Bharatiya Gyanpeeth

श्री जिनेन्द्र पूजन

Shaastrii Padmachandr · 2006/03/14

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श्री जिनेन्द्र
पूजन
卐
परस्परोफाहो जीवानाम
ला० रघुवीरसिंह जैन धर्मार्थ ट्रस्ट
(जैना वाच कम्पनी)
७/३२ दरियागंज, नई दिल्ली-११०००२

भगवान बाहुबली को प्रवणबेलगोला में १० मीटर (५७
फीट) उंची खगासन प्रतिमा के १०००वें प्रतिष्ठापना
वर्ष के अवसर पर पाठकों को सादर भेट
संकलन : मुभाष
जन
मुल्य : पूजन में निन्य प्रयोग
प्रथम मंम्करण : १९८१
मुद्रक : भारती प्रिटर्म. दिल्ली-११००२
Shri Jinondra Poojan
Edition 1931
Price Daily Poojan
Publisher: Lala Raghubir Singh Jain Dharmarth Trust
(Jaina Watch Co..) 7 32 Darya Ganj, New Delhi-110002

दो शब्द
और भाव-पूजा
परम पुरपार्थ-मोक्ष में कारणभून एकमात्र वीनगगभाव है
और उम बीनगगभाव की उपलब्धि वीनगग की उपासना
में ही माध्य है। इसलिए श्रावक की भूमिका मे लेकर मुनिदशा
पयंन्त वीनगग की पूजा का विधान किया गया है। ये पूजा
द्रव्य-पूजा
के भेद मे दो प्रकार की है। जहां
मुनिदशा में मात्र भावपूजा का विधान है वहां श्रावक के
द्रव्य और भाव दोनों प्रकार की पूजा उपयोगी है। इस पूजा
के
माहात्म्य मे मेंढक जैमा तुच्छ जीव भी अपना कल्याण कर
गया। कहा भी है-'जगत में जिनपूजा मुखदाई।'
श्रावक का कनंव्य है कि वह प्रान: दैनिक कृत्यों मे निवृत्त
होकर म्नान करके, शुद्ध वस्त्र पहिन, श्री जिनमंदिर में जाए
और जल चंदनादि अप्ट द्रव्यों से जिनेंद्र भगवान की पूजा कर
निज भावों को पवित्र बनाए। ऐमा करने में पाप की हानि नो
होनी ही है. माथ ही पुण्य का मंचय भी होता है। पूजा का
निरंतर अभ्याम होने में क्रमश: भावों की शुद्धि में महायता
मिलती है और परम्पग्या जीव निःश्रयम मुख का अधिकारी
बनता है।
जिनशामन में मूर्ति की पूजा का विधान नहीं है अपितु

४ मूर्ति के द्वारा मूर्तिमान की पूजा का विधान है। प्रकारांतर से यह जीव अहंत की पूजा के बहाने अपने गुणों का ही स्मरण करता है वह 'नम: समयसाराय' का ही अनुकरण करता है। आचार्यों ने श्रावक की निचली दशा में लेकर मुनि की उच्चदशा पर्यत इस पूजा का विधान किया है। कहीं द्रव्यपूजा की प्रमुखता है तो कहीं भावपूजा की। अत: हमारा कर्तव्य है कि पूजा से लाभ उठाएं। इस दिशा में श्रीमान स्व० ला० रघुवीरसिंह जैन के सुपुत्रों श्री प्रेमचंद जैन, श्री कैलाशचंद जैन व श्री शान्तिस्वरूप जैन 'जैना टाइम इण्डस्ट्रीज' दिल्ली ने एक और प्रयत्न किया है । वे स्वयं तो इस मार्ग में लगे ही हैं-जनसाधारण के लाभ का भी उन्हें सहज ध्यान है । वे सदा ही धार्मिक भावनाओं को मूर्तरूप देने में सावधान रहते हैं। फलन: यह पूजा-पुप्प भी उन्हीं के धार्मिक भावों का मूर्त-रूप है । आशा है यह पुष्प भव्य-जीवों के मागं में सहायक होगा और सभी जन इससे लाभ उठाएंगे। पद्मचंद्र शास्त्री एम०ए० वीरसेवा मंदिर, दिल्ली प्रकाशकीय-निवेदन नुम निरखत मुझको मिली मेरी संपति आज । कह चक्री की संपदा कहां स्वर्ग साम्राज्य ॥ तुम वंदन जिन देव जी नवनित मंगल होय । विघन कोटि नक्षण टलं लहैं मुगनि सबलोय ।। मद-गृहस्थ का कर्तव्य है कि वह प्रान: शय्या त्यागकर णमोकार मंत्र का मंगलपाट पढे और दैनिक कृत्य स्नानादि करके गुद्ध वस्त्र धारण कर थी जिनमंदिर में जाकर जिनेंद्र- पूजन कर आत्मानुभूति का अभ्याम कर आनंदित हो। जिम प्रकार भीषण गर्मी के आनप में वसित पथिक मागं को मघन-शीतल-हग्नि और जल-प्रपात युक्न पुष्पवाटिका की शीतल मंद वायु मे आनंदिन हो उठना है-उसकी थकान दूर हो जाती है, उसी प्रकार मांमारिक जन्ममरण और गाह- स्थिक झंझटों में फंसा प्राणी जिनंद्र पूजा का लाभ प्राप्तकर -वीतराग मुद्रा के आधार पर अपूर्व आन्मिक शांनि प्राप्त करता है-वह आत्मानुभूति के मुख में झूम उठना है। थावक के दैनिक पट्कृत्यों में देवपूजा का प्रथम स्थान है और यह भारत के सभी प्रान्नों, नगरों और ग्रामों में अबाध- रूप में प्रचलित है। पूजा के पठन-पाठन की मुविधा को दृष्टि

६
में रखते हुए यह पृजा-पुप्प हमारे पूज्य पिताश्री ला० रघुबीर
सिह जैन के धर्मार्थ ट्रस्ट की ओर से प्रस्तुत है। आशा है यह
भव्यजीवों के कल्याण मार्ग में निमित्त-भून और हितकर होगी
एवं भव्यबधु इममे लाभ लंगे।
पुस्तक में नवीन कुछ नहीं है-पूर्व कवियों की रचनाओं का
गंकलनमात्र है। इसके संकलन तथा प्रकाशन व्यवस्था में जिन
बंधुओं ने सहयोग दिया है हम उनके प्रति अत्यंत आभारी
हैं।
७.३०ग्यागंज, नई दिल्ली
प्रेमचंद जैन, कैलाशचंद जैन
शांतिस्वरूप जैन
बी. नि. म. २५.

अनुक्रमणिका
मगन्नाष्टकम्
महावीगाष्टकम्नांत्रम्
সনামলাম
श्री पाश्र्वनाथानीय
विपापहाररतीय
श्री गोम्मटेशमग्नवन
श्री दोलन गमजी कृतम्तृति
दर्शन-पाठ
दर्शन-पाठ (मम्कन)
अभिपंक पाट
विनय पाठ
म्तृति (भूधग्दामजी)
नित्य नियम पूजा
ग्वाम्न-मगलम
देव-शास्त्र-गृह-पृजा (द्याननगयजी)
देव-गास्त्र-गुरुभाषापूजा (जुगलकिशोर)
५१
६५
30
बीम नीर्थकर पूजा
देवशास्त्र गुरु-विद्यमान बीम तीर्थकर और मिद्ध पूजा
कृत्रिमाकृत्रिम-जिनचत्यपूजा

मिद पूजा ११३ ममुच्चय चौबीमी पूजा श्री आदिनाथ जिन पूजा श्री चंद्रप्रभ जिन पूजा श्री शांतिनाथ जिन पूजा श्री पाण्वनाथ जिन पूजा ( (वखनावरजी) श्रीवर्धमान जिन पूजा श्री गोम्मटेश्वर पूजा मरम्बनी पूजा मानहकारण पूजा पचमा पूजा नन्दीश्वर द्वीप पूजा दणलक्षण धर्म पूजा अग पूजा १२८ १३३ १४६ १४८ ग्वयम्भ ग्नांत्र १५६ निर्वाण क्षेत्र अध्यं शान्लि पाट (भाषा) शान्ति पाठ (मग्कृत) इष्ट प्रार्थना पंच परमेष्ठी की आग्नी भागचंद्र कृत भजन १५७ १५८ १५६ श्री तीर्थकर महावीर स्वामी

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मंगलाष्टकम् । - साधवः। श्रीमन्नम्रसुरा-सुरेन्द्र-मुकुट-प्रद्योतरत्न-प्रभा- भास्वत्पादनखेन्दवः प्रवचनाम्भोधीन्दवः स्थायिनः । ये सर्वे जिनसिद्धसूर्यनुगतास्ते पाठकाः स्तुत्या योगिजनश्च पञ्चगुरवः कुर्वन्तु ते मङ्गलम् ॥१॥ नाभेयादिजिनाः प्रशस्तवदना:, ख्याताश्चतुर्विशतिः । श्रीमन्तो भरतेश्वरप्रभृतयो, ये चक्रिणो द्वादश ।। ये विष्णुप्रतिविष्णु-लाङ्गल धरा, सप्तोत्तरा विशतिः । त्रैलोक्ये प्रथिनास्त्रिपण्ठिपुरुषाः कुर्वन्तु ते मङ्गलम् ॥२॥ ये पञ्चौपधिऋद्धयः श्रुततपो-वृद्धिंगता पञ्च ये। ये चाष्टाङ्गमहानिमित्तकुशलाश्चाप्टौ विधाश्चारिणः ।। पञ्चज्ञानधराश्चयेपि विपुला, ये बुद्धि-ऋद्धीश्वराः । मप्नते सकलाचिंता मुनिवराः कुर्वन्तु ते मङ्गलम् ॥३॥ ज्योतिर्व्यनर-भावनामर-गृहे, मेरी कुलाद्री स्थिताः । जम्बूशाल्मलिचत्यशाविपु नथा, वक्षार-रूप्याद्रिपु॥ इक्ष्वाकारगिरी च कुण्डलनगे, द्वीपे च नन्दीश्वरे । शैले ये मनुजोत्तरे जिनगृहाः कुर्वन्तु ते मङ्गलम् ।।४।। .

बहु व महे। कैलाणो वृपभम्य निनि-मही, वीरम्य पावापुरी। चम्पा या वामृज्यमग्जिनपते: मम्मेदशैलोईनाम् ।। पाणामपि चीजयन्नशिखरी नेमीश्वरम्याहनः । निर्वाणा-वनवः प्रमिद्धविभवाः, कुर्वन्नु ने मङ्गलम् ।।५।। मर्पो हारलना भवमिलना, मन्पुप्पदामायते । मम्पयन ग्गायन विपपि, प्रीति विधने रिपुः ।। देवा यान्ति वशं प्रमन्नमनमः, किवा धर्मादव नभोऽपि वपन नगं, कुवंन्तु ते मङ्गलम् ॥६॥ यो गभावनगन्मवे भगवतां, जन्माभिपकोत्सव यो जान: परिनामेण विभवी, य: केवलज्ञानभाक् ।। य: कंवन्यपुरप्रवेशमहिमा, मम्पादिनः स्वगिभिः । कल्याणानि च नानि पञ्च मनतं, कुर्वन्तु ते मङ्गलम् ।।७।। आकाशं मन्यभावा-दघकृलदहना-दग्निकर्वी क्षमाप्ना । नं: मंगादायुराप:-प्रगृणशमनया,म्वात्मनिप्ठः मुयज्वा ।। मोमः मौम्यन्वयोगा-द्रविरिनि च विदु-म्तेजमः मन्निधानाद् । विश्वात्मा विश्वचक्षु-विनग्न भवनां, मंगलं श्रीजिनेश: ।। इत्थं श्री जिनमंगलाष्टकमिदं, मोभाग्य-सम्पत्करं । कल्याणपु महोत्सवेषु मुधियस्नीथंङ्कराणां मुखाः ।। ये शृण्वन्ति पठन्ति नैश्च मुजनः, धर्मार्थकामान्विताः । लक्ष्मीलंभ्यत व मानवहिता, निर्वाणलक्ष्मीरपि |||| ।। इति मंगलाप्टकम् ।।

महावीराष्टक स्तोत्रम्
[कविवर भागचन्द]
शिखरणी
यदीये चैतन्ये मुकुर इव भावाश्चिदचितः
समं भान्ति प्रौव्य-व्यय-जनि-लमन्तोऽन्तरहिताः ।
जगत्साक्षी मार्ग-प्रकटन-परो भानुरिव यो
महावीर स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥१॥
अताम्र
यच्चक्षुः कमल-युगलं स्पन्द-रहितं
जनाकोपापायं प्रकटयति वाभ्यन्तरमपि ।
स्फुटं मूर्तिर्यस्य प्रशमितमयी वानिविमला
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु
नमन्नाकेन्द्राली-मुकुट-मणि-भा-जाल-जटिलं
लसत्पादाम्भोज-यमिह यदीयं ननुभृताम् ।
भवज्ज्वाला-शान्य प्रभवनि जलं वा स्मृनिमपि
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥३॥
यदर्चाभावेन प्रमुदित-मना दर्दुर इह
क्षणादासीत्स्वर्गी गुण-गण-समद्धः मुख-निधिः ।
म ॥२॥

- लभन्ते सदभक्नाः शिव-सुख-समाजं किमु तदा महावीर स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥४॥ कनत्स्वर्णाभासोप्यपगत तनुर्ज्ञान - निवहो विचित्रात्माप्येको नृपति-वर-सिद्धार्थ-तनयः । अजन्मापि श्रीमान् विगत-भव-रागोद्भुत-गति: महावीर-म्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥५॥ यदीया वाग्गङ्गा विविध-नय-कल्लोल-विमला बृहज्जानाम्भोभिर्जगति जनतां या स्नपयति । इदानीमप्येपा बुध-जन-मरालः परिचिता महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥६॥ अनिर्वारोद्रकस्त्रिभुवन - जयी काम सुभट: कुमारावस्थायामपि निज-बलाद्येन विजितः स्फुरन्नित्यानन्द-प्रशम-पद-राज्याय स जिनः महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥७॥ महामोहातङ्क - प्रशमन - पराकस्मिक - भिषक् निरोपेक्षो बन्धुर्विदित-महिमा मङ्गलकरः । साधूनां भव-भयभृतामुत्तमगुणो महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥८॥ महावीराप्टकं स्तोत्रं भक्त्या 'भागेन्दु' ना कृतम् । य: पठेच्छणुयाच्चापि स याति परमां गतिम् ।।६।। - शरण्यः भक्तामर स्तोत्रम् [श्रीमानतुंगाचार्य] भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा- मुद्योतकं दलित-पाप-तमो - वितानम् । सम्यक्प्रणम्य जिन-पाद-युगं युगादा- वालम्बनं भव-जले पततां जनानाम् ।।१॥ यः संस्तुतः सकल-वाङ्मय-तत्त्व-बोधा- दुद्भूत-बुद्धि-पटुभि: सुर-लोक-नाथैः । स्तोत्रर्जगत्त्रितय - चित्त - हरेरुदारैः स्तोप्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम् ॥२॥ बुद्धया विनापि विबुधाचित-पाद-पीट स्तोतुं समुद्यत-मतिविगत-त्रपोन्हम् । बालं विहाय जल-मंस्थितमिन्दु-बिम्ब- मन्य: क इच्छति जनः सहमा ग्रहीनुम् ॥३॥ वक्तुं गुणान्गुण-समुद्र शशाङ्क-कान्तान् कस्ते क्षमः सुर-गुरु-प्रतिमोऽपि बुद्धया । कल्पान्त-काल - पवनोदत चक्रं को वा तरीतुमलमम्बु निधि भुजाभ्याम् ।।४।। सोन्हं तथापि तव भक्ति-वशान्मुनीश कर्तुं स्तवं विगत-शक्तिरपि प्रवृत्तः । नत्र तच्चारुचाम्र प्रीन्यात्म-वीर्यमविचार्य मृगो मृगेन्द्र नाभ्येति कि निज-शिशो: परिपालनार्थम् ॥५॥ अल्प-श्रुतं श्रनवतां परिहास-धाम त्वद्भक्तिरेव मुखरीकुरुते वलान्माम् । यत्कोकिल: किल मधौ मधुरं विरोति कलिका-निकरक-हेतु ॥६॥ न्वन्मम्तवन भव-सन्तति-सन्निवद्ध पापं क्षणाक्षयमुपैति शरीरभाजाम् । आक्रान्त - लोकमलि - नीलमशेषमाशु मूर्याण-भिन्नमिव शार्वरमन्धकारम् ।।७।। मत्त्वेति नाथ नव संस्तवनं मयेद- मारभ्यते तनु-धियापि तव प्रभावात् । चनो हरिप्यति सतां नलिनी-दलेषु मुक्ता-फलद्युतिमुपैति ननूद-बिन्दुः ।।८।। आस्तां तव स्तवनमस्त-समस्त दोपं त्वत्सङ्कथापि जगतां दुरितानि हन्ति । दूरे सहस्रकिरण: कुरुते प्रभव पद्माकरेषु जलजानि विकासभाजि ।।६।। नात्यद्भ.तं भुवन-भूपण भूत-नाथ भूतैर्गुणभुवि भवन्तमभिष्टुवन्तः । तुल्या भवन्ति भवतो ननु तेन कि वा भूत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति ॥१०॥ दृष्ट्वाभवन्तमनिमेप विलोकनीयं नान्यत्र तोषमुपयाति जनस्य चक्षः । पीत्वा पयः शशिकर-द्युति-दुग्ध-सिन्धोः क्षारं जलं जल-निधेरसिंतु क इच्छेत् ॥११॥ यः शान्त-राग-रुचिभिः परमाणुभिस्त्वं निर्मापितस्त्रिभुवनैक - ललाम भूत। तावन्त एव खलु ते प्यणवः पृथिव्यां यत्ते समानमपरं न हि रूपमस्ति ॥१२॥ ववत्रं क्व ते सुर-नरोरग-नेत्र-हारि निःशेप-निजित-जगत्त्रितयोपमानम् । बिम्बं कलङ्क-मलिनं क्व निशाकरम्य यहासरे भवति पाण्डु पलाश-कल्पम् ।।१३।। संपूर्ण-मंडल-शशाङ्क - कला - कलाप- शुभ्रा गुणास्त्रिभुवनं तव लङ्घयन्ति । ये संश्रितास्त्रिजगदीश्वर-नाथमेकं कस्तान्निवारयति संचरतो यथेप्टम् ।।१४।। चित्रं किमत्र यदि ते विदशाङ्गनाभि- नीतं मनागपि मनो न विकार-मार्गम् । कल्पान्त-काल-मरुता चलिताचलेन कि मन्दरादि-शिखरं चलितं कदाचिन् ।।१५।।

निर्धूम-वतिरपवजित-तैल-पूर कृत्स्नं जगत्त्रयमिदं प्रकटीकरोषि । गम्यो न जातु मरुतां चलिताचलानां दोपो परस्त्वमसि नाथ जगत्प्रकाशः ॥१६॥ नास्तं कदाचिदुपयासि न राहु-गम्यः स्पष्टीकरोषि सहसा युगपज्जगन्ति । नाम्भोधरोदर-निरुद्ध-महा-प्रभाव: सूर्यातिशायि-महिमासि मुनीन्द्र लोके ॥१७॥ नित्योदय दलित-मोह-महान्धकारं गम्यं न राहु-वदनस्य न वारिदानाम् । विभ्राजते तव मुखाब्जमनल्पकान्ति- विद्योतयज्जगदपूर्व-शशांक-बिम्बम् ॥१८॥ कि शर्वरीषु शशिनाह्नि बिवस्वता वा युष्मन्मुखेन्दु-दलितेषु तमः सु नाथ । निष्पन्न-शालि-वन-शालिनि जीव-लोके कार्य कियज्जलधरर्जल-भार-नम्रः ॥१६॥ ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं नवं तथा हरि-हरादिषु नायकेषु । तेजःस्फुरन्मणिषु याति यथा महत्त्वं नवं तु काच-शकले किरणाकुलेपि ॥२०॥ मन्ये वरं हरि-हरादय एव दृष्टा दृष्टेषु येषु हृदय त्वयि तोषमेति । किं वीक्षितेन भवता भुवि येन नान्यः कश्चिन्मनो हरति नाथ भवान्तरेऽपि ॥२१॥ स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान् नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रमूता । सर्वा दिशो दधति भानि सहस्र-रश्मि प्राच्येव दिग्जनयति स्फुरदशुजालम् ।।२२।। स्वामामनन्ति मुनयः परम पुमांस- मादित्य-वर्णममलं तमसः परस्तात् । त्वामेव सभ्यगुपलभ्य जयन्ति मृत्यु नान्यः शिवः शिव-पदस्य मुनीन्द्र पन्थाः ।।२३।। स्वामव्ययं विभुमचिन्त्यमसख्यमाद्यं ब्रह्माणमीश्वरमनन्तमनङ्गतम् योगीश्वर विदित-योगमनेकमेक जान-स्वरूपममल प्रवदन्ति बुद्धस्त्वमेव विबुधाचित-बुद्धि-बोधात् त्वं शंकरोसि भुवन-वय-शकरत्वात् । धातासि धोर शिव-मार्ग- विविधानाद् व्यक्तं त्वमेव भगवन्पुरुपोत्तमामि ॥२५॥ नुभ्यं नमस्त्रिभुवनातिहराय तुभ्यं नमः क्षिति-तलामल-भूपणाय । मन्तः ।।२८॥ नाथ नुभ्यं नमस्त्रिजगतः परमेश्वराय तुभ्यं नमो जिन भवोदधि-शोषणाय ।।६।। को विस्मयोत्र यदि नाम गुणरशेष- स्त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश । दोपंम्पातविविधाश्रय-जात-गः स्वप्नान्तरे पि न कदाचिदपीक्षितोसि ।।२७।। उच्चरशोक-तरु-संश्रितमुन्मयूख- माभाति म्पममल भवतो नितान्तम् । स्पष्टोल्लसत्किरणमस्त-तमो-वितानं बिम्बं रवेरिव पयोधर-पार्वति ॥२८॥ सिंहासने मणि-मयूख-शिखा-विचित्रे विभ्राजते तव वपुः कनकावदातम् । विम्बं वियद्विलसदंशुलता-वितानं तुङ्गोदयाद्रिशिरसीव सहस्र-रश्मेः ॥२६॥ कुन्दावदात-चल-चामर-चारु-शोभं विभ्राजते तव वपुः कलधौत-कान्तम् । उद्यच्छशाङ्क-शुचि-निर्भर-वारि-धार- मुच्चस्तटं सुरगिरेरिव शातकौम्भम् ॥३०॥ छत्र-त्रयं तव विभाति शशाङ्क-कान्त- मुच्चैः स्थितं स्थगित-भानु-कर-प्रतापम् । मुक्ता-फल-प्रकर-जाल-विवृद्ध-शोभं

प्रख्यापयत्त्रिजगतः
परमेश्वरत्वम् ॥३१॥
गम्भीर-तार-रव-पूरित-दिग्विभाग-
स्त्रलोक्य-लोक-शुभ-सङ्गम-भूति-दक्षः ।
सद्धर्मराज-जय-घोषण-घोपक:
सन्
खे दुन्दुभिनंदनि ते यशसः प्रवादी ॥३२॥
मन्दार-सुन्दर-नमेरु-मपारिजात-
मन्तानकादि-कुम्मोन्कर-वृप्टि-मद्धा
गन्धोद-विन्दु-शुभ-मन्द-मरुत्प्रयाता
दिव्या दिवः पतति ते वचसा ततिर्वा ॥३३॥
शुम्भप्रभा-वलय-भूरि-विभा विभोस्ते
लोक-त्रये द्युतिमतां द्युतिमाक्षिपन्ती ।
प्रोद्यदिवाकर-निरन्तर-भूरि-संख्या
दीप्त्या जयत्यपि निशामपि सोम-मौम्याम् ॥३४॥
स्वर्गापवर्ग-गम-मार्ग-विमार्गणेप्ट:
सद्धर्म-तत्त्व-कथनक-पटुस्त्रिलोक्या:
दिव्य-ध्वनिर्भवति ते विशदार्थ-सर्व-
भाषा-स्वभाव परिणाम-गुणःप्रयोज्य: ॥३५॥
उन्निद्र-हेम-नव-पङ्कज-पुज-कान्ती
पर्युल्लसन्नख-मयूख-शिखाभिरामी
पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र धत्तः
पद्यानि तत्र विबुधाः परिकल्पयन्ति ॥३६॥

२० तथा परस्य । इत्थं यथा नव विभूतिरभूज्जिनेन्द्र धर्मोपदेशन-विधी न यादृक्प्रभा दिनकृतः प्रहतान्धकारा तादृक्कुतो ग्रह-गणस्य विकासिनो पि ॥३७॥ शच्योतन्मदाविल-विलोल-कपोल-मूल- मत्त भ्रमभ्रेमर-नाद-विवृद्ध-कोपम् ऐरावताभमिभमुद्धतमापतन्तं दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदाश्रितानाम् ॥३८॥ भिन्नेभ-कुम्भ-गलदुज्ज्वल-शोणिताक्त- मुक्ता-फल-प्रकर-भूपित-भूमि-भाग: बद्ध-मः क्रम-गतं हरिणाधिपोप नाकामति क्रम-युगाचल-संथितं ते ॥६॥ कल्पान्त-काल-पवनोद्धत-वह्नि-कल्प दावानलं ज्वलितमुज्ज्वलमुत्स्फुलिङ्गम् । विश्वं जिघत्सुमिव संमुखमापतन्तं त्वन्नाम-कीर्तन-जलं शमयत्यशेपम् ॥४०॥ रक्तेक्षणं समद-कोकिल-कण्ठ-नीलं क्रोधोद्धतं फणिनमुत्फणमापतन्तम् । आक्रामति क्रम-युगेन निरस्त-शङ्क- स्त्वन्नाम-नाग-दमनी हृदि यस्य पुंसः ॥४१॥ वल्गत्तुरङ्ग-गज-गजित-भीमनाद- २१ माजी बलं बलवतामपि भूपतीनाम् ।। उद्यद्दिवाकर-मयूख-शिखापविद्धं त्वत्कीर्तनात्तम इवाशु भिदामुपैति ।। ४२।। कुन्तान-भिन्न-गज-शोणित-वारिवाह- वेगावतार-तरणातुर-योध-भोमे युद्धे जयं विजित-दुर्जय-जेय-पक्षा- स्त्वत्पाद-पंकज-वनाथयिणो लभन्ते ॥४३॥ अम्भोनिधी क्षुभित-भीपण-नक्र-चक्र- पाठीन-पीठ-भय-दोलवण-वाडवाग्नी रङ्गत्तरङ्ग-शिखर-स्थित-यान-पात्रा- स्त्रास विहाय भवत: स्मरणाद् व्रजन्ति ॥४४॥ उद्भूत-भीपण-जलोदर-भार-भुग्नाः शोच्यां दशामुपगताश्च्युत-जीविताशाः । त्वत्पाद-पंकज-रजोमृत-दिग्ध-देहा मा भवन्ति मकरध्वज-तुल्यम्पाः ॥४५॥ आपाद-कण्ठमुरु-शृङ्खल-वेष्टिनाङ्गा गाढं वृहन्निगड-कोटि-निघृष्ट-जवाः । त्वन्नाम-मन्त्र मनिशं मनुजा: म्मरन्त: सद्यः स्वयं विगत-वन्ध-भया भवन्ति ॥४६॥ मत्तद्विपेन्द्र-मृगराज-दवानलाहि- सझाम-वारिधि-महोदर-वन्धनोत्थम् ।

२२ तस्याशु नाशमुपयाति भयं भियेव यस्तावकं स्तवमिम मतिमानधीते ॥४७॥ स्तोत्रस्र तव जिनेन्द्र गुणनिबद्धां भक्त्या मया रुचिर-वर्ण-विचित्र-पुष्पाम् । धत्तं जनो य इह कण्ठ-गतामजस्र तं 'मानतुङ्ग' मवशा समुपैति लक्ष्मीः ॥४८॥ अधीशं, श्री पार्श्वनाथ स्तोत्र भुजंगप्रयात छन्द नरेंद्र फणीन्द्र सुरेंद्र शतेंद्र सु पूजें भजें नाय शीशं । मुनींद्रं गणेंद्रं नमों जोड़ि हाथं, नमो देवदेवं पार्श्वनाथं ॥१॥ गजेंद्रं मृगेंद्र गह्यो तू छुड़ावै, महा आगते नागते तू बचाव । महावीर ते युद्ध में तू जितावै, महा रोग से बंध तें तू छुड़ावै ॥२॥ दुखीदुःखहर्ता सुखीसुक्खकर्ता, सदा सेवकों को महानंदभर्ता । सदा २३ हरै यक्ष राक्षस्स भूतं पिशाचं, विषं डाकिनी विघ्न के भय अवाचं ॥३॥ दरिद्रीनको द्रव्य के दान दीने, अपुत्रीनकों तें भले पुत्र कीने । महासंकटों से निकारे विधाता, सबै संपदा सर्व को देहि दाता ॥४॥ महाचोर को वज्र को भय निवार, महापौन के पुंजतें तू उबार । महाक्रोध की अग्नि को मेघ-धारा, महालोभ-शैलेश को वज्र भारा ॥५॥ महामोह अंधेर को ज्ञान भानं, महाकर्मकांतार को दो प्रधानं । किये नाग नागिन अधोलोक स्वामी, हरयो मान तू दैत्य को ही अकामी ॥६॥ तुही कल्पवृक्ष तुहो कामधेनु, तुही दिव्य चिंतामणी नाग एनं । पशू नर्क के दुःखतें तू छुड़ावै, महास्वर्ग से मुक्ति में तू बसावें ॥७॥ कर लोह को हेम पाषाण नामी, रटै नाम सो क्यों न हो मोक्षगामी । कर सेव सेवता की करें देवसेवा, सुनै वन सोही लहै ज्ञान मेवा ॥८॥ जप जाप ताके नहीं पाप लागें, धरै ध्यान ताके सबै दोप भागें । बिना तोहि जाने धरे भव घनेरे, तुम्हारी कृपा तें सरें काज मेरे ॥६॥ दोहा गणधर इंद्र न कर सके, तुम विनती भगवान । 'द्यानत' प्रीति निहारके, कीजे आप समान ॥१०॥ विषापहार स्तोत्र आतम लीन अनन्त गुण, स्वामी ऋषभ जिनेन्द्र । नित प्रति वन्दित चरण युग, सुर नागेन्द्र नरेन्द्र ॥१॥ विश्व सुनाथ विमल गुण ईश, विहरमान बन्दों जिन बीस । गणधर गौतम शारदमाय, वर दीजै मोहि बुद्धि सहाय ॥२॥ सिद्ध साधु सत गुरु आधार, करूँ कवित्त आत्म उपकार ।

२५ विषापहार स्तवन उद्धार, सुक्ख औषधी अमृत सार ।।३।। मेरा मंत्र तुम्हारा नाम, तुम ही गारुड गरुड समान । तुम सम वैद्य नहीं संसार, तुम स्याने तिहुँ लोक मंझार ॥४॥ तुम विषहरण करन जग सन्त, नमो नमों तुम देव अनन्त । तुम गुण महिमा अगम अपार, सुरगुरु शेष लहैं नहिं पार ॥५॥ तुम परमातम परमानन्द, कल्पवृक्ष यह सुख के कन्द । मुदित मेरु नय-मण्डित धीर, विद्यासागर गुण गम्भीर ॥६॥ तुम दधिमथन महा वरवीर, संकट विकट भयभंजन भीर । तुम जगतारण तुम जगदीश, पतित उधारण विमवाबीस ।।७।। तुम गुणमणि चिन्तामणि रास, चित्रबेलि चितहरण चितास । विघ्नहरण तुम नाम अनूप, नाम मंत्र यत्र तुमही मणिरूप ॥८॥ जैसे पर्वत परिहार, त्यों तुम नाम जु विप-अपहार । नागदमन तुम नाम सहाय, विपहर विषनाशक क्षणमाय ।।६।। तुम सुमरण चिते मनमाहिं, विष पीवे अमृत हो जाहिं । सुधारस वर्षे जहाँ, पाप पंकमल रहै न तहाँ ॥१०॥ ज्यों पारस के परसे लोह, निज गुण तज कंचनसम होह । त्यों तुम सुमरण साधे सूंच, नीच जो पावे पदवी ऊँच ॥११॥ तुमहिं नाम महामंत्र सर जीवन मूल । न जाने भेव, कर्म कलंक दहन तुम देव ॥१२॥ तुम ही नाम गारुड़ गह गहे, भुजंगम कैसे रहे । तुम्हीं धनन्तर हो जिनराय, मरण न पावे को तुम ठाय ॥१३॥ औषधि अनुकूल, मूरख मर्म काल २७ मेरे यह धन तुम सूरज उदकाघट जास, संशय शीत न व्यापे तास । जीवे दादुर वर्षे तोय, सुन वाणी सरजीवन होय ।।१४।। तुम बिन कौन करै मुझ पार, तुम कर्ता-हर्ता किरपाल ।१५।। शरण आयो तुम्हरी जिनराज, अब मो काज सुधारो आज । पूंजी पूत, साह कहै घर राखो सूत ॥१६॥ करों वीनती बारम्बार, तुम बिन कर्म कर को क्षार ॥१७॥ विग्रह ग्रह दुख विपति वियोग, और जु घोर जलंधर रोग । चरण कमल रज टुक तन लाय, कुष्ट व्याधि दीरघ मिट जाय ॥१८॥ मैं अनाथ तुम त्रिभुवननाथ, मात-पिता तुम सज्जन साथ । तुम-सा दाता कोई न आन, और कहाँ जाऊँ भगवान ॥१६॥ प्रभुजी पतित उधारन आह, भक्ति सहाय, बांह गहकी लाज निबाह । जहें देखो तह तुमही आय, घट-घट ज्योति रही ठहराय ॥२०॥ बाट मुघाट विपम भय जहाँ, तुम विन कौन महाई तहाँ । विकट व्याधि व्यंतर जल दाह, नाम लेत क्षण माहि विलाह ॥२१॥ आचार्य मानतुंग अवसान, मंकट मुमिरो नाम निधान । भक्ता-मरकी प्रण गवं प्रगटे तिस ठाय ॥२२॥ चुगल एक नृप विग्रह ठयो, वादिराज नृप देखन गयो। एकी भाव कियो निसन्देह, कुप्ट गयो कंचनसम देह ॥२३॥ कल्याण मदिर कुमुद चद्र ठयो, राजा विक्रम विस्मय भयो । सेवक जान तुम करी सहाय, पारसनाथ प्रगट तिस ठाय ॥२४॥ गई व्याधि विमल मति लही, तहाँ फुनि सनिधि तुमही कही।

२६ दीनों साज, भव सुदत्त श्रीपाल नरेश, सागर जल संकट सुविशेष ॥२५॥ तहाँ पुनि तुमही भये सहाय, आनन्द से घर पहुँचे जाय । सभा दुश्शासन पकड़ो चीर, द्रुपदो प्रण राखो कर धीर ॥२६॥ सीता लक्ष्मण रावण जोत विभीपण राज । सेठ सुदर्शन साहस दियो, शूली से सिंहासन कियो ।।२७।। बारिपेन नृप धरियो ध्यान, ततक्षण उपजो केवल ज्ञान । सिंह सादिक जीव अनेक, जिन मुमिरे तिन राखी टेक ।।२८।। ऐसी कीरति जिनकी कहूं, माह कहै शरणगत रहूं । इस अवसर जीवे यह बाल, मुझ मन्देह मिटे तत्काल ॥२६॥ वन्दी छोड़ विरद महाराज, अपना विरद निबाहो आज । और आलंबन मरे नाहिं, धर्मचक्र तुम धारण मैं निश्चय कीनो मन माहिं ॥३०॥ चरण कमल छोड़ों ना सेव, मेरे तो तुम सतगुरु देव । तुम ही मूरज तुम ही चन्द, मिथ्या मोह निकन्दनकन्द ॥३१॥ धीर, विपहर चक्रबिडारन वीर । चोर अग्नि जल भूत पिशाच, जल जङ्घम अटवी उदबास ॥३२॥ दर दुशमन राजा वश होय, तुम प्रसाद गर्जे नाहिं कोय । हय गज युद्ध सबल सामंत, सिंह शार्दल महा भयवंत ॥३३॥ दृढ़ बंधन विग्रह विकराल, तुम सुमरत छूटें तत्काल । पांयन पनहीं नमक न नाज, ताको तुम दाता गजराज ॥३४॥ एक उपाय थप्यो पुन राज, तुम प्रभु बड़े गरीब निवाज । पानी से पैदा सब करो, भरी डाल तुम रीती करो ॥३५।। , हर्ता कर्ता तुम किरपाल, कीड़ी कुञ्जर करत निहाल । तुम अनन्त ज्ञान अल्प मो ज्ञान, कहं लग प्रभुजी करों बखान ॥३६॥ आगम पन्थ न सूझे मोहि, तुम्हरे चरन बिना किमि होहि । भये प्रसन्न तुम साहस कियो, दयावन्त तब दर्शन दियो ॥३७॥ साह पुत्र जव चेतन भयो, हँसत हँसत वह घर तब गयो। दर्शन पायो भगवन्त, आज अंग मुख नयन लसन्त ॥३८॥ प्रभु के चरण कमल में नयो, जन्म कृतारथ मेरो भयो। कर युग जोड़ नवाऊँ शोश, मुझ अपराध क्षमो जगदोश ॥३६॥ सत्रह सौ पंद्रह शुभ यान, नारनौल तिथि चौदस जान । पढ़े सुने तहाँ परमानन्द, कल्पवृक्ष महा सुखकन्द ।।८०॥ अष्ट सिद्धि नवनिधि सो लहै, धन अचलकीति आचारज कहै । याको पढ़ो मुनो सब कोय, मनवांछित फल निश्चय होय ॥४१॥ दोहा भय भजन जिन जगत, बिपापहार अभिराम । संशय नज मुमिरो मदा, श्री जिनवर को नाम ॥४२ श्री गोम्मटेश संस्तवन शत-शन बार विनम्र प्रणाम ! विमिन नील कमल दल मम हैं जिनके मुन्दर नेत्र विशाल। शरदचन्द्र शरमाना जिनकी निरव शांत छवि, उन्नत भाल । चम्पक पाप ल जाता रख कर मलिन नासिका मुपमा धाम । विश्ववद्य न गोम्मटेश प्रति शत-शत वार विनम्र प्रणाम ।।१।। पय सम विमल कपाल, झलते कणं कध पयंत नितान्त । सौम्य, सातिशय, सहज शानिप्रद वीतराग मुद्राति प्रशांत । हस्तिशुड मम मबल भुजाएं बन कृतकृत्य करें विश्राम । विश्वप्रेम उन गोम्मटेश प्रति शत-शत वार विनम्र प्रणाम ।।२।। दिव्य संख मोदयं विजयिनी ग्रीवा जिनकी भव्य विशाल । दृढ़ स्कंध लख हुआ पराजित हिमगिरि का भी उन्नत भाल । जग जन मन आकर्षित करनी कटि मुपष्ट जिनकी अभिराम । विश्ववंद्य उन गोम्मटेश प्रति शत-शत वार विनम्र प्रणाम ।।३।।

ANT विध्याचल के उच्च शिखर पर हीरक ज्यों दमके जिन भाव । नप: पून सर्वांग सुखद हैं आत्मलीन जो देव विशाल । वर विराग प्रसाद शिखामणि, भुवन शांतिप्रद चन्द्र ललाम । विश्ववंद्य उन गोम्मटेश प्रति शत-शत बार विनम्र प्रणाम ॥४॥ निर्भय बन बल्लरियां लिपटीं पाकर जिनकी शरण उदार। भव्य जनों को सहज सुखद हैं कल्पवृक्ष मम सुख दातार । देवेन्द्रों द्वारा अचित हैं जिन पादारविंद अभिराम । विश्ववंद्य उन गोम्मटेश प्रति शत-शत बार विनम्र प्रणाम ||५|| निष्कलंक निग्रंथ दिगम्बर भय भ्रमादि परिमुक्त नितांत । अम्बरादि-आसक्ति विजित निर्विकार यांगोन्द्र प्रशांत । मिह-म्याल-शुंडाल-व्यालकृन उपमर्गों में अटल अकाम । विश्ववंद्य उन गोम्मटेश प्रति शत-शत वार विनम्र प्रणाम ।।६।। जिनकी मम्यग्दृष्टि विमल है आशा-अभिलापा परिहीन । मंमृति-मुख बांछा मे विरहित, दोष मूल अरि मोह विहीन । बन संपुष्ट विगगभाव में लिया भग्त पनि पूर्ण विराम । विश्ववद्य उन गोम्मटेश प्रति शत-शत बार विनम्र प्रणाम ।।७।। अंतरग-बहिरंग-मग धन धाम विजित विभु मभ्रांत । ममभावी, मदमोह-राजित् कामक्रोध उन्मुक्न नितांत । किया वर्ष उपवाम मौन रह बाहुबली चरितार्थ मुनाम । विश्ववंद्य उन गोम्मटेश प्रति शत-शत वार विनम्र प्रणाम ।।८।।

३४ जय जय दृगसुख-वीरजमंडित श्री दौलतरामजी कृत स्तुति दोहा सकल जेय ज्ञायक तदपि, निजानन्द रस लीन । सो जिनेन्द्र जयवन्त नित, अरि-रज-रहस विहीन ॥१॥ पद्धरि छंद वीतराग विज्ञानपूर. जय मोहतिमिरको हरन सूर । ज्ञानअनंतानंत धार, अपार ॥२॥ जय परमशांत मुद्रा समेत, भविजनको निज अनुभूति हेत । भवि भागनवशजोगेवशाय, तुम धुनि ह्व सुनि विभ्रम नसाय ॥३॥ तुम गुण चिंतत निजपरविवेक, प्रगट विघट आपद अनेक । तुम जगभूषण दूषणविमुक्त, सब महिमायुक्त विकल्पमुक्त ॥४॥ अविरुद्ध शुद्ध चेतनस्वरूप, परमात्म परम पावन अनूप । शुभ-अशुभविभाव अभाव कीन,

धरंत ॥६॥
स्वाभाविकपरिणति मयअछीन ॥५॥
अप्टादश-दोपविमुक्त धोर,
स्व-चतुष्टयमय राजत गंभीर ।
मुनिगणधरादि
सेवत महंत,
नवकेवललब्धिरमा
तुम शासन सेय अमेय जीव,
शिव गये जाहिं
जैहैं सदीव ।
भवसागर में दुख
छार वारि,
तारन को अवर न आप टारि ॥७॥
यह लखि निज दुखगद हरण काज,
तुम ही निमित्तकारण इलाज ।
जाने ताते मैं शरण आय,
उचरों निज दुख जो चिर लहाय ।।८।।
मैं भ्रम्यो अपनपो विसरि आप,
अपनाये विधि फल पुण्य पाप ।
निजको परको करता पिछान,
पर में अनिष्टता इप्ट टान ॥६॥
आकुलित भयो अज्ञान धारि,
ज्यों मृग मृगतृष्णा जानि वारि।
तनपरणति में आपो चितार,
कबहूं न अनुभयो स्वपदसार ॥१०॥

अब तुम को विन जाने जो कलेश, पाये सो तुम जानत जिनेश । पशु-नारक-नर-सुरगति मझार, भव धर-धर मर्यो अनंत बार ॥११॥ काललब्धिबलतें दयाल, तुम दर्शन पाय भयो खुश्याल । मन शांत भयो मिटि सकल द्वंद्व, चाख्यो स्वातम-रस दुनिकन्द ।।१२।। तातें अब ऐसी करहु नाथ, विछुरै न कभी तुव चरण साथ । तुम गुणगण को नहि छेव देव, जग तारन को तुव विरद एव ।।१३।। आतम के अहित विषय कषाय, इन में मेरी परिणति न जाय । मैं रहूं आप में आप लीन, सो करो होउं ज्यों निजाधीन ॥१४॥ मेरे न चाह कछु और ईश, रत्नत्रयनिधि दीजे मुनीश । मुझ कारज के कारन सु आप, शिव करहु, हरहु मम मोहताप ॥१५॥ शशि शांतिकरन तप हरन हेत स्वयमेव तथा तुम कुशल देत । पीवत पियूप ज्यों रोग जाय, त्यों तुम अनुभवतें भव नसाय ॥१६॥ त्रिभुवनतिहुंकाल मॅझार कोय, नहिं तुम बिन निज सुखदाय होय । मो उर यह निश्चय भयो आज, दुखजलधिउतारन तुम जिहाज ॥१७॥ दोहा तुम गुण-गण-मणि गणपति, पावहिं 'दौल' स्वल्ममति किम कहै, नमू त्रियोगसंभार ॥१८॥ गणत न पार । जी । दर्शन-पाठ प्रभु पतितपावन मैं अपावन, चरन आयो सरन यो विरद आप निहार स्वामी, मेट जामन मरनजी तुम ना पिछान्या आन मान्या, देव विविधप्रकार जी ।

या बुद्धिसेती निज न जान्यो,
भ्रम गिन्यो हितकारजी ॥१॥
भवविकटवन में करम वैरी,
जानधन मेरो हर्यो
तब इप्ट भूल्यो भ्रष्ट होय,
अनिप्टगति धरतो
फिर्यो ।
धन घड़ी यो धन दिवस यो ही,
धन जनम मेरो भयो
अब भाग मेरो उदय आयो,
दरश प्रभुको
लखलयो ॥२॥
छवि वीतरागी नगन मुद्रा,
दृष्टि नासाप धरै
वसु प्रातिहार्य अनंत गुण जुत,
कोटि रवि छविको हरें ।
मिट गयो तिमिर मिथ्यात मेरो,
उदयरवि आतम भयो
मो उर हरप
ऐसो
चितामणि
मैं हाथ जोड़ नवाय मस्तक,
वीनऊं
तुव
चरन जी
सर्वोत्कृष्ट त्रिलोकपति जिन,
भयो,
मनु रंक
लयो ॥३॥

जी । सुनहु तारन तरन जाचूं नहीं सुर वास पुनि, नरराज परिजन साथजी । बुध जाचहूं तुव भक्ति भव भव, दीजिये शिवनाथ जी ॥४॥ दर्शन-पाठ दर्शनं देवदेवस्य, दर्शनं पाप-नाशनं । दर्शनं स्वर्ग-सोपानं, दर्शनं मोक्ष-साधनं ॥१॥ दर्शनेन जिनेन्द्राणां, साधूनां वंदनेन च । न चिरं तिष्ठते पापं, छिद्रहस्ते यथोदकम् ।।२।। वीतरागमुखं दृष्ट्वा, पद्मरागसमप्रभ । अनेकजन्मकृतं पापं, दर्शनेन विनश्यति ॥३॥ दर्शनं जिनसूर्यस्य, संसार-ध्वान्त-नाशनं । बोधनं चित्तपास्य, समस्तार्थप्रकाशनं ॥४॥ दर्शनं जिनचन्द्रस्य, सद्धर्मामृतवर्षणं । जन्मदाहविनाशाय, वर्धनं सुखवारिधेः ॥५॥ जीवादितत्त्वप्रतिपादकाय, सम्यक्त्वमुख्याष्टगुणार्णवाय।

४०
परमात्मने
प्रशांतरूपाय दिगम्बराय,
देवाधिदेवाय नमो जिनाय ॥६॥
चिदानन्दकम्पाय, जिनाय
परमात्मप्रकाशाय, नित्यं सिद्धात्मने नमः ॥७॥
अन्यथा शरणं नास्ति, त्वमेव शरणं मम ।
तस्मात्कारुण्यभावेन, रक्ष रक्ष जिनेश्वर ! ॥८॥
न हि वाता न हि वाता, न हि त्राता जगत्त्रये ।
वीतरागात्परो देवो, न भूतो न भविष्यति ॥६॥
जिने भक्तिजिने भक्तिजिने भक्तिदिने दिने ।
सदा मेस्तु सदा मेस्तु सदा मेस्तु भवे भवे ॥१०॥
जिनधर्मविनिर्मुक्तो, मा
भवेच्चक्रवर्त्यपि ।
स्याच्चेटो दरिद्रोऽपि जिनधर्मानुवासितः ॥११॥
जन्म जन्म कृतं पापं, जन्मकोटिमुपाजितं ।
जन्ममृत्युजरारोगं, हन्यते जिनदर्शनात् ॥१२॥
अद्याभवत्सफलता नयनद्वयस्य,
देव ! त्वदीय चरणांबुजवीक्षणेन ।
अद्य त्रिलोकतिलक ! प्रतिभासते मे,
संसारवारिधिरयं चुलुकप्रमाणम् ॥१३॥

अभिषेक पाठ दोहा जय जय भगवन्ते सदा, मंगल मूल महान । वीतराग सर्वज्ञ प्रभु, नमों जोरि जुगपान ।। छन्द (अडिल्ल और गीत) श्रीजिन जग में ऐसो, को बुधवन्त जू, जो तुम गुण वरननि करि पावै अन्न जू । इन्द्रादिक सुर चार ज्ञानधारी मनी, कहि न मकै तुम गुणगण हे त्रिभुवनधनी ।। अनुपम अमित नुम गुणनि वारिधि, ज्यों अलाकाकाश है। किमि धरै हम उर कोप में सो अ अथकगुणमणिराश है ॥ पं जिन प्रयोजन सिद्धि की तुम नाम में ही शक्ति है । यह चित्त में सरधान यात नाम ही भक्ति है ॥१॥ दर्शनआवरणी भने । कर्म मोहनी अन्तराय चारों भने ।। लोकालोक विलोक्यो केवलज्ञान में । इन्द्रादिक के मुकुट नये मुरथान में ।। नब इन्द्र जान्यो अवधिन उटि मुरन युन वंदन भयो । तुम पुन्य को प्रेर्यो हरि हू मुदित धनपतिसौं चयो ।। अब बेगि जाय रचौ समवनि सफल सुरपद को कगे। साक्षात श्री अग्हंत के दर्शन करी कल्मप हरी ॥२॥ ज्ञानावरणी

मे वचन
सुने मुरपतिके धनपती ।
चल आयो ततकाल मोद धार अती ।।
वीतराग छवि देखि शब्द जय जय चयौ।
दे परच्छिना बार बार बंदत भयो ।
अति भविन भीनो नम्र-चिन हा समवशरण रच्यो सही।
ताकी अनूपम शुभगतीको, कहन समरथ कोऊ नहीं ।
प्राकार नोरण सभा मण्डप कनक मडिमय छाजही ।
नग जड़िन गंधकुटी मनोहर मध्यभाग विराजही ॥३॥
सिंहासन तामध्य बन्यो अद्भुत दिपै ।
नापर वारिज रच्यो प्रभा दिनकर छिप ।।
नोनरव मिर शोभित चौंसठ चमर जी ।
महाभक्तियुत ढोरत हैं नहां अमरजी ।।
प्रभु तरन तारन कमल ऊपर, अंतरीक्ष विराजिता।
यह वीतराग दशा प्रतच्छ विलोकि भविजन सुख लिया ।
मुनि आदि द्वादश सभा के भवि जीव मस्तक नायकै।
बहुभांनि
वारंबार
पूजें, नमै
गुणगण गायकै ॥४॥
परमौदारिक दिव्य देव पावन सही।
क्षुधा तृषा
निता भय गद दूपण नहीं।।
जन्म जरा मति अरति शोक विस्मय नसे ।
राग दोष निद्रा मद मोह सबै खसे ।।
श्रमविन श्रमजल रहित पावन अमल ज्योतिस्वरूपजी।
शरणागतनिकी अशुचिता हरि करत विमल अनूपजी ।।
ऐसे प्रभुको शांति मुद्राको न्हवन जलतं करें ।
'जस' भक्तिवश मन उक्तितें हम भानु ढिग दीपक धरें॥५॥

तनरूप ४३ तुमतौं सहज पवित्र यही निश्चय भयो। तुम पवित्रताहेत नहीं मज्जन ठयो । मैं मलीन रागादिक मलतें हरह्यो। महामलिन तनमें वमुविधिवश दुख सह्यो । वीत्यो अनन्तो काल यह मेरी अशुचिता ना गई । तिस अशुचिताहर एक तुमही हरहु बांछा चित ठई ।। अब अप्टकर्म विनाश सब मल रोषरागादिक हरो। कारागेहसै उद्धार शिववासी करी ॥६॥ मैं जानन तुम अप्टकर्म हरि शिव गये। आवागमन विमुक्त रागवजित भये ॥ पर तथापि मेरो मनोरथ पूरत सही। नयप्रमानते जानि महा साता लही ॥ पापाचरण तजि न्हवन करता चित्त में ऐसे धरू । साक्षात श्रीअरहंतका मानो न्हवन परसन करूं। (यहां पर जलाभिषेक करें) ऐसे विमल परिणाम होते अशुभ नसि शुभबंध तं । विधि अशुभ नमि शुभबंधने व गर्म सब विधि नासतें ॥७॥ पावन मेरे नयन भये तुम दरमते । पावन पानि भये तुम चरननि परसते ।। पावन मन ह गयो तिहारे ध्यानते । पावन रसना मानी, तुम गुण गानते।। पावन भई परजाय मेरी, भयो मैं पूरणधनी। मैं शक्तिपूर्वक भक्ति कीनी, पूर्णभक्ति नहीं बनी।। धन्य ते बड़भागि भवि तिन नीव शिवघरकी धरी ।।

वर क्षीरसागर आदि जल मणिकुंभरि भक्ति करी ॥८॥
विधनमघनवनदाहन-दहन
प्रचण्ड हो।
मांह महानमदलन प्रवल मारतण्ड हो।।
ब्रह्मा विष्णु महेश, आदि संज्ञा करो।
जगविजयी जमगज नाश नाकी करो।
आनन्दकारण दुखनिवारण, परममंगलमय सही ।
मोमो पनिन नहि और तुममो, पनिननार सुन्यो नहीं ।।
चितामणी पारम कलपतरू, एकभाव मुखकार हो।
तुम भक्तिनोका जे चढू ने, भये भवदधि पार ही ।।६।।
दोहा
तुम भवधित रि गये, भये निकल अविकार ।
नारतम्य इम
भक्ति को हमें उतारो
पूरा पाट पढ़कर निर्मल वस्त्र में प्रनिमाजी का मार्जन
करें। और पीछे चरणोदक ग्रहण करें। पश्चात् ६ वार णमो-
कार मन्त्र पढकर नमस्कार करें।
पार ।।
विनय पाठ
इह विधि ठाडो होय के, प्रथम पढ़ जो पाठ ।
धन्य जिनेश्वर देव
तुम,
नाशो कर्मजु आठ ।।१॥
अनन्त चतुष्टय के धनी, तुम ही हो सिरताज ।
मुक्तिवधू के कथ तुम, तीन भुवन के राज ॥२॥

. तिहुं जगकी पीड़ाहरन, भवदधि शोषणहार । ज्ञायक हो तुम विश्व के, शिवसुख के करतार ।।३।। हरता अघअंधियार के, करता धर्मप्रकाश । थिरतापद दातार हो, धरता निजगुण रास ।।४।। धर्मामृत उर जलधिसों, ज्ञानभानु तुम रूप । तुमरे चरणसरोजकों, नावत तिहुंजग भूप ॥५॥ मैं वंदौं जिनदेव को कर अति निर्मल भाव । कर्मबंध के छेदने, और न कछू उपाव ॥६॥ भविजनकों भव-कूपत, तुमही काढनहार । दीनदयाल अनाथपति, आतम-गुण-भडार ॥७॥ चिदानद निर्मल कियो, धोय कर्म-रज मैल । सरल करो या जगत में, भविजन को शिव-गेल ।।८।। तुम पदपकज पूजते, विघ्न रोग टर जाय । शत्रु मित्रता को धरै, विप निरविपता थाय ।।६।। चक्री-खगधर-इन्द्र पद, मिलें आपतें आप अनुक्रमकर शिवपद लहैं, नेमसकल हनि पाप ॥१०॥ तुम बिन मैं व्याकुल भयो, जैसे जलबिन मीन । जन्मजरा मेरी हरो, करो मोहि स्वाधीन ॥११॥ पतित बहुत पावन किये, गिनती कौन करेव । अंजन से तारे कुधी जय जय जय जिनदेव ॥१२॥ .

४६
थकी नाव भवदधिविप, तुम प्रभु पार करेय ।
खेवटिया तुम हो प्रभु, जय जय जय जिनदेव ॥१३॥
रागसहित जगमें रुल्यो, मिले सरागी देव ।
वीतराग भेटयो अब, मेटो राग कुटेव ॥१४॥
कित निगोद कित नारकी, कित तिर्यंच अज्ञान ।
आज धन्य मानुप भयो, पायो जिनवर थान ॥१५॥
तुम को पूर्जे सुरपति, अहिपति नरपति देव ।
धन्य भाग्य मेरो भयो, करनलग्यो तुम सेव ।।१६।।
अशरण के तुम शरण हा, निराधार आधार ।
मैं डूबत भव-सिन्धु में, खेउ लगाओ पार ।।१७।।
इन्द्रादिक गणपति थके, कर विनती भगवान ।
अपनो विरद निहारकै, कीजे आप समान ।।१८।।
तुमरी नेक सुदृष्टिते, जग उतरत है पार ।
हाहा डूबो जात हों, नेक निहार निकार ॥१६॥
जो मैं कहऊँ औरसों, तो न मिट उरझार ।
मेरी तो तोसों बनी, तातें करौं पुकार ॥२०॥
बंदों पांचों
परमगुरु, सुरगुरु वंदत जास ।
विघनहरन मंगल करन, पूरन परम प्रकास ॥२१॥
चौबीसों जिनपद नमों, नमों शारदा माय ।
शिवमग साधक साधु नमि, रच्यो पाठ सुखदाय ॥२२॥

४७
स्तुति
[कविवर भूधरदासजी]
अहो जगतगुरु देव, सुनिये अरज हमारी ।
तुम प्रभु दीनदयाल, मैं दुखिया संसारी ॥
इस भव-वनके माहिं, काल अनादि गमायो ।
भ्रम्यों चहूँ गतिमाहि, सुख नहिं दुख बहु पायो ।
कर्म-महारिपु जोर, एक न कान करै जी ।
मनमाने दुख देहि, काहू सों नाहिं डरै जी ।।
कबहूँ इतर निगोद, कबहूँ नरक दिखावें ।
सुर-नर-पशु गतिमाहिं, बहुविधि नाच नचावें ॥
प्रभु इनको परसग, भव-भव माहिं बुरो जी ।
जे
दुख
देखे देव, तुमसो नाहिं दुरो जी॥
एक जनम की बात, कहि न सकौं सुनि स्वामी ।
परजाय,
अंतरजामी ॥
मैं तो एक अनाथ,
अनाथ, ये मिल दुष्ट घनेरे ।
कियो बहुत बेहाल, सुनियो साहिब मेरे ।
ज्ञान महानिधि लूटि, रंक निबल करि डार्यो।
इनही तुम मुझ माँहि, हे जिन अंतर पार्यो ।।
पाप पुन्य मिलि दोय, पायनि बेड़ी डारी ।
तन-कारागृहमाहि, मोहि दियो दुख भारो ।।
इनको नेक बिगार, मैं कछु नाहिं कियो जी ।
तुम अनंत
जानत

४ विन कारन जगवंद्य, बहु बिध वैर लियो जी। अब आयो तुम पास, सुन जिन सुजस तिहारो। नीति-निपुन जगराय, कीज न्याव हमारो ॥ दुप्टन देहु निकाल, साधुन कों रखि लीज। विनवं 'भूधरदास' हे प्रभु ढील न कोजै ॥ नित्य-नियम पूजा ॐ जय जय जय । नमोस्तु नमोऽस्तु नमोस्तु । णमो अरहनाणं णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं । णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्वसाहूणं ॥१॥ ॐ ह्रीं अनादिमूलमन्त्रेभ्यो नमः पुष्पाञ्जलि क्षिपामि चत्तारिमंगलं-अरहंता मगल, सिद्धा मंगलं, केवलपण्णत्तो धम्मो मंगलं । चत्तारि लोगुत्तमा-अरहता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा, केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमो । चत्तारि सरणं पव्वज्जामि-अरहते सरणं पवज्जामि, सिद्धे सरणं पवज्जामि, साहू सरणं पव्वज्जामि, केवलिपण्णत्तं सरण पवज्जामि । ॐ नमोहंते स्वाहा, पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि अपवित्रः पवित्रो वा सुस्थितो दुःस्थितोऽपि वा। साहू मंगलं, धम्म ४६ ध्यायेत्पञ्च-नमस्कार सर्व-पापैः प्रमुच्यते ॥१॥ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत्परमात्मानं स बाह्याभ्यन्तरे शुचिः ।।२।। अपराजितमन्त्रोऽयं सर्व-विघ्न-विनाशनः । मङ्गलेषु च सर्वेषु प्रथम मङ्गलं मतः ॥३॥ एसो पंच-णमोयारो सव्व-पाव-प्पणासणो । मंगलाण च सव्वेसि पढम होइ मंगलं ॥४॥ अहमित्यक्षरं ब्रह्मवाचक परमेष्ठिनः । सिद्धचक्रस्य सद्बीजं सर्वतः प्रणमाम्यहम् ॥५॥ कर्माष्टक-विनिर्मुक्तं मोक्ष-लक्ष्मी-निकेतनम् । सम्यक्त्वादि-गुणोपेतं सिद्धचक्र नमाम्यहम् ॥६॥ विघ्नौघाः प्रलयं यान्ति शाकिनी-भूत-पन्नगा: । विपं निर्विषतां यानि स्तूयमाने जिनेश्वरे ।।७।। पुष्पाञ्जलि क्षिपामि [सहस्रनामस्तोत्रं पठित्वा क्रमगोऽयंदशकं दद्यात् । समया- भावादधोलिखितं प्रलोकं पठित्वा एकोदेयः ।। उदक-चन्दन-तण्दुल-पुष्पकैश्चरु-सुदीप-सुधूप-फलार्थ्यकैः । धवल-मङ्गल-गान-रवाकुले जिन-गृहे जिननाथमहं यजे ॥ ॐह्रीं श्रीभगवग्जिनमहस्रनामेभ्योऽध्य निर्वपामीति म्वाहा। श्रीमज्जिनेन्द्रमभिवन्द्य जगन्वयेशं स्याद्वाद-नायकमनन्त-चतुष्टयाहम् ।

श्रीमूलसंघ-सुदृशां सुकृतकहेतु- जैनेन्द्र-यन-विधिरेष मयाऽभ्यधायि॥८॥ स्वस्ति त्रिलोक-गुरवे जिन-पुङ्गवाय स्वस्ति स्वभाव-महिमोदय-सुस्थिताय । स्वम्ति प्रकाश-सहजोजित-दृङ्मयाय स्वस्ति प्रसन्न-ललिताद्भुत-वैभवाय ।।६।। म्वस्त्युच्छलद्विमल- बोध-सुधा-प्लवाय स्वस्ति स्वभाव-परभाव-विभासकाय । म्वस्ति त्रिलोकविततक-चिदुद्गमाय स्वस्ति त्रिकाल-सकलायत-विस्तृताय ॥१०॥ शुद्धिमधिगम्य यथानुरूपं भावस्य शुद्धिमधिकामधिगन्तुकामः । आलम्बनानि विविधान्यवलम्ब्य वल्गन् भूतार्थ-यज्ञ-पुरुषस्य करोमि यजम् ।।११।। अर्हत्पुराण पुरुषोत्तम पावनानि वस्तून्यनूनमखिलान्ययमेक एव अस्मिञ्ज्वलद्विमल - केवल-बोधवह्नौ पुण्यं समग्रमहमेकमना जुहोमि ॥१२॥ [इति पुष्पाञ्जलि क्षिपामि] द्रव्यस्य ५१ स्वस्ति-मंगलम् श्रीवृपभो नः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीअजितः । थीसम्भवः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीअभिनन्दनः ।। श्रीसुमतिः स्वस्ति. स्वस्ति श्रीपद्मप्रभः । श्रीसुपार्श्व: स्वस्ति, स्वस्ति श्रीचन्द्रप्रभः ।। श्रीपुष्पदन्तः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीशीतलः । श्रीश्रेयान् स्वस्ति, स्वस्ति श्रीवासुपूज्यः ।। श्रीविमल: स्वस्ति, स्वस्ति श्रीअनन्तः । श्रीधर्मः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीशान्तिः ॥ श्रीकुन्थुः स्वस्ति, स्वस्ति श्रोअरनाथः । श्रीमल्लि: स्वस्ति, स्वस्ति श्रीमुनिसुव्रतः ।। श्रीनमिः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीनेमिनाथः । श्रीपार्श्वः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीवर्धमानः ।। [पुष्पालि क्षिपामि] नित्याप्रकम्पाद्भुत-केवलौघाः, स्फुरन्मनःपर्यय - शुद्धबोधाः । दिव्यावधिज्ञान - बलप्रबोधा:, स्वस्ति क्रियासुः परमर्पयो नः ॥१॥ कोप्ठस्थ - धान्योपममेकबीजं, संभिन्नसंश्रोतृ • पदानुसारि । चतुर्विधं बुद्धिबलं दधानाः,

५२
स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥२॥
संस्पर्शनं संश्रवणं च दूरा-
दास्वादन-घ्राण-विलोकनानि ।
दिव्यान्मतिजानबलाद्वहन्त:,
स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥३॥
प्रज्ञाप्रधाना: थवणा: समृद्धाः,
प्रत्येकबुद्धा दशसर्वपूर्वैः ।
प्रवादिनोप्टाङ्गनिमित्तविज्ञा:,
स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ।।४।।
जङ्घावलि-श्रेणि-फलाम्बु-तन्तु,
प्रसून-बीजाङ्कर-चारणाह्वाः ।
नभोग्ङ्गण-स्वर-विहारिणश्च,
स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥५॥
अणिम्नि दक्षा:कुशलामहिम्नि,
लघिम्निशक्ताः कृतिनो गरिम्णि ।
मनो-वपूर्वाग्बलिनश्च नित्यं,
स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥६॥
सकामरूपित्व • वशित्वमश्य,
प्राकाम्यमद्धिमथाप्तिमाप्ताः ।
तथा प्रतीघातगुणप्रधानाः,
स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥७॥

दीप्तं च तप्तं च तथा महोग्रं, घोर तपो घोरपराक्रमस्था: । ब्रह्मापरं घोरगुणं चरन्तः, स्वस्तिः क्रियासुः परमर्पयो नः ॥८॥ आमर्प - सौंपधयस्तथाशी- विषंविषा दृष्टिविषविषाश्च । सखिल्ल-विड-जल्ल-मलोपधीशाः, स्वस्ति क्रियासुःपरमर्पयो नः ॥६॥ क्षीर सवन्तोन्त्र घृतं स्रवन्तो, मधु स्रवन्तोप्यमृतं अक्षीणसंवास - महानसाश्च, स्वस्ति क्रियामुः परमर्पयो नः ॥१०॥ [प्रतिश्लोकममाप्नरनन्तरं पुष्पाञ्जलि क्षिपेत् ] इति परमपिस्वस्तिमङ्गलविधानम् । स्त्रवन्तः । देव-शास्त्र-गुरु-पूजा [कविवर द्यानतरायजी] अडिल्ल छद प्रथम देव अरहंत सुश्रत सिद्धान्त जू । गुरु निरग्रन्थ महत मुकतिपुरपंथ जू ॥

तीन रतन जगमाहिं सो ये भवि ध्याइये। तिनकी भक्तिप्रसाद परमपद पाइये ॥१॥ दोहा पूजों पद अरहंत के पूजों गुरुपदसार । पूजों देवी सरस्वती नितप्रति अष्टप्रकार ॥२।। ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुममूह ! अव अवतर अवतर संवौषट् । ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुसमूह ! अव निष्ठ तिष्ठ ठः ठः । ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुममूह ! अब मम सन्निहितो भव भव वषट् । गीता छन्द सुरपति उरग नरनाथ तिनकरि वन्दनीक सुपदप्रभा। अति शोभनीक सुवरण उज्जल देख छवि मोहित सभा। वर नोर क्षीरसमुद्र घट भरि अग्र तसु बहुविधि नचूं । अरहंत श्रुत-सिद्धान्त गुरु-निरग्रंथ नित पूजा रचूं ॥१ दोहा मलिन वस्तु हर लेत सब जल-स्वभाव मलछीन । जासों पूजों परमपद देव शास्त्र गुरु तीन ॥१॥ ॐ ह्रीं देवशास्त्र गुरुभ्यो जन्म जरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपा० ॥१॥ जे विजग-उदर मझार प्रानी तपत अति दुद्धर खरे । तिन अहितहरन सुवचन जिनके परम शीतलता भरे ।।

तसु भ्रमरलोभित घ्राणपावन सरस चन्दन घसि सचूं । अरहंत श्रुत-सिद्धान्त गुरु-निरग्रंथ नित पूजा रचूं ।। दोहा चंदन शीतलता करै तपत वस्तु परवीन । जासों पूजों परमपद देव शास्त्र गुरु तीन ॥२॥ ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपा०। यह भवसमुद्र अपार तारण के निमित्त सुविधि ठई । अति दृढ़ परमपावन जथारथ भक्ति वर नौका सही । उज्जल अखंडित सालि तंदुल पुंज धरि जयगुण जचूं । अरहंत श्रुत-सिद्धान्त गुरु-निरग्रंथ नित पूजा रचूं ।। दोहा तंदुल सालि सुगंधि अति परम अखंडित बीन । जासों पूजों परमपद देव शास्त्र गुरु तीन ॥३॥ ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो अक्षयपदप्राप्नये अक्षतान् निर्वपा०। जे विनयवंत सुभव्य-उर-अंबुजप्रकाशन भान हैं । जे एक मुख चारित्न भाषत त्रिजगमाहिं प्रधान हैं । लहि कुंदकमलादिक पहुप भव भव कुवेदनसों बचूं । अरहंतश्रुत-सिद्धान्त गुरु-निरग्रंथ नित पूजा रचूं ।।

में पचूं ।
दोहा
विविध भांति परिमल सुमन भ्रमर जास आधीन ।
जामों पूजों परमपद देव शास्त्र गुरु तीन ॥४॥
ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्वो कामवाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्व।
अति सबल मदकंदर्प जाको क्षुधा-उरग अमान है ।
दुस्सह भयानक तासु नाशनको सगरुडसमान है ।।
उत्तम छहों रसयुक्त
नित नैवेद्य करि
घृत
अरहंत श्रुत-सिद्धांत गुरु-निरग्रंथ नित पूजा रचूं ॥
दोहा
नानाविधि संयुक्तरस व्यंजन सरस नवीन ।
जासों पूजों परमपद देव शास्त्र गुरु तीन ॥५॥
ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो क्षुधारोगविध्वंसनाय नैवेद्यं
निर्वपा०
जे त्रिजग-उद्यम नाश कीने मोह-तिमिर महाबली।
तिहि कर्मघाती ज्ञानदीप प्रकाशजोति प्रभावली ॥
इह भांति दीप प्रजाल कंचनके सुभाजन में खचूं ।
अरहंत श्रुत-सिद्धांत गुरु-निरग्रंथ नित पूजा रचूं ॥
दोहा
स्व-पर-प्रकाशक जोति अति दीपक तमकरि हीन।
जासों पूजों परमपद देव शास्त्र गुरु तोन ॥६॥

'०। ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीप निर्वपा० जो कर्म ईंधन दहन अग्निसमूह सम उद्धत लस । वर धूप तासु सुगंधिताकरि सकल परिमलता हंस ।। इह भाँति धूप चढ़ाय नित भव-ज्वलनमाहिं नहीं पचू । अरहंत श्रुत-सिद्धान्त गुरु-निरग्रंथ नित पूजा रचूं ॥ दोहा अग्निमांहिं परिमल दहन चंदनादि गुणलीन । जासों पूजों परमपद देव शास्त्र गुरु तीन ॥७॥ ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्योऽष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं निवपा० । लोचन सुरसना प्रान उर उत्साह के करतार हैं । मोप न उपमा जाय वरणी सकल फलगुणसार हैं । सो फल चढ़ावत अर्थपूरन परम अमृतरस सचूं । अरहंत श्रुत-सिद्धांत गरु-निरग्रंथ नित पूजा रचूं ॥ दोहा जे प्रधान फल फलविर्षे पचकरण-रस-लीन । जासों पूजों परमपद देव शास्त्र गुरु तीन ॥८॥ ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपा० । जल परम उज्ज्वल गंध अक्षत पुप्प चरु दीपक धरूं । वर धूप निर्मल फल विविध बहु जनमके पातक हरू । इह भांति अर्घ चढ़ाय नित भवि करतशिव-पंकति मचूं ।

५८ अरहतश्रुत-सिद्धांत गुरु-निरग्रंथ नित पूजा रचूं । दोहा वसुविधि अर्घ सजोयकै अति उछाह मन कीन । जासों पूजों परमपद देव शास्त्र गुरु तीन ॥६॥ ॐ ह्री देवशास्त्रगाभ्योऽनपदप्राप्तये अध्यं निर्वपा० । जयमाला दोहा देव शास्त्र गुरु रतन शुभ रतन तीन करतार । भिन्न-भिन्न कहुँ आरती अल्प सुगुणविस्तार ॥१॥ पदरी छन्द चउ कर्मसु वेसठ प्रकृतिनाशि, जीते अप्टादश दोषराशि । जे परम सुगुण हैं अनंत धीर, कहवत के छयालिस गुणगंभीर ॥ शुभ समवसरणशोभा अपार, शत इंद्र नमत कर सीस धार । देवाधिदेव अरहंत देव, बंदों मन वच तन करि ससेव ।।

ॐ ह्रीं विद्यमानविंशतितीर्थङ्करेभ्यो भवतापविनाशनाय चंदनं.
ह संसार अपार महासागर जिनस्वामी ।
ताते तारे बड़ी भक्ति-नौका जगनामी ।।
तन्दुल अमल सुगंधसों (हो)पूजों तुम गुणसार ।।सीमं०॥
ॐ ह्रीं विद्यमानविंशतितीर्थकरेभ्योऽक्षयपदप्राप्तये अक्षनान्
निर्वपा०।
भविक-मरोज-विकाश निंद्य-तमहर रवि से हो ।
जति-श्रावक आचार कथन को तुम्हीं बड़े हो ।
फूल मुवास अनेकसों (हो)पूजों मदनप्रहार ॥सीमं०॥
ॐ ह्रीं विद्यमानविंशनिनोर्थकरेभ्यो कामवाणविध्वंसनाय पुणं
निवंपा।
काम-नाग विषधाम नाशको गरुड कहे हो।
क्षुधा महादवज्वाल तासुको मेघ लहे हो।
नेवज बहघृत मिष्टसों (हो)जानज्योति करतार ॥सीमं०।।
ॐ ह्रीं विद्यमानविनितीर्थकरेभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं
निर्वपा० ।
उद्यम होन न देत सर्व जगमाहिं भर्यो है ।
मोह-महातम घोर नाश परकाश कर्यो है ।
पूजों दीप प्रकाशसों(हो)जानज्योति करतार ॥सीमं०॥
ॐ ह्रीं विद्यमानविंशतितीर्थकरेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय
दीपं निर्वपा०
कर्म आठ सब काठ भार विस्तार निहारा ।

ध्यान अगनिकर प्रगट सरब कीनो निरवारा ॥
धूप अनूपम खेवतें (हो) दुःख जले निरधार ॥सीमं०॥
ॐ ह्रीं विद्यमानविंशतितीर्थङ्करेभ्योऽष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं
निपा०
मिथ्यावादी दुष्ट लोभहंकार भरे हैं ।
सबको छिन में जीत जैन के मेर खड़े हैं ।।
फल अति उत्तमसों जजों(हो)वांछित फलदातार|सीमं०॥
ॐ ह्रीं विद्यमानविंशतितीर्थकरेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपा०
जल फल आठों दर्व अरघ कर प्रीति धरी है ।
गणधर इन्द्रनिहूर्त थुति पूरी न करी है ।।
'द्यानत' सेवक जान के (हो)जगत लेहु निकार ॥सीमं०॥
ॐ ह्रीं विद्यमानविंशतितीर्थङ्करेभ्योऽनर्घपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपा०
जयमाला
सोरठा
ज्ञान-सुधाकर चन्द भविक-खेत हित मेघ हो।
भ्रम-तम भान अमन्द तीर्थकर बीसों नमों।
चौपाई
सीमंधर सीमंधर स्वामी,
जुगमंधर जुगमंधर नामी ।

जात . बाहु बाहु जिन जगजन तारे, करम सुबाहु बाहुबल दारे ॥१॥ सुजातं केवलज्ञानं, स्वयंप्रभू प्रभु स्वयं प्रधानं । ऋपभानन ऋषि भानन दोष, अनन्तवीरज वीरजकोपं ॥२॥ सौरीप्रभ सौरीगुणमाल, सुगुण विशाल विशाल दयालं । वज्रधार भवगिरि वज्जर हैं, चन्द्रानन चन्द्रानन वर हैं ।।३।। भद्रबाहु भद्रनिके करता, श्रीभुजंग भुजंगम हरता । ईश्वर सबके ईश्वर छाजे, नेमिप्रभु जस नेमि विराजै ॥४॥ वीरसेन वीर जाने, महाभद्र महाभद्र बखाने । नमों जसोधर जसधरकारी, नमों अजित वीरज बलधारी ॥५॥ धनुष पांचस काय विराजें, आव कोडिपूरव सब छाजै । समवसरण शोभित जिनराजा, जग भव-जल-तारनतरन जिहाजा॥६॥ सम्यक रत्न-वयनिधि दानी, लोकालोक प्रकाशक जानी। शत इन्द्रनिकरि वंदित सौहैं, सुर नर पशु सबके मन मोहैं ॥७॥ दोहा तुमको पूर्ज वंदना करै, धन्य नर सोय । 'द्यानत' सरधा मन धरै, सो भी धरमी होय ॥८॥ ॐ ह्रीं विद्यमानविनितीर्थङ्करेभ्यो निवंपामीति स्वाहा। देव शास्त्र गुरु-विद्यमान बीस तीर्थंकर और सिद्ध पूजा [सच्चिदानन्द कृत] दोहा देव शास्त्र गुरु नमन करि, बीम तीर्थकर ध्याय । सिद्ध शुद्ध राजत मदा, नमूं चित्त हुलसाय ।। ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरु समूह श्री विद्यमान विंशति तीर्थकर श्री सिद्ध समूह अत्रावतरअवतर, अव तिष्ठ ठः ठः, अत्र मम सन्निहिनो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् । अनादिकाल से जग में स्वामिन् जल से शुचिता को माना।

गुद्ध निजातम सम्यक रत्नत्रय निधि को नहिं पहिचाना।।
अब निर्मल रत्नवय जल लेकर,श्री देव शास्त्रगुरु को ध्याऊ ।
विद्यमान श्री बीस तीर्थकर, मिद्ध प्रभु के
गुण गाऊं।
ॐ ह्रीं श्री देवशाम्ब गुरु ममूह श्री विद्यमान बीस तीर्थकर
ममूह,
श्री सिद्ध परमपिउभ्यों जलम् नि०म्वाहा ।
भव आताप मिटावन की निज में ही क्षमता ममता है।
अनजाने अब तक मैने, पर मैं की अटी ममता है ।
चन्दन मम शीतलता पाने, श्री देवशास्त्र गुरु को ध्याऊं।
विद्यमान श्री वीस नीर्थकर, मिद्ध प्रभु के गुण गाऊं ॥चन्दम्।।
अक्षय पद बिन फिग जगत की, लख चौरासी योनि मैं ।
अष्ट कर्म के नाश करन को, अक्षन तुम ढिग लाया मैं ।।
अक्षय निधि निज की पाने को श्री देव शास्त्र गुरु को ध्याऊँ ।।
विद्यमान श्री बीम तीर्थकर, मिद्ध प्रभु के गुण गाऊं ।।अक्षन।।
पुष्प मुगंधी मे आतम ने शील स्वभाव नसाया है ।
मनमथ वाणों में विध करके चहुंगति दुःख उपजाया है ।।
स्थिरता निज पाने को, श्री देव शास्त्र गम को ध्याऊं।
विद्यमान श्री बीम तीर्थकर, मिद्ध प्रभु गुण
गाऊं
पुष्पम्।।
पट् रम मिश्रित भोजन में, ये भूख न मेरी शान हुई ।
आतम रम अनुपम चखने में, इन्द्रिय मन इच्छा शमन हुई ।।
सर्वथा भूख के मंटन को, श्री देव शाम्ब गुरु को ध्याऊ ।
विद्यमान थी बीम तीर्थकर, मिद्ध प्रभु के गुण गाऊं।।नैवेद्यम्।।
जड़ दीप विनश्वर को अब तक समझा था मैंने उजियारा।
निज गुण दर्शायक जान दीप में, मिटा मोह का अंधियारा ॥
ये दीप समर्पित करके मैं, श्री देवशास्त्र गुरु को ध्याऊं।

विद्यमान श्री बीमतीर्थकर, मिद्ध प्रभु के गुण गाऊं ॥दीपम।।
ये धूप अनल में लेने से, कर्मों को नहीं जलाएगी।
निज में निज की शक्ति ज्वाला, जो राग द्वेष नसाएगी।
उस शक्ति दहन प्रगटाने को, श्री देव शास्त्र गुरु को ध्याऊं।
विद्यमान श्री बीस नीर्थकर, सिद्ध प्रभु के गुण गाऊ॥धूपम्।।
पिस्ता,बादाम,श्रीफल लवंग, नुव चरण निकट मैं ले आया।
आतम.रम पीने निजगुणफल मम मन अब उनमें ललचाया।।
अब मोक्ष महाफल पाने को, श्री देव शास्त्र गुरुको ध्याऊं।
विद्यमान श्री बीस तीर्थकर, मिद्ध प्रभु के गुण गाऊं ॥फलम्॥
अष्टम वसुधा पाने को, कर में ये आठों द्रव्य लिये ।
सहज शुद्ध स्वाभाविकना में, निज में निज गुण प्रगट भये ।।
ये अर्घ ममर्पण करके मैं, श्री देवशास्त्र गुरु को ध्याऊं।
विद्यमान श्री बीस तीर्थकर, मिद्ध प्रभ के गुण गाऊ ।।अर्घम्।।
जयमाला
नसे घातिया कर्म अरहंत देवा,
करे
सुर अमुर नर मुनि नित्य सेवा।
दरस ज्ञान सुख बल अनन्न के स्वामी,
छियालीस
गुण युत महा ईश नामी।
तेरी दिव्य वाणी सदा भव्य मानी,
महामोह विध्वंसिनी मोक्षदानी।
अनेकान्तमय
द्वादशांगी बखानी,
नमो लोक माता श्री जैन बानी ।

नगन
बिरागी अचाराज उवज्झाय साधू,
दरश ज्ञान भडार समता अराधू।
वेशधारी
मु एका विहारी,
निजानन्द मंडित मुकतपथ प्रचारी।
विदेह क्षक्ष में तीथंकर वीस राजे,
बिहरमान बन्दू
सभी पाप भाजे ।
नमू सिद्ध निरभय निरामय मुधामी,
अनाकुल समाधान महजाभिरामी ।।
देव शास्त्र गुरु बीम तीर्थकर, सिद्ध हृदय विच धरले र ।
पूजन ध्यान गान गुण करके, भवमागर जिय तरल रे ! अघम्।।
भूत भविष्यत् वर्तमान की नीम चौबीमी मैं ध्याऊ ।
चन्य चैन्यालय कृत्रिमाकृत्रिम तीन लोक में मन लाऊ ।।
ॐ ह्रीं त्रिकाल मबंधी नीस चौबीसी, त्रिलोक संबंधी
कृत्रिमाविम चैत्यचैत्यालय येभ्यो अर्ध नि०म्वाहा ।
चन्य भक्ति आलोचना चाहूं.
कायोन्मर्ग अघ नामन त ।
कृविमाकृत्रिम तीन लोक में, राजन हैं जिनबिब अनेक ॥
चतु निकाय के देव जज, ले अप्ट द्रव्य निज कुटुम्ब समेत ।
निज शक्ति अनुमार जजूं मैं, कर ममाधि पाऊ शिव खेत ।।
(पुष्पांजलि क्षेपण)
पूर्व मध्य अपरान्ह की वेला पूर्वाचार्यों के अनुमार ।
देव वन्दना कम भाव मे मकल कम की नासनहार ।।
पंच महागुरु मुमिरन करके कायोत्सर्ग करू मुखकार ।
महज स्वभाव शुद्ध लख अपना, जाऊंगा, मैं अव भवपार ।।
(कायोत्सर्ग पूर्वक नौ बार णमोकार मंत्र का जाप करें)

पोडश-कारण भावना भाऊ, दशलक्षण हिरदय धारूं । सम्यक् रत्नत्रय गहि करके, अष्ट करम को बन जारू ।। ॐ ह्रीं पोडणकारण भावना दशलक्षण धर्म, सम्यकरत्नत्र- येभ्यो अधंम् नि०म्वाहा। कृत्रिमाकृत्रिम-जिनचंत्य-पूजा कृत्याकृत्रिम-चारु-चैत्यनिलयान् नित्यं त्रिलोकोगतान् । वन्दे भावन-व्यन्तरान् द्युतिवरान् स्वर्गामरावासगान् ।। सद्गन्धाक्षत-पुष्प-दाम-चम्कैः सहोप-धूपः फल- द्रव्यनीरमुखैर्य जामि सतत दुष्कर्मणां शान्तये ॥१॥ [ॐ ह्रीं कृविमाकृविमचैत्यालयसम्बन्धिजिनबिम्वेभ्योऽयनिव० वर्षेषु वर्षान्तर-पर्वतेषु नन्दीश्वरे यानि च मन्दरेषु यावन्ति चैत्यायतनानि सर्वाणि बन्दे जिनपुङ्गवानाम् ॥२॥ अवनि-तल-गतानां कृत्रिमाकृत्रिमाणां । वन-भवन-गतानां दिव्य-वैमानिकानाम् । इह मनुज-कृतानां देवराजाचितानां । जिनवर-निलयानां भावतोऽहं स्मरामि ॥३॥ जम्बू-धातकि-पुष्करार्ध-वसुधा-क्षेत्र-वये ये लोके । भवा- - श्चन्द्राम्भोज-शिखण्डिकण्ठ-कनक-प्रावृड्यनाभाजिनाः । सम्यग्जान-चरित्र-लक्षणधरा दग्धाष्ट-कमेंन्धनाः । भूतानागत-वर्तमान-समये तेभ्यो जिनेभ्यो नमः ।।४ श्रीमन्मेरी कुलाद्रो रजतगिरिवरे शाल्मली जम्बुवृक्षे । वक्षारे चैत्यवृक्षे रतिकर-रुचके कुण्डले मानुपा के । इप्वाकारे जनाद्री दधिमुख-शिखरे व्यन्तरे स्वर्गलोके। ज्योतिर्लोके भिवन्दे भवनमहितले यानि चैत्यालयानि ॥५ द्वौ कुन्देन्दु-तुपार-हार-धवलो द्वाविन्द्रनील-प्रभो । द्वौ बन्धूक-सम-प्रभो जिनवृपो हो च प्रियगुप्रभो । गेपाः पोडग जन्म-मृत्यु-रहिताः सन्तप्त-हेम-प्रभा- स्ते सजान-दिवाकग: मुर-नुताः सिद्धि प्रयच्छन्तु नः ।।६ ॐ ह्री त्रिलोकमम्बन्धि-विमाविमचैत्यालयेभ्योऽघं निर्व। इच्छामि भते ! चेयभत्ति-काउसग्गों को तस्सालोचेउ अहलोय-तिरियलोय-उड्ढलोयम्मि किट्टिमाकिट्टिमाणि जाणि जिणचेइयाणि नाणि सव्वाणि तीसु वि लोएस भवणवासिय-वाणवितर- जोइसिय-कप्पवासिय नि चउबिहा देवा सपरिवारा दिव्वेण गधेण दिब्वेण पुप्फेण दिव्वेण धूवेण दिव्वेण चुण्णेण दिव्वेण वासेण दिव्वेण हाणेण णिच्चकालं अच्चति पुज्जति वदति णमस्सति । अहमवि इह सतो तत्य संताइ णिच्चकालं अच्चेमि पुज्जेमि वदामि णमंसामि । दुक्खक्खओ कम्मक्खओ बोहिलाहो सुगइ- गमणं समाहिमरणं जिणगुणसम्पत्ती होउ मज्झं । अथ पौर्वाह्निक-माध्याह्निक-आपराह्निक देववन्दनायां पूर्वा- चार्यानुक्रमेण सकलकर्मक्षयार्थ भावपूजा-वन्दना-स्तवसमेतं श्री पंचमहागुरुभक्निकायोत्सर्ग करोम्यहम् । ताव काय पावकम्मं दुच्चरियं वोस्सरामि । णमो अर हताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं । णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्वसाहूणं । सिद्धपूजा द्रव्याष्टक ऊर्वाधारयुत सबिन्दु सपरं ब्रह्मस्वरावेष्टितं, वर्गापूरित-दिग्गताम्नुज-दलं तत्सन्धि-तत्त्वान्वितम्। अन्त:पत्र-तटेष्वनाहतयुत ह्रोंकार-संवेष्टित, देवं ध्यायति यः स मुक्ति-सु-भगो वैरीभ-कण्ठीरवः ॥१ ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन् ! अवतर संवीपट् । ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ अत्र अवतर 3:ठः। ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन् ! अव मम सन्नि- हितो भव भव वषट् । निरस्त-कर्म-सम्बन्धं मूक्ष्म नित्यं निरामयम् । वन्देह परमात्मानममूर्तमनुपद्रवम् ॥२ - सिडयन्त्र स्थापनम् सिद्धौ निवासमनुग परमात्म-गम्य, हान्यादि-भाव-रहितं भव-वीत-कायम् । रेवापगा-वर-सरो यमुनोद्भवानां, नोरर्यजे कलशगर्वर-सिद्ध-चक्रम् ॥३॥ ॐ ह्रीं क्षायिकसम्यक्त्व-अनन्तज्ञान-अनन्तदर्शन-अनन्तवीर्य- अगुरुलघुत्व - अवगाहनत्व-मूक्ष्मत्व - निराबाधत्वगुणसम्पन्न मिद चक्राधिपतये मिद्धपरमेष्ठिने जन्ममृत्युविनाशनाय जलं निर्वपा० आनन्द-कन्द-जनक घन कर्म-मुक्त, सम्यक्त्व-गर्म-गरिमं जननाति-वोतम् । सौरभ्य-वासित-भुवं हरि-चन्दनानां, गन्धर्यजे परिमलवर-सिद्ध-चक्रम् ॥४॥ ॐ ह्रीं मिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेप्टिने समारनाप-विनाशनाय चन्दनं निवंपामीति म्वाहा । सर्वावगाहन-गुण सुसमाधि-निष्ठ, सिद्धस्वरूप-निपुण कमल विशालम् । सौगन्ध्य-शालि-वनशालि वराक्षतानां, पुजबजे शशि-निभर्वर-सिद्ध-चक्रम् ॥५॥ ॐ ह्रीं सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपप्टिने अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निवंपामीति स्वाहा । नित्यं स्वदेह-परिमाणमनादिमंज,

८२
पुष्पर्यजे
द्रव्यानपेक्षममृतं मरणाद्यतीतम् ।
मन्दार-कुन्द-कमलादि वनस्पतीना,
शुभतमर्वर-सिद्ध-चक्रम् ॥६॥
ॐ ह्रीं सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्टिने-कामबाणविध्वं-
मनाय पुप्पं निवंपामीति म्वाहा ।
ऊर्ध्व स्वभाव-गमन सुमनी-व्यपेतं,
ब्रह्मादि-बीज-सहित गगनावभासम् ।
क्षीरान्न-साज्य-वटके
रस-पूर्ण-गर्भ,
नित्यं यजे चरुवरवर-सिद्ध-चक्रम् ॥७॥
ॐ ह्रीं सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने क्षुधारोगविध्वं-
सनाय नैवेद्यं निवंपा।
आतङ्क-शोक-भय-रोग-मद - प्रशान्तं,
निर्द्वन्द्व-भाव-धरणं महिमा-निवेशम् ।
कर्पूर-वर्ति-बहुभिः कनकावदातर्दीप,
यंजे
रुचिवरर्वर-सिद्ध-चक्रम्
ॐ ह्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने मोहान्धकार
विनाशनाय दीपं निवंपा।
पश्यन्समस्त-भुवन युगपन्नितान्त,
वैकाल्य-वस्तु-विषये निविड-प्रदीपम् ।
सद्व्य-गन्ध-धनसार-विमिश्रितानां,
धूपैर्यजे
परिमलर्वर-सिद्ध-चक्रम्
॥६॥
ॐ ह्रीं सिद्धचकाधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अप्टकर्मदहनाय धूपं
॥८॥

सिद्धासुराधिपति - यक्ष नरेन्द्र - चक्र, ध्येयं शिव सकल-भव्य-जनः सुवन्द्यम् । नारिङ्ग-पूग- कदली- फल-नारिकेलः, सोहं यजे वरफलर्वर-सिद्धचक्रम् ॥१०॥ ॐ ह्रीं सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने मोक्षफलप्राप्तये फलं गन्धाढ्यं सुपयो मधुवत-गणः संगं वरं चन्दनं, पुप्पोघं विमलं सदक्षत-चयं रम्यं चरुं दीपकम् । धूपं गन्धयुतं ददामि विविधं श्रेष्ठ फलं लब्धये, सिद्धानां युगपत्कमाय विमल सेनोत्तरं वाञ्छितम् ॥११॥ ॐ ह्रीं सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेप्टिने अनयंपदप्राप्तये अर्घ० । सुख-शस्य-बीजं, ज्ञानोपयोगविमल विशदात्मरूपं, मूक्ष्म-स्वभाव-परम यदनन्नवोयम् । कमों घ-कक्ष-दहनं वन्दे सदा निम्पमं वर-सिद्ध-चक्रम् ॥१२॥ कर्माप्टक-विनिर्मुक्त मोक्ष-लक्ष्मी-निकेतनम् । सम्यक्त्वादि-गुणोपेतं सिद्धचक्रं नमाम्यहम् ।।१३।। ॐ ह्रीं मिददकाधिपतये मिद्धपरमेष्ठिने महाघ निवंपा० त्रैलोक्येश्वर-वंदनीय-चरणाः प्रापुः श्रियं शाश्वती, यानाराध्य निरुद्ध-चण्ड-मनसः सन्तोऽपि तीर्थङ्कराः।

सत्सम्यक्त्व - विबोध-वीर्य- विशदाव्याबाधताद्यर्गुण,
युक्तांस्तानिहतोप्टवीमि सततं सिद्धान् विशुद्धोदयान् ।।१३
(पुष्पाञ्जलि क्षिपामि)
जयमाला
विराग सनातन शान्त निरंश,
निरामय निर्भय निर्मल हस ।
सुधाम विबोध-निधान विमोह,
प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ॥
विदूरित · संमृति - भाव निरङ्ग,
समामृत - पूरित देव विसङ्ग ।
अबन्ध कषाय - विहीन विमोह,
प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ॥
निवारित - दुष्कृत - कर्म - विपाश,
सदामल - केवल-केलि-निवास ।
भवोदधि-पारग शान्त विमोह,
प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ॥
अनन्त - सुखामृत - सागर - धीर,
कलङ्क - रजो - मल-भूरि-समीर ।
विखण्डित-काम विराम विमोह,
प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ।।

विकार - विजित तजित - शोक,
विबोध-सुनेत्र-विलोकित लोक ।
विहार विराव विरङ्ग विमोह,
प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ॥
रजोमल - वेद - विमुक्त विगात्र,
निरन्तर नित्य सुखामृत-पात्र ।
मुदर्शन - राजित नाथ विमोह,
प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ॥
नरामर - वन्दित निर्मल भाव,
अनन्त-मुनीश्वर-पूज्य विहाव ।
सदोदय विश्व महेश विमोह,
प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ॥
विदम्भ वितृप्ण विदोष विनिद्र,
परापर शङ्कर सार वितन्द्र ।
विकोप विम्प विशङ्क विमोह,
प्रसोद विशुद्ध मुसिद्ध-समूह ॥
जरा - मरणोज्झित वीत -विहार,
विचिन्तित निर्मल निरहंकार ।
अचिन्त्य - चरित्र विदर्प विमोह,
प्रसोद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ॥
विवर्ण विगन्ध विमान विलोभ,

विमाय विकाय विशब्द विशोभ ।
अनाकुल केवल सर्व विमोह,
प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ।।
घत्ता
असम
समयसारं
चारु
चैतन्य - चिन्हें
पर - परिणति - मुक्तं पद्मनंदीन्द्र - वन्द्यम् ।
निखिल - गुण - निकेत सिद्धचक्रं विशुद्ध
स्मरति नमति यो वास्तौति सोभ्येति मुक्तिम् ।।
ॐ ह्रीं सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने महाघ्य निर्वपा०
समुच्चय चौवीसी पूजा
वृषभ अजित सम्भव अभिनन्दन,
सुमति पदम सुपासजिनराय ।
चंद पुहुप शोतल श्रेयांस नमि,
वासुपूज्य पूजितसुरराय ॥
विमल अनन्त धर्म जस उज्ज्वल,
शांति कुंथु अर मल्लि मनाय ।
मुनिसुव्रत नमि नेमि पार्श्वप्रभु,
वर्द्धमान पद
पुष्प चढ़ाय
॥

ॐ ह्रीं श्री वृषभादिमहावीरांतचतुर्विशतिजिनसमूह ! अब
अवतर अवतर, संवौषट् आह्वाननं । ॐ ह्रीं श्रीवृषभादिमहावी-
रांतचतुर्विशतिजिनसमूह ! अन तिष्ठ तिष्ठ, ठः ठः स्थापनं ।
ॐ ह्रीं श्री वृषभादिमहावीरांतचतुर्विशतिजिनसमूह ! अब मम
सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् ।
मुनिमनसम उज्ज्वल नीर, प्रासुक गंध भरा।
भरि कनककटोरी धीर, दीनी धार धरा ।।
चौवीसों श्रीजिनचंद, आनंदकंद सही ।
पद जजत हरत भव-फंद, पावत मोक्षमही ।।
ॐ ह्रीं श्रीवृषभादिवीरांतेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं ।
गोशीर कपूर मिलाय, केशर रंगभरी ।
जिन चरनन देत चढ़ाय, भव-आताप हरी॥चौवीसों.
ॐ ह्रीश्रीवृषभादिवीरांतेभ्यो भवातापविनाशनाय चन्दनं निर्व०
तन्दुल सित सोमसमान, सुन्दर अनियारे ।
मुकता-फलकी उनमान, पुंजधरों प्यारे ।। चौवीसों०
ॐ ह्रीं श्रीवृषभादिवीरांतेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्व०
वरकज कदंब कुरड, सुमन सुगंध भरे ।
जिन अग्र धरों गुनमंड, काम-कलंक हरे ।।
ॐ ह्रीं श्रीवृषभादिवीरांनेभ्यो कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निव०
मनमोहन मोदक आदि, सुन्दर सद्य बने ।
रसपूरित प्रासुक स्वाद, जजत क्षुधादि हने ॥चौवीसों.
ॐ ह्रीं श्रीवृषभादिवीरांतेभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्व.

आग। तमखंडन दीप जगाय, धारों तुम सब तिमिरमोह क्षयजाय, जान-कला जागे ॥चौवीसों० ॐ ह्रीं श्रीवृषभादिवीरांनेभ्यो मोहांधकारविनाशनाय दीपं निवं० दशगध हुताशनमांहि, हे प्रभु खेवत हों । मिस धूम करम जरिजाहिं, तुम पद सेवत हों॥चौवीसों ॐ ह्रीं श्रीवृषभादिवीरांनेभ्योऽप्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति. शुचि पक्व सुरसफल सार, सब ऋतुके ल्यायो। देखत दृगमनको प्यार, पूजत सुख पायो । चौवीसों० ॐ ह्रीं श्री वृषभादिवीरांतेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्व० जलफल आठों शुचिसार, नाको अर्घ करों। नुम को अरपों भवतार, भवतरि मोक्ष वरों ॥चौवीसों० ॐ ह्रीं श्रीवृपभादिवीरांनेभ्यो अनर्थ्यपदप्राप्नये अयं निव० जयमाला दोहा श्रीमत तीरथनाथ-पद, माथ नाय हित हेत । गाऊँ गुणमाला अब, अजर अमरपद देत ॥१॥ धत्ता जय भवतमभंजन जनमनकंजन, रंजन दिनमनि स्वच्छ करा ।

८६ शिवमगपरकाशक अरिगननाशक, चौवीसों जिनराज वरा ॥3॥ पद्धरि छन्द जय ऋपभदेव ऋपिगन नमंत, जय अजित जोत वसुअरि तुरंत । जय संभव भव-भय करत चूर, जय अभिनंदन आनंद - पूर ॥३॥ जय सुमति सुमति-दायक दयाल, जय पद्म पद्मदुतितन रसाल । जय जय मुपास भवणस नाश, जय चन्द चन्द तनदुतिप्रकाश ॥४॥ पुष्पदंत दुतिदंत - सेत, जय शीतल शीतलगुन-निकेत । श्रेयनाथ नुतसहसभुज्ज, जय वासवपूजित वासुपुज्ज ॥५॥ जय विमल विमलपद देनहार, जय जय अनत गुनगन अपार । जय धर्म धर्म शिवशर्म देत, जय शांति शांति पुष्टी करेत ॥६॥ जय कुंथु कुंथुवादिक रखेय, जय जय जय अर जिन वसु अरि क्षय करेय। जय मल्लि मल्ल हत मोहमल्ल, जय मुनिसुव्रत व्रतशल्ल दल्ल ॥७॥ जय नमि नित वासव-नुत सपेम, जय नेमिनाथ वृपचक्र नेम । पारमनाथ अनाथनाथ, जय वर्द्धमान शिवनगर साथ ॥८॥ जय घत्ता चौबीस जिनंदा आनंदकंदा पापनिकंदा सुखकारी। तिनपद जुगचंदा उदय अमंदा वासव वंदा हितधारी ॥ ॐह्रीं श्रीवृषभादिचतुर्विशनिजिनेभ्यो महार्घ निर्वपामीति स्वाहा भुक्ति मुक्तिदातार, चौबीसों जिनराजवर । तिन पद मन वचधार, जो पूर्ज सो शिव लहैं । इत्याशीर्वादः श्री आदिनाथ जिनपूजा अडिल्ल परम पूज्य वृषभेश स्वयंभूदेव जू, पिता नाभि मरुदेवि करें सुर सेव जू।

कनक-वरण तन तुङ्ग धनुष पन-शत तनो,
कृपा-सिंधु इत आइ तिष्ठ मम दुख हनो।
ॐ ह्रीं श्रीआदिनाजिनेंद्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेंद्र ! अव निष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेंद्र ! अब मम सन्निहितो भव भव वपट्
अष्टक
छन्द
द्रुतविलंबित तथा सुन्दरी
हिमवनोद्भव-वारि सुधारिक,
जजत हों गुन-बोध उचारिके।
परम-भाव सुखोदधि दीजिए,
जनम मृत्यु जरा छय कीजिए ।
ॐ ह्रीं श्रीवृषभदेवजिनंद्राय जन्ममृत्युविनाशनाय जलं निर्व
मलय-चन्दन दाह-निकंदनं,
घसि उभे करमें करि वंदनं ।
जजत हों प्रशमाश्रम दीजिए,
तपत ताप विधा छय कीजिए।
ॐ ह्रीं श्रीवृषभदेवजिनेन्द्राय भवनापविनाशनाय चन्दनं निव०
अमल तंदुल खण्ड-विवजित,
सित निशेण-हिमामिय-तजितं ।
जजत हों तसु पुंज धरायजी,

९२
.
अखय संपति द्यो जिनरायजी ।।
ॐ ह्रीं श्रीवृषभदेवजिनेन्द्रायअक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्व०
कमल चम्पक केतकि लीजिए,
मदन-भंजन
भेट धरीजिए।
परम शील महा सुखदाय हैं,
समर-सूल निमूल नशाय हैं।
ॐ ह्रीं श्रीवृषभदेवजिनेन्द्राय कामवाणविध्वंसनाय पुष्पं
सरस मोदन मोदक लीजिए,
हरन भूख जिनेश जजीजिए।
सकल आकुल-अन्तक-हेतु हैं,
अतुल शांत-सुधारस देतु हैं ।
ॐ ह्रीं श्रीवृषभदेवजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं
निविड मोह-महातम छाइयो,
स्व-पर-भेद न मोहि लखाइयो।
हरन-कारन दीपक
तास के,
जजत हों पद केवल भास के ।
ॐ ह्रीं श्रीवृषभदेवजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं
अगर-चन्दन आदिक लेयकें,
परम पावन गंध सुखेयके ।
अगनि-संग जरै मिस धूम के,
सकल कर्म उड़े यह घूमके ।।
ॐ ह्रीं श्रीवृषभदेवजिनेन्द्रायअप्टकमंदहनाय धूपं निर्व.

पावने, सुरस पक्व मनोहर विविध ले फल पूज रचावने । त्रिजगनाथ कृपा अब कीजिए, हमहि मोक्ष महाफल दीजिए ।। ॐ ह्रीं श्रीवृषभदेवजिनेन्द्राय मोक्ष फलप्राप्तये फलं निर्व० जल-फलादि समस्त मिलायके, जजत हों पद मंगल गायके । भगत-वत्सल दीन-दयालजी, करहु मोहि मुखी लखि हालजी ।। ॐ ह्रीं श्रीवृपभदेवजिनेन्द्राय अनयंपदप्राप्नय अघं निव० पञ्चकल्याणक द्रुतविलम्बित तथा सुन्दरी असित दोज अपाढ़ सुहावनी, गरभ-मंगल को दिन पावनी । हरि-सची पितु-मातहिं सेवही, जजत हैं हम श्रीजिनदेव ही ।। ॐ ह्रीं आपाढकृष्णद्वितीयादिने गर्भमङ्गलप्राप्ताय श्रीवृषभ- जिनदेवाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।

असित चैत सुनौमि सुहाइयो,
जनम-मंगल ता दिन पाइयो।
हरि महागिरिप जजियो तब,
हम जजें पद-पंकज को अब ।।
ॐ ह्रीं चैत्रकृष्णनवमीदिने जन्ममङ्गलप्राप्ताय श्रीवृषभनाथाय
अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
असित नौमि सुचंत धरे सही,
तप विशुद्ध सबै समता गही ।
निज सुधारससों भर लाइयो,
हम जजै पद अर्घ चढ़ाइयो ।
ह्रीं चैवकृष्णनवमीदिने दीक्षामङ्गलप्राप्ताय श्रीवृपभनाथाय
अर्घ निवंपामीति स्वाहा ।
असित फागुन ग्यारसि सोहनों,
परम केवल ज्ञान जग्यो भनो।
हरि-समूह जर्जे तहँ आइक,
हम जजै इत मंगल गाइके ।।
ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्णंकादश्यां ज्ञानसाम्राज्यमङ्गलप्राप्ताय श्री
वृषभनाथाय अर्ष निवंपामीति स्वाहा ।
असित चौदसि माघ विराजई,
परम मोक्ष सुमगल साजई ।
हरि-समूह
जजे कलासजी,
हम जजै अति धार हुलासजी ।।

ॐ ह्रीं माघकृष्णचतुर्दश्यां मोक्षमङ्गलप्राप्ताय श्री वृषभनाथाय
अर्घ निवंपामीति स्वाहा ।
जयमाला
घत्ताछन्द
पूरन पर्म,
जय जय जिन-चदा आदि-जिनंदा,
हनि भव-फंदा-कंदा
जू।
वासव-शत-वंदा
धरि आनंदा,
ज्ञान अमंदा नदा जू ।।
छन्द मोतियदाम
त्रिलोक-हितंकर
प्रजापति विष्णु चिदातम धर्म ।
जतीसुर
बुद्ध,
वृषक अशंक क्रियांबुधि शुद्ध ।
जब गर्भागम,मंगल जान,
तब हरि हर्ष हिये अति आन ।
पिता जननीपद सेव करेय,
अनेक प्रकार उमंग भरेय ।।
जये जब ही तब ही हरि आय,
गिरीद्रविष किय न्हौंन सुजाय ।
ब्रह्म-विदांवर

नियोग समस्त किये तित सार,
मुलाय प्रभु पुनि राज-अगार ॥
पिता कर सोपि कियो तित नाट,
अमंद अनंद समेत विराट ।
मुथान पयान कियो फिर इंद्र,
इहां सुर-सेव करें जिन-चंद ॥
कियो चिरकाल सुखात्रित राज,
प्रजा सब आनंद को तित साज ।
सुलिप्त सुभोगनि में लखि जोग,
कियो हरि ने यह उत्तम योग ।।
निलजन नाच रच्यो तुम पास,
नवों रस-पूरित भाव विलास ।
बजे मिरदंग दृमं दृम
चले पग झारि झनझन झोर ।।
घनाघन घंट करें धुनि मिष्ट,
बजै मुहचंग सुरान्वित पुष्ट ।
खड़ी छिन पास छिनहि आकाश,
लघू छिन दीरघ आदि विलास ।।
ततच्न ताहि विल अविलोय,
भये भवतै भय-भीत बहोय ।
सुभावत भावन बारह भाय,
जोर,

तहां दिव-ब्रह्म-ऋषीश्वर आय ॥
प्रबोध प्रभू सुगये निज धाम,
तब हरि आय रची शिवकाम ।
कियो कचलोंच पिराग-अरन्य,
चतुर्थमज्ञान लह्यो जग-धन्य ।
धरी तब योग छ मास प्रमान,
दियो शिरियस तिन्हें इख दान ।
भयो जब केवलज्ञान जिनद्र,
समोसृन-ठाठ रच्यो सु धनेंद्र ।।
तहाँ वृपतत्त्व प्रकाशि अशेष,
कियो फिर निभंय-थान प्रवेश ।
अनंत
गुनातम श्रीसुख-राश,
तुम्हें नित भव्य नमैं शिव-आश ।।
घत्तानन्द
दूर करो।
यह अरज हमारी, सुनि त्रिपुरारी,
जनम जरा मृत्यु
शिव-संपति दीजे, ढील न कीजे,
निज लख लीजे कृपा धरो ।
ॐ ह्रीं श्रीवृषभदेवजिनेन्द्राय महा निवंपामोति स्वाहा ।

जो ऋपभेश्वर पूज, मन-वच तन भाव शुद्ध कर प्रानो।
सो पावै निश्चसौं, भुवती औ मुक्ति सार मुख-थानी ।।
(इत्याशीर्वादः । पुष्पालि क्षिपामि)
श्रीचन्द्रप्रमजिन पूजा
कविवर वृन्दावनजो]
छप्पय
चारू
चरन आचरन,
चरन चित-हरन चिहनचर ।
चंद चंद-तन चरित,
चंद-थल चहत चतुर नर ॥
चतुक चंड चकचूरि,
चारि चिचत्र
गुनाकर ।
चंचल चलित सुरेश,
चूल-नुत चक्र
धनुरहर ।।
चर-अचर-हितू तारन-तरन,
सुनत चहकि चिरनंद शुचि ।
जिन-चंद-चरन चरच्यो चहत,
चित-चकोर नचि रच्चि रुचि ।।
दोहा
धनुप डेढसौ तुंग तन, महासेन-नृप-नद ।

मातु लक्ष्मना-उर जये, थापों चंद-जिनंद ।।
ॐ ह्रीं श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्र ! अव अवतर अवतर संवीपट् ।
ॐ ह्रीं श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्र ! अत्र निप्ट निप्टर: ट::
ॐ ह्रीं श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्र ! अव मम सन्निहिलो भव भव चपट् ।
अष्टक
गंगा-हृद-निरमल-नीर, हाटक-भृग भग।
तुम चरन जजों वग्बीर. मेटो जनम-जरा ॥
श्रीचंदनाथ दुति चद, नग्नन चंद लगे ।
मन वच नन जजन अमंद आतम-जानि जगे ।।१।।
ॐ ह्रीं श्रीचन्द्रप्रभाजिनेन्द्राय जन्मजपमृत्युमिनामना। जलं निवं.
श्रीखंड कपूर सुचंग, कगार-रंग भी ।
घसि प्रामुक-जलके मग, भव आताप हरी बिचंदनाथ.
ॐ ह्रीं श्रीनन्द्रप्रजिनेन्द्राव नापविनाशनाय चन्दनं निर्व
तंदुल सित सोम-समान, मम लय अनियारे।
दिय पुंज मनोहर आन, नुम पदतर प्यारे ॥श्रीचंदनाथ.
ॐ ह्रीं श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय क्षयपदप्राप्नचे अक्षतान् निवं०
मुर-द्रुमके मुम, मुरग, गंधित अलि आवं।
तासों पद पूजत चग, काम-विथा जावै ॥थीचंदनाथ.
ॐ ह्रीं श्रीचन्द्रप्रजिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्व.
नेवज नाना-परकार, इंद्रिय-बलकारी ।

सो ले पद पूजों सार, आकुलता हारी ॥श्रीचंदनाथ.
ह्रीं श्रीचन्दप्रभजिनेन्द्राय सुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्व०
तम-भंजन दीप संवार, तुम ढिंग धारतु हों।
मम तिमिर-मोह निरवार, यह गुन धारतु हों।।श्रीचंदनाथ
ह्रीं श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निव०
दश गंध हुताशनमाहि, हे प्रभु खेवतु हों।
मम करम दुष्ट जरि जाहि. यातें सेवतु हों॥श्रीचंदनाथ.
* ह्रीं श्रीचन्द्रप्रजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्व०
अति उत्तम फल सुमंगाय, तुम गुन गावतु हों।
पूजों तन मन हरषाय, विघन नशावतु हों॥श्रीचंदनाथ.
ह्रीं श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्व०
सजि आठों दरब पुनोत, आठों अंग नमों।
पूजों अष्टम जिन मीत, अष्टम अवनि गमों ॥श्रीचंदनाथ०
ॐ ह्रीं श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय अनर्थ्यपदप्राप्तये अध्यं निर्व०
स्वाहा
पंचकल्याणक
तोटक (वर्ण १२)
कलि पंचम चैत सुहात अली,
गरभागम-मंगल
मोद भली।
हरि हर्षित पूजत मातु पिता,

आप धरा, हम ध्यावत पावत शर्म सिता ।। ॐ ह्रीं चत्रकृष्णपञ्चम्यां गर्भमङ्गलप्राप्ताय श्रीचन्द्रप्रभजिने- न्द्राय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । कलि पौष इकादशि जन्म लयो, तब लोकविर्षे सुख-थोक भयो। सुर-ईश जज गिर-शीश तब, हम पूजत हैं नुत शीश अब ।। ॐ ह्रीं पोपकृष्णकादश्यां जन्ममंगलप्राप्ताय श्रीचन्द्रप्रभजने- न्द्राव अर्घ नियंपामीति स्वाहा । तप दुदर श्रीधर कलि-पौष इकादसि पर्व वरा । निज-ध्यानविर्ष लवलीन भये, धनि सो दिन पूजत विघ्न गये । ॐ ह्रीं श्रीपोषकृष्णकादश्यां निःक्रमणमहोत्सवमण्डिताय श्री- चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । वर केवल-भानु उद्योत कियो, तिहुँ लोकतणों भ्रम मेट दियो। कलि फाल्गुण-सप्तमि इन्द्र जजें, हम पूर्हि सर्व कलंक भजे ॥ ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्णमप्तम्यां केवलज्ञानमण्डिताय श्रीचन्द्रप्रभ- जिनेन्द्राय अर्घ निवपामीति स्वाहा। सित फाल्गुण सप्तमि मुक्ति गये, गुणवंत अनंत अबाध भये । हरि आय जज तित मोद धरें, हम पूजत ही सव पाप हरें ॥ ॐ ह्रीं फाल्गुन शुक्लसप्तम्यां मोक्षमंगलमण्डिताय श्रीचन्द्र- प्रभजिनेन्द्राय अर्घ निवंपामीति स्वाहा । जयमाला 4 दोहा हे मृगांक-अंकित-चरण, तुम गुण अगम अपार । गणधरसे नहि पार लहि, तौ को वरनत सार ॥१॥ तुम भगति हिये मम, प्रेरै अति उमगाय । . तात गाउँ सुगुण तुम, तुम ही होउ सहाय ॥२॥ छन्द पद्धरी (१६ मात्रा) जयचंद्र जिनेंद्र दया-निधान, भव - कानन-हानन-दव-प्रमान । जय गरभ-जनम-मंगल दिनन्द, भवि जीव-विकाशन शर्म-कंद ॥ दश लक्ष पूर्वकी आयु पाय, मन-वांछित सख भोगे जिनाय ।

१०३
लखि कारण ह जगते उदास,
चित्यो अनुप्रेक्षा सुख-निवास ।।
तितलोकांतिक बोध्यो नियोग,
हरिशिविकासजिधरियो अभोग ।
तापै तुम चढ़ि जिनचंदराय,
ता छिनको शोभा को कहाय ।।
जिन अंग सेत सित चमर ढार,
सितछत्र शीस गल-गुलकहार ।
सित रतन-जड़ित भूषण विचित्र,
सित चंद्र-चरण चर, पवित्र ।।
सित तन-द्युति नाकाधीश आप,
सित शिविकाकांधेरि
सुचाप ।
सित सुजस सुरेश नरेश सर्व,
सित चितमें चितत जात पर्व ।।
सित चंद-नगरतें निकसि नाथ,
सित वनमें पहुँचे सकल साथ ।
सित शिला-शिरोमणिस्वच्छ छाँह,
सित तप तित धारी
तुम जिनाह ।।
सित पयको पारण परम सार,
सित चंद्रदत्त दीनों उदार ।
सित करमें सो पय-धार देत,

१०४
मानो बांधत भव-सिंधु-सेत ॥
मानो
सुपुण्य-धारा प्रतच्छ,
तित अचरजपन सुरकिय ततच्छ ।
फिरजायगहन सित तप करत,
सितकेवल-ज्योति जग्यो अनंत ।।
लहि समवसरण-रचना महान,
जाके देखत सब पाप हान
जहें तरु अशोक शोभे उतंग,
सब शोकतनो चूरै प्रसंग ॥
मुर सुमन-वृष्टि नभतें
सुहात,
मनु मन्मथ तज हथियार जात ।
वानी जिन-मुखसौं खिरत सार,
मनु तत्त्व-प्रकाशन मुकर धार ।
जह चौंसठ चमर अमर दुरंत,
मनु सुजसमेघझरि लगिय तंत
सिंहासन है जहँ कमलजुक्त,
मनु
शिव-सरवरको कमल शुक्त ॥
दुंदुभि जित बाजत मधुर सार,
मनु करम-जीतको है नगार ।
सिर छत्र फिर वय श्वेत-वर्ण,
मनु रतन तीन वय-ताप-हर्ण ।

तन-प्रभातनों मंडल
सुहात,
भवि देखत निज-भव सात सात ।
मनुदर्पण-द्युतियह जगमगाय,
भवि-जनभव-मुख देखतसुआय ॥
इत्यादि विभूति अनेकजान,
बाहिज दीसत महिमा महान ।
ताको वरणत नहिं लहत पार,
तो अंतरंग को कहे सार ॥
अनअंत गुणनि-जुत करि विहार,
धरमोपदेश दे भव्य तार ।
फिर जोग-निरोधि अघाति हान,
सम्मेदथकी लिय मुकति-थान ॥
वृन्दावन वंदत शोश
नाय,
तुम जानत हो मम उर जु भाय ।
तातें का कहौं सु बार बार,
मन-वांछित कारज सार सार ॥
घताछंद
जय चंद-जिनंदा आनंद-कंदा,
भव-भय-भजन राज
रागादिक-द्वंदा हरि सब फंदा,
मुकतिमांहि थिति साजे है ॥
ह्रीं श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय पूर्णाघ निर्वपामीति स्वाहा ।

१०६
भव-भवके
छंद चौबोला
आठौं दरब मिलाय गाय गण,
जो भवि-जन जिन चंद जजें।
ताके
अघ भाजे,
मुक्तिसार सुख ताहि सजें ॥
जमके
वास मिटें
सब ताके,
सकल अमंगल दूर भजें
वृन्दावन ऐसो लखि
पूजत,
जाते शिवपुरि राज रजें
(इत्याशीर्वादः परिपुष्पाञ्जलि क्षिपामि)
श्री शांतिनाथ जिन-पूजा
[श्री बख्तावरसिंह रतनलाल]
सर्वार्थ सुविमान त्याग गजपुर में आये ।
विश्वसेन भूपाल तास के नन्द कहाये ।।
पंचम चक्री भये दर्प द्वादश में राजें ।
मैं सेऊँ तुम चरण तिष्ठिये ज्यों दुख भाजें ।
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथजनेन्द्र ! अव अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्र ! अव तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
* ह्रीं श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्र ! अव मम सन्निहितो भव भव वपट्

कोश मालती छन्द
.
-
पंचम उदधि तनो जल निरमल,
कंचन कलश भरे हर्षाय ।
धार देत ही श्रीजिन सन्मुख,
जन्म जरा मृत दूर भगाय ॥
शान्तिनाथ पंचम चक्रेश्वर,
द्वादश मदनतनो पद पाय ।
तिनके चरण
कमल के पूजे,
रोग शोक दुख दारिद जाय ॥
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं
निर्वपा०।
मलयागिर चंदन कदलीनंदन,
कुंकुम जल
के संग घसाय ।
भव आताप विनाशन कारण,
चरचू चरण मवै मुखदाय ॥शां०॥
ॐ ह्रीं श्रीशानिनाथ जिनेन्द्रायसंसार नापगंगविनाशनाय चन्दनं
पुण्य राशि सम उज्ज्वल अक्षत,
शशि मरीचि तिस देख लजाय ।
पुञ्ज
किये
तुम
आगे
अक्षयपद के हेतु बनाय ॥शां०॥
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथजनेन्द्राय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतान् ।
श्रीजिन,

सुर पुनीत अथवा अवनी के, कुसुम मनोहर लिये मंगाय । भेंट धरत तुम चरणन के ढिंग, ततक्षिण कामवाण नश जाय ॥शां० ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्राय कामवाणविध्वंसनाय पुष्पं भांति भांति भांति के सद्य मनोहर, कीने मैं पकवान संवार । भर थारी तुम सन्मुख लायो, क्षुधा वेदनी वेग निवार ॥शां० ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथजनेन्द्राय क्षुधावेदनीरोग विनाशनाय नैवेद्यं कर्पर लाय कर, दीपक ताके धरे प्रजार । जगमग जोत होत मन्दिर में, मोह अंध को देत ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्राय मोहांधकार विनाशनाय दीपं नि० देवदारु कृष्णागरु चंदन, तगर कपूर सुगंध अपार । खेॐ अष्ट करम जारन को, धूप धनंजय माहि ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनापजिनेन्द्राय अप्टकर्मदहनाय धूपं निवंपा० नारंगी बादाम सुकेला, एला दाडिम फल सहकार । घृत सनेह सुटार ॥शां० सुडार ॥शां० कंचन थाल मांहि धर लायो, अरचत ही पाऊँ शिवनार ॥शां० ॐ ह्रीं श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्राय मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्व जल फलादि वसु द्रव्य संवारे, अर्घ चढ़ाये मंगल गाय । 'बखत रतन' के तुम हो साहिब, दीजे शिवपुर राज कराय ॥शां० ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्राय अनर्घपद प्राप्तये अर्घ निर्व० पंचकल्याणक भादव सप्तमि श्यामा, सर्वार्थ त्याग नागपुर आये। माता ऐरा नामा, मैं पूजू अर्घ शुभ लाये ।। ॐ ह्रीं श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्राय भाद्रपदकृष्णसप्तम्यां गर्भ- कल्याणकप्राप्ताय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । जन्मे श्रीजिनराजा, जेठ असित चतुर्दशी सोहै । हरिगण नावें माथा, मैं पूजूं शान्ति चरण युग जो है। ॐ ह्रीं श्री शान्तिनायजिनेन्द्राय ज्येष्ठकृष्णचतुर्दशी जन्म- कल्याणकप्राप्ताय अर्घ निर्वपामोति स्वाहा । चौदश जेठ अंधेरी, कानन में जाय योग प्रभु लीन्हा । नवनिधि रत्न सुछारी, मैं वंदूं आत्मसारजिन्ह चीना ।।

ॐ ह्रीं श्री शांतिनाजिनेन्द्राय ज्येष्ठ कृष्णचनुर्दश्यां तप-
कल्याणकप्राप्नाय अर्घ निवंपामीति स्वाहा।
पोप दशै उजियारा,
अरि घाति ज्ञान भानु
जिन पाया।
प्रातिहार्य वसुधारा,
मैं सेॐ
सुर नर जास यश गाया।
ॐ ह्रीं श्रीशानिनाजिनेन्द्राय पोपशुक्ल दशम्यां केवल-
ज्ञानप्राप्ताय अर्घ निर्वपामीति म्वाहा।
सम्मेद शैल भारी, हरि करि अघाति मोक्ष जिन पाई।
जेठ चतुर्दशि कारी; मैं पजं सिद्ध थान सुखदाई ।।
ॐ ह्रीं श्रीशांतिनाजिनंद्राय ज्येप्टकृष्णचतुर्दश्यां मोक्ष-
मंगलप्राप्ताय अर्घ निर्वगामीनि स्वाहा।
जयमाला
भये आप जिन देव जगत में सुख विस्तारे,
तारे भव्य अनेक तिन्हों के मंकट टारे ।
टारे आठों कर्म मोक्ष सुख तिन को भारी,
भारी विरद निहार लही मैं शरण तिहारी।।
चरणन को सिर
नाय हूँ,
दुःख
दरिद्र संताप
हर सकल कर्म छिन एक में,
शांति जिनेश्वर
शांति कर ॥१॥

सारंग लक्षण चरन उन्नत धनु हाटक वर्ण शरोर नमूं शांति जग में, चालीस । दुति, ईस ॥२॥ गिनाऊ कछु छन्द भुजंगप्रयात प्रमो आपने वं + फंद तोड़े, में तिनों नाम थोड़े। पडो अम्बुधे वत्र श्रीपाल राई, जपो नाम तंगे भए थे महाई ।। धरो राय ने मेट सो मूलिका पै, जपी आपके नाम की सार जाप । भये थे महाई नर्व देव आये, करी फूल वर्मा न-विष्टर मुहाये ।। जवै लाख के धाम वन्हि प्रजागे, भयो पांडवों पं महाकप्ट भारी । जवै नाम तेरे तनी टेर कोनी, करी थी विदुर ने वही राह दोनी । हरी द्रोपदो धानको खड मांहीं, तुम्हीं थे सहाई भला और नाहीं । लियो नाम तेरो भलो शील पालो,

बचाई तहां ते सबै दुःख टालो ।।
जब जानकी रामने थी निकारी,
धरे गर्भ को भार उद्यान डारी ।
रटो नाम तेरो सबै सौख्यदाई,
करी दूर पीड़ा सु छिन ना लगाई।
विसन सात सेवे करे तस्कराई,
अंजन जु तारा घड़ी ना लगाई।
सहे अंजना चंदना दु:ख जेते,
गये भाग सारे जरा नाम लेते ।।
घड़े बीच में सास ने नाग डारो,
भलो नाम
तेरो
जु
सोमा संभारो।
गई काढ़ने को भई फूल माला,
भई है विख्यातं सबै दुःख टाला ॥
इन्हें आदि देके कहाँलों बखाने,
सुना विरद भारी तिहुँलोक जानें ।
अजी नाथ मेरी जरा ओर हेरो,
बड़ी नाव तेरी रती बोझ मेरो ॥
गहो हाथ स्वामी करो वेग पारा,
कहूं क्या अब आपनी मैं पुकारा ।
सबै ज्ञान के बीच भासी तुम्हारे,
करो देर नाहीं अहो शांति प्यारे ।

घत्तानंद
श्रीशांति तुम्हारो कीरति भारी,
सुर नर नारी
गुणमाला ।
'बखतावर' घ्यावे 'रतन' सुगावे,
मम दुःख दारिद सब टाला ॥
ॐ ह्रीं श्रीशांतिनाथ जिनेन्द्राय गर्भ जन्म तप ज्ञान निर्वाण
पचकल्याणक प्राप्ताय महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
शिखरणी छंद
अजी ऐरानंद छवि लखत हैं आय अरनं ।
धरै लज्जा भारी करत थुति सो लाग चरनं ।।
करे सेवा सोई लहत सुख सो सार छिन में ।
घने दीना तारे हम चहत हैं वास तिन में ॥१३
इत्याशीर्वाद:
श्री पाश्र्वनाथ जिनपूजा
[कविवर बखतावरजी]
वर स्वर्ग प्राणतको विहाय सुमात वामा-सुत भये ।
अश्वसेन के पारस जिनेश्वर चरण तिनके सुर नये ॥
नौ हाथ उन्नत तन विराजे उरग-लक्षण अति लस ।
थापूं तुम्हें जिन आय तिष्ठो कर्म मेरे सब नसें ॥

ॐ ह्रीं श्री पार्श्वनायजिनेंद्र ! अव अवतर अवतर सवौषट् । ॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथजिनेंद्र ! अव तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । ह्रीं श्री पाश्वनायजिनेंद्र ! अव मम सन्निहितो भव भव वषट् चामर छंद क्षीर सोम के समान अंबु-सार लाइये, हेम-पात्र धारके सु आपको चढ़ाइये । पार्श्वनाथदेव सेव आपकी करूं सदा, दीजिये निवास मोक्ष भूलिये नहीं कदा ॥ ॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथजिनेन्द्राय गर्भजन्मतपज्ञाननिर्वाणपंच- कल्याणकप्राप्ताय जलं निर्वपामीति स्वाहा । चंदनादि केसरादि स्वच्छ गंध लीजिये। आप चर्न चर्च मोह-तापको हनीजिये ॥पार्श्व० ॐ ह्रीं श्रीपाश्र्वनाजिनेन्द्राय ! गर्भजन्मतपज्ञाननिर्वाणपंच- कल्याणकप्राप्ताय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा । फेन चंदके समान अक्षतं मँगायके । पादके समीप सार पूजको रचायके ॥पार्श्व० ह्रीं श्री पार्श्वनाजिनेन्द्राय ! गर्भजन्मतपज्ञाननिर्वाणपंच- कल्याणकप्राप्ताय अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा। केवड़ा गुलाब और केतको चुनाइये । धार चर्णके समीप काम को नशाइये ॥पार्श्व० ह्रीं श्रीपाश्वनाथ जिनेन्द्राय ! गर्भजन्मतपज्ञाननिर्वाणपंच- कल्याणकप्राप्ताय पुष्पं नियंपामीति स्वाहा।

११५ घेवरादि बावरादि मिष्ट सपिमें सनें । आप चर्ण अर्चतें क्षुधादि-रोगको हनें ॥पार्श्व० ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय ! गर्भजन्मतपज्ञाननिर्वाणपंच- कल्याणकप्राप्ताय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा । लाय रत्न-दीपको सनेह-पूरके भरूं । बातिका कपूर वार मोह-ध्वांतको हरूं |पावं. ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनायजिनेन्द्राय ! गर्भजन्मतपज्ञाननिर्वाणपंच- कल्याणकप्राप्ताय दीपं निर्वपामीति स्वाहा । धूप गंध लेयके सु अग्नि संग जारिये । तास धूमके सु मंग कर्म अष्ट वारिये ॥पार्श्व० ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय ! गर्भजन्मतपज्ञाननिर्वाणपंच- कल्याणप्राप्ताय धूपं निर्वपामीति स्वाहा । खारकादि चिर्भटादि रत्न-थारमें भरूं । हर्प धारके जजू सुमोक्ष सौख्यको वरूं ॥पार्श्व० ॐ ह्रीं श्रीपाश्र्वनाथ जिनेन्द्राय ! गर्भजन्मतपज्ञाननिर्वाणपंच- कल्याणकप्राप्ताय फलं निर्वपामीति स्वाहा । नीर गंध अक्षतं सुपुष्प चारु लीजिये। दीप धूप श्रीफलादि अर्घतें जजीजिये ।।पार्श्व० ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय ! गर्भजन्मतपज्ञाननिर्वाणपंच- कल्याणकप्राप्ताय अर्घ निवंपामीति स्वाहा।

पंचकल्याणक शुभ प्राणत स्वर्ग विहाये, वामा माता उर आये। वैशाखतनी दुति कारी, हम पूजें विघ्न-निवारी ।। ॐ ह्रीं श्रीपाश्वनाथजिनेन्द्राय ! बैशाखकृष्णद्वितीयायांगर्भ- कल्याणकप्राप्ताय अर्घ निवंपामीति स्वाहा । जन्मे त्रिभुवन-सुखदाता, कलिइकादशि पौष विख्याता। स्यामा-तन अद्भुत राजे, रवि-कोटिक तेज सु लाजे ॥ ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाजिनेन्द्राय ! पोपकृष्णकादश्यां जन्म- कल्याणकप्राप्ताय अर्घ निपामीति स्वाहा । कलि पौष इकादशि आई, तब बारह भावना भाई। अपने कर लौंच सुकीना, हम पूजें चर्न जजीना ।। ॐ ह्रीं श्रीपाश्र्वनाजिनेन्द्राय पोषकृष्णकादश्यांतपःकल्याणक- प्राप्ताय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। वह कमठ जीव दुखकारी, उपसर्ग कियो अतिभारी। प्रभु केवलज्ञान उपाया, अलि चैत चौथ दिन गाया । ॐ ह्रीं श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय ! चैत्र कृष्णचतुर्थ्यां ज्ञान- कल्याणकप्राप्ताय अर्घ निर्वपामोति स्वाहा । सित सावन सातें आई, शिव-नार तब जिन पाई। सम्मेदाचल हरि माना, हम पूजें मोक्ष-कल्याना ॥ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय श्रावणशुक्लसप्तम्यां मोक्ष- कल्याणकप्राप्ताय अब निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला पारसनाथ जिनंदतने वच पौनभखी जरते सुन पाये, करो सरधान लहो पद आन भये पद्मावति-शेष कहाये। नाम प्रताप टरे संताप सुभव्यनको शिव-शर्म दिखाये, हो अश्वसेन के नंद भले गुण गावत हैं तुमरे हरषाये ॥ दोहा केकी-कंठ समान छवि, वपु उतंग नव हाथ । लक्षण उरग निहार पग, बंदूं पारसनाथ ।। मोतियादाम छंद रची नगरी षट् मास अगार, बने चहुँ गोपुर शोभ अपार । सु कोटतनी रचना छवि देत, कारनपै लहक बहु केत ॥१॥ बनारस की रचना जु अपार, करी बहु भांत धनेश तैयार । तहाँ अश्वसेन नरेंद्र उदार, करें मुख वाम सु दे पटनार ॥ तजो तुम प्राणत नाम विमान, भये तिनके घर नदन आन । तब पुर इन्द्र नियोगनि माय, गिरींद्र करी विध न्होन सु जाय ।

११८
वर्ष कुमार,
पिता घर सौंप गये निज धाम,
कुबेर करे वसु जाम जु काम ।
वढ़ें जिन दूज मयंक समान,
रमैं बहु बालक निर्जर आन ।
भये जब अष्टम
घरे अणुव्रत महा सुखकार ।
पिता जब आन करी अरदास,
करो तुम ब्याह वरो मम आस ।।
करो तब
नाहिं रहे जगचंद,
किए तुम काम कषायजु मंद ।
चढ़े गजराज
कुमारन संग,
गंगतनी सुतरंग ॥
लख्यो इकरंक करे तप घोर,
चहूं दिस अग्नि बले अतिजोर।
कही जिननाथ अरे सुन भ्रात,
करे बहु जीवतनी मत घात ।।
भयो तब कोप कहै कित जीव,
जले तब नाग दिखाय सजीव ।
लख्यो यह कारण भावन भाय,
नये दिव-ब्रह्म-ऋषी सब आय ।।
तब सुर चार प्रकार नियोग,
सु देखत

१११
धरी शिविका निज-कंध मनोग ।
करो वन मांहिं निवास जिनंद,
धरे व्रत चारित आनंद-कंद ।।
गहे तहाँ अष्टम के उपवास,
गये धनदत्ततने
जु अवास।
दियो पयदान महा सुखकार,
भई पण वृष्टि तहाँ तिह वार ॥
गये फिर काननमांहिं दयाल,
धरो
तुम
योग सबै अघ टाल ।
तबै वह धूम सुकेत अयान,
भयो कमठाचर को सुर आन ।
कर नभ गौन लखे तुम धीर,
जू पूरव वर विचार गहीर ।
करो उपसर्ग भयानक घोर,
चली
बहु
तीक्ष्ण पवन झकोर ।।
रहो दशहूँ दिश में तम छाय,
लगी बहु अग्नि लखी नहिं जाय ।
सुरुंडन के बिन मुण्ड दिखाय,
पड़े जल मूसल धार अथाय ।
पद्मावति कंत धनंद,
नये युग आय तहाँ जिनचंद ।
तब

१२० देखत हाल, भगो तब रंक स लहो तब केवल ज्ञान विशाल ॥ दियो उपदेश महाहितकार, सु भव्यन बोधि सम्मेद पधार । सुवर्णहिभद्र जू कूट प्रसिद्ध, वरी शिवनारि लही वसु ऋद्ध । जजूं तुम चर्ण दोऊ कर जोर, प्रभू लखिये अब ही मम ओर । कहै 'बखतावर रत्न' बनाय, जिनेश हमें भव-पार लगाय ।। धत्ता जय पारस-देवं, सुर-कृत सेवं, वंदित चरण सुनागपती । करुणाके धारी, पर-उपकारी, शिव-सुखकारी कमंहती॥ ॐ ह्रीं श्रीपाश्र्वनाथजिनेन्द्राय गर्भजन्मनपज्ञाननिर्वाण पंच- कल्याणकप्राप्ताय महायं निर्वपामीति म्वाहा । जो पूजे मन लाय, भव्य पारस प्रभु नित ही । ताके दुख सब जाय, भीति व्याप नहिं कित ही ।। सुख-सम्पति अधिकाय, पुत्र-मित्रादिक सारे। अनुक्रमसों शिव लहे, 'रतन' इम कहें पुकारे । (इति आशीर्वादः । पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि)

१०१
no
करुणा
धन
श्रीवर्द्धमान जिन-पूजा
[कविवर वृन्दावनजी]
मत्तगयंद
श्रीमत वीर हरें भव-पीर, भरें सुख-सीर अनाकुलताई।
केहरि-अंक अरीकरदंक, नये हरि-पंकति-मौलि मुआई ।।
मैं तुमको इत थापतु हौं प्रभु,
भक्ति - समेत हिये हरषाई ।
धारक देव,
इहाँ अव तिष्ठहु शीघ्रहि आई ।।
ॐ ह्रीं श्रीवर्द्धमानजिनेन्द्र ! अव अवतर अवतर मंवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्रीवर्द्धमानजिनेन्द्र ! अव तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्रीवद्धं मानजिनेन्द्र ! अत्र मम मन्निहिता भव भव
वपट् ।
क्षीरोदधिसम शुचि नीर, कंचन-भृङ्ग भएँ ।
प्रभु वेग हरो भव-पीर, यातें धार करों।
श्रीवीर महा अतिवीर, मन्मति नायक हो ।
जय वर्द्धमान गुण-धीर, सन्मति-दायक हो ॥१।।
ॐ ह्री श्रीवद्धं मानजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं
निर्व०
मलयागिर - चंदन सार, केशर - संग घमों।
प्रभु भव-आताप-निवार, पूजत हिय हुलसों ।।श्रीवीर०
ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय भवनापविनाशनाय चंदनं निवं०

१२२
तंदुल सित शशि-सम, शुद्ध, लीनो थार भरी।
तसु पुञ्ज धरों अवरुद्ध, पावों शिव-नगरी ॥श्रीवीर०
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतान् निर्व.
सुरतरु के सुमन समेत, सुमन सुमन प्यारे ।
सो मनमथ-भंजन-हेत, पूजों पद थारे ॥श्रीवीर०
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय कामवाणविध्वंसनाय पुष्पं निवं .
रस-रज्जत सज्जत सद्य, मज्जत थार भरी।
पद जज्जत रज्जत अद्य, भज्जत भूख-अरी॥थोवीर०
ॐ ह्रीं श्रीमहावीर जिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नवेद्यं ।
तम-खंडित मंडित-नेह, दीपक जोवत हों।
तुम पदतर हे सुख-गेह, भ्रम-तम खोवत हों।थोवीर०
ह्मीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं
हरिचन्दन अगर कपूर, चूर सुगन्ध करा ।
तुम पदतर खेवत भूरि, आठों कर्म जरा ॥श्रीवीर०
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अप्टकर्मविध्वंसनाय धूप निर्व.
ऋतु-फल कल-वजित लाय, कंचन थार भरा।
शिव-फल-हित हे जिनराय,तुम ढिंग भेट धरा।।श्रीवीर०
ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निवं .
जल-फल वसु सजि हिम-थार, तन-मन-मोद धरों।
गुण गाऊं भव-दधि तार, पूजत पाप हरों ॥श्रीवीर०
ह्रीं श्रीव मानजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अध्यं निर्व.

१२३ पंचकल्याणक राग टप्पाचाल मोहि राखो हो सरना, श्रीवर्द्धमान जिनरायजी । मोहि. गरभ साढ़ सित छट्ट लियो थिति, त्रिशला उर अघ- हरना॥ सुर सुरपति तित सेव करो नित, मैं पूजों भव - तरना । मोहि० ॐ ह्रीं आपाढशुक्लपप्ठयां गर्भमंगलमंडिताय श्रीमहावीर- जिनेन्द्राय अर्घ निर्व० । जनम चत सित तेरस के दिन, कुंडलपुर कन वरना । सुरगिरि सुरगुम पूज मैं पूजों भव - हरना ॥ मोहि० ॐ ह्रीं चैत्र शुक्लत्रयोदश्यां जन्ममंगलप्राप्ताय श्रीमहावीर- जिनेन्द्राय अर्घ निवं पा० । मंगसिर असित मनोहर दशमी, दिन तप आचरना । नृप - कुमार घर पारन कोनो, मैं पूजों तुम चरना ॥ मोहि० ॐ ह्रीं मार्गशीपंकृष्णदशम्यां नपामंगलमडिताय थीमहावीर- जिनेन्द्राय अर्घ निर्व पा० । रचायो, १२४ तारे, शुकल दशै वैशाख दिवस अरि, घाति चतुक छय करना। केवल लहि भवि भव-सर जजों चरन सुख भरना । मोहि० ॐ ह्रीं वैशाखशुक्लदशम्यां जानकल्याणकप्राप्ताय श्रीमहावीर- जिनेन्द्राय अर्घ निवंपा० । कातिक श्याम अमावस शिव-तिय, पावा पुरतं परना । गन-फनि-वृद जजै तित बहुविधि, मैं पूजों भय - हरना ॥ मोहि० ॐ ह्रीं कार्तिककृष्णामावस्यां मोक्षमंगलमंडिताय श्रीमहावीर- जिनेन्द्राय अर्घ निवपा० । जयमाला छन्द हरिगीता गनधर असनिधर, चक्रधर, हलधर गदाधर वरवदा । अरु चापधर विद्यासुधर, तिरसूलधर सेवहि सदा ॥ दुख - हरन आनंद - भरन तारन, तरन चरन रसाल है ।

१२५ - सुकुमाल गुन - मनिमाल उन्नत. भालकी जयमाल है ॥१॥ धत्तानंद जय विशला-नंदन, हरिकृत-वंदन, जगदानदन, चदवरं । भव-ताप-निकदन तन कन-मंदन, रहित सपंदन नयन धरं ॥२॥ छन्द तोटक जय केवल - भानु कला - सदन, भवि - कोक - विकाशन - कंज-वनं । जग जीत - महारिपु - मोह - हरं, रज ज्ञान - दृगांवर चूर - करं॥ गर्भादिक - मंगल मंगल - मडिन हो, दुख - दारिद को नित खंडित हो । जगमाहिं तुम्ही सत पंडित हो, तुम ही भव - भाव - विहंडित हो । हरिवंश - सरोजनको रवि हो, बलवंत महंत तुम्हीं कवि हो । लहि केवल धर्म - प्रकाश अबलों सोई मारग गजति यो । पुनि आपतने गुनमाहिं सही, कियो,

१२६
बजे,
सजे।
सुर मग्न रहैं
जितने सब ही।
तिनको वनिता गुन गावत हैं,
लय माननि सों मन - भावत हैं।
पुनि नाचत रंग उमंग भरी,
तुम भक्तिविर्षे पग येम धरी ।
झननं झननं झननं
झननं,
सुर लेत तहाँ तननं तननं ॥
घननं घननं घन घंट
दृमदृ दृमदृ मिरदंग
गगनांगन - गर्भगता
सुगता,
ततता ततता अतता वितता ॥
धृगतां धृगतां गति बाजत है,
सुरताल रसाल जु छाजत है।
सननं सननं सननं
में,
इक रूप अनेक जु धारि भमें ।
कइ नारि सुवीन बजावति हैं,
तुमरो जस उज्जल गावति हैं ।
कर - तालविर्ष
करताल धरें,
सुर ताल विशाल जु नाद करें।
इन आदि
अनेक उछाह भरी,
सुर भक्ति करें प्रभुजी तुमरी ।

तुमरे
पन
तुम ही जग-जीवनि के पितु हो,
तुमही बिन कारनतें हितु हो ।
तुमही सब विघ्न - विनाशन हो,
तुमही निज आनंद - भासन हो।
तुमही चित - चिंतित दायक हो,
जगमाहिं तुम्हों सब लायक हो ।
मंगलमाहिं सही,
जिय उत्तम
पुन्न
लियो सब ही।
हमको तुमरी सरनागत है,
तुमरे गुन में मन पागत है।
प्रभु मो हिय आप सदा बसिये,
जब लों वसु कर्म नहीं नसिये।
तव लों तुम ध्यान हिये बरतो,
तब लों श्रुत चितन चित्त रतो ।।
तब लों व्रत चारित्र चाहनु हों,
तब लों शुभ भाव मु गाहतु हों।
तब लों सत - संगति नित्त रहो,
तब लों मम संजम चित्त गहो ।।
जब लों नहिं नाश करो अरि को,
शिव-नारि बरों समता धरि को।
यह द्यो तब लों हमको जिनजी,

१२८
भरा।
हम जाचतु हैं इतनी सुन जी ॥
धत्तानंद
श्रीवीर - जिनेशा नमित - सुरेशा,
नाग - नरेशा
भगति
'वृन्दावन' ध्यावै विघन नशावे,
वांछित पाव
ॐ ह्रीं श्रीवर्द्ध मानजिनेन्द्राय महार्घ निर्व पामीति स्वाहा ।
श्रीसन्मति के जुगल पद, जो पूजे धरि प्रीति ।
'वृन्दावन' सो चतुर नर, लहै मुक्ति-नवनीत ।।
शीर्वादः । पुष्पाञ्जलि क्षिपामि )
शर्म - वरा
॥
श्री गोम्मटेश्वर पूजा
मत्तगयंद छंद
स्थापना
देखत ही द्युतिवन्त हरे, तनकी छवि, सुधाधर हारे ।
ध्यान विवेक तपोबल से, जिनने अरि-कर्म प्रचंड संहारे ।।
बाहु पसार अनुग्रह की, भवसागर से भवि जीव उबारे ।
सो जिन बाहुबलीश, दयाकर तिष्ठहु मानस आय हमारे ।
ॐ ह्रीं श्रीवाहुबलिभगवन् अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्रीबाहुबलिभगवन् अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्रीबाहुबलिभगवन् मम सन्निहितो भव भव बपट् ।

१२६
मदनतन
हरिगीतिका छंद
शुचि सित सलिल की धार, शशि रस तुल्य गुण की खान है ।
सो चरण मन्मुख ईश के, भवसिंधु-सेतु समान है।
वमुकर्मजेता मोक्षनेता,
अभिराम है।
भगवान वाहुबलीश को, नित शीशनाय प्रणाम हैं ।।
ॐ ह्रीं भगवते श्रीबाहुबलिजिनाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय
जलं निवपामीति म्वाहा।
केशर
कपूर मुगन्धयुत श्रीखण्ड संग घमाइये ।
भवतापभंजन देव पद की भव्य पूज रचाइये ॥वमुकमं०।।
ॐ ह्रीं भगवते श्रीबाहुबलिजिनाय संसारनापविनाशनाय चंदन
निर्वपामीति स्वाहा।
अक्षत अखंड मुधांशुकरमम धवल शुद्ध चुनायके ।
अक्षय महापद हेतु चरचं चरण निन गुण गायक ॥वमुकमं०।।
ॐ ह्रीं भगवने श्रीवाहुनिजिनाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान
निर्वपामोति स्वाहा।
अम्भोज चंपक मालनी बेला गुलाव प्रमृन
ले ।
पदपद्म पूजू देवके, हैं. मदन मद जिनने दल ॥वमुकम०।।
ॐ ह्रीं भगवते श्रीवाहुर्याजिनाय कामवाणविध्वंसनाय पुष्पं
निर्वपामीनिम्बाहा।
अनिमिष्ट मोहन भोग मादक घंवदिक घृनमने ।
पकवान मे भगवान को पृज क्षुधादिक जिन हुने ।।वमुकमं०।।
ॐ ह्री भगवते श्रीबाहुबलिजिनाय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं
निर्वपामीति स्वाहा।

लेकर जजूं कर्पर घृत रत्नादिकी दोपावली । जिनकी प्रभा में ही प्रगट गुणराशि आनमकी भली ॥वसुकर्म० ।। ॐ ह्रीं भगवते श्री बाहुबलिजिनाय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निवंगामीनि स्वाहा। सुरदारु अगर कपूर नगर मुगन्ध चंदन से बनी। ददिशारंजन धूप दशविधि अग्र खेऊ पावनी ॥वसुकर्म०॥ ॐ ह्रीं भगवते श्री वाहुबलिजिनाय दुष्टाप्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा । बादाम पिस्ता नारियल अंगूर कदली आम हैं। शिव अमरफल हित चर्चते हम नाथ तव पदधाम हैं ।।वसुकर्म०॥ ॐ ह्रीं भगवते श्रीवाहुबलिजिनाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निवंपामीति स्वाहा। गन्धाम्बु तन्दुल मुमन व्यंजन दीप धूप सुहावनी। फल मधुर मिश्रित अर्घ ले, पूंजूं तुम्हें त्रिभुवन धनी॥वसुकमं०॥ ॐ ह्रीं भगवते श्री बाहुबलिजिनाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ निर्व- पामीति स्वाहा। दोहा पोदनपुर में स्वर्ण की, जजू बिब छविधाम । पुष्प वृष्टि सुर जहं करें, केशरकी अविराम ॥ ॐ ह्रीं श्रीपोदनपुरस्थबाहुबलिस्वामिप्रतिमायै अर्घ निर्व- पामोति स्वाहा । भला विध्यगिरि शिखर है, भले विराजे जेह । चालिस हस्त सुशोभनो, खड्गासन है देह ।। अनुपम छवि जिनराज की, देख लजे शशि सूर्य,

तात नहिं
छाया पड़े, बन्दूं यह माधयं ॥
ॐ ह्रीं श्रीश्रवणबेलगोला-विध्यगिरिस्थ बाहुबलिजिनाय
अर्घ निवंपामीनि स्वाहा ।
गोम्मटगिरि वेणूर में, जजू नाय कर शीश ।
पूंजू आरा कारकल, और जहां हों ईण ।।
ॐ ह्रीं श्रीगोम्मटगिरि वेणुपुर, धनुपुरा (आरा) कारकल
आदिविविधस्थानस्थ श्रीवाहुबलिजिनप्रतिमायै अर्घ निर्वपामि।
नमू शिखर कैलाश जिहि, शेप कम करि शेष ।
लोक शिखर चूडामणी, भए सिद्ध परमेश ।।
ॐ ह्रीं श्रीकलाशिवरात् सिद्धिंगताय श्रीवाहुबलिमिद्धाय
अर्घ निवपामीति स्वाहा ।
.
जयमाला
दोहा
मवा पांचसो धनुष नन, लतायुक्त अभिगम ।
खगासन मरकत वरण, मुन्दर रूप ललाम ।।
पदरी
जय बाहुबलीश्वर मुगुण धाम, चरणों में हों कोटिक प्रणाम ।
तुम आदि ब्रह्म के मुन मुजान, था अंतरंग में स्वाभिमान ।।
प्रण था वृषभेश्वरके मिवाय, यह मस्तक परको ना झुकाय ।
पट-खण्ड भूमि भरतेश जीत, लोटे जब अवधपुरी पुनीत ।।
नहिं करै चक्र नव पुर प्रवेश, भरतेश्वर की जय थी अगेप।

१३२
.
तुम पादनेश बाहवलीश, नहिं थे वश में नहिं नमो शीश ।।
इस पर ही युद्ध टना महान, थीं खड़ी सैन्य चतुरंग आन ।
हैं भरत बाहु द्वय चरम अंग, इनका नहि होगा अंग भंग ।।
बहु सेना का होगा मंहार, कर उभयपक्ष मन्त्री विचार ।
ठहराए निर्णय हित प्रबुद्ध, थिर-दृष्टि मल्ल जल तीन युद्ध ।
तीनों जीते तुम हे बनीश, तब क्रोधित हो वह चक्र ईश ।
निज चक्रदिया तुम पर चलाय, कुल रीति नीति सबको भुलाय॥
पर चक्ररत्न तुम पास आय, फिरि गया सदिक्षण शीश नाय ।
यह ज्येष्ठ भ्रात की क्रिया देख, इस जग की स्वार्थकता विलेख ।।
तुम देव भयं जग से उदाम, सब शिथिल किया भवमोह पास ।
दे तनुज महावल को स्वराज, सब माँप उसे वैभव समाज ।।
कह भरतेश्वर मे वनो ज्येप्ट, हम नश्वर भू के भूप श्रेष्ठ ।
फिर यथाजात मुद्रा मु धार, कर किया कमरिपु का संहार ।।
इक वर्ष खड़े थे एक थान, धर प्रतिमायोग अखण्ड ध्यान ।
थे एक वर्ष तक निराहार, सर्वोत्कृष्ट तप महा धार ।
बाईस परीपह सहे धीर, तपते थे तप जिन अति गहीर ।
थे उगे लता तर आस पास, चरनन में था अहि का निवाम ।।
थे तजे उग्र तप के प्रभाव, बन के सव जीव विरोध भाव ।
अनुताप तुम्हें इक था महेश, पाए हैं मुझमे भरत क्लेश ।।
भरतेश्वर से सन्मान पाय, सन्ताप गया सत्वर नशाय ।
तब भए केवली हे जिनेश, पूजन की आकर नर मुरेश ।
उपदेश दिया करुणा-अधार, भवि जीवों को करके विहार ।
कैलाश शिखर से मुक्ति थान, पाया तुमने सब कम हान ।।
जय गोमटेश बाहुबलीश, जय जय भुजबल जय दोवलीश ।

१३३
जय विभुवन मोहन छवि अनूप, जय धर्मप्रकाशक ज्योनिरूप ।।
जय मुनिजन भूपण धर्मसार, अकलंकरूप मोहि करहु पार ।
जय मात सुनन्दा के सुनन्द, शिव राज्य देहु मोहि जगतवंद ।।
है स्वर्णमयी प्रतिमाभिराम, पोदनपुर मे शतश: प्रणाम ।
धनु मवापांचसो हो जिनेन्द्र, जजते कुसुमांजलि ने मुरेन्द्र ।।
प्रतिमा विध्येश्वरको प्रधान, नित नमू कारकल की महान ।
वेणूर पुरीकी है ललाम, गोमटनिरिपति को हो प्रणाम ।।
आरा में रहे विराज नाथ, शनवार तुम्हें हम नमत माथ ।
जितनी हों जहं अहं बिम्बमार , सबको मेरा हो नमस्कार ।।
धत्ता
जय बाहुबलीश्वर महाऋपीश्वर, दयानिधीश्वर जगतारी।
जय जय मदनेश्वर जिनचक्रेश्वर, विध्येश्वर भवभयहारी ।।
महाघ
वाहुबली के महापादपदमी को, जो भवि निन्य जजें,
मर्वसंपदा पावे जग में, ताके सब मंताप भजें।
होकर 'वीर' बाहुबलि जैमा, 'धर्म' चक्र का कंत मजे,
कर्मबेड़ियां काट स्वपर को, निश्चय शिवपुरराज रजै ।।
| इत्याशीर्वाद]
सरस्वती पूजा
जनम जरा मृत्यु छय करे, हरे कुनय जड़रीति ।
भवमागर मों ले निर, पूजें जिन वच प्रीति ||१||
अह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवमरम्बनीवाग्वादिनि ! अत्र अवतर अवतर मबीषट् ।

१३४ ॐ ह्रीं श्री जिनमुखोद्भवसरस्वतीवाग्वादिनि ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं। ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीवाग्वादिनि ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणं अथाष्टक सोरठा छोरोदधिगंगा, विमल तरंगा, सलिल अभंगा सुखसंगा। भरि कंचन झारी, धार निकारी, तृपा निवारी, हित चंगा। तीर्थकरकी धुनि, गणधर ने मुनि, अंग रचे चुनि, ज्ञानमई। सो जिनवरबानी, शिवमुखदानी, विभुवन मानी, पूज्य भई ॥१ ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्य जलं निर्वपामीति स्वाहा । करपूर मंगाया, चंदन आया, केशर लाया, रंग भरी। शारदपद बंदों, मन अभिनंदों, पाप निकंदों, दाह हरी ॥तीर्थ ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरम्वतीदेव्यै चंदनं निर्वपामीनि स्वाहा । सुखदाम कमोदं, धारकमोदं, अति अनुमोदं, चन्दसमं । बहु भक्ति बढ़ाई, कीरति गाई, होहु सहाई, मात ममं ।।तीर्थ० ॐ ह्री श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा । बहु फूल मुवासं, विमल प्रकासं, आनन्द रासं, लाय धरे । मम काम मिटायो, शील बढ़ायो, सुख उपजायो, दोष हरे।।तीर्थ ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै पुप्पं निर्वपामीति स्वाहा । पकवान बनाया, बहु घृत लाया, सब विधि भाया मिष्ट महा । पूजू थुति गाऊँ, प्रीति बढ़ाऊँ, क्षुधा नशाऊँ, हर्प लहा तीर्थ. ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै नैवेद्यम् निर्वपामीति स्वाहा । करि दीपक-जोतं, तमछय होतं, ज्योति उदोतं तुमहिं चढ़े। तुम हो परकाशक, भरमविनाशक, हम घट-भासक, ज्ञान बड़े ।। ॐ ह्रीं जिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै दीपं निवपामीति स्वाहा। .

१३५
..
शुभगंध दशोंकर, पावकमें धर, धूप मनोहर खेवत हैं।
सब पाप जलावे, पुण्य कमावं, दास कहावे, सेवत है।तीर्थ.
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतिदेव्यै धूपं निर्वामीति स्वाहा ।
बादाम छुहारी, लौंग सुपारी, श्रीफल भारी, ल्यावत हैं।
मनवांछित दाता, मेट अमाता, तुम गुन माता, ध्यावत है ।तीर्थ०
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवमरम्वतीदेव्यं फलं निवंपामीनि स्वाहा ।
नयननमुखकारी, मृदुगुनधारी, उज्ज्वलभारी, मोलधरै ।
शुभगंधसम्हारा, वसन निहारा, तुम तन धारा, ज्ञान करै ।।तीर्थ
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै वस्त्र निर्वपामीनि स्वाहा ।
जलचंदन अच्छन, फूल चरू चत, दीप धूप अति फल लावें।
पूजा को ठानत, जो तुम जानत,
तुम जानत, सो नर द्यानन,
सो नर द्यानन, मुख पावें तीर्थ.
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवमरस्वतीदेव्यं अर्घ निर्वपामोति स्वाहा ।
अथ जयमाला (सोरठा)
ओंकार धुनिसार, द्वादशांगवाणी विमल ।
नमों भक्ति उर धार, ज्ञान कर जड़ना हरै।।
छन्द वेसरी
पहलो आचारांग बखानो, पद अष्टादश महम प्रमानो।
दूजो मूवकृतं अभिलापं, पद छत्तीम महम गुरु भापं ।।१।।
तीजो ठाना अंग मुजानं, महम बियालिम पद मरधानं ।
चौथो समवायांग निहारं, चौमट सहस लाख इक धारं ।।२।।
पंचम व्याख्याप्रज्ञपनिदरम, दोय लाख अट्टाइम सहमं ।
छट्टो ज्ञातृकथा विसतारं, पांच लाख छप्पन हज्जारं ।।३।।
सप्तम उपासकाध्ययनंग, मत्तर सहम ग्यार लख भंग ।
अप्टम अंतकृतं दश ईसं, सहस अठाइस लाख तेईमं ॥४॥

१३६ नवम अनुत्तर दश मुविशालं, लाख बनावै सहस चवालं । दशम प्रश्न व्याकरण विचारं, लाखतिरानव सोल हजारं॥५॥ ग्यारम मूत्र विपाक मुभाखं, एक कोड चौरासी लाखं । चार कोडि अफ पंद्रह लाख, दो हजार सब पद गुरु शाखं ।।६।। द्वादश दृष्टिवाद पनभेदं, इक मी आठ कोडि पन वेदं । अडसटलाख सहस छप्पन हैं, सहित पंचपद मिथ्या हन हैं ।।७।। इक मी वारह कोडि वखानी, लाख तिरासी ऊपर जानो। ठावन सहम पंच अधिकाने, द्वादश अंग सर्वपद माने ।।८।। कोडि इकावन आठहि लाखं, सहस चुरासी छहसो भाखं । साढ़े इकीस मिलोक बताये, एक एक पद के ये गाये ।।६।। जा बानी के ज्ञान में, मूझे लोक अलोक । 'द्यानत' जग जयवंत हों, सदा देत हों धोंक ।। ॐ ह्री श्रीजिनमुखोद्भवमरस्वतीदेव्य महाघ निर्वपामीनि स्वाहा । [इत्याशीर्वाद] सोलहकारण पूजा [कविवर द्यानतरायजी] सोलह कारण भाय तीर्थकर जे भये । हरषे इन्द्र पूजा करि निज धन्य लख्यो बहु चावसौं। हमहू षोडश कारन भावै भावसौं । अह्रीं दर्शनविशुद्ध्यादिषोडशकारणानि ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् । अपार मेस्प गये ।।

ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्ध्यादिषोडशकारणानि ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्ध्यादिषोडशकारणानि ! अत्र मम मन्निहितानि भव भव वषट्। कंचन-झारी निरमल नीर पूजों जिनवर गुन-गंभीर । परम गुरु हो जय जय नाथ परम गुरु हो। दरविशुद्धि भावना भाय सोलह तीर्थकर-पद-दाय । परम गुरु हो जय जय नाथ परम गुरु हो॥ ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्धि - विनय मम्पन्नता - शीलवनेष्वनतिचाराभीक्ष्णज्ञानो- पयोग-संवेग - शक्तितस्त्याग-नपमी-माधुममाधि - वैयावृत्यकरणार्हद्भक्ति- आचार्यभक्ति - बहुश्रुतभक्ति - प्रवचनभक्ति - आवश्यकापरिहाणि - मार्ग- प्रभावना - प्रवचनवात्सल्यनितीर्थकरत्वकारणेभ्योजन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निवंपामीति स्वाहा। चंदन घसौं कपूर मिलाय पूजौं श्री जिनवर के पाय । परम गुरु हो जय जय नाथ परम गुरु हो ।।दरश०।। ॐ ह्री दर्शनविशुद्ध्यादिपोडशकारणेभ्यो संसारतापविनाशनाय चंदनं नंदुल धवल मुगंध अनूप पूजौं जिनवर निहुं जग-भूप। परम गुरु हो जय जय नाथ परम गुरु हो ।।दरश०।। ॐ ह्री दर्शनविशुद्ध्यादिषोडशका रणभ्योऽक्षयपदप्राप्नय अक्षतान् फूल सुगंध मधुप-गुंजार पूजौं जिनवर जग-आधार । परम गुरु हो जय जय नाथ परम गुम हो ।दरण०।। ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्ध्यादिपोडणकारणेभ्यो कामवाणविध्वंसनाय पुष्पं मद नेवज वहुविधि पकवान पूजौं श्रीजिनवर गुणखान । परम गुरु हो जय जय नाथ परम गुम हो ।।दरण।। ॐ ह्री दर्शनविशुद्ध्यादिषोडशकारणेभ्यां क्षुधागंगविनाशनाय नै दीपक-ज्योति तिमिर छयकार पूजू श्रीजिन केवलधार ।

१३८
गंध शुभ
परम गुरु हो जय जय नाथ परम गुरु हो॥दरश०।।
ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्ध्यादिषोडशकारणेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं
निवंपा।
अगर कपूर
खेय श्रीजिनवर आगे महकेय।
परम गुरु हो जय जय नाथ परम गुरु हो ॥दरश०॥
ॐ ह्रीं दर्शनविणुद्ध्यादिषोडणकारणेभ्योऽष्टकर्मदहनाय धूपं निर्व०
श्रीफल आदि बहुत फलसार पूजौं जिन वांछित दातार ।
परम गुरु हो जय जय नाथ परम गुरु हो।
दरविशुद्धि भावना भाय सोलह तीर्थकर-पद-दाय ।
परम गुरु हो जय जय नाथ परम गुरु हो॥
ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्ध्यादिषोडशकारणेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं
जल फल आठों दरब चढ़ाय 'द्यानत' वरत करों मनलाय।
परम गुरु हो जय जय नाथ परम गुरु हो ॥दरश०॥
ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्ध्यादिषोडश कारणेभ्योऽनर्घपदप्राप्तये अर्घ निर्व०
पोडश कारण गुण करे, हर चतुरगति-वास ।
पाप पुण्य सब नाश के, ज्ञान-भान परकाश ।।
चौपाई १६ मात्रा
दरविशुद्धि धरे जो कोई, ताको आवागमन न होई ।
विनय महाधार जो प्राणी, शिव-वनिता की सखी वखानी ।।
शील सदा दिढ जो नर पाल, सो औरन की आपद टाल ।
ज्ञानाभ्यास कर मनमाहीं, ताके मोह-महातम नाहीं ।।
जो संवेग-भाव विसतारे, सुरग-मुकति-पद आप निहार।
दान देय मन हरष विशेख, इह भव जस परभव सुख देखे ॥
जो तप तप खपे अभिलाषा, चूरे करम-शिखर गुरु भापा।
-

१३६
साधु-समाधि सदा मन लावै, तिहुं जग भोग भोगि शिव जाव।।
निश-दिन वैयावृत्य करैया, सो निहचे भव-नीर तिरैया।
जो अरहंत-भगति मन आने, सो जन विषय कषाय न जाने ।।
जो आचारज-भगति कर है, सो निर्मल आचार धरै है।
बहुश्रुतवंत-भगति जो करई, सो नर संपूरन श्रुत धरई ।।
प्रवचन-भगति कर जो ज्ञाता, लहै ज्ञान परमानंद-दाना।
पट आवश्यक काल जो साधे, सो ही रत्न-वय आराधे ।।
धरम-प्रभाव करें जे ज्ञानी, तिन शिव-मारग रीति पिछानी।
वत्सल अंग सदा जो ध्यावं, सो तीर्थकर पदवी पावै ।।
ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्ध्यादिपोडश कारणेभ्यो पूर्णाऱ्या निर्वपामी०
दोहा
एही सोलह भावना, सहित धरै व्रत जोय ।
देव-इन्द्र-नर-वद्य-पद, 'द्यानत' शिव-पद होय ।।
| इत्याशीर्वाद]
पंचमेरु पूजा
[कविवर द्यानतरायजी]
गीता छन्द
नीर्थकरों के न्हवन - जलने भये तीरथ शर्मदा,
नातै प्रदच्छन देत मुर-गन पंच मेगनकी मदा।
दो जलधि ढाई द्वीप में सब गनत-मूल विराजहीं,
पूजौं असी जिनधाम-प्रतिमा होहि मुख दुख भाजहीं ।।

१८० ! ॐ ह्रीं पंचमेरुसम्बन्धिजिनचैन्यालयस्थजिनप्रतिमासमूह ! अत्रावतरावतर संवौषट् । ॐ ह्रीं पंचमेरुसम्बन्धिजिनचन्यालयम्थजिनप्रतिमासमूह ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ट:ट:। ॐ ह्रीं पंचमम्मम्बन्धिजिनचन्यालयस्थजनप्रतिमासमूह ! अत्र मम सन्नि- हिनो भव भव वपट् । चौपाई आंचलीबद्ध मीनल-मिष्ट-मुवाम मिलाय, जलसों पूजौं श्रीजिनराय । महामुख होय, देखें नाथ परम मुख होय ॥ पांचों मग अमी जिनधाम, सब प्रतिमा को करों प्रनाम । महामुख होय, देखें नाथ परम मुख होय ॥ ॐ ह्री मुदर्शन - विजय-अचल-मन्दिर - विद्य न्मालिपंचमेरुसम्बन्धिजिन- चैत्यालयस्थजिनबिम्बेभ्यो जलं निर्वपामीति स्वाहा । जल केशर करपूर मिलाय गंधसौं पूजौं श्रीजिनराय । महामुख होय, देखे नाथ परम सुख होय ।।पांचों०।। ॐ ह्रीं पंचमेरुमम्बन्धिजिनचन्यालयस्थजिनबिम्बेभ्यो चन्दनं अमल अखंड मुगंध मुहाय, अच्छन सौ पूजौं जिनराय । महामुख होय, परम मुख होय पांचों०।। ॐ ह्रीं पंचमेरुसम्बन्धिर्धाजनचन्यालयाजनबिम्बेभ्यो अक्षतान् बरन अनेक रहे महकाय, फूल सों पूजौं थीजिनराय ! महामुख होय, देखे नाथ परम सुख होय ॥पांचों०।। ॐ ह्रीं पंचमेम्मम्बन्धिजिनचन्यालयस्थजनविम्बेभ्यो पुष्पं निर्व. मन-बांछित बहु तुरत बनाय, चरुसों पूर्जी श्रीजिनराय । महासुख होय, देखे नाथ परम मुख होय ॥पांचो०।। ॐ ह्रीं पंचमेरुसम्बन्धिजिनचंत्यालयस्थजिनबिम्बेभ्यो नैवेद्य निर्व० देख नाथ .

नम-हर उज्ज्वल ज्योति जगाय, दीपसों पूजौं श्रीजिनराय । महासुख होय, देखे नाथ परम मुम्न होय ॥ पाँचों मेरु असी जिन धाम, सब प्रतिमा को करो प्रनाम । महासुख होय, देखे नाथ परम मुख होय ॥ ॐ ह्रीं पंचमेरुसम्बन्धिजिनचन्यालयस्थाजनबिम्बेभ्यो दीपं निवं. खेऊँ अगर अमल अधिकाय, धूपसों पूजौं श्रोजिनराय । महामुख होय, देख नाथ परम मुख होय ॥ ॐ ह्री पंचमेरुसम्बन्धिजिनचंन्यालयजिनबिम्बेभ्यो धूपं निवं. मुरस सुवर्ण मुगंध मुभाय. फलसों पजौं श्रीजिन राय । महासुख होय, देख नाथ परम मुम्न होय ।।पांचा।। ॐ ह्री पंचमम्मम्बन्धिजिनचंत्यालयस्थजनवम्बेभ्यो फल निर्व। आठ दरवमय अरघ बनाय, 'द्यानत' पजी श्रीजिनराय । महामुख होय, देने नाथ परम मुख होय पाचों०।। ॐ ह्री पचमम्मम्बन्धिर्धाजनचंन्यालयाजनबिम्बन्यो अर्घ निर्व. जयमाला प्रथम मुदर्शन-ग्वामि, विजय अचल मंदर कहा। विद्युन्माली नाम, पंच मह जग में प्रगट ॥१॥ वेसरी छन्द प्रथम मुदर्शन मंझ विगजे, भद्रशाल वन भूपर छाजे । चन्यालय चारों मुम्बकारी, मनवचनन बंदना हमारी ऊपर पंच-शतकपर मोहै, नंदन-वन दखन मन मोहै। चन्यालय चारी मुखकारां, मनवचनन वंदना हमारी || .

१४२ साढ़े बासठ सहम ऊँचाई, वन मुमनस शोभै अधिकाई । चैत्यालय चारों मुखकारी, मनवचतन बंदना हमारी ।।४।। ऊँचा जोजन महम छत्तीसं, पांडुकवन सोहै गिरि सीमं । चैत्यालय चारों मुखकागे, मनवचतन वंदना हमारी ॥५॥ चारों मेरु ममान वखाने, भूपर भद्रसाल चहुँ जाने । चैत्यालय सोलह सुखकारी, मनवचतन बंदना हमारी॥६॥ ऊँचे पांच शतक पर भाख, चारों नन्दनवन अभिलाखे । चैत्यालय मोलह मुखकागे, मनवचतन बंदना हमारी।।७।। साढ़े पचपन सहम उनंगा, वन सौमनस चार बहुरंगा । चैत्यालय सोलह मुखकारी, मनवचतन बंदना हमारी।।८।। उच्च अठाइस सहस बनाये, पांडुक चारों वन शुभ गाये । चैत्यालय मोलह सुखकारी, मनवचतन बंदना हमारी ।।६।। सुर नर चारन बंदन आवै, सो शोभा हम किह मुख गावें । चैत्यालय अस्सी सुखकारी, मनवचतन बंदना हमारी ॥१०॥ दोहा पंचमेरु की आरनी, पढ़े सुने जो कोय । 'द्यानन' फल जानै प्रभू, तुरत महामुख होय ।।११।। ॐ ह्रीं पंचमेरुसम्बन्धिजिनचंन्यालयस्थजिनबिम्बेभ्यो अर्घ निर्व० [इत्याशीर्वाद] नन्दीश्वरद्वीप-पूजा [कविवर द्यानतरायजी] सरव पर्व में बड़ो अठाई परव है । नंदीश्वर सुर जांहि लेय वसु दरव है ।।

हमें सकति सो नाहिं इहां करि थापना । पूजें जिनगृह-प्रतिमा है हित आपना ।। ॐ ह्रीं श्रीनन्दीश्वरद्वीपे हि पंचाशज्जिनालयस्थजिनप्रतिमासमूह ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् । ॐ ह्रीं श्रीनन्दीश्वरद्वीपे द्विपंचाशज्जिनालयस्थजिनप्रतिमाममूह ! अत्र तिष्ठः तिष्ठः ठः ठः। ॐ ह्रीं श्रीनन्दीश्वरद्वीपे द्विपंचाग्जिनालयस्थजिनप्रतिमासमूह ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् । कंचन-मणि-मय-भृङ्गार, तीरथ-नीर भरा। तिहुं धार दई निरवार, जामन मरन जरा॥ नंदीश्वर-श्रीजिन-धाम, बावन पुंज करों। वसु दिन प्रतिमा अभिराम, आनंद-भाव धरों। ॐ ह्रीं श्रीनन्दीश्वरद्वीपे पूर्वपश्चिमोत्तरदक्षिणदिक्षु द्विपंचाईज्जनालय- स्थजिनप्रतिमाभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्व० भव-तप-हर शीतल वास, सो चंदन नाहीं। प्रभु यह गुन कीजै मांच आयो तुम टांही ॥नंदी० ॐ ह्रीं श्रीनन्दीश्वरद्वीपे द्विपंचाग्जिनालयस्थजनप्रनिमाभ्यो भवता- पविनाशनाय चन्दनं निवपा० उत्तम अक्षत जिनराज, पुज धरे सोहै । मव जीते अक्ष-समाज, तुमसम अरु को है ॥नंदी० ॐ ह्रीं श्रीनन्दीश्वरद्वीपे द्विपंचाग्जिनालयजनप्रतिमाभ्यो अक्षयपद- प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीनि स्वाहा। तुम काम विनाशक देव, ध्याऊं फूलनमों । लहुँ शील-लच्छमी एव, छूटों मूलनमौं ।नंदी० ॐ ह्रीं श्रीनन्दीश्वरद्वीप द्विपंचाशाजिनालय जनप्रतिमाभ्यो कामवाण- विध्वंसनाय पुष्पं निबंपामीति म्वाहा ।

१४४
नेवज इंद्रिय-बलकार, सो तुमने चूरा ।
चरु तुम दिग सोहै सार, अचरज है पूरा ॥नंदी०
ॐ ह्रीं श्रीनन्दीश्वदीप द्विपंचाग्जिनालयस्थजिनप्रतिमाभ्यो क्षुधारोग-
विनाशनाय नवयं निर्वपामीति न्बाहा।
दीपक की ज्योनि-प्रकाश, तुम तन मांहि लसै।
टूट करमन को गश, ज्ञान-कणी दरस ॥नंदी.
ह्रीं श्रीनन्दीश्वरद्वीप द्विपंचाग्जिनालयस्थजिनप्रतिमाभ्यो मोहान्ध-
कारविनाशनाय दीपं निवंपामीति म्वाहा ।
कृष्णागरू-धूप-मुवाम, दश-दिशि नारि वरै।
अनि हरप-भाव परकाश, मानों नृत्य
करै ॥नंदी०
ॐ ह्रीं श्रीनन्दीश्वरद्वीपे द्विपंचाग्जिनालयस्थजनप्रतिमाभ्यो अष्टकर्म-
दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
बहुविधि फल ले निहुँ काल, आनंद राचत हैं।
तुम शिव-फल देहु दयाल, तुहि हम जाचत हैं ।।नंदी०
ॐ ह्रीं श्रीनन्दीश्वरद्वीपे द्विपंचाग्जिनालयस्थजिनप्रतिमाभ्यो मोक्षफल-
प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
यह अरघ कियो निज-हेत, तुमको अरपतु हों।
'द्यानन' कीज्यो शिव-खेत, भूमि समरपतु हो ।नंदी०
ॐ ह्री श्रीनन्दीश्वरद्वीपे द्विपंचाग्जिनालयस्थजिनप्रतिमाभ्यो अनर्घपद-
प्राप्तये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
दोहा
कार्तिक फागुन साढके, अंत आठ दिन माहिं ।
नंदीश्वर सुर जात हैं, हम पूजे इह ठाहिं ॥१॥

१४५ एकसौ वेमठं कोडि, जोजन महा । लाख चौरासिया एक दिश में लहा ॥ आठमों दीप नंदीश्वरं भास्वरं भौन बावन्न प्रतिमा नमों मुखकरं ।।२।। चार दिशि चार अंजनगिरी राजहीं । सहस चौरासिया एक दिश छाजहीं ॥ ढोलसम गोल ऊपर तले संदरं ।।भौन० एक इक चार दिणि चार शुभ बावरी । एक इक लाख जोजन अमल-जल भरी ।। चहुँ दिमा चार वन लाख जोजन वरं । भौन वावन्न प्रतिमा नमों मुखकर ॥४॥ मोल वापीन मधि मोल गिरि दधिमुखं । मम दश महा जोजन लखत ही मुखं ।। बावरी कौन दो माह दी रति करं ॥भीन० ॥५॥ शल वत्तीम हक महम जोजन चार सोले मिले मवं बावन लहं ॥ एक इक मीम पर एक जिनमंदिरं मौन० ॥६॥ विव अर एकमौ रतनमयि मोहहीं । देव देवी मरत्र नयन मन मोहहीं ।। पद्म-आसन पर भीन० ।।। लाल नम्व-मुख नयन म्याम अर म्वत हैं । म्याम-रंग भोह मिर-कशछवि देन हैं। वचन वोलन मनों हमत कालुप हराभोन० ।।८।। कहे । पांचमै धनुष नन कोटि-शशि-भान-दुनि-तेज छिप जात है। महा-वैगग-परिणाम ठहरान है। वयन नहि कहैं लखि होत सम्यक्धरं ।।भौन० ॥६॥ सोरठा नंदीश्वर-जिन-धाम, प्रतिमा-महिमा को कहै । 'द्यानत लीनो नाम, यही भगति शिव-सुख करे ।। ॐ ह्रीं श्रीनन्दीश्वरद्वीपे पूर्वपश्चिमोत्तरदक्षिणदिक्षु द्विपंचाशजिनालयस्थ- जिनप्रतिमाभ्यो पूर्णाघ निर्वपामीति स्वाहा । [इत्याशीर्वादः । पुष्पाञ्जलि क्षिपामि] दशलक्षणधर्म-पूजा [कविवर द्यानतरायजो] अडिल्ल उत्तम छिमा मारदव आरजव भाव हैं, सत्य सौच संयम तप त्याग उपाव हैं। आकिंचन ब्रह्मचरज धरम दश सार हैं, चहुंगति-दुखत काढ़ि मुकति करतार हैं । ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म ! अवतर अवतर् संवौषट् । ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म ! अत्र तिष्ठ निप्ठ ठः ठः । ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् । सोरठा हेमाचलकी धार, मुनि-चित सम शीतल सुरभि । भव-आताप निवार, दस-लच्छन पूजौं सदा ॥

१४७
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमामार्दवार्जवसत्यशौचसंयमतपस्त्यागाकिंचपरह्म चयति
दशलक्षणधर्माय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
चन्दन केशर गार, होय सुवास दशों दिशा ।
भव-आताप निवार, दस-लच्छन पूजौं सदा ।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा ।
अमल अखंडित सार, तंदुल नन्द्र समान शुभ ।
भव-आताप निवार, दस-लच्छन पूजौं सदा ।।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय अक्षतान् निर्वपामीनि स्वाहा ।
फूल
अनेक
प्रकार,
महकें ऊरध-लोकलों ।
भव-आताप निवार, दस-लच्छन पूजौं सदा ।।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
नेवज विविध निहार, उत्तम पट-रस-संजुगत ।
भव-आताप निवार, दस-लच्छन पूजी सदा ॥
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
वाति कपूर सुधार, दीपक-जोति सुहावनी ।
भव-आताप निवार, दस-लच्छन पूजों सदा ।।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय दीपं निर्वपामीनि स्वाहा ।
अगर धूप विस्तार,
फैले सर्व मुगंधता ।
भव-आनाप निवार, दम-नच्छन पूजी मदा ॥
ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय धूपं निपामीनि स्वाहा ।
फलकी जाति अपार, घ्रान-नयन-मन मोहने ।
भव-आनाप निवार, दस-लच्छन पूजी मदा ॥
ॐही उनमक्षमादिदशलक्षणधर्माय फलं निर्वामीनि म्वाहा ।

१४८
आठों दरव संवार, 'द्यानन' अधिक उछाहसों ।
भव-आताप निवार, दम-लच्छन पूजी सदा ।।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माया निर्वपामीति स्वाहा ।
करें।
अंगपूजा
सोरठा
पीई दुष्ट अनेक, बांध मार बहुविधि करें।
धरिये छिमा विवेक, कोप न कीजे पीतमा ।।
उत्तम छिमा गहो रे भाई, इह भव जस पर-भव सुखदाई।
गाली मुनि मन खेद न आनो, गुनको औगुन कहे अयानो ।
कहि है अयानो वस्तु छीने, बांध मार वहुविधि
घरने निकारै तन विदार, बैर जो न नहाँ धरै ।।
ते करम पूरव किये खोटे, महै क्यों नहिं जीयरा ।
अति क्रोध-अगनि बुझाय प्रानी, साम्य जल ले सोयरा ।।
ही उत्तमक्षमाधर्माङ्गाय अयं निर्वपामीनि म्वाहा।
मान महाविषरूप, करहि नीच-गनि जगत में ।
कोमल मुधा अनूप, मुख पावै प्रानी सदा ।।
उत्तम मार्दव-गुन मन माना, मान करनको कौन टिकाना।
वस्यो निगोद माहितं आया, दमरी रूकन भाग बिकाया ।।
विकाया भाग-वशत, देव इकइंद्री भया ।
मुआ चांडाल हवा, भूप कीड़ों में
जीतव्य जोवन धन गुमान, कहा कर जल-बुदबुदा ।
करि विनय बहु-गुन बड़े जनकी, ज्ञानका पावै उदा ॥
ॐ ह्रीं उत्तममार्दवधर्माङ्गाय अर्घ निवंपामीति स्वाहा ।
उत्तम
गया।।

१४६
कपट न कीजै कोय, चोरनके पुर ना बसै ।
सरल सुभावी होय, ताके घर बहु संपदा ।।
उत्तम आर्जव-रीति बखानी, रंचक दगा बहुत दुखदानी ।
मनमें हो सो वचन उचरिये, वचन होय सो तनसौं करिये ।।
करिये सरल तिहुँ जोग अपने, देख निरमल आरसी ।
मुख करे जैसा लखै तैसा, कपट-प्रीति अंगारसी ॥
नहि लहै लछमी अधिक छल करि, करम-बंध-विशेषता।
भय न्यागि दूध विलाव पीवै, आपदा नहिं देखता ॥
ॐ ह्री उनमाजवधर्माङ्गाय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
कटिन वचन मति बोल, पर-निंदा अझ झूठ तज ।
मांच जवाहर खोल, मतवादी जगमें सुखी ।।
उनम सत्य-वरत पालीज, पर-विश्वासघान नहिं कोज ।
मांचे झूठे मानुष देखो, आपन पूत स्वपास न पेखो ।।
पेखो तिहायत पुरुप मांचे को दरव
दीजिये ।
मुनिराज-श्रावक को प्रनिष्टा साँच गुण लख लीजिये ।।
ऊँचे सिंहासन बैठि वमु नृप, धरम का भूपति भया ।
बच झूठमेनी नरक पहुंचा, मुरग में नारद गया।
ॐ ह्रीं उनममत्यधर्माङ्गाय अर्घ निर्वामीनि स्वाहा ।
धरि हिरदै मनोप, करहु तपस्या देहमों।
शौच मदा निरदीप, धरम बड़ी संमार में ।।
उत्तम शौच सर्व जग जाना, लोभ पाप को बाप बखाना।
आशा-पास महा दुखदानी, मुख पावे मंतापी प्रानी ।।
प्रानी मदा गुचि शील जप नप, ज्ञान ध्यान प्रभावतं ।
निन गंग जमुन ममुद्र न्हाये, अशुचि-दोष मुभावने ।
मव

१५०
.
ऊपर अमल मल भरयो भीतर, कौन विधि घट शुचि कहै ।
बहु देह मैली मुगुन-थैली, शौच-गुन साधू लहै ।
ॐ ह्रीं उसमशीचधर्माङ्गाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
काय छहों प्रतिपाल, पंचद्री मन वश करो।
मंजम-रतन संभाल, विषय चोर बहु फिरत हैं।
उत्तम संजम गहु मन मेरे, भव-भवके भाजे अघ तेरे ।
सुरग-नरक-पशुगति में नाहीं, आलस-हरन करन मुख ठाहीं।।
ठाहीं पृथी जल आग मारुत, रूख त्रस करुना धरो ।
सपरसन रसना घ्रान नैना, कान मन सव वश करो ॥
जिस बिना नहि जिनगज सीझे, तू रुल्यो जग-कीच में ।
इक घरी मन विसरो करो नित, आव जम-मुख बीच में ।।
ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्माङ्गाय अर्घ निर्वपामीनि स्वाहा।
तप चाहै मुरराय, करम - सिखर को बन है ।
द्वादविधि सुखदाय, क्यों न करै निज सकति सम ।।
उत्तम तप सब माहिं वखाना, करम-शैल को वज्र-समाना ।
वस्यो अनादि-निगोद-मझारा, भू-विकलत्रय-पशु - तनधारा॥
धारा मनुष तन महादुर्लभ, मुकुल आव निरोगता ।
श्रीजैनवानी तत्त्वज्ञानी, भई विपय-पयोगता ॥
अति महा दुरलभ त्याग विषय, कषाय जो नप आदरें ।
नर-भव अनूपम कनक घर पर,
मणिमयी कलसा धरें ॥
ॐ ह्रीं उत्तमतपोधर्माङ्गाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा।
दान चार परकार, चार संघ को दीजिए ।
धन विजुली उनहार, नर-भव-लाहो लीजिए ॥
उत्तम त्याग कहो जग सारा, औषध शास्त्र अभय आहारा ।

निहर्च राग - द्वेष निरवार, ज्ञाता दोनों दान संभार ।
दोनों संभारे कूप - जलसम, दरब घर में परिनया ।
निज हाथ दीजे साथ लीजे, खाय खोया वह गया ।
धनि साध शास्त्र अभय-दिवया, त्याग राग विरोध को ।
बिन दान श्रावक साध दोनों, लहैं नाहीं बोध को ।।
ॐ ह्रीं उत्तमत्यागधर्माङ्गाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
परिग्रह चौबिस भेद, त्याग करें मुनिराज जी ।
तिसना भाव उछेद, घटती जान घटाइए ।
उत्तम आकिंचन गुण जानो, परिग्रह - चिता दुख ही मानो।
फांस तनक सी तन में माल, चाह लंगोटी की दुख भाले ।।
भाले न समता मुख कभी नर, बिना मुनि - मुद्रा धरै ।
धनि नगन पर तन-नगन ठाड़े,
मुर अमुर पानि परै ।।
घर माहिं तिसना जो घटाव, रुचि नहीं मंमारसीं ।
बहु धन बुरा ह भला कहिय, लीन पर - उपगार सौं ।
ॐ ह्रीं उत्तमाकिंचन्यधर्मागाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
शील - वाढ़ नौ राख, ब्रह्म - भाव अंतर लखो।
करि दोनों अभिलाख, करहु मफल नर-भव मदा ॥
उत्तम ब्रह्मचर्य मन आनौ, माता बहिन मुता पहिचानी ।
महैं वान - वरपा बहु मूरे, टिक न नंन - बान लखि करे ।।
कूरे तिया के अशुचि तन में, काम - गेगी रनि करे ।
बहु मृतक सड़हि मसान माहीं, काग ज्यों चोंचं भरे ।।
संसार में विप - बल नारी, तजि गयं जोगीश्वग ।
'द्यानत' धरम दश डि चढिके, शिव - महल में पग धरा ।।
ॐ ह्रीं उत्तमब्रह्मचर्यधर्मागाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
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समुच्चय-जयमाला दोहा दश लच्छन बंदी सदा, मन-बांछित फलदाय । कहों आरती भारती, हम पर होहु सहाय ॥ वसरी छन्द उत्तम छिमा जहाँ मन होई, अंतर-बाहिर शत्रु न कोई। उत्तम मादव विनय प्रकाम, नाना भेद ज्ञान सब भास । उत्तम आजव कपट मिटाव, दुरगति त्यागि सुगति उपजावै । उत्तम सत्य-वचन मुख बोले, सो प्रानी संमार न डोले ॥ उत्तम शौच लोभ-परिहारी, मंतोपी गुण-रतन-भंडारी। उत्तम संयम पाले ज्ञाता, नर-भव सफल करै ले साता ।। उत्तम तप निग्वांछिन पाले, सो नर करम-शत्रु को टाले । उत्तम न्याग करे जो कोई, भोगभूमि - मुर-शिवमुख होई ।। उत्तम आकिंचन व्रत धारै, परम समाधि दशा विसतारै । उत्तम ब्रह्मचर्य मन लावै नर-मुर सहित मुकति-फल पावै ।। दोहा करै करम की निरजरा, भव पीजरा विनाश । अजर अमर पदको लहै, 'द्यानत' सुखको राश ।। ॐ ह्रीं उत्तमक्षमामार्दवावशोचसत्यसंयमतपत्यागाकिचन्यब्रह्मचर्यदश- लक्षणधर्मेभ्यः पूर्णाध्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

१५३
-
स्वयम्भू-स्तोत्र
[कविवर द्यानतराय]
राजविर्ष जुगलनि सुख कियो, राज त्याग भुवि शिवपद लियो।
स्वयंबोध स्वयंभू भगवान, बंदी आदिनाथ गुणखान ।।
इंद्र छीर - सागर - जल लाय, मेरु न्हवाये गाय बजाय ।
मदन - विनाशक सुख करतार, बंदौं अजित अजित-पदकार ।।
शुकल ध्यानकरि करम विनाशि, घाति अघाति सकल दुखराशि।
लह्यो मुकतिपद मुख अधिकार, बंदौं सम्भव भव-दुख टार ॥
माना पच्छिम रयन मंझार, मुपने सोलह देखे सार ।
भप पूछि फल मुनि हरपाय, बंदी अभिनन्दन मन लाय ।।
सब कुवादवादी सरदार, जीते स्यादवाद - धुनि धार ।
जैन-धरम-परकाशक स्वाम, सुमतिदेव - पद करहुँ प्रनाम ।।
गर्भ अगाऊ धनपति आय, करी नगर - शोभा अधिकाय ।
वरम रतन पंचदश माम,
नमों
पदमप्रभु सुख की गम ।।
इंन फनिद नरिंद विकाल, वानी मुनि मुनि होहिं खुम्याल ।
द्वादश सभा ज्ञान-दातार, नमों मुपारमनाथ निहार ।।
मुगुन छियालिस हैं तुम माहिं, दोष अठारह कोऊ नाहि ।
मोह - महातम - नाशक दीप, नमों चन्द्रप्रभ राख ममीप ।।
द्वादशविध नप करम विनाश, नेरह भेद चरित परकाश ।
निज अनिच्छ भवि इच्छकदान, बंदों पहपदंत मन आन ।।
भवि- मुखदाय मुरगत आय, दविध धरम को जिनगय ।
आप समान सबनि मुख देह, बंदी शीतल धर्म-मनेह ।।
समना - सुधा कोप - विष - नाश, द्वादशांग वानी परकाश ।

१५४
चार संघ - आनंद - दातार, नमों श्रियांस जिनेश्वर सार ।।
रतनत्रय चिर मुकुट विशाल, सोभ कंठ सुगुन मनि - माल।
मुक्ति - नार - भरता भगवान, वासुपूज्य बंदों धर ध्यान ॥
परम समाधि - म्वरूप जिनेश, ज्ञानी ध्यानी हित - उपदेश ।
कर्म नाशि शिव - सुख - विलसंत, बंदौं विमलनाथ भगवंत ।।
अंतर बाहिर परिग्रह डारि, परम दिगंबर - व्रत को धारि ।
सर्व जीव - हित - राह दिखाय, नमों अनंत वचन मन लाय ॥
सात तत्त्व पंचासतिकाय, अरथ नवों छ दरब बहु भाय।
लोक अलोक मकल परकास, बंदों धर्मनाथ अविनाश ।।
पंचम चक्रवरति निधि भोग, कामदेव द्वादशम मनोग।
शांतिकरन सोलह जिनराय, शांतिनाथ बंदों हरखाय ।।
बहु थुति करे हरप नहिं होय, निदे दोष गहैं नहिं कोय ।
शीलवान परब्रह्मस्वरूप, बंदौं कुन्थुनाथ शिव -
द्वादश गण पूजें सुखदाय, थुति वंदना करें अधिकाय ।
जाकी निज-थुति कबहुँ न होय, बंदी अर-जिनवर-पद दोय ॥
पर - भव रतनत्रय - अनुराग, इह भव ब्याह - समय वैराग ।
बाल • ब्रह्म - पूरन - व्रत धार, बंदौं मल्लिनाथ जिनसार ।।
बिन उपदेश स्वयं बैराग, थुति लोकांत करें पग लाग ।
नमः सिद्ध कहि सब व्रत लेहि, बंदी मुनिमुव्रत व्रत देहिं ।।
श्रावक विद्याबंत निहार, भगति - भाव सों दियो अहार ।
वरसी रतन - राशि ततकाल, बंदौं नमि प्रभु दीन - दयाल ।
सब जीवन की बंदी छोर, राग - दोष द्वै बंधन तोर ।
रजमति तजि शिव-तियसों मिले, नेमिनाथ बंदों सुखनिले ॥
शिव - भूप ।।

दैत्य कियो उपसर्ग अपार, ध्यान देखि आयो फणधार ।
गयो कमठ शठ मुख करि श्याम, नमो मेरुसम पारस स्वाम ।।
भव सागर ते जीव अपार, धरम पोत में धरे निहार।
डूवत काढ़े दया विचार, वर्धमान बंदौं बहुबार ।।
दोहा
चौवीसों पद-कमलजुग,
बंदौं मन-वच-काय ।
'द्यानन' पढ़े सुने सदा, सो
प्रभु
क्यों न सहाय ।।
निर्वाणक्षेत्र-अर्घ्य
जल गंध अच्छत फूल चरु फल धूप दीपायन धरौं ।
"द्यानन" करो निरभय जगत ने जोर कर विनती करों।
सम्मंदगिर गिरनार चम्पा पावापुर कैलासकौं ।
पूजों सदा चौबीम जिन निर्वाणभूमि निवाम की ।
ॐ ह्रीं चतुर्विनितीर्थ निर्वाणक्षेत्रेभ्यो अनर्घपदप्राप्तये अघं
महाघ
गीता छन्द
मैं देव श्री अहंन्न पूज, सिद्ध पूजूं चावमों ।
आचार्य श्री उवझाय पूजूं, साधु पूजू भावमा ।।
अहंन्त - भापित वैन पूज, द्वादशांग रचे गनी ।
पूजू दिगम्बर गुरुचरन शिव हेत मब आशा हनी ।।
सर्वज्ञभाषित धर्म दविधि दया - मय पूजू मदा ।
जजि भावना पोडश रतनत्रय जा बिना शिव नहिं कदा ।।
त्रैलोक्य के कृत्रिम अकृत्रिम चत्य चैत्यालय जज ।
पन मेरु नन्दीश्वर जिनालय खचर सुर पूजित भजू ।।

करें।। कैलाम श्री सम्मेद श्री गिरनार गिरि पूजू सदा । चम्पापुरी पावापुरी पुनि और तीरथ और तीरथ सर्वदा।। चौबीम श्री जिनराज पूज बीम क्षेत्र विदेह के । नामावली इक महम वमु जप होय पति शिवगेह के ।। दोहा जल गंधाक्षत पुष्प चरु दीप धूप फल लाय । मर्व पृज्य पद पृज हूं बहु विध भक्ति बड़ाय ।। ॐही निर्वाणक्षत्रभ्यो महाघ निर्वपामीति स्वाहा। शान्ति-पाठ शास्त्रोक्त विधि पूजा महोत्सव सुरपति चक्री करै । हम मारिख लघुपुरुष कैसे यथाविधि पूजा धनक्रिया ज्ञानरहित न जाने रीति पूजन नाथजी । हम भक्तिवश तुम चरण आगे जोड़ लीने हाथ जी ।।१।। दुखहरण मंगलकरण आशा भरन जिन पूजन मही। यह चित्तमें सरधान मेरे शक्ति है स्वयमेव ही ।। तुम सारिखे दातार पाये काज लघु जाचं कहा । मुझ आपसम कर लहु स्वामी यही इक वांछा महा ।।२।। संसार भीषण विषमवन में कर्म मिल आनापियो। तिसदाह्ते आकुलित चिरते शांति थल कहूं ना लियो।। तुम मिले शांतस्वरूप शांति करण समरथ जगपती। वमुकर्म मेरे शांत कर दो शांति में पंचमगती ॥३॥ जबलों नहीं शिव लहों तबलों देहु यह धन पावना । सत्संग शुद्धाचरण श्रुत अभ्यास आतम भावना ।। तुमबिन अनंतानंत काल गयो रुलत जगजाल में ।

स्थापन अब शरण आयो दोऊ कर जोर नावत भाल मैं ॥४॥ कर प्रमाण के मानतें, गगन नपों किस भन। त्यों तुम गुणवरनन करें, कहूँ न पावे अंत ।। विसर्जन संपूर्णविधि करि वीनऊँ इस परम पूजन ठाठ में अज्ञानवश शास्त्रोक्त विधितै चूक कोनी पाठ में ।। सो होउ पूर्ण समस्त विधिवत् तुम चरण की शरणने । वंदू तुम्हें कर जोड़ के उद्धार जम्मन मरणते ।।१।। आह्वानन सन्निधीकरण विधानजी । पूजन विसर्जन हू यथा विधि जानों नहीं गुण खानजी।। जो दोष लागे मो नशो सब तुम चरण की शरण ते । बंद तुम्हें कर जोड़ के उद्धार जम्मन मरणनै ।।२।। तुम रहित आवागमन आह्वानन कियो निज भाव में। यथा विधि निज शक्ति सम पूजन कियो अति चाव ते ।। करहूं विसर्जन भाव ही में नुम चरण की शरण ते। वंद तुम्हें कर जोड़ के उद्धार जम्मन मरण नं ॥३॥ नीन भुवन निहुँ काल में तुममा देव न और। मुख कारन मंकट हरण नम जुगल कर जोर ।। शान्ति-पाठ (संस्कृत) शान्तिजिनं शशि-निर्मल-वक्त्रं शील-गुण-व्रत-संयम-पात्रम् । अष्टशताचिन-लक्षण-गावं नौमि जिनोनममम्वुज-नेत्रम् ।।१।। पञ्चमभीप्सित-चक्रधराणां पूजिमिन्द्र-नरेन्द्र-गणेश्च । ।

१५८ शान्तिकरं गण-शान्तिमभीप्मुः षोडम-तीर्थकरं प्रणमामि ।।२।। दिव्य-नरुः सुर-पुष्प-मुवृष्टिर्दुन्दुभिरासन-योजन घोषो । आतपवारण-चामर-युग्मे यम्य विभाति च मण्डलतेजः ॥३॥ तं जगचित-शान्नि-जिनेन्द्र शान्तिकरं शिरमा प्रणमामि । सर्वगणाय तु यच्छनु शान्ति मह्यमरं पठते परमां च ॥४॥ यस्यचिता मुकुट-कुण्डल-हार-रत्नैः । शक्रादिभिः मुरगणैः स्तुन-पाद-पद्माः । ते में जिना: प्रवर-वंश-जगत्प्रदीपा- म्तीर्थङ्कराः मतत-शान्तिकरा भवन्तु ।।५।। मंपूजकानां प्रतिपालकानां यतीन्द्र-सामान्य-तपोधनानाम् । देशस्य गष्ट्रस्य पुरस्य राज्ञः करोतु शान्ति भगवाजिनेन्द्रः ।।६।। क्षेमं मर्व-प्रजानां प्रभवतु बलवान्धामिको भूमिपालः । काले काले च सम्यग्वर्षतु मघवा व्याधयो यान्तु नाशम् । दुभिक्षं चौर-मारी क्षणमपि जगतां माम्म भूज्जीवलोके । जैनेन्द्र धमंचकं प्रभवतु सततं सर्व-मोख्य-प्रदायि ॥७॥ घाति कर्माण: केवल ज्ञान - भास्कराः । कुवंन्तु जगतां शान्ति वृपभाद्या जिनेश्वराः ॥८॥ इष्ट-प्रार्थना प्रध्वस्त प्रथम करणं चरण द्रव्यं नमः शास्त्राभ्यामो जिनपनि-नुति: मङ्गतिः सर्वदायें: सवृत्तानां गुण-गण-कथा दोप-वादे च मौनम् । सर्वस्यापि प्रिय - हिन-वची चात्मतत्त्वे । सम्पद्यन्तां भव-भवे यावदेतेपवर्गः ॥ भावना मम १५६ तव पादौ मम हृदये मम हृदयं तव पद-द्वये लीनम् । तिष्ठतु जिनेन्द्र तावद्यावन्निर्वाण-सम्प्राप्तिः ॥१० अक्खर-पयत्थ-हीणं मत्ता-हीणं च जं मए भणियं । तं खमउ णाणदेव य मज्झ वि दुक्ख-क्खयं दितु ॥११ दुक्ख-खओ कम्म-खओ समाहिमरणं च बोहि-लाहो य । मम होउ जगद्-बंधव तव जिणवर चरण-सरणेण ।।१२ विसर्जनम् ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि शास्त्रोक्तं न कृतं मया । तत्सर्व पूर्णमेवास्तु त्वत्प्रसादाग्जिनेश्वर ॥१॥ आह्वानं नैव जानामि नैव जानामि पूजनम् । विसर्जनं न जानामि क्षमस्व परमेश्वरः ॥२॥ मन्त्र-हीनं क्रिया-हीनं द्रव्य-हीनं नर्थव तत्सर्व क्षम्यतां देव रक्ष रक्ष जिनेश्वरः ॥३॥ आहूता ये पुरा देवा: लब्धभागाः यथाक्रमम् । ते मयाऽभ्यचिताभक्त्या सर्वे यान्तु यथास्थितिं ।।४।। पंच परमेष्ठी की आरती इहविधि मंगल आरती कीजै । पंच परमपद भज मुख लीज ॥टेक।। पहली आरती श्रीजिनराजा । भव दधि पार उतार जिहाजा ।इहविधि०।।१।। दूसरी आग्नी सिद्धनकरी । मुमिरन करत मिटे भव फेरी ॥इहविधिः।।२।। तीजी आरती मूर मनिंदा।

जनम मरण दुख दूर करिंदा ॥इहविधि०॥३॥ चौथी आरती श्री उवझाया। दर्शन देखन पाप पलाया ॥इहविधि०॥४॥ पांचमी आरती साधु तिहारी । कुमनि-विनाशन शिव-अधिकारी ।इहविधि०॥५॥ छट्ठी ग्यारह प्रतिमा धारी। श्रावक बंदों आनन्दकारी ॥इविधि०॥६॥ मातमि आरती श्रीजिनवानी। 'द्यानत सुरंग मुकति मुखदानी ॥इविधि०॥७॥ भागचन्द्र कृत (भजन) राग सोरठा हे जिन तुम गुन अपर पार, चन्द्रोज्ज्वल अविकार ॥टेक।। जब तुम गर्भमाहिं आये, मिलि रनन नगरी में वरषाये, अमित अमोघ सुढार ॥हे जिन०॥१ जन्म प्रभु तुमने जब लीना, न्हवन सुरगिर परि कीना । भक्ति करि मची सहित भीना, बोलो जयजयकार हे जिन०॥२ जगत छनभंगुर जब जाना, भये तब नगनवृत्ती वाना । स्तवन लोकांतिकमुर ठाना, त्याग राजको भार ॥हे जिन०।३ घातिया प्रकृति जब नामी, चराचर वस्तु सबै भासी। धर्म की वृष्टि करी खासी, केवलज्ञान भंडार हे जिन०॥४ अघाती प्रकृति सुविघटाई. मुक्तिकान्ता तब ही पाई । निराकुल आनंद असहाई, तीनलोकसरदार ॥ हे जिन० ॥५ पार गनधर हूं नहिं पावै, कहां लगि 'भागचन्द' गावै । तुम्हारे चरनांवुज ध्यावे, भवसागर सों तार ॥हे जिन०॥६ नवे मव मुरगन आये।

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श्री जिनेन्द्र पूजन

Author
Shaastrii Padmachandr
Title
Shrii Jinendr Puujan
File name
श्री जिनेन्द्र पूजन
Text
OCR done
Citation
1981
Published
2006/03/14
Publisher
Laalaa Raghuviirasinh Jain Dharmaarth Trasta, Dariyaaganj, Na-ii Dillii
Language
Sanskrit
Pages
152
Library
Bharatiya Gyanpeeth
Classification
RELIGION THEOLOGY
DLI number
477016
Barcode
99999990170552.00
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