Government College, Kota

Sanskrit Kavya Lahari

Sansarchandra · 2012/04

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A Text-book prescribed for lotermediate Examination
of East Panjab Universite
2
संस्कृत-काव्य-लहरी
waz
प्रो० संमारचंद्र, एम. ए.
minatirasana
नीन रुपया आठ आने

Herbert College Library
KOTAH.
Class No
5.83.1.....
........
Book No........5279..
...
....
Accession No
127.73.
& P. 2 5000-9-43

40-12113 727730 संस्कृत-काव्य-लहरी The Aeroconfuetuin wrong the book and Regisis. kup it in Sharuk. मम्पादक तथा संग्रहकर्ता प्रोफेसर संसारचंद्र एम.ए., सनातन धर्म कालेज अम्बाला (फैट) प्रकाशक- मेहरचंद्र लक्ष्मणदास संस्कृत-हिंदी-पुस्तक-वित्र ठा गली गन्देला, ऋचा चेलो दरियागंज, दिल्ली १९५६ [द्वितीयावृत्ति

प्रकाशक
लाला खजानचीराम जैन, मैनेजिंग
प्रोप्राइटर, मेहरचंद्र लक्ष्मणदास,
संस्कृत-हिन्दी-पुस्तफ-विक्रेता, गली
नन्हेखां, कूचा चेला, मज बाजार
दिल्ली।
मुद्रक
लाला अज्ञानचीराम जैन,
मनोहर इलैक्ट्रिक प्रेस
गली नन्हेसां, बूचा चेला,
ज़ बाजार, दिल्ली।

भूमिका संस्कृत का गौख संस्कृत साहित्य(भारतवर्ष की अमूल्य सम्पत्ति है। इस विशाल साहित्य को प्रमुखो तथा व्यापक प्रवृत्ति के कारण संस्कृत और संस्कृति भारत के लिए पर्यायवाची शब्द कहे जा सकते हैं। प्राज मो संस्कृत हमारे नीवन से अधिक सम्बन्ध रखती है। पूर्व से पश्चिम सक और उत्तर से दक्षिण तक भारत में ऐक्य का यदि कोई साधन हो सकता है तो यह संस्कृत है। हमारा आचार- म्यवहार धर्म-कर्म जन्म-मरण सर संस्कृत से श्रोत-प्रोत हैं। अाज भी देश में वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, मागवत का पर्याप्त प्रचार है। हमारे संस्कार विना संस्कृत के हो नहीं सकते। हमारी धार्मिक भाषा संस्कृत है। प्राचीन काल से लेकर ब्रिटिश-युग के प्रारम्भ तक हमारी सांस्कृतिक तथा साहित्यिक भाषा संस्कृत रही है। मुग़ल काल में भी भारतीय संस्कृति का अध्ययन संस्कृत द्वारा ही होता था। पतन की पराकाष्ठा तब होती है जब दूसरों का अनुकरण करने में अपनी निजी धारणा विलकुल खो दी जाती है। जब पाश्चात्य विद्वानों ने कहा कि ग्रीक लैटिन यूरोप में 'मृत-मापा' के नाम से पुकारी जाती है तम भारतीय विद्वानों ने भी सदनुसार प्रोक-लैटिन की सहचरी संस्कृत भाषा को 'मृत. भाषा' को पदवी दे दी। पर यह मारी भून है। प्रोक लैटिन का प्रभाव यूरो- पीप-जीग्न से देर हुई उठ गया था किन्तु संस्कृत का देशव्यापी अस्तित्व प्रथ भी भारत में ज्यों-कारयों है । हिन्दी भाषा में संस्कृत की ध्वनि-साममो, शब्द भएडार, वाग्धारा, विचार-समूह अभी तक विद्यमान हैं। देश-काल के प्रभार में संस्कृत का रूपान्तर हिन्दी हो गया है । संस्कृत को देखा-देखी 'मृत-मापा' कहना घोर अन्याय है जब कि वह देव-बाणो इमारी भाषा में, हमारे माशे में और हमारे धर्म में जीवित है। यह फन कह सकता है कि भविष्य में भारत की सांस्कृतिक भाषा संस्कृत नहीं हो सस्ती । ऐतिहासिक दृष्टि से भी देखा जाय तो हम कह सकते हैं कि संस्कृत एक रहे महब का पान रखती है। जनों और बौद्धों के अन्य अधिकांश स्म में संस्कृत में मिलते हैं। वेद, स्यति इतिहास, पुराए मादि प्रन्यों का प्रमार - हमारे व्यावहारिक और सामाजिक जीवन पर अनादि काल से थायण रहा संस्कृत-प्रचार भारत से बाहर मलयाद्वीप यवद्वीप स्वर्णद्वीप,तिब्बत, चीन आदि देशों चोर मांसीसी हिन्दी-चीन तथा प्राचीन चम्पा पनिवेश में रहा है। स्यास में अभी तक राज्याभिषेक के समय टूटी-फूटी संस्कृत में ही मन्त्र पढ़े जाते हैं। वैद्य लोगों का आयुर्वेद संस्कृत में ही तो है। कितने ही दीन-दुखियों के स्वास्थ्य और सुख का साधन संस्कृत भाषा ही तो बनी है। संस्कृत का जीवित साहित्य भाज भी विद्यमान है और इसके जीवन का प्रत्या प्रमाण मिलता है। जीवन का नाम वृद्धि है, मृत्यु का नाम हास है। यूरोप में जब से संस्कृत का अध्ययन प्रारम्भ हुमा सय से उन देशों में भाषाशास्त्र का विमर्श और विवेचन प्राहम्म हुश्रा। उन्होंने मी यास्क मुनि और पाणिनिःपूतजलि प्रादि प्राचार्यों से वे भाषा-श्व सीखे तो केवल संस्कृत द्वारा ही सीग्वे जा सकते थे। भाषा-विधान तया शास्त्र में तारतम्य दृष्टि के उद्बोधन करने का श्रेय केवल संस्कृत को ही प्राप्त हो सकता है। यह कहना भी भ्रान्ति ही है कि संस्कृत पोली नहीं जाती थी और इस का प्रचार केवल प्रन्यों तक ही था। रामायण और महाभारत काल में संस्कृत ही बोल-चाल की भाषा थी। इसके प्रमाण पद-पद पर मिलते हैं। हनुमान जब पहले पहन श्रीरामचन्द्र को मिलते हैं तय खत में ही बार्तालाप करते हैं। सोताको सन्देश देते समय हनुमान् संस्कृत का मानय लेते हैं। श्री पाएमीकि लिखते है कि जय हनुमान अपनी यात समान कर चुके तय श्रीराम बोले- "सचिवोऽयं कपीन्द्रस्य सुप्रीवस्य महात्मनः । नूनं व्याकरणं कृतलमनेन बहुधा श्रुतम् ॥ बहु व्याइरतानेन न किश्चिदपशब्दितम्।" किष्किन्धा काए ॥ ३ ॥ २६ ॥ इससे जान पड़ता है कि राम के जाने से पूर्व ही दक्षिण में संस्कृत भाषा पोली जाती थी। सीता-सन्देश के समय भी हनुमान जी ने सोचा- वाचं चोदाहरिप्यामि मानुपीमिह संस्कृताम् !! सुन्दर कापड ॥३०॥10॥ यास्क और पाणिनि के प्रन्यों से प्रत्यक्ष पता चलता है कि संस्कृत पोली जाती थी। इसीलिए उन्होंने इसका नाम 'मापा' या 'लौकिक' रक्सा है । शिष्ट वर्ग की भाषा संस्कृत थी। हर्षवर्धन के ममय तक राज-भाषा मी यही थी। मारतीय इतिहास के ज्ञान के लिए, पुरातत्व की गवेषया के लिए, भारत के प्राचीन जीवन की जिशामा को मृप्त करने के लिए संस्कृत साहित्य का अध्यपन अत्यावश्यक है । जीवन के चतुर्वर्ग-धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष में से धर्म और मोत साधन के लिए मंस्कृत अनिवार्य है। भले ही हम अर्ध और काम के लिए अन्य प्राश्रय का अवलम्बन कर लें। इस वैज्ञानिक युग के आध्यात्मिक अन्धकार में यदि कहीं से रक्षा का पालोक मानव-संसार को प्राप्त हो सकता है तो वह संस्कृत-साहित्य से ही मिल सकता है। वैज्ञानिक घाता- वरण में वेदान्त का समावेश जब तक न होगा तब तक संसार में शान्ति का मानाय स्थापित नहीं होगा। विज्ञान और साहित्य में यह मेल तभी सम्पन्न हो सकता है जब संस्कृत वाइमय के श्रमर ररन शिक्षा-विधि में रम्वे जायं और उनसे प्रारमा की धमरता, एकता में अनेकता, अनेकता में एकता तथा 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का ज्ञान लोगों को हो। यह पावन सन्देश संस्कृत ही प्रदान कर सकती है, यह समता केवल संस्कृत में ही है, यह हम बडे दावे मे कह सकते हैं। इस बात का प्रमाण यूरोपीय विद्वान् अपने लेखों थौर पुस्तकों द्वारा पर्याप्त रूप में दे चुके हैं। संस्कृत भाषा और साहित्य भारत के बुद्धि- वैभव का उच्चतम परिणाम हैं और इस बात का प्रमाण भी है कि यदि भारतीय विकास का परम रमणीय उदाहरण देखना हो तो 'संस्कृत' देखिये। हमारी साधना का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण यदि आपको देखना हो तो देवनागरी वर्ण-माला ही देखिये । यह वह मणि-माला है जिसके साथ की माता मंमार की किसी भी भाषा के पास नहीं है। इसे पढ़कर यह पाश्चर्य होता है कि वह कैसा मस्तिष्क रहा होगा जिससे इस मुकर क्रम का प्रकाश हुथा होगा। इस वर्ण-माला के देप में साहित्यिकों ने, दार्शनिकों मे, प्राचार्यों ने, शास्त्र. कारों ने, अषियों ने, मनीषियों ने और मुनियों ने सरस्वती का अपय भण्डार भरकर हमारे सामने रख दिया है जो जाति को अस्य सम्पत्ति है और जो हमारा जीवनाधार है। यदि संस्कृत है तो भारत है, यदि संस्कृत नहीं तो भारत कुछ नहीं । भूत और भविष्यत् के अन्तर को ही तो वर्तमान कहते है। भूत की भित्ति पर वर्तमान बनता है। भारत का भविष्य बडे ऐश्वर्य का सत कर रहा है । यह तब तक न होगा जब तक हम जातीय जीवन में अपनी चिन्तन-साधना के संचय को पुनः न अपना लेंगे। रामायण और महा- भारत की अनश्वर निधि हमारे जातीय गौरव का अद्वितीय प्रतीक है । मर्यादा पुरुषोत्तम राम का निःस्वार्य जीवन, सकी सीता का पातिव्रत्य तथा योगि- राज श्रीकृष्ण का गीतामृत रूपी सन्देश मृत जाति को भी पुनरुजीवित करने का यल रसते हैं। केवल इनके अध्ययन और उचित रीति मे अध्यापन की अावश्यकता है। रामायण में सुन्दर काण्ड, महाभारत में में श्रीमद्भगवद्गीता, कवियों में कालिदान, अश्वघोष और विविध पद्य-संप्रद में मर्तृहरि प्रादि ।

लेखकों के अन्यों से उद्धरण इस संग्रह में लिये है। रामायण की अमर कहानी, कृष्ण की अमृत वाणी और कालिदास की मापुरी जिसके कानों में पढ़ गई उसे संस्कृत काप्यामृत का रस प्राप्त हुए विना नहीं रह सकता, यह हमारी द धारणा है। संस्कृत साहित्य दो भागों में बाँटा जा सकता है। प्रथम यह जो वैदिक भाषा में है और दूसरा वह जो लौकिक भाषा में है। इस मंप्रद का श्रीगणेश रामायण से किया गया है। क्योंकि वैदिक साहित्य के अनम्वर प्रथम स्थान महाकवि वाल्मीकि को ही दिया गया है। वाल्मीकि रामायण संस्कृत साहित्य की विमूतियों में रामायण एक अनुपम रहन है। यह यह प्रन्य है जिसे धादि काग्य होने का गौरव प्राप्त है। संस्कृत साहित्य के अनेकों खेसकों के लिए यह अन्य घिरकाल तक उपजीव्य बना रहा है। कानि- दाम, भवभूति प्रादि प्रमुख कवियों ने आदि-काव्य के अनुशीलन से ही स्फूर्ति एवं प्रेरणा प्राप्त कर काव्यमय रचना की थी। अनेकों काय तथा नाटक रामायण के कथानों के आधार पर लिये गए है जिनमें सबसे प्रमुख रघुवंश सया भास भवभूति के नाटक है। अनेक कवियों के लिए रामायण ने पय- प्रदर्शन का कार्य किया है। भारतवर्ष में रामायण का प्रचार चिरकाल से रहा है। पर इस युग म रामजीला और रामायण की क्या का स्थान 'सिनेमा' तया रेडियो नेले लिया है। फिर भी चित्रपट पर 'रामराज्य' और 'भरत मिलाप' जैसे एप और रामायण की कथा-चार्ग, रामायण की उस रलोकपद उक्तिको प्रमाणित करते हैं जो हमें रामायण के दूसरे ही सर्ग में मिलती है:- "यायतथास्यन्ति गिरयः सरितश्च महीतले । वावद्रामायणकथा लोकेषु प्रचरिष्यति ॥ क्या सचमुच ही रामायण का ऐसा महान है उमका पठन-पाठन तया दर्शन किमी-न-किसी रूप में भारतीय जनता के लिए अनिवार्य समझा जाता है ? इसमें कोई आपत्ति नहीं । इसके कारण है- रामायण और भारतीय सभ्यता एक दूसरे के प्रतीक है। भारतीय-मम्यता का जहाँ कहीं प्रचार हुअा, वहाँ वाल्मीकि रामायण का प्रभाव विशेष रहा । हिन्दु-समाज की संस्कृति की नींव गृहस्य धर्म है। चाहे यह मन्नाधार शिला जनैः सुतः इस तथाकथित (So-called) यैज्ञानिक युग में छिन्न-भिन्न होती जा रही है, पर फिर भी लोगों की रष्टि मर्यादा पुरुषोतम राम की ओर पड़े बिना नहीं रह सकती। मार्य योर राम और भार्या सती सीता भारतीय सभ्यता का प्रतिनिधित्व अनन्तकाल तक करते रहेंगे। राम प्रादर्श पीर हुए है। इस यात का उल्लेख पाएमीकि ने मालकाएर के प्रथम सर्ग में ही पदी भोजस्विनी भाषा में किया है। सपमें निरस वाल्मीकि मुनि के पास नारद जी ने राम के और स्वभाव का यह चित्र खींचा है, जिसको उद्धत किये बिना राम के दर्शन नदी हो सकते । मर्यादा पुरुषोसम का परिश-चित्रण याल्मीकि ने इन शब्दों में किया है। इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान् धृतिमान्वशी ॥१॥ बुद्धिमान् नीतिमान् वाग्मी श्रीमान् शत्रुनियहणः विपुलांसो महायाहुः कम्युमोयो महाहनु. ॥२॥ महोरको महेष्वासो गृहज ररिंदमः आजानुबाहुः सुशिराः सुललाटः सुविफमः ॥ ३ ॥ समः समविभक्तागः स्निग्धवर्णः प्रतापवान् पीयवक्ष्म विशालाक्षो लक्ष्मीवाशुभलक्षणः ॥४॥ धर्मशः सत्यसन्धश्च प्रजानां प हिते रतः यशस्वी ज्ञान-सम्पन्नः शुचिर्पश्यः समाधिमान् ॥५॥ प्रजापतिसमः श्रीमान् धाता रिपुनिपूदनः रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य । परिरतिता ॥६॥ रतिसा स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रतिता वेदवेदाग तत्त्वज्ञो धनुर्वेदे प निष्ठितः ॥७॥ सर्पशास्त्रार्थतत्त्वशः मतिमान् प्रतिभानवान् सर्वलोकप्रियः साधुरदीनारमा विचक्षणः ॥८॥ सर्वदाभिमतः सङ्गिः समुद्र इव सिन्धुभिः । आर्यः सर्यसमश्चैव सदैव प्रियदर्शनः ॥४ इस प्रकार मारद मुनि ने प्रारम्भ से लेकर अन्त तक संक्षेप से राम-कथा पाएमीकि को सुनाई । तदनन्तर मुनियर पाश्मोकि समसा मदी के तौर पर भ्रमण कर रहे थे कि उन्होंने एक व्याध से विद कौर को देखा और उसके लिए विखाप करने वाली कौधो का करण शम्द सुना इस घटना के गहरे प्रभाव से पाविष्ट होकर उनके मुख से ये शम्द निकले जिनमें हृदय-येदमा स्वत: .

(८) प्रस्फुटित हो रही यौ । मोच की करण-कहानी से द्रवित होकर राम-धरित की वेदनामयी कया को सीता-वनवास से सीता-वन-रयाग तक कह सुनाया। जीवन में ऐसे पण पाते हैं, जब मनुष्य का वेतना-प्रवाह क्या-क्या कुछ कर दिखाता है। अर्जुन को घेदना हुई, भगवान् श्रीकृष्ण को गीतामृत का संचार करना पड़ा । मगान् गौतम को वेदना हुई, तब बौद्ध विचारों की सृष्टि हुई। नघर वाल्मीकि की वेदना ने संसार के गोक को श्लोक्मय कर दिया। ऐसा महाकाव्य रघा कि जिसकी तुलना संसार-भर का कोई महाकाव्य नहीं कर सकता । राम-कथा को रमणीयता, वाल्मीकि की भावुकता, उनको शैली की तन्मयता, भाषा की सरसता मावों की गम्भीरता एवं स्वामाविकता और वार्तालाप की ययार्यता तथा सबलता इस अन्य को प्रत्येक पंक्ति मे टपकती है। यही महत्ता थी जिसके कारण वाल्मीकि के जीवन काल से ही इस अनुपम अन्य-रन का प्रचार हो चलाया। धीराम ने स्वयं इसका गायन सुना। ऐसे लेखक विरले ही होते है जिनकी रचना का सम्मान उनके जीवन काल में ही इतना होता हो जितना कि यात्मीकि की कृति का उनके जीवन काल में है । रामायण-माधुरी का धास्वादन वाल्मीकि की प्रत्येक पंक्ति में होता है। गौतमबुद्ध से पहले ही रामायण का निर्माण हो चुका था। वाल्मीकि- रामायण को अाधुनिक प्रति में २४००० रलोक मिलते हैं। इसके तीन | संस्करण प्रचलित हैं-वम्बई, बंगीय और काश्मीरी। इस थादि काम्य के निर्माता कहाँ रहते थे ? उनका कौन-सा समय है ? उन्होंने क्या क्या लिखा ? इत्यादि प्रश्नों का उचा इदमित्थं रूप में नहीं दिया जा सकता। संस्कृत का प्राधीनतम साहित्य प्रायः देश को निजी सम्पत्ति के रूप में दिखाई पड़ता है। लेखक अपना नाम-पता बताते सकुचाते हैं। उस समय, सर्वाधिकार सुरक्षित रखने की प्रथा नहीं यो । कौन ग्राम, कौन स्थान, पादने को MIN विश्व-कल्याण के लिए सर्व-सामान्य जन-समुदाय के हित के लिए अन्य रचे जाने थे । वह साहित्य-क्षेत्र में व्यापार का युग न था । विश्वजनीन प्रेम, मभाष और हित-बुद्धि साहिरय का संदेश समझा जाता था। कालिदासादि महाकवियों ने वाल्मीकि के सम्बन्ध में यों कहा है---पौता चन-स्याग का वर्णन करते हुए रघुवंश --~७० में लिखा है- वामभ्यगच्चदुदितानुसारी कविः कुशेमाहरणाय यात। निपादविद्धाण्डजदर्शनोस्यः श्लोक्त्यमापद्यत यस्य शोकः ॥ इमी श्लोक का उदगार वाल्मीकि ने इस पद्य में किया था- - मा निपाद प्रतिष्टान्त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ॥ मानवीय शोक का सागर वाल्मीकि के हृदय में उमड पड़ा और उस आवेश से उनकी कोमल वेदना सारस्वत सन्दोह में फूट पडो । भादर्श जीवन का लक्षण जैसा वाल्मीकि ने अंकित किया है वैसा किसी और से नहीं हो सका । करण-काव्य-कथा यह राम की ही नहीं प्रत्येक जीव-मात्र की हैं। तभी तो इतनी सहानुभूति, इतनी समवेदना इस कथा से जागृत होती है । यही तो रामायण को लोकप्रियता का रहस्य है। वाल्मीकि का हृदय कुसुम से भी कोमल और धन से भी कठोर था। जिस मर्मस्पशी हृदय से मीता-वनवास लिसा उसी वन-सम कठोर मन से संता वन-त्याग और सीतान्तर्धान अंक्ति किया है। पाठक रामायण पढ़ता हुश्रा नतमस्तक होकर कहता है- कूजन्तं राम रामेति मधुरं मधुराक्षरम् । आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ।। गाईस्थ्य प्रधान हिन्दू समाज का जो कुछ धर्म है वाल्मीकि ने श्रीरामचन्द्र जी को उसी का श्रादर्श प्रतिनिधि बनाकर दिखाया है । पुत्र रूप में, भ्रातृरूप में, पतिरूप में, मित्ररूप में ब्राह्मण-धर्म के रक्षक के रूप में, और अन्त में राजा के रूप में वाल्मीकि के राम ने अपनी लोक-पूज्यताको प्रमाणित कर दिया है। उन्होंने एक मात्र अपनी धर्म-परनी के उद्धार के लिए ही रावण को मारा और प्रजा-रंजन के अनुरोध के कारण ही उन्होंने अन्त में अपनी पत्नी का परित्याग कर दिया। वाल्मीकि रामायण में अतिमानव (Supernatural) अंश है, पर योदा । इतना नहीं जितना लोक-प्रसिद्ध तुलसी-कृत रामायण- रामचरितमानस में। भगवद्भक्ति की लहर तुलसी में उमड पाई है जिससे राम नर-दैव हो गए हैं और प्रतिमानुपी लीला के प्रधान नायक यन गए हैं। बाल्मीकि रामायण में सात काण्ड है. बाल काण्ड, अयोध्या काण्ड, अरण्य काण्ड, फिपिन्या काण्ड, सुन्दर काण्ड, लंका काण्ड, उत्तर काण्ड । भाषा और मात्र दोनों को दृष्टि से यह महाकाव्य अद्वितीय है। भाषा प्रसाद-गुण-युक्त तया मात्र सरस एवं मनोरम है । श्लोकों की भाषा सरल है और मन को वशीकरण का एकमात्र मन्त्र है । इनमें बह रम है जो परथर को भी पिघला दे। इस महाकाव्य में श्रादर्श नर-नारी, पतिव्रता नारी और परनो-यत नर की करण कहानी का ग्रन्दन ही ध्येय प्रतीत होता है, वास्ता मनुष्य के नश्वर जीवन की जाने वाली कहानी है। .

- रामापरा-माधुरी और उमको रमीयता प्रत्येक पद मे रपस्ती है परिवचित्रण में वाल्मीकि ने अद्भुत काव्य-दृष्टि की है। महावीर हनुमान जैमा मेवा, लक्ष्मरामा म और भरत मा स्थानी किती विरले ही साहित्य में मिलेगा । सीता का पवित्र धादर्श भारतीय नारी-जीवन में रस प्रारमचारी प्रेन का उद्बोधन करता पाया है जिससे इसंख्य महिनामों का प्रेम-स्रोत मरी प्राण को ओर भनवरत दहता पा रहा है। रामायण में मानव स्वभाव का चिरलपए, हृदय को मारनामों का उतार• दाब, उनका उद्रेक चोर उद्ग यही हो मानिक भाषा में चित्रित किये गए है। - कालिदास घरनी उपमानों के लिए, प्रति-वन के लिए, मनुष्य हा हृदय टटोजने के लिए, चरित्र-चिवर के लिए प्रसिद्ध है; पर यह शिक्षा उन्हें कहाँ मे मिली। यह कला उन्होने बानीकि से मोती। उनके वन का अनुकरए संस्कृत के कई महात्रियों ने किया, पर ये वाल्मीकि को कोटि तक नहीं पहुंच सके। मादियिक सौन्दर्य के कारण, काशाता को पुनरम्जीवित करने वाले सोटा-सन्देश के कारण मुन्टर कागद को मृतक हो माना गया है। वास्तव में पह काण्ड सुन्दर ही है। इसमें वारमीकि ने अपनी कमनीय कल्पनाचों का कान्त-पावलि में, उज्वल उपमानों और उदास उधानों द्वारा विशद बरंन किया है और अपनी कान्य-कला का पूर्व परिचय दिया है। हमने इस काम्य-संग्रह में मुन्दर काण्ड में सार लिया है और इसमें महावीर-पराक्रम, समुद्र-संधन, संका-प्राप्ति, पुपक-वर्णन, सोवा-दर्शन, सीता- पीतार, हनुमद्विपाद, सोठा-मदेश मकानों से सार लेकर पारमीकि के शब्दों में दो संदिप्त कर दिया है, हिमये कोमल-झवि मुकुमार चालकों को रचि वाश्मोजिनामापए को और प्रत हो और हमारी पुनोत परम्परागत मानसिक सम्रति हमारे हृदय में स्थान पनाये रखे। सीता के सुन्दर वाग्य क्या माको छरित करते हैं- कल्याणी वट गायेयं लौकिकी प्रतिभाति में। एवि जीवन्तमानन्दो नरं वर्ष-शतादपि।। महाभारत वाश्मोकि के घननां पास का नाम लिया जाता है। यदि वारमोकि पादि-कवि है दोशन विश्वकोप के रचयिता। क्योंकि व्यास महाराज की अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार महाभारत वद प्राय है जिसने पुरपाय धनुष्टश प्रार धर्म, अर्थ, काम, मोर मा परिपूतिपादन किरा गया है 1 व जिरते है- 1 धर्मे अर्थ च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ । यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित् ।। महाभारत में एक लास श्लोक हैं। इसीलिए इसको शतसाहनीसंहिता कहते हैं । इस विशालकाय अन्य में कान्य की अपेक्षा ऐतिहासिक अंश अधिक होने के कारण इसे महाकाव्य न कहकर इतिहास कहा गया है। इस महा- काय प्रग्य का विकार तीन रूपों में हया प्रतीत होता है। इसका मौलिक रूप 'जय' नामक था जो तदनन्तर 'भारत' और 'महाभारत' के नाम से विम्यात हुअा। महाभारत के अठारह पर्व है। भीम-पर्व के प्रारम्भ में ऐसी घटना का वर्णन है जो हृदय में उथल-पुथल मचाने वाली है। मंग्राम द्विढने वाला है । सब तैयारियाँ हो चुकी हैं। वीर महारथी अपने-अपने स्थान पर शस्त्र प्रयच धारण किये सन्नद्ध बैठे हैं। यहाँ तक कि लदाई का मारू बाना मी यज चुका । शंखनाद हो चुका । तीर कमान से छूटना ही पादने थे कि अकस्मात् धीर अर्जुन पर उदासी पा गई। उसके निमय मन में यह मोह दा गया जिससे हतोत्साह होकर शोक में डूबा हुमा दह सोचने लगा कि बदना पाप है। यह नहीं कि वह पहले कभी लहान हो या कौरवों से पहले उसकी मुठभेड़ न हुई हो। कई बार उमने शत्रुमों का संहार किया था। लड़ाई में भी पीठ न दिखाई थी। मानव हृदय की चाल निराली है। कोई अनुपम मुहूर्त ऐसा था जाता है जो जीवन-स्रोत की दिशा को ही बदल देता है। इतिहास में ऐसी घटनामों की गिनती करमा कोई कठिन कार्य नहीं । हम अपने जीवन में भी यह अनुभव करते हैं। ऐसे (Psychological moment) मनोवैज्ञानिक पण में मन के हदय ने पलटा साया । श्री कृष्ण जिसके सारयी हों, उसे हार-जीत से पया घर ! पर वह श्री कृष्ण के ममझाने पर भी कह बैठा- न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूणी बभूव ह । जए कोई ऐमा दुराप्रद कर ले कि जायो में काम नहीं करता, तब ऐसे हठी को कार्य में प्रवृत्त करने के लिए जोर लगाना पड़ता है। बलात्कार किया तो क्या किया, यह तो पाशविक व्यवहार है। जो कर्म-प्रवृत्ति हृदय से जगती है पद्दी सच्ची प्रेरणा होती है। पर उस प्रवृत्ति का जगाना बिना किसी योगिराज के नहीं हो सकता। कर्तभ्यपरायणतारूपी योग का उपदेश भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन को दिया जो उपदेश केवल अर्जुन के लिए दो नहीं मा अपितु मनुष्य-मात्र के लिए रिश्वव्यापी सर्व कल्याणकारी यादेश था, जिमका प्रचार याज का युग-धर्म बन गया है। यह उमी उपदेश का फज था कि पाय-धर्म को भूला हुअा अन ठोक रास्ते पर प्रागया। गीतोपदेवा की समाप्ति पर वही मोइ-मस्त धन, जो रथ पर घनुप-याण छोड़कर हतारमाह हुश्रा बैठा था, विननमाव से श्रीकृप्य से कहने लगा- नष्टो मोहः स्मृतिलब्धा"करिप्ये वचनं तव । गीतात्पमाप्ति के अनन्तर भीष्म-प के ४३ वें अध्याय में सञ्जय कहते हैं- चतो धनश्चयं दृष्ट्वा वाणगाण्डीवधारिणम् । पुनरेव महानाद व्यसृजन्त महारथाः॥ भीष्मपर्व ॥ ४३ ॥ ६ ॥ गीतामाहाभ्य का उत्तम उदाहरण इससे दूसरा क्या हो सकता है ? श्रीमद्भगवद्गीता महामारत के मन्य में बाती है। भीम-पर्व के पच्चीसवें अध्याय से थारम्म होकर बयालीम पर यह भगवद्गीता समाप्त होती है। यह देदीप्यमान निर्मल हीरा, भारत का गौरव ग्रन्थ, ईश्वरीय संगीत मुनाने- वाला तया अमर सन्देश देने वाला है । जो मुनेगा और उस पर अाचरण करेगा वही अमृत-पद को प्राप्त करेगा। माहित्य के अनमोल रन गीता के अठारह अध्याय है। हमने इस मंग्रह में गीतासार दिया है। गीता के ७०० रनोकों का सार गीता के अपने शब्दों-रलोकों में दिया है। जिन पाठकों के लिए यह संग्रह प्रस्तुत किया जा रहा है, टनकी पावश्यकताओं को दृष्टि में रखते हुए हमने गूढ़ दार्शनिक अंशों को छोड़कर गीता के सम्पूर्ण कर्मयोग के उपदेश को यहां रखा है। अजुन का विषाद और श्रीकृष्ण का निष्काम कर्म करने का उपदेश भली. भौति हृदयंगम कराने का प्रयास किया है । इस उपदेश को चरितार्य करने के लिए कैमा माहार-व्यवहार होना चाहिए, इसका मी टरलेस दिग्दर्श. नार्थ किया है। इससे हमारे युग-धर्म के प्रवर्तक नवयुवक व्याम प्रसाद को ग्रहण कर जीवन को सफल बना सकेंगे। कटिन पे-करिन विषय का सरल. से-परल भाषा में प्रतिपादन गोवा से भिन्न और किमो पुस्तक में नहीं हुधा । इस संग्रह में भाषा और भाव दोनों को सरलता और सरमता पर विशेष ध्यान रखा गया है। गीतामृत गीता में हिन्दू धर्म और हिन्दू-संस्कृति के प्रमुग्म विचार अत्यन्त सुन्दर और माल भाषा में वर्णन किए गये है। यह प्रन्य भारतीय प्रतिमा कामार है। इसकी महत्ता का इममें बनकर और क्या प्रमाण हो मना है कि हम प्रन्यनन का अनुवाद संसार की प्रायः सभी मम्य भाषाओं में हो गया है। संसार के कोने-कोने में गीता के प्रशंसक विद्यमान है, जिनके जीरन इस अद्भुत प्रन्य की शिक्षा के अनुकरण में विकास को प्रात हो रहे हैं। - - - ( १३ ) इस गौरवमय रचना में ज्ञान-कर्म और भक्ति का अत्यन्त सन्तोषजनक मेल कर दिया गया है। प्रात्मा की अमरता, परमात्मा को सर्व-व्यापकता समस्त स्थावर और जंगम जगत् को इसी महाशक्ति में विद्यमान, विभूतियों का वर्णन और ग्यारहवें अध्याय में सारे ब्रह्माण्ड को पुरुपयल में प्रस्तुत करना इत्यादि सब बातों को गीता का ज्ञान-काण्ड कहना चाहिए। इस ज्ञान से इस बात का निश्चयात्मक ज्ञान हो जाता है कि सब घटनाएं परमात्मा की शक्ति और इच्छा से हो रही है, तथा मनुष्य की अल्पज्ञता और अज्ञान ही उसके दुःख का कारण हैं । बारहवें अध्याय में भक्ति के लक्षण बड़े सुन्दर रूप में किये गए हैं। गीता में ज्ञान ने भक्ति का रूप धारण किया है। जब परमात्मा की विद्यमानता और उसको सर्वशक्तिमत्ता का मान हो गया, तब उसको सब-कुछ अर्पण किये बिना और कोई चारा नहीं रहता। ज्ञान और भक्ति के साथ कर्म का अत्युत्तम मेल कर दिया गया है। तीसरे अध्याय में यह बता दिया गया है कि कर्म के बिना एक क्षण के लिए भी कोई प्राणी नहीं रह सकता। इसलिए कर्म किस प्रकार करना चाहिए, यह रहस्य गीता हमारे सामने स्पष्ट करके रसती है। कर्म का रहस्य यही है कि हमारे कर्म निष्काम हो। निष्काम कर्म का यह अर्थ नहीं कि हमारे कर्म बिना प्रयोजन के होने चाहिएं, प्रत्युत इसका अर्थ यह है कि जिस अवसर पर जो कार्य करना उचित और अावश्यक है, उसको अवश्य करना चाहिए । उसके करने में और किसी बात से प्रभावित नहीं होना चाहिए। मैं क्या करना चाहता हूँ और मुझे क्या करना चाहिए, इन दोनों बातों में कई बार अन्तर पड जाता है और एक समस्या-सी खड़ी हो जाती है। ऐसी अवस्था में 'मुझे क्या करना चाहिए' इसी बात को अपने सम्मुख रखना श्रावश्यक है । अर्जुन युद्ध करना नहीं चाहता; भगवान् श्रीकृष्ण उमे यही ज्ञान देते है कि इस समय युद्ध करना कर्तव्यानुरोध (Obligators) है। इच्छा का होना या न होना तो इस बात का निर्णय कर सकता कि किम अवसर पर कौन-सा कर्म श्रावश्यक है। इसी कम करने की कुशलता को भग- वान् श्रीकृष्ण ने योग के नाम से पुकारा है 'योगः कर्मसु कौशलम्' । इस योग में मनुष्य को सुख-दुःख, हानि-लाम, मान-अपमान, सफलता-असफलता, जय-पराजय को देखना नहीं होता, प्रत्युत शुद्ध हृदय से अपने कर्तव्य कमा का पालन करना होता है। सोलहवें अध्याय में देवो पासुरी सम्पत् का वर्णन करके नैतिक जीवन का बहुत ही अच्छा विवेचन किया गया है। बात यह है कि गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने पूर्ण जीवन का चित्र खींचकर रख दिया है और उसमें सारे रङ्ग । (१४) इस प्रकार भर दिये है कि उनके यादर पुष्प रह नहीं जाता। गीता पर विशाल साहित्य की रधि होतो भा रही है। पता नहीं यह अनुपम प्रन्य व महामारत से पृथकरूप में सलित किया गया। गीता पदवे समय लोग प्रायः यह नहीं समझते कि वे महामारत ही पढ़ रहे है। इसका अपना म्यक्तिगत अस्तित्व है जो मुक्काहार में मध्यमणि के सदश सारे महा- मारत को उदोश कर रहा है। इस ज्ञान-निधि अन्य पस्यसंख्य मान्य, अनेक प्रवचन, घगएित रोकाएं लिखी गई है चौर इसके प्रगण्य अनुवाद हो चुके हैं और इतने गवेषणात्मक निबन्ध लिखे जा चुके है कि पुस्तकालय में गीता-साहित्य का एक पृथक् विभाग दन सकता है। संस्कृत में शहर प्रभृति अनेक प्राचार्यों ने इस पर अपने विचार लिखे हैं। लोकमान्य तिलक का 'गोतामहस्य', गान्धी का 'मनामन्ति-योग' और भरविन्द के Essays on Gita इस प्रसिद् अन्ध पर प्रमुख विवेचन है। यह उपनिषदों का सारमूत अन्य यसमति याजों के लिए भावनष्टि से दुरूह है, परन्तु भाषा की दृष्टि से सरल और सुबोध है । इस पुस्तक में जो काम्य-गुए हैं उनका परिचय विशेष रूप में "ययाय मे मिलता है। यों दो समस्त गीता ही सर्व-प्रिय काग्य है पर ग्यारहवें अध्याप में भगवरस्तुति को यनोखी मजक मलती है । गीठा निय-नबीन तया रम पूर्ण है। किसी लोक को पदो, किसी स्थल का मनन करो मर्वध रस मिलेगा, नीरसता का तो कहीं नाम नहीं। सोमनगवद्गीतग धर्म-प्रन्यों में मुकुट-मणि है। काग्य की शनि का मनोखा उदाहरण है। गीता का उपदेश "प्रशोच्यानन्दशीचश्वम्" से मारम्भ होकर "यहरवा सर्वपापेम्पो मोदयिष्यामि मा शुचः" पर समात होता है। हम उपदेश को सुनकर धनुन फिर से चापपारी होकर लड़ने के लिए सानद हो गया था। कर्तव्य-परायण बनने के लिए ही तो सद्बुद्धि का उपदेश समाप्त हुमा तब अर्जुन को युद्ध के लिए सन्नद पाया। अतः गीता हमें मही सिखाती है कि हम भी वही करें वो थनुन ने किया । जगत् की समस्याओं को सुलझाने में अपने को असमर्थ दिसाकर जंगल की राह न में, अपितु जोरन-संग्राम में पोर-योदा की तरह भाग लें और भरने कर्तव्य 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' का पालन करें। साहित्य में सड़ीवनौषधि का काम करने दालो, मृतक की जिलाने वालो यदि कोई पुस्तक है तो वह गीता है, जिसके अध्ययन से 'मृतो मानुपां मजेन्'-परा हुमा मी जो उठता है; हतोसाद मी काय-परापस हो जाता है। गीता को मापा की साळता हमारा ध्यान प्राइष्ट करती है। इसमें न तो थकाने वाले लम्बे लम्बे समाप हैं, न छन्दों की दुरूइता, न कठिन शब्दों का प्रयोग । जन-माधारण की भाषा में भगवान ने अपनी मधुर वाणी सुनाई है। मारा सरल है, भाव गम्भीर । भार इतने गम्भीर है कि जितना भी । मनन करो, नित्य नवीन अर्थ प्राप्त होता है । गीता में समूचे जीवन की व्याख्या है। यह काव्यमय अन्य मानव-समाज का सर्वशिरोमणि अन्य बनने के योग्य है। वही अर्जुन जिसने कृष्ण के सारथित्व के बिना ही राजा विराट को नगरी में गोहरण के समय कौरवों को अकेले पराजित किया था, अब कुरुक्षेत्र के मैदान में युद्ध के लिए तैयार दोनों सेनाओं को देखकर उसके मन में पाप- शङ्का और दया-वृत्ति का एक-साय ही उदय हुया। युद्ध से विरत होने का विचार करके उसने धनुप-याए रथ पर रख दिये और भगवान् से कहा-इस घोर पाप-रूपो युद्ध में प्रवृत्त होने को अब मेरी इच्छा नहीं । राज्य प्राप्त करने के लिए इन समस्त स्वजनों की हत्या करना मैं बड़ा भारी पाप समझ रहा हूँ । इन मबका विनाश हो जाने पर मुझे कभी सुख नहीं मिल सकता । अतएव इस प्रकार राज्य प्राप्ति की अपेक्षा भीख मांगकर जीवन धारण करना पहुत अच्छा समझता हूँ। अर्जुन के विपाद को दूर करने के लिए और उसे कर्म-मार्ग में प्रवृत्त करने के लिए भगवान् ने इस कर्म-योग का उपदेश दिया है। भगद्गीता के अठारह अभ्यायों में इस कर्म-योग-शास्त्र का प्रति- पादन हुया है। प्रारमा की अमरता का उपदेश देते हुए भगवान् शान-धर्म की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि प्राततापियों को मारना पात्र-धर्म है, पाप नहीं, स्वर्ग:प्राप्ति का साधन है। युद्ध-क्षेत्र से भागना क्लीवता है, अनार्य व्यवहार है। पहले तो पृथ्वी का सामान्य मिलेगा, स्वर्ग तो कहीं गया ही नहीं। उठो, युद्ध में डर जायो । इस स्वर्णावसर को हाथ से मत निकलने दो। जय-पराजय, हानि-लाभ, सुख-दुःख का कोई विचार मत करो, फलासक्ति को दोहो, ईश्वर-प्रोस्यर्थ कर्म करो। अनासक्ति-योग का प्राश्रय लो। कर्म करने का अधिकार तुम्हारा है, फल तुम्हारे अधीन नहीं। युद्ध का फल चाहे कुछ भी हो उस पर विचार न करो और इस स्वधर्म-कर्म में प्रवृत्त हो जाओ। कम मार्ग की पुष्टि करते हुए भगवान् कहते हैं--शनासक-बुद्धि द्वारा कर्म करना योग कहलाता है। फल में प्रापस्ति'को छोड़कर कर्म में तत्पर रहना ही संन्यास का सार है। कर्म का सर्वथा त्याग हो ही नहीं सकता। शरीर धारण के लिए कर्म अनिवार्य है। जब कर्म करना ही पड़ता है तो योग- युक्त मंदी क्यों न किया जाय । अनासम भाव से कर्म करने पर ही देही पाप का भागी नहीं होता। यह सत्य है कि मन चञ्चल है--स्थिर है। इस को वश में करना हवा पर काबू पाने के सदृश छठिन कार्य है। परन्तु अना मस्ति के अभ्यास से मनुष्य मन पर विजय पा सकता है और मन स्थिर हो मरता है। इसी स्थित-प्रज्ञता के आधार पर मनुष्य कम-योग का मापन कर सकता है। सर्वशक्तिमान् परमेश्वर से ही जगन् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते हैं तथा उन्ही में जगत् प्रतिष्ठित है। इस बात का अनुमबम होना ही हमारे दुःखों और पापों का कारण है । सत्व, रज, तम गुणों द्वारा अभि ज्यक त्रिगुणाग्मिमा प्रकृति भी उसी परमेश्वर की लीला है। इसी को माया कहते हैं। मनुष्य अनन्य भक्ति द्वारा ही ईश्वर प्राप्ति कर सकता है और मेरे माया को समझ पाता है। तभी वह त्रिगुणातीत, स्थित-न या भक्त कहा जा सकता है। भगवान कहते हैं कि इस भक्ति का उदय मेरी विभूतियों और गुणों के चिन्तन से होता है । भगवान् ने विभूतियों के पर्णन में कहा है कि सारे जगन् को अपनी विभूतियों के एक ग्रंश-मात्र से धारण किये में स्थित हूँ। अर्जुन की जिज्ञासा बढ़ने पर उसे विश्वरूप दिखाया। अर्जुन ने भक्ति-प्रत होकर भगवान् को स्तुति की, जिसमें भक्ति काव्य की अनुपम धारा पही। भगवदर्शन और मक्ति का ऐसा उदार तथा मरल वर्णन कदाचित् ही पदी अन्यत्र मिलेगा। परम पिता परमेश्वर मे ही सम्पूर्ण संसार प्रकट हुआ है। उसी को पुरषोत्तम कहें चाहे ग्रहा। सब जीव उसी के अंग-मात्र हैं । देवी और प्रामुरी सम्पद् का दिमाग करते हुए भगवान् ने नैतिक जीवन की ओर संकेत किया है । साय-निष्ठ का याचार-विचार, थाहार ग्यवहार कैमा होना चाहिए जिससे कि योग-साधन ठीक हो सके । यज्ञ, प्रदा, तप, त्याग और दान तया सुख प्रादि कैसे होने चाहिएं, इन सब पर विशद रूप से विवेचन किया गया है । अर्थात् योगो बनने के लिए जोवन-निर्वाह कैसा होना चाहिए इसका लक्षण सुचारू रूप में कहा गया है। अन्त में भगवान ने अपने अमर प्रवचन का उपसंहार करते हुए अठारहत्रे अध्याय में अर्जुन से यही कहा है कि फलाहा को छोड़कर अनासक्त- चित्त से कर्म करता जा। इसी में तेरा अधिकार है, इमो में तेरी विजय है, यही नीति है, और इमो के करने से नुझे किसी प्रकार का पाप न लगेगा, जिसमें तुझे डर लग रहा है ।त् उठ और कर्तव्य परायण वन । यही गीता का उपदेश है, इसी का अर्जुन ने घनुपरण किया और यश तथा कीर्ति का पात्र बना।

तुलनात्मक दृष्टि रामायण और महाभारत पर एक रामायण और महाभारत दोनों भारतवर्ष के प्राचीन महा-काव्य (Eynes) है। भारतीय जीवन पर इन दोनों महामान्य ग्रन्थों का प्रभाव पहुत गहरा पदा है। क्या धर्म नीति, क्या साहित्य, सभी रामायण और महाभारत के विचारों से अनुप्राणित और जीवित हैं। यदि रामायण प्राचीन है सो महाभारत अर्वाचीन । रामायण काल को सभ्यता महाभारत काल की सभ्यता से अधिक सुसंस्कृत तथा शिष्ट प्रतीत होती है। मापेर दृष्टि से रामायण में शरा भ्यवस्था है । परन्तु महाभारत की संस्कृति में क्रान्ति, पिप्लव, संक्षोभ, विषमता और अव्यवस्था सटकतो है। रामायण की लोक-संख्या महाभारत की श्लोक- संख्या से कहीं बहुत कम है। रामायण एक व्यकि की साधना का फल है। महाभारत के जय, भारत और महाभारत के उत्तरोत्तर वृद्धि को प्राप्त होते हुए संस्करणों में कई ऋषि-मुनियों और कवियों की छाप दिखाई देती है। उक्त अन्तर दोनों महाकाव्यों को भाषा, भार और शैली को तुलना से स्पष्ट रष्टिगत होते हैं। रामायण के नायक राम का परिन आदर्श रूप में अक्षित है और प्रति. नायक का उससे सर्वथा विपरीत । महाभारत के कौरव-पाण्डवों का जीवन वास्तविक एवं साधारण है। उनमें गुण भी हैं, दोप भी है। रामायण में भ्रा-स्नेह व्या महाभारत में भ्रातृ-द्रोह क्या हो अच्छे अहित हैं। रामायण केवल 'राम-अयन' है अर्थात् राम के जीवन को धाधार मानकर रचा गया है, किन्तु महाभारत विभिन्न प्रकार के व्यावहारिक चरित्रों का निचोड़ है। रामायण कहती है ऐसा होना चाहिए, महाभारत कहता है ऐसा होता है। नुलना को दृष्टि से यदि रामायण की संस्कृति धर्म-प्रधान है तो महाभारत को कर्म प्रधान । मर्यादा पुरुषोत्तम राम को कर्मयोगो कृष्ण से तुलना कीजिये । रामायण में चप्पे-चप्पे पर धर्म को दुहाई सुनाई देती है, परन्तु महाभारत में अहकार-बुद्धि की प्रबलता है। अभिमान और दर्प पानों को रग-रग में भरे हुए हैं। हाँ, इतना कहना न्यायोचित होगा कि यदि महाभारत में राम जैसे प्राज्ञागजक और स्यागी, भात-जैसे भाई, हनुमान जैसे भक्त और सीता-सी पतिव्रता नहीं मिलतों तो रामायए में भी भोप्म से ज्ञानी, कृष्ण से तय. दर्शी और द्रौपदी-सी मनस्विनी दुर्लभ हैं । राम का धर्ममय थावरण और युधिष्ठिर को पत-प्रवृत्ति, भरत-लक्ष्मण का भ्रातृ-प्रेम और कौरव-पाण्डवों का भ्रातृ-द्रोह राम तय! मरत का राज्य को कराना और दुर्योधन का रास्य-प्राप्ति के निमित्त घोर अनाचार भादि विपरीत भाव इन दोनों महाकाव्यों के अध्ययन से स्पष्ट प्रतीत होते हैं तथा पाठक को विचारमग्न बना देते हैं। रामायण के समय में शासन में मना का हाथ .

पर्याप्त मात्रा में था ऐसा प्रतीत होता है, किन्तु महाभारत काल की प्रजा कठोर शासन के सामने चूं तक नहीं कर सकती। दुर्योधन को भाज्ञा का पाजन भीम भी नतमस्तक हो मूव-भाव से करते हैं। द्रौपदी की दुहाई कोई काम नहीं करती । उस पर भस्याचार घऔर उसके अपमान के समय भीष्म भी ताकने ही रहते हैं। वही भोम जो शर-शच्या पर भी शान्ति पर्व गा सकते है, अपनी विवशता का कारण यताते है-'मैंने दुर्योधन का यन्न साया है। साम्राज्यवाद (Impernahsm) का विरोध करना भीम को भी कठिन प्रतीत होता है। रामायण में सती-सीता का पातिवस्य और राम का एक पत्नी-बत, भले ही दशरथ की तीन पत्नियां थीं, महाभारत में सत्यवती और कुन्ती की कौमारावस्था में ही सन्तान-लिप्सा, पाण्डवों के अनेक विवाह और दीपदी के पाँच पनि, मे सब पैवाहिक जीवन में भी दोनों संस्कृतियों का भेद दिखाते हैं। युद्ध-क्षेत्र में भी थादर्श विभिन्न है। राम शस्त्र रहित शत्रु पर हाय नहीं उठाते, परन्तु महाभारत में शस्त्र-हित भीष्म तथा दोण का वध, स्य. से रतरे हुए कर्ण का वध और सोये हुए द्रौपदी-पुत्रों का वध होता है सीता-हरण और दीपदो-हरण की घटनाओं में अाकाश-पाताल का अन्तर है। महाभारत के नैतिक जीवन से रामायण का नैतिक जीवन (Moral lite) । बहुत ऊँचा है। महाभारत के समय विदेशी प्रभाव भी स्पष्ट दिखाई देता है। विदुर विदेशी म्लेन्च भाषा को जानते हैं। पुरोचन विदेशी है। वही लासा- गृह का निर्माण करता है। रामायण बौद् प्रभाव से सर्वथा असम्पृक है महाभारत के आधुनिक रूप में चौद्ध-अवतार का उल्लेख मिलता है। अन्य काव्य-ग्रन्थ संस्कृत में काव्य का लक्षण बड़ी सरल भाषा में लिया गया है। इसमें अधिक छोटा पर सारगर्भिव लक्षण धन्य भाषा में मिलना यहा कठिन है। 'वाश्यं रसात्मकं काम्यम्'। वाक्य ही काम्य बन जाता है, यदि उसमें रस हो। रस क्या है? इसका स्पष्टीकरण भी सरल है । रस एक व्यापक परि- भाषा है। कहने वाले को वाणी में रस है, इसलिए उसमें कवित्व है। बस, इससे अधिक और क्या कहा जाय ! चित्त का माहाद, मन की तृप्ति, इन्द्रिय-जन्य सन्तोष, प्राध्यात्मिक नियुचि ये सब रस के अन्तर्गत है। सारी भावुकता (Emotional Life) रस-वाचक है। रसौली उक्ति, बाँकी घचनावली, मिर को हिलाने वाली बाइ माधुरो, कविश्व राति के अन्तर्गत है। संस्कृत साहित्य का प्रादिम मन्य वाल्मीकि रामायण है, इसमें प्रगति है, नैसर्गिक प्रवाह है, कला है, रस है, सौन्दर्य है और है वह सत्य तया शिवः। इमलिए वाल्मीकि यादिकवि अर्याद फवि-शिरोमणि है। उसका काव्य महा- कायों में प्रादिकाव्य यर्यात सर्वप्रथम काम्य है। ऐसे काग्य को Epic कहने ।

। (१६) : जिसमें घटना (Action) की प्रधानता हो । इसमें प्राकृतिक वर्णन भी है, ति-काव्य को मनोरता भी है। पर है विशेषतः घटना-प्रधान । प्राय संस्कृति म्पूिर्ण भारत में फैल रही.थी; शान्ति का साम्राज्य अभी पूर्णतया स्थापित ही हुमा था; दुराचारी रास न केवल दक्षिण में ही मिलते थे अपितु मथुरा । विद्रोह-शान्ति के लिए शत्रुघ्न को भी जाना पड़ा था। ठीक इसी काल का किन रामायण में मिलता है। साम्राज्यवाद तथा वर्णाश्रम-व्यवस्था ज़ोरी र थी। महाभारत में समय परिवर्तन दिखाई देता है। वैसे भी महामारत इतिहास की अधिकता है। महाभारत के उपरान्त जो सिद्धान्त रटिगोचर हुए उनमें सर्व- मुख बौद्ध-सिद्धान्त हैं । यही काल तथाकथित (so-called) ऐतिहासिक ाल में हमारा पदार्पण कराता है । समय बड़ा लम्बा है। चौद्ध-कल के स्कृत साहित्य का प्रतिनिधि कवि अश्वघोष है। रामायण और महाभारत उपरान्त वघोष के काव्यों का उल्लेख अनिवार्य है। यौद्ध काल ऐति- मिक काल है, जिसमें भारतीय संस्कृति का विकास हुअा, भारत से बाहर सिका सन्देश सुनाया गया। रामायण-महाभारत के पीछे और अश्वघोप के हले के काव्य अब सुनाई नहीं देते। अधिक प्रसिद्ध अन्य के सामने सामान्य योग्यता के अन्य प्राय' लुप्त हो ही जाया करते हैं। महाकाव्य का जय प्रचार बढ़ा तब उसमें कला की मात्रा भी बढ़ने लगी। मान की दशा भी प्रति जटिल होने लगी। प्राचीन सरलता का स्थान बाह्या- म्यर ने ले लिया। यदी दशा साहित्य की हुई । रामायण के प्राकृतिक कान्य है मरनों का स्थान कृग्निम तटों से सुशोभित, येन-बूटों से अलंकृत, नगरों बिहने वाली नहरों और दीचिकाओं ने ले लिया। यह युग समृद्धि का था, जिसका प्रभाव काव्य को हासमय पतन की भोर वलसा गया। श्रश्वभोप घऔर कई अंशों में कालिदास को छोड़कर अन्य प्रमुख ऽपि भारवि,माघ प्रभृति इसी लहर में बह गये। रूदिवाद ने प्रगतिवाद मा स्थान लिया । राज-सभा का गठ, उसका भातक, उसकी सज-धज, वि साहित्य में टपकने लगी। राज-सभा जैसे सबके लिए नहीं होती, वैसे ही इस सभा के लिए साहित्य भी रचा गया । साहित्य भी सीमा की परिधि में iघ गया ! रामायण को सार्वभौमता अब लुप्त सी दिखाई देती है। संकीर्णता प्रधिक है, मापकता कम है । अश्वघोष भोर कालिदास इस दोष से मुक्त तीत होते है, परन्तु उन परवर्ती कभी भी इस दीप से मुक्त हो ऐसी मात नहीं, उन पर देश काल का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है अश्वघोप भरपोप-रचित बुद्ध-धरित के नायक राजमार सिदार्य गौतमबुद्ध माज २२१०० वर्ष पूर्व कपिलवस्तु नामक राजधानी में उत्पन्न हुए । उनका प्रभाव - - - धान भी महान है । किसको पता था कि एक तपस्वी रामकुमार मिपुरानन- कर इतना महामान्य यन जायगा । बुद्ध भगवान् को हिधर्म-ग्रन्थों में प्रर. नार कहा गया है और उनको इस प्रकार उच्च पदवी दे दी गई है। उन्होंने सर्व कोई पुस्तक नहीं लिखी। यहाँ तक कि युद्ध का जीवन उनके समय में लिखा नहीं मिलता जैसे कि राम और कृष्ण का मिलता है। बड़े अाश्चर्य की बात है कि रामायण महाभारत मे किमी बौद्ध इतिहाम-पुराण की सृष्टि नहीं हुई। बौद्ध साहित्य विशाल है। जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम राम और योगिराज श्रीकृस्य के जीवन रामायण-महाभारतादि इतिहास पुराण अन्यों से संकलित किये जा सकते है उसी प्रकार बुद्ध भगवान् का जीवन चरित्र भी मान्य बौद्ध-प्रन्यों पिटकाय, महावस्तु, ललितविस्तर, सद्धर्मपुण्डरीक श्रादि के आधार पर संक- लित किया जा सकता है । ऐमा ही प्रयास प्राचीन काल में कनिष्क के समय महाकवि अश्वघोष ने किया। ये महाराज कनिष्क के समकालीन थे। इन्होंने बौद्ध-धर्म के प्रचार में अपनी काव्य-शक्ति का मदुपयोग किया । काव्य की मुललित भाषा में बौद्ध धर्म के तत्तों को समझाया । बुद्धचरित २८ मा में लिस्वा गया है । सम्पूर्ण पुस्तक तो विन्धन और चीनी भाषाओं में अनूदित मिलती है। संस्कृत में दूसरे सर्ग मे तैरहवे तक तथा दो तिहाई भाग पहजे सर्ग का और एक चौथाई भाग चौदहवें सर्ग का मिलता है। यश्वघोष की भाषा सरल तपा मधुर है और काव्यशैली भो कठिन नहीं । उपमा सुन्दर एवं रोधक है। शारि पुत्र प्रकरण, सौदरानन्द इनके अन्य अन्यों में प्रसिद्ध हैं। उनके अन्यों में यौद्ध सिद्धान्तों का काव्यमय वर्णन वो है ही, परन्तु कालिदास और रामा- यण काल के अन्तराज का प्रतिनिधि होने का श्रेय भी इन्हें ही प्राप्त है, किन्तु तब तक यह निर्विवाद रूप से नहीं कहा जा सकता कि कालिदास और अश्व घोप में पूर्वापर कौन है जब तक कालिदान का समय निर्धारित न हो जाय । प्रसाद और माधुर्य में अश्वघोष कालिदाप से किसी प्रकार कम नहीं, परन्तु काव्य-संस्कृति में कालिदास मागे बढ़े हुए हैं । काम्य-कला की दृष्टि से अश्वघोर कालिदास के समकक्ष नहीं हो सकते । जो प्रगमगा और प्रौदता एक परिमार्जित कवि में पाई जाती हैं वे अश्वघोष में नहीं। करि-शिरोमणि की पदवी प्रास करने का अधिकार कालिदास कोही है। हमने प्रस्तुत संग्रह में युद्ध का तपोवन- गमन प्रश्वधोप की रचना से, दिलीप का तपोवन-गमन कालिदास की कृति मे लिये है, जिसमे दोनों कवियों को मारा, भाव और शैली की तुलना की जा सके। अश्वधोप ने दागनिक तत्वों को मधुर भाषा में लिखकर एक उपदेशक कवि का काम किया है। उनके नायक बुद्ध भगवान् सन्यास और विरणि. में अधिक प्रास्या रखते हैं। तदनुसार अश्वघोप के ग्रंथों में भी यही चैराग्य की भावना प्रस्फुटित होती है।

कालिदास कालिदाम की महिमा केवल इसलिए नहीं कि उसने सुन्दर काव्य-रचना की है, पर इसलिए कि वह प्राय संस्कृति का प्रतिनिधि-कदि है। उसमें गीता में दिया गया 'कवि' का लण 'कवि पुराणमनुशापितारम्' पूरा घटित होता है। कालिदास की कल्पना मनुष्य-वर्ग फो भागे ले जाने वाजी है । ई सूम, नये विचार, उनमा थनुपम काव्य जाति में जीवन-संचार करने वाला है। कलुषित मनोवृत्तियों को तृप्त करने वाली रचना साहित्य नहीं कहा जा माता । हित करने वाला मुख-दुःस में साथ देने वाला साहित्य ही सच्चा साहित्य होता है । कालिदास सच्चे साहित्य के ग्रहा है। न केवन भारत- बासी ही, मयत अन्य देशवामी भी कालिदास को अभी तक पयों नहीं भूब सके, इसका उत्तर उनकी कृतियों में इंहिये । कुमार सम्भव-कुमार संभव में गाईस्थ्य जीवन का मनोरम विश्लेपय मिलता है। सामाजिक सुख शान्ति पति-पत्नी के सम्बन्ध पर भाभित है। यदि उक्त सम्बन्ध पवित्र, शुद्ध, निदोप, अभिन्न, निर्यात, सरध एवं प्रेम स्पद है वो जीवन यात्रा भी सुर तथा साल होगी । सतौरव की नींव पर ही हमारे अपियों ने जीवन-मवन पड़ा किया है और इमी का सन्देश कालिदास ने सठी और शिव के जीवन द्वारा कह सुनाया। कुमार संभव में तपस्या और प्रेम का धादर्श मेल हुमा है । कुमार संमय का यही विषय है । भाषा प्राञ्जल है। प्रकृति-वर्णन अनुरम है । 'उपमा कालिदासस्य' का यह अर्थ नहीं कि ये केवल उपमा अलङ्कार ही रचना में ला सकते हैं। उपमा तो मलद्वार-मात्र फा मूलाधार है। अन्य सब अलङ्कार उपमा से ही अनुमाणिव होते हैं। उपमा-जन्य विचार-सन्दोह हो अलंकृत भाषा का अाधार है। ऐमो मधुर मुलजित प्रगत मापा जिसने में कालिदास सिद्ध-हस्त है। कालिदास का हार-रस-वर्णन भी पड़ा उदार और उदात्त है। इसमें वासना का लेश भी नहीं । कन्दर्प का घना होना कुमार सम्भव का ही विषय तो है । मा-विजय का उदाहरण मगगन बुद्ध के जीवन में मिलता है। परन्तु उसमें गृहस्य का सन्देश नहीं। उसमें संन्यास मार्ग का उपदेश है जो एकाही होने के कारण जन-साधारण को नहीं मुद्दाता। उसके लिए कालिदास का कुमार सम्भव ही उपादेय है जिसमें दिय जीवन की मलक मिलती है। रघुवंश में राम के वंश का चरित्र गाया गया है। राम के पूर्वजों घोर उसराधिकारियों का भाग्यमय घर्णन इसमें मिला है। इस महाकाम्य में स्यामाविकता, परित्र चित्रण को सरलता,सरलता तथा सरसवा प्ररयर धनुभव होती है। भाषा सुगम है। रघुवंश को रोचकता उसको सर्व-प्रियता में है। रामायण के उपरान्त यदि कोई धेष्ठ महाकाय माना जाता है वो पह रघुवंश - गृष्टि-मुपमा और मानवीय प्रकृति का मा मुन्दर तया विशद वर्णन जपा कालिदास की माल भाषा में मिलताई वैमा अन्य कवियों की कृतियों में नहीं। मरभूनि कालिदाय में कंबल करण-रम-निरूपण में यावा है, परन्तु काजिदाम की सर्वतोमुम्बी प्रतिमा की तुलना नहीं कर सकता। 'उत्तररामचरित' में मीठा की काप कहानी एलान वार्ड शब्दों में अवश्य लिपी है, किन्नु रघुवंश मी Epi मम स्पों का परिसराफ दुप्रा हो, भवभूति को लखनी में न निकल मका । नाटक, काव्य, गीनि, मयमें कालिदास की प्रतिमा की छ्याप गति है। कान्निदाम की लोकप्रियता टनकी यादयुन शैली में है। कहीं विद्धिष्टता नहीं, की विषमता नहीं, कृत्रिमवा का कहीं नाम नहीं । हमने मंग्रह में रघुवंश के द्वितीय सर्ग की प्रवृत किया है। इसमें आर्य-सस्कृति का मुन्दर उदाहरण मिलता है । वशिष्ट के पाश्रम में मपनीक दिलीप द्वारा मन्दिनी को पेवा और दिलीप की परीता पाठकों को मुग्ध एवं म्वन्ध करने वाली है और पटन तथा मनन में ही सम्बन्ध रखती है। कालि. दाम की अमर कृतियाँ निग्य नई प्रतीत होती है, उनमें पायीपन या फीकापन (Staleness) पा नहीं सकता क्योंकि ये अनवरत यहन घाले जीवन की जीती-ज्ञागदी मूर्तियाँ हैं। जीवन के विशात अनुभव का प्रतिबिम्ब टनकी कृतियों में मिलता है। उनका प्रति-निरीमय, मनुष्य-स्वभाव-विश्लेषण, गम्भीर और व्यापक स्वाध्याय, ये सब टन प्रन्यों में स्पष्ट दियाई देते हैं। कवि-कुल-गुरु कालिदाप की कीर्ति का महत्व इसी में भली प्रकार जाना मकता है कि यूरोर में संस्कृत मारा को प्राप्यात काने याचे टनके प्रत्य-रन ही है। अर्मन दार्शनिक गैटे ने विशेषतः शकुन्तला की मुक-करट में प्रशंमा की है। कालिदास के उपरान्त के कवि अधीर धीर काशिदाय के उपरान्त जो कवि हुए टनमें मापा की स्विष्टवा और शब्द-निपुणता अधिक प्राता गई,भाव गीय हो गए और माग प्रधान, जिसमे कोई नरीमना उनमें न याने पाई । राज्याश्रित होने के कारण करि लोग अपने अभिमादर्श को प्रसन्न करने में ही विश्व शनि की मरसता समझने धे टममें स्वतन्त्र रूप में काम्य-मृष्टि की मचि न रह गई यौ। काच्य में पालन्यता प्रा मी यो । राज-पमानों के मनी- विनोद के लिए कविता का प्रयोग होने लग पड़ा था। माम्राज्यवाद पूरे शोरों पर था। रामायण की मालवा और तोच वेगमयी वाग्वारा अय लुप्त हो शुकी थी। कृत्रिमता की याद पा रही थी। राजाओं की मांग-जिपमा में कान्य को भी कलुषित कर दिया । काम-शास्त्र, अलवार शास्त्र प्रार काव्य-यास्य एक हो गये जिममें विवाह को बड़ी हानि पहुंची। रूविवाद ने धा यायनी प्रारम्भ कर दी। कवि का (Genius) प्रतिमा - शालिस्व ऐसे गोरख धन्धे में जकडा गया, ऐसे कीचड में जा फंसा जिसमे निकलना कठिन हो गया। वैयक्तिक निरीक्षण, निजो अनुभव, विचार-स्वातन्त्र्य सब लुप्त हो गये। पराधीनता इतनो यदी कि उमने मोह-मन्त्र का काम किया। कवि अपने- प्रापको भूल गया और लगा चक्कर काटने नस-शिरस को भूल-भुलैयो में । काव्य का घोत मन्द हो गया। नये साहित्य की श्रावश्यकता प्रतीत होने लगी। यही पारश्यक साहित्य कुछ शताब्दियों के उपरान्त हिन्दी के भक्ति- काव्य में भारत को मिला। यों तो संस्कृत साहित्य में रचना-शैली-भेद से गद्य-पद्य का पृथक् वर्गी- करण नहीं किया गया। गद्य-पद्य लेपकों को कवि कहा गया है। काव्य, नाटक श्रादि सब एक ही सूत्र में इस प्रकार पिरोये गए है जैसे माला में विविध मणि । केवल विभाग-दृष्टि से हम कह सकते हैं कि रामायण-महा. भारत के रचयिता पाल्मीकि-व्याम के अतिरिक्त प्रमुख कवि ये है--अश्वघोप, कालिदाम, भाररि, माघ, रत्नाकर, श्रीहपं । इसी प्रकार माटककारों में प्रसिद्ध नाटककार भास, शूद्रक, कालिदाम, हर्षवर्धन, भयभूति, विशाखदत्त, भह नारायण, राजरोसर और कृष्ण मिश्र है । प्रसिद्ध गद्य लेखक दण्डी, सुबन्धु और वाण है। फान्य कई रूपों में लिया जा सकता है। महाकाव्य, नाटक, गद्य श्रादि रूपों के अतिरिक्त गीति-काव्य भी एक रोधक रूप है। इसमें प्रधान कृतियाँ ये है-ऋतु-संहार, मेघदूत, ससराती, भर्तृहरिशतकत्रय, श्रमशतक, गीत- गोविन्द, भामिनी-पिलाय । पाख्यान-साहित्य में पातन्त्र और हितोपदेश तो प्रचलित हैं ही, परन्तु सर्वप्रमुख स्रोत-रूप में 'यहरकथा' कयासरित्सागर, पृहरकथा मञ्जरी विश्व- साहिरप में भी उच्च पदवी प्राप्त करने योग्य है । ऐतिहासिक काव्यों में हर्ष- चरित और राजतरङ्गिणी प्रसिद्ध है। गप-पद्यमय काम्यों में रामायणम्, नाचम्प, वरदायिकापरिणयचम्पू अादि प्रसिद्ध है। मत हरि भर्तृहरि के नोतिमय काव्य मे कर एक गोलियाँ इस संप्रद में उद्धृत की गई हैं। महरि फो संमार का बड़ा अनुभव था। इनकी मार्मिक भावुकता का परिचय इनके शतकों से मिलता है। जीवन के विविध अनुभव मधुर, कडु, तीपण और दारण इनकी कृति में मिलते हैं। विविध छन्दों में नोतिरस्न इस प्रकार जड़े हुए हैं कि काव्य-मधुरिमा पद-पद पर टपकती है और उसका यास्वाद लेते ही बनता है। भर्तृहरि की सूक्तियां लोकोकियों के रूप में प्रचलित हैं। यया-'शोल परं भूपणम्' 'मूर्यस्य नास्योपधम ।' 'सरसातिः

कपय किन करोति पुसाम् ।' यदि वैराग्य शतक में करल रस का परिपाक
हुमा है तो मोतिपटक में जीवन-पहार का पथ-प्रदर्शन किया गया है।
मार-पाक में प्रवृत्ति-मार्ग का टल्लेख है तो राज्य में निवृत्ति मार्ग का।
'कृप्या न जीर्या इयमेव जोपाः' कहकर कवि ने वैराग्य की पुष्टि की है।
मनहरि कवि, वयामार और राजनीतिज्ञ थे, परन्तु कविता को महिमा उनको
कृतियों में प्रचुर मात्रा में मिलती है। 'मुदिता पेन राज्येन सिम्पादिमादि
सनकी रचनामों में विचार-स्वाउन्न्य स्थान-स्थान पर टपकता है। मनुहार
के काम्य-कोशल का परिचय इस संग्रह में मिलेगा।
विषयानुक्रमणिका
"
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२८
H
यीमहाल्मीकि रामायये मुन्दर काटम्
श्रीमद्भगवद्गीतापाम अजुनविषाद
श्रीप्तोपदेशः
कर्मयोगः
योग-साधन विधि:
मछियोगः
ज्ञानदइएन्
गुपत्रय-दिमाग योगः
इदचरिते समः सर्गः
रघुवंशे दिटीय. सर्गः
मीति रावक
राग्य शतक
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१२१

श्रीमद्वाल्मीकिरामायणे
रामायणशिरोमगिटीकासमेतम् (संचिप्तम् )
सुन्दरकाण्डम्
ततो रावणनीतायाः सीतायाः शनकपणः ।
इयेष पदमन्वेष्टुं चारणाचरिते पथि ॥१॥
स सूर्याय महेन्द्राय पावनाय स्वयम्भुवे।
भूतेभ्यश्चामलिं यद्धा चकार गमने मतिम् ॥ २॥
त्पपाताय वेगन
वेगवानविचारयन् ।
सुपर्णमिव चात्मानं मेने स कपिकुञ्जरः ॥ ३॥
स सागरमनाधृष्यमतिक्रम्य महाबलः।
त्रिकूटशिखरे लद्धां स्थितां स्वस्थो ददर्श सः ॥ ४॥
गिरिमूर्ध्नि स्थितां लद्धां पाण्डुरैर्भवनैः शुभाम् ।
सदुदर्श फपिः श्रीमान् पुरमाकाशगं यथा ॥ ५ ॥
जाम्ययन्कर्तृफमागरतरणोद्देश्यफप्रोत्साहनानन्तरकालिक वृत्तान्तमाह-नत,
इत्यादिभिः । ततः सवीर्यस्मरणानन्तरं गीतायाः पदं स्थितिप्रदेशमन्वेष्टं चारणैर्देव-
जातिविशेष. आचरिते अतिसंचारविशिष्टे पथि आकाशमार्गे प्राप्तमिति शेषः, इयेष
.
नवाञ्छ॥१॥
म इति-सूर्यादिभ्यो ऽसलिं पध्दा म हनूमान् गमने मति युद्धिं चकार॥२॥
उत्पपातेति-अविचारयन् उत्पतनं किंचिदपिश्रमजन समित्यगणयन् य
हनूमान् वेगेन उत्पपात । अय अतः आत्मानं सुपूर्ण शोभितपक्षान्त पक्षिराज-
मिउ मेने ॥३॥
तीर्णसागरस्य हनुमतो वृतान्तमेवाह-सु इत्यादिभिः। अनाधृष्य
धयितुमराक्य सागर स हुन्मान् अतिक्रम्य विकूटस्य गिरिवर्याभिषस्य शिसरे
खम्यः स्थितः सन् लहां ददर्श ॥४॥
गिरीति-आगराग आकाशदूर्घ गो गमनं यस्य तत्पर, यथा श्रीमान्
हनुमान लो ददर्श ॥५॥

संस्कृत-काव्य-लहरी
पालितां राक्षसेन्द्रेण निर्मितां विश्वकर्मणा ।
प्लवमानामियाकाशे ददर्श हनुमान् पुरीम् ॥ ६ ॥
सत्त्वमास्थाय मेधावी हनुमान मारुतात्मजः ।
निशि. लहां महासत्त्वो विवेश कपिकुलर ॥ ७ ॥
शुश्राव जपतां तर मन्त्रान रक्षागृहेषु वै।
स्वाध्यायनिरतांश्चैव यातुधानान् ददर्श सः ॥ ८॥
रक्षित सुमहावीर्यर्यातुधानस्सहस्रशः।
राक्षसाधिपतेर्गुतमाविवेश गृहं कपिः ॥९॥
प्रासादसंघातयुतं स्त्रीरत्नशतसंकुलम् ।
सुन्यूढकक्ष्यं हनुमान प्रविषेश महागृहम् ॥ १० ॥
नामपदयन् कपिस्तत्र पश्यंश्चान्या धरस्त्रियः।
इथपथ्य तदा वीरः प्रध्यातुमुपचक्रमे ॥११॥
१२,६६ दृष्टमन्तःपुरं सर्वे दृष्टा रावणयोपितः।
न सीता दृश्यते साध्वी वृथा जातो मम थमः ॥१२॥
किं नु मां वानराः सवें गतं वक्ष्यन्ति सङ्गताः।
पालितामिति-आगरी प्लवमानां गच्छन्तीमिव पुरीम् हनूमान् ददर्श ॥६॥
हनुमत्कर्तृकलवाप्रवेशनमेव वर्णयति सत्त्वमिति-सत्वं प्रवेशनयोग्य-
शनैर्गतिमास्थाय निश्चित्य महासत्त्वोऽतिबलवान हनुमान निशि लहा प्रविवेश। ॥॥
शुभ्रादेति-तत्र तस्मिन् समये जपतां पठतां मन्वान रक्षागृहेषु शुधार ।
स्वाध्यायनितान् वेदपाठारायणान् यातुधानान् रक्षोविशेषान सहनुमान ददर्श ॥८॥
रक्षितमितिमयशो. यातुधानः रक्षितं गुप्तं राक्षमाधिपते,
कपिहनुमान् द्र ॥
प्रासादेति-प्रामादसंघातैर्युतं भव्यूदाः विशालाः कश्या यस्मिन् तत्
महाराई हनुमान प्रविण ॥१०॥
तामिति–ता सीतामपश्यन् कपि अन्याः खियः पश्यन् सन् अपक्रम्य
उत्प्लुत्य प्रध्यातुं विचारयितुमपचकसे ॥११॥
दृष्टमिति रावणयोषितो दृष्ट्वा सर्वमन्तःपुरं मया दृष्टम्, मीना नुन
हत्यते अतः मम श्रमः समुदलपनादिजनिवखेदः
॥१२॥

सुन्दरकाण्डम्
अदृप्ट्वा किं प्रवक्ष्यामि तामई जनकात्मजाम् ॥१३॥
१. अनिर्वेदः श्रियो मूलमनिर्वेदः परं सुखम् ।
अनिदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः ।
इति संचिन्त्य भूयोऽपि विचेतुमुपचक्रमे ॥१४॥
१५ उत्पतन्निपतंश्चापि तिष्ठन् गच्छन् पुनः पुनः।
अपावृण्वंश्च द्वाराणि कपाटानयघाटयन् ॥
१.सर्वमप्यवकाशं स विचचार महाकपिः ॥१५॥
चतुरङ्गुलमानोऽपि नावकाशस्स विद्यते।
रावणान्तःपुरे तस्मिन् यं फपिन जगाम सः ॥१६॥
१२५२ अदृष्ट्वा जानकी सीतां अनचीवचनं कपिः।
५ह सम्पातिना सीता रावणस्य निवेशने ॥
आख्याता गृध्रराजेन न च पश्यामि तामहम् ॥१७॥
१७१ स मुहूर्त मिष ध्यात्वा मनसा चाधिगम्य ताम् ।
अयप्लुतो महातेजाः प्राकारं तस्य घेश्मनः ॥१८॥
कि विति-गतं सोतासन्देशं विना प्राप्तं मां सर्वे वानराः किं नु वक्ष्यन्ति
प्रश्यन्त्येवेत्यर्थः । जनकात्मजाम् अदृष्ट्वा अहं किं प्रवक्ष्यामि नोत्तरमस्तीत्यर्थः ॥१३॥
अनिर्वेद इति अनिर्वेदः कृत्यात् निवृत्तियस्मात् स उत्साहः इत्यर्थः श्रियः
सम्पतेः मूलं कारणम् अतएव अनिर्वेदः परं सुखं परममुसहेतुः । सर्वार्थेषु निखिल-
कर्तव्येषु प्रवर्तकः अनिर्वेदः हि एव । इति संचिन्त्य विचेतुमुपचक्रमे ॥१४॥
उत्पतनिति-उत्पतनादि फुर्वन् महाकपिः अवकाशम् अन्वेषितातिरिक्तदेशं
मर्वमपि विचार ॥१५॥
चतुरलमान इतिग्रमवाशं मु कपिर्ने जगाम सोऽवकायो देश.
चतुरगुलमानोऽपि न विद्यते ॥१६॥
अदृष्ट्वेति-सीताम् अदृष्ट्वा कपिः अब्रवीत् । इह भस्मिन् रावणस्य निवेशने
सीता स्थितेति शेषः गधराजेन भाख्याता । परं ताम्हं न पश्यामि ॥१७॥
स इति-अशोउन्नतिलान्टपातमते-सहमाद अहर्त ध्याता सरिका
गमनप्रकार संचिन्त्य ता सीता मनमा अधिगम्य प्राप्य तस्य रावणस्य सतः वेश्म-
प्राकारात्प्राकारम् अशोकवनिशया इति शेषः अवप्लुतः उत्प्लुत्य प्राप्तः ॥१८॥

च । २८ संस्कृत-काव्य-लहरी अशोकवनिकायां तु तस्यां थानरपुङ्गवः । ददर्श शुक्लपक्षादौ चन्द्ररेखामियामलाम् ॥१९|| मन्दं प्रख्यायमानेन रूपेण रुचिरप्रभाम् । पिनद्धा धूमजालेन शिखामिय विभावसोः ॥२०॥ पीतेनैकेन संचीतां क्लिनोत्तमवाससा। सपकामनलद्वारा विपनामिव पडिशनीम् ॥२१॥ ब्रीडितां दुःखसंतप्तां परिम्लानां तपस्विनीम् । ग्रहेणाडारकेणेव पीडितामिय रोहिणीम् ॥२२॥ अर्थपूर्णमुखीं दीनां कृशामनशनेन शोभ्यानपरां दीनां नित्यं दुःखपरायणाम् ॥२३॥ तस्य सन्दिदिहे बुद्धिमुहुः सीतां निरीक्ष्य तु । आम्नायानामयोगेन विद्या प्रशिथिलामिव ॥२४॥ दुःखेन बुबुधे सीता हनुमाननलंकृताम् । संस्कारेण यथा हीनां चावमर्थान्तरं गताम् ॥२५॥ अशोकेति-अशोकवनिकायां वानरपुङ्गवः शुभपादौ चन्दरेमावि अमला. दोपसमर्गरहित्य मीतां ददर्श ॥१६॥ मन्दमिति-मन्दं प्रख्या दैन्यबोधनमयते प्रामोति तेन रूपेण चिरा प्रमा यस्या तां धूमजालेन पिनाम् आच्छादितां विभाइसोर शिखामिव ॥२०॥ पीतेनेति-लिऐन, जीर्णतया प्रतीतेन पीतेन एकेन उत्तमवासमा संवीनाम अनलद्वाराम् अलङ्कतिरहिताम् अत एव विपद्मा एधिनी सरसौमिव मरतां मलिनाम् ।। बीहितामिति-दुखसंतप्ता वियोगजनितदु खाकान्ताम् , अत एव महारकेण भौमेन प्रहेण वाहितां रोहिणीमिव पीडिताम् ॥२२॥ अधुपूति-अधपूर्णमुखीम् अत एव दीना चीणा तत्त्वेन प्रतीयमानाम् अनशन भोजनाभावेन कृयाम शोभ्यानपरां शोकहेतुरचिन्ताकान्तो नित्यं दु.स्व. परायणाम् मौता ददत्यनुकृष्यते ॥२३॥ तस्येति-'आम्नायानाम् अभ्यासानाम् अयोगेन प्रशिथिला विद्यामिव ता मोटा निरीक्ष्य तस्य हनुमतो बुद्धिः सन्दिदिहे ॥२४॥ दुःखेनेति-संस्कारेण यथोचितस्नानादिरूपसंस्थत्या हीनाम् अत एव अर्था: न्तरं गना वाचमित्र अनलाला मोना दुःखेन अवधे ॥२५॥ A

सुन्दरकाण्डम्
तां समीक्ष्य विशालाक्षीराजपुत्रीमनिन्दिताम्।
तयामास सीतेति कारणरुपपादिभिः ॥२६॥
वैदेह्या यानि चाङ्गेषु तदा रामोऽन्यकीर्तयत्।
तान्याभरणजालानि शाखाशोभीन्यलक्षयत् ॥२७॥
तत्र यान्यवहीनानि तान्यहं नोपलक्षये
भूपणानि विचित्राणि दृष्टानि धरणीतले।
अनयैवापविद्धानि स्वनवन्ति महान्ति च ॥२८॥
इदं चिरगृहीतत्वाद्वसनं क्लिप्टचत्तरम् ।
. तथापि नूनं तद्वर्ण तथा श्रीमद्यथेतरत् ।।२९।।
इयं कनकवर्णागी रामस्य महिपी प्रिया।
प्रनष्टाऽपि सती याऽस्य मनसो न प्रणश्यति ॥३०॥
अस्यादेव्या मनस्तस्मिंस्तस्य चास्यां प्रतिष्टितम्।
तेनेयं स च धर्मात्मा मुहर्त्तमपि जीवति ॥३१॥
तामिति--तां सौनां समीक्ष्य कारगैरुप्पादिभि हेतुभिः इयं सीतेति तर्कया-
माम अनुमानेन निश्चयं चकार ॥२६॥
वैदेह्या इति--तदा प्रस्थानसमये वैदेह्या अज्ञेषु यान्याभरणजालानि
रामोऽन्वतियत् तानि शाखाशोभीनि शाखाया शोभन्ते इति शाखाशोभोनि भर्तृ-
विरहकाले भूषणधारणस्यानुचितत्वात् स्वाभ्य उन्मुच्य शाखायां न्यस्तानीत्यर्थः
अलक्षयत् अपश्यत् ॥२॥
तति-तव रामाज्ञापिताभरणेषु यानि अवहीनानि ऋष्यमूवादी पातितान्यह
नोपलक्षये । अनयैव अपविद्धानि परिक्षिप्तानि भूषणानि दृष्टानि ॥२८॥
इदमिति यद्यपि चिरग्रहीतत्वाद्धेतोरिदं वसनं क्रिष्टवत्तरम् अतिबाधिताम्
तथापि तद्वर्ण पीतवर्णविशिष्टं तया श्रीमत् बझैश्वर्यलभ्यं यथा श्रीमत् इदं अन्तरीय
तया इतरत् तदक्षासकोत्तरीयमपि ॥२६॥
इयमिति-प्रणष्टापि या अस्य रामस्य मनसः सती महिपी न प्रणश्यति तस्य
रामय सा प्रिया सौता इयमेव ॥३०॥
अस्या इति---अस्याः मनुः तस्मिन् रामे तस्य रामस्य धमनः अस्यां तेन
हेतुना इयं म उ जीवति मुहूर्तमपि अन्यथा न जीवेदित्यर्थः ॥३१॥

३०
संस्कृत-काव्य-लहरी
दुष्करं कृतवान् रामो हीनो यदनया प्रभुः ।
धारयत्यात्मनो देहं न शोफेनावसीदति ॥३२॥
एवं सीतां तदा इप्ट्या दृपः पवनसंभवः ।
जगाम मनसा रामं प्रशशंस च तं प्रभुम् ॥३३॥
स मुहूर्तमिव ध्यात्वा वाप्पपर्याकुलेक्षणः ।
सीतामाश्रित्य तेजस्वी हनुमान् विललाप ह ॥३४॥
मान्या गुरुविनीतस्य लक्ष्मणस्य गुरुमिया ।
यदि सीताऽपि दु.खार्ता कालोहि दुरतिक्रमः ॥३५॥
रामस्य व्यवसायमा लक्ष्मणस्य च धीमतः।
नात्यर्थ क्षुभ्यते देवी गॉव जलदागमे ॥३६॥
तुल्यशीलवयोवृत्तां तुल्याभिजनलक्षणाम् ।
राघवोऽहति वैदेहीं तं चेयमसितक्षणा ॥३७॥
भस्या देतोर्विशालाक्ष्या हतो याली महायलः।
चतुर्दशसहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम् ।
दुष्करमिति-अनया हीनः रामः आरमनो देई धारयति शोकेन च न
अवसीदति सर्वविस्मारकसेदं प्राप्नोति तत् दुष्परं कृतवान् ॥३२॥
एवमिति- तदा तस्मिन् काले एव सीतां दृष्ट्वा हा प्रवनमभवः शर्म
मन मा जगाम प्रगम च ॥३३॥
स इति-म हनुमान् मुहूर्त ध्यात्वा सीता, सीतादु समाधिन्यावलोक्य
बिललाप विविधमुवाच ॥३४॥
मान्येति-गुरुभिविनीतस्य शिक्षितस्य लक्ष्मणस्य पुरुपिया गुरोः रामस्य
प्रिया मीता यदि वार्ता तर्हि काल परमात्मसंकेतः दुरतिक्रमः भाविकमितुमराक्यः ।।
रामस्पति-देवी सीता यतो रामास लक्ष्मणस्य च व्यवसायमा अनिवार्य-'
पराक्रमविज्ञानी अतोऽत्यर्धमत्यन्तं न तुभ्यते । तत्र दृष्टान्त जलागमे वर्षौ गया
प्रयागस्थलाइवी ॥३६॥
तुल्यैति-तुल्यानि रामशीलादिसदृशानि शील व्यथ वृत्तमाचरणं च यस्या.
तुल्ये अभिजन. कुलं लक्षणं सामुद्रिवोक्तमुलक्ष्म च यस्याः तां वैदेही राघव एवाईति
एवमेव इयं वैदेही एव तुं राघवमइति ॥३७॥
अस्या इति-अस्या हेनोली इतः । रक्षमा चतुर्दश सहप्तागि निहतानि॥१८॥

सुन्दर-काण्डम्
३१
निहतानि जनस्थाने शरैरग्निशिखोपमैः ॥३८॥
सागरश्च मया फ्रान्तः श्रीमान् नदनदीपतिः ।
अस्या हेतोर्विशालाक्ष्याः पुरी चेयं निरीक्षिता ॥३९॥
यदि रामः समुद्रान्तां मेदिनी परिवर्तयेत् ।
अस्याः कृते जगञ्चापि युक्तमित्येव मे मतिः ॥४०॥
राज्यं वा त्रिपु लोकेपु सीता वा जनकात्मजा ।
त्रैलोक्यराज्यं सकलं सीताया नाप्नुयात् कलाम्॥४॥
सर्वान भोगान् परित्यज्य भरी हवलात्कृता।
अचिन्तयित्वा दुःखानि भविष्टा निर्जनं वनम् ॥४२॥
इमां तु शीलसंपन्नां द्रष्टुमर्हति राघवः ।
अस्या नूनं पुनर्लाभाद्राघवः प्रीतिमेप्यति ॥४३॥
कामभोगैः परित्यक्ता हीना बन्धुजनेन च ।
धारयत्यात्मनो देहं तत्समागमलालसा ॥४४॥
नैया पश्यति राक्षस्यो नेमान् पुप्पफलद्दुमान् ।
एकस्थहृद्या नूनं राममेवानुपश्यति ॥४५॥
सागर इति-निरीक्षिताऽवलोकिता ॥३६॥
यदौति-अस्याः कृते. प्राप्तये समुद्रान्त मेदिनी जगत् त्रिलोकी वा
परिवर्तयेत् भ्रामयेत् तर्हि यक्तमेव इति मे मतिनिधयः ॥४०॥
राज्यमिति-त्रिषु लोकेषु राज्यमधिकं सीता वाधिोति विचार्यमाणे सतीति
शेषः, सकलं त्रैलोक्यराज्यं सीतायाः क्लां पोडशांशमपि नाप्नुयात् ॥४१॥
सर्वानिति-भर्तृस्नेहचलातु सर्वान भोगान परित्यज्य दुःखानि अचिन्त-
यित्वा च कृता सहगमनविषयकप्रयभवती सीता वनं प्रविष्टाः॥४२॥
इमामिति-इर्मा सीता राघवो इष्टुमईति । अस्याः सीताया लाभात् राघवः
प्रीतिमेष्यति प्राप्स्यति ॥४३॥
कामेति-कामभोगैः परित्यक्षा सौता तत्समागमलालसा रामसमागमविषय-
मोत्कटेच्छावती सती आत्मनो देह धारयति ॥४॥
न इति–एकस्यहृदया एषा सीता राममेवानुपश्यति, अतः राचस्यो राक्षसीः
पुष्पफलामांब न पश्यति ॥४॥

३२ संस्कृत-फाव्य-लहरी भर्ता नाम परं नार्या भूपणं भूपणादपि। एपा विरहिता तेन भूपणा न शोभते ॥६॥ इमामसितकेशान्तां शतपप्रनिमेक्षणाम्। सुखाही दुःखितां दृष्ट्वा ममापि व्यथितं मनः nan तथा विप्रेक्षमाणस्य चनं पुष्पितपादपम् । विचिन्वतश्च वैदेहीं किञ्चिच्छेपा निशाऽभवत् ॥१८॥ पडङ्गयेविदुपां मतुप्रयरयाजिनाम् । शुश्राय ब्रह्मयोषांश्च विराने ब्रह्मरक्षसाम् ॥९॥ अथ मलयादित्रै शब्दैः श्रोत्रमनोहरैः। प्राध्यत महाबाहुर्दशग्रीवो महाबलः ॥५०॥ वियुध्य तु यथाकालं राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् । अशोकवनिकामेय प्राविशत् सन्ततगुमाम्। वृतः परमनारीभिस्ताराभिरिव चन्द्रमाः ॥५१॥ रावणोऽयं महायाहुरिति संचिन्त्य वानरः । पघगुल्मान्तरे सक्तो हनुमान संवृतोऽभवत् । सीतामसितकेशान्तामुपायर्तत रावणः॥५२॥ भर्तेति-भर्ता भूपणाप्यधिकं नार्या, भूपर्ण शोभाहतुः अतः भूषणापि एषा सौता तेन रामेण विरहिना मती न शोभते ॥४६॥ इमामिति-अमिता कृष्णा केयाः यस्याः तां प्रमिद्धाम् इमां दुखिता रट्वा ममापि मनो व्यथिठम् ॥४॥ 'तयेति-देही विचिन्वतः अतएव नया उकप्रकारेण वर्न विप्रेक्षमाणस्य हनुमतो निशा सिंचिरया अमवत् ॥४॥ पडोति-पडावेदविदषा वेवेदितणाम् अतएव कृतप्रवायातिनां प्रभरक्षा ब्राह्मणराक्षसाना ब्रह्मघोपान वेदनिनदान विराने रात्र्यवसाने शुश्राव हुनुमानिति शेषः । 'अति-मालवादिनः मालिकवायवद्धिः राक्षमैः कर्तृभिः धोत्रमनोहरः शब्दः करणभूते दशग्रीवः प्रायुध्यत ॥५०॥ वियुष्यति राक्षमेन्द्रः विषघ्य सन्ततहमा नित्यं द्रुमविशिष्टाम् अशोकवनिका: मेव ताराभिः चन्द्रमा इव नारीभिः वृतः सन् प्राविशन् ॥५॥ रावणोऽयमिति-अयं रावण इति संचिन्त्य, वानरः पत्रगमान्तरे पर- समूहान्तरे सक्तः सन् संदतोऽभवत् शूढोऽभवन् । असिनुकेशान्ता मोतां रावणः- सुन्दरकाण्डम् ३३ स तां पतिग्रतां दीनां निरानन्दा तपस्विनीम् । साकारैर्मधुरैफ्यैिर्यदर्शयत रायणः ॥५३॥ वहीनामुत्तमस्त्रीणामाहतानामितस्ततः सर्वासामेव भद्रं ते ममाममहिषी भय ॥५४॥ ऋद्धिं ममानुपश्य त्वं श्रियं भद्रे यशश्च मे । फि फरिप्यसि रामेण सुभगे चीरवाससा ॥५५|| निक्षिप्तविजयो रामो गतधीर्वनगोचरः। प्रती स्थण्डिलशायी च शके जीवति या न वा ॥५६॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सीता रौद्रस्य रक्षसः । तृणमन्तरतः कृत्या प्रत्युवाच शुचिस्मिता ॥५॥ निवर्तय मनो मत्तः स्वजने क्रियतां मनः । न मां प्रार्थयितुं युक्तः सुसिद्धिमिव पापकृत् ॥ ५८ ॥ अकार्य न मया कार्यमेकपन्या विगर्हितम् । नाहमीपयिकी भार्या परभार्या सती तव ।। ५९ ॥ मका लावर्तत तत्समीपं प्राप ॥५२॥ स इति-म रावणः पतियतां निरानन्दाम् अत एव दीनां गीतां मागरिरभि-. प्रायमहिनः वाक्य न्यदर्शयत अग्रवीत् ॥५३॥ पानामिनि-इतस्तत आरतानां मम सर्वासामेव बागीनामुप्तमीणाम् अप्रमाहिती भव । ते तव भद्रं कल्याणम् ॥५४॥ प्राद्धिमिनि-वं मम प्रद्धिं धियं न पत्य चीरयाममा चीरानहादिवेन रामेण पिम् ॥५॥ निक्षिप्तेति-विशिस्तव हरणोदिना विनष्टः विजयः विजयमामा युत्मादा- दिर्यस्य अत एव गतीः रामः जीवति न पा इत्यह शो विचारयामि ॥५६॥ तस्पेति-समनस्य रावणस्य तुदुक्तं वचनं श्रन्या शुचिम्मिता गीता अन्तरतः म ये तूर्ण परवा प्रत्युवाच ॥५॥ निवर्तयेति-मत्तः मनः निवर्तय वजनः स्वभार्यादिः तम्मिन् मनः जिग- ताम् । पापकृत् ससिद्धिमिव मा प्रार्थयितुं न युक्तम् ॥८॥ अकार्यमिति–एकपल्या पतिनतया मया विहित पतिविरोधि फक्वेन निन्दित कार्य पुत्सितप्रोभिः वर्तव्य, मया अार्य न कारयितव्यम् । तव भार्याभिः ३५ संस्कृत-काव्य-लहरी साधु धर्ममवेक्षस्व साधु साधुवतं चर। यथा तव तथान्येषां दारा रक्ष्या निशाचर ॥ ६॥ इह सन्तो न वा सन्ति सतो या नानुवर्तसे । तथा हि विपरीता ते बुद्धिराचारयर्जिता ॥ ६१ ॥ विदितः स हि धर्मज्ञः शरणागतवत्सलः। तेन मैत्री भवतु ते यदि जीवितुमिच्छसि ॥ ६२ ॥ मां चास्मै प्रयतो भूत्वा निर्यातयितुमर्हसि । एवं हि ते भवेत् स्वस्ति संप्रदाय रघूत्तमे ॥ अन्यथा त्वं हि कुर्वाणो वधं प्राप्स्यसि रावण ॥ ६३ ।। सीताया वचनं श्रुत्वा परुषं राक्षसाधिपः । प्रत्युवाच ततः सीतां विप्रियं प्रियदर्शनाम् ॥ ६४॥ वामः कामों मनुष्याणां यस्मिन् किल निवध्यते । जने तस्मिंस्त्वनुमोदाः स्नेहश्च किल जायते ॥ ६५॥ पूरभार्या अत्यन्त सेविता सती आपायी त्वक्षणोपायमाधिका अहं न भविष्या- मीति शेष. ॥५६॥ साध्विति–अत एव साधु धर्म साध अवेक्षम्य चिन्तय, अत एव साधुवतं संकल्पं चूर कुरु । हे निशाचर, दारा यथा तव रक्ष्याः तथा अन्येषामपि रक्ष्याः ॥६॥ इहति-इह लढायां सन्तो महात्मानो न सन्ति वा सतो विद्यमानान या महात्मानस्त्वं नानुवर्तमे अत एव ते घुद्धिः तथा विपरीता विरुद्धकर्मविषयिणी आधार- वर्जिता च अतीति शेष । एतेन त्वया महात्मानोऽनुसर्तव्या इति सूचितम् ॥ १॥ विदित इति-गरणागतवत्सलो यो रामः तेन सह तब मैत्री भवतु ॥६॥ -अस्मै रामाय मा निर्यातयितुमर्हनि दातुमर्हमि त्वम् । एवम् अनेन प्रकारेण रपूनमे सम्प्रदाय दत्त्वा प्रापन्य वा ते सस्ति भवेत, अन्यथा कुर्वाणस्त्वं वध प्राप्स्यसि ॥१३॥ सीताया, इनि-मीतायाः पाषं वचनं प्रत्वा रातमाधिपः प्रियदर्शना सीता प्रत्यवाच ॥६॥ वाम इति-म्मिन् अने वाम मुन्दर उत्कळ इत्यर्थ, काम इन्छा निवध्यते चिरं तिष्टनि तम्मिन् जने अनुक्रोशः दया स्नेह जायते एतेनामोशस्नेहयोः कोविध्वमन्वं मुचितम् ॥६५॥ मामिति- सुन्दर-काण्डम् एतस्मात्कारणान्न त्वां धातयामि वरानने । द्वी मासी रक्षितव्यो मे योऽवधिस्ते मया कृतः ॥ ६६ ॥ ऊध्वं द्वाभ्यांतुमासाभ्यां भर्तारं मामनिच्छतीम् मम त्वां प्रातराशार्थमारभन्ते महानसे ॥ ६७ ।। इत्युक्त्वा मैथिली राजा रावणः शत्रुरावणः । प्रस्थित: स दशग्रीवः कम्पयन्निघ मेदिनीम् ॥ ६८॥ 2.11 हनुमानपि विथान्तः सर्व गुथ्राय तत्वतः । २ ततो यहुविधां चिन्तां चिन्तयामास वानरः ॥ ६९ ।। 7 यां कपीनां सहस्राणि सुबहून्ययुतानि च । दिक्षु सर्यासु, मार्गन्ते सेयमासादिता मया ॥ ७० ॥ ७ अहमाश्वासयाम्येनां पूर्णचन्द्रनिभाननाम् । सममक्लिष्टकर्माणं वयन्धुमनुकीर्तयन् ।। ७१॥ एतस्मादिति-एतस्मादुक्तात् कारणात् त्वां न घातयामि । योऽवधिः मया कृतः 'मासान् द्वादश भामिनि' इत्यनेन अरण्यकाण्डे निश्चितः तन्मध्ये अवशिष्टा- दिति शेषः द्वौ मामी रद्वितव्यो ॥६६॥ ऊर्चमितिद्वाभ्यां मासाभ्याम् ऊर्ध्व भरि मां लङ्काश्रियमनिच्छस्ती ज्वार मम प्रातराशाय प्रातःकालिकाशनार्थ महानसे पाकशालाया आरभन्ते आलभन्ते । रत्नयोरभेदः 'आलम्भः स्पर्शहिंसयोः, इत्यमरः मम रावणभ्य प्रात.कालिकभोजनार्थ स्वां मीता हनिष्यन्तीति भावः ॥६॥ दनौतिम दशग्रीवः रावणः मैथिलौमित्युक्त्या मंदिनी पृथिवी कम्पयन इव प्रस्थितः ॥७॥ हनुमानिति-विश्रान्तः अपनीतश्रम हनुमान् सर्व तत्त्वतः शुश्राव । ततो. ऽनन्तरं यह विधाम् अनेकप्रकारां चिन्तां चिन्तयामास चार ॥६॥ यामितियां सीतां कपीनां वहनि सहखाणि अयुतानि च सर्वाम दिक्षु : मान्ने मा इममा आमादिना HERE Iss9.!! अहमिति-अधिकर्माणं क्लेशकारकक्रियारहितं स्वबन्धु खस्याः मीतायाः, पन्धु प्रियं रामम् अनुकीर्तयन अहम् एनां मीताम् आश्वामयामि आश्वासयिष्यामि । THAHYHai संस्कृत-काव्य-लहरी सोऽवतीर्य दुमात्तस्माद्विदुमप्रतिमाननः। विनीतपः कृपणः प्रणिपत्योपसृत्य च ॥७२॥ तामनवीन्महातेजा हनुमान् मागतात्मजः । शिरस्यअलिमाधाय सीता मधुरया गिरा ॥ ७३ ॥ का त्वं भवसि कल्याणि त्यमनिन्दितलोचने । महिपी भूमिपालस्य राजकन्याऽसि मे मता ॥ ७॥ रायणेन जनस्थानाद् यलादपरता यदि । सीता त्वमसि मद्रं ते तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥ ७५ ॥ यथा हि तव या दैन्यं रूपं चाप्यतिमानुपम् । तपसा चान्यितो घेषस्वं राममहिपी ध्रुवम् ॥ ७६ ॥ सा तस्य वचनं श्रुत्या रामकीर्तनहार्पिता। उयाच पायं वेदेवी हनूमन्तं द्रुमाधितम् ॥ ७ ॥ स्नुपा दशरथभ्याहं शत्रुसैन्यममाथिनः । दुहिता जनकम्याई देवस्य महात्मनः ।। सीता च नाम नाम्नाऽहं मार्या रामस्य धीमतः॥ ८ ॥ र इनि-विद्यमप्रतिम विद्रुममदशमाननं, सम्य म हनुमान शिरमि अशलिमा- धाय धन्दा मधुरया गिरा अनावीन् । श्लोकद्वयमेान्दयि १७२-७३॥ का इति- हे भनिन्दितटोक्ने त्वंश मासि ? भुमिपालस्य निखिलबामा- ण्डाधिपतेः रामस्य महिषी राजकन्या जनकराजपुत्री च मे मम मुना निश्रिता अमि । रावणेनेति-जनस्थानात रावणेन चलादु अपहता मीता यदि त्वममि नदा पृच्छतो मे आचश्च ॥७॥ ययेतिया ययावत् तद् दैन्यं वियोगदुःखजनितदीनता अनिमान मानुषा- नतिकान्तम् अत्यद्भुतमित्यर्थः तव मम च तपमा अधिनम्नद वेपश्व अमीनि श्रेष- अतव राममहिप्येव usu सा इति-मा सीता तम्य हनुमतो वचनं शून्वा रामनहर्षिता मत्ती दमाश्रित हनमन्तमुवाच ॥७॥ स्नुपेति-दायमन्यत्रमाथिन दशरयम्याई स्नुषा पुत्राघू, महान्मनो अनक- म्याई दुहिता पुत्री, नाम्नाई मीना नाम सीतेनि प्रमिदा, रामम्य भार्याहमम्मोनिश्रेषः।

सुन्दरकाण्डम्
३७
।
यसतो
दण्डकारण्ये
तस्याहममितीजसः।
रक्षसाऽपहता भार्या रावणेन
दुरात्मना ॥७॥
दो मासी तेन मे कालो जीवितानुग्रहः कृतः।
ऊर्य द्वाभ्यां तु मासाभ्यां ततस्त्यक्ष्यामि जीवितम् ॥८०॥
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा हनूमान् हरियूथपः ।
दुःखाद् दुःखाभिभूतायाः सात्वमुत्तरमब्रवीत् ॥८॥
अहं रामस्थ सन्देशाइयि दूतस्तयागतः,
वैदेहि कुशाली रामस्त्यां च कौशलमप्रवीत् ।दि।
लक्ष्मणश्च महातेजा भर्तुस्तेऽनुचरः प्रियः ।
कृतवान्शोकसन्तप्तः शिरसा ते ऽभिवादनम् ॥८३॥
सा तयोः कुशलं देवी निशम्य नरसिंहयोः ।
प्रीतिसंहष्टसर्याशी हनुमन्तमधानधीत् ॥८॥
३१६ कल्याणी वत गाथैयं लौकिकी प्रतिभाति मे।
पति जीवन्तमानन्दो नरं वर्षशतादपि ॥८५॥
वमत इति-दण्डकारण्ये चमतः तम्य रामस्य भार्याद रक्षमापहना ॥६॥
द्वविति-तेन रक्षमा द्वौ मासौ मे जोचितानग्रहः जीवनावधिरित्यर्थः कृतः ।
किंच द्वौ मासी जीवितानुग्रहः कृत. अतः ततः ताभ्या मामाभ्यामध्वं जोयित.
त्यस्यामि रामानागमने त्यक्तुमिन्छामि ॥८॥
तस्या इति-दुः वाभिभूतायाः तम्याः सीताया वचनं प्रन्या दु.वान दु.
प्राप्य हनुमान मानवं सान्त्वनमुन्तरमनवीन ॥८॥
अहमिति-रामस्य दूतोऽहं सन्देशात हेतोः नव समीपमुपागतः । ननु कः
सन्देश इत्यत आह-वैदेहीति । हे वदेहि, अशली रामः त्वा कौशलमप्रवीन अकथयन्
किंच त्या त्वत्सौगलमत्रवीत अपृच्छन् ॥३२॥
लक्ष्मण इतिश्मणोऽभिवादनं ते कृतवान् ।।८३॥
मेनि-सा सौता तयोः रामलक्ष्मणयोः कुहालं निशम्य प्रीतिमहामाही
प्रीतिपुलक्तिसाही मती हनुमन्तमनवीन ॥४॥
पायाणीति-जीवले नरं वर्षशतादपि आनन्दः एनि प्रामोनि ट्र्य लौकिक
गाथा ग्याणी मन्येन्यर्थः ॥५॥

मुन्दरकाण्डम्
भ्रानाऽपि तस्य मात्रः मौमित्रिरपगजिनः ।
अनुरागेण रूपेण गुणैश्चैव तयाविधः ॥२३॥
नाबुमो नरमाईलो न्यदर्शनममुन्मुको।
विचिन्वन्तो मही कृत्स्नामस्माभिरभिसङ्गनी ॥९४||
ततम्चमाश शोक रामन्याक्लिएकमपः।
लक्ष्मणो वानरेन्द्राय मुग्रीवाय न्यवेदयत् ॥१५॥
ननन्चगावशोमीनि
रक्षसा
द्वियमाणया।
यान्यामग्णजालानि पातिनानि महीतले॥
नानि गमाय दत्तानि मर्यवोपहृतानि च ॥१६॥
नान्यके दर्शनीयानि कृत्या बहुविध तव ।
नेन देवप्रकाशेन देवेन परिदेवितम् ॥२७॥
म त्यां मनुजशार्दूल सिमं प्राप्म्पनि राघवः ।
শলিষাত্ম हत्या रावणं जनकात्मजे ॥२८॥
महिती राममुग्रीवायुभावकुरुतां
ममयं बालिनं हन्तुं नर चान्येपर्ण नथा ॥२९॥
भ्रानति-तम्य रामम्य भौमित्रित्रांता द्वैमात्रः राममात्रपेक्षया द्विनीयमातृ-
अनित इत्यर्थः अनुगगादिभिस्तथाविधः गममशः ॥३३॥
नाविनि-बर्शनसमुन्मता गमलमणी अन ' एवं विचिवन्नी मन्त्री
अम्माभिरभिमानी बम्बगिति शेषः ॥१४॥
नन तितः मुग्रीववृत्तान्तश्रवणानन्तरं लन्नामहं त्वदर्शनजनित
ग्रमस्य गोकं लः मणः मग्रीवाय व्योदय ६५॥
तन ददि-रक्षमा द्वियमा गया त्वया यान्याभरण नालानि पातितानि तानि
रामाय दत्तानि वानरैरितिगेषः, भोपड़तानि प्रयममिति शेषः ॥६॥
तानानि तानि आभरणानि अड्डे कृत्वा तेन देवप्राशन देवनावतारेण अन
एर देदेन रामेण बहादयं परिदेविनम् Hen
ग दति- राधवः गवणं इन्वा त्वां शिमं शानं प्राप्यति ॥८॥
महिनाविति हित एकीभूती उभी राममग्रीवा वालिन हन्तुं तवान्नेवणं
कतुं च ममयं प्रनिनाम् अकुरुताम् ॥६६॥

संस्कृत-काव्य-लहरी
ततो निहत्य तरसा रामो वालिनमाहर।
सर्वक्षहरिसवानां सुग्रीवमकरोत् पतिम् ॥१०॥
रामसुग्रीवयोरपयं देव्येवं समजायत।
हनुमन्तं च मां विद्धि तयोदूतमिहागतम् ॥१०॥
स्वराज्यं प्राप्य सुग्रीवः समानीय महाफपीन् ।
त्वदर्थ प्रेपयामास दिशो दश महायलान् ॥१०२॥
मादिया यानरेन्द्रेण सुग्रीवेण बनौकसः ।
चरन्ति वसुधां कृत्वां चयमन्ये च वानराः ॥१०३।।
विश्वासार्थ तु वैदेहि भर्तुरुक्ता मया गुणाः ।
अचिराद्रायवो देवि स्वामितो नयिताऽनघे ॥१४॥
एतचे सर्वमाख्यातं समाभ्यसिहि मैथिलि।
रामनामाङ्कितं चेदं पश्य देव्यंगुलीयकम् ॥१०॥
प्रत्ययार्थ तवानीतं तेन दत्तं महात्मना ।
समाश्यसिहि भई ते क्षीणदुःखफला हासि ॥१०॥
तत इति रामः बालिनं निहत्य मुग्रीव निखिलदिीनां पतिमकरोत् ॥१०॥
रामेति एवमुक्तप्रकारेण राममग्रीचयोः ऐक्यं मयं ममजायत । मां तु
तयोर्दूतं हनुमन्तं विद्धि जानीहि ॥१० १॥
स्वराज्यमिति मग्रीयः स्वराज्यं प्राप्य अत
एव महारपीम् ममानीय
त्वदर्थ प्रेषयामाम ॥१०२॥
आदिष्टा इति–वानरेन्द्रेण मुग्रीवेण आदिष्टा वनौकमः कृत्स्ना वमर्धा
चरन्ति । पूर्व घरामः अन्ये वानराश्च चरन्तीति शेषः ॥१०३॥
विदासार्थमिति है वैदेहि, मया तव विश्वामार्थ भर्तुर्गुणा उताः ।
अनपे निप्पापे, अचिरात् शीघ्रं रापवस्वामितो नयिता नेता ॥१०४॥
एतदिति है मैथिलि, एतत् भवत्या पृष्टं ममाव्यातम् अनः ममाश्यमिहि
धीरा भव । देवि इदं रामनामाङ्कितम अंगुलीय च पाय ॥१०॥
प्रत्ययार्यमिति तव प्रत्ययार्थ विश्वामार्थ तेन महात्मना रामेण द्रा
अंगुलीयकमिति शेषः आनीत मर्यात शेषः । अत एव चीग. दु साला दु खफलक
समयो यस्या. सा त्वमसि अत एव समाश्वसिहि ॥१०॥

सुन्दर-काण्डम्
गृहीत्या प्रेक्षमाणा सा भर्तुः करविभूषणम् ।
भर्तारमिव संप्राप्ता जानकी मुदिताऽभवत् ॥१०॥
ततः सा ह्रीमती वाला भसन्देशहर्पिता।
परितुष्टा प्रियं कृत्वा प्रशशंस महाकपिम् ॥१०॥
"विक्रान्तस्त्वं समर्थस्त्वं प्राशस्त्वं वानरोत्तम।
येनेदं राक्षसपदं त्वयैकेन प्रधर्पितम् ॥१०॥
दिष्टया स कुशली रामो धर्मात्मा सत्यसहरः।
लक्ष्मणश्च महातेजाः सुमित्रानन्दवर्धनः ॥१०॥
कुशली यदि काकुत्स्थः किं न सागरमेखलाम् ।
महीं दहति कोपेन युगान्ताग्निरियोत्थितः ॥११॥
अथवा शक्तिमन्तौ नौ सुराणामपि निप्रहे।
ममैव तु न दुःखानामस्ति मन्ये विपर्ययः ॥१२॥
फश्चिन्न व्यथितो रामः कश्चिन्न परितप्यते।
उत्तराणि च कार्याणि कुरुते पुरुपोत्तमः ॥११३॥
गृहीन्वेति-भर्नः करविभपणं गृहीत्वा भर्ता संपातेव जानकी मदिना
अभवत् ॥१०॥
तत इति-ततोऽनन्तरं भर्तुः सन्ददोन हर्षिता मा माता महाकपि हनुमन्न
पियं प्रीतिविषयीभूतं कृत्वा प्रशम ॥१०॥
विक्रान्त इति-येन हेतुना एरेन त्वया राक्षमपदं प्रधर्पितं तेन हेतुना
विशावत्यादिविशिष्टस्वं मयाऽबोधीति शेषः ॥१०॥
दिप्येनि-कुगली कुदालविशिष्टः ॥११०॥ .
पुरालीति-यदि कायस्थः फुगली तर्हि कोपेन जातपृथिव्यपराधजनित-
बोधेन मही किं नु न दहनि दहन्येवेन्यर्थः । एतेन एवं शक्तिसत्त्वे रावणं फुलो न
निहन्तीति सूचितम् । चि कोपेने रावणापराधजनितकोधेन महीं लदामि नि
नु दद्दति ।।१११॥
अथवेति-अयंत्रति पक्षान्तरे मुराणामधि निग्रहे शक्तिमत्ती तो गम-
लक्ष्मगौ स एव नथापि मन दुःखानां विपर्ययो विनासकालो नेवास्तीत्यहं मन्ये ।
कृञ्चिदिति रामः शिन व्यथितः कच्चिन परितप्यते वा अन एव कार्याणि
यानि उभगन दुःमोनारान प्रयभान पाते ॥११॥

४२
मंस्कृत-काव्य-लहरी
फश्चिन्न विगतनेहो वियासान्मयि राघवः ।
कश्चिन्मां व्यसनादसाद् मोक्षयिष्यति वानर ॥११॥
सीताया वचनं श्रुत्या मारतिभीमविक्रमः ।
शिरस्यञ्जलिमाधाय चाफ्यमुत्तरमब्रवीत् ॥११५॥
न त्वामिहस्थां जानते रामः कमललोचने ।
तेन त्यां नानयत्यागु, शचीमिय पुरन्दरः ॥११॥
३७६२० श्रुत्वैव तु धचो मा क्षिप्रमेष्यति राघवः ।
चमं प्रकर्पन महतीं हयृक्षगणसंकुलाम् ॥११७॥
विष्टम्भयित्वा याणीघेरक्षोभ्यं वरुणालयम् ।
करिष्यति पुरी लवां काकुत्स्थः शान्तराक्षसाम् ॥१८॥
तवादर्शनजेनार्ये शोकेन. स परिप्लुतः ।
न शर्म लमते रामः सिंहार्दित इच द्विपः ॥११॥
अनिद्रः सततं रामः सुप्तोऽपि च नरोत्तमः।
सीतेति मधुरा धाणी व्याहरन् प्रतियुध्यते ॥१२०॥
.
वञ्चिदिति-विधामात् हेतोः राघवः मयि विगतस्नेहो न चिद् अम्माद
व्यपवार दुःखहेतुभूननिरोधात् मोचयिष्यति मोचयिष्यनि ॥११॥
मीताया इतिमापतिः सीताया वचनं श्रुत्वा अवलि शिरमि आधाय उत्तर
श्रेष्ट वाक्यमबवीत ॥११५॥
नति-इहस्था खा रामो न जानीते तेन हेतुना पची पुरन्दर इस त्यामाश..
नानयति ॥११॥
थुत्वेति-मयं मम वचः धन्वा एवं राघवः एष्यति ॥११॥
विष्टम्भयित्वेति-वाणालय ममुद्रं विभयिचा विष्टभ्य मम्मभ्यं मनु
वट्वेन्यथः लता यापौधेः शान्तराधमा करिष्यति ॥११॥
तवति तोकेन परिप्लतः परिपरितः म रामः शम न लभुने ।११९॥
अनिद्र इति-अनिदः प्रायेग निद्वारहितः रामः मुप्तः कथंचित विभिनवार्य
प्राप्तोऽपि सीनेति मधुगं वाणी व्याहग्न मन् प्रतियुध्यते ॥१२०॥

सुन्दर-काण्डम् ४३ अभिज्ञानं प्रयच्छ त्वं जानीयाद्राघवो हि यत् । प्रहि यदाघयो वाच्यो लक्ष्मणश्च महाबलः ॥२१॥ इत्युक्तवति तसिंश्च सीता सुरसुतोपमा। उवाच शोकसन्तप्ता हनुमन्तं प्लवङ्गमम् ॥१२२॥ कौसल्या लोकभर्तारं सुपुर्व यं मनखिनी। नं ममार्थ सुखं पृच्छ शिरसा चाभिवादय ॥१२॥ द्धिोपसेवी लक्ष्मीवान् शक्तो न बहुभापिता । राजपुत्रप्रियः श्रेष्ठः सदृशः श्वशुरस्य मे ॥१२४॥ मत्तः प्रियतरो नित्यं भ्राता रामस्य लक्ष्मणः । य सप्ट्वा राघवो न वृत्तमायमनुस्मरेत् ॥१२५॥ स ममार्थाय कुशलं वक्तव्यों वचनान्मम । मृदुर्नित्यं शुचिर्दक्षः प्रियो रामस्य लक्ष्मणः ॥१२६॥ यथा हि वानरश्रेष्ठ दुःखक्षयकरो भयेत् । मा स्वस्मिन् कार्यनिर्योगे प्रमाणं हरिसत्तः ॥१२७॥ राघवस्त्वत्समारम्भान्मयि यत्नपरो भवेत् । इदं व्रया प्रयाश्च मे नार्थ शूरं रामं पुनः पुनः॥१२८॥ अभिज्ञानमिति यत् यतः राघवो जानीयान मरकर्तृकत्वदर्शनं युध्येत नभिः ज्ञानं चिह त्वं प्रयच्छ । राघवः यद्वाच्यः तद् हि वद ॥१२१।। इतीनि-तस्मिन् हनुमति इति उक्तवति सति सीता हनुमन्तमुवाच ।।१२।। कौसल्येति--ौमच्या यं सुष्वे तं ममा उयुक्तमिनि शेषः रामं सुखं पर अभिवादय ॥१२॥ युद्धति-शनः समर्याऽपि न बहुभाषिता मितभाषीत्यर्थ रामस्य प्रियः । मे मम वशरस्य महशश्च ।।१२४॥ मत्त इति-भक्त; ममापीन्यर्थः, प्रियनरमाद नैव अनुम्मरेत् । स लक्ष्मण शेषः । यं लक्ष्मणं दृष्ट्वा राघव वृत्तुं पित मनाय कुशल वक्तव्यः ॥१२५-२ म प्रयः लक्ष्मणः अस्तीति मृदुरिति-दुःखनाशः भवेर लक्ष्मणः इति शेषः, हे हरि- मातम, अस्टिर कार्यनियागे निर्वाह त्वं प्रमाणम् ॥१२६-१२७॥ राघव इति-वत्समारम्भात त्वदुत्साहनात् राघवः मयि यत्रारो भयो अन. --

संस्कृत-काव्य-लहरी
जीवितं धारयिष्यामि मासं दशरथात्मज ।
ऊर्व मासान जोधयं सत्येनाहं अपीमि ते ॥१२९॥
ततो वस्नगतं मुफ्त्वा दिव्यं चूडामणि गुमम् ।
प्रदेयो राघवायति सीता हनुमते ददी ॥१३०||
मपिपरनं कपिवरः प्रतिगृहामियाय च।
हृदयेन गतो रामं शरीरेण तु विष्ठितः ॥१३॥
तस्माद्देशादपफ्राम्य चिन्तयामास यानरः।
अल्पशेपमिदं काय दृष्टेयमसितेक्षणा।
धीनुपायानतिक्रम्य चतुर्थ इह दृश्यते ॥१३॥
कायें कर्मणि निर्दिष्टे यो बहन्यपि साधयेत् ।
पूर्वकार्याविरोधेन स कार्य कर्तुमर्हति ॥१३३।।
मे मम नाथ राम पुनः पुनः इदं वश्यमाणं व्या. बहि ॥१८॥
जीक्तिमिति- हे दुसरयान्मज्ञ, मासम् भवधिभूतमासपर्यन्तं जीविन
धारयिष्यामि । मामात् ऊर्य न जोवेयम् इति मल्येन मलं ते भई वामि ॥१६॥
तत इनि-ननोऽनन्तरं वनगतं दियं चूडामणि शिरोरनं मुक्त्वा उन्मुन्य
राघवाय प्रदेय इन्युक्त्वा इति शेषः, हनुमने ददौ ॥१३०॥
मगिरममिति-पिवगे हनुमान् मगिरनं मणिर्ट प्रतिगृध स्वीपख
अभिवाय च सीतामिति शेषः, हृदयेन मनमा गर्म गतः गरीरेण तु विदितः नत्र
पिन: आम दिति शेषः ॥१३॥
तन्नादिति वानरः हनुमान तम्मादेशाद् अपरम्य निर्गत्य चिन्तयामास ।
इयं सीता दृष्टा प्रधान सिमित्यर्थः । इदं परबलदर्शनरूपं कार्यमयशेष स्वयं
गन् शिष्यते, इह परबलदर्शनपर्ये दु यनः प्रीन मामादीन उपायान् अनिकम्य
चतुर्यो दण्ड एव टपायः दृष्ट्यते ॥
कार्य इति प्रर्य साम्य प्राप्त कर्तव्ये थी निर्दिष्टे निश्रिते मनि यो
यद्दनि निर्थितकार्यपोषकतया विपुलकार्यानि साधयेत् मायापमिच्छेन् म पूर्वकर्या-
विरोधेन नियनकार्यप्रानिकृत्यराहिल्लेन कार्य कर्तुमहीने ॥१३३॥

सुन्दर-काण्डम् नोकः साधको हेतुः खल्पस्यापीह कर्मणः । यो ाथ बहुधा वेद स समर्थोऽर्थसाधने ॥१३॥ इदमस्य नृशंसस्य नन्दनोपममुत्तमम्। वनं विध्वंसयिष्यामि गुप्कं वनमिवानलः । असिन् भने ततः कोपं करिप्यति दशाननः ॥१३५॥ ततस्तु हनुमान् वीरो वमा प्रमदावनम् । चकार सुमहद्रुपं राक्षसीनां भयावहम् ॥१३॥ ततस्तं गिरिसंकाशं राक्षस्यो विकृताननाः। विरूपं घानरं भीममायातमुपचक्रमुः ॥१३॥ अशोकवनिकामध्ये राजन् भीमवपुः कपिः । सीतया कृतसंचादस्तिष्ठत्यमितविक्रमः ॥१३॥ तेन त्यद्भुतरूपेण यत्तत्तव मनोहरम् । मानामृगगणाकीर्ण प्रमृष्टं अमदावनम् ॥१३९॥ नेति-वल्यस्यापि कर्मणः रामकार्यस्य मोताप्राप्तेरित्यर्थः, माधणे हेतरेकः एष नसावः मन्तीत्यर्थः, सीतादर्शनमात्रेण रामकार्यसिद्धिर्न भवतीति तात्पर्यम् , अतः अर्थ गमकार्यमाधवर्तु बहया बहुप्रकारेण यो वेद म एव अर्थमाधने समर्थः । ददमिति -अस्य शमय क्रूरस्य रावणस्य इदं वनं नन्दनोपमम् उत्तम चाम्तीनि शेषः । इदम् उक्तं वनं शुष्कं वनम् अनुल इव अग्निरिव विध्वंमयिष्यामि । अम्मिन् भने मनि दशाननः रावगकोपं करिष्यति ॥१५॥ तत दलि-नतोऽनन्तरं प्रमदाकुलवनिको भन। राक्षमीनां भयावह भयं- कर पंचकार हनुमानिति शेषः ॥१३॥ ततस्तमिति ततोऽनन्तरं गिरिजा पर्वतमदृशं विस्पं वानरं विकृताननाः भयेन हेनुनेत्ययः, रानमः आख्यान वर्णविमुपचक्रमः ॥१३॥ भगांकेति-सीतया कृतः मंवादो न सोऽमितविनमः कपिः तिष्ठति । लेनेति यत् तव प्रमदावन ता तेन वानरेण प्रमुष्ट विधमिनम् ।।१३६॥

४६
संत-कान्य-लहरी
न तत्र कश्चिदुद्देशो यस्तेन न विनाशितः ।
यत्र सा जानकी सीता न स तेन विनाशितः।
जानकीरक्षणार्थ वा प्रमादा नोपलदयतं ॥१४॥
राक्षसीनां वचः श्रुत्वा रापणो राक्षसेश्वरः।
आत्मनःसहशान भूरान् किंकरान नाम राक्षसान।
घ्यादिदेश महातेजा निग्रहार्य
हनूमतः
ते गदाभिर्विचित्रामिः परियः काञ्चनारदः ।
भाजघ्नुर्धानरश्रेष्टं शरश्चादित्यसनिमः ॥१४॥
ततः स किदुरान् हत्या हनुमान दर्शयन् यलम् ।
चैत्यप्रासादमुत्प्टुन्य मेरुयनामियोप्नतम् ।
घृष्टमास्फोटयामास लवां सादेन पूरयन् ॥१४॥
मनविजयतां रामो लक्ष्मणश्च महाबलः ।
राजा जयति सुग्रीयो राययेणामिपालितः ॥१४॥
दासोऽहं फोसलेन्द्रस्य रामस्यालश्कर्मपाः ।
हनुमान् सैन्यानां निहन्ता मारतात्मजः ।
न रावणसहनं मे युद्ध प्रतियलं भवेत् ॥१४॥
नेदिन दानरेग यः कश्चिदुद्देशः स्थन विनाशितः म दत्र वनियां
नान्ति, स्व देश मा शनी स देशस्तु तेन न विनाशितः। सीताधिकृतदेशः तेन
बानहरनमार्य सीतारक्षमायें न विनाशिन- अयदा श्रमान न बिनशित इति
मोलभ्यते न निधाय ॥४॥
राक्षसीनामिति–राचीनां चः धन्वा हनुमती निवार्थ किंकरा नाम
किमान दमा एक व्यादिदेछ आराधाना nam
त इति-विकराः। गदामिः बाब माइः काचन परिषश्च मूत्र
भानुः ।।१४२॥
तत इति हनुमन् दई दर्शन घेवामादसू उम्प्य भष्ट निर्मयम्
आरफोटयानाम विधारयानाम ||४i
अन्नविदिति- अंग्वेद गन. जयताम, महाबलः लामा जयनाम् ।
राघवेगामिनाठितः मुवो उयति ॥
दाम इति बह रामन्य दामः भन्याना निता व अग्नि, गवण-
मानमपि मे मन युद्ध प्रतिपदं न मवेत् ॥१४॥

सुन्दरकाण्डम्
अदयित्वा पुरी लकामभिवाद्य च मैथिलीम् ।
समृद्धार्थी गमिप्यामि मिपतां मर्वरक्षमाम् ॥१४६||
एयमुक्या महाबाहृश्यैत्यस्थो हरियूथपः ।
ननाद भीमनिहादो रक्षमा जनयन् भयम् ॥१७॥
ततस्तः स्वगणैरिएरिन्द्रजित, प्रतिपूजितः ।
म रथी धन्धिनां श्रेष्ठः शनमोऽनविदांवरः ।।
हनमन्तमभिप्रेत्य जगाम रणपण्डितः ॥१४॥
नाबुमी बेगमम्पनी रणकर्मविशारदी।
मयंभूतमनोग्राहि चतुर्युद्धमुत्तमम् ॥१४॥
ततः पैतामहं वीरः मोऽसमरनविदां धरः।
सन्दधे सुमहातेजास्तं हरिप्रवरं
प्रति ॥१५०॥
नेन यस्ततोऽस्त्रेण राक्षमेन स वानरः ।
अभवग्नियिंचएच
महीतले ॥१.२१॥
नं मत्तमिव मानई यद्धं कपियरोत्तमम् ।
राक्षसा राक्षसेन्द्राय रावणाय न्यवेदयन् ॥१५॥
पपात
अर्दयिन्वेनि-लडाम अर्दयिया धर्षयिन्वा · ममदायः मालमनारथः
गमिष्यामि ॥१४॥
पवमिति एवं पूर्वीकम् उमदा चैत्रायः हनुमान रक्षमा भयं जनयन
मन ननाद ।।
तत इति- प्रनिजितः ममाहतः ग. रथी रणादिनः इन्द्रजिन
मंघनादः हनमन्तमभिप्रेय जगास ॥१४॥
तावितित हनूमदिन्द्रनिती गर्वभतमनोग्रादि निविलप्राणिहृदयावर्ष.
युई चकतः ॥१४॥
स्त इतिममहातेजा इन्द्रजिन् हरिप्रदर प्रति ऐमासहसं मन्दधे वाय.
मन्धानमरीन 1100
तेनेनि-राक्षमेन अग्रेग करणेन बदो वानरः निर्वियष्टोऽभवा , अन एवं
महीतले गत च ॥१५॥
दमिति-गतमाः यदं कपिर रावणाय न्यवेदयन् ॥१५॥

४८
संस्कृत-काव्य-लहरी
स तैः संपीड्यमानोऽपि रक्षोमिर्मीमविक्रमः।
विस्मयं परम
गत्या रक्षोधिपमवैक्षत ॥१५३॥
भ्राजमानं ततो दृष्ट्वा हनुमान् राक्षसेश्वरम् ।
मनसा चिन्तयामास तेजसा तस्य मोहितः ॥१५॥
महो रूपमहो धेर्यमहो सत्वमहो घुतिः ।
अहो राक्षसराजस्य सर्वलक्षणयुक्तता ॥१५५॥
यघधर्मो न बलवान् स्यादर्य राक्षसेश्वरः।
स्थादयं सुरलोकस्य सशकस्यापि रक्षिता १५६॥
तं ममीक्ष्य महासत्त्वं सत्त्ववान् हरिसत्तमः ।
चाफ्यमर्थवदव्यग्रस्तमुवाच
दशाननम् ॥१५॥
अहं तु हनुमान नाम मारुतस्यौरसः सुतः ।
सीतायास्तु ते पूर्ण शतयोजनमायतम् ।
समुद्रं लवयित्वैय तो दिक्षुरिहागतः ॥१५८॥
भ्रमता च मया दृष्या गृहे ते जनकात्मजा ।
तद्रवान्
दृधर्मार्थस्तप कृतपरिमहः ।
परदारान् महाप्रासो नोपरोर्बु, त्यमईसि ॥१५९॥
स इति न रक्षोभिः संपोधमानोऽपि म हनुमान विस्मयं गत
रक्षोधिपमवैध ॥१५॥
भ्राजमानामिति-म्राजमान राक्षसेश्वर. दृष्ट्वा तस्य रामेश्वरम्य नेत्रय
मोहितः कर्तव्यविषयकविवेकहितो हनुमान चिन्तयामास ॥१५॥
अहो इति-राक्षसराजस्य स्पादिसर्वलक्षणयुक्तता च अहो आधर्मम् ॥१५५।
याति-अयं राक्षमेश्वरः यदि अधर्म धर्मविरोधी । भ्यान नहिं मालोव
म्यापि रक्षिता स्यात् ।।१५६॥
तमिति–महासत्वं तु गवणं समीर अर्थतन मप्रयोजनं वाक्य रिसत्तम
दनुमानुवाच ॥१५॥
अहमिति-- मारतस्य औरमः मुख्यः मतः हनुमानामाहं तु सीतायाः
सोनार्थ शायोजनमायतुं समुई लंघयित्वा ता सीता दिदतः सन् इह लहापामागतः
भ्रमतेति-मया भ्रमता ते रहे जनमहा दृष्टा इटौ साक्षात्कृती धर्मार
येन सः तपसा कृतः परिवहः धनादिसँग्रहो येन मः अन एष भवान् प्रश्पस
परदारान उपगेई नाईमि ॥१५॥

सुन्दर काण्डम् न हि धर्मविरुद्धेषु बरपायेपु कमसु । मूलघातिषु सजन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधाः ॥१०॥ तत् त्रिकालहितं वाक्यं धर्म्यप्रर्थानुवन्धि च । भन्यस्व नरदेवाय जानकी प्रतिदीयताम् ॥१३॥ तम्य तद्वचनं श्रुत्वा वानरस्य महात्मनः । भागापयद् वधं तस्य रायपः क्रोधमूञ्छितः ॥१२॥ बधे तम्य ममानते रावणेन दुरात्मना । निवेदितवतो दौत्यं नानुमैने विभीषणः ॥१६॥ नभ्य तद्वचनं श्रुत्वा दशग्रीयो महात्मनः । देशकालहितं वाक्य भ्रातुरुत्तरमब्रवीत् ॥१३॥ कपीनां किल लालमिष्टं भवति भूषणम् । तदम्य दीप्यतां शीघ्रं तेन दग्धेन गच्छतु ॥१६॥ तम्य तद्वचनं श्रुत्वा राक्षसाः कोपकर्कशाः । वेष्टयन्ति स लागलं जीर्णः कार्यासजैः पटैः । तलन परिपिच्याथ तेऽग्निं तत्राभ्यपातयन् ॥१६॥ नहीति-धर्मविरुदेषु धर्मशास्त्रविरुद्धयु अत एव अपायेषु विपुलापाय- मंपादकेषु अन एव मूलपातिषु कर्मम् भवद्विधा बुद्धिसतो न मजन्ते ॥१६॥ तदिति नतु उक्तहेतोः विशालहितं सर्वकाले हितकारसंघ धर्मादनपेतम् अर्यानुवन्धि, "अर्थानुयायि वाक्यं मन्यस्य अन एवं नरदेवाय रामाय जानकी प्रतिदीयताम् ॥१६॥ तम्यति-तम्य हनुमतः यचनं श्रुन्वा क्रोधमूट्रिनो रावणः नम्य हनुमतो धमानापयत॥६॥ वध इति रावगेन वधे ममाज मनि दौत्यं बनिष्टदूतधर्म निवेदितदनो हनूमनः वो, विभीष यो नानुमेनु न अनुमति चयर । वध इन्युभयान्वयि ॥१३॥ नम्यनि-महात्मनो विभीषगम्य वचन देशशलहितमंत्तर वाक्यमनत्रीत् ॥१६॥ कोनामिति माहलं कपीनां भूप गम् अन एवं दृष्टुं भवति । अनः भम्य तत लागलं दीप्यता दान लागलेन विष्टः मन् गन्तु ॥१६॥ नम्यनि-नमा गणस्य बन धन्वा कोपर्यशाः भनिकोपबन्दो प्रयाः अन्या सातव्य एN लाडूलं संप्रदीप्तं तद्दष्ट्री तस्य हनूमतः । सहस्त्रीयालवृद्धाश्च जग्मुः प्रीति निशाचराः ॥१६॥ धीक्षमाणस्ततो लड़ां कपिः कृतमनोरथः। वर्धमान समुत्साहः कार्यशेषमचिन्तयत् ॥१६॥ घनं तावत् प्रमथितं प्रकृष्टा राक्षसा हता। यलैकदेशः क्षपितः शेषं दुर्गविनाशनम् ।।१६९।। दुर्ग विनाशिते कर्म भवेत् सुखपरिश्रमम् । अल्पयत्नेन कार्यऽसिनमम स्यात् सफलः श्रमः ॥१७०।। यो ह्ययं मम लाङ्कले दीप्यते हव्यवाहनः । अन्य सन्तर्पणं न्याय्यं कर्तुम मिहोत्तमैः ॥१७॥ ततः प्रदीपलाइलः सविद्युदिय तोयदः । भयनागेपु लङ्काया विवचार महाकपिः ॥१७२!! तस्य हनुमतो लाडलं यः कार्यासोपादानके पटेः वेश्यन्ति म्म। अथ अनन्तरं तलन परिषिश्य अभिषिच्य नन्न लागले अनिम् अभ्यपात्यन् ददुरित्यर्थः । लालमिति तस्य हनुमनः मंप्रदीप्त लाइ द्रष्ई महीबालवृद्धा निशा- नगः जग्मुः ते च दृष्ट्वा प्रीति जम्मरित्युभयान्दयि ॥१६॥ बीक्षमाण इति-वर्धमानः समुत्माहो यस्य म हनूमान् कार्योषम् अब- शिष्कृत्यम् अचिन्तयत् ।।१६८॥ वनमिति प्रक्रमाः बलवन्तः राजमा. हताः बलैकदेशः सेनायाः कश्रिदेशः चपितः विनाशिनश्च अतः दुर्गविनाशनमेव शेष पत्यामीति शेषः ॥१६॥ दुर्ग इति-दुर्ग विनाशिने मति कर्म मम किया मुखं मुगापः परिश्रमो यम्मिन् तत् भवेत् अतः अल्पयत्नेन माये अम्पिन दुर्गविनाशनम् कार्य निष्पने सतीति शेष, मम श्रमः मफल स्यान् ॥१७॥ य इति-मम लााले दीप्यते प्रकाराने यो हव्यवाहनो वहि अन्य गनपंग- मेभिगृहोत्तमः क्तुं न्यायम् ।।११।। तत इति-मविद्युत् तोयनो मेघ व लढाया भवनापेषु विचचार महादपिः हनुमान् ।।१२।। A सुन्दरकाण्डम् गृहाद् गृहं राक्षसानामुघानानि च वानरः। धीक्षमाणो घसन्त्रस्तः प्रासादांश्च चचार सः।।१३।। लड़ां समस्तां सन्दीप्य लालाशि महारलः । निर्वापयामास तदा समुद्र हरिसत्तमः ॥१७॥ ततस्तां शिशुपामूले जानकी पर्यवस्थिताम् । गमनाय मति कृत्वा वैदेहीमभ्यवादयत् ॥१७॥ स लिलयिपुर्भामं सलीलं लवणार्णवम् । कल्लोलास्फालबेलान्तमुत्पपात नमो हरिः। निपपात महेन्द्रस्य शिखरे पादपाकुले ॥१७६।। ततस्ते प्रीतमनसः सर्वे वानरपुङ्गवाः। हनूमन्तं महान्मानं परिवार्योपतस्थिरे॥१७ प्रदृष्टवदनाः सर्वे तमरोगमुपागतम् । उपायनानि चादाय मूलानि च फलानि च । प्रत्यर्चयन् हरिश्रेष्ठं हरयो, मारुतात्मजम् ॥१७॥ गृहादिति-राक्षसानां हान् उन्नतभवनार गृहम उसानानि महारानाथ बोक्षमाणो हनूमान् प्रामादान बुचर ॥१३॥ सहामिति मनम्नां ला पोध हरिमत्तमः वानरश्रेष्ठ हनुमान लागलामि समझे नि माम ॥१७॥ नत इति-ततोऽनन्तरं गमनाय मति विचारं कृत्वा शिशमानुले पमिता जानकात अभ्यरादयन् नमार हनुमानिति शेषः ॥१७॥ म इनि-कोलारसाललान्नं तरहैसालिततीरोपान्तं भीम लवगावं मलीउ लीलापूर्वक लिलकि हारेः स हनूमान् नभ उशात् । महेन्द्ररू तदास्यस्प पर्वतम्य पाइपरले नरमले शिवरे निशान च ॥१७॥ तन इतिवें बनाया हुनुमन परिवार्य उरतभिरे। अगेगं पुशल- पूटर उपहार फलादीन्युपायनान्याहार हरस:वानराः निपूजितान्नः। मार्थकहमनकान्वाय ॥१४-१७॥

हनूमांस्तु गुरून् वृद्धान् जाम्ययत्यमुखांस्तदा ।
कुमारमगदं चैव सोऽचन्दत महाकपिः ॥१७॥
हनूमानववीद् दृष्टस्तदा तान् धानरर्षभान् ।
भशोकवनिकासंस्था दृष्टा सा जनकात्मजा ।
रक्ष्यमाणा सुघोराभी राक्षसीमिरनिन्दिता ॥१८॥
सा प्रकृत्यैव तन्वही तद्रियोगाच कर्शिता।
प्रतिपपाठशीलम्य विद्येव तनुतां गता ॥१८॥
प्रीतिमन्तस्ततः सयें वायुपुत्रपुरस्सराः।
महेन्द्रादि परित्यज्य पुप्लुयुः प्रधगर्षमाः ॥१८२॥
लवमानाः खमुत्पन्य ततस्ते काननीकसः।
निपेतुर्हरिराजस्य समीप राघवम्य च॥१८३॥
हनूमांश्च महाबाहुः प्रणम्य शिरमा ततः।
नियतामक्षतां . देवी राघयाय न्वदेयत् ॥१८॥
तत्र लङ्केति नगरी रावणम्य दुरात्मनः।
दक्षिणस्य समुद्रस्य तीरे वसति दक्षिणे ॥१८५॥
द्दनूमानिति-- हनुमान जाम्बवत्प्रमुवान अवन्दत ॥१६॥
हनुमानब्रवीदिति–दृष्टः प्रसन्नः हुनमान मुधोराभिः राक्षमीभिः रक्ष्यमाणा
अनिन्दिना निन्दासंसर्गरहिता अशोरवनिप्रसंशा जनकात्मजा मया ऐति वाना-
भार अात् ॥१८॥
मेनि-प्रन्यैव स्वभावनत्र नन्दही मीता तद्वियोगान् रामवियोगजदु मान्
चर्शिता अनिकृगत्वं प्राप्ता अन एवं प्रनिरन्याशीलस्य जनस्य विद्येव तनुता गता।
प्रीनिमन्त इनि-नवोऽनन्तरं वायुपत्रपुर मगः प्रौनिमल गर्व वानरा
महेन्दार्टि महेन्द्रपर्वत परित्यज्य त्यक्त्वा पुष्टुयुः जग्मुः ।।१८२॥
प्लवमाना दनि-लवमाना इप्टत्य, गच्छन्नः ते आननारयः वानराः
हरिराजस्य मुग्रीवस्य राघवस्य च ममीपे निपेतुः ॥१३॥
हनूमानिनिहनुमान् प्रगट नियनां यतचित्ताम् अनता विनाशरहितां
देवी मौनां राघवाय न्यवेदयत् ।।१८४॥
नोनि–नव प्रमिद्धे दचिगस्य ममुद्रस्य तारे रावणस्य लईति नगरी
बमति अस्ति ॥१॥

सुन्दरकाण्डम् तत्र सीता मया दृष्टा रावणान्तःपुरे सती। संन्यस्य त्वयि जीवन्ती रामा राम मनोरथम् ॥१८६॥ सा मया नरशार्दूल विश्वासमुपपादिता। रामसुग्रीवसस्यं च श्रुत्वा प्रोतिमुपागता ॥१८॥ अभिज्ञानं च मे दत्तं यथावृत्तं तवान्तिके। चित्रकूटे महाप्राज्ञ वायसं प्रति राघव ॥१८८॥ अयं चास्सै प्रदातव्यो यत्नात् सुपरिरक्षितः । एप नियातितः श्रीमान् मया ते वारिसंभवः ॥१८॥ जीवितं धारयिष्यामि मासं दशरथात्मज । ऊ मासान्न जीवयं रक्षसां वशमागता ॥ इति मामब्रवीत् सीता कृशाङ्गी वरवर्णिनी ॥३०॥ तत्र सीतेति-तत्र लङ्कायां रावणान्तःपुरे, त्वाय रामे मनोरथं संन्यस्य जीवन्ती मती रामा सीता मया दृष्टा ॥१६॥ सेति-हे नरमाईल राम मा मागिता सीता मया विश्वासमुपपादिता विश्वास प्रापिना च तथा राममग्रीवमयं रामस्य मुग्रीवस्य च मैत्री श्रुत्वा प्रीति प्रसन्नताम् उपागता प्राप्ता 9-10 अभिज्ञानमिति-चित्रकूटे वायसं जयन्तं प्रति तवान्तिके यद् वृत्तं वृत्तान्तः तदभिशान मन् संवादचिह मे मह्यं दून कथितमित्यर्थः । “पुरा किल मिसाधित देशे मन्दाक्निीनमीपे वायसः मां विलिलेख । भवान् मां बिलिसितां रट्या क्रुद्धः कोपेन च दर्भसंम्नरात् दर्भमुटेरके दर्भ मानदेवतामन्त्रेणयोज्य तं वायस प्रतिचिक्षेप । तेन च म वायसः भूमौ निपत्तितः 'दत्त्वा च दक्षिगं नेत्रं प्राणेन्यः परिरक्षिनः" । न्येनां क्थामुद्दिश्य सौनया रामः उपालब्धः यत् 'मत्कृते कारमारेऽपि ब्रह्मात्र ममुदीरितम् कमायोमाहरत् त्वत्तः क्षमसे तंमहीपते' इत्युदन्तजातं अत्रानुसन्धेयम् । अयमिति-अयं मुपरिरक्षित वारिमंभवः भया सीतया ते तुभ्यं निर्यातितः दत्तः श्रीमान् मगिः अन्न रामाय प्रदातव्यः ॥१८॥ जीवितमितिमामाल न जौदेयं सीता मामित्यवधीनं ॥१०॥ .

५४ संस्कृत-काव्य-लहरी एवमुक्तो हनुमता रामो दशरथात्मजः। ते तु रष्ट्या मणिश्रेष्ठं राधयः शोककर्शितः। नेत्राभ्यामधुपर्णाभ्यां सुग्रीवमिदमब्रवीत् ||१६|| अयं हि शोमते तस्याः प्रियाया मुनि मे मणिः । अस्याद्य दर्शनेनाहं प्राप्तां तामिव चिन्तये ॥१५॥ चिरं जीवति वैदेही यदि मासं धरिप्यति । न जीयेयं क्षणमपि विना तामसितेक्षणाम् ॥१६॥ नय मामपि तं देशं यत्र दृपा मम प्रिया । न तिष्ठेयं क्षणमपि प्रवृत्तिमुपलभ्य च ||१६|| मधुरा मधुरालापा किमाह मम भामिनी । मद्विहीना वरारोहा हनुमन् कथयस्व मे ॥१९५॥ एवमुक्तस्तु हनुमान् राघवेण महात्मना । सीताया भापितं सत्र न्यवेदयत रायवे ॥१९६॥ हनुमन् सिंहसंकाशी तायुभी रामलक्ष्मणौ । सुग्रीवं च सहामात्यं सर्वान् या ह्यनामयम् ॥१९७|| एवमिति हुनुमना एवं पूर्वोकप्रकारेग उक्तः; मणिं दृष्ट्वा शोकार्तित रामः सुग्रीवम् इदं वश्यमाणम् अत्रवीत् ॥११॥ अयमिति-अयं मणिः तस्याः सीताया मूर्ति शोभते। अत. अस्य मणेर्दश- नेन ता सीतां प्राप्तामिव चिन्तये मन्ये ॥१२॥ चिरमिति- यदि मासं धरिष्यति प्राणाम् इति शेषः तदा वैदेही चि जीवति । अहं तु तां सीतां विना क्षणमपि ज जीवयं जीवितुमिश्चा ॥१६॥ नयेति--प्रवृत्ति वृत्तान्तमुपलभ्य नावा चणमपि न नियम् अत. यत्र मम प्रिया दृष्टा तं देश मामपि नयु ॥१६॥ मधुरोति-मम भामिनी प्रिया तिमाह कयं व जीवति तत् कथयस्व ॥१६॥ एवमिति रावण एवमुत्तो हनुमान मीतायाः मर्व भाषितं राव तत्समीपे व्यवेदयत १६६u हनुभिति-मिहसनशी सदृशौ राममयी मुग्रंवं मर्गन् अन्योश्च अनामयं नया वदेः ॥१६ सुन्दरकाण्डम् यथा च स महावाहुमाँ तारयति राघवः । असाद् दुःखाम्बुसंरोधात् त्वं समाधातुमर्हसि ॥१९८॥ तदर्थोपहितं वाक्यं प्रश्रितं हेतुसंहितम् । निशम्याहं ततः शेयं वाक्यमुत्तरमनवम् ॥१९९।। मम पृष्ठगती तो चं चन्द्रसूर्याविवोदितौ । त्वत्सकाशं महाभागे मृसिंहावागमिप्यतः ॥२००। अरिषं सिंहसंकाशं क्षिप्रं द्रक्ष्यसि राघवम् । लक्ष्मणं च धनुप्पाणि लडाद्वारमुपस्थितम् ॥२०॥ निवृत्तवनवासं च त्यया सार्धमरिन्दमम् । अभिषिक्तमयोध्यायां क्षिप्रं द्रक्ष्यसि राघवम् ।।२०२॥ ययेति-दुःसाम्बुसंरोधान दुरासागरात् यथा स राघव मा तारयति त्या वं ममाधातुमर्हसि ॥१६॥ तदर्थेति--अहम् अपिहिने तद्वाक्यं निशम्य अन्वा शेषं भिरम् उपर क्यम् अभवम् ।।१६।। ममेति-सम पृष्ठगतो पृष्ठाभदौ तौ रामलक्ष्मणी उदिता चन्द्रम्याटव उम्मवाराम् आगमिष्यतः ॥२०॥ अरिप्नमिति-सिंहसंकाशं रामं धनुपाणिं लक्ष्मण च क्षिप्रं शीघ्रं दृश्यति । निवृत्तेति त्वया सार्धमभिषिक्तं राघवनयोध्यायां क्षिप्रं वक्ष्यामि ॥२०॥ इति श्रीवाल्मीकिरामायणे सुन्दरकाण्डं रामायणशिरोमणि- टीशसमेनं समाप्तम् ॥

श्रीमद्भगवद्गीतोपदेशः अर्जुन-विपादः धृतराष्ट्र उवाच- धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥ १-१ ॥ धर्मप्रधानत्वाद्धर्मप्रदत्वादा धर्मक्षयात्रायत इति वा धर्मक्षेत्र तस्मिन्धर्मक्षेत्रे याममात्रेण धर्मतत्फलप्रदे फुरक्षेने युयुत्सवो युद्धं चिकीर्पयोऽतएव समवेताः समवार्य प्राप्ताः सन्नदा. मामका. दुर्योधनादयः पाण्डवाश्च किं. कार्य कृतवन्त' मध्य, तद् ब्रहीत्यर्थः । , ममय उवाच- अथ व्ययस्थितान्द्रप्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः । प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डयः ॥१-२०॥ पीकेशं तदा वाफ्यमिदमाह महीपते । अथोमयमेनयोः युद्धसम्माहसमनन्तरं पाण्डोरपत्यं पाण्ड्यः कपिध्व मोऽर्जुनः व्यवस्थितान् धार्तराष्ट्रान् दृष्ट्वा स्वयमपि धनुक्ष्यम्य शखाणां मम्पाते प्रयोगकाले प्राप्त तदा हृषीकेशमिदं वक्ष्यमाणं वाक्यमाह हे महीपते । अर्जुन उवाच- सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥१-२५॥ याघदेताग्निरीक्षेऽहं योद्धुफामानवस्थितान् । कर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥१-२२॥ योद्धमान् युयुन्सून अत एवावस्थितानसेनां सन्नद्य युद्धायोयुक्तानेतान् योधान गर्वान् यावत् यावति देशे स्थित्वाहं निरीदे सम्यक् पश्यामि हे अच्युत 1 तावन्त देदो मे रथं नीग्दा सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापय । विमिह सेनो द्रष्टुमागतोऽसि वा त्वमिन्यत आह-रिति । अम्मिन, रणममुयमे युद्धव्यापारे कैः सह मया योद्धय युद्ध कर्तव्य भवति ।

संस्कृत-काव्य-लहरी समागताः। योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेयुद्धे प्रियचिकीर्पयः ॥१-२३॥ दुर्दुरधर्मनिष्टस्य धार्तराष्ट्रभ्य धनराप्तापत्यस्य दुर्योधनस्य युद्धे प्रियचिव युद्धने एमधं सम्पादयितुशमा संतोऽत्र कुरक्षेत्रे ये वा एते समागतानान् योन्यमानान् सनिदमोक्षे नाम रूप कुद च मंरचं यथा बास्से नया रथं स्थापयर्थः । समय उवाच- एयमुक्तो हपीकशो गुडाकेशेन भारत । सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयिन्या रथोत्तमम् ॥१-२४॥ भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् । उवाच पार्थ पश्यताम् समयेतान् कुरूनिति ॥१-२॥ गुदाश-गुडवन्मधुर सन् भवानवनि प्रामोनीति गुहारः शिव' । 'म्बा- दुपिलायं मधुमानुनायम्' इति श्रुतेः । स शिव ईशो यस्य म गुदादशोऽर्जुनसेन पीकगः हृषीकाणामिन्द्रियाणामीशो हृषीकेश श्रीकृष्णः एवमुक्त: मन रथोत्तम रयिकगारथिभ्यामविगेपर्ध्वजप्रभावेण चोत्कृष्टत्वेन तदभम्योतमन्चम् । तं रथोत्तम सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा, भीष्मद्रोणप्रमुखत. पट्टी बहुवचनान्तम्नमि भी मद्रोशी प्रमुखमादिका ते भीष्मद्रोगप्रमुखा. महीक्षित छत्रिन्यायेनात्र भीष्मस्व महीक्षित्त्वं तेषां भीष्मद्रोणप्रमुखाना महीक्षिता भभुजां सर्वेषा गप्वामिनिशेषः । हे पार्थ, समवेनान्ममार्य प्राप्तानतान्युम्न्यस्येन्युवाच । तप्रापश्यत् स्थितान्पार्थः पितृनथ पितामहान् । आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पोत्रान्सीस्तथा ॥१-२६॥ श्वगुरान् सुहृदथैव मेनयोरुभयोरपि । अथ भगवदुत्तेरनन्तरं पार्थ-पृथाकुन्ती तदपन्य पार्याऽर्जुनो यत्र रथः स्थापितम्ना स्थिन्वा मेनयोरुभयोरपि स्थिवान् पितॄन् पितृव्यान , मसीन मवयस्का' मसायस्तान्, श्वसुरान् मुढो मित्रागि चा मानपि स्वीयानेवापश्यत् । न तु तनातिरक्किानिन्यर्थः। तान् समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्यान् बन्धूनवस्थितान् ॥६-२७ कृपया परयाविष्टो विपीदग्निदमरवीत्।

श्रीमद्भगवद्गीतोपदेशः म दर्शनकर्मणि प्रवृत्तः कौन्तेयः पुरत्या अपत्यं कौन्तेयोऽर्जुनः बन्धून् कन्धुत्वधर्मविशिष्टानव तानवस्थितान् युद्धसन्नद्धान् सर्वान् ममीक्ष्य प्रीवामुन्नम्य सम्यग्दृष्ट्या तेषु परया कृपयाविष्टो भूत्वा विषादन्निदं वक्ष्यमाणलक्षणं वचनमब्रवीत् । अर्जुन उवाच- दृट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥१-२८॥ सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति । वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्पश्च जायते ॥१-२९॥ युयुन्म मेना मन्नर युयुत्सया समुपस्थितमिमं पुरःस्र्थ खजनं पितृपुत्रादिक दृष्ट्या मदीया इति ज्ञात्वा, हे कृष्ण, इमं हन्तुं मम गात्राणि करचरणादयः मीदन्ति मिथिलायन्ने, मुगं च परिशुष्यति शुष्पीभवति, शरीरे वेपथु कम्पो रोमहर्षी भयमन्तापाच्या रोमोगमन जायते ॥ गाण्डीवं संसते हस्तात् न्वक्चैय परिदहाते । नत्र शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥२-३०॥ हम्नाद् गाण्डीवं धनुः संमते गलति त्वर चर्म च परितापेन दयने, में मनोऽपि च भ्रमनि परवशं गच्छति । अत एव रथे स्थातुं च न शक्नोमि । निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव । न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥१-३१॥ हे केशव, युद्धनेरनर्थन्वसूचकानि विपरीतान्येव निमित्तानि च पश्यामि न त्खनुकूलानि । इदानीमेवमस्तु तथापि पश्चात्तु श्रेयो भविष्यतीत्यतआहनचेति । इमं पितृपितामहादिकं स्वजनमाहवे युद्धे हवा अनु-पश्चाद् युद्धानन्तरभावि न किमपि श्रेयश्च एव्यामि । एतेषां वधेन न किमपि पुरषार्थमेष्यन्नं विज्ञान इत्यर्थः । नकाक्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च । किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगै वितेन वा ॥१-३२॥ अवनेपा वन जयादि उभग श्रेय दत्यन आह- काङ्क्ष इति । खजन- हिंसया प्राप्तो यो जयन्तमहं न काइते, तेन प्राप्त राज्यं च तन्यूलकानि विषय- मुखान्याप नाई काइत इत्यर्थः । एतैर्यधा राज्याचपेचया युध्यने तथा भवद्भिरपि खुश्यनामिन्यन आह-किमिनि । धर्माधर्मविवश्वना नोऽम्मा स्वजन-हिंसया प्राप्न गयेन किं फलं तन्मूलभोग; किं तदर्थन जोविनेन वा किम् । अधर्ममूलक সন্ধাৱসৰ ল্য ন্যালিখ ।

संस्कृत-काव्य-लहरी येपामर्थे काइक्षितं नो राज्यं भोगा सुखानि च । तामेऽयस्थिता युद्ध प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥१-३३॥ अकार्यशतेनापि पोपणीयानां येषां पितृपुत्रादीनामधे निमित्त राज्य भोगा' मुसानि च पाक्षितं नोऽस्माभिः काक्षितानि भवन्ति । न इति तृतीयार्थे षष्टी । न एव पित्रादय इमे प्राणान् धनानि च त्यक्त्वा युद्धे युद्धनिमित्तमवस्थिताः । जीवितास त्यक्त्वा युद्धे मर्तुमागत्य तिष्ठन्तीत्यर्थः । पतान हन्तुमिच्छामि नतोऽपि मधुसूदन । अपि त्रैलोक्यराज्यस्स हेतोः किं नु महीकते ॥१-३५ खर्मा नतोऽपि हिंमतोऽप्येतानाचार्यादीन् हन्तुं नेच्छामि भैलोक्यराज्यम्य हेतोरपि निमित्ताय वा। एतेषा हननेन्दत्वं वाप्यागच्छतु तथाप्येतान् हन्तुं नेच्छामि किं नु महीकृते किं वक्तव्य राज्यार्थमेनान् हन्तुं नेच्छामीति । अनेन वर्गमुखमणि मास्त्वियुकं भवति । मजय उवाच- . एयमुफ्त्यार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् । विसृज्य सशरं चापं शोकसंविनमानसः॥१-४॥ अर्जुनः मख्ये सति एवम् उक्तप्रकारकं वचनमुक्त्वा शोवर्मविप्रमानसः स्वजन- विनाशं निमित्तीकृत्य समुन्पनेन शोकेन संविनं मानस यस्य म तयोक्तः मन् सारं बाप विमृज्य नाहं योद्धं श्यामीति रथोपस्थे रयस्योपरि उपाविशद् उपविष्टवानित्यर्थः । श्रीकृष्णोपदेशः मन्त्रय उवाच- तथा कृपयाऽऽविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् । विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥ २-१॥ तया-उक्तरीत्या मदीया एते प्रानृात्रादयो युधि प्रियन्त इति मरियमाणस्व- जनेषु कृपयाविष्टमत एवं विषीदन्तमत एवाध्रुपूर्णाकुलेक्षा तमर्जुनं दृष्ट्वा मधुसूदनः मध्वा मर्वेषां दहे मधुवदिष्टत्वान्मधुरहधारस्त मात्मप्रकाशनेन सूदयतीति मधुसूदनः । यद्वा 'दयं पृथिवी सर्वपा भूतानां मथु' इति श्रवगान्मधु खरूपानन्दनन् खापरोक्षवता सूत्यति स्तोरयनीति मधुसूदन श्रीकृष्ण, इदं वक्ष्यमाणलक्षगं वाक्यमुवाच ।

श्रीमद्भगवट्ठीतोपदेशः क्लैव्यं मा श्रीभगवानुवाच- कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । अनार्यजुष्टमस्वयंमकीर्तिकरमर्जुन ॥२-२॥ हे अर्जुन शुद्धखभाव विपमे सटे शत्रुभिः शौर्हन्तुं प्रातसमये इदं कश्मलं "एतान्न हन्तुमिच्छामि' इत्यायुक्तलक्षणश्चित्तव्यामोहः कुतः कस्माद्धतोस्त्वा त्वां समुपस्थितम् प्राप्तम् । कालदोषाकर्मदोषाहा क्स्मादयं प्रमः शुद्धखभावस्य विवेकि- नस्तव प्राप्त इत्यर्थः । हे पार्थ अनार्यजुष्टमनायरायशिक्षावर्जितः पामरैर्जुष्टं सेवितम- स्वयं स्वर्गाप्रापकै दुर्गतिकारणमिह लोकेऽप्योर्तिकरम् । म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपद्यते । शुद्रं हृदयदौर्यल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ट परंतप ॥ २-३ ॥ लव्यं लौषभावं कार्य शराणामानह त्वं मा म्म गमः मा भजस्व । राजधर्मज्ञे रणपण्डिते त्वयि नेतदुपपद्यते। वीरतसस्तुत्यस्य तव नेतयुक्तमित्यर्थः । हे परन्तप अनुकर्षण तुई क्षुदत्वकारणं निकृष्टत्वापादक हृदयदौर्बल्यमधर्य मन - कालुष्यमेतत्त्यक्त्वोत्तिष्ट । युद्धाय सन्नद्धो भवेत्यर्थः । नित्य आत्मा इति अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे । गतासूनगतासुंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥२-११॥ न शोन्या अशोच्या भीष्मद्रोणादयः, सद्वत्तत्वात् , परमार्थखरूपेण च निन्य- त्वान् । तान अगोच्यान् अन्वशोचः अनुशोचितवान् असि 'ते नियन्ते मानिमित्तम् अहं ते विनाभूतः किं करिष्यामि राज्यमुवादिना ?' इति त्वं प्रज्ञावतां बुद्धिमनां वादान वचनानि च भाषमे । तदेतत् मौल्यं पाण्डित्यं च विरुद्ध आन्मनि दर्शयमि उन्मत्त इव इत्यभिप्रायः | यम्मान् गतामून् गतप्राणान् मृतान् अगतामृन् अगत- प्राणन् जीवत. च न अनुगोचन्ति पण्डिताः आन्मज्ञाः पण्डा आत्मविषया बुद्धिः येषां ने हि पण्डिताः । परमार्यतस्तु तान् निन्यान् अशोच्यान् अनुशोचमि, अतो महोऽमि इत्यभिनय नत्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः । न चैव न भविष्यामः सर्व वयमतः परम् ॥२-१२|| न तु एवं जानु कदाचित् अहं नामम् , किन्तु आसमेव । अतीतेषु देहोत्पत्ति- विनाशेषु घटादिषु रियदिव नित्य एव अहम् आसम् इत्यभिप्रायः । तथा न वं संस्कृत-काव्य-लहरी । नामी किन्तु आमीरेख । तथा न इमे जनाधिपाः न आसन्, किन्तु आसभेव । तथा न च एव न भविष्यामः, किन्नु भविष्याम एव सर्वे वयम् अतः अस्मान् देहविनाचात् परम् उत्तरकालेऽपि । विष्वपि कालेषु निन्या आग्मस्वरूपेण इत्यर्थः । देहभेदानुबया बहुवचनम् , न आत्मभेदाभिप्रायेण । देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। तथा देहान्तरमाप्तिधारस्तान न मुह्यति ॥२-१३॥ देह अम्य अस्तौति देही तस्य देहिनो देहवत आत्मनः अस्मिन् वर्तमाने देहे यथा येन प्रकारेण चौमार कुमारभावी बाल्यावस्था यौवनं यूनो भावो मध्यमावस्था, जरा क्योहानिः जीर्णावस्था इत्येताः तिसः भवस्थाः अन्योन्यविलक्षगा। तामां प्रथमावस्थानाशे न नाश , द्वितीयावस्थोपजने न उसजनमात्मनः । कि तहिं ! अवि- कियस्यैव एक्स्स द्वितीयतृतीयावस्थाप्राप्ति आत्मनो दृष्टा । तथा देव देवात् अन्यो देहो देहान्तरं, तस्य प्राप्तिः विकियस्यैव आत्मन इत्यर्थः। धरो धीमाम् नत्र एवं मति न मुपति न मोहम् आपद्यते । अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्पमिदं ततम् । पिनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥२-१७ ॥ अविनाशिन विनष्टुं शीलम् अस्येति । तुसन्दः असनो विदोषणार्थः । नन् विद्धि विजानीहि । किम् ? येन सर्वम् इदं जगत् तनं व्याप्तं सदाख्येन ब्रह्मणा साकाशम् आशेनेव घटादयः । विनाशम् अदर्शनम् अभावम् । अव्ययस्य न म्येनि उपचयापचयो न याति इति अन्ययं तस्य अश्ययस्य । न एतत् मदाख्यं ब्रह्म खेन रूपेण व्येति, व्यभिचरति निरवयवत्वात् । अनः अव्ययम्य अस ब्रमण. विनादान कधित्वर्तुमर्हति, न कश्चित् आत्मानं विनागयितुं शनि ईश्वरोऽपि । आत्मा हि ब्रह्म, वात्मनि च कियाविरोधात् । जायते म्रियते या कदावित् नार्य भूत्वाऽभविता वा भूयः । मजो नित्यः যাৰী पुराणो हन्यते हन्यमाने शरीर ॥२-२०॥ चाशब्दः चार्थे । कदाचिन्दाद मर्वविक्रियाप्रतिषेधेः मम्बद्धपते न कदाचिन् आयते उत्पयने तथा न कदाचित् नियते वा न म्रियते च । यम्मात् अयम् आग्मा न श्रीमद्भगवद्गीतोपदेशः ६३ भूत्वा भवनक्रियाम् अनुभूय पश्चात् अभविता अभावं गन्ता न भूयः पुनः, तस्मात् न म्रियते। यो- हि भूत्वा न भविता स म्रियते इत्युच्यते लोके । वाशब्दान् नशब्दाच अयम् आत्मा अभूत्वा वा भविता देहवत् न भूयः पुनः । तस्मात् न जायने यो हि अभूत्वा भविता स जायते इति उच्यते । नैवम् आत्मा । अतो न जायते । यम्मात् एवं तस्मात् अजः । यस्मात् न म्रियते तस्मात् नित्यः च । शश्वद्भव शाश्वत । न अपनीयते खरूपेण निरवयवत्वात् । निर्गुणत्वाञ्च नापि गुणक्षयेण अपक्षयः । पुराणः यो हि अवयवागमेन उपचीयते संवर्धते, अभिनव इति च उच्यते। अयं तु आत्मा निरवयवत्वात् पुरापि नव एवेति पुराण., न वर्धते इत्यर्थः । तथा- न हन्यते। हन्तिः अत्र विपरिणामार्थे द्रएच्या अपुनरुक्तताय । न विपरिणम्यते इत्यर्थः । हन्यमाने विपरिगम्यमानेऽपि शरीरे ॥ अस्मिन् मन्त्रे पड् भावविकारा. लौकिकवस्तुविक्रिया आत्मनि प्रतिषिध्यन्ते. मर्वप्रकारविक्रियारहित. भारमा इति वाक्यार्थः। वासांसि जीर्णानि यधा विहाय नवानि गृहणाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥२-२२॥ वामामि वत्राणि जीर्णानि दुर्बलतां गतानि यथा लोके विहाय परित्यज्य भवानि अभिनवानि गृह्णाति उपादत्ते नरः पुरुषः अपराणि अन्यानि, तथा तद्वदेव शरीराणि विहाय जीर्णानि अन्यानि संयाति मंगच्छति नवानि देही आत्मा पुरुषवत् अविकिय एवेत्यर्थः । नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥२-२३॥ एनं प्रकृतं देहिनं न हिन्दन्ति शस्त्राणि निरवयवत्वात् ने अवयव विभाग कुर्वन्ति । शत्राणि अनादीनि । तथा न एनं दहति पावकः, अमिरपि न मली- करोति। तथा-नच एन इंदयन्ति आपः अपओ हि सावयवस्य वस्तुनः आदीं- भावकरणेन अवयवविश्लेषापादने सामर्थ्यम् । तत् न निरवयवे आत्मनि सम्भवति । नया स्नेहवन् द्रव्यं स्नेहशोषणेन नाशयनि वायु । एनं तु आन्मानं न शोषयति मारतः अपि।

संस्कृत-काव्य-लहरी
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अच्छेद्योऽयमदाहोऽयमक्लेद्योऽशोप्य एव च ।
निन्यः सबंगतः स्थाणुरचलोश्यं सनातनः ॥२-२४॥
सम्मा अन्योन्यनाराहेतनि भृतानि एनम् नामानं नाशयितुं न उन्महन्ते दम्मान
निन्यः । निन्यवान मगनः । सर्वगतन्त्रात् म्यागरिव स्थिर इत्यनेन । स्थिरत्वान् अचलः
अयम् आग्मा, अतः मनातनः चिन्निनः न वारणार कुशिनिपनः अभिनत्र स्र्यः।
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमधिकार्योऽयमुच्यते ।
नस्सादेवं विदित्वनं नानुशाचितुमर्हसि ॥२-२३॥
मारमाविषयवान् न व्यते इति अवतः अयम् आन्मा । अन एव
अचिन्यः अयम् । यत् हि इन्द्रियगोचरः दन् चिन्ताविषयवम् आपयने । अयं तु
मान्मा अनिन्द्रियगोचरत्वान् अचिन्य अविर्य अगम् , यथा ईरं दध्यातमनादिना
विभरि न नया अयम् आमा । निग्यान्यात् च अविकिय । न हि निरवयत्र विचित्
विकियात्म टम् । अविकिसत्वान् अविकार्यः अयम् आमा उच्यते । नम्मान एवं
यौतरकारेण एनं आत्मानम् विदिन्वा त्वं न अनुमोचितम् अईमि हन्तानमेषां
मया ने इन्यन्न।
भय चैनं निन्यज्ञातं नित्यं वा मन्यस मृतम् ।
तथापि च महाबाहो नवं शोचितुमहमि ॥२-२६॥
अथ चटति अभ्युगनार्थः । मनं प्रतिम अमानं निन्यवान लोकंपमिद्धया
प्रन्यनगरोन्यत्ति बादी वातः इति वा मन्यये, दया प्रति नादिना निन्यं वा
मन्यमे मन मुनी मृतः दति; नारि तथामावेऽपि आत्मनि व मदाबही नाई
गोचिनुन् अहमि, जन्मवती नाशः नाशवटी अन्म ति एती अवश्यमादिनी दति
सन्मात् ।
जातम्य हि ध्रुयो मृत्युभ॑यं जन्म मृनभ्य च ।
तसादपरिहार्य नवं शोचिनुमईसि ॥२-२७
जानस्य हि लम्बवन्मनः ध्रुवः अव्यभिचारी युः नागवं जन्म मृनम्य
च । नम्मा अपरिहार्योऽयं जन्नमरणलक्षनः अर्थः दन्मिन आरिहार्य नर्व
गोवितुम् अहमि।
अन्यतादीनि मृतानि व्यनमध्यानि मारत ।
अव्यक्त निधनान्येय नन का परिदचना ॥२-२८॥

- श्रीमद्भगवद्गीतोपदेशः अव्यक्तादीनि-अव्यक्तम् अदर्शनम् अनुपलब्धिः आदिः येषां भूतानां पुत्रमित्रादिकार्यकरणसंघातात्मकानां तानि अव्यक्तादीनि भूतानि प्राक् उत्पत्तेः । उत्पन्नानि च प्राक् मरणान् व्यक्तमध्यानि । अव्यक्तानिधनानि एव पुनः अव्यक्तम् अदर्शनं, निधनं मरणं येषां तानि भव्यक्तनिधनानि । मरणात् ऊर्च अध्यक्ततामेव प्रति- पद्यन्ते इत्यर्थः। तत्र का परिदेवना-को वा प्रलापः अदृष्टदृष्टप्रनष्टभ्रान्तिः भूनेषु इत्यर्थः । आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनम् आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः। आश्चर्यवञ्चनमन्यःशृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् २-२९॥ आश्चर्यवत् आश्चर्यम् अष्टं पूर्वम् अद्रुतम् अकस्मात् दृश्यमानं तेन तुल्यम् आश्चर्यवत् आश्चर्यमिव एनम् आत्मानं पदयति कश्चित् । आश्चर्यवन् एनं वदति तथैव च अन्यः, आश्चर्यवत् च अन्यः शूगोति । श्रुत्वा दृष्ट्वा उक्त्वा अपि एनम् आत्मानं वेद न चैव कश्चित् । अथवा-यः इमम् आत्मानं पश्यति स आश्चर्यतुल्यः । यो वदति यश्च शृगोति, स अनेक्सहस्रेषु कश्चिदेव भवति । अतः दुर्योधः आत्मा इत्यभिप्राय.। देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत । तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥२-३०॥ देही शरीरी नित्यं सर्वदा सर्वावस्थामु अवध्यः निरवयवत्वान्नित्यत्वाच्च तत्र अवध्योऽयं देहे शरीरे सर्वस्य सर्वगतत्वात् स्थावरादिपु स्थितोऽपि । मर्वस्य प्राणि- जातस्य देहे वध्यमानेऽपि अयं देही न वध्यः यस्मात् तस्मात् भीमादीनि सर्वाणि भूतानि उद्दिश्य न त्वं शोचितुम् अर्हसि । स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि । धाद्धि युद्धाच्छेयोऽन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते ॥२-३१।। खधर्मम् अपि स्वो धर्मः क्षत्रियस्य धर्मः युद्धं तमपि अवश्य त्वं न विकम्पितुं प्रचलितुम् अर्हसि । धर्मात् क्षनियस्य साभाविकात् धर्मात् आत्मस्त्रा- भाव्यादित्यभिप्रायः। तच युद्धं पृथिवीजयद्वारेण धर्मार्थ प्रजारक्षगार्थ चेति परमं धर्म्यम् । धर्मात् अनपेतं धर्म्यम् । तम्मान् धात् युद्धात् श्रेय अन्यत् क्षत्रियम्य न विद्यते हि यस्मात् । चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् । सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥२-३२॥ यहच्छया च-अप्रार्थितम् उपपन्नम् आगनं स्वर्गद्वारम् आरतम् उद्घाटितं ये एतत् ईदृशं युथ लभन्ते क्षात्रेयाः हे पार्य किं न सुखिनः ते ? यदृच्छया श्रीमद्भगवद्गीतोपदेशः सुखदुःसे समे तुल्ये कृन्वा, रागझेपी ( अपि) अहत्वा इत्येतत् । तथा लाभालाभौ जयाजयौ च समौ कृत्वा ततो युद्धाय युज्यख घटख । न एवं युद्धं फुर्वन् पापम् अवाप्स्यसि । (इति) एप उपदेश' प्रासनिक कर्मयोगः कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सगोऽस्त्वकर्मणि ॥२-४७।। कर्मणि एवं अधिकारः, न ज्ञाननिष्ठाया ते तव । तत्र च कर्म कुर्वत. मा फलेषु अधिकार. अस्तु कर्मफलनृष्णा मा भूत् कदाचन कस्याचिदपि अवस्थायाम् इत्यर्थः । यदा कर्मफले तृष्णा ते स्यात् तदा कर्मफलप्राप्तेः हेतुः स्याः, एवं मा कर्म- फलहेतुः भूः। यदा हि कर्मफतृष्णाप्रयुक्तः कर्मणि प्रवर्तते तदा कर्मफलम्यव जन्मनः हेतुः भवेत् । यदि कर्मफलं न इध्यते, किं कर्मणा दुःरारूपेण ? इति मा ते तव सः अस्तु अकर्मणि अकरणे प्रीतिः मा भूत् । न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मरत् । कार्यते घबराः कर्म सर्वः प्रतिजैर्गुणैः ॥ ३-५॥ न हि यस्मात् क्षगमपि वालं जातु कदाचित् कधित् तिष्ठति अकर्मकृत् सन् । कस्मात् ! कार्यते प्रवर्त्यते हि यस्मात् अवश एव अवतन्त्र एस कर्म सर्वः प्राणी प्रकृतिजैः प्रतितो जातैः सत्त्वरजस्तमोभिः गुगैः। अज्ञ इति वाक्यशेषः । यतः वक्ष्यति 'गुणैयों न विचात्यते' इति । सांख्यानां पृथर करणात् अज्ञानामेन हि कर्मयोगः न ज्ञानिनाम् । ज्ञानिनां तु गुणैरचाल्यमानानां स्वतःचलनाभावत् कर्मयोगो न उपपरते। नियतं फुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो यकर्मणः । शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ॥३-८॥ नियनं नित्यं (शास्त्रोपदिष्ट) यो यस्मिन् कर्मणि अधिकृतः फ्लाय च अध्रुत तत् नियत कर्म, तत् फुरु त्वं हे अर्जुन, यतः कर्मज्यायः-अधिक्तरं फलतः, किं परमार आर्मण:-अकरणात् भगारम्भार । वयम् ? शरिफामा शरिस्थितिः अपि चते तव न प्रसिध्ये-प्रसिद्धि न गच्छेत् आर्मणः अपरणात् । अतः दृपः फर्माधर्मगोः विशेषः लोके। कर्मय हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः। लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन् कर्तुमर्हसि ॥३-२०॥

१८ संस्कन-काव्य लहरी जनः। वह धक विमः सिद्धि माचं गन्दन अपना मनः। नामः-उनघालानुदयः । पदि ने फारसम्पन्दनाः, दनुः सहाय परमर्मत सम्झ अन्यत्र क मदि अरियना इत्यर्थः । बन अमानवदर्शनः उमददः तदा कर्मा चयनम्टेन कर पाय मान्यता दि बाकाका अय कन्यो रगी (इनानिनि) अमनदः व कर्तव्यं कर्म कृतं तदा नकर अन्दन कवं मन्दमन्दता टार्थेन दान । नयति प्रारम्बम्मावत: लं टाइम्सी गाय उन्नावृदिन्दिर महः, देवति प्रयाउन संसद कर्टन अति । यद्यदावरति अंटलत्तवेतरी यसमा कुमते टोकलदनुवर्तते ।।३-२० यछन् आने गन प्रेटः प्रदानः दटेड कने बाद ददनुमः । १९ अंक प्रमः उस्तै ट िदैदिकं वात अनुवटले नदेव प्रमात पयः । योगसाधनविधिः उद्धरदारमानान्मान नात्मानमवसादयेत्। आम्मैत्र धानना वन्धुरामैत्र रिपुरान्मनः ॥६-५॥ टन्दरदरार निमाम् आनानम् अन्नना दतः टर-उर्च होत उद्धरन कमाइदम् आदर दयः। न मानम् मदद न अब नन् आम हि यन्न बामना दः। नहि अन्यः कश्चित् वः सरसन्ये नाति र बचतवन मे प्रति प्रधान । स्नेहादिपवन चतनवादा तन्मात् अनन् अबसरन् । अन्नव दामनो कति । अत्र तिः शत्रुः । यः अन्यः आकर दादः शयः मी आमयुरः पुत्र इति युन्ने अबसारमनु 'अन्नर रिस्मनः' इति। अधुरामाऽऽत्मनस्तन्य यनान्मवान्मना जितः। अनान्मननु शत्रुन्ये यनान्मर शत्रुथन् । ६६ । बन्छुः आमा बन्नः हर दम्य अत्मनः म आन्ना बन्नु न अन्ना अन्नव नि:, आमा अवरनकदी देन हत, रिन्द्रियः इत्ययः । अमनः तु-अनिमनः तु गवे शत्रुन ददन अब गाद. या अनन्मा मः अमनः अमरी, दया आमा अन्ननः अरे दस्ते न्यर्थः ।

श्रीमद्भगवदीतोपदेशः , योगी युद्धीन मदनमात्मानं रहसि स्थितः। पकाकी यतचिनात्मा निगरपरिग्रहः ॥१०॥ योगी घ्यावी, युगीन स्माद यान , मननं मर्वदा भान्मानम् अन्नारगं रहीम पन्न गिरिगृहादी चितः मन् पसी अमहायः 'म्हामि स्थितः एकाकी च' टनि विशेषगात मन्याम कृत्वा इत्ययः, यतचिनात्मा, विनम् अन्तःकरणम् आन्मा देवथ गंगनी यम्य मः याचनान्मा, निगशी, वीनतृष्णः, अपरिग्रहः परिग्रहराहिनश्चयर्थः । मेन्यामित्व पि न्यनगपांग्ग्रहः मन युटीन टन्यर्थः । शुची दश प्रतिष्ठाय बिग्मामनमान्मनः । नान्युच्दिनं नातिनीचं चलाजिनकुशोत्तरम् ॥६-१३ शुची शुद्ध मिनितंब भावत, महारती वा, देग म्याने प्रतिष्टाप्य बिग्म अचलम आत्मनः आमनं नान्युदिन नानीव निटूनं न अपि, अतिनीचं दब चलानिन- योत्तर चलं अजिनं कुमाथ उतरे यन्मिन् श्रामने नत् आमनं चलाजिनोत्तरम्। पाटनमात् विपरीतः अत्र क्रमः चलानाम् । नत्रका मनः कन्या यनचित्तन्द्रियक्रियः। उपविश्यामन युन्ज्यायोगमान्मविशुद्धये ॥४-१२॥ तर तम्मिन् आमने उपविश्य योगं युग्यात् , कथं ? मर्वविश्यभ्यः उपमहत्य एमयं मनः कृत्वा मचिन्द्रियमियःनि च दन्द्रियाणि च चिन्द्रियाणि तपां किया मंगता यस्य म यतचिन्द्रियक्रियः । म किमयं योग युज्या टल्याह-आत्मविशुद्धय अन्नावरणस्य विशुद्धयर्थम् इन्यदर । ममं कायशिरोग्राव धारयन्नचलं स्थिरः। मंप्रेक्ष्य नासिकाग्रं म्यं दिशश्चानवलोकयन् ॥३-१३॥ मर्म कायनिंगीर्वकारय निरव प्रीवा कायशिगंगावं नन् गर्न धाग्यन, अचः च । मर्म धाग्यतः चटनं मम्मति; अतः विशिष्ट अवलम् नि । थिरः धिगं भूदा इत्यर्थः। मं नामिराग्रं मप्रश्य मन्या प्रेक्षणं दर्गनं कृत्वा दर इतिः, वगन्दी लुप्तः द्रष्टव्यः । नहि मनामिकाप्रतिगम् अत्र विधिनिम्तन् । कि. नहिं ! चनुरोः दृष्टिमंनिपातः । टिगन अनवलोयन दिशां च अवलोटनं अन्नग न. इत्यनन् । प्रशान्तामा विगतीब्रह्मचारियत स्थितः। मनः संयम्य मशिनो युनः आसीन मन्परः ॥३-१४ vo संस्कृत-काव्य-लहरी प्रशान्तात्मा-प्रकर्येण शान्तः आत्मा अन्ताररणं यस्य सोऽयं प्रशान्तामा, विगतभी.-.-विगनभय , ब्रह्मचारिश्ते स्थितः ब्रह्मचारिणो व्रतं ब्रह्मचारिवतं ब्रह्मचर्य गुम्शुश्रूषाभिक्षान्नभुल्यादि तम्मिन् स्थितः, तदनुष्ठाता भवेत् इत्यर्थः । किश-मनः संयभ्य मनसः वृत्ती. उरगंहत्य इत्येतत् , मञ्चित्तः मयि परमेश्वरे चित्तं यस्य सोऽयं मचिनो युक्तः ममाहितः सन् आनीत अविशत् । मपरः--अहं परो यस्य सोऽयं मत्परो भवति । युवनेचं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः। शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥६-१५॥ युजन् ---समाधानं कुर्वन् , एवं यथोक्तन विधानेन सदा भात्मानं मर्वदा योगी नियनमानस:-नियत सयत मानसं मनो यस्य सोऽयं नियतमानसः-शान्ति अपरनि, निर्वागारमा-निर्वाण मोक्ष तत् परमा निष्ठा यस्याः शान्तः सा निर्वाण- परमा ता निर्वाणपरमो मत्संस्था मदर्धानाम् अधिगच्छति प्रमोति । नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमननतः । न चातिस्वमालस्य जानतो नैव चार्जुन ॥६-१६॥ न अन्यश्चन:-आत्मसंमितम् अन्नपरिमाणम् अतीत्यानत अत्यनतः न सोग. अन्ति । न च एरान्तम् अननत योगः अस्ति। न च अतिम्वतशीलस्य योगों भवति । नव च अतिमानं जाग्रतो योगो भवति च अर्जुन । युक्ताहारविहारस्य युक्तचेपश्य युक्तस्वप्नायबोधस्य योगो भयति दुःखहा ॥६-१७॥ युक्ताहारविहारस्य-आहियते इति आहारः अन्नं, विहरणं विहारः पादनमः, ती युक्ती नियनपरिमाणी यस्य स युक्ताहारविहारः तस्य, तथा युक्तचेटस्य-युक्ता नियना चेष्टा यस्य कर्मसु तस्य, तथा युक्त खनादत्रोधस्य-युक्ती सनश्च अवबोधश्च तो नियतकाली यस्य तस्य, युक्ताहारविहारस्य युक्तचेयस्य वर्मा युचखनावरोधस्य योगिनो योगो भवनि दुःखहा-दुःखानि सर्वाणि हन्तीनि दु सहा सर्वमंमारद रा. क्षयत् योगः भवति इत्यर्थः । यदा चिनियतं वित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥६-१८।। बदा विनिम्नै विशेषग नियनं संयनम् एकाग्रताम् आपन्नं चित्तं हित्वा वाद्याथ- कर्मसु ।

श्रीमद्भगवद्गीतोपदेशः चिन्ताम् आत्मन्येव केवले अवतिष्ठते, सात्मनि स्थिति लभते इत्यर्थ । निःस्पृह सर्वमामेभ्यः-निर्गता दृष्याविषयेभ्यः स्पृहा तृष्णा यस्य योगिन मयुक्त समाहितः इन्युच्यते तदा तस्मिन् काले। यथा दीपो नियातस्थो नेते सोपमा स्मृता। योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥६-१९॥ यथा दीपः प्रदीप निवातस्थः निवांत वातवजिते स्थाने स्थित न इगते न चलति, सा उपमा उपमीयते अनया इत्युपमा योगज्ञः चित्तप्रचारदर्शिभि स्मृता चिन्तितः योगिनो यतचित्तस्य संयतान्त करणस्य युजतो योगम् अनुतिष्ठतः आत्मनः समाधिम् अनुतिष्ठतः इत्यर्थ । संकल्पप्रभवान् कामान् त्यक्त्वा सर्वानशेषतः। मनसैवेन्द्रियग्राम विनियम्य समन्ततः॥६-२४॥ संकल्पप्रभवान् संकल्प प्रभव. ये कामाना ते संकल्पप्रभवा. कामा तान् त्यक्त्वा परित्यज्य सर्वान् अशेषतः निर्लेपेन । किं च मनसैव विवेक्युक्तेन इन्द्रिय- ग्रामम् इन्द्रियसमुदाय विनियम्य नियमनं कृत्वा समन्ततः ममन्तात् । शनैः शनैरुपरमेद् बुद्धया धृतिगृहीतया। आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥६-२५॥ शनैः शनैः न सहसा उपरमेत् उपरति कुर्यात् , क्या-युद्धया किं विशिष्ट- या ?-भृतिगृहीतया धृन्या धैर्यण गृहीतया धैर्यग युक्तया इत्यर्थः । आत्मसंस्थम् आत्मनि संस्थितं 'आत्मैव सर्व न ततः अन्यत् विचित् अस्ति' इत्येवं आत्मसंस्थ. मनः कृत्वा न विचिदपि चिन्तयेत् । एष योगस्य परमः विधिः । यतो यतो निश्चरति मनश्चंचलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥६-२६॥ यतो यतः यम्माद्यम्मात् निमित्तान् शब्दादेः निश्चरति निर्गठाते स्वाभाविक- दोषात् मनः चंचलम् अत्यर्थ चलम् , अत एव अस्थिरं, ततस्ततः तस्मात्तम्मात् शब्दादेः निमित्तात् नियम्य तत्तन्निमित्तं याथात्म्यनिरपणेन आभामीकृत्य वैराग्यभाव- नया र एतत् मनः आत्मन्येव वशं नयेत् आत्मायनाम् आरादयेत् एवं योगाभ्यास- बलात् योगिनः आत्मन्येव प्रशाम्यति मनः । युसनेवं सदाऽऽन्मान योगी विगतकल्मपः। . सुसेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमनुते ॥६-२८॥

35 मंस्कृत-कान्य-लहरी युवन् पं क्योतन मंग योगी योगान्तरायवर्जित महा सर्वदा आन्मानं विानामा विगतपार मुखेन अनावामन प्रागा परंण संस्सी यस्य तत् प्रम- सम्पम् अन्नमदीव्य वतंत इति अन्यन्नम् उन्ष्टं निरतिगयं मुखम् अानुन व्यानोति। आपापम्यन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । मुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥४-३२॥ आन्मापायन आन्मा स्वयमेव उपमीयत अनया इति उपमा तम्या उपमाया भाव औपम्बम् नन आन्मौपम्येन सर्वत्र मर्वभूतेषु मर्म नुयं पश्यति य अर्जुन, म च किं ममं पदयति दनि । उच्यते-यथा मम मुखम् इष्टं नशा मग्राणिनां मुग्वम् अनुकूलम् । वादा थार्थे । यदि वा यञ्च दुःख मम प्रनिकूटम् अनिष्टं यथा, तथा गंवप्राणिना दुयम् अनिष्ट प्रनिलम् इत्येवं आन्माषम्येन मुख.म्वे अनुकूल प्रतिकूल नुसतया सर्व नधु सनं पश्यति, न कस्यचिन् प्रतिकूठमाचरनि, महिमा इत्यर्थः । य एवम् अमिकः सम्यग्दर्शननियः म योगी परमः उष्टः मतः अभिवतः मंत्र- योगिना माये। अर्जुन उवाच- योऽयं योगचया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्या स्थिति स्थिराम् ॥६-३२।। यः अयं योगा दया प्रोक्ता माम्येन समन्वन है मधुमूहन एतम्य योगस्य अहूं न पश्यामि नोपलभे चबलन्दा मनमः-सिम-स्थिरान् अचलां स्थितिन् । चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलयद् दृढम् । नस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिख मुटुकरम् ॥६-३४॥ कृध्या इति कृपतेः विलेखनाथस्य म्पन् । भननपापादिदोषाकर्षगान कृष्ण: तस्य मम्युद्धिः हे कृष्ण, हि यन्मात् मनः चंच न केवलम् अन्ययं चंच, प्रमाथि व प्रमथन गोलं प्रमनाति शरीरम् रन्द्रियाधि च विचित् मन् परवशीकरोति । रिद बलवन् प्रवलं, न केनचिन् नियन्तुं शकतम् । दुनिवारत्वान् नि हुई नग्नुनामदन अच्छगम् । तस्य एवंभूतम्य मनम् अहं निग्रहं निराध मन्ये वायोरिख स्था वाया: दुष्करी निगेषः नतोऽपि मननः दुष्कर मन्ये दन्यभिप्राय । धभगवानुवाच- असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चदम् । अभ्यासेन तु कौन्तय यंराग्येण च गृह्यते ॥६-३५॥

असंशयं नास्ति संशयो हे महाबाहो मनो दुनिग्रहं चम्म् इत्यत्र । किन्तु- अभ्यामेन तु, अभ्यागो नाम चित्तभूमौ स्याचिन् समानप्रत्ययावृत्तिः चित्तस्य । वैराग्येण वैराग्यं नाम दृपादृष्टभोगेषु दोषदर्शनाभ्यासात् वैतृष्ण्यम् । तेन च वैराग्येण गृह्यने विक्षेपरूपः प्रचारः चित्तस्य । एवं तत् मन. गृह्यते निगृह्यते निह यते इत्यर्थः । असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः । वश्यात्मना तु यतता शक्योऽयाप्तुमुपायतः ॥६-३६|| अभ्यामवैराग्याभ्याम् असंयतम् आन्मा अन्त करणं यस्य सः अमंयतामा नेन असंयतात्मना योगो दुष्प्रापः दुखेन प्राप्यते इति मे मति । यस्तु पुन वयात्मा अभ्यासवराग्याभ्या पश्यन्वम् आपादितः आत्मा मनः यस्य सः तेन वश्यात्मना तु यनता भूयोऽपि प्रयत्नं कुरता शक्यः अवाप्तुं योगः आयतः यथोक्तान उपायान् । भक्तियोगः श्रीभगवानुवाच- ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥१२-६॥ ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि ईश्वरे संन्यस्य मत्पराः अहं परः येषा ते मत्पराः मन्तः अनन्येनैव अविद्यमानम् अन्यत् आलम्पनं विश्वरूपं देवम् आत्मानं मुक्त्वा यस्य सः अनन्यः तेन - अनन्येनेव केन ? योगेन समाधिना मां ध्यायन्तः चिन्तयन्त. टपामते । तेपामह समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् । भवामि न चिरात् पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ।।१२-७॥ तेषां मदुपागनेरपराणाम् अई ईश्वरः ममुदर्ता फुत: इत्याह मृत्युसंसार- मागरात् मृत्युयुक्तः समारः मृत्युसंगारः, म एव सागर इव सागरः, दुस्तरत्वात् , तम्मान् मृत्युसमारमागरात् अहं तेषां ममुर्ता भवामि न चिरात् मयि आवेशित गमाहितं चेतः येगा ते मयावेशितचनमः तेषाम् । मय्येव मन आधत्स्य मयि बुद्धि निवेशय । निवसिप्यसि मय्येव अन ऊर्य न संशयः॥१२-८॥ माय एवं विश्वम्ये ईश्वरे मनः संल्लिविकल्यात्मकं समाधास्त्र स्थापय । मथि एव अन्यवमायं कुर्वन्ती युद्धिं च आधरम्ब निवेशय । ततः ते किं स्यात् ? इतिशृणु- संस्कन-काव्य-लहरी निमियां-नियम निश्चंदन महामना मनि वाम रिममि एव, अदाग- पन्दन मंगाया गया अर न कर्नन्य 1 अथ वित्तं समाधानुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् । अभ्यामग्रामन तठो मामिच्छाप्तुं धनबय या आप का भोलार दशा मयि बिर्न गमाघार्नु सापयतुं दिगम् अवर न नसरि चंद, न पवा अन्य मांगन, विनय एकस्मिन् आलम्बन मांग मम हत्य पुन: पुन स्थापनम् अन्य मः, नवयं योगः ममापान रचननंन अन्याय बैंगन मा विश्वयम् टच्च प्रार्ययम्ब आर्नु है धनधय । अभ्यामऽप्यममर्योऽमि मत्कमपरमा मत्रा मदधमपि कर्माणि कुर्वन् मिद्धिमयान्यसि ॥१२-१०॥ अभ्याय अपि असमर्थ. भूमि अयान अपि, नदि मन्कपरमः भा, मध मक, दामः मर्मपामा मतप्रधान न्ययः । अन्यापन विना मदत कनांनि केवलं कुर्वन् निधि मत्वादियोगानापिटारंग अवयनि । यदृष्ट्याहोमि कर्नु मद्योगमाश्रितः। मकर्मफलन्यागं ततः यतान्मवान् ॥१...॥ नय पुन्दः परि यत् उई मकनारमन्त्रं देत कर्नु अगर अनि मयोग अतः मवि रियमानि मानिनन्यच दम देवा अनुवान मु मदोगः ते आधिन बना कर मां मसरन्या मनः अनन्तरं यत्र यामक यन-चिन द इयर्थः । श्रेया हि माननन्यामामानाध्याने विशिष्यत। ध्यानाकर्मफन्टन्यागन्यागाचान्तिरनन्तरम् ॥ यदि मान्यता इनकमात?-अ) विवेवमा अभागद। दमदार हाना बना ध्यान विशिष्यते । नन्वतो ध्यानाद अपि कर्मया 'विवि' इति अनुरसंत । एवं कारयामा गिरावतः (13) ma उमः म्हनुन्य मंगरम्य अनन्ताम् एव मात्र कान्तरम् अंपवर। बया मर्वभूतानां मंत्रः करण एव च। निर्ममा निरहदारः ममदुनमुखः क्षमी १२-१३॥ श्रोटा मन्दाना भूदान्त ने डेटा अमनः दुमदुमान विविद डिस्नान भूतानि अनवन परक मंत्र-निवनः ममत 1 श्रीमद्भगवद्गीतोपदेशः . तया वनो इति मैत्रः, करुण एव च, करुगा कृपा दुःखिनेषु दया, तद्वान् करुगः सर्वभूताभयप्रदः संन्यानी इत्यर्थः। निर्ममः-मम प्रत्ययवर्जितः निरहवार निर्गताहप्रत्यय । समदुःखमुख:-ममे दु:खमुखे द्वेषरागयोः प्रवर्तके यस्य मः मनदुःखमुराः । क्षमा क्षमावान् , आकुष्ट. अभिहतो वा अविक्रिय. एव आस्ते । सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥१२-१४॥ मन्तुष्टः सततं नित्य, देहस्थितिकारणस्य लाभे अलाभ च उत्पन्नालंप्रत्ययः । तथा गुणवद्धाभे विपर्यय च सन्तुष्टः। सततं योगी समाहितचित्त । यतात्मा संयत- खभावः । दृढनिश्चयः, दृढः स्थिरः निश्चयः अध्यवसायः यस्य अध्यात्मतत्त्वविषये म दृढनिश्चयः, मय्यर्पितमनोबुद्धि मंकल्पविकल्पात्मकं मन., अयवसायलक्षणा बुद्धि ते मय्येव अपिते स्थापित यस्य संन्यामिन. म मय्याग्निमनोबुद्धि । य ईदृश मइक्त. स मे प्रियः । यस्मानोद्विजते लोको लोकानोद्विजते च यः। हमर्पभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥१२-१५॥ यस्मात् संन्यासिनः न उद्विज्ञते न उद्वेगं गच्छति, न संतप्यते, न संतुभ्यनि लोकः, तथा लोकान् न उद्विजते च य हर्षामर्षभयोगः, हर्षध अमर्षश्च भयं च उद्वेगश्च ते हर्षामर्षभयोगैः मुक्तः सः प्रियलाभे अन्त:करणम्य उत्कर्ष. रोमान- नाश्रुपानादिलिझः, अमर्पः अमहिष्णुता, भयं श्राम, उद्वेगः उद्विमता, तैः मुक्त. या मच मे प्रियः। अनपेक्षः शुचिर्दक्षः उदासीनो गतव्यथः । सर्यारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥१२-१६॥ अनपेक्षः-देईन्द्रियविषयसम्बन्धादिषु अपेक्षा यस्य नाम्नि म अनपेक्षः निःस्पृहः । शुचिः, वाद्येन आभ्यन्तरेण च शौचेन मम्पन्नः । दक्षः-प्रन्युत्पन्नेषु कार्येषु मयः यथावत् प्रतिपर्नु ममर्थः, उदामीनः न कस्यचित् मित्रादेः पदं भजने य. म. उदासीन:-पतिः । गतव्यथ:-गतभय , मरिम्भपरित्यागी-आरभ्यन्ने इति आरम्भा इहामुत्रफलभोगार्थानि कामहेतृनि कर्माणि मरम्भा, नान् परित्यक्तुं शीलं अन्येनि सर्वारम्भपरित्यागी यःमदक्तः स मे प्रियः। यो न हप्यति न टेष्टि न शोचति न काशति । शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् यः स मे प्रियः ।।१२-१७॥ 4 .

. अपनयनं शौचम् । स्थैर्य स्थिरभाषः, मोक्षमार्ग एवं कृतव्यवमायित्वम् । आत्मविनि- प्रहः आत्मनः अपकारकतया आत्मशब्दवाच्यस कार्यकरणमंघातस्स विनिग्रहः म्वभावन सर्वतः प्रवृत्तस्य सन्मार्गे एव निरोधः आत्मविनिग्रहः । इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार पव च। जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोपानुदर्शनम् ॥१३-८॥ इन्द्रियार्थेषु शब्दादिषु दृष्टादृष्टेषु विषययोगेषु विरागभावो वैराग्यम् , अनहद्वार.- अहवाराभावः एव च जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनं-जन्म च मृत्युश्च जरा च व्याधयश्च दुःसानि च तेषु जन्मादिदुःखान्तेषु प्रत्येकं दोषानुदर्शनम् । जन्मनि गर्भवासयोनिद्वारनिःमरण दोषः, तस्य अनुदर्शनम् आलोचनम् । तथा मृन्यौ दोषानु- दर्शनम् । तथा जरायां प्रजाशक्तितेजोनिरोधदोषानुदर्शनं, परिभूतना चेति । तथा व्याधिषु शिरोरोगादिषु दोषानुदर्शनम् । तथा दुःखेषु अध्यात्माधिभूताधिदेवनिमित्तेषु । अथवा-दुःखान्येव दोषः दुःखदोषः तस्य जन्मादिषु पूर्ववत् अनुदर्शन-दुःखं जन्म दु.लं मृत्युः, दुःखं जरा, दुःखं व्याधयः । दु खनिमित्तत्वात् जन्मादयः दुःखानि, न पुनः खरूपेणैव दुःखमिति । एवं जन्मादिषु दुःखदोषानुदर्शनात् देहेन्द्रियादि- विषयमोगेषु वैराग्यम् उपजायते। ततः प्रत्यगात्मनि प्रवृत्तिः करणानाम् आन्मदर्शनाय । एवं ज्ञानहेतुत्वात् ज्ञानम् उच्यते दुःखदोषानुदर्शनम् ॥ असक्तिरनभिवतः पुत्रदारगृहादिपु। नित्यं समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥१३-९॥ असरितः सक्तिः सहनिमित्तेषु विषयेषु प्रोतिमात्रं, तदभावः असात्तिः । अनभिप्याः अभिष्वज्ञाभावः । अभिष्वको नाम आसक्तिविशेष एव अनन्यारमभावना- लक्षणः, यथा अन्यस्मिन् मुखिनि दुःखिनि वा 'अहमेव सुखी, अहमेव दुःखी च,' जीवति मृते वा 'अहमेव जीवामि मरिष्यामि च' इति । क्व इति ? आह–पुत्रदार- गृहादिषु पुत्रेषु दारेषु गृहेषु-'आदिग्रहणान्' अन्येष्वपि अन्यन्नेप्टेषु दामवर्गादिषु । नथ उभयं ज्ञानार्थत्वात् ज्ञानम् उच्यते । नित्यं च समचित्तत्वं तुल्यचित्तता व ! इष्टानिष्टोपपत्तिषु इयानाम् अनिष्टानां च उपपत्तयः संप्राप्तयः नामु इष्टानिष्टोपपत्तिषु। तम एतन् नित्यं ममचित्तत्वं ज्ञानम् । मयि चाजन्ययोगेश भक्तिरन्यभिचारिणी। विविक्तदेशसेविन्यमरतिर्जनससंदि ॥१३-१०॥

मयि च ईश्वरे अनन्ययोगेन-अथर समाधिना 'न अन्यो भगवतो वासु- देवात् पर. अस्ति, अतः म एव न गतिः' इत्येवं निश्चिता अव्यभिचारिणी बुद्धिः अनन्ययोग , तेन भजनं भक्तिः न व्यभिचरणशीला अव्यभिचारिणी । सा च ज्ञानम् विवित्त देशमवित्वम् , विविक्त. स्वभावत संस्कारेण वा अशुत्र्यादिभिः सर्पचोरव्यात. भयादिभिश्च रहितः, अरण्यनीपुरिनदेवगृहादिभिर्विवित्तो देशः त मेवितुं शीलम् अन्य इति विपितदेशसेवी, तस्य भाव विविच्चदेशमवित्वम् । विविक्ते हि देशे चित्तं प्रसीदति यन , तत आत्मादिभावनाविविक्त संजायते । अत विविक्तदेशमेविन्वं ज्ञानम् उच्यते । अरति अरमणं जनसंमदि, जनानां प्राकृताना संस्वारशून्यानाम् अविनीताना संसन् समवाय जनसमन्, न संस्कारवत् विनीतानां संसन् , तस्याः ज्ञानोपकारित्वान् । अत. प्राकृनजनर्ममदि अरति. ज्ञानार्थत्वात् ज्ञानम् । अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् । पतज्दानमिति प्रोक्तमशान यदतोऽन्यथा ॥१३-११॥ अध्यात्मज्ञाननिन्यन्व-आत्मादिविषय ज्ञान अध्यात्मज्ञान, तस्मिन् , निन्य. भाव. नियन्त्रम् । अमानित्वादीनां (७) ज्ञानसाधनाना भावनापरिपारनिमित्तं तत्त्वं. जान, तस्य अर्थः मोक्ष समारोपरमः, तस्य आलोचनं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् , तत्वज्ञाफला- लोचन हि तत्साधनानुष्टाने प्रवृत्तिः स्यादिति । एतत् अमानिन्वादितत्त्वज्ञानार्थदर्शनान्तम् उक्तं ज्ञानम् इति प्रोक्तं, ज्ञानार्थत्वात् । अज्ञानं यत् अतः- एतम्मान् यथोक्तान अन्यथा विपर्ययेण-मानित्वं, दम्भित्वं, हिंसा, अक्षान्तिः, अनार्जवम् , इत्यादि अज्ञानं विनेयं परिहरणाय, संगारप्रानिकारणत्वात् इनि । गुणनय-विभागयोगः श्रीभगवानुवाच- परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् । यज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥१४-१॥ परं-ज्ञानम्' इति व्यवहितेन सम्बन्धः-भूयः पुनः पूर्वेषु सर्वेषु अध्यायेगु अमकृत् उक्तमपि, प्रवक्ष्यामि । तच परं, परवस्तुविषयत्वात् । कि तन् ?-ज्ञानं मवषां जानानाम् उनमम् , उत्तमालदान । 'शानाना' इति न अमानियादीनां, किं तहि । यज्ञादिनयवस्तुविषयाणा इति। तानिन मोक्षाय, इदं तु मोक्षाय इति परोत्तमशन्दाभ्या स्तौति श्रोतृवृद्धिमन्युपादनाथम् । यत् ज्ञात्वा यत्नानं ज्ञात्वा प्राप्य मुनयः संन्यासिनः मननशीलाः मवे पर मिद्धि मोक्षायाम् इतः अम्मान देहवन्धनार अवगनाः प्राप्ताः ।

श्रीमद्भगवट्टीतोपदेशः सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः । निवघ्नन्ति महायाही देहे देहिनमव्ययम् ॥१४-५॥ मत्त्वं रजः तमः इति एवंनामानः गुणा , ते च प्रकृतिमम्भवा मगवन्माया- सम्भूताः निवनन्ति स हे महाबाहो, महन्तौ समर्थनरौ आजानुप्रलम्बी बाहू यम्म म महाबाहुः हे महाबाहो देहे गरीरे देहिनं देहान्नम् अव्ययम् इति । तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम् । सुखसंगेन बध्नाति ज्ञानसंगेन चानघ ।।१४-६॥ निर्मलदान् स्फटिकमणिति प्रकाशकं, अनामयं-निरुपद्रवं, सन्वं तत् बनाति । क्यं ?-मुग्धमझेन 'मुन्नी अहम्' इति विषयभूतस्य विषयिणि आन्मनि संश्लेषापादनं भूपेव मुखे सननन् । सैषा अविद्या । नहि विषयधर्मः विषयिणः भवति । तथा ज्ञान- मंगन च ज्ञानमिति मुग्वसाहचर्यान् क्षेत्रम्यैव विषयस्य अन्तःकरणस्य धर्मः, न आत्मनः,आन्मधर्मवन्चे महानुपपत्ते बन्धानुपपत्तेश्च। मुग्वे इत्र जानादौ मङ्गः मन्तव्यः । अनघ अध्ययन रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासंगसमुद्भवम् । तनिषभ्नाति कौन्तेय कर्मसंगेन देहिनम् ।।१४-७॥ रजः रागात्मक-रजनात् रागः गैरिकादिवदागात्म-विद्धि जानीहि । नृणाऽऽमाममुद्भवम्-नृणा-अप्राप्ताभिलाषः, आमङ्गः-प्राप्ते विषये मनसः प्रीति- लक्षणः मषः, तृणाऽऽमायोः समुद्भवं तृष्णामङ्गममुगवम् । तत् रजः निब नाति कौन्तेय ! कर्ममद्रेन, दृष्टादृष्टार्थेषु कर्मसु मञ्जनं तत्परता कममङ्गः, तेन निबध्नाति रजः दिनम् । तमस्त्वनाननं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् । प्रमादालम्यनिद्राभिस्तनिवघ्नाति ॥१४-८॥ तमः तृतीयः गुणः, अजाननम्-अनानात् जातं अनाननं विद्धि । मोहन- मैदर अविवेककरं सर्वदेहिनां सर्वेषां देहवताम् । प्रमादालन्धनिद्राभि-प्रमादध अालयं च निद्रा व प्रमादालम्पनिद्रा, नाभिः प्रमादालम्पनिद्राभिः तत् तमः निवनानि भारत मत्त्वं मुखे सजयति रजः कर्मणि भारत । शानमावृत्य तु नमः प्रमाद सञ्जयन्युत ॥१८-९।। भारत 1 संस्कृत काव्य-लहरी . मत्वं मुखे सन्जयति संपति, रजः कर्मणि हे भारत ! सप्रयति इति अनु. वर्तते । ज्ञानं सत्त्वकृतं विवेकम् आरत्य आच्छाद्य तु तमःखेन आवरपारमना प्रमादे मनयति उत प्रमादः प्राप्तकर्तव्याकरणम् । रजस्तमश्वामिभूय सत्वं भवति भारत। रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥१५-१०॥ रजः तमश्च उभावपि अभिभूय सत्त्वं भर्वात उद्भवति वर्धते यदा, नदा लन्धात्मक सत्त्वं खकार्यज्ञानमुखादि आरभते हे भारत । तथा रजो गुणः सत्त्वं तमय एव उभावपि अभिभूय वर्धते यदा, तदा कर्म तृष्णादि खार्यम् आरभते । तथा एक तमाख्यो गुणः सत्त्वं रजय उभावपि अभिभूय वर्धते यदा, तदा ज्ञानावरणादि खकार्यम् आभरते। सर्वद्वारेषु देहेऽसिन् प्रकामा उपजायते। झानं यदा तदा विद्याद्विवृद्ध सत्त्वमित्युत ॥१५-११॥ मद्वारेषु-भात्मनः उपलन्धिद्वाराणि धोत्रादीनि सर्वाणि करणानि, क्षेषु सर्वेषु द्वारेषु अन्तःकरणस्य बुदे वृत्तिः प्रमशः देहे अस्मिन् प्रकाशशब्दवाच्यः मर्वद्वारेषु उपजायते, तदेव ज्ञानम् । यदा एवंप्रकाशो ज्ञानाख्यः उपजायते, तश ज्ञानप्रकागेन लिन विद्यान विद्धम् उद्भूतम् सत्यम् इति उत अपि । लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा । रजस्येतानि जायन्ते विवृद्ध भरतर्षभ ॥१५-१२।। लोभः परद्रव्यादित्सा, प्रसि. प्रवननं मामान्यचेष्टा, भारम्भ:-कम्य- कर्मणाम् , अशमः अनुपशमः हर्परागादि प्रतिः, स्पृहा सर्वसामान्यवस्तृविषया तृष्णा- रजसि गुणे विवृद्ध एनानि लिजानि जायन्ते हे भरतर्षभ । मप्रकाशोऽभवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च । तमस्येतानि जायन्ते विवृद्ध कुरुनन्दन ॥१४-१३॥ अप्रकाश:--अविवेकः, अत्यन्तम् अश्वत्तिय प्रवृत्यभावः तत्वार्य, प्रमादो मोह एव च ( तत्कार्य ) अविवेकः भूइना इत्यर्थः । तममि गुणे विवृद्ध एतानि लिङ्गानि जायन्ते हे कुरुनन्दन! कर्मणः सुरतस्याहुः सात्यिकं निर्मलं फलम् । रजसस्तु फलं दुखमशानं तमसः फलम् ॥१५-१६।।

श्रीमद्भगवद्गीतोपदेशः ८१ कर्मणः मुक्तस्य–सात्त्विकस्य इत्यर्थः-आहुः शिष्टाः सात्त्विकमेव निर्मल फलम् इति । रजसत्तु फलं दुःख-राजसस्य कर्मगः इत्यर्थः, कर्माधिकारात्-फलम् अपि दुःसम् एष, कारणानुरूप्यात् राजसमेव । तया अशानं तमसः तामसस्य कर्मणः अधर्मस्य फलं पूर्ववत् । सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोम पव च । प्रमादमोही तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥१४-१७॥ सत्त्वात् लधारमकात् सजायते समुत्पद्यते ज्ञान, रजसो लोभ एव च, प्रमाद- मोही प्रमादध मोहश्च प्रमादमोहौ उभौ तमसो गुणात् भवतः, अज्ञानमेव च भवति। गुणानेतानतीत्य त्रीन् देही देहसमुद्भवान् । जन्ममृत्युजरादुःवैविमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥१४-२०॥ गुणान् एनान् ययोवान् अतीत्य जीवनेव अतिक्रम्य मायोपाधिभूतान् श्रीन् देही देवममुद्भवान् देहोत्पत्तिबीजभूतान् जन्ममृत्युजरादु खैः जन्म च मृन्युश्च जरा च दुःखानि च जन्ममृत्युजरादुःखान तैः जीवमेव विमुफः सन् विद्वान् अमृतम् अश्नुते, एवं मद्भावम् अधिगच्छति इत्यर्थः ।

अथ महाकविश्रीयुताश्वघोपविरचिते वुद्धचरिते
सप्तमः सर्गः
वनविहारापदेशेन भार्गवस्याश्रममुपगतः सिद्धार्थश्छन्दकाय खाशयं निवेद्य
ध्याधरूपधारिणा दिवोक्सा दत्तं वन्य वासः परिधायाश्रमाभिमुस ययाविति आश्रम-
वर्णनं प्रस्तौति कविः।
ततो विराज्याश्रुमुखं रुदन्तं छन्दं वनच्छन्दतया निरास्थः ।
सर्वार्थसिद्धो वपुपाभिभूय तमाश्रमं सिद्ध र प्रपेदे ॥१॥
ततः खाशयकथनानन्तरम् , रुदन्तं. सिद्धार्थस्य राज्यानिःस्पृहत्वं विभाव्य
बिलपन्तम् , अत एवाभ्रमुखमधूणि मुखे यस्य तम् , छन्दं तन्नामकात्ममारथिनं
विमूज्य त्यक्त्वा राजधानी प्रति प्रस्थाप्येति यावत् । पुनस्य छन्द आशयः 'अभि-
प्रायश्छन्द आशयः' इत्यमरः । तस्य भावस्वत्ता तया वनवासाभिप्रायेण । निर्गता
मांसारिकपदार्थेभ्य आस्था आसक्तिर्यस्य स मुक्कसनः । यस्मिजाते राजकुलस्य सर्वेपा-
मर्थानां सिद्धिर्माता स मर्वार्थसिद्धः सिद्धः अणिमादिसिद्धिसम्पन्न इव वपुषा श्रेष्ठया-
कृत्या 'वपुः क्लीवं तनी शस्ताकृतावपि' इति मेदिनी । तं भार्गवस्याश्रमम् अभिभूय
वशीकृत्य प्रपदे प्राप्तवान् । मर्गेऽस्मिन्प्रायेणोपत्रातिम्, वृत्तम् विशेषन्तु तत्र तत्र वक्ष्यते।
स राजसूनुर्पगराजगामी मृगाजिरं तन्मृगवत्प्रविष्टः ।
लक्ष्मीवियुक्तोऽपि शरीरलक्ष्म्या चभूपि सर्वाश्रमिणां जहार ॥२॥
मृगाणा राजा नगराजः सिंहः स इव गच्छनीति मृगराजगामी स राजसूनुः
राजपुत्रः मिद्धार्थः तद् गम्यमानम् मृगाजिर भृगपराशगं 'अजिरं प्रागे वाते' इत्यमरः ।
मगवत्प्रविष्टः मृग इव निर्भयः सन् प्रविष्टवान् । लक्ष्मीवियुक्तोऽपि राजलक्ष्मीर-
हितोऽपि सिद्धार्थः शरीरलमा शारीरिकमौन्दर्येण करणेन सर्वेषामाश्रमिणाम् आश्रम-
वासिनो चर्चाधि नेत्राणि दृष्टिमिति भावः जहार अहरत् चार्थ वा ।
स्थिता हि हस्तस्ययुगास्तथैव कौतूहलाचक्रधराः सदाराः ।
तमिन्द्रकल्पं दगुर्न जग्मुधुर्या इवार्धायनतैः शिरोभिः ॥ ३॥

संस्कृत-काव्य-सहरी इन्वेयु स्थिना युगा हलायमानि योक्मादीनि येषाम् । 'युगो पहला इति मेशिनी । क्रियतेऽनेन कार्यनिति चकम् किमपि पियोम्पयाधनम् । तच परन्तीनि Hal| धारः प्रीमि. रह वदमाना: मदाराः कृषन इति शेर, 'माना जामाय भूम्नि दाराः' इत्यमरः । सोलानौनुनत् । 'कोहलकोई चइत्यमरः । नयेत. सल्यानेषु स्थिना हि पिता ए३ । " हिनावबघारने' इत्यमरः । पूर्वी हा वृपमा इछ 'पूर्वद धुर्मचौरेयी' इत्यमरः । भूधानतः शिरोमिलविना निन्दनम् इन्द्रसरले सिद्धार्थ दरवन्त. जामुन गन्तव्यस्थानानि न गताः । विनाश्च गत्या पहिरिष्महतोः प्राप्ताः समितुष्पपवित्रहस्ताः । तपामधानाः कृतयुद्धयोऽपि ते द्रष्टमीयुनं मटानमीयुः ।।८।। र तथा इनहेतोः भनिदिनयन् आअनादहिनवा मानाः सम्मिलिताः सन्तः समिधः महाय इत्यनानि, 'इन्धन रश्नमेषः सनि नियाम्' इत्यमरः । प्रभागि, पवित्रानि फुयाश्च 'पवित्र तु मध्ये दाने कुं अले' इति हेमः । इदे पा र प्रधान मुख्य कर्न पाम्, ला सन्मादिना वृदियने शानाभ्यायेन रिदमावा भी विधा र त राजवंदपुन युः द ग । मठान सनिवासस्थानानि "मामवादिनिका इत्यमरः । नेयुन गताः । हवाच केका मुमुचुमयूरा हवाम्बुई नीलमिवानमन्तः। शम्पाणि हित्वामिमुसाश्च तस्थमंगायलाझा मृगचारिणश्च ५ च दयानल नीलब सबलमिति भावः । अम्बुर्द जलद दवा विलोक्य इन् । हुराः प्रसन्नाः ददनन कनावा मयूराः नः देशवाति का दानी मपास' इत्यमरः । मुनस्पयन्तः, कूपन्न इत्यर्थः। दया IIक्षा लोललोचना मृगण हरिमाः अयानि वानवृगानि 'सपं बालनून पामः' इत्यमरः, हिला स्यात्रा, भनिनमान्नयः सम्नु स्थिताः । एवं मगा इस चरन्तीति भूगचारिणः अन्ये पशवाजी तव दस्युः । दृष्ट्वा तमिस्वाकुकुलमदीपं ज्वन्तमुघन्तमियांशुमन्तम् । छतेऽपि दोहे जनितममोदाः प्रसस्नुहोमदुहश्च गायः ॥ ६॥ अंशक किरमाः अन्त्यस्येनि अंगमान सूर्यः 'अंगमान् भास्करे को इन मेदिनी दमिव जालम् दीयमानम्, सरले प्रतिवारदीपन इसाईनं विद्यापं हटवा जनिबटनोंदा उत्पन्न तिरका अन्यय प्रसन्नाः होनाय पाय दुग्न इति होगदः गावः यानदः दोहे कृतेशी दोहनकियार्थ मादायामनि प्रमुलुयः प्रस्नुनयः प्रसादाविपदेन दुध मुमुचुः ।

महाकवि अश्वघोषविरचिते युद्धचरिते कञ्चिद्वसूनामयमष्टमः स्यात्स्यादश्विनोरन्यतरदच्युतो वा। उरुरुचैरिति तत्र वाचस्तदर्शनादिरलयजा मुनीनाम् ॥७॥ कञ्चिद् इष्टप्रश्ने 'कचिकामं प्रवेदने' इत्यमरः । कचिन् कदाचिद् अयम् एप राजपुनः, वमना गगशताविशेषमाम् 'आदिप-विश्ववस्वस्नुषितामाखरानिलाः, महाराजिमाध्याश्च स्वाश्च गगदेवता' इत्यमरः अनमो नमुः प्रभापारस्यः स्वाद भवेत् । वा अथवा अश्विनोः अश्विनीकुमारसंज्ञरदेवयो. अन्यतर एकतरः च्युतः पदभटः अत्र पतिनो वा भवेत् तत् तस्य सिद्धार्थस्स दुर्घनाद् यो विलयः आश्चर्य तम्बामाता उत्सना इति पूर्बोिच्य अनीनां वाचनत्र, आभने उचः उचखरेग उधेरः उचारणं गताः । इन्दवजा वृत्तम् । लेखपभस्येव वपुर्दितीय धामेव लोकस्य चराचरस्य । स द्योतयामास हि कृत्वं यदृच्छया सूर्य इवावतीर्णः॥ ८॥ लेखेषु देवेषु ऋयमः श्रेष्ठ इन्दः निशुर्लेसमः शमः' इत्यमरः । तस्य द्वितीय- मारं वपुः शरीरनित्र, चराचरम्य स्थावरजनमानस तोपत्र धानेन तेन इव, 'धान दशक्ती प्रभावे च तेजोमन्दिरगन्नमु' इत्यमरः । यदन्या खेच्या अवतीनः अध आगतः सूर्य इव म राजपुत्रः हि निययेन कृत्स्नमखिलं वन तपोवनं होतयामास प्रकाशितवान् । स तैरामिभिर्ययावदभ्यर्चितचोपनिमन्त्रितश्च । प्रत्यर्चयां धर्मभृतो बभूव वरेण साम्भोऽन्वुधरोपमेन ॥९॥ ततः राइपुत्रदर्शनविलयानन्तरम् । त उ आधभिः आश्रमवामिभि- सपोधनः उपनिनन्दः मनीषनाहनः च तया यथ गद्ययोचितम् अभ्यर्चितः मन्वृतः सिद्धार्थः अम्भता जन महितो योऽन्सुघर: जलयरः तान्न तमहशेन स्वरेग गर्भरया स्लिम्यया च वाया तोधनानां सत्कारं वय धर्मननः धर्माननः सानपोधनान् प्रत्ययविभव प्रतिपूजितवान् । कीर्ण तथा पुण्यस्ता जनेन खगाभिकामेन विमोक्षकामः। तमाश्रमं सोऽनुचचार धीरस्तपांसि चित्राणि निरीक्षमाणः ॥२०॥ विनु नोवः उन्नजरान्नादिभ्य इति मारः कानः स, चित्राणि मद्- मुतानि 'विन्नमोऽनुनमा चिपमा' इत्यमरः । गनि चान्दारगादनि निरक्षनागः सम्पर पश्यन् धीरः धवान् म राजपुत्रः साद अभिमः कामः इच्छा ततः

संस्कृत-काव्य-लहरी
यस्य तेन स्वर्ग गन्नुगमेन पुण्यं करोतीति पुण्यकृत् देन वपः कुर्वता जनेन तपखि-
वग जावावेकरचनामस्येवचनम् । की व्याप्त तनाधनमनुचचार राधमवासिमिः
सहबार । 'अनु होने सहा ' इति विश्वः ।
तपोविकारांश्च निरीक्ष्य सोन्यस्तपोयने तत्र तपोधनानाम् ।
तपस्विनं कंचिदनुव्रजन्तं तत्त्वं विजिज्ञासुरिदं यमापे ॥११॥
तत्र तपोवने दसिनाधने तपोधनानां तपस्विनां तपोविकारान् तपसः परिणामान्
'परिणामो विकारो ३' इत्यमरः । निरीक्ष्य सम्यग् विलोक्य सौम्यः साधुः सिद्धार्थः
तत्त्वं सत्यं परमात्मानं वा 'तत्वं परमात्मनि । वायभेदे खको ' इति हैमः।
विजिज्ञामः विशेषेण ज्ञानुमिच्छः चिम्मपि अनुवजन्तम् अनुगच्छन्तं तपखिन
पभापे उकवान पृष्टबानिति भावः ।
तत्पूर्वमद्याश्रमदर्शन में यस्मादिमं धर्मविधि न जाने ।
तलाद्भवानहति भापितु मे यो निश्चयो यत्प्रति वः प्रवृत्तः ॥१२॥
खर आधनदर्शने में मम अब पूर्व प्रथमवार जातनिति शेषः । यस्साच यतः
घरपाद, इमं धर्मविधि धर्मानुष्ठानं न जाने नहि जान मि । तस्माद, वः युष्मा यः
निश्चयः विश्वासः सिद्धान्तो वास्ति स निश्चयो यत्प्रति यदर्य प्रवृत्तः प्रारब्धः ( सदसर्व)
मदान मे मा भापिटु कथयितुमर्हति योग्योऽधिकारी वर्तते । इन्दवा वृत्तम् ।
ततो द्विजातिः स तपोविहार शायर्षभायार्पविक्रमाय ।
कोण तसे कथांचकार'तरोविरोपांत्तपसः फलं च ॥३॥
ततः प्रप्राणानन्तरं स अनुजन् । हे जाती जन्मनी यस्य स द्विवन्मा !
तथा च मनुः-'मातुरधि-(वि)-जननं द्वितीय नौजिबन्धनात्' इति । तपोविकारः
तर एव विहारः फ्रीडासमरजमिति भावः । यस्य, स ताखी । ऋषभस्स
वृषभस्य “भाभी वृषभो दृषः' इत्यमरः । इस विकरः अतिपराक्रमः झान्तिर्वा
यस्य 'विकमरत्वतिकिता' । 'फ्रान्तौ विक्रमः' इत्यमरः । तस्ने । शक्येषु शाक्य-
पश्येषु ऋषभाय श्रेष्टाय 'स्युरुत्तरपदे व्याघ्रपुंगवर्षभराः। सिंहशालनागादाः
पुसि श्रेष्ठार्यगोचराः' इत्यमरः । सिद्धार्थाय कमेग तपोधिरोपान तपो भेदान तपस.
फलंबु कथयांचकार कथयामास ।
“अप्राम्यम सलिल प्ररूढं पर्णानि तोयं फलमूलमेव ।
यथागमं पृत्तिरिय मुनीनां मितास्तु ते ते तपसां विकलाः ॥१४॥

महाकवि अश्वघोपविरचिते बुद्धचरिते ८७ माने मवं ग्राम्यम् 'प्रामायसनी' इति यत्प्रत्ययः । न प्राम्यम् अग्राम्यं वन्य नौवारश्यामाकादि अन्नम् , सलिले अले प्रदमुत्पन्नं किञ्चिद्भोग्यम् पनि तहलतादि- पनि तरलतादिपत्राणि, 'पत्रं पलाशं छदनं दुलं पर्ण च्दः पुमान्' इत्यमरः । तोयं पानीयम् 'अम्भोर्णस्तोयपानीय' इत्यमरः । फूलमलमेव फलानि मूलानि च एवं एतेषु पर्यायेणेकमेवेति भाव: मुनीनामियं मयोक्का ययागमं शास्त्रानुसारं यथा स्यात्तथा वृत्तिः जीवनोपायोऽस्त्रीति शेषः । तपसां कृच्छ्चान्द्रायणादीनां ते ते विकल्पाः प्रारा मिन्नास्तु मिन्ना एव मन्तीति शेषः । "उन्छेन जीयन्ति खगा इवान्ये तृणानि फेचिन्मृगवञ्चरन्ति । केंचिगुजङ्गः सह घर्तयन्ति वल्मीकभूता बनमारतेन ॥१५॥ अन्ये तापसाः खगाः पक्षिण इव उग्छेन खलादिपतितधान्यस्य कणश आदानेन जीवन्ति "उन्छः कणा आदानम् इत्यमरः । वेचित् मृगवतु मृगा इव सृगानि घास चरन्ति मक्षयन्ति । केचिदपरे वल्मौकभूताः पिपीलकादिनिष्कासित- मृत्युलभूना , भुज: सह सौः सार्धम् वनमारनेन वन्यवायुना वर्तयन्ति जीवन्ति । "अदमप्रयत्नार्जितवृत्तयोऽन्ये फेचित्स्वदन्तापहतान्नभक्षाः । कृत्या परायें थपणं तथान्ये फुर्वन्ति कार्य यदि शेपमस्ति ॥१६॥ अन्ये. तापसा अमनः प्रयनेन उपायमूतेन उपार्जिता सम्पादिता वृत्तिः जीवनोपायः येषां तथाभूताः, वेचित् सदन्तैः यत्तु मुशलादिसाधनैः अपहतं तुभ्यः पुष कृतं हितं पिष्टं वा अभं भवन्तीति तथाविधाः वर्तन्ते इति शेषः । अन्ये फेवन परार्यम् अन्येभ्यः नत्वात्मने धणे पार्क कृत्वा यदि तत्र तस्मिन् पाके शेष. मलि किंचिदवाशिष्यते तदा तेनारशिष्टेन कार्य पूर्वन्ति खभोजनादि कार्य सम्पादयन्तीति भावः । इन्द्रवज्रावृतम् । "चिजलक्लिनजटाकलापा द्विः पावकं.जुद्धति मन्त्रपूर्वम् । मीनः समं फेचिदपोवगाद्य वसन्ति कूर्मोल्लिखितैः शरीरैः॥१७॥ जलेन निन्ना आर्दा जवानां संलिष्टकेशानां क्लापाः समूहा येषां तथाभूताः वैचितारमा मन्त्रपूर्व मन्त्रानुच्चार्येति भावः, दिः द्विवारं प्रातः सायं पावकं जुइति पन्ति इति कलितार्यः। केचिद् अओ जलानि विगाहा अवगाम जले निलीनाः मन्त इति मावः, कुर्मागां कच्छयानां संघोंगोलिसितैः चिह्नितः शरीररुपलहिताः मीनेः मन्स्य मम मद वमन्ति।

८८ संस्कृत-काव्य-लहरी " । "एवंविधैः कालचितस्तपोभिः परैर्दिवं थानत्यपरैर्नृलोकम् । दुःखेन मार्गेण मुखं हापति सूखं हि धर्मस्य वदन्ति मूलम् ॥१८॥ वालचितः दीर्घकालमंचित एवंविधः दशः परैः उत्तमविशेपम्तपोभिः नियमः करणः दि स्वर्ग यान्ति इनि शेप , अपई साधारण: तपोभिः नृलोक नरलोई भृत्युः लोके यान्ति सम्यध्यने । दुम्वन कष्टकरेग मार्गेण विधिना लोकः मुखम् उपति प्राप्नोनि द्वि यन. मुखं धर्मभ्य मुलमस्तीति वदन्ति युद्धिमन्तः । इत्येवमादि द्विपदन्द्रवत्सः श्रुत्वा वचस्तस्य तपोधनस्य । यह तत्वोऽपि न सन्तुतोष शनरिदं चात्मगतं यमापे ॥१९॥ तस्य. उक्तस्य तपोधनस्य इत्येवमादि इत्यादि वचः वचनं श्रुत्वा न दृष्टं साक्षात्कृतः तत्त्वे परमात्मा सत्यं वा येन तयाभूतोपि सद्विपदाना मनुष्याणाम् इन्द्रः राजा तस्य वस्मः नरेन्द्रपुत्र न सन्तोष सन्तुष्टी नाभूत् । च तथा इदै वक्ष्यमाणम् आत्मगतम् मनसि । शनैः बभाप उपवान् विचारयामासेति भाव । दुःखात्मक नैकविधं तपश्च स्वर्गप्रधान तपसः फलं च । लोकाश्च सवें परिणामवन्तः स्वल्पे श्रमःखल्वयमाश्रमाणाम् ॥२०॥ तपश्च किंच इच्छचान्द्रायणादि तपोऽनुदानम् न एका विधा प्रकारो यस्य तथाविधमने कीवधं, सामर दु खादं चास्त्रीति शेषः । तपमः फले व वर्ग प्रधान मुख्यतया स्वर्गवानिरवेति भाव । च तया मर्वे लोकाः परिणामवन्नः विकारिणः 'परिणामी विकारो ३' इत्यमरः । परिवर्तनशीलाः सन्ति । 'आब्रह्मभुवनालोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन' इति गीता ( ८-१६) । (अतः) आश्रमाणामाश्रवासिनाम् अय तपोनुष्टानापः थमः प्रयनः स्वये सद्ध स्वर्गादिलोकप्राप्तिरूपात्यल्यालाय एव । इन्द्रद वारस्य वृत्तम् । “प्रियांश्च अन्धन विषयांश्च हित्या ये स्वर्गद्देतोर्नियम चरन्ति । ते विप्रयुक्ताः खलु गन्तुकामा महत्तरं बन्धनमेय भूयः ॥२६॥ प्रियान् बन्धून् विषयान् रूपरमादींश्च हित्वा त्यक्त्वा ये जनाः सर्गहेनोः खर्गप्राप्ययं नियम चरन्ति तपः कुर्वन्ति ते विप्रलब्धा वविता भूयः पुनः महत्तरम् अतिमहन् बन्धनं जन्मा बन्दु निवेवन गन्तुगमाः गन्तुमिच्छन्ति । ततं भुक्न्दा स्वर्गलो विशालं झोगे पुम्ये मर्त्यलोकं विशन्ति । एवं अयोधर्ममनुप्रपना गतागतं काममा लभन्ते' इति गीता श्रुतिस्प-ति प्रलोकेषु परान्तकाले परामनाः परिमुच्यन्त सर्वे ।

L
महाकवि अश्वघोपविरचिते बुद्धचरिते
कायतमैर्यश्च तपोऽभिधानः प्रवृत्तिमाकाङ्क्षति कामहेतोः।
संसारदोषानपरीक्षमाणो दुःखेन सोऽन्विच्छति दुःखमेव ॥२२॥
तपः अभिधानं नाम येषा तैस्तपोनामके कायतमैः शरीरपीडनैः, यः नरः
कामानां भोगैश्वर्यादभिलाषाणां हेतोः कारणात् 'कामः स्मरेच्छयोः पुमाम्' इति
मेदिनी। प्रवृत्ति प्रवाहं 'प्रवृत्तिवृत्तवृत्तान्तप्रवाहेषु प्रवर्तने' इति हैमः । जन्मरूपम्
आकाइरति इच्छति स नरः संसारदोषान् संसारसम्बन्धीनि रागद्वेषादिदूषणानि
अपरीक्षमाणः न सम्यग् आलोचयन् दुःखेन कायक्लेशेन दुःखमेव जन्म मरणरूपं
दुःखमेव अन्विति मार्गयति । यतः-'भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते । किञ्च, नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य
भावना । न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य फुतः सुखम्' इति भगवद्गीता ।
प्रासश्च नित्यं मरणात्प्रजानां यत्नेन चेष्छन्ति पुनः प्रसूतिम्।
सत्यां प्रवृत्ती नियतश्च मृत्युस्तत्रैव मना यत एव भीताः ॥२३॥
घ अथ च प्रजानां लोकानां मरणात् मृत्यो नित्यं सर्वदा प्रासः भयं
विद्यत इति शेषः । च किंच लोका यनेन तपोऽनुष्टानरूपोपायेन पुनः प्रसूति प्रसवं
जन्म वा 'प्रसूतिः प्रसवे' इत्यमरः । इच्छन्ति । प्रवृत्ती सत्यां प्रवाहे वर्तमाने मृत्यः
नियतः अपरिहार्यः निश्चितः । 'जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्धर्व जन्म मृतस्य च' इति
भगवद्गीता। यतः यस्माद् भीताः अस्तास्तत्रैव मना लौना इति महदाश्चर्यम् प्रोत्यतेऽत्र ।
इन्द्रवना वृत्तम् । यिनमा
'इहाथमेके प्रविशन्ति खेदं स्वर्गार्थमन्ये श्रममाप्नुवन्ति ।
सुखार्थमाशाकृपणोऽकृतार्थः पतत्यनर्थे खलु जीवलोकः ॥२४॥
एके केचिद् इहायं एतस्मै लोकाय खेदं दुःसं कायक्लेशरूपं प्रविशन्ति गच्छन्ति।
अन्येऽपरे खर्गा खर्गप्राप्त्यर्थ श्रमं तपोऽनुष्ठानप्रयन्नम् आप्नुवन्ति अधिगच्छन्ति।
(एव) आशाकृपणः आशा दीना हीना वा यस्य स आशादीनः जीवलोकः न कृतः
साधितम् अर्थः प्रयोजनं येन स असफलः सन् मोरित अर्थः प्रयोजनं यस्य तस्मिन्
अनर्थे पतति । मुखमन्विच्छन् अनन्तदु.से पततीत्यनर्थः ‘स शान्तिमामोति न काम-
कामी' 'अन्तवनु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्' इति च भगवद्गीता ।
'न खल्वयं गर्हित एव यत्नो यो हीनमुत्सृज्य विशेषगामी ।
प्राः समानेन परिश्रमेण कार्य तु तद्यत्र पुनर्न कार्यम् ॥२५॥

९० संस्कृत-काव्य-लहरी सनु निश्चयेन अयम् अत्र क्रियमाणः सन्नः तपोनुष्ठानरूपोपायः, य: होने निकृष्टम् उमुख्य स्यक्त्वा विशेषमसाधारण खर्गादिफलं गन्तुं शीलमस्यास्तीति तयाभूतः गर्हित एव न निन्दितो नैव । तु किन्नु प्राज्ञैः युद्धमद्भिः समानेन परापर- पोर्भेदं त्यक्त्वा सदृशेन परिश्रमेश प्रयभेन तत्वार्य कर्तुमुचितं यत्र यस्मिन् कृते पुनः कार्य गर्नुमवशिष्येत किमपौति शेषः । शरीरपीडा तु यदीह धर्मः सुखं शरीरस्य भवत्यधर्मः। धर्मेण चामोति सुखं परत्र सादधर्म फलतीह धर्मः ॥२६।। यदि पदान्तरे 'पक्षान्तरे चेदि च' इत्यमरः । इह अत्र लोके शरीरपीछ चान्द्रायणादिभिः शरीरपीडनं धर्मः। शरीरस्य मुखम् अधर्म. पापं भवति, च तथा धर्मेण परन परलोके सुखं (नरः) आप्नोति लमते, तस्मात् तदा इह अस्मिन् निश्चये सति धर्मः शरीरपीटारूपः अधर्म परलोके सुराहां फलति जनयति। धर्मोऽधर्म फलभावेन परिवर्तते इति भावः, अतोऽयं विचारो न समीचीनः॥ 'यतः शरीरं मनसो पशेन प्रवर्तते चापि निवर्तते च । युक्तो दमश्चेतस एव तस्माभित्ताहते काष्ठसमं शरीरम् ॥२७॥ यतः शरीरं मनसो दर्शन मनसः प्रेरणमा प्रवर्तते विषयेषु प्रवृत्ति करोति व तथा निवर्ततेऽपि निवृत्तिमपि गच्छति, तस्मादेतोः चेतसः मनसः दमः दमन वशीकरणमेव युक्तम् दचितम् न तु शरीरस्येति भावः । (यतः) वित्ताइते चित्तं विना शरीर काष्ठसम शुष्क निश्चेष्टं चेत्यर्थः, तदुकम्-'यतो यतो निचरति मनश्चमल- मस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वर्श नयेत्' इति गी. (6-२१) एवञ्च मन एव मनुष्याणां कारण बन्धमोक्षयोः' इति । 'आहारशुद्धया यदि पुण्यमिष्टं तस्मान्मृगाणामपि पुण्यमस्ति। र ये चापि याद्याः पुरुषाः फलेभ्यो भाग्यरपराधेन पराङ्मुखार्याः॥२४ यदि चेद् आहारस्य मोजनस्य शुरपा पवित्रतया शुद्धभोजनकरणेनेति भावः पुष्मं धर्मप्राप्तिः इष्टम् मता तस्मात् तदा मृगाणामपि हरिणादिपशूनामपि पश्यसस्ति तेऽपि पुण्यवतः पवित्रभोजनकरशात् । अपि च ये साधकाः फोभ्यो : फलाहारमपि त्यकान्तः मतदोनित्यसम्बन्धात् ते भाग्यापंराधन भाग्यदोषेण दौर्भाग्येण वा पराक् प्रत्यावृत्त मुखम् अर्थेभ्यो येषां ते उद्देश्यविमुखाः मन्तीति शेष । इन्द्रवमाख्यं वृत्तम्।

महाकवि अश्वघोषविरचिते बुद्धचरिते 'दुःखेऽभिसन्धिस्त्वथ पुण्यहेतुः सुखेऽपि कार्यो ननुसोऽभिसन्धिः। मथ प्रमाणं न सुखेऽभिसन्धिर्दुःखे प्रमाणं ननु नाभिसन्धिः ॥२६॥ अथानन्तरं दुःखे शरीरपौडने अभिसन्धिस्तृ पक्षपात एव पुण्यहेतुः अथवा 'दुःखं पुण्यवद्' इत्यादिपक्षकयनमेव धर्मकारणम् , ननु निश्चयेन स उक्तः अभिसन्धिः पक्षातः पत्तकथनं वा सूखेऽपि कार्यः कर्तुमुचितः । अथ चेत् सुखेऽभिसन्धिःप्रमाणं प्रमाणपुष्ट युक्तियुक्तं वा यथा स्यात्तथा न तदा दु.खेऽभिमन्धिः प्रमाणं न ननु नैव । तथैव ये कर्मविशुद्धिहेतोः स्पृशन्त्यपस्तीर्थमिति प्रवृत्ताः। तथापि हृदि केवलोऽयं न पावयिप्यन्ति हि पापमापः ॥३०॥ सम्लरबहान तथैव एवमेव जनाः तीर्थ पवित्रस्थानं विद्यते इत्यनया भावनया प्रवृत्ताः प्ररिताः कर्मणां विशुद्धिहेतोः विशेषेण पवित्रतासम्पादनाय अपस्तीर्यजलानि स्पृशन्ति पिबन्ति अवगाहन्ते वा तत्रापि एवमाचरणेऽपि हृदि हृदये केवलः अयं तोषः एकैषा तुर्यित् कर्मविशुद्धिर्जाता। वस्तुतस्तावदेवं कापि शुद्धिर्न भवति यावन्मनः शुदं नास्ति मनसि शुद्धे तु तीर्थेन किम् । तथाच 'शुचि मनो यद्यस्ति तीर्थेन किम्' इति । हि यस्मात् पार्प पापिनं पुरुष दुष्कर्म वा आगे जलानि न पावयिष्यन्ति पवित्रतांन नेष्यन्ति । स्पृष्टं हि यद्यद् गुणवद्गिरम्भस्तत्तत्पृथिव्यां यदि तीर्थमिष्टम् ।, तस्माद् गुणानेव परैमि तीर्यमापस्तु निःसंशयमाप एव ॥३॥ यदि चेत् पृथिव्यां यद्यद् हि यद्यदेव अम्भःजलं गुणवद्भिः गुणिभिर्महात्मभिः स्मृष्ट स्पर्शेन पवित्रितं तत्तत् तीर्थमिष्टम् तीर्थ मतम् तस्मात गुणानेव तीर्थ परैमि गुणा एवं उत्तमं तीर्थमिति मन्ये आपस्तु जलानि तु निःसंशयं निःसन्देहम् सामान्य- जलानि न तु किश्चिद्विशिष्टं तत्र विद्यते । इन्द्रवमा वृत्तम् । इति स तत्तद्वहुयुक्तियुक्तं जगाद चास्तं च ययौ विवस्वान् । ततो हविधूमयिवर्णवृक्ष तपशान्तं स वनं विवेश ॥३२॥ इति अनेन प्रकारेण तत्तद् दुःखात्मकमित्यागेकादशोकेयूक्तं बहुयुक्तियुक्तमनेक- तर्कसम्मतं स जगाद स उवाच । विवस्वान् सूर्यश्चास्तं ययौ गतः । ततस्तदनन्तरं स सिद्धार्थः । हविषों हवनीयपदार्थानों घृतादीनां घुमेन विरुद्धो वर्णो रागो येषों ते हविधुमधूसरितवर्णाः वृक्षाः यत्र, तपसा प्रज्ञान्तमतिशान्तम् वनं तपोवनं विवेश प्राविशत् । उपेन्द्रवमा वृतम् । M संस्कृत-कान्य लहरी Hrud अभ्युद्धतप्रज्वलिताग्निहोत्रं कृताभिषेकर्षिजनायकीर्णम् । जाप्यसनाजितदेवकोष्ठं धर्मस्य कर्मान्तमिप प्रवृत्तम् ॥३३॥ अभितः सर्वतः उसनमुरिक्षप्त प्रज्वलितं प्रदीप्तं च अमिहोवे मन्त्रपूर्वक स्थापि- तामौ हुतं यत्र, अथवा उद्धतः प्रदीप्तच अमिहोत्रसम्बन्धी अमि. यत्र । कृतः अभिषेकः शास्त्रविधिना मन्त्रपूर्वकस्लान यस्तैः ऋजिनमुनिभिरक्कोणम् प्याप्तम् , भाध्यानां जपयोग्यमन्त्राणां खनेन मधुरध्वनिना आ समन्तात् कूजिताः प्रतिध्वनिपूर्णाः देवानां कोष्टा गृहमध्यभागाः ‘कोप्टः पुसूले चात्मीये मध्ये पुशेहस्य च इति मेदिनी । यत्र धर्मस्य सुकृतस्य कर्मान्तमिव कार्यपूर्तिचनमिव प्रवृत्त वन से विवेशोते पूर्वेण श्लोकेन सम्बन्धः। काचितिशास्तत्र निशाफराभः परीक्षमाणश्च तपस्युयास । सर्व परिक्षेप्य-तपश्च मत्वा तस्मातपक्षेत्रतलाजगाम ॥३॥ “निशाकरस्य बन्दस्य आभा. कान्तिरिव आभा यस्य स रूपलावण्यसम्परः सर्वार्थसिद्धः तपसि नियमान परीक्षमाणः समीदमाः बाधित निशा रात्री र तपोदने उवास तस्थौ । सा तपः परिक्षेप्य सर्वविधं तपः बन्धनयुक्तममारं च मदा शात्वा तस्मात्यः क्षेत्रतलात तपोवनाद् जगास निर्ययो । 'परिदेप्य' पदत्य प्रकरणा- नुसारी अर्थः प्रदर्शितः परिदेप्येन्ययं पाठो भ्रष्टः प्रतीयते, यतो खन्वयसातिन भवति । विशेषन्त मनीषिभिः खयं विचारणीयम् । मन्चमजन्नाथमिणस्ततस्तं तपदात्म्यगतैर्मनोभिः। देशादनारभिभूयमानान्महर्पयो धर्ममियापयान्तम् ॥३५॥ अनाः दुष्टेः अमिभयमानात् पराभव नीयमानाद् देशाद् अपमान्त गरमन्तं धर्म महर्षय इव ततः तपोवनानिर्गमनानन्तरं तत् तस्य स्पस्य प्रशस्ताकृतेः माहारम्यगतः प्रशंसागतैः प्रशंशतिः मनोभिरूपलक्षिताः आभ्रमिणस्तै सिदार्थम् अन्वाजन् अनुगतवन्त। सतो जटायरकलचीरखेलास्तपोधनांइचय स तान्ददर्श । तपांसि चैपानुरुध्यमानस्तस्यो शिव श्रीमति पृक्षमूले ॥३६॥ तत: स. सिद्धार्थः जमा, वल्कशनि, चीराणि र सेला श्रीडा मनोविनोदः या येषां तान् तपोधनान एरा तपांसि चैव दुर्श रटवान् । अनुरुध्यमान भामिभिः सामहं प्राय॑मानः शिवे शुभे मगलरूपे वा श्वःयम शिवं मई कल्यागं माल शुभम्' इत्यमरः । श्रीमति शोभायुकं सक्षमूरे तस्थौ स्थितिं चकार ।

महाकवि अध्ययोपविरचिते युद्धचरिते अथोपसृत्याश्रमवासिनस्तं मनुष्यवर्ग परिवार्य तस्य । वृद्धश्च तेपा बटुमानपूर्व कलेन साम्ना गिरमित्युवाचं ॥३७॥ अशु वृक्षमूलस्थित्यनन्तरम् आश्रमवामिनः तं मनुष्यवयं मनुष्यश्रेष्टम् उपमृत्यु ममीपं गल्या परिवार्य परितः सर्वतः वृन्वा तस्थ. स्थिताः । च तथा तेपा कोऽपि वृद्धस्तपसी बदमानपूर्व अतिममानेन माम्ना शाल्या कलेन मधुरवरेण इति वश्यमाणां गिरमुवाच वाचमुक्तवान् । त्वय्यागते पूर्ण इवाश्रमोऽभूत्संपद्यते शुन्य इव प्रयाते । तस्मादिम नाईलि तात हातुं जिजीविपोर्देहमिवेष्टमायुः ॥३८॥ त्वयि मिद्धार्थे आगतेऽत्र प्राप्ते आध्रमः पूर्ण इवाभूत प्रयाते गते सति त्वयि शून्या रिक्त इव सम्यते जायते । तम्मान हे तात प्रिय जिजीविषोः जीवितुमिच्छोः इष्टं दे धियं शरीरं आयुः जीवनकाल इव इममाधम हातुं त्यक्तुं नाईसि उचितं नास्ति। "ब्रह्मर्पिराजर्पिसुरर्पिजुटः पुण्यः समीपं हिमवान हि शैलः। तपांसि तान्येव तपोधनानां यत्सन्निकावलीभवन्ति ॥३९॥ ब्रह्मर्षिभिः वशिष्टमशः राजर्षिभिः विश्वामित्रकल्पः, मुरपिभिः नारदानुरूपः, जूपः सेवितः पुण्यः पुनः हिमवान हिमालयः शैलः पर्वतः समीपे हि.समीपमेव विद्यते इति शेषः । सुत्सन्निकाद् यस्य सामीप्यात् तपोधनानां तान्येव उक्तान्येव तमि पहलीभवन्ति बहुलतां प्राप्नुवन्ति । "तीर्थानि पुण्यान्यमितस्तथैव सोपानभूतानि नभस्तलस्य । जुधानि धर्मात्मभिरात्मविद्भिर्देवर्षिभिश्चैव महर्षिभिश्च ॥४०॥ तथुव एवमेव धर्मात्मभिः आत्मविद्धिः आत्मज्ञानिभिः देवप्रिमिः महापभिः बजष्टानि मेवितानि, नभस्तलभ्य व्योम्नः खर्गस्येति यावत् सोपानभतानि भारोहणमार्गरपाणि पुण्यानि पवित्राणि तीर्थानि 'हिमालयम्' अभिनः सर्वतः सन्तीति शेषः । इन्द्रव नाग्यं वृतम्। इतश्च भूयः क्षममुत्तरैव दिपसेवितुं धर्मविशेषहेतोः । • न तु क्षमं दक्षिणतो युधेन पदं भवेदेकमपि प्रयातुम् ॥४॥ इतध अम्मास्थानाच भूयः पुनः धर्मविशेषतोः निवृत्तिफला विशेषधर्मा- नुष्टानांय उत्तरे दिल मेवितुं क्षमा उत्तरदिशायामेव गमनं युक्तम् 'युक्त धर्म शक्त हिते त्रिपु' इत्यमरः । शुक्ला गतिरेव प्रात्येति युधेन युदिमता दक्षिणतः एकपटुमपि प्रया शर्म न तु भवेत् । दक्षिगमार्गेण एक पदमपि युद्धिमता गन्तुं युक्तं नैव भवेत इमे हि HEADAनः । एतयोईयोर्गत्योरेवानोडेख संस्कृत-काव्य-लहरी कृष्णा गतिः त्याज्येति भावः । तदुकं भगवद्गीतायाम्-'शुक्लकृष्णे गती येते जगत- शाश्वते मते। एकया यात्यनावृतिमन्ययावर्तते इति प्रतीयते । "तपोवनेऽसिपथ निष्क्रियो वा संकीर्णधर्मापतितोऽशुचिर्वा । इष्टस्त्वया येन नते विवत्सा तद् अहि यावदुचितोऽस्तु वासना४२॥ अथ प्रश्न 'मालानन्तरारम्भप्रश्नकारन्ये वयो अर्थ' इत्यमरा, रिममिस्तपोवने त्वया रधिन कोऽपि निष्क्रियः अर्मण्यः, संकीर्णे जुड़े धर्म आपतितः सर्वथामना, अथवा अवि अपवित्रः दृष्टः ? येन कारणेन ते तब अन वियत्मा वस्तुमिच्छा न अस्तीति शेषः । तत् तस्माद् द्रहि क्थ्य यावत् कालं वासः अब स्थिति. रचिनः रचिकरा अस्तु भवतु तवेति शेपः । तपःसहायं तपोनिधान भवन्तम्। 'बासस्त्वया हीन्द्रसमेन साधु वृहस्पतेरप्युदयावहः स्यात् ॥१३॥ हि निश्चयेन इमे त्वां परिवार्य स्थिताः तापसास्तपखिनः तपोनिधानप्रतिम तपोनिधिरूपं त्वां तप महाय तरमि आत्ममहबरं वाञ्छन्ति इच्छन्ति । त्वमपि एभिः सद् तपः फुयों इत्येषामिच्छा, हि यतः इन्द्रसमेन इन्द्रसद्दशेन त्वया सार्ध मह वामः यूहस्पते देवगुरोः अपि अभ्युदयम् आवृति आनयति तथाभूतः भाग्योदयकारक अत्र मुक्तिरूपाभ्युदयप्रापकः स्याद्भवेत् । येन सह वासो देवगुरोरप्यभ्युदयावदः स्यादन्येषान्तु क्यं नेति भावः । इत्येवमुक्तः स तपखिमध्ये तपसिमुख्येन मनापिमुख्यः । भवरणाशाय कृतप्रतिज्ञः सं भविमन्तर्गतमाचचक्षे ॥४॥ तपस्विमध्ये तापसानां समक्षं तपखिमूख्येन तपखिना मुख्येन प्रधानेन इत्येवम् उत्तप्रकारेण उनले पथिते ( सति ) भवस्य जन्मनः “भवः क्षेमेशसमारे सत्तायो प्राप्तिजन्मनोः' इति मेदिनी । प्रणाशाय प्रकर्षेग नाशाय कृता प्रतिक्षा येन स कृत- मङ्कल्पः मनीविषु धौरेषु प्रज्ञेषु वा धारो मनीषी शः प्रज्ञ.' इत्यमरः । मुख्यः श्रेष्टः स सर्वार्थसिदः स्वमात्मनः अन्तर्गत हास्य भावुमाशयं आचचने कथयामाम । ऋज्यात्मनां धर्मभृतां मुनीनामिष्यातिथित्वात्स्वजनोपमानाम् । एवंविधैर्मा प्रति भावजातः प्रीतिः परा मे जनितश्च मानः ॥४५॥ ऋजः सरलः आरमा येषां तथाभूतानां धर्ममयं धर्मपालकानाम् इष्टातिथित्वात् प्रियातिधिभावात् स्वजनोपमानाम् आत्मीयकल्पाना मुनीनां मां प्रति मद्विपये एवंविधैः महाकवि अश्वघोपविरविते बुद्धचरिते . उक्तः भावजातः भावममुहैः 'जातं जात्योपजन्ममु' इत्यमरः । मे मम पुरा महती प्रीतिः अनुरक्तिः जनिता च तथा परः मानः जनितः उत्पादितः । इन्द्रवज्राख्यं गृत्तम्। 'स्निग्धाभिरामिहृदयंगमाभिः समासतः स्नात इवास्मि वाग्भिः । रतिश्च में धर्मनवग्रहस्य विस्पन्दिता सम्प्रति भूय एच ॥६॥ समामतः मंक्षेपतः स्निग्धाभिः स्नेहपूर्णः अतएव हृदयंगमाभिः हृदयस्पर्शिमिः आभिः युष्मदुच्चरितः वाग्भिः यचोभिः सात इव पवित्रीकृत इवास्मीति भावः । च तथा से मम धर्म नवः नूतनः यः ग्रहः अनुरोधः तस्य रतिः अभिरुचिः सम्प्रति मधुना भूय एवं पुनरपि विम्पन्दिता सञ्चालिता उद्योधितेति भावः । तपलिनां स्नेहसिक्त- व्यवहारेण वचनैश्चाधुना सिद्धार्थस्य मुक्तयेऽभिलाषोऽत्यर्थमुवुद्धः इत्याशयः । "एवं प्रवृत्तान् भवतः शरण्यानतीय सन्दर्शितपक्षपातान् । यास्यामि हित्वेति ममापि दुःखं यथैव बन्धूंस्त्यजतस्तथैव ॥४७॥ एवम् इत्थं प्रकृष्टं वृत्तं चरित्रं येषा तान् प्रवृत्तान् 'वृत्तं पद्ये चरित्रे इत्यमरः । अतीव अत्यर्थ सम् सम्यग् दर्शितः प्रकटित पक्षपातः प्रेमातिशयः यैस्तान् , शरणाय साधून शरण्यान शरणयोग्यान् भवतः हित्वा त्यक्त्वा यास्यामि गमिष्यामीति अनेन विचारेण ममापि तथैव तादृशमेव दुःखं भवतीति शेषः, यथैव बन्धून् बान्धवान् त्यजतः। एवं सति किमयं भवानन न तिष्ठतीति तदादाग्रिम श्लोकस्येन- 'स्वर्गाय युष्माकमयं तु धर्मो ममाभिलापस्त्वपुनर्भवाय । अस्मिन्यने येनन मे विषत्सा भिन्नः प्रवृत्त्या हि निवृत्तिधर्मः॥४८॥ युष्माश्म अयं तपोनुष्ठानरूपो धर्मः तु खर्गाय स्वर्गप्राप्त्यर्थ, ममाभिलाषस्तु ममेच्छा तु अपनर्मदाय, भवत्प्रणाशाय मुक्तये वा इत्यर्य महान् भेदः येमे । अम्मिन्वने विवरमा वस्तुमिच्छा न नास्तीति शेषः। हि यतः निवृत्तिधर्मः मोक्षधर्मः प्रवृत्त्या सकामधर्माद भिन्नः अस्तीति शेषः । तनारतिमें न परापचारो वनादितो येन परिव्रजामि । धमें स्थिताः पूर्वयुगानुरूपे सर्वे भवन्तो हि महर्पिकल्पाः ॥१९॥ येन इतो वनाद् अस्माद् बनान् परिप्रजामि गच्छामि तन मे मम अरतिः अरुचिः न परः अपचारः अहिदाचरणं परेपाम् अपचारः दुराचरणं वा न अस्तीति शेषः । हि यतः पूर्वयुगानुरूपे पूर्वयुगसदृशे धर्मे स्थिता पूर्वयुगवद् धर्माचरणं धुर्वन्तः भान्तः सर्वे महर्षीणां कल्याः सदृशाः सन्ति । मम संस्कृत-काव्य-लहरी सन्म ततो वचः सूनृतमर्थव सुलक्षणमोजखि च गर्वितं च । श्रुत्वा कुमारस्य तपखिनस्ते विशेषयुक्तं यहुमानमीयुः ॥५०॥ ततः वान्तर्गतमावस्यनान्तरं कुमारस्य मिद्धार्थस्य सूतृत प्रिय मत्यं च, अर्थउच्च सारवञ्च, मुहम मुमधुरं संक्षिप्तं वा ओउखि च प्रभावशालि च, गर्नेण अन्वित मानयुक्त वः वचनं श्रुत्वा ते परिवार्य स्थिताः तपखिनुस्नापसाः विशेष युक्तम् असाधारण बहुमानम् अत्यधिकमानम् , ईयु गताः । कुमारस्यौदारमाशय ज्ञात्वा तेषां हृदयानि तं प्रति सविशेष ममादरपूर्णानि जातानि । कश्चिद् द्विजस्तत्र तु भस्मशायी प्रांशुः शिखी दारवचौरवासाः। आपिङ्गलाक्षस्तनुदीर्घघोणः कुण्डैकहस्तो गिरमित्युवाच ॥११॥ तर नेषु भस्मनि शेते इति भम्मशायी, प्रांशुः अतितेजखी, शिसा अस्यास्तीति शिखी जटौति यावत् , दाखचीरवासाः तरुत्वग्धारी, आ ईपरिपाले कपिलवणे अक्षिगी यस्य स, 'कपिलः पिपिशो कटुपिझलौ' इत्यमरः । तन्वी कृशा दीर्घा च घोणा नासिका यस्य सः “घोणा नासा च नासिका' इत्यमरः । कुण्डं पाप्रविशेषः कमबटुर्वा एक केवल: हुस्ने यस्य स तथाविधः कश्चिद् द्विजः इति वक्ष्यमाणों गिर पाच वाच । वृत्तमिन्द्रया। धीमन्नुदारः खलु निश्चयस्ते यस्त्वं युवा जन्मनि दृष्टदोपः स्वर्गापवर्गो हि विचार्य सम्यग्यस्यापवर्गे मतिरस्तिसोऽस्ति । हे धीमन् बुद्धिमन् , ते तव निधयः भयप्रणाशनस्त उदारः, सल महान एंव। यस्त्वं युवा युक्तः सन् जन्मनि प्रवृत्तौ दृष्टः लक्षितः दोषः येन तथाभूतः असि । स्वर्ग प्रवृत्तिम् अपवर्ग मोक्षं निवृत्ति च सम्यक् पूर्णतया विचार्य आलोच्य हि , एव यस्य अपवर्गे मोजे मतिः प्रवृत्तिः रुचिर्वा अस्ति म सात्त्विको युदिसम्पन्नः भवान् अस्ति । सात्त्विकी बुद्धिस्तु 'प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्य भयाभये । पन्ध मोदं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी' इति गीती । इन्दवनाख्यं वृत्तम् । यस्तपोभिर्नियमेश्च तैस्तैः स्वर्ग यियासन्ति हि रागवन्तः । रागेण सार्धं रिपुणेयं युवा मोy परीप्सन्ति तु सत्त्ववन्तः ॥१३॥ तेस्तैः विविधः योः तयोभिः जत करणैः रागवन्त राजसाः माधमः हि. निश्चयेन खर्ग यियासन्ति गन्तुमिच्छन्ति राजससाधास्तु गीतायाम्-'रागी कर्मफलप्रेमुल्यो हिसारमकोऽशुचिः । इपोमावतः कभी राजसः परकीर्तितः ।। इति । तु किन्तु सत्त्वं विद्यते एपामिति सत्त्ववन्तः । सत्वं सांख्यशाचे प्राधमाधनम् स ।

९८ महात-काव्य-लहरी . भावः या अगाधा अनलसर्शिनी गम्भीरता गभीरता स्थिता वा याच दीप्तटा नेज. यानि चोक्तानि मष्टोच्चघोणमित्याटे प्रतिभातत्त्वमूचशनि लनणानि है करणस्त्वं पृथिच्या भूमण्डले तन् तथाविधम् आचार्यस्य कर्म भावो वा आचार्गाम आचार्यपदं प्राप्म्युग्गि यद् यथाविधम् ऋषिभिः पूर्वयुगेऽपि न अवाप्तम् प्राप्तम् । भवानपूर्वामाचार्यप वीमविगमिप्यतीनि सारः । वृत्तमिन्दवनाग्यम् । "परममिति ततो नृपात्मजनमृषिजनं प्रतिनन्ध निर्थयों विधिवदनुविधाय तेऽपि प्रविविशुराथमिणस्तपोवनम् ॥५८॥ परमाम इति स्वीकार 'ओमेव परमं मतम्' इत्यमरः । परम ओम् इत्यनेन प्रकारेण तस्य तपोधनस्य सम्पतिं स्वीकृत्य नृपात्मजः राजपुत्र. मिद्धार्थ त परिचार्य- स्थितम् ऋपिजनं 'जातावेकवचनम् इति । प्रतिनन्दा अभिनन्य प्रसाद वा तनसस्माद् वृतमूलान् निर्ययो निर्जगाम । त तपसिनोऽपि विधिवद विधिपूर्वक यथाशास्त्र या अनु सदर्श, विधाय कृत्वा अवसरोचितविमर्जनक्रिया सम्पाद्य उचितरीत्या तं. विसज्येति भावः तपोवनं प्रविविशुः प्रविष्टवन्तः । अपरखचाख्यं वृत्तम् । इति बुद्धचरिते महाकाव्ये अन्वयार्थदीपिकाया तपोवनप्रवेशो नाम सप्तमः सर्गः ।

- अथ रघुवंशम् संजीविन्या समेतम् द्वितीयः सर्गः अध प्रजानामधिपः प्रभाते जायाप्रतिमाहितगन्धमाल्याम् । बनाय पीतप्रतिपद्धवत्सां यशोधनो धेनुमृपेर्मुमोच ॥ १॥ अथ निशानयनानन्तरं यशोधनः प्रजानानाविपः प्रजेश्वरः प्रभात प्रातःकाले जायया मुदातेगमा प्रतिप्राहयिन्या प्रतिग्राहिते स्वीकारित गन्यमान्ये यया सा जाया- प्रतिमाहितगासा ता नयोकाम् । पीतं पानमस्याम्वीति पीतः । पोगदानित्यर्थः । अर्शआदिभ्योऽव्' इत्यन्प्रत्ययः । 'पीता गावो भुक्ता ब्राह्मणा' दनि महाभाष्ये दर्शनात् । पौनः प्रतिबद्धो वमो यस्यान्नमर्नु बनाम् वनं गन्नुम् । क्रियार्थोपपद इत्यादिना चतुर्थी ) मुमोच मुक्तवान् । [जायापदमामर्थ्याच मुक्षिणायाः पुत्रजनन; योग्यत्वमनुसन्धेयम् । तथाहिति. पति या प्रविशति गर्भो भूत्वेह मातरम् । तस्या पुनर्नवो भूत्वा दशमे मामि जायते । तवाया जाया भवति यदस्यां जायते पुनः।' इति । यशोधन इत्यनेन पुत्रवत्ताकीर्तिलोभाद्राजानन्हें गोरचणे प्रवृत्त इनि गम्यने] अम्मिन् मर्गे वृत्तमुपजातिः-'अनन्तरोर्दारितलक्ष्ममाजौ पादौ यदीयाबुपज्ञातयनाः' इति । तस्याः खुरन्यासपवित्रपांसुमपासुलानां धुरि कीर्तनीया । मार्ग मनुष्येश्वरधर्मपत्नी श्रुतेरिवार्थ स्मृतिरन्वगच्छन् ॥ २॥ पासवो दोषा आसा सन्नीति पामुलाः खरिण्यः किरिणी पामुला' इत्यमरः । 'मिध्मादिभ्यश्च' इति लअन्ययः अपामनानां पतिवनानां धूर्यग्रे कीर्तनीया परिगणनीया मनुष्येश्वरधर्मपन्नी । खुरन्यासः पवित्राः पसिनो यस्य तम् । रेणुद्वयोः खियां धूलि. पांमुर्ना न द्वयो रज' इत्यमरः । तम्या धेनोर्गिम् । स्मृतिर्मन्दादिवाय वेदवाक्य- न्यायमुभिधेयमित। अन्वानुमृतवती है। विधा स्मृतिः श्रुतिक्षुण्णमेवार्थमनुमति तथा मापि गोखुरक्षुण्णमेव मार्गमनुममारेत्यर्थः धर्मपत्नीत्यनाश्वघासादिवत्तादर्य पष्टी मनाम प्रतिविकाराभावान् । पांमुलपधप्रवृत्तावष्यपामुलानामिति विरोधानं गारो ध्वन्यते)

रघुवंशम् संजीविन्या समेतम् १०१
निवर्त्य राजा दयितां दयालुस्तां सौरभेयीं सुरभिर्यशोभिः ।
पयोधरीभूतचतुःसमुद्रां जुगोप गोरूपधरामिवोर्वीम् ॥ ३॥
दयालु कारुणिकः । स्थाद्दयालुः कारुणिक.' इत्यमरः । 'स्पृहिगृहि-'इत्यादिना 25
लुन्प्रत्ययः ।] यशोभिः मुरभिर्मनोनः । सुरभिः स्यान्मनोऽपि' इति विश्वः । राजा
तां दयितां निवर्त्य सौरभेयी कामधेनु-मुतां नन्दिनी धिरन्तीति धराः । पचाद्यच ।
पयमांधराः पयोधराः स्तना.स्त्रीस्तनाब्दी पयोधरौ' इत्यमरः । अपयोधराः पयो-
धराः संपद्यमानाः पयोधरीभूताः । अभूततद्गावे चिः। 'कुगति प्रादयः । इति
ममामः । पयोधरीभूताश्चत्वारः समुद्राः यस्यास्ताम् । [अनेकमन्यपदार्ये' इत्यनेक-
पदार्थग्रहणं सामर्थ्यात्रिपदो बहुव्रीहिः गोरूपधरामुवी मिव । जुगोप ररक्ष । भिरक्षग-
प्रयत्नेनैव ररक्षेति भावः । धेनुपक्षे पयसा दुग्धेनाधरीभुताश्चत्वारः समुद्रा यस्याः सा
तथोक्ताम् । दुग्धतिरस्कृतसागरामित्यर्थः ।
व्रताय तेनानुचरेण धेनोय॑पेधि शेपोऽप्यनुयायिवर्गः।
न चान्यतस्तस्य शरीररक्षा स्ववीर्यगुप्ता हि मनोः प्रसूतिः ॥ ४॥
व्रताय धेनोरनुचरेण । नतु जीवनायेति भावः । तेन दिलीपेन शेषोऽवशिष्टो-
प्यनुयायिवर्गाऽनुचरवर्गा न्ययेधि निवर्तित । शेषत्वं मुदक्षिणापेक्षया । कथं तात्म-
रक्षणमत आह-न चेति। तस्य दिलीपस्य शरीररक्षा चान्यतः पुरुषान्तरान्न । कुतः ।
हि यम्मात्कारणान्मनोः । प्रसूयत इति प्रमृतिः सन्ततिः खवीर्येणैव रक्षिता । नहि
स्वनिर्वाहकस्य परापेक्षति भावः ।
आस्वावद्भिः कयलैस्तृणानां कण्डूयनैर्देशनिवारणैश्च ।
अव्याहतैः खैरगतैः स तस्याः सन्नाः समाराधनतत्परोऽभूत ॥५॥
मम्रामण्डलेश्वरः [येनेष्टं राजसूयेन मण्डलस्येश्वरश्च यः । शास्ति यश्चाज्ञया
राज्ञः म सम्राट्' इत्यमरः । स राजा आदिवी रसवद्भिः। खादयुक्तरित्यर्थः ।
तृणानां क्वलैमः 'प्रासस्तु कवलार्थकः' इत्यमरः) कण्डयनैः खर्जनैः दंशानां
वनक्षिाणां निवारणः । 'दंशस्तु वनमाक्षिका' इत्यमरः । अव्याहतैरप्रतिहतैः
स्वैरगतः खच्छन्दगमनै तस्याः धेन्वाः समाराधनतत्परः शुश्रूषासचोऽभूत् । तदेव
परं प्रधानं यस्येति तत्परः तत्पर प्रसितासत्ती' इत्यमरः ।
स्थितः स्थितामुञ्चलितःप्रयातां निपेदुपीमासनवन्धधीरः।
जलाभिलापी जलमाददानां छायेच तां भूपतिरल्यगच्छत् ॥६॥

१०२ संस्कृत-काव्य-लहरी भुपतिस्तां गां स्थिना सती स्थितः सन् । स्थितिरूविस्थानम् । प्रसादा प्रस्थितामुच्चलितः प्रस्थितः । निषेदुषी निषण्णाम् । उपविष्टामित्यर्थः । (भाषाया सदवमध्रुव' इति कमुप्रत्ययः । उगित इति टीप् । आसनबन्ध उपवेशने धीरः। स्थित । उपविष्ट मनित्यर्थः । जलमादतानां पिबन्ती जलाभिलाषी । पिनित्यर्थः । इत्थं छायेवान्वगच्छदनुसृतवान् । स न्यस्तचिह्नामपि राजलक्ष्मी तेजोविशेषानुमिता दधानः । आसीदनाविष्कृतदानराजिरन्तर्मदायस्थ इच द्विपेन्द्रः॥७॥ न्यम्नानि परिहृतानि विद्वानि वयामरादीनि यस्यास्तां तथाभूतामपि तेजोनिशेषेण प्रभावातिशयेनानुमिनाम । सर्वया राजेवायं भवेदित्यहिता राजलक्ष्मी दूधान म राजा । अनाविष्कृतदानराजिवहिरप्रकटितमदोखः । अन्तर्गता मद्रावस्था यम्य सोऽन्तमदावस्यः । तपाभूतो द्विपेन्द्र छ । आसीत् । लताप्रतानोद्ग्रथितैः स केशरधिज्यधन्या विचचार दावम् । रक्षापदेशान्मुनिहोमधेनोर्वन्यान्विनेप्यन्निय दुष्टसत्यान् ॥ ८॥ लताना वहीनां प्रतानः कुटिलतन्तुभिष्ट्रप्रथिना जनमथ्य प्रधिता ये वेशाम्व- रुपलक्षितः । इत्यं भूतलक्ष,' इति तृतीया । स राजा अधिज्यमारोपितमौर्योकं धनुर्यस्य सोऽधिज्यधन्वा सन् धनुपश्च' इत्यनादेशः । मुनिहोमधेनोः रक्षापदेशा- दक्षगच्याजात् वन्यान्दने भवान्दुष्टमत्त्वान दुष्टजन्तून् । दिव्यामुव्यवसायेषु सत्त्वमन्त्री तु जन्तुपु ।' इत्यमर विनेष्यन्दिाक्षयिष्यमिव , दार्व वन वने च धनवहौ च वो दाव इहेष्यते' इति यादवः विचार वने चचारेत्यर्थः । दिशकालावगन्तव्या. वर्मसंज्ञा कर्मणाम्' इति दावस्य मत्वम् । "विसृष्ट-'इत्यादिभिः पद्भिः इलोक्तस्य महामहिमतया दुमादयोऽपि राजोपचारं चरित्याह-- विस्टपार्थानुवरस्य तस्य पाश्चंद्रुमाः पाशभृता समस्य। उदीरयामासुरिचोन्मदानामालोकशब्दं पयसां विराः ॥९॥ विमुष्टा पानिचराः पार्थवतिनो अना येन तस्य । पारामतावरणेन प्रमा नुल्यस्य । प्रचेता परणः पाशी' इत्यमरः । अनुमावोनेन सूचितः, तम्य राज्ञः पार्श्व योमाः । उन्मदानामुत्कटमदानां व्यसां सगानां । सगवाल्यादिनोर्वयः' इत्यमरः । विरार शन्दै आलोकस्य शब्द्धं वाचस्मालोकयति शम्दम्।जयशब्दमित्यर्थः आलोको जयशब्दः स्यात्' इति विश्व शेरयामामरिवावदन्निव' इत्युत्प्रेक्षा ।

रघुवंशम् संजीविन्या समेतम् मरुत्पयुक्ताश्च मरुत्सखाभं तमऱ्यामारादभिवर्तमानम् । अवाकिरन्याललताः प्रसूनैराचारलाजैरिय पौरकन्याः ॥१०॥ मध्ययुक्ता वायुना प्रेरिताः बाललता आरात्ममीपेऽभिवर्तमानम् आरादर- समीपयोः' इत्यमरः । मस्ती वायोः मावा मत्सगोऽग्निः स इवामातीति मन्मयाभम् । आवश्नोपमर्गे' इति कप्रत्ययः] अन्य पूर्य तुं दिलीपं प्रसूनः पुष्पैः । पौरकन्याः पौरान ताः कन्या आचारार्थ तेरावारलाईरितु । अवाधिन । तस्योपरि निक्षिप्तवत्य इत्यर्थः । ससा हि ससायमागतमुपचरतीति भावः । धनुर्भूतोऽप्यस्य दयाभावमाख्यातमन्तःकरणविशः। विलोकयन्त्यो बपुरापुरक्ष्णां प्रकामविस्तारफलं हरिण्यः ॥१५॥ धन तोऽप्यस्य राज्ञः । एतेन भयसंभावना दर्शिता । तथापि विशद्वेर्निर्भीर- रन्त-करणैः कर्तृभिः। दयया कृपारमेनार्डो भावोऽभिप्रायो यस्य तद्दयाभावं तदाग्यतम् । दयाद्रभावमेतदित्यास्यामिन्ययः भाव, मत्तासभावाभिप्रायचेष्टात्म- जन्म' इत्यमरः । तथाविधं वपुर्विलोक्यन्यो हरिष्योऽरणां प्रकामविस्तारस्यात्यन्त- विशालतायाः फलमापुः । पिमलं कीपी-भवध चेतः कथयत्येव हितैषिणं रिपुं च ।' 'दति न्यायन स्वान्त करणवृत्तिप्रामाण्यादेव विश्रब्धं दरित्यर्थः । स फीचकर्मागतपूर्णरन्त्रैः कूजद्भिरापादितवंशहत्यम् । मुश्राव कुवेषु यशः स्वमुश्चरागीयमानं चनदेयताभिः ॥१२॥ म दिलीपो मारुतपूर्णरन्चैः अत एव जद्विः स्वद्भिः । कीचर्वणविशेषः । विणवः वीचमास्ते स्युर्य म्वनन्त्यनिलोदताः' इत्यमरः । वंशः सुपिरवायविशेषः । वंशादिकं तु मुपिरम्' इत्यमर, आपादित सम्पादित वंशस्य कृत्य कार्य यस्मिन्कमणि तत्तया । र लनाहषु (निराकुजी या भोये लतादिपिहिनोदरे' इत्यमरः वन- देवताभिष्ट्रीयमानमुथैीयनानं म्यं यशः अथाव श्रुतवान् । गृतस्तुपारगिरिनिझराणामनोकहाकम्पितपुष्पगन्धी । तमानपक्लान्तमनातपत्रमाचारपूतं पचनः सिपवे ॥१३॥ गिरिषु निराणां वारिप्रवाहाणाम् । वारिप्रवाही निझरो क्षरः' इत्यमरः तपारः मीरः। तपारी हिममीवरौं' दाँत शाश्वत्तः । पृक्तः संपृक्तोऽनोरहानां वृक्षाणामा- एपितानीप कम्पितानि पुष्पाणि ते यो गन्धः सोऽस्यास्तीति आकम्पितपुष्प- गया । पकम्पितपुष्पगन्धवान् । एवं शीनो मन्दः मुरभिः पवनो वायुरनातपत्रं.

१०४ संस्कृत-काव्य-लहरी - व्रतार्य परिहृतरछत्रम् । अतएवानुपकालमाबारेग पूतं शुद्धं तुं भूपं सिपेवे । आचार- पूतन्वात्म राजा जगत्पावनस्यापि सेन्य आसीदिति भावः । शशाम वृष्ट्यापि विना दवाग्निरासीद्विशेषा फलपुष्पवृद्धिः। जनं न सत्त्वेप्यधिको ययाधे तस्मिन्वन गोप्तरिगाहमाने ॥१॥ गोपरि तस्मिप्राज्ञि बन गाहमाचे प्रविशति वृष्टया विनापि । देवामिः । दवदायी वनानले' इति हेम शाम । पानां पुप्पाणां च वृद्धिः। विशेष्यत इति विशेषा । अतिशयितीसौन् । किमर्थि घन् प्रत्ययः । सत्वेषु जन्तुषु मध्ये । यिनश्च निर्धारणम्' इति सप्तमी अधिकः प्रबलो व्याधादिस्नं दुर्बले हरिणादिक न बधाधे । संचारपूतानि दिगन्तराणि त्या दिनान्ते निलयाय गन्तुम् । प्रचक्रमे पल्लवरागतामा प्रभा पतनस्य मुनेश्च धेनुः ॥१५॥ पर वस्य रागो वर्ण पदवरागः । 'गोऽनुरक्ती मात्सर्यशादी लोहितादिषु' इति शादत. । म एव ताम्रा पध्वरागताम्रा पतस्य सूर्यस्य प्रभा कान्तिः । पतरः पक्षिमूर्ययोः' इनि शाश्वतः मुनेनुश्च दिगन्तराणि दिशामवकाशान् । 'अन्तरमवाशा. वधि परिधान्तधिभेदतादये' इत्यमरः। मंचारेण पूनानि शुद्धानि कृत्वा दिनान्ते सायंकाले निलयायास्तमयाय, धेनुपर्व आलयाय चागन्तुं प्रचश्मे। तां देवतापित्रतिथिक्रियार्थामन्यग्ययौ मध्यमलोकपालः । घमौ च सा तेन सतां मतेन धद्धव साक्षाद्विधिनोपपना ॥१६॥ मध्यमलोपालो भूपालः देवनापिनतिथीनां क्रिया यागध्राद्धदानानि ता एवार्थ- प्रयोजनं यस्यामा धेनुमन्वगनुपदं ययौ । 'अन्वगन्वक्षमनुगेऽनुपदं शोबमध्ययम्' इत्यमरः । गता मतेन सद्विान्येन । 'मतिथुद्धि-' इत्यादिना वर्तमाने कः । 'क्तस्य च वर्तमाने' इति पटो। तेन राज्ञोपपन्ना युक्ता सा धेनुः । सता मतेन विधिनानुटा- नेनोपपन्ना युक्ता साक्षात्प्रत्यक्षा श्रद्धान्तिक्यबुद्धिरिव । वी च । स पल्बलोत्तीर्णवराहयूथान्यावासवृक्षोन्मुखबर्हिणानि । ययो मृगाध्यासितशादलानिश्यामायमानानि चनानि पश्यन् ।।१७।। स राजा । पत्वलेभ्योऽन्यजत्राशयेभ्य उत्तीर्णानि निर्गतानि वराहाणां यूथानि फुलानि येषु तानि । यहाँण्येषां सन्तीति बहिणा मयूराः 'मयूरो पहिणो वहीं इत्यमरः । “फलबहायामिनप्रत्ययो वक्तव्य । भावामदृष्टापामुमुया बर्दिया येषु तानि स्यामायमानानि बराबहिणादिमलिनिम्ना अश्यामानि स्यामानि भवन्ति इति रघुवंशम् संजीविन्या समेतम् १०५ श्यामायमानानि । 'लोहितादिहारभ्य क्यम्' इति क्यम्प्रत्ययः । वाक्यष' इत्यात्मनेपदे शानच् । मृगैरन्यामिना अधिष्टिनाः शाहलाः येषु तानि । शादाः शप्पाण्येषु देशेषु मन्तीति शादलाः शष्पश्यामेदशाः । 'शाद्वलः शादहरिते' इत्यमरः । शादः कर्दम- शपयोः' इति विश्वः। 'नडशादाद् ड्वलच् इति इवलम्प्रत्ययः । वनानि पश्यन्ययौ । आपीनभारोद्वहनप्रयताद् गृष्टिगुरुत्याद्वपुपो नरेन्द्रः। उभावलंचक्रतुरश्चिताभ्यां तपोवनावृत्तिपथं गताभ्याम् ॥१८॥ गृष्टिः सकृत्प्रसूता गौः । 'मकृत्प्रसूता गौष्टिः' इति हलायुध । नरेन्द्रश्च। उभौ यथाक्रमम् । आपीनमूधः । 'ऊधस्तु क्लीवमापीनम्' इत्यमरः । आपीनस्य भारोबहने प्रयनात्प्रयासान् । वपुषो गुरुत्वादाधिक्याच । अचिताभ्या चारुभ्यां गताम्यां गमना- भ्यां तपोवनादावृत्त. पन्या आवृत्तिपयस्तं तपोवनावृत्तिपथम् । 'ऋक्पू:-' इत्यादिना समासान्तोऽप्रत्ययः । अलंचकनुभूषितवन्तौ । वसिष्ठधेनोरनुयायिनं तमावर्तमानं यनिता धनान्तात् । पपी निमेपालसपक्ष्मपंक्तिरुपोषिताभ्यामिव लोचनाभ्याम् ॥१९॥ वसिष्टधेनोरनुयायिनमनुचरं वनान्तादावर्तमानं प्रत्यागतं तं दिलीपं वनिता मुदक्षिणा । निमेषेष्वलसा मन्दा पश्मणां पतिर्यस्याः सी निनिमेषा सतीत्यर्थः । लोचनाभ्यां करणाभ्यां । उपोषिताभ्यामिव । उपवासो भोजननिवृत्तिः। तद्वद्भयामिव । वमतेः वर्तरि क्तः । पपी । यथोपोषितोऽनितृष्णया जलमधिकं पिबति तद्वदतितृष्णया- विकं व्यलोक्यदित्ययः । पुरस्कृता वर्मनि पार्थिवेन प्रत्युद्गता पार्थिवधर्मपत्न्या। तदन्तरे सा विरराज धेनुर्दिनक्षपामध्यगतव सन्ध्या ॥२०॥ वर्मनि पार्थिवेन पृथिव्या ईश्वरेण । 'तस्येश्वरः' इत्यप्रत्ययः । पुरस्कृनाप्रतः कृता । धर्मस्य पन्नी धर्मपत्नी । धर्मार्थपत्नीत्यर्थः । अश्वघासादिवत्तादर्ये पटीसमासः । पार्थिवस्य धर्मपन्न्या प्रन्युद्गता मा धेनुस्तदन्तरे तयोर्दम्पत्योर्मध्ये। दिनक्षत्योदिन- राज्योर्मध्यगता मंन्येव विरराज । प्रदक्षिणीयत्य पयस्विनी तां सुदक्षिणा साक्षतपात्रहस्ता। प्रणम्य चानर्च विशालमस्याः शृङ्गान्तरं द्वारमिवार्थसिद्धेः ॥२१॥ असताना पात्रेण सह वर्तते इति साक्षनपात्रौ हस्ती यस्याः सा मुदक्षिणा पयस्विनी प्रशस्तक्षीरी नां धेनु प्रदक्षिगीकृत्य प्रणम्य च तस्या धेन्या विशालं शृशान्तर संस्कृत-काव्य-सहरी . गदमयं । अर्थाद्धः कार्यमिद्धे. द्वारं प्रवेगनामिव । भानावामान - तभीवादिकारि । वत्सोत्सुकापि स्तिमिता सपर्या प्रत्यग्रहीत्सति ननन्दतुस्तौ । भन्योपपत्रेषु हि तद्विधानां प्रसादचिह्नानि पुरःफलानि ॥२२॥ सा धेनुवन्योन्मुकापि वन्म उत्कण्टिनापि स्तिमिता निश्चला मनी रूपयां पूत्रा प्रत्यहीदिति हेवोस्ती दमनी ननन्दनुः । पूजातीकारस्यानन्दहेतृत्वमाह-भक्त्येति । पूज्यप्वनुरागो भात । तयोपपनेषु युक्तेषु विपये तद्विधानाम् - तन्या धेन्वा विधेत्र विधाप्रकारो येषा नेपाम् । महतामिन्यर्थः । प्रसादम्य चिहानि लिहानि पूजाम्ब कारा- दीनि पुर फलानि पुरोगनानि प्रत्यामन्नानि फानि तानि हि । अविलम्बितरल- सूचालिङ्गदर्शनाडानन्दो युज्यत इत्यर्थ । गुरोः सदारस्य निपीड्य पादौ समाप्य सांध्यं च विधि दिलीपः। दोहावसाने पुनरेव दोग्धीं भेजे भुजोच्छिन्नरिपुर्निपण्णाम् ॥२३॥ भुजोन्टिन्नरिपदिलीपः मदारस्य दारैरहन्धन्या स्ह वर्तमानस्य गुरोः । उभयोरपाव्यर्थ । 'भार्या जायाय पुं भूनि दारा' इत्यमरः । पादौ नि च्याभिवन्ध । मोध्ये मध्याया विहितं विधिमनुष्टानं च ममाप्य । दोहावसाने निनामा मीनां दोधी दोहनशीलाम् । 'तृन्' इति वृन्प्रन्ययः । धेनुमेव पुनर्भेजे मेविनवान् । दोग्धीमिति निरुपपदप्रयोगालामधेनुवं गम्यने । तामन्तिकन्यस्तवलिमदीपामन्यास्य गोता गृहिणीसहायः। क्रमेण सुप्तामनु संविवेश सुप्तोत्थितां मातरनूदतिष्ठत् ॥२४॥ गोप्ता रक्षये गृहिणीसहाय पनद्वितीयः सन् । उभानपीन्यर्थ । अन्ति के न्यस्ता बलय प्रदीपाश्च यस्यास्ता तथोक्ता ता पूर्वत्तिां निपग्णां धेनुमन्वास्यानूर- विदय नामेग मुतामन्वनन्तरं संविवेश सुश्वाप । प्रान मुप्तास्थिताननूदतिदुन्धित- वान् । अत्रानुनन्देन धेनुरात्रव्यापारयोः पौरियमुच्यने नमशन्देन धेनुघागरागा- मेव इन्यपानरतत्वम् । 'धर्मप्रवचनीययुक्त-' इति द्विनीया । इत्थं व्रतं धारयतः प्रजाथै समं महिप्या महनीयकीतः। सप्त व्यतीयुस्त्रिगुणानि तस्य दिनानि दीनोदरणोचितस्य ॥२५॥ दत्यमनेन प्रकारेण प्रजायं संनानाय महिप्या समनभिषिक्तान्या मह । 'कृताभिषेरा महिपी, इत्यमरः । धारयनः महनीया पूज्मा कीर्तिस्य तस्य । N रघुवंशम् संजीविन्या समेतम् १०७ टीनानामुदरगं दन्यविमोचनं तत्रोचितस्य परिचितस्य तस्य नृपम्य । यो गुणा आवृत्तयो येथा नानि त्रिगुणानि त्रिरावृत्तानि मप्त दिनान्येकविंशतिदिनानि व्यतीयु । अन्येधुरात्मानुचरस्य भावं जिग्रासमाना मुनिहोमधेनुः । गङ्गाप्रपातान्तविरूढशष्पं गौरीगुरोर्गद्वरमाविवश ॥२६॥ अन्ययुग्न्यम्मिन्दिने-द्वाविंशे दिने । 'मद्य, परत्परारि-' इत्यादिनानिपातना- दव्ययन् । 'अयात्रान्दायपूर्वेऽन्यादी पूर्वोत्तरापरात् । तथाऽधरान्यान्यतरेतरात्पूर्व- युरादय' इत्यमर । मुनिहोमवेनु । आम्मानुचरस्य भावमभिपायं दृढभकिन्वम् । 'भानोऽभिप्राय आराय' । इति यादवः । विज्ञाममाना ज्ञातुमिच्छन्ती । 'ज्ञाश्रुस्मृशा मनः' इत्यान्मने पदे मानच् । प्रपतन्यम्मिन्निति प्रपात- पतनप्रदेशः । गङ्गायाः प्रपाता. न्तस्तस्यान्ते माप विष्टानि जातानि राष्पाणि चालतृणानि यम्मिस्तत् । 'शप्पं बालतृगं घाग.' इत्यमरः । गौरीगुरो पार्वतीपितुर्गह्वरं गुहामाविवेश । सा दुष्प्रवर्ग मनसापि हिनैरित्यदिशोभाप्रहितेक्षणेन । अलक्षिताभ्युत्पतनो नृपण प्रसहा सिंहः किल तां चकर्ष ॥२७॥ मा धनुर्दियावादिभिर्मनमापि दुष्प्रर्षा दुषति हेतोहिशोभाया प्रहि. तंत्रगेन दत्तदृष्टिना नृपेमालक्षिनमभ्युपतनमाभिमुन्यनोत्पतनं यस्य स सिंहस्ता धेनु प्रयता हटान् । 'प्रमहा नु हटार्थकम्' इत्यमरः । चकर्ष मिलत्यलीक । तीयमानन्दितमार्तसाधोगुहानिबद्धमतिशब्ददीर्घम् ररिमविवादाय नंगेन्द्रसक्तां निवर्तयामास नृपस्य दृष्टिम् ॥२८॥ गुदानितद्धन प्रतिमन प्रनिश्चनिना दोघम् । तम्या इदं तदीयम् । आकन्दि- तमार्तपोषगम् । आर्ते वापन्नेषु साधोहितकारि गो नृपस्य नगेन्दमका दृष्टिं रदिमपु प्रग्रहणु । किरणप्रग्रही रदमी इत्यमरः। आदायेव गृहीत्वेव निवर्तयामाम । स पाटलायां गयि तस्थियांसं धनुर्धरः केमरिणं ददर्श। अधित्यकायामिव धातुमय्यां लोधद्रुमं सानुमतः प्रफुल्लम् ॥२९॥ धनुधरः म नृपः पाटलाया रक्तवर्माया गवि तस्थिवानं स्थितम् । 'बवमुश्व इति वमु प्रन्ययः । कमरिगं गिदम् । मानुमतोऽः। धातोगरिकस्य विकारो धातुमयी तस्यामधियायामूर्वभूमी । 'उपन्यादरामनाभूमिमधित्यका' इत्यमरः । 'उमाविन्या स्थानासन्नास्टयोः' इति त्यान्प्रत्ययः। प्रफुटं विकमितम् । 'फुट विकाने इति धातोः पचायच । 'प्रफुटम् इति तसर-शाले 'निकला विसरणे' इति धातोः कतीर तः । 'उपरस्यात' इत्युगरादेम । लोनारय ममिर ददर्श । - संस्कृत-काव्य-लहरी करः ततो मृगेन्द्रस्य मृगेन्द्रगामी वधाय वध्यस्य शरं शरण्यः। जाताभिपहो नुपतिनिपङ्गादुचर्तुमै छन्मसभोद्धतारिः ॥३०॥ ततः सिंहदर्शनानन्तरं मृगेन्द्रगामी मिंदगामी । शरणं रक्षगम् । 'शरणं रक्षगे गृह' इनि यादरः। शरणे माधुः दारण्यः । 'तन साधुः' इति यत्प्रत्ययः । प्रमभेन बलात्कारेणोदृनाभरयो येन म नृपती राजा जाताभिषहो जानपराभवः सन् । 'अभिपहः पराभवे' इत्यमर । वयस्य वाहस्य । 'दण्डादिभ्योयः' इति य प्रत्ययः । मृगेन्द्रस्य वधाय नियंगात् तृगीरान् । 'तूणोपासतणीरनिषहा दपुधियोः' इत्यमरः । शरमुर्नुमैग्छन्। वामेतरस्तस्य प्रहर्तुनखमभाभूपित कङ्कपत्रे । सक्तांगुलिः सायकपुङ्ग चित्रार्पितारम्भ इवायतम्ये ॥३१॥ प्रहनुस्तस्य वामेतर: दक्षिगः कर. । नखप्रभाभिभूषितानि विछुरिनानि कदस्य पक्षिविशेषस्य पनाणि यस्य तम्मिन् । 'पद्धः पक्षिविशेष स्याद्गुप्ता शारे युधिष्टिरे' इति विश्वः । कदुस्तु कटः इनि यादव. । सायकस्य पुंस एव वर्तयोख्ये मूरप्रदेशे 'कर्तरी पुढे ति यादव । सत्तालिः सन् । चित्रार्पिनारम्भवित्रा- लिखितशरोद्धरणोद्योग इव । अवतस्थे । बाहुमतियम्भविद्धमन्युरभ्यर्णमागस्कृतमस्पृशद्भिः। राजा खतेजोभिरदद्यतान्त गीय मन्त्रीपधिरुद्धयीयः ॥३२॥ बाहोः प्रतिष्टम्भेन प्रतिबन्धेन । 'प्रतिरन्ध- प्रतिष्टम्भः' इत्यमर विवृद्धमन्युः प्रवृद्धरोपो राजा । मन्त्रीपधिभ्यां रदवीर्यः प्रतियशक्तिभोगी सर्प इव । 'भोगी राजभुजंगयोः' इति शाश्वत । अभ्यर्गमन्तिकम् । उपरण्ठान्तिाभ्यर्णाभ्यना अभितोऽव्ययम् । इत्यमरः । आगस्कृतमपराधरारिणमरपृशद्भिः सजोभिरन्तर- दद्यत । 'अविरायमन तेज प्राणान्ययेष्वपि' इति यादवः । तमार्यगृह्यं निगृहीतधेनुर्मनुष्ययात्रा मनुवंशकेतुम् । विमाययन्विस्मितमात्मवृत्ती सिंहोरुसत्त्वं निजगाद सिंहः ॥३३॥ निगृहीता पीडिता घेनुयन मदिआर्याणां सना गृच पश्यम् । 'पदास्वैरि. याद्यापश्येषु च' इति क्यम् । मनुवंशस्य केतुं चिद केतुक्रव्यावर्तकम् । मिह दवोर- मरवो महायलस्तम् । आन्मनोवृत्ती याहुस्तम्भम्पे व्यापारेऽभूतपूर्ववाहिम्मितम् । कतरिक्तः । तं दिलीप मनुष्यत्राचा करणेन पुनर्विम्मायर्यान्वस्मयं आश्चर्य प्रापयनि- -

रघुवंशम् संजीविन्या समेतम्
१०९
जगाद । लिङ् ईपद्धसने' इति धातोणिचि वृद्धावायादेशे शतृ प्रत्यये च सति
विस्माययनिति रूपं सिद्धम् । “विस्मापयन्' इति पाठे पुगागममात्रं वक्तव्यम् । तच्च
'नित्यं मयतेः' इति हेतुभयविवक्षायामेवेति 'भीरम्योहेनुभये' इत्यात्मनेपदे विस्माय-
यनिति रूपं सिद्धम् । करणविवक्षायां न कश्चिदोषः ।
अलं महीपाल तव श्रमेण प्रयुक्तमप्यस्त्रमितो वृथा स्यात् ।
न पादपोन्मूलनशक्ति रंहः शिलोचये मूर्च्छति मारुतस्य ॥३४॥
हे महीपाल, तव अमेणालम्। माध्याभावाच्छ्मो न कर्तव्य इत्यर्थः अत्र
गम्यमानसाधनक्रियापेक्षया श्रमस्य करणत्वानृतीया । उकं च न्यामोद्योते-'न
केवलं धूयमाणैव क्रिया निमित्तं करणभावस्य अपि तर्हि गम्यमानापि' इति । 'अलं
भूपपर्याप्तिशतिवारणवाचकम्' इत्यमरः। इतोऽस्लिन्मयि । सार्वविभक्तिकस्तसिः ।
प्रयुक्तमप्यत्रं वृथा स्यात् । तथाहि । पादपोन्मूलने शक्तियस्य तत्तथोक्तं मारुतस्य
रंहो वेगः शिलोच्चये पर्वते न मूर्छति न प्रसरति ।
फैलासगौर वृपमारुरुक्षोः पादार्पणानुग्रहपूतपृष्ठम् ।
अवेहि मां किं करमष्टमूर्तेः कुम्भोदरं नाम निकुम्भमित्रम् ॥३५॥
कैलान इव गौरः शुभ्रस्तम् । 'चामाकरं च शुभ्रं च गौरमाहुर्मनीषिणः' इति
शाश्वतः वृष वृषभमारुरक्षोरारोदुमिच्छेः । खस्योपरि पदं निक्षिप्य वृषमारोहतीत्यर्थः ।
अष्टौ मूर्तयो यस्य स तस्याष्टमूर्तेः शिवस्य पादाणं पादन्यासतदेवानुग्रहः प्रसादस्तेन
पूतं पृष्ठं यस्य तं यथोकं निकुम्भमित्रं कुम्भोदरं नाम किंजरं मामवेहि विद्धि । पृथिवी
सलिलं तेजो वायुराकाशमेव च । सूर्याचन्द्रमयौ सोमयाजी चेत्यष्टमूर्तयः' इति यादवः।
अमुं पुरः पश्यसि देवदारं पुत्रीकृतोऽसौ वृषभध्वजेन ।
यो हेमकुम्भस्तननिःसृतानां स्कन्दस्य मातुः पयसां रसशः॥३६॥
पुरतोऽप्रतोऽमुं देवदार पश्यसि । इति काकुः । असौ देवशमः वृषभो बजे
यस्य स तेन शिवेन पुत्रीकृतः पुत्रत्वेन स्वीकृतः । अभूततद्भाचे चिः । यो देवदामः
स्कन्दस्य मातुरौर्या हेम्नः-घुम्भ एव स्तनम्नन्नान्निमृतानां पयसानम्वूनाम् । रमज्ञः
सादतः । स्कन्दपक्षे हेमकुम्भ इव स्तन इति विग्रहः । पयसां भोराणाम् । पयसा
क्षाराणाम् । 'पयः क्षीरं पयोऽम्बु च' इत्यमरः । स्कन्दममानप्रेमासदमिति भावः ।
कण्डूयमानेन फटं कदाचिदन्यद्विपेनोन्मथिता त्यगस्य ।
अथैनमनेस्तनया शुशोच सेनान्यमालीदमिवासुराः ॥३७॥

संस्कृत-काव्य लहरी कदाचित्कटं कपोल काइयमानेन प्रर्षयता। कण्वादिभ्योयम्' इति यत् । तत शानन् । वन्यद्विपेनास्य देवदारोस्त्वगुन्मथिता । अथादेननया गौरी अमुराने- रालीदं क्षतम् । गेनां नयनीति सेनानीः स्कन्दः। पार्वतीनन्दनः सन्दः मेनानी' इन्यमरः ‘मरसूद्विप-' इत्यादिना विष । तमिर एनं देवदाई शुशोच । तदारभृत्येव वनद्विपानां प्रासार्थमस्मिन्नहमद्रिकुक्षी। व्यापारितः शूलभृता विधाय सिंहत्वमहागतसत्त्ववृत्तिः ॥३८॥ तदा तत्काल प्रमनिरादिस्मिनमणि तत्तया नदाप्रमृत्येव वनविपाना त्रासार्थ भयाथं शूलमृता शिवेन । अव समीपमागताः प्राप्ताः मत्त्वाः प्राणिनो वृत्तिम्मिनन् । 'अव समीप उन्सझे बिहे स्थानापराधयो' इति केशवः । मिहत्वं विधाय । अम्मिन्नद्रिपुक्षी गुहायामदं व्यापारितो नियुक्तः । तस्पालमेपा क्षुधितस्य तृप्त्यै प्रदिष्टकाला परमेश्वरेण । उपस्थिता शोणितपारणा मे सुरद्विपश्चान्द्रमसी सुधेय ॥३९॥ परमेश्वरेण प्रदिष्टो निर्दिष्टः कालो भोजनवेला यस्याः स्रोपस्थिता प्राप्तिमा गोला शोणितपारणा रुविरस्य प्रतान्तभोजनम्। सुरद्विषो राहोः चन्द्रमस इयं चान्द्र- ममी मुधेव । लुधितस्य घुभुक्षितस्य तम्यागतमत्वात्तैमें मम सिंहस्य तृपया अलं पर्याप्ता । 'नम. स्वम्नि' इत्यादिना चतुर्थी। स त्वं निवर्तम्य विहाय लजां गुरोर्भवान्दर्शितशिप्यमक्तिः । शस्त्रेण रक्ष्यं यदशक्यरक्षं न तद्यशः शखभृतां क्षिणोति ॥३०॥- स एवमुशायशन्यावं लजां विहाग निवर्तन्छ । भास्त्वं गुरोर्दर्शिता प्रकाशिता शिष्यभ्य कर्नव्या भक्तियन स तीनोऽनि । ननु गुरुवनं विनादय क तन्ममीप गच्छयमन आह शनंगेति । रयिं धनं काग्रे गायुयेन । 'शनमायुधलोहयो.' इत्यमरः । अगस्या रक्षा यम्य तदशवरक्षम् । रक्षितुमगायमित्यर्थः । तद्रव्यं नष्टमपि शम्रता यशो न तिगोति न दिननि । अशक्यावअतिरिधान न दोषायेति भावः । इति प्रगल्भं पुरुपाधिराजो मृगाधिराजम्य घचो निशम्य । प्रत्याहृतास्त्री गिरिशप्रभावादारमन्यवहां शिथिलीचकार ॥४१॥ पुरुषाणामधिराजो नृपं इति प्रगभं मृगाधिराजम्य वचो निशम्म श्रुत्वा गिरिसस्पेश्वरस्य प्रभावान्प्रत्याहृतानः पुष्टिताम्नः सनात्मनि विषयेऽवज्ञापमानं शिथिलीचकार । नन्या नेत्यर्थः । अवज्ञानोऽहमिति निर्वेदं न प्रापेत्यर्थः । ममानेषु हि क्षत्रियाणामभिमानो न सर्वेश्वरं प्रतीति भावः ।

रघुवंशम् संजीविन्या समेतम् प्रत्यद्रवीचैनमिपुप्रयोगे तत्पूर्वभङ्गे वितथप्रयत्नः। जडीरुतस्त्रयम्बकवीक्षणेन वनं मुमुक्षन्निव वज्रपाणिः ॥४२॥ स एव पूर्वः प्रथमो भगः प्रतिबन्धो यस्य तस्मिस्तत्पूर्वभहू इपुप्रयोगे वितथ- प्रयत्रो विफलप्रयासः। अतएव वघ्नं कुलिशं मुमुक्षन्मोक्नुमिच्छन् । अम्बकं लोचनं 'दग्दृष्टिनेत्रलोचनचक्षुर्नयनाम्बवेक्षणाक्षीणि' इति हलायुधः। त्रीण्यम्बकानि यस्य स त्र्यम्बरो हरः । तस्य वीक्षगेन जडीकृतो निष्पन्दीकृतः वनं पाणौ यस्य स वज्रपा- गिरिन्दः । 'प्रहरणार्थेभ्यः परे निष्टामप्तम्यौ भवन इति वक्तव्यम्' इति पाणेः सप्तम्यन्तस्योत्तरनिपातः । स इव स्थितो नृप एनं सिंह प्रत्यव्रवीच । 'वाहुं सवज्नं शक्रस्य दस्यास्तम्भयत्प्रभुः' इति महाभारते। संरुद्धचेष्टस्य मृगेन्द्र कामं हास्य वचस्तद्यदहं विवक्षुः। अन्तर्गतं प्राणभृतां हि वेद सर्वं भवान्भाधमतोऽभिधास्ये ॥४३॥ हे मृगेन्द्र, संरुद्धचेष्टस्य प्रतिबद्धव्यापारस्य मम तद्वचो वाक्यं कामं हास्य परिहमनीयम् । यद्वचः 'स त्वं मर्दीयेन' (२॥ ४५) इत्यादिकमहं विवक्षुर्वक्तुमिच्छु- रस्मि । तर्हि तूष्णी स्थीयतामित्याशयश्वरकिंवरत्वात्सर्वशं त्वां प्रति न हास्यमित्याह अन्तरिति । हि यतो भवान् प्राणभृतामन्तर्गतं हृद्रतं वाग्वृत्या यहिरप्रकाशितमेव सर्व भावं वेद वेत्ति । 'विदो लटो वा । इति णलादेशः। अतोऽहमभिधास्ये वक्ष्यामि । वच इति प्रकृतं कर्म सम्बध्यने । अन्ये त्वीदृग्वचनमाकासंभावितार्थमेतदित्युप- हसन्ति । अतस्तु मौनमेव भूषणम् । त्वं तु वाङ्मनसयोरेकविध एवायमिव जानामि । अतोऽभिधास्ये यद्वचोऽहं विवचरित्यर्थः । मान्यः स मे स्थावरजंगमानां सर्गस्थितिप्रत्यवहारहेतुः । गुरोरपीद धनमाहिताग्नेनश्यत्पुरस्तादनुपेक्षणीयम् ॥४४॥ प्रत्यवहारः प्रलयः। स्थावराणां तहशैलादीनां जंगमानां मनुष्यादीनां सर्ग- स्थितिप्रायवदारेषु हेतुः म ईश्वरो मे मम मान्यः पूज्यः । अलव्यशासन इत्यर्थः । शामनं च "सिंहत्वमागतसत्त्ववृत्ति' (२ । ३८) इत्युक्तरूपम् । तर्हि विमृज्य गम्यताम् । नेत्याहगुरोरपीति । पुरस्तादो नश्यदिदमाहिताग्नेगुरोर्धनमपि गोरूपमनु. पेक्षगीयम् । आहितामेरिति विशेषणेनानुपेक्षागरणहविः साधनत्वं सूचयति । स त्वं मदीयेन शरीरवृत्ति देहेन निर्वर्तयितुं प्रसीद । दिनावसानोत्सुकंयालयत्सा विसृज्यतां धेनुरियं महः ॥१५॥ ।

संस्कृत-काम्य-लहरी । नववृत्तिरच मान देहेन शरीरस वृत्ति नं निरनि सम्म दयितुं प्रद। दिन दान रन्मुधे मना मनियर युमितो करबन्यो यस्ताः मा मडारि धेनुर्विमध्यान्। भयान्धकारं गिरिगदरापां दंष्ट्रामयूखैः सकलानि कुर्यन् । भूयः स भूतेश्वरपार्श्ववता किंचिद्विहस्वार्थपति बमापे ॥४॥ अय भनेवरस पानुचरः न हो निरेगहरा गुहानान् । 'देवसर, दिले गुहा। बहरम्' इत्यमरः । अपार पन्तं दंघ्यन्यूनः शानि सम्मान कुर्वन् । निरसहिचर्यः। प्रिंदिहस्पावनि नरं मुबो बनाये। हान घरम्म् 'अस्स हेतोहानुनिन्छन् (२०४७) इति वचनामयम् । “एकातपत्रं जगतः प्रभुत्वं नवं वयः कान्तमिदं वपुश्च । अल्पत्य हेतोयहु हातुमिच्छन्धिवारमूढः प्रतिभासि मे त्वम् ।। रचनायनेच्यं जगतः अनुवं समिनन् । न वने क्षेत्रनम् । इदं चन्न रम्य वध । इसे बहु। अपस्स हेलोरमेन कारपेन । अचफ्तार यर्थः । 'पटी हेतुपयन' इति पट। हातुं त्वानुमेन्टस्त्र विचरे कमविनसे मूढो मतों में मन प्रतिभामि। "भूनानुकम्पा तय चेदियं गौरेका भवन्तस्तिमनी त्वदन्ते । जीवन्पुनः सम्वदुपप्लवेभ्यः प्रजाः प्रजानाय पितेव पासि aven न भूदे चनुाना का न्। 'का दबनुन्ग सार' इन्चनरः । क्षेत्र वर्तते चेदिन्यः । ताई लदने तब ना मानेर गौः सोस्न नमस्का अति वस्ननली मवेद । दियः। 'सस्वाश नम्बा' इत्परः । हे प्रमानाय, जीवन्तुनःनिदेव प्रजा दसप्लान्यो विप्नेन्या क्षमदा। 'पुनः महारयोः सवर' इत्परः । पानि रमाने । खगायनच्धेनुरक्षादरं जीविटेनर सवदलिजपना- - - न घनसादिय प्रवृत्तिः, किन्नु गुलममादित्यत आइ- अकयेनोपरापवण्डा गुरोः समानुप्रतिमादिमपि। शक्योऽयमन्युर्मयता विनेतुंगाकोटिशासयताघटोनी ॥४॥ अपेलि पभानरे। अपा। र धेनुर्मस तस्मात् । अमरगो- पन्यास दाते शेषन् । अन एराधे गोमेददरसेनते चन्दादतिग्रेनात्। चन्द- रघुवंशम् संजीविन्या समेतम् । स्त्वत्यन्त कोपनः' इत्यमरः अतएव कृशानुः प्रतिमोपमा यस्य तस्मादग्निकल्पाद्गुरो- विभपि । इति काः । 'भीत्रार्थानां भयहेतु' इत्यपादानात्पञ्चमी । अल्पवितस्य धनहानिरतिदुःसहेति भावः । अस्य गुरोर्मन्युः क्रोध । 'मन्युर्दन्ये ऋतौ अधि' इत्यमरः । पटा इवोधामि यामां ता घटोनीः। 'अधसोऽनङ्' इत्यनडादेशः । बहुबी हेरधसो डीप्' इति दी। कोटिशो गाः स्पर्शयता प्रतिपादयता । 'विश्राणनं वितरण स्पर्शनं प्रतिपादनम्' इत्यमरः ।भवता विनेतुमपनेतुं शक्यः । "तदक्ष कल्याणपरम्पराणां भोक्तारमूर्ध्वस्खलमात्मदेहम् । महीतलस्पर्शनमात्रभिन्नमृद्धं हि राज्यं पदमैन्द्रमाहुः ॥१०॥ तत्तग्मारकारणात् कल्याणपरम्पराणां भोक्तारम् । कर्मणि पष्टी । ऊर्जा यलमस्या- स्तीति ऊर्जखलम् । 'ज्योत्स्नातमिला-'इत्यादिना वलच्यत्ययान्तो निपातः । आत्म- देहं रक्ष । ननु गामुपेक्ष्यात्मदेहरक्षणे खर्गहानिः स्यात् । नेत्याह-महीतलेति । ऋद्ध समृद्ध राज्यं महीतलस्पर्शनमात्रेण भूनलसम्बन्धमात्रेण भिन्नमैन्द्रमिन्द्रसम्वन्धि पदं स्थानमाहुः । स्वर्गान भिद्यत इत्यर्थः । एतावदुफ्त्वा विरते मृगेन्द्र प्रतिस्वनेनास्य गुहागतेन । शिलोच्चयोऽपि क्षितिपालमुच्चैः प्रीत्या तमेयार्थमभापतेव ॥५१॥ मृगेन्द्र एतावदुक्त्वा विरते सति गुहागतेनास्य सिंहस्य प्रतिस्वनेन शिलोचयः शैलोऽपि प्रीत्या तमेवार्थ क्षितिपालमुच्चैरभापतेव । इत्युत्प्रेक्षा । भापिरयं वृविसमाना- यत्वाद्विर्मकः । विस्तुद्विमकेषु पठितः । तदुत्तम्-‘दुहियाचिरधिप्रच्छिजिशिचि- यामुपयोगनिमित्तमपूर्वविधौ । ब्रुविशासिगुणेन च यत्सचते तदकीर्तितमाचरितं कविना । इति । निशम्य देवानुचरस्य चाचं मनुप्यदेवः' पुनरप्युवाच । धेन्वा तदध्यासितकातराध्या निरीक्ष्यमाणः सुतरां दयालुः ॥५२॥ देवानुचरस्येश्वरकिंकरस्य सिंहस्य वाचं निशम्य मनुष्यदेवो राजा पुनरप्युवाच किंभूतः सन् । तेन सिंहेन यदध्यासित व्याक्रमणम् । नपुंसके भावे क्तः। तेन कातरे आधिगी यस्यास्वया । 'बहुनाही सक्थ्यश्णोः साझात्पन्' इति पच् । 'विद्रौरादिभ्य' इति दी । किं या वक्ष्यतीति भीत्येवं स्थितयेत्यर्थः । धेन्वा निरीक्ष्यमाणः अत एव मुतरी दयालुः सन् । मुतरामित्यत्र 'द्विवचनविभज्य-' इत्यादिना मुशब्दात्तरम् । 'किमेत्तिइन्यय' इत्यादिनाम्प्रत्ययः । 'तद्धितथासर्वविभक्तिः' इत्यव्यय संज्ञा ।

संस्कृत-काव्य-लहरी किमुवाचेत्याह-- क्षतात्किल पायत इत्युदनः क्षत्रस्य शब्दो भुवनेषु रूढः। राज्येन किं तद्विपरीतवृत्तः, प्राणैरुपक्रोशमलीमसैर्वा ॥५३॥ "क्षणु हिंसायाम्' इति धातोः संपदादित्वात्विम् । 'गमादीनाम्' क्षतो इति वक्तव्यादनुनासिकलोपे तुगागमे च तदिति रूपं सिद्धम् । जनो नाशात्वायत् इति क्षत्र । मुपीति योगविभागाकः । तामेता व्युत्पत्ति कविरर्थतोऽनुशाति-क्षतादि- त्यादिना । उदम उन्नतः क्षत्रस्य चत्रवर्णस्य गन्दः वाचकः चनशब्दइत्यर्थः । अता- स्वायत इति ध्युत्पत्त्या भुवनेषु ट क्लि प्रसिद्धः रालु । नाश्वकर्णादिवत्वेवलस्टः किन्तु पङ्कजादिवद्योगरूडः इत्यर्थः । ततः किमित्यत आह--तस्य चत्रशब्दस्य विपरीतवृत्तेविरुद्धच्यापारस्य क्षनवागमकुर्वतः पुमो राज्येन किम् । उपक्रोशमलीमसै- निन्दामलिनः । 'उपक्रोशो जुगुमा च कुरमा निन्दा च गईणे' इत्यमरः । 'ज्योत्स्ना- • तमिला-'इत्यादिना मलीमसान्दो निपातितः । 'मलीमसं तु मलिनं कच्चरं मलदूषि- तम्' इत्यमरः । तेः प्रार्णारिम् । निन्दितस्य सर्व व्यर्यमित्यर्पः । एतेन 'एशतपत्रम्' (२१४७) इत्यादिना भोकद्वयनोकं प्रत्युक्तमिति वेदितव्यम् । 'अथैकथेनो' (२१४८) इत्यत्रोत्तरमाह- कथं नु शक्योऽनुनयो महचिंधाणनाश्चान्यपयसिनीनाम् । इमामनूनां सुरभेरवेहि रुद्रोजसा तु प्रहृतं त्ययास्याम् ॥५४॥ अनुनयः क्रोधापनयः। चकारो वाकारार्थः। महरनुनयो वान्यासां पयखिनीनां दोग्ध्रीणां विधागनाहानात् । 'त्यागो विहापिनं दानमुन्मर्जनविगर्जने । विश्राणनं वितरणम् इत्यमरः कथं न शक्यः । न शम्य इत्यर्थ । अब हेतुमाह-इमा गां मुरभेः कामधेनोः । 'पचमी विभः' इति पञ्चमी अनूनामन्यूनामवेहि जानीहि । तर्हि क्यमस्याः परिभवो भूयादित्याह--शौजमेति । अस्या गवि त्वया ब; प्रहतं तु प्रहारस्तु । नपुंसके भावक्तः । स्ट्रीजयश्वरमामयन न तु खमित्यर्थः । 'सप्तम्यधि. करणे च' इति सप्तमी। तहि किचिर्षितमित्यत्रा:- पसेयं वदेहार्पणनिष्क्रयेण न्याय्या भया मोचयितुं भवत्तः। न पारणा स्यादिहता तवैवं भवेदलुप्तश्च मुनेः क्रियार्थः ॥५५॥ मयं गौर्मया निष्क्रीयते प्रत्याहियतेऽनेन परिगृहीतमिति निष्क्रयः प्रतिशपरम् । 'एरच्' इत्यत्र ययः । खदेहापणेमद निष्कयन्तेन । भवास्त्वत्त । पञ्चम्यास्तसिन् ।

रघुवंशम् संजीविन्या समेतम् मोचयितुं न्याय्या न्यायादनपेता। युक्तेत्यर्थः । 'धर्मपथ्यर्थ' इत्यादिना यत्प्रत्ययः । एवं मति तब पारणा भोजनं विहता न स्यात् । मुनेः क्रिया होमादिः स एवार्थः प्रयोजनम् । स चालुप्तो भवेत् । स्वप्राणव्ययेनापि खामिगुरुधनं संरक्ष्यमिति भावः । अत्र भवानेव प्रमाणमित्याह- "भवानपीदं परवानवैति महान्हि यत्नस्तव देवदारौ। स्थातुं नियोक्तुन हि शक्यम विनाश्य रक्ष्यं स्वयमक्षतेन ॥५६॥ परवान्खामिपरतन्त्रो भवानपि । परतन्त्रः पराधीनः परवान्नायवानपि' इत्यमरः ददं वक्ष्यमाणमवैति । भवतानुभूयत एवेत्यर्थः । 'शेषे प्रथम' इति प्रथमपुरुषः । विमित्यत आह- हि यस्माद्धेतोः। "हि हेताववधारणे इत्यमरः । तव देवदारी विषये महान्यत्रः। महता पन्नेन रक्ष्यत इत्यर्थः । इदं शब्दोक्तमयं दर्शयति स्थातु- मिति । रक्ष्य वस्तु विनास्य विनाशं गमयित्वा खयमक्षतेनाव्रणेन । नियुक्तेनेति शेषः । नियोक्तुः स्वामिनोऽग्रे स्थातुं शक्यं न हि। सर्वथा चैतदप्रतिहार्यमित्याह-- किमप्यहिंस्यस्तव चेन्मतोऽहं यशः शरीरे भव मे दयालुः । एकान्तविध्वंसिपु मद्विधानां पिण्डेष्वनामा खलं खलु भौतिकेषु ॥५७॥ किमपि किं वाहं तवाहियोऽवघ्यो मतभेहि मे यश एव शरीरं तस्मिन्दयालुः कारुणिको भव । 'स्याइयालुःकारुणिकः' इत्यमरः । ननु मुख्यमुपेक्ष्यामुख्यशरीरे कोऽभिनिवेशः । मत आह-एशन्तेति । मद्विधानां माहवानां विवेक्निामेकान्तवि- ध्वंसिघु अवश्यविनाशिषु भौतिकेषु पृथिव्यादिभूतविकारेषु पिण्डेषु शरीरेप्वनास्था सलवनपेक्षे । 'आस्था वालम्बनास्थानयत्नापेक्षामु कथ्यते' इति विश्वः । मौहादहमनुमरणीयोऽस्मीत्याद- सम्बन्धमाभाषणपूर्वमाहुर्वृत्तः स नौ झंगतयोर्वनान्ते। #- तद्भूतनाथानुग नाहसि त्वं सम्यन्धिनो मे प्रणयं विहन्तुम् ॥५८।। सम्बन्ध सरमम् । आभाषणमालापः पूर्व कारण यस्य तमाहुः। 'सादाभाषण- मालापः' इत्यमरः। स तारसम्बन्धो बनान्ते संगतयोन वादयोऽत्तो जानः तत्ततो हेनोहे भूतनाथानुग शिवानुचर । एतेन तस्य महत्त्वं सूचयति। अत एव संबन्धिनो • मिनस मे प्रणयं याच्नाम् । 'प्रयास्वमी। विथम्भयाचनाप्रेमाणः' इत्यमरः । विहन्तुं नाहमि।

सस्कृत-काव्यलहरी - तथेति गामुक्तवते दिलीपः सद्यः प्रतिष्एम्भधिमुक्कयाहुः । स न्यस्तशस्त्रो हरये खदेहमुपानयत्पिण्डमिवामिपश्य ॥५९॥ तथेति गामुक्तवते हरये सिंहाय । 'क्पी सिंह मुवणे च वर्ग विष्णो हरि विदुः । इति शाश्वत । सद्यस्तत्वणे प्रतिष्टम्भा प्रतिबन्धादिमुक्तो बाहुर्यस्य स दिलीपः ।न्यम्त- शवस्त्यचायुधः मन् । सदेवम् । आमिषस्य मासस्य । पसलं प्रव्यमामिपम् । इत्यमरः । पिण्डं कवलमिव । उपानयत्समर्पितवान् । एतेन निर्ममत्वमुक्तम् । तस्मिन्क्षणे पालयितुः प्रजानामुत्पश्यतः सिंहनिपातमुग्रम् । अपामुखस्योपरि पुष्पवृष्टिः पपात विद्याधरहस्तमुक्ता ॥६०॥ तस्मिन्क्षण उग्रं सिंनिपातमुत्पश्यत उत्पेक्षमाणस्य तय॑तोऽवामुखस्याधी- मुखस्य । 'स्यादवाटप्यधोमुखः' इत्यमर । प्रनाना पालयितू राज्ञः उपर्युपरिष्टात् । 'उपयुपरिष्ठात्' इति निपातः विराधराणा देवयोनिविशेषागा हन्तर्मुका पुष्पवृष्टिः पाता "उत्तिष्ठ वत्सत्यमृतायमानं वयो निशम्योत्थितमुत्थितः सन् । ददर्श राजा जननीमिय स्वां गामनतः प्रविणी न सिंहम् ॥६१॥ राजा अमृतमिवाचरतीत्यमृतात्मानं तत् । 'उपमानादाचारे' इति क्यच् ततः शानच् । रस्थितमुत्पन्नम् । 'देवत्स, उत्तिष्ट' इति वचो निशम्य श्रुत्वा । उत्थितः सन् । अस्तेः शतृप्रत्ययः । अग्रतोऽयं प्रसवः क्षीरसावोऽग्नि यस्याः सा ता प्रसविणी गा सा जननामिव ददर्श । मिदं न ददर्श । तं विस्मितं घेनुरयाच माधो मायां मयोद्धाव्य परीक्षितोऽसि । ऋषिप्रभावान्मयि नान्तकोऽपि प्रभुः प्रहर्तुं किमुतान्यहिंस्राः ॥२॥ विस्मितमाश्चर्य गतम् । करि क्तः । तं दिलीपं धेनुस्वाच । मिमित्यत्रादहे माधो मया मायामुद्राव्य कयित्वा परीक्षितोऽमि ऋषिप्रभावान्मयन्तको यमोऽपि प्रहतुं न प्रभुन ममर्थः । अन्ये हिंसा घातुश । 'शरार्धातुको हिंस' इत्यमरः । 'नमित्र म्पि--' इत्यादिना रमन्ययः । किमुत सुग्छ । न प्रभव इति योज्यम् । 'बलवन्मुष्ठ किमुत स्वस्त्यतीव च निर्भरे। इत्यमरः । भक्त्या गुरी मय्यनुकम्पया च प्रीतासि ते पुत्र घरं वृणीप्य । न केवलानां पयसां प्रसूतिमवेद्दि मा कामदुधां प्रसन्नाम् ॥६३॥ हे गुरौ भक्त्या मयनुकम्पया च ते तुभ्यं प्रीताम्मि । "कियाग्रहणमपि कर्तव्यम्' इति चतुर्थी । वरं देवेभ्यो वरणीयमर्थम् । 'देवावृते वरः भेटे नियु पुन, रघुवंशम् संजीविन्या समेतम् शीर्थ मनाकिये' इत्यमरः । वृणीष्व खौफुरु । तथाहि मां केवलानां पयसां प्रति मारणं नावेहि न विद्धि । किन्तु प्रमना माम् । कामान्दोग्धीति कामदुधा । तामवेहि। -"दुह पश्च' इति कप्प्रत्ययः । ततः समानीय स मानितार्थी हस्ती वहस्ताजितवीरशब्दः । वंशस्य कर्तारमनन्तफीति सुदक्षिणायां तनयं ययाचे ॥६॥ नतो मानितार्थी । खहन्नार्जितो वीर इति शब्दो येन सः । एतेनास्य । दातृत्व दैयराहित्यं चोक्तम् । स राजा हस्तौ समानीय संधाय अमलिं बवेन्यर्थः । वंशस्य कर्तारं प्रवर्तयितारम् । अतएव रघुकुलमिति प्रसिद्धि । अनन्तकीर्ति स्थिरयशसं तनयं मुदक्षिगायां ययाचे। संतानकामाय तथेति कामं राशे प्रतिश्रुत्य पयस्विनी सा। दुग्ध्वा पयः परपुटे मदीयं पुत्रोपभुक्ष्वेति तमादिदेश ॥६५॥ सा पयखिनी गौः। संतानं कामयत इति सन्तानगमः । कर्मण्यण् । तस्मै राशे तथेति । काम्यते इति कामो यरः । कर्थेि धम्प्रत्यय. तं प्रतिश्रुत्य प्रतिज्ञाय हे पुत्र, मदीयं पयः पनपुटे पत्रनिर्मिते पाने दुग्ध्वोपभुक्ष्व' । 'उपयुझ्य' इति वा पाठः । 'पिव' इति तमादिदेशाज्ञापितवती । यत्सस्य होमार्थविधेश शेपमृपेरनुशामधिगम्य मातः । मोधस्यमिच्छामि तवोपभोक्तुं पष्ठांशमुा इव रक्षितायाः ॥६६ हे मातः, यत्मस्य वत्सपीतस्य शेषम् । वत्मपीतावशिष्टमित्यर्थः । होम एवार्थः । तस्य विधिरनुठानम् । तस्य च शेषम् । होमावशिष्टमित्यर्थः । तव । उपसि भामोधस्य क्षीरम् । 'शरीरावयवाय' इति यत्प्रत्ययः। रक्षिताया उर्ध्या. पाश परभागमिव । प्रापेरनुशामधिगम्य । उपभोक्तुमिच्छामि । इत्थं क्षितीशेन वसिष्ठधेनुर्विशापिता प्रीततरा यभूय । तदन्यिता हैमवताच कुक्षेः प्रत्याययावाश्रममथमेण ॥६॥ इत्यं क्षितीशेन विज्ञापिता वसिष्ठस्य धेनुः प्रीततरा । पूर्व शुभ्रूपया प्रीता संप्रत्यनया विज्ञापनया प्रीततरातिसंतुष्टा बभूव । तदन्विता तेन दिलीपेनान्विता हैमव. ताद्धिमवरसम्बन्धिनः युगुहायाः सकाशादश्रमशानायासेनाभ्रमं प्रत्याययावागता ।। तस्याः प्रसन्दुमुसः प्रसाद गुरुपाणां गुरवे निवेद्य । प्रहपचिदानुमितं प्रियायै शशंस याचा पुनरुतयेय n६८॥

संस्कृत काव्य-लहरी प्रमनेन्दुरिव मुसं यस्य म नृाणां गुरुदिलीपः प्रहपचिपरागादिभिरनु- मितमूहितं तस्या धेनोः प्रमादमनुग्रहं प्रहर्षचिरेव ज्ञातवान्पुनरत्तयेक वाचा गुरखे निवद्य विज्ञाप्य पश्यात्त्रियायै शशंस कथितस्यैव कथनं पुनरुक्तिः । न चेह तदनि । किन्नु चिद्र' कवितामन्यात्पुनरुचायेव स्थितन्युत्प्रेक्षा । स नन्दिनीस्तन्यमनिन्दितात्मा सद्वत्सलो वत्सगुतायशेपम् । पपी वसिष्ठेन कृताभ्यनुशः गुभ्रं यशो मूर्तमियातितृप्पाः ॥९॥ अनिन्दितात्माऽगहितस्वभाव । मन्मु वत्सलः प्रेमवान्मदामलः । 'वन्मामाभ्यां कामबले' इति लच्प्रत्ययः । वसिप्टेन कृतानुज्ञः कृतानुमतिः म राजा चन्मस्य हुतस्य चावशेष पातहुतावशिष्ट नन्दिन्या स्तन्यं क्षीरम् । शुनं भूतं परिच्छिनं यश इव । अतितृष्णः सन्मपी। प्रातयथोक्तवतपारणान्ते प्रास्थानिक स्वस्त्ययनं प्रयुज्य । ती दम्पती स्वां प्रति राजधानी प्रस्थापयामास यशी वसिष्ठः ॥७०॥ वशी वसिष्ठः प्रातः । यथोक्तस्य पूर्वोक्तस्य व्रतम्य गोसेवाम्पस्याभूता या पारणा तस्या अन्ते पास्थानिक प्रम्यान झालेभवम् । तत्कालोचितमित्यर्थः । 'कालाहन्' इति टन्प्रत्ययः । 'यथाचिद्गुणत्यापि काले वर्तमानत्वान्प्रत्यय दप्यते' इनि वृत्तिकारः। ईयते प्राप्यतेऽनेनेत्ययनं स्वस्थयनं शुभावहभाशीर्वाद प्रयुज्य । नौ दम्पनी या राजधानी पुरी प्रति प्रस्थापयामास । प्रदक्षिणीकृत्य हुतं हुनाशमनन्तरं भर्तुररुन्धती च । घेर्मु सवत्सां च नृपः प्रतस्ये सन्मगलोदनतरप्रभावः ॥७॥ नृपो हुतं तर्पितम् । हुतमश्नातीति हुताशोऽमिः। 'कर्मण्यम्' । तं भर्तुमनेरनन्त- रम् । प्रदक्षिणानन्तरमिन्यर्थः । अझन्धती च मन्मा धेर्नु च प्रदक्षिणीकृत्य । प्रगतो दक्षिगं प्रदक्षिणम् । तिगद्गुप्रभृतीनि च इति अव्ययीभाव । ततदिच्चः । अनदक्षिणं प्रदक्षिणं मग्यमान कृत्वा प्रदक्षिणीकृय मदिमलेः प्रदक्षिणादिभिर्मगलाचाररुद- प्रतरप्रभार. सन्न् प्रतम्य ।। श्रोत्राभिरामध्यतिना रथेन स धर्मपत्नीसहितः सहिष्णुः । ययायनुद्घातमुखेन मार्ग स्वेनेव पूर्णन मनोरथेन ॥७२॥ धर्मपन्नामहित महिष्णुतादिदुःश्वमहनशीलः म नृपः श्रोत्राभिरामध्वनिना कर्णदादरम्यनेनानुदान पापागादिग्रनिपातरहिनः अतएव मुययतीति मुय । तेन रघुवंशम् संजीविन्या समेतम् रथेन । खेन पूगेन सफरेन मनोरथेनेव । मार्गमध्वानं ययौ। मनोरथपक्षे ध्वनिः श्रुतिः । अनुद्धातः प्रतिबन्धनित्तिः । तमाहितीत्सुक्यमदर्शनेन प्रजाः प्रजार्थवतकर्शिताङ्गम् । नेत्रैः पपुस्तृप्तिमनाप्नुवनिर्नवोदयं नाथमिवौपधीनाम् ॥७३॥ अदर्शनेन प्रवामनिमित्तेनाहितीनमुक्यं अनितदर्शनोत्कण्ठम् । प्रजार्थेन संता- नार्थेन व्रतेन नियमेन कर्शितं कृशीकृतमहं यस्य तम् । नवोदयं नवाभ्युदयं प्रजास्तु- प्तिमनाप्नुवद्भिरतिगृनुभिनेत्रः । ओषधीना नाथं सोममिव । तं राजानं पपुः । अन्यास्थया ददृष्ट्यरित्यर्थः । चन्द्रपक्ष-अदर्शनं कलाक्षयनिमित्तम् । प्रजार्थ लोक- हितार्थम् । व्रतं देवताभ्यः कलादाननियम । 'तं च सोमं पपुर्देवाः पर्यायेणानुपूर्वश' इति व्यासः । उदय आविर्भावः । अन्यत्ममानम् । पुरन्दरधीः पुरमुत्पताकं प्रविश्य पौरैरभिनन्द्यमानः । भुजे भुजंगेन्द्रसमानसारे भूयः स भूमधुरमाससञ्ज ॥७॥ पुरः पुरीरमुराणा दारयतीति पुरंदरः शक्रः । 'पू: सर्वयोरिसहोः' इति सच्प्रत्ययः । 'वाचंयमपुरंदरौ च इति मुमागमो निपातितः । तस्य धौरिव श्रीर्यम्य स नृपः पौरैरभिनन्धमानः । उत्पताकमुच्छ्रितध्वजम् । 'पतारा वैजयन्ती स्यात्केतनं ध्वजमन्त्रि- याम्' इत्यमरः । पुरं प्रविश्य भुजगेन्द्रेण समानसारे तुल्यबले । “सारो बले स्थिरांशे च न्याय्ये श्रीयं वरे त्रियु' इत्यमरः । भुजे भूयो भूमे(रमाससम स्थापितवान् । अथ नयनसमुत्थं ज्योतिरत्रेरिव द्यौः सुरसरिदिय तेजो वह्निनिष्ठ्यतमैशम् । नरपतिकुलभूत्यै गर्भमाधत्त राशी गुरुभिरभिनिविष्टं लोकपालानुभावैः ॥५॥ अथ द्यौः मुरवम। 'यौः सर्गमुरवर्मनीः' इति विश्वः । मर्महर्नयनयोः ममुन्थमुपन नयनसमुत्थम् । 'आतश्योपसर्गे' इति यत्प्रत्ययः । ज्योतिरिव । चन्द्रामि- वेन्यर्थः । 'प्रदेशः स्यादत्रिनेत्रप्रसूतः' इति हलायुधः । चन्द्रस्यात्रिनेत्रोद्भूतत्वमुक्त हरिवो-नेत्राभ्या वारि मुवाद दशधा द्योतयदिशः । तदर्भविधिना हृष्टा दिशो देव्यो दधुन्नदा । ममेन्य धारयामामुन व ताः समशक्नुवन् । स ताभ्यः सहसैवाथ दिग्भ्यो गर्भः प्रभावितः । पात भासयोगीतांशुः सर्वभावनः।' इति । सुरसरि- हा वाहनानिष्टयूनं निक्षिणम् । 'चोः शूडनुनासिके च' इत्यनेन निपूर्वाष्टीवतेर्वका- रस्य उम् । 'नुत्तनुनान्तनिष्ठ्यूनाविवक्षिरिताः समाः' इत्यमरः । ऐश तेजः सन्द- ।

संस्कृत-काव्य-लहरी मिव । अत्र रामायणम्-'त गत्वा पर्वतं राम कलाम धातुमण्डितम् । अग्नि नियोजयामामुः पुत्रार्थ सर्वदेवताः । देवकार्यमिदं देव ममावत्स हुताशन । शैलपुत्र्या महानजो गलाया तेन उत्सृज । देवतानां प्रतिज्ञाय गतामभ्येत्य पावकः । गर्भ धारय वे दवि देवतानामिदं प्रियम् । इत्येतद्वचनं श्रन्दा दिव्यरूपमधारयत् । स तस्या महिमा दृष्ट्वा ममन्तादवकीय च। ममन्नतस्तु ता देवीमभ्यसिञ्चत पावकः । सर्वस्रोतासि पूीने मनाया रघुनन्दन ।' इति राज्ञी मुदक्षिणा नरपतदिलीपस्य कुलभूत्यै मतति- लक्षगाथै गुरभिर्महद्भिर्लोकपालानामनुमावनेनोभिरभिनिविष्टमनुप्रविष्ट गर्ममाघत्त । दधाविन्यर्थः । अत्र मनु:--'अष्टाना लोकशालाना वपुर्धारयते नृपः । इति । अत्र 'भावात' इत्यनेन स्त्री कर्तृकधारणमात्रमुच्यते । तथा मन्त्रे च दृश्यते-'यथेयं पृथिवी मन्दुत्ताना गर्भमादधे । एवं त्वं गर्भमाघहि दशमे मामि सूतवे ।' इन्यायलायनाना सौमन्तमन्त्रे स्त्रीब्यापारधारणे आघानाब्दप्रयोगदर्शनादिति । मालिनी-वृत्तमेतत् । तदुचाम्-'ननमयययुतेथे मालिनी भोगिलोकः' इति लक्ष गात् । इति महामहोपाध्यायकोलाचलमहिनाथरिविरचितया संजीविनी-समाग्ल्यया व्याख्यया समेतो महाकविधीकालिदासहती रघुवंशे महाकाव्ये नन्दिनी. वरप्रदानो नाम द्वितीय मर्ग ।

अथ श्रीभर्तृहरियोगीन्द्र-विरचित
नीति-शतके
दिसालाधनच्छिमानन्तचिन्मात्रमूर्तये ।
म्यानुभून्येकमानाय नमः शान्ताय तेजसे ॥ १ ॥
दिश प्राच्यादिदिक्प्रदेशाः, काला भूतभविष्यद्वर्तमानरूपा, आदिशब्दसंगृही-
नानि वस्तुनि तथा च दिशाला आदयो येषा नानि दिशालादीनि । अतद्गुण
मविज्ञानोबहुव्रीहिः । तरनवन्छिनापरिक्तृता । विभुत्वादेकत्वाच देशन कालतो वस्तु-
नवापरिनिगरः अन एव अनन्ता अपरिमिता चिन्माना शानधना, नादशीमूनिः
यस्य तम्मै । तथा वात्मानुभतिरात्मानुभव एव मानं प्रमाणं . तु घटादेरिव चक्षुरा-
दिपमाणिकत्वम् इति भावः । यस्य तम्म । तथा शान्ताय-अविधानकार्यसम्बन्धशून्य.
खात्यसाय । तेजसे ज्योतीम्पाय नमः प्रहीभावः। 'नमः स्वस्नि-' इत्यादिना
चतुर्थी । अत्र नमस्काररूप मङ्गलमाचरितम् । सोख्यमेतदानुष्टुभं वृत्तम् ।
योद्धारो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः मयदृषिताः ।
अयोधोपहताश्चान्ये जीर्णमहे सुभाषितम् ॥ २॥
योद्धारः परिशातारः 'बुध अगमने इत्यसादातोश्तृन् । मत्सरेणासूयया
परोलगिहनेन प्रा: ममाझान्ताः । न तु हृदयालवः, अतो नानुमोदन्न इति भावः
प्रभवो गजानः स्मगपिता गर्वदुर्विनीताः। न तु विनयप्रहाः, अतोन गयन्तीति
भावः । अन्ये उरतोभयव्यतिरिक्तजनाः अशेधेनाज्ञानेनोपहना नष्टात्मानः । ते नाधि-
कारिणः । तम्मान सभापिठं साधुभाषणम् । अन्नर जीर्णमन्नहितम् । न त्वद्यापि
चाहिः प्राम् । तथापि वक्ष्यामानि वास्यशेषः ।
यदा किंचिज्ज्ञोऽहं गज इव मदान्धः समभवं
तदा सर्वशोऽसीत्यमयवलितं मम मनः।
यदा किंचित्किचिबुधजनसकाशादयगतं
नदा मूर्योऽम्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः॥३॥

संस्कृत-काश्य-लहरी अहं किंचिमोऽलनः मन् यदा पन्मिन् ममरे गज इव मदन दगान्धः कतन्याकविवेकशून्य. मममदं नातालि, नदा तन्निन् समये महोऽशेषनाऽम्मति नम मनोऽन्दि गर्वितन भवन् । 'अगविशे महागीं' इति न्यायात् 'अवलपम्नु गर्ने म्यान्' इति विश्वप्रकादाः। यदा वुयबनम्बामान्-विद्वजनमुवात् 'आयादोपयोग इति पदमी । मिचिन विचिन्तयं वयम् । माघकोधिताचादिकमिनिसषः । अनु. गर्न दातम् । तथा मो मूटोऽयं नि मे मम मद्री अर इव स्वागनः निगनः अभ्- दिन्तिप । 'आदायवान् गुम्यो देद' इति श्रवणादाचार्यावर विश्व विवेकः सम्भव दति भावः । सिद्धारकी वृनन् । विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनं विद्या मोगकरी यःमुखकरी विद्या गुरुणां गुरुः। विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परा देवता विद्या राजमु प्यते नहि धनं विद्याविहीनः पतुः 11 का नाम फुटलहारनूपुरागदादिचतुर्विधभूपाभावेऽपि विभूपिन्तद्भासमान कारविशेषः । विद्या नाम वशाम्राद्यान्नित्राविधव नरम्य पुंनाऽवि भूपिष्ट रूपम् स्था प्रच्छ निगूटं यथा तथा गुप्तं रखिन धन विविति सम्बन्धः । विद्या भोगान् करोतीनि भागहरी । तया युगः समाख्या मुन्नमिद्रियरंगम् । एनी एतदेवध । समयवापि 'कृनो हेनुताटस्यानुलोम्बे'' इति प्रत्यये टिबान्ही । तथा विद्या भन्युनदियनीति गुरवनेषां हिनाहितरामाचार्यागामारे ग्रहपदभुता । विद्या विदेशगननेवामे वाहनः मुद्द्दनः । विद्या परा देवता परात्मभूता । मोच. दावच्यादिति भावः, यहा परा देवता सामष्ट देवता । विझा राजम पूज्यते रातमध्ये प्रशन्यते। धनं द्रव्यं तु न । सहायरं न भवतीत्यर्थः । तम्मादिरामोदरूपया विदीनः शून्यः जन. पमुः पशुप्रायः । कर्तव्याम्दयविवेकरहित्यादिति भावः शार्दूलविहितम् । जावं धियो हरति सिञ्चति चाचि सत्यं मानोन्नति दिशति पापमपाकरोति । चेतः प्रसादयति दिनु तनोति फीति सत्सङ्गतिः कथय किन करोति पुंसाम् । किसी शुद्धाय मान्य हरनि निरस्यति । वाच वचने मन्यं सुनतमा निर्धात आगवति । मानोन्नति दगुमानातिशय दिशति प्रयच्छति । पापं दिलाना - नीति-शतक . नामयति । धर्मोपदेशादना । तथा चेतः प्रमादयति निर्मन्दयति ज्ञानोपदेवादिना । दिन दिमाम कीति तनोति विस्तारयति । अतः गत्संगतिः-मजनसमागमः घुमा दि. यो न करोति । कृथय इति पृथग्-जन मम्योधनम् । सर्वमपि श्रेय करोत्येवेन्यर्थः । अतः मत्मनाति---कार्या । वसन्ततिलका वृत्तम् । जातिर्यातु रसातलं गुणगणतत्राप्ययो गच्छतां शीलं शैलतलापतत्यभिजनः। सन्दहातां वह्निना । शौर्य वैरिणि पत्रमाशु निपतत्सर्थोऽस्तु नः केवलं येनकेन विना गुणास्तृणलवप्रायाः समस्ता इमे ॥६॥ आनिर्वाह्मणत्वादि रमानलं नामाधोलोकं यात गन्नु। भ्रश्यन्चित्यर्थ । गुणगणो धैर्योदायर्यादिगुणममूहम्तवापि रसातलापेक्षयाप्यधु पाताललोकं गहना प्राप्नुयात् । शीलं मत्स्वभावः शैलतलारपतत् । विशीर्णः भवन्वित्यर्थः । अभिजनो वंशः' इत्यमरः। द्विना दातां भस्मीक्रियताम् । परिणि संक्षोभशरित्याग्नुभूने शौर्य आशु शीघ्रं वघ्रमशनिनिपतन्। अशनिनिपातेन तदपि विश्वन्तं भवतु । एवंपूक्ति- आतिकुलादिनारोऽयम्मा न किंचिदपिन्टिनम् । नः भम्माकम् अर्थः केवलं वित्तमेवास्तु संभपतु । अयमेवाग्माकं परमार्थ इति भावः । एरेन केवलेन ‘एके मुख्यम- न्यकेवला' इत्यमरः । येनार्थेन विना इमे पूर्वोक्ताः ममना अघि गुणाः जाति कुलादयः नृणलबधायास्तृणकल्पाः । तद्वन्निस्सारा इत्यर्थः । शार्दूलविकीदितम् । जाड्यं ह्रीमति गण्यते व्रताची दम्भः शुची फैतघं शूरे निघृणता मुनी विमतितादिन्यं प्रियालापिनि । तेजस्विन्यवलिप्तता मुखरतावितव्यशक्तिस्थिरे तत्को नाम गुणो भवेत्स गुणिनायो दुर्जनैनाद्वितः arti होमति लमावति पुसि लाग्नं मान्यम्, गण्यते संख्यायने दुर्जनारतिशेय. स्वपश्चादायणादिनियमः शुचौ शुद्ध दम्भी धर्मध्वजिन्वं गण्यते, न त्वनुष्टातृत्वम्। शुची स्वभावादेव याह्यान्तरशुद्धे देतवं कपट गृथ्यते, न तु पारमार्थिकत्वम् र शर निपुणता दयाराहित्य गम्यते, न तु विनान्तत्वम् । मुनी मननशीले धिमनिना मुद्धिदन्यं गण्यने, न त्यास्मैक्यानुसंधानतत्परत्वम् । प्रियालापिनि मधुरवादिनि दैन्यं गण्यते न नुश्रवणानन्दकरत्वम् । तेजः प्रागल्भ्य प्रभाविशेषो वा तनि अवलिप्तता गर्पग्रस्तत्वं गम्यते. न तु स्वभावः। वनव्येश्वर्येषु शक्तिः प्रतिभापरपर्यायः सामयविशेषः तया स्थिरे। मुखमस्यास्त्रीति मुसरो दुर्मुखः 'दुर्मुसे मुग्घराबद्धमुयो, इत्यमरः । समुताभ्यः इति र प्रत्ययः। तस्य भावमता । असभ्यरालापिन्वमित्यर्थः ।

सस्कृत-काव्य-लहरी जसमा गम्यते, न तु वाग्मित्वम् । तत्तस्मात्कारणात् गुणिना गुणसम्पन्नानां म को नाम गुगोभवत् , यो दुर्जनः न अहितः दृषिनः । दुर्जनादूपिनो गुणः सुगुणिना न कोऽप्यन्तीत्यर्थः । शार्दूलविक्रीडितम् । मौनान्मूकः प्रवचनपटुर्याचको जल्पको या धृष्टः पार्योभवति च वस दुरतोऽप्यनमः। क्षान्त्या भीत्र्यदिन सहप्रायशो नाभिजातः संचाधर्म परमगहनो योगिनामप्यगम्यः ॥८॥ मौनातूष्णीभावान्मुको निर्वयो भवति । सेवक इति दोषः । पंदवनपट प्रगमवातिदका बाचको बहुभाषी, अत्पीति जत्रोऽर्मवद्धप्रलापी वा भवनि । पार्थे समीपे च वसन धृष्टो निर्भीको भवति । दुरनो विग्रकटे देशे वमन्नप्रगल्भोऽप्रौढी - भवति । चान्या परिभवादिपूपपद्यमानेषु उत्पद्यमानेषु वा क्रोधप्रतिबद्धलक्षणयोप- लक्षितवेद भीरर्भयशीलो भाति । न मते परिभवादिक क्षमत यदि, तहि प्रायशो बाहुल्येन अभिजातः मत्कुलीनः न भवति । अतः परमगहनः अत्यन्तदुरवगाहः मेवाधर्म परिचर्यात्मकं कर्म योगिनामणि कालत्रयाभित्रानामपि । किमुतान्येषामिति मार अगम्यो ज्ञानुमशक्य मर्वे गत्याः ज्ञानार्थाः । वृत्तं मन्दानान्ता । द्वाभि आरम्भगुवा क्षयिणी फ्रमेण लध्यी पुरा वृद्धिमुपैति पश्चात् । दिनस्य पूर्वार्धपरार्धभिन्ना छायेव मैत्री खलसजनानाम् ॥९॥ पूर्वार्धपराधांभ्या पूर्वाहापराभेदेन भिन्ना पृथविधा 'छायात्वनातपे कान्ती' इति वैजयन्ती । झारम्भे प्रारम्भसमये गी गुरुः । वर्धिष्णुरित्ययः, 'वोतो गुणकचना- दिति' विकल्पान्दीप् । क्रमेण कालकमेण चयिणी क्षयिष्णुश्च । 'जिति' इत्यादिना दनि । तथा पुरा पारम्भे लछी हवेत्यर्थः पश्चादनन्तरं दृद्धिमुपैति प्राप्नोति । अय- मर्थः-दुर्जनमैत्री पूर्वाह्रछायेव प्रारम्भगुर्वी कमण क्षयिणी च भवति । उनमंत्री तावदपराहदायवादी लघ्वी ततो वर्धिष्णुश्च भवतीति । उपजाति वृत्तम् । विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः । यशसि चाभिरतिव्यसनं श्रुती प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥१०॥ विभागका निविकरचितम् ! अा अनपर अपारम्भेश अभ्युदये गंपदि चना महिष्णुत्वम् । मदमि राजविहन्मभाया वाक्पटुना वामिवं नीतिशतके मरसवचनं च । याक्चातुर्यमिति यावत् । यधि रगर विक्रमः परामम' । यशमि अभिरति: मंग्रहच्छा । श्रुतौ वेदशास्त्राभ्यमने व्यगनमामक्तिः । इनी, सर्व महात्मना महानुभावानां प्रतिसिद्ध स्वभावमिदं हि । हतविलम्वितं वृत्तम् । संतप्तायसि मंस्थितस्य पयसोनामापि न श्रूयते मुक्ताकारतया तदेव नलिनीपस्थितं दृश्यते । अन्तः सागरशुक्तिमध्यपतितं तन्मौक्तिकं जायते प्रायेणाधममध्यमोत्तमजपामपंचिधा वृत्तयः ॥११॥ मंतवायमि मम्यगमितताय:पिड संस्थितस्य निक्षिप्तस्यत्यर्थः प्रयो जलभ्य नामापि नामधेयमात्रमपि न धयते। मूलनो ध्वम्नमेव भवतीत्यर्थः । नदेव पयो नलिनीवाशिनं पद्मपत्रगर्न मन् मुताकारतया मौक्तिकापेण यत । तदव पोइन्त. मागरे मागरान्तराले या शक्तिर्मुक्तास्फोटस्तस्या मध्ये उदरे पनि मत् नि आयते। मुक्तव मौक्तिमिति विग्रहः । विनयादित्वाम्बार्थे ठम् । अतः प्रायेण भूम्ना अधममध्य- मोजमजा निकृष्टसाधारणोन्कृष्टाप्रयाणा बितवतामेवंविधा नामाश्रवणादयो वृत्तयो. व्यापाग भान्तीति यथाक्रममन्वय. अतः महदाश्रय एवं कर्तव्य ।शार्दूलविक्रीडितम् । भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमै- नवाम्धुभिरविलम्बिनो धनाः । अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभाव एवैप परोपकारिणाम् ॥१२॥ तरवः पनमरमात्मदिवृक्षाः फलोहमः फलभारः नपा आनता भवन्ति । घना मेघा नवाम्बुभिर्नूतनोदकैलालक्षिताः सन्तो दुरविलम्बिनः मर्वत्र प्रवर्षणार्थमन्तरि- तमंचारिणो भान्ति । मत्पम्पाः मदिभिरूपलक्षिता. अप्यन्दता अनुचण्डा भवन्ति । तया एष टनिजनम्रन्यादिव्यवहारः परोपकारिणां परहिताचरणनत्यगणा स्वभावः नियमिद्ध एव । न लादायक इत्यर्थः । वंशस्थवृत्तम् । निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुरन्तु लक्ष्मीः समाविशनु गलतु बायोपम् । यद्यय या मरणमस्तु युगान्तरे या न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पंदं न धीराः ॥१३॥ नानिनिपुणा नविगारदा निन्दन्नु कांबद्दषयन्तु वा, यदि भया स्तुवन्त भरपन्नु वा । लक्ष्मी मंपन्ममाविशन प्राप्नोनु वा, उन स्ये, निरगत गटन था।

संस्कृत-काव्य-लहरी - अर्थवेदानी मेव मरणं निधनमस्तु वा, उत युगान्तरे कल्पान्तरे वास्तु । तथापि धोरा धैर्यशालिनो व्याप्यान्न्यायादनपेताप्रयो मार्गास्पदमेकपादविन्यासमानमपि न प्रविचलन्ति न भ्रस्यन्ति । तेषा न्यायमार्गापरित्याग एव परमार्थो न निन्दास्तुत्या, निरिति भाव । वमन्ततिलका वृत्तम् । वैराग्यशतके आधिव्याधिशतैर्जनस्य विविधैगरोग्यमुन्मूल्यते । लक्ष्मीयंत्र, पतन्ति तत्र विवृतद्वारा इय व्यापदः । जातं जातमवश्यमाशु विशं मृत्युः करोत्यात्मसात् तरिक तन निरहुशेन विधिनायनिर्मितं सुस्थिरम् ॥१५॥ विविधैः नानाप्रकारः आधीनां मनोव्यथाना व्याधीना पित्तादिशरीररोगाणा च शतैः । अनेकैराधिव्याधिभिरित्यर्थः । 'पुंस्थाथिमानिसी व्यथा रोगव्याधिगदामया' इति चामर, । जनस्य आरोग्य देहस्वास्थ्य उन्मूल्यने निर्मूलीफियते । तथा यन्त्र यस्मिन्पुरपे लमी. ऐश्वर्यमद्धि । तिष्ठतीति शेषः। तत्र तम्मिन्पुरुपे व्यापदः महो- पद्रवा- वित्तानि उद्घाटितनिद्वारामि क्वाटानि यासा तास्तथोका इव पतन्ति । तया मृत्युः अन्ततः ज्ञातंज्ञातं मार-धर्मवशात्पुनःपुनरुत्पन्नम् । वीप्साया द्विर्भावः । अतएव विवशं विवलं जन्तुमिति शेषः । अपर नियतं आशु शोघ्रमेव आत्मसात आत्माधीनं करोति । मारयतीत्यर्थः । अतः तेन प्रसिद्धन निरक्शेन निरर्मलेन विविना ब्रह्मणा यदस्तु निर्मितं टिक वा मुस्थिरम् । न मिपीत्यर्थः । अतोऽस्थिर- भोगाशंसनं न कर्तव्यम् । शार्दूलविक्रीडितम् । सा रम्या नगरी,महान्स नृपतिः सामन्तचक्रं च तत् पावें तस्य च सा विदग्धपरिपताश्चन्द्रविम्याननाः। उदृत्तः स च राजपुत्रनियहरते बन्दिनस्ताः कथाः सर्व यस्य घशादगात्स्मृतिपथं कालाय तस्मै अन सर्वत्रापि तच्छन्दः पूर्वानुभूतविषयः। तथा च सा पूर्वानुभूना रन- योग्या रम्या मनोहरा नगरी राजधानी च तत्र स महान् साम्राज्यभारधौरेयतया पूज्यो नपतिः राजा च । तस्येति सम्बन्धसामान्ये पारी सर्वत्र संबध्यते । तस्यनृपतेस्तन मामन्तकम् प्रत्यधिरानमण्डलम् । यदा सेवार्थ समागताखण्डमण्डलाधिपतिपरिवारश्य तस्य पायें स्थितमिति शेषः । मा विदग्धपरिपन विद्वत्समा । अथवा विदग्धानां कर्तव्यार्थचतुराणां परिषत् समुदायच तस ताः चन्द्रविम्वमिव आननं यास ता. मुन्दर्यश्च । मस्स स उदबूतः उत्पपगतः । उद्दण्ड इति यावत् । राजपुननिवाः राजकुमारवर्गध, तस्य ने वन्दिनः स्तुतिगठनाथ । 'वन्दिनः स्तुतिपाटकाः' इत्यमरः ।

यस्य ताः कथाश्च श्राव्यवावश्च । इति मवं अशेषमपि यथा कालस्य दशाद् आयत्त स्वात् स्मृतिपy म्मरणमार्ग अगर प्रापत् । कालमहिम्ना मवमपि नष्टमभूदित्यर्थः । नम्म कालाय नमः प्रसीभावः । शार्दूलविक्रीडितम् । यत्रानका किचिदपि गृहै। तय तिष्ठत्यथैको यत्राप्यस्तदनु वह तत्र कोऽपि चान्ते । इत्यं नेय रजनिदिवसौ लोलयन्दावियाक्षी कालः कल्योभुवनफलके कीडति प्राणिशोरी ॥१६॥ यत्र यस्मिन् गृहे वेश्मनि कोष्ठे व चिदपि कदाचित् । यद्वा यन्त्र कचिप यम्मिन् कम्मिबिग्दहे। अनेक बहुल प्रागी शारश्च तिष्ठति, अथानन्तरं नत्र तस्मिभेव गृहे कदाचिदेकस्तिष्ठति । एकत्र कालभेदवशात् , अन्यत्र परिणामवशाचेनि भावः । तथा यत्र यम्मिन् गृहे कदाचिदेकस्तिष्ठति तदनु तदनन्तरं यहवा तिष्ठन्तीति शेषः । तर तम्मिन् गृहे अन्ते अवसानाले द्यूतसमाप्तौ च एकोऽपि न तिष्ठति । दार्थ उतरीत्या भान फलकमित्र शारप्रवर्तनोचितकोष्ठयन्त्रमिव तम्मिन् नयः । प्रवर्तनीयरिति मावन् । प्राणिनः शारा इव द्यूतगूढा इव । अक्षोपकरणानीयेतियावत् ते साधनः 'शारे धूत गूढो नपुंगकम्' इति वैजयन्ती । कल्यः कलनासमर्थः देवन चतुरश्च कालः (कर्ना) अक्षधूर्तश्च गम्यते । रजनिदिवमा रात्र्यहनी (कर्म) द्वौ अक्षी पाशकारित 'पगोड ग्लहोतास्तु देवनाः पाशकाश्च ' इत्यमरः। लोलयन पौन पुन्येन गृहणन् राजश्वेत्यर्थः । श्रीदति दीव्यति । प्राणिसंयोगवियोगयोः वृदिक्ष- यादीनां च काल एष कर्तेति भावः । मन्दाक्रान्तावृत्तम् । क्षणं यालो भूत्यो क्षणमपि युवा कामरसिक क्षणं वित्तहीनःक्षणमपि च संपूर्णविभवः । जराजीगरट व वलीमण्डिततनु- नरः संसारान्त विशति यमघानीयवनिकाम् ॥१७॥ घगं क्षगमानम् । ईपकालमित्यर्थः । अत्यन्तसयोगे द्वितीया । पाल: शिशुः भूत्वा तपा च गमपि कामेन मन्मथेन रमिः शृङ्गाररमाभिनिविष्टः । यद्वा काम्यन्ने 'ममिलप्यन्त इति यामाः तेषु रसिरः अनुरागवान् , या तरुणच भूत्वा । तथा क्षगं वित्तहीनः निर्धनो भूत्वा । अयमपि च संपूर्णधिनः परिपूर्गधनश्च भूत्वा । तया क्षण जाया जाणः शियित औरलक्षितः अतएव चुतीभिः विश्वचीभिः मण्डिता भूषिता, तनुः गात्रं यस्य तथोत्तो भूत्वा नरः मर्योऽपीत्यर्थः नटः तत्तद्वेषधारी नर्तक व मंगारस्य याल्ययौवनायास्यानुभवस्यममाररुपटनाटकस्य नाट्यप्रवर्तगदम्बरस्य न अन्ते भवमाने । यमो धीयतेऽवेति यमशानी मंयमिनीनाम्नी यमपुरी सा रनिया

Sanskrit Kavya Lahari

Author
Sansarchandra
Title
Sanskrit Kavya Lahari
File name
Sanskrit Kavya Lahari
Text
OCR done
Citation
1949
Published
2012/04
Publisher
Delhi, Meharchand Lachhmandas
Language
Sanskrit
Pages
123
Library
Government College, Kota
Classification
Literature
DLI number
407705
Barcode
99999990303623.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
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