Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Shree Aatmanand-dwasaptati

Swami Yogjivanand Sarswati · 2011/07

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८३ २ ५ १०४ ४ १०४ प्रपयिष्यत्ययागा, प्रवनयिष्यतीत्याया- प्रयंकजाशनमार्थः, प्रयकर-पारातमोज्य: पूणार्थ पूरणार्थ तन्त्रेणेय সন্মষ সিনি নীশিশি अनरमतुष्टयत्वम्, अनामनुष्यम् नमादि নাম্বা घटिकापनि, पटिकाग्विति माम्नी+मच सायन मायने मन्दिरीन, पन्दिर अभीने दायादगार दायात कमंकनांग विमपानमाता यामाना. पनितम पास जाकाम वान शिनीमराण गिनी मागत भी काम नाम्नीन, १३ १३ १ का सत्र १ f.1927291 मनाशय मायिनी निपकोटा नगर मावती ४

पंजाय देशोद्धारक न्यायामोनिधि जैनाचार्य १००८ श्री
मद् विजयानंद सूरीश्वर जी महाराज के परम भक्त स्वर्गीय
बावू जसवंत राय जी जैनी
२
दोशियारपुर (पंजाय) f० सम्बत् १६२८ चैत्र सुदी ६॥
स्यगंवान:--
इली पिक सभ्यत १६५८ सावन यदी १३ ।
।
आपने अपनी मादीसिन्दगी में गुरुदेव नया जैन समान की
सेवा में अपनी जिन्दगी का अधिक से अधिक समय में हुये
श्री मारमा जैन ममा के मंत्री का काम करते हुये धीयान्मानन्द
जर पत्रिका का संपादन किया ने ही मन्य और ट्रैक्ट
प्रकाशित किये। श्री प्रामानन्द और गुरुकुल ना इस्तिमापुर
सीamrarमार। अंत में प्राको प्रकर
करके और अम्मां में धी प्रारमामाद जैम ममा स्थापन कराके
देली में प्रमामार्टफस होने से परलोकपचार गये।
WIVE साघु पुर "धर्म"

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中学

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प्रस्तावना
जीवों के आवागमन रूप यह जगत्-संसार अनादि अनंत
है। अनादि काल से प्रभाह रूप चला आया है और चला
जायगा, न प्रादि है, न अन्त होगा, यह है जैनधर्म का मुख्य
सिद्धान्त । परन्तु कई लोगों के मन में जगत् अनादि होने में शंका
रहती है। इस शंका को निवारण करने के लिए अनेक युक्ति
प्रमाणों की आवश्यकता है। परन्तु स्थान संकुचितता के कारण
केवल एक पाश्चात्य विद्वान् को साक्षी ही पर्याप्त होगी, क्योंकि
पाश्चात्य व्यक्तियों के कथन पर प्रायः लोगों को शीघ्रतर विश्वास
'आता है। कहा भी है कि "घर का जोगी जोगड़ा, बाहर का जोगी
सिद्ध" । देखिये, डाक्टर वेल साहिब ने दुनिया का इतिहास
लिखा है। उसका हिन्दी अनुवाद भी पुस्तकाकार छपा है। उसमें
से जगत अनादि होने के सम्बन्ध का लेख यहाँ अक्षरशः उद्धृत्त
किया जाता है.
"यह सर्वसम्मत सिद्धान्त है कि जिस विश्व में हम
रहते हैं, यह युग-युगान्तरों से और संभवतः अनादिकाल
से एमा ही चला पाता है, विश्व को 2 या सात
हजार वर्ष का पुराना मानने का सिद्धान्त अब सर्वथा
मिथ्या मिद्ध हो चुका है।"

। मियो ! यदि यह एक ही प्रमाग की अनादिमिति में सन प्रमाग,नयादिमागने का प्रयन मी मग अलगत किया जायेगा। जैन धर्म प्रान मागीन बतन्त्र प्रमिा मनोमी:म नाग्निक वान अनंत मग विमान मन न मांग की काना माना का निबाना माना नानिक भंटा जानने की नाम वियपरवडीसामी गोली मां, यही नहीं निमी पापानी नामानि पान या प्रमा चार मायामा । म:म किया मम्पmन प्राय पानं अभिमानामा म का नराग, नयमात मानमरममा पिन : म अयान करना मन म- मया .tam नमन अपमान मय पार मात पाना न ममनन मनपस T11111 मनाना मामान tataria मात्र यामत नMARi8.1 सान: 11:44"': NP mमarriम.ममा 17 स1.4-1..14in TE 74...+14

१, स्वतन्त्र धर्म है, किसी की शाखा नहीं । देखिय, श्री वरदाकांत
मुख्योपाध्याय गम० ० महाल लिखते हैं कि-"जैनधर्म
हिन्दुधर्म से सर्वथा स्वतन्त्र है, उसकी शाखा वा रूपान्तर
नहीं है । पार्श्वनाथजी जैनधर्म का आदि प्रचारक नहीं
था, परन्तु इसका प्रथम प्रचार पभदेवनी ने किया था"
लीजिये एक और प्रबंल प्रमाण-~-श्रीयुत तुकारामकृष्णा शर्मा
भट्ट बी० ए० पी०ीम पार १० एम एम ए.
एम. पी. एम. जो सो एम प्रोफेसर मयत शिलालेखादिक
विषयों के अध्यापक कोन्स पालंज पनारम के दशम वार्षिकोत्सव
पर दिये व्याख्यान में कहते हैं कि सबसे पहिले इस
भारतवर्ष में अपभदेव नाम के महर्षि उत्पन हुए,
दयावान, भद्रपरिणामी पहले तीर्धकार हुए"। ति जैनधर्म
को स्वतन्त्र मिशि।
इतने प्रवल प्रमाण होने पर भी जो हमनधर्मको चौर
भा में निकला या पौरभ को शापाने, या मया
अपनी बात पर मूर्खता का परिचय देने का विषय
भी बड़ा पापमपर बल , विद्वानों है गार
प्रकट करना पनि
r: { པཔཱ ཙ
पमा ग्री: नाशेन ग
"यह सही नगद प्रमाणित हो गुफा है कि जैनधर्ग
चे

बाद-धर्म की गागा नहीं है।"
श्रीतुन पामय नगा याय पोहा (Baroda)
भगटीग मा नं: टमाटा कहने जनधर्म बाँदधमं
में निरूला वा नहीं, उमरा उहब मन्त्र होने में उमनं
चांदरम में कुछ निया मी नहीं ।"
मान्य मामम्मायामायं यामी गमगी
जीने व्याग्यान में बन r-"जनमन गृष्टि की
आदि मे अगर अपिहिन चला आया है, जनमत में
बाद
मिदान्न का
अर्मान प्राममान का अंदा"
": अनेक. मग मनाम का सामना, आत
होनस श्रीराम की
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मागमनमा
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.

धर्मपली श्रीमती मरुदेवी की फूख से प्रथम तीर्थकर जन्मे । जिनका नाम श्री ऋपभदेव जी प्रसिद्ध हुमा, और जिनफा भारतवर्ष में सबसे प्रथम महर्पि होना श्रीयुत तुकाराम कृष्ण के लेख से ऊपर सिद्ध कर आये हैं। आज से २५३८ वर्ष पहले २४ वें अंतिम तीर्थंकर श्रीमान् महावीर भगवान् क्षत्रीकुंड नाम नगर में राजा सिद्धार्थ की धर्मपत्नी श्रीमती त्रिशलादेवी को फूख से जन्मे और ३० वर्ष पर्यन्त गृहवास के पीछे मुनिदीक्षा धारणकर, "अवश्यमेव भोक्तव्य कृतकर्म शुभाशुभम्" इस नीति के अनुसार घोर तपस्या कर घाती कर्मों का तय कर फेवलज्ञान-ब्रह्मासान को प्राप्त कर और अनेक जीवों के उपकार के लिये मुक्ति के सत्यमार्ग का उपदेश देणार अाज से २४६६ वर्ष पहले पाधापुरी में जन्म मरणादि दुःखों से रहित हो, सचिदानंद अनन्त मुखमय गुफायस्था को प्राप्त हुए। भी महावीर भगवान के निर्वाण से २० वर्ष पहले २३ में तीर्थकर भी पार्श्वनाथ भगवान् १०० वर्ष की आयु पूर्ण कर मोक्ष गये। इनकी जन्म नगरी बनारम, पिता का नाम राना पश्वसन, माता का नाम श्रीमती यामायी था। सी पार्सनाथ भगवान के निर्धारण से ५० वर्ष पहले बतीर्थकर भीनेमिनाथ भगवान बो बोरा महाराज मेरे भाई थे. एक हजार वर्ष का मामुप्यपूर्ण कर नियरिणाम (मुनि) को प्राप्त हुए । इनका जन्म नगर गौरीपुर, पिया राजा

নান, মামা এমন বিশ্ব খা।
মা (মুন : Aা * সমান আর মা
ল বন কলকি খান লিণা, পান না
মন শব্দ। যা স্বল নয়া পাশ মাল । পিল
}, না পায়
কাম ? না খাত
মান হন। নাম হল যা । মৃধা, মন
বা বা শসা, ৪ স খ ন * rি
तोकान की गंधकाम।
প্র ম য ন না গাধা? কি খাবার
মান ও আ স খাল পাম প্লানো বা
পান দু'প, পুষ্টি, প্রসাধন n.
নঃ-
শয় ৫ নমঃ খ্য, মৃ মন গল গান
iHi ! দ খাব ???
মন ( এমন মনস' মূস য'। '
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+

( ७ )
अग्निभूति, सुधर्मा स्वामी प्रमुख ११ गणधर विद्वतशिरोमणि
जैनशासन के महारथी हुए। इनके पीछे दशकालिक सूत्र के
कर्ता आर्य श्रीशम्यंभव और नियुक्तिकारक श्रीभद्रबाहुस्वामी
पंचम श्रुतकेवली परम चिल्यात हुए हैं ।
श्रीसिझसेनदिवाकर-परमकाव्य कुशल और शक्तिशाली,
'कल्याण मन्दिर स्तोत्र महाकाव्य के पाठ में श्री पार्श्वनाथ भगवान
की मूर्ति पृथ्वीतल से प्रकट करनेवाले महाराजाधिराज विक्रम के
समय में हुए । सर्वोच्चकोटि का 'सम्मति तर्क नाम शास्त्र
रचकर जैनन्यायशास्त्र की प्रगति की है।
श्रीमलवादी-गजा शिलादित्य के गम में बौद्धों को
पराजय कर जयपताका प्राप्त करनेवाले
श्रीमानतुंगावार्य-श्री शादीश्वर भगवान की 'भक्तामर'
काव्यों द्वारा स्तुति कर निगह बन्धनों में निमुग हो जैनशामन
कोहिमा करनेवाल. मयार स्लोजकता।
धोनभयदेवरि-गवर्णगटीकाकार और जयनिया
स्नोजकता।
श्रीधादिदेवदार-मोनिया र दिपनार्य श्री
फुमुदचन्द्र पर विजय पाया।
कालेकालला श्री मनमानायगुर नश भी
कुमारपान प्रोभा. गोगा जित मात्र,
व्यापारमा न्याय काय mata in ents
प्रायः मम मियाँ र नेद म प मा; मन र

माग मान्य कमनवाल।
धीग्मिटमार-महातप्रम या प्राचार्य, प्रयों के
पनं वाल. पायकत्र यमकमा बी टीका और
मानांममुग्नय प्रादि कर्ना।
प्रीरिजमहीमार-मुगन मम्राट अशर को निकाय
परतिमा गुडान काले जननीयों की रमा और पावित्रों में पर
(T.13 ) नमन शरमाना करने वाल मानना
মাথা ব্যাথা পাপ - ম
मिनामी म मकाा न बाया. कहा
ग्माणामीअनवाया गया।
मानिधि विजयादार याममात्रीमती
राम मदनयंत या ना मात्र कमरमर
invitri -
धीमजिपाननगर । श्रीमान्मागमही महागा।
यामा भन76444म' प्रम:
......
1.नयंग्य Enam
.
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Marat
4.4.
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..
.
.

Ft.PHP----
(६)
श्री आत्मारामजी महाराज का शुभजन्म विक्रमसम्बत
१८६४ (गुजराती १८६३) महा मंगलकारी चैत्र शुदी १ के दिन
श्रीमान गणेशचन्द कपूर क्षत्रिय कुल में श्रीमती रूपादेवी माता
की
कुख से जीरा (जिला फीरोजपुर, पंजाब ) के पास लहरा
गांव में हुया। इनके पिता के परम मित्र लाला जोधामल ओसवाल
जीरा में एक प्रतिष्ठित और ऋद्धिबृद्धिसम्पन्न श्रावक रहते
थे। व्यावहारिक शिक्षण के लिये इनके पिता ने इस बालक
को छोटी ही अवस्था में लाला जोधामल के पास छोड़ दिया।
जिन्होंने अपने पुत्रों के समान इनका पालन पोपण किया। ममय
समय पर हडिये साधुषों का जीरा में आगमन हुआ करता था।
लाला जोधामल आदि की संगति से वाह भी उन साधुत्रों के
पास जाने लगे, पदने लागे, समयान्तर में नहीं हटियें साधुओं
का पेला बनने की प्रबल इचहा प्रकट की, माता का विरोध होने
पर उसे समझा बुझाकर सम्बत १६१० (अनुमान १६ यप की
चदती युवावस्था) में श्री जीवनगल जी दिन माधु फल चने
हडिगों को सम्प्रदाय के माने ३२ शास्त्रों का पूर्व पाचपन
करने के बाद सनी के अयों को तुलना करने पर इन्हें त्रियों
के प्रताये और व्यापारपारा फिरे पयों में यह ar
मालग होने लगा पयोंकि यावरा शा भरार हो
सालिया। गोच.--
यद्यपि या नाभीचे तदपि पठ पुत्र प्यावरणम् ।
वजन घननी माग मफलं गाना गान् !!
।

. अपने गुर नथा उम ममय * मृव्य हटिय मायुत्रों को कहाफिजनगानी में मन्दिा, प्रतिमा पजादि मिट होते है। मंडपनि ने डोग डालकर दिन गन में सिमना कहीं नही निमा गुनिमिन गधि की तुम पानी क्यो नही मतं, त्यात प्रगानीका ममान नाशिमीने या करना था. गुन न टीन में या निमम और ना की धमनिया दिनी गुरु कर दी। कीनी नग नम में समान और मयामा गभग था। विनोको पावन का मंकाम, पिनः पुनः नगर प्रनिहन्यमानाः प्राग्यममम- जना न परियलि। पव्यय अनुमार देगा कर रहा या भमानी शासक गायिक वान मा की मिमि म का वर. प. R" मयनया 44 म मागमा azत । दन 47 मिय मम-1 RIVE 14.1 मटा'Emirate it'.. hui.a2' " मा -KA-Naren.netmaitwanorammarruattraimittance .-...--------- .AN Arrh...In विरोधियों के उपद्रव सहन करते करते मारवाड़ प्रादि देशों में सत्य जैनधर्म का प्रचार करते हुए आप अहमदावाद (गुजरात) में पहुँचे। यहाँ सब सम्प्रदायों के साधुओं से सत्य की तलाश में मिलते रहे, अविछिन्न परंपरागत श्रीमद् बुद्धिविजय जी गणी के दर्शन कर जो पड़े वैरागी और साधुगुणसम्पन्न थे, बहुन प्रसन्न हुए और इनके ही पास मूर्तिपूजक संवेगमत को दीक्षा अपने सहचारी इंडिये साधुओं के माथ अंगीकार की । गुरू बुद्धिविजयजी ने श्रापका नाम अानन्दविजय रक्या और विशनचंद आदि के नाम श्रीलक्ष्मीविजय जी मादि रक्खे। कालान्तर में देशदेशान्तर में परिभ्रमण कर वीसिद्धाचल शादि अनेक तायी की यात्रा की। स्वमत परमत शास्त्रों के पारंगत बर्षे भारी विज्ञान प्रसिद्ध हुए। अपनी मनोहरवागी द्वारा पीपभाग- व्यायान से जनसमूह गुप्त करने रहे। पापके बुनियेगव और मगायोग की तुलना करनेवाला न्य कोई समाज में न दनकर भारत के समस्त नंगन एक विना होकर हजाग जनों के समन श्रीगिमाची नोय की दया में पाहनाना नगर में पाको संयम १९५६ मंगमिमादि पंचीको न्यायाम्भो।नधि जैनाचार्य श्रीमद विजयानंद गरि माम में अगापित किया सामान्य यान गयो Mantt पापान पर पाये, हा पान करने और मनायो ? Ari. मानी जाने में । र म

।
( )
प्रमानिमिग्माकर, नानियत्रामाद प्रादि कई प्रन्य हिन्दी
শাবা মণ fা বানায়াশা দুমান ঘি
जिन मायादी, गुजगी, पंजायी, पूर्वी प्रादि अंक मांग
पदका बाहुन माम प्रान कर गई। क पायान्य विज्ञान
हामटर मागमाननानकचं प्रन्यों की रानकी प्रशंमा
मी उद्गार प्रकट यि, यामी पुम्नक श्री प्रामानंद
अमन के पटनंट में धमोट L में
समारी नहीं. जन्य अनेक विद्वानों ने भी मी प्रांगा
पीपायम क मायामी महात्मा का अभिवाय लिग
का यह विषय याही गमत का ?, या
मनुयायी मात्र, गजामहागात्री की ममानों में
in. योग वानर म्यामा
म" ने न ममा के पास पान.
HEEL का पदका प्रा प्रामारामती महाग
२'म या था, हम यह
मालकाने-
मन मान पण कमल "मना अंक
प्रतापय EntTी
AIR मन्ना
13 iran"
पामाम मन्यामी
घ. */17
,
भान....
40-4समा 144 मा.-'
,

पड़ा कि मानो एक जगन छोड़ के दुसरं जगत् म मान तड़े हो
गये ओ आचाल्यकाल सात वर्ष से जामध्यरत करा
वो वैदिक धर्म बांध फिरा सो व्यर्थमा माल्म होने लगा नतत्वा-
दर्श वो म्पशानतिमिरभारकर एन योनो प्रथों को नमन गनि
दिव मनन फरता बैठा, बोथकार की प्रशंसा वाला बठिन्डे
में बैठा हूँ। सेतुपनगा रामेश्वर यात्रामे प्रय मैं ने न देना चला
है परन्तु पत्र मेरी ऐसीपमामान्य महनी इतनमना रही
६ फिकिसी प्रकार से भीक घार मापन गमनागम को
परस्पर संदशनहोसायतो में परमानहात्मन
एन सन्यासी मा गोपालमदारा जो
समाविशयीहोकेसमा माग गतिकमाय
( १३ )
साधनांश होता है कि राजे लोग जानते समझते हैं फलाना पुरुष
घड़ा भारी विद्वान है परन्तु आत्मा को क्या लाभ हो सकता
देखा तो कुछ भी नहीं । आज प्रसंगवस रेलगाड़ी से उतर के
बठिंडा राधाकृष्णमंदिर में बहुत दूर से धान के डेरा किया था मो
एक जैनशिप्य के हाथ दो पुस्तक देखे तो जो लोग (दो चार
अच्छे विद्वान जो मुझसे मिलने पाये ) कहने लगे कि यह
नास्तिक (जैन) ग्रंथ है इसे नहीं देखना चाहिग अंत उनका
मूर्खपणा उनके गले उतार के निरपेक्ष बुद्धि के द्वारा विचारपूर्वक
जो देखा तो यो लेख इतना सत्य वो निष्पक्षपाती लेख मुझे देत
पाप ने जिले को यो
RATE

- मममतं वो जानते हैं, परन्तु हम्म मागुम पागमान गुम माना का धन नहीं। मात्र में मार पामना मात्र हा का मरता प्राचीन धर्म पान धन সব গম सन नामाशिममा नमकान की यह धन की Par: वो मां भयं यं पग्नु पगात पन्य हो या पाटिनाटन गरि बागवामी मानगो में ननना पग:म मनही महिनायत्र auntiirनहींनी मात्रा मग पुननियमनमानी र न मम कालानन ममी। नन्दमान- मागानुगामी दिनमाननिः नारदाना नः । রিসাদবাবধান: পরিবার : पास्यायी पलानानना नानीनपनतः। রাধা বদনাদাদাদরদপ ॥ T- 4.45amir REET" म.ar Prad... "म नरमपमा 11.rian-मा. 92.4rst' .4 4 ( १५ ) पाशातीत इस काव्य के ७२ अर्ध करके काव्यकर्ता की विद्वत्ता और काव्यकुशलता को प्रकट करने के अतिरिक्त अपने बुद्धि- चैभव का परिचय देते हुए साहित्यसेवा और स्व-पर परिश्रम को समल किया। परन्तु यह भी अप्रकाशित दशा में पड़ा रहने में किया परिश्रम भी तत्काल मफल न हो सका। काव्यकर्ता और अर्थकर्ता दोनों विद्वानों के परिश्रम को सफल करने के लिए इनकी समम कृति को "श्री प्रात्मानंदवामातति" नाम पुस्तक के रूप में छपवाकर प्रकट किया जाता है, इसके छपवाने का सारा श्रेय जैनधर्मप्रभावक न्य-परमतनिष्णात जैनाचार्य श्रीमद्विजयानंद सूरीश्वरजी के पहशर वर्गमान जैनाचार्य श्रीमद्विजयवल्लभमूरिती को है, जिन्होंने शहर अम्बाला निवासी सदगा लाला लालचन्द जैग नगर की धर्मपत्नी सुधायिका सदगत श्रीमती द्रोपदी प्रमिस नाम महाग वाई के फंड के द्रस्टियों में उपदेश द्वारा साधिक मामला दिलाने में सुप्रगान किया है, समय आपको पौर हटियों को भयाद दिया जाना है। नम निवेदन किस पर करवाने का मुकार्य मुग. मापा गया था ! 'एडा भाग मंग भानुमग्धिनि में दा है। नामादि का ध्यान न नोमी दृष्टिदोष या मन्त्रालय की मूल में गदि काही प्रशासन गो पाठफ मोटा सुधारने की या करें। पिERe-- देहली-41. *ཀry ཝཱ་༔

प्राथमिक नम्र निवेदन
मंत्रा में निरंतन महा प्रयाला की नममा नाम
मनानी मुवनाश्य योगामानुगामी माध्यमाय:म अभिवाय का
मिमाशिमपाल्य प्रतिक मानिक जिन भी अयं ।
मो. नालिय में प्रयन रीर पर भागमा कतिपय
प्रेमी मित्र मान में ए ममरम कार्य में न
पा, गुरजनों की कग और मित्रों की मनमानाची में
न धर्म या महामा श्रीमान नाम मात्रा मने
व" अयं मंगान बग्न में गरम प्रारजहाँ
की दया नही मान जन मांगी
मारपानी ध्यान रानाने की।
गन्दनः मिलन कापि भाग्यरत्रमादनः ।
हन्ति मनाना ममादपनि माजनाः ।।
श्रमकामा श्रीमा
गनीमत्रोवनी: ini नानी
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मात्र श्री श्रम मित्र
पियनमकीनयान में।"
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नमः श्री परमात्मने
जैन जयति शासनम् ।।
श्री आत्मानन्दद्वासप्ततिः॥
तत्रादी मंगलाचरणम् ॥
राधेशो राधिकाधीशं वैजनाथी मुदा स्मरन ।
योगाभोगेति काव्यम्य, व्याख्यां वितनुतेश्मलाम ।।
अथेदानीमारभ्यते "योगाभोग" इत्यादिमालावन्ध-
काव्यस्य व्याख्यानसन्दर्भेऽखोंधोगप्रयोगः ।
योगाभोगानुगानी हिजभजनजनिःशारदारक्तिरको।
दिग्जेताजेतृजेतामनिनुतिगतिभिः जिनोजिजितः
जीयामायादगात्री बलयलदलनोलोललीलस्वतनः।
केदारोदास्यदारी विमलमजुमदोहामभामममाः ॥३॥

সাধ মায়াসে। "योगामागानुगामी" इत्यादिविमिन्नविशेषगान्मानि সমানানি হল বিন নুন যা “যা” যদি faখলে মালালা মি: । সুমারি-মার্মাগানদী না যায় গানা- দ: প্রধান ধর্ম: লালন মালা নঃ মানার ‘গাম' সবাশ্বালাম সামদানি , ॥থবাসে। পথ- যায়: খ গ্যালামাল । খাগ:থান গগলা যায়: শিং:: {}" বগৰি ৰামাল বিসিবিপি যশোচা সমাধান: } ধারনা বা মা মুনিমর্ম:। মনসামা রানা না থা: {{নি এ পা : শিশুর নিবাস যথা ললনানা পর্ন দাবি: : লি: ক াে?** तस्य योगस्य-श्राभोगः परिपूर्णत्वं त्रुटिरहित्यमितियावत् "आभोगःपरिपूर्णता" इत्यमरः इतियोगाभोगस्तस्मै- योगाभोगाय अनुक्रमेण गच्छति-उत्तरोत्तरं याति इत्येवं शीलं यस्याऽसौ योगाभोगानुगामी गुरूपदिष्टमार्गेण क्रमा- घोगपत्य-उद्युञान इति भावः । क्रमश्चापि तत्रैवं दर्शितो योगविद्भिर्महर्षिभिः- "पूर्वसेवा तु योगस्य गुरुदेवादिपूजनम् ।। सदाचारस्तपोमुक्त्यवेपश्चति प्रकीर्तिताः ॥१॥ यागमेनानुगानेन ध्यानाभ्यासरसेन न ॥ विधा प्रकल्पयन्प्रज्ञां लभते योगमुत्तमम् ॥२॥" इत्यादि ननु किमर्थोऽयमुधोगोऽस्य महात्मनो योगम्प्रति यतः "प्रयोजनमनुद्दिश्य मन्दोऽपि न प्रवर्तते न्यारावास प्रतः फलमपहिब प्रदर्यते यथाशाख । नद्यथा-- "इहापि लघयश्चिनाः परन च महादयः ।। परात्मायत्तताप योगकल्पतरोपलम् ।।३।। अपि राणि कमाणि नातायोगः विलोनि हि ॥ ज्वलनोज्यालयत्येव फुटिलानपि पादपान् ॥४॥ नमा जन्मवीजान्निजरमोऽपि जापरः || दुमानां गजपमा मपान गुरुवाहनः 1114 उगटीमवन्ति नानगानि मन्मयाम्नागि मया ।। योगवमान चिन नपछिटरुगण्यपि ॥६॥ अदनिंगमपि ध्यानं यांग व्यनरद्वयम् ।। अगाय पापानां धूय बजार्गनायने ॥७" न्याटि-अलनिरिम्नांग। जीयान- मकरंगायनाम-योगमार्गन्निगपभूनानिन বাৰিষাবালি মাখানি লবননা प.नमाग्यानि च मम्मान्यामम्माव्यापि पगप सिंदर मापार वान्याटनम प्यानं नमनन्यमिमान्यः क- भूनानी-बिजमजान जनिः-दाम्यां जन्मगंमागम्यां जापनं नजा:~प्रागनियांग्या ल्ययः, " हिमानी मादमी" व्यतः "पचम्पामाती" नि : पर: टियाला: "डिज यादमागसपटलावर ना" ৭ ননো। নানান। এরন না: 'মরান आमादातामार यूट, दागिना मागाति माय दय जिनान निम पण गतिमनना, "नम्नम:" मा, मिनामा माग कमगान मामात् । सागामागानमामिला र लिदा लाभ न वामन:-मराहात.

सरस्वती वागधिष्ठात्रीदेवी-शरदृतीपूज्यत्वाच्छारदा आश्विनो मासः शरहताव गएयते तत्पूर्णिमाया एव शरत्पूर्णिमाऽभिधानात्-तस्मिन्नेव मासि नवरात्राऽवसरे दुर्गापूजा तन्त्रशास्त्रैः सुविशेषतया प्रत्यपादि दुर्गानाम भगवती, महाकाली,महालक्ष्मी, महासरस्वती-इति त्रिनाम- रूपात्मिका त्रिगुणात्मिका शक्तिस्तेषु दिनेषु महारान्यादी विभिन्नरुपकरण विभिन्नेन च विधानेन विभिन्नास्वर तिधिपु पूज्यते । तत्पूजनात्यानपरं वचनन्तु- "मूलेनाबाहयेदेवी श्रवणेन विसर्जयेन्" इति, तथा च शब्दकल्पद्रुमे शारदाशब्दनिरुक्तिः- "शरत्काले पुरा यस्मानवम्यां योधिना सुरैः । शारदेति समाख्यातापीठे लोक च नामतः॥१॥ तस्यां रनिरनुगगः-प्रेम इतियावत. रज रागे इत्यस्माद् भावे तिन , नया रक्ताः परिप्लुतो भावित इति भावः । इजरागे इत्यन एक कमगिनागनदेय वीजं पूर्वोनो-. पपत्ती। पुनःकभनी दिन्ना...दिशां जयस्य कना-तत- दिशामस्थिना में मिसनमागृहापोहसम्पादपिया मनापा नापतीनां प्रमारानमेवादियदापोनाकम नपान. जन नाविनमागमन प्राषिता, ननुहादि- যাথা শশানা তিশা ..

विद्याश्रयन्याटिन नादगिकाव्यमयात्र वाच्यः "न: क्रोन्नि" निवन। मग्प्यन्याः प्रामवादियाम्यामव्यमनियम्मिश्री बादमिदमर नयबाहिन्यनपत्यम्य पम- प्रानति न कम्यापि नागारमायः॥ पुनःकयंभूतः-डता, जगन्नानि ता:-तिपाद पगमयति प्रमा जना, योगायटयांक पर-वि घात:मवार गलती इत्यनेन च । ना गं মূত্র ত্যানা বা দাৰিবা। पुनः रथंभूतः-मलाम्पटनायगान मामानं गति:- काम:-मनितिगतिमिः-मननं मतिः यदिः "पदिनी पावित चीमा नामांत:" यमर-नानं दिः नति: "प्ता मात्र नुति: नति" ममा, गमनं गति मार मदतान पापागामवाय विदा । यम-दिमाग रण मतदार र: प्रान्तम दिया पनन ममार पEEPटायर टप ram rare. अादन irrity निदादं.

. . इति यावत् (पहुँच इति भाषा) "गुजर "इत्यर्दू भाषा । यथा च महाकाव्ये रघुवंशे कालिदासः- "अथवा कृतवारद्वारे वंशेऽस्मिन् पूर्वसरिभिः । मणी वजसमुत्कीर्णे सूत्रस्येवास्ति मे गतिः" ।। ताभिःपूजितः । कैः (पूजितः) जिप्णुजिहः जयन्ति इत्येवं शीलं यासां ता जिप्णयः "जि जय" इत्यस्माद्धातोः ग्लाजिस्थश्च स्नुः" इत्यनेन रस्नुः "लशक्वतद्धिते" इति गकारस्येत्वम् गित्वाद्गुणाभावः "सादेशप्रत्यययोः" इति सस्य पत्वम् "टुना प्टुः" इति नस्य णः-जिप्पयो जिला येपांतर्जिप्णुजिहः पूर्वस्मिन् विशेपणे ये जेतृत्येनाभिहिताः त एव जिप्णुजिल्हास्तद्-व्यापारेणैव तेषां जेवत्यसिद्धः सहवात् तावत्कालपर्यन्तन्तु तेषामेव जेतृत्वप्रसिद्धिन्वारन साम्प्रतञ्च नेऽविरुवशुदद्व्यवहारमचारसन्तुष्टाःतद्गुणगरण- परिगुधारतरस्नेहगेहाभिरमणाचरणाः सन्तोऽन्य महात्मनः स्वाभाविकगुणरेयावजितमात्मानं मन्यमानास्ताभिरेव जिप्युजिताभिः स्तोतुमारभयन्तां । गत:--- "गुमाः पूजास्थानं गुणिषु न नलिनन नमः ।। m infम्न मापन किसान पर कदा लग्न न पुनपनि गतिमा न्यत थाहारंग नगंस्यं यदनेन ने विमानिता मवेयुरिनि, नपाका অহিশায়ণপত্নসন্ধান, পথচলশানদানথি হিন- যা গাল ন্যা। মূলঃমূলযাযাথা,বিসানায় গমন বিধিনিষাদ-নি অনালি ৰায়ঃ- বন্যা:-~রানা, স্থা। "শদ, “যাণ সমি গাধা বলবিনা। গা য়ের কল’ ‘বাবলম্বীন, “গ্রাণী লাঠি ণ না। না খায়না ন্যা-গণিকা-ঘাষণা যাকান নির্না” নেন নি পান ৯। গান: সদাগাস্যা সানির নাম থানা ন্য নাস্তা, দয়া । প্রতিমা দালা, গালাগালি । नाः नानापन लगा सपने माँ गंगा দী ও নাসা। 'সন। " । । । ন যুগৰ পা নন : নিশা ধ ন প ন ** ** * লা বা ?

पितुः सम्पत्तौ पुत्राधिकारदर्शनात् , पुत्राद्यर्जितद्रव्यनिचयेऽ- पि पित्राधिकारसम्भवाच । तथा श्रुतिः-'पुत्रेण लोकं तरति' इति भाग्यकारःपतञ्जलिरपि व्याकरणा- ऽऽध्ययनफलोपदेशे- 'यश्चैनमधीते यश्चैनमध्यापयति, मातापितरी चास्य स्वर्गेलोके महीयेते' इति! महाकविःकाली- दासोऽपि-'सन्ततिः शुद्धवंश्या हि, परत्रेह च शर्मणे इति । पुनरपि यथा-- "पुन्नाम्नी नरकाद्यस्मारिपतरं जायते मुतः--तस्मात्पुत्र इति प्रोक्तः स्वयमेव स्वयम्भुवा" किम्पुनर्वक्तव्यं यदीदृशः मुनपाः सर्वतोगीतकीर्तिः सुपुत्रः स्यात् । अत अर्ध्वमपि महासत्वस्यास्य मुतरामूर्ध्वरेतस्न्यात् सन्ततेरनुत्पादनात् सदायादयात्रा (वंशपरम्परा) एतदवधिकैवेति न दुर्विभा- व्योऽयं विपयः कस्यापि चननावतः । अतः मुतगं घटते दायादगानोतिविशेषगमस्मिन्महाभागे। पुनः कथंभूतः बलबलदलनः, खला:-~-दुर्जनाः, "पिशुने दुर्जनःखलः' इत्यमरः, नेपां पलानां बलम्-~~ सामथ्र्य सैन्यं पा.-"मधील्यमामध्यसैन्य बलं नाकाक- मीरियो" इत्यमरः । तनु सलबलं दलनि-विदाम्यनि- इनि लाल दलनः "दल वितरीत्यती गौमादिकान ‘নবিয়াবাগো নি:নেন যুগ “খুলা মেলল খাবলাম, খ্রিসাদমান বিমাঃম্বোনিধান্য প্রমাণিতানের- সামর্শঃনা ৰিমাণায় বল বিলাে শাদার, इनि मायः नयाचीन.--- মা: ক য ন হি হিনি। নিপল ঘনিলা খা: মা ঘৰ৷ নি বােধি লিনিন নি। বৃহ:বগমূল-পালন্দালন, লালা:-গর- লাশবা নন; যাি;--ৰি লাশনাল “সালা মি: লিলাশন না" বাবগ, ব্যানানানা: সাল্প লবণ লাললললল:. বর প্রায় গান-না আনমনালেন বসল । ধান-~~ঘাগ প্লাশ। নামান পরব শামানানস ন • : ফিন্যাসমান শালাৰ ??" * না। এমতাবৃনমঃ । ":" • দ।' .

( ११ ) "त केदारः इदं शरीरमेव, 'इदं शरीरं कौन्तेयक्षेत्रमित्यभिधीयते इति श्रीमद्भागवद्गीतायाम् श्रीमुखत एवाभिधानात्, तस्मिन्केदारे यदादास्यम् उदासीनता-वैराग्यम्मनोयोगाभाव इति यावत्, केदारीदास्यं सांसारिकभोगहेतुत्वादस्मिञ्चरीरे एव यन्धनकारणदृप्प्यात्रानवधानम्-तस्य केदारोदास्वस्य दारो(आदरो) यस्यास्तीति असौ-केदारोदास्यदारी, दरणं- दार: -भाने पञ्, “हङ् यादरे इत्यस्य पनि रूपम्, इनि" इत्यनेनेनिः, स्वशरीरसझाव एवं पूर्वजन्मनि मोत- स्यासाधकत्वाल्लज्जावहोऽतोऽस्मिन् जन्मनि तत्पालनपो- पणयोरनवहितत्वमेवाद्रियत इति भावः ।। पुनःकथंभूतो-विमलमधुमदोहामधामप्रमत्तः-- विमलम्-निर्मलं-मलरहितम्, शरीरमलेन यद्वा स्वाभाविक- सौम्यतया क्रोधादिजन्यः पित्तादिनिकारश्चापि रहितं यन्मधु-मातुः क्षीरम् “मधु चौद्रे जले हारे मने पुष्परसे मधु, दैन्ये चने बसन्त च" इति विश्वमंदिन्यो । नदिम- लमधु तस्मिन्-चिमलमनि की मदः वीर्यम्. "महो रतसि कम्तयाँ गएँ भदानयोः" इति मेदिनी ।। पसौ विमलमधुमदः, यथा मातःचारऽपि वीर्य निग्रमेय तिति तथाऽनेनाऽपि गर्दा निगदमेव रसित सामानये- नातम्तम्प विमलममदस्य बहामन्याहर धाम-गस्नाति मलमभूमदोशामधाम सामने -- च नजोमन्टिग्जन्ममु" इनि विश्वः । नन विमलमधुमदोडा- मधाम्ना प्रमनः-प्रमुदिनी, "मटि म्नुतिमादमदम्यमकान्नि. गनिए"-टन्यम्माकनरिक्तः प्रहाष्टः मन-बीयादिन्यनंनाच. यः । १६ मनु काव्याला कीटक मुशामना मगिगश्रिता, योगानुगामिन् द्विजादयत्वं चीतम , नन एव पियानुगग- म्नतम्य दिनुवं क्रमागतमा नत्रा:पि जन्जयोग्यांदसाग- नम्नतन्य जिगुजिद : नं पूजनं ममारमिदमर लीके मन्ननिप्रगंमाश्रयमाहापाटानां नियुनिः पन्नालदलनच युगपदा गमपादिपानाम, एतापर्यन्नन्तु पहनामित সন; অল: বনাননামানেলাল্লালালালা रंग:नाग्र गर्ग गिमायापि पग्लास्गाधनं नाग मिवियामप्रानिः, न्यूनगनगमम्मदः गालाममनितरि- य पदाग्यमानापि माला-महिव्याचीनि नाति किमपिगमलाम, अधर मामान्याना नकिमरिपरि पितं तेन पिडा नथापि युधजनदियटाध्यागनमन ন বন ধারাব ( হল বৰলাগা: एम्मानि ति ) नागनं गायिन ययाति यथा मंत्र न पनि । न जिनानां पाकटासमंग गति मापदम्मालगायी मगमन्या समाय म: । अयाय पधगम, नटमा यथा- 'प्रपना त निता माग कालिम - ।

.. ( १३ ) प्रोजो गुणः, "ओजश्चित्तस्य विस्ताररूपं दीप्तत्वमुच्यते, वीरवीभत्सरौद्रेपु क्रमेणाधिक्यमस्य तु" इति तल्लक्षणात् अत्रापि वीरादयः शब्दा उपलक्षणानि तेन वीराभासादावप्य- स्यावस्थितिरिति दर्पणकृत् । अत्र तु "दिग्जेता जेतजेता" इत्यादि शब्दैवीरोरसः साक्षाज्जागरूकन्वेन दृष्टिपथमवतर- ति । ततश्चश्लेपःसमाधिरौदार्य प्रसादश्चतिगुणचतुष्टय- मपि निर्विवादसिद्धमेवान लभ्यते-तस्योजस्येवान्तर्भागात् । उक्तञ्चैतत्- "श्लेपःसमाधिरौदार्य प्रसाद इति ये पुनः । गुणाश्चिरन्तनरुक्ता योजस्यन्तर्भवन्ति ते ।।" चित्ररलेपावलारी, शब्दालारंप चित्रोऽलझारः, श्लोकाक्षराणां मालाऽकृतेर्हेतुत्वात् । तल्लक्षणं यथा- "तनिया वर्णानां खझायाकृति तुता" इति काव्य- प्रकाशोऽर्धालझारपु च लपोऽलंकारः सुस्पष्ट एव माहि- त्यदर्पणे- "शिष्टपदैरनेकार्थाऽभिधान संप प्यने । वर्गप्रत्ययलिंगानां प्रत्यययोः पदापि ॥ पाहिभत्तियचनमापायामप्टधा नम:" दी तल्लचणात् । अलंकार समरि गतश्चममाग प्रगान नग्न्यात् । गोरी गतिः, "ममामबहुला गौरी" नि नइदगान् । काम्यानुग्म्य विदयो महती करित्यगानः मुनगं मापनीया, व्युत्पनिः प्रतिमा नापि महताज्या गनर मम्मादिना भटिति नाम्यत्र महायमरः कान्गित्- कचित् कम्पनिदपि । मनि फिनाम्पयन यदयांना. रिचानावासनता प्रतिमानि, समांत्र व्याकग्गे ननद- समिपि गदागप्रत्यंग पग्मितनगननर रवाना- দিনেল নগৰি বাৰাি সামান नागनगांगतामपानि, नाय "मंफना" यया. গানিনি হলি, শামস বাস मिरगति सन्यादि वन परियटा टीदिनार सामान, न मनु गन्दाना मांगिनन, अनार মা গার্য নিতো বনিবনা বিল- गय गरियनं । नरिटलीमाटगाना मराठी कापायी वा मग यादगार: मगमनि । प्रायमर पम्पयनारि गिदम्य रस्टटयनाश्याननंगा पारमयमंटमलाकर সিদ্ধাধা গুলাব গ্যাব বেল मग PETania :: THE Aimire, krishna ( १५. ) जीतने वाले, और सब पर विजय पाने वाली जिन्हाओं वाले विद्वानों से अपनी बुद्धि के अनुसार को हुई स्तुति की धारा से पूजे हुए, अपने वंश की अपने पर ही समाप्ति करने वाले, दुर्जनों के बल को कुचलने वाले, और विलक्षण लीला ( चरित्र ) वाले, और अपनी लजा को अपने हाथ में रखने वाले, कार्य सिद्धि के लिए अपने शरीर की भी परवाह न करने वाले, जन्म से लेकर मरण पर्यन्त वीर्य रक्षा के कारण उत्पन्न हुए तीन तेज से ही मस्त रहने वाले, श्री विजयानन्द सूरि सर्वत्र और सदा - विजयी होत्रं ॥१॥ अथ द्वितीयोऽर्थः द्विजभजनजनिर्योगाभागानुगामी जीयान्-द्विचिन्ने ते द्विजाः । तथा च म्मृतिः- "जन्मना ब्राह्मणों नेयः संस्काराद्विज उच्यते। योगी याज्ञवल्क्योऽपि- "मातुर्यदये जायन्ते द्वितीयं मौखिवन्धनान् । नामरगतियाविशन्नम्मादेन हिलाः स्मृताः" इति ।। नेपा हिलानां भजनार मेवनारीव निः-जन्म यस्य म द्विजमजनजनिः, पाल्ये तु विधान्यानार्थम् मामा- नां गया कना. पालनपोषणाशमविश्वानां, मामतिः धादिमम्पनिम्न र मन्कमापदंशन एय मन्मार्ग गमिताः, नम्मान्मयं जीवनं द्विजमवन एवं न्यन्यायिनमिति मारः। जनिः गटांत्र जीवनपरः प्रादमावस्य नवापि मन्यान् । "मज मंगायाम" नि मात्र न्युट अनाव योगामांगानु- गामी, योग:-मंगनिमल नि यारत,मापि द्विजगह पर मनिन मयं गला गुगादिमिः मह मंगनिरुग्गम् कारिंग मीपसमागजिनामुश्रापकममहन मह मंगतिः-नगग नगर प्रति गमनन नु पंन्यारत की योग उपग- गाणं ममागतमव्यजन: मह परंपधारनको योगः- "जिर योग" ल्यम्माद्वातामा पत्र "चना: धिपाय- नाः" इति माय गमार: "पुगतनश्यम्य " ননামায়। তালাল: স ালাসোনাম: परिपालनम नमश्रित्य गन्यनि-जीनयागा निति ज्यांगीलं यम्य मः-योगामागानुगामी गारंगत ‘ন বালােকাষা:" নি থালাখানা पर अनाकार 'गम्लगती" इत्यनम्नानदीप गिनि , "प्रतापगः" ब्यावराया दिः, अगं मार यालियन मम्या परिगीय पगमश्रित 'म तिः कनी मंग" ति गागात मनानान ाि पारगमगतमनामानिमः दिन मर्म:दमाग, नामामागताना दरणरूपां सेवां विधातु धृतजन्मा यं महात्मा पूर्वस्वयमेव संगतिरूपं योगमनुमृतः । जीयात्-संगतिविघटकविघ्न- सन्दोहरूपं शत्रु निराकृत्य, स्वकर्मणि साफल्यं लभेत इति भावः । तथाकतु विद्वानेव पारयति इत्याकाङ्क्षा- यामाह-कधंभृतःसः-शारदारक्तिरक्त:--विद्यानुरागवान् । पुनः कथंभूतो-दिग्जेता-दिग्विजयी, पुनः कथंभूतो- जेतृजेता-सर्वोत्कृष्टो जेता, पुन कथंभूतो-जिप्णुजिह- मतिनुतिगतिभिः पृजिता--मतिमद्भिर्यथाशक्ति समर्चितः । पुनः कथंभूतो-दायादयात्री-स्वसपिण्डानां चरमा गतिः, पुनः कथंभूतः बलपलदलनः-स्वयोगवल (म्ब संगृहीतशिष्यकोटिबल)दर्शनमात्रेणयोत्सारितखलसमुदायः। पुनः कथंभूतो--लोललीलस्वलजः, सांसारिकचञ्चलविला. गेभ्यः स्वयं लज्जमानः पुनः कथंभूतः-दारोदाम्पहारी, शरीरपरिचर्यायामनवधानवान । पुनः कथंभूतो-विमलमधु- मदोदामधामग्रमत्तः-मातुः क्षीरोद्मृतचीगणैव प्रकटतेज- स्वितां प्राप्त इत्यर्थः, पूर्वव्याख्यातत्यासंक्षिप्ताडिन दर्शितः ॥ भावाश---, जिगयमन मनोमालिनी विद्यापन पाटन सभीपापमोचन निमिया या भिम राशि और परस्पर गरीन दिन मी,

जगत-विजय करने वालों में भी पूर्ण हा, जीनने वालों को भी
जीतने पाने, नया दिगल पर्यन जीतने वाले प्रश्न पत्रों
(यंगरपग पलों ) को भी मिल जाने वाले, दुर्जनों में
ममुदाय
की भी मन करने वाले, पंचम मीनामों में अपने
बार में ही रहने वाले, मागरिक सामानता की चिंता में
:न, प्रसार के नेत मंगहा प्रसन्न नपान, श्री विजयानन्द
गरी मयंत जिय माल को॥॥
प्रयागं
गारमागिरमी योगामांगानुगामी जीगा-
गाग्दा मापती, "गाग्दागी मम्मी" तिषिमाग:
गंगः, मा गाडा बनाम्यति गारदम् “मागहरना"
त्याग, भाग,नम्निमर्गनाः, न गस्तरांमाग मा प्रा.
क्तिग्नुनमातममामः, [ अष्टिमिनिसमा गमागः ] पर.
* पपरी पर चरम माल Rahul
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।

"श्रत क्तिरित्यर्थस्तस्मिन् शारदेऽरक्तिः-शारदारक्तिः, तया शारदारक्तथा रक्तो-रजितः शारदारक्तिरक्तः, शास्त्रा- न्तर्गतगाहम्णा तन्मयतां नीत इति भावः। योगाभोगानुगामी-योगो योगशास्त्रं दर्शनपटकस्यै- काजभूतम् , तस्याऽऽभोगः परिपूर्तिर्योगाभोगस्तस्मै योगा- भोगाय, अनु- समीपं गच्छन्ति ते योगाभोगानुगाः, तेपां योगाभोगानुगानाममो गतिराश्रय इति भावः, असौ योगा- भोगानुगामः, "श्रम गौ" इत्यस्मानावे धन ; मित्वा- नोपधावृद्धिः । सोऽस्यास्तीति योगामांगानुगामी, इनि" इत्यनेनेनिः॥ गोगशास्त्रपिपठिपावतां हद्गतमन्देहनिरसन तत्परिपूर्णतां सम्पादयितुं तेपामाश्रयदातेत्यर्थः । मनेन योगशास्त्रपारगमचमम्मिन च्यञ्जयति कविरतन द्विज- भजनजनिः-द्विजसेवनपरः (द्विजातिरिक्तस्य योगमात्रा- नवगमानदुत्कएटच न सम्ञायते)। द्विजास्तं गुमन्त रन्न त्यतो द्विजानां भजनाय जनिरम्याऽभूत् ।। स च शिजेषु शिप्पल्यवहारेण नान सेयर इन तदर्थ- जन्मा. पहा जलस्थलयोनीराफटपमहारेरा पर माना जनगर । योगशास्त्रेऽनन्यसारयाद दिला, तर जेवजेता-इलादीनि विशेषगानिसमा गजुष्टो योगशाम्यविशेषविज्ञानविद्यानविनान् जीयाद तिरमर्यादिति भावः । शेपम्पूर्ववत् ।। भावार्य साम्पा में अनुपम प्रेम प्रेग के कारण दिनरान स्वयं ही शाब रुप बने हुए होने में योगशाम के पार तक पहुँचे, श्रा य योगशाग्य में गर्म गगमने के लिये प्राय र निजों के गन्देश दूर करने में ही दिन मेया के लिए ही जन्म भारग दिशानी में जय प्राप्त करने वाले, जीना यामी को भी जीतने पाती, और विजयशामी थाणी यानी में भी अपनी मान गुनि गनि के अनुसार पर, अपने पुदम्य यानी की यात्रा के प्राधार, दुना की दुगना को दूर करता यामामारिक पंपस ध्यागम मपम अधिक लमा पार करने वाले, गंगार की बता को मारने वाला, निर्मल प्रयगय पं. गाम पर नजमिनी को मानतीन का याग, श्री गियानन्द गरि विजय हाय ॥ ॥ ग्राम: दिग्ना-नागाल- जा--मगगता गर्थः। "त: पृमान मंग विना मगाने" निधानगान्टे-कापा. तः, न जानाम:-निगराणप्रथामिति मारत "मैं मगनी निगागनाप" मियान ।

( २१ ) राजेन्द्रः, इत्येवं जेधूर्तदमनमित्यर्थः। तच्च शान्तरसेनैव, "अतिशीतलमप्यम्भः किम्भिनत्ति न भूभृतः" इति न्यायेन सूपदेशः स्वदर्शनप्रभावेणेच वा तद्हृदयेषु पश्चा- त्तापऽनुवृत्त्या धिकारणमिति भावः । तजयं तायते--सन्तनोति-विस्तारयति-असो जेता, "ताय सन्तानपालनयोः" इति धातोः कर्त्तरि क्विप, धूर्तदमनकर्ता इत्यर्थः । दिनु सर्वतो दिशाजेता दि- ग्जेता, अतएव योगाभोगानुगामी, योगः---कर्मसु कौशल- मिति वचनात् । योगः कर्मकुशलता, तनयापारपारीण- त्यन्तस्याऽभोगोऽन्यूनत्वं योगाभोगः, तत्र योगाभोगे (फर्तव्यचातुर्यसर्वस्वे ) अनुसादृश्येन गच्छति, सार- श्यं यथायोग्यत्वं जानातीति वा इत्येवंशीलो योगाभोगानु- गामी जीयादुत्कर्पम् भन्नताम् । कर्मम् निपुग्णतया यथा- योग्यव्यवहारपिदेव दिनु मान्सर्यनिराकरिष्णुः प्रभवित सम्भवति, ततश्च स्वत एवाऽपरे नहरागा मपन्ति, तत- स्तेपाअयस्तु करतलागतापलकवद्धस्तगत एप, पतएवाह--- जेवजेता मर्यजेता जेतृणाच सिद्धेऽन्ये सामान्या जनास्त विनायासमेव जिना भवन्ति, इति नचार्थः । ननो जिष्णु- जितरित्यादि गधापूर्व विशेपरवान्यपर्ण विधयमित्य वि- स्तरेण ॥ भाषा-पाक में गमलों धूलों की मोसन ग्म मंडी दयानन कार का मंदार का गरेमी में अग्नी का गाला में पाट करने बाग, इमाम ने बरी विजय वान बा.महामान्मारा मनन करने वाले याविनी में भागमालि Y. मानविमल राना मीमत्र विव সমাx जत्रा गंगामोगानुगामी जीयान- जपतीति जता-यानः, नम्र मारिपिाल, दम्य नियमान्दानन्तु माग्मम्मराती प्रमिदनर। मगाटी रिमा: अममम्मनिवर्गनारि "अनंग मानायी मन्मयो इनिंगः" इनिहितम, मतः मालपतृ-क्तिमान कान पत्र, नारा- তানা, নর নানা গুণ- गानासानाति मारः। मात्र विदरन दम मामा, मान पटव गुमानुः । दा मनं मां- मनहाटनने नगमाननगः पतःमत पंदर सिग Fटर: ॥

( २३ ) इति कामविजेतेत्यर्थः । अतएव योगाभोगानुगामी, योगः सङ्गः कामुकानां गमाऽगमरूपस्तस्य योगस्य अभोगः-अनुपभोगः-अनाश्रयणमिति यावत् । तदुक्तम्- "सङ्गः सर्वात्मनो हेयो यदि त्यस्तु न शक्यते । स सद्भिः सह कर्तव्यः सहितस्य हि भेपजम् ॥" इति हेतोः सङ्गपरित्याग इत्यर्थः । तं योगाभोगम् अनु-अवधार्य, "अनु अवधारणे" इति शब्दार्थ- चिन्तामणिः । सम्यक् पूर्वापरं विचार्य गच्छति--जीवन- यात्रा निहति-इत्येवंशीलो योगाभोगानुगामी । सनपरित्यागेर्नव कामजेतृत्वस्य सम्भवात् , अनएय चखलपलदलनः, खलः काम एवं मारकत्वात् । तस्य पलं सैन्यम्-लाभादिनमुदितं, तं दलपतीन्यमा खलपलदलनः, जीयात्-~-मनोमालिन्यकरीत्तीः पराबु- यादिति भावः । लोललीलपलब्ज इत्यादीनि यथायथं योजनीयानि । गन्धभूयस्त्वमयान्याने स्थाने न निगृष्यन्ने । पूर्ववत्तेषामन्मयों माध्यः ॥ भाया-AT REAT का दाम पर भी निकमा मामी सोनाम मेमोरी याद मा In मोर ! यो परम सीमन में की में मी नियों में मीटर गहने वाले, मी प्रकार काम मंचाक मन रहन बाल, कामी जनी याने मगर में भी कम हुँमा की मदुरोग में निवास करने वाले, प्राय के निर नंत मेमभावना को मिटाकर अमन ने बाल. श्री विजय नन्द मी मयंत्र विजय की बात हो ॥४॥ प्रय पाय जिजिनितिगतिमिः जितो गोगाभोगा- नगामी जीयान- जपनगीना जिता यग्गामा जिजहानन्मपदी है जिनि ! मनिनुनिनिनिः । यामभूतामिः ) जितः, पूजा मम्जाता याया:मी पूजितः, पनागन मति. पत्राचारवामित्यर्थम्ममिति ः। :--प्रागलाम, माहागात "ती" पम्प नटि मध्ययन मंटन । पदमनानानायनाना पूजा या निमिदानानः मानितु खमंगा नाम नतिजामियानन्याम । पति. 11. मजादा पम्य मः "टप्य मन्त्रादनगरम्य दर" या दात नमः,नात परतायात, प्रमाण प्रथमददगारकाय-गार, विशेषणयु कनो भवानिति नेपः, जीपान--पराभूयात् मति- ( २५ ) . स्थैर्यकरप्रयोगः, तीर्थराणाम्बपुःस्थैर्यकरप्रयोगवान् इत्यर्थः । वपुः शरीरं मूर्तिरिति यावत् स्थिरतां नेयं स्थाप- यितव्यमित्यर्थः, एवमात्मकः प्रयोगो व्यवहारः "योगोऽपू- वार्थसम्प्राप्ती सङ्गतिध्यानयुक्तिपु"। "धपुः स्थैर्यप्रयोगे च विष्कुम्भादिपु भेपजे । विश्रब्धघातके द्रव्योपायसन्नहनेप्वपि। कार्मणेऽपि च" इति मेदिनी । तेन योगेन वपुःस्थैर्यप्रयोगेण, आभा शोभा (यशो) यस्याऽसौ योगाभः, पुनःकथंभूतो- गानुगामी, गः-गाथा, लोके तु गाथा शन्देन कथा गृह्यते, तन्मूर्तिप्रकरणे पूर्वकालिककथासु जैनशास्त्रेष्यपि मूर्तिपूजा क्वचिद् दृष्टा भयेत् तदनुकूलगामीत्यर्थः। परनशास्त्रेषु बौद्धशास्त्रेपु चापि गाथाशब्दःप्रमाणिकरलोकपरस्तद्विपये- ऽपि प्रमाणिकरलोकम् (सत्रं वा) अनुसरणशील इत्यर्थः। एतेनात्मारामागमनसमयान प्राङ् मध्ये मध्ये मृतिपूजनं लुप्तप्रायमभवत्, परगाथाऽनुगामिनोऽस्य हदि पुनरपि पूजा- भावः सजातः, तत एवानेन स्थाने स्थाने मृतिस्थापन- योगेन कातिलब्धा । ततएव योगाभोगानुगामीनि विशेष- रणद्वयं संगछतं । एयम्भूतन्मेन ऐः । तो दिजेता जेतजेता शारदारस्तिपनो हिजगजनजनिरित्यादि- पूजनसाहनपगन् इति भावः । कामय गाथा नियामकन्न शब्दफन्पमें यननं । नया-

"गी गांगे गाग्वा गंगा गणेशो गांउलेश्वरः।
গান্না বান্না মাথা নষ: সনঃ বিঃ”
মাথা-বিনয কন থাশ। নিম্ন স্বাণ গামী বা
হা * পনিমা পিছু ই না (নমিতি) থান বাপ, সয়া
খ গ যুঃ * অমৃল পাথ ক খাব, মশি সখা
নানা খামাম, নু মুনি না জানা কান পার্শ,
কসাইখা ক নলগ ধা নি ধা পপ সস
জানা নাই নি না । কি , সয়া বি এন
পান খ যুল ঈমান মা ও বাস,
শাখা না, যা বললেন শা
সু এ গা, মন গন সকাল বা মারা যান
मीरने यन, मंमाग गरित्रो मदर in ,
রুনা ল * গম কাপ, গাধা না বিল
fazন শা, গণ বিতা ।।
স্ব সমাস
হাম্বা বানালাম না---
:–য়া, সখা সাবানা নূর
প। যদিনা fসা র:, পান বা মা
{সা:। ধারনা কালা শাবান্ধা
" " কাৰো বৰ, শাল কারে

( २७ ) त्राणम् दायादयात्राः, सोमपावदाकारान्तः शब्दः, ऽस्यास्तीति दायादयात्री, शिप्यमार्गमनुयानपर इत्यर्थः । दायादयापूर्वकात् "ङ पालने" इत्यस्मात् कर्मणि क्विप् , "यत इनिठनी" इतीनिः प्रत्ययः । अयं भावः-~-यद्यपि जनसाधूनां काचिद्विशेषरूपेण सम्पत्तिर्नहि भवति, तथापि गुरूपदेशमार्गेण तत्तद्वतनिय- मादिपालनं तद्धर्मानुष्ठानं तदनुकूलमेव युवराजमहा- राजादिपदवीप्राप्तिरेव, एतेपामपि दायोलोकः राजव्यवस्था- दिपुचापि मन्यत एव, तदधिकार्यपामपि दायादस्तस्य दायादस्य मार्गा---गुरूपदेशश्रवणं, तदाज्ञामनुधावनञ्च, तत्पालयितेत्यर्थः । अतएव योगाभागानुगामी, योगा- स्तत्पालनार्थका उपायाः, योग उपागेऽपीति मेदिनीति पूर्व निदर्शितम्, तेषां योगानां शाईपद्, भोगः- कौटिल्यम्, "भुज कौटिल्य" इत्यस्मात् घञ्, योगा- भोगमनु (हीनं मत्वा) गन्दनीयवंशीलः, जीपात- निरवरोधतया न्याधिकारपत्कर्षभान्भवेत । भृयान् ।। अवशिष्टविशेषणानि यशापूर्वम् ।। भावारी-- गृहधों के पुत्र पौरादि फी ने गुर पा रुप सम्पति पानी या मारा पान गाली नाले में भारत पर रि पाने या मा नया विचित्र मीना वाल, मनी प्रकार मुशामिन जय में परने প্রাতিগ গা ঘষাঘ শ্বালানী বিলা मिटाने वाले, श्रीर प्रभाव में काम एप विगंर नंत में जमी, रजाति में प्रादुर्भत, मायनी देवी के विगं पुजारी, श्री विजयानन्द गरि विजय की प्रात्र करें। प्रयाटमान्य । पलपलदलनी योगामोगानुगामी जीयात- गमाका): "यमिन्द्रो मंत्र गरिन्दा विहार्याम" पनि मंदिनी । नम्मिन ग-यामा ग्यां मान्ने गग्गः मंपा । अयम्यः रामः,"गलं निनाघनिभानग्यम्पनाः" यमरः। ग्लयांग्यात् माया गर मलगाम्नां गनगना नन्द:-गलाला मंपगतः, "लगन्दः पनना यूपी माधर: गवारः" नियमापदमः । ग्लगाकर बननन्तु- "लगानगोनर गमगारंगाप्नया । বা সালারিনা: ।" -- "यमनियामानात।" त्यनारायः । नाय मनालय नन मर :,"दम" गन्दा भानुलामः ( २६ ) . द्रौवादिकानन्धादिलक्षणो ल्युप्रत्ययः, खलबलदलनो मेखराजस्यापि भापयितेत्यर्थः, इन्द्रोऽप्यस्य योगविभूतिभ्यो भीतः सर्वथास्याज्ञाकारक इवासीत् ।। एतचित्रमवाऽऽम्बालयनगरे जैनमन्दिरस्य प्रतिष्ठा- वसरे महोत्सवार्थ सुसज्जीकृतस्य विविधवर्णः पत्रपर्णा- दिभिरसितम्य स्वचाकचिक्येनावजितसर्वजनीनमानसस्य समागतसभ्यजनोपवेशनार्थ परिष्कृतम्य सभामण्डपस्य रचनायास्तत्कालमेवकत्रीभृतस्य मेघाडम्बरस्य धारासारैः सम्भावितसमूलनाशस्य भीत्या परिखिन्नमनस्कः प्रबन्धकर्त- भिः सानुनयं साग्रहञ्चापि निरभ्रीकरणेन तद्रमार्यम्प्रार्थित- नानेन मुनिना, तत्क्षणमकामलिहां पताकां रचयित्वा तन्मध्यस्तम्भन सहास्तरां तां बया तत्प्रमावेण तद्वन्ध- नसमकालमेव निखिलमेवातत्यमाकाशमण्डलम्मानुभामा- सिनकृत्वा नर्मन्यनयता प्रदर्शिनमिति नाविदितचरन्तन्का- लिकानामम्यालयनिवामिनां किञ्चिजनानाम् । एतद्दर- पितुमेवाह-योगाऽऽभोगानुगामीति योगः-सनहनम्यार- नधारगामित्यर्थः, सन मन्त्रमयों, गया शाम्पु देवीक- र नारायणवर्ग गोपालकरचमित्यादयः कयना उपलग- ने, नर्भय जनप्रन्यवापि माना गरिमन्यादाने माप योगविभून्या निर्मिना भवितुमर्हन्ति । ताप गोगामी गो-यन्नः "ग्रामांगो यमणछा पूर्गनापन्नगारपि" इति . विश्यमंदिन्या, नत्र यागामांगानु–माइयन ययापाय- बंन गन्तीनिशीली योगामीगानुगामी, या पर यानपारगम्य पांगप्पाकाक्षा कने, ना ना ना. गारगम्य कवचम्य प्रयोगनि मावः । जीयान् - जाण्यादिन्यः, धातनामने कार्यवान् । नदनम- "निपानागापमानधानपश्यति ने प्रयः । अनेकार्याः स्मृताः मा पाटनपानिनम ।" अनः परम् द्विजमजननिम्न्यिादिकान गिगानि गवान्यायानि॥ । IT मा-मया का दामी भानी नाम्या के समापन का नया कं, पर faman) म मानव या पार माया मगरत M, R! म दान मिला, Tir म अन मी न पान रमन imgx भरम 1 412101 यमपान funarathi - म 11 FM M. म' tire ......" Mr. Amital ..

(नोट ) सुना जाता है कि जिस वर्प अम्बाले में जैन मंदिर की प्रतिष्ठा हुई थी। उस समय उत्सव के लिये जो रङ्गभूमि (पराल) की रचना की गई थी। वह कागज पत्र पन्ने के काम से बहुत सजाई थी। परन्तु जिस दिन उत्सव होना था, उस दिन प्रातः काल ही घड़ी भारी पनघोर काली घटाएं उमह आई, मानों पाज प्रलयकाल सदृश वृष्टि होगी, और सारा पृथ्वीतल जलमय हो जायगा, इसे देख कर सभी बाधक बड़े भयभीत हुए. और महाराज में प्रार्थना करने लगे कि किसी तरह से यह पुष्टि टल जाय, नव श्रीगुरुमहाराज ने सवा गज लट्टा मंगवा फार उसका त्रिकोण गएदा बना कर, उस पर फैसर से ग्वस्तिक बनाया और फेसर के ही गए छोटे दे पर मएसप पर पजा बना कर वन्यया दिया । ज्यों ज्यों हवा से ध्वजा लहराने लगी.त्यो त्यों काली घटानों फा भादम्बर भी दसों दिशाओं को भागना पा नराया, और यादीही देर में आकाश निर्मल हो गया. एग मे मित होना ६ कि इन के प्रभाव से इन्त्रादि देयता भी प्रभावित रहते थे, हम उपरोक नरसी पटापादिग्दर्शन माराया गया है। पथनयमो लोललीलस्यलज्जो योगाभोगानुगामी जीयाद- सन हिं, ल---3-~ल इनि दः ल हल्यातरसम्बरा- साकाशामा बने. उगोमागे । वागिन), पुनरवलो दानादान, सधा चारकोपोमिधान राजेन्द्रोऽपि "लो लगनेऽम्बर पाईद दानादान मुप मन पारलेप शालय ने इन्हें वापि ममी : ar 33 , नदिन्यम् मा, यो:-नायम्य, ल: दानादान, दनि लानः । कदाचिन्गर्यकर ममंगहन्य जलमाकागाय टोयनं, कदाचिमाकाशाद्वान्दाय भृमी मिच्यने दीयते । न च गंयम-ममावणाकाशमद्भागन् नती वदिन- नीयन इति, यनः मुथुनमन पन्नव महामनानि पापा मनुपस्टिानि मन्ति, घरम्यान द्रव्यं वा प्राधान्यन नशा व्यनिः परिगणना च । नदन मुश्रुतं- "अन्यान्यानुप्रविष्टानि मांगयनानि निटिंगन् । मंचं दव्यं तु गगां व्यनालनगमिप्यने ।।पनि गया ति ममागमागमहानगंगामायपि भूमि महारः, प्राधान्यन्तु ममी ममंग, आमांग-या- कागम्यानि न्याग्यवान् । नम्य लालम्प नीना गल: ( नाटम्म ) लालनीला, "लीलामिदः निग्निाम- मेलगदारमारमारिया" ति पिगः । लोनलीला नीना गम्य नलीलनानानीलम, लालनीलानीलन नाम । धनम )नालनीलम्ब "गाराविनां मिय नापटलारगारमनपानम" पनन नाननीनां नागरण লালা লাপ:, সাবিনামাবিলা। शामलालनपाल-मिनीयमा माननीन मनन्त्र:, पनापन।

अयम्भावः-यथा जलं सूर्यरश्मिभिः प्रणीयमानं फदाचिङ्गमौ कदाचिदाकाशे बम्भमीति नैकन तिष्ठति, तथैव धनमपि देवेनातितराम् प्रणोद्यमानम् कदाचिद्राज- कोशेषु कदाचित्र प्रजाकरेषु विचरति नैकत्र तिष्ठति । त- दर्थमेवोक्तम्--"मा गृधकस्य स्विद्धनम्" इति तस्मात्कार- णादेव सन्यासिभिस्तत्स्पर्शमात्रमपि निपिद्धम् । मतः सन्यासधर्माद्धहि तत्वात्तत्स्वीकरणम् लज्जावहमेव, तदेव परिपोपयत्युत्तरवचनेन योगाभोगानुगामीन्यनेन । योगः- अलभ्यलाभोऽलभ्यानां धनादीनां लाभः प्राप्तिरितिभीम- अगवद्गीताटीकायाम् शीधरस्वामी,तस्य योगस्य धनादि- लाभस्य-पभोगः-गानुपभोगः, [प्राप्तस्याप्यम्बीकारः इति योगाभोगस्तं गोगामोगम् अनु-सापन यथाईत्वेन गन्छतीत्येवंशीलो योगाभागानुगामी ।। शयंभाष:--द्विधातिविनयादिनुबद्तरगुगष्टम्प स्वभावेनगालभ्यलाभः गम्भाव्यते. तलमागतम्यानिधनम्म पैतमसम्पापि भाग माया प्रमजितोऽयं महारमा स- तारतम्य महासत्वस्पतदेश युज्यते. अयमेव ( अनु ) इन्द- व्ययस्य सारश्यमममनोऽभ्यरं महाला पूजा कृतस्य कम्पविदसानपारसायकलादान परमावोगा. अन्यायिनः मन पन्भनभूमेधनादिनः प्रतीनी यशों भूया स्वतत्यान, - ..

(32) नीय डीपाट-अन,अतः पवन विमानना पयानंच प्यायें वानरमंगवामानानं दिन्नंग विद्वन्मु॥ मा-परदा महम मन में नं व मनमा मनकामयगत मान मन र मान int दांत में HTTE.टामद मदत मागद Friri दागदागदारी योगाभागानुगामी जीमा- कार:वन मिनटी माननात द. मननिदानामतः, टाटा-को-दर- ग: 1 "टयां रद.ममानन"मरत गन्दः, “तस्याः रं. नाव साम्यं नमन दलान दियारा महान दारा पिटारसाट, "gia पर, Pra ( ३५ ) केदारोदास्यदारः, सोऽस्यास्तीति-~-केदारीदास्यदारी, अतएव योगाभोगानुगामी । योगा:-युक्तयः "योगः सन्नहनोपायध्यानसङ्गतियुक्तिपु" इत्यमरः, ता युक्तयश्चा- प्येतत्सम्बन्धिन्य एव । कस्मिन् क्षेत्रे को नियोज्यः, कथञ्चा- सो भूभागः समधिकमलप्रदः स्यादित्याकारिकाः, तेषां योगानां युक्तीनाम् आ-मर्यादया भोग उपभोगो व्यवहारो- ऽसौ योगाभोगस्तं योगाभोगम् अनु हीनं तुन्छ मत्या गच्छ- ति (स्म इति शेपः) इत्थंशीलो योगाभोगानुगामी । पूर्वा- जितस्यैव म्पप्यानरैः स्पष्टीकरणमेतत 'द्विबंद मुबद्धं भवति इति न्यायान् । प्रवज्याकाले स्वभूभागस्य न बन्धयुत्तचा- दिकमनाइन्याऽमोशतो बन्धुश्चाप्यनादृत्य प्रजितोऽयं महात्मेत्यादिप्रशंसाजन्याभिमति जीयात् । अवशिष्र्ण गधापूर्वमिति ॥ चिन्ना की प्रमाया भाया- अपने पिता प्रपिता आदि की परम्परा भूमि क्षेत्र गृह पाहि के प्रयामा TEE वीजा) रुप में काटने वाले. फेरत प्रारूप में नाटो जाती और भग्न रहने वाले न दे मानियाँ योजनाको मिनि में पार करने से xिit नागस्य को नरोपमा गुमान में "THE A कि इस समय अनुसार और लोभमा भी विसपारने के, कई अहे नको भी निष्ठा पाय अपने यंश को प्रमिद्ध माल वाले, लोभी লন * শল কা লন কাল, শাল গা শবন লালাগা গা মা অন ল া হয়। পলিন কান আল, খিরস্থান মূৰি বিস্ত হaa ।। খায়া विमलमजुमदोहामधामप्रमत्ती योगाभोगानुगार्मा কাশ- বিৰ মন যক্ষ্মা যিমন—প্লব, নিঃস: য দিন :--মামাৰ মিনা, বাণ মিলাদ: ফল মিলাদ ‘দা নই কালনিন খালিঃ, নয় নিনমাস- লগ--বি, ঘাম সমান মিলনামাম- গার মি: গণি, বি, গল্প, মনি” ৰ গার্যনিলাগলি:, , , ,মা, গান, প্লাগ, মনি, মনা, বি, বিবি, শান্তা, যো” মা পাগিfলন, ন দিন। সরমানা ধার্ণল সােপাৰি । স্বর্যা fষবমানঘাস, গয়ের সব লিন"যােবানা, মা মা হ ম পা ‘বস সাবানা" সিন ন থা:, নাসা Fu-.-.. ( ३७ ) स्त्रियां, सा विमलमधुमदोद्दामधामप्रमत्ता यस्याऽस्तीति- विमलमधुमदोहामधामप्रमत्तः, , "अर्शयादिभ्योऽच्" इत्यच प्रत्ययः। अयं भावः--अर्हन्-~~-मधुस्रावी द्रुमः, यथा द्रुमाणां मकाशात् फलार्थिनो जनाः फलानि, काहार्थिनोऽपि का- छानि, पत्रार्थिनः पत्राणि, त्वगधिनस्त्वत्रम्, छायार्थि- नरवायामेव लभन्ते, सामान्यतश्यायातु सर्वेपामनुपादेव जायते । एवमहन्नपि, यं भावमुद्दिश्य जनाः एतच्छरणमा- यान्ति, तेषां तॉस्तान भावान पूरयति । तथापि हिंसोपर- मरणरूपा शान्तिस्तु सर्वेपामनुपङ्गादेवाविर्भवति, एपाशान्नि- रेव कन्यारण्यस्तुरूपों मदः, तस्य विमलमधुमदम्यानिरुदने- जःप्रभावणवायं महात्मा परान प्रधर्पयति, एतादी शक्ति दधदासीत्. (अहन्मतानुयायीनि ध्वनिः) सताएब योगाभा- गानुगामी, योग:--अर्यार्थ प्रापिः, नस्य योगाय-- शाभोगः परिपूर्णत्वं योगाभोगः, तं योगाभोगमनु (नेन मह ) गन्तीत्येवंशीली योगाभोगानुगानी । नवरन विजभजनजनिरित्यादीनि विशेषतानि संयोज्य, जोपान- उत्कर्ष भनेदिति योजनीयम् । ལམ་བཏྟཾ ན པ ཙཔས པས' ༣ ཙམ ༣ i :མསྶ ༣༣ ཡཾ ན ཀཱ ཡྻོ ཙྩ་

(5)
पिन कार्दने वाल, नया नये नय त्रयों की पसना में अनुष
मन का मान दशांन याने उच्य कुल नया उग्न जानि में जन्म
पाय टूगे. अपने मात्र की विद्या में रन देनेवाल, देश दंगलगे
में जय पान याने. हमी प्रकार अपने यग की प्रतिधा करने वाले
মনিয়া কাবা শাখা । মূল নয় বা যন.
पाग गमन के निगर में रानहागिन्ना को अपने नियति
को भतका मिटाने वाल, श्री विजयानन्द रिजीवित हो ।
प्रामादगायं
अथानापिनामगन्याम्पर पटम्य नागाल्यः पुनगी
प्रदर्ग।
विमलमयुमहोमगामम्ममा गोगामागान गामी
सं.या---
प्रय-:---:-निटः, नत्र 3:नि नाम,
::ति गट, गटी गगमिरानगजेन्दः । नांग्यम -
जातामय ::--हामी fr:, नार यांया मनाम
पनायानन मगा नापन्नं नम्य वः । नागमण
ये मना बारिमापन मिनाः, मनोमानिया
मामला माना । प्राय मागतान मिलाप
मर: मईया मनमानामा -
मिनम:, " हात

.. - (३६) पाध्यारोपे" इति शब्दार्थचिन्तामणिः, विमलमधुमदम् उद्दाम्ना महता धाम्ना तेजसैव प्रमध्नातीति विमल- मधुमदोद्दामधामप्रमत्, तस्य भावः तत्ता सा यस्यास्ती- ति विमलमधुमदीद्दामधामप्रमत्तः । तपउद्धृतरोगाणामपि तेजःप्रभावणेय नाशयितत्यर्थः । श्रतएव योगाभोगानुगामी, योग.-पजसमुदायः तस्य अभोगः-~-अनुपयोगः, (या मर्यादया भोगो भोजनमिति वा) स्वस्य कृत विनिर्मिता- नान्तु अभागः, अन्य हस्थिभिस्तदर्थमुद्दिश्यानीतानाम- प्यभोग एव, अनुपात् प्रामानां श्रमणकरानीतानामपि दिनशेप एव भोजनमिति मर्यादया भोगः । तं योगाभा- गमनु साश्येन-~अहन्मतानुशासनानुकलं गच्छतीत्यर- शीला गांगाभोगानुगामी । नतएव केदारीदास्यदारीत्यादि- प्रथमच्याथ्यार्थकानि विशेषगानि योजनीयानि । परतरच जीयादिति--तपोभसमुत्पादकविग्ननिवयं जयेदिति कवि- कामनाकान्तोऽयमर्थः । शनेनाधिच्यामिमहंऽध्याय प्रभुन्यं संगनिलगिति कृतं बहुना ।। मापा-यां में मिल में होने वाले रोगों को भी दो अपने शाले. भाइसमा हरा र पिनो का प्रयोग न करो पानोपरा याने के . H ) বিগাম্মা ই বিষ ৪৪ হান বাণ, দ্বীদাৰ হাঁ ন ষ স্বামৃগ (নুসূধা । মা প্রায় ৪ দিন ধ মা লি বধ কাবান্ধা ম মসলা a. । পূধা বিল ৪ মৃঙ্গ খা কিনা যা বিগ স্ত প্রশ্বাস লাঘরী গাণানামা শ্বাস- : দাদা, নদ । নষা বাধা: • সামগ্যাত্মিানি”. ": স্বর যা মান বলবি ন”। --:-- যালান, নর সম্বাসি , মান- : । কথা-- !। :-fা: “দ্মা-গদান fায় নিলয় এল ন” সি খলিলালি:। বম্ব স্বাদ দিল চল সাল -মা, বা " গান" r: কিন্তু বাবা ছে? প্লানিনা। মা:। মানাম আল মুগােব- চাল লি:। গুনাবল ব?? তা মান্না দাস এম . “ " লস নি ঘন ( ४१ ) बीजेला । रूपमेतत् ॥ । अयं भावः-हे केद ! (आत्मज्ञानप्रद!) त्वत्तः पूर्वमांप चहव उपदेष्टारो विरोधनिवारका आसन्, परं बहुप्रयत- मानरपि तैः साफल्यं न प्राप्तम् । सम्प्रति तु त्वदात्मज्ञा- नोपदेशेन सर्वो विरोधो नष्ट इति हेतुनाऽश्चयेण मुखं न्यादानास्तिष्ठन्ति ते । नेपामपि चेतांसि चित्रयितुम भवानायात इत्यर्थः । यतो भवान् योगाभोगानुगामी, योगः निष्कामकर्म, "योगो निष्कामकर्मणि" इति शब्दार्थचि- न्तामणिः । तस्य योगस्य निकामकर्मण:-आभोगः परिपूर्णता तेन योगाभोगेन-अनु ( सह ) गन्तीत्येवं- शीलो योगाभोगानुगामी । ततश्च प्राथमिकार्थविशेपखा- नि मंयोज्य, जीयादिन्यनेनान्ययो विधेयः ।। भावार्थ- भाग जान देने याने गुरुदेव ! उपदेश झाग परम्पर विरोध के मिटाने वाली शिक्षा के माता पूर्ण उपदेशों ग. प्रयत्न करने पर भी जम में मकामान मात्र होने मयासी हा में बनायामही मर मला फिर वन पूर्व उपदेष्टायो की हमा गाया गावाले, पापही पाय है। मोकि पार पूरे नांगो मामले में मार्ग पर पाने वाले साल मे है किसी की मेया करने किन हुने, मी विधा में गा में पूर्व गमा ६. मोना. शाम A সালঃ , া ম বিশ্ব প্রয়া । স্বা, মদাৰ ধৰি পালাগা (সা) * পানি বা গান নেম মুখ নন ধাপ, গা ঘিন দৃT ara ।। গ ঘ পালন্দালন। সীমানমর্মী নাশ- লালালদল নি বনে মিলন। বিদ্যাখ। ল~~-গানঃ, লা না, মূৰ, , প্রাপ" বেশিথানান। নন, ": নি, গাব, বনি, লাল ম - নিবনা । পলন লন: বি:, লন - মন: ঘন কব-~-সালে শিললঃ ওবাৰে সখ্যতাগণ। :--সদর থানাবলি; মন । বিশ: না, বল চাৰ্যশনস মন বৰ:, দালাল লালন, শনি" নব: । শালাৰ নামৰ নাৰ সৰু কাৰবাদ নাথসম - প্রশ্ন: সস্তা নানা নানা সখ ঃ ০৭ | ल:-चन्द्रमाः, "लश्चन्द्रः पूतना पृथ्वी माधवः शक्र- वाचक्रः" इतिशब्दकल्पद्रुमः, "सु-~~-इत्यव्ययं प्रकर्थेि। "अल भृपणे" इत्यम्य शवन्तप्रयोगः-अलत्, "जस्तेजसि" इत्यभिधानराजेन्द्रः । तदेवं मु---सुप्ठ् ( सुतराम् । सलदिति स्वलत्,ल:-चन्द्र इव स्खलत् इति लस्वल, लस्बलत् जः ( तेजो ) यस्याऽसौ लस्वलज्जः-चन्द्र इव शान्ततेजस्त्रीत्यर्थः । ततश्च योगाभोगानुगामी, "योगः---अघट्यटनासामध्योऽतिशय" इति शब्दा- चिन्तामणिः, तस्य योगस्याऽऽभोगः परिपूर्णता योगाभोगः, तस्य योगाभोगस्य-अनु । पस्नात. पृष्ठता या ) गन्नतीत्वन्धीलः । विचित्रघटनापटक- शक्तियदुलतामनुसृत्य विहरणशील इनि भावः । अत: परभ सलपलदलन इत्यादीनि विशेषणानि नियोज्यानि । ततो जीयादिति ॥ भाग-1. राष्ट्र में माया कोशालिकों ने मोकिालनमा नेकायों पायोग करने के नाम पर नया नाम स्पयों को भी नया जो कि बनियामा : सौ. बनीद में समाये, कर rrent धान न पाये माः प्रादि मनानुमागे जताया में भी अंना, उनमें भी मम्भर पहुये, अपनं गुम्बादिष्ट मन के फैलाने वाले प्रोर मरम वर्षीय जैन मम्प्रदाय को निन्ना को मिटाने वाले प्रभावी विजयानन्द जी विजय प्रान का प्रय पञ्चगान्य पलपलदलनो गोगामोगानुगामी जागान- पः-न्दः, नः कला,यायंकःगठः,ल:--प्र. नम | "ग: ग, रिन, टिपि, दी" ल्यमियानगडे. न्द्रः। गन्दकपटुंग- "नरचन्दः पना भी माघर: गरमागरः । यनानुजः पिनासीगी स्मारकी मांममंतरः॥ मही नाही मृत जी ना बारगीतिः । চিন্তা স্বাল zিগা বা মানিনাধাগনা দ্বিধা मालिनी वांगनी नादः प्राम्नः गाना cit रियाममन्यां बनी गंगा मांग दलाम पति मदनी, या मागमा दामः, पदमांग्लार:- . -- "ताम्बूलीनां दलस्तत्र राचताऽपानभूमयः । नारिकेलासवं योधाः शात्र व पपुर्यशः ।।" तदेवं खम्य-इन्दोः ला-कला ब-इव लस्य---- अमृतस्य दलनो--विशरण:-~-चर्पण इत्यर्थः । "दल विशरणे" इति भौवादिकानन्यादिलक्षणो न्युप्रत्ययः । यथेन्द्रो कलाऽमृतं जगति सिमति, तथैवहन्मतरूपाका- शादिन्दुकलावदयमपि ज्ञानोपदेशामृतवारीतीति भावः ।। योगाभोगानुगामी-योऽयं गाभः, गः-गन्धर्व इव आमा शोभा यस्य सः-गामः, गन्धर्वो देवानामुत्त- मजातीयो देवः । अथवा गः-गणेश:--विघ्ननिवारकः, तस्य गणेशस्य--यामा-इवामा यस्य म इति भिन्नमेव चिशेपरगम् । पुनश्च गानुगामी, ग:--- --सर्वगः (सर्वेषु गतः) कर्म, तत् गम् (कर्म) अनुगन्बतीत्येवं शीलं यस्येति योगाभागानुगामी फर्मानुगामी (कर्मवादी)। सतरच दायादयात्रीत्यादीनि विशेषणानि सनिगोज्य, जीयादित्यनेनान्पयो विधेयः ।। भाया... दमाराम प्रारकाले भने पाने और गम को नार ri राहो पायी करने पीलियो are या ami पर विजय पान याने. मन को मो जाननं यान. धनागिर मं मी प्रतिष्टित. अानं कल मांटा की प्रतिक म्ने बरे. चंचल नीला में दानं वालं. दंगकांग में निश चिन्ता को छोड़ने वा नशम्मी विजयानल मा in नया प्रय पांडगा दागदात्री योगामांगानुगामी जीगान- ४: टीमिः, पापः-ग्रागमः, मा-अनिमुना .:-चालनम, यात्रा-प्रागनम । नया प गिर गम्ममुनिः- "दीनान पूजनं दाग दानागा पानां। दो टीना दगा दामने दीरंगा ॥१॥ दयाय दमन टीन टटाच: स्मृतः वन बन्धन बांध पाने वाले वनाटिनं ॥1 विहार माना गाननं गोरापा बन्नानिमालकालात 1410 मदान न निनावनिता गटा" । ও দ ম দ যা +V.15 ...AMALA - क ( ४७ ) यस्य (संसृतिमहोदधाविदति शेषः) असौ दायः । पुनश्च हो या-अभिमुख्यं यथा स्यात्तथा दाय चालनार्थ- १ मेव यात्रा---गमनम्-~-प्राणनम्--जीवनममिति यावत - यस्यासौ-श्रादयात्री, दायश्चासौऽऽदयात्रीति दाया- दयात्री। स्वोपदिष्टशिप्यसमुदायस्य स्वाभिमुख्येन चाल- नार्थ विहारवानित्यर्थः ।। योगाभागानुगामी-योऽयम् अगस्य कुटिलगतेः अभीगमनुपयोगम् अनुगच्छनीति शीलवान् । “ग वन- गतो" इति कविकल्पद्रुमः, अव्याजगतिमानित्यर्थः । अतएव खलबलदलन इतिपूर्वोक्तार्थविशेषणमप्यस्मिन् जा- घटीति । नतश्चान्यान्यपि विशेषणानि यथापूचं योजनीयानि, ततश्च जीयादिन्गनेनान्वयः, इत्यलम् ।। " भावार्थ-जन गत की विशेष (रोशनी) . नार पं. लिय ही उ. ममा पसिनादार में भी पंग मेरी माया मारने की मांदा पिर रप कल पैदा हो गया पारने पाले ममा पहिला नि ! आदि का परम करने वाली पर मा घोर पाई. बमको मामा कर का मानने माल, पीः दी मोबाग में aneभोशामक पानामा Tera को मामले एक:प्रमाढीम कयम हन्यते यःमरते पन्नाभिम पत्र म प्रकार दिनों को कुटिल गनि म यवन के लिये ही जन्म हुये, नथा उनको विधा में लगाने के बद में रन हुने सिविता नेजम्यी ग्रन गाग श्री विजयानन्द मरि जी विजय मात्र का है।" গৰ নহয়া: जैतृजेता योगाभागानुगामी जीयात- अनजना, जपन्नोनि-जंतणि इन्द्रियागि, "हन्दि यागि प्रमाानि हान्नि प्रममम्मनः" न्युनमनमि गन्नयाः मम्मपन्नि,इन्द्रियाणि शरीरमपि नन्नि। यय गानम्--- "मानपतगहमीना हनाः पमिर पर । नादियागापिना-अपनील निभा.! नाग मलरमालनः, मानि-इन्द्रियागि, "मः गणे, नृप, पयाग, इन्द्रिय, " त्याभियानगवनः। नां मानां न:-न्दः मामी गजा यामी गना मनः,नम्य मनगर ( मलाय) पनं दलपतीप मि गलालाननः । अनी गामापानुगामी । गांन्नादिसम गम्यम, नाय पान --पा-ममन्नात मांया । माग जननम

रक्त:-क्तियों गुजाः, तासां रक्तत्वं सर्वत्र जगति
प्रसिद्धमेव, अतो रक्तिभ्योऽप्यधिकरक्त इति रक्तिरक्तः।
श्रूयते किल कदाचित्पुरा दुर्भिक्षसमये स्वसम्बन्धिना-
माश्रयस्यादानात् रक्तीनां मुखे कालिमा समुत्पन्नः । भवतु
येन केनाऽपि कारणेन कालुप्यलगनात् रक्तीनां रक्तत्वे
त्रुटिरस्त्येव, परमस्य रक्तत्वे त्रुटिनास्ति, अतो रक्तिभ्योऽपि
रक्त इति कथनात् सर्वधा रक्त इत्यर्थः । इदं वचनं लोको-
क्तिपरं लोके यथा यः कश्चित् कदाचित्कवशिद्धर्मसकटे
पतितोऽपि सुदृढनिश्चयेन ततो निष्कलको निस्सरति, तदा
तं लोकभापया (लाल का लाल रहा) इत्यभिदधनि लोकाः,
(धर्मसकटपरीक्षायाम् ) सुनरां परिशुद्ध इति भावः।
योगाभागानुगामी, य:-पागोग इति छेदः।गामा
सिद्धयो, गकारकोपानुगतोऽयमधः । तेषां गानां (सबसि-
शीनाम्)मामदिया भोगः-उपयोगी गाभोगा,
गाभांगम् अनुसारस्येन गतीनिशील इति गाभोगा-
नुगामी, सर्वमिदीनां यथास्थान प्रयोगकन्यः । नया...
হা হা লিখি নিন।
पापयापि विमानसायान सम्मेलनेनीवरल्या-
শান্তা মানাবে, বিমল
युवापनुमार विभाजनमानी सम्मका, .
है

- ग्ग में अभी नाहगेय, नया मोसमाग में मानवमी पर मी गानुगामी । ननचनगण्यपि विशेषगानि यथान्यानं नियोज्य, जीयादिन्यनेनान्वयः ।। भावार्ग-दिशानों और विदिशात्रों में मुनि के प्रकार देने याम, जैन धर्म की गिता को बनाने वाले, कोकि की नाप्रटन निश्चय ग्मने यालं, अतण्य धनं गायों ने मार्ग में एक मात्र भी न टलनं यान, यानि समोर अटल शिक्षा में सेवा के लिये जन्म पायय, मोक्षमार्ग को कि पर विजय पाने वाले, अनेक जीवन मगरको में भी कर ", अपने न पा वालो को भी मुनि हिमाने पर गई पलको दलने वाविभित्र सीमानों को मनान मुली की गिना को मिटाने या प्रवर्गाती श्री विपनामा किया। পাসবো गारदागिनो योगायोगानुगामी जीयात-- गाहा, गनग्नः, निriTEN | गाग- এ বিষণা ত্যা: । গাশ "टी माने" र "ग: ग" वम | "माया" मार पर, मार्ग : "मी" REER If.

( ५१ ) रक्त:-रक्तयो गुजाः, तासां रक्तत्वं सर्वत्र जगति प्रसिद्धमेव, अतो रक्तिभ्योऽप्यधिकरक्त इति रक्तिरक्तः। श्रूयते किल कदाचित्पुरा दुर्भिक्षसमये स्वसम्बन्धिना- माश्रयस्यादानात् रक्तीनां मुखे कालिमा समुत्पन्नः । भवतु येन केनापि कारणेन कालुप्यलगनात् रक्तीनां रक्तत्वे त्रुटिरस्त्येव, परमस्य रक्तत्वे त्रुटिनास्ति, अतो रक्तिभ्योऽपि रक्त इति कथनात् सर्वथा रक्त इत्यर्थः । इदं वचनं लोको- क्तिपरं । लोके यथा यः कश्चित् कदाचित्कयचिद्धर्मसङ्कटे पतितोऽपि सुदृढनिश्चयेन ततो निष्कलको निस्सरति, तदा तं लोकमापया (लाल का लाल रहा) इत्यभिदधति लोकाः, (धर्मसकटपरीक्षायाम् ) सुतरां परिशुद्ध इति भावः । योगाभोगानुगामी, यः-गाभोग इनि छेदः । गाः सयाः सिद्धयों, गकारकोपानुगतोऽयमधः । तपां गानां (सर्वति- जीनाम् )या-मर्यादया भागः--उपयोगो गामोगः, तं गागोगम् अनु-- सारश्येन गच्चीनिशील पनि गामोगा- नुगामी, सर्वसिद्धीनां यथास्थान प्रयोगकर्नेन्यर्थः । यथा- स्यीय ययालय मन्दिर निप्टाऽच मरे जनमन्पनां स्वाप्यन्ययापि विशोत्सवमयान, नम्मेलनेनीयम्पन्न- सपागाम मानवसमागगं प्रत्लागाज्मपन, समापिशी संपन न्यज्ञापनुमाप विरोपभाजनमागी माला, प.

परिमादीनां परन्यं रिचानुन्नु वयं करायमार पर
যা মূর্ম ন হিমাল, নাম ।
প্রণালুকি প্রদান: বিলিশিবির।
বাবাবাবালিদিৱালন:শঙ্কা নাম:
‘মান! দশের বিশ্বাৰু লনি তা
মানৰ মাৰা মন শান্ত, বৰ বিনা
ফেমিনাশদিন মারন মামা।
যনি লাযূন দিন বৃমিকা-ে
নি” না না নানানসম্মান বালানি
র নানান, দরবন, বন নিন
যন্ত্র দিব নালা বন্ধ না মানা
বা গাল ফল বা সব, নেন বা
শার্নিবনাশ.কা: বিমান
শাথ বর্মনালৰ হাবা-
বাশিস সানিবি, ব্যথা মানে
ব্যবস্থা রাখা মালা
পপ খা:। পা গণৰ বন ?
পানাম নবদবসসৰ ৰণঃ **
। না:শ্বা,
না। মৰা । কােষ, নগ্ন ঃ
গ. প শ :: ।

(५३ ) दृग्गोचरतां गतानान्यत् किमपि । वृत्तमेतद् दृष्ट्वा तत्सामयिकाः सर्वेऽपि श्रावका अतीव श्रद्दधिरे तोति नाज्ञाता पं तत्का. लिकानां भावुकानां । अतोऽनुमीयते सर्वासामणिमादिसिद्धी- नामुपयोगोऽप्यस्यासीत् । अतएव गाभोगानुगामी तिविशेप- रणं युक्तरूपम्, योऽयं गाभोगानुगामी स.जीयादित्यनेना- न्वयः । ततश्चान्यानि विशेषणान्यपि यथायधं संयोजनी- यानि॥ भावार्थ-फिमोधर्म नंकट में पड़फर भी दुर्यलता का साक्षय न लेकर, अपनी परीक्षा में पूरे उतर कर सभी सिरियों को प्राप्त पारके, उनको मर्यादा के अंदर रा कर अपने मारा हो जीयन में व्यवहार करते हुए, जनिशियों का समय समय पर प्रयोग करने पाने, और हिजो रही भी मितिनों में पायसर मेवा करने के लिये बाये हुए ऐसी दिशा में पूर्ण भाव में भरे दुप, विविजयी रिभर रहने पाने. परने सापकों के पास भायों पर भर्य से विजय पाने वाले. मरि पो गरे योग से पशंमा किए. पपनेजपाला फा भी अंग बनाने पाने, भीरमादिरा की माने पर विवि पर गात, पनीर परामियों ने माने जिस भाग पर पाने में ही है. दो गाने की भी शार में या rifrrerit र को M

।। কি সব ম স মন মন
( 2 )
না:- গল্প শ্বালা স ম ল দ য়
ই মন বর যাবি দাম্মাম্ব না মায়া ধ ন
মঃ মন মা সন্তান কিন্তু ব্যয় কমানে
दमयंवर कारगा यहां मन यो माया र
দাস, না মা মূল । সৰ নগাল লুমান ।
বিশ্বৰ মন মান্না বা গ্য। বিঃ, ম খন
নুমানৰ মাস ম ধান গ ল গব নিষ্ঠা
স, । ঘর। না না না নাম ধাতব
কা। যা বলা মৃত নগন্য নয়।
বিসখান ৭ নিধন হি , দ্যাৰ tri
বাগান এক পদ , ০ এ ।
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ज्योंही झपटकर वह चादर उठाई, तो उसके नीचे से दल-बोस भूरी चीटियें फिरने में सिवाय और गुड नजर नहीं पाया। इस उपरोक्त अर्थ में इसी घटना का श्य दिग्वाया गया है। अथ विशाग्र्धः - द्विजभजनजनिर्योगाभोगानुगामी जीयात्- अत्र द्विज-भजन-जनिरिति छेदः, द्विजाः शुद्रा- निरिक्ता वर्णाः, भा-बानम्, जननं जनः-उत्पादनम्, अन्तभांवितएयर्थस्य सांचादणिजन्तम्यापि या प्रयोगोऽय- योध्या, तम्यवाभीष्टत्वात् । ततश्च जनिर्जन्म, भस्य जनः प्रादुर्भावो भजन:,पर्थे कः। भजनाय जानियवासी भजनजनिः,द्विजानां भजनजनिरिति द्विजभजनजनिः। यता हिजेपु भजनाय जनिर्यस्याऽसी हिजमजनजानिरिनि समुदि- तस्यय समासो विधेयः । द्विजेपु--सज्ञानास्तेषु मानप्र- चारार्थमेव भारत इत्यर्थः । "मी मासिया गनिपिकाने " इति शब्दार्थचिन्तामणि, अभिशनराजेन्द्रना! पहा लानां मालामर जान यर्थ एव चोध्यो, यतः लय- गनिनाव जनम्य नम्बहामुन्न नापि शोग शल्पा चासनीयमेर, साली नगगन शोमान गया मानायव यानी योगामीगानुगागादिया, रनोरमका timilai TAIT.

गाम् श्रा-ग्राभिमुख्य एव म्यमानादेय मांगः काटिन्यन्
चक्रगनियाँगामोगः,
योगाभोगम् अनु-हीनम् तुन्छ
मन्या-अविगणयनि यावद् गच्छनि नगगनगरम् नेरी
मुधारणार्थमेव गच्छनि] इनि शीलवान् योगाभोगानुगामी ।
( ननु ) यथा सन्मद्गनिः मफलप्रदा, नर्थव दुष्टमानिगी
दुफलरुग भवत्येव । अनी यदि महात्मनां महान पिअन्य
पानिनां नीनत्वमपमदिति मम्माग्ना म्पादपि, नदि
महान्मम्यपि दृष्टमानः फलम् दुर्वाग्मेवम्यादिनि नग
याव्यम् ,यतः पूर्वमपा राका महाममिनिम्ना। नदुनम् --
"मगदादयति हि माना गलानाम |
माधनां नहि गलगगनः गलयम ।।
प्रामा मुममा मृग धग ।
मृद्गन्धं नदि गुमानि धाग्यनि । हाल
নতর গলষণলেন শামিরা।'
पिगाणानि मान्नुमन्नामानि ग यायमची
यारियननामयः ।।
मान-मन ! 17 14
समान मनम1
Metfilm.marg. .. .

उपदेशों से अपना रा चढ़ाने वाले विश्वासघातियों को दिगन्तों नक जीतने वाले, अन्त में नहीं सुधरे हुए दम्मियों से पूजे हुए, ऐसे खलों के बल को दलने वाले. विचित्र चंचल (विकट ) चरित्र थाले दुर्जनों से अपनी लजा बचाने वाले. “ऐसे बुजनों के मैदान में हमारा काम न हो सकेगा ऐसी चिन्ता को पास तकनसाने येने वाले प्राचार्य से सोत तेजस्वी श्री विजयानन्द जी विजय को प्राम फरें। অামি - योगाभोगानुगामी निजभजनजनिः शारदारक्तिरक्तो जीवात्- य:---रगामः----गानुगामी इति दः । योऽयमिति निर्दिष्टः, पगो पृषः, "अत: स्पानगरचरी" इतिहगोक्त- त्वात् । यगेन-याभा----उपमा यस्यासी भाभ:-- पृक्षनशः । स चापि कल्पवृक्षस्तत्साहपेन लेपकलनका- मनापूर कत्याल । नाच गानुगानी, ग...याम्पीति न सोश प्रदर्शितमेय. "ग: गीनं सरस्पनी विधा भोगिनी नन्दनो धरा" इनि सन्दकपनुमोक्नन्मान में पायामनु- अमेय गागनशीलः सन पक्षावगगनादेव-गाम- भीपन्ने, समान गमनीत लाई नामोन बनामनि विरोधमानः प्रवीचने पर योगडिको

।
}
কাশনা। “প্লামা-হাত্মা গান",
খৰিলামাল। এলাকায় দিলো
নিঃ---ামাৰ মাথিলা নাৰ ন পূর্বাবু
তারিখ, অন্য নিষিদখবা, মরননি, এ
মালি (অলিষণ) নবীনি সরলা, “মা বা"
শিদিয়ানা, মানা নানা মনননি।
রাৰি নিয়ামামা শ্যালিনালি। যে
র্ষে সম্মা বা শ্যালিকা মালা গ্যা নিন,
মরণ {সারনাথ, শর্থনাৰ নিন,
৮। বি:, :-fলন ,শা-
দিবা ঘামান
নাম: ::্যাদা
:, দায়িত্ব।
হকার, পি.এন
শাৰি দৰ, বৰা , t
ণার মা
গাখা যায় ।
এ না? বার,
" শ্বাস -
গান
মাধৰ। প্ৰাপথাস ধা, '' ঃ
নরসনৰ বালি
কানা নাম:
ও রুপ
নি: 11.

** दण्डाष्टि--प्रार यांगामागः, नमनु-न्यम्मान दृढनिश्वरत्वेन महंत লালানি দাবি ঘ্যাশা নাদাল। নিশিথিলাল ঝদাবি না, না। গাল কোনান নানান पारम्परिकाविंगधनातीयमुष्टामुष्टि সাপান। পালামিষাবিদালিবানের। সাবিনা মানা ঘনােনা দিন ঘষামায়াখা ন্যাশনাল ব্ল্যান [ বালি। খালা ঘামি, সায়দানিন্মর: বাষ তা সমান সিখানি, নিম্ববানল বানৰ ঘর নয় মনু । বারানামাব নানামনি দল ও সমাধবী র:। নামায়া পোনু বব বার্মার, বা বাসন মৃনাপ সবা দ্বাৰাৰ পৰাসৰ সহ- সন। সব র্যাব স্থানান, বি- ৭। সাশালিসান খাবার বা নিব: । সব খবরধr a * * *"1 ৪ ?' ৭ * * * * * * * प्रकार द्विजों की मन्त्र तन्नादि से सेवा करने के लिये उत्पन हुये मन्त्रविद्या के बत्ता तथा मन्त्रवेत्ताओं के दिगन्त जेता, जीतने वालों को भी जीतने वाले, मन्त्र शासियों में भी प्रतिष्ठा पाये हुये, विचित्र लीला ( धारण शक्ति ) दिखाने वालें, और ऐसे पुरुपों से अपनी लजा को रखने वाले, किसी देश विशेप की चिंता को धारण न करने वाले अपूर्व तेजस्वी श्री विजयानन्द जी विजय प्राप्त करें। (नोट ) यह वात फिी अन्बाला निवासी मूर्तिपूजक समाज के पृत पुरुप से छिपी हुई नहीं है कि एक समय जबाते में मूर्तिपूजक समाज की दृदियों को साय बड़ी घोर लड़ाई हुई. जिसमें इंद्रियों को बहुत चोटें लगी, और अदालत में भी पर्चे हो गरे, महाराज साहय के सापकों ने महाराज जी से कहा कि बड़ी सरल सजा मिलने की सम्भावना है. कोई माया हो तो हम पच जायें, तब उन्होंने उनको एक माली मटका ( पदा) देकर कहा कि इस नाटक को वन ना कर हमारे पत्ताय दुबै मन्त्र का जाप रो जान दिन में ज्यादा पानी से भर जाद खर मोड़ देना, पिर नुमने कोई चिन्ता नहीं ! उन लोगों ने देश कोरिया किन्तु अप करने में नाम कम था, पारने पर में पानी देने को लगन अधिक दी. दो पडे में पानी ना शाम पा. मोदी का स्प पर करता को दिल निशarathi हामियों को मिलोमी! मग পথ ধাবিয়া : हिजमजनजनिीयान- हो जी जाग येपानाममु ने द्विजाः । यथा अमान्य द्विग्फ-ति मंना नाम्न्यव पदयमाश्रिन्य प्रमिद्धिमिता, नयावापि जपन्यज इन्यम्मिन्यातिपदिक जाहपमड़ा यान गदा अपि हिना त्यामधीयग्न । न हिजानां (हाणामपि ) मध्य मायम्य जनाय जननाय (सा. दनाय ) अनियम्य म हिजमजनजनिः । जननं जनः, ( पनि प्रागपि यत्रय करिधानन प्रतिम ) मम्म मारण्य जनः-मजनः, मजनाय अनिमंजनजानः । मसारपस्नु यथा- "पितृप्रापिय मानिमीतं मयाल । माः पृमि जल प्रमा माग्गनिनाः" "मं नये मग मागे" "नमा म नाप गर्ने पारनन्दाः" मेगावाः, अमियानगरमा मारम्वार रामनाशायमाया मानगो धर्म लिगमा धानन्दागिः। परम जिन मापनास्त्र

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(१)
-
गच्छन्तो लग्जने, यतः प्रथममेव नद्रागन नामसालिन्
विका मजन म्म । नदनं यथा-
"न जाग्जानम्य ननाटगृहगं कुलप्रमनप्प न पानिन्!
यया यया मुभान वाक्यता नयानया नम्य उलं प्रमाणम्॥
अनमंचम्पप्रत्यवताग्गिंगवायनाति मारः.
सलमान जीयादिन्यन्वयः । गो ययाम ॥
माया-द्वितम मा कुलीनता लानत यष्ये पुर
हे विमग मी जन्म शार, वियप प्रतिमा
पिता विस्यमा मनाम पर नागमन
नही मरने, यात मीना को वन में टमा
बनता दिनही . मरती थीम
मर्म का जननं ३ , मोल नपानं
वणे, नया गान in मनोमा पारपत्र
वर्मा (न)ोदाराना
arti.: • IN
मांग
प्रय
हितमानमानी -
हो गया:-त्रा

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प्रय पदायिगोय द्विजभजनजनिः- द्विज्ञायन्नं ने द्विजा अण्दनाः, प्रथम मानुगंमाग्जा यन्नं एटम्पंग, नश्वापण्या निगु (जार) संग जायनं, यन अण्डजाअपि हिजा उन्यन्न, "हिजः म्याद् प्राधगधर- चपदन्नाण्डजेपु ना" इत्यमरः । पूर्वानाधैं 'जगवानी कल्यागाय जानः' त्यमिधानादन्यसामागिनां सिं- म्यापानिपंनिता मादित्यभिप्रासंगाध्यमागायों: गजटिविषयको सिगानं । नेपां दिजानामादनाना मम्य गिरम्य (कन्यागम्य) जननाय जनिन्म यमामा हिजमजनजनिः, अगाजमृष्टिगपि विप्रियः प्रमिले। যা ঘনাে মৃহিঙ্গারা সাবি, গলার नीवादिम्यागपगहान्यर नापन्ने, अनःपंजटाया जमरामानमारः । नानपा यानीवाटीनामा यापटगन कन्यागमनेन रियत र पया रियायः ॥ । मय-TTAR 47 4.1 यंग 4 2-41.124. ar" * 47 minut योगानुकूल जीवन बिताने वाले, पूर्वोक्त विशेषणों से युक्त श्री विजयानन्द विजय प्राप्त करें। श्रय सपिशोध द्विजभजनजनिर्जीयात- अधेदानीजरायुजाएडजस्वेदजेति त्रिविधाया एव सृष्टेः कल्याणकारित्वमस्मिन्दर्शयता चतुभ्या उद्विद्नायाः सप्टे- विषये तूपंक्षाधुद्धिर्दशितपेनि न दोपराहित्यमत्राप्यरगम्यत इति न शकणम् . अनेनैव पदेन तदर्थस्यापि भानात् । तदित्यम्---सोऽपि नंवत्सरः कृपीपलयोरेय भा- गयोविभत्तः एकस्य विभागस्य नाम "सायनी" इत्यभिधी- यते, द्वितीयस्य च नाम "भगादी' प्रीत्यने । यहादतियो- जरायणरूपेण भागहरामस्तीति । शनस्नयोहयोमागोजी- বন তিলনা হিল হল না। नेपामपि भस्य न्यायमा जननार जनियस्यानामिजमजन- अनि : । उविजानामपि वेदनमर्दनदनादिसंन विधेयम् नेपपि जीवनझापान, हिनावानेव नगियानन्यान, स.. मातभानगात-न्यासाशनमा स- मृष्टानुपारिन्यमनन पिशान सपनामाप दनयन्त, यत्र न मन्दागोपीनि शाम ।।

(5) मायाय- -टम पूर्वोट दान में कंचन उपयुद्ध प्रहार मंजष्टि का ही वगन हमा, अब दिदत मंत्र का बन मी:मी पट में किया जातामातीमा माई अथवा मावनी में प्रसन्न होने वाले दृशमला गुन्म की पृषी में टान होने वन्दियनीया कमीकम दान प्रांत प्रागन गीतों को भी नहीं पर और जयप्रयता में मोमकार नम काम गरिने मनल नष्ट नको माग में न पाने कवि पवन श्री विजय व || प्रादायगी गारागिरगोजागान- म, पार, दार्गन, क. निझंटा, य: समय रिलाहाना मा कन्यारातियात काम ধীন বিনা খাল সকালেমা दार्गस्तान प्रार, दान गर्थः, गार प्राममन्नामांवर दात मातिाला दान मन म प्रा--. मियागरा-म, दाना ।

ne (६६ ) आपूर्वकस्य " गती" इत्यस्य लिटि रूपम् । स प्रार इत्यत्र "सोऽचि लोपे चेत्पादपूरणम्" इत्यनेन सन्धिः, शसयोरक्यात् स इति छेदः । यहा सारम् धनम् ददाती- ति सारदा धनदा श्रेष्टिनस्तेपामारत्तथा रक्तः-सारदार- क्तिरक्तः, शसयोः सावरात् शारदारक्तिरक्तः, "सारो चले स्थिरांशे च मजि पुंसि जले धने" इति मेदिनी । अथवा स अर दा रक्तिरक्तः-अरं शीघ्र ददातीति अरदारक्तिरक्तः "लघु क्षिप्रमरन्द्रुतं" इत्यमरः । “सोऽचि- लोपे' इत्यनेनैव सन्धिः, अविपक्षयव दानार्धकान् "उदाञ् दाने" इतिधातोरकर्मकत्वम् । तदुक्तम् - "धातोरान्तरे पत्ते धात्वर्थेनोपसंग्रहान् । प्रसिद्धरविवक्षातः कर्मणोऽशामिका मिया ।" यदेव यत्कार्य सम्पादयितुमती मनागप्पोष्ठी सञ्चा- लपति, तदेव ने श्रेष्ठिनम्त्वरितमेव धनव्ययेन पिधापय- न्तीति हेनोः सर्वकल्याणकारित्वं तस्य रूपपलमेव । पर- म्भूनः स जीयादिति परेणान्ययः, ननच यथार्थम् ।। भापाय-महाराज पा.मानो पदमनी नया - गायों के गान होकर या दानयोगे पोराको सपोग करने मो. ने पाय मे दामों में सिर पर हिर पने पार, नि मन শর্যা ম দ খান, নল, , , সক মনে ন ম রপ্তানি না ? ” হল কি ন ম ম ম বল নি ? স্বা, মা যা শিম জানি না iঃ গল্প । খাবায় বিলা নয়- েিনা লাল লাল মরি: ঘষা , স্ব- নি: সর বিনাশ্লান না, বা বলা যায় { ঘষা লে, বিমা দাশ। চালানাদার । ঃ না । পানি পাবনাবানল, স দাবা z্যিা দানা বাৰি । সে বিশ্রানৰয়া, না" নামল । স। গাৰি নিশান র ৮ রাখে নি, ন পায় স্বাগম ::~~ঃ rধানখানা লি- স। রপ্ত করেন। fা, " " " ( ७१ ) नात विपः सर्वापहारान्नकारान्तोऽयं शब्दः । यथा सूर्यः स्वकिरणः प्रकाशं ददाति, दुर्गन्धश्चापि प्रशमयति, तथैवाऽयं महात्मा ज्ञानमुद्भासयति, दुर्वासनाश्च विदुरयती- ति हेटोरियमस्याऽनुकम्पैच, न किमपि स्वार्थानुसरणम् । तत एव सूर्येण साम्यम् ॥ । ध्रुवश्चापि सुमहती शिक्षा वितरति । यथा विचल- त्यपि सर्वस्मिज्योतिश्चक्रे ध्रुवः स्यम्धान एव स्थितः, तथैव प्रचनमानेऽपि संसारचक्रे विद्वद्भिः सुमहर्चाि न भ्रमितव्यम् प्रत्युत सुद्धतया स्वधर्म एव स्थातव्यमिनि- भाषः । एतादृश्या शिक्षयाधु चोऽप्यनुकम्पते जगति, एवमे- यायमपि महात्मा म्वधर्माश्रयणे तद्व्यवहारे चापि गुर - रेव स्थातव्यमित्याग्रुपदंशशिनणेन सन्मार्गनियोगेन सुतरामनुकम्पत एव, एरमेयान्यान्यपि विरोपणानि यथाय नियोज्य, जीपादित्यनेनान्वयः ।। भावार्थ-पूर्व के समान कारा हर नगा KATTA रुपी भहार होकर कर संसार कारगरने बानमा गरेमा ममा निधन में गद . सोमारामारी परदेशी मी विमान में विभागले गये, या का विमान !

प्रय निगायः जेतृजना जीयान- जेतारः प्रचण्डदादरामुन मुमण्डने ममन निगमला. गनिनिरई म्यशामनन नंतारः पंगळमंग शामिवार क. यः, नेपां जेतृगां जः विजया नियन्येन पहिमाम्याची बेतृतः, नम्र्य जेतृजम्य-:-गतिः, उपगंनगपिन्न प्रमाःगह इनि यात्, अमातृजः, नं जेतृ जयम् नर्गत पारंगधति नाग्यनि या नेतृजेता, विजययानिनामपि गाः, हिंमारियजन्याहादिगंगम्य निरागपिना । यहा हिमाविषमेर रिमगंगः, नम्मानार्गपता ननिगम नन्यर्थः । अयादिमोपदेशात् पापाननमूनगिरम्या निगमागास पगडपम्पकाउनिगरगनान्गारिन নবালাগিদোলন বানি नयं प्रमाग्य नतः परं मियां हिंमनम्यारागागाग- नार्गदता, "प्रगामानः कारः" इत्युका नशामाला नमन गिंधमृदय मंत्रीत्रमार्गमता, प्रचारप्रमालाहिति मात्रः । दिनारंगत " नानपन्नाम:" :: "ग" की दलान टा, "गामपनगरान" । एता पाय-

( ७३ )
वृत्तिकारः, तम्य फलन्तु क्वचिद्दीर्घः, क्वचित्सम्प्रसारणम्
क्वचिद् द्वे क्वचिद्स्व इत्यादि प्रदर्शितं दीक्षितेन,
तस्मादत्रापि दृशिग्रहणसामर्थ्यास्वः । जेतृजेतृ-इत्या-
कारकस्य प्रथमाधिभक्त्येकवचने रूपंजेतृजेतेति, पापात्मनां
पापनिरतान् भावान् व्यन्यास्य पापं प्रति घृणोत्पादनना-
हिंसात्रतधारणानुप्रवर्जनमेवास्य तरणन्तारणञ्चापि।इत्यलं
विद्वत्सु विस्तारप्रस्तारेण । ततश्च यथापूर्वमवशिष्टविशे-
पणप्रयोगोत्तरम् जीयादित्यनेन सम्बन्ध उत्पः ।।
भावार्थ-शरन-युक्त शत्रुषों को हिंसा फरफे विजय प्राप्त
करने वाले निर्दय पुरुपों पर भी पहिलोपदेश द्वारा हिंसा से
हटाफर उन्हें पार उतारने वाले, इसी सिलसिले में परस्पर विरोध
को भी मिटा देने वाले, इसी प्रकार हारनेवालों के हृदय में
हारने से उत्पन्न हुई बेदना और जीतने पालों के चित्र में
जीतने के हर्ग से उत्पन्न हुये महार फो सयुपदेशों से
मिटाफर पिछले फिये पर पापारा और मागे के लिये निधि
फराफर जैन धर्म को विजयताका लहाने यासी सथा प्रयोग
विशेषलों में भी पिजगनन्द जो पिजय प्राप्त करे ॥३॥

प्रयकत्रिंगीन्यः जिजि_मनिनुतिगतिमिः पृजितो जीयान- गिनसम्बोधनार्यरः वगनविपः। कानिन्म म्बोधनार्थगन्दानां पग्नाऽपि प्रयोगा लन्यते । यपा- "गम है न्यां मजाम्यहम्" नेन ऐ जिष्णुजित !जिग्दिः "जिगनेंगपमानामः"त्यमामिहाभियानात, नम जिन जयनिम जिगुजिः कामः, "कामजिन पर पगांना अपि न्यना अहन्यां प्रपंट" नि पुगलिया. जिगमात् “जि जयं" न्यम्मान 'न्' प्रागादिर: प्रत्ययः, याहुलकाहिन्यम्, टियानोरः । अयागि. र चियः, गिग्रहणमानथ्यांन तुगमारः। नियति ६पने-अमी जिगजिदः, "त्र पायाम गर्दक व्यम्माकमंगपटे-"यातानुरामगं यः" इत्यनेन : नाममुद्रा है जिजि सामामिमा पर्यः । मतिः-मनुतगति यानत्रयांतिजन्याम या मा मतिः कालवानाम्या, नाया दतपः स्तुतयः मलिनुपः, নামান দাগানবিলাবলামৰাপান। नमिता मानजितः मानीपान ।। रहा मजनुमानिमिंग कामवामिः ( मर सीमान, मांग T.

( ७५ ) जायाःकारणम्, अत एताभिर्जुष्ट एव भवाजीयात् जीव्या- दित्यर्थो वाऽप्यूह्यः । शेषम्पूर्ववत् ॥ भावार्थ-हे इन्द्र के जेता कामदेव को भी नीचा दिखाने वाले, और केवल मानानुसारणी मति की स्तुति से युक्त अथवा इस प्रकार की मति तथा स्तुति और गति से पूजे हुये तथा पूर्ववत् विशेषणों से युक्त श्री विजयानन्द जी चिरकाल रोक जीते रहें जिससे संसार का उपकार होना रहे ॥३१॥ . अथ द्वात्रिंशोधः दायादयात्री जीया- दा-सा-यय-या या -इति देदः ! "नियनिता च दा" इति विश्वदेवशम्भुमुनिः, श्यानम् अय:--प्राप्तिः, "ग् गनौ" इन्गम्मात् यार्थे 'एर अत्यने- नाचनत्ययः, "धनजपाः पुंसि" इत्यनेन पुंस्त्वम् । पादनम्- पादः--भोजनम, गिजन्ताद् "पदभक्षण" पादादिका- आवे घन यानं गा---पाहि: -नि:-जीवननियहि इति पायत, "पा प्राप" इत्यती माय शिवबा दानामिन- न्त्रीमान सामन्नात याय....... ज्यादाय: सस्मिनदारनिगाबादनमा নাথ { খান। t शान्न ग्म में ही मदुपदेश द्वाग निन्द्रकों में निन्दा नीर पाल में पापलमी युड्याकर उनको मामार्ग में लगाने वाले श्री विजय नन्द विजयी होयें, गर पूर्वया ॥३॥ সুষ মিশে लोललीलम्बलाज:- । अब न, उ, लनी, मनग्न नि छदः । ग्लो क्यानम्य म्यान :, टनयोग्ययान ननीयम्य स्थान लडी-नि पाध्यम् । पुनर्गप ग्लपांगवान् नपनान ज्यम्य म्यानमग्न नियम् । गनी-पान न्यवश पदन्यं पायव्यम् । अस्याः :- भाग- धनम् ) मगरहजनम्, "r: गिरे, कामे, निधी, मनी, आगयन" मियानगजेन्दः, 3: निगग: महाग था, ": अनुम्मायाम, नियांग, यहाग"यन. पानगजेन्दः, "ला ग्लिागं" निमारादि धात: पाटी। नरियननं ना:-पिनामः ( मान. प्रम कः, गवनाय--:-निगंगः [ मानया नम्मिन्नानानां प्रारम ] महामार्गा, [ मगरहने बानि नाम या, निगल या मामान:-महीनाम:

( ६ ) [आनन्दः] रोलडः, सोऽस्यास्तीति रोलडी । रल- योर्डलयोश्चैक्यान् लोललीति जातः, आराधनाङ्गीकारस्य तन्नियोगस्य वा विलासवान्नित्यर्थः ॥ लस्वलज्जः( रस्वरज्जः ) र कामः, तेन कामेन स्व- रन्तः--उपतप्ताः कामिनारस्वरन्तः, "म्वृशब्दोपतापयोः" इति भौवादिकाच्छतप्रत्ययान्तप्रयोगः । तेषां रस्वरतां जा-देववाहिनी ( गङ्गा ) यत्रासी रस्वरज्जः, रेफम्याने लादेशालस्वलज इति सम्वृत्तः । यथोपतापवतांदाप्रशमना- य गङ्गा प्रयहति, एवमेव कामोचापितानामपि तापन- शमनायास्योपदेशवचांसि गलायन्ते स्म इति तात्पयार्थः । शेपम्पूर्ववत् ॥ भाषा-सपनेप्टदेय राषन पो मोकार शाम पाले तथा अपने अनुयायियों को अपनाय में बारामन में लगा देने से लानन्द घटने पाने, तथा कामायनों के काम मञ्चार से समास पदयों में शाम्नि पहुँचाने के लिये कहा सो की मरह शीललना का मापार करने पर मो भी चोग पहन पाल, गमा विशेषाणों में rram. मादी विजय पान का ( . ) प्रय पन्नगाय: कंदागदाम्यदारी- "कम्-मनः" नि शब्दार्थचिन्तामगिरमियानग- जन्दग्वापि, "ग्रीः म्मग्ग" इन्यमिधानगजेन्दः । मान् म्मग्गम् ददातानि-नोदाः, आसान् "टान दान" त्यम्माकिम, दागगाम म्यागाम् आदा:- दागठाः, के मनमि दागदाः कंटागटाः, "अमधमानमा पागाउकामइत्यनेन मनाया अनुरू, पदी वंगा, "हम्नग्मीनुरायः म्यदः" इत्यमरःानम्मादागा. न यनि-धारतान्यांगाना कंटागदाम्यहाग, पि योनिमगटाग्यानकाइ घारनीति मारः ।। মাধি র থানালা নাৰি গান- নাম্বার, ন ম ফার্মানিষা। সার सियामाग्निः पर यगिता नि नपाः ।। माया-rit काम या मा भारी पत्र (rint मानिन में intini मा. मात्र में विनाम या riri अपने nिarizier" s ༣ འt ཤཱནསཾ. ཙr rj4 . m ( १ ) याचरण से उर्ध्व रेता बने हुये, तथा अन्यान्य पूर्वोक्त विशेपणों से युक्त श्री विजयानन्द सूरि विजयी होवें ॥३॥! अथ पट्त्रिंशोऽयः विमलमधुमदोद्दामधामप्रमत्तः-- विमला नाम काचिद्देव्युत्कलदेशे । तदुक्तं यथा- "उत्कले . नाभिदेशस्तु रिजाक्षेत्रमुच्यते । विमलान महादेवी जगन्नाथस्तु भैरवः" इति।। तस्या विमलाया यन्मधु मघम् ( भोगव्याजेना- हतम् ) तहिमलमधु, तस्य विमलमधुनो मदः--मराता विमलमधुमदः, तेन विमलमधुमदेन-उदागानि--उन्म- बलानि धामानि-शरीराणि पान्ते विमलमधुमदोहाम- धामानः, "उडाग पर यातिय स्वतन्ने "इति शब्दार्थचिन्तामणिः । “धाम देते, गन" इत्यादिरपि शब्दार्थनिन्तामगिरे । नान पिगलमधुमदाबामधान्नः मग नानि करोनि , नादानियाई पानी पिमलम- मदोरामपागम्मत, नस्य निमसमधमाशामागप्रमनःवाममानिमिया माति- पाद मां नमवादिगए नपान •inition - निगमननि मावः ।। भावार्य-याममार्ग में मद्यमांमादि द्वारा भगवती का पूजन करने वाले और भगवनी का भीग ममम. कर या कार मामांम के मेयन में अपने गैर पर मी का न मने वर्ष সমানিয়া & না যায়বিকা ৪ বার , मुधारने याने,हमी वाम्न जानने वाला मानाननं यनभयान मी पहुये श्री विजयानन्द जी विजय प्राप्त करें। रविन यंदन ॥॥ পাষাঃ - प्रथाएना पुनरपि विलोमायर गम्यते- विमलमयमदोहामगमत्रममा जीगान- मयमामा मानिसम, पिमनं निमनम मन्दमा नमय-तिमिमलम्यु, नष्प पिमनमथना मदन - মান- বানি যানি ঘামান না पान निममदातामयामानः, मगिरमिति यान जालना निगमन गगन कार मानिनीनानानगरपद नान्ता मानां, समादमाग पा ग निगमनागमनमाना ग

(मधुमक्षिकाः)जायन्ते, तान् मधुकान का
दामधामप्रमत्तः । विमलेत्यादिन्द्रमानन्द
डः प्रत्ययः, डिवाहिलोपः । माहिती -
शेपं यधापूर्वम्, जीयादिन्पन्न नबन्दः
भावार्ग--- यमनमादि शुभ यो कितना
(शहद की सम्पति रिभर रियाल
लगेको हो शान रममा ने
महमेश र करा
पानी
विमान मार गि
( ८३
समागतोऽयमृतुराजः शत्रुमस्मदी मार्टनर
प्यति, विपुलमधु चास्मको
कान्मधुप्राप्तिमूलकान्मदाद् (हाल
[ मधुलोभेन तद्ग्रहाना मनिक
विमलमधुमदोदामधामप्रमथः, तान नन्द
धामप्रमथः कर्मभूतान् तर्जयति मन
भर्सने" इत्यस्माद्धातो: "यन्येबारे का
शरेव बोधयित्वा तदात्मभिरेव नान् विशः
महर्षका रस चूस कर पर मन बन
को gavat गर ारणों की गर
Anamnp

प्रयायरिंगांय
यंदागदास्यदारी जीयादिति-
अत्र क-2-अटार-गोदाम्पदानि छः।
*:-कामः, "क:-अनगि, मिनी, कान, अग्नी, वार,
यम न्याटिपु" इत्पमियानगडेन्टः । ": गमनागन.
मनायाम, घागीयहरे, पदनं, माने, गती नि
पामियानगजेन्द्र । नदिल्यं नमन्नि दाग: पित
বললাপাদাতা যানানয়ন
न्यान् महागन या तामाभ्यन कामांगन वारि नामा
दिमनम्रता ] ना-प्रहागडायन,
ना जान [ कोमा यामः, गोदरः पाप्य Ar,
रिश तम्य पालन, कया नमानसम, यमायामा
रियत, रिगाम्यारिमझिमलम मति, त्रिनमा
गर्म का या दर्शनरत पाटिलमानर ]
अदागदाणं मानिदिदापति [ निगतीनि पार
नील पम्यामां महामार्ग "IRE
r:" हनन के मानान, दार :: हाला
पनामा यम, दागलामा
टारमा: मामा , : writ
मतपत्र, नया i

तद्धयानमेव निराक्रियत इति भावः । तादृशो जीयादिति ।
राई विधुर एवं नासधारी तथा तपस्वियों के वित्त में कदाचित्
सी न होने से उत्पन्न हुई उदासीनता को (काम देव क्या है
यह भोगना चाहिय. किस रीति से उससे बचा जाता है,
पचने से क्या लाभ होता है, या सुख पहुँचता है, और वह
मुख्य काहां में किस तब मिल मफता है? इत्यादि) तत्वज्ञान द्वारा
मिटाने वाले, अतएव विचित्र लोसा घाले, कामदेव से अपनी तथा
सपने मतों की प्रतिष्ठा पचाने माले, योगमार्ग के पूर्ण ज्ञानी
राथा पूर्व पिशेपरणों से युग, श्री विजयानन्द जी विजय
लोललीलत्वलजो जीयान् -
प, चालायाम्, नापान्" नि यार्थचिन्तामणिः,
लोला जिल्हा "लोला जिल्हापाम् रामलायाम् , थि-
चागल्याद लिपि लामा, मन विविध तद्भवति, एवं
यापनम् सिनीय मान्यादान पर
सानिमाजमकमपि स्यान, सभाबादशान्तु र
अवशिष्टं यथापूर्वम् ॥
( ५ )
भावार्थ-~-संसार में प्रियों से पाली रहे हुवे कुवारे तथा
कसे उसका व्यवहार होता है, क्या उसका फल (नतीजा) होता है
कोनयापारिशोधः
पातन्तु

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प्रयोग की शिक्षानुसार चलान वाले श्री विजयानन्द सूरि महाराज विजय प्राप्त करें, शेप विशेपण पूर्ववत् ॥३६॥ अथ चत्वारिंशोऽर्थः खलबलदलनो जीयात्- अत्र खर-बल-दल-न इति छेदः । खरो नाम कश्चिद्रावणरावसस्य भ्राता प्रसिद्धो रामायणे, यः शूर्पण- खाया नासिकाछेदनानन्तरं दण्डकारण्य एव दूपणेनापरेग भ्रात्रा सहितः श्रीरामचन्द्रेण सह याद्धं समायात् । तस्य खरस्य बलं वीर्य सैन्यचापि दलत्यसो खरवलदलः, सा- चलपूर्वकात् "दल विशरणे" इत्यस्मानीयादिकादानीः पनादिलक्षणोऽच्प्रत्ययः । स खरबलदल एव सलपल- दलः श्रीगमचन्द्रो, रलयोरक्यान्न भेदः। तेन खलबलदलेन नः सनाधोऽसौ खलबलदलनः, "नो नरेन सनाये च. अनाधेऽपि गते" इत्यकारकोपः, "नायः कुलपर- म्परागास्वामिनि" इनिशब्दार्थचिन्तामणिः, न नापन सह इति मनाया, "साच मः नमानाम्' इत्यनेन मह इत्याच स्थान मादेशः । सनेन विपरोन श्रीगमन- शे नियोजय महामायन्य उन्माभूदिति राहिलो ऽगमः, नागुमनाशनम्नारगुपयन्दन्य म- भावदिवापियनीति, मगनीयन मा.कामिन

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. . दावादयात्री जांपाद- इवानां नन्ही दमन . कचन दया या स्वातच मृतदया नर दया करना काकांच- नन का दान.नायकवान. नवादानव नहो इयानकातम्या. "नन्दनः इन्चनेनालन्ययः सद्दामा अदालत वाय.तः देव- पाः . "दोनने इन वजन्ययः. वांकापादान प्रयो निकनगेन डनी दादयः 'इस गतौ इन्चना नावाको जयः दायावर दायानुन ( ६ ) या समन्तात् नोटयति ते दायादयात्राः, दयाभावनाश- कानांमध्ये तादृशानांगते:--उत्तरोचरवृद्धनिरोधका उपदे- शाः (तादृशा भावाः) दायादयात्रा, प्रापर्वकात् "त्रुट छेदने" इति तौदादिकारिणजन्ताद् "अन्यप्वपि दृश्यते" इति डः प्रत्ययः, डिवाडिलोपः। ते सन्ति यस्याऽसौ दायादयात्री, कलौ दयाभावं निगिलन्तो नराः प्रतिदिन- मुत्तरोत्तरं वर्धन्ते स्म । तद् दृष्ट्वानेनाहिंसावतस्योपदेश- फराणि व्याख्यानानि दातुं समारब्धानि, तैश्च सा प्रगत्ति- स्तत्रैव न्यरोधि, तत एवोच्यते दायादयात्रीति । ततश्चा- न्यान्यपि विशेपणानि सन्नियोज्यान्वयो विधेयः ।। भावार्थ-दया के भावों को समूलोच्छेद करनेवाले यवनादि निर्दयों की उत्तरोत्तर बढ़ती हुई निर्दयता की गति को तोड़ने वाले, अर्थात् निर्दय मांसाहारियों के चित्तपर भी "अहिंसा परमो धर्म:" की छाप डाल कर हिंसाको रोकने वाले व्यायानों के दाता तथा पिता के परम प्रेमी इत्यादि पूर्व विशेपणों से युक्त श्री विजयानन्द सूरि विजय को प्राप्त करें ।।४।। अथ द्विचत्वारिंशोधः जिष्णुजिङमतिनुतिगतिभिः पूजितः ऐ जिपणजिह ! मतिनुतिगतिभिः सहितोऽपि भवा- न्यूजितः "जिष्णुना वासवेऽजुने जित्वर वाच्यमादिनि" (६० ) इति मेदिनी। जिष्णुरज्जुनः, तम्य जिह व जिह्वा यम्यामो जिष्णुजिह्वः, नन्मम्बुद्धी हे जिष्णुजिह्न !, ऐरिति सम्बोधनार्थकमन्नरम, नन एव ऐ:जिष्णुजिह्व इति सिद्धम्, अर्जुनम्य जिह्वा यथा मदव जन्पनि म्म, यदेव जन्पति तदेवाऽर्जुनः सम्पादयनि, म्बबाचा पदमात्रमप्यर्जुनो न विचलति । तथैव भवानपि यदव याचा प्रतिपादयति, तम्मात् पदमपि न विचलति, प्रत्युतः कार्यम्बरूप एव तद्वि- परिणमाति भावः ॥ । मतिश्च नुतिश्च गतिश्चेति मतिनुतिगतयः, ताभि- मनिनुतिगतिभिः (महिनाऽपानि शेपः) भवान पूजित, पवि- बतया कत्तु भनया जिनः, पवनं पृ: "पूङ् पवन' इत्यता भावे क्विप्, पू: पवित्रा शुद्धिः, मा च कायबाङमनोजा । तया जिना वशीकृतो जगज्जित्वरोऽपि कायवाङ्मनःम- त्यताभिस्तु जिन एव, मन्यव्यवहारवशीभृत इति भावः । इह हि निन्दागभितैः शब्दनिन्दायामपि स्तुतिरेख मुच्यते नास्त्यत्र रोपदोपहेतुः, एवं जितोऽपि भवान् अवशिष्टविश- पण विशिष्टो जीयादित्यनेनान्वयः ॥ भावार्थ-ऐ अर्जुन के सदृश जिहा से निकले हुये अपने शब्द मात्र को भी प्राण पण से निभाने वाले श्री विजयानन्द सृरिजी महाराज ! यद्यपि उत्तम गति से युक्त श्राप सारे भावों के

(१ )
जता है, तथापि पवित्रता (अंतःकरण की शुद्धि) तथा सत्यता
ने आप पर विजय पाई हुई है, अर्थान आप सत्यता और पवित्रता
के वशीभूत होकर इससे एक इञ्च भर भी बाहिर न जाने वाले
तथा पूर्वोक्त विशेषणों से युक्त पाप जीने रहें ।।४।।
अथ त्रिचत्वारिंशायः
जेतृजेता जीयात--
जेतृणाञ्जतृषु वा जेता (परतरो जैतेत्यर्थः) "जि
अभिभव।
इत्यस्मात्तृच्, अभिभवश्च न्यूनीकरणम्
न्यूनीभवनं च इति दीक्षितः । तस्मादव जेतृशब्दस्य न्यूनी-
भवनमेवार्थः, सा च नम्रता एवं ज्ञेया, मज्जनपु विद्वत्मच
तस्या एवं सद्भावात् प्रशंसाहत्वं सर्वसम्मतं भवतीति हेतोः ।
तथा चोक्तम्---
"भवन्ति नन्नास्तरयः फलोद्ग्मैः ।
नवाम्बुभिरिविलम्बिनी घनाः ।।
अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः ।
स्वभाव एवैपः परोपकारिणाम् ॥"
अन्यचापि-
"नमन्ति फलिता वृक्षा, नमन्ति सज्जनाः सदा ।
शुष्ककाठैश्च मूश्न भियते न च नम्पने ॥"

एतेन विशंपणनाम्यऽहकागदततादयो दापा नि- रम्नाः, अभिजनन्वादिकश्च म्पष्टतया प्रतिपादितं भवति । ततश्चाऽवशिष्टविशेषणानि यथापूर्व संयोज्य जीयादित्य- ननान्वयः ॥ भावार्थ है निरभिमानियों में सबमे बढ़ कर निरभिमानी, यहकार और उद्धना ( अकबड़पन ) म रहिन नथा टमी प्रकार के अभिजनों ( परिवार ) में युक्त, नन्नता के मञ्चार करने वाले, तथा देश देशान्तरों में जमा बङ्ग में विजय प्रान करने वाले, विलक्षण लीला वाले, नथा पूर्वोत. विशेपणों में युक्त श्री विजयानन्द मूरि विजय प्राप्त करें ।।४।। अथ चतुश्चत्वारिंशोऽर्थः शारदारक्तिरक्तो दिग्जता- स-पार-दारक्तिरक्तः, उ-दिग्-ज-इ-ता इति छेदः । स [ यः पूर्वोक्तविशेपणर्जुष्टः ] दारक्तिरक्तः, दे दाने श्रा समन्ताद्रक्तिरनुरागो दारक्तिः, तया रक्ता दारक्ति- रक्ता दानशीला धनाढ्याः । उः शिवः, तस्य दिग् उदीची तस्याज्ञो मेरुः ( स्वर्णगिरिः ) असावुदिग्ज:' 'जः पुमान् विजये मेरो" इत्येकाक्षरकोपः । तस्य ":" ( लक्ष्मीः) इत्युदिग्जेः, तामुदिग्जयम् मेरुश्रियं तस्यति उपक्षिणोति- उदिग्जेताः । दारक्तिरक्तः सहकारिभिरुपलक्षितरुदिग्जेता (१३ ) असौ दारक्तिरक्तो दिग्जेता आर जगाम यत्र तत्रापि सर्वत्र । मेरुस्तु स्वयमेव स्वर्णशैलः, परं स्वर्णदानेन कस्यचिदप्य- भिलापान पुरयति । अयं महात्मा तु दानशीलर्धनाय - धनदापनेन दीनानां कामनाः पूरयित्वैव मेरुशोभा क्षिणोति । अतएवोक्तं केनापि- "किन्तेन हेमगिरिणा रजताद्रिणापि यत्राधिताश्च तरवस्तरवस्त एव । मन्यामहे मलयमेव यमाश्रितास्तु । सर्वेऽपि निम्बकुटजा हरिचन्दनाः स्युः ।।" अनापि यथा कविना मेरुमहिमानमुद्दिश्य मलय- महिमैवोपवर्णितः, तथैव प्रकृतेऽपि । उदिग्जेपूर्वकान् "तसु उपनये" इति देवादिकारकरि स्विम्, "अत्त्वसन्त- स्य चाधातोः" इत्युपधादीर्घत्वम् । यद्वा "इण अमिः" इत्यौणादिक आसिप्रत्ययः । बाहुलकाहित्यम्, डिवा- द्विलोपः, जेतृ--इत्यश्परत्वाद् "भोभगोः' इत्यादिना विसर्गस्य यत्वे, लोपे च पूर्वपदान्तस्याशारस्योगरपादा- दिफेन इकारेण सह गुणत्तन्धिनित्यसमाससदाचादिति बोध्यम् । स बार इत्या "सोऽचि लोपे नेत्पादपणम्" इत्यनेन सन्धिः, शतयोरक्यान शार इति निम्पनन् । शेष यथापूर्वम् ।।

(2) भावार्थ-हे प्राचार्य जी महाराज ! दानशील धनियों के द्वाग दान दिलाफर दीन हीनों की दुर्गति को निवारण करके स्वर्णगिरि मेरु को भी मान करने वाले केवल आप ही हैं। अतः दीन हीनों के दुःग्य को मिटाने वाले, नथा पूर्व विशेषणों से युक्त आप विजय को प्राप्त करें यथा अथ पञ्चचत्वारिंशांव्यः द्विजभजनजनिीयात- भम् चन्द्रमाः 'नपुंसक में नक्षत्रे गगने पुण्डचन्द्र- योः" इति । जननम्-जनः, भम्य चन्द्रम्य जनः प्रादु- भावः [ उदय इति यावत् ] इति भजनः, भजन इब जनियस्यासो भजनजनिः, द्विजेपु भजनजनिरिति द्विज- भजनजनिः, ब्राह्मणादिवर्णत्रयोऽपि चन्द्रोदय इब्राह्लादजन- क प्रादुरभृदित्यर्थः । यद्वा द्वयोजायत-इति द्विजाः, द्वि- जा चासो भजनजनिरिति द्विजभजनजनिः। चन्द्रोदयस्तु एकस्मिन् पक्षे वृद्धिपरोऽन्यस्मिन् पक्ष हासपरो भवति । चन्द्रोदयो वृद्धिपरस्त्वाहादजनकोऽसौ इतरश्च नैव । अस्य तूभयोरेव पक्षयोराह्लादग्रदेव जनिरिति विशेपार्थं सूचयति विशेपणमिदम् । ततश्च यथापूर्व जीयादित्यनेनान्वयः ।। भावार्थ-द्विजकुल रूपी समुद्र से उत्पन्न हुये चन्द्रमा की तरह शान्ति और सुख देने वाले, परन्तु चन्द्रमा से विलक्षण । चरिन वाले, चन्द्रमा तो एक पक्ष में घटता और एक पक्ष में पड़ता है, परन्तु इनका चरित्र दिन पर दिन उत्तरोत्तर बहता ही जाता है। यही इसमें विलक्षणता है। और शास्त्रीय ज्ञान में रहने हुये श्री विजयानन्द सूरि सर्वत्र तुम्हारी जय हो, शेप विशेपर पूर्ववत् ॥४॥ अथ पट्चत्वारिंशोधः शारदारक्तिरक्तो जीयान- शारा:-धृतोपकरणानि हस्तिदन्तादिभिनिमितानि, (सारपाता-इति हिन्दीभापायां प्रसिद्धानि) "शारोती- पकरणम्" इति मेदिनी तेषां शाराणां दो दमनम् (सया- परिमोचनमित्यर्थः) "दयायां दमने दीने दन्दशकेऽपि दः स्मृतः" इत्यकावारकोपः। तस्मिञ्चारदे आ-आभिमुल्येन रक्तिस्तयारतः, शारव्यवहारदगने तु विशिष्टाऽनुरागयुक्त इतिभावः, तन्मूलकत्वाद् तस्य । अस्य किल भारतश्पचा- वनती द्यूत एव मुल्य कारणम्, नन्मूलयभारनपुत्तिर- भून । यदि पाण्ड्या नव्यानिनो नामविपन्, तदा क- गादीनां धनुर्वेदपारगानां परस्पताण विनाशी नाभाव- प्यत् । ततश्च ऋत्ता चपना अपि भारते विशेषन याया- पर्ने नाऽऽगमिष्यन, न चाप्पशोकादिमिरजेललेभरीक- तोहिंसात्मको धनौरसानलमगनियन्-इत्यादिक बार- (६ ) गर्भितरूपदेशः शारक्रीडादमनपगयणो धर्मापदेष्टा जीयात् । शपं यथापूर्वम् ।। भावार्थ-मार पामों में चलने वाले जव चौपड़ादि दुव्यमनों को दबाने वाले तथा उपदेशों में जर्व के कुव्यमन को मिटाने वाले तथा पूर्व विशेषगा में युक्त श्री विजयानन्द मूरि जी विजयी हो । इम मारपामा के बनने में ही इम भाग्नवप की मारी शक्तियों का नाश हुआ है। पहिले राजा नल ने इमी ग्येल में गन्य हारा, और बारह वर्ष विपन के काट । इमक अनन्तर इम मुनकर भी युधिष्ठिर इम दुळमन में न वच मका, अन्त में राज्य को हार गया, जिमन परस्पर विरोध की ज्वाला भड़की, जिसमें भी म. द्रोग, कर्ग जैम वीर बलिदान हो गये । वीगें से शून्य भारनवर्ष पर विरुद्ध मनवाली के अाक्रमण ( हमले ) हुये और मर्वनाश हो गया ॥५६॥ कथा को . अथ सप्तचत्वारिंशोध: योगाभोगानुगामी- अत्र य-उ-ग-ग्राम इति छेदः । याः-यव- नोपमाः (प्राचारहीना नीचा इति यावत्), नेपां यानाम् (यव- नोपमानाम्) उः-भशम् (भ्यस्त्वेन) गः–गङ्गारूप इ- तियोगः, तेपामचारशिक्षया पवित्रीकरणान् शान्तिप्रदत्वा- च । "यकारः पुंसि यवनोपमे दातरि मातरि" इति त्रिकांड- ( ६७ ) शेपः । "उ अवधारणे अन्तिके भशाथै" इत्यभिधानरा- जेन्द्रः । "गो गौरी गौरवा गङ्गा" इतिशब्दकल्पद्रुमः । तेन योगेन आभा-उपमा यस्यासौ योगाभः, पुनश्च गः प्रभा प्रकाश इत्यर्थः । "गो गौरी गौरवां गङ्गा गणेशो गोकुलेश्वरः । सर्वसिद्धिः प्रभा" इत्यादिशब्दकल्पद्रुमो- तत्वात् । तम् गम् (प्रकाशम्) अनुगमनशील इति गानु- गामी, योगाभो गानुगामी योगाभोगानुगामी । यवनसह- शानां पापाचारिणामपि स्वच्छोपदेशः तपाम्मनोमालिन्यं गङ्गाजलेनेव निस्सार्य ( प्रक्षाल्य ) निर्मलताप्रदानशीलः। समये समये प्रकाशस्याऽनुरूपं [ रोशनी के मुताविक इति भाषायां ] विहरणशीलश्चेति भावः । तथाभूतो जीयात् । अवशिष्ट यथापूर्वम् ॥ भावार्थ-जो लोग यवन अथवा मुसलमानों से आचरण चाले अथवा प्राचार हीन भी यापको मिले उनके भी पापाचारी को तथा मलीन अन्त:करणों को गाजल में स्नान किये हुवों को तरह स्वच्छ तथा कालुप्प रहित बनाकर सुधार करने वाले, तथा समय-समय के प्रकाश ( रोशनी ) के अनुकुल चलने वाले और उसी के अनुसार पाचार व्यवहारों का संशोधन करने वाले, द्विजनान की सेवा करने वाले, क्षेत्र तथा देश विशेष की उदासीनता के विनाशी अथवा ज्ञानमा स्वरूप होकर जान को पवित्र करने वाले श्री विजयानन्द जी पूर्वोक्त विशेषों से युक विजय को प्राप्त होयें ॥४॥ - --- अयाचकांग्गोथः वलयलदलनो जीयान- बन् गन्यन. तन्य यः गन्दः वग्वः मान्यवादः. नव वदान्तवादः । वेदान्तिनः चतु अवलोऽतिग्नि नत्र जगन्छन्यनस्ति न किन्योति बढन्ति, वन्य जगतोनियन्यान. अन एय अल्वादिनने । वर्ग नंयाचिका नाश्चापि तिवनान्यपि नतवादिनी ईतनेय नाथयन्ति, परमाननां निन्यान्यतेदनाद् द्विन्यं नकदेव निष्टतीन्यादिनितुनितान्तिनां नतं निगन्ति । अतोऽन्य नहान्ननो-पि जनमतानुयाचिन्वात् तनिकन - बनायातन । जनवाद-विवन्य योनः याद:."नः नख च वाद इत्यानधानगजेन्द्रः. अनी बन्यनः. तन्निन बग्यने । शन्यवादनाबायें : दननः । शत्रुनत- दमन इत्यर्थः । जीयात् । संवत् . -- ---- भावार्थ-भती प्रकार वन दुचे वचनान ननार को भी गन्य बजाने वाले कान के अन्य अनय दिन अन्य अन- बाड़ी वढान्नियों को नवाद को न्याना ने अथवा निराकरल (जवाब देने) ने दबानेवाले. इबर, जीव और प्रनि तीनों को नित्यता सिद्ध करने वाले, तथा वन विशेषलों ने युक्त श्री विजयानन्दजी विजयी हो ।। ८ ।।

(६६) अथकोनपञ्चाशत्तमोऽर्थः योगाभोगानुगामी जीयात्- यो दाता, गाभः-गेन धरयाऽऽभा उपमा यस्यासी गाभः "यकारः पुंसि यवनोपमे दातरि" इत्येकाक्षरकोपः, ज्ञानस्य दातेत्यर्थः । ज्ञानस्येति कुतो गम्यते----गानुगामी- तिपदादेव, गंज्ञानम्-अनुगच्छतीति गानुगामी, "गोगौरी त्यारभ्य भोगिनी नन्दनी धरा भोगवती च हृदयम् ज्ञानं जालन्धरो लवः" इत्यन्तं शब्दकल्पद्रुमे पठितत्वात् । लघु- चेतसि दातरि दानादभिमानमुत्पद्यते, अयन्तु महासत्वः, दाता भृत्वापि धरा (पृथ्वी) सदृशः । यथा धरायानराः कदाचिन्मलादिकम् विसृजन्ति, कदाचिदएडादिना प्रह- रन्ति, परं तथापि पृथ्वी तु तदर्थमनजलादिकमुत्पाद्य तस्य ददात्येन, न च तस्य हानी प्रयतते । एवमेवायमपि महात्माऽपकारिणामुपयपि दयामेव कुरुते, देयच तेभ्यो ददात्येव । यथा चोक्तम्- "उपकारिपु यः साधुः, साधुत्वं तस्य को गुणः ॥ अपकारिपु यः साधुः, स साधुः मद्भिरुच्यते" ॥१॥ एवञ्च य:-गामः-गानुगामी-इंगवस्थातः "विसर्जनीभ्य सः" इत्यनेन विसर्गस्य नः, नतः "मलजुपो ( १८० ) रुः" इति सम्य रुः, ततोऽपि "हशि च" इन्येनन रु- स्थान उः, ततश्च "याद्गुणः" इत्यनेनाकागेकारयो- रेक एव-योकागे गुणः, उभयत्रेदमेव मधिकृत्यम् । ततश्च योगाभोगानुगार्माति निप्पन्नं, पृथ्वीममः शान्तः सर्वेषां भारसहनक्षमः । ज्ञानेन पगपरं ममीच्य कार्याऽनुम- रणशीलो दाता धर्मोपदेशानाजीयात् । शेपं यथापूर्वम् ।। भावार्थ-जो श्री यात्मागम जी पृथ्वी के ममान शान्तमय होकर पूर्वोक्त मंत्राओं के भार महने में समर्थ हुये, तथा दूरदर्शी ज्ञान से परापर विचार कर काम करने वाले, तथा अपकारियों पर भी उपकार करने वाले, और जैनधर्म के अद्वितीय स्तम्भ होकर धारण करने वाले हैं. वह पूर्वोक्त विशेपणों से युक्त चिरकाल तक जीव ।। १ ।। अथ पञ्चाशत्तमोऽर्थ: दिग्जेता जीयात्- अत्र दिग्-ज-ई-ता-इति छेदः । दिक्षु जः ( जयो ) येपान्ते दिग्जाः । 'जः पुमान् विजये, मरौ" इत्येकाक्षरकोपः । यद्वा दिशां जा:-जेतारो दिग्जाः, "जो मृत्युञ्जये, जन्मनि, पितरि, वेगे, जेतरि" इत्यभि- धानराजेन्द्रः । जेतार एव नृपत्वेन शासनं कुर्वन्तीति हेतो- दिग्जाः (दिक्पालाः), तेपां दिग्जानाम् (दिस्वामिनाम) ( १०१ ) ईम् मोहन्तायते (तनोति चा) असौ दिग्जेता। श्राद्यपक्ष यकारान्तः शब्दः, द्वितीये नकारान्तः । दिग्जेपूर्वकात् "ताय सन्तानपालनयोः” इत्यस्मात् "तनु विस्तारे" इत्यस्माद्वा कर्तरि विप् । सौ परे "लोपो व्योवलि" इत्यनेन यकारलोपे सति प्रकृतरूपस्य सिद्धिः। द्वितीयपने नकारा- न्तो राजयत् । अस्य दिग्विजयसम्पत्तिं दृष्ट्वा दिक्पालास्तु अस्माभिस्तु दशभिर्दश दिश एककेनककादिगतिकाठिन्येन जिताः, अत एवैकैकस्यां दिशि हि प्रभुत्वमस्माकम्, अनेनै- केनैव दशसु दिशासु स्वप्रभावः प्रसारितः । अत एकन- यातिकठिनतमं कार्य कथं प्रसाधितम् , कीरकुतोऽयमेता- दृशः पुरुपो वा देवो वाऽन्यः को या भवोदिन्यात्मकं मोहं प्राप्ताः । एतादृक्कार्यसम्पादकः पूर्वोक्तविशेषणेजुटी जी- यादित्यन्वयः॥ भावार्थ-जिसकी दिग्विजय को देखकर दशो दिशात्रों के दश ही दिक्पाल तथा दिग्गज भी आश्चर्य में पड़ गये कि हमने तो एक ने एक २ दिशा पर ही अति काटनता से ही विजय पाई और अपनी-अपनी दिशा के पालन में मात प्रपान करते हुये कठिनता से ही अपने-अपने शासन को धारण किये हुये है, परन्तु इन महात्मा जी ने बिना ही किसी विशेष सामग्री के दशों दिशाओं में मनायास ही विजय प्राप्त कर लीयह कार्य एक पुरुष से किया जाना कटिनतम ही नहीं, प्रत्युत्त प्रसन्मय है।

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१.३ ) च निर्मिती, नपुंसके यकारस्तु यशोरूपयोर्भवेत्" इत्येका- क्षरकोपः । तथाभूतो विशिष्टविशेषणयुक्तो जीयादिति ।। भावार्थ-जिनके शिष्य प्रशियों में से अाजकल के समय में भी विधमान श्राचार्य श्री १०८ श्री विजय वल्लभ जी महाराज जैसे ऊहापोह तर्क वितर्क से परिपूर्ण है, इनसे उनकी विद्वत्ता, सत्यार्थता तथा कार्य-कुशलता आदि का अनुमान इसी प्रकार हो सकता है, जैसे सत्पुत्र से उमके कुल का अनुमान हो जाया । अतएच अनुमान, ज्ञान, दर्शन, चरित्र आदि सभी सद्गुणों से युक्त श्री विजायन्द सूरि विजय को प्राप्त करें ।।२।। नोट-यहां तक श्लोक के बनाने वाले और इसके सावन (५१) अर्थ करने का प्रयत्न श्री श्रात्मानन्द जैन महासभा के सञ्चालकों की भी इच्छा-पूर्णार्ज किया गया. अब जैसे सूचना पत्र के पीछे श्री १००८ श्री विजयानंद सरि जी का संक्षिप्त जीवन चरित्र दिया है, उसको भी इसी श्लोक से सिद्ध किया जायगा। है . . अग द्वापञ्चाशत्तमाः MARA अधास्य महात्मनः संक्षिप्तं जीवनचरित्रमप्यस्मा- देव श्लोकालभ्यते, पूर्वमस्य जन्मसम्बन्सरी लभ्यते ॥ द्विजभजनज़निज यात- पूर्वोक्तयाज्ञवल्क्यप्रमाणेन ब्रामपक्षनियरिया द्विजा उच्यन्ते, तेच सायायां वय एव । अतो द्विजराब्देन ( १०2 ) पूर्व त्रिच्चं लब्धम् । ततो भशब्देन भानि ननत्राणि नानि •७ सप्नविंशनिमङ्ख्याकानि । नेपां पापलब्धाङ्कन भागढानन : नवाकलब्धिः, ननश्च जकारानरं वितरण गणनानः १७ सातदशमङ्ख्यात्मकम् । संख्याम्ब पन्तु- अची नव पञ्च कवीयाः, चवीयान्त्रयः, सर्वेषां यांगेन १७ सप्नदशः । पुनग्नयोः १+७ द्वयोम्प्यत्रयोः मंयोज- नेन = अष्टाङ्कलामः, ततः न इत्यनरम्याथों गणेशः, न व संख्यायाम एक. एव, अत एवकाङ्कलब्धिः । ततः "अङ्गानां वामना गनिः" इतिज्योतिर्विदां सिद्धान्तेन बामाङ्गाभिमुन्वगमनात् द्विजः ३ भ ज = न ? इत्येषां वामगन्या गमनात् । वैपर्गन्यन ) १६३ इनि लब्धाङ्का जानाः । नत्र जनिर्जन्म बन्यामा हिजभजनजानीयात । ननु विभागादयः कुना लन्या इति शङ्कनीयम् , तन्त्रा- वृज्यकशपाणामन्यमनेनाऽपि कार्याणि नम्भवन्तीन्युक्त- वान् . "मकदच्चग्निः शवोऽनेकार्थपगे. यत्र तत्र तन्त्र- नि व्यवहारः" पुननच्चारणमानिः, द्वयावहूनां वा यत्रकः शिप्यते तत्रैकशेपः । तदत्र नन्त्रणवायमथों बोडव्यः । 'भजन इतित्रयाणामनगणामावृत्तिरेकशेपो वा विधयः । तद्यथा-भश्च भश्च भी, जश्च जश्च जो, नश्च नश्च नौ, भौ च, जो च, नौ च ते भजनाः, द्विजाश्च भजनाश्चैनपां समाहागे द्विजभजनम् । तत्रैकस्य यहा - ( १०५ ) -- भस्यार्थस्तु भानि नक्षत्राणि, द्वितीयस्य भगः, भग एवं भाग इत्यर्थः, "भः-भगे, गगने, पुण्ड्चन्द्रयोः" इत्यभिधा- नराजेन्द्रोक्तत्वात् । भगस्तु घनर्थे कविधाने व बोध्यः । तत्र भानां भागेन योऽको लभ्यते, स एव ग्राह्यः । अध केन भागः प्रदीयत इत्याशङ्कायामुत्तरम् "सहचरितासहच- रितयोर्मध्ये सहचरितस्यैव ग्रहणम्" इति न्यायेन सहचरि तस्य द्विज शब्दांकस्यैव ग्रहणम् भवति । एवमेवफस्य जकारस्यार्थश्चवर्गीयस्तृतीयो वर्णः, अपरस्य च विस्तारः, "ज:--मृत्युञ्जये, पितरि, विस्तरे" इत्यभिधानराजेन्द्र- प्रतिपादनात् । विस्तरश्च संयोजनादेव भवति, तयोरेकत्व- सप्तत्वविशिष्टयोः संयोगादष्टाइलाभः । तथैकस्य नका- रस्यार्थी गणेशः, अपरस्य च नकारस्य नर इत्यर्थः । जनिरित्यनेन समासादष्टादशोत्तरत्रिणयतिपरिमिते वन्सरे नरस्य जनिरभृदित्यर्थः । यद्वा द्वितीयस्य नकारस्यापि गणेश एवार्थः । तन च १८६३ तमेऽन्दे नाद् गणेशाद् जनिर्यस्येत्यर्थी योध्यः । गणेशश्चास्य पितुनामेति ध्वनि- तम्, "नः पुंसि वही, हेरम्बे" इत्येकाक्षरकोपः । हेरम्या गणेशः "अप्येकदन्तहेरम्बलम्बोदरगजाननाः" इत्यम- रसिंहाभिधानात् । एवम्भूतः सर्वविशेषणविशिष्टो जी दित्पर्धः । एतत्तु गुर्जरसम्बत्तराभिप्रायेण शेयम् । मीयसम्बत्सरस्तु १६४ पासीत्, तत्साधनारक

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क " द. -:.--:- ट:- कम कन्सन- -: .. कामाला ल - - वाली कंत्र जान प्रतिदि-नातं मन नत्राम-न-कुबन "उन्त्रावनिकनन- प्रकानान" इनिधानात, दानव नन्नवणात भावः, धामानि ( नजानि । नन्नवागांति यावद यतः प्रत्र- नन्ने नद्दामधान, अश्विनीननितिनावः । “गृहटे- इन्विट्प्रभावा धामानि" इत्यमरः । नन्निन् उद्यानधान्नि ( अश्विनी में ) । पुनश्च नन्त्राश्रयागनावृत्यकोपन्य 'म चन द शब्दार्थचिंतामणिः । नम्याहाम चलणस्वामिकस्य याश्रयगान धाग्न.

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( १०८ ) अथ प्रिंपञ्चाशत्तमोऽर्थः नम्मिन् सम्बन्मरे कदा जात इति प्रश्नस्योत्तरम्- विमलमधुमदोद्दामधामप्रमत्तो जीयात्- वयः पक्षिणो "विविप्किरपतत्रयः" इत्यमरः । वीनां पक्षिणां मधुकराणां (मधुमक्षिकाणाम्) मलं बान्तिरूपं माक्षि- कम् यत्र लभ्यते म कालो विमलो वसन्त इत्यर्थः, तस्मिन् विमले यो मधुः—चैत्रो मासः म विमलमधु । तत्र विमल- मधौ मदायाम्-तिथौ, मस्य हपस्य दा दात्री प्रापयि- व्यमौ मदा, तस्यां मदायाम, चैत्रमासे हपंपदा तिथिः सर्वाभ्योऽपि पूर्व नूतनवर्षस्य प्रारम्भकत्वात्, नवरात्रारम्भ- कत्वाचाप्याद्या चैत्रशुक्ल प्रतिपदेव आयाति, ततश्च वसन्तता चैत्रे मासे प्रतिपदि–इत्यन्तं लब्धम् । तत्राऽपि-उत्-ऊर्ध्वम् "उत्प्रावल्यवियोगोकर्मलाभ- प्रकाशने" इत्यभिधानात, दामरूपेणेव नैरन्तर्येणेति भावः, धामानि ( तेजांसि ) नक्षत्राणीति यावद् यतः प्रव- त्तन्ते तदुद्दामधाम, अश्विनीनक्षत्रमितिभावः । “गृहदे- हत्विटमभावा धामानि" इत्यमरः । तस्मिन् उद्दामधाम्नि ( अश्विनी भे ) । पुनश्च तन्त्राश्रयणेनावृत्यैकशेपस्य वाश्रयणात् "उद्दाम वरुणे देवे" इतिशब्दार्थचिंतामणिः । तस्योदाम्नो वरुणस्य धाम्नः स्वाम्यस्य वरुणस्वामिकस्य ܕ ܙ ( ११० ) वर्ष के प्रारम्भ होने से हपं उत्पन्न करने वाली तिथि चैत्र शुदि प्रतिपदा हुई, उनमें भी उद्दाम अथांन अनुक्रम से नक्षत्र प्रारम्भ होने हैं, जिनमें ऐमा अश्विनी ननत्र याया, और अश्विनी नक्षत्र में नप का चन्द्रमा न्वभाव न होता है. इन चान्न नप का चन्द्रमा मिद हुया । 'उडान' का अर्थ वना' भी है, उसका धान नक्षत्र शतभिषा होता है. और गननिपा की राशि कुम्भ होनी है. अनाव कुन्न नग्न निद्ध हुया । इसने यह उनर निला कि चैत्र शुदि प्रतिपदा अश्विनी ननन नेय कं चन्दना में कुन्भ लन्न में हमारे चरित्र नायक का गुनागनन हुआ । ने महाराज श्री विजयानन्द जी नवदा बिजया दाव. जर विशेषग बन ॥५॥ यु .. गु. ग.च . श.क. मं. .

( १११ ) । अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽर्थः अथ च पञ्चाङ्गस्यकाङ्गभृतत्वाद्योगवर्णनमप्यावश्य- कमित्याकाङ्क्षयामुच्यते-- योगाभोगानुगामी जीयात्- योगा विष्कुम्भादयोऽष्टाविंशतिसंख्याकाः, तेपामा- भोगः परिपूर्तिः समाप्तिर्यत्र स योगाभागः, स च वैधृ- तिनामयोगः । तस्मिन्नप्यनुगेऽनुक्रमेण गते ( भुक्ते) अन्त्यघटिकास्त्रतिभावः । "य-इत्यक्षरमनुकम्पायाम्" इति शब्दार्थचिंतामणिः, "मःमाने समये, सूर्य, चंद्रे" इत्यभि- धानराजेन्द्रः । तत्र वैधुतियोगान्त्यघटिकामु अस्य-अनु- कम्पायाः ( दयायाः) मः समयो यस्यासी यांगाभोगा- ऽनुगामी, विष्कुम्भादियोगेषु सर्वपश्चिमे वैधृतियोगऽपि समाप्तप्राये धृतजन्मायं जीयादित्यन्वयः । योगस्य वधु- तिनाम्न एवायम्प्रभावो यदीशो धैर्यधारी महात्माऽय- मिति भावः । चैत्रशुक्लप्रतिपदि प्रायेण खत्यश्विन्यारे- कनर नक्षत्रमवश्यमेव भवति, एवमेव वैधृतिविष्कुम्भयारेक- तरी योगोऽपि प्रायेण भवति । तदा तु निश्चितरूपेणावि- नीनजानं वैधृतिश्च योग आसीदितिकविमनश्चिनि- नोऽयः ।।

। ( ११२ ) भावार्थ-जन्मकुण्डली के पञ्चाङ्ग में एक अङ्ग योग भी है, उसको 'योगाभोगानुगामी' यह पद प्रगट करता है। 'योग' का अर्थ विष्कुम्भादियोग, इन का आभोग (पूर्ति ) भोगा जाने पर अर्थान अन्त की घड़ियों में यागमन हुआ। विष्कुम्मादिक २८ योगों की पूर्ति वैधृति योग पर होती है, इस लिये मिद्ध हुअा कि वैधृति योग की अन्तिम घड़ियों में इनका जन्म हुआ । यह इसी योग का प्रभाव है कि उनका चरित्र सर्वाङ्ग पूर्ण धीरता वीरता से भरा हुआ नज़र आ रहा है। ऐसे श्री विजयानन्द जी महाराज पूर्वोक्त विशेपणों से युक्त सर्वदा विजयी होवें ॥५४॥ अथ पञ्चपञ्चाशत्तमार्थ: अथ मातुःपितुश्चापि नाम्नीत एव ज्ञायते- योगाभोगानुगामी जीयात- अत्र य--उ-ग-अ-भ इतिछेदः । यं रूपक स्वार्थे कनविधानेन रूपकमिति म्बम्पम, तद्विरहे तु रूपमेव । 'नमकं यकारस्तु यशोम्पकयोभवंद" इन्ये- कानरकोपः, अभिधानराजेन्द्रश्चापि । उ:-भूमिः, "उश्चंद्रभायाम् . गिरी, भूमी, विलोकन" इन्यभिधान- राजेन्द्रः, 'गः-गणेशः" इतिशब्दार्थचिन्तामणिः, अश्च- न्द्रः "अःविष्णी, शिवं, ब्रह्मणि, चन्द्र, अग्नी, भानाविन्यादिपु" इत्येकानरको पाऽभिधानराजेन्द्रोऽपि, - ( ११३ ) भः पिता "भः पितृभ्रातृपितृव्येपु, भोऽतिभीते भाकुले" इत्यप्येकाक्षरकोपः । तदित्थं यं रूपम् स्त्रीत्वविवक्षायां रूपा इति कल्प्यते, उ:-भूमिः (जन्म इति शेपः), यद्वा भूमिशब्देनैव वीजवपनस्थानं मातैव लक्ष्यत इति । यश्च तद् उरिति योरिति निप्पन्नम् । गात्-गणे- शात् अ (परन ) अ:-चन्द्र इति गाः, (गणेशचन्द्रः), गाश्चाऽसौ भ इति गाभः । तथा च यम् (रूपा) उ:- भूमिः (जन्मभूमिः, मातेति यावत् ) गारच भः पिता यस्य स योगाभः । ततश्च पुनरपि (गणेशचन्द्रः) तस्मात् गाद-गणेशचन्द्राद् अनु-आयामम् (दैर्घ्यम् महत्त्व- मिति यावत्) गमनशील इत्यर्थः । “अनु-आयामे" इति शब्दार्थचिन्तामणिः, "आयामो देध्ये" इति शब्द- कल्पद्रुमः । रूपानाम्न्यां मातरि गणेशचन्द्रापितुः पुत्री गणेशचन्द्रात् (तदपेक्षयातीव) महत्वगामी वृद्धि प्रति गमन- कर्ताऽयं महात्मा जीयादित्यन्वयः तथा च विश्वकोपः । "अनु हीने सहार्थे च पश्चात्सादृश्ययोरपि । आपामे च समीपे च लक्षणादावनुक्रमे" || भावार्थ-"योगाभोगानुगामी" इस पद से भय इनसे मातापिता का नाम प्रगट किया जाता है। इसके दो भाग किचे गये हैं, पंफ 'योगाभा दूसरा 'गानुगामी' । इनमें भी फिर य-3- , गु-भ, और भाये अलग-अलग और ग-अनु-गानी ये अलग क्षत्रियवंश जान इति तु पूत्र खलबलदलन इत्यचाय- प्रकाशावमा प्रकाटिनमंत्र चत्वारिंशेऽर्थे । परं नात्रियेपनि चन्द्रयाः इत्येकानाकोपान, भव्य जनालोका इति भजनाः, द्विजपु भजना इनि द्विजभजनाः, पु द्विजभजनेषु जनि- अलग, 'य' का अर्थ ल्पा '' का अर्थ भूनि अयान व्यादेवी इनकी जन्म भूमि अयान उनकी माता हुई और 'ग' का अर्थ गणेश, 'अ' का अथ चन्द्र और '' का अर्थ पिता अथात् त्पादेवी नामक नाना और गणेशचन्द्र नार पिता से उत्पन्न हुये, परन्तु फिर ग-अ (गा) गणेशचन्द्र ने अनु का अथ बहुन बड़ाई यांनी तरक्की. नानी का अयं पाने वाले हुये । नाकाय यह है कि पादेवी नाना ने और गणेशचन्द्र पिता से जन्न पाकर भी गणेशचन्द्र जी में अयान अपने पिता ने बहुत बढ़कर उन्नति प्राप्त करने वाले हुये । धर्मशान्त्र ने ऐसा ही माना है कि पुत्र वही नपुत्र है जो पिता ने गुणों में बड़कर हो । ने मदगुगों में युनः श्री विजयानंद जी विजयो हो । रोग विशेषग पूर्वचन | अथ पटपञ्चाशत्तमोऽर्थः कम्मिन भेद जान इति प्रतिपाद्यते- द्विजभजनजानीयात्- भम-चन्द्रः "नमक में नक्षत्रे, गगने, पुण्ड ( ११५ ) जन्म यस्याऽसौ द्विजभजनजनिः। भम्-चन्द्रः, आयु- वंदे (वैद्यकशास्त्रे) चन्द्रशब्देन कपरो गृह्यते, तथा च वैद्यकशब्दसिन्धौ कर्परः सोमसंज्ञक इति, "चन्द्रः कर्पूर- काम्पिलसुधांशुस्वर्णवारिपु" इति मेदिन्यपि। तथार्थकरणात नियेष्वपि कर्पूरलोकेषु जात इति सुस्पष्टार्थः सम्पद्यते । कर्परशब्दस्यैवापभ्रंशः कपूर इत्येकवचनप्रयोगादेक एव एवंभूतो जीयात् , एकल एव पुत्र इति न निगृहम् ।। भावार्थ-हमारे चारित्रनायक क्षत्रिय वंश में उत्पन्न हुये यह भाव तो चालीसचे अर्थ में कथन कर चुके हैं। किन्तु क्षत्रियों में भी कौनसी जाति में जन्मे यह बात यहाँ 'द्विजभजनजनिः' पर द्वारा प्रगट की जाती है। 'भ' का अर्थ चन्द्रमा है, मंदिनी कोरा के मत से जितने चन्द्रमा के नाम हैं, उतने व सब कपूर के नाम हैं। जन का अर्थ मनुष्य लोग है. अर्थात् दिनों में भी कपर ज्ञाति क्षत्रिय लोगों में जन्म धारण किये हुये श्री विजयानन्द जी विजय प्राप्त करें। शेप विशेषण पूर्ववतु ।।५।। अध सप्तपञ्चाशत्तमायः तत्पालनपोपणं फेन कृतमिति प्रश्नोत्तरे तु- शारदारकिर:- "शारन्दविल्यम इति शब्दकल्पद्रुमः,"निनाववनिता च दा" इन्येकानकोगः । तथा च शारे दोवन्ये मनि (पन्युग्भावाव दविन्यज्ञानम), दायाः विधवायाः (मानुः) प्राग्क्तया (प्रेमसम्बनया) रक्तः परिभाविनः । इत्यनेन म्बल्यावस्थायामेव पन्युबिंग्हंग दविन्यस्य (निधनतायाः) प्रातिः, तत्र निनाथया मात्रैव पालित इन्यथा निम्पन्नः । ततश्चापि शाग्दाक्तिरता विद्याधिष्ठात्रीदव्या अनुरागंग रक्तः, मातुपदेशादेव विद्या पठितुमारचा इति भावः ।। भारतीया विशेषतया संस्कृतजा एव नरस्वती विद्या- घिदेवनां मन्यन्ने, अतः शारदाशब्दग्रहणादारतीयाया एव [ हिन्दीभापायाः ] अध्ययनमारब्यमिति फलितोऽयः । ताशा जीवात् ॥ भावार्थ- इन नहान्ना का पालन-पोपा फैन हुया यह "शाग्दानिरतः" पद प्रगट करता है । 'शार' का अर्थ दुवजना, 'दा' का अर्थ पतिहिन बी. 'बानि का अर्थ गहरा प्रेन, रत का अर्थ रंगा हुआ। भावार्थ यह है कि पति के न रहन ने दुबनना (निधननायुन माना। अयान पनि ने रहिन विधवा नाता के प्रसन्पी नबन्ध में भी हुये अयान परिभावित हुये हुए नाना के उपदेश में ही विद्या पढ़ने के लिये प्रयन हुप श्री विजयानन्द नरि विजय को प्राप्त करें। शेप विशेषग पूर्ववत ||५|| ( ११७ ) अथाष्टपञ्चाशत्तमोः ततश्च दीक्षाकालो धन्यते- 4 - खलवलदलन:- -- . खम्-शून्यम् (०), ल इन्द्रः (१), स एव स्वगांधि- व:-बातः स चोनपश्चाशत्संख्याको मरुताङ्गणः, पूर्वाङ्कद्वयेन भागे कृते ४६:१०६४-६ अवशिष्यन्ते, नवाङ्कलब्धिः, अथवा वर्णगणनक्रमेण वकार ऊन- रिंशो भवति, तत्रापि भागानवैव शिष्यन्ते, ततोऽपि किलब्धिरेव, ततश्च पुनर्लः-इन्द्रः, स चाप्येकः, कानां वामतो गतिः" इत्याश्रयणात् १६१० इन्याया- । तत्र खलवले दलः--दं दीप्ति प्रकाशं योधं लाति-प्राददात्यसौ दलः, तथा चैकानरकोपः- "दो दाने पूजने क्षीणे दानशौण्डे च पालके। देवे दीप्तौ दुराधर्षे दोर्भुजे दीर्घदेशके । दयायां दमने दीने दन्दशकेऽपि दः स्मृतः। बढेच बन्धने पोधे वाले वीजे चलोदिते ॥" दपूर्वकात् "ला आदाने" इन्यतः "प्रातोऽनुपसर्गे " इत्यनेन प्रत्ययः, "आता लोप इटि च" इत्याका- रलोपेन दल इति सिद्धः । ततश्च खलबलपदेन सह समानं कृतं खलबलदल इति जानः । ततश्च सलवल- दलश्चामा नः मनाथ इति खलबलदलनः, "नो नरे व सनाथ च" इत्येकानरकोपः । इन्यतः १६१० ऊनविंशत्यु- त्तरदशकऽन्दे वोधग्राही ( दीनानाही ) ननायः ( नार्थन गुरुणा मह ) जान इति शपः । एवम्भृतो जीयादित्यन- नान्वयः ॥ 1 - भावार्य-अब इन नहात्मा की दीक्षा के नन्वन को "बल- वलनदलन" पद प्रगट करता है । 'स्व' का अथ गन्य :. 'ल का अथ इन्द्र वा का राजा. वह एक ही है। इसलिये इसका अर्थ एक हुआ। 'वका अथ वायु. वायु का गण है, इनमें दश का नाग दन में वाको वचन है। उसने गंप अङ्कका लान हुआ अथवा मगलाचरण कर श्रोन और बर और पचीन वनियानर और चार अन्तन्य ( य र ल व ) वर्ग इन नरद जोड़ने में हुये इनको नी दश का भाग देनेनं बाकी वचन है। इन नन्द भी गंप अफ का नाम हुआ और फर 'लका अथ वही इन्द्र एक ( । हुत्रा. नी इन ऋन ने अंको की दाई नरक ने बाई नरकलिन्दन में बन गये . फिर 'द का अथ प्रकाश अयान बोव और 'ल का अर्थ नाई। भावार्थ यह हुआ 11 में आपने बीया दीना ) को ग्रहण किया । इन प्रकार दाज्ञा को ग्रहण करने वाले श्री विजयनन्द मूरि विजय प्राप्त कोप विशेष प्रयवत । - ( ११६ ) अथैकोनपाप्ठतमोर्थः सनाधतया किं कृतमित्याकाङ्क्षायामुत्तीर्यते- शारदारक्तिरक्तो जीयान- - शारदा वाग्देवी (सरस्वतो) "माया नारायणी देवी शारदेत्यम्बिकेति च" इति तन्नामसु शब्दकल्पद्रुमपठनात् "लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालम्" इति तद- भिप्रायेणेव पुष्पदन्तपाठाच्चापि शारदा सरस्वत्येव, तस्याः शारदाया इदं शास्त्रं शारदं सारस्वतचन्द्रिकादिरूपम्, तस्मिन्नासमन्तात् ( सर्वभावपरित्यागेर्नेकाग्रचित्ततपा) रक्तिः प्रेम, तया रक्तः परिप्लुतोऽभूदिति शेपः, सार- खतचन्द्रिकादिपठनानुरागवान् सम्वृत्त इतिभावः । तदनु- रागेणैव तत्र निष्णातोऽभूदितितत्वार्थः । पूर्वन्तेन सारस्वत- चन्द्रिकेऽधीते, तत्सूत्राणां सरस्वत्युक्तत्वात्सारस्वतत्वम् । तौ च व्याकरणग्रन्यौ, ततः सर्वस्यापि विद्याविषयस्य व्याकरणमूलकत्वात् तदधीतः सकलोऽपि शास्त्रविषयः सारस्वत एव । स एव शारदशब्देनाभिधीयत्त इति तन्नाव- भावितो न्यायवेदान्तादिज्ञानसम्पनोऽभवदितिशेपस्तथा- भूतो जीयात् ।। भावार्थ-फिर उन्होंने क्या किया इसका नर "शारदा ( ११८ ) समासे कृते खलबलदल इति जातः । ततश्च खलवल- दलश्चासौ नः मनाथ इति खलबलदलनः, "नो न व सनाथे च" इत्येकाक्षरकोपः । इत्यतः १६१० ऊनविंशत्यु. त्तरदशकेऽन्दे बोधग्राही ( दीक्षाग्राही ) मनाथः ( नाथेन गुरुणा सह ) जात इति शेपः । एवम्भृतो जीयादिन्यन- नान्वयः ॥ । भावार्य-अब इन महात्मा की दीक्षा के मन्वन को "खल. बलनदलन" पद प्रगट करता है । 'ख' का अथ शून्य (०), 'ल' का अथ इन्द्र स्वर्ग का राजा, वह एक ही है। इसलिये इसका अर्थ एक हुआ। 'व' का अथ वायु, वायु का गण ४६ है, इसमें दश का भाग दन में बाकी बचते है । इममं शेप अर का लाभ हुया अथवा मंगलाचरण रूप ग्राम और बर और पचीस वर्गियातर और चार अन्नन्य ( य र ल व ) वर्ण इन तरह जोड़ने से ३६ हुये । इमको भी दश का भाग देने में बाकी बचते हैं। इन तरह भी शेप अक का लाभ हुआ और फिर 'ल' का अर्थ वहीं इन्द्र एक (१) हुआ, तो इस क्रम सं अंको को दाईं तरफ में बाई तरफ लिखने में १६१- बन गये । फिर 'इ' का अर्थ प्रकाश अर्थात चोध और 'ल' का अर्थ लेना है। भावार्थ यह हुआ कि १६१० में आपने बोय ( दीक्षा ) को ग्रहण किया। इस प्रकार दीक्षा को ग्रहण करने वाले श्री विजयानन्द मूरि विजय प्राप्त करे । शेप विशंपण पूर्ववत ।।५।। । . ।

(११६ ) प्रथैकोनपाप्तमोर्थः सनाथतया किं कृतमित्याकाङ्क्षायामुत्तीर्यते-- शारदारक्तिरक्नो जीयान- तस्मिन्नासमन्तात् शारदा वाग्देवी (सरस्वतो) “माया नारायणी देवी शारदेत्यम्बिकेति च" इति तन्नामनु शब्दकल्पद्रुमपठनात् "लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालम्" इति तद- भिप्रायेणैव पुष्पदन्तपाठाच्चापि शारदा सरस्वत्येव, तस्याः शारदाया इदं शास्त्रं शारदं सारस्वतचन्द्रिकादिरूपम्, सर्वभावपरित्यागेर्नकाग्रचित्ततया) रक्तिः प्रेम, तया रक्तः परिप्लुतोऽभूदिति शेपः, सार- स्वतचन्द्रिकादिपठनानुगगवान् सम्वृत्त इतिभावः । तदनु- रागेणैव तत्र निष्णातोऽभूदितितत्वार्थः । पूर्वन्तेन सारस्वत- चन्द्रिकेऽधीते, तत्मवाणां सरस्वत्युक्तत्वात्सारस्वतत्वम् । तौ च व्याकरणग्रन्धौ, ततः सर्वस्यापि विद्याविषयस्य व्याकरणभूलकत्वात् तदधीतः सफलोऽपि शास्त्रविपरः सारस्वत एव । स एवं शारदशन्दनाभिधीयत इति नझाव- भावितो न्यायवेदान्तादिज्ञानसम्पन्नोऽभवदितिशेपस्तया- भूतो जीपात् ।। भावार्थ-फिर उन्होंने क्या किया इसका उत्तर "सान्दा तिर' प्रगट करता है। शान्दा. (मरावती). मान्दा का कहा हुया शान्त मन्वन चन्द्रिका नी शान्द नान में ही कहा जा सकता है। उनमें आर्गन रा-वृग नन्दव्य अथवा लगाव, 'र' का अर्थ पूरे लवलीन है। नापर्य यह कि नाग्न्वन और चन्द्रिका को इन्होंने उग न लगाकर पढ़ा। यह दोनों व्याकरण के ग्रंथ है। व्याकरना ही नामान्त्रों का सार है। इसलिये इन्होंने जो कुछ पढ़ा, वह नव ही शारद बन गया । अनः इनके पड़े हुये नभी शान्त्र न्याय वदान्न नीनानादि सान्त्र नाग्वन कहलाने लग ! उनके पैन में लगे हुयं वान विगंपनी ने विजयानन्द गरि जी विजय को प्राप्त करे ।। -- अथ पाष्टतमा यः दिना- अत्र दिग-जा-अा-ई-ता—इति छंदः । नत्र दिनु पूर्वदक्षिणपश्चिमानु, जा नमुद्रबेला समुद्रतट- मिनियावन, अा अाङ्मादायान, इम् गतिम् नायने- पालयतीनिदिजना : जा समुद्र नेत्यभिधानगजेन्दः, "वी गतिच्यामिप्रजनकान्यमनवादनपु' अत्र इकागेऽपि घान्वन्तग्म् प्रश्लिप्यन इनिर्दानितः । तेन अयनम, ":" इन्यत्र-धाताभाचे विप्, ननश्च "ताय मन्नानपालनयोः" इनिधातोः कनार क्विप, नम्मान - । समुद्रवेलां यावत् गतिमान्-पझ्यामेव गन्ता इत्यर्थः एभिर्महात्मभिर्गुजरातकाठियावाड़मारवाड़मेवाड़मालवा- मध्यप्रान्तपाञ्चालप्रभृतिषु देशेषु पझ्यामेव प्रयाणं भ्रमणं कृतमितिनिप्पन्नम् । तच्च भारतवर्षमान एव, नान्यत्राऽम- रीकादौ यानमारूह्य गमनस्य तद्धर्मशास्त्रेषु निषिद्धत्वात् । अनेन च अमरीकाया अाहाने समायानेऽपि तत्र यानं न कृतमितियोधितम्, पद्भ्याम् नत्र गमनस्याशस्यत्वात्, यानमारूह्य गमनस्य निषेधाच्चेतिदिक् ।। भावार्थ-प्रय हम "दिग्जेता" पद ने ही इन महात्मा को पादविहारी सिद्ध करते हैं। इसके दिग-ज्ञा-पा-ई-ताचे पा टुकड़े हैं। 'दिग्' का अर्थ पूर्व पश्चिम दक्षिणादि दिशा, 'जा' ५॥ अर्थ समुद्र का फिनारा, 'प्रा' का अर्थ नर्यादा. ईका अर्थ चलना, 'ता' का अर्थ पालन करना, अर्थात् पूर्वादि सभी दिशाओं में समुद्र के किनारे तक अपने धर्म को मर्यादा में रहकर किसी भी सवारी विना पोवों से चलकर ही विहार की मांदा पालन फरते रहे । गुजरात, फाठियावाड़, नारवाड़, मेवाड, मालवा, मध्यप्रान्त और पाञ्चालादि देशों में भ्रमण करने वाले भारतवर्ष मान में रहकर अपने धर्म का उपदेश करते हुए धर्म को मयांदा पालने वाले लो विजयानन्द सूरि जी विजय को प्राप्त हो ! शेप विशेपण पूर्वयन् ॥६॥ नोट-इस वचन से यह भी सिद्ध हो गया किमतरीका धादि देशों से बुलापा पाने पर भी थाप वहा नहीं गये । मचाफि " ।

१०० )
बिना किनी बगे के वहाँ जाना अनन्नव था और किमी
प्रकार की मनवारी पर चढ़कर जाना इनके धन के विन्द्ध था।
इसलिये वह अपने धर्म को नयांदा ही पालन करते रहे और
अपन' अनुपन्थिति की पूर्ति के लिये अपने प्रतिनिधि तरीके
'नः चन्द राघव जी गांधी बी. ए. को शिकागो (अमेरिका
में मंजकर सावभीनयनपरिषद् में जैनधन की प्रधानता.
निशान्त और अनेकान्नवाद का प्रचार करा कर अपनी दक्षता
और दूरदर्शिता का खूब परिचय दिया ||३०||
.
अथैकपाष्टतमोर्य:
जिष्णुजिहर्मनिनुतिगतिभिः पूजितो
योगाभोगानुगामी जीयात्-
मतिः-नुतिः-गतिः-भिः-इति छेदः। अत्र
वर्णसामान्यान्निसक्तिनित्क्तमतेन बोध्या । “मो मन्दिर
च माने च सूर्य चन्द्रे शिव विधी" इत्येकाचारकोपः,
"नु स्तुतौ वारिणि वित च" इत्यभिधानराजेन्द्रः, गः
सर्वगः [ मर्व गच्चति जानातीति ज्ञानार्थे गमनं प्रयोगः ],
अतएव सर्वगः सर्वज्ञ इतियावत् । तदित्थम्—मानि मन्दि-
राणि ननोनि-विस्तारयत्यमा मतिः, नुः वितान तक्षति
हामयत्यमौ नुतिः, गं सर्वज्ञ तन्त्रयते कुटुम्बयते स्वकी-
यन्वेन स्वीकरोतीत्यर्थः-अमौ गतिः, भातीति भिः-

-- ( १२३ ) भास्वरः । इत्यत्र सर्वत्र "सर्वधातुभ्य इन" इत्यौणादिक इन, याहुलकाड्डित्त्वम, डिवाडिलोपः । तन्–तक्ष- तन्त्र-भा इतिचतुर्णामेव धातूनां तिः, तिः, तिः, भिरि- तिरूपचतुष्टयसिद्धिः । तदुक्तं- "संज्ञासु धातुरूपाणि प्रत्ययाश्च ततः परे। कार्याद्विद्यादनुवन्धमतच्यास्त्रमुगादिपु ॥ अन्यच्चाप्युक्तम्- "सुप्तिङपग्रहलिङ्गनराणां कालहलचस्वरक याञ्च, व्यत्ययमिच्छति शास्त्रकदेपांसोऽपि च सिद्धयति बाहुलकेन" उणादयो बहुलमितिसूत्रयता पाणिनिना घनितम् । भाग्यकृताऽपि लकारस्य पृथगुपदेशे कारणं निर्दिशना "लफिड:-लफिडः" इत्युदाहरता फिडफिडापौणादिक- प्रत्ययावितिप्रतिपादयता च स्फुटतान्नीनम् । ततश्न मनि- थासौ नुतिर्मतिनुतिः, मतिनुतिश्चासौ गतिमतिनुतिगनिः, स चासो भिरिति मतिनुतिगतिभिः एवम्भूतः सन् जिष्णु- जिहः पूजितः सत्कृतः ॥ योगाभोगानुगामी, य-अग इति छेदः । अगः- सूर्यः "अगः स्यानगवत्तरी, शैले, सरी स्ये, भानी" इतिहमः। यो भवान् अगाभा-अगम्य मूर्यस्य इन -7-2: ... ... ..!...... ..... ग: मां ग = . नममनपर मगर गत र “गं :- इन मार्च = 3 जातामा तार मान गन्ध जन्मजादान नंद - SHEET मार मानात नामांकन नमन ननन्याय Fir...मा महाग ............2 नाम- 'माननगर नाज मंग- नागानन मार्ग का मगर . माम महाल.. उपचार म. का मकान, छान की जानका ६ नमक श क न बरको का नाता की काट कर मां नमः पर इनाफा कम्मर माने का मानना नं :::. :: 7 कम न न काट ( १२५ ) अथ द्वापष्ठितमायः ततश्चानेनानेकान् ग्रन्थान रचयित्वा बहपकृतमिति ध्वनिः-- शारदारक्तिरक्त:- शसयोरक्यादत्र सारदेति छेदः । सारी बलम् "मारो चले, स्थिरांशे च, मज्ज्ञि, पुंसि जले, धने, न्याये, क्लीवे त्रिपु परे” इतिमेदिनी । दाः-दानम् "डुदान दाने" इत्यस्मात् क्विप् , सारस्य दाः सारदाः ( बलदानम् ). स. च विशेपेण ज्ञानिचात् ज्ञानस्यैव यलं दातुं योग्यः, सर्वसाधारणम्प्रति ज्ञानवलं पुस्तकरवानायासन दीयो तती · बलदानार्थ ग्रन्थरचनमेय सारदाक्रिया, तस्यां रक्ति-लवलीनता, तया रक्तः-पाभिमुख्यन स्वाभि- मुख्येन रत इत्यर्थः । यद्वा सारस्तत्वम् , तम्य दा शोधनम् (निर्णयः) सारदा, इत्यस्य तत्त्वनिर्णय इत्यर्थः, तस्य रक्तथा रक्तो लवलीन इत्यर्थ एवं वाध्यः । तत्र- शोधन" इत्यतः क्षिप् , सोऽपि (तचनिर्णयोऽपि) ग्रन्थ- निर्माण व मुगमरीत्या सर्वसाधारणं प्रनि मुमनिपायः स्यादिति, अतएव तचनिर्णयनामक एक ग्रन्या व्यरचोनि । ततश्चान्यान्यपि पुस्तकानि तचाप्रतिपादनाधनाररूपर्णव रचितानि । तैरुपकारक रक्तिरक्तः स जीयादिति नम्बत्यः ।।

भावार्थ-"शारदारन्जियन' इन पद ने बढ़ नि करना है कि उन्होंने बटुन ने ग्रंथ रचकर नंमार का बहुन उपकार किया है। शार' का अर्थ बन या च है, 'दा' का अर्थ देने बाला या शोधन (निर्णय ) करने वाला. इन नहानात्रों में ज्ञान की अधिकता होने में नानन्त्री बन देना और नन्चार्य चन अननी अर्थ का निर्णय करना निद्र होता है. वह अन्य ग्चना ने ही अच्छी नन्द किया जा सकता है। नीलिये उन्होंने "नवनियमानाद" नानक अन्य उदाहरण बने लिया । जिनको देखकर यह अनुनान किया जाता है कि उन्होंने वने और मी अन्य जगदुकामार्थ नब है दमने बिटु दुआ कि बहन नं नव-यमानद"द प्रयोगीन्चना करके जगत का प्रकार 'कया में 'वजयानन्द नरजी विजय प्रम को जेल विकावन अथ चपटनना दायादयात्री जीयान- दयानां नमूदो दायम. ना दायम याददते- बीकुन्नि त दाबादा जैना:. ने दायादवप यायती- व्यवंगाना दायादयात्री. जननन्प्रदाय विवरणशीनइन्यथः । यात्रागदात तकगति नटाचटं वाटयन्मिन्नर्थ नामधातुविषयक. मिचि कृत तादीन गिनिः । यहा 'ट:-दयायाम' हुन्यकानाकोपः. नस्य दम्य -ग्रयो . गतिः-दायः, पुनश्च दाः क्षीणाः, न दा:-अदा अक्षीणाः प्रपलाः, दाये अदा:-दायादाः, दयायां प्रबला इत्यर्थः । तेषु दायादेषु यां गतिं वायते (यात्रयति या) इत्येवंशीलो दायादयात्री, दयामधानेप्वेव यानया विहारीति भावः । जैनेन तद्गमनप्राधान्याज्जैनधर्मोद्धारकत्वम- स्मिन् प्राशस्त्येन प्रतीयते, ततोऽयमपि जैन एवेति धनिः । अतएवानेन · जैनधर्मिपु बहुपकृतमिति सपपादितम्, तदुपीरित्वाद्गृहीततद्धर्मदीक्षावतोऽयं जीयादित्यन्वयः ।। भावार्थ-"दयादयात्री" इस पद ने सिद्ध किया जाता है कि इन्होंने जैन धर्मावलम्बियों पर बहुत उपकार किये। दया- मात्र एक धर्म को ही प्रधान धर्म मानकर उसे स्वीकार करने वाले अर्थात् जन लोगों में ही यात्रा करके विशेष गति से धर्म की और नुकाकर और अपने धर्म के नियमों पर घर निश्चय वाले बनाफर जैनधर्म का उपकार करने वाले तथा पूाज विशे- पणों से युक्त श्री विजयानन्द मूरिजी विजय को प्राप्त करें। प्रय चतुः पारनमार्य: खलबलदलनो जीयात- 'ख:--वितर्क, ल:-माद' इत्यभिधानराजेन्द्रः, चल सम्बरणे धातुः । तदित्यम्सन पिन लंबाई चलन्ने (संहरावते) ते खलाला, गोरएडाः (मनायाः), ( १२८ ) नेपामपि दलनः म्बनगपरिमर्दनः । मानेन महान्मकनग्रन्थावलोकनन 'हनले माहेब' इन्युपाधि- धारिणा नदय एव प्रधपणाऽनुभवान म्बग्रन्थे नन्ग्रशं- साकरमपि वनिनम् । एवम्भूना जीयात् ।। भावार्थ-- "बन्न बलदलन" इस पद में यह सिद्ध किया जाता है कि जनधम में रहकर इन्होंने 'दान', मादव जम यंग्रेजी के चिन पर भी विशेष प्रभाव डाला। 'व' का अर्थ वितक ( दलील बाजी ) 'ल' का अथ वाद (नगड़ा ) 'वन' का अर्थ लपेटना अथान दन्न्न बाजी में नगई में लपेटने वाल, ईमाई अंग्रेजादियां को भी दलन वान. ( अपने नकम नीचा दिग्याने वाले ) इममें इन महात्मा के लिये हुये ग्रन्थों को दम्वनं ही दानले मादब अपने दिल में हार मानने का अनुभव करके अपने ग्रन्थ में उनकी प्रगंमा करने लगे. इस प्रकार के प्रभावशाली नया पनि विगंपनी में युन, श्री विजयानन्द जी विजय को प्राप्त करे ॥६॥ -- . यह नोटा के पाचान्य विद्वान हुए है, उनका मन्ग नाम और पद नीचे दिया जाना है। I. I III... IN I). Tubinven, ( । । । : ht: . Honorr; '' .1 IC । Scr : ।। , Llitic Society of Ben. . - ( १२६ ) अथ पञ्चपष्ठितमोज्यः - जिष्णुजिहमतिनुतिगतिभिः पूजितः- जयन्तीति जिष्णवो जयशीला:, तेऽपि गोरएडा एव भारतजयेनैव तेपां राज्यस्थितेखलोकनात, तेषु जिष्णुपु ये जिहाः, जिह्वा इव कर्मकर्तरि व्याख्यातारस्ते जिप्णुजिह्वाः, तैर्जिष्णुजि मतिनुतिगतिभिर्लक्षणलक्षि- आपने जैनधर्म के एक नामी प्राकृत ग्रंथ "उपासकदशांग" का अंग्रेजी अनुवाद सन् १८४८ में छपवाया। उसको भूमिका में आपने लिखा है कि-"For some of this information I am indebted to Muni Maharaj :Itmaram Ji Anand Vijay Ji, the well known and highly respected Sadhu of the Jain Community through out India, and author of (among others) two very useful works in Hindi, the Jaina Tattwadarsha mentioned in note 276 and the Agyana Timira Bhaskan. My only regret is that I had not the advantage of his invaluable assistance from the very beginning of my work". इस लेस का सारांश यह है कि किंचित् शास्त्रीय ज्ञान से सम्बन्ध में मैं मुनि महाराज श्री आत्मारामजी, भानन्दविजय जी का भणी हूँ। यह महात्मा हिन्दुस्तान भर को जनप्रजा के प्रसिद्ध और परम पूज्य साधु हैं। इन्दोंने हिन्दी में कई प्रन्यों की रपना

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( १३३ ) अथ सप्तपष्ठितमोग्यः केदारोदास्यदारी जीयात- "कः कामः" इत्येकाक्षरकोपः, ईः प्रत्यने (दर्शन), ":--विपादे दुःखभावनायाम् क्रोधे अनुकम्पायाम् प्रत्यक्षे" इत्यभिधानराजेन्द्रः । तस्य कस्य कामस्य ईम्-प्रत्यक्षम् ( साक्षात्करणम् ) दहति यति चाऽसौ फेदः शिवः, तस्य केदस्य अरि शत्रुः सोऽपि काम एव, केपूर्वाद् "दह भस्मीकरणे" इत्यतः "दो खण्डने" इत्य- स्माद्वा उत्प्रत्ययः, डिवाट्टेलोपः । "द:---देव" इत्ये- कांक्षरकोपः, तस्मिन् केदारी कामविपये तु दानाम्--- देवानामप्यास्यं दृणाति दारयति वेत्येवंशीलः केदारी- दास्यदारी, "तत्पुरुप कृति बहुलम्" इति सप्तम्या अलुक, बाहुलकात्कृदन्तान्ते परंऽप्यलुगेय, कामे तु देवा अप्पाश्चर्येण मुखं व्यादाय विस्मयन्त इति भावः । नदुक्तम्- "कामः सर्वात्मना हेयो यदि त्यक्तुं न शक्यते । मुमुक्षां प्रति कर्तव्यः सैर तस्य हि भेषजम् ।।" इत्युक्तत्वात् सदा सर्वथा सकामनां परित्यज्य मोक्षकामोऽयमिति भावः ।।

(१३) । भावार्थ-बुद्धिमानों को केवन नोन की कामना छोड़कर और नत्र प्रकार के इन्द्रियजन्य कानविपय छोड़ने चाहिये । ये नहान्ना नोनकानी थे । इन बात को निद्ध करने वाला "कंदारी दान्यदार्ग" पद है। 'क' का अर्थ कानदेव और ईका अर्थ दर्शन, 'द' का अर्थ रुकने वाला. 'अनि का अर्थ रात्र. किरदका अर्थ देवना. 'अान्य का अर्थ नन्व. 'दारी का अर्थ बोलने बाज़ा. अयान कामदेव को दर्शननात्र ने हक देने वाले. जो कानदेव शिवजी महागन का शत्रु हुआ, उन कानदेव ( नदन ) के विषय में तो आश्चर्य के नारे देवता लोग भी नद फाड़ कर देखने नह जान थे कि विनोकविजयी नदन ( कानदेव ) का केना नुन्न भञ्जन किया । नविषयक मार्ग कामनाओं को छोड़कर कंचन मोन की कामना वान प्रा विजयानन्द नृषि विजची होवे । शेर विशंपण पूर्ववन् । अथाष्टपष्टितमोक्षः लोललीलस्वलन्जो जीयात- "लोला जिह्वा" इतिशब्दार्थचिन्तामणिः, लोलाया जिवाया लीलाः-विलानाः, "लीलां विदुः कलिबिलाने- त्यादिकपु" इनिविश्वः । तं च द्विविधाः, प्रथमा ग्रान्बाद- विपयकाः, द्वितीयाश्च बचनविषयकाः, प्रथमान्तावन् कटुतिक्तकपायमधुराम्ललवणाद्या विविधा ग्राम्बादाः समधिकमान्बदन्नं पुन्माणाम्, द्वितीयाश्चापि वादविवाद- .

( १३५ ) योनिग्रकोटयां निपातनाद् वादिनां चित्ताहादनाय गीता- दीनां गानेनोपहासोक्तिपु तत्क्षणमेव प्रतिभाभास्वरैरुत्तरैः पठनपाठनादिषु चापि तत्सहायताप्रदानरतीवानन्दप्रदाः, ते वाग्विलासा इत्याख्यायन्ते, सर्वास्ता लोलाया एव लीलाः कथयन्ते । तासु लोललीलासु स्वरन्ति-पाक्षिप- न्तीति स्वरन्तः, तान् स्वरतो जयतीति लोललीलस्वलज्जः। यदा साधवो निर्मर्यादा भृत्वा जिहाविलासवशगाः सन्तो लोकलोचनगोचरा भवन्ति, तदा लोकाः तेप्वाक्षेपान् कर्तुमारभन्ते । परमयं महात्मा तु यथालाभं भोजनाद- नस्वादपरोऽनुचितवाग्विलासाप्रयोगाच संयत एवासीदि- तिहतोरेवाक्षेपकारिणामनवकाशप्रदानादेव तज्जेताऽभूदिति, अतिशक्तः परिपन्थिनोऽपि नोत्सहन्त श्राक्रमणं विधा- तुम् । “स्वर्-आक्षेपे" इति चौरादिकाच्छनन्तात्पर- स्थितात् "जि जये" इत्यस्माहुः प्रत्ययः, णिचोऽनित्य- त्वान्नानप्रयोगः, रलयोरक्यालप्रयोगः । ततोऽशिष्टविशे- पणान्वयम्बिधाय जीयादित्यनेन सन्धयः ।। भावार्थ-इन महानाने चंचल जिला फेवरान पढ़कर अधिक जिला चलाने वाले निन्दक जनों को निशा चलाने का प्रकाश नहीं दिया और नाही अपने आप उसका अनुचित प्रयोग फिया, इस बात को सिद्ध करने वाला पद "लालजीलस्वलन 'लोल' का अर्थ चंचल जिला, 'लीला' का अर्थ मागद. 'स्वलन' का अर्थ कटान करने वालों को लजित करने वाला अर्थात् चंचल जिह्वा के दोनों प्रकार के आनन्द के विषय में कटान करने वालों को लक्षित करने वाले, कटान करने वालों को मौका ही नहीं मिलता था कि वह अंगुली उठा सकें, क्योंकि इनके व्यवहार को देखकर वह स्वयं ही लग्जित हो जाते थे। जिह्वा के दो प्रकार के आनन्द हैं. एक तो खट्टे, नोठे, चटपटे पदार्थ खा कर आनन्द लेना. और दूनरा अनुचित शब्दों को बोल कर किसी पर कटाक्ष करना वा हमी-नखौलादि से दूसरे के चित्त पर चोट लगाना। परन्तु यह महात्मा इन दोनों विषयों पर विजय पाये हुए थे. अर्थात् ममय पर जैना भोजन प्राप्त होता. वैसा पा लेते और असह्य शब्दों से किसी के हृदय पर आघात भी न पहुँचाते थे । ऐने गुणों में विशिष्ट श्री विजयानन्द रिवर विजयी हो । शंप विशेषण पूर्ववत् ।।३।। अथकोनसप्ततितमोऽर्थः लोललीलस्वलज्ञो जीयात- "लोला:-स्त्रियः" इतिशब्दार्थचिन्तामणिः, तासां लोलानां (म्त्रीणाम्) लीला:-विलासाः (हावभावकटाक्ष- रूपाः) इनिलोललीलाः, लोललीला एव स्वम् धनं यासान्ता लोललोलस्वाः, लोललीलस्वाः लजन्ते यस्मात् स लोललीलम्बलज्जः । प्रायण कामिन्यो हावभावकटान- रूपैरेव स्वसर्वस्वैलोकान् मोहयन्ति (मदयन्ति), स्ववीकृत्य ( १३७ ) नानाप्रकाराश्चेष्टाः कुर्वन्ति । तद्वशगो भूत्वा मनुष्योऽपि यद्यत्ताः कारयन्ति, तत्तत्सर्व समाचरति । तदुक्तम्भोज- कालीदासीये- "न किं दद्यान किं कुर्यात् स्त्रीभिः स प्रार्थितो नरः । गर्दभा यत्र हेपन्ते तत्र पर्वणि मुण्डनम्" || अन्यच्चापि "एता हसन्ति च रुदन्ति च कार्यहेतोः, विश्वासयन्ति हि परं न च विश्वसन्ति । शीघ्र प्रविश्य सरलं हृदये सराणाम् , किं किं न वामनयना हि समाचरन्ति ॥" इत्यादि परं प्रकृते त्वस्य महात्मनः समक्षन्तासां स्त्रीणाम् ता लीलाः शृङ्गारसर्वस्वरूपा एव ताः स्त्रिय एव लज्जयन्ति, तत्र प्रयोगस्यासाफल्यदर्शनाद यांपत्तेः । यथा च भर्नु शतके शान्तरसवर्णने श्रीमता भना निगदितम्- "पाले लीलामुकुलितममी मन्थरा दृष्टिपाता: किंक्षिप्यन्ते विरम विरम व्यर्थ एप अमले ।

( १३८ ) सम्प्रत्यन्ये वयमुपरतं बाल्यमास्था बनान्ते क्षीणो मोहस्तृणमिव जगज्जालमालोकयामः ॥" अत्र तु समारूढ़यौवनानां परमोत्कृष्टनव्यस्त्रीणामपि कटाक्षादिप्रसारस्य साहस एव नोत्पद्यते, प्रत्युतः शृङ्गार- रसमुत्सृज्य शान्तवैराग्यरसयोः समुद्भवो लन्यते । अने- नास्य महात्मनः प्रकाण्डशान्तरसमत्वं समुद्भाव्यत इति दिक् ॥ भावार्थ-इनके सामने बड़ी-बड़ी जगन्मोहिनी त्रियों को भी साहस न होता था कि उन पर अपना कोई न्त्रीचरित्र चला सके । इम अर्थ को प्रगट करने वाला पद "लोललीलत्वलनः है। 'लोला' का अर्थ न्त्री और 'लीला' का अर्थ चरित्र. 'स्व' का अर्थ अपने आप, 'लज्ञः' का अर्थ शर्मिन्दा होना, अथान चपल-से-चपल वियों के चित्त में भी इनके तेज प्रताप के मानने कुष्टि करने का माहम ही नही होता था, प्रत्युत वह तो आप ही लजाभूपण-न्त्रीधर्म की मयांदा में लन्ना के वश (आधीन) रहकर उनकी शरण में प्राकर नकम में प्रवृत्त हो जाती थी। एने मद्भाव वाले तथा पूर्वोक्त विशेषणों से युक्त श्री विजयानन्द विजयी होय ||Ril

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( 22 ) भावार्थ- -अब इन नहान्मा का प्रनिड नाम निकाला जायेगा, जिनको प्रकट करने वाला "केदारोदान्यदागे" द है। क का अर्थ आना. 'ईका अयं अानन्द. ४ का अर्थ प्रकाश अर्थात् आत्मा सदनं २ मानन्द शब्द जोइन ने जोशब्द (आन-बानंद) बनना है उन अान्नानंद नान ने पार पनि हुप । अानंद का ही अर्थ बताने वाला दनग सब्द बागान है, इनको अान्ना के नाय जाइन नं बान्नागन बन जाता है. इनीलिव इनका नान प्रान्ना- गन भी प्रनि हुआ। 'दन्य का अर्थ उदानी (चिन्ता ) 'दारी का अथ नष्ट करने वाला. अर्थात अन्नानन्द अथवा ऋमागन जी टन नाम नं प्रनिट बनना की चिता को दूर करने वाले इन ननय ने अयं जिन ननय नवन का नव जनमान की कुलनिय घटना ने आदिन हो रहा था. जनधन के नहन्त्र का प्रका 'ननं दुया जाना था। जन प्रयन्यन' का प्रबार बट दृया जाता था जेनधन ६ अनयनवाद का जनाधार बन कर पंजाब में अम' जनवम क' मादक कंटे न था और निवजा या नयनरम कया जाता था जैन नाम लिवाई 'क जब-जब ५ वटना र अमन टोनी है. नव-नत्र नयी नटयर बना लिये और पाप नालय कमी उमा वाल की रचना करके मरता हूँ मई जनधन २' नवना के लिये आये हुए अटलवनी का बजवन्द 'वजय को न करे पंप 'पावन सन्धारा फरना चाहते थे, इस अर्थ का दिन्दशन "योगाभोगा. - सन्धारा करने के लिये जाना अच्छा समझते है, वहां पर ही अवैकसप्ततितमोयः योगाभोगानुगामी जीयात्- यत्र यः-अगा-भोगा-नुगा-मी-इति बेदः। यः सर्वत्र पूर्वाऽर्थेषु निर्दिष्टः प्रधानो नायकः 'श्री आत्मा- नन्दनामकः', अगः पर्वतः, कश्चिद् विशिष्टः पर्वतः, . पत्रं जनाः साधवो महात्मानः सन्याराकरणार्थमन्तसमये ब्रजन्ति, तस्यागस्य आभोगः-विस्तरः, उच्चशिखर- मितियावत् । तम् अगाभोगम् अनुक्रमेण गच्छन्ति तेऽगा- भोगानुगाः, तेपामगाभोगानुगानाम् आ मर्यादायाम् , अन्तसमये इतियावत्, मः—मानम् , (सत्कारः) यस्या- स्त्यसायगाभोगानुगामी । तत्र योऽगाभोगानुगामीति योगाभोगानुगामी, सर्वस्मिन्नायुपि धमोपदेशप्रचारेण यत्र तन धर्मस्थितिस्थापनानन्तरमन्तसमये तस्मिन् पर्वते गत्वा सन्धाराकरणाम् श्रेयस्कर मनुते स्म । अयं महात्मापिनथा- भूतः स्वस्य सर्वकर्मसिद्धेरनन्तरञ्जीयात्, तादृशेष्यपि साधुपूचस्थानं लभतामिति भावः ।। भावार्थ-यह महात्मा अन्त समय में किसी खास पर्वत वा तीर्थस्थान पर जहां जैनमतानुयायी महात्मा अन्त समय में

(११२ )
नुगानी" पद निद्र करता है. । 'चः' का अर्थ जो, 'ग' का अर्थ
पचन और श्राभोग' का अर्थ शिन्वर, 'अनु' का अर्थ पीछे, 'ग'
का अर्थ जानेवालं. 'त्रा' का अर्थ नयादा के अन्दर, 'नी' का
अर्थ सत्कार करनेवाले. यान् धर्मप्रचार के अनन्तर जो
नहान्ना किली पर्चन विशेष के शिखर पर जाने वालों को नयांदा
का नत्कार करने वाले हैं, ने वह श्री विजयानन्द जी तथा
सर्वोच विशंपलों ने युन विजयी होवें 15!!
अथ द्वासनतितनामयः
योगाभोगानुगामी जीयान्-
योगाः पूवातंकनमनिम्वर्थेषु निर्दिष्टा अर्थविशेषाः,
नेपामाभागः परिपूर्णन्वन् . तम् अर्थमाफल्येनानुगच्छनीन्ये-
वंशीनो योगाभागानुगामी । अकनानिमितऽथनंग्रह
येड्या निर्दिष्टा. ते याधानध्यनानुनन्ति बटन्ते यन्मिन्
महान्मनि मोऽयंमहात्मा अम्मचरित्रनायको जीयात्
नवान्कटतमो यादिन्यथः, इति शम् ।।
नत्राङ्कनय चन्द्रऽलं. माघशुक्लाष्टमीनियो ।
नीना प्रतिनियंव्याख्या, वैजनाथन धानना ॥
नावार्थ - अब अनिन अनी उनी पद का लिन्वत है.
'वोग का अर्थ न । अयं वन कंय हुये विप विशेष

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Shree Aatmanand-dwasaptati

Author
Swami Yogjivanand Sarswati
Title
Shree Aatmanand-dwasaptati
File name
Shree Aatmanand-dwasaptati
Text
OCR done
Citation
1940
Published
2011/07
Publisher
Ellahabad.bhrti-bhandar
Language
Sanskrit
Pages
169
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
DLI number
314068
Barcode
99999990310857.00
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Banasthali University
Digital publisher
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