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Prakrutananda

Pandit. Raghunatha Kavi · 11/12/2002

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* राजस्थान पुरातन गन्नमाला
प्रधान सम्पादक-पद्मश्री जिनविजय मुनि, पुरातत्त्वाचार्य
[सम्मान्य सञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर]
ग्रन्थाङ्क १०
पण्डित रघुनाथकवि विरचित
प्राकृतानन्द
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प्रकाशक
राजस्थान राज्य संस्थापित
राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
RAJASTHAN ORIENTAL RESEARCH INSTITUTE, JODHPUR
जो (राजस्थान)

राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला
प्रधान सम्पादक
पद्मश्री जिनविजय मुनि, पुरातत्त्वाचार्य
[ सम्मान्य सञ्चालक, राजस्थान पाच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर ।
ग्रन्थाङ्क १०
पण्डित रघुनाथकवि विरचित
प्राकृतानन्द
प्रकाशक
राजस्थान राज्य संस्थापित
राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान

राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला
राजस्थान राज्य द्वारा प्रकाशित
सामान्यतः अखिल भारतीय तथा विशेषत: राजस्थानदेशीय पुरातनकालीन
संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, राजस्थानी, हिन्दी आदि भापानिबद्ध
विविध वाङ्मयप्रकाशिनी विशिष्ट ग्रन्थावलि
पधान सम्पादक
पद्मश्री जिनविजय मुनि, पुरातत्वाचार्य
सम्मान्य संचालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर
ग्रॉनरेरि मेम्बर ऑफ जर्मन ओरिएन्टल सोसाइटी, जर्मनी;
निवृत्त सम्मान्य नियामक ( नॉनरेरि डायरेक्टर ),
भारतीय विद्याभवन, बम्बई; प्रधान सम्पादक,
सिंघी जैन ग्रन्थमाला, इत्यादि
ग्रन्थाङ्कः १०
'पण्डित रघुनाथकवि विरचित
प्राकृतानन्द
प्रकाशक
राजस्थान राज्याज्ञानुसार
सञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान

प्राकृतानन्द
सम्पादक
पुरातत्त्वाचार्य मुनि जिनविजय
प्रकाशनकर्ता
राजस्थान राज्याज्ञानुसार
सञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
जोधपुर ( राजस्थान )
-
.
विक्रमाब्द २०१८
भारत राष्ट्रीय शकाब्द १८८३
प्रथमावृत्ति ७५०
ख्रिस्ताब्द १९६२
मुद्रक-निर्णयसागर प्रेस, बम्बई
मुख पृष्ठ आदि के मुद्रक-श्री हरिप्रसाद पारीक, साधना प्रेस, जोधपुर

प्रधान सम्पादक
पद्यश्री मुनि जिनविजय, पुरातस्थाचार्य
द्वारा सम्पादित ग्रन्थ
३
१ त्रिपुराभारतो लघुस्तव – कर्ता-सिद्ध सारस्वत श्री लघुपण्डित
२ कर्णामृतप्रपा - कर्ता-महाकवि ठक्कुर सोमेश्वर
वालशिक्षा व्याकरण – कर्ना-ठक्कुर संग्रामसिंह
४ पदार्थ रत्नमञ्जूपा - कर्ना-पं० कृष्ण मिश्र
५ शकुनप्रदीप – कर्ता-पं० लावण्य शर्मा
६ उक्तिरत्नाकर - कर्ता-पं० साधुसुन्दरगणी
प्राकृतानन्द - कर्ता-रघुनाथ कवि
८ हम्मीरमहाकाव्य - कर्ता-नयचन्द्र सूरि
है राठौड़ारी वंशावली
१० सचित्र राजस्थानी भाषा साहित्य ग्रन्थ सूची
११ मीरा वृहत् पदावली
१२ रत्नपरीक्षादि सप्त ग्रन्थ संग्रह - कर्ता-ठक्कु र फेरू
७
இஓஓஓஓ
999

विषयविवरणम्
१-३
४-१२
१३-१७
१-प्रास्ताविकं वक्तव्यम्
२-प्राकृतानन्दस्य सूत्रानुक्रमणिका
३-प्राकृतानन्द-प्राकृतप्रकाशयोः सूत्राणां भेदानुक्रमणिका
प्रथमे परिच्छेदे
४-अजन्तपुल्लिङ्गप्रकरणम्
५-अजन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरणम्
६-अजन्तनपुंसकलिङ्गप्रकरणम्
७-हलन्तपु लिङ्गप्रकरणम्
८-हलन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरणम्
६-हलन्तनपुंसकलिङ्गप्रकरणम्
१०-निपाताधिकार:
द्वितीये परिच्छेदे
११-धातुप्रकरणम्
परिशिष्टम्
क-प्राकृतशब्दानुक्रमणिका
१-१८
१६-२३
२३-२७
२७-३३
३४ वां
३५-३७
३८-५२
५३-७६
भाल

- प्रस्तुत 'प्राकृतानन्द' ग्रन्थ प्राकृत भाषा का एक संक्षिप्त व्याकरण है। इसकी रचना पंडित रघुनाथ ने की है जो कवि-कण्ठीरब के विरुद से अपने आपको उल्लिखित करते हैं । ये ज्योतिर्विद् सरस के पुत्र थे। इसके अतिरिक्त इनके समय और स्थान आदि के बारे में कुछ उल्लेख नहीं मिलता । इम ग्रंथ को एक पुरानी हस्त लिखित पोथी विद्वद्वर्य प्रागमप्रभाकर मुनिराज श्री पुण्य- विजयजी महाराज को शायद बीकानेर में मिली थी। जिस पर से उन्होंने स्वयं इसकी प्रतिलिपि की थी। यह प्रति जैसा कि इसके अन्त में लिखा मिलता है- संवत् १७२६ में लाभपुर अर्थात् लाहोर में लिखी गई थी। सन् १९५२ में जब मेरा बीकानेर जाना हुया तो उन्होंने यह ग्रन्थ मुझे दिखलाया। मैंने इसे राज- स्थान पुरातन ग्रन्थमाला में प्रकट करने का अपना विचार प्रदर्शित किया तो उक्त सौजन्य-मति मुनिवर ने अपनी वह प्रतिलिपि बड़े अानन्द के साथ मुझे दे दी। मैंने उसको छपने के लिये बम्बई के निर्णय सागर प्रेस में दी। दीर्घकाला- वधि में यह ग्रन्थ प्रेस ने छाप कर पूरा किया । कुछ अन्यान्य कारणों से भी ग्रन्थ के प्रकाशन में और अधिक विलम्ब होता रहा । इस तरह प्रतिलिपि के प्राप्त होने के बाद कोई १० वर्ष अनन्तर अब यह ग्रन्थ पाठकों के कर-कमलों में उपस्थित होने का अवसर प्राप्त कर रहा है । 'प्राकृतानन्द' प्राकृत भाषा का एक छोटा-सा व्याकरण है। ग्रन्थकार का कहना है कि जो पण्डित के कुल में पैदा हुअा है परन्तु अल्पबुद्धि है और कुछ साहित्य का रसास्वाद करना चाहता है उसके ज्ञान के लिये यह प्रयत्न किया गया है । संस्कृत की तरह प्राकृत भाषा में लिखित साहित्य-संपत्ति बहुत ही विशाल है । विविध विषय के हजारों ही ग्रंथ प्राकृत भाषा में लिखे गये हैं । यद्यपि ब्राह्मण-सम्प्रदाय में प्राकृत साहित्य का उतना अधिक संचय नहीं मिलता है, परन्तु जैन और बौद्ध संप्रदाय में प्राकृत भाषा ही का प्राधान्य रहा और इसलिये इन दोनों संप्रदायों में इस भाषा में लिखित साहित्य-संपत्ति की विशालता बहुत अधिक है । बौद्ध साहित्य की प्राकृत भाषा जो कि मूल रूप में 'मागधी' भाषा कहलाती है, अब 'पाली' के नाम से प्रसिद्ध हो गई है । परन्तु जैन साहित्य-संपत्ति मुख्य रूप से प्रावृत के व्यापक नाम से ही प्रसिद्धि प्राप्त करती रही है । भाषा-विदों ने जैन साहित्य की प्राकृत भाषा को 'अर्द्धमागधी' [ २ ] और 'महाराष्ट्री' प्राकृत के नाम से विभक्त किया है । प्राचीन जैन आगमों की भाषा अर्द्धमागधी संमिश्रित है और बाकी का सारा साहित्य प्राय: 'महाराष्ट्री' और 'शौरसेनी' संमिश्रित है। जैन सम्प्रदाय का मौलिक वाङ्मय प्रायः सारा इसी प्रकार की प्राकृत भाषा का अपूर्व भंडार है । द्रविड़ जाति के भारतीय जन-समूहों की द्रविड़कुलीन भाषाओं के अतिरिक्त समग्र ग्रार्य जातोय जन-समूह की जो विद्यमान भापायें हैं उनकी उत्पत्ति इस मूल पुगतन प्राकृत से है । शाक्य भगवान् बुद्ध और ज्ञात पुत्र तीर्थंकर महावीर के समय से लेकर वर्तमान काल तक की आर्य-भाषाभाषी व भारतीय जनता की मातृ-भाषा प्राकृत के नाम से संबोधित की जाती रही है । वह प्राचीन प्राकृत अब अनेक उपभाषाओं और देश-विशेष की बोलियों में विभक्त हो गई है। जैसा कि ऊपर कहा गया है जैन संप्रदाय का सारा ही मौलिक साहित्य प्राकृत में है। कई ब्राह्मण विद्वानों ने भी प्राकृत भाषा में कुछ विशिष्ट ग्रन्थों की रचना की है, जिनमें काव्य और नाटक ग्रंथ मुख्य हैं । गौडवहो, सेतुबन्ध, लीलावई, गाथा सत्तसई आदि उत्कृष्ट प्राकृत काव्यकृतियां हैं जो ब्राह्मण विद्वानों की देन हैं। इसी तरह कर्पूरमंजरी नादि अनेक नाटक कृतियां भी प्राकृत के प्रभाव को प्रकट करती हैं। जिम तरह संस्कृत भापा का व्यवस्थित ज्ञान प्राप्त करने के लिये पाणिनी आदि अनेक प्राचीन-अर्वाचीन विद्वानों ने नाना प्रकार के व्याकरण-ग्रन्थों की रचनायें की उसी तरह प्राकृत भाषा का व्यवस्थित ज्ञान प्राप्त करने की दृष्टि से वररुचि आदि अनेक विद्वानों ने प्राकृत व्याकरण ग्रन्थों की रचनायें की हैं। यों तो प्राकृत भाषा के बीमों छोटे-बड़े व्याकरण-ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं पर उन में वररचि का प्रान-प्रकाश' सब से प्राचीन ग्रन्थ समझा जाता है। प्राकृत- गापा वा गाग संपूर्ण व्याकरण ग्रन्थ हेमचन्द्र सूरि का है जो उनके महान् व्याकरण ग्रन्थ सिद्ध है मशब्दानुशासन' का अष्टम अध्याय स्वरूप है । इस महान् व्याकरण ग्रन्थ के सात अध्यायों में संस्कृत भाषा का परिपूर्ण व्याकरण ग्रथित है और ग्राम श्रध्याय में प्राकृत भाषा का परिपूर्ण व्याकरण है। इसमें प्राकृतोत्तरकालीन अपभ्रंश भाषा का भो विस्तृत व्याकरण है जो उनको मालिक देन है । हेमचन्द्र मुरि के बाद अनेक छोटे-बड़े प्राकृत व्याकरण बनले रहे और उनम से अनेक ग्रन्थ प्रकाशित भी हो गये हैं। वररुचिकृत 'प्राकृत-प्रकाश' हेमचन्द्रसूरि के 'प्राकृत व्याकरण' की अपेक्षा । C... - -17TTIT . TIT Trrmat -on- यह प्रस्तुत 'प्राकृतानन्द' वररुचिकृत 'प्राकृत-प्रकाश' का हो एक प्रति संकलन है । संस्कृत के लघुकौमुदी आदि प्रक्रियात्मक शैली के अनुकरण नाथ कवि ने 'प्राकृत-प्रकाश' को इस प्रकार प्रक्रियात्मक रूप देकर इस प्रा का संकलन किया है। इस में कुल ४१६ सूत्र हैं, इससे मालूम देता है 'प्राकृत-प्रकाश' के कुछ सूत्र छोड़ भी दिये हैं । पर, साथ में कुछ ऐसे दिये हैं जो 'प्राकृत-प्रकाश'को प्रसिद्ध पुस्तक में नहीं मिलते । चौखम्भाग्रन्थ भामहकृत मनोरमाव्याख्या सहित जो प्राकृत प्रकाश छपा है उसमें कुल हैं जिनमें के ८७ सूत्र इस प्राकृतानन्द में नहीं हैं; और साथ में इसमें २ हैं जो प्राकृत-प्रकाश में नहीं मिलते । तुलना की दृष्टि से दोनों ग्रन्थों सूचि इसके साथ दी जाती है । संशोधक विद्वानों को इसका कुछ उपयो मुद्रित प्राकृत-प्रकाश के और प्राकृतानन्द के सूत्रों में कुछ पाठ-भेद : गोचर होते हैं । लिपिकर्तायों के कारण ऐसे पाठ-भेदों का होना स्वाभ ग्रंथ अभी तक कहीं प्रकाशित नहीं हुआ है । अॉफ्रंट ने इसका सूचन 'कॅटेलागस कॅटलॉगरम्' भा. १; पृ. ३६१ पर किया है का नाम सूचीकार को लाहोर के पण्डित राधाकृष्ण के 'पुस्तकानां में मिला है, जो काश्मीर-निवासी पं० राजाराम शास्त्री ने लिखा था अौ टिक सोसाइटी बंगाल के प्रोसीडिंग्स्, जून १८८० ई. में इसका उल्लेख प्रस्तुत पुस्तक की प्रेस-कॉपी जिस प्रति से तैयार की गई है वह भी वि में लाहोर में ही लिखी गई थी। सौजन्यमूर्ति विद्वद्रत्न मुनिवर श्री पुण्यविजयजी महाराज के प्रति हार्दिक कृतज्ञभाव प्रकट करते हैं कि जिन्होंने स्वयं अपने हस्ताक्षर रचना की सुन्दर प्रेस कापी कर के हमको राजस्थान पुरातन ग्रन्थमा करने के लिये प्रदान की। प्रेस की कठिनाई के कारण इसके प्रूफः कार्य कार्यालय द्वारा ही किया गया अतः कुछ अशुद्धियां भी , विद्वज्जन उसे स्वयं शुद्ध कर लेंगे, ऐसी विज्ञप्ति के साथ कवि रघुन ग्रन्थ के प्रारंभ में इस विषय में जो बहुत ही सुन्दर उक्ति प्रकट की। हम भी यहां पुनः उद्धृत कर देना चाहते हैं । दोषदुष्टमिदमित्यवजया हातुमिच्छत न जातु साधवः । शैवलं किल विहाय केवलं निर्मलं किमु न पीयते जलम् ।। जोधपुर -मुनि वि० २५-६-६३ प्राकृतानन्दस्य सूत्रानुक्रमणिका limi सूत्रा पृष्ठाव. प्राइ बले साभाषण ३०० ३५ अंकोठे ल्लः २५ अःक्ष्मा-श्लाघयोः अक्ष्यादिपु यः २०० १७२ ११८ १४ अत्रि माच ३ or ६ ३२६ ३१० ३ २ ३ अज्ज अामन्त्रणे श्रत था भिपि वा यात ए से अत श्रोत सो: श्रतोऽमः अत् पथि-हरिद्रा-पृथिवीप अदगो दो गु: अदातो यथादिगु वा अन् दुवाले बा लस्य द्वित्वम् अधो ग-न-गाम् अन्मुकुटादिगु अन्त्यस्य हलः अपी विः ६ ४५ १८६ ५ ५५ 19 २६ ३०६ क॥ अगि हस्वः १५८ ३२ २६७ २७४ ३३ अम्हे जग गयोः अम्हेहिनो अम्हेगुत्तोभ्यसि ग्रम्हहि गित श्राम्हेसु सुपि २७२ ३२ २७८ ६१ अयुवतस्य रिः २६8 ३५ ३५३ ३०१ ३५ . अनाहि निवारणे - अवाद् माहित । अब्बो अम्गो दुःला-शेप-विस्मापने : पब्बो दुःख-सूचना-सम्भावनेगु - पसेर्लोपः अस्तेरासिः २६८ ४६ । २ ] क्रमाङ्क सूत्राङ्क पृष्ठाङ्क ३२ २६६ २५६ २७० ३२ २१ २५ १६७ १५५ २३२ २८ २६ २३६ १७४ २७ ४ ३६ ५ ७ २२३ २ २४६ ३२ अस्मदो महमहयं सौ ३३ अहम्मिरमि च ३४ प्राडिच ते दे ३५ आडि में ममाई ३६ प्राङो ज्ञादेशस्य ३७ प्राच्य गौरव ३८ प्राच्च सौ या गो-गणमोरङसि ४० प्रात्मनो अप्पागो वा प्रादीतौ बहुलम् ४२ प्रादेरतः ४३ अायों जः ग्रापीडे म ४५ ग्रामः एसि ४६ आमन्त्रणे वा बिन्दुः ४७ ग्रामि सिं ४८ ग्रामो रण ४६ अाम्र-ताम्रयोर्वः पालाने न लो: आल्विल्लोल्लालवत्तरोत्ता मतुपः ५२ आवे च प्रा समृद्ध यादिपु वा ५४ अाहे इग्रा काले इमं भूते ५६ इच्च बहुपु ५७ इज्जस्-शसोर्धिश्च ५८ इट्-मयोमिः ५६ इत एत पिण्डसमेपु ६० इतेस्तः पदादेः ६१ इत् पुरुपे रोः ६२ इत् सैन्धवे ६३ इत्व-द्वित्ववर्ज राजवदनादेशे २३८ ३० २६ २६ २०८ २१४ . ३१४ ४०२ ४६ ४३ ६ २५५ ३२६ ३६ ३६ ३२७ २३ १४ ३२५ १२१ ३११ ६४ १६४ ६ २८ २४० २६ २३७ २६ ६४ इदद्वित्वे २२६ ६ इदम इमः तनावर दगारवा २२० २७ सूत्राङ्क पृष्ठाङ्क क्रमा १७ ७ ६ ७० ३४ ३६ ३६ '४१६ २२ २४ ७ ४२ २६ ६७ इदीपत् पक्व-स्वप्न-वेतस-व्यञ्जन-मृदङ्गाऽङ्गरेषु २८ ६८ इदुतो: शसो रणो १४०० ६६ इद् ईतः पानीयादिपु ११ इद ऋष्यादिपु ७१ इद्भ्यः स्सा-से २८५ ७२ इर-किर-किला अनिश्चित्ताख्याने २६३ ७३ इवे व्वः ७४ ईन भूते ३२८ ७५ ईत् सिंह-जिह्वयोश्च ७६ ईत् स्त्रियाम् ईदुनोह स्व: १७७ ७८ ईद् धैर्य १९५ उत ओत् तुण्डरूपेषु उत्तमे स्सा हा च ३३५ ८१ उत्तरीया-ऽनीययोर्यस्य जो वा ८६ उत्समोलः उत् सौन्दर्यादिषु ८४ उदृम्बरे दोलोपः २०६ ८५ उदूग्वले द्वा वा १८७ ८६ उदूतो मधूके १८८ उदो विजः ३७६ उद् ऋत्वादिपु २६ ८६ उद्ध्मो धूमा ३६३ उपरि लोपः क-ग-3-त-द-प-ष-साम् ३६ ६१ उ: पद्म-तन्वीस मेपु १७६ ६२ उर्जस्-शस्-टा-स्-सुप्सु वा १५३ ६३ उलूहले ल्वा वा १८७A ६४ उ-सु-मु-विध्यादिज्वेकस्मिन् ३३१ ऋत प्रारःसुपि १५२ ६६ ऋतोऽत् १२० ९७ ऋतोऽर: ६८ ऋत्वादिषु तो दः ६६ एकाचो ही १०० ए च सुप्यङि-ड-सोः १४ १०१ एच्च क्त्वा तुमन-तव्य-भविष्यत्सु २३ २३ ८७ ८८ ६ २२ १८ २३ १८ १४ क २ 10 । ४ । कमाङ्क सूत्राक पृष्ठाक २४ ५ १७ है १० AD 8 २३ २ 1719 ११ १०२ एत इद् वेदना-देवरयोः १०३ एतदः सात्वोत्वं वा २४७ १०४ एत् नीडा-ऽऽपीड-कीदृगीदृशेषु ५२ १०५ एन्न पुरे १०६ ए भ्यसि १४३ १०७ ए शय्यादिषु ४१ १०८ एपामामोण्टं ११० ऐत एत ६६ १११ एरावते च ८२ ११२ प्रो च द्विधा कृमः ३१२ ११३ अोतोऽद् वा प्रकोष्ठे कस्य वः ७२ ११४ अोदवा-ऽपयोः ३१० ११५ ओ बदरे देन ११६ अो सूचना-पश्चाताप-विकल्पेषु २६२ ११७ पौत्, प्रोत् ११८ क-ग-ब-ज-त-प-य-वां प्रायो लोड १० ११६ ववन्धे वो मः १२० कापिणे १२४ १२१ कालायमे यस्य वा १२२ काशेर्वास : ३५१ १२३ कि-यत्-तद्भ्यो ङस पास २२२ १२४ किरणो प्रश्ने २६७ १२५ किम : क: २१६ १२६ किगते च : ६१ १२७ कुब्जे ख : १२८ कृष : का भूत-भविष्यतोश्च ३६५ १२६ कृज: कुणो वा ३६४ १३० कृ-दा-व-वचि-गमि-रुदि-शि-विदिरूपाणां काहं दाहं सोच्छ वोच्छ गच्छं रुच्छ दच्छ वेच्छं १३१ कृष्णे वा १३२ कैटभे व: १३३ कौशले वा ७५ ४१२ १३५ क्ते तुर : ४११ १४ ४३ २१ २७ w w ११ ४८ : १५ ११ & १३४ क्ते ५१ [ ५ ] कमाङ्क सूत्रा पृष्ठाङ्क :३७ क्ते वत्व ऊरण : १० ४१५ १८१ ५१ २३ ३८५ ४७ १७१ २३ १ ३ ५४ ३५ ४३ ३४० ७ ८४ १० :३६ कमस्य -४० क्रीज: किरण : ४१ क्रुधेझूर : ४२ विनष्ट-रिलष्ट-रत्न-क्रिया-शाङ्गैपु तत्स्वरवत् पूर्वस्य ४३ क्वचिद् ङसि उघोर्लोपः ४४ क्वचिद् युक्तस्यापि ४५ क्वथे: ४६ क्षमा-वक्ष-क्षणेपु वा क्षियोझिज्जः ख-ध-य-ध-भां-हः ४६ खादि-धाव्यो: खा-धी ५० गद्गदे : ५१ गमादीनां द्वित्वं वा ५२ गतेंडः ५३ भिते रणः ५४ गृहे घरोऽपती ५५ ग्रसेविसः ५६ ग्रहे दो? वा ५७ ग्रहेण्हः ५८ घुणो घोल: ५६ घे बत्वा-तुमुन् तव्येषु ६० उसाच द्वित्वं वाऽन्त्यलोपश्च ६१ डसा से ६२ सि तुमो-तुह-तुज्झ-तुम्ह-तुब्भा ङसेः ग्रा-दो-दु-ह्यः ६४ डगो वा ५० ८० ७ २१२ ३५२ ४० ५१ ४६ ४०० ४२ ३४८ ४१६ २६ २४५ ३ २० १४४ उसा वा १६ २५६ ६६ सौ तत्तौ तइत्तो तुमादो तुमादु तुमाहि ६७ डे ए म्मी २२ ३ २२४ २७ ६६ डेस्सि-म्मि-स्थाः १६ सूत्राङ्क पृष्ठाक क्रमाङ्क ३२ २७ २२ ३ २० ३५ ३८६ ४७ २५ ४१ २५ २० ४२ २ २८ २ १ १६ १७१ ङौ तुमम्मि २६२ १७२ चतुरश्चत्तारो चत्तारि २१८ १७३ चतुर्थी-चतुर्दश्यो स्तुना १७८ १७४ चतुर्थ्याः षष्ठी १८ १७५ चन्द्रिकायां मः १७६ चि चेअ अवधारणे २६१ १७७ चिनश्चिरणः १७८ चिन्हे धः २०५ १७६ च्चो व्रज-नृत्योः ३४१ १५० चौर्यसमेषु रिनं २०२ १८१ छायायां हा १६८ १८२ जल्पेलों मः ३४७ १८३ जस् शस्-डसि-ग्राम्सु दीर्घः १३ १८४ जस्-शस्-ङसो पो २३१ १८५ जस्-शसोर्लोपः १२ १८६ जस ओ वो वाऽत्वं यूत्वं च १४० १८७ जस अोश्च यूत्वम् १३६ १८८ जसो वा १५७ १८६ जिघ्रते: पा-पानी ३६२ १६० जभो जंभाग १६१ , जो जाण-मुरणों ३९८ १६२ ज्ञो गज्ज-गब्वौ वा ३०८ १६३ ज्यायामीत् १७३ १९४ झयि तद्वर्गान्तः १६५ टाऽऽमोर्णः १६६ टा-ङस्-ङीनामिदेददातः १९७ टा-ङ्योस्तइ तए तुमए तुए २५५ १६८ टाणा १४१ १९९ टाणा २३५ २०० टोड: २०१ ठा-झा-गांश्च-वर्तमान-भविष्यद्-विध्याय कवचनेष ३६१ २२० ठो ढः १६६ डस्य च १६८ २६५ २०५ गवरि प्रानन्तर्य २६६ ४२ ४६ २ ३ ३१ २८ ४३ २५ २५ २०४ णवरः केवले ३५ [ ७ ] क्रमाङ्क মুম্বা पृष्ठाङ्क ३०२ ४०१ ४६ ४७ ३२ २६९ २५३ २४४ ३ . ३० २४३ . २६ १८ २०७ १४९ २५२ २६४ ३० ३२ ३१ २५८ २५७ २०६ रणवि वैपरीत्ये २०७ णिच एदादेरत पात् २०८ गुदेलॊणः २०६ णेशसि २१० तं वाऽमि तद पोश्च २१२ तदेतदोः सः सावनपुंसके २१३ तल त्वयोर्दा-त्तणों २१४ तालवृन्ते ण्ठः २१५ तिणि जस्-शस्भ्याम् २१६ तुझे तुम्हे जसि २१७ तुझेसु तुम्हेसु सुपि २१८ तुज्झेहिं तुम्हेहिं तुन्भेहिं भिसि २१६ तुमाइ च २२. तुम्हाहिंतो तुम्हासुत्तो भ्यसि २२१ तूर्य-धैर्य-सौन्दर्या-ऽऽश्चर्य-पर्यन्तेषु रः २२२ तृन इरः शीले २२३ तृपस्थिम्पः २२४ ते तिपोरिदेती २२५ त्तो हुसे: २२६ त्तो-स्थयोस्तो लोपः २२७ तो दो ङसे: २२८ त्य-थ्य-द्यां च्च-च्छ-ज्जा: २२६ बसेर्वज्जः २३० त्रस्ती २३१ त्वरस्तुवरः २३२ थास्-सिपोः सि से २३३ दशादिषु हः २३४ दाढादयो बहुलम् २३५ दिक-प्र वृषोः सः २३६ दिवसे सस्य २३७ दुहि-लिहि-वहां दुब्भ-लिब्भ-वभा २३८ दूडो दूमः २३६ शेः पुलन-रिणअक्क-प्रवक्खाः २६० १६६ ४१७ २४ ३६१ ४८ ३१७ २४८ २४६ २२१ ३० २७ ३८० ३५६ ४३ ३६ १४ २१५ २८० १०३ २६ ३३ १२ ४०७ ३८१ ३६८ - क्रमाङ्क सूत्रा पृष्ठाक १६२ १४ २४ ११ ११ १२ १०४ ११ १४६ १४७ १७ ३३३ 22322 १४२ १ २५२ २२६ २८ १३ २१६ २६ २८७ ३४ ११४ २४१ दैवे वा २४२ दोला-दण्ड-दशनेषु डः २४३ दोहदे रणः २४४ द्रे रोवा २४५ द्विवचनस्य बहुवचनम् २४६ द्वे दुवे दोरिण वा २४७ द्वेदों २४८ धातोर्भविष्यति हिः २४६ ध्य-ह्योः २५० न डि-डस्योरेदाती २५१ नमो हलि न त्थ: २५३ न धूर्तादिषु २५४ न नपुंसके २५५ नपुंसके स्वमोरिदमिणमिणमो २५६ न बिन्दु परे न र-होः २५८ न विद्युति २६ न शिरो-नभसी २६० न-सान्त-प्रावृट्-शरदः पुसि २६१ न स्तम्ब २६२ नाऽऽतो ऽदातो २६३ नाऽऽमन्यो सावोत्व-दीर्घत्व बिन्दवः २६४ नानेकाचः २६५ निपाता: २६६ निरो माङो मारण: २६७ नीडादिषु च २६८ नो णः सर्वत्र २६६ नोत्सुकोत्सवयोः २७० न्त-माणौ न्त-मारणौ शतृ-शान चोः २७१ न्ति हेत्था मो-मु-मा बहुषु २७२ न्तु ह न्तु ह मो बहुषु २७३ न्मो म्मः २७४ पटे: फल: २७५ पत्तने २४ . २८८ २४२ १०६ २६ १३ १६ ४ २५ ३२२ २८९ ३७७ ४६ १६३ E २ १४ १२६ ४१८ ५२ ६६ ३६ ११ ૪૨ ३४५ २०४ २५ [१] २५० ३८२ पद: पाल: २०३ १५४ २५ १५ ७४ t ५ ६२ १ ३३६ ३४९ ४१ ४२ १४ १२३ १८० २२ २७६ पदस्य २७७ २७८ परुष-परिघ-परिखासु फ: २७६ पर्यस्त-परिण-सौकुमार्येषु ल्ल: २८० पितृ-भ्रातृ-जामातृणामरः २८१ पृष्ठा-ऽक्षि प्रश्नाः स्त्रियां वा २८२ पो वः २८३ पौरादिष्वतः २८४ प्रतिसर-वेतस-पताकासु : २८५ प्रथम-शिथिल-निषधेषु ढः २८६ प्रदीप्त-कदम्ब-दोहदेषु दोलः २८७ प्रादेर्भवः २८८ प्रादेर्मीलः २८६ फोभः २६० बाष्पेऽश्रुणि हः २६१ बिसिन्यां भः २६२ बुड-खुप्पो मस्जे: २६३ बृहस्पती ब-होर्भ-ग्री २६४ ब्रह्माद्या प्रात्मवत् २६५ भाव-कर्मणोर्वश्च २६६ भिदि-च्छिदोरन्तस्य न्दः २६७ भिन्दिपाले ण्ड: २६८ भियो भा-बीही २६६ भिसो हिं ३०० भुजादीनां वत्वा-तुमुन्-तव्येषु लोपः ३०१ भुवो हो-हुवौ ३०२ भ्यसो हितो सुत्तो ३०३ मं मम ३०४ मज्मणो अम्हं प्रम्हाणं अम्हे पामि ३०५ मत्तो मइत्तो ममादो ममादु ममाहि उसी ३०६ मध्यान्हं हस्य ३०७ मध्येच ३०८ मन्मथे वः ३०६ मममि डी ३१० मयूर-मयूख-योवा वा १७ १४५ २४१ २६ ४०४ १२८ १५ १ ३ १७ ४१४ २१ ३ ३२ २६८ २७६ २७३ ३२ १२ १ १ २ ३३ २७७ ४२ ६ [ १० ] क्रमाङ्ग सूत्राङ्क पृष्ठाक १८२ २३ ४५ ३७४ ४६ ३६६ ३३ २७५ २ १ १५ १२७ ३०५ ३५६ ४०३ २० २२ १७६ १३४ ३१ ४७ ३१३.. मातुरात् ११४ मिना स्सं वा ३१५ मि-मो-मु-मानामधो हश्च ३१६ मृजेलुंभ-पुसौ ३१७ मृदो लः ३१८ . मे मम मह मज्झ ङसि ३१६, मो विन्दुः ३२० मो-मु मैहि-स्सा-हित्था ३२१ म्न-ज-पञ्चाशत पञ्चदशेषु ए: ३२२ म्मिव-मिअ-विमा इवार्थे ३२३ म्लै वा-वानी ३२४, यक ईअ-इज्जो ३२५. यमुनाया मस्यः ३२६ यष्टयां लः ३२७ यावदादिषु वस्य ३२८ युक्तस्य ३२६. युधि-बुध्योर्भः ३३० युष्मदस्तं तुम राज्ञश्च . ३३३ रुधेध-मौ ३३४ रुषादीनां दीर्घः ३३५० रे अरे हिरे सम्भाषण-रतिकलहा-ऽऽक्षेपेषु ३३६ ३३७ तस्य टः ३३८ र्य-शय्या-ऽभिमन्युषु ज: ३३६ लवण-नवमल्लिकयोवन ३४० लादेशे वा ३४१ लाहल लाङ्गल-लाङ्ग लेषु वा रणः ३४२ लतः क्लुप्त इलि ३४३ लोपोऽरण्ये ३४४ वक्रादिषु ३४५ वर्गेषु युजः पूर्वः ३४६ वर्तमान-भविष्यदनद्यतनयोजः ज्जा वा २८ ३५३ २५१ २३० ३७५ ३६२ ३८४ ३३२ रुदेवः रोरा २८४ ११५ ११२ १६४ ३१६ १३ १३ १४ ११ २४ १८३ २३ الله 3 ५ ५ २ ५ ३२० ३० १२६ १५ ३५५ '४३ २६ ४७ ६ [ ११ ] ३४६ विप्रकर्षः ३५० विह्वले म्भ हो वा ३५१ वृक्षे वेन रुर्वा ३५२ वृधेः ३५३ वृन्दे वो रः ३५४ वृश्चिके छः ३५५ वृष कृष-मृष-हृषामृतोऽरिः ३५६ वेः के च ३५७ वेष्टेश्च ३५८ वो च शसि ३५६ वो भे तुज्झारणं तुम्हाणमामि ३६० शकादीनां द्वित्वम् ३६१ शकेस्तर-चन-तीराः ३६२ शद् तृ-पत्योर्ड: ३६३ शरदो दः ३६४ शषोः सः ३५४ ३६७ ४६ ४२ -- ३४२ . २५४ २६३ ३८७ ३८८ ३५७ ३१ ४७ ४७ ४३ २७६ ३ ४४ عن शस एत् २८ २३४ ३०७ ५ ३६६ ४५ १३७ १२५ २०१ १४ २५ ४६ ४२ ४४ शेष: संस्कृतात् ३६७ शेष -ऽऽदेशयोद्वित्वमनादौ ३६. शेषाणामदन्तता ३६६ शेषोऽदन्तवत् ३७० इच-त्स-प्सां छः ३७१ श्मश्रु-मशानयोरादेः ३७२ श्रदो धो दहः ३७३ श्रु-हु-जि-लू-धुवां पणोऽन्त्येह्रस्वः ३७४ श्वादीनां विष्वप्यनुस्वारवर्ज हिलोपश्च वा ३७५ षट्-शावक-सप्तपर्णानां छः क-स्क.क्षां वखः ३७७ ष्टस्य : २७८ ष्ठा-ध्या-गानां ठा-माअ-गावाः ३७६ ष्पस्य फः ३८० म-यक्ष-विस्मयेषु म्हः ३८१ संख्यायां च ३८२ संज्ञायां वा ३८३ सटा-शकट-कैटभेषु तः Hasोपविलम ३६६ 88 १२ २२ ४३. २५ १७५ ३६० २०६ ११६ १०१ १०२ ८६ १२ १२ R:४ [ १२ ] ऋमा पष्ठाङ्क দুঙ্গা १०५ ३४ १२ ५ १० २४ १३८ ३०३ ११३ १३ १५ १८४ ११० २३ १३ १५६ ३८६ सर्वज्ञतुल्येषु अस्य ३८७, सर्वत्र लबराम् 1८८ सर्वादेजस एत्वम् ३८९ सीकरे भः ३६०. सुपः सुः ३६१ सु-भिस् सुप्सु दीर्घः ३६२, सू कुत्सायाम् ३६३, सूर्ये वा ३६४. सेवादिषु ३६५ सोबिन्दुर्नपुंसके ३६६ स्तम्भे खः ३१७: स्तस्य थः ३८. स्त्रियां शस उदोतो ३६६ स्त्रियामात् ४०० स्त्रियामात एत् ४०१. स्थाणावहरे ४०२. स्नुषायां पहः ४०३ स्नेहे वा ४.४ स्पस्य सर्वत्र स्थितस्य ४०५: स्फटिक-चिकुर-निकषेषु कस्य हा ४०६ स्फटिके लः ४०७. स्फुटि-चल्यो स्फोटके ४०६ स्मरतेर्भर-सुमरौं ४१०. स्स-स्सिमोरद् वा ४११. स्सो ङसः २८३ १६३ १५१ १६६ १८ २० १२२ १४ ७७ १० ७८ १० ३४४ ४२ १३ ४०८ ४४ २८ २२७ १६ ३ ܕܝܨܕܨܨܚ ४५ ल: I ६० २८२ २६० २६४ ४०६ ५० भावनेषु ४.१७, ह-क्राहार-कारा ४१८. ह.नः-स्नःष्ण-क्षण-श्नां ण्हः ४१९, हन-ह-मष न-ल-मां स्थिति-रूद्धर्वम ४६ ६ १२ प्राकृतानन्दप्राकृतप्रकाशयोः सूत्राणां भेदानुक्रमणिका प्राकृतानन्दस्य सूत्राणि सूत्राङ्क प्राकृतप्रकाशस्य सूत्राणि सूत्राङ्क अंकोठे ल्लः २०० XXX ३०६ २७४ १ अपी वि अम्हेहितो अम्हेसुत्तो म्यसि X X X २ अव्वो अम्मो दु:खाऽऽक्षेप- विस्मापनेषु असेर्लोपः अंकोले ल्ल: २।२५ १ अत इदेतो लुक् च ११।१० २ श्रदीर्घः सम्बुद्धौ ११११३ ३ अनादावयु जोस्तथयोदधौ १२। ३ X अम्हाहिन्तो अम्हासुन्तोभ्यसि ६।४६ ४ अस्मदः सौ हके हगे अहके ११९ ५ अस्मदोजसावधं च १२।२५ ६ अयुक्तस्यानादी २११ अस्तेर्लोपः ७।६ ७ अस्तेरच्छ १२।१६ X ३ अस्थिनि प्राडो ज्ञादेशस्य पाच्च सौ २१७ १७० प्राङो ज्ञस्य १५५ प्राच सो ३१५५ ५।३५ ३१४८ XX 81 आमः एसि २२३ प्रामि सिं २४६ आल्विल्लोल्लालबत्तेत्ता मतुपः ३१४ ८ श्रात्मनि पः है अानन्तर्ये गवरि पाम एसि प्रामासि प्राल्विल्लोलवन्तेन्तामतुपः १० श्रावि:क्त कर्मभावेषु वा ११ श्राश्चर्यस्याच्चरि ६४ ६.१२ ४।२५ ७।२८ X X १२।३० ४ इअं भूते ३२६ X इट् मयोमिः ३२५ इड् मिपोमिः x १२ इ गध्रसमेषु १२।६ ७१३ १३ इत्सदादिषु श११ १४ इः श्रीह्रीक्रीतक्लान्तवलेशम्ला- नस्वप्नस्पर्शहर्हिगर्थेषु ३१६२ १५ इवस्य पिव: १०॥४ X X [ १४ । प्राकृतानन्दस्य सूत्राणि सूत्राङ्क क्र. प्राकृतप्रकाशस्य सूत्राणि सूत्राङ्क ५ इवे व्व ३०८ ईत् स्त्रियाम् ४१६ उत्तरीया-नीययोर्यस्य जो वा उद्ध्मो धूमा ६ उदूखले द्वा वा १८७ उलूहले ल्वा वा १८७ A X X एच्च क्त्वातुमुन् तव्य- भविष्यत्सु ३३४ X औत् प्रोत् XXX X ईच स्त्रियाम् ७१११ उत्तरीयाऽऽनीययोज्जों वा २०१७ उद्ध्म उधुमा ८.३२ X उलूरवखेल्वा वा १६२१ १७ ऋरीति १.३० १८ लतः क्लुप्तः इलिः ११३३ एच क्त्वातुमुन् तव्यभविष्यत्सु ७।३३ १६ एवस्य जेब्व १२।२३ प्रात प्रोत् १.४१ २० कन्यायां न्यस्य १०।१० २१ करेण्वां रणो: स्थितिपरिवृति: ४।२८ २२ कृगृङ्गमां क्तस्य डः ११११५ क्रुधेर्जूरः २३ क्त्व इमः १२१६ २४ क्त्व स्तूनम् १०११३ २५ क्तान्तादुश्च ११:११ २६ क्त्वो दारिणः ११।१६ क्वचित्पृक्तस्यापि २७ क्षस्य स्कः ११८ २८ खिदेविसूरः ८।६३ २६ गर्दभसंभदवितदिविच्छदिषु दस्य ३।२६ घेत् क्त्वा तुमुन् तव्येषु ८.१६ धेफ़्रः ३८५ ८.६४ X.XXX क्वचिद् युक्तस्यापि ५४ XX घे क्त्या-तुमुन्तव्येषु ४१६ ७ इ.सा से सि तुमो-तुह-तुज्झ-तुम्ह- तुब्भा + ङसो वा २६१ X ङसि तुमो तुह तुज्भ तुम्ह तुम्हा: x ३० ङसो हो वा दीर्घत्वञ्च हु रेम्मी ३१ उर्दैन हः ३२ चर्चेश्चम्पः ३३ चवर्गस्य स्पष्टतया ११११२ ५ के ए-म्मी २२ ६।१६ XXX ८६५ प्राकृतानन्दस्य सूत्राणि सूत्राङ्क क्र. प्राकृतप्रकाशस्य सूत्राणि सूत्राङ्क ६ चिन चेन अवधारणे २६१ ११११४ X १० जस प्रो वो वाऽत्वं यूत्वं च १४० X ३४ चिट्ठस्य चिष्टः X ३५ जश्शस्ङसांगो जसश्च प्रो यूत्वम् जश्शस्ङसां को ५०३८ १३९ ५।३८ जस ओश्च यूत्वम् जस्-शस्-ड-सो पो X ११ ज्ञो गज्ज-गव्वौ वा ३६ जोयः ११।४ ४०८ X १६० २५५ X १२ झयि तद्वर्गान्तः टा-डस डीनामिदे ददातः टा ड्योस्तइ तए तुमए तुए X X १३ गवरि आनन्तनर्य X २६६ ३७ ज्ञस्य जः १०॥ ३८ ज च १०।११ X टाङसिङस्ङीनामिदेददातः ५.२२ टाङयोस्तइ तएतुमए तुमे ६।३० ३६ टामोर्णः ५०४ ४० डुकृञः करः १२।१५ X ४१ गिजश्शसो क्लीबे स्वरदीर्घश्च १२।११ पा७ रगो शसि ६.४४ ४२ रणो नः १०१५ ४३ ततिपो रिदेतो ७११ ४४ तिपात्थि ११२० ६.२७ तुज्झेहिं तुम्हेहि भिसि ४।२४ ३८९ णुदो गोल्ल गुदेलॊणः णे शसि २६६ XXX तु चामि ६१३४ तृन इरः शीले तृणइरः शीले X तं वाऽमि २५३ तुझेहिं तुम्हे हिं तुब्भेहिं भिसि २५८ ४१७ १४ ते तिपोरिदेतो ३१७ त्रेस्ती १५० X १५ दुहि-लिहि-वहां दुब्भ-लिब्भ वब्भा ४०७ त्रस्ति ४५ ददात दइस्स लुटि x ६५५ १२।१४ X ४६ दृशेः पेक्खः १२।१८ १६ दोहदे णः X X ४७ धातोर्भावकर्तृकर्मसु परस्मैपदम् १२।२७ [ १६ ] भाकृतानन्दस्य सूत्राणि सूत्राङ्क क्र. प्राकृतप्रकाशस्य सूत्राणि सूत्राङ्क X नपुंसके स्वमोरिदमिणमिणमो २८७ नाऽऽमन्त्रणे सावोत्व-दीर्घत्व बिन्दव २५ XX पदः पाल: २८३ पदेः पाल: X परुष-परिघपरिखासु फः X X XXX १७ बाष्पेऽश्रुणि हः १८ बृहस्पती ब-हो-औ X १२३ १४५ ४८ न लुटि १२।१३ नपुंसके स्वमोदिदमिण- मिणमो ६।१८ नामन्त्रणे सावोत्व- दीर्घबिन्दवः ५।२७ ४६ नान्त्यद्वित्वे ७६ ५० नैदावे ७।२६ ८।१० ५१ पनसेऽपि २।३७ परुषपलितपरिखासु फ: २।३६ ५२ पुत्रेऽपि क्वचित् १२५ ५३ पैशाची १०११ ५४ प्रकृतिः शौरसेनी १०१२ ५५ प्रकृतिः संस्कृतम् १२।२ ५६ प्रकृत्या दोलादण्डदशनेषु १२।३१ x X ५७ ब्रह्मण्यविज्ञकन्यकानां ण्यझ- न्यानां जो वा १२७ ५८ भविष्यति मिपास्सं वा स्वर- दीर्घत्वञ्च १२।२१ ५६ भाजने जस्य ३१४ X ६० भोभुवस्तिङि १२।१२ भ्यसो हिन्तो सुन्तो ५०७ ६१ मागधी ११११ ६२ मिपो लोटि च १२।२६ मृजेल्भसुपौ सा६७ ६३ ययि तद्वन्तः ४११७ याबादादिषु वस्य ४१५ ६४ राज्ञो राचि टाङसिङस्- डिषु वा १०११२ रुषादीनां दीर्घता ८.४६ ६५ र्यस्य रिमः १०१८ x ३७६ २१ X १६ भियो-भाः बीही X भ्यसो हिंतो सुत्तो X X मृजेलुभ-पुसौ X यावदादिषु वस्य X ३७४ १३४ रुषादीनां दीर्घः ३८४ X [ १७ ] क. प्राकृतानन्दस्य सूत्राणि क्र. प्राकृतप्रकाशस्य सूत्राणि सूत्राद्ध लाहल-लाङ्गल-लाङ्गलेषु वाणः ६८ x २० लतः क्लुप्त: इलि १६१ X XXXX वे क्के च ३६७ x शकेस्तर-चन-तीराः X X XX षट्-शावकसप्तपर्णानां छः लाहले रण: २।४० ६७ लिहेलिज्म ४६ X ६८ वर्गाणां तृतीयचतुर्थयोर- युजोरनाद्योराद्यौ १०।३ ६६ वाष्पेऽश्रुरिण हः ३१३८ ७० विप्रवेष अवधारणे 8/३ ७१ A विसिन्यां भः २०३८ ७१ B बृहस्पती वहेर्भाऔ ४।३० वेक्वेच ७२ व्यापते ड: १२।४ शकेस्तरव अतीराः पा७० ७३ शीकरे भः २१५ ७४ शृगालशब्दस्य शिवाला शिपाले शिपालका: ११।१७ ७५ शेषं महाराष्ट्रीवत् १२।३२ ७६ शौरसेनी १२।१ षट्शावकसप्तपर्णानां हू: २।४१ ७७ षसोः सः ११३ ७८ ष्टस्य सटः १०१६ ष्टाध्यागानांठाअभाअभायाः ८२५ सर्वज्ञतुल्येषु नः ७६ सर्वज्ञेङ्गितज्ञयोग १२।८ ८० सर्वनाम्नां 3 सित्वा १२।२६ ३१३७ X ३।१३ ८३ स्थश्चिट्ठः १२।१६ ८४ स्मरतेः सुमर १२।१७ ८५ स्त्रियामित्थी १२।२२ ८६ स्नस्य सनः १०१७ हुदानपृच्छानिर्धारणेषु ९/२ ८७ हृदयस्य हितकम् १०११४ ५८ हृदयस्य हडक्कः ११११६ हहह्मपु नलमां स्थितिलम् ३१८ x ष्ठा-ध्या-गाना-ठा-झा-गानाः ३६६ सर्वज्ञतुल्येषु अस्य १०५ XX ५१ सिच २१ सीकरे भः ७8 ५२ स्तम्बे X X XXX हुंदानपृच्छानिर्धारणेषु २६० X X हन-ल-ह्मषुनलमां स्थितिरूव॑म् १०८ नन·rm msaie. हमालयाध्या-

भाषा द्विधा संस्कृता च प्राकृता चेति भेदतः।
कौमारपाणिनीयादिसंस्कृता संस्कृता भवेत् ॥ १
इयं तु देवतादीनां मुनीनां नायकस्य च
विप्रक्षत्रियविट्शूद्रमन्त्रिकञ्चुकिनामपि ।। २
गार्ग्यगालवशाकल्यपाणिन्याद्या यथर्षयः ।
शब्दराशेः संस्कृतस्य व्याकर्तारो महत्तमाः ॥ ३
तथैव प्राकृतादीनां षड्भाषाणां महामुनिः ।
आदिकाव्यकृदाचार्यो व्याकर्ता लोकविश्रुतः ।। ४
यथैव रामचरितं संस्कृतं तेन निर्मितम् ।
तथैव प्राकृतेनापि निर्मितं हि सतां मुदे ॥ ५
पाणिन्यायैः शिक्षितत्त्वात्संस्कृती स्याद्यथोत्तमा।
प्राचेतसव्याकृतत्त्वात्प्राकृत्यपि तथोत्तमा ।। ६

पण्डित-रघुनाथ-कवि-विरचित प्राकृतानन्द www wm प्रेङ्खन्नखच्छविमिथश्छुरितेन यस्मिन् , रक्ताचलग्रथनकौतुकमन्वकारि । खेदोगमद्विगुणदानजलः स भूयान्, भूयात् करग्रहविधिः शिवयोः शिवाय ॥१॥ रचयति नृसिंहरत्यै रघुनाथः सरसदैववित्तनयः । रसिकानन्दनिमित्तं सानन्दं प्राकृतानन्दम् ॥२॥ दोषदुष्टमिदमित्यवज्ञया हातुमिच्छत न जातु साधवः!। शैवलं किल विहाय केवलं निर्मलं किमु न पीयते जलम् ? ॥३॥ ये पण्डितकुलोत्पन्ना रसवन्तोऽल्पबुद्धयः। तदर्थमयमारम्भः किमज्ञातं मनीषिणाम् ? ॥ ४॥ * सन्धावचामलोपविशेषा बहुलम् ॥ १ ॥ अचां सन्धावविशेषा लोपश्च वा स्युः । नदीस्रोतः णइसोत्तो राम ओ इति स्थिते रामो, अकारलोपः। मो बिन्दुः॥२॥ मस्य अनुखारः स्यात् । कण्ह अम् इति स्थिते कण्हं । अचि मश्च ॥ ३ ॥ अचि परे मस्य म एव स्यात् । अनुखारापवादः । धणम् ओहरह इति स्थिते धणमोहरइ । 'अनचि मो विन्दुः' इत्येव सूत्रयितु- मुचितम् । नञो हलि ॥ ४॥ नकार-अकारयोः अनुखारः स्याद् हलि । अन्सः अंसो, अत्र - रा २ पण्डित-रघुनाथ-काव-वराचत वक्रादिषु ॥ ५॥ एषु अनुखारागमः स्यात् । वकं वंकं । वक्र त्र्यस्र हस्ख अश्रु श्मश्रु गृष्टि मूर्द्धन मनस्विनी दर्शन स्पर्श वर्ण प्रतिश्रुत् अश्व अभिमुक्त वक्रादिः । मांसादिषु वा ॥ ६ ॥ एषु वा बिन्दुः स्यात् । संयोगेऽणो हृख इति वाच्यम् । मांस मंसं मासं । आकृतिगणोऽयम् । झयि तद्वर्गान्तः ॥ ७ ॥ तद्वर्गान्तोऽनुखारो वा स्याद् झयि । शङ्का संका सङ्का । ॥ इति सन्धिः॥ अत ओत् सोः ॥८॥ अकारान्तात् परस्य सोः ओत् स्यात् ॥ नो णः सर्वत्र ॥ ९॥ यत्र कचित् स्थितस्य नस्य णः स्यात् । क-ग-च-ज-त-द-प-य-वां प्रायो लोपः ॥ १०॥ कादीनां नवानामयुक्तानामनादिवर्तिनां प्रायो लोपः स्यात् नारायणः णाराअणो । अयुक्तानामिति किम् ? शक्रः सको इत्यादि अनादिवर्तिनामिति किम् ? कृष्णः कण्हो इत्यादि। द्विवचनस्य बहुवचनम् ॥ ११ ॥ सुपां तिङ च द्विवचनस्य बहुवचनं स्यात् । जस-शसोर्लोपः॥ १२ ॥ अकारान्तात् परयोः जसू-शसोः लोपः स्यात् । जसू-सू-ङसि-आमसु दीर्घः ॥ १३ ॥ एषु अतो दीर्घः स्यात् । ए च सुप्यङि-ङसोः ॥ १४ ॥ अकारस्य एत्वं स्यात् सुपि, न तु डि-ङसोः। चादू दीर्घोऽपि अकारान्तात् परस्य अमः अकारस्य नाराअणं । ननु ‘सन्धावचाम्' (१) इति अलोपेनैव भाव्यम इति चेत्, न, तत्र बहुलग्रहणात् कचिदप्रवृत्तेरपि सम्भावनीयत्वात् नारायणान् णाराअणा णाराअणे । टा-ऽऽमोर्णः ॥ १६ ॥ अकारान्तात् परयोः टा-ऽऽमोः णः स्यात् । नारायणेन णारा अणेण । नारायणानां णाराअणाणं । भिसो हिं॥ १७ ॥ अकारान्तात् परस्य भिसो हिं इत्यादेशः स्यात् । नारायणैः णाराअणेहिं। चतुर्थ्याः षष्ठी ॥ १८॥ स्यात् । तथा हि। स्सो ङसः॥ १९ ॥ अकारान्तात् परस्य उसः स्स इत्यादेशः स्यात् । नारायणाय णाराअणस्स । नारायणेभ्यः णाराअणाणं । ङसेः आ-दो-दु-यः ॥ २० ॥ अदन्तात् परस्य उसेः आ दो दु हि इति प्रत्येकं चत्वार आदेशाः स्युः । नारायणात् णाराअणा णाराअणादो णाराअणादु णारायणाहि 'जस्-शसू०' (१३) इति दीर्घः। भ्यसो हिंतो सुत्तो ॥ २१ ॥ अदन्ताद् भ्यसो हितो सुत्तो इत्येतो आदेशौ स्याताम् । नारा- यणेभ्यः णाराअणाहिंतो णाराअणासुत्तो । नारायणस्य णाराअणस्स ः ए-म्मी ॥ २२॥ अदन्ताद् ङि इति सप्तम्येकवचनस्य ए म्मि इत्येतौ स्याताम् क्वचिद् ङसि-योर्लोपः ॥ २३ ॥ ङसि-ड्योः परयोः कचिदतो लोपः स्यात् । नारायणे णाराअणे णाराअणम्मि।

नारायणेषु णाराअणेसु । 'ए च०' (१४) इति एत्वम् । नाऽऽमन्त्रणे सावोत्व-दीर्घत्व-बिन्दवः ॥ २५ ॥ सम्बोधने ओत्व-दीर्घत्वा-ऽनुखारा न स्युः । अन्त्यस्य हलः ॥ २६ ॥ [अन्त्यस्य हलः] लोप: स्यात् । हे नारायण हे णाराअण । रागः राओ। 'क-ग' (१०) इति गलोपः। रागाः राआ राए 'जस्-शसो' (१२) इति लोपः, 'जस्-शस्०' (१३) इति दीर्घः रागम् रा रागान् राआ राए । रागेण राएण । रागैः राएहिं । रागाय राअस्स । रागेभ्यः राआणं । रागात् राआ राआदो राआदु राआहि रागेभ्यः राआहिंतो राआसुत्तो। रागस्य राअस्स । रागाणाम् राआणं रागे राए राअम्मि । रागेषु राएसु। आदेरतः ॥ २७ ॥ -इत्यधिकृत्य । इदीषत्-पक्क-स्वप्न-वेतस-व्यजन-मृदङ्गा-ऽङ्गारेषु ॥ २८ ॥ एषु सप्तसु मध्ये आदेः अतः इ: स्यात् । उद् ऋत्वादिषु ॥ २९ ॥ एषु ऋतः उः स्यात् । मृदङ्गः मुइंगो । ऋतु मृणाल पृथिवी वृन्दा- वन प्रावृट प्रवृत्ति विवृत संवृत निवृत वृत्तान्त परभृत मातृक जामा तृक मृदङ्ग इत्यादि ऋत्वादिः । विप्रकर्षः ॥ ३०॥ -इत्यधिकृत्य । युक्तस्य ॥ ३१ ॥ -इत्यधिकृत्य । इः श्री-ही-क्रीत-क्लान्त-क्लेश-म्लान-खान-स्पर्श-हर्षा-ऽहं-गर्हेषु ॥ ३२ ॥ एषु एकादशसु युक्तस्य विप्रकर्षः स्यात्, पूर्वस्य इत्वम्, तत्ख- रता च । 'नो या०' (९) इति णः । स्वमः सिविणो इत्यादि । 'उपरि०' (३६) इति वक्ष्यमाणेन पलोपः।

, एषु तस्य डः स्यात् । प्रतिसरः पडिसरो । 'सर्वत्रः' (३४ इति वक्ष्यमाणेन रलोपः । ननु पडिवआ पडिसिद्धि इत्यादौ तस्य डः केन ? इति चेत्, उच्यते, प्रतिसर इत्यत्र प्रतिना सरति प्रतिपूर्वक इति यावद् इति व्याख्यानात्, 'प्रतिसर'शब्दस्यापि प्रतिनैव सरत्वा- दिति । वेतसः वेडिसो। सर्वत्र लबराम् ॥ ३४ ॥ संयुक्तस्य उपर्यधःस्थितानां लकार-बकार-रेफाणां लोपः स्यात् शेषा-ऽऽदेशयोहि त्वमनादौ ॥ ३५ ॥ युक्तस्य लोपे जाते यः शेषः आदेशश्च तयोः अनादौ वर्तमान- योर्द्वित्वं स्यात् । पक्कः पिको। उपरि लोपः क-ग-ड-त-द-प-ष-साम् ॥ ३६ ॥ कादीनामष्टानां युक्तस्य उपरिस्थितानां लोप: स्यात् । भक्त भत्तो। वर्गेषु युजः पूर्वः॥ ३७॥ 'शेषा' (३५) इति यस्य द्वित्वं क्रियते स द्वितीयः चतुर्थो वा चेत् तत्पूर्वः प्रथमः तृतीयो वा स्यात् । मुग्धः मुद्धो । खड्गः खग्गो उत्पीतः उप्पीओ। सद्गमः सरगमो । आप्तः अत्तो। वसिष्ठः वसिट्ठो स्नेहे वा ॥ ३८ ॥ अत्र युक्तस्य विप्रकर्षों वा स्यात् , पूर्वस्य अत्वं च । लेहः सणेहो हो। आदेर्यो जः ॥ ३९॥ शब्दस्य आदिभूतयकारस्य ज-आदेशः स्यात् । अधो म-न-याम् ॥ ४० ॥ युक्तस्य अधःस्थितानामेषां लोपः स्यात् । योग्यः जोग्गो। ए शय्यादिषु ॥४१॥ एषु आदेः अकारस्य एत्वं स्यात् । उत्करः उकेरो । शय्या सौन्दर्य उत्कर त्रयोदश आश्चर्य पर्यन्त बल्ली शय्यादिः ।

अनया यूशब्दन सह आदः अत आत्व वा स्यात् मयूरः मारा मयूखः मोहो । पक्षे 'क-ग' (१०) इति यलोपः, मऊरो मऊहो । आ समृयादिषु वा ॥ ४३ ॥ अविभक्तिको निर्देशः । 'सविसर्गः पाठः' इति केचित् । एषु आदेः अकारस्य आकारो वा स्यात् । समृद्धि प्रकट अभिजाति मनखिनी प्रतिपत् सहक्ष प्रतिस्पर्द्धि प्रसुप्त प्रसिद्धि अश्व । आकृति गणोऽयम्। शषोः सः ॥४४॥ सर्वत्र शस्य षस्य च सः स्यात् । अश्वः आसो अस्सो। अदातो यथादिषु वा ॥ ४५ ॥ एषु आतः स्थाने वा अत् स्यात् । प्रहारः पहरो पहारो 'सर्वत्र (३४) इति रलोपः । हालिका हलिओ हालिओ। यथा तथा प्राकृत तालवृन्त उत्खात चामर प्रहार चाटु दावाग्नि खादित संस्थापित मृगाङ्क हालिक यथादिः। उद् इनु-वृश्चिकयोः ॥ ४६ ॥ अनयोः इत उत् स्यात् । वृश्चिके ज्छः ॥ ४७ ॥ युक्तस्य स्यात् । वक्ष्यमाणश्च-त्स-प्सां छः' (१२४) इति छत्वापवादः । इद् ऋष्यादिषु ॥ ४८॥ एषु ऋकारस्य इत् स्यात् । वृश्चिकः विञ्छुओ। ऋषि वृषी गृष्टि सृष्टि दृष्टि शृङ्गार मृगाङ्क भृङ्ग भृङ्गार हृदय वितृष्ण बृंहित कृशर कृत्या वृश्चिक कृपा शृगाल कृति कृत्ति कृषि ऋष्यादिः । शृङ्गार सिंगारो । मृगाङ्कः मिअंको, यथादित्वाद् आत अः। भृङ्गः भिंगो भृङ्गारः भिंगारो। ह्र-स्त्र-ष्ण-क्ष्ण-श्नां ग्रहः ॥ ४९ ॥ एषां पहादेशः स्यात् । वितृष्णः वितिण्हो । शृगालः सिआलो प्राकृतानन्द ईत सिंह-जिह्वयोश्च ॥ ५० ॥ अनयोः इत ईत् स्यात् । सिंहः सीहो । इद् ईतः पानीयादिषु ॥ ५१ ॥ एषु ईत इत् स्यात् । करीषः करिसो । पानीय अलीक वीडित व्यलीक गृहीत तदानीम् करीष द्वितीय तृतीय गभीर पानीयादिः । एत् नीडा-ऽऽपीड-कीदृगीदृशेषु ॥ ५२ ॥ एषु ईत एत् स्यात् । आपीडे मः॥ ५३ ॥ पस्य मः स्यात् । लोपं बाधित्वा प्राप्तस्य ‘पो वः' (८५) इति वक्ष्यमाण-व-त्वस्यापवादः । आपीड: आमेलो। क्वचिद् युक्तस्यापि ॥ ५४ ॥ वर्णान्तरेण युक्तस्यापि ऋकारस्य कचिद् रिः स्यात् । 'क-ग (१०) इति द-लोपः। कीदृशः केरिसो। ईदृशः एरिसो। उत ओत् तुण्डरूपेषु ॥ ५५ ॥ संयुक्तवर्णपरोकारेषु उत ओत् स्यात् । ष्क-स्क-क्षां क्खः ॥ ५६ ॥ एषां क्खादेशः स्यात् । पुष्करः पोक्खरो। स्तस्य थः ॥ ५७ ॥ स्यात्। 'उपरि लोप:०' (३६) इत्यस्यापवादः। पुस्तकः पोत्थओ लुब्धकः लोद्धओ। 'उत ओत्' (५५) इत्यस्य प्रायिकत्वात् लुद्धओ अत्र 'सर्वत्र' (३४) इति ब-चयोरैक्यादु लोपे शेषस्य धस्य 'शेषा (३५) इति द्वित्वे दपूर्वो धकारः। अन्मुकुटादिषु ॥ ५८ ॥ एषु आदेः उतः अत् स्यात् । मुकुट मुकुल गुरु गुर्वी युधिष्टि सौकुमार्य मुकुटादिः । 'आदेयों जः' (३९) इति जः, 'उपरि (३६) इति षलोपः, 'शेषा०' (३५) इति द्वित्वम् ।

एषामयुक्तस्य रेफस्य लादेशः स्यात् । युधिष्ठिरः जहिढिलो । हरिद्रा चरण मुखर युधिष्ठिर करुण अङ्गुरी अङ्गार किरात परिखा परिघ हरिद्रादिः । चरणः चलणो । मुखर मुहलो । अङ्गारः इंगालो, 'इद् ईषत्' (२८) इति इत्वम् । किराते चः॥६१॥ अत्र आदेः च: स्यात् । ऋत्वादिषु तो दः ॥ ६२ ॥ एषु तस्य दः स्यात् । किरातः चिलादो। ऋतु रजत आगत निवृति आकृति संवृति सुकृति हत संयत विवृत सञ्जात सम्प्रति प्रतिपत्ति ऋत्वादिः। परुष-परिघ-परिखासु फः ॥ ६३ ॥ एषु आदेः फः स्यात् । परुषः फरुसो । परिघः फलिहो । आगतः आअदो। हतः हदो । संयतः संजदो, 'आदेयों जः' (३९) इति जः सम उपसर्गत्वाद् यत इति यकारस्य आदिस्थत्वम् । इत् पुरुषे रोः ॥६४॥ अत्र रोः उत इत् स्यात् । पुरुषः पुरिसो। रोरिति किम् ? पका- राद् उकारस्य मा भूत् । अयुक्तस्य रिः॥६५॥ वर्णान्तरेण अयुक्तस्य ऋकारस्य रिः इत्यादेशः स्यात् । ऋद्धः रिद्धो। वृक्षे वेन रुवा ॥ ६६ ॥ वृक्षशब्दे वशब्देन सह ऋकारस्य रुः वा स्यात् । व्यवस्थित- विभाषेयम् , तेन च्छत्वपक्षे न भवति, खत्वपक्षे तु स्यादेव । क्षमा-वृक्ष-क्षणेषु वा ॥ ६७॥ एषु क्षस्य वा च्छः । पक्षे 'क-स्क०' (५६) इति खः 'ऋतोऽत्' (१२०) इति वक्ष्यमाणेन अकारः । वृक्षः वच्छो रुक्खो । .

.. एत इद् वेदना-देवरयोः ॥ ६८ ॥ अनयोः आदेः एत इर्वा स्यात् । देवरः दिअरो देअरो, 'क-ग' १०) इति वलोपः। ऐत एत् ॥ ६९॥ आदेः ऐतः ए: स्यात् । शैलः सेलो । कैलास केलासो। दैत्यादिष्वइः ॥ ७० ॥ दैत्यादिषु ऐकारस्य अइः इत्यादेशः स्यात् ।। त्य-थ्य-द्यां च-च्छ-ज्जाः॥ ७१ ॥ त्रयाणां क्रमेण त्रयः स्युः। दैत्यः दइच्चो । चैत्रः चइत्तो, 'सर्वत्र' ३४) इति रलोपः। भैरवः भइरवो । वैदेशः वइदेसो । वैदेहः वइ- देहो । कैतवः कइअवो। वैशाखः वइसाहो, 'ख-घ०' (५९) इति हः । वैशिकः वइसिओ। वैशम्पायनः वइसंपाअणो । दैत्य चैत्र भैरव स्वैर चैर वैदेश वैदेह कैतव वैशाख वैशिक वैशम्पायन दैत्यादिः। ओतोऽद् वा प्रकोष्ठे कस्य वः ॥ ७२ ॥ प्रकोष्ठशब्दे ओतः अद् वा स्यात्, कस्य च वः स्यात् । प्रकोष्ठः पवट्ठो, 'सर्वत्र०' (३२) इति रलोपः, 'उपरि०' (३६) इति षलोपः 'शेषा०' (३५) इति द्वित्वम् । पक्षे पओट्ठो, 'क-ग.' (१०) इति कलोपः। औत ओत् ॥ ७३॥ आदेः औकारस्य ओत् स्यात् । पौत्रः पोत्तो । पौरादिष्वउः ॥ ७४ ॥ एषु औकारस्य अउः इत्यादेशः स्यात् । ओत्वापवादः । पौरः पउरो कौरवः कउरवो। कौशले वा ॥ ७५ ॥ कउसलो कोसलो। आकृतिगणोऽयम् । उत् सौन्दर्यादिषु ॥ ७६ ॥ एषु औकारस्य उत् स्यात् । मौजायनः ' मुंजाअणो। शौण्डः सुंडो कौक्षेयकः कुक्खेअओ, 'वर्गेषु०' (३१) इति कः, 'क-ग.' (१०) य-कोर्लोपः । सौन्दर्य मौञ्जायन शौण्ड कौक्षेयक दौवारिकादयः सौन्द स्फटिक-चिकुर-निकषेषु कस्य हः ॥ ७७ ॥ एषु ककारस्य हादेशः स्यात् । 'क-ग' (१०) इति कलोपापवादः स्फटिके लः ॥ ७८ ॥ अत्र टस्य लः स्यात् । 'टो डः' (८८) इति वक्ष्यमाणस्यापवादः 'उपरि०' (३६) इति सलोपः, स्फटिकः फलिहो । चिकुरः चिहुरो निकषः णिहसो, 'नो णः०' (९) इति णत्वम् , 'शषोः०' (४४ इति सः। सीकरे भः॥ ७९ ॥ अन कस्य भः स्यात् । “क-ग.' (१०) इत्यस्यापवादः । सीकर सीभरो। गर्भिते णः ॥ ८ ॥ तस्य णः स्यात् । गर्भितः गम्भिणो। वसति-भरतयोर्हः॥ ८१ ॥ अनयोः तस्य हः स्यात् । लोपापवादः । भरतः भरहो। ऐरावते च ॥ ८२ ॥ अत्र तस्य णः स्यात् । लोपापवादः। ऐरावतः एरावणो, 'ऐत एत् (६९) इति एत् । प्रदीप्त-कदम्ब-दोहदेषु दोलः ॥ ८३ ॥ एषु अनादिभूतस्य दस्य लः स्यात् । कदम्बः कलंबो। दोहदा णोहलो। अनेति (अनादीति) किम् ? आद्यस्य मा भूत् । 'दोहदे णः (९७) इति वक्ष्यमाणेन णः । गद्गदे रः ॥ ८४ ॥ अत्र अयुक्तस्य दस्य रः स्यात् । 'उपरि०' (३६) इति दलोपः, गद्गदः गग्गरो। पो वः ॥ ८५॥ पस्य अयुक्तस्य अनादिभूतस्य वा स्यात् । शपथः सवहो, 'ख-घ (५९) इति हः। ननु पस्य लोपोक्तेः कथं पस्य वविधिः ? इति चेत्, उच्यते, लोपविधौ ‘प्रायः' (सू० १०) इत्युक्तेः यत्र लोपाभावस्तत्रैव M

प्राकृतानन्द
उत्तरीया-ऽनीययोर्यस्य जो वा ॥ ८६ ॥
उत्तरीयशब्दस्य अनीयप्रत्ययस्य च यो यकारः तस्य जो वा
रमणीयः रमणिज्जो।
कबन्धे बो मः ॥ ८७ ॥
अत्र बस्य मः स्यात् । लोपापवादः । कबन्धः कमंधो ।
टो डः॥ ८८ ॥
टस्य अयुक्तस्य अनादिभूतस्य डः स्यात् । विटपः विडवो।
सटा-शकट-कैटभेषु ढः॥ ८९ ॥
एषु टस्य ढः स्यात् । डापवादः । शकटं सअढो।
कैटभे वः ॥ ९ ॥
भस्य वः स्यात् । कैटभः केढवो, 'ऐत एत्' (६९) इति एत् ।
फो भः ॥ ९१ ॥
स्यात् । सफलः सभलो।
प्रथम-शिथिल-निषधेषु ढः ॥ ९२ ॥
एषु थ-धयोः ढादेशः स्यात् । हापवादः । प्रथमः पढमो । शि
सिढिलो। निषधः णिसढो।
कुब्जेः खः ॥ ९३ ॥
अत्र आदेः वर्णस्य खादेशः स्यात् । कुनः खुजो।
दोला-दण्ड-दशनेषु डः ॥ ९४ ॥
एषां आदेः डः स्यात् । दण्डः डंडो । दशनः डसणो ।
मन्मथे वः ॥ ९५ ॥
अत्र आदेः वः स्यात् ।
न्मो म्मः ॥ ९६ ॥
स्यात् । मन्मथः वम्महो, 'ख-घ०' (५९) इति हः ।
दोहदे णः ॥ ९७ ॥
अत्र आदेः णः स्यात् । दोहदः णोहलो।
लाहल-लाङ्गल-लाङ्गुलेषु वा णः ॥ ९८ ॥

विका एषु आद् छः स्यात् । षण्मुखः छम्मुहा । पर्णः छत्तवण्णो, 'पो वः' (८५) इति वत्वम् , 'सर्वत्र' (३४) इति , रलोपः। दशादिषु हः॥ १०० ॥ एषु शस्य हः स्यात् । सङ्ख्यायां च ॥ १०१॥ सङ्ख्यावाचिशब्दसम्बन्धिदकारस्य र स्यात् । एकादशः एआरहो द्वादशः बारहो । त्रयोदशः तेरहो, शय्यादित्वाद् एत् । संज्ञायां वा ॥ १०२॥ संज्ञायां दशादेः शस्य हो वा स्यात् । दशमुखः दहमुहो दसमुहो दशरथः दहरहो दसरहो। दिवसे सस्य ॥ १०३ ॥ हः स्याद् वा । दिवसः दिअहो दिअसो । द्रे रो वा ॥ १०४॥ द्रशब्दे रेफस्य लोपो वा स्यात् । इंद्रः इंदो इंद्रो। द्रुतः दुओ द्रुओ सर्वज्ञतुल्येषु अस्य ॥ १०५ ॥ सर्वज्ञ इत्येवमाकृतिषु अस्य लोपः स्यात् । सर्वज्ञः सबजो । अत्र से जकारजकारयोर्मध्ये अकारलोपे 'शेषा०' (३५) इति द्वित्वम् । जानाते- योनि सोपपदानि रूपाणि तत्राय लोपः। मध्याह्ने हस्य. ॥ १०६ ॥ लोप: स्यात् । वक्ष्यमाणोर्द्धस्थितेः (१०८) अपवादः ॥ ध्य-योझः॥ १०७ ॥ स्यात् । मध्याह्नः मज्झण्णो। ह्र-ह-ज्ञेषु न-ल-मां स्थितिरूध्दूर्वम् ॥ १०८ ॥ एषु त्रिषु अधःस्थितानां नकार-लकार-मकाराणां त्रिभ्य उपरि स्थितिः स्यात् । प्रह्लादः पल्हादो । अत्र ग्रहणं चिन्त्यम् , 'ह-ल-ष्ण (४९) इति बहादेशे नस्य खयमेव उपरिष्टाद् (१०६) भूतत्वात् कौस्तुभः कोत्थुहो, औत ओत्' (७३) 'स्तस्य थः' (५७) 'ख-घ०' (५९) इति हः स्तस्य थो न स्यात् । 'उपरि०' (३६) इति सलोपः। तः इति पाठा न्तरम् । स्तम्बः तंबो। स्तम्भे खः ॥ ११० ॥ स्तस्य खः स्यात् । थापवादः । स्तम्भः खंभो। स्फोटके ॥ १११॥ अत्र युक्तस्य खः स्यात् । स्फोटकः खोडओ, 'टो डः' (८८ इति डः। र्य-शय्या-ऽभिमन्युषु जः॥ ११२ ॥ र्य इत्येतस्य शय्या-भिमन्युशब्दयोश्च युक्तस्य जः स्यात् । कार्य कजो। सूर्ये वा ॥ ११३॥ सूर्यशब्दे युक्तस्य र-जौ वा स्याताम् । न र-होः ॥ ११४॥ रेफ-हकारयोर्द्वित्वं न स्यात् । सूर्यः सूरो सुज्जो । तस्य टः ॥ ११५॥ स्पष्टम् । कैवतः केवट्टो, 'ऐत एत्' (६९) इति एत् । न धूर्त्तादिषु ॥ ११६॥ एषु तस्य टो न स्यात् । धूर्तः धुत्तो, 'सर्वत्र' (३४) इति रलोपः आवतः आवत्तो । संवतः संवत्तो। निवतः णिवत्तो। आतः अत्तो धूर्त कीर्ति वर्तमान वर्त आवर्त संवर्त निवर्त्त वर्तिका आर्त कर्तरी मूर्ति धूर्तीदिः। गर्ने डः ॥ ११७ ॥ तस्य डः स्यात् । गतः गड्डो । १अत्रायमाशयः यथा "न स्तम्बे" इति सूत्रपाठो दृश्यते तथा प्रत्यन्तरेषु "तः स्तम्बे' इत्या सूत्रपाठो दृश्यत इति ।

, एषु क्षस्य छः स्यात् । क्षुब्धः छुद्धो। उत्क्षिप्तः उच्छित्तो। 'उपरि० (३६) इति पलोपः । सहक्षः सरिच्छो, 'क-ग' (१०) इति दलोपः, क्र रिः । ऋक्षः रिच्छो । अक्षि लक्ष्मी क्षुण्ण क्षीर क्षुब्ध उत्क्षिप्त सहक्ष इक्ष उक्षा क्षार ऋक्ष मक्षिका क्षुर क्षुत क्षेत्र वक्ष उदक्ष कुक्षि कक्षा रक्षा अक्ष्यादिः । क्षणः छणो खणो। ष्म-यक्ष्म-विस्मयेषु म्हः ॥ ११९ ॥ ष्म इत्यस्य यक्ष्म-विस्मययोश्च युक्तस्य म्हादेशः स्यात् । विस्मय विम्हओ । लातः पहाओ, 'ह-ल.' (४९) इति बहादेशः । ऋतोऽत् ॥ १२० ॥ ऋत आदेः अत् स्यात् । कृष्णः कण्हो । प्रश्नः पण्हो । इत एत् पिण्डसमेषु ॥ १२१ ॥ एषु इकारस्य एत्वं स्यात् । समग्रहणं संयोगपरमुपलक्षयति। विश्न: वेहो। स्पस्य सर्वत्र स्थितस्य ॥ १२२ ॥ फः स्यात् । स्पन्दः फंदो । निस्पन्दः णिप्फंदो। बाष्पेऽश्रुणि हः ॥ १२३ ॥ बाष्पशब्दे पस्य हः स्यात् , अश्रुणि वाच्ये । बाष्पः बाहो, र-होः' (११४) इति द्वित्वनिषेधः । अश्रुणि किम् ? बाष्पः बाफो ऊष्मा, वक्ष्यमाणः 'ष्पस्य फः' (२०६)। कार्षापणे ॥ १२४ ॥ युक्तस्य हादेशः स्यात् । कार्षापणः कहावणो, 'पो वः' (८५) इति वः। श्व-त्स-प्सां छः ॥ १२५ ॥ त्रयाणां छः स्यात् । पाश्चात्यः पच्छत्तो । वत्सः वच्छो । ईप्सितः इच्छिओ। नोत्सुकोत्सवयोः ॥ १२६ ॥ अनयोः त्सस्य छादेशो न स्यात् । उत्सुकः असुओ । उत्सव ऊसवो।

न-ज्ञ इत्येतयोः पञ्चाशत्-पञ्चदशशब्दयोश्च युक्तस्य णः स्यात् प्रद्युम्नः पञ्जुण्णो, 'त्य-थ्य' (७१) इति जः । यज्ञः जण्णो। भिन्दिपाले ण्डः ॥१२८ ॥ युक्तस्य ण्डः स्यात् । भिन्दिपालः भिडिवालो, 'पो वः' (८५ इति वः। विह्वले म्भ-हौ वा ॥ १२९ ॥ युक्तस्य एतौ वा स्याताम् । विह्वलः विभलो विहलो। न बिन्दुपरे ॥ १३० ॥ अनुस्वारात् परस्य द्वित्वं न स्यात् । सङ्कान्तः संकेतो। समासे वा ॥ १३१ ॥ समासे शेषा-ऽऽदेशयोर्वा द्वित्वं स्यात् । 'शेषा०' (३५) इत्यत्र 'अनादौ' इत्युक्तेः अप्राप्तविभाषेयम् , अन्तर्वर्तिनी विभक्तिमाश्रित्य पदादित्वात् । छायाग्रामः छायाग्गामो छाहागामो, 'छायायां हा (१६८) इति वक्ष्यमाणेन हः । सेवादिषु ॥ १३२ ॥ एषु अनादौ स्थितस्य हलो द्वित्वं वा स्यात् । निहितः णिहित्तो णिहिओ 'न र-होः' (११४) इति निषेधाद्न हस्य द्वित्वम् । तूष्णीकः तुहिको तुहिओ, 'ह-ल.' (४९) इति पहः । दुःखितः दुक्खिओ, पक्षे 'ख-घ० (५९) इति हः, दुहिओ । द्वित्वपक्षे 'वर्गेषु' (३९) इति कः। विश्राम वीसामो विस्सामो। निःश्वासः णिस्सासो णीसासो । पुष्यः पुस्सो पूसो सेवा एक नख दैव अशिव त्रैलोक्य निहित तूष्णीक कर्णिकार दीर्घरात्रि दुःखित अश्व ईश्वर विश्राम निःश्वास रश्मि मित्र पुष्य सेवादिः । उभ- यत्र विभाषेयम् , सेवादीनामप्राप्ते दीर्घादीनां 'शेषा०' (३५) इति प्राप्ते कृष्णे वा ॥ १३३ ॥ अत्र युक्तस्य विप्रकर्षों वा स्यात् , पूर्वस्य तदचकता च । कृष्णः किसणो कण्हो । व्यवस्थितविभाषेयम् , तेन वर्णवाचके विप्रकर्षः, भग- चति न इति। , लोपः । अनुवर्तमानः अणुअत्तमाणो। यावत् तावत् पारावत अनु- वर्तमान जीवित एवं एव अवट देवकुल यावदादिः । आकृतिगणोऽयम् सर्वः सबो। सर्वादेर्जस एत्वम् ॥ १३५ ॥ स्पष्टम् । सर्वे सवे । सर्व सवं । सर्वान् सवा । सर्वेण सवेण । सर्वैः सवेहिं । सर्वस्मै सबस्स । सर्वेभ्यः सवाणं । सर्वस्मात् सवा सवादो सवाद् सवाहि, 'ङसेः' (२०) इत्यादेशाः । सर्वेभ्यः सबाहिंतो सबासुत्तो सर्वस्य सबस्स । सर्वेषाम् सवाणं । रिस-म्मि-स्थाः ॥ १३६ ॥ सर्वादेः परस्य ः इति सप्तम्येकवचनस्य स्सि म्मि त्थ इति त्रय आदेशाः स्युः। सर्वस्मिन् सवस्सि सबम्मि सवत्थ । सर्वेषु सवेसु । विश्व विस्सो । उभौ उहे । उभशब्दस्य द्विवचनान्तत्वाद् द्विवचनस्य बहुवच- नादेशः । संस्कृते प्रसिद्धः सर्वादिः ॥ शेषोऽदन्तवत् ॥ १३७ ॥ शेषस्तु विधिः अदन्तवत् स्यात् । तेन आकारान्तादपि 'अत ओत सोः' (८) इत्यादि विधिः प्रवर्तते । विश्वपाः विस्सवो इत्यादि । सु-भिसू-सुप्सु दीर्घः ॥ १३८ ॥ इदुदन्तयोः दीर्घः स्याद् एषु परेषु । 'अन्त्यस्य हलः' (२६) इति सोर्लोपः, अग्निः अग्गी । 'अधो०' (४०) इति न लोपः। जस ओश्च यूत्वम् ॥ १३९ ॥ इदुदन्तयोः परस्य जस ओ इत्यादेशः स्याद् णो च, पूर्वस्य ईकारो- कारौ च स्याताम् । अग्नयः अग्गीओ अग्गीणो। पाठान्तरे तु- जस ओ वो वाऽत्वं यूत्वं च ॥ १४० ॥ इदुदन्तयोः शब्दयोर्जसः ओ वो इत्येतावादेशौ स्याताम् , ईत्वम् ऊत्वं च विकल्पेन स्यात् णो च । पक्षे अदन्तवत् । अग्नयः अग्गीओ अग्गीवो अग्गीणो अग्गओ अग्गवो अग्गी । हे अग्ने हे अग्गि अग्निं अग्गि। अत्वम , टा णा ॥ १४१ ॥ इदुदन्तयोः टाया णा इत्यादेशः स्यात् । अग्निना अग्गिणा। न डि-डस्योरेदातौ ॥ १४२ ॥ इदुदन्तयोः परयोः डि-ङस्योः एत् आत् इत्येतौ न स्याताम् । अग्नेः अग्गीदो अग्गीदु अग्गीहि । डि-डस्योरिति किम् ? समृद्ध्या समिद्धीए समिद्धीआ। 'टा-ङसू-डीनाम्' (१६०) इति एत्-आतौ । ए भ्यसि ॥१४३ ॥ इदुदन्तयोः भ्यसि एत्वं न स्यात् । अग्निभ्यः अग्गीहितो अग्गीसुत्तो। ङसों वा ॥ १४४ ॥ इदुदन्तयोः ङसो णो वा स्यात् । पक्षे 'शेषो' (१३७) इत्य- तिदेशात् 'ङसः स्सः' (१९) इति स्सः । अग्नेः अग्गीणो [अग्गिस्स] अग्नीनाम् अग्गीणं । अग्नौ अग्गिम्मि । अग्निषु अग्गीसु । ऋषिः इसी, 'इद् ऋष्यादिषु' (४८) इति इत्वम् । बृहस्पती ब-होर्भ-औ॥ १४५ ॥ अत्र बकार-हकारयोः क्रमेण भकाराकारौ स्याताम् । बृहस्पति भअप्पई, 'उपरि०' (३६) इति सलोपः, 'शेषा०' (३५) इति द्वित्वम् , “क-ग' (१०) इति तलोपः, 'सु-भिस०' (१३८) इति दीर्घः । गृहपतिः, गहवई, 'पो वः' (८५) इति वः ॥ द्विशब्दो नित्य द्विवचनान्तः। द्वेर्दुवे दोणि वा ॥ १४६ ॥ द्विशब्दस्य जसा शसा च सह दुवे दोणि इत्येतावादेशौ स्याताम् द्वौ दुवे दोणि। द्वेः ॥ १४७ ॥ द्विशब्दस्य दो अयमादेशः स्यात् सुपि । द्वाभ्याम् दोहिं । द्वाभ्याम दोहिंतो दोसुत्तो। एषामामो ण्हं ॥ १४८ ॥ द्वि-त्रि-चतुरामामो ण्हं इत्यादेशः स्यात् । णापवादः। द्वयोः दोण्हं द्वयोः दोसु । त्रिशब्दो नित्यं बहुवचनान्तः । , , तिण्णि जस्-शस्भ्याम् ॥ १४९ ॥ जसा शसा च सह त्रिशब्दस्य तिणि इत्यादेशः स्यात् । त्रयः तिपिण। नेस्ती ॥१५०॥ त्रिशब्दस्य ती इत्यादेशः स्यात् सुपि । त्रिभिः तीहिं । त्रिभ्यः तीहिंतो तीसुत्तो । त्रयाणाम् तीण्हं त्रिषु तीसु । सखा सही । सखायः सहीओ सहीणो। हे सहि । सखायम् सहिं । सखीन् सहिणो इत्यादि । पतिः पई । 'इत एत्' (१२१) इति एत्, विष्णुः वेण्हू । जहुः जण्हू । इक्षुः उच्छू, 'उद् इक्षु०' (४६) इति उत्वम् , अक्ष्यादित्वात् छः । ऋतुः उदू, 'उद् ऋत्वादिषु' (२९) इति उत्वम्, 'ऋत्वादिषु' (६२) इति दः। स्थाणावहरे ॥ १५१ ॥ युक्तस्य खादेशः स्यात्, न तु हरे अभिधेये । स्थाणुः खाणू । हर- वाचके तु थाणू, 'उपरि०' (३६) इति सलोपः, विष्णुवत् । 'य-शय्या' (११२) इति जः, अभिमन्युः अहिमज्जु । करेणुः सूर्यः करेणू सुज्जो। ऋत आरः सुपि ॥ १५२ ॥ ऋकारस्य आरः स्यात् सुपि । भर्ता भत्तारो॥ उर्जस्-शस्-टा-ङस्-सुप्सु वा ॥ १५३ ॥ जसि शसि टायां ङसि सुपि च ऋकारस्य स्थाने उर्वा स्यात् आरापवादः । भर्तारः भत्तारा भत्तूओ भत्तुणो, 'जस ओ:०' (१३९ इति ओत्वं णो च । हे भर्तः हे भत्तारा । भर्तृन भत्तुणो, 'इदुतोः० (१४०) इति णो । भर्ना भत्तुणा भत्तारेण । भर्तृभिः भत्तारेहिं । भर्तुः भत्तुस्स भत्तारस्स । भर्तृणां भत्ताराणं । भर्तरि भत्तारम्मि । भर्त पितृ-भ्रातृ-जामातृणामरः॥ १५४ ॥ एषाम् ऋत अरः स्यात् सुपि । आरापवादः । आच सौ ॥१५५॥ पित्रादीनाम् आत स्यात् सौ परे। पिता पिआ पिअरो इत्यादि भ्राता भाआ भाअरो । जामाता जामाआ जामाअरो इत्यादि। इत्यजन्ताः पुंल्लिङ्गाः॥ भत्तुसु भत्तारेसु ।

- पक्षे यथालिङ्गम् । प्रश्नः पण्हा । शय्या सेजा, 'ए शय्यादिषु (४१ इति एत्वम् , 'र्य शय्या' (११२) इति जः। जसो वा ॥ १५७ ॥ स्त्रियां तिष्ठतो जस उ ओ इत्येतावादेशौ वा स्याताम् । शय्या सेन्जाउ सेज्जाओ सेजा। अमि हवः ॥ १५८ ॥ स्त्रीवाचकस्य हखः स्याद् अमि परे । शय्याम् सेजं । स्त्रियां शस उदोतौ ॥.१५९ ॥ स्त्रीलिङ्गे वर्तमानस्य शस उत् ओत् इत्येतावादेशौ स्याताम्। शय्या सेजाउ सेन्जाओ। टा-डस्-ङीनामिदेददातः ॥ १६० ॥ स्त्रीवाचकात् परेषां टा ङस् डि इत्येतेषां इत् एत् अत् आत् एते आदेशाः स्युः । इति चतुलपि प्राप्तेषु नाऽऽतोऽदातौ ॥ १६१॥ स्त्रीवाचकादाकारान्तात् शब्दात् परेषां टा-ङसू-डीनाम् अत्-आतौ न स्याताम् । शय्यया सेन्जाइ सेन्जाए। शय्याभिः सेजाहिं । शय्यायाः सेन्ज सेजादो सेजादु सेजाहि । शय्याभ्यः सेजाहिंतो सेजासुत्तो। ङसो वा ॥ १६२ ॥ उसः स्त्रियाम् उ ओ इत्येतावादेशौ वा स्याताम् । शय्यायाः सेजार सेन्जाओ सेजस्स (2) सेजाइ सेन्जाए। शय्यानाम् सेजाणं । शय्यायाम सेज्जाइ सेन्जाए । शय्यासु सेजासु। स्त्रियामात एत् ॥ १६३ ॥ सम्बुद्धौ स्त्रियाम् आत एत्वं स्यात् सौ। हे शय्ये हे सेजे, 'अन्त्यस्य (२६) इति सोर्लोपः। लवण-नवमल्लिकयोर्वेन ॥ १६४ ॥ लवण-नवमल्लिकयोः आदेः अतो वकारेण सह ओकारः स्यात् नवमल्लिका णोमल्लिआ । मल्लिका इत्येतदुपलक्षणम् , तेन नवफलिका णोभलिआ इति सिद्धम् । निद्रा णेद्दा णेद्रा, 'द्रे रो वा' (१०४) इति व रलोपः, 'इत एत्' (१२१) इति एत्वम् । हे णेद्दे इत्यादि । अत् पथि-हरिद्रा-पृथिवीषु ॥ १६५ ॥ एषु इतो अत् स्यात् । हरिद्रा हलद्दा हलद्रा, 'हरिद्रादीनां' (६० इति रेफस्य लः । जिह्वा जीहा, 'ईत् सिंह०' (५०) इति ईत्वम् "सर्वत्र.” (३४) इति वलोपः। मुक्ता मोत्ता, 'उत ओत्' (५५) इति ओत्वम् । घृणा घणा, 'ऋतोऽत्' (१२०) इति अत् । कृशरा किसरा कृत्या किच्चा, 'त्य-थ्य०' (७१) इति चः। कृपा किवा, ‘पो वः' (८५ इति वः। विष्वपि 'ऋतोऽत्' (१२०) इति अत्वे प्राप्ते ऋष्यादित्वाद इत्वम् । वेदना विअणा वेअणा, 'क-ग०' (१०) इति दलोपः, 'नो णः (९) इति णः । यमुनाया मस्य॥ १६६ ॥ लोपः स्यात् । यमुना जउणा, 'आदेर्यो जः' (३९) इति जः। चन्द्रिकायां मः ॥ १६७ ॥ मः स्यात् । चन्द्रिका. चन्दिमा, 'सर्वत्र' (३४) इति रलोपः। पताका पडाआ, 'प्रतिसर०' (३३) इति तस्य डः, "क-ग० (१०) इति कलोपः। छायायां हः ॥ १६८ ॥ यस्य हः स्यात् छाया छाहा । रमणीया रमणिज्जा, 'उत्तरीया० (८६) इति जः, 'शेषादेशः' (३५) इति द्वित्वम् । सटा सढा । राधा राहा । सभा सहा । शोभा सोहा । परिखा फलिहा, हरिद्रादित्वाद् लः, 'परुष०' (६३) इति फः, 'ख-घ०' (५९) इति हः । दोला डोला, 'दोला-दण्ड०' (९४) इति डः । निशा णिसा। स्नुषायां ग्रहः ॥ १६९॥ षस्य पहः स्यात् । स्नुषा सोण्हा, तुण्डरूपत्वाद् उत ओत्वम् । उल्का उका, 'सर्वत्र० (३४) इति ललोपः। वार्ता वत्ता, 'र्तस्य टः (११५) इति प्राप्ते धूर्तादित्वान्न। वर्तिका वत्तिआ, पूर्ववत् । सन्ध्या ...) कस्य NON- इति चः । मिथ्या मिच्छा । विद्या विजा । क्षुणा छुणा । उक्षा उच्छा मक्षिका मच्छिआ। कक्षा कच्छा । रक्षा रच्छा। पञ्चवपि अक्ष्यादित्वात छः 'वर्गेषु०' (३७) इति चः। क्षमा छमा खमा, 'क्षमा-वृक्ष' (६७) इति छत्ववैकल्प्यात् पक्षे 'एक-स्क०' (५६) इति खः । 'श्च-त्स-प्सा च्छः' (१२३) पश्चिमा पच्छिमा। विवत्सा विइच्छा (?)। लिप्सा लिच्छा जुगुप्सा जुउच्छा, 'प्रायः' (१०) इत्युक्तेर्लोपाभावपक्षे जुगुच्छा मूर्छा मुच्छा, “वर्गेषु०" (३७) इति चः। आङो ज्ञादेशस्य ॥ १७० ॥ 'न-ज्ञ.' (१२७) इति जातो यो णादेशः तस्य आङः परस्य द्वित्व न स्यात् । आज्ञा आणा । सेवा सेव्वा सेवा, 'सेवादिषु' (१३२) इति द्वित्वम् । क्लिष्ट-श्लिष्ट-रत्न-क्रिया-शाङ्गेषु तत्स्वरवत् पूर्वस्य ॥ १७१ ॥ एषु युक्तस्य विप्रकर्षः स्यात् । विप्रकर्षितव्यस्य विप्रकर्षे जाते य पूर्वो वर्णो निरर्थकस्तस्य विप्रकर्षितव्यस्वरता स्यात् । क्रिया किरिआ। अः क्षमा-श्लाघयोः ॥ १७२ ॥ युक्तस्य विप्रकर्षः स्यात्, पूर्वस्याकारः तत्वरता च । क्षमा खमा विप्रकर्षितव्यस्य दीर्घत्वादीर्घत्वे प्राप्ते ह्रस्वो अकारो विधीयते । 'ष्क-स्क० (५६) इति खः। श्लाघा सलाहा, 'श-पोः०' (४४) इति सः, 'ख-घ० (५९) इति हः। ज्यायामीत् ॥ १७३ ॥ युक्तस्य विप्रकर्षः स्यात्, पूर्वस्य ईकारः। ज्याजीआ अत्राप्याकारे प्राप्त ईकारो विधीयते । ज्येत्यत्र विप्रकर्षकरणात् पूर्वम् 'अधो म-न-याम्' (४० इति यलोपः, ततो घचेत् 'कग०' (१०) इति । माला माला । शाला साला आदीतौ बहुलम् ॥ १७४ ॥ स्त्रियामकारान्तादातः स्थाने आत् ईत् इत्येतो बहुलं स्तः। सहमान सहमाणा सहमाणी । वेपमाना वेवमाणा वेवमाणी । हरिद्रा हलद्रा(दा हलद्दी । सूर्पनखा सुष्पणहा सुप्पणही । छाया छाहा छाही । का की जा जी। ता ती। प्रश्नः पण्ही । समृद्धिः समिद्धी सामिद्धी, 'आ समृद्ध्या (४३) इति वा आकारः, ऋष्यादित्वाद् इ., 'सु-भिसू०' (१३८) इति . -' (६०) इतित बलिरानि अनि ष्टस्य ठः ॥ १७५ ॥ ष्ट इत्यस्य ठकारः स्यात् । गृष्टिः गिट्ठी । दृष्टिः दिट्ठी । सृष्टिः सिट्ठी। चतुर्वपि ऋष्यादित्वाद् इत्वम् । आकृतिः आइदी; ऋष्यादि- त्वाद् इ.; आउदी, ऋत्वादित्वाद् उः । सुकृतिः सुइदी, ऋष्यादौ कृति- शब्दपाठात् । संवृतिः संवुदी । प्रतिपत्तिः पदिवत्ती, 'प्रतिसर०' (३३) इति तु न, ऋत्वादिपाठेन बाधात् । वसतिः वसही, 'वसति-भरत० (८१) इति हः। यष्टयां लः ॥ १७६ ॥ आदेर्लः स्यात् । 'आदेखें जः' (३९) इति जापवादः । यष्टिः लट्ठी कीर्तिः कित्ती, 'र्तस्य ट' (११५) इति टे प्राप्ते धूर्त्तादित्वाद् न मूर्तिः मुत्ती । वितर्दिः विअड्डी । विच्छर्दिः विच्छड्डी । उभयत्रापि 'गर्दभ०' (?) इति डः, 'शेषा-ऽऽदेश०' (३५) इति द्वित्वम् । कुक्षिः कुच्छी, अक्ष्यादित्वात् छः। स्थितिः थिई । मनस्विनी मणंसिणी, समृद्ध्या- दित्वाद् वा आकारः, वक्रादित्वादनुसारः। ईदूतोहस्त्रः॥ १७७ ॥ सम्बुद्धौ । [हे मनस्विनि] हे माणंसिणि । मनस्विनीम् माणंसिणिं, 'अमि हवः' (१५८) इति हखः। वल्ली वेल्ली, शय्यादित्वाद् एकारः । चतुर्थी-चतुर्दश्योस्तुना ॥ १७८ ॥ अनयोस्तुशब्देन सह आदेः अतः ओत्वं वा स्यात् । चतुर्थी चोत्थी चउत्थी । चतुर्दशी चोदही चउद्दही । “दशादिषु' (१००) इति हः । पृथिवी पुहवी, ऋत्वादित्वाद् उः, 'अत् पथि०' (१६५) इति अः। उः पद्म-तन्वीसमेषु ॥ १७९ ॥ पद्मशब्दे तन्वी इत्येवंरूपेषु च युक्तस्य विप्रकर्षः स्यात्, पूर्वस्य उकारः । गुर्वी गरुई, मुकुटादित्वाद् अः। शफरी सभरी, 'श-षोः सः' (४४) 'फो भा' (९१) । अङ्गुरी अङ्गुली, "हरिद्रादीनां' (६०) इति रेफस्य लः। बिसिन्यां भः ॥ १८० ॥ आदेः । बिसिनी भिसिणी । स्त्रीलिङ्गनिर्देशः किम् ? बिसं । षष्ठी छट्टी, 'षट्-शावक०' (१९) इति छः । सप्तमी सत्तमी । कर्तरी कत्तरी, "तस्य ट:"( ११५) इति प्राप्ते धूर्त्तादित्वाद् न । लक्ष्मी लच्छी, अक्ष्या दित्वात का 3 , पः स्यात् । रुक्मिणी रुप्पिणी । श्रीः सिरी । ही हिरी, 'इ: श्री-ही (३२) इति विप्रकर्ष-यो । लघ्वी लहुई, 'ख-घः' (५९) इति हः, ' पद्म' (१७९) इति विप्रकर्षः। तन्वी तणुई। नदी नई । हे नइ । पृष्ठं पुट्ठी अक्षि अच्छी । वधूः वहू । हे बहु इत्यादि । मातुरात् ॥ १८२ ॥ मातृशब्दसम्बन्धिन ऋकारस्य आत् स्यात् । माता माआ। हे मा इत्यादि । ॥ इति अजन्ताः स्त्रीलिङ्गाः ॥ : लोपोऽरण्ये ॥ १८३ ॥ आदेरतः। सोबिन्दुर्नपुंसके ॥ १८४ ॥ नपुंसके तिष्ठतः सोः अनुस्वारः स्यात् । अरण्यं रणं । इज्जसू-शसोर्दीर्घश्च ॥ १८५ ॥ नपुंसके वर्तमानयोः जसू-शसोः इदादेशः स्यात् , पूर्वस्य दीर्घश्च अरण्यानि रण्णाई । अरण्यं रण्णं । अरण्यानि रण्णाई। अरण्येन रणेण पुंवत् । हे अरण्य हे रण्ण, 'नाऽऽमन्त्रणे' (२५) इति निषेधाद् बिन्दु किन्तु 'अन्त्यस्य०' (२६) इति सोर्लोपः। ओ बदरे देन ॥१८६॥ अत्र दकारेण सह आदेरत ओत्वं स्यात् । बदरं बोरं इत्यादि । उदूखले द्वा वा ॥ १८७ ॥ अत्र दूशब्देन सह आदेः ओद् वा स्यात् । उदुखलं ओखलं उदूहलं। उलूहले ल्वा वा ॥ १८७A || उलूहलशब्दे लू शब्देन सह आदेः उकारस्य ओकारो वा स्यात् । उलूहलंओहलं । इति पाठान्तरम् । उदूतो मधूके ॥ १८८ ॥ अत्र मधूकशब्दे ऊकारस्य उत् स्यात् । मधूकं महुआ।

फूलपा विस्वम् ।। दुकूलशब्दे ऊकारस्य अकारो वा स्यात् , तत्सन्नियोगेन च लस्य द्वित्वम् । दुकुलं दुअल्लं दुऊलं । एन्नूपुरे ॥ १९० ॥ नूपुरशब्दे अकारस्य एत् स्यात् । अत्र 'आदेः' इति प्रयोजनाभा- वाद् नानुवर्तते । नूपुरं णेउरं । ऋणं रिणं, 'ऋ रिः' (2) इति रि । हृदयं हिअयं, ऋष्यादित्वाद् इः । वृन्दावनं बुंदावणं, 'ऋतोऽत्' (१२०) इति प्राप्ते ऋत्वादित्वाद् उः। लतः कृप्त इलि ॥ १९१ ॥ क्लृप्तशब्दे लकारस्य इलिः स्यात् । क्लुप्तं किलित्तं । त्रैलोक्यं तेल्लोकं, 'ऐत् एत्' (६९) इति एत्, सेवादित्वात् द्वित्वम् , द्वित्ववैकल्प्यात् पक्षे तेलोकं । शैत्यं सेत्तं । स्वैरं सइरं। वैरं वरं । द्वयोरप्यैकारस्य 'दैत्यादिषु' (६८) इति अइः। दैवे वा ॥ १९२॥ दैवशब्दे ऐकारस्य अइरित्यादेशो वा स्यात् । नीडादिषु च ॥ १९३ ॥ एषु अनादौ तिष्ठतो हलो वा द्वित्वम् । दैवं देवं देवं दइवं । नीड स्रोत प्रेम व्याहृत जनक यौवन दैव इत्यादयः नीडादिः। इत् सैन्धवे ॥ १९४ ॥ अत्र एकारस्य इकारः स्यात् । एत्वापवादः । सैन्धवं सिन्धवं । ईद धैर्ये ॥ १९५ ॥ अत्र एकारस्य ईत् स्यात् । एत्वापवादः । तूर्य-धैर्य-सौन्दर्या-ऽऽश्चर्य-पर्यन्तेषु रः॥ १९६ ॥ एषु यस्य रः । धैर्य धीरं । तूर्य तूरं । सौन्दर्य सुन्दरं, 'उत् सौन्द- यादिषु' (७६) इति उः। आश्चर्य अच्छेरं, 'श्व-त्स०' (१२५) इति छः । पर्यन्तं परंतं । विष्वपि शय्यादित्वाद् एत्वम् । यौवनं जोवणं, 'औत ओत्' (७३) इति ओत्, 'आदेर्यों जः' (३९) इति जः, नीडादित्वात् द्वित्वम्, नो णः०' (९) इति णः।

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आच्च गौरवे ॥ १९७ ॥
गौरवशब्दे आ अउ ओ इत्येते स्युः। गौरवं गारवं गउरवं गोर
इत्यादि । गर्भितं गम्भिणं, 'गर्भिते णः' (८०) इति णः।
डस्य च ॥ १९८॥
डकारस्यायुक्तस्य अनादिभूतस्य लः स्यात् । दाडिमं दालिम । 'प्रायः
इत्यनुवृत्तेः कचिदू दाडिम इत्यपि ।
ठो ढः ॥ १९९ ॥
अयुक्तस्य अनादिभूतस्य ठस्य ढः स्यात् । जठरं जढरं । कठोरं कढोरं
अंकोठे ल्लः॥ २००॥
अत्र ठस्य ल्ल: स्यात् । अंकोठं अंकोल्लं । सफलं सभलं, 'फो भः
(९१) इति भः । सुखं सुहं, 'ख-ग' (५९) इति हः । करुणं कलुणं
हरिद्रादित्वाद् रेफस्य लः।
श्मश्रु-श्मशानयोरादेः ॥ २०१॥
अनयोरादेवर्णस्य लोपः स्यात् । श्मशानं मसाणं ।
चौर्यसमेषु रिअं ॥ २०२॥
एषु यस्य रिअं इत्यादेशः स्यात् । चौर्य चोरिअं। शौर्य सोरिअं
'औत ओत्' (७३) इति ओत् । वीर्य वीरिअं ।
पर्यस्त-पर्याण-सौकुमार्येषु लः ॥ २०३ ॥
एषु यस्य क्लः स्यात् । पर्यस्तं पल्लत्थं, 'स्तस्य थ' (५७) इति थः
'शेषादेश०' (३५) इति द्वित्वम् । पर्याणं पल्लाणं । सौकुमार्य सोअमलं
मुकुटादित्वाद् ।
पत्तने ॥ २०४॥
युक्तस्य 2: । पत्तनं पट्टणं । क्षीरं छीरं, अक्ष्यादित्वात् छः । श्लप
सहं । तीक्ष्णं तिण्हं । 'ह-ल' (४९) इति बहादेशः।
चिह्ने धः॥ २०५॥
युक्तस्य धः स्यात् । पहापवादः । चिह्न चिन्धं, प्रायिकमेतत् , चिण्हं
पस्य फः ॥ २०६॥

युक्तस्य पठः स्यात् । तालवृन्तकं तालवेण्ठ तलवेण्ठअं। आम्र-ताम्रयोः॥ २०८ ॥ अनयोरनादेः वः स्यात् । आनं अंबं । तानं तंबं । क्लिष्टं किलिटुं| रत्नं रअणं । 'क्लिष्ट-श्लिष्ट' (१७१) इति विप्रकर्षः तत्वरता च । उदुम्बरे दोर्लोपः ॥ २०९ ॥ अत्र दु इत्यस्य लोपः स्यात् । उदुम्बरं उंबरं । कालायसे यस्य वा ॥ २१० ॥ अत्र यस्य वा लोपः स्यात् । य इति विशिष्टग्रहणम् । कालायसं कालासं कालाअसं, लोपाभावपक्षे 'क-ग..(१०) इति यकारमात्रलोपः मलिने लिनोरिलौ वा ॥ २११ ॥ मलिनशब्दे लि इत्यस्य इः स्यात्, न इत्यस्य लः स्याद् वा । मलिनं मइलं मलिणं। गृहे घरोऽपतौ ॥ २१२ ॥ गृहशब्दस्य घर इत्ययमादेशः स्यात्, न तु पतौ परे । गृहं घरं अपताविति किम् ? गृहपतिः गहवई । पीतं पीअं । धनं धणं । वृन्दे वो रः॥ २१३ ॥ वृन्दशब्दे वात् परः खार्थे रो वा स्यात् । बंदं वंदं । आलाने न-लोः॥ २१४ ॥ अत्र नकार-लकारयोः स्थितिपरिवृत्तिः स्यात् । आलानं आणालं दाढादयो बहुलम् ॥ २१५ ॥ दाढा इत्यादयः शब्दाः बहुलं निपात्यन्ते । चातुर्य चाउलिअं । पृष्टं पुढे । इदानीं एण्हि । दुहिता दिद्धी । मण्डूकः मण्डूरो । कमलं कंदोहो। गोदावरी गोला । ललाटं लडालं णिडालं । आकृतिगणोऽयम् । 'सु-भिसू० (१३८) इति दीर्घ प्रासे- न नपुंसके ॥ २१६ ॥ क्लीवे प्रथमैकवचने दी? न । वारि वारि । वारीणि वारीइं । पुनस्त- द्वत् । शेषं पुंवत् ।

युक्तस्य ठः स्यात् । अस्थि अहिं । सक्थि सत्थिं । अक्षि अञ्छि गुरु गरअं, मुकुटादित्वाद् अः । श्मश्रुः मंसू, 'श्मश्रु-श्मशानयोः (२०१) इति शकारलोपः अश्रु अंसू , वक्रादित्वाद् अनुस्वारः। मधु महुं ॥ इत्यजन्ता नपुंसकलिङ्गाः ॥ अनड्वान् अणडुओ, विष्णुवत् । चतुर्शब्दो नित्यं बहुवचनान्तः चतुरश्चचारो चत्वारि ॥ २१८ ॥ चतुःशब्दस्य जसा शसा च सह एतावादेशौ स्याताम् । चत्वार चत्तारो चत्तारि । चतुरः चत्तारो चत्तारि । चतुर्भिः चऊहिं । चतुर्य चऊहिंतो चऊसुत्तो । चतुर्णा चउण्हं । चतुषु चऊसु । किमः कः ॥२१९॥ स्पष्टम् । कः को । के के, 'सर्वादेः' (१३५) इति एत्वम् । इदम्-एतत्-कि-यत्-तद्भयष्टा इणा वा ॥ २२० ॥ एभ्यः परः दा इणा इति वा स्यात् । केन कइणा केण । तो दो ङसेः ॥ २२१ ॥ किं-यत्-तद्भ्यो उसेः त्तो दो इत्येतावादेशौ वा स्याताम् । कस्मात कत्तो कदो का कादो कादु काहि । केभ्यः काहिंतो कासुत्तो। किं-यत्-तद्भयो ङस आसः ॥ २२२ ॥ एभ्यः परस्य ङस आस इत्यादेशो वा स्यात् । कस्य कास कस्स आम एसिं ॥ २२३ ॥ इदम् एतत्-कि-यत्-तद्भयः परस्य आम एसिं इत्यादेशो वा स्यात् । केषां केसिं काणं । डेहि ॥ २२४ ॥ किं-यत्-तद्भयो उ सप्तम्येकवचनस्य हिं इत्यादेशो वा स्यात् । कस्मिन् कहिं कस्सि कम्मि कत्थ । आहे इआ काले ॥ २२५ ॥ किं-यत्-तद्व्यः परस्य . काले वाच्ये आहे इआ इत्येतावादेशौ वा स्याताम् । कदा काहे कइआ कहिं कस्सि कम्मि कत्थ । केषु केसु ।

२८ पण्डित-रघुनाथ-कवि-विरचित इदम इमः ॥ २२६ ॥ इदम्शब्दस्य इम इत्यादेशः स्यात् सुपि। अयं इमो । इमे इमे इमं इमं । इमान् इमा। अनेन इमेण इमिणा, 'इदमेतत्' (२२०) इति इणादेशः। एभिः इमेहिं । अस्मात् इमादो इमादु इमाहि । एभ्यः इमाहितो इमासुत्तो। स्स-स्सिमोर वा ॥ २२७ ॥ इदम्शब्दस्य अ इत्यादेशो वा स्यात् स्से स्सिमि च । अस्य अस्स इमस्स । एषां इमेसिं इमाणं । ङेदन हः ॥ २२८॥ इदम्शब्दस्य दकारेण डेः ह इत्यादेशो वा स्यात् । पक्षे यथाप्राप्तम् न त्थः ॥ २२९ ॥ इदमः परस्य ः त्थ इत्यादेशो न स्यात् । अस्मिन् अस्सि इमसि इह इमम्मि । एषु इमेसु। राज्ञश्च ॥ २३० ॥ राजनशब्दस्य आ इत्ययमादेशः स्यात् सौ । राजा राआ. 'अन्त्यस्य' (२६) इति सोर्लोपः। जसू-शस्-ङसो णो ॥ २३१ ॥ राज्ञः परेषामेषां णो इत्यादेशः स्यात् । आ णो-णमोरङसि ॥ २३२ ॥ णो-णमोः परयोः राज्ञो जस्य आ स्यात् । राजानः राआणो । आमन्त्रणे वा बिन्दुः॥ २३३ ॥ राजनशब्दस्यामन्त्रणेऽनुखारो वा स्यात् सौ। हे राजन् हे राज हे राअ । राजानं राअं। 'शेषो०' (१३७) इति अदन्तवद्भावः । शस एत् ॥ २३४॥ राज्ञः परस्य शस ए इत्यादेशः स्यात् । राज्ञः राए राआणो।

ङसश्च द्वित्वं वाऽन्त्यलोपश्च ॥ २३६ ॥ राज्ञः परस्य ङसादेशस्य टादेशस्य च द्वित्वं वा स्यात् अन्त्यस्य च लोपः। राज्ञा रण्णा । पक्षे- इदद्वित्वे ॥ २३७ ॥ उसादेशस्य टादेशस्य च द्वित्वाभावपक्षे राज्ञ' इत्वं स्यात् । राइणा । राजभिः राएहिं 'शेषो०' (१३७) इत्यदन्तवद्भावः । राज्ञः राआ राआदो राआदु राआहि । राजभ्यः राआहितो राआसुत्तो। राज्ञः रण्णो राइणो। आमो णं ॥ २३८ ॥ राज्ञ उत्तरस्य आमः णं इत्यादेशः स्यात् । राज्ञां राआणं । राज्ञि राअम्मि राए । राजसु राएसु। आत्मनो अप्पाणो वा ॥ २३९ ॥ आत्मनः अप्पाण इत्ययमादेशो वा स्यात् । इत्व-द्वित्ववर्ज राजवदनादेशे ॥ २४० ॥ आत्मनः अनादेशे राजवत् कार्य स्यात्, [इत्व-द्वित्वे वर्जयित्वा ] आत्मा अप्पाणो अप्पा । 'राज्ञश्च' (२३०) इति आकार उक्तः सोऽत्रापि स्यात्।आत्मनः अप्पाणो । आत्मानं अप्पं । आत्मनः अप्पणो। आत्मन अप्पणा । आत्मभिः अप्पेहिं । आत्मनः अप्पा अप्पादो अप्पाद अप्पाहि । आत्मभ्यः अप्पाहिंतो अप्पासुत्तो। आत्मनः अप्पणो आत्मनां अप्पागं । आत्मभिः (त्मनि?) अप्पे अप्पम्मि । आत्मसु अप्पेसु। ब्रह्माद्या आत्मवत् ॥ २४१ ॥ ब्रह्मन् युवन् इत्यादयः शब्दाः आत्मवत् साधवः स्युः। ब्रह्म बह्मा बह्माणो । युवा जुवा जुवाणो । अध्वा अद्धा अद्धाणो । एवमादय लक्ष्यानुसारतो ज्ञेयाः। न-सान्त-प्रावृट-शरदः पुंसि ॥ २४२ ॥ नमसन न-मो अन्ते यम्य इति विग्रहः। एते पंसि प्रयोक्तव्या:

A अनयोर्यः तकारः तस्य सकारः स्यात् सौ । सः सो। ते ते । तं तं । तान् ता । तेन तइणा तेण । तैः तेहिं । तद ओश्च ॥ २४४॥ तदः परस्य ङसेः ओ इत्ययमादेशो वा स्यात् । तस्मात् तओ तत्तो तदो तादो तादु ताहि । तेभ्यः ताहिंतो तासुत्तो। ङसा से ॥ २४५॥ तदो डसा सह से इत्यादेशो वा स्यात् । तस्य से तास तस्स । आमि सिं ॥ २४६॥ तद आमा सह सिं इत्यादेशो वा स्यात् । तेषां सिं तेसिं ताणं । तस्मिन् तहिं तस्सि तम्मि तत्थ। तदा तहे तइआ। तेषु तेसु। एवं यःजो। एतदः सावोत्वं वा ॥ २४७ ॥ एतद ओत्वं वा स्यात् सौ। एषः एसो एस, नित्यप्राप्तविभाषेयम् । एते एते । एतं एतं । एतान् एता । एतेन एदिणा एदेण । एतैः एदेहिं । तो उसेः ॥ २४८॥ एतदः परस्य उसेः त्तो इत्ययमादेशो वा स्यात् । त्तो-त्थयोस्तो लोपः ॥ २४९ ॥ एतच्छब्दस्य तकारस्य लोपः स्यात् त्तो-त्थयोः परयोः। एतस्मात एत्तो एदादो एदादु एदाहि । एतस्मिन् एत्थ एतस्सि एतम्मि । पदस्य ॥ २५०॥ - इत्यधिकृत्य । युष्मदस्तं तुमं ॥ २५१ ॥ युष्मदः पदस्य तं तुम इत्यादेशौ स्यातां सावा सह । त्वं तं तुमं । तुझे तुम्हे जसि ॥ २५२ ॥ युष्मदः पदस्य तुज्झे तुम्हे इत्येतावादेशौ वा स्तः जसा सह । यूयं तुज्झे तुम्हे। तं वाऽमि ॥ २५३ ॥ युष्मदः पदस्थ त्तं इत्यादेशो वा स्यात् अमा सह । त्वाम् त्तं तुम युष्मदः पदस्य वो तुझे तुम्हे इत्येते आदेशाः स्युः शसा सह युष्मान् वो तुज्झे तुम्हे ॥ टा-डयोस्तइ तए तुमए तुए ॥ २५५ ॥ युष्मदुत्तरयोः टा ङि इत्येतयोः तइ तए तुमए तुए इत्येते आदेशा स्युः प्रकृत्या सह । त्वया तह तए तुमए तुए। आङि च ते दे ॥ २५६ ॥ युष्मदः पदस्य आङा सह ते दे इत्येतावादेशौ स्तः । आङ् इति टासंज्ञा प्राचाम्। तुमाइ च ॥ २५७ ॥ अयमपि स्यात् । ते दे तुमाइ । तुज्झेहिं तुम्हेहिं तुब्भेहिं भिसि ॥ २५८ ॥ युष्मदः पदस्य एते आदेशाः स्युः भिसा सह । युष्माभिः तुज्झेहि तुम्हेहिं तुब्भेहिं । अत्र 'तुज्झे तुम्हे तुब्भे' इति सुवचम् 'शिषोक (१३७) इत्यनेन 'भिसो हिं' (१७) इति हिमादेशस्यातिदिष्टत्वात् । ङसौ तत्तो तइत्तो तुमादो तुमादु तुमाहि ॥ २५९ ॥ युष्मद एते आदेशाः स्युः ङस्या सह । त्वत् तत्तो तइत्तो तुमाद तुमादु तुमाहि। तुम्हाहिंतो तुम्हासुत्तो भ्यसि ॥ २६० ॥ युष्मद एतौ आदेशौ स्यातां पञ्चमीबहुवचनेन सह । युष्मद तुम्हाहितो तुम्हामुत्तो । अत्रापि 'तुम्हा भ्यसि' इत्येव सुवचम् । एवम [स्मत् शब्देऽपि ज्ञेयम् । ङसि तुमो-तुह-तुज्झ-तुम्ह-तुब्भाः॥ २६१ ॥ युष्मद एते आदेशाः स्युः डसा सह । तव तुमो तुह तुज्झ तुम्न तुम्भ। वो भे तुज्झाणं तुम्हाणमामि ॥ २६२ ॥ युष्मद एते स्युरामा सह । युष्माकम् बो भे तुज्झाणं तुम्हाणं ।

३२.
पण्डित-रघुनाथ-कवि-विरचित
ङौ तुमम्मि ॥ २६३ ॥
युष्मदः तुमम्मि इत्यादेशः स्यात् या सह । त्वयि तुमम्मि तइ
तए तुमए तुए।
तुज्झेसु तुम्हेसु सुपि ॥ २६४ ॥
युष्मद एतौ स्यातां सुपा सह । युष्मासु तुझेसु तुम्हेसु ।
अस्मदो हमहमहअं सौ ॥ २६५ ॥
अस्सद एते स्युः प्रथमैकवचनेन सह । अहम् हं अहं अहअं ।
अहम्मिरमि च ॥ २६६ ॥
अस्मदः प्रथमैकवचन-द्वितीयैकवचनाभ्यां सह आदेशः स्यात्
अहं अहम्मि।
अम्हे जस्-शसोः ॥ २६७ ॥
अस्मदः अयमादेशः स्याद् जसा शसा च सह । वयं अम्हे ।
मं ममं ॥ २६८॥
अस्मद एतावादेशौ स्याताम् । माम् अहम्मि में ममं । 'अहम्मि
रमि च' (२६६) इत्यतो 'अमि' इत्यनुवर्तते । 'चानुकृष्टं नोत्तरत्र' इति
परिभाषया चानुकृष्टानां हं-आदीनां नानुवर्तनम् ।
णे शसि ॥ २६९ ॥
अस्मदो णे इत्यादेशः स्यात् शसा सह । अस्मान् अम्हे थे।
आङि मे ममाइ ।। २७० ॥
अस्मदः एतौ स्तः टया सह । मया मे ममाइ ।
डौ च मइ मए ॥ २७१ ॥
अस्मदः एतौ स्तः डि-टाभ्यां सह । मया मइ मए ।
अम्हेहिं भिसि ॥ २७२ ॥
अस्मदः अयं स्याद् भिसा सह । अस्माभिः अम्हेहिं ।
मत्तो मइत्तो ममादो ममादु ममाहि ङसौ ॥ २७३ ॥

अम्हेहिंतो अम्हेसुत्तो भ्यसि ॥ २७४ ॥ अस्मद एतौ स्यातां भ्यसा मह । अस्मत् अम्हेहिंतो अम्हेसुत्तो। मे मम मह मज्झ ङसि ॥ २७५ ॥ अस्मद एते स्युः ङसा सह । मम मे मम मह मज्झ । झस्य धत्वमपीच्छन्ति केचित्, मद्ध । मज्झणो अम्हं अम्हाणं अम्हे आमि ॥ २७६ ॥ अस्मद एते स्युरामा सह । अस्माकम् मज्झणो अम्हं अम्हाणं अम्हे ममम्मि ङौ ॥ २७७ ॥ अस्मदः अयं स्याद् ड्या सह । मयि ममम्मि मइ मए । अम्हेसु सुपि ॥ २७८ ॥ अस्मदः अयं स्यात् सुपा सह । अस्मासु अम्हेसु । शरदो दः ॥ २७९ ॥ अत्रान्त्यहलो दः स्यात् । लोपापवादः। शरत् सरदो, 'नसान्त (२४२) इति पुंवद्भावः। दिक्-प्रावृषोः सः ॥ २८० ॥ अनयोरन्त्यस्य सः स्यात् । लोपापवादः । प्राकृट् पाउसो । रनमुद्र रअणम्। अदसो दो मुः ॥ २८१ ॥ अदसो दकारस्य मु इत्यादेशः स्यात् सुपि । हश्च सौ ॥ २८२॥ अदसो दस्य हः स्यात् सौ । असौ अह अमू । हादेशोऽयं ओत्व- आत्व-बिन्दून परत्वादु बाधते । अमी अमुए अमुणो । अमुम् अमुं अमून अमूओ। अमुना अमुणा। अमीभिः अमूहिं । अमुष्मात् अमूदो अमूदु अमूहि । अमीभ्यः अमूहितो अमूसुत्तो । अमुष्य अमुस्स अमीषाम् अमुणं । अमुष्मिन् अमुस्सि अमुम्मि अमुत्थ । अमीषु अमूसु तपः तवो। यशः जसो । सरः सरो। ॥ इति हलन्ताः पुंलिङ्गाः ॥

रो रा ॥ २८४ ॥ स्त्रियामन्त्यस्य रेफस्य रा इत्ययमादेशः स्यात्।धूः धुरा। गीः गिरा चतस्रः चत्तारो चत्तारि । का काआ की। इद्भयः स्सा-से ॥ २८५ ॥ इकारान्तेभ्यः किं-यत्-तद्भयो ङसः स्सा से इत्येतावादेशौ वा स्याताम् । कस्याः किस्सा कीसे । पक्षे कीइ कीए कीअ कीआ, 'टाङसू०' (१६०) इति आदेशाः । 'आदीतौ' (१७४) इति आकारपक्षे काइ काए । इयं इमा। युष्मदस्मदोर्लिङ्गत्रये सदृशं रूपम् । या जा जी । याः जाउ जाओ जा । यस्याः जिस्सा जीसे जीइ जीए जीअ जीआ जाइ जाए। वाकवाआ। न विद्युति ॥ २८६ ॥ अन्त्यस्य हल आकारो न स्यात् । विद्युत् विजू । दिक् दिसा, 'दिप्रावृषोः०' (२८०) इति सः । असौ दिक अमू दिसा। अमूः अओ। मूशेषमूकारस्त्रीलिङ्गवत् । ॥ इति हलन्ताः स्त्रीलिङ्गाः ॥ नपुंसके वमोरिदमिणमिणमो ॥ २८७ ॥ क्लीबे सविभक्तिकस्येदमः इदं इणं इणमो इत्यादेशाः स्युः खमोः परयोः । इदम् इदं इणं इणमो । इमानि इमाइं । पुनस्तद्वत् । शेषं पुंवत् । किम् किं । कानि काई । पुनरपि । शेषं पुंवत् । तत् तं, '०अनपुं- सके' (२४३) इत्युक्ते न सादेशः। तानि ताई । एतत् एदं। यत् जं। यानि जाई । अदः अह अमुं। अमूनि अमूइं । 'न सान्त०' (२४२) इति प्राप्ते- न शिरो-नभसी ॥ २८८ ।। एतौ पुंसि न स्याताम् । शिरः सिरं, 'अन्त्यस्य । सोर्लोपः। ॥ इति हलन्ता नपुंसकलिङ्गाः ॥ इति आधकाराऽयम् । हुं दान-पृच्छा-निर्धारणे ॥ २९० ॥ हुमित्ययं निपातसंज्ञः स्याद् दाने पृच्छायां निर्धारणे च । चिअ चेअ अवधारणे ॥ २९१ ॥ चिअ चेअ इत्येतौ निपातसंज्ञौ स्तः निश्चये। ओ सूचना-पश्चात्ताप-विकल्पेषु ॥ २९२ ॥ ओ इत्ययं निपातः सूचनायां पश्चात्तापे विकल्पे च । इर-किर-किला अनिश्चिताख्याने ॥ २९३ ॥ प्रयो निपाताः संशयाख्याने । हु-क्खु निश्चय-वितर्क-सम्भावनेषु ॥ २९४ ॥ हु क्खु इत्येतौ निपातौ निश्चये वितर्के सम्भावनायां च । णवरः केवले ॥ २९५ ॥ निपातः केवलेऽर्थे । णवरि आनन्तर्ये ॥ २९६ ॥ णवरि इति आनन्तर्ये निपातः । किणो प्रश्ने ॥ २९७ ॥ किणो इत्ययं पृच्छायां निपातः । अबो दुःख-सूचना-सम्भावनेषु ॥ २९८ ॥ अव्वो इत्ययं निपातः दुःखे सूचनायां सम्भावनायां च । अलाहि निवारणे ॥ २९९ ॥ अलाहि इत्ययं निपातः निषेधे । अइ वले सम्भाषणे ॥ ३० ॥ अइ वले. एतौ निपातौ वचने । अबो अम्मो दुःखा-ऽऽक्षेप-विस्मापनेषु ॥ ३०१ ॥ एतौ निपातौ दुःखे आक्षेपे विस्मापने च । अत्र 'अव्वो दुःख-सूच- -सम्भावनेषु' 'अम्मो च दुःखाऽऽक्षेप-विस्मापनेषु' इति सूत्रयितुं रक्तमिति केचित् । वयं तु तत्रापरसूत्रे 'दुःख' शब्दमपि त्यजामा, पूर्वसूत्रे सुखशब्दस्य स्वरितत्वेनानुवर्तनात्, 'खरितेनाधिकारः' इति पाणिनीये wwwmwww परिभाषितत्वात् समस्तपदादेकदेशानुवृत्तिस्तु 'क्ङिति च' इत्यत्र ', धातुलोप'- इत्यतो धातुग्रहणानुवृत्तिवत् । णवि वैपरीत्ये ॥ ३०२ ॥ अयं वैपरीत्ये निपातः। सू कुत्सायाम् ॥ ३०३ ॥ सू इत्ययं निपातो निन्दायाम् । रे अरे हिरे सम्भाषण-रतिकलहा-ऽऽक्षेपेषु ॥ ३०४ ॥ रे अरे हिरे इति त्रयः क्रमेण सम्भाषणे रतिकलहे आक्षेपे च निपा ताः । अत्र च 'यथासंख्यमनुदेशः समानाम्' इत्युक्तत्वाद् यथासंख्यम् म्मिव-मिअ-विआ इवार्थे ॥ ३०५ ॥ म्मिव मिअ विअ इत्येते इवार्थे निपातसंज्ञकाः। अज आमन्त्रणे ॥ ३०६॥ अज इत्ययं निपातः आमन्त्रणेऽर्थे, सम्बोधने इत्यर्थः । शेषः संस्कृतात् ॥ ३०७ ॥ उक्तादन्यः संस्कृतादवगन्तव्यः। इवे वः ॥ ३०८ ॥ इवशब्दे व्व इति निपात्यते । स इवायम् सो व्व इमो। विअ इति वक्तव्यम् , सो विअ इमो। अपौ विः ॥ ३०९ ॥ अपिशब्दे विः इति निपात्यते । सोऽपि देव इव सो व्षि देवो व्व ओदवा-ऽपयोः ॥ ३१० ॥ अव अप इत्येतयोः ओ इत्यादेशो वा स्यात् । अवगाहः ओगाहो अवगाहो । अपनयः ओणओ अवणओ, 'पो वः' (८५) इति वः । इतेस्तः पदादेः ॥ ३११ ॥ पदादेः इतिशब्दस्य यः तकारः ततः परस्य इकारस्य अ इत्यादेशः स्यात् । इति विलपन इअ विलअंतो। त इति किम् ? आदेरिकारस्य मा सरपटारिनिरनितिन (विस

कृश्परो यो द्विधाशब्दः तस्य आदेः इकारस्य ओकारः स्याद् उश्च
विधाकृतम् दोहाइअं दुहाइअं। एवम् एअं एवं, एव एअ एव, यावदादि-
त्वाद् वा वलोपः।
तलू-त्वयोर्दा-त्तणौ ॥ ३१३ ॥
पाणिनीये भावार्थे [ यौ] तलू - त्वौ विहितौ तयोः क्रमेण दा त्तण
इत्येतावादेशौ स्याताम् । कृष्णता कण्हदा, 'तलन्तं स्त्रियाम्' (
इति लिङ्गानुशासनबलात् स्त्रीत्वम् । कृष्णत्वम् कण्हत्तणं, 'त्वान्त
क्लीबम्' ( ) इति षण्ढत्वम् ।
आल्विल्लोल्लालवत्तेत्ता मतुपः ॥ ३१४ ॥
तदस्यास्त्यस्मिन्नित्यर्थे विहितो मतुप् तस्य आलु इल्ल उल्ल आल
वत्त इत्त इति षडादेशाः स्युः। निद्रावान् णिहालू । मालावान् मालाइल्लो
विकारवत् विआरुलं । धनवान् धणालो। गुणवान् गुणवत्तो। मानवान
माणइत्तो, 'सन्धावचा०' (१)।
विद्युत्-पीताभ्यां वा लः ॥ ३१५ ॥
आभ्यां लप्रत्ययः स्यात्। विद्युत् विजुली, विद्युच्छब्दस्य स्त्रीलिङ्ग
त्वात् स्त्रीत्वम् , पक्षे विजू । पीतं पीअलं पीअं।
॥ इति श्रीज्योतिर्वित्सरसात्मजरघुनाथकविकण्ठीरव-
विरचिते प्राकृतानन्दे प्रथमः परिच्छेदः॥१॥

[अथ द्वितीयः परिच्छेदः ।। भू सत्तायाम्। भुवो हो-हुवौ ॥ ३१६ ॥ भूधातोः हो हुव इत्येतावादेशौ स्याताम् । ते-तिपोरिदेतौ ॥ ३१७॥ धातोः परयोः ते तिप् इत्येतयोरिदेतौ स्याताम् । यथासंख्यं नेष्यते । अत ए से ॥ ३१८ ॥ नियमार्थ वचनम् । त-तिपोः सिप्-थासो? ए से इत्येतावादेशी विहितौ तावकारान्तादेव स्याताम् , नान्यस्मात् । लादेशे वा ॥ ३१९ ॥ लकारादेशे परे अत एत्वं वा स्यात् । भवति होइ हुवइ हुवए हुवेइ हुवेए। वर्तमान-भविष्यदनद्यतनयोर्ज ज्जा वा ॥ ३२० ॥ त्तमाने भविष्यदनद्यतने च विध्यादिषु चोत्पन्नस्य प्रत्ययस्य ज जा इत्येतावादेशौ वा स्याताम् । होज्ज होजा। लि -लो-लुट् - ल. विध्यादयः। मध्ये च ॥ ३२१ ॥ वर्तमान- भविष्यदनद्यतनयोर्विध्यादिषु च धातु-प्रत्यययोर्मध्ये ज जा इत्येतावादेशौ वा स्याताम् । भवति = होला होज्जेइ होजाइ, पक्षे पूर्व- मुक्तम्। नानेकाचः ॥ ३२२॥ वर्तमान-भविष्यदनद्यतनयोर्विध्यादिषु चानेकाचो धातोः परतो मध्ये ज ज्जा इत्येतावादेशौ न स्याताम्। भवति हुवज हुवेज हुवज्जा हुवेजा। एवमग्रेऽपि पूर्वोक्तलेषुप्रथम-द्वितीय-तृतीयेषु पुरुषेषु एकवचन - द्विवचन- बहुवचनादावल्यवगन्तव्यम् । न्ति-हेत्था-मो-मु-मा बहुषु ॥ ३२३ ॥ तिङो बहुवचनानामेते आदेशाः स्युः। प्रथमपुरुषबहुवचनस्य न्ति, मध्यमस्य ह इत्था एतौ, उत्तमस्य मो मु म एते इति विवेकः। भवतः भवन्ति होन्ति हुवन्ति हुवेन्ति हुवज हुवेज हुवजा हुवेजा होज होजा थासू-सिपोः सि से ॥ ३२४ ॥ धातोः परयोः थास-सिपोः सि से इत्येतावादेशौ स्याताम् । यथासंख्यं न । भवसि होसि हुवसि हुवेसि हुवसे हुवेसे । भवथः भवथ- होह होइत्था हुवह हुवेह हुवइत्था हुवेइत्था हुवित्था, 'सन्धा०' (१) इत्यकारलोपो वा। इट्-मयोर्मिः ॥ ३२५ ॥ इट् मि इत्येतयोः मिः स्यात्। अत आ मिपि वा ॥ ३२६ ॥ अकारस्य आकारो वा स्याद् मिपि परे। भवामि = होमि हुवामि हुवेमि हुवमि । इच बहुषु ॥ ३२७ ॥ मिपो बहुवचने परे अत इ. स्याद् आ च । भवावः भवामः- होमो होम होम हुवामो हुविमो हुवेमो हुवमो हुवामु हुविमु हुवेमु हुवम् हुवाम हुविम हुवेम हुवम । इति लट् । अथ लिट्- ईअ भूते ॥ ३२८ ॥ भूते काले धातोः परस्य प्रत्ययस्य ईअ इत्यादेशः स्यात् । बभूव- हुवी। इअं भूते ॥ ३२९ ॥ भूते काले धातोः परस्य प्रत्ययस्य इअं इत्यादेशः स्यात् । बभूव हुविअं। एकाचो हीअ ॥ ३३० ॥ भूते काले एकाचो धातोः परस्य प्रत्ययस्य हीअ इत्यादेशः स्यात् बभूव=होहीअ । त्रीण्यपि रूपाणि प्रथम-मध्यमोत्तमैकवचन-द्विवचन बहुवचनेष्ववगन्तव्यानि । उ सुमु विध्यादिष्वेकस्मिन् ॥ ३३१ ॥ विध्यादेरेकवचनस्य क्रमेण उ सु मु इत्येते आदेशाः स्युः। बभूव- होउ हुवेउ हुवउ । न्तु ह मो बहुषु ॥ ३३२ ॥ विध्यादेबहुवचनस्य क्रमेण न्तु ह मो इत्येते आदेशाः स्युः। बभूवु:- बोनसभाबोर हुवह, हविधानं इत्थ(स्था)बाधनार्थम् । बभूव-हामु हुवमु हुवमु । बभू- विम= होमो हुवेमो हुवमो। मोविधानं मु-मयोर्वाधार्थम् । इति लिट् । अथ लट्- धातोर्भविष्यति हिः ॥ ३३३ ॥ भविष्यति काले धातोः परे हिः स्यात्। भविता होहिइ हुवेहिइ हुवहिइ। एच्च क्त्वा-तुमन्-तव्य-भविष्यत्सु ॥ ३३४ ॥ एषु अत एत्वं स्यात्, चादिश्च । हुविहिइ हुवेहिए हुवहिए हुविहिए होज होजा हुवेज हुवज हुवजा होजहिइ होजेहिइ होजाहिइ होउ हुवेउ हुवउ । भवितारः- होहिंति हुवेहिंति हुविहिंति हुवहिंति होन्तु हुवेन्तु हुवन्तु । भवितासि होहिसि हुवेहिसि हुवहिसि हुवेहिसे हुवहिसे होसु हुवेसु हुवसु । भवितास्थ = होहिहा हुवेहिह हुवहिह होह हुवेह हुवह । उत्तमे स्सा हा च ॥ ३३५ ॥ भविष्यत्युत्तमे परे धातोः परौ स्सा हा इत्येतौ स्याताम् । चात् हिः। मिना स्सं वा ॥ ३३६ ॥ भविष्यति मिना सह धातोः परः स्सं वा स्यात् । भविष्यामि होस्सामि हुवेस्सामि हुवस्सामि होहामि हुवेहामि हुवहामि हुवाहामि होहिमि हुवेहिमि हुवाहिमि हुवहिमि होस्सं हुवेस्सं हुवस्सं होम हुवेमु हुवामु हुवमु। मो-मु-मैर्हि-स्सा-हित्था ॥ ३३७ ॥ भविष्यति मो-मु-मैः सह हिस्सा हित्था इत्येतावादेशौ वा स्याताम् । भवितास्मः होहिस्सा हुवेहिस्सा हुविहिस्सा हुवाहिस्सा हुवहिस्सा होहित्था हुवेहित्था हुविहित्था हुवाहित्था हुवहित्था होस्सामो हुवेस्सामो हुविस्सामो हुवस्सामो होहामो हुवेहामो हुविहामो हुवाहामो हुवहामो होहिमो हुवेहिमो हुविहिमो हुवाहिमो हुवहिमो होमो हुवेमो हुविमो हुवामो हुवमो । इति लुट् । अथ लट् । भविष्यति- होहिइ हुवेहिइ हुवहिय हुवेहिए हुवहिए। भविष्यन्ति = होहिन्ति हुवेहिन्ति हुवहिन्ति । भविष्यसिहोहिसि हुवेहिसि हुवहिसि हुवेहिसे हुवहिसे । भविष्यथ = होहिह हुवेहिह- हुवहिह होहित्थ हुवइत्थ हुवित्थ । भविष्यामि - होस्सामि हुवेस्सामि हुवाहिमि हुवहिमि होस्सं हुवेस्सं हुवस्सं । भविष्यामः- होहिस्सा हुवे- हिस्सा हुविहिस्सा हुवाहिस्सा हुचहिस्सा होहित्था हुवेहित्था हुविहित्था हुवाहित्था हुवहित्था होस्सामो हुवेस्सामो हुविस्सामो हुवस्सामो होहामो हुवेहामो हुविहामो हुवाहामो हुवहामो होहिमो हुवेहिमो हुविहिमो हुवाहिमो हुवहिमो होस्सामु हुवेस्सामु हुविस्सामु हुवस्सामु होहामु हुवेहामु हुविहामु हुवाहामु हुवहामु होहिमु हुवेहिमु हुविहिमु हुवाहिम हुवहिमु होस्साम हुवेस्साम हुविस्साम हुवस्साम होहाम हुवेहाम हुविहाम हुवाहाम हुवहाम होहिम हुवेहिम हुविहिम हुवाहिम हुवहिम। इति लट् । अथ लोट- भवतु = होउ हुवेउ हुवउ। भवन्तु = होंतु हुवेन्तु हुवन्तु। भव=होसु हुवेसु हुवसु । भवत=होह हुवेह हुवह । भवानि होमु हुवेमु हुवामु हुवमु । भवाम = होमो हुवेमो हुवामो हुविमो हुवमो। इति लोट् । लोट्वद् लडू-लिङाशीर्लिङः । अथ लुङ्- अभूत्-हुवीअ हुविअं होहीअ, एवं पुरुष-वचनेषु लडू लट्वत् । प्रादेर्भवः ॥ ३३८ ॥ प्रादेः परस्य भुवो भव इत्यादेशः स्यात् । प्रभवति = पभवइ पभवए पभवेइ पभवेए । उद्भवति उब्भवइ । प्रतिभवइ पडिभवइ, 'प्रतिसर (३३) इति तस्य डः। खाह भक्षणे । खादि-धाव्योः खा-धौ ॥ ३३९ ॥ अनयोः खा धा इत्येतो क्रमेण स्यातां वर्तमाने भविष्यति विध्या- दीनामेकवचनेषु च । खादति खाइ । चखाद खाहीअ । खादिता खाहिइ खादिष्यति खाहिइ । खादतु खाउ । एवं लडू-लिङाशीर्लिङ । अखादीत खादीअं खादीअ । ल लड्वत् । क्षियो झिजः ॥ ३४० ॥ 'क्षि क्षये अस्य झिज इत्यादेशः स्यात् । क्षयति झिजइ झिजए छिज-भिजावप्येके । व्रज गती। च्चो ब्रज-नृत्योः ॥ ३४१ ॥ अनमोन्तम्य स्यात।वजाति वच्चइ वच्चेइ वच्चए । व्रजिता वच , वेष्टेश्च ॥ ३४२॥ अन्तस्य ढः स्यात् । ठापवादः । वेष्टते वेढइ वेढए वेढेइ वेढेए 'कथेढ :' (३५८) इति पूर्वसूत्रान्तर्गतं न कृतम् , 'उत्समोल:' (३४३ इत्युत्तरसूत्रेऽनुवृत्त्यर्थम् , अन्यथा कथिरपि ल्लविधानेऽनुवर्तेत । उत्समोलः ॥ ३४३ ॥ एतयोः परस्य वेष्टेरन्तस्य ल्लः स्यात् । उद्वेष्टते उबेल्लइ । संवेष्टते संविल्लइ । स्फुट विकसने । स्फुटि-चल्योर्वा ॥ ३४४ ॥ अनयोरन्तस्य द्वित्वं वा स्यात् । स्फोटते फुटइ फुटइ, भौवादिक तौदादिको गृह्येते स्फुटि-चली इह । पट गतौ । पटेः फलः ॥ ३४५॥ स्पष्टम् । पटति फलइ । जुभि गात्रविनामे । जभो जंभाअ ॥ ३४६ ॥ जुभि इत्यस्य जंभाअ इत्यादेशः स्यात् । जृम्भते =जंभाअइ जंभाएछ जंभाअए जंभाएए । जृम्भिताजंभाअहिइ जंभाएहिइ जंभाअहिए जंभा एहिए । जल्प व्यक्तायां वाचि । जल्पेर्लो मः ॥ ३४७ ॥ जल्पेलस्य मा स्यात् । जल्पति जंपइ । घुण भ्रमणे । घुणो घोलः ॥ ३४८ ॥ घुणे?ल इत्यादेशः स्यात् । घूर्णति घोलइ घोलए, भ्वादि तुदादि मील निमेषणे। प्रादेर्मीलः ॥ ३४९॥ प्रादेः परस्य मीलो लस्य द्वित्वं वा स्यात् । प्रमीलति= पमिल्लइ पमी- लइ पमिल्लए पमीलए पमिल्लेइ पमीलेइ पमील्लेए पमीलेए। जि जये। श्रु-हु-जि-लू-धुवां ण्णोऽन्त्ये हवः ॥ ३५० ॥ एषामन्त्ये पणः स्यात्, दीर्घस्य हखश्च स्यात् । जयति जिण्णइ जिगाय जिण्णी। धावु गति-शुद्ध्योः । धावति धावते धाइ । दधाव दधावे धाही. धाविता धाहिइ । धावतु धावतां धाउ । m- काशेवासः॥ ३५१॥ अवात् परस्य कार्वास इत्यादेशः स्यात् । अवकासते ओवासह अवादिति किम् ? कासते कासइ । ग्रसु ग्लसु अदने । ग्रसेर्विसः ॥ ३५२ ॥ अस्य विस इत्यादेशः स्यात् । ग्रसते विसइ । गाहू विलोडने । अवाद् गाहेर्वाहः ॥ ३५३ ॥ अवात् परस्य गाहेर्वाह इत्यादेशः स्यात् । अवगाहते ओवाहइ अवादिति किम् ? गाहते गाहइ । वृषु मृषु सेचने । वृष-कृष-मृष-हषामृतोऽरिः॥ ३५४ ॥ एषां ऋतः अरिः इत्ययमादेशः स्यात् । वर्षति वरिसइ । मर्षति मरिसइ । कृषि विलेखने इति भौवादिकस्यैव ग्रहणम्, न तौदादिकस्य, वृषादिसाहचर्यात् । हृषु अलीके । हर्षति हरिसइ । वृधु वृद्धौ । वृधेः ॥ ३५५॥ अन्तस्य स्यात् । वर्धते वडइ, 'ऋतोऽद्' (१२०) इत्यकारः। भित्वरा सम्भ्रमे। त्वरस्तुवरः॥ ३५६ ॥ स्पष्टम् । त्वरते तुवरइ तुवरए । चल कम्पने । चलति चल्लइ चलइ, 'स्फुटि-चल्योवी' (३४४) इति वा द्वित्वम् । पत्ल गतौ । शद्लू-पत्योर्डः ॥ ३५७ ॥ अनयोरन्तस्य डः स्यात् । पतति पडइ। शद्ल शातने । शीयते सडइ । कथे निष्पाके। कथेः ॥ ३५८ ॥ अन्तस्य स्यात् । कथति कढइ । मलै हर्षक्षये । ग्लै वा-वाऔ ॥ ३५९ ॥ अस्य वा वाअ इत्येतावादेशौ स्याताम् । म्लायति वाइ वाअइ । ध्यै चिन्तायाम्। ष्ठा-ध्या-गानां ठाअ-झाअ-गाआः ॥ ३६० ॥ एषामेते क्रमेण स्युः। ठा-झा-गाश्च वर्तमान-भविष्यदू-विध्यायेकवचनेषु ॥ ३६१ ॥ TRIPPTET मोलेला ध्याति-झाअइ झाइ । दध्यो-झाइअं झाही। ध्याता-झाअहिइ झाहिइ एवं लट् । ध्यायतुझाअउ झाउ । अध्यासीत् = झाइअं झाईअ । अ 'ठाझा गावालुङि' इत्येव सूत्रयितुं युक्तम् । गै शब्दे । गायति गाअ गाइ, पूर्ववत् । घा गन्धोपादाने । जिघ्रतेः पा-पाऔ ॥ ३६२ ॥ अस्य पा पाअ एतौ स्याताम् । जिघ्रति पाइ पाअइ । जघ्रौ पाही पाईअ पाइअं। ध्मा शब्दा-ग्निसंयोगयोः। उद्ध्मो धूमा ॥ ३६३ ॥ उदः परस्य धमतेः धूमा इत्यादेशः स्यात् । उद्धमति उद्भूमाइ ष्ठा गतिनिवृत्तौ । तिष्ठति ठाअइ' ठाइ, ध्यावत् । स्मृ चिन्तायाम् । स्मरतेर्भर-सुमरौ ॥ ३६४ ॥ अस्य भर सुमर इत्येतौ स्याताम् । स्मरति भरइ सुमरइ । मृ गतौ ऋतोऽरः॥ ३६५॥ धात्वन्तऋकारस्य अरः स्यात् । सरति सरइ । श्रु श्रवणे । शृणोति सुण्णइ । शुश्राव सुण्णीअ सुण्णिअं। वादीनां त्रिष्वप्यनुस्खारवर्ज हिलोपश्च वा ॥ ३६६ ॥ श्रु वचि नमि रुदि दृशि विदि इत्येतेषां प्रथम-मध्यम-उत्तमपुरुषेषु परेषु सोच्छं वोच्छं गच्छं रुच्छं दच्छं वेच्छ इति क्रमेण आदेशाः स्युः, अनुस्खारवर्ज हिलोपश्च वा । श्रोता सोच्छिहिइ सोच्छिइ सोच्छ। सोच्छहि सोच्छेहिइ सोच्छेइ सोच्छिहिए सोच्छिए सोच्छए सोच्छ- हिए सोच्छेहिए सोच्छेए । श्रोतारः = सोच्छहिंति सोच्छिति सोच्छंति सोच्छिहिंति सोच्छेहिंति सोच्छेति । श्रोतासि सोच्छिसि सोच्छिहिसि सोच्छेसि सोच्छेहिसि सोच्छसि सोच्छहिसि सोच्छिसे सोच्छिहिसे सोच्छेसे सोच्छेहिसे सोच्छसे सोच्छहिसे । श्रोतास्थ =सोच्छिहिह सोच्छेहिह सोच्छहिह सोच्छिह सोच्छेह सोच्छह । कृ-दा-श्रु-वचि-गमि-रुदि-दृशि-विदिरूपाणां काहं दाहं सोच्छं वोच्छ गच्छं रुच्छं दच्छं वेच्छं ॥ ३६७ ॥ एषामेते क्रमेण स्युः भविष्यत्युत्तमैकवचने । श्रोतास्मि-सोच्छं सोच्छिस्सामि सोच्छेस्सामि सोच्छस्सामि सोच्छिहामि सोच्छेहामि मोक्तानामि मोजानामि मोजातिविपिन सोच्छाहामि सोच्छामि सोच्छहिमि सोच्छमि सोच्छेस्सं सोच्छस्सं श्रोतास्मः सोच्छिहिस्सा सोच्छेहिस्सा सोच्छाहिस्सा सोच्छिहित्थ सोच्छेहित्था सोच्छाहित्था सोच्छहित्था सोच्छिस्सामो सोच्छेस्साम सोच्छस्सामोसोच्छिहामो सोच्छेहामो सोच्छाहामो सोच्छहामोसोच्छि हिमो सोच्छिमो साच्छेहिमो सोच्छेमो सोच्छाहिमो सोच्छामो सोच्छ हिमो सोच्छमो। श्रोष्यति = सोच्छिहिइ इत्यादि । प्रथमे मध्यमस्यैक वचने च लड्वत् । बहुवचने तु श्रोष्यथ = सोच्छिहिह सोच्छिह सोच्छे हिह सोच्छेह सोच्छहिह सोच्छह सोच्छिहित्य सोच्छित्थ सोच्छे हित्थ सोच्छेइत्थ सोच्छहित्थ सोच्छइत्थ । मिपि लुट्वत्, मवि च । मु- मयोस्तु यत्र मो इति तत्र मु-मौ प्रत्येक प्रयोज्यौ । शृणोतु सुण्णउ श्रृण्वन्तु सुणंतु । शृणु सुणसु । शृणुत सुणह । शृणोमि सुणमु शृण्मः सुणमो । दृशिर प्रेक्षणे । इर् इत् । दृशेः : पुलअ-णिअक-अवक्खाः ॥ ३६८ ॥ त्र्यक्षरा आदेशाः स्युः। पश्यति पुलअइ णिअक्कइ अवक्खइ। दद्रष्ट पुलईअ णिअक(की?)अ अवक्खीअ । द्रष्टा दच्छिहिइ इत्यादि वोच्छवत् कृषि विलेखने । कर्षति करिसइ । गम्ल गतौ गच्छति गमइ । गन्तासिम गच्छं इत्यादि । इति भ्वादिः । अद भक्षणे। शेषाणामदन्तता ॥ ३६९ ॥ लुप्तानुबन्धानां शेषाणामकारान्तत्वं स्यात् । अत्ति अअइ । हन हिंसा-गत्यो। हन्तेर्मः ॥ ३७० ॥ हन्तेर्नस्य म्मः स्यात् । हन्ति हम्मइ । वच परिभाषणे । वक्ति व अइ । वक्ष्यामि वोच्छं इत्यादि सोच्छवत्। विद ज्ञाने । वेत्ति वेव वेअइ । वेत्स्यामि वेच्छं । अस भुवि । अस्ति अस्थि । सन्ति असन्ति । असेापः॥ ३७१॥ असो लोप: स्यात् थास्-सिपोः परयो । असि सि । थासोऽनुवृत्ति भीव-कर्मणोः सफला । स्थ त्थ । मि-मो-मु-मानामधो हश्च ॥ ३७२ ॥ अन्तमि-मो---मातामोतात अमोति ॥

. भूते निपातः । बभूव आसि । मृजूष शुद्धौ । मृजेटुंभ-पुसौ ॥ ३७४ ॥ यक्षरौ स्याताम् । मार्टि लुभइ पुसइ 'सुप' इति पाठे सुपइ रुदिर अश्रुविमोचने । रुदेवः ॥ ३७५ ॥ रुदेर्दस्य वः स्यात् । रोदिति रुवइ । रुदिष्यामि रुच्छं, वोच्छवत् इत्यदादयः। हु दानादनयोः । जुहोति हुण्णइ, 'श्रु-हु-जि०' (३५०) इति पणः जिभी भये। भियो भा-बीहौ ॥ ३७६ ॥ भा बीह इत्येतावादेशौ स्याताम् । बिभेति भाइ बीहइ । — पालन पूरणयोः। पिपर्ति परइ । डुभृञ् धारण-पोषणयोः। बिभर्ति भरह माङ् माने। निरो माङो माणः ॥ ३७७ ॥ निरः परस्य माङो माण इत्यादेशः स्यात् । निर्मिमीते णिम्माणइ निरः किम् ? मिमीते माइ । हुदाञ् दाने । ददाति दाइ । दातास्मि दाहं डधाञ् धारण-पोषणयोः। श्रदो धो दहः ॥ ३७८ ॥ श्रदः परस्य धो दह इत्यादेशः स्यात् । श्रद्दधाति सद्दहइ । श्रद इति किम् ? धाइ । विजिर् पृथग्भावे । उदो विजः॥ ३७९ ॥ उदः परस्य विजेजस्य वः स्यात् । उद्वेविक्ते उद्वेवेक्ति उव्विव्वइ ऋ स गतौ । इयर्ति अरइ । ससर्ति सरह । इति हादयः। दिवु क्रीडा-विजिगीषा-व्यवहारद्युति-स्मृति-मोद-मद-खम-कान्ति गतिषु । दीव्यति दिवइ । नृती गात्रविनामे । नृत्यति णचइ । त्रसि उद्वेगे त्रसेर्वजः ॥ ३८० ॥ स्पष्टम् । त्रस्यति वजइ । ब्रीड चोदने लज्जायां च । ब्रीज्यति वीलइ घूङ् प्राणिप्रसवे । सूयते सूइ । दूङ् परितापे ।

स्पष्टम् । दूयते-दूमइ दूमए दूमेइ दूमेए । शो तनूकरणे । श्यति सोइ । दो अवखण्डने । यति दोइ । जनी प्रादुर्भावे । जायते जणइ । पद गतौ। पदः पालः ॥ ३८२ ॥ आदेशः स्यात् । पद्यते पालइ । वुध अवगमने । युधि-बुध्योझः ॥ ३८३ ॥ एतयोर्धस्य झः स्यात् । वुध्यते बुज्झइ । युध सम्प्रहारे । युध्यते जुज्झइ । सृज विसर्गे । सृज्यते सजइ । शुष शोषणे । रुषादीनां दीर्घः ॥ ३८४ ॥ रुषादीनां दीर्घः स्यात् । शुष्यति सूसइ । तुष प्रीती। तुष्यति तूसइ । दुष वैकृत्ये । दुष्यति दूसइ । क्रुध कोपे। क्रुधेझूरः ॥ ३८५ ॥ स्पष्टम् । क्रुध्यति झूरइ । रुष रोषे । रुष्यति रूसइ । गृधु अभि- काङ्क्षायाम् । गृध्यति गधइ । इति दिवादयः । घुञ् अभिषवे । सुनोति सुअइ । चिञ् चयने । चिञश्चिणः॥ ३८६ ॥ चित्रः चिण इत्यादेशः स्यात् । चिनोति चिणइ । शक्ल शक्तौ । शकादीनां द्वित्वम् ॥ ३८७ ॥ शकादीनां द्वित्वं वा स्यात् । शक्नोति सक्कइ । पले- शकेस्तर-चअ-तीराः ॥ ३८८ ॥ अस्य यक्षरास्त्रय आदेशाः स्युः। शक्नोति तरइ चअइ तीरइ । अशू व्याप्तौ सङ्घाते च । अनुते असइ । निधृषा प्रागल्भ्ये । धृष्णोति धसइ । इति खादयः। तुद व्यथने । तुदति तुअइ । णुद प्रेरणे । णुदेर्लोणः॥ ३८९ ॥ णुदेर्लोण इत्यादेशः स्यात् । नुदति लोणइ । 'णोल्ल' इति पाठे णोल्लह । कृष विलेखने । कृषति कसइ, 'वृष-कृष-०' (३५४) इति अरिस्तु न, वृषसाहचर्याद् भौवादिकस्यैव ग्रहणात् । ओविजी भये । उद्विजति उव्विवह, 'उदो विजः' (३७९) इति वः । टुमस्जी शुद्धौ । - पाण्डत-रघुनाथ-कवि-विचित बुड-खुप्पो मस्जेः॥ ३९० ॥ [मस्जे: वुड खुप्प इत्येतावादेशौ स्याताम् । ] मजति बुडइ खुप्पड़ तृप तृप्तौ। तृपस्थिम्पः ॥ ३९१॥ तृपेः थिम्प इत्यादेशः स्यात् । तृपति थिम्पइ । घुण भ्रमणे । घूर्णति घोलइ । पृडू व्यायामे । प्रियते परइ । मृङ् प्राणत्यागे । म्रियते मरइ मृज विसर्गे । सृजति सअइ । कृती छेदने । कृन्तति कतइ । खिद परि घाते । खिंदति विसूरइ । पिश अवयवे । पिशति पिसइ । इति तुदादयः रुधिर आवरणे। रुधेन्ध-म्मौ ॥ ३९२ ॥ रुधेः धस्य न्ध म्म इत्येतावादेशौ स्याताम् । रुणद्धि रुन्धइ रुम्मइ । भिदिर विदारणे । भिदि-च्छिदोरन्तस्य न्दः॥ ३९३ ॥ अनयोः दस्य न्दः स्यात् । भिनत्ति भिंदइ । छिदिर द्वैधीकरणे । छिनत्ति छिंदइ। खिद दैन्ये । खिनत्ति विसूरह । ओविजी भय-चलनयोः। विनक्ति विअइ । उद्विनक्ति उविवइ । इति रुधादयः । तनु विस्तारे । तनोति तण्णइ । षणु दाने । सनोति सण्णइ । क्षणु हिंसायाम् । क्षणोति खण्णइ । क्षिणु च-क्षिणोति खिण्णइ । ऋणु गतौ। ऋणोति अण्णइ । तृणु अदने । तृणोति तण्णइ । घृणु दीप्तौ । घृणोति घण्णइ । वनु याचने । वनोति वण्णइ । मनु अवबोधने । मनोति मण्णइ । डुकृञ् करणे। कृञः कुणो वा ॥ ३९४ ॥ कृत्रः कुण इत्यादेशो वा स्यात् । करोति कुणइ करइ । कृञः का भूत-भविष्यतोश्च ॥ ३९५ ॥ एतयोरर्थयोः क्त्वा-तुमुन्-तव्येषु च कृतः का इत्यादेशः स्यात् । चकार काहीअ कम्भं (?) [करिष्यति ?] काहिइ । कर्तासि काहं, दावत् । इति तनादयः। डुक्रीञ् द्रव्यविनिमये।

वः क च ॥ ३९७॥ वेः परस्य क्रीणातेः के इत्यादेशः स्यात् । चात् किणः। विक्रीणाति विक्केइ विकिणइ । लूज् छेदने । लुनाति लुण्णइ, 'श्रु-हु-जि०' (३५०, इति अन्त्यस्य णः पूर्वस्य हखश्च । कृञ् हिंसायाम् । कृणाति करइ । धूम कम्पने । धुनाति धुण्णइ । हिंसायाम् । शृणाति सरइ । पृ पालन-पूर णयोः । पृणाति परइ । मृ हिंसायाम् । मृणाति मरइ । ज्ञा अवबोधने । ज्ञो जाण-मुणौ ॥ ३९८ ॥ यक्षरावादेशौ स्याताम् । जानाति जाणइ मुणइ । बध बन्धने बध्नाति बंधइ । वृङ्क सम्भक्तौ । वृणीते वरइ । मृद क्षोदे । मृदो लः॥ ३९९ ॥ मृगातेः दस्य लः स्यात् । मृगाति मलइ । अश भोजने । अनाति असइ । पुष पुष्टौ । पुष्णाति पूसइ । ग्रह उपादाने । ग्रहेर्गेण्हः॥ ४०० ॥ स्पष्टम् । गृह्णाति गेण्हइ । इति ऋयादयः । चुर स्तेये। णिच एदादेरत आत् ॥ ४०१ ॥ णिच एत् स्यात्, धातोरकारस्य आत् स्यात् । आवे च ॥ ४०२ ॥ णिचोऽयमपि आदेशः स्यात् । चोरयति चुरेइ चुरावेइ । चिति स्मृत्याम् । चिन्तयति चिंतेइ चिंतावेइ । लक्ष दर्शना-ऽङ्कनयोः । लक्षयति लाखेइ लखावेइ । भक्ष अदने । भक्षयति भाखेइ भखावेइ । गज शब्दे गाजयति गाजेइ गजावेह । शठ श्लाघायाम् । शाठयति साठेइ सठावेइ इति चुरादयः। भू-हेतुमद् णिच् । भावयति होएइ होआवेइ हुवेइ हुवावेइ । पट- पाटयति फालेइ फलावेइ । जल्पयति जंपेइ जंपावेइ । प्रमीलयति पमि- ल्लेइ पमिल्लावेइ । अवकाशयति ओवासेइ ओवासावेइ । ग्रासयति विसेझ विसावेइ । अवगाहयति ओगाहेइ ओगाहावेइ । रोषयति रूसेइ रूसा- वेइ । वर्षयति वरिसेइ वरिसावेइ । वर्धयति वड्डेइ वड्डावेइ । त्वरयति तुवरेइ तुवरावेइ । चलयति चल्लेइ चालेइ चल्लावेइ चलावेइ । स्मारयति ७ भारेइ भरावेइ सुमरेइ सुमरावेइ । सारयति सारेइ सरावेइ । श्रावयति सुण्णेइ सुण्णावेइ । गमयति गामेइ' गमावेइ । रोदयति रुवेइ रुवावेइ पारयति पारेइ पारावेइ । नर्तयति णचेइ णचावेइ । त्रासयति वजेइ वजावेइ । व्रीडयति वीलेइ वीलावेइ। शुष्यति सूसेइ सूसावेइ । क्रुध्यति झूरेइ झुरावेइ । चिनोति चिण्णेइ चिण्णावेइ । शक्नोति सकेइ सकावेइ, तारेइ तरावेइ, चाएइ चआवेइ, तीरेइ तीरावेइ । घूर्णयति घोलेइ घोला- वेइ । रुन्धयति रुंधेइ रंधावेइ, रुम्भेइ रुम्भावेइ । कारयति कारेइ करावेइ, कुणेइ कुणावेइ । क्राययति किणेइ किणावेइ । इति हेतुमण्णिचप्रकरणम् । यक ईअ-इज्जौ ॥ ४०३ ॥ यको यक्षरावादेशौ स्याताम् । भूयते होईअइ होइज्जइ हुवीअइ हुविजइ। भाव-कर्मणोर्वश्च ॥ ४०४॥ श्रु हु जि लू धू एषामन्ते वः स्यात् , णश्च भाव-कर्मणोः । जीयते जिवइ जिण्णीअइ जिणिजइ। गमादीनां द्वित्वं वा ॥ ४०५ ॥ एषां द्वित्वं वा स्याद् भाव-कर्मणोः । हस्यते हस्सइ हसीअइ हसिजइ । रम्यते रम्मइ रमीअइ रमिजइ । ह-कोहीर-कीरौ ॥ ४०६ ॥ हृञ्-कृतोः क्रमाद् हीर कीर इत्येतौ स्यातां भाव-कर्मणोः । हियते हीरइ । श्रूयते सुबइ सुण्णीअइ सुणिजइ । गम्यते गम्मइ गमीअइ गमिजइ। दुहि-लिहि-वहां दुब्भ-लिब्भ-वब्भाः ॥ ४०७ ॥ एषां क्रमेण यक्षरा आदेशाः स्युः भाव-कर्मणोः । उह्यते वन्भइ दुह्यते दुब्भइ । लिह्यते लिब्भइ । हूयते हुवइ हुण्णीअइ हुणिजइ । क्रियते कीरइ । लूयते लुचइ लुण्णीअइ लुणिजइ । धूयते धुवइ धुण्णीअइ धुणिज्जा। ज्ञो णज्ज-णवौ वा ॥ ४०८ ॥ ज्ञाधातोः यक्षरावादेशौ वा स्यातां भाव-कर्मणोः । ज्ञायते णजइ णवइ । पक्षे जाणीअइ जाणिजाइ, मुणीअइ मुणिजइ॥

ग्रहे दीघा वा ॥ ४०९॥ स्पष्टम् । गृह्यते गाहिजइ । पक्षे गेण्हिज्जइ। ॥ इति भावकर्मप्रकरणम् ॥ इति तिङन्तम् ॥ क्ते हुः ॥ ४१० ॥ भुवो हुरादेशः स्यात् क्ते । भूतं हुआ। ते तुरः ॥ ४११ ॥ त्वरतेः तुर इत्यादेशः स्यात् ते। ते ॥ ४१२॥ धातोरन्त्याकारस्य इः स्यात् क्ते । त्वरितं तुरिअं। पटितं फलिअं। क्तेन दिण्णादयः ॥ ४१३ ॥ दिण्ण इत्यादयः शब्दाः क्तेन सह निपात्यन्ते । दाञ् दत्तं दिण्णं । रुदिर रुदितं रुण्णं । त्रसी त्रस्तं हित्थं । दह भस्मीकरणे दग्धं डढें । रञ्ज रक्तं रत्तं । दंश दष्टं डढें । रुधिर् रुद्धं रहूं इत्यादयः । भुजादीनां क्त्वा-तुमुन्-तव्येषु लोपः ॥ ११ ॥ एषामन्तस्य लोपो वा स्यात् । क्त्व ऊणः ॥ ४१५ ॥ तवाप्रत्ययस्य ऊण इत्यादेशः स्यात् । भुक्त्वा भोऊण । भोक्तुमा भोउं । भोक्तव्यम् भोअछ । विदित्वा वेऊण । वेत्तुम् वेडं। वेत्तव्यम् वेअचं । एवं रुदिर्। घे क्त्वा-तुमुन्-तव्येषु ॥ ४१६ ॥ ग्रहे: घे इत्यादेशः स्याद् एषु परेषु । गृहीत्वा घेऊण । ग्रहीतुम घेउं । ग्रहीतव्यम् घेअछ । कृत्वा काऊण । कर्तुम् काउं । कर्तव्यम् काअछ । तृन इरः शीले ॥ ४१७ ॥ शीलार्थ तृन इर इत्यादेशः स्यात् । गन्तगामिरो मनशील इत्यर्थः।

शतृ शानच् इत्येतयोः क्रमेण न्त माण इत्येतावादेशौ स्याताम् भवन् हुवंतो। यजमानः जअमाणो । ईत् स्त्रियाम् ॥ ४१९॥ शत-शानचोः ईदादेशः स्याद् न्त-माणौ च । वदन्ती वदई । यज माना जअमाणी । पक्षे वदंती जअमाणा। इति श्रीज्योतिर्वित्सरसात्मजरघुनाथकविकण्ठीरवविरचिते प्राकृतानन्दे द्वितीयः परिच्छेदः। * ॥ समाप्तः प्राकृतानन्दः॥ [॥ संवत् १७२६ अश्विन सुदि १२ रविदिने लिखितं लाभपुरनग रमध्ये शुभं भवतु । ॥ श्री॥॥ छ ॥]

परिशिष्टम् प्राकृतशब्दानुक्रमणिका कुतशब्द: संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्द: संस्कृतरूपम् सूत्राणि अस्थि २१७ नई अत्ति २१७ अनड्वान् अस्ति - अद्धि अणड्डयो अस्थि अत्तो प्रत्तो श्रद्धा, प्रद्धाणो अप्पजू प्रप्परगा प्पणो २८६ १४० १४१ १४०A १४४ प्राप्तः प्रातः श्रध्वा प्रात्मयुक प्रात्मना १४० प्रात्मनः अप्पणः २४१ २४२ २४० २४० २४० २४० २४० २४० १३८ १४० १३६,१४० प्रात्मनः जापा अमू: गनो, अग्गवो प्राग्नयः गणा अग्निना गणो अग्नीन गम्मि अग्नो ग अग्नि गी गी प्रस्नयः गीयो अग्नयः गीतो (अग्गिस्स) प्रग्नेः गीणो प्रग्नयः गीदु, अग्गोदो अग्नः गीवो अग्नयः गीहि अपनेः गीणं अग्नीनाम् गोसु अग्नीषु गीसुत्तो, अग्गीहितो अग्निभ्यः प्रात्मनः १४४ १३६,१४० १४२ १४० १४२ २३६ २४० २४० २४० २४० १४४ अप्पा प्रात्मा अप्पादु, अप्पादो प्रात्मनः अप्पाणो श्रात्मनः अप्पाणं प्रात्मना अप्पाहि मात्मनः अप्पेहि प्रात्मभिः अप्पं प्रात्मानं श्रप्पम्मि प्रात्मनि अप्पासुत्तो, अप्पाहितो प्रात्मभ्यः अप्पे आत्मनि अप्पेसु प्रात्मसु अम्हे वयम् अम्हे अस्मान् १४४ २४० . २४७ ली २४० अगरी न्छ १४३ १७६ २१७ १८१ १६६ २४० २६७ प्रक्षि प्रक्षि प्राश्चर्य ortfa छी छेरं २६६ नार रम्हे अस्माकम २७६ [ ५४ ] प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्द: संस्कृतरूपम् सूत्रा २७४ स्सि २२२ अस्मिन् प्रसौ २७२ पर २७४ प्रह प्रह प्रह प्रदः २८ अहम्मि २६ २७६ २७६ २८२ २८२ २८२ २६ अस्मत अस्माभिः अस्मत् अस्माकम् अस्माकम् अमी अमुष्मिन् अमुना अमी अमीषाम् अमुस्मिन् अमुष्य प्रमुष्मिन् अमुम् अहम्मि अहिपाई अहिमज्जु अहं अहं अहम् अहम् माम् अभिजातिः अभिमन्युः प्रहम् अहम १७ १५ २६ २८२ २८२ २८२ २६ ना अम्हेसुत्तो अम्हेहि अम्हेहितो अम्हं अम्हाणं प्रमुए श्रमुत्थ प्रमुणा अमुणो श्रमुणं अमुम्मि अमुस्स मुस्सि अमुं प्रमुं श्रमू अमूई श्रमूग्रो अमूदिसा प्रमूड अमूदो अमूसु आमूसुत्तो श्रमूहि अमूहि अमूहितो २८२ २८२ २८२ २८७ आप्रदो आइदी पाउदी १७ प्रदः ७ २८२ प्राणा 9 असौ प्रमूनि प्रमून २८७ प्रागतः प्राकृति: प्राकृतिः प्राज्ञा पालानं पापीडः श्रावत: बभूब अश्वः २१ ५ असो दिक् प्राणालं पामेलो पावत्तो प्रासि पासो, अस्सो अहिवाई. अहिआई २८६ २८२ ३७ २८२ २८२ . २८२ अभिजातिः १७ ७ अमष्मात प्रमुण्मात अमीषु अमीभ्यः अमुष्मात अमीभिः अमीभ्यः इत्ति पश्यति hur २८२ २८२ २८२ ३७६ ईप्सितः इच्छिो इणमो अरई १२ २८ २८ २८ इदम् इदम् इदम इणं ८ दद्रष्ट अवक्खइ श्रवक्खी अवगाहो प्रवणप्रो ३१० ३१० इमम्मि इमस्स इमस्सि इह अस्य अवगाहः अपनयः प्रश्नुते प्रश्नाति सन्ति असई अस्मिन् २२ २२ २२ २८ इमा इमान् श्रसइ असन्ति ३७० इमा तशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि २२७ उत्सुकः उभौ उसुनो उहे उंबरं १२६ १३६ Ima २२६ २२६ उदुम्बरम् २०६ हो त्तो ए है . एषां अस्मात अस्मात एभ्यः अस्मात एभ्यः अनेन इमे अनेन एषां एव हतो गा २२६ २२६ २२६ २२६ २२६ २२६ १०१ ३१२ २१५ २४६ स २२७ २४६ २४६ २४६ इ एभिः श्रयं इमं २२६ २२६ २२६ २२६ १४४ ६० १०४ १०४ एप एप्रारहो एवं एहि एत्तो एथ एतम्मि एतस्सि एता एते एतं एदादु एवादो एवाहि एदिणा एदेरण एदेहि २४७ २४७ ऋषिः लो अङ्गारः इन्द्रः एकादशः एवम् इदानीं एतस्मात एतस्मिन् एतस्मिन् एतस्मिन् एतान् एते एतं एतस्मात एतस्मात. एतस्मात एतेन एतेन एतैः एतत् ऐरावतः ईदृश: एवं एवम् एष: एषः २४७ २४६ २४६ २३६ २४७ रो उत्कर: २४७ ET उक्षा ४१ १६६ ११८ १५० उत्तो उत्क्षिप्त २८७ नाइ १५० १८७ लं श्रो एरावणो एरिसो एव एवं एस एसो ३१२ ३१२ २४७ २४७ वइ णमा उद्धमति ऋतु: उदूखलम् उत्पीत: उद्भवति उपानत उद्वेविक्ते, उद्वेवेक्ति उद्विजति उद्विनक्ति उद्वेष्टते २८३ यो वन्वइ ३७६ ३८६ प्रोखलं प्रोगाहावेइ प्रोगाहेइ प्रोगाहो प्रोणो उदूखलम् अवगाहयति अवगाहयति प्रवगाहा १८७ ४०२ ४०२ ३१० ३१० ३४३ १२६ को उत्सवः अपनयः [ ५६ ] प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्रारि कस्स २२ कस्य कस्मिन् ४०२ २२ कस्सि कस्सि ४०२ कदा २२ अोवास प्रोवासावेइ अोवासेइ अोवाहइ श्रोहलं अंकोल्लं अंबं अंसू अवकासते अवकाशयति अवकाशयति अवगाहते उलूहलम् अंकोठं मानं ३८ कृषति ক্ষ ২ २० २ १८७A २०० २०८ २१७ १२ कस कलुणं कलंबो कहावणो कहिं कहि का काअन्वं कदम्बः कार्षापण: कस्मिन् कदा अश्रु २२ २२ क कइप्रको केतवः ७१ कस्मात कर्तव्यम् ४१ का कउरवो कउसलो कदा कौरवः कामा २८ कौशल: ७५ २८ का काई २८ कच्छा कज्जो का कानि कर्तुम कृत्वा का ४१ काऊण ४१ का २८ काए काद काणं २२ कस्मात केषां कारयति २ २२ कढई कढोरं कण्हो कण्हं कण्हत्तण कण्हदा कतई कत्तरी कत्तो ४० कारेइ कालाप्रसं कालासं २१ कक्षा १६६ कार्य: ११२ क्वथति कठोरं १९६ कृष्णः १०,१२०,१३३ कृष्ण कृष्णस्वम् ३१३ कृष्णता ३१३ ३६१ कर्तरी १८० २२१ कदा २२५ कस्मात २२१ करिष्यति (?) ३६५ कदा २२५ कर्म २४२ १ कालायस कालायसं कृन्तति २१ कास कस्य २२ कस्मात कासते केभ्यः २२ केभ्यः कत्थ कदो काभं (?) कम्मि कम्मो कमंधी कासह कासुत्तो काहि काहितो काही काहे काहं किच्चा कित्ती किणह किणावेह कस्मात २२ २२ करिष्यति (?) ३६ कदा २२ कास्मि कन्धः करई ३६४ . १ १७ कर करावे करिसई करोति. कृणाति कारयति कर्षति कृत्त्या कात्तिः श्रीरवाति क्राययति ४०२ ४० , [ ५७ ] प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्द: संस्कृतरूपम् सूत्राणि खमा १७२ खमा खहिइ क्षमा खादिता खादति खाइ ३३६ ३३६ खाज किरिया किलिट्ठ किलितं किया किसणो किसरा किस्सा कि की कीय कीमा कोई कोए क्रिया १७१ क्लिष्ट २०८ पलप्त १६१ कृपा १६५ कृष्णः (भगवति) १३३ कृशरा १६५ कस्याः २८५ किम २८७ का १७४,२८४ कस्याः २८५ खादत स्थाणुः अखादीत् अखादीत् खादिष्यति ३३६ ३३६ खाणू खादी खादी खाहिद खाहीन खिण्णइ खुज्जो खुप्पड़ खोडो खंभो चखाद क्षिणोति कस्पा: २८५ कस्याः २८५ ६३ २८५ कस्याः क्रियते कुब्जः मज्जति स्फोटकः कीर ४०७ स्तम्भः २८५ ७६ १७६ १६७ गउरवं गग्गरो ८४ ४०२ कस्याः कौक्षेयक: कुक्षिः करोति कारयति कारयति के कैटभः कीदृशः कैलासः कैवत्तः केषां केषु २१६ कीसे कुक्खेप्रमो कुच्छी कुणइ कुणावेइ कुणे के केढवो केरिसो केलासो केवट्टो केसि केसु को कोत्थुहो कोसलो कंबोट्टो गच्छं गजावेइ गड्डो गध गभिणो गभिणं ४०२ ११७ ३८५ ९० ग गौरवं गद्गवः गन्तास्मि गाजयति गतः गृध्यति गभितः गभित गम्यते गच्छति गमयति गम्यते ६६ १६७ ४०६ गम्मद ११५ २२३ २२५ २१६ ४०२ गमई गमावेश দিছ गमिरो गमोह गरुनं गराई कौस्तुभः कोशल: कमलं ४१७ गन्ता गम्यते ४०६ २१५ ख गुरु गु/ गृहपतिः २१७ १७६ १४५, २१२ खग्गो खङ्ग गहवई Tanmar IT ITT f २९० चतुरः ४०२ १६७ ३५३ चतस्त्रः चत्वारः ४०६ गामेइ गमयति गारवं गौरवं गाह गाहते गाहिज्जइ गृह्यते गिट्ठी गृष्टिः गिरा गीः गुणवत्तो गुणवान् गेण्हइ गेण्हिज्जा गोरवं गौरव गोला गोदावरी चत्तारि चत्तारि चत्तारो चत्तारो चत्तारो चन्दिमा चम्मो १७५ २८४ चतुरः चतस्त्रः चन्द्रिका चर्म चलति चलति ३१४ ४०० चलभइ गृह्णाति गृह्यते ४०१ १६७ २१५ घ चलइ चलणो चल्लावे चलावेइ चल्लेह चाउलिग्रं चाए घण्णइ ३६३ १६५ २१२ चाले चिणइ ४१६ घणा घरं घेप्रघं घेऊण घेउ घोलइ घोलए घोलेइ धोलावे घृणोति घृणा गृहं ग्रहीतव्यम् गृहीत्वा ग्रहीतुम् घूर्णति घूर्णति घूर्णयति घूर्णयति ३४८, ३६१ ३४८ ४०२ ४०२ चिण्णावेइ चिण्णेइ चितावेई चितेइ चिन्धं चिलानो चिहुरो चुरावेइ चुरेइ चोथी चोद्दही चोरिय चरणः चलयति चलयति चलयति चातुर्य शक्नोति चलयति चिनोति चिनोति चिनोति चिन्तयति चिन्यति चिह्न किरात: चिकुरः चोरयति चोरयति चतुर्थी चतुर्दशी दौर्य च शक्नोति शक्नोति ३८८ ४०२ चैत्रः ७१२ १७८ १७८ चप्रह चावेइ चइत्तो चउत्थी चउद्दही चउण्हं चऊसु चउसुत्तो चऊहिं चउहितो चतुर्थी चतुर्दशी चतुर्णा चतुर्यु चतुर्व्यः चतुभिः चतुर्य: २१८ २१८ २१८ छत्तवण्णो छट्ठी छणो सप्तपर्णः षष्ठी क्षणः २१८ क्षमा प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि ४०४ षण्मुखः छायाग्रामः ३५० जीयते जिगाय जीयते जीयते ४०४ शावकः ४०४ छम्मुहो छायाग्गामो छवनो छाहा छाहागामो छाही छिद छोरं छुद्धो छुणा यस्याः १६८, १७४ १३१ १७४ छाया छायाग्रामः छाया छिनत्ति क्षीरं २८५ १७५ ३६३ या २८५ २०४ यस्याः २८५ १७३ ११८ जिणिज्ज इ जिण्णीय जिग्णीअाइ जिम्वर जिस्सा जी जी जीप जीश्रा जीश्रा जी जीए जीसे जोहा जुउच्छा जुगुच्छा जुज्झइ ज्या क्षुब्धः क्षुणा यस्याः २८५ यस्याः यजमाना जप्रमाणा जप्रमाणी जप्रमाणो ४१६ ४१६ २८५ २८५ २८५ १६५ यजमाना यजमानः ४१८ जउण जहरं जण्णो १६६ १६६ यमुना जठर १६६ यज्ञः १२७ जुवा, जुवाणो जह्नः जायते २४१ २४६ जण्हू जण जम्मो जसो जहिटिलों १५० ३८१ २४२ २८२ जन्म यशः १६६ २८७ युधिष्ठिरः ६० या २८५ यस्याः यस्याः जिह्वा जुगुप्सा जुगुप्सा युध्यते युवा यः योग्यः यौवनम् यत् जापति जल्पयति जल्पयति जुम्भते जृम्भिता जृम्भिता जम्भते जम्भते जम्भते जम्भिता जम्भिता म ध्यायतु ध्यायति ३४७ ४०२ जा या २८५ ४०२ जाउ याः जो जोग्गो जोवणं जं जंपह जंपावे जंपेइ जंभाप्राइ जंभाग्रहिइ जंभाप्रहिए जंभाप्रए जंभाएइ जंभाएए जंभाएहिए जंभाएहिइ २८५ यस्याः २८५ २८७ यानि जाइ जाई जाए जामो ३४६ ३४६ यस्याः २८५ २८५ ३९८ याः जानाति ज्ञायते ज्ञायते जाण जाणिज्ज जाणी ४०८ ३४६ ३४६ ३४६ ३४६ ४०८ जामाता १५५ ३६१ जामापा जामाप्रारो जिण्णइ जामातारः जयति भाउ झाई [ ६० ] प्राकृतशब्द: संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् ३६१ झाहिद भाइ झाइ झाइ भाइ झाउ झाहीस झाहि ३६१ 'झिज्जई ध्याता ध्यायति दध्यौ अध्यासीत् अध्यासीत् ध्यायतु दध्या ध्याता क्षयति क्षति क्रुध्यति क्रुध्यति क्रुध्यति ठ तिष्ठति तिष्ठति ३४० ४०२ झिज्जए भूरावेद झूरह झूरेइ ४०२ ठाप्रह ३६२ ठाइ ड णाराप्रणा नारायणात् णाराप्रणादु नारायणात् णाराणादो नारायणात् णाराणाणं नारायणेभ्यः णाराप्रणाणं नारायणानां णाराणासुत्तो नारायणेभ्यः णाराप्रणाहि नारायणात णाराणाहितो नागायणेभ्यः णाराप्रणे नारायणान् णाराप्रणे नारायणौ णारायणे नारायणे णाराण नारायणेन णाराप्रणेसु नारायणेषु णाराणेहि नारायणः णाराणो नारायणः जाहलो लाहल: णांगलो लाङ्गलः णिअक्का पश्यति णिप्रक्क क्की? अदद्रष्ट णिडालं ललाट णिद्दालू निद्राबान् णिफंदो निस्पन्दः णिम्माण तिभिमीते णिवत्तो निवर्तः णिसढो निषधः णिसासो नि:श्वासः णिसा নিহা णिहिलो निहितः णिहित्तो निहितः णिहसो निकषः णीसासो निःश्वासः णे अस्मान् णेउरं नूपुरं कहा निद्रा दष्टं दग्धं ४१३ ४१३ ६४ दशनः उड्ढे डसणो डोला डंडो दोला दण्डः ९४ ण ११६ हामो णइसोत्तो १ णच्च णच्चावे णच्चे स्नातः नदीस्रोतः नृत्यति नर्तयति नर्तयति ज्ञायते ज्ञायते नारायण ३७६ ४०२ ४०२ णज्जई ४०८ ४०८ : नव्वद णाराणम्मि णाराणस्स नारायणाय १४, २३ १६ १४,२१ १४ णाराणस्स नारायस्य TOTT नारायणा:

[ ६१ ] प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्द: संस्कृतरूपम् মুয্যি ४०२ हो जोभलिपा णोमल्लिया णोल्लइ कोहलो त्थ स्नेहः नवफलिका नवमल्लिका नुदति दोहदः स्थ १६४ ३८६ ८३,६७ शक्नोति तालवृन्तकं तस्य तेभ्यः तस्मात् तीक्ष्णं २०७ २४४ २४४ २४४ २०४ तह त्रयः स्वय त्वयि तइ तइमा तदा तेन २५५ २६३ २४६ २४३ २५६ तहणा तइत्तो तए तए तो त्वत् त्वया त्वयि तारेड तालवण्ठ तास तासुत्तो ताहि तिण्हं तिष्णि तो तीह तीरइ तीरावेइ तीरे तीसु तीसुत्तो तीहि तीहितो तुग्रह तुए तुए तुज्झ तुज्झाणं तुझे १४६ १७४ . १५० ३८८ ४०२ ४०२ १५० १५० १५० २५५ २६३ त्रयाणाम् शक्नोति शक्नोति शक्नोनी त्रिषु त्रिभ्यः त्रिभिः त्रिभ्यः तुदति त्वया स्वयि २४४ तण्ण ३६३ तण्ण तणुई तत्थ तत्तो तत्तो तदो तम्मि १८१ २४६ २५६ २४४ २४४ तव २६३ २६१ २६२ २५२ २५४ २४६ ३८८ तरह तरावेद तलवेण्ठ तवो तस्मात तनोति तृणोति तन्वी तस्मिन् स्वत् तस्मात तस्मात् तस्मिन् शक्नोति शक्नोति तालवृन्तकं तपः तस्य तस्मिन् तस्मिन् तवा तान् तानि तेषां २५८ घुष्माकम् यूयम्, युष्मान युष्मासु युष्माभिः तूष्णीक: तूष्णीकः तव युष्माभिः ४०२ २०७ .. २८२ २४५ २४६ २४६ २४६ २४३ तस्स तस्सि तहि तुझे तुझेहिं तुहियो तुहिक्को तुभ तुब्भेहि तुम्ह तुम्हाणं तुम्हासुत्तो तुम्हाहितो १३२ १३२ २६१ २५८ तहे तव २६१ २६२ ता २८७ ताई ताणं युष्माकम् युमत् युष्मत २४६ २६० [ ६२ ] प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्रानि देवं द्रष्टा १० . दशमुखः दशरथः . तुम्हेसु तुम्हेहि तुमए तुमए तुमम्मि तुमादु तुमादो .तुमाहि तुमो १० १० ३ १६ तुम ६ तुमं तुरियं तुवरावेड़ तुवरेइ दइवं दच्छिहिद दसमुहो दसरहो दहमहो दहरहो दाइ दाडिम दालिम दाह दिरो दिअसो दिग्रहो दिया दिट्ठी दिण्णं दिद्धी दिवड दिसा दुअल्लं दुऊलं दुओ १० १० . दशमुखः दशरथः ददाति दाडिम दाडिम वातास्मि देवरः दिवसः दिवसः धौः दृष्टिः दत्त दुहिता दीव्यति दिक दूकूल दुकूल द्रुतः G युष्मासु युष्माभिः २५८ त्वया २५५ स्वयि २६२ स्वाय २६३ स्वत् २५६ स्वत् २५९ त्वत् २५६ तव २६१ त्वाम् २५३ त्वं त्वरित ४१२ स्वरयति ૪૦૨ स्वरयति ४०२ तव २६१ तूर्य तुष्यति ३८४ ते २४३ तेन २४३ त्रयोदशः १०१ लोपयं १६१ तेषु २४६ तेषां २४६ तः २४३ त्वाम् २५३ तम् २४३ स्वं २५१ स्तम्बः १०६ तानं २०८ थ स्थाणुः (हरवाचके) १५१ तृपति ३६१ द १७ ४१ ३७ तूरं तूस ते तेण तेरहो तेलोक्कं तेसु तेस तेहि २८ १८ 10 १० दुक्खियो दुब्भ दुवे दुहियो दुःखितः दुह्यते द्वो दुःखितः दूयते १४ तं तं तंबो तंब ३८ ३८ दूयते दूमए दूमेइ दूमेए दूसइ देअरो देववं दूयते दूयते दुष्यति " थाणू थिम्प देवरः ६ ho द्यति सत्रो नत: १०४ प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्रतिभवति प्रतिसरः ३३ दोसु दोसुत्तो दोहि दोहितो १४८ १४७ १४७ १४७ प्रथमः ६२ पडिभवा पडिसरो पढमो पहा पण्ही पण्हो पदिवत्ती प्रश्न: प्रश्न: ३ प्रश्नः । धणमोहर धणालो धणं १७४ १२० १७५ पभवह द्वयोः द्वाभ्याम् द्वाभ्याम् द्वाभ्याम् ध धनमाहरति धनवान् धनम् धृष्णोति धावति, धावते धावतां, धावतु धाविता दधावे, दधाव धंयं धुनाति धूयते धसइ २१२ ३८८ ३५० धाइ पभवए पभवेद पभवेए पमिल्ल पमिल्लए पमिल्लाप पमिल्लेइ ३३७ ३४६ धाउ धाहिइ धाहीन धीरं धुण्ण धुणिज्जइ धुण्णीप्रद धुत्तो धुरा धुव्वह १६६ ३६७ ४७७ ३४६ ४०२ ३४६ ४०२ ३४६ ४०७ E घूयते धूर्तः धूः धूयते ११६ २८४ पमीलइ पमीलए पमीले पमीलेए पमीलेए प्रतिपत्ति प्रभवति प्रभवति प्रभवति प्रभवति प्रमीलति प्रमील ति प्रमीलयति प्रमीलति, प्रमीलयति प्रमोलति प्रमीलति प्रमीलति प्रमीलति प्रमीलति पिपति प्रियते पृणाति प्रह्लादः पर्यस्तं पर्याणं प्रकोष्ठः जिप्रति जिघ्रति जनौ ३४६ ३४६ ४०७ ३४६ परह १८१ मई नाराअणं नदी नारायणं १६ पर ३६१ प १०८ २०३ प्रतिभवति प्रकोष्ठः पति जनौ पौर: ३३८ ७२ १५० ३६२ २०३ पर पल्हादो पल्लत्थं पल्लाणं पवठ्ठो पाइ पाइ पाइग्रं पाउसो पारावे पारेइ ७२ ३६२ प्रतिभवई पट्टी पई पईम पउरो पच्छत्तो पच्छिमा पज्जुण्णो पट्टणं पड पडामा ७४ ३६२ पाश्चात्यः पश्चिमा ३६२ १२५ १६६ १२७ २८० ४०२ प्रद्युम्नः पत्तनं पतति पत्ताका २०४ ३५७ १६७ प्रावट पारयति पारयति पद्यते ४०२ ३८२ पालइ प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि बाफो . बारहो बाहो बीहा बुज्झा बुडइ बोरं बंध बाष्पः (ऊष्मा) [१६३ द्वादशः १०१ बाष्पः (अश्रुणि) १२३ बिभेति ३७६ बुध्यते ३८२ मज्जति बदरं १८६ बध्नाति भ १४५ पाहीन जघ्रो पिपरौ पितरः पिमा पिता पिनो ति हसइ प्रिय इति हसति ३१२ पिरको पववः ३५ पिस पिशति पीपल पीतं ३१५ पी पोतं २१२,३१५ पुट्ठी पृष्ठं १८१ पुट्ठ पुष्ट २१५ पुष्फ पुष्पं २०६ पुरिसो पुरुषः ६४ पुल प्रह पश्यति पुलईन दद्रष्ट ३६८ पुस्सो पुष्यः १३२ पुहवी पृथिवी १७८ पूस पुष्णाति ३६६ पूसो पुष्यः १३२ पेरंतं पर्यन्तं १६६ पोक्खरो पुष्करः पोस्थो पुस्तकः Gરો पौत्र: ७३ भअप्पई भइरवो भखावेइ भत्तारम्मि बृहस्पतिः भैरवः भक्षयति भरि भर्तुः भारः ४०२ १५३ भत्ताररस १५३ भत णां १५३ १५३ भर्ता भर्तृषु भर्तृभिः भत्तारा भत्ताराणं भत्तारण भत्तारेषु भत्तारेहि भत्तारो भत्तुणा भत्तुणो भत्तुस्स भत्तुसु भा भी भत न् १५३ १५२ १५३ फ १५३ mr भत्त: १५३ ४०२ ४१२ भर्तृषु भारः भत्तू श्रो १५३ फलावे फलिअं फलिहा फलिहो फलिहो परुषः पाटथति पटितं परिखा परिघः स्फटिकः पाटयति भत्तो ६३ भर भक्तः स्मरति बिति ३६४ ७८ फालेइ भर भरहो भरावेइ भारो भरतः स्मारयति ३७६ ८१ ४०२ फुट फंदो स्फोटते स्पन्दः ब ३४४ १२२ भ्रातार: बिभेति ब्रह्मा ब्रह्माणो भाइ भापो भालेह ब्रह्मा २४१ भक्षयति ४०२ [ ६५ ] प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि ४०२ १८० ममादो ममाहि मम २७३ २७३ ४८ मरह भारे भिसिणी भिगारो भिगो भिडितालो भिदड भे भोप्रवं भो भोऊण ३६१ ३९७ मर मरिसइ स्मारयति बिसिनी भृङ्गारो अजः भिन्दिपाल: भिनक्ति युष्माकम् भोक्तव्यं भोक्तुं भुक्त्वा म प्रस्मि मत् मत् माम् प्रियते मणाति मर्षति मदनाति मलिनं श्मशानं १२८ ३६३ २६२ ४१५ मलई বলিত मसाणं ४१५ ४१५ २११ २०१ २७५ १८८ हि मधुकं मधु माता मिमीते मानवान् २१७ १८२ ३७७ स्मः मयि ३७२ ३७२ ३७२ २७७ २७१ २७३ २११ ४२ मया माला १६३ म्हो म मई मइत्तो मइलं मऊरो मऊहो मए मए मच्छिा मत् मलिनं ६४ ४२ मयूरः मयूखः मया मयि मह महुअं महुं मापा माइ माणइत्तो माला मालाइल्लो मांसं मिश्रको मिच्छा मुइङ्गो मुच्छा मुजामणो मुणइ मुणिज्जइ मुणीआइ मुत्ती मुद्धो मुहलो मे १६९ २७१ २७७ १६६ २७५ मक्षिका मालावान् मांसं मृगाङ्कः मिथ्या मृदङ्गः मूच्र्छा मौजायनः जानाति ज्ञायते ज्ञायते मूत्तिः मुग्धः मुखरः मया मम म मज्झण्णो मज्झणो ४०८ ४०८ मध्याह्न अस्माकम् मनोति मनस्विनीम् मनस्विनी २७६ ३६३ मण्ण मणंसिणि मणंसिणी मत्तो १७६ मत् १७७ १७६ २७३ २७५ २७५ २७० मद्ध मम मे मम मम मम मोत्ता मोरो ममम्मि मग्रि मुक्ता मयूरः २७७ ४२ ARTS प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्द संस्कृतरूपम् सूत्राणि रागेभ्यः मंसू मंसं श्मश्रुः मांसं २६ २३७ ६ राजभ्यः र २६ २३७ रणं २०८ रागात राज्ञः रागेभ्यः रामासुत्तो रामासुतो राप्राहि रामाहि रामाहितो रामाहितो राणा राहणो २८० रत्नम् रत्नमुट रक्षा रक्त रमणम् रच्छा रतं राजभ्यः २६ २३७ २३७ ४१३ राज्ञा २३६ राज्ञः राज्ञा भरण्यानि अरण्येन २३७ २६ राए रणा रपणा रष्णण रणो रणं रमणिज्जा रमणिज्जो १८५ १८५ २३७ १८४ १६८ ८६ ४०५ अरण्यं रमणोया रमणीयः रम्यते रम्यते रम्यते राए रागान्, रागाः, रागे राज्ञः, राज्ञि रागण रागेषु राजसु रागः राजभिः २६ २३४ २३८ २६ २६ २३८ रम्म रमिज्जा रमीप्रह राप्रमि रामम्मि ४०५ ४०५ राएण राएम राएसु राएहिं राएहि राम्रो रानं २६ २३७ २६ २३८ राज्ञि रागः २६ राप्रस्स रामाय, राजानं २३३ २६ रागस्य २६ रागम् राप्रा राजा रामः १ राप्रा राज्ञः राधा रामा रागा: २३० २३७ २६ २६ २६ ऋक्षः ऋणं १६० रागान् रागात् राज्ञः খাদ্যাগী राजानः २३२ रामो राहा रिच्छो रिणं रिद्धो रुक्खो रुच्छं रुड्ढं रुपणं रुप्पिणी रुम्भावे रुम्भेइ रुम्म रुवइ स्वावेह राज्ञां राप्राणं राप्राणं रागेभ्यः, २३८ २६ वृक्षः रुदिष्यामि रुद्धं रुदितं रुक्मिणी रुन्धयति रुन्धयति रुणद्धि रोदिति रोयवति ३७५ ४१३ ४१३ १८१ ४०२ रागाणाम् रागात राज्ञः २३७ रामादु राप्रादु राश्रादो राप्रादो रागात् ३६२ ३७५ ४०२ [ ६७ ] प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि रुवेड ४०२ बच्चे व्रजति ३४१ हंध वच्छो रुधावेड रुधे रोयदति रुणद्धि रुन्धयति रुन्धयति रूष्यति रोषयति रोषयति ३६२ ४०२ ४०२ ६७ १२५ ३८० ४०२ रूसइ रूसावेइ रूसेइ ४०२ ४०२ ४०२ ४०२ वृक्ष, वत्सः त्रस्यति त्रासयति त्रासयति वर्द्धयति वर्द्ध यति वनोति वार्ता वत्तिका वदन्ती उह्यते मन्मथः ४०२ . ४०२ ३६३ १६६ १६६ ४१६ १८० १७६ २१५ १८१ ४०२ १६६ वज्जई वज्जावेइ घज्जेइ घड्ढावेइ बड्ढेइ वण्ण वसा वत्तिमा वदई वब्भ वम्महो वर वरिसइ वरिसावेइ चरिसेइ वसही वसिट्ठो वहू वाग्रह ६६ वृणीते ३६८ ४०७ ४०२ वर्षति वर्षयति वर्षयति वसतिः वसिष्ठः ३६७ ४०७ ४०२ १७५ ल लखावे लक्षयति लच्छी लक्ष्मी लट्ठी यष्टिः लड़ालं ललाट लहुई लध्वी लाखेइ लक्षयति लिच्छा लिप्सा लिब्भइ लिह्यते लुद्धो लुब्धक: लुण्णइ लुनाति লগিস लूयते लुण्णीअइ लूयते लुव्वइ लूयते लोणइ नुदति लोद्धो लुब्धकः व वप्रह वक्ति वइदेसो वैदेशः वइदेहो वरं वैरं वइसाहो वैशाख: वइसिनो वैशिक: वइसंपारणो वैशम्पायन: घच्चइ व्रजति वच्चए व्रजति ४०७ ४०७ वधू म्लायति १८१ ३५६ ३८६ वापा ३७० ७१ ७१ १६१ वैदेहः वाक् म्लायति वारि वारीणि विनक्ति विधिः वेदना वाइ वारि वारीइं विनइ विग्रड्डी विप्रणा विप्रारुल्लं विइच्छा विक्किणइ विक्के २८५ ३५९ २१६ २१६ ३६३ १७६ १६५ ३१४ १६६ ३६७ . विकारवत् ३४१ ३४१ विवत्सा विक्रीणाति विक्रीणाति V0 .

। ६९ प्राकृतशब्द: संस्कृत रूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि विद्युत् ३१५ विद्यत् १२१ १७७ विश्नः वल्ली वेपमाना वेपमाना १७४ ८८ १७४ ४६ विज्जुलो विज्जू विछुप्रो विडवो वितिण्हो विम्हो विलअन्तो विसई विस्सवो विसावेद विस्सामो विसूरइ वेण्हो वल्ली वेवमाना वेवमाणी वो वो वोच्छं वंक वंचिो वंदं ११६ २५४ २६२ ३७० ३११ युष्मान् युष्माकम् वक्ष्यामि वक्र वञ्चितः वन्वं ५ . ३५२ १३७ ४ ४०२ २१३ १३२ ३६३ ३६१ ३६१ ८६ ४०२ सप्रह सप्रढो सइरं सक्का सक्केह सक्को सग्गमो सृजति शकट स्वरं शक्नोति शक्नोति १६१ ३८७ ४०२ १३६ १२६ १२६ २०२ शक्रः १० ३७ विसेइ विस्सो विहलो विभलो वीरि चीलइ धोलावे वीलेइ घीसामो बुंदावणं वृश्चिक: विटप: वितृष्णः विस्मयः वलपन् असते विश्वपाः ग्रासयति विश्रामः खिनत्ति, खिदति ग्रासयति विश्वः विह्वल: विह्वलः वीर्य तोड्यति वीडयति बीडयति विश्रामः वृन्दावन वेद वेत्ति वेदना वेत्तव्यम् वेत्तं विदित्वा वेत्स्यामि वेष्टते वेष्टते वेष्टले वेष्टते विष्णूः ३८० सच्चा १६९ ३८३ ४०२ सद्गमः सत्या सुज्यते शाठयति शीयते सज्ज सठावेद ४०२ सडइ ४०२ ३५७ १६८ सढा वेप्रह २०४ १३२ १६० ३७० ३७० १६५ ४१५ ४१५ ४१५ ३७० सण्ण सहं सणेहो सत्तमी सस्थि सटा सनोति इलक्षणं स्नेहः सप्तमी सक्थि श्रद्दधाति शष्पं शफरी वेग्रह वेषणा वेअन्वं वे वेऊण वेच्छं वेढ वेढए वेढे वेढेए वेण्ह १८० २१७ ३७८ २०६ ३४२ ३४२ सद्दहइ सप्फ सभरी सभलो सभलं समिद्धी सफल: सफल समृद्धिः ६१ २०० ३४२ ३४२ समिद्धीमा, समिद्धीए समवध्या १४२ प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि सस्कृतरूपम् प्राकृतशब्दः सूनाम साला शाला असि सि सियालो १७३ ३७१ ४६ १७५ सिठ्ठी श्शृगालः सृष्टि: शिथिलः श्रीः स्वप्नः तेषां २४६ ४८ सिढिलो सिरी सिविणो सि सिंगारो सिधवं सीभरो सीहो सुई सुइदी सुज्जो सुण्णइ शृगारः सैन्धवं सीकरः सिंहः सुनोति ५० सुकृतिः १७५ १५१,११४ सूर्य: शृणोति शृणोतु श्रावयति सुण्ण सर सरति सरह संसति ३७६ शृणाति सरावेह सारयति ४०२ सरिच्छो सदृक्षः सरो सर: २८२ सलाहा इलाघा १७२ सवहो शपथः ८५ सम्बज्जो सर्वज्ञः १०५ सनस्स सर्वस्थ, सर्वस्मै १३५ सर्वास, सव्ध- म्मि, सवत्थ सर्वस्मिन् सव्वा सर्वान्, सर्वस्मात् १३५ सव्वाणं सर्वेषाम्, सर्वेभ्यः १३५ सव्वाद सव्वादो सव्वाहि सर्वस्मात् १३५ सध्यासुत्तो सव्वाहितो सर्वेभ्यः १३५ सध्ये १३५ सम्वण सर्वेण १३५ सब्वेसु १३६ सवेहि सम्वो सर्वः १३४ सन्वं सर्व सहमाणा, सहमाणी सहमाना १७४ सहा सभा १६८ सहिणो सखीन् १५० सहि सखायम् सही सखा सहीनो, सहीणो सखायः १५० साठे शाठयति ४०२ सारेड सारयति ४०२ ४०२ सर्व ४०६ सर्वेषु ४०२ सर्वः सुण्णावेइ सुणि सुणिज्जइ सुण्णीय सुण्णीअइ सुण्णेइ सुणमु सुणमो सुणसु सुणह सुणंतु सुप्पणहा सुपण्णही सुमरइ सुमरावेइ सुमरेइ सुब्वाइ सुहं शुभाव भ्रूयते शुश्राव श्रूयते श्रावयति शृणोमि शृण्मः शृणु शृणुत शृण्वन्तु सूर्पनखा ३६७ ३६७ स्मरति स्मारयति ४०२ ४०६ श्रूयते सुखं २०० [ ७० ] प्राकृतशब्द: संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि सेवा सेवा १७० सेवा सः सुंडो सुंदरं सूई सूरो सूसइ सूसावेइ सूसेइ से सेज्जस सेज्जा शौण्डः सौन्दर्य सूयते सूर्यः शुष्यति शुष्यति ३८४ ४०२ " तस्य " शय्याया: शय्याः " शाय्यायाः २४५ १६२ १५७ १६१ १६२ १६१ १६२ " " शय्यायाः शय्यथा सेजजाई सेज्जाइ सेज्जाइ सेज्जाए शय्यायाम् " शय्यया ३ शय्यायाः " १६२ १६२ शय्यायाम् " " सेज्जाउ शय्या: १५६ सो २४३ सोअमल्लं सौकुमार्य २०३ सोइ श्पति :८१ सोच्छई श्रोता सोच्छए सोच्छहिइ सोच्छहिए सोच्छि सोच्छिए सोच्छिहिइ सोच्छिहिए सोच्छेद सोच्छेए सोच्छेहिइ सोच्छेहिए सोहिंति श्रोतारः सोच्छंति सोच्छिहिति सोच्छिति सोच्छति सोच्छसि श्रोतासि सोच्छसे सोच्छहिसि सोच्छहिसे सोच्छिसि सोच्छिसे सोच्छिहिसि सोच्छिहिसे सोच्छेसि सोच्छेसे सोच्छेहिसि सोच्छेहिसे सोच्छइत्थ श्रोष्यथ ३६६, ३६७ (बहवचने) " शय्यायाः " सेज्जाओ शय्याः १ . १५७ १५६ शय्यायाः १६२ शय्यानाम् १ " " हाय्याया: " " " . शय्यासु शय्याभ्यः १६२ ११६ " सेज्जाणं सेज्जादु सेज्जादो सेज्जाहि सेज्जासु सेज्जासुत्तो सेज्जाहिंता सेज्जाहिं सज्ज सेज्या सेत्तं सेलो " शय्याभिः " शय्याम् शय्या शैत्यं शल: १५६ १६१ ६६ प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि ३६७ " - " सोच्छह श्रोष्यथ २६७ सोच्छहिह सोच्छिह सोच्छिहिह सोच्छेह सोच्छेहिह सोच्छहित्य श्रोष्यथ (बहुवचने) ३६७ सोच्छहिह सोच्छित्थ सोच्छिह सोच्छिहित्थ सोच्छिहिह सोच्छेह सोच्छेहित्था सोच्छेहिह १ " " ११ " " " " " " " सोच्छिहिइ श्रोष्यति सोच्छस्सामो श्रोतास्मः सोच्छहामो सोच्छहित्था सोच्छहिमो सोच्छामो सोच्छाहामो सोच्छाहित्था सोच्छाहिमो सोच्छाहिस्सा सोच्छिमो सोच्छिस्सामो सोच्छिहामो सोच्छिहित्था सोच्छिहिमो सोच्छिहित्था सोच्छेमो सोच्छेस्सामो सोच्छेहामो सोच्छेहित्था सोच्छेहिमो सोच्छेहिस्सा सोण्हा स्नुषा सोरिय शौर्य सोहा शोभा संका शङ्का संङ्का संकतो संक्रान्तः संजदो संयतः संझा संध्या संवत्तो संवतः संविल्लइ संवेष्टते संबुदी संवृत्ति: इत्यादि ३३७ " " " " . " १६६ २०२ १६८ ७ " सोच्छमि श्रोतास्मि सोच्छस्सामि सोच्छस्स सोच्छहामि सोच्छहिमि सोच्छामि सोच्छाहामि सोच्छिमि सोच्छिस्सामि सोच्छिहामि सोच्छेमि सोच्छेस्सामि सोच्छेस्स सोच्छेहामि सोच्छेहिमि सोच्छं सोच्छमो श्रोतास्मः ૬ ૨ १६६ " ३४३ १७५ " हतः हदो हम्म हन्ति ३७० [ ७२ ] प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्द संस्कृतरूपम् सूत्रा हुवमि भवामि ३ mm हुवम् T" १६५ १७४ बभूव भवामः । ३२ ३ ३ २ F ३ १७४ ३३ भवाव: भविष्यामि भवानि भविष्यामः ४५ ३३ ३३२ हुवमो ३ ४०५ भावाम ३= भवामः । ४०५ ४५ हरिसइ हलद्रा हलद्दा(द्रा) हलद्दा हलद्दी हलियो हविधानं हस्सइ हसिज्जा हसिइ हलियो हिप्रयं हित्य हिरी हीरइ हुअं हुण्ण हुणिज्जइ हुण्णीअइ हुब्ध हुन्वंतो हुवा हुवइत्थ हुवइत्था हुवउ हर्षति हरिद्रा हरिद्रा हरिद्रा हरिद्रा हालिकः बभूव हस्यते हस्यते हस्यते हालिकः हृदयं त्रस्तं होः ह्रियते भूतं जुहोति हूयते हूयते हूयते भवन् भवति भविष्यथ १६० ४१३ १८१ : स्वावः बभूविम भविष्यामः ३६ भविष्यामि ३३६-३%3D भविष्यामः भविष्यामः भवसि बभूविथ भविताति हुवस्साम हुवस्सामि हुवस्सामु हुवस्सामो हुवसि हुवसु . ४०६ KI ४१० ३७५ f ४०७ Pil ४०७ पाग ४०७ i हुबसे हुवस्सं हुवह भव भवसि भविष्यामि बभूव ४१५ ३१६ ३३७ ३२४ 7 भवथः ३३ त भवथ, भवथः भावग ३ सा ३३७ ३३१ ३१६ ३ भवतु बभूव भवति भवति भवन्ति भवत भवितास्थ भविष्यामः भविष्यामि हुवए हुवज्ज ३३ हुवहाम हुवहामि । ३२२ ३ ३ ३२३ ३२३ ३ MY ar भवतः भवति ३२२ ३ हुवज्जा हुवज्जा भवन्ति हुवहामु हुवहामो हुवहिइ हुवहिए हुवहित्था निशा भविष्याम: भविष्याम: भविता भविष्यति भविष्यामः भवतः ३२३ ३ Y हुवम भवामः ३२७ 2010 YTTET [ ७३ ] प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि ३३७ हुवाहिमि भविष्यामि हुवहिम हुवहिमि भविष्यामः भविष्यामि ३३७ ३३७ हुवाहिमु हुवाहिमो हुवाहिस्सा ३३७ भविष्याम भविष्यामः भावितास्मः भाविष्यामः हुवहिम हुवहिमो हुवाहय हुवहिस्सा ३३७ ३३७ हुवि ३३७ ३२६. ४०३ हहिसि भविष्यामः भविष्यामः भविष्यति भवितास्मः भविष्यामः भविष्यसि भवितासि भविष्यसि भवितासि भवितारः भविष्यन्ति भविष्यथ भवितास्थ अभूत् बभूव भूयते माविष्यथ भावमः, भवथ भवामः, भवाव: हुविज्जइ हुवित्थ हुविस्था ३३४ हुवहिसे ३२४ हुविम हुहिति ३३४ हुविमु हुविमो ३३७ भविष्यामः भवाम ३३७ हुवहिह ३३४ हुवाम भवामः कावः हुविस्साम हुविस्सामु हुविस्सामो हुबिहाम हुविहामु हुविहामो हुवामि ३२६ हुवाम भवामि भविष्यामि भवानि भवामः भवाव: ३२७ हुविहित्था हुवामो भवामः भावामः, भावाव: ३२७ भविष्यामः भविष्यामः भाविष्यामः ३३७ भविष्याम: भविष्यामः भविष्यामः भविष्याम भविष्यामः ३३७ भविष्याम भवितार: ३३४ भविष्यामः भविष्यामः भविष्यामः भविष्याम ३३७ आवितास्मः ३३७ भविष्यामः बभूव अभूत भावावः ३२७ ३२७ हुविहिति हुविहिम हु विहिम् हुविहिमो भवाम भविष्याम: भावयति भविष्यामः भविष्यामि ३३७ ४०२ हुवावेइ हुवाहाम हुवाहामि ३३७ हुविहिस्सा हुवीस हुवाहामु हुवाहामो भविष्यामः भविष्यामः अलि ३३७ मा Fun मा [ ७४ ] प्राकृनशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्द: संस्कृतरूपम् सूत्राणि ४०२ ३३४ हुवेउ भावयति भवतु बभूव भवति भवति भवन्ति हुवेहाम हुवेहामि भवितास्थ भविष्यामः भविष्यामि हुए हुवेज्ज हुवेज्जा ३३७ ३३७ ३३७ हुवेहामु हुवेहामो हुवेहिइ ३२२ ३२३ ३२३ ३२२ ३२७ भवतः भवति हुवेमः भविष्यामः भविष्यामः भविता भविष्यति भविष्यति भविष्याम भविष्यामः भविष्यामि भवामः भवावः भवामि हुवेहिए हुवेहित्था हुवेहिम हुवेहिमि हुवेमि हुवे ३२६ ३३७ ३३७ ३३६ ३३७ बभूत्र भवामः ३२७ ३३७ भवावः भवानि मविप्यामि भविष्यामः हुवेहिमु हुवेहिमो हुवेहिस्सा हुयेमो ३३७ ३३७ ३३७ ३३७ ३३७ भवाम हुवेहिसि भवामः, भवावः ३२७ वभूविम ३३२ भविष्यामः ३३७ भविष्यामि ३३४ ३३४ हुवेहिसे हुस्साम हुवेस्सामि ३३७ हुवेहिह ३३४ हुवे सामु भविष्यामः भविष्यामः भवितास्मः भविष्यामः भविष्यसि भवितासि भवितासि भविष्यसि भविष्यथ भवितास्थ भविष्यन्ति भवितारः भवन्ति, भवत: भवन्तु बभूवुः भवितारः भवतः, भवन्ति भवितारः भवन्तु बभूवुः ३३७ हुवेहिति हुवेलामो हुवेसि हुवे ३३७ ३२४ ३३४ भविष्यामः भविष्यामः भवति भवितासि बभूविथ भव भवसि भविष्यामि ३३७ ३३४ ३२३ हुति हुवेंतु ३३७ ३३२ ३२४ हुवेसे हुवेस्स हुवंति हुवंतु ३२३ ३२४ हुवेह ३३६ ३३२ ह बभव ३३२ कृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि प्राकृतशब्दः संस्कृतरूपम् सूत्राणि हे भर्तः ३६७ - सत्तारा मणंसिणि होस्साम होस्सामि भविष्यामः भविष्यामि १५३ १७७ १८५ २३३ हे मनस्विनि हे अरण्य हे राजन् ! रण -राधे ई राम -सेज्जे होस्सामु होस्सामो होसि होसु भविष्यामः भविष्यामः भवसि बभूविथ भवितासि ६२४ ३३२ प्रावेद ३४. भव होस् भविष्यामि ३३७ ३३६ इज्जइ इत्था ईग्रह उ होह ३३४ हे शय्ये १६२ भावयति ४०२ भवति ३१६ बभूव ३३२ भूयते ४०३ भवथः, भवथ ३२४ भूयते बभूव ३३१ भवतु ३३७ भावयति ४०२ भवन्ति, भवतः ३२३ भवति ३२१ भवन्ति भवतः ३२३ भवति ३२१ भवन्ति, भवतः ३२३ भवथ, भवथः भवितास्थ: ३३४ भवत होहाम होहामि भविष्यामः भविष्यामि नोएइ ज्ज ज्जह ज्जा ३३७ . होहामु होहामो होहिइ ३३७ ज्जाइ ३३७ जंति ज्जांति ज्जेइ ज्जेंति भविष्यामः भविष्यामः भविता भविष्यति भविष्यत भविष्यामः भविष्यामः भविष्यामि ३३७ होहित्थ होहित्था होहिम होहिमि मि मु भवति ३२१ भवन्ति, भवतः ३२३ भवावः, भवामः ३२६ भवामि ३२६ भविष्यामि भवानि ३३७ भवाव: ३२७ भवामः ३२७ बभूव ३३२ भवावः ३२७ भबामः ३२७ बभूविम ३३२ भवाम भविष्यामः ३३७ होहिम होहिमो होहिस्सा . ३६७ ३३७ होहिसि मो भविष्यामः भविष्यामः भविष्यामः भवितास्मः भ तासि भविष्यसि भाविष्यत भावितास्थ भवितारः भविष्यन्ति होहिह होहिहां होहिति ३३४ ३३७

संस्कृतरूपम्
सूत्राणि
प्राकृतशब्द:
प्राकृतशब्दः
संस्कृतरु
भवितारः
होहीन
३३७
बभूव
अभूत्
भवन्ति
बभूयुः
ਕੇਤੇ
अहम
.
होंति
होंतु
३३२
सानन्दं प्राकृतानन्दे शब्दानामनुसूचिका । मुनीनां प्रीतये सेयं जिनविजयसू
वृगिन्दुनभनेत्राब्दे मासे भाद्रपदे शुभे । कृष्णाष्टम्यां गुरौ वारे कृता गोपा

मानमरमा राजस्थान सरकार राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान Cajasthan Oriental Research Institute ) जोधपुर परमाव्यविधान EMBOE anin- सूची-पत्र उस्मान पुरातन गन्दरमाला * प्रधान सम्पादक पद्मश्री जिनविजय मुनि, पुरातत्वाचार्य अक्टूबर १९६३ ई० - . . - राजस्थान पुरातन ग्रन्थ-माला प्रधान सम्पादक-पद्मश्री मुनि जिनविजय, पुरातत्त्वाचार्य प्रकाशित ग्रन्थ १. संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश १. प्रमाणमंजरी, ताकिकचूड़ामणि सर्वदेवाचार्यकृत, सम्पादक मीमांसान्यायकेसरी पं० पट्टाभिरामशास्त्री, विद्यासागर । मूल्य-६ २. यन्त्रराज रचना, महाराजा-सवाईजयसिंह-कारित । सम्पादक-स्व० ५० केदारनाथ ज्योतिविद्, जयपुर। मूल्य- ३. महर्षिकुलवैभवम्. स्व० पं० मधुसूदनोझा-प्रणीत, भाग १, सम्पादक-म० म० पं० गिरिधरशर्मा चतुर्वेदी । मूल्य-१० ४. महषिकुलवैभवम्, स्व० पं० मधुसूदन ओझा प्रणीत, भाग २, मूलमात्रम् सम्पादक श्रीप्रद्युम्न प्रोमा। मूल्य- ५. तर्कसंग्रह, अन्नंभट्टकृत, सम्पादक-डॉ. जितेन्द्र जेटली, एम.ए., पी-एच. डी., मूल्य- ६. कारकसंबंधोद्योत, पं० रभसनन्दीकृत, सम्पादक-डॉ० हरिप्रसाद शास्त्री, एम. ए., पी-एच. डी.। मूल्य- ७. वृत्तिदीपिका, मोनिकृष्णभट्टकृत, सम्पादक-स्व.पं. पुरुषोत्तमशर्मा चतुर्वेदी, साहित्या मूल्य- ८. शब्दरत्नप्रदीप, अज्ञातकर्तृक, सम्पादक-डॉ. हरिप्रसाद शास्त्री, एम. ए., पी-एच मूल्य- 8. कृष्णगीति, कवि सोमनाथविरचित, सम्पादिका-डॉ. प्रियबाला शाह, एम. ए. पी-एच. डी., डी. लिट् । मूल्य- १०. नृत्तसंग्रह, अज्ञातकर्तृक, सम्पादिका-डॉ. प्रिय बाला शाह, एम. ए., पी-एच. डी., डी. लिट् । मूल्य- ११. शृङ्गारहारावली, श्रीहर्षकवि-रचित, सम्पादिका-डॉ. प्रियबाला शाह, एम. ए., पी-एच.डी., डी.लिट् । मूल्य- १२. राजविनोदमहाकाव्य, महाकवि उदयराजप्रणीत, सम्पादक-पं० श्रीगोपालनारायरा बहुरा, एम. ए., उपसञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर । मूल्य- १३. चक्रपाणिविजय महाकाव्य, भट्टलक्ष्मीधरविरचित, सम्पादक-पं० श्री केशवराम कार मूल्य- १४. नृत्यरत्नकोश (प्रथम भाग), महाराणा कुम्भकर्णकृत, सम्पादक-प्रो. रसिकलाल लाल पारिख तथा डॉ. प्रियबाला शाह, एम. ए., पी-एच. डी., डी. लिट् । मूल्य- १५. उक्तिरत्नाकर, साधसुन्दरगरिणविरचित, सम्पादक-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजयजी, तत्त्वाचार्य, सम्मान्य संचालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर । मूल्य- १६. दुर्गापुष्पाञ्जलि, म०म० पं० दुर्गाप्रसादद्विवेदिकृत, सम्पादक-पं० श्रीगङ्गाधर द्वि साहित्याचार्य । मूल्य- १७. कर्णकुतूहल, महाकवि भोलानाथविरचित, इन्हीं कविवर की अपर संस्कृत कृति श्री लीलामृत सहित, सम्पादक-पं० श्रीगोपालनारायण बहुरा, एम. ए., मूल्य- १८. ईश्वरविलासमहाकाव्य, कविकलानिधि श्रीकृष्णभट्टविरचित, सम्पादक-भट्ट श्री नाथशास्त्री, साहित्याचार्य, जयपुर । स्व. पी. के. गोड़े द्वारा अंग्रेजी में प्रस्तावना स मूल्य-१ १६. रसदीपिका, कविविद्यारामप्रणीत, सम्पादक-पं० श्रीगोपालनारायण बहुरा, मूल्य- २०. पद्यमुक्तावली, कविकलानिधि श्रीकृष्णभट्टविरचित, सम्पादक-भट्टश्रीमथर . - शास्त्री। -- . - .

" " " [ २ ] २२. काव्यप्रकाशसंकेत, भाग २ भट्टसोमेश्वरकृत, सम्पा०-श्रीरसिकलाल छो० पारीख, मूल्य-८.२५ २३. वस्तुरत्नकोष, अज्ञातकर्तृक, सम्पा०-डॉ० प्रियबाला शाह । मूल्य-४-०० २४. दशकण्ठवधम्, पं० दुर्गाप्रसादद्विवेदिकृत, सम्पा०-५० श्रीगङ्गाधर द्विवेदी । मूल्य-४.०० २५. श्रीभुवनेश्वरीमहास्तोत्र, सभाष्य, पृथ्वीधराचार्यविरचित, कवि पद्मनाभकृत भाष्य- सहित पूजापञ्चाङ्गादिसंवलित । सम्पा०-पं. श्रीगोपालनारायण बहुरा। मूल्य-३.७५ २६. रत्नपरीक्षादि-सप्तग्रन्थ-संग्रह, ठक्कुर फेरू विरचित, संशोधक-पद्मश्री मुनि जिन- विजयजी, पुरातत्त्वाचार्य । मूल्य-६.२५ २७. स्वयंभूछन्द, महाकवि स्वयंभूकृत, सम्पा० प्रो० एच. डी. वेलणकर । विस्तृत भूमिका (अंग्रेजी में) एवं परिशिष्टादि सहित मूल्य-७.७५ २८. वृत्तजातिसमुच्चय कवि विरहाङ्करचित; ॥ मूल्य-५.२५ २६. कविवर्पण, अज्ञातकतक, मूल्य-६.०० . ३०. कर्णामृतप्रपा, भट्टसोमेश्वरकृत सम्पा०-पद्मश्री मुनि जिनविजयजी । मूल्य-२.२५ ३१. त्रिपुराभारती लघुस्तव, लघुपण्डितविरचित, सम्पा० मूल्य-३.२५ ३२. पदार्थ रत्नमञ्जूषा, पं० कृष्ण मिश्रविरचिता, सम्पा० मूल्य-३.७५ ३३. वृत्तमुक्तावली, कविकलानिधि श्रीकृष्णभट्ट कृत; सं० पं० भट्टश्रीमथुरानाथ शास्त्री। मूल्य-३.७५ ३४. इन्द्रप्रस्थप्रबन्ध, सम्पा०-डॉ. दशरथ शर्मा। मूल्य-२.२५ ३५. प्राकृतानन्द, रघुनाथकवि-रचित, सम्पा०-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजयजी। मूल्य-४.२५ २. राजस्थानी और हिन्दी ३६. कान्हडदेप्रबन्ध, महाकवि पद्मनाभविरचित, सम्पा०-प्रो० के.बी. व्यास, एम. ए.। मूल्य-१२.२५ ३७. क्यामखां-रोसा, कविवर जान-रचित, सम्पा०-डॉ. दशरथ शर्मा और श्रीअगरचन्द नाहटा। मूल्य-४.७५ १८. लावा-रासा, चारण कविया गोपालदानविरचित, सम्पा०-श्रीमहताबचन्द खारैड़। मूल्य-३.७५ ३९. वांकीदासरी ख्यात, कविराजा वांकीदासरचित, सम्पा-श्रीनरोत्तमदास स्वामी, एम. ए., विद्यामहोदधि । मूल्य-५.५० ४०. राजस्थानी साहित्यसंग्रह, भाग १, सम्पा०-श्रीनरोत्तमदास स्वामी, एम.ए. । मूल्य-२.२५ ४१ राजस्थानी साहित्य संग्रह, भाग २, सम्पा०-श्रीपुरुषोत्तमलाल मेनारिया, एम. ए., साहित्यरत्न । मूल्य-२.७५ ४२ कवीन्द्र कल्पलता, कवीन्द्राचार्य सरस्वतीविरचित, सम्पा०-श्रीमती रानी लक्ष्मी- कुमारी चूंडावत । मूल्य-२.०० ४३. जुगलविलास, महाराज पृथ्वीसिंहकृत, सम्पा-श्रीमती रानी लक्ष्मीकुमारी चूंडावत । मूल्य-१.७५ ४४. भगतमाळ, ब्रह्मदासजी चारण कृत, सम्पा०-श्री उदराजजी उज्ज्वल । मूल्य-१.७५ ४५. राजस्थान पुरातत्त्व मन्दिरके हस्तलिखित ग्रंथों की सूची, भाग १ । मूल्य-७.५० ४६. राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठानके हस्तलिखित ग्रन्थोंकी सूची, भाग २ । मूल्य-१२.०० ४७ मुंहता नैणप्तीरी ख्यात, भाग १, मुंहता नैणसीकृत, सम्पाo-श्रीबद्रीप्रसाद साकरिया। मूल्य-८.५० २, मूल्य-६.५० ४६. रघुवरजसप्रकास, किसनाजी पाढाकृत, सम्पा०-श्री सीताराम लाळस । मूल्य-८.२५ mins श्रीजिनविजय मल्य-४.५० . ४८.

स्वामा दाक्षित । १ " " 1" - - - - बहुरा, एम. ए. आर बाल मूल्य-६.२५ ५४. सूरजप्रकास, भाग १-कविया करणीदानजी-कृत, सम्पा०-श्री सीताराम लाळस । मूल्य-८.०० ५५. २ मूल्य-६.५० ५६. ३ मूल्य-६.७५ ५७ नेहतरंग, रावराजा बुधसिंहकृत-सम्पा०-श्रीरामप्रसाद दाधीच, एम.ए. मूल्य-४.०० ५८. मत्स्यप्रदेश की हिन्दी-साहित्य को देन, प्रो. मोतीलाल गुप्त,एम.ए.,पी-एच.डी. मूल्य-७.०० ५६. बसन्तविलास फागु, अज्ञातकर्तृक, सम्पा०-श्री एम. सी. मोदी । मूल्य-५.५० ६०. राजस्थान में संस्कृत साहित्य की खोज-एस. आर. भाण्डारकर, हिन्दी-अनुवादक श्री ब्रह्मदत्त त्रिवेदी, एम. ए., साहित्याचार्य, काव्यतीर्थ मूल्य-३.०० ६१. समदर्शी प्राचार्य हरिभद्र, श्रीसुखलालजी सिंघवी, मूल्य-३.०० प्रेसों में छप रहे ग्रंथ संस्कृत १. शकुनप्रदीप, लावण्यशर्मारचित, सम्पा०-पद्मश्री मुनि श्रीजिन विजय । २. बालशिक्षाव्याकरण, ठक्कुर संग्रामसिंहरचित, सम्पा०--पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजय । ३. नन्दोपाख्यान, अज्ञातक क, सम्पा०-डॉ० बी.जे. सांडेसरा । ४. चान्द्रव्याकरण, प्राचार्य चन्द्रगोमिविरचित, सम्पा०-श्रा बी. डी. दोशी। ५. कविकौस्तुभ, पं० रघुनाथरचित, सम्पा०-श्री एम. एन, गोरे । ६. एकाक्षर नाममाला-सम्पा०-मुनि श्रीरमणिकविजय । ७. नृत्यरत्नकोश, भाग २, महाराणा कुंभकर्णप्रणीत, सम्पाo-श्री आर. सी. पारिख और डॉ. प्रियबाला शाह । ८. हमीरमहाकाव्यम्, नयचन्द्रसूरिकृत, सम्पा०-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजय । ६. स्थूलिभद्रकाकादि, सम्पा०-डॉ० आत्माराम जाजोदिया। १०. वासवदत्ता, सुबन्धुकृत, सम्पा०-डॉ० जयदेव मोहनलाल शुक्ल । ११. आगमरहस्य, स्व० पं० सरयूप्रसादजी द्विवेदी कृत, सम्पा०-प्रो० श्रीगङ्गाधर द्विवेदी । राजस्थानी और हिन्दी १२. मुंहता नैणसीरी ख्यात, भाग ३, मुंहता नैणसीकृत, सम्पाo-श्रीबद्रीप्रसाद साकरिया । १३. गोरा बादल पदमिणी चऊपई, कवि हेमरतनकृत सम्पा०-श्रीउदयसिंह भटनागर, एम.ए. १४. राठौडारी वंशावली, सम्पा०-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजय । १५. सचित्र राजस्थानी भाषासाहित्यग्रन्थसूची, सम्पा०-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजय । १६. मीरां-बृहत्-पदावली, स्व० पुरोहित हरिनारायणजी विद्याभूषण द्वारा संकलित, सम्पा०-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजय । १७. राजस्थानी साहित्यसंग्रह, भाग ३, संपादक-श्रीलक्ष्मीनारायण गोस्वामी। १८. रुक्मिणी-हरण, सांयांजी झूला कृत, सम्पा० श्री पुरुषोत्तमलाल मेनारिया, एम.ए.,सा.रत्न १६. सन्त कवि रज्जब : सम्प्रदाय और साहित्य, डॉ. व्रजलाल वर्मा । २०. पश्चिमी भारत की यात्रा, कर्नल जेम्स टांड, हिन्दी अनु० श्रीगोपालनारायण बहुरा, एम.ए. २१. बुद्धिविलास, वखतराम शाहकृत, सम्मा०-श्रीपद्मधर पाठक, एम. ए. २२. प्रतापरासौ, जाचीक जीवण कृत, सम्पा०-प्रो. मोतीलाल गुप्त, ए. ए., पीएच. डी. अंग्रेजी 23. Catalogue of Sanskrit and Prakrit Manuscripts Part I, R.O.RI. (Jodhpur Collection ), ed., by Padamashree Jinvijaya Munis. Puratattvacharya. A List of Rare and Reference Books in the R.O.R.I., Jodhpur, compiled by P.D. Pathak, M.A. विशेष- पुस्तक-विक्रेताओं को २५% कमीशन दिया जाता है। . - - - . . 24.

Prakrutananda

Author
Pandit. Raghunatha Kavi
Title
Prakrutananda
File name
Prakrutananda
Text
OCR done
Published
11/12/2002
Publisher
Rajasthan Oriental Research Institute, Jodhpur
Language
Sanskrit
Pages
107
Library
Svclrc
DLI number
382830
Barcode
2040100002433.00
Scanning centre
S.V. Digital Library, Tirupati
Digital publisher
UDL.TTD TIRUPATI
VMLT id
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