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Gitaamrutarngini

Raghunath · 2012/08

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युद्धसग

यासही
सियाली
श्तराष्ट्र
समय
COEXCE

गीतामूर्ति.
विनय
जय
अथश्रीमद्भगवदीवार्थवाडूमयीमूर्तिः॥ श्लोसौवनाणि
पंचजानीहिपंचाध्यायाननुक्रमात्॥ दशाध्यायाभुजाश्चै
कमुरंद्वौपदांयुजे॥१॥ एवमष्टादवाध्यायीवाङ्मयीमूर्तिरै
श्वरी। जानीहिज्ञानमात्रेणमहापातकनाशिनी॥२|| ॥
इस मूर्तिमे अफ दालमे मतलब है कि जोजोअध्यायफे जोजो अगह उन अगामेन
अध्यायोकै भर तिरसे है।

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भूमिका हम वडे आनंदसे सर्व सद्धर्मावलंबियोंपर विदित करत है | यह "भगवद्गीता" ग्रंथ सर्व लोगोंको धर्मग्रंथ शिरोमणिरूपसे मान्य है प्रायः समस्त सनातनधर्माभिमानी विज्ञलोगोंको पाठ आता है. साधारणसभी साधारण क्यों न हो एक आध शेकका तो मुखसे उच्चारण करताही है. ऐसा इस ग्रंथका माहात्म्य है. यह क्यों नहीं हो कि, जो साक्षात् पद्मनाभ भगवान् श्रीकृष्णचंद्रजीने परम भक्त अर्जुनको श्रीमुखसे निरूपण करा है. जिसमें एकएक अक्षर तत्त्व- ज्ञानसे भराहुआ है. ऐसा यह ग्रंथ है तो इसकी इतनी महिमा होना पा आश्चर्य है। यह ऐसी गीता सर्व उपनिषदोंके साररूप है श्रीकृष्ण- तीने इसको निकाली है, अर्जुनजीने इसका प्रथम आस्वाद लिया है. इसके भोक्ता बुद्धिमान लोग हैं. यह परम पवित्र और चतुर्विध पुरुषार्थको सिद्ध करता है. ऐसा यह तत्त्वज्ञान महाभारतके भीष्मपर्वमें श्रीव्यासमुनिने ग्रंथरूपसे निरूपण किया है, यह ग्रंथ संस्कृतभाषामें रहनेसे इसका अर्थ समझनेमें साधारण लोगोंको पराधीन करता था. यह. न्यूनता देखकर मैंने इस ग्रंथकी "गीतामृततरंगिणी" नामक भाषाटीका निर्माण करी. इसको प्रथम आवृत्तिमें अन्यत्र छपवायाथा. वह आवृत्ति हाथों हाथ विकगई. इस वास्ते अब इस भापाटीकाका रजि- स्टो हक सदाहीके लिये यथोचित पारितोषिक पाकर बडे उत्साइसे श्रीमान् सेठ खेमराज श्रीकृष्णदासजी "श्रीवेदेवर" छापाखानाके अधिपतिको निवेदन किया है. उन सेठ श्रीखेमरान श्रीकृष्णदास- जीने यह ग्रंथ परम उत्साहसे अपने "श्रीवेङ्कटेश्वर" छापाखाने में भूमिका। सुंदर मनोहर अक्षरोंमें पुष्ट चिकने काग़जपर छापके प्रसिद्ध किया है यह उक्त सेठजीका परम उपकार है. अब हम आशा रखते हैं कि, इस अलभ्य मनोहर भापाटीकास- मेत पुस्तकको संग्रह करके भगवदुक्त तत्त्वज्ञानको पायकर परम आनंदका विद्वान् अनुभव करेंगे. सुकुल सीतारामात्मज- पण्डित रघुनाथप्रसाद.

॥ श्रीः॥ अथ श्रीभगवद्गीतामाहात्म्यम्। भाषाटीकासमेतम् । ऋषिरुवाच। गीतायाश्चैव माहात्म्यं यथावत्सुत मे वद ॥ पुराणमुनिना प्रोक्तं व्यासेन श्रुतिचोदितम् ॥ १॥ श्रीर्जयति ॥ नत्वा रामानुजं कृष्णं गीताचार्य जगद्गुरुम् ।। गीतामाहात्म्यसव्याख्यां कुर्वे प्राकृतभाषया ॥३॥ अनेकप्रकारकी कथा सुनते सुनते शौनकऋषी सूतजीसे प्रश्न करतेभये कि, हे सूत । जो श्रीमद्भगवद्गीताका माहात्म्य श्रीव्यास- जीने कहा है सो यथावत् मेरेको कहो ॥१॥ सूत उवाच ॥ पृष्टं वैभवता यत्तन्महदोप्यं पुरातनम्। केन वा शक्यते वक्तुं गीतामाहात्म्यमुत्तमम् ॥ २ ॥ शौनकका प्रश्न सुनिके सूतजी बोले कि, जो तुमने मेरेसे पूंछ। यह अतिगोप्य प्राचीन है. अति उत्तम यह गीताका माहात्म्य किसी करिके भी कहने में नहीं आता है ।।२।। कृष्णो जानाति वै सम्यक क्वचित्कौंतेय एव च ॥ व्यासो वा व्यासपुत्रो वा याज्ञवल्क्योऽथ मैथिलः॥३॥ सम्यक्प्रकारसे तो, कृष्णही जानते हैं और किंचित् अर्जुन तथा व्यासजी, शुकदेवजी, याज्ञवल्क्य अथवा जनक जानते हैं ॥३॥ अन्ये श्रवणतः श्रुखा लोके संकीर्तयंति च ॥ तस्मात्किचिद्रदाम्यद्य व्यासस्यास्यान्मया श्रुतम् ४

(६)
गीतामाहात्म्य ।
औरजन कानोंसे सुनिके लोकमें वर्णन भी करते हैं, परंतु जानते
नहीं हैं, इसते जैसा मैंने श्रीव्यासजीके मुखारविंदसे सुना है तैसा
कुछ थोडा कहूंगा ॥४॥
सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनंदनः॥
पार्थो वत्सः सुधीभॊक्ता दुग्धं गीताऽमृतं महत् ॥५॥
सर्व उपनिपदें तो गउरूप होतीभई दुहनेवाले श्रीकृष्ण और
बछरारूपी अर्जुन प्रथम पान करतेभये. पीछे यह गीतारूप दूध
अतिमिष्ट लोकमें प्रवर्त करतेभये ॥५॥
सारथ्यमर्जुनस्यादौ कुर्वन् गीतामृतं ददौ ॥
सर्वलोकोपकारार्थे तस्मै कृष्णाय ते नमः॥६॥
जो भगवान् प्रथम अर्जुनका सारथीपना करते करते सर्वलोकोंके
उपकारके वास्ते अर्जुनको गीतारूपं अमृत देता भया ऐसे आप
श्रीकृष्णको मेरा नमस्कार है ॥ ६ ॥
संसारसागरं घोरं तर्तुमिच्छति यो जनः ॥
गीतानावं समारुह्य परं याति सुखेन सः ॥७॥
जो संसारघोरसागर तरना चाहता होय, सो गीतारूप नावपर
बैठके सुखसे पार पाता है ॥७॥
गीताज्ञानं श्रुतं नैव सदैवाभ्यासयोगतः॥
मोक्षमिच्छति मूढात्मा याति बालकहास्यताम् ॥८॥
जिसने गीतासंबंधी ज्ञान सदा अभ्याप्तयोगसे नहीं सुना है और वह
मूर्ख मोक्ष चाहता है वह बालकोंकरिके उपहासको प्राप्त होता है ॥८॥
ये शृण्वंति पठेत्येव गीताशास्त्रमहर्निशम् ॥
नते वै मानुषा ज्ञेया देवा एव न संशयः ॥९॥

भाषाटीकासमेत जो रातदिन गीता पढते और सुनते हैं वे मनुष्य नहीं, देवताही हैं, ऐसे जानना यहां संशय नहीं॥९॥ गीताज्ञानेन संबोध्य कृष्णः प्राह तमर्जुनम् ॥ अष्टादशपदस्थानं गीताध्याये प्रतिष्ठितम् ॥ १० ॥ श्रीकृष्णभगवान अर्जुनको गीताके ज्ञानसे प्रबोधिके वोले कि, इसगीताके एकएक अध्यायमें अष्टादशपद् जो विष्णु उनका स्थान जो परमपद सो स्थापित किया है ।। १०॥ मोक्षस्थानं परं पार्थसगुणं वाथ निर्गुणम् ॥ सोपानाष्टादशैरेवं परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ ११ ॥ हे अर्जुन ! सगुण अथवा निर्गुण स्वइच्छाप्रमाण मोक्षस्थानपर इन अठारह अध्यायरूप सोपानोंकरिके परब्रह्मको प्राप्त होता है।।११॥ मलनिर्मोचनं पुंसांजलस्नानं दिने दिने.॥ सकृतीतांभसि स्नानं संसारमलनाशनम् ॥ १२ ॥ जो दिनदिनप्रति जलसान है सो शरीरमलका नाशक है और इसगीतारूप जलका स्नान संसारदुःखरूप मलका नाशक है ॥ १२ ॥ गीताशास्त्रस्य जानाति पठनं नैव पाठनम् ॥ परस्मान्न श्रुतं ज्ञानं नैव श्रद्धान भावन ॥ १३ ॥ स एव मानुषे लोके पुरुषो विद्धराहकः ॥ यस्माद्गीतां नजानाति नाधमस्तत्परो जनः ॥ १४ ॥ जो गीताशास्त्रका पढना पावना नहीं जानता है, न दूसरेसे सुना, न जिसके श्रद्धा है और न भावना है सो पुरुष इसलोकमें प्राम- (८) गीतामाहात्म्य। सूकरके समान है, जिसते कि, वह गीता नहीं जानता है तिसीसे उसके सिवाय दूसरा अधम नहीं है ।। १३॥ १४ ॥ धिक्तस्य मानुषं दे धिग्ज्ञानं धिकुलीनताम् ।। गीतार्थ न विजानाति नाधमस्तत्परो जनः ॥ १५॥ जो गीतार्थको नहीं जानता है उसके मनुष्यदेहको, ज्ञानको और कुलीनताको धिक्कार है और उससे अधिक कोई अधम नहीं है ।।१५॥ धिक्सुरूपं शुभं शीलं विभवं सहाश्रमम् ॥ गीताशास्त्रं न जानाति नाधमस्तत्परो जनः ॥१६॥ जो गीताशास्त्रको नहीं जानता है उसके सुंदररूपको, सुंदरशी- को, विभवको और श्रेष्ठगृहाश्रमको विकार है और उसते अधिक अधम दूसरा नहीं है ।। १६॥ धिक प्रागल्भ्यं प्रतिष्ठां च पूजां मानं महात्मताम् । गीताशाखे रतिनास्ति तत्सर्वं निष्फलं जगुः॥ १७॥ जिसकी गीताशाखमें प्रीति नहीं उसकी हिम्मत, प्रतिष्ठा, पूजा, मान और महात्मापनेको धिकार है और उसका सर्व निष्फल है ॥१७॥ धिक्तस्य ज्ञानमाचारं व्रतं चेष्टांतपो यशः॥ गीतार्थपठनं नास्ति नाधमस्तत्परो जनः॥१८॥ जिसके गीतार्थका पठन नहीं है तिसके ज्ञानको तथा आचार, व्रत, चेटा, तप और यशको धिकार है, उससे अधिक कोई जन अधम नहीं है ।। १८॥ गीतागीतं न यज्ज्ञानंतद्विद्धयासुरसंज्ञकम् ॥ तन्मोघं धर्मरहितं वेदवेदांतगर्हितम् ॥ १९ ॥ जो ज्ञान गीताका गाया नहीं है उस ज्ञानको आसुरी ज्ञान जा- प भाषाटीकासमेत। ननाः वह व्यर्थ और धर्मरहित तथा वेदवेदांतकारके निंदित है।॥ १९॥ यस्माद्धर्ममयी गीता सर्वज्ञानप्रयोजिका ॥ सर्वशास्त्रमयी गीता तस्माद्गीता विशिष्यते ॥२०॥ जिसवास्ते कि, गीता धर्ममयी और सर्वज्ञानोंकी प्रवर्तकरने- वाली है और सर्वशास्त्रमयी है। ऐसा कहा है, तिससे गीता सबशा- स्त्रोंसे श्रेष्ठ है ॥२०॥ • योऽधीते सततं गीतां दिवा रात्रौ यथार्थतः ॥ वपन्गच्छन्वदस्तिष्ठञ्छाश्वतं मोक्षमाप्नुयात् ॥ २१॥ जो निरंतर गतिदिन अर्थसहित गीताको सोते, चलते, पोलते, खडेभी पढते रहते हैं वे सनातन मोक्षको प्राप्त होते हैं ॥२१॥ शालग्रामशिलाग्रे तु देवागारे शिवालये॥ तीर्थे नद्यां पठेद्यस्तु वैकुंठं याति निश्चितम् ॥ २२॥ शालग्रामके संमुख देवमंदिरमें, शिवालयमें, तीर्थमें और नदी- किनारे जो गीताको पढता रहै सो निश्चय वैकुंठको जाताहै ॥ २२ ॥ देवकीनंदनः कृष्णो गीतापाठेन तुष्यति ॥ यथा न वैदैनिश्च यज्ञतीर्थव्रतादिभिः ॥ २३॥ जैसे श्रीदेवकीनंदन कृष्ण गीतापाठसे संतुष्ट होते हैं। तैसे वेद- पाठ, दान, यज्ञ, तीर्थ और व्रतादिकोंसे नहीं संतुष्ट होते हैं ॥२३॥ गीताऽधीता च येनापि भक्तिभावेन चेतसा ॥ तेन वेदाश्च शास्त्राणि पुराणानि च सर्वशः॥२४॥ जिनने भक्तिभावपूर्वक चित्त लगायके गीताका अध्ययन किया उसने सर्व वेद, शास्त्र और पुराणभी पठचुका ॥२४॥ योगिस्थाने सिद्धपीठेशिष्टाग्रे सत्सभासु च ॥

. (१०) गीतामाहात्म्य। यज्ञे च विष्णुभक्ताग्रे पठन्याति परां गतिम् ॥२५॥ योगीके स्थानमें, विंध्येश्वरी इत्यादि सिद्धपीठमें, श्रेष्ठपुरुपके संमुख, साधुसभामें, यज्ञमें और विष्णुभक्तके संमुख पाठ करनेसे मोक्ष पावेगा ॥२५॥ गीतापाठश्रवण के यः करोति दिने दिने। क्रतवो वाजिमेधीद्याः कृतास्तेन सदक्षिणाः ॥ २६ ॥ जो दिनदिन प्रति गीताका पाठ और श्रवण करता है तिसने सब अग्निष्टोमादिक और अश्वमेधादिक दक्षिणासहित यज्ञ करचुका ॥२६॥ यः शृणोति च गीताथै कीर्तयेच्च स्वयं पुमान् ॥ श्रावयेच्च पराथै वै स प्रयाति परं पदम् ॥ २७॥ जो गीताका अर्थ सुने और आप कहै दूसरोंको श्रवण करावे सो परमपदको प्राप्त होताहै ॥२७॥ गीतायाः पुस्तकं नित्यं योऽर्चयत्येव सादरम् ॥ विधिना भक्तिभावेन तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ २८॥ जो आदरपूर्वक नित्य गीताके पुस्तकको विधिपूर्वक भक्तिभा- वसंयुक्त पूजेगा उसके पुण्यका फल सुनो ॥२८॥ सकला चोरा तेन दत्ता यज्ञे भवत्किल ॥ व्रतानि सर्वतीर्थानि दानानि सुवहून्यपि ॥ २९॥ उस गीताके पूजनेवालेने यज्ञमें सर्व पृथ्वी दान देचुका तथा सर्वत्रत, सर्वतीर्थ और बहुतसे दानभी देचुका ॥२९॥ भूतप्रेतपिशाचाद्यास्तत्र नो प्रविशति वै । अभिचारोद्भवं दुःखं परेणापि कृतं च यत् ॥ ३० ॥ जिस घरमें गीताका पूजन होता है तहां भूत, प्रेत, पिशाचादिक भाषादीकासमेत। और दूसरेके कियेभये मंत्रयंत्रादिक अभिचारज दुःखभी नहीं प्रवेश कर सकते हैं ।॥३०॥ नोपसर्पन्ति तत्रैव यत्र गीतार्चनं गृहे ॥ तापत्रयोद्भवा पीडा नैव व्याधिमयं तथा ॥ ३१ ॥ जिसघरमें गीताका पूजन है तहां देहिक, दैविक और भौतिक इन तीनों तापोंकी पीडा और रोगकृतपीडाभी नहीं होती है ॥३१॥ न शापौ नैव पापं च दुर्गतिन च किंचन ॥ देहेऽरयः षडेते वैन बाधते कदाचन ॥ ३२॥ वहां कोईका शाप और पाप और दुर्गति तथा देहमें रहे जो पांच ज्ञानेंद्रिय, एक मन ऐसे छ: शड वेभी पीडा नहीं करते हैं ॥ ३२॥ भगवत्परमेशाने भक्तिरव्यभिचारिणी॥ जायते सततं तत्र यत्र गीताभिनंदनम् ॥ ३३॥ जहां गीताके अर्थका निरंतर विनोद होता है तहां भगवानमें अतिउत्तम अखंडभक्ति उत्पन्न होती है।॥ ३३॥ प्रारब्धं भजमानोऽपि गीताभ्यासे सदा रतः ।। स मुक्तः स सुखी लोके कर्मणा नैववध्यते ॥३४॥ जो सर्वकाल गीताहीके अभ्यासमें निरत है वह प्रारब्धवशसे संसारभी भोगता है, तोभी वह मुक्त और सुखी है, तथा कमसेभी बंधनेका नहीं ॥३४॥ महापापादिपायानि गीताऽध्यायी करोति चेत् ॥ न किंचित्स्टशते तं तु पद्मपत्रमिवांमसा ॥ ३५ ॥ जो नित्य गीताका श्रवण, पठन, मनन करता होय और वह दै

(१२)
गीतामाहात्य।
योगसे जो भूलमें ब्रह्महत्यादिक महापापभी करे तो भी जलकरके
कमलपत्रवत् लिप्त नहीं होता है ॥ ३५॥
स्नातो वा यदि वाऽस्नातः शुचिर्वा यदि वाऽशुचिः॥
विभूतिं विश्वरूपश्च संस्मरन्सर्वदा शुचिः ॥३६ ॥
स्नान किये होय अथवा न किये होय, पवित्र होय अथवा अप-
वित्र होय, विभूतियोग और विश्वरूपदर्शन अध्यायको पढताभया
सदा पवित्र होता है ॥३६॥
अनाचारोद्भवं पापमवाच्यादिकृतं च यत् ॥
अभक्ष्यभक्षजं दोपमस्टट्यस्पर्शजं तथा ॥ ३७॥
ज्ञाताज्ञातकृतं नित्यमिंद्रियैर्जनितं च यत् ॥
तत्सर्वं नाशमायाति गीतापाठेन तत्क्षणात् ॥ ३८॥
जो अनाचारसे और जो निदितशब्द बोलनेसे, जो अभक्ष्यभक्ष-
णसे जो न छूने योग्यके छूनेसे, पाप भये हों तथा जो जान और
अजानमें नित्य पाप भयेहों और जो इंद्रियोंसे पाप भया हो सो सर्व
गीतापाठसे तत्काल नष्ट होता है ॥ ३७॥३८॥
सर्वत्र प्रतिभोक्ता च प्रतिग्राही च सर्वशः ॥
गीतापाठं प्रकुर्वाणो न लिप्येत कदाचन ॥ ३९ ॥
जो सर्वत्र भोजन करता हो सर्वप्रतिग्रह लेताहो उसके भी
पापों करके गीतापाठसे लिप्त नहीं होता है ।। ३९ ॥
रत्नपूणी महीं सवी प्रगृह्यापिविधानतः॥
गीतापाठेन चैकेन शुद्धःस्फटिकवत्सदा ॥४०॥
विधिहीन रत्नपूरित पृथिवीका दानभी लेके एक गीतापाठसे
शुद्ध स्फटिकमणिवत निष्पाप होताहे ॥१०॥

1
माषाटीकासमेत।
(१३)
यस्यांतःकरणं नित्यं गीतायां रमते सदा॥
सर्वाग्निकः सदाजापी क्रियावान्सच पंडितः॥४१॥
जिसका अंतःकरण सदा गीतामें रमता हो सो सर्वअग्निहोत्री
सदा जप करनेवाला, सो क्रियावान् और सोई पंडित है ॥४१॥
दर्शनीयः स धनवान्स योगी ज्ञानवानपि ॥
स एव याज्ञिको ध्यानी सर्ववेदार्थदर्शकः॥४२॥
सोई दर्शनयोग्य है, सोई धनवान, सोई योगी, सोई ज्ञानवान्, सोई
याज्ञिक, सोई ध्यानी और सोई सर्ववेदोंके अर्थका देखनेवालाहै ॥४२॥
गीतायाः पुस्तकं यत्र नित्यं पाठे प्रवर्तते ॥
तत्र सर्वाणि तीर्थानि प्रयागादीनि भूतले ॥४३॥
गीताका पुस्तक जहां नित्य पाठमें प्रवर्त्त हो तहां पृथिवी-
परके सर्व प्रयागादितीर्थ सदा रहते हैं ॥१३॥
निवसति सदा गेहे देहदेशे सदैव हि ॥
सर्वे देवाश्च ऋषयो योगिनः पन्नगाश्च ये॥४४॥
और यहां घरमें और देहमें भी सर्व देव, ऋपि, योगी और पन्नगभी
सदा वसते हैं ॥४॥
गोपालवालकृष्णोपि नारदध्रुवपार्षदैः॥
सहायो जायते शीघ्रं यत्र गीता प्रवर्त्तते ॥४५॥
जहां गीता प्रवृत्त होती है तहां नारद, ध्रुव और सर्व पार्षदनस-
हित गोपाल-बालकृष्ण शीघ्रही सहाय होते हैं॥४५॥
यत्र गीताविचारश्च पठन पाठनं तथा ॥
तत्राहं निश्चितं पार्थ निवसामि सदैव हि ॥ ४६॥

.
गीतामाहात्म्य।
श्रीकृष्ण अर्जुनसे कहते हैं कि, हे पार्थ ! जहां नित्य गीताका
विचार होता है। तहां मैं निश्चय सर्वदा रहता हूं ॥४६॥
गीता मे हृदयं पार्थ गीता मे सारउत्तमः ॥
गीता मे ज्ञानमत्ययं गीता मेज्ञानमक्षयम् ॥४७॥
हे अर्जुन ! गीता मेरा हृदय है, गीता मेरा उत्तम सार है, गीता
मेरा अतिअयज्ञान और अक्षयज्ञानभी है ॥ १७ ॥
गीता मे चोत्तमं स्थानं गीता मे परमं गृहम् ॥
गीताज्ञानं समाश्रित्य त्रिलोकी पालयाम्यहम् ॥ ४८॥
गीता मेरा उत्तमस्थान है और गीता मेय उत्तम सार है, गीता-
के ज्ञानको धारण किये भये तीनों लोकोंका पालता हूं ॥ १८॥
गीता मे परमा विद्या ब्रह्मरूपा न संशयः॥
अर्द्धमात्राक्षरा नित्या त्वनिर्वाच्यपदात्मिका ॥४९॥
गीता मेरी उत्तम विद्या है, गीता ब्रह्मरूप है, इसमें संशय नहीं ।
अपात्रा, नाशरहित, सनातन, अनिर्वाच्यपदरूप ऐसी परावाणी-
रूप मेरी यह गीता है ॥ १९॥
गीतानामानि वक्ष्यामि गुह्यानि शृणु पांडव ॥
कीर्तनात्सर्वपापानि विलयं यांति तत्क्षणात् ॥५०॥
हे,पांडव : गीताके जो गुप्त नाम हैं सो मैं तुमसे कहता हूं
जिनके कीर्तनसे तत्काल सर्वपापक्षय होते हैं ॥५०॥
अथ गीतानामानि ।
गीता गंगा च गायत्री सीता सत्या सरस्वती ॥
ब्रह्मविद्या ब्रह्मवल्ली त्रिसंध्या मुक्तगेहिनी ॥५१॥

भाषाटीकासमेत। अर्द्धमात्रा चिदानंदा भवनी भयनाशिनी ॥ वेदत्रयी पराऽनंता तत्त्वार्थज्ञानमञ्जरी ॥५२॥ इत्येतानि जपन्नित्यं नरो निश्चलमानसः ॥ ज्ञानसिद्धिं लभेच्छीघ्र तथांते परमं पदम् ॥ ५३॥ अब गीताके नाम कहते हैं+गीता ३ गंगार गायत्री सीता सत्या ६ सरस्वती ब्रह्मविद्या । ब्रह्मवलीट त्रिसंध्या ९ मुक्तगहि- नी ११ अर्द्धमात्रा १३ चिदानंदा १३ भवनी ११भयनाशिनी १४ वेदत्रयी १६परा १६ अनंता १तत्त्वार्थज्ञानमंजरी ॥ १८॥५१॥ ॥५२॥ गीताके इन अठारह नामनको नित्य मन स्थिर करके जपता रहै तो शीघही ज्ञानसिद्धिको प्राप्त होके, अंतमें मोक्षको प्राप्त होताहै ॥ ५३॥ पाठेऽसमर्थः संपूर्णे तदई पाठमाचरेत् ॥ तदा गोदानजं पुण्यं लभते नात्र संशयः ॥ ५४॥ जो संपूर्ण पाठ न करसके तो आधीगीताका याने नव अध्यायन- का पाठ करे, तो एक गोदानका पुण्य पावै। इसमें संशय नहीं ॥५४॥ पडंशं जपमानस्तु गंगास्नानफलं लभेत् ॥ विभागं पठमानस्तु सोमयागफलं लभेत् ॥ ५५ ॥ छठे अंशको याने तीन अध्यायोंका नित्य पाठ करें तो गंगास्ना- नका फल पावे. तीसरे भागका याने छः अध्यायनका नित्य पाठ करनेसे सोमयागका फल पावै ॥५५॥ तथाऽध्यायद्यं नित्यं पठमानो निरंतरम् ॥ इंद्रलोकमवाप्नोति कल्पमेकं वसेद्धवम् ॥ ५६ ॥ दो अध्यायोंका नित्य पाठ करता रहै तो इंद्रलोकको प्राप्त होके, वहां एककल्प वास करे ॥५६॥ .

(१६) गीतामाहात्म्य । एकमध्यायकं नित्यं पठते भक्तिसंयुतः ।। रुद्रलोकमवाप्नोति गणो भूत्वा वसच्चिरम् ॥ ५७ ।। जो एकही अध्यायका निरंतर नेमसे भक्तिपूर्वक पाठ करतारहे तो रुद्रलोकको प्राप्त होके वहां शंकरका गण होके, बहुतकाल पर्यंत याने कल्पपर्यंत रहिके मुक्त होताहे ॥१७॥ अध्यायाच च पादं वा नित्यं यः पठते जनः॥ स प्राप्नोति खेलोकं मन्वंतरशतं समाः॥५८॥ जो मनुष्य गीताका आधा अथवा पाव अध्यायकाभी नित्यने- मसे पाठ करता रहै, तो वह सूर्यलोकमें सौ मन्वंतरके वर्षांपर्यंत वास करै ॥२८॥ गीतायाः श्लोकदशकं सप्त पंच चतुष्टयम् ॥ त्रिकद्विकैकमर्दू वा श्लोकानां च पठेन्नरः॥ चंद्रलोकमवाप्नोति वर्षाणामयुतायुतम् ॥ ५९ ॥ जो गीताके दशश्लोक अथवा सात पांच .चार तीन दो एक अथवा आधे शोककाभी निरंतर पठन करे, तो अयुतायुतवर्ष याने दशकोटिवर्प १०,००,००,००० चंद्रलोकमें वास करेगा ॥ ५९॥ गीतार्थमेककालेपि श्लोकमध्यायमेव च ॥ स्मरंस्त्यक्त्वा जनो देहं प्रयाति परमं पदम् ॥६॥ जो एककालभी गीताके एकश्लोकका अथवा अध्यायका अर्थ स्मरताभया देहको त्याग तो मोक्षको पावै ॥६॥ गीतार्थ वापि पाठं वा शृणुयादंतकालतः॥ महापातकयुक्तोपि मुक्तिभागी भवेन्जनः ॥६॥ .

(१७) भाषाटीकासमेत। जो अंतकालके समयमें गीताका अर्थ अथवा पाठ सुनता देह त्यागे, तो महापातकीभी मुक्त होय ॥ ६ ॥ गीतापुस्तकसंयुक्तः प्राणांस्त्यक्त्वा प्रयाति यः॥ स वैकुंठमवाप्नोति विष्णुना सह मोदते॥६२॥ जो गीताके पुस्तकयुक्त प्राणोंको त्यागे, सो विष्णुलोकको प्राप्त होके विष्णुके समीप आनंद करै ॥ १२ ॥ गीताध्यायसमायुक्तो सृतो मानुषतां व्रजेत् ।। गीताभ्यासं पुनः कृत्वा लभते मुक्तिमुत्तमाम् ॥६३॥ जो मरणसमयमें गीतापुस्तकका एक अध्याय भी समीप होय तो मनुष्यजन्म पायके फिर गीताभ्यास करके मुक्त होय ॥ ६३ ॥ गीतोच्चारणसंयुक्तो श्रियमाणो गतिं लभेत् ॥ यद्यत्कर्म च सर्वत्र गीतापाठं प्रकीर्तयेत् तत्तत्कर्म च निर्दोपं कृत्वा पूर्णमवाप्नुयात् ॥६॥ मरनेपरभी जो गीता ऐसा उच्चारण करके मरे तो भी मुक्त होय जो जो कर्म करे उस उसमें गीतापाठ करे तो निषिकर्मका संपूर्ण फल पावे ॥६॥ पितृनुद्दिश्य यः श्राद्ध गीतापाठं करोति वै । संतुष्टाः पितरस्तस्य निरयाद्यांति सगतिम् ॥ ६५ ॥ जो श्राद्ध में पितरनके निमित्त गीताका पाठ करे तो वे पितर संतुष्ट भयेहुये नरकसे मुक्तिको जॉय ॥ ६५ ।। गीतापाठे तु संतुष्टाः पितरः श्राद्धतर्पिताः॥ पितृलोकं प्रयांत्येव पुत्राशीर्वादतत्पराः ॥ ६६ ॥ गीतापाठसे प्रसन्न पितर पुत्रको आशीर्वाद देतेभये पितृलोकको जाते हैं ॥६६॥ १

(१८)
गीतामाहात्म्य।
लिखित्वा धारयेत्कंठे वाहुदंडे च मस्तके ॥
नश्यंत्युपद्रवाः सर्वे विनरूपाश्च दारुणाः ॥ ६७ ॥
गीताको लिखके गलेमें, भुजापर अथवा मस्तकमें धारण करे
तो उसके विनरूप दारुण उपद्रव नास होय ॥६७ ॥
गीतापुस्तकदानं च धेनुपुच्छसमन्वितम् ॥.
दत्वातत्सहिजे सम्यहवार्थों जायते जनः ॥६८ ॥
गोदान देनेपर गाईकी पूंछसहित हाथमें गोताका पुस्तक लेके
जिसने दान दिया वह सर्व करचुका ।। ६८॥
पुस्तकं हेमसंयुक्तं गीतायाः शुद्धमानसः॥
दत्वा विप्राय विदुषे जायते न पुनर्भवे ॥६९॥
सुवर्णसंयुक्त गीतापुस्तकका दान जो शुद्धमन्से विद्वान ब्राह्मण-
को देय, सो फिर जन्म न पावै ।। ६९ ॥
शतपुस्तकदानं च गीतायाः प्रकरोति यः॥
सयाति ब्रह्मसदनं पुनरावृत्तिवर्जितम् ॥ ७० ॥
जो गीताके सौ पुस्तकोंका दान करे, तो जिसलोकसे फिर
इहां नहीं जन्मता है। उस वैकुंठको जाता है ।। ७० ॥
गीतादानप्रभावेण सप्तकल्पावधीः समाः॥
विष्णुलोकमवाप्नोति विष्णुना सह मोदते ॥ ७१ ।।
गीतादानके प्रभावसे विष्णुलोकमें सात कल्पपर्यंत विष्णुसंयुत्त
रहके आनंद करे ॥७॥
सम्यक् श्रुत्वा च गीतार्थ पुस्तकं यः प्रदापयेत् ॥
तस्मैप्रीतोस्मिभगवान्ददामि मनसेप्सितम् ॥ ७२ ॥

" भाषाटीकासमेत। श्रीकृष्ण कहते हैं कि, जो गीताका अर्थ सुनिके पुस्तकका दान करे; उसको मनवांछित फल देता हूं॥७२॥ देहं मानुषमाश्रित्य चातुर्वण्र्येषु भारत ॥ न शृणो- ति पठत्येव गीताममृतरूपिणीम्॥७३॥ हस्तात्त्य- स्त्वाऽमृतं प्राप्तं कष्टात्वेडं समश्नुते ॥ पीला गी- तामृतं लोके लब्ध्वा.मोक्षं सुखी भवेत् ॥॥७४ ॥ जो मनुष्य देह पाइके इस अमृतरूपिणी गीताको नहीं पढताहे और नहीं सुनता है सो हाथमें आयेभये अमृतको त्यागके विपको कष्टसे पीता है। इस गीतारूप अमृतका पान करके मोक्षको प्राप्त होके सुखी होता है॥७३॥७४॥ जनैः संसारदुःखात्तगीताज्ञानं च यैःश्रुतम् ॥ संप्राप्तममृतं तैश्च गतास्ते सदनं हरेः ॥ ७५॥ संसारदुःखकरके पीडित जिन मनुष्योंने इस गीताके ज्ञानको सुना वे अमृत होके विष्णुलोकको प्राप्त भये ॥ ७ ॥ गीतामाश्रित्य बहवो भूभुजो जनकादयः॥ निर्धूतकल्मषा लोके गतास्ते परमं पदम् ॥ ७६ ॥ इस गीतका आश्य करके, बहुलसे जनकादिक राजा पापरहित होके परमपदको गये हैं ।। ७६ ॥ गीतासु न विशेषोस्ति जनेषूच्चावचेषु च ॥ ज्ञानेष्वेव समग्रेषु समा ब्रह्मस्वरूणी ॥ ७७ ॥ गीतामें नीच ऊंचका विशेष नहीं, आत्मा सबमें; समान है। इससे यह ब्रह्मस्वरूपिणी है ।।७७॥ योभ्यसूयति गीतां च निंदां वा प्रकरोति च ॥

(२२) गीतामाहात्म्य । जो गीताको सुनके और पढके माहात्म्यको पढते सुनते हैं ने मनइच्छित फलको पाते हैं ।। ८८॥ इति श्रीमद्वाराहपुराणे मूतशौनकसंवादे श्रीकृष्ण- प्रोक्तं श्रीमद्भगवद्गीतामाहात्म्यं संपूर्णम् । इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिता श्रीमद्भगवद्गीतामाहात्म्यचंद्रिकाव्याख्या समाप्तिमगाव ।। ॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥ ॥ शुभं भवतु ॥ आपका-खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम् प्रेस, खेलबाड़ी-बबई.

श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भगवद्गीता।
सान्धय-अमृततरंगिणीभाषाटीकासमेता।
श्रीजयति।
प्रणम्य परमात्मानं कृष्ण रामानुज गुरुम् ॥.
गोताव्याख्यामहं कुर्वे गीतामृततरंगिणीम् ॥१॥
धृतराष्ट्र उवाच।
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः॥
मामकाः पार्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥ १ ॥
जब श्रीकुरुक्षेत्रमें दुर्योधनादिक धृतराष्ट्रके पुत्र और युधिष्ठिरा-
दिक पांडके पुत्र आपआपकी सेनाओंको लेके युद्धके वास्ते तयार
भये तब यहां हस्तिनापुरमें धृतराष्ट्र संजयसे पूछने लगे कि, हे संजय !
धर्मस्थल कुरुक्षेत्रमें युद्धकी इच्छा कियेभये इकडे भयेहुये मेरे पुत्र
और पांडके पुत्र ये निश्चयकरके क्या करनेको प्रारंभ करते भये सौ.
कहो ॥१॥
संजय उवाच ।
दृष्ट्वा तु पांडवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचैनमनैवीत् ॥२॥
ऐसे धृतराष्ट्रके वाक्य सुनिके संजय कहते भये कि, हे राजन् !
राजा दुर्योधन तवे व्यूहरचनायुक्त पांडवनकी सेनाकोदेखके और द्रोणा-
चार्यके समीपं जाके वचन बोलतेभये ॥२॥
पश्यैती पांडुपुत्राणामाचार्य महती चमूम् ॥
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥३॥

(२४) भगवद्गीता। [अध्याय:- हे आचार्य ! जो तुम्हारी बुद्धिमान शिर्प द्रुपदेका पुत्र धृष्ट- युम्न तिसकरके यथायोग्यस्थानोंपर स्थापित पांडपुत्रोंकी इस सर्वो- त्तम सेनीको आप देखो ॥३॥ अत्र शूरी महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि । युयुधानो विराटश्च द्रुपदैश्चं महारथः ॥ ४ ॥ इससेनों में जो युद्धकरनेमें भीम अर्जुनके समान बडे धनुपारी शुरै हैं वे ये कि, युयुधान और विराट और महारथी द्रुपद ॥४॥ धृष्टकेतुश्चेकितानः काशीराजश्च वीर्यवान् । पुरुजित्कुंतिभोजश्च शैब्यश्च नरपुंगवः॥५॥ धृष्टकेतु चेकितान और बलवान् काशीका रोजा तथा पुरुजित और कुंतिभोज और नरोंमें श्रेष्ठं शैव्यं ॥५॥ युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ॥ सौभद्रो द्रौपदेयाँच सर्व एव महारथाः॥६॥ पराक्रमी और उत्तमशक्तिवाला और धीरजवान ऐसा युधामन्यु सुभद्राका पुत्र अभिमन्यु और महास्थवाले संवहीं" द्रौपदीके पुत्र जिसमें इसप्रकार पांडवोंकी सेना रची है ॥६॥ अस्माकं तु विशिष्टाय तौन्निबोधं द्विजोत्तम । नार्यका मम सैन्यस्य संज्ञाथ तान्वीमि ते ॥७॥ हे द्विजोत्तम ! इमारनमें जो श्रेष्ठ और हमारी सेना के पति हैं उनको जाननेके वास्ते तुलारसे कहती हूं तिन्होंको जोनो॥७॥ भवाने भीष्मश्च कणर्य कृपश्चै समितियः ।। अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥८॥ जो हमारी सेनामें मुख्य हैं उनमें एक आप हो और भीष्म और कर्ण

(२५)
सान्वय-
प्रथमः १.]
-अमृततरंगिणी भा० टी०॥
और संग्रामके जीतनेवाले कृपाचार्य अश्वत्थामा और विकर्ण
और तैसी ही राजा सोमदत्तका पुत्र भूरिया ॥ ८ ॥
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।।
नानास्त्रिप्रहरणाः सर्वे युविशारदाः ॥९॥
और मेरेवास्ते जीवितको त्यागनेवाले और नानात्रिोंके प्रहारकर-
नेवाले और भी सर्व युद्धचतुर ऐसे बहुत शुरे हैं ॥९॥
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ॥
पर्याप्तं त्विदमेतेषां वलं भीमाभिरक्षितम् ॥१०॥
हमारी सेना भीष्मंकरके रक्षित है तिससे असमर्थ है और इनकी
यह सेना भीमकरके रक्षित है इससे वलिष्ट है. तात्पर्य यह है कि, भीष्म
उभयपक्षपाती हैं ॥ १०॥
अयने' चं सर्वेषु यथाभांगमवंस्थिताः ।।
भीष्ममेवाभिरक्षतु भवतः सर्वएव हि ॥ ११ ॥
इससे सर्व नाकेनपर यायोग्य भागबनायेभये खड़े रहके तुम
संबही निश्चयकरके भीष्मका ही संरक्षण करो ॥११॥
तस्यं संजनर्यन्हप कुरुवृद्धः पितामहः ॥
सिहनादं विनंद्योच्च-शखं दध्मौ प्रतापवान् ॥ १२॥
ऐसे सुनके बडेप्रतापवान् कोखनमें धुंद्ध पितामह भीष्म उस दु-
योधनको हेर्प उत्पन्नकरनेवाले ऊंचेस्वरसे सिंहनादसे गर्जनाके
र शंखको बनातेभये ॥ १२॥
ततः शंखांश्च भेयश्चं पणवानकगोमुखाः ॥
सहसवाभ्यहन्यंत से शब्दस्तुर्मुलोऽभवत् ॥ १३ ॥

(२६)
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
तवं शंख और भैरी और तासे नगारे रंणसिंहे एकसंग हीवनतेभेये
'सो शब्द मिश्रितभारी होतामयीं ॥१३॥
ततः श्वेतैयैर्युक्ते महति स्यदने स्थितौ ॥
माधवः पांडवंश्चैव दिव्यौ शंखी प्रैदध्मतुः ॥ १४ ॥
तये जिसमें वेतं घोड़े जोर्डे हैं ऐसे श्रेष्ट स्थपर बैठेभये कृष्ण और
अर्जुन दिव्य शेखोंको बजातेभये ॥ १४ ॥
पांचजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजयः।।
पौडूं दध्मौ महाशंख भीमकर्मा कोदरः ॥१५॥
तहां श्रीकृष्ण पांचजन्यको, अर्जुन देवदतको, भयंकर है कर्म
जिसका ऐसा वृकोदर याने तीक्ष्णामिउदरवालाअर्थात् भीम पौंडूनामक
महाँशंखको वजोतेभये ॥५॥
अनंतविजेयं राजा कुंतीपुत्रो युधिष्ठिरः॥
नकुलः संहदेवश्च मुघोपमणिपुष्पकौ ॥ १६ ॥
कुंतीका पुत्र राजा युधिष्ठिर अनंतविजयशंखको, नकुल और
संहदेव सुघोप और पुष्पकशं खोंको, क्रमसे वजातेभये याने नकुल
सुघोपको और सहदेव मणिपुष्पको वजातेभये ॥ १६॥
काश्यश्च परमेष्वांसः शिखंडी च महारथः
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥ १७॥
श्रेष्टधनुपवालों काशीका रोजा और महारथ शिखंडी और धृष्टद्युम्न
और विराट और शडनकरिके अजित सात्यकि यादव ।। ३७ ॥
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः टथिवीपते॥
सौभद्रश्च महाबाहुः शंखाँन्दध्मः पृर्थक्टक ॥ १८॥

प्रथमः १.] सान्वय-अमृततरंगिणी मा० टी०। (२७)
हे पृथ्वीनाथ ! राजाद्रुपद और सँव द्रौपदीके पुत्र और महावाहु
अभिमन्यु ये न्यारे न्यारे शंखों को बजेतिभये ॥१८॥
से घोपो धार्तर्राष्ट्राणां हृदयानि व्यदौरयत्॥
नमश्च {थिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥ १९॥
सो मिश्रित ऐसा बैंडा शब्द आकाश और पृथिवीको शब्दीयमा. .
न करनेवालाधृतराष्ट्र के पुत्रोंके हृदयोंको ही"विदीर्णकरताभया॥१९॥
अंथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः॥
प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पांडवः ॥२०॥
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाहे महीपते ॥
सेनयोरुभयोमध्ये रैथे स्थापय मेंऽच्युत ॥ २१ ॥
हे महीपते। तवं शस्त्रपात प्रवृत्तहानेके समयमें कपिध्वज पांडव अर्जुन
तुम्हारे पुत्रोंको युद्धार्थ संडे देखेके त धनुर्पको ऊंचाकरके अंक-
णसे ये वाक्य बोलते ये कि, हे अच्युता दोनों सेनाओं के मध्य में
मेरे" रथको स्थापितकरो॥२०॥२३॥
यौवदेतानिरीक्षेऽहं योर्द्धकामानवस्थितांन् ।
कैमया सह योद्धव्यमस्मित्रणसमुधमे ॥ २२ ॥
मैं प्रथम इनै युद्धइच्छावाले खडेभयेनको देखूगा कि, इस
रणखेतमें मेरे साथै कौनकरके युद्ध करना योग्य है ।। २२ ॥
योत्स्यमानानवेक्षेह य एतेऽत्रं समागताः ।।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्वेयुद्धे प्रियंचिकीर्पवः ॥ २३ ॥
जो ये जितने दुर्बधि धृतराष्ट्रपुत्रके यु में प्रियइच्छनेवाले यहां
इकट्ठे भयेहें इन युद्धकरनेवालोंको में देखेंगी ॥ २३ ॥

(२८)
भगवद्गीता।
अध्याया-
संजय उवाच ।
एवमुक्तो हपीकेशो गुडाकेशेन भारत ॥
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥२४॥
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेपांच महीक्षिताम् ॥
उवाच पार्थ पश्यन्सिमवेतान्कुरूनिति ॥ २५॥
संजय धृतराष्ट्रसे कहतेहैं कि हे भारत ! अर्जुनकरके ऐसे कहेभये
श्रीकृष्ण दोनों सेनाओं के बीचमें श्रेष्टरथेको स्थापितकरके भीम
और द्रोणाचार्यके सामने और सर्व राजाओंके सामने इसप्रकार बोले-
तेभये कि हे पार्थीये इकडेभये जो कुरुवंशी तिनको देखो ॥२४॥२५॥
तंत्राऽपश्यस्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान् ॥
आचार्यान्मातुलान्भ्रान्पुत्रान्पौत्रान्सखीस्तथा ॥
श्वशुरान्सुहृद श्चैव सेनयोरुभयोरपि।
तान्समीक्ष्य से कौतेयः सर्वान्वंधूनवस्थिताने ।।
कृपयों परयाविष्टो विपीदैनिदैमनवीर्ते ॥ २६ ॥२७॥
श्रीकृष्णजीके कहने पर अर्जुन उस रणमें खडेहुए पिन (पिता-
सहशभूरिश्रवादिक काका) पितामह (भीष्म सोमदत्तादिक) आचा-
ये (द्रोणाचार्यादिक) मार्मा ( शकुनिशल्यादिक) प्रातो ( दुर्योचना-
दिक) पुत्र ( द्रौपदीमें पांचों से भये जो पांच) पौत्र ( लक्ष्मणादिकोंके
पुत्र) तयाँ सखा (अश्वत्थामा जयद्रथादिक) ससु (द्रुपदादिक) और
सुहदै (कृतवर्मादिक)इनको देखतेभये ऐसे दोनों सेनाओंमें भी उन
सवै वैधुनको खडे देखि के सो कुतीपूत्र अर्जुन अति कृपांकरके
व्यात खेदित होते होते यह बोलते भये ॥ २६ ॥२७॥

(२९)
प्रथमः १.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी।
अर्जुन उवाच ।
दृष्ट्वेमैं स्वजनं कृष्णं युयुत्सुं समुपस्थितम् ।।
सीदति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जीयते ॥२८॥२९॥
अर्जुन कहते हैं कि हे कृष्ण ! युद्धइच्छावाले खडेभये इन स्वज-
नोंको देखिके मेरे गात्र शिथिले होतेहैं और मुख सूखता है और
मेरे" शरीरमें करें और रोमांच होते हैं।॥ २८॥२९॥
गोंडीवं संसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते॥
नै च शैक्नोम्यवस्थातुं भ्रमंतीव च में मैंनः ॥३०॥
होथसे गांडीवधनुप गिरीपरता है और त्वचाभी जरीजातीह और
खंडेहोनेको भी नहीं सकता हूँ और मेरी मन भ्रमतीसरीखाहे ॥३०॥
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ॥
नंचं श्रेयोऽर्नु पश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥ ३१ ॥
और हे केशव ! निमित्तभी विपरीत देखता हूं और संग्राममें स्वज-
नौको मारके फिर कल्याणभी नहीं देखतीहूं ॥ ३३ ॥
न कोंक्षे विजयं कृष्ण न चे राज्यं सुखानि च ॥
किन्नो राज्येन गोविंद कि भोगै जीवित वा ॥२॥
हे कृष्णं ! विजय और राज्य और सुख नहीं चाहताहूं. हे गोविंद !
हमारेको राज्यकरके भोगकरके क्या प्रयोजनी अथवा जीवनेलर भी
क्या प्रयोजन है ।। ३२ ॥
येपामर्थे कांक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
तं ईमेवेस्तिथा युद्धे प्रोणास्त्यका धनानि चे ॥३३॥
हमको जिनकेचौस्ते भोग सुख और राज्य चाहीयेथा वे ये प्राण
और धनोंको त्यागके युद्ध में खडे हैं ॥ ३३॥

१०॥ मगवद्गाता। [अध्याय:- आचार्याः पितरः पुत्रांस्तथैव च पितामहाः॥ - मातुलाः श्वशुराः पौत्रोः श्यालाः संबंधिनस्तथी॥३४॥ ये सर्व मरे आचार्य पितातुल्य काका पुत्र और तसेही पितामह मामा सर्मुर नातीपोतो साँले तथों और संबंधी हैं ॥३४॥ एतान्ने हंतुमिच्छामि नतोऽपि मधुसूदन । अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥३५॥ हे मधुसूदन ! तीनोंलोकोंके राज्यके वास्ते भी मेरेको ये मारते होय तोभी इनको मारनेकी नहीं इच्छारताहूं तो" पृथिवीके- वास्ते क्यों मारूंगा ॥ ३५॥ निहत्य धार्तराष्ट्रानः को प्रीतिः स्यांजनार्दन । पामेवी श्रेयेदस्मोन्हत्वैतानाततायिनः॥ ३६॥ हेजनार्दन ! धृतराष्ट्र के पुत्रोंको मारके हमको क्यों प्रसन्नता होयगी इन आततायिनको मारके हमको पापही लगेगा । आततायी- लक्षण।।दोहा-अग्निदेइ विपदेइ जो, क्षेत्रदारहरजोइ॥ धनहरसन्मुखश- स्त्रकर, आततायिषट्होइ ॥ १॥३६॥ तस्मांनाही वयं हेतु धार्तराष्ट्रान्स्वबांधवान् ॥ खर्जन हि कथं हत्वा सुखिनः याम माधव ॥३७॥ तिससे कि, इनके मारनेका पाप ही होयगा तिससे हमारे बंधूंधृतरा- ट्रके पुत्रोंको मारनेके वास्ते हमें नहीं योग्य हैं हे माधव ! निश्चयपूर्वक स्वजनोंको मौरके कैसे सुखी होयंगे" ॥ ३७॥ याप्यते न पश्यति लोभोपहतचेतसः ।। कुलक्षयकृतं दोपं मित्रंदोहे पातकम् ॥ कथ न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्माँनिवर्तितुम् ॥

(३१)
प्रथमः १.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०।
कुलक्षयकृतं 'दोष प्रैपश्यद्भिर्जनार्दन ॥ ३८॥ ३९ ॥
हे जनार्दन ! लोभकरके जिनके चित्त भ्रष्ट भयेहें ऐसे ये दुर्योधना-
दिक कलक्षयरनेके दोपको और मित्रद्रोहमें पापको यपि नहीं
देखते हैं नहीं जानतेहे तोभी कुलक्षयकृत दोपको देखतेभये हम-
करके इस पापसे निवृत्त होनेके घाँस्ते कैसे" ने जाननाचीहिये ॥३९॥
कुलक्षये प्रणश्यति कुलधर्माःसनातनाः ॥
धर्म नष्टे कुलें कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युतं ॥ ४० ॥
कुलके क्षयहोनेसे सनातन कुलके धर्म नाश होतेहैं फिर धर्म नष्प-
होनेसे सब कुलको अधर्म जीतलेताह याने कुलको अप्रतिष्ठित
करदेता है ।। ४०॥
अधोऽभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यति कुलस्त्रियः ॥
स्त्री दुष्टासु वाणय जायते वर्णसंकरः॥ ११ ॥
हे कृष्ण ! अधर्मकरके कुलको अप्रतिष्ठितहोनेसे कुलकी स्त्रीजन
दुष्ट होयगी हे वृष्णिवंशोद्भव ! उन दुष्ट स्त्रियनमें वर्णसंकर उत्पन्न
होयगा॥११॥
सँकरो नरकायै कुलनानां कुलस्य च ॥
पतति पितरो टोपी लुप्तपिंडोदकक्रियाः ।। ४२ ।।
जिससे कि जिनके पित्तर पिंडोदकक्रिया प्रातभयेविना संसारमें पै-
डतेहैं और इसीसे कुलघातिनके कुलको वह वर्णसंकर नरकमाप्तिही के
हेतु उत्पन्न होताहै ॥४२॥
दोपरे तैः कुलनानां वर्णसंकरकारकैः ।।
उत्सांद्यते जांतिधर्माकुलंधर्माश्च शाश्वताः ॥ १३॥
जो कुलपाती हैं उनके जो ये वर्णसंकरकारक दो तिनकरके
जातिधर्म और सनातन कुलंधर्म नष्टे होतेहैं ॥१३॥

(३२)
भगवद्गीता। [अध्यायः-
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां,जनार्दन ।
नरके नियंतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥४४॥
हेजनार्दन। जिनके कुलधर्म नष्ट भये उन मनुष्यों को नरको अवश्य
वास होताहै ऐसा सुनेतहैं ॥१४॥
अहो बंत महत्पापं कर्तुं व्यवसिंतता वयम् ॥
यदाज्यसुखलोभेन हेतु खर्जनसुद्यताः ॥ ४५ ॥
अहो कष्ट! हम बडेपोपको करनेको निश्चयकिये हैं जो राज्यसु-
खलोभकरके स्वजनोंको मारनेको उद्योगकियेहैं ॥ ४५ ॥
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शत्रपाणयः॥
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तेन्मे"क्षेमतरं भवेत् ॥ ४६
जो हाथमें शस्त्रलियेहुये धृतर्राष्ट्रके पुत्र अशस्त्रको और अप्रतीकार-
को याने जो मैं बदला नहीं लेताहूं ऐसे मेरेको रणमें मारेंगे सो मारना
भी मेरी अतिकल्याणरूप होयगा ॥४६॥
संजय उवाच ।
एवमुक्काऽर्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ॥
विसृज्य संशरं चापं शोकसंविनमानसः॥४७॥ .
राजातराष्ट्रसे संजय कहतेहैं कि, संग्राममें अर्जुन ऐसे कहके
घाणसंयुक्त धनुप डॉरिके झोकव्याकुलमनहुआ भया रथके पिछाडी
जायके रेयमें बैठरहतांभया ॥ १७ ॥
• इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिपत्सु ब्रह्मविद्यायां योग-
शास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अर्जुनविपादयोगोनाम
प्रथमोऽध्यायः॥१॥
इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचि-
तायां गीतामृततरंगिण्यांप्रथमाध्यायप्रवाहः ॥ १॥

द्वितीयः२.] 'सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। संजय उवाच। त तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् । विषीदंतमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥ १ ॥ राजाधृतराष्ट्रसे संजय कहते हैं कि, जोप्रथम अध्यायमें करुणावाक्य कहे पैसेही कृपाकरके व्याप्त सुनके भरनेसे नेत्र याकुल विषाद- युक्त उस अर्जुनसे मधुसूदन भगवान् ये वाक्य बोलते भये ॥ १ ॥ कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।। अनार्यजुष्टमस्वयमकीर्तिकरमर्जुन ॥२॥ जो बोले सो कहतेहैं कि हे अर्जुन ! जो अनार्यनके सेवनेयोग्य नरकको लेजानेवाली और अपकीर्तिका करनेवाला ऐसा यह मोह तुमको ऐसे विपमस्थल में कैसे प्राप्तभया॥२॥ केन्यं या स्मगमः पार्थ नैतत्वय्युपपद्यते॥ क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठं परंतपं ॥३॥ हे पृथाके पुत्र ! तुम कायरतोको न ग्रहणकरो तुम्हारमें यह नहीं योग्य है हे परंतप ! तुच्छ हृदयको दुर्वलताकारके काय- रताको छोडि के खडेहोजावो ॥३॥ अर्जुन उवाच । कथ भीष्ममह संख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।। पुभिःप्रतियोत्स्यामि पूजाहाँवरिसूदन ॥४॥ ऐसे कृष्णके वाक्य सुनअर्जुन बोले कि हे मधुसूदनाम संग्राम में भी- धर्म और द्रोणाचार्य से बाणोंकरके कैसे युद्धेकरूंगा हे भरिसुदन । ये दोनों पूजनेयोग्य हैं यहां मधुसूदन कहनेका तात्पर्य यह कि आप दैत्यहं- ता हो तो सजनांसे क्यो युद्धकरातहो आरिसूदन कहने का तात्पर्य यह कि, जो शत्रुनाशक हो तो भीष्मादिक पूज्यनपर वाणप्रहार क्यों कराते हो॥४॥ ३ भगवद्गाता। [अध्यायः- गुरूनहत्त्वां हि महानुभावाञ्च्छ्रेयो भोक्तुंभक्ष्यम- पीह लोके ॥ इत्वार्थकामांस्तु गुरूनि हैवभुजीय भोगाधिरपेंदिग्धान् ॥५॥ इस लोकमें अतिउत्तगप्रभाववाले गुरुर्नेको मारेविना भिक्षाका अन भी खानेको कल्याणही जानना और अर्थ याने व्यकी है कामना जिनके ऐसे गुरुनको इस संग्राममें मारके रक्त से भरेभये भो- गोंको भोगोंगा ॥५॥ ने चैतद्विः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदिवा नो जयेयुः ॥ याने हत्वा नजिजीवि- पामस्तेऽवस्थिताः प्रमुंखे धार्तराष्ट्राः ॥६॥ यह भी नहीं जानते कि, हमारेमें कौन बली है नजाने हम जीतेंगे किया ये हमको जीत जिनको मारके हम जीना नहीं चाहतेहैं वै" धृतराष्ट्रके पुत्र सन्मुखं ही खंडेहैं ॥ ६॥ कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्म- संमूढचेताः॥ यच्छ्रेयः स्यौनिश्चितं ब्रूहि तन्में शिप्यस्तेऽहं शाँधि मा त्वौं प्रपन्नम् ॥ ७॥ कार्पण्य यह कि हम इनको मारके कैसे जियेंगे तथा जो कुलक्षय- कादोप इन कार्पण्य और कुलक्षय दोपोंकरके मेरा क्षत्रियस्वभाव विध्वं- सित भयाहै इसीसे धर्ममें भी मेरा चित्तचकितभयाहै जैसे कि,शनिय धर्म- युद्ध अथवा भिक्षान्नभोजन इनमें कौन कल्याणकारक है ऐसे चित्त चकि- तह ऐसा मैं तुम्हारा शिष्य तुमको पूंछताहूं जो मेरेवास्ते निश्चय कल्या- भदायक होये वही कहो तुम्हारे शरणागत मेरे को सिखावो ॥ ७ ॥ नं हि पश्यामि मापर्नुद्याचंच्छोकमुच्छो- - द्वितीयः २.] सान्यय-अमृततरंगिणीभा० टी० । पणमिंद्रियाणाम् ॥ अवाप्य भूमारसपत्नमृद्ध राज्यं सुराणामपि चाँधिपत्यम् ॥ ८॥ अरेरेरेरे ! बडो अनर्थ है,कि, जो प्रथिवीमें चिरहित संपदायुक्त राज्यको और देवताओंके भी अधिपतित्वको पायके मेरी इंद्रियेनके सुखानेवाले शोकको दूरकरे उसको में नहीं देखताहूं ॥८॥ संजय उवाच। एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परंतपः॥ नं योत्स्यं इति गोविंदमुक्का तूष्णीं बभूव है ॥९॥ संजय धृतराष्ट्रसे कहनेलगे कि, शत्रुनको संतापितकरनेवाला तथा गुडाँका जो निद्रा तिसके जीतने में समर्थ ऐसा जो अर्जुन हपी- केश याने इंद्रियों के मालिक श्रीकृष्णको ऐसे कहके फिर नहीं युद्धकरूंगा ऐसे गोविंदसे कहके मौन होतेभये ॥९॥ तमुवाच हषीकेशः प्रहसन्निव भारत ॥ सेनयोरुभयोर्मध्ये विपीदंतमिदं वचः॥ १०॥ हे भरतवंशोत्पन्न धृतराष्ट्र ! दोनों सेनाओंके मध्यमें युद्धके- उत्साहको त्यागिक शोक कररहा जो अर्जुन तिर्ससे हसतेसरीसे श्रीक- प्णजी यह याने जो आगे कहेंगे सो वचनं बोलते भये ॥१०॥ श्रीभगवानुवाच । अंशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादाचं भांपसे । गतामूनगतासूच नौऽनुशोचंति पंडिताः ॥ ११ ॥ श्रीकृष्णभगवान्ने निश्चय किया कि, इसको धर्माधर्मका ज्ञान नहीं है। इससे यह धर्मको तो अधर्म और अधर्मको धर्म मान रहा है, परंतु धर्मको जानना चाहता है सो मोह गये धिना यह कैसे जानेमा सो मोह आत्मदर्शनविना नष्ट होनेका नहीं ज्ञानपिना आत्मदर्श -- (३६) 'भगवद्गीता। [ अध्यायः- न होनेका नहीं सो ज्ञान निष्कामकर्मविना होनेका नहीं और अध्या- स्मशास्त्र जो आत्मा-अनात्मा-विवेक उपदेश याने जीव और शरीर- का विवेक उसका उपदेश इसविना निष्काम कर्म होने सकतानहीं इससे अध्यात्मशास्त्र ही उपदेश करो, ऐसा विचारके उपदेश कर- नेलगे. अब इस श्लोकसे लेके अठारहे अध्यायमें छासठके श्लोकमें जो “माशुचः" ऐसा वाक्य है वहां पर्यंत गीता उपदेश है. तहां प्रथम भगवान् कहते हैं कि, हे अर्जुन ! "त्वं अशोच्यान् अन्वेशोचः" याने जो शोचनेयोग्य नहीं तिनको शोचते हो और प्रज्ञावाद याने पंडितोंसरीखी बातें तिनको भापते याने कहते हो वे ऐसे कि, हमारे पितरोंका श्राद्ध और तर्पण न होनेसे वे स्वर्गसे नरकमें पड़ेंगे सो स्वर्गप्राप्ति और पडना श्राद्धादिक होने न होनेके स्वाधीन नहीं है; वे तो आपके करे पुण्यपापके स्वाचीन हैं "क्षीणे पुण्ये मर्य- लोकं विशंति" इस प्रमाणसे वे पुण्य पाप सदेह आत्माके स्वाधीन हैं. केवल देढके स्वाधीन नहीं हैं यद्यपि पुत्रादिकोंके करेभये श्राखा- दिकोंका पुण्य प्राप्त होता है। कारण कि, पुत्रादिक सदेह आत्मसं. बंधी हैं; तथापि श्राद्ध न होनेसे स्वर्गसे पडना यह कोई कालमें भी होनेका नहीं। इसवास्ते गताएं जो ये शरीर नित्य नाशवी और अगतामू जो जीव नित्य अमर एकरस है इससे "नासतोविद्यते भावोनाऽभावोविद्यतेसतः ” इसप्रमाणसे पंडितजन इनका शोच नहीं करते हैं। इससे तुमकोभी शोचना अयोग्य है. "स्वेत्स्वेव म- ण्यभिरत सिद्धिविंदतिमानवः" इसप्रमाणसे स्वधर्मयुद्ध ही कल्याण- कारक है ॥११॥ नंत्येहि जातु नास नेलं 'नेमे "जनाधिपाः॥ में चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥ १२॥ श्रीकृष्ण कहते हैं कि, हे अर्जुन ! जो आत्मा याने जीवात्मा द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (३७) परमात्मा है उनके सभाव सुनो. सो ऐसे कि, "अहं सर्वेश्वर इतः पूर्वमनादौ काले जातु नासमपि त्वासमेव" मैं सर्वेश्वर इस समयसे प्रथम अनादिकालमें क्या न था ? क्योंकि, निश्चयकरके था "त्वं नासीः अपितु आसीः एक" जैसा मैं था ऐसा क्या तू न था ? तू भी था. “इमे जनाधिपाः किं न आसन् अपित्वासन एव" ये सब राजा क्या न थे? अर्थात् ये भी थे. "अतः परं सर्वं वयं किं न भविष्या- मः अपितु भविष्याम एव" इसकालसे अगाडी क्या हम, तुम ये सर्व न होयगे ? अर्थात् होयहाँगे. इससे आत्मा नित्य है. शोच करना वृथा है. तथा जो यहां हम, तुम और ये ऐसा कहा इससे यह सिद्धां- त भया कि, जीवात्मा और परमात्मा न्यारे न्यारे हैं यह न्यारापनाही सत्य है. इसीसे श्रीकृष्णजीने भी उपदेश किया क्यों कि, अज्ञानमो- हित अर्जुनको मिथ्याउपदेश करनेहीके नहीं. इस न्यारेपनमें श्रु- । तिभी प्रमाण है सो यह-"नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहू- नां यो विदधाति कामानिति" अर्थ-जो एक नित्यचेतन परमात्मा है सो बहुत नित्यचेतन जीवोंकी कामनाको परिपूर्ण करता है। जो कोई कहे कि यह भेद अज्ञानकृत है तो उनसे कहना कि, यह परमार्थदृष्टिके अधिष्ठाता और आत्मयाथात्म्यसे सदा अज्ञानर- हित नित्यस्वरूप परमपुरुप श्रीकृष्णमें अज्ञानकृतभेददर्शनकार्य होनेका नहीं. तोभी कोई कृष्णको अज्ञ कहे तो उनकरके उप- दिष्ट गीता अप्रमाण होती है. जो कोई कहे कि, श्रीकृष्णने अभेद- निश्चय किया इससे वह भेद निराकृत है; सो जले वस्त्रतुल्य बंधन- कारक नहीं है. तब कहना कि, मृगतृष्णानिराकृत जानिके फिर उसमें पल लेने न जायगा जो गया तो वह अज्ञ है. इसीतरह नो मिथ्या भेदका इसमें उपदेश दिया तो इस गीताकामी प्रमाण न मानना चाहिये. दुसरा यह कि, भेदविना उपदेशभी नहीं वे (३८) भगवद्गीता। [अध्याय:- तथा परमात्मामें ऐसाभी होनेका नहीं कि, प्रथम भज्ञ थे शास्त्रा- ध्ययनसे ज्ञानी भये. जिसको शास्त्राभ्याससे ज्ञान होताहे उसको कोई समयमें अज्ञान भी होता है. सो नित्यज्ञानस्वरूप श्रीकृष्णमें यह भी नहीं होसकता है. यहां श्रुती प्रमाण है सो ऐसे कि, 'यासर्वज्ञः सर्ववित् ॥ पराऽत्यशक्तिविविधैवथूयतेस्वाभाविकीज्ञानवलक्रियाच' तथा यहांभी कहेंगे 'वेदाहसमतीतानिवर्तमानानिचार्जुन । भविष्या- णिचभूतानिमांतुवेदनकश्चन' इत्यादि प्रमाणोंसे भेदही सिद्ध होता है. भेदविना उपदेश किसको करे ? तहाँ कोई कहतेहें कि, अर्जुन कृष्णका प्रतिक्वि है, आपको आपही उपदेश करतेहैं. तहां कहना कि, दरपन जल इत्यादिमें आपके प्रतिषियको देखके जो बातें करे सो उन्मत्त याने चित्तभ्रष्ट सिरीं होताहै, उसके वाक्यभी अप्र- माण हैं, जिसको अभेदज्ञान है उसको उपदेश बननेहीका नहीं न उसके गुरू हैं न शिष्य है इससे यही सिद्ध भया कि, परमात्मासे जीव न्यारे हैं ।। १२ ॥ देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारे यौवनं जरी ।। तर्था देहांतरप्राप्तिधारस्तत्रं न मुहाति ॥ १३ ॥ जैसे इस देहमें जीवकी कुमार अवस्था यौवन और जरा अवस्था होतहें तैसे देहांतरकी प्राप्ति भी होतीहे तहां धीर याने ज्ञानीपुरुप नहीं मोहता है ॥ १३॥ मात्रास्पशीस्तु कौंतेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।। आगमापायिनोऽनित्यास्तीस्तितिक्षस्व भारत ॥१४॥ हे कुंतीपुत्र! मात्रा जो इंद्रियां तिनके स्पर्शजो शब्दस्पर्शरूपरस और गंध ये शीत उष्ण याने मृदु कठोरशन्द शीतोष्ण शस्त्र प्रहारादिक और द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। संयोगवियोगादिक दुःखके देनेवाले अनित्य और आगमापायी याने होते जाते रहते हैं हे भारत ! तुम भरतवंशी हो उनको सहनकरो ॥१४॥ यं हिनं व्यर्थयंत्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।। संमदुःखसुखं धीर सोऽतत्वाय कल्पते ॥ १५ ॥ हे पुरुषर्षभ! सुख और दुःख है सम जिसके ऐसे जिस ज्ञानी पुंरुप- को ये निश्चयकरके नहीं पीडॉ करते हैं सो" मोक्षजानेको समर्थ- होती है ।। १५॥ नाऽसतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।। उभयोरपि दृष्टोऽतस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः ॥ १६ ॥ जो "गतासुनगतासुंश्चनानुशोचंतिपंडिताः" इस वाक्यकरके आ- त्माका स्वाभाविक नित्यत्व और देहका नाशित्व समझके शोक न करना कहा उसीको अब 'नासतः' इत्यादिकरके खुलासा दृढता- करके कहते हैं सो ऐसे कि, असत् जो नाशवान् है उसकी थिरता नहीं होती है और सत् जो अविनाशी है उसका नाश नहीं होता तत्त्वदर्शी- पुरुषोंने इन दोनोंकी भी सिद्धांत देखा है सोई आगे दो श्लोकोंमें खुलासा कहेंगे ॥ १६॥ अविनॉशि तुं तदिद्धि येन संमिदं ततम् ॥ विनीशमव्ययस्यास्य न कश्चित्तंतुमर्हति ॥ १७ ॥ जिस आत्मतत्त्वकरके यह सर्व अचेतन तत्त्व व्याप्त है उसको तो अविनाशो जीनो इस अविनाशीका विनाश करनेको कोई नहीं अंतवंत इम देहां नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।। अनौशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युदयस्व भारत ॥१८॥ जो यह जीव अविनाशी है तथा अप्रमेय है याने यह इतना (४०) भगवद्गीता। [अध्याय:- ऐसा कहने में नहीं आता है तथा नित्य है याने सर्वदा एकसा है ऐसे जीके ये देह हैं नाशवंत कहे हैं हे अर्जुन ! तिससे युद्धकैरो॥१८॥ यएनं वेति हतारं यश्चै न मन्यते हतम् ॥ उभौ तौ" ने विजीनीतो नौयं हन्ति नै हन्यते ॥१९॥ जो इस आत्माको मारनेवालो जानता है और जो इसको अन्यक- रकेमरा मानता है। वे दोनों नहीं जानते हैं यह न किसीको मारता है न किसीकरके मरता है ।। १९॥ नं जायते म्रियते वा कदाचिन्नीयम्भूत्वा भविता वा न भूयः॥ अंजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो ने हन्यते हैन्यमाने शरीरे ॥२०॥ यह आत्मा कोईकालमें भी जन्मता और मरता नहीं यह अर्ज- न्माहै नित्यं सर्वकालमें है पुराण याने पहिले थासो भी है नवा नै भयों है और फिर होनेवाला भी नहीं है शरीरके मारनेपर भी नहीं मरता है ॥२०॥ वेदाँऽविनाशिनं नित्यं ये एनमंजमव्ययम् ॥ कैथं से पैरुपः पार्थ के घातयति हंति कौ ॥२१॥ जो इस आत्माको नजन्मा अक्षय नित्य अविनाशी जानता है तो हे अर्जुन ! सो वह पुंरुप के से किसको मरवावताहे और कैसे किसको मारता है ॥२१॥ वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि हाति नरोऽपराणि ॥ तथा शरीराणि विहाय जीर्णी- न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥२२॥ यद्यपि शरीर नएहोनेसे आत्माका नाश नहीं तो भी शरीरवियोगका जो दुःख होताहै ऐसा गर्जुनकामाशय जानिके भगवान् कहनेलगे कि,

द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणीभा० टी०। (४१)
जैसे मनुष्य पुराने नोंको त्यागिक और नवीनोंको ग्रहणकरता है तैसे
जीच पुरीने शेरीरोंको त्यौगिके और नवीनशरीरोंको प्राप्त होताहै२२
नै नै छिन्दति शस्त्राणि नैं ने दहति पावकः ॥
नं चैन केदयंत्यांपोन शोपयति मारुतः॥२३॥
सर्व शस्त्रे भी इस आत्मांको नहीं छेदि काटि सकतेहैं अग्नि इसको न
जलाताहै ॥ जल इसको नहीं भिजोयसकता है और पवन भी नहीं
सुखायसकतीहै ।। २३॥
अंच्छेद्योऽयम ह्योऽयमक्तेद्योऽशोध्य एव च ॥
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ २४ ॥
यह आत्मा छेदनेयोग्य नहीं यह जलानेयोग्य नहीं और भिनाने
सुखानेयोग्य भी नहीं है। यह नित्य सर्वप्रकारके शरीरों में जानेवाला
स्थिरस्वभाव अचल और सनातनहै ॥२४॥
अव्यक्तोऽयमचिंत्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ॥
तस्मादेवं विदित्वैन नानुशोचिर्तुमहसि ॥२५॥
अथ चैन नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ॥
तथापि त्वं महाबाहो नै शोचितुमर्हसि ॥२६॥
यह मतिसूक्ष्मतासे अप्रगट है यह विचारमें नहीं आताहे यह वि-
काररहित कहाँहे ॥ तिससे इसको ऐसा जानिके शोचकरनेको नं-
ही योग्यहै ।। जो कि , इसको नित्य जन्मा अर्थवा नित्ये मरा जानों-
गे॥ तोभी हे महाभु अर्जुन ! तुम इस आत्माको शोचनेको नहीं
योग्यहो ।॥ २॥ २६ ॥
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्धर्व जन्म मृतस्य च ॥
तस्मादपरिहार्यऽर्थं न त्वं शोचितुमर्हसि ॥२७॥

(४२) भगवद्गीता। [अध्याय:- जिससे कि, जन्मेको मृत्यु निश्चय है और मरेको जन्म निश्चय है ।। तिससे इस निरुपाय परिणाम में तुम शोचनेको नहीं योग्यहो ॥२७॥ अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्त निधनान्येव तत्र को परिदेवना ॥२८॥ हे अर्जुन ! मनुष्यादिक भूतप्राणी जन्मके आदिमें प्रगट न थे जन्म- के पीछे मरणके आदिमध्य अवस्थामें प्रगट दीखतेहैं मरेपीछे भीनंदीखें- गे ऐसे निश्चयसे तहां शोक कौन है ।। २८॥ आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमार्थर्यवर्ट- दति तथैव चौन्यः ॥ आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेदँ नै चैवं कश्चित् ।। २९ ॥ ऐसे देहात्मवादमें शोकका परिहार किया अब कहतेहैं कि, देहसेन्यारे आत्मामें द्रष्टा श्रोता वक्ता और ज्ञाता भीदुर्लभहै।।प्रथमकहेभये लक्षणों- करके युक्त आत्मा सर्वसे विलक्षणहै तहां कोईतपस्वी पुण्यवान् इस आत्माको आश्चर्यवत् देखती और तेसोही कोई गांश्चर्यवत् कहता है। और तैसाही और पुरुप इसको आश्चर्यतुल्य सुनताहै और कोई पुरुप इस आत्माहीको सैनिक भी नहीं जानती है ।। २९ ।। देही नित्यमवंध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ॥ तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥३०॥ हे अर्जुन ! सर्वकी देहमें यह जीव नित्यही अवध्य है ।। तिससे तुम सर्व भूतोंको शोचनेको नहीं योग्यहा ॥३०॥ स्वधर्ममपि चावेक्ष्य नै विकपिमतुर्हर्सि ॥ धौद्धि युद्धाच्छ्योऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥३१॥ स्वधर्मको भी देखेंके दाँकरनेको नहीं योग्यहो । क्यों कि क्षत्रियको धर्मसंबंधी युद्ध से और कल्याण नहींहै ।। ३१॥

द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (४३) यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ॥ सुखिनः क्षत्रियोंः पार्थं लभते युद्धमीदृशम् ॥ ३२ ॥ हे पृथापुत्र अर्जुन ! जो आपसे प्राप्तंभया और खुलांभया स्वर्गका द्वार ऐसे युद्धको पुण्यवान क्षत्रियलोग पार्वत हैं ॥३२॥ अंथ चेत्त्वमिमं धर्य संग्रामं नं करिष्यसि ॥ ततः स्वधर्म कीर्ति च हित्वा पापमयाँप्स्यसि ॥३३॥ अंकीर्ति चापि भूतानि कथयिष्यति तेऽव्ययाम् ॥ संभावितस्य चाऽकीर्तिमरणादतिरिच्यते ॥३४॥ जो कदाचित तुम इस धर्मरूपं संग्रामको ने करोगे तो उसे से स्वधर्म और कीर्तिको भी छोर्ड के पापको प्राप्त होवोंगे ॥ और लोगे तुह्मारी अखंड अकीर्तिको भी कहेंगे । सो अकीर्ति संभावितपुरु- पके मरणसे अधिक है ॥३३॥३४॥ भयाँद्रणादुपरतं मस्यंते त्वां महारथाः ॥ येषां च त्वं वहुमतो भूत्वा यास्यसि लार्धवम् ॥ ३५॥ अवाच्यवादांश्च वह्न्वदिष्यति तैवाहिताः॥ निंदतस्तव सामर्थ्य ततो दुःखंतरं तु किंम् ॥३६॥ श्रीकृष्णजीने अर्जुनकाअभिप्राय जाना कि, जो में बंधुनके रोह और दयालुतासे युद्ध न करूंगा तो मेरी अकीर्ति कैसे होयगीयाने होनेकी नहीं ऐसा जानिके बोले कि, हे अर्जुन ! जिन कर्णदुर्योधनादिक महारथोंके तुर्म शूर शत्रु ऐसे मान्य थे उनहीके अब युद्ध न करनेसे निंदनयोग्य लें- घुताको प्राप्त हो वोगे वोई महारथ शव तुमको भयसे संग्राम न किया ऐसा मानेंगे वोई तुझारे शई तुहारी सामर्थ्यको निंदतेभैये बहुत से वाक्य बोलेंगे याने अर्जुन कायर है शोभाके वास्ते शस्त्र बांधताह जैसे (४४) भगवद्गीता। [अध्याय:- स्त्री आभूपनमें सपसिंहादिक देखिके प्यारसे धारण करे और साक्षात् दे- खिके प्राणलेके भागे तैसे जब ऐसी निंदा करेंगे तब उससे वहादुःख कौन है सो कहो ॥ ३५॥३६॥ हंतो वा प्राप्स्यसे स्वर्ग जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।। तस्मादुत्तिष्ठ कौंतेयं युद्धाय कृतनिश्चयः॥ ३७॥ उसनिंदाके सुननेसे रणमें मरना मारना ही श्रेष्ठ है ऐसा कहते हैं हे कुं- तीपुत्र! जो रणमें शत्रुप्रहारसे मरोगे भी तो स्वर्गको प्राप्तहोयोगे जो जी- तोगे तों पृथिवीको भोगोगे तिससे युद्ध के अर्थ निश्चयकियेभये उँठो॥ सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ॥ ततो युद्धाय युज्यस्व नै वं पापमवाप्स्यसि ॥३८॥ सुख और दुःखको समानकरके तथा लाभ और हौनिजय और परा- जयसमान जानिके फिर युद्धके अर्थयुक्तहो ऐसे पॉपकोनहीं प्राप्तहोयोगे।। एषां तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिोंगे विमी शुणु॥ बुद्धचों युक्तो यया पार्थ कर्मबंधं प्रहास्यसि ॥ ३९॥ श्रीकृष्णभगवान्ने ऐसा आत्मस्वरूप दिखाया अब आत्मस्वरूप ज्ञानपूर्वक मोक्षसाधनभूत कर्मयोग कहतेहैं सो ऐसे कि, हे पृथापुत्र ! यह बुद्धि तुम से मैंने सांख्य जो आत्मा देहका विवेक उसमें कही और इसीको योगमें यांने कर्मयोगमें सुनो जिसे बुद्धिकरके युक्त कर्मबंधजो संसारदुःख उसको छोडोगे" ॥३९॥ नेहांभिक्रमनांशोस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ॥ स्वल्पमप्यस्यं धर्मस्य त्रायते महतो भयौत् ॥४०॥ जो अब ज्ञानयुक्त कर्मयोग कहेंगे विसका माहात्म्य कहतेहैं । इस शानयुक्त कर्मयोगों याने निष्काम कर्मयोगमें प्रारंभका भी नाश नहीं है द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (४५) याने प्रारंभ होके समाप्त न होय तो भी नाश नहीं है इसके छूटनेका दोष भी नहीं होताहै इस निष्काम कर्मको लवलेशमात्र भी जन्ममरणरू- प बडेभयसे रक्षणकरताहै ॥ ४०॥ व्यवसायात्मिकाबुद्धिरेकेंह कुरुनंदन । बहुशाखाह्यनंताचं बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ ४१ ॥ हे कुरुनंदन! व्यवसाय जो विष्णुपरमात्मा तिनमें है आत्मा नाम मन जिनका ऐसे पुरुषोंकी बुद्धि इस निष्काम कर्महीमें वह एक है याने एक मोक्षसाधनहीके वास्तेहै जो अव्यवसाई याने परमात्माविना नानापदार्थ पशुपुत्रादिकोंके चाहनेवाले हैं उनकी बुद्धि बहुतहै याने अनेककामना- में लगीहै और तहां भी बहेशाखा याने एककार्यके वास्ते कर्मकरके उसमेंभी अनेक फल मांगतेहैं जैसे पुत्रार्थ यज्ञमें धनधान्य,आयुष्य, आरोग्यका मांगना ॥४१॥ यौमिमी पुष्पितां वाचं प्रदत्यविपश्चितः ।। वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीतिवादिनः ॥कामा- स्मानः स्वर्गपरी जन्मकर्मफलप्रदाम् ॥ क्रियावि- शेपैबहुला भोगैश्चर्यगति प्रति ॥ भोगैश्वर्यप्रसक्तीनां तयाँपहतचेतसाम् । व्यवसायात्मिकाबुद्धिः समा- धौ नै विधीयते ॥४२॥४३॥॥४४॥ हे पृथापुत्र! जो अज्ञानी जैन वेदवोदरत याने वेदोक्त कर्मसे स्वर्गा- दिकफलही होताहै ऐसे कहनेवाले स्वर्गसुखसे और सुख नहीं है ऐसा कहनेवाले कामनाहीमें चित्तरखनेवाले स्वर्गहीको श्रेष्टमाननेवाले जिस पुष्पित याने कहनेमात्रमें रमणीय जन्मकर्मरूपंफलको देनेवाली तथा जिसमें भोग और ऐश्वर्यनिमित्त बहुत उपकरण याने कर्मसाधन हैं जि- सैमें ऐसी इस वाणीको कहतहें इसीसे उसी वाणीकरके अपहरणभयेहें १२ (४६) भगवद्गीता। [अध्याय:- चित्त जिनके इसीसे भोग और ऐश्वर्यमें आसक्त उनके मन में वह पर- मात्मविषयकवुद्धि नहीं प्रवृत्तहोतीहै ॥ १२ ॥४३॥ १४ ॥ गुण्यविषयावेदा निस्वैगुण्यो भार्जुन ॥ निद्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥१५॥ हे अर्जुनावेदये गुण्यविषय, याने तीनों गुणों के कर्मनहींको कहते है तुम निद्वैत याने सुखदुःख,जयपराजय लाभअलाभ, इन द्वंद्वनसे र- हितहो.अर्थात इनसे उत्पन्न हर्पशोकरहितहों नित्यसत्वस्थहो याने सात्विककर्म करो नियोगक्षेम याने कोइसा भीलाभ और लब्धका रक्ष- गईश्पराधीन न जानो आत्मवान् याने परमात्मामें चित्त राखो ऐसेभये हुये निस्वैगुण्यहो याने कर्मफलोंका त्यागकरो ॥ ४५ ॥ यावानर्थ उदपौने सर्वतः संपतोदके ॥ तावॉन्सर्वेषु वेदेपु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥ ४६॥ जो कहा कि, वेदोक्त कोमेसे तुम सात्त्विक करो उसीको खुलासा कहतेहैं जैसे सर्वत्र जलसे भरेभये तालाव इत्यादिक जलाशयमें मनुष्य- का जितनाप्रयोजन होताहै उतनाही लेता है तसेही वेर्दैके जाननेवालेको सर्ववेदोंमें तावान्याने साविककर्म ही योग्यहै ॥ ४६॥ कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ॥ मा कर्मफलहेतुर्भूमा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥४७॥ तुझारको कर्महीमें अधिकारह फैलोंमें नहीं कौके फलका कारण तुलारेमें कोई समयमें भी मति हो तुम्हारे को अकर्म याने स्वधर्म योग्य युद्धादिकाँका न करना इसमें सँगै जोनिष्टा सो कदाचित् न हो" ४७|| योगस्थः कुरुं कर्माणि संग त्यका धनंजय ॥ सिइंचसियोः संमो भूत्वा समलं योगें उच्यते४८॥

द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० ।
हे अर्जुन ! सिद्धि और असिदिमें समवृद्धि होके कर्मफलके संगको
त्यागिक योगमें स्थितभयेहुये कमेको केरो सिद्धि और आसिद्धि में जो
समत्व है वहीं योग कहाँ है अर्थात् चित्तके समाधानत्वको योग कहते हैं
तात्पर्य चित्तको समाधानकरके युद्धरूप स्ववोचित कर्म करो॥४८॥
दूरेण ह्यवर कर्मबुद्धियोगांधनंजय ॥
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपौः फलहेतवः॥४९॥
• हे अर्जुन ! जो बुद्धियोगसे और कम है सो निश्चयकरके अत्यंत नी-
च है इसवास्ते बुद्धियोग जो निष्काम कर्म उसीमें ईश्वरप्राप्तिकी इच्छा
करो फलेकी इच्छा करनेवाले कृपण हैं ॥१९॥
बुद्धियुक्तो जहांतीह उभे सुकृतंदुष्कृते॥
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्म, कौशलम् ॥५०॥
बुद्धियुक्त जो निष्कामकर्मी सो इसीलोकमें सुकृत जो पुण्यकर्म
और दुष्कृत जो पापकर्म उन दोनोंको त्यागताहै इससे योगके अर्थ याने
बुद्धियोग जो निष्काम कर्म उसकेवास्ते युक्तहो यह योगे सर्वकाँके
कुशल कारकहै ॥५०॥.
कर्मजं बुद्धियुक्तो हि फलं त्यक्ता मनीपिणः॥
जन्मबंधविनिर्मुक्ताः पदं गच्छत्यनामयम् ॥ ५१ ॥
जो बुद्धियोगयुक्तहैं वे ज्ञानी कर्मजन्य फलको त्यागके जन्मबंध-
नसे मुक्तभयेहुये निश्चयकरके मोक्षं पैदको नातहें ।। ५१ ॥
यदा ते मोहकलिलं दुधिर्व्यतितरिप्यति॥
तदा गंतासि निर्वेद श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ।। ५२ ॥
जब तुमारी बुद्धि मोहरूप दुःखको उल्लंघनकरेंगी तब जो फला-
दिक सुननेयोग्य और जो सुनेहो उनके वैराग्यको प्राप्तहोवोगे ॥५२॥

(४८) भगवद्गीता। [अध्यायः- श्रुतिविप्रतिपन्नाते यदास्थास्यति निश्चला। साधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥५३॥ जब तुह्मारी बुद्धि श्रुतिमें याने मेरे उपदेशमें विशेषकरके आसक्त निश्चले मनमें अचल ठहरेगी तवे योगको पावोगे ॥५३॥ अर्जुन उवाच । स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ॥ स्थितधीः किं प्रभात किमासीत व्रजेते किम् ॥५४॥ ऐसा सुनिके अर्जुन बूझते भये कि,हे केशवा याने सर्वके अंतःकर- णमें रहनेवाले हे ईश्वर ! स्थिरवद्धि समाधिस्थकी कौनसी भापी याने उसकावाचक कौन, अर्थात् वह स्थिरबुद्धि किससे कहाताहै स्थिरबुद्धि के से बोलताहै कैसे पेठेताहै और कैसे चलता है ।। ५४॥ श्रीभगवानुवाच । प्रजहाति यंदा कामान्सान्पार्थ मनोगतान् ॥ आत्मन्येवात्मना तुष्टैः स्थितप्रैज्ञस्तैदोच्यते ॥ ५५॥ अव श्रीकृष्णभगवान् स्थिरबुद्धिवालेका स्वरूप कहते, तहाँ ऐसा न्यायदे कि, रहनिरीतिसे भी स्वरूपनिश्चय होताहे इससे रहनिरीति कहतेहैं सो ऐसे कि, हे अर्जुन ! जबै आपके मनकरके आप स्वरूपहीमें संतुष्टभया हुआ मर्नमें रहेभये सवै मनोरंथोंको सर्वथा त्यागतो तेव वह स्थिरद्धि कहाताहे ॥१५॥ दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः मुखेषु विगतस्पृहः॥ वीतरांगमयक्रोधः स्थितधीर्मनिरुच्यते ॥ ५६ ॥ दुःखोंमें जिसका मन व्याकुल नहीं होताहे सुखोमें निराश होताहै और जिसके पुत्रादिस्नेह भय और क्रोधे न होय सो मुनि स्थिरद्धि कहाता है ।। ५६॥

दिनीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणी आ० टी०। (४९)
यः सर्वत्राऽनभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।।
नाऽभिनंदति न द्वेष्टिस्थितप्रज्ञस्तंदोच्यते ॥५७ ॥
जो सर्वत्र स्नेहरहित उसउस शुभाशुभको पाइकभी न शुभसे भी.
नंदहो न अणुभसे दुःखीहो तेव सो स्थिरबुद्धि कैहाताहै ।। ५७॥
यदा संहरते चौयं कूमोऽगानीवं सर्वशः।
इंद्रियाणांद्रियार्थभ्यस्तस्य प्रैज्ञा प्रतिष्ठिता ॥५८ ॥
पर यह कछुवा जैसे अपने सर्व अंगोंको समेटिलेताहै तैसे
इंदियों के विपयन से आपकी सर्व इंद्रियोंको खेचिलेताहै तब उसकी
बुद्धि स्थिर होतीहै ॥ २८॥
विषया विनिवर्तते निराहारस्य देहिनः॥
रसवेज रसोप्यस्य परें हैवानिवर्तते ॥ ५९॥
इंद्रियनके आहार इंद्रियविपय उनको जो नहीं सेवताहै उस देहीके
विषयानुरागविना विप॑य निवर्त्त होतेहैं उसका वह विपयांनुराग भी
आत्मस्वरूपको देखके निश्चय निवत होताहै ॥ ५९॥
यततो ह्यपि कौंतेय पुरुषस्य विपश्चितैः ।।
इंद्रियणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसंभ मैनः ॥६० ॥
तौनि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ॥
वैशेहि यस्येद्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठितां ॥१॥
हे कुंतीपुत्र : आत्मदर्शनविना विपयानुग्ग निवत होता नहीं और
उसकी निवृत्तिविना जो ज्ञानी पुरुप बुद्धिकी स्याताकेवास्ते यत्रकर-
ताहे तोभी जिससे ये जोरावरीले मनको हरनेवाली इंद्रियों जवरेईसे
मनको दैरतो हैं ।। इससे योगयुक्तभैयाहुआ हैन सर्वइंद्रियोंको निय-
मितकरके मेरेऔंश्रय रहे जिसके इंद्रियों वर्श हैं तिसकी निश्च-
यकरके बुद्धि स्थिर है ।। ६० ॥ ६ ॥

भगवद्गीता। [अध्याय:- ध्यायतो विषयानं पुंसः संगेस्तेषूपजायते॥ संगात्संजायते कामः कामाको धोऽभिजायते ॥३२॥ क्रोधीदेवति संमोहःसंमोहात्स्मतिविभ्रमः ॥ स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥६३॥ बाह्यइंद्रियनकी प्रबलता और उनको वश नकरनेमें जो दोप सो कहा अब मनसंबंधी कहते हैं जो पुरुष मन वशकिये विना जितेन्द्रियता चाह- ताहै सो होनेकी नहीं जैसे कि, जिसके मनमें विपयोंको चितवन है उस पुरुषको उनविषयोंमें संयम करतेकरतेभी आसक्ति होगी उस आसक्ति- से अभिलापा होगी अभिलापासे क्रोध होगी क्रोध से मतिभ्रम होती है मतिभ्रमसे स्मरणशैक्तिमें विभ्रम होताह स्मृतिविभ्रमसे ज्ञानका नाश ज्ञानके नाशंसे स्वरूपसे नरें होताई याने संसारमें भ्रमताहे ॥६२॥६॥ रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिद्रियैश्चरन् । आत्मवश्यैविधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥६४ ॥ प्रसौदेसर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ॥ प्रसन्नचेतसोह्या बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ।। ६५॥ वश्यहै मन जिसका ऐसा पुरुष रागद्वेषकरके रहित और आपके पश्ये ऐसी इंद्रियों करके विपयोंकी सेवनकरता भया प्रसन्नताको प्राप्त होताहे याने निर्मलांतःकरण होताहे तव निर्मलचित्तहोनेसे इसके स- वैदुःखोंका नाश होता है उस प्रसन्नचित्तवालेकी बुद्धि शामही स्थिर होतीहै ।। ६४ ॥६५॥ नास्तिं बुद्धिरेयुक्तस्य नं चायुक्तस्य भावना ॥ नै चांभावयतः शांतिरशांतस्य कुतैःसुखम् ॥ ६६ ॥ H

4644(५१)
द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०।
भयुक्त जो समतारहित है उसकी बुद्धि नहीं स्थिर होतीहै और उस
अयुक्तके भावना याने आस्तिकता सो भी नहीं होतीहै और जिसके
भावना नहीं उसके शांति नहीं जिसके शांति नहीं उसको कहाँसे
सुख होगा ॥६६॥
इंद्रियाणां हिं चरतीयन्मनोऽनुविधीयते ॥
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुनीवमिवामसि ॥६७॥
तस्मौद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः॥
इंद्रियाणींद्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥६८॥
जिससे कि, जो मने विषय में प्रवृत्त इंद्रियोंको अनुसर्रताहै सो इस
पुरुपकी बुद्धिको वायु जैलमें नावको ऐसे हरता हे तिसीसे" हेम-
हावाहो ! जिसकी सर्व इंद्रियाँ इंद्रियोंके विषयोंसे सर्वयों रोकीभइहैं
तिसकी बुद्धि प्रतिष्टित है ॥६७॥६८॥
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागति संयमी॥
यस्या जाग्रतिभूतानि सौ निशा पश्यतो मुनेः॥६९॥
सर्वभूतप्राणीमानोंकी जो रात्री अर्थात् जिसविपयमें सर्वसोइसे रहे
हैं ऐसी परमात्मविपया बुद्धि तिसमें इंद्रियसंयमी जागताहे याने आत्म-
स्वरूपको देखताहे जिस शब्दादिविषयरूपं गनिमें सर्वभूतप्राणी
जोगते सो ज्ञानीजनकी रात्रिरूप है ॥ ६९॥
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्टं समुद्रापःप्रविशंति यन्द्र ।
तेदकामायं प्रविशति सर्वे में शांतिमानोति ने
कामकामी ॥७॥
जैसे आपही परिपूर्ण सर्वदा एकसे भरेभये समुद्रमें जल बाहरसे भ-
रताहै तैसे जिसकी सर्व कामना प्राप्तहोयहें सो" शांतिको प्राप्त होता है
जो कामनाओंकी इच्छाकरनेवाला देसो नहीं शांतिको पावताहे ॥७॥

भगवद्गीता। [अध्याय:- विहार्य कार्मान्यः सर्वान्पुमाश्चरति निःस्टहः॥ निर्ममी निरहंकारः सं शांतिमधिगच्छति ॥ ७१ ॥ जो पुरुप सर्व अभिलोपनको छोड़के इच्छारहित विचरताहै 'सो ममतोरहित और अहंकाररहितभयाहुआ शौतिको प्राप्तहोताहे॥ ७ ॥ एषां ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नै नां प्राप्य विसुह्यति ॥ स्थित्वाऽस्योमंतकालेपि ब्रह्मनिवा]मृच्छति ॥७२॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासुपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोग शास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादे सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः॥२॥ हे पृथापुत्रअर्जुन ! यह जो निष्कामकर्मरूप मैंने कही सो ब्रह्ममाप्ति- कारक स्थिति है इसको पांके नहीं मोहको पावताहै इसमें अंतकाल- में भी स्थितहोके ब्रह्मसदशैमुक्ति पावे अर्थात् जो सर्वकाल ऐसाही रहे उसकी मुक्तिको संदेह क्या है ॥ ७२ ॥ इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां गीतामृततरंगिण्यांद्वितीयाऽध्यायप्रवाहः॥ २॥ अर्जुन उवाच। ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ॥ तत्कि कर्मणि 'धोरे माँ नियोजयसि केशवे ॥१॥ ऐसे श्रीकृष्णके वाक्य सुनके अर्जुनने विचार किया कि, भग- वान्ने प्रथम मेरेको 'अशोच्यानन्वशोचस्त्वं' इत्यादिवाक्योंकरके ज्ञा- नयोग उपदेश किया. फिर 'बुद्धियोगेत्विमांशृणु' इत्यादिकरके क- मेयोग उपदेश किया उसमें भी श्रुतिविप्रतिपना ते यदा स्थास्यति नि- बला' इत्यादिकरके निष्कामकर्मसे आत्मज्ञानहीकी प्राप्ति कही इस . तृतीयं: ३.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०॥ (५३) से निश्चय होताहै कि, कर्मयोगसे जो पीछे आत्मज्ञान कहा सोई श्रेष्ठहै ऐसे विचारके अर्जुन भगवानसे कहने लगे कि, हेजनार्दन ! जोकि कर्मयोगसे ज्ञानयोगही तुमने श्रेष्ठं मानाहोय तों हे केशव ! घोर कर्ममें मेरेको "क्यों युक्तकरतेहो ॥ १ ॥ व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयंसीव में । तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहंमाप्नुयाम् ॥ २॥ ऐसे मिश्रित वाक्यंकरके मेरी बुद्धिको मोहतेसे हो जिसकरके मैं कल्याणको प्राप्तहोउं सो ऐक निश्चयकरके कहो॥२॥ श्रीभगवानुवाच । लोकेऽस्मिन द्विविर्धा निष्ठा पुर्रा प्रोक्ता मयाऽनंघ ॥ ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेनैं योगिनीम् ॥ ३॥ ऐसे अर्जुनके वाक्य सुनके श्रीकृष्णभगवान बोलते भये हेनिष्पाप अर्जुन ! इस लोकमें पूर्वकालमें मैंने दोप्रकारकी निष्ठा कहीहै सो सां- ख्येवालोंको ज्ञानयोगकरके और योगिनको कर्मयोगैंकरके ॥३॥ ने कर्मणामनारंभांनष्कम्यं पुरुषोऽईनुते ॥ नै च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥४॥ शास्त्रोक्तकमोंके किये विना पुरुष निष्कर्मता जो सर्वेद्रियवि- पयनिवृत्तिपूर्वकज्ञाननिष्ठा उसको नहीं प्राप्तहोताहै और कर्मके न करनेसेभी सिद्धिको नहीं प्राप्तहोता है ॥ ४॥ न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ट्रत्यकर्मकृत् ॥ कार्यतेहावेशः कम सेवैः कृतिजैगुणैः॥५॥ कोईकालेमें क्षणभरंभी कर्मकियेविना कोईभीपुरुष निश्चय

[अध्यायः-
भगवद्गीता।
करके नहीं रहता है क्योंकि सर्व सत्वादिप्रकृतिके गुणोंकरके पर-
वैश कर्म करनेही पैरता है ॥५॥
कर्मेंद्रियाणि संयम्य ये ऑस्ते मनसा स्मरन् ।
इंद्रियार्थान विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥६॥
जो ज्ञानयोगमें प्रवर्तहोनेको कर्मेंद्रियोंको हठसे संयममें रखके
इंद्रियविषयोंको मनकरके सुमिरतासुमिरता रहता है सो मूढे-
मति मिथ्याचार याने वृथायोगी कहाती है ॥६॥
यस्त्विंद्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ॥
कमेद्रियैः कर्मयोगमसक्तः सै विशिष्यते ॥ ७॥
और जो इंद्रियोंको मनसे नियममें रखके विपयोंमें आसक्त
न भयाहुवा कर्मेंद्रियोंकरके कर्मयोगको करतो है हे अर्जुन !
सौ" श्रेष्ट है ॥७॥
नियंत कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ॥
शरीरयात्रापि चे ते"नै सिध्येदैकर्मणः॥८॥
तिससे तुम स्ववर्णउचित कर्म करो क्योंकि कर्म ने करनेसे कर्म
करना श्रेष्ट है और कर्म विना तुम्हारा ज्ञानयोग करनेको शरीर निर्वा-
ईभी ने सिद्ध होगा ॥८॥
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽय कर्मबंधनः ।।
तिदथै कर्म कोतेयं मुक्तसंगः समाचर ॥९॥
जो कर्मसे बंधन कहाहै सो ऐसा कि, जो यज्ञार्थकर्म है उससे अ-
न्यत्र कर्म करनेसे यह मनुर्य कर्मबंधनको प्राप्त होता हे हेकुंतीपुत्र ।
तुम फलासंग छोडेभये उस यहीके अर्थ कर्म केगे॥९॥
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाचं प्रजापतिः॥
अनेन प्रसविप्यध्वमपे वो ऽस्त्विष्टकामधुक् ॥१०॥

तृतीयः ३.1 सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी। प्रयपति जो परमात्मा सो पुरा याने सृष्टिकालमें यज्ञंसहित प्रजाको उत्पन्नकरके बोले कि, इस यज्ञकरके तुम वृद्धिको प्राप्तहोउ यह यह तुम्हारे इच्छित कामनाओंको पूरनेवाला होउँ ॥ १० ॥ देवान्भावयताऽनेन ते देवां भावयतु वः ॥ परस्परं भावयतः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥ इस यज्ञकरके तुम देवताओंको पूजिके उनको बढावा वे तुम्हारे पूजे बढायेभये देवं तुम्हारा मनोरथ पूरतेभये तुमको वैढावेंगे ऐसे परस्पर व- देभिये तुम और देवता दोनों श्रेष्ठं कल्याणको प्राप्तिहोवोंगे ॥ ११ ॥ इष्टॉन्भोगोन्हेिं वो देवा दास्यते यज्ञभाविताः ॥ तैर्दत्तानप्रदीयेभ्यो यो भुक्ते स्तन एवं सैः ॥ १२ ॥ जो यज्ञ करोगे उसकरके वदितकियेभये देव तुमको इच्छित भोग निश्चयकरके देंगे उनकरके दियेभये भागोंको उनको दियेविनी जो भोगेगी स" निश्चयकरके चोर है इससे चोरतुल्य दंड पावेगा ॥१२॥ यज्ञशिष्टांशिनः संवो मुच्यते सर्वकिल्विषैः ॥ भुंजते ते लय पापी ये पंचंत्यात्मकारणात् ॥ १३ ॥ देवादिपूजनरूप यज्ञका शेप याने उबरेभये अन्नादिकके भोगनेवाले सत्पुरुष सर्वपापोकरकै मुक्तहोते हैं और जो आपहीवास्ते अन्नको पातहें वे पोपी पाप जैसाहोय तैसा ही खातेहैं ॥ १३ ॥ अन्नाद्भवति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः ।। यज्ञाद्भवंति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥ १४ ॥ कमब्रह्मोद्भवं विदि ब्रह्माक्षरसमद्भवम् ।। तस्मात्सर्वगतं ब्री नित्यं यज्ञे प्रतिष्टितम् ॥ १५ ॥ 12 (५६) भगवद्गीता। [अध्याय:- एवं प्रैवर्तितचक्र नौनुवयितीह यः ।। अघायुरिद्रियाँरामो मो घं पार्थ से जीवति ॥ १६ ॥ अब दिखातेहैं कि लोकदृष्टि और शानदृष्टिसे भी सर्वका मूल यज्ञ ही है सो ऐसे कि.सर्व भूतप्राणि अन्नसे होतेहैं अन्नकी उत्पत्ति वाँसे है सो लोकप्रसिद्ध देखने में आताहे वो यज्ञसे होताहै,यह शास्त्रप्रसिद्ध है सो यह श्लोक ॥ "अनोप्रास्ताहुतिः सम्यमादित्यमुपतिष्ठतिआदित्या- जायते दृष्टिकृष्टेरनं ततःप्रजाः ॥१॥" यज्ञकी उत्पत्ति यज्ञकतीके किये भये कमसे होतीहै सो कर्मब्रह्मसे होता है ऐसे जानो ब्रह्म नाम प्रकृति इहां प्रकृतिहीका रूप शरीर ब्रह्म जानना तहां प्रथम श्रुतिः तदेतवा नाम रूपमन्नं च जायते"तथा इहां भी कहेंगे"मम योनिर्मदा तस्मिन् गर्भ दधाम्यहम्" इत्यादिप्रमाणों से यहां यही अर्थ है कि प्रकृतिको ब्रह्म कह- ते हैं उसीका परिणाम यह शरीर इससे कर्म होताहै यह शरीर अक्षरस- मुद्भव याने अक्षर जो जीव तिसकरके सहित उत्पन्न होताहे याने सजीव शरीर कर्मका कारक है जिससे कि, शरीरही कर्मकारक है ईसीसे सर्वग- ते याने सर्वाधिकारयोग्य शरीर यज्ञमें नित्य प्रतिष्टित है याने यज्ञका मूलकारण है ऐसे यह ईश्वरकरके प्रवर्तमान इस चक्रको जो कर्माधि- कारी किंवा ज्ञानकर्माधिकारी नहीं अनुवर्त्तताहै याने यज्ञविना शरीर पोपताहे हेअर्जुन सो इंद्रियारोम पापीयुष्य वृथा जीवता है जो चक्र कहा उसका खुलासा यह कि अन्नसे शरीर, अन्न वर्षासे, वर्षा यज्ञसे, यज्ञ कर्मसे, कर्म शरीरसे, शरीर अन्नसे, ऐसे प्रवर्त्त है ॥ १४ ॥१५॥१६॥ यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तधैं मानवः॥ आत्मन्येवं च संतुष्टुंस्तस्यै कार्य नै विद्युत ॥१७॥ नेव तस्य कृतेनार्यो" नाकृतेनेहें कश्चनै । नै चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥१८॥ १ तृतीयः ३.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। कर्म न करनेसे किसको दोप नहीं सो कहते हैं सा ऐसा कि,जो मनुष्य औत्मरति हो यानेआत्मस्वरूपहीमें आनंदहोय और आत्मस्व- रूपहीसे तृप्त हो भन्नादिकसे प्रयोजन नहीं और आत्माही में संतुष्टहो उसके कर्त्तव्यता नहीं है उसके कर्मकरनेसे न कॅरनेसे भी यहां कुछ प्रयोजन नहीं है और इसके सर्वभूतप्राणिनमें कोई ऐसा भी नहीं नि- ससे कुछ प्रयोजन होय तात्पर्य ऐसा मनुष्य कर्म करै अथवा न करें तो चिंता नहीं ॥ १७ ॥१८॥ तस्मादसक्तः सततं कार्य कर्म समाचर ॥ असक्तो ह्याचरन कर्म परमाप्नोति पूरुषः ।। १९ ॥ जिससे कि, ऐसेको दोप नहीं तुम तो द्रव्यकुटुंवादिसे रतहो इससे कर्म में असक्त न भयेहुये करनेयोग्य स्ववर्णोचित कर्मको निरतर करो क्यों कि फलेच्छारहित कर्म करते करते पुरुप परमात्माको प्राप्त होताहै ॥ १९॥ कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः॥ लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन् कर्तुमर्हसि ॥२०॥ अब यह दिखातेहैं कि ज्ञानीको भी कर्मही श्रेष्ठहै सो ऐसे जिससे कि, जनकादिक ज्ञानी भी कर्मकरकेही मोक्षको प्राप्तमये वैसे तुमभी लोकसंग्रहको भी देखते भये कर्म करनेको योग्य हैं ॥२०॥ यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः॥ सं येत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥२१॥ यहां कारण यह है कि, श्रेष्ठ पुरुप जोजो आचरणकरतेहें दूसरे लोग भी पैसाही आचरणकरते हैं सो श्रेष्टपुरुप जो प्रमाणे करताहै सर्वलोगभी 4ही प्रमाणकरने लगते हैं ।। २१ ॥ न में पार्थोऽस्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन ॥

(५८) भगवद्गीता। [ अध्याय:- नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एवं च कर्मणि ॥ २२॥ हे पृथापुत्र अर्जुन ! तीनोंलोकों में मेरेको कुर्छ कर्तव्य नहीं है तथा नहीं प्राप्त ऐसाभी नहीं और प्राप्तहोय ऐसा भी नहीं अर्थात् सर्व मेरा ही है तथापि कर्ममें निश्चयकरके वर्तमान रहताहूं याने लोगोंको सिखाने- को कर्म करता रहताहौँ ॥२२॥ यदि वह न वैतेयं जातु कर्मण्यतंद्रितः ॥ मैम वर्मांनुवर्तते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ २३ ॥ हे अर्जुन ! जो कदाचित् सावधानर्भयाहुआ में कर्म में न वर्तमान रहों तो निश्चयकरिक सर्व मनुष्य मेरी ही रीतिपर चलनेलगै याने वे- भी निरर्थ मानके कर्म न करें ॥२३॥ उत्सीदेयुरिमे लोको ने कुर्यां कर्म चेदहम् ॥ . संकरस्य च कर्ता स्योमुपहेन्यामिमाः 4जाः ॥२४॥ जो कदाचित् में कर्म ने करौं 'तो ये लोक भी ऐसे जानेंगे कि, जो कर्म श्रेष्ठ होता तो श्रीकृष्ण करते इससे कर्म तुच्छ है ऐसा जानके कर्म छोडके नष्ट होंगे तव में वर्णसंकरका कत्ती होउंगा और इस प्रजाको मारनेवाला होउंगा ॥२४॥ सक्तो कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वति भारत । कुदिद्वांस्तथाऽसक्तश्चिकीर्षुलोकसंग्रहम् ॥ २५॥ हे अर्जुन ! जैसे अविद्राने लोग कर्म में आसक्तभयेहुये कर्म करते तैसे विद्वान् आसक्तंनभयाहुआलोकसंग्रहेको करनेकी ईच्छा कियेभषे कर्म करे ॥२५॥ ने बुद्धिभेदं जनैयेदज्ञानां कर्मसंगिनाम् ॥ जोपयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥ २६ ॥ जो ज्ञानी दे सो ज्ञानयोगयुक्तभयाहुमा कर्मकरताकरता जो कर्म- तृतीयः ३.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । संगी अज्ञानीहें उनको सर्वकमोंकी प्रीति उपजावे याने उनसे प्रशंसा करके कई करावे और बुद्धिभेद याने कर्ममें अश्रद्धा ने करावे ।। २६ ॥ प्रर्कतेः क्रियर्माणानि गुणैः कमाणि सर्वशः। अहंकारविमूढात्मा केहिमिति मन्यते ॥ २७॥ तत्त्ववित्तुं महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ॥ गुणों गुणेषु वर्तत इति" मैत्वा न सज्जते ॥२८॥ हे अर्जुन ! सर्व कर्म प्रकृतिके सत्वादिगुणोंकरके कियेभयेहैं जो अह- कारसे मृचित्त है सो में केत्ताहूं ऐसे" मानताहै और जो सत्यादि- क गुण और उनके कर्मके तत्वका ज्ञाताहै सो जानताहै कि, सत्वा- दि गुण आपआपके कार्यों में वर्तमान हैं ऐसा जानके आसक्त नहीं होताहै ॥ २७ ॥२८॥ प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जते गुणकर्मसु ॥ तानक- स्नविदो मंदान् कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥ २९ ॥ प्रकृतिके सत्वादिकगुणकार्योंकरके भूलेभये जो पुरुप वे सत्वादिगु- णकर्मफलोंमें आसक्त होतेहैं उनै अल्पज्ञमंदोंकों सर्वज्ञपुरुष कर्ममार्गसे चलायमान न करें ।। २९॥ मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याऽध्यात्मचेतसा ॥ निरांशीनिर्ममो भूला युध्यस्व विगतज्वरः ॥३०॥ हे अर्जुनाअध्यात्म जो स्वभाव स्वभावोऽध्यात्म उच्यते" इसप्रमाणसे क्षत्रियका जोशूरत्वादिक स्वभाव है उसमें चित्तको लगायेभये उसकरके सर्व कर्म मेरेमें अर्पणकरके निराशी याने फलाशारहित निर्मम याने कर्त्तापनका ममत्व छोड़के कर्मबंधनभयरूपचरसे छुटेभये युदं करो॥३०॥ ये में मंतमिदं नित्यमनुतिष्टति मानवाः ॥

भगवद्गीता। [अध्यायः- श्रद्धर्वितोऽनसूयंतो मुच्यते तेपि" कर्मभिः ॥ ३१ ॥ ये लेतेंदभ्यसूयंतो नानुतिष्टंति में मत ॥ सर्वज्ञानविमूढास्तीन्विद्धि नष्टॉनचेतसः ॥ ३२ ॥ जो मनुष्य इस मेरे मतको नित्य धारण करतेहैं और जो इसमें श्रद्धा ही रखते हैं और जो इसकी निंदारहिते, वे भी कर्मबंधनोंसे छुटगे और जो ईश "मेरे मैतकी निंदाकरतेभये इसको ग्रहणनहीं करते, वे सर्व ज्ञानविषयमें मूढ उँन अज्ञानिनको नभये जानो ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ संदेशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ॥ प्रकृति यांतिभूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ ३३.॥ जो ज्ञानवान् है सो भी आपके जातिस्वर्भावके सदृश चेष्टाकरताई अज्ञकरे तो शंकाही क्या है।सर्वभूतप्राणी आपके जातिस्वभावको अनु- सरतेहैं यहां नियह क्या करेगा ॥ ३३ ॥ इंद्रियस्येंद्रियस्यार्थे रोगद्वेषौ व्यवस्थिती ॥ तयौन वंशमार्गच्छेत्तौ होस्य पारपंथिनौ ॥ ३४ ॥ जय कर्म स्वभावहीसे है और उसका निग्रह नहीं तव उपाय क्या सो कहतेहैं कमेंद्रिय और ज्ञानेंद्रिय इनके निमित्त राग द्वेष युक्त हैं ति- के श न होना क्यों कि, वे इसके शडे हैं याने जीवके बंधनकारक रागद्वेपही हैं ॥ ३४॥ श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्टितात् ॥ संधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मों भर्यावहः ॥ ३५ ॥ जो रागद्वेपके वश होनेसे स्वधर्मका त्याग और पुरधर्ममें निष्ठा होतीहै उसका निवारण करतेभये श्रीकृष्ण कहतेहें सो ऐसे कि, नेत्रादिइंद्रियोंकी प्रीतिसे अर्जुन स्वधर्मोको त्यागने लगे कि, इन स्वजनोंको देखके मेरे दया आतीहै इससे युद्ध न करेंगा भीख मागि खाउंगा सो निवारते हैं जैसे कि, श्रेष्ठक- तृतीयः ३.] सान्वग-अमृततरंगिणी भा० टी०। (६१) मारंभ अन्यके धर्मसे स्वधर्म न्यूनभी कल्याणकारक है स्वधर्ममें मरना कल्याणदायक है परंधर्ममें मरनेसे भी अतिभयंकारक है ॥३५॥ अर्जुन उवाच। अर्थ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरूपः ॥ अनिच्छन्नपि वार्ष्णेयं बलाँदिवं नियोर्जितः ॥ ३६ ॥ अर्जुन भगवानसे पूंछतेहैं कि, हे वृष्णिवंशोत्पन्न कृष्ण! आपने कहा स्वधर्मही श्रेष्ठ है अन्यधर्म भयदायक है ऐसा जो जानताभी है और स्वधर्मपूर्वक ज्ञानयोगमें प्रवर्तहोके विषय भी त्यागे, तौभी फिर यह पुरुप विपर्यइच्छा नकरता भी बलात्कार विषयोंमें युक्तकिया सरीखो किसका प्रेरौभया पापोंको करती है ॥ ३६॥ श्रीभगवानुवाच । काम एप क्रोध एवं रजोगुणसमुंदकः॥ महाशंनो महापाप्मा विद्धये मिह वैरिणम् ॥ ३७॥ अर्जुनका प्रश्न सुनके श्रीकृष्णभगवान् कहतेहैं कि जो यह रजोगु- जसे प्रगट काम याने कामना सोबड़ा पापी अतिविषयसेवनरूप बडे आहारका करनेवाला यही क्रोधरूप होताहे इसको इस ज्ञानविपर्यों वेरी जानों ॥३७॥ धूमेनानियते वहियथादर्शो मलेन ॥ यथोल्वेनावृतो गर्भस्तथा ते"नेदमावृतम् ॥ ३८॥ जैसे अग्नि धुर्वांकरके ढर्कताहै और मलकरके दर्पण ढकताहे जैसे गर्भ जराकरके भावृत तेसे यह ज्ञान उसकामनाकरके टका है ॥ ३८॥ औवृतं ज्ञानमेतेनं ज्ञानिनो नित्यवेरिणा ॥

१६२)
भगवद्गीता। [ अध्याय:-
कामरूपेण कौंतेयं दुःपूरेणानलेन च ॥३९॥
हेकुंतीपुत्र! इस ज्ञानीका नित्यवैरी दुःखसे भी नभरसके इससे अप-
रिपूर्ण और इच्छाचारी ऐसे इस काँमकरके ज्ञान केंरहाहै काम याने
विषयवासना ॥ ३९॥
इंद्रियाणि मैनो बुद्धिरस्याऽधिष्ठानमुच्यते ॥
एतैर्विमोहयत्येपं ज्ञानमात्य देहिनम् ॥ ४० ॥
जब शत्रुको जीतना होय तव प्रथम उसके स्थान स्वाधीन करना
इससे इस कामनाके स्थान कहतेहैं सो वे ये कि, सर्व इंद्रिये मैन और
बुद्धि ये कामनाके स्थान कहतेहैं यह ईनहींकरके ज्ञानको आच्छादि-
तकरके जीवको मोहितकरता है ।। १०॥
तस्मात्त्वमिंद्रियाण्यादौ नियऱ्या भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजैहि 'ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥ ११ ॥
हेभरतवंशिनमें श्रेष्ट ! तिससे तुम प्रथम इंद्रियोंको संयममें कर-
के स्वरूपज्ञान और विज्ञान जो भक्ति इनके नाशनेवाले इस काम
पापीको निश्चय मारो॥४१॥
इंद्रियाणि पैराण्याहरिद्रियेभ्यः परमनः॥
मनसस्तु परा बुद्धियों बुद्धः परतस्तु सः ॥४२॥
जो ज्ञान के विरोधीहैं उनमें विद्वान लोग इंद्रियों को प्रबल कटते हैं
इंद्रियोंसे मैन प्रबलहै और मनसे बुद्धि प्रबलहे और जो बुद्धिसे
प्रबलहे सो वह कामनाहै।। ४२॥
एवं बुद्धेः पर बुओं संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जैहि शत्रु महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥ १३॥

चतुर्थः ४.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०।
इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगोनाम
तृतीयोऽध्यायः॥३॥
हे महाभुज अर्जुन ! ऐसे बुद्धिसे पर्वल स्वेच्छाचारी टुःसह कामना-
रूप शत्रुको जानके फिर मनको बुद्धिकरके रोकके" इस शत्रु-
को मारो ॥४३॥
इतिश्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिता-
यांश्रीमद्भगवद्गीतामृततरंगिण्यांतृतीयाध्यायप्रवाहः ॥३॥
प्रकृतिसंसर्गी मुमुक्षु सहसा ज्ञानयोगाधिकारी नहीं होसकता
है इससे तीसरे अध्यायमें उसको कर्म करनाही उपदेशा तथा
ज्ञानयोगीकोभी कर्तृत्वत्यागपूर्वक कर्म करनाही उत्तम कहा और
जनसंग्रहके वास्ते भी कर्म करनाही श्रेष्ट कहा. अब जो जगत्
उद्धारके वास्ते मन्वंतरके आदिमें इसी कर्मयोगका उपदेश किया था
उसीको इस चौथे अध्यायमें दृढ करते हैं. ज्ञानयोग भी इसीके
अंतर्गत है; इससे इसकी ज्ञानयोगाकारता दिखायके कर्मयोगका
स्वरूप और भेद तथा उसमें ज्ञानांशकी प्रधानता तथा इसीप्रसं-
गसे भगवदवतारनिश्चय भी कहते हैं।
श्रीभगवानुवाच ।
इमं विवस्वते योग प्रोक्तवानहमव्ययम् ॥
विवस्वान्मनवे प्राहे मरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥१॥
श्रीकृष्णभगवान अर्जुनसे कहते हैं कि, जो यह योग मैंने तुमसे
कहा सो केवल अब युद्धोत्साह बढानेको तुम्हारेहीसे नहीं कहा
इसको कल्पकी आदिमें भी कहा है सो सुनो में प्रथम इस अव्यय'
कर्मयोगेको सूर्यसे कहता या सूर्य वैवस्वतमनुसे कहतेभये मैनु
इलाकुसे कहतेभये ॥३॥

(६४) भगवद्गीता। [अध्याय:- एवं परंपराप्राप्तमिमें राजर्षयो विदुः ॥ सं कौलेनेह महता योगो नष्टः परंतप ॥२॥ ऐसेही परंपरासे प्राप्त इसको गर्जवपि जानतेभये हेपरंतप ! सो यह योगं इससमयमें बहुत कालकैरके नष्टंभया था॥२॥ सेएवायं मया तेऽचं योगः प्रोक्तः पुरातनः ॥ भक्तोसि मे सदा चे "तिरहस्य तदुत्तमम् ॥३॥ सोई येह पुरातन योर्ग भेने तुम्हारसे आज कहाँ क्योंकि तुम मेरे भक्त और सखौ हो यह उत्तम रहस्य है ॥३॥ अर्जुन उवाच । अपरं भवतो जन्म पर जन्म विवस्वतः॥ कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥४॥ ऐसे सुनिक अर्जुन कहने लगेकि, तुम्हारा जन्म अभी भैया विव- स्वानको जन्म प्रथमर्भया तुम गादिमें उनको कहतेभये ऐसे इसको हम कैसे जानें ॥४॥ श्रीभगवानुवाच । बहूनि में व्यतीतानि जन्मानि तवं चॉर्जुन,॥ तान्यहं वेझिं सेवाणि नै त्वं वेत्थ परंतप ॥५॥ अर्जुनके प्रश्नका श्रीकृष्ण भगवान् उत्तर देतेहैं इसमें आपके अवतारका भी प्रयोजन कहेंगे सो ऐसे कि हे परंतप 1 याने शत्रुनको संतापित करनेवाले अर्जुन ! मेरे और तेरे बर्हत जन्म व्यतीतभयेहें उन सर्वको "मैं जानतीही तुम नहीं जानतेहो ॥५॥ अंजोर्पि संन्नव्ययात्मा भूतानांमीवरोपि सन । प्रकृति स्वामधिष्टाय संभवाम्यात्ममायया ॥६॥ .

चतुर्थः ४.] सान्वय अमृततरंगिणी मा० टी०। यहाँ कारण यह है कि, मैं अविनाशी संवीतर्यामी हूं सर्वभूतोंका भी ईश्वर भयौढुवा तथा भजम्मा भयाँढुवा भी मेरो स्वभाव जो सोशील्य वात्सल्य शरणागतरक्षकत्व इत्यादिक तिसको आश्रितकरके याने उ- स स्वभावहीसे आपके ज्ञानसहित अवतौरलेताहूं जीवको ज्ञान नहीं रहताहै मेरा ज्ञान अखंडहे में केवल स्वभक्त खसेतुरक्षणार्थ अवतार लेताहूं इसका कारण अगाडीके श्लोकोंमें है ॥६॥ यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहमें ॥७॥ हे भारत ! जब जब निश्चयपूर्वक धर्मकी हानि अधर्मकी वृद्धि होती है तैब में रूपैको धारणकरतीहूं ॥७॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ॥ धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥ ८॥ जो स्वस्वभावसे अवतार कहा यह स्पष्ट करतेहैं धर्महानि अधर्म- दि देखके मैं साधुनके संरक्षणके वास्ते और दुष्ट के विनाशके वास्ते युग युगमें धर्मस्थापनके वास्ते अवतार लेताहूं ॥ ८॥ जन्म कर्म च में दिव्यमेवं यो वेति तत्त्वतः॥ त्यत्रो देह" पुनर्जन्म नै"ति मामेति सोऽर्जुन ॥९॥ हेअर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य याने प्राकृत नहीं है ऐसे जी निश्चयकरके जानती है सो" देहको त्यागिक फिरिके जन्म नहीं लेता है अर्थात् मेरे को प्रामिहोताहै ॥ ९ ॥ वीतरांगभयकोधा मन्मयां मामुपाश्रिताः ॥ बहवो ज्ञानंतपसा पूता मद्भावमार्गताः ॥ १० ॥ M भगवद्गीता। [ अध्याय:- व्यतीत भये हैं सांसारिक अनुराग भय और क्रोध जिनके तथा सर्वत्र मेरेहीको जानतेहैं और जो मेरे ही आश्रितहैं ऐसे बहुत मेरे स्व- रूपज्ञानरूपतपकरके पवित्रभयेहुये मेरी सदृर्शताको प्राप्तभये हैं।॥१०॥ ये या मी प्रपंछते तास्तथैवं भजाम्यहमें । मम वत्मानुवर्तते मनुष्योः पार्थ सर्वशः ॥११॥ हे पृथापुत्र अर्जुन ! सवै मनुष्य ममवत्म याने जो जो सकामनिष्का- वेदमें मार्ग कहे, वे मेरेही कहे मार्ग हैं. उन्हीं मांगोंके आश्रित कर्मक- रहें तहां जो मेरेको जैसे भजैतहे में"उनेको वेसे ही" भजता हूं; याने जो सकाम इंद्रादिरूप मेरेको भजतेहें उनको 'तदेवानिस्तत्सूर्य अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता' इत्यादि प्रमाणसे इंद्रादिलोक पुत्रादिकाम- ना देता हूं और जो निष्काम मेरेको सर्वेश्वर जानके सर्वकर्म 'कायेन वाचा मनसेंद्रियेवो' इत्यादि प्रमाणोंसे मेरे अर्पण करतेहैं उनको मेरे स्वरूपवैभवको प्राप्त करताहूं ॥ ११॥ कांक्षतः कर्मणां सिद्धि यजंतं इहें देवंताः॥ क्षिप्रं हिँ मानुषे लोके सिद्धि भवति कर्मजा॥ १२॥ जो कर्मोंकी सिद्रिकी इच्छा करतेभैये इस लोकमें देवताओंका यजन करते हैं उनकी निश्चयकरके शीघ्र मनुष्यलोकमें कमसे उत्पन्न सिद्धि होती है" ॥ १२॥ चातुर्वण्य मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ॥ तस्य कतरिमंपि मां विद्धर्यकत्तरिमध्ययम् ॥ १३ ॥ गुणकर्मविभागसे जसे सत्त्वगुणप्रधान ब्राह्मण उनके शमदमादि कर्म सत्वरजःप्रधान क्षत्रिय उनके शूरत्वादि कर्म रजस्तमःप्रधान वेश्य चतुर्थः ४.] सात्वय-अमृततरंगिणीभाटी। उनके कृपिवाणिज्यादि कर्म तम प्रधान शुद्र उनके परिचर्यात्मक कर्म ऐसे गुणकर्मविभागकरके चातुर्वर्ण्य यह संसार मैंने सजा है उसका अविनाशी का भी मेरेको अर्कत्ती जानो ॥ १३ ॥ नं मां कर्माणि लिम्पति ने मेकर्मफैले स्यहाँ । इंति माँ यो"ऽभिजानाति कमभिन से वध्यते॥१४॥ जो प्रथम कहा कि, मेरेको अकर्ता जानो उसका कारण कहतेहैं सो ऐसा कि, मेरेको कर्मफलमें इच्छा नहीं इससे मेरे कर्म नहीं लितहोतेहैं ऐसा मेरेको" जो जानती है सो" कोकरके नहीं बधता है ॥ १४॥ ऍवं ज्ञात्वां कृतं कर्म पूवैरपि मुमुक्षुभिः । कुरुकम तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥ १५ ॥ पूर्वसमयके मनु इत्यादिक मुसुक्षुजनोंने भी ऐसें जानके कम किया है तिससे तुम पूर्व मुमुक्षु करके पूर्वकालमें किये भये कर्म' हों को करो ॥१९॥ कि कम किमकर्मेति कश्योऽप्यंत्र मोहिताः ॥ तते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभौत् १६ कम क्या है और अकर्म क्या है ऐसे इसवपयमें कविजन भी मोहते भये सो" कर्म मैं तुम्हारेको कहूंगी जिसको जानके संसारसे मुक्त होगे ॥१६॥ कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ॥ अकर्मणचं बोई व्यं गहनों कर्मणो गतिः॥ १७॥ जिसवास्ते कि, कर्म याने करने योग्य कर्म उसका रूपभी जानना चाहिये और विकर्म जिस एककर्ममें विविध प्रकार है उसका रूप भी जानना चाहिये और अन्र्म जो निश्चयात्मक बुद्धिकरके केवल ईश्वरास-

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(७०)
भगवद्गीता।
[ अध्याय:-
ब्रह्माग्नापरे यज्ञ यज्ञेनैवोपंजुह्वति ॥ २५ ॥
ऐसे कर्मयोगकी ज्ञानाकारता कहके अब कर्मयोगके भेद कहतेहें
अपरे 'अकारो वै विष्णुः' इस श्रुतिप्रमाणसे जो विष्णुपरायण हैं वे योगी
देवयनहीं याने प्रतिमापूजनरूप यज्ञ करतेहैं इनसे और भी ऐसेही
योगी ब्रह्मात्मक अग्निमें यज्ञसाधन सामग्रीकरके हवनात्मक यही को
हैवन करतेहैं ॥२९॥
श्रोत्रांदीनींद्रियाण्यन्ये संर्यमानि जुवति ।।
शब्दादीन्विषयानन्ये इंद्रियोग्निषु जुहति ॥ २६ ॥
और कितने योगी श्रोत्रादिक इंद्रियोंको संपमरूपं अग्निमें होमत
अर्थात् श्रोत्रादिकोंको हरिकीर्तिश्रवणादिकहीमें युक्त करतेहैं और कि-
तेनेक शब्दांदिकविषयोंको इंद्रियरूप अग्निमें होते हैं याने हरिकी-
तैनविना और श्रवणादिक नहीं करतहें ॥२६॥
सर्वाणींद्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
आत्मसंयमयोगाग्री जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥२७॥
और कितने योगी सर्व इंद्रियेनके कर्मोंको और प्रोणोंके कर्मोको
ज्ञानकरके प्रदीत ऐसे मनके संयमरूप अग्निमें होमतेहैं अर्थात् मनकर-
के इंद्रिय प्राण कर्म वृत्तिनको संसारविषयसे निवारणकरके आत्मज्ञान-
में लगानेका यत्न करतेहैं ।। २७॥
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयःशंसितव्रताः ॥ २८ ॥
और कितने योगी द्रव्यसे यज्ञ करतहैं. याने दानादिक करतेहैं. कि-
तनेक उपवासादि तपरूप यज्ञ करतेहैं. तसेही और कितनेक पुण्यक्षे-
त्रादिक वासरूप योग करते हैं और कितने हूँढवती यती याने
यत्नशील वे वेदाध्ययन वेदार्थविचाररूप यज्ञ करतेहैं ॥२८॥

चतुर्थः ४.] सान्वय-अमृततरंगिणीभा० टी०॥ अपाने जुह्वति प्राण प्राणेऽपान तथा परे । प्राणापानगती सुद्धा प्राणायामपरायणाः॥ २९ ॥ अपरे नियंताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ॥ सर्वेऽप्येते" यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥ ३० ॥ यज्ञशिष्टाऽमृतभुजो यांति ब्रह्म सनातनम् ॥ नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम३१॥ और कितनेक कर्मयोगी प्रमाणसे आहार करनेवाले जैसे कि, आधा पेट अन्नसे भरे चौथाई जलसे और चौथाई वायुसंचारनिमित्त खाली राखै ऐसे और प्राणायाम परायण हैं ऐसे योगी अपानमें प्रोणको होमतेहैं याने पूरक करतेहैं; तैसेंही किर्तनेक प्राणवायुमें अपानको होमते, याने रेचक करतेहैं. ऐसेही और प्राण अपान दोनोंकी गति को रोकके प्राणोंको प्राणनहीं में होम तेहैं याने कुंभक करतेहैं। इतने ये सब भी यज्ञके जाननेवाले यज्ञकरके पापरहित यज्ञ- हीका शेप अमृतरूप अन्नके खानेवाले सनातन ब्रह्मको प्राप्त होते हैं. हे कुरुवंशिनमें श्रेष्ट अर्जुन! जो यज्ञ नहीं करता है उसको यह लोकभी नहीं है और परलोक तो कैसे होयगा ॥२९॥३०॥३१॥ एवं बहुंविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ॥ कर्मजान्विद्धि तान्सानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥३२॥ ऐसे बहुत प्रकारके यज्ञ ब्रह्मके मुंखमें याने वेदमें विस्तारसे कहें उन सबको कर्मजं जीनो याने वे कर्महीसे होते हैं, ऐसे जीनिके कर्म करके मुक्त होवोगे ॥ ३२॥ श्रेयान्द्रव्यमयांद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप ॥ सर्व काखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥३३॥ हे परंतप ! द्रव्यमय यज्ञसे ज्ञानय श्रेष्ठ है, कारण कि द्रव्य- 4 (७२) भगवद्गीता। [ अध्याय:- यज्ञकाभी फल ज्ञानही है हे पार्थ ! फलसहित सर्व कर्म ज्ञान में समाप्त होताहे; याने इस ज्ञानहीके वास्ते यज्ञ करतहैं ॥ ३३ ॥ तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवयाँ ॥ उपदेक्ष्यंति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ३४ ॥ सो ज्ञान तत्त्वंदी ज्ञानीजन तुमको उपदेशेंगे तुम उनकी सेवा करके और सत्कारपूर्वक नमस्कार करके उनसे प्रश्न करके जानो ॥ यहां श्रीकृष्णभगवानने केवल ज्ञानीजनोंकी प्रशंसानिमित्त यह वाक्य कहाहै और "अविनाशि तु तद्विद्धि " यहाँसे लेके एपा तेभिहिता सांख्ये" यहां पर्यंत ज्ञान उपदेश तो करही चुके ॥३४॥ यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पांडव ॥ येने भूतान्यशेषेण ट्रेक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥ ३५ ॥ हे पांडुपुत्र ! जिस ज्ञानको जानिके ऐसे मोहको फिर नहीं प्राप्त होगे. जिसज्ञानकरके सर्वे भूतप्राणिमात्रको आपसदृश देखोगे. "जैसे कि, प्रकृतिसे भिन्न ये परज्ञानाकारतासे सर्वसमान हैं आपसंदेश देखे पीछे फिर मेरेसमान देखोगे याने ज्ञान प्राप्तभये जीव मेरी समता- को प्राप्तहोतेहैं सो आगे कहेंगेभी " इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्य मागताः॥" यहां ब्रह्मसूत्र भी प्रमाणहे "भोगमात्रसाम्यलिंगाच्च" ऐसे ही श्रुतिभी प्रमाण है "तथा विद्वान्पुण्यपापे विधूय निरंजनः परमां शां- तिमुपैति ॥” इत्यादिप्रमाणोंसे नामरूपरहित याने सूक्ष्मावस्थामें आ- त्मा और परमात्माकी स्वरूपसमता निश्चय होतीहै ॥ ३५॥ अपि चेदेसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ॥ सर्व ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि ॥ ३६ ॥ जो कि, सर्व पापिनसे भी तुम बड़े पापकारक होउगे तो भी इ ज्ञानरूप नौका करकेही सेव दुःखसमुद्रेको तैरोगे ॥३६ ।।

चतुर्थः ४. सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी। यथैधांसि समिदोऽग्निभस्मात्कुरुतेऽर्जुन ॥ ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसाकुरुते तथा ॥ ३७॥ हे अर्जुन जैसे प्रज्वलित अग्नि इंधनेको समग्रभस्मकरताहै तसे विज्ञानरूप अनि सर्वकर्मबंधनको समग्र भस्मकरताहै ।। ३७ ॥ नहिं ज्ञानेन संदृशं पवित्रमिह विद्यते । तत्स्वर्य योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विदेति ॥ ३८ ॥ इसलोकमें निश्चयकरके ज्ञानके सहश पवित्र नहीं है स ज्ञानको कुछकाल कर्म करते करते कर्मयोगसे सिद्धिभयाहुँचा औपदीमें आ ही प्राप्तहोतीहै ॥३८॥ श्रद्धावॉलभते ज्ञानं तत्परः संयतेंद्रियः ॥ ज्ञानं लब्ध्वा पेरां शांतिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ३९ ॥ ज्ञानप्राप्तिमें लगांभया इंद्रियोंको संयममें कियेभये श्रद्धावान् धुरुप ज्ञानको प्राप्तहोते हैं उसज्ञानको पाइँके थोड़ेहीकालमें परमशांति को प्राप्त होताहै ॥३९॥ अज्ञश्चाऽश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ॥ नायं लोकोस्ति न पैरो नै सुखें संशयात्मनः॥ ४० ॥ जो अज्ञानहै और ज्ञानप्राप्तिम श्रद्धाको भी नहीं धारणकियेहैं और मनमें संशय रखता सो नष्टभ्रंट संसारमें भ्रमताहै जिसके मनमें संशय है उसको यह लोक सुखदायक नहीं है" परलोक भी नहीं है उसको कहीं भी सुख नहीं है ।। ४० ॥ योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसँछिन्नसंशयम् ॥ आत्मवंतं न कर्माणि निवश्नति धनंजय ॥ ४१ ।। हे गर्जुन ! परमेश्वराराधनरूप जो निष्काम कर्मयोग उस योगकरके

(७४)
भगवद्गीता।
[अध्यायः--
परमात्माके अर्पण कियहें कर्म जिसने और ज्ञानकरके संछिन्नभये ।
संशय जिसके ऐसे स्थिरचित्त ज्ञानीको कर्म नहीं बंधनकरते हें ॥४१
तस्मादज्ञानसंभृतं हृत्स्थं ज्ञानांसिनात्मनः॥
छित्त्वैनं संशयं योगैमातिष्टोत्तिष्ठं भारत॥४२॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिपत्सु ब्रह्मविद्यायां
योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसंन्यास-
योगोनाम चतुर्थोऽध्यायः॥४॥
हेभरतवंशोत्पन्ने अर्जुन ! तिससे जो अज्ञानसे उत्पन्न तुम्हारे हद
में स्थित ऐसे इस आपके संशयको ज्ञानसंगसे छेदनकरके उँट
और कर्मयोगमें प्रवृत्त होउँ याने क्षत्रियका कर्म युद्ध करो ॥ ४२ ।
इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिता-
यांश्रीमद्भगवद्गीतामृततरंगिण्यां चतुर्थाऽध्यायप्रवाहः ॥४॥
अर्जुन उवाच ।
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ॥
यच्छ्रेय एतयोरेकै तन्मे बेहि सुनिश्चितम् ॥ १॥
श्रीकृष्णको अर्जुन पूंछतेहैं कि, हे कृष्ण! कर्मोंको संन्यास जोज्ञान
योग उसको और फिरे कर्मयोगको कहतेहो इन दोनोंमें एक 'जो नि-
चय कियाभया श्रेष्ट होय जैसीको मुझे कहीं जैसे कि, दूसरे अध्याय
में कहा कि, मुमुक्षु प्रथम कर्मकरके अंतःकरण शुभयेपर ज्ञानयोग
करके आत्मदर्शनका उपायकरे तीसरे चौथेमें ज्ञानीको भी कर्म करना
ही श्रेष्ठ कहा, ऐसे दोनों कहते हो जो इन दोनोंमें श्रेष्ठ हो सोई कहो।।१॥
श्रीभगवानुवाच ।
संन्यासः कर्मयोगश्चै निःश्रेयसंकरावुभौ ॥
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥२॥

पंचमः ५.] सान्वय-अमृततरंगिणीभा० टी०। (७६) जब अर्जुनने प्रार्थना की तब श्रीकृष्ण भगवान् बोले सो ऐसे कि, संन्यास जो कर्मका त्याग और कर्मयोग ये दोनों कल्याणकारक हैं. तिन से भी कर्मके त्यागसे कर्मयोग विशेष श्रेष्ठ है ।।२।। ज्ञेयः सं नित्येसंन्यासी यो ने द्वेष्टिं नं कांक्षति ॥ निद्वो हि" महाबाहो सुखं बंधात्प्रमुच्यते॥३॥ हे महाबाहो ! जो ने कोई वस्तुसे द्वेष करे, न चाईनाकरे, सो सुखदुःखादि ईईरहित नित्यंसंन्यासी जानना वह सुखपूर्वक निश्चय वधनसे मुक्त होताहै ॥३॥ सांख्ययोगौ पृथवाला प्रवदंति नं पंडिताः । एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोविदते फलमें ॥ ४॥ जो मूर्ख हैं वे सांख्ययोगोंको याने ज्ञानकर्मीको न्यारे कहतेहैं पंडित नहींकहतेहैं. इन दोनों से एकमें भी अच्छीतरहसे स्थितरहाभया दोनोंके फलेको पाता है ॥४॥ येत्सौख्ये प्राप्यते स्थान तद्यो गैरपि गम्यते ॥ एक सांख्यं च यो ग च यः पश्यति सैं पश्यति ॥५॥ जो स्थान ज्ञानेकरिके प्राप्तहोता है सोई कर्मकरिकेभी प्राप्तहो- ता है। इससे ज्ञानेको और कर्म को जो एक जानताहै 'सो जानता है याने विद्वान है ॥६॥ संन्यासस्तु महावाहो दुःखमाप्तुमयोगतः॥ योगयुक्तो मुंनिर्बी न चिरेणाधिगच्छति ॥६॥ हे महाबाहो ! यह संन्यास कर्मविना प्रातहोनेको दुर्गम है याने हो

(७६)
भगवद्गीता।
[ अध्यायः
होका नहीं और जो कर्मयोगयुक्त आत्मज्ञानमें मनलगाये है सो थोड़ेही
कालमें प्राको प्राप्तहोताहे ॥६॥
योगयुक्तो विशुद्धांत्मा विर्जितात्मा जितेंद्रियः ॥
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥७॥
जो कर्मयोगयुक्त है याने निष्काम कर्म करताहै और वाणी जिसकी
शुद्ध है याने वाणीसे हरिकीर्तन करता है और मन शुद्ध है याने मनसे
हरिस्मरण करताहै और जितेंद्रिय है याने इंद्रियविपयको श्रेष्ठ नहीं जा
नताहै और सर्वभूतप्राणीका आत्मा अंतर्यामीमें है आत्मा मन जिसका
सो पुरुप कर्म करताभया भी नहीं लिप्त होता है ॥ ७॥
नै व किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ॥
पश्यञ्छृण्वन्स्पेशविनश्चेन्गच्छन्स्वपञ्छुसैन ॥८॥
प्रलेपन्विसृजन्गृह्णन्मिपन्निमिपन्नपि ॥
इंद्रियाणींद्रियार्थेषु वत्तेत इति धारयन् ॥९॥
इंद्रियनके विषयों में इंद्रियां वर्तमान रहतीहैं ऐसे धारणकरेभयेत-
त्वज्ञानी कर्मयोगी देखता, सुनतो, स्पर्शती, सूघेता खाती, चलती
सोतो, इवासलेता बोलता छोड़ेंता, परता, नेवखोलता, मीचंता
भयोभी में कुछ भी नहीं करतीहूं ऐसे" मानताहे ॥ ८॥९॥
ब्रह्मण्याधायें कर्माणि संगं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते नै सं पापेने पैद्मपत्रमिवीं भौं। १०॥
जो शरीरमें याने शरीरस्य इंद्रियनेमें कमीको धारणकरके याने
कर्मकरनेवाली इंद्रियां है ऐसे जानिके कर्मफलासक्तिको त्यागिक कर्म
करता है सो पापकरके नहीं लिप्त होता, जलकरके कमलप-
जसरीस॥१०॥

पंचमः ५.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (७७) कायेन मनसा बुद्धयाँ केवलैरिद्रियैरपि । योगिनःकम कुँति संगं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥११॥ जो योगी हैं वे फलंसंग त्यागि आत्मशुद्धिके वास्ते याने आत्म- गत प्राचीन कर्मबंधन छूटनेके वास्ते शरीरकरके, मनकरके, बुद्धि- करके, केल इंद्रियोंकरके भी कर्म करते हैं ॥ ११॥ युक्त कर्मफेलं त्यक्ता शांतिमाप्नोति नैष्टिंकीम् ॥ अयुक्तः कामकारेण फेले सैतो निवयते ॥ १२ ॥ युक्त याने आत्मज्ञान योगयुक्त पुरुष कर्मफलको त्यागिक ईश्वर- निष्ट शांतिको प्राप्तहोता है जो आत्मज्ञान योगरहित है सो यथेष्ट करण- करके फेलविषे आसक्तभया ऐसा जो जीव सो बैदहोय ॥ १२ ॥ सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वंशी ॥ नवद्वारे परे देही नै वै कुर्वन्नं कारयन् ॥१३॥ वशी याने जिसका चित्त वेशहै ऐसा देही देहधारी जीव सो नवद्वार- गपुर जोदेहँ तिसमें मनसे सब कोको स्थापितकरके न करतान करीता भया सुखं जैसे होय तैसे ही रहता है ।। १३॥ न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ॥ नकर्मफलंसंयोग स्वभौवस्तु प्रवर्तते ॥ ११॥ प्रभु याने अविनाशी आत्मा लोक जो देवादिक शरीर तिसकाने फर्पिन ने कर्म न कर्मफलके संयोगको सिरजेताहै क्योंकि, यह स्वभाव याने अनादिकाल प्रकृतिसंसर्गकी वासना प्रवृत्त है ॥ १४॥ नार्दत्ते कस्यचित्पापं ने चैव सुकृतं विभुः। अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेनै मुह्यति जंतवः ॥१५॥ जैसे कि, कर्तृत्व और कोको नहीं उत्पन्नकरताहै इसीसे यह जी

(७८)
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
वात्मा किसी शरीरसंबंधी पापको भी नहीं ग्रहणकरता है और सुकृत
को भी नहीं ग्रहणकरता है क्योंकि, जिनका ज्ञान अज्ञान करके ढक-
रहाहै उस करके वे जीवे मोहको प्राप्त होते, याने अज्ञानकरके देहा-
दिकमें आसक्ति और उससे दुःख होताहै ॥ १६॥
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येपां नाशितमात्मनः॥ ।
तेषीमादित्यवज्ञान प्रकाशयति तत्परमें ॥ १६ ॥
परंतु जिनका आत्मसंबंधी ज्ञानकरके वह अज्ञान नष्टभैयाहै उनका बहे
श्रेष्ठं ज्ञान सूर्यसदृशं प्रकाश करताहै याने वे संसारदुःखरहित मुक्त.१६॥
तेदद्धयस्तदात्मानस्वनिष्ठास्तत्परायणाः ॥
गच्छंत्यपुनरावृत्ति ज्ञाननिर्धतकल्मषाः ॥ १७॥
उस आत्मज्ञानहीमें है बुद्धि जिनकी उसीमें है मन जिनको उसीमें
हे निष्ठा जिनकी और वही है श्रेष्ठस्थान जिनको इसतरहसे ज्ञानकरके
नष्ट भये हैं मनके विकार जिनके वे पुरुप मुक्तिको पावतेहैं।॥ १७ ॥
विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।।
शनि चैव श्वपाके च पंडिताः समदर्शिनः ॥ १८॥
विद्या और विनययुक्त ब्राह्मणों, गऊँ में, हाथीमें और कुत्तों और
चांडालमें भी पंडितजन समैदशी होतेहैं याने आत्माको आपसदृश
जानते हैं ॥ १८॥
इहव तें जितः सगों येषां साम्ये स्थितं मनः ॥
निदोपं हि" सैम ब्रह्म तस्माद्रीणि ते स्थिती १९॥
जिनका मनं ऐसी समतामें स्थितहै उन्होंने इहीं हो संसार जीता
है. जिसंवास्ते कि, ब्रह्मै निदाप सर्वत्र समान है ति सीसे वे ब्रह्मप्रप्ति-
निमित्त स्थित हैं।॥ १९॥

पंचमः५.] सान्वय-अमृततरंगिणीभा टी। (७९) नप्रहष्येत्प्रेियं प्राप्यं नौदिजेत्प्राप्य चाप्रियम् ॥ स्थिरईद्धिरसमूढो ब्रह्मविद्रमणि स्थितः ॥२०॥ प्रियवस्तुको पायके हर्पना नहीं और अप्रियको पायके व्याकुल ने होना; ऐसा स्थिरबुद्धि, विचारशील बीका ज्ञाता ब्रह्मप्राप्तिनिमित्त स्थितहै ॥२०॥ बाह्यस्पर्शेष्वसत्तात्मा विदत्यात्मनि यत्सुखम् ॥ -- संब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुर्खेमक्षयमश्नुते ॥ २१ ॥ जो शब्दादिक विषयोंमें अनासक्तभयाहुआ जो आत्मों में सुखको पार्वताहे सो ब्रह्मप्राप्ति उपायचित्तवाला पुरुष अक्षयं सुखेको पावताहै याने मोक्ष पाताहै ॥२१॥ यहि संस्पर्शजा भोगा दुःखयो य एंव ते ॥ आद्यतवंतः कौंतेय नै तेरे रमते बुधैः ॥ २२॥ हे कुंतीपुत्र! जे शब्दस्पर्शादिक भोगे हैं वे दुःखके कारण आयत- वंत याने होतेजाते रहते हैं अर्थात् अल्पसुख हैं इस निश्चयंसे उनमें पंडितजन नहीं रमते हैं ॥ २२॥ शनोती हैवं यः सोडुं प्रांक शरीरविमोक्षणात् ॥ कामक्रोधोद्भवं वेगें संयुक्त से सुखी नरः॥२३॥ जो मनुष्य कामक्रोधके वेगको शरीरसे निकसनके प्रथम उस वे- गको सहनेको सकताहै सो योगी है सो मनुष्य इस ही" लोकमें सुसीहै ॥ २३॥ योतःसुखोऽतरारामस्तथांर्तज्योतिरेवं यः ।। सं योगी ब्रीनिर्वाणं ब्रीभूतोऽधिगच्छति ॥२४॥ जो आत्माहीमें सुखी और आत्माहीम है विश्राम जिनको तैसे' (८०) भगवद्गीता। [अध्याय:- ही जो अंतज्योति याने आत्मज्ञान ही करके प्रकाशितहे सोई योगी ब्रह्मप्राप्ति उपायतत्पर ब्रह्मवत् ऍक्तिको प्राप्त होताहै ॥ २४ ॥ लभते ब्रह्मनिर्वाणमृर्पयः क्षीणकल्मषाः ॥ छिन्नद्वधा यंतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥२५॥ जिनके लाभ अलाभसुखदुःखादिक दो दोउपद्रव नष्ट भयेहैं जिनका मन ईश्वरमें लगी है और सर्वभूतप्राणिमात्रके हितमें रहतेहें इससे उनके पाप क्षीण भयेहैं ऐसे ऋपिजन ब्रह्मसमान मुक्तिको पातेहैं ॥ २५ ॥ कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ॥ अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥ २६ ॥ जो कामक्रोधरहित हैं और ईश्वरप्राप्तिके यत्नकरनेवाठेद और चित्त जिनके वेश हैं ऐसे आत्मज्ञानिनको सर्वप्रकारसे ब्रह्मसुख वर्त्त- मान होरहाहै ॥ २६॥ स्पर्शान्कृत्वा वहिर्वाह्यांश्चक्षुश्चैवांतरें ध्रुवोः॥ प्राणापानौ सैमी कृत्वा नासाभ्यंतरचारिणौ ॥ २७॥ यतेंद्रियमनोडिर्मुनि र्मोक्षपरायणः ॥ विगतेच्छाभयकोधो यःसदा मुंक्त एंव सः ॥ २८ ॥ बाह्यइंद्रियोंके स्पर्श जो शब्दादिक विषय तिनको बाहर याने त्याग करके फिर भौहोंके मध्यमें दृष्टिको करके नासिकाके भीतरही संचार करें ऐसे प्राणापोनोंको सैप करके जो मुँनि याने मननशील पुरुष इंद्रिय, मन और बुद्धिको वशे करे मोक्षहीमें आसँत इच्छा, भय और क्रोधक- रके रहित होय सो सैदा मुक्तही है ॥२७॥२८॥ भोक्तारं यज्ञतेपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।। सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शांतिमृच्छति ॥२९॥ अब और भी अतिसुगम मुक्तिकारलाय कहतेहे सर्व यज्ञ और तपोका षष्ठः ६.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० ॥ (८१) भोक्ता सर्वलोकोंका महेश्वर याने लोकेश्वरोंका भी ईश्वर सर्वभूता- णिनका सुहृद ऐसा मेरेको जानिके भी मुक्तिको प्राप्तहोता है ॥२९॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतामुपनिषत्सुब्रह्मविद्यायां योग- शास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसंन्यासयोगो- नाम पंचमोऽध्यायः॥५॥ इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां गीतामृततरंगिण्यां पंचमाध्यायप्रवाहः॥६॥ अनाश्रितः कर्मफलें कार्य कर्म करोति यः॥ संसंन्यासी च योगी चै नै निरैग्निन" चाँक्रियः ॥ १ ॥ कर्मयोग कहिके अब ज्ञानकर्मसाध्य आत्मदर्शनरूप योगाभ्यास कहतेहें. तहां कर्मयोगकी अपेक्षारहित योगसाधनत्व दृढकरनेको ज्ञानाकार कर्मयोगको योगशिरोमणि कहतेहैं सो ऐसे कि, जो कर्म- फलको नचाहताभया स्ववर्णाश्रमोचित करनेयोग्य कर्मको करताहे सो सैन्यासी है और योगीहै और जिसने अग्निकर्मको त्यागाहे सो संन्यासी मोर योगी नहीं है और जिसने क्रियाकर्मको त्यागाई सोभी संन्यासी योगी नहींहै ।। यहां श्रीकृष्णका एक अभिप्राय औरभी दीखताहे कि, कलियु- गमें संन्यासका निर्वाह होगानहीं. क्योंकि मनुष्योंकी बुद्धि चंचल होगी. सो देखने मेंभी आता है कि, जो घर छोड़ते हैं तो संन्यासी लैके मठ वाधिक व्यापार करते हैं. जो स्त्री विवाहित नहीं तो परस्त्री- गमन करते हैं. पुत्रोंकी जगह शिष्य करते हैं; ऐसेही औरभी सामान्यगृहस्थोंसे अधिक रसके केवल प्रपंचरत होते हैं इससे श्रीकृष्णने निष्कामकर्मकर्ताहीको संन्यासी योगी कहा है और अमिकर्म तथा क्रियात्यागनेका निषेध किया है ॥ १ ॥ ६

(८२)
भगवद्गीता।
[अध्यायः-
यं संन्यासमिति प्रा योग तं विद्धि पांडवे ॥
नै ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन ॥२॥
अब कहेभये कर्मयोगमें ज्ञानभी दिखातेहैं. हेपांडुपुत्र ! जिसको
संन्यास कहतेहैं उसको अभेदकरके योग जानो जिसवास्ते कि,
कर्मफल संकल्प त्यागेविनी कोईभी" योगी नहीं होता है. अर्थात्
कर्मफलको ईश्वरार्पण कियेविना योगी संन्यासी होता नहीं. जो
कर्मफलको ईश्वरार्पण करताहै वही योगी और संन्यासी है ॥ २ ॥
ऑरुरुक्षोर्मुनेयोग कर्म कारणमुच्यते ॥
योगारूंढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥३॥
आत्मज्ञानकी प्राप्ति चाहनेवाले मननशीलको ज्ञानप्राप्तिकारण,
कर्म कहाँहे उसी ज्ञानप्राप्तभयेको मुक्तिकारण संकल्पविकल्पत्या-
गपूर्वकै कम ही कहाहै ॥३॥
यदा हि नेंद्रिया न कर्मस्वनुपज्जते ॥
सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥४॥
जवे ने इंद्रियोंके विपैयनमें ने कामें आसक्तहोय तय सर्वसंक-
ल्पोंका त्यागी योगारूढं कहाताहै इससे कर्मकरना अवश्यहें ॥ ४ ॥
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ॥
आत्मैव ह्यात्मनो बंधुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥५॥
ऐसे आपके वश मनकरके आपका उद्धारकरना, आपका अव-
सोद याने घात याने अधोगति नकरना. कारण कि, आपका मन ही
आपका मित्र है और वह मैन ही आपका शंख है ॥५॥
बंधुरात्मात्मनस्तस्य॑ येनात्मैवात्मना जिंतः ॥
अनात्मनस्तु शईले वततात्मेवे शत्रुवत् ॥६॥

पष्ठः ६.] सान्धय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (८३) जिसने बुद्धिकरके निश्चय मर्न जीताहे उर्स जीवात्माका मन मित्र है ओर जिसने मन नहीं जीताहै उसका मन ही शत्रुत्तमें शउस- रोखा होता है ॥६॥ 'जितात्मनः प्रशांतस्यं परमात्मा समाहितः ॥ शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥७॥. शीत उष्ण सुख और दुःखमें तैसेही मान अपमानोंमें जीताहै मन जिसने ऐसे शांतकी बुद्धि अतिशय परिपूर्ण रहतीहै ॥७॥ ज्ञानविज्ञानतृप्तांत्मा कूटस्थो विजितेंद्रियः ॥ युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकांचनः ॥ ८॥ ज्ञान जो आत्मज्ञान विज्ञान जो विशेषज्ञान याने अनात्म आ- त्मविवेक इन करके जिसका मन तृप्त होय कूटस्थ याने सर्वशरी- रोंमें आत्माको समान जानिके निर्विकार इसीसे जितेंद्रियत्वसे जो ठीकरी पत्थर और सोना इनको सम जान रहीहै ऐसा योगी युक्त याने आत्मदर्शनयोगयुक्त कहाँताहै ॥८॥ सुहृन्मित्रायुदासीनमध्यस्थद्वेप्यवंधुषु ॥ साधुवपि चे पापे' समबुद्धिविशिष्यते ॥९॥ सुहृद् जो प्रत्युपकारविना हितकारक मित्र परस्पर उपकारी अरि शत्रु उदासीन जो प्रीति वैररहित मध्यस्थ जो सर्वकाल प्रीति वैर समान द्वेष्य जो सदा ईपी करता होय सो जो सदाहितेच्छु सो बंधु जो धर्मशील सो साधु और जो पापशील सो पापी इन सबोंमेंभी जो सम- बुद्धि होयं सो श्रेष्ठं है ॥ ९॥ योगी पंजीत सततमात्मनि रहसि स्थितः ॥ एकांकी यतचिंत्तात्मा निराशौरपरिग्रहः॥१०॥ एकही बैठा स्ववशचित्तमनवाला सांसारिक आशारहित आत्म 1 (८४) भगवद्गीता। [अध्याय:- विना परिग्रहरहित ऐसा योगी एकांत में बैठाभया मनको निरंतर परमा- त्मामें लगातारहै ।। १०॥ शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः॥ नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलोजिनकुशोत्तरम् ॥ ११ ॥ तंत्रकांग्रे मैनः कृत्वा यतचित्तेंद्रियक्रियः॥ उपविश्यासने युज्यायोगॅमात्मविशुद्धये ॥१२॥ अब योगाभ्यासमें आसननियम कहतेहैं. जैसे कि पवित्र स्थानमें न अति उंची न अति नीचा कुशासनपर मृगादिक उसपर वस्त्र ऐसा और थिर आपका आसन बिछोइके उस आसनपर बैठिकै मनको एकाग्र करके चित्त और इंद्रियोंके कर्म स्ववैशकिये भया अपना बंधन छुटनेके वास्ते योगको करें ॥ ११॥ १२ ॥ सम कायशिरोग्रीवं धारयनचलं स्थिरम् ॥ संप्रेक्ष्यं नासिकाग्रं स्वं दिशश्चीनैवलोकयन् ॥ १३॥ प्रैशांतात्मा विगतभीब्रह्मचारिवते स्थितः ॥ मन संयम्य मंचित्तोयुक्त आसीत मैत्परः॥१४॥ अब बैठनेका नेम कहतेहैं-काया जो मध्यशरीर शिर और ग्रीवा इनको अचले थिर और सम राखेभये आपके' नासिकाँग्रको देखिके और औरंगोर नदेखता या प्रशांतचित्त भयरहित ब्रह्मचर्य-वमें स्थित मेरेमें चित्तलगाये भये मैनको नियमितकरके आत्मनिष्ट पुरुष मेरेमें लीनभयाहुआ बैठारहे ॥ १३ ॥ १४ ॥ युञ्जन्नेव सदात्मोनं योगी नियतमानसः॥ शांति निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥ १५॥ ऐसे नियममें मनहे जिसका ऐसा योगी ऐसही सर्वकालमें मनको मेरेमें लगातांभया आनंद है परम जिसमें ऐसी मेरेसदृश शांतिको पाताहै ।। १५॥

सान्वय-अमृततरंगिणी मा० टी० ॥ नात्यनंतस्तुयोगोऽस्ति ने चैकाँतमनश्नतः ॥ न चौतिस्वप्नशीलस्यं जाग्रतो नै व चौर्जुन ॥१६॥ अब योगीके आहारादिकोंका नियम कहते हैं जैसे कि, हे अर्जुन । जो अति भोजन करताहै उसका योग नहीं सिद्धहोतीहै; और जो कुछभी भोजन नकर उसकाभी योग नहीं सिद्धहोताहे और अति- सोनेवालेका योग नहीं सिद्धहोताहै; और अविजागनेवालेका भी" योग नहीं सिद्धहोताहै ॥ १६॥ युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ॥ युक्तस्वप्नाऽववोधस्यं योगी भवति दुःखहा ॥ १७ ॥ जो आहार और स्त्रीप्रसंग प्रमाणमें करेगा । आहारका प्रमाण यह कि, आधापेट अन्नसे और चौथाई जलसे भरके चौथाई पवनसं- चारके वास्ते खाली राखे, स्त्रीप्रसंगप्रमाण यह कि, अतिकामकी इच्छा होनेसे 'स्त्रीसंग करै, जो कोई यहां शंका करै कि, योगीको तो ब्रह्म- चर्य कहि आये हैं जैसे कि, इसी अध्यायके चौदहवें शोकमें कहाहै सो सत्य है। परंतु "ऋतीभार्यामुपेयात " इस अतिप्रमाणसे ऋतु- समयमें स्त्रीप्रसंग करनेमेंभी एक ब्रह्मचर्य है; औरभी कहाहै कि, "इंद्रियाणींद्रियार्थेषु वर्तत इति धारयन् ॥ कर्मेंद्रियाणि मनसा निय- म्यारभतेऽर्जुन" इत्यादि तथा कहेंगे कि, " अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्" तो जो योगी स्त्रीप्रसंग न करेगा तो उसके कुलमें जन्म कैसे होगा । इत्यादि प्रमाणोंसे योगी स्त्रीप्रसंग प्रमाणसे करे यह विहारशब्दका अर्थ सिद्धहै । ऐसेही कर्ममेभी चेप्या प्रमाणहीसे करे अति परिश्रम नकरना यहाँ भागवतका प्रमाणदेतहें "सिद्धेड- न्यथार्थे न यतेत तत्र परिश्रमं तब समीक्षमाणः" ऐसा द्वितीयस्कंधके

(८६)
भगवद्गीता।
[अध्यायः-
दूसरे अध्यायके तीसरे श्लोकों कहाहै ऐसेही जो प्रमाणसे सोवै और
प्रमाणहीसे जागे उसका दुःखनाशक योग सिद्ध होता है ॥ १७ ॥
यदा विनियंतं चित्तमात्मन्येवावतिष्टते ॥
निस्टहासर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥१८॥
जैव आत्माहीमें अतिनिश्चल चित्त लगरहताहै तब संवैकामना-
ओंसे निःस्पृहहुआभया वह पुरुप युक्त ऐसा कहाताहै ॥ १८॥
यथा दीपो निवातस्थो नँगते सोपेमा स्मृता ।।
योगिनो यतचित्तस्य गुंजतो योगमात्मनः ॥ १९ ॥
जैसे निवातस्थानमें धराभया दीपक नहीं हालता तथा डोलॅताहै
तेसेही वाहे चित्त जिसकां ऐसे योगके करनेवाले योगी के मनकी
उपमा सोई कहीहै ।। १९॥
यंत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ॥
यत्रं चैवात्मनात्मानं पश्यनात्मनि तुष्यति ॥२०॥
योगसेवन करके विषयोंसे रोकामया चित्त जहाँ विश्रामको प्राप्त
होती है और जहां बुद्धिकरके आत्मस्वरूपको निश्चय करता भैया
मन हीमें संतुष्ट होय ॥२०॥
सुखमात्यंतिकं यत्तद्वृद्धिंग्राह्यमतींद्रियम् ॥
वैति यत्र नं "चै वाय स्थितश्चलति तत्वतः ॥ २१ ॥
जो इंद्रियोंके जाननेमें ननावे बुद्धिकरके ग्रहणकरनेमें आवे ऐसा
अत्यंत सुखं उसको जिसयोगमें स्थितभयार्तुआ यह पुरुप जानेहै ऐसा
निश्चय और फिर आत्मस्वरूपसे नैं चलायमान होय ॥ २१ ॥
यं लब्ध्वा चोऽपरं लाभ मन्यते नाधिकं ततः॥
यस्मिन्स्यितो नै दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥२२॥

षष्ठः ६.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (८७)
जिसको पार्यके फिर उससे अधिक श्रेष्ठ लाभ नहीं मानताहै जिसमें
वर्त भारी भी दुःखकरके नहीं थेंबराताहै ॥२२॥
ते विद्यादुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ॥
संनिश्चयेनयोक्तव्यो योगोऽनिविण्णचेतसा ॥ २३ ॥
उसको दुःखसंयोगवियोगकारक योगनामक जानना सो योग
निर्विकल्पचित्तसे निश्चयकरके करनेही योग्य है ॥ २३ ॥
संकल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वांनशेषतः ॥
मनसैवेंद्रियग्रामं विनियम्ये समततः ॥ २४ ॥
शनैःशनैरुपरमेत् बुद्धया धृतिगृहीतया ॥
आत्मसंस्थं मनः कृत्वों न किंचिदपि चिंतयेत् ॥२५॥
स्पर्शजन्य और संकल्पज ऐसे भेदसे कामना दोपकारकी है,
तिनमें स्पर्शज शीत उष्णादिक, संकल्पज पुत्रवित्तादिक इनमें स्पर्श-
जका त्याग स्वरूपसे नहींहोसकता इससे संकल्पज सर्व कामनाओंको
समग्रतासे मनहीसे त्यागि के सर्व इंद्रियोंको सर्वत्रसे नियमित करके
विवेकशुद्ध बुद्धिकरके धीरे धीरे विश्रामको प्राप्तहोना फिर मैंनको
आत्मस्वरूपमें स्थिर करके आत्मस्वरूपविना किसीकाभी ने
चितवनकरना ॥ २४ ॥२५॥
यतो यतो निश्चरति मनश्चंचलमस्थिरम् ।।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येवै वैशं नयेत् ॥ २६ ॥
यह मन चंचल है इसीसे आत्मस्वरूपमें थिर नहीं रहताहै. सो
यह मैन जहां जहां लगे तहांतहां से इसको फिरायके आत्मस्वरूप-
"होमें लैगाना ॥२६॥
प्रशांतमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ॥
उपैति शांतरजसं ब्रह्मभूतमकल्मपम् ॥ २७ ॥

(८८) भगवद्गीता। [अध्यायः- कारणे कि, जिसका मन आत्मस्वरूपमें स्थिर है उसीसे उसक रजोगुणभी नष्टभया, उससे वह निष्पापहे, उसले वह आपके स्वरूपमें स्थिरहे ऐसे इस योगीको उत्तम याने आत्मानुभवरूप सुखे प्राप्त होताहै ॥२७॥ यंजन्नेव सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ॥ सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यंत सुखमश्नुते ॥ २८॥ ऐसे निष्पाप योगी इसीतरह सर्वदर्दा मनको स्वरूपज्ञानमें युक्त करताकरता ब्रह्मानुभवरूप अत्यंत सुखको सुखसे पावताहे ॥२८॥ सर्वभूतस्थर्मात्मानं सर्वभूतानि चौत्मनि ॥ इक्षते योगेयुक्तात्मा सर्वत्र संमदर्शनः ॥ २९॥ सर्वत्र शमित्रादिकोंमें समदृष्टियोग जो "द्वासुपर्णासयुजा सखा- या" इस श्रुतिप्रमाणसे सखित्वरूप संयोग उसमें लगायाहे मन जिसने सो आपरूपको आकाशादि सर्वभूतों में स्थित और उनका आकाशादि सर्वभूतोंको आँपमें देखता है ॥ २९ ॥ यो मां पश्यति सर्वत्र सवै चं मयि पश्यति । तस्याहं ने प्रणयामि से चै में नै प्रणश्यति ॥३०॥ ऐसे जो मेरेको सर्वत्र मालाके मणिकोंमें सूत्रकीतरह देखता है और सर्वजगत् सूत्रमें मणियोंकी तरह मेरेमें देखा है में उसके मह श्य नहीं होतीहूं और वह मेरे नहीं अदृश्य है ॥ ३० ॥ सर्वभूतस्थित यो मां भजत्येकलमास्थितः॥ सर्वथा वर्तमानोपि से योगी मयि वर्तते ॥३१॥ जो एकत्व याने सर्वसे मित्रभाव, ( एकत्वका अर्थ जो स्वरूपकी एकताकर तो भजन किसका करै ? इससे मित्रताही अर्थ है. वाल्मीकी- रामसुग्रीवयोरक्यं देव्येवं समजायत य सुंदरकांडमें भी इस सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (८९) हुनुमानके वाक्य करके एकताका अर्थ मित्रता ही सिद्ध होताहे इस से) जो सर्वकी मित्रतामें रहाभया सर्वभूतों में व्यापक मेरेको भंज- ताहे निश्चय सो योगी सर्व आचरण करताभया मेरेमें वर्तमानहै याने मेरे हृदयमें वसता रहताहै ॥३१॥ आत्मौपम्येन सर्वत्रं समं पश्यति योऽर्जुन ॥ सुखं वा यदि वा दुःखं से योगी परमो मतः॥ ३२ ॥ हे अर्जुन ! जो सुखं अथवा दुःखेको आपके समत्व करके सर्वत्र समान देखता है 'सो योगी उत्तम है. यह शोक उनतिसवे श्लोकका खुलासा करनेवाला है ।। ३२॥ अर्जुन उवाच । योध्य योर्गस्त्वां प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन॥ ऐतस्याहं न पश्यामि चंचलत्वात्स्थिति स्थिराम्३३ श्रीकृष्णके वाक्य सुनके अर्जुन बोलतेभपे कि, हे मधुसुंदन ! जो यह योग समताकरके तुमने कहाँ सो मनके चंचलत्वसे में इस की स्थिर स्थिति नहीं देखताहूं ॥ ३३॥ चंचलं हि मनः कृष्ण प्रेमाथि बलवईटम् ॥ तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ ३४ ॥ हे कृष्ण जिससे कि यह मैनचंचल इंद्रियोंका क्षोभक ईट बली है में इसको रोकेंना पवनका रोकना जैसी दुष्कर मानताहूं ॥ ३९ ॥ श्रीभगवानुवाच । असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ॥ अभ्यासेन तु कौंतेयं वैराग्येण च गृह्यते ॥ ३५॥ ऐसा सुन श्रीकृष्णभगवान् बोले कि हे महाबाहो ! यह मन चंचले हे इसीसे रोकनेमें माना कठिन है. यहां संशय नहीं तोभी हे कुंती-

भगवद्गीता। [अध्यायः-
पुत्र ! अभ्यास करके और वैराग्यकरके रोकनेमें आताहै ॥ ३५ ॥
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः॥
वश्यात्मना तुं यतता शक्योऽवाप्नुभुपायतः ॥३६॥
यह योग जिसने मन वश न किया उसैकरके प्राप्त होनेका नहीं
'ऐसी मेरी मति है और जिनने मनको वश कियाहै उसकरके यत्न
करते करते उपायसे प्रौति होनेको संकताहै ॥ ३६॥
अर्जुन उवाच ।
अयंतिः श्रेयोपेती योगाचलितमानसः॥
अप्राप्यं योगसंसिद्धि कां गतिं कृष्ण गच्छति॥३७॥
"नहाभिकमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते" इत्यादि वाक्यों-
करके योगमाहात्म्य सुना था तो भी विशेषज्ञानके वास्ते फिर पूंछ-
ते हैं जैसे कि, हे कृष्ण जो श्रद्धाकरके युक्त और यत्न न करसको इस
से योगसे मन चलायमान भया इससे योगसिद्धिको न पायके किस
गतिको जाता है ॥३७॥
कचिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नैश्यति ॥
अप्रतिष्टो महाबाहो विमूटो ब्रह्मणः पंथि ॥ ३८ ॥
हे महाबाहो ! वेदक मार्गमें भूलाभया याने स्वर्गादिप्रातिनिमित्त
कर्मत्यागके निष्कामकर्मरूप योगको भी न प्राप्तभया इसीसे वह
अप्रतिष्टितं और उभयभ्रष्टं याने स्वर्गादिप्राप्तिकारक कर्मभी छोड़ा
और योगभी नमिला इसीसे कदाचित् निाधकी तरह जैसे बड़े
मेघमेंसे निकसिके मेघका टुकडा दूसरे मेघको न प्राप्त होके बीच-
होमें नष्टहोताहे तैसे ने नष्टहोई ॥३८॥
एतन्मे संशयं कृष्ण च्छेत्तुमर्हस्यशेषतः॥
त्वदन्यैः संशयस्यास्यं च्छेत्ती नष्पपाते ॥ ३९ ॥

षष्ठः ६.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। हेकृष्ण ! इस मेर संशयको अच्छीतरहसे छेदन करनेको योग्यहो क्योंकि, इस संशयका छेदनेवाला तुमविन दूसरा नहीं (९१) मिलेगा ॥३९॥ . श्रीभगवानुवाच । पार्थ नै वे हैं नोमुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ॥ न हि कल्याणकृतंश्चिद्दुर्गति तात गच्छति ॥ ४०॥ अर्जुनके वाक्य सुनिके कृष्ण बोले कि. हे पार्थ ! उस योगीका गोश न इस लोकमें हीन परलोकमें होता है क्योंकि हेतीत । शुभ- का कोई भी दुर्गतिको नहीं पार्वताहै ॥ १० ॥ प्राप्ये पुण्यकृताल्लोकांनुपित्वा शाश्वतीः समाः ॥ झुंचीनां श्रीमतां गेहे" योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥४१॥ जो योग पूराभयेविना मरजाय तो भी वह योगेभ्रष्ट पुण्यकरके उपार्जित लोकोंको प्राप्तहोके वहां अनेक प रहिके पवित्र और धन- सालोंके घरमें जन्मताहै ॥४१॥ अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ॥ ऐंतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥१२॥ अथवा बुद्धिमान योमिनके कुलमें ही जन्मता, जो ऐसा यह जेन्म सो इस लोक निश्चय दुर्लभहै ॥ ४२ ॥ तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदैहिकम् ॥ यैतते च ततो भूयः संसिही कुरुनंदन ॥४३॥ कुरुनंदन ! वहाँ जन्मलेके वही पूर्व देहसंबंधि बुद्धिसंयोगको पावताहे और उसपीछे फिरभी डॅस सिद्धिनिमित्त यनकरताहे ॥१३॥ पूर्वाभ्यासेन तेनैवं द्वियते यदेशोपि सः॥ जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्त्तते ॥१४॥ जो न करना चाहे इंद्रियजित न होय तो भी वह पुरुष उसी (९२) भगवद्गीता।। [अध्याय:- पूर्वाभ्यासकरके ही उसीको प्राप्तहोताहै. क्योंकि जो योगेके जाननेकी भी इच्छाकरे तो भी शब्दब्रह्म ताने देवादिनाम शब्दयुक्त जो प्रकृति उसको उल्लंघन करजाताहै याने मुक्त होता है।॥ १४ ॥ प्रयत्नांद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्विपः॥ अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो यांति पर गतिम् ॥ ४५ ॥ ऐसे प्रयत्नसे योगकरता करता निष्पाप भयाहुआ योगी अनेक जन्मोंकरके सिद्धर्भया तैव उत्तम मुक्तिको प्राप्तहोताहै ॥ १५ ॥ तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः कमिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥४६ हे अर्जुन ! योगी जो निष्काम कर्म कर्ता सो सकामिक तपस्विन अधिक माना है, ज्ञानिनसे भी अधिकहै और सकाम कर्म करने वालोंसे भी योगी" अधिकहै। विससे तुम योगी" हो" याने निष्काम होके स्वधर्मरूप क्षत्रियकर्म युद्ध करो ॥ ४६॥ योगिनामपि सर्वषां मद्गतेनांतरात्मना । श्रद्धावान्भजते यो मां स में युक्ततमो मतः॥४७॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिपत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अभ्यास- योगोनाम षष्टोऽध्यायः॥६॥ जो श्रद्धावा, पुरुप मेरेमें लगारहे जो चित्त ऐसे चित्तकरके मेरेको भजनाई सो सब योगिनेमें भी श्रेष्ट योगी है ऐसा मेरी अभि- प्राय है ।। ४७॥ इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मनपंडितरघुनाथप्रसादविरचिता. यांश्रीमद्भगवदीतामृततरंगिण्यां पष्ठाघ्यायप्रवाहः ॥ ६ ॥ इति प्रथमं पदकं समाप्तम् ।

सप्तमः ७.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। अथ द्वितीयषट्कं प्रारभ्यते ॥ प्रथम पटकम याने प्रथमके छः अध्यायनमें ईश्वरप्राप्तिका उपायरूप भक्तियोगका अंग आत्मस्व- हपज्ञानकी प्राप्ति ज्ञानयोग कर्मयोगसे कही. अब मध्यपट्कमें पाने छःसे बारहपर्यंत छः अध्यायनमें परमात्मस्वरूपका यथार्थ ज्ञान और उस ज्ञानके माहात्म्यपूर्वक भगवान्की उपासना याने भक्ति इसीको प्रतिपादन करते हैं. इसका खुलासा अठारखहें अध्या- यमें पैंतालिस श्लोकपीछे “यतःप्रवृत्तिः यहाँसे लेके मद्भक्ति उभते परी" इस चौअनवें श्लोकपर्यंत कहेंगे. अब सातवें अध्यायमें भगवान आपका स्वरूपवैभव वर्णन करेंगे। श्रीभगवानुवाच । मय्योसक्तमनाः पार्थ योग गुंजन्मदाश्रयः॥ असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ १ ॥ हे पृथापुत्र अर्जुन ! तुम मेरेमें चित्तलगायेभये मेरे आश्रित भयेहुँये योगमें युक्तभये हुये जैसे संशयरहित समग्र याने विभूति पलसहित मेरे को जानोगे सो सुनो ॥१॥ ज्ञानं तें'ऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ॥ यज्ज्ञात्वा ने" है भूयोन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥२॥ म तुम्हारेको इस विज्ञानसहित ज्ञानको संपूर्णकरके कहता हूं निसको जानके फिर इस लोक में और जाननेयोग्य नहीं रहती है।२।। मनुष्याणां सहस्रप कश्चिद्यतति सिद्धये। यतामपि सिद्धानां कश्चिन्मी वेत्ति"तत्वतः ॥३॥ मनुप्यों के हजारोंमें याने अनेक हजारमनुष्यों में आत्मज्ञानसि- देके वास्ते कोई एक यलकरताहे यत्नकरनेवाले सिद्धों में भी (९४) भगवद्गीता। [ अध्यायः- कोई एक मेरे को निश्चयकरके जानताहे अर्थात ऐसा जानने वालाही दुर्लभ है ॥३॥ भूमिरापोऽनलो वायुःख मनोर्बुद्धिरेव च ।। अहंकार ईतीयं में भिन्त्री प्रकृतिरष्टधा ॥४॥ अपरेयमितस्त्वन्या प्रकृतिं विद्धि में पैराम् ॥ जीवभूतां महावाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥५॥ हेमहाबाहो ! पूधिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार ऐसे" आठ प्रकारकरके न्यारीन्यारीभैया यह जो मेरी" प्रकृति सो यह अपरा याने जड है और इससे और जीवरू- पको मेरी पैंग याने चेतन प्रकृति जानो जिस प्रकृतिकरिके यह जगत् धारण भयाहै ॥ ४॥५॥ एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ॥ अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रैलयस्तथा ॥ ६ ॥ सर्वभूत प्राणीमात्र इन्ही दोनोंसे प्रगट होतेहैं ऐसा जानो. मैं सब जगत्का उत्पत्तिस्थान तथा प्रलयस्थान भी हूं॥६॥ मंत्तः परतरं किं चिन्नान्यदस्ति धनंजय ॥ मंयि सर्वमिदं प्रोत सूत्रे मंणिगणा इव ॥७॥ सूत्रमें मालाके मणियोंकी तरह मेरेमें यह सर्वजगत पोहो है इसीसे हे धनंजय मेरेसे न्यारा और कुछभी नहीं है" ॥ ७ ॥ रसोऽहमप्सु कौतेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ॥ प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुपं ॥ ८॥ "मूत्रे मणिगणा इव" इसीको दिसातेहैं. हे कुंतीपुत्र ! जलमें रस चंद्रमर्यकी कांति सर्ववेदों में ओंकार आकाशमें शब्दं पुरुषों में पुरु- पौधि में याने इन जलादिकोंके सार जो रसादिक टनका भी शरी-

सप्तमः ७.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (९५)
री में और वे मेरे शरीर हैं ऐसे अहंशब्दका अर्थ सर्वत्र शरीरशरी-
रीसंबंधसे जानना ॥८॥
पुण्यो गंध-प्रथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥९॥
पृथिवीमें पवित्र गंध और अग्निमें तेज मैही हूं सर्वभूतप्रोणिनमें
आयुष्य और तपस्विनमें तप में हूं॥९॥
वीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥ १० ॥
हे पार्थ ! सर्वभूताको सनातन उत्पत्तिकारण मेरेको जर्जानो में बुद्धि-
नाँनों में बुद्धि तेजस्विनमें तेजे "हीं ॥१०॥
बलं बलवतां चाहें कामरागविवर्जितम् ॥
धर्माऽविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११ ॥
हे भरतर्षभ'! मैं जो वस्तु प्राप्त नहीं उनकी कामना और प्राप्त
वस्तुमें जो अनुराग इन कामरागोंविनों बलवंतोंका बलें और भूत
प्राणिनमें धर्मसे अंविरुद्ध काम हूँ ॥११॥
ये चैवं सात्विका भावा राजसास्तामसार्च ये॥
मत्त एवेति" तान्विं द्धि न ल हे ते ते मैयि॥१२॥
जो शमादिक सात्विक भाव और द्वेपादिक राजस और जै-
मोहादिक तामस भाव हैं वे मेरेसे ही हैं ऐसे" उनको जानो और
में उनमें नहीं याने उनके स्वाधीन नहीं हूं वे" मेरेमें हैं याने मेरे
स्वाधीन हैं ॥ १२॥
त्रिभिर्गुणमयीवरोभिः सर्वमिदं जगत्॥
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥१३॥

(९६) भगवद्गीता। [अध्यायः- इन तीनों गुणमय भावोंकरके मोहित यह सर्वं जगत् इनसे पर अविनाशी मेरेको नहीं जानता है ॥ १३ ॥ दैवी ोषा गुणमयी मम मायाँ दुरत्यया ॥ मामेवं यें प्रपद्यते मायामेती तरति ते" ॥१४॥ जिसवास्ते कि, यह गुणमयी देवी याने मेरे संबंधिनी मेरी माया दुरत्यय है इसीसे जो मेरे शरण होते हैं वे" इस मायाँको तरतेही॥१४॥ न माँ दुष्कृतिनो मूढाः पद्यते नराधमाः ॥ माययापहृतंज्ञाना आसुर भौवमाश्रिताः ॥१५॥ मायाकरके हयगयाहे ज्ञान जिनका ऐसे मनुष्य वे असुरनके धर्म- को प्राप्तहोरहे निदित कर्मकरनेवाले नरनमें अधम मूल मेरेको नहीं भजतेहैं ॥ १५॥ चतुर्विधा भजते मी जेनाः सुकृतिनोऽर्जुन ॥ आँ” जिज्ञासुरार्थी ज्ञानी चे भैरतर्षभ ।। १६॥ तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिविशिष्यते ॥ प्रियो हिज्ञोनिनोऽत्यर्थमहंच से च में प्रियः॥१७॥ हे अर्जुन ! एकप्रकारके जो संसारसे दुःखी दूसरे जाननेकी इच्छा करनेवाले तीसरे धनादिक चाहनेवाले और चौथे ज्ञानी याने स्वरूप- ज्ञाता ऐसे चार प्रकारके सुकृती जेन मेरे को भेजतेहैं. हे भरतर्षभ। तिनमें ज्ञानी नित्ययोगयुक्त मेरी मुख्यभक्तिवाला श्रेष्ट है कारण कि, ज्ञानीके "मैं अत्यंत प्रियहूं और सो मेरे अतिशय प्रिय है ॥ १६॥ १७॥ उदाराः सर्व एवैते' ज्ञानीत्वात्मैव में मतम् ॥ आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तैमांगतिम्१८॥ वे सर्व ही उदार हैं तो भी ज्ञानीमात्माही मेरेको पुत्रवत् प्रियहै, सप्तमः ७.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (९७) ऐसा मेरा अभिप्राय है कारण कि, वह मेरेहीमें चित्तको युक्तकिये भये वोत्तम गति मेरेही को ध्यावताहै ॥ १८॥ बहूनां जन्मनामैते ज्ञानवान्मा प्रपद्यते ॥ वासुदेवः समिति से महात्मा सेंदुर्लभः ॥ १९ ॥ अनेक जन्मोंके अंतमें सर्वजगत् वासुदेवरूप हे ऐसे ज्ञानवान् होताहै याने वासुदेवात्मक जानिके ईपादिरहित होताहै तब मेरेको भजताई 'सो महात्मा अति दुर्लभ है याने कोट्यावधीनमें कोईएक होता है ॥ १९॥ कामैस्तैस्तैहतज्ञानाः प्रेपचंतेऽन्यदेवताः ॥ तं त नियममास्थायं प्रकृत्या नियतोःस्वयां ॥ २० ॥ दूसरे सर्व तो आपकी राजस तामस प्रकृतिकरके राजस तामस कौमें लगेभये उनउन कामोंकरके नष्टज्ञानभयेईये उनउन पु- गदिनिमित्त नियमोंको धारणकरके अन्यदेवोंको भजते हैं ॥२०॥ यो यो यांयाँ तर्नु भक्तः श्रद्धयाचितुमिच्छति ॥ तस्य तस्याचैलां श्रद्धांतामेव विदधाम्यहम् ॥२१॥ से तया श्रद्धया युक्तस्तस्यारीधनमीहते ॥ लभते चै ततःकामान्मयैव विहितान्हितान् ॥ २२ ॥ अंतवत्तुं फैलं तेपी वैद्भवेत्यल्पमेधेसाम् ॥ देवान्देवयजो याति मद्भक्ता यीति मामपि ॥ २३ ॥ तदेवाग्निस्तत्सूर्यस्तदुचंद्रमाः" इत्यादि अतिनके अर्थको खुलासा करनेवाली जो " यस्यादित्यः शरीरं" इत्यादि श्रुतिनके अर्थरूप इन श्लोकोंकरके अन्य देवतोंको भी भगवान् आपहीके शरीरभूत दिखातेहैं. जैसे कि, जोजो भक्त जिस जिस इंद्रादिरूप मेरे ७

(९८)
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
शरीरको श्रद्धाकरके अर्चनेको चाहता है उसउस भक्तको में वही
अचले श्रद्धौ धारणकरातीहूं "सो भक्त उसी श्रद्धीकरके युक्त उसी
इंद्रादिरूप मेरी मूर्तिका आराधन करताहै. और इसीसे मेरे ही
करके नियमित कियौं ये हित कॉमनोंको प्राप्तहोताहै; परंतु उनै
अल्पबुद्धिनके घहै फैल नाशवान होतीहै. जैसे कि, इंद्रादिदे-
व पूजनेवाले इंद्रादि देवीको प्राप्तहोतहें मेरे भैंक निश्चय में"रेको प्राप्ति
होते हैं ॥ २१ ॥२२॥२३॥
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यते मामबुद्धयः ।।
परंभावमजानंतो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ २४॥
मेरे' अविनाशी सर्वोत्तम परस्वरूपको न जाननेवाले मूर्खलोग
नो में सर्वके हृदयमें मूर्तिमान प्राप्त तिस मेरेको अव्यक्त याने अमृ.
त्ति मानतेहैं. तात्पर्य इसीसे अन्यदेवोंको भजते हैं ॥ २४ ॥
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः॥
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मासजमव्ययम् ॥२५॥
यहाँ न जाननेका कारण कि, योगमायाकरके आच्छादित में
सर्वको दीखता नहीं हूं इसीसे यह मूर्ख जन अजन्मा अविनाशी
मेरे को नहीं जानती है ॥२५॥
वेदोहं समंतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।।
भविष्याणि च भूतानि माँ वेदै नै कश्चन ॥२६॥
हे अर्जुन ! मैं जो प्रथम भये उनको और हैं तिनको और होयंगे
इन सर्वभूतप्राणीमाबोंको जानता हूं, परंतु मेरेको" कोई भी मन
जानताहै ॥२६॥
इच्छाद्वेपसमुत्थेन इंदमोहेन भारत ॥
सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यांति परंतप ॥२७॥

ततमः ७.] सान्वय-अमृततरंगिणी माटी। (९९)
हेभारत । हेपरंतप । इच्छा और द्वेषकरके उत्पन्नभये सुख दुःख लाभ
अलाभादिदंवरूप मोहकरके सर्वभूतप्राणि संसारमें मोहको प्राप्त होतेहैं।।
येषां त्वंतंगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ॥
तें इंद्रमोहनिर्मुक्ता भजते मी दृढव्रताः॥२८॥
और जिन पुण्यकर्मवाले मनुष्योंका पाप नाशको प्राप्तभयाहै
में द्वैमोहसे छुटेभये हेढवती मेरेको भजते हैं ॥२८॥
जरामरणमोक्षाय मामांश्रित्य यतति ये॥
ते'ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्म कर्मचाखिलम् ॥२९॥
जो मेरे आश्रितहोके जरामरण छूटनेके वास्ते यत्नेकरतेहैं वे
उस ब्रह्मको और सर्व अध्यात्मको सर्व कर्मको जानतेहैं इन ब्रह्मश-
ब्दादिकोंका खुलासा आठवें अध्यायमें होगा ॥ २९ ॥
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ॥
प्रयाणकालेपि च मी ते विदुयुक्तचेतसः ॥३०॥
' इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योग
शास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विज्ञानयोगो
नाम सप्तमोऽध्यायः॥७॥
भो मेरेको अधिभूत और अधिदैवसहित और अधियज्ञसहित
जानते हैं वे मनुष्य ही मेरेमें नित्य चित्तलगायेभये मरणकालमें भी
इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिता-
यां श्रीगीतामृततरंगिण्यांसप्तमोऽध्यायप्रवाहः॥७॥
अर्जुन उवाच ।
किं तद्रा किंमध्यात्म किं कर्म पुरुपोत्तम ॥
मरेको जानत हैं ॥३०॥

.१००)
J
भगवद्गीता।
अध्याय:-
अधिभूतं चे कि प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥१॥
जो सातवें अध्यायमें कहा था कि, जो जरामरणसे मुक्त होनेके
वास्ते मेरा आसरा करके यत्न करतेहैं वे उस ब्रह्मको तथा सर्व
अध्यात्मको और सर्व कर्मको जानते हैं इत्यादि सुनिके अर्जुन
कृष्णसे पूछते हैं कि, हे पुरुषोत्तम । जो आपने कहा वह ब्रह्म कौन
है, अध्यात्म कौन है, कर्म क्या है और अधिभूत कौन कहातीहै और
अधिदेव कौन कहाँताहै ? ॥१॥
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।।
प्रयाणेकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥२॥
हे मधुसूदन ! इस देहमें अघियह कैसेभया और कौन है और .
इसलोकमें मरणकालमें जिसने मन जीताहे उसकरके के से जाने
नेमें आतेहो ?॥२॥
श्रीभगवानुवाच।
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्मसुच्यते ।।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः॥३॥
ऐसे अर्जुनके वचन मुनिके श्रीकृष्णभगवान् बोले कि, परहे
प्रकृति जिससे याने प्रकृतिमुक्त जो अक्षर याने मुक्तजीव सो ब्रह्म है।
स्वभाव अध्यात्म कहाँताहै जो सर्व भूतपाणिनको उत्पत्ति करने
वाला विसर्ग याने सृष्टि सो कर्मसंज्ञक है ॥३॥
अधिभूतं क्षरोभावः घुरुपश्याधिदैवतम् ।।
अधियज्ञोऽहमेबांचं देहे देहभृतीवर ॥४॥
जो क्षर भाव याने नाशवान् देवादिक सो अधिभूतहै और पुरु
जो सूर्यमंडलवत्तीं मेराही एकरूपे सो अघिदेवत है. हे देहधारिनमें श्रेष्ठ
अर्जुन ! इस देहमें अधियझैमै"ही हूं याने जीवका पूज्य मेंहूं ॥४॥

अष्टमः ८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०॥ 464 अंतकाले च मामेव स्मरन्मुंका कलेवरम् ॥ यःप्रयाति से मौवं याति नौस्त्यन संशयः ॥५॥ और जो पुरुप अंतसमयमें मेरे हीको सुमिर्रतासुमिरता देहको त्यौगिक इसलोकसे जोताहै 'सो मेरी समताको प्राप्तहोताहै यहीं . संशय नहीं ॥५॥ - यं यं वापि स्मरन् भाव त्यजत्यंते कलेवरम् ॥ ततमे "वैति कौंतेयं सदा तद्भावभावितः ॥६॥ जो मेरा सदा और अंतकालहीमें स्मरण करतेकरते शरीर त्यागै सो तो मेरेहीको पावे. अथवा जो जो भाव याने वस्तु अथवा कोई प्राणीको सुमिरतामुमिरता सदा उसीमें लवलीन भयाहुँआ अंतमें । देहको त्यागता है, सो हे कुंतीच। उसी सीको ही प्राप्तहोताहे ॥६॥ तस्मात्सर्वेषु काले' मॉमनुस्मर युद्धय च ॥ संयर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयः॥७॥ विससे सर्व कालमें मेरेको सेमिरो और युद्धकरो; ऐसे में रेमें मन अदिको लगायेभये मेरे होको पावोगे, इसमें संदेह नहीं ॥७॥ अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नाऽन्यगामिना । परमं पुरुषं दिव्यं यांति पार्थानुचितयन् ॥ ८॥ हे पृथापुत्र ! सदा अभ्यासयोगयुक्त आत्मस्वरूपविना दूसरेमें नहीं जानेवाला ऐसे चित्तकरके मेरा चितवन करताकरता देदीप्यमान अति- उत्तम ऐसा जो परमपुरुप मैं उर्स मेरेको प्राप्त होताहै ॥ ८॥ कैवि पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः । सर्वस्य धातारमचित्यरूपमादित्यवर्ण तमसःपर ( १०२) भगवद्गीता। [अध्याय:- स्तात् ॥ ९॥ प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्यायु तो योगबलेन चैं। ॥ भ्रुवोर्मध्ये प्राणमविश्य सम्यक् स त परै पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १० ॥ जोकोई भक्तिकरके युक्त पुरुष मरणसमयमें अचल मनकरके और योगवलकरके भौंहोंके मध्यमें निश्चल अच्छीतरहसे प्रोणोंको प्रवेशकरके अर्थात् कुंभककरके जो सर्वज्ञ, पुरातन, सर्वका शिक्षक, सूक्ष्मसे सूक्ष्म, सर्वका पालनेवौला, नहीं चितवनमें आताहै रूपै जिस- का, सूर्यसरीखा प्रकाशमान जो पुरुप और प्रकृतिसेपरे उसको सुमि- रताहै सो उस पर देदीप्यमान पुरुपको प्राप्तहोताहै ॥ ९ ॥१०॥ यदक्षरं वेदविदो वदंति विशति यद्यर्तयो वीतरागाः ।। यदिच्छंतोब्रह्मचर्य चरति तैत्ते पदं संग्रहण प्रवक्ष्ये११ वेदके जाननेवाले जिसको अक्षेर कह तेहें, वीतराग ईश्वरप्राप्तिका यत्न करनेवाले जिसको प्राप्तहोतेहैं। जिसको चाहनेवाले ब्रह्मचर्यको आचरते हैं, उस पर्दैको तुम्हारेसे संक्षेपैकरके कहूंगा ॥ ११ ॥ सर्वद्वाराणि संयम्यं मनो हँदि निरुंध्य च ॥ मध्यांधायात्मनः प्राणमाँस्थितो योगधारणाम् ॥१२॥ ओमित्येकाक्षरं बृह्म व्याइरन्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजेन्देहं सैयौति परमां गतिम् ॥ १३॥ जो योगी देहेको त्यागतात्यागता सर्व इंद्रियोंको संयममें केरके । और हृदयमें मर्नको रोकेके आपके प्राणों को मस्तकमें चटीयके लोगधारणोंमें थिर भयो?आ ॐ इसे एक अक्षर त्रैमका उच्चारण रताकरता मेरेको सुमिरतीसुमिरता देहत्यागिक जाताहै सो तिउँत्तम गैतिको प्राप्तहोती है ।। १२ ॥ १३ ॥ । e अष्टमः ८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः॥ तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ १४॥ हे पृथापुत्र! जो अनन्यचित्त मेरेको नित्य निरंतर सुमिरताहै उस नित्य मेरे संयोग चाहनेवाले योगी को "मैं सुलभ हूं ॥ १४ ॥ मांमुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ॥ नाति महात्मानः संसिद्धि परमां गताः ॥१५॥ यहाँसे अव्यायसमाप्तिपर्यंत ज्ञानी जो केवल्याथीं उसकी मुक्ति और ऐश्वर्य चाहनेवालेकी पुनरावृत्ति कहतेहैं सो ऐसे कि, जो मेरी उपासनारूप परमसिद्धिको प्राप्तभयेहैं वे महात्माजन मेरेको प्राप्त होके फिर दुःखको घर नाशमान जन्मेको नहीं प्राप्तहोतेहैं ॥ १५ ॥ आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ॥ मामुपेत्य तु कौंतेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १६ ॥ हे अर्जुन ! ब्रह्मलोकपर्यंत सर्वलोक, पुनरावर्ती है और हे कुंती- पुत्र ! मेरेको प्राप्तिहोके फिरं जन्म नहीं होतीहै ।। १६॥ सहस्रयुगंपर्यंतमहयद्रह्मणो विदुः॥ रात्रि युगसहस्रांतांतेहोरात्रविदो जनोः ॥ १७ ॥ ब्रह्मलोकपर्यंत पुनरावृत्ति देखनेको ब्रह्माके दिनरात्रिका प्रमाण दिखातेभये उसको जाननेवालोंकी श्रेष्ठता कहतेहैं-जो ब्रह्माका हजार चतुयुमीपर्यंत दिन और हजार चतयुगीपर्यंत गतिको जानते में मनुष्य दिनरातिके जाननेवाले हैं, याने दीर्वदर्शी हैं ।। १७ ॥ अव्यक्ताव्यक्तयः सर्वाः प्रभवंत्यहरागमे ॥ रायागमे प्रलीयते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ १८ ॥ दीर्घदर्शित्व दिखातेहैं सो ऐसे कि, ब्रह्माके दिनके आगर्ममें ब्रह्माके .

( १०४) भगवद्गीता। [अध्याय:- शरीरसे सर्वे जीवोंके शरीर होतेहैं रात्रिके आर्गममें उसी ब्रह्माके शरीरमें लीनेझेतेहैं ॥ १८॥ भूतोमः स एवायं भूत्वा भूत्वाँ प्रलीयते ॥ रांच्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरोंगमे ॥ १९ ॥ हे पृथापुत्र । सोई यह भूतप्राणीसमूह कर्मपरखझं भया हुआ सदा है है के रात्रिके आगममें लीन होतीहै, दिनके आगममै उत्पन्न होताहै ॥ १९॥ परस्तस्मात्तुभावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तीत्सनातनः॥ यःसं सर्वेधु भूतेषु नश्यत्स्वैपि न नश्यति ॥ २० ॥ उसे ब्रह्माके जडप्रकृतिशरीरसे श्रेष्ठ और जो अध्यक्त सनातन भाष है याने शुद्धचेतन है सो सेव आकाशादि और शैरीर नष्टहीने- से भी नहीं नष्टहोताहै ॥२०॥ अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ॥ यं प्राप्य नै निवर्तते तेडाम परमं मम ॥२१॥ वह अव्यक्त अक्षर ऐसे कहाई 'कूटस्थोऽक्षर उच्यते' उसको परम गति कहतेहें जिस शुद्धरूपको प्राप्तहोके नहीं जन्मतेहैं वह मेरी सर्वोत्तम धाम है; याने जसे प्रकृतिमें मेरा शरीर है और जीवभी मेरा शारीर है परंतु असे सर्व घर किसी पुरुपका है उसमें निजमंदिर श्रेष्ठहो- ताहै तैसे जीवकृतिमें और में जीवमें रहताहूं इससे वह मेरा मुख्य- शरीर है. यह कैवल्यमुक्ति कही, अब ऐश्वर्य प्राप्ति कहतेहैं ॥२१॥ पुंरुपः से पैरः पार्थ भक्त्यालैभ्यस्त्वनन्यया। यस्यांत स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥२२॥ हे पृथापुत्र । ये सर्व भूतप्राणि जिसके अंतस्य हैं और यई सबै

अष्टमः ८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० ।
जगत् जिसकरके विस्तरितहे 'सो पर पुरुप याने परमात्मा अनन्य-
भक्ति करके प्राप्तहोने योग्य है ।। २२॥
यत्र कालेवनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।।
प्रयाता यांति'त कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥ २३ ॥
हे पुरुपनमें श्रेष्ठ ! जिस कालमें देहत्यागिके गयेभये योगी अना-
वृत्तिको और आवृत्तिको जोतेहैं उस कालको मैं कहतीहूं ॥ २३ ॥
अग्निज्योतिरहः शुक्लः पण्मासा उत्तरायणम् ॥
तत्र प्रयाता गच्छति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥२४॥
जिसकालमें अग्नि प्रकाशक है तथा दिन शुलपक्षहे ऐसे छ महीने
उत्तरायण उसमें गये भये हाज्ञानी जनै नहीको प्राप्तहोते. ॥ २४॥
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः पण्मासा दक्षिणायनम् ॥
तत्रं चांद्रमसं ज्योतियोगी प्राप्य निवर्तते ॥ २५ ॥
जिसकालमें धूम रौति तथा कृष्णपक्ष छमहीने दक्षिणायन
इसमें गया या योगी चांद्रमस ज्योति को याने स्वर्गपायके यज्ञादि
फलभोगिके फिर यहाँ जन्मलेताहै ॥२५॥
शुकुकृष्णे गती होते जगतःशाचते मते ॥
एकया योत्यनावृत्तिमन्ययावतते पुनः ॥ २६ ॥
य' शुकृष्ण मार्ग जगत्के सनातन नियमितहें एकंकरके
मुक्तिको जाताहे दूसरेकरके फिर जन्मती है ॥ २६ ॥
मैं ते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ॥
तस्मात्सर्वेषु कालेपु योगयुक्तो भैवार्जुने ॥ २७ ॥
हे पृथापुत्र ! इन मागोको जानतांभया कोईभी योगी नहीं मोह-
ताहे. हे अर्जुन ! तिससे सर्व कालमें योगयुक्त हो ॥२७॥

(१०६) भगवद्गीता। [अध्याय:- वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दाने यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ॥ अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी पर स्थानमैं पैति चाद्यम् ॥२८॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिपत्सु ब्रह्मविद्यायां योग शास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्मयोगोनाम अष्टमोऽध्यायः॥८॥ मनुष्य इसको जानिके फिर जो पुण्यफल वेदाध्ययनमें, यज॑में, तपैमें और दान में कहा है उसे सवैको अतिक्रमणकरता याने उससेभी अधिकफल पाताहै, फिर योगी होके सर्वोत्तम आदि स्था- नको पोताहै, याने मुक्तहोताहै ॥ २८॥ इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां श्रीगीतामृततरंगिण्यामष्टमोऽध्यायप्रवाहः ॥ ८॥ इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूर्यवे ॥ ज्ञान विज्ञानसहितं य॑ज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेंऽशुंभात् ॥ १॥ सप्तम और अष्टम अध्यायोंमें आपकी स्वरूपप्राप्ति भक्तिहीसे कही है. अब नवममें आपका सर्वोत्तम प्रभाव और भक्तिका भी प्रभाव कह- तहे सो ऐसे कि, हे अर्जुन ! यह अतिगुप्तकरनेयोग्य विज्ञानसहित ज्ञानको असूया जो पराये गुणमें दोप लगाना उसकरके रहित जो तुम तिनसें कहूंगा । जिसको जोनिके संसार,ससे ऐटोगे ॥१॥ राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ॥ प्रत्यक्षावगमं धयं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥२॥ यह भक्ति ज्ञान विद्या और गोप्यवस्तुनमें सर्वोत्तम पवित्र अतिउत्तम :

नवमः ९.] सान्वय-अमृततरंगिणी मा० टी०। (१०७)
प्रत्यक्षर्फलरूप धर्मयुक्त करनेकोभी अतिसुगम और अविनाशी है॥२॥
अश्रद्दधानाः पुरुषां धर्मस्यास्य परतेप ॥
अप्राप्य मां निवर्तते मृत्युसंसारवमनि ॥३॥
हे परंतप अर्जुनै ! इस धर्मसंबंधी श्रद्धाको न धारणकरनेवाले पुरुष
मेरेको प्राप्तभयेविना मृत्युरूपसंसारमार्गमें फिरतेरहतेहैं ॥३॥
मयाँ ततमिदं सर्व जंगदव्यक्तमूर्तिना॥
मत्स्थानि सर्वभूतानि नै चाह तेष्ववस्थितः ॥ ४ ॥
ने चै मत्स्थानि भूतानि पैश्य में योगमैश्वरम् ।।
भूतभृन्नं च भूतस्थो मैमात्माँ भूतभावनः ॥ ५॥
यह सर्व जगत् अतिसूक्ष्म अंतर्यामीरूप मेरे करके व्याप्त है।
इससे सर्वभूतप्राणी मेरे स्वाधीन और में उनमें नहीं स्थित
याने उनके स्वाधीन नहींहूँ और वे भूतपाणी मेस्में स्थित महा
याने जैसे घडेमें जल तैसे नहीं हैं मेरे" ईश्वरसंबंधी इस योगको देखो
भूतोंका भरने पोपनेवीला भी मेरी आत्मा याने मेरा शरीरभूत
जीवात्मा भूतोंको धारणकरनेवाला और भूतोंमें स्थित नहीं है।॥४॥५॥
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ॥
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥६॥
जैसे महान् वायु नित्यही आकाशमें रहाभया मेरे आधारसे सर्व-
विचरताहै तसेही सर्व भूते मेरे आधार हैं ऐसे निश्चयकरो ॥६॥
सर्वभूतानि कौतेयं प्रकृति यांति मामिकॉम् ॥......
कल्पैक्षये पॅनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ।।..७॥
हे कुंतीपुत्र ! प्रलयकालमें सर्वभूतप्राणी मेरी प्रकृति में
लीन होते, कल्पकी भाँदिमें मैं उनको फिर. अनेक प्रकारके
उत्पन्न करती हूं ॥ ७॥

(१०८) 1 भगवद्गीता। [अध्याय:- प्रकृति स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ॥ भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥ ८॥ अपनी प्रकृतिको आश्रयदेके प्राचीनस्वभावके वर्शसे परवंश संपूर्ण इस भूतप्राणीसमूहको वारंवार सृजती हूं ॥८॥ ने च मां तानि कर्माणि निवघ्नति धनंजय ॥ उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥९॥ हेअर्जुन ! जो कहोगे कि, ऐसे विषमसृष्टि सृजनेवालेको विपम- ताके वैपम्य निर्दयत्वदोप क्यों न लगेगे तहाँ सुनो, जो मैं मृष्टयादि- ककर्म करताहूं उन काँमें असक्त और उदासीनसरीखा स्थित ऐसे मेरेको वे कर्म नहीं बंधनकरतेहैं ॥ ९ ॥ मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिःसूयते सचरोचरम् ॥ हेतुनानेन कौंतेय जंगद्विपरिवर्तते ॥१०॥ हे कुंतीपुत्र ! जय मैं अध्यक्ष याने सर्वकृत्यका सम्हारनेवाला होता हूँ तब मेरे करके प्रकृति चराचरैजगत्को उत्पन्न करती है इस कारंण करके जगत उत्पन्नहोताहै ॥ १० ॥ अवजनिंति माँ मंदा मानुषी तनुमास्थितम् ॥ परभावमजांनंतो मैम भूतमहेश्वरमें ॥ ११ ॥ मोवांशामोधकर्माणो मौवज्ञाना विचेतसः ॥ राक्षसीमासुरीं चैवं प्रकृति मोहिनी श्रिताः ॥१२॥ जो राक्षसी और आसुरी आपसरीखी मोहकारक प्रकृतिको धारण कररहेहैं याने ऐसे स्वभाववाले निष्फल आशावाले, निष्फले कर्मवाले, निष्फलेज्ञानवाले वे भ्रष्टचित्तै पुरुष, जो सर्व भूतोंके नवमः ९. सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। ६ १०९ ईश्वरोंका भी ईश्वर ऐसे मेरे" प्रभावको न जानतेभये मूर्ख अति- करुणासे मनुष्यरूप शरीरमें स्थित मेरों अवज्ञौकरतेहैं ॥ ११॥१२॥ महात्मानस्तु मां पार्थ दैवी प्रकृतिमाश्रिताः ॥ भजत्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥ १३॥ हे पृथापुत्र । दैवी प्रकृतिको प्राप्तभये?ये महात्माजन मेरेको सर्वभूतोंका ऑदि और अविनाशी जानिके अनन्यमनवाले भयेहुए मेरेही को भज तेहैं ॥१३॥ सततं कीर्तयेतो मी यततश्च दृढव्रताः॥ नमस्यंतश्च मौं भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥१४॥ अब महात्मनके भजनकी रीति कहतेहैं जैसे कि निरंतर मेरी कीर्तनकरतेभये और दृढसंकल्पकियेभये मेरी प्राप्तिके वास्ते यत्नकरतेभये और भक्तिकरके मेरेको नमस्कार करतेभये नित्य मेरे समागमकी इच्छा करनेवाले मेरी उपासना करते हैं ॥१४॥ ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजतोमर्मामुपासते ॥ एकत्वेन पृथक्त्वेनं बहुंधा विश्वतोमुखम् ॥ १५॥ और कितनेक महात्मा एकत्वकरके याने सख्यंभावसे और कितनेक पृथत्व से याने दास्यभावसे ऐसे बहुर्धा याने कोई वात्सल्य और कोई शृंगार इत्यादि भावनाकरके सर्वतोमुख याने सर्वव्यापी मेरेको इत्यादि ज्ञानयज्ञकरके पूजतेर्भये उपासना करते हैं ।। १५ ॥ अहंऋतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम् ॥ मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरह हुँतम् ॥ १६ ॥ अब आपका सर्वव्यापित्व दिखातेहैं सो ऐसे कि भगवान् कह- तेहैं कि, कतु याने अमिष्टोमादिक श्रौतयज्ञ में हौं', यज्ञ जो स्मात पंचमहायज्ञ सो में हो स्वधा जो पितृनके आदादिकम सो मेंह

१२
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
औपंध याने अन्न सो में हौं, मंत्र में हौं",आज्य याने घेत सो में हों,
अमि में हो, होम में हों" यह निश्चय है ॥ १६॥
पिताऽहमस्यं जगतो माता धातां पितामहः ।।
वैद्यं पवित्रमोंकार ऋक् साम यजुरेव च ॥ १७॥
गैतिभती प्रभुःसाक्षी निवासःशरणं सुहेत् ॥
प्रभवः प्रलयस्थान निधानं बीजमव्ययम् ॥ १८॥
इसे जगत्का पिता, माता, धाता पितामह जो जाननेयोग्य सो
और पवित्रह सो और ओंकारे, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद इस
जगतकी गति, पालनकर्ता, स्वामी, शुभाशुभकर्मनका साक्षी, रहनेका
स्थान इच्छितवस्तु देनेवाला और अनिष्टका निवारक सुहदै उत्पत्ति
और नाका स्थान धारणकरनेवाला अविनाशी उत्पत्तिकारण सर्व"
मैं ही हौं ॥ १७॥१८॥
तपाम्यहमह वर्ष निनाम्युत्सृजामि च ॥
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥ १९॥
हे अर्जुन ! अग्नि और सूर्यरूप होके में ही तपाताही, में ही ग्री-
मादिक्रतुनमें वर्षाको वंदकरताहों और वर्षाऋतुमें वर्षांताहौं, अमृत
'और मृत्यु और सत् और असत् में निश्चय ही ॥ १९॥
विद्या माँ सोमपाः पूतपापा यज्ञरिष्ट्वा स्वगति
प्रार्थयते ॥ ते पुण्यमासाद्य सुरेंद्रलोकमश्नंति
दियान दिवि देवभोगान्॥२०॥ते त भुक्त्व स्व-
गलोक विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशति ।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्नों गतागतं कामकामा
लभते ॥२१॥

नवमः ९.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०॥ (१११) 'इसतरहसे महात्मा ज्ञानिनका व्यवहार और आपका वैभव कहा अव सकाम जनोंकी रहनि रीति कहतेहैं; जैसे कि, विद्या याने ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेदोक्त इंद्रादिदेवनिमित्त यज्ञ करनेवाले सोमपान कियेभये पापरहित यज्ञकरके इंद्रादिरूप मेरेको आर- धिक स्वर्गकी प्राप्ति मानते हैं वे पुण्यरूप इंद्रलोकमें प्राप्तहोके वहाँ स्वर्गमें दिव्य देवभोगोंको भोगते हैं. फिर वे" उर्स विशाल स्वर्गलोकको भोगिके पुण्य क्षीण होने से इस मनुष्यलोकमें प्राप्तहोते हैं। ऐसे" वेदत्रयीधर्मको केवल वारंवार करतेभये सकामीजैन गता- गत याने स्वर्गजाना मनुष्यलोकको आना फिर जाना फिर आना ऐसे फलको पाते हैं । २०॥ २१ ॥ अनन्यांश्चितयंतो मां ये जनाः पर्युपासते ॥ तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ २२ ॥ जो मनुष्य अनन्यभयेहुये मेरो चितवन करते करते मेरेको भेजते हैं उन नित्य मेरे संयोग चाहने वालोंका योग जो धनादिककी और मेरी प्राप्ति क्षेम जो धनादि संरक्षण और अपुनरावृत्ति इनको में प्राप्तकरताहीं ॥ २२ ॥ येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ॥ तेपि मामेव कौंतेय यजेत्यविधिपूर्वकम् ॥२३॥ जोकि और देवतोंके भक्त उनका श्रद्धायुक्त पूजन करतेहैं वेभी मेराही पूजन करतेहैं। परंतु हे कुंतीपुत्र ! वे अविधिपूर्वक पूजन करतेहैं याने विधिपूर्वक नहीं ॥२३॥ अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्तां च प्रभुरेव च ॥ नै तु मामभिजीनंति तत्त्वेनाऽतथ्यवति तें ॥२४॥ में निश्चय करके सर्वयज्ञोंका भोक्ता और स्वामी भी हो परंतु

(११२)
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
ये सकामिक जन मेरेको ऐसे निश्चयकरके नहीं जानते हैं इससे जन्म
मरणको प्राप्त होतेहैं ॥२४॥
यांति देवव्रता देवाने पितॄन्याति पितॄत्रताः॥
भूतानियोंति भूतेज्याँ याति मद्यौजिनोऽपि"माम५
अहो जो कहोगे कि, एकही कर्ममें संकल्पमात्रसे कैसे भेद
भया तहां सुनो जो इंद्रादिदेवनको भक्तिपूर्वक आराधते हैं तो
उनहीको प्राप्त होते हैं, पितृभक्त पितृनको प्राप्त होतेहें, जो कोईसे भी
राजा साधू चोर इत्यादि भूत प्राणिकी सेवा संगतिकरतेहैं वे उन-
हीकी समताको प्राप्त होतहैं; जो मेरी भक्तिकरतेहैं वे निश्चय मेरे को
प्राप्त होते हैं याने मेरी समताको पाते हैं ॥२५॥
पत्रं पुष्पं फलं तोय यो में भत्त्या प्रयच्छति ॥
तदेहं भक्त्युपहृतमश्नौमि प्रेयतात्मनः॥ २६॥
जो कहोगे कि, बड़ेनके प्रसन्न करनेको बड़े उपाय चाहिये तहाँ
सुनो जो कोई पैत्र, पुष्प, फल, जल मेरेको भक्तिकरके युक्त अर्पण
करताहै में उस शुद्धचित्तंभक्तका भक्तिपूर्वक अर्पणकियेभये उस
पत्रादिक पदार्थको स्वीकार करताहों ॥२६॥
यत्करोषि यदनांसि यज्जुहोषि ददासि यत् ॥
यत्तपस्यसि कौतेये तत्कुरुवं मैदर्पणम् ॥ २७॥
शुभाशुभफलैरेवै मोक्ष्यसे कैर्मबंधनैः॥
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपेष्यसि ॥ २८॥
हे कुंतीपुत्र ! मेरेको ऐसा सुलभ जानिके जो कुछभी तुमकरो,
जो खाउँ, जो होमो, जो देठे, जो तपकरी उसको मेरे अर्पण किये
भये करो; ऐसे करतेभये जो कर्म बंधनकारक हैं, उन शुभाशुभ फल
कोकरके छुटोगे. ऐसही इस कर्मफल अर्पण सन्यासयोगयुक्त
चित्तवाले तुम मुक्त भये हुये मेरेको प्राप्तहोवोगे ॥ २७ ॥२८॥

नवमः ९.] सान्वप-अमृततरंगिणीमा टी० ॥ (११३) संमोह सर्वभूतेषु नै में द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ॥ ये" भजति तु मां भक्त्या मयि ते ते चाप्यह२९ मैं सर्वभूतोंपर सम हौ मेरे नै अप्रियं न कोई प्रिय है. परंतु "मेरेको भक्तिकरके भजतेहैं वे" मेरे हेदयों और उँनके हृद- यमें निश्चयकरके मैं रहताहौं ॥ २९॥ अपि चेत्सुदुराचारो अर्जते मोमनन्यभोक् ॥ साधुरेव स मंतव्यः सम्याव्यवसितो हि सः ॥ ३० ॥ क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वेच्छांति निगच्छति ॥ कौतर्य प्रतिजानीहि नै में भक्तः प्रणश्यति ॥ ३१ ॥ जो कदाचित् कोई पुरुष भतिर्दुराचारी भी होई और वह मेरेको अनन्यभाक् याने औरको न भाग देताभया सर्वत्र मेरेहीको जानिके सर्व मेरे अर्पण करताभया भंजताहोय सो साधूही है ऐसे मानना चाहिये। जिससे कि वह सम्यक् निश्चय कियेहै उससे वह शीघेही धर्मात्मा होयगा और मोक्षहीको प्राप्तहोयगा. हे कुंतीपुत्रं । तुम यह निश्चय जानो कि, मेरों भक्त नहीं नाशको पावताहै याने मुक्तही होताहै ॥ ३०॥३१॥ मोहिं पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयो- नयः ॥ त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तपि" याति पैरां गतिम् ॥ किं पुनर्ब्राह्मणोः पुण्या भक्तों राजर्षयस्तों ॥ अनित्यमसुखं लोकमिमें प्राप्य भजखें मौम् ॥ ३२ ॥३३॥ हे पृथापुत्र ! निश्चयपूर्वक मेरेको पाश्रय करके जो पायोनी भी होय तथा स्त्री शद वैश्य वे" भी उत्तम मोर ८ ५

,
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
घोह्मण तथा क्षेत्रिय भक्त हैं उनको मोक्षको फिर क्या शंकाहै ? इससे
अनित्य दुःखरूप इस लोकको पाँइके मेरेको भेजो ॥ ३२ ॥ ३३ ॥
मन्मना भर्व मद्भक्तो माजी मां नमस्कुरु॥
मामेवैष्यसि युक्त्वैर्वमात्मानं मत्परायणः ॥ ३४॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतामूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां
योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे राजविद्यारा-
जगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः ॥९॥
भजनरीति यह कि, मेरेहीमें मनको युक्त कियेभये रहो मेरेदी
भक्त मेराही पूजन करनेवाले होउँ, मेरे हीको नमस्कार करो
ऐसे मेनको मेरेमें युक्तकरके मेरेही पैरायण भयेहुये मेरेही को
प्राप्तहोवोगे ॥३४॥
इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायो
श्रीगीतामृततरंगिण्यां नवमोऽध्यायप्रवाहः ॥९॥
सप्तमादिक तीनों अध्यायोंमें श्रीकृष्णजीने आपका भगवत्तत्त्व
और विभूति वर्णन की. जैसे कि, सप्तममें “ रसोहमप्मु कौंतेय "
इत्यादि, अष्टममें " अधियज्ञोऽहमेवात्र " इत्यादि, नवममें “अहं
ऋतुः" इत्यादिकरके संक्षेपसे कही. उनको और भक्तिकी आव-.
श्यकता अब दशमाध्यायमें विस्तारसे कहते हैं ।
श्रीभगवानुवाच।
भूय एव महोवाहो भृणु में परमं वर्चः ।।
यत्तेऽह" प्रीयमार्णाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥१॥
श्रीकृष्णभगवान् कहतेभये कि, हे महाबाहो मेरी सर्वोत्तम
वाक्ये फिर भी मुंनो; जो वाक्य प्रीतियुक्त जो तुम तिन तुमसे
तुम्हारे हितके पास्ते में कहताहों ॥ १॥

दशमः १०.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी । ने में विदुःसुरगाः प्रभवे ने महर्षयः॥ अहमीदिहिदेवानामहर्षीणांचे सर्वशः ॥ २ ॥ मेरो जन्मभंया ऐसा ने देवता न मही जानते हैं; कारण कि, में देवनकों और सर्व महर्पिनकामी आदि हौं ॥२॥ योमांमजमनादि चे वेत्ति लोकमहेश्वरम् ॥ असमंटः सं मत्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ३ ॥ जो मेरेको अजन्मा और अनादि लोकमहेश्वर जानती है सो मनुष्योंमें ज्ञानी है और सर्वपापोकरके ईंटाहै ॥३॥ बुद्धिज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमःशमः ॥ सुखं दुःखं भवो भावो भैयं चौमयमेव चे ॥४॥ अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दीनं यशोऽयशैः ॥ भवंति भावी भूतानां मत एव पृथग्विधीः ॥५॥ बुद्धि, ज्ञान, अव्याकुलता, क्षमा, सत्य, दम, शम, सुख, दुः उत्पत्ति, नौश, भय और अभयभी और अहिंसा, समती, संतो तप, दान, यश, अयश ये न्यारे न्यारे भूतोंके भाव मेरेहीसे" होते हैं ॥४॥५॥ महर्पयः सप्त पूर्वे चत्वोरो मनर्वस्तां । मद्भावा माना जाता येषों लोक इमाः प्रजाः॥६॥ सात महाऋषी याने मरीचि वसिष्ठादिक महावधि चार इनके भी पूर्वज याने सनकादिक ऋपि तथा चौदह मनु मेरे संकल्पन मन इच्छा प्रमाण उत्पन्नहोतेभये जिनके लोकमें ये प्रजा हैं ॥६॥ एती विभूति योग चे मर्म यो वेत्तिं तत्त्वतः । सोऽविकपन योगेनै युज्यते नात्र संशयः ॥७॥ जो पुरुष मेरी महपी इत्यादिकोंकी उत्पत्तिरूप इस विभूतिको (११६) भगवद्गीता। अध्याय:- और कल्याणगुणादिरूप योगको तत्त्वसे जानती है सो अचल भक्तियो- गर्करके युक्त होताहै इसमें संशय नहींहे ॥७॥ अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वे प्रवर्तते ॥ इंति मत्वा भजते माँ बुधा भोवसमन्विताः॥८॥ में सर्वको उत्पतिस्थान हाँ मेरेसे सर्व प्रवर्तहोताई ऐसा मेरेको मानिके भावसंयुक्त ज्ञानीजन मेरेको" भजतेहैं" ॥८॥ मचित्ता मदतप्राणा बोधयंतः परस्परम् ॥ कथयंतश्चै मां नित्यं तुष्यंति चै रैमंति च ॥९॥ उनका भजन प्रकार यह कि, मेरेहीमें जिनका चित्त है श्वासो- स्ट्रासपर मेरा स्मरण करते रहते हैं. परस्पर एक दूसरेको उपदेश करतर्भये निश्चयपूर्वक मेरेको याने मेरेही गुणगणनको कहते कहते निरंतर संतुष्ट होतेहैं और मेरी करीभई कीडा करने लगतेहे ॥९॥ तेपी सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।। ददामि बुद्धियोगं ते येन मौमुपयाति ते॥१०॥ ऐसे वे निरंतर मेरे संगी मेरेको प्रीतिपूर्वक भजनेवाले तिनको उस बुद्धियोगको देतातौं कि, जिसकरके वे मेरेको प्राप्त होते हैं ॥ १० ॥ तेपामेवानुकंपार्थमहमज्ञानजं तमः ॥ नोशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वंता॥११॥ उनहीको दयाके वास्ते उनकी मनोवृत्तिमें रहार्भया में प्रकाशित ज्ञानरूप दीपकरके उनके अज्ञानजन्य तिमिरका नाशकरताही ॥११॥ परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् । पुरुष शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥ १२ ॥ अर्जुन उवाच ।

दशमः १०.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० ।
(११७)
बहुस्त्वा पयः सर्वे देवर्षिनारदस्तथा।।
असितो देवलो व्यासः स्वयं च वै वीपि में ॥१३॥
ऐसे श्रीकृष्णजीके वाक्य सुनिके अर्जुन बोले कि, आप परब्रह्म
हो श्रेष्प्रभाव हो परम पवित्र हो; सर्व ऋपिजन आँपको अविनाशी
दिव्य पुरुष आदिदेव अजन्म व्यापक ऐसे कहतेहैं, वे ये जैसे कि,
देवत्रापि नारद तथा असित देवल व्यास और औप भी "मेरेसे
कहतेहो ॥ १२॥ १३॥
सर्वमेततं मन्ये यन्मां वदसि केशवें ॥
न हि ते" भगवैन व्यक्ति विदुर्देवों ने दानवाः ॥१४॥
हे केशव ! जो मेरेसे कहतेहो यह सर्व सत्य मानाहों, कार-
कि, हे भगवन् ! तुम्हारी उत्पत्तिको नै देवता जीनतेई न दानव
जानतेहैं ॥१४॥
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ॥
भूतभावन भूतेश देवदेवं जगत्पते ॥ १५॥
हे युरुपोत्तम ! हे भूतभावन ! हे भूतेश ! हे देवेंदेव ! हे जगत्पते ।
आँपको आपहीकी बुद्धि से आपही जानतेहो ॥ १५ ॥
वक्तुमर्हस्यशेपेणं दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।।
गोभिर्विर्भूतिभिर्लोकानिमास्वं व्याप्य तिष्ठसि॥१६॥
जो दिव्य औपकी विभूती हैं उनको समग्रतासे कहनेको योग्य हो
कारण कि, जिन विभूतिनकरके इन लो कॉमें आप व्यापिके
रहेहो ॥१६॥
कथं विद्यामहं योगी खांसदापरिचितयन् ।।
के' केषु च भावे\ चिंत्योसि भगवन्मया ॥ १७॥

(११८) भगवद्गीता। [ अध्याय:- में भक्तियोगयुक्तभयाहुँआ आपको सर्दा घ्यावतामयाँ कैसे जानों. और हेभगवन् ! आप मेरेकरके कौन कौन से से.पोंमें ध्यावनयो- ग्य हो ॥ १७॥ विस्तरेणात्मनो योग विभूतिं जनार्दन ॥ यः कथंय तृप्तिहिं शृण्वतोनास्ति में ऽमृतम्।।१८॥ हे जनार्दन ! आपको प्राप्ति उपाय और विभूति याने भव सो वि- स्तारसे फिर कहो. याने संक्षेप कहा अब विस्तार कहो क्योंकि, इस अमृतरूप माहात्म्यको सुनते सुनते मेरे" तृप्ति नहीं होती है ॥ १८॥ श्रीभगवानुवाच । हंत ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।। प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ट नौस्त्यंतो"विस्तरस्य मे।।१९।। एसे सुनिके भगवान् बोले कि हंत याने हे अर्जुन !तुम्हारेसे दिव्य परी विभूतिनको प्रधानतासे याने मुख्य मुख्य कहोगा क्योंकि, हे पुरुश्रेष्ठ । मेरे विस्तारको अंत नहीं है ।। १९ ॥ अंहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।। अहेमादिश्च मध्यं च भूतानामत एव चै ॥ २० ॥ -

दशमः १०.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (११९)
आदित्यानामहं विष्णुंज्योतिपी रविरंशुमान् ।
मरीचिमरुंतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥ २१ ॥
द्वादश आदित्यनमें विष्णुनाम आदित्य मैं ही, ज्योति में किर-
पर्वते सूर्य उनचास मरुतनमें मरीमिरुत् नक्षत्रोंमें चंद्रमा
में हो ॥२१॥
वेदानां सामवेदोऽस्मिं देवानाममिं वासवः ॥
इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतीनामस्मि चेतना ॥ २२ ॥
वेदनमें सोमवेद है।, देवनमें इंद्र हो और इंद्रियों में मने हों"
भूतप्राणिनमें चेतना हो ॥२२॥
रुद्राणां शंकरश्चास्मि वित्तेशी यक्षरक्षसाम् ॥
वसनां पविकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥ २३ ॥
रुद्रनमें शंकर हौ और यक्षराक्षसोंमें कुवेर, और अष्टवसुनमें आग्नि
शिखैरवालोंमें मेरुपर्वत में हो ॥२३॥
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।
सेनानीनामहं स्कंदः सरसामस्मैि सागरः॥ २४ ॥
हे पृथापुत्र!पुरोहितनमें मुख्य बृहस्पति मेरेहाको जानो और सेना-
पतिनमें कार्तिकस्वामी, सरोवरनमें समुद्र में ही हों" ॥२४॥
मैहपीणां भृगुरहं गिरोमस्म्येकमक्षरम् ॥
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥ २५ ॥
महर्पिनमें भृगु, वाक्यनमें एक अक्षर याने "ओम्" में हो यज्ञ-
नमें जपयज्ञे, स्थावरों में हिमाचल हो" ॥ २५ ॥
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवीणां चे नारदः।
गंधर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥ २६ ॥

-
(१२०)
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
सर्वक्षनमें पीपैर और देवपिनमें नारद, गंधर्वनमें चित्ररथ
सिद्धनमें केपिलमुंनि हौं ॥२६॥
उच्चैःश्रेवसमश्वांनां विद्धि माममृतोद्भवम् ॥
ऐरावतं गजेंद्राणां नराणां च नराधिपम् ॥ २७॥
घोडोंमें अमृतसे उत्पन्न उच्चैःश्रवाको, हॉथिनमें ऐरावतको और
मनुष्योंमें राजा मेरेहीको जीनो ॥२७॥
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कॉमधुक् ॥
प्रजनश्चास्मि कपः सैपणामस्मि बाँसुकिः ॥२८॥
आयुध में वत्र, धेनमें कामधेनु में ही उत्पत्तिकारक कार्म-
देव हो और ऐकशिवाले सर्पनमें वासुकीसर्प में हो ॥२८॥
अनंतश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ॥
पितणामयमा चास्मैि यमः संयमैतामहम् ॥ २९ ॥
और अनेक शिरवाले सपोंमें शेपजी में हो जलजीवनमें में वरुण
हो पितृनमें अर्थमा और शासनकरनेवालोंमें में यम हो"॥ २९॥
प्रद्वादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ॥
मंगाणां च मृगेंद्रोऽहंवैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥३०॥
दैत्य में प्रेहाद हों और अनर्थकारककी गनतीकारकों में काल
हो और मृगोंमें में" "हों और पक्षि में गड हौं ॥३०॥
पवनः पवतामस्मि रोमः शस्त्रभृतामहम् ॥
झंपाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मैि जाह्नवी ॥३१॥
पवित्रकारकोंमें पैवन ही शस्त्रधारीन में राम साक्षात् में हों, यहाँ
मस्त्रधारणमात्र विभूति है मच्छनमें मैकर हो और प्रवाहयालोंमें श्रीभी
गीरथी हों" ॥ ३१॥

दशमः १०.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१२१) संर्गाणामांदिरंतश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ॥ अध्यात्मविद्याविद्यानां वादः प्रवदतीमहमें ॥ ३२ ॥ सँगै जो ब्रह्माके दिवस उनमें आदि उत्पत्तिकारक और अंत प्रलय- कारक और मध्य याने रक्षक मैं ही हों. हे अर्जुन ! सर्वविद्यानमें अध्या- ' त्मविद्या वादकरनेवालोंमें वाद याने सिद्धांत में हों" ॥ ३२॥ अक्षराणामकारोस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च ॥ अंहमेवाक्षयः कालो धाताह विश्वतोमुखः ॥ ३३ ॥ अक्षरों में अकार ही समार्सनमें वैवसमास और अक्षय काल में चौतरफ मुंख जिसके ऐसा सर्वनका भरनेपोपनेवाला में ही हों॥३३॥ मृत्युः सर्वहरेश्वाहमुद्भवश्च भविष्यताम् ॥ कीर्तिःश्रीवाक् – नारीणां स्मृतिमेधा धृतिः क्षमा॥३४॥ सर्वका हरनेवालो मृत्यु में और आपकी वेढती चाहनेवालों में उद्भव याने बढती में ही स्त्रीजनोंमें कीर्ति, श्री, वा, स्मृति, मेधी, धृति और क्षमा मैं हौं ॥३४॥ बृहत्साम तथा सौम्नां गायत्री छंदैसामहम् ॥ माँसाना मार्गशीर्पोऽहमृतूंनां कुसुमाकरः ॥ ३५ ॥ तेसे' सामवेदेके मंत्रोंमें वृहत्साम, छंदामें गायत्रीमंत्र में हो महीनोंमें मार्गशीर्ष ऋतुनमें 4सत में" हो ॥ ३६॥ धूतं छलयंतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥ जयोस्मिं व्यवंसायोस्मैि सत्वं सत्ववैतामहमें ॥३६॥ छलकारिनमें जुवा तेजस्विनमें तेज में हों, जीतनेवालोंमें जय हो', निश्चयवालोंमें निश्चय ही उदारनेमें उदारतों में हों ॥३६॥ वृष्णीनांवासुदेवोस्मि पांडवांनां धनंजयः ॥

-
,
(१२२)
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
मुनीनामप्यह व्याँसः कवीनामुर्शना कैविः ॥ ३७ ॥
वृष्णिवंशिनमें वासुदेव यहां वसुदेवपुत्रत्व मात्र विभूति जानना
पांडवमें अर्जुन तुम हो सो श्रेष्ठ विभूति हो इससे तुमभी मैं हौं', मुनि
नमें व्यासजी मैं हौं, कवि जो शास्त्रदशी उनमें शुक्राचार्य
कवि मैं हौं ॥ ३७॥
दंडो दमयंतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ॥
मौनं चैवास्मिं गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवेंतामहम् ।। ३८॥
स्ववशकर्तनमें दंड हो, जयं चाहनेवालोंमें नीति हो, गुप्तकर-
नेके उपायोंमें मौन हौं ज्ञानिनमें मैं"ज्ञान हौं ॥३८॥
यच्चापि सर्वभूतांना बीज तंदहमर्जुने ।
नं तदस्ति विनौयत्स्योन्मयोंभूतं चराचरम् ।। ३९ ।।
हे अर्जुन 1 सर्वभूतोंका जो आदिकारण सो में हो; जो चराचर
भूत "मेरे विना होय सो" नहीं है ॥ ३९॥
नीतोऽस्तिं मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप ।।
एषे तूद्देशैतः प्रोक्ती विभंतेविस्तरो मया ॥४०॥
हे अर्जुन ! मेरी दिव्य विभूतिनका अंत नहीं है परंतु यह विभू-
लिगलियार मैंले स्करीमत्रसे कामहै 1.30
यद्यद्विभूतिमत्सतं श्रीमदूर्जितमेव वा ॥
तत्तदेवाऽवगच्छे त्वं मम तेजोशंसंभवम् ॥ ११ ॥
जो' जो पाणी ऐश्वर्यवान्, शोभायमान अथवा बडा होय साँसो
मेरे तेजके अंशयुक्त है ऐसे तुम जानो ॥४१॥
अथवा वहुँनैतेने किं ज्ञातेन तवार्जुने ।।
विष्टभ्याइमिदं कृत्स्नमांशेन स्थितो जगैत्॥१२॥

A-
.एका० ११.], 'सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (१२३)
इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिपत्सु ब्रह्मविद्यायां यो-
गशास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो
नाम दशमोऽध्यायः॥१०॥
हेअर्जुन ! अथवा ईप्स बहुत जानकरके तुम्हारे क्या प्रयोजन है
मैं इसे सर्व जगतको एक अंशकरके धारण कियेभयस्थित हौं ॥४२॥
इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिताया
श्रीगीतामृततरंगिण्यां दशमोऽध्यायप्रवाहः ॥ १० ॥
अर्जुन उवाच ।
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ॥
यत्त्वंयोक्तं वर्चस्तन मो होऽयं विगतो ममें ॥ १ ॥
जब भगवान्ने आपकी विभूति कही और उसमें आपका स्वरूप
वर्णन किया तब सुनिके अर्जुन देखनेकी इच्छा करके घोले कि, हे
भगवन् ! मेरे अनुग्रहके वास्ते सर्वोत्तम गोप्य अध्यात्मसंज्ञित याने
आत्मज्ञानविपयक जो वर्चन आपने कहा उसकरके मेरा यह
मोहें मैया ॥१॥
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ॥
त्वतः कमलपत्राक्षं माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥२॥
कारण कि कमलदलैनयना भूतप्रोणिनक उत्पत्ति प्रलय आपसे
मैंने विस्तारपूर्वक सुने और आपको अक्षयमाहात्म्य भी सुन॥२॥
एवमेतXथात्थं त्वमात्मानं परमेश्वर ॥
ट्रैष्टुमिच्छामि ते लैपमैश्वरं पुरुपोत्तम ॥३॥
हे परमेश्वर! तुम आपको जैसे कहतहो यह ऐसाही है हे पुरु-
घोत्तम ! तुम्हारे ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य, तेज, इन छहों
ऐश्वर्ययुक्त रूपको देखनेको चरिताहीं ॥३॥

१
(१२४)
मगवद्गीता।
[अध्याय:-
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुंमिति प्रभो॥
योगेश्वर ततो में त्वं देशयात्मानमव्ययम्॥४॥
हे प्रभो ! जो वहरूप मेरेकरके देखनेको योग्य है ऐसा मानते हो
हे योगेश्वर! 'तो तुम भविनोशी आपके रूपको मेरेको "दिखावो॥४॥
श्रीभगवानुवाच ।
पैश्य में पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः॥
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥५॥
ऐसे वचन सुनिके भगवान बोले कि, हे पृथापुत्र ! सैकडों फिर
हजारों अनेकप्रकारके दिव्य और अनेकवर्ण आकारके मेरे रूपोको
देखो॥५॥
पश्यादित्यान् वसून रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पैश्याश्चर्याणि भारत ॥६॥
इहकस्थं जगत्कृत्स्नं पैश्याचे सचराचरम् ॥
मम देहे गुडौंकेश यच्चान्यद्रष्टुमिच्छसि ॥७॥
हे भारत ! मेरी देहमें द्वादशेसूर्य अष्टवसु ११ रुद्र अश्विनीकु-
मार १९ मरुत् देखो तथा जो प्रथम न देखे ऐसे बहुत आश्चर्य
देखी हे गुडाकेश । ईस मेरे देदमें संचराचर सर्व जगत् एकही ठिकाने
इकटेको आज देखी और जो और भी देखनेको चाहतेहो उसे
भी देखो।॥ ६॥७॥
ने तुं माँ शक्यंसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुपां॥
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य में योगमैश्वरम् ॥८॥
इस आपकी दृष्टिकरके मेरेको देखनेको नै समर्थ होगे इससे
तुमको दिव्य ने देतीही तिसकरके मेरे ईईवरसंबंधी योगको
देखो॥८॥

एका० ११.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी।' (१२५) संजय उवाच। एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः ।। दर्शयामास पार्थायें परमं रूपमैश्वरम् ॥ ९ ॥ संजय धृतराष्ट्रसे कहतेभये कि, हे राजने । महायोगेश्वर श्रीकृष्ण ऐसे कहिके फिर सर्वोत्तम ईश्वरसंबंधी रूप अर्जुनको दिखाते भैये ॥९॥ अनेकवकनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ।। अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोधतायुधम् ॥ १० ॥ जिसरूपमें अनेक मुख और नेत्र हैं और अनेक अद्भुत दर्शन हैं अनेक दिव्य आभूपणयुक्त है और दिव्य अनेक उगाये हैं आयुध जिसमें ॥१०॥ दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगंधानुलेपनम् ॥ सर्वांश्चर्यमयं देवमनंतं विश्वतोमुखम् ॥ ११ ॥ दिव्य मालो और वस्त्रधारणकियेहें दिव्य चंदनादि गंधका लेपन किये हे सर्व आश्चर्यमय प्रकाशमान अंतर्हिते और सब और जिसमें मुख हैं ऐसा रूप अर्जुनको दिखातेभये ॥ ११ ॥ दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेयुगदुत्थिता ॥ यदि भौः सदृशी सांस्यौदासस्तस्य महात्मनः॥१२॥ जो आकाशैमें हजारों सूर्यनका एक समयमें उत्पन्नभयाहुगा तेजें होर्य सो तेज उन महात्मा भगवानके तेजके समान होय ॥ १२ ॥ तेत्रकस्थं जगत्कृनं प्रविभक्तमनेकधा । अपश्यदेवदेवस्य शरीरे पांडवस्तर्दा ॥ १३ ॥ उसे देवनकेभी प्रकाशक कृष्णके शैयरमें उस समयमें अनेक (१२६) भगवनीता। [अध्याय:- प्रकारका न्यारा न्यारा एकही ठेकाने इकट्ठा ऐसे सर्व जगतको अर्जुन देखतेभये ॥१३॥ ततः स विस्मयाविष्टो हप्टरोमा धनंजयः॥ प्रणम्य शिरसा देवं कृतांजलिरभीपत ॥१४॥ तेव विस्मय करके व्याप्त रोमांचयुक्त वह अर्जुन कृष्णको मस्तकसे प्रणामकरके हाथ जोरेभये बोले" ॥१४॥ अर्जुन उवाच । पश्यामि देवास्तवं देवं देहे सर्वीस्ता भूतवि- शेषसंघान् ॥ ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमपी- श्वे सर्वानुरगाँ) दिव्यानं ॥ १५॥ अर्जुन कहते हैं कि, हे देवे । तुम्हारे शरीरमें देवनको तथा सर्व भूतप्राणिनके समूहोंको तथा ब्रह्माको और कमलासन जो ब्रह्मा उनमें स्थित जो ईश्वर याने आपही तिनको और सर्व पिनको और दिव्यै सर्पनेको देखताहीं ॥ १५ ॥ अनेकांहदरवक्रनेत्रं पश्यामि त्वा सर्वतोऽनंत- रूपम् ॥ नातं ने मध्य नै ऍनस्तंवादि पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥ १६॥ हे विश्वेश्वर । हे विश्वरूप ! तुमको सर्वे ओरसे अनेक भुजा उदर मुख और नेत्रवाले अनंतरूप देखत्ताही तुम्हाग ने अंत ने मध्य में फिर ऑदि देखताहीं ॥१६॥ किरीटिनं गैदिन चर्किणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमंतम् ॥ पश्यामि त्वां दुनिरीक्ष्यं समंता- दीप्तानलौकशुतिमप्रमेयम् ॥ १७॥ - एका०११.] सान्वय-अमृततरंगिणी मा० टी०॥ (१२७) तुमको किरीटवान् गदावान् चक्रवान् और तेजकी राशि सब ओरसे प्रकाशवान् सब ओरेसे दुनिरीक्ष्य प्रदीप्त अग्नि और सूर्यनकी कांतिसरीखी कांतिमान् और अपरिमितरूप देखताहौं ॥ १७॥ त्वमक्षरं परमं वेदितव्य खेमस्य विश्वस्य पर निधांनम् ॥ त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनाते- नस्त्वं पुरुषो मैंतो मे ॥ १८॥ जो मुमुक्षु जनोंकरके जानने योग्ये सर्वोत्तम विष्णु आप हो इस विश्चके श्रेष्ट आधार आप हो सनातनधर्मके रक्षक अविनाशी आप हो सनातन पुरुप आप हो यह मैंने जाना है ॥ १८॥ अनादिमध्यांतमनतवीर्यमनंतबाहुं शशिसूर्यने- नम् ॥ पश्यामि त्वां दीप्तहुताशकं स्वते. जसा विश्वमिदं तपेतम् ॥ १९॥ नहीं है आदि, मध्य और अंत जिनके अनंत है पराक्रम जिनका अनंत है भुजा जिनके चंद्र सूर्य हें नेत्र जिनके प्रदीप्त अग्निसदृश मुख जिनके जो आपके तेजकरके इस विश्वको तपायमान करर- हेहो ऐसे तुमको देखता हौं ॥ १९॥ धावाष्टथिव्योरिदमतरं हि व्याप्तं त्वयन दिशश्च सर्वाः ॥ दृष्ट्वाऽद्भुतं सैंपKग्रं तवेद" लोकत्रयं प्रैव्यथितं महात्मन् ॥ २० ॥ हे महाशरीर ! द्यावापृथिवीका यह अंतर याने इस ब्रह्मांडका पोल भोप एक करके व्याप्त है और सर्व दिशा व्याप्त हैं अर्थात् ऊंचाई फरके ब्रह्मांड पोल और चौडाई करके सर्व दिशा पूरगई हैं ऐसे (१२८) भगवद्गीता। अिध्याय:- आपके इस अद्भुत उग्र रूपको देखिके तीनों लोके याने तीनों लोकोंके निवासी देव मनुष्यादिक व्याकुल हैं ॥२०॥ अंमी हि त्वां सुरसंघा विशंति केचिद्भीताः प्रां- जलयो गृणंति ॥ स्वस्तीत्युक्ती महपिसिद्धसं- घाः स्तुवंति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः॥ २१ ॥ ये' देवतनके समूह आपके समीपे प्राप्तभयेहें कितने भयभीत हाथ जोरेभये तुम्हारे गुण नाम उच्चारणं करतेहैं महर्षी और सिद्धन- के समूह स्वस्ति ऐसे" कहिके तुझारी अनेकै प्रकारकी स्तुतिन करके स्तुति करतेहैं ॥२१॥ रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वश्विनी मं- रुतश्चीमपाश्चै ।। गंधर्वयक्षासुरसिद्धसंघों वी"क्ष- तेला विस्मिताश्चैव सर्वे ॥ २२ ॥ एकादश रुद्र द्वादश आदित्य अष्ट वसु और जो साध्य नामक उपदेव तेरह विश्वेदेव दो अश्विनीकुमार उंचार्श मरुत् और पितर और गंधर्व यक्ष देवता और सिद्ध इनके समूह ये सर्व विस्मित भये हुए तुमको ही देखिर हैं ।। २२ ॥ रूपं महत्ते बहुवत्रनेत्रं महाबाहो बडवाहूरूपा- दम् ॥ बहुदरं बहुदंष्ट्राकरांलं दृष्ट्वा लोको प्रेव्यथितास्तथीहम ॥ २३॥ हे महाबाहो ! बहुत हैं मुखै और नेत्र जिसमें तथा बहुत हैं भुना जांघों और चरण जिसमें बहुत हैं उदर निसमें बहुत दांडों करके एका० ११.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१२९) विकराल ऐसे तुम्हारे महत् रूपको देखिके लोक व्याकुल हैं तोही मैं भी व्याकुल हूं ॥२३॥ नभःस्पशं दीप्तमनेकवर्ण व्यत्तिाननं दीप्तवि- शालनेत्रम् ॥ {ट्वा हि त्वां प्रैव्यथितांतरात्मा धति न विदामि शमं चै विष्णो ॥ २४ ॥ दंष्ट्रा- करालानि च ते सुखानि दृष्ट्वैव कॉलानलसन्नि- भानि ॥ दिशो न जाने नै लेभे चे शर्म प्रेसीद देवेश जगन्निवास ॥ २५॥ अमी चैत्वा ("दृष्टा दिशो में जीनति शर्म नै लभते इति पूर्वेण पंच- विंशतितमेन पद्येनान्वयः") धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सवै सहैवावनिपौलसंधैः॥ भीष्मो द्रोणः संत- पुत्रस्तथाऽसौ संहाऽस्मदीयैरपि योधमुंख्यैः ॥ ॥ २६ ॥ बैंकाणि ते त्वरमाणों विशति दंप्री- करालानि भयानकानि ॥ के चिदिलंगा दश- नांतरेषु सदृश्यते चूर्णितैरुत्तमांगैः ॥ २७ ॥ हे विष्णो ! नभ जो प्रकृतिसे परे परम आकाश वैकुंठ तहांपर्यंत हे स्पर्श जिनका जो प्रकाशमान अनेक वर्णयुक्त रूप तथा मुख फैलाये प्रदीप्तं और विशाल नेत्र ऐसे आपको देखिके जिससे कि, में ध्याकुलचित्त भयाहुआ धीरजको और शांतिको नहीं प्राप्त होताहूं और दाट कराल जिनमें और कालाने के तुल्य हैं ऐसे तुम्हारे मुखों को देखिके ही दिशाओंको नहीं जानताहूं गोरे मुखको भी ना प्राप्त होताहूं और राजोंके समूहोंकरके सहित सर्व धृतराष्ट्रके पुत्र तथा भीष्म द्रोण यह कर्ण और हमारे जोधनमें मुख्य जो हैं ९ (१३०) भगवद्गीता। [अध्याय:- तिनकरके सहित तुमको ("देखिके दिशाओंको नहीं जानते हैं और सुखको नहीं प्राप्तहोते हैं ऐसे प्रथमके पच्चीसवें श्लोककरके अन्वय है")। ये सर्व अतिवेगको प्राप्तभैये डौटें हैं कराल जिनमें ऐसे भयानक आपके सुखोंमें प्रवेश करते हैं कितनेक चूर्णितभयेहुये मैस्तकोंकरके सहित तुम्हारे दांतोंकी संधिनमें पटकभये दीखते हैं इससे हे देवेश ! हे जगन्निवास 1 माप कृपा करो याने हम सब डरते हैं इससे आप प्रथमसरीखे सौम्यरूपको धारणकरो॥२४॥२५॥२६॥२७॥ यथा नदीनां बहवोऽम्बुंवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवति ॥ तथा तैवामी नैरलोकवीरा विशंति वाण्यभितो ज्वलंति ॥२८॥ जैसे नैदिनके बहुतसे पानीके वेगें समुद्रहीके संमुख धाक्त है तैसे ये नरलोकवीर तुम्हारे सबै ओर प्रज्वलित मुंखोंमें प्रवेश करतेहैं ।। २८॥ यथा प्रेदीप्तं ज्वलनं पतंगा विशंति नौशाय स- मृद्धवेगाः । तथैव नौशाय विशंति" लोकास्त- वापि" वक्रोणि समृद्धवेगाः ॥ २९ ॥ से अतिवेगवंत पतंगे आपके नाशके वास्ते प्रदीम अमिमें प्रवेश करते. तसेही अतिवेगवंतं ये लोग भी अपने विनाशके वास्ते तुम्हारे मुंखोंमें प्रवेश करते हैं ॥ २९॥ लेलिंडसे ग्रंसमानः समंतालोकोन्समैग्रान्वर्द- नेज्वलंद्भिः ॥ तेजोभिरीपूर्य जगत्सर्भग्रंभी- सस्तेवोनीः प्रैतपति विष्णो ॥३०॥ हे विष्णो । प्रज्वलित अपने मुखोकरके सर्वे लोगोंको सर ओरसे घेरतेभये चाटेंजातहो याने खायेजानेहो तुम्हारे उ प्रकाश एका० ११.] सान्वय-अमृततरंगिणी मा० टी० । (१३१) सबै जगत्को अपने तेजकारके परिपूरित करिके तैपरहे, ॥ ३० ॥ आख्याहि में को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ॥ विज्ञातुमिच्छामि भवतमाचं न हि 4जानामि तव प्रवृत्तिम् ॥ ३१ ॥ हे देववर ! ऐसे उग्ररूप आप कौन हो सो मेरेसे कहो क्योंकि, तुम्हारी प्रवृत्तिको मैं नहीं जानताहूं जो आप आदिहो उनको जानने- की इच्छा करताहूं आप कृपाकरो तुम्हारेको नमस्कार होउँ ॥३१॥ श्रीभगवानुवाच । कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाह- तुमिह प्रवृत्तः ॥ तेऽपि त्वां न भविष्यति से- वैयेऽवस्थिताः |त्यनीकेषु योधाः ॥३२॥ ऐसे सुनिके श्रीकृष्ण भगवान् बोले कि, में इन लोगोंके क्षयके चास्ते बढाभया काल हूँ यहाँ इन लोगोंका संहार करनेके वास्ते प्रर्वत भयाहूं जो ये जोधा तुम्हारी शसेनाओंमें खे हैं ये सब तुम्हारे विनों निश्चयपूर्वक न रहेंगे ॥३२॥ तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुं- क्ष्व राज्यं समृद्धम् ॥ मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥ ३३ ॥ हे सव्यसाचिन् ! हे अर्जुन ! जिससे कि ये मरेहीगे तिससे तुम ठो यंश लेट शत्रुनको जीतिकें समृद्ध राज्यको भोगो" प्रथमही ये संप मेने मारीखहें तुम तो निमित्तमानै होउँ ॥ ३३ ॥ द्रोण चे भीष्मं च जयद्रथं च कर्ण तथाऽन्यानपि

( १३२)
भगवहीता।
[अध्याय:-
योधवीरान् ॥ मैया हतास्त्वं जैहि माँ व्यथिष्ठा
युध्यस्व जैतासि रणे सपत्नान् ॥ ३४॥
द्रोणं और भीष्म गौर जयद्रथ मोर कर्ण तां औरभी शूरवीर
इनको मेरे मारेभयेनैको तुम मारो, मैति दुःसित होउ रेगमें शवून-
को जीतोगे युद्धकैरो॥३४॥
संजय उवाच ।
एतच्छ्रुत्वा वर्चनं केशवस्य कृतांजलिवपमानः
किरीटी ॥ नमस्कृत्वा भूयंएवाह कृष्णं संगद्गदं
भीतभीतः प्रणम्य ॥ ३५॥
संजय धृतराष्ट्रसे कहतेहैं कि, किरीदी जो अर्जुन सो श्रीकृष्ण
के इतने वचन सुनिके कांपते कांपते हाथ जोड़ेभये नमस्कार
करके फिरभी भयभीत प्रणाम करके गद्दकंठयुक्त श्रीकृष्णसे
बोलोभये ।। ३५॥
अर्जुन उवाच ।
स्थाने हपीकेश तव प्रकीर्त्यां जगत्महष्यत्य -
रज्यते च ॥ रक्षांसि भीतीनि दिशो द्वंति सै-
वे नमस्यंति चे सिद्धसंघाः ॥३६॥
अर्जुन कहते हैं कि, हे हपोकेश ! तुम्हारी उत्तम कीर्तिकरके ज-
गत आनंदित होताह और आपसे प्रीति करताहै राक्षस भयको
प्राप्तभयेईये संवदिशाओंको भागतेहैं और सर्व सिद्धसमूह नम-
स्कार करते हैं सो यह योग्यही है ॥३६॥
कस्माच्च ते नं नमेरंन् महात्मन् गरीयसेब्रह्म-
णोऽप्यादिकत्रे ॥ अनंत देवेश जगन्निवास बैं-
मक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥ ३७॥

एका०११.] सान्वय-अमृततरंगिणीभा० टी० । हे महात्मन् ! ब्रह्मासे भी बडे आदिकत्ती जो आप तिनै तुमको वे क्यों ने नमन करें अर्थात् कोहोकरें. हे अनंत । हे देवेश ! हे जैग- निवास । जो अक्षर याने जीवतत्त्व सत् जो कार्य स्थूलप्रकृति असत् जो सूक्ष्मप्रकृति कारण तत्पर जो शुद्ध आत्मा सो सब आप हो याने सबके अंतर्यामी हो ॥ ३७॥ त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ॥ वेत्तासि वेयं च परं च धीम लैया तेतं विश्वमनंतरूप ॥ ३८॥ आपे आदिदेव पुराण पुरुप हो तुम इस विचके परम आधार हो इसके जाननेवाले और जानने योग्य और इसके सर्वोत्तम वास- स्थान हो" हे अनंतरूप ! यह विश्व तुमकरके व्याप्त है ॥ ३८॥ वायुयमोग्निवणः शशांकः पितामहस्त्वं प्रपि- तामहा ॥ नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोपि नमो नमस्ते ॥ ३९॥ पेवन अग्नि यम वरुण च पितामह और प्रपितामह तुम हो इससे तुमको हजारोंवार नमोनमः होउँ फिरें और फिरभी तुमको मोनमः ॥ ३९॥ नमः पुरस्तादथ पेष्टतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ॥ अनंतवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्व समाप्नोपि ततोऽसि सर्वः ॥ ४०॥ हे सर्व ! तुमको अगारीसे और पिछारीसे नमस्कार और तुमको सब ओरसे भी नमस्कार होते अनंत बल और अमित परीकम तुम समें व्यापक हो इसीसे तुम सर्वरूप हो ॥४०॥ सैखेति मत्वा प्रेसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव

(१३४)
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
हे संखेति ॥ अजानता महिमानं तवेर्दै मया
प्रमादात्प्रणयेनं वापि"॥ ४१ ॥ यँचौवहीं-
सार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेयूँ ॥
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वाम-
हममेयम् ॥४२॥
हे अच्युते ! तुम्हारे महिमाको और इस विश्वरूपको न जानने-
वाला जो मैं तिस मैंने प्रमादसे अथर्वा प्रणयसे भी संखा ऐसे
मोनिके हे कृष्ण! हे यादव ! हे सखे ! ऐसे हैंठसे जो" कहाहोये और
कोडा शयन आसन तथा भोजनकालमें अकेली अथवा और उन
सखोंके संमुख इसीके वास्ते जो आपका अपमान किया होय सो
परमितिरहित जो आपतिनै आपसे में क्षमा करताहूं ॥११॥४२॥
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च
गुरुंगरीया ॥ नै त्वत्समोस्त्यभ्यधिकः
कुतोन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभावः ॥ ४३ ॥
तस्मात्प्रणम्य प्रैणिधाय कायं 4सादये त्वाम-
हमीशमी.यम् ॥ पितेव पुत्रस्य संखेव सैख्युः
प्रियः प्रियायाहसि देव सोर्दुम् ॥ ४४॥
हे सर्वोत्तमप्रभाव ! आप इस चराचर लोकके पिता हो और सर्व
गुरुनसे बडे गुरु हो इसीसे पूज्य हो तीनों लोकमें भी आप समान
और नहीं है" तो कहांसे और अधिक होगा तिसत में शरीरको
धृथिवीपर धारणकियेभये प्रणामकरके ईश्वर इसीसे स्तुतिकरने-
योग्य आपको प्रसन्न करूंहूं हे देव । पुत्रके प्रियके वास्ते पिता जैसे
खाके प्रियके वास्ते सखा जैसे ऐसे मेरे प्रिय आप हो सो मेरे
प्यारके वास्ते मेरे अपराध सहनेको योग्य हो ॥४३॥४४॥

एका० ११.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी । (१३५)
अदृष्टपूर्व हेषितोस्मि दृष्ट्वा भयेन चे प्रव्यथितं
मनो मे ॥ तदेव में दर्शय देव रूपं 4सीद देवे-
शै जगन्निवास ॥४५॥
जो रूप मैंने और किसीनेभी प्रथम नहीं देखा था उसको देखिके
चकित भयाहूं और भयेसे मेरी मन व्याकुल भयाहै हे देवें। मेरे-
को वही प्रथमका रूप दिखापो हे देवेश ! हे जगनिवास ! आप
मेरेपर प्रसन्न होउ ॥ ४॥
किरीटिनं गंदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्ट-
महं तथैव ॥ तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्त्र-
बाहो भवं विश्वमूतॆ ॥ ४६॥
हे सहस्रबाहो । हे विश्वमूर्ते ! मैं वैसाही किरीटयुक्त गदायुक्त
चक्रहस्त आँपको देखनेको चौहता हूं इसवास्ते उस ही चतुर्भुज
रूपैकरके युक्त होउँ ॥४६॥
श्रीभगवानुवाच ।
भैया प्रसन्नेन तवार्जुनेद रूपं पैर दर्शितमात्म-
योगात् ॥ तेजोमयं विश्वमनंर्तमाद्यं यन्मे त्वंद-
न्येन ने दृष्टंपूर्वम् ॥ १७॥
पेसी अर्जुनकी प्रार्थना सुनिके भंगवान् बोले कि, हे अर्जुन । जो
मेरो तेजोमय विश्वरूप अंचहित सर्वका आदि तुम्हारे विना और
किसीने नहीं प्रथम देखा सो यह पैर रूप प्रसन्न होके मैंने आपके
सत्यसंकल्परूपयोगसे तुमको दिखायाँ ॥ १७ ॥
नं वेद॑यज्ञाऽध्ययनैनं दांनैन" चे क्रियाभिन"
तपोभित्रैः । एवरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं
त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥ ४८॥

(१३६) मगयद्गीता [अध्याय:- हे कुरुवंशिनमें श्रेष्ठवीर ! ऐसे रूपका में इस मनुष्यलोकमें तुम्हारे विना औरके न वेदपाठ यन और मंत्रनपंकरके न दानकरके और में योगक्रियाकरके ने उग्रं तपकरके देखनेको योग्यहूं ॥१८॥ मां तें व्यथा मैच विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोर- मोर्टङ् ममेदम् । व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव में" रूपमिदं"प्रैपश्य ॥४९॥ ऐसे घोर मेरे इस रूपको देखिके तुमको व्यथा मेति होउ और मोहभाव भी मैति होउ भयरहित प्रसन्नमन तुम ही यह मेरी कैप फिर देखो ॥ १९॥ संजय उवाच । इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोकी खंकं रूपं दर्शया- मास भूयः ॥ आश्वासयामास चे भीतैमेनं" भूत्वा पुनः सौम्यवपुमहात्मौ ॥ ५० ॥ संजय धृतराष्ट्रसे कहते हैं कि, चसुदेवपुत्र कृष्णं ऐसे अर्जुनको कहिके वैसा ही पूर्ववत् आपके रूपको फिर दिखातेभेये और जो डेशरीरयुक्त थे सो सौम्यरूप "होके फिर भयभीत भर्जुनको आश्वासते भये ॥५०॥ अर्जुन उवाच। दृष्ट्वदं मानपं रूपं तवं सौम्यं जनार्दन ।। ईदानीमैस्मि संवत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥५१॥ तब अर्जुन बोले कि, हेजनार्दन । तुम्हारे इस सौम्य मानुपरूपको देखि के भव सचेतभयाहुआ आपके स्वभावको प्रीतमया सावधान हूँ"॥५१॥ श्रीभगवानुवाच । सुदर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ॥

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एका०११.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (१३७)
देवा अप्यस्य रूपस्यं नित्यं दर्शनकाक्षिणः ॥ १२ ॥
अर्जुनके वाक्य सुनिके श्रीकृष्ण बोले कि, हे अर्जुन । जो अंति-
दुर्लभदर्शन इस मेरे रूपको तुम देखतेभये इस रूपके देवता भी
निरंतर दर्शनाभिलापी रहा करते हैं ॥५२॥
नाही बर्दै नै तपसा नै दाने ने चे" ज्यया ॥
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि माँ यथा ॥ ५३॥
भक्त्या बँनन्यया शक्य अहमेवंविधा ऽर्जुनं ।
ज्ञातुं ट्रैष्टुं च तत्त्वेन प्रवष्टुं च परंतपै ॥ ५४ ॥
हे अर्जुन ! जैसे मेरेको तुम देखते ये इसप्रकारका में न वेदों-
करके ने तपकरके ने दीनकरके और में यज्ञकरके देखें नेको
सैकवाहों क्योंकि हे परंतप । ऐसी में अनन्य भक्तिकरके निश्चयपूर्वक
जाननेको और देखनेको समी प्राप्तहोनेको भी सकताहीं॥५३॥५४॥
मत्कर्मकृन्मपरमो मद्भक्तः संगवर्जितः॥
निर्वैः सर्वभूतेषु यः सं मामेति" पांडव ॥ ५५ ॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतामुपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां यो-
गशाचे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शन-
योगो नाम एकादशोऽध्यायः॥ ११ ॥
हे पांडव ! जो मनुष्य मेरेनिमित्त लौकिक वैदिक सर्व कर्म
करताहै मेरेहीको सर्वसे अतिउत्तम मान रहाहै मेरा ही भक्त है
मेरे संबंध विना और संगोंकरके रहितहै और सर्वभूतप्राणिनमें
निर हैं सो मेरे को प्रातहोताहै ॥ ५५ ॥
इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां
श्रीमद्भगवद्गीतामृततरंगिण्यामकादशाध्यायप्रवाहः ॥ ११ ॥

(१३८) भगवद्गीता। [अध्याय:- अर्जुन उवाच । एवं सततयुक्ता ये भक्तांस्त्वों पर्युपासते ॥ ये चाँप्यारमव्यक्तं तेपी के योगवित्तमाः ॥११॥ ऐसे प्रथम आत्मज्ञानकी महिमा श्रीकृष्णजीने वर्णन की फिर भक्तिहीसे जानने देखनेमें और प्राप्तहोनेमें आताहों सो दोनोंको. सुनिके अर्जुन पूंछते हैं कि, निरंतर भक्तियोगयुक्तभये?ए जो भक्त ऐसे जो आप पीछे अध्यायके अंतमें कहा तैसे आपकी उपासना करते हैं और जो इंद्रियोंके अदृश्य अक्षर याने आत्मस्वरूप उसकी उपासना करतेहैं उन दोनोंमें अतिश्रेष्ठं कौन हे याने आत्मज्ञानी श्रेष्ठ है कि, आपके उपासक श्रेष्ठ हैं सो कहो ॥१॥ श्रीभगवानुवाच। मंय्यावश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ॥ श्रद्धया परयोपेतास्ते में युक्ततमा मताः॥२॥ ऐसा अर्जुनका मन सुनिके श्रीकृष्णभगवान् बोले कि, जो' निरंतर भक्तियोगयुक्त मेरेमें मनको लगायके परम श्रद्धाकरके युंक्त मेरेको भेजते हैं वे" योगिर्नमें श्रेष्ठ मेरे" मान्य हैं ॥२॥ येत्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ॥ संवत्र- गर्मचिंत्यं च कूटस्थमचलें ध्रुवम् ॥ संनिय- म्येंद्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः॥ ते प्राप्नुवंति मामेव सर्वभूतहिते रताः ।। क्लेशोऽधिकतरस्ते- पामव्यक्तांसक्तचेतसाम् ॥ अव्यक्ता हि" गति- दुःखं"देहवद्भिरवाप्यते ॥३॥४॥५॥ जो कोई इंद्रियसमूहको नियममें रोखिके संवत्र समधुद्धि सर्वभू- तोंके हितमें रतहुयेभये अंनिर्देश्य याने देवादि शरीरशब्दोंकरके कह-

द्वाद० १२.] सात्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०।
(१३९)
नेमें न आवे ऐसे अव्यक्त याने इंद्रियगोचर नहीं "सर्वत्रग"याने सर्वत्र
देवादिशरीरों में रहनेवाला अचिंत्य याने ध्यानमें न आवे और कूट-
स्थ याने सर्वत्र एकसा रहे अँचल याने स्वस्वरूपहीमें स्थिर ईसीसे
नित्य ऐसे अक्षरको याने आत्मस्वरूपको मैंजते हैं याने आत्मस्व-
रूपहीका अनुसंधान करते हैं वेभी मेरेहीको प्राप्तहोते हैं परंतु
आत्मज्ञाने देशा दुःखपूर्वक देहधारिनकरके प्राप्तहोताहे इससे
न अव्यक्तासक्तचित्तनको केश अतिशय है ॥३॥४॥५॥
येतु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ॥
अनन्येनैव योगेनं मां ध्यायंत उपासते ॥६॥
तेषामह समुद्घा मृत्युसंसारसागरात् ॥
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ ७॥
हे पृथापुत्र ! जो कोई सर्व कर्मोको मेरेमें अर्पर्णकरके मेरेही
शरणभयेहुये अनन्य भक्तियोगकरके मेरे"को ध्यावते पूंजते हैं ऐसे
"मेरेमें लगायाहै चित्त जिनने उनका में" थोडे ही कामें मृत्युदुःख-
रूप संसारसागरसे उद्धारकर्ता होउंगा ॥ ६॥ ७ ॥
मय्येव मनं आधत्स्व मंयि बुद्धिं निवेशयं ।
निवसिष्यसि मय्येव अतऊर्ध्व नै संशयः ॥ ८॥
इससे तुम मेरेहीमें मैनको लगावो मेरे हीमें बुद्धिको लगावो
इस मन,बुद्धिलगाये पीछे मेरेही समीप रहोगे इसमें संशय नहीं है।।८॥
अर्थ चित्तं समाधातुं न शक्नोपि मयि स्थिरम् ॥
अभ्यासयोगेने ततो मामिच्छाप्तुं धनंजय ॥ ९॥ •
हे अर्जुन ! जो कदाचित् मेरेमें चित्तको स्थिर समाधानकरने-
को नहीं सकते हो तो अभ्यासयोगकरके मेरे प्राप्तहोनेको इच्छ
तेरहो।॥ ९॥

(१४०)
भगवद्गीता।
अध्याय:-
अभ्यासेप्यसमर्थोसि मत्कमपरमो भवे ।।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥१०॥
जो अभ्यासमेंभी असमर्थ होउँ तो मेरे पूजनादिक कामें मुख्य
स्थिर होउ मेरे अर्थ भी कमाको करतेकरते मेरी प्राप्तिरूप सिद्धिको
प्राप्त होवोगे ॥१०॥
अथैतदप्यशक्तोऽसि केतु मद्योगमाश्रितः॥
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥ ११ ॥
जोकि, तुम यहभी करनेको अर्शक्त होवे ईससे मनको सावधान
कियेभये मेरे भक्तियोगका आश्रय कियेभये सर्व कर्मफलका त्याग
करो।॥११॥
श्रेयो हिं' ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञांनाड्यानं विशिष्यते ॥
यांनात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छांतिरनंतरम॥१२॥
जिससे कि, अभ्यासप्ते कल्पाणकारक ज्ञान होताहै ज्ञानसे विचार
होताहे विचारसे कर्मफलका त्यागे होताहै कर्मफलके त्यागसे
फिर शांति याने संसारसे वैराग्य होताहै ॥ १२ ॥
अद्वेष्टी सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव चै॥
निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखामी ॥ १३ ॥
संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।।
भैय्यर्पितमनोबुद्धिोमद्भक्तः सें में प्रियः ॥ १४ ॥
जो सर्वभूतोंको ने उपकारक होय और सबका मित्र होय और
दयालू भी होय ममतारहित अहंकाररहित सुखदुःखमें सम क्षमावान
थालाभसंतुष्ट निरंतर भक्ति योगवान् नितचित्त दृढनिश्चय मेरेमें"
मन बुद्धिको लगायेहोई सो मेरो भक्त मेरे को प्रिय है ।। १३॥ १४ ॥

द्वाद० १२.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० ॥
(१४१)
येस्मान्नोद्भिजते लोको लोकांनोजिते . यः ॥
हपामर्पभयोद्रेगैर्मुक्तो यः स च में प्रियः ॥ १५ ॥
जिससे कोई भी जैतु त्रास नरावै और जो किसीसे भी दुःख न पावे
और जो हर्प, इपी,भय और उद्वेगोंकरके रहित होय मो मेरी प्रिय है १५
अनपेक्षः शुचिर्दा उदासीनो गंतव्यथः ॥
सर्वारंभपरित्यागी यो मद्भक्तः से में"प्रियः ॥ १६ ॥
जो मनुष्य मेरे सर्वधविना सर्वत्र अपेक्षारहित शुचि याने शुद्ध-
आहारी और बाहर मृत्तिका जलादिकरके और अंदर चित्तकी
शुद्धताकरके पवित्र स्वधर्मअनुष्ठानमें चतुर्र शत्रुमित्रादिभेदरहिते
शास्त्रोक्त कर्म करनेमें व्यथारहित सर्व आरंभोंके फल और ममता
का त्यागी ऐसा मेरा भक्त सो मेरे को प्रिय है ॥ १६॥
यो न हृष्यति न द्वेष्टिं नशोचति नकाक्षति ॥
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः सं में प्रियः ॥१७॥
जो सुखकारक वस्तु पायके ने हर्षे दुःखकारक पायके न द्वेपकर
शोकनिमित्तमें न शोककरे और हर्षकारककी न इच्छाकरे जो शुभा-
शुभं कर्मफलोंका त्यागीहुआभया भक्त होय सो मेरे प्रिय है ॥१७॥
संमः शत्रौ चे मित्रेचं तथा मानापमानयोः ॥
शीतोष्णसुखदुःखेषु संमः संगविवर्जितातुल्यनि-
दौस्तुतिमा नी संतष्टो येनकेनचित् । अनिकेतैः
स्थैिरमतिभक्तिमान्म प्रियो नरः ॥ १८॥ १९ ॥
शेव और मित्रमें सम तैसा ही मान अपमानमें और शीतउ-
पण सुखदुःखोंमें समे होय विषयोंकी आसक्तिरहित निंदा स्तुति
तुल्यमाने मितभीपी जो स्वतःप्राप्तहोई इसीकरके संतुष्ट घरमें
अनासक्तं स्थिरखंद्धि भक्तिमान मनुष्य मेरी प्रिय है ॥ १८ ॥ १९ ॥

(१५२) भगवद्गीता। [अध्याय:- येतुं धामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ॥ श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव में प्रियाः॥२०॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिपत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२॥ जो कोई अंदा धारेभये मेरेहीको सर्वोत्तम जाननेवाले भक्त इस यथोक्त धर्मरूप अमृतको याने मेरेमें मन लगाना इत्यादि धर्मरूप अमृतको सेवते हैं वे मनुष्य मेरे" अतिशय प्रिय हैं ॥ २० ॥ इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिता- यां श्रीगीतामृततरंगिण्यां द्वादशाऽध्यायप्रवाहः ॥१२॥ इति द्वितीयं पट्कम् । अथ तृतीयं पट्कम्। श्रीभगवानुवाच । इदं शरीरं कौंतेयं क्षेत्रमित्यभिधीयते ॥ एतद्यो वेति ते प्राहुँ क्षेत्रसँ इति तद्विदः ॥ १॥ प्रथमके छः अध्यायोंमें ईश्वरप्राप्तिका उपायभूत उपासना और उपासनाका अंगभूत आत्मस्वरूपज्ञान कहा और उस आत्मस्वरूप- ज्ञानकी प्राप्ति ज्ञानयोगकर्मयोगनिष्टाते होती है ऐसे कहा ॥ मध्यके छःअध्यायोंमें परमात्मस्वरूपका यथार्थ ज्ञान और उसके माहात्म्य ज्ञानपूर्वक उपासना जिस उपासनाको अक्ति भी कहते हैं तो कहते भये । अब अंतके छः अध्यायोंमें प्रकृतिपुरुपका निरूपण और इस प्रपंचका प्रकृतिपुरुपसंयोगसे होना कहेंगे और प्रथम बारह अध्या- योंमें जो परमात्मस्वरूपका यथार्थ निश्चय और कर्मज्ञानभक्ति- अयो० १३.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (१४३) स्वरूप और इनके ग्रहणके न्यारेन्यारे प्रकार कहेंगे। तहाँ तेरहवें अध्यायमें देह और आत्माके स्वरूप और आत्मस्वरूपप्राप्तिका उपाय तथा प्रकृतिमुक्त आत्माका स्वरूप और उसके प्रकृतिसंव- धका कारण और प्रकृतिपुरुपविवेकका अनुसंधानप्रकार कहेंगे। श्रीकृष्णभगवान कहतेहैं कि हे कुंतीपुत्र ! यह शरीर क्षेत्र ऐसो कहाहे जो इसकी जानती है उसको देहात्मज्ञानिजन क्षेत्रज्ञ ऐसे कहते हैं याने देह क्षेत्र और आत्मा क्षेत्रज्ञ है ॥ १॥ क्षेत्रंशं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ॥ क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोीनं यत्तज्ज्ञानं मैतं ममै ॥२॥ हे भारत । सर्वक्षेत्रों में याने सर्वदेहोंमें क्षेत्रज्ञ जो जीव भोर में जो परमात्मा तिस मेरेको भी जानो जो क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका ज्ञान याने इनका विवेक ज्ञान है सो ज्ञान मेरेको" अंगीकार है ॥ यहां जो शरीरों में आत्मा परमात्मा दोनों कहे उसपर श्रुति प्रमाण है सो यह "द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिपस्वजाते ॥ तयोरन्यः पिप्प- लं स्वाहत्त्यनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति ॥" अर्थ-दोपक्षी संगसंग रह- नेवाले परस्पर सखा एक सदृश वृक्षपर रहतेहैं उनमें से एक उस वृ- क्षके स्वादु फल खाताहै दूसरा खाएविना प्रकाशताहै । अर्थात् ईश्वर और जीव सदा संग रहते हैं परस्पर सखा एकसरीखे देहमें रहते हैं तिनमें जीव शरीरजन्य कर्मफलोंका भोक्ता है और ईश्वर साक्षी- मात्र प्रकाशक है दूसरा यह अर्थ होताहै कि, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ मेंही हो अर्थात् इन दोनोंका अंतर्यामी हौं तो भी देशांतर्यामी जीव जीवां- तर्यामी परमात्मा ऐसे भी वही अर्थ सिद्धभया जो यहां जीव और ईश्वर एकही कहते हैं उनको " उत्तमःपुरुपस्त्वन्यः " यहां अर्थकी पंचाइत होनेकी शंका आती है अंतर्यामित्वमें तो ईश्वरःसर्वभूतानां हृद्दे- शेर्जुन तिष्ठति ॥ नतदस्तिविनायत्स्यान्मया भूतं चराचरम्" और LI .. (१४४) भगवद्गीता। [अध्यायः- "यस्यात्मा शरीरंय आत्मनि तिष्ठन् य आत्मानमंतरो यमयति यमात्मा न वेद स ते आत्मा अमृत " इत्यादिक श्रुति भी प्रमाण हैं ॥२॥ तत्क्षेत्रं यच्च याचं यद्रिकारि यतेश्चयत् ॥ से चै यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन में शृणु ॥३॥ सो क्षेत्र जिप्त व्यका है और जिनके आश्रयभूत है और जिन विकारोंकरके और जिस प्रयोजनकेवास्ते उत्पन्न भयाहे और जिसरूपसे वर्तमान है और यह क्षेत्रज्ञ जो है याने जैसे रूपयुक्त है और जैसे प्रभाववाला है 'सो संक्षेपकरके मेरे से मुंनो॥३॥ ऋषिभिर्वहधा गीतं छंदोभिर्विविधःपृथक् । ब्रह्ममूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥४॥ वह क्षेत्र क्षेत्रज्ञका यथास्वरूप बहुत प्रकारकरके पराशरादिक ऋपिनने और वग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद ऐसे अनेक प्रकार वेदोंने और ब्रह्मके प्रतिपादन करनेवाले जो ब्रह्मसूत्र याने व्यासकृत शारीरक सूत्ररूप पदेंने जो कारणयुक्त निश्चय याने सिद्धांतकरने- वाले उनने भी क्षेत्रक्षेत्रज्ञके स्वरूपको न्यारान्यारा कहा सो मैं संक्षे. पसे कहौंगा तुम मेरेसे सुनो॥ ४॥ महा तान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।। इंद्रियाणि दशैक च पंचे चेंद्रियगोचराः ॥५॥ इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतनों धृतिः॥ एतत्त्रं समोसेन सविकौरर्मुदाहृतम् ॥६॥ पंचमहाभूत, अहंकार, बुद्धि याने महत्तत्व और अव्यक्त याने सूक्ष्मरूप प्रकृति ये क्षेत्रके उत्पत्तिकारक द्रव्य हैं अब विकार याने कार्य कहते हैं देश और एक ऐसे ग्यारह इंद्रियां हैं जैसे कि, कान, त्वचा, नेत्र, जीभ और नासिका ये पांच ज्ञानइंद्रियां वाणी, हाथ, पॉय, J प्रयोद० १३.] सान्वय-अमृततरंगिणीभा० टी०। (१४५) गुदा और लिंग ये पांच कर्मइंद्रियां एक मन ऐसे ग्यारह इंद्रियों और शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध ये पांच इंद्रियों के विषय हैं ये सोलह विकार, इच्छा, द्वे, सैंख, दुःख, संघात याने सविकार- भूतसमूह चेतना जो ज्ञानशक्ति धृति 'जो धीरज ऐसे संक्षेपसे विकारसहित यह क्षेत्र कहा ॥ ५॥६॥ अमानित्वमदमित्वमहिंसा शांतिरार्जवम् ॥ आचार्योपासनं शौच स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥ ७॥ अब क्षेत्रकायों में आत्मज्ञानसाधनके वास्ते ग्रहण करनेके गुण कहतेहैं जैसे कि, श्रेष्ठ जनोंमें मानका न चाहनों लोक दिखानेको धर्म कर्मरूप दंभ न करना, परपीडारूप हिंसाको न करना, अपनेसे बलहीनके अपराध सहनरूप क्षमा राखना, सर्वसे सरलस्वभाव रहना, मन, वचन, कर्म करके गुरुकी सेवा करना, मृत्तिका जलादिसे बाहर और शुद्धचित्तसे ईश्वरस्मरणरूप अंतर ऐसा शौच करना आत्म- ज्ञानमें स्थिर रहना,मनको सर्वत्रसे निवारणकरके ईश्वरमें लगाना।।७॥ इंद्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च ॥ जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ ८॥ इंद्रियविषयोंमें गुणबुद्धि नै करना और देहमें और देहसंबंधी पदार्थों में अहंबुद्धिभी न करना, जन्म मृत्यु वृद्धावस्था अनेक रोग ऐसे शरीरमें इन दुःखरूप दोपोंका विचारना ॥८॥ असक्तिरनभिष्वंगः पुत्रदारगृहादिषु ॥ नित्यं चे समंचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥९॥ आत्माविना अन्यत्र आसक्तिरहित पुत्र स्त्री और पर इत्यादि- कमें अति मिलाप न रखनी और इप्ट और अनिवस्तुको प्रोप्तिमें निरंतर समचित्त रहना ॥ ९॥ १०

(१४६)
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
मंयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ॥
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥१०॥
मेरेमें अनन्ययोगकरके अखंड भक्ति और एकांत रहनेमें प्रीति
जनसभामें अनीति ॥ ३०॥
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम्॥
एतज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा॥११॥
मात्मसंबंधी ज्ञानकी सत्यता तत्वज्ञानके प्रयोजनका विचारनी
ऐसे यह ज्ञान कहाँ जो इससे अन्यथा है सो अज्ञान है ॥ ११॥ .
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते ॥
अनादिमत्परं ब्रह्म नै सत्तत्रासदुच्यते ॥ १२॥
जो जाननेयोग्यहै सो कहताहूँ निसको जानिके मोक्षको पाताई
घह ऐसा है कि, अनादि याने जन्मरहित है मत्पर याने उससे श्रेष्ठ
मेंही हूं वह केवल मेरे स्वाधीन है ब्रह्म याने प्रकृतिमुक्त शुद्ध चैतन्य
जीवात्मा है वह आत्मी नै सत् नै असत् कहनेमें आताहै याने कार्य-
कारण दोनों अवस्थाओंकरके रहित है ॥ १२॥
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ॥
सर्वतः श्रुतिमल्लोकें सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १३ ॥
वह जीवात्मा सब ओरसे हाथपाँववाला है सब ओरसे नेत्र मस्तक
और मुखवालाहै सब ओरसे कानवालाहै लोकमें वस्तुमात्रमें
व्यापक होके रहताहै यह स्वरूप मुक्तजीवका कहा मुक्तदशामें
जीवकी समता परमात्माके सरीखी है सो यहां गोतामेभी कहेंगे
" इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः" सूत्रभी है " भोगमा-
नसाम्यलिंगाच" और " तथाविद्वान् पुण्यपापे विधूय निरंजनः
परमं साम्यमुपैति" ऐसे जो परमात्माको समता कही है तो परमा-
स्मासरीखा स्वरूप होने में क्या शंक है।॥ १३ ॥

(१४७) प्रयोद० १३.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । सर्वेद्रियगुणाभासं सर्वेद्रियविवर्जितम् ॥ असक्तं सर्वभृञ्चैव निर्गुणं गुणभोक्त चं ॥१४॥ सर्व इंद्रियनकी वृत्तिनकरके भी विषयनको जाननेमें समर्थ हैं और आप स्वभावसे सर्वइंद्रियोंकरके रहित भी हैं याने इंद्रियनको वृत्तिनविना भी विपयनको जाननेमें समर्थ हैं आप स्वयं देवादि श- रामें आसक्त नहीं हैं और सर्व देवादिशरीरोंका धारणकरनेवालाहै सत्त्वादिगुणरहितं और गुणोंका भोगनेवाला है ॥१४॥ बहिरंतच भूतानामचरं चरमेव च ॥ सूक्ष्मत्वातंदविज्ञेय दूरस्थं चौतिके – तत् ॥ १५॥ वह आत्मा मुक्तावस्थामें पृथिव्यादिभूतोंके बाहर और बद्धाव- स्थामें भीतर रहता है त्वयं आप अंचर है और देहसंयोगसे चरहो- ता है सूक्ष्म हे इससे जाननेयोग्य नहीं है वह अज्ञानिनको दूरहै 'और ज्ञानिनको सँमीप है ॥ १५॥ अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव चं स्थितम् ॥ भूतभर्तृ च तज्ज्ञ य ग्रसिष्णुं प्रभविष्णु ॥१६॥ वह पृथिव्यादि भूतविकार देवादि शरीरोंमें एकरसे रहता है और अज्ञानिनको देवादिशरीरोंमें देवादिशरीरोंके सदृश दीखता है कि, यह देव यह मनुष्य पशु इत्यादिक विभक्तसरीखा स्थित दीख- ता है और सर्वभूतोंका पोपक है और अन्नादिक भूतोंको भक्षक है देहरूपसे आहारकरनेवाला है और उसी अन्नादिविकारसे उत्पत्ति- कर्ताभी है ऐसे जाननेयोग्य है ॥ १६ ॥ ज्योतिषांमपि तज्ज्योतिस्तमसः परंमुच्यते॥ . ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हदि सर्वस्य धिष्टितम् ॥ १७॥ वह सूर्यादिक ज्योतिनका भी प्रकाशक है सूक्ष्मकारणरूप प्रकृ- (१४८) भगवदगीता। [अध्याय:- तिसे पर यौने न्यारा कहाता है ज्ञानरूप जाननेयोग्यं ज्ञान प्राप्त- होने योग्य सर्वके हेदयमें रहता है याने सर्व देव, मनुष्य, पशु, पक्ष्यादि शरीरोंके हृदयमें रहता है ॥ १७॥ इति क्षेत्र तथा ज्ञानं ज्ञेयं चक्ति समासतः॥ मैदक्त एतद्विज्ञाय मौवायोपद्यते ॥१८॥ ऐसे "महाभूतान्यहकारः" यहांसे लेके, “संघातश्चेतनाधृतिः"यहां- पर्यंत क्षेत्र कहा तथा "अमानित्वं" यहाँसे लेके "तत्वज्ञानार्थदर्शनं " यहांपर्यंत ज्ञान कहा और "अनादिमत्परं" यहाँसे लेके "हदि सर्वस्य धिष्ठित" यहांपर्यंत ज्ञेय याने जाननेयोग्य आत्मस्वरूप कहां ऐसे यह संक्षेपसे कहा यौनेको जीनिके मेरी भक्तहोके मेरेसरीखे स्वरूपको प्राप्तहोय ॥१८॥ प्रकृति पुरुषं चैव वियनांदी उंभावपि ॥ विकारांश्च गुणोंश्चैवं विद्धि प्रकृतिसंभवान् ॥ १९॥ प्रकृतिको और पुरुपंको याने जीवको इन दोनोंको भी अनादि याने सनातनै जानों जो बंधनकारक इच्छा रेप सुख दुःखादिक विकार उनको और मोक्षकारक अमानित अदंभित्वे गुण उनको निश्चयपूर्वक प्रकृतिसंभव नीनो अर्थात् इच्छादिविकारयुक्त प्रकृ- ति पुरुपकी बंधनकारक और अमानित्वगुणयुक्त मोक्षदायक होती है ॥ १९॥ कार्यकारणकर्तृवे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ॥ पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तत्वे हेतुरुच्यते ॥२०॥ अब एकसंग रहेभये प्रकृतिपुरुपोंके कार्यभेद कहते हैं जैसे कि, कार्य जो प्रकृतिपरिणाम देहकारण मनसहित इंद्रियां इनका व्यापार करानमें कारण प्रकृति कही है सुखदुःखोंके भोक्तापनेमें कारण चयोद० १३.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० ॥ (१४९ पुरुप कही है याने भोगसाधनकर्मकी आश्रय प्रकृतिपरिणाम और पुरुपयुक्त देह तथा सुखादिभोकृत्वआश्रय पुरुष है ॥२०॥ पुरुपः प्रकृतिस्थो हि भुंक्त प्रकृतिजान्गुणान् ॥ कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिर्जन्मसु ॥ २१ ॥ जिसंवास्ते कि, यह पुरुप प्रकृतिहमें रहाभयो प्रकृतिजन्य गुणोंको भोगतीहै तिसीसे इसका ऊंचनीचयोनि में जन्मलेनमें कारण प्रकृतिगुणोंका याने सत्वादिगुणोंकी संगही है अर्थात् उन गुणनकी आसक्तिहीसे ऊंच नीच जन्म होते हैं ॥२१॥ उपद्रष्टाऽनुमंता चं भै भोक्ता महेश्वरः॥ परमात्मेति चाँप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः॥ २२ ॥ इस देहमें यह पुरुप देखनेवाला है याने चौकसी करनेवाला है और अनुमोदन देनेवाला याने सलाह देनेवाला है और इस देहका पोपनेवाला है और भोगनेवाला है और इसका महेश्वर है जैसे कि, इस देहमें ईश्वर इंद्रिय मन इत्यादि हैं उनका भी ईश्वर है. ऐसे इस देहसे यह जीव न्यारीभी है तोभी अज्ञानसे केवल यह देहे ऐसी कहाताहै ॥ २२॥ य एवं वेति पुरुषं प्रकृति च गुणैः सह ।। सर्वथा वर्तमानोपि नै सं भूयोऽभिजायते ॥२३॥ जो ऐसे इस जीवको और गुणोंकरके सहित प्रकृतिको जानता है सो सर्व प्रकारसे संसारमें रहताहै तोभी फिर नहीं उत्पन्न होताहै ॥२३॥ निनात्मनि पश्यंति केचिदात्मानमात्मना। अंन्ये सांख्येन योगेने कर्मयोगेन चौपरे ॥२४॥ अन्ये वेवमानंतः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते ।।

( १५०) भगवद्गीता।
[अध्याय:-
तेपि' चाति तरत्येव मृत्युं श्रुतिपरायणौ ॥२५॥
कितनेक पुरुप आपके अंतःकरणमें बुद्धि से विचारकरके इस
जीवात्माको जानतेहैं और कितने सांख्य योगकरके जानतेहैं और
कितनकै कर्मयोग करके याने ईश्वगर्षणकर्म करते करते जान-
तेहैं और कितने और ऐसे नहीं जानतेभये दूसरोंस सुनिके
उपासना करतेहैं याने सुनिके प्रथमसरीखे उपाय करके जानतेहैं
और कितनेक केवल श्रद्धायुक्त श्रणही करते रहते हैं तो वे भी"
संसारको तरतेहैं ॥ २४ ॥२९॥
यांवत्संजायते किंचित्सत्वं स्थावरजंगमम् ॥
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥ २६ ॥
हे भरतवंशिनमें श्रेष्ठे अर्जुन ! जितनों कुछ थावर और जगम
प्रोणी उत्पन्न होता है उसको क्षेत्र और क्षेत्रके संयोगसे याने
शरीर और जीवके संयोगसे जोनो ॥ २६ ॥
समं सर्वेपुं भूतेषु तिष्ठतं परमीश्वरम् ॥
विनश्यत्स्वविनश्यंतं यः पश्यति से पैश्यति ॥२७॥
जो कोई सबै भूतोमें सम रहेभये केवल मन इंद्रियादिकोंके
ईश्वर इस जीवको इन इंद्रियादिकोंके नाशहोतेभी इसको नाशर-
हित दीखताहै याने जानेताहै सोई जानताहै ॥ २७॥
समं पश्यन् हि सर्वत्रे समवस्थितमीश्वरम् ॥
नहिनस्त्यात्मनात्मान तैतोयोति पैरागैतिम्॥२८॥
सेव देवादिशरीरोंमें एकसरीखे रहेभये इस मन इंद्रियादिकोंक
ईश्वर जीवात्माको सम देखताभयाँ जो कि, बुदिपूर्वक आपको नहीं
हताह याने संसारमें नहीं गिरावाहे उससे वह परम गतिको याने
मुक्तिको पविताहै ॥२८॥

पयोद० १३.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०।
प्रकृत्यैव च कौणि क्रियमाणानि सर्वशः ॥
यः पश्यति तथात्मानमकतारं से पैश्यति ॥ २९ ॥
जो सर्व कर्माको प्रकृतिहीकरके याने प्रकृतिविकार इंद्रियों-
करके ही करेभये जानता और तैसेही आपको अकत्ती जानताहे
'सो जानतीहै ॥ २९॥
यदा भूतथग्भावमेकंस्थमनुश्यति ॥
तत एव च विस्तार ब्रह्म संपंद्यते तदा ॥३०॥
जय भूतोंका पृथाभाव याने देवमनुष्यादिक शरीरोंकी छोटाई
बड़ाई मोटाई पतराई इत्यादिक न्यारेन्यारे भावोंको एकस्थ याने
एकप्रकृति में देखता है और उसी प्रकृतिमें पुत्रादिरूप विस्तारको
देखताहै तवं शुद्धस्वरूपको प्राप्तहोताहै ॥३०॥
अनादित्वानिर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः॥
शरीरस्थोपि कौंतेय ने कैरोति न लिप्यते ॥ ३१ ॥
हे कुंतीपुत्र । यह जीवात्मा अनादिपनेसे अविनाशी है केवल
शरीरमें रहाँभया भी निर्गुणपनेसे ने कुछ कर्मनको करताहै में उन
कर्मफलोंकरके लिप्त होती है ॥३१॥
यथा सर्वगतं सौक्षम्यादाकाशं नोपंलिप्यते॥
सर्वत्रावस्थितो देहे तात्मा 'नोपंलिप्यते॥३२॥
जैसे सर्वत्र प्राप्त भयाहुमा आकांश सूक्ष्मतासे उन भूतोंके
गुणोंकरके लिप्त नहीं होता है तैसे सर्वदेवादिशरीरोंमें रहा या
भीवात्मा देहगुणोंकरके नहीं लिप्तहोतीहै ॥ ३२ ॥
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ॥
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥३३॥

भगवद्गीता।
[अध्याय:-
हे भारत 1 जैसे एक सूर्य इस सर्व लोकको प्रकाशताहे
'तैसे यह जीव सर्व शरीरको प्रकाशताहै ॥ ३३ ॥
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमंतर ज्ञानचक्षुषा ॥
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुयोति ते परम् ॥ ३४ ॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतामुपनिपत्सु ब्रह्मविद्यायां यो-
गशास्ने श्रीकृष्णार्जुनसंवादे प्रकृतिपुरुषविवे-
कयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३ ॥
जोकोई ज्ञानदृष्टिकरके क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका ऐसे अंतरको और
भूतप्रकृतिके मोक्षको जानतेहैं वे मेरे को प्राप्तहोतेहैं ॥ ३४ ॥
इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां
श्रीमद्भगवद्गीतामृततरंगिण्यांत्रयोदशाभ्यायप्रवाहः॥ १३॥
पर भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ॥
यज्ज्ञात्वांमुनयः सर्वे पैरां "सिद्धिमितो गताः॥१॥
श्रीकृष्णभगवान अर्जुनसे कहते कि, सर्वज्ञानीमें उत्तम प्रसिद्ध
भयाआ ज्ञान फिर कहतीही निसको जानि सर्व मुनिजन
यहाँसे श्रेष्ठ सिद्धिको याने परमपदको जातेभये ॥१॥
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मर्म साधर्म्यमागताः ॥
सर्गेऽपि नोपजायते प्रलये नै व्यथंति च ॥२॥
जो कहताहीं इस ज्ञानको प्राप्तहोके मेरौं सधर्मताको याने मेरे
सम्पनरूप वैभवको वे मुनिजन प्राप्तहोतेभये वे उत्पत्तिकालों ने
उत्पन्न होतेहैं और प्रलयमें न दुःखी होते हैं ॥२॥
मम योनिमहद्ब्रह्म तस्मिनगम दधाम्यहम् ॥
संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥३॥

. चतुर्द०१४.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी। (१५३) हे भारत ! मम महद्ब्रह्म याने मेरी प्रकृति सर्वभूतोंका योनि याने उत्पत्तिस्थान है मैं उस प्रकृतिमें जीवरूपगर्भको धारण करता हौं. तब उससे सर्वभूतोंकी उत्पत्ति होतीहै" ॥३॥ सर्वयोनिपु कौन्तेय मूर्तयः संभवंति यौः ॥ तासां ब्रह्म महद्योनिरहं वीजप्रदः पिता ॥४॥ हे कुंतीपुत्र ! देवमनुप्यादि सर्व योनि में जो देहे उत्पन्नहोतेहैं उन संबकी महत् ब्रह्म याने प्रकृति कारणे हे में" चेतनरूप बीजका देने- पाली पिता हौं ॥४॥ सत्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः ॥ निवघ्नति महाबाहो दे हे देहिनमेव्ययम् ॥५॥ हे महाबाहो । सत्वगुण रजोगुण और तमोगुण ये प्रकृतिसे उत्पन्न गुणं इस देहमें अविनाशी जीवको बंधनकरतेहैं ॥५॥ तत्र सत्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकर्मनामयम् ॥ सुखंसंगेन वनौति ज्ञानसंगेने चाँऽनय ॥६॥ हे निष्पाप ! उनगुणोंमें सत्वगुंण निर्मलतासे प्रकाशक याने शु. भाशुभकर्मोंका दिखानेवाला रोगरहित है इसीसे यह सुखकी आस- तिसे और ज्ञानके संग करके बांधताहै याने ज्ञानसुखसे शुभकर्म शुभकर्मसे स्वर्गादि फिर उत्तमकुलमें जन्म फिर ज्ञानसुख ऐसे बांधताहै ॥६॥ - रंजो राँगात्मकं विद्धि तृष्णासंगसमुद्भवम् ॥ तन्निबध्नाति कौंतेय कर्मसंगनै देहिनम् ॥ ७॥ हे कुंतीपुत्र ! तृष्णा और स्त्री धनादिनमें आसक्तिका करनेवाली रजोगुण विपयादिकमें प्रीति उपजानेवाला जोनो वह जीवको कर्म भगवद्गीता । [ अध्याय:- संगसे बांधताह जैसे प्रीत्यात्मक कर्मसे उन कर्मसंगिनमें जन्म फिर कर्म फिर जन्म ऐसे ॥७॥ तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहन सर्वदेहिनाम् ॥ प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निवनौति भारतं ॥ ८॥ हे भारत ! सर्वदेहधारी जीवोंको मोहनेवाली तमोगुण अज्ञानका कारण जानो और वह प्रमाद आलस और निद्राकरके बंधन करताहै ॥ ८॥ संत्वं संखे संर्जयति रजः कर्मणि भारत ॥ ज्ञानावृत्य तु तमः प्रैमादे संजयेत्युत ॥९॥ हे भारत ! सत्वगुण मनुष्यको सुखमें लगाता है रजोगण कर्ममें तमोगुण ज्ञानको टेकिके फिर प्रेमादमें लगाताहै ॥ ९ ॥ रजस्तमश्चाभिभूय संत्वं भवति भारत। रजः सत्वं तमश्चैव तैमः सत्वं रजस्तथा ॥१०॥ हे भारत ! यद्यपि ये गुण प्रकृतिके हैं तोभी विपरीतताका कारण यह कि, रजोगुण और तमोगुणको जोतिके सत्त्वगुणं प्रबल होता है और रजोगुण सत्वगुणको जीतिके तमोगुण प्रबल होताहै तैसाही तमो- गुण सत्वगुणको जीतिक रजोगुण प्रैवल होताहै यहां कारण प्राचीन कर्म और नित्य आहारादिक हैं ।। १० ।। सर्वद्वारेपु देहे ऽस्मिन् प्रकाश उपजायते ॥ ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विद्ध सखुमित्युत् ॥ ११॥ लोभः प्रवृत्तिरीरंभः कर्मणामशमैः स्टही। रजैस्येतीनि जोयंते विहे भैरतर्पभ ॥ १२॥ हे भरतवंशिनमें श्रेष्ठ ! इस देहेमें नर्व सर्वनादिद्वारों में प्रकाश या- ने वस्तुका यथार्थ निश्चय सोई ज्ञान उत्पन्नहोय तवं सत्वगुण बढाहै ऐसा जानना और रजोगुणके बैढनेसे लोभ जो धनादिक सनारचेवि चतुर्द० १४.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१५५) और मिलनेकी इच्छा प्रवृत्ति याने प्रयोजनविना चंचलता कर्मनका आरंभ इंद्रियलोलुपता विषयइच्छों इतने उत्पन्न होतेहैं ॥११॥१२॥ अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ॥ तमस्येतानि जायते विवृद्ध कुरुनंदन ॥ १३ ॥ हे कुरुनंदन ! तमोगुणके बढेनेसे विवेककी हानि निरुद्यमता और न करनेका करना और विपरीतज्ञान इतने ये होते है" ॥१३॥ यदा संत्वे प्रवृद्ध तु प्रलयं यांति देहभृत् ॥ तदोत्तमंविदां लोकोंनेमलान्प्रतिपद्यते ॥ १४ ॥ जब सत्वगुणके बढने के समयमें देहधारी प्रलय याने मृत्युको प्राप्त- होय त आत्मज्ञानिनके शुद्ध लोकोंको" प्राप्तहोताहै अर्थात् आत्मज्ञानिनके कुलमें आत्मज्ञान जाननेयोग्य शरीरोंको प्रातहोताहे "लोकस्तुभुवनेजने" इसप्रमाणसे यहाँ लोकशब्द जनवाची ॥१॥ रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसंगिषु जायते ॥ तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥ १५ ॥ रजोगुणकी वृद्धिमें मृत्युको प्राप्त होके कर्मसंगिर्नमें जन्म लेता है याने उनमें जन्म लेके सकामकर्म करके स्वर्ग जाताहै फिर उनहीमें जन्म लेके फिर कर्म करके स्वर्ग ऐसही फिरता रहताहै तथा तमो- गुणमें मरार्भया नीचेयोनिमें जन्मताहै वहाँभी पैसाही क्रम जानना ॥ १५॥ कर्मणः सुकृतस्या ः सांत्विकं निर्मल फलम् ॥ रजसंस्तु फलं दुःखमज्ञान तैमसः फलम् ॥ १६ ॥ सुकृत कर्मको फेल सात्विक निर्मल कहते हैं याने उसके करते करते कोई जन्ममें मुक्तहोताहै और रजोगुणी कर्मका फेल दुःख याने उस सकामसे स्वर्ग स्वर्गसे मृत्युलोक फिर स्वर्ग ऐसे संसारदुःख ही है भगवद्गीता। [अध्याय:- तमोगुगीकर्मको फैल अज्ञान है याने उससे नरक ही है ॥ १६ ॥ सत्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ॥ प्रमादमोहौतमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ १७॥ सात्विककमसे ज्ञान होताहै और रोजससे लोभही होताहै ताम- ससे अज्ञान और मोह होतेहैं और अज्ञान भी होताहे ॥ १७॥ ऊंव गच्छंति सत्वस्था मध्ये तिष्ठति राजसाः ॥ जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छंति तामसाः ॥१८॥ सात्विककर्म करनेवाले मुक्तिको पतिहैं जिसकर्मवाले मध्यमें (स्वर्ग मृत्यु लोकहीमें रहते हैं जैसे पुण्यसे स्वर्ग पुण्य क्षीण होनेसे मनुष्यलोक फिर पुण्यसे स्वर्ग ऐसे वारंवार मध्यहीमें रहते, तमोगुणी नीचगुणकी वृत्तिमें वर्तनेवाले तामसी नीचोति पशुकीटादिकमें जन्मते रहतेहैं ॥ १८॥ नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यंदाद्रष्टाऽनुपश्यति ॥ गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १९॥ जब विवेकी पुरुपै सत्वौदिगुणोंके विना और किसीको कत्ती नहीं जानता है और आपको गुणोंसे न्यारी जानती है तब सो मेरी सौम्य- ताको प्राप्तहोताहै ॥ १९॥ गुणानेतान्तीत्य त्रीन्देही देहंसमुद्भवान् ॥ जन्ममृत्युजरादुःखैविमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥२०॥ यह देहधारी जीव देहमें उत्पन्नभये इन सत्यादि तीनि गुणोंको उल्लंघन करके जन्म मृत्यु और जरापनके दुःखोंकरके छुटामयाँ मोक्षको पाताहै गुणयुक्त नहीं ॥२०॥ अर्जुन उवाच । कॉलगैत्री गुणनितानतीतो भवति प्रभो ॥

(१५७) चतुर्द० १४.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। किमाचारः कथं चै" तात्रीन्गुणानैतिवर्तते ॥२१॥ ऐसे सुनिके अर्जुन पूंछते हैं कि, हे प्रेभो ! कौनसे चिह्नोंकरके इन तीन गुणोंको उल्लंघन कियार्भया होताहै वह कैसे आचरणपालों होताहे और इन तीनों गुणोंको कैसे" उल्लंघन करे ॥२१॥ श्रीभगवानुवाच । प्रकाशं चे प्रवृत्तिं च मोहमेवं च पांडव ।। नं देष्टिं संप्रवृत्तानि नै निवृत्तीनि कांक्षति ॥ २२ ॥ उदासीनवदासीनो यो गुणैन विचाल्यते ॥ गुणों वर्तत इत्येवं योवतिष्ठति ने" गते ॥ २३ ॥ समदुःखसुखःस्वस्थः समैलोष्टाश्मकांचनः ॥ तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिंदात्मसंस्तुतिः॥२४॥ मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ॥ सरिंभपरित्यागी गुणातीतः से उच्यते ॥ २५॥ अर्जुनका प्रश्न सुनिके भगवान कहते हैं कि, हे पांडुपुत्र ! जो पुरुष प्रकाश याने भारोग्यादिक सत्वगुणके कार्य और प्रवृत्ति याने रजोगुणके कार्य और मोह याने तमोगुणके कार्य ये जो प्रवृ. तहोयें तो इनको नहीं त्यागचाहता है और निवर्त्तभये इनको में चाहता है उदासीनसरीखी स्थित भैयाहुआ गुणोंकरके नहीं चला- यमान होता है आप आपके कार्यों में गुंग ही वर्तमान है ऐसे जो स्थिर है चलायमान नहीं होताहै सुखदुःखमें सम स्वस्थ ठीकरी कंकर पत्थर और सोना जिसके सम हैं तुल्य हैं प्रिय अप्रिय जिसके और इसीसे आपकी निंदा स्तुति समान जानता है मान और अप- (१५८) भगवद्गीता। [अध्याय:- मान तुल्य मित्रशत्रुपक्षमें तुल्य मेरे सेवनादिकविना सर्व आरंभोंका त्यागी सो गुणातीत फहाताहै ॥ २२ ॥ २३ ॥२४॥२५॥ माँ च योऽध्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ॥ से गुणान्समैतीत्यतीन्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६ ॥ ब्रह्मणो हिं प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्य॑यस्य च ॥ शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखैस्येकांतिकस्य चे ॥२७॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिपत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयवि- भागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥ जिसवास्ते कि मरणधर्मरहित और इसीसे अविनाशी जो ब्रह्म याने मुक्तजीव उसका और सनातन धर्म जो भक्तियोग उसका और मुख्य मुंख जो स्वस्वरूपकी प्राप्ति उसका म आधारहूं इसीसे 'जो अखंडित भक्तियोगकरके मेरेको भजताई सो इन गुणोंको उल्लंघन करके मेरी समताको प्राप्त होताहै ॥२६॥२७॥ इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिता- यो श्रीमद्भगवद्गीतामृततरंगिण्यांचतुर्दशाध्यायप्रवाहः ॥१४॥ श्रीभगवानुवाच । ऊर्ध्वमूलमधशाखमश्वत्थं प्राहुरव्य॑यम् ॥ छंदांसि यस्य पर्णानि येस्तं वेदै मैं वेदवित् ॥ १॥ तेरहवें अध्यायमें क्षेत्ररूप प्रकृति और क्षेत्रज्ञ पुरुष याने जीव इनका स्वरूप कहा, शुद्धजीवात्माके भी प्रकृतिसंबंधी गुणोंके प्रवाहनिमित्त देवादिक आकारसे परिणामको प्राप्तभई जो प्रकृति उसका संबंध अनादि कहा, चौदहवें अध्यायमें कहा कि, इस जीवको जो कार्य और . पंचद० १५.7 सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०॥ (१५९) कारण अवस्थानमें यह गुणसंगप्रवाह मूलप्रकृतिसंबंध सो भगवान् होने किया है ऐसे कहिके विस्तारसहित गुणसंगप्रकारको कहिके कहा कि, गुणसंगनिवृत्तिपूर्वक स्वस्वरूपकी प्राप्ति भगवद्भक्तिमूल ही है. अब पंद्रहवें अध्याय में जो भजने योग्य भगवान् भापके कल्याण- गुणादिकोंकरके बद्ध मुक्त दोनों प्रकारके जीवोंसे विलक्षण ( न्यारे ) उनका पुरुषोत्तमत्व कहनेको जो यह बंधन आकारसे विस्तरित प्रकृतिका परिणाम विशेषसंसार उसको पीपरवृक्षरूप कल्पित करके श्रीकृष्ण भगवान बोलतेभये कि, जिसके वेद पत्ते अर्थात जैसे पत्तोंकरके वृक्ष बढताहे तैसे यह संसाररूप वृक्ष वेदोक्तकर्म करके चढताहे इससे वेद पत्तारूप हैं ऊर्ध्वमूल याने सत्यलोकमें ब्रह्मा जिसका मूल हे अर्धेःशाख याने सत्यलोकसे नीचे जो देव म. नुष्य कीट पतंगपर्यंत शरीर ये उसकी शाखा है ऐसा अव्यय याने सम्यक् ज्ञानप्राप्ति होनेसे प्रथम अज्ञानदशामें प्रवाहरूप करके छेदनेके अयोग्य इसीसे अज्ञानिनके अविनाशी हैं ऐसा इस सं. सारको अश्वत्थ याने पीपरवृक्षरूप श्रुति कहती है किसको जो" जानताह "सो चेदका जाननेवाला है अर्थात वेद इस संसारके छेदने- का उपाय कहताह तो जो इसको जानेगा तो छेदनका भी उपाय जानेगा इससे वह वेदजाननेवाला है ॥१॥ अर्धश्चोर्व प्रमृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा वि- पयप्रवालाः ॥ अर्धश्च मूलान्य संततानि कर्मा- नुबंधीनि मनुष्यलोके ॥२॥ अब उस संसारवृक्षको और भी विलक्षणता कहते हैं जैसे किस- त्वादिगुणोंकरके बैठीभई और शब्दादिक विपय जिनके प्रवाई, (१६०) भगवद्गीता। [अध्याय:- कोपल याने जो नये एक दिनके निकसेभये पत्ते वैसे पत्ते जिनके विषय हैं ऐसी उस वृक्षकी शाँखायें नीचे मनुष्यलोकमें और ऊपर देव गंधर्वादिलोकोंमें फेलाही हैं अर्थात् नीचकमसे नीचे मनुष्योंसे भी नीच पश्वादिशरीर ऊपर उत्तमकर्मसे उत्तम देवादिशरीररूप शाखें फैलरही है नीचे मनुष्यलोकमें भी उसकी कौनसारी मुलें फैली- रही हैं अर्थात् मनुष्यलोकमें जो ऊंच नीच कर्म वही मूलरूप हैं ऊंच नीच पदवी कर्मविना नहीं कर्म मनुष्पशरीरविना नहीं होताहै ॥२॥ नरूपमस्येह तथोपलभ्यते नांतो ने चोदिन" चे संप्रतिष्ठा ॥ अश्वत्थमैन सुविरूँढमूलमैसं- गशस्त्रेण इँटेन छित्त्वा ॥३॥ ततः पैदं तत्परिमा- गिंतव्यं यस्मैिन्गों ने निवर्तति भूयः ॥ तमेव चाँध पुरुपं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृती पुराणी ॥४॥ इस संसारवृक्षका इस लोकमें जैसा कहा है तैसा रूप अज्ञानीजनों करके नहीं जानने में आताहै नं उसका अंत और नै आदि और ने स्थिति जाननेमें आतीहै ऐसे दृढमूल इस पीपरक्षको अतित वैराग्यरूप शस्त्रसे छेदन करके फिर जिससे यह प्राचीन मवृत्ति याने गुणमय भोगरूप संसारप्रवाह विस्तरितहै उसी ऑदि पुरुपके शरणागत होके उस पैदको ढूंढ़ना कि, जिसमें गयेभये मुनिजन फिर इस संसार में नहीं गातेहैं ॥३॥४॥ निमीनमोहाँ जितसंगदोपां अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ॥ द्वंद्वैविमुक्ताः सुखदुःखेसंज्ञैर्ग- च्छंत्यमूढाः पैदमैव्ययं तत् ॥५॥ जो मानमोहकरके रहित हैं और जिनने संगद पोंको जीताहे और जो अध्यात्मशास्त्रहीमें नित्य वर्तमान हैं और जिनकी कामना निवृत्त (१६१) पंचद०१५.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। है जो सुखदुःखसंज्ञक इंद्रोंसे छुटेभये हैं वही ज्ञानीजन उस अविनाशी पैदको प्राप्त होतहें याने स्वस्वरूपको प्राप्त होतेहैं ॥५॥ नं तंद्रासयते सूर्यो ने शशांको नं पावकः ॥ यद्तत्वाने निवर्त्तते तद्धाम परमं मम ॥६॥ सूर्य उस आत्माको नहीं प्रकाशिसकताहै ने चन्द्रमा और ने अग्नि प्रकाशिसकताहै जिसरूपको याने शुद्धआत्मस्वरूपको प्राप्त होके नहीं संसारमें आतेहें यह मेरों परमैं धौम है याने मेरे रहनेका मुख्य स्थान मेरा शरीर है इस जगह “यस्यात्मा शरीर" यह श्रुति भी प्रमाण है ॥६॥ ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ॥ मनःपष्ठानींद्रियाणि प्रकृतिस्थानि कति ॥७॥ जो यह ऐसा वर्णन किया सो यह मेरोही सनातन अंश है याने जैसे प्रकृति और अनंत जीव मेरेही हैं उनमें यह एक मेराही है मेरी ही विभूति है सो यह इस जीवलोकमें जीवभूत याने अति संकुचितज्ञान- भयाहुआ पांच ज्ञानेंद्रिय और एक मन ऐसे मनसहित छः प्रकृतिवि- कार इस देहमें रहीभयो इंद्रियोंको 'बैंचता फिरताहै ॥७॥ शरीरं यदवाप्नोति यंचॉप्युत्क्रामतीश्वरः ।। गृहीत्वैतानि संयोति वायुगंधौनिवांशयात् ॥ ८॥ जब यह जीव शारेको प्राप्तहोताहै और जय वर्तमान शरीरसे जाताहै तब यह मन इंद्रियोंका ईश्वर आपकी सेनारूप इन इंद्रियों- की, पवन पुष्पादिक गंधस्थानसे गंधों को जैसे तैसे ग्रहणकरके जाताहै ॥ ८॥ श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ॥

(१६२) भगवद्गीता। [अध्याय:- अधिष्ठाय मनश्चीय विषयानुपैसेवते ॥९॥ यह जीवात्मा श्रोत्रइंद्रियं याने कान ने और स्पर्शन जो त्वचा- इंद्रिय रसना जो जिहा और प्राण जो नासिका और मैन ईनको आश्र- यकरके विषयोंको सेवता है ॥ ९॥ उत्क्रामतं स्थितं वापि भुंजान वा गुणान्वितम् ॥ विमूढा ना पश्यति पश्यति ज्ञानचक्षुपः ॥ १० ॥ यह जो गुणोंकरके युक्त आत्मा तिसको देहत्यागतेको अथवा देहमें रहते भयेको अथवा विषयभोगतेभयेको भी अज्ञानीजन नहीं देखतहैं जिनके ज्ञानदृष्टि है वे देखे हैं ।। १० ॥ यततो योगिनश्चैनं पश्यत्यात्मन्यवस्थितम् ॥ यतंतोऽप्यंकृतात्मानो ने" नं पश्यत्यचेतसः ॥११॥ योगीजेन जतन करते करते आपके अंतःकरणमें रहेभये इस आत्माको देखतहें और जो विपयासक्त हैं वे जो शादाय उपाय करें चोभी वे अज्ञानी इस आत्माको नै देखिसके ॥११॥ यंदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽचिलम् ॥ यचंद्रमसि यच्चानौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ १२॥ जो सूर्यमें रहाभैया तेज स जगत्को प्रकाशिरहा है और जो तेज चंद्रमामें और 'जो अग्निमें है उस तेजको मेराही तेज जौनो ॥ १२ ॥ गांमाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजौ ॥ (ष्णामि चौपंधीः सर्वाःसोमो भूत्वा रसात्मकः॥१३॥ मैं पृथिवीमें प्रविष्टहोके अपने अचिंत्य सामर्थ्यकरके सर्वभूतों- को धारण करताहूं और अमृतमयं चंद्रे "होके सर्व ओपिधिनको पोलताहूं ॥ १३ ॥ .

पंचद० १५.] सान्वय-अमृततरंगिणीमा० टी०। अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः॥ प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥१४॥ में जठरामि होके सर्वप्राणिनके देह रहाभयां प्राण और अपान- संयुक्त भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, पेय ऐसे चारप्रकारके अन्नको पंचाताहूं१४ सर्वस्यं चाहं हंदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञान- मपोहनं च ॥ "वैदैश्च सवैरहमेव वेद्यो वेदांत- कृद्रदेविदेवं चाहम् ॥ १५॥ मैं सबके हृदयमें प्रविष्टहूं और सर्वके स्मृति ज्ञान और विचार मेरेसे होतेहैं और सर्व वेदोंकरके मैं ही जानने योग्यहूं और वे- दांतका कर्ता और वेदैका जाननेवाला मैं ही हूँ ॥ १५ ॥ द्वाविमौ पुरुपी लोके क्षरंश्चाक्षर एव च ॥ क्षेरैः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १६ ॥ उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ॥ यो लोकत्रयमाविश्य विभैर्त्यव्यय ईश्वरैः ॥ १७॥ इस लोकमें क्षर और अक्षर ऐसे ये दोप्रकारके पुरुष हैं तिनमें सर्व शरीरधारी भूतप्राणी और और मुक्तजीव अक्षर कहाताद इन दोनोंसे उत्तम पुरुष और है जो परमात्मा ऐसे हातादे जो अ. विनाशी ईश्वर त्रिलोकीमें प्रवेशकरके सर्व त्रिलोकीका भरण पोपेण करता है ॥ १६॥ १७॥ यस्मात्क्षरमतीतोऽहंमक्षरादपि चोत्तमः ॥ अतोऽस्मि लोके वेदे" चे प्रथितः पुरुषोत्तमः॥१८॥ जिप्तवास्ते कि, मैं बद्धावस्थ जीवसे श्रेष्ठे और मुक्तसेभी उत्तम हूँ इससे स्मृति और वेदमेंभी पुरुषोत्तम प्रैसिबेहूं ॥ १८ ॥ .

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भगवद्गीता।
[अध्याय:-
यो मामेवैमसंमूढो जानाति पुरुपोत्तमम् ॥
संसर्वविद्भजति माँ सर्वभावेन भारत ॥ १९ ॥
हे भारत ! जो सम्यम् ज्ञानीपुरुप ऐसे मेरेको पुरुषोत्तम
जानता है सो सर्वज्ञहै इसीसे वह सर्वभाव याने माता पिता सुहृद्
धनादिक मेरेको जानिके मेरेहीको" भेजताहै ॥ १९॥
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयोऽनघे ॥
एतद्दुवा बुद्धिमौन्स्योत्कृतकृत्यश्च भारतं ॥ २० ॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सुब्रह्मविद्यायां योग-
शास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुराणपुरुपोत्तमयो-
गोनाम पंचदशोऽध्यायः ॥१५॥
हे निष्पाप ! ऐसे यह अंतिगोप्य शास्त्र मेने कहा हे भारत !
इसको जानिके बुद्धिमान् 'और कृतकृत्य होताहै ॥२०॥
इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां
श्रीमद्भगवद्गीताऽमृततरंगिण्यां पंचदशाध्यायप्रवाहः ॥१५॥
ऐसे तेरवहें अध्यायसे पंद्रहके समाप्तिपर्यंत क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका वि-
वेक और गुणत्रयका विभाग और क्षराक्षर याने बद्ध मुक्त जीवोंका .
स्वरूप तथा परमात्माका पुरुपोत्तमत्व और सामर्थ्य कहते भये अब
सोरहें अध्यायमें जीवको शास्त्रवश्यता और दैवासुरसंपत्तिविभाग कहेंगे।
श्रीभगवानुवाच ।
अभयं सत्वंसंशुद्विर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः
दानं दमैश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्त आर्जवम् ॥१॥
अहिंसौ सत्यमक्रोधस्त्यागः शांतिरपैशनम् ॥
दया भूतेष्वलोलॅस्वं मार्दवं हीरचीपलम् ॥ २ ॥

षोडशः १६.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१६५)
तेजः क्षमा धृतिःशौचमद्रोहो नातिमानिता ॥
भवंति संपदं दैवीमंभिजातस्य भारत ॥३॥
श्रीकृष्ण भगवान् अर्जुनसे कहतेहैं कि हे भारत ! देवी संपदाको
प्राप्त भये मनुष्यको निर्भय रहना अंतःकरणकी शुद्धि प्रकृतिसे
भिन्न आत्मा है ऐसी निष्ठा सुपात्रको कुछ देना और मनको विप-
योसे निवत्त करना और निष्कामतासे भगवानके पूजनरूप पंचम-
हायज्ञोंका करना वेदमंत्रादिकोही जप एकादशीव्रतादिरूप तप
सर्वसे सरल रहना जीवमात्रको पीडा न देना हित और यथार्थ
भापण कोका न करना उदारती शांति याने इंद्रियोंको वशकरना
चुंगली न करना भूतप्राणिमात्रपर दया परस्त्रीधनादिपर इच्छा न
करना अकरता लेना व्यर्थकामका न करना तेज क्षमा याने सहन-
शीलता धीरज पवित्रता द्रोहको न करना मानप्राप्तिके वास्ते गति-
मानका न करना ये २६ गुण देवीसपैदाके होतेहैं ॥ १॥२॥३॥
दंभो दोऽभिमानश्च क्रोधः पौरुष्यमेव चैं ।
अज्ञानं चौभिजातस्यं पार्थ संपदमांसुरीम् ॥ ४ ॥
हे पृथापुत्र ! आँसुरी संपदाको प्राप्तभये मनुष्पके दंभ, दे
और अभिमान कोष "और कटुभापण और अज्ञान ये लक्षण
होतेहैं ॥४॥
दैवीसंपद्रिमोशाय निबंधायासुरी मता ॥
मी शुः संपदं देवीमंभिजातोसि पांडवे ॥५॥
है पाचपुत्र । देवीसेंपदा मोक्षके वास्ते है आसुरी बंधनके वास्ते
निश्चय कीगई है तुम देवीसंपदाको प्रतिभयेहो मति शोचो ॥५॥
द्वौ भृतस! लोकेऽस्मिन्दैवं आसुरएव च ॥
देवो विस्तरशः प्रोक्त औसुरं पार्थ मे शृणु ॥६॥

भगवद्गीता। [अध्याय:- हे पार्थ । इस लोकमें दो प्रकारके प्रोणीहैं एक देव और दूसरे आसुर दैवं विस्तारसे कहा और मुझसे आसुरको सुनो ॥६॥ प्रवृतिं च निवृत्तिं च जना ने विदुरासुराः । ने शौचं नौऽपि" चौचौरो में सैत्यं ते विद्युते ॥७॥ अमुरस्वभाववाले मनुष्य संसारसाधन और मोक्षसाधनभी नहीं जानतेहैं उनमें ने शुचिता "और ने शास्त्रीय आचरण न सत्यमी रहताहै ॥७॥ असत्यमप्रतिष्ठं ते जगंदाहुंरनीश्वरम् ॥ अपरस्परसंभूतं किमन्यत्कीमहैतुकम् ॥८॥ वे असुरप्रकृति मनुष्य इस जगत्को कोई तो असत्य याने मिथ्याँ और भ्रम कहतेहैं कोई अप्रतिष्ठं याने इसका कोई आधार नहीं ऐसा कहतेई कोई अनीश्वर कहतेहैं स्त्रीपुरुषके परस्परसंयोगसे भये विना और जगत् क्या है केवल कामहीके निमित्तसे याने स्त्रीपुरुपके संयोग- हीसे होताहें ऐसा कहतेहैं ॥८॥ एतां दृष्टिमवष्टभ्यं नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः । प्रभवत्युग्रकर्माणः क्षयायं जगतोऽहिताः॥९॥ वे अज्ञानी जन खानपानादिके अल्पपदार्थमें बुद्धिवाले ऐसी समुझे को ग्रहणेकरके उग्रकर्मकरनेवाले याने परस्त्रीधन पुत्रादिकोंके हरण करनेवाले सर्वके अहित जगतके नाशके वास्ते प्रवृत्त होते हैं ॥ ९ ॥ कार्ममाश्रित्य दुःपूरं दंभमानमदन्विताः॥ मोहाद्वहीत्वाऽसदाहन्प्रेिवततेऽशुचिव्रताः॥१०॥ जो दुःखसे भी न पूरी होय ऐसी कामनाको आथितहोके दंभ मान और मदयुक्त भयेहुये मोहसे असग्राहोंको ग्रहणकरके याने

षोडशः १६.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०।
मारण मोदन वशीकरणके उपाय करना ऐसे भ्रष्टाचारनको स्वीकार
करके अपवित्रवत भूतादि सेवनेवाळे भयेहुए उनही कामों में प्रवृत्त
होतेहैं ॥१०॥
चिंतामरिमेयां चे प्रलयांतामुपाश्रिताः॥
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥ ११ ॥
अपार और मरणांत चिताको प्राप्तभये हुये कामोपभोगमें तत्पर
इतनाही सुखहै ऐसे निश्चयकियभये ॥ ११ ॥
आशापाशशतैर्वद्वाः कामक्रोधपरायणाः ॥
ईहते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचर्यान् ॥ १२ ॥
सैकडों आशाकी फाँसिनकरके वधभैये काम और कोपके स्वाधी-
न भये कामभोगके वास्ते अन्यायकरके द्रव्यसंचर्यको उपापकरते
रहतेहैं ।। १२॥
इदमद्य मयो लब्धंमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ॥
इदमस्तीदैमपि में भविष्यति पुनर्धनम् ॥ १३ ॥
मैंने आज यह पाया इस मनोरथको पागों मेरे यह न है" फिर
यहभी होयेंगा ॥१३॥
अंसौ मयां हतः शत्रुहनिष्ये चापरानपि ।
ईश्वरोहमहं भोगी सिद्धोऽहै बलवान्सुखी ॥ १४ ॥
मैंने यह वैरी मारा और औरनकोभी मारूंगा मैं ईश्वरहूं "में
भोगीहूं में सिद्धहूं में बेठवानहूं में सुखीहूं ॥ १४ ॥
आंढयोऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ॥
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्यं इत्यज्ञानविमोहिताः॥१५॥

भगवद्गीता। [अध्याय:- में योग्यहूं उत्तम कुलमें जन्मीहूं मेरे समान और कौन है' यज्ञ फरूंगा दोन देउंगा आनंदें करूंगा ऐसे" अज्ञानमें "मोहरहतहें।।१५॥ अनेकचित्तविभ्रांतां मोहजालसमावृताः ॥ प्रसक्ताः कामभोगेषु पतति नरकेऽशुचौ ॥ १६ ॥ • अनेकजगह चित्त लगनेसे भ्रमिष्टं मोहके जाल में फँसेभये कामभोग- में भासक्त वे अपवित्र नरकमें पड़तेहैं ।। १६॥ आत्मसंभाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ॥ यजते नामयज्ञैस्ते दंभेनाऽविधिपूर्वकम् ॥ १७ ॥ जो आपको आपही श्रेष्ठ मानिरहेहैं और अनम्र हैं धन मान मदयु. कहैं वे दंर्भसे अविधिपूर्वक नाममात्र यज्ञोंकरके यगर्न करतहैं।॥१७॥ अहंकारं बलं दर्प कॉम क्रोधं च संश्रिताः॥ मामात्मपरदेहेर्पा पेंद्विपंतोऽभ्यसूयकाः ॥ १८ ॥ अहंकार बैल है कॉम और क्रोधका आश्रयकर रहेहैं ऐसे वे आपके और औरोंके देहोंमें रहेभये मेरेसे द्वेप करतेभये मेरी निंदा करतेहैं ।। १८॥ तीनेहं द्विषतः क्रूरॉन्संसारपुं नराधमान् ।। क्षिपाम्यैजसूमशुभानासुरीष्वेवं योनिषु ॥ १९ ॥ मैं उन द्वैपकरनेवाले क्रूर अशुभ नराधमोंको संसारमें आसुरीही यौनिनमें वारंवार पटकैताई ॥ १९ ॥ आसुरी योनिमापन्ना मूढो जन्मनि जन्मनि ॥ मांमप्राप्यैवं कौंतेयं ततो यात्यधैंमां गतिम् ॥ २०॥ हे कुंतीपुत्र ! वे मूर्ख जन्मजन्ममें आंसुरी योनिको प्राप्तभयेहुये मेरेको न प्राप्तहोके फिर अधम गैतिको प्राप्तिहोतहैं ॥ २० ॥ त्रिविध नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः॥

-- पोहशः १६.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। ( १६९) कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतयं त्यजेत्॥२१॥ कामना, कोष तथा लोभ यह तीन प्रकारका नरकका द्वार ओ. पका नाशनेवालाहै याने संसारमें भ्रमानेवालाहै इससे इन तीनोंको त्यागना ॥२१॥ एतैर्विमुक्तः कौंतेयं तमोदारैत्रिभिर्नरः । आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति पैरां गतिम् ॥ २२॥ हे कुंतीपुत्र ! इन तीनों नरकद्वारोंकरके छुटाभया मनुष्य आपके कल्याणका साधन करताहै ससे परम पैदको प्राप्तहोताहै ॥ २२ ॥ यः शास्त्रविधिमुत्सृज्यं वर्तते कामकारतः ॥ नंस सिद्धिमाप्नोति नैं सुख नै परांगतिम् ॥२३॥ जो शास्त्रविधिको त्यागि के स्वइच्छाप्रमाण चलताहै सोन सि- द्विको पावताहै में सुखको नै मोक्षको पावताहै ॥ २३ ॥ तस्माच्छास्त्रं प्रमाण ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ॥ ज्ञात्वां शास्संविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहाहसि ॥ २४ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसंपद्वि- भागयोगो नामषोडशोऽध्यायः॥ १६॥ इससे तुमको कार्याकार्यव्यवस्था में शास्त्रहीप्रमाणहै यह जानिके इस लोकमें शास्त्रविधानोक्त कर्म करनेको योग्यहो ॥२४॥ इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपडितरघुनायप्रसादविरचि- तायां श्रीमद्गीतामृततरंगिण्या पोडशाध्यायप्रवाहः ॥१६॥ अर्जुन उवाच । ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजते श्रद्धयान्विताः।।

(१७०) भगवद्गीता। [अध्याय:- तेषां निष्टा तु कां कृष्णं सत्त्वमोहो रजस्तमः ॥ १ ॥ सोरहवें अध्यायमें ईश्वरतत्त्वका ज्ञान और ईश्वरप्राप्तिका उपाय इनके कारण मूल वेदही हैं ऐसे कहा और अंतमें कहा कि, शास्त्रवि- घिद्दीन कर्म करनेवालेको सुखादिक नहीं सो मुनिके अर्जुन घोले कि, हे कृष्ण ! जो शास्त्रविधिको त्योगिके श्रद्धांकरके युक्त यमन करते उनकी क्या निष्ठाद सत्वगुण है किवा रजोगुण या तमो. गुण है ॥ १॥ श्रीभगवानुवाच । त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनी सौ स्वभावजा ॥ सात्विकी राजसी चैवं तामसी चेति ती शृणें ॥२॥ अर्जुनका प्रश्न सुनिके श्रीकृष्ण भगवान कहते हैं कि, सात्विकी और राजसी और तामसी ऐसे तीनप्रकारकी निश्चय श्रद्धा होती' "सो देहधारिनकी स्वभावहीसे होतीहै उँसको सैनो ॥२॥ सत्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारते। श्रद्धार्मयोऽयं पुरुपो यो यच्छूद्वैः संएव सः ॥३॥ हे भारत ! संरकी अंदा अंतःकरणके अनुरूप होतीहै यह पुरुषं श्रद्धामयहे भो जिसश्रद्धावाला होताह सो" वही होताद जैसे सात्विकी श्रद्धावाला सात्विक इत्पादि ॥ ३॥ यजते सात्विका देवान्यक्षरक्षांसिराजसाः।। प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजते तामसां जनाः॥४॥ सात्विक पुरुष देवतानको पूजतेहें राजसी यक्षरीलसोंको और और तामसी जने प्रेत भूतगणोंको पूजतेहैं ॥४॥ अशास्त्रविहितं घोर तप्यते ये तपो जनाः ।।

सप्तद० १७.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी। (१७१)
दंभाहंकारसंयुक्ताः कामरागवलान्विताः ॥५॥
कर्शयंतः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः॥
माँ"वांतःशरीरस्थं तान्विद्धयासुरनिश्चयांन॥६॥
दंभ और अहंकारसंयुक्त कामना और विषयानुराग इनद्दीकी
सेनायुक्त जे मनुष्य वे अशास्त्रविहित याने जो शास्त्रप्रसिद्ध नहीं
ऐसे घोर तपको तपतहैं वे अज्ञानी जेन शरीरमें रहेभैये भूत-
समूहको "और अंदर शरीरमें स्थित मेरेको भी दुःख देते हैं
सैनको आसुरनिश्चय याने असुरपनेमें निश्चय जिनका ऐसे उनको
जानो॥५॥६॥
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवंति प्रियः ॥
यहस्तपैस्तथा दानं तेषां भेदमिम शृणें ॥७॥
आहार भी सर्वका तीनप्रकारको प्रिय होती है और यज्ञ तथा संप
दोन येभी तीनि प्रकार के हैं तिनका भेदै यह सुनो ॥७॥
आयुःसत्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवईनाः॥रस्याः
स्निग्धाः स्थिरो हृया आहाराः सात्विकप्रिभा॥
जो आहार आयुष्य होशियारी बल आरोग्य सुख और प्रीतिके
चढानेवाले होय मधुरादिरसयुक्त स्निग्ध स्थिर याने बहुतकाल रह-
नेवाले हृदयका वर्दक ऐसे आहार सात्विक जनोंको प्रिय होतेहैं।।८॥
कदम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ॥
आहारां राजसंस्यष्टो दुःखशोकामयप्रदाः ॥९॥
अतिकटु जैसे बहुत मिर्चवाला पदार्थ अतिखट्टा अतिलोन-
वाला बडावगैरे अति गरमागरम अतितीक्ष्ण राईवगैरह मिश्रित अति
रूखे और दाहकार राजसिनेके प्रिय आहार दुःख शोक और
रोगोंके देनेवाले होतहें ॥९॥

( १७२)
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
यातयाम गतरेसं पूंति पर्युपितं च यत् ।।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनंतामसप्रियम् ॥१०॥
जिस भातवगैरेको एक पहर पिता होय वह ठंढा पदार्थ रसवि.
हीने दुर्गधवाला और वासी और उच्छिष्ट भी ऐसा अपवित्र भोजन
तामसिनको प्रिय होताहै ॥१०॥
अफलाकांक्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ॥
यशव्यमेवेति मनः समाधाय से सात्विकः ॥११॥
यज्ञकरनाही योग्यहे ऐसे मनको समाधानकरके फल-इच्छा.
रहित मनुष्योंने विधिपूर्वक जो यर्ज कियाहोय सो" यज्ञ सात्विकै ११
अभिसंधार्य तु फलें दंभार्थमपि चैव येत् ॥
इज्यते भरतश्रेष्टं तं यज्ञं विद्धि" राजेसम् ॥ १२ ॥
हे भरतश्रेष्ठ ! जो फलकी इच्छाकरके और दंभके वास्तेभी
यज्ञ करे उस यज्ञको रौंजस बानो ॥ १२ ॥
विधिहीनेमसृष्टोन्नं मंत्रहीनमर्दक्षिणम् ॥
अंडाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥१३॥
जो यज्ञ विधिहीन उचित अन्नहीन मंत्रहीन देक्षिणारहित और
श्रद्धौरहित यज्ञ तामस कहा है ।। १३ ॥
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजने शौचमार्जवम् ॥
ब्रह्मचर्यमहिंसा चे शारीरं तर्प उच्यते ॥१४॥
देव ब्राह्मण गुरु और विद्वानोंका पूजन शुचिता सरलता वहाँ
चर्य और परपीडापर्जन यह शरीरसंबंधी तर्प कहाहै ॥ १३॥
अनंद्रेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यते ॥
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वा.मयं तपे उच्यते॥१५॥

" सप्तद०१७.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१७३) जो वचने उद्धेगकारक न होय और सत्य प्रिय हितहोय भोर वेद- पाठ मंत्रजपादिकका अभ्यास यह वाणीमय त कही है ॥ १५ ॥ मनःप्रसादः सौम्यंत्वं मौर्नमात्मविनिग्रहः ॥ भावंसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥ १६ ॥ मनकी प्रसन्नतो सदयपना याने दूर न होना मितभापण मनको पश करना और अंतःकरणकी शुद्धता यह इतना तप मानस कहोताहे ॥१६॥ श्रद्धया परयो तप्तं तपस्तंत्रिविधं नरैः॥ अफलोकांक्षिभिर्युक्तैः सौलिकं परिचक्षते ॥ १७॥ फलकी इच्छा नकरनेवाले योग्य पुरुष तिनकरके परम श्रद्धा- करके तपार्भया सो तीनों प्रकारका याने मानस, कायिक, वाचिक तेप सात्विक कहाँहै ॥ १७॥ सत्कारमानपूजार्थं तपो दंभेन चैव यत् ॥ क्रियते तदिह प्रोक्त रोजसं चलैमधुवम् ॥ १८॥ जो तप सत्कार मान और पूजाके वास्ते और दंभकरके भी किया जाताहै सो यहां शास्त्र में रोजस चले और नाशमान कहाहे १८ मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ॥ परस्योत्सादनार्थ वा तत्तामसमुदाहैतम् ॥ १९ ॥ जो तप दुराग्रह करके आपकी पीड़ाका निमित्त अथवा दूस- रेके बिगाडके वास्ते कियाहोय सो तीमत कहा ॥ १९॥ दातव्यमिति यदान दीयतेऽनुपकारिणे ॥ देशे काले च पात्रे च तद्दीन सात्विकं स्मृतम् २०॥ जो दान देनाही चाहिये ऐसी पुद्धिकरके कुरुक्षेत्रादि देशमें और ग्रहणादिककालमें जिससे फिर कुछ अपना उपकार न होय .

(१०४)
भगवद्गीता।
[अध्यायः-
ऐसेको तथा वह पात्र याने तपःस्वाध्यायकरके रक्षक होय उसको
दियानाय सो दान सात्विक कहाहे ॥ २० ॥
यत्तुं प्रत्युपकारार्थ फर्लेमुद्दिश्य वा पुर्नः ॥
दीयते च परिक्ष्टिं तेंद्राजसैमुदाहृतम् ॥ २१ ॥
जो प्रत्युपकारके वास्त अथवा फलके निमित्तकरके फिर भी
राहुवगैरह ग्रहनिमित्त उग्रदान दियाजोय सोरानेस कहाहे ॥ २१॥
अदेशकाले येद्दानंमपात्रेभ्यश्च दीयते ॥
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥
जो दोन तिरस्कार अवज्ञापूर्वक देशकालविना और कुपा-
घोको दियाजाताहै सो दान तामसे यहाहै ।। २२ ॥
ओं तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिंविधः स्मृतः ॥
ब्राह्मणांस्तेनं वेदोश्चै याश्च विहिताः पुरौ ॥२३॥
'ओं तत् सतं ऐसे तीन प्रकारका वेर्दका निश्चय जानागाँ है
"याने ओशब्दसे कर्मका स्वीकारकरना उचित हे तत् शब्दसे तदर्थ
याने परमेश्वरार्थ करना उचितहे सत्से श्रेष्ठकर्म साधुवृत्तिसे करना
रेसा वेदका निश्चय है" उसी निश्चयकरके युक्त ब्राह्मण याने वेदकर्म
करनेवाले तीनों वर्ण कर्मस्वीकारार्थ और वेद जो ईश्वरार्थकमको
प्रतिपादन करतेहैं और यज्ञ दान जो सत्कर्म ये मैं ने पूर्वकालमें
स्थापितकिये हैं।॥२३॥
तस्मादोमित्युदाहृत्यं यज्ञदानतपःक्रियाः॥
प्रवर्तते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ २४॥
जिससे कि, वेदवादी तीनोंवर्णकर्म स्वीकारार्थ हैं तिससे ओं ऐसे
कहिके याने कर्मस्वीकार करके वेदवादी तीनोंवोंको विधिसे कही-
भई यज्ञ दान तपैकी क्रियायें निरंतर प्रवृत्त होतीहैं ॥२४॥

सप्तद० १७.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी। (१९)
तेदित्यनभिसंधार्य फेलं यज्ञतपःक्रियाः ॥
दानळियाच विविधाः क्रियते मोक्षकांक्षिभिः ॥२५॥
तत्याने कर्म तदर्थहे याने परमेश्वरार्थहे ऐसी बुद्धिसे फलेका
अनुसंधान नहीं करके यज्ञ, दान, तप, क्रिया और अनेकप्रकारको
दानक्रिया मोक्षके चाहनेवालों केरके कीजातीहै ॥२५॥
सद्भावे साधुभावे च संदित्येतत्प्रयुज्यते ॥
प्रशस्ते कमणि तथा सच्छन्दः पार्थ युज्यते ॥ २६ ॥
हे अर्जुन । श्रेष्ठपनेमें और साधुभावमें सत्र ऐसा यह शब्द युक्त
करतेहैं तथा श्रेष्ट कर्ममेंभी संतशब्दयुक्तकरते हैं ॥२६॥
यज्ञे तपसि दर्दाने च स्थितिः संदिति चोच्यते ॥
कैम चैव तदीयं संदित्येवाऽभिधीयते ॥२७॥
जो यज्ञमें, तपमें और दानमें स्थिति है सो सत् ऐसे कहाँतीहै
और जो ईश्वगर्थ कर्महे सो सेत् निश्चयह ऐसे कहते। इन
चारों श्लोकोंमें ओतत् सत् इनका खुलासा कियाहै ॥२७॥
अश्रद्धयाँ हुतं देत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्यै नो इहँ ॥२८॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां यो-
गशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभाग-
योगोनाम सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥
हे पृथापुत्र । जो श्रद्धाविना होभिया इवन दिया भयादान तपार्भया
तप और कियाभया कर्महे 'सो असत् ऐसा कहाताई और सोने पर
लोकमें न इस लोकमें सुखदायक है ॥२८॥
इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिता
श्रीमद्भगवद्गीतामृततरंगिण्यां सप्तदशाध्यायप्रवाहः ॥ १७ ॥

( १७६)
भगवद्गीता।
[ अध्यायः
अर्जुन उवाच ।
संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ॥
त्यागस्य चे हंपीकेश पृथकशिनिपूदन ॥१॥
अब इस अठारहवें अध्यायमें सर्वगीताका सारांश निरूपण होय..
तहां अर्जुन प्रश्नकरतेहैं कि, हे महाबाहो ! हे हृषीकेश । हे केशिनि-
पूर्दन ! संन्यासका और त्यागका तत्त्व न्यारा न्यारा जाननेको
चाहतीहूं ॥१॥
श्रीभगवानुवाच ।
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः ॥
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यांग विचक्षणाः ॥२॥
ऐसा अर्जुनका प्रश्न सुनिके श्रीकृष्ण भगवान् बोलते भये कि, के-
वि जो सारासारविवेकी वे कामनावाले कर्मोके छोड़नेको संन्यास
जानतेहैं और विचक्षण जो तत्त्वज्ञानी हैं वे सर्व कर्मोंके फलत्यागको
त्योग कहतेहैं ॥२॥
त्याज्यं दोपवेदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ॥
यज्ञदानतः कर्म नै त्याज्यमिति चाँपरें॥ ३ ॥
कोईएक ज्ञानिपुरुष दोपवाली कर्म त्यागनीचाहिये ऐसे कहते
हैं और कितनेक और आचार्य यज्ञ, दान, तप कर्म नहीं त्यागना
चाहिये ऐसेकहतेहैं ॥३
निश्चयं शृणु में तत्रं त्यागे भरतसत्तम ।
त्यागो हि पुरुपव्याघ्र त्रिविधः परिकीर्तितः॥ ४ ॥
यज्ञदानतपैः कर्म नै त्याज्यं कार्यमेव तत् ।।
यज्ञो दानं तपैश्चैवं पावनानि मैनीपिणाम् ॥५॥

। अष्टाद. १८.] सान्वय-अमृततरंगिणीभा० टी०। (१७७) हे भरतसत्तम । उस त्यागमें मेरा निश्चय सुनो हे पुरुषनमें श्रेष्ठ । जिससे कि, त्याग तीनि प्रकारको कहा है ति सीसे यज्ञ, दान, तपरूप कर्म नहीं त्यागना करनाही योग्य है यज्ञ, दान और तैप ये ज्ञानिनको भी पवित्र करनेवाले हैं ॥४॥५॥ एतान्यपि तु कमौणि संगं त्यक्त्वा फलानि च । कर्तव्यानीति में" पार्थ निश्चितं मतैमुत्तमम् ॥६॥ हे पार्थ । ये यज्ञादिकभी कर्म ममता और फलोंको त्यागि के करनेयोग्य है ऐसा निश्चय कियाभयों मेरी उत्तम मत ॥६॥ नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते॥ मोहात्तस्यं परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥७॥ कारणे कि, जो नियमित संध्यादि पंचमहायज्ञादिकहें उन कर्मका त्यागें नहीं होसकताहे जो मोहसे उसका त्यागे किया सो तामस कैहाताहे ॥७॥ दुःखमित्येवं यत्कर्म कायक्लेश यात्त्यजेत् ॥ स कृत्वा राजसं त्यागं नैवै त्यागफलं लभेत् ॥८॥ जो कर्म दुःख ऐसे शरीरंक्लेशके भयसे ही त्याग सो राजस त्यागको करके त्यागफैलको नहीं पावताहै ॥८॥ कायमित्येवं यत्कम नियतं क्रियतेऽर्जुनं ।। संगं त्यक्त्वा फलं चैव सत्यागः सात्त्विको मतः॥९॥ हे अर्जुन ! जो कम करनेयोग्य ऐसी बुद्धिसेही ममता और फलको त्योगिके नियमित याने उचित ऐसीही धुद्धिसे करे सो त्याम सात्त्विक मानाहै ॥ ९॥ नं द्वेष्टर्यकुशलं कर्म कुंशले नानुषेजते ।

(१०८) भगवद्गीता। [अध्याय:- त्यागी सत्त्वंसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥१०॥ : जो सत्त्वगुणयुक्त बुद्धिमान् संशयरहित कर्मफलत्यागी है सो सकुशलको याने संसारकारक कर्मको न निदताहै ने कुशल याने यज्ञादिकं तिनमें आसक्त होताहै ॥ १०॥ न हि देहभृता शक्य त्यक्तुं कर्माण्यशेपतः ॥ यस्तु कर्मफलत्यागी सै त्यागीत्यभिधीयते ॥ ११॥ जिसवास्ते कि, देहधारीकरके सर्व कर्म त्यागनेको नहीं होसक- नाहे तिससे जो कर्मफलका त्यागीह सो" त्यागी ऐसा कहाताहे॥११॥ अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ॥ भवत्यत्यागिनां प्रेत्ये न च संन्यासिनां कैचित्॥१२॥ अप्रिय, प्रिय और मिश्रित ऐसे कर्मका तीन प्रकारका फलं कर्मफलानुरागिर्नको मरेपर होतीहै और कर्मफलत्यागिको कहीं भी नहीं ॥१२॥ पञ्चैतानि महोवाहो कारणानि निबोध में। सांख्ये कृतांत प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥१३॥ हे महाबाहो ! सर्वकर्मोंकी सिद्रिके वास्ते ये पांच कारण सांख्यसिद्धांतों केहेभये मेरेसें" सुनो ॥ १३ ॥ अधिष्टानं तथा कत्ती करणं चे पृथग्विधम् ॥ विविधांश्च पृथक् चेष्टां दैवं चै" वात्र पंचमम् ॥१४॥ वे ये कि, अधिष्ठान याने आधार अर्थात् शरीर तथा कर्ता याने जी इस जीवके कर्त्तापनमें "ज्ञातएवचकर्ताशास्त्रार्थत्वात्" यह ब्रह्मसूत्र प्रमाणहें और न्यारे न्यारे प्रकारके करण याने मनसहित पंच इंद्रियोंके व्यापार और अनेकप्रकारकी न्यारी न्यारी चेष्टी याने पांच अष्टाद०१८] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। ( १७९) प्राणवायुनकी चेष्टा औरै' यहां पांचवां देवं यौने अंतर्यामी अर्थात मैं हूँ इस विषयमें "परात्तुतच्छतेः" यह ब्रह्मसूत्रभी प्रमाणहे यहाँ शंकासमाधान वाक्यार्थबोधिनीमें कियाहै ।। १४ ॥ शरीरवाइनोभियंत्कर्म प्रारभतेऽर्जुनं ॥ न्याय्यं वा विपरीतं वा पंचेते" तस्य हेतवः॥१५॥ हे अर्जुन । शरीर वाणी और मन करके जो न्याय्ये अथवा अ- न्यायं जो कम प्रारंभ करा जाता तिसके ये"पांचे कारण हैं ॥१५॥ तत्रैवं संति कतारमात्मानं केवलं तु यः ॥ पश्य॑त्यकृतबुद्धित्वान्ने से पैश्यति र्दुर्मतिः ॥ १६ ॥ ऐसे सिद्धांत होने पर भी तहां जो केवल आत्माको कत्ती जान- चाहे सो दुर्बुद्धिपुरुष अकृतबुद्धित्व से याने यथार्थ निश्चयकारक बुद्धिहीन है तिससे नहीं जानताहे ॥१६॥ यस्य नहिंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ॥ हैत्वापि से ईमॉल्लोकान्नै हति" नै निबध्यते॥१७॥ जिसके आपके कत्र्तापनका भाव नहीं है जिसकी बुद्धि कर्ममें महों लिप्तहोतीदे सो ईन लोकनको मौरके भी ने मारताहै में पापमें वधताहै तात्पर्य कि, तुम भीष्मादिके वधसे डरते हो तहां जो मनुष्य ममता अहंतारहित होके स्वधर्माचरण करताहे उसको उस कर्मजन्य पापपुण्यका भय नहीं ॥ १७ ॥ ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविर्धा कर्मचोदना ।। करणं कमै कतैति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ॥१८॥ ज्ञान जो कर्त्तव्यकर्मका जानना ज्ञेय जो वह कौ परिज्ञाता उसे- के सम्यक् जाननेवाला ऐसे तीन प्रकारका शास्त्रविधान है तह करणं (१८०) मगवद्गीता। [ अध्याय:- जो कर्मकरनेकी साधनसामग्री जैसे यज्ञमें सुवादिक युद्धमें शस्त्रादिक कर्म जो करना होय कर्ता करनेवाला ऐसे तीनि प्रकारका कर्मके वास्ते संग्रह है अर्थात् इनहोसे होसकेगा इन विना नहीं ॥ १८॥ ज्ञानं कर्म च कत्तति निधैवं गुणभेदतः ॥ प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावैच्छृणु तान्यपि ॥१९॥ ज्ञान की ओर का ऐसे ये गुणभेर्दकरके साँख्यशास्त्रमें तीन प्रकारहीके कहें उनैको भी यथावते सुनो।। १९ ॥ सर्वभूतेषु येनकै भावमव्ययमीक्षते ॥ अविभक्तं विभक्तपुं तज्ज्ञानं विद्धि सौत्त्विकम्॥२०॥ जिस ज्ञानकरके ब्राह्मणक्षत्रियादि विभागयुक्त सर्वभूतोंमें विभाग- रहित याने आत्मा सर्वमें समान है ऐसा अविनाशी एक भावको देखताहो उसे ज्ञानेको सात्त्विक जानना ॥२०॥ पृथक्वेन तु यज्ज्ञोनं नानाभावान पृथग्विधान ।। वेर्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसस् ॥ २१ ॥ और वो सबभूतोंमें अनेक ब्राह्मणादिक छोटे बडे उत्तम मध्यम भेदयुक्त आत्मनकोभी उत्तम मध्यम न्यारे न्यारे जानताहै ऐसा जो न्यारेपनेकरके जो ज्ञानहें उस ज्ञानको जस जानो ॥२१॥ यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये संतमहतुर्कम् ।। अतत्त्वार्थवदेल्पं च वैचामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥ जो कि एकही कर्ममें सक्त याने आसक्त सर्वफलयुक्त जाने और वह निरर्थ होय कारण कि, जिसमें तत्त्वार्थ नहीं और तुच्छ याने भूतादि आराधनरूप ज्ञान सो" तामैस कहाँहै ॥२२॥ नियंत संगैरहितमरागद्वेषतः कृतम् ॥

(१८१)
अष्टाद०१८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्सात्त्विकमुच्यते ॥ २३ ॥
जो कर्मफलकी इच्छा न करनेवालेने नियत याने कर्तव्य फला-
संगरहित और रागद्वेपविना किया हो सो सात्त्विक कहाहै ॥२३॥
यत्तु कामेप्सुनों कर्म सहिंकारेण वा पुनः ।।
क्रियते बहुलायासं तंद्रांजसमुदाहृतम् ॥ २४ ॥
जो बहुत परिश्रमयुक्त कर्म कामनाका प्राप्ति इच्छामरके अर्थ-
वा फिर अहंकारसहित कियाहोय सो राजस कहाहै ॥२४॥
अनुबंध क्षयं हिंसामनवेक्ष्यं च पौरुषम् ।।
मोहाँदारमते कर्म यंत्तत्तीमसमुच्यते ॥ २५ ॥
कर्मके परिणामको दुःख द्रव्यादिकका सये उस कर्ममें प्राणि-
पोडा और आपके पुरुपार्थको न देखि के मोहसे जो कर्म आरंभ
कियाजीताहे सो" तामस कैहाताहै ॥ २५ ॥
मुक्तसंगोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ॥
सिद्धयसिद्धयोनिर्विकारः कत्ता सात्त्विक उंच्यते२६
जो पुरुष कर्मफलासक्तिरहित में कर्ता हूं ऐसे न कहनेवाला
धीरज और उत्साहयुक्त सिद्धि और असिदिमें निर्विकारहोय सो
की सात्विक कहाँताहै ॥२६॥
रांगी कर्मफलप्रेमुलुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः॥
हपंशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥२७॥
जो कर्ममें आसक्त कर्मफलके चाहनेवाला लोभी याने कर्ममें
यथार्थ खर्चका न करनेवाला प्राणिपीडा करनेवाला अपवित्र हपंशो-
कयुक्त सो की जिस कहाहै ।। २७॥
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शंठो नैष्कृतिकोऽलसं॥
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥२८॥

(१८२) भगवद्गीता। [अध्याय:- जो शास्त्रोक्त कर्मके अयोग्य विद्याहीनं अनम्र मारणादिकमंत- पर ठग आलसी विपाद करनेवालों और घड़ीके काममें एक दिन वितानेवाला सो कर्ता तोमस फैहाताहै ॥२८॥ बुद्धभैदै धृतेश्चैवं गुणतंत्रिविधं शृणु ॥ प्रोच्यमानमशेपेणं पृथक्वेन धनंजय ॥ २९ ॥ हे धनंजय ! संपूर्णपनेकरके मेरा कहाँभया न्यारा न्यारी गुणोंक- रके तीनिप्रकारका बुद्धिका और धीरजको भेर्दै मुनो ॥ २९ ॥ प्रतिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ॥ बंध मोक्ष चै यो वेत्ति बुद्धिःसाँ पार्थ सात्त्विकी३०॥ हे पार्थ । जो बुद्धि प्रवृत्तिको और निवृत्तिको कार्य अकार्यको और भय अभयको बंधको और मोक्षको जानतीहै सो सात्त्विकी ॥३०॥ यया धर्ममधर्म चे कार्य चाकार्यमेव च ॥ अयथावत्प्रजानौति बुद्धिः सौ पार्थ राजसी ॥३१॥ हे पृथापुत्र ! जिस बुद्धिकरके धर्मको और अधर्मको तैसे कार्यको और अकार्यको भी उलटा जाने सो" बुद्धि राजसी ॥ ३१ ॥ अंधर्म धर्ममिति यो मन्यते तमसावृता । सान्विपरीतांश्च बुद्धिःसों पार्थ तामसी॥ ३२॥ हेपार्थ । जो बुद्धि अज्ञानकरके ढकीभई अधर्मको धर्म ऐसा माने और सर्व अथीको उलटे मानै सो तामसी ॥३२॥ धृत्या ययां धारयते मनःप्राणेंद्रियक्रियाः॥ योगेनाव्यभिचारिण्यां धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी३३ हे पार्थ । जिस अखंडमोतसाधनरूप धारणार्करके योगवलेसे मन प्राण और इंद्रियनकी क्रियोंको धारणकरे सो धारणा सत्विकी॥३॥ यया तु धर्मकामार्थान्धृत्यां धारयते नरः॥

. अष्टाद० १८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी। (१८३} प्रसंगेर्ने फलांकांक्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥३४॥ हे पार्थ ! फलकी इच्छा करनेवाला पुरुपं फलइच्छाप्रसंगसे जिस धारणाकरके धर्मअर्थ कामोंको धारणकरै सो धारणा राजसी ॥ ३४ ॥ यया स्वप्नं भयं शोकं विर्षादं मदमेव च ॥ ने विमुंचति दुर्मेधा धृतिः सौ तामैसी मर्ती ॥ ३५ ॥ दुष्टबुद्धिपुरुष जिस धारणाकरके स्वप्न भयं शोक विपद और मंद इनको नहीं त्यागताहे सो धारणा तामसी मानते हैं ।। ३५ ॥ सुखं विंदानी त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ। अभ्यासांद्रमेते यत्रं दुःखातं , निगच्छति ॥३६॥ यत्तदंग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोमम् ॥ तत्सुखं सात्त्विक प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥ ३७॥ हे भरतश्रेष्ठ ! अब सुखभी तीनप्रकारका मेरेसे सुनो सो ऐसे किन जिस सुखमें अभ्यास करनेसे मन रमताहै और दुःखकोनाश होती जो उसके प्रथम विपतुल्य अंत में अमृततुल्य सुख वह आत्मबुद्धि की प्रसन्नतासे उत्पन्न सुख सात्विक कहा है ॥ ३६॥३७॥ विषयेंद्रियसंयोगांधत्तंदग्रेऽमृतोपमम् ॥ परिणामे विपमिव तंत्सुखं राजेसं स्मृतम् ॥ ३८॥ जो विपदियके संयोगसे प्रारंभमें अमृततुल्य अंतमें विपतुल्य सो सुख राजस कहाहै ॥ ३८॥ यंदंग्रे चार्नुबंधे च सेख मोहनमात्मनः॥ निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ ३९॥ जो प्रारंभमें और अंतमें भी आपका मोहक सोनिद्रा आलस औ- र प्रमादसे उत्सन सुख तामस कैहाहै ॥ ३९ ॥ मैं तदस्ति पृथिव्यां वो दिवि देवेषु वी पुर्नेः ।।

(१८६) भगवद्गीता। [अध्याय:- वांछारहित पुरुष परम नष्कर्यसिद्धिको याने आत्मज्ञानको फल त्यागकरके प्राप्तहोताहै ॥ १९॥ सिद्धि प्रोप्तो याँ ब्रह्म तथाऽऽप्नोति निवांध में ॥ समासेनैव कौंतेय निष्टा ज्ञानस्य यो परी॥५०॥ हे कुंतीपुत्रं ! उस आत्मज्ञानको प्राप्तभयाहुआ जैसे ब्रह्मको प्रामहोती तेसे संक्षेपकरके मेरेसे सुनो जो" ध्यानात्मज्ञानकी परम निष् है याने उपायकी सीमा है ॥२०॥ बुद्धचा विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ॥ शब्दादीन्विषयोस्त्यक्त्वा राँगद्वेषौ व्युदस्य च ॥५१॥ विविक्तसेवी लैप्वाशी यतवाकायमानसः ॥ ध्यानयोगपैरो नित्यं वैरीग्यं समुपाश्रितः॥५२ ॥ अहंकार बैलं दैप काम क्रोध परिग्रहम् ॥ विमुच्य निर्ममः शीतो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५३॥ सो जैसे कि, शुद्धबुद्धिकरके युक्त और धारणासे मर्नको वश के- रके शब्दादिक विपेयोंको त्योगिक और रोंगद्धेपोंको त्यागिके एकांत ठाभया अल्पौहारी शरीर वाणी और मनको वशकियेभये नित्य ध्यानयोगपरायण रायको धारणकियेभये आकार गर्ने दर्प कॉम क्रोध ममता इन सबको त्यागिके निमम शांत ऐसा पुरुप आत्मज्ञानमय होतीहै ॥५॥५२॥५३॥ ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा ने शोचति ने कांक्षति ॥ समः सर्वेषु भूतेषू मैद्भक्तिं लभते पराम ॥५४॥ ऐसे आत्मज्ञानमय भयाहुआ प्रसन्नमनयुक्त ने कोई वस्तु मेरे सिवा- य जोगई तो उसको शोचताहै नै चाहताहै सर्व भूतोंमें समदृष्टिभया- हुओं अतिउत्तमें मेरी भक्तिको प्राप्तहोतीहै याने सर्व जगत्को अष्टाद०१८.1 मान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। ( १८७) मेरे शरीरभूत मेरी परमविभूति जानिके पक्षपातरहित सर्वमें मेरे- हीको देखताभया मेराही स्मरण उनमें करताहै कि, ये सब मेरे स्वामीके हैं यही परमभक्ति है ॥५४॥ भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः॥ ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विर्शते तदनंतरम् ॥ ५५ ॥ मैं जितना और जो हौ तितना और तिस मेरेको भक्तिकरके निश्चयपूर्वक जानताहै फिर मेरेको" निश्चयपूर्वक जीनिके मेरेहीको उसैपीछे प्राप्त होता है ॥५५॥ सर्वकर्माण्यपि सदो कुर्वाणो मद्यपाश्रयः॥ मत्प्रसादांदवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥५६ ॥ 'मेरा आश्रितजने सर्व लौकिक वैदिक कर्मनकोभी- सदा करता- भया मेरे अनुग्रहसे सनातन नाशरहित पदको प्राप्तहोताहै ॥ १६॥ चेतसो सर्वकर्माणि मयि सन्यस्य मत्परः॥ बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भवे ॥ ५ ॥ मेरे परायण भयेहुये चित्तकरके सर्वकर्मोंको मेरेमें स्थापितक- रके याने मेरे अर्पणकरके ज्ञानयोगका आश्रयकरके निरंतर मेरेमें चित्तको लगायेभये स्थितरहो ॥१७॥ मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रेसादात्तरिष्यसि ॥ अर्थ चेत्त्वंमहंकारान्न श्रोष्यसि विनंक्ष्यसि ॥५८॥ मेरेमें चित्तलगायेर्भये मेरे अनुग्रहसे सर्वसंसारदुःखोंको तरोगे जो कदाचित तुम अहंकारसे मेरा उपदेश नै सुनोगे तो नष्टहोउंगे॥१८॥ यदहंकारमाश्रित्य ने योत्स्य इति मन्यसे । मिथ्येवं व्यवसायस्तै प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥२९॥ जो अहंकारको आश्रयकरके नै युद्धकलंगां ऐसे मॉनोगे सो भी ( १८८) भगवद्गीता। [अध्याय:- तुम्हारी निश्चर्य वृथा होयगों क्योंकि, तुमको तुम्हारा जातिस्वभी- वही युद्धमें लगायदेयगौ ॥ १९॥ स्वभावजन कौंतेय निबद्धः स्वेने कर्मणा। कैत नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवंशोपि तत् ६० हे कुंतीपुत्र जो युद्ध मोहसे करने को नहीं चाहते हो सो आपके क्षत्रि- यस्वभावजन्य आपके कर्मकरके बंधे ये परवशंभये भी करोगे॥६०॥ ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ॥ भ्रामयन्सर्वभूतानि यंत्रारूढानि मायया ॥ ६१ ॥ हे अर्जुन ! ईश्वर आपकी मायाकरके यंत्र जो शरीर तिनमें रहेभये सर्वभूतोंको भ्रमाताभयां सर्वभूतोंके हृदयस्थलमें स्थित है ॥६१ ॥ तमेवे शरणं गच्छ सर्वभावनं भारत ॥ तत्प्रसादात्परांशांति स्थान प्राप्स्यसि शाश्वतम्६२ हेभारत ! सर्वभावनाकरके उसी परमात्माके झरणे होने वसीके अनुग्रहसे परम शांति और सनातने स्थानको प्राप्तहोवोगे ॥ २ ॥ इति ते ज्ञानेमाख्यातं गुहादह्यतरं मया । विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ६३ ॥ मैंने यह गोप्यसेभी गोप्य ज्ञान तुमको कहाँ इसको अच्छीत- रहसे विचारके जैसा चाहो तैसों करो ॥ ६३ ॥ सर्वगृह्यतमं भूयः शृणु में परमं वचः ।। इष्टोसि में दृढमतिस्ततो वैक्ष्यामि ते" हितम्॥४॥ सर्वगोप्यनमें भी अतिगोप्य मेरों परमे वाक्यं फिर मुंनो मेरे अति प्रियहो तिससे तुमको यह हित उपदेश करतीहूं ॥ ६ ॥ मन्मनां भव मद्भक्तो मद्यांजी मां नमस्कुरु॥ ममिवैष्यसि सत्यं वे" अंतिजाने प्रियोऽसि मे ६५॥

अष्टाद०१८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१८९) मेरेमें मनको लगांवो मेरे भक्त होई मेरा पूजनकरनेवाले होई मेरेको नमन करो और ऐसे करनेसे मेरेको ही प्राप्तहोडेगे तुमसे सत्य प्रतिज्ञा करतीहूं क्योंकि, मेरे" प्रियहो ॥ ६ ॥ सर्वधर्मान्परित्यज्य मोमेके शरणं वर्ज। अहं त्वां सेर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥६६॥ हे अर्जुन ! तुम सर्वधर्मोको परित्यागि के याने सर्वधर्मोके फलको त्यागिके अर्थात् “यत्करोपि यदनासि इत्यारभ्यतत्कुरुष्व मदर्पणम्" इस रीतिसे मेरे अर्पणकरके मुख्य मेरे शरणं प्राप्त होउं अर्थात् "स्वकर्मणा तमभ्यर्य सिद्धि विदति मानवः" इस प्रमाणसे मेरेको पूज्य और मेरेको प्राप्य जानिके मेरी आज्ञा करो याने मेरा पूजन जानिके स्वधर्मरूप युद्धकरो मैं तुमको इन भीष्मादिकोंको युद्धमें मारने इत्यादिक सर्वपापोंसे मुक्तकरोगी तुम मैति शोचकरों यहां इस श्लोकमें कोई विद्वद्भूपण अर्थ करते हैं कि, चातुर्मास्ययाग श्राद्ध पितृतर्पण इत्यादिकर्मरूप धर्मोको त्यागिके मेरे शरण होउ याने मेरेको और आपको एकही जानो इस एकताज्ञानरूप भक्ति करो तब विचारना चाहिये कि, प्रथम तो "उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मे- त्युदाहृतः” इत्यादिप्रमाणसे जीवनाकी स्वरूपएकता नहीं होसक- तीहै सुक्तभयेपरभी "मम साधर्म्यमागताः" और "भोगमात्रसाम्यलिं गाच"तथा "निरंजनः परमं साम्यमुपैति" इत्यादिक गीताब्रह्मसूत्र और श्रुतिप्रमाणसे भी भोगादिकमें समता होती है एकता नहीं जहाँ एकता भी कहाँहे तहां अंतर्यामिभावसे अथवा "द्वासुपर्णा" इत्यादिश्रुतिप्रमा ण सखापनसे कहीहै दूसरे 'भन सेवायो' धातुका भक्ति शब्द होताहै भक्ति याने सेवा सो भी एकतामें बननेकी नहीं इससे जीव परमात्मासे न्यारे परमात्माके स्वाधीन हैं यह सिद्ध भया तब जो अर्थ किया कि, मेरी और आपकी एकतारूप भक्तिको सो यह अर्थ तो सिद्धभया नहीं अब जो धर्मको त्यागनेका अर्थ किया तहां "धर्मसंस्थापना- र्थाय संभवामि युगयुगे। श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः । स्वधर्मे निधनं श्रेयः"

भगवद्गीता।
[अध्याय:-
इत्यादि वाक्योंमें विराधे आताहे इसवास्ते सर्वधर्मोंका फलत्यागिके
निष्काम और ईश्वरपूजनरूप जानिके करना यही सिद्धहोताहै यहां
इसी अध्यायमें प्रमाणहे "निश्चर्य शृणु मे तव त्यागे भरतसत्तम ॥
त्यागो हि पुरुपच्याम त्रिविधः परिकीर्तितः" यहांसे लेके "संग त्यका
फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥ यस्तु कर्मफलत्यागी सत्यागीत्य-
भिधीयते" इत्यादि और भी कहहैं ग्रंथबढनेके भयसे नहीं लिखते हैं
सुज्ञजन इतनेहीमें समुझिके धर्माचरण करेंगे ॥६६॥
इंदते नातपस्काय नाऽभक्ताय कदाचन ।।
नाऽशुश्रूषवे वाच्यं नमी योऽभ्यसूयति ॥ ६७ ॥
हे अर्जुन ! यह मेरा गोप्य उपदेश तुम जिसने तप नकियाहोय उ-
सको न कहना तथा कभी भी मेरा और मेरे जनोंका भक्त, न होय
उसको न कहना और जो गीताउपदेष्टाकी सेवा नकर उसको भी न
कहना और जो मेरी" निंदाकर उसको तुम न कहना ॥ ६७॥
य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिर्धास्यति ॥
भक्ति मयि परां कृत्वा मोमवैष्यत्यसंशयः ॥ ६८ ॥
जो इस परमै गोप्यं गीताशास्त्रको मेरे भक्तोंमें प्रसिद्ध करेगा वह
मेरेमें सर्वोत्तम भक्ति करके मेरेहीको प्राप्त होगा इसमें संशयनहीं ६८
नंच तेस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियंकृत्तमः ॥
भविता ने च में तस्मादन्यः प्रियतेरो भुवि ॥६९ ॥
उसे गीताको भक्तोंमें प्रसिद्धकरनेवालेसे अधिक मेरो प्रियका-
रैक पृथिवीमें दूसरा मनुष्यों को ईभी नहीं है और ने उसकी
बरोवर और मेरे को प्रिय होगा ॥ ६९ ॥
अध्यष्यते च ये इमं धय संवादमावयोः ॥
ज्ञानयज्ञेन तेनामिष्टं स्यौमिति में मतिः॥७॥
जो मेरे तुम्हारे इस धर्मवईक संवादरूप गीताका अध्ययन करेगा
उस करके मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित होऊंगा ऐसा में मानता हूं ॥ ७० ॥

.
अष्टाद० १८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० ।
श्रद्धावान सूयुश्च शृणुयादपि यो' नरः॥
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ७१
जो निंदारहित और श्रद्धायुक्त श्रवणभी करेगा सोभी संसारसे मुक्त
होके पुण्यकर्म करनेवालोंके सुखद लोकों को प्राप्त होयगा ॥ १ ॥
कच्चिदेतच्छुतं पार्थ लयैकाँग्रेण चेतसा ॥
कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रणटस्ते धनंजय ॥७२॥
भगवान् पूंछते कि, हे पृयोपुत्र । इस ज्ञानको तुमने एकाय
चित्तंसे सुना कि नहीं, और हे धनंजय ! जो सुना होय तो अज्ञौनजन्य
मोह तुम्हारा नष्ट भया कि नहीं सो कहो ॥ ७२ ॥
अर्जुन उवाच ।
नष्टो मोहः स्मृतिलब्धा त्वत्प्रेसादान्मयाच्युत ॥
स्थितोऽस्मि गतंसंदेहः करिष्ये वचनं तैव ॥ ७३ ॥
श्रीकृष्णके वचन सुनिके अर्जुन कहतेहैं कि, हे अच्युत ! तुम्हारे
अनुग्रहसे मोहै नष्टंभया और मैंने ज्ञान प्राप्त किया अब संदेहरहित
स्थित हूं" आपको वचन जो स्वधर्मरूप युद्धकरनेकी आज्ञा सो
करौगा।॥ ७३॥
संजय उवाच ।
इत्यैह वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ॥
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ७४ ॥
संजय धृतराष्ट्रसे कहते हैं कि, हेराजन् ! ऐसा यह श्रीकृष्ण और
महात्मा अर्जुनकामतिअद्भुत रोमांचकारक सेवा में सुनाभया ७४
व्यासप्रसादाच्छतवानेतामहं परम् ॥
योग योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ७५
मैं' यह अत्यन्त गोप्य प्रत्यक्ष स्वयंही योग कहतेभये योगेन्वरे
श्रीकृष्णके मुखसे वेदव्यासजीके अनुग्रइसे सुनतीभया ॥ ७ ॥

(१९२) भगवद्गीता। [अष्टादशोऽध्यायः १८] राजन संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् ॥ केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहेर्मुहुः ॥ ७६ ॥ हेराजन् ! इस श्रीकृष्ण और अर्जुनके अद्भुत पुण्यदायक सा- दको सुमिरि मुमिरिके वारंवार हपितहोताहौं ॥ ७६ ॥ तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरे॥ विस्मयो में महान राजन् हँप्यामि च पुनःपुन:७७ हेराजन् ! उस अद्वैत भगवान्के रूपकोभी सुमिरिसुमिरिके मेरे बडी विस्मय होताहै और वारंवार हर्षित होताहौं ॥ ७७॥ यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थों धर्नुर्धरः॥ तंत्र श्रीविजयो भूतिध्रुवों नीतिमतिर्मम ।। ७८।। इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिपत्सुब्रह्मविद्यायां योग- शास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसंन्यासयोगो नाम अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ हेराजन् । जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहां अर्जुन धनुर्धारी है तनांदी अचल संपदा अचलविजेय अचलवैभव और अचेल नीति है यह मेरी निश्चय मत है ।। ७८॥ इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितागा श्रीमद्भगवद्गीताऽमृततरंगिण्यामष्टादशाध्यायप्रवाहः ॥१८॥ अंबराबध्यकशूसंख्येविक्रमार्फस्यसंपदि ॥ माघमासेक्लेशुभ्रद्धि- तीयायांतियोबुधे ॥ १ ॥ इयंसंपूर्णतायातागीताऽमृततरंगिणी ॥ श्रीमद्भागवताचार्यानुग्रहात्सगुरुमंग ॥२॥ समाप्तोऽयं ग्रंथः। पुस्तकमिलनेका पता-सेमरान श्रीकृष्णदास, "श्रीवेट्वटेश्वर" (स्टीम् ) यन्नाटयक माटिय-मुंबई. BHAI .

Gitaamrutarngini

Author
Raghunath
Title
Gitaamrutarngini
File name
Gitaamrutarngini
Text
OCR done
Citation
1966
Published
2012/08
Publisher
Mumbai.,shreewenkteshwer Stem Yantralay
Language
Sanskrit
Pages
188
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312212
Barcode
99999990321022.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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