Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Indravati [ Part - I ]

Shyam Sundar Das · 2011/03

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E
Masanker
कवि नूरमुहम्मद कृत
इन्द्रावती
पहिला भाग।
श्याममुन्दरदास
बी०
ए सम्पादित
मूल्य शा
--

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Nagar 2-prachor ini Granthmala Series No 12
G
कवि
नूरमुहम्मद कृत
इन्द्रावती।
पहिला भाग।
२०८
सम्पादित ।
श्यामसुन्दरदास बी०
काशी नागरी-प्रचारिणी सभा द्वारा
प्रकाशित।
BENARES
PRINTED AT THE LAHARI PRESS
।
1906

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निवेदन। कवि नूरमुहम्मद रुन "इन्द्रावती" का पहिला भाग छाप कर प्रकाशित किया जाता है । इसका इतनाही अशोर छपने को बाकी है। उसके छप जाने पर इस ग्रथ की सविस्तर भूमिका प्रकाशित की जायगी । जय तक समस्त ग्रन्थ न छप जाय तय तक उत्तको भूमिका लिसने का नियम नहीं है। इसी लिये इस ग्रन्थ तथा उसके कर्ता के विषय में जो कुछ मुझे वक्तव्य है वह मैं अभी नही निवेदन करता। इस ग्रन्थ की प्रति मुझे मिर्जापुर निवासी मौलवी अब- दुल्लाह द्वारा प्राप्त हुई है जिसके लिये उन्हे मैं अनेक धन्यवाद देता हूं। इस कवि के पोते मालवी तसद्दुक से उक्त ग्रन्थ की प्रति मौलवी अबदुलाह को प्राप्त हुई है। मूल ग्रन्थ फारसी अक्षरी में लिखा था । मौलवी अपदुल्लाह ने सवत् १९५७ में इसकी नकल कैथी अक्षरो में की। इसी अन्तिम प्रति के आ- धार पर यह ग्रन्थ छापा गया है। कवि नूरमुहम्मद ने अपना कुछ सक्षेप वृत्तान्त इस ग्रन्थ के पहिले राण्ड में दिया है। पाठकगण इससे ग्रन्थ बनने का समय आदि जान सकते हैं। श्यामसुन्दरदासा २.92260 खण्ड सूची। १-६ १० ६ १०-२२ २२-३४ ३४-४२ ४२-१२ ५२-६३ ६४-६ ६६-७८ (१) स्तुति खण्ड (२) जन्म खण्ड (३) स्वम खण्ड, कुअर (४) जेोगी खण्ट (१) फाग खण्ड (६) मालिन खण्ड (७) फुलवारी खण्ड () जीय कहानी सण्ड (८) पाती खण्ड (१०) दर्शन खण्ड (११) मुवा खण्ड (१२).नहान खण्ड (१३) जुख सण्ड (१४) मधुकर सरह (१५) मानिक सण्ड (१६) यिरह अवस्था खण्ड (१७) ओपद सपा (1) मोती खपट (१८) व्याह पड ७८-८४ ८५-८ ८०-६ ८६ - १००-११६ १९६-१४८ १६८-१४८ १५०-१५७ १५८-१८४ १६५-१६ -

इन्द्रावती।
[१] स्तुति खण्ड।
धन्य आप जग सिरजन हारा । जिन विन खम्स अकास सँवारा॥
होम जग को आपुहि राजा । राज दो जग को तेहि छाजा ।।
दीन्हा नैन पथ पहिचानो । दीन्हा रसना ताहि वसानो ।
बात सुनै कहँ सरवन दीन्हा । दीन्हा बुद्धि ज्ञान तेहि चीन्हा॥
गगन कि सेना कीन्हे सितारा । धरती सेना मनुप सँवारा ॥
आप गुपुत श्री परगट, आप आद श्री अंत ।
आप सुनै श्री देखै, कीन्द मनुप बुधवत ॥१॥
अहद अकेल सेासिरजन हारा। जानत परगट गुपुत हमारा॥
कीन्ह गगन रविससि महिमेरा। कोउ नाही जोरी तेही फेरा ॥
कीन्हा राति मिलै सुख तास । कीन्हा दिन कारज है जास
धन से महि पर भेजत नीरा । पलुअत सूखी भूमि सरीरा ॥
सब बिलाय जाइहि एक बारा। रहै तेहिक मुख रवि उजियारा॥
है स्रोता श्री दिष्टा, तेहि सम कोउ न पाहि।
जो कुछ है महिगगन महें,सब सुमिरत है ताहि॥२॥

इन्द्रावती। - अरे दोक जग के करतारा । कित कै सकउँ बखान तुम्हारा ॥ रसना होइ राम सब माही । तबहू बरन न पारउँ ताही ॥ है अपार सागर भी केरा । मोहि करनी को नाव न बेरा॥ कै किरपा मोहि पार उतारो । दया दृष्टि मोहि अपर डारो। है हमफह आलम्म तुम्हारी। ताहि दाया सा मुकुत हमारी॥ है मगु बहुत जगत्तमहँ,तिन मगु की नहिं चाव। आपन पथ देखावहु, राखौ तापर पॉव ॥३॥ सुमिरी चेत धरे मन ठाऊ । अरबी नबी मुहम्मद नाऊ ॥ जा कह करता दरस देखाए । के किरपा सब भेद बताएउ ॥ जेहिक बसान अहै लौ लाका । ताहि यखानत दोउ जग थाका॥ चार यार चारित जस तारे । दीन गगन ऊपर उजियारे ।। अबूधकर औ उमर बसाना । उस्मॉ बहुरि अली कॅट जाना॥ अहदहुते अहमद् भएउ, एक जोत दुइ नाउं। भएउ जगत के कारने, परेउ मोहम्मद नाउं ॥४॥ कती मोहम्मद साह यखातू । है सूरज दिहली मुलतानू ॥ धरम पन्थ जग बीच चलाया । निबरन सबरै सा दुस पावा ॥ पहिरे सलातीन जग केरे । आए सुहाँस बने हैं घेरे उहै माह नित धरम यदावै । जेहि पहराँ मानुप सुस पावै ॥ सय काहू पर दाया धरई । धरम सहित सुलतानी करई ॥ धरम भलो सुलतान कहें, धरम कर जो सार । सुग्ध पावै मानुप सबै, सरको होइ निवाह ॥५॥ फवि अस्यान कीन्ह जेहि दान । से वह ठाक सयरहद नाक ॥ पूरय दिम फइलाम समाना। अहे नसीरुद्दी को थाना है जग मह पथिक रहना। लेए पहासे आगम उहना ॥

इन्द्रावती। जगा आपुहि कस पहिचानो। तरिवर और बटोहिय जाना ।। घला जात जस होइ घटाही । आइ उँहाइ विरिछ तर वाही। जना जुड़ाइ तरिवरतर, धरै पन्ध पर पाँव । वास हमार जगत महँ, बुझो तेही सुभाव ॥६॥ आज रइन यह चॉद न जमा। आनन्द हरन जगत कर हुआ। साह काबला को दुस सेागू । समुझि समुझि रोवै सय लागू ॥ रोएउ गमन सेंदुरी शाही । रकत आँस है मुख उपराही ।। रोवै बादशाह जग साई । हम ना रहे करबला ठाई ॥ देते मीस दीनपति फारन । करते जिउ तनमन सय वारन॥ रोवै अच्छर सीसधुनि, सल्ससविल भाखार। आज छिपान जगतरवि,जगत भएउ अँधियार॥७॥ धावैला प्यासा गा मारा । आल रमूल वतूल पियारा ॥ उठा चहू दिस ते वाबैला । महि सिर परेत सेाग को सैला॥ पहिरेउ गगन मातमी बागा। परेउ चन्द के हियरे दागा ॥ ओ मसि कहु दुर राहु गराहा । सूरज कहँ उपनेत उर दाहा॥ इनके बीच हसन का प्यारा । सेहरा लीन्ह रकत के धारा ॥ नूर मोहम्मद जीभतें, कहें न मातम होइ । जिय सोकह मातम कथा,मनांखिन सोरोइ॥८॥ मन दृगसा एक रात मझारा । सूझि परा मोहि सब ससारा ।। देरो एक नीक फुलवारी । देखे तहाँ पुरुप अउ नारी ॥ दोउ मुख सेभावरनि न आई। चन्द सुरुज उतरेउ भुई आई ॥ तपी एक देखे तेहि टाऊ । पूछेउँ तासो तिन कर नाऊ । कहा अहे राजा अउ रानी। इन्द्रवति औ कुवर गेयानी॥ श्रागमपुर इन्द्रावती, कुवर कलिजर राय । प्रेम हुते दोऊ फहँ, दीन्हा अलख मिलाय ॥६॥ 1 ४ इन्द्रावती। । सरय कहानी दीन्ह सुनाई । कहा दया सेती हो भाई ॥ इन्द्रावति औ कुवर फहानी । फहभापा मो फघि ज्ञानी । गाढी गाठ परै जहा ताही । छुटि जाय सुमिरेड तुम माहीं॥ आज्ञा दीन्हा तपिय सेयाना । मन जित सो आशा मैं माना ॥ होत और लिखनी में लीन्हा । कहै लिसै ऊपर चित दीन्हा । सन इगयारह सौ रहेड, सत्तावन उपराए । कहे लगेउ पोथी तये, पाय तपी कर वांद ॥२०॥ कवि है नूर मोहम्मद नाऊ । है पछलग सयको जग ठाऊ । चुनि कविजन सेतन से बाला । करै चहत सरिहान विसाला ॥ है कवि समै नई तरुनाई । छूट न अवहीं कवि लरिकाई । जाके हिरा लरिक बुधि होई । यहुतै चूक कहत है सोई ॥ विनवत कविजन कहकरजोरी। है थोरी बुधि पूजिय मेरी ॥ चूका देखि सम्हारि के, जोरेहु अच्छर ट्ट । दाया कर मोहि दीन पर, दोस न लाएहु कूट ॥११॥ है। हीना विद्या बुधि सेती। गरव गुमान करै केहि नेती। है। मैं लरिकाई को चेला । कही न पाथी रोलठ खेला ॥ गुरुजन से यह विनतिय मारी। कोप न मानहि भैाह सिकारी॥ दोस बहुत खेलत मह हाई । दाया करेहु न कोपेहु कोई ॥ दोस कर जो छोटा आही । मया करै गुरजन कह चाही ॥ मोहि विवेक कछु नाहीं, नहिं विद्या वल आदि। खेलत है। यह खेल एक, दिष्टा देइ निवाहि ॥१२॥ एक रात सपना मैं देखा । सिन्धु तीर वह तपिय सरेखा ॥ अहै ठाढ मोहि लीन्ह बलाई । कहेसि कि सिन्धु मे बूहहु भाई ॥ मसा छाह पोढा के हीया । मोती काढहु होइ मरजीया ॥ - .

इन्द्रावती।
ससि गोती को हार सवराहु । इन्द्रावति की गीत मह हारहु ॥
लै माती दोउ हाथन माहा । झारू रतन सीर उपगहा ॥
अस सपना मैं देखेउँ, जागि उठेउँ अकुलाइ ।
बहुत बुझ संचारे, सपन न बुझा जाड ॥१३॥
चित औ चेत बहुत मै धरा । तब वह सपन वृझि माहि परा ॥
सिन्धु समा मनको पहिचानेउ। मानी समा बचन कह जानेउ ॥
हार गुहन बूझेउ घरपाई । रतन ग्रीव कह रतन बहाई ॥
मनुप सुवचन कहे मे लहई । वचन मरस माती सा अहई ॥
धचन एक करतार निसारा। सा तेहि वचनहुते ससारा ॥
वचन हसावै मनुष्य कहें, वचन रोवावै ताहि ।
बचनहु तें यह जगत मो,कीरत परगट आहि॥१४॥
है मन फुलवारी हो भाई । फूल समॉ यह बचन साहाई ॥
घचन अरथ है वास समाना। कवि स्त्रोता है अवर सयाना ॥
अचरज ऐस फूल पर अहई । बारी माँह कली नित रहई ॥
जब वह फूल तजत फुलवारी। विकमत वास देत अधिकारी ॥
जुगजुग रहत नतनु कुम्हिलाई । दिनदिन वास घढत अधिकाई॥
मन चाहत सो अस पुहुप,आज चुनों भरिगोद।
हार गूंथि कै पहिरेउँ, मनमो वा मोद ॥१५॥
हिया कहा दुइ हार सवारहु । रवि ओ कमल गले मह डारहु ॥
बुद्धि कहा दुइ हार यनावहु । मालति मधुकर कह पहिरावहु॥
तेहि पल तपसी दरस देखाएउ । मोहि सग एहि बात सुनाएन ।।
राजकुभर रानी इन्द्रावती । हैं रवि कमल औ भवर मालती।
चुनि परमुन दुइ हार सवारहु । तिनके ग्रीव बीच लै
डारह॥
अज्ञा मान तपी कर, चलेउँ जहां फुलवार ।
खुला न पाय द्वार को,मालिहि दिण्ड पुकार॥१६॥

इन्द्रावती।
भाएउ माली सुनत पुकारा । खालेउ फुलवारी का द्वारा ॥
पैठेउ फुलवारी मह जाई । रहमेत देखत फूल निकाई ॥
तन पलुहा बारी को गाई । मन भा फुलवारी तेहि ठाई ॥
माली कहा जएन मन होई । लेटु फूल नहि बरजत कोई ॥
जब आज्ञा मालिहिसा पाएत । तब में फूल चुनै पर आएउ ॥
किरपा सो बारी मह, माली दीन्हा साथ ।
आडे कोउ न आण्ज, भै फुलवारी हाय ॥१७॥
रहत न आगर रूप छिपाना । आपुहि परगट करै निदाना ॥
जो रम रूप से बाधहु द्वारा । जाइ झरोसे चितवै प्यारा ॥
सिरजनहार छिपा ना रहा । आपुहि फेर चिन्हावै चहा ॥
तब यह जग करतार सवारा । चीन्ह पडा वह सिरजन हारा॥
मानुष फूल सुरस सी नाऊ । धरि धरिता परगट सब ठाऊ ॥
आपुहि भोगि रूप धरि,जगमो मानत भोग।
आपुरिजोगीभेसहोइ,निसदिन साधत जोग॥१८॥
अलप प्रेम कारन जग कीन्हा । धन जो सीस प्रेम मह दीन्हा॥
जाना जेहिक प्रेम मह हीया । मरै म कबहू से मर जीया ॥
प्रेम खेत है यह दुनियाई । प्रेमी पुरुप करत बोवाई ॥
जीवन जाग प्रेम को महई । सावन मीचु वा प्रेमी कहई ॥
आग तपन जल चाल समूझो । पुनि दिकान माटी कह बूझो ।
हो प्रेमी है प्रेम को, चचलताइ याय
जा मन जामां प्रेमरस,भा दोउ जगको राय॥१६॥

इन्द्रावती। [२] जन्म खण्ड। राजा एक फलिजर ठा । रहा से निर्प को भूपति नाक॥ तेहि घर पुत्र लीन्ह अवतारा । दीपक सेक्षिा घर उजियारा ॥ धन आ पुत्र पियारा हाई । दोऊ कहें चाहै सय कोई ॥ मा आनँद से मङ्गलचारा । याहर भोतर भा झनकारा ॥ राजै पण्डिन वेग हँकारेठ । पडित आइ सुगनम निवारेउ। कहा पुत्र के हीयरे, पाढे प्रेम वियोग । रूप एक पर रीझे, तेहि नित साधै योग ॥१॥ राजकुभर तेहि राणा नाऊँ । जनम नछत्र घडी के भाऊँ। भा सेयान जब राजकुमारा । मात तेहिक जगछाडि सिधारा॥ पढि विद्या भा पण्डित स्थाना । भूपति के मन माह समागा ॥ गुम औ पिता अनन्द मनावें । चेला सुन जो पण्डित पावें ॥ राजा हिये अनन्द बढावा । पुत्र सरेसा पण्डित पावा ॥ राज पुत्र विश्राहा, सुन्दर रानी साय चढ़ी जोत श्रानन्द की, सूर चन्द हाय ॥२॥ भूपति राय जगत तजि गयेऊ । कुभर राज पर राजा भयेऊ ॥ जगत रीत जाने सब कोई । मरे पिता मुत राजा होई ।। पिता हो जब माटी माहाँ। तब सुत हाइ पाट उपराहाँ। पिता राज पर भा यह राजा। धरम दमामा चहुदिसि बाजा॥ धरमी रीत धरम की राखा । अधरम बचन न काहू पाया। करै कर्म जो राज को, यसै ग्राम उजार । ग्रामा नित्त असीसहीं, अचल कर करतार ॥३॥ ।

८ इन्द्रावती। ॥ - कालिजर गढ बरनि न पारी । जच बहुत किमि चित्त सँचारी। कवि चित गगन पाय तर डारै तय गढ ऊच वसाने पार भूधर पर भूधर गढ घेरा । दीप भयेउ भूधर तेहि केरा ॥ देवतन की मूरत छवि धारी । सहि गढ पर औ फुलवारी ॥ युद्धि ज्ञान दुइ पहरू तहाँ । जागहि चार सघरै कहाँ ॥ गढ पर चढी कमान, दुरजन देखि डेराय । कुअर त्रास ते निबल को, सपल न सकेसनाय॥४॥ बरनी राज मंदिर की सेना । सेक्षिा रूप आइ तेहि लोभा। मदिर मा उवि अधिक सेाहाही। राजा रहे आप तेहि माहीं ॥ घरनि न मकी भीत निर्मलाई । चितवत दृष्टि पार हाई जाई ॥ खम्भा चार कनक के लागे । चारो कहँ देखें अनुरागे ॥ चितवत पावै ऐसि मताई । भूलै एक तीन रह जाई ॥ पुनि दुइ भूले दुइ रहे, पुनि एकै रहि जाइ । एकहि खम्भ विलोकत, निपनहार अघाइ ॥१॥ कटक बहुत राजा के रहई । अनगिनती गिनती को कहई। एक दिन बाधे तुरै बिराजै । पवन बाधि जनु रासा राजै ॥ भूधर के भूधर गढ ऊपर । भूधर ऊपर सेाहै भूधर राजा आप धनी औ बली । कीरत अली लता सी चली ॥ सब पर धरै दया की दीठी । रासे सय फाहू पर ईठी ॥ राजा के भण्टार मह, धन श्री दरव सपूर । पूरन रतन पदारथ, गुलिक कनक खर चूर ॥६॥ यरनो राजा को फुलवारी । फूलनहू ते साहनवारी सुमन मुरङ्ग मुगन्ध माहाही । चहुदिस तिनपर अयर अवाही तारै राजा चाहै जाहीं । चाहै ना कहँ राखै ताहीं ॥ ॥ ॥

इन्द्रावती। । नित अनेक परसुन झरि जाहीं। नित अनेक फूलहि तेहि माही। सुगंध सुरङ्ग पुहुप तह फूलैं । सुमन सुमन मधुकर होइ भूलै ॥ अपने अपने मानहीं, सब परसुन मों वास । पास लेड के कारनहि, भँवर फिरै तिन पास ॥७॥ घरनी हाट महीपति केरी । ता महँ लाख वस्तु की ढेरी ॥ जो कोक कछु लेवै चाहै । जस पूंजी तस माल वेसाहै ॥ हाट आइ छूछे कर जाना । भन पछतावा रहइ निदाना ॥ जो आगम को लाना चाहै । हाट आइ से वस्तु बेसाहै ॥ मन मा जेतिक वस्तु रचाहीं । लेहि धनी निधनी पछताहीं । नित राजा के हाट मों, एक आवै एक जाइ । अपनी अपनी ऑट तें, वस्तु बेसाहै भाइ ॥८॥ वरना राज कुभर की बानी । धर्मिष्टी औ पण्डित ज्ञानी । । दान दरब की रीत सँचारा । अधरम को जर मूल उखारा ॥ पर त्रीया पर दृष्टि न देई । मनसा याचा पाप न लेई ॥ ऐस धरम को पन्थ चलावा । बाघ गाय से प्रीत लगावा ॥ सब फहँ मृधी याद चलावै । नियठ न सबले मेा दुस पावै ।। सय असीसे राजी, रहै सुखी सब कोइ । राजकुंअर के नगर मों, धरम पुन्न नित होइ ॥९॥ अति सरूप रानी सुन्दरी । धरती पर अपलर औतरी ॥ उबि से धन रिझवारिन भई । पियहि रिझाइ जीउ वाम गई ।। पीउ पियारी सुन्दर नारी | अइट पीत की प्रान पियारी॥ देसी पिउ धन की सुघराई । मन से मया करै अधिकाई ॥ साथै कुअर लिहै धन कोरा । कबहु न पीट दीन्ह तेहि ओरा॥ पिय को प्रोत वखाने, एक न राग्वै गोड । रूप गरयता सुन्द्रो, प्रेम गरयता होइ ॥१०॥ - - २ १० इन्द्रावती। सो अन्तर पट आगे लाँए । मुन्दर रूप न छिपत छिपाए । परगट होइ तहा से साई जेहि अस्यान छिपाना हाई ॥ जय प्रेमी पर पाहुन देई । एक दृष्टि मौन कइ लेई ॥ जेहि साए पर चित्त चलावै । नैन बान हनि ताहि जगावै ।। प्रेग वढावत प्रेमी हियरें । पुनि आनत तेहि अपने नियरें। प्रेम ध? जो दूइ मन, दोज एकै होय । बिछुरे ते वाढत अधिक, झै प्रेमी होय ॥११॥ । [३] स्वप्न खण्ड, कुँअर । एक रात महँ कुअर सरेसा । सपन बीच दर्पन एक देसा ॥ रहा अमल दरपन उँजियारा । जिउ मुख को निर्खावन हारा॥ दरपन मा एक सुन्दर नारी। देरोहु चन्दहु ते उजियारी ॥ रही तइस सुन्दर जस चही । दरपन देह वीच जित रही। रही न तेहि सँग ससीय सहेली । रहित मुकुर महें आप अकेली। ससिबदनीमनु रबिरही,रहा मुकुर जिमि धूप। तेहि रुपवन्ती रूप सों, दरपन पाएउ रूप ॥१॥ जागा कुअर और कह पावा । सपन चिन्त मा देवत्त गँवाया ॥ दुसर रात कस्तूरीय झारा । तासो मगध कीन्ह ससारा । तेही निजमा राय सरेखा । पहिली रात कि मुरत देखा । रहेउ न मूरत दरपन माही। दरपन बहुत रहे अगुवाही॥ कालिजरी निर्प नर नाहा । तास वदन देसा सप माहा ॥ जस दरपन निर्मल रहे, तस देवा अधिकार । दरसन एकै नारि को, सय अादरस मझार ॥२॥ - इन्द्रावती। । पहिली रात महीप सरेसा । मुस पर लट विथुरी नहि देखा। दूसर रात महीपति ज्ञानी । देखा मुख पर लट छितरानी। देखि वदन लट सुन्दरताई । सपने बीच परा मुरुछाई ॥ मोहि अचरज हिरदयमा आही। कैसे सुकुर म देखा ताही॥ यह सपने को को पतिआई । मुकुर साह विनु देखिन जाई । यह सपने की बात पर, अचरज करै न कोइ। सपने मों सो होत है, जो सौतुकै न होइ ॥३॥ राजा देखि सपन अस जागा । लागा ग्रीव प्रेम को तागा ॥ तागा पाइ प्रेम को राजा । भा प्रेमी छाहा सुख काजा ॥ का जाने सुख भोग भुलाना । प्रेम मरम जब लग अनजाना ॥ जाना जात प्रेम तब भाई । जब मन भीतर प्रेम समाई ॥ कालिजर को राय सयाना । वह नारी के रूप भुलाना ॥ हग सो विछुरी मूरत, हिदै श्राइ समान । जब हिय वीच समानी, हरिगै चिन्ता धान ॥४॥ राजै राज फाज तजि दीन्हा । चिन्ता वह भूरत की लीन्हा ॥ कहै कहा वह चन्द लिलाटी । वरु तेहि आगे है ससि घाटी॥ कहा धनुक भौही वह नारी । बरूनी वान चोख जेई मारी॥ कहवा मृग नैनी वह बाठा । प्रेमद दीन्ह कीन्ह मतवाला ॥ होते दरपन ता मुस केरा । मो महँ तो मुस लेत बसेरा ॥ राजकुँअर भा बाउर, छाडेउ सुख रस भोग। परे सफल संसै मों, कालिंजर के लोग ॥५॥ राज कुअर छाडा सुख भोगू । असुखी भए नगर के लोगू ॥ दस सघातिय राजा केरे । रहे सो रहे आठ जस चेरे ॥ पर चिन्त मो आठ सँघाती । आठो कह दिन भा जस राती ॥ । - ।

इन्द्रावती। काहु बात सुनवत जी दीन्हा । कोउ कौतुक पर दिष्ट न कीन्हा॥ रस सुगन्ध कहँ छाहा काहू । आठो परे बहुत दुख माहू ॥ राजा के अनमन भए, अनमन भा सब कोइ। मांगहिंसव करतार सों,माद कुंअर कहँ होड ॥३॥ आठी माँ मत्री एक रहा । राजा मानै ताकर कहा ॥ बुद्धसेन रहु ताको नाऊँ । जन्मभूमि तेहि मनपुर ठाऊँ ॥ तेहि यिनु सात मित्र अवदाही । ताहि मिले सातो सुघराही ॥ सुख छाडा सब राय सयाना । बुद्धसेन मन ससै माना ॥ कहा कुअर सो अहो नरसू । दिवस चार से कस तोहि भेसू॥ औरै तन मन देखऊ, औरै चिन्ता चाव । सुख अनंद को छाड़ेऊ,कहो कुँअर केहि भाव ॥७॥ कहा बुद्ध सो राय सरेखा । नारी एक सपन मैं देसा ॥ पहिल रात अस देखे ज्ञानी । दरपन बीच रही वह रानी ॥ दूसर निस बहु दरपन देखेउँ । सब दरपन ता रूप परेखेउँ ॥ सावत रहित नयन के नियरें । जागत आइ समानिउ हियरें। अमल रूप वह नारी केरा । मन हरिलीन्ह कीन्ह माहि चेरा॥ तामुख दुति के प्रागें, अहै सर ससि छोड । काहु निर्प की है सुता,जेहि देखेउँ निस मॉह ॥८॥ सुनि बुध राजा कहँ समुझाया। ताहि सपने महँ कौतुक आया। सपन रूप पर का विसवासू । तज मन चिन्त बढाव हुलामू ॥ फुअर कहा यह सपन न हाई । मेाहि लेखे मैतुक है साई ॥ दरपन मो दरपन मुख ताको । भाजित ठाग मुकुर साहा को॥ मोहि निपं वह प्रान पियारी । कर चहत है दरम भिखारी॥ विधुरी प्यारी नैन सो, हियरें आइ समान । रिया हाथ मा कीन्हा, भएउ परान परान ॥६॥ - इन्द्रावती। भत्री मरम कुअर को पाएत । गुनी चितेरा एक बोलाएउ ।। अस गुनयन्त चितेरा रहा । जल पर चित्र बनावै पहा ॥ बुद्ध कहा लिसि आनु चितेरा । सुघर रूप इस्तिरीन केरा॥ निर्प सपने एक नारिय देखा। रीमा तापर निर्प सरेसा ॥ होइ अहेर फाद मा आवे । देखै कुभर बोध मन पावै ॥ पहु नारिन की मूरतें, लिखा चितेरा जाइ । चुड बांह सो राजही, सकल देखाएउ आइ ॥१०॥ देखि सफल राजै मुख फेरा । कहा कहा यह अरे चितेरा ॥ कहा लिसे आवे वह प्यारी । सपने बीच थान जेई मारी ॥ ताको मृरत को लिसि पारे । दिर्ग यान बरूनी को मारे ॥ अधर तेहिक जो लिखे चितेरा । मीठ होइ लिपनी नहि केरा ॥ सुनि अस वात चितेरा हँसा । कहाप्रेम महिपति मन बसा ॥ कहि बुध साथ चितेरा, गएउ सदन कह सोइ । पहिले प्रेम न गाढा, अन्त गाद पुनि होइ ॥११॥ आना बुद्ध मनुप दम ज्ञानी । राजा नियरें कहै कहानी ॥ रूप बखान करे बहुतेरा । होइ फिरै मन राजा केरा ॥ राजा के मन बोध न हाई । सपन कहानी कहेउ न कोई ॥ जा दृग लागेउ जो रँग नीका । नीको वही आन रंग फीका ॥ जा मन आइ यसै जो कोई । ता कहँ प्रान पियारा साई ॥ रंचिक ताहि न भावै, कहै कहानी जेत । परम दवात कहै जत, दुखद होइ तेहि तेत ॥१२॥ राजा की फुलवारिय जहा । लीन्ह बसेरा तपी एक तहा ॥ मान रहा गहि तपिय सयाना । सकन तिहिकसब काहुअजाना। रात होत मन मेो धरि आसा । गएउ कुअर तापस के पासा ।।

इन्द्रावती। । . कहु जोहरिये कतहु चितेरा । कतहु कँदेरा कतहुं ठठेरा । सब भूले अपने जग धन्धा । का हिठियारू का जो अन्धा ॥ सब तो अहै वटाज, पै पाएं सुख भोग आपुहिं कोइ न जानत, है पन्थिक हमलोग ॥२०॥ पुनि बखान सुनु मन तारा को । बसुधा वीच सुधा जल ताको । जो मनतारा सम्बर पीऔ । सुख जीवन पावै मन जी ॥ आवै नीर भरै पनिहारी । सुन्दर आगमपुर की नारी ॥ और नदी तीर जस छीरू । मद अस भेद मरावर नीरू ॥ मधु अस मीठ जीउ सर पानी । यह बखान समझे नर ज्ञानी ॥ जो मानुप अनुरागरल, अचवै चारो नीर । निर्मल होड सरीर तेहि, व्याध नरहै सरीर॥२२॥ पुनि बसान सुनु मत के चेरा । आगमपुर के जोगिन केरा । वैरागी सन्यासिय जोगी । साधू सजम तपिय वियोगी॥ काउ ठाढा है ध्यान लगाए । कोउ धरती पर सीस नवाए ॥ कोउ महिपर माथा धरि रहा । जोग लाग सुख भोग न चहा ॥ बहुतन कह जगसो मुधि नाही। रीमि रहे करता उपराही ॥ रसना एक न कहि सको, आगमपुर की बात । राजा, सुखी छतीसौ जात ॥२२॥ रहा महीपति घर उँजियारा । बालक दीपक बिनु अँधियारा॥ जाइ ग्रीस महप मह पूजा । बहुत कीन्ह सँग लीन्ह न दृजा। मिव सपने मो दरस देसावा । दरस दान देइ बात सुनावा॥ बालक एको लिसा न राजा । देउ न बालक अपचित काजा। राजें कहा पुत्र जो ताहीं । होइ मुता तो मन अनदाही ॥ आतमजा जो होत एक, होत सदन उँजियार। कन्यादान दिहे सो, होते मुकुत हमार ॥२३॥ धरम धनी इन्द्रावती। 'कहा महेस काज एक करहू । रतन एक भयहप मे धरहू ॥ निसमा राखहु भार आएहु । धिर्ज धरेहु जैसा फल पाएहु ।। जैसे इस्सर अज्ञा दीन्हा । तैसें मानि महीपति कीन्हा ।। सिव दाता कह बहुत मनाया। तुम करता त्रीलोक धनाया धरती गगन पवन जल आगी, । सिर्जेठ सिर्जन बेर न लागी ॥ होइ रतन से कन्या, यह मनसा है मार । राज सदन अधियारो, तासौ होइ अँधजोर ॥२४॥ सिधा अलखसा बिनती कीया। जस है रतन जोत से दीया ।। दीप रतन सम कन्या हाई । करइ निकेत अजारी सोई॥ मा दयाल दाता तेहि घरी । वाहि रतन कन्या अवतरी ॥ भै महेस मपहप जियारी । उतरी मनहु इन्द्रपुर नारी भोर होत राजा बलि आए। मण्डप घौच चन्द्र सम पाएउ ।। परमद से मंडप मों, पुलकेउ राजा देह । कन्या कहं अति श्रादरें, आनेउ अपने गेह ॥२॥ पुन सिवरात होत सपनावा । गारिहु आपहु दरस देखावा ।। कहा धरेहु अवतार सुमाऊं । रतन जात कन्या कर नाक ॥ मोती एक बेटामो कीजे । जलधिम झारहार तेहि दीजे ॥ वह मोती काढ जो राजा । सेाई वर कन्या कर छाजा मोती फाढ न पारै कोई । फाढे सोई घर जो हाई ॥ सिव भावित के पाछे, सिवा कहा तेहि ठाउं। होत भलो इन्द्रावति, वह कन्या को नाउं ॥२६॥ राजे दो नाम तेहि राखा रतन जोत इन्द्रावति भासा॥ रूपम्मा धाई तेहि पाला लाग चले महि अपर पाला ॥ साइजो सयान भई चितगरी । पदि विद्या भई विद्याधरी ॥ ३ इन्द्रायती। लागी साप अगमपुर यारी । जोरेउ स्यामा राज दुलारी । जगपति मरम सुता कर पाया । कीन्हा परन जोस बताया। वृरे बहुत समुद्र मे, मोती चढेउ न हाथ । नहिं जाना को देह है, सेंदुर ताफी माय ॥२७॥ मण्डप मा माते सघ भागे । यरसदेवस पर तीरथ लागे ॥ जय आगमपुर फह मैं गएक । पूजा नित मगहप मह भएका ।। तति खन मै और पुकारी। आवत है जगपति की वारी । पन्य देव घाउ रहइ न आगें । जात मैंडप फह पूजा लागें ॥ पन्थ छा भासघ कोउ ठाढा। सबके हिये प्रेम रस यादा पंथ छाड सर ठाउ भा, नैन भएउ सब देह । इन्द्रावति दरसन नित, सब मन बढेउ सनेह ॥२८॥ सब मानुस मन प्रीत घनेरी । उपजी इन्द्रावति मुरा केरी। मुकुर बने चाहा सब कोई । जाम आइ परै मुख सेाई सविन साथ इन्द्रावति आई । घरनि न पारी सुन्दरताई रहिन सखी सुन्दर जहा ताई। जिअस लिहें रतन कह आई। देह भई सय आगम वारी । जीउ रही इन्द्रावति प्यारी ॥ सखी रहीं अन्तर पट, देखा विरलै कोइ । मंडप धीच गई वह, सब को मति नग खोड ॥२६॥ रचिफ तेहि देसा जे कोई । कीन्ह बयान आप मे साई ।। काव कहा अहै अपरा । नहि चितएउ ऐसें मन हरा ॥ काव कहा दिष्ट जो देती । मन औ प्रान दोज हर लेती॥ रूप गगन जग काया वारी । है जिट है जित है जित प्यारी॥ जो वहि मुख को परगट देखा । गूग भएउ भा बाउर खा ॥ तेहि अस आपुहिहोइ रहा,रहान ताहि विवेका जातें जानें एक मै, श्री इन्द्रावति एक ॥३०॥ ॥

इन्द्रावती। इन्द्रावति घा कीन्ह बहारा । ससि होइ ले नछत्र चहु आरा॥ आप गई मन्दिर कह प्यारी । बहुतन को कइ गई निसारी॥ जो रविक ता दरसा पाना । हाथ मलेउ मानेव पळतावा ॥ कहा सहेलिन वैरिन भई । वोटै वोट किहे ले गई आज आइ वह परगट भई । मिला न दरस गुपुत हो गई। सुमिरे सिरजनहारही, जर देवेडं असरूप । ऐसा रूप संवारहु, धन्य त्रिविष्टपभूप ॥३॥ है पदुमिनि इन्द्रावति प्यारो । ताको बदन रूप फुलवारी " कोमलताइ सुन्दरताई । सै रसना से बरनि न जाई ॥ दिर्गन हरा मान मृग केरा । मन लजाइ बन लोन्ह बसेरा ना अति लाव न छोटी आही। है तस इन्द्रावति जस चाही ॥ यह बखान का धरने हाई । जो देखा जानहि पइ सेई . कै बखान जोगी कहा, माहि जाने होराय । चन्द्र बदन इन्द्रावति, ताहि सपनाएउ आय ॥३२॥ पहिले इन्द्रायति सुकुमारी । रहिल रतन दरपन मो प्यारी॥ जब जगमा अवतरी मवेली । ताको दरपा अई सहेली है वह दीप सिसा उँजियारी । आपन जोत सखिन मेो डारी ।। है वह रतन सान आता को । जोत सुरूप रूप है ताको है आनन्द यदन यह प्यारी । उवि वापर है लट सटकारी ॥ इन्द्रावति है पदुमिनी, रम्भा तुलै न ताहि । एक जीभ सों कितमैं ताको सको सराहि॥३३॥ सुनत यसान फलिजर ईमू । तपिय चरन पर हारेउ सीसू ।। कहा कुपर हो सिद्ध सरीरा । ओपद दै फाटेहु मन पीरा ॥ सपन विचारेहु मार गुसाई । पीरा हरे रही जह ताई । ।

२० इन्द्रापती। ॥ हिराती कर फरहु यखानू । निसधे हरा साई मन जानु ॥ तजि का राज होय में जोगी। इन्द्रायति पर हात पियोगी ।। है।मैं चेला तुम गुरू, पिने करत हो तोहिं। आगम पन्ध देखावहु, लै पहुचायहु मोहिं ॥३४॥ तषिय कहा ताहिजोगन छाजा। वैठे राज करीजे राजा अद कठिन मागम को याटा । गहिर समुद्र न थाह न घाटा॥ ओ है गुलिक काढियो गाढा । सिन्धु न जाने तट जो दाता ॥ है हम कह तीरथ यहु करना । फासिय पन्य उपर पगधरना। जाय पयाग करत अस्त्रानो । पुनि महेस को देसठ थाना ॥ तपी भेस मैं मानुप, नाम मार गुरुनाथ । तब गुरुनाथ कहाव, जय आन तप हाथ ॥३॥ फुपर कहा गुरू नाथ गोसाई ।राज रहा मीठा अवताई अब निसचे में होय भिखारी । तहा चलिजाउ जहावह प्यारी॥ जित को लोभ कछुहुमोहि नाहीं। ता नित पैठउ पावक माहीं ॥ अगुवाई जो कीजे नाथा । तो वह मूल होइ माहि हाथा॥ मा तो सुमिरत दया तुम्हारी । जाउ तहा होइ तपसि भिखारी॥ राज पाट सब छाड़उँ, लेउ अगम को पन्थ । पन्थिक होऊँ अगम को,परिर जोग को कन्ध ॥३६॥ जाना तपी तजहि सुस पाटा । हिमें सुधान अगम की घाटा। सकत आपनो परगट कीन्हा । देव दिष्टि राजा कह दीन्हा॥ माया रहित फौन्ह मनुसाई । उपबन सेो कीन्हा अगुवाई ॥ फुलवारी मेराय सरेखा । पन्थ सहित आगमपुर देखा ॥ देखा देस अगमपुर केरा रीझि रहा राजाभा घेरा अगम पन्ध मन मों सेउ, भूली दूसर बाट । हिद चिन्तसोउ तरिगा,राज मुकुट श्री पाट ॥३७|| ॥

इन्द्रावती। २१ । तपिप फहा राजा कुछ सूझा ।राजा सुनत मरम सब यूझा ॥ कहा भए कृपाल गोसाई । सूझी बाट रही जहा ताई सूझा इन्द्रावती कर देसू । होएत मिसचे जोगिय क्षेसू ॥ सुनि गुरनाथ ऋपेश्वर जाना । पन्थ अगम राजहि पहिचाना। गुपुत भएल पुनि कुवर न देवा । आएत मन्दिर राय सरेखा ॥ गुरू जानि गुरनाथहीं, चेला आपुहिं जानि । आगम जोग धरा चित,मन परान से मानि ॥३८॥ काटिजर से नए उदासा । भएनरफ मन्दिर-कविलास सुन्दर फहा फन्त कस जीक । फस उदास तेहि देखत पीक ।। परेत सीस ऊपर का भारा । जदा है जीउ तुम्हारा दीन्हा कतर सुन्दर केरा । सैतुक बीच सपन भा मेरा मुनेत आज मैं तेहिफ बानू । सपन देखाइ हरा जेइ ज्ञानू ॥ राजपाटधन भोग सुख,सब तजि साधांजोग। जाउँ वोही के देस कर, शेर संजोग वियोग ॥३६॥ सुनि के कहा सुन्दरी राजा । तुम्हे भोग तजि जोगन छाजाम सुख सम्पत सब दीन्हा दाता । मारु न छीर भात मो लाता॥ कहा रहे अवलग मैं भोगी । अब मैं होत अगम को जोगी। केरा लेउ जाइ तेहि गलिय बसेरा। आगै बीच रह जठ भूला । कित माहि हाथचढइवहमूला॥ तुम फामिनी मत हीनो, भोग सुपाबहु मोहि । प्रेम खींच है मो कह, सझबुझ नहिं ताहि ॥४०॥ राजै राजपाट सुख तजा । प्रेम आइमति सा अरबजा ॥ मनमो प्रेम बसेरा लीन्हा । बरबस राजा प्रेमिय कीन्हा । मेम अगिन मममा उदगरी । तासा दाल बुद्धि कर जरी जागी होत अगमपुर -- २२ इन्द्रावती। भारवाही राजा सिर परा । जो न ओमहि को बठहरा। নিম্ন को धन मनुपाई । जो अस भारिय भार उठाई ॥ प्रेम आग के बाड़े, मेधा भयो मलीन । सूर किरिन के आगें, है मयंक दुति हीन ॥४१॥ रे कल पार आय पलि बेगें । है। में ठाद सिन्धु मा नेगें है निर्मल मद सदा तुम्हारा । मोहि लेखें सज ठाकुर द्वारा ॥ दे मदिरा भर प्याला पीवो । हाइ मतवार कापरा सीवा ॥ सो कायर काधे पर हारत । जोगी हाइ जग चाहत मारठ॥ हेच जोगी हि देसहि जाऊ । है जेहि देन सुमीतम ठाज मोहि यह देस न भावत, छन है घरपसमान । अब तेहि देस सिधार,जहा रहत वह प्रान ॥४२॥ ॥ [१] जोगी खण्ड। छाडेउ कुभर राजसुख भोगू । साधेउ आगमपुर को जागृ । भा जागी इन्द्रावति लागी । लीन्हा सारङ्गी अनुरागी राज दुकुल मय तुरत उतारा जाग काथा काधे हारा रासा जटा घढाएठ रोहा । कीन्ह सनेह सनेहिय देहा जावत जोगी रहा ममाजा । तायत कीन्हा प्रेमिय राजा ॥ आठ मित्र राजा के, पहिरा जोग दुकल । सुस सवाद को चिन्ता, गण्उ चेत सो भूल ॥१॥ चन्दन चढत रहा जेहि काया । सो तेहि काया असम चढाया। नित जेहि सीम फुलेठ घढाए। भसम चढाए जटा बढाए ।

इन्द्रावती। जेहि कर सरग बीज सम रहेका तहि फर सारङ्गी ले गहेज ॥ घरन धरनि जेहि पाय न ठाऊ । तेहिपगु राजहि लीन्ह सराक ॥ प्रेम पाय वह राजा भोगी ।भातजिभोग आगमियाजोगी॥ राज काज तजि राजा,लीन्ह अगम को जोग। परेउ नगर कालिजर, राजा कारन सोग ॥२॥ समुझा कालिजर वासी । राजा मन की तजहु उदासी ॥ जाको रूप न देखेहु राजा । तेहि कारन यह जोग न छाजा। आनहि जागत है। वह नारी। है वह गौर कि सावर कारी ॥ देस घात जेई कीन्हे उ फेरा । से जन मूठ कहा बहुतेरा ॥ तपसी बहुत देस फिरि आएउ । झूठ कहानी तुमहि सुनाए । राज न झाडहु राजा, होहु न जोगी भेस। ना होइहि इन्द्रावती, ना आगमपुर देस ॥३॥ कहा प्रेम है जाकर नाऊ । सुनि बसान उपनत मन ठाक। तपिय न भाषा झूठ कहानी । साच रही तय हिये समानी ॥ इन्द्रावति दाया पर आएठ । मोहि नित प्रेम बनीठ पठाए॥ तव न वसीठ अहै बरियारा । फादा आइ ग्रोउ मह डारा आगमपुर दिम सावत सोई ।कैसें रहन कलिजर हे.ई सावर गार रङ्ग को, अ न हम कहं ग्वाज । नैन भवर सम होइ रहे, चाहे दरस सरोज ॥४॥ पुनि बोले कालिजर लोग । राज छाड कित लाजइ जोगू ॥ गगन समान जचगढ आही । अस गढ उन्नत तजइ न चाही। दूसर ऐसे है नहि कोई । पाठे राज सम्हारइ साई नहि जानहु परदेविय साझा । परघत सो भारी यन माझा ॥ ओ रामा अस कहइ न कोई । आगमपुर को अगुवा होई ॥ ॥ ॥ ॥

२४ ॥ ॥ इन्द्रावती। अनुया विना न पायहु, आगमपुर को पन्थ । जनि दुख वस्तु साहहु, पहिरिजोग को कन्ध॥शा कहा राज आवइ केहि काजू 1जोग धीच पाएठ मैं दोग जगत देव मा कोक । एक रती पर लेट न देता यह गढ से का फरठ हिताई । है गढ ढहन हार दहि जाई॥ मागमदेस सूमि मेाहि आएन । गुरू नाप माहि पन्ध देखाए॥ मा मन यसा प्रेम तेहि केरा । उहद प्रेम अगुवा है मेरा मैं जोगी हर यावरो, जाउं से आगमपूर । यात समेटहु श्रापुन, है जाना मेदि दूर ॥६॥ कहेन लियर अस घलन न छाजा। गवन सुदिन साधिकइ राजा।। जाते जोग लाश कर होई । सुदिन साधि गवनत सब कोई॥ कहा माहि प्रेम घरी नहि देई । कैसे गवनउ सुधि नहि लेई ॥ तादिन गवन सुदिन मैं पाया । जा दिन प्रेम हकारइ आवा॥ आई प्रेम तुरतें गोहराई । चलहु चलहु दिन यीना जाई । प्रेम न देत घरी मोहि, देवस कहां से ले। भला देवसहै यह दिवस, आगमपुर पग देखें ॥७॥ कालिजर के लोग जो रहा । राजा साथ चले सर कहा बिनय कीन्ह सबसे तब राजा । प्रेम के पन्ध बटोर न छाजा॥ कठिन अगम सचर है भाई । हलुक रहत तो पहुचत जाई ॥ दुचित रह तुम नित मन ठाऊ । सुमिरि न सक्छ प्रीतम नाक ॥ घाटै गरब देसि के सैना । मदतें कहउ गरब की वैना ॥ होउँ अधीन अफेला, कटक न लावउँ माथ। मकु अधीनता सो चहै, आइ बलम्भा हाथ ॥८॥ कहे न अकेल न साधहु जे गू । का बोलहि आगम के लेागू ॥ ॥

इन्द्रावती। २५ नृप नहि को अहद भिखारी । कित तेहि जोगें राजकुमारी ॥ ठाकुर गरुअ अगु से हाई । जेहि सँग अगु गरुव है साई ॥ लोग कहे जह लेहु घसेरा । है राजा कालिजर केरा ससि तारन को सेवक पाया । निसिपतितारापति कहवावा। जानि परत राजा नवन, परी न है यह बोल। टीडी दल के ब्रास तें, होत दमामा ढोल ॥९॥ दीन्हा उतर महीप वियोगी । है। अस भीस लाग मैं जोगी। भेप किहें वह भीख न पावत । तय पावट जब भेष नसावठ ॥ उवत अकेल सूर उजियारा हेत अलोप चन्द अयतारा ॥ प्रेम मगन हाइ बदन देखाए। माही ससि की प्रभुत नमायउ॥ गइ अय हाथ सा आपा मारी। प्रेम करइ दुति लीन्हेउ छेरीि ॥ चन्द्र हाथ भा छछा, रहा न मन को गर्व । तारा सङ्ग लेह कित, लटि दर्व गा सर्व ॥१०॥ प्रेम भान जो दया करी है । फिर जो तामा समि कह दी है । तजिकै चलेठ जो नामको ठाऊ । जेागी भए न चाहै। नाऊँ ॥ जन मै आपन नाम भुलाव । तय वह नाम जपत रस पाव ॥ जो मैं चहतेत आपन नाक 1 करतेउ राज कलिमर ठाऊ ॥ पिरहु सबै मै हेरठ बटोही । साथी आठ बहुत है माही ॥ राजा आयसुमानि सय,फिरे कलिंजर माहिं। अगम पंथ पगु राखा, कुवर जोग को नाहि ॥११॥ सुन्दरीहु ते उठे पुकारा । हम केहि कारन करम सिगारा चिनगी भएउ साग से पूनी । प्रीतम चला सेज भइ सूनी ॥ के सोनार हथफेरा कीन्हा । कनक साहाग मेोर हरि लीन्हा यशत सदन केइ सुत्रु उजारा । हरि लेइ चला परान,हमारा॥ - इन्द्रावती। २६ राजा पन्थ अगम पर चला धन के रोयत रोषद चेरो । फोरेन बलिया लागेठ ढेरी । लाजवन्ति सुन्दर रही,पियहिंन घरजा जात। धीरज हिंदै मोंधरा, कछु न सुनाएउ यात ॥१२॥ सुन्दर कह समुझाव लागू । राजै लीन्ह अगम कर जोगू ॥ राए ताहि न होइह भला जो रोए से राजहि पावहि । अस रोवहि त्रीलोक रोवावहि। रोए से पिय फेरि न आवहि । फरु साई जासे सुख पावहि ॥ दिन दिन अहम राइयो रानी। अब यह सामै समुझि सयानी॥ चहु दिस सय समुझावै, गई जनहु ठगमार। घसा मंदिर कविलास सम, प्रीतम कीन्ह उजार॥१३॥ जोग रोल आगमपुर खेला । गुरुअ अकेल आठ सम चेला ॥ छोरेन कालिजर गढ ठाऊ । सुमिरेम इन्द्रावति कर नाऊ। । आगमपुर अहद केहि ओरा ॥ जेहि मगु लाग लीन्ह तुम कन्या। है राजा केहि दिस वह पथा ॥ कहा चले आवहु मोहि पाछे । जेहि दिसघलहुचलहुकटिका जब हम तजा कलिजर, लोन्द जोग को कन्ध । मन मो बुझहु चेत कै, इहइ अगम को पन्थ ॥१४॥ । लिहे न बसेर देहपुर गाक भजन जीभ की राजै साधा । खाय अहार मेम से आधा ॥ जोगिह आपन उदर न भरई । मन मोजोग अस तव परई ॥ उदर भरे घट जोत न होई । खाय मनाक जोगेमर साई ॥ जपत कुवर इन्द्रावति नाक । काटेउ रैन देहपुर ठाऊ भोर होत भा पन्धिक, सातों बन नियरान । पहिले यन म आएउ, देखत चित्त हेरान ॥१५॥ पूछइ चेला करइ निहारा ॥ करत पयान जपत वह नाक ॥

इन्द्रावती। - पहिले बन मा राज सरेखा । भातहिभात कि पच्छिय देखा। एक कहा बन फेरा कीजे । पत्री भात भात लखि लौजे ॥ राजें कहा जोग हम लोन्हा । आगम पहुचै पर चित दीन्हा॥ बीचहि मा रङ्ग देखि भुलाऊं । कैसे आगमपुर कह जाऊ एकै रूप इन्द्रावति केरा | माहि आखिन मोलीन्ह बसेरा। जो मैं फीरौं दुर्ग मों, तजि के सुधो पन्थ । याउर फिरों भुलाना, काटें बाझै कन्ध ॥१६॥ दुसरे बन मो राजा आएठ । मधुर सबद पच्छिन से पाएट एक कहा यह सबद सेाहावन । थिरके सुनि लीजै मन भावन ॥~ राजै कहा घिरते तेहि टाऊ । जहा सुन इन्द्रायति नाक सरवन वाही सबद पर लाव। जामा नाम रतन कर पाय॥ मान सबद है मोहि विष यानू । सरवन परत लेत है प्रानू जो सुरपुर की अपरा, राग सुनावै आइ, ।। मोहिन भावै रंचि को,यरु मोहि धै धै खाइ ॥१७॥ तिसरे बन आएठ नरनाहा । मिलेठ सुगन्ध तहा बन माहा। साथिय एफ कहा हो राजा । यह बन लेत बसेरा छाजा प्रान आहार सुगन्ध बसाई । लेहु प्रान को प्रान अछाई फहा प्रीतम लट कर वासा । पाहत है।रास नित आसा॥ है इन्द्रावति आप अकेली । कमल चमेली मालत बेली ।। तेहिमालत की घास पर, है। मैं मधुकर भेस । कह पावउ यासमैं, जाइ अगमपुर देस ॥१८॥ जब आये धधेि बन जहा । फले बहुत फल देखा तहा साथिय एक कुधर से बोला । फलहिफ्लिोफिारसनासोल। माज कर धन बीच बसेरा ।तारि महार फरह फल फेरा । । ॥ ।

२८ इन्द्रायती। राजें कहा भूस माहि नाही । खाउँ कहा फल यह वन माही॥ है। अनरुध चाहना कसा । यहि दरसन का है। मैं भूखा ॥ है वरती तेहि पन्ध को, इन्द्रावति जेहि नाउँ । फल अहार तेहि दरस को,चा ितेहि दिसजा ॥१९॥ कादत पन्थ महीप सयाना । पचाएँ धन मे। आइ तुलाना ॥ छोटहि छोटे कोमल घासा । महि पर लागि रहा चहुं पासा॥ साथी एक कहा मन भायन । है अति कोमल घास पिलावना पन्य बहुत फाटा तुम भूधर ।दर विसराम करहुतेहि ऊपर ।। कह की कोमल सेज जो चहते। राजहि देम कलिजर रहते ।। मोहि विसराम कहां है,जब लग दरसन होइ । चले हिर्दै पाटिसों, सुख को अच्छर धोड ॥२०॥ छठएँ बन मो राजन आएर । सो बन नाचत बेर न लाएउ ॥ नाम जपत इन्द्रावति के । सतएँ बन मो लीन्ह बसेरा साथिय एक कुंवर से कहा । धन बिगहरि से छूळेी अहा ॥ राजै साथी को समुझावा । जेहि दरसन पर मे चित लाया। मदद हमार सघातिय साई । काहेक भेंट बाघ से हाई कामक्रोध तिसनामया,जोनहिं जात नेवारि । नरक होत बन सातो, हम कई पन्थ मझार ॥२१॥ जय राखत है। मगु पर पाऊ जात एक तारा सम आगे ।विष्टि परत देखद अनुरागे ॥ जो अय दाउँ छाडि का पन्था। भूल कादे याम कन्या तिना मारि पन्ध जो चला । ताकर होड पन्थ मह भला ॥ शाही जो चाहे भल होना । धारा साना थारा साना नूर मरम्मद सो मनुप, जिझै सदा सुख चैन । प्रेम पन्ध मो जा मन, जागा दिन अउ रैन ॥२२॥ । वाढत मानस आगम चाऊ ॥ ॥ ॥

इन्द्रावती। २९ ॥ जब साता बन पाठेघडारा । पहुचे तब देहन्त मझारा सात ससा से राजन बोला ।बात विनै रस पागिय ला॥ है। मै तासु गलिय कर जोगी । जा सुमिरन सो जगत सजोगी। है। मै जोग पन्थ कह काचा । एका जोग भेद नहि बोचा तुम सब कह मै साथ लगाए। जाइ न सकउँ लाज मैं पाए। थिरहु सबै देहन्तपुर, तब मेलेउँ बोलाइ । जय मोहिं अलख दयालहोइ,जिउकों देइ मिलाइ॥२३॥ साथिन को बिछुरन की बाता। चास बान होय बेधेसि गाता ॥ फहा न मेटेन राजहि केरा ।रो लिहेन देहन्त बसेरा आज विमुरा मा प्रान हमारा । हम कह मङ्गसो कीन्ह निनारा॥ जो आपन सँग तजि के जाई ।प्रीत किहे सो कोन भलाई ॥ सुस है जय लगि रहै मेराक । बिछुरत जिय पर मारइ घाऊ॥ ता सँग प्रीत करीजे, जियत न छाडै साथ । ना तो विछुरे प्रावई, पछतावन निज हाथ ॥२४॥ घुद्ध सेन सँग ले हित स्वाती नाघा बन औ परबत पाती ।। आगे आइ सिन्धु नियराना । पार जाइ कह गाढ अटाना ॥ सात सन काया पति बनि जारा। आइ यहा उतरइ कह पारा ॥ पूछा मरम जोग कर सोई । राजै कहा न रासेत गाई प्रीत बीज काया पति बोवा । आपन विपति फुवर सारीवा। जो कानन तुम नाघि कै,आए? तप के जोर। तेहि कानन एक साम, दरव लूटि गो मोर ॥२५॥ यनिज लाग आगपुर गएक । आगम हाट यीच में एक ॥ हाट जहा आगमपुर केरी । देरो याहुत वस्तु फइ ढेरी ॥ माही सहा छत्तीस जाती । लेन देन करहि दिन राती ॥ - ।

३० द्रिायती। आवा गपन काइ मय कोई । यस्तु लेहि जस पूज़िय हाई ॥ पूंजी रही तपस में लीन्हा । यनमा अलप अदरयी कीन्हा॥ पुनि दयाल भा दाता, सुमिरत ताको नाउँ । आगमपुर की हार कहं, घस्तु घेसाहन जा ॥२६॥ वाहित चढे देक धीमान 1 कायापनि और कुवर मुजानू ॥ पल पल उठे लहर हलकोरा । सेवक सेवत मुरा नहि मारा॥ लरि समुद्र को उरमी गादी । सेवक बात बोध कर काढी ॥ मनते साहस तजहुन राजा । लाइ अलसतटपुर इहि काजा।। लहर देसि जो धीरज तजा । तीर न मिल सिधु मह भजा ॥ धीरज धरे रहहु मन, सुमिरहु एकहि नाउँ । गि तीर तुम पावह, धीरज के साउँ ॥२६॥ हा खेवक भाषा तुम सला । ज्ञान सरोत भएउ निर्मला ॥ ताहि समुद्र मो है। मैं परा । जेहि आगें यह बुन्देक धरा अम्बु सीस ते नीचेह नाहीं । सात समुद्र होत उपराही प्रेम समुद्र की लहरै गाढी । तन सो जीउ लेत हैं काढी सुमिरन मान पियारी केरा । जिउ कह तन मे देत बसेरा ॥ प्रेम समुद्र अथाह है, चूडे मिले न अन्त । तेहि समुद्र में है। परा, तीर न मिलत तुरन्त ॥२७॥ खेवक गुनी तीर लेइ आधा । सिन्धु तीर सब काहू पावा ॥ अब्ध पार होइ राजा जोगी । जाइ बसा जिउपूर वियोगी ॥ जिउपुर माह प्रेमिय राजा 1 गुपुत माप घटमा उप राजा ॥ जे मूरत तेहि प्रेम बढाएउ । स्वात पत्र पर ताहि बनाए । तेहि ऊपर अस ठाएउ ध्याना । रहि गइ मुरत आप हेराना ॥ तेहि पल एक चितेरा, श्राएउ राजा पास। जोग फूल को मधुकर, भएज पास रस आस ॥२८॥ ॥

इन्द्रावती। जोगी मरम चितेरहिपावा रहसि कुवर को यात सुनावा।। जो चाहसि लसु नेहिय देहा । इन्द्रावति को मूरत ग्रेहा राजै सुनि के बदन न फेरा । पछि लाग भएन चितेरा केरा ॥ जाए चितेरें सदन उघारा ।ा मन्दिर में राज कुमारा ॥ सहस अठारह मूरत देसा । देखा रानिय रूप सरेखा भएउ विचित वियोगी, चित्र संवारन हार । मन्दिर बाहर कीन्हा, दीन्हा फेर केवार ॥२९॥ जय जागा मोहा अनुरागी ।अधिको प्रेम अगिन मन लागी॥ मेधा दारु हितानल पाया । उवर बढावा ताहि जरावा ॥ जब जिअन्तपुर पहुचा राजा । बुद्धहि छाड तहा से भामा ॥ युद्ध सेन बिठुरन दुस भेंटा । पै राजा को कहा न भेटा आप जिअन्तपूर मह रहा । धीजे गहा बिछुरन दुस सहा ॥ कुंवर अकेला होइ चला, लै सारगी हाथ । जेहि कारन भा जोगी, तेहिक प्रेम तेहि साथ ॥३०॥ । राना को जित मन रह साना॥ दिष्टि परा जयहीं फक्लिासा । मिलेउ सुगन्ध प्रीत को बासा ॥ जतिय एक राजा संग लागा । जोगी जाय कि रस मह पागा॥ कहेसि काहा लग गवन गोसाई। लेय बसेरा निसि केहि ठाई ॥ हम तापसी अगमपुर जाहीं । कयन देस तुम हिरदै माही ॥ कहा जती से राजा, आगमपुर मैं जा। रात बसेरा लेई मैं, एहि आगमपुर ठा॥३१॥ अहो बहुत ठाक है तहा । रात बसेरा लेइ है। कहा जे देसै चाह अल नारी । मनतारा पर जाहु भिखारी ॥ ससि बदनी पनिहारिन आवै । परगट आपन रूप देखावै ॥ आगमपूर आइ नियराना ॥

३२ इन्द्रावती। । । कहा जो चाहसि पछु वस्तु येसाहै । हाठ घसेरा नीको आहे जो तुम होहु भोस कर चेरा । राज दुवारे लेहु बसेरा जो विद्या तुम चाही, पहुचहु विद्या ठौर । नां तो इस्सर मंडपै, भलो नाय ना और ॥३२॥ कुवर मैं लेब बसेरा जहा थान गोरीपति केग जा दिन मै गुरमुप फल पावा । रूप एक मोहि गुरु देखाना॥ वही रूप है हिर्द समाना । आन रुप मे हिये न आना ॥ छुछ दरब से हाय हमारा । वस्तु लेन की नाहिय् पारा आपन भोख ताहि मैं चीन्हा । जोग भेष जेहि कारन लीन्हा॥ है जोगी जेहि दरस नित, धापन दहौं सरीर। विद्या है तेहि रूप को, अन्तप पट गम्भीर ॥३३॥ भा आगनपुर कुगर वियोगी । मानहु मरग बी व सा जोगी। महि निर्मल देया तपधनी । धरतो मनहुरूप की बनी रहेठ आप माटी एक मुठी 10एउ प्रेम बल सो वैकुठी ॥ करता हित मॉटी सङ्ग हेरा । नासा गरब पाव किय केरा ॥ मॉटीभीतर रतन छिपाया । या नित आदर तेहिक बडावा सर ऊपर उत्तम जनम, अलख मानवहिं दीन्ह । आपन थाती ताहि है, थाती हारा कीन्ह ॥३४॥ महा देव के महप पाता । राजा बसा मनोरथ आसा जाइ सनेही निस जब पावा । स्मर के आर्गे सिर नावा महादेय देन के देवा । होहु दयाल करब मैं सेवा नहि नहि प्रभूना । सेवा जोग कहा माहि धूता ॥ हा अन्ता जामी तुम देवा । जानन हा मात्र मन कर भेवा। होइ दयाल गारी पती, पुरवहु काज हमार। मनसा प्रजै कारने, लीन्हा सरन तोहार ॥३॥ ॥ ॥ ॥ ॥

इन्द्रावती। ३३ । मिले . जब महेस कह बहुत मनावा । सबद एक महप से आधा ॥ प्रम पूर पूरा है जहा । रानी की फुलवारिय तहा तेहिक नाम है मन फुलवारी । थिरहु जाइतेहि बीचभिखारी॥ वाहि फुलवारि लेहु बसेरा दरस इन्द्रावति केरा सबद पाराजा रहसाना । सुमिरिसुमिरिइस्सरहि बखाना।। रैन गवाएउ जाप मों, भोर होत तपि नांह। प्रेमपुरा में होड कै, भा फुलवारी माह ॥३६॥ जय राजा फुलवारिय आएउ । यास सुगन्ध प्रीत कर पाएउ ॥ मन फुलवारी मन फुलवारी ।भएउ भएउमनमुदित भिखारी। फूलन सेो दरसन कर घेरा । पाएन रँग इन्द्रावति केरा पर चिन्ता कह छाडेउ जोगी । एकै चिन्त मो परा वियोगी ॥ मन बारी मन बारिय पावा । बीरो प्रेम प्रीत को लाया प्रीत बीज मन खेत मां, वोएउ राज कुमार। इन्द्रावति को दरस हित, बैठा आसन मार ॥३७॥ । जेहि दरसन ऊपर चित रहई । यचन देखाव दरस को कहई ॥ देख न मको हाइ सदेसा । अन्तो प्रगटै किरपा भेसा जात सैल के ऊपर हारइ । दरम देव अन्तर पट जार गिर बुद्ध वैसाखिय करसो । हाइ सरप तेहि घरइन डरा।। आय सुपाय परइ तब सेाई । जैसो रहै तयस पुनि राई दरस पाइ कै मुरुम, रह न चेत गेयान । प्रेम अरथ यह भापित, बृझै चतुर सुजान ||3|| अरे मित्रनी प्रेम पियारी ताहि सम नहि दृमर काटयागा फागुन मास बीच जस लीमे । खेलउँ फाग याममियटी एफ पियाला हाला पाय । वासहि साहिटीरियायत ॥ ।

मावती। जोतिक भहे काय रुद अगू । वेतिक करहु ताठ मिरगू ॥ मुस के पाव तरें मिर ना । दुप के मिर पर हालिक लाव।। पिना कदम्परि के पिणं, नाम न मन सोजात । दयावती होड दीजिये, होलिक लागी मात ॥३९॥ ॥ [५] फाग खण्ड। आगमपुर कविलास महारा । फागुन आइ अनन्द पमारा ॥ एक दिस पुरुसे एक दिस गोरी। हिलमिलगावहि चाचर जेारी। हैफ बजावहि औ मिरगू 1 पिचकारिन मे भरइ मुरगू ॥ धन के ऊपर हारहि नाहा । धन डारहि पूरुप उपराहा रग अबीर भरा सब कोई । जो जहा रहा भरा तहा साई॥ गली गली घर घर सकल, मानहिं फाग अनन्द । मात सय थानन्द सो, भा फागुन सुख कन्द ॥१॥ फैस आनद मानद कोई । सै चिन्ता पाळे सत होई और फिर आएज कहा अगोरा । वहु बहुत हँसहु तुम थारा॥ मन पर घटा बुन्द बरमावा । एक बुन्द पर मद को आवा ॥ औरन सा मानुप नियराना । नियरे सो हर बीच ममाना ॥ राजा नियर रहाइ जउ कोई ना कहें बहुतै चिन्ता हाई ॥ राजा के अस्थान सों, दूर पसै जो कोइ । तेहिमन निप किठोर मो, चिन्ता बहुत न होइ ॥२॥ इन्द्रावति राजा कर बारी । आगमपुर की प्रान पियारी । सासिन माथ भूली मुख केला । भूली फागुन की सेलो धन के अङ्गन यल तरुनाई । आई उयि अधिकार प्रदाई ॥ ॥

इन्द्रावती। ३५ ॥ जोबन लाज नयन मेा दीन्हा । मुगधा मे मध्या तेहि कीन्हा॥ गइ चचलताई थिरताई । आई लाज निकाइय पाई धन सूर्फे चितवतरहीं,निस दिन जेहि अंखियान। सोतीछे चितवन लगी, जोवन के अभिमान ॥३॥ इन्द्रावति सँग ससी महेली । गावहि गीत मनावहि केली ॥ ससिन माय इन्द्रावति ठाउँ । सजनी रही बिरहनिय मा। सावत मन बिरहिम को जागा। रही कमल अलि सङ्ग,न लागा। गाएउ होरिय विरहिनि गोरी। तरुनाई सामय हइ थारी जात अकारथ है पछताना । कान्हा कुपरिहि मग लेभाना ॥ है अथाह जोवन उदधि, थाकी नाव हमार। खेवक कान्ह कहा है, खेइ लगावद पार ॥४॥ लासा कौन मिलै जग माही । जो प्रीतम अपने घर नाही ॥ धन पिय कोरे पिय धन कोरा । सेविहि है दुख हम धन वोरा ॥ है जोबन हस्ती मतवारी । कहा महाउत आकुस धारी ॥ विर्थ खाब साइव भी जीवन । पिउना जिवना लाहुब पीवन ॥ बिरह आग नित जारत देहा। अन्त एक दिन हाबइ सेहा ॥ जाइ बसाएउ मधु बनै, निर्दै नन्द कुमार । हम धन अरै रात दिन, गोकुल भएउ उजार ॥५॥ होरी पारी होरिय प्यारी । है नाही है भारन हारी गोरिन जारिन के मँग हारी । गावहि होरिय बैरिन भारी ॥ बना नहीं आएउ जोयना । गा सुख दुख आएन अँगना ॥ फाग राग अनुराग बढावै । बिरह भाग ननदाग लगावै ॥ बिनु प्रीतम बिछुरन धन माही। अहउ परी बन आवत नाही। करता जे किरपा करै, मील प्रीतम प्रान। नाही तो जिउ जात है, फागुन होत निदान ॥६॥ - ॥ इन्द्रायती। मुनि हरी इन्द्रावति रानी 1 अलि आपमा आतुर स्थानी॥ जेधन सिन्धु सात गाहा । ना तो पार हाइ कह थाहा ॥ खोज हिये सेवक फर कीन्हा । तजि आनंद तायर चित दीन्हा॥ दो उदास रानि जमुहानी । युझे न शानी सखिय सयानी ॥ कहे न ध्यान धन का पर दीन्हें । धनुकै बीच चन्द्रमा कीन्हे ॥ इन्द्रावति सखियन मों, राखा मरम छिपाइ । दिन भर धन व्याकुल रही,गा निसनीद पराइ ॥णा बीती रात भएउ जब भारा । एक सखी आएत धन आरा ॥ वैठिय घोलिय यात रसीली । तुम प्यारी सुकुवार छबीली ॥ सेना रूप घात ताहि माही ! ऐसी रूपवती कोत नाहीं फेहि लाहै यह छवि अधिकारी । आपन बदन न देखद प्यारी॥ दरपन दे देसु मुप साक्षा । एतो दिन लग जामा सेक्षा पहिले भंजन नैन मो, दै लीजे हो मान । तव दरपन लै देखहु, बदन कनक को यान || सखी बात धन सरवन कीन्हा । अजन स्याम सखी तेहि दीन्हा, दीन्हा अजन आखिन माही । दरपन ले देखा परछाही देखि बदन कर भजुल सेसा । धन मन अपने रूपहि लेना आपुहि पर रीझी वह प्यारी । रहिल अचेत भइल सुधधारी ॥ पाए चन्द्र बदन उजियारा । कहा कहा है देखन हारा भएउ फल इन्द्रावति,चित गांहकपर दान् । हीरा मनि दिनु जौहरी,कैसेहु जाईन चीन्॥९॥ अध्यापुल इन्द्रायति रानी । मन मा गाँहक सेाच समानी। लाग दोहाग मरीर मझारा । दगध दोहा को अहै अपारा ॥ भइ विषहरु इन्द्रावति घाठा । भयो कपाल इँगुर हरताला ॥ -- ॥

इन्द्रावती - ईगुर अधर दसन यह पारा । प्रेम काग दाज फह जारा । अधर न हँमा न रद विहसाना। सा संकेत मन कलिय समाना॥ धन मन प्रेम भाग पर, भा पारा के मान। चंचल श्री व्याकुल भा,सुख श्रीनींद हिरान॥१०॥ ताको कहा नीद सुख भोग ।जाको प्रीतम लाग वियागू ॥ खाय तवे जय भूस सतावै घाले तब जब को घोलावै ॥ देखे जात रयन अधियारी 1 पियरी सेत अवर रतनारी सेत पियर मन जोत बिलाफै । और चॅदर सम त्रास न रोके ॥ जिठ की जीत बहुत है सेता ।औ परघट है सूरण जेता महा जोत यह नैन सों, कहां विलोकै कोइ । चखु सरवन औ नासिका, तेहि पल एकैहो॥११॥ प्रेम समुद्र बीच धन परी । लहरै खाय घरी आ घरी हिर भीतर करइ पुकारा । कहा हमारो सेवन हारा दिन व्याकुल निस नीद न सावै। व्याकुल हाइ मनआखिन रोवै॥ काम के धान को बेझा भई । बैरो ताहि भई तरुनई रहीलि एक तो अलप अहारी । औरी तजा अहार पियारी ॥ छूट गएउ प्यारी से, सुख सोइब श्री खाय । चिन्तझकोरा सोपियर,भएउसो ललति गुलाब॥१२॥ भरमी नाम ससी धन केरी । पूछा कस धन है गति तेरी ॥ ताहि मन मा कछु चिन्ता अहई। तेरो बदन मरम सब कहई ॥ काहे बिना झकार बयारा पियरो ललित गुलाब ताम्हारा। है विस मो प्यारी मन माही । परमद छवि मुख पर नाही। फागुन भहै मोद को मासा ताहि अनन्द मनसे कह नासा॥ दिवस चार सो देखलं, और बदन तोहार । अहै सीस के ऊपर, कछु चिन्ता को भार ॥१३॥ ॥ ॥ - इन्द्रावती। । हो मरमी चिन्ता का नाही । अन्त सुरज फूउ कुम्हिलाही । फूल रहत पहिले दिन नीका । दुमेर देवस होत रंग फीका ॥ पुरन चन्द्र जो निर्मल होई । पुनि दिन दिन छीजत है साई ॥ आ सब विर्छ देशु धन हेरी । लाग कर पात ना करी ॥ हरियर रहइँ यिर्छ कइ हारा । देखहु होन चहई पतिझारा रहै न एको अन्त कह, नारंग दाडिम दाख । देवस चार की चादनी फिर अधियारो पाग्य ॥१४॥ कहेउ साच धन प्रान पियारी । पै नवीन है समै तुम्हारी तुम धन अहै। दुइज के चाटू । पूरनचन्द्र परेठ ताहि फादू ॥ दिन दिन गो दूनी ताहि चाही। अबहि घटन की समैं न आही॥ मैं मरमी मरमी हतारी । हमतें मरम न यह गारी ॥ मित्र बयद से रासहि गाई ताको भला न कहू हाई नव पत्री तुम रानी, जिउ फुलवारी माह । सामय पत्र झरै की, नाही ताहि उपराह ॥१॥ धन मरमी को मरमी पाए । दाया से तेहि कठ लगाएउ । कठ लाइ धन कहँ धन राई । नरगिस नीर गुलावहि धोई ॥ ईकहा मा जोबन बैटरी १ का फीजे री देह दहै रो जोबन गजरिपु सारी भारी । कहा महाउन रासमारी निसको नीद दिवस को रोला । हरा देशज होइ सत्र नवेला ॥ जोबन सिन्धु मां इतन, भाजल कली ममान । खिन विलात खिन प्रगटत, व्याकुल रहत परान॥१६॥ महा रानी यह जग माह जब लग गरी पारस ताही । तब लग ज्ञान महादत आही। फाम क्रोध मन मार रहक । रहठ न व्याकुल धीरज गहका ॥ । है यह गजक महाउत नाहू इन्द्रावती। ॥ यह जोयन को कार फरेरी । एक समै सब को है धेरी ताहि मन भीतर चिन्त समानी। नीद कहा मे भाव रानी ॥ नाव तोर रानी है, जोयन जलधि मझार । फरता खेवक मेरइहि, खेइ करइ ताहि पार ॥१७॥ इच्छा पूजे कहा हमारी । इठ जगत मेा मैं हत्यारी । निर्ष यहुत माहि कारन आए । जलज जलधि मा जीउ गवाए ॥ हत्या बहुत पढी है मो का । कित भल मार हाइसर लेोका। जानत हो जस मानय चाही । रहर अकेली बिना बियाही॥ मोतिय धर इन काय हाया । सेदुर चढइ न मारह माथा ॥ अर्जुन धनुधारी कहा, राहु से येधै आइ । मीट पन अति गाढा, द्रोपद व्याही जाइ ॥१८॥ आस न छाडहु हाइह फाजा । अरजुन सम हाई कोइराना । जैसे कपिधुज बेधेउ राहू । भएउ तोपदी सङ्ग बियाहू ॥ तस वह माती आइ निमारे । ताहि सँग परमद धित मवार । सिवहिँ मुमिरु जेई परम यतावा। तस मनाउ जस जाइ मनाया। है सब काज घरी कर याधा । आइ घरी हलुकाइहि काधा ॥ देह दुर्म पलुहानहु, न तो जाहि कुम्हिलाइ। पूजे इच्छा रानिया, जा दिन घरी तुलाइ ॥१६॥ रात समै इन्द्रायति रानी व्याकुल चिन्ता सिन्धु समानी॥ पुमिरा महादेव कर नाउँ । पारयतिहि आना मन ठाउँ । पेता को परन पुभावहु तुही । गुरजन बीच करहु सित मुही। । म जगदम्बा सिघ अर्घगी । देहु माहाग होठ पिय सगी॥ "यकर फूल चढा पिय पागा । फूल हमार डार है लागा ॥ सोइ गइउ सेजिया पर,सिव श्री सिवा मनाइ। सोवतहि देखा सपन, जागत रहिताय ॥२०॥ - । । ।

इन्द्रायती। ॥ - - हो मरमी चिन्ता कटु पाही । अन्त मुरण उ कुम्हिलाही । फूल गहत पहिरो दिन नीका । दुमेर देवस होत रेंग फीका । पुरम चन्द्र निर्मल होए । पुनि दिनदिन लीजत है माई। भी सय विठं देगु धन हेरी । लाग भर पात ना करी ॥ दरियर रापिलं फह हारा । देगा दान घई पतिकार ॥ रहेन एको अन्त कह, नारंग दादिम दाख । देवस चार की चादनी फिर अंधियारो पाय॥२४॥ फत साच धन प्रान पियारी । नयीन है समै तुम्हारी तुम धन अहै। दुधज के बाद । पूरनचन्द्र परेव तेहि फाद ॥ दिन दिन गो दूनी ताहि चाही। अयहि घटन को समन आही। में मरमो भरमी हतारी ।हमते मरम न गोवह गारी ॥ मित्र ययद सो राराहि गाई । ताफा भला न कयर हाई नव पत्री तुम रानी, जिउ फुलवारी माह । सामय पन झरे की, नाहीं तोहि उपरारं ॥१॥ धन सरमी को मरमी पाए । दाया सो तेहि कठ लगाएउ ॥ कट लाइ धन कहें धन राई । नरगिस नीर गुलाबहि घाई ॥ रोई कहा था जोबन वैरी । का कीजे री देह दहै री जोबन गजरिपु भारी भारी । कहा महाउत राखद मारी ॥ निसको नीद दिवम को रोला । हरा देऊ हाइ मत्रु नवेला ।' जोधन सिन्धु मां इतन, भाजल कली समान । खिन चिलात खिन प्रगटत, व्याकुल ररत परान॥१३॥ अहो रानी यह जग माहू " ॥ इन्द्रावती। यह जीयन को फाह करैरी । एक समै सय को है वेरी ताहि मन भीतर चिन्त समानी। नीद कहा मो भावइ रानी ॥ नाव तोर रानी है, जोवन जलधि मझार। करता खेवक मेरइहि, खेइ करड तोहि पार ॥१७॥ इच्छा पूजे कहा हमारी । भइ जगत मे मैं हत्यारी ॥ निर्प यहुत मोहि कारन आए । जलज जलधि मा जीउ गवाए ॥ इत्या यहुत चढी है मो का । कित भल मार हाइसुरलोका। जानत हो जस मानय चाही । रहर अकेली बिना बियाही॥ भासिय यर इन काहुब हाथा । सेंदुर घढइ न मोरेह माया ॥ अर्जन धनुधारी कहा, राहु सो घेधै आइ । मीटै पन अति गाढा, द्रोपद व्याही जाइ ॥१८॥ आम न छाडहु होइह काजा । अरजुन मम हेई कोइ राना । जैसे कपिधुज बेधेउ राह । भए द्रोपदी सङ्ग बियाहू ॥ तस वह मोती आध निमारे । ताहि सँग परमद विर्त सवार। सियहिं सुमिरु जे परम यताया। तस मनाउ जस जाइ मनाया। है सब काज घरी कर याधा । आइ घरी हलुकाइहि काधा । देह दुर्म पलुहानहु, न तो जाहि कुम्हिलाइ । पूजै इच्छा रानिया, जा दिन घरी तुलाइ ॥१६॥ गत समै इन्द्रावति रानी । व्याफुल चिन्ता सिलपा बनयीस, मिरा महादेव करा. .. गास दुख बील कन्त नित बीता। अह खेल नैहर को जिवना । पै पिय बिन है लोहू पियना । हर रोल अहे दिन चारी । पिप सग जनम निप्राह पियारी॥ नैहर तेहि नरक समाना । जाके मन में पीउ समाना ॥ । जो निर्दै होइ प्रीतम, देइ नरक असथान होइ सोई वैकुण्ठ सम, पत्तिथरता के जान ॥२७॥ d ६ सा" ושון ॥ इन्द्रायती। जो पसी यित बाहर धावा । सो निदान महि पर आवा ॥ अपने जोग ठाव जेइ लीन्हा । मय कोऊ तेहि आदर कीन्हा॥ सब काई कह ठाउँ है, अपने अपने मान रानी राजा जोग है, ससि जोगे है भान है। मै ता दरसन नित जोगी । असम चढाएँ क्षेम बियोगी ताको प्रेम गुरू है मेरो जोग सिखाय कीन्ह माहि चेरे॥ जय मन धमी परेउ तब जोगू । तजि कै सकल जगत मुख झागू ॥ वाहि उत्तम दरसन के कारन । आएउ नाघि मेरु दधि आरन जा दिन मे दरसन वह पावट । होइ आप आपुहि हेरवावत ॥ दरसन देखै कारनहि, रोम रोम भये नैन नींद न आवत निस कहं, वासर परत न चैन ॥६॥ चैन कहा चिन्ता जेहि जीऊ । जीउ दुग्ध भा चिन्ता घीऊ ॥ जब चिन्ता तय नीद न आवै । आवै तब जब चिन्ता जावै ॥ प्रेमी पर चिन्ता कह मारे । मारै मा चाहुत जिय वारै ॥ हेरै प्रीतम मुस नहि फेरै 1 कार मित्र मित्र यह हेरे रावे रकत आस नहि सोवै । दरमन लाग रात दिन रोवै ॥ सत्तर सिर मन तीन सै, पांव एक सै जारि । प्रेमी को दुख देत सो, प्रेम अथ यह आहि ॥७॥ हो जोगी पै उत्तिम भीखा प्रेम पाइ मागै मै सीखा नेहि मन ऊँच अंच पा साई । जेहि मन नीच नीच से हाई॥ कहा चाद कह रह चकोरा ।प्रीत लाग चितवत तेहि और औ अरविन्द रहै जल माही । रवि सेवत तेहि जोगें" दादुर क्वल सनेह न पाये । घासे मधुकर तेहि पि दर देस की दिष्ट साँ, है समीप गुन भर बिना नैन श्रादिष्ट के, नियरें के है दूर । ॥ - 1 इन्द्रावती। ॥ ॥ ॥ मालिन कहा बहुत तुम यूझा । प्रेम पन्ध उजियारा सूझा फवन जात है का है नाक । कहा जनम भुम्मी को ठाऊ कहा रहेउ मै जात चदेला । अब सम जात धूर सिर मेला ॥ जानम भुम्मि कालिजर ठाऊ । राजकुवर है मेरे नाक प्रेम तेहिक माहि चेला कीन्हा। राज छोडाय जोग गुन दीन्हा ।। हो जोगी तेहि पन्ध को,नहिं चाकविलास । चारउँ दरसन भिच्छा,राखत है। नित आस ॥९॥ हो जागी मुख आभा तेरी । सासि देत है राजा केरी पै ताहि साथ न सेवक कोई । राजा पर विस्वास न हाई औ मोती का ढय है गाढा । बूडे बहुत न काहुअ काढा भीस मिलन गाढी है जोगी । भाग जो होइ तो हाहु सजोगी। याहू पर बहुतै तुम कीन्हा । तजि सुख भोग जोग दुख लीन्हा जेहि दरसन के दीप पर, है पतङ्ग संसार प्रेम तेरिक तुम लीन्हा, मरैन नाम तोहार ॥१०॥ है इन्द्रावति विद्याधरी । विद्याधरी आप अवतरी है पदमिनि मृगसावक नैनी । ज्ञानवन्त औ कोकिल बैनी ॥ जे काहुअ पर हार डीठी । सेो जन देव जगत दिस पीठी। अस रूपवन्ती सुन्दर आहै । बिनु देखें सघ ताहि सराहै । सोले मुख परमात देसावै । खोलै केम साम होइ आवै है तेहि चन्द्र बदन लखि,जगत नयनउँजियार। गगन सहस लोचन सों, निखै तेहिक सिंगार॥११॥ धन दृग मतवारे पैरारे । चितवन बीच सिन्धु जा ढारे । अधरन सेो मुसकान सेहाई । वात कहत से झरत मिठाई ॥ सपी अहै दरपन तेहि माही । हारा सुन्दर मुख परछाही ॥ ॥ - ।

इन्द्रावती। ॥ तासो मसी भई उपि धारी । छबि दाता है प्रान पियारी ॥ से मन अलक बीघ हैं बाधे । लेहि सहस जिउ हत्या काधे ॥ बहुतन तजि जग धन्धा,तपसाधा तेहि लाग। अरुझि रहा मन अलकै, जिउ मारा अनुराग ॥१२॥ है तेहि अम ताक मे दीया ।सा उनियारी मन्दिर हीया ॥ सीधा बीच दिया है धरा । मनु मीसा तारा निर्मरा है मन्दिर साजित फुलवारी । अहै सुगन्ध मालति वह धारी।। लेहि रहैं आखिन पर चेरी । अहै सखी छाया तेहि केरी दिएन आधत ताकी छाया मान जीव धरे है काया वोहि डोले सब डोलें, थिरें थिरै सब कोइ । फाया सों जो होत है, सो छाया मोहोड ॥१३॥ सात अन्ता पट भीतर साई । रिहत न देखत चह कोई बारह मन्दिर मे यह प्यारी । रहत सदा है सेज सवारी हीरा मात सात जस तारे । हैं मन्दिर भीतर जियारे दुइ से औ अढतालिस करी । लागे रतन पदारप भी है मन्दिर मे तेरह द्वारा ना द्वारा नित रहत चारा ॥ थाय तेज जल पिर्थिवी, मानहु फैयक ठाउँ । बारह मदिर संवारा, जगपत जाको ना ॥१४॥ आवै जाद पवन दुइ द्वारें 1 सगी साहु न सबद सँगारें दसई द्वार न खोलन कोई । तय खोलै जब मरमी होई दस चेरी धन की गुन भरी । सेवा बीच रहे नित खरी पाच मॅदिर के बाहर रहाई । पाच मॅदिर भीतर एक सुध पाचो सो नित ले । सुध चारो चेरिन कह देई ॥ है सरूप घर रानी, रहै सात पट मांह सखियन सो वह प्रगट, है सखी सर छार ॥१५॥ ॥ ॥ । " इन्द्रापती। ७ ॥ - -- । सनि इन्द्रावति रूप घसानो । राजकुबर हिर्दै रहमानो फहा लेहि तेहि कारन जोगू । हे माहिमानम प्रीत यियोग ।। भायेठ आवत पहा अकेला । गुरु न भयेन का राखत चेला। हाउँ अब्धि मे हाइ मर जीया। तजि जिउ सय पाढा कधीया भाग जो हाइ जलज निसारत । ना तो जिउ जिउ कारन बारत॥ प्रेम फांद मों है परा, नहिं छूट की आस मिलयो चाहीं प्रान को, अहै न भूख पियास ॥१६॥ जो चाहत सोग वियोगी । जो मैं कह से साधह जोगी। सोटे काज के नियर न जाहू । निरमल कथा होइ जस पाहू ॥ पर चिन्ता तजि सुमिरहुताको । हे।इ से भरता मन आभा फो॥ ना रहिये आपा गुन साथा । निरमलना आवै जित हाथा ।। मन जिउतें सुमिरहु वह नाऊ । बुझहु प्रान मे ताको ठाऊ ॥ दृसर चिन्ता छाडिकै, तापर लावहु ध्यान । मन फुलवारी मो रहै, पावहु दरस निदान ॥१७॥ आपन है नाही करू जोगी । पुनि है होसि होसि है भागी नाही हेाइ नाहि तै हेरा ।नाता मिलतनियर तेरि केरा॥ नियर मिले ते दरसन हाई । जोग भूल है तीनउ साई जो मर जिया से भा मर जीया। मोती लिया दिया भा दीया। मरिकै जिउ पुनि मीचु न आवै । प्रानपियारी बदन दिखावै ॥ छिन अन्तरपट होइ रही, फुलवारी के फूल । देखु रङ्ग प्यारी कर, है रङ्गन को मूल ॥१८॥ फहि राजा सो भेद कहानी । गहल जहा इन्द्रावति रानी ॥ व्याकुल प्यारी तब ताई ।जोगी आइ बसा मन हाई ॥ बाढेत प्रीत जागेस्वर केली । मन पद परी प्रेम की बेरी ॥ ॥

- इन्द्रायती। कहै कहा वह रावल प्यारा ।दै दरसन मन हरा हमारा ॥ सोइय रहेउ जाग से सला । जामो मिला दरस निर्मला ॥ मिला दरस जेहि सपन मों,तापरवारीजा। जागव मोहि वैरी भयेउ, कीन्ह दूर दुइठाउं ।।१६।। वही समै मो मालिनि गई । प्यारी कहँ सुख दाता भई ॥ पूछे लाग परान पियारी । है कस आज काल्ह फुलवारी। बीता फागुन औ पतिझारा । जो निर्यात कीन्ह कुज डारा ॥ जो पछिन को जीउ सतावा ।पन को झारिके लाह नसावा ॥ सो तो अब न रहे उ जग माही। फुलवारी पलुही की नाही ॥ पदन उघारा है पुहुप, अली भवहिं उपराह । की समुझत पति झार कों,अहै छिपी पद माह ॥२०॥ घेता नारी तर निसारी । हो पारी फूली पुलवारी ॥ मान पाट पर बैठे फू । फूल घास मधूकर मन भूलै ॥ देश के उत्तर कुसुम को हारा । इन्द्रावति के गल मे हारा ॥ फेर कहा कि बहुत न गयेऊ । सपा तुम्हारो सैतुरु भयेक ॥ फुल पारी मेा है एक जोगी । रानी दरसन लाग वियोगी ॥ है कालिंजर महीपति, राजकुंचर है ना नाम तिहारो जपत है, मन फुलवारी ठा ॥२१॥ ए रानी का धरना ताही ।पूर लपेटा मानिक आही यहुन सरूप अहद यह तया । कन्था बीच रता है उपर होइ दूग जिठ जो देसाहारी । तो मुख ताको लरी पिपारी । जावत राजा लच्छन चाहीं । है मय हग रत सारी आहीं ॥ गई चन्द मम माल मोहाई ।रेस तीन दिष्ट माहि माई ॥ धनुक समां है भिडुटी, नमना चोपी यान । फीर समानामिका, सनद मोर परमान ॥२२॥ ॥

॥ ॥ इन्द्रावती। लवर करन को सीर न आहे । राजा सिद्ध होन कस चाहै ॥ कुअर यियोगी उपवन दाऊँ । निस दिन सुमिरत रानी नाऊँ। अहै प्रेम मदिरा मतवारा । जपत सास मे नाम तुम्हारा ॥ लेन न एकउ भूले सासा । दरसन लाग देह मुस नासा ॥ जोगी भेस न सफत सराही । गोपीचन्द्र दूसरो आही होत जियत को भरथरी, ताको चेला होत । आइ बसा फुलवारी, सुनहु खोलि मनस्रोत ॥२३॥ इन्द्रावति सुनि जोगी नाक । जोगिन होइ चहा तेहि ठाक ॥ कहा सपन को जोगी प्यारा । हाह वाही मनहरा हमारा ॥ सकल आफ तुम आइ सुनाया। सपन तपी लच्छन मै पावा ॥ एक अचम्भे आवत हियरें । है न फहू कालिजर नियरें मो मुनरूप कहाते पाया । जोगी हाइ अगमपुर आवा ॥ भेंट न होइ न गुन सुन, प्रेम कहां से होइ कैसे मोहिं कारन भयेउ, प्रागम जोगी सोइ ॥२४॥ अहे। पियारी वृझन ताका । तर बसान गयेउ सुर लोका। तहा सदा सव निर्जर नारी । चरचा तेरा कर पियारी धरतीपर कालिजर देसू । सुनि बसान आ जोगी भेमू ॥ ते धन कली समा पट माहीं ।सैको लालप ताहि उपराहीं ॥ नाहि जानो फस परत पुकारा । जो परगट मुख होत तुम्हारा ॥ तुम धन प्यारी पदुमिनी, सुधा भरे अधरान । बहुत अमीअपरन पर, दिहेनिसुन्धुमो प्रान ॥२॥ हो धन जाको नाम सुनायेहु । फुलवारी मे दरमन पायेहु ॥ मन औ ज्ञान हरा है साई । होत भलो जो दरसन हाई ॥ मैं सकुचाउ जात फुलवारी । भइउ नयन सा मैं हत्यारी ॥

इन्द्रावती। ॥ चार दिष्ट काहुव से हाई । जाइ चेत से मुरछेइ साई औ परगट मोहि चलत न भावै। अब मोहिलल्या जिउ सकुरावै॥ गयेउ सखी वह सामै, आखिन रो न लाज । अब यह नैन रमारो, पायेउ लाज समाज ॥२६॥ लाज नहीं जेहि आखिन माही। हे यह पसु है मानुप नाहीं ॥ घुघरू पहिर लाज यह आही । पगु कह धीमे राख बचाही ॥ ओ धन ऊची सबद न घाले । सुनत बिराने को मन डोल ॥ आधे नैन लाज सा कीजे मुख ऊपर घूघट लीजै हो प्यारी जय पहिरहु गहना । पुरुप बिराने से छिप रहना ।। चारोथलचेली, पारी कैसे जार्ड भेंट होइ काहुय सों, खार और मग ठाउँ ॥२०॥ जो जोगी देसै तुम चाहा । जागिहि मिले जोग से लाहा। परगट तुम्हे घलै को कहई ।ता पट भली पवन रथ अहई ।। तेहि पर घटि के चलिये प्यारी। धादिम पट लीजे हारी जोगी साय न दृमर कोई । है अकेल यारी मो साई भिच्छुक सेहि दाया कीगे । उत्तम दरसा सिच्या दीजे ॥ दर दिसाइ फै दरसन, यापुहिं लेहु छिपाइ । अधिक यदै अभिलापतेहि, दुसर पंधन जाइ ॥२८॥ चला पसिधै फुलवारी । देखठ जोगी फाह मन यारी ॥ जाज देवस और पितायत । मात ममे पुरखयारी आय जोगी पास है मन मोरा 1ये सीस पर प्रेम झकारा॥ हो गये आपन मा पायठ । मन पायें आनन्द मायउ पहिले आपन दरस देखायेठ ।पा मे महिपोग मियापेठा रहिउ यचेत भुलानी, लाग राग को पान प्रेम निजोजियउँ तरि लेमर निदान ।।२९।। । ॥ ।

इन्द्रावती। ना ले मरन क नाम पिधारी । ताहि मरत मरिहैं यह नारी॥ जह लग है नारी रज दीपी । का बिछुरानी काह समीपी ॥ ताहि जिय से जीयत सब कोई । कहु न मरन तो पर ली हाई॥ है जह लग रजदीपी नारी । जीउ निन्है है प्रीत तुम्हारी ॥ भलो भयेउ जो बाढा प्रेमू । मिलिहै प्रीतम हाइहै खेमू ।। अति समीप है प्रीतम, अहै न एको बाट एक पाव दे आप पर, बैट मिलन के पाट ॥३०॥ काहे न लेउ मान कर नाऊ । मरब एक दिन धरती ठाक ॥ केतिको प्रीत जगत मह हाई । देत न साथ मरन मह कोई ॥ जावत जिया ভালু जग रहई । करता बस सयको जिय जहई। है समीप वह मित्र हमारा । पै जगधन्ध दूर माहि द्वारा ॥ काम क्रोध तिस्ना मन माया' । है रिपु कछहु उपायन पाया ॥ किलु उपाय नहिं आवै, जाते जाहिं नेवारि । हे बैरी मोहि गाढे, सकों न यह सन मारि ॥३१॥ अहो तुम राजा कर धारी । अरुझि रहिउ मुसबीच पियारी सुसमा काम क्रोध अधिकाई ।तिला मया करइ अगुवाई ॥ पखेरू तोहि तन माहीं । चारा चारा नित उडि जाही॥ रेत ग्रीउ घारी कर प्यारी । मरिकै नियहि होहि गुनधारी॥ मन दरपन कपर चित दीजे । नाही है सो निर्मल कीजे मांज सजो मन दपन, रात देवस चित लाइ । स्याम रंग अन्तर पट, उठि धागे सो जाइ ॥३२॥ बोय साइब साइब थोरा । हाइ हाइ त कारज तेरा ओ पिहार प्रीतम को ठीजे ।जो सिखवै सो कारज कीजे ॥ ओनिस घासर अफसर रहना । सुमिरन नाप बीच दुरा सहना।

इन्द्रावती पे यह मन हे मत्रु सयाना । जात न मारा सुरा लुयुधाना ॥ मन बरजे पर काको फरई । मान मर धरु पारा मरई ॥ मालिन हिता उपाय दै, गई शापने ग्रेड इन्द्रावति के मान सें, भयेउ समस्त सनेह ॥३३॥ चलु मन तहा जहा फुलवारी । तहा यसा है दरस भिसारी ॥ मित्रहि भेंटहु देय फूल । हे फुलवारी परमद मूलू धन से मानुप धन तेहि भागू । जेहि मधु मिले उसेलि के फागू॥ जेता तेहि पतिकार सतावा । तेता से बसन्त सुस पाया धन जग माली मिर्जन हारा । कुर पलुहावत है पतिझारा ॥ भागवन्त सो मानुप, है तेहि धन धन हाथ । मित्र बदन श्री फुल मुग्व, देखै एकै साथ ॥३४॥ . [७] फुलवारी खण्ड । इन्द्रावति दिन रात बिताया । भारहि सखियन कह हैकरावा भै न बिलम्ब सखी सब आई । तारा समा रही जह ताई आइ ससि वदनी थार दीनी । सकल गज दीपी पदुमीनी ॥ आई समुदै कुल की मुता । बहु व्याही बहु अव्याहुता ॥ और समय वह नपत सहेली। धन मयक घेरेन अलवेली रानी की सब सहचरी, ग्राड जुरी तेहि पास । सब अपहरा समारहिं,भवन भयेउ कविलास॥१॥ इन्द्रावति सखियन से कहा । सो दिन गयेउ मिर्छ जो दहा। जग से पतिझारी रितु गई । पलोहे विळ नवल रितु भई ।। फाल्ह जनायेउ चेता नारी । फूल रही है मन फुलवारी ॥

इन्द्रावती। ॥ बीता बेला छूटा बानू ॥ घलहु गवन बारी दिस कीजे । फूल देखि परमद रस लीजे नहि जानहि मिर परिहै कैसे। । सेलहु होइ खेलना जैसे फुलवारी चाहत है, मन बैरागी मोर चलहु देखिये उपवनै, है वसन्त रितु थोर ॥२॥ थारा है कुसुमाकर बेला । चलि देसहु औ खेलहु खेला ॥ । हाथ न आवै सँखै परानू सकल समै को भेद पाना । है हमलोगन ताको जाना मेटत औ रापत करतारा । जो चाहै है सिरजन हारा समय सरग है काटन हारी । जात चली तेहि भेटु पियारी॥ मधु मीठो है मधु समां, मधु दरसन को लेहु । हार सरीर ग्रीव को, तर दुसुम को देहु ॥३॥ सब काहू धन आज्ञा माना । फुलवारी दिस कीन्ह पयान ॥ इन्द्रावति रथ ऊपर चढी । दूना बढी रूप को बढी चली मासा ब्राम्हन पारी । बनियाइन नाइन पटहारी ॥ चली सोनारिन कचन बरनी । रजपूती सतरिन मनहरनी ॥ लोनी धन हलसाइन अली । अधर मिठाई वाटत चली, ॥ चली सहेली सुन्दरी, इन्द्रावति के संग गीत बसन्ती गायतै, पहिरे दुकुल सुरंग मन फुलवारी मो सब गई । देखि सुमन को सुमना भई चेता मालिन भेटेठ आई । चन्द्रवदन देरी दुति पाई सुगंध कुसुम को हार मयारा । सब सुन्दरि के गीत मो हारा ॥ देसि भवर गन गुजत तहा । एक सखी बोली गन महा धन यह मधुकर धन यह फूलै । किन के कपर अलि मन भूले। जगत मझार मराहिये, भंवर फूल को रेत । भवरहि चिन्ता फूल की, फल पास रस देत ॥५॥ ॥ ॥४॥ ॥ ।

इन्द्रायती। सुनि सचेन पन्द्रावति रानी बोली मुनिये सखी सयानी ॥ जग मा प्रीत यसानहु साई । जीयग मरन एक सँग हाई ॥ खोटी प्रीत अपर की भाहै । भयर आपनो कारज पाहै ॥ जामयात घास रस आसा । ले रस तजत फूल को पासा ॥ ले रस यास अवर उडि जाई । मरत न जय सुमनस कुम्हिलाई। प्रेमी ताको जानिये, देइ मित्र पर प्रान मित्र पन्ध पर जिउ दिहें,जुगजुग जियै निदानाका धन जो प्रीतम पर जित वारा । मिर पर चला प्रेम का आरा॥ धन जो परा हुमासन माही । और सहायक घाहा नाही ॥ दया दिष्ट प्रीतम तय धरा । पायक फूल भयेठ नहि जरा ॥ धन जो मित्र आपनो चीन्हा। पुत्र जीठ आगे के दीन्हा । अलख पन्थ जो जूझा हाई ॥ मित्र जो है करतार के, मरत नहीं हैं सोइ । एक मन्दिर तजि दूसरें, गवनत है वै लोइ ॥ गायेठ गीत एक धन प्यारी । जग है करता की फुलवारी ॥ आपुहि माली आपुहि फूला । आपुहि भंवर फूल पर भूला ॥ आपुहि रूपवन्त से हाई । प्रेमी हाई रिझत है सोई आपुहि परगट गुपुन अकेला । गुरू हाइ कहु कहु हो'चेला ॥ आपुहि दाता करता होई ।दिष्टा स्रोता बकता साई सुनि सरवन दै चेत सों,सपन वर्खामा गीत । उपजो सर के हिर्दै, चतुर सखी की प्रीत ॥६ एक कहा हो राजदुलारी । है भानन्द ठाठ फुलवारी खेल एक खेलहु सब कोई । जासो स्वात बीच मुद हाई ॥ एक कहा आनन्द न चहक । निस दिन आगमोचमा रहका मुवा न कहे। जियत है सोई ॥ ॥ ॥ १ इन्द्रावती। भारी ॥ बहुत अनन्द न चाहै। प्यारी । ना तो परै आइ एक कहा चिन्ता अल नाही । तरुनी चिन्ता से बिरधाहीं । खेलि लेहु नइहर मों, सब मिलि परमद खेल । पुनि नइहर के छाडतै, सासुर होय यकेल ॥१०॥ हम अज्ञात न सासुर चीन्हा । यह नइहर ऊपर चित दीन्हा॥ है जग जीवन खेल समानू । ऊमर नहीं है मरन निदानू ॥ हम कह पार मीचु सेा नाही । निसरि गगन महि तट ते जाही। जानत मरम हमारो साई ।जाको सुमिरत है सय कोई ॥ मूरत अलख नही जग ठाक ।हम तुम रासा हे तेहि नाज ॥ यह मूरत को तजि के, चित्त प्रमूरत देहु जाहि अमूरतध्यान सों, स्वर्गलोक फल लेहु ॥११॥ राजकुअर फुलवारी माहीं । धन को आवन बूझा नाहीं ॥ चातुर चेता के चतुराई । सब काहू सी बात जनाई है फुलवारी मो एक जोगी । है काहू को प्रेम यियोगो है यह ठार बहुत दिन सेती । नहि जानहु बाउर केहि नेतीं। मुनि के सखिन कहा घलु रानी । देरौं है कस जागिय ध्यानी ॥ बात सुधानी सखिन कहं,चली सखिन केसग। एक एक सप काह, लीन्हें फूल सुरंग ॥१२॥ घरजा एक अगम की नारी । तुम मर प राजा की धारी अलबेली लागहु मल देखें । तुम तिय जियभम जिय के लेखें। हरित यारी यिना वियाही । जोगी देसै ताहि न चाही लागहु तपी नयन मे मीठी । यहमिनिहाइ उगै ताहि डोटी। नहि जानहि जागी कस अहई। आपन कपा केहि नित दहई । देखदुमन फुलपारी, जाहुन तपी समीप होइ पतंग तपी वह, देखि पदन को दीप ॥१३॥ । ॥ ॥ ॥

५६ इन्द्रावती। ॥ ॥ ॥ जय यह बात सही वह कही । सुनि मलीन रानी होइ रही। औरन कहा चलहु वहि बोरा । नग करता है रच्छक तेरा रज्छक आप अलस है जाको । एक बार न वाकै ताको पै अबही देखहु फुलवारी । फेर चले जेहि और भिखारी॥ सुसी भई यह बात सयानी । लीन्ह मुरग फूल एक रानी ॥ देखत रहिंगै रानी, लिहें फूल को हाथ एक सखी हँसी गोली, इन्द्रावति के साथ ॥१४॥ हँसि के मालिन को गुन गावा। धन चेना अस फूल लगावा उतर दीन्ह मुनि चेता नारी । मोहिन सराहा अहो पियारी॥ सुमिरहु तेहि जो है सुस दाता । जे पह फूल कीन्ह रग राता ॥ जो हमार दाउ हाथ बनाया । जेहि करते मै फूल गावा जग मे जावत है सब बना । तारत करता को दरपना दीठ होइता देग्वट्ट, तन पादरस मझार बदन बिराजत है तेहिक,जेहिक सकल संसार॥१५॥ है वह एक जगत उपराजा 1 जो दाइ हात बनत नहिकाजा॥ धरती गगन मधारा सेाई । तास जात अउर तम हाई ॥ करता तीन अउर दुइ नाही । एक है दोज जग माहीं जो किछु करत न पूछा जाई । पूछा जाइ जनम जेइ पाई कीन्हा निम दिन औरवि चन्दा। तेहि सुमिरन मा सबहि अनन्दा रात दिवस दुइ चिन्ह है,रात मिटत दिनहोड। याही मो लेखा वरस, जानत है सर कोइ ॥१६॥ इन्द्रावति धन कमल सुचामा । आइ #घर गूजे चहु पाना कहा मसिन सो हर जिउपाये भवर न मे तन इक लगावे॥ फहेन ससिन तुम कमल पियारी। लेन भर हैं वाम तुम्हारी ॥ ॥ । ॥

॥ । इन्द्रावती। ५७ माहे या पाइ कै तेरी । कहा तिन सुधि बिन्धै केरी॥ फूल भवर हाइ आइ #धाहीं । तोहि करत अचरज नाहीं॥ भंवर यास के कारने, चहु दिस धाइ भंवाहिं। पोढा मजकरु रानियां, पिन्ध की डर नाहिं ॥१॥ जह उग सुन्दर रही सयानी । फुलबारी देखें रह सानी कहा एक आगम की यारी । धन नहहर जामा फुलशारी ॥ फुलवारी औ फूल थिलाक । बहुत अनन्द घढी है कि फेर न देखब अस फुलवारी । जब गवने जावै ससुरारी पर सीस पर भारी पारा । कैसे राखिही कन्त हमारा नइहर अहै पियारा, चक चूहट जिय होइ सुमिरि गवन सासुर को, दूर पर सब कोइ ॥१८॥ मुनि इन्द्रावति सासुर नाऊ । मनमा सोव कीन्ह तेहि ठाक॥ कहा जाय निश्चय ममुरारी । नइहर तजब जब फुलवारी॥ छुटि परै सब सखी सहेली । जावै सासुर अन्त अकेली अहो सखी आगम मोहि सूझा । सासुर गवन आजु मैं बूझा ॥ अस फुलवारी पाउय कहा । सासुर नगरी हाइह जहा तुम्, समांकित पाऊं, एक बैस की नार नइहर खेल न पाइव, जप जावै ससुरार ॥१९॥ समुझा मुखिन सोच मोरानी । बोली सरब बोध की बानी ॥ अहो पियारी सोच न करहू । जेहि प्रीतम प्यारे सग परहू ॥ ठाठ देव सुख मन्दिर प्यारी । लाइ देखावहि ताहि फुलवारी॥ देहहै बहुत हमैं अस घेरी । कर रान दिन सेवा तेरी प्रीतम जित सम राखै ताही ।ताहि सँग सेलें सेलइ वाही ॥ अससुख देइ सासुरे, तोहि कामिन कहं सोह। वैसे सुख नइहर मों, मिला न कबहू होई ॥२०॥ ॥ ॥ ॥ ८ ॥ द्रावती। इन्द्रायति फिर यात निसारा । तो मुख देशहे कन्त हमारा ॥ जो नहर मो जारय नेहा । होये एक जीठ दुइ देहा घय मान तजि भूधी पाठा । तो सामुर अबउप मुख हाला॥ रहये सत्त सनेह मम्हारे । काम क्रोध तिस्ना फह मारें ॥ रासय मीत सिराय गुन नीका । सुमिरन करय पियारे पीका ॥ तो पाइय सासुर सुस, प्रीतम होइह हाथ सुख अनन्द नित मानव, पिया पियारे साथ ॥२२॥ धन की करनी जासह पीक । एहि समुझ हर मानत जीऊ । जाफर भारी हो तूला । सुर मन्दिर द्वारा तेहि सूला ॥ जेहि हलुका हाइँ है दुख सहई । दुम अगिन मँदिरमा रहई ।। करनी सिसा जान सघ कोई । दाहिन सो पाए भल हाई देहि लिखा बाए सो जाको । बहुत कलेस पर सिर ताको । फरनो सेती छोट बड, सब किछु पूछे जाहिं । सतवन्ती गुनवन्त पर, डर एको कछु नाहिं ॥२२॥ सखी एक आसू कह ढारा । पूछेन कहा परान तुम्हारा कहा गवन को दिन मैं बूझा । सकट दुख तादिन को सूझा ।। जब सासुर गवने मैं जाऊ । देहि सकेत मदिर मोहि ठाक॥ दुइ जन पूछहि को पिय तेरा । को है जामा मगु तै हेरा पूछहि फवन पन्थ तैं लीन्हा । हर सो उत्तर जाइ न दीन्हा । उतर दे तो वाचऊ, ना तो मारी जाउ यही बूझि मै रोई, कैस होइ वह ठाउ ॥२३॥ रानी कहा रहा जित कहा । पूछहि जदिन गवन घर महा ।। एक कहा यह जीत पियारा । तापल रहह सरीर मझारा एक कहा जिउ पूछा जाइहि । पूछे बीच न काया आइहि ॥ + H इन्द्रावती। एक कहा दोउ यात न अहई । फा पर कया धीच मिठ रहई ॥ एक कहा फछु या तग कहना । फहना से सहमा चुप रहना। गवन मंदिर मों सुग्व दुस, डर से टै हाड़ । अहे सरग फुलवारी, है नरक को गोड़ ॥२४॥ बोल उठी एक सुन्दर नारी । रहत फूल नित करत न प्यारी॥ रग सलोन फूल झरि जाई । चफ चूहट उपगत अधिकाई ॥ मुमन सुपर न मगन्ध महाहीं । अन्त झरे माटिन मिलि जाहीं॥ उतर निसाग यूमन हारी । नित जो एक रहत पियारी ॥ जग माली गुन रहत छिपाना । यात यरन गुन जातम जाना ।। यह जग है फुलवारी, माली सिरजन हार । एक एक सो सुन्दर, लावत ताहि मझार ॥२५॥ जीरन यह जगती हम पाई । मितु एफ आवै नितु एक जाई ॥ फेतिफ थरन के फूठन फूले । फेतिक की लालय मन भूले ॥ फेतिकन रूपयन्त अयतर । केतिकन विरह आग से जर ।। केतिकन भईन सलोनी नारी । फेतिक तिन पर भयेन भिसारी॥ केतिकन विद्यावन्ती भयेक । केतिकन धनीयली हो गयेक॥ अब हेरें नहिं पाइये, तेन सरीर को चीन्ह केतिक रतन पदारथ, मीचु चार हरि लीन्ह ॥२६॥ हमहू घलय अवध के पूणे । फेर न जगमो आइय दूर्जे फूल देसि का भैसहु पियारी । हम तुम सबकी आइहि पारी॥ एक फहा वैरागिन हाहू । अहै मरन हम कह औ तोहू ॥ होइकै वैरागिन तप करटू । जामा सरग सदन मह परहू। कहकी भेस न फेरै चाही । फेरें भेस भला नहि आही ॥ पिय की सेवा नित करहु, रहु सम्हारे नेह । यातें दाता देइहै, आगम दिन सुख गेह ॥२७॥ - इन्द्रावती कहेन बहुत अब आगम सूझा । परमारथ सब काहुअ बूझा ॥ अब रानी चलि देखहु जोगी । कैसा राखत भेप वियोगी चन्द्र नखत सग पाव उठायेउ । जाइच कोरहि दरस देखाये॥ सफल सखिन कह जोगी भेषा । जित दरबन पायेठ जिउ देषा। इन्द्रावति औसखिय सयानी । जोगी रूप बिलकि लाभानी। मन लोचन मां चंद दिस,रहिंगा चितै चकोर। चन्द विलोकत रहि गयेउ,निज चकोर की ओररा॥२८॥ जब लग नैन चार रहु चारी । राजकुधर कह ठग असमारी ॥ दामिन चमक चाह अधिकाई । हुमक चितै रहे चित लाई ॥ यउ पवन एट पर अनुरागें । लट छितिरान पवन के लागें ॥ परी बदन पर लट सटकारी । तपी देस मानिस अधिकारी। मोहि परा दरसन कर चेरा । हना धान धन आखिन केरा ॥ प्रेम पन्थ को पन्थिक, परें जोग दुकूल परी सांझ तेहि मगुमो, गएउ घाट से भूल ॥२६॥ हा हा सखिन कहा पळताई । काहें तपो परा मुरझाई नहि मुरछा मुख देखि मयाना । लट परतहि मुख पर मुरुलाना।। एक कहा लटसे मुख सेना । होत अधिक लसि मुरछा लाभ एक कहा उट नागिन कारी । सागरल से गिरा भिसारी॥ एक कहा लट जामिनि होई । रात जानि जोगीगा साई एक कहा निस जानि कै, तपी गयेउ जो साइ। का जोगी के जोग साँ, तप पुरपारथ होइ ॥३०॥ जोगी से जो जाग रयना । मन पर धरै ध्यान को नयना । ध्यान समेत रयन जो जागै ताको हाथ मनोरथ लागे पहरू जागत ध्यान न छाया । यात तेहि कछुहाथ न आया । ॥

इन्द्रावती। ॥ ॥ ॥ मन जागै तब जागव नीको ।चित फिरि आवैधरती जीक॥ एकै बार न जागे कोई । थोरे दिन मा बाउर हाई जाके मन श्री नैन मों, दरसन रहा समाइ ताको नीद कहां परै, चिन्ता श्रावै जाइ ॥३१॥ चोली एक सहचरी सयानी । जय मुख ऊपर लट छितिरानी। यह मुख यह सिल यह लटकरी। ये तो कहि कै गिरा भिखारी॥ नहि मानहि आगे कस कहते । चेन समेत तपी जो रहते आवह आगे अरथ लावें । सब कोठ भरथ पन्य पर धावै॥ मुनि सब ससी चेत दउडाया । जोगी हु ते समस्या पाया एक कहा मुग्व ला तिल, मुकुर फॉद है चार । जग मनसूया फंदै कहं, है एतो उपकार ॥३२॥ आपुहि देखि मुकुर मा भूलें । दूसर सुवा जानि मन फूलैं ॥ दूमर देखि देखि कै चारा । फहें तुरत यह फाद मझारा ॥ एक कहा मुख तिल उटकारी। सधुल अवर अहै फुलवारी ॥ एक कहा मुख ससिहि लजाया। लट जोगी को मन अरुझावा ॥ तिल इन्द्रायति मुख पर साहै । तिल नाहीं जाना जग नाहै ॥ इन्द्रावति हग लिखत कै,भा विरच मतवार । मसि लागउ लेखनी गिरेउ,सोभा भैअधिकार॥३३॥ एक कहा का कोउ सराहै । रूप गरन्थ रानि मुख आहे ॥ तिल है सुन्न गरन्य मझारा । लट स्यामल सेहत मसिधारा॥ सघन पाखाना जो जप्त चूका । इन्द्रावति कह आगम सूझा ॥ कहा तपी अस कहते आगे । गरब न करू सुन्दर हर त्यागे। यह मुख यह तिल यह लटकारी। अत हे। एक दिन सय छारी। कहेन सखी सब पापमों, धन इन्द्रावति बुझ । धन अधीनताधन बचन,धन धन धन धन सूझ ॥३४॥ - इन्द्रावती। दापा सखी गुलाब मैंगायेउ । चिरिकि कुबर कह बहुतलगायेष्ठ सेइ गए अधिको नहि जागा । वह गुलाब सीतल तेहि लागा। एक कहा यह सा मतवारा । धन के नैन बासनी ढारा ॥ सविन कहा हो मान पियारी । मारेहु चखुसर गिरा सिखारो॥ फिर जित जो जोगी यह पावै। ताहि तजि औरहि ध्यान न लावे सविन न जानहिं जागी, है चाउर तेहि लाग। तजा राज कालिजर, लीन्ह जोग वैराग ॥३५॥ वाह वाह में आपन मारा । काहे धूमहु दोष हमारा कहेन दोष नाही धन तेरा । देय तुम्हारी आसिन केरा ॥ जेहि चित तेहि मारहि यानु। मुमिर मुमिर ताहि देश परानू। फेर सखी सब बात सम्हारा दोप नैन नहि देोप तुम्हारा ॥ रूप दरब मुखतार पियारी अम्गुरु जमल करहि रखवारी।। चाहा लेइ तपी हग, होड के चोर समान नैन तु हारे तसकरें, मारा घरुनी वान ॥३६॥ कर तसकर को काटा चाही । जो न मार देष धन माही॥ हैं हत्यारे भपन यह तेरे । राजन मिर्ग अहैं दो चेरे अहे नयन से उत्तम कानू । तास बात सुना यह प्रानू ॥ यह नित जो दो जग कीन्हा । रसना एक करन दुर दीन्हा । फो कहु एक धात मति सानी । मुनि दुधात आन से रानी॥ बहुतन को संसार मों, जो सिर्जा दिन रैन । छाप दीन मन ऊपर, श्री सरवन पट नैन ॥३७॥ मसि ओ पत्र ससी एक आनी । जीत कहानी लिखा सपानी ॥ यहुरि लिखा है। जोगी पा ।जोग तार इन्द्रावति देवा ताको दरसन पाय भिसारी । मुरखानेट नहि सफेउ सम्हारी। ॥

इन्द्रावती। ॥ अवहीं तेरी जोग न पूजा । जोग छोडि करु काजन दूजा।। लिखा साधान सखिन के हियरें। चली राखि राजा के नियरें ॥ जीउ कहानी लिख के, राखि चली तेहि पास। छड़ तपी को आई, जहां सदन सुख बास ॥३८॥ जब राजा जागा सुधि पावा । जागि पहूदिस दिष्ट लगावा ॥ पत्र उठाइ बिलोकेशानी । पढा संपूरन जीत कहानी जब बाचा इन्द्रावति नाऊ । कसा बहुत अपन मन ठाऊ ॥ उपजी प्रेम भाव हर दाहा । बहुतै पछताना कहि हाहा ॥ सो रानी आई मोहि आगे । पहिरेते यह कन्या जेहि लागें। मोहिं लेखें एक,पल भर,उपयन भयेउ पहार। अब देखउं फुलवारी, आइ पसेउ पतझार ॥३६॥ कहा गई वह प्रान पियारी । जेहि कारन मैं भयेउ भिसारी॥ कहा गई वह दीप मिखासी । जाको सै रम्भा सी दासी दिष्ट परी तनु पुनि का भई । देखि न परी परी सम गई रेजिउ कमल सुगन्धित अगू । गयेउ न लागेउ अलि हाइ सगू॥ गारी वह गारी सम गोरी । नैन नैन सो स्यामा जारी गहा धिर्ज मन भीतर, लिह मिलन की श्रास। भा कालिंजर राजन, विप्र योग को दास ॥४०॥ .

इन्द्रावती। ६४ . - ॥ [८] जिव कहानी खण्ड । सुनहु मित्र अय जोय कहानी । जो लिखि गई महवरी ज्ञानी॥ जीठ एक राजा को नाक । सो सरीरपुर पायेउ ठाक रह वह जिठ के एक नरेसू । सो दीन्हा जिउ को वह देसू ।। जय ठाकुर सो आयसु पाया । तय जिउ राय सरीरहि आवा साधी बहुत साथ जिउ लीन्हा। तय सरीरपुर आवन कीन्हा । श्राइ पाट पर बैठा, भा सरीर को राय देखि नगर को सोभा, रहसा परमद पाय ॥१॥ आधी नगर सरीर मझारा । दुर्गन नाम नि परियारा ॥ बूझ युद्ध सोयोला राजा । एक नगा दुइ मिर्पन छागा ॥ यह दुर्जन राजा है दुरा । माया मोह भरम मे पता हमा अन्त कर सतुराई । कहा सत्रु से हो मलाई है यह काट बाट मे मोही । पग मेो धन न दाया वाई ॥ यह बनाव कैसे बने, एक नगर दुइ राज राज करै नहिं पावलं, दुर्जन करै अकाज ॥२॥ बुद्ध सयाना मत्री रहा राजा साथ बात अस कहा राज करहु होइ निडर भुवारा । दुर्जन सरवर करइ न पारा जब से आए राजा पाक । बसा सरीर पूर हो राक बुद्ध बूम जिउ कह समुझावा । तब जिउ व्यान राज पर लावा॥ भा परियार राज के कीए । दुर्जन हरा बूमि के होए छल संचर पगु राखा, श्रापन छाडेउ राज दुर्जन भा जिउ सेवक, कन्हा सेवब राज रहा जीउ एक पुत्र पियारा रहा नाम मन रहा दुलारा ॥ मन चाहै रुपयन्ती नारी ।पैन मिली कोउ प्रेम पियारी॥ ॥ -- इन्द्रावती। मन यह नित नित ब्याकुल रहई। जिठ को जितानित दुख सहई। दुर्जन कह एक दिन हकरायेव । तासा मन की यिथा सुनाये ॥ कहा करहु का एक उपाई । जासेो मन जिउको दुख जाई। मन को यह प्रकीर्त है, देखि सुरूप लाभाइ । पैन मिली रुपवती,जो तेहि स्वांत समाइ ॥४॥ बोला दुर्जन आज्ञा पाऊ । तो राजहि एक धात सुनाक । माज्ञा दीन्हा दुर्जन बोला । मन द्वारा को ताला खोला ॥ कायापुर है दरसन राजा । राज गगन पर सूर घिराजा ॥ तेहि राजा की एक सुता है ।रूप नाम सय रूप सराहै एक समय में रूपहि देसा' । देखत रीझा जीउ सरेसा जो मन पावै रूप को, मान बहुत अनन्द मन परभाकर जोग, है वह रानी चन्द दुर्जन रूपहि बहुत बखाना । सुनि राजा शिव को मनमाना। तासा कहा जतन कस की ।रूप मेलाय पुत्र को दीजे कहे उ उपाय आन है कहा । दिष्ट बसीढहि भेजउ तहा गयेत दिष्ट कायापुर देमू । काया पति से कहे व सदेसू ॥ मुनि दरसन मन चिन्ता कीन्हा। जिउ कह बलि मजेगी चीन्हा।। कहा निपं कन्या सों, जोउ संदेसा जोड मन कारन तेहि चाहत, प्रीत सदेस पठाइ ॥६॥ मुनि के रूप पितहि समझाया। जिउ राजा एक मनुज पठावा ॥ जो राजा मन पुत्र पियारा । है हमार वह वाहन हारा काहें एक बमीठ पठाये । काहे न आपुहि मन चलिआयेउ एक मनुज भेजे जउ नाक । छोटा हेाइ जगत मो नाक दिष्ट साथ तर उतर पठावा मैं कन्या कह बहुत वुझावा ॥ कन्या कहा न मानत, है नहिं दोप हमार मरम हमार जनाइहै, जाइ पसीठ तोहार १७॥ ॥ ॥ ॥ ॥ ९ इन्द्रावती जाई जीठ सादिष्ट मुनायेउ ।जिठ के हिए कोप यदि आये। बूझे कहा बुद्धि चलि भावे । मेहि मैंग होइ कयापुर धावै । तब लग दुर्जन छलके अला ।नित कह कायापुर छैचला ॥ कोपवन्त वह जीउ सयाना । कायापूर जाइ नियराना रूप भेद पाव के कारन । भेजा बुद्ध घशीठ विचन्छन । वृझ भेद लै पायेउ, राजहिं दीन्ह सुनाह रूप रहै सै पटमा, तहान पवन समाइ 1101 कराह कबहू रूप पियारी । आवत जह निर्मल फुलवारी ॥ फुलवारी द्वारे दुई बोरा | का खरग रहैं रनधारा बुद्ध चतुर पहुचा तध ताई । कहा यिने कर सेवक नाई ॥ आप रूप मद पन्थ न लीन्हा । मान सखी तेहि मानिनि कीन्हा मोहि अस मन लोचन सासूझा। आवहि जाहि दिष्ट अउ बूझा। जिउ राजा कर फेरा, धुद्ध गेयानी नाहिं दिष्ट वृझ आवागवन, करहि कयापुर माहिं ॥९॥ घेरा एक राय के ठाऊ । रहित फटाउ रदेउ तेहि नाका कहा रुप से भेजा चेरी । लसि आने सूरत मम फेरी यात पियारी के मन भाये । घेरी पितवानाम पवाये ॥ चितवा मामन देसि लेभाना। रूपयन्ति से जाइ यसाना प्रेम पदेठ तय मन के हिपरें । भेजा निज युद्ध के नियरें ॥ बुद्ध पठायेज लाज को,मनहि बुझायेउ आय। दिन दुइ मन धीरज धरापुनि अधीर भाराय॥१०॥ दुर्गी आपन धन्यु पठाया । মাঃ শনবিহ ভাগ্নিাযায়? यिनु जिउ अा मन गा तहा । रहा देम कायापुर जहा साहस सेयर मत हो रहा । मन के साथ यात अस पछा। ।

इन्द्रावती। ६७ भेंट कर चितवन सो चाही । आपन विथा सुनावहु ताही ॥ रूप गठी निस कह मन आयेउ। यूझै चितवन धाम पठायेठ । चितवन पायेउ मन नियर,मन की बातहिं पाई। जहां रूप बैठी रही, तहां सुनायेउ जाइ ॥११॥ सुनि मन यात नप अभिमानी। चितवन ऊपर अधिक रिसानी। फहा मन पास फेर जिन जाहू । मन से दूर करहु यह चाहू ॥ मन सेवक दरसन दिग आई । मन के नेह की बात सुनाई ॥ दरसन यात मुना पर थापा । छाडे आपसा आपन आपा ॥ ओमन राय आस धै हियरें । भेजा प्रीय रूप से नियरे प्रीत पियारी नारि, गई रूप के ठाउँ आपन पास यतयेउ, निर्मलतापुर गाउँ ॥१२॥ घेरी समा रही होइ नारी । भइल प्रीत रुप की प्यारी रही पियत धन सुरा सुपाता । मन तेहि गली गयेठ तजि त्रासा चितवन कह तय प्रीत देसावा। चितवन रानी कह निर्यावा । देसि रूप मन रूप लेभानी । मन औ जिउ सो रीझी रानी ॥ मन सनेह दुरा जेतेा पाया । प्रीत रुप मन पाइ सुनाया सुना रूप मन को दुख, दाया संचर लीन्ह । यायसुयायागवन को,चितवन कहं तबदीन्ह॥१३॥ चितवन अपने सदन मझारा । मन राजा कह आनि उतारा ।। देवस चार पर रूपहि आना । मन कह भेंटा मन मनमाना । पिता कि लाज रही तेहि हियरें। आवै दूरि दूरि मन नियरें नार एक विभिचारिन रही । रूप कि बात पिता से कही । पिता रूप मन साथ बियाहा । भादोउहाथ मिलन को लाह। मन की इच्छा पूजी, भए दोज एक ठाउं रूप सहित मन पायेउ, पुनि सरीर पुर गाउं ॥१४॥ - - इन्द्रावती। ॥ ॥ ॥ ॥ दिन दिन अधिक बढी परभूता । जनमे मन पर सुन औ मृता ॥ चिन्ता गै परमद यउसाक । चन्द्र सुरज उत्तरे घर ठाऊ जिट रीमा दोउ बालक ऊपर। राजफाज सय छोडेठ भूधर ॥ राज सउँपि दुर्जन कहँ दीन्हा । आप प्रेम को सुपर लीन्हा । जित के सेवक निर्यल भए । दुर्जन दास बली हाइ गए जिउ कहँ घुद्ध बुझायेउ, जिउ न पुजायेउ आस। बुद्ध बटाऊँ होइ गयेउ, साहस जोगी पास ॥१॥ साहस ते जिउ मरम मनावा । सुनि कै तपी उपाय बताया । प्रीतपूर है निर्मल ठाऊँ । तहा महीपत कीपा ना चलहु चलहु क्रोपा के ओरा । होइ सँवारै कारज तारा गए दाज क्रीपा के पासा । जिनको राज बहारै आसा क्रीपा आदर बहुत कीन्हा 1 ठाउँ परम मन्दिर मे दीन्हा । क्रीपा के राजा रहा, सुखदाता तेहि नाउँ । जीउ मनोरथ कारने, गयेउ महीपति ठाउँ ॥१६॥ मुगदाता कीपहि वै दीन्हा । कह साई जो चाहस कीन्हा ॥ विविलेल्ने बुधि सग लगावा । बुधि जित निकट तिन्है लै भाव दून रुप भुलाना राजा । मनमा प्रेम दमामा बाजा वेदोक जिउ कहँ लै आए । कीपा नियरे भेंट कराए प्रेम प्रेम मद प्याला दीन्हा । तब जिउ सुखदाता कहँ चीन्हा।। होइ दवाल सुखदाता, चार देस तेहि दीन्द । जीज महाराजा भयेउ, पुनि सरीर पुर लीन्ह ॥१७॥ कहेउ सपूरन जीट कहानी । बूझै जो मानुष है ज्ञानी जीत कहानी सह मझारा । चित्र मनोरम कविन सँवारा॥ जोधाहत तो करत गरन्या । पै कवि चला कुवर के पाया। - ॥ ॥

इन्द्रावती। होइहै जो कोई भापनहारा । से फरिहै तिनकर बिस्तारा ॥ दीन्हे उ मैं एक भीत उठाई । कोउ कवि चित्र सँवारै भाई ॥ अरे मित्र मन चूमिकै, मन राजा को प्रेम । शारु रूप के सीस पर, मधुर बचन को हेम ॥१॥ - [९] पाती खड। पढत कहानी रागिय भवरा । बुध से नहि मत्री कह सवरा ॥ होते सग जो मन्त्रिय मोरा । कारज लाग न लावत भारा ॥ बुद्ध उहा सपने ना देखा । जनु हु हँकारत कुवर सरेग्वा ॥ धुद्ध सनेह घरन सो धाये । फुलवारी मो राजहि पायेउ ॥ अनुकम्पा से रोयन देक । मित्र से होइ विलग नहि कोक बुद्ध सेन के मिलन सों, राजहिं भयउ अनन्द । फुलेउ कुमुदिन मोद को,पाइ मिलन को चन्द ॥१॥ रहा न मन राजा के हाथा । लागेव इन्द्रावति के साथा मन धिनु भा अनुमन अनुरागी। दिष्ट नासिकाऊ पर लागी ॥ रकतआँसू आखित सो ढारा । नैन भए नोनित फौव्वारा ॥ घेता वाहि समै घलि आई । रहसि कुवर कह बात सुनाई। जैसा कति भयेठ तोहि तैो । पाइ दरस मुरछे तुम ऐसे इन्द्रायति मन मो घसी,की मन सो उचठान । है तैसो वह को नहीं, जैसो कहेउँ यखान ॥२॥ प्रेम फि बाट है याद हमारी । मनसेो उपठी कहा पियारी ॥ है दरसन इन्द्रायति रानी । रोम रोम तन आइ समानी ॥ अहे घसान से बाहर सेई । तासु बखान कर का कोई ॥ ॥

७. - , इन्द्रायती। नससिख से वह मरत चीनी । है सुन्दरता परमल भीनी ताको अतिहि सुधालय प्यारा है अकार सम प्रान मझारा ॥ झरना ता मुख मान को, मनमों रहा समाई। बुडी लेाचन पूतरी, यांस दगमों जाइ धन को बदन सुमज की चादू । अलकायर नागिन की फादू ॥ नैना मिर्गकि हैं मतवारी की घचल राजन कजरारी ॥ तिल कपाल पर है मुठलाना । की सुमना पर मधुकर छेना ॥ राइ अधर की अमृत हाई । की मूंगा की रवि सुत सेाई ॥ कली कि अहै अँगूठी । की नाही किछु भेद अनूठी ॥ दसन बोज दाडिम को, की मोती लर होइ । की होरा की नपत है, चमक बीज अस सोइ ॥४॥ घेता कहा बदन प्यारी का 1 सिव परफास मुकुर है नीका ।। प्यारी के नैना मतवारे । भेद अलख के अहैं मवारे ॥ तिल है सुन्न एकाई केरा । तेहि दिस करत जगत जिउ फेरा औ है सुन्न मनुष के जीका । बेग न परख जात है नीका ॥ अधर अहै झीपा कर ताको । सुधा समान बचन है जाको । मुख है भेद छिपाना, वृमिन पारै कोइ दसन निमरा ताको, मूल जोत को होइ धन वह जेई अस रूप बनाया । मनहु जोत धारा है काया पहिले जोन उतरि जिउ भये । आप आतमा होइछिपि गये। पुनि मन भये आतमा सेती । मन से काया चाह समेती ॥ एकै जीत तीन पहिरावा । पहिरनाम इन्द्रावति पावा ॥ जातो आग आग से बाज भयेउ पवन सा नीर घनाऊ । भयेउ नीर से माटो, चारों से भै देश देह और यह जीउ सों, पाढ़ी बहुत सनेह ॥६॥ , । + इन्द्रावती। " 1 पहिले धन के अम्बुक माही । अजन स्याम रहा है नाही ॥ भाते रहे नही कछु जाना ना अजन पर चाहुत आना ॥ सखी एक अजन तेहि दीन्हा । अजन है हत्यारिन कीन्हा ॥ दरपन दीन्हा ससी सयानी । आपुहि आप देखि बुधानी॥ प्रेम को पाव एक मो आयेउ । एकहि दुइ दिस दरस देखायेत॥ रूप पदारथ देखि के, प्यारी रही लोभाइ । गांहक खोज रिये घसी,दीन्हो सखी जगाइ ॥७॥ रूप समुद्र अहै वह प्यारी जवा प्रेम परा सिर भारी ॥ तासा देत लहर उबिलानी व्याकुल भै मन बीच सयानी ॥ लागत चार ठाउ तेहि नीको । है विरामी धन के जी को ॥ एक सरीर मॅदिर छविधारी । दृसर है यह मन फुलवारी ॥ तीसर अहै जीउ अस्थाना । चौथा जोत सदन हम जाना ॥ कोज नाहीं बीच मो, अपने रूप लेभान अपनो चित्र चितेरा, देखि आप अरुझान ॥८॥ मुनि धसान राजा वैरागी । बोला अधिक भयेउ अनुरागी॥ रूप पियारी का मैं देखा । जगत भयेउ दरपन के लेसा ॥ यह सब दिष्ट परत है माही । तामा देखत हा मुख ओहीं । रही सुगन्ध जहा उट केरी । मन औ चित्त वर होइघेरी॥ पहिल धार से निरसत जो है । ताफो प्रान पियारी से है ॥ पाती एक लिखत हो, लै पहुचावहु ताहि जीउ दुखारी काया, उठत कराहि कराहि ॥९॥ तय राला प्रेमारथ सोसा । इन्द्रावति को पाती लीसा ॥ अहो पियारी प्राअहेरी । सपत अहै उस आसिन फेरी ॥ जे पहिरा अगा पहिराया । चितवन मदसा जगत मतावा। । - इन्द्रावती। ॥ । सपथ दाज अधरन की खाक घसुथा बीच सुधा के टाक अहे सपथ स्पामल तिल केरी । जापर सरगनार हैं चेरी स्यामल लटकी सौह है, जेहि फांदे मन फांद। सपथ सलोने यदन की, जाको तुलै न चांद ॥१०॥ देस हमार कलिजर जहा । तुम्है सपन मा देखउँ तहा दिन मनि मत आ मन माही। गै हेराइ पर चिन्ता छाही ॥ छोडे सकल राज औ देसू । भयेउ तुम्है नित जोगी भेमू ॥ तष अनुराग चरन से धायेउ । मन फुलवारी भीतर आये ॥ दरसन दरसन किहेउ पुकारा । पायेउ उत्तर दरस तुम्हाला ॥ मोहि लेखें आदरस है, निर्मल यह संसार । तामा देखत है। सदा, सुन्दर यदन तोहार ॥११॥ प्रेत आगो जरा परान । बेधा हिये नयन कर बानू फा जो दूर परा है। प्यारी । निमरत नाही भजन तुम्हारी। जबसा मोह.धनुक तुम साचा । वित्तवन सरसो जीउ न बाचा।। यह तन माटी कहें का पारा । आमै परगट प्रेम तुम्हारा ॥ पै तेरि ढीठ आप तुम कीन्हा । प्रेम रतन हाय मह दीन्हा ।। है सनेह के जलमो, यदै प्रान को मीन बाहेर काढि न डारहु, ना तो मरै मलीन ॥१२॥ जब से मोहि असार मझारा । मानस लागा बान तुम्हारा ॥ उपजाहियें सहस आन्दू । गयेउ जगत को मध दुमदन्द्र है हिय प्रेम बान कर घाऊ । किछु पाहीं ओपद परचार आपद गिठन कहा हम माहीं।। भूलि मकल पर चिन्ता गपेऊ । ठाउँ तोहार स्वात महँ सऊ॥ हजै दरसन ऊपरें, नेरडावर जिउ मोर काटिजगत को फादा,भागि रचेउताहिर॥१३॥ दूसर ओपद ताको नाही इन्द्रापती। ७३ । - ॥ ॥ है सारङ्गी देह हमारी । तार बना है प्रीत तुम्हारी ॥ बाजत महै प्रीत को तारा । निसरत तासेा नाम तुम्हारा ॥ है। मै पिरत बन मा परा । काहुअ मेरो हाथ न धरा दया तोहार धरै जो हाथा । बन सो निसरत है। जिउ साथा॥ रहे 'आद को राजा भोगी । है। अब प्रेमपन्थ कर जोगी ।। बहुत लिखै वह मन दुखै,यात लिखी न और। अनुकम्पा चारी सदा, यह फुलवारी ठौर ॥१४॥ लिखि पाती चेता कह दीन्हा । चेता गवन रतन दिस कीन्ह।। प्यारी तहा वियाकुल भई । जबसे देखि कुवर कहँ गई ॥ कुभर रूप लागेउ अति नीका । हिये समान खेल भा फीका ॥ मन है बाग रहै नहि हाथा लागेउ मन जोगी के साथा आखिन सा देसै सै रगू । बसा परान मन रावल सगू भाखुम्भीर प्रेम तेहि, परी तासु मुख माहँ। भयेउ अस्त थानन्द रवि, फैलेउ चिपमाछाहँ॥१५॥ जय धन से सुख चिन्ता गई । ससियन के मन चिन्ता भई ॥ वैठिन आई चहू दिस घेरी । भइ पतग तेहि दीपक केरी ॥ पूछेन फस अमन हँम प्यारी । तुम सिर छाह पिता को भारी॥ ललित फूल मा पीत तुम्हारा । यही न फछा झकार ययारा ॥ रितु बसन्त पलु है फुलवारी । तेहि पतिमार कहा से प्यारी॥ है धन बदन विरोचन, सोम घटन केहि लाग। पिता छार सिर ऊपर, है उन्नत भल भाग ॥१६॥ भइउ अहे मुगधा के पना । होइ अज्ञात जात जायना रहा सेल तेहि ममय पियारा । परा न सीस सोच दुख भारा ॥ बीत गयेउ अब जब उरिकाई । मध्या भइउ भई तरुनाई १० ---- ७४ इन्द्रावती। 10 । - 4 से तरुनाई वेरिन भई । सेल फेल सब हरि लेगई पैतरुनाई है मोहि प्यारी । बल मति की पूजी है भारी॥ एक समै पिर्धाई, लागिहि काया साथ सोच करत है। निसिदिन, रूपनरहि हाथ ॥१७॥ या मन मरम लिपायम रानी । आन सोच है हिय समानी ॥ फोन रही धन मुगधा कन्या ।भईन मध्या गारी धन्या भई मघाला तरुनी नारी । यि न भै मन चाहन मारी॥ मा सय पर सय पर अस हाई । एफ बैस पर रहम कोई सो का अमन हैंसि जेहि सेती। मरम छिपावत है केहि नेती हव सब मरमी सहचरी, चा, कुसल तोहार । मन को मरम सुनाचहु, कै परतीत हमार ॥१८॥ हो गइया का कहते पुकारी । जादिन से देखते फुलवारी ।। जोगी नहा दिष्ट जो परा । रूपमन्त्र मन मेरो हरा तादिन से व्याकुल नित रहला दगध प्रेम पाधक को महक ॥ मन से गयेठ भूल सय खेला । भये मोर मन जागी चेला ॥ जागी प्रेम विधापा हियरें | निसदिन पावत है।मन नियर दूमर एक न भावत, जोगीहिये समान मन अकास उदित भयेउ,तासु प्रेम को मान॥१९॥ मानमती अभिमानी सखी । लवी नेम धन मान न रसी। इन्द्रावति तेहि छागत नाही । जोगी बसे आइ मन माही ॥ जोका होत आपना जारी । तास पीन लगावहि गारी ॥ जोगी दिन दुइ मो चलि गाई । तेहि कारन सन देहु नसाई ॥ जोगी माया रहित भिसारी । उचित कहा मन लाइ प्यारी जो अपने सम नाही, ताकी प्रीत न लेहु तजि जोगो की चिन्ता, मन अनन्द पर देहु ॥२०॥ .

इन्द्रावती।
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मानमती सो कहा पियारी प्रेम मरम
जेहि निस दिन मुमिरत है कोका तार कह र
वृमि परत सुमिरत है माहीं । सुमिरन म
मैं न आपसे साधा प्रेमू प्रेत साध
का राजा का कोई भिखारी । सुमिरै साई
कुल विसेप उत्तम नहीं, सुमिरे र
उत्तम जात भये सो, गरब नराखे
दायायन्ती उतर सुनाया
। मानमती
वह जोगी रामा सुनि परा । तजि करा
माहि जाने वह तपी वियोगी । इन्द्रावति
यसै आय फुलवारी साई जो रानी
धूझ खेोल मन अन्तर पटा । सपने का जे
दायावन्ती पचन सुनि, इन्द्रावति !
कहा सत्त तुम भापा, भापा सत्त।
समुझाइन सघ ससी सपानी । अब तेज
आई पहूघा जोग सरेसा
मान घेत देखत फुलवारी
नता कहा
जो जोगी कह समुमत आजू । पाइहिती
गगन पहूचै जोगी सीमू वृन्दारक ते
धीरज धरि कै देखियै, होत होतक
tran
।
.
A
।जाको तुम
॥

७६ इन्द्रावती योठी तुम घेता जस कहा । फुलवारी जोगी तम अहा माज परन समुफत मै रोई । कैसें मोतिय का साई माती फाढे कारने, वुडे न जलधि मझार नाता जोगी के निमित,जाइहि जीउ हमार ॥२४॥ चिन्ता जोगी लाग न याद । अउस दया से मोती फाढे ॥ जो प्यारी मा जागी घसा । हाइ सजोग नपत के दसा हसि पदुमिनी कमल औ चन्द्र। ससिकमलहि ताहि देखिअनदू। होइ मधुकर जोगी रस लेई । होइ तिमिरार जोतताहि देई॥ ताहि जोगें हैं जोगिय राजा । सिर्जनहार समारइ काजा उतर देह लिग्वि प्यारी,जाइ देवावउँ ताहि। प्रेम पन्य तुम लीन्हा, करता देइ निवाहि ॥२॥ उतर लिखा तय प्रेम सजेगी । जो मोहि लाग भयेव तुमजोगी। तो मेरो मन तुम हरि लीन्हा । अपने रूपहि जोगिनि कीन्हा॥ सपन बीच देरोठ मैं तोहीं । गुरु सपन दरसन भा माही ॥ जा दिन से सुध मिली तुम्हारी। प्रीत हिये बाढी अधिकारी ॥ देरी नित फुलवारी गइक । दरसन पाइ बाउरी भइक होड जोगीआयेहु इहा,छाडि सकल सुख भोग। मह रहोंताहि कारने, व्याकुल पाइ वियोग ॥२६॥ प्यारे दूर न जानेहु माहीं । पावत है। घट भीतर तोही ॥ मूदे नैन तुही माही सूझा । देश मूल मै तुम कह झा तुमही देह धरे सब ठाक । रविससिनीरज कुमुदिनि नाऊ दस में सहस एक से होई । सुन लागे सुन नासें सोई तस तुम एक सहस गुन तोही । गुन तोहार अरुझायेहु मोही॥ जिउ मा नियर तुम्हारे, हौं सरीर सों दूर । मेम छाह मोहि घटमा, छाइ रही भरपूर ॥२७॥ ॥

इन्द्रावती अरमान कालिजर राजा । दरसन देत तुम्हें मेाहि छाजEM पै परगट मुख हेात हमारा । पातर हेरत एक ससारा औ परिसै जग लोग विराना । इन्द्रावतिमनतपिहि लोभाना है मोहि उचित प्रीत अन्य कर ऊ । लेग जगत मुख धीच न परक ॥ जो सजाग मनोरथ राजा तो मोती को कादय छाजा ॥ प्रान पियारे अहै माहिं, चिन्ता प्रेम तोहार । चित्र तुम्हारे बदन को, है मन पन मझार ॥२८॥ धन पाती चेवाले आई । राजा मान अभिलाय बढाई । कहे हेत पषी उडि जाज । प्रान पियारी है जेहि ठाक॥ आप भीचु मोहि हारत भारी । माटी हेात सरीर हमारी मान सुरा का हेातेउवाला से अधरल लावत भरि हाला॥ अधरतेहिक जिउदाता आही। देत पले जीवन जस चाही ॥ मारिनिर्यल निगुन कह,अलख सकति अस देत। प्रतविधी ता बदन को, होतेउं चाह समेत ॥२९॥ जब परभात भयेउ उजिपारा । फुलवारी मो यहिउ ययारा ॥ पाई ययार कली रहमानी । बहुम हमी यहुतै मुमुकानी । राज कहा पवन के साथा । है मेरे मन जा धन हाथा ॥ जो तेहि और यह तुम आई । दीन्हे ३ मार सदेम सुनाई सुघरी मिली दया की पाती । भै मुद मै हिर्द औ छाती पदिराग्वे मन ऊपर, डरे किमान मदाहि। पाती करन जरा, धरे नयन पर ताहि ॥३०॥ फेर हरेउ आमृ भोज । तहितेधरेनियमह किन छीज। चाहत है। नित दया तुम्हारी। है नहि दुम भास हमारी । ठार तोहार यो मन माही । ठाउ तहा दुसरे कर नाही ॥ । -- ॥ २॥

इन्द्रावती। ७८ - समुफन करुनी हो रँग राती । यहुतै वेध हात मेाहि छाती ॥ प्रेम आग दगधी हिय काया । पर चिन्ता को दारुज राया ॥ प्राइ परा है। प्रेम मगु, कर गहि देहु सम्हार। चिन्ता करउँ मिलन को, दूसर धन्ध नेवार ॥३१॥ अरे अरे फलबार पियारे । मदिरा ढारै नैन तुम्हारे एक पियाला भर मद दीजै । मोल पियारी मानस लीजै ॥ पिअत सुरा पर चिन्ता मारउ । पलकनसे मद सदन घोहारत॥ ताहि सरवन सेा है दुरव्यचा । दून अमल मुख सेना रचा ॥ यह मन तापर आवई जाई । मूलत है मन देत जुलाई दे मद अपने हाथ से,पिउँ देखि मुख तोर। चाहसि तो मद मोल ले, प्रान पियारा मोर ॥३२॥ ॥ [१०] दर्शन खण्ड। कुवर सदेस पवन जो पावा । इन्द्रावति सो जाइ सुनावा ॥ प्रेम अधिक रानी कह बाढा । हाइ अनुरागिन उत्तर काढा ॥ हम कह जानहु प्रीतम माई । जग भीतर मेंहदी की नाई ॥ है। मै धन परगट मेहरी । पैहै। गुपुन रफत सी भरी ताहि आखिन परमेमन लाभ सेना अब नित मारत चोभा। होइ निडर जा ताई, नहि भेंटत हो तोहिं तब ताई सुख मन्दिर, दुख मन्दिर है मोहि ॥१॥ मेरे हाथन हिर्द सयाना । साताहिजोग जटा अरुझाना। है। अमनताहि सुमिरत जियऊ। सदा करेज सरोनित पियक ॥ ससी यान हम कह समुझावै । घट की पीरा एक न पावें ॥

का . द्रापती। जागा न गई घेयाई सो का जाने पीर पराई पापन महे लाश की येरी । ना तो घेरी हानि तेरी पवन सुनाइह तुम कर, सब दुख विधा हमार। जगमों इच्छा मेरो, संजोग तोहार ॥२॥ राणा उतर पवन से पायेउ ।प्रेमपुरा उपवन से आयेत ॥ वह मर ठाउ पेमपुर गाक । मद्यप रहा पेमपति नाज समेत कुघर तेहि द्वारी दाढा । आदर यचन प्रेम पति फाढा ॥ फही भीरा कयु पाही जोगी ।की काहु के प्रेम यियोगी कहा भीर में पावन तबही ।हाइ दयाल उप मोहिमयहीं। इन्द्रावति को मिलन है, उत्तम भीग्न हमार । जग में दूसर भीरप को, अहो न चाहन हार ||३|| मुनि फलवार कहा हो जोगी । महा रूप के अहद वियोगी । है यह रूप दीप उजियारा । है पद्दतापर समारा राज दीए को दीपक अहई । गुप्तम रहै न परगट रहई कादि परन माती आये । तय कोउ इन्द्रायति कह पावे।। अय तो पियचास मद मेरा । होइ कि जे कारज तेरा एक पिघाला मद पियें, छूट जाइ सो त्रास । भीख भीख कै मागह, जाह महीप नेवास ॥४॥ कहा त्रास लीहें यह जीक । मद्य धान दापित नहि पीऊ ।। चोला मद्यप यह मद पोसू । इष्टा लाग पिय नहि देखू ॥ अब अॅधयउ मद भा मतयारा । गयेउ तहा जहा राग दुधारा॥ फोजीमा मनवारानेही । पैन तमा बुद्धहि मति देही ॥ सहि राज दुरारे ठाम 1 पादप रहा सनेहा नाऊ जो तेहि छारें वटै, ता कंह आज्ञा होड - जाइ जलज के सागर, मोती का? सेहि ॥५॥ ॥ ॥ -- - ( - ८० इन्द्रावती। ॥ वैठा कुबर सनेहा तरे 1 चिन्ता कथन चिन्त मे धरें ॥ आइ एक जगपत का घेरा । कहा सनेहा छाहं बसेरा लेई आइ के राजा साई । जो इन्द्रावति प्रेमी हाई कहा सनेहा छाहें आये तब जब प्रेम रतन को पाये। तजि कालिजर राज पिपारा । जोगी भयेउ तजेड घर बारा॥ होइन्द्रावति जोगी, जोग पियाला राय दरसन भिष्या मागमन लागा तेहि माथ ॥६॥ कुवर सरम जय चेरा पायेउ । तव जगपति सोमरम जनाये। सुनि जगपति तेहि फेर पटावा। तुरत बसीठ पवन सम माया । फहा भीए पाव किम ठाढे । सिप्या मिलै 'जलज के काढ़े ॥ जय यमीठ यह कहे 3 सदेसा । मानहु दीप बचन को लेसा ॥ राजहि मूक परेउ वह पन्या । जानित पहिरेउ जोगी काया। कता होउं मै सिन्धु मो, जलज मिले तो भाग। न तो मेछावर होइ जिउ,प्रान पियारी लाग॥७॥ ता दिन कुवर प्रेम रस पाया । रैन भनेहा तरे धिनाया धवराहर रानी प्यारीको । सपेउ गगन राजा के जी को। इन्द्रायति को चिन्ता धरें । गयेठ कुधर धराहर तरें तेहि पल इन्द्रावती सुभागी । आप करो चितवन तागी॥ रधि परसातरोरो या । गपठ तमिरारा पासर हुभा ॥ राजा श्री रानी सों, भयेउ नयन दुई चार तति मामा अतर पट, धचराहर रग्यपार | भापम यदगी घ घालीन्हा। अधिक वेगाकुर मिहि कीन्हा मोसम सपअधारन देगा Pा पार धन जीउभरेसा ॥ रोवि डाग दादुग यादा । गिटन वियोगदातयहि मादा , ॥

इन्द्रायती। धवराहर पर प्रीतम आवा । आपन रूप माहि निरखावा । आज उघारेउ दसई द्वारा । दिष्ट परा वह प्रीतम प्यारा ॥ दरस देवायेउँ आपनो, प्रीतम प्रान हमार । जीउ न नैन अघाने, भा बैरी रखवार ॥९॥ राजा हाहा कहि पछताना । दिष्ट परा जिठ,फेर छिपाना ॥ आज परान परा मेहि दोठी । दिहेठ सरीर र दिस पीठी ॥ जित का मैं जिठ का जित देसा। लुयुधाना यह जीत सरेखा आज बदन देखा मैं जाको । है यह जगत झरोखा ताको ॥ मन की दिष्ट प्रान पर लागी । येउ जीत अधिको अनुरागी॥ आयेउ विर्छ तर कुंवर, आसु रकत की रोइ । अपने घट मो जरि रहा, यिथा न पूछा कोइ ॥१०॥ घोही ममै रागि एक आयेठ । आइ मेम की राग सुनाये ॥ प्रेम राग सुनि निर्व बैरागी । अधिक भये अभिलाषी रागी॥ उठा वियोग हुतासन जला । बुद्ध समेत सिन्धु दिस चला ॥ आपा गढपति दुर्जन नाक । कटक समेत रहा मगु ठाक भेटि कुपर कहँ कहा गामाई । क्रीपा करहु आज यह ठाई ॥ तुम जोगस्वर ज्ञानी, मैं मूरख मति हीन होइ तुम्हार पचन सुनि, बुद्ध मोर बलवीन ॥११॥ भाप कुवर बोला तेहि ठाक । लाब पन्थ है कहा चिराऊँ ॥ दिन बीतत भा काज न हाथा। नहि कछु दरब जोग को साथा॥ यह जगजीवन थारी आही । काज अधिक करनामेाहि चाही। सपन समा यह जीवन मेरा । अहै दिया सब बहै ककोरा ॥ सत्तर पथ दिष्ट मोहि आयेउ । तिन्हैं तजेउ यह सचर माये॥ तब लग कहा थिरो मैं, जगमों काहू साथ जब लग नाहीं होत है, जोग मूल मोहिहाथ ॥१२॥ ॥

इन्द्रावती । ॥ ॥ दुर्जन कहा जोग तुम धामा लाँये पन्य घरन का राग फवन पन्थ के मह थियोगी । हहु मेयरा की जगम जोगी ॥ कहा वियोगी पन्या धारी । इन्द्रायति नित महत शिसारी॥ परन गलन काढ मह जाक । हुयुफी गाउ सुमिरि यह नाक॥ फहा अघाने जीवन मेती । मान तजहु इन्द्रावति नेती ॥ यहुत महीप जलज नित, वुडे सिन्धु मझार । मान न देहु गोसाई, मानहु कहा हमार ॥१३॥ राज ठतर बान अस मारा किछु न रहे दुर्जन कह पारा॥ पायहुर कीना बहताई । बाधा रामहि के सतुराई दुर्जन गाढा दुर्शन भयेक । राजहि आपागले गयेऊ ॥ प्रेमी ससे माना नाही । इन्द्रावती रही मम माही मन मा निम दिम सुसिरनघाही। रहै कहू किछु दोष न ाही ॥ राजा परा बन्द मो, वुद्ध मेनहत छूट बन्द छोडाइन पारेउ, माना मनमो टूट ॥१४॥ मा धावा जो भेद उिपाया । जो बोला सो सीम गवावा जी अली तालू के तरें । सग्गसली प्रयालम धरें अधर न पोल कह करु मेरा । रासन भीत कान बहुतेरा भेद मित्र सो राखन गाई । मित्र मित्र के दूसर हाई भेद न सोलु देवस ते नाही । खोलत भेद जाइ जग माहीं ॥ सुना नहीं है यह बचन, मन मो बचन छिपाच । घातरि हाथी पाइयो, बातहि हाथी पाव ॥१५॥ दर्जन की कामिनि मोहनी । कै सिगार एक ज मिशिबी ॥ आ धन प्राध लीन्ह दन चेरी । मब अपउरा इन्द्रपुर केरी आई कुत्रा निकट भै ठाडी । बिनती बरन अधर सा काढी॥ - - । ॥ D इन्द्रावती। प्रेम पन्ध ॥ मेरो भलो न कीन्हा ।तुम अस जोगी कह बँद दोन्हा फोप न मानहु राजा जोगी ।ले दस कामिन हो अब भोगी। इन्द्रावति चिन्ता तजी, मानहु सुख श्री भोग। येइ दस कामिनि संगी, हे जोगी तोहि जोग॥१६॥ राज कुधर घूझा यह गोरी धैरी है मोरी फहा बन्द मैं ता दिन पाना । जा दिन जिन काया मे आया। उचित कहा यिमराक ताही । आप बोध पावन है। जाहो ॥ घट हमार जे। छाई सेाई । प्रान मरीर छूछ मेाहि हाई ॥ येह दसा कामिनि सग तेरी । हैं लाया इन्द्रावति केरी प्रेमजेहिकमोहियाउरो,कीन्ह छोडायेउराज। सो प्यारी है मान जिउ,है तासोमोहि काज ॥१॥ रहिये येहि मगर बैरागी । भूरत तार अली मोहि लागी।। धवराहर तोहि देठ उठाई । दामिन देव करहि सेवकाई ॥ रुप सुवरम देव परभूता । करै धनी उपजावै भूता जो इन्द्रावनिप्रीत भुलावाहु । अयहीं मुकत बन्द मे पावर ॥ ता धन को मन काठ करेरो । ता मन हाइ न विन्ता तेरी ॥ बहुत महीपत बूडे, मोती सिन्धु मझार है जग मा हत्यारी, वह इन्द्रावति नार ॥१८॥ काहे भलो हमें तुम चीन्हा । भला सोड जो हम कह कोन्हा॥ मैं यह नगर रहत तब ताई । जय लग होई लिखा जग साई काह फरी कचन ओ रुपा । कचन रूप पन्ध मा कूचा मापन भुलै जेहि बँद माही । भलो से धद मुकत अल नाहीं॥ हित चिन्ता का जानई कोई । मैं जाना की जानै साई करत न हत्या आप वह, इन्द्रावति रमनीय । दीपक कहत पतंग से, मो पर दे तैं जीय ॥१९॥ ॥ ॥ ॥

इन्द्रावती म ॥ घेरिन सहित मोहनी गई । उतर धान से घायल भई राज ऑसु रकत की ढारा । सा इंगुर गेरू रतनारा सोच बन्द को निर्प न कीन्हा । रोयेठ आपन आगुन चीन्हा ॥ आपन आगुन काइ सुनावठ । आगुन सो सजोग म पावत जो ममता यह मासे जाती होत गोद मो वह रगराती ॥ बिच अंतर पट हो रही, यह ममता मद् मोर । मिलचे के दिन दूर हैं, जग को जीवन थोर ॥२०॥ अनुरे सुवा मित्र तैं मेरो । मन मो धरो निहारा तेरो ॥ रहत जहा वह प्राम पियारी । जाइ सुनाये विथा हमारी ॥ ताहि बिनु जगत बन्द है माहीं। किछु हमार चिन्ता है ताही ॥ दिन औ रात जपत है। नाऊ । है आनन्द बन्द के ठाऊ हम कह यह जगबन्द मझारा । है अहार एक नाम तुम्हारा ॥ जो न होत मोहि बन्द मों,नाम तोहार अहार। एक घड़ी ठहरत नहीं, जीवन प्रान हमार ॥२१॥ ॥

इन्द्रावती। । ॥ ॥ का [११] सुवा खण्ड । राजा रहा धन्द मो जहा । लागा रहा विळ एक तहा धेठा पनी पर एक सुवा । रीवा सुरा नयन जल चुवा ॥ देखा कुवर कीर से कहा ढारेउ आसु कवन दुःख अहा ॥ ना पिजर को अहइ कलेसू । पख पाइ मा पूरन असू की ताहि लाग भूख औ प्यासा को आगम केो हीयें त्रासा है। दुग्व भरे सुआ तुम, का तोहार है नाउं । को तोहारमाता पिता,कहां जनम भुमिठा॥१॥ पूलत हो मेरे माऊ । माता पिता जनम भुमि ठाक । प्रान हमार नाम है जोगी । सदा जगत मा रहट वियोगी॥ धरती मात गगन पितु नाऊ । है यह लोक जनम भुमि ठाक ॥ औ जो पूछह गुरू के चेरा । जनम देम तन औजिउ केरा। तन को देस इलापुर जानेउ । जिउ को गगनपूर पहिचानेउ ।। पंख पाय सव मोरें, थहै न भूख पियास रोवत अहौं विर्छ पर, मित्र छाडि गा पास ॥२॥ जा दिन से भा मित्र विछोह । नैन घटा बरसावत लाहू रहेठ मित्र सँग तेहि बन माही। भूख पियास रहेउ जह नाहीं ॥ काग एक भा शत्रु हमारा । दीन्ह चिन्हाइ से गाहू धारा ॥ ( लाग दोष गोहू के खायें । बिछुरा प्रीतम देशपिल पायें ॥ गोह खाइ दूर मैं परा । सुख अनन्द महेरुह हरा मित्र बिना तन मेरो, पिंजर चार संकेत अहै विराना सब कोज, हित सो जासों हेत ॥३॥ आगेह बरजा मित्र पियारा ।पै खायेवं फादे मह हारा ॥ ॥ ॥

इन्द्रावती । ॥ ॥ रहा न गाहू विहरल हीया । निसचै रहा प्रेम कर बीया वाही बीज मन धरती परा ।जोग बिर्छ तासा अवतरा रहा न बायम जो निर्वावा । आपुहि प्रेम दृन हाइ आवा॥ की वह बीज रहा मति केरा । जेहि खाये विठुरन दुख घे॥ यह सरीर पिंजर मो, रहत दुखारी प्रान चाहत ऊडै तारि कै, जाइ पहिल अस्थान ॥४॥ सुनत सवा दुख राजा रावा । रकत आसु गुजा महि पोवा ॥ ले सारङ्गी गीत निसारा । उतरन ठाउ अहै ससारा पथिक अहै हमारो नाऊ । पिता पीठ है उतरन ठाक मात उद्र पुन है पिर थाना । पुन थिर ठाठ जगत हम जाना॥ पुन माटी मो लेव बसेरा । फेर करब परलो दिस फेरा पुनि जस करनी हो रही, तैसा पाइव वास । अब चाहत है। निस दिन,प्रान प्रिया को पास ॥२॥ बोला सुवा परान मरेखा । बन्द आप केहि कारन देसा ॥ जग के बन्द पर सो कोई । जाहि जगत को धन्धा होई ॥ कहिये आप प्रीतमा को है । मन के बीच उर बसी जो है ॥ कुवर सुवा कह प्रेमी पावा । प्रेम विथा की कथा सुनाया ॥ विनती कीन्ह सुवा तेहि माना। भयेत परान परान पराना प्रेमो पाइ सुवा कहं, राज कुवर गुन रास सहित सँदेस पठायेउ, इन्द्रावति के पास ॥६॥ आर्गे मालत कह मुध भयेऊ । मधुकर फुलवारी नजि गयेक ॥ व्याकुल भयेउ घर नित थारी। यिनु अलि का मालत का यारी फाट पलपल दोरघ सामू । ढार नैन रकत की आसू विरह व्याल कटेत धन परी ।फो पिनु मित्र पिपाय जरी ॥

। दूसर ॥ ॥ इन्द्रावती। कहै कहा गा प्रेम पियारा । जा सनेह मद मन मतवारा मैं अचेत नहि जाने, केहि दिस गा रम सोइ। कोन करम अव कीजे, जाते यस मों होई ॥॥ इन्द्रावति व्याकुल जेहि ठाई । दरमन लागि सखी हुई आई ॥ रूप गरबता एक मयानी प्रेम गरयता सानी धन के मन चिन्ता अधिकाई । मन दुख रूप गरबता पाई कहा लेो दाया बच कहना । चिन्ता बीच न एना रहना गेंदा साई जगत मो जीत । जेहि आनन्द बीच दिन बीते। रानी के मन चिन्ता, बूझत हिर्द हमार चिन्ता मरम पियारी, भापत बदन तोहार ॥८॥ हा मन चिन्ता बूझे उ सखी । भानस मरम भले तुम लसी ॥ सचर एक दिष्ट माहि आई । सीर न केम चाह अधिकाई ॥ परग धार से सचर चोखो । दामिनिमम सतरहि निर्दोखी॥ कोत पवन कोऊ जस बानू । तरै मिलै सुराद अस्थान फाउ चीटा सम चले न पाएँ गिरहि कुडमा जाहि पलारें ॥ देखि पन्थ डर मानेउँ,तापर धरेउँ न पाव । खरग धार सम सचर, करै न पद मा घाय ॥९॥ रूप गरबता मुनि चुप रहो । हमि के प्रेम गरयता कही प्रेम पन्थ है कठिन पियारी । चोखी खरग घाह अधिकारी। हाइ सुखी गियहा जो कोई । दरसन सहित सरग मो हाई ॥ तुम्हें प्रेम है जाको रानी । तेहि नित चिन्ताहिये ममानी॥ पन्य एफ अस अलक बनाई । मब कोऊ तेहि कर जाई ॥ चिन्ता करहु न रानी, दया करै करतार होइ प्रेम को प्यारी, एक ठाउँ एक बार ॥१०॥ ॥ - - ८८ सुधा ॥ ॥ ॥ इन्द्रावती। लिहें संदेम प्रान गा तहा । व्याकुल मन इन्द्रावति जहा ॥ देखि बोली की छवि । जिठ से प्रेम पीजर हुआ जय इन्द्रावति नामिक देखा । लाजवन्त मा सुवा सरेखा देसि सुधा अनचीन्हा नियरें । भयेउ अचम्भा धन के हियरें। जब न उमा पिञ्जर मेो हारा । सुन्दर पच्छी होत पियारा दयावन्ति वह रानी, दया सुवा पर कीन्ह । सुवा लाग पिंजर मों, जल चारा भर दीन्ह ॥१२॥ दीप सिसा ऐसी वह बारी । साफ होत घर दीपक बारी ॥ रहा रात बरखा रितु केरी लिहेन पतग दीप मह चेरी ॥ जरि पतग दल बहुतै मुवा । चितै दीप दिस बाला सुधा ॥ धरिये दीप गरब मन धारा । यह जीवन धारा है तारा मा पल आई पूगै आई । बहै पवन एक देइ बुझाई दीपक दोही जरत हैं, पुरै कामना देहु निस भर के जीवन उपर, काहे हत्या लेहु ॥१२॥ जप पियूष समा मुखयानी 1 सुनि रहसी इन्द्रावति रानी॥ लीन्ह उतारि सो पिञ्जर रेवा । कहा नियर ले अरे परेवा आम बुद्ध सो भयेउ पियारे । म ते। एक मुठि पख तुम्हारे ॥ बुद्ध भान ताहि घट मा उवा । हॅमि मानुप हँसिका जो वा ।। मनि पूजी जो तुम्है न होती । हेातेहु पच्छो पसु की गाती ॥ तुम अनचीन्ह परेवा, ना हम पाला तेहिं । केहि हित आइ धरायेउ,तान सुनावहु मोहिं ॥१३॥ सुया समस्त सदेस सुनावा । इन्द्रावति मन पावक लावा ॥ प्रीतम कारन करुना कीन्हा । अम दुख ता कह करता दीन्हा॥ कैसा रहा मात को हीया । असे तनुज यिलगि जेइ कीया॥ ॥ । -

११
॥
इन्द्रावती
कैस पिता को रहा करेजा ।जो अस पुत्र विदेसहि भेजा ॥
है जिउ चाह पियारा वोही । मन्दिर धन्द सदन सा माही ॥
हम धन के नित रोवत, आंख सागर बाढ
घन श्रासू जल लै चढेउ, परखेउमास असाढ़ ॥१४॥
तात भई इन्द्रावति छाती
। रातहि लिखा कुपर कह पाती।
मुखी न जानेउ मोहि अनुरागी। है उद्वेग व्याध मोहि लागी ॥
गा घिघेच यह जीत हमारा । वन्द तोहार चन्द मोडारा
है एक मानुप मित्र पिता को । क्रीपा राय नाम है ताको
सुध तोहार किरणा जोपाव
। तो दयाल हाइ बन्द छोडाधै ॥
रोवत आंसू रकत को, इन्द्रावति छविरास ।
पाती बांधी सुवा के, भेजा प्रीतम पास ॥१५॥
मान सवा पाती ले आयेउ
। प्रान अहार सनेही,पायेठ
रहमा हियें प्रेम का चेरा
। दरसन पायेत पाती फेरा
पाती दरमन पाय नरेसू । गयेउ ध्यान दरसन के देसू ॥
खालितनारुह सुक उहि गयेऊ । दगसे छिपेठ दुर्गम भयेऊ ॥
बुद्ध सेन कहँ कुवर पठावा । किरपाराय निकट चलि आया।
रहा अकेला बन्द मों, हित सारंगी हाथ
प्रेम प्रान प्यारी को, रहा कुपर के साथ ॥१६॥
धन नैहर को नगर पियारा । धन नैहर को मिर्मल तारा ।
धन प्यारी जो नारा जाई । रहमि सखिन के सग नहाई ॥
धन सनेह प्यारी अलबेली 1 जा सग खेल सखी सहेली
धनमो जा कह आगम मूझा
। खेलत मो सासुर कह बूझा ॥
धन जो सासुर घलो जाना । प्रीतम प्रेम पन्य पहिचाना ।
धन जेहि मोच अगम का, खेल न रहै भुलान।
थागम की चिन्ता सों, पावै लाभ निदान ॥१७॥

९० इन्द्रावती । [१२] नहान खण्ड। ॥ ॥ इन्द्रावति मन प्रेम पियारा । पहुचा आइ तीज तेवहारा ॥ रहिल जहा इन्द्रावति प्यारी । आइन राज दीप की बारी ॥ हाड कष्ट मन रहा समाना । पै आनन्द ससी नित माना ॥ फहेनि सहेलिन है डर मानू । मन तारा धलि करहि नहानू ॥ रतन हितू जन के यस सई । ससिन साथ मन तारा गई ॥ केस सुगन्धित खोलि के,राखि चीरसय तीर। पहिरिनहानदुकुलसकल,कीन्हा सजल सरीर॥१॥ अब जूरा इन्द्रावति छोरा । भयेउ घटा भी बाद अारा ॥ पैठिहु जब जल भीतर रानी । पानिय पायेउ तारा पानी झुलनी मूलेहु करत नहानू । लहकि चहेत चुम्बै अधरानू ॥ लखि नथ मोती की अमलाई । सुक्र छपाना आप लजाई मनु तारा भा गगन समान 1 अयेत मयक समा वह प्रानू ॥ सुरज उप्रा श्राकासही, चन्द्र उआ जल मांह । कुमुद तामरस फूले, दोउ मित्र के पार ॥२॥ कहा रतन सो एक सहेली । वरनि न पारो ताहि अलबेली। केस कस्तुरी हिदै फादू । अहै लिलाट अजेोरा चादू ॥ अहै भिर्कुटी धनुफ समानू । है यरुनी निसनू के यानू नैन सलोन जगत मन हरा । करन सीप मोती सा भरा नासिक मनहु कीर बैटो है । यरुक अकार फलानिधि काह। चिबुक कृप को पानी, चाहत कीर घरान फूल गुलाब कपोल है, तिल है भयर समान ॥३॥ सोरम छाल अधर रतनारा । दमन पाप्त मोती को हारा॥ " । .

इन्द्रायती। 1 - ॥ । मन मेरो लालहि धित धरा । जाइ चिबुक गाहा मो परा ॥ रेसा एक ग्रीउँ भी है । का बरनो सभा मन मोहै ॥ निर्मल बदन आरसी छाजे । गल कचन को डाडी राज अमल कनक से भुना बनाया। सुन्दर हाथ कमल मन भाया ।। यह सामै हो रानी, जल श्री मुख रचि तोर । पाइ होऊ कर वारिज, विकस चले मुख वोर ॥४॥ चरज धीर दुध मनमथ को है । छबि उपवन दुश् श्रीफल सेाहैं। नाही नाही धुप यह जानहु । बटा जमल जोत के मानहु ॥ का बरनो रोमावलि हेरी । सेल्है मदन याहनी केरी पातर लक केस की नाइ नाही से सिरजा जग साई ॥ जय चरन से आघम्सी है । रम्भा खम्म कमल पर साहै ॥ मानहु खम्भा रूप के, जुगल जंघ है तोर चरन यखान न कैसकों, नित परसै चितमोर ॥५॥ सुन्दरता को लच्छन जेते । प्यारी चेरे तेरे तेते लट फुतल अति स्यामल आहे। भौह स्याम जेहि इन्द्र सराहै। स्याम अधिरु लोचन सँयराई । स्यामल वरुनी जिश्नु डेराई ॥ ललित अधर औ रसना तारे । अँगुली सीस ललित रग धेरे ॥ ललित कपोल गुलाब लजाही । जग मन मधुकर समा लोभाही॥ तरवा और थोरी, आनन रसना छोट गल कुतल दिर्ग लाव है, बानन मिले न वोट ॥६॥ दसन सेत औ नैन सेताई । अधिक सेत कछु बरनिन जाई। गोल सीस ओ बदन तुम्हारा । गल एडी विधि गोल सवारा। ऊच नामिका कची भाहैं घरुनी जच घात सम साहैं ॥ करन छिद्र पायेउ सकराई (साकर नासिक छिद्र साहाई ॥ - .

९२ इन्द्रावती। ॥ ॥ आहै साकरि ना तुम्हारी । तोहि विधि साप सानि सवारी॥ एतो सुधराई पर, रंचिक गरयन ताहि सुन्दर सील तेहारो, लागत नीको मोहि ॥ निज बसान इन्द्रावति पाए । रही लजाइ सीस आधाए कहा बखान करहु का मेरा । है मनाक जीवन जग केरा ॥ का अभिमान देह पर करऊ । एक दिन होइछार हाइपरज गरब ससी सब ताकह छाजा । जो त्रैलोक बीच है राजा जे निधनी को सग न चाहा भयेउ न तेन्है अगमा लाहा । परगट रन देह को, देखि न गरवै कोइ श्रावै एक देवस अस, छार कलेवर होइ 18 बोलिन राजदीप की नारी । आवहु जलमो रचैं धमारी ॥ जब लग सीस पिता को छाहा । खेलहि कोठ करहि जगमाहा॥ जब चल जाहि कत के देसू । कैसे कैसे सह कलेसू नइहर देस कहा फिर आवन । कहें यह पन्थ चले यह पावन ॥ सो गुन एक हाथ न आया । जासे हाई प्रीतम दाया जानो नहि पिय प्यारा, राखै कौने मान एका गुन नहि सीखा, हम चाउर अज्ञान ॥१०॥ रानी कहा भेद अब कहना । केहि गुन हेाइ कन्त से लहना। एक कहा सेवा नित कीन्हेउ । चितमरत सम पिय पर दीन्हे ठा। एक कहा लहना तय हाई । पिय जो कहै फरै धन माई ॥ एक कहा नित करत सिगारा । चाहै धन कह कन्त पियारा ॥ पावै लाभ कन्त से साई इन्द्रायति प्यारी करेउ, ताकरं चाहै पीउ जो पिय को संवा किहें, गरय न रासै जीउ ॥११॥ ॥ एक कहा जो इन्द्रावती। - समुझ बन्दमो प्रीतम प्यारा । इन्द्रावति अम्युम जल ढारा ॥ महि जानो केहि भाते साई । दिन औ रात बितावत होई॥ अरे जिउ दाया ताहि नाही । तेरो जीउ परेच बँद माही जलनातनी ठाढतवानी । सचिन सान्त रसमा पहिचानी॥ पूछै आरामपुर की बारी । सजल नयन केहिलागपियारी। धान अनंद देवस है, अहे तीज तेवहार । केहि कारन चिन्ता मो, प्यारी जीउ तोहार ॥१२॥ सफल ससिनसे मरम छिपावा। आनहि भाति कि बात सुनावा। वह दिन समुझ सखी में रोई । जा दिन नइहर विठुरन हाई ॥ विधुर तुम सब सखी सहेली । सब अलबेलि रूप अलवेली ॥ मिलैं कहा तुम समा पियारी । कहा अलिबेल कहा फुलवारी।। रहै न सासुर भादर मारा । सासुर लोग करै नक तारा ॥ सो दिन समुझि परेसों,जल महं ठाढ तपाउ । नहिं जानां कस होड है, हम कर सासुर ठांउ॥१३॥ रग न फीको करिये जी को ।पी को सग पियारी नीको तब लग नइहर देम पियारा । जब लग मूरसता को पारा जय ही सुलै सेमुखी नैना । सामुर सोच बढे दिन रैना सासुर देस मिलै सघ प्यारी । हितू तडाग राग फुलधारी ॥ पीठ अनन्द मूल जय पावा । सब सुख राज हाथ मे आवा ॥ तुम का यापुहि को डरहु, है हमह कहँ त्रास । सासुर कविलास है, रहें जो प्रीतम पास ॥१४॥ खेले लागिन तारा माहा । कोउ धरि काध कोऊधरिचाहा। सुन्दरता सागर वह नारी । मन तारा मो रचा घमारी ले जल मुख के ऊपर मारै । नरम फलोल देहि जव हारें ॥ ॥ ॥

२२ इन्द्रावती। आहे साफरि ना तुम्हारी । ताहि विधि सौ सानिमवारी॥ एतो सुधराई पर, रंचिक गरय न तोहि सुन्दर सील तेहारो, लागत नीको मोहि ॥८॥ निज बसान इन्द्रावति पाए । रही लजाइ सीस औधाए ॥ कहा बखान करहु का मेरा । मनाक जीवन जग केरा ॥ फा अभिमान देह पर करज । एक दिन हेइछार हाइपरका गरब सखी सब ताकह छाजा । जो त्रैलोक बीच है राजा जे निधनी को सग न चाहा । भयेउ न तेन्है अगमा लाहाय परगट रङ्ग देर को, देखि न गरवै कोइ श्रावै एक देवस अस, छार कलेवर होइ ॥६॥ बोलिन राजदीप की नारी । आवहु जलमो रचें धमारी ॥ जब लग सीस पिता को छाहा । खेलहि कोठ करहि जगमाहा। जब चल जाहि कत के देसू । कैसा कैसा सह कलेमू नइहर देस कहा फिर आवन । कह यह पन्थ चले यह पावन ।। से गुन एकर हाथ न आया । जासे हाई प्रीतम दाया जानों नहिं पिय प्यारा, राग्वै कौने मान एका गुन नहि सीग्वा, हम बाउर अज्ञान ॥१०॥ रानी कहा भेद अब कहना । केहि गुन हेाइ कन्त से लहना। एक कहा सेवा नित कीन्हेउ । चित मूरत सम पिय पर दीन्हे ॥ । पिय जो कहै करै धन साई ॥ एक कहा नित करत सिगारा । चाहै धन कह कन्त पियारा ॥ । पावै लाभ क्न्त से साई इन्द्रावति प्यारी करेउ, ताकई चाहै पीउ जो पिय को संवा किहें, गरव न रावै जोउ ॥११॥ ॥ एक कहा लहना तव हाई एक कहा जो । घर हाई इन्द्रापती। ॥ समुभ ग्रन्दमो प्रीतम प्यारा ।इन्द्रावति अम्धुम जाउ द्वारा ॥ महि जाना केहि माते साई । दिन आ रात वितायत होई ॥ अरे जिउ दाया ताहि नाही । तेरो जीउ परेशचंद माहीं जउमा नी ठाइ नयानी । ससिन मान्त रममा पहिचानी पूरे आगमपुर को पारी । सजल नयन केहिलागपियारी॥ थान अनंद देवस है, यह तीज तेवहार । फेहि कारन चिन्ता मो, प्यारी जीउ तोहार ॥१२॥ सफल मसिनमा मरम छिपाया। आनहि भाति कि बात सुनाया यह दिन ममुझ मसी में रोई । जा दिन नइहर विधुरन हाई ॥ यिछुरहु तुम सघ ससी सहेली । सय अठवेलि रूप अलबेली ॥ मिठे कहा तुम समां पियारी । कहा अलिवेल कहा फुलयारी॥ रहे न सासर आदर मारा । सासुराग करै नक तारा ॥ सो दिन समुझि परेसो,जल मह ठाढ तपा। नहिं जाना कस होट है, हम कर सासुर ठाउ॥१३॥ रंग न फीको करिये जी को पी को सग पियारी नीको तब ग नइहर देम पियारा । जन उग मूरयता को पारा जयही मुले मेमुगी नैमा । सासुर सोच बदै दिन रैना सामर देस मिले सब प्यारी । हितू तहाग राग फुलबारी ॥ पीठ अनन्द माल जय पावा । सब मुस राज हाथ मा आवा॥ तुम का श्रापुहि को डरहु, है हमह कहँ त्रास । पे सासुर कविलास है, रहें जो प्रीतम पास ॥१४॥ सेले दागिन तारा माहा ।फोठधरिकाध कोऊधरियाहा। सुन्दरता सागर वह नारी । मन तारा मा रचा धमारी लैजल मुरा के अपर मारें । नरम फलोल देहि जब हारें ।। ॥

२४ इन्द्रावती ॥ 11 रानी साथ फहा एक नारी । गहिरें पाव न घरहु पियारी । जो गहिरें पग राराइ कोई । मीर सीस ते पर हाई गहिर बहुत है पागे, इपि मरै जनि कोइ । ना खेल कोउ मो, महा दन्द दुख होइ ॥१५॥ मुनि पह बात ससी एफ राई । आसु गुलिक जल ऊपर वाई ॥ पू. और आमु कस ढारे । रोल के बीच अनन्द नेवारे ॥ उतर दीम्ह सासुर मगु ठाऊ । है सागर भी सागर नाक होइहै जा दिन गवन हमारा । नहि जानौ किम उतरउ पारा यह नइहर तारा है जाना । जेहि आगे पगु धरत डेरामा । वह न जान कस होड है,गहिर गम्हीर अथाह । इहै समुझि मै रोइड, केहि विधि होइ निवार॥१६॥ सुनि सब राजदीप की बारी । तजि आगद समुझा ससुरारी॥ भागम सेाच कीन्ह सब कोई । सासुर पन्थ बीच कस हाई ॥ बोलिन फेर सोच यह काहै । प्रोतम दाया पथ निबाहै होइ जलधि तो खेधक लेई । धन कह जलधि पार के देई । जा सग व्याह होत जग माहा। पन्थ निघाहत सो धरि बाहा। जनम मघाती होत सो, जाके संग बियाह । जैस परै तस अंगवै, धन को करै निवाह ॥१७॥ के नहान सब बाहेर आई । निर्मल अग परी की नाई लटकी लट इन्द्रावति केरी । देऊ दिस ते मुख कह घेरी ॥ मुख लटसो से वह रामा । एक चन्द्रमा दृष्ट विजामा खट कपोल पर मोहे कैसे 1 धैठा नाग वित्त पर जैसे सेन बिनावट दुकुल रगीला । कीन्हा असे परगट लीला॥ के नहान घर कहं चली, वै सब कनक सरीर । । उनकी निर्मलताइ सों, भा निर्मल मन नीर ॥१८॥ ।

इन्द्रावती। 1 ॥ ॥ ॥ ॥ मन तारा केती रहि रानी । दिउरी एक देखि विघकानी । प्रान याटिका की वह स्यामा । पूछा फवन सती यह ठामा सखियन कहा सती यह ठाक । रानी महा सती है नाऊ तव की बात हमैं सुनि परी । अपने कन्त लाग धन जरी ॥ जस तोहार तस ता गल नीका । सात तमोल देसावै पीका श्रय धन जरि कै छारभ, रहे न एका चीन्ह । दिउरी साखी करत है,अगिन छार तेहि कीन्ह ॥१९॥ इन्द्रावति करुना मै राई । एक दिन छार हाइ सब कोई ।। दिठरी के समीप हाद कहेऊ । हहु कैसे यह रानी रहेऊ हहु कस रहा घरन औ हाथा । कैसो रहा ग्रीव औ माथा हहु फस रही चाल नारी की । दयावन्ति की मानिनि जी की। कहा गई धन मिले नहेरै । है ता जिउ दिउरी के नेरें मन तेथान कै ठाढी, रही घरी भर आप हिद सात रस डूबा, बुझि जगत कहं स्वाप ॥२०॥ इन्द्रावति जय ध्यान लगावा । सबद एक एक दिसते आवा॥ मैं का रहित रही बहुतेरी । जिनकी रही अपलरा चेरी ॥ सोक नगत छाहि के गई । मिलि धरती मे माटी भई ॥ इहान लहत सिगारी काया । लहत न गरब उहत है दाया। लहत न काया सुन्दरताई लहत पुन्य मन की निर्मलाई। सबद पाइ इन्द्रावति, अधिका रही तधाइ । चिन्ता बहुतै कीन्हा, अपने मन्दिर श्राइ है। में पाप परी जग माहीं । आस मुकुन की है किछु नाही॥ है मोहि धीच दोष जह ताई । हरत करै कैसो जग साई साहस देत परान हमारा । भहै रसूल निवाइन हारा . ॥२१॥ ॥

इन्द्रावती! ॥ ॥ निस दिन सुमिरु मोहम्मद नाजा नासा मिलै सरग मोठाक करता ताहि मोहमदि कीन्हा । माथ सुभाग अस ताहि दीन्हा॥ ना करु सोच अगम को,राखु हिर्दै मों आस । जाके दीन बीच ते, सो देइ सुख बास ॥२२॥ अरे प्रीतम तैं मन हरा । अहो वियोग वन्दमो परा आइ बन्द सा मोहि छोडाबहु । दोक जगत भलो फल पाबहु ॥ मोहि पाछे बैरी बहुतेरे । तेरे सेवक माथी मेरे पा काढि बैरी कह मारहु । बन्द कूप ते मेाहि निसार ॥ अठख सवारा तुम कह वली । घलै जगत मो कीरत भली दृसर चन्द न भावत, जहां प्रेम को बन्द जगत बन्द दुखदायक, प्रेम चन्द आनन्द ॥२॥ ॥ सेवे देवा ॥ [१३] जुद्ध खण्ड। बुद्धसेन क्रीया कह सेवा जैसे मानुष राज कुबर को बन्द सुनारा ।मुनि कीपा क्रीपा पर आवा ॥ तष सहाय जगपति सो माग । सघ पायेव का एक न खाग । कीपा चला कटक लै भारी । गोहन सुभट चरो बलधारी ॥ पानहु दीन्ह समुद्र हलोरा । लहर मनुज तम्बरम घोरा तम्रम दल सोहै, फजल गिर के रूप रहेउ अचल कज्जल गिर,ताहि चलायेव भूप ॥१॥ कहत न पारत तुरै यवान । रहे घलत मह पवन समानू ॥ ओ चिराय के सामै माही । माटी चाह सो अधिक थिराहीं।। ॥

इन्द्रावती। २७ । . - नीचे जल सम पाव उठावें । अगिन समा अपर कह धावै ।। धाजी सकल पवन के जाये मान चेत भेस धर आये वै सवार है पर केहि मानन । मन हु पवन ऊपर परचानन ॥ यह समीर तेन आगे, चलत थकित होइ जाइ। आगें वै पगु राखहीं, पाछे पवन थिराइ ॥२॥ कीपा आवागढ नियराया । आया पति दुर्जन सुधि पावा ॥ गढ भारत औ कटक बटोरा । धरेनि अलङ्ग वीर चहुओरा ॥ तिस्त्र। कोप सहायक आयेउ ।आयेत गरब अधिक बल पायेगा गढ से छूटन लागेठ गोला । डोला सात अकासहि डाला ॥ क्रीपा दिस छुटत अरि चाटा । भयेत जगत करता की वोटा ॥ वाजहिं बाला संजुगी, चहु दिस परेउ पुकार । चार मास तहँ बीता, होत सत्रु सो मार ॥३॥ जो करतार पन्थ पर जूझा । ताकह चिरञ्जीत हम घूझा ॥ करता मगु रन लायेठ । ताहि सहाय गगन से आयेठ । आयेउ नाबासीको सैना । दीख न पाहता कह नैना ॥ करता की सेवा के बेरा । होइ जहा हर दुर्जन केरा सुमिरन सेवा आधे करही । आधे लोग सत्रु सग लडहीं ॥ धन जो सिर्जनहार मगु, गहि कै राखेउ पाव । पाव न दारा जुह सो, आय उरद मो घाव ॥४॥ गढ मो गरय राय मुख खोला । गरव वचन दुर्जन से बोला ॥ जैसे जगपति तस तुम राजा । गढ मानिसरि जुद्धि तेहि छाजा। एक एक करहि मिलि जूझा । जाय सुमट जन को गुन बूझा।। तब दुर्जन गढ सो निसराना । हलकी रज तिमिरार उपाना॥ यदि मैदान कोप मा ठाढा' । छमा खरग यह दीसा काढा ॥ भयेउ खेत के ऊपर, सीधै सींघ भिडाव आइ सरीरन मंचरेत, काहे करसो घाव पर - इन्द्रावती। सुमिरि हिये करता कर नाक । मारा उमा कोप सिर ठाक ॥ जय यह फोप गिरा गा मारा । आयेउ मदनसिह बरियारा ॥ घरम राय यह दिसते धायेत । मदनसिघकहवाधिलिआयेठ॥ मदन विमद हाइ सेवक भाये। आपा सुरा उतरि तेहि गायेऊ॥ दुर्जन कटक सहित तय धावा । अतरन रफत ममुद्र यहाया ॥ एकै भये दोऊ दल, जमल जलधि मैं एक कठिन परगटेउ संजुग, मनमो गयेउ निवेक ॥६॥ भयेउ घटा दालन से कारी । खरगन अये वीज चमकारी ॥ गेंदा सीस खरग चौगानू । खेलहि बीरहि चढि मैदानू ॥ हाल आपनो आपनो चाहैं । अरि को शस्त्र चलाव सराहैं । भाला खरग हनै सब कोई । चोहन खरग ठनाठन होई गगन खरग सो ठन ठन गयेउ । हिनहिना धुन हन हन भयेठा वोनई घटा धूर सों, दिन मनि रहा छिपाय । तहां महाभारथ भा, सबद परेउ हू हाय साहस राय गयन्द मरीरा । औ मन सिह धरम रन बीरा ॥ सरग हनै जाके उपराही । विनु बिलगें सो वा नाही ॥ कोठ भये घायल कोउ मारे । साला सरग सुरा मतवारे छुछायान से भयेव निखगू । भयेउ निसग वान को अगू ॥ बढेट कमठ कह दाह कराहू । चकाचाक ना धाधक हाहू ॥ जुद्ध करत दोऊ कटक, थाके रहे अपाय दुर्जन रिपु मारा परा, ता दल गयेउ पराय ॥ क्रीपा जय दुर्जन कह भारा । जाइ के बद से कुवर निसारा ।। फुवर कहा क्रीपा जस लीजे । जलज मिधु दिस गवन करीजे॥ कीपा कुर माहित गा तहा । रहा ममुद्र गुलिक को जहा ॥७॥ ।

इन्द्रावती। - ॥ कहा बहुत राजा जिउ दीन्हा । काहुअ मेोतो हाथ न कीन्हा । यहुत महीप भये मर जीया । मोती का नित जित दीया ॥ दीन्ह कुवर कहँ फ्रीपा, माती ठउर घताइ औ खेवक एंकरायेउ, राहहिं दीन्ह चिन्हाइ ॥६॥ राजा जगपति यह सुधि पाया। मरमी जन से मरम जनावा ॥ एक मनुप राजा से कहा । ना जानहि जोगी कस अहा ।। राजन ऊपर परन तुम्हारा ।नाही सवै निसारन हारा यह माती तेहि काढय छाजा । राना पुत्र होइ जो राजा घरजि पठायहु बेर न कीजे । जात खेाति के आजा दीजे ॥ भाये बात निप कहँ, भेजा तुरत बसीठ फेरि लिआई कुवर कह दीन्ह जलज दिसपीठ॥१०॥ बैठा विऊँ तर अनुरागी । चिन्ता कथन हुतासन कहै फवन उपकार बनावट जाते प्रान बना पायउ जावक होत हे दुख मेटउ । तो यह कमलधरनकह भेंटउ ।। कज्जल होउ नयन लगिरहठहोठ पवन लट ऊपर यहक ॥ हाइ माती बेसर मह परक । होइ प्रतिबिम्बी छाया धरक ॥ जेहि प्रानप्यारी के, अमी भरे अधरान ता पगु रज के ऊपर,वारों श्रापन प्रान ॥११॥ लागी ॥ । " ।

१०० ॥ - - इन्द्रावती । [१४] मधुकर खण्ड। इन्द्रावति चिन्ता परी । रहै न यिनु चिन्ता एक घरी ॥ माइ रैन तेहि बहुत सतावै ।क्छ न मुपेती ऊपर पाये कलगै गलगै जलगै काया । तेहि वियोगको पीर सताया ।। सखिन मता आयुस मो कीन्हा। सब मिलि के ऐसो मत लीन्हा निस कह जहा रहे यह रानी । सदा सुनाव एक कहानी ॥ होइ बहोरै जीउ को, सुनत कहानी बात चिन्ता जाय सरीर सो, नीद परै पहिरात ॥१॥ एक ससी निस होतहि आई । मधुरी घधन असीस सुनाई ॥ कहा कहत है। एक कहानी । सरधन है के मुनिये रानी बहुत बधन करतार पठावा । जेहि सुनिकै बहुतन मनु पाया। कहा बहुत जेन की मति फेरी । अहै कहानी आगेहि केरी अहै कहानी पै रानी । है अमृत सानी रस बानी कहा कहानी कहिये, सुनो कान दैताहि जीउ बिरह से तन मह,उठत कराहि कराहि ॥२॥ मन रानी को पाय सयानी । धन से डाग से कहै कहानी। मोहनपूर रहा एफ याक । तहा महीपत मधुकर नाज ॥ जस मधुकर रस रहै सेनाना । तैसें यह रस मह लपटाना जग रस बीच परा जो कोई । मागम रस नहि पायहि सोई॥ रस पावै जो जेहि करतारा । दया दिष्ट सो हिया उघारा ॥ मधुकर के मन्दिर मों, रहै यहुत रनिवास । संधत करै भंवर सम, लय अम्बुज के पास ॥३॥ एक दिन राजा गयेउ महेरें । देखा एक मिर्ग कह नेरें मिर्ग चला मुधुकर है हाका । मिर्ग पचन दुह रहे कहा का ॥ पछा मिर्ग के पाडे सोई । फुटा लोग ना पहुधा कोई ॥ सुन 11 । - ॥ ॥

इन्द्रावती।
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जात जात एके वन मह परा । देसा विर्छ एक अति हा
भयेठ कुरा कुरङ्ग हेराना ।तरियर तरें आइ पनाना ॥
कंचा तरवर देवि कै, और गम्हीरो छांह
सुख पायेउ दुख भूला, भा अनन्द मन माह ॥४॥
सीतष्ठ छाहा से सुख पाई । पाढा भुई पर बसन बिछाई ॥
ततिखन दुइ सुक आइ बईठे ।घोले यधन आप मह मीठे ॥
पूछा एक कुसल हो प्यारे
। केहि धरती सुख वास तुम्हारे॥
जब से हम तुम विखुरे होऊ । मिला न तुम्हें समाहित कोक॥
जेहि भेटेड अपकारी पायेठ ।तासे भागेउ प्रीत न लायेत ।।
सुभ घेला यह सुभ देवस,दरसन मिला तोहार।
समाचार आपन कहो, जीउ थिराय हमार ॥५॥
दूसर मुआ अधर फह खोला । समाचार की वानिय बोला ॥
जा दिन छूटा सग तुम्हारा
। जाइ परेर एक विपिन मझा।
तरिबर पर निर्चिन्त बईठेठ । छल पहरा को एक न हीठेत ॥
सब अजाम न जानत कोई
। गुपुत अन्तर पट सेो का हेई ।।
जिनि यह कहै। फरी असिभाएँ । दुहु अस प्रगटै भोर अरें ॥
मैं निचिन्त अपने मन, थाइ एक चिरिमार ।
खांचा मारि बझायउ, डारेउ धन्द मझार ॥६॥
ले मोहि प्रेम नगर के हाटा । बेचेसि चलिगा दूसर बाटा ॥
परेत रूप राजा घर माहीं । जहा दरय फछु खागा नाही ॥
तेहि के घर सुन्दर एक बारी
। तेहि की सुता सुन्दर सुकुमारी॥
अति सुगन्ध मालति की काया। जनुविधि सुगंध मिलाइयनाया।
मोहि राजा माठति कह दीन्हा। बधनन सा सेवा मैं कीन्हा ॥
कीन्ह पियार बहुत मोहिं, दायावन्ती होइ ।
सेवा किहे पियारा, रोइ अन्त सप कोइ ॥७॥

१०२ इन्द्रावती ॥ । ॥ ॥ मालतिरूप न यरनै पारत । केतिको अर्थ म चिन्त संचारत। अवहीं तेहि सग अवर न लागा। मिर्ग नयन लसि आनन भागा॥ मालति घाम सालती यासा । मालति पास मालनी पासा ॥ जान मसि भुई पर अवतरा । पुष्टमी पर उतरी अपछरा है सुकुमार बहुत वह रानी 1ोलन बानी अमृत सानी है मालती सुवासित, सुगन्ध भरे जनु अंग । ज्ञान भरी सुन्दर सखी, रहैं सदा तेहि संग ॥1 एक देवस धन रूप निधानू । निर्मल तारा गइल नहान् ॥ सून मॅदिर मो पिजर मोरा । रेवा रहा मजारिय तारा बाचे रिपु सो हिउँ डेराना पिजर सो मैं मिसरि पराना । वद छुटे आनंद मैं पावा । अन्त पखेरू अहद पगवा जेहि के छर्ले युटा सुखवा । तेहि वैरी कर का विसवासू ॥ श्रय वन वन फेरा करउ,समुझि पिंजर को चंद। काहू कर सेवक नहीं, मन मा रहत अनंद ॥९॥ मुनि मधुकर मालति करनाऊ । आ मालित मधुकर तेहि ठाक॥ उठि के कहा बिहग पियारे बात न बान प्रेम कर मारे ॥ तुम पडित वुधवन्त गरेवा । उतरहु आइ करउँ में सेवा ॥ हहु नियरें पै करमो नाहीं । रहेठ समाज सकल तन माहीं। आवहु मीस देते तेहि ठाऊ ।तादि लै जिउ अस राखउँ तुम कहूँ,धरउँ नपिंजर माह। जल चारा आगें कै, रहा जोरि दाज यांह ॥१०॥ फहा सुधा तुम मानुप होहू तुम धरती पर बारहु लेह ॥ आर्गे अय मानुप नहि आवा । बहुतन गुनता पर लाया ॥ है मानुप निर्दै हत्यारा । सकै अनुज कहें जिससे मारा। अपाने गाक॥ , - । इन्द्रावती। सात देह मानुप कर जाएँ । सात नरक द्वारे मह डार घाम जरे तब दूसर देहीं । मानुप बार बार दुख लेहि ॥ हो पंडित श्री चातुर, कहां चलो तेहि सग । जिज पंखी नहि पाल, पाले अंग बिहंग ॥११॥ तुम माहि यह सत बात सुनावा। मानुष परसै ऐगुन आवा मानुप बुध के बरसात । सकलो सिष्ट को माना नाज ॥ मानुष पर दाता को दाया । सकलो सिष्ट को नाम सिखाया। करता की ने मानुष अहई । का जो दोप पाप मो रहाई ॥ प्रेम नगर औ मालति बात 1 फेर सुनाउ चतुर महात एक एक कै घरनहु, वह मालति की बात सुनउ जीउ सरवन दै, हो पंडित मुग्वरात ॥१२॥ कहा मोहिमान समो जेइपाला। मन मातेहि की प्रीत को माला॥ भरमी येते सदा फइ सेवा । ताहि बेरान से भाप वा। सरवन सुने जाग तेहि नाही । मूल न देखेसि देखेसि छाही ॥ नरक बीच बहुतन कहँ भरई । मन राखहि पै यूझ न करई ॥ नैना हाड न देखहि नैना । मरवन रखहि सुनहि नहि बैना वे सब पसु के मान है, बरू पसु चाह अचेत । जेहि के मन नहिं चेत है, तेहि को भेद न देत ॥१३॥ मेंटा । नहि जानो का ऐगुन भेंटा ॥ - घिननी एक करते कर जारी । मानु दया से विनतिय मारी। मार सदेम फान के लीजै । प्रेम नगर कह गवन करीजे ॥ जायेहु जहँ वह मालति प्यारी। तासे भाखेहु विषा हमारी ॥ सपत तेहिक जेइ जनमा नाही। प्रेम हमार जनायट वोही मोहनपुर महें मधुकर, कहहु निपं एक आह । बहुत धेयाकुल कीन्हा, प्रेम तेहारो तार ॥१४॥ । कहा कहा मेरो ॥ ॥ । इन्द्रायती। कहा तेहारी बिनती मानेत । मालति कर मधुकर तोहि जानता। एकबार तोहि कारन जाऊ । धन से कहऊ तेहारे नाकै । मानक सपत दिहा नहिकाही। सपत सलो करता कर माही ॥ बहुत सपत जो मानुप खाहीं । तें जिन रहु तेहि प्रज्ञा जाहीं ॥ फहै। नाम सुनि के ताहिंलोभा। बिनु देखे मूरत औ साना यह सब कहि उडिगा सुवा,मधुकर मन पछतान। पंखी सम चंचल है, काया बीच परान ॥१२॥ रित सफल लोग औ दासू । आए सब मधुकर के पासू लोग समेत निर्म घर आएउ । मन मह प्रेम बसेरा पाएन परगट राज फर औ बोले । गुपुत दिष्ट मालति पर खोले । परगद सबके जाने भोगी । गुपुत भएउ मालति कर जोगी। परगट रहन आपने गाऊ । गुपुत रहै मालति के दाजै ॥ परगट सबसों घोले, गुपुत जपै वह नाम मन मह रहै व्याकुल, हरिगा सुख बिसराम ॥१६॥ भालति वहा याहुल दुख देखा । जा दिन से गा सुवा सरेखा ॥ कहै कहा वह पडित सुभा । कादह हुआ जियत को मुमा । টুতা যি বলা হয়। उहिगा प्यारा प्रान परेवा जो पिजर की भीतर बोला । ओ जामा यह पिजर होला । सो चलिगा केहि धन ठहराना । रहा आपनो सयेद बिराना ।। सुवा यानि को मेरवे, पिंजर देह जियाइ फा औगुन दहु देखा, तजि के गयेउ पराइ ॥१७॥ समिन बुझायहि सुवा पियारा । ठहरा जय उग रहा तुम्हारा ।। सडिक गा रहिगा पछतावा । कहा पिरै कम भयेउ पराया । जो पछताने आयाहापा हम पख्ताहिं सकल तुम साधाm - ॥ । .

इन्द्रावती। पिजर देह रहा तेहि भारी । हलुक देह उहि लीन्हेति प्यारी॥ उहि के पन करि भयेउ अहेरी । तेहि हर छूट मजारिन केरी ॥ पिंजर बोच रहा सुवा, चारा चिन्त मझार । अब ऐसे बन में गयेउ, सुख सो मिलै अहार ॥१८॥ दिन दस बीत सोच मा गयेऊ । सुवा जाइकै परगट भयेऊ मालति देखि जीत जनु पावा । प्रान मिलै फह आगेहँ धावा ॥ कहा प्रान अस नियरे हाहू ।ताहि नित बहुत पिया मैं लाहू ॥ कहा सुवा बाचा माहि दीजे । मोहि पिजर के बीच न कीजे॥ मैं बन बीच रहे जय भागा । नरक समा अब पिजर लागा ॥ बाचा दोन्हा मालती, सुवा नियर भा पाइ । कण्ठ सुवा कहं लायेउ, प्रान पियारी धाइ ॥१९॥ कहा कुसल कहु प्यारे सुधा । ताहि नित आसु नैन सेचुवा॥ कहो कवन आगुन मोहि लागे। जेहि नित छाह हमै तुम भागे। केहि बन भीतर रहेत बसेरा । कहा कहा तुम कीन्हा फेरा मुनि के सुधा असीस सुनाया । देव असीस सोस पुनि नावा ॥ तुम औगुन से निर्मल प्यारी । आगुन भरी सरीर हमारी तुम तो निर्मल तारा, गबहु करै श्रस्नान पिंजर धरा मैंजारो, गा यह टूट निदान ॥२०॥ पिनर टूटा मिला दुवारा । बाहर निफसि पख मैं झारा ॥ । रिपुनित रहै घात सर साधे ॥ परोस जहा सत्रु को हाई । तहा निचिन्त रहै का कोई ॥ जाइपर ऐसे बन माहीं । खाग जहा धारा कर नाहीं ॥ हम तुम टि गर तेहि ठाक । इहा अहै हम तुम सघ नाक ॥ आयेउँ दरसन कारने, श्री राखउँ एक बात । सुनो मन्दिर होइ जय, यात फही तय जात ॥२१॥ १४ रहत न भावा वैरी राधे इन्द्रावती। ॥ सून मन्दिर तब मालति कीन्हा। सुवा सयान भेद तय दीन्हा ॥ उडि उहिसव कानन मह भयेजा ओ सब तरिवर जपर गये। मिला एक दिन एक परेवा । मित्र रहा फोहा मोर नेवा ॥ दाऊ एक विर्छ पर गयेक । छाहा पाय सखी मन भैयेऊ ॥ सुवा माथ मैं तुम्है बखाना । जस तोहार सब वोनहू जाना। पिर्छ तरें एक मानुप, सुना सकल गुन तोर । बिनु आज्ञा अब आगे, कहि न सके मुख मोर ॥२२॥ 'कहा पियारे बात तुम्हारी । जीउ देत है कहु बलिहारी ॥ सुम पडित जो पडित हाई । अब सकु घात न आपै साई ॥ सिद्ध रूप तुम सुया गेयानी । बात तोहार अमीरस सानी ॥ सिद्ध धात लाक्षा की कहई । का जो वलटी वात रहई स्वानोकोफरा जो मरि जाहीं । मिटु कहै सल है भल गाहीं । आज्ञा का मांगत हो, भापहु जो मन होइ । मिलयो लूट तुम्हारो, मरम न राखा गोइ ॥२३॥ फहत धपान नाम गुन तेरो । मुनि के वह मानुप मा चेरी ॥ धितनो यहुत फीर माहिसाया। नग मदेस को दीन्हा rrपा ॥ कहा जाई मालमि के गाज । प्यारी साथ कहेठ मम नाऊ ॥ मोहनपूर देस है 'मेरो में मधुकर राजा हित तेरो 'माहि राजा फहँ प्रेम तुम्हारा । व्याकुल कीन्ह सोच मोहारा ॥ एहि सँदेस तेही कहै, कुछ पसीठ पर नाहि । जो सँदेस ले श्रावहीं, पहुंचा चलि जारि ॥२४॥ यह मुनि मालति मुकुगारी । धुप हो रही न घात निमारी। विनती कीम्ह मुया शहरासा । दीन्हा ठाम मिदं कर सामा विजार भीतर मुया नाया । याग रहे एटा गुए पाया इन्द्रारती। - ॥ रहै सुबा फुलवारी माहा ।जह फल फूल औ सीतल छाहा।। जस वैकुठ बोच फल नियरें । तस नियरे अनदाना हियरें। उडि बैठहि तेहि डार पर, जहां चलावै जीउ । मन काया के छोर महं सुख अनंद भै घीउ ॥२॥ मालति मा पर मधुकर नाक । लिसिगा देखि परै मन ठाक । कवल ममा मन प्य री फेरा । हाइ मधुकर भा मधुकर घेरा ॥ प्रेम फाद प्यारी मन परा मधुकर मन मालति मनहारा॥ मन सी का कह सुमिरै कोऊ । सुमिरै ता कह मन सा सेक ॥ कहा अठस सुमिरो तुम माही। सुमिरे से सुमिरी मे ताहीं ॥ रही सुगन्धित मालती, प्रेम भँवर तेहि कीन्ह । व्याकुल भई जोउ महं, भेद न काहू दीन्ह ॥२६॥ दुर्वल भइ जन मालति बारी । धाई धाइ कहा बलिहारी फवन कलेस समान सरीरा । फहत सरीर मे आपन पीरा ॥ कहा फलेस न एको माही । कवन कलेस सुनार तोही ॥ कहा भई दुर्वल तैं यारो । यिनु दुख दुर्वल होत न प्यारी ॥ हो री मात समा है। तोरी । भारी मरम न गोवहु गोरी जो दुख होई पिड मंह, सो मोस कहि देहु । धाइ करउँ उपकार से, दुख कर ओपद लेहु ॥२७॥ कहा सुवा वोही दिन जो आवा। मासे मधुकर नाव सुनाया है जो एक देस मेहनपुर । मधुकर राय तहा जस सुर सुना सुनायेउ तेहिक सदेमू । है। तेहि कारन प्रेमी भेसू है। माता सुनि मधुकर नाऊ | HI मन मधुकर नहि के जाऊ॥ मोहि मालति कह मधुकर नेहा। कीन्हा मधु कर नेही देहा तुम माता दाया भरो, दाया ऊपर आउ मोहिमालति पाई मधुशर, कै उपकार मराउ॥२८॥ *- ॥ ॥ । ॥

१.८ इन्द्रावती। ॥ " ॥ मुनि धाई दाया पर आई । मालति से उपकार सुनाई ॥ सौपाहु फाज आपनो ताको । सिर्जनहार नाम है जाको पुरुष पछुम को पालन हारा । है सा पुरवै काज तुम्हारा सुमिरहु ताहि विसारहु नाहीं । सुमिरन बहा अहै दिन माही। बहुरि सवा से विनती फोजे । विनती के जित कर मह लीजे भेजहु तेहि मोहनपुर, मधुकर आने पास धानै प्रेम पढाइ कै, तेहि मालति के पास ॥२९॥ एक देवस मालति मति पागी । यिनतो कर मुवा सो लागी ॥ कोमल बात जीसी खोला । फाद अलो है कोमल बोला कोमल बात कहै कह दाता । कहा अहै भल कोमल बाता ॥ धरती ऊपर जीत परावा । कोमल कहें हाथ मह आवा ॥ तुम है। सुया प्रान जस प्यारा । जैसे प्रेम बान तुम मारा तैसें महि घायल कहँ, औपद फाहा देहु लैआवहु मधुकर कहें, यह पूरा जस लेहु ॥३०॥ सुवा कहा सुनु बारी भारी । अहै सीस पर आज्ञा तारी ॥ मैं पखी वह मानुप आही मनुप वसीठ मनुष दिस चाही। सो जेई कीन्हा जगत अजोरा । मानुप भेजा मानुष वारा मानुष मानुष वचन समझे । सुवा सुधा की बातें बूझ ओ मोहनपुर देखेत नाही । अफस नाउ भूल बन माहीं ॥ होइ साथ जो मानुप, जाउ मोहनपुर देस । दोज मिलि समुझाच, आवै इहां नरेस ॥३१॥ दुई समुझायें समुझई माई । दुइ जन मिले त मल हाई ॥ जेहि बसीठ के जीउ हेराई । लीन्ह सहायक आपन भाई ॥ गा तेति दिस नासा हर माना । झापा साची बात सयाना ॥ -- इन्द्रावती। १०९ ॥ - - ॥ दुइ मन एक होइ गिरतारें । कटक बिदारत बदन न मार ।। जे मन तारा सोगा तेरा मन तारा फहि तोरा मारा ॥ प्रेम नाम यनिजारा, बसै तुम्हारे गाउँ ताके संग पठावहु, मोहनपुर कहं जाउँ ॥३२॥ माना यात मालती रानी धाई साथ जनायेस ज्ञानी धाई गई प्रेम दिस धाई । विनै सुनाई यात जनाई दीन दरब और आसा दीन्हा ।प्रेम सीस पर आज्ञा लीन्हा । दरख कर सब कारज पूरा । उहित फरै दरब जिमि सूरा ॥ जो न दरब को निर्मल करई । अगिन हास होइगल मो परई। करता अपने पन्थ पर, दरय कहा है देह जो नहि देई सो एक दिन, लाल दरय सां लेह ॥३३॥ सग ले सुवा प्रेम बनिजारा । मोहनपूर पन्ध पगु द्वारा महै बनिज को उद्दम भलो । पै जो करै धनिज निर्मले। सिर्जनहार जाप को वेला । आवत तजै बनिज को खेला ॥ बेचब लेघ कहा है भलो । अहै विधाज नही निर्मला सुन्दर रिन करता कह देहू । वह जग मूल ला सग लेहू ॥ पिनु पद दरवजान को,जो कोउ अगमों खात। आनहु अगिन सो खात है, है यह साचो बात ॥३४॥ फाटत पन्थ सुवा धनिमारा । पहुचे मोहनपूर मझारा मधुकर उहा वियाकुल हीयें । ध्यान रहै मालति पर दीयें ॥ धेकल बहुत मा मधुकर राजा । गा सब छूट राज को काजा भरम की फली फूल बिकसाना । यास पाय सब काहुअ जाना ॥ उपि ये प्रेम कस्तूरी दोऊ । अत बास पावै सब कोक लोगन बहुत वुझावा, फिरा न मधुकर प्रान । भयेउ प्रेम के बाडे, बाउर भेस निदान ॥३५॥ ॥ ॥ ॥ ॥

इन्द्रावती M - । ॥ ॥ । ॥ सुधा प्रेम का मरम सिसावा । बेहु हम यह बानि पराया । हाट घढाइ मेल करू शारी ले न सकै बैठे मव हारी तब राजा मधुकर मोहि लेई । भारी मोल वेगि तोहि देई ॥ मित्र जो होइ सो मोल बढावै । वैरी जन से आगुन लावै अति सुन्दर कह वैरी लेग्गू । बेचा धारै पर विनु जागू मधुर बचत मै बोलऊ, मधुकर लेड निदान । रहि राजा के संग महं, करो हाथमो प्रान ॥३६॥ पेम जवै दृसर दिन जब पावा । लेकै मुवा हाट मह आवा हाद नगर मा भयेठ पुकारा । पेम नगर का है घनिजारा बेचत है एक सुगम मरेखा वैसे पडित कीर म देखा गाहक आये मोल धारा । भारी माल सुनत सय हारा मधुकर पेमनगर कर नाऊ । सुनि आनन्दति भा मन ठाक॥ आउ मधुकर हाट मे, लोन सुबरा कहं मोल । सुवा अघर कहं खोला, बोला कोमल बोल ॥३॥ भनिमय पिजर बीच परेवा । राखा मधुकर कीन्हा सेवा "भयेउ अहार सुवा की बात मधुकर राजा कह दिन गते । एक दिन पेमहि पास हकारा । सून सदन के थात निसारा है मालतिरानी वह देसी । रूप विहाय कला निधि भेसा॥ 'घहरानी कर सुनत बसानू । सुरत सनेही भयेठ परानू तुम आरहु बहि नगर सो,ताकर कही यपान । एक सुवा सो मैं सुना, उडिगा सुगनिमान ॥३८॥ मुनि यह यात पेग तब हसा ।हमा फूल माह महि रासा ॥ जो एक माल निर्म-तुम लीन्हा । मोल गुलि नग मानिक दीन्हा।। येही सुना मायति गुन-कहा । अम्र अनवीह तुम हो रहा ॥ ॥

द्रावती। - वह सुधा है तुम नहि चीन्हा । पष्ठित जान मोल लीन्हा॥ सुधा का पिर नियरें रासी । तय रसाल यच को रस घास। सुनि रहसाना मधुकर, पिंजर लीन्ह उतार । पूछा कुल कहा कुसल है,है जय दुसल तुहार ॥३९॥ पेम सुवा दाज गुन गावा । ऐकै मुस होइ बात सुनावा ॥ हम मालति के भेजें आये । दरसन देखि यात मुख पाये ॥ मारुति तुम्है रात दिन सँवारा । मा धन मन तोहि कपर मयरा॥ तुम कर आनै हमैं पठाया । पेमहि निर्प को ताहि जनावा॥ यनिज हमार तुहीं है। राजा । अब यह देस गयन तोहि छाजा। रटत चातकी रोइ रही, चलि दरमन जल देहु। नातो मान देइ धन, यह अपराध न लेहु ॥४०॥ भुनि मधुकर जानहु जित पावा । कहा तुम्हें मोहि लाग पठाया। छाजत सीस अफास लगावत । सीस चरन के तेहि दिस धावत॥ अब लग रहे अरम मदमाहीं । रही पन्थ की सुधि मो नाही ।। तुम हुइ अगुवा चतुर सयाने । मिले करउ तेहि और पयाने ॥ है धन दिष्ट भाग को माही । सुमिरन मोर चढे चित वाही। रोचत दिन माहि वीता,अप हँसि करउँ अनंद । सोइ रोवाइ हँसावै, जे. कीन्हा रवि चंद ॥४१॥ तजा राज कह मधुकर राजा । सकल समाज चलै को साजा ॥ - पिजर से वाहेर भा सूआ । पेम आप मिलि अगुवा हुआ। बहुत लोग राजा सा लागे । मानहायत कै सब जागे सावत है जग मह सब कोई । जव भरि जाहि जाग तब हाई॥ यह जीयन यह छोटा जानहु । जीवन बडो अगम पहिचानहु ।। जस जियह तैसें मरह, उठहु मरहु जेहिभांत । जग चाहुत के ऊपर, कह दिहे है। दांत ॥४२॥ । ॥

॥ ॥ ॥ औ इन्द्रावती। बहुत देवस को करत पयाना । एक समुद्र आइ नियराना चढे पोत पर सय कोई । गाढी पेम नगर मगु होई वोहय घृष्ट बहे सब कोज । सुवा उडा जनि बिछुइन होक जाको रासत सिर्जनहारा । जल सखाई मगु लाइ उतारा॥ यह जनि जानहु नीर हुवावै । चाहै धरती बीच धसावै एकबार जलथल भवा, राखा चाहा जाहि । श्रागें कहिक भेजेज, नाव बनावै ताहि ॥४३॥ बडे गरब कोप ओ माया । सरमित और काम की काया ॥ एक दिस बहे बुद्ध बूझा । मधुकर पेम बहे नहि सूझा ॥ मन पछताइ सुवा गा तहा । चितवत पन्थ मालती जहा ॥ मिली कहा कहु कुसल पियारे । पन्थ निहारा नैन हमारे कहा कुसल का बूडी पाता । हात कुसल जो जन मन होता॥ मधुकर आवत तेहि दिस, बहा सिन्धु के धार। बुडे सकल संघाती, कोउ न लाग गोहार ॥४४॥ सुनि यह बात मालती रानी । मन पछतानी साध सयानी ॥ धन लेखें जनु परले आई । यह परलै केहि दिसत धाई ॥ काहें यह परलै परगटे । आर द्वाय परम्हा के छटे । की बिरच को एक दिन बीता । सायेउ भै परल की रीता महि निसरे वै यरियारा । जाकर अवध लिसा करतारा ॥ थीचाहिं देखहु परलै, धरती भयेउ असिप्ट । की मन मोरफिरा है, उलटि विलोकन दिष्ट ॥४॥ सुषा धुझबै यूझा रानी जीयन हार न यू? पानी कर जो किछु करता कोई । अन्त फाज वह सुन्दर होई ॥ भेद लिपा ताहि कारन माहीं । से जानहिहम जानहि माहीं . ॥

इन्द्रायती। ११३ . जग बीच ॥ - । सानी एक एक बालक मारा । औ एक गाव जलधि मे फार साथी ताकर भेद न जाना । भेद रहा तेहि बीच छिपाना ॥ घर धीरज मन भीतरें, होइ जियत वह होह। जो मति साढूछा अहै, छाडै धीरज साई ॥४६॥ मालति कहा दे तुम बेोधू । मेहि पहरा पर आवत फ्रोधू ॥ कहा करत पहरा कछु नाही ।वह करता नाही जग माहीं ॥ पहरा को करता जाना सो मूरख भुलाना ॥ से करता जो सब पर बलो । दोन्ह मनुप को काया भली ॥ यह पूरय से सूर निमार । को पच्छुम सो आनै पारै कोपन करु पहरा पर, धरु धीरज मन माह । देखु जगत मो करता, कस विस्तारा छाह ॥४॥ धीरज बात कहत है। सुआ । मोहि वियोग से आसू चुभा ॥ अब अम करहु बहारह ताही । मन औ ध्यान घोच को आही॥ कहा यहारन हारा साई । जेहि अशा जीवे सब कोई ॥ पै ताहि लाग फेर उडि जाऊ । हेरो बन परवत सब ठाऊ जियत हाई ता हेरि निमारउ । ना तो बैठ रहन चुप मारई ॥ जियतमिलतहै एकदिन, मुवा मिलत है नाहिं। मानुप मुवा मिलै तब, जब निर्मल होइ जाहि ॥४८॥ एडानात ले उडा परेवा । हेरा इडा अडा वह सेवा मधुर यहि तट ऊपर भयेका पलि सैर गपूर मो गयेक हेरत ताको सुधा सरेखा । तेहि सैरगपूर कह देखा राये ऐसे दोक्त दुस भरे । तेन रावत कुग के दिल झरे ॥ जो दल झर अलस तेहि जाने। दृमर पत्र विर्छ माह आनै रोये मधुकर श्री सुवा, बहुत मानि मन हान । साथी कारन भा वेकल, मधुकर निर्प सयान ॥४९॥ ॥ ॥ ॥ ॥

मधुकर गयेऊ । ॥ इन्द्रावती सवा सयेट अगुआ औ पला पाठे चला घिरह कर जला ॥ मगु मा मिठा पेम यनजारा । और लोग जो रहा पिधारा ॥ पेम नगर मो । जनु तप साधिसरगमो भयेका है तेहि नित वैकुठ सवारा । जो भल काज कीन्ह मद जारा॥ पहिरै कनक कहा औ धागा वोट पाट उपर मनि लागा ।। मालनि फुलवारी रही, रहेउ सनेही नाउं सुवा कहा मधुकर सो, लेहु इहा तुक ठाउं ॥५०॥ मधुकर लीन्ह घास फुलबारी । सूआ आप गया जह प्यारी । पूछा धन कहु कुसल पियारे । देखि जुटाने नैन हमारे कहा कुसल जब कुमल तुम्हारी। नोको भाग तेहारी बारी मधुकर राजा को मैं आना । फुलवारी मा दीन्हेउ थाना ॥ है दरसन का भूखा राजा । अब तेहि दरस देखाउब छाजा॥ तुम मालती वह मधुकर, दोऊ एक सैंजोग । रहसे देवी निर्प को, प्रेम नगर के लोग ॥५॥ दरस देखावै कह तुम कहा । मोहि धहि दरसन पर वित रहा। दरसन जोग कियेउ वह काजू । राजा रहा तजा सब राजू जो दरसन दाता को चाहै । काज कर अल मत्त निबाहै ॥ करता की सेवा माही यह सुमिरेउ है एकहि मोही । छाजत दरस दोवाहु वोही ॥ पै यहीं नहीं उचित, परगट देउं देखाय देखै मेरो छाया, ऐसा करहु उपाय ॥५२॥ कहा बात सापा तुम भली । अनहीं लाज लि रहुलली ॥ है फुलवारी बीच अटारी । जाइ अटारी चढिये प्यारी ॥ मधुकर हाथ देउ मैं दरपन । छाया हारि देसावहु दरमन ॥ ॥ ॥ । दृसर माझे मेरव नाही " इन्द्रावती। , । - तै परगट तेहि लसु उरयसो । वह देसै तोहि ससि को ससी। परगट दरमन को दिन और । है प्यारी केती दिर्ग दवरे इरइ उपाय भला है, यह दिन देहु विताइ । भोर होइ जब दसर, दरसन दीजे जाइ दुसरे देवस मालती प्यारी । सखियन सँग आई फुलवारी ॥ चढिल अटारी मसियन साथा । दुइज चन्द सेाहा यह माथा ॥ आप दच्छ वह सुवा मयाना । अटा तरें मधुकर कह आना ॥ दरपन दीन्ह हाथ मह लीन्हा । मालति यदन झरोखेह कोना ॥ झाका दरपन मो परछाही । परी बदन की बिछुरी नाहीं ॥ देखि वदन की छाया, मधुकर भये अचेत मालतिकली भंवर लखि, विकसिरही सकेत ॥५४॥ जव सचेतना मधुकर ज्ञानी मन्दिर गइ तघ मालति रानी। दरसन देकै गइल पिपारी । तेहि दोहाग भई अधिकारी ॥ मीलन लाग देोक दुस माही । परी हाय सुख एकी नाही सुवा सदेस दोऊ कर आने । देाक सग सनेह बखान कबहुव पाती आने सुया चतुर दिन रातै ॥ प्रेम विरह वैराग , बहुत मास गा पोत कयह दुख कबह सुख, कठिन प्रेम की रीति ॥५६॥ रूप जानि मालति बरजोगू । नेवता राज बस के लोगू रचा सपम्बाठौर बनाये । राजकुमार देम के आये एक एक सुन्दर राज कुमारा । कोक रवि कोक ससि तारा मधुकर बिनु नेवतेगा तहा । रहे राज बसी मब जहा मधुकर रूप देखि सब लोभा । सेोमा तहा सभा को सेक्षिा ॥ मडि मालामालति लिहें, आई सभा मैंझार । बहुत सहेली गोरने, भयेउ सभा उजियार ॥५॥ ॥ - । कबहुव यात ॥ r ॥

इन्द्रावती। - लगी आम सब के मन साथा । यह चचला चढे केहि हाथा । वह चचला चंचला के समा चहु दिसि फिरी लिहेमनिछमा। ताकर ग्रील हली वह भाला । ठारेउ जो मातेउ तेहि हाला॥ गये सकल निर्प अपने घर को । मालति व्याह गई मधुकर से। दुख सहि के सुख पायन देऊ । यस सुख तुम्है पियारी हो। सखी कहानी कहि गई, इन्द्रवती के लाग कल ना परै प्यारी को, बाढे अधिक दोहाग ॥५॥ , ॥ [१५] मानिक खण्ड। दृसरि सखी से दूसरितमी । मीठे अधरन झारा अमी कहा सुनावत एक कहानी । चेत करन सो सुनिये रानी ॥ जो यह कथा रसाल समझा । निज वपु करम अवस्या यूझरी॥ परगट बूझ बूझहु कथा । बृझे गुपुत जाइ घट मथा लोग भुलाइ रहा परछाही । छाह मूल को देखहिं नाहीं ॥ एक कहानी कहत हो, सुन प्यारी दै कान रैन बडो अती होत है, सो इब जाइ निदान ॥१॥ एक नगर एक राजा रहा । सब तेहि नाम आतमा कहा ॥ रहा से महीपत फरगढ़ बाका । तेहि में रहा सब तेरह नाकाम नो नाका नित रहे उघारा । बारह रहे पाय हरकारा जय लग जागहि तय गधावे । सव सुध बाहर की ले आये ॥ हे तेहि गढ मी चोयिस सहा । यारह तिन तिन भीतर पहा॥ सात लोग कारज के, गढ़ मो राखें यास रहे आतमा गढ मो, जब लग सातो पास ॥२॥ ।

इन्द्रावती। ॥ । मो पावा राजा पुन्य चरम बहु कीन्हा । पुत्र एक करता तेहि दीन्हा ॥ मानिक चन्द्र रहा सुनाऊ । रहा समाइ पिता मन ठाऊ ॥ मानिक सम पह मानिक लेना। ताके रगक वारिय सोना सुन्दर रूप सलाना प्यारा । वस्न रहा अस मीत तुम्हारा ॥ मीत तुम्हार जाट के काया । परमातमा सेम धरि आया है सरूप श्री कोविद, रानी मीत तोहार 'सै मानिक मानिक अस, तापर डारधार ॥३॥ मानिक भयेउ तरुन जब नीको। जीठ अयेउ राजा के जी को । जब तारुन्य पुत्र । राजा मन व्याहै पर आवा देउ वियाह बाम घर आने । बस हाई मानिक सुर माने ॥ अस होइ जग काज मो आवै । जननी जनर मुकुन नित धावै॥ जो पितु मात मुकुत मन धरई । घास काटि पसु सेवा करई ॥ ताके मात पिता कों, मुक्त देह करतार बस भलो दोऊ जग, जो पावै श्रपतार ॥४॥ वित्त मीठहि निपं हकारा । रहा चित्त को चरन बयारा ॥ भेजा हेरहु ऐमिय रानी । होइ मरूप गुनी औ ज्ञानी जा घर कामिनी सूघर हाई । सदा रहै सुध भीतर साई जा घर कामिनी सूघर नाही । है तेहि नरक यही जग माहीं ॥ औ तीन वार तिय कीजै ।जोह डेराहु त एकै लोज रद बतीस दाडिम समा, लोचन पकज मान । जेहि कामिन के पाइये, करहु होइ सुख प्रान ॥५॥ अरु जोस मिर्ग से दिर्ग जाको। वाद्र छीन आगम गत ताक सेाजा घर आवै सुख देई पिय को जीत हाथ के लेई ॥ धाम कपोल मसा अदि हाई ।सुखी सहागिन नारि साई ॥ . ॥ ॥ । ॥

॥ इन्द्रावती। स्याम ममा याए कुच जाको । विछुरै अन्त प्रेम नहि ताको । सरवन जघ अधर फुच माही । रोम हाइ तो सुन्दर नाही ॥ भांह दुइज के चाद सम, लघु अंगुली समनाक । प्रीत बहुत तेहि कंतसो, सुग्व सम्पतको आक ॥६॥ चित्त बसीठ फिरा बहु देसू । मिलि उ न रानी सुन्दर भेसू ॥ निर्मल नगर एक सूका । चित्त अमल होहनिर्मल धूमा । चित वोही पत्तन दिस चला । वह दिसि होत भयेउ निर्मला॥ निर्मल यहुन नगर वह देखा । देखत रीझा वित्त मरेखा रहसि नगर के भीतर आयेत । धरम की रीत चहू दिस पाये॥ पन्थ गली स निर्मलै, सुग्बी चली सब लोग । रोग वियोग न देखा, मिला भोग संजोग ॥१॥ चित्त एक उपधन मेो गयेऊ । पाय रुचिर आनन्दित भयेक ॥ फुलवारी मो चित्त सरेखा । मन्दिर एक काच को देखा ॥ बीच स्याम रगतिलसर सोहा । ता लखि चित्त चित्त को मोहा॥ स्याम रग सुन है मत माहा । करै सेत रग प्रेमी नाहा जा दिन प्रेम सु पूरन है।ई । हाइ स्याम से उज्जल साई ॥ भये अमल मन्दिर से, टिष्टपार के पार मानुप एक न देखा, निर्मल सदन मझार ॥८॥ चित्त भेद मालिन मा लीन्हा । मालिन सकल भेद तेहि दीन्हा॥ यह मदिर औ यह फुलवारी । है हीरा को जो नि बारी है हीरा हीरा जग माही । हियरा हेरा बस को नहीं । सरतिय प्रीत मुभाव असीसैं । तासु चरन रमनी के सीमें सन्दरता पुर हत अधियारा । तेहि मयोप सोमा उजियारा॥ है मन्दिर फुलवारी, वह मालती समान अलिन गयेउ तेहि आलै, है जग काया प्रान ॥९॥ ॥ । ।

इन्द्रावती। ११२ ॥ ॥ ॥ । ॥ चित्त गये निर्मल पति पासा। मन मा राखि मनोरथ आसा।। कहा संदेस आतमा केरा निर्मलेस माना नहि फेरा कहा महा प्रति है आतमा । हम वह हैं दुइ नीरध समा दुइ दधि मिलही प्रोत बेवहारा। एक देह दूमर जित प्यारा बीच रहै अन्तर पट परा बढे न एक सिन्धु निर्भरा दोऊ दधि सों नीसर, मुंगा गुलिक अनूप सुख दर्शन निर्खाव, मिले रहै जो भूप ॥२०॥ जय निर्मल पति बातहिमाना। होरा जोगें मानिक जाना आदर बहुत चित्त को कीन्हा । दान दुकल नग मानिक कीन्हा॥ सूधी चाल चला चित ज्ञानी । भान गरब गति सी अभिमानी॥ चलु न गरब से महि पर प्यारे। पार न तोहि महि डारस फारे॥ नाघ रचन सो धरती भारसि । ओ परवतलग पहुपिन पारसि॥ फेर न यदन गरव सें, चलु न लेहि अभिमान । मुग्व श्री चरन एक दिन,छार होहिं तन प्रान ॥११॥ अपने नगर घिर जय आयेठ ।घात आतमा माथ मनायेठ ॥ मुनि राजा को मन हरपाना । यहुत अनन्द जीउ मा माना ॥ यह जग परमद छाजत नाही । सीस परत यिसमा परछाही ॥ बहुतै सम और कष्ट मझारा । मानुप जन्म कीन्ह करतारा जेहि नित लेसा एक दिन हाई । कहा अनन्द मनावै साई मात श्रोद्र मों रक्त को, जाके भयउ प्रहार । ताको जग मे रक्त है, जेपन नित निस पार ॥१२॥ व्याह किरीत रघा जमराजा । मचे वियाह को धाजत ग्राजा॥ चित्त फेर निमलपुर गयेक 1निर्मल पति के आगे भयेक ॥ घाह बियाह कर कर दीन्हा । यात माति निर्मल पति लीन्हा॥ . ॥ ॥ - - १३० इन्द्रारती। ॥ ॥ है उगन धरावा । देल नगर मो नेवल पठावा ॥ काम आज को प्राता रासा । हेरा सफल सूल को माखा जो कारज है आदि को, पात न राग्वहु ताहि । समय लूट वृझत है, महा ज्ञान है जाहि व्य इक चाह सुना जम हीरा । वा मानिक पुहुप मरीरा ।। अधान हमो मान मे। आई । सोही नाग लगा ललनाई जो कन्या बुधवन्ती हाई । सुनि बर नाऊ हँसे जो साई ।। की चुप रहै कि आमू ढारे । उन्न न हाइ न सबद निसार । निश्चै वा तेहि हिये समाना । विद्य'जन यह अज्ञा जाना जोयारी भरिशि, श्री विवेक मति नाहिं । जानु पिता मुव सोहै, जहा देहि तह जाहि ॥१४॥ हीरा हसत हँसे मब हीरा । हरा मखिन के उर को पीरा ॥ पूछा मसिम हँ मो तुम प्यारी । काहें कहै। जाहि बलिहारी ॥ तेरो मन्द हास मन हरा । मामहु हँपय फूट खसि परा ॥ । मुसुकानी जा रही मपानी तुम मुसुकाइ हँमी केहि कारन । है मन नगरे बीच कि आरन ।। कहा वात कछु नाहीं, आइ बसी मन मार ऐसें आज हंसी मैं, धरा हसो तुम छह ॥२५॥ घोली मखी हँसी तब आवे । जब दरसन अघरज देखावै ।। मनुज हमी फपि हँसी न होई । जय कुछ होइ हमी तब कोई॥ सो हमें किछु मरम यतावा । जिमि मसि सबद चद प्रगटाया नोसर । पायक देह बताया तहा ओडीमा उह उहकै बोला । मरम मे बच्छ पीर को तोला। तेसै हैंसो तुम्हारी, कहा है किछु यात चल चाल नसा की, जस माजरतात मुसुकान मनोरम रानी प आजम धुवा जहा इन्द्रावती। १२१ ॥ लाल अधर सो हीरा रानी । झारा गुलि कहिये रहसानी ॥ सुनि के व्याह आ घर को नाज। यह नित हसित सखी यह ठाऊ। मैं हीरा यह मानिक अहई । मनि को गुन मनिके सँग लहई ॥ सुनि वियाह बर मैं अनदानी । पै एक चिन्ता हियें समानी ॥ है मानिक गुन के बउसाऊ । की मानिक है ऐसहि नाठ ॥ बहुत यि मो हात फल, देवत लागै नीक ॥ पैरसना के साधे, होइ तीन की फोक ॥१७॥ बोलो निर्मलपुर की नारी । सत्त बचन भाया तुम प्यारी ॥ जेहि प्रक्रीत भलो है नाही मनुज नही है पसु जग माही॥ का परगद के भय सलोना । जो निसर्ग को खाटा सेना ॥ तेलिया कद स्याम रँग हाई । रूप करत ताबा कह सेाई अगिन जाति धारी जेहि भेटा। छार कीन्ह तेहि को प्रम भेटा। पवन सयाना चातुरो, द्वार पाल है तोर ॥ हम सब तेहि भेजत है, वोहि मानिक के वोर॥८॥ सखिन पवन कह भेजा तहा । बास रहा मानिक को जहा ॥ उहा अनन्द बीच आतमा । सा सब लोगन के जिउ ममा॥ रागारंग मे मानिक भूला । राग अहै परमद को मूला नाद पाय काया जिउ आया । वेद नाद पाछे तन पाया आदि नाद से यह जगमाहीं । सकल सपद भै ठूछा नाही ॥ नाद अनाहद अंहद, सुनै अनाहद कौन ॥ सिद्ध होह अपने गन, सुनै अनाहद तीन ॥१९॥ है खटराग छनीस रागिनी । औ सँग पुत्र पुत्रनामिनी प्रथम राग भैरो की जान 1 मालकास दूसर पहिचानहु ॥ पुन हिडोल ओ दीपक गहई । श्री राग धरती को कहई ॥

इन्द्रावती। ॥ ॥ यष्टम राग मलार कहावे । पुत्र मारजा कोन गनाये निर्त छनये भहे पियारी त्रिीमठ अलकार उवि धारी ॥ ताल एक सै साठ है, सात भांत सुरजान । तीन लाल सत्रह सहस, नो से तीस मतान ॥२०॥ मानिक परा राग रंग माही । चिन्ता रही कुछौ तेहि नाही॥ एक रात जासे सुख होई । सेवित रहा अजिर मो सोई ॥ राकस दिष्ट परा वह प्यारा ले राकस मायापुर डारा मायापूर नगर अति वाफा । सहम गली समुदै नाका ॥ माया मो मायापुर बासी । का गृही औ का सन्यासी हीरा मानिक मोती, रूपा कनक करोर पै आगम धन आगे, मायापुर धन योर ॥२१॥ जब मानिकहि असुर परियारा। मायापूर नगर लै हारा हारा एक फुलवारी माही । लागेउ चोट देह मो नाही ॥ जागा मानिक अचरज नाना । कहा मार मन्दिर अस्थाना अम्बर वही मीम उपराही । पाव तरे धरती वह नाही ॥ अबही ना वह दिन यह घरी । होइ रसा वह दूभर जनही ॥ रहे कहा मैं सेवित, इहां परेउँ केहि भात ॥ पर पराये देस मों, नियरें पिता न मात ॥२२॥ कहा सदन वह आगन कहा । साअत रहेउँ लिहे सुख जहा ॥ मैं भुलाइ केहि सचर लागेउ । अनुज पिता माता से भागेउँ ।। वह दिन अबही नाही आयेउ। जेहि दिन कह करतार जनाये॥ अस दुःख सकट पाळे लागे । अनुज मात पितु से नरभ गै॥ अपने ऊपर सब अरुकाही ករក្តី को रासहि नाही। को मोहि इहा वारा, को रिपु रहा कठोर ॥ निस अधियार अकेला, पगु दारो केहि वोर ॥२॥ । सुधि इन्द्रावती। ર૩ सीचत मानिक रेन बिताया ।प्रातहि सुन्दर बारी पाया अति सुन्दर फुलवारी देखा । रहा लोशाय *वर के लेखा ॥ रमा नाउ राजा को वारी 1 रहिल रही ताकी फुलवारी ॥ महा सरूप रही वह रानी । काया कचन बारह यानी वह ससि समा रमा आतमा । मानहु रही रमा की रमा रमा रमाए सो रमा, रमा फिकिरी होह ॥ सेवाता कहं रात दिन,मन सो ममता धोइ ॥२४॥ मानिक चन्द प्रात जब पायेउ । फुलवारी मा मालिन आये ॥ मालिन जब मानिक कह देखा। रीझि रहा तेहि प्रान सरेखा ।। पूछा मालिन को तुम हेाहू । ललित अधर अँचवा तुम लाह। नियन सरीर रकत घउमाज । है जिठ समा फलेवर ठाऊँ ॥ मन मोचन लेोचन कजरारे । मतवारे रद छद रतनारे कवन भेस तुम आये, यह फुलवारी मांह ॥ सुर कि असुर की मानुप,ससिर वितेरो छांह ॥२५॥ मुनिमानिकमानिक कह खोला। मसिगाती सम भापित बोला तुम हत्या का मेहि लावा । मैं न हनत हैजीत परावा ॥ दोप बिना मारे जो काह । मारे चाहे तेहि नित तार ॥ मारनहारेहि मारा चाही ।यामा जीवन सबको आही । तुम का लोचन अधर बखाना । ताहि बसानु जो तहा समाना॥ है। मानुप सुर असुर नहि,मानिक मेरो नाउँ।। नहि जानहु के. डारा, यह फुलवारो ठाउँ ॥२६॥ नगर हमार आतमा पूरु । मन सन रहेउँ तहा गुन मूरू ॥ है। मै बुद्ध ज्ञान का घेरा । तनुज आतमा राजा केरा जस ज्ञानी मन काया माही । तस मैं रहा रहा जह नाही ॥

१२४ इन्द्रावती। - ॥ मन से जमा मागा चाही । तन मो मन मत्री भल आहो। मन सवर सघरै सब काया । मन सोटें सोदे सय पाया विसमादीदेस नित,फेहिमारग होइ जाउँ॥ को राजा यह नगर मो, को रानी यह गाउँ ॥२७॥ मालिन कहा गगन है राजा । जाफर का जग मो बाजा ॥ है विसमती याम तेहि फेरी । विष्णु वल्लभा जाको घेरी रमा प्रहै राजा कर बारी । जाकर यह सुन्दर फुलवारी ॥ है अवही वह यिना विआही। है सुन्दर जैसे किछु चाहो ॥ सब चाहत दरसन तेहि केरा । मानवती मबसे मुरा फेरा ॥ घरी घरी पल पल रमा, सोभावन्ती होत ॥ मानभरी सिर पाव सो, उद्दित मुग्व को जोत॥२८॥ जेवर रमा कलेवर माही । छवि पायेउ छघि नेवर नाहीं॥ अब तुम हिये उदास न हूजे । तेरो सकल कामना पूजे बार धीरहस्पत जा दिन परई। राजा गगन सयम्बर करई ॥ आवै ता दिन राजकुमारै । ता नित सोभा सम्रा सँवारे ॥ तुमहू रगभुम्मि मह जायेहु । दूसर ठाउँ यिलम्ब न लायेहु ॥ रहिये फुलवारी मो, रमा पास मैं ॥ तुम सी श्री प्यारी से, परचै देउँ कराय ॥२६॥ मुनि मानिक हर्षित मा हीयें । थिरा तहा आसा मन लीये ॥ मालिन जाइ रमा सो कहा । रमा हिर्द नीरज हाइ रहा ॥ कहा देसार रूप तेहि फेरा । सुनत भयेठ चेरा मन मेरा है कैसे वह तरुन नवीना । रूपवन्त है अहै कुलीना कहा सखिन सँग लीजे हारा । उपवन जाड देसु वह प्यारा ॥ हो प्यारी वारी गये, देखि परै वह रूप ॥ रूप भूप के सुत को, है अनूप रवि धूप ॥३०॥ ॥ जाय ॥

इन्द्रावती। ॥ मुख कहई॥ रमा वेग सय मसी हँकारा ।कमल घरन उपचन दिस द्वारा ॥ फुलवारी मो सब मिलि आई । सुन्दर राय मुनी की नाई रमा रूप मानिक जब देसा । आवा उर वह कुभर सरेखा । मानिफ मुरा देखा जव रमा । ससि नेह चकेरी ममा दिष्टवान मैं ताफर चीन्हा । आद मनुप सी जेइ छल कीन्हा॥ नयन नयन के लागें, महा उपद्रो होई पौधे नैन से राखै, ज्ञान भरा जो कोइ ॥३१॥ रमा मखिन से कहा बुझाई । ता कुल बुध यह विध प्रगटाई ॥ का जो सुना निर्प सुत अहई ।निर्प तनुज अपने पूछहु प्रथम देस औ गा । तेहि पाळे पूछ हु कुल नाऊँ ॥ राज काज पुनि पूछा चाहो । निपको यही कसोटी आही॥ पूछेन कवन नगर से लला । केहि कुल अम्बर रवि निर्मल मानिक उतर निसारा, नगर पातमा पूर तनुज आतमा राय को, सोम यस कुल भूर ॥३२॥ जग महँ मानिक नाउँ कहावा । अपने सुद्ध इहा नहि आधा । आगन बीच रहा मैं सेवा । सेवा मुवा एक सुख सोवा ॥ कहा रहा अगुवा जो कोई । सोइय अनुज मिर्तु को हाई ॥ गुरू एक चेला से पूछा । यह निस सेाइ भएसिस छूछा ॥ सपन कीन्ह सुध सेोइन सोये। जबसा मित्र मिला नहि साये। सोयत रेहउँ अजिर मों, इहांपरेउँ अब आइ।। ना जानउँ सुर की असुर, डारा इहां उठाइ ॥३३॥ फहा तुम्है जो सम्पत राजू । देह सुनाय राज को काजू ॥ चाही कवन काज राजा को । जासो राज रहे थिर ताको ॥ कहा धरम को रीत संचार । ना अधरम सा देस उजारै ॥ ॥ -

૨૨૬
इन्द्रारती।
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अज्ञा सिर्जनहार पठावा । धरम कर की यात जनाया ॥
औ
यह बात वेद मो आई
। करै समीपी सग भलाई
राजा है चरवाहा, जाहि चरावत होइ
तेहि दिन करे जो दाया, सरग न पावे सोइ ॥३४॥
निर्प अधर्मी लेखा के दिन , । आवै रहै सहायक जन विन ॥
बाँधा जाइ नरक कुठ माही ।तहा मरीच अँजोरा नाहीं ॥
राजा से जो इच्छा करई । छोट बडे पर दाया धरई
चरवाहै कहँ सत्रु न आनहि । डरिक धनुक छुरी प्रनतानहि ॥
होइ अबरप ना बेच अगूटी । दत्त करे घर आनहि मूठी ॥
रहै अहरै मास नित, अनुचर ग्रामी पास ॥
लोन मोल आने कहू, भेजै हरै न आस
उचित नही अधरम चित लावै। मानुष गूदा नित्त कढावै
आपद हेत मनुष मरवावत । तेहि देश छाड मया मन आवत॥
निहर रहै नहि जीत के पाये। करता त्रास रहै चित लाये ॥
हाह न करै डाह भल नाही । मन कह डाह करै दुस माही।
जैसे पायक लाटी खाई । अच्छत तैसे डाह भलाई
घड़ान करै कुमानुपी, राखै अधरम रीत ॥
मानहु काटत श्रापुहीं, जाहि स्वान सो प्रीत॥३६॥
तासा मिले एक जो अहई । दरपन दरपन महिमा लहई ॥
काटा सग रहै पे काटा । पुहुप पुहुप रस चाहै घाटा ॥
सत्रुहि सत्रु सग भिडावे
भेडा भेडा माथ लहावे
औ अंकार पर चित्त न देई । हाइकै निर्प कोर न लेई ॥
जो अॅकर दीन्हा जो साया । तिन्ह से दूर अलस को दाया ॥
लूट मिलै रिपुमार, लूटहि देइ लुटाइ ॥
गुपुत देइ पहुतन कंह, तामो आप न खाइ ॥३७॥

इन्द्रावती। १२७ । ॥ S ॥ ॥ ॥ 4 ज्ञानी पास पठावै ज्ञानी औ आगे की पढ़ कहानी सकट परे निरास न हाई । हाइ भाग बल पावै साई उन्नत ठौर न ऐसा सवै । सुनै न सबद दुखी जो रोवै ॥ लेइ चतुर लोगन की मता । फरै घरम बाढ जस लता भगु चढि मगु सुध लेइ अगाऊ । आगे पन्थ होइ कस ठाऊँ ॥ धरती काज सँवारे, नभ दिस करै न चाव ॥ ना तो ऊचे सों गिरे, खाय हटन को घाव ॥३॥ अकसर आपन उद्र न भरई । सात पोच सँग जेवन करई सेवा अनुज की करे न मूयें । अनुज अनुज कहँ हारा कुयें ॥ जो जैसे तेहि तैसे रासै । दया बचन सकल सँग भाखै ॥ बूद बूंद सागर से लेई । दन्त समै वारिद सम देई कोमल कहि बस करै कठोरा । हीरा कहँ रागा पै तेरा धरम मूल है राज को, अधरम किहें नसाय । कठिन राज को काज है,दिहे मनाक सुनाय॥३९॥ रमा रमा मखियन पहिचाना । निर्प सुवन मानिक कहँ जागा॥ किन प्रतिष्टा आदर सेवा । राखेन दुग्ध खाँह मेगा ॥ कहेन दया करि जेवन कीजै । ससै कहँ मन पन्ध न दीजै ॥ हम सय चेरी तेरी प्यारे । तोहि नित जहि सेवन हारे॥ फुलबारी मा कीजे बासा अचुर भेज देहि ते हि पामा ॥ यर फुलवारी सुन्दर, है जैसे कविलास चास करहु आवत है, दास मनोरम पास ॥४०॥ मानिक परा रमा बस नाहीं । वात ससिन को फेरा माहीं ॥ दै कै बोध मदिर सब आई । गहन रहिन ससी जहँ ताई ॥ मोती मगा ऐसे दासे । भेजेन रहैं कुघर के पास . ॥

इन्द्रावती। । । ॥ । ओ अंसुरु जिमि फूल सलोना । भेगा तेहि लागे मनि सेना ॥ पहिरा बाधा धागा पागा । लागा मला भाग तेहि जागा॥ रमा बसी मानिक मन, मानिक रंमा प्रान बार विरहस्पत थायेऊ, श्राण कुंवर सुजान ॥४१॥ रनभूमी मी मानिक गयेऊ । रमा हार ले परगट भयेक ॥ फिरी हार माजिक गल हारा । मानिक बदन भयेउ उजियारा॥ सब निरास होइ कै घर गयेक । रमा व्याह मानिक सँग भयेऊ॥ मानिक रमा भये एक ठाक । तैं न दुसी मम हैबलि जाऊ॥ मायापुरी लागु जाहरावा । मकल राज को कुजी पावा यहत किंफिरी किंकर, पायेउ मानिकचद अरुझि रहा मायापुर, भै धन श्री धन फंद ॥४२॥ उहा पिता मन सोग समाना । जब सो मानिक चन्द्र हेराना । चहु दिस लोग पठावा हेरे । को हित हेाइ मानिक हि फेरे।। पिता आतमा इन्द्री माता । रोवहि होइ प्रान नही साता॥ कैवैरी मन मानिक हरा । हम सिर अलि घिसमौ कोपरा।। मानिक नित होरा हेरा ।हरि को लगा मानिक मेरा ॥ मिला न मानिकचंद विस्मित होड के त्यागा, माता पिता अनंद ॥४॥ पवन गवन निर्मलपुर कीन्हा । बात ससिन से सब कहि दीन्हा मानिक सूघर कुरर सयाना । है वे सोबत रैन हेराना चहु दिस लोग हेरि कै हारा । केहि धरती गामानिक प्यारा॥ जैसे चाही भूपति बेटा । तैसे मानिकरुप लपेटा माता पिता नगर के लागू । मानिक लगा भरे दुख मागू ॥ राय प्रातमा भा दुखी, तजा थनन्द हुलास । गगन छिपायेउ मानि के, होहनिदै की न्यास॥४॥ लोग हेरिकै हारा, ॥ ॥

r न्द्रायती। ૨૨૨ - ॥ मुनि यह यात सखी पछतानी । सब परसून ममा मुरझोनी -॥ होरा के मन उपनेत पीरा । परगट सोच न माना हीरा...' मान भरी जैसें धन रही । वैसे रही से धीरज गही ससिन गुपुत कै पीरा चीन्हा । दोन्हा येोध समापन कीन्हा ॥ पवन जाइ निर्मल पति गियरें। कहा महीप दुखी भा हियरें। भयेउ चिन्त त्रिमलेस मन,कहा पवन सराय। जाहु श्रातमा पूर कहं, मानिक हरहु जाय ॥४॥ सबै वियाह की रीत उठायेठ । पवनहि हेरे लाग पठायेत ॥ सरियन चित्र हीरा कर दीना । लैकै पवन गवन तय कीन्हा ॥ वेग मातमापुर मो आयेउ । विस्मित सकल लोग कहपायेत॥ राजा आगे नायेन माथा । चित्र दीन्ह राजा के हाथा कहा सम्हार धरहु यह राजा। थाति जोग इब तुम कह छाजा॥ थाती भार उठायेउ, यह निर्वल मानुक्ख लैन सके महिअम्बर, समुझिभार को दुक्ख ॥४६॥ जो पाती काहू से नारी । आपुहि आप न ताही ग्रासे ।। जो थाती थाती ले धरई । नासे उतर ताहि को करई ॥ जो थाती दूसर घर माही । हर सोडारा कर तेहि नाहीं ॥ अपने दरय बीच को मेखै । थाती मिलि कैफेर न नेसै ॥ धाती देन ताहि पै छाना । थाती कठिन वस्तु है राजा ॥ दुइ मानुप थाती घरे, मागै आवै एक दुसरे बिना न दीजिये,जो तोहि बुद्धि विवेक ॥४॥ ही मे पवन पवन पग मारा । पवन समान पिरत चहु धारण मानिक खोज लाग अब जाक। हेरी बन परवत सय ठास ना यह गन्धक तामर हाई है उज्जल औ ठाठ न साई॥ , 1 इन्द्रावती। 11 । सब - जियत हो तो हेरि निसार । तन मन वह मानिक परवारवा है जग सकल पवन से भरा । कहू नहीं छूछा परा मानुष एक नगर को, साथी चाही मोहि बन समुद्र श्री परवत, हेरि निसारउँ बोहि ॥४॥ राजे साथ चित्त कह दीन्हा । दोऊ गवन एक दिस कीन्हा ।। पहिले साथी तब मगु नीको । साथी नोको है हित जी को ।। नगर बीच सब के मन सेागू । सेोग समुद्र परा सघ लेागू ॥ बीच परा सुख भागा। मनु रवि गहन विठ मा लाग॥ यह सुनि कै इन्द्रावति कहा । गहन विचार सषी अस अहा॥ कहिले सावी पियारी,रविससि गहन विचार। फेर कहानी भापेउ, चाहा जीउ हमार ॥४९॥ कहा मेप के बीच पियारी जा रवि गहन हा अधियारा॥ अगिन दरै पसु मरै बहूती । घट मुफल अनपडे अफूता ॥ बाढ़ विग्रह मानुष माहीं । मोउन प्रोत रहै कछु नाहीं ॥ जो ससि गहन मेप मा हेाई । दुख के फाँद पर सब कोई ॥ सिंहासन पति जीत न पावै । ता पर जो रिपुता पर पावै ॥ जा रचि गहन पिधारी, होइ यिर्पधेन के पास। बहुत तसकर प्रगट, विर्छ धेन को नास १५०॥ थोर हाइ फल पसु सहताही । बाढ ससै मारग माही चन्द्र गहन निग्रह प्रगटावै । दुरा येयाध रमनि पर धावै ॥ पसु पर आवै मीचु क धारा । धिपं आधेनु मरे अधिकारा॥ रवि को गहन मिथुन माप्यारी। उद्दम घदो हाइ अधिकारी ॥ निर्वल छेसक और वनिज़ारे । होहि और जो लीखन हारे ।। ससि को गह्न मिथुन मों,मोचु और दुख होइ। स्त्रोनित यहै चहं दिस, दास न पावै कोइ ॥५१॥ ॥ - एदापती। H । तो रवि गदार कर्ष मो हेई । दुरा मकट देरी सय कोई मक जो प्रगटे न अपराही । इयं नाय नाद पति माहीं ॥ राक लोग मधि काई मरई पिउं गमाहि नाम मो परई ॥ कर्मयोग सति गरा । सपा पटे मिठ फल ना मरे यानग मिनी पियारी । यिग्रह करें आप मर भारी ॥ सिंह पीच रविको गहन,सिंहासन पति नास। दुम को परन झकार, गहन सिंह के पास ॥५२॥ को स न अयस्या दाई । गर समेत नार जो कोई मनुप अधेर दृमी जाना । विग्रह राजन मा पहिचानो। भी समि गहन घार जल उरई। पाठा जाहा पाते परई सतुराई लेगा मा हाई । दुग्ग देखें गुरजन शो कोई न पर अक परगटे पियारी । घटे गदी जय राम दुलारी सुर्ज गहन कन्या मों, कन्या मर यहत नासै फल पो होड दुस, गुरुजन पर अंकृत ॥५३॥ मसि को गहन त्रीन उपजाये । सेती छाये सेत बढाये उदर पीर घहुते सतुगई । जल ओमहि नित प्रगटै आई। ससे अवत नीन पर हाई । विद्या को रुचि फरै न कोई॥ चाहुत यिर्ड लगाये केरी । सघ मन होइ मा जिउ मेरी॥ तुला बीच रवि गहा मुभाक । सब मन देश राग को घाऊ । उमडै कटक जगत मो, घई झोरा याउ दुस मुँइचाल प्रगट, यह विचार मोहि पाउ ॥५४॥ जो ममि गहन तुला मा आवै। तस्विर फट औ सेत ममाथै ॥ बहुतै अधरम रीत प्रगटई । विग्रह को धमनुप को घटई ।। रवि को गहन विठु मी प्यारी । दुरा को भार देई सिर भारी॥ है ॥ ।

१३२ इन्द्रावती। । + मिर्तु बहुत लोगन पर आये । पसु आ पखी फवन गनावे नपन अगिन आ मूडहि लागें । अत विठु मा दुख सजेर विईडंक को बोपद, जो पूछसि तैं मोहिं । जल श्री लोन मलै कह, घेग बतायउँ तोहि ॥५॥ चन्द्रगहन नासै दुख पोरा मानुप घूह मम मीरा पिय धन यीच हाइ सतुराई । दुख बालक ऊपर अधिकाई ।। फर फटि कन्ध देव दुर साई । औ ससै पन्थिक पर हाई ॥ मदिर बहुत उठावें लागू । मन्दिर सुन्दर अपने जागू ॥ धनु में रवि को गहन विचारी। भापत है। ताहि आगे पारी॥ मरहिं ऊंट पसु बहुतै, मरहि तरुन अधिकार । सिंहासन पति अपरा, परै कष्ट को भार ॥५६॥ चन्द्र गहन अति देइ कलेसू । मरि के लोग हेाहि मन्ह भेमू ॥ सीत खाइ । भलो अवस्था पसु को करई ॥ काज खेत को भलो सबारे । कन्ट बालकन ऊपर डारे बहुतै लोग परै बँद माही । बहुतै लोग दास होइ जाहीं । भकर बीच सूरज को गहना । उपजै चोर हाइ अनलहना ॥ नासै खेत समुद्र मों, नाव डुवावै सोह चूक कहे करतार के, श्रज्ञा सो सब होइ ॥५॥ गहन चाद को मकर मझारा । सिसु अधिकार उदर सो हारा। मीचु होइ औ या चोरा । तारा उ खटोलन वारा रवि को गहन कुम्भ को बासा। मिलन मिलाव गात मोगासा। अन्न वढावै मिर्तु देसावै । पहरा सो कुटिलाई आवै ससि के गहन कँवल दुख बाटै । लाहू दुरै सरग सय काद मरहिं तुरंग घनेरे, पुरुपहिं तिय पर चाव। जोर जोर काया मों, पीरा मारै घाव ॥२८॥ भानुप मरई इन्द्रावती। ॥ जो रवि गहन मीन मा होई ।नीर वढावे दधि मो साई जलवामी बहुतै मरि जाही । अजा बहुत पसु बाचें नाहीं ॥ तपन अयार बिज्ज अधिकाई । पमु सहताही खेत नसाई जाहा पाला बहुतै परई । पानी दामिन बहुतै करई ससि के गहन सिन्धु मो पाती । बाढै बढे मीन है। रानी यस षडै मानुप कै, फल तरिवर अधिकाहिं। सर करता अज्ञा से, उपजत है जग माहिं ॥५९॥ चित्त औपबन गयन जब कीन्हा। मानिक हेरै पर चित दीन्हा । चातुर चित्त पवन सो बोला । मानिक मानिक रहा अमोल जो हरि लेगा जो तेहि पावउँ । फाटत हाथ बिलम्ब न लावउ॥ चार मदिर सो जो कछु लेई । हाथ से काट एक तब देई ॥ कर काटब तय छाजत अहई । जब दुइ जन की आपुहि कहई। मगु मार के धागें, जो ठग पकरे जाहिं चंद दिहा चाहै उन्हें, ठगी करहिं फिर नाहिं ॥१०॥ पन्थ मार जो पकरे जाहीं । है अज्ञा महिपत कर माही ॥ चाहे हाथ पाव बिलगावै । चाहै जिस से मारि लहावै ।। धाह जियत देइ रेवाई । फारे उदर दास नहि लाई ॥ जो फल काठी घास चराया ।तापर कर फाटय नहि आया। पाहुन जो कछु लेइ चोराई । कर काटव अल नाही आई। एक कटोरा यस्तु कहँ, लैगा दूसर चोर ताकर हाथ न काटिये, जासों यस्तु पटोर ॥३१॥ चित औपयन गए मय टाऊ । हेरा सब परयत यन गाज पयन जहा संघरै नहि पाया । पित्त अमल तेहि भीतर आया। पै वह पवन जोति से भरा । मित्त घाह अधिको निमरा ॥ - - इन्द्रावती। वै करता पवन मनुप जे. पावा । एक दिम से से। पन्ध देखावा ।। रोम रोम है पवन समाना । जा कह लोग कहत हैं माना।। पवन संचरा एक दिस, रहेउ न एको ठाउँ । काहू मानुप सो, सुनान मानिक ना ॥३२॥ हेरि पवन चित कहू न पाए । मायापुर के बन महँ आए ॥ उतरे एक बिर्छ तर दोऊ वन मो तीसर मिलान कोऊ॥ मानिक आप अहेरें आवा बहुत अहेर मिर्ग सग पावा ।। वन ऊसर आ जलध अहेरा । है अल अलख निजोगें हेरा ॥ दीरघ नख धारी जो हाई । करै न भोजन ताकहूँ कोई ॥ निर्मल होत अहेर यहु, जापर करता ना। पढिकै मानीसरे, रकत गीउ तन ठाउँ मानिक बन बन करत अहेरा । कीन्हा वाहि बिर्छ दिस फेरा॥ चित्त पवन को रूप बिलोके । हरपिता मुद बाढेठ वा ॥ बाले चित्त पवन दुख रोवत । यह मानिक जागत की सेविता जागत मा मानिक हम देसा । की सोवतही सपन के लेवा । जब मानिक नियरें अति आवा। परसिदोज आतीस सुनाया। रदै माथ महि नाइकै, लाइ पीठ पर हाथ जैसे भूरत आगे, ब्राहमन नावै माथ ॥६४॥ जो फरता की प्रीत को यावा । तेहि देखत मूरत सिर नावा ॥ जेहि मन भा करता की धारा । सब छोटे मूरत कहँ तारा मरत के काधे । चास कुठार रहा सत याचे तेहि नित जो जग फरता आही। महि पर माथ लगाया चाही। तेहि तो अपने लाग न भाया । विठं हँकारा फेर पठाया जो भल होत आन कहें,तो पिय कारन याल । थज्ञा पावत मुन्न सो, धरै रसा पर भाल t घरा ॥

इन्द्रावती। १३५ ॥ ॥ उतरि तुरै मा मानिक प्यारा । मिला चित्त से आसुर ढारा ॥ मानिक कमल नयन सा पानी। दारा शा अभिलायी ज्ञानी ॥ पूछा कुमल मातु पितु केरी गौत बन्धु चेरा औ चेरी चित्त कहा जीयत सब कोई । पै तुम बिनु व्याकुछ मन होई॥ जैसा नगर रहा तस अहा पै अमन तोहि विनु होइ रहा।। मन हरिगा सर नगर को, परमद रीत न होत। कष्ट मदिर मा बैठे, वन्धु लोग श्री गोत ॥६६॥ माता रोइ नयन कहँ खोवा । नदी वाहायेत पितु अम रावा सरवन को जस अन्धी अन्धा । छुटि गयेउ सब जग को धन्धा॥ आज काल दसरथ दुख हाथा । बाम साइ चाहत है साथा मात अधिक बिसमादी भई । अयहीं नैन जान नहि गई ॥ माता अधिक मयारी हाई । होइ असोस देव जो सेई जनमे बालक कष्ट सहि, बहुत मयारी होइ। ता निदेस मों नित रहै, है सपूत जो कोइ ॥६॥ अब आपने अवस्था कहा । तजि के देस कहा तुम रहहू ॥ सावत रैन बीच का परा तुम निसरे की काव हरा ॥ राजा पर बहुतै दुख बीता । धरा उठाइ देस को रीता है राजा की काया सगरी । मन नाही मूनी है नगरी है मन पै मन हाथ न ताके । धन से हाथ बी व मन जाके । आयु आतमा जीउ है, तुम मानिक मन ताहि । मन कारन जिउनोस दिन,उठत कराहि कराहि॥६॥ मानिक सकल अवस्या कहा । चित्त अचर्ज बीच होइ रहा ॥ कहा अली सा तुम सुख पाया। मायापूर हाथ कहँ आया एक करम तुम भलो न कीन्हा । आपन सुध न पिता कह दीन्हा॥ ॥ , इन्द्रावती। मात पिता कह जा रहमावा । सो वैकुण्ठ मुकुत फल पावा ॥ जासो दुखी मात मन रहा । मरत बार से बहु दुख सहा ॥ सावित्री के पाय तर, है वैकुंठ अनूप जो सेवै सो पावै, राक होह की भूप ॥६९॥ भात पिता सँग करहु लाई । करता की अशा अस आई ॥ जो अपने आगे विर्धाही । उन्हें बात उह पाप नाही । और न कीजै उन्हें निरास । उन नित मागु सरग सुसबामू ॥ एक बात मे कहा न कीजै । सुनि यह बात चित्त से लोजे॥ जो तेहि फहै कि जगत मझारा पूजु वृमू मर करतारा सिर्जनहार एक है, काहू जना न मोइ श्रापन काहू सो जना,वह समान नहि कोइ ॥७॥ मानिक कहा परेउँ अस ठाऊ । गा मोहि बिसर आपनो गाजा काम क्रोध भरमित औ माया। सेवा करै लागि मैं पाया वै सब मेवा से बस कीन्हा । रानी रमा महिनी दीन्हा ॥ कबहू समुझि परै जब देमा । गुपुत होठ वैरागिय क्षेसा पल एक रहउ फेर फिरि जाऊ। मन सो उतरि जाइ वह दाऊ॥ माता पिता की मीत मोहिं, मन बीच समान । चाह देइ बा लेइ कै, चाहत रहा परान ॥७१॥ पुन मानिक मुराधाद अौरा। कीन्ह चकोर पवन की ओरा ॥ पूछा निर्मठ पुर को छेमू पाय पवन कह उपजा प्रेम् ॥ कहा पवन निर्मलपुर ठाक । कुमल अहे रावर के नाक प्रोत ताहार यसै सय हिपरें । तन से दूर जीउ से नियरें ॥ पेजय उग तन नियर न हाई। कहा अघात मिखन सा कोई॥ दरसन मिलन न एक है, एक होत जो प्रान । नैन काँट के दे, घायल होत निदान ॥७२॥ । ॥

इन्द्रायती। १३७ । - - मानिक कुसल बात सब पायेठ। दोक कहँ द्वार ले आयेत सुन्दर ठाउ बसेरा दीन्हा । बहुत प्रतिष्ठा आदर कीन्हा । जाना सबै देस के मानुप । आए हैं मानिक फहँ भामुख पूछहि चित्तहु तें सब कोई । केतिक पन्थ बीच मे हाई ॥ हम आतमा पूर कर नाऊ । सरवन सुना न देखा ठाऊ कहा यहुत अनयीच है, दूर आतमापूर रवि समीप जिमि किन सों, कायासों है दूर ॥७३॥ धरती रहेउ पन्थ जव लागेउ । बूझेउ कष्ट बर्त कहँ त्यागेठ ॥ बर्त तजा थाहै सब कोई । जब मगु तीन देवस कर हाई॥ मैं तो बहुत देवस कर सचर । आयेत काटि सिन्धु बन भूधर ॥ अब त हा थिए सघ चासत । तैसें फेर बर्त कहँ राखत बर्तहु ते मुख जात न फेरा । अहै निजोग अमूरत केरा वर्त राखि चिनु जाने, जो जल की अनखाइ । जानि लगावै तेल जो, इनसों पर्त न जाइ ॥७॥ रजनी एक प्रीत धै हियरें । गये पवन मानिक के नियरें। आदर सो मानिक बैठावा । चहू ओर की बात चलावा ॥ जब मा करन गुलिक सो छूछा । हीरा की सुघराई पूछा कैसा गुन कैसा सुघराई 1 कैसे धन की सुन्दरताई कहा बहुत गुन है तेहि माहीं । हीरा गुन से छूछो न ही ॥ सूधर सुन्दर विमलतन, घिमल सहज है ताहि। तेहि का पूछे चाहिये, रम्भा चेरी जाहि ॥७॥ का बखान हीरा फर कर । बरनि न पारी जबलगमरका चरन सीस नहि सको सराही । चाहिय जैसे तैसे आही पदुम रूप प्यारी पद परा । अपने काज पाव गहि धरा ॥ , ॥ ॥

इन्द्रात । धन से जो पगु गहिके गरौ । टार नाहि साई फल चाखै ॥ फाटै सर्प आइ पगु माही । निसर जीत गिरे पे नाहीं ॥ है। चेरा तेहि चरन को, जेहि ऐसो पगु होइ । पन सम्हारि कै राखै, सबै गिराइ न कोइ ॥६॥ वह रम्भा करो जस रम्ना । नाहीं जुगम कनक को सम्मा। जब लग वह दिन आवत नाही । जा दिन उरो तरी लपटाही॥ तय लग चित्त चढी वह करो । कचन खम्भ रूप की मूरो कटि नाही जनु काया धरा । मानहु सन्न बीच मो परा दुर्वल है वह प्रेमिय नाही । तेहि नित चिन्ता धन मन माही अलकावर श्री कट सों, परा एक दिन बाद । कट चाहै अप महिमा, लट आपन मरजाद ॥७॥ पहिले कट अस लक से कहा । तेरो साभा मोहि सो अहा ॥ है। प्रेमी लोगन को फादू । है। मै निस चादू बहुतै ताहि पाछे मैं धाई । सील प्रीत न एको पाई मुनिके भयेउ लक मन छोना । टेढहु सीलवन्त कहु कोना जद्यपि ते सु बाचा । सीस पाव कथा तब खाचा ॥ ऊंच नीच जैसे मगु, तैसे तेरो भेस फनी गरलधारीतै, काटस देस कलेस ॥७॥ अति क्रिस उदर पियारी पाया। निर्मल बदनै बीच न आवा ॥ माना उदर सो जनमी वारी । भाग भरी सुन्दर सुकुमारी ॥ भागवन्त उदरहि से हाई । जनमै भागवन्त जो कोई उदर रहै मो सिम दूसरा । तेहि नित सदर मसिर महि घरा॥ जेहि भाग पाछे से लागा । माता उदर से होइ अनागा। भागवन्त है हीरा, है हीरा जग माहि हियरा हेरा पिर्धि मो, बैसो कोऊ नाहि ॥७९॥ मुख तेरो ॥ ॥ ॥ कछु मोल ॥ ॥ उरवधु कर मदृक समाना । हीरा रतन अनेक समाना चूक भई सदूक न हाई । सान रतन मानिक को साई । मुन्न एक करता सो मागा । मम उर सोल न आवै खागा ॥ जा पर करता दाया धरेज ।ता तर चीर जोत से भरेक ॥ जाके उर मा प्रीतम बासा । प्रीतम कर रहै है पासा जेहि करता उर खोला, ता कह दीन्हा जोत । जोत नियर है सेोजन, यह क्रीपा से होत ॥८॥ तर मह उरज बिराजै कैसे । गगा जल दुइ बुम्मा जैसे वाए दिस उर के मन परा । कमलज कमल साज जनु घरा॥ हाड न पायेउ मन मह काई । हाड हस्ति के मन महँ हाई ॥ बल समेत है मन प्यारी को । मन जेहि बल साई मन नीको। चिन्ता सोग बहुत जो करई । तेहि मानस अबले हाह परई॥ अजा दुग्ध मह माती, पोसि पियै जो कोई । मासे चार तीन दिन, सवल तेदिक मन होइ ॥८॥ जेहि काहू के होइ न हानी । कहा चलै तेहि कर मह माती॥ आनै जेठी मधु एक ताला । मूंगा मासे धार अमोठा झीना पीसि गाय पय माही । हार पिले रहै दुस नाही इहै। न पावै घालिस मासा ।लेइ आवरा मन बल आसा ॥ वोही मान धनिया ले आवै पीसि खाट रम माह मिलावै॥ रात देवस जो पीये, यली होह मन ताहि कहा सरीर चखानत, ओपद रहेउ सराहि ॥२॥ है समाधारी कर प्यारी प्यारी कर मत लेत निसारी ॥ तेहि कर बीच हिया सब केरा । लीन्ह हि या मन कीन्ह बसेरा॥ जब लग जग न रहा तन दीठा । गिद्ध मीन सँग आइ बईठा ॥ P ॥ ॥

१४० ॥ इन्द्रावती। पाय परगट मा मानिफ हाथा। तमा गिद्ध सफरी को साथा ॥ यह मानुप कर सो को पारै । गिद्ध उतारै मीन निसार ॥ हाथ पांव सों बाद भा, दोज चतुर सुजान । भुजा आपयो देखि के,भाकरमन अभिमान दशा हाथ कहा सुनु घरन भुलाने । आपन औगुन ना पहिचाने ॥ आद मनुष जादिन जित पावा। जिलका ताप तेहि माधा देखा पाव गिला वा माही । रहेठ अनन्द हिये तेहि नाहीं॥ स्रोनन बीच सबद तेहि आयेउ। यह नित पग ऐसा निर्यायेत॥ की कबहू बिसरावस नाहीं । आपन चरन फेर जग माही। हाथ बात सुनि के चरन,कोपा कर उपरांह । पाह भुजा पल ताहि भयेउ,पाय हमारो याहमा पुन कर कहा बात कहु सोई । अपने जोग बात जो हाई मैं खरग औ वैसाखो पावा 1 पन ही वह चाम परावा दुर्जन लोग सर्प जो ढीले बैसासी अजगर होइलीलें ॥ तेहि जेविमल भुम्मि हो रहा। मनहीं अलख निसारै कहा ॥ पाव कहा जहा धाही आऊ । अन्त पाव के परसि पराज हाथ कहा मैं हौं बली, ते निर्बल सुकुवार । कर सो दान को देत है, औ मारै तरवार धन अगुली धन को रतनारी । मनहरकत मह धोरिनिसारी॥ अगुली ललित अनूप अनूठी । कीन्हा जग को हिया अगूठी ।। सकल सिष्ट रचना जेई कीन्हा । लास बहुत अगुलिन मेो दीन्हा॥ जेश दरसन करता को पावा । ताकर अगुली जल बरसाधा। सो भयक अगुली से मारा ।भा दुइ ख चन्द उजियारा । नख दस चन्द सपूरन, धन के हाथ मझार । कस न हाइवह धन सों,सय मन्दिर उजियारा॥८॥ ।

। धन को पीठ विमल विधि कीन्हा। सय दिस पीठ मान सा दीन्हा॥ जगदिस पीठ देइ जो कोई । सकल सिष्टि तेहि बसमो हाई॥ टेढी पीठ धनुक सम आही । मारे बान डरा तेहि चाही ॥ पीठ भीत है पाव पसारे । जो वैठा से बहुतन मारे कुयर हँसी न कोऊ करई । चाहै भार घाध सिर धरई ॥ सुद्ध पीठ होरा कर, दीन्हा सिरजनहार । चितवन नाहीं मान सों, मुख जोवन संसार ॥८॥ सुन्दर गीउ गाल अति नीका । प्रगटै नाग लता की पीका ॥ गीठ रूप अस अलख सवारा । जगत गीत मी फादा हारा ॥ सभै गीउ राखा तेहि सेवा । का मानुप का राफस देवा ॥ जेहि पूजा करता कर हाई । रिपुसो गीत न राखा गाई ॥ जो करतार पन्थ से फोर । लोह फाद तेन के गल हीरे ॥ रोइ कै सूमन हाथ कह,बांध न गीउ लगाइ। बहुत न छोड़ा चाहिये, बैठसि हिये तवाइ ॥८॥ मुख ससि है ससि है घस माहा। बरु ससि है ता मुख को छाहा। ऐसा बदन वही कह छाजा । अपने हाथ अमृरत साजा जेहि सनमुख मा सिर्जनहारा । तजा सुन सविता उजियारा ॥ सिर्जनहार ओर मुख लावा । रवि ससि अथवन हारा पावा॥ नास बदन की छाई होई । ससा रकत जो लावद कोई ॥ सिरिसछाल सितजीरा,स्यामतिलहिजल घाल। पीसिमलै छाई पर, नास होइ ततकाल ॥८९॥ मुखपर अधिक स्याम तिल सेाहा। रति तिलोत्तमा को मनमोहा॥ भलो चिघुक पर सेद सोहाई । वह जल बिनु जग प्यास न जाई विद्रूम रग अधर धन केरा । है मधु को तेहि बीच बसेरा। ka ॥

१४२ इन्द्रावती। ॥ साह कहा की मधु है साई की विद्रूम की मानिक हाई ॥ ललित अधर औरद उजियारा। है जैसे इंगुर औ पारा दाडिम वीज दसन कही, की मोती लर होई। की है मपत अंजोरे, तेहि यरन सब कोई ॥६॥ एक दिन अघातेहिफाघायल। घाव रदन से तापर आयल ॥ अधर दसन सो कहा सुनाई ।हमित हाह करसिबरियाई ॥ है। मैं लाल लाल सब चाहैं । अधिक गुलिक सी लाल सराहै। लाल जो तीन भाति का हेाई । जो जाने जाने पै साई मेच असम त हिम तोहि सामा। सीतल सास को का विस्खासा ।। कपटी छली होसि तै, तोसे को पतियाव महा मुन्न संग छाडे, लगत गरव को घाव ॥९॥ रहन कहा का आप मराहे नहि बखान को अन्त निबाहे ।। जो तै लाल अही मैं मोती । सारह बरन होत ससि गेती। मेघ असम को सीत भला है । सीत च है जो मनुप जलो है ॥ रुपवन्तिन के गर मह ठाऊ । पाये मम महि मावठे साऊ॥ पिता सिन्धु ससि बन्धु हमारा। निसअधियार जेहिक उजियारा ते सूखा स्रोनित हसि, कवन लेई तुव नाउँ । जो पहिले भूपन महं, होइन मेरो ठाउँ ॥१२॥ तै ईगुर अस मै जस पारा । पारा सोई गुर अवतारा ते साखा मे अमोला का मोहि साथ बाद खोला। बहुते बन्धु सघातिय मारे । एकै बन्धु सघातिय तारे बोला अधर बहुन अलि जाहीं । एक सघाती बिछुरत नाहीं ॥ मैं सुत महै। देवाकर केरा । जेहि दिन प्रीथी हाइ अधेरा। पिता दीप है दिन को, मैं रजनो को दीप । को पारै सरवर होय, अस पित तनै समीप ॥१३॥ - इन्द्रावती। - - ॥ । रसना अभी भरी धन केरी । सुरतिय जेहि बघनन की चेरी॥ रसना औ रसना है एकै । तब रसना जब रसना फैकै ॥ जो न करहु से पहिये नाहीं । भलो नही मन से मत जाहीं॥ जेई निद्रा रसना पर लीन्हा । धन्धुमास तेइ भोजन कीन्हा॥ झूठ न कहु कयहू जिभ्या से । परजा है करता सघही को ॥ स्वाद तजै जो रसना, पात न सुधरै जाहि । भूज सोंठ बा हरदी, मिर्च पीस मल ताहि ॥९॥ सरवन है प्यारी को भला । सत्त बचन सुन सा निर्मला ॥ बक सरवन को वेध जो भयेठ । वेग भयानक सबद न गयेत ॥ करन नयन से उत्तम होई । पहिले सबद सुनावै साई धन के नैन अहैं कजरारे । बाके मान सुरा मतवार नैन साई जेहि लाज समाने । देख लजारू छुवत लजाने नासिक सुन्दर की रहै, करत अधर रस पान । दुइ सॉसा जासो चलें,एक ससि के एक भान ॥१५॥ दिन भर धन ससि सासा लेई । व्याध सरीर न आवइ देई ॥ निस कह लेत भान की सासा । यह उपकार सकल दुरा नासा॥ है धनु साह भौह कर खाचे । वेधा सबै न कोतव बाचे बरूनी बान धनुक है भाग । को तेहि दिस वितवै होइ साहैं। अलक फनी जेहि फाटा भूवा । सहस फनी मा नीक न हूवा ॥ भाल दुइज को चन्द है, सीस यहुत है गोल । केस रात मुखससि समां,तारे गुलिक अमोल ॥१६॥ मुनि मानिक हीरा पर लोसा । विसरी मन्द रमा की सेना ॥ भा मन मुकुर मन्द निर्मला । अयेत यखान ताहि मिस कला छाई मन मो छाई जाको । दिष्ट न परै गुपुत छुकताको । ॥

इन्द्रावती। रसना घाव लागमा घायल चित्तहु आइ उपर सौं कहा । पिता तुम्हे फारन दुख सहा॥ जीयत वह सहे कलेसू । अघ तुम घलहु आपने देस ॥ पित्रन के उपवर्गनित, भागीरथी सपूत विश्नुपती लै आये, सहि दुख कष्ट बहूत ॥३७॥ थोरे दिन का मानिफ प्यारा । चित्त पवन दुइ सरतेहि मारा। ।वठा उदास रमा पह आयल ॥ कहा सकेत येउवह ठाक । अपने जनम भुम्मि अब जाऊ॥ यह सुख राजन अय मोहि छाजा। मोहि कारन दुरा देखै राजा ॥ माता मोहि कारन नित रोवै । दुख सहि मुख आसू सेो धावै॥ येही काल उडि जातेऊ, पच्छ होत जो मोहिं। दरसन मार पाइ कै, परमद उपजत ओहि ॥९॥ हान बहुत माना मैं मन मा । जेइ मातादुख सहि कै जनमा । सो मेहि काज कष्ट नित सहई । तर बिहराय रात दिन रहई । धन वह सुत जो आयेठ तहा । मात कया धरती मो जहा ॥ रहा वह ऊट के ऊपर धरा । मात समुझि धरतो गिरि परा॥ हाथ पाव से बाधा रहा । नुबहू गिरा विधा दुख कहा ॥ सुखमों रहत श्री सुखसों, सुद्धनमात कलेउ । लेखा दिन करतार कह, कवन उतर मैं दे ॥६६॥ बीते रात प्रात जब अयेऊ । गगनराय के आगे गयक पहिले प्राज्य बखान सुनाया । फेर गवन की बात जनावा गगन कहा यह देस हमारा । है ताहार औ सब घर बारा॥ कहा पयाना अयहि पियाना । सघत रस मानस न अघाना ॥ चलन तबै जब चलन तुम्हारी। लखि अघाइ तय घठन हमारी॥ राज पाट और सैना, तुरै ऊंट सुडाल है तुहार सब बेलसहु, भा करतार दयाल ॥१०॥ ॥ - इन्द्रावती- मानुप जो आये देसी ॥ -- - ॥ मानिक कोमल धात निसारा । सीस नयन पर कहन तुम्हारा ॥ तुम हमार सय आदर कीन्हा । पूजो दीन्हा कुल्जिय लीन्हा ॥ पै मात पिता के अहैं सँदेसी ॥ पिता आतमा उत्तम सुसी । मोहि आत्मल कारन भादुखी॥ मातु रोइ घR सोवै चाहत । उठे कराहन काया दाहत अवनि देस मोहिं दीजे, करम् पयाना देस । मात पिता से भेंट कहँ, भयेउ यावुरो भेस ॥१०१ ॥ गगन कहा मानिक कर कीन्हा । मानिक रमा गवन के दीन्हा । दीन्हा बहुत तुरै ओ हाथी । चेरी बहुत रमा की दासी करत पधान आतमा पूरु । आइ निकट भा रहा नै दूरू । मानिक के असुक को वामा । माना पवन पिता के पासा ॥ हर्षित भयेत आतमा हीया । जनुमिर्तत जिउ पाएँ जीया ॥ लोगन आइ जनाया, आवत मानिकचन्द गोन लेहे रमा दुइ, सकल हरप को कन्द ॥१०२ ॥ सुनि राजा आनन्दित भयेउ । आने कहँ आगे चलि गयेठ । मान जिउ पावा ।रहसि रहसि घरसो सब धावा ॥ मानिक पाय पिता के परा ।हिद लाइ पिता तेहि धरा ॥ करुना रस ते रोयन दोक । भए सजल अम्बुक सब कोऊ । आसू ढारे सेो रहसाने । दोऊ हिर्द कमल बिकसाने ॥ सहित बधावर नगर कह, आए दोऊ भूप नेछावर मानिक गुलिक, दीन्ह देखि सुत रूप॥१०३॥ रमा रमा सम मन्दिर माही । पायेन घास रहा दुख नाही ॥ मानिक आयेठ माता नियरें ।भै अनद माता के हियरें सावित्री के नैन जुडाने । तन मन प्रान बहुत रसाने ॥ नगर लोग हावती। ॥ धन से जेई यह जगत बनाये । पुत्र विछोहा फेर मिलायेठ ॥ नदी एक सुत हार कहा । हारा मात तेहिक दुख सहा ॥ तनु जव चाइ नदी सों, डारा ऐसे टॉर सापित्रिहि तेहि दीन्हा,दुग्ध न अँचवा और॥१०४॥ दिस दस पाच पोत सुख माहीं । सबै मिटे पवन कह नाहीं ॥ गयेउ आतमा आगे साई । जामा काज व्याह कर हाई ॥ व्याह कर की यात जनाया 1 अशा व्याहरीन के पावा औ कहि आयेउ अब मैं जाऊ । जनम भुम्मि निर्मलपुर गाक ॥ जाइ उहा यह बात जनावउँ । व्याहरीत कारज पर धावते ॥ अज्ञा दीन् आतमा, पवनहि भयेउ हुलास । चित्र मागि के लोन्हा, आयेउ मानिक पास ॥१०॥ सून सदन कै चित्र देखायेत 1 देखि चित्र तेहि मुरुछा आयेठ॥ जब सा घेत भयेव अनुरागी । काया आग प्रेम को लागी ॥ रूप रमा तेहि चित से भूला । हीरा रूप फूल मन फूला कहा पवन मोहि लेचलु तहा । निर्मलपुर हीरा है जहा भूलें एतो दिन मैं खोवा । मिर्ग छाहि अरुझानेउ लावा ॥ मैं अपराज्ञ न जाना, है ऐसो वह रूप रोझेउ मैं प्रतिबिम्ब पर, तजि कै देह अनूप ॥१०॥ पवन कहा अब जनि अगुताहू । नियरें भयेउ ताहि लगिब्याहू॥ काहू से मन मरम न कहऊ । मानुप मा मानुष अस रहज ॥ साचा जीउ तार अकुलाना । जलधि कवडल बीच समाना ।। अब अस गहिकै आपुहि राखहु । काहू के सँग मरम न प्रापहु ॥ सूरी चढा भेद जे झापा ।याचा साजेइ मन मा रापा ॥ मैं अब जाउँ अगाऊ, चित्त तुम्हारे साथ अगुव होइ लै पाइहै, होइ मूल ताहि हाथ ॥१०७॥ ॥ ॥

॥ इन्द्रावती। पवन पयान पयन सम कीन्हा । निर्मलपूर आइ सुध दीन्हा ॥ रहसा राजा रहसिन रानी । सब रनिवास रूप रस सानी॥ रहसी हीरा रहेउ न धीरा । हुकुल न आवे हुलसि सरीरा॥ रहमी सखिया सँग की घेरी ।अलबेली येलो चम्बेली राजा रहसि बियाह पसारा । हान लाग सब मगलचारा नेवता लोग कुटुम्ब सर,रचा चित्र सन ठाउँ। घर घर माद हुलास भा,यह निर्मलपुर गांज॥१०॥ उहा आतमापुर महँ राजा 16पाह पमारा बाजन बाजा ॥ सागी भयेउ रमा कर जीऊ । सवत ठियाइहि माहिपरपीका परगट हँसै गुपुत मह रोवै । यह चिन्ता सो रैन न सावै ॥ कहै सहेलिन सा हो सजनी । रजनी बीच फरत दुख यजनी॥ दूसर होत पीठ कर व्याही । सवत सत्रु मोहि ऊपर चाहा ॥ सखी वुझावं हो लली, दासा पिय को तोहि । रानी बूझा चाहिये, सेवा कीजे वोहि ॥१०९॥ मानिक साथ कटक दै राजा । व्याहन भेजा बालन बाजा मारग कठिन काटि के गयेऊ । चित्त चतुर अगुवा तेहि भयेऊ॥ निर्मलपूर देखि हरखाने । सब मनमानिक रुप समाने ॥ धयराहर चढि हीरा देखा । रीझ रहा धन जीउ सरेखा ॥ मानिक कटक बरात रेंगीलो । देखि रही मन रीमि छबीली॥ भा बियार गठवन्धन, हीरा मानिक सग। एक ठाउँ दाऊ भये, अरुझाने रस रंग ॥११०॥ आगे कथा न साथै पारठ । ठेका नीद नींद किमि भारत ॥ जस हीरा मानिक वर पावा । बर बर सग अनद मनाया बस रानी तोहि कुअर पियारा। बेग मेलावै सिर्जनहारा ॥

१४८ इन्द्रावती। इन्द्रायति जय सुना कहानी । अधिको भई येयाकुल रानी ॥ कहा ससी सो तीसर रजनी । कह न फेर कहानिय सजनी ।। अधिक कहानी के सुने, पाढत घिरह वियोग। अव तो अलस दयाल होइ,आप मिटावे सेोगा।१११॥ । [१६] विरह अवस्था खण्ड धन से धन जेहि विरह यियोगू। प्रीतम ठाग तजे सुरा भोग ॥ नेह बीज मन धरतिय बावै रैन न सोवै दिन कह रोवै ॥ धन जेहि जीउ होइ अनुरागी । वार प्रान से प्रीतम लागी तजै भोग सुख सुमिरन नाही । जागै निसि कहँ सेवइ नाही॥ धन सों जन धनमन तेहिक,जाकेमन दोहाग। परै दोह की आग सो, मानस भोंसै दाग ॥१॥ रोड दीप सुत हा धोई । मभिलापिन अनुरागिन हाई ॥ इन्द्रावति सुकुवार कुमारी । भार बियोग परा तेहि भारी॥ प्रेम सरीर बेयाय वढाया । दूबर पीत भयेउ धन काया ॥ पान न खाय न पीवै पानी । भूख पियास भुलायेत रानी ॥ व्याकुल भई रात दिन रोवै । बदन करेज रकत से घावै ॥ प्रेम आग तन काठिय जारा । मारै चाहा मन को पारा भइउ दूबरी रानी, भै वियरन तन रग बैरिन होइकै लागेउ, व्याध अंग के संग ॥२॥ दुर्बल इस व्याध से नारी । बल घटि गाभा जीवन भारी॥ चित्त ध्यान प्रीतम पर राखा चाखा प्रेम बढेत अभिलाखा । ।

इन्द्रावती। १४९ वैरागिन कीन्हा वैरागू । अनुरागिन कीन्हा अनुरागू ।। सुमिरै सेवित बैठी ठाढी । मन अममर्थ अवस्था बाढी ॥ प्रेम झकार अपेठ तेहि सीसू । वैरी यूझ निस रजनीसू सुक्खभयेउ दुग्व दायक,सुधमतिरहेउ नसाथ। परी जगत प्रानेसरी, जडता केरी हाथ ॥३॥ सुन्दर बाक मनाक न पावै । गगन चाक उदवेग सतावै विरह आग से भै उर दाहू । धन ससि कहँ मा मन्दिर राहू॥ भावर ठाय न सिच्छा मानी ।छिन छिन कहै आन की वानी॥ उन्नमाद से रोवइ हँसई । आमू धरती माती खसई जियत रहद घेयान के बाहा ।नाता हात मान पल माहा ॥ धन कहँ अंतरपट भयेउ,गगन ऊँच महिनीच। छाडि सकल धधा कहँ, परि गुन कत्थन वाच॥४॥ , वह रायल जग मित्र नवेला । मन परान कह कीन्हा चेठा। वह बिदग्ध सुकुमार पियारा । रूप गगन सविता उँजियारा ॥ चिन्ता कथन बीच पन परी । चिन्ता कर घरी आ घरी केहि तपफार दरस वह पावउ । केहि उपकार के ढिग धाव।। हात भलो हातिउँ जरि छारा । देह चढायत रावलु प्यारा पडो भाग सारंगी, रहती प्रीतम पास मोहि कलेस पिछड़न को, है प्रछन्न परकास ॥२॥ ॥ ॥

१५० इन्द्रावती। [१७] ओपद वनन । हाटक रग पियारिय फापा । यिरह थियाध पित्र रग पापाn दूयर में दूसर जित भयेठ । यिछिपा विठंरूप हाइ गयउ ।। एक दिन मन्द जरानी रानी ।सबके मन मह सोच समानी ।। नारिय एक धरा धन नारी । कहा पित्त जर है ताहि प्यारी दुस तन महँ जानत मय कोई । याय पित्त औ कफ से होइ ॥ नसा चलैजा काग गत, पित्तहु ते पहिचान । मेंडक रकत मार कफ, चाय जांक गत जान ॥१॥ जो तीतर लावा गत हाई । सन्नपात से जानहु साई चल धीमा नसा पियारी । जानहु सोत देह दुख भारी ॥ मुक्व कटुक जो रहै तुम्हारा । पित्त जान दुख आय पसारा ॥ सूखै अधर नयन पियराई । मुर्मा दाह पित्त सो पाई जो खासी औ स्वासा हाई । कफ सी कहें बयद सब कोई ॥ मुख मीठा तासो रहै, होइ भूख कर नास होड दुग्ध धधि तल्ल सों, प्रगटै फागुन मास ॥२॥ जो प्यारी मुख फीका होई । जानहु अहै बाय से साई होप बाय सी रूखी देहा । निदरा नासै उश्न सनेहा तुम्हें पित्त जर काया धरा ।ले चन्दन औ पितपापरा सोठ उसी निलचिन लीजे । माया सँग करि सगे कीजे काढा करिकै पीजे प्यारी । तजै पित्त जर देह तुम्हारी ॥ कटुक तिक्त के खाये, रहे अनल के पास पित्त व श्री परगदै, तुला विप के मास ॥३॥ कन्या तुला मेप विर्ष माही । पित्त बढे यह मिश्या नाहीं ॥ ॥ ॥ ।

इन्द्रावती। मकर बयारा ॥ - कुम्भ मीन महँ कफ आनरई । मारुत राज मास पट करई ॥ मिथुन कर्क औ सिघ मझारा । यदै बिर्छ धनु उपजत बाय बत्त के साथै हिक्का छौंक बवै के याधे ॥ चिन्ता किहे रयन के मागे । सो सरीर साझ के लागे अजमोदा चितरकना, पतरज घायभिरंग । सेंधा सोंठ बाफला, नासहिं मारुत अंग ॥४॥ माथा नीय चिरायत बामा । पीतपापरा पित कहँ नासा तज जावित्री लोग सोपारी । कफ काया से देहि निसारी ॥ जो जर देह पित्त से हाई । मुर्छा त्रिपा बढावइ साई बवन अरुच औ ऊभै सासा होत होइ जब कफ नर नासा॥ मोथा औ पटोल दल आनी । त्रिफला झै त्रीकुटा सयानी॥ नीव की छाल चिरायता, यानै फेर गिलोय । सकल टाक भरिकै कढा,पियै नास जर होय ॥॥ उपजै देह बाय जर जाको । होइ फम्प जमुहाई ताको मोह भरम मुख । औरो माच होइ अधिकाई ॥ अभया साठ चिरायत कना । सोचर मिर्चहि चूरन बना भारुत जर यह जूरन हरई । प्रात ममै जो भोजन करई ॥ तीन देवस ताई ही प्यारी । देहु न ओपन जानि दुखारी ॥ बहुत न सोऊ देवस कर, थोर न रैन मझार । खाहुन उदर भरे पर,पियहु न निस फहंधार॥३॥ पूछा तेहि ऐसा त्रिी दुपजर को ओपद कैसे ॥ सीत ताप और रस जर फेरा ।का ओपद है मो मन हेरा कहा होइ जोत्री दुप तापा अदाह औ माथा गुर्च शिवापा परा । कुटकी और उसीनि धरा M । कालाई ॥ एक सखी । सूखै जो झापा ॥ ॥

१५२ इन्द्रातवी। । ॥ ॥ फेर रकत चन्दन कह लीजे ।टाक टाक पर काढा कीजे ॥ तीन देवस लग पीजे, त्री दुख को जर जाय । सोचर अजमोदा शिवा,रस जर देइ मिदाय ॥७॥ यह तीनो रसजर के नेती पीस पिये तपसादक सेती गुमा सेट गुर्च औ कना । जलसी पियें सीत कह बना ॥ पीपल हरी आवरा । चितरक सेंधा ऊपर धरा चरन करि के जलसो पीये । जाइ सरब जर सुख मो जीये॥ होइ छथा तब भोजन कोजे ।राखि छुधा ओजन तजि दीजे॥ ऐसे करहु निरंतर, होइ न कबहू दुक्ख श्रीपद येही बडी है, भोग करहु श्री सुक्ख ॥८॥ एक कहा कीजे हो प्यारी । बाय वित्त कफ जनम बिचारी॥ कहु पर्क कीर्तिवाय पित केरी । औ असलेषम की है। चेरी कहा बाय को जेहि अब तारा। बहुत बचन है मापन हारा ॥ पच इन्द्र तेहि हाथ न रहई । कहै न जोग बचन से कहई ।। देसै जोग न जो कछु हाई । ता कह अवस विलोकै साई ॥ अभिमानी निया, छोटे ताके नैन ताहि करम पसु ऐसें, कर सदा दिन रैन ॥६॥ जाको जनम पित्त मैं हाई । हाइ चतुर ओ शानी साई काहू जन को कहा न करई । बेग केप मन मह अवतरई ॥ ताको सरन ताकि जो आवै ।वाट देश रै ऊपर धावै खाय पि पर चाहुत रासै । मधुर सटाई लटुता चारी तेहि दुगन्ध छैद सो धावै ।बेगे विर्याई आये अरुन अनल सोवत मों, देव बहुतै सोइ करम सिघ श्री कपि को, परगट तासो होइ ॥१०॥ असलेसमी जनम है साको ।दायायन्त मीठ है नाको ॥ ॥ ॥

इन्द्रावती। १५३ - ॥ मिर्च और वैदेही साहू ॥ काज बीच धीर से हाई । सय पर दाया राखे साई मात पिता ओ गुरु की सेवा । करे सदा माने जस देवा दुखित न होइ लाज से साई । क्रोधहि रहै दुसी जाँ हाई ॥ स्थाम केस दीरघ चखु ताले । मबद यचन अमित रसयाके। कुसुम विलोकै सोवत, देखै हरियर घास करम मयूर चकोर को, करै सदा गुन रास ॥११॥ बोली तय इन्द्रावति रानी । लाल की बात कही तुइ ज्ञानी॥ कहु फिर भेद कपट ताहि नाहीं । कैसे रहिये पटरितु माहीं कहा हेमन्त होइ जय प्यारी साहु साठ होइ अज्ञाकारी । जाहा लगे अगिन ढिग जाहू ।। निसदिन पियहु ताल को नीरा। मर्दन कीजे तेल सरीरा कीजे येही सिसिर मों,जाड न लगै सरीर । शिवा खाहु पीपल सँग, पियहु ताल को नीरा॥१२॥ मधु सँग अभया साहु पियारी। ऐसे रहउ बसन्त मा बारी मा बसन्त मोप्रान पियारी । लीन्हेहु ठाव जो छाया धारी।। चन्दन कुमकुम लाठ सरीरा । पिठ दिन रैन कूप को नीरा ॥ हँसि मनोरमा परा नेसरी । बैठ सुभग सँग लै सुन्दरी सुनिये मधुर राग औ बाजा भोजन तीतर लावा छाजा ग्रीपम रितु जय श्रावै, पित्त राज सर होइ। कैसहु फिरे न धूप मों, ज्ञानवन्त जो कोइ ॥१३॥ बहुत पिर्छ सो छहा जहा । कमल बिछाइ बैठु धन तहा ॥ सीतल फूल कमल कर हाई । जो लीन्हा सुख पावइ सेाई ॥ गुह सँग अभया ओजन कीजे । मधुर राग सरवन कहँ दीजे ॥ बरपा रितु महँ मारत राजा । चारहि जेवन जेउय छाजा - ॥ ॥ ॥ २० इन्द्रावती। धाराहर पर रहहु पियारी निद्रा दिन भर राखहु मारी ॥ तपतोदक सीतल के, पियह हरै सब रोग । चन्दन श्री घनसार कह, लाउ होइ सब भोग॥१४॥ धूप बीच यह समय न जाहू । सेंधा साथ अमृता खाहू जब जग बीच सरद रितु हाई । पित्त को राज कहै सब कोई ॥ यह रितु रकत देह सो लीजे । औ उपकार छोर को कीजे ॥ पहिल पहर निस हो छबि रासा। धाराहर पर कीजे यासा गगन तरे साइब अल नाही । खाड शिवा सँग चातुर साहीं॥ सात देवम रितु मां रहै,तव आगम रितु लेहु । छाड काज एहि रितु को,यहि रितु पर चित देहु॥१॥ कहि सब बात गई सब नारी । मरमी साथ कहा धन प्यारी ॥ जा के देह प्रेम दुस हाई । ओपद फर न पारै कोई मुखी प्रेम के दुरा का दुखी । प्रगट दुखी गुपुत है सुखी जा कहँ कुष्ट प्रेम का होई । गिरै न देश फीट कहँ साई ॥ जब मन औ जिभ्या पर आये । होइ अधीर प्रीतम गहिरावै ॥ आधा सीस पिराइ जो, धरै बैद सो गोइ । मिटै नहीं ओपद सो, प्रेम पीर जेहि होइ ॥१६॥ रहा सनेह बिर्छ तर दोही । भै उदवेग हिर्द मो वाही अपने मन कहँ अन्त बुझावा । रेमन ताहि यह जीवन मावा ॥ मोहि भारी दूभर भा जिवना। जिवना हाथ रफत मित पिवना।। चक्रवाक नित रहइ विछोवा । मैं निसदिन यह,जिवनित रोवा॥ गगन सिघ माहि मिघ समाना! ताको यिर्छ बिई में जाना जलज न काढे पायउं, रहेउ न कछुहु उपाय । अब यह जोउ देत हो, जलज सिन्धु मो जाय॥१७॥ n ॥ ॥

इन्द्रावती। ताहि मूरत प्र ॥ चित्त प्रीत मो मूरत लावा 1 ताजापन बिथा सुनावा ॥ परेत प्रान मन ठूढी कूमा । उठत करेजा सेो मित धूमा । दिन मा आग धूम भै रयना । मन मा सिन्धु मेघ भये नयना । मो मन मोन फंदा है प्यारी ।वाहि बेसर लट मत्स्याधारी ॥ को पूजनहारा । है यह प्राल्लन जीउ हमारा ॥ जगत देवहरा धीच नित,वामन जीउ हमार । पूजत है परचिन्त तजि, मूरत लिहें तोहार ॥१८॥ होत प्रभात प्रभञ्जन बहेज । कुअर सँदेस पवन सो कहेक ॥ जा कहु पवन पियारी साथा । रहे न धीरज नेहिय हाथा अय यह जीवन भले न लागे। जात सिन्धु दिस प्रान तेयागे। मन से आस घरत है साई । अन्त देवस सजोगी होई सकल कहा जो भापित छाजा । यू? चला सिन्धु दिस राजा ॥ चन्दन कीन्ह चरन धरि, समुझायेउ बुधसेन । पैन फिरा समुझाये, चला जलधो जिउ देन ॥१९॥ आइ परा गुरुनाथ गोसाईं । पन्थ वीच इस्सर की नाई ॥ रूप देखि राजा पहिचाना । चरन परा बहु भाति यखाना फहा नाथ को पन्थ देखावा । आगमपूर तुम्हें लै आवा राजा कहा गोसाइय दाया । पायउ अगुवा तब मै आया ।। सकल आपनो बिया सुनावा । सुनि गुमनाथ बहुत समुझावा ॥ तेरो जोग न पूजहै, जो घोचै जिउ देहु आगमपूर श्राइकै, कवन लाभ तुम लेहु ॥२०॥ फेर सनेह बसेरा दीन्हा । आप गवन राजा पहँ कीन्हा ।। उडा ययार मैंदेस सुनाया । इन्द्रावति कहँ मुळ आवा सुरंगसुपेती ऊपर रानी । मुरुळी धाई सपिय समानी . - ॥

इद्रारती।
-
॥
॥
हा हा कहि दे अग उठायें
। हे हो हाक लगाइ जगाधैं
गुलाब हिम यालक चन्दन । लावहि इन्द्रावति सुन्दर तन ॥
भयेउ न चेत रतन कहँ, किहेन अनेक उपाय।
जीउ हाय नहिं जाके, को तेहि सके जगाय ॥२१॥
ताफहँ कहा मेक हम जाना । जो सरीर के रुप भुलाना
जीत याज यह कला न डोले । परै उपल हाइ मन्द न बोलै ।
जीउ सरीर बीच जो चीन्हा । मा ससार मनम फल लीन्हा॥
जग मे चित्र दीपा साई । हर ययार से ताहि न हाई ॥
घरी एक पर जागी रानी । सपिन कहा काहे मुमझानी ॥
कहा सीस घुमरत रहा,दहु याही केहि भाउ ।
रहा न जीउ हाथ मों, मुरछानिएहि ठाउं ॥२२॥
जग घखु रतनजोत वह बाला । अँचवा उन्नमाद भै प्याठा
सुनि धाई रूपम्मा धाई । आइ अदभ्र ताहि समुझाई ॥
समुझु पियार चिन्त नेवारी । चिन्ता सो बाढ़
दुख
भारी ॥]
ते प्यारी बारी राजा की । हर्षित रहु तोहि सपत बबाकी॥
नइहर महँ का चिन्ता चीन्हें । आपन भेस चिन्त की कीन्हें ॥
गई आप रूपम्भा, प्यारी कह समुझाइ
सुना वात धाइकै, आपन मरम छिपाइ ॥२३॥
चेता देखि कुअर कहँ आई । इन्द्रावति सो कुसल जनाई ॥
मालिन इहा कुअर दुख भेंटा । उहा नाथ जगपति कहँ भेटा ।
चीन्हत रहा नाथ कह राजा
। आदर भाव बहुत उपराजा ॥
भयेठ नाथ जगपति दरपना । नाथ मुकुर जगपत मन बना ॥
दरपन होत मरम मुख सूझा । राजा दुचित नाथ सहँ घूझा॥
पूछा अहो गोसाई , बिजै कीन्ह केहि लाग
दरसन मिला तुम्हारी, पड़ी हमारी भाग ॥२४॥

इन्द्रावती । ॥ ॥ । - राजा यातनाथकर माना दे अमीस बोला गुमनाथा । जुग जुग मय भाग को माथा ॥ जो कोपा से पूछह माही । आयन यचा सुनायठ ताहो ॥ बिर्छ तरें जो गघल मेमू । फालिशर को है नरेमू है फुलीन कुल घर को दीया । घरमिष्टी दाया मै हीया राज दीप नित भयेउ पतगू । आएउ छाड राज रम रगू है कुलीन भूपत सुत, काजिञ्जर को राय राजा आज्ञा चाहिये, मोती का जाय ॥२६॥ । रासा आदर दिने घसाना अज्ञा दीन्ह निसारहि माती । है ताकहँ जो साहस होती ॥ रहसेठ नाथ कुअर पर आयेत। मुदित अनन्द सँदेस सुनाये ॥ माथ घरन राजा गहि परा । नाथ हाथ दाया से धरा दाया के आसीप सुनाया । राजा कुअर सभापन पावा दै असीस राजा कहं, मोती यावै हाथ श्री उपदेस वचन कहि, गयउ तहां सो नाथ ॥२७॥ अमर जिया सोइ मर जीया । मन समुद्र मोती जो लीया ॥ रे मरजिया कहा करू मारा । है यह जग मो जीवन थारा ॥ पैठि जलधि मो जलज निसारी। प्रान प्रीतमा ऊपर वारी प्रेम समुद्र मरजिया साई । जाको जिउ को लोसन हाई॥ लाभा लागि से ता महें डूवै । जो मोती हेरत नहि जवे जोगी जोग समुद्र को, प्रेमी हित जल रासे । मथि मोतो काढत है, तर पूजत है आस ॥२८॥ ॥ - - ॥

इन्द्रारती। ॥ ॥ ॥ । [१८] मोती खण्ड । मोती का फारन राजा । चला सिन्धु दिम याजन घाजा सग घले आगमपुर लागू । कह सुरुज है चन्द सँजागू यह मय ससिन जनावा तहा । विरह यीच इन्द्रावति जहा ॥ धन को जिउ अधरन पर आवा। महादेव कहँ यहुत मनाया है महेस जो राजा जोगी । काढ़े मुकता हाइ मॅजोगी तो तोहार मै पूजा, करमँडप में आइ होइ दयाल गारिपति, कीजे श्राज सहाई ॥१॥ कुअर ममुद्र तीर जप आयेउ । सेवक कहँ बेगहि हॅकरायेउ । बिनै बहुत सेवक से कीन्हा । प्रीत सुभाव दान तेहि दीन्हा ।। सेवक राजहि नाव चढावा । सकल लोग करतार मनावा ।। रे दाता यह मेतिहि पावै । जीउ ममेत नीर कह पावै है यह उदधि महा हत्यारा 'तुम दाया से लायेहु पारा बहुत कहे जेहि प्रेम है, तेहि भावत जिउ देत। अब जिउवा मित्रमगु, तय सुख जीवन लेता।२।। जाकी प्रीत मित्र की पूरी । आ मनसूर चदा यह सूरी प्रीतम जाको चीरा हीया । दीन्हा जोन हिया भा दीया ॥ बिनु दुःख सहे मिलत मुख नाही। मधु सुख अहै इक दुस माहीं । प्रेमी रात समैं बन ठाक । सो आग सुने हित नाक जो पसु कह दस बग्य चरावा । अत कामना मन कर पावा जो चाहै सोई करै, करता जाको नाऊं डारि कृप मों अंत कहँ, देह सिंघासन ठाउं ॥३॥ राजकुअर सो सेवक वोला । मरम अपार सिन्धु को खोला। । ॥ - इन्द्रावती। । ॥ - जगपति पातिय वटा हारा । जहा भुम्मिहत मिन्धु मझारा॥ पै जत राजा का आयेठ । यूडेन बटा काहु न पायेठ सुबकी साइन फाहुय पाया ।स्य समुद्र म जीउ गयावा मोहि भस यूझि परत यह साऊ। यदा भयेहु से दूरेह ठाक होड भाग जो दाहिन, अलग्ब दया पर होइ । तो दधिरकी ग्वाये, राथ म आवै मोह ॥४॥ सुनिकै राजा उतर सुनाया । महिमित देत उदधि महावा॥ पावत मुमता पूजे आमा ।नता जिजाइ जीत के पामा॥ जिट पप ऊपर जो जित देक । फेर न मरत मिलन रस लेक ॥ ना पाहत है। फूसल पेमू । जाइ जो जाइरहे सग पेमू ॥ अन्त मरत हाइहै जग ठाक । कम न मरै आगेहँ मरि जाक। है थाती इष्टा कर, है जो जिउ तन साथ चाहत रहेउंदरस लै, सौप देतेहि हाथ ॥५॥ सेयक कहा न हेगहु निरामा । आसा है धीरज के पासा हरन तारा पावन हारा । है यह कहा सुरुज उँजियारा ॥ जेहि कारज को बन्द दुवारा । खोलनहार अहै करनारा जेहि चाहे मगु पर ले आवै । भूजी झप से पन्य देसावै जा कहँ पन्थ ठगावै नाही ।चालिम बरप फिर बन माही ॥ जा कहँ पुत्र पियारा, जग मो विछुडा होइ । ता कहँ वसन यास है, प्यारा मेरवै सोइ ॥६॥ चिन्ता खेवक हिये ममानी । परी सरोनन अम्बर घानी ॥ कमला अहै जादपति बारी । ताको है मुकता रखवारी जब कोउ राजा का आवहि । बटा आन ठाउँ लै लावहि कमला से जब दाया हाई । तय मोती कहँ पावइ कोई ॥ । ॥ ॥ ॥ ॥ ॥

इन्द्रावती। - , ॥ सुनि खेयक राजा सो कहा । अधिको अभिलापी हो रहा । कहा कहा कमला सों, दाया प्रगट पाइ श्रय उपाय कछु नाहीं, चूडय अहै उपाइ ॥७॥ तति सन बाव कोरा वही । औघट जाइ नाव लगि रही ।। ऐसोधही झकार बयारा । येयक नाव न फेरै पारा नाव दूर आसी सो गई 1 मानहु गुपुत मिन्धु मो भई ॥ लोगन भाना बूडिय नौका लिखा न मिटे महीप करै का। यह ममुद्र मो याच न कोई । का राजा का जोगिय होई ॥ आगमपूर नगर मो, किन पुकारा जाय ना जाने केहि दिस गये,खेवक श्री यह राय | प्रीतम मरम सुनत धन प्यारी । ऊ सास ले अमुक कारी कहा सखिन सा मोहिविप दीजे। खाइ मरउँ एतो जस लीजे ॥ २ जित हासि तैं कुटिल कठोरा । कसन चलमि जहँ साजन मारा। अरे जीठ दाया ताहि नाही । रहन तार दूभर जग माही ॥ अरे मीघु लै आइ पराना । मोहितजि साजन आप पराना। देति काढ़ कयासों, प्रान होत जो हाथ याज प्रान मन यल्लभ, प्राज क्रिक जिउ साथ॥६॥ बोली धीरा सखिय सयानी । हो न अधीरा मन मोरानी ।। ता कहें सुमिर जीत जो दीन्हा । जगत रहा नाही है कीन्हा । एकै ठाव जो चार बिहगा । मारहु कूचि करहु एक सगा ॥ जो चाहे करतार जिआवै । चारित पसी कह बिलगावै ॥ सिन्धु लहर से का नहि हाइ । कोउ बूडत तट लागत कोई ॥ यह विश्वास न मोजे, झूठ अन्त कहँ होइ । जो यह आइ पुकारा, साचु न जानत सोई ॥१०॥ ।

इन्द्रावती। ॥ इन्द्रावती कहा मुनु धीरा । वह जित है मै अहउँ सरीरा ॥ जीत वाही यह जीउ हमारा । वह जिउसे है जीवनहारा ॥' जिउ बिनु कैसे जीवइ काया । जब लग काया तब लग छाया॥ यह काया परवारे जाहीं । जेहि काया की छाया नाहीं ॥ जाकर रहे जोत से काया । ताकर प्रगटै कहवा छाया सखी माहि समुझावहू, धीरज यांधि न जाइ । अब कैसे प्रीतम मिलै, दीन्हा समुद यहाइ ॥११॥ सुमिरु पियारी सिर्जन हारा । देह मिराइअ प्रीतम प्यारा ॥ मानुप मरि धरती मा जाई । माटो हाइ हाड छितिराई ॥ फेर जिआवै ताफहँ साई । भूला अचरज बूझ जो कोई ॥ आदि मनुप माटी सा साजा । बहुर बुन्द से कुल उपराजा ॥ घालिस बालक ताकहँ दीन्हा । सकल सिष्ट पर उत्तम कीन्हा॥ बोन्तिस अक्षर तापर, भेजा सिर्जनहार तेहि करता कहँ सुमिरहु, मेवै मित्र तोहार ॥१२॥ गइल सखी तह पहिल वयारा। धन पूछा कहँ मित्र हमारा ॥ कहा न झखिये रामा हियरें । मित्र ग्रोउं नस ते है नियरे ॥ आपन आपा देहु विमारी । आवै प्रीतम सेज तुम्हारी हरपट कमल मित्र तुम्हारा । पट उठाइ कसु है उँजियारा ॥ साखा कीजे सब गुन लहई । सास परमद कुञ्जी अहई है समीप वह प्रीतम, यरुक तुम्हारे पास घेगें मिलिहै तुम कहँ, राखा हियरें आस ॥१३॥ हा छमित धन पीरा भयेऊ । उहा नाव अवघट बाहि गयेका मेम आग राजा कर गाढी । उपर बढाइ समुद्रहि डाढी ॥ जारा अप्स जल रास सरीरा । जरिके सार भयेउ तेहि नीरा ॥ । - १६२ इन्द्रावती। ॥ सिन्धु सुता से मरम जनायेउ । मोहि प्रेमो क्रिष्टान जराये ॥ जो वह सीपज आज न पावइ । तास हुतासन माहि जराघद ॥ छाडि देहु रखवारी, तो मोती वह लेड नाता प्रेम हुतासन, मोहि न वाचै देह ॥१४॥ तब कमला गोहन लै चेरी । देखा मूरत राजा केरी कहा अहाँ मैं इन्द्रावती । ताहि मधुकर कारन मालती। सा मानस ताहि कारन सेगी । मोतिय लाग न चूडइ जोगी ॥ आइ यह नित प्रान पिपारे । चलहु कलिजर साथ तुम्हारे ॥ तोहि नित भयेउ निकेत मॅकेतू। भयेउ नरक माहि नाक निकेतू॥ नाव बही जिउयांचा, मिलेउ उदधि को तीर। तजि मुकता को कादयो, चलिये प्रेम सरीर ॥१शा निकै बूझा दरस भिमारी । हाइ हाइ यह कमला प्यारी ।। रूपन है इन्द्रावति केरा । है कमला सत मेरो हेरा कहा कवल दूसर है मोरा । ताके रग रग नहि तारा इहा कहा पगु दार रानी । लज्यावन्ति लाज को सानी ॥ ना वह धरन न लक न हाथा । ना वह नैन न माह न माथा ॥ लाज भरा तेहि लोचन, इहांन आवट सोइ । ते छल भेस धरै हसि, यह सब छल गति होइ॥१६॥ कमला आवन मरम छिपाया । अति सतवन्त कुअर फहँ पावा कहा कामना पूरन हाई तहि सम नेहो रहा न कोई ॥ दे असीस कमला चलि गयेऊ । आस कुअर के हिर्दै भयेक ॥ पुनि खेघक खेत्र पर आवा । मोतिय ठाठ नाव कहँ लाया। अमिरि कुअर करता करनाऊ । होइ मरजिया गयेउ तेहि ठाका नूर मोहम्मद जाहि मन, होइ महा अनुराग। चुदै गहिर समुद्र मों, अपने प्रीतम लाग ॥१७॥ ॥ , इन्द्रावती। १६३ ॥ " ॥ जैसे बुन्द समुद्र समाई । एकै होइ न तनु बिलगाई ॥ तेसे निपं मरजिया भयाना । हुयको साइ समुद्र समाना राहा नहि ममता के साथा । परा गुलिक बटातेहि हापा ॥ ले उतिरान नाव पर आवा । मरिक मनहु कर जित पावा ॥ पूर्व प्रेम सिन्धु जो कोई मिर्तुं समुद्र न है साई मन अनन्द सो खेवक, खेइ लगायेउ तीर आयेउ कुंअर नगर मों, हुलसे सकल सरीर ॥१८॥ राजा से सुमिरन सुधि गई । मन मे प्रान प्रीतमा भई जाको सुमिरन निसदिन कीन्हा। साई हियेहि बसेरा लीन्हा । मानस भयेठ प्रीतमा ठाक । भूलि गयेउ सुमिरन औ नाऊ ।। आपुहि जब वह मृरत जाना । सपने को मूरत पहिचाना आ यह सकल जगत कहँ पाया। जल दरपन सपने की फाया ॥ चोहि जिउ की काया से,आपुहिं पायेउ छांह। घट बढ पायेउ श्रापमा, नहिं पायेउ तेहिमांह॥१६॥ जगपति आप सोपा सुत लीन्हा । पुनितेहिसापिकुअरफहदीन्हा॥ बोलेन आगमपुर के लोगू । है यह मोती रतनासँागू ॥ इन्द्रायति मन मा हुलसानी । हुलसे कुच फचुकि सफरानी ॥ मुख पर उनि बाढी अधिकाई । गइ पियराइभई ललताई ॥ भयेउ परमदा परमद भेषा गै दुख भै सुख जै मुख देपा ॥ छूटेउ बिरह अवस्था, ससि ते रजनी सार। निसमुख पयेउ दुखद को,भा दिन मुख उँजियार॥२०॥ इन्द्रावति मब सखिन हकारा । बिहसि ससिन से बात निसार महादेव सम देव न दूजा पूजा काज करहु तेहि पूजा ॥ लिये मण्डप सीतल बेरा । घाम तपै कुसुमाकर केरा - १६४ इन्द्रावती । ॥ ॥ ॥ ससिन यात रानी कर माना । फुलवारी मय कीन्ह पयाना ॥ सय मिलि फूल चुनै पर भई । लेकै फूल मॅहप फहँ गई रानी फूल चढाचा, महादेव के सीस पूजा रहा सो कीन्हा, दीन्हा सखीं असीस ॥२१॥ जैस मयफ ईस के माथा । तस रविकन्त रहै ताहि साधा। जस गौरी इस्सर कहँ प्यारी । तस पियप्यारी होसि दुलारी॥ जस सिय सिया जीत काया सम। तप्त जिउ काया तुम औ प्रीतम।। कहै न पीय जाहि बलिहारी । मात पीठ सम पीठ तुम्हारी ॥ कह पाकर साठ जन कहीं । जेवन दे दीप तय नहीं बिछुरन यात न भाषै, रहै तुम्हारे साथ सेंदुर सदा सोहराग को, रहै तुम्हारे माथ ॥२२॥ पूजा महादेव की पूजा । पूजा फाज रहर नहिं दूजा तब इन्द्रावति आनँद माहीं । आई घर बढि रथ उपराहीं ॥ चन्द रहा चन्द्रारि महारा मुफुत मिलेउ कौमुदी पारा ॥ छूटेउ ध्याध व्याह सुनि परा । मन आनन्द हु भा हरा छुटा क्याह परन को गाढा 1 अधिक रूप इन्द्रावति वाढा ॥ उपजेज इन्द्रावती मन, मोद सकल सुखकन्द । उमड़ेउ उर निर्जर नदी, दीन्ह कलोल अनन्द।।२३॥ रहसि रहसि सब सखिय सयानी। आवहि जाहि जहा वह रानी॥ देहि असीस बखान हि सोभा ताहि सोसावन्ती सम को भा ॥ बहुत फलेस सहा तुम प्यारी । अब सुख आयेव राजकुमारी ॥ जापरप्रीत अमृरत केरी । ता ऊपर है विपत पनेरी अत विपत सहि सम्पत पावै । आगसुसद तेहि दरस देखावै ।' बहुत सहा तुम सकट, श्रय नियराना सुक्ख । रहसु पियारी नियरें,आयेउ सुख गा दुःख ॥२४॥ - ॥ ॥

इन्द्रावती। - ॥ । पानो [१८] व्याह खण्ड । धन्य ध्य ह जासे धन प्यारी । हाइ फत सग सेखन हारी होइ साहागिन प्रीतम पायें । पिप ढिग जाडसी निहुरायें। भाजे बहठि सरीर बनाये । पिट रस लेह पीउ रस पावे ॥ निर्मल हाइ हाइ सुकुवारू फूल को करम अहारू ॥ माजे मह पर चिन्त नेवार निन प्रीतम को जाप सवार ॥ सत्त सहित धन जो धरै, प्रीतम को अनुराग । प्रीतम अपने हाथ सो, धन कहं देइ सोहाग ॥१॥ निर्प सयम्बर लगन धरावा । सब काह कह नेवत पठाया ॥ भयेउ अनन्द अगमपुर नगरी । इ मुद चरचा नगरी सगरी ॥ याजै लाग बियाहुत वाजा । जन परजन मन परमद बाजा।। रघा चित्रमा मन्दिर द्वारा । गेउ हान सो मगल चारा सुभ माँडव छायन उपराहा । जामा हाइ मुबर सिर छाहा ॥ ससि यदनी सव कामिनी, गा4 मंगल चार । लीन्ह अनन्द बसेरा, जगपत सदन मझार ॥२॥ इन्द्रावति माजे मेंह भई । घेता मालिन नियरेंगई पूछा हिये लजानिय नाही । कैसे रहिये माजेय माही कहा रहो मन निर्मल की, ।चित प्रीतम प्यारे पर दीहें ॥ मन से दूसर चिन्त नेवारी । पिउ पर ध्यान लगावहु प्यारी॥ निस दिन मन को खेत यनावहु । पिय की प्रीत को बीरी लावहु॥ अलप हारिहु जीयै, सुमिरहु पिय को ना। रहा अकेली रात दिन, प्यारी मांजे ठाउं ॥३॥ भाजे भोन्द्रावति रानी आइ असीसहिंसखिय सयानी। ॥ ।

इन्द्रावती। ॥ देहि अमीस सखी हित प्यासी । रमा निरन्त्र रहै ताहि दासी । है। प्यारी बिलसहु पिय प्यारा। पिय मेरवत है सिर्जन हारा ॥ जा सोग चहा तुम रानी 1 भेंट तेहिक अब आइ तुलानो। व्याहु नसेनी मिलन सदन को । मिलै सिघर अब मिलन राजन को सुख अनन्द सा रानी, बेलसह पिया सजाग। भये कन्त सजोगिनि, आवै कर सुख भोग ॥४॥ सखिन असीस बधन सुनि रानी। कहा पिता घर रहिउभुलानो । खेली कोड में देवस बितायेत । कुछहू प्रोतम मरम न पायेउ । खेलहि बीति गई लरिकाई । बाढेउ दरप होत तरुनाई भूलित खेल सखो के साथा । चढे उ गगुन कर मानिकहाया॥ गुन नहि एक त्रास मेहि हियरें। कैसे हाव कन्त के नियरे है। अजान श्री निर्गुनी, ज्ञान रूप वह पीउ । हाथ छूछ गुन ज्ञान सो,सम्वो सोच महं जीउ ॥५॥ मोहि गुन बुद्ध सखी है नाही । यह नित साधन है। मन माहीं। जेहि गुन बुद्धि हाय मह हाई । तायर प्यार करै सब कोई ॥ रहत न बुद्धि पिये मद हाथा । यातित देोप लाग मन साथा ॥ सत्रु चतुर जो जिउ फर होई । है भल मृढ मित्र से साई गुन से मानुष हात पियारा । गुन कर गाहक है ससारा यिप कह अमिय करत है, ज्ञानी जो कोई। मूरख जन के हाथ सा, अमृत चिप सम होई ॥ भानमती वह ससिप पिपारी । वाली सुनिये राज दुलारी ॥ यह जग बीच अहो रूपवन्ती । पिय जेहि रोझासा गुनयन्ती ।। तुम पर अस रोझा पिय साई । पाहा एक बार एक हाई पै यह उट औ भार तुम्हारी । घरा वियोगयोध तेहि प्यारी । ॥

इन्द्रारती। - . । गुनि मति काँत सहज ओ रुपा। सय तोहि रीफ फन्त गुनभूपा प्रीतम भै का भैहिये, तोहि नित धाउर पीउ । तो लट श्री अधरनों, प्रीतम मन श्री जोउ ॥७॥ रतन जोत पुनि बात निसारा । भयेउ रतन से मम अवतारा। एक सेचि माहि आवत सजनी । ता सेचत है। दिन रजनी। पिय आगुन लावै मोहि रामा । मानुप जन मन तेरो यामा मानय मानुज उदर सा होई । मनुज उदर यिनु मनुज न कोई पितु को परमद अमु जब आवै। मात उदर तब नर भी पाये जनम मोर अस नाहीं, सखी सोच में ले पिय ऐगुन जो लावै, कौन उतर में देखें ॥ना कहा ससी क्छु सोच न कीजे । ध्यान अमूरत ऊपर दीजे तोहि करतार रतन सा कीन्हा। कर मह रतन ज्ञान कर दीन्हा जो करना कह करबे हाई । हो तेहि कहै होइ तब साई विध पुरुष औ बन्ध्या नारी । तासो सुन पायन सत धारी बाज पिता से बालक कीन्हा । अमृत बचन जो मा दीन्हा कीन्ह विमल माटी सों,बहुर बुन्द तेहि कीन्ह । तासों रकत मास करि, हाड फेर जिउ दीन्ह ॥६॥ अलख अमृरत सिजन हारा । मूरत जगत अलेख सवारा तेहि छाजत मिजै जस चाहै । दोक जग आपुहि करता है जनक जननि बिन सिर्जे पारै । जातें चाहे जनम सँवार आद पिता के पिता न माता । ऐमें सिओ दाता प्रीतम ताहि गुन ऐसे लाभा । लखै न ऐगुन देरी सेवा मित्र मित्र को ऐगुन, पहिचानत गुनमान तेरो सकल अवस्था, गुन बूझै पिय प्रान ॥१०॥ वह जिन इद्रायती। दायावन्त है फन्त तुम्हारा 1 है अपराध छिपावन हारा जो गुनधन्त अहै जग माहीं । सेो ऐगुन हेरत है नाही जेहि गुन से गाहक गुन फेरा । लेहि ऐगुन से ऐगुन हेरा आपुहि योच जो ऐगुन पावा । सेो न कहा अपराध परावा जे अपराध छिपावइ कहा । जोग धमन ताकेतन रहा जो मुख पर ऐगुन कहै, महा मित्र है सोइ । ताको मित्र न जानिये, ऐगुन रासै गाइ ॥१२॥ राज कुवर जय मातिय पावा । सात सखा कह नेवत पठावा ।। मिर्तक रहे जी उन पाये । धाये सकल अगमपुर आये ॥ सात मिन राजा कह भेंटा । दरसन विठुरन सबाट मेटा ॥ राजा के कालिञ्जर टाऊ । मित्रपराक्ला प्रेम तेहिनाक॥ रहा बहुत दिन सो परदेसा । आये नगर धनी हाइ भेसा ।। देखि सून कालिंजर, मरम कुंवर को पाह रहिन सकाराजा बिनु,लोन्ह जोगचित लाइ ॥१२॥ मुनि के राज कुंर को आगू । भा जागी त्यागा सुख भोग ॥ प्रेम के साथ लगै सैसगी । रावल भेस लिहें मारगी पारगम सचर गरोन पाऊ । आगमपुर के भयेन बदास सीस जटा धरि सप्पर हाथा । आये मिले राज के साधा अटेन प्रेम राय कर राजा ।भा मन मुदित माद उपराजा॥ भयेउ जोग को राजा, राजा वह गन माह । जगपत दाया दुर्म को सव सिर पायेउ छांह ॥१३॥ सीतल छाहा पावइ साई जो तप कि जगत मह हाई॥ जेहि मन करता की हर भारी । तेहि नित लागे दुइ फुलवारी॥ दोक प्रोच दुइ झरना यहा । सय फल फले दो मह रहई। । । 1 ॥ । इन्द्रावती। औ सूपर नारी तेहि ठाई । यनी रतन मोती की नाई दूसर फल भल को है नाहीं Iसल कामठ फल दो जग माहीं॥ जो पावै करता दिस, एक भलाई साथ चोही भलाई के सम, दस श्रावै तेहि हाय ॥१४॥ कुधर पास कोपा चलि आयेठ । जगपति दुरुल समेत पठाये। आइ कुवर सग झोपायोला ।कीपा रस भैसापित वाला ॥ अहो लला जत साधेठ जोगू । तत अब मानहु परमद भोगू ॥ धरू सारगी गहु क्रीपानू । उहित भयेउ मनोरथ भानू ॥ कन्या काढहु पहिरहु धागा । जोग मुकुट धरी बाघ पागा ॥ काढहु माला जोग को, पहिरहु मानिक हार। दैव दिष्ट सनमुख भयेउ, होहु तुरंग सवार ॥१॥ । चकचूहत मन मे उपराजा माला गनि सुमिरेउ वह नाऊ । काढत छोह भयेउ तेहि ठाऊ ॥ जोग चिन्ह वह कन्या पाया । फढ़त उपेजेज करुना माया फीपा यूमि कहा हे। राजा जोग न पूजैन न जोगू जोग लेहू अब भागू जल में दूरद आप गा, मारै माद तरंग दुख को बासर पीतेऊ, अब सुग्व दिन को रंग ॥१६॥ दुकुल अहे मानुप की सेना । धीर बाज सभाधर को भा ॥ बिनु गुन काया अम्बर घालें ।काठ कि खरग अहै परयालें ॥ तप औ जाग के आहसि चेरा। करू पवित्र अम्बर तन केरा ।। घस्तर लेहु भाग के जागू । जोग जोग अब है गल भोगू ॥ सुमिरन पूजा है तब ताइ । जब लग नहि निश्चै मन ठाई। है सब बस्तर मनिमय, मनमो करहु अनन्द । पहिरहु लखि कै साभा, लाजै रवि श्री चन्द ॥१७॥ कादतमाला कन्या राजा । ॥ ।नन कन्था मन माला छाजा ॥ । पूगा --- २२ ॥ 1 ॥ इन्द्रावती। सखि एक हेड सचेत पुकारा । धरती उवा मुरुज उजियारा । एफ कहा मानुप नहि हाई । यह मुर भेस पर है कोई एक कहा रजनीपति आही । मेहर अवहिन का ताही ॥ एक कहा यह साता धारी । जगत कलेवर शिउ है प्यारी ।। जेहि जस रहेउ दिष्ट औ ज्ञानू । तैसा देखा कीन्ह बखानु कुंवर सनेह सकल मन,उपजेउरूप विलोकि। लोचन चितवन मगुसे, एक न पारै रोकि ॥२॥ सखिन बचन सुनि के वह रानी। समुझा आगम सोच समानी ।। कहा सखिन सा प्रीतम प्यारा । है मोहि सग लगावन हारा ।। भय बियाह गवन पुनि हाई । नइहर के बिछु हैं सब कोई ॥ परदेसी की लालप अहई । कहा एक थल पर थिर रहई । परदेसी है कन्त हमारा । देस चलै को रायै पारा रहनो अन्त न होइहै, नहर देस मझार परदेसी है सहचरी, लोना पीड हमार ॥२६॥ कहेन साध रानी केहि लागे । यह दिन है हम सब के आगे ॥ हम रोये जनमत सनसारा । जनम देम कित रहन हमारा॥ नइहर नगर अन्त नहि रहना । सीखु सोइ जेहि सासुर लहना। जनम निबाह भलो पिय पासा। बिनु पीतम न लहै कविलासा। मिले नरफ जो दरसन पीको । नरक भलो बैकुठ न नीको ॥ मिलै तहां से प्यारी, नइहर देस पियार जेहि श्रस्थान बसेरा, चाहै पीज तोहार जय बनवास राम कहूँ येऊ । सीता सती गोहेन मह गयेऊ । सदन नरक भा पिय बछुराते । वन वैकुठ भयेद तेहि जाते ॥ विय बिनु फीका सुखरग जीका। पिय गोहन मीका सुख तीका ॥ - - इन्द्रावती। १७३ । जो प्रीतम संग प्रीन लगाया । सो दोउ जगत बीच सुरा पावा।। अज्ञा माथे ऊपर लीन्हा । पिय कर अज्ञा भेट न कोन्हा॥ पीउ जहा है सुख तहां, जहां न प्रीतम होइ । तहां सुखद को दरसना, कहा क्लिाकै कोइ ॥२८॥ धीि बरात द्वार जब आयेठ । अमल ठाउ बाटै कह पायेठ॥ घइठेउ कुवर पाट उपराहा । ऊपर मीतल साखी छाहा सुर नर देखि आसिया देहीं । निर3 रूप रहसि फल लेहीं । जे तो मुख तजि साधा जागू । वे तो अलख दिहा सुख भोग। थोरे दिन का कुवर सलाना । लाना अम्बुक कीन्हे व टोना ।। रूपवन्त राजा कुंवर, सकल बरातिन महि । सुन्दरता पति होइ रहा, मान पाट उपरांह ॥२६॥ जेवन बने सहस परकारा । जे नित भा निर्प हकारा ॥ घठे लोग आह सब तहा । दीन्ह ठउर जेवै नित जहा ॥ भोजन केतो सुन्दर हाई । उदर भरे पर खाय न कोई ॥ त्रिपा छुधा पर अचवै साई । तत्र जल जेवन कर भलाई ॥ छुधावन्त कह देहु अहारा । देह नाक फल सिरजन हारा ॥ कहत न पारै रसना, सर पक्रयान बखान से सवाद एक कवर मों, मिलै खात पकवान ॥३०॥ वराबरी सो करइन पारा । घराबरी सूरज ससि तारा जत जग बीच भले पकवानू । रहे सकल कित करउ बखानू ॥ बरनत रसना लोनी हाई । जाने से अच्छे जो कोई बिनै किहेन राजा के लागू । हे पकवान न तुम सब जागू ॥ जो पवित्र भोजन करतारा । दीन्ह तुम्हें से करहु अहारा । जेवै लागे जेवनहिं, ले दाता को नाउं एक कवर में पावै, सै सवाद तेहि ठा ॥३१॥ ॥ . - २७३ इन्द्रावती। भाअता जनाजायाजा माडी के तर कुवर पहा - ॥ - । राजित चला बिया है राजा ॥ तूर दमामा बाजै लागे । अम्बर गये सबद सुर जागे ॥ १ रहा गगन लग माडी जवा हरि गीत नारी सब गावै । घर घर से सब देखै आवै ॥ पर त्रिय दिष्ट परत अल नाहीं। तैप पर पूलप उपराही रहा उदित होड रूप से, दूलह भान समान । वोहि समै मांडौ तर, आयेउ चन्द्र छिपान ॥३२॥ उश्नरमम कह देसत नियरें । रहमा नीरज अपने हियरें ॥ लाज मयक देखि सकुवाना । परगट हाइ नाहि विकसाना॥ तन तन से ता रहा वियोगू । मन मन से तो रहा सजागू दुइ मन प्रीत रीत सा जाने 1 अपने नेह जे मन मे आने ॥ रवि दूलह मुख परगट कीन्हा । ससि दुलहिन मुख पर पद लीन्हा पढेन वेद वामन सब, बर कन्या के ना ररेउ पर्न नैरित्त जो, भयेउ सफल तेहि ठाउँ॥३३॥ मा विवाह कन्या घर माथा । आयेव सुस को मानिक हाथ भयेउ कुघर जगपत को प्यारा । सब काटू मिलि आ जाहारा दाया से आगमपुर ईमू । डारा छाह कुवर के सीसू जैसे राम त्याग तप कोन्हा । वैसे अठस भोग सुख दीन्हा।। पायेउ यहुत दास आ दासी । सेवक नये अगमपुर यासी ॥ भयेउ नगर वासी कर, कुंवर मान को प्रान । सरतें जोरेज मित्रता, कुवर सनेह निधान ॥३४॥ रहिन सखी मुन्दर मुह ताई । इन्द्रावति के निपरे आई सकल सपो मिलि दीम्ह ममीसा प्रीतम छाह रहे ताहि सीसा ।। ६ Cr बियाह मो हाई ताहि लास रपित सय काई । ॥ - ॥

इन्द्रावती। , जुग जुग रहै सोहाग तुम्हारा । चाहे तुप्त कह कन्त पियारा ॥ तोहि गुन पर रीमा रहई । कोमल यात प्रीत की कहई ॥ सदा रहै ताहि बस महं, करता के परताप तोहिंपिय को सुमिरन रहै,पियहिं तुम्हारो जाप॥३५॥ अधरन मो मुसुकानी रानी । हाइ अभिमानी बोली बानी॥ है मोहि रूप बिमल उजियारा । यस मह रहै से प्रीतम प्यारा ॥ ऐगुन भये न रुटै देक । तनु मुसुकाय हाथ के लेक ॥ अमन होइ करत असमानू । प्रीतम देव हाथ मह प्रानू ॥ पाहन समा कठार जो हाई । फरउ सिगार होइ जल साई ॥ अब किछु चिन्ता है नहीं,प्रोतम भामोहि हाया अंमन कबहु न होइहै, नित रहि है मोहि साथ॥३६॥ सरियन अगुरी दानन दाया । प्यारी गरब न हम कह भावा । मैं न भली मैं भल जो भाया । तेहि करतार अगिन सीस जो ऊपर फरई । देसहु उनत नीच हेाइ परई ॥ भाटिय सीस नीच फै परई । तथाहि अनेक लाभ से भरई ॥ नयन आप कह देखत नाही । सूझि परातेहि सब जग माही। सोडूया जो भापा, मै जग सिर्जनहार पार भयेउ जेइ जाना, है एकै करतार ॥३॥ प्रीतम आपन नाहिय प्यारी । अहै समुद्र लहर से भारी ॥ सेवा चढे ना कोई । पार भमुद्र से उतरै साई माय घढन मुमिरे एका नाऊ । कहै उतारहु मोहि सुभ ठाक॥ फरता आयसु घोहित पायेउ । तमहि समुद्र के ऊपर धायेक ॥ पिप सेा गरय न कह फोजे । आये सुमार्थे ऊपर लीजे गरय बात तुमत पोलिउ, करता करैन कोप। फिर प्यारी अभिमान सो,ऐगुन होइ न लोप॥३॥ रासा ॥ नाघ ॥ ।

इन्द्रावती। ~ ॥ के घट फाज फिरा जो कोई मनु घट काज न कीन्हा सोई॥ सुला दुयारा है तय ताई । रविन औपच्छिम जय ताई। आवही फिरू माने करतारा । जब लगोल फिर को द्वारा ॥ हम मद पियव तियागा पारी। पै तुम्हरी अँखिया मनवारी ॥ हम कह खीच मुरादिम आनें । त्राहि फहैं हम नैन न मानें इन्द्रावति समुझा पचन, धरती लायेउ भाल। तुम करतार जगत के, दाता दीयनदयाल ॥३६॥ ए पारी सुमिरत है। ताही । दरसन वेग देखावहु माहीं धन आनन्द राज सुख आही । एकै दाया दरमन पाहो बहुत वियोग मुरा मैं पीया । सजोगी मद वाहत हीया सजागी प्याला अघ दीजे । अधर सुधा सतवाला कोजे ॥ आज हार आयन मा देक । होइनिसक अगभरि लेक ॥ मोहिं संजोगसलील को, है प्रीतमा पियास । अनुकम्पा के दीजे, प्रजै मन की आस ॥४०॥ सपूरन आधी कथा मानहु ज्ञान सिधु मै मथा तीन सहस चौपाइय भई । देखु आइ फुलवारिय नई पुनि आगें जो सुख से रहऊ । तोन सहप्त चौपाइय फहक ॥ है। अवही धोरे दिन केरा । बात बहुत दिन कर मैं हेरा ॥ विद्या ज्ञान बहुत जेहि होई । अर्थ छिपाने बूझ सोई नूर महम्मद यह कथा, जेहि मन होई प्रेमरस, पढे सोइ दिन रात ॥४१॥ ॥ - अहै प्रेम की बात पहिला भाग समाप्त ॥

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Indravati [ Part - I ]

Author
Shyam Sundar Das
Title
Indravati [ Part - I ]
File name
Indravati [ Part - I ]
Text
OCR done
Citation
1906
Published
2011/03
Publisher
The Lahari Press Benares
Language
Sanskrit
Pages
182
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551339
Barcode
4990010032090.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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