा सपनी दशे निहतं सुखम् ॥३१॥ हात खापर्वणि स्त्रीविलापपरी स्त्रीणी शाध्यायः १६॥ पारीको सुनामों से छोड़ी हुई शक्ति परिव और नानामकार के ल खड्ग बाणों समेत धनुपों से मुशोभित हैं । २१ । प्रसभचिन कहीं साथ निवास करनेवाले कही क्रीड़ा करनेवाले केही सोमैयाले और कहीं मांसभक्षी राक्षसों से संयक्त है । २४ समर्थ वार श्रीजी इसमकार की रणभूमि को देखा इमको देखकर शोकमे भस्म ई नाती हूं । २५ । हे मधुमूदनगी मैंने पाञ्चाल और कौरवों के नाश पाचो सत्तोंके भी नाशको पान कियाहै । २६ । रूपिरसे भरे मरुड़ और गिद्ध उनको खैचो । भोर ईनारों गिद्ध चरणोंगे पकड़कर उनको भक्षण करते हैं । २७ । कौन मनुष्य जयक्ष्य, कण, द्रोणाचार्य, भीष्य मौर अभिमन्यु से नाशकी चिन्ताकरने के योग्यई । २८ । जो प्लव पूर्वसमय में कोमल सानों पर सोते ये अब वह मृतकहोकर इमपिस्तूल भूमि पर सोते हैं । २९ । इससे अधिक कानसा दुःख मुझको दिखाई देता है निश्चय करके विदित होवाई कि मैंने पूर्व जन्ममें पाप कियाथा । ३० । हे माघवजी जो मैं पुत्र भाई और पिता मोको मृतक देखतीहूं इसमकार पीडाशन विलाप करने वालीने मृतकपुत्रकोदेखा। || garlands of the wriors are lying pall mel math the sprara, clubs, sworils, arrows and bums. Those who lved, played and slept together are now surrounded by birds of prey. I ain burning with ise the destruction of Erief at the sight of this battle field. 25 the five elements with that of the Kanrayas and Panchals. Vultures Bbweb m and A bis mariyuk those who slept on roft beds are now ly. Vhcond think of the slaughter of Jayadrath Karan, Drona, thirs Sorely I conmitted a sin in my former birth that I Ege 8008, (1399 flesh What trouble civ by giéster to me than 23 ing dead on bare earth brothers and fathers lying dead here. "Thue lamenting the sain the dead body of her son 31.

- . [7400) Mahabharat पैशम्पायन उवाच । ततो दुर्योधन दृष्ट्वा गान्धारी शोकमर्छिता । सहसा तद्भमौ छिप कदली घने ॥१॥ सा तु लया पुन संज्ञा विश्य च पुन पुनः। धनमभिप्रेश्य शयान रुधिरोक्षितम् ॥ २॥ परिग्यज्य च गान्धारी कृपणं परेषयत। हा हा पुति शोका दिललापाकुलीन्द्रया ॥ ३ ॥ वारिणा नेत्रजेमोर शोकतापिता । समीपस्थं हषीकेशीमदं यवनमप्रवीत् ॥ ४ ४ उपस्थितेऽस्मिन् क्षातीनां सक्षये विभो । मामय प्राद पाणय प्राजील पसत्तमः । भस्मिन् वर्षे अपगम्या बघीतु मे ॥ ५॥ रयुक्त जानती सर्यमह सव्यसनागमम् । मनुवं . ग्याघ्र पो धर्मस्ततो जय ।।६। इत्येयमयुर्व नैनं पूर्व शोचाम्यहं मतम् । भोगामि कृपण हतवान्धवम् ।। ७६ नमर्पण युधां श्रेष्ठ कृताल युगदुर्मदम । धारशयने पश्य माधव मे मुतम् ॥ ८ ॥ पाऽयं मूभिषिक्तानामप्रे याति भोपाय १७ ॥ वैशम्पायन वोले कि शोको पीडावान गांधारी दुर्योधनकोमा हुआ अकस्मात् ऐसे पृथ्वीपर गिरपड़ी जैसे कि बनमें टूटाहमा केलेका होता है। फिर र ने सपेतताको पाकर पुकारकर और विलाप करके उस पृथ्वीपर रुधिरो लिप दुर्योधनको देखकर । २। हृदयसे लगाया और दुखका किया शोकसे पीडावान् महाब्याकुन चित्त हायपुत्र हायपुत्र इसरीतिसे विलाप नेलगी । ३ । अपनी छातीको नेत्रोंके जलसे सींचती महादुःखी उस समीप वर्तमान श्रीकृष्णजी से यह वचन कहा कि हे समर्थ इस युद्ध के और जातवालों के नाशके वर्तमान होनेपर इस हाथ जोडनेवाले महाराज दुर्योधनने मुझमे यह कहा कि हे माता जानबालों के युद्ध में मेरी विजयको कहो।। पुरुषोत्तम उसके ऐसा कहने ार में अपने सब दुस के आगमन को जानतीहुई योगी कि मिघर धर्म है उपरही विजय है । ६ । हे प्रभु मैंने पूर्व समय में इस प्रकार कहाथा मै इसको नहीं शोचती हू मैं धृतराष्ट्रका शोच करती हूं जो दान और वांधव रहित है । ७ । हे माधवजी इस अशान्त भोर भस्रज्ञ युद्ध दुर्पद और शूर वारों में श्रेष्ठ मरे पुत्रको धीरों के शयनपर सोता देखो। ८ । जो यह शत्रुमंतापी CHAPTI RIVII Tasshnupayan bud, " Seting the chipao of Duryodhan, Gandhari fill down on carth with grief like a plantain tree cut down in a forest. Wien she rzained conciousness, she wept bitterly and embraced the blood stained corpse of Duryodhan, Ising in great grief and saying " Alas on!” Washing her breast with tears of guef, she said to K? xhr, ' At the corimencoment of the great war, Daryodban asked my}} paing with Juned hands to gun Filtory orer hs kmsimen. '. I hnew the great grief which was in Atore for mo and replied that .

साजिशान ॥ १५॥ Str Part 9178 (7401 शेप पांशुषु शेनेऽद्य पश्न कालस्य पर्ययम ॥ ९ ॥ धुर्व दुय्योधनो धारो गति न मुल मागत । तथा धिमुख शेते शयमे वारसंचिते ॥ १० । एष गेते महावाहुलिवान सस्थविक्रम सिंहनेव द्विप संख्ये भोगसेनेन पातित ११॥ पिदुर छवमन्य पित पमन्दभाशावालो नापमानेन मन्दो मृत्युषश गत ॥१२॥ इद कृच्छर पश्य तस्यापि षध न्मम । यदिमा पर्युपासने हतान् शूरान रणे त्रिय ॥ १३ ॥ फथ नु पपा नेद हदयं मम दीयते । पश्यन्त्या निहत पुत्र पुत्रेण सारित रणे ॥ १४ ॥ पदि बाप्यगमा सम्ति यदि वा भ्रयस्तदा । य लोकानघाप्नोऽप नृपो पाहु इति स्वीपर्वणि श्रीविलापपणि गान्धार्या दुर्योधनदर्शने सप्तदशाध्याग ७॥ पारामामों के भी अग्नवर्नी होकर चलतामा अब वह इस पृथ्वीकी रजमें सोता है संगयकी विपरीतताको देखो।९। निश्चय करके वीर दुर्योधनने दुपाप्पगतिको पाया इस प्रकार मम्मुख वीरों से सेविन शयनपर सोता है।" । युद्धमें भीम सेनके हाथमे गिरायाहुआ पा सत्य पराक्रमी बलवान् महावाहु ऐसे सोताहै जैसे कि सिंहके हाथने मांगा हाथी सोताहै। ११ । यह अभागा अज्ञान निर्मुदी विदुरजी समेत पिताकोभी अपमान करके वृद्धोंकी भवज्ञास मृत्युके प्राधीनहुआ ॥१२॥ पुत्र के मरनेमे भी अधिक इस मेरे दुःखको देखा जो यह स्त्रियां युद्धभूमि चारों और से मतकशूरोंके पास नियत हैं । १३ । युद्ध में पौत्र समेत मोहुपे अपने पुत्रको मम देखेनवाली का यह हृदय कैसे सौटुकडे नहीं होना । १४ । जो शास्त्र और अतियां सत्य हैं तो निश्चय करके इस गजाने अपने भुजवलों से मात लोगों फो पाया। १५॥ Victory should fall un the r le of Dhani 1 said his before and therefore 1 donot grieve tur bim, I grieve for Dhritrashtra who is helpless and has lost all luis hinsmed. This dissatisfied prince, bra yo la war and leatif warriois, my son lies here in the field of battle. dust." Look at the change of time Surely brave Duryodhan has This great destroyer of foer, who used to lead kings, dow sleeps on secured regi de unattainable by others, and now lies here before me Slaid by Bhim, this great warrior of bruo prowess sloepe lıke nn elep innt slain by a lion and uun ise fool disregarded the advice nt Vidur and his father, and met his death for disobeying his elders A grief greater than that of my son's drath vorwhelms me, when I co the e women round the bodies of the dend warriot2. W by does my beart not break into a hundred pieces at the Biz bit of my sun and grangeun lying dead to gether? Sarely this prmco has got good regions with the strrogth of bia arms, ut our religious books and the Vedas aro tight 10 Tbis unfortunato on the bed of war jor8 JI 15.

11402 Mahaliharat गन्यापान । पश्य गाधर पुवामो रातसंधान नितान् I या भीमसे मेन माय निामागे ॥ १ ॥ इदं दुःखतरं मे यदिमा मुत्तमाः। इतभार पालाः परिधानि मे स्नगः। २. प्रासाचा लियश्वरधर्भवणान्धितः । माप यस्पृशन्नीमा विद्रों पसुम्यम् ॥ धानसारय स्यश्च तथा गोमावार सान् । शोधनात विवर्णन्स्यौ भत्ता इव चारयुग ॥ ४॥ हवा में पार्थिषमतामता लक्षणमातरम् । राजपुरो महामाहो मनोन युगसाम्पति ॥ ५ ॥ मन्याचापडत कायाधारकुण्डलमुभसं । सस्प घोः शिरः कृष्ण गृहीत्या पश्य तिष्ठताम् ॥ ६ ॥ पूर्व जाति पाप मन्ये नाल्पमियानघ । पसाभिरनवद्यामिर्मया बचावपमेषया. फुल्लमप्रामाशानि पुण्डरीकाक्ष योषिताम | अनवधानि बत्राणि तापयत्येव रहिम धान् ॥ ८॥ पर दुशासनः गेते रेणामित्रमनिना । पातशोणिनताको भीम युधि पातितः ॥ ९॥ गरा भीमसेनेन पश्य माधय में मुनम् । इतक्लेशाननुस्मय द्रोपता अाप १८॥ गान्धारी वोली हे मानी पद्धः परिश्रम रहित मेरे सौ पुत्रों को भीमसे की गदाने कठिन घायल हुये देखो। ।। भव यह मेरा बड़ा दुख है जो मुझे केश मृतक पुबाली मेरी पुत्राधू वाला युद्ध भमि मेरे चारों ओर दौड़ती । ।२। भूषणों से अलंकृत चरणों से महलोंमें फिरनेपाली नियां अपनी भापचिों फंसकर इस रुधिर से आई पृथ्वीको स्पर्श करती हैं यह कठिनतासे उनके ऊपर बैठहुये गिद्ध श्रृगाल और काकों को उड़ानी है और दुःखसे पीड़ावान् मनवासों के समान घूमती हैं । ४ । ह महाबाहु इस राजपुत्री लक्ष्मण की माताको देखकरमेरा चित्त शान्तीको नहीं पाताहै । ५। हे श्रीकृष्णजी शरीर सेजदे सुन्दर कुएसऔर वेणी रखनेवाले अपने गांव के शिरको पकड़कर नियत होनेवाली अन्य खियोंको देखा । ६ । हे निष्पाप इन निर्दोष खियाँप्स और घुझ निर्बुदी से पिछले जन्ममे किया हुआपाप छोटा नहीं है । ७। कमललोपन नियोंके मुख जोकि पूछे कमम के समान और निर्दोष हैं उनको दुःष रूप मूर्य संतप्त कररहा है। ८ । शुओं के मारनेवाले शूर भीमसेनके हाथ से युद्धमें गिरीयाहुआ मंदिर से लिम सहि CAPTER XVIII Gandhari continued, “ Look at my handred song dostroyed by Bhim's mace O Madhav, Ms youthful daughters in-law running on the field of battlo with dishevelled hair enhance my grif. They who tised to tread the palace ground with their or, ardented feet, touch the Loody snel of the field of batıl., and unable to korp Avay the jackals frd crors, they are running n mad race, My mind is deprived of p-ace at the right of Lakelman's mother. 5. Othe: w inen are bold ing up the jewolled heads of their kidspen, and I have committed no small sin in our former life. The lutua liko These innownt women Stil Parvस्त्रीपर्ष (71030 दिसेन च ॥ १० ॥ उकायनेन पाचाली समाया पतनिजिता । प्रिय पिपिता पकप च जनाईन ॥११॥ सब सहदेन नफुटना सुनेन च । दासभायोसि मालिक्षिम प्रविश नो गृहम् ॥ १२॥ सप्तोऽहममर कृष्णरदा दुर्योधन नृपम । हिपाशपरिक्षित शनि पुत्र जय ।। १३. एप पु शासन शेते विक्षिप्य विपक्षी षो। मिहतो भीमसेन मिनिव महागा । १४ ।। भरपर्थमक रोद्रो भीमसेनस्य पंप । एमासस्य पर शोषियोगितमाहये । १५ ॥ इपि स्त्रीविद्यापपणि गान्धारी विज्ञाऐ अष्टादशोध्यायः १८॥. पा दुधाचन सोपाई । ९ हे माधवी पृतके दु ख को स्मरण करके द्रौपदी की पेरखापूर्वक भीमसेन की गदा से मृतक हुये मेरे पुत्रको देखा। १० । हे जनार्दननी कर्णका और माई दुर्योधन क प्रिय करनका अभिमापी इस दुशमन ने सभाके मध्य में बूत में पराजित द्रौपदी से यह बरन रहे ११ । कि हे द्रौपदी तू सह देड नकुल और अर्जुन समेत दासीहुई शीघ्र हमारे घरों में प्रवेश करो । १२ । हे भीहण्यपी इस समय मैंने रामा दुर्योधन से कहा कि हे पुत्र मृत्युकी फांसी में बंध से वारो निषए फरो। १३ से कि वहाहाथी सिंहसे माराजाताई उभी महार सीमेपले हायमे तक यह दुश्शामन सुजामों को फैलाकर सोताहै ।१।। मरून्य गोपटक भीममेग ने बड़ा भपकारी कर्म किण जो कोपयुक्तने युद्ध में दुस्तान कपिर लो पान किपा १५ । faces and epos of those innocent women are being burnt by the run of grief. Šlain by Blum the destroyer of foes and blet ding in all parts of his body, Dushagun lies here. He was killed by the mace of Bhim whoſremembered the wrongs done to Draupadi at the occasion of gambling. DeBirous of pleasing Karan and Duryod han he said to Draapadı who was won 10 gambling. You as well as Bahadev, Nakal and arjup are made slizes Nake hasta to go in to our house, 12. I then warned Duryodhanto Leap bauk Shakuna who was tie l in death's etring. Dushasan lies here with outstretchoi xring like a huge elephant alion, Bhim did a very cruel deod in his anger as he drank Duthasan's blood in the field of battle ' 5 tle slain Us (10) [7404] Mahabliala गान्वाय्युवाच । एमाधव पुत्रो मे विकर्ण प्राज्ञसातः । भूमौ मिनिहत शत भीमेन शतधा त ॥ १ । गजमध्येहय शेते विकर्णो मधुसूदन | मालमेघ परिक्षिप्त शवीप निशाकरः ॥ १. अस्म भाामिषप्रेप्सन गृध्रानेतालपस्विनी । बारयाप निश वाला न च शकतामाधय ॥ ३ ॥ युका अन्दारक: शी विकर्णः पुरुष । मुखाषित मुलाच शेते गांशु मामय ॥ ४ ॥ फर्णिनालीकनचिनिन्नमाणमाइथे।। मालिन अमात्येनं लवमर्मिरतसत्तमम् ॥ ५॥ एष संप्रामवारेण प्रतिक्षां पालसिध्यता दुर्मुग्वामिमुख शेते ततोषिगणहा रणे ॥ ६॥ यस्यामुग्वे मौम्य स्थाना मेवोपपद्यते। स कय दुखामिहतो विवुधलोकार्बत् ॥ ७ ॥ चित्रसेनेत ममौ शयानामधनमा धाराष्ट्राममं पश्य प्रतिमान अनुराताम् ॥ ८ ॥ तश्चित्रमान्याभरणं युवस्यः शोकक पिता: व्यावसंधै सहिना रुदत्यः पय्युपासो।। ९ ॥ युवा पुनारको निवप्रवर अध्याय १९॥ गान्धारी बोली हे माधवजी यह शानियोंका अङ्गीकृत भीमसेनके हाथरे सैकड़ो खण्डकिया हुभा मेरापुत्र विकर्ण मृतक पृथी पर सोताहै 21 हे मधुसूदननी वह विकर्ण मरेहुये हाथियों के मध्य में ऐमे सोता है जैसे कि नीले यादलों से घिरा दुआ शरदऋतुका चन्द्रमा होताहै ! २ हेमावजी उसकी तपस्विनी वाला भार्या मांसके अभिलापी गिद और कागोंको हटाती है परन्तु हटाने को सार्थ ना होती है। ।। देपुरुषोत्तम माधवजी तरुण देवतारूप शूरवीर सुखपूर्वक निवास करने वाला विकर्ण पृथ्वीको धूलपर,सोताहै । ४ । युद्धमें करणी नालीक औरनाराब नाम वाणों से दूटे मर्मस्थलोंचाले भरतर्षभ इम पिकर्णको अवभी शोभानहीं छोड़ती । ६ । युद्धमें शत्रुओंके समूहोंका मारने वाला सम्मुख रहनेवाला यह दुर्मुख उसयुद्ध भीममें वीरमतिमा पूर्गकरने के अभिलापी भीमसेन के हाथमे मृतक होकरसोतारे ।६। हे स्वामी युद्धके मुखपर जिमकी सम्मुखता करनेवाका कोनिहीं वह देव CHAPTER XIX Gandhari coutinued, " Hero lies, O Madhav, wise Viharn cut into handreds of parts by Bhim. He lieg ilala amung olephants like the the wintor moon surrounded by clouds, His good youtiful, wife 1 trying to keep away crows and vultures from his budy, but finde it a licult task to parloin. Ilic ycuthful, godlika warrior Vikara, who lived a life of ease, slcops on dust. The wealth of beauty doos not leave bim, although he has received arrow wounds in all his vital parts. 5, Valiant Durmukh the destroyer of foes foll'a proy; to the bra so vow of Bhim How was invincible Durmukh, the winner of dirino regions, blait by fuel Look at thu doad figuro of thio great Archer Chitraseu Iging on the ground The lainenting women and a trop of flesh cature ara standing by his body ducked with garlando - StriPary नापप 17403) बतः। विधितिरसौ शेभ स्त. पाशुपु माधव ॥ १० ॥ शरसंझप्तयाण वंशसने हतम् । परिवायतो गृधाः परिक्तिद्विपिशतिम् ॥ ११ ॥ प्रविश्य धारः पापमानामनीकिनीम् । स शरशयने शते पुनः सत्पुरुगचिते ॥ १२ ॥ इस्पतदागाति शर्स सट्टा : 1 गिरिरामरहे. फुल्ल फर्णिकारिधानः ॥ शातकोमया स्नगाभानि कपन घमास्वता अग्निष गिरिःोतो मना दुःसहः । १४ ॥ हाते स्त्रीपणि दीपिलापपर्वणि गान्धारीविसापे एकोनविंशीध्यायः १९ ॥ - कका विजय करनेवाला दुर्मुख किसमकार शशुओंके हायसे मारागया । ७ । हे [सूदनजी इस धृतराष्ट्रके पुत्र धनुपधारी पृथ्वीपर सोनेवाले चित्रसेनकी मृतक को देखो। शोकसे पाहत रोनेवाली स्त्रियां मांनभक्षियों के ममूहों गत नहाऊ माला भोर भूपण रखनेवाले चित्रसेनके पास नियतहैं । ९ । हेमाधवजी तरुण सदैव उचन स्त्रियोंमे संविव देवतारूप विविंशती धूल में पड़ासोताहै ।। श्रीकृष्णजी देखो कि गिद्ध इप्त पाणों से टूटेकवच वीर विविंशति को बड़ी सभामे में घेरकर बैठे हैं। ११ वहशूर युद्ध में पाण्डवों की सेनामें प्रवेश कर के। तरपुरूषों के योग्य वारसय्या परसोताहै । १२ । दुस्महका यह शरीर वाणोंसेयुत्ता' ऐमा शोपायमान जो कि अपने ऊपर वर्चमान कर्णिकार के पुष्पोंसे व्याप्त पर्यत होना । १।। यह मृतकभी दु खसे सहने के योग्य रवर्णमाला और प्रकाशित कवचसमेत एमे प्रकाश मानहै जैसे कि अग्निसे पतपर्वत गकाशितहोता है। १४॥ and other ornaments. The youthful Yivinghati of god lilo form, * 1101 | always enjoyed the society of gord women, h६१ hero on tin-t. 10, Vultures are stauding round his body of strich the armitate is broken asunsler by eirove, Ilaring entered the Pandav army, that great warrior lies dead on the walıke led. The brdy of Dusenh, pierced through by arrose, lauks glorious like a hillots groun with the bloom ing Karnikars. With hit gold garland and bright armour his body lools glorious lihe x shite_hili illumined by fire. " 14, १ । - - [7406] Mahabharat गान्धायुधाय । मध्यगुणमार्य पले शीय घ फेशप । पित्रो स्वया च एत सिंहपिचोरपाटम् ॥ ६॥ यो विमेव चममेको मम पुत्रस्य दुर्मिदाम । सत्या रम्येषामय मृत्युपशं गतः ॥ २॥ तस्योपलक्षोहाग फाणमिततंजसः।। तस्यापि प्रभानधोगशाम्यति ॥ ३." एपा धिराटदुरिता स्तुपा . मार्शा पाला पति धीर इप्ट्या शोचनिन्दिता ॥ ४ ॥ तमेषा हि समासाथ भारनिके। विराट हिना दृष्ण पानि परिमाजति ॥ ५ ॥ फर्षन्ति दुःखिताम् । उत्तरा मोबसमा सरस्पराजकुलस्त्रियः ॥ ६ ॥ नामा मास्तराः स्वपम् । विगट निहतं दृष्ट्पा कोशस्ति पिलपन्ति च ॥ ७॥ सारसंशत् शयान रुधिगेक्षिता । विराट धिनदन्त्येते गृध्रगोमायुपापसा ॥ अध्याय २० । - गान्धारी बोली हे यादर के भावभी जिम अहंकारी और सिंहके समान मन्युको घल परामय में पिना धर्जन और सुमसे भी ट्यौदाकदाहै । १।। . ने मेरे प्रकी सेनाको गोलि काँटतामे चीरनेके योन्यपी नीरा वह दूसरोंका रूप होकर आपही कालके आधीनटुझाइ । ५ । हे श्रीकृष्णजी में देखती हूं कि अर्जुन के पुत्र घड़े तेजस्वी मरेछय अभिमन्यु काग नाशको नहीं पाताहै। यह पिराटकी पुत्री और थनिकी पुत्रमधू निर्दीप और पीड़ानान इस व. वारपति को देखकर शोचकरती है । ४ । हे श्रीकृष्ण यह विराटकी भार्थ्या समीपमे उसपतिको गियर दागने साफ करती है । राजा पिराट के कुलकी रियां ऐसे नाम की महादुखी निष्फल संक इस उत्तराको हटाती हैं । ६ । पापी महाडि यह नियां इस अत्यन्त उत्सराको हटाकर गरेहुये विराट को देखकर पुकारती हैं बिलाप करती हैं द्रोणाचार्य के मन और वाणों में टूटे. मा रुधिसित सोनेवाले विराटको गिद्ध शृगाल भौर काग काटत हैं । ८ श्यामचक्षु नाडायान् नियां भी CHAPIER XX. Gandhari said, “Proud and lion-like Abhimanyu, who in stru prowess tras reported to be superior to his father Arjun and, self, who alone entered the impregnable army of my son, that de of foos tes dead here. 1 see, Krishn, that Arjun's son Abhims, is still glorious in death. Virat's daughter;- Arjun's daughter -law is lamorting the death of her youthful 'usband. She goes him and wipes his body with her hands The women of V household try to remove her from the place. Those women distress, see the dead byly of Viac nud lament ins death. Pirerced cut by Drona's weapons, Vhat's body is being oaten hy jackals and crona, Seing it thus destroytd by birds, the black and , in ।

Stii Paryaीपर्व (74971 मानं विहंगैगिटनसिक्षणा शक्मयनि विधामा घिवनीयतुमातुराः ॥९॥ चामिमन्युकाभ्योजच शिक्षाम् । शिशूने गार हतान् पश्य लक्ष्मण नम्। भायोधनशिरामध्ये या पश्य माधव ॥ १० ॥ इति स्वीपणे तीचित्तापपर्वणि गान्धारीवाक्ये विंशोध्यायः २०॥ गान्धायुवाच । एप कष्टनः शेते महेप्यासो महाबलः । अलिप्तामलवत् संख्ये शान्तः पार्थतेजसा ॥ १ ॥ पक्ष की कगे निदत्यतिरपान घहुन् । शोणितीयप # शयानं पतितं भुगि ॥ २५ अापी दीर्घरोगच महेवासो महारथः । रणे विनि पल होते विराटको देरूकर पलियों के टानको समर्थ नहीं होती हैं। ९। बर, अभिमन्यु काम्बोज, दाग दर दर्शन लक्ष्मण इन सब मृतक लिकोंको देखो हे माधवनी इन राघको युद्ध शूमि में सोता हुआ देखो १० ॥ अध्याय २१ ॥ - गान्धारी वोली यह बढ़ा धनुपधारी महारथी कर्ण सोताहै यह अर्जुम के तेज के युद्ध में ज्वालन मान समान ज्ञात होगया।। बहुतसे र्थियों को मारकर पृथ्वीपर पड़ा सोसाई और हालित शरीर सूर्य के प्रवर्णको देखो। २ । यह प्रशान्तचित्रा महानोधी बड़ा धनपधारी पशमी शुर यसमें अर्जुन के हाथ से मारा आ सोता है ।।। मेरे महारथी पुत्र पांडवोंके भयरी मिसको अग्रवर्ती करके women try to scare them away, but tbeir attempt is futile. Look at sttar, Abhimanyu, Camboj, Sudakshin and beautiful Lakshman. AII Shese youthful boys are lying dead, O Madlav." 10. . CHAPTER XXI Gandhari ssi!, " Here lies the great archer Kaçan, quenched like Are, flain in lattle by Arjun. Look at the blocd stained body of Karan the son of Surga n ho lies dead on earth after slaging many warriors. There lies sluin by Arjnn he sbo led the Kanrayas to fight like an elephant chief loading his herd, He was s'ala by Arjun (७०८ . [7408) Maliabharat हतः शेते भरोगाण्डीवधन्वना ॥३॥ यं स्म पाण्डवमन्त्रासान्मम पुत्रा महारथाः ध्यंन्त पुरस्टत्य आतङ्गा इव यूध पम् ॥ ४ ॥ शामिव सिंहंग मरे मातङ्गमिव मत्तेन मौत निपातितम् ॥ ५ ॥ समेताः पुरुषव्या नितं शूरमाह प्रकीर्णमूर्बजाः पर-यो रदन्यः पर्युपासते ॥ ६ । उद्विग सततं यस्मात् युधिष्ठिर । प्रयोदशसमा निद्रा चिन्तयशाध्यगच्छत ॥७॥सभूत्या नाम हीरो का ष्ट्रस्य माधव । भूमौ विनिहयः शेते षातरुम्न इय दुमः ॥ ८ ॥ कर्षस्य पन्न नृपसेमस्थ मातरम् । तालप्यमानां करुणं रुदती पतिशा भनि । ९ मार्यशाम गतो धुये गं यदनसमचक्रमियं पराते। ततः शरे पापहतं शिरस्ते शत्रुमध्ये ॥१०॥दा हा धिगया पतिता विसंता सीपय जादा वक्ष्यम। महापाहुमदीनस सुषेणमाता रुदती भशा ॥ ११ | सातमागा पलिता । मुत्थाय दीना पुनरेव चैपाकाप घर परिजिघ्रमाणासयते पुरषाभितप्ता इती सीपणि स्त्रीविलापपणि गान्धारी वाक्ये एकविंशोध्यायः २१ ॥ अच्छे प्रकार ऐसे युद्ध करनेवाले हुये जैसे कि हाथी अपने प्रधान साथी को 'बत्ती करके उत्तम युद्ध करते हैं। ४ । वह युद्ध में अर्जुन के हाथ से गिरांयागना जो कि सिंदते शार्दूल और मताले हाथी से मतवालाहाथी गिर। जाता है । । हे पुरुषोनप यह विखरे येवल रोदन करती रही स्त्रियाँ . युद्ध में गरेहुय शुरके चारोंमोर नियत हैं। ६। सदैव जिससे याद ल • और चिंगा करके धर्मराज युधिष्ठिग्ने तेरह वपरीक निद्रा को नहीं पाया। वहीर दुयोधनका रक्षाश्रमहोकर ऐसेमराहुभा पृथ्वीपरस ताहै हेमाधवनै सकि दाभाचक्ष होताहै । ८ ! तुम कणकी स्त्री नृपसेनकीमाता पृथीपर गिरी रोदन करतीहुई और शोककीमा करनेवाली को देखो। ९ निश्चय करके शुरुका शप तुझको प्रमहुआ जो पृथ्वी ने इस तेरे स्थचनाको वालिपा इससे युद्धको शोभा देनेय ले अर्जुन के बाण से तेगशिर काटागया ।१०। हायर यह गेदर करतो अत्यन्न पाडावान शूगमनकी माता सुवर्ण के बाजूवेन्दसे अलंकृत बड़े पराक्रमी महावाहु कर्णको देखकर अंचत पड़ी है। ११ । पृथ्वोपर पड़े हुई महादुःखी उठकर कर्णके मुखको सूंघती पुत्रके मरण शकिस्से 'दु.सी रोती है १२॥ like a tig-r slain by a lion or an elephant slain by an elephant. 1.* menting women, with dishovelled lair, arround hiin. 6. Hels 'robo e fone Yudhislithir found no repro bg day or night for thirten reors, lion here like a tros struck down by the wind. Inok at Karon's wift. Vrishasan's mother. In penting, crring nud lsing doxn on earth Burely it was the precphur's curre which mindusk's enrth grnaps this car wheel and Arjun'a nimes to Cilt off thy head. 10. Alat Shureen's mother ios insensible at the ight of Karan. She smella Karan's worit" reprl sep. for theitrith of her pan 12.

- bring dragged by jackals and culturos, Stui Parvatna (7409 गान्धार्युवाच । भावन्त्य भीमसेनन भक्षयन्ति निपातितं । गृध्रगोमापना गरे धमत्रन्धुवत् ॥ १ ॥ तं धृगालाश्च पाडनश्च ऋज्यादाश्च पृथग्विधा । सेन तेन सन्ति पश्य कालस्थ पर्ययम् ॥ १ ॥ शयानं पारशयने वाग्मामन्दकारिणम् । मावन सहिता नायों सदन्त्य पर्युपासते ॥ ३ ॥ प्रातिपयं महेप्यासं हतं भल्लेन वाहिलाम् ! मुप्ताभिध शाईल पश्य कृष्ण मस्सिनम् । ४ । अतीघ मुखोऽस्य निहतस्यापि शोमते । सोमस्वाभिपूर्णस्य पान मारश समुद्यतः ५ ॥ पुत्रशोकाभि तलन प्रतिज्ञा परिरक्षता । पाकशासनिनी संस्थे वाचक्षत्रिनिपातितः॥ ६ ॥ एकादश चर्मित्या रक्ष्यमाणं महात्मना । सत्यं चिकीर्षतापश्य हतमे जयद्रथम् ॥७ : सिंधु सौवीरभरि वर्षपूर्ण मनस्विनम् । गक्षयन्त्यशिपा गृध्रा जनाईन जयद्यम् ॥ ८ ॥ पदा कृष्णमुपादाय प्राद्रवत् केकरः सह । वदेव पध्य पानां ननाईग जयद्रय. अध्याय २२ । गान्धारी बोली कि गिद और भृगाल भीमरोनके गिराये हुये राजा अवन्तीको जोकि शूरवीर गोर बहत वान्या रसनेवाले भाइयों से रहिसके समान सातेहैं । १ । श्रृगाल केक और काकादिक अनेक मांसभक्षी उसको सेंचतेहैं समयकी विपरीत ताको देखो १२ । युद्ध करनेवाले शूरतीर शय्यापर सोनेवाले राजा भयन्तीके पास रोनेवाली त्रिपां नियत है । ३ । हे श्रीकप्पनी इस बड़े धनुषधारी और भल्ल से मृतकमनीपवंशी वाढ्लीक को शार्दूलके समान सोताहुआ देखो । ।। इन मरेहुये काभी पुचका वर्ण ऐसा शोभादेता है जो कि पूर्णमासीका पूर्ण चन्द्रमाहोताहै ।। पुत्रशोकसे दुःखी भौर प्रतिज्ञाको पूरा करनेवाले इन्दके पुत्र अर्जुन से युद्धमें जय इप गिरापागया। । । मतिज्ञाको सत्य करने के अभिलापी अर्जुनने ग्यारह अती. हिणी सेनाको हटाकर महात्मा रक्षित इप्त जयद्रथको मारा ! ७ । हे जनाईनजी | देखो इस सिन्धुमौवार देशके स्वामी भईकारी साहसी जयद्रयको शगाल मौर गिद खानेहैं । । । हे जनार्दनजी जब यह नयद्रथ केकय देशियों समेत द्रौपदीको CHAPTERXXII Gandhari continued, " Vultures and jachu]s are eatiog the dead body of the p ince of Avanti. Jachals and birds of prey drag his body. This in the change of tim ! Women aro terping by the dead body of the prince. The great sreber Vallik of the family of Pratip sleeps like a tiger. illis face looks liko thu ſuli moon. 5. Jayadrat! lies plain by Arjun, who slew him to fulfil his vow while he was pro. tested by sleven ahehauhinis. Look at Jayadrath's body which is He deserved death at the hands of the Pandavas, nben he, in company, with the perple of Laikase, feized Draupadi. They spread his lifo then out of their Mababliniat ।। ९ ॥ दु शला मानयनिस्तु तदा मुको जगद्गय । पथगद्य न ता कृष्ण मानयन्तिस्त्र ते पुन ॥ १० ॥ सैषा मम मुता याला पिरान्ती सुदु जिता । प्रमापयति घामाममा कोशति च पाण्डवान् । ११ । किं न दु बनर कृष्ण परम भविष्यति । यत् सुता विधवा बाला स्नुपान नितेश्वरा । १२ ।। इति स्वापर्वणि ती विनापपर्वणि गान्धारीवारय द्वाविंशोध्याय २२ ॥ ३ पाड कर भागानमी पारवोंके हाथसे मारने के योग्यथा।९। उस समय दुशला के माननेवाले पाएवों के हाथसे जयद्रथ वचाया हे श्रीकृष्ण अब उन पाण्डवों ने उस बहनोई को कैसे नहीमाना । १० । वह मेरी पुत्री याला दुखी विलाप करती और पाडवोंका पुकारती आर अपने शरीरको घायल करती है। ११ । हेश्रीकृष्ण जी इमसे अधिक मेरा और कौनसा दुःख होगा जो वालक पुत्री विधवा मृतक पति वाली है। १२॥ regard for Dushola [ Gandhari's daughter married to Jayadrath]. Why did they not spale liian this fimo? My youog danghter is woop ing for him and wounding herself What grief can be greater to me than the sight of my widowed daughter? 12.

Shi Pal साध गान्धार्युवाच । एष शल्यो हतः ते साक्षानकुलमातुलः ! धर्मतन सशा सात धर्मराजेन संयुगे॥१॥एस्त्वया पद्धत नित्यं सर्घष पुरुषर्षभ । स एप निहतः रेत महराजो महारथः ।। २ ॥ गेन संगृहनता सात रथमाधिरथेयुधि जयाधं पाण्डुपुत्राणा तथा तेजोषधः कृतः ॥ ३ ॥ हा हा धिमाश्य शस्पस्य पूर्णचन्द्रसुदर्शनम् । मुखं पना पलाया कार करादष्टणम ॥ ॥ यथितिरेण निहस शल्पं समितिशोमनम् । दन्त्य पर्युपासाते मद्रराजलेलियः ॥ ५॥ एप सैलासपो राजा गगदत्तः प्रतापवान् । गजां वध श्वेष्ठः शेते भाव निपातितः ॥ ६॥ पोम किन पार्थम्प पुरमासीत् सुदारु मम् । लोमहर्पणमाय शमस्येवाहिना यथा ॥ बोधयित्वा महाबाहुरेप पार्थ धन जखम् । संजय गमनिस्पान कुन्तीवेण पालिस ॥ ८ ॥ पस्प मास्ति समो लोके अध्याद २ ॥ गान्धारी वोली हे तात मुद्ध धर्मक्ष धर्मरानमे मारा माक्षात् नकुलका माना यह सत्य सोसाई । १६ हे पुरुषोत्तम जो कि सदैव सर्वत्र रोरेसाय ईपफिर नाथा का बड़ा वलवान पराक्रमी मद्रकागजा सोराहे । २ । युद्ध कर्णके स्थको पकड़मेपाले निम शल्यने बोडवोंकी विजय के नि मेल कर्णकं तेजको क्षीणकिया ।। दुस्खका स्थान है गौर धिकार है कि शल्यके मुखको कार्कोस काटा हुआ देखो नोकि पूर्ण चन्द्रमाके समान मुन्दर दर्शन कमल पनास के समान नेत्रधारी और सच्वा । ४ । सभा गढ़के कुलको रोदन करनेवाली नियां इस युधिष्ठिर के हापसे मरे हुये युद्धफे शोमादेनेवाले शल्यके चारोंओर निपत। ५ । यह पहाड़ी श्रीमान प्रतापवान मनदर राधीका अंकुश हाथमे रखनेवाला और पृथ्वीपर पड़ा हुआ सोचा है । ६ निधन करके इसके साथ पांडयोंका युद्ध यहहुआ जो किबड़ा भपकारी अत्यन्त कठिण रोमांचोंका खड़ा करने वालाथा और इन्द्र औरयासुरके युद्ध के समान था ।. । यह महावाहु पांडव अर्जुन से युद्ध कर के और संशयको उत्पक करके कुन्तीके पुत्र युधिष्ठिरसे गिरायागया । ८ । लोकमें जिसके CHAPTER AXIII Gandhari said;" Slain by Yudh -hthir, here lies Shalya tho mater. Dal oncle of Nakal. The valiant king of Madra who always bore enmity towards you, is dead. Ho s ho drove Karan's car and diminish ed his glory for the sake of the Pandavas, has been slain. women of his family aro lauentin; his glorious hilt king ele på with elephant's honk in bir band. His battle with the Pandutas was like that of Iudra and Pritrasur fought with Arjun, he was slam by Yudhial.thir. E-re lies Bhishm mattor of great griol that cross aro eating n wey his benutiful faco, The (०४११] It is 1 d'all. 5. Bhagdatta the Having 17413) Mahnbl.n.at (७४१२ शौरिय धार्थ च करयन । स एनिमः शेने भीमो भीमाने ॥९॥ पश्व शान्त पन सप्ण शनं सूर्यपेयच्च सम् । युगान्त इय फालेर परिसं सूपमम्परात् ॥ १० ॥ एप तयारणे शाखापत्र सार्थवान् । नरस्योत्तमयोत सूर्यास्तमिव शिष ॥ ११॥ शरतल्पात बार धर्मे देवाग्निा समम् । शयानं धारशयने पश्य शरनिषेविते ॥ १२ ।। अतूलपूर्णगायत्रिभिर्धागः समन्धितम् । उपधायोपधानाप्रय दत्तं गाण्डीव धन्वना ॥ १३ ॥ पालपानः पितु शारसमद्धरेता महायशाः । एप शान्तनवःोते। मावधापतिमो युधि ॥ १५ ॥ धर्मात्मा तर धर्मशः पाराघयण निर्णये। भमय इस मर्यः सभेष प्राणामधारपत् ॥ १५ ॥ स्वयमेतेन शोण पृच्छ्यमागेल पाण्डयः । धर्म नाहधे मृत्युराख्यातः सत्यमादिगा ॥ १६ । धर्मयु कामातु-परिप्रश्यन्ति माधय । शूरता और उनपराक्रम के समान गई नहीं है युद्ध में भयकारी फर्म करनेवाले वह भीष्मजी भासन्नमृत्यु होकर मोहे । ९ । हे श्रीकृष्णाजी इसमूर्य के समान तेजस्वी सोनेवाले भामजी को ऐसे देखो जैसे कि प्रलयकाल में कालसे मेरित भाकाशत गिराड्डा सूर्य होताई । १० । हे केशवनी यह पराक्रमी नररूप सूर्य युद्ध में शस्रों के सापसे शत्रुओं को सन्तसकरके ऐसा अस्तंगत होताह जैसे कि अस्ताचलपर वर्तमान सूर्य होता है । ११ । इस बीयको च्युत न करनेवाले अजेय शरशय्यापर वचमान शूरवीरों से सेषितवीरयाय्यापर सोनेवाले भीष्म को देखो । १२ । यह गङ्गाजी के पुत्र इत्ते रहित तीनवाणों से पने भजुन के दियेहुये तकियेको शिरके नीचे धरकर । ११ । पिताके भामानुप्तारी प्रापयारी महातपस्वी युद्ध भामजी सोते हैं । १४ । हे तान सच पातों के मानना नररूप होकर इस घमात्माने ब्रह्मज्ञानक पल देवताओं के समान मानीको धारण किया पायवासे पूछे हुये इस शुरधर्मवान सरपवक्ता ने भाप अपनी मृत्युको युद्धमें रतलादिया। १६ । हे माधवजी इस देवता के समान नरोत्तम देवक्त भीप्प के सर्गपासी होनेपर कौरस लोगों के विपय किससे पूर्षेगे । १७ । गोकि अर्जुनका पिता और सात्पकी the matchless warrior of this world. He is lying love liko the sun fnllon down at Pialaya, Having sina numorous warriors, he deolines hke a Fetting sun. 11. He is lying on the field of bitllo blnin by Aujon. Ho observed n Futr of celibacy and ascotici-ın for his father's enke. Tijs wise and virtuous boing is sustaining liis lite by tho puwer of the knowledge ol Bralun, like a god. 15. Ashed by the Paudaraca, tliis t uthful man pouts them out the manner of his death. mill tho Kauraran con-ult in the matter if dlurin, when Darnbrat Bishnu is derd! Look at Dronacharya, the picerptor of Arjun, Satyaka aud all tho Kauravas, lying on Oarth. I. Wag master of the knowledge में अनुपम । Thom 74150 १३) ShiPary त्रपिव गते देवनते स्वर्ग देवकल्प नरामे ॥ १७ ॥ अर्जुनस्य विनतारमाचा सान्यतया तपश्य पतितं द्रोण कुरूणा द्विजसत पम् ॥ १८ ॥ अस्तं चतुर्विध घेद यथैव निवणे पर भार्गवो चा महाबीर्यतया द्रोगापि माध ॥ १९ ॥ यं पुराधाय पुरष गाइव पन्ते म पाण्डयान । सो शबन श्रेयो दोण शने परिक्षन, ॥ २० ॥ मोटर चीच इलावा माधव मनिहतस्यापि जीवितो या॥ २१ ॥दा रहमाञ्च चत्वारः सामाणि च केशया सनपेतानि वै शायथैवादी प्रजापते॥२२॥ पदनाहाविमा तस्स पन्दिगिन्दितौ सुमो । गोमाययो विकर्षन्ति पादौ शिष्यगणा चिती ॥ २५ ॥ द्रोण द्रुपदपुत्रेण निहत मधुसूदन । रुपी गणमधास्ते दुःसोपहत चेतना ॥ २४ ॥ तां पश्य पतितामारी मुक्तकेशीमधोमुखीम् । इतं पतिमुपासन्ती होणे शखमृताम्मरम । २५ ॥ अग्निमाहत्य विविञ्चितां प्रज्याप सर्वशः। द्रोण का गुरु उसकौरवों के उत्तमगुरू द्रोणाचार्य को पृथ्वीपर पड़ाहमा देखो । १८ । मानवजी जैसे कि देवताओं के ईश्वर इन्द्र और बड़े पराक्रमी भार्गव परशुराम जी चारोंकारके भनके माताये उसीप्रकार द्रोणाचार्य भी जानतेय । १९ । कौर- बोने जिसको अग्रत्ती करके पांग्यों को बुलाया दह पृथ्वीपर मराहुआ ऐसे सोता है जै कि निलित अग्नि होती है । २० । हे माधवी मृतक द्रोणाचार्य की धनुपकी मुष्टि और युदके हस्ताण विना जुदेहुये रणभूमि में ऐसे दिखाई पड़ते जैसे कि जीवतेगे के होते हैं । २१ । हेकेशरजी चारों वेद और सब अन जित से ऐसे पृथक नये जैसे कि गादि प्रजापति जीसे जुदेनहीं हुयेथे । २२ । उनके उन दोनों नरगोंको अगाल बचने जोकि दंडवद् के योग्य और पन्दी- मनोले स्नूयपास मरियम होकर सडो शिप्पोंसे पूजितथे । २३ । हे मधुसूदनजी यह दुःखसे घानित शापी इन धम्नके हाथ से मृगक द्रोणाचार्य के पास महादुःखी नियत है २५ । उनरोदन करनेवाली पीड़ादान लेकेश नाचा शिरक्रिये शनधारियों में श्रेष्ठ अपने पनि प्रोणाचार्य के समीप नियतको देखो। २५ । सागम बामण रिकि अत्रियों को धारण करके सब ओरगे चिताको अग्निमे मचालित करने द्रोणाचार्यको उममें रपका मामवेदके वानमन्त्रोंको गातेहैं।२६मरे of weapons like Irior Paahuran Itaunder whos •lrad-rship the Kauravas chillen god tjo t.*vA», lies on darth lihe qienched fire. Holding bia bow in hs guir lox loux; he looks like one living The four Vedas and thig napoua dil not lerro hrn as thy did not Icaro Prajapatı. His fet, (int rated by hundruls of die ples and praised by burcis, oro besagersal by jasaal, Kno, much. di trused ataents the drath of Drona slain bp Dhrichtadyumn. She is standing by lion with downcast head ana colins llad la r. Having put the body of Drinchania on tho fungral pilu, thu Brahma ing set fire to it path 20 17414) Mahabharat (७४१४] भाषायगायन्तित्रीणितामानि सामगाः ॥२६॥ साममिसिभिरनास्थैरनुशंसन्ति चाप भग्नावग्निमिवाधाय द्रोण हुत्या हुताशगे॥ २७ ॥ गच्छन्त्यभिमुमा गंगां द्रोणविन द्विजातयः। मपसव्यां धित करवा पुरस्कश्य फपी सदा ॥ २८ ॥ इतो ब्रीपणि सीविलापपर्वणि गापारी पाको त्रयोविंशोपायः २३ ।। गान्धार्युवाच । सोगदत्त पश्य युयुधानेन पानितम् । विद्युतमान विहगंधा मिर्मावधान्तिके ॥ १ ॥ पुत्रशोशाभिसन्तप्त लोगचो जनाईन । युयुधान.पहेण्यास गईशीमय रश्पते ॥ २ ॥ मसौ हि भरिधरसो माता परमदु.मिता। माश्यासपीव शिष्य अनिमें अनिको पारण करके और द्रोणाचार्यको अग्निमें हवनकरके अन्तर्मे निपत होकर तीन साममन्त्रों को गातेई । ९ । द्रोणाचार्य के शिष्य यह बामण चिताको दक्षिण करके मौर कपीको आग करके भीगंगाजी के सम्मुखनातौं २४॥ L अध्याय २४॥ गान्धारी चोली रे माजी सम्मुखही सापकी के हाथ से किराये और बहुत से पक्षियों से घिरेहुये सोमदत्त के पुत्रको देखो।।। हेजनार्दननी पुत्रशोक से दुखी सोगदत्त मानों बड़े धनुषधारी सात्यकी की निन्दाकरता हुआ देखताहै । २। यह भूरिश्रवाकी माता निर्दोष दुःखसे पूर्ण अपने पति सोमदत को मानो विभास करातीहै । ३ । कि हे महाराज प्रारम्भ से इस भरतवंशियों के भयानक the bpmos of the samved Other dissiplos pour libations into fire an sing the thrae hyur.ns of the Samved in the end. Having burnt blog body, bis disciples follow Kripi to the Ganges." 28. CHAPTER XXIV Gandhari continued, ** Yonder lies Somdatta'a enn slain by Satyaki and surrounded by numerous birds The great areher Sondatta is looring ng if in contempt of Satyaki. Bhurishrava's mother in lavºnting as thongh she were consoling Sondatta her husband in these worde - " It is locky, Ling, that yon donot soe the great des १५) Stri Parvani 17415 रं सोमदत्तमानिन्विता ॥ ३ ॥दिन्दया नेनं महाराज दारुण भरतक्षयम् । कुरा दनं घोर युगान्तमनुपश्यसि । ४॥ दिष्ट्रपा'यूपा धार पुत्रं भारसारदम । क्रितुयज्यानं निहतं नाय पश्यास॥ ५॥ दिया स्नुशणामाग्दे घोरं बिलाप । न भणोषि महाराज सारकीनामिषाणये ॥ ६॥ शलं विनिहतं संस्थे भूरिश्रयस पास्नुषाश्च विधधाः सर्या दिष्टपा नाघेह पश्यसि ७ ॥ पता पिलप्य यहुल शोफेन कर्षिताः। प्रतम्यमिमुथा भूमौ कृपणं तव केशव ॥ ८॥ धाममुरनिधी कर्मेदमकरोत् कथम् । प्रमत्तस्य यलेसीद्वाहु शरस्य यज्पन ॥९॥ ततःपापतरं । कृतवानपि सात्याः। यस्मात् प्रायोपविष्टस्य प्राहा त संसितारमनः ॥ १७ ॥ नु पक्ष्यास संसरम.क्यामु घ जनाईन । भर्जुनस्य माहत की स्पयं वा स निरी नि ॥ ११॥ गान्धाररात्र.शकुनिलवान सत्यधिकमः। निहतः सध्देक्षेत मागिने । मातुलः ॥ १२॥ यः पुरा हेमदग्याश्या व्यजमा स्म वाउपते । स एष पक्षिमिः । शयान स्पधीज्यते ॥१३॥ मायथा निकृतिप्रशो सितवान् यो युधिष्ठिरम समायां शको और कौरवों के घोरं प्रलयकाल के समान रोदन करने को तुम नहीं बहो । ४ । और मारपसे इम इजारों दक्षिणा देनेवाले बहुत यहाँसे पूजन रेनेवाले यूर ध्वजाधारी मृतक पुत्रको नहीं देखते हो।५। हे महारान पारध से पभूमि में इन पुत्रवधुओं के घोर मिलापको ऐसे नहीं देखतेहो जैसे कि समुद्रपर रसियों के शब्द होते हैं । ६ । अब यहां युद्ध में मृतक भूरिया और शको और पुत्रवधुओं को नहीं देखतेहो। ७। केशवजी दुःखकी पातहै कि पतिशोक ते पाडावान यह स्त्रियां दुःखका विलाप करके सम्मुख पृथ्वीपर गिरती हैं। ८ । । अर्जुन तुमने धीमत्सुनामहो यह निन्दितकर्म कैसे किया जो यज्ञकरनेवाले अचेत पूरकी भुभाको काटा ।। ९ । सात्यकिने भी उससे अधिक पापकर्म किया कि शरीर त्यागने के निमित्त नियम करनेवाले तीक्ष्णबुन्दिका शिरकाटा जनार्दनजी सत्पुरुषों के मध्य में और कथाओं में भर्जुन के इस बड़े कर्मको क्या कहोगे अथवा भाप अर्जुनहीं क्या कहेगा । ११ । यह वलवान और सत्यपराकमा शकुनी गान्धारदेशका राजा मामा अपने भानजे सहंदद के हाथ मारागया १२ मोकि पूर्जशपप में सवर्ण दण्डीवाले पंखोंसे वायुकियाजाताथा वह अब सोता truction of Eba Kigravas and 8 Weeping and crying like that of pralaya. It was by good luck that you did rot see the death of your warrior BOR #bo Lad performed ma uy xocu sfices with large donations is by good lack tliat you doont henr the lamentations of ponr daughtoreir-law crying like cianer. You donit ec the dead bodies of Bburishrara and Shalsa and the won en meeping to them. It is bard to see t1 co nicomed en er fell on earth will gritt. Arjan is called Billateu and yet be cu ce moted the grievcue sin of cutting the alm of sn inscnsillo sed TOR-oleerving warrior, Satyabi did a greater 5. It very (174169) Malabuarat विपुलं राज्य पुनर्जीणित जितः ॥ १४ ॥ गग मम पुत्राण लोकाः शाजिता विभो। एपमस्यापि दुखे लोकाः शरण मे जि।।। १५ । कचनापं तत्रा पुत्रान्मे भ्रातृभिः सह । विरोधयेहनुमाननृजमसूद ॥ १६ ॥ इति खीपीण खविलापपरिण गाम्नागिदारये चतुर्विशाध्यायः २४ ॥ हुआ पक्षियों के परों से वायु कियाजाताहै । १३ । जिम उलीने सभा में माप से जीवते युधिष्ठिर को और बड़े राज्यको जिप किगा अन्त में वह पराजित ।१४। हे प्रभु जमे कि मेरे पुत्रों के लोकशतों विभयह उसीप्रकार १ दुर्बुद्धी भी लोकशस्त्रों से विजय होगये । १५ । हे मधुसूदननी यह कुटिल वहां भी मेरे सत्य बुद्धिाले पुत्रोंको काही भाइमों सभेन विरोधी न करे १६॥ - fault in a viuch as he beheaded the wiso Warrior who had resigne hwelt to death. 10. What will you any, Vasudev, about this dec of Arju's in tl.o assemblres of yoot men ! This powerful Shakuni o truo yır "89, the king of Gandhar was slman by Sahadev the son his astur in-law. He who was ke vid with gold hundled fans, is no being faoned by the wings of birds. He who deceitfully won Yuc hi-hthit and his great kingdom, mara cor quered. He wi good royons by means of as nis í ke my song, I fexr he will sprea quarrel among my well-meaning sons in the other world toa "87. Trot Stri Paip ringa (74171 गाग्वायुषाच काम्योत्रं पश्य दुषं काम्बोजास्तरणचितम शियानमृष भारत पाशुपु माघ ॥ १॥यस्य तजसन्दिग्धी पाहूनन्दनमपितौ । मपेक्ष्य पणं मार्मा विलपस्पतिदुःस्थिता ॥ २ ॥शयानमभितार फालिग मधुमदन । पश्य तोगयुगप्रतिपयमहाभुतम् ॥ ३॥ मागधानां मधिपति जयत्संन बनाईन । परि सब प्ररुदिता मागपः पश्य योषितः ।।४ । अस्प गारगताम् वाणान् कानिया पार्पिताम् । उसयसमाविष्टा मूळमानाः पुनः पुनः ॥ ५॥ मासो सानया जामतन परिश्रमात् । प्रम्लाननलिनामानि मान्ति पपत्राणि माघष ॥ ६॥द्रोणेन निहला गरी शेरते रुचिरांगदा । धृष्टद्युम्नमुनास शिशधो हेमा मालिनः॥ ७॥ तर मिता शराः शेरले रुचिरागदाः। द्रोणेनाभिमुखाः सर्वे भ्राने: पञ्च केकयाः द्रोणेन दुपद संख्ये पश्य माधव पातितम् । महाद्विपमियारण्ये सिंहन महता अध्याय २५॥ गान्यारी बोली हे माधवनी इस मृतक और पृथ्वीकी धूलपर सोने वाले मोम के रामा को देखो मोकि अनेक उत्तम स्कन्धयुक्त होकर काम्बोज देशी म पुरुषों के योग्यौ । १ । यह माया जिसकी रुधिर भरी चन्दन से लिप्त ना को देखकर महादुःखी होकर दुःखका विलाप करती है । ३ । हेमघुमदनजी र सोनेशले शूरवीर राजा कलिङ्ग को चारोंपोर से देखो जिसकी पड़ी भुजा काशित वाजूान्दों के जोड़े से अनेछन है ।।। हे जनार्दनजी स्त्रियां सब भोरसे स अपरसेन राजा मगधको घेरकर अत्य त रोदन करती हुई व्याकुलहैं ।। पर बारम्बार अचेत और दुःलसे पूर्ण स्त्रियां अभिमन्यु के भुजबलसे गारे भौर उसके अंगों में लगेहुये वाणोंको निकालती हैं । ५. माधपनी इन सब निदोप स्त्रियोंके मुख धूप और परिश्रम से ऐसे दिखाई पड़ते हैं जैसे कि कुम्हलाये हुये कम होते हैं ।। धृष्टद्युम्न के सब पुर पालक सुवर्णको माला और सुन्दर वाजूवन्द रखनेवाले शूरवीर द्रोणाचार्य के हाथ मरे हुये सोतेहैं। ७ । उसीमकार मुन्दर बाजूबन्द रखनेवासे कैकयदेशी पाचों शूर भाई सम्मुखनामें द्रोणाचार्य के हाथ से मरेडुये सोते हैं । ४ । हे माधवजी युद्धमें द्रोणाचार्य के हायसे गिराये हुये CHAPTER XXV Gandhari said, “ Look at the king of Camboj who is lying dead ,on dust O Madhav. He was an excelent warıiors of brond shouldors like the goud soldiers of Camboj. His Wifi- is weeping at his bleed. ing arm pasted with sandal Look O Madhusudad, at the warrior king of Kaling wboso long arms are decked with a briliant pair of armlets. Women are weeping round Jayatsen, the king of Vagadh and extract the arrows shint by the perful arms of Abhimanyu all ti rough his body. 5. The fac-s of all these worto look like with. dead 15418) Mahabharat (१८ इतम ॥९॥पाचालरा विमलं पुण्डरीकाक्ष पायरम । मानपत्रं समामाति शरदी पनिशाकर. ॥ १० ॥ नास्तु दु पर्दा स्नुषा मा- सुदु.सिता दावा गान्ति पाश्चात्य राजानम[सम्पतः ॥ ११ ॥ धृष्टकेतु, मायासं चीपुंगव बनाः । ब्रोमेन निहतं शरे दर ितचेतस ॥ १२॥ दाशाईपुत्रधार शयानं सत्यषिकमारामारो प्याके रुदन्त्येवाधेदिरान रांगनाः । १३ ॥ विदामुन्दिावापात्यो पतितो पाय केशव । हिमान्ने पुष्पिती शाली मरुना गलिताविष ॥ १४ १ मवण्याबााकण सर्व एव स्पया सह। ये मुक्का द्रोणमीमायां कर्णात वैकर्सनाव कात् ॥१५॥ दुख्यो धनातू दोगमुवात् सैन्वयाच्च महायात् । सोमदत्ताहिकाच शराब मतपण: ॥ १६॥ ये हम्युः शत्रवेगेन वैधापि नरर्षभाः । इमे निहताः सौ परेप काहस्थ पर्व यम् ॥ १७ ॥ तदेव निहताः कृष्ण मम पुत्रास्तस्पिन । पदेवातकामस्वपुषा द पद को ऐसे देखो जैसे कि बनमें वढे सिंहसे मारे हुये पड़े हानी को देखते हैं। राजा द्रुपदका श्वेन निमल छत्र ऐसे प्रकाशमान जैसे कि शरदऋतु पन्द्रमा होताहै । १० । या दुःखी भार्या भौर पुत्रवधू पांचालके वृद्ध राजा छुपदकोदार देकर दाहिनी ओरसे जाती ।।१। अचेत स्त्रियां द्रोणाचार्य के साथसे पारेहुये | इस महात्मा शूर चंदेरके राजा धृष्टयुम्नको उठाताई । १२ । हे श्रीकृष्णजी राजा चंदेरी को यह उतम निपा इस सत्य पराक्रमी वार मैदान में सोनेवाले अपने पौत्र को पगल में लेकर रोती हैं । १३ । हे श्रीकृष्णनी इन प्रवान्ति देवके राना निन्दानुविन्दको ऐभेदेखो जैमे कि हिमऋतुके अन्तपर वायुमे गिराये ये दोपुष्पित शालयलोंको देखते हैं । १४ । हे श्रीकृष्णजी स पांडव आपके साथ मारने के प्रपोग्य भो कि द्रोणाचार्य भीष्म, कर्ण और कृपाचार्ग से भी बचेहुये हैं दुर्गा धन अश्वत्थामा, मिन्धु का गजा जयद्रय, विकर्ण, सोमदत्त और यूर कतवर्मासे भी बचे । १६ । जो नरोत्तम शत्रों की तीक्ष्णता से देवतामामाकोभी मारसकये ered lotus flowers on Bscount of t vil and the heat of the Sun. All the youthful song of Dhrishtadyunn, Blain by Dronacharya, are sleeping here on earth. Smilarly, the live Karkiya brothers, slaun by Drons, sleep in death. Drupad, alain by Drona in battle, looky like a great elephant skin by a lion in a forest. U: whit: umbrella shines like tha bu jos in winter. 10. H. dist.23191 vf, at duz itur-in-law hayo burnt Drapui t'ie od king of Panih sl 40 l ar yong stay, Thy iubensible fromba lift up the king of Chanderi who was slaid by Drona The women of Chenden bays taken up thur brave grandern in their arın, and are weepiog i ver him Look at Vind and Anurudd the two princes of Asanti lying down like tno flowerug ial de eer vpooted by the wind at the end of winter, The Panday us as well as you, O Krishn, (7419 {०४१९] SthaPAL सापष . गः पुनः ।। १८ शान्तनाश्चैव पुत्रेण प्रनित विदुरेण पाराशोकारित मा स्ले कुछ धारममुतग्विति ॥ १९ ॥ तयोर्न दर्शन तात मिया भधिमहति । मनिरणे पुत्रा मे भस्सीमता अमाईन ॥२० । मैशम्पायन उवाच । इत्युक्त्या पपतमो गाग्भारी शोक मूस्विता । घोपहनविताना धैर्यमुत्स्न्य भारत ॥ २१ ॥ ततः कोपपरीती पुत्र शोकपरिष्कृताचगाम शौरि पोषेष गापारी व्यपितेन्द्रियः । २२ ॥ गान्धार्युवाच । पावापाराष्ट्राच कृष्य परस्परम् । उपेक्षिता विनयातस्त्वया कस्माउन मान ॥२३॥ोपेक्षितो काछ कुरुना मधुमदम मायया महाबाहो फल तस्मारवा४ि॥ निशुलषया बम्मे नपा निवाजिनमन त्या दुरा पर सब इस युदम मारमप इस विपरीत समयका दखा। भाकृष्णनी मेरे वेगवान पुष भी मारेबो ना कि तुम माने अभीष्ट प्राप्ती से रहिस उपप्पी स्थानको करो। १८ । उसी समय मुझको भीष्म पितामह और ज्ञानी षिदुरपी में समझापामा कमाने पुत्रों पर भीति मतकरो। १८ । उन दोनोंकी या प्रकला कियाहोलके पतेवनही वी इसीसे हे जनाईनमी मेरे पुत्र थोडेही दिनों नाव होगरे । २० । कम्मापन बोले हे भरतवंशी षह गान्धारी यह सब काकर मोफसे दूपार दुल से बापल बुधि फरर्पको त्यागकर पृथ्वीपर गिर पड़ी। . फिर कोषसे पूर्ण शरीर पुत्रशोक में डूबी जमापधान इन्द्रिय गान्धा लेनोमनी को दोषनगावा । ११ । गान्धारी बोली हे श्रीकृष्णाजी पांडवों रामके प्रमादिक सप परस्पर मरमहुये हे जनार्दन तुमने किप्तहेतु से सरिमामहोनेवालों को त्याग किया। हे महावाह मधुमदनजी जिसकारण aro indestructible as you scap d death from the hands of Drona. sharya, Bhishm, Karan, Kripacharya, Duryodhan, Jayadrath, Viharn Somdar and valiant Kiitvarus, The heroes, sho could say even gods with their sharp and powerful w.apone, bare died in this war; the times are so changed. 17. I keld my sons as dead from the you returned from your useless mission of peace to Upap'arya. Bhishm the grandfather and wise Vidur told me then that I should loro my song no more Their foresight ceuld not te wrong, Janardan, and therefore my sons were Blain." says that having talked at above, Gandhari lost her senees and patience with grief and fell down on earth. Then with his body full of and her organs out of control, she blamed Shri Krishn, saying, sons of tha Pandavas and Dhrishtadyumn were all slain at once. Why did you loayo them in the lurch! wilfully looking at the distruction of the Kauravas By the virtue of thu atceticism which I have performed in attending on my husband time 20 Vaislampayan Tego " The You will be punished lor [[74 20] Nabablarat पेन शो चक्रगदापरः ॥ २९ ॥ परमात परस्पर मन्तो हातयः कुरुपाण्डवाः । उपे क्षिनास्ते गोविन्द तस्मामातीन घधिप्यसि ॥ २६ ॥ त्वमप्युपस्थिते घ वदनिशे मधु मदग । हसभानिईनामात्यो इतपुत्रो पोचर कुरिसतेनाप्युपायन निधनं समवासि ॥२७॥ तवापरामुपा नितजातिभावाः । नियः परितषिष्यन्ति पयेव भरत निर ।। २८ ॥ वैशम्पायन उवाच । एतस्मा तु पवन चामुदेषो महामनाः । उपाय देवीं गावातमीपासमयभित्र ॥ २९ ॥ संहा रिणव मरायो नेह विग्ते । जागहमेतदप्येवं चीर्ण धरसि मुत्रत । ३. ॥ अषयाते नरैरन्यैरपि वा देख से हुनइच्छावान ने जान बूझ कर कौरवों का नाश होनदिया इसोतुपे तुमभी उसके फलको पाभागे । १४ । पति की सेवा करनेवाली मैंने जो कुछ तपपात किया उस दुष्पाप्य तपके द्वारा तुझनक्र गदाधारी को शापदेतीहूं । २५ । के गोविन्दनी नो कि तुमने परम्पर जतगाले को मारनेवाले कोच और पांचोंको नहीं रोका इसहेतुसे तुम भी अपनी नातवालों को मारोगे ।२० । हेमधुसूदनजी तुमभी उत्तीमापर्ष गर्न समान होनेपर मरेइये मंत्री पुत्रज्ञातिवाले वनमें फिरनेवाले प्रजातरूप लांकोगस भनाथ के समान निन्दित उपायरो मरणको पायोगे । २७ । इसीप्रकार तेरीखियां भी जिनके पुवाया और जातिवाले मारेगये ऐसे चारोंओरको दौड़ेंगी जैसे.कि यह भरतवंशियोंकी स्त्रियां दौड़ना । । ८ वैशम्पायनबोले कि बड़े साहसी वासुदेवजी इसमोर वचनको मुनकर मंदमुनकान कग्नेहुये उस देनी गांधारीसि कोले | हे क्षत्रिपाणी मैं जानता कि तू मेरे कर्म के ममान कर्मकोभी अपने तपके नाशक लिये करतीई यादवलोग देवसेही नाशको पागे इसमें संदेह नही। १०.देशुभ स्त्री पादसग अन्य मनुष्प देता और दानतेभी अवधाहैं परसर विनाश को I curse you. Because you did not stop the eutuul carnage of the Kauravas and the Pandavas, you will destroy your own kinsma cu After thirty six years your ministers, 8 18 and kinsmen being slain, and you hiding in a forest will die an ignominous death. The women of your family will run here and there like these Vaishampayar says that brava Vuegilev smiled plowly at these, words of Gandhari, and said, "I know, Kshatrya #opan that you have dona a decd like mine to destroy the merit of your asceticism. The Yadavas are sure to die of God's will. They are indestructible by the gds and Danayas and therefore thoy shall die tno, KəU AV " women, २] Stri Parvस्त्रीप (7421) कान. । पररपरकृत नाशं पत प्राप्सम्ति यादया।३१ ॥ इन्युजपति दाशा पाण्ड पलस्तचेतस । वर्धशस पन्ना निराशावापि जीविते ॥३२॥ इति सोपर्वणि श्रीपिलापपणि गन्धारीवाक्य पंचविशीध्याप २५ ॥ - भगवानुभव । उत्तिोत्तिष्ठ गान्धारिमा र शोफे मन कपा तपैष होपराधेन बहयो निघन गता ॥१॥ यत्व पुत्र दुरात्मानमीघुमत्यन्तमानिनम | दुर्योधने पुर स्वस्य दुहन साधु मन्यसे ।।३२ ॥ निष्ठुर धेरपुरुष वृद्धाना शासनोतिगम् । कथमा मकृत दोव मराधातुमिच्छसि ॥ ३॥ मृत पा यदि पालिद धोतीतमनुशोचति । दुखेन लभते दु ख बावनया प्रपद्यते ॥ ४ ॥ तोयि ब्राह्मणध गर्भ गोषोंडार पागे ।।१। श्रीकृष्ण जी के इस प्रकार कहने पर पाण्डपलोग भयभीत चित्त अत्यन्त न्याकुल और जीर्वनमें निराशा युक्तहुये । ३३ । अध्याय २६॥ श्रीभगवान बोले हे गान्धारी उठो उठो शोकमें चित्रको मतकरी तेरेभपराध से कौरवोंने नाशको पाया। १। जो उस दुर्बुद्धी अत्यन्त अहङ्कारी ईप करनेवाले दुर्योधनको अग्रती करके अपने दुल कपको अच्छा मानती है । २ । जोकि कठोर पचन शत्रुताको मिय जाननघाले मनुष्य और वृद्धोंकी प्राज्ञाके विपरीत विरुद्धकर्म करनेवाला था यहां तू अपने कियेहुपे दोपको कैसे मुझमें लगाना चाहती ।३ । जो मृतक अथवा विनाशयुक व्यतीत समय को शोचती है और दुःखसे दुःखकोपातीहै अर्थात् भादि अ-तके दोनों दुखोंको पाता है । ४ । बामणी तपके निमित्त उत्पा fighting with one another, " The Pandavas were terrified at these words of Shu Krisho au I lost all liope of life in their distress * 32 CHAPTERXXII up and donot Shri Krialın suid to Gandhari, “ R140 give your. self up to grief The Kuu avay tere destroyed by your din fault. You made proud and envious Dur ycdban heade trorg and yot call your wicked dood good He loved emty and d -pised the advice of old men, and yet you wish to lay your own fault on my skoulder Yur canta at the meat destruction and are doubly distressed, A B-ahman 117422) Maliabharat (૭૪રર ७। कि हे धाविसारं तुरंगी। दादास पशुपालञ्च वैश्या वधार्थीम स्पद्विधा राजपुत्री ॥५॥ पैशम्पायन उवाच । तच्छुत्या वासुदेवस्य पुनरुक्तं यचौप्रियम् । तूष्णीषभूय गान्धारी शोकव्याकुल चेतना ॥ ६ ॥ धृतराष्ट्रस्तु राजर्षिनिगृधानुद्धिज तमः पर्यपृच्छत धर्मात्मा धर्मराज युधिष्ठिरम् । जीयतां परिमाण ज्ञः सैन्यानानपि पाण्डय । हतानां पदि जानीषे परिमाणं पदस्थ मे ॥ ८ ॥ युधिष्ठर उवाच दशायुतानमधुतं सहस्राणि ध विशतिः । कोट्यः परिश्च षट्चैष येसि राजन् मृधे इताः॥ ९ ॥ अलक्ष्याणातु घाराणां सहस्राणि चतुर्दश । दश घान्यानि राजेन्द्र शतं षष्टिश्च पश च ।। १० । धृतराष्ट्र उवाच ! पुधिष्ठिर गति कान्ते गता. पुरुषसत्तमाः । आचश्व मे महावारो सर्वशो हसि मे मतः ।। ११ । युधिष्ठिर उवाच । पै तानि शरीराणि हष्टैः परमहंयुगे। देवराजसमाल्लोकान् गताले सत्यविकमा ॥१॥ ये वहष्टन मनमा मतपमिति होनेवाले गर्भको धारण करती है गौ भार लेचलने वालको घोड़ी दौड़ानेवाले को शुद्रा दास को वैश्या पशुपालको राजपुत्री क्षत्रिया युद्धके अभिलापी गर्भको । ५। वैशम्पायन बोले किशोकसे व्याकुल नेत्र गान्धारी वामदेवजी के उस अभियभार दुवारा कहेहुये वचनको सुनकर मौनहोगई । ६ । फिर राजऋपि धृतराष्ट्रने अज्ञान से उत्पन्न होनेवाले मोहको रोककर धर्मज्ञ राजा युधिष्ठिर से पूछा । पांडव नुपजीवतीदुई सेनाकी संख्याके जागनेवाले दो और जोमृतक शूरवीरों की संख्याको जानने हो तो मुझसे कहो।। पुधिष्ठिर बोले हे रामा इम युरमें दश करोर वीसहजार शूरवीर मारेगमे । ९ । हे राजेंद्र दृष्टि न आनेवाने धारों की संख्या चौबीम हजार एकसौ पैंसठ है । १० । धृतराष्ट्रवोले हे पुरुषोत्तम महावाहु युधिष्ठिर उन्होंने किस गतिको पाय वह मुझपे कहो मेरे विचारसे तुम सब बातों के मानने पोलहो । ११ । युधिष्ठिर वाले जिन प्रसन्न चित्तों ने बड़े पदमे अपने शरीरको नाश किया वह सत्य पराक्रमी इन्द्रलोकके समान लोकोंको गये १२ । हेभरतवंशी जो अमत्तम चित्तसे युद्ध में लड़तेहुये मारेगये वद गन्धर्व लोकको गये। १३ । और woman produces ofi'spring for Asctticigin, a cow to carry load, a mare to produce a runner, a shudra toman produces a elave, a Vaishga woman produces one wh) lear: buasta; bul a kbhatrya yoman pro dace4 tighting men. Valshampayan says that on hearing these Sugıda ot Vasudev, respeatod again and again and unpleasint to loaf, Gundhuri distressed with grief. bacamo silent. Thon Dhritraslıtrn tho ::e. Cuching his pe-910ne, s bich were the outcomo of ignoranca d.fludiishther the w16c the number of the warriors slain, and i shtir said that the dood warriors amocated to ten crores Inst twenty thousands and that trenty lour thousanda, ono hundred 11 uxty five vero insi-ile, Dhritrashtra then questionru nliout - StriParv सौरव 17423)" रत । युध्यगाना हताः सण्ये ते गन्धर्वः समागता ॥ १३ ॥ ये घ संग्रामभूयिष्ठा चमाना. परांमुखाः । मस्रण निधनं प्राप्ता गतास्ते गुह्यकानप्रति ॥ १४ ॥ पाध्यमाना रेयेंतु हीचमाना निरायुधाः । निरचा महात्मान परानभिमुखा रणे । १५॥ विध पाना.शिने शरीः क्षत्रधर्मपरायणाः । गताम्ते ब्रह्मसदन हा धीराः सुघर्चस १६ ॥ थे तत्र निहता राजन्नन्तरायोधने प्रति । यथाकचित्ते राजन् संत्रापास्तू रान् कुरुन् ॥ १७ ॥ धृतराष्ट्र उवाच । केन शानवलेने पुत्र पश्यास सिद्धवत । तन्मे पद महाबाहो श्रोतव्यं यदि मन्यसे ॥ १८ ॥ युधिष्ठिर उयाध निदेशाद्भवतः पूर्व धने विचरता मया ! तीर्थयात्राप्रसङ्गेन संप्राप्तोऽयमनुग्रह ॥ १९ ॥ देवर्पिोमशो प्टस्तता प्राप्तोस्म्यनुस्मृतिम् । दिव्यं चक्षुरनुपाप्त झानयोगेन चै पुरा ॥ २० ॥धृत राष्ट्र उवाच । पेत्रानाथा जनस्यास्य सनाथा ये च भारत । कश्चित् शरीरानि औरणभूमि में नियत याचना करते पराख होकर शस्त्रोंसे मारंगये यत गृहकों के सोकोंको गये । १४ । जो पात्यमान अशस्त्र लज्जासे युक्त और नड़े साहसी युद्ध में शिशुओं के सम्मुख शनुओं के हाथसे गिरते क्षत्रिय धर्मको उत्तम माननेवाले तेज शस्त्रों से मारेगपे वह निम्मंदेह ब्रह्मलोकको गये । १६ हे राजा जोमनुष्य यहां रणभूमि के मध्यमें निम किती प्रकारसे मारेगये बह उत्तर कारवदेशको गरे। १७ धृतराष्ट्र गोले हे पुत्र तुप सिद्धोंके समान निस ज्ञानवल से इस प्रकार देखते हो हे पदावाहु वह मुझसे कहो जो मेरे मुनने के योग्यहै । १८. युधिष्ठिर पोले कि समय में आपकी आज्ञानुसार वनमें घूमनेवाल मैने तीर्थयात्रा के पोगस इस अ. महको प्राप्त किया । १९ । देवऋीप लोमसमपि देखे उनसे इप्त मनुस्मृतिको या भौर निश्चयकरके पूर्वसमयमें ज्ञान गांगमे दिव्य नेत्रों को पाया । २० । मृतराष्ट्र बोल हे भरतवंशी क्या तुम नाथ और सनाथ लोगों के सिरोंको विधि अनुसार दाइ करोगे । २१ । जिन्हों का सम्कार करने के योग्य नहीं है t1 eir late hereafter, and Yudhulthir said, " Those who died cheerſally lave gone to the rigion of Indrv; tho«e who were cheerless, joined the Gandharvar; those who beggea for motus nad torned back, were luired nto Guhy ahfy those who were deprived of their weapons ard yet faced the enemy aud mere s'nin, Invo aonly gone to the rrgions of Bralım. All tense tho dud in the field of battle, ander any circumtenen, h25e gone to the country of Ultar-Kirns. Dhrtenahatra then azked bim hos he could seo all that like riddhar, and Yudh alıtlun raid, 'Roaming by your order 11. fyrirts, I got this freulis by visiting I oly place Tras La mash tlo dsmp page and Lot fitml m tlHridge as nekr drrt angli. " la letra then iad, Wilson burn thero bodies nhub base note to 20. Lhrit. lcok siteit Tarlcald save the lcdies frem be ng dragged and cater 107424] Mababhar (७४२॥ धक्ष्यन्ति विधिपूर्वकम् ॥ २१ ॥ न येषां सात कचारी न च त्राहिताग्नयः। घपञ्च कस्य फुर्शम बहुरवात्तात् कर्मणः ॥२२॥ यान सुपर्णाश्च गृध्राश्च पिकन्ति ततस्ततः तेषान्तु कर्मणा लोका भविष्यन्ति युधिष्ठिर ॥ २३ ॥ पैशम्पायन उवाच । एवमुक्ती महाप्रान्त कुन्तीपुत्रोयुधिष्ठिरः । आदिदेश सुधर्माण धौम्यं सतम्च सञ्जयम् ॥ २॥ विदुरच महाबुद्धिं युयुत्सम्चैध कौरवम् । इन्द्रसेनमुखांश्चैव मृत्यान मुतांश सर्वर ९ २५॥ भवन्तः कारयन्वेषां तकाव्ण्यनशः । यथा चानायवत् फिठिच छरी। गविनश्यति ॥ २६ ॥ शासनाद्धर्मराजस्य क्षत्सा सूतश्च सञ्जयः । अधमा घोप हित इन्द्रसनाइयस्तथा ॥२७॥ चन्दनागुरुकाष्ठानि तथा कालीयकान्युत । घृत तिला गन्धांध क्षौमाणि घसनानि च ॥ २८ ॥ समारय महाहाणि दारुणावैध सअयान रयांध सूदितांस्तत्र.नानाप्रहरणानि च ॥ २९ ॥ चिता त्या प्रयत्नेन यथामुख्यान धिप । दाहयामासुरम्यमा वियिरष्टेन कर्मणा ३० ॥ दुर्योधनाच राजानं भ्रातुंचास्य और यहां जिनती अग्नि नियत नहीं है हे तात कर्मों की अधिकता से हा फिसमा क्रिपा कर्मकरें जिन्होंको सुवर्ण अर्थात् गरुड और गिद्ध इधर उध रो गोद हे युधिष्ठिर क्रियाकर्म से उन्हों के लोकहोंगे । २३ । बैशम्पायन बोले हे महाराज इस बचनको सुनकर कन्क पुत्र युधिष्ठिरने दुर्योधन के पुरोहित सुधी, धाम् ऋपि मूत संजय, बड़े बुद्धिमान् विदुरजी, कौरव युयुत्सु इन्द्रसेनादिन भृत्य और सव सूत । २५ । इन सबलोगोंको आज्ञाकरी कि भाप सवलोग इन्ही के सब मेतकार्यों को करो जिससे कि कोई शरीर अनाथ के समान नाशको न पावे । २६ । धर्मरागकी आज्ञा से विदुर मूतमंजप सुधर्म) और धाम्प पुरोहित समेत इन्द्रसेन और जयने । २७ । चन्दन, अगुरु, काष्ट और कालीपक घृता तेल, सुगन्धियां बहुमूल्य क्षोमवस्त्र । २८ । लकड़ियों के ढेर और वहां पर टूटेहुये रथ और नानाप्रकार के शस्रोंको इकट्ठा करके । २९ । सावधानों ने बड़े उपायों से चिताओंको बनाकर मुख्य २ राजाओंको शास्त्र विहित कर्मों के द्वारा घाई किया । ३० । राजा दुर्योधन उसके सौ भाई शल्य राजाशल भूरिश्रवा । ३१ away by tho 3nds ut jurug and shoulj burn them in accordance with the religious rites 23. Vaishampayan paid that on bearing Dhritra-intra's wrdi, Yudhishti.ir isked sidhuruin the priest of Daryodhan. Dinuings, Sinjaya, MindTr, Yuyutru tho haurav and Indrason and other servants and drivers to perform the funeral rites and let no corpo by destroyed for sant of caro. 26. By Yudhishthir's ordler Vidur, Sanjaya, 8 dlaruna, Domumyathe priest, Tollrasua and Jinya collected sandil, agur wood, gler, oil, porfumes, olitnes, the pref fuel. broken cars and werpons. They lion mad nemal piles and burnt orur them th-bxlist of chief binge with religious nts. 30. Prince Duryodhan with his hundreds urots.ors, Shniyas (७४२५] Stu Pain (7425 'शताविकान् । सल्लञ्च राजान भरिश्रयसमेव च ॥ ३१ ॥ अपद्रयाध राजान मभिमन्युश्च भारत । दीशासनि लमणञ्च धृष्टकेतुम्न पार्थवम् ॥ ३२ ॥ वृहन्तं सोमदनच सुजयां शताधिकान् । गजानं क्षमधन्धान विराटदुग्दो तथा ३३ ॥ शिवपिहनच पावाल्यं प्रद्युम्नश्च पार्पतम् युधामन्युञ्चाविकारतमुत्तमजिसमेवच ॥ ३४ ॥ कौशस्य द्रौपदेयांश्च शनिश्चैव प्रौयलम् । अवलं वृपय मगदलंच पार्थि पम् ॥कणे पैक चैन सहपुनममर्षण | कायांच महेवामाश्रिगतीश्च महारथान ५३दा मटोत्कचं राक्षसेन्द्रं वकमातरमेव । गलम्युचं राक्षसेन्द्रं जलसम्घञ्च पार्थि पम् ॥३७॥ अन्यांस पार्थिवान् अनु शतशोऽथ सहस्रशः । प्रतधाराहुनदीमः पावकै. समदाहयत् ॥ ३८ ॥ ये चाप्यगाथास्तत्रासन्नानादेशसमागताः । तांश्च सर्वान समा माय्य राशीन करना सहस्रशः ॥ ३९ ॥ चिया दारुमिरव्यप्रैः प्रभूतः स्नेहाचितः । वाहयामास विदुरो धर्मराजस्य शासनात् ॥ ४० ॥ कारयित्या क्रियास्वेषां कुरुराजो- युधिष्ठिरः। धृतराष्ट्र पुरस्करप गङ्गामभिमुखोऽगमत् ॥ ४॥ . .इति स्त्रीपणि श्राद्धपर्वाण युद्धमृतानामौदोहके पशोध्यायः २६ ॥ राजानपद्ध,अभिमन्यु दुश्शाशन के पुत्र लक्ष्मण राजा धृष्टकेतु । २२। इन्त सोम दम सैकड़ों मृजयदेशी, राजा क्षेमधन्मा, विराट द्रुपद । ३३ । शिखण्डी धृष्टद्युम्न पराक्रमी युधामन्यु उत्तमौनस कौशल्य द्रौपदीके पुत्र सौवलका पुत्र शकुनी, भचल पृषक गजा भगदत्त । १५ । क्रोपयुक्त मूर्य का पुत्र कर्ण पुत्रों समेत बड़े धनुषधारी केकयदेशी महारथी विगर्गदशी । ३६ । राक्षप्ताधिप घरोत्कच वकका भाई राक्षसोंकाराजा भलम्युप राजा नलप्तिन्ध इनको और अन्यहजारों राजा ३७ भोंको घत की धारामों से होमीहुई प्रकाशमानः अग्नियों से अच्छे प्रकारसे दाह किया। ३८। यहाँपर नानामकार के देशोंसे आनेवाले ज़ो भनाथ भी ये न सबको इकट्ठा करके ।३९। सीधे सद्धियुक्त तेल से संयुक्त लकड़ियों की चितामों से.विदुरभीने रानाकी भाज्ञानुमार उन सबको दाह किया कौरवराज युधिष्टिर उन्होंकी क्रियाओंको कराके धृतराष्ट्रको भागे करके श्रीगङ्गाजी के सम्मुख गये ४१ Sha!, Bhurishravn, Jayadrath, Abhimanyu, D 1+1iasan's sonx, Laksbe man, Dhrishtaketu. Vrihant, Somdatta, the Srinjayan, Kshemdharwa, Virat, Drupal, Shillandi, Dhrishtadyuinn, valiant Yodhamanga, Uttamauja", Kjealo, the sons of Drupad, Shakoni the con Surat, Achak, Vriehok, king Bhagdatta, 33. Ghatutkachi the prince of rakslase, Vak's brother Alabrush, Prince the Knikaya warriors and their king the Jalandh aud other great warriors by thousands were burnt with libatives of ghee. Other Warriors from different countries, laring no freinds, were collected together and barut. with lilations of oil by Ilaying p rformed their funeral cremoniea, Yudhichthir awal Phritrashtrs. went to the Gangca, rash Kuran the son of Surya, marriors of Tripart Vidur. .

17426] Mahabharat (७४२ धैशम्पायन उवाच । ते साध गंगगन्तु शियां पुण्यजलोषिताम् । इदिनों धम सम्पन्नां महानूपा महायलाम् ॥ १ ॥ भूषणाण्युत्तरीयाणि बेपनान्यवमुख्य ततः पितृणां पौत्राणां भ्रातृणां सजनस्यच॥२॥ पुत्राणामाऱ्याकाणाच पतीनांच कुत्रियः। उदफचकिरे सर्या रुदन्त्यो भूशदु खिताः। सदाचापि धर्मज्ञाः प्रचः सलिलक्रिया २॥लत कुन्ती म्हागज सहसा शोककाता। रुदती मन्दया धाचा पुत्रान पचन मनधीत् ॥ ४॥ यः स शरो महेपासो रथयधपयूथपम् । अर्जुनेन हतः संस्पे वारलक्ष णलक्षितः । ५॥ यं सूतपुत्रं मन्यधं गधेपमिति पाण्डवाः । यो व्यराजचमध्ये दिवा कर इय प्रभुः ॥ ६॥ प्रत्ययुध्यत यः सर्वान पुग घः सपदानुगान् । दुर्योधमधलं सर्व यः प्रकर्षन् व्यरोचत ।। | यस्य नास्ति समाधीये पृथिन्यामपि कश्चन । यो प्रणीत यश. शरः प्राणैरपि सदा भुवि ॥८॥ शत्यसन्धस्य शरस्य संग्रामेष्यपलायिनः । कुरु अध्याय २७। वैशम्पायन वाले कि उन्होंने कल्याणरूप पवित्र जलों से पूर्ण श्रीगङ्गाजी को और वही रूपवान् स्वच्छजल रखनेवाली इदिनीको पाकर । १ । उत्तरीयवस और पगड़ी प्रादि को उतारकर पिता भाई पौत्र समनपुत्र और नानाभी के जलदानोंको किया । २ । अत्यन्त दुखी रोनेवाली सब कौरवीय स्त्रियोंने अपने पतियोंको जलदान किंगा ॥ तवशोकति कुन्ती अकस्मात् अपने पुत्रोंसे यह वचन वोली । ४ । कि वह बड़ा धनुषधारी महारथी बारीक चिहनों से चिहिनत युद्ध | में अर्जुनके हाथ से विजय हुआ। ५ : हे पाडप तुम भिमको मृत और राधाका पुत्र मानने हो और जो ममर्थ मूर्य के समान सेनाके मध्य में विराजमान हुआ प्रथम जिप्सने तुम सब समेत तुम्हारे साथियों से युद्ध किया और जो दुर्योधनकी मन सेनाको बचता शोभामान हुमा निसके पलके समान सम्पूर्ण पृथ्वीपर कोई राजा नहींहै और जिम शूरने सदैव इस पृथ्वीपर शुभ कीर्ति को प्राणोंसे भी मधिक चाहा उस सत्यप्रतिज्ञ युद्ध में पराडमुख न होनेवाले । गमकर्मी अपने भाई CHPIER XXVII Valbampajan taid, "Going, to the Ganges, thu but of rivers and waters, they put off their clothes and offered water to the manes of thrir elders, BODe, kinsmen and friends. The Jamenting Kaurar somon offer od water to the manes of their ljoubanda Then Kanti, distio sed with grief, taid to her sons, Tho great a chior defeated by Anjun, known to you as the sun of Sut and Rilhn, who shone hke thyun in the field of bot .le, the foremstof your epponents, who led the Raurar forces, wl.o na tl.o aliongext of the princes of the world. who preferred fame to lifi, nas year truthinl and invincible brether ind therefore you muit offer water to bis , - - (७४२७) Stri Parvस्त्रीपर्व (7427 घमुदकं तस्य भ्रातुफ्लिप्टष मणे ॥९ । स हि प पूजो भ्राता भास्करामय्पना पत ! कुण्डली कषची शूर्ग दिवाकरसमप्रभः ॥ १० ॥ श्रुत्वा तु पाण्डघाः सर्वे मातुर्थ धनमप्रियम् । फर्णमेघावशीचन्त भूयश्चातगमन् ॥ ११ ॥ तत स् पुरुषव्याघ्र कुम्तीपुधोयुधिष्ठिरः 1 उवाच मातरं धीरो निश्यसानिव पन्नगः॥१९॥ यस्येषुपातमासाप नाम्यस्तिप्टेममयात् । भवत्यस फार्थ एत्रो देवगर्भः पुराभवत् ॥१३ ॥ महो भवत्या मन्द्रस्य ग्रहणेन व हता. निधनेन हि कर्णस्य पीडितास्मै सवान्धवाः॥१४॥ अभि मायोर्षिनाशेन द्रौपदेयषधेन च । पांचालामांय नाशेन फुरुणां पततेन च । १५४ तहः शतगुण दु खमिदं मामस्पशनृशंम् । कर्णमेघानुशोचन् हि सन्दह्यऽग्नाधियादित. ॥ १६॥ एवं विलय वरलं धर्मराजो युधिष्ठिर विनदन दुखितो राजा चारास्यो किं ममः ।। १७ ॥ तत मानाययामास फर्णस्य सपरिच्छया । त्रिय. पुरपीमान कर्ण का मलदान करो ।९। वह तुम्हारा वहाभाई मूर्यदेवता से मुझमें उत्सम हुआ या यह शूर कुमहल कवचधारी और सूर्य के समान तेजस्वी या। १० । सब पौर माता के उस अश्यि वचनको सुनकर कर्णको शोचतेहुये फिर पीड़ावान हुये । ११ । इसकेपीछे सर्प के समान श्वास लेता वह कुन्तीका पुत्र पुरुषोत्तम वीर युधिष्ठिर अपनी मातासे वोला । १२ । अर्जुन के सिवाय दूमरा मनुष्य जिसकी वाणष्टी को पार सम्मुख नियत नहीं हुआ वह देवकुमार पूर्वसमय कैसे भापका पुम हुआ । १३ । दुःखकी बात है कि भापके भेद यप्त करने से हम वानमा समेत कर्ण के मरनेऐ हम पान्धवों सपेन कर्ण के मरने से पाहावान हुये। १४ । भाभ मन्यु क्षेपदी के पुत्र पाचाकों के नाश और कौरवों के गिरने से भी हम पोहायान हुये परन्तु उनसवसेनी सौगुने इस दुःसने अब मुझको दवाया है में कर्णकाही शोच वाहुआ मानों जान में मियत होकर जलता ई.। १६ हे राना इमप्रकार युधिष्ठिरने चतुत विलाप करके धीरे २ बहुतरोदन किया इसके पीछे उसमभुने उसका नलदान किया ॥१७॥ इसके पछे उसे युद्धिमान कारखपति युधिष्ठिरने भाई के प्रेमसे off-p ing of Surya born with armour and ear-rings and gloriouslk, the Sun, 10. Hearing thes, unwelcome words of thóir gother all tha brothers Imere much grieved for Karan. mothor, " How could he, whose shower of arrows none bni Arjun your bon ! Alas! we aro undorio by your keeping the matter a secret and have to suffer tho pange of Karan's death. We are distressed for the death of Draupadi's sons and Panchale; but bundred times greater has been Karan's death. Tlus Yudhishthir sept much for Karan's d-ath and offered water to Thon for fraterasl love he धर्मराज and mysell, - tbo Ho was manes. Yudhishtbir then said, to bis could oppose, bo I burn for Kuran's death, " 19 sent for all the women of his manos.

The Mahabharat Sauptikparv

Author
Vedavyas,
Title
The Mahabharat Sauptikparv
File name
The Mahabharat Sauptikparv
Text
OCR done
Citation
1876
Published
2012/08
Publisher
Moradabad.,ram Krishna & Co.
Language
Sanskrit
Pages
179
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313084
Barcode
99999990321807.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
aXAxY2tFzWn
Download PDF

The Mahabharat Sauptikparv