Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Shrimad Devchndra Bhag-1

Suri, Budhisagar · 2011/07

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पुस्तक मळवानु ठेकाणु-
वकील मोहनलाल हिमचद-पादरा (स्टेट वडोदरा)
वडोदरा-शियापुरामा, लुहाणामिन स्टीम प्रिं प्रेसमा, विठ्ठलभाई आशाराम
उकरे ता १-६-१८ ना रोज प्रकाशक-शाह लल्लभाई करमचद दलाल,
चपागला-मुबाई-ने माटे छापा प्रसिद्ध कयु

निवेदन. श्रीमद् बुद्धिसागरसूरि ग्रन्यमालाक ४९ तरीके श्रीमद् देवचन्द्र प्रथम भाग बहार पडे छे जैन कोममा अढारमी सदीना अवे अने ओगणीशमी सदीना प्रारममा विद्यमान खरतरगच्छीय पडित श्रीमद् देवचन्द्रजी पएल छे तेमणे जेजे कृतियो बनावी छे ते प्रस्तावनामा पादराना वकील मोहनलाल हेमचदमाइए जणावी छे श्रीमद् आनदघनजी, श्रीमद् यशो- विजयजी उपाध्यायनी पेठे जैन कोममा महात्मा ज्ञानी तरीके श्रीमद् देवचद्रजी महाराज प्रस्यात ययेल छे श्रीमद् देवर- द्रजी महाराजना ग्रन्थोनो जैन कोममा सादर साधे प्रचार थयो छ, थाय छे अने भविष्यमा थो श्रीमद् देवचन्द्रजी महाराज जेवा द्रव्यानुयोगी गीतार्थयी जैनसव अने खरतर- गच्छनी महत्तामा वृद्धि थएल छे श्रीमद् देवचद्रजी महाराजनो तपागच्छीय आचार्य मुनिवरो साथे घणो सारो सबध हतो श्रीमद् उपाध्यायजी यशोविजयजीकृत ज्ञानसार ग्रन्थ पर तेमणे ज्ञानमजरी नामनी टीका रचेली छे अने दिगरी शुभचन्द्रा- चार्यकृत जानार्णवनो ध्यानचतुष्पदी ग्रन्थमा सार खेंची सर्व गच्छोना महापुरुषो प्रत्ये गुणानुराग दर्शावी भविष्यना जैन सा- घुओ माटे स्वादर्शजीवन मुकी गया छे श्रीमद् द्रव्यानुयोगी गीतार्थ हता वेमनु चारित्र केबु उत्तम हतु ते तेमना बनावेला ग्रन्यो- माना उद्गारोयी सुस्पष्ट थाय छे, अने खरतरगच्छना अद्य- पर्यत थयेल सर्व आचार्यों मुनिवरोमा श्रीमद् देवचद्रजी महा- राज प्रथम नबरे आवे छे एवा महापुरुषनी कृतिओने छपावी जाहेर करवामा आवे तो तेथी जैन कोम तथा जैनेतर , (४) भारतबधुओपर महान् उपकार करी शकाय एवो विचार प्रथम श्रीमद् बुद्धिसागरसूरिजीना मनमा प्रगट्यो अने तेमणे पादरा निवासी सुश्रावक वकील मोहनलाल हेमचदभाइ, माणेकलाल, प्रेमचदभाइ, मगळभाइ वगेरे श्रावकोने जणान्यो अने तेओए श्रीमद् देवचद्रजी महाराजकृत सर्व कृतियोने छपावीने बहार पाडवानो निश्चय कयों छे, तथा प्रवृति वरी छे तेना फल तरीके श्रीमद् देवचद्र प्रथमभाग छपाइने बहार पड्यो छे अने द्वितीय भाग अल्पमासमा छपाइने बहार पडशे एम आशा रहे छे द्वितीय भाग छपाववानो आरभ करवामा आब्यो छे अने तेमां कया ग्रन्थो छपाववामा आवशे तेनु लीष्ट पण प्रस्तावनामा दर्शाववामा आव्यु छ श्रीमद्नी कृतियो छपाववामा मुख्य भाग लेनार अने तेमना रागी पादराना वकील श्रावक मोह- नलाल हिमचदभाइ छे तेमणे णसेना आशरे पो लखीने ज्या त्या मुनिराजो तथा श्रावकोने मळीने श्रीमद्नी कृतियो मेगी करी छे अने पोताना अमूल्य वखतनो भोग आपीने श्रीमदनी कृतियो छपाववानी व्यवस्था करी छे तेथी तेमने धन्य- वाद घटे छे श्रीमद्ना ग्रन्थोना अभ्यासयी तेमना रागी बनेल पादरा निवासी द्रव्यानुयोगना अभ्यासी सुश्रावक शा माणेक- लाल वरजीवनदास तथा शा प्रेमचदभाइ दलसुख तथा वडु निवासी छगनलाल लक्ष्मीचद तथा भाइलालभाइ -चुनीलाल वगेरेए वकीलजी मोहनलाल हिमचदभाइनी पेठे श्रीमदनी कृ- तियो छपाववामा आर्थिक सहायनी व्यवस्थामा सारो भाग लीयो छ तेथी तेमने बन्यवाद घटे छे वडोदरा-लहाणामिन स्टीम प्रेसना मालीक विठ्ठलभाइ जाशारामे जल्दी पुस्तक छापता माटे प्रवृत्ति करी छे तेथी तेमने धन्यवाद आपवामा आवे छे, तया मुफो शोधमामा पडित लारचद भगवान् तथा पडित जयचद विठ्ठल तथा शास्त्री भाइशकर वकुठराम तथा मुनि कीर्तिसागरजी तथा मास्तर चदुलाल नानचद वगेरेए थोडावणा अशे जे जे सहाय करी तेमाटे तेमने धन्यवाद घटे छे आ पुस्तक छपारवामा आर्थिक सहाय करनाराओनो उप- कार मानवामा आवे छे तथा जे जे मुनिराजोए तया श्राव- कोए श्रीमद्नी कृतियो मेळापामा साहाय्य करी छे तेनो प्रस्ता- वनामा उपकार मानमामा आव्यो छे श्रीमद् देवचद्रजीनी कृतियोनु श्वेताम्बर जैनोनी पेठे दिगर जैनो पण वाचन श्रवण मनन करे छे, तेमना बनावेला पुस्तकोनो वधु प्रमाणमा फेलावो करवामाटे आर्थिक सहाय कर्ताओनी सहाययी पडतर किंमत करता पण मोचवारीना सययमा घणीज ओठी मात्र रु २) किंमत राखवामा आवी छे एक हजार उपर परवाळा ग्रन्थनी विलकुल ओछी किंमत रासीने तेनो जैनोमा सर्वत्र फेलावो करवानो इरादो रास्यो छे तेयी हवे वाचको तेनो लाभ लेवा चूकशे नहीं एम आशा रखाय छे बालुचर निवासी श्रीयुत् झवेरी अमरचदजी बोथराए तेनी १५० प्रतियो लेवानी भाग- गीतो ग्रन्थ तैयार थता पूर्वे करी छे ते उपरथी श्रीमद् देव- चद्रजीकृत कृतियोनी उपयोगितानो ख्याल आवी शके छे आ ग्रन्थनी किंमतनी उपजेली रकम बन्ने भाग उपावता वधशे तो तेनो अन्य द्रव्यानुयोगना तथा आध्यात्मिक ग्रन्थो छपाववा- मा उपयोग करवामा आवशे तेथी परपराए धार्मिक ग्रन्थोनो प्रचार तथा तेओनु प्राकट्य थशे एम अवबोधीने जैनोए तथा गुणानुरागी जैनेतरोए श्रीमद् देवचद्र प्रथम भागनो लाभ लेवा चूक नहीं अध्यात्मज्ञानप्रसारक मडळ तरफयी आप्रमाणे

उपयोगी पुस्तको बहार पड्या छे-पडे छे अने भविष्यमां
सद्गृहस्थोनी साहाय्ययी उपयोगी पुस्तको बहार पडशे, माटे
जैनधर्मामिलापी सज्जनोए आ मडळने सहाय करवी जोइए
श्रीमद् देवचद्रजीकृत पुस्तको छपाववामां अत्यार
सुधीमा जे जे गृहस्थो तरफथी मद्द मळी छे
तेमनां नामो नीचे प्रमाणे
"
"
"
"
.
५०१ शा मोहनलाल नाथाभाई पादरा
२०० शा मोहनलाल नरोत्तमदास रणु ( पादरा)
२०० शा जवेरभाई भगवानदास कावीठा (बोरसद)
१०१ श्रीयुत श्रेष्टी अमरचदजी बोथरा-वालुचर (मुशीदाबाद)
बुधसिंहजी बोथरा
, जगपतिसिंहजी दुगड
, हरखचदजी नाहटा
२५
गुलाबचदजी भुरा
१८६ शा हीरालाल छोटालाल पादरा
१५० बाई रतन शा चुनीलाल कहानदासनी विधवा रे
इटोला (वडोदरा)
१०१ वकील मोहनलाल हीमचद पादरा
२५ सौ बाई जमना वकील मोहनलाल हीमचदना पत्नी
पादरा
१०० शा लक्ष्मीचद लालचद बडु (पादरा)
१०० बाई चचळ शा दामोदर कल्याणदासनी विधवा वड
(पादरा)
८९ वेन मणी शा प्रेमचद दलसुखभाईनी भाणेज पादरा

८० शा केशवलाल लालचद वडोदरा मामानीपोळ ७५ शा केशवलाल नरोत्तमदास वटु ( पादरा) ७५ गाई आधार शा गोरधनभाई हीराचदनी विधवा अगुटण (डभोई) ५० शा रतनचद लावाजी कावीटा (चोरसद) ४१ शा भाईलाल चुनीलाल पादरा २५ वकील नदलाल टल्लभाई पादरा २५ वाई साकळी ते शा मणीलाल चुनीलारनी विधवा पादरा. २० एक गृहस्थ तरफयी पादरा १० शा ीकमलाल पृजलाल राजली (इभोई), १० शा मुळजी पीताबरदास मुजपुर (पादरा) ५ वाई रुक्षमणी शा दलमुखमाई माणजीरनदासनी दीकरी पादरा ५ वाई टाही ते शा छोटालाल उगनटानी विधवा पादरा ५शा माणेकलाल वरजीवनदास " २३४७ उपर प्रमाणे मदद करनारा सभ्य गृहस्थोनो उपकार मान- वामा आवे छे तथा जे जे गृहस्थो हवे पछी मदद करशे तेनो द्वितीय भागमा नामसहित उपकार मानवामा आवशे आवा मोधवारीना प्रसगमा श्रीमनी कृतियो छपाववामां आ- र्थिक सहायनी घणी जरुर छे, तपागच्छना श्रावकोनी पेठे खरतरगच्छीय श्रावको जो पोतानो उदार हाथ लबावशे तो.

(८)
तेओ श्रामदना रागी भक्त बनी तेमना पुस्तकोनो प्रचार करी
अमूल्य लाभ प्राप्त करशे अने तेथी तेओ भविष्यनी जैन
कोमना उपकारी बनशे ॥ इत्यल विस्तरेण ॥ ॐअहंशान्ति ३
अध्यात्मज्ञानप्रसारक मंडळ-मुबाई,
चपागली
स १९७४ चैत्र सुदि १

प्रस्तावना.
-
श्रीमद् देवचद्रजी कृत सर्व अधो छपाववानो सकल्प,
श्रीमद् देवचन्द्रजी महाराजकृत सर्व ग्रयो उपाववानो सक
ल्प सकप सवत् १९६८ ना चैन मासमा थयो योगनिष्ठ
शाखविशारद जैनाचार्य श्रीमद बुद्धिसागर मूरिश्वरजी बिहार
करता मुगाई सुरत थई चैत्र मासमा पादरे पधार्या तत्समये
श्रीमद्देवचद्रजीकृत आगमसार नयचक्रसार विगेरे ग्रयोनु परि-
शीटन ययु ते वखते गुरु महाराजे तेमना सर्व ग्रथो मेळवी
एकर करी छपाववा सरवी उपदेश कर्यो तेयी वेम करवा द्वन्द्र
निश्चय कयों, अने ते सनधी विचारोनो प्रवाह गरु थयो,
आद्यमा कया कया ग्रयो उपाववा तेनो निश्रय कयों सवत
१९७२ नी सालमा श्रीमद् मूरिजी महाराज विजापुरमा चो-
मासु रह्या ते समये तेमनी देखरेख नीचे तथा तेमनी दृष्टि
प्रमाणे आगमसार ग्रय छपाववानो शरु कयों, वडोदराना
लहाणामिन स्टीम प्रेसना मालीक रा विठ्ठलभाई आशारामे
सगवड भरेली रीते पुस्तको छापी आपवानु कबुल कयु तेथी
तेमना प्रेसमा आगमसार ग्रथ प्रथम आपवामा आग्यो, अने
एक तरफ वेमना बनावेला पुस्तकोनी शोध अने सग्रह माटे
जाहेर खबरो छपाववामा आवी
श्रीमद् देवचद्रजी महाराजनु नाम समग्र जैन कोगमा
प्रख्यात छ जैन कोमनो कोई पण फीरको तेमना नामयी अजा-
ण्यो नयी, सर्व गच्छवाळाओ तेमना ग्रथोनो प्रेमथी उपयोग
को छे वेयी वेमना सर्व ग्रयो छपाववानी जाहेरखबर बहार
a

(१०) पटवायी जैन काममा आनदनी लागणी फेलाई, तेमना ग्रयो ज्याथी ज्यायी मळे एवो सभव हतो त्या त्या अनेक स्थळे अनेक महाशयो उपर पत्रो लख्या ग्रथोनी प्राप्ति माटे पत्रव्यवहार श्रीमद् मुळचदजी महाराजना सवाडाना आचार्य श्रीविजय कमळसरिजी, तथा तेमना शिष्य पन्यास केसरविजयजी, तथा मुनी लाभविजयजी, तथा मुनीराज श्रीहेतमुनिजी, तथा प्रवर्तकजी महाराजापी कान्तिविजयजी, तथा मुनिराजश्री जिनविजयजी, तथा पन्न्यासजी महाराजश्री दानविजयजी तथा मुनिगहाराजश्री श्रीकृपाचद्रमुरिजी तथा पन्यासजीश्री भावविजयजी (पाली) तया मुनीश्री नागचद्गजी (कच्छ) तया मुनिश्री चित्तविजयजी तथा वालुचर (मुर्शीदाबाद) निवासी जवेरी अमरचदजी बोथरा तथा भोजक गीरवरभाई हेमचद तथा रा रा चीमनलाल डी० दलाल तथा जवेरी भोगीलाल ताराचद तथा रा रा मोहनलाल दलीचद देसाई तथा अन्य मुनिराज तथा ग्रहस्थो अने सस्थाओ साथे पत्र- व्यवहार कों कया कया ग्रथो क्या क्याथी मळ्या १ आगमसारनी एक जुनी प्रति के जेमा प्रतिमापूजा, पुप्पपूजाचर्चा, गुणस्थानक स्वरूप, पापस्थानक स्वरूप ए चार विषयो के जे छपाएला आगमसारना नहोता ते प्रत पादरीना भडारमायी मळी अने तेवा वधारावाली बे प्रतिओ सुरतना श्रीमोहनलालजी महाराजना भडारमायी मळी' तथा मुनिश्री लाभविजयजी पासेयी एक प्रति तेवा वधारावाळी मळी * प्रत न ४०९-५६० । - (११) २ नयचक्रमारनी एक जुनी पनि मृगतना मोहनलालजी महाराजना भटारमायी मग ते पूना उपायला नयचक्रसारना जेवी हती ३ जानमजरी टीकानी जुनी ने प्रतिनो सन्त मोहन- लालजी महाराजना भटारमाथी मनिधी के मुनिजी मारफत मी तथा तेमनाज तरफ्था तानाज उपाठी एक प्रति मळी ४ गुरु गुणपटनिशिकानोटयो-नेगी एक प्रति पन्यास गुलाविजयजी पासेयी भोजक गीरवरभाई हेमचंदे मेळवी आपी अने तेने श्री आत्मानद सभा तरफयी उपाएल मृत टीका सहितनी मळेली प्रतना आधारे मुवारी ५ ध्यानदीपिकाचापढीनी एक प्रति आचार्य श्रीविजय- कमळमरिजी ( मुळचटजी महाराजना ) मारफत चोराजीना भटारमायी शा जादवजी यजीए मोकली तेना आधारे उपावी ६ पाच कर्मथनोटयो आनी एक प्रति पन्यास गुलान- लार विजयजी पासेयी भोजक गीरवरभाइए मेळवी आपी बीजी प्रति मळी नयी ७ विचार रत्नसारनी एक प्रति प्रतिवाजी श्री कातिवि- जयजी महाराज पासेथी तथा एक प्रति अमदाबाद श्रीशाति- सागरजीना भडारमायी शा जमनादास घेलाभाई मारफत मळी तथा एक प्रति मुनि लाभविजयजी पासेथी मळी ८ प्रश्नोत्तरनी एक प्रति प्र श्रीकातिविजयजी महाराज पासेयी मळी * न ५४६ पान ४१ (१२) ९ कर्मसवेध अमदावाद डेलाना उपाश्रयना भडारमायीx झवेरी भोगीलालभाई ताराचद मारफत मळी १० प्रतिमापुष्पपूजासिद्धि ११ गुणस्थानकअधिकार आ बने विषयो पादराना तथा सुरतना भडारमायी+ तथा मुनिलाभविजयजी पासेथी मळेली आगमसारनी जुनी प्रतिओमायी मळेल छे, अने प्रतिमापुष्पपूजासिद्धिना जुदा लखेला भागनी बे प्रतो अमदावाद डेलाना उपाश्रयना ज्ञान भडारमायी म- ळेली छे * ज्यारे आगमसार छपातो हतो ते वखते आ विषय- वाळी प्रतिओ मळेली नही होवाथी तेनी अदर दाखल करेल नथी अने पाछळथी मळवाथी ते आगमसारना पेटा भाग तरीके आ ग्रथमा पाछळ दाखल करवामा आवेल छे . श्रीमद् देवचद्र द्वितीय भागमा छापवाना ग्रथो. १२ (१) विचारसार मूळ-सस्कृत-टीका-श्रीमद् देवच- द्रजीकृत विचारसार नामनो यथ छे एवी प्रथम खबर मने वालुचर नीवासी श्रीयुत अमरचदजी बोथराए अत्रेयी छपावेल जाहेरखबर वावीने आपी अने ते यथनी मुळ-टवावाळी एक प्रत तेमणे श्रीजिनयश सुरिजीना पुस्तक भडारमाथी मोकली आपी अने तेवीज बीजी प्रती रा रा चीमनलाल डी० दलाल x डाबडो न ३२ बी प्रत न ४२ + प्रत न ४०९-१६३ पान ६६ ६७ * डाबडो न २० वी प्रत न ८०-८१ पान १०. ०-७ । (१३) एमणे बीकानेरयी त्यांना प अनुपचन्द्रजीयति पासेयी खरीद री मारापर मोकली आपी तथा तेवीज एक मति प्र० श्री कान्तिविजयजी महाराज पासेयी मी तथा आ ग्रथनी सपूर्ण टीकावाली प्रति अमदावादटेलाना उपाश्रपना ज्ञानभडारमायी+ मळी तया तेज भडारमायी टनावाळी एक प्रत मळी तथा विचारसारनी प्रथमखटनी सस्कृत टीकावाळी प्रत उपाध्यायजी श्रीवीरविजयजी शास्त्रसग्रहमायी प श्रीदानविजयजी महाराज पासेयी मळी (पान ६८) आ स्थळे एक बात जणावी जग- त्यनी छे के अमदावाद टेलाना उपाश्रयनो ज्ञानभडार जे घणो जुनो तथा तेमानो ग्रथसग्रह घणो उनम अने अमूल्य छे, परतु कार्यवाहकोना मतभेदना लिचे तेमायी प्रतिओ मेळववा घणी मुदकेलीओ नडी हती, छता अध्यात्मज्ञान रसिक झवेरी भोगीलालभाइ ताराचद एमणे खास प्रयास करी जोइती - तिओ कदावी आपी हती तेमाटे तेमनो उपकार मान्छु १३ (२) अध्यात्मगीता-आ अथ प्रथम छपायेलो हतो ते शीवाय तेनी बे प्रतिओ सुरत मोहनलालजी महाराजना ज्ञानभडारमायी मळी हती १४ (३) द्रव्यप्रकाश-नी एक प्रति अमदावाद विद्या- शाळाना ज्ञानभडारमायी भोजक गीरघरभाइ मारफत अने एक प्रति पन्यास लाभविजयजी महाराज पासेयी मळी हती. x डावटो न ४९ पोथी न ९७ पान ६८ + टाबडो न ३२ वी पूर्वाध प्रत न ५० उत्तरार्ध न ५१. न ३२ वी प्रत न ५२ * प्रत न ७०२-४३५ पा १२-४९ " -- १५ (४) चोवीशी मोटी ट्वासह-आ चोवीशीनी प्र- थम छपायली प्रतिओ उपरात प्र० श्रीकातिविजयजी महाराज पासेथी आजयी दोढसो वर्षपर सुरतना भणसाली कुटुबे लखा- वेली प्रति मळी छे आ प्रति प्रथम छपाएगी चारे आवृतिओ करता वधारे शुद्ध छे छापेली प्रतिओमा जुनी आवृति अम- दावाद श्रीशातीसागरजीना भडारमा छे १६ (५) वीस विहरमानजी स्तवन (वीसी)-आ ग्रंथ प्रथम छपायेल छे १७ (६) गतचोवीसी (स्तवन २१) प्रथम छपाएल छे छे छेल्ला त्रण स्तवनो शोध कर्या छता मळी शक्या नयी कोइ महाशयना जोवामा आवेने जणावशे तो आभार थशे १८ (७) स्नात्रपूजा आ चारे ग्रथो प्रथम १९ (८) नवपदजीपूजा (उलाळा)। पूजा सग्रहमा छपा- २० (९) एकवीशप्रकारी पूजा एल छे तेनी जुनी २१ (१०) अष्टप्रकारी पूजा हस्तलीखीत प्रति- ओ पादराना पुस्तक भडारमा छे २२ (११) वीरनिर्वाणना स्तवननी ढाळो-नी एक प्रति अमदावाद विद्याशाळाना भडारमायी भोजक गीरधरभाइ मार- फत मळी छे २३ (१२) बाहुजीन स्तवननो टबो अमदावाद डेलाना उपाश्रयना भडारमाथी मळेल,छे * बीजा ओगणीस स्तवननो टबो श्रीमदे लखेलो होय एवो सभव छे पण मळेल नथी * डाबडा न ४४ बी प्रत न ८ पान ७ २४ (१३) भावी चोवीशीना मथम तीर्थकर पद्मनाभजीनु स्तवन श्रीयुत अमरबदजी गोयरा तथा भोजकगीरघर हेमचद तरफथी मळेल छे बीजा तेवीस स्तनो एम साभच्यु छे पण हज मुघी मळी शश्या नधी २५ (१४) सीमधरजिनरतपन मोड भोजक गीरघरमाई तरफयी मन्यु छे तेम उपायेल पण छे २६ (१५) २७ (१६) सिदाचळना स्तवनो आ चारे स्तवनो २८ (१७) पादराना भडारस्थ टीपणामायी मळेल छे २९ (१८) ३० (१९) दीपाळीनु स्तवन नानु ३१ (२०) नवानगरजी स्तवन पादराना भडारमाथी मळेल छे ३२ (२१) पपद स्तान ३३ (२२) समवसरणस्तवन आ वे स्ताने श्रीयुत ३४ (२३) कुभर यापना स्तवन | अमरचदजी बोथरा तथा भोजकगी० हे० तरफथी मळेल छे ३५ (२४) सहस्त्रकुटनु स्तवन भोजकगी. हे० तरफथर्थी मळेल के तेमज कॉ हेरल्डना १९१५ ना खास अकमा छपायलु छे ३६ (२५) अजितनाथ जिनहोरी होरी सग्रहमा छपा- छे ३७ (२६) प्रभुस्तुति ३८ (२७) सिद्धाचळस्तुति आ स्तुतिओ श्रीयुत ३९ (२८) विशस्थानकस्तुति अमरचदजी बोथरा ४० (२९) गीरनारस्तुति | तरफयी मळी छे. ४१ (३०) ज्ञानबहुमानस्तुति

आ सझायो
(१६)
४२ (३१) बडी साधुवदनानी ढालो श्रीयुत अमरचदजी
बोथरा तरफथी मळेल छे
४३ (३२) अष्टप्रवचन मातानी सझायो।
४४ (३३) प्रभजनानी सझाय
४५ (३४) ढढण ऋषिनी सझाय
छपायेली छे
४६ (३५) समकितनी सझाय
४७ (३६) गजसुकुमालनी सझाय
४८ (३७) पचेंद्री विषय त्यागपद-श्रीयुत् अमरचदजी
बोथरा तरफथी मळ्यु छे
४९ (३८) सुरत नीवाशी जानकीबाइ उपर लखेला
५० (३९) [ पत्रो २-आ बे पत्रो आत्मानदप्रकाशमा
छपाएला छे ते उपरथी लीधा छे
५१ (४०) एक श्रावक उपर लखेलो पर-प्र० श्रीका-
तीविजयजी महाराज पासेयी मळ्यो छे
५२ साधु स्वाध्याय
५३ बे सज्जायो प अजितसागरगणि तरफथी मळेल छे
उपर प्रमाणे ज्यायी पुस्तको स्तवनो सझायो विगेरे मळ्या
तेनी वीगत आपी छे श्रीमद देवचद्रजी महाराजना रागी
भक्तोमा श्रीयुत् अमरचदथी बोथरानु नाम प्रथम पद धरावे
छे तेमणे श्रीमद्नी केटलीक कृतिओना नाम तथा ते क्या
क्या मळी शकशे ते मने पत्र लखी प्रथमी जणाव्यु हतु
तेमना पत्रव्यवहार उपरयी तेमनी श्रीमद् उपरनी भक्तिनो
उत्तम ख्याल आवी शके छे “ श्रीमद् देवचद्र " पहेलो भाग
छपायलो तेमनापर मोकल्यो त्यारे तेमने अत्यत आनद थयो
हतो ते सबधी पत्रनो उतारो नीचे आप्यो छे

पत्र श्रद्धास्पद धर्मर वकील मोहनलालभाइ जोग ली. बालचरसे अमरचद बोयरेका प्रणाम बहुत बहुन वंचियेगा, यहा कुशलमगल है आप रोगोकी कुशल सदा चहाता हु अपरच समाचार चियेगा आगु " श्रीमद देवचन्द्र " नामाग्रयका मुद्रिताश आपने कृपाक मेजा सो पतितपावनि तिधि चैत्र शुकल त्रयोदशीके दिवस मुजे मिला था आपकी इस कृपाके लीये मै आपका आ जन्म ऋणी भया हु, उपरोक्त प्रयका पहुंच समाचार में करते चले जानेसे फॉरन देनमे देरि मया आशा हे हमारा ए अपराव क्षमा करिगा ओर कलदिनमें कलक्वेसे आया हु “विचारसार " ग्रंथ पहोचा सो जानियेगा, विकानेवाले श्रीपूज्पजी कहा है मालम नही भया मालुम होनेसे उनको पत्र लिखकर सर्व वात पुछ- कर आपको लिखुगा आगु-कमसेकम हजार पुस्तक छपवाइएगा ऐसा हमारा अनुमान था इसिसे १५१ पुस्तक भेजनेको लिखा था लिकन पुस्तक कम उपेगी तो पु १५१ मेजनेकी जरुरत नहि है, पुस्तक छववानेके खर्च बाबत रुपीया चार पाच रोजमे मेजेगे श्रीमद्कृत समस्त ग्रयादि छपानेके विचार है एक अक्षर मी छोडनेका इरादा नहि है लिखा सो वाचकर खुशी भये पूज्याचार्य श्रीमद् बुद्धिसागरजीसरिजी तपागच्छके होकर श्रीमद् देवचन्दजी महाराजके प्रति इतनी भक्ति रखते है इह इस कालमे अपूर्व है इस लिये श्रीआचार्य बुद्धिसागरसरिजीके चरणमे वाखार नमस्कार हो x x x x x x ३ .

- (१८) श्रीमद् समन्धि हमको जो कुछ मालुम था सो बतलाना हमारा फरज था सो हम कथचित पालन किया यह हमारा सौभाग्य है इस लिये हमारी प्रससा की कोई जरुरत नहि मुजे लज्जित' होना पड़ता है सो मालुम फिजियेगा धर्म स्नेह सविशेष रखीयेगा, पनोतर शीव दिजियेगा यहा के लायक काम हो सो लिखिपेगा इति छपाव्या विनाना पुस्तको (१) गुरुगुणपशिका टमो (२) ध्यानदीपिका चतुष्पदी (३) कर्मयय पाचनो टयो (४) विचाररत्नसार पूर्ण (५) प्रश्नोत्तर (६) विचारसार मुळ-टीका अने टकों (७) कर्मसवेध प्रकरण (८) प्रतिमापुष्पसिद्धि (९) गुणस्थानाधिकार (१०) द्रव्यप्रकाश (११) बाहुजिनस्तवन टबो (१२) वीर निणनी ढालो (१३) पद्मनाभजिन- स्तवन (१४-१५-१६-१६) सिदाचलंना स्तवन' (१८) नवानगरस्तवन (१९) ध्रुवपदरतवन (२०) समवसरण स्तवन (२१) कुभस्थापनस्तवन (२२) सिझाचलस्तुति (२३) वीशस्थानकरतुति (२४) ज्ञानबहुमानस्तुति-(२५) गिरनारस्तुति (२६) कागळ (२७) पचेन्द्रिय विषय- त्यागपद (२८) प्रभुस्तुति साधुपद अन्यपद ए रीते त्रीश छपविया वगरना हता ते छपाया छे अने ते विनाना पहेला छपावेला हता ते पुन शुद्ध दरी छपावेल छे काइ शाला या पुरुषको क्या गाम रच्या । सेवत्। १७७६ फागण सुदि चीजें मोटा कोट-मरोट-मा पोताना मित्र दुर्गादासना बोचार्थे आगमसारनी रचना कर- वामा आवी (१९) सवत् १७९६ ना कार्तिक सुदि पाचमे नवानगरमा ज्ञानसार उपर ज्ञानमजरी टीका रचवाना आवी सवत् १७६६ ना वेशाख वदि १२ नारोज मुलनान शहे- रमा भणशाली मीठमल्ना आग्रहयी मारदीपिकाचतुष्पदी रची सबत् १७९६ ना कार्तिक सुदि १ ना रोज नवानगरमा विचारसार ग्रथरच्यो सवत् १७६७ ना पोप वदि १३ ना रोज द्रव्यमकाश अथ रच्यो सरत् १८०४ ना मागशर सुदि १३ ना रोज सिद्धाच- टजीनु रतवन सुरताशी कचरा कीकाना सवमा सिद्धाचळजीना दर्शन करी रच्यु जेसलमेरमा वर्धमान शेटना आग्रहयी पचभावनानी रचना करी शाल मळती नयी लीमडी शहेरमां अध्यात्मगीतानी रचना करी भावनगरमा दीवाळीना दीवसे वीरनिर्वाणनु स्तवन (ढालो) रची शाल टखी नयी. ए शीवाय वीजा अयोनी शाल तथा स्थळ मळेल नयी श्रीमद्नुं जीवनचरित्र श्रीमद्नु जीवनचरिन दजी परिपूर्ण उपलव्य ययु नयी ते सबधी ज्या त्या पनो लखी हकीकत मेळववा प्रयास करवामा आवे छे श्रीमद् देवचद्र द्वितीय भागमा श्रीमद्ना जीवनचरित सबधी जे-जे हकीकत मळगे वे दाखल करवान आवशे तथा तेमनी कृतिओ सबधी उपोद्घातमा लेख्य विचारो प्रगट करवामा (२०) आवशे प्रथम भागमा पर विस्तार भययी ते दाखल करेल नयी श्रीमद्ना जीवनचरित सधी जे जे महाशयो खबरो पूरी पाडशे तेमनी उपकारसह बीजा भागमा नोंध ठेवामां आवशे अप्रगट कृतियो श्रीमद्नी जे जे कृतियो मळी तेनु लीष्ट उपर आपवामा आव्यु छे तेम छता हजी जे जे अप्रगट कृतियो रही होय ते सबधी जाहेरखबरथी तथा पत्रव्यवहारयी प्रयत्न करवामा आवशे श्रीमदनी अप्रगट कृतिओ मेळववामा जे जे महाशयो स्हाय करशे तेमनी बीजा भागमा उपकार सह नोंध लेवाशे पुस्तको मेळवी आपनार महाशयोनो उपकार अमदावाद डेलाना उपाश्रय ज्ञानभडारमायी बने पक्षना मतभेद प्रसगे पुस्तको न मळी शके तेवा सजोगोमा खास काळजी राखी श्रीमद्नी कृतियोनी प्रतिओ अपाववामा झवेरी भोगीलालभाइ ताराचदे जे सहाय आपी छे तेमाटे तेमनो आभार मानुछु श्रीमद् देवचद्रजीनी चोवीशी तथा अन्य वाच- नयी तेओनो श्रीगद्पर पूर्ण राग प्रगटेलो जणाय छे ने तेथी तेमणे आ कार्यमा सारी स्हाय आपी छे वालुचरवाळा झवेरी अमरचदजी बोथरा जेओ श्रीमना पूर्ण रागी ज्ञानरसिक भक्त छे तेमनो तया भीमदनी कृतिना पुस्तको आपवा माटे श्रीमद् प्रवर्तक श्रीकातिविजयजी तथा श्रीमद् विजयकमळसूरीश्वरजी, पन्यास लाभविजयजी, पन्यास केसरविजयजी, पन्यास गुलाबविजयजी, मुनि हेतमुनि, भोजक (२१) गीरघरमाइ हेमचद तथा धोराजीना शेठ जादपजी सनी विगे- रेनो अत वरणपूर्वक आभार मान्छ आ कार्पना मूळ उत्पाद अने प्रेरक परमपूज्य योगनिष्ट शास्त्रविशारद जैनाचार्य श्रीमद बुद्धिसागर सूरिश्वरजी महाराज ओए मान आ ग्रय उपावबानो उपदेश करीनेज नहीं अ- क्ना तमाम ग्रयो शोमा सुधारसामा तेमज मुफो तपासनामा आगरे वे वर्षयी सतत प्रयास सेवेटो छे एटलज नहीं पण विचारसारनी सरकृत टीम अने वीजा केटराक ग्रय एटला तो अशुद्ध अने अव्यवस्थित रीते ल्खायला हता के जे शुद्ध करवामा तेओ श्रीनो घणो काळ व्यतीत थयो छे तेओ श्रीनी आटली बघी काळजी अने सहाय न होत तो आ कार्य कदापी यई शक्त नहीं वेयी तेओश्रीनो जेटलो उपकार मानीए वेटलो जोओ छे, अने तेयी आ कार्यनी सफळतानु सर्व मान वेओश्रीनेज घटे छे. आ पुस्तकसग्रहमा उपाएल ग्रयो पैकी केटलाकनी प्रतिओ घणी जुनी पण अशुद्ध होवाथी तेमज तेनी मेळवणी माटे पुरतु साधन नहा मळवायी तेने शुद्ध करवा प्रयत्न कर्या छता घणी भुलो रही जवानो सभव छे तेनु शुद्धिपनक दाखल करेल छे छता पण कोई रथळे भुलो रहेली होय तो ते सुज्ञ वाचको सुधारी वाचशे अने मने जणाशे तो तेमनो आभार मानी वीजी आवृत्तिमा सुधारो करवामा आफ्शे आ ग्रथ सबधमा जे काई टखवानुं बाकी रहेल हशे ते बीजी आवृतिमा जणावधामा आरशे

(२२),
छेवटे श्रीमदनी कृतिओ अने जीवनचरित्र सबधी तेमज
आ ग्रय सबधी जे जे उपयोगी सुचनाओ आपत्रानु योग्य
लागे तेवी सुचनाओ आपा सर्व सज्जनोने विनति करी आ
प्रस्तावना पूर्ण करु छु, अने मारा जीवननो जे काई समय
आ कार्यमा व्यतित थाय छे तेमाटे मारा आत्माने धन्य
मानुछु
पादरा
चैन सुदि १ स १९७४
} वकील मोहनलाल हीमचंद
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अनुक्रमणिका. - " प्रष्ट १ आगमसार १-७२ त्रणकरण १ निगोद ३७ पद्रव्यनु स्वरुप ३ चार ध्यान " आठपक्ष भापना ५४ सातनया १५ समकिन ५६ चार निक्षेप २१ निश्चयन्यवहार स्वरूप चार प्रमाण " ३२ पचासमवाय ६८ सप्तभगी २ नयचकसार ७३-१८८ गुणठाणाआधीजीउना मेद७४ सप्तभगीनु स्वरूप १०२ द्रव्यगुणपर्याय लक्षणनय- उत्पादव्ययना मेद ११७ निक्षेप सहित ८० सामान्य स्वभावना मेद १२७ पचास्तिकायनु स्वरूप ८८ विशेष स्वभावना मेद १४० सामान्य विशेष स्वभावना नयज्ञान स्वरूप १४३ ९५ प्रमाण स्वरूप १७९ ३ ज्ञानसारटीका १८९-४२२ १ पूर्णाष्टक १८९ ७ इन्द्रियजयाष्टक २४१ २ मग्नाष्टक ८त्यागाष्टक २४८ ३ स्थिरताष्टक २०८ ९ किनाष्टक २५७ ४ मोहत्यागाष्टक ३१३ १० तृप्त्यष्टक २६४ ५ ज्ञानाष्टक २२२ ११ निलेपाएक २७१ ६ समाएक. २३४ १२ निस्पृहाष्टक.

(२४) १३ मौनाएक २८३ २४ शास्त्राष्टक ३६२ १४ विद्याष्टक २९२ २५ परिग्रहाष्टक १५ विवेकाष्टक २९९ २६ अनुभवाष्टक ३७२ १६ माध्यस्थ्याएक ३०८ २७ योगायक ३७७ १७ निर्भयाष्टक ३२३ २८ निवागाष्टक १८ अनात्मशसाष्टक ३२७ २९ भावपूजाटक ३८८ १९ तत्वदृष्ट्यष्टक ३३३ ३० ध्यानाष्टक ३९२ २० सर्व समृद्धयष्टक ३४१ ३१ तपोऽएक ३९७ २१ कर्मविपाकचिंतनाष्टक ३४६ ३२ सर्वनवणयणाष्टक ४०४ २२ भवोद्वेगाष्टक ३५२ ३३ टीकाकारमशस्ति ४२० २३ लाकसज्ञात्यागारक ३५७ ४ गुस्गुणछत्रीशी ४२५-४५० ५ ध्यानदिपीकाचतुःष्पदी ४५३-५७९ १ बारभावनानु स्वरूप ५२४ २ रत्नत्रयपचमहाबत खड २ ४६९ खड ५ ५४९ ३ समितिगुप्ति-मोहजय ६ शुक्लध्यान स्वरूप वर्णन खड ३ ५६८ ६ कर्मग्रथनो दबो ५८२-७१२ १ पहेलो कर्मग्रय ५८२ ४ चोयो कर्मथ ६४२ २ बीजो कर्मग्रय ६११ ५ पाचमा कर्मग्रय ६८४ ३ त्रीजा कर्मग्रय ६२९ ७ विचाररत्नसार ७९३-९३२ ८ छुटक प्रस्नोत्तर ७५३-१६५ ९ कर्मसवेधमकरण ९६७-९९२ १० प्रतिमापुप्पपूजासिद्धि ९९३-२००४ ११ गुणस्थानक अधिकार. १००५-२०२८ ४ ध्यानव्येय स्वरूप ४५३ खड ४ ५ धर्मध्यान स्वरूप ॥ श्रीसर्वज्ञाय नम• ॥ ॥ अथ ॥ ॥ श्रीपडितदेवचद्रजीकृत ॥ आगमसार. मन्यजीवने प्रतिमोथवा निमित्त मोक्षमार्गनी बचनिका कहे छे तिहा प्रथम जीव अनादिकालनो मिथ्यात्वी हतो ते काललब्धि पामीने नण करण करेछे तेना नाम-पहेलु यथामवृ- त्ति करण, वीज़ अपूर्व करण, अने नीजु अनिवृत्ति करण तेमा पहेल यथाप्रवृत्ति करण कहेछे १ ज्ञानावरणीय, २ दर्शनावरणीय, ३ वेदनीय, ४ अतराय, ए चार कर्मनी नीस को- डाकोडी सागरोपगनी स्थिति छे, तेमाथी ओगणत्रीस कोडाकोडी खपावे अने एक कोडाकोडी बाकी राखे, तथा १ नामकर्म, २ गोत्रकर्म, ए वे कर्मनी वीस कोडाकोड़ी सागरोपमनी स्थिति छे, तेमायी ओगणीस खपावे अने एक कोडाकोडी राखे, अने मोहनीयकर्मनी सित्तेर कोडाकोडी सागरोपमनी स्थिति छे तेमाथी अगणोतेर खपावे, बाकी एक कोडाकोडी शेष राखे । एवी रीते एक आयुकर्म वर्जीने बाकी साते कर्मनी एकपल्योपमना अस- ख्यातमा भागेन्यून एक कोडाकोडी सागरोपमनी स्थिति राखे, - २ आगमसार एवो जे वैराग्यरूप उदासी परिणाम तेने यथाप्रवृत्तिकरण कहिये ए पहेलु करण, सर्वसजी पचेंद्रीजीव अनन्तीवार करेछे हवे बी अपूर्वकरण कहेछे ते एक कोटाकोडी साग- रोपमनी स्थितिमाहेथी एक मुहर्त अने अनादि मिथ्यात्व जे अनतानुबधीआनी चोकडी ते खपानवाने अजान हेय ते छाड, अने ज्ञान उपादेय एटले आदरवु, ए पाडारूप अपूर्व कहेता पहेला क्यारे न आन्यो एवो जे परिणाम ते अपूर्व करण कहीये, ए बीजु करण ते समकितयोग्य जीवने याय हवे चीजु अनिवृत्ति करण कहे ते मुहूर्तरूप स्थिति खपावीने निर्मल शुद्ध समकित पामे मिथ्यात्वनो उदय भटे त्यारे जीव उपशम समकित पामे, एको जे परिणाम ते अनि- वृत्ति करण कहिये ए करण कीधायी गठीभेद थयो कहीए उक्तञ्च आवश्यकनियुक्तौ " जा गठी ता पढम । गठीसमय छेओ भवे- बीओ ॥ अनिअट्टिकरण पुण । समत्तपुरक्खडेजीवे ॥१॥ ऊसर देस दबिल्लिय च । विज्जाइ वणदवो पप्प | मिच्छत्त- स्साणदए । उवसमसम्म लहइ जीवो ॥२॥ एम मिथ्यात्वनो उदय मट्यायी जीव समकित पामे, ते समकितनी सद्दहणाना बे भेद छे, एक व्यवहार समकित सदहणा, वीजी निश्चय समकित सदहणा देवश्रीअरिहत देवाधिदेव, अने गुरु सुसाधु जे सूधो अर्थ कहे ते, तथा वर्म केवलीनो प्ररुप्यो जे आगममा सातनय तथा एक प्रत्यक्ष बीजु परोक्ष ए बेममाण अने चार निक्षेपेकरी सहहे, एवी सद्दहणा ते व्यवहार समकित कहिये ए पुण्यनु कारण तथा धर्म प्रगट करवानु कारण छे एवी रुचि ज्ञानविना पण घणा जीवाने उपजे. .

आगमसार ३ वीज़ निश्चयसमकित ते आवी रीते जे निश्चय देव ते आपणोज आत्मा जीव निम्पन्नस्वरपी सिद्ध ते सग्रहनयनी- सत्तागपता, तथा निश्चयगुरु ते पण आपणो आत्मांज तत्व- रमणी, अने निश्चयधर्म ते आपणा जीपनो स्वभावज छे एवी सहहणा ते मोक्षनु कारण छे केमके जीव स्वरूप ओलस्या बिना कर्मखपे नहीं एवी शुद्ध सटहणा ते निश्चयसमकिन हवे जाननु स्वस्प कहेछे ते ज्ञानना बे मेन्छे एक व्यवहारजान, वीजु निश्चयज्ञान, तेमा जे अन्यमतिना सर्व- शास्त्र जाणवा अथवा जेनागममन्ये कह्या जे एकगणितानुयोग ते क्षेत्रमान, पीजो चरणकरणानुयोग ते क्रियाविधि, बीजो वर्मकथानुयोग ए त्रण अनुयोगनु जाणापण ते सर्व व्यव- हारज्ञान छे अथवा अन्तरउपयोगविना जे सूत्रना अर्थ करवा ते पण व्यवहारज्ञान कहिये हवे निश्चयज्ञान ते छ त्य तथा तेना गुण अने पर्याय सर्वने जाणे तेमा पाच अजीव द्रव्यछे ते हेय-कहेता छाडवायोग्य जाणी ठाटबा, अने एक जीवद्रव्य ते निश्चयेंकरी सिद्धसमान मोक्षमयी मोक्षनो जागनार मोक्षनु कारण मोक्षनो- जावावाले मोक्षमाज रहे छे एहवो आपणो जीव अनतगुणी अरूपीछे तेनेज व्यावे ते निश्चयज्ञान कहिये हवे एकपर्मास्तिकाय, वीजो अधर्मास्तिकाय, बीजो आका- शास्तिकाय, चोयो पुद्गलास्तिकाय, पाचमो जीवास्तिकाय, अने छठ्ठो काल ए 3 द्रय शाश्वताछे तेनु ज्ञान कहे छे. ए छ द्रव्य मध्ये पाच अजीव द्रव्यछे अने एक जीव द्रव्य ते चेत- नालक्षणवतछे उपादेयछे , - आगमसार हवे ए छ द्रव्यना गुण कहेछे पहेलो धर्मास्तिकायना चार गुण एक अरूपी, बीजो अचेतन, नौजो अक्रिय, चोथो गतिसहायगुण बीजा अधर्मास्तिकायना पण चार गुणछे एक अरूपी, बीजो अचेतन, वीजो अक्रिय, अने चोयो स्थिति- सहायगुण वीजा आकाशास्तिकायद्रव्यना चार गुणछे एक अरूपी, बीजो अचेतन, त्रीजो अक्रिय, चोयो अवगाहना दान- गुण हवे कालव्यना चार गुण कहेछे एक अरूपी, बीजो अचेतन, बीजो अक्रिय, चोथो नवापुराणवर्तनालक्षण हवे पुद्गल- द्रव्यना चार गुण कहेछे एकरुपी, बीजो अचेतन, चीजो सकिय चोथो मिलणविखरणरूप पूरणगलन गुण हवे जीवद्रव्यना चार गुण कहेछे एक अनतज्ञान, बीजो अनतदर्शन, बीजो अन- न्तचारित्र, चोथो अनतवीर्य, ए छ द्रव्यना गुण कह्या ते नित्यवछे हवे छ द्रव्यनापर्याय कहेछे वर्मास्तिकायना चार पर्यायछे. एक खध, बीजो देश, जो प्रदेश, चोथो अगुरुलघु अध- स्तिकायना चार पर्याय एक खध, बीजो देश, जीजो प्रदेश, चोथो अगुरुलघु, पुद्गल द्रव्यना चार पर्याय एक वर्ण, बीजो गध, श्रीजो रस, चोथो स्पर्श अगुरुलघुसहित, तथा आकाशास्तिकायना चार पर्याय एक खध, बीजो देश, बीजो प्रदेश, चोयोअगुरुलघु, कालदत्यना चार पर्याय एक अतीत काल, बीजो अनागत काल श्रीजो वर्तमान काल, चोथो अगुरुलघु, अने जीव द्रव्यना चार पर्याय एक अन्यावाध, बीजो अनवगाह, त्रीजो अमूर्तिक, चोथो अगुरुलवु ए उ दयनापर्याय कया हवे छ द्रव्यना गुणपर्यायनु साधर्म्यपणु कहेछे अगुरु लघुपर्याय सर्वद्रव्यमा सरीखो छे अने अरूपीगुण पाच द्रव्यमा आममसार. . छे. एक पुद्रलद्रव्यमा नयी, तथा अचेतनगुण पाच द्रव्यमाछे एक जीवद्रव्यमा नयी, अने सक्रियगुण जीव तथा पुगल ए वे द्रयमाछे बाकी चारद्रव्यमा नयी, तथा चरणसहायगुण एक धर्मास्तिकायमाछे, वीजा पाच द्रव्यमा नयी, वली स्थिरसहायगुण एक अपर्मास्तिकायमा छे वीजा पाच द्रव्यमा नयी, तथा अव- गानागुण ते एक आकागद्रव्यमाछे, वीजा पाच द्रव्यमा नयी, अने वर्तनागुण ते एक कालद्रव्यमाजछे, वीजा पाच द्रव्यमा नयी, तेमज मिलणविखरणगुण ते पुद्गलमाछे, वीजा द्रव्यमा नयी तथा ज्ञान-चेतना गुण ते एक जीव द्रव्यमा छे, पण वीजा- द्रव्यमा नयी. ए मूल्गुण कोइ द्रव्यना कोइ द्रव्यमा मिले नही. एक धर्म, वीजो अधर्म, पीजो आकाश, ए रण द्रन्यना नण गुण तथा चार पर्याय सरिखाछे अने नण गुणें करी तो काल- द्रव्य पण ए समान छे हवे वली अग्यार बोले करी उद्रव्यना गुणजाणवाने गाथा कहेछे परिणामि जीव मुत्ता, सपएसा एग खित्त किरिआय निच कारण कत्ता, सव्वगय इयर अप्पवेसे । १। अर्थ--निश्चयनयी आप आपणा स्वभावे छए द्रव्य परि- णामी छे अने व्यवहारनययी जीव तथा पुद्गल ए वे द्रव्य परिणामी छे तथा एक वर्म, बीजो अधर्म, चीजो आकाश अने चोथो काल, ए चार द्रव्य अपरिणामी छे तथा उ द्रव्यमा एक- जीव द्रव्य ते जीवछे, वीजा पाच द्रव्य अजीव छे तथा छ द्रव्यमा एक पुद्गल मूर्तिवन्त रूपी छे अने पाच द्रव्य अमृति- मत अरूपी छे उ द्रव्यमा पाच द्रव्य सप्रदेशी छे, अने एक- काल-द्रव्य अमदेशीछे, तेमा एक धर्मास्तिकाय. वीजो अधर्मा- - - ६ आगमसार , P स्तिकाय ए बे द्रव्य असख्यात प्रदेशी छे, अने एक आकाश- द्रव्य अनतप्रदेशीछे जीव द्रव्य असख्यात प्रदेशीछे, पुद्गलपरमा- माणु * अनतप्रदेशी छे, परमाणुआ अनताले एम पाच द्रव्य सप्रदेशीछे अने छठो काल अप्रदेशी छे छ द्रव्यमा एकधर्मास्तिकाय, बीजो अधर्मास्तिकाय, त्रीजो आकाशास्तिकाय ए त्रण ते एकेक द्रव्यछे, तथा एक जीव- द्रव्य बीजो पुद्गलद्रव्य चीजो कालद्रव्य ए त्रण द्रव्य अनेकअ- नेकछे, छ द्रव्यमा एक आकाशद्रव्य क्षेनछे, अने बीजा पाच द्रव्य क्षेत्रीछे, निश्चयनययी छ द्रव्य पोतपोताना कार्ये सदा प्रव- तेले माटे सक्रियछे, अने व्यवहारनययी जीव तथा पुद्गल ए बे द्रव्य सक्रियछे, तेमा पण पुद्गल सदा सक्रियछे, अने जीव द्रव्यतो ससारी थको सक्रियछे, पण सिद्धअवस्थायें थको ससारी क्रिया करवाने अक्रिय छ, तथा बाकीना चार द्रव्य तो अक्रियछे, निश्च- यनययी छ द्रव्य नित्यछे ध्रुवछे, अमे उत्पादव्ययेकरी अनित्यपणे पण छे तथा व्यवहारनये जीव अने पुद्गल ए बे द्रव्य अनित्यछे, बाकीना चार द्रव्य नित्यछे, यद्यपि उत्पादव्ययब्रुवपणे सर्व पदार्थ परिणमेछे तोपण एक धर्म, बीजो अधर्म, बीजो आकाश, चोथो काल, ए चार द्रव्य सदा अवस्थितछे ते माटे नित्य कह्या छ द्रव्यमा एक जीव द्रव्य अकारण छे अने पाच द्रव्य कारण छ केमके पाचे द्रव्य जीवने भोगमा आवे छे माटे कारण कहिये केमके वर्मास्तिकाय चालवानो साह्य आपे के अधर्मास्तिकाय थिररहेवानो साह्य आपे छे आकाशास्तिकाय अवकाश आपे छे पुद्गलास्तिकाय जीवने मधुरादि, सुरभिगवादिक तथा सकोमल स्पर्शादिक भोगपणे थाय छे तथा कालद्रव्य ते जीवने जरा, बाल, * पुद्गलास्तिकायना म्कन्धो पर्यायो अन तप्रदेशी छे .

आगमसार ७ तारुण्य अवस्था दिएछे, तया अनादि ससारी जीव मवस्थिति परिपाक छता एक अतहतकालमा सकल्कर्म निर्जरी मोक्ष पहोंचे तिहा सिद्ध अवस्यायें अनतोकाल पर्यंत जीव अन्ता सुखने विल्से माटे कालाय पण जीवने भोग यारा छे पण एक जीव द्रव्य कोइने भोग आरतो नयी माटे अकारण का आने पाच द्रव्य भोग आये माटे कारण स्या तथा घणी प्रलोमा तो सक्षेपे एटल छे जे अन्यमा एक जीन द्रव्य कारण छे पाच द्रय अकारणछे ए पण वात घणीरीते मस्तीछे माटे जे बहुश्रुत कहे ते खरु मारी वारणा प्रमाणे जीवद्रय कारण अने पाच द्रव्य अकारण एम सभवे छे" निश्चयनययी उए द्रव्य कर्ताछे अने व्यव- हारनये एक जीवद्रव्य कर्ताछे बाकी पाचदन्य आकर्ता छे. छद्रव्यमा एक आकाशदव्य सर्व-यापी छे अने पाचद्रव्य लोक व्यापी छे छए एक सेनमा एकटा रहा छ पण एक चीजा साये मली जाय नहीं एद्र यनो विचार करो हवे एकेका द्रव्यमा एक नित्य, वीजो अनित्य चीजो एक चोथो अनेक, पाचमो सत्, उठो असत्, सातमो वक्तव्य, आठमो अवक्तव्य, ए आठ आठ पक्ष कहेछे चर्मारितकायना चार गुण नित्यछे तथा पर्यायमा धर्मास्ति- कायनो एक खध नित्यछे बाकीना देश प्रदेश तथा अगुरुलघु पर्याय अनित्यछे अधर्मारितकायना चार गुण तथा एक लोक- प्रमाण खध नित्यछे अने एक देश, बीजो प्रदेश, बीजो अगुरुलघु एत्रण पर्याय अनित्यछे तथा आकाशास्तिकायना चार गुण तथा लोकालोकप्रमाणखध नित्यछे अने एक देश, बीजो प्रदेश त्रीजो अगुरुलघु ए त्रण पर्याय अनित्यछे तथा कालद्रव्यना चार गुण नित्यछे अने चार पर्याय अनित्यछे पुद्गल द्रव्यना चार गुण नित्य आगमसार अने चार पर्याय अनित्यछे जीवद्रव्यना चारगुण तथा त्रण पर्याय- नित्यछे अने एक अगुरुलघु पर्याय अनित्य छे ए रीते नित्या- नित्यपक्ष को हवे एक अनेकपक्ष कहे छे एक धर्मास्तिकाय वीजो अध- र्मास्तिकाय ए बे द्रव्यनो खध लोकाकाशप्रमाण एक छे अने गुण अनताछे पर्यायअनताछे प्रदेश असख्याताछे, तेणेकरी अनेकछे, आकाशद्रव्यनो लोकालोकप्रमाणखध एकछे अने गुण अनताछे पर्याय अनताछे प्रदेशअनताछे माटे अनेकछे, काल द्रव्यनो वर्तनारूप गुण एकछे अने गुण अनताछे, पर्याय अनता छे, केमके समय अनताछे अतीत काले अनतासमय गया अने अनागतकाले अनता समय आवशे तथा वर्तमानकाले समय एक छ माटे अनेकपक्षछे पुद्गलद्रव्यना परमाणु अनताछे ते एकेक परमाणुमा अनतागुण पर्यायछे ते अनेकपणुछे अने सर्व परमा- गुमा पुद्गलपणु ते एकज छे माटे एक छे जीवद्रव्य अनताछे एकेका जीवमा प्रदेश असख्याताछे तथा गुण अनताछे पर्याय अनंताछे ते अनेकपणु छे-पण जीवितव्यपणु सर्वजीवोनु एकसरीखुछे माटे एकपणु छे इहा शिष्य पुछे छे जे सर्व जीव एक सरीखा छे तो मोक्षनाजीव सिद्ध परमानदमयी देखायछे अने ससारीजीव कर्मवश पड्या दु.खी देखाय छे-अने ते सर्व जुदाजुदा देखाय छे ते केम वेहने-गुरु -उत्तर -कहे छे के निश्चयनये तो जीव सिद्ध समान छ माटेज-सर्व जीव कर्म खपावीने सिद्ध थाय छे तेथी सर्व जीवनी सत्ता - एकछे फरि -शिष्य पुछे छे के जो-सर्व जीव ,सिद्ध समान कहोछो तो अभव्य जीव पण सिद्ध-समानछे एम ठेरयु (यु) अने आगमसार ९ ते तो मोक्षे जता नयी, तेहने उत्तर जे अमन्यने कर्म चीकणा से अने अभव्यमा परावर्त धर्म नी तेथी सिद्ध यता नयी माटे तेनो एहलोज स्वभावछे जे मोक्षे जज नयी अने भन्यजीवमा परावर्त धर्म ले माटे कारण सामग्री मिले पलटण पामे गुण श्रेणि चढी मोक्षे करी सिद्ध थाय पण जीरना मुख्य आठ रुचक प्रदेश जे छे ते निश्चयनययी भव्य तथा अभन्य सर्वना सिद्ध समान छे भाटे सर्व जीवनी सत्ता एक सरीखी छे केमके ए आठ प्रदेशने विल्कुल कर्म लागता नथी ते "श्री आचाराग सूत्रनी श्री सिलागाचार्य कृत टीकाना लोक- विजयान्ययने प्रथमोटेशके साख छ तिहायी सविस्तरपणे जोवु " हवे सत् तथा असत् पक्ष कहेछे एउद्रव्य ते स्वद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल, अने स्वभावपणे सत् एटले उता छे अने परद्रव्य, परक्षेन, परकाल तथा परमावपणे असत् एटले अग्रता छे तेनी रीत बताववाने अर्थे उए द्रव्यना द्रव्य क्षेत्र काल भाव कहिये ये धर्मास्तिकायनो मूलगुण चलण सहायपणो ते स्वद्रव्य, अवर्मास्तिकायनो मूलगुण स्थिति सहायपणो ते स्वद्रव्य, आका- शास्तिकायनो मूल गुण अवगाहपणो ते स्वद्रव्य, कालद्रव्यनो मूल गुण वर्तनालक्षण पणो वे स्वद्रव्य, तथा पुद्गलनो मूलगुण पुरणगलनपणो ते स्वद्रव्य अने जीवद्रव्यनो मूलगुण ज्ञानादिक चेतनालक्षणपणो ते स्वद्रव्य ए छद्रव्यनोस्वद्रव्यपणो कह्यो हवे स्वक्षेन ते द्रव्यनो प्रदेशपणो छे ते देखाडे छे तिहा एकधर्मास्तिकाय, बीजो अधर्मास्तिकाय ए बे द्रव्यनो स्वक्षेत्र असख्यात प्रदेश के अने आकाशद्रव्यनो स्वक्षेत्र अनत प्रदेश छे कालद्रन्यनो स्वक्षेत्र समय छे. पुद्गलद्रव्यनो स्वक्षेत्र एक पर- २० आगमसार माणछे ते परमाणु अनताछे जीवद्रव्यनो स्वक्षेत्र एक जीवना असख्याता प्रदेशछे हवे स्वकाल ते छए द्रव्यमा अगुरुलघुनोज छे अने ए छ द्रव्यना पोतपोताना गुण पर्यायते सर्व द्रव्यनो स्वभाव जाणवो एटले धर्मास्तिकायमा पोतानाज द्रव्य क्षेत्र काल भावछे पण बीजा पाच द्रव्यना नयी तथा अधर्मास्तिकाय द्रव्य मव्ये पण स्वद्रव्यादिक चार छे पण वीजा पाच द्रव्यना नयी एमज आकाशास्तिकायने विषे आकाशनाज स्वदन्यादिक चार छ पण बीजा पाच द्रव्यना नयी कालद्रव्यमा कालनाद्रव्यादिक चार छ वीजा पाच द्रव्यना नयी अने पुद्गलना द्रव्यादिक चार ते पुद- लमाज छे पण बीजा पाच द्रव्यना नयी तथा जीव द्रव्यना स्वद्रव्यादिक चार ते जीवमा छे पण बीजा पाच द्रन्यना नयी जे द्रव्य ते गुण पर्यायवत द्रव्ययी अभेदपर्याय होय ते द्रव्य कहिये तथा स्वधर्मनो आधारवतपणो ते क्षेत्र कहिये अने उत्पाद व्ययनीवर्तना ते काल कहिये तथा विशेष गुण परिणति स्वभाव परिणति पर्याय प्रमुख ते स्वभाव कहिये इहा १ भेद स्वभाव, २ अभेदस्वभाव ३ भन्यस्वभाव ४ अभव्यस्वभाव ५ परमस्वभाव ए पाच स्वभाव कहेवा तेमा द्र- व्यना सर्व वर्मने पोतपोताना स्वस्वकार्यने करवे करी मेद स्व- भाव छे,अने अवस्थान पणे अभेद स्वभाव छे अणपलटण स्व- भावे अभव्य स्वभाव छे तथा पलटण स्वभावे भव्य स्वभाव छ अने इत्यना सर्व धर्म ते विशेष वर्मने अनुयायीज परिणमे ते माटे ते परम स्वभाव कहियें ए सामान्य स्वभाव जाणवा ए रीते छए द्रव्य स्वगुणे सत् छे अने परगुणे असत् छे आगमसार ११ हवे वक्तव्य तथा अवक्तन्य पक्ष कहेछे ए उन्यमा अनता गुण पर्याय ते वक्तव्य एटले बचने कहेवा योग्य छे अने अनता गुण पर्याय ते अपक्तत्य एटले वचने कया जाय नहीं एवाडे तिहा केवठी भगवते समस्त भार दीटा तेने अनतमे भागे जे वक्तव्य एटले कहेवा योग्य हता ते कद्या वली तेनो पण अन- तमो भाग श्रीगण पर देने सूनमा गुथ्यो ते सत्रमा गुल्या ते ने असर यातमे भागे हमणा आगम रया ले ए 3 द्रव्यमा आठपक्षकह्या हो नित्य तथा अनित्य पक्षयी चोभगी उपनी ते कहे छे एक जेनी आदि नयी अने अत पण नथी ते अनादि अनत पहेलो भागो अने जेनी आदि नयी पण अत छे ते अनादि सात वीजो भागो तथा जेनी आदि पण छे अने अत एटले छेहेडो पण छे ते सादि सात नीजों भागो वली जेहने आदि छे पण अत नथी ते सादि अनन नामे चोयो भागो जाणवो हवे ए चार भागा छ द्रव्यमा फलावी देखाडे ठे जीव द्रव्यमा ज्ञानादिक गुण ते अनादि अनत के नित्य , अने भव्य जीवने कर्म साये सच तथा ससारीपणानी आदि नयी पण सिद्ध याय तेबारे अत आव्यो तेथी ए अनादि सात भागो, अने देवता तथा नारकी प्रमुखना भव करवा ते सादिसात भागो छ, अने जे जीव कर्म खपावी मोक्ष गया तेनी सिद्धपणे आदिळे अने पालो ससारमा कोड काले आववु नयी माटे अत नयी तेथी ए सादि अनत भांगो के एजीव द्रव्यमा चौभगी कही जीव द्रव्यना चार गुण अनादि अनतछे जीवने कर्म साये सयोग ते अनादि सातछे केमके केवारे पण कर्म टेले १२ आगमसार हवे धर्मास्तिकायमा चार गुण तथा खवपणो ते अनादि अनतछे अने अनादि सात भागो नयी तथा १ देश २ प्रदेश ३ अगुरुलघु ए सादि सात भागोछे तथा सिद्धना जीवमा वास्तिकायना जे प्रदेश रह्या छे ते प्रदेश आश्रयीने सादि अनत भागोछे एवीज रीते अधर्मास्तिकायमा पण चौभगी जाणवी अने आकाश द्रव्यमा गुण तथा खव अनादि अनतछे बीजो भागो नथी अने १ देश २ प्रदेश तथा ३ अगुरु लघु सादि सातछे तथा सिद्धना जीवनी साधे सबध ते सादि अनत छे पुद्गल द्रव्यमा गुण अनादि अनतछे जीवपुद्गलनो समन्ध अभन्य ने अनादि अनतछे भव्य जीवने अनादि सातछे पुगलना खध सर्व सादि सातछे जे खध बाध्या ते स्थिति प्रमाणे रही खरेछे वली नवा बघायछे माटे सादि अनत भागो पुद्गलमा नयी कालद्रव्यमा गुण चार अनादि अनतछे पर्यायमा अतीत काल अनादि सात छे अने वर्तमानकाल सादि सात छे अना- गतकाल सादि अनत छे ए कालनु स्वरूप ते सर्व उपचा- रथी छे ए रीतें काल द्रव्यमा चौभगी कही हवे द्रव्य क्षेत्र काल तथा भावमा चौभगी कहे छे जीव द्रव्यमा स्वद्रव्ययी ज्ञानादिक गुण ते अनादि अनत छे स्व- क्षेत्रे जीवना प्रदेश असख्याता छे ते सादि सात छे ततोद्ध- र्तनापणे फरे छे ते माटे अथवा अवगाहना माटे सादि सात छ पण उती पणे तो अनादि अनत छे स्वकाल अगुरु लघुने गुणे अनादि अनत छे अने अगुरु लघु गुणनो उपजबो आगमसार. १ तथा विणशवो ते सादि सात छे तथा खभाव गुण पर्याय ते अनादि अनत छे अने मेदान्तरे अगुरुलघु ते सादि सात छे धर्मास्तिकायमा स्वद्रव्य जे चलण सहाय गुण ते अनादि अनत छे अने स्वक्षेत्र असल्यात प्रदेश लोक प्रमाण छे ते अवगाहनापणे सादि सात छे स्वकाल ते अगुरुलबु गुणे करी अनादि अनत छे अने उत्पाद व्यय ते सादि सात छे स्वभाव ते चार गुण अगुरुल अनादि अनत छे १ खव २ देश ३ प्रदेश ते अवगाहनाने प्रमाणे सादि सात छे एम अधर्मास्तिकायना पण ठ्यादि चार भागा जाणवा तथा आकाशास्तिकायमा स्वद्रव्य अपगाहनादान गुण ते अनादि अनत के अने स्वक्षेन लोकालोक प्रमाण अनत प्रदेश ते अनादि अनत छे स्वकाल ते अगुरुलघुगुण सर्वथापणे अनादि अनतछे अने उपजवे तथा विणसवे सादि सात के स्वभाव ते चार गुण तथा खघ अने अगुरुलघु ते अनादि अनत छे तथा देश प्रदेश ते सादि सात ते आकाश द्रव्यना वे भेद छे एक चौद- राज लोकनो खध लोकाकाश ते सादि सात छे चीजो अलोका- काशनो खध ते सादि अनत छे * काल द्रव्यमा स्वदच्य जे नव पुराणवर्तना गुण ते अनादि अनतछे स्वक्षेत्र समय काल ते आदि सात छे केमके वर्तमान चउदराज लोकनो खध लोकाकाश साटि सात छे ते आवी रीते जे लोकना मायमागे आठ स्चक प्रदेशथी माडीने सादि छे जिहा चउदराज लोकनो अत आवे तिहा सात तथा चउढराज लोकनो छेलो प्रदेश मूकीने पछे अलोकनी आदि लेवी पण अलोकनो अत नथी माटे सादि अन्न का छे आगमसार समय एकछे ते माटे तथा स्वकाल ते अनादि अनत छे स्वभाव ते गुण चार अने अगुरुलघु अनादि अनतछे अतीत काल अनादि सात छे अने वर्तमानकाल सादि सात छे अनागत काल सादि अनत छे पुद्गल द्रव्यमा स्वद्रव्य ते द्रव्यपणे जे पूरणगलन वर्म ते अनादि अनन्त छे अने स्वक्षेन परमाणु ते सादि सात छे स्वकाल स्थिति अगुरुलधु गुण ते अनादि अनत छे अगुरु- लघुनो उपजत्रो विणशवो ते सादि सात छे स्वभावते गुण चार अनादि अनत छ वर्णादि पर्याय चार एटले वर्ण गव रस स्पर्श ते सादि सात छे ए द्रत्यादि चारमा चौभगी कही हवे छ द्रव्यना सबन्ध आश्री चौभगी कहे छे, तिहा प्रथम आकाश द्रव्य छ तेमा अलोकाकाशमा कोइ द्रव्य नयी, अने लोकाकाशमा छ द्रव्य छ, तिहा लोकाकाश द्रव्य तथा वीजु धर्मास्तिकाय द्रव्य अने श्रीजु अधर्मास्तिकाय द्रव्य ते अनादि अनत संबंधी छे जे लोकाकाशना एकेक प्रदेशमा चर्म द्रव्य तथा अधर्म द्रव्यनो एकेक प्रदेश रह्यो छे ते पण किवारे विउडसे नहीं माटे अनादि अनत सबधी छे, आकाश खेत्र लोक सर्व अने जीव द्रव्यनो अनादि अनत सबध छे, अने ससारी जीव कर्म सहित तथा लोकना प्रदेशनो सादि सांत सबन्ध छे लोकांत सिद्धक्षेत्रना सिद्ध जीवोनो आकाश प्रदेश सार्थे सादि अनत सबन्ध छे, लोकाकाश अने पुद्गल द्रव्यनो अनादि अनत सबन्ध छे आकाश प्रदेशनी साथे पुद्गल पर- माणनो सादि सात सबन्ध एम आकाश द्रव्यनी परे वर्मा- स्तिकाय तथा अधर्मास्तिकायनो पण सर्व समन्ध जाणवो जीव अने पुद्गलना सबचमा अभव्य जीवने पुद्गलनो अनादि अनत आगमसार सबप ले केमके अभव्य जीवना कर्म किवारे खपशे नही माटे, अने भन्य जीवने कर्मनु लगवु अनादि काल्नु ले पण ते किगरेक छुटटी माटे भय जीवने पुल सम्र अनादि सात छे तथा निश्चय नयेवरी उद्रय स्वभाव परिणाम परिणम्या छे ते परिणामीपणो सदा शाश्वतो छे ते माटे अनादि अनत छे अने जीव तथा पुद्गल वेह द्रव्य मलि सनम भाव पामे छे ते पर परिणामीपणो छे ते परपरिणामिपणो अभव्य जीवने अनादि अ- नत के अने भव्य जीवने अनाटि सात अने पुदल्नो परिणामी पणो ते सत्ताये अनादि अनत अने पुदल्नो मिल्यो विउडयो ते सानि सात के एटले जीव द्रव्य पुद्गल साये मित्यो सक्रिय के अने पुद्गल कर्मयी रहित याय तेबारें जीर द्रव्य अक्रिय ले अने पुद्गल द्रव्य सदा सक्रिय ले हवे एक, अनेक-पक्षयी निश्चय ज्ञान कहेवाने नय कहे छे, सर्व द्रन्यमा अनेक स्वभाव छे, ते एक वचनयी कह्या जाय नहीं माटे माहोमाहे नय करी सक्षेप पणे कहे छे, तिहा मूल नयना वे भेद छे एक द्रव्यार्थिक बीजो पर्याया- र्थिक तेमा उत्पाद व्यय पर्याय गौण पणे अने प्रधानपणे द्रव्यनो गुण सत्ताने ग्रहे ते द्रव्यार्थिक नय कहिये तेना दश भेद छे ? सर्व द्रव्य नित्य छे ते नित्य द्रव्यार्थिक २ अगुरु लघु अने खेत्रनी अपेक्षा न करे मूल गुणने पिंडपणे ग्रहे ते एक द्रन्यार्थिक ३ जानादिक गुणे सर्व जीव एक सरीखा छ माटे सर्वने एक जीव कहे स्वव्यादिकने ग्रहे ते सत् द्रव्यार्थिक जेम सल्लक्षण द्रव्य ४ द्रव्यमा कहेवा योग्य गुण अगीकार करे ते वक्तव्य द्रव्यार्थिक ५ आत्माने अज्ञानी कहेवो ते अशुद्ध द्रव्यार्थिक ६ सर्व द्रव्य गुण पर्याय सहित आगमसार . छे एम कहेवु ते अन्वय न्यार्थिक ७ सर्व जीव द्रव्यनी मूल सत्ता एक छे ते परमभ्यार्थिक नय ८ सर्व जीवना आठ प्रदेश निर्मल छे ते शुद्ध द्रव्यायिक नय ९ सर्व जीवना अस- ख्यात प्रदेश एक सरीखा छे ते सत्ता द्रव्यार्थिक नय, १० गुण- गुणी द्रन्य ते एक छे ते परमभावग्राहक द्रव्याथिक जेम आत्मा ज्ञानरूप छे इत्यादिक ए द्रव्यार्थिक नयना दश भेद कह्या हवे पर्यायार्थिक नयना छ भेद कहे जे जे पर्यायने ग्रहे ते पर्यायार्थिक नय कहिये, तेना छ भेद छे १ द्रव्य पर्याय ते जीवने भव्यपणु तथा सिद्धपणु कहेवु, २ द्रव्य व्यजन पर्याय ते द्रव्यनु प्रदेशमान, ३ गुण पर्याय जे एक गुणयी अनेकता थाय जेम वर्माधर्मादिद्रव्य पोताना चलण सहका- रादि गुणयी अनेक जीव तथा पुद्गलने सहाय करे, ४ गुण व्यजन पर्याय जे एक गुणना घणा भेद छे ५ स्वभाव पर्याय ते अगुरुलघु पर्याययी जाणवो ए पाच पर्याय सर्व द्रव्यमा छे अने छठो विभाव पर्याय ते जीव पुद्गल ए बे द्रव्यमा छे तिहा जीव जे चार गतिना नवा नवा भव करे ते जीवमा विभाव पर्याय तथा पुद्गलमा खधपणु ते विभाव पर्याय जाणवो हवे पर्यायना वीजा छ भेद कहे छे १ अनादि नित्य पर्याय ते जेम पुद्गल द्रव्यनो मेरु प्रमुख, २ सादि नित्य पर्याय ते जीव द्रव्यनु सिद्धपणु, ३ अनित्य पर्याय ते समय समयमा द्रव्य उपजे विणशे छे, ४ अशुद्ध अनित्य पर्याय ते जन्म मरण थाय छे तेणे करी कहेवु, ५ उपाधि पर्याय ते कर्म सबध, ६ शुद्ध पर्याय जे मूल पर्याय सर्व द्रव्यना एक सरीखा छे ए पर्यायार्थिकनु स्वरूप का, A आगमसार " ढे सात नय कहे ले १ नैगम, २ सगृह, ३ व्यव- हार, ४ रजु सन, ५ शब्द ६ सममिस्ट, ७ एव मत-ए सात नयना नाम जाणवा, तेमा पहेलो नेगम नय कहे छे नयी एक गमो ते नगम कहिये गुणनो एक अश उपन्यो होय तो नगमनय कहिय दृष्टान्त जेम कोडक मनुष्यने पाली लावधानो मन ययो, ते पार जगलमा लाकलु लेवा चाल्यो, रस्तामा कोइक मनुष्य मल्यो तेणें प्रयु तु क्या जाय छे ते वारे तेणें का जे पाली लेवा जाउ छु ते पाली तो हजी घढी नयी पण मनमा चितवी ते यइ एम गण्यु तेम नैगम नय, सर्व जीवने सिद्ध समान कहे, केमके सर्व जीवना आठ रुचक प्रदेश निर्मल सिद्र रूप ले तेयी एक अशें सिद्ध छे ते माटे सिद्ध समान सर्व जीव कद्या ते नेगम नयना त्रण भेद छ १ अतीत नेगम २ अनागत नैगम ३ वर्तमान नेगम, ए नैगम नय कहो हवे सग्रह नय कहे छे सत्ताग्रहे ते सग्रह जे एक नाम लीचायी सर्व गुण पर्याय परिवार सहित आवे ते सग्रह नय जाणवो तेनो दृष्टान्त-जेम कोइक मनुष्ये प्रभातें दातण कर- वाने अर्थे पोताना घरना बारणे वेशीने चाकर पुरुषने का जे दातण लइ आवो, ते वारे ते चाकर मनुष्य पाणीनो लोटो तथा रुमाल अने दातण एम सर्व चीज लइ आन्यो हवे शेठे तो एक दातण नाम लइने भगाब्यु हतु पण सर्वनो सग्रह करी चाकर लड आन्यो तेमज द्रव्य एबु नाम का तो द्र- व्यना गुण पर्याय सर्व आव्या ए सग्रह नयना बे मेद छे एक जे द्रव्य पणो सामान्य पणे बोलता जीव तथा अजीव द्रव्यनो भेद पडयो नही ते मेहेलो सामान्य सग्रह, तथा बीजो आगमसार विशेषताने अगीकार करे छे, जे जीव द्रव्य एम का तो अजीव सर्व टल्या ते विशेष संग्रह हवे व्यवहार नय कहे छे. जे वाद्यस्वरूप देखीने भेदनी वैहेचण करे अने जे बाहेर देखता गुणनेज माने पण अतरग सत्ता न माने एटले ए नयमा आचार क्रिया मुख्य छे अत- रंग परिणामनो उपयोग नयी केमके नैगम तथा सग्रह नय ते ज्ञान रूप ध्यानना परिणाम विना अश तथा सत्ता ग्राही छे तेम इहा करणी मुख्य छे ते व्यवहारनये (पणे) जीवनी व्यव- स्था अनेक प्रकारे छे तिहा नैगम तथा सग्रह नय करी सर्व जीव सत्तायें एक रूप छे पण व्यवहार नययी जीवना बे भेद छ एक सिद्ध, बीजा ससारी ते वली ससारी जीवना बे भेद छे एक अयोगी चौदमा गुणठाणावाला तथा वीजा सयोगी ते सयोगीना बे मेद एक केवली -बीजो छद्मस्थ, छद्मस्थना बे भेद एक क्षीण मोही बारमा गुणठाणे वर्तता मोहनीय कर्म खपाव्यु ते, बीजो उपशान्तमोहवे उपशान्त मोहना चली बे भेद एक अकषायी इग्यारमा गुणठाणना जीव, बीजा सकषा- यीना बे मेद छे, एक सूक्ष्म कषायी दशमा गुणठाणाना जीव बीजा बादर कषायी ते बादर कषायीना वली बे भेद छे एक श्रेणि प्रतिपन्न, बीजो श्रेणि रहित ते श्रेणी रहितना बे भेद एक अप्रमादी वीजो प्रमादी ते प्रमादीना बे भेद एक सर्व विरति बीजो देश विरति, देश विरतिना बे भेद एक विरति परि- णामि वीजा अविरति परिणामि, अविरतिना बे मेद एक अविरति समकीति-धीजा अविरति मिथ्यात्वी, ते मिथ्यात्वीना बे मेद एक भन्य-वीजा अभव्य, ते भव्यना वे भेद एक ग्रथिभेदी बीजा ग्रयी अभेदी (अभेद ग्रन्थि) एवी रीते जे जीव जेवो देखाय तेने आगमसार तेवो माने ए व्यवहार नय रे एमज पुट्टटना मेद करवा ते कहे छे पुद्गल द्वयना वे भेद के एक परमाण, वीजो खब, संचना वे मेद एक जीवने लागा ते जोर सहित वीजा जीव रहित ते घटो प्रमुख अजीवनो खब, हवे जीव सहित खपना धे भेद छे एक सूक्ष्म खव वीजो बादर खब इहा वर्गणानो विचार रसीये 'व्यें, तिहा पुगटनी वर्गणा आठछे १ औदारिक वर्गणा २ वैक्रिय वर्गणा ३ आहारक वर्गणा ४ तेजस वर्गणा ५ भापा वर्गणा ६ श्वासोच्च्चास वर्गणा७मनो वर्गणा ८ कार्मण वर्गणा-ए आठ वर्गणाना नाम क्या वे परमाणु मेला याय त्यारे द्वयणकखप कहेवाय त्रण परमाणु मेला थाय तेवारे श्यणुकखच थाय एम सख्याता परमाणु मिले सख्याता- णुकरवर याय, तेमज असख्याते असरयाताणकखध थाय, तथा अनता परमाणु मिले अनताणकखध थाय ए खा ते सर्व जीवने अग्रहण योग्य छे, अने जेवारें अभव्ययी अनतगुण अधिक परमाणु मेला थाय तेबारें औदारिक शरीरने लेवा योग्य वर्गणा थाय एमज औदारिकथी अनतगुणा अधिक वर्गणामा दल मेला थाय तेवॉर वैक्रिय वर्गणा याय, वली वक्रिय थकी अनतगुणा परमाणु मिठे तेबारे आहारक वर्गणा थाय एम सर्व वर्गणाना एकेकयी अनतगुणा अधिक परमाणु मिले तेवारे ते वर्गणा याय एटले पहेलीथी बीजी वर्गणा, वीजीथी त्रीजी एम सातमी मनो वर्गणाथी आठमी कार्मण वर्गणामा अनतगुण परमाणु अधिक छे इहां १ औदारिक, २ वैक्रिय, ३ आहारक, ४ तैजस, ए चार वर्गणा बादर ले तेमा पाचवर्ण-वे गन्ध-पाच रस, आठ स्पर्शए वीस गुण छे तथा १ भाषा २ श्वासोच्वास ३ मन ४ कार्मपा ए २० आगमसार ते आ- चार वर्गणा सूक्ष्म छे एमा पाचवर्ण-वे गन्ध, पाचरस-चार स्पर्श- ए सोल गुण छे, अने एक परमाणमा एक वर्ण-एक गव- एक रस-बे स्पर्श ए पाच गुण छे एम पुद्गल खवना अनेक भेद छे ए व्यवहार नयना छ भेद छे १ शुद्ध व्यवहार गला गुणठाणानु छोड्बु अने उपरना गुणठाणानु ग्रहण करवु अथवा ज्ञान-दर्शन-चारिन गुण ते निश्वयनय एकरूप छे पण ते शिष्यने समजाववाने जूदा जूदा भेद कहेवा ते शुद्ध व्यव- हार के २ जीवमा अज्ञान राग द्वेष लाग्या छे ते अशुद्धपणु छे मारे अशुद्ध व्यवहार ३ जे पुण्यनी क्रिया करवी ते शुभ व्यवहार ४ जेथकी जीव पापरूप अशुभ कर्म करे ते ५ अशुभ व्यवहार धन-घर-कुटुब प्रत्यक्ष सर्व आपणाथी जुदा जुदा छे पण जीवें अज्ञानपणे आपणा करी जाण्या के ते उपचरित व्यवहार ६ शरीरादिक परवस्तु यद्यपि जीवथी जुदी छे तोपण परिणामिकभाव लोलीपणे एकठा मिली रह्या छे तेने जीव आपणा करी जाणे छे ते अनुपचरित व्यवहार जाणवो ए व्यवहार नय कयो हवे ऋजु सूत्र नयनो विचार कहे जे जे अतीत काल अने अनगत कालनी अपेक्षा न करे पण वर्तमान काले जे वस्तु जेवा गुण परिणामे वर्ते ते वस्तुने तेवेज परिणामे माने माटे ए नय परिणाभग्राही छे जेम कोइक जीव गृहस्थ छे पण अतरंग साधुसमान परिणाम छे तो ते जीवने साधु कहे अने कोइक जीव सावुने वेपे छे पण मनना परिणाम विष- याभिलाष सहित छे तो ते जीप अवतीज छ एम ऋजु मूत्रनु मान छे ते ऋजु सूचना वे भेद के एक सूक्ष्म ऋच सूत्र ते

आगमसार.
एम कहे जे सदाकाल सर्व वस्तुमा एक वर्तमान समय वर्ते के
एटले जे जीर गया कालें अजानी हतो अने अनागत कालें
अज्ञानी भावें अजानी थो एम बेहु कालनी अपेक्षा न करे
पण एक वर्तमान समये जे वो तेने तेवो कहे ते सूक्ष्म
ऋजस्त्र कहियें अने महोटा बाह्यपरिणाम ग्रहे ते स्थूल ऋजु
सूत्र नय जाणवो एटले रुजु सूत्र नय कयो
हवे शब्दनय कहे जे जे वस्तु गुणवत अथवा निर्गुण ते
वस्तुने नाम कही बोलावियें ले भाषा वर्गणाथी शब्द पणे वचन
गोचर थाय ते शब्दनय जे कारणे अरूपी द्रव्य वचनयी कहेवा
ते शब्दनय कहिये इहा जे शदनो अर्थ होय ते पणो जे
वस्तुमा वस्तुपणे पामिये ते वारे ते वस्तु शब्दनय कहिये जेम
घटनी चेष्टाने करतो होय ते घट. ए शन्दनयमा व्याकरणयी
नीपना अने वीजा पण सर्व शब्द लीधा ते शब्दनयना चार
मेद छे १ नाम २ स्थापना ३ द्रव्य ४ अने भाव चार निक्षे-
पाना पण एहिज नाम के
१ पहेलो नाम निक्षेपो ते आकार तथा गुणरहित वस्तुने
नाम करी बोलाववो जेम एक लाकडीनो कटको लेइने कोइके
तेहने जीव एव नाम का ते नाम जीव जाणवु जेम काली
दोरीने सापनी बुद्धिये करी घावेहणे तेहने सापनी हिंसा लागे
ए नाम सर्प ययु एवीज रीते नाम तप अथवा नाम सिद्ध
जेम वड प्रमुखने सिद्धवड एम कही बोलावे छे ते नाम निक्षेपो
कहिये ए सूर साखें छे
२ स्थापना निक्षेपो कहे छे जे कोइक वस्तुमा कोइक
वस्तुनो आकार देखीने तेने ते वस्तु कहे जेम विनामण अथवा
काष्ट पापाणनी मूर्ति तेने घोढा हायीनो आकार छे तो ते

२२ आगमसार घोडा-हायी कहेवाय ते स्थापना जाणवी एस्थापना निक्षेपो नाम निक्षेप सहित होय जेम स्थापना सिद्ध जिनप्रतिमा प्रमुख ते सद्भाव स्थापना पण होय अने असद्भाव स्थापना पण होय अकृत्रिम जिन प्रतिमा ते नदीश्वरद्वीप प्रमुखने विषे अने जेह इहानी जिन प्रतिमा ते कृत्रिम ते सर्व स्थापना जाणवी जेम चित्रामनी स्त्री जिहा माडी होय तिहा साधु रहे नहीं कार- णके स्थापना स्त्री छे ते स्त्री तुल्य जाणवी तेमज जिन प्रतिमा जिन समान जाणवी इहा कोइक अज्ञानी जीव कहे छे जे, स्थापनामा ज्ञानादि गुण नयी तेथी स्थापनाने मानवी पूजवी नही तेने उत्तर कहे छे के स्थापना रूप स्त्रीमा स्त्रीपणाना गुण नयी तो पण ते विकारनु कारण। थाय छे तेमज जिन- प्रतिमा पण ध्याननु कारण छे अने जे एम पुछे के हिंसा थाय छे अने भगवते तो दयाने धर्म कयो छ तेहने एम कहे जे परदेशी राजा केसी गुरुने वादवाने अथै बीजें दीवसें। मोहोटा आडबस्थी आव्यो ते बदनामा हिंसा थइ पण लामा कारण गणता त्रोटो न थयो बीजो मल्लिनाथजीयें छ मित्र प्रतिबोधवाने पुतलीनो दृष्टान्त कह्यो, ते हिंसा तो घणी थइ।. पण ते लामना कारणमा गणी छे एम भाव शुद्ध होय तिहा हिंसा लागती नयी, अथवा कोइक एम कहे छे जे अमे आपणे। स्थानके बेठा नमुथ्थुण कहिसु अमने लाभ थासे ते खरो पण भगवती सूत्रमा भगवानने। वदनाने अधिकारें तो तिहा जइ। वदना करवानु फल महोड का छे तथा निक्षेपाने अधिकारे का जे भाव निक्षेपो एकलो थाय नही। पण नाम' स्थापना तथा द्रव्य ए त्रण मिल्या भाव निक्षेपो थाय माटे स्थापना अवश्य मानवी हवे जे स्थापना न माने तेने कहिये जे आगमसार वित्रामनी मूर्ति ते हिंसाना परिणामयी फाडे तेहने हिंसा लागे छे तेमज जिनवरना ध्याने जिनप्रतिमा पृजता लाभ याय के एम युक्ति करता तथा आगमनी सासे पण जिन प्रतिमाने जिनसमान माने ते आराधक अने जे जिन प्रतिमाने न माने तेणे स्थापना निक्षेपो उयाप्यो अने स्थापना उयापी तो द्रव्य तथा भाव निक्षेपो रथापना विना याय नही माटे ट्रन्य तथा भाव पण उयाप्यो एम प्रण निक्षेपा उयाप्या ते पोरें सिद्धान्त उथाप्याज माटे जे जिनप्रतिमाने नहीं माने ते विराधक जा- णवो ते स्थापना इतर अने यानत्कधिक ए चे भे. ३ द्रव्य निक्षेपो कहे के, जेनो नाम पण होय तथा आ- कार थापना गुण पण होय अने लक्षण होय पण आत्मोप- योग न मिले ते द्रव्य निक्षेपो जाणवो एटले अजानी जीव ते जीव स्वरूपना उपयोग विना द्रव्य जीव छे “अणुवओगो- दव" इति अनयोगद्वार वचनात् वली का छे जे सिद्धान्त वाचता पूछता पद अक्षर माना शुद्ध अर्थ करे छे अने गुरु- मुखे सद्दहे ले ते पण शुद्ध निश्चये पोतानी सत्ता ओलख्या विना सर्व द्रव्य निक्षेपामा जे भाव विना द्रव्यपणो छे ते पुण्य- बधनु कारण ले पण मोक्षनु कारण नथी एटले जे करणी रूप कष्ट तपस्या करे छे अने जीव अजीव पदार्थनी सत्ता ओ- लखी नयी तेने भगवती सूत्रमा अवती तथा अपञ्चख्खाणी कह्या छ, तथा जे एकली बाह्य करणी करे छे अने पोते साधु कहेवाय छे ते मृपावादी छे एम उत्तराध्ययन सूत्रमा का छे "नमुणी स्नवासेण” ए वचनें “नाणेण य मुणी होइ ए वचनथी जे ज्ञानवान् ते मुनि छे अने जे अज्ञानी ते मिथ्यात्वी छे तथा कोइक गणितानुयोगना नरक देवताना बोल अथवा यति २४ आगमसार. जे " नाण श्रावकनो आचार जाणीने कहे जे अमे ज्ञानी छये ते पण ज्ञानी नथी पण जे द्रव्य गुण पर्याय जाणे तेने ज्ञानी क- हिये श्री उत्तराध्ययने मोक्ष मार्गे कह्यो छे गाथा एय पच विहणाणाणा दवाणय गुणाणय, पज्जवाणय सबसि, नाण नाणी हि दसिय ॥१॥ माटे वस्तु सत्ता जाण्या विना ज्ञानी सम- जवु नही अने नवतच ओलखे ते समफीति अने एहवा ज्ञान दर्शन विना जे कहे के अमे चारित्रिआ छैये ते पण मृषावादी छे कारण के श्री उत्तराध्ययन सूत्र मध्ये का दसण नाण नाणेण विना न हुति चरण गुणा " ए वचन छे ते माटे आज केटलाक ज्ञानहीन क्रियानो आङबर देखाडे छे ते ठग छ तेहनो सग करवो नहीं ए बाह्य करणी अभव्य जीवने पण आवे माटे ए बाह्य करणी ऊपर राचवु नही अने आ- त्मानु स्वरूप ओलख्या विना सामायक पडिकमणा पच्चख्खाण करवा ते सर्व द्रव्यनिक्षेपामा पुण्याश्रव छे पण सवर नथी श्रीभगवती सूत्र मध्ये का छे के “ आयाखलु सामाइय" ए आलावायी जाणजो तथा जीव स्वरूप जाण्या विना तप सयम पुण्य प्रकृति ते देवताना भवनु कारण छे पुव्व तवेण पुन्च सयमेण देवलोए उववज्जति नो चेवण आयत्ता भाववत्तव्वयाए " ए आलावो भगवतीमा कह्यो छे तथा जे क्रियालोपी आचार हीन अने ज्ञानहीन छे मात्र गच्छनी लाजें सिद्धान्त भणे वाचे छे व्रत पच्चख्खाण करे छे ते पण द्रव्य निक्षेपो जाणवो एम श्री अनुयोगद्वारमा का छे सेकिंतलोगुत्तरिअदवावस्सय ? जे इमे समण गुणमुक्कजोगी छक्वाय निरणुकपा ॥ हयाइव उद्दामा ॥ गयाइव निरकुसा ॥ घट्टामट्ठातुप्पोठा ॥ पडुरपडयाउरणा जिणाणमणाणाए सच्छद विहरिउण उभओकाल' आवस्सयस उवठ्ठति ॥ सेत लोगुचरिय दवावस्सय ॥ ।

आगमसार २५ अर्थ-जेने छ कायनी दया नथी, घोटानी पर उन्मत्त , हायी- नी पेठे निरकुश , पोताना शरीरने योगता मसलता उनले कपडे शिणगार करी गच्छना ममत्वभाने माचता स्वेच्छाचारी वीतरा- गनी आज्ञा भाजता जे तप क्रिया करे ते पण द्रव्य निक्षे- पामा के अथवा ज्योतिष वद्यक करे ले अने पोताने आचार्य उपाध्याय कहेवरावीने लोक पासे महिमा करे (राये छे) ते पनी- बघ खोटा रूपेया जेवा घणा भव भमसे माटे अवदनीक के ए साख उत्तराध्ययनमभ्ये अनायी मुनिना अध्ययनयकी जाणवी अने सूचना अर्थ गुरुमुसे शिल्या विना तथा नय प्रमाण जाण्या विना निश्चय आत्मानु स्वरूप ओल्रया विना नियुक्ति विना उपदेश आपेले ते पोते तो ससारमा बुडया ले पण जे तेमनी पासे बेमे ले तेमने पण ससारमा बुटाये के एम प्रश्न व्याकरण सूत्र तथा अनुयोगद्वार मूत्रमा का छे " अज्जत्य चेत सोल सम" इत्यादि अने भगवती सत्रमा, पण का छे “सुतत्थो खलु पढमो, चीओ निजुत्ति मिसओ भणिओ, इत्तो तईयणुओगो, नाणुनाओ जिणवरेहि अने केट- लाक एम कहे छे जे अमे सूत्र उपर * अर्थ करिये छेये तो नियुक्ति तथा टीका प्रमुखनु शु काम छे ते पण मृपावाद * श्री भगरती सूत्रमा " मुतत्थोखलु पढमो, बीओनिज्नुत्ति मिसओ भणिओ ॥ इत्तो तईयणुओगो, नाणुन्नाओजिणवरोहिं" एवी रीते आगमसारनी जूदी जूदी त्रण पतोमा ख्यु ह्तु माटे म पण तेमन लख्यु छ पण वीजा ठेणे ए भगरतीनी साख दीधी छ तिहा तो " सुतत्यो खलुपढमो, बीमोनि-जुत्ति मिमओ मणिओ ॥ तदओय निर- विसेसो, एस विहि होइ अणुओगो" एवो पाठ छे ते खरो जणाय छे बहुश्रुत कहे ते खरु आगमसार तथा कोइकनु तप एहबु नाम ते नाम तप तथा पुस्तक- मा तपनी विधीनु लेखन ते यापना तप अने पुण्यरूप गास- खमणादिक करवो ते द्रव्य तप जे परवस्तु ऊपर त्यागनो परिणाम ते भाव तप एम सवरादिक सर्वमा चार चार निक्षेपा जाणवा तथा श्री अनुयोगद्वार मध्ये का छे-यत "जत्थयज जाणिज्जा, निख्खेव निख्खिये निरवसेस ॥जत्थवी य न जाणिज्जा, चउक्चगनिख्खिवे तत्थ ॥१। ए चार निक्षेपा कह्या एटले शब्दनय को हवे छटो समभिरूढ नय कहे छे जे वस्तुना केटलाक गुण प्रगट्या छे अने केटलाक गुण प्रगट्या नयी पण अ- वश्य प्रगटशे एहवी वस्तुने वस्तु कहे ते वस्तुना नामातर एक करी जाणे जेम जीव चेतन तथा आत्मा एहनो* एक अर्थ कहे ते समभिरूढ नय कहियें ए नय एक अश ओछी वस्तुने पूरेपूरी वस्तु कहे जेम तेरमा गुणठाणे केवली होय तेने सिद्ध कहे ए नयना भेद बिलकुल नथी ए सममिरूढनय कह्यो हवे एवभूतनय कहे छे जे वस्तु पोताने गुणे सपूर्ण छे अने पोतानी क्रिया करे छे तेने ते वस्तु कही बोलावे जेम मोक्षस्थानकें जे जीव पहोतो तेने सिद्ध कहे जेम पाणीयी भरेलो स्त्रीना माथा ऊपर आवतो जल धरण क्रिया करतो, तेने घडो कहे ए एवभूतनय कयो हवे सात नयना दृष्टान्त श्री अनुयोगद्वार सूतथी लखिये कैये जेम कोइक पुरुष कोइक वीजा पुरुषने पुज्यु जे तमे किहा बसोचो तेवारे ते पुरुष कयु हु लोकमा वसुछु तेवारें * एकार्थवाची नामोना-नामभेदे भिन्न भिन्न अर्थ करे छे तेने समभिरूढनय क्ये छे' - आगमसार. २९ - . अशुद्ध नैगमवाले पुन्यु जे लोक्ना नण भेद छे, १ अमोलोक २ निछोरोक ३ ऊर्वलोक तेमा तु किहा रहे छे जेवारें शुद्ध नैगमें कयु जे विद्यालोकमा रहछ वली पुञ्यु जे निकालोकमा असख्याता द्वीप समुद्र छे तेमा तु कया द्वीपमा रहे छे तेवारें विशुद्ध नैगमें का जे जवुद्रीपमा रहछ, ते जमुद्रीपमा सेन घणा छे, ते तेमा तु कया सेनमा रहे छे, तेवारे अतिशुद्ध नैगम बोत्यो जे भरतक्षेनमा रनुछु, ते भरतक्षेनना छ खड छे ते माहेला कया खटमा रहे छे तेबारें का जे मध्यखटमा रह छ एम क्रमे पूछना छेरले का जे आपणा देशमा रह छ, तेवारें फरी पुञ्यु जे देशमा तो नगरगाम घणा छ तो तु किहा रहे छे तेवारें का जे तु अमुक गाममा रतु छु, ते गाममा वली अमुक पाटो तथा अमुफ घर बतायु तिहा सुधी नैगम नय जाणवो अने सग्रह नय वालो बोल्यो जे मारा पोताना शरीरमा वसु कु, तथा व्यवहारनयवालो बोत्यो जे ससारे बेटो छ तेट- लाज बिछानामा रह छु, अने ऋजुसून नयवाले का जे मारा. आत्माना असख्याता प्रदेशमा रहु छु वली शब्दनय कहे जे मारा स्वभावमा रहु छु, तेमज समभिरूढनय कहे जे हु मारा गुणमा रहु छु, अने एवम्तनयवादी कहे जे ज्ञानदर्शन गुणमा वसु छ ए दृष्टात कयो तेम सर्व वस्तुमा कहे तथा कोइके प्रदेशमान क्षेन अगीकार करी पुज्यु जे ए प्रदेश कया द्रव्यनो छे तेबारे नैगमनय बोत्यो जे छए व्य- नो प्रदेश के केमके एक आकाश प्रदेशमध्ये छ द्रव्य भेला छे तेवारे सग्रहनय बोल्यो जे कालद्रव्य तो अप्रदेशी छे ते माटे सर्व लोकमा एक समय सरिखो छ पण ते एक आकाश न्यना प्रदेशमा जदो नयी माटे काल विना पाच द्रव्यनो ३० आगमसार. प्रदेश छे तेवारे व्यवहारनय बोल्यो के जे द्रव्य मुख्य देखाय छ तेहनो प्रदेश छे तेवोरें ऋजमुत्रनय बोल्यो के जे द्रव्यनो उपयोग देइ पुछिये ते द्रव्यनो प्रदेश छे जो धर्मास्तिकायनो उपयोग देइ पुछिये तो धर्मास्तिकायनो प्रदेश छे. जो अधर्मा- स्तिकायनो उपयोग देइ पुछिये तो अधर्मास्तिकायनो प्रदेश छे तेवारे शब्दनय बोल्यो के जे द्रव्यनो नाम लइ पुछियें ते द्रव्यनो प्रदेश के हवे समभिरूढनय बोल्यो जे एक आकाश प्रदेश मध्ये वर्मास्तिकायनो एक प्रदेश छे, अधर्मास्तिकायनो एक प्रदेश के अने जीवना अनता प्रदेश के पुद्गलना पण अनता प्रदेश छे, तेवारे एवमूतनय बोल्यो के प्रदेशनी जे ट्रव्यनी क्रियागुण पर्याय अगीकार करी देखीये ते समय ते प्रदेश ते द्रव्यनो गणिये ए प्रदेशमा सात नय कह्या हवे जीवमा सात नय कहे छे प्रथम नैगमनयने मते जे गुण पर्यायवत शरीर सहित ते जीव एटले शरीरमा जे बीजा पुद्गल तथा धर्मास्तिकायादिक द्रव्य छे ते सर्व जीवमाज गण्या तेवारे सग्रहनय बोत्यो जे असख्यात प्रदेशी वे जीव एटले एक आकाशना प्रदेश टल्या वीजा सर्व द्रव्य एमा गणाणा तेवारे व्यवहारनय बोल्यो जे विषय लइ काम वात सभारे ते जीव इहा धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय,आकाश तथाबीजापुद्गल सर्व टल्या पण पाचे इन्द्रीय तथा मन अने लेश्या ए पुद्गल छे ते जीवमा गणाणा, कारणके विषयादिकतो इद्वियो ले छ ते जीवयी न्यारा छे पण इहा व्यवहारनयमते जीव भेला लीचा छे तेबारें ऋजुसूत्रनय बोल्यों जे उपयोगवत ते जीव इहा इद्रियादिक सर्व टल्या पण अज्ञान तथा ज्ञानना भेद टल्या नही. हवे शब्दनय बोल्यो जे नामजीव, स्थापना जीव आगमसार द्रव्य जीव भाव जीव इहा जीवमा गुण-निर्गुणनो मेद पडयो नही, तेबारे सममिरुदनय बोल्यो जे जानादिगुणवत ते जीव तेवार मतिजान श्रुतजान इत्यादिक साधक अवस्थाना गुण ते सर्व जीव स्वरूपमा आन्या हवे एवम्तनयनोल्यो जे अन- तज्ञान, अनतदर्शन, अनत चारिन, शुद्धसत्तावत ते जीव ए नये जे सिद्ध अवस्थामा गुण हता तेज ग्रया ए सात नये जीव द्रव्य को हवे सातन धर्म कहे छे नेगमनय बोल्यो जे सर्व धर्म छ केमके सर्व प्राणी धर्मने चाहे छे ए नय अशरूप धर्मने वर्म एहवु नाम कहे हवे सग्रहनय बोल्यो जे वडेरायें आ- दरयो ते वर्म, एणे अनाचार छोड्यो पण कुलाचारने धर्म करो, व्यवहारनय बोल्यो जे सुखनु कारण ते वर्म एणे पुण्य कर- णीने धर्म करी मान्यो ऋजुसुतनयमते जे उपयोग सहित वैराग्यरूप परिणाम ते धर्म कहियें ए नयमा यथाप्रवृत्तिक- रणना परिणाम प्रमुख सर्व धर्ममा गण्या ते मिथ्यात्वीने पण होय हवे शब्दनय बोल्यो जे धर्मनु मूल समकित छे माटे समकित तेज धर्म तेवारें समभिरुढनय बोल्यो जे जीव अजीव नवतत्व तथा उ द्रव्यने ओलखीने जीवसत्ता च्यावे, अजीवनो त्याग करे एहवो ज्ञान दर्शन चारित्रनो शुद्ध निश्चय परिणाम ते वर्म ए नये साधक सिपना परिणाम ते धर्मपणे लीधा एवमूतनय बोल्यो जे शुक्क ध्यान रूपातीतना परिणाम क्षपक श्रेणि कर्म क्षयना कारण ते धर्म जे जीवनो मूल स्वभाव ते वस्तु धर्म जे मोक्षरूप कार्यने करे वे धर्म ए साते नये धर्म कहो हवे सातनये सिद्धपणो कहे छे. नैगमनयनी मते सर्व आगमसार जीव सिद्ध छे केमके सर्व जीवना आठ रुचक प्रदेश सिद्ध समान निर्मल छे माटे सग्रहनय कहे जे सर्व जीवनी सत्तासिद्ध समान छे एणे पर्यायार्थिक नयेकरी कर्म सहित अवस्था ते टालीने द्रव्यार्थिकनर्यकरी अवस्था अगीकार करी तेबारें व्यवहारनय बोल्यो जे विद्या लब्धि प्रमुख गुणे करी सिद्ध थयो ते सिद्ध ए नये बाह्य तप प्रमुख अगीकार करया हवे ऋजसूतनय बोल्यो के जेणे पोताना आत्मानी सिद्धपणानी सत्ता ओलखी अने ध्याननो उपयोग पण तेज वर्ने छे ते समये ते जीव सिद्ध जाणवो ए नये समकीति जीव सिद्ध समान छे एम का हवे शब्दनय बोल्यो जे शुद्ध शुक्ल ध्यान परिणाम नामादिक निक्षेपे ते सिद्ध तेबारे सममिरूढनय बोल्यो जे केवलजान केवलदर्शन, यथाख्यातचारित्र ए गुणे सहित ते सिद्ध जाणवा ए नये तेरमा चउदमा गुणठाणाना केवलीने सिद्ध कथा अने एवमतनय कहे छे के जेना सकल कर्म क्षय थया लोकने अते विराजमान अष्टगुणः सपन्न ते सिमाजाणवा ए रीते सिम पदे सात नय कह्या एम सात नय मिल्या समकीति छे अने जे एक नयने ग्रहण करे ते मिथ्यात्वी छे “ए-साते नय सिक ते वचन प्रमाण छे अने ए सात नयमा कोइ पण नयने उथापे तेनु वचन अप्रमाण छे हवे प्रमाणनो विचार कहे छ प्रमाणनााबे भेद छे एक प्रत्यक्ष प्रमाण वीज परोक्ष प्रमाण तेमा जे जीव पोताना उपयोगयी द्रव्यने जाणे ते प्रत्यक्षाप्रमाण कहिये जेम केवली छ द्रव्य प्रत्यक्ष प्रमाणे जाणे तथा देखे ते माटे केवलज्ञान ते सर्वयी प्रत्यक्ष जान छे, अने मन पर्यवज्ञान ते मनोवर्गणा प्रत्यक्ष जाणे तथा अवधिज्ञान ते पुद्गल द्रव्यने प्रत्यक्ष जाणे आगमसार --- माटे ए वे जान देश प्रत्यक्ष छे चीज छद्मस्थजान ते सर्व परोक्ष प्रमाण छे हवे परोक्ष प्रमाण कहे छे मतिजाननो अने श्रुतजाननो उपयोग परोक्ष प्रमाण छे केमके जे शास्त्रना बलयी जाणे ते परोक्ष प्रमाण कहिये ते परोक्ष प्रमाणना नण भेद छे १ अनु- मान प्रमाण, २ आगम प्रमाण, ३ उपमान प्रमाण तेमा अनुमान एटले कोइक सहिनाण देसीने जे ज्ञान याय नेम धुमाडो देसीने अग्निनु अनुमान याय अने आगम एटले शासनी साखयी जे वात जाणिये जेम देवलोक तया नरक निगोड विगेरेनो विचार आगमयी जाणिये उये ते आगमप्रमाण अने कोडक वस्तुनो दृष्टान्त आपीने वस्तुने ओलखाववी ते उप- मान प्रमाण जाणवो ए प्रमाण कह्या हवे सत् असत् पक्षयी सप्तभगी कहे छे १ रयात् केहता अनेकातपणे सर्व अपेक्षा लेड जीव- द्रव्यमा आपणो द्रव्य आपणो सेन आपणो काल आपणो भाव एम आपणे गुण पर्याय जीव छे तेम सर्व द्रव्य आपणे गुणपर्या ये छे ते स्यात् अस्ति नामा पहेलो भागो थयो २ जे जीवमा वीजा पाच द्रव्यना १ द्रव्य २ खेत्र ३ काल ४ भाव ते परद्रव्यना गुणपर्याय जीवमा नथी एटले पर- द्रव्यना गुणनो नास्तिपणो सर्व द्रव्यमा छे ए स्यात् नास्ति वीजो भाग थयो ३ द्रव्य स्वगुणे अस्ति अने पर गुणे नास्ति ए वे भागा एक समये द्रव्यमा छे जेम जे समये शुद्ध स्वगुणनी अस्ति छे तेज समये परगुणनी नास्ति पण छे, माटे अस्ति नास्ति ए बेहु भागा भेला छे ते स्यात् अस्ति नास्ति त्रीजो भागो थयो

आगमसार
- Am
४ अस्ति अने नास्ति ए बेह भागा एक समयमा छे
तो वचने करी अति एटलो बोलता असख्याता समय लागे
तेथी नास्ति भागो तेज वखते कहेवाणो नही अने जो नास्ति
भागो को तो अस्ति पणो नाव्यो माटे एकज अस्ति कहेता
थका नास्तिपणो तेज समये द्रव्यमा छे ते नहीं कहेवाणो माटे
मृषावाद लागे तेमज नास्ति कहेता अस्तिनो मृपावाद लागे
माटे वचने अगोचर छे एक समयमा बेहु वचन बोल्या जाय
नही केमके एक अक्षर बोलता असख्याता समय लागे छे माटे
वचनथी अगोचर छे ते स्यात् अवक्तन्य ए चोथो भागो को
५ ते अवक्तन्यपणो वस्तुमा अस्तिधर्मनो पण छे माटे
स्यात्अस्ति अवक्तव्य पाचमो भागो कयो
६ तेमज नास्ति धर्मनो पण अवक्तन्यपणो वस्तु मध्ये
छे माटे स्यात् नास्ति अवक्तव्य छठो भागो जाणवो
७ ते अस्तिपणो तथा नास्तिपणो बेहु वर्म एकसमये
बस्तु मध्ये छे पण वचनथी अवक्तव्य छे माटे स्यात् अस्ति-
नास्तियुगपत्अवक्तन्य ए सातमो भागो कयो:
हवे ए सात भागा नित्य तथा अनित्यपणामा लगाडे छे
१ स्यात् नित्य २ स्यात् अनित्य ३ स्यानित्यानित्य ४ स्यात्-
अवक्तव्य ५ स्यानित्यअवक्तत्य ६ स्यात्अनित्य अवक्तव्य ७
स्यात् नित्यानित्य युगपत् अवक्तव्य, एमज एक अनेकना सात
भागा कहेवा तथा गुणपर्यायमा पण कहेवा केमके सिद्ध मध्ये
नय नथी तोपण सप्तभगी तो सिद्धमा छे
हवे सत्ता ओरखावधाने विभगीयो कहे छे १ मिथ्यात्व
दशा ते बाधकदशा २ समकित गुणठाणायी माडीने अयोगी
केवली गुणठाणा सुधी साधक दशा जाणवी ३ सर्व कर्मथी

आगमसार.
Ma
रहित ते सिम दशा १ जाननो जाणपणो ते जीवनो गुण.
२ तेनो ज्ञाता ते जीन ३जेय ते सर्व द्रव्य १ ध्यान ते जीवना
स्वरूपनो २ ते ध्याननो ध्याता जीव ३ ध्येय आत्मानो स्वरूप,
१ कर्ता ते जीव २ कर्म ते एक मोक्ष वीजो बन्ध ३ क्रिया
ते एक सवर वीजी आस्रव १ कर्म ते चेतनाने कर्म बधना
परिणाम २ कर्मनु फल ते चेतनाने जे कर्म उदयना परिणाम
३ ज्ञान चेतना ते जीवनो स्वगुण ते आत्माना रण मेद छे
१ अज्ञानी जीव शरीरादिक परवस्तुने आत्मबुफ़िये करी माने
छे पहेलो बहिरात्मा २ जे देह सहित जीव छे ते पण निश्चये
सत्तागुण सिद्ध समान छे एटले पोताना जीवने सिम समान
करी घ्यावे ते बीजो अतरात्मा जाणवो ३ कर्म खपावी
केवलजान पाम्या ते अरिहत तथा सिह सर्व परमात्मा जाणवा.
ए विभगीनो विचार कयो एटले आठ पक्षनो विचार क्यो
हवे एक द्रव्य मध्ये 3 सामान्य गुण छे ते कहे छे
पहेलो अस्तित्व ते जे द्रव्य आपणा गुण पर्याय प्रदेशे
करी अस्ति छे तेमा धर्म, अधर्म, आकाश अने जीव ए चार
द्रव्यनो असल्याता प्रदेश मिल्या खप थाय छे अने पुद्गलमा
खध थवानी शक्ति छे माटे ए पाच द्रव्य अस्तिकाय छे अने
छट्टो काल द्रव्यनो समय कोइ कोइयी मिलतो नथी केमके
एक समय विणस्या पछे बीजो समय आवे छे माटे काल
अस्तिकाय नयी द्रव्यमा ए अस्तित्व पणो करो
२ वस्तुत्व कहेता बस्तुपणो कहे छे ते द्रव्य छए एकठा
एक क्षेत्र मध्ये रह्या छ एक आकाश प्रदेशमा धर्मास्तिका-
नो एक प्रदेश रह्यो छे तथा अधर्मास्तिकायनो पण एक प्रदेश
रद्यो छे अने जीव अनताना अनता प्रदेश रह्या छ -पुद्गल

आगमसार . . परमाणु अनता रह्या छे ते सर्व पोतानी सत्ता लीधा थका रह्या छ पण कोइ द्रव्य साये मिली जातो नयी ते वस्तुपणो ३ द्रव्यत्व केहता- द्रव्यपणो वे सर्व द्रव्य पोतपोतानी क्रिया करे एटले वर्मास्तिकायमा चलनगुण ते सर्व प्रदेश मध्ये छे. सदा कालें पुद्गल तथा जीवने चलावारूपक्रिया करे छे, इहा कोइ पुछे जे लोकान्त सिद्धक्षेनमा धर्मास्किाय छे ते सिद्धना जीवने चलाववापणो करतो नयी तेनु केम ? तेने उत्तर कहे छे जे सिद्धना जीव अक्रिय छे माटे चालता नयी पण ते क्षेत्रमा जे सूक्ष्म निगोदना जीव तथा पुद्गल छे तेहने धर्मास्तिकाय चलावे छे माटे पोतानी क्रिया करे छे, तेमज अधर्मास्तिकाय जीव तथा पुद्गलने स्थिर राखवानी क्रिया करे छ, तथा आकाश द्रव्य ते सर्व द्रव्यने अवगाहनारूपकार्य करे छे. इहा कोइ पूछे जे अलोकाकाशमातो बीजु कोइ द्रव्य नयी तो अलोकाकाश कया द्रव्यने अवगाहदान आपे छ तेने उत्तर कहे छे जे अलोकाकाशमा अवगाह करवानी शक्ति तो लोकाकाश जेवीज छे परतु तिहा अवगाहनो दान लेनार द्रव्य कोइ नयी माटे अवगाहदान करतो नयी अने पुद्गल द्रव्य मिलवा विखरवारूप क्रिया करे छे तथा काल- द्रव्य वर्तना रूप क्रिया करे छे अने जीव द्रव्य ज्ञान लक्षण उपयोगरूप क्रिया करे छे एम सर्व द्रव्य पोताने परिणामी स्वसत्तानी क्रिया करे छे ए द्रव्यत्वपणो क्यो ४ प्रमेयत्व कहेता प्रमेयपणो जे छ द्रव्यमा प्रमेय पणो छे, तेनो प्रमाण केवली पोताना ज्ञानथी करे छे, जे वर्मा- स्तिकाय तथा अधर्मास्तिकाय अने आकाशास्तिकाय एकेक द्रव्य छे अने जीवद्रव्य अनता छ तेहनी गणति कहे छे सज्ञी M

आगमसार
३७
,
१
मनुष्य सख्याता छे, असजी मनुष्य असरयाता छे, नारकी अस-
ख्याता छे, देवता असख्याता छे, तियेच पचेन्द्रिय असख्याता
छे, वेइन्द्री असल्याता छे, तेइन्द्री असख्याता, चौरेंद्रीय अस-
स्याता छे ते यकी पृथ्वीकाय असख्याता, अपकाय असख्याता,
तेउकाय असरन्याता, वायुकाय असख्याता, प्रत्येकवनरपति जीव
असख्याता, ते यकी सिझना जीन अनता ते यकी चादर निगो-
दना जीव अनतगुणा एटले बादर निगोद ते कदमूल आदु
सरण प्रमुख पहने सुइने अग्रभागें अनता जीव छे ते सिजना
जीवयी अनत गुणा छे अने सूक्ष्मनिगोद सर्वथी अनत गुणा
छे सूक्ष्मनिगोदनो विचार कहे छे जेटला लोकाकाशना प्रदेश
छे तेटला गोला छे ते एकेक गोलामा असर याता निगोद छे
निगोद शदनो अर्थ ए छे जे अनता जीवनो पिंड मत एक
शरीर तेहने निगोद कहिये ते एकेकी निगोदमध्ये अनता
जीर छे ते अतीत कालना सर्व समय तथा अनागतकालना
सर्व समय अने वर्तमान कालनो एक समय तेने मेला करी
अनत गुणा करीये एटला एक निगोदमा जीन छे एटले अनता
जीव छे ए ससारी जीव एकेकाना असख्याता प्रदेशे छे अने
एकेका प्रदेशे अनति कर्म वर्गणा लागी छे ते एकेक वर्गणा
मध्ये अनता पुद्गल परमाणु छे एम अनता परमाणु जीप साथे
लाग्या छे ते यकी अनत गुणा पुद्गल परमाणु जीवथी रहित
छुटा छे
गोलाय असखिज्जा,
असख निगोयओ हवइ गोलो ।।
इकिक्कमि निगोए,
। अणतजीवा मुणेयव्या ॥१॥

आगमसार. अर्थ-लोक माहे असख्याता गोला छे, एकेका गोला मध्ये असख्याति निगोद छे एकेक निगोदमा अनता जीव छ । सत्तरस समहियाकिर । इगाणुपाणुमि हुति खुडूभवा ।। सगतीससयतिहत्तर । पाणू पुण इग मुहुत्तमि ॥१॥ अर्थ-निगोदिया जीव ते मनुष्यना एक उसासमा सत्तर १७ भव जाजेरा करे छे अने सडत्रीससो तिहुतेर ३७७३ श्वासोच्छ्वासे एक मुहूर्तमा याय पणसहि सहस्स पणसय । छत्तिसा इग मुहुत्त खुड्भवा ।। आवलियाण दो सय । छपन्ना एग खुड्भवे ॥ १ ॥ अर्थ-निगोदना जीव एक मुहुर्तमा ६५५३६ भव करे अने निगोदनो एक भव २५६ आवलीनो छे क्षुल्लक भवनो ए प्रमाण छ کے अथ्थि अणताजीवा, जेहिं न पत्तो तसाइपरिणामो ॥ उववज्जतिचयति य, पुणोवि तत्थेव तत्थेव ॥१॥ अर्थ-निगोदमा अनता जीव एहवा छे जे जीव बसपणो पहेला किवारें पाम्या नयी अनतो काल पूर्वे गयो अने अनतो काल जाशे पण ते जीव वारवार तिहाज उपजे छे अने ति- हाज चवे छे एम एक निगोदमा अनता जीव छे ते निगो- दना वे भेद छे एक व्यवहार राशी निगोद अने,बीजो अव्य- ।

आगमसार वहारराशी निगोद तेमा जे बादर एकेन्द्रियपणो भावे त्रसपणो पामीने पाठा निगोदमा जाइ पडया छे ते निगोदिया जीवने व्यवहार राशिया कहिये, अने जे जीव कोइपण काले निगो- दमायी निकल्या नथी ते जीव अव्यवहारराशीया कहिये अने इहा मनुष्यपणायी जेटला जीव कर्म खपावीने एक समयमा मोक्ष जाय छे तेटला जीव तेज समये अन्यवहारराशी सूक्ष्म निगोदमायी निकलीने उचा आवे छे जो दश जीव मोक्ष जाय तो दश जीव निक्ले कोइक वेलाए भव्य जीव ओठा निकले तो ते ठेकाणे एक वे अभव्य निकले पण व्यवहारराशीमा जीव कोइ वधे घटे नहीं एवा निगोदना असख्याता लोकमाहेला गोला ते छदिशीना आव्या पुद्गलने आहारादिपणे ले छे ते सकल गोला कहेवाय अने लोक अतना प्रदेशे जे निगोदना गोला रह्या छे तेने त्रण दिशीना आहारनी फरशना छे माटे विकल गोला पहिये ए सूक्ष्म निगोदमा पाच यावरना सूक्ष्म जीव ते सर्व लोकमा काजटनी कुपलीनी पेरे भरया थका व्यापी रह्या छे अने साधारणपणो ते मान एक वनस्पतिमाज छे पण चार थावरमा नथी ए मूक्ष्म निगोदमा अनतु दुख छे तेनु उदाहरण कहे छे सातमी नरकनु आयुष्य तेनीस साग- रोपमनु छ तेत्रीस सागरोपमना जेटला समय याय तेटला बखत सातमी नरकमा उत्कृष्टो तेनीस सागरोपमने आयुपे कोइक जीव उपजे तेटला भवमा जेटलु छेदन भेदननु दुख थाय ते सर्व एकछ करिये वेयी अनतगणु दु ख निगोदना जीव, एक समयमा भोगवे छे दृष्टान्त जेम कोइक मनुष्यने साडा वण क्रोड लोढानी सुइने अग्नियी तपावीने कोडक देवता सम- काले चापे तेने जे वेदना थाय 'तेथी अनत गुणी वेदना नि- आगमसार -- गोद मध्ये छे अने भव्य जीवने निगोदत कारण ते अज्ञान दशा छे माटे तेहनो साग करो ए.निगोदनो विचार को ए सर्व प्रमेयनो प्रमाता आत्मा पोताना ज्ञान गुणे करी प्रमेयनो प्रमाण करे ए प्रमेय पणो कयो ५ सत्त्वपणो ते छ द्रव्य एक समयमा उपजे विणशे छे अने स्थिरपणे छे उत्पाद व्यय ब्रुवपणो तेहिज सत्पणो उत्पाद व्ययवयुक्त सत् इति "तचार्य वचनात " ते विस्तारयी कही देखाडे छे जे वर्मास्तिकायना असख्याता प्रदेश छे तिहा एक प्रदेशमा अगुरुलघु असख्यातो छ अने वीजा प्रदेशमा अततो अगुरुलघु छ, त्रीजा प्रदेशमा सख्यातो अगुरुलघु छ एम अस- ख्याता प्रदेशमा अगुरुलघुपर्याय घटतो वधतो रहे छे ते अगुरुलघु पर्याय चल छे ते जे प्रदेशमा असख्यातो छे ते प्रदे- शमा अनतो थाय छे अने अनताने ठेकाणे असख्यातो थाय छ एम लोकप्रमाण असख्यात प्रदेशमा शरीखो समकाले अगुरु लघु पर्याय फिरे छे ते जे प्रदेशमा असख्यातो फिटीने अनतो थाय छे ते प्रदेशमा असख्यातपणानो विनाश छे अने, अनत पणानो उपजवो छे अने अगुरुलथुपणे गुण ध्रुव छे एम उपजवो विणसवो अने व ए त्रणे परिणाम छे अधर्मा- स्तिकायमा पण ए वणे परिणाम असख्यात, प्रदेशे सदा समय समयमा परिणमी रह्या छे,, तेमा पण उपजे विणशे अने थिर रहे छे एम आकाशना अनता प्रदेशमा पण एक समये त्रण परिणाम परिणमे छे अने जीवना असख्याता प्रदेश के ते मध्ये पण उपजे विणशे थिर रहे (छे)तथा पुद्गल परमाणुमा .पण समय थाय छे अने कालनो वर्तमान समय फिटीने अ- तीत, काल थाय, छे तो, ते समयमा वर्तमानपणानो विनाश - आगमसार छे अने अतीतपणानो उपजको छे काल पणे व छे ए स्थूल यकी उत्पादक व्यय अवपणो क्यो अने वस्तुगते मूलपणे जेयने पल्टवे जाननो पण ते भासनपणे परिणमवो थाय ते पूर्व पर्यायना भासननो व्यय अने अमिनव जेयना पर्याय मास- ननो उत्पाद तथा ज्ञानपणानो ध्रुव ए रीते सर्व गुणना वर्मनी प्रवृत्तिरूप पर्यायनो उत्पाद व्यय श्रीसिमभगवन्तमा पण थइ रह्यो छे एमज धर्मास्तिकायना प्रदेशे जे क्षेत्र गत असख्यात पुद्गल तथा जीरने पहेले समय चलण सहायीपणो परिणमतो हतो अने वीजे समय अनन्त परमाणु तथा अनन्ता जीव प्रदेशने चलन सहायी थयो तेवारें असरन्याता चल्न सहायनो व्यय अने अनता चलन सहायनो उपजवो अने गुणपणे ध्रुव एम धर्मदत्य मव्ये उत्पाद व्यय थइ रह्यो छे तेमज अपर्मादिक इत्यने विपे पण भावनु तथा वली कार्य कारणपणे उत्पाद व्यय तथा अगुरुलचुना चलननो उत्पाद व्यय पचास्तिकायने विपे कहे तथा कालव्य ते उपचार छे तेनु स्वरूप सर्व उपचारयीज कहेतु ए रीते सर्व द्रव्यमा सत्पणो छ जो अगुरुलधुनो भेद न थाय तो पछे प्रदेशनो माहोमाहे भेद केवो थाय ते माटे अगुरुलघुनो भेद सर्वमा छे अने जेनो उत्पाद व्यय रूप सत्पणो एक छे ते द्रव्य एक छे तथा जेनो उत्पाद व्यय सत् पणो दो ते द्रव्य पण जूदो छ एटले सत् केहता सचपणो को ६ अगुरुलघुपणो कहे छे जे द्रव्यनो अगुरुलघु पर्याय छे ते 3 प्रकारनी हानि वृद्धि करे छे वेमा छ प्रकारनी वृद्धि छ १ अनन्त भागवृद्धि, २ असख्यातभागवृद्धि, ३ सख्यातमाग- वृद्धि, ४ सख्यातगुणवृद्धि, ५ असरूयातगुणवृद्धि, ६ अनत , ४२ जागमसार , गुणवृद्धि हवे छ प्रकारनी हानि कहे छे १ अनतभागहानि, २ असख्यातभागहानि, ३ सख्यातभागहानि, ४ सस्यातगुण हानि,५ असख्यातगुणहानि, ६ अनतगुणहानि ए रीते छ प्रका- रनी वृद्धि तथा छ प्रकारनी हानि ते सर्व द्रव्यमा सदा समय समय यइ रही छे वृद्धि ते उपजबो अने हानि ते व्यय कहिये ए अगुरुलघुपणो कह्यो नहीं गुरु तथा नहीं लघु ते अगुरुलघु स्वभाव कहियें ए सर्व द्रव्य मध्ये छे ते श्री भगवती सुनें सव्वदव्वा सवगुण सम्बपएसा सबपज्जवा सवहा अगुरु लहुआए अगुरुलघु स्वभावने आवरण नयी तथा आत्मा मध्ये जे अगुरुलघुगुण ते आत्माना सर्व प्रदेशे क्षायक भाव थये सर्व गुण सामान्यपणे परिणमे पण अधिका ओठा परिणमे नहीं ते अगुरुलघुगुणनु प्रवर्तन जाणवु ते अगुरुलघु गुणने गोत्रकर्म रोके छे ए अगुरुलघु स्वभाव ते सर्व द्रव्यमा छ हवे गुणनी भावना कहे छ तिहा जेटला छए द्रव्यमा सरीखा गुण छे ते सामान्य गुण कहिये, अने जे गुण एक द्रव्यमा छे अने वीजा द्रव्यमा नयी ते विशेष गुण कहिये जे गुण कोइक द्रव्यमा छे अने कोइक द्रव्यमा नयी ते साधा- रण,असाधारण गुण कहिये एम ए छ द्रव्यमा अनतगुण, अनन्त पर्याय, अनन्त स्वभाव सदा शाश्वता छे जेम श्रीके- वली भगवतें प्ररूप्या ते सर्व जे रीतें छे ते रीतें सद्दहणा पूर्वक यथार्थ उपयोगयी श्रुतज्ञानादिकयी पथार्थपणे जाणवा. सदहवा ते मोक्षनु कारण छे जे जीव ज्ञान पाम्यो ते जीव विरति करे छे ते चारित्र कहियें ज्ञाननु फल विरतिपणो छे ते मोक्षनु तत्काल कारण छे हवे, निश्चय चारिस अने व्यवहार चारिननो विचार कहे आगमसार AAR छ तेमा प्रथम व्यवहार चारिन ते ने माणातिपातविरमण प्रमुख पचमहानतस्प ते सर्व पिरति कहिये अने स्थूलपाणा- तिपातपिरमण व्रतादिक श्रावकना बार व्रत ते देश विरति चारित जाणवु ए व्यवहार चारिन सुखनु कारण छे एवी कर- णीरूप श्रावकना बार व्रत अने यतिना पाच महावत ते अमन्यने पण आरे तेयी देवतानी गति पामे पण सकाम निर्जरानु कारण न याय इहा कोइ पछे के मोमनु कारण नथी तो एटल कष्ट शा वाग्ते करिये १ तेने उत्तर जे त्याग बुद्धि निश्चय ज्ञान सहित चारित ते मोक्षनु कारण छे माटे निश्चय चारित सहित व्यवहार चारिन पाल्तु ते निश्चय चारिन कहे छे शरीर, इन्द्रिय, विपय, कपाय योग ए सर्व परवस्तु जाणी अटवा तथा आहार ते पुगल वस्तु जाणी छाडयो आत्मा अणाहारी छे ते माटे मुजने आहार करवो घटे नही आहार ते पुद्गल छे, आत्मा अपुदली छे ते माटे त्याग करबो तद्रूप जे तप ते तप निश्चय चारिनमा जाणवु चारिन कहेता चचलता रहित थिरताना परिणाम अने आत्मस्वरूपने बिषे एकत्वपणे रमण तन्मयता स्वरूप विश्राति तत्वानुभव ते चारित्र कहिये ते चारिनना ये मेद छे एक देशविरति, चीज़ सर्व विरति तिहा देश विरति कहेता श्रापकना वार व्रत ते बार व्रत निश्चय तथा व्यवहारथी कहे छे १ प्राणातिपात पिरमण व्रत ते परजीवने आपणा जीव सरीखो जाणी सर्व जीवनी रक्षा करे ते व्यवहार दया थइ माटे व्यवहार प्राणातिपात विरमण व्रत जाणबु अने जे आपणो जीन कर्म वश पटयो दुखी याय छे ते आपणा जीवने कर्म- बवनयी मुकावबु अने आत्म गुण रक्षा करी गुण द्धि करवी आगमसार ते स्वदया बधहेतु परिणति निवारी स्वरूप गुणने प्रगटपणे करवा जे गुण प्रगट थयो ते राखबो एटले ज्ञाने करी मिथ्यात्व टाली आपणा जीवने निर्मल करे ते निश्चयथी प्राणातिपात विरमण व्रत कहिये २ मृषावाद विरमणवत कहे छे जूटु वचन बिलकुल बोलवु नही ते व्यवहार मृषावाद विरमणबत अने जे पर पुन- लादिक वस्तुने आपणी कहेवी ते मृपावाद वचन छे अने जीवने अजीव कहे तथा अजीवने जीव कहे इत्यादिक अज्ञान भाव ते सर्व निश्चय मृषावाद छे अथवा सिद्धान्तना अर्थ खोटा कहे ए मृषावाद जेणे छाड्यो ते निश्चय मृषावाद विरमणबत कहियें, एटले बीजा अदत्तादानादिक व्रत जो भाजे (भागे) तो तेनो मात्र चारित्र भग थाय पण ज्ञान दर्शननो भग न थाय अने जेणे निश्चय मृषावादनो भग करयो तेणे समकित तथा ज्ञान अने चारित ए त्रणेनो भग करयो तथा आगममा एम का छे जे एक साधुयें चोथो व्रत भग करयो अने एक साधुये बीजो मृषावाद व्रत भग करयो तो जेणे चोथो व्रत भग करयो ते आलोयण लेइ शुद्ध थाय पण जे सिद्धान्तना अर्थनो मृषा उपदेश आपे ते आलोयण लीघे पण शुफ थाय नहीं ३ अदत्तादान विरमण व्रत कहे छे जे पारकु धन वस्तु छुपावे चोरी करे ठगबाजी करी लीये ते चोरी छे, एटले पारकी वस्तु धणीना दीवा विना लेवी नही ए व्यवहारथी अदत्ता- दानविरमण व्रत जाणवु अने जे पाच इदियना वीस विषय, आठ कर्मवर्गणा इत्यादिक परवस्तु लेवी नहीं तथा तेनी वाठा न करवी ते आत्माने अग्राह्य छे भाटे ते निश्चयी अ- दत्तादानविरमण व्रत कहिये इहा कोइ पूछे जे विषयनी !

आममसार. अने कर्मनी वाला कोण करे छे? तेने उत्तर जे पुण्यने मेलो लेवा योग्य कहे छे ते जीव कर्मनी वाठा करे छे जे पुण्यना ४२ भेद छे ते चार कर्मनी गुभ प्रकृति छे एटले जे व्यव- हार अदत्तादान तो नथी लेता पण अतरंग पुण्यादिकनी वाला छे तेने निश्चय अदत्तादान रागे छे ४ मैथुन विरमणत्रत कहे जे जे पुरुष परस्त्रीनो परिहार करे तथा जे स्त्री परपुरुपनो परिहार करे इहा साधने स्त्रीनो सर्वथा त्याग छे अने गृहरथने परणेली स्त्री मोकली छे पर- स्त्रीनो पन्चखाण छे ते व्यवहारयी मथुननु चिरमण कहिये अने ने विषयना अभिलापनु तथा ममता तृष्णानो त्याग परभाव वर्णादिक परदव्यना स्वामित्वादिक तेनो अभोगीपणो आत्मा स्वगुण ज्ञानादिकनो भोगी छे अने ए पुद्गल्खच ते अनता जीवनी एठ छे तेने केम भोगवे ए रीते त्याग निश्चययी मैथुन विरमण कहिये जेणे बाह्य विषय छाड्यो छे अने अतरग लालच छुटी नयी तो तेहने ते मैथुनना कर्म लागे छे ५ परिग्रह परिमाणवत कहे छे परिग्रह वन-धान्य-दास- दासी-चौपद-जमीन-वस्त्र आभरणनो त्याग तेमा साधुने सर्वथा परिग्रहनो त्याग छे तथा श्रावकने इच्छा परिमाण छे जेटली इच्छा होय तेटलो परिग्रह मोकलो राखे बीजानी विरति करे ए व्यवहारथी को अने जे कर्म रागद्वेष अज्ञान द्रव्य ज्ञानावरणीय प्रमुख आठ कर्म अने शरीर इन्द्रियनो परिहार एटले कर्मने पर जाणी छाडवो ते निश्चययी परिग्रहनो त्याग एटले परवस्तुनी मूळ छाडवी जेणे मूळ छोडी वेणे परिग्रह योडयोज छे एम जाणवु ६ दिशिपरिमाण व्रत कहे छे. तिहा तिरछि चार दिशी आगमसार पाचमी अवो छट्ठी ऊर्व ए छ दिशिना क्षेननो मानकरी मो- कलो राखे ते व्यवहारयी दिशिपरिमाण कहियें अने चार- गतिमा भटकवु ते कर्मनु फल छे एम जाणी तेयी उदासी- पणो अने सिक अवस्था(नो) शु उपादेयपणो ते निश्चय दिशि- परिमाण त कहिये ७ भोगोपभोगपरिमाण व्रत कहे छे जे एकवार भोग- बबु ते भोग अने जे वारवार भोगवबु ते उपभोग तेनो परि- माण करे ते व्यवहार भोगोपभोगवत कहिये, अने जे व्यव- हारनये कर्मनो कर्त्ता भोक्ता जीव छे अने निश्चयनये तो कर्मनो कर्ता कर्म छे आत्मा अनादिनो परभाव भोगी ययो छे तेयी परभावग्राहक अने परभावरक्षक थयो एटले आत्मानी जाय- कता, ग्राहकता, भोग्यता, रक्षकता वीगडे कर्ता पणो वीगडयो तेवारें परभाव कर्ता थयो ते पण परभाव रगीपणे आठ कर्मनो कर्ता थयो छे पण सत्ताय तो स्वभावनो कर्त्ता छे पण उप- करण अवराणा तेथी स्वकार्य करी शकतो नयी विभावने करे छ अज्ञानपणे जीवनो उपयोग मल्यो छे पण न्यारो छे पो- ताना ज्ञानादिक गुणनो कर्त्ता भोक्ता छे एहवो स्वरूपानुयायी परिणाम ते निश्चयभोगोपभोगनत साग जाणवो ८ अनर्थदण्डविरमणत्रत कहे छे काम विना जीवनो वध करवो पारका वारते आरभ प्रमुख करवानी आजा प्रमुखे आपवी ते ध्यवहार अनर्यदड अने शुभाशुभ कर्म ते मिथ्यात्व अविरति कपाय योगयी बधाय छे तेने जीव आपणा करी जाणे ए निश्चययी अनर्थदड. ९ सामायिक व्रत कहे छे जे मन वचन कायाना आरम दालीने तेने निगरभपणे वर्ताने ते व्यवहार सामायिक जाणको -

आगमसार
अने जे जीवना जान, दर्शन, चारित गुण विचारे सर्व जीवना
गुणानी सत्ता एकसमान पाणी सर्व जीर साये समतापरिणामे
वर्ने ते निश्चय समतारूप सामायिक कहिये
१० देशावगाशिक नत कहे छे जे मन वचन कायाना
योग एक टोर की एकरथान वेसी धर्म ध्यान करखो ते
व्यवहार देशावगाशिक कहिये अने जे शुनजाने करी छद्रय
ओल्सीने पाच न्यनो त्याग करे अने ज्ञानत जीवने ध्याने
ते निश्चय देशावगाशिक त कहिये
११ पौषध नत कहे छे जे चार पहोर अथवा आठ
पहोर सुधी समता परिणामे सावध छोडी निरारभपणे सझा-
यध्यानमा प्रवर्ते ते व्यवहार पोगह कहिये अने पोताना जीवने
ज्ञान ध्यानयी पोपीने पुष्ट करे ते निश्चययी पौषध त कहिये
जीवने पोताना स्वगुणे करी पोपीजे तेणे पोषध कहिये
१२ अतिधिमविभाग व्रत कहे छे जे पोशहने पारणे
अथा सदा सर्वदा साधुने तथा जैनमिश्रावकने पोतानी
शक्ति प्रमाणे दान देव ते व्यवहार अतिधिसविभाग कहिये
अने पोताना जीवने अथवा शिष्यने ज्ञाननु दान ते भणबु,
भणाव, गुणवु सुणाव,ते निश्चययी अतिथिसविभाग व्रत कहिये
एटले प्रारम्ना बार व्रत कथा ते समकित सहित जे निश्चय तथा
व्यवहारथी बार नत पारे ते जीवने पाचमे गुणठाणे देशविरति
श्रावक कहियें देश केहता देशयकी थोडीशी बतिपणोछे माटे
अने यतिने सर्वयी व्रतिपणो छे तेथी पाच महाव्रतज छे साधुने
पाच महानतमा सर्व व्रत आल्या ए निश्चय त्यागरूपाजान ध्यान
सबर निर्जरामा थिरताना परिणाम ते निश्चय चारिनना एक
उत्सर्ग बीजो अपनाद ए वे मार्ग छे तेमा जे उत्कृष्ट तीक्ष्ण

४६ आगमसार पाचमी अधो उही ऊर्व ए छ दिशिना क्षेननो मानकरी मो- कलो राखे ते व्यवहारथी दिशिपरिमाण कहिये अने चार- गतिमा भटकबु ते कर्मनु फल छे एम जाणी तेयी उदासी- पणो अने सिज अस्था(नो) शु उपादेयपणो ते निश्चय दिशि- परिमाण व्रत कहिये ७ भोगोपभोगपरिमाण व्रत कहे छे जे एकवार भोग- ववु ते भोग अने जे वारवार भोगवद् ते उपभोग तेनो परि- माण करे ते व्यवहार भोगोपभोगवत कहिये, अने जे व्यन- हारनये कर्मनो कर्त्ता भोक्ता जीव छे अने निश्चयनये तो कर्मनो कर्ता कर्म छे आत्मा अनादिनो परभाव भोगी थयो छे तेथी परभावग्राहक अने परभावरक्षक थयो एटले आत्मानी जाय- कता, ग्राहकता, भोग्यता, रक्षकता वीगडे कर्ता पणो वीगड्यो तेवारें परभाव कर्ता थयो ते पण परभाव रगीपणे आठ कर्मनो कर्ता थयो छे पण सत्ताय तो स्वभावनो का छे पण उप- करण अवराणा तेयी स्वकार्य करी शकतो नयी विभावने करे छे अज्ञानपणे जीवनो उपयोग मल्यो छे पण न्यारो छे पो- ताना ज्ञानादिक गुणनो कर्त्ता मोक्ता छ एहवो स्वरूपानुयायी परिणाम ते निश्चयभोगोपभोगनत साग जाणवो ८ अनर्थदण्डविरमणबत कहे छे काम विना जीवनो वध करवो पारका वारते आरभ प्रमुख करवानी आज्ञा प्रमुखे आपवी ते व्यवहार अनर्यदड अने शुभाशुभ कर्म ते मिथ्यात्व अविरति कषाय योगयी बवाय छेतेने जीव आपणा करी जाणे ए निश्चययी अनर्थदड ९ सामायिक वत कहे छे जे मन ववन कायाना आरम दालीने तेने निरारभपणे वर्तावे ते व्यवहार : सामायिक जाणवो आगमसार ४९ एहवी आगला भवनी वाच्या छे ते अग्रगोर आर्तव्याननो चोथो पायो जाणो ए आर्तत्यानना चार मेट कया ए तिर्यच गतिना कारण छे ए न्यानना परिणाम ते पाचमा अथरा ठट्टा गुणटाणा सुधी होय २ जे कठोर परिणामनु चितवन ते रोदन्यान तेना चार भेद छे १ जीवहिंया करीने हर्प पामे अथवा बीजो कोई हिंसा करतो होय तेने देगी खुशी याय जया युद्धनी अनु- मोदना करे ते हिंसानुनवी दिल्यान २ जूठु बोलीने मनमा हर्ष पामे के जुओ में केवो कपट केळन्यो मारा जटापगानी खनर कोटने पडी नही, पयो मृपाना- रप परिणाम ते मृपा- नवधी राद्रव्यान ३ चोरी करी अयवा टगाइ करी मनमा खुशी थाय के मारा जेवो जोरावर कोण छे, दु पारको माल खाउ छु एनो परिणाम ते चोरानुनवि राज्यान ४ परिग्रह बन धान्य परिवार पणो धपानी लालच होय ते वन अथवा कुटु- बने माटे गमे तेवु पाप करे अपवा वणो परिग्रह मिल्यायी जहार करे ते परिग्रहरक्षणानुनधी रौद्रन्यान ए रौद्र- ध्यानना चार मेद कद्या ए व्यान नरक गति पमाडबानु कारण छे महा अशुभकर्मनु कारण छे ए पाचमा गुणठाणा सुधी छे, अने उठे गुणठाणे पण एक हिंसानुरवीरौद्रव्यानना परि- णाम कोडक जीवने होय हवे बर्मव्यान कहे छे जे व्यवहार क्रियारूप कारण ते धर्म तथा श्रुतजान अने चारिन ए उपादानपणे सापन वर्म तया रत्नायी मेदपणे ते उपादान शुद्ध व्यवहार उत्सर्गाऽनु- यायी ते अपवाद वर्म जाणवो ओ अमेद रत्ननयी ते सावन शुद्ध निश्चयनये उत्सर्ग वर्म अने (धम्मो वत्थु सहावो ).जे 7 आगमसार . परिणाम ते उत्सर्ग अने जे उत्सर्ग राखवाने कारणरूप ते अप- वाद-उक्तच ॥ "सवरणमि असुफ, दुन्नवि गिन्ह तदेतयाणहिय ॥ आउर दिट्ट तेण, ते चेवहीय असवरणे ॥१॥ एटले ज्या सुधी साधक भावने बाधक न पडे त्या सुधी जेहनी ना कही ते आदरखो नही अने जो साधक परिणाम रहेता न दीठा तेवारे जेहनी ना ते आचरे तेने अपवाद मार्ग कहिये जे आत्मगुण राखवाने करवो ते अपवाद अने गुणीने रागे भक्तियें करवो ते प्रशस्त ए बे तो साधन छे अने जे औदयि- कने अखमवाथी करखु ते अतिचार छे तथा सबलो अने औदयिक माटे अशक्तपणे करबु ते पडिवाइ छे ते मध्ये अपवाद मार्ग ते परिणाम दृढ रहे तेम आजायें करवो हवे चार ध्यान कहे छे १ आर्तध्यान, २ रोद्रध्यान, ३ वर्मध्यान, ४ शुक्लध्यान तिहा पहेला बे ध्यान ते अशुभ क- हिये अने पाछला बे ध्यान ते शुद्ध छे तिहा मनमा आहट्ट दोहट्टना परिणाम ते आर्तध्यान कहिये तेना चार पाया छे १ भाइ, मिन, सज्जन, माता, पिता, स्त्री, पुत्र, धन, प्रमुख इष्ट वस्तुनो वियोग थयायी विलाप करे ते पहेलो इष्ट वियोगनामा आर्तध्यान तथा २ अनिष्ट जे भुडा दुखना कारण, दुश्मन दरिद्रीपणो, तथा कुपुत्रादि मलवायी मनमा दुख चिंता उपजे ते अनिष्ट सयोग नाम आर्तध्यान , ३ शरीरमा रोग उपना थका दुख करे, चिंता घणी करे ते रोगचितानाम आर्तध्यान ४ मनमा आगलना वखतनो शोच करे जेआ वर्षमा आ काम करशु, आवता वर्षमा अमुक काम करशु तो अमुक लाभ थशे अथवा दान शील तपनु फल मागे जे आ भवमा तप कीयो छे माटे आवते मवे इन्द्र चक्रवर्तिनी पदवी मले + आगमसार " ३ विपाकविषय वर्मन्यान कहे छ जे एह्यो जीव छे तोपण कर्मों दुसी छे ते कर्मनो विपाक चितरे जे जीवनो ज्ञानगुण ते जानावरणीय कमें दायो छे अने दर्श- नावरणीय कम दर्शनगुण दायो छे, एम आठ कमें जीवना आठ गुण दाच्या छे एटले आ ससारमा भमता यका जीवने जे सुखद् स छे ते सर्व कर्मना कीमा छे माटे सुख उपने राचा नही अने दुस उपने दिलगीर यत्र नहीं कर्म स्वरू- पनी प्रकृति, स्थिति, रस, अने प्रदेशनो वध, उदय, उदीरणा, तथा सत्ता, चिंतनानु एकाग्रता परिणाम ते विपाकविचय धर्मव्यान , ४ सस्थानविचयधर्मध्यान कहे छे ते चउद राजमान लोकनु स्वाप विचारे जे ए लोक ते चउदराज ऊचो छे ते मध्ये सातराज अपोलोक छे विचमा अढारसो योजन मनुष्य क्षेत्र विछो लोक छे ते ऊपर काइक ऊणो सातराज ऊर्ध्व- लोक छे तेमा सर्व वमानिक देवता से छे अने ऊपरें सिद्ध शिला सिद्ध क्षेत्र छे ए रीते लोकनु प्रमाण छे ए लोकनु सरथान वैशाख छ अनतो काल आपणा जीवें ससारमा भमता सर्व लोकने जन्म मरण करी फरस्यो छे, एवु जे लोक स्वरूप तथा लोकने विपे पचास्तिकायनु अपर यान तथा परिणमन द्रव्य मध्ये गुणपर्यायनु अपरथान तेनो जे एकायताये तन्मयचिंतन परिणाम एहनु जे ध्यान ते सस्थान विचय वर्मन्यान कहिये ए वमध्यानना चार पाया कह्या ए धर्मध्यान चोथा गुणठा- पाथी माडीने सातमा गुणठाणा सुधी छे हवे शसध्यान कहे छे शुक केहता निर्मल, गुड, पर .

आगमसार , वस्तुनो सत्तागत शुद्ध परिणामिक स्वगुण प्रवृति कांदिक अनतानद रूप सिद्धारस्थायें रह्यो ते एवमत उत्सर्ग उपादान शुद्ध धर्म, ते वर्मनु भासन रमण एकाग्रतापणे चिंतन तन्मय- तानो उपयोग एकत्वनो चिंतववो ते धर्म ध्यान कहिये तेना पाया चार छे ते कहे छे १ आज्ञाविचयधर्मव्यान ते जे वीतराग देवनी आजा साची करी सदहे एटले भगवते छ द्रव्यनु स्वरूप नय प्रमाणे निक्षेपा सहित सिद्ध स्वरूप, निगोद स्वरूप जेम कह्या तेम सहहे, वीतरागनी आजा नित्य अनित्य स्याद्वादपणे निश्चये व्यव- हारपणे माने सहहे ते आजा प्रमाणे यथार्थ उपयोग भासन थयो तेने हर्षे करी ते उपयोग मध्ये निरधार, भासन, रमण अनुभवता, एकता, तन्मयपणो ते आज्ञाविचय वर्मव्यान कहिये २ अपायविचयधर्मव्यान ते जीवमा अशुद्धपणे कर्मना योगयी ससारी अवस्थामा अनेक अपाय कहेता दूषण छे ते अज्ञान, राग, द्वेष, कषाय, आश्रव ए मारा नथी हु एथकी न्यारो छु हु अनतज्ञान, दर्शन,चारिन, वीर्यमयी, शुऊ, बुद्ध, अविनाशी छु अज, अनादि, अनत, अक्षर, अनक्षर, अचल, अकल, अमल, अगम्य, अनमी, अरूपी, अकर्मा, अबधक, अनुदय, अनुदीरक, अयोगी, अभोगी, अरोगी, अभेदी, अवेदी, अछेदी, अखेदी, अकषायी, असखाइ, अलेशी, अशरीरी, अणाहारी, अव्याबाध, अनवगाही,अगुरुलघु, परिणामी,अतीन्द्रिय, अप्राणी, अयोनि, अससारी, अमर, अपर, अपरपार, अव्यापी, अनाश्रित, अकप, अविरुद्ध, अनाश्रव, अलख, अशोफी, असगी, अना- रक, लोकालोकजायक, एवो शुद्ध चिदानद मारो जीव छे, ए- हवो एकाग्रतारूप ध्यान ते अपायविचयवर्मध्यान जाणवो , आगमसार . मल केवल जान पामे पछे तेरमें गुणटाणे ध्यानतरीकापणे छे तेरमाना अते अने चउदमे गुणठाणे ए वे पाया ध्या ३ सश्मक्रिया अप्रतिपाति पायो कहे छे ते सूक्ष्म मन, वचन कायाना योग स्वे, शैलेगी कग्ण करी अयोगी याय ते जे अप्रतिपाति निर्मल्वीय अचल्तारूप परिणाम ते सूक्ष्म- क्रियाअप्रतिपाति ध्यान जाणनु इहा सत्ताये ८५ प्रकृति रही हती ते माये ७२ खपाने ४ उच्छिन्नक्रियानुवृत्ति पायो कहे छे जे योग निरुष कीया पछे तेर प्रकृति खपावे, अकर्मा याय, सर्व क्रियायी रहित याय ते, समुच्छिन्न मिया निरतिशुक्लध्यान कहियें ए ध्यान ध्यावता शेप, दल, खरणरूप क्रिया उच्छेदे, अवगाहना देह मानमाथी नीजो भाग घटाटे, शरीर मूकी इहायी सातराज ऊपर लोकने अते जाय, सिद्ध थाय इहा शिष्य पूछे जे चौदमे गुणटाणे तो अक्रिय छे, तो सात राज उचो गयो ए क्रिया केम करे छ ? तेने उत्तर ने सिद्ध तो अक्रिय छे, पतु पूर्व प्रेरणायें तुनीने दृष्टान्ते जीवमा चालवानो गुण छे वर्मास्तिकायमध्ये प्रेरणा गुण छे, तेथी कर्मरहित जीव मोक्षे जता लोकने अते जइ रहे इहा कोइ प्रछे जे आगळ उचो अलोक छ तिहा किम जातो नयी १ तेने उत्तर जे आगल वर्मास्तिकाय नयी माटे न जाय वली कोइ पुछे जे तो अधोगतियें अथवा तिरच्छी ग- तियें केम नयी जातो ? तेने उत्तर जे कर्मना भारयी रहित ययो, हलुवो ययो, माटे नीचो तथा टामो जिमणो न जाय, कारण के प्रेरक कोइ नयी तथा कपे नहीं केमके अक्रिय छे माटे तथा कोड पूरे जे सिद्धने कर्म केम लागता नयी ? तेने कहे छ जे कर्म तो जीपने अजानयी तथा योगथी लागे छे, आगमसार आलबन विना आत्माना स्वरूपने तन्मयपणे ध्यावे एहवु ध्यान तेने शुलध्यान कहिये तेहना पाया चार छे ते कहे के १ पृथक्त्वबितर्कसप्रविचार-ते पृथक्त्व केहता जीवयी अजीव जूदा करवा, स्वभाव विभाव तेने जता पृथकपणे वहें- चण करवी स्वरूपने विषे पण द्रव्य तया पर्यायनो पृथपणे व्यान करी, पर्याय ते गुणमा सक्रमावे अने गुण ते पर्यायमा सक्रमण करे ए रीते स्वधर्मने विपे वर्मातरभेद ते पृथक्त्व कहिये अने तेनो वितर्क ते जे श्रुतजाने स्थित उपयोग अने सप्रविचार ते सविकल्पोपयोग एटले एक चिंतन्या पछी चीजो चितववो तेने विचार कहियें एटले निर्मल विकल्प सहित पो- तानी सत्ताने व्यावे ते पृथक्त्व वितर्कसप विचार पेहेलो पायो ए आठमा गुणठाणायी माडी अग्यारमा गुणटाणा सुधी छे २ एकत्व वितर्फअप्रविचार नामा चीजो पायो कहे छे जे जीव आपणा गुणपर्यायनी एकता करी त्यावे ते आवी रीते के जीवना गुणपर्याय अने जीव ते एकज छे, अने महारो जीव सिधस्वरूप एकज छे एवो एकत्व स्वरूप तन्मय- पणे अनता आत्म धर्मनो एकत्वपणे ध्यानवितर्क केहता श्रुत- जानावलगीपणे अने अप्रविचार केहता विकल्प रहित दर्शन जाननो समयातरे कारणता विना रत्नत्रयीनो एक समयी का- रण कार्यतापणे जे ध्यान वीर्य उपयोगनी एकाग्रता ते एकत्व- वितर्क अप्रविचार जाणवो ए पायो बारमा गुणठाणे ध्यावे ए बेहु पायामा श्रृतजानायलमनीपणो छे पण अवधि मन र्पयव ज्ञानोपयोगेंवर्तता जीव कोइ ध्यान करी सके नहीं, ए वेज्ञान परा- नुयायी छे माटे ए ध्यानथी घनघातिया चार कर्म खपावे नि- जागमसार नही कारण के हिंसक ऊपर पण उत्तम जीवने करणा अप- जे जो उपदेश थकी साग माग आवे तो तेने शुद्र मार्ग आ- वो कदाचित् मार्गे न आवे तो पण द्वेष न सखवो केमके ते अजाण छे एम समज एहवा जे परिणाम ते मन्यग्य भावना ४ सर्व जीवने पोताने तुत्य जाणी ठया पाले, कोइने हणे नहीं तया जे दुसी अथरा बमहीन तेहना उपर करुणा तेना दुख टाळवानो परिणाम तथा वर्महीन जीव देसीने एनो चिंतवे जे ए जीन किवारें धर्म पामो यथार्य आत्मसाधन पामी खम्प धर्मने किवारें अबल्यो यो परिणाम ते चोयी करणा केहता दया भावना ए चार भावना कही १ वे बार भावना कहे छे शरीर, कुटुर, बन, परिवार सर्व विनाशी छे जीवनो मूल वर्म अविनाशी छे एम चिन- व ते पहेली अनित्य भावना २ ससारमा मरण समये जीवने अरण राखनार वोइ नयी एक वर्मनो शरण छे एवु चितववु ते वीजी अगरण भावना ३ मारा जीवे ससारमा भमता सर्व भव कीधा के ए ससारयी हु केवारें छुटीश, ए ससार मारो नथी हु मोक्षमयी छु एम विचारखु ते नीजी ससार भा- वना ४ ए माहरो जीव एकलो छे, एकलो आन्यो, एकलो जशे, पोताना करेला कर्म एकलो भोगवशे एम चिंतवबु ते चोयी एकत्व भावना ५ आ ससारमा कोइ कोइनो नथी एम चिंत- बबु ते पाचमी अन्यत्व भावना ६ आ शरीर अपविन मलमूतनी खाण छे, रोग-जरायी भत्यो छे, ए शरीरयी हु न्यारो छु, एम चिंतववो ते छठी अशुचि भावना ७ रागद्वेष, अज्ञान, मिथ्यात्व प्रमुख सर्व आस्रव छे, एम चितवबु ते सातमी आस्रव भावना, ८ ज्ञानव्यानमा वर्ततो जीव नवा कर्म बाधे आगमसार PARA- ते सिझना जीवने अजान तथा योग नथी, मारे कर्म लागे नहीं ए चार ध्याननो अधिकार को हवे वली बीजा चार ध्यान कहे छे १ पदस्थ, २ पिंडस्थ, ३ रूपस्थ, ४ रूपातीत तेमा पहेलु पदस्थ ध्यान कहे छे जे अरिहतादीक पाच परमेष्ठीना गुण सभारे, तेनो चित्तमा ध्यान करे ते पदस्थव्यान २ पिंडस्थ केहता शरीरमा रह्यो जे आपणो जीव तेमा अरिहत, सिझ, आचार्य, उपाध्याय अने साघुपणाना गुण सर्व छे एहवो जे व्यान ते पिंडस्थ ध्यान अथवा गुणीना गुण मध्ये एकत्वता उपयोग करवो ते पिंडस्थ व्यान ३ रूपमा रह्यो थको पण ए मारो जीव अरूपी अनत गुणी छे, जे वस्तुनो स्वरूप अतिशयावलमी थया पछे आत्मानु रूप एकतापणो एहवो जे ध्यान ते रूपस्थध्यान ए त्रण ध्यान वर्म ध्यानमा गणवा ४ निरजन, निर्मल, सकल्पविकल्प रहित, अभेद एक शुभ सत्तारूप चिदानद तत्त्वामृत, असग अखंड, अनतगुण पर्यायरूप, आत्मस्वरूपतु ध्यान ते रूपातीत ध्यान जाणबु इहा मार्गणागुणठाणा नयप्रमाण मति आदिक ज्ञान क्षयोपशमभाव सर्व गाडवा योग्य थया एक सिद्धना मूल गुणने न्यावे ते रूपातीत ध्यान जाणवो एटले मोक्षनु कारण जे व्यान ते का हवे भावना कहे छे तेमा वर्म ध्याननी चार भावना कहे छ १ मैनी भावना ते सर्व जीव साथे मित्रतानो भाव चिंत- ववो, सर्वनु भलु चाहबु पण कोइनु माठु चितववु नही सर्व जीव ऊपर हित बुद्धि राखवी ते मैत्री भावना २ गुणवत अने ज्ञानादिक गुण ऊपरें राग ते बीजी प्रमोदभावना ३ जे धर्म- वत ऊपर राग अने मिथ्यात्वी ऊपर राग नहीं तेम द्वेप पण

आगमसार
14PM
तेने समकेत ज्ञान कहिये ते समकेत जान भलोज याय तिहा
अनुयोगद्वारमा कयो छे
नायम्मि गिन्हियन्ये,
अगिन्हियवे अ इच्छ अच्छामि ।
जडवमेवइयजो, सो उपएसो नओताम । १ ।
अर्थ-ज्ञानथी उ द्रव्य जाणीने लेवा योग्य होय ते ले
अने डाटवा योग्य छाडे एवो जे उपदेश ते नय उपदेश
जाणवो हवे समकेतनी दश रुचि कहे छे
१ निसर्ग रुचि ते निश्चयनये करी जीवादि नव तत्व
जाणे आरव त्यागे सबर आदरे वीतरागना कह्या भाव जे छ
दव्य ते दन्य क्षेत्र काल भाव सहित जाणे, नामादि चार
निक्षेपा पोतानी बुद्धियी जाणे सहहे, वीतरागना भाख्या भाव
ते सत्य एवी सहणा होय
२ उपदेश रुचि नव तत्व तथा ल द्रव्यने गुरु उपदे-
गयी जाणी सहहे ते उपदेश रुचि
३ आजा रुचि ते रागद्वेष मोह जेमना गया छे, अज्ञान
मिट्यु छे एहरा अरिहत देव तेणे जे आज्ञा कही तेने माने
सहहे ते आज्ञारुचि
४ सूररुचि १ आचाराग २ सुयगडाग ३ ठाणाग
४ समवायाग ५ भगवती ६ जाताधर्म कथा ७ उपासकदशाग
८ अतगडदशाग ९ अनुत्तरोववाइ दशाग १० प्रश्नव्याकरण
११ विपाक ए इग्यार अग तथा बारमु अग दृष्टिवाद जेमा
चउद पूर्व हता ते हमणा विच्छेद गया छे तथा १ उबराइ
२ रायपसेणी ३ जीवाभिगम ४ पन्नवणा ५ जबुद्वीपपन्नति

आगमसार नही ते आठमी सवर भावना ९ ज्ञान सहित क्रिया ते नि- जरानु कारण छे, जे नवमी निर्जरा भावना १० चउदराज लोकनु स्वरूप विचारखु ते दशमी लोकस्वरूप भावना ११ ससारमा भमता जीवने समकित जाननी प्राप्ति पामवी दुर्लभ छे अथवा समकित पाम्यो पण चारिन सर्व विरति परिणाम रूप वर्म पामो दुर्लभ छे ते अग्यारमी बोधिदुर्लभ भावना १२ वर्मना कहेणहार (कथक) गुरु तथा शुद्ध आगमनु साभलबु एहवी जोगवाइ मलवि दोहेली छे ते बारमी धर्मदुर्लभ भावना एटले बार भावना कही ए चारित्रनु स्वरूप सपूर्ण का एवो समकित सहित जानचारिन ते मोक्षनु कारण छे, तेना उपर भव्य प्राणी विशेपे उद्यम करवो अने जो तेवु ज्ञानचारित्र नहीं पले तोपण श्रेणिक राजानी पेरे सदहणा शुद्ध राखवो जो समकित शुद्ध छे तो मोक्ष नजीक छे समकित विना ज्ञानध्यान क्रिया सर्व नि फल छे एम आगममा कयो छे जसकत किरइ, अहवा न सक्केइ तहय सद्दहइ । सद्दहमाणो जीवो, पावइ अयरामर ठाण ॥१॥ अर्थ-रे जीव । तु करी शके तो कर अने जो न करी शके तोपण जेवो वीतरागें वर्म कह्यो ते रीते सदहजे सद्दहणा शुद्ध राखनार जीव अजरामर स्थानक ते मोक्ष पदवी पामे हवे समकितनो मार्ग कहे छे १ जीव, २ अजीव, ३ पुण्य, ४ पाप, ५ आस्रव, ६ सदर, ७निर्जरा, ८ बध, ९ मोक्ष ए नव तत्वछे तेमा मोक्षनु कारण जीव छे, अने सबर तथा निर्जरा ए बे गुण छे, एटले जीव सवर निर्जरा मोक्ष ए चार उपादेय छे अने वीजा पाच हेय छे एह्वो परिणाम आगमसार १० जे पाच अस्तिकायनु स्वरूप जाणे श्रुतजाननो स्व. भाव अतरग सत्ता सदहे ते धर्मरुचि हवे समकितना आठ गुण कहे छे १ नि का ते जिना- गम मध्ये सूक्ष्म अर्थ कह्या ते साचा सहहे तेमा सदेह आणे नहीं तथा सात भययी पण टरे नहि १ निकंखा गुण ते पुण्यरूप फल्नी चाना न रासे केमके जिहाँ इच्छा तिहा कर्मनो बारे माटे ३ निवित्तिगिच्छागुण ते शुभ अशुभ पुद्गल एक सरिखा है तेमा पुण्यना उदययी शुभयोग मिल्या खुशी यइ अहकार न करवो तथा पापना उदययी दुखस- योग मिल्या दिलगीर थावु नही ४ अमृहष्टि गुण ते जे आगममा सूक्ष्म निगोदना तथा 3 द्रव्यना सूक्ष्म विचार कह्या ले ते साभल्तो यको मुजाय नही, जे पोतानी वारणामा आवे ते चारी राखे अने जे वारणामा न आवे तेने सद्दहे ५ उपत्रहगुण जे ए आपणा जीपमा अनत ज्ञानादिक गुण छे ते छुपाववा नही शुद्ध सत्ता जेवी तेवी कहेवी, राग द्वेष अजान ते कर्मनी उपाधि , जीव ए उपाधियी न्यारो छ ६ स्थिरिकरण गुण ते आपणा परिणाम जानमा स्थिर करवा टगाववा नहीं अथवा कोइ भव्य प्राणी धर्मथी पडतो होय तेने साद्य देड उपदेश आपी स्थिर करखो ७ वात्सल्यता गुण ते जेनी साथे ज्ञान ध्यान तप पडिक्कमणो मेलो करता होइये अने सदहणा पण एकज होय ते आपणो साधर्मि भाइ ले तेनी भक्ति करवी अथवा सर्व जीवना जानादि गुण आपणा समान छे माटे सर्व जीव ऊपर दया करवी अथवा वीजा जीवना पण आपणा तुल्य ज्ञानादि गुण छे ते जीवने पोषवा योग्य ज्ञान व्याननो घणो अभ्यास करावे ८ प्रभावक ६. श्रीदवकालिकमूत्रे हे गौतम ! मलिपुनस्य गोशालकस्यानुसम्पनार्य चालतपस्विनो श्याय- नस्य तेजःप्रतिसहरणार्थ च मया शीतला तेजोलेश्यामुड़ाव्य तटीयोप्णा तेजी- लेश्या प्रतिहतेत्यर्थः। तर 'अणुकपणट्टयाए ''तेयपडिसाहरणहयाए' इति पद- द्वयेन गोशालकरक्षणार्थ भगवतस्तेजोलेश्यासमुहा इति स्पष्टीभाति । न च रक्षण यदि धर्मस्तहि स्वसमवसरणे वर्तमानौ सर्वानुभूतिमुनक्षत्रनामानी शिष्यौ किं न भगक्ता रक्षितौ ' इति वाच्यम् , भगवतः सर्वज्ञतया तयोरायु:- समाप्तिसन्दर्शनात् । ननु यथा समाप्तायुप कोऽपि नैव रसितु प्रभवति तथा विद्य- मानायुप न कोऽपि हन्तु शक्नुयात् ' इति चेन्न, त्रिपष्टिशलाकापुरुषान् देवान् यहा यह सदेह हो सकता है कि यदि बचाने में धर्म होता तो भगवान्ने अपने समवसरणमें स्थित सर्वानुभूति और सुनक्षत्र नामक शिष्यों को क्यो न बचाया? इसका समाधान यह है कि भगवान् सर्वज्ञ थे, इसलिए किसका आयुष्य कितना अवशेष है या समाप्त हो चुका है इसे वे अपने निर्मल केवल ज्ञानसे जानते थे । सर्वानुभूति और सुनक्षत्र शिष्योका वर्तमान आयुष्य समाप्त हो चुका था। प्रश्न-जैसे वर्तमान आयुष्य समाप्त होने पर कोई किसीको बचा नहीं सकता वैसे ही आयुष्य रहते हुए कोई किसीको प्राणरहित भी नही कर सकता અહીં એ સદેહ થઈ શકે છે કે-જે બચાવવામા ધમ થાય છે તે ભગવાને પિતાના સમવસરણમાં રહેલા સવનુભૂતિ અને સુનક્ષત્ર નામના શિષ્યને કેમ ન પચાવ્યા ? એનું સમાધાન એ છે કે ભગવાન સર્વજ્ઞ હતા, તેથી તેનું આયુષ્ય કેટલું અવશેષ રહ્યું છે અથવા સમાપ્ત થઈ ચૂકયુ છે તે ભગવાન પિતાના નિર્મળ કેવળ જ્ઞાનથી જાણતા હતા સર્વાનુભૂતિ અને સુનક્ષત્ર શિષ્યનુ વર્તમાન આયુષ્ય સમાપ્ત થઈ ચૂકયુ હતુ પ્રશ્ન –જેમ વર્તમાન આયુષ્ય સમાપ્ત થવાથી કઈ કઈને બચાવી શકતું નથી, તેમજ આયુષ્ય બાકી હોય તે કેઈ ડેઈને પ્રાણરહિત પણ કરી શકતું નથી ९ अभ्ययन १ गा. १ अहिंसास्वरूपम् एवविधा च हिंसा काययोगस्य चपलतया सर्वथा परिहमशक्येवि व्यवहार- नयमानगम्या। भावतो हिंसा-माणन्यपरोपणेच्छालक्षण आत्मनोऽशुद्धपरिणामः, यथा- मकरनान्नो जलजन्तुविशेपस्य भूप्रदेशे लब्धजन्मा तण्डुलदघ्नोऽन्तर्मुहूत्युको- ऽन्तर्मुहूर्त्तमात्रगर्भनिवासानन्तरमुत्पादशीलस्तण्डुलाभिधानो मत्स्यविशेषस्तत्र स्थित एनावलोकयति- मकरोऽय मत्स्यानशितु तावतण्डतस्तोयमाकपति, ततश्च जलवेगादान- नान्तःसमागतेषु प्रचुरतरेषु मीनेषु पश्चात्तानवरुध्याऽऽस्यगत नीर निस्सार- योगकी चपलताको सर्वथा दूर करना अत्यन्त कठिन होने के कारण व्यवहारनयमान है। (२)भावहिंसा-प्राणोंसे रहित करनेकीइच्छारूप आत्माका अविशुद्ध परिणाम, भावहिंसा कहलाती है। जैसे-मगर नामके जलचर-जीव-विशेषकी भोंह पर बारीक चाँवलके समान शरीरवाला एक तन्दुल नामका मत्स्य होता है, वह अन्तर्मुहर्त्त गर्भ में रहकर जन्म लेता है, उसकी आयु अन्तर्मुहर्तमानकी ही होती है। गर्भज होनेके कारण उसको मन होता है। वह वहाँ (भौंह पर) बैठा हुआमगरका कृत्य देखता है कि वह मगर जलजन्तुओंको खानेके लिए पहले अपने मुंहमें पानीको खीचता है, फिर पानीके वेगसे आई- हुई मछलियों को मुँहमें रोककर जव पानीको निकालता है तब दातोंके સર્વથા દૂર કરવી અત્યંત કઠિન હોવાને કારણે વ્યવહારનયમાત્ર છે ૨) ભાવહિસા–ખ્યાથી રહિત કરવાની ઈચછારૂપ આત્માને અવિશુદ્ધ પરિણામ એ ભાવહિંસા કહેવાય છે જેમકે-મગર નામના એક જળચર પ્રાણની ભમ્મર પર ચોખા જેવા ગર્ભમાં રહીને જન્મ લે છે તેનું આયુષ્ય આ તમુહૂર્ત જેટલું હોય છે તે ગર્ભજ જીવ હોવાને લીધે તેને મન થાય છે તે મગરની ભમ્મર પર બેઠેબેઠા મગરનું કૃત્ય જુએ છે કે આ મગર જળમાના અને ખાવાને માટે પહેલા પિતાના મહેમા પાણીને એ ચે છે, પછી પાણીના વેગથી આવેલી માછલીઓને મહેમા રોકીને જ્યારે પાણીને કાઢી નાખે છે, ત્યારે દાતના છિદ્રો દ્વારા પાણીની श्रीदशवकालिको स्मृतिभ्रश-योगदुष्पणिधान-धर्मानादरभेदादष्टविधः। सा च हिंसा त्रिविधा- द्रव्यतो भावत उभयतश्चेति, तत्र-- द्रव्यतो हिंसा-आत्मनो विशुद्धपरिणामस्य सत्वेऽप्यकस्मादनिच्छया जन्तुविराधन, यथा-भिक्षाचर्यादौ प्रवृत्तस्य समितिगुफ्यादिधारकस्य चलनार्थ पादोत्थाने कृते एकेन चरणेन तिष्ठतः साधोरुत्थापितचरणतले तदानीं कुत- विद्भयाद् दुर्लक्ष्यकारणवशाद्वा वेगेन समागतस्य कस्य चिद् दीन्द्रियादिजन्तो- रितस्ततः साधुना तदक्षणमयासे कृतेऽपि अस्माचरणतलसलमतया पिराधनम् । (३) विपर्यय, (४)राग, (५) देप, (६)स्मृति-भ्रंश, (७) योगदुष्पणिपान, (८) धर्मानादर, के भेदसे आठ प्रकारका है। हिंसा तीन प्रकारकी है-(१) द्रव्यहिंसा, (२) भावरिसा और (३) उभयहिंसा। (१) द्रव्यहिंसा-आत्माके परिणाम विशुद्ध रोने पर भी अकस्मात् इच्छाके बिना ही जन्तुको पीडा हो जाना द्रव्यहिंसा है, जैसे-आहार विहार आदिमें प्रवृत्त, समिति और गुप्तिके धारण करनेवाले मुनिने जय एक चरण उठाया तो उठाये हुए चरणके नीचे किसी भयसे या अन्य कारणसे कोई दीन्द्रिय आदि लघुकाय जीव अचानक नीचे आ जाय और साधु उसकी रक्षा करनेका प्रयत्न भी कर रहे हों, फिर भी अचानक व जानेसे विराधना होना । इस प्रकारकी हिंसा, शरीरके (४) २००१, (५) देष, (६) स्मृतिश, (७) योगप्रविधान, (९) धर्मना અનાદર, એ ભેદે કરીને પ્રમાદ આઠ પ્રકાર છે હિસા ત્રણ પ્રકારની છે - (१) द्रव्यलिसा, (२) भावहिसा, भने (8) उसयडिसा (૧) કહિ સા–આત્માના પરિણામ વિશુદ્ધ હોવા છતા ઈચ્છા વિના જ તુઓની વિરાધના થઈ જાય તે દહિસા છે જેમકે–આહાર વિહાર આદિમા પ્રવૃત્ત, સમિતિ અને ગુણિને ધારણ કરવાવાળા મુનિએ જ્યારે એક પગ ઉપાડે ત્યારે ઉપાડેલા પગની નીચે કાઈ ભયને લીધે અથવા બીજા કેઈ કારણથી કોઈ બેઈદ્રિય આદિ લધુકાય જીવ અચાનક પગ નીચે આવી જાય, અને મુનિ એની રક્ષા કરવા પ્રયત્ન પણ કરી રહ્યા હોય, તે પણ અચાનક દબાઈ જવાથી વિરાધના થાય આ પ્રકારની હિંસા, શરીરના ચેગની ચપલતાને मरभात " अध्ययन १ गा.१ सयमस्वरूपम् ११ शस्त्रादिना तत्पहरण तदभिलापमान वा रज्जोरचेतनत्वेन प्राणच्यपरोपणाs- भावेऽपि आन्मन उक्तस्वरूपाऽशुद्धपरिणामोदयाचतुर्गतिभवभ्रमणहेतुर्वन्धो नियत भवति । उभयतो हिंसा-आत्मनोऽशुद्धपरिणामपूर्वक माणन्यपरोपण, यथा-केन- चिद् व्यायेन मृगजिघासया शरप्रक्षेपेण कृत तद्धननम् । संयमः। सयमः सयमन-सम्यगुपरमण सायद्ययोगादिति सयमः, स च सप्तदशविधः, समझकर क्रूर परिणामसे मारा, या मारनेका प्रयास किया तो वहाँ रस्सीके अचेतन होने के कारण यद्यपि प्राणोंका व्यपरोपण नहीं हुआ तथापि आत्मामें अशुद्ध परिणामके उदय होनेसे वह भी भावहिंसा है। उस हिंसासे निश्चय ही चतुर्गतिमें परिभ्रमण करानेवाले कर्मोंका पन्ध होता है। (3) उभयहिंसा-अशुद्ध परिणामोंसे जीवका घात करना उभयहिंसा है, क्योंकि इस हिंसामें आत्माके अशुद्ध परिणाम और प्राणोंका नाश दोनों पाये जाते है, जैसे-कोई व्याध हरिणको मारनेकी इच्छासे बाण चलाता है और उससे उसके प्राणोंका नाश हो जाता है। सयम। सावद्ययोगसे सम्यक्प्रकारसे निवृत्त होनेको सयम कहते हैं । वह પરિણામથી માર્યો, અથવા મારવાનો પ્રયાસ કર્યો, તે તેમા દેરડુ અચેતન હેવાથી જે કે પ્રાણુનું વ્યરે પણ થયું નહિ, તે પણ આત્મામા અશુદ્ધ પરિણામને ઉદય હોવાથી એ પણ ભાવહિંસા છે આ હિસાથી નિશ્ચિતપણે ચતુર્ગતિમાં પરિભ્રમણ કરનારા કર્મોને બધ થાય છે (૩) ઉભયહિંસા-અશુદ્ધ પરિણામેથી જીવને ઘાત કરે એ ઉભયહિસા છે, કેમકે એ હિંસામાં આત્માના અશુદ્ધ પરિણામ તથા પ્રાણુને નાશ બને રહેલા હોય છે જેમકે-કઈ પારધી હરણને મારવાની ઈચ્છાથી બાણ છોડે છે અને એ રીતે હણના પ્રાણુને નાશ થઈ જાય છે સ ચમ સાવદ્યગથી સમ્યફ પ્રકારે નિવૃત્ત થવું તેને સયમ કહે છે સચમ સત્તર , श्रीदशवैकालिकमूत्रे यति तदा दशनान्तरावकाशनिर्गतोदकवेगतो बहुतर मीना लघुतरा निस्सरन्त्येव । एर हिजतस्तानिरीक्ष्यासौ तण्डुलमत्स्यो मनसि विभावयति- " यदि मम वपुरीश बृहत् स्यात् तर्हि मम मुखानिगन्तुमेकोऽपि मत्स्यो न शक्नुयात् , मया सर्वेऽपि भक्षिता भवेयुः" इति । इत्य कलुपिताध्ययसायरूपया भारहिंसया स्वकीयमन्तर्मुहर्तप्रमाणमायुष्य समाप्य त्रयस्त्रिंशत्सागरममाण नरकायुप्य नियध्यासौ (तण्डुलमस्यः) तमस्तमा:- भिधाया सप्तम्या नरकपृथिव्या नारकत्वेन समुत्पद्यते । यद्वा-अल्पीयसि प्रकाशे रज्जुमालोक्य 'व्यालोऽय'-मित्यालोचयतः छिद्रो द्वारा पानीके साथ-साथ पहुतसी छोटी२ मछलिया निकल जाती है, तब उन निकलती हुई मछलियोंको देखकर तन्दुलमत्स्य विचारता है कि- इस (मगर) के तो दातोंके छिद्रों द्वारा बहुतसी मछलिया निकल जाती है, किन्तु, अगर मेरा शरीर मगरके बराबर बड़ा होता तो मैं इनमेंसे एकको भी नहीं निकलने देता-सयको भक्षण कर जाता। इस प्रकार वह परम कलुषित अध्यवसायरूप भावहिंसासे तेंतीस- सागरप्रमाण नरकायुष्य वाधकर अन्तर्मुहर्तकी अपनी आयुष्यको समाप्त करके तमतमा नामकी सातवीं नरकपृथिवीके अन्दर नारकीपनमें उत्पन्ना होता है। अथवा जैसे-मन्द-मन्द प्रकाशमें किसी हिंसकने रस्सीको सर्प સાથે સાથે ઘણુય નાની નાની માછલીઓ બહાર નીકળી જાય છે એ નીકળી જતી માછલીઓને જોઈને તદુલ મત્સ્ય વિચારે છે કે આ મગરના દાતના છિદ્રોની વાટે ઘણીય માછલીઓ બહાર નીકળી જાય છે, પરંતુ જે મારૂ શરીર મગરના જેટલુ મોટુ હેત તે હુ એમાથી એક પણ માછલીને બહાર નીકળવા ન દેત બધીયનું ભક્ષણ કરી જાત આ પ્રમાણે એ પરમ કલુષિત અધ્યવસાયરૂપ ભાવહિંસાથી તેત્રીસ સાગરનું નરકાયુષ્ય બાધીને અતર્મુહૂર્તનું આયુષ્ય સમાપ્ત કરે છે અને તમતમાં નામની સાતમી નરકમૃથિવીની અદર નારકપણે ઉત્પન્ન થાય છે અથવા જેમ–મદ મદ પ્રકાશમાં કઈ હિ સકે રડાને સર્પ સમજીને ક્રૂર अध्ययन १ गा. १ सयमम्वरूपम् ११ शवादिना तत्महरण तदभिलापमान पा रनोरचेतनत्वेन प्राणव्यपरोपणाs- भावेऽपि आत्मन उक्तस्वरूपाऽशुद्धपरिणामोदयाचतुर्गतिभवभ्रमणहेतुर्वन्धी नियत भवति । उभयतो हिंसा-आत्मनोऽशुद्धपरिणामपूर्वक प्राणव्यपरोपण, यथा-केन- चिद् व्यारेन भृगनिघासया शरप्रक्षेपेण कृत तदननम् । संयमः। सयमः सयमन सम्यगुपरमण सापययोगादिति सयमः, स च सप्तदशविधः, समझकर क्रूर परिणामसे मारा, या मारनेका प्रयास किया तो वहाँ रस्सीके अचेतन होनेके कारण यद्यपि प्राणोंका व्यपरोपण नहीं हुआ तथापि आत्मामें अशुद्ध परिणामके उदय होनेसे वह भी भावहिमा है। उस हिंसासे निश्चय ही चतुर्गतिमें परिभ्रमण करानेवाले कर्मोंका बन्ध होता है। (३) उभयहिंसा-अशुद्ध परिणामोंसे जीवका घात करना उभयहिंसा है, क्योंकि इस हिंसामें आत्माके अशुद्ध परिणाम और प्राणोंका नाश दोनों पाये जाते हैं, जैसे-कोई व्याध हरिणको मारनेकी इच्नसे घाण चलाता है और उससे उसके प्राणोंका नाश हो जाता है। सयम। सावद्ययोगसे सम्यक्प्रकारसे निवृत्त होनेको सयम कहते है। वह પ@િામથી માર્યો, અથવા મારવાને પ્રયાસ કર્યો, તે તેમા દેરડુ અચેતન હેવાથી જે કે પ્રાણુનું વ્યપરંપણ થયું નહિ, તે પણ આત્મામા અશુદ્ધ પરિણામને ઉદય હોવાથી એ પણ ભાવહિંસા છે આ હિસાથી નિશ્ચિતપણે ચતુર્ગતિમાં પરિભ્રમણ કરનારા કર્મોને બધ થાય છે (૩) ઉભયહિસા– અશુદ્ધ પરિણામેથી જીવને ઘાત કરે એ ઉભયહિસા છે, કેમકે એ હિનામા આત્માના અશુદ્ધ પરિણામ તથા પ્રાણુને નાશ બને રહેલા હોય છે જેમકે-કોઈ પારધી હરણને માવાની ઈચ્છાથી બાણ છેડે છે અને એ રીતે હણના પ્રાણને નાશ થઈ જાય છે સ યમ સાવદ્યોગથી સમ્યક્ પ્રકારે નિવૃત્ત થવું તેને સયમ કહે છે સયમ સત્તર - १२ श्रीदशवैकालिकमूत्रे तदुक्त समायाङ्गे- "सत्तरसनिहे सजमे पण्णत्ते तजहा-(१) पुढवीकायसनमे (२) आउकाय- सजमे (३) तेउकायसनमे (४) वाउकायसनमे (५) वणस्सकायसजमे (६) वेइदियसजमे (७) तेइदियसजये (८) चउरिदियसनमे (९) पचिंदियसनमे (१०) अजीवकायसजमे (११) पेहासजमे (१२) उवेहासजमे (१३) अवटु- (परिद्वावणा)सजमे (१४) पमज्जणासजमे (१५) मणसजमे (१६) वयमनमे (१७) कायसजमे" इति । छाया-सप्तदश विधः सयमः प्रज्ञप्तस्तद्यथा-(१) पृथिवीकायसयमः(२) अप्काय- सयमः (३) तेजस्कायसयमः (१) वायुकायसयमः (५) वनस्पतिकायसयम: (६) द्वीन्द्रियसयमः (७) त्रीन्द्रियसयमः (८) चतुरिन्द्रियसयमः (९) पश्चेन्द्रियसयमः (१०)अजीवकायसयमः(११) मेक्षासयमः (१२)उपेक्षासयमः (१३)अपहत्यसयमः (१४) प्रमार्जनासयमः (१५) मनःसयमः (१६) वाक्सयमः (१७) कायसयमः। तत्र (१) पृथिवीकायसयमा सचित्तपृथिव्या हस्तपादादिना सघटनादि- सतरह प्रकारका है। समवायाङ्गके सतरहवें समवायमे (१)पृथिवीकायसयम,(२)अप्कायसयम, (३)तेजस्कायसयम, (४) वायु- फायसयम, (५) वनस्पतिकायसयम, (६) दीन्द्रियसयम, (७) श्रीन्द्रिय- सयम, (८) चतुरिन्द्रियसयम, (९) पञ्चेन्द्रियसयम, (१०) अजीवकाय- सयम, (११) प्रेक्षासयम, (१२) उपेक्षासयम, (१३)अपहृत्यसयम (परि- छापनासयम),(१४) प्रमार्जनासम्म, (१५)मनःसयम, (१६) वाक्सयम, (१७) कायसयम। (१) पृथिवीकायसयम हाथ पैर इत्यादिसे सचित्त पृथिवीका सघन (सघटा) आदिका वर्जन करना। પ્રકાર છે સમવાયમાં તે પ્રકારો (1) पृथिवीयस यम, (२) मायस यम, (७) यस यम, (४) वायुय सयम, (५) वनस्पतियसयम, (6) हन्द्रियसयभ, (७) श्रीन्द्रियसयम, (८) यतुरिन्द्रयसयम, (6) पयेन्द्रियस यम, (१५) मायस यम (११) प्रेक्षास यम, (१२) उपेक्षास यम, (१3) ममाहत्यस यम (परिपनास 4 ), (१४) प्रभानासयम, (१५) भर सयभ, (१६) वासियभ, (१७) ।यस यम (૧) પૃથિવીકાયસયમ-હાથ પગ ઈત્યાદિથી સચિત્ત પૃથિવી- સ ઘટન વગેરેને વર્જવું સમવાયાગના સત્તરમાં ४ा , अ ययन १ गा. १ सयमस्वरूपम् १३ विरतिः (२) अफायसयमा सचित्तजलस्य सघट्टनायकरणम् , (३) तेजस्काय- सयमः पचनपाचनादिनिमित्तकाऽनलारम्भनिवर्त्तनम् , (४) वायुकायसयमः= वस्त्रपारव्यजनवक्त्रादिसमुत्पन्नवायुजनितवायुकायोपमर्दननित्तिः, तत्र वस्त्र- पात्राणामयतनया निक्षेपणादानप्रक्षेपनिपातनादिकारणवशात् , तथा तेपा (वस्त्र- पागाणा) व्यजनपर्णशाखादीना च विधूननेन वायुकायविराधन भवति । अनाव- मुखेन सभापणे च तन्निर्गतोष्णवायुना तद्विराधन जायते । (६) वनस्पतिरायसयमा तरुलतिकादिहरितकायमात्रस्य सघटनादिवर्जनम् । (२) अप्कायसयम सचित्त जलका सघटा आदि न करना। (३) तेजस्कायसयम पचन पाचन आदि किसी प्रयोजनके लिए अग्निके सघटा आदिका वर्जन करना। (४) वायुकायसयम-वस्त्र, पात्र, पखा, फूक आदिसे उत्पन्न हुए वायुद्वारा वायुकायकी विराधनाका वर्जन करना। वस्त्र, पात्रोंको अयतनासे रखनेसे, अयतनासे लेनेसे, फेंकनेसे, गिरानेसे, तधा वस्त्र, पात्र, पखा आदिको हिलाकर वायुकायकी उदीरणा करनेसे तथा बोलते समय उष्णवायुनिकलनेके द्वारा मुखसे वायुकायकी विराधना होती है। (५) वनस्पतिकायसयम-वृक्ष, लता आदि हरित कायके सघटा आदिसे निवृत्त होना। (૨) અકાયસયમ–સચિત્ત જલનું સઘટન આદિ ન કરવુ (3) १२यसयभ-राध, ૨ધાવવું વગેરે કોઈ પ્રજનને માટે અગ્નિનું સ ઘટન આદિને વજેવું () વાયુકાયસ યમ–વઝ, પાત્ર, પ, ફેક ઈત્યાદિથી ઉત્પન્ન થએલા વાયુદ્વારા વાયુકાયની વિરાધના વર્જવી વસ્ત્ર, પાત્ર ઈત્યાદિને અયતનાપૂર્વક રાખવાથી, અયતનાપૂર્વક લેવાથી, ફેકવાથી, પાડવાથી, તથા વસ્ત્ર–પાત્ર-પ વગેરેને હલાવીને વાયુકાયની ઉદીરણા કરવાથી તથા ખેલતી વખતે મુખના ઉના વાયુથી વાયુકાની વિરાધના થાય છે (५) वनस्पतिशयस यम-वृक्ष, લતા આદિ હરિતકાયના , સ ઘટન આદિથી નિવૃત્ત થવુ wa १४ श्रीददशवकालिकमूत्रे एच (६) द्वीन्द्रियादि- (९) पञ्चेन्द्रियपर्यन्ताना सर्वयाऽनुपमर्दन तत्तत्सयमः (१०) अजीपकायसयमा बहुमूल्यस्ता वस्रपानादीनामनुपादानम् , उपादेय- वस्त्रपात्रादीना सयत्नमुपादान स्थापन च, (११) प्रेक्षासयमा वसतिवसपात्रा- दीना सयतन सविधि प्रतिलेखनम् , (१२) उपेक्षासयमा सयममार्गे लेशमाक- लयतोऽ सयममार्गे मवर्तमानस्य वा स्वात्मनः परस्य वा असयमदोपान सयम- (६-७-८-९) दीन्द्रियादिसयम-दीन्द्रिय, श्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, और पञ्चन्द्रिय जीवोंका सर्वथा उपमर्दन न करना तत्तत्सयम, अर्थात् दीन्द्रियसयम, त्रीन्द्रियसयम, चतुरिन्द्रियसयम, पञ्चेन्द्रियसयम कहलाता है। (१०) अजीवकायसयम-बहुत मूल्यवाले वस्त्र पात्र आदिका ग्रहण न करना, तथा कल्पनीय वस्त्र पात्र आदि को यतनाके साथ लेना और रखना। (११) प्रेक्षासयम वसती, वस्त्र, पात्र, पाट, पाटला आदिका यतना- पूर्वक सविधि प्रतिलेखन करना। (१२) उपेक्षासयम सयममार्गमें अनुकूल प्रतिकूल परिषरोंसे क्लेशका अनुभव करनेवाले, अथवा असयममे प्रवृत्ति करनेवाले स्वपरकीआत्माको सयमके गुण और असयमके दोष समझाकर फिर सयममार्गमें प्रवृत्त (६-७-८-६) हन्द्रियासियभ-कन्द्रिय, श्रीन्द्रिय, यतन्द्रिय, भने પચેન્દ્રિય જીવેનું સર્વથા ઉપમર્દન ન કરવું, તે તે પ્રકારને સયમ, અર્થાત દ્વીન્દ્રિયસયમ, ચતુરિન્દ્રિયસયમ અને પચેન્દ્રિયસ યમ કહેવાય છે (૧૦) અજીવકાસ યમ-મૂલ્યવાન વસ્ત્ર પાત્ર આદિને ગ્રહણ ન કરવા, તથા કપે તેવા જ વસ્ત્ર પાત્ર આદિને યતનાપૂર્વક લેવા તથા રાખવા (११) प्रेक्षासयभ-सती, पत्र, पात्र, पाट, પાટલા ઈત્યાદિને ચતના પૂર્વક તથા વિધિસર પ્રતિલેખન કરવા (૧૨) ઉપેક્ષાસ મસયમમાર્ગમાં અનુકૂળ-પ્રતિકૂળ પરિષહાથી સ્ટેશને અનુભવ કરનાર, અસ યમમાં પ્રવૃત્તિ કરનારા, સ્વપરના આત્માઓને સયમના ગુણ તથા અસયમના દેષ સમજાવીને પછી સયમમાર્ગમાં ત્રીન્દ્રિયસયમ, અથવા जययन १ गी. १ सयमस्वरूपम् १५ गुणाचावयोन्य सयमयोगेषु प्रवर्तन सयमसमीपानयनलक्षण सयमसामीप्य- दर्शनमित्यर्थः । यद्वा प्रेक्षासयमा सकृत्मतिलेखनम् । उपेक्षासयमा पुनः पुनः मतिलेखनम् । (१३) अपहृत्य(परिष्ठापना) सयमा उच्चारादीना विधिना समुत्सर्गः परिप्ठापनमित्यर्थः । (१४) प्रमार्जनासयम-विधिना वसतिपात्रादेः परि- शोधनम् । (१५-१६-१७) मनोवाकायसयमा अकुश ताना मनोवाक्कायाना निरोधेन कुशलानामुदीरणम् । तनाऽऽतरौद्रयानपरिहारपूर्वकधर्मशुल यान- प्रवर्तन मन सयमः । सावधपरिहारपूर्वकनिरवधभापण चारसयमः । अयतनापरि- करना । अथवा वस्त्र पात्र आदिके उपभोग करते समय एक बार प्रति- लेखन करना प्रेक्षासयम है, और यारवार चारों ओरसे प्रतिलेखन करना उपेक्षासयम है। (१३) अपहृत्य(परिष्ठापना)सयम यतनापूर्वक उच्चार-प्रस्रवणको त्यागना। (१४) प्रमार्जनासयमयतनाके साथ वसती वस्त्र पात्र आदिको पूँजना (प्रमार्जन करना)। (१५) मनःसयम-अकुशल मनका निरोध करके कुशल मनकी प्रवृत्ति करना, अर्थात् आर्तध्यान और रौद्र यानकात्याग करके धर्म और शुक्ल- ध्यानमें मनको लगाना। (१६)वचनसयम अशुभ (सावद्य)वचनकात्यागकर शुभ (निरवद्य) वचन बोलना। પ્રવૃત્ત કરવા અથવા વસ્ત્ર–પાત્ર આદિને ઉપભોગ કરતી વખતે એકવાર પ્રતિલેખન એ પ્રેસાસ યમ છે, અને વાર વાર ચારે બાજુથી પ્રતિલેખન કરવું એ ઉપેક્ષાસ યમ છે (१३) आपकृत्य (परिपना) सयम-तपूर्व अभ्यार-प्रसपाने પરિઠવવા–ત્યજવા (૧૪) પ્રાર્થનામ યમ–ચતનાપૂર્વક વસતી પાત્ર આદિને ५पा (प्रभाषा) (૧૫) મન મયમ–અકુશળ મનને નિરોધ કરીને કુશળ મનની પ્રવૃત્તિ કરવી, અર્થાત આર્તધ્યાન અને રૌદ્રધ્યાનને ત્યાગ કરીને ધર્મધ્યાન તથા શુકલ- ધ્યાનમા મનને લગાડવું (૧૬) વચનસ યમ–અશુભ વચનને ત્યાગ કરીને શુભ વચન બોલવા કરવું વર - श्रीदशवकालिकमंत्र एव (६) द्वीन्द्रियादि- (९) पञ्चेन्द्रियपर्यन्ताना सर्वयाऽनुपमर्दन वृत्तसायमः (१०) अजीवकायसयमा बहुमूल्यवता वनपानादीनामनुपादानम् , उपादेय- वस्त्रपात्रादीना सयत्नमुपादान स्थापन च, (११) प्रेक्षासयमा वसतिवलपात्रा- दीना सयतन सविधि प्रतिलेखनम् , (१२) उपेक्षामयमः सयममार्ग केशमान- लयतोऽ सयममार्गे मवर्तमानस्य वा स्वात्मनः परस्य वा असयमदीपान सपम- (६-७-८-९) दीन्द्रियादिसयम द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, पतुरिन्द्रिय, और पञ्चेन्द्रिय जीवोका सर्वथा उपमर्दन न करना तत्तत्सयम, अर्थात् दीन्द्रियसयम, त्रीन्द्रियसयम, चतुरिन्द्रियसयम, पश्चेन्द्रियसयम कहलाता है। (१०) अजीवकायसयम-बहुत मूल्यवाले वस्त्र पात्र आदिका ग्रहण न करना, तथा कल्पनीय वस्त्र पात्र आदि को यतनाके साथ लेना और रखना। (११) मेक्षासयमवसती, वस्त्र, पात्र, पाट, पाटला आदिका यतना- पूर्वक सविधि प्रतिलेखन करना। (१२) उपेक्षासयम-सयममार्गमें अनुकूल प्रतिकूल परिषरोंसे क्लेशका अनुभव करनेवाले, अथवाअसयममें प्रवृत्ति करनेवाले स्वपरकी आस्माको सयमके गुण और असयमके दोष समझाकर फिर सयममार्गमें प्रवृत्त (१-७-८-६) द्रियाशियम-दीन्द्रिय, जान्द्रिय, यतुरिन्द्रिय, भने પચેન્દ્રિય ઇવેનું સર્વથા ઉપમન ન કરવું, તે તે પ્રકારને સયમ, અર્થાત દ્વીન્દ્રિયસયમ, ત્રીન્દ્રિયસયમ, ચતુરિન્દ્રિયસચમ અને પચેન્દ્રિયસ થમ કહેવાય છે (૧૦) અજીવકાસ ચમ-મૂલ્યવાન વસ્ત્ર પાત્ર આદિને ગ્રહણ ન કરવા, તથા કપે તેવા જ વસ્ત્ર પાત્ર આદિને યતનાપૂર્વક લેવા તથા રાખવા (११) प्रेक्षास यम-पस्ती, पत्र, पात्र, पार, પાટલા ઈત્યાદિને યતના પૂર્વક તથા વિધિસર પ્રતિલેખન કરવા (૧૨) ઉપેક્ષાસ યમ–સયમમાર્ગમાં અનુકૂળ-પ્રતિકૂળ અનુકૂળ-પ્રતિકૂળ પરિષહેથી ફ્લેશને અનુભવ કરનારા, અથવા અસ યમમાં પ્રવૃત્તિ કરનારા સ્વપરના આમાઓને સથમના ગુણ તથા અસયમના દેષ સમજાવીને પછી સયમમામા , अययन १ गा.१ सयमस्वरूपम् १७ पूर्व वायुकायसयमविषये प्रोक्त यत् - 'अनासतमुखेन सभापणे मुख- निर्गतोप्णवायुना वायुकायविराधन जायते' इति, तर केचिदेव वदन्ति-आत्मा हि भापणकाले चतुःस्पर्शवतो भापावर्गणापुद्गलान् गृह्णाति तैर्वायुकायस्य विराधना न सभवति तस्यापि चतुःस्पर्शववादिति. तेपामपर्याप्तमेतत्कथनम् , वस्तुतस्तु आत्मा पूर्व चतुःस्पर्शकपुद्गलानेव गृह्णाति स्न्तुि सभापणसमये तैजसशरीर सबैच भापापुद्गला निस्सरन्तीति तैजसशरीर- सम्बन्धेन तेऽस्पर्शवन्तो जायन्ते तस्मादनिवार्या वायुकायविराधना । पहले वायुकायसयममें कहा है कि-चोलते समय मुग्यसे निकलने- वाली वायु गर्म होती है और इसी कारण उसले वायुकायके जीवोंकी विराधना होती है। यहां कुछ लोगोंका कहना है कि आत्मा चार स्पर्शवाले भापावर्गणाके पुद्गलोंको ग्रहण करती है और चार स्पर्णचाले पुद्गलों से वायुकायकी विराधना नहीं हो सकती, क्योंकि वायुकायके जीवभी चार स्पर्शवाले होते हैं। उनका यह कथन अधूरा है । वात वास्तव में यह है कि आत्मा ग्रहण तो चार स्पर्शवाले पुद्गलों का ही करती है किन्तु भापण करते समय तैजस शरीरको ग्रहण करके ही भापा-पुद्गल निकलते हैं। तैजस शरीरके सम्बन्धसे भापा-पुद्गल आठ स्पर्शवाले हो जाते है, और आठ स्पर्शयाले होने से उनसे वायुकाय आदि की विराधना अवश्य होती है। પૂર્વે વાયુકાય–સયમમાં જે કહ્યું છે કે – ખુલે મે બોલવામાં મુખમાથી નીકળતા ગરમ વાયુ વડે વાયુકાયના જીની વિધિના થાય છે ત્યા કેટલાક લેકેનું કહેવું એવું છે કે આત્મા ચાર સ્પર્શવાળા ભાષાવર્ગણાના પુદગલેને ગ્રહણ કરે છે અને ચાર સ્પર્શવાળા પુદગલેથી વાયુકાયની વિગધના થઈ શકતી નથી કેમકે વાયુકાયના જી પણ ચાર સ્પર્શવાળા હેાય છે એમનુ એ કથન અધુરૂ છે વ તુત વાત એવી છે કે આત્મા ગ્રહ, તે ચાર સ્પર્શવાળા યુગલેનું જ કરે છે, કિન્તુ બોલતી વખતે તેજસ શરીરને ગ્રહણ કરીને જ ભાવાપુદગલે નીકળે છે તેજસ રારીરના સબ ધથી ભાષા-પુદગલ આઠ સ્પર્શવાળા થઈ જાય છે, અને આઠ સ્પર્શવાળા થવાથી, તેનાથી વાયુકાય આદિની વિરાધના અવશ્ય થાય છે श्रीदर्शवकालिकसूत्रे - हारेण यतनापुरस्सरकायप्रवर्तन कायसयम इति रिवेकः । प्रकारान्तरेणापि सयमः सप्तदशविधः, यथा- पञ्चास्रवाद्विरमण, पश्चेन्द्रियनिग्रहः कपायजयः । दण्डत्रयपिरतिश्चेति सयमः सप्तदशभेदः ॥१॥ इति । तत्र पञ्चास्रवविरमण पञ्चास्रवाः माणातिपातादय एतेभ्यो विरमण-निवृत्तिः (५),पत्रेन्द्रियनिग्रहः तत्तद्विपयेप्वमवर्तनम् , इष्टानिष्टेषु शब्दादिषु रागद्वेषाकरण- मित्यर्थः (१०), कपायजया उदयभावममाप्नुयता क्रोधादीना चतुर्णा निरोधः, उदयभाव माताना च तेपा निष्फलीकरणम् (१४) दण्डत्रयविरति दण्डचते- रस्नत्रयैश्वर्यापहारादसारीक्रियते आत्मा यैरिति दण्डास्तेपा त्रय दण्डत्रय मनो- दण्ड-चचोदण्ड-कायदण्ड-लक्षणास्त्रयो दण्डा इत्यर्थः, तस्माद्विरतिनिचिः(१७) (१७) कायसयम अयतनाको छोडकर यतनापूर्वक ही कायकी प्रवृत्ति करना। सयमके सत्तरह भेद दूसरे प्रकारसे भी होते हैं, जैसे-प्राणातिपात आदि पाच आस्रवोंका विरमण (५), पाच इन्द्रियोंके इष्ट विषयोंमें राग न करना, अनिष्टविषयोंमें द्वेषन करना(१०), उदयमें न आएहुए क्रोध आदि चार कपायोंका निरोध करना और उदयमें आये हुएको निष्फल करना, जैसे-क्रोधका उदय होने पर क्षमा रखना, मानका उदय होनेपर मार्दव भाव रखना, मायाका उद्य होने पर सरलता रखना, और लोभ- कपायका उदय होने पर निर्लोभता धारण करना (१४), ज्ञान आदि गुणोंका अपहरण (नाश) करके आत्माको दरिद्र बनानेवाले मनदण्ड वचनदण्ड, और कायदण्डका त्याग करना (१७), (૧૭) કાયસયમ–અયતનાને ત્યજીને ચતનાપૂર્વકજ કાયાની પ્રવૃત્તિ કરવી સયમના સત્તર ભેદ બીજે પ્રકારે પણ થાય છે જેમકે પ્રાણાતિપાત આદિ પાચ આનું વિરમણ (૫), પાચ ઈન્દ્રિયેના ઈષ્ટ વિષયમાં રાબ ન કરે, અનિષ્ટ વિષયમાં દ્વેષ ન કરે. (૧૦), ઉદયમાં ન આવેલા કાંધ આદિ ચાર કષાયે નિરોધ કરે અને ઉદયમાં આવેલાને નિષ્ફળ કરવા ક્રોધને ઉદય થતા ક્ષમા રાખવી, માનને ઉદય થતા માર્દવભાવ રાખ, માયાને ઉદય થતા રારલતા રાખવી, અને લાભકષાયને ઉદય થતા નિર્લોભતા ધારણ કરવી (૧૪), જ્ઞાન આદિ ગુણનું અપહરણ (નાશ) કરીને આત્માને દરિદ્ર બનાવનારા મનદડ, વચન્દડ અને કાયદડને ત્યાગ કરે (૧૭), अध्ययन १ गा. १ मुखवस्त्रिकाविचारः अयमाशयः-मुखवत्रिकाधारण बिना भाषणे वायुकायादिविराधनस्य दुरितया भाषा सावधा भवतीति । एतद्वयाख्याने अभयदेवमूरिणाऽपि-"जीवसरक्षणतोऽनवधाभापाभवति, अन्या तु सावधे" त्युक्तम् । 'सुशुमकाय अणिहित्ताण' इत्यस्य हि वस्त्रम- पोह्य मुखोपरि वस्त्रमदत्वे (मवद्ध्वे) त्यर्थः । यदन्वयव्यतिरेकाभ्या भापाया निर- वधत्व सावधत्व च भवति, भाषाभिव्यक्तिश्च मुखाद्भवतीति मुखे ध्रियमाण वस्त्र 'मुखवस्त्रिका' शब्देन शास्त्रे व्यवाहियते । 'शक' इत्येव वक्तव्ये 'देवेन्द्रो देवराजः' इति विशेपणोक्या दिव्यशक्ति- तात्पर्य यह है कि मुखवस्त्रिका धारण किये बिना भाषण करनेसे वायुकायकी विराधना अनिवार्य है, अत एव वह भापा सावध है। इसका व्याख्यान करते हुए अभयदेवभूरि लिखते हैं-"जीव सरक्षणतो- ऽनवद्या भाषा भयति अन्यातुसावधा।"-अर्थात् जीवों की रक्षाहोनेसे भाषा निरवध होती है और इससे भिन्न (जीवों की घात करने वाली) भाषा सावध होती है। मृल पाठके 'सुटुमकाय अणिजूहित्ताण' इस पदका अर्थ यह है कि-'मुख पर वस्त्र नधारण करके ' जहाँ वस्त्र धारण नहीं वहाँ भाषा सावध होती है, और जहा वस्त्र धारण होता है वहाँ भाषा निरवद्य होती है। भाषा मुखसे निकलती है, इसलिए मुख पर धारण किया जानेवाला वस्त्र 'मुखवस्त्रिका' कहलाता है। मूलमे 'शक' कहनेसे ही इन्द्रका बोध हो सकता था, किन्तु તાત્પર્ય એ છે કે મુખવસ્ત્રિકા ધારણ કર્યા વિના ભાષણ કરવાથી વાયુ કાયની વિરાધના અનિવાર્ય છે, તેથી કરીને એ ભાષા સાવદ્ય છે એનું વ્યાખ્યાન કરતા અભયદેવ સૂરિ લખે છે કે जीवसरक्षणतोऽनवधा भापा भवति अन्या तु सावधा" अर्थात् नी २क्षा यवायी. भाप निश्वध थाय छ भने गथी ભિન્ન ( જીની ઘાત કરવાવાળી ) ભાષા સાવદ્ય હોય છે મૂળ પાના 'मुहुमकाय अणिज्जूहित्ताण' पहन। अर्थ में छे 'भुम ५२ पत्र ન ધારણું કરીને, જ્યાં વસ્ત્ર ધારણ નથી, ત્યા ભાષા સાવદ્ય છે અને યા વસ્ત્ર ધારણ થાય છે ત્યા ભાષા નિરવદ્ય છે ભાષા મુખમાથી નીકળે છે તેથી મુખ પર ધારણ કરવામાં આવનારૂ વસ્ત્ર મુખવસ્ત્રિકા' કહેવાય છે મૂળમાં “શ” કહેવાથી ઈન્દ્રને બંધ થઈ શકતો હતો, પરંતુ દેવેન્દ્ર १८ श्रीदवैकालिकों । मुखवस्त्रिकाविचारः। ननु मुखोप्णायुनाऽपि यदि वायुफायविराधन तर्हि मुनीना कय वायु- • कायसंयमः? इति चेत् न, यतो भगवता श्रीतीर्थरेण मुनीना वायुकायसंयमा मुखपत्रिकावन्धन भतिपादितम् । तद्विना हि श्रीन्याख्यामशती पोडशतमशतकस्य द्वितीयोदेशे भगवता शक्रेन्द्रस्यापि भापण सावधत्वेन परिकथित, तथाहि- 'गोयमा! जाहे ण सके देविंदे देवराया मुहुमकाय अणिहिताण भास भासति ताहे ण सके देविदे देवराया सावज भास भासइ । जाई ण सके देविदे देवराया मुहुमकाय णिहिताण भास भासइ ताहे सके देविदे देवराया असावज्ज भास भासइ' इत्यादि। 'गौतम! यदा शक्रो देवेन्द्रो देवराजः सूक्ष्मकायमपोश भाषा भापते तदा शक्रो देवेन्द्रो देवराजः सावद्या मापा मापते। यदा शक्रो देवेन्द्रो देवराजः सूक्ष्मकाय दत्त्वा भाषा भापते तदा शक्रो देवेन्द्रो देवराजः असावधा भापा भाषते' इति सस्कृतम् । मुखवस्त्रिकाविचार. जब मुग्यसे निकलनेवाली वायुसे वायुकाय की विराधना होती है, तो मुनि वायुकायका सयम कैसे पाल सकते है ? इस प्रभ का उत्तर यही है कि वायुकायके सयमके लिए ही तीर्थकर गणधर भगवान्ने मुखवस्त्रिका धारण करना बताया है। भगवतीसूत्र सोलहवें शतक के दूसरे उद्देशमें भगवानने विना मुखवस्त्रिकाके इन्द्र महाराज के भाषणको भी सावध बताया है, यथा-" गोयमा !" इत्यादि । મુખવસ્ત્રિકાવિચાર જે મુખમાંથી નિકળનારા વાયુથી વાયુકાયની વિરાધના થાય છે, તે મુનિ વાયુકાયને સયમ કેવી રીતે પાળી શકે છે? એ પ્રશ્નને ઉત્તર એ છે કે વાયુકાયના સયમને માટે જ તીર્થ કર ગણધર ભગવાને મુખવસ્ત્રિકા ધારણ કરવાનું બતાવ્યું છે ભગવતીસૂત્રના સેળમા શતકના બીજા ઉદેશમાં મુખવસ્ત્રિકા વિનાના छन्द्र महाराना मापने पशु सापाने सावध मताभ्यु छ,- 'गोयमा' या अध्ययन १ गा. १ मुखवस्त्रिकाविचारः २१ पुनरपि- "मुखे पाधी ते-मुहपती, हेठे पाटो धारी। अति देठी दाढी थई, जोतर गले निवारी ॥१॥ एक काने धजसम कही, खधे पछेड़ी ठाम । केड़े खोसी कोथली, नावे पुण्यने काम ॥२॥" इति । (श्रावक-ऋपभदासकृते हितशिक्षारासे पृ० ३८ ५० १६) मुल्लम वोधी जीवड़ा, माडे निज पटकर्म । साधु जन मुख मोपती, पाधी है जिन-धर्म ॥१॥" (मुनिलब्धिविजयकृते हरिवलमन्छीरासे पृ० ७३ दोहा ५) और भी कहा है- " मुखे यांधी ते मुहपती, हेठे पाटो धारी। अति हेठी दाढी धई, जोतर गले निवारी ॥१॥ एक काने धज सम कही, खधे पछेडी ठाम | केडे खोसी कोथली, नावे पुण्यने काम" ॥२॥ (श्रावक-ऋपभदास-कृत हितशिक्षारासे पृ० ३८ प १६) सुलभ-बोधी जीवडा, माडे निज पट-कर्म । साधुजन मुग्व मोपती बाधी है जिन-धर्म" ||१|| (हरिचलमन्छीरास मुनिलब्धिविजयकृत पृ० ७३ दोहा ५) વળી કહ્યું છે કે- મુખે બાધી તે મુહપતી હેઠે પાટે ધારી, અતિ હેઠી દાઢી થઈ જતર ગળે નિવારી એક કાને ધજ સમ કહી, ખધે પછેડી ઠામ, કેડે બેસી કેથળી, નવે પુણ્યને કામ (e) (श्राप-महास-कृत 'ति-शिक्षा-रास' પૃષ્ઠ ૩૮ ૫ ૧૬) સુલભ બધી જીવડા, માડે નિજ પ–કર્મ સાધુ જન મુખ પતી બાધી હૈ જિન-ધર્મ છે (હરિબલ-મકી–રાસ–મુનિ લબ્ધિવિજય કૃત પૃષ્ઠ ૭૩, દેહા ૫) " - श्रीदशवकालिकाने मत्त्वेऽपि तस्य मुखपत्रिकाधारणामावे यदि सारधा मापा ताई औदारिक शरीरधारिणा का वार्ने ? ति धनितम् । सा च मुसरत्रिका वायुकायादिमाणिमाणसरसणोपयोगि-मुखोपरिबन्धनीय -मुखपरिमित-सदोरकाउटपुटवस्त्रग्वण्डाविशेपः । अत्राय सङ्ग्रहः- “वाउकायाइरयखट्ट, वज्मई ज सया मुहे। सदोरहपुड पत्थ, वुत्ता सा मुद्दवस्थिया ॥ १॥ मुहमाणा जईलिंग, सत्यसनमकारण । पसत्थभावणापूड़ी-देऊ य मुद्दयत्यिया ॥२॥" इति । देवेन्द्र और देवराज विशेषणों का देना यह सिद्ध करता है किजब दिव्य शक्तिमान होने पर भी मुखवस्त्रिका न धारण करने से उसकी भाषा सावध होती है तो औदारिक-शरीर-धारियों की बात ही क्या है? उनकी भाषा अवश्य ही सावध होगी। वह मुखवत्रिका वायुकाय आदिके प्राणियोंकी रक्षाके लिये उप- योगी, मुख पर बाधने योग्य, मुखके बराबर डोरा सहित आठ पुटवाला, वस्त्रका खण्डविशेष है । यरा सग्रहगाधाएँ हैं-'चाउ' इत्यादि, अर्थात्-वायुकाय आदिकी रक्षाके लिये जो सदा मुख पर 'बाँधी जाती है, वह डोरासहित आठ पुटवाला वस्त्र "मुखवस्त्रिका" कहलाती है ॥१॥ वह मुखवत्रिका मुख-प्रमाण होती है, यह मुनिका चिह्न सर्व सयमका कारण तथा प्रशस्त भावना की वृद्धिका कारण है ॥२॥ અને દેવરાજ વિશેષણે એ સિદ્ધ કરે છે કે જે દિવ્ય શક્તિમાન હોવા છતા પણ મુખવસ્ત્રિકા ન ધારણ કરવાથી એની ભાષા થાય છે તે દારિક- શરીરધારીઓની વાત જ શી? એની ભાષા પણ જરૂર જ સાવદ્ય જ થાય એ મુખવઝિકા વાયુકાય આદિના પ્રાણીઓની રક્ષા માટે ઉપયોગી, સુખ પર બાધવા એ ગ્ય, મુખની બરાબર, દેરાસહિત આયુટવા વસ્ત્રને विशेष छ मही सड शयामा छ-'वाउ' त्या અથવાયુકાય આદિની રક્ષાને માટે જે સદા મુખ પર બાધવામાં આવે છે, તે દેરાસહિત આઠપુટવાળું વસ્ત્ર “સુખવસ્ત્રિકા' કહેવાય એ મુખત્રિકા મુખ–પ્રમાણુ હોય છે એ મુનિનું ચિહ્ન સ સયમનું કારણ તથા પ્રશસ્ત ભાવનાની વૃદ્ધિનું કારણ છે (૨) સાવા . - अध्ययन १ गा.१ मुखवस्त्रिकाविचारः पुनरपि- "मुखे पाधी ते-मुहपती, हेठे पाटो धारी। अति हेठी दादी थई, जोतर गले निवारी ॥१॥ एक काने धजसम कही, खधे पछेड़ी ठाम । केडे खोसी कोथली, नावे पुण्यने काम ॥२॥" इति । (श्रावक-ऋपभदासकृते हितशिक्षारासे पृ० ३८५०१६) मुलभ वोधी जीवड़ा, माडे निज पटकर्म । साधु जन मुख मोपती, वाधी है जिन-धर्म ॥१॥" (मुनिलब्धिविजयकृते हरिवलमच्छीरासे पृ० ७३ दोहा ५) और भी कहा है- " मुखे यांधी ते मुहपती, हेठे पाटो धारी। अति हेठी दाढी धई, जोतर गले निवारी ॥१॥ एक काने धज सम कही, खधे पछेडी ठाम । केडे खोसी कोथली, नावे पुण्यने काम" ॥२॥ (श्रावक-ऋपभदास-कृत हितशिक्षारासे पृ० ३८५ १६) सुलभ-योधी जीवडा, माडे निज पट-कर्म । साधुजन मुख मोंपती बांधी है जिन-धर्म" ॥१॥ (हरिवलमन्छीरास मुनिलन्धिविजयकृत पृ० ७३ दोहा ५) વળી કહ્યુ છે કે- મુખે બાધી તે મુહપતી હેઠે પાટે ધારી, અતિ હેડી દાઢી થ5 જેતર ગળે નિવારી એક કાને ધજ સમ કહી, ખધે પછેડી ઠામ, કેડે બેસી કેથળી, નવે પુણ્યને કામ (श्राप-महास-तृत 'ति-शिक्षा-रास' પૃષ્ઠ ૩૮ ૫ ૧૬) “સુલભ ધી જીવડા, માડે નિજ વ–કર્મ સાધુ જન મુખ પતી બાધી હૈ જિન-ધર્મ (હરિબલ-મછી–રાસ–મુનિ લબ્ધિવિજય કૃત ५४ ७३, होडा ५) " . २२ श्री दशकालिको ननु भापणसमये हस्तेनापि वस्त्रमादाय मुखाच्छादने उक्तनीवरक्षा निर्वहति किमन्यदापि मुखवस्त्रिकारन्धनेन ? इति चेदुश्यते- न केवल भापणसमय एव जीपविराधनासमवः, यतो इस्तेन बसमादाय मुखाच्छादने जीवरक्षा सभवेत् , किन्तु दीर्घश्वासनिश्वासाभ्या, जृम्माता, स्वभाषा- दकस्मादपि च, तथा निद्रावस्थाया मुखन्यादानाच तत्सम्भव इति न इस्तेन मुखोपरि वस्त्र धारयन्तः सम्यग् जीवरक्षा सर्वदा कर्तुं ममवन्ति, वस्त्रेण मुखमाणप प्रसुप्तस्यापि निद्राया पार्श्वपरिवर्तनेन चनापसरणे सति क उपायस्तदानीं सूक्ष्म- यहाँ यह आशङ्का की जा सकती है कि जय पोलनेका काम पडे तब हाथमें कपडा लेकर मुंह ढंक लेनेसे वायुकाप आदि जीवोंकी रक्षा हो सकती है, जय बोलते नही उस समय भी मुखवत्रिका बांध रखनेसे क्या लाभ है ? इसका उत्तर यह है कि केवल योलते समय हरी मुखसे हवा नहीं निकलती जिससे हाथमें वस्त्र लेकर मुंह ढक लेनेसे जीवोंकी रक्षा हो जाय। किन्तु दीर्घ श्वासोच्छास लेनेसे, जभाई लेनेसे, स्वभावसे, अक- स्मात् , तथा निद्रावस्था में मुख खुला रहनेसे भी हवा निकलती है। अतएव मुख पर हाथसे वस्त्र लगानेसे जीवोंकी सम्यक प्रकार सर्वदा रक्षा नहीं हो सकती। घखसे मुँह ढाँक कर सोया हुवा व्यक्ति नींद में करवट (पसवाडा) बदलता है तब वस्त्र खिसक जाता है। उस समय सूक्ष्म, અહીં એવી આશકા કરી શકાય છે કે જ્યારે બેસવાનું કામ પડે ત્યારે હાથમાં કપડુ લઈને મહે ઢાકી લેવાથી વાયુકાય આદિ ની રક્ષા થઈ શકે જ્યારે બેલતા ન હેઈએ, ત્યારે પણ મુખવસ્ત્રિકા બધી શખવાથી છે " दाछ? એને ઉત્તર એ છે કે કેવળ બેલતી વખતે જ મુખમાથી હવા નીકળતી નથી કે જેથી હાથમાં વસ્ત્ર લઈને મહે ઢાકી લેવાથી જીની રક્ષા થઈ જાય. કિંતુ દીર્ધ શ્વાસોચ્છવાસ લેવાથી, બગાસુ ખાવાથી, સ્વભાવથી, અકસમાત તથા નિદ્રાવસ્થામાં મહે ખુલ્લું રહેવાથી પણ હવા નીકળે છે તેથી હે પર હાથ વડે વશ્વ લગાડવાથી જીવેની સમ્યક્ પ્રકારે સર્વદા રક્ષા થઈ શકતી નથી વસ્ત્રથી મહે ઢાકીને સૂતેલી વ્યક્તિ ઉઘમાં જ્યારે પાસુ બદલાવે છે ત્યારે જ ખસી अध्ययन १ गा.१ मुखवस्त्रिकाविचारः २३ . -- व्यापिसम्पातिमजीवसचित्तरजःप्रवेशवारणार्थ दीर्घोष्णनिःश्वासोच्छ्वासजनित- वायुकायविराधनापरिहारार्थ च । तथा चोक्त योगशास्त्रे तृतीयप्रकाशे सप्ताशीतितमश्लोकस्य स्वोपझविवरणे हेमचन्द्राचार्येण- "मुखवस्त्रमपि सम्पातिमजीवरक्षणादुष्णमुखवातविराध्यमानयाय- घायुकायजीवरक्षणान्मुखे धूलिप्रवेशरक्षणाचोपयोगी"ति । तथा चोत्तराध्ययनसूत्रे तृतीयाध्ययने श्रीलक्ष्मीवल्लभीयायां नवमगाथा- व्यारयाया सप्तमनिझवोदाहरणेऽपि-- तथा सम्पातिमाः सत्त्वाः, सूक्ष्माश्च व्यापिनोऽपरे। तेपा रक्षानिमित्तं च, विज्ञेया मुखवस्त्रिका ॥१॥" इति । व्यापी और सपातिम जीव तथा सचित्त रज आदि मुखमें जानेसे कैसे रुक सकते है ', तथा दीर्घश्वासोच्छ्वाससे होनेवाली वायुकायकी विरा- धना का क्योंकर परिहार हो सकता है ? इन्हें रोकने का उपाय ही क्या है ? हेमचन्द्राचार्य कहते हैं "मुखवस्त्र०" इत्यादि- अर्थात् “मुखवस्त्र, सपातिम जीवोंकी रक्षा करता है, मुख से निकलने वाले उष्ण वायु द्वारा चिराधित होनेवाले बाह्य वायुकायके जीवोंकी रक्षा करता है, तथा मुँहमें धूली नहीं घुसने देता, इसलिये वह उपयोगी है।" उत्तराध्ययन सूत्र के तीसरे उद्देशकी टीकामें कहा है-" सन्ति०" इत्यादि, अर्थात् “सपातिम, सूक्ष्म और व्यापी जीवोंकी रक्षाके लिये मुख- જાય છે તે સમયે – સૂક્ષમ, વ્યાપિ અને સપાતિમ જીવ તથા સચિત્ત રજ આદિ મુખમાં જવાથી કેવી રીતે શેકાઈ શકે ? તથા દીર્ધ શ્વાસોચ્છવાસથી થનારી વાયુકાયની વિરાધનાને કેવી રીતે પરિહાર થઈ શકે ? તેને રોકવાને SIय । छ? भन्यदायार्य ४ छे "मुखवस्त्र०" त्या અર્થાત-મુખવઝ સપાતિમ ની રક્ષા કરે છે, મુખથી નીકળતા ઉષ્ણુ વાયુ દ્વારા વિરોધિત થતા વાયુકાયના જીવની રક્ષા કરે છે, તથા મુખમાં ધૂળ પેસવા દેતું નથી, તેથી તે ઉપયોગી છે उत्तराध्ययन सूत्रना श्री शनी रीमा उखु छ है "सन्ति" त्या અર્થ-“સ પાતિમ, સૂક્ષમ અને વ્યાપી જીવોની રક્ષાને માટે મુખવસ્ત્રિકા य , २२ श्री दनौकालिको ननु भापणसमये इस्तेनापि पत्रमादाय मुखाच्छादने उक्तजीवरक्षा निर्वहति किमन्यदापि मुखबस्विफावन्धनेन ? इति चेदुष्यते- न केवल भापणसमय एव जीवविराधनासमवः, यतो हस्तेन बसमादाय मुखाच्छादने जीवरक्षा सभवेत् , किन्तु दीर्घश्वासनिःश्वासाभ्या, वृम्मातः, सभावा- दकस्मादपि च, तथा निद्रावस्थाया मुखन्यादानाच तत्सम्भव इति न हस्तेन मुखोपरि वस्त्र धारयन्तः सम्यग् जीवरक्षा सर्वदा फत्तु ममवन्ति, वस्रेण मुखमाणप मसप्तस्यापि निद्वाया पार्श्वपरिवर्तनेन वनापसरणे सति क उपायस्तदानीं सूक्ष्म- यहाँ यह आशङ्का की जा सकती है कि जय बोलनेका काम पडे तब हाथमें कपडा लेकर मुंह ढंक लेनेसे वायुकाय आदि जीवोंकी रक्षा हो सकती है, जब वोलते नहीं उस समय भी मुखवत्रिका बांध रखनेसे क्या लाभ है ? इसका उत्तर यह है कि केवल पोलते समय ही मुखसे हवा नहीं निकलती जिससे हाथमें वस्त्र लेकर मुंह ढक लेनेसे जीवोंकी रक्षा हो जाय । किन्तु दीर्घ श्वासोच्छ्वास लेनेसे, जभाई लेनेसे, स्वभावसे, अक- स्मात् , तथा निद्रावस्था में मुख खुला रहनेसे भी रवा निकलती है। अतएव मुख पर हाथसे वस्त्र लगानेसे जीवोंकी सम्यक प्रकार सर्वदा रक्षा नहीं हो सकती। वस्त्रसे मुँह ढाँक कर सोया हुवा व्यक्ति नींद में करवट (पसवाडा) बदलता है तब वस्त्र खिसक जाता है। उस समय सूक्ष्म, અહીં એવી આશકા કરી શકાય છે કે જ્યારે બોલવાનું કામ પડે ત્યારે હાથમાં કપડુ લઈને મહે ઢાકી લેવાથી વાયુકાચ આદિ જાની રક્ષા થઈ શકે જ્યારે બેલતા ન હોઈએ, ત્યારે પણ મુખવસ્ત્રિકા બાધી રાખવાથી શો साल छ? એને ઉત્તર એ છે કે કેવળ બોલતી વખતે જ સુખમાથી હવા નીકળતી નથી કે જેથી હાથમાં વસ્ત્ર લઈને મોં ઢાકી લેવાથી જીવોની રક્ષા થઈ જાય કિન્તુ દીર્ધ શ્વાસોચ્છુવાસ લેવાથી, બગાસુ ખાવાથી, સ્વભાવથી અકસ્માત્ તથા નિદ્રાવસ્થામાં હો ખુલ્લું રહેવાથી પણું હવા નીકળે છે તેથી મહા પર હાથ વડે લગાડવાથી જીવેની સભ્યત્ પ્રકારે સર્વદા રક્ષા થઈ શકતી નથી વાથી મહે તાકીને સૂતેલી વ્યક્તિ ઉઘમાં જ્યારે પાસ બદલાવે છે ત્યારે વઢ ખસી व कटु एव वयासी" अन्ययन १ गा. १ मुखवस्त्रिकाविचारः २५ ध्यायविरचित-सर्वार्थसिद्धि-टीकाया तृतीयाध्ययनेऽप्येवमेव । एव विशेषा- वश्यकवृवृत्तावप्युक्तम् । किञ्चाऽऽगमरोिधोऽपि तेपा (अबद्धमुखवस्त्रिकामा) दुर एर, तथाहि -भगवतीसूत्रे द्वितीयशतकस्य प्रथमोद्देशके स्कन्दकानमारस्यानशनकाले 'नमो- त्यु ण' पाठविधौ- "पुरत्याभिमुहे सपलियकनिसपणे करयलपरिग्गहिय दसनह सिर- सावत्त मत्थर अजलि इत्याधुक्तम्, तत्राञ्जलिबद्धस्य करद्वयस्य शिरसि स्थापने पद्मासनसस्थः स्कन्दकोऽनगार: कथ तन्मते 'नमोत्यु णं' पाठमनातमुखेन व्यधात् । अनाहतमुखेन हि मुनयो न भापन्ते, तथाविधभापणस्याऽऽगमप्रतिपिद्धत्वात् । पाध्यायरचित सर्वार्थसिद्धिनामकी तीसरे अध्ययनकी टीकामें भी इसी प्रकार कहा है और ऐसेही विशेपाचश्यक वृहदधृत्तिमें भी कहा है। जो मुख पर मुखवस्त्रिका नही वाधते, उनके मतमें आगम-विरोध अनिवार्य है। भगवतीसूत्र २ श०,१ उ० में स्कन्दन अनगारके अनशन समय में 'नमोत्युण' के पाठकी विधिमें कहा है-"पुरत्था०" इत्यादि। इसमें विचारणीय विपय यह है कि अञ्जलि वाध कर दोनों हाथ सिर पर धर कर पद्मासन लगाकर पूर्व दिशाकी ओर मुख करके बैठे हुवे स्कन्दक अनगारने 'नग्गेत्यु ण' पाठ खुले मुखसे कैसे उच्चारण किया, क्योंकि दोनों हाथ सिर पर रखे हुए थे। और खुले मुखसे तो मुनि योलते नही, क्योंकि ऐसा बोलना तो शास्त्रसे निपिद्ध है। સર્વાર્થ-સિદ્ધિ નામની ત્રીજા અધ્યયનની ટીકામાં પણ એવું જ રીતે વિશેષાવશ્યક પ્રવૃત્તિમાં પણ કહ્યું છે જેઓ મુખ પર મુખવસ્ત્રિકા બાધતા નથી, તેમના મતમા આગમ-વિરોધ અનિવાર્ય છે ભગવતીસૂત્ર ૨ ૨ ૧ ૩ માં २७६ अनगारना मनशन समयमा 'नमोत्यु ण' ना पानी विधिमा ४घुछ-"पुरत्था०" त्या એમા વિચારણીય વિષય એ છે કે આ જલિ બાધીને, બેઉ હાથ શિર પર ધારણ કરીને, પદ્માસન લગાવીને, પૂર્વ દિશા તરફ મુખ કરીને બેઠેલા કદક मनगरे 'नमोत्यु ण' पानु मुस्ता भुपी शत न्या२ थु ? म मा હાથ માથા પર રાખેલા હતા અને ખુલે મુખે તે મુનિ બેલે નહિ, કારણ કે એમ બોલવુ શાસ્ત્રથી નિષિદ્ધ છે उखु छ, मेवा २४ श्रीदशवेकालिकसूत्रे ओघनियुक्तौ द्वादशाधिकसप्ताततम (७१२)-गाथाऽप्येवमेव वोधयति- "सपातिमरयरेणू,-पमजणहा वयति मुहपत्ति । नास मुइ च वधइ, तीए सहि पमजतो ।। ७१२॥" सपातिमरजोरेणुममाजनार्थ वदन्ति मुखपत्रीम् । नासिका मुख च वध्नाति, तया वसतिं ममार्जयन् ॥७१२॥ इति सस्कृतम् । वसति प्रमानयता घ्राणे मुखे चैतद्वयेऽपि मुखवत्रिका बन्धनीया, अन्यदा मुख एवेत्याशयः, अन्यथा भगवतीसगधनेकागमविरोधापत्तिारा स्यात् । एवमेव प्रवचनसारोद्धारे प्रयोविंशत्यधिकपञ्चशततमगाथा विधते, तथा प्रकरणरत्नाकरस्यापि तृतीयभागे, उत्तराध्ययनसूत्रस्य कमलसयमोपा- वखिका समझनी चाहिये" ॥१॥ ओघनियुक्ति ७१२ वीं गाथामें कहा है-"सपातिम." इत्यादि । अर्थात् "सपातिम जीव, सचित्त रज तथा रेणुकी रक्षा करनेके लिये मुखवत्रिका का कथन करते हैं। और जय वसतिकी प्रमार्जना करे तय नाक और मुख दोनों याधे।" अर्थात् अन्य समयमें सिर्फ मुखही बाधे, यह तात्पर्य हुआ, अन्यथा भगवतीसूत्र आदि अनेक आगमोंका विरोध अनिवार्य होगा इसीप्रकार प्रवचनसारोद्धारकी ५२३ ची गाथामें कहा है। तथा प्रकरणरत्नाकरके तीसरे भागमें, फिर उत्तराध्ययनसूत्रकी कमलसयमो- समरवीन" (१) माधनियुहित ७१२ भी थामा मधु छ ४-सपातिम. त्या अर्थात- સપતિમ જીવ, સચિત્ત રજ, તથા રક્ષા કરવાને માટે મુખવસ્ત્રિકાનું કથન કરે છે અને જ્યારે વસતિની પ્રમાર્જન કરે ત્યારે નાક અને મુખ माधे " અર્થ –અન્ય સમયમા સિફ મુખ જ બધે, એ તાત્પર્યાથે થયું, અગર એવું અર્થ નહીં કરવામાં આવે તે ભગવતીસૂત્ર આદિ અનેક આગને વિરોધ અનિવાર્ય આવશે એવી જ રીતે પ્રવચનસદ્ધારની પર૩ મી ગાથામાં કહ્યું છે તથા પ્રકરણ રત્નાકરના ત્રીજા ભાગમા, અને ઉત્તરાધ્યયન સત્રની કમલસ મોપાધ્યાયરચિત - " "इत्यादि, अध्ययन १ गा.१ मुखवस्त्रिकाविचारः दानसूत्रस्य व्यारयाया तट्टीकाकारेण हरिभद्रसूरिणाऽभिहितम्- " अय च प्रकृतसूत्रार्थः-अपग्रहाद्वहिःस्थितो विनेयोऽर्धापनतकायः करद्वय- गृहीतरजोहरणो वन्दनायोयत एवमाइ-इच्छामि-अभिलपामि हे क्षमाश्रमण ! वन्दितु नमस्कार कर्नु भान्तमिति गम्यते " इत्यादि । अत्र 'करदयगृहीतरजोहरणः' इति विशेपण कथयता हरिभद्रसूरिणा 'मुखोपरि मुखवत्रिकावन्धन भगवदभिमेत मिति मकटीकृतम् , अन्यथा क्षमाश्रमण- सूत्रोच्चारणफाले करद्वयस्य रजोहरणग्रहणे प्रतिबद्धतया मुखोपरि मुखरखिका- स्थापनस्योपायान्तरासम्भवात् क्षमाश्रमणदानमेव निर्षिपय स्यात् । अनादृतमुखेन तु मुनीना भापणमेवाऽऽगममतिपिद्धमिति नान केपाश्चिद्विवादः । किञ्च क्षमाश्रमणदाने सम्बोधनशब्दप्रयोगे गुरोः स्वाभिमुखीकरणाथै सरि- श्रमणदान सूत्रकी व्याख्यामें व्याख्याकार हरिभद्रसूरिने भी कहा है- अय यहाँ “दोनों हाथोंमें रजोहरण लेकर" ऐसा करनेवाले हरिभद्रसूरिने यह प्रगट किया है कि मुख पर मुखवत्रिका घाधनेकी भगवानकी आज्ञा है । अन्यथा जब दोनों हाथोंमें रजोहरण ले लिया तब मुख पर मुख- वत्रिका धारण करनेके लिए अन्य उपाय असभव है। और खुले मुख योलनेसे क्षमाश्रमण देना ही व्यर्थ हो जायगा। साधुओंको खुले मुखसे योलना शास्त्रविरुद्ध है, इस विषयमें किसीको विवाद नहीं है । दूसरी यात यह है कि क्षमाश्रमणदानमें 'हे क्षमाश्रमण !' इस सम्बोधनका प्रयोग किया है। इसलिए गुरुको अपनी ओर अभिमुग्न करने के लिए સૂની વ્યાખ્યામાં વ્યાખ્યાકાર હરિભદ્રસૂરિએ પણ કહ્યુ છે કે–“” ઈત્યાદિ અહી “બેઉ હાથમાં રજેહરણ લઈને” એમ કહેતા હરિભદ્રસૂરિએ એમ પ્રકટ કર્યું છે કે મુખ પર મુખવઝિકા બાધવાની ભગવાનની આજ્ઞા છે નહિ તે જે બેઉ હાથમા રજોહરણ લઈ લીધે એટલે મુખ પર મુખવસ્ત્રિકા ધારણ કરવાને માટે અન્ય ઉપાય અને ભવિત છે, અને ખુલે મુખે બેસવાથી ક્ષમા શમણ આપવાનું જ વ્યર્થ બની જાય સાધુઓએ ખુલે મુખે બોલવું એ શાસ્ત્રવિરૂદ્ધ છે, એ સબંધમાં તે કેઈને વાધ નથી બીજી વાત એ છે કે ક્ષમા શમણુદાનમા “હે ક્ષમાશમણ એ સબોધનને પ્રવેગ કહે છે તેથી કરીને ગુરૂને પિતાની તરફ અભિમુખ કરવાને માટે વિશેષ–પ્રયત્નપૂર્વક સ્પષ્ટ .

-- २६. श्रीदर्शवकालिकयो किञ्च-अन्तकृदशागपप्ठे वर्गेऽतिमुक्ताव्ये पञ्चदशाभ्ययने- "तए ण अइमुत्ते कुमारे भगव गोयम एव पयासी-हण भते!' तुम्भे जाण अह तुन्भ भिक्ख दवावेमि त्ति कटु भगव गोयम अंगुलीए गेरइ, गिण्डित्ता जेणेव सए गेहे तेणेव उवागरा" इत्यभिहितम् । तत्र मिक्षाचर्या गतस्य गौतमस्वामिनो भिक्षापात्रधारणप्रतिवदेकहस्तारण- लिव सतरामेव सिद्धम् । इतरस्य तु फरस्यादगुली अतिमुक्तकुमारेण गृहीताया सत्या तस्य भगवतो गौतमस्वामिनो इस्तेन मुखोपरि मुखवत्रिकाधारण नोपपद्यते, सूक्ष्मव्यापिसम्पातिमजीवसचित्तरजामवेशादिवारणाय तदानीमपि मुखवत्रिका- धारणमावश्यकमेव । किचावश्यके 'इच्छामि'खमासमणो! वदिउ' इत्यादि-क्षमाश्रमण- अन्तकृतदशागके ६ वर्गमें 'अतिमुक्त' शीर्षक पन्द्ररखें अध्ययनमें कहा है-"तए ण इत्यादि । इस कथनसे भिक्षाचरी (गोचरी) के लिए -गये हुवे गौतमस्वामीने हाथमें भिक्षाका पात्र लिया था, यह यात स्वय सिद्ध है और दूसरे हाथ की अगुली अतिमुक्त कुमारने पकड़ ली थी। इस प्रकार जब दोनों हाथ गौतमस्वामीके रुधे हुए थे तो मुखस्त्रिका नहीं रही होगी। किन्तु सूक्ष्म, व्यापी, सपातिम जीव तथा-सचिन रजका प्रवेश रोकनेके लिए मुखवस्त्रिकाकी उस समय भी आवश्यकता थी। आवश्यक सूत्र में “इच्छामि खमासमणो ! वदिड" इत्यादि क्षमा- मन्तMEAll t qभा 'अतिमुक्त' शब ५६२मा अध्ययनमा घु छ 'तए णत्याह આ કથન મુજબ ભિક્ષાચરી (ગેચરી) ને માટે ગએલા ગૌતમ સ્વામીએ હાથમા ભિક્ષાનું પાત્ર લીધુ હતુ એ વાત સ્વયંસિદ્ધ છે અને બીજા હાથની આગળી અતિમુક્ત કુમારે પકડી લીધી હતી એ પ્રકારે જે ગૌતમ સ્વામીના બેઉ હાથ રેકાઈ ગયા હતા, તે તે વખતે હાથવડે મુખવસ્ત્રિકા મુખ પર કેવી રીતે રાખી હોય? કિન્તુ સૂકમ, વ્યાપી, સાપતિમ છે તથા સચિત્ત રજને પ્રવેશ રવાને માટે એ સમયે પણ મુખવસ્ત્રિકાની આવશ્યક્તા હતી आवश्य:-सूत्रमा 'इच्छामि खमासमणो वदिउ' त्या समाश्रमायुहान अध्ययन १ गा. १ मुखवत्रिकाविचारः दानसूत्रस्य व्याख्याया तट्टीकाकारेण हरिभद्रसूरिणाऽभिहितम्- अय च प्रकृतसूत्रार्थ:-अवग्रहाद्वहिःस्थितो विनेयोऽर्दावनतकायः करद्वय- गृहीतरजोहरणो वन्दनायोयत एवमाइ-इच्छामि-अभिल्पामि हे क्षमाश्रमण ! चन्दितु नमस्कार कर्तु भवन्तमिति गम्यते" इत्यादि । अत्र 'करद्वयगृहीतरजोहरणः' इति विशेपण कथयता हरिभद्रसूरिणा 'मुखोपरि मुखवत्रिकावन्धन भगवदमिमेत'मिति प्रकटीकृतम् , अन्यथा क्षमाश्रमण- सूत्रोचारणकाले करद्वयस्य रजोहरणग्रहणे प्रतिवद्धतया मुखोपरि मुखवत्रिका- स्थापनस्योपायान्तरासम्भवात् क्षमाश्रमणदानमेव निर्विपय स्यात् । अनारतमुखेन तु मुनीना भाषणमेवाऽऽगमप्रतिपिद्धमिति नान केपाश्चिद्विवादः । किञ्च क्षमाश्रमणदाने सम्बोधनशब्दप्रयोगे गुरोः स्वाभिमुखीकरणार्थ सवि- श्रमणदान सूत्रको व्याख्यामें व्याख्याकार ररिभद्रसरिने भी कहा है- अय" इत्यादि, यहाँ "दोनोंहाथोंमें रजोहरण लेकर" ऐसा करनेवाले हरिभद्रसूरिने यह प्रगट किया है कि मुख पर मुखवत्रिका घाधनेकी भगवानकी आज्ञा है। अन्यथा जय दोनों हाथोंमें रजोहरण ले लिया तव मुख पर मुख- वत्रिका धारण करनेके लिए अन्य उपाय असभव है। और खुले मुख योलनेसे क्षमाश्रमण देना ही व्यर्थ हो जायगा। साधुओंको खुले मुखसे बोलना शास्त्रविरुद्ध है, इस विषयमें किसीको विवाद नहीं है। दूसरी यात यह है कि क्षमाश्रमणदानमें 'हे क्षमाश्रमण !' इस सम्बोधनका प्रयोग किया है। इसलिए गुरुको अपनी ओर अमिमुख करने के लिए સૂવની વ્યાખ્યામાં વ્યાખ્યાકાર હરિભદ્રસૂરિએ પણ કહ્યુ છે કે–” ઈત્યાદિ અહી “બેઉ હાથમાં રહરણ લઈને” એમ કહેતા હરિભદ્રસૂરિએ એમ પ્રકટ કર્યું છે કે મુખ પર મુખવસ્ત્રિકા ખાધવાની ભગવાનની આજ્ઞા છે નહિ તે જે બેઉ હાથમાં રજોહરણ લઈ લીધે એટલે મુખ પર મુખવસ્ત્રિકા ધારણ કરવાને માટે અન્ય ઉપાય અમ ભવિત છે, અને ખુલે મુખે બોલવાથી ક્ષમા શ્રમણ આપવાનું જ વ્યર્થ બની જાય સાધુઓએ ખુલ્લે મુખે બોલવું એ શાસ્ત્રવિરૂદ્ધ છે, એ બધમાં તે કઈ વાધ ની બીજી વાત એ છે કે ક્ષમા શમણુદાનમાં “હે ક્ષમાશ્રમણ એ સ ધનનો પ્રવેગ કહે છે તેથી કરીને ગુરૂને પિતાની તરફ અભિમુખ કરવાને માટે વિશેષ–પ્રયત્ન–પૂર્વક સ્પષ્ટ " श्रीदशवकालिकसूत्रे शेपमयत्नपूर्वकोचैःस्वरेण सुस्पष्टोचारण विधेयमस्ति न स्यव्यक्तध्वनिनेत्युपाया न्तरेण मुखावरणस्य कर्तुमशस्यतयोक्तजीवविराधना परिदर्जुमशक्यैव । अन्यच्च तत्रै क्षमाश्रमणदाने गुरुनिदेशानन्तरम्-"अरोकाय, कायस- फास" इत्यस्य व्याख्याया तेनैव ररिभद्रसूरिणा व्यारयात, तथाहि- ततः शिष्यो नैपेधिम्या भविश्य गुरुपादान्तिकम् , निधाय तत्र रजोहर- णम् , तत् (रजोहरण) ललाट च कराभ्या सस्पृशन्निद भणति-अपस्तास्कायः अधाकायाम्पादलक्षणस्तमधःकाय प्रति कायेन-निजदेहेन सस्पर्श कायसस्पर्शस्त करोमि, एतच्चानुजानीते-"ति। तत्र समिलितकरद्वयेन रजोहरण-ललाटयोः सस्पर्श सति 'अहोकाय, कायसफास' इत्यस्योचारण मुखपत्रिकावन्धन विना नोपपद्यते, हस्तेन मुखोपरि मुखवत्रिकास्थापन तदानीं न सभवति, इस्तद्वयस्यापि रजोहरणललाटसस्पर्श- मतिबद्धत्वात् । अपि च-ज्ञाताधर्मकथासूत्रे चतुर्दशाध्ययने- विशेषप्रयत्नपूर्वक स्पष्ट उच्चारण करनेकी आवश्यकता है।अव्यक्त भाषासे सबोपन करना सभव नहीं है। इस प्रकार जव दुसरे उपायसे मुख नहीं ढंका जा सका तो उल्लिखित जीवोंकी विराधना अनिवार्य है। इसके सिवाय इसी क्षमाश्रमणदानमें गुरुकी आज्ञाके अनन्तर "अरोकाय कायसफास" इसका उच्चारण मुखवत्रिका बाधे विना नहीं हो सकता और हायसे मुख पर मुखवत्रिकाधारण करना उस समय सभव नहीं है, क्योंकि दोनोंहाथ रजोहरणको ग्रहण करके ललाटमें लगाये जाते हैं। ज्ञाताधर्मकथाङ्ग सूत्रके चौदहवें अध्ययनमें कहा है-"तएण" इत्यादि। ઉચ્ચારણ કરવાની જરૂર છે અવ્યકત ભાષાથી સ ધન કરવાને સ ભવ નથી એ રીતે જે બીજા ઉપાયથી મુખ નથી ઢાકી શકાય તે ઉપર લખ્યા મુજબ જીવોની વિરાધના થયા વિના રહે નહિ એ ઉપરાત એ ક્ષમાશ્રમણદાનમાં शुनी माज्ञानी पछी 'अहोकाय, कायसफास' मेनु स्या- भुभपनि या વિને થઈ શકતું નથી અને એ સમયે હાથથી મુખવસ્ત્રિકા ધારણ કરવાનું સભવિત નથી, કારણ કે બેઉ હાથ રજોહરણને ગ્રહણ કરીને કપાળે અડાડવાના साताया। सूत्रना योहमा अध्ययनमा घुछ 3- तए ण त्या હોય છે अ ययन १ गा. १ मुखबस्त्रिकाविचारः •२९ "तएण ताओ अनाओ पोहिलाए एव वुत्ताओ समाणीओ दोवि कन्ने ठाइति, ठाइत्ता पोटिल एप क्यासी-अम्हे ण देवाणुप्पिए! समणीओ निग्गथीओ जाव गुत्ताभयारिणीओ, नो खलु कप्पइ अम्ह एयप्पयार कन्नेहिदि निसामित्तए किमग पुण उवदिसित्तए बा" इत्यायुक्तम् । पोट्टिलया भिक्षार्थ स्वगृहमनुपविष्टामु सा-बीपु काचित् पतिं - वशीकर्तु चूर्णयोग-मन्त्रयोगादिकानुपायान् पृष्टा सती की पिधाय मोवाच-हे देवानुपिये! वया श्रमण्यो निर्ग्रन्थ्यो यावद् गुप्तब्रह्मचारिण्यः स्मः, नो खलु कल्पते अस्माक- मेतस्मकार कर्णाभ्यामपि निशामयितु किमङ्ग पुनरुपदेष्टुमित्यर्थः। । लोके हि अनुचितवा श्रवणसमये झटिति कर्णपिधान हस्ताभ्यामेव विधी- यमान दृश्यते तस्मात् सा च्या हस्ताभ्या कर्णा पिधाय पतिवचनदाने मुखवस्त्रिका- धारण पन्धन विना नोपपद्यते, तदभावे वायुकायादिजीवविराधनाऽवश्यम्भाविनी । अर्थात्-"पोटिलाके घरमें साचियाँ भिक्षाके लिए गई। उसने अपने पतिको वश करनेके लिए एक साध्वीसे चूर्णयोग और मत्रयोग आदि उपाय पूछे। तत्र सा-बीने तत्काल दोनो कान मूद कर कहा-हे देवानुप्रिये! हम निम्रन्य आर्थिका हैं यावत् गुप्तवमचारिणी है। ऐसी यात सुनना 'भी हमें नहीं कल्पता तो उपदेश देनेकी बात ही क्या है ? " अनुचित बात सुनते समय लोकमें भी झटपट हाथोंसे कान मूदना देखा जाता है। ऐसी हालतमें दोनों हाथोसे दोनों कान मूद पर विना मुखवस्त्रिका बाधे उत्तर देना युक्त नहीं हो सकता । यदि मुख- वत्रिका के वाधे विना उत्तर दिया तो वायुकाय आदि जीवोंकी विराधना अवश्य हुई। અર્થાત-“પિફ્રિલાના ઘરમાં સાધ્વીઓ ભિક્ષાને માટે ગઈ તેણે પિતાના પતિને વશ કરવાને માટે એક સાધ્વીને ચૂર્ણવેગ અને મત્રગ આદિ ઉપાયે छया, ત્યારે સાધ્વીએ તત્કાળ બેઉ કાને હાથ મૂકીને કહ્યું–હ દેવાનુપ્રિયે! અમે નિર્ચ થ આયિકા છીએ તેમજ ચાવત્ ગુપ્તબ્રહ્મચારિણી છીએ આવી વાત સાભળવી પણ અમને કહપતી નથી તે પછી ઉપદેશ આપવાની તે વાત જ શી?” અનુચિત વાત સાભળતી વખતે લેવામાં પણ ઝટપટ હાથથી કાન ઢાકવામાં આવે એવું જોવામાં આવે છે એવી હાલતમાં બેઉ હાથથી બેઉ કાન ઢાકી લેતા, મુખર્વાસ્ત્રિકા બાળ્યા વિના ઉત્તર આપ યુકત નથી હોતે જે મુખ વસ્ત્રિકા ખાધા વિના ઉત્તર આપવામાં આવે તે વાયુકાય આદિ જીની વિરાધના અવશ્ય થાય ३० श्रीदशकालिको किश्च-मुखवत्रिकावन्धनमन्तरेण पट्कायपिराधना दुप्परिहार्या, तथाहि- मुखे सूक्ष्मसचित्तरजामवेशेन पृथिवीकायस्य, वृष्टयादिनशात्सचित्तजलकणा- नामाकस्मिकनिपातेन धूमिकायाः प्रवेशेन वाऽप्कायस्य, तया यत्र कुत्रापि स्फुलिङ्गा उत्पतन्ति तत्राऽऽझस्मिकसूक्ष्मस्फुलिङ्गनिपातेन तेजस्कायस्य, मुखस्यो- ष्ण वासनिश्वासाभ्या वायवायुकायस्य, 'जस्थ जल तत्थ वण' इतिप्रामाण्या जलनान्तरीयकतया मुखे सचित्तजलविन्दुनिपातेनैव वनस्पतिकायस्यापि, तथा सम्पातिम-व्यापि-सूक्ष्म-जीवसम्पातेन प्रसकायस्य विराधना भवतीति । किश्च मुग्ववत्रिकावन्धने प्रमादवतः पट्कायविराधना दुरा, यतः प्रति- मुखवत्रिकाके यांधे यिना षटकायकी विराधनाका परिहार नहीं हो सकता। मुखमें सूक्ष्म सचित्त रजका प्रवेश होनेसे पृथ्वीकायकी विराधना होती है । यरसा होने पर सचित्त जलकणोंके अकस्मात् ही मुखमें चले जानेसे अथवा मुखमें घूअर के चले जाने से अपकायकी विराधना होती है। इधर-उधर उड़नेवाली अग्निकी चिनगारी कदाचित् मुग्वमें घुस जाय तो तेजस्कायकी हिंसा होती है । मुखसे निकलती हुई गर्म साससे पाय वायुकायकी विराधना रोती है। 'जहाँअपूकाय है वहाँ वनस्पतिकाय भी होता है" (जत्थ जल तत्थ वण) इस प्रमाणसे मुखमें सचित्त जल गिरनेसे ही वनस्पति कायकी विराधना होती है। तथा सपातिम, व्यापी और सूक्ष्म जीवोंके घुसनेसे त्रसकायकी भी विराधना होती है। मुखवत्रिकाके याधनेमें जो साधुप्रमादी होता है उमको षट्कायकी મુખવસ્ત્રિકા બાધ્યા વિના પસ્કાયની વિરાધનાને પરિહાર નથી થઈ શકતે મુખમા સૂક્ષ્મ સચિત્ત રજને પ્રવેશ થવાથી પૃથ્વીકાયની વિરાધના થાય છે (૧) વરસાદ પડતા સચિત્ત જલક અકસ્માત્ મુખમાં જવાથી અથવા મેઢામા ઝાકળ જવાથી અપકાયની વિરાધના થાય છે (૨) અહી–તહી ઉડતી અગ્નિની ચિણગારી કદાચ મુખમાં પેસી જાય તે તેજસ્કાયની હિંસા થાય છે (૩) સુખમાંથી નીકળતા ગરમ શ્વાસથી બાઢા વાયુકાયની વિરાધના થાય છે (ક) જ્યા અપકાય છે ત્યા વનસ્પતિ ४५ ५ उय छे' (जत्य जल तत्य वण) मे प्रभाथी मुभभा सथित are પડવાથી વનસ્પતિકાયની પણ વિરાવના થાય છે (૫) તથા સપાતિમ, વ્યાપી અને સૂમ છે પસી જવાથી ત્રસકાયની પણ વિરાધના થાય છે (૨) મુખવસ્ત્રિકા બાધવામાં જે સાધુ પ્રમાદી હોય છે તેને પકાયની વિરાધના अध्ययन १ गा.१ मुखरखिकाविचारः ३१ - " लेखनकालेऽन्यस्मै तत्मत्याख्यानदानेऽपि प्रतिलेखनोपयोगाभावेन प्रमाद- दोषाविष्टः सन् पट्कायविराधको भवतीति भगवतोत्तराध्ययनसूत्रे प्रतिपादितम् , तथाहि- "पडिलेहण कुणतो , मिहो कह कुणड जणवयकह था। देह व पचक्खाण वाण्ड सय पडिच्छह वा ॥ १ ॥ पुढवी-आउकाण,तेज-वाऊ-वणस्सइ-तसाण । पडिलेहणापमत्तो, छण्डपि विराहओ होड ॥१" इति । तर्हि का वार्ता ये मुखवत्रिकावन्धनमन्तरेण तिष्ठन्ति तेपा प्रमाददोपस्त- जनितपट्कायविराधना नापतेत् ? आगमे हि मुखवत्रिकावन्धनपरित्यागे दोप- वाहुल्य प्रदर्शित तच्च मागे प्रतिपादितम् । इत्य च यथा नौकादौ सूक्ष्मेऽपि मुपिरे सति नद्यादौ तन्निमज्जनान्महती विराधना अवश्य लगेगी क्योंकि भगवानने उत्तराध्ययनसूत्रमें कहा है कि-"प्रतिलेखन करनेमें जो साधु प्रमादी है तथा प्रतिलेखनके समय साधु परस्पर यातें करे, जनपद आदिकी कथाकरे, पचक्खाण देवे, याचे अथवा बचावेतो वह पट्कायका विराधक होता है" तो जोमुखवस्त्रिका - याचे विना रहते हैं उनको प्रमाद-दोपतथा प्रमादजन्य पट्कायकी विरा- धनाका दोप कैसे नहीं लगेगा? अर्थात् जरूर लगेगा। मुखवस्त्रिकाके नहीं याधनेमें आगमोंमें जो यहुतसे दोप कहे हैं वे तो पहले प्रतिपादित कर ही धुके हैं। इस प्रकार जैसे नावमें छोटासा छेद होनेपर नदी आदिमें डूब जानेसे અવશ્ય થાય છે કેમકે ભગવાને ઉત્તરાધ્યયનસૂત્રમાં કહ્યું છે કે-“પ્રતિલેખન કરતી વખતે જે સાધુ પરસ્પર વાર્તાલાપ કરે, દેશકથા આદિ કથા કરે, પચક્ખાણું કરાવે, પિતે વાચે અને વેચાવે તે તે પટકાયો વિરાધક થાય છે જે એમ છે તે જે મુખવસ્ત્રિકા બાળ્યા વગર રહે છે અને પ્રમાદેદેવ અન પ્ર દિન પકાયની વિરાધનાને દેવ કેમ નહી લાગે ? અર્થાત્ અવશ્ય લાગે મુખસ્ત્રિકા નહીં બાધવામા આગમમ દેવ બતાવ્યા છે તે તે પહેલા કહી ચુકયા છીએ એ પ્રકારે જેમ નાવમાં નાનું છિદ્ર પડવાથી તે નદી આદિમા ડૂબી - ३२ श्रीदशवकालिकमात्र हानिः, अल्पीयस्या अपि हीरककणिकाया भक्षणे माणानामेव नाशः, शिकस्पे- पदशनेऽपि सफलशरीरख्यथनम् , कण्टकाप्रमाणे पाणाप्रमाने च कचिदले निखाते सकलागपीडा, नेत्रेऽणुतरस्यापि रजकणस्य निपाते नेत्रोपघाता, नासिकाग्रमाने स्वल्पेऽपि देहभागे छिन्ने समग्रशरीरशोभोपपातः, स्वल्पेनाऽप्याधाकर्मादिसिक्थेन मिश्रितेऽन्नादौ पूतिकर्मदोपपितमाहारजात भवति, स्वल्पेऽपि जिनवचन सन्देहे सर्वचारित्रनाशो जायते, तथैव स्वल्पेऽपि काले मुखवत्रिकाबन्धनोपेक्षया पट्कायविराधनाया सत्या चातुर्मासिकमायश्चित्ताधिकारितापत्तिः। तया चोक्त निशीथसूने द्वादशोद्देशकेऽष्टमसूत्रादारभ्य द्वादशमून यावद- महान् हानि होती है, छोटीसी हीराकी कनीका भक्षण करनेसे प्राणोंका ही नाश होता है, विच्छूके धोड़ासा काट खानेसे सारे शरीरमें व्यथा होती है, काटे या तीरकी जरासी नोंक किसी अगमें घुस जाय तो सब अगमें पीडा होने लगती है, आँखमें छोटीसी किरकिरी घुस जानेसे आँख में तकलीफ होती है, जरासी नाक कट जानेसे सब शरीरकी सुन्दरता नष्ट हो जाती है।आधाकर्म आदि आहारका एक भी सीथ मिल जानेसे सब आहार पूतिकर्मदोपसे दृपित हो जाता है, जिनवचनों में तनिक भी सन्देह करनेसे समस्त चारित्रका नाश हो जाता है, वैसे ही थोडी देर भीमुखवस्त्रिका बाधनेकी उपेक्षा करनेसे पट्कायकी विराधना होती है, अतः चातुर्मासिक प्रायश्चित्त लगता है। निशीथसत्रके यारहवें उद्देशके आठवें सूत्रसे बारहवें सूत्रतकमें कहा है-"जे भिक्खू०" इत्यादि, જવાથી ભારે હાનિ થાય છે, નાની સરખી હીરા કણીનું ભક્ષણ કરવાથી પ્રાણને નાશ થાય છે, વીંછી જરા કરડવાથી આખા શરીરમાં વ્યથા થાય છે, કાટા યા તીરની નાની સરખી અણુ કેઈ અગમ પિસી જવાથી ને આખા અગમા પીડા થવા લાગે છે, આખમાં નાનું સરખું કાણું પેસી જવાથી આખમાં તકલીફ થાય છે, નાનું સરખું નાક કપાઈ જવાથી આખા શરીરની સુંદરતા નષ્ટ થઈ જાય છે, આધાકર્મ આદિ આહારનું એક પણ કણ મળી જવાથી બધે આહાર પૂતિકર્મ દેવથી દૂષિત થઈ જાય જિનવચનમા લગાર પણ કરવાથી સમસ્ત ચરિત્રને નાશ થઈ જાય છે, તેમ છેડા વખત પણ મુખવસ્ત્રિકા બાધવાની ઉપેક્ષા કરવાથી પટકાયની વિરાધના થાય છે તેથી ચાતુર્માસિક પ્રાયશ્ચિત્ત લાગે છે, નિશીથસૂત્રના બારમા ઉદેશના આઠમા સૂવથી બારમા સૂત્ર सुधामा थुछ 'जे भिक्खू०' त्याल, , સદેહ अध्ययन १ गा. १ मुखवत्रिकाविचारः "जे भिक्खू० पुढवीकायस्स कलमायमवि समारभइ, समारभत वा साइजह एव जाव वणस्सइकायस्स आवज्जइ चाउम्मासिय परिहारहाण" पुनरपि निशीयभाष्ये सयमघातद्वारे महिकाद्यफाययतनार्थ प्रोक्तम्- "वासचाणावरिया णिकारणे ठति, कज्जे जतणाए । हत्यऽछिगुलिसण्णा, पोत्ततरिया व भासति ॥१॥ इति । (नि. भाष्य उ. १९ गा. ५७) छाया-'वत्राणाहता निष्कारणे तिष्ठन्ति, कार्ये यतनया । इस्ताक्ष्यगुलीसक्षा, पोतान्त एव भापन्ते ॥१॥' इति । चूर्णिकारेण "पोत्ततरिया व भासति" इति पदस्य चूणौ हस्तभ्रुवादिसङ्केतेन यदि साधवो नावगच्छन्ति तदाऽवश्यवक्तव्ये सति "मुहपोत्तियअतरिया जय- णाए भासति" इति प्रतिपादितम् । अनेन स्पष्ट सिध्यति-यत् मुखवत्रिका साधना मुखे पूर्व वद्धाऽऽसीदिति, तेनैव कारणेन 'मुखपातान्त एवं यतनया मन्द-मन्द भापन्ते' इत्युक्तम् । फिरभी निशीथ सत्रके भाष्यमें सयमघात नामक द्वारके अन्दर घूअर आदि अप्कायकी यतनाके लिए कहा है 'वासत्ताणा' इत्यादि, इस गाथामें आये हुए 'पोत्ततरिया व भासति' इस पदकी चूर्णि करते समय चूर्णिकारने कहा है-अगर साधु हाथ आँख आदिके इशा- रेसे नहीं समझ सके और बोलना ही जरूरी समझे तो 'मुखवस्त्रिकाके अदर ही यतनासे (धीरे-धीरे) चोले' इससे स्पष्ट सिद्ध होता है कि साधुओंके मुख पर मुखवस्त्रिका पहले बाधी हुई थी, इसी कारणको लेकर ही 'मुखवस्त्रिकाके अदर ही यतनासे (धीरे धीरे) बोले ऐसा ઝાકળ આદિ વળી નિશીથસૂત્રના ભાષ્યમા સ યમઘાત’ નામના દ્વારમાં मायनी या ती मते यु छ है 'वासत्ताणा.' त्याल, આથી સ્પષ્ટ સિદ્ધ થાય છે કે સાધુઓના મુખ પર મુખવસ્ત્રિકા બાધેલી ती २१ २४ने सीधे 'पोत्ततरिया व भासति' मा પદની ચૂર્ણિ કરતા भूणि आरे घुछ है- " સાધુ ઈશારાથી ન સમજે અને બેલિવુ જ પડે તે મુખ વસ્ત્રિકાની અંદર જ યતનાથી બોલે . ३२ श्रीदशवेकालिकम हानिः, अल्पीयस्या अपि हीरकणिकाया भक्षणे माणानामेव नाशः, श्रिवस्ये पद्दशनेऽपि सफलशरीरव्यथनम् , कण्टकाग्रमाने पाणाप्रमाने च कचिदो निखाते सफलाहपीडा, नेत्रेऽणुतरस्यापि रजःकणस्य निपाते नेत्रोपघाता, नासिकारमात्रे स्वल्पेऽपि देहभागे छिन्ने समग्रशरीरशोभोपयातः, स्वल्पेनाऽप्याधार्मादिसिधेन मिश्रितेऽन्नादौ पूतिकर्मदोपपितमाहारजात भवति, स्वल्पेऽपि जिनवचन सन्देहे सर्वचारित्रनाशो जायते, तथैव स्वल्पेऽपि काले मुखवत्रिकाबन्धनोपेक्षया पदकायविराधनायां सत्या चातुर्मासिकमायश्चित्ताधिकारितापतिः। तथा चोक्त निशीथसत्रे द्वादशोद्देशकेऽएमसूत्रादारभ्य द्वादशमून यार- महान हानि होती है, छोटीसी हीराकी कनीका भक्षण करनेसे प्राणोंका ही नाश होता है, विच्छूके थोड़ासा काट खानेसे सारे शरीरमें व्यथा होती है, कांटे या तीरकी जरासी नोंक किसी अगमें घुस जाय तो सब अगमें पीडा होने लगती है, ऑखमें छोटीसी किरकिरी घुस जानेसे आँखमें तकलीफ होती है, जरासी नाक कट जानेसे सय शरीरकी सुन्दरता नष्ट हो जाती है।आधाकर्म आदि आहारका एक भी सीथ मिल जानेसे सव आहार पूतिकर्मदोपसे पित हो जाता है, जिनवचनोंमे तनिक भी सन्देह करनेसे समस्त चारित्रका नाश हो जाता है, वैसे ही थोड़ी देर भी मुखघस्त्रिका याधनेकी उपेक्षा करनेसे पटकायकी विराधना होती है, अतः चातुर्मासिक प्रायश्चित्त लगता है। निशीथसूत्रके यारहवें उद्देशके आठवें सूत्रसे वारहवें सूत्रतकमें कहा है-"जे भिक्खू०" इत्यादि, જવાથી ભારે હાનિ થાય છે, નાની સરખી હીરા કણીનું ભક્ષણ કરવાથી પ્રાણને નાશ થાય છે, વીંછી જરા કરડવાથી આખા શરીરમાં વ્યથા થાય છે, કાટા તીરની નાની સરખી અણુ કેઈ અગમાં પેસી જવાથી આખા અગમા પીડા થવા લાગે છે, આખમાં નાનું સરખું કાણુ પસી જવાથી આખમાં તકલીફ થાય છે, નાનું સરખુ નાક કપાઈ જવાથી આખા શરીરની સુંદરતા નષ્ટ થઈ જાય છે, આધાકર્મ આદિ આહારનું એક પણ કણ મળી જવાથી બધે આહાર પૂતિકર્મ દેવથી દૂષિત થઈ જાય છે જિનવચનામા લગાર પણ કરવાથી સમસ્ત ચારિત્રને નાશ થઈ જાય છે, તેમ ઘેડો વખત પણ મુખવસ્ત્રિકા બાધવાની ઉપેક્ષા કરવાથી પકાયની વિરાધના થાય છે તેથી ચાતુર્માસિક પ્રાયશ્ચિત્ત લાગે છે, નિશીથસૂત્રના બારમા ઉદ્દેશના આઠમા સૂતથી બારમા સૂત્ર सुधीभा छ 'जे भिक्खू ' त्याल, . યા સ દેહ अध्ययन १ गा. १ मुखवस्त्रिकाविचारः ३५ वेति भावः । तस्मात्-मुखोपरि मुखवत्रिकाबन्धन सफलजैनागमतिपायमिति सिद्धम् । एव च भगवतीमो 'सुहुमकाय अणिज्जूदित्ताण' इति वाक्यस्य सूक्ष्म- काय=मुखवत्रिकाम् 'अणिज्जहित्ता'-अपोद्य परित्यज्य अवद्-वेत्यर्थों बोध्या, एवमन्यत्राऽप्यूहनीयम् । यत्तु-आचारागसूत्रे उन्खासादिकाले मुग्वपिधानोपदेशेन मुखवत्रिका करेणैव धारणीया न तु दोरकेणेति तत्तत्समये एच मुखवस्त्रिया घ्राणमुखादि- पिधान विवेयमिति च प्रतीयते, दोरकावलम्बेन मुखवत्रिकायाः सदा धारणीयत्वे तु पुनर्मुग्वपिपानोपदेशो व्यर्थः स्यादिति वदन्ति तदज्ञानमूलम् । आचाराङ्ग- आज्ञाभगमे गुस्तर प्रायश्चित्त देना युक्त ही है । इसलिये यह सिद्ध हुआ कि मुख पर मुखवस्त्रिका चाधना सब जैनशास्त्रोंमे प्रतिपादन किया गया है । इस प्रकार भगवती सूत्रके 'सुहुमकाय अणिहिताण' वाक्यका अर्थ यह समझना चाहिये कि 'मुखवत्रिकाका त्याग करके अर्थात् न .बाध करके ।' ऐसा सब जगह समझना चाहिए। प्रश्न-आचाराङ्गसूत्रमे उच्दास आदि लेते समय मुख ढंकने का उपदेश दिया है। इससे यह प्रतीत होता है कि मुखवस्त्रिका हायमें ही रखनी चाहिए डोरेसे नहीं बाँधनी चाहिए, अमुक-अमुक समय पर ही जब उच्छ्वास आदि आवे तर ही नाक या मुख ढंक लेना चाहिए। डोरेसे मुखवस्त्रिका धारण करना उचित हो तो पुनः मुख ढकनेका उपदेश व्यर्थ हो जायगा। ભગમ 3 भुप ગુક્ત પ્રાયશ્ચિત્ત આવે છે એ રીતે સિદ્ધ થયુ પર મુખવસ્ત્રિકા બાધવી એવું બધા જેનશાસ્ત્રોમાં પ્રતિપાદન કરેલું છે એટલા भाटे भापती-सूत्रना 'मुहमाय अणिजूहिचाण' में पाया सब मेम समन्वो જોઈએ કે “મુખવસ્ત્રિકાનો ત્યાગ કરીને અર્થાત્ ન બાધીને એજ પ્રમાણે બધી જગ્યાએ સમજવું. પ્રશ્ન-આચાગ-સૂત્રમાં ઉર વાસ આદિ લેતી વખતે મુખ ઢાકવાને ઉપદેશ આપે છે એવી એમ પ્રતીત થાય છે કે મુખત્રિના હાથમાં જ રાખવી જોઈએ, દેરાથી બાધવી જોઈએ નહિ અમુક અમુક સમયે જ જ્યારે ઉરૂવાસ આદિ આવે ત્યારે જ યા મુખ ઢાકી લેવું જોઈએ, દેરાથી મુખવસ્ત્રિકા ધારણ કરવી ઉચિત હોય તે પછી પુન મુખ ઢાકવાને ઉપદેશ વ્યર્થ થઈ જશે નાક - ধীমালিক किञ्च रिधिमपाग्रन्थे चारित्रातिचारमापभित्ताधिकारे मुखवत्रिकामन्तरेण भाषणनिषेधः प्रतिपादितः । किञ्च पूर्वोक्तदिशा पट्कायपिराधास्य तद्विराधनावर्जनपरकमगबदामामा दोपप्रसङ्गः। तथा च सति अविधिविधान, ततो मिल्यास, तस्माचारित्रविराधना, वतन दीर्घससारित्व मपत्रेत, अत एमाशामक गुरुवरप्रायश्चित्त प्रदर्शितम् । उक्त हि वृरकल्पमाप्ये- "अवराहे लहुगयरो, आणाभगमि गुरुतरो किरणु ? | आणाए चिय चरण, त भगे किं न भाग तु? ॥१॥” इति। सर्वमेव चारित भगवदाज्ञायामेव व्यवस्थितम् , अतस्तद्भड़े भूलोत्तरगुणादिक वस्तु कि न भग्नम् ? अपि तु सर्वमपि भग्नमिति हेतोस्तन गुरुतरमायवित्त युक्तमे- फिर 'विधिप्रपा' नामक ग्रन्थमें भी चारित्रके अतिचारोंका प्रायश्चित्त कहते समय मुखवस्त्रिकाकै विना योलनेका स्पष्ट निषेध किया गया है। तथा-पूर्वोक्त रीतिसे पटकायकी विराधना करनेवालेको भगवानकी "पद्कायकी विराधनाका त्याग करना" इस आज्ञाके भंग करनेका दोष लगता है । यह दोप लगनेसे अविधिका विधान, अविधिका विधान करनेसे मिथ्यात्व, मिथ्यात्वसे चारित्रकी विराधना और चारित्रकी विरा धनासे दीर्घससारित्वकी प्राप्ति होती है। इसीसे आज्ञाभगका गुरुतर प्रायश्चित्त लगता है। बृहत्कल्पभाष्यमें कहा है-"अवराहे" इत्यादि, समस्त चारित्र भगवान्की आज्ञामें ही है। भगवानकी आज्ञाका भग होने पर मूलगुण उत्तरगुण आदि सभी नष्ट हो जाते हैं। अत' વલી “વિધિપ્રપા” નામના ગ્રન્થમાં પણ ચારિત્રના અતિચારની શુદ્ધિના પ્રકરણમાં મુખસિકા વગર બલવાને નિષેધ કર્યું છે તથા–પૂર્વોક્ત રીતિથી ષટ્કાયની વિરાધના કરનારને ભગવાનની વિરાધનાનો ત્યાગ કર” આ આજ્ઞાનો ભગ કરવાને દેષ લાગે છે આ દેષ લાગ વાથી અવિધિનું વિધાન, અવિધિ-વિધાનથી મિથ્યાત્વ, મિથ્યાત્વથી ચારિત્રની વિરાધના અને ચારિત્રની વિરાધનાથી દીર્ધસ સરિત્વની પ્રાપ્તિ થાય છે એથી આજ્ઞાભ ગનું ગુરૂતર પ્રાયશ્ચિત્ત લાગે છે पास्यमा प्रयु छ- 'अबराहे त्याह સમસ્ત ચારિત્ર ભગવાનની આજ્ઞામાં જ રહેલું છે ભગવાનની આજ્ઞાને ભગ થવાથી મૂળગુણ ઉત્તરગુણ આદિ બધુ જાય છે તેથી આજ્ઞા , ષકાયની । अध्ययन १ गा.१ मुखयस्त्रिकाविचारः ३५ वेति भावः । तस्मात्-मुखोपरि मुखवत्रिकापन्धन सफलजैनागमप्रतिपाद्यमिति सिद्धम् । एव च भगवतीमत्रे 'सुहुमकाय अणिज्जूहित्ताण' इति पाक्यस्य सूक्ष्म- काय-मुखवत्रिकाम् 'अणिज्जूहित्ता'अपोद्य परित्यज्य अवद्-वेत्यर्थों बोध्यः, एवमन्यनाऽप्यूहनीयम् । यतु-आचारागसने उन्च्यासादिकाले मुग्वपिपानोपदेशेन मुखवत्रिका करेणैव धारणीया न तु दोरकेणेति तत्तत्समये एव मुखवस्त्रिकया घ्राणमुखादि- पिधान विधेयमिति च प्रतीयते, दोरकावलम्बेन मुसवत्रिकायाः सदा धारणीयत्वे तु पुनर्मुग्वपिपानोपदेशो व्ययः स्यादिति वदन्ति तदज्ञानमूलम् । आचाराग- आज्ञाभगमे गुस्तर प्रायश्चित्त देना युक्त ही है । इसलिये यह सिद्ध हुआ कि मुख पर मुखवस्त्रिका गांधना सर जैनशास्त्रोमे प्रतिपादन किया गया है। इस प्रकार भगवती सूत्रके 'सुहुमकाय अणिनूहित्ताण' वाश्यका अर्थ यह समझना चाहिये कि 'मुग्ववत्रिकाका त्याग करके अर्थात् न -वाध करके ।' ऐसा सर जगह समझना चाहिए। प्रश्न-आचाराङ्गमूत्रमे उच्चाम आदि लेते समय मुख ढंकने का उपदेश दिया है। इससे यह प्रतीत होता है कि मुखवस्त्रिका हायमे ही रखनी चाहिए डोरेसे नहीं बाँधनी चाहिए, अमुक-अमुक समय पर ही जन उच्छ्वास आदि आवे तय ही नाक या मुख ढंक लेना चाहिए। डोरेसे मुखवस्त्रिका धारण करना उचित हो तो पुन' मुख ढकनेका उपदेश व्यर्थ हो जायगा। ગુતર પ્રાયશ્ચિત્ત આવે છે એ રીતે સિદ્ધ થયુ કે મુખ પર મુખવસ્ત્રિકા બાધવી એ બધા જેનાસ્ત્રોમાં પ્રતિપાદન કરેલું છે એટલા भाटे लापती सूत्रना 'मुहुमकाय अणिहिताण' में वायन! म मेम सभन्यो જોઈએ કે “મુખવસ્ત્રિકાને ત્યાગ કરીને અર્થત ન બાધીને ” એજ પ્રમાણે બધી જગ્યાએ સમજવું પ્રશ્ન-આચારાગ-સૂત્રમાં ઉર વાસ આદિ લેતી વખતે મુખ ઢાકવાને ઉપદેશ આપે છે એવી એમ પ્રતીત થાય છે કે મુખત્રિકા હાથમાં જ રાખવી જોઈએ, દેરાયા બાધવી જોઈએ નહિ અમુક અમુક સમયે જ જ્યારે ઉર વાસ આદિ આવે ત્યારે જ યા મુખ ઢાકી લેવું જોઈએ, દેરાથી મુખવસ્ત્રિકા ધારણ કરવી ઉચિત હોય તે પછી પુન મુખ ઢાકવાને ઉપદેશ વ્યર્થ થઈ જશે ભુ ગમાં નક श्रीभवकालिको किश्च विधिमपानन्थे चारित्रातिचारमायभित्ताधिकारे मुखवसिकामन्तरेण भाषणनिषेधः प्रतिपादितः । किञ्च पूर्वोक्तदिशा पट्कायविराधस्य तद्विराधनावर्जनपरकमगवदाहामा दोपप्रसनः। तथा च सति अविधिविधान, ततो मिळ्यात्य, तस्माचारित्रविराधना, वतत्र दीर्घससारित्व प्रपयेत, अत एमाऽऽसामगकर्तगुरुतरमायश्चित्त प्रदर्शितम् । उक्त हि वृहत्कल्पभाप्ये- " अवराहे लहुगयरो, आणाभगमि गुमतरो किरणु ? । आणाए चिय चरण, तमगे कि न भग्ग तु ? ॥१॥” इति। सर्वमेव चारित्र भगवदाज्ञायामेव व्यास्थितम् , अतस्तो मृलोत्तरगुणादिक वस्तु किं न भग्नम् ? अपि तु सर्वमपि भग्नमिति हेतोस्तत्र गुरुतरमायश्रित युक्तमे फिर 'विधिप्रपा' नामक ग्रन्थमें भी चारिसके अतिचारोंका प्रायश्चित्त करते समय मुखचस्त्रिकाके विना योलनेका स्पष्ट निषेध किया गया है। तथा-पूर्वोक्त रीतिसे पटकायकी विराधना करनेवालेको भगवानकी “पटकायकी विराधनाका त्याग करना" इस आज्ञाके भंग करनेका दोष लगता है। यह दोष लगनेसे अविधिका विधान, अविधिका विधान करनेसे मिथ्यात्व, मिथ्यात्वसे चारित्रकी विराधना और चारित्रकी विरा- धनासे दीर्घससारित्वकी प्रासि होती है । इसीसे आज्ञाभगका गुस्तर प्रायश्चित्त लगता है। बृहत्कल्पभाष्यमे कहा है-"अवराहे" इत्यादि, समस्त चारित्र भगवान्की आज्ञामें ही है। भगवान्की आज्ञाका भग होने पर मूलगुण उत्तरगुण आदि सभी नष्ट हो जाते हैं । अतः વલી “વિધિપ્રપાનામના ગ્રન્થમા પણ ચારિત્રના અતિચારની શુદ્ધિમાં પ્રકરણમાં મુખવસ્ત્રિકા વગર બલવાને નિષેધ કર્યું છે? તથા-પૂર્વોક્ત રીતિથી ષકાયની વિરાધના કરનારને ભગવાનની પાચની વિશધનાને ત્યાગ કરે આ આજ્ઞાન ભ ગ કરવાને દેષ લાગે છે આ દેષ લાગ વાથી અવિધિનું વિધાન, અવિધિ-વિધાનથી મિથ્યાત્વ, મિથ્યાત્વથી ચારિનની વિરાધના અને ચારિત્રની વિરાધનાથી દીર્ઘસ સારિવની પ્રાપ્તિ થાય છે એથી આજ્ઞાભગ! ગુરૂતર પ્રાયશ્ચિત્ત લાગે છે मृड.४८५मास्यमा उखु छ- 'अबराहे त्या સમસ્ત ચારિત્ર ભગવાનની આજ્ઞામાં જ રહેલું છે ભગવાનની આજ્ઞાને ભગ થવાથી મૂળગુણ ઉત્તરગુણ આદિ બધુ " नट था જાય છે તેથી આજ્ઞા अध्ययन १ गा. १ मुखवस्त्रिकाविचारः ३५ वेति भावः । तस्मात्-मुखोपरि मुखवत्रिकाबन्धन सफलजैनागमप्रतिपायमिति सिद्धम् । एव च भगवतीमत्रे 'सुहमकाय अणिज्जूहित्ताण' इति वाक्यस्य सूक्ष्म- काय=मुखवत्रिकाम् 'अणिज्जहिता'अपोद्य परित्यज्य अप-वेत्यर्थों बोध्यः, एवमन्यनाऽप्यूटनीयम् । यतु-आचारागसूत्रे उन्यासादिकाले मुग्वपिपानोपदेशेन मुखवस्त्रिका करेणैव धारणीया न तु दोरकेणेति तत्तत्समये एवं मुखवस्त्रिया घ्राणमुखादि- पिधान विधेयमिति च प्रतीयते, दोरकावलम्न मुखवत्रिकायाः सदा धारणीयत्वे तु पुनर्मुग्वपिपानोपदेशो व्यः स्यादिति बदन्ति तदनानमूलम् । आचाराग- आज्ञाभगमे गुम्तर प्रायश्चित्त देना युक्त ही है । इमलिये यह सिद्ध हुआ कि मुख पर मुसवस्त्रिका गाधना सर जैनशास्त्रोंमे प्रतिपादन किया गया है। इस प्रकार भगवती सत्रके 'सुहुमकाय अणिहित्ताण' चाक्यका अर्थ यह समझना चाहिये कि 'मुखवत्रिकाका त्याग करके अर्थात् न -वाध करके।' ऐसा सर जगह समझना चाहिए। प्रश्न-आचाराङ्गमत्रमे उन्हाम आदि लेते समय मुस ढंकने का उपदेश दिया है। इससे यह प्रतीत होता है कि मुखवस्त्रिका हायमे ही रखनी चाहिए टोरेसे नहीं बाँधनी चाहिए, अमुक-अमुक समय पर ही जन उच्छ्वास आदि आवे तव ही नाक या मुख ढंक लेना चाहिए। डोरेसे मुखवत्रिका धारण करना उचित हो तो पुन' मुख ढकनेका उपदेश . व्यर्थ हो जायगा। ભગમ ગુતર પ્રાયશ્ચિત્ત આવે છે એ રીતે સિદ્ધ થયુ કે મુખ પર મુખવસ્ત્રિકા બાધવી એવું બને જેનગાસ્ત્રોમાં પ્રતિપાદન કરેલું છે એટલા भाटे भरती-सूत्रना 'मुहमकाय अणिहिताण' से वायने। म मेम सभाये। જોઈએ કે “મુખવસ્ત્રિકાને ત્યાગ કરીને અર્થત ન બાવીને ” એજ પ્રમાણે બધી જગ્યાએ સમજવું પ્રશ્ન-આચારાગ-સૂત્રમાં ઉર વાસ આદિ લેતી વખતે મુખ ઢાકવાને ઉપદેશ આપે છે એવી એમ પ્રતીત થાય છે કે મુખવસ્ત્રિકા હાલમાં જ રાખવી જોઇએ, દેરાથી બાધવી એ નહિ અમુક અમુક સમયે જ જ્યારે ઉપાસ આદિ આવે ત્યારે જ થા મુખ ઢાકી લેવું જોઈએ, દેરાથી મુખવસ્ત્રિકા ધારણ કરવી ઉચિત હોય તે પછી પુન મુખ ઢાકવાને ઉપદેશ વ્યર્થ થઈ જશે नाड - श्रीदनकालिको किञ्च विधिमपानन्ये चारित्रातिचारमायश्चित्ताधिकारे मुखवत्रिकामन्तरेण भापणनिषेधः प्रतिपादितः । किञ्च पूर्वोक्तदिशा पट्कायविराधास्य तद्विराधनावर्जनपरकमगवदामामा दोपमसनः। तथा च सति अविधिविधान, ततो मियात्य, तस्माचारित्रविराधना, ततश्च दीर्घससारित्व पपवेत, अत एवाऽऽशामक गुरुतरमायश्चित्त प्रदर्शितम् । उक्त हि बृहत्कल्पभाप्ये- "अवराहे लगयरो, आणाभगमि गुरुतरो किरण ? । आणाए चिय चरण, तमगे किन भग्ग तु ? ||१॥” इति। सर्वमेव चारित भगवदाज्ञायामेव व्यवस्थित्तम् , अतस्तो मूलोत्तरगुणादिक वस्तु किं न भग्नम् ? अपि तु सर्वमपि भग्नमिति हेतोस्ता गुरुतरमायश्चित्त युक्तमे फिर 'विधिप्रपा' नामके ग्रन्थमें भी चारित्रके अतिचारोंका प्रायश्चित्त कहते समय मुखयस्त्रिकाके विना योलनेका स्पष्ट निषेध किया गया है। तथा-पूर्वोक्त रीतिसे पटकायकी विराधना करनेवालेको भगवानकी “पटकायकी विराधनाका त्याग करना" आज्ञा भंग करनेका दोष लगता है। यह दोप लगनेसे अविधिका विधान, अविधिका विधान करनेसे मिथ्यात्व, मिथ्यात्वसे चारित्रकी विराधना और चारित्रकी विरा धनासे दीर्घससारित्वकी प्राप्ति होती है। इसीसे आज्ञाभगका गुरुतर प्रायश्चित्त लगता है। बृहत्कल्पभाष्यमे कहा है-"अवराहे" इत्यादि, समस्त चारित्र भगवानकी आज्ञामें ही है। भगवानकी आंज्ञाका भग होने पर मूलगुण उत्तरगुण आदि सभी नष्ट हो जाते हैं । अतः વલી “વિધિપ્રપ' નામના ગ્રન્થમાં પણ ચારિત્રના અતિચારની શુદ્ધિના પ્રકરણમાં મુખત્રિકા વગર બોલવાને નિષેધ કર્યું છે! થા-પૂક્ત રીતિથી ષકાયની વિરાધના કરનારને ભગવાનની છે વિરાધનાને ત્યાગ કરે” આ આજ્ઞાને ભગ કરવાને દોષ લાગે છે આ દેષ લાગ વાથી અવિધિનું વિધાન, અવિધિ-વિધાનથી મિથ્યાત્વ, મિથ્યાત્વથી ચારિત્રની વિરાધના અને ચારિત્રની વિરાધનાથી દીર્ઘસસારિત્વની પ્રાપ્તિ થાય છે એથી આજ્ઞાભ ગનું ગુરૂતર પ્રાયશ્ચિત્ત લાગે છે मुखमाध्यमा धु - 'अवराहे त्या સમસ્ત ચારિત્ર ભગવાનની આજ્ઞામાં જ રહેલું છે ભગવાનની આજ્ઞાને ભગ થવાથી મૂળગુણ ઉત્તરગુણ આદિ બધુ નષ્ટ જાય છે તેથી આજ્ઞા કાયની का अध्ययन १ गा. १ मुखवस्तिकाविचारः ३५ वेति भावः । तस्मात्-मुखोपरि मुखवत्रिकाबन्धन सफलजैनागमप्रतिपाद्यमिति सिद्धम् । एव च भगवतीमुत्रे 'सुदुमकाय अणिज्जूरित्ताण' इति वाक्यस्य मूक्ष्म- काय=मुखवत्रिकाम् 'अणिज्जूहित्ता'अपोद्य परित्यज्य अवद्ध्वेत्यर्थों वोध्यः, एवमन्याऽप्यूहनीयम् । यत्तु-आचारागसने उन्यासादिकाले मुग्वपिधानोपदेशेन मुखवत्रिका करेणैर धारणीया न तु दोरकेणेति तत्तत्समये एव मुखवत्रिकया घ्राणमुखादि- पिधान विधेयमिति च प्रतीयते, दोरकावलम्बेन मुसवत्रिकायाः सदा धारणीयत्वे तु पुनर्मुग्वपिपानोपदेशो व्यर्थः स्यादिति बदन्ति तदज्ञानमूलम् । आचाराग- आजाभगमे गुरतर प्रायश्चित्त देना युक्त ही है । इसलिये यह सिद्ध हुआ कि मुख पर मुखचस्त्रिका गधना सर जैनशास्त्रोमे प्रतिपादन किया गया है । इस प्रकार भगवती सूत्रके 'सुहुमकाय अणिनूदित्ताण' वास्यका अर्थ यह समझना चाहिये कि 'मुखवत्रिकाका त्याग करके अर्थात् न -याध करके ।' ऐसा सर जगह समझना चाहिए । प्रश्न-आचारागसूत्रमे उन्हाम आदि लेते समय मुख ढंकने का उपदेश दिया है। इससे यह प्रतीत होता है कि मुखवस्त्रिका हाथमे ही रखनी चाहिए डोरेसे नहीं बाँधनी चाहिए, अमुक-अमुक समय पर ही जन उच्छवास आदि आवे तर ही नाक या मुख ढंक लेना चाहिए। डोरेसे मुखवस्त्रिका धारण करना उचित हो तो पुनः मुख ढकनेका उपदेश व्यर्थ हो जायगा। ભરૂમ ગુસ્તર પ્રાયશ્ચિત્ત આવે છે એ રીતે સિદ્ધ થયુ કે મુખ પર મુખવસ્ત્રિકા બાધવી એવું બધા જેનશાસ્ત્રોમાં પ્રતિપાદન કરેલ છે એટલા भाटे भगवती बना 'सुहमकाय अणिज्जूहित्ताण' में पाया म मेभ समावे। જોઈએ કે “મુખવસ્ત્રિકાને ત્યાગ કરીને અત્ન બાધીને ” એજ પ્રમાણે બધી જગ્યાએ સમજવું मन-मायाराग-सूत्रमा વાસ આદિ લેતી વખતે મુખ ઢાકવાને ઉપદેશ આપે છેએથી એમ પ્રતીત થાય છે કે મુખવસ્ત્રિના હાથમાં જ રાખવી જોઈએ, દેરાથી બાધવી જોઈએ નહિ અમુક અમુક સમયે જ જ્યારે આદિ આવે ત્યારે જ યા મુખ ઢાકી લેવું જોઈએ, દેરાથી મુખવસ્ત્રિકા ધારણ કરવી ઉચિત હોય તે પછી પુન મુખ ઢાકવાને ઉપદેશ વ્યર્થ થઈ જશે ઉર ફુવાસ નાક - " - . श्रीदर्शवकालिको फिच विधिमपानन्थे चारित्रातिचारमायशिनाधिगरे मुख पत्रिकामन्तरेण भापणनिपेधः प्रतिपादितः । किश्च पूर्वोक्तदिशा पट्कायविराधरस्य तद्विराधनार्जनपरकमगवदाशामा दोपप्रसङ्गः। तथा च सति अविधिविधान, ततो मि यात्व, तस्माचारित्रनिराधना, ततश्य दीर्घससारित्व प्रपवेत, अत एमाशामक गुरुतरमायश्चित्त प्रदर्शितम् । उक्त हि वृहत्कल्पमाप्ये- अवराहे लहुगयरो, आणाभगमि गुमतरो किरणु ? | आणाए चिय चरण, तब्भगे किं न भग्ग तु? ॥१॥” इति। सर्वमेव चारित भगरदाशायामेव व्यवस्थितम् , अतस्तद्धरे मूलोचरगुणा वस्तु किन भग्नम् ? अपि तु सर्वमपि भग्नमिति हेतोस्तत्र गुरुतरमायश्चित्त र फिर विधिप्रपा' नामक ग्रन्थमें भी चारित्रके अति प्रायश्चित्त करते समय मुखयस्त्रिकाके विना योलनेका स्पष्ट नि गया है। तथा-पूर्वोक्त रीतिसे पट्कायकी विराधना करनेवालेको "पटकायकी विराधनाका त्याग करना” इस आज्ञाके भंग। लगता है। यह दोष लगनेसे अविधिका विधान, अपि करनेसे मिथ्यात्व, मिथ्यात्वसे चारित्रकी चिराधना और धनासे दीर्घससारित्वकी प्राप्ति होती है । इसीसे आ प्रायश्चित्त लगता है। बृहत्कल्पभाप्यमे कहा है-"अवराहे" इत्यादि समस्त चारित्र भगवानकी आज्ञामें ही है। भग होने पर मूलगुण उत्तरगुण आदि सभी વલી “વિધિપ્રપ’ નામના ગ્રન્થમાં પણ પ્રકરણમા મુખવસ્ત્રિકા વગર બલવાને નિષેધ ક તથા પૂર્વોક્ત રીતિથી ષકાયની વિરા વિરાધનાને ત્યાગ કર” આ આનાને ભ વાથી અવિધિનું વિધાન, અવિધિ-વિધાનથ અને ચારિત્રની વિરાધનાથી દીર્ઘસ સાદિ ગુરૂતર પ્રાયશ્ચિત્ત લાગે છે બૃહકાભાષ્યમાં કહ્યું છે… . સમસ્ત ચારિત્ર ભગવાનની આ ભાગ થવાથી મૂળગુણ ઉત્તરગુણ આદિ - . stant MAN Ave um अध्ययन १ गा. १ मुखवस्त्रिकाविचार: सादियतनाया अनुपपत्तेः । अनेन सूत्रेण 'उन्यासादिकाले आस्यकपोपपरिपिधान पाणिना विधेय' मिति बोधयतो भगवतस्तात्पर्य मुखवस्त्रिया पिधाने कल्पयन्तः पण्डिताभिमानिन एवमनुयोक्तव्याः-'पाणि' शब्दस्य मुखवस्त्रिकारूपोऽर्थः किं वाच्यो लक्ष्यो व्यङ्गयो वा ? । नायः, अभिधाशक्तिग्राहकव्याकरणकोशादिभिरुक्तार्थालाभात् , पञ्च- शाखः शयः पाणि'-रित्यमरकोशव्यारयाया पञ्च शाखा इवादगुलयोऽस्येति पञ्चशाखः, शेतेऽस्मिन् सर्वमिति शयः, ('पुसि' ३३१२११) घः। पणाय- मुख ढंक लेनेपर भी नाकसे निकलनेवाले उच्चास आदिकी यतना नहीं हो सकती। इस सूत्रसे 'उच्वास लेते समय आस्यक और पोपक (मलदार)को हाथसे ढंक लेना चाहिए,' ऐसा भगवान् यताते हैं, फिरभी नामधारी पडित 'मुखवस्त्रिकासे ढंकना चाहिए' ऐसा अर्थ निकालते है । उनसे हम पूछते हैं कि तुम हाथका अर्थ मुखवत्रिका करते हो सो वह अर्थ वाच्य है, या लक्ष्य है या व्यङ्गय है ? । पहला पक्ष तो ठीक नहीं है, क्योंकि अभिधा शक्तिके ग्राहक व्याकरण कोश आदिकोंमे यह अर्थ नहीं मिलता। अमरकोशमें हाथके तीन नाम दिये हैं-(१) पञ्चशाख (२) शय और (३) पाणि । व्याख्यामें बताया है कि शाखा जैसी पाँच अंगुलियाँ होती हैं इसलिए इसे पञ्चशाख कहते हैं । उसमे सब वस्तुएँ सोती (रखी जाती) हैं इसलिए शय कहते हैं। उससे सब लेनदेन લેવા છતા પણું નાકથી નીકળનાર ઉશ્વાસ આદિની યતના થઈ શકતી નથી આ સૂત્રથી ઉશ્વાસ લેતી વખતે આસ્થા અને પિષક (મલદ્વાર) ને હાથથી ઢાકી લેવું જોઈએ એમ ભગવાન બતાવે છે, છતાં પણ નામધારી પડિત “મુખવસ્ટિકાથી ઢાકવુ જોઈએ એ અર્થ કાઢે છે એમને અમે પૂછીએ છીએ કે તમે હાથને અર્થ મુખવસ્ત્રિકા કરે છે, તે એ અર્થ વા છે, યા લક્ષ્ય છે. કે વ્ય ગ્ય છે? પહેલે પક્ષ તે બરાબર નથી કારણ કે અભિધા શક્તિના ગ્રાહક વ્યાકરણ દેશ આદિમાં એ અર્થ નથી મળતે અમરકેશમા હાથના ત્રણ નામ माया छ (१) यशाम, (२) शय मने (3) पाणि व्यायामा બતાવ્યું છે કે શાખા જેવી પાચ આગળીઓ હોય છે તેથી તેને પચશાખ” કહે છે એમા બધી વસ્તુઓ સૂએ (રાખવામાં આવે ) છે તેથી તેને “ શ્ચય " Im . श्रीदशवकालिको सूत्रपाठो हि तापदेव विधते- "से भिररसू चा२ उस्सासमाणे चा नीसासमाणे वा कासमाणे वा छीयमाणे वा जभायमाणे वा उद्योग वा चायनिसगवा करेमाणे पुन्यामेव आसय वा पोसय चा पाणिणा परिपेरित्ता तओ सजयामेव उससिज वा जाव वायनिसग्गं चा करेजा" (सूत्र १०९) इति । छाया-~"स मिथुर उच्चसन् वा,निःश्वसन्वा, कासमानः (कास कुर्वन्) वा, सुवन् (क्षुत कुन्) वा, जृम्ममाणो बा, उद्विरन् वा, ((अधिष्ठानेन) बातनि- सगै वा कुर्वन् पूर्वमेव आस्यक वा पोपक या पाणिना परिपिघाय ततः सयत एवं उच्छ्वसेद् वा यापद् वातनिसर्ग वा कुर्यात्." इति संस्कृतम् । अत्र "आसय" इति लक्षणावृत्त्या घ्राणस्यापि बोधकम् , " उस्सासमाणे वा नीसासमाणे या छीयमाणे वा" इति पदानि लक्षणाया तात्पर्यग्राहकाणि। 'आसय' इत्यस्य मुखमात्रपरत्वे तु पाणिना तत्परिविधानेऽपि घ्राणजन्योच्छूना- उत्तर-ऐसाप्रश्नकरनाअज्ञानता है।आचारागसूत्रका पाठ ऐसा है- "भिक्षु श्वासोच्छ्रास लेते समय, खांसते समय, छींकते समय, जभाते समय, डकारते समय तथा अधोवायुका त्याग करते समय, पहले मुख अथवा मलद्वारकोहाधसे ढंककर फिर यतनापूर्वक श्वास लेवे यावत् अधोवायुका त्याग करे। यहाँ 'आसय' (मुख) पद लक्षणाके द्वारा घ्राणकाभी बोधक है। 'उस्सासमाणे वा निस्सासमाणे वा छीयमाणेवा' ये पद लक्षणा तात्पर्यके ग्राही-हैं। 'आसय' पदसे केवल मुखका अर्थ लिया जाय तो राधसे ઉત્તર-એ પ્રશ્ન ક અજ્ઞાનતા છે આચારાગ સુત્રને પાઠ એ છે— ભિક્ષુ શ્વાચ્છવાસ લેતી વખતે, ઉધરસ ખાતી વખતે, છીકતી વખતે બગાસુ ખાતી વખતે, ઓડકાર ખાતી વખતે તથા અધેવાયુને વખતે, પહેલા મુખ અથવા મળદ્વારને હાથથી ઢાકીને પછી થતનાપૂર્વક શ્વાસ લે ચાવત અધેવાયુને ત્યાગ કરે ” मी 'आसय' (भुभ) wa લાલુ દ્વારા પ્રાણુને પણ બેધક છે 'उस्सासमाणे वा निस्सासमाणे वा छीयमाणे वा 'मे पो सभा तापना ગ્રાહી છે પય શબ્દથી કેવળ મુખને અર્થ લેવામા આવે તે હાથથી સુખ ઢાકી ત્યાગ ક૨તી . . अध्ययन १ गा. १ मुखवस्तिकाविचारः ३७ सादियतनाया अनुपपत्तेः । अनेन सूत्रेण 'उच्छ्वासादिकाले आस्यकपोपकपरिपिधान पाणिना विधेय' मिति बोधयतो भगवतस्तात्पर्य मुखवस्त्रिया पिधाने कल्पयन्तः पण्डिताभिमानिन एवमनुयोक्तव्याः-'पाणि' शब्दस्य मुखवस्त्रिकारूपोऽर्थः किं वाच्यो लक्ष्यो व्यङ्गयो वा ? । नाद्यः, अभिधाशक्तिग्राहकव्याकरणकोशादिभिरक्तार्थालाभात् , 'पञ्च- शाखः शयः पाणि'-रित्यमरकोशव्यारयाया पश्च शाखा इवादगुलयोऽस्येति पञ्चशाखा, शेतेऽस्मिन् सर्वमिति शयः, ('पुसि' ३३११२११) घः' पणाय- मुख ढंक लेनेपर भी नाकसे निकलनेवाले उच्छ्वास आदिकी यतना नहीं हो सकती। इस सूत्रसे 'उच्छ्वास लेते समय आस्यक और पोपक (मलद्वार)को हाथसे ढंक लेना चाहिए,' ऐसा भगवान् यताते हैं, फिरभी नामधारी पडित 'मुखवत्रिकासे ढंकना चाहिए' ऐसा अर्थ निकालते हैं। उनसे हम पूछते हैं कि तुम हाथका अर्थ मुखवत्रिका करते हो सो वह अर्थ वाच्य है, या लक्ष्य है या व्यङ्गय है ? । पहला पक्ष तो ठीक नहीं है, क्योंकि अभिधा शक्तिके ग्राहक व्याकरण कोश आदिकोंमे यह अर्थ नहीं मिलता। अमरकोशमें हाथके तीन नाम दिये हैं-(१) पञ्चशाख (२) शय और (३) पाणि | व्याख्यामें बताया है कि शाखा जैसी पाँच अगुलियाँ होती हैं इसलिए इसे पञ्चशाख कहते हैं। उसमें सब वस्तुएँ सोती (रखी जाती) हैं इसलिए शय कहते हैं। उससे सब लेनदेन લેવા છતા પણ નાકથી નીકળનાર ઉશ્વાસ આદિની યતના થઈ શકતી નથી આ સૂત્રથી ઉશ્વાસ લેતી વખતે આસ્ટક અને પિષક (મલદાર) ને હાથથી ઢાકી લેવું જોઈએ એમ ભગવાન્ બતાવે છે, છતાં પણ નામધારી પડિત મુખવસ્ત્રિકાથી ઢાકવુ જોઈએ” એ અર્થ કાઢે છે એમને અમે પૂછીએ છીએ કે તમે હાથને અર્થ મુખવસ્ત્રિકા કરે છે, તે એ અર્થ વાચ્ય છે, ચા લક્ષ્ય છે વ્ય ગ્ય છે? પહેલો પક્ષ તે બરાબર નથી કારણ કે અભિધા શક્તિના ગ્રાહક વ્યાકરણ કેશ આદિમા એ અર્થ નથી મળતે અમરકેશમા હાથના ત્રણ નામ આપ્યા છે (૧) પચશાખ, (૨) શય અને (૩) પાણિ વ્યાખ્યામાં બતાવ્યું છે કે શાખા જેવી પાચ આગળીઓ હોય છે તેથી તેને “પચશાખ” કહે છે એમ બધી વસ્તુઓ સૂએ ( રાખવામાં આવે ) છે તેથી તેને “શય” श्रीदनवैकालिकसूत्रे ३८ न्स्यनेनेति पाणिः 'पण न्यवहारे स्तुती च' इत्यस्मात् 'अशिपणाग्यो डायलको च' (उ० ४.१३३) इत्तीण् , 'आयप्रत्ययस्य लुक थे-ति व्यु त्पादनेन तत्र करपाचरत्वस्यैव लाभाच । नापि द्वितीयः, मुरयार्थकरकरणापिधानतात्पर्यस्य निर्धापन तात्पर्यानुष पत्तिरूपलक्षणानीजस्याभावात् । नापि तृतीयः, मुग्यार्थतात्पर्यस्त्वेनैवरकरण पायुपिधानस्यापरकरेष मुखघ्राणपिधानस्य चोपपत्या व्यगयार्थमुखयसिकातात्पर्यावाल्पनाया अना वश्यकत्वात् , अनौचित्याच । पायुनिसर्गानन्तर भुते जायमाने पायुनिर्गतवायु- आदि व्यवहार होते है अतः उसे पाणि करते है। "अशिपणाप्यो रुडा यलको च" (उ० ४।१३३) इस सूत्रसे 'इण' होता है और 'आय' प्रत्ययका लुक होता है। ऐसी व्युत्पत्ति करनेसे 'कर'का वाचक ही रोता है। दूसरा भी पक्ष (लक्ष्य अर्थ मानना) ठीक नहीं है। लक्ष्य अर्थ वहाँ माना जाता है जहाँ मुख्य (शाब्दिक) अर्थ लेने में किसी प्रकारकी बाधा आती हो । यहाँ पर हाथसे ढंक कर' ऐसा अर्थ करने में कोई बाधा नहीं आती, इसलिए लक्षणा नहीं हो सकती, अतः यह लक्ष्यअर्थभी नहीं है। तीसरा (व्यङ्गय अर्थ मानना) भी पक्ष बाधित है। जब प्रधान लेनेसे एक हायसे मलद्वार ढंकना और दूसरे हाथसे नाक मुखका ढेंकना युक्त है तो व्यङ्गय अर्थ (मुग्ववत्रिकाके तात्पर्यकी कल्पना करना) अना वश्यक और अनुचित है। अधोवायु निकलते ही किसीको छोंक आने કહે છે તે વડે બધે લેણદેણ વગેરેને વહેવાર થાય છે તેથી એને “પાણિ” કહે છે अशिपणाग्यो रुडायलुमौ च (उ० ४ । १३३) मे सूत्रथी इण् थाय छ भने आय प्रत्यय लुक थाय छ मेवी व्युत्पत्ति ३२वाथी कर ना पाय भने બીજે પક્ષ પણું (લક્ષ્ય અર્થ માન) બરાબર નથી લય અર્થ માનવામાં આવે છે કે જ્યાં મુખ્ય ( શાબ્દિક) અર્થ લેવામાં કઈ બાધા આવે અહીં “હાથથી ઢાકીને ” એ અર્થ કરવામાં કઈ બાધા આ નથી, તેથી લક્ષણા થઈ શકતી નથી, એટલે એ લક્ષ્ય અર્થ પણ નથી ત્રિીજો પક્ષ ( વ્યગ્ય અર્થ માનવે ) પણ બાધિત છે. લેવાથી એક હાથથી મળદ્વાર ઢાકવું અને બીજા હાથે નાક-મુખને જ્યારે પ્રધાન અર્થ યુક્ત છે તે વ્યર્થ (મુખવકાને તાત્પર્યની કલ્પના કરવી) અને અને અનુચિત છે અધેવાયુ નીકળતી વખતે જ તેને છીંક આવવા લાગે ૮ अर्थ " 1 है १ ३९ अध्ययन १ गा. १ मुखवस्त्रिकाविचारः समष्टया मुखपत्रिकया मुखघ्राणपिधानस्यानौचित्यमापामरमतीतमेव । पाणिशब्देऽजहल्लक्षणाति स्वीकृत्य 'पाणिस्थितमुखवत्रिमये त्यर्थकल्पनेऽपि नोक्तानौचित्यदोपनिस्तारः । अपिच-आस्या-पोपकैतदुभयपरिपिधाने पाणि- नेत्येकमेव साधनमुक्त, तत्र पाणिस्थितमुखवत्रिकयेत्यर्थाङ्गीकारे दीर्घोच्छ्वासादी- नामघोवायुनिसर्गस्य च योगपद्ये सति कथमेशयैव पाणिस्थितया मुखवखिकया युगपदेव घ्राण मुख पायुचाऽऽवरीत शक्यत इति "पाणिणा परिपेरित्ता" इति भगवद्वाक्यस्यानुपपत्तिः।नच 'एकपाणिस्थितया मुखवस्त्रियाऽऽस्यकम् , अपरपा- लगे तो उसी अधोवायुवासित मुखवस्त्रिकासे 'मुख' और नाक मूदना बिलकुल अनुचित है और इस अनौचित्यको हरेक समझ सकता है। यदि 'पाणि' शब्दमें अजहल्लक्षणा वृत्ति मानकर 'पाणि' (हाथ) से पाणिमें स्थित मुखवस्त्रिका अर्थ लोगे तो भी अनौचित्य दोष नहीं स्ट सकता । दूसरी बात यह है कि मुख और मलद्वार ढंकनेका पाणिरूप एक ही साधन बताया है। यदि इसका अर्थ मुखवस्त्रिका किया जाये तो जव एक ही साथ अघोवायु और दीर्घ उच्छ्चास आवेगा तब एक ही मुखवत्रिका मलद्वार पर लगाई जावेगी या मुंहपर ? और यदि साथ ही छींक भी आयगी तो वही नाकमें कैसे लगाई जावेगी क्योंकि एक मुखवत्रिकासे एक साथ ही सब द्वार नहीं ढाँके जा सकते । अतः 'पाणिणा परिपेरित्ता' यह भगवान्का वचन ठीक नही बैठेगा। यदि " ऐसा समाधान करना चाहो कि एक हाथकी मुंहपत्तीसे मुंह और दूसरे એ અધેવાયુથી વાસિત મુખવસ્ત્રિકાથી મુખ અને નાક ઢાકવા એ બિલકુલ અનુચિત છે અને એ અનૌચિત્યને સૌ કઈ સમજી શકે છે न पाणि' मा मaat वृत्ति मानीन, 'पाkिe' () था - પાણિમા સ્થિત મુખવચિકાનો અર્થ લેશે તે પણ અનોચિય દેષ દૂર થઈ શકતે ", નથી બીજી વાત એ છે કે મુખ અને મળદ્વાર ઢાકવાનું પાણિરૂપ એકજ સાધન બતાવ્યું. છે જે એને અર્થ મુખવસ્ત્રિકા કરવામાં આવે તે જ્યારે એકી સાથે * અધેવાયુ અને દીર્ધ ઉચ્છવાસ આવશે ત્યારે એક જ મુખાગ્નિક મળદ્વાર લગાડવામાં આવશે કે મુખ પર? અને એ સાથે જ છીંક પણ આવશે તે નાક પર કેવી રીતે લગાડવામાં આવશે? કારણ કે એક મુખવસ્ત્રિકાથી એકી साथै मधा द्वार ढाही. शत नथी तथा 'पाणिणा परिपेहिता' समपानर्नु - વચન બરાબર બંધ બેસશે નહિ જે એવું સમાધાન કરવા ઈચ્છે કે એક હાથની A al પર ५ भने वा યુક્ત છે, તે વ્યથાર્થ (મુખવસ્ત્રિકાના તાત્પર્યની કલ્પના કરવી ) અનાજ અને અનુચિત છે અધેવાયુ નીકળતી વખતે જ કોઈને છીંક આવવા લાગે ! श्रीदनवैकालिको न्स्यनेनेति पाणिः 'पण व्यवहारे स्तुती च' इत्यस्मात् 'अशिपणाप्योग- डायलको च' (उ० ४।१३३) इतीण , 'आयप्रत्ययस्य लुरु चे'-ति व्यु त्पादनेन तत्र करवाचकत्यस्यैर लाभाच । नापि द्वितीयः, मुरयार्थकरकरणापिधानतात्पर्यस्य निर्वाधेन तात्पर्यानुप पत्तिरूपलक्षणाीजस्याभावात् । नापि तृतीयः, मुरयार्थतात्पर्यस्त्वनैवरकरेण पायुपिधानस्यापरकरेव मुखघ्राणपिधानस्य चोपपत्त्या व्यग यार्थमुखरखिकातात्पर्यस्वाल्पनाया अना घश्यकत्वात् , अनौचित्याच । गायुनिसर्गानन्तर भुते जायमाने पायुनिर्गतवायु आदि व्यवहार होते हैं अतः उसे पाणि करते है। "अशिपणाग्यो रुडा- यलुको च" (उ०४।१३३) इस सूत्रसे 'इण' होता है और 'आय' प्रत्ययका लुक होता है । ऐसी व्युत्पत्ति करनेसे 'कर'का चाचक ही होता है। दूसरा भी पक्ष (लक्ष्य अर्थ मानना) ठीक नहीं है। लक्ष्य अर्थ वहाँ माना जाता है जहाँ मुख्य (शाब्दिक) अर्थ लेनेमें किसी प्रकारकी बाधा आती हो । यहाँ पर हाथसे ढंक कर ऐसा अर्थ करने में कोई बाधा नहीं आती, इसलिए लक्षणा नहीं हो सकती, अतः यह लक्ष्यअर्थ भी नहीं है। तीसरा (व्यद्य अर्थ मानना) भी पक्ष याधित है । जय प्रधान अर्थ लेनेसे एक हाथसे मलद्वार ढंकना और दूसरे हाथसे नाक मुखका ढेंकना युक्त है तो व्यङ्गय अर्थ (मुखवत्रिकाके तात्पर्यको कल्पना करना) अना वश्यक और अनुचित है । अधोवायु निकलते ही किसीको छोंक કહે છે તે વડે બધે લેણદેણ વગેરેને વહેવાર થાય છે તેથી એને “પણિ” કહે છે अशिपणाग्यो रुडायलौ च (उ० ४ । १३३) में सूत्रयी इण् थाय छ भने आय प्रत्ययाना लुक थाय छे मेवी व्युत्पत्ति २वाथी कर ना पाय । બીજો પલ પણ (લક્ષ્ય અર્થ માન ) બરાબર નથી લક્ષ્ય માનવામાં આવે છે કે જ્યાં મુખ્ય ( શાબ્દિક) અર્થ લેવામાં કઈ બાધા આવે અહીં “ હાથથી ઢાકીને એ અર્થ કરવામાં કઈ બાધા એ નથી, તેથી લક્ષણ થઈ શકતી નથી, એટલે એ લક્ષ્ય અર્થ પણ નથી ત્રીજો પક્ષ ( વ્યગ્ય અર્થ માન) પણ બાધિત છે જ્યારે પ્રધાન લેવાથી એક હાથથી મળદ્વાર હાકલુ અને બીજા હાથે નાક-મુખને બને છે मर्थ। , अध्ययन १ गा. १ मुखवस्त्रिकाविचारः समृष्टया मुखवत्रिकया मुखघ्राणपिधानस्यानौचित्यमापामरमतीतमेव । पाणिशब्देऽजहलक्षणात्ति स्वीकृत्य 'पाणिस्थितमुखवत्रिक' त्यर्थकल्पनेऽपि नोक्तानौचित्यदोपनिस्तारः । अपिच-आस्या-पोपफैतदुभयपरिपिघाने पाणि- नेत्येकमेव साधनमुक्त, तत्र पाणिस्थितमुखवस्त्रिकयेत्यर्थाङ्गीकारे दीघोंच्छ्वासादी- नामधोवायुनिसर्गस्य च योगपये सति कथमेकयैव पाणिस्थितया मुखवत्रिकया युगपदेव घाण मुख पायुश्वाऽऽवरीतु शक्यत इति "पाणिणा परिपेहिता" इति भगवद्वाक्यस्यानुपपत्तिः।नच एकपाणिस्थितया मुखवस्त्रियाऽऽस्यकम् , अपरपा- लगे तो उसी अधोवायुवासित मुखवस्त्रिकासे 'मुख' और नाक मूदना पिलकुल अनुचित है और इस अनौचित्यको हरेक समझ सकता है। यदि 'पाणि' शब्दमें अजहल्लक्षणा वृत्ति मानकर 'पाणि' (राथ) से पाणिमें स्थित मुखवस्त्रिका अर्थ लोगे तो भी अनौचित्य दोप नहीं हट सकता। दूसरी यात यह है कि मुख और मलद्वार ढंकनेका पाणिरूप एक ही साधन बताया है। यदि इमका अर्थ मुखवस्त्रिका किया जाये तो जय एक ही साथ अधोवायु और दीर्घ उच्छ्वास आवेगा तब एक ही मुखवस्त्रिका मलद्वार पर लगाई जावेगी या मुंहपर ? और यदि नाथ ही छींक भी आयगी तो वही नाकमे कैसे लगाई जावेगी? क्योंकि एक मुखवत्रिकासे एक साथ ही सब द्वार नहीं ढोंके जा सकते । अतः 'पाणिणा परिपेहित्ता' यह भगवान्का वचन ठीक नहीं बैठेगा। यदि ऐसा समाधान करना चाहो कि एक हाथकी मुंहपत्तीसे मुंह और दूसरे એ અધેવાયુથી વાસિત મુખવઅિકાથી મુખ અને નાક ઢાકવા એ બિલકુલ અનુચિત છે અને એ અનૌચિત્યને સૌ કઈ સમજી શકે છે ने 'पाथि' मा मcaan वृत्ति मानीन, 'पाल' (12) था પાણિમા સ્થિત મુખવઅિકાને અર્થ લેશે તે પણ અનૌચિત્ય દોષ દૂર થઈ શકતા નથી બીજી વાત એ છે કે મુખ અને મળદ્વાર ઢાકવાનું પાણિરૂપ એકજ સાધન બતાવ્યું છે જે એને અર્થ મુખવસ્ટિકા કરવામા આવે તે જ્યારે એકી સાથે અધેવાયુ અને દીર્ઘ ઉચ્છવાસ આવશે ત્યારે એક જ મુખવસ્ત્રિકા મળદ્વાર લગાડવામાં આવશે કે મુખ પર? અને જે સાથે જ છીંક પણ આવશે તે તે નાક પર કેવી રીતે લગાડવામાં આવશે? કારણ કે એક મુખવસ્ત્રિકાથી એકી साथे या द्वार ढही त नयी तेथी 'पाणिणा परिपेहित्ता' मे भगवान વચન બરાબર બંધ બેસશે નહિ જે એવું સમાધાન કરવા ઈ છે કે એક હાથની પર munde . . श्रीकालिको नत्यनेनेति पाणिः 'पण व्यवहारे स्तुती च' इत्यस्मात् 'अशिपणाग्योर- डायलुको च' (उ० ४.१३३) इतीण , 'आयप्रत्ययस्य लुक थे-ति व्यु त्पादनेन तत्र करवाचकत्वस्यैत्र लाभाच । नापि द्वितीयः, मुरयार्थकरकरणकपिधानतात्पर्यस्य निर्वाधेन तात्पर्यानुष- पतिरूपलक्षणानीजस्याभावात् । नापि तृतीयः, मुरयार्थतात्पर्यस्त्वनराकरेण पायुपिधानस्यापरकरेण मुखघ्राणपिधानस्य चोपपत्त्या व्यद्यार्थमुखपत्रिकातात्पर्यस्वाल्पनाया अना- वश्यकत्वात् , अनौचित्याच । वायुनिसर्गानन्तर भुते जायमाने पायुनिर्गतवायु- आदि व्यवहार होते हैं अतः उसे पाणि कहते है। "अशिपणाय्यो रुडा यलुको च" (उ०४।१३३) इस सूत्रसे 'इण्' होताहै और 'आय' प्रत्ययका लुक होता है । ऐसी व्युत्पत्ति करनेसे 'कर'का चाचक ही रोता है। दूसरा भी पक्ष (लक्ष्य अर्थ मानना) ठीक नहीं है । लक्ष्य अर्थ वहाँ माना जाता है जहाँ मुख्य (शाब्दिक) अर्थ लेनेमें किसी प्रकारकी बाधा आती हो । यहाँ पर हाथसे ढंक कर' ऐसा अर्थ करने में कोई बाधा नहीं आती, इसलिए लक्षणा नहीं हो सकती, अतः यह लक्ष्य अर्थ भी नहीं है। तीसरा (व्यङ्गय अर्थ मानना) भी पक्ष घाधित है । जय प्रधान अर्थ लेनेसे एक हाथसे मलद्वार ढंकना और दूसरे हाथसे नाक मुखका ढेंकना युक्त है तो व्यङ्गय अर्थ (मुखवत्रिकाके तात्पर्यकी कल्पना करना) अना वश्यक और अनुचित है। अधोवायु निकलते ही किसीको छींक आने કહે છે તે વડે બધે લેણદેણ વગેરેને વહેવાર થાય છે તેથી એને “પાણિ” કહે છે अशिपणाग्यो रुडायलुकौ च (उ०४।१३३) मे सूत्रथी इणू याय, ने મા પ્રત્યયને થાય છે એવી વ્યુત્પત્તિ કરવાથી શર ને વાચક જ બને છે બીજે પક્ષ પણ ( લક્ષ્ય અર્થ માનવે ) બરાબર નથી લક્ષ્ય અર્થ ત્યા માનવામા આવે છે કે જ્યાં મુખ્ય ( શાબ્દિક ) અર્થ લેવામાં કોઈ પ્રકારની બાધા આવે અહીં “હાથથી ઢાકીને ” એ અર્થ કરવામાં કઈ બાધા આવતી નથી, તેથી લક્ષણ થઈ શકતી નથી, એટલે એ લક્ષ્ય અર્થ પણ નથી ત્રીજો પક્ષ ( વ્યગ્ય અર્થ માન) પણ બાધિત છે જ્યારે પ્રધાન અર્થ લેવાથી એક હાથથી મળદ્વાર ઢાકવુ અને બીજા હાથે નાક-મુખને ઢાકવું યુક્ત છે તે વ્યર્થ (મુખવસ્ત્રિકાના તાત્પર્યની કલ્પના કરવી) અનાવશ્યક અને અનુચિત છે અધેવારુ નીકળતી વખતે જ કોઈને છીંક આવવા લા ।

अध्ययन १ गा. १ मुखवस्त्रिकाविचारः समष्टया मुखवत्रिकया मुखघ्राणपिधानस्यानौचित्यमापामरमतीतमेव । पागिशन्देऽनहल्लक्षणात्ति स्वीकृत्य 'पाणिस्थितमुखवत्रिकये त्यर्थकल्पनेपि नोक्तानौचित्यदोषनिस्तारः । अपिच-आस्यक-पोपकैतदुभयपरिपिधाने पाणि- नेत्येकमेव साधनमुक्त, तत्र पाणिस्थितमुखवत्रिकयेत्यर्थाङ्गीकारे दीर्घोच्छ्वासादी- नामघोवायुनिसर्गस्य च योगपये सति कथमेकयैव पाणिस्थितया मुखवत्रिकया युगपदेव घ्राण मुख पायुधाऽऽवरीतु शक्यत इति "पाणिणा परिपेहित्ता" इति भगवद्वाक्यस्यानुपपत्तिः।नच 'एकपाणिस्थितया मुखवत्रिकयाऽऽस्यकम् , अपरपा- लगे तो उसी अधोवायुवासित मुखवस्त्रिकासे 'मुख' और नाक मूदना बिलकुल अनुचित है और इस अनौचित्यको हरेक समझ सकता है। यदि 'पाणि' शब्दमें अजहल्लक्षणा वृत्ति मानकर 'पाणि' (हाथ) से पाणिमें स्थित मुखवस्त्रिका अर्थ लोगे तो भी अनौचित्य दोप नहीं हट सकता । दूसरी बात यह है कि मुख और मलद्वार ढंकनेका पाणिरूप एक ही साधन बताया है। यदि इमका अर्थ मुखवस्त्रिका किया जाये तो जय एक ही साथ अधोवायु और दीर्घ उच्छ्वास आवेगा तब एक ही मुखवस्त्रिका मलद्वार पर लगाई जावेगी या मुंह पर ? और यदि साथ ही छींक भी आयगी तो वहीं नाकमे कैसे लगाई जावेगी? क्योंकि एक मुखवत्रिकासे एक साथ ही सब हार नहीं ढाँके जा सकते । अतः 'पाणिणा परिपेरित्ता' यह भगवानका वचन ठीक नहीं बैठेगा। यदि ऐसा समाधान करना चाहो कि एक हाथकी मुँहपत्तीसे मुंह और दूसरे એ અધેવાયુથી વાસિત મુખવસ્ત્રિકાથી મુખ અને નાક ઢાકવા એ બિલકુલ અનુચિત છે અને એ અનૌચિત્યને સો કેઈ સમજી શકે છે न. 'पाyि' शाहमा मत वृत्ति भानीन, 'पालि' (2) था પાણિમા સ્થિત મુખવસ્ત્રિકાને અર્થ લેશે તે પણ અનચિત્ય દેષ દૂર થઈ શક્ત નથી બીજી વાત એ છે કે મુખ અને મળદ્વાર ઢાકવાનું પાણિરૂપ એકજ સાધન બતાવ્યું છે જે એને અર્થ મુખવસ્ત્રિકા કરવામાં આવે તે જ્યારે એકી સાથે અધેવાયુ અને દીર્ધ ઉચ્છવાસ આવશે ત્યારે એક જ મુખવસ્ત્રિકા મળદ્વાર લગાડવામાં આવશે કે મુખ પર? અને એ સાથે જ છીંક પણ આવશે તે તે નાક પર કેવી રીતે લગાડવામા આવશે? કારણ કે એક મુખવસ્ત્રિકાથી એકી साथै मा दार ढाa Astal नथी तथा 'पाणिणा परिपेहित्ता' मे भगवान વચન બરાબર બંધ બેસશે નહિ જે એવું સમાધાન કરવા ઈચ્છે કે એક હાથની પર , श्रीदवेकालिको न्स्पनेनेति पाणिः ‘पण "यवहारे स्तुती च' इत्यस्मात् 'अशिपणाग्योग- डायलुको च' (उ० ४।१३३) इतीण , 'आयप्रत्ययस्य लुक् चे'-ति व्यु स्पादनेन तत्र करपाचकत्यस्यैत्र लाभार । नापि द्वितीयः, मुग्यार्थफरकरणपपिधानतात्पर्यस्य निर्वाधेन तात्पर्यानुप पत्तिरूपलक्षणावीजस्याभागत् । नापि तृतीयः, मुग्यार्थतात्पर्यवत्पनेवरकरण पायुपिधानस्यापरकरेण मुखप्राणपिधानस्य चोपपत्या व्यगायार्थ मुखात्रिकातात्पर्यस्त्वकल्पनाया अना- वश्यकत्वात् , अनौचित्याच । वायुनिसर्गानन्तर भुते जायमाने पायुनिर्गतवायु- आदि व्यवहार होते है अतः उसे पाणि करते है। "अशिपणाप्यो रुडा यलुकीच" (उ०४।१३३) इस सूत्रसे 'इण' होता है और 'आय' प्रत्ययका लुफ होता है । ऐसी व्युत्पत्ति करनेसे 'कर'का वाचक ही रोता है। दूसरा भी पक्ष (लक्ष्य अर्थ मानना) ठीक नही है । लक्ष्य अर्थ वहाँ माना जाता है जहाँ मुख्य (शान्दिक) अर्थ लेने में किसी प्रकारकी बाधा आती रो। यहाँ पर हाथसे ढंक कर ऐसा अर्थ करने में कोई बाधा नहीं आती, इसलिए लक्षणा नहीं हो सकती, अतः यह लक्ष्य अर्थ भी नहीं है। तीसरा (ब्यङ्गय अर्थ मानना) भी पक्ष याधित है । जब प्रधान अर्थ लेनेसे एक हाथसे मलद्वार ढंकना और दूसरे हाथसे नाक मुखका ढंकना युक्त है तो व्यङ्गय अर्थ (मुखवत्रिकाके तात्पर्यकी कल्पना करना) अना वश्यक और अनुचित है। अधोवायु निकलते ही किसीको छोक आने કહે છે તે વડે બધે લેણદેણ વગેરેને વહેવાર થાય છે તેથી એને “પાણિ” કહે છે अशिपणाग्यो रुडायलुकौ च (उ०४ । १३३) मे सूत्रथी इणू थाय छ भने आय प्रत्ययाना लुा थाय छ मेषी व्युत्पत्ति ३२पाथी कर न पाय ०८ गते બીજે પક્ષ પણ ( લય અર્થ માન) બરાબર નથી લય અર્થ ત્યા માનવામાં આવે છે કે જ્યા મુય ( શાબ્દિક ) અર્થ લેવામાં કોઈ પ્રકારની બાધા આવે અહીં “હાથથી ઢાકીને ” એ અર્થ કરવામાં કઈ બાધા આવતી નથી, તેથી લક્ષણ થઈ શકતી નથી, એટલે એ લક્ષ્ય અર્થ પણ નથી ત્રીજો પક્ષ ( વ્યગ્ય અર્થ માન) પણ બાધિત છે જ્યારે પ્રધાન અર્થ લેવાથી એક હાથથી મળદ્વાર ઢાકવું અને બીજા હાથે નાક-મુખને ઢાકવું યુક્ત છે તે વ્ય ગ્યાર્થ (મુખવકાના તાત્પર્યની કલ્પના કરવી) અનાવશ્યક અને અનુચિત છે અધેવાયુ નીકળતી વખતે જ કોઈને છીક આવવા my अध्ययन १ गा. १ मुखवत्रिकाविचारः समृष्टया मुखवत्रिकया मुखघ्राणपिधानस्यानौचित्यमापामरमतीतमेव । पाणिशन्देजहलक्षणाति स्वीकृत्य 'पाणिस्थितमुखवत्रिकये' त्यर्थकल्पनेऽपि नोक्तानौचित्यदोपनिस्तारः । अपिच-आस्यक-पोपकैतदुभयपरिपिधाने पाणि- नेत्येकमेव साधनमुक्त, तत्र पाणिस्थितमुखवत्रिकयेत्यागीकारे दीर्घोच्छ्वासादी- नामघोवायुनिसर्गस्य च योगपये सति कयमेकयैव पाणिस्थितया मुखवत्रिकया युगपदेव घ्राण मुख पायुधाऽऽवरीतु शक्यत इति "पाणिणा परिपेहिता" इति भगवद्वाक्यस्यानुपपत्तिः।नच 'एकपाणिस्थितया मुखवत्रिकयाऽऽस्यकम् , अपरपा- लगे तो उसी अधोवायुवासित मुखवस्त्रिकासे 'मुख' और नाक मूदना बिलकुल अनुचित है और इस अनौचित्यको हरेक समझ सकता है। यदि 'पाणि' शब्दमें अजहलक्षणा वृत्ति मानकर 'पाणि (राथ) से पाणिमें स्थित मुखवस्त्रिका अर्थ लोगे तो भी अनौचित्य दोष नहीं हट सकता । दूसरी यात यह है कि मुग्व और मलढार ढंकनेका पाणिरूप एक ही साधन बताया है। यदि इमका अर्थ मुखवस्त्रिका किया जावे तो जय एक ही साथ अघोवायु और दीर्घ उच्छ्वास आवेगा तब एक ही मुखवत्रिका मलद्वार पर लगाई जावेगी या मुंहपर ? और यदि साथ ही छींक भी आयगी तो वही नाकमें कैसे लगाई जावेगी? क्योंकि एक मुखवत्रिकासे एक साथ ही सय द्वार नहीं ढाँके जा सकते । अतः 'पाणिणा परिपेहिता' यह भगवानका वचन ठीक नहीं बैठेगा। यदि ऐसा समाधान करना चाहो कि एक हाथकी मुंहपत्तीसे मुंह और दूसरे એ અધેવાયુથી વાસિત મુખવઝિકાથી મુખ અને નાક ઢાકવા એ બિલકુલ અનુચિત છે અને એ અનોચિત્યને સૌ કઈ સમજી શકે છે ने 'पाथि' शाहमा म सक्ष! वृत्ति मानीन, 'पा' (डाय) था પાણિમા સ્થિત મુખત્રિકાને અર્થ લેશે તે પણ અનૌચિત્ય દેવ દૂર થઈ શક્ત નથી બીજી વાત એ છે કે મુખ અને મળદ્વાર ઢાકવાનું પાણિરૂપ એકજ સાધન બતાવ્યું છે જે એને અર્થ મુખવસ્ત્રિકા કરવામા આવે તે જ્યારે એકી સાથે અધેવાયુ અને દીર્ઘ ઉચ્છવાસ આવશે ત્યારે એક જ મુખવોિ મળદ્વાર લગાડવામાં આવશે કે સુખ પર? અને એ સાથે જ છીંક પણ આવશે તે તે નાક પર કેવી રીતે લગાડવામાં આવશે? કારણ કે એક મુખવાસ્ટિકથી એકી साथे मा २ ८ As नयी तथा 'पाणिणा परिपेहिता' भगवाननु વચન બરાબર બંધ બેસશે નહિ જે એવું સમાધાન કરવા ઈચ્છે કે એક હાથની પર श्रीदवकालिको न्स्यनेनेति पाणिः 'पण व्यवरारे स्तुतौ च' इत्यस्मात् 'अशिपणाय्यो- डायलुको च' (उ०४।१३३) इतीण् , 'आयप्रत्ययस्य लुकचे'-ति व्यु स्पादनेन तत्र करवाचकत्वस्यैव लाभाच । नापि द्वितीयः, मुरयार्थफरफरणापिधानतात्पर्यस्य निर्वाधेिन तात्पर्यानुप पत्तिरूपलक्षणाीजस्याभागात् । नापि तृतीयः, मुख्यार्थतात्पर्यस्येवरकरण पायुपिधानस्यापरकरेग मुखप्राणपिधानस्य चोपपत्त्या व्यद्यार्थमुखपत्रिकातात्पर्यस्त्वाल्पनाया अना- वश्यकत्वात् , अनौचित्याच । वायुनिसर्गानन्तर सुते जायमाने पायुनिर्गतवायु- आदि व्यवहार होते है अतः उसे पाणि करते हैं। "अशिपणाय्यो रुडा आलुको च" (उ०४।१३३) इस सूत्रसे 'इण' होता है और 'आय' प्रत्ययका लुक होता है । ऐसी व्युत्पत्ति करनेसे 'कर'का चाचकरी शेता है। दूसरा भी पक्ष (लक्ष्य अर्थ मानना) ठीक नही है । लक्ष्य अर्थ वहाँ माना जाता है जहाँ मुख्य (शान्दिक) अर्थ लेने में किसी प्रकारकी बाधा आती हो । यहाँ पर 'हायसे ढंक कर' ऐसा अर्थ करने में कोई बाधा नहीं आती, इसलिए लक्षणा नही हो सकती, अतः यह लक्ष्य अर्थभी नहीं है। तीसरा (व्यङ्गय अर्थ मानना) भी पक्ष बाधित है । जब प्रधान अर्थ लेनेसे एक हाथसे मलद्वार ढंकना और दूसरे हाथसे नाक मुखका ढंकना युक्त है तो व्यङ्गय अर्थ (मुखवत्रिकाके तात्पर्यकी कल्पना करना) अना घश्यक और अनुचित है। अधोवायु निकलते ही किसीको छोक आने કહે છે તે વડે એ લેણદેણ વગેરેને વહેવાર થાય છે તેથી એને “પાણિ” કહે છે अशिपणाग्यो रडायलुको च (उ०४।१३३) मे सूत्रथी इणू थाय छ भने ગાય પ્રત્યયને ૯ થાય છે એવી વ્યુત્પત્તિ કરવાથી જ ને વાચક જ બને છે બીજે યક્ષ પણ ( લય અર્થ માન) બરાબર નથી લક્ષ્મ અર્થ ત્યા માનવામાં આવે છે કે જ્યા મુખ્ય ( શાબ્દિક) અર્થ લેવામાં કોઈ પ્રકારની બાધા આવે અહી “ હાથથી ઢાકીને ' એ અર્થ કરવામાં કોઈ બાધા આવતી નથી, તેથી લક્ષણ થઈ શકતી નથી, એટલે એ લક્ષ્ય અર્થ પણ નથી બીજે પક્ષ ( વ્યગ્ય અર્થ માન) પણ બાધિત છે જ્યારે પ્રધાન અર્થ લેવાથી એક હાથથી મળદ્વાર ઢાકવું અને બીજા હાથે નાક-મુખને ઢાકવું યુક્ત છે તે વ્યગ્યાર્થ (મુખવસ્ત્રિકાના તાત્પર્યની કલ્પના કરવી) અનાવસ્થક અને અનુચિત છે અધેવાયુ નીકળતી વખતે જ કોઈ अध्ययन १ गा.१ मुखवस्त्रिकाविचारः ३९ समष्टया मुखवत्रिकया मुखघ्राणपिधानस्यानौचित्यमापामरमतीवमेव । पाणिशन्देजहल्लक्षणात्ति स्वीकृत्य 'पाणिस्थितमुखवत्रिकये त्यर्थकल्पनेऽपि नोक्तानौचित्यदोपनिस्तारः । अपिच-आस्यक-पोपकैतदुभयपरिपिधाने पाणि- नेत्येकमेव साधनमुक्त, तत्र पाणिस्थितमुखवत्रिकयेत्यर्थानीकारे दीर्घोच्छ्वासादी- नामधोवायुनिसर्गस्य च योगपये सति कयमेकयैव पाणिस्थितया मुखवत्रिकया युगपदेव घाण मुख पायुश्वाऽऽवरीतु शक्यत इति "पाणिणा परिपेहिता" इति भगवद्वाक्यस्यानुपपत्तिः।नच 'एकपाणिस्थितया मुखवत्रिकयाऽऽस्यकम् , अपरपा- लगे तो उसी अधोवायुवासित मुखवस्त्रिकासे 'मुख' और नाक मूदना बिलकुल अनुचित है और इस अनौचित्यको हरेक समझ सकता है। यदि 'पाणि' शब्दमें अजहल्लक्षणा वृत्ति मानकर 'पाणि (राथ) से पाणिमें स्थित मुखवस्त्रिका अर्थ लोगे तो भी अनौचित्य दोष नहीं हट सकता । दूसरी यात यह है कि मुख और मलदार ढंकनेका पाणिरूप एक ही साधन बताया है। यदि इमका अर्थ मुखवस्त्रिका किया जाये तो जब एक ही साथ अघोवायु और दीर्घ उच्छ्वास आवेगा तब एक ही मुखवस्त्रिका मलद्वार पर लगाई जावेगी या मुंहपर १ और यदि साथ ही छोंक भी आयगी तो वही नाकमें कैसे लगाई जावेगी? क्योंकि एक मुखवत्रिकासे एक साथ ही सब हार नहीं ढोंके जा सकते । अत: 'पाणिणा परिपेहित्ता' यह भगवान्का वचन ठीक नहीं बैठेगा। यदि ऐसा समाधान करना चाहो कि एक हाथकी मुँहपत्तीसे मुंह और दूसरे એ અધેવાયુથી વાસિત મુખવસ્ત્રિકાથી મુખ અને નાક ઢાકવા એ બિલકુલ અનુચિત છે અને એ અનચિત્યને સો કેઈ સમજી શકે છે ने पाथि' मा भsaal ति मानीन, ' पाए'() थी પાણિમા સ્થિત મુખવસ્ત્રિકાને અર્થ લેશે તે પણ અનોચિત્ય દેવ દૂર થઈ શકતે. નથી બીજી વાત એ છે કે મુખ અને મળદ્વાર ઢાકવાનું પાણિરૂપ એકજ સાધન બતાવ્યું છે જે એને અર્થ મુખવસ્ત્રિકા કરવામા આવે તે જ્યારે એકી સાથે અધેવાયુ અને દીર્ઘ ઉચ્છવાસ આવશે ત્યારે એક જ મુખવસ્ત્રિકા મળદ્વાર લગાડવામાં આવશે કે મુખ પર? અને એ સાથે જ છીંક પણ આવશે તે તે નાક પર કેવી રીતે લગાડવામાં આવશે કારણ કે એક મુખવસ્ત્રિકાથી એકી साये मा २ ढाडी Astt नथी तथा 'पाणिणा परिपेहिता' मे भगवानk વચન બરાબર બંધ બેસશે નહિ જે એવું સમાધાન કરવા ઈચ્છે કે એક હાથની - પર Aatm श्रीदवकालिको न्स्यनेनेति पाणिः 'पण व्यवहारे स्तुती च' इत्यस्मात् 'अशिपणाग्यो डायलको च' (उ० ४.१३३) इतीण , 'आयमत्ययस्य लुक चे'-ति व्यु स्पादनेन तत्र करवाचकत्तस्यैव लाभाच । नापि द्वितीयः, मुरयार्यकरकरणकपिधानतात्पर्यस्य निर्वाधेन तात्पर्यानुप पत्तिरूपलक्षणानीजस्याभागात् । नापि तृतीयः, मुग्यार्थतात्पर्यस्त्वेनैवाकरेण पायुपिधानस्यापरकरेण मुखप्राणपिधानस्य चोपपत्या व्यद्गपार्थमुखपत्रिकातात्पर्यकत्वात्पनाया अना वश्यकत्वात् , अनौचित्याच । वायुनिसर्गानन्तर क्षुते जायमाने पायुनिर्गतवायु आदि व्यवहार होते है अतः उसे पाणि कहते है। "अशिपणाय्यो कडा यलको च" (उ०४।१३३) इस सूत्रसे 'इण' होताहै और 'आय' प्रत्ययका लुक होता है । ऐसी व्युत्पत्ति करनेसे 'कर'का वाचक ही होता है। दूसरा भी पक्ष (लक्ष्य अर्थ मानना) ठीक नही है । लक्ष्य अर्थ वहाँ माना जाता है जहाँ मुख्य (शाब्दिक) अर्थ लेनेमें किसी प्रकारकी बाधा आती रो। यहाँ पर हाथसे ढंक कर ऐसा अर्थ करने में कोई बाधा नहीं आती, इसलिए लक्षणा नही हो सकती, अतः यह लक्ष्य अर्थभी नहीं है। तीसरा (व्यङ्गय अर्थ मानना) भी पक्ष याधित है । जब प्रधान अर्थ लेनेसे एक हाथसे मलद्वार ढंकना और दूसरे राधसे नाक मुखका ढंकना युक्त है तो व्यङ्गय अर्थ (मुखवत्रिकाके तात्पर्यकी कल्पना करना) अना वश्यक और अनुचित है। अधोवायु निकलते ही किसीको छींक आने કહે છે તે વડે બધે લેણદેણ વગેરેને વહેવાર થાય છે તેથી એને “પાણિ” કહે છે अशिपणाग्यो रुडायलुकौ च (उ०४।१३३) मे सूत्रथी इण् थाय छ भने ગાય પ્રત્યયને છું થાય છે એવી વ્યુત્પત્તિ કરવાથી શર ને વાચક જ બને છે બીજે પક્ષ પણ ( લક્ષ્ય અર્થ માનવે ) બરાબર નથી લક્ષ્ય અર્થ ત્યા માનવામા આવે છે કે જ્યાં મુખ્ય (શાબ્દિક ) અર્થ લેવામાં કઈ પ્રકારની બાધા આવે અહીં “હાથથી ઢાકીને ” એ અર્થ કરવામાં કોઈ બાધા આવતી નથી, તેથી લક્ષણ થઈ શકતી નથી, એટલે એ લક્ષ્ય અર્થ પણ નથી ત્રીજો પક્ષ (વ્યગ્ય અર્થ માન) પણ બાધિત છે જ્યારે પ્રધાન અર્થ લેવાથી એક હાથથી મળદ્વાર ઢાકવુ અને બીજા હાથે નાક-મુખને ઢાકવું યુક્ત છે તે વ્યગ્યાથે (મુખવસ્ત્રિકાના તાત્પર્યની કલ્પના કરવી) અનાવશ્યક અને અનુચિત છે અધેવાયુ નીકળતી વખતે જ કઈને છીંક આવવા લાગે તે अध्ययन -१ गा. १ मुखवत्रिकाविचारः ४१ तापत्तिः, अन्यथा परिधानवस्रावृतपोपफावरणोपदेशस्य वैयर्थ्यापत्तिरित्युभयथाऽपि न दोपनिस्तारः। तस्मात-" आसय था पोसय वा पाणिणा परिपेदित्ता" इति भगवद्वाक्यस्य 'मुखवत्रिका करेणैव धारणीया नतु दोरकेणे'-त्यर्थकल्पन साहसमानम् । मम तु सूक्ष्मन्यापिसम्पातिमघायुकायादिजीवविराधनापरिहाराय बद्धमुख- वत्रिकस्योच्छ्वासादिकाले मुखोद्गतवायुवेगेन मुखतो दोरकावलम्बिततदपगम- सम्भावनायाः सत्त्वेन तन्निवारणाय मुखवत्रिकाऽऽवृतस्यापि मुखस्य पाणिना परिपिधानमावश्यकमेव । एव परिधानवस्वाऽऽनृतस्यापि पोपरस्य परिपिधान विधेयमेव, उच्छ्वासादीना योगपत्रेऽयोगपधे वा एकेन करेण घ्राणमुखपिधानम् , फिर आवरण करने का उपदेश व्यर्थ हो जायगा। अतएव "आसय वा पोसय वा पाणिणा परिपेहिता" इस भगवद्वाक्य का यह अर्थ निकालना कि-'मुखवस्त्रिका हाथ ही मे रखनी चाहिए डोरेसे मुख पर नहीं चाधना चाहिए, ऐसी कल्पना करना साहसमात्र है। हमारे मतसे सूक्ष्म, व्यापी, सपातिम तथा वायुकाय आदि जीवोंकी विराधनासे बचनेके लिए मुखवत्रिका बॅधी हुई होने पर भी उच्छ्वास आदिके समय मुखसे निकलने वाले वायुके वेगसे मुखवस्त्रिकाके खिसक जानेकी सभावना रहती है, इसलिए उस समावनाको दूर करनेके वास्ते मुखवत्रिकासे आवृत मुखको फिर हाथसे आवृत करना आवश्यक है। इसी प्रकार चोलपट्ट होने पर भी अधोवायुके दिपयमे समझना चाहिए । उच्छ्वास आदि यदि एक ही साथ होवें तो एक हाथसे मुख નહિ તે આવૃતને ફરી આવરણ કરવાને ઉપદેશ વ્યર્થ બની જશે તેથી કરીને 'आसय वा पोसय वा पाणिणा परिपेहिता' लगवायनो मेवे भर्थ કાઢવે કે “મુખવસ્ત્રિકા હાથમાં રાખવી જોઈએ, દેરાથી મુખ પર આધવી ન જોઈએ એવી કલ્પના કરવી એ સાહસમાત્ર છે અમારે મતે સૂફમ, વ્યાપી, સપાતિમ તથા વાયુકાય આદિ ની વિરા ધનાથી બચવાને માટે મુખવસ્ત્રિકા બાધી હોવા છતા ઉચ્છવાસ આદિને સમયે મુખથી નીકળતા વાયુના વેગથી મુખવસ્ત્રિકા ખસી જવાની સંભાવના રહે છે તેથી એ સંભાવનાને દૂર કરવાને માટે મુખવસ્ત્રિકાથી ઢાકેલા મુખને પણ હ થથી દાવાની આવશ્યકતા છે એજ રીતે ચલપટ્ટ રહેવા છતા પણ અધેવાયુના વિષયમાં સમજવું ઉગ્વામ આદિ જે એકી સાથે જ થાય તે એક હાથથી ४ श्रीववेकालिको णिस्थितया पायुपस्त्रिया पोपफ परिपिधायें त्यागीगारेण समाधान मुनकमिति वाच्यम् , सकृदुचरितन्यायविरोधेन तादृशार्थकल्पनायाः कषुमशक्यवाद । किञ्च तेपामयोगपोऽपि पायुपिधायकवनखण्डे मुखवस्त्रिकात्वकल्पन परम- भ्रान्तिमूलम् , मुखपाचोरेक्यामापात् । अनारतस्यैय मुसादेरावरणे तात्पर्यसरवे परिपिधायेत्यत्र परीत्युपसर्गप्रयोगस्याऽऽनर्धक्यापत्तिव, अपिपूर्वकादपि ल्यपू- प्रत्ययसिद्धः। किञ्च-'आरतस्य पुनरापरण व्यर्थमेवेति हेतोरनारतस्यैवाऽऽवरणार्थमयमुप- देश" इति वदतस्तव इस्तपत्रिकाधारकस्य मते पोपफस्य परिधाननसनानावरणीप- हाथके पायुवस्त्रसे मलदार ढक देवेंगे, सो ठीक नहीं है। 'सकृदुधरि- तन्याय से ऐसी कल्पना करना शक्य नहीं है। अधोवायु और छोक आदि एक साथन भी हों तो भी अधोवायुकी यतना करनेवाले वनको मुग्ववत्रिका करना भारी भूल है, क्योंकि मुख और मलद्वार एक चीज नहीं है-दोनों अलग अलग हैं। यदि खुले मुख घोलनेका तात्पर्य हो तो 'परिपेहिता' पदमें 'परि' उपसर्ग व्यर्थ हो जायगा, क्योंकि 'अपि' उपसर्गपूर्वक धातुसे भी ल्यप् प्रत्यय होता है। 'ढंके हुएको फिर ढाँकना वृथा ही है, इसलिए बगैर देंके हुए को ढंकनेके लिए यह उपदेश दिया है।'-यदि हाथमें मुँहपत्ति रखने वाले ऐसा कहेंगे तो यह सिद्ध हो जायगा कि उनका मलद्वार सदा अनावृत (उघडा हुआ) रहता है। नहीं तो आवृतको મુહપત્તિથી મુખ અને બીજા હાથના પાયુવથી મળદ્વાર ઢાકી લેવાશે, તે તે ५२।१२ नथी, ॥२५ सदुच्चरितन्यायथा मेवी ४८५ना ४२वी २४य नथी અધેવાયું અને છીક આદિ એકી સાથે ન હોય તે પણ અધેવાયુની યતના કરનારા વસ્ત્રને મુખવસ્ત્રિકા કહેવી એ મોટી ભૂલ છે, કારણ કે મુખ અને મળદ્વાર એક ચીજ નથી બેઉ અલગ અલગ છે જે ખુલે મુખે બોલવાનું તાત્પર્ય હોય तो परिपेहिता शमा परि सर्भ व्यर्थ थ नशे र अपि Sat પૂર્વક ધાતુથી પણ વધુ પ્રત્યય થાય છે ઢાકેલાને ફરીથી ઢાડવુ એ વૃથા છે, તેથી ઢાક્યા વગરનાને ઢાકવાને માટે આ ઉપદેશ આપે છે જે હાથમાં મુહુપત્તી રાખનાર એમ કહેશે તે એમ સિદ્ધ થશે કે એનું મળદ્વાર સદા અનાવૃત ( ઉઘાડુ ) રહે છે , अध्ययन -१ गा. १ मुखवस्त्रिकाविचारः तापत्तिः, अन्यथा परिधानवस्त्रावृतपोपकावरणोपदेशस्य वैयापत्तिरित्युभयथाऽपि न दोपनिस्वारः। तस्मात-"आसय वा पोसय वा पाणिणा परिपेहिता" इति भगवद्वाक्यस्य 'मुखवत्रिका करेणैव धारणीया नतु दोरकेणे'-त्यर्थकल्पन साहसमात्रम् । मम तु सूक्ष्मव्यापिसम्पातिमवायुकायादिजीवविराधनापरिहारार्थ बद्धमुख- पत्रिकस्योच्छ्वासादिकाले मुखोद्गतवायुवेगेन मुखतो दोरकावलम्बिततदपगम- सम्भावनायाः सत्त्वेन तन्निवारणाय मुखवत्रिकाऽऽवृतस्यापि मुखस्य पाणिना परिपिधानमावश्यकमेव । एव परिधानवस्वाऽऽकृतस्यापि पोपरस्य परिपिधान विधेयमेव, उच्छ्वासादीना योगपत्रेऽयोगपये वा एकेन करेण घ्राणमुखपिधानम् , फिर आवरण करने का उपदेश व्यर्थ हो जायगा। अतएव " आसय वा पोसय चा पाणिणा परिपेहिता" इस भगवद्वाक्य का यह अर्थ निकालना कि-'मुखवस्त्रिका हाथ ही मे रखनी चाहिए डोरेसे मुख पर नहीं धाधना चाहिए, ऐसी कल्पना करना साहसमात्र है । हमारे मतसे सूक्ष्म, व्यापी, सपातिम तथा वायुकाय आदि जीवोंकी विराधनासे बचनेके लिए मुखवस्त्रिका यँधी हुई होने पर भी उच्छ्वास आदिके समय मुखसे निकलने वाले वायुके वेगसे मुखवस्त्रिकाके खिसक जानेकी सभावना रहती है, इसलिए उस समावनाको दूर करनेके वास्ते मुखवत्रिकासे आवृत मुखको फिर हाथसे आवृत करना आवश्यक है। इसी प्रकार चोलपट्ट होने पर भी अधोवायुके विषयमें समझना चाहिए। उच्छ्वास आदि यदि एक ही साथ होवे तो एक हाथसे मुख નહિ તે આવૃતને ફરી આવરણ કરવાને ઉપદેશ વ્યર્થ બની જશે તેથી કરીને भासय वा पोसय वा पाणिणा परिपेहिता' मे मगलवायनो मेवो मर्थ કાઢવે કે “મુખવસ્ત્રિકા હાથમાં રાખવી જોઈએ, દોરાથી મુખ પર આધવી ન જોઈએ એવી કલ્પના કરવી એ સાહસ માત્ર છે અમારે મતે સૂક્ષ્મ, વ્યાપી, સાપતિમ તથા વાયુકાય આદિ જીવોની વિરા ધનાથી બચવાને માટે મુખવશ્વિના બાધી હોવા છતા ઉચ્છવાસ આદિને સમયે મુખથી નીકળતા વાયુના વેગથી મુખવઢિડા ખસી જવાની સંભાવના રહે છે તેથી એ સભાવનાને દૂર કરવાને માટે મુખવસ્ત્રિકાથી ઢાકેલા મુખને પણ હાથથી દાવાની આવશ્યકતા છે એજ રીતે ચલપટ્ટ હોવા છતા પણ અધેવાયુના વિષયમા સમજવું ઉચ્છવાસ આદિ જે એકી સાથે જ થાય તે એક હાથથી . , , c श्रीदशवकालिको ४२ अपरेण पायुपिधान विधेयमिति भावः । पाणिनेत्यत्रैकवचनमपि पाणिवनातारवयक्षियेत्युभयपाणिवीपकरोड प्यनुकूलमेव । किञ्च पाणिशब्दस्य मुख्यायाधाऽभाषेन मुरयार्थवाधमूलिका लक्षणापि नाही- करणीया भवति । तथा चोक्तमूक्ष्मव्यापिमभृतिविधिजीवहिंसावारणाय सदेव सदोरकमुखवत्रिकाधारण नैतत्सूत्रतो रिध्यते, किन्तु परिपिधायेस्पत्र परिशम्द- प्रयोगेण भगवान मुखरस्त्रिकापिहितस्यैर मुखस्य पिधानमावेश्यतीत्यल पल्लवितेन। केचित्तु-'विपाकसूने मृगापुत्रा ययने-"तरण सामिया देवी तक सगडिय अगुकड्ढेमागीर जेणेर भूमिघरे तेणे उवागच्छति, उवाग- और नाक ढंक ले और दूसरे हाथसे अधोवायुकी यतना करे। "पाणिणा" यद्यपिण्कवचन है तथापिपाणित्वजातिअन्वय होनेसे दोनों हाथोंका चोधक होता है, इसलिए हमारे मतके अनुकूल री है । भी यहाँ 'पाणि' शब्दके मुख्य अर्थमें पाधा नहीं है अतः लक्षणा मानने योग्य नहीं है, क्योंकि लक्षणा नहीं होती है जरा मुख्य अर्थ में बाधा आती हो। इसलिए उक्त सूक्ष्म व्यापी वगैरह विविध जीवोंकी विराधनासे बचने के वास्ते सदैव डोरा सहित मुखवत्रिका मुख पर बाँधना इस सूत्रसे विरुद्ध नहीं है। परन्तु 'परिपेरित्ता' में 'परि' उपसर्गके प्रयोगसे प्रगट है कि महावीर प्रभुने मुंरपतिसे पिहित (के हुए) मुखको पुनः पिधान करना प्रतिपादित किया है। कोई कोई ऐसा करते है कि विपाकसूत्रमे मृगापुत्रके अध्ययनमें મુખ અને નાક ઢાકી લેવા અને બીજા હાથથી અવાયુની યતના કરવી ળા જે કે એકવચન છે તે પણ પાણિત્વ જાતિમા અન્વય થવાથી એક હાથનો બેધક થાય છે તેથી અમારે માટે તે શબ્દ અનુકૂળ જ છે અહી પણ શબ્દના મુખ્ય અર્થમા બાધા નથી તેથી લક્ષણ પણ માનવ ગ્ય નથી, કારણ કે લક્ષણા ત્યા થાય છે કે જ્યાં મુખ્ય અર્થમાં બાધા આવતી હોય તેથી કરીને ઉક્ત સૂમ, વ્યાપી વગેરે વિવિધ એની વિરાધનાથી બચવાને માટે સદૈવ દારા સાથે મુખવસ્ત્રિકા બાધવી એ સૂત્રથી વિરૂદ્ધ નથી પરંતુ परिपेहिता मला परि. Satan प्रयोगयी ५ याय महावीर प्रभु મુહપત્તિથી પિહિત (ઢાલ) મુખને પુન પિધાન કરવાનું પ્રતિપાદિત કર્યું છે કોઈ એમ કહે છે કે વિપાકસૂત્રમાં મૃગાપુત્રના અધ્યયનમાં લખ્યું છે- अध्ययन १ गा. १ मुग्ववत्रिकाविचारः च्छित्ता चउप्पुडेण वत्येण मुह वधमाणी भगव गोयम एव वयासि-तुम्भे- वि ण भते । मुरपोत्तिया मुह वधेह । तरण से भगव गोयमे मियाए देवीए एव वुत्ते समाणे मुहपोतियाए मुह बधड" इत्युक्त, तस्यायमाशयः- मृगापुन दर्शयितु प्रवृत्ता मृगादेवी भूमिगृहद्वारोद्घाटनकाले दुर्गन्धाघ्राणवारणाय चतुप्पुटेन वस्त्रेण स्वमुख पन्नती भगवन्त गौतम जगाद-हे भदन्त ! त्वमपि मुख- पोतिकया मुख धान, ततः स भगवान गौतमो मृगादेव्यैपमुक्तः सन् मुग्वपोति- कया मुख बध्नाति (स्म) इति । इदममेन मुस्पष्ट प्रतीयते-गौतमस्वामिनो मुखो- परि मुखरखिका वद्धा नासीत् किन्तु इस्त एव धृतेति, अत एव मृगादेवी दुर्गन्धा- प्राणप्रतिवन्धाय "तुम्भेचि ण भते! मुहपोतियाए मुह वधेट्" इति माथित- वतीत्याहुः तन्न सम्यक्-उप्णमुखवायुतः सम्पातिममूक्ष्मव्यापिजीवाना रक्षणार्थ ऐसा लिखा है-"तए ण सा" इत्यादि। इसका आशय यह है कि मृगादेवी जब मृगापुत्रको आहार देनेके लिए भोयरेके किवाड खोलने लगी तर नाफमे दुर्गन्ध आनेका निवारण करनेके लिए चार पडवालावस्त्रमुख पर याधकर भगवान् गौतमस्वामीसे कहने लगी-'हे भदन्त । आप भी मुखवस्त्रिकासे मुख वाध लीजिये। मृगादेवीका कथन सुनकर भगवान गौतम मुग्ववस्त्रिकासे मुख बाधते हैं (याध लिया)। इससे यह बिलकुल स्पष्ट है कि पहले गौतमस्वामीके मुख पर मुखवस्त्रिका नहीं वधी हुई थी, किन्तु हाथमे थी, इसीसे मृगादेवीने मुखवधिका बाधनेकी प्रार्थना की थी । उनका यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि मुखकी उष्ण वायुसे सपातिम, सूक्ष्म और व्यापी जीवोंकी रक्षा करनेके लिए तथा बाह्य वायुकायकी 'तए ण सा' या मेनो माशय में 3 भृावा न्यारे भृगापुत्रने माडार દેવાને માટે ભોયરાના કમાડ ખોલવા લાગી ત્યારે નાકમાં દુર્ગધ આવતી નિવાર વાને માટે ચાર પડવાળું વસ્ત્ર મુખ પર બાધીને ભગવા ગૌતમ સ્વામીને કહેવા લાગી કે-હે ભદન ! આપ પણ મુખવસ્ત્રિકાથી સુખ બાધી લે ભૂગાદેવીનું કથન સાભળીને ભગવાન ગૌતમ મુખવસ્ત્રિકાથી મુખ બાધે છે ( બાધી લીધુ ) આથી એ તદ્દન સ્પષ્ટ થાય છે કે પહેલા ગૌતમ સ્વામીના મુખ પર મુખવસ્ત્રિકા બાધેલી નહોતી, કિરતુ હાથમાં હતી, તેથી મગાદેવીએ મુખવાસ્ત્રિકા બાધવાની પ્રાર્થના કરી હતી એમનું એ કહેવું બરાબર નથી કારણ કે મુખના ઉષ્ણ વાયુથી સપાતિમ, સૂક્ષ્મ અને વ્યાપી જેની રક્ષા કરવાને માટે તથા બાહ્ય વાયુકાયની , અહી પાછા શબ્દને મુખ્ય અર્થમાં બાધા નથી તેથી લક્ષણ પણ માનવા श्रीदशवकालिको , अपरेण पायुपिधान विधेयमिति भारः । पाणिनेत्यप्रैकराचनमपि पाणिलगातारवयक्षियेत्युमयपाणिपोषकरपेड प्पनुकूलमे। किश्च पाणिशब्दस्य मुरयायाधाभाषेन मुरयार्थापलिका लक्षणापि नाही करणीया भवति । तथा चोक्तमूक्ष्मव्यापिमभूतिरिरिधनी हिंसावारणाय सदैव सदोरकमुखपत्रिकाधारण नैतत्सूत्रतो रिध्यते, स्न्तुि परिपिधायेत्या परिशब्द- भयोगेण भगवान् मुखरखिकापिहितस्यैा मुखस्य पिधानमावेदयतीस्थल पल्लवितेन। केचित्तु-'विपाकसूत्रे मृगापुत्रा ययने-"ताण सा मिया देवी तक सगडिय अगुकड्ढेमागी जेणे भूमिधरे तेणेव उवागच्छति, उषाग और नाक ढंक ले और दूसरे हाथसे अघोवायुकी यतना करे। "पाणिणा" यद्यपिकवचन है तथापिपाणिवजाति अन्वयरोनेसे दोनों हाथोंका योधक होता है, इसलिए हमारे मतके अनुकूल री है। यहाँ 'पाणि' शब्दके मुख्य अर्थमें याधा नहीं है अतः लक्षणा भी मानने योग्य नहीं है, क्योंकि लक्षणा नहीं होती है जहाँ मुख्य अर्थ में बाधा आती हो। इसलिए उक्त सूक्ष्म व्यापी वगैरर विविध जीवोंकी विराधनासे बचने के वास्ते सदैच डोरा सहित मुखवस्त्रिका मुख पर बाँधना इस सूत्रसे विरुद्ध नहीं है । परन्तु 'परिपेहिता' में 'परि' उपसर्गके प्रयोगसे प्रगट है कि महावीर प्रभुने मुंहपत्तिसे पिरित (के हुए) मुखको पुनः पिधान करना प्रतिपादित किया है। कोई कोई ऐसा कहते हैं कि विपाकसन्नमे भृगापुत्रके अध्ययनमें મુખ અને નાક ઢાકી લેવા અને બીજા હાથથી અધેવાયુની ચેતના કરવી पाणिणाने मेवयन ताप पाyिa ilan Aqय थवाथी 28 હાથને બાધક થાય છે તેથી અમારે મને તે શબ્દ અનુકૂળ જ છે ગ્ય નથી, કારણ કે લક્ષણ ત્યા થાય છે કે મુખ્ય અને બાધા આવતી હોય તેથી કરીને ઉક્ત સૂરમ, વ્યાયી વગેરે વિવિધ ની વિરાધનાથી બચવાને માટે સદૈવ દેરા સાથે મુખવસ્ત્રિકા બાધવી એ સૂવથી વિરૂદ્ધ નથી પરનું परिपेहिता ही परि उपसर्ग प्रयोगका थामडावीर अनुमे મુહપત્તિથી પિડિત (ઢાકેલા) મુખને પુન પિધાન કરવાનું પ્રતિપાદિત કર્યું છે કઈ કઈ એમ કહે છે કે વિપાકસૂવમ મૃગાપુત્રના અધ્યયનમા લખ્યું છે- अध्ययन १ गा. १ मुग्ववत्रिकाविचारः ४३ च्छित्ता चउप्पुडेण वत्येण मुह पधमाणी भगव गोयमण्व क्यासि-तुम्भे- वि ण भते ! मुहपोत्तियाए मुह यधेह । तरण से भगव गोयमे मियाए देवीए एच वुत्ते समाणे मुहपोतियाए मुह घड" इत्युक्त, तस्यायमाशय:- मृगापुत्र दर्शयितु प्रवृत्ता मृगादेवी भूमिगृहद्वारोद्घाटनकाले दुर्गन्धाघ्राणवारणाय चतुप्पुटेन वस्त्रेण स्वमुख यन्नती भगवन्त गौतम जगाद-हे भदन्त ! त्वमपि मुख- पोतिकया मुख वधान, ततः स भगवान् गौतमो मृगादेव्यैवमुक्तः सन् मुखपोति- कया मुख पध्नाति (स्म) इति । इदमनेन सुस्पष्ट प्रतीयते-गौतमस्वामिनो मुखो- परि मुखवत्रिका वद्धा नासीत् किन्तु इस्त एव धृतेति, अत एव मृगादेवी दुर्गन्धा- घाणपतिरन्धाय "तुम्भेवि ण भते! मुहपोतियाए मुह वधेट्" इति प्रार्थित- चतीत्याहुः तन्न सम्यक्-उप्णमुखवायुतः सम्पातिमसूक्ष्मव्यापिजीवाना रक्षणार्थ ऐसा लिखा है-"तए ण सा" इत्यादि। इसका आशय यह है कि मृगादेवी जय मृगापुत्रको आहार देनेके लिए भोयरेके किवाड़ खोलने लगी तब नाफमे दुर्गन्ध आनेका निवारण करनेके लिए चार पडवाला वस्त्रमुग्व पर वाधकर भगवान् गौतमस्वामीसे कहने लगी-'हे भदन्त । आप भी मुखवस्त्रिकासे मुख बाध लीजिये। मृगादेवीका कथन सुनकर भगवान् गौतम मुग्ववस्त्रिकासे मुख वाधते है (बाध लिया)। 'इससे यह विलकुल स्पष्ट है कि पहले गौतमस्वामीके मुख पर मुखवस्त्रिका नहीं वधी हुई थी, किन्तु हायमे थी, इसीसे मृगादेवीने मुखवधिका याधनेकी प्रार्थना की थी । उनका यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि मुखकी उष्ण वायुसे सपातिम, सूक्ष्म और व्यापी जीवोकी रक्षा करनेके लिए तथा बाह्य वायुकायकी 'तए ण सा' या मेना भाशय भृावा न्यारे भूतपुत्रने मार દેવાને માટે ભયરાના કમાડ ખેલવા લાગી ત્યારે નાકમાં દુર્ગધ આવતી નિવાર વાને માટે ચાર પડવાળું વસ્ત્ર મુખ પર બાળીને ભગવા' ગૌતમ સ્વામીને કહેવા લાગી કે-હે ભદન્ત ! આપ પણ મુખવસ્ત્રિકાથી મુખ બાધી લે મૃગાદેવીનું કથન સાભળીને ભગવાન ગૌતમ મુખવસ્ત્રિકાથી મુખ જોવે છે ( બાધી લીધુ ) આથી એ તદ્દન સ્પષ્ટ થાય છે કે પહેલા ગૌતમ સ્વામીના મુખ પર મુખવસ્ત્રિકા બાધેલી નહોતી, કિન્તુ હાથમાં હતી, તેથી મૃગાદેવીએ મુખવસ્ત્રિકા બાધવાની પ્રાર્થના કરી હતી એમનું એ કહેવુ બરાબર નથી કારણ કે મુખના ઉષ્ણ વાયુથી સપાતિમ, સૂક્ષમ અને વ્યાપી જીની રક્ષા કરવાને માટે તથા બાહ્ય વાયુકાયની श्रीदशवकासिम ४२ भी अपरेण पायुपिधान विधेयमिति भावः । पाणिनेत्यत्रैकवचनमपि पाणिवनातारवयविक्षयेत्युमपपाणिवोपकरपेड- प्यनुकूलमेव । किश्च पाणिशब्दस्य मुख्यार्यवाधाऽभाषेन मुरयायाधमूलिका लक्षणापि नाही करणीया भवति । तथा चोक्तमव्यापिनभूतिरिरिधनी हिंसावारणाय सदैव सदोरकमुखवत्रिकाधारण नैतत्सूत्रतो रुिध्यते, स्न्तुि परिपिधायेत्पत्र परिशब्द मयोगेण भगवान् मुखवत्रिकापिहितस्यैर मुखस्य पिधानमावेदयतीत्यल पलवितेन। केचित्तु-'विपाकसूत्रे मृगापुनाध्ययने-"ताण सा मिया देवी तक सगडिय अगुकड्ढेमागी२ जेणेष भूमिधरे तेणेव उवागच्छति, उधाग- और नाक ढंक ले और दूसरे हायसे अधोवायुकी यतना करे। "पाणिणा" यद्यपिएकवचन हतापिपाणिवजाति अन्वय होनेसे दोनों हाथोंका योधक होता है, इसलिए हमारे मतके अनुकूल री है। यहाँ 'पाणि' शब्दके मुख्य अर्थमें बाधा नहीं है अतः लक्षणा मानने योग्य नहीं है, क्योंकि लक्षणा वहीं होती है जहाँ मुख्य अर्थ में पाधा आती हो। इसलिए उक्त सूक्ष्म व्यापी वगैरह विविध जीवोंकी विराधनासे बचने के वास्ते सदैव डोरा सहित मुखवत्रिका मुख पर बाँधना इस सूत्रसे विरुद्ध नहीं है। परन्तु 'परिपेरित्ता' में 'परि' उपसर्गके प्रयोगसे प्रगट है कि महावीर प्रभुने मुंहपत्ति से पिरित (टके हुए) मुखको पुनः पिधान करना प्रतिपादित किया है। कोई कोई ऐसा करते हैं कि विपाकसूत्रमे मृगापुत्रके अध्ययनमें મુખ અને નાક ઢાકી લેવા અને બીજા હાથથી અધેવાયુની યતના કરવી पाणिणाने मेवयन छ तपशु पाणित्यतिमा मन्वय थवाथी 6 હાથનો બેધક થાય છે તેથી અમારે મતે તે શબ્દ અનુકૂળ જ છે અહી પળ શબ્દના મુખ્ય અર્થમાં બાધા નથી તેથી લક્ષણ પણ માનવા ગ્ય નથી, કારણ કે લક્ષણ ત્યા થાય છે કે જ્યા મુખ્ય અર્થમા બાધા આવતી હોય તેથી કરીને ઉક્ત સૂક્ષ્મ, વ્યાપી વગેરે વિવિધ જીવોની વિરાધનાથી બચવાને માટે સદૈવ દારા સાથે મુખવસ્ત્રિકા બાધવી એ સૂત્રથી વિરૂદ્ધ નથી પરનું परिपेदित्ता मही परि. SAfन प्रयोगका पट याय छ है महावीर प्रभु મુહપત્તિથી પિહિત (ઢાકેલા) સુખને પુન પિધાન કરવાનું પ્રતિપાદિત કર્યું છે કઈ કઈ એમ કહે છે કે વિપાકસૂત્રમાં મૃગાપુત્રના અધ્યયનમાં લખ્યું છે- . अध्ययन १ गा. १ मुखवत्रिकाविचारः ४५ किश्च दुर्गन्मात्राणवारणोद्देशेनापि तत्मार्थना नोपपयते, मुखमात्रमन्थने कृतेऽपि घ्राणेन्द्रियस्याऽनावरणेन तदुद्देशसिद्वयसम्भवादिति मुखमात्रे बन्धनान्वयतात्प- यस्यानुपपत्या तत्समीपवर्तिनि घ्राणेऽपि लक्षणावृत्त्या तात्पर्यमिति गम्यते । लक्षणाश्रयणस्याऽऽवश्यकत्वादेवाऽऽचारागसूत्रेऽपि-"से भिक्खू चार उस्सास- माणे वा नीसासमाणे वा कासमाणे वा छीयमाणे चा जभायमाणे चा उहोए वा वायनिसग्ग वा करेमाणे पुवामेव आसय वा पोसय वा पाणिणा परिपेहिता" इत्यादिपाठः सगच्छते, तत्राप्यास्यकशब्दे लक्षणाश्र- यणाऽभावे तु पाणिनाऽऽस्यकपरिपिधाने सति तज्जन्योच्छ्वासादियतनाया उप- पत्तावपि घ्राणजन्योच्चासनिवासक्षुतयतनाया अनुपपत्त्या तेपामागमविरोधः सुस्पष्ट एव । लिए मुग्व वाधनेकी प्रार्थना करना युक्त नहीं है, क्योंकि मुख थाध लेने पर भी दुर्गन्धका आना नहीं रुक सकता, अतः यहाँ मुख बाँधनेका अर्थ अयुक्त होनेसे मुखके समीपवर्ती नासिका वाँधनेका तात्पर्य लक्षणासे विदित होता है। लक्षणाका आश्रय लेना आवश्यक होनेसे ही आचा- रागसूत्रका "से भिक्खू वा." इत्यादि पाठ ठीक बैठता है। वहाँ पर भी यदि 'आसय' (मुख) शब्दमें लक्षणाका आश्रय न लिया जाय तो हादसे मुख ढक लेने पर मुग्वजन्य उच्छ्वास निःश्वास आदिकी यतना सभव हो सकती है किन्तु घ्राणजन्य उच्छ्वास-निःश्वास छोंककी यतना नहीं हो सकती। अतः उन लोगोंके मतमें आगमसे विरोध होना स्पष्ट है। પેસવા દેવાને માટે મુખ બાધવાની પ્રાર્થના કરવી યુક્ત નથી કારણ કે મુખ બાધી લેવા છતા દુગધ આવવાનું રોકી શકાતું નથી એટલે અહી મુખ બાંધવાને અર્થ અયુક્ત હોવાથી મુખની નિકટ આવેલુ નાક બાધવાનું તાત્પર્ય લક્ષણથી વિદિત થાય છે લક્ષણને આશ્રય લે આવશ્યક હેવાથી જ આચારગ સૂત્રને " से भिक्खू वा० " त्या 48 २ ५५ मेसे छे तेभा पने आसय (भुम) शण्डमा सक्षयानी आश्रय खेवामा न भावे તે હાથથી મુખ ઢાકી લેતા મુખજન્ય ઉરવાસ નિ શ્વાસ આદિની ચેતના સભવિત થઇ શકે છે, કિંતુ ઘણુજન્ય ઉર શ્વાસ-નિશ્વાસ છીંકની યતના થઈ શકતી નથી એટલે એ લોકેના મતમાં આગમથી વિરોધ થાય છે એ સ્પષ્ટ છે .

४४ श्रीदशकालिकमूने घायवायुकायरतार्थ च मुखरखिकापन्धनस्य सकरजैनागमवारपर्यविषयतया मुखवत्रिका बद्धा नासीदिति कल्पन तापन्मिश्यावरिलमित सकलागमविरुद्ध च । इदमत्र तत्त्वम्-दुर्गन्यामाणवारणाय 'मुर यधेह' इति प्रार्थनाऽनुपपन्ना, मुखेन गन्धग्रहणानुपपत्तेः, तस्मादत्र 'मुह' शन्दो न मुखमात्रपरः किन्तु यथा 'गङ्गाया घोपः' इत्यत्र गहाशब्दस्य प्रवाहरूपे शस्याये (मुग्या) घोषान्वय तात्पर्यानुपपत्या तत्समीपपत्तिनि तीरे लक्षणारया तात्पर्यमिति मन्यते, तथा मुखे बद्धाया एव तस्याः पुनस्तत्रैव बन्धनार्थमार्थना निष्फलतया नोपपद्यते, रक्षा करनेके लिए मुखवत्रिका यांधना सय जैन-आगमोंमें तात्पर्यरूपसे विधान किया गया है, इसलिए उनके मुख पर मुखवस्त्रिका नहीं बंधी थी' ऐसा करना मिथ्यात्वका ही प्रताप है और सब शास्त्रोंसे विरुद्ध है । तात्पर्य यह है कि दुर्गन्धसे बचनेके लिए मुख धाधनेकी प्रार्थना उचित नहीं है, क्योंकि मुखसे गन्धका ग्रहण नहीं होता। अतएव यहाँ मुखसे केवल मुसही अर्थ नहीं है। जसे "गगामें घोप (अहीरोंकी वसती) है। इस वाक्यसे ऐसा मतलय नहीं निकल सकता कि गगाकी बीचधारमें अहीरोंकी धसती है, क्योंकि ऐसा होना अनुपपन्न है । अतएव जय वाक्यके मुख्य (शाब्दिक अर्थ में बाधा आती हो तप लक्षणासे दूसरा मतलब लेना पडता है कि-गगाके किनारे अही- रोकी वसती है। इसीप्रकार मुखवस्त्रिकाका जब पहलेसे बंधी हुई है तब पुनः वाधनेकी प्रार्थना व्यर्थ पडती है, तथा दुर्गन्ध नाकमे न घुसने देनेके રક્ષા કરવાને માટે મુખવસ્ત્રિકા બાધવી એવુ બધા જૈન-આગમમા તાત્પર્યરૂપે વિધાન કરવામાં આવ્યું છે તેથી એમના મુખ પર સુખશ્વિક બાધેલી નહોતી એમ કહેવું એ મિથ્યાત્વને જ પ્રતાપ છે અને બધા શાસ્ત્રોથી વિરૂદ્ધ છે તાત્પર્ય એ છે કે દુર્ગધથી બચવાને માટે મુખ બાધવાની પ્રાર્થના ઉચિત નથી, કારણ મુખથી ગધનું ગ્રહણ થતું નથી એટલે અહીં મુખથી કેવળ મુખને જ અર્થે થતું નથી જેમ “ગગામ ઘેષ (આહીરની વસતી) છે” એ વાકયથી એવી મતલબ નથી નીકળી શકતી કે ગગાની વચ્ચે પાણીના પ્રવાહમાં અહીંની વસતી છે, કેમકે એમ હોવુ અનુપપન્ન છે એટલે કે જ્યારે શાબ્દિક અર્થમાં બાધા આવે છે ત્યારે લક્ષણથી બીજી મતલબ લેવી પડે છે, કે ગગને કિનારે અહીરની વસતી છે એ રીતે મુખશ્ચિક જે પહેલેથી ખાધી રાખેલી છે તે પુન બાધવાની પ્રાર્થના વ્યર્થ બને છે તથા દુર્ગધ ના ला વાકયના મુખ્ય अ ययन १ गा. १ मुखवस्त्रिकारिचारः ४५ किञ्च दुर्गन्धात्राणवारणोदेशेनापि तत्मार्थना नोपपद्यते, मुखमात्रबन्धने कृतेऽपि घाणेन्द्रियस्याऽनावरणेन तदुदेशसिद्धयसम्भवादिति मुखमात्रे बन्धनान्वयतात्प- यस्यानुपपत्त्या तत्समीपवर्तिनि घाणेऽपि लक्षणाच्या तात्पर्यमिति गम्यते । लक्षणाश्रयणस्याऽऽवश्यकत्वादेवाऽऽचारागसूत्रेऽपि-“से भिक्खू चार उस्सास- माणे वा नीसासमाणे वा कासमाणे वा छीयमाणे वा जभायमाणे वा उद्योए वा चायनिसग्ग वा करेमाणे पुन्वामेव आसय वा पोसय वा पाणिणा परिपेहिता" इत्यादिपाठः सगन्छते, ताप्यास्यकशन्दे लक्षणाश्र- यणाऽभावे तु पाणिनाऽऽस्यकपरिपिधाने सति तज्जन्योच्छ्वासादियतनाया उप- पत्तावपि प्राणजन्योच्चासनिवासातयतनाया अनुपपत्त्या सेपामागमविरोधः मुस्पष्ट एव । लिए मुग्व याधनेकी प्रार्थना करना युक्त नहीं है, क्योंकि मुख यांध लेने पर भी दुर्गन्धका आना नहीं रुक सकता, अतः यहाँ मुख बाँधनेका अर्थ अयुक्त होनेसे मुखके समीपवर्ती नासिका बाँधनेका तात्पर्य लक्षणासे विदित होता है । लक्षणाका आश्रय लेना आवश्यक होनेसे ही आचा- रागसूत्रका “से भिक्खू वा०" इत्यादि पाठ ठीक बैठता है। वहाँ पर भी यदि 'आसय ' (मुख) शब्दमें लक्षणाका आश्रय न लिया जाय तो हाधसे मुख ढंक लेने पर मुग्वजन्य उच्छ्वास निःश्वास आदिकी यतमा सभव होसकती है किन्तु घाणजन्य उच्छ्चास-निःश्वास छोंककी यतना नही हो सकती। अतः उन लोगोंके मतमें आगमसे विरोध होना स्पष्ट है। પિસવા દેવાને માટે મુખ બાધવાની પ્રાર્થના કરવી યુક્ત નથી કારણ કે મુખ બાધી લેવા છતા દુગધ આવવાનું રોકી શકાતું નથી એટલે અહી મુખ બાંધવાને અર્થ અયુક્ત હોવાથી મુખની નિકટ આવેલું નાક બાધવાનું તાત્પર્ય લક્ષણથી વિદિત થાય છે લક્ષણને આશ્રય લે આવશ્યક હેવાથી જ આચરાગ સૂત્રને " से भिक्खू वा." त्या पा ॥२२५२ ५५ मेसे छे तेभा पने आसय (भुम) १७६मा क्षयाना माश्रय सेवामा न मावे તે હાથથી મુખ ઢાકી લેતા મુખજય ઉવાસ નિશ્વાસ આદિની ચેતના સભવિત થઈ શકે છે, કિંતુ ઘાણજન્ય ઉવાસ-નિ શ્વાસ છીંકની યતના થઈ શકતી નથી એટલે એ લોકોના મતમાં આગમયી વિરેધ થાય છે એ સ્પષ્ટ છે ४४ श्रीदर्शवकालिकात्रे याबवायुकायरक्षार्थ च मुखरखिकापन्धनस्य सकलजैनागमतात्पर्यविषयतया मुखपखिका बद्धा नासीदिति कल्पन तान्मिध्यावविलसित सकलागमविरुद्ध च । इदमत्र तत्त्वम्-दुर्गन्धामाणवारणाय 'मुर यघेह' इति मार्थनाऽनुपपन्ना, मुखेन गन्धग्रहणानुपपत्तेः, तस्मादत्र 'मुर' शन्दो न मुखमात्रपरः विन्तु यथा गङ्गाया घोपः' इत्यत्र गहाशब्दस्य मवाहरूपे गम्याय (मुरया) घोपान्वय- तात्पर्यानुपपत्या तत्समीपपत्तिनि तीरे लक्षणाच्या तात्पर्यमिति मन्यते, तथा मुखे बद्धाया एव तस्याः पुनस्तव बन्धनार्थमार्थना निष्फलतया नोपपते, रक्षा करनेके लिए मुखवत्रिका यांधना सय जैन-आगमोंमें तात्पर्यरूपसे विधान किया गया है, इसलिए उनके मुख पर मुखवस्त्रिका नहीं बंधी थी ऐसा कहना मिथ्यात्वकारी प्रताप है और सब शास्त्रोंसे विरुद्ध है । तात्पर्य यह है कि दुर्गन्धसे बचनेके लिए मुख बांधनेकी प्रार्थना उचित नहीं है, क्योंकि मुखसे गन्धका ग्रहण नहीं होता। अतएव यहाँ मुखसे केवल मुखही अर्थ नहीं है। जसे "गंगामें घोप (अहीरोंकी वसती) है। इस वाक्यसे ऐसा मतलब नहीं निकल सकता कि गगाकी बीचधारमें अहीरोंकी वसती है, क्योंकि ऐसा होना अनुपपन्न है । अतएव जब वाक्यके मुख्य (शाब्दिक अर्थ में वाधा आती हो तय लक्षणासे दूसरा मतलब लेना पडता है कि-गंगाके किनारे अरी- रोंकी वसती है। इसीप्रकार मुग्ववत्रिकाका जब पहलेसे बंधी हुई है तथ पुनः बाधनेकी प्रार्थना व्यर्थ पडती है, तथा दुर्गन्ध नाकमें न घुसने देनेके રક્ષા કરવાને માટે મુખવસ્ત્રિકા બાધવી એવું બધા જેન-આગમાં તાત્પર્યરૂપે વિધાન કરવામાં આવ્યું છે તેથી એમના મુખ પર મુખવસ્ત્રિકા બાધેલી નહોતી એમ કહેવું એ મિથ્યાત્વને જ પ્રતાપ છે અને બધા શાસ્ત્રોથી વિરૂદ્ધ છે તાત્પર્ય એ છે કે દુર્ગધથી બચવા માટે મુખ બાધવાની પ્રાર્થના ઉચિત નથી, કારણ મુખથી ગધનું ગ્રહણ થતું નથી એટલે અહીં મુખથી કેવળ મુખને જ અર્થ થતું નથી જેમ “ગગામા શેષ (આહીરેની વસતી ) છે” એ વાકયથી એવી મતલબ નથી નીકળી શકતી કે ગગાની વચ્ચે પાણીના પ્રવાહમાં અહીંની વસતી છે, કેમકે એમ હોવુ અનુપયન છે એટલે કે જ્યારે (શાબ્દિક અર્થમાં બાધા આવે છે ત્યારે લક્ષણથી બીજી મતલબ લેવી પડે છે, કે ગગાને કિનારે અહીરેની વસતી છે એ રીતે મુખવસ્ટિક જે પહેલેથી બધી રાખેલી છે તે પુન બાધવાની પ્રાર્થના વ્યર્થ બને છે તથા દુર્ગધ નાકમા 8 વાકયને મુખ્ય अ ययन १ गा. १ मुखवस्त्रिकाविचारः किश्च दुर्गन्याघ्राणवारणोद्देशेनापि तत्मार्थना नोपपद्यते, मुखमात्रबन्धने कृतेऽपि घ्राणेन्द्रियस्याऽनावरणेन तदुद्देशसिद्धयसम्भवादिति मुखमात्रे बन्धनान्वयतात्प- यस्यानुपपत्त्या तत्समीपवर्तिनि घाणेऽपि लक्षणापत्त्या तात्पर्यमिति गम्यते । लक्षणाश्रयणस्याऽऽवश्यकत्वादेवाऽऽचाराद्गसूत्रेऽपि-"सें भिक्खू वार उस्सास- माणे वा नीसासमाणे वा कासमाणे वा छीयमाणे वा जभायमाणे वा उड्डोए वा वायनिसग्ग वा करेमाणे पुन्वामेव आसय वा पोसय वा पाणिणा परिपेहित्ता" इत्यादिपाठः सगन्छते, तत्राप्यास्यकशब्दे लक्षणाश्र- यणाऽभावे तु पाणिनाऽऽस्यकपरिपिधाने सति तज्जन्योच्छ्वासादियतनाया उप- पत्तावपि घ्राणजन्योच्छ्वासनिःश्वासातयतनाया अनुपपत्त्या तेपामागमविरोधः मुस्पष्ट एव । लिए मुग्न बाधनेकी प्रार्थना करना युक्त नहीं है, क्योंकि मुख थाध लेने पर भी दुर्गन्धका आना नहीं रुक सकता, अतः यहाँ मुख बाँधनेका अर्थ अयुक्त होनेसे मुखके समीपवर्ती नासिका बाँधनेका तात्पर्य लक्षणासे विदित होता है । लक्षणाका आश्रय लेना आवश्यक होनेसे ही आचा- रागसूत्रका "से भिक्खू चा" इत्यादि पाठ ठीक बैठता है। वहाँ पर भी यदि 'आसय ' (मुख) शब्दमें लक्षणाका आश्रय न लिया जाय तो हादसे मुख ढंक लेने पर मुग्वजन्य उच्छ्वास निःश्वास आदिकी यतना सभव हो सकती है किन्तु घ्राणजन्य उच्छ्वास-निःश्वास छोककी यतना नही हो सकती। अतः उन लोगोंके मतमें आगमसे विरोध होना स्पष्ट है। પેસવા દેવાને માટે મુખ બાધવાની પ્રાર્થના કરવી યુક્ત નથી કારણ કે મુખ બાધી લેવા છતા દુગધ આવવાનું રોકી શકાતું નથી એટલે અહી મુખ બાંધવાને અર્થ અયુક્ત હેવાથી મુખની નિકટ આવેલુ નાક બાધવાનું તાત્પર્ય લક્ષણથી વિદિત થાય છે લક્ષણને આશ્રય લે આવશ્યક હોવાથી જ આચારાગ સૂત્રને " से भिक्खू वा०" त्याहि पा २०१२ ५५ मेसे छ तमा पने आसय (भुम) शभा क्षयानी आश्रय सेवामा न भावे તે હાથથી મુખ ઢાકી લેતા મુખજન્ય ઉફવાસ નિશ્વાસ આદિની યતના સભવિત થઈ શકે છે, કિંતુ પ્રાણુજન્ય ઉશ્વાસ-નિ શ્વાસ છીંકની ચેતના થઈ શકતી નથી એટલે એ લોકોના મતમાં આગામથી વિરોધ થાય છે એ સ્પષ્ટ છે -- ४६ श्रीदशवकालिकसूत्रे नन्वेव मुखरखिका भातु वन्धनीया तथापि दोरकस्य बन्यने निवन्धनता ऽऽगमतो न लभ्यते, तथा च तत्मान्तभागेनापि बन्धन मुसम्पादम्, अल्मेतेन दोरकपरिग्रहेणेति चेन्न, मुखयस्त्रिकापन्धनस्य शास्त्रप्रतिपाचताया सिद्धाया तत्रा ल्पमेव दोरकमपेक्ष्य निरवद्यमकारेण तद्वन्धनसिद्धौ सत्या चारित्रमालिन्यापादक- प्रकारान्तराश्रयणस्यानौचित्यात् , मुखपत्रिकामान्तभागेन शिरःपञ्चामागे न्यून तावशान्थिविरहमाप्तावुचिताधिकतन्मानमल्पनायामुत्सूत्रमरूपणापत्तेश्च । किञ्च-मुखोपरि मुखवत्रिकाया धन्धन दोरकेणेव समुचित भगवदभिप्रेत च, - प्रश्न-उक्त प्रकारसे मुग पर मुपवत्रिका बाँधना तो सिद्ध हुआ किन्तु डोरा लगाकर वाँधना आगममें कहीं नहीं पाया जाता । इसलिए मुखवस्त्रिकाके छोर (पल्ला) से भी उसे बाँध सकते है, डोराकी क्या आवश्यकता है? उत्तर-उनका यह कथन ठीक नहीं है। क्योंकि जब यह सिद्ध हो चुका कि आगममे मुखपत्रिकाका पाँधना प्रतिपादित किया गया है तो छोटेसे डोरेसे निर्दोपतापूर्वक बन्धनकी सिद्धि होने पर चारित्रको मलिन करने वाले दूसरे तरीके काममें लानाअनुचित है। मुखवत्रिकाके छोरसे, सिरके पीछे न्यूनताके चशसे गाठ न लगा सकनेसे मुख वत्रिकाके उचित प्रमाणसे अधिककी कल्पना करनी पडेगी, और ऐसी कल्पना करनेसे उत्सूत्रप्ररूपणाका दोष लगेगा। दूसरी बात यह है कि डोरेसे ही मुख पर मुखवस्त्रिका बाधना પ્રશ્ન-એ પ્રકારે મુખ પર મુખત્રિકા બાધવાનું તે સિદ્ધ થયું, પર છે રે લગાવીને બાંધવાનુ આગમમાં કયાય મળી આવતુ નથી તેથી કરીને સુખ વસ્ત્રિકાના છેડાથી પણ તેને બાધી શકાય છે દરાની શી આવશ્યકતા છે ઉત્તર–એનું કથન બરાબર નથી, કારણ કે જે એ સિદ્ધ થઈ ચૂકયુ કે આગમમાં મુખવસ્ત્રિકા બાધવાનું પ્રતિપાદિત કરવામાં આવ્યું છે તે નાના સરખા દેરાથી નિર્દોષતા–પૂર્વક બ ધનની સિદ્ધિ થતા ચારિત્રને મલિન કરનાર કરીને કામમાં લે એ અનુચિત છે, મુખવસ્ત્રિકાના છેડાથી શિવની પાછળ ન્યૂનતાને કારણે ગાઠ ન બાધી શકાવાથી મુખવસ્ત્રિકાને ઉચિત પ્રમાણુથી વધારે (सामी) रामपानी કલ્પના કરવી પડશે, અને એવી કલ્પના કરવાથી ઉસૂત્ર- બીજી વાત એ છે કે દેરાથી જ મુખ પર મુખવસ્ત્રિકા બાધવી ઉચિત છે Lપ્રકાર પ્રરૂપણને દેષ લાગશે अ ययन १ गा. १ मुखबलिकाविचारः ४७ लोके हि बन्धन गुणेनैव प्रसिद्ध तत्रापि यथायोग्यमेव मूत्रदोरकादयस्तदर्थमा- दीयन्ते, यथा पुष्पपुस्तकवसनादिनन्यनार्थी यथाक्रम मृदुमेव दोरकमुपादत्ते । किञ्च-सामाचारीग्रन्थे-"मुग्ववत्रिका प्रतिलेरय मुखे बद्ध्वा प्रतिले- खयति रजोहरणम्" इत्युक्त देवचन्द्रमरिणाऽपि । अन मुखवत्रिकाया वन्ध- नक्रियाकर्मत्वेन प्रतिपादनात् तदौचित्याच सा दोरकरूपमनुरूप करणमपेक्षत एव । तत्मान्तभागेन ग्रन्धिदाने तु तत्र करणत्वकल्पन देवचन्द्रसूरिविरुद्धमयुक्त च, कर्मत्व-करणत्वयोविरोधात् । उचित है और यही यात भगवानको भी इष्ट है । लोकमे किसी वस्तुका याँधना डोरेसे ही प्रसिद्ध है। उसमें भी यथायोग्य सूत्रका डोरा आदि बाँधनेके काम में लाये जाते हैं, जैसे फल, पुस्तक या कपडा बाँधने वाले क्रमशः कोमल डोरेको ही काममें लाते है। सामाचारी ग्रन्थ में देवचन्द्रसूरिने लिखा है-"मुखवस्त्रिका प्रतिलेख्य मुखे बद्ध्वा प्रतिलेखयति रजोहरणम् ।" इस वाक्य में मुखवत्रिकाको बाँधनेरूप क्रियाका कर्म बताया है और वह उचित भी है। इसलिये वह (क्रिया) मुखवस्त्रिकाके अनुरूप डोरारूप करणकी अपेक्षा रखती है। तात्पर्य यह है कि जन मुखवस्त्रिका कर्म है तर करण भी कोई होना चाहिये और वह करण अर्थात् जिससे याँधनारूप क्रिया होती है, डोरा ही होना चाहिए।गाठ लगाने में करणत्वकी कल्पना करना देवचन्द्रसूरिसे विरुद्ध है और अयुक्त है, क्योंकि कर्मत्व और करणत्वका विरोध है। વાત ભગવાનને પણ ઈષ્ટ છે કેમ કે વસ્તુને બાધવાનું કાર્ય પ્રસિદ્ધ છે તેમા પણ યથાયેગ્ય સૂતરને દોરે વગેરે બાધવાના કામમાં લેવામાં આવે છે, જેમકે ફૂલ, પુસ્તક યા કપડુ બાંધનારા ક્રમશ કમળ દેરાને જ કામમાં લે છે साभाया। अथमा हेवयन्द्रसूरिये सभ्यु छ “ मुखवत्रिका प्रतिलेख्य मुखे वद्वा प्रतिलेखयति रजोहरणम्" में पाया भुमपन्निशाने पा३५ ठियानु કમ બતાવ્યું છે અને તે ઉચિત પણ છે તેથી કરીને એ (ક્રિયા) મુખવસ્ત્રિકાને અનુરૂપ દેરારૂપ કરણની અપેક્ષા રાખે છે તાત્પર્ય એ છે કે જે મુખવસ્ત્રિકા કર્મ છે તે કરણ પણ હોવું જોઈએ અને એ કરણ અર્થાત જેવડે બાધવારૂપ ક્રિયા થાય છે તે દરે જ હૈ જોઈએ ગાઠ બાંધવામાં કરણત્વની કલ્પના કરવી એ દેવચનસૂરિથી વિરૂદ્ધ છે અને અયુક્ત છે, કારણ કે કર્મ અને કરણત્વને વિરોધ છે અને એ જ રાથી જ . . श्रीदनवैकालिकमूत्र मन्येव मुखरखिका भातु पन्धनीया तथापि दोरकस्य बन्धने निबन्धनता गमतो न लभ्यते, तथा च तत्मान्तभागेनापि बन्धन मुसम्पादम्, अन्मेतेन दोरकपरिग्रहेणेति चेन्न, मुखरखिकारन्धनस्य शास्त्रमतिपायताया सिद्धाया तत्रा रूपमेच दोरकमपेक्ष्य निरसयमकारेण तदन्धनसिद्धी सत्या चारित्रमालिन्यापादक मकारान्तराश्रयणस्यानौचित्यात्, मुखपत्रिकामान्तभागेन गिरःपचादागे न्यून तावशान्थिपिरहमाताधुचिताधिस्तन्मानारपनायामुत्सूत्रमरूपणापत्तेश्च । किञ्च-मुखोपरि मुखात्रिकाया पन्धन दोरकेणव समुचित भगवदभिप्रेत च, प्रश्न-उक्त प्रकारसे मुग पर मुग्यचस्त्रिका बाँधना तो सिद्ध हुआ किन्तु डोरा लगाकर बाँधना आगममें कही नही पाया जाता । इसलिए मुखवस्त्रिकाके छोर (पल्ला) से भी उसे बाँध सकते हैं, डोराकी क्या आवश्यकता है? उत्तर-उनका यह कथन ठीक नही है। क्योंकि जब यह सिद्ध हो चुका कि आगममे मुखवत्रिकाका बाँधना प्रतिपादित किया गया है तो छोटेसे डोरेसे निर्दोषतापूर्वक पन्धनकी सिद्धि होने पर चारित्रको मलिन करने वाले दूसरे तरीके काममे लानाअनुचित है। मुखवत्रिकाके छोरसे, सिरके पीछे न्यूनताके वशसे गाठ न लगा सकनेसे मुख 'वत्रिकाके उचित प्रमाणसे अधिककी कल्पना करनी पडेगी, और ऐसी कल्पना करनेसे उत्सूत्रप्ररूपणाका दोष लगेगा। दूसरी बात यह है कि डोरेसे ही मुख पर मुखधस्त्रिका बाधना प्रश्न-2 प्रारे भुम ५२ भुमपनि माधवानु ता सिद्ध थयु, ५२ દેરે લગાવીને બાધવાનું આગમમાં કયાય મળી આવતું નથી તેથી કરીને મુખ વસ્ત્રિકાના છેડાથી પણ તેને બાધી શકાય છે દેરાની શી આવશ્યકતા છે ઉત્તર–એનું કથન બરાબર નથી, કારણ કે જો એ સિદ્ધ થઈ ચૂકયું આગમમાં મુખવસ્ત્રિકા બાધવાનું પ્રતિપાદિત કરવામા આવ્યુ છે તે નાના સરખાં દેરાથી નિયતા–પૂર્વક બધનની સિદ્ધિ થતા ચારિત્રને મલિન કરનારે બીજે કામમાં લે એ અનુચિત છે, મુખવસ્ત્રિકાના છેડાથી શિરની પાછળ ન્યૂનતાને કારણે ગાઠ ન બાધી શકાવાથી મુખવસ્ત્રિકાને ઉચિત પ્રમાણથી વધારે (सामी) रामपानी કરવી પડશે, અને એવી કલ્પના કરવાથી ઉત્સવ પ્રરૂપણને દોષ લાગશે બીજી વાત એ છે કે દેરાથી જ મુખ પર મુખવસ્ત્રિકા બાધવી ઉચિત છે પ્રકાર કલ્પના अध्ययन १ गा. १ मुखबनिकाविचारः ४७ लोके हि बन्धन गुणेनैव प्रसिद्ध तनापि यथायोग्यमेव मूत्रदोरकादयस्तदर्थमा- दीयन्ते, यथा पुष्पपुस्तकासनादिनन्यनार्थी यथाक्रम मृदुमेव दोरकमुपान्ते । किश्व-सामाचारीग्रन्थे-"मुखवस्त्रिका प्रतिलेरय मुखे बद्ध्वा प्रतिले- खयति रजोहरणम्" इत्युक्त देवचन्द्रमरिणाऽपि । अब मुखवत्रिकाया वन्ध- नक्रियाकर्मत्वेन प्रतिपादनात् तदौचित्याच सा दोरकरूपमनुरूप करणमपेक्षत एव । तत्मान्तभागेन ग्रन्धिदाने तु तन करणत्वकल्पन देवचन्द्रसूरिविरुद्धमयुक्त चं, कर्मत्व-करणत्वयोर्विरोधात् । उचित है और यही यात भगवानको भी इष्ट है । लोकमे किसी वस्तुका बाँधना डोरेसे ही प्रसिद्ध है। उसमें भी यथायोग्य सूत्रका डोरा आदि बाँधनेके काम में लाये जाते है, जैसे फल, पुस्तक या कपड़ा बाँधने वाले क्रमश कोमल डोरेको हो काममें लाते है। सामाचारी ग्रन्थ में देवचन्द्रसरिने लिखा है-"मुखवत्रिका प्रतिलेख्य मुखे बद्'वा प्रतिलेखयति रजोहरणम् । इस वाक्य में मुखवत्रिकाको याँधनेरूप क्रियाका कर्म बताया है और वह उचित भी है। इसलिये वह (क्रिया) मुखवस्त्रिकाके अनुरूप डोरारूप करणकी अपेक्षा रखती है। तात्पर्य यह है कि जब मुसवस्त्रिका कर्म है तय करण भी कोई होना चाहिये और वह करण अर्थात् जिससे याँधनारूप क्रिया होती है, डोरा ही होना चाहिए।गाठ लगानेमें करणत्वकी कल्पना करना देवचन्द्रसूरिसे विरुद्ध है और अयुक्त है, क्योंकि कर्मत्व और करणत्वका विरोध है। વાત ભગવાનને પણ ઈષ્ટ છે લેકમા કઈ વસ્તુને બાધવાનું કાર્ય પ્રસિદ્ધ છે તેમાં પણ યથાયેગ્ય સૂતરને દેરે વગેરે બાધવાના કામમાં લેવામાં આવે છે, જેમકે ફૂલ, પુસ્તક યા કપડુ બાંધનારા ક્રમશ કમળ જ કામમાં લે છે साभायारी अथमा हेवयन्द्रसूरिये सध्यु छे “ मुखवस्त्रिका प्रतिलेख्य मुखे वद् वा प्रतिलेखयति रजोहरणम्" में पाया भुगपश्चिाने गावा३५ जियानु કર્મ બતાવ્યું છે અને તે ઉચિત પણ છે તેથી કરીને એ (ક્રિયા) મુખવસ્ત્રિકાને અનુરૂપ દેરારૂપ કરણની અપેક્ષા રાખે છે તાત્પર્ય એ છે કે જે મુખવસ્ત્રિકા કમ છે તે કરણ પણ હોવું જોઈએ અને એ કરણ અર્થાત જેવડે બાધવારૂપ ક્રિયા થાય છે તે દરે જ હવે જોઈએ ગાઠ બાધવામાં કરણત્વની કલ્પના કરવી એ દેવચન્દ્રસૂરિથી વિરૂદ્ધ છે અને અયુકત છે, કારણ કે કર્મવ અને કરણત્વને વિરોધ છે અને એ જ રાથી જ દેરાને । श्रीदर्शकालिको मुखवत्रिकापन्धनार्थ कर्णयुगळे शस्त्रेण छिद्रकरण तु अतीवाऽमानविन म्भितम् , छिद्रकरणस्य शास्त्रानुकतया शस्त्रमयोगसाध्यतया दुष्करतया च तदपेक्षया निरवचत्वेन दोरकाश्रयणस्यैोचिस्यात् । नन्वेव दोरकाश्रयणे सदोररमुखत्रविकाधारकाणा भाषणकाले मुखोत्पतित- जलरुणैराीभूताया मुखवत्रिकायामशचिस्थानतया समून्मिजीवा उत्पधेरन् । इस्तेन मुखयस्त्रिकाधारणे तु न तथाविधजीवोत्पत्तिसम्भवः, तथा च दोरकपरियो दुराग्रहमात्रमिति चेन्न, मुखोत्पन्ननलकणाना भगवता जीरोत्पत्तिस्थानतयाऽनुक्त मुखवस्त्रिका पाँधनेके लिए-कानों में छेद कर लेना तो बड़ी भारी अज्ञानता है। क्योंकि साधुपनेके लिए किसी अवयवको छेदना शास्त्रों में निषिद्ध है और शस्त्रसा य होनेसे दुष्कर भी है। उसकी अपेक्षा निर्दोषरूपसे डोरेका आश्रय लेना ही उचित है। प्रश्न-डोरेका आश्रय लेनेसे डोरा सहित मुखवत्रिका मुख पर धारण करनेवालोंकी मुखवस्त्रिका भाषण करते समय मुखसे निकलनेवाले पानी के कणोंसे गीली हो जायगी और गीली होनेसे अशुचिस्थानरो जानेके कारण वहाँसमूच्छिम जीवोंकी उत्पत्ति होगी। राधमे मुखवत्रिका धारण करनेसे समूच्छिम जीवोंकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। इसलिए डोराका ग्रहण करना दुराग्रहमात्र है। उत्तर-ऐसा कहना उचित नहीं है। क्योंकि मुखसे निकलने वाले जलके कणोंको भगवान्ने जीवोत्पत्तिका स्थान नहीं बताया है। ऐसा भी મુખવસ્ત્રિકા બાધવાને માટે કાનમા છિદ્ર પડાવી લેવા એ તે ભારે અજ્ઞાનતા છે, કારણ કે સાધુપણાને માટે કઈ અવયવને છેદવુ શાસ્ત્રમાં નિષિદ્ધ છે અને શઅસાધ્ય હેવાથી દુષ્કર પણ છે એને બદલે નિર્દોષ રૂપે દેરાને આશ્રય લે જ ઉચિત છે પ્રશ્નદેરાને આશ્રય લેવાથી દરા-સહિત મુખવસ્ત્રિકા મુખ પર ધાર કરનારાઓની મુખવસ્ત્રિકા ભાષણ કરતી વખતે મુખમાંથી નીકળતા પાણીના કણેથી ભીની થઇ જશે અને ભીની થવાથી અશુચિસ્થાન થઈ જવાને કારણે હવે સ મૂચ્છિમ છની ઉત્પત્તિ થશે હાથમાં મુખાસ્ત્રિકા ધારણ કરવાથી સામૂચ્છિમ જેની ઉત્પત્તિ થતી નથી તેથી કરીને હેરાન ગ્રહણ કરવું એ દુરાગ્રહ થાય છે ઉત્તર-એમ કહેવું ઉચિત નથી, કારણ કે મુખથી નીકળતા જળના કને ભગવાને ઉત્પત્તિનું સ્થાન બતાવ્યું નથી, એમ પણ ન કહી શકાય .

" अययन १ गा. १ मुखवत्रिकाविचारः त्वात् । न चैतेपा जलकणाना खेलागतयाऽशुचिस्थानतया वा जीवोत्पत्तिस्थानत्व पतीयत इति वाच्यम् , तत्र खेलाशतामतीतेमन्तिमूलकत्वात् । वैद्यकशास्त्रे हि खेलस्य मुखजलकणाना च भेदः सुस्पष्टः, तथाहि खेल्शब्दः श्लेप्मण्यर्थे वर्त्तते, आमाशयो, हृदय, कण्ठः, शिरः, सत्ययश्चैतानि श्लेप्मणः स्थानानि, तथाचोक्त भावप्रकाशे- "आमाशयेऽय हृदये, कण्ठे शिरसि सन्धिपु । स्थानेप्वेपु मनुष्याणा, श्लेष्मा तिप्ठत्यनुक्रमात् ।।" इति, अस्य स्वरूप धर्माश्वोक्ताः सुश्रुतसहिताया यथा- " लेप्मा श्वेतो गुरुः स्निग्धः, पिच्छल: शीत एव च । मधुरस्त्वविदग्धः स्याद् , 'विदग्धो लवणः स्मृतः ।।" इति, नहीं कहना चाहिए कि वे जलकण खेलके अश है, इसलिए अशुचिस्थान हैं और अशुचिस्थान होनेसे जीवोत्पत्तिके स्थान हैं। क्योंकि उन जल- कणोंको खेल (कफ) का अश समझना भ्रान्तिमूलक है । 'खेल' शन्दका अर्थ श्लेष्म है। आमाशय, हृदय, कठ, सिर और सन्धियाँ श्लेष्म के स्थान हैं। भावप्रकाश में लिग्वा है- आमाशयेऽथ हृदये, कण्ठे शिरसि सन्धिषु । स्थानेष्वेषु मनुष्याणां, श्लेष्मा तिष्ठत्यनुक्रमात् ॥१॥ अर्थात्-" आमाशय, हृदय, कण्ठ, शिर और सधिभाग, इन स्थानों में मनुष्यों को अनुक्रम से कफ रहता है।" सुश्रुतसहितामें श्लेष्मका स्वरूप और गुण इस प्रकार बनाये हैं- કે એ જળકણ ખેલ (કફ) ના અશરૂપ હોય છે અને તેથી અશુચિ-સ્થાન છે અને અશુચિસ્થાન હોવાથી ઉત્પત્તિના સ્થાન છે એ જળકમાં કફને અશ સમજે એ બ્રાતિમૂલક છે તે શબ્દનો અર્થ લેમ્બ છે આમાશય, હૃદય, કઠ, શિર અને સધિ એ લેબનું સ્થાન છે ભાવપ્રકાશમાં લખ્યું છે કે- भामागयेऽथ हृदये, कण्ठे शिरसि सन्धिषु । स्थानेष्वेपु मनुष्याणा, श्लेप्मा तिप्ठत्यनुनमात् ।। અર્થાત-“આમાશય હૃદય કઠ શિ. અને સધભાગ એ સ્થાનેમા મનુષ્યને અનુક્રમથી કફ રહે છે ? સુશ્રુતન હિતામાં શ્લેષ્મનું સ્વરૂપ અને ગુણ આ પ્રકારે બતાવ્યા છે – १ विदग्ध-पका या जला हुआ । - ४८ श्रीदशवकालिकाले मुखपत्रिकापन्धनार्थ कर्णयुगले शस्त्रेण निकरण तु अतीवाऽज्ञानविनृ म्भितम् , छिद्रकरणस्य शास्त्रानुक्ततया शस्त्रमयोगसाध्यतया दुष्करतया व तदपेक्षया निरपवत्वेन दोरकाश्रयणस्यैौचित्यात् । नन्वेव दोरकाश्रयणे सदोरकमुखपत्रिकाधारकाणा भाषणकाले मुखोत्पतित जलकणैराीभूताया मुखपत्रिकायामशुचिस्थानतया समून्मिजीवा उत्पधेरन् , इस्तेन मुखवत्रिकाधारणे तु न तथाविधजीयोत्पत्तिसम्भः, तथा च दोरकपरिग्रहो दुराग्रहमात्रमिति चेन्न, मुखोत्पन्नजलरुणाना भगवता जीनोत्पत्तिस्थानतयाऽभुक्त मुखवस्त्रिका याँधनेके लिए-कानों में छेद कर लेना तो बड़ी भारी अज्ञानता है। क्योंकि साधुपनेके लिए किसी अवयवको छेदना शास्त्रों में निषिद्ध है और शस्त्रसा य होनेसे दुष्कर भी है। उसकी अपेक्षा निर्दोषरूपसे डोरेका आश्रय लेना ही उचित है। प्रश्न-डोरेका आश्रय लेनेसे डोरा सहित मुखवत्रिका मुख पर धारण करनेवालोंकी मुखवस्त्रिका भापण करते समय मुखसे निकलनेवाले पानी के कणोंसे गीली हो जायगी और गीली होनेसे अशुचिस्थान रो जानेके कारण वहाँसमूच्छिम जीवोंकी उत्पत्ति होगी। हाथमें मुखवस्त्रिकाधारण करनेसे समूच्छिम जीवोंकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। इसलिए डोराका ग्रहण करना दुराग्रहमात्र है। उत्तर-ऐसा करना उचित नहीं है। क्योंकि मुखसे निकलने वाले जलके कणोंको भगवान्ने जीवोत्पत्तिका स्थान नहीं बताया है। ऐसा भी મુખવસ્ત્રિકા બાધવાને માટે કાનમા છિદ્ર પડાવી લેવા એ તે ભારે અજ્ઞાનતા છે, કારણ કે સાધુપણને માટે કેઈ અવયવને છેદવુ શાસ્ત્રમાં નિષિદ્ધ છે અને શઅસાધ્ય હેવાથી દુષ્કર પણ છે એને બદલે નિર્દોષ રૂપે દોરાને આશ્રય લે જ ઉચિત છે પ્રશ્ન-દેરાને આશ્રય લેવાથી દેરા-સહિત મુખવસ્તિકા મુખ પર ધારણ કરનારાઓની મુખવસ્ત્રિકા ભાષણ કરતી વખતે મુખમાથી નીકળતા પાણીના કોથી ભીની થઇ જશે અને ભીની થવાથી અશુચિસ્થાન થઈ જવાને કારણે ત્રા સમૂર્ણિમ જીની ઉત્પત્તિ થશે હાથ મુખવસ્વિકા ધારણ કરવાથી સામૂચ્છિમ જીવની ઉત્પત્તિ થતી નથી તેથી કરીને દોરાનું ગ્રહણ કરવું એ દુરાગ્રહ થાય છે ઉત્તર–એમ કહેવું ઉચિત નથી, કારણ કે મુખથી નીકળતા જળની કોને ભગવાને જીત્યત્તિનું સ્થાન બતાવ્યું નથી, એમ પણ ન કહી શકાય . अ ययन १ गा १ मुखवत्रिकाविचारः त्वात् । न चैतेपा जनकणाना खेल्गशतयाऽशुचिस्थानतया वा जीवोत्पत्तिस्थानत्व मवीयत इति वाच्यम् , तत्र खेलागतापतोतेोन्निमूलकत्वात् । वैद्यकशास्त्रे हि खेलम्य मुखजलवणाना च भेद' सुस्पष्ट', तथाहि खेल्शब्दः श्लेष्मण्यये वर्त्तते, आमाशो, हृदय, क्ण्ठ , शिर., सन्धयश्चैतानि श्लेप्मण. स्थानानि, तथाचोक्त भावप्रकाशे- "आमाशयेऽय हृदये, कण्ठे शिरसि सन्धिषु । स्थानेप्वेषु मनुष्याणा, श्लेष्मा तिष्ठत्यनुक्रमात् ॥” इति, अस्य स्वरूप धर्माश्वोक्ताः सुश्रुतसहिताया यथा- "श्लेप्मा श्वेतो गुरुः स्निग्धः, पिच्छलः शीत एव च । मधुरम्त्वविदग्ध' स्याद् , 'विदग्धो लवणः स्मृतः ॥” इति, नहीं करना चाहिए कि वे जलकण खेलके अश हैं, इसलिए अशुचिस्थान हैं और अशुचिस्थान होनेसे जीवोत्पत्तिके स्थान हैं। क्योंकि उन जल- कणोंको खेल (कफ) का अश समझना भ्रान्तिमूलक है । 'खेल' शन्दका अर्थ श्लेष्म है। आमाशय, हृद्य, कठ, सिर और सन्धियाँ श्लेष्म के स्थान हैं। भावप्रकाश में लिखा है- आमाशयेऽथ हृदये, कण्ठे शिरसि सन्धिषु । स्थानेष्वेषु मनुष्याणा, श्लेष्मा तिष्ठत्यनुक्रमात् ॥१॥ अर्थात्- " आमाशय, हृदय, कण्ठ, शिर और सधिभाग, इन स्थानों में मनुष्यों को अनुक्रम से कफ रहता है।" सुश्रुतसहितामें श्लेष्मका स्वरूप और गुण इस प्रकार यताये हैं- કે એ જળકણ ખેલ (કફ) ના અશરૂપ હોય છે અને તેથી અશુચિસ્થાન છે અને અશુચિસ્થાન હેવાથી ઉત્પત્તિના સ્થાન છે એ જળકમાં કફને અશ સમજ એ બ્રાન્તિમૂલક છે તે શબ્દને અર્થ થ્ય છે આમારા, હૃદય, કઠ, શિર અને સધિ એ કલેષ્મનું સ્થાન છે ભાવપ્રકાશમાં લખ્યું છે કે- आमाशयेऽथ हृदये, कण्ठे शिरसि सन्धिषु । स्थानेष्वेपु मनुष्याणा, श्लेष्मा तिप्ठत्यनुक्रमात् ।। અર્થાત-“આમાશય હૃદય કઠ શિર અને સાધભાગ એ સ્થાનમાં મનુષ્યને અનુક્રમથી કફ રહે છે ? સુશ્રુતસંહિતામા લેમનું સ્વરૂપ અને ગુણ આ પ્રકારે બતાવ્યા છે – १ विदग्ध-पका या जला हुआ । Home Pr श्रीदवैकालिकसूत्रे मुखजलस्य तु रसनामूल तदग्रभागथेतिद्वयमुत्पत्तिस्थानम् , इद च चर्वित- स्यान्नस्य पिण्डीभवने कण्ठनलिफयाऽयोनयने पाचने च निमिसम् । अत एवं योगचिन्तामणौ मयमाध्याये- " रसाऽसदमासमेदोऽस्थिमज्जाशुकाणि धावपः । इत्युक्त्वा कस्य धातोः किं मलम् ? इति प्रदर्शयित पुनरमिहितम्- "जिहानेपोलाना जल पित्त च रखपम्," इत्यादि। श्लेप्मा श्वेतो गुरु. स्निग्धः पिच्छलः शीत एव च। मधुरस्त्वविदग्धः स्याद्, विदग्धो लवणः स्मृतः ॥१ अर्थात्-श्लेष्म (कफ) सफेद, गुरु, चिकना, पिच्छल और शीत होता है । नहीं जला हुआ या कचा कफ मधुर होता है और पका या जला हुआ नमकीन होता है। मुखजलके केवल दो उत्पत्तिस्थान हैं-(१) जिवाका भूल और (२) जिहाका अग्रभाग । यह मुखजल चयाये हुए अन्नको पिण्ड बनाने तथा कण्ठकी नलीके नीचे लेजाने तथा पचानेका कारण है। इसीसे योग- चिन्तामणि अन्धके प्रथम अन्यायमें “रसासदमासमेदोऽस्थिमज्जाशुक्राणि धातव." ऐसा कह कर किस धातुका क्या मल है, सो बतानेके लिए फिर कहा है-"जिद्वानेत्रकपोलाना, जल पित्त च रक्षकम् " । अर्थात् श्लेष्मा श्वेतो गुरु स्निग्ध. पिच्छल• शीत एव च । मधुरस्त्वविदग्धः स्यात् विदग्धो लवण. स्मृतः ॥ मर्थात्-" -" (४३ ) सहे, ३, यि, पिस, मन शीत छाय નહિ બળે યા કા કફ મધુર હોય છે અને પાકે યા બળેલે કફ ખારે હેય-છે મુખજળના માત્ર બે ઉત્પત્તિ સ્થાન હોય છે (૧) જીલ્લંનું મૂળ અને (૨) જીલ (જીભ)ને અગ્રભાગ એ મુખજળ ચાવેલા અન્નનો પિડ બનાવવાનું તથા કઠની નળીની નીચે લઈ જવાનું તથા પચાવવાનું કારણ છે તેથી યોગ यिन्तामणि अयना प्रथम अध्यायमा रसामृट्मासमेदोऽस्थिमज्जाशुक्राणि धातक. એમ કહીને કઈ ધાતુને કયે મળે છે તે બતાવવાને માટે પછી કહ્યું છે કે जिहानेकपोलाना जल पित्त च रञ्जमम् । अर्थात्- म भने oney are - अध्ययन १ गा.१ मुखवत्रिकाविचारः निहानेकपोलाना जल रसधातोर्मल, रखक पित्त रुधिरस्य मलमिति वदर्थः । इत्य निहारूपोलदेशे जायमान जल मुखजल, तदीयकणिका एव भापणकाळे कदाचिद् पहिरुत्पतन्तीति विशदीभवति, श्लेप्मा तु न कस्यचिद् धातोर्मल, स हि दोपत्रयान्तःपातित्वात्तत्स्वरूपम् , अत एव योगचिन्तामणौ प्रथ- माध्याये धातुमलतः पृथक्कृत्य दोपत्रयोपादान कृत, यथा शारीरकपकरणे- कला: सप्तागयाः सप्त, धातवः सप्त तन्मला:। सप्तोपधातवः सप्त, त्वचः सप्त प्रकीर्तिताः ॥१॥ त्रयो दोपा नवशत, स्नायूना सन्धयस्तथा । दशाधिक च द्विशतमस्थ्ना च द्विशत मतम् ॥ २॥ सप्तोत्तर मर्मशत, शिराः सप्तगत सप्तगत तथा । चतुर्विंशतिरारयाता, धमन्यो रसवाहिकाः ॥ ३ ॥ मासपेश्यः समारयाता, नृणा पञ्चशत जुधैः । स्त्रीणा च विंशत्यधिकाः, कण्डराश्चैव पोडश ॥ ४ ॥ नृदेहे दश रस्त्राणि, नारीदेहे त्रयोदश । एतत्समासतः प्रोक्त, विस्तरेणाधुनोच्यते ॥५॥" इति । . जीभ, नेत्र और गालका जल रसधातुका मल है तथा रजक पित्तरुधिरका मल है । इसप्रकार जीभ और गालोमें उत्पन्न होनेवाला जल मुखका जल कहलाता है और उसीकी कणिका भापण करते समय कभी-कभी बाहर निकल जाती है, यह बात स्पष्ट है। श्लेप्मा किसी धातुका मल नहीं है, वह तीन दोपोंमेंसे एक दोप है, इसीसे योगचिन्तामणिमें धातु- ओंके मलोंसे पृथक् करके तीन दोप अलग बताये है, देखो शारीरक प्रकरण कलाः सप्ताशयाः" इत्यादि श्लोक ५। । , રસ ધાતુને મલ છે તથા રજક પિત્ત રૂધિરને મલ છે એ રીતે જીભ અને ગાલમાં ઉત્પન્ન થનારૂ જલ મુખનું જ કહેવાય છે અને તેની કણિકાઓ ભાષણ કરતી વખતે કઈ-કઈ વાર બહાર નીકળી જાય છે તે વાત સ્પષ્ટ છે કલેષ્મ કઈ ધાતુને મલ નથી, તે ત્રણ દેમાનો એક દેવ છે તેવી ગચિન્તા મણિમા ધાતુઓના મલેથી જુદા પાડીને ત્રણ દેષ અલગ બતાવેલા છે જુઓ कला' सप्ताशयाः ઈત્યાદિ શ્લોક ૫ શારીરિક પ્રકરણ " श्रीदशकालिको मुखेजलस्य तु रसनामूल तदग्रभागतिध्यमुत्पत्तिस्थानम् , उद च चर्वित स्यानस्य पिण्डीभाने कण्ठनलिकयाऽधोनयने पाचने च निमित्तम् । अव एवं योगचिन्तामणौ प्रथमाध्याये- रसाऽमृदमासमेदोऽस्थिमन्नामाणि घातकः । इत्युक्त्वा कस्य धातोः किं मलम् ? इति प्रदर्शयित पुनरभिहितम्- " जिहानेकपोलाना जल पित्त च रखरम्," इत्यादि । श्लेप्मा श्वेतो गुमः स्निग्धः पिच्छलः शीत एव च। मधुरस्त्वविदग्धः स्पा, चिदग्धो लवणः स्मृतः ॥१ अर्थात्-श्लेष्म (कफ) सफेद, गुरु, चिकना, पिच्छल और शीत होता है । नहीं जला हुआ या कचा कफ मधुर होता है और पका या जला हुआ नमकीन होता है। मुखजलके केवल दो उत्पत्तिस्थान है-(१) जिहाका मूल और (२) जिहाका अग्रभाग । यह मुखजल चबाये हुए अन्नको पिण्ड बनाने तथा कण्ठकी नलीके नीचे लेजाने तथा पचानेका कारण है। इसीसे योग चिन्तामणि ग्रन्थके प्रथम अध्यायमें "रसामृहमासमेदोऽस्थिमज्जाशुक्राणि धातवः" ऐसा कह कर किम धातुका क्या मल है, सो बतानेके लिए फिर कहा है-"जिबानेत्रकपोलाना, जल पित्त च रकम्" । अर्थात् श्लेष्मा श्वेतो गुरुः स्निग्धः पिच्छल शीत एव च । मधुरस्त्वविदग्ध स्यात् विदग्धो लत्रणः स्मृतः ॥ अर्थात्-" म ( ५३ ) सईद, शु३, यि, पिस, भने शीत डाय નહિ બળેલ યા કા કફ મધુર હોય છે અને પાકે યા બોલે કફ ખાર डाय छ " મુખજળના માત્ર બે ઉત્પત્તિ સ્થાન હોય છે (१) Caनु भू भने (૨) જીલ્લા (જીભ)ને અગ્રભાગ એ સુખજળ ચાવેલા અન્નને પિંડ બનાવવાનું તથા કઠની નળીની નીચે લઈ જવાનું તથા પચાવવાનું કારણ છે તેથી યોગ चिन्तामणि अयना प्रथम अध्यायमा रसासमासमेदोऽस्थिमज्जाशुक्राणि धातव' એમ કહીને કઈ ધાતુને કયે મળે છે તે બતાવવાને માટે પછી કહ્યું છે કે जिहानेकपोलाना जल पित्त च रञ्जकम् । अर्थात- नत्र भने natra अध्ययन । गा. १ मुखचखिकाविचारः ५३ शब्दानुपादानात् । वस्तुतस्तु निष्ठीवनशब्दस्य भावल्युडन्ततया प्रक्षेपणात्मकनि- रसनक्रियावाचित्व युक्तम् , अतएव- "रक्तनिष्ठीवन दाहो, मोहउर्दन-विभ्रमौ । प्रलापः पिटिका तृष्णा, रक्तमाप्ते ज्वरे नृणाम् ॥” इति, रक्तज्वरलक्षण प्रतिपादयता माधवनिदानकृता निर्गमनेऽप्यर्थे निष्ठीव- नशब्दः प्रयुक्तः । कवलीकृतस्य द्रव्यस्य मुखानिरसनेऽपि निष्ठीवनत्वमुक्त, भावप्रकाशे यथा- "वातपित्तकफलस्य द्रव्यस्य कवल मुखे । अर्धे निःक्षिप्य सचर्य, निष्ठीवेत् कवले विधिः ॥” इति, तिचअकबराख्ये वैद्यस्ग्रन्थे पञ्चमाध्याये प्रथमप्रकरणेऽपि जिह्वामूलतो निष्ठीवनका वास्तविक अर्थ है क्षेपण करना, या त्यागना। इसीसे 'माध वनिदान' कर्ताने रक्तज्वर के लक्षण बताते समय निकलनेके अर्थमें निष्ठीवन शब्दका प्रयोग किया है- रक्तनिष्ठीवन दाहो, मोहश्छईनविभ्रमौ । प्रलापः पिटिका तृष्णा, रक्तप्राप्ते ज्वरे नृणाम् ॥१॥ भावप्रकाशमें कौर (कवल)के बाहर निकालनेको निष्ठीवन कहा है- "वातपित्त” इत्यादि, "तिच अकबर" नामक यूनानी वैद्यक ग्रन्थमें भी जिहाके मूलसे मुखजलकी उत्पत्ति स्पष्टरूपसे बताई गई है " जीभकी जड़मे एक मासका लोथडा है जिसमेसेलुआय और मुखका पानी निकलता है और जीभको तर रखता है और खानेकी चीजोंमे मिला करता है।" तथा અર્થ છે-ક્ષેપણ કરવું યા ત્યાગવું તેથી માધવનિદાન” કર્તાએ રક્તસ્વરના લક્ષણે બતાવતી વખતે નીકલવાના અર્થમાં નિષ્ઠીવન શબ્દ પ્રયોગ કર્યો છે रक्तनिष्ठीवन दाहो, मोहश्छर्दनविभ्रमौ । प्रलापः पिटिका तृष्णा, रक्तमाते ज्वरे नृणाम् ॥ १ ॥ ભાવપ્રકાશમાં કાળીયાનું બહાર નીકાળવુ એને નિષ્ઠીવન કહેલ છે वातपित्त० त्यादि * તિછા અકસ્મર નામક ચૂનાની વિદ્યક ગ્રથમા પણ જીલ્લાના મૂલમાથી મુખજલની ઉત્પત્તિ સ્પષ્ટરૂપે બતાવી છે જીભના મૂળમાં માસને લોચે છે જેમાથી લુઆબ અને મુખનું પાણી નીકળે છે અને જીભને તર રાખે છે અને " ५२ श्रीदशवकालिको एव च मुखजलस्य खेलतो भेदः स्पष्ट एर । न च खेलगन्दस्य निष्ठीवनार्यक- तया निष्ठीवनात्मके मुखजले खेलभन्दमवृत्त्या तस्यापि जीवोस्पतिस्थानव दुर्वास्मेवेति वाच्यम् , निष्ठीव्यते-निरस्यते अतिप्यते यत्तनिष्ठीवन मिति 'निपू- वात् 'ठीयु निरसने' इति धातोर्णाहुल कात् कर्मणि ल्युटि निप्पन्नस्य निष्ठीव- नशब्दस्य योगेन मुखनिर्गतपदार्थमा प्रयोगो भाति, पर च निष्ठीवनशब्दस्यैव पतितखेलाधकल सि यति न तु खेलशन्दस्य निष्ठीवनार्यस्त्वम् , तथा च मुखनिर्गतजलकणेषु न जीयोत्पत्तिसिद्धिः, जीगोत्पत्तिस्थानपरिगणने निठीवन- इस प्रकार स्पष्ट है कि मुसका जल श्लेप्मसे भिन्न है। प्रश्न-'खेल' शब्दका अर्थ 'यूक' है, और थूक तथा मुखजल एक ही है। अतः मुखजलमें खेल शब्दकी प्रवृत्ति होनेसे वह जीवोत्पत्तिका स्थान होगा ही। उत्तर-ऐसा कहना ठीक नहीं है। क्योंकि 'निष्टीवन' शब्द 'नि'- उपसर्गपूर्वक 'ठी निरसने' धातुसे बना है। अतः मुखसे निकलने वाला कोई भी पदार्थ निष्ठीवन कहलाता है। इससे यह सिद्ध रोता है कि त्यागा हुआ खेल आदि निष्ठीवन कहला सकता है किन्तु निष्ठीवन 'खेल' नही कहला सकता। इसलिए मुखसे निकलने वाले जलकणोंमें जीवोत्पत्तिकी सिद्धि नहीं होती, क्योंकि जीवोत्पत्तिके स्थानोंमे 'निष्ठी वन' शब्द नही दिया है । वास्तवमें निष्ठीवन शब्द भावल्युडन्त होनेसे प्रक्षेपणरूप निरसन क्रियाका वाची है, ऐसा मानना युक्त है। अर्थात् એ રીતે સ્પષ્ટ થાય છે કે મુખનું જલ એ શ્લેષ્મથી ભિન્ન છે પ્રશ્ન–ખેલ' શબ્દનો અર્થ “ચૂકી છે, અને ચૂક તથા મુખજલ એક જ છે એટલે મુખજલમાં ખેલ શબ્દની પ્રવૃત્તિ થવાથી તે જીત્પત્તિનું સ્થાન થશે જ ઉત્તર–એમ કહેવું બરાબર નથી નિષ્ઠીવન શબ્દ “નિ—ઉપસર્ગ–પૂર્વક ठी निरसने धातुथी ग-यो छ मेटवे भुया नlkudi ts पहा ABlar કહેવાય છે તેથી એમ સિદ્ધ થાય છે કે ત્યાગેલ ખેલ આદિ નિષ્ઠીવન કહી શકાય છે, પરંતુ નિકીવન “ખેલ નથી કહી શકાતું તેથી મુખથી નીકળતા જલકમાં છત્પત્તિની સિદ્ધિ થતી નથી, કારણ કે ઉત્પત્તિના સ્થાનેમા “નિષ્ઠીવન” શબ્દ આપે નથી વસ્તુત નિજીવા શબ્દ ભાવવુડન્ત હેવાથી પ્રક્ષેપણરૂપ નિરસન ક્રિયાને વાચક છે એમ માનવુ યુક્ત છે અર્થાત્ નિકીવનને વાસ્તવિક अ ययन १ गा. १ मुखवत्रिकाविचारः अत्र " सव्वेसु चेव असुइट्ठाणेसु" इत्यस्य " सर्वेषु चैव अशुचिस्था- नेपु” इति सस्कृतम् , अशुचीना म्यानानि अशुचिस्थानानि तेपु-अशुचिस्थानेषु, यत्रानेपामशुचीनामुचारादीना स्थितिस्तनेत्यर्थः । अयमाशय:-यथा पृथिव्यादीना परकायशस्त्रेण परिणतत्वे सति सचित्तत्वम- पगच्छति तयोचारादीना प्रस्रवणादिसाकर्ये सति समन्धिमजीवोत्पत्तिस्थानत्वापगमः स्यादिति शिष्यशङ्कासमाश्नाया तनिरसनार्थमेव पृथस्कृत्येदमुक्तम्-"सब्वेसु चेव असुट्ठाणेसु" इति, न त्वत्रानुक्तानामशुचीना स्थानेषु, इति तदाशयः । एतेनोच्चारादीना समन्धिमजीवोत्पत्तिम्थानत्वादेव तत्साकर्येऽपि तादृशजीवोत्पत्ति- यहाँ सन अशुचियोंके स्थानोंसे तात्पर्य यह है कि जहाँ उच्चार आदि अनेक अशुचियोंकी स्थिति हो वह स्थान । मतलब यह कि-परकाय शस्त्रसे परिणत होने पर पृथिवीकाय आदि अचित्त हो जाते हैं, उसी प्रकार जन उच्चार आदि प्रसवण आदिके साथ मिल जाते हैं, तब उनमें समूच्छिम जीवोको उत्पन्न करनेकी शक्ति रहती है या नहीं ? शिष्यके ऐसे प्रश्नकी सभावना होने पर खुलासा करनेके लिए अलग कहा है कि "स अशुचिस्थानोंमे।" इस वाक्यका “उक्त अशुचियोंके स्थानोंके सिवाय अन्य स्थानोंमे" यह अर्थ नहीं है। उपर्युक्त करन करनेसे यह म्वय सिद्ध हो गया कि जर उच्चार आदि समृच्छिम जीवोंकी उत्पत्तिके स्थान है तर उन स्थानोंमेंसे यदि दो या तीन आदि मिल जावें तो भी वे जीवोकी उत्पत्तिके स्थान रहेंगे। अतएव जो लोग અહીં ગર્વ અશુચિઓના સ્થાનનું તાત્પર્ય એ છે કે જ્યા ઉચ્ચાર આદિ અનેક અશુચિઓની સ્થિતિ હોય તે સ્થાન મતલબ એ છે કે-પરાય ગઢથી પરિણત થતા પૃથિવીવાય આદિ અચિત્ત થઈ જાય છે, એ રીતે જ્યારે ઉરચાર આદિ પ્રસરણ આદિની સાથે મળી જાય છે, ત્યારે તેમાં સામૂર્ણિમ જીવને ઉર્પન્ન કરવાની શકિત કહે છે કે નહિ ? શિષ્યના એવા પ્રશ્નની સંભાવના રહેલથી ખુલાસો કરવાને માટે જુદું કહ્યું સર્વ અશુચિસ્થાનેમા ” વાયનો અર્થ “ઉકત અશુચિઓના સ્થાને સિવાય અન્ય સ્થાને મા એ નથી ઉપર મુજબ કથન કરવાથી એ સ્વચસિદ્ધ થઈ ગયું કે જે ઉચ્ચાર આદિ સમૃમિ જીવની ઉત્પત્તિના સ્થાન છે તે એ સ્થાનમાં જે બે યા ત્રણ આદિ મળી જાય તો પણ તે જીની ઉત્પત્તિના સ્થાને રહેશે તેથી કરીને જે લોકે એમ કહે છે કે પૂજકત અર્થ કરવાથી मा ५४ श्रीदशकालिकसूत्रे मुखजलोत्पत्तिः स्पष्ट प्रतिपादिता । शरीरविज्ञाने च मुखजरस्य पाचनशक्तिमत्त्व प्रकटितम् । अशुचिस्थानतया मुखजलस्य जीवोत्पत्तिस्थानत्वापादन तु सर्वथा निमल्मेव, तथाहि-यावन्ति जीरोत्पत्तिस्थानानि सन्ति तानि प्रज्ञापनाम निर्दिष्टानि, यथा- उच्चारेसु वा पामवणेसु वा खेलेसु वा सिंघाणसु वा वतेसु वा पित्तेसु वा पूयेसु वा सोणिसु वा सुक्षेसु वा सुफपुग्गलपरिसाडेसु वा विगयजीवकलेवरेसुवा थीपुरिससजोएसुवा णगरनिद्वमणेसु वासब्वेसु चेव असुइटाणेसु, एत्य ण समुच्छिममणुस्सा समुच्छति" इति । 'शरीर विज्ञान' नामक ग्रन्थमें मुखजलके विषयमें लिखा है कि उसमें पचानेकी शक्ति होती है। 'अशुचिस्थान होनेसे मुखजल जीयोत्पत्तिकास्थान है। ऐसा करना विलकुल वेजड है । जीवोत्पत्तिके जितने स्थान हैं उन सबका निर्देश प्रज्ञापनासूत्र में किया है "उच्चारेसु वा" इत्यादि, अर्थात् " उच्चार (विष्टा) मे, प्रस्रवण (मूत्र)मे, कफमे, नाकके मैलमें, कैमें, पित्तमें, पीवमें, खूनमे, शुक्रमे, शुक्रपुद्गलपरिशाट (शुष्क शुक्र- पुद्गलोके फिर भीने होने ) मे, प्राणीकी लाशमें, स्त्रीपुरपके सयोगमे, नगरकी गटरमें, इन सब अशुचियोंके स्थानोमें समृच्छिम मनुष्य उत्पन्न होते है ।" , નામના ગ્રંથમાં, ખાવાની ચીજોમાં મળ્યા કરે છે ” અને “શરીરવિજ્ઞાન મુખજલના વિષયમાં લખ્યું છે કે એમા પચાવવાની શક્તિ હોય છે અશુચિસ્થાન હોવાથી મુખજલ છત્પત્તિનું સ્થાન છે એમ કહેવું બિલકુલ અમૂલક છે ઉત્પત્તિના જેટલા સ્થાને છે એ બધાને નિર્દેશ પ્રજ્ઞાપના-સૂરમાં सीछे उच्चारेसु वा Vत्याह यार (विटा)मा, प्रखपY (पिसा)भा, ४३मा, नाal el मा, मन-Gटीमा, पित्तमा, ५३भा, बोलीमा, शुर-पीया, કપુદગલપરિશમા (શુક્રના સુકાયલા પુલ બીના થવામા ), પ્રાણીના મુડદામા, સ્ત્રીપુરૂષના સમાગમ, નગરની પાળ (ગટરો)મા, એ બધા અશુચના સ્થાનમાં સમૂછિમ મનુષ્ય ઉત્પન્ન થાય છે ५५ अ ययन १ गा. १ मुखवस्त्रिकाविचारः अत्र " सब्वेसु चेव असुइट्टाणेसु" इत्यस्य " सर्वेषु चैव अशुचिस्था- नेपु" इति सस्कृतम् , अशुचीना स्थानानि अशुचिस्थानानि तेपु-अशुचिस्थानेषु, यत्रानेकेपामशुचीनामुच्चारादीना स्थितिस्तरेत्यर्थः । अयमाशय:-यथा पृथिव्यादीना परकायशस्त्रेण परिणतत्वे सति सचित्तत्वम- पगन्छति तयोचारादीना मस्रवणादिसाकर्ये सति समूच्छिमजीवोत्पत्तिस्थानत्वापगमः स्यादिति शिष्यशङ्कासमाश्नाया तनिरसनार्थमेव पृथकृत्येदमुक्तम्--"सब्वेसु चेव असुट्ठाणेसु" इति, न त्वत्रानुक्तानामभुचीना स्थानेषु, इति तदाशयः । एतेनोच्चारादीना समन्छिमजीवोत्पत्तिम्थानत्वादेव तत्साकर्येऽपि तादृशजीवोत्पत्ति- यहाँसर अशुचियोंके स्थानोंसे तात्पर्य यह है कि जहाँ उच्चार आदि अनेक अशुचियोंकी स्थिति हो वह स्थान । मतलब यह कि-परकाय शस्त्रसे परिणत होने पर पृथिवीकाय आदि अचित्त हो जाते हैं, उसी प्रकार जब उच्चार आदि प्रस्रवण आदिके साथ मिल जाते हैं, तब उनमें समूच्छिम जीवोंको उत्पन्न करनेकी शक्ति रहती है या नहीं ? शिप्यके ऐसे प्रश्नकी सभावना होने पर खुलासा करनेके लिए अलग कहा है कि "सर अशुचिस्थानोंमे।" इस वाक्यका "उक्त अशुचियोंके स्थानोंके सिवाय अन्य स्थानोंमे" यह अर्थ नहीं है। उपर्युक्त कथन करनेसे यह म्वय सिद्ध हो गया कि जब उच्चार आदि समूच्छिम जीवोंकी उत्पत्तिके स्थान हैं तब उन स्थानोंमेसे यदि दो या तीन आदि मिल जावें तो भी वे जीवोंकी उत्पत्तिके स्थान रहेंगे। अतएव जो लोग અeો સર્વ અશુચિઓના સ્થાનેનુ તાત્પર્ય એ છે કે જ્યા ઉચ્ચાર આદિ અનેક અશુચિઓની સ્થિતિ હોય તે સ્થાન મતલબ એ છે કે-પરકાય શાસ્ત્રથી પરિણત થતા પૃથિવીકાય આદિ અચિત્ત થઇ જાય છે, એ રીતે જ્યારે ઉચાર આદિ પ્રમાણ આદિની સાથે મળી જાય છે, ત્યારે તેમા સમૂર્ણિમ જીવને ઉત્પન્ન કરવાની શક્તિ રહે છે કે નહિ ? શિષ્યના એવા પ્રશ્નની સંભાવના હોવાથી ખુવાસ કરવાને માટે જુદું કહ્યું છે કે " सर्व अशुधियानामा " આ વાકયનો અર્થ “ઉકત અશુચિઓના સ્થાને સિવાય અન્ય સ્થાને મ” એ નથી ઉપર મુજબ કથન કરવાથી એ સ્વયંસિદ્ધ થઈ ગયું કે જે ઉચ્ચાર આદિ સમૃર્ણિમ જીની ઉત્પત્તિના સ્થાન છે તે એ સ્થાનમાં જે બે યા ત્રણ આદિ મળી જાય તો પણ તે જીવની ઉત્પત્તિના સ્થાને રહેશે તેથી કરીને જે લોકો એમ કહે છે કે પાકત અર્થ કરવાથી श्रीदशकालिकसूत्रे मुखजलोत्पत्तिः स्पष्ट प्रतिपादिता । शरीरविज्ञाने च मुखजलस्य पाचनशक्तिमत्त्व प्रकटितम् । अशुचिस्थानतया मुखजरस्य जीयोत्पत्तिस्थानत्वापादन तुर्सया निर्मूल्मेव, तथाहि-यावन्ति जीवोत्पत्तिस्थानानि सन्ति तानि मज्ञापनामृत्रे निर्दिष्टानि, यथा- "उच्चारेसु वा पामवणेसु वा खेलेसु चा मिघाणण्तु वा वतेसु वा पित्तेसु वा पूयेसु वा सोणिण्तु वा सुफेसु चा सुफपुग्गलपरिसाडेसु वा विगयजीवकलेचरेसुथा थीपुरिससजोसुवा णगरनिदमणेतु वासव्वेसु चेव असुइट्टाणेसु, एत्य ण समुच्छिममणुस्सा समुच्छति" इति । 'शरीर विज्ञान' नामक ग्रन्थमें मुखजलके विषय में लिखा है कि उसमें पचानेकी शक्ति होती है। 'अशुचिस्थान होनेसे मुखजल जीवोत्पत्तिकास्थान है। ऐसा करना बिलकुल बेजड है। जीवोत्पत्तिके जितने स्थान हैं उन सबका निर्देश प्रज्ञापनासूत्र में किया है “उच्चारेसु वा" इत्यादि, अर्थात् “ उच्चार (विष्ठा) मे, प्रस्रवण (मूत्र)मे, कफमें, नाकके मैलमें, कैमें, पित्तमें, पीवमें, खूनमें, शुक्र, शुक्रपुद्गलपरिशाट (शुष्क शुक्र पुद्गलोंके फिर भीने होने ) मे, प्राणीकी लाशमें, स्त्रीपुरपके सयोगमें, नगरकी गटरमें, इन सब अशुचियोंके स्थानों में समृच्छिम मनुष्य उत्पन्न . होते है।" નામના ચ થમાં ખાવાની ચીજોમાં મળ્યા કરે છે ? અને શરીરવિજ્ઞાન મુખજલના વિષયમાં લખ્યું છે કે એમાં પચાવવાની શક્તિ હોય છે અશુચિસ્થાન હોવાથી મુખજલ ઉત્પત્તિનું સ્થાન છે” એમ કહેવું બિલકુલ અમૂલક છે ઉત્પત્તિના જેટલા સ્થાને છે એ બધાને નિર્દેશ પ્રજ્ઞાપના-સૂરમાં श्य छ उच्चारेसु वा त्या जयार (१४), प्रसपाय (पिसाI)भी, भा, नाsit aleमा, वमन-सीमा, पित्तमा, ५३भा, सोलीमा, शु-पीय भा, શુકપુદગલપશિટમ (શુક્રના સુકાયેલા પુદ્દલ ભીના થવામ), પ્રાણીના મુડદા, સ્ત્રી પુરૂષના સમાગમમાં, નગરની ખળ (ગઢ)મા, એ બધા અશુચિને સ્થાનમાં સામૂછિમ મનુષ્ય ઉત્પન્ન થાય છે ” अध्ययन १ गा. १ मुलवस्त्रिकाविचारः ५७ त्पत्तौ सत्या भगवता शिष्याणा स्पष्टपतिपत्तये- "खेलेसु वा वतेसु वा" इत्यादिवत् “ मुरजलकणेसु वा” इति वाक्येन तेऽपि पृथक्कृत्य निर्देष्टव्याः स्युः, इति मुखजलकणाना भगवदनुक्तत्वान्न वत्र जीवोत्पत्तिर्भवतीति निश्चीयते । इदमत्र तत्वम्- शिष्याणा जीवोत्पत्तिस्थानप्रतीति विना सम्यक् सयमपालन न स्यादिति हेतोः स्पष्टीकृत्य सकलानि समूच्छिमजीवोत्पत्तिस्थानानि बोधयितु भगवता तत्त- नामनिर्देशप्रयत्नोऽङ्गीकृतः, साकल्येन समूछिमजीवोत्पत्तिस्थानपरिगणनतात्पर्या- भावे तु भगवान्-" सव्वेसु चेव असुइट्ठाणेसु" इत्येव वयात , उच्चारमस्रव- उत्पत्ति होती तो शिष्योंको स्पष्ट योध करानेके लिए भगवानने जैसे 'खेलेसु वा वतेसु वा' इत्यादि अलग अलग नाम गिनाये हैं वैसे ही "मुरजलकणेसुवा" ऐसा और एक सूत्रपाठ रख देते। अत. निश्चित है किमुखसे निकलने वाले जलकणोंमें समूछिमजीव उत्पन्न नहीं होते, क्योंकि भगवान्ने उसे जीवोत्पत्तिका स्थान नहीं बताया है । तात्पर्य यह है कि- शिप्य जबतक यह न जानलें कि जीवोंके उत्पत्तिस्थान कौन कौन हैं ? तय तक सयमका सम्यक प्रकार परिपालन नहीं कर सकते। इसीसे भगवानने जीवोत्पत्तिके स्थानोंका खुलासा ज्ञान करानेके लिए अलग अलग नाम गिनाये हैं। यदि समूच्छिम जीवोंकी उत्पत्तिके सप स्थान गिनानेका मतलय न होता तो सिर्फ 'सब्वेसुचेव असुइहाणेसु' (अशुचि ઉત્પત્તિ થતી હોત તો શિષ્યને સ્પષ્ટ બંધ કરાવવાને ભગવાને જેમ વેજુ બા वतेमु वा त्या ! मस नाम माया छ तभ मुहजलकणेसु गा वो એક વધારે સૂત્રપાઠ રાખ્યા હતા તેથી કરીને નિશ્ચિત છે કે મુખથી નીકળનારા જલકણેમા સામૂ૭િમ છે ઉત્પન્ન થતા નથી, કારણ કે ભગવાને એને જી- ત્પત્તિનું સ્થાન બતાવ્યું નથી તાત્પર્ય એ છે કે-જ્યાં સુધી શિષ્ય જાણ ન લે કે જીવન ઉત્પત્તિ સ્થાન કયા કયા છે, ત્યા સુધી તે સયમનું સમ્યફ પ્રકારે પરિપાલન કરી શક્તા નથી તેથી ભગવાને જીત્પત્તિના સ્થાનેનું ખુલાસાથી જ્ઞાન કરાવવાને અલગ અલગ નામે ગણાવ્યા છે જે સામૂછિન છની ઉત્પત્તિના બધા સ્થાને ગણાવવાની भत नसत तो भात्र सम्वेस चेव असुइटाणेस (अशुथिन मा स्थान श्रीदशकालिको स्थानव मुतरा सिद्धमिति "सन्वेसु चेव असुहाणेसु" इति पुनरमिषा- नमसङ्गत व्यय च स्यादितिरादिनः परास्ताः, उक्त शङ्कावारणाय तथाऽभिधान- स्याऽऽवश्यकत्वात् । अयमर्थश्च भगद्वाक्यादेव स्फुटीमवति, तथाहि-सर्वेषा मुखनिर्गतपदार्थानां जीवोत्पत्तिस्थानत्वे लाघवानुरोधेन " मुरनिग्गसु सव्वेसु चेव दवेसु" इत्येव वक्तव्ये पुनः " खेलेसु वा तेसु वा पित्तंसु वा" इति तत्तन्नामनिर्द- शमयत्लो भगवत्कृतो व्यर्थः स्यात् , तस्मानिर्दिष्टेतरपदायें जीवोत्पत्तिर्न भवतीति स्पष्ट मतीयते । अथवा अणीयस्मु भाषणकालिकेषु मुखोत्पतिवनलकणेषु जीबो- ऐसा कहते हैं कि पूर्वोक्त अर्थ करनेसे 'सब्वेसु चेव असुइहाणेसु"कहना व्यर्थ और असगत हो जायगा, वे परास्त रो गये। क्योंकि शिष्यकी पूर्वोक्त शकाका निवारण करनेके लिए उस कथनकी आवश्यकता है। यह अर्थ भगवान्के वचनसे ही निकलता है, क्योंकि यदि मुखसे निकलने वाले सब पदार्थ जीवोत्पत्तिके स्थान होते तोसक्षेप करनेके लिए केवल इतना कह देते कि 'मुहनिग्गएसु सन्वेसु चेव दव्येसु' अर्थात् मुखसे निकलने वाले सय पदार्थोंमें समूच्छिम जीव उत्पन्न रोते हैं। "खेलेसुवा वतेसु वा पित्तेसु वा" इस प्रकार अलग अलग भगवान न फरमाते। इसलिए सूत्रमें निर्देश किये हुए पदार्थों के सिवाय अन्य किसी पदार्थ में जीवोंकी उत्पत्ति नहीं होती, यह यात स्पष्ट प्रतीत होती है। अथवा यदि भाषण करते समय निकले हुए थोडेसे जलकणोंमें जीवोंकी सव्वेसु चेव असुइटाणेस धुव्यय भने मसात गये, तसा परास्त यई કારણ કે શિષ્યની પૂર્વોક્ત શકાનું નિવારણ કરવા માટે એ કથનની આવશ્યકતા છે આ અર્થ ભગવાનના વચનેમાથી જ નીકળે છે કારણ કે જે મુખથી નીકળ નારા બધા પદાર્થો છત્પત્તિના સ્થાને હેત તે સક્ષેપ કરવાને કેવળ એટલું જ त मुहनिग्गएमु सव्वेसु वेव दम्वेसु अर्थात् भुमयी नाना था पहाभा मभूछिम ७ पान थाय छे खेलेसु वा वतेसु वा पित्तेसु वा मे પ્રમાણે ભગવાન અલગ અલગ કહેત નહિ તેથી કરીને સૂવમા નિશેલા પદાર્થો સિવાય અન્ય કોઈ પદાર્થમા ની ઉત્પત્તિ થતી નથી એ વાત સ્પષ્ટ પ્રતીત થાય છે અથવા જે ભાષણ કરતી વખતે નીકળતા ચેડા જલકણમા જાની ગયા अध्ययन १ गा. १ मुसवस्त्रिकाविचारः ५७ त्पत्तौ सत्या भगवता शिष्याणा स्पष्टपतिपत्तये- "खेलेसु वा वतेसु वा" इत्यादिवत् " मुरजलकणेतु वा” इति वाक्येन तेऽपि पृथक्कृत्य निर्देष्टव्याः स्युः, इति मुखजलकणाना भगवदनुक्तत्वान्न तत्र जीवोत्पत्तिर्भवतीति निश्चीयते । इदमत्र तत्त्वम्- शिष्याणा जीवोत्पत्तिस्थानप्रतीति विना सम्यक् सयमपालन न स्यादिति हेतोः स्पष्टीकृत्य सफलानि समूच्छिमजीवोत्पत्तिस्थानानि चोधयितु भगवता तत्त- नामनिर्देशप्रयत्नोऽङ्गीकृतः, साफल्येन समूच्छिमजीवोत्पत्तिस्थानपरिगणनतात्पर्या- भावे तु भगवान्-" सब्वेसु चेव असुइहाणेसु" इत्येव व्रयात, उच्चारमस्रव- उत्पत्ति होती तो शिष्योंको स्पष्ट योध करानेके लिए भगवानने जैसे 'खेलेसु वा वतेसु वा' इत्यादि अलग अलग नाम गिनाये हैं वैसे ही "मुजलकणेसुवा" ऐसा और एक सूत्रपाठ रख देते। अतः निश्चित है किमुखसे निकलने वाले जलकणोंमें समृच्छिम जीव उत्पन्न नहीं होते, क्योंकि भगवान्ने उसे जीवोत्पत्तिका स्थान नहीं बताया है। तात्पर्य यह है कि- शिप्य जातक यह न जानलें कि जीवोंके उत्पत्तिस्थान कौन कौन हैं ? तब तक सयमका सम्यक् प्रकार परिपालन नहीं कर सकते। इसीसे भगवान्ने जीवोत्पत्तिके स्थानोंका खुलासा ज्ञान करानेके लिए अलग अलग नाम गिनाये हैं। यदि समूच्छिम जीवोंकी उत्पत्तिके सय स्थान गिनानेका मतलय न होता तो सिर्फ 'सब्वेसुचेव असुइट्ठाणेसु' (अशुचि ઉત્પત્તિ થતી હતી તે શિષ્યને સ્પષ્ટ બોધ કરાવવાને ભગવાને જેમ હું વા बतेसु वा त्या म HAL नाम गाव्या छ तभ मुहजलकणेस वा मेवा એક વધારે સૂત્રપાઠ રાખે હેત તેથી કરીને નિશ્ચિત છે કે મુખથી નીકળનારા જલકમાં સામૂ૭િમ ઉત્પન્ન થતા નથી, કારણ કે ભગવાને એને જીવે ત્પત્તિનું સ્થાન બતાવ્યું નથી તાત્પર્ય એ છે કે-જ્યા સુધી શિષ્ય જાણ ન લે કે જીના ઉત્પત્તિ સ્થાન કયા કયા છે, ત્યા સુધી તે સયમનું સમ્યફ પ્રકારે પરિપાલન કરી શકતું નથી તેથી ભગવાને ઉત્પત્તિના સ્થાનનું ખુલાસાથી જ્ઞાન કરાવવાને અલગ અલગ નામે ગણાવ્યા છે જે સામૂર્ણિમ જીવોની ઉત્પત્તિના બધા સ્થાને ગણાવવાની भतब न त भात्र सन्वेस चेव अमुइटाणेस (शुस्थिना या स्थानाभा) ५८ श्रीदवकालिकमरे णादीनामग्यशुचिस्थानतयैव तागजीवोत्पनिस्थानत्वमतीतिसिद्धेः, तथा च तत्त- दशुचिस्थाननिर्देशस्य चयापत्तिः । जीपोत्पत्तिम्यानपरिगणनतात्पर्याङ्गीकारे तु कियत्स्वनुचिस्थानेषु समूचिमनीया उत्पद्यन्ते ? इति जिज्ञासोपशमी न स्यादिति तत्तदशुचिस्थाननिर्देशस्य नानर्थक्य, प्रत्युताऽऽन्यतया सार्थक्यमेव, अतएव " उत्थियिनिग्गणसु दव्येसु वा " (उपस्पेन्द्रियनिर्गतेषु द्रज्येषु) इत्यनु क्त्वा पुनः पुन:-" पासवणेसु या सुफेसु वा सुकपुग्गलपरिसाडेसु वा सोणिएसु वा थीपुरिससजोसु वा" इति तत्तन्नाम्ना भगवानुपादिशन् , के सव स्थानोंमें) इतना ही कर देते। क्योंकि उचार प्रस्रवण आदि सभी अशुचिस्थान होनेके कारण समृमि जीवोंकी उत्पत्तिके स्थान हैं, यर बात प्रतीतिसे सिद्ध है। ऐसी अवस्थामें अलग-अलग नाम गिनाना अकारय हो जायगा। अगर ऐसा माने किजीयोंकी उत्पत्तिके स्थान गिनानेका मतलब है तो जिज्ञासु शिष्योंका सन्देह तय तक दूर नहीं हो सकता जब तक उन्हें माफ न बता दिया जाय कि किन-किन जगहोंमें समूच्छिम जीवोंका जन्म होता है। इसलिए अलग-अलग गिनाना वृथा नहीं है, किन्तु आवश्यक होनेसे सार्थक है, इसी कारण "उवधिदिय निग्गएसु वा" (उपस्थेन्द्रियनिर्गतेपु) ऐसा न कहकर चारपार 'पास चणेसुवासुक्केसु वा सुक्कपुग्गलपरिसाडेसु वा सोणिएसु था धीपुरिस- सजोएसु वा” इस प्रकार हरेकका अलग-अलग नाम गिना कर भग- वान्ने कथन किया है। ऐसा कथन न करते तो यह मशय बना रहता એટલું જ કહી દેત કારણ કે ઉરચાર પ્રસવણ આદિ બધા અશુચિસ્થાને રહેવાને કારણે સામૂછિમ ની ઉત્પત્તિના સ્થાન છે, એ વાત પ્રતીતિથી સિદ્ધ છે એવી સ્થિતિમાં અલગ અલગ નામે ગણાવવા અહેતુક થઈ જાય માને કે જેની ઉત્પત્તિના સ્થાને ગણાવવાની મતલબ છે તે જિજ્ઞાસુ શિને સદેહ ત્યા સુધી દૂર નહિ થઈ શકે કે જ્યા સુધી તેમને સાફ ન બતાવી દેવામાં આવે કે કઈ કઈ જગ્યાઓમાં સામૂછિમ જીવને જન્મ થાય છે તેથી કરીને અલગ અલગ ગણાવવુ એ વૃથા નથી, કિન્તુ આવશ્યક હોવાથી સાર્થક છે એ से उपस्थिदियनिग्गएमु वा (उपस्थेन्द्रियनिर्गतेषु) मे ना पा२५२ पासवणेसचा मुक्केसु वा मुक्कपुग्गलपरिसाडेसुबा सोणिएमु वा थीपुरिससजोएसु वा એ રીતે દરેકના અલગ અલગ નામે ગણાવીને ભગવાને કથન કર્યું છે એવું કથન ન કરત તે એ સશ પડત કે સ્ત્રી-પુરૂષના સ લેગ વિના કેવળ શુક્રણિત અગર એમ अन्ययन १ गा. १ मुखवत्रिकाविचारः ५९ अयथा “ स्त्रीपुरुपसयोगातिरिक्तेपु केवलशुक्रशोणितादिपु समून्धिम- जीवा उत्पद्यन्ते न वा?" इति सशयानपगमे सति मुनीना सयमपालन सकटापन्न स्यादिति । वस्तुतस्तु भाषणकाले मुखोत्पतिताना जलकणानामचित्वमेव निर्मूलतया दुर्वचम् , शास्त्रे प्रज्ञापनासूत्रोक्तेपूच्चारादिष्वेवाशुचिशब्दप्रयोगदर्शनात् , मुग्वोत्पतित- जलरणार्थे तत्पयोगानुपलव्येच, तथाहि व्यवहारसूत्रभाप्ये तृतीयोदेशके- दब्वे भावे असुई भावे आहारवटणादीहिं" इत्यादिगाथा-(२८६) व्यार यानावसरे-" अशुचिह्निधा-द्रव्यतो भावतच, तत्र योऽशुचिना लिप्तगात्री कि स्त्रीपुरुषके सभोगके सिवाय केवल शुक्र शोणित आदिमें समूच्छिम जीव उत्पन्न होते है या नहीं? इस प्रकारके सन्देहसे मुनियोंको सयम- पालन करना मुश्किल हो जाता। वास्तवमें मुखसे निकलने वाले जलकणोंको अशुचि कहना ही खोटा है,क्योंकि शास्त्रमें प्रज्ञापनासूत्रोक्त उच्चार आदि ही 'अशुचि' शब्दसे कहे गये हैं, और मुखसे निकलने वाले जलकणके अर्थमें 'अशुचि' शब्दका प्रयोग नहीं पाया जाता । व्यवहारसूत्रके भाष्यमें, तीसरे उद्देशमें “दब्वे भावे असुई ” इत्यादि २८६ वीं गायाका व्यारयान करते समय कहा है- अशुचि दो प्रकारकी है (१) द्रव्य अशुचि और (२) भाव अशुचि । जिस व्यक्तिका शरीर अशुचिसे लिप्त हो अथवा जो विष्ठाका त्याग આદિમાં સામૂર્ણિમ જી ઉત્પન્ન થાય છે કે નહિ? એ પ્રકા સદેહથી મુનિઓને સચમ પાલન કરવાનું મુશ્કેલ થઈ પડત વાસ્તવમાં મુખમાથી નીકળનારા જળકને અશુચિ કહેવા એ બેટુ છે, કારણ કે શાસ્ત્રમાં પ્રજ્ઞાપનામૂકત ઉચ્ચાર આદિન જ અશુચિ શબ્દથી ઓળખ વામાં આવ્યા છે અને મુખમાથી નીકળનારા જળતણના અર્થમાં અશુચિ શબ્દને પ્રાગ મળી આવતે નથી વ્યવહાર સૂત્રના ભાગમા, ત્રીજા ઉદેશમાં જે મારે अमुई त्या २८६ भी गायानु व्यायान ती मत धु- અશુચિ બે પ્રકારની છે (१) द्रव्य मयि मने (२) लाव अशुधि २ વ્યકિતનું શરીર અશુચિથી લેપાયલું હોય અથવા જે વિષ્કાને ત્યાગ કરીને (જાજરૂ - श्रीदशवेकालिकसूत्रे यो या पुरीपमुत्सृज्य पुती न निपयति स दन्यतोऽशुचिः” इत्युक्तम् , किञ्च-" दन्वे भावे असुई दबमि विद्यमादिलितोउ।" इत्यादिगाया- (२८७) व्याख्यानापसरे "अशुचिद्विधा द्रव्ये भावे च, तत्र द्रव्ये विष्ठादिना लिप्तः, आदिशब्दान्मूत्रश्लेप्मादिपरिग्रहः " इत्यमिहितम् । मझापनासूत्रोक्ता उच्चारादय एवाशुचिपदस्यार्थ इत्याशयेने ते द्रव्यभारदेन दिधा विभाजिते ऽप्यशुचिपदार्थे मुखनिर्गतपिमुपामनुपादान कृतम् । आवश्यकसूत्रे बन्दनाख्य तृतीयाध्ययने एकादशाधिकशततम-( १११ )-गाथाच्यारयाया ररिभद्रसू. रिणाऽप्यचिस्थानशब्दस्य विप्रधानस्थानार्यस्त्वमुक्तम् । एवमेव दर्शनशुद्धि- करके (टटी जाकर ) मलहार नहीं धोता उस व्यक्तिको द्रव्यसे अशुचि कहते है, इत्यादि । तथा इसी व्यवहार भाष्यके तीसरे उद्देशेकी 'दब्वे भावे असुई दव्वमि विट्ठमादिलित्तो उ" इस २८७ ची गाथाकी व्याख्या करते समय टीकाकारने कहा है-विष्ठाआदिसे लिप्सको द्रव्य अशुचि कहते है। यहाँ आदि शब्दसे मूत्र और श्लेष्म आदिको ग्रहण करना चाहिए, ऐसा कहा है । प्रज्ञापनासूत्र में कहे हुए उच्चार आदि ही अशुचि पदका अर्थ है, इसी आशयसे प्रकृतमें द्रव्य भावका भेद कर देने पर भी अशुचि पदार्थों में मुखसे निकलने वाले जलकणोंका ग्रहण नहीं किया है। आवश्यकसूत्रके वन्दना नामकतीसरे अध्ययन में हरिभद्रसरिने १११वीं गाथाकी व्याख्या करते समय अशुचि शब्दका अर्थ विटप्रधान स्थान જઈને) મળદ્વાર નથી છે એ વ્યક્તિને દ્રવ્યથી અશુચિ કહે છે, ઈત્યાદિ तया-मे व्यपारसूत्र मायनी दवे भावे असुई दबमि विद्यमादिलितो उ એ ૨૮૭ મી ગાથાની વ્યાખ્યા કરતી વખતે કહ્યું છે- વિષ્કાઆદિથી લિપને દ્રવ્ય અશુચિ કહે છે. અહીં આદિ શબ્દથી મૂત્ર અને શ્લેષ્મ આદિનું ગ્રહણ કરવું જોઈએ એમ કહ્યું ઉચાર આદિ જ અશુચિ શબ્દનો અર્થ છે, એ આશયથી પ્રકૃતમા દ્રવ્યભાવને ભેદ પ્રજ્ઞાપના સૂત્રમા કહેલા કરતા છતા પણ અશુચિ પદાર્થોમાં મુખથી નીકળતા જળકને ગ્રહણ કર્યા નથી આવશ્યક સૂત્રના વદન નામક ત્રીજા અધ્યયનમાં હરિભદ્ર સૂરિએ ૧૧૧ મી ગાથાની વ્યાખ્યા કરતા અશુચિ શબ્દને અર્થ વિટાપ્રધાન સ્થાને દર્શન अययन १ गा.१ मुखवत्रिकाविचार: ६१ नामके ग्रन्थेऽपि प्रतिपादितम् । उत्तराध्ययनसूत्रे एकोनविंशेऽध्ययने द्वादशगा- थान्याख्याया भावविजयगणिनाऽपि-"अशुचिभ्या शुक्रशोणिताभ्या सभनम् उत्पन्नम् अशुचिसम्भवम् " इत्युक्तम् । तत्रैव कमलसयमोपाध्यायेनापि सर्वार्थ- सिद्धिटीकायाम्-" अशुचिसम्भवम् = अशुचिरूपशुक्रशोणितोत्पन्नम् "-इति व्यारयातम् , सूत्रकृनाने द्वितीयश्रुतस्कन्धे द्वितीयाध्ययने नरकवर्णने पट्पष्टितम- (६६) मूत्रे-'अमुई ' इत्यस्य टीकायाम्-" अशुचयो विष्ठासक्लेदप्रधान- त्वात् " इति शीलानाचार्येण कथितम् । लेद' भस्वेदः (पसीना) इति हिन्दी- शब्दसागरकोशः। स च मुखजगदिन्न इत्यतिरोहितमेव सर्वेपाम् । प्रस्वेदेऽपि किया है। दर्शनशुद्वि नामक ग्रन्यमें भी ऐसा ही प्रतिपादन किया है। उत्तराध्ययनसूत्र में उन्नीसवें अध्ययनकी चारहवीं गाथाकी व्याख्या करते समय भावविजयगणिने कहा है-"अशुचिभ्या शुक्रशोणिताभ्या सभवम्- उत्पन्नम् अशुचिसभवम्।" इसीसत्रकी सर्वार्थसिद्धि नामक टीकामें कमल- सयम उपाध्यायने ऐसा व्याख्यान किया है-" अशुचिसभवम् अशुचि- रूप शुक्रशोणितोत्पन्नम् । सूत्रकृतागसत्र में द्वितीय श्रुतस्कन्धके द्वितीय अध्ययनमें नरकके वर्णनमें ६६ वें सूत्रमें 'असुई' पदकी टीकामे शीलानाचार्य ने कहा है- "अशुचयो विष्टामुक्क्लेदप्रधानत्वात् ।" यहाँ हेद पसीनाको कहा है। यह बात सरको विदित ही है कि मुग्यसे निकलने वाले जलकण और पमीना एक नहीं है दोनों अलग-अलग हैं। पसीनेमे भीसमृद्धिम जीव उत्पन्न नहीं होते, क्योंकि समूच्छिम जीवोंके उत्पत्ति-स्थानोंकी गिनती શુદ્ધિ નામક ગ્રથમા પણ એવુ જ પ્રતિપાદન કર્યું છે. ઉત્તરાધ્યયન સૂત્રમાં ૧૯ મા અધ્યયનની બારમી ગાવાની વ્યાખ્યા કરતા ભાવવિજયગણિએ કહ્યું છે કે- अशुचिभ्या = शुक्रशोणिताभ्या सभवम् = उत्पन्नम् अशुचिसभवम् । मा सूत्रनी સર્વાર્થસિદ્ધિ નામક ટીકામાં કમલસયમ ઉપાધ્યાયે એવું વ્યાખ્યાન કર્યું છે કે- अशुचिसभवम् अशुचिरूप-शुक्रशोणितोत्पन्नम् । સૂત્રકૃતાગ સૂત્રમાં દ્વિતીય શ્રુતસ્ક ધના બીજા અધ્યયનમાં નરકના વર્ણનમા १६ भी सूत्रमा असई शहनी Arमा शीया छ ? अशुचयो विष्ठासम्- क्लेदभयानत्वात् । मटी ६ पानानं इह्यो छे मे पात भी on 3 भुमयी નીકળતા જળaણ અને પગીને એક નવો-બેઉ જૂ–જૂદા છે પનામાં પણ સ મૂર્ણિમ જી ઉત્પન્ન થતા નથી, કારણ કે એ મૂછમ જીના ઉત્પત્તિ . ६२ श्रीदशवकालिकसूत्र न समूच्छिमजीयोत्पनि, तत्परिगणने तस्यानुक्तस्यात् । पिण्डनियुक्तौ च पूर्तिक मंदोषभेदस्य द्रव्यपूतेरुदाहरणे अशुचिगन्धशब्दम्य पुरीपगन्धार्थयत्त निगदितम् । मानवधर्मशास्त्रेऽपिभापणकालिग्मुखोद्गतविमुपा मेध्यत्वमेवोक्तनसचिव, यथा मनुस्मृती पश्चमाध्याये- मक्षिका विमुप'छाया, गौरवः सूर्यरश्मयः । रजो भूर्वायुरमिय, स्पर्श मे यानि निर्दिशेत् ।। ५ ॥" १३३ ॥इति । किश्च दोरकाश्रयणमेव हिसानिदान मत्या हस्तेन शिरःपश्चादागे प्रथिदा नेन वा मुखपत्रिका धारयताऽपि भापणकालिक्मुखोत्पतितजलकणेषु समूचिमनी वोत्पत्तिस्थानत्वाभारोपपादनाय प्रकृतोपानानि प्रमाणान्याश्य शरणीकरणीयानि, करते समय भगवान्ने पसीना नहीं कहा है । पिण्डनियुक्तिमें प्रतिकर्म दोषके भेद द्रव्यप्रतिके उदाहरणमें 'अशुचिगन्ध' शब्दको विष्ठा गन्ध वाले अर्थमें प्रयोग किया है। मानवधर्मशास्त्र में भापण करते समय निकलने वाले जलकणोंको अशुचि नहीं कहा है । मनुस्मृति पाँचवाँ अध्याय- मक्षिका विग्रुपश्छाया, गौरश्वः सूर्यरश्मयः । रजो भूर्वायुरग्निश्च, स्पर्शे मेध्यानि निर्दिशेत् ॥ १३३ । डोरा धारण करनेको ही हिंसाका कारण मान कर हाथसे अथवा सिरके पीछे गाठ लगा कर मुखवस्त्रिका धारण करने वालोंको भी इन प्रमाणोंकी शरण लेनी चाहिए, जो यह बतानेके लिए यहाँ दिये गये हैं कि भाषण करते समय मुखसे निकलने वाले जलकणों में समृच्छिम जीव સ્થાનની ગણત્રી કરતી વખતે ભગવાને પાને કહે નથી પિડનિર્યુક્તિમાં तिभाषना मह द्रव्यपूतिन SUseणुभ अशुचि-गध शहना वि-14 અર્થમાં પ્રવેશ કર્યો છે માનવધર્મશાસ્ત્રમાં ભાષણ કરતી વખતે નીકળતા જળકને અશુચિ કહા નથી મનુસ્મૃતિના પાચમા અધ્યાયમાં કહ્યું છે – मक्षिका विभुषश्छाया, गौरश्च सूर्यरश्मय । रजो भूर्वायुरग्निश्च, स्पर्श मे यानि निदिशेत् ।।१३३।। દોરે ધારણ કરવાને જ હિસાનું કારણ માનીને હાથથી અથવા શિરની પાછળ ગાઠ વાળીને મુખવસ્તિકા ધારણ કરનારાઓએ પણ આ પ્રમાણેનું શરણ લેવું જોઈએ, જે એ બતાવવાને માટે અહી આપવામાં આવ્યા છે કે ભાષણ કરતી વખતે મુખથી નિકળતા જલકણેમાં સામૂચ્છિમ જીવ ઉત્પન્ન નથી થતા, અન્યથા વ્યાખ્યાન ३ अध्ययन १ गा. १ मुग्ववत्रिकाविचारः अन्यथा तेपामपि धर्मोपदेशकाले द्वित्रहोरापर्यन्त भापणे मुखोपरि मुखवत्रिकाधा- रणस्याऽऽवश्यकतया तत्र मुखोत्पतितजलकणैरार्द्रतापत्तिर्वारयितुमशक्यैव, लोके हि अनास्तमुखेन पुस्तक पठता पर प्रति ब्रुवता च मुखविभुपः पुस्तके परदेहे च पतन्त्यो लक्ष्यन्ते, पुनः समीतरवत्तिमुखयस्त्रिकाया न ताः पतिप्यन्तीति कल्पना कि दुराग्रह नावेदयेदित्यलम् । नन्वेव सूक्ष्मव्यापिसम्पातिमवायुकायादिजीवविराधनापरिहारार्थमेव यदि सदा सदोरसमुखवस्त्रिकापन्धने सावधानता विधीयते तर्हि भोजनकाले तदपसारणावश्यकतया कय तादृशजीवपिराधनापरिहारः १, इति चेच्चित्तमवधेहि । उत्पन्न नहीं होते । अन्यथा धर्मोपदेश देते समय वे दो-दो तीन तीन घण्टे योलते हैं उस समय मुखवस्त्रिका धारण करना आवश्यक होनेके कारण मुखसे निकलने वाले जलकणोंसे मुखवविका गीली हो जायगी और इस आपत्ति का निवारण करना शक्य नहीं है। लोकमें खुले मुंह पुस्तक पढनेवालोंके तथा दूसरोंसे वार्तालाप करने वालोंके मुखसे जलकण निकल कर पुस्तक पर तथा दूसरेकी देह पर गिरते हुए देखे जाते है । फिर मुखके पास ही रहनेवाली मुखवस्त्रिका पर कण नहीं गिरेगे, ऐसी कल्पना करना दुराग्रहको ही प्रगट करता है। प्रश्न-सूक्ष्म, व्यापी, सपातिम तथा वायुकाय आदि जीवोंकी विरा- धनासे पचनेके लिए ही यदि सदा डोरा सहित मुखवत्रिका याँधनेमें सावधानी रखी जाती है तोभोजन करते समय उन जीवोंकी विराधनासे कैसे बच सकते हैं क्योंकि उस समयमुखवत्रिकाखोल लेनाआवश्यक है। વાચતી વખતે બબે ત્રણ-ત્રણ કલાક સુધી બોલે છે, ત્યારે મુખવસ્ત્રિકા ધારણ કરવી આવશ્યક હેવાથી મુખથી નીકળતા જલકણેથી મુખવસ્ત્રિકા ભીની થઈ જશે અને એ આપત્તિ નિવારવાનું શકય નથી લેકેમ ખુલે મુખે પુસ્તક વાચનારના તથા બીજાઓ સાથે વાર્તાલાપ કરનારના મુખમાથી જલકણ નીકળીને પુસ્તક પર તથા બીજાના શરીર પર પડતા જેવામાં આવે છે તે પછી મુખની પાસે જ રહેનારી મુખવસ્ત્રિકા પર કશું નહિ પડે, એવી કલ્પના કરવી એ દુરાગ્રહને પ્રકટ કરે છે પ્રશ્નસૂફમ, વ્યાપી, સાતિમ તથા વાયુકાય આદિ ની વિરાધનાથી બચવાને માટે જ જે સદા દેરા સાથે મુખવસ્ત્રિકા બાધવામાં સાવધાની રાખવામા આવે છે તે ભોજન કરતી વખતે એ જીવોની વિરાધનાથી કેવી રીતે બચી શકાય? કારણ કે એ વખતે મુખવસ્ત્રિકા છેડી નાખવાની જરૂર પડે છે ४ ६४ श्रीदशवकारिक " अत्रैव चतुर्थाध्ययने- "जय भुजतो भासतो पाव कम्म न बघा इति भगरताऽभिहितम् , 'मागुक्तरीत्या मुग्यास्त्रिकारन्धनस्याऽऽवश्यकस्वेऽपि तदपसारणमन्तरेण 'भुजतो' इति पदयो याया भोजनक्रियाया अनुपपत्या भोजनकाले मुनिना मुखबखिरा मोचनीयेति गम्यते, अत एवात्र-'जय भुजतो' इत्यस्य यथाकल्पलब्धान्तमा तावाशन मण्डलदोपार्जनपूर्वग्मभ्यवहरमाणः' इत्ये वाशयो न तु मुखवत्रिका बझै भुञान इति, तथा चोक्तयतनापूर्वकभोजनकाले मुखवत्रिकापसारणमागमानुालमेवेति न तस्य पापकर्मवन्धन हेतुत्वम् , अनेनैवाऽऽ १ 'पूर्वोक्तममाणानुसारेण ' इत्यर्थः । उत्तर-चित्त लगाकर सुनो। इसी (दशकालिक) के चौथे अध्ययनमें भगवान ने कहा है "जय भुजतो भासतो पाच काम न पधह।" अर्थात् यतनापूर्वक आहार करने और भापण करनेसे पापकर्मकायन्धनहीं रोताहै। पहले कहे गये प्रमाणोंसे मुखयस्त्रिका याधना सिद्ध होने पर भी उसके निकाले विना 'भुजतो' पदसे योध्य भोजनक्रिया नहीं रोसकती। इससे ऐसा तात्पर्य निकलता है कि भोजन करते समय मुनिको मुख वत्रिका हटा देनी चाहिये । अतः 'जय भुजतो" पदका “ कल्पके अनुसार प्राप्त हुआअन्त प्रान्त आदि आहार मण्डलदोपोंका त्याग करके भोगता हुआ" ऐसा अर्थ समझना चाहिए। ऐसा नहीं कि मुखवस्त्रिका वाँधे-बाँधे आहार करे । अत एव उक्त-यतना पूर्वक भोजनकालमे मुख वस्त्रिका त्याग देना आगमके अनुकूल है, अतः उससे पापकर्मका बन्ध ઉત્તર-ચિત્ત રાખીને સાભળે એના (દશવૈકાલિકના) જ ચેથા અધ્યયનમાં भगवान यु छ जय भुजतो भासतो पाव कम्म न बधइ अर्थात् यतनापू આહાર કરવાથી પાપકર્મને બધ થતું નથી પૂર્વોકત પ્રમાણેથી મુખવસ્ત્રિકા બાધવી એ સિદ્ધ થયા છતા પણ એને કાઢી નાખ્યા વિના મુંનતો શબ્દથી બેધ્ય ભજન ક્રિયા થઈ શકતી નથી તેથી એવુ તાત્પર્ય નીકળે છે કે ભજન કરતી વખતે, મુનિએ મુખવસ્ત્રિકા હટાવી દેવી જોઈએ એટલે ના મુખ પદનો અર્થ “કપને અનુસાર પ્રાપ્ત થએલો અતિ પ્રાત આદિ આહાર મડલનો ત્યાગ કરીને ભોગવતા” એ પ્રમાણે સમજવું જોઈએ એમ ન સમજવું જોઈએ કે મુખવસ્ત્રિકા બધી રાખીને બહાર કરે એટલે ઉત-ચતનાપૂર્વક ભેજનકાળમા મુખવસ્તિકને ત્યાગ કર એ આગમને અનુકૂળ છે, તેથી પાપકર્મને બધ થતું નથી :

अध्ययन १ गा. १ मुखवस्त्रिकाविचारः शयेन च-"पाव कम्म न बधइ" इत्युक्त भगवता । एव च भगवतीर्थङ्करगणधरादिपचनपलोचनेन निरवशेपसंशयतिमिराप- गमपुरस्सर प्रकाशमाने मानसे वायुकायादिविराधनापरिहाराय सदोरकमुखवस्त्रिका- वन्धन साहादं स्थानमासादयति । रागद्वेपदोपारुलितचेतसा भगवद्वचनामृत- रसास्वादाञ्चिताना विविधसशयपराहते चेतसीममर्थ दुर्लक्ष्यमभिलक्ष्य हस्तदुप्पाप्य- मर्थमाकलयितु सोपानमिवालम्बन तेभ्यः पुरस्कर्तुं सप्रमाणमेतत् सम्यगुपपादितम् । नहीं होता। इसी आशयसे भगवान्ने 'पाव कम्म न बन्धह' कहा है। इस प्रकार भगवान् तीर्थङ्कर गणधरादिकोंके वचनोंकी पर्यालोचना करनेसे सकलसशयरूप अन्धकारके दूर हो जानेके कारण प्रकाशमान ऐसें हृदयमे वायुकाय आदिकी विराधनाका दोप टालनेके लिए दोरासहित मुखवत्रिकामा यान्धना आल्हादपूर्वक स्थानको धारण करता है। रागडेपरूपी दोपसे दृपित भगवद्वचनामृतके रसास्वादसे वञ्चित पुरुषोंके अनेक दुर्विकल्पोंसे पराहत हुए चित्तमे इस अर्थको दुर्लक्ष्य समझकर उनके लिए हायसे न प्राप्त होनेवाली वस्तुकी प्राप्ति के लिए सोपान (सीढी) की तरह आलम्बन अगाडी रखकर यह सब सप्रमाण प्रतिपादित किया गया है। से माशयथी भगवान पार कम्म न वधइ उधु छ એ પ્રકારે ભગવાન્ તીર્થ કર ગણધરાદિના વચનેની પર્યાલચના કરવાથી સકલ સશયરૂપ અધકાર દૂર થઈ જવાને લીધે પ્રકાશમાન એવા હૃદયમા, વાયુકાય આદિની વિરાધનાને દેવ ટાળવાને માટે દેરાસહિત મુખવસ્ત્રિકાનું બાધવું તે આફ્લાદપૂર્વક સ્થાનને ધારણ કરે છે રાગદ્વેષ રૂપી દેવથી દૂષિત, ભગવવચનામૃતને રસાસ્વાદથી વચિત એવા પુરૂના અનેક દુર્વિકલ્પથી રાહત એવા ચિત્તમા આ અર્થને દુર્લક્ષ્ય સમજીને તેમને માટે હાથથી ન પ્રાપ્ત થનારી વસ્તુની પ્રાપ્તિને માટે પાન (સીડી)ને જેવું આલબન આગળ રાખીને આ બધુ સપ્રમાણ પ્રતિપાદિત કરવામા આવ્યુ છે Prem श्रीदनकासिकसी अत्र प्रमाणतयोपन्यस्तग्रन्यनामानि पिनेययुटिमित्याय निर्दिश्यन्ते- (१) श्री-भगवतीसूत्रम् । (१५) निगीपत्रम् । (२) हितशिक्षारासः । (१६) वृहस्वल्पभाष्यम् । (श्रावक-पभदासकृतः) (१७) घ्यबहारमाप्यम् । (३) हरिवलमच्छीरासः (१८) आचारागमूत्रम् । (मुनिलब्धिविजयकृतः) (१९) पिपारसूत्रम् । (४) योगशास्त्रम् (हेमचन्द्राचार्य०) (२०) सामाचारी । (५) ओधनियुक्ति। ( देवचन्द्रमरिकता) (६) प्रवचनसारोद्धारः । (२१) प्रज्ञापनासूत्रम् । (७) प्रकरणरत्नाकरः। (२२) भावमफाशः। (१०) उत्तराध्ययनसूनटीकाः ३। (२३) मुश्रुतसहिता । (१) सर्वार्थसिद्धिटीका । (२४) योगचिन्तामणिः । (२) भावविजयकृतष्टत्तिः। (२५) माधवनिदानम् । (३) पाईटीका । (२६) तिबअफब्बर । (११) विशेषावश्यकबृत्तिः (२७) शरीरविज्ञानम् । (१२) अन्तकृदशाङ्गम् । (२८) मानवधर्मशास्त्रम् । (१३) आवश्यकसूत्रटीका । (२९) पिण्डनियुक्तिः। (हारिभद्रीया) (३०) सूत्रकृताङ्गम् । (१४) ज्ञाताधर्मकथाङ्गम् । (३१) दशवैकालिकसूत्रम् । इति । ॥ इति मुखवत्रिकाविचारः ॥ 'यहां विनीत शिष्यकी वृद्धिका विकाशके लिए प्रमाणरूपसे दिये गये ग्रन्थोंकी कुछ नामावली सस्कृत टीकामे दी गई है, पाठकगण वहा देख लेवें ॥ ।। इति मुखवस्त्रिकाविचार ।। અહી વિનીત શિષ્યની બુદ્ધિના વિકાસને માટે પ્રમાણુરૂપે આપિલા ગ્રથની નામાવલી સંસ્કૃતટીકામાં આપવામાં આવી છે, ત્યાથી પાઠકે એ જોઈ લેવી ઈતિ મુખશ્ચિાવિચાર .

अध्ययन १ गा. १ तपास्वरूपम् ६७ तपः तपः-तपति-ज्ञानावरणीयाद्यष्टविध कर्म दहतीति तपः, तत्तु वाह्याभ्यन्तर- भेदाद्विधा, तत्र बाद्य तपः पड्वियम् , तथा चोक्तम्- अणसणमूणोयरिया, भिकरवायरिया य रसपरिच्चाओ। काफिलेसो सलीणया य वज्झो तवो होइ ॥१॥" इति । छाया-" अनशनमूनोदरिका, भिक्षाचर्या च रसपरित्यागः । कायालेशः सलीनता च, वाय तपो भवति ॥१॥" (१) अनशन चतुर्थभक्तादिपाण्मासिकान्त यावज्जीवन वाऽशेपाहारपरिहारः। । तप । जिससे ज्ञानावरणीय आदि आठ कर्म भस्म हो जावें उसे तप कहते हैं । वह दो प्रकारका है-(१) याह्य और (२) आभ्यन्तर । पाय तप छह प्रकारका है- (१) अनशन, (२) ऊनोदी, (३) भिक्षाचर्या, (४) रसपरित्याग, (५) कायक्लेश, (६) सलीनता । (१) अनशन इहलोक परलोक सम्बन्धी कामनारहित चतुर्थभक्त, पष्टभक्त, अष्टमभक्त आदि छहमासी तप पर्यन्त, अथवा यावजीवन सपूर्ण आहारका परित्याग करना अनशन तप कहलाता है। त५. જેથી જ્ઞાનાવરણીય આદિ આઠ કર્મ ભસ્મીભૂત થઈ જાય તેને તપ કહે છે તપ બે પ્રકારને છે (૧) બાહ્ય અને (૨) આભ્યતર બાહ્ય તપ છ પ્રકારને छे-(1) अनशन, (२) अनश, (3) भिक्षाया, (४) सपरित्याग, (५) यश, (९) सलीनता (૧) અનશન–ઈહલેક પરલેક સબધી કામના રહિતપણે, ચતુર્થ ભક્ત, ષષ્ઠ ભક્ત, અષ્ટમ ભક્ત (સળગ એક ઉપવાસ, બે ઉપવાસ, ત્રણ ઉપવાસ) આદિ છ માસી તપ સુધી અથવા જીવનપર્યત સ પૂર્ણ આહારને પરિત્યાગ કરે એ અનશન–તપ કહેવાય છે श्रीदवेकालिको (२) ऊनोदरिका यावताऽन्नादिनोदर परिपूर्यते तत्र फालमात्रमपि न्यूनयित्वा ऽभ्यबहरणम् । (३) भिक्षाचर्या धान्यायापिरोधियथाविधिरिशुद्धभिक्षाकृते चरणम् (४) रसपरित्यागः दुग्धादिविकृतित्यागः। (५) कायरटेगाशीतोष्णादि- सहिष्णुत्व केशलञ्चन च । (६) सलीनतान्त्रीपशुपण्डारहितवसती धर्मवदनो- पागाधाकुश्चनपूरस्थानम् । (२) अनोदरी-जितने अन्नसे उदरकी पूर्ति हो जाती है उससे एक ग्रास भी कम आहार करनेको ऊनोदरी तप करते हैं। इससे स्वाध्याय, ध्यान आदि क्रिया अच्छीतरह निभती है। (३) भिक्षाचर्या जिससे स्वाध्याय, ध्यान आदि क्रियाओंमें विघ्न न आवे, इसप्रकार शास्त्रानुकूल विधिसे विशुद्ध भिक्षाके लिए पर्यटन करना भिक्षाचर्या तप कहलाता है। (४) रसपरित्याग द्ध, दही, घृत, तेल, मीठेका त्याग करनेको रस परित्याग करते हैं। (६) कायक्लेश= शीत, उष्ण आदिकासहन करना, अथवा केशलोच करनेको कायक्लेश तप करते हैं। (६) सलीनता स्त्री-पशु-पण्डकरहित वसतीमें कछुवेकी तरह अङ्गो पाङ्ग,सकुचित करके स्थित होना सलीनता तप कहलाता है। (૨) ઉનેદરી–જેટલા અન્નથી ઉદર ભરાય તેથી એક કોળિયે માત્ર પણ ઓછો આહાર કરે તે ઊદરી તપ કહેવાય છે તેથી સ્વાધ્યાય, ધ્યાન, આદિ ક્રિયાઓને સારી રીતે નિભાવ થાય છે (૩) ભિક્ષાચર્યા–જેથી સ્વાધ્યાય, ધ્યાન આદિ ક્રિયાઓમાં વિદ્ધ ન આવે, એ પ્રકારે શાસ્ત્રાનુકૂલ વિધિથી વિશુદ્ધ ભિક્ષા માટે પર્યટન કરવું એ ભિક્ષાચ તપ કહેવાય છે (૪) રસપરિત્યાગ-દૂધ, દહીં, ઘી, તેલ, મીઠાઈને ત્યાગ કરે એને રસપરિત્યાગ કહે છે (૫) કાયલેશ-ટાઢ, તાપ, આદિને સહન કરવા અથવા કેશલેચ કરે એ ડાયકલેશ તપ કહેવાય છે () सदीनता-श्री-पशु-५४४-डित सतीमा (स्थानमा) यमानी પડે અપાગ સકેચીને રહેવું તે સલીનતા તપ કહેવાય છે , 4 अन्ययन १ गा. १ तपास्वरूपम् ९ " इति । आभ्यन्तरमपि तपः पविध, तथा चोक्तम्- "पायन्उित्त पिणओ वेयाश्च तहेव सज्झाओ। झाण च विउस्सग्गो एसो अभितरो तवो ॥१॥ छाया-" प्रायश्चित्त विनयः, वैयावृत्य तथैव स्वाध्यायः । ध्यान च व्युत्सर्गः, एतदाभ्यन्तर तपः ॥ १ ॥ तत्र (१) मायश्चित्तम् उपचिताऽतीचारशोधन, यथाऽऽलोचनापतिक्रमणादि । (२) विनया गुर्वाचाराधन, यथाऽभ्युत्थानाऽऽसनमदानाभिवादनतन्मनोऽनुकूल- प्रवृत्त्यादि । (३) वैयावृत्त्य साधनामशनपानाबानयनादिना साहाग्यकरणम् । (४) स्वा-यायः श्रुतधर्माराधन, स च वाचना-पच्च्ना-परिवर्तनाऽनुपेक्षा-धर्म- आभ्यन्तर तपके भी छह भेद है-(१) प्रायश्चित्त, (२) विनय, (३) वैयाऋत्य, (४) स्वाध्याय, (५) ध्यान, (६) व्युत्सर्ग । (१) प्रायश्चित्त लगेटुए अतिचारोकी विशुद्धि करनाप्रायश्चित्ततप है, जैसे आलोचना, प्रतिक्रमण आदि करना । (२) विनय गुरु आदिकी आराधना करना विनय है। गुरु आदिके आने पर खडा होना, आसन देना, वन्दना करना, उनके मनके अनुकूल प्रवृत्ति करना आदि अनेक प्रकारका विनय होता है । (३) वैयावृत्य-अशन पान आदि लाकर मुनियोंको सहायता पहुंचाना चैयावृत्य (वेयावच्च) तप कहलाता है । (४) स्वा याप-श्रुतज्ञानकी आराधना करनास्था याय है। स्वाध्यायके पाच भेद हैं-(१) वाचना, (२) पृच्छना, (३) परिवर्तना, (४) अनुप्रेक्षा मास्यतर तपन प ७ लेह छ (१) प्रायश्चित्त, (२) विनय, (3) या वृत्य, (४) स्वा याय, (५) ध्यान, (6) व्युत्सर्ग (૧) પ્રાયશ્ચિત્ત–લાગેલા અતિચારેની વિશુદ્ધિ કરવી એ પ્રાયશ્ચિત્ત તપ છે, જેમકે આલેચના, પ્રતિક્રમણ વગેરે કરવા (ર) વિનય-ગુરૂ આદિની આરાધના કરવી એ વિનય છે ગુરૂ આદિ આવે ત્યારે ઊભા થવુ, આસન આપવું, વદના કરવી, એમના મનને અનુકૂળ પ્રવૃત્તિ કરવી વગેરે અનેક પ્રકારે વિનય થાય છે (3) वैयाकृत्य-२ –અશન પાન આદિ લાવીને મુનિઓને સહાય આપવી આદિ વૈયાવૃત્ય (વૈયાવચ્ચ) તપ કહેવાય છે (૪) સ્વાધ્યાય–શ્રુતજ્ઞાનની આરાધના કરવી એ સ્વા થાય છે સ્વા થાયના पाय ले (१) वायना, (२) छना, (3) परिवर्तना, (४) अनुप्रेक्षा, . श्रीदनकालिको कथाभेदात् पञ्चविधः । (५) ध्यानम् एकमात्रायलम्बनेन पत्रनासपृक्तदीपशिखाया इव चित्तस्य स्थिरीकरणम् । यद्यपि तचतुर्विधम् आर्च-ौद्र-धर्म-शुक्रमेदाद , तथापि धर्म-शा लक्षण द्वयमेवोपादेय पूर्वद्वयस्य फर्मवन्धहेतुत्वात् । (६) व्युत्सर्गः कायादिसचालन और (५) धर्मकथा । शिष्योंको आगम पढ़ानेको 'वाचना' कहते हैं। सद्भावसे सशय दूर करनेके लिए, अथवा तत्त्वका निश्चय करनेके लिए पूछना पुच्छना कहलाता है। शुद्ध उच्चारण करके चार-चार मनन करना अनुप्रेक्षा' है। धर्मकी चर्चा या उपदेश करनेको 'धर्मकथा' करते हैं। (१) ध्यान-वायुके स्पर्श नहीं होनेसे जैसे दीपककी ज्योति स्थिर हो जाती है, वैसेही मनको किसी एक विषयमें स्थिर करलेनेको ध्यान कहते हैं । ध्यान यद्यपि आर्त, रौद्र, धर्म और शुक्ल भेदसे चार प्रकारका है, तथापि यहाँ धर्म और शुक्ल ये दो शुभ ध्यान ही उपादेय है, यही दोनों तपमें अन्तर्गत हैं, पहलेके दो अशुभ यान कर्मनन्धनके कारण हैं। (६) व्युत्सर्ग-काय आदिके व्यापारको, तथा कपाय आदिको त्याग कर उपयोगसहित रहनेको 'व्युत्सर्ग' कहते हैं । અને (૫) ધર્મકથા શિષ્યને આગમ ભણવવા અને પોતે ભણવું એ વાચના કહેવાય છે સદ્દભાવ પૂર્વક સશય દૂર કરવા માટે, અથવા તત્વનો નિશ્ચય કરવા માટે પૃચ્છા કરવી પૂછવુ એ પૃચ્છના કહેવાય છે શુદ્ધ ઉચ્ચારણ કરીને વાર વાર આવૃત્ત કરવું પરિવર્તન કહેવાય છે ભણેલા અર્થનુ વાર વાર મનન કરવું એ અનુપ્રેક્ષા છે ધર્મની ચર્ચા અથવા ઉપદેશ કરે એ ધર્મકથા કહેવાય છે (૫) ધ્યાન–વાયુને સ્પર્શ નહિ થવાથી જેમ દીવાની ત સ્થિર રહે છે, તેવી રીતે મનને કોઈ એક અલબનમાં સ્થિર કરી લેવું એ पान मात, રીત, ધર્મ અને શુકલ એવા ભેદે કરીને ચાર પ્રકારનો છે, તે પણ અહી ધર્મ અને શુકલ એ બે શુભ થાન જ ઉપાદેય છે એ બે અ તત છે, પહેલા બે અશુભ ધ્યાન કર્મબ ધના કારણે છે (६) व्युत्सर्ग -નાયા આદિના વ્યાપારને તથા કષાય આદિને ત્યજીને ઉપગ સહિત રહેવું એ વ્યુત્સગ કહેવાય છે તે થાન કહેવાય છે યાન નષમાં . अध्ययन १ गा. १ तपास्वरूपम् ७१ निवृत्तिपूर्वकसोपयोगावस्थानम् । एव वाद्याभ्यन्तरभेदेन द्वादशविध तपः सिद्धम् । ननु अहिंसा-सयम-तपः-स्वरूपस्य धर्मस्योत्कृष्टमगल्ल प्रतिपाद्यते तत्र तपसोऽनशनादिलक्षणदुःखरूपत्वेन मोक्षहेतुत्व न मानोति, तद्धि अशातवेदनीय- कर्मोदयात्मकम् , भगवताऽपि क्षुत्पिपासादयः परीपहा वेदनीयकर्मोदयस्वरूपत्वे- नाऽभ्यधायिपत । कर्मक्षयो हि यद्यपि मोक्षाङ्गत्वेन श्रूयतेऽपि शास्त्रे, कर्मोदयस्य तु न कचिन्मोक्ष- हेतुत्व शाखे लोके वा मथितम् । एव सति तस्योत्कृष्टमगलात्मधर्मरूपत्वकथन- मयुक्तम् । इस प्रकार याद्य और आभ्यन्तरके भेद मिलकर तपके सब पारह भेद होते है। प्रश्न-अहिंसा, सयम और तपस्प धर्मको उत्कृष्ट मगल बतलाया है, लेकिन अनशन आदि तप भोजन आदिका त्याग करनेसे होते हैं, इसलिए वे दुख हैं और दुःख मोक्षका कारण नहीं हो सकता, क्योंकि दुःख असातवेदनीय कर्मके उदयसे होता है । भगवान्ने भी यही प्रति- पादन किया है कि-"क्षुधा पिपासा आदि परिपह वेदनीय कर्मके उदयसे होते हैं।" कर्मका क्षय तो मोक्षका कारण हो सकता है, परन्तु यह कहीं नहीं सुना कि कर्मका उदय भी मोक्षका कारण है । यह बात न किसी शास्त्रमें है और न लोकमेंही प्रसिद्ध है, इसलिए जय कि तप, कर्मोदय- जन्य होनेसे मोक्षका कारण नहीं हो सकता तो उसे उत्कृष्ट मगल क्यों એ પ્રમાણે બાહ્યા અને આભ્યતરના ભેદ મળીને તપના એક દર થાય છે પ્રશ્ન–અહિંસા, સયમ અને તપ રૂપ ધમને ઉત્કૃષ્ટ મગલ બતલાવેલ છે, પરંતુ અનશન આદિ તપ ભેજનાદિને ત્યાગ કરવાથી થાય છે, તેથી એ દુ ખ છે અને દુ ખ મેક્ષનું કારણ થઈ શકતું નથી, કારણ કે દુ ખ અસાતા વેદનીય કર્મના ઉદયથી ઉત્પન્ન થાય છે ભગવાને પણ એમ જ પ્રતિપાદન કર્યું છે કે-“ભૂખ તરસ આદિ પરિવહ વેદનીય કર્મના દયથી જ થાય છે… કર્મને ક્ષય તે મોક્ષનું કારણ હોઈ શકે છે અને તુ એવું કયાય સાભળ્યું નથી કે કર્મને ઉદય પણ મેક્ષનું કારણ છે એ વાત કોઈ શાસ્ત્રમાં નથી તેમજ લેકમાં પ્રસિદ્ધ નથી, તેથી જે તપ કર્મોદયજન્ય હેઈને મોક્ષનું કારણ થઈ શકતું નથી તે માર , ७२ খ্রীস্মক্ষাঙ্গিন दुःखरूपत्वेन तपसो मोक्षसाधावस्वीकारे तु व्याधिनाऽऽतुरस्य, राजदण्डेन "तस्करस्य, पशादिघातेनाम्पादे, दधिक्षेत्रवेदनया नाराणा, श्वासोच्छ्वास मात्रममितकालेऽपि सार्द्धसप्तदशमितजन्ममरणनिमित्तकाऽनन्तघोरवेदनायुक्ताना निगोदनीपाना च मोक्षापत्तिः, तेपामपि भवभिमनमोक्षहेतदुःखसझावादिति । फिञ्चालमेतेन रिशेपपिचारेण जन्मजरामरणेएपियोगाऽनिष्टसयोगायनेक- विधदुःखयुक्ता. सर्व एव ससारिण इत्यविशेषण सपा मोक्षापत्तिः स्यात् । एतदुक्त भाति-तप- समाचरत' भुत्पिपासादयः समुपन्ति, ततश्च प्रबर कहा है ?, यदि दुसरूप तपको मोक्षका कारण मानलिया जाय तो अनेक दोप आते है, वे ये है कि-जो पुम्प रोगसे अत्यन्त पीड़ापारहा है उसे मोक्ष होजाना चाहिये, राजदण्डसे दुप भोगनेवाले चोर डाकुओंको मोक्ष होना चाहिए, घोडोंपर कोहोंकी मार पटती है, वे दुखी होते हैं, अतः उन्हेंभी मोक्ष मिलना चाहिये । इसी प्रकार, क्षेत्रवेदनासे दुःखी नारकी जीवोंको तथा एक श्वासोच्छवासमे साढ़े सतरर चार जन्म- मरणके अनन्त काल तक दुग्व पाने वाले निगोदिया जीवोंको मुक्तिको प्राप्ति होनी चाहिये । अधिक कहा तक कहें ? ससारके समस्त प्राणी जन्म, मरण, इष्टवियोग, अनिष्टसयोग आदि भाति-भातिके दुःखोंसे दुखी हैं अत एव सवहीको मोक्ष मिलजाना चाहिये, क्योंकि दुःखको यहा मोक्षका कारण माना है । जो अनशन आदि तप करता है उसे क्षुधा पिपासा आदि परिषद તેને ઉત્કૃષ્ટ મગલ કેમ કહ્યો છે ? જે દુ ખરૂપ તપને મોક્ષનું કારણ માનવામાં આવે છે. અનેક આવે છે, જેમ-જે પુરુષ રાગથી અત્યંત પીડા પામી રહ્યો હોય તેને મેક્ષ થઈ જ જોઈએ, ગજડથી દુખ ભેગવવા વાળા ચેર ડાકુઓને મ થ જોઈએ, ઘેડા પર ચાબૂકને માર પડે છે તેથી તે દુખ થાય છે તે તેને પણ મેક્ષ મળે જોઇએ એજ પ્રમાણે વેદનાથી દુખી એવા નારી જીવોને તથા એક શ્વાસમાં સાડી સારવાર જન્મ-મરણના દુખે અન તકાળ સુધી પામનાર નિગેદિયા જેને પણ મુકિતની પ્રાપ્તિ થવી જોઇએ વધારે શુ કહીએ? જગતના બધા પ્રાણીઓ જન્મ મરણ ઈદને વિયેગ અનિષ્ટનો સાગ વગેરે તરેહ તરેહના દુખેથી દુ ખી છે એટલે એ બધાને મેક્ષ મળી જ જોઈએ, કારણ કે દુખને અહીં મેક્ષના કારણ રૂપ માને છે જે અનશન આદિ તપ કરે છે તેને ભૂખ-તસ આદિ પરિહ થાય अ ययन १ गा. १ तपःस्वरूपम् ७३ । दुःखम् , एतच चित्तविक्षेपस्य हेतु', सति च तस्मिन् अभशस्त ध्यान, तस्माचावश्य कर्मवन्धः, ततश्च चतुर्गतिरससारपरिभ्रमणरूप महदमङ्गलमिति कथकथमप्यहिंसा- सयमविशिष्टस्यापि तपमो मोक्षहेतुत्वरूपमुत्कृष्टमगलव न सम्भवदुक्तिकमिति । अत्रोच्यते-तपो न तावदुःसात्मक, दुग्य हि नामाऽशातवेदनीयकर्मोदय- विपाक पीडालक्षण आत्मपरिणामः, तपश्चर्यागर्भिताऽनशनादिव्यापारस्य न पीडात्मकाऽऽत्मपरिणामरूपत्वम् । किञ्च तप' पक्षीकृत्य मोक्षसाधनत्वाभावसाध्ये यदुक्त दुःखरूपत्वसाधन होते हैं। परिपर होनेसे तीव्र दु.स होता है । दु खसे चित्तका विक्षेप होता है। चित्तके विक्षेपसे अशुभ ध्यान होता है । अशुभ ध्यानसे कर्मका बन्ध होता है। कर्मपन्धसे चार गतियोमे भ्रमण करना पडता है, इसप्रकार यह वडा अमगल है। जो प्रवल अमगल है वह अहिंसा और सयमसे युक्त होनेपर भी उत्कृष्ट मगल नहीं हो सकता । अमृतमे विष मिला देनेसे क्या विष अमृत हो सकता है। कदापि नही । इसलिए तपको मोक्षका कारण मानना उचित नहीं है । उत्तर-तपको दुःग्व कहना युक्त नहीं है वह दुरवरूप नहीं है। क्योंकि असातावेदनीय कर्मके फलको, जो आत्माका ही एक विभाव परिणाम है, और पीडारूप है उसे दुःख करते है । अनशन आदि तप पीडारूप परिणाम नहीं है, अतः उन्हें दु.ख नहीं कहा जा सकता। दूसरी बात यह है-शकाकारने कहा है कितपमोक्षका कारण नही है । क्योंकि वह दुःख है । यहा "तप मोक्षका कारण नहीं" यह પરિવહથી તીવ્ર દુ ખ થાય છે દુખથી ચિત્તને વિક્ષેપ થાય છે ચિત્તના વિક્ષેપથી અશુભ ધ્યાન થાય છે અશુભ ધ્યાનથી કર્મને બધ થાય છે કર્મબંધથી ચારે ગતિઓમાં પરિભ્રમણ કરવું પડે છે એ રીતે એ મોટુ અમ ગળ છે જે પ્રબળ અમ ગળ છે તે અહિંસા અને સયમથી યુક્ત થવા પણું ઉત્કૃષ્ટ મ ગળ થઈ શકતું નથી અમૃતમાં વિષ મેળવવાથી શું વિષ અમૃત થઈ શકે છે ? કદાપિ નહિ તેથી તપને મોક્ષનું કારણ માનવુ એ ઉચિત નથી ઉત્તર–તપને દુ ખ કહેવુ એ યુક્ત નથી તે દુ ખરૂપ નથી કારણ કે એ સાતવેદનીય કર્મ કે જે આત્માને જ એક વિભાવ પરિણામ છે અને પીડારૂપ છે, તેને દુ ખ કહે છે અનશન આદિ તપ પીડારૂપ પરિણામ નથી, તેથી તેને દુ ખ કહી શકાય નહિ બીજી વાત આ છે શ કાકરે કહ્યું કે તપ મેક્ષનું કારણ નથી. કારણ કે તે દખ છે, પરંતુ અહીં તપ મોક્ષનું કારણ નથી” છતા " श्रीदनयकालिकस्त्रे तदयुक्त, तस्य दुःखजयरूपत्वेन स्वरूपासि। तत्र (तपसि) जायमानाः क्षुत्पिपासादयः आत्मनः प्रार्द्धमानविशुद्धपरिणा- मेन रिजिताः सन्तः पीडालक्षण कार्य न जनयन्ति । एतेन क्षुत्पिपासादीना कर्मोदयस्वरूपत्वेऽपि स्वकार्यकरणाऽक्षमतया चित्तरिक्षपाजनकत्व सिद्धम् । प्रतिज्ञा है और "क्योंकि यह दुग्य हैयह हेतु है। हेतुका सदाऐसा ही प्रयोग करना चाहिए जो प्रतिवादीको भी सिद्ध रोवे । यदि "वह दु:न्व है" यह हेतु सिद्ध होता तो शकाकारका सान्य सिद्ध रो सकता, परन्तु वह सिद्ध नहीं है। क्योंकि पहले यत्तला चुके हैं कि तप दुःख नहीं है। अत एव यह हेतु स्वरूपसेही असिद्ध है। तप दुःखरूप नहीं, बल्कि दुःखको विजय करना तप कहलाता है । अनशन आदि तपसे रोनेवाले क्षुधा आदि परिपर आत्माके बढ़ते हुए विशुद्ध परिणामसे जीत लिये जाते हैं। क्षुधा दुःख अवश्य है परन्तु उसे तप नहीं कहते, यल्कि क्षुधा पर विजय पानेको तप करते हैं। क्षुधाको जीतना दुःख नहीं परन्तु सुख है अत एव तप सुखरूप है । क्योंकि तपश्चर्या करनेवालेको भूसकी परवाह ही नहीं रहती। इसलिए शकाकारका यह कहना ठीक नहीं है कि तपसे पीड़ा उत्पन्न होती है। इस कथनसे यह बात अच्छीतरह सिद्ध हो गई कि क्षुधा आदि परिषह પ્રતિજ્ઞા છે અને છે કારણ કે તે દુખ છે” એ હેતુ એ હેતુને પ્રગ સદા એ કરવું જોઇએ કે જે પ્રતિવારીને મને પણ સિદ્ધ હોય છે તે દુખ છે” એ હેતુ સિદ્ધ હેત તે શકાકારનું સાધ્ય સિદ્ધ કરી શકાય, પરંતુ એ સિદ્ધ નથી, કારણ કે પહેલા બતાવી ચૂકયા છીએ કે તપ એ દુખ નથી એટલે એ હિતુ વરૂપથી જ અસિદ્ધ છે તપ ટુ ખરૂપ નથી, બન્ને દુ ખ ઉપર વિજય મેળવે એ તપ કહેવાય છે અનશન આદિ તપથી થનારા ક્ષુધા આદિ પરિષહ આત્માના વિશુદ્ધ પરિણામથી છવાઈ જાય છે સુધા એ દુ ખ અવશ્ય છે, પરંતુ તેને તપ કહી શકાય નહિ, બકે સુધા પર વિજય પ્રાપ્ત કરે એ તપ કહેવાય છે સુધાને તવી એ દુખ નથી પરંતુ સુખ છે એટલે તપ સુખરૂપ છે, કેમકે તપશ્ચર્યા કરનારાઓને ભૂખની પરવા જ નથી હોતી તેથી શ કાકાનું એ કહેવું બરાબર નથી કે–તપથી પીડા ઉત્પન્ન થાય છે? આ કથનથી એ વાત સારી રીતે સિદ્ધ થઈ ગઈ કે સુધા આદિ પરિષહ વેદનીય કર્મના ઉદયથી થાય છે પરંતુ વધતા aadi अध्ययन १ गा. १ तपःस्वरूपम् अतएव भगवताऽपि क्षुत्पिपासादिपरीपहस्य तपसश्च पृथक्त्वेन प्रतिपादन विहितम् । यद्यनशनादिक सर्वत्र दुःखात्मकमेव मन्येत तदा-सिद्धानामपि अशनाध- ग्राहितयाऽनन्तदुःखसद्भावमसङ्गः केन वार्येत । एव च मोक्षमार्गे प्रवर्तकस्य शास्त्रस्य तदुक्तधर्मानुष्ठानस्य च वैयर्थ्यापत्तिः । अय भावः-यथा व्याधितस्य व्याधिपरिजिहीर्पया स्वयमेव लड़नादिमवृत्तिः वेदनीय कर्मके उदयसे होते हैं, परन्तु वे पीडा नहीं उत्पन्न कर सकते । और जब उनसे पीड़ा नही उत्पन्न हो सकती तो चित्तमें विक्षेप भी नही हो सकता। चित्तमें विक्षेप न होनेसे कर्मका बन्ध भी नहीं हो सकता। उल्टा क्षुधा आदिको जीतनेसे कर्मोंकी निर्जरा होती है और आते हुए कर्मोंका निरोध होनेसे सवर भी होता है । इसलिए भगवान महावीर स्वामीने क्षुधा आदि परिपद और तपको अलग अलग कहा है । एक बात और भी है-सिद्ध भगवान् कभी आहार नही लेते। यदि अनशनको दुःख मानलिया जाय तो उन्हें भी दुःखी मानना पडेगा। जब सिद्ध भी दुःखी होंगे तो मोक्षमार्गकी प्ररूपणा करनेवाले शास्त्र व्यर्थ होजावेंगे, और उन शास्त्रोंके अनुसार की हुई क्रियाएँ भी व्यर्थ जायेंगी। क्योंकि दुःखी बननेके लिए कोई बुद्धिमान तैयार नहीं होगा। मतलय यह है कि जैसे अपना रोग दूर करने के लिए रोगीकी स्वय ही लघनमें તે પીડા ઉત્પન્ન કરી શક્યું નથી અને જે તેથી પીડા ઉત્પન્ન નથી થતી તે ચિત્તમાં વિક્ષેપ પણ થઈ નથી શક્ત, ચિત્તમા વિક્ષેપ નહિ થવાથી કર્મને બધ પણ નથી થઈ શકતે ઉ સુધા આદિને જીતવાથી કર્મની નિજ થાય છે અને આવતા કર્મોને નિધિ થવાથી સવર પણ થાય છે તેથી ભગવાન મહાવીર સ્વામી સુધા આદિ પરિષહ અને તપને જુદા-જુદા કહેલા છે એક બીજી વાત એમ છે કે–સિદ્ધ ભગવાન્ કદાપિ આહાર લેતા નથી જે અનશનને દુ ખ માની લેવામાં આવે તે તેમને પણ દુખી જ માનવા પડે જે સિદ્ધ પણ દુખી હોય તે મોક્ષમાર્ગની પ્રરૂપણ કરનારૂ શાશ્વ વ્યર્થ બની જાય, અને એ શાસ્ત્રોને અનુસરીને કરવામાં આવતી ક્રિયાઓ પણ વ્યર્થ થાય, કારણ કે દુખી થવાને કઈ બુદ્ધિમાન તૈયાર નહિ થાય મતલબ એ છે કે-જેમ પિતાને રોગ દૂર કરવાને માટે રેગી પિતાની મેળે જ લાઘણુ કરવામા પ્રવૃત્ત kepe PPP- श्रीवनकालिको मणि-मौक्तिक-भवाल-हेम हीरक-रजतादीना म्याटर्नुः स्वयमेव सिन्धुतरणगहन- भयानकानगमनदुर्गमपथभ्रमणमरत्तिः पीडालक्षणात्मपरिणाम न जनयति, अन्य था हि भतिलकर्मणि समुत्साहपूर्वकस्वतःमरत्तिनोपपपते, तथा मुनयोऽपि वक्ष्य माणभावनया तपसि पीडां नानुमान्ति, तथाहि- इह ससारे (१) स्वतदुप्फत्तसन्ततिप्रशानरकेषु नारकाः कियन्तो मिधन्ते, प्रवृत्ति होती है । अथवा हीरे, मोती, मृगे, सोने, चांदी आदिकी प्राप्तिके लिए मनुष्य, दुस्तर समुद्र तरते हैं, अथवा अपनी इच्छासे री मोती आदिकी प्राप्तिके लिए गहरे समुद्र में गोते लगाते हैं। बड़े बड़े गहन और भयानक जगलोंमें गर्मी आदि अनेक कष्ट उठाते है, दुर्गम मार्गमें लाभके लिए घूमते फिरते है, फिरभी अपने मनमें उसे दुख नहीं मानते न पीडाका अनुभव करते हैं, यदि लघन करनेमें और गोते लगाने आदिमें कष्ट मालूम होता तो विना किसीके दवावके अपनी इच्छासेही उत्साह पूर्वक क्यों प्रवृत्ति करते ? इसी प्रकार मुनिराज भी अपनी आत्माकी विशुद्विके लिए अपने आपही प्रमुदित भावसे अनशन आदि तपस्या करते हैं । ऐसा करने में उन्हें तनिकभी दुःख नहीं होता। (१) ससारमें अपने किये हुए कर्मों के कारण कईएक नरकमें जाकर परमाधर्मीद्वारा भाले आदिसे भेदे जाते हैं। कईएक घानीमें तिल या થાય છે, અથવા હીરા, મોતી, માણેક, સોનું, ચાદી આદિની પ્રાપ્તિ માટે મનુષ્ય દુસ્તર સમુદ્રને તરે છે, અથવા પિતાની ઈચ્છાથી જ મોતી આદિની પ્રાપ્તિ માટે ઉડા સમુદ્રમાં ડુબકી મારે છે, મેટા મોટા ઘચ અને ભયાનક જ ગલેમાં ટાઢ તાપના અનેક કષ્ટ ઉઠાવે છે. દુર્ગમ રસ્તાઓમા લાભને માટે ભટકતે ફરે છે, તે પણ પિતાના મનમાં તેને દુખ માનતું નથી કે પીડાને અનુભવ કરતું નથી, જે લઘન કરવામાં અને ડુબકી મારવા આદિમા કષ્ટને અનુભવ થતું હોત તે કેઈએ દબાવ્યા કે આગ્રહ કર્યા વિના પિતાની જ ઈચ્છાથી મનુષ્ય ઉત્સાહ પૂર્વક કેમ પ્રવૃત્તિ કરત? એજ રીતે મુનિરાજ પણ પિતાના આત્માની વિશુદ્ધિને માટે પિતાની મેળે જ પ્રમુતિ ભાવથી અનશન આદિ તપશ્ચર્યા કરે છે એમ કરવામાં તેને જરા પણ દુ ખ થતુ નથી (૧) જગતમાં પિતાના કરેલા કર્મોને કારણે કઈ કઈ જ નરકમાં જઈને પરમધમી દ્વારા ભાલા આદિથી છેદાય-ભેદાય છે કેટલાક ઘાણીમાં તલ અથવા + ७७ " अध्ययन १ गा.१ तपःस्वरूपम् कियन्तस्तैलयन्त्रे तिलसर्पपादिवनिप्पीडयन्ते, ताम्रादिभाजनवच्च कियन्तः कुटयन्ते, फियन्तो दारुवद्विदार्यन्ते, क्यिन्तः शूलशग्याया स्वाप्यन्ते, कियन्तः शिलोपरि वस्त्रवत्ताडयन्ते, अनन्तक्षुत्पिपासादिभिः परिभूयन्ते, इत्येव विविध- दुःखसन्ततिमनुभवन्ति । (२) अथ तिर्यश्चोऽपि केचित् सम्लेश शीतोपणे सहमानाः, केचिद् गुरुतर भार वहमानाः, केचित्तोगादिना ताड्यमानाः, केचिन्मासार्थिभिर्विविधैस्तीक्ष्णाग्र- शौश्छियमानाः, केचिच्च गदकुनिनद्धा. प्रालैः क्षुत्पिपासादिभिः परिभूयमान लक्ष्यन्ते । सरसोंकी तरह पीले जाते हैं। कईक तांबे पीतल आदिके वर्तनोंकी तरह कृटे जाते हैं। कईएक काठकी भॉति करवतसे चीरे जाते है। कईएक तीक्ष्ण काटोंके पिछौने पर सुलाये जाते है । कईएक शिलापर कपडोंकी तरह पछाडे जाते हैं, और अनन्त भूख प्यास आदि नाना प्रकारके असच क्लेश पाते है । इस प्रकार भाँति-भाँतिके दुःखोंका अनु- भव करते हैं। (२) तिर्यञ्च गतिमे भी कोई२ तिर्यञ्च दुःखके साथ गर्मी सर्दी सहते हैं, किसी पर भारी बोझ लादा जाता है, कोई-कोई कोडोंकी मार खाते है, कोईर पैने (तीखे) शस्त्रोंसे छेदे जाते है, कोई-कोई खूटीसे यधे हुए भूख प्यास आदि नाना प्रकारके दुख भोगते हुए देखे जाते हैं। સસવની પિઠે પિલાય છે કેટલાક તાબા પીતળના વાસણોની જેમ કુટાય- પીટાય છે કેટલા લાકડાની પેઠે કરવતથી વહેરાય છે. કેટલાકને તીણુ કાટાના બિછાના પર સુવાડવામાં આવે છે કેટલાકને કપડાની પેઠે શિલાપર પછાડવામા આવે છે, અને અનત ભૂખ-તરસ આદિ નાના પ્રકારના અસહ્ય કલેશ પમાડ વામાં આવે છે એ પ્રમાણે તરેહ તરેહના દુ ખેને અનુભવ એ જ કરે છે (૨) તિર્થં ચ ગતિમા પણ કઈ કાઈ તિર્થં ચ દુ ખ સાથે ટાઢ-તાપ સહન કરે છે, કેટલાક પર ભારે જે લાદવામાં આવે છે, કેકેઈ ચાબુકના ખાય છે, ફઈ કોઈને કાતીલ શસ્ત્રોથી છેદવામાં આવે છે, કઈ કઈ ખૂટે બધાએલા ભૂખ-તરસ આદિ નાના પ્રકારના દુ ખ ભેગવતા જોવામાં આવે છે મારે , ७८ श्रीदशवकालिको (३) ए३ मनुष्यगति माता अपि केचिदन्यस्व, केचिठधिरस्व, केचिद पत्र, केचित्कासवासादिरोग, केचिहारिण च समाप्य, हीना दीनास्तत्तस्पीडापरिहारा- क्षमा विविधदुर्दशामापन्नाः, स्थापिरे कलत्रपुत्रादिमिरप्यनाहताः वरिपपासादिमि बांध्यमाना नियन्ते । (४) देश अपि परोकपनिरीक्षणेविषादिननितान्तस्तापस्य प्रतिवर्तुमत्र- क्यतया मायो दुःखमाज एर दृश्यन्ते । (३) यदि भाग्योदयसे मनुष्यगति मिल जाय तो उसमें भी सैकड़ों दुःख भोगने पड़ते है । कोई मनुष्य अन्धा रोजाता है, कोई बरिरा हो जाता है, कोई लगड़ा होजाता है। किसीको श्वास या खाँसीका रोग हो जाता है । कोई दरिद्रताके दु.पोंसे दीन हीन रोकर अनेक प्रकारकी दुर्दशाका अनुभव करता है। वृद्धावस्थामें पत्नी पुत्र आदि तिरस्कार करते हैं । अन्तमें क्षुधा-पिपासा आदिके भी दुःख उठाकर मरणकी शरणमें जाना पड़ता है। (४) कभी देवगति पाकर देवता होजाय तो वहा भी तरह-तरहके दु:ख विद्यमान है। किसी देवाताकी विभूति अधिक होती है, किसीकी कम रोती है, कम विभूतिवाला अधिकविभूतिवाले देवताको देखकर ईर्ष्या-द्वेष करता है, ऐसा करनेसे मनमें अत्यन्त सन्ताप होता है। उस सन्तापको मिटाने मे जब अपनेको असमर्थ पाता है तो दुखी होता है । इसलिये ससारमें कहीं भी सुख नहीं दिखलाई पडता है । (૩) જે ભાગ્યદયથી મનુષ્યગતિ મળી જાય તે તેમાં પણ સેકડો દુખે જોગવવા પડે છે કે ઈ માણસ આધળે થઈ જાય છે, કેઈ બહેર બની જાય છે, કે લગડો થાય છે કે શ્વાસ મા ખાસીને રોગ થાય છે કેઈ દરિદ્ર તાના દુખેથી દીન-હીન થઇને અનેક પ્રકારની દુર્દશાને અનુભવ કરે છે વૃદ્ધાવસ્થામાં પત્ની પુત્ર આદિ તેને તિરસ્કાર કરે છે. છેવટે ભૂખ-તરસ આદિના દુખે પણ વેઠીને તેને મરણ શરણ થવું પડે છે (૪) કદાચ દેવગતિ પામીને દેવતા થઈ જાય છે ત્યા પણ તરેહ તરેહના બે વિદ્યમાન હેય છે કેઈ દેવતાની વિભૂતિ અધિક હોય છે, કોઈની ઓછી હેય છે એછી વિભૂતિવાળ અધિક વિભૂતિવાળા દેવતાને જોઈને ઈર્ષા–દેષ કરે છે એમ કરવાથી મનમાં અત્યત સતાપ થાય છે એ સતાપને શમાવવાને જ્યારે તે પિતાને અસમર્થ જુએ છે ત્યારે તે દુખી થાય છે તેથી સંસારમાં કયાય પણ સુખ જોવામાં આવતું નથી ड अध्ययन १ गा. १ तपःस्वपरम् ७९ , इत्येवमपारपारावारतरलतरतरङ्गभङ्गमालायमानजन्मजरामरणाधिव्याधीट- वियोगाऽनिष्टसयोगादिजनित विविधसन्तापकलापमाफलयन्तः 'कथमेतस्मात्क्ले- शकदम्बकादुन्मुक्ता भविष्यामः? इत्युपाय समन्तात् समार्गयन्तो मुनयोऽपि जिने- न्द्रमतिपादित मोक्षमार्गमारुह्य, तत्रापि शुक्लध्यानाहितकेवरज्ञानसमनन्तरजाय- मानाऽव्याधामन्दानन्दसन्दोहलक्षणमोक्षस्याऽपुनरात्तिलक्षण महिमान विनि- चित्य, ईपत्सुत्पिपासाऽऽपादितदुःख मनागपि न गणयन्ति, अत एव तदनशना- जिसतरह अपार सागरमें चञ्चल तरगे उत्पन्न होती है उसी तरह ससारमें जन्म, मरण, धुढ़ापा, मानसिक चिन्तायें, शारीरिक व्याधियाँ, इष्टवस्तुओंका वियोग, अनिष्टका सयोग आदि अनेक प्रकारके नये-नये दुःख उत्पन्न होते रहते है । इन विविध प्रकारके दुःसोंको भली भाँति सम्यग्ज्ञानद्वारा जाननेसे यह जिज्ञासा होती है कि इस दुःखसमूहसे हम कैसे छूटेंगे ? इसप्रकार छूटनेका उपाय ढूँढ़ते २ मुनिमहात्मा जिनेन्द्र भगवान् द्वारा प्रतिपादित मोक्षके मार्ग पर आरूढ़ हो जाते हैं। फिर क्रमशः शुक्लध्यान द्वारा केवलज्ञान पाकर अव्यायाध अनन्त आत्मिक- सुख और पुनरागमनरहित मोक्षको प्राप्त करते हैं। ऐसा अपने मनमें विचार कर तपमें लीन होनेवाले तपस्वी जन क्षुधा-पिपासाके थोडेसे दुःखको तनिक भी नहीं गिनते । उनके सामने अनन्त सुखका स्थान मोक्षका ध्येय सदा रहता है और उस ध्येयकी प्राप्तिमें क्षुधा आदि જેવી રીતે અપાર સાગરમાં ચચલ તર ગો ઉત્પન્ન થાય છે, તેવી રીતે સ સારમાં જન્મ, મરણ, બુઢાપિ, માનસિક ચિંતાઓ, શારીરિક વ્યાધિઓ, ઈન્ટ વસ્તુઓને વિયેગ, અનિષ્ટને સગ આદિ અનેક પ્રકારના નવા નવા ૬ ઉત્પન્ન થતા રહે છે એ વિવિધ પ્રકારના ખેને સારી પેઠે સમ્યગાન દ્વારા જાણવાથી એવી જિજ્ઞાસા થાય છે કે આ ૬ ખસમૂહથી આપણે કેવી રીતે ટીશુ ? એ રીતે છૂટવાને ઉપાય શોધતા મુનિ મહાત્મા જિનેન્દ્ર ભગવાને પ્રતિપાદિત કરેલા મેક્ષના માર્ગ પર આરૂઢ થઈ જાય છે પછી ક્રમશ શુકલ ધ્યાન દ્વારા કેવલ જ્ઞાન પ્રાપ્ત કરીને અવ્યાબાધ આત્મિક સુખ અને પુનરાગમનરહિત મોક્ષને પ્રાપ્ત કરે છે પિતાના મનમાં એ વિચાર કરીને તપમાં લીન થનાર તપસ્વીજન ભૂખ-તરસના છેડા દુ અને લગારે ગણતા નથી તેમની સામે અનત સુખના સ્થાન મેક્ષનું ધ્યેય સદા રહે છે અને એ બેયની પ્રાપ્તિમાં સુધા આદિ પરિવહથી થનારૂ દુ ખ નહિવત્ બને છે તે પિતાના અબત श्रीदशकालिकसूत्रे दिलक्षण तपः परिणामपरमपदमुग्यजनयतया मुनीनामात्मपरिणामविकृतिकारण न भवितुमीष्टे नापि च तत्कर्मोदयस्वरूपमिति मार पतिपादितमिति तपसः सर्वमा मोक्षाङ्गत्वेनोत्कृष्टमङ्गलात्मकधर्मरूपत्व सिद्धम् । अयोत्कृष्टमङ्गलयसम्पादक धर्मस्य महिमानमाचेदयति-'देवा वि' इत्यादि । धर्म-अहिंसाटिनयस्यरूपे यस्य माणिन' मना-चित्त सदा निरन्तर तिष्ठती ति शेषः, तधर्मचित्त माणिन देवा अपिम्मानपत्यादिचतुर्निकाया अपि परिपरोंसे रोनेवाला दुःप नरों के यरायर है । वे उन तुच्छ दुःवोंको अपने अन्तकरणमें स्मरण भी नहीं करते । तात्पर्य यह है कि-अनशन आदि तप, परमपद मोक्षके अनन्त अविनाशी सुग्वका प्रमल कारण होनेसे मुनियोंकी आत्माके परिणामोंमे विकार उत्पन्न नहीं कर सकता है और न औदयिक भावमें ही है, अर्थात तप क्षायोपशमिक मावोंमें है । इस विषयमा विस्तारसे प्रतिपादन परले किया जा चुका है । अब यह बात अच्छी तरह सिद्ध हो चुकी कि तप मोक्षका कारण है और उत्कृष्ट मगलरूप धर्म है। धर्म उत्कृष्ट मगल है, किन्तु धर्ममें ऐसी कौनसी विचित्र महिमा है जिससे उसे उत्कृष्ट मगल कहते हैं ?, इस प्रश्नका समाधान करनेके लिए कहते है- जिस प्राणीके मनमें अहिंसा, सयम और तपरूप धर्मका निरन्तर निवास रहता है, उस धर्मात्मा प्राणीको भवनवासी, व्यन्तर, આત કરણમાં એ તુછ નું સ્મરણ પણ કરતા નથી તાત્પર્ય એ છે કે- અનશન આદિ તપ, પરમપદ મેક્ષના અન ત અવિનાશી સુખનું પ્રબલ_કાર હેવાથી યુનિઓના આત્માના પરિણામમાં વિકાર ઉત્પન કરી શકતું નથી અને એ ઔદયિક ભાવમાં પણ નથી અર્થાત્ તપ ક્ષાપશમિક-ભાવમાં છે પ્રતિપાદન પહેલા વિસ્તારથી કરવામા આવ્યું છેહવે એ વાત સારી રીતે સિદ્ધ થઈ ચૂકી છે ત૫ મેક્ષનું કારણ છે અને ઉત્કૃષ્ટ મગલરૂપ ધર્મ છે ધર્મ ઉત્કૃષ્ટ મ ગલ છે, પરંતુ ધર્મમા એ કર્યો વિચિત્ર મહિમા છે જેથી તેને ઉત્કૃષ્ટ મગલ કહ્યો છે ? આ પ્રશ્નનું સમાધાન કરવાને કહે છે જે પ્રાણુના મનમાં અહિંના, સયમ અને પરૂપ ધર્મને નિરતર નિવાસ રહે છે, તે ધર્માત્મા પ્રાણીને ભવનવાસી, વ્યન્તર તિષી અને વૈમાનિક એ ज्योतिषी . આ વિષયનું ८१ अययन १ गा. १ धर्ममहिमा नमस्यन्ति नमस्कुन्ति सम्मानयन्तीति यावत् , किं पुनश्चक्रवादयो मनुष्या इत्यर्थः । एतादृशोऽय समुत्कृष्टो धर्मः स्पसमाराधनपद्धपरिकराणा वृन्दारकन्दवन्द- नीयपदारविन्दता जनयति, यदि पुनम्विविधारणयोगेन तदाराधनपरायणो भवेत् तदा शिवमचलमरुजमनन्तमक्षयमव्यागराधमपुनराधत्ति सिद्धिगतिनाम य मोक्षपदमपि समासादयेदेव, कैव कथा तदपेक्षया तुमच्तरदेवेन्द्रचारादिपद- प्राप्तिननितसौर यस्य सस्यानुगतपलास्वदिति । और वैमानिक इस प्रकार चारों निकायोंके देवता नमस्कार करते हैं अर्थात् समान करते है। गाथामे आये हुए 'अपि' शब्दसे प्रकट है कि जर देवताभी धर्मात्मा प्राणीका समान करते हैं तो राजा, महाराज, सम्राट् और चक्रवर्ती आदिकी बात ही क्या है ? वे भी उसके चरणोमें गिरते हैं। इस प्रकार इस उत्कृष्ट धर्मकी आराधना करनेवाले प्राणी देवोंके द्वारा वन्दनीय हो जाते हैं। यदि कोई तीन करण और तीन योगसे उस धर्मकी आराधना भली-भाँति करे तो वह अवश्यही ऐसी सिद्धिगति (मोक्ष)को प्राप्त करेगा जो परम करयाणरूप है, अचल है, जिसमें किसी प्रकारका रोगदोप नहीं है, जिमका कभी अन्त नहीं होता, जिसमे पहुँच कर क्षय नहीं होता, और न किसी प्रकारकी बाधा शेप रहती है। अहो ! उम मोक्षका क्या कहना है, जिसके आगे नरेन्द्र, इन्द्र, अहमिन्द्र आदिका सुख इतना तुच्छ है जैसे धान्यके आगे भूसा तुच्छ होता है। ચારે નિકાના દેવતા નમસ્કાર કરે છે અર્થાત્ તેમનું સમાન કરે છે ગાથામાં मापेक्षा अपि' थी स्पष्ट थाय छे न्यारे देवता ५५ धर्मात्मा एनु સમાન કરે છે તે રાજા, મહારાજા, સમ્રાટ અને ચક્રવત આદિની તે વાત જ કયા રહી? તેઓ પણ તેમના ચરણમાં પડે છે એ રીતે આ ઉત્કૃષ્ટ ધર્મની આરાધના કરનાર પ્રાણી દે વડે વદનીય બને છે જે કઈ ત્રણ કરણ અને ત્રણ યુગથી એ ધર્મની આરાધના ભલી પેઠે કરે છે તે અવશ્ય એવી સિદ્ધિ ગતિ (મોક્ષ) ને પ્રાપ્ત કરે કે જે પરમ કલ્યાણરૂપ છે, અચલ છે, તેમાં કઈ પ્રકારને રગદેવ નથી, જેને કદાપિ અત આવતો નથી જેમાં પહેચવાથી ક્ષય થતું નથી અને કોઈ પ્રકારની બાધા-પીડા થતી નથી અહા ! એ મેક્ષની શી વાત કહીએ, જેની આગળ નરેદ્ર, ઇદ્ર અહર્ષિદ્ર આદિનું સુખ એવું તુચ્છ છે કે જેમ ધાન્ય આગળ ફેરા તુચ્છ છે , ८२ श्रीदनयकालिकाचे ननु सर्वधर्माणामहिंसामूलपस्वादहिंसायामेव सयमतपसोरपि धर्मयोः समावेशे सति किं पुनस्तयोः पृथनिर्देशः ? इति चेन्न,- तपो रिना सयमो यथावत्स्वरूपनमस्य न लभते, सयममन्तरेणाऽहिंसाऽपि न परिशदिमेति इत्याशयेनाहिंसा मविपाध तनिर्मलीकरणाय सयमस्य मविपादनम् , तस्य च मभूतशक्तिमम्पादनाय तपसः समाराधनमापश्यामित्याशयेन, प्रयाणा पृथनिर्देशः कृतः । किन्च सयमतपसोरिपयेऽपरोऽपि विशेषो दृश्यते-सयमास्सवरः, तपस्व मुख्यतो निर्नरामुद्भावयत् सवरमपि निप्पादयति । सयमस्तपश्चैते द्वे-राज आत्म प्रश्न-सयम तप आदि सय धमाका मूल अहिंसा है, इसलिए सपम और तपका अहिंसामें ही समावेश हो जाता है तो फिर सपम और तपको अलग अलग क्यों कहा है ? सुनो- उत्तर-अलग अलग कहनेका कारण यह है कि तपके विना सयम की जैसी चाहिए वैसी निर्मलता नहीं होती और विनासयमके अहिंसाका ठीक २ पालन नहीं हो सकता । इस अभिप्रायसे अहिंसाका प्रतिपादन करके उसे निर्मल बनानेके लिए तपका अलग कथन किया गया है। इससे तीनोंका अलग २ कथन उचित है। सयम और तपके अर्थमे और भी विशेषता है और वह यह है कि- सयमसे सवर होता है, परतु तपसे सयम और निर्जरा दोनों होते है। अथवा यह समझना चाहिये कि सयम और तप ये दोनों પ્રશ્નન્સયમ તપ આદિ સર્વ ધર્મોનું મૂલ અહિંસા છે, તેથી સંયમ અને તપનો સમાવેશ અહિંસામાં જ થઈ જાય છે તે સયમ અને તપને જુદા- જુદા કેમ કહ્યા છે ? સાભળ– ઉત્તર–જુદા જુદા કહેવાનું કારણ એ છે કે તપ વિના સયમની જઈએ તેવી નિર્મળતા થતી નથી અને સયમ વિના અહિંસાનું બરાબર પાલન થઈ શકતુ નથી એ કારણથી અહિંસાનું પ્રતિપાદન કરીને તેને નિર્મળ બનાવવાને માટે તપનું જુદુ કથન કરવામાં આવ્યું છે એથી ત્રણેનું જુદુ-જુદુ કથન ઉચિત છે સચમ અને તપના અર્થમાં બીજી પણ વિશેષતા છે અને તે એ કે- સયમથી આ વર થાય છે, પણ તપથી સયમ અને નિર્જરા બેઉ થાય છે અથવા એમ સમજવું જોઈએ કે સચમ અને તપ એ બેઉ રાજાને अध्ययन १ गा.१ अहिंसासयमतपोविवेक ८३ रक्षकाविवाऽहिंसावतस्य सरक्षके। यद्वा एतवयस्याहिंसापरिपोपकतया पृथट्- निर्देशः सगच्छते । अन्यच्च अहिंसा माणव्यपरोपणनित्तिप्रधाना, सयमस्तु श्रोत्रादीन्द्रियनिग्रह- प्रधान इति महद्वैलक्षण्यमुपलभ्य पृथनिर्देशः। तपसो वैलक्षण्य तु न कस्यचित् सशयगोचरः स्वरूपत एवं परस्पर भेदाद , तथाहि-अहिंसा नाम स्वतः परतो वा प्राणव्यपरोपणनितिकरण, तपस्तु क्षुत्पिपासाशीतोष्णादिसहिष्णुत्वरूपमिति । राजाके आत्मरक्षकोंकी तरह अहिंसावतके रक्षक है, जबतक सयम और तप न हों तवतक अहिंसाका सम्यक् पालन नही हो सकता। एक समाधान औरभी है-अहिंसामें प्राणोंके व्यपरोपणकी निवृत्तिकी प्रधानता है, और सयममें श्रोत्र आदि इन्द्रियोंके निग्रहको प्रधानता है। इस प्रकार इनमें कितनी ही प्रकारकी बडी २ विशेपता देखकर सूत्र- कारने पृथक् कथन किया है। तपके स्वरूपमें तो इतनाभेद है कि किसीको सन्देह हो ही नहीं सकता। अपने या दूसरेके द्वारा प्राणव्यपरोपणकी निवृत्ति करनेको अहिंसा कहते है, और क्षुधा पिपासाशीत उष्ण आदिको सहन करना तप कहलाता है। प्रश्न-भगवान्ने अहिंसा सयम और तप इन तीनोमे तपको ही अन्तमें क्यों कहा આત્મરક્ષકેની પેઠે અહિંસાવ્રતના રક્ષક બને છે જ્યા સુધી સ યમ અને ન થાય ત્યા સુધી અહિંસાનું સમ્યક્ પાલન થઈ શસ્તુ નથી એક સમાધાન બીજુ પણ છે અહિંસામાં પ્રાણેના વ્યપરોપણની નિવૃત્તિની પ્રધાનતા છે અને સયમમા શ્રોત્ર આદિ ઈદ્રિયેના નિગ્રહની પ્રધાનતા છે એ રીતે એમાં અનેક પ્રકારની મેટી મેટી વિશેષતાઓ જોઈને સૂત્રકારે પૃથક કથન કર્યું છે તપના સ્વરૂપમાં તે એટલે ભેદ છે કે કેઈને સદેહ થઈ શકે નહિ પિતાની અથવા બીજાની દ્વારા પ્રાણુના વ્યપરંપણની નિવૃત્તિ કરવી તેને અહિંસા કહે છે, અને ભૂખ તરસ તાપ આદિને સહેવા તે તપ કહેવાય છે પ્રશ્ન–ભગવાને અહિંસા, સયમ અને તપ એ ત્રણમા તપને છેલ્લે કેમ કહ્યું ? १ તપ पद । श्रीदकालिकसूत्रे ननु सर्वधर्माणामहिंसामूलपस्वादहिंसायामेव मयमतपसोरपि धर्मयोः समावेशे सति किं पुनस्तयोः पृथनिर्देशः ? इति चेन्न, तपो पिना सयमो यथावत्स्वरूपनमल्य न लभते, सयममन्तरेणाहिंसाऽपि न परिशद्धिमेति इत्याशयेनाहिमा मविपार निर्मलीकरणार्य सयमस्य मतिपादनम् , तस्य च मभूतशक्तिसम्पादनाय तपसः समाराधनमावश्यकमित्याश्रयेन, प्रयाणा पृथइनिर्देशः कृतः । किश्च सयमतपसोपियेऽपरोऽपि रिशेपो दृश्यते-सयमात्सरः, तपस्तु मुख्यतो निर्जरामुद्भापयत् सारमपि निष्पादयति । सयमस्तपश्चैते द्वे-राज आत्म प्रश्न-सयम तप आदि सय धोका मूल अहिंसा है, इसलिए सयम और तपका अहिंसामें ही समावेश हो जाता है तो फिर सयम और तपको अलग अलग क्यों कहा है ? सुनो- उत्तर-अलग अलग कहनेका कारण यह है कि तपके विना सयम की जैसी चाहिए वैसी निर्मलता नहीं होतीऔरविनासयमके अहिंसाका ठीक २ पालन नहीं हो सकता। इस अभिप्रायसे अहिंसाका प्रतिपादन करके उसे निर्मल बनानेके लिए तपका अलग कथन किया गया है। इससे तीनोंका अलग २ कथन उचित है। सयम और तपके अर्थमें और भी विशेषता है और वह यह है कि सयमसे सवर होता है, परंतु तपसे सयम और निर्जरा दोनों होते हैं। अथवा यह समझना चाहिये कि सयम और तप ये दोनों તપ આદિ સર્વ ધર્મોનું મૂલ અહિંસા છે, તેથી સંયમ અને તપને સમાવેશ અસામા જ થઈ જાય છે તે સયમ અને તપને જુદા- नु भा छ ? सालणा- ઉત્તર---જુદા જુદા કહેવાનું કારણ એ છે કે તપ વિના સ યમની જોઈએ તેવી નિમળતા થતી નથી અને સયમ વિના અહિંસાનું બરાબર પાલન થઈ શકતું નથી એ કારણથી અહિંસાનું પ્રતિપાદન કરીને તેને નિર્મળ બનાવવાને માટે તપનું જુદુ કથન કરવામાં આવ્યું છે એથી ત્રણેનું જુદું-જુદુ કથન ઉચિત છે સચમ અને તપના અર્થમા બીજી પણ વિશેષતા છે અને તે સયમથી સ વર થાય છે, પણ તપથી સયમ અને નિરા બેઉ થાય છે અથવા એમ સમજવું જોઈએ કે સચમ અને તપ એ બેઉ રાજાના प्र-सयम अध्ययन १ गा. १ अहिंसासयमतपोविवेकः ८३ रक्षकाविवाऽहिंसावतस्य सरक्षके। यद्वा एतद्वयस्याहिंसापरिपोपकतया पृथद- निर्देशः सगच्छते । अन्यच्च अहिंसा माणन्यपरोपणनित्तिमधाना, सयमस्तु श्रोत्रादीन्द्रियनिग्रह- प्रधान इति महद्वैलक्षण्यमुपलभ्य पृथइनिर्देशः । तपसो वैलक्षण्य तु न कस्यचित् सशयगोचरः स्वरूपत एव परस्पर भेदाद , तथाहि-अहिंसा नाम स्वतः परतो वा प्राणव्यपरोपणनिवृत्तिकरण, तपस्तु क्षुत्पिपासाशीतोष्णादिसहिष्णुत्वरूपमिति । राजाके आत्मरक्षकोंकी तरह अहिंसावतके रक्षक है, जबतक सयम और तप न हों तबतक अहिंसाका सम्यक् पालन नही हो सकता। एक समाधान औरभी है-अहिंसामें प्राणोंके व्यपरोपणकी निवृत्तिकी प्रधानता है, और सयममें श्रोत्र आदि इन्द्रियोंके निग्रहकी प्रधानता है। इस प्रकार इनमें कितनी ही प्रकारकी चडी २ विशेपता देखकर मृत्र- कारने पृथक् कथन किया है। तपके स्वरूपमें तो इतनाभेद है कि किमीको सन्देह हो ही नहीं सकता । अपने या दूसरेके द्वारा प्राणव्यपरोपणकी निवृत्ति करनेको अहिंसा कहते हैं, और क्षुधा पिपासाशीत उष्ण आदिवां सहन करना तप कहलाता है । प्रश्न-भगवान्ने अहिंसा सयम और तप इन तीनोंमें नमनाई अन्तमें क्यों कहा આત્મરક્ષકેની પેઠે અહિંસાવ્રતના રક્ષક બને છે ज्या सुधी * ન થાય ત્યા સુધી અહિંસાનું સભ્ય પાલન થઈ શસ્તુ નવા समाधान मान्नु पए मडिARL आम मा નિવૃત્તિની પ્રધાનતા છે અને સયમમા શ્રોત્ર આદિ ઇનિ. से शत मेमा भने नी भरी भी hिari पृय ४यन पृथु छ तपना २०३५मा त - ASS चातानी अथवा मानी जान १२वी तन मसिा ४छ, भने भूम ४, पाल प्रभावाने मासा, 4, 7 કેમ કહ્યું ? १ તપ કહેવાય છે 1 - श्रीदश्वकालिको कोटिभवसचितानि शतमान्यपि कर्माणि तपसाऽऽतर नियन्तीति दुस्तरससारसागर शीघ्रमुत्तर्नुमभिलप्यतामहिसासयमाऽऽराधनवस्पराणा समुषणा- मुग्रतपोऽवश्यमाश्रयणीयमित्याशयेनान्ते तपसः पृथनिर्देशः कृत इति भावः । इति प्रयमगाथार्थः ॥ १ ॥ ननु धर्मः शरीरेण रक्ष्यते, शरीररक्षण चाहारेण भाति, स च पाजीव- निकायोपमर्दनरूपाऽऽरम्मेण निप्पाधते, यत्र चारम्भो न तत्र धर्मः समवति, यथोक्त श्रीस्थानाङ्गमूने- " दो ठाणाइ अपरियाणित्ता आया णो केलिपनत्त धम्म लभेला सब गयाए, तजहा-आरभे चे। परिग्गहे च।" इति, अस्य हि-"द्वे वस्तुनी अपरि- शाय आत्मा न केवलिमसात धर्म श्रोतु लभेत, तद् यथा-आरम्भश्व परिग्रहश्च" उत्तर-करोड़ों भवोंमें सचित किये हा अत्यन्त कठोर कर्म, तपके द्वारा शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं । इसलिए दुस्तर ससाररूपी सागरको शीघ पार करनेकी अभिलाषा रखनेवाले, अहिंसा और सयमकी आरा- धनाम तत्पर रहनेवाले मोक्षाभिलापियोंको अवश्य ही उग्रतपस्या करनी चाहिये, इस उद्देश्यसे भगवानने तपको अन्तमें अलग कहा है ॥१॥ धर्मका रक्षण शरीरसे होता है और शरीरका निर्वाह आहारसे होता है । आहार पृथिवी आदिक षड्जीवनिकायके आरभके विना नहीं बन सकता, और 'जहां आरम्भ है वहां धर्म नहीं' यह सर्वज्ञ भगवानने कहा है, क्योंकि ठाणाग (स्थानाङ्ग) सूत्रके दूसरे ठाणेसे यह बात स्पष्ट है। ઉત્તર–કરડે ભમાં સચિત કરેલા અત્યત કર કમ તપની દ્વારા શીઘ નષ્ટ થઈ જાય છે એથી હુસ્તર સ સારરૂપી સાગરને શીધ્ર પાર કરવાની અભિલાષા રાખનારા, અહિંસા અને સયમની આરાધનામાં તત્પર રહેનારા, મેક્ષાભિલાષીઓએ અવશ્ય ઉગ્ર તપસ્યા કરવી જોઈએ એ ઉદેશથી ભગવાને તપને છેટલુ જુદુ કહ્યુ છે કે ૧ ધર્મનું રક્ષણ શરીરથી થાય છે અને શરીરને નિવહ આહારથી થાય છે આહાર પૃથિવી આદિ છ જવનિકાયના આર ભ વિના નથી બની શકતે, અને લ્યા આર ભ છે ત્યા ધર્મ નથી” એમ સર્વજ્ઞ ભગવાને કહ્યું છે ઠાણુગ (સ્થાનાગ) સૂત્રના બીજા ઠાણામાં એ વાત છે અર્થાત આર ભ અને સ્પષ્ટ 3 ४ २ ५ १२. 13 अध्ययन १ गा. २ गोचरीविधी भ्रमरदृष्टान्तः अर्थादारम्भ-परिग्रही ज्ञ-परिशया जन्ममरणादिदुःखहेतू विज्ञाय प्रत्या- ख्यानपरिक्षया तयोस्त्यागमकृत्वा जिनोक्त धर्म श्रीतुमपि न शक्नोति, पालयितु शक्कोतीति तु दुरापास्तमित्यर्थः, तस्मादुक्तरीत्या त्यागसम्पन्नस्यापि श्रमणस्य शरीरसरक्षणावश्यकता वर्तते तदर्थ चाहारो ग्रहीतव्यः, तत्र का रत्तिः समाद- र्तव्ये ? त्याह-'जहा दुमस्स' इत्यादि मूलम्-जहा दुमस्स पुप्फेसु, भमरो आविया रसं । ण य पुप्फ किलामेइ, सो अ पीणेइ अप्पयं ॥२॥ छाया-यथा द्रुमस्य पुप्पेषु, भ्रमर आपिपति रसम् । न च पुप्प लामयति, स च मीणात्यात्मानम् ॥ २॥ अर्थात् आरभ और परिग्रह इन दोनोंके यथार्थ स्वरूपको आत्मा ज्ञपरिज्ञासे सम्यक् प्रकार जानकर कि ये ही दोनों जन्म जरा मरणके दाता चतुर्गतिस्प अनन्त ससारमें परिभ्रमण करानेवाले, छेदन-भेदन- आधि-व्याधि-क्लेशरूप दुःखोंके कारण तथा आत्माके विशुद्ध स्वरूपके घातक है, परतु जातक प्रत्याख्यानपरिज्ञा द्वारा तीन करण और तीन योगसे इनको त्याग न देवे तय तक जिनेन्द्र भगवान द्वाराप्ररूपितधर्मको सुनने योग्य भी नहीं रोता, पालनेकी तो यात ही कहा है ? तात्पर्य यह है कि आरभ और परिग्रहका त्याग किये विना धर्मका पूर्ण पालन नहीं हो सकता। इसलिए धर्मके आराधक मुनियोंको निरचद्य आहारकी विधि कहते हैं-'जहा दुमस्स' इत्यादि । પરિગ્રહ એ બેઉના યથાર્થ સ્વરૂપને આત્મા, પરિણાથી સભ્યપ્રકારે જાણે કે એ બેઉ જન્મ જરા મરણના દાતા, ચતુર્ગતિરૂપ નત સંસારમાં પરિભ્રમણ કરાવનારા, છેદન-ભેદન-આધિ-વ્યાધિ-કલેશરૂપ દુના કારણ તથા વિશુદ્ધ સ્વરૂપના ઘાતક છે, પરંતુ જયા સુધી પ્રત્યાખ્યાનપરિજ્ઞા દ્વારા ત્રણ કરણ અને ત્રણ વેગથી તેને ત્યજી ન દેવાય ત્યા સુધી જિનેન્દ્રભગવાને પ્રરૂપેલા ધર્મને સાભળવા પણ થવાતુ નથી, પછી પાળવાની તે તાત્પર્ય એ છે કે આર ભ અને પરિગ્રહને ત્યાગ કર્યા વિના ધર્મનું પૂર્ણ પાલન થઇ શકતું નથી તેથી ધર્મના આરાધક મુનિઓને નિરવદ્ય આહારની વિધિ -"जहा दुमस्स" त्यादि અભિાના વાત या ?

, श्रीदशवकालिकाने सान्वयार्थ:-जरा जैसे, भमरो मारा, दुमस्मतके पुप्फेसु-फूलोंमें (रहे हुए) रसरसको आवियह-मर्यादानुसार पीता है, और पुष्प-फूलको ण कीलामेइ-पीडित नहीं करता है, अम्तोमी सोपह भौरा अप्पय अपनेको पीणेइ-सन्तुष्ट कर लेता है । अर्थात्-जैसे मारा अनेक वृक्षोंके फूलोंसे थोड़ा थोड़ा रस उचित मात्रामें लेता है, ऐसा करनेसे वह सन्तुष्ट भी होजाता है और फूलोंकोभी फट नहीं देता ॥ २ ॥ टीका-यथा भ्रमरः-भ्राम्यति एकत्र नातिप्ठत इति भ्रमरः चतुरिन्द्रिय जातिमान् भृङ्गपर्यायवाच्यः माणिविशेषः । द्रुमस्य, जात्येक्त्वादेववचनम् , 'सर्वो गच्छति' इत्यादिवत् , तेन द्रुमाणामित्यर्थः, द्रुमपदेन योगमर्यादया लतादीना- मपि ग्रहण योद्धव्यम् , पुष्पेषु स्थितमित्यस्याध्याहारः, रसम्मकरन्दम् आपिवति- आ-मर्यादा-पूर्वकम् उचितादधिक परित्यज्य पिवति पानविपय करोति, अल्प गृह्णातीति भावः । चकारी हेत्वर्थे, तेन-च-अत एव पुप्प न सामयति-न पीड यति-लेशतोऽपि न म्लानयतीति यावत् , चरिश्च सः भ्रमरः आत्मान-स्व पीणातितोपयतीत्यर्थः। पुष्पाणि तु द्रुमलतादीनामेव भवन्ति पुनर्दुमपदोपादानम्-यथा भ्रमरः सर्वे पामेव द्रुमलतादीना पुष्पेषु रसमापिपति न चोचनीचादिभेदभाव रक्षति 'वृक्षोऽय जैसे भ्रमर भ्रमण करके अनेक वृक्ष लता आदिकोंके पुष्पोंका थोडा२ रस मर्यादासे लेता है, अधिक नहीं, यानी ऐसा कि किसीको भी पीडा न देते हुए वह अपनी आत्माको तृप्त कर लेता है। प्रश्न-वृक्ष और लताओंमे ही फूल होते है फिर हुम (वृक्ष) शब्द देनेका क्या अभिप्राय है ? । ऊच-नीच भेद-भाव नहीं रखता कि-इस वृक्षमें कम फूल है और उत्तर-जैसे भौरा सभी वृक्षों और लताओंके फूलोंका रस पीता है, જેમ ભ્રમર ભ્રમણ કરીને અનેક વૃક્ષ લતા આદિના પુષ્પને ચેડે થોડે રસ મર્યાદાપૂર્વક લે છે, વધુ લેતું નથી, અને એવી રીતે લે છે કે કોઈ પણ પુષ્યને જરાએ પીડા થાય નહિ, એમ તે પિતાના આત્માને તૃપ્ત કરી લે છે પ્રશ્ન-વૃક્ષ અને લતાઓ પર જ ફૂલ થાય છે, તે વળી द्रुम કહેવાને શે હેતુ છે ઉત્તર–જેમ ભમરે બધા વૃક્ષે અને લતાઓના ફૂલેને રસ પીએ છે, ઉચનીચને ભેદભાવ રાખતું નથી કે આ વૃક્ષ (वृक्ष) शण्ड પર ઓછા છે અને ८७ अध्ययन १ गा. २ गोचरीविधौ भ्रमरदृष्टान्त: मल्पपुष्पफलोऽय च बहुपुप्पफलसमृद्धः' इति, तथा साधुरप्युच्चनीचादिभेदभाव विहाय सर्वत्र समानभावो गृहस्थकुलाना सकाशाद् यथोचिता भिक्षामाददीतेति सूचनार्थम् । यहा 'दुमस्स' इत्यत्र सम्बन्धसामान्यपष्ठया द्रुमसम्बन्धि विति, अर्थादय दृष्टान्तो दुमससक्तपुष्परसग्राहिणो भ्रमरस्य वोद्धच्यो नेतरस्य, ततश्च यथा भ्रमरो द्रुमसम्बद्धेषु स्थित रसमापिपति तथा साधुरपि गृहस्थसम्बन्धिनमेव, अर्थात् तत्त्वत्वयुक्तमेवाऽऽहार गृह्णीयान्न तु स्वामिविरहितमित्यर्थः । इसमें अधिक, इसी प्रकार साधुभी द्रव्य-भावसे ऊच-नीच भेद-भाव न रखकर समानदृष्टिसे गृहस्थियोंके कुलोमें भिक्षा-वृत्तिके लिए भ्रमण करते हैं । इस आशयको प्रगट करनेके लिए गाथामे 'द्रुम' शब्द दिया गया है। अथवा यो समझिये कि गाथामें 'द्रुम' शब्दके साथ पष्ठीविभक्तिका प्रयोग किया गया है, पष्ठी विभक्तिका अर्थ है 'सम्बन्ध' । इसलिए यह दृष्टान्त द्रुममें लगे हुए पुष्पके रसको ग्रहण करनेवाले भोरेका ही समझना चाहिए, दूसरे भौरेका नहीं । इससे यह अर्थ निकलता है कि जैसे भ्रमर, हुम (वृक्ष) सम्बन्धी पुष्परसको ही ग्रहण करता है, अन्य रसको नहीं, इसीभाँति साधुभी गृहस्थसे सम्बन्ध रखने- वाले अर्थात् जिसपर गृहस्थका अधिकार है उसी आहारको ग्रहण करते है, जिस आहारका कोई गृहस्थ स्वामी नही होताउसे नहीं ग्रहण करते। આ પર વધારે છે, એ પ્રમાણે સાધુ પણ દ્રવ્ય-ભાવથી ઉચ નીચને ભેદભાવ ન રાખીને સમાન દૃષ્ટિથી ગ્રહના કુળોમાં ભિક્ષાવૃત્તિને માટે બ્રમણ કરે છે એ આશયને પ્રકટ કરવા માટે માથામાં રૂમ (વૃક્ષ) શબ્દ આપેલ છે અથવા એમ સમજવું કે ગાથામાં ટ્રેમ શબ્દની સાથે છઠ્ઠી વિભક્તિને પ્રયોગ કરવામાં આવ્યું છે છઠ્ઠી વિભક્તિનો અર્થ સબધ થાય છે એથી આ દુષ્ટાત હૂમમાં લાગેલા પુના રસને ગ્રહણ કરનારા ભમરાનું જોઈએ, બીજા ભમરાઓનુ નહિ એટલે એ અર્થ છે કે જેમ ભ્રમર, द्रुम (१६) सणधी पु०५२सने १ अय रे , मी २सने नलि, तभ साधु પણ ગૃહસ્થથી સ બધ રાખનારા અર્થાત્ જેની ઉપર ગૃહસ્થને અધિકાર હોય તે આહારને જ ગ્રહણ કરે છે જે આહારને કાઈ ગૃહસ્થ સ્વામી નથી લેતે તેને સાધુ ગ્રહણ કરતે નથી - સમજવું થાય श्रीदशकालिको सान्वयार्थ:-जरा जैसे, भमरो भोरा, दुमस्म-क्षके पुप्फेसु-फूलोंमें (रहे हुए) रस-रसको आविया मर्यादानुसार पीता है, यम् और पुष्पं फूलको ण कीलामेइ-पीडित नहीं करता है, अन्तोमी सो मारा अप्पय अपनेको पीणेइ-सन्तुष्ट कर लेता है। अर्याद-जैसे भौंरा अनेक वृक्षोंके फूलों से थोड़ा थोड़ा रस उचित मात्रा लेता है, ऐसा करनेसे वह सन्तुष्ट भी होजाता है और फूलोंकोमी कष्ट नहीं देता ॥ २ ॥ टीका-यया भ्रमर:-भ्राम्यति एकन नारविप्ठत इति भ्रमरम्म् चतुरिन्द्रिय जातिमान् भृङ्गपर्यायवाच्या प्राणिविशेषः । गुमस्य, जात्येकत्वादेववचनम् , 'सर्वो गच्छति' इत्यादिवत् , तेन द्रुमाणामित्यर्थः, द्रुमपदेन योगमर्यादया रतादीना- मपि ग्रहण योद्धव्यम् , पुष्पेषु स्थितमित्यस्याध्याहार', रसम्मकरन्दम् आपिबति- आ मर्यादा-पूर्वकम् उचितादधिक परित्यज्य पिरति पानविषय करोति, अल्प गृहातीति भावः । चकारी हेत्वर्थे, तेन-च-अत एव पुप्प न कामयति न पीड- यति-लेशतोऽपि न म्लानयतीति यार , च-किञ्च सः भ्रमरः आत्मान-स्व मीणाति तोपयतीत्यर्थः। पुष्पाणि तु द्रुमलतादीनामेव भवन्ति पुन?मपदोपादानम्-यथा भ्रमरः सर्वे पामेव द्रुमलतादीना पुष्पेषु रसमापिरति न चोचनीचादिभेदभाव रक्षति 'वृक्षोऽय- जैसे भ्रमर, भ्रमण करके अनेक वृक्ष लता आदिकोंके पुष्पोंका थोडार रस मर्यादासे लेता है, अधिक नहीं, यानी ऐसा कि किसीको भी पीडा न देते हुए वह अपनी आत्माको तृप्त कर लेता है। प्रश्न-वृक्ष और लताओंमें ही फूल होते है फिर हुम (वृक्ष) शब्द देनेका क्या अभिप्राय है। उत्तर-जैसे भौंरा सभी वृक्षो और लताओंके फूलोंका रस पीता है, ऊच-नीच भेद-भाव नहीं रखता कि-इस वृक्षमें कम फूल है और જેમ ભ્રમર ભ્રમણ કરીને અનેક વૃક્ષ લતા આદિના પુષ્પો ઘડે છેડે રસ મર્યાદાપૂર્વક લે છે, વધુ લેતા નથી, અને એવી રીત લે છે કે કઈ પણ પુષ્પને જરાએ પીડા થાય નહિ, એમ તે પિતાના આત્માને તૃપ્ત કરી લે છે પ્રશ્ન–વૃક્ષ અને લતાઓ પર જ ફૂલ થાય છે, તે વળી કહેવાને શે હેતુ છે ઉત્તર–જેમ ભમરે બધા વૃક્ષે અને લતાઓના ફૂલોને રસ પીએ છે, ઉચ-નીચને ભેદભાવ રાખતું નથી કે આ વૃક્ષ ઓછા લે છે અને , (११) પર अध्ययन १ गा. २ गोचरीविधौ भ्रमरदृष्टान्तः मल्पपुष्पफलोऽय च बहुपुप्पफलसमृद्धः' इति, तथा साधुरप्युचनीचादिभेदभाव विहाय सर्वत्र समानभावो गृहस्थकुलाना सकाशाद् यथोचिता भिक्षामाददीतेति मूचनार्थम् । यद्वा 'दुमस्स' इत्यत्र सम्बन्धसामान्यपप्ठया द्रुमसम्बन्धिप्विति, अर्थादय दृष्टान्तो द्रुमससक्तपुष्परसग्राहिणो भ्रमरस्य बोद्धव्यो नेतरस्य, ततश्च यथा भ्रमरो द्रुमसम्बद्धेषु स्थित रसमापिरति तथा साधुरपि गृहस्थसम्बन्धिनमेव, अर्थात् तत्स्वत्वयुक्तमेवाऽऽहार गृहीयान्न तु स्वामिविरहितमित्यर्थः । इसमें अधिक, इसी प्रकार साधुभी द्रव्य-भावसे ऊच-नीच भेद-भाव न रखकर समानदृष्टिसे गृहस्थियोंके कुलोमें भिक्षा वृत्तिके लिए भ्रमण करते हैं । इस आशयको प्रगट करनेके लिए गाथामें 'द्रुम' शब्द दिया गया है। अथवा यों समझिये कि गाथामें 'दुम' शब्दके साथ पष्ठीविभक्तिका प्रयोग किया गया है, पष्ठी विभक्तिका अर्थ है 'सम्बन्ध' । इसलिए यह दृष्टान्त द्रुममें लगे हुए पुष्पके रसको ग्रहण करनेवाले भोरेका ही समझना चाहिए, दूसरे भौंरेका नहीं । इससे यह अर्थ निकलता है कि जैसे भ्रमर, दुम (वृक्ष) सम्बन्धी पुष्परसको ही ग्रहण करता है, अन्य रसको नहीं, इसीभाँति साधुभी गृहस्थसे सम्बन्ध रखने- वाले अर्थात् जिसपर गृहस्थका अधिकार है उसी आहारको ग्रहण करते है, जिस आहारका कोई गृहस्थ स्वामी नहीं होताउसे नहीं ग्रहण करते। આ પર વધારે છે, એ પ્રમાણે સાધુ પણ દ્રવ્ય–ભાવથી ઉચ નીચને ભેદભાવ ન રાખીને સમાન દૃષ્ટિથી ગૃહસ્થના કુળામાં ભિક્ષાવૃત્તિને માટે ભ્રમણ કરે છે से मायने ५४८ ४२वा भाटे या हम (१६) शह आपेको छ અથવા એમ સમજવું કે ગાથામાં દુમ શબ્દની સાથે છઠ્ઠી વિભક્તિને પ્રવેગ કરવામાં આવ્યું છે છઠ્ઠી વિભક્તિને અર્થ સબધ થાય છે એથી આ દુષ્ટાત હૂમમાં લાગેલા પુના રસને ગ્રહણ કરનારા જોઈએ, બીજા ભમરાઓનુ નહિ એટલે એ અર્થ થાય છે કે જેમ ભ્રમર, हम (वृक्ष) सपथी परसने १ अडय ४२, मीत २सने नलि, तभ साधु પણ ગૃહસ્થની સબ વ રાખનારા અર્થાત્ જેની ઉપર ગૃહસ્થને અધિકાર હેય તે આહારને જ ગ્રહણ કરે છે જે આહારને કોઈ ગૃહસ્થ સ્વામી નથી હોતે તેને ભમરાનું સમજવું સાધુ ગ્રહણ કરતે નથી श्रीदशकालिकसूत्रे सान्वयार्थ:-जहा जैसे, भमरो भौरा, धुमस्मतके पुप्फेस-फूलोंमें (रहे हुए) रस-रसको आरिया मर्यादानुसार पीता है, य-और पुष्प-फूलको ण कीलामेइम्पीडित नहीं करता है, अन्तोमी सोबर मीरा अप्पय अपनेको पीणेइ-सन्तुष्ट कर लेता है। अर्थात्-जैसे भोरा अनेक वृक्षोंके फूलोंसे थोड़ा थोड़ा रस उचित मात्रामें लेता है, ऐसा करनेसे वह सन्तुष्ट भी होजाता है और फूलोंकोभी कष्ट नहीं देता ॥ २ ॥ टीका-यथा भ्रमरः-भ्राम्यति एकत्र नापतिप्ठत इति भ्रमरः चतुरिन्द्रिय जातिमान् भृङ्गपर्यायवाच्यः प्राणिविशेषः । द्रुमस्य, नात्येकत्वादेववचनम् , 'सर्वो गच्छति' इत्यादिवत् , तेन द्रुमाणामित्यर्थः, द्रुमपदेन योगमर्यादया रतादीना- मपि ग्रहण योद्धव्यम् , पुष्पेषु स्थितमित्यस्याध्याहारः, रसम्मकरन्दम् आपिवति- आ-मर्यादा-पूर्वकम् उचितादधिक परित्यज्य पियति पानविपय करोति, अल्प गृहातीति भावः । चकारी हेत्वर्थे, तेन-च-अत एव पुप्प न कामयतिन पीड- यति-लेशतोऽपि न म्लानयतीति यावत् , च-विश्च सम्भ्रमरः आत्मानस्व प्रीणाति तोपयतीत्यर्थः। पुष्पाणि तु द्रुमलतादीनामेव भवन्ति पुनर्दुमपदोपादानम्-यथा भ्रमरः सर्वे पामेव द्रुमलतादीना पुष्पेषु रसमापिति न चौञ्चनीचादिभेदभाव रक्षति 'वृक्षोऽय जैसे भ्रमर, भमण करके अनेक वृक्ष लता आदिकोंके पुष्पोंका थोडार रस मर्यादासे लेता है, अधिक नहीं, यानी ऐसा कि किसीको भी पीडा न देते हुए वह अपनी आत्माको तृप्त कर लेता है। प्रश्न-वृक्ष और लताओंमे ही फूल होते हैं फिर हम (वृक्ष) शब्द देनेका क्या अभिप्राय है ? | उत्तर-जैसे भौंरा सभी वृक्षों और लताओंके फूलोका रस पीता है, ऊच नीच भेद-भाव नहीं रखता कि इस क्षमें कम फूल है और જેમ ભ્રમર ભ્રમણ કરીને અનેક વૃક્ષ લતા આદિના પુપેન છેડે થોડે રસ મર્યાદાપૂર્વક લે છે, વધુ લેતે નથી, અને એવી રીત લે છે કે કોઈ પણ પુષ્પને જરાએ પસ થાય નહિ, એમ તે પિતાના આત્માને તેમ કરી લે છે પ્રશ્ન-વૃક્ષ અને લતાઓ પર જ ફૂલ થાય છે, તે વળી द्रुम કહેવાને શો હેતુ છે ઉત્તર-જેમ ભમરે બધા વૃક્ષે અને લતાઓના ફૂલેને રસ પીએ છે, ઉચ-નીચને ભેદભાવ રાખતું નથી કે-આ વૃક્ષ પર ઓછા કેલે છે અને (वृक्ष) अध्ययन १ गा. २ गोचरीविधौ भ्रमरदृष्टान्तः ८९ पुप्फ' इत्येकवचनेन 'यथा भ्रमर एकमपि पुप्प न कामयति तथा साधु- रपि कश्चिदेकमपि दातार न विपादयेदिति मुचितम् । यथा जलधरो न कञ्चिदुदिश्य जल मुञ्चति, यथा पा शाखिनः स्वीयनाम- गोत्रकर्मोदयेन पुष्प-फलानि स्वभावत एव समुत्पादयन्ति तथा गृहस्था अपि स्वक्षुधावेदनीयोदयेन यथासमय दिवसे निशाया वा रन्धयन्ति, यथा च यन भ्रमरा म गन्तु शक्नुवन्ति तत्रापि द्वमाः पुप्प्यन्त्येव तथा साधना तपोऽवस्थाया रात्री साधुसस्थितिरहितेषु ग्रामनगरनिगमादिषु च गृहस्थाः पाक सम्पादयन्त्ये- वेति नास्ति गृहस्थसम्पादितपारस्य साधुभिक्षाहेतुत्वम् । गाधाके उत्तराईमें 'पुप्फ' इस एकवचनसे ऐसा सूचित होता है कि जैसे भारा एकभी पुष्पको पीड़ा नहीं पहुंचाता है वैसे ही साधु किसी एकभी दाताको कष्ट न पहुचावे । जैसे मेघ, किसीको उद्देश्य करके पानी नही वरसाता अथवा जैसे वृक्ष, अपने नाम-गोत्र कर्मके उदयसे ही विना किसीको उद्देश्य करके स्वभावसे ही फल-फूल उत्पन्न करते है उसी प्रकार गृहस्थ अपने क्षुधा- वेदनीय कर्मके उदयसे जर आवश्यकता होती है भोजन बनाते है । अथवा जैसे जहाँ भोरे नहीं जा सकते वहा परभी वृक्ष फूलते ही है, वैसे ही साधु जर तपस्या करते हैं, या जहां साधु नहीं होते उस ग्राम नगर आदिमे भी दिन या रात्रिमें गृहस्थ भोजन बनाते ही है, इसलिए 'गृहस्थ जो भोजन बनाते हैं वह साबुओंके निमित्त होता है। ऐसा नहीं समझना चाहिये। थाना उत्तराभा 'पुप्फ' में क्यनथी मेम सूचित थाय જેમ ભમરે એક પણ પુષ્પને પીડા ઉપજાવતું નથી, તેમજ સાધુએ ઈપણ દાતાને કષ્ટ ન ઉપજાવ જેમ મેઘ, કેઈને ઉદ્દેશ્ય કરીને પાણી વરસાવતે નથી, અથવા જેમ વૃક્ષ, પિતાના નામ ગેત્ર કમેન ઉદયથી જ કોઈને ઉદ્દેશ્ય કર્યા વિના સ્વભાવથી જ ફળ ફૂલ ઉત્પન્ન કરે છે, તેમ ગૃહસ્થ પિતાના સુધા-વેદનીય કર્મના ઉદયથી જ્યારે આવશ્યકતા લાગે છે ત્યારે ભેજન બનાવે છે અથવા જેમ જ્યા જઈ શકે તે સ્થળે પણ વૃક્ષ ફૂલે છે, તેમ જ સાધુ જ્યારે તપસ્યા ત્યારે, અને જ્યાં સાધુ નથી હોતા તે ગ્રામ નગર આદિમા પણ દિવસે યા રાત્રિએ ગહ ભેજન તે બનાવે જ છે, એથી “ગ્રસ્થ જે ભોજન બનાવે છે તે સાધુઓને નિમિત્ત હેય છે” એમ ન સમજવું જોઈએ - . ભમરા न .

- , ८८ श्रीदप्रकालिक 'पु'फेस' इति प्रमूनामुमादिपर्यायान्तर परिहाय पुष्पपदोपादाने विक- सितार्योऽभिप्रेतस्ततय यथा भ्रमरो फिसितेपेर पुप्पेषु स्थित रस याति तथा साधुरपि दातृत्वमाश्मसनेभ्यो निर्जुगुप्सेभ्यश्च कुलेभ्य आहार गृहीयादिपर्यः । 'भमरो' इत्यनेन इतस्ततो भ्रमणेन फिनिस्किनिदाहारग्रहण प्रचितम् । मर्यादार्थकेनोपसर्गेणाऽऽटा 'यारानाहारोऽपेक्षितस्तावानेव ग्रहीतभ्यः । इति सूचितम् । पुष्प' शब्दके प्रसून कुसुम आदि अनेक पर्याय शन्द होनेपर भी गाथामें प्रसून या कुसुम आदि अन्य शब्द न देकर 'पुष्प' शब्द ही दिया है, इससे सूत्रकारका आशय पिलेटुए फलोंसे है ऐसास्पष्ट होता है, क्योंकि खिले हुए फूलका ही नाम पुष्प है, इसलिए भ्रमर, जैसे खिले हुए फूलों पर ही ठहरता है और उन्हींका रसपान करता है उसी प्रकार साधुभी उन्ही गृहस्थोंसे आहार लेते है जिनका साधुओंको आरार देनेका भाव हो, तथा जो कुल दुगुडित न रो। भ्रमरके भी पट्पद द्विरेक आदि अनेक नाम हैं, उनमेंसे दूसरा कोई शब्द न देकर 'भ्रमरे' पद दिया है, 'भ्रमर' शब्दको अर्थ है भ्रमण करने वाला-एक स्थानपर न ठहरने वाला, इस शब्दको देनेका आशय यह है कि साधुको इधर-उधर भ्रमण करके थोडारआहार लेना चाहिए, गृहस्थ फिर आरभन करे मर्यादाअर्थवाले 'आ उपसर्गको देनेकातात्पर्य यह है कि जितने आहारकी आवश्यकता हो उतनाही लेवे, अधिक नहीं। પુષ્પ શબ્દના પ્રસૂન કુસુમ આદિ અનેક પર્યાય શબ્દ હોવા છતા ગાથામાં પ્રસૂન 3 કુસુમ આદિ અન્ય શબ્દ ન આપતા પુપ શબ્દ જ આપ્યો છે એમ સત્રકારનો આશય ખીલેલા ફૂવે છે એમ સ્પષ્ટ થાય છે, કારણ કે ખીલેલા કુલનું જ નામ પુષ્પ છે એથી ભ્રમર, જેમ ખીલેલા ફલ પર જ બેસે છે અને તેનું રસપાન કરે છે, તેમ સાધુ પણ એવા ગૃહસ્થ પાસેથી આહાર લે છે કે જેમને ભાવ સાધુઓને આહાર આપવાનું હોય અને જે કુળ દુગુછિત ન હોય ભ્રમરના પણ પક્ષદ દિફ આદિ અનેક નામે છે. તેમાથી બીજે કઈ શબ્દ ન આપતા “ભ્રમર’ શબ્દ આપે છે ભ્રમર શબ્દનો અર્થ થાય ભ્રમણ કરનાર-એક સ્થાન પર બેસી ન રહેનાર, એ શબ્દ આપવાને છે કે સાધુએ અહીં-તહીં ભ્રમણ કરીને ઘેડે છે આહાર લેવો જોઈએ, જેથી ગૃહસ્થ ફરી આરભ ન કરે મર્યાદા અર્થવાળે મા ઉપસર્ગ આપવાનું તાત્પર્ય એ છે કે જેટલા આહારની આવશ્યકતા હેાય એટલે જ તે વધારે નહિ जिससे સ્નાશય , मध्ययन १ गा. २ गोचरीविधौ भ्रमरदृष्टान्तः ८९ 'पुप्फ' इत्येकवचनेन 'यथा भ्रमर एकमपि पुष्प न लामयति तथा साधु- रपि कश्चिदेकमपि दातार न विपादयेदिति सूचितम् । यथा जलधरो न कश्चिदुद्दिश्य जल मुञ्चति, यथा वा गाखिनः स्त्रीयनाम- गोत्रकर्मोदयेन पुष्प-फलानि स्वभावत एव समुत्पादयन्ति तथा गृहस्था अपि स्वक्षुधावेदनीयोदयेन यथासमय दिवसे निशाया वा रन्धयन्ति, यथा च यत्र भ्रमरा म गन्तु शक्नुवन्ति तत्रापि हमाः पुप्प्यन्त्येव तथा साधूना तपोऽवस्थाया रात्रौ साधुसस्थितिरहितेपु ग्रामनगरनिगमादिषु च गृहस्थाः पाक सम्पादयन्त्ये- वेति नास्ति गृहस्थसम्पादितपारस्य साधुभिक्षाहेतुत्वम् । गाधाके उत्तराई में 'पुप्फ' इस एकवचनसे ऐसा सूचित होता है कि जैसे भौरा एकभी पुष्पको पीडा नहीं पहुंचाता है वैसे ही साधु किसी एकभी दाताको कष्ट न पहुंचावे । जैसे मेघ, किसीको उद्देश्य करके पानी नहीं वरसाता अथवा जैसे वृक्ष, अपने नाम-गोत्र कर्मके उदयसे ही विना किसीको उद्देश्य करके स्वभावसे ही फल-फूल उत्पन्न करते है उसी प्रकार गृहस्थ अपने क्षुधा- वेदनीय कर्मके उदयसे जर आवश्यकता होती है भोजन बनाते है। अथवा जैसे जहाँ भौरे नहीं जा सकते वहा परभी वृक्ष फूलते ही है, वैसे ही साधु जव तपस्या करते है, या जहा साधु नहीं होते उस ग्राम नगर आदिमें भी दिन या रात्रिमें गृहस्थ भोजन बनाते ही है, इसलिए 'गृहस्थ जो भोजन बनाते है वह साधुओके निमित्त होता है ऐसा नहीं समझना चाहिये। ગાથાના ઉત્તરાર્ધમા “પુ એ એકવચનથી એમ સૂચિત થાય જેમ ભમરે એક પણ પુષ્પને પીડા ઉપજાવતું નથી, તેમજ સાધુએ પણ દાતાને કષ્ટ ન ઉપજાવો જેમ મેઘ, કેઈને ઉદ્દેશ્ય કરીને પાણે વરસાવતે નથી, અથવા જેમ વૃક્ષ, પિતાના નામ ગોત્ર કર્મના ઉદયથી જ ડેઈને ઉદ્દેશ્ય કર્યા વિના સ્વભાવથી જ ફળ ફૂલ ઉત્પન્ન કરે છે, તેમ ગૃહસ્થ પિતાના ક્ષુધા-વેદનીય કર્મના ઉદયથી જ્યારે આવશ્યકતા લાગે છે ત્યારે ભેજન બનાવે છે અથવા જેમ જ્યા ભમરા જઈ શકે તે સ્થળે પણ વૃક્ષ ફૂલે છે, તેમ જ સાધુ જ્યારે તપસ્યા કરે છે ત્યારે, અને જ્યા સાધુ નથી હોતા તે ગ્રામ નગર આદિમા પણ દિવસે યા રાત્રિએ ગૃહ ભેજન તે બનાવે જ છે, એથી ગ્રન્થ જે ભેજન બનાવે છે તે સાધકે નિમિત્ત હોય છે એમ ન સમજવું જોઈએ न , + . श्रीदनवैकालिको ननु पिपमोऽय भ्रमरदृष्टान्तः, तथाहि-भ्रमरो हमाझामन्तरेणव पुष्परसमादत्त भिक्षुः पुनर्याचित्यैव, पिश तय कहानिदेकस्मिन्नपि दिन मुर्मुहुरेक ठुममुपैति तत्कि साधयोऽपि तथैर गृहस्थेभ्यो मिक्षा गृहीयुः ? किन भ्रमरोऽसनी, साध- यस्तु सन्जिनो जिनाचननिपुणाय, भ्रमरोऽग्रती साधवस्तु तिनः, भ्रमरो- ऽमत्याख्यानी साधयस्तु मत्यारयानिनः, भ्रमरोऽसयत साधरस्तुसयताः, इत्यादि विरुद्धधर्मशारित्वादिति चेन्न, सत्र दृष्टान्तस्यैकदेशिस्पस्वाद , अनेकपुष्पतः पुष्पाऽलान्तिपूर्वककिञ्चित्किञ्चिदुपादानमाने दृष्टान्ततापर्यमिति निष्कपः, स्फुटी प्रश्न-भ्रमरका उदाहरण विपम है, कारण यह कि उसकासाधुओंके साथ ठीक मिलान नहीं होता। क्योंकि, भ्रमर वृक्षकी आजा प्राप्त किये चिना ही पुष्परस पीता है, साधु याचना करके ही भिक्षा लेते है, भ्रमर एक दिनमें एकही वृक्षके पास थारम्बार जाता है और पुप्परसको पीता है, साधु एक दिनमे पारम्बार एक गृहस्थके घरसे भिक्षा नहीं ले सकते, भ्रमर असञ्जी होता है, सायुसज्जी होते है,भ्रमर अप्रत्यारयानीहोता है, साधु प्रत्याख्यानी होते है, भ्रमर असयत होता है, साधु सयत होते हैं, इत्यादि अनेक भिन्नता पायी जाती है। उत्तर-ऐसी शका ठीक नहीं है, क्योंकि दृष्टान्त सब जगहोंमें एक- देशीय ही होता है, 'पीडा न पहुंचाते हुए अनेक पुष्पोंसे थोडा थोडा लेना' इतने अशोमें यह दृष्टान्त समझना चाहिये। इस विषयका स्पष्टी- પ્રશ્ય–ભ્રમરનું ઉદાહરણ વિષમ છે, કારણ કે તે સાધુઓની સાથે બરાબર બધ બેસતુ નથી ભ્રમર વૃક્ષની આજ્ઞા પ્રાપ્ત કર્યા વિના જ પુષ્પને છે સાધુ યાચના કરીને જ ભિલા લે છે ભ્રમર એક દિવસમાં એક જ પાસે વાર વાર જાય છે અને પુષ્પાસને પીએ છે, સાધુ એક દિવસમાં ચાર વાર એક ગૃહસ્થને ઘેરથી ભિક્ષા નથી લઈ શકતા, ભ્રમર અસણી હોય છે, સાધુ સન્ની હેય છે, ભ્રમર અઢતી હોય છે, સાધુ વ્રતી હોય છે, ભ્રમર અપ્રત્યા ખ્યાની હોય છે, સાધુ પ્રત્યાખ્યાની હેય છે ભ્રમર અસયત હોય છે, સાધુ સયત હાય છે ઈત્યાદિ અનેક ભિન્નતાઓ રહેલી છે ઉત્તર–એ શકા બરાબર નથી, કારણકે દષ્ટા ત બધી જગ્યાએ એક દેશીય જ હોય છે “પીડા ઉપજાવ્યા વિના અનેક પુષ્પમાથી થોડે છેડે રસ લે” એટલા અશમાં જ આ દૃષ્ટાન્ત સમજવું જોઈએ આ વિષયનું સ્પષ્ટી રસ પીએ વૃક્ષની Y 3 । १०८ ૧૨ अध्ययन १ गा. ३ गोचरीविधौ भ्रमरदृष्टान्तः ९१ करिष्यति चैतत्सूत्रकारः स्वयम्-'महुगारसमा' इति पञ्चमगावया ॥२॥ एतदेव विशेषेण स्फोरयितु दान्तिकमाह-एमेए' इत्यादि मूलम्-एमेए समणा मुत्ता, जे लोए सति साहुणो विहंगमा व पुप्फेसु, दाणभत्तेसणे रया ॥३॥ छाया-एवमेते श्रमणा मुक्ता, ये लोके सन्ति साधवः । विहङ्गमा इव पुप्पेषु, दानभक्तपणे रताः ॥३॥ सान्त्वयार्थः- एमेए-इसीप्रकार ये लोएलोरम जे-जो मुत्ता-द्रव्यभाव- परिग्रहरहित समणा तपस्वी साहुणो साधु सति है, (वे) पुप्फेसु-फूलोंमें विहंगमा व-पक्षियों-भमरोंकी तरह दाणभत्तेसणे-दाता द्वारा दियेजाने वाले आहारकी गवेपणामें रया लीन रहते है । अर्थात्-जैसे पूर्वोक्त प्रकारसे भौंरा पुप्परसका पान करता है उसी प्रकार साधु गृहस्थियोंको अमुविधा न पहुचाते हुए अनेक घरोंसे थोडा-थोडा आहार ग्रहण करते है ॥ ४ ॥ टीका-एवम् उक्तभकारेण ये लोके समयक्षेत्रे सन्ति-वर्तन्ते एते ते सर्वे श्रमणा । श्रमणाः, शमनाः समनसः, समणाः' इत्येतेपा प्राकृते 'समणा' इति रूप करण सूत्रकार स्वय 'महुगारसमा' इस पाचवों गाथामें करेंगे ॥२॥ अव विशेप खुलासा करनेके लिए दान्तिक कहते है- इस प्रकार अढाइ द्वीपमें जितने श्रमण, मुक्त, साधु हैं वे सब दाताद्वारा दिये जाते हुए आहारकी एपणामें इस प्रकार प्रयत्न करें जैसे भ्रमर पुष्पोंके रसके अन्वेपणमें लीन होता है । श्रमण, शमन, समनस, समण, इन सब शब्दोंका प्राकृत भाषामें ४२९सूत्रा२ पोते ॥ महुगारसमा मे पायमी याभा ४२शे (२) હવે વિશેષ ખુલાસો કરવાને દાછતિક કહે છે – આ પ્રમાણે અઢી દ્વીપમા જેટલા શ્રમણ, મુક્ત, સાધુઓ છે તેઓ બધા દાતા દ્વારા આપવામાં આવતા આહારની એષણમા એ પ્રયત્ન કરે કે જેમ ભ્રમર પુષ્પના રસના શેધનમાં લીન થાય છે શ્રમણ, શમન, સમનસુ, સમણ, એ બધા શબ્દોનું પ્રાકૃત ભાષામાં - श्रीदशकालिकमूत्र ननु विपमोऽय भ्रमरम्यान्तः, तथाहि-भ्रमरो द्वमाझामन्तरेणव पुष्परसमादत्त भिक्षु' पुनर्याचित्येय, किस तदर्थ कटाचिकस्मिन्नपि दिन मुहुर्मुहुरेक द्रुममुपैति तति साधनोऽपि तथैव गृहस्येभ्यो मिशा झीयुः १ विच भ्रमरोऽसनी, साध- वस्तु सम्झिनो निनाचननिपुणाय, भ्रमरोऽयती साधास्तु, प्रतिनः, भ्रमरो ऽमत्याख्यानी साधास्तु प्रत्यार पानिनः, भ्रमरोऽसंयतः साधास्तु सयताः, इस्पादि- विरुद्धधर्मशालिवादिति चेन्न, सन दृष्टान्तस्यैकदेशिरूपत्वात् , अनेकपुष्पतः पुष्पाकान्तिपूर्वकफिश्चितिचिदुपादानमात्रे दृष्टान्ततात्पर्यमिति निष्कर्षः, स्फुटी प्रश्न-भ्रमरका उदाहरण विषम है, कारण यह कि उमकासाधुओंके साथ ठीक मिलान नहीं होता। क्योंकि, भ्रमर पक्षकी आजा प्राप्त किये विना ही पुष्परस पीता है, साधु याचना करके ही भिक्षा लेते हैं, भ्रमर एक दिनमे एकही वृक्षके पास पारम्बार जाता और पुष्परसको पीता है, साधु एक दिनमे बारम्यार एक गृहस्थके घरसे भिक्षा नहीं ले सकते, भ्रमर असञ्जी होता है, साधु सजी होते हैं, भ्रमर अप्रत्याख्यानीहोता है, साधु प्रत्याख्यानी होते है, भ्रमर असयत होता है, साधु सयत होते हैं, इत्यादि अनेक भिन्नता पायी जाती हैं। उत्तर-ऐसी शका ठीक नहीं है, क्योंकि दृष्टान्त सब जगहोंमें एक- देशीय ही होता है, 'पीडा न पहुंचाते हुए अनेक पुष्पोंसे थोडा थोडा लेना' इतने अशोमें यह दृष्टान्त ममझना चाहिये। इस विषयका स्पष्टी પ્રશ્ન-ભ્રમરનું ઉદાહરણ વિષમ છે, કારણ કે તે સાધુઓની સાથે બરાબર બધ બેસતુ નથી ભ્રમર વૃક્ષની આજ્ઞા પ્રાપ્ત કર્યા વિના જ પુષ્પો છે સાધુ યાચના કરીને જ ભિક્ષા લે છે ભ્રમર એક દિવસમાં એક જ પાસે વાર વાર જાય છે અને પુષ્યરસને પીએ છે, સાધુ એક દિવસમાં વાર વાર એક ગૃહસ્થના ઘેરથી ભિક્ષા નથી લઈ શકતા, ભ્રમર અસી હોય છે, સાધુ સી હોય છે, ભ્રમર અઢતી હોય છે, સાધુ નતી હોય છે, ભ્રમર ખ્યાની હેય છે, સાધુ પ્રત્યાખ્યા ની હોય છે ભ્રમર અસયત હોય છે, સાધુ સયત હોય છે ઇત્યાદિ અનેક ભિન્નતાઓ રહેલી છે ઉત્તર-~એ શકા બરાબર નથી, કારણકે દાન્ત બધી જગ્યાએ એક દેશીય જ હોય છે પડા ઉપજાવ્યા વિના અનેક પુખેમાથી છેડે થેડા લેવ” એટલા અશમાં જ આ દષ્ટાન્ત સમજવું જોઈએ આ વિષયનું સ્પષ્ટ રસ પીએ વૃક્ષનો અપ્રત્યાં , ૨ अध्ययन १ गा. ३ गोचरीविधी भ्रमरदृष्टान्तः ९३ जीवन्तीति वा समणाः । मुक्ताः परिग्रहबन्धनरहिताः धर्मोंपकरण विहाय सूची- कुशाग्रमाप्रेणापि परिग्रहेण रिक्ता इति यावत , तत्र परिग्रहो वाह्याभ्यन्तरभेदाद्वि- विधः, तयोराधो धनधान्यादिरूपो नवविधः । द्वितीयस्तु--- "मिच्छत्त वेयतिग, हासाइयछक्ग च नायव्य । कोहाईण चउक्क, चउदस अभितरा गठी ॥" इत्युक्तरूपः । साधा-सा नुवन्ति-निप्पादयन्ति स्वपरशिवसुख ये ते, पुप्पेपु-व्याख्यात- पूर्वेषु विहगमा इव, विहायसागगनेन गच्छन्तीति तथोक्ता, प्रकरणादत्र भ्रमरा इत्यर्थः, त इव, भ्रमरतुल्या इति यावत् । एव दृष्टान्तदान्तिकयोमिथः सादृश्य प्रदय सम्मति यः कश्चिद् भेदस्तमाह- परिग्रहके बन्धनसे रहित अर्थात् धर्मके उपकरणोके सिवाय सुई या कुशकी नोंकके यरायर भी परिग्रह न रखनेवालोको मुक्त कहते है। परिग्रहके दो भेद हैं-(१) बाह्य और (२) आभ्यन्तर । पहला पाह्य परिग्रह धन-धान्य आदि नौ प्रकारका है। दूसरा आभ्यन्तर परिग्रह- (१) मिथ्यात्व, (२) स्त्रीवेद, (३) पुरुपवेद, (४) नपुसकवेद, (५) हास्य, (६) रति, (७) अरति, (८) शोक, (९) भय, (१०) जुगुप्सा, (११) क्रोध, (१२) मान, (१३) माया और (१४) लोमके भेदसे चौदह प्रकारका है। स्व और परके मोक्ष सम्बन्धी सुखको साधनेवाले माधु कहलाते है। ऐसे साधु, दिये जानेवाले अशन आदिकी एपणामे प्रवृत्त होवें -आहार-पानी की विशुद्विमें लीन रहें। यहां तक दृष्टान्त और दाष्टान्तिककी परस्परमे समानता यतलाई है। પરિગ્રહના બ ધનથી રહિત અર્થાતુ ધર્મના ઉપકરણે સિવાય એક સોય કે તણખવા જેટલું પણ પરિગ્રહ ન રાખનારાઓને મુક્ત કહે છે પરિગ્રહના બે ભેદ છે (૧) બ ઘ અને (૨) આ૫તર પહેલે બાહ્ય પરિ ચહ ધન-ધાન્યાદિ નવ પ્રકાર છે બીજે આભ્ય તર પરિગ્રહ-(૧) મિથ્યાત્વ, (२) श्री३६, (3) ५३५३६, (४) नपुस४६, (५) स्य, (6) रति, (७) मति, । (८), () भय, (१०) गुस्सा, (११) अध, (१२) भान, (१३) माया, અને (૧૪) લેભ, એ ભેદેએ કરીને ૧૪ પ્રકાર છે સ્વ અને પરના મેક્ષ સ બ ધી સુખને સાધનારા સાધુ કહેવાય છે એવા સાધુ, આપવામા આવતા અશન આદિની એષણમાં પ્રવૃત્ત થાય, આહાર પાણીની વિશુદ્ધિમાં લીન રહે અહીં સુધી દુષ્ટાન્ત અને દષ્ટિબ્લિકની પરસ્પર સમાનતા બતાવી છે હવે --- - . ९२ श्रीदवकालिकमाने भाति, तत्र याम्यन्तिन्तपस्पन्न्याहारादिनिरासेन भरीर पटेशयन्तीति, भवभ्रम- गहेतुभूतविपयेषु खिचन्तीति, यद्वा अन्तर्भावितण्यर्थयात् श्राम्यन्ति दमनेन श्रमयन्तीन्द्रियनोइन्द्रियाणीति श्रमणाः, शमयन्ति शान्ति नयन्ति पायनोकषाय- रूपाऽनलमिति, शाम्यन्ति-पिशवटमाटवीपर्यटडोगानलो ज्वरज्वालामाला जनितसन्तापकलापतो निता भान्तीति या शमनाः । समानानि सपरेषु तुल्यानि मनासि येपामिति, कुशलमवैर्मनोभिः सह पर्त्तन्त इति वा समनसा, सम् सम्यक् अणन्तिमपचन चुस्त इति, सम्यक् अण्यन्ते-कपायचतुष्टय निस्वा 'समण' रूप होता है। इनमें 'श्रमण' का अर्थ यह है कि जो अनशन आदि तप करते है-परिपर सहते है, ससारमें परिभ्रमण करानेवाले इन्द्रियोंके विषयोंसे उदास रहते है, अथवा जो पाच इन्द्रियोंका तथा मनका दमन करते हैं। 'शमन का अर्थ यह होता है कि कषाय-क्रोध मान माया और लोभ तथा नोकपाय-हास्य रति अरति शोक भय जुगुप्सा स्त्रीवेद पुम्पवेद और नपुसकवेद-रूपी अग्निकोशान्त कर देते हैं, विशाल भवाटवीमे पर्यटन करते हुए भोगरूपी अग्निकी धधकती हुई ज्वालाओसे उत्पन्न हुए सतापके समृहको शुद्ध भावनासे.शान्त कर देते है। 'समनस्' शब्दका यह अर्थ है कि जिनका मन स्व और पर में समान है, अथवा जिनके मनोयोग सदा शुद्ध रहते है। 'समण' शब्दका अर्थ यह है कि-जो सम्यक् प्रकारसे प्रवचनका प्रतिपादन करते हैं अथवा चारों कपायोको जीत लेते हैं। सभ' ३५ थाय छ । શમણું નૈ અર્થ એ છે કે-જે અનશન આદિ તપ કરે છે–પરિષહ સહે છે, સસમા પરિભ્રમણ કરાવનારા ઇન્દ્રિયના વિષયેથી ઉદાસ રહે છે, અથવા જે પાચ ઈન્દ્રિયેનું તથા મનનું દમન કરે છે, “મન” ને અર્થ એ થાય છે કે--કપાય-ક્રોધ માન માયા અને લેભ, તથા નેકષાય- હાસ્ય રતિ અરતિ શેક ભય જુગુસા સ્ત્રીવેદ પુરૂષદ અને નપુસકવેદ- રૂપી અગ્નિને શાન્ત કરી નાખે છે, વિશાળ ભવાટવીમાં પર્યટન કરતા ભેગરૂપી અગ્નિની ભભકતી જવાલાઓમાથી ઉત્પન્ન થતા સતાપના સમૂહને શુદ્ધ ભાવ નાથી શાન્ત કરી નાખે છે “સમનલૂશબ્દનો અર્થ એ છે કે–જેનું મન સ્વ અને પરમ સમાન હોય અથવા જેના મગ હમેશ શુદ્ધ રહે “સમણ શબ્દનો અર્થ એ થાય છે કે-જે સમ્યફ પ્રકારે પ્રવચનનું પ્રતિપાદન કરે છે અથવા ચારે કષાને જીતી લે છે अध्ययन १ गा.३ भिक्षामकाराः - मपि व्यवच्च्यिते । आधाफर्मादिदोपच्याहत्तये 'एसणा'-पदमुपातम् । एवमुक्तगाथाभ्या दृष्टान्त-दान्तिकमदर्शनपुरस्सर साधुभिः कथ मिक्षा ग्रहीतव्येत्युक्त, तत्र भिक्षा द्विविधा-लौकिकी लोकोत्तरा च । तयोराधा दीनवृत्ति- -पौरुपती-भेदाद् द्विविधा, तत्र स्वोदरभरणासमर्थाना हीना-ऽनाथ-पगुमभृती- नामाचा, पञ्चासवभाजामिन्द्रियपत्रकविपयासक्तचित्ताना ममादपञ्चकमवृत्ताना भोगामिपगृनूना सन्ततिसमुत्पादकाना निरुथमाना द्वितीया । लोकोत्तराऽपि निराकरण करनेके लिए 'भत्त' शब्द और आधाकर्मी आदि दोषवाले आहारका व्यवच्छेद करनेके लिए 'एपणा' शब्द गाथामें दिया गया है। इन दो गाथाओंमें दृष्टान्त और दान्तिक यतलाकर यह प्रगट किया है कि माधुओंको किस प्रकार भिक्षा लेनी चाहिये?, अतःभिक्षाके भेद कहते हैं- भिक्षा दो प्रकारकी है-लौकिक भिक्षा और लोकोत्तर भिक्षा। लौकिक भिक्षाके भी दो भेद हैं-(१) दीनवृत्ति, (२) पौरुषघ्नी । अपना पेट भरनेमें असमर्थ, दीन, हीन, अनाथ, लूलों, लगडोंकी भिक्षा दीन- वृत्ति कहलाती है। पांच आस्रवोंका सेवन करनेवाले, पांचों इन्द्रियोंके विषयोंमें चित्तको सदा आसक्त रखनेवाले, पाचो प्रकार के प्रमादोंमें प्रवृत्ति करनेवाले, भोगरूपी आमिपमे अभिलापारखनेवाले,बाल-बच्चोंको उत्पन्न करनेवाले निकम्मे मनुष्योंको दी जानेवाली भिक्षा पौरुषघ्नी कहलाती है, क्योंकि इससे उनका पौरुष नष्ट हो जाता है । આધાકમી આદિ દેવવાળા આહારને વ્યવરછેદ કરવાને માટે જીપળા શબ્દ ગાથામા આપવામા આવેલ છે આ બે ગાથાઓમાં છાત અને દષ્ટાંતિક બતાવીને એમ પ્રકટ કરવામાં આવ્યુ છે કે સાધુઓએ કેવા પ્રકારની ભિક્ષા લેવી જોઈએ માટે ભિક્ષાના ભેદ કહે છે- ભિક્ષા બે પ્રકારની છે લોકિક ભિક્ષા અને લોકેર ભિક્ષા લોકિક ભિક્ષાના પણ બે ભેદે છે (૧) દીનવૃત્તિ, (૨) પૌરૂષની પિતાનું પેટ ભરવામાં અસમર્થ દીન, હીન, અનાથ, ભૂલા, લગડાની ભિક્ષા દીનવૃત્તિ કહેવાય છે વેનું સેવન કરનારા, પાચે ઈન્દ્રિયના વિષયમાં ચિત્તાને સદા પાએ પ્રકારના પ્રમાદેમા પ્રવૃત્તિ કરનારા, ગરૂપી આમિષમા અભિલાષા રાખ નારા, બાળ-બચાને ઉત્પન્ન કરનારા, એવા નકામા મનુષ્યને આપવામા આવતી ભિક્ષા પરૂષMી કહેવાય છે, કારણ કે તેથી એમનું પરુષ નષ્ટ થઈ જાય છે , પાચ ખાલ આસકત રાખનારા सान श्रीदनवैकालिकने यद्वा यया पिढङ्गमाः पुप्पेषु तथा साधयः कुत्र रताः ? इत्याह-'दानमक्तपणे रताः' इति, दीयत इति, अदायीति पा दान-दीयमानमथवा दत्त, तब तक कम् अन्नादिक च दानभक्त तस्य एपणम् अन्वेपण तस्मिन् , अथवा दान दत्त, भक्त-मासकम् , पपणा अन्वेपणम् एतेपा समादारद्वन्दे दानमक्तपण तस्मिन् रता-आसक्ता इत्यर्थः । चोटिक-शाक्य तापस-गरिका-ऽऽजीया अपि लोके अमणपदेनोच्यन्ते तेषा निरासार्थमुक्त 'मुक्ता' इति । निहादिप्यपि व्यवहारतो मुक्तत्वमस्त्यतस्त- यारत्त्यर्थमाह-'साहुणो' इति । मधुकरा अदत्ताऽऽदानवृत्या कुमुमरस पिबन्ति श्रमणास्तु दाभिरदत्तस्यानादेक्षिामपि न ते ग्रहणस्य तु कयैव केति भ्रमरापेक्षया साधूना व्यतिरेक दर्शयितुमाह-दाण' इति । 'भत्त' पदेन सचित्त- अब उनमें जो अन्तर है उसेभी यतलाते है । वह अन्तर यह है कि जैसे भ्रमर पुष्पोंमें अनुरक्त होता है वैसे साधु गृहस्थद्वारा दिये जाने वाले अशन पान आदिके अन्वेपणमें प्रवृत्त हो । योटिक, शाक्य, तापस, गैरिक और आजीविक आदिभी, लोकमें श्रमण कहलाते है, उनका निराकरण करनेके लिए गाया 'मुत्ता' (मुक्ताः) कहा है। निहव आदिभी व्यवहारसे मुक्त कहलाते हैं अतः उनका निराकरण करनेके लिए 'साहुणो' (साधवः) पद दिया है। भ्रमर विना दिये हुए पुष्पके रसका पान करते है किन्तु श्रमण विना दिये हुण्को ग्रहण करनेकी इच्छाभी नहीं करते, ग्रहण करनेकी तो बात ही दूर है, इस भेदको प्रगट करने के लिए 'दान' शब्द, सचित्त आहारका તેમ જે અતર રહેલું છે તે બતાવે છે તે અતર એ છે કે-જેમ ભ્રમર અનુરક્ત થાય છે તેમ ગૃહસ્થ આપેલા અનશન પાન આદિના શોધનમાં પ્રવૃત્ત થાય બેટિક, શાક, તાપસ, ગરિક અને આજીવિક આદિ પણ मा श्रम सेवाय छ, तेनु नि२५ ४५वा भाट गाथामा मुत्ता (मुक्ता। કહ્યું છે નિહનવ આદિ પણ વ્યવહાર કરીને મુક્ત કહેવાય છે, તેથી તેનું ४र४ ४२वाने साहुणो (साधय ) ५६ भादु छ ભ્રમર અણઆપેલા પુષ્પ રસનું પાન કરે છે, કિન્તુ શ્રમણ અણઆપેલા ભેજનનું ગ્રહણ કરવાની પણ કરતા નથી, પછી ગ્રહણ કરવાની વાત જ કયા રહી ? આ ભેદને પ્રકટ કરવા માટે વાન શબ્દ, સચિત આહારનું નિરાકરણ કરવાને માટે મત્ત શબ્દ, पामा .

अध्ययन १ गा.३ भिक्षामकाराः ९७ द्वितीया-यथा गौर्यत्र लघुतणादिक पश्यति तत्राऽल्प यत्र चाधिक तत्र पूर्वापेक्ष- याऽधिक कवल गृह्णाति न तु तृणादिकमुन्मूलयति तथा मुनिरपि गृहस्थगृहे यथाऽ- वसर यथासामग्रि च या भिक्षा गृहाति सा । अथवा विविधवसनरत्नालङ्करणवि- भूपिता मुन्दरी युवतिर्गवे घासादिक समर्पयति तदा तदीयरूपलावण्यादिकमप- श्यन्ती गौर्दीयमान घासादिकमुपादत्ते, तद्वद् भिक्षुणाऽपि दाश्वसनमुचेपरूपलाव- ण्यादेः सानुरागावलोकन विहाय केवलमशनपानादिशुद्धौ दृष्टिः स्थापनीयेति गोचरीभिक्षासमाचारः (२)। तृतीया गडुलेपा-यथा गडूपरि समधिकलेपमदानेन ममृतलेपतो नीरुजोऽपि (२) गोचरी-जैसे गाय जहा कम घास देखती है वहाँ कम कवल ग्रहण करती है, जहा अधिक देखती है वहां पहलेसे कुछ अधिक ग्रहण करती है, घासको जड़से नहीं उखाडती, उसीप्रकार भिक्षु एक स्थानसे ही पूर्ण अशन पान आदि न ग्रहण करे किन्तु गृहस्थको फिर आरम्भ न करना पडे इस प्रकार विचार कर अशनादि ले उसे गोचरी कहते हैं। अथवा जैसे विविध बहुमूल्य वस्त्र आभूषणोंसे आभूषित सुन्दरी युवती स्त्री गायको घास डालने आती है तो गाय उसकी सुन्दरता नहीं देखती वरन् घास पर ही दृष्टि रखती है, उसीप्रकार भिक्षु आहारादि देती हुई स्त्रीके सौन्दर्य, सुवेप, आभूषण आदिका निरीक्षण न करे किन्तु अशनादिकी शुद्धि पर ही दृष्टि रखे उसे गोचरी कहते हैं। (३) गडलेपा-जैसे फोडेके ऊपर आवश्यकतासे अधिक लेप करनेसे (૨) ગેચરી-જેમ ગાય જ્યા ઓછુ ઘાસ જુએ છે ત્યા એ છે કે ળિયે લે છે, જ્યા વધુ ઘાસ જુએ છે ત્યા પહેલાથી વધુ મટે ગ્રાસ (કોળી) લે છે, ઘાસને મૂળમાંથી ઉપાડતી નથી એ રીતે ભિક્ષુ એક સ્થાનેથી જ પૂરા પાન આદિ ગ્રહણ ન કરે, કિંતુ પ્રહસ્થને ફરીથી આર ભ સમાર ભ ન કરવું પડે એ વિચાર કરીને અશનાદિ લે, તેને ગોચરી કહે છે અથવા જેમ વિવિધ બહુ મૂલ્ય વસ્ત્રાભૂષણથી સજ્જ થએલી સુન્દર યુવતી સ્ત્રી ગાયને ઘાસ નીરવા આવે છે, તે ગાય તેની સુંદરતા જેતી નથી પરંતુ ઘાસ પર જ દષ્ટિ રાખે છે, તે પ્રમાણે ભિક્ષુ આહારાદિ આપતી સ્ત્રીનું સૌદર્ય, સુવેશ, આભૂષણ આદિનું નિરી ક્ષણ ન કરે, કિંતુ અશનાદિની શુદ્ધિ પર જ દ્રષ્ટિ રાખે તેને ગોચરી કહે છે (૩) ગડુલેપા–જેમ ગુમડા ઉપર જરૂર કરતા વધારે લેપ કરવાથી લેપ અશન Tagran ९६ श्रीदशवकालिको द्विविधा-अपशस्ता प्रशस्ता च, तत्राप्रसन्न-पार्श्वस्यादीनामप्रशस्ता भिक्षा, प्रशस्ता पुनः पञ्चमहाप्रतधारिणा पट्कायरक्षकाणा समितिपत्र-गुप्तित्रयवता -मुनीना प्रतिमाधारियाणा च, यत पपभूताः श्रारा अपि श्रमणकल्पा •ए । इयमेर 'सर्वसम्पत्करी'-त्युन्यते, अस्या अन्यान्यपि पडू नामानि यथा-(१) माधुकरी, (२) गोचरी, (३) गहलेपा, (४) अक्षाञ्जना, (५) गर्ता पूरणी, (६) दाडोपशमनी चेति । तास माधुकरी-समनन्तरमृत्रोक्तस्वरूपा (१)। लोकोत्तरभिक्षा भी दो प्रकारकी है-(१) अप्रशस्त और (०)प्रशस्त। अवसन्न और पार्श्वस्थ आदिकी भिक्षा अप्रशस्त और पचमहाव्रतधारी, पटुकायरक्षक, पाचसमिति तीनगुसिका पालन करनेवाले मुनिकी तथा प्रतिमा (पडिमा) धारी श्रावकोंकी भिक्षा प्रशस्त कहलाती है। प्रतिमा-(पडिमा)-धारी श्रावकोंकी भिक्षा प्रशस्त इस कारण है कि वे श्रावक होते हुए भी साधुसरीसी उत्कृष्ट क्रियाका पालन करते हैं। इस भिक्षाको 'सर्वसम्पत्करी' भी कहते हैं, क्योंकि इससे आत्माकी ‘समस्त सम्पत्ति ज्ञान दर्शन सुख आदिकी प्राप्ति होती है । इस भिक्षाके छह नाम और भी कहते है- (१) माधुकरी (भ्रामरी), (२) गोचरी, (३) गडुलेपा, (४) अक्षाजना, (५) गर्तापूरणी और (६) दाहोपशमनी । (१) माधुकरी (भ्रामरी) का स्वरूप इससे पहलेकी गाथामें कहा जाचुका है। લેકેત્તર ભિક્ષા બે પ્રકારની છે (૧) અમાસ્ત, (૨) પ્રશસ્ત અવસન્ન અને પાવસ્થ આદિની ભિક્ષા અપ્રશસ્ત અને પચ મહાવ્રતધારી, કાયરક્ષક, પાચ સમિતિ ત્રણ ગુપ્તિનું પાલન કરનારા મુનિની તથા પ્રતિમાન(પશ્ચિમ)-ધારી શ્રાવકેની ભિક્ષા પ્રશસ્ત કહેવાય છે પ્રતિમા–(પડિમા–ધારી શ્રાવકેની ભિક્ષ પ્રશસ્ત એ કારણથી છે કે એ શ્રાવક હોવા છતા સાધુના જેવી ઉત્કૃષ્ટ ક્રિયાનું પાલન કરે છે સર્વ સમ્પકરી” પણ કહે છે, કારણ કે તેથી આત્માની સમસ્ત સમ્પત્તિ જ્ઞાન દર્શન સુખ આદિની પ્રાપ્તિ થાય છે એ ભિક્ષાના બીજા છ નામ પણ કહેલા છે (१) भाधु (ब्रामरी), (२) आयरी, (3) सपा, (४) माना, (५) गापूरणी, मने (९) हापशमनी (१) माधुरी (भ्रामरी )नु स्व३५ पडदानी गाथामा यु આ ભિક્ષાને अ ययन १ गा. ३ भिक्षामकारा: ९७ द्वितीया-यथा गोर्यत्र लघुरणादिक पश्यति तत्राऽल्प यत्र चाधिक तत्र पूर्वापेक्ष- याऽधिक कवल गृह्णाति न तु तृणादिकमुन्मूलयति तया मुनिरपि गृहस्थगृहे यथाऽ- वसर यथासामग्रि च या भिक्षा गृह्णाति सा। अथवा विविधवसनरत्नालङ्करणवि- भूपिता मुन्दरी युवतिर्गवे घासादिक समर्पयति तदा तदीयरूपलावण्यादिकमप- श्यन्ती गौर्दीयमान घासादिकमुपादत्ते, तद्वद् भिक्षुणाऽपि दावसनसुवेपरूपलाव- ण्यादेः सानुरागावलोकन विहाय केवलमशनपानादिशुद्धी दृष्टिः स्थापनीयेवि गोचरीभिक्षासमाचारः (२)। तृतीया गडुलेपा-यथा गहपरि समधिकलेपमदानेन महतलेपतो नीरुजोऽपि (२) गोचरी-जैसे गाय जहा कम घास देखती है वहाँ कम कवल ग्रहण करती है, जहा अधिक देखती है वहां पहलेसे कुछ अधिक ग्रहण करती है, घासको जड़से नहीं उखाडती, उसीप्रकार भिक्षु एक स्थानसे ही पूर्ण अशन पान आदि न ग्रहण करे किन्तु गृहस्थको फिर आरम्भ न करना पड़े इस प्रकार विचार कर अशनादि ले उसे गोचरी कहते हैं। अथवा जैसे विविध यहुमूल्य वस्त्र आभूषणोंसे आभूपित सुन्दरी युवती स्त्री गायको घास डालने आती है तो गाय उसकी सुन्दरता नहीं देखती वरन् घास पर ही दृष्टि रखती है, उसीप्रकार भिक्षु आहारादि देती हुई स्त्रीके सौन्दर्य, सुवेप, आभूपण आदिका निरीक्षण न करे किन्तु अशनादिकी शुद्धि पर ही दृष्टि रखे उसे गोचरी कहते है । (३) गड्डुलेपा-जैसे फोडेके ऊपर आवश्यकतासे अधिक लेप करनेसे (૨) ગોચરી–જેમ ગાય જ્યા ઓછુ ઘાસ જુએ છે ત્યા એ છે કે ળિયે લે છે, જ્યાં વધુ ઘમ જુએ છે ત્યા પહેલાથી વધુ મટે ગ્રાસ (કેળીયે ) લે છે, ઘાસને મૂળમાંથી ઉપાડતી નથી એ રીતે મિક્ષ એક સ્થાનેથી જ પૂરા પાન આદિ ગ્રહણ ન કરે, કિંતુ ગૃહસ્થને ફરીથી આરબ-સમાર ભ ન કર પડે એ વિચાર કરીને અશનાદિ લે, તેને ગોચરી કહે છે અથવા જેમ વિવિધ બહુ મ્ય વસ્ત્રાભૂષણથી સજજ થએલી સુન્દર યુવતી સ્ત્રી ગાયને ઘાસ નીરવા આવે છે, તે ગાય તેની સુંદરતા જેતી નથી પરંતુ ઘાસ પર જ દષ્ટિ રાખે છે, તે પ્રમાણે ભિક્ષુ આહાદિ આપતી સ્ત્રીનું સૌદર્ય, સુશ, આભૂષણ આદિનુ નિરી ક્ષણ ન કરે, કિંતુ અશનાદિની શુદ્ધિ પર જ દષ્ટિ રાખે તેને ગોચરી કહે છે (૩) ગડુલેખા-જેમ ગુમડા ઉપર જરૂર કરતા વધારે લેપ કરવાથી લેપ અશાન ९८ श्रीदशकालिकाये गइसन्निहितदेशो पिहन्यते, तदेकदेशमा यस्कित्रिल्लेपमदाने गडपदेशसाफरपेन लेपाभागादोगो नोपशाम्पति, तद्वत्साधुरपि, निर्दोपपरिमिताहारेण ध्रुधा निवर्तयति तद्रूपा (३)। चतुर्थ चास्या अक्षाअनेति नाम-यथा शकटेन दरं गन्तुकामस्तत्र यदि वैलदान न कुर्यात् , तदा चलितुमेवाक्षम तन्न पारयति शकटारोहिण भापयितु- मभीष्ट स्थानम् तनाधिक्तरतैलनिक्षेपस्तु न केवल निष्फलः प्रत्युत हानि जन- यतीति, तद्विनिरवधाशनपानमदान बिना मोक्षमापकसयमपणे चलितुमक्षम शरीर लेप इधर-उधर फैल जाता है और आस-पामका नीरोग प्रदेश भी स्वराव हो जाता है, और यदि फोड़े पर बिलकुल ही लेप न किया जाय तो भी रोग शान्त नहीं रोता, वैसेटी साधु यदि प्रमाणसे अधिक आहार करे तो प्रमाद आदि दोष उत्पन्न रोनेसे स्वाध्याय आदि क्रियाओंका पूर्ण पालन नहीं कर सकता, और बिलकुल ही थोड़ा आरार करे तो क्षुधावेदनीयको शान्ति न होनेसे वैयावृत्त्य आदि साधुकी क्रियाएँ नहीं हो सकती, इसलिए निर्दीप और परिमित आहार लेना 'गडलेपा' भिक्षा कहलाती है। (४) अक्षाञ्जना-जैसे कोई गाडीद्वारा इच्छित स्थान पर जाना चाहता है परन्तु गाडीको बिलकुल तैल नहीं देवे तो वह गाडी चल नहीं सकती और यदि अधिक तेल दे दिया जाय तो वह वृथा ही नहीं वरन हानिकारक भी है, इसीप्रकार मोक्षपुरी तक पहुचनेके लिए शरीर-रूप शकट (गाडी) આમતેમ ફેલાઈ જાય છે અને આસપાસને નીરાગ પ્રદેશ પણ જાય છે અને જે ગૂમડા ઉપર બિલકુલ લેપ ન કરવામા આવે તે રેગ શક્તિ થાય નહિ એવી જ રીતે સાધુ જે પ્રમાણુથી અધિક આહાર કરે તે પ્રમાદ આદિ દોષ ઉત્પન થવાથી સ્વાધ્યાય આદિ ક્રિયાઓનું પૂણું પાલન કરી શકો નથી, અને બિલકુલ શેડે આહાર કરે તે સુધાવેદનીયની શાન્તિ નહિ થવાથી વૈયાવૃત્ય આદિ સાધુની ક્રિયાઓ થઈ શકતી નથી તેથી નિર્દોષ અને પરિમિત આહાર લે એ “ગડુલેપા” ભિક્ષા કહેવાય છે (૪) જેમ કોઈ માણસ ગાડામાં બેસીને ઈચ્છિત સ્થાન પર જવા ઈચ્છે છે પરન્તુ ગાડાને બિલકુલ તેલ ન ઉજે તે એ ગાડુ ચાલી શકતું જે વધારે પડતું તેલ ઉજે તે તે વૃથા જાય છે એટલું જ નહિ પણ હાનિકારક પણ નીવડે છે એ રીતે એક્ષપરી સુધી પહોચવાને માટે શરીર-શકટ (ગાડા) ખરાબ થઈ નથી અને अध्ययन १ गा.३ भिक्षामकाराः . मपि नाल मुनीन् मोक्ष मापयितुम् , अधिकतराहारपूरित तु निद्राप्रमादादिदोप- जात जनयन्नूनमेव विनयश्रुतादिसमाधि विध्वसयति, अतः परिमित विशुद्ध चाशनपानमुपादेय भिक्षुणेति सेय भिक्षा 'अक्षाजना नाम' (४)। पश्चमी गर्तापूरणी, सा यथा-कस्यापि अप्ठिनो भवनसम्बन्धिनि गमना- गमनमार्गे यदि केनापि कारणेन गतः सजायते तदा तमवलोक्य स तदानी यटेच सद्यो लोटपापाणखण्डादिकमुपलभते तदेवादाय त गर्ने परिपूरयति न तूत्तमेनैवेष्टकमभृतिना गर्तोऽय पूरयितव्य इति विचारयति, तथा सति महाऽन- योत्पत्तिसभवः, एवमेव मुनिरपि क्षुधावेदनीयोदयवशाद्रिक्तमुदरमैपणिकैरन्तमा- न्तादिभिराहारैभित्तीति । (५) को आहारादिरूप तेल विलकुल न दिया जाय तो सयमयात्राका सम्यक् निर्वाह नहीं हो सकता और अधिक आहार देनेसे रोगादि होजानेके कारण विनय श्रुत आदि समाधि नहीं हो सकती, इसलिए परिमित आहार लेना अक्षाञ्जना भिक्षा कहलाती है । (५) गर्तापूरणी-जैसे यदि किसी रईसके घर जाने-आनेके मार्गमें किसी कारणसे गड्ढा होजाय तो उसे देखते ही वह रईस शीघ्रतासे मिट्टी-पत्थरके टुकडे आदि जो कुछ पाता है उन्हीको लेकर खड्डेको भर देता है। परन्तु ऐसा नही विचारता है कि अच्छे २ ईट-पत्थरों से ही इसे भरना चाहिये। यदि न पूरे तो बड़ी आपत्ति आनेकी सभावना रहती है । इसीप्रकार मुनि, क्षुधावेदनीयके वशसे अन्त-प्रान्त आदि निरवद्य आहार लेकर खाली उदर भर लेते है। इसलिए इसे गर्तापरणी कहते हैं। ને આહારાદિ રૂપ તેલ બિલકુલ ન ઉજવામા આવે તે સયમ-યાત્રાને સમ્યક નિર્વાહ થડ શકતું નથી, અને અધિક આહાર આપવામા આવે તે રોગાદિ થવાથી વિનય શ્રુત આદિ સમાધિ થઈ શકતી નથી તેથી પરિમિત આહાર લે એ “અલાજના” ભિક્ષા કહેવાય છે (૫) ગપૂરણી-જેમ કે ગૃહસ્થને ઘેર જવા આવવાના માર્ગ પર કઈ કાણુથી ખડે પડી જાય છે તે તેને દેખતા જ તે ગૃહસ્થ શીત્ર માટી, પત્થરના ટુકડા, વગેરે જે કઈ મળે તે લઈને ખાડાને પૂરી નાખે છે પણ એમ નથી વિચારતે કે સારી ઈટે પથરોથીજ પૂરીએ જે ન પૂરે તે ભારે આપત્તિ આવી પડવાની સંભાવના રહે છે એ રીતે મુનિ સુધા–વેદનીયને લીધે અત–માત આદિ નિરવા આહાર લઈને ખાલી ઉદર ભરી લે છે તેને ગપૂરણી કહે છે marma १०० श्रीदवेकालिकात्रे पप्ठी दाहोपशमनी यथा-भाने घटनमागमालादन्दामाने गृही यदेव सयो जलकर्दमधूलिलोप्टमभृतिकमुपलभते तदेव प्रक्षिप्य पापक प्रशमयति न तु गङ्गादिसलिल मतीक्षते, तथा सयमरक्षार्थ निहोपेण रक्षादिनाऽन्याहारेण शमयति क्षुधा मुमुक्षुर्मिपुरिति (६) ॥३॥ प्रशस्तैव भिक्षा साधुभिर्ग्रहीतल्या नेतरेति निशम्य शिष्यो गुर प्रत्याह- (वय च , इत्यादि । ४ ५ ६ ८ 13 १२ मूलम्-वय च वित्तिं लभामो, न य कोड उवहम्मड । अहागडेसु रीयते, पुप्फेसु भमरा जहा ॥ ४॥ (छाया)-य च वृत्तिं लप्स्यामहे, न च कोऽपि उपहन्यते । यथाकृतेपु रीयन्ते, पुप्पेषु भ्रमरा यथा ॥ ४ ॥ (६) दाहोपशमनी-जिस समय घरमें अग्नि धधक जाय उस समय घरका स्वामी जल्दी में जल कीचड़ धूल मिट्टी आदि जो कुछ मिलजाय उसीको डालकर आग बुझाता है। उस समय वह यह नहीं सोचता कि जव गगासिन्धुका निर्मल नीर मिलेगा तभी आग वुझाऊगा, उसीप्रकार सयमकी रक्षाके लिए मुमुक्षु भिक्षु तुच्छ आदि निर्दोप भिक्षासे क्षुधाको शान्त कर लेता है । इसलिए इसको दाहोपशमनी कहते है ॥३॥ प्रशस्त भिक्षा ही साधुको ग्रहण करनी चाहिये अन्य नहीं' यह सुनकर शिष्य गुरुसे निवेदन करता है-'वय च वित्ति' इत्यादि । (૬) દાહપશમની–જે સમયે ઘરમાં અગ્નિ ભભૂકી ઉઠે તે સમયે ઘરને ધણું જરદી-જલ્દી પાણી, કાદવ, ધૂળ, માટી વગેરે જે કાંઇ મળી જાય તે નાખીને આગ બુઝાવે છે તે વખતે તે એમ નથી વિચારતે કે જ્યારે ગગા-સિંધુનું નિર્મળ નીર મળશે ત્યારે આગને બુઝાવીશ એ રીતે સયમની રક્ષાને માટે મુમુક્ષુ ભિક્ષુ લુખી, તુચ્છ, આદિ નિર્દોષ ભિક્ષાથી સુધાને શાન્ત કરી લે છે तथी त 'पशमनी' ४ छ (3) પ્રશસ્ત ભિક્ષાજ સાધુએ ગ્રહણ કરવી જોઈએ બીજી નહિ,” એમ સાભ जीन शिष्य १३ सभी निवेदन ४२ छ --बय च वित्तिं त्याह .

- अ ययन १ गा. ४ मिक्षाया मिष्यमविज्ञा गुरु महाराजके प्रति शिष्यकी प्रतिज्ञा- सान्वयार्थः-(हे गुरुमहाराज !) वय-इम च ऐसी वित्तिवृत्ति-मिक्षा- वृत्तिको लम्भामो स्वीकार करेंगे (जिससे) कोडय-कोईभी न उवहम्मड= उपमर्दित न हो, (साधु) अहागडेसु-सदाकी भाति गृहस्थद्वारा अपने लिए वनाये हुए भोजनमेही रीयते सयम याताका निर्वाह करते है, जहा-जिस प्रकार भमरो=भारा पुप्फेसु-फूलोमें निर्वाह करता है । अर्थात् श्रमण महाराज गृहस्थद्वारा सुदके लिये बनाये हुए आहारसे ही अपनी यात्राका निर्वाह कर लेते हैं ॥४॥ टीका-एतद्गाथायाः पूर्वार्दै समुपात्त चकारद्वय क्रमेण यथा-तथा-शब्दार्थ- वाचक ततथायमर्थः-चय च-तथा-तेन रूपेण, वृत्ति जिनोक्तस्वरूपा प्रशस्ता भिक्षा, लप्स्यामहे पाप्स्याम' स्वीकरिष्याम इति यावत् , यथा न कोऽपि त्रस स्थावरमाणिमात्रमित्यर्थः उपहन्यते उपद्दत' (उपमर्दितः) भवेत । एवविध- वृत्तिग्रहणे सदृष्टान्तहेतुमुपन्यस्यति 'अदा' इति, अत्र 'यत्' इत्ययाहार्यम् , तथा च-यतः यथाकृतेपु-गृहस्थैरात्मार्थमात्मीयाथै च सम्पादितेप्वाहारादिपु रीयन्ते-गच्छन्ति सयमयाना निर्वहन्तीति यावत् 'साधवः' इति शेषः । अत्र गतमपि भ्रमरदृष्टान्त विस्पष्टप्रतिपत्तये पुनरुपन्यस्यति 'पुप्फेस' यथा पुष्पेषु इस गाथाके पर्चाई में दो 'च' आये हैं, एकका अर्थ है 'जैसे और दूसरेका अर्थ है 'वैसे', इसलिए इसका अर्थ यह हुआ कि-हे भगवन् ! हम वैसेही प्रशस्त भिक्षा ग्रहण करेगे जैसे (जिस प्रकार) त्रस या स्थावर जीवको किसीभी प्रकारकी वाधा न पहुँचे, क्योंकि गृहस्थोंद्वारा अपने- लिये या अपने कुटुम्बके लिये बनाये हुए आहारको लेकर ही साधु अपनी सयमयात्राका निर्वाह कर लेते हैं । इसी यातको अधिक स्पष्ट करनेके આ ગાથાના પૂર્વાર્ધમા બે ર આવ્યા છે એને અર્થ છે જેમ અને બીજાને અર્થ છે “એમ” એ રીતે તેનો અર્થ એમ થયું કે હે ભગવન્! અમે એમ જ (એજ પ્રકારે) પ્રસ્ત ભિક્ષા ગ્રહણ કરીશું કે જેમ (જે પ્રકારે) ત્રસ ચા સ્થાવર જીવને કઈ પણ પ્રકારનો બાધા ન પહોચે કારણ કે ગૃહસ્થાએ પિતાને માટે યા પિતાના કુટુંબને માટે બનાવેલ આહાર લઈને જ સાધુ પિતાની સયમયાત્રાને નિર્વાહ કરી લે છે એ વાતને વધુ સ્પષ્ટ કરવાને માટે ભ્રમરના દષ્ટાતને ફરીથી બેવડાવે છે .'

- २ 3 १ ७ ४ १०२ श्रीदशवकालिको भ्रमराः, ते हि पुष्पेभ्यो रसमाइरन्तोऽपि तानि (पुष्पाणि) लेशतोऽपि न पीडयन्ति । अत्र 'लम्मामो' इत्यस्य लिमयाम' इति व्याख्यान तु सर्वथा व्याकरणविरुद्धमेर 'लभ' धातोरनुदात्सु पठितत्वेन नित्यात्मनेपदित्वात् , न च चतिटो रिस्करणशापितया 'अनुदात्तेचलक्षणमात्मनेपदमनित्यम् ' इतिपरिभाषया परस्मैपदमपि युक्तमेवेति वाच्यम् , तस्या अगतिकगतिस्तयेष्टमयोगविषयत्वात् , वस्तुतस्तु भाप्यानुक्तज्ञापितार्थस्य साधुताया नियामरत्वे प्रमाणामावादेवमा- दिकाः परिभापाचिन्त्या एवेति स्पष्ट 'परिमापेन्दुशेसरे' इत्यतिरोहित वैया करणानाम् । अत्र गाथाया 'लभामो' इति, 'उवहम्मइ' इति भविष्यद्वर्त्तमानौ कालावविवक्षितो, तेन कालत्रयग्रहण योग्यम् ॥ ४ ॥ एव मधुकरदृष्टान्तेन यत्फलित तत्मतिपादयन्नुपसहरति-'मगारसमा इत्यादि। मूलम्-महुगारसमा बुद्धा जे भवंति अणिस्सिया । नाणापिडरया दता तेण वुच्चति साहुणो ॥त्तिवेमि॥५॥ 'छाया-मधुका (क) रसमा बुद्धा यतो भवन्त्यनिश्रिताः। नानापिण्डरता दान्ताः, तेन उच्यन्ते साधवः ॥५॥ सान्वयार्थः-(क्योंकि)जे जो महगारसमा भौरेकीभाति वुद्धा-विधेको अणिस्सिया-मोहबन्धनरहित नाणापिंडरया अनेक घरोंका निरवध पिण्ड लेकर सयममें लीन दता इन्द्रियविजयी भवति होते हैं, तेण इसीसे वे साहुणो साधु वुच्चति कहलाते हैं। तिबेमि इस प्रकार श्रीसुधर्मा स्वामी लिए कहे हुए भ्रमर दृष्टान्तको फिर दुहराते हैं कि जैसे भ्रमर पुष्पोंसे रस ग्रहण करकेभी किसी पुष्पको पीडा नही पहुँचाता ॥४॥ मधुकरका उदाहरण देनेसे जो निष्कर्ष निकला उसे सूत्रकार कहते हैं-'महुगारसमा' इत्यादि । કે જેમ ભ્રમર પુષ્પમાથી રસ ગ્રહણ કરીને પણ કઈ પુષ્પને પીડા ઉપ तो नथी (४) મધુકરના ઉદાહરણમાથી જે નિષ્કર્ષ નીકળે તેને સૂત્રકાર કહે છે- ૫ ८ १. +4 महुगारसमा, त्या अध्ययन १ गा. ५ साधुस्वरूपम् जम्बूस्वामीसे कहते है-“हे जम्मू ! श्रमण भगवान महावीरसे मैने जैसा मुना है वैसा ही तेरे लिए कहता हु ॥५॥ ।। इति मथमाध्ययनस्य सान्वयार्थः ॥ १ ॥ टीका-अत्र गाथाया 'जे' इत्यस्यादौ 'यतः' इति, 'तेण' इत्यस्यान्ते 'ते' इति च पदद्वयमध्याहार्यम् , तथा च-यतः ये मधुका(कोरसमा भृङ्गबदनियत- वृत्तयः युद्धाः इद कर्तव्यमिदमकर्तव्यमित्येव विवेकवन्तः, अनिश्रिताः निश्रा- यरहिताः-निवासकुलादिषु प्रणयनिगडवन्धशून्या इत्यर्थः, नानापिण्डरताः नाना=अभिग्रहविशेषेण प्रतिगृहाऽल्पाल्पग्रहणयुक्ततया अन्तमान्तादिभेदेन च विविधप्रकारा ये पिण्डाः आहाराधास्तेपु रताः ससक्ताः, दान्ताः इन्द्रिय- नोइन्द्रियविकारभावाऽनुपहतचित्ताः, भवन्ति सम्पद्यन्ते, तेन-उक्तमकारेण निरव- धत्तिसमाराधनेन हेतुना ते योगत्रये-न्द्रियपश्चक-नवविधविशुद्धब्रह्मचर्याऽहिंसाः साधयन्तीति साधवः व्युच्यन्ते कथ्यन्ते इति गाथार्थः, इत्यन्ये, वस्तु- तस्तु अन 'यतः' इत्यस्य, 'ते' इत्यस्य चाध्याहरण 'जे' इत्यस्य प्रथमान्तत्वेन व्याख्यान च न युक्त, तथा सति 'ये'-'ते'-शब्दयोंवैयापत्तेः, तस्मात् 'जे' इत्यव्ययपद 'यतः' इत्यस्यार्थे, अव्ययानामनेकार्थत्वात् , ततश्चा- यमभिसम्बन्धः-यतः मधुकारसमाः बुद्धाः अनिश्रिताः नानापिण्डरताः दान्ता जो भारेके समान अनियत (कुलकी नेसराय रहित) मिक्षा लेते हैं, कर्तव्य और अकर्तव्यके विवेकी हैं, निवासस्थान तथा कुटुम्ब परिवार आदिमे ममताके बन्धनसे बन्धे हुए नहीं हैं, भाँतिरके अभिग्रह धारण करके अनेक घरोंसे लिये जाने वाले अन्त-प्रान्त आदि आहारमें अनुरक्त रहते है, इन्द्रियों और मनके विकारको दमन करते हैं वे निर्दोष भिक्षा लेकर तीन योग, पाँच इन्द्रियाँ, नव प्रकारके विशुद्ध ब्रह्मचर्य और अहिंसाकी साधना करनेवाले साधु कहलाते है। જે ભ્રમરાની પેઠે અનિયત (કુળની નેસરાય રહિત) ભિક્ષા લે છે, કર્તવ્ય અને અકર્તવ્યને વિવેકી છે, નિવાસસ્થાન તથા કુટુમ્બ પરિવાર આદિમ મમ તાના બંધનથી બદ્ધ થયે નથી, તરેહ-તરેહના અભિગ્રહો ધારણ કરીને અનેક ઘરોથી લીધેલા અતિ પ્રાત આદિ આહારમા અનુરક્ત રહે છે, ઈન્દ્રિયે અને મનના વિકારનુ દમન કરે છે, તે નિર્દોધ ભિક્ષા લઈને ત્રણ ગ, પાચ ઈન્દ્રિયે, નવ પ્રકારનું વિશુદ્ધ બ્રહ્મચર્ય અને અહિંસાની સાધના કરનારે સાધુ કહેવાય છે .

१०४ श्रीदवेकालिको भान्ति तेन साधरः उन्यन्त इति, साधुरिगेपणाना मधुकारममादीना व्याख्या तु यथापूर्वमेवेति पयमिति विभावयन्तु विहासः । मधुकरसमा असशिनोऽपि भान्ति अतस्तम्चाच्छेदार्थमाह 'दा' इति, मधुकरसमा युद्धाय मतिमाधारिमभृतयः सयताऽसयता अपि भवन्ति तद्वयात्तये 'अणिस्सिया' इति । मधुकरसाम्य च साधना न सादेशिक किन्तु चन्द्रमुखा- दिदैकदेशिकमेयेत्यतो यदशे मधुररसादृश्याभारस्तद्वोधनार्यमाह-'नाणापिंडरया देता' इति, भ्रमरा हि सुगन्धिभ्य एव कुमुमेभ्यः स्वायमेव च रममादत्ते न च भारेके समान असजी भी होते अत युद्ध (कर्तव्याकर्तव्य विवेकसे युक्त) पद दिया है। प्रतिमा (पडिमा) धारी श्रावक (सयतासयत) भी भीरेके समान और युद्ध होते है इसलिए 'अणिस्सिया' पद दिया है, जैसा कि पहले कहा जा चुका है भारेका उदाहरण एकदेशीय है, कोई कहता है कि 'इसका मुख, चन्द्रमाके समान है तो मुखमे चन्द्रमाके सब गुण नही पाये जाते, अर्थात् कुछ गुण सदृश होते हैं कुछ विसदृश होते ह, भौरेका उदाहरण भी कुछ अशोमे मिलता कुछ अशोमें नहीं मिलता है । जिस अशमे नही मिलता है वह सूत्रकारने 'नाणापिंड रया' और 'दता' विशेषणोंसे प्रगट किया है । भमर, केवल कुसुमोंके स्वादिष्ट रसको ही पीता है इसलिए यह दान्त (इन्द्रियोंको जीतनेवाला) नहीं है, इस दृष्टान्तसे दान्तिककी विसदृशता है । ભ્રમરની પિઠે અસણી પણ હોય છે, તેથી બુદ્ધ (કર્તવ્યા કર્તવ્ય-વિવેકથી યુક્ત) પદ આપેલ છે પ્રતિમા (પડિમ) ધારી શ્રાવક (સયતાસયત) પણ ભ્રમરાની સમાન અને બુદ્ધ હોય છે, તેથી મિિસિયા પદ આપ્યુ છે પહેલા કહેવામા આવ્યુ છે કે ભ્રમરનું ઉદાહરણ એક-દેશીય છે કઈ કહે છે કે એનું મુખ ચંદ્રમા જેવું છે” પણ મુખમાં ચદ્રમાના હોતા નથી અર્થાત્ કાઈ ગુણ સમાન હોય છે, કાઈ અસમાન હોય છે ભ્રમરાનું ઉદાહરણ પણ કાઈ અશેમા મળતુ છે, કાઈ અશેમા અણુમળતુ જે અશમાં અણુમળતુ છે તે સૂવારે નાણાપંદરા અને ટ્રતા વિશેષણથી પ્રકટ કર્યું છે ભ્રમર માત્ર કુસુમેના સ્વાદિષ્ટ રસને જ પીએ છે, તેથી એ જીતનાર) નથી આ દૃષ્ટાતથી દાર્જીન્તિકની અસમાનતા છે બધા ગુણ દાન્ત (ઈન્દ્રિયને अध्ययन १ गा. ५ उपसहारः १०५ , - दान्ता भवन्ति । 'तिमि' इति उक्तरूप तत्त्व यथा तीर्थङ्करस्य भगवतो महावीरस्य सकाशान्मया श्रुत न तु स्वमुदया कल्पित यतः स्वमुद्धया कथने श्रुत- ज्ञानस्याबिनयो भवति, किञ्च उद्मस्थाना दृष्टयोऽप्यपूर्णा भवन्ति, तस्माद् यथा भगवस्मतिपादितमेव ला ब्रवीमिन्-उपदिशामीत्यर्थः । इहार्थे चेय सङ्ग्रहगाथा- 'मुअणाणस्स अविणओ परिहरणिजो मुहादिलासीहिं। छउमत्थाण दिही, पुण्णा णस्थिति सृश्य इइणा ॥१॥" इति, इति पञ्चमगाथार्थः ॥ ५॥ सुधर्मस्वामी जम्बूस्वामीसे कहते हैं-हे जम्बू ! ऊपर जो प्रथम अध्य- यनका भाव कहा गया है वह अन्तिम तीर्थङ्कर भगवान् श्रीमहावीरसे जैसा सुना वैसाही कहा है, अपनी बुद्धिसे कल्पना किया हुआ नहीं कहा है, अपनी बुद्धिसे कल्पना करके करनेसे श्रुतज्ञानकी आशातना होती है, और छद्मस्थोंका ज्ञान भी अधूरा होता है, इसलिए भगवानद्वारा प्रति- पादित प्रवचन ही तुझे सुनाया है । कहाभी है- "सुखके अभिलापी पुरुपोंको थुतज्ञानकी आशातनाका त्याग करना चाहिये । क्योंकि उद्मस्थोंकी दृष्टि पूर्ण नहीं होती। इसी अर्थको 'त्तिवेमि' शब्दसे प्रगट किया है" ॥५॥ સુધર્મ–સ્વામી જ બૂ–સ્વામીને કહે છે-હે કબૂ 1 ઉપર જે પ્રથમ અશ્ચય નને ભાવ કહ્યો છે તે અતિમ તીર્થકર ભગવાન મહાવીર પાસેથી જે મે સાભળે તે જ કહ્યો છે કે પિતાની બુદ્ધિથી કલ્પના કરેલે નથી કહ્યો પિતાની બુદ્ધિથી કલ્પના કરી કહેવાથી શ્રુતજ્ઞાનની આશાતના થાય છે અને છઘસ્થાનું જ્ઞાન પણ અધૂરું હોય છે, તેથી ભગવાન દ્વારા પ્રતિપાદિત પ્રવચન જ મે તને સ ભળાવ્યું છે કહ્યું પણ છે કે- * સુખના અભિલાષી પુરૂએ શ્રુતજ્ઞાનની આશાતના ત્યાગ કરવો જોઈએ, કારણ કે છાપેની દષ્ટિ પૂર્ણ હોતી નથી આ અર્થને રિધિ શબ્દથી પ્રકટ ध्या छ" (५) श्रीशिवकालिमसूत्रे इति श्री विश्वविख्यात गगहल्लम-प्रसिद्धगावर-पनदशभाषा-कलित परिव. कलापाऽऽलापग-प्रविशुद-गध-पर-नेकान्यनिर्मापाचादिमानमर्दक श्री शाहू छत्रपति-कोल्हापुरराज-भदत्त-जैनशास्त्राचार्य-पदभूषित- कोल्हापुरराजगुरु-पालनामचारि-जैनाचार्य जैनधर्मदिवाकर- पूज्य-श्रीघासीलालातिविरचिताया श्रीदशकालिपसूत्र- स्याऽऽचारमणिमन्जपारयाया व्याख्याया प्रथम दुमपुप्पकार यमभ्ययन समाप्तम् ॥१॥ द्रुमपुष्पक' इसप्रकार दशवकालिक मृत्रके नामक पहले अध्ययनकी आचारमणिमजपा नामक व्याख्याका हिन्दी भाषानुवाद समाप्त हुआ ॥१॥ ઇતિ “હમપુષ્પક નામના પહેલા અધ્યયનનુ शुराती-पानुवाद समास (१).

१२ ૧૦ ५ अध्ययन २ गा. १ धैर्यधारणोपदेशः १०७ ॥ द्वितीयाध्ययनम् ॥ गत प्रथममध्ययनमथ द्वितीयमारभ्यते, तत्रायमभिसम्बन्धः-पूर्वाध्ययने 'धम्मो मगल' इत्यादिना धर्मः प्रशसितो यः केवल जिनशासन एवोपलभ्यते, ततश्योक्तरूपधर्मपरिपालनार्यस्वीकृतजिनशासनो नवदीक्षितः कदाचि?र्याभावा- चारित्रच्युतो न भवेदित्याशयेनास्मिन्नध्ययने 'साधुना धैर्य धार्य' मिति वक्तव्य, धैर्यधारण च कामनिवारणमन्तरेण न सभवतीति प्रथम तदेवाह-'कह नु' इत्यादि । मूलम-कह नु कुजा सामण्णं, जो कामे न निवारए । पए पए विसीअतो, सकप्पस्स वसगओ॥१॥ छाया-कथ नु कुर्याच्छामण्य, यः कामान्न निवारयेत् । पदे पदे विपीदन् , सकल्पस्य वश गत ॥१॥ दूसरा अध्ययन । पहले अध्ययनमें धर्मका स्वरूप और माहात्म्य कहा है वह केवल जैनशासनमे ही पाया जाता है । इसलिए पहले कहे हुए धर्मका पालन करनेके लिए जिसने जैनशासन अर्थात् चारित्रधर्म स्वीकार कर लिया रो परन्तु नवीन दीक्षित होनेसे कभी धैर्य छूट जानेके कारण वह कदा- चित् चारित्रसे स्खलित न हो जाय, इस अभिप्रायसे इस अध्ययनमें 'साधुको धैर्य धारण करना चाहिए' यह कहा जायगा। लेकिन धैर्य तव ही रह सकता है जर कि कामके विकारको जीत लिया जाय । अत एव शास्त्रकार सबसे पहले इसी चिपयका प्रतिपादन करते हैं- 'कह नु-' इत्यादि। અધ્યયન ૨ જુ પહેલા અધ્યયનમા ધર્મનું સ્વરૂપ અને માહામ્ય કહ્યું છે તે કેવળ જેન શાસનમાં મળી આવે છે તેથી, પહેલા કહેલા ધર્મનું પાલન કરવાને માટે, જેણે જેન શાસન અર્થાત્ ચારિત્ર ધર્મ સ્વીકાર્યો હોય પરંતુ નવદીક્ષિત હેવાથી કેઈવાર ધૈર્ય છૂટી જવાથી એ કદાચ ચારિત્રથી ખલિત ન થઈ જાય, તેટલા માટે આ અધ્યયનમાં “સાધુએ ઘેર્ય ધારણ કરવું જોઈએ ” એ કહેવામાં આવશે પરતુ ધૈર્ય ત્યારે જ રહી શકે છે કે જ્યારે કામવિકારને જીતી લેવામાં આવે तेथी शा२ सौथी पड़ता से विषयर्नु प्रतिपादन ४२ -कह नु० ध्या . , १०८ श्रीदर्शकालिकम सान्वयार्थ:-जो-जो कामे रिपयोंको न नियारम्नहीं छोडता है, वह सकप्पस्स-इच्छाओंके यमगओशम होकर पाप-पद-पद पर विसीमतो- खेदित होता हुआ नु-आधर्य है कि पद मामण्ण-श्रमणधर्मको कह कैसे कुज्जा-कर-पाल सकता है। अर्थात-जो इन्द्रियोंके विषयोंका परित्याग नहीं करता उसकी इन्चाएँ सदैव बहती रहती है, उसे कभी सन्तोप नहीं होता, सन्तोप न होने से निरन्तर मानसिक कष्ट होता है, विषयोकी इच्छासे उत्पन्न हुआ मानसिक कष्ट होते रहनेसे चारित्रधर्मकी आराधना नहीं हो सस्ती, अतः सर्व प्रथम इन्द्रियोंको में करना चाहिये ॥१॥ टीका-यः, काम्यन्ते अभिलप्यन्ते प्राणिमिरिति कामाः शब्दादयस्ता न निवारयेत् नापनयेत् , अन 'सः' इत्यध्याहार्य यत्तदोनित्यसम्बन्धादिति केचित् , वस्तुतस्तु नान तच्छन्दाध्याहारावश्यक्ता, न चाऽन याहारे साकाक्षवदोष इत्याक्षेप्यम् , उत्तरवाश्यगतत्वेन यच्छन्दोपादाने तस्य दोपस्याऽनवकाशात 'आत्मा जानाति यत्पाप' मित्यादिवत् । सकल्पस्य अमाप्तविषयमाप्तिरूपस्याऽभ- शस्तस्याऽभ्यवसायस्य, वशम्=अधीनता गतस्तदधीनवर्ती भूत्वेति भावः, पदे पदे- प्रतिस्थान विपीदन खेदमनुभवन् कय केन प्रकारेण 'नु' क्षेपे वितर्के पन्छाया वा, श्राम्यति-तपस्यतीति श्रमणः सचित्ता चित्त-मनोज्ञा मनोजद्रव्याधिकरणक- साम्यभाव हास्यादिपविभमुक्ति-पचसमितिसमितत्व-गुप्तित्रयगुप्तत्व गुप्तब्रह्मचर्यत्व जीव, जिन इन्द्रियोंके विषयोंकी कामना (अभिलाषा) करता है उनको 'काम' कहते हैं । जो साधु, इन कामोंका त्याग नहीं करते, वे अप्राप्त विषयकी प्राप्तिरूप अशुभ अध्यवसायके अधीन होकर पद पद पर खेदका अनुभव करते हुए क्या कभी श्रमणताको प्राप्त कर सकते है ? कदापि नहीं । इष्ट, अनिष्ट, सचित्त, अचित्त आदि समस्त वस्तुओं पर समताभाव रग्बना, हास्य आदि छह नोकषायका त्याग करना, જીવ જે ઈન્દ્રિયના વિષયેની કામના (અભિલાષા) કરે છે તેને કહે છે જે સાધુ, એ તમેને ત્યાગ નથી કરતા, તેઓ અપ્રાપ્ત વિષયની પ્રાપ્તિ રૂપ અશુભ અધ્યવસાયને અધીન થઈને ડગલે ડગલે ખેદને કદાપિ શમણુતાને પ્રાપ્ત કરી શક છે ? કદાપિ નહિ छ, अनिष्ट, सथित्त, मथित, माहि गधी पन्तुओ पर समता-माव રાખવે, હાસ્ય આદિ છએ કષાયને ત્યાગ કર પાચ સમિતિ અને ત્રણ ગુપ્તિનું , કામ અનુભવ કરતા શુ अययन २ गा. १ श्रामण्यापिकारिलक्षणानि योगनयसापकत्व-सदोरकमुग्वस्त्रिकोपशोभितमुखत्व-यतनावमवरत्व-मोगामिष- रिक्तत्व-करणमप्तति-चरणसप्ततिपारगाव-निर्दोपभिक्षणशीलत्व तीर्थराज्ञाराधस्त्व- स्वात्मज्ञत्व-निष्परिग्रहत्त-यात्रामाज्ञत्व-कर्मपदात्मगोपाला-ऽल्पपिण्डाऽल्पपाना- शित्वाऽल्पोपधिकत्वाऽल्पपायव-निराश्रवत्व-तीर्णत्वाऽपापत्व निग्रन्थ-प्रवचन- प्रवीणत्व शल्यकर्तपत्त सन्निधिरहितत्वो-रगाधुपमितत्व-पापश्रुतप्रतिषेधित्व-सुमन- पाच समिति और तीन गुप्तिका पालन करना, गुप्त-ब्रह्मचारी होना, तीन योगोंको साधना, श्रुतज्ञानरूपी जलसे अन्तःकरणको शुद्ध रग्वना, सम्यक्त्वसे युक्त रहना, मयमरूपी कवच (बरतर) से सटासन्नद्ध रहना, डोरासहित मुखवस्त्रिकाको मुखपर बाधे हुए रहना, यतना-धर्मकोधारण करना, भोगरूपीआमिपसे चिरक्त रहना, करणसत्तरी और चरणसत्तरीके पारगामी होना, निर्दोपभिक्षासे ही सयमयात्रामा निर्वाह करना, तीर्थङ्कर भगवानकी आजाका आराधन करना, आत्मज्ञानी होना, परिग्रहकात्याग करना, यात्रा-मात्राको जानना, कछुएकी भाँति इन्द्रियोंका गोपन करना, अल्प जशन अरप पानका ग्रहण करना, अल्प उपधि रखना, कपायको त्यागना, आस्रवरहित होना, ससारस्पी मागरसे पार उत्तरना, पापरहित होना, निम्रय प्रवचनमें प्रवीण होना, माया, मिथ्यात्व और निदान रूप शल्योंको काटना, सन्निधिका न रखना, उरगादिकी उपमासे युक्त होना. पापकी प्ररूपणा करनेवाले शास्त्रोंका उपदेश नहीं करना, मनको स्वच्छ रखना और अतिचाररहित चारित्रको पालना, तथा मृग जैसे सिंहसे પાલન કરવું, ગુણ બ્રાચારી થવુ, ત્રણ એને સાધવા, કૃતજ્ઞાનરૂપી જળથી અત રણને શુદ્ધ રાખવું, સભ્યત્વથી યુક્ત રહેવુ, ચયમરૂપી કવચ (બખ્તર) થી સદા સજજ રહેવું, દેસહિત મુખવઝિકને સુખ પર બાધીને રહેવું, યતના-ધર્મને ધારણ કરવું, ભેગરૂપી આમિયથી વિરકત રહેવું, કરણ સિત્તેરી અને ચણસિત્તેરીના પારગામી થવુ, નિર્દોષ ભિલાથી જ સ યમયાત્રાને નિહ કર, તીર્થ - નની આજ્ઞાનું આરાધન કરવું, આત્મજ્ઞાની થવુ, પરિગ્રહને ત્યાગ કર, યાત્રામાત્રાને જાણવી, કાચબાની પેઠે ઈન્દ્રિયનું ગેપન કરવું, અન્ય અગન અ૫ પાનને ગ્રહણ કરવા અc૫ ઉપધિ શખવી, કષાયને ત્યજવા, આવરહિત થવુ, સસારરૂપી સાગરથી પાર ઊતરવું, પાપરહિત થવુ, નિગ્રંથ પ્રવચનમાં પ્રવીણ થવુ, માયા, મિથ્યાત્વ અને નિદાનરૂપ શજોને કાપવા, સન્નિધિને ન રાખ, ઉગાદિની ઉપમાથી યુકત થવુ, પાપની પ્રક્ષણા -નારા શાસ્ત્રોને ઉપદેશ ન કરો અને રૂછ શખવ અને અતિચારસહિત ચારિત્રને ભરવા- ११० श्रीदनकालिकसूत्रे -स्कत्य-निरतिचारचारित्रवादिगुणसम्पन्ना, तस्य भावः कर्म वा श्रामण्यं श्रमणधर्म कुर्यात्-प्रतिपालयेद , न हि सकल्पाधीनचित्तत्तितया व्याक्षिप्तस्य मावक्रिया- शून्य-द्रव्य-क्रियामात्रपालनेन श्रामण्य भवतीति गाथार्यः ॥ ॥१॥ अत्राय सग्रहः- " सचित्ताचित्तदन्वेस मणुग्ने अमणुन्नए । रक्खए समभाव जो, समणो सो पपुषई ॥१॥ हास रई भय सोगो, दुगुडा य फसायया । एएहिं विप्पमुको जो, समणो सो पपुच्चई ॥२॥ पचसमिइहिं समिओ, विगुत्तिगुत्तो य अभयारी जो। परिसाहेइ मुजोग, सो समणो बुच्चई निच्च ॥३॥ छाया- " सचित्ताचित्तद्रव्येषु, मनोज्ञे अमनोझके । रक्षति समभाव यः, श्रमणः स प्रोच्यते ॥१॥ हास्य रतिभर्य शोको, जुगुप्सा च कपायता। एतैर्विप्रमुक्तो यः, श्रमणः स प्रोच्यते ॥२॥ पञ्चसमितिभिः समित', निगुप्तिगुप्तश्च ब्रह्मचारी यः। परिसाधयति सुयोग, स श्रमण उच्यते नित्यम् ॥३॥ सर्वथा दूर भागते हैं उसी-प्रकार पापकर्म जिसके पास न ठहरे वह श्रामण्य' (साधुपन ) कहलाता है। ऐसा श्रामण्य तय तक प्राप्त नहीं होता जब तक वह काम-भोगका त्याग न कर देवें, जिसका चित्त कामके सकल्प-विकल्पोंसे व्याकुल रहता हो उसकी क्रियाएँ भावशून्य व्यक्रियाएँ है, केवल द्रव्यक्रियाओंका पालन करनेसे कोई श्रमण नहीं हो सकता, इस विषयमे सग्रहगाथाएँ हैं उनकाअर्थपहले आचुका है ॥१॥ પાળવુ, તથા મગ જેમ સિંહથી સદા દૂર ભાગે છે તેમ પાપકર્મ જેની પાસે ન ઉભા રહે તે “શ્રામણ્ય”(સાધુતા) કહેવાય છે એવુ શ્રમણ્ય પ્રાપ્ત નથી થતું કે જ્યા સુધી તે કામગને ત્યાગ કરે નહિ, જેનું ચિત્ત કામના સકવિ૮૫થી વ્યાકુળ રહેતુ હોય છે તેની ક્રિયાઓ ભાવ્યશૈન્ય દ્રવ્ય-ક્રિયાઓ હોય છે, કેવળ દ્રવ્ય-ક્રિયાઓનું પાલન કરવાથી કોઈ શ્રમણ થઈ શક્તા નથી આ વિષયમા સ ગ્રહ ગાથાઓ છે, જેને અર્થે પહેલા આવી ગયા છે : - , , ત્યા સુધી अध्ययन २ गा.१ श्रामण्याधिकारिलक्षणानि १११ . मुयनाणसुनीरेण, मुद्धो समत्तरजिओ । सजमवम्मसनद्धो, समणो सो पवुचई ॥ ४ ॥ सदोर मुहपत्ति जो, वधई सयय मुहे । जयणाधम्मेण जुओ, समणो सो पच्चई ॥ ५ ॥ भोगामिसपरिहीणो, करणे चरणे य वट्टए सुद्ध । अदोसभिक्खणसीलो, समणो सो वुचई निच्च ॥ ६ ॥ जिणाणाए समारोहो, आयन्नो निप्परिग्गहो । जायामायनो य मुणी, समणत्ति पवुचई ॥ ७ ॥ कुम्मो जहा नियगाइ, सए देहम्मि गोवई । वहा गोवइ अप्पाण, समणत्ति पवुचई ॥ ८ ॥ अप्पपिंडे अप्पपाणे, अप्पोवहिकसायो । निरासवो य तिन्नो य, निप्पावो समणो भवे ॥ ९ ॥ निग्गयपवयणन्नो, अनियाणो सल्लकत्तओ । भेसजाईण वत्यूण, सन्निहि वजए मुणी ॥ १० ॥ छाया- श्रुतज्ञानमुनीरेण, शुद्धः सम्यक्त्वरञ्जितः । सयमवर्मसनदः, श्रमणः स मोच्यते ॥ ४ ॥ सदोरा मुखवस्त्री यो, बध्नाति सतत मुखे । यतनाधर्मेण युतः, श्रमण. समोच्यते ॥ ५ ॥ भोगामिपपरिहीण., करणे चरणे च वर्चते शुद्धम् । अदोपभिक्षणशीलः, श्रमण. स उच्यते नित्यम् ॥ ६ ॥ जिनाज्ञाया समारोहः, आत्मज्ञो निप्परिग्रहः । यात्रामात्राज्ञश्च मुनिः, श्रमण इति मोच्यते ॥ ७ ॥ कूर्मों यथा निजागानि, स्वके देहे गोपयति । तथा गोपयत्यात्मान, श्रमण इति प्रोच्यते ॥ ८ ॥ अल्पपिण्डोऽल्पपानः, अल्पोपधिकपायक' । निरास्रवश्व तीर्णश्च, निष्पाप, श्रमणो भवेत ॥ ९ ॥ निर्ग्रन्थमवचन , अनिदानः शल्यकर्तकः । भैषज्यादीना वस्तूना, सनधि वर्जयति मुनिः ॥ १०॥" .

११२ "श्रीदवेकालिकमूत्रे उरगाउउपमो पार,-मुयाण पडिसेडो । मुमणो मुहचारित्तो, समणति पपई ॥ ११ ॥ मिया जहेर सीहाओ, दूर चरति सचहा । तद्दा जओ य पाराइ, समणनि पगई ॥ १२ ॥ इति । छाया- उरगाशुपमः पापर्वाना प्रतिषेधकः । मुमना' शुभचारित्रः, श्रमण इति मोन्यते ॥ ११ ॥ मृगा यथैव सिंहाद् , दर चरन्ति सर्वथा । तथा यतश्च पापानि, श्रमण इति मोन्यते ॥ १२ ॥” इति छाया । पूर्व शब्दादिविषयमवृत्तः श्रामण्य पालयितु न शक्नोतीत्युक्त, सम्मति 'द्रव्यक्रिया कुर्वाणोऽपि कलुपितचित्तत्वादश्रमण एवेति दर्शयितुमाह- यद्वा पूर्वगाथया भगवन्तेरण शब्दादिविपयविनिवृत्त एव श्रामण्यमर्डवीति सूचितम् , शब्दादिविषयविनिरत्तिश्व रोगादिना कारणेनापि सभवतीत्यतस्तद्वयव च्छेदार्थ गाथान्तरमाह-वत्थगध'-मित्यादि । ऊपर कह चुके हैं कि शन्दादि इन्द्रियविषयों में प्रवृत्त साधु श्रामण्य (चारित्र) का पालन नहीं कर सकता । अब द्रव्यक्रियाएँ करते हुए भी यदि साधुके चित्तमे कलुपता हो तो वह वास्तव में त्यागी नहीं है, यह कहते हैं--- अथवा पहली गाथामे एक विशेष प्रणालीसे यह प्रतिपादन किया है कि-शब्दादिविषयोंका त्यागी ही श्रामण्य (साधुपना) पाल सकता है, किन्तु रोग आदि कारणोंसे भी शब्दादि विषयोंको नही भोग सकता तो क्या उस समय वह भी त्यागी कहला सकता है? कभी नहीं कहला सकता, इसी विषयको कहते है-'वत्थ गध' इत्यादि । ઉપર કહેવાઈ ગયું છે કે શબ્દ આદિ ઈન્દ્રિયવિષયમાં પ્રવૃત્ત એ સાધુ શ્રામણ્ય (ચરિત્ર)નું પાલન કરી શકતું નથી હવે દ્રવ્યક્રિયાઓ કરતા પણ સાધુના ચિત્તમા કલુપતા હોય તે તે વાસ્નવમાં ત્યાગી નથી, એ કહે છે– અથવા પહેલી ગાથામાં એક વિશેષ પ્રણાલીથી એમ પ્રતિપાદન કર્યું છે કે- શબ્દાદિ-વિષયેને ત્યાગી જ શ્રમય (સાધુતા ) પાળી શકે છે, કિંતુ ગાદિ કારણથી પણ શબ્દાદિ વિષને નથી જોગવી શકતું તે શું તે સમયે એ પણ ત્યાગી કહેવાઈ શકે છે ? નથી કહેવાતે, એ વિષય હવે કહે ઈત્યાદિ अययन २ गा. २-३ त्यागिस्वरूपम् ११३ 3 ५ ७ २ . १०१० 13 मूलम्-वत्थगंधमलकार, इत्थीओ सयणाणि य । अच्छंदा जे न भुंजति, न से चाइत्ति वुच्चई ॥२॥ छाया-खगन्धमलवार, स्त्रियः शयनानि च । अच्छन्दो यो न भुदरते, न स त्यागीत्युच्यते ॥ २॥ सान्वयार्थ:-जेम्जो अच्छदा-पराधीन होनेसे वत्थगधवस्त्र गन्ध अल- कारल्याभूपण इत्थीओ-त्रियों य और सयणाणि शग्या-(पलग महल विगेरे) को न भुजति नहीं भोगता है से वह चाइत्ति="त्यागी” ऐसा न बुचड-नहीं कहा जाता है । अर्थात् अपनी इच्छासे विपयोको न भोगनेवाला त्यागी कहलाता है। जो रोग आदि किसी कारण से पराधीन होकर विषयोका सेवन नहीं कर सकता यह त्यागी नही कहलाता ॥ २ ॥ और- टीका-अत्र 'अच्छदा' 'जे' 'भुजति' इत्येतेषु पदेषु बहुवचनप्रयोगः सौनत्वात् । तथा चायमर्थ.-यः अच्छन्दः रोगावभिभूततया पराधीनो बस्त्र च गन्धश्चानयो. समाहारः वस्त्रगन्ध, तर वस्त्र प्रसिद्ध, गन्धः चन्दनकर्पूरादि- मुगन्धिद्रव्य तत् , अलङ्कार'-कुण्डलवलयादिस्तम् , स्त्यायतः शुक्रशोणिते यासु १ यत्तु 'बहुवचनोदेशेऽप्येकवचननिर्देशो विचित्रत्वात्सूत्रगते । इति, यच्च अत्र सूत्रगतेर्विचित्रत्वादहुवचनेऽप्येस्वचननिर्देश । इति, यदपि च 'किं बहुवचनोद्देशेऽप्येक्वचननिर्देश. ' विचित्रत्वात्सूत्रगतेविपर्ययश्च भवत्येवेति कृत्वा- ऽऽह-'नासौ त्यागीत्युच्यते' इति, तदिद नितयमपि व्यार यान मूत्रपूर्वापराऽननु- सन्धानमूलकत्वादनुपादेयमेव, यतो द्वितीय-तृतीयगाथयोस्तात्पर्यपर्यालोचनायामेर- वचनान्तमयोग एव सूत्रकृतोऽभिमेत इति सूचीकटाहन्यायेनापि बहुवचननान्तेप्वेवैक- वचनान्तत्वकल्पन युक्तियुक्तमिति ।। जो मनुष्य रोग आदिसे आक्रान्त होनेके कारण पराधीन है और पराधीनता (असमर्थता) के कारण वस्त्र, कस्तूरी, केशर, चन्दन, आदि गन्ध, कुण्डल, कटक आदि आभूषण, स्त्री, शग्या और'च' शब्दसे सवारी જે મનુષ્ય ગાદિથી આક્રાન્ત હોવાને કારણે પરાધીન છે અને પરાધીનતા (मसभयंता)ने आरो पर, ४२तूरी, शर, सहन माहि गध, स, 1 આદિ આભૂષણ, સ્ત્રી, શવ્યા અને એ શબ્દથી સવારી, આસન આદિનું સેવન " १ 3 ५ २ ७ ८1० १२ 13 ११४ श्रीदनकालिकम् ताः खियः कामिन्यस्ताः, 'शग्यते येपु तानि शयनानि-पल्पङ्क खट्वाचतुति कादीनि, 'तानि, चकारात् यानाऽऽसनादीनि, न भुदरतेन्न सेवते, सः, त्याग त्यजति परिमुञ्चति ससारसम्बन्ध तन्छील इति, न उच्यतेच्न कथ्यते, ह गाथार्थः ॥२॥ कस्तहि त्यागी ? इति चेत्तत्राह-'जे य फते' इत्यादि । मूलम्-जे य कते पिए भोए, लडेवि पिडिकुव्वड । साहीणे चयई भोए, से हु चाइत्ति वुच्चई ॥३॥ छाया-यश्च कान्तान् पियान भोगान , ल धानपि पृष्ठीपरोति । साधीनस्यजति भोगान् , स एव त्यागी इत्युच्यते ॥ ३ ॥ सान्वयार्थ -जे य=जो लदेवि प्राप्त हुएभी कते मनोहर पिण्=अभीष्ट मन गमते भोग भोगोको पिढिकुव्वत्याग देता है (और) साहीणे स्वतन्त्र हो हुए मोर-विपयोको चयई त्यागता है से यह निश्चय करके चाइत्ति "त्यागी” ऐसा बुचइ-महलाता है। अर्थात् भोगोकी प्राप्ति होने पर भी औ १-अधिकरणे ल्युट् । २-प्रथमान्तमिदम् । ३-द्वितीयान्तमिदम् । ४-' भुजोः नवने' इत्यात्मनेपद, मूने तु प्राकृतत्वात्परस्मपदम् । आसन आदिका सेवन नहीं करते है वे त्यागी अर्थात् ससारके सम्ब न्धोंका त्याग करने वाले नहीं कहला सकते है, क्योंकि असार समझक ममता छोडना-रुचि न रखना त्याग कहलाता है । रोग आदिसे प्रसि ऊपर कहे-हुए विषयोंकी ममता नहीं छोडता (रुचि रखता) है इसलि वह त्यागी नहीं कहला सकता ॥२॥ त्यागी किसे कहते है ? इसपर सूत्रकार कहते है-'जे २०' इत्यादि કરતા નથી તેઓ ત્યાગી અર્થાત્ સ સારના સ છે ને ત્યાગ કરવાવાળા કહેવાઈ શક્તા કારણ કે અસાર સમજીને મમતા છોડવી-રૂચિ ન રાખવી એ ત્યાગ કહેવાય છે રેગાદિથી ગ્રસિત મનુષ્ય ઉપર કહેલા વિષયેની મમતા છોડ नथी, तथा तेसो त्यागी उवाता नथी (२) त्याशी ने ४ छे १ मे विधे सूत्रार ४ -जे य. त्यादि , अध्ययन २ गा. ३-४ त्यागिस्वरूपम् ११५ भोगनेकी स्वतन्त्रता रहते हुए भी जो भोगोंको नहीं भोगता वह सच्चा त्यागी है। गावामें "वि" शब्द आया है उससे यह प्रगट होता है कि यदि किसीको अमुक समयमें मनोहर और प्रिय भोग न भी उपलब्ध हो तथापि उसकी इच्छा कदापि भोगनेकी न हो तो भी वह त्यागी ही है ॥३॥ टीका-'च' शब्दः पूर्वगाथोक्तार्यनिवारकत्वेन 'तु-शब्दार्थेऽवधारणार्थे वा, 'खलु'-शब्दोऽवधारणाथै, तथा चायमर्थः-यस्तु लब्धान प्राप्तानपि कान्तान कमनीयान (मनोहरान) प्रियान-अभिलपितान् , भोगान् शब्दादीन् पृष्ठीक- रोति-पृष्ठशब्दस्य तत्स्थे लक्षणया अपृष्ठस्थान् पृष्ठस्थान् करोति दूरतः परिदर- तीत्यर्थः, ततो विमुखीभवतीति यावत् । एव तु रोगावस्थायामपि सभवतीत्यत' स्पष्टयति-स्वाधीनः रोगायनभिभूतचित्तः सन् भोगान-पूर्वोक्तलक्षणान् शब्दादीन, पुनर्भोगग्रहण 'द्विद्ध सुबद्ध भवती'-ति न्यायात्साकल्येन भोगत्वावच्छिन्नपरि- ग्रहार्थम् , त्यजति=मुञ्चति, स खलुस एव त्यागीति उन्यते कथ्यते, न तु परापीन इति गाथार्थ. ॥३॥ उक्तविधस्यापि साधो सयममार्गे विहरतः कदाचिद् विपयस्मरणेन प्रस्ख- लितचित्तता मामसाक्षीदिति तदुपाय दर्शयति-"समाए०" इति । जो महापुरुप पूर्वपुण्यके उदयसे प्राप्त हुए मनोहर और इष्ट शब्दादि विपयों को विविध-वैराग्य-मावना भाकर त्याग देते है-उनसे विमुख हो जाते हैं और रोग आदिसे पीटित न होने के कारण स्वाधीन (समर्थ) होते भी विविध-वैराग्य-भावना भाकर समस्त भोगोंको त्याग देते है वही त्यागी कहलाते हैं ॥३॥ मयम मार्गमे विहार करते हुए त्यागी मुनिका मन, स्त्री आदिको देखनेसे कदाचित् विचलित (डावाडोल) हो जाय तो उसको रोकने के लिए उपाय बतलाते है-'समाए०' इत्यादि । જે મહાપુરૂ પૂર્વપુણ્યના ઉદયથી પ્રાપ્ત થએલા મનહર અને ઈષ્ટ શબ્દાદિ વિયેને વિવિધ-વૈરાગ્ય–ભાવના ભાવીને ત્યજી દે છે-તેનાથી વિમુખ બની જાય છે, અને ગાદિથી પીડિત ન હોવાને કારણે સ્વાધીન (સમર્થ) હોવા છતા પણ વિવિધ–વેરાગ્ય-ભાવને ભાવીને બધા ભેગેને ત્યજી દે છે, તેઓ જ ત્યાગી घडवाय छ (3) સયમમાર્ગમાં વિહાર કરતા ત્યાગી મુનિનું મન, સ્ત્રી આદિને જોવાથી જે वियलित (भा314) थाई यो तेन ।पाने भाटे पाय मतावे छ-'समाए.' त्याह ११६ श्रीदवेकाल्पित्रे . " १. . मूलम्-समाए पेहाए परिव्ययतो, सिया मणो निस्सरई वहिद्धा । न सा महं नोवि अहवितीसे, डच्चेव ताओविणइजराग ॥४॥ छाया-समया प्रेक्षया परिनजतः, स्यान्मनो निःसरवि पहिः । न सा मम नो अपि अहमपि तस्याः, इत्येा तम्या विनयेत रागम् ॥४॥ सान्वयार्थः-समारासम पेहा मारनासे परिवयतो सयममार्गमें विच रते हुए साधुका मणो मन सिया कदाचित्-कभी यहिदा-सयमगृहसे बाहर निस्सरई-निकल जाय तो "सा=वह सीमा मेरीन नहीं है अवि और अवि- मैं भी तीसे उस स्त्रीका नो नहीं हूँ" इचेच इस प्रकार ताओ उस स्त्रीसे राग-रागको विणहज-दर करे ॥ ४ ॥ टीका-समया-रागद्वेपपरिणतिरिक्तया स्वतुल्यया, प्रेक्षया प्रेक्षतेऽन- येति करणव्युत्पत्तिपला दृष्टया, परिजताविहरतः प्रोक्तरूपश्रामण्ये स्थितस्पे त्यर्थः मन' हृदय, स्यात् कदाचित् मोहनीयकर्मप्रकृत्युदयवशाद् भुक्तभोगतया पूर्वकृतरत्यादिस्मरणेन तदन्ययात्वे रिपयसेवनवाडया वा, वहि. सयमयोगा- द्वाह्ये विपयादौ नि सरति=निर्गच्छति, अथ किं कर्तव्य तदाह 'न सा' इति, सा- परिचिन्त्यमाना स्त्री न मम, अपि-च अहमपि तस्याः परिचिन्त्यमानाया रागद्वेपरहित-समतापूर्वक विचरते हुए श्रामण्यमें स्थित मुनिकामन स्त्री आदिको देखने पर मोहनीय कर्मके उदयसे कदाचित् पहले भोगे हुए भोगोंका स्मरण होजानेसे, अथवा विषयसेवनकी इच्छा होनेसे सयमरूपी घरसे थाहर निकल जाय तो उस समय साधुको विचारना चाहिए कि मै जिसकी अभिलाषा करता है, वह स्त्री न मेरी है और न રાગદ્વેષ રહિત સમતાપૂર્વક વિચરતા શ્રમણ્યમાં સ્થિત મુનિનું મન સ્ત્રી આદિને દેખતા મેહનીય કર્મના ઉદયથી કદાચિત પહેલા ભગવેલા ભેગોનું સ્મરણ થઈ જવાથી, અથવા વિષય સેવનની ઈચ્છા થવાથી સયમરપી ઘરની બહાર નીકળી જાય છે તે સમયે સાધુએ વિચારવું જોઈએ કે હુ જેની અભિલાષા કરૂ છુ તે સ્ત્રી નથી મારી કે નથી હું તેને એ વિચાર કરીને એ સ્ત્રી પ્રત્યેના में अययन २ गा. ४ कामरागदोपानुचिन्तनम् ११७ स्त्रियाः न, इत्येवम् अनया रीत्या, तस्याः अभिलप्यमाणायाः स्त्रियास्तत्सम्व- न्धिनमित्ययः, रागम् दुरभिलाप, विनयेत्-दूरीकुर्यात् । वनिताविपये प्रस्त मनस्तदीयरागसवन्धिवहुतरदोपानुचिन्तनेन ततो निवर्तयन् मुनिः समा प्रेक्षामवलम्ब्य वनितादर्शनात् प्रागिव रागशून्यो भवेदिति भावः । दोपानुचिन्तन यथा-"रे चित्त ! चारित्रस्य प्राणभृत ब्रह्मचर्य यावज्जी- वनमनुपालयितु कृतप्रतिज्ञस्य तव स्वकृतप्रतिज्ञापरित्यागोद्यमे कुतो न लज्जास- मुद्भवः । यदा ससारदावदहनपरितप्तस्य तब कोऽपि लोके शरण नाभूत् तता यानेव विषयान् परित्यज्य जिनेन्द्रप्रतिपादित चारित्रधर्म शिरसाऽङ्गीकृत्य त्वया उसका हूँ। ऐसा विचार करके उस स्त्रीके विषयका राग-भाव दूर करना चाहिए । तात्पर्य यह है कि-स्त्रीके विषयमें मनकी प्रवृत्ति होनेसे चारित्रकी मलिनता आदि बहुतेरे दोप उत्पन्न होते हैं । उन दोपोका विचार करके मुनि अपने मनको उस तरफसे हटाता हुआ समक्षाका अवलम्बन करके उसीप्रकार रागरहित होजावे जिस प्रकार स्त्रीको देखनेके पहले था । दोपोंका विचार इसप्रकार करे-रे मन ! चारित्रके प्राणोंके समान ब्रह्मचर्यको यावत्जीवन पालन करनेकी तुने प्रतिज्ञा की है, पहले की हुई प्रतिज्ञाका अब परित्याग करते तुझे लज्जा नही आती? जिस समय त ससाररूपी तीव्र दावाग्निसे सतप्त हुआ और लोकमें कोई भी तुझे न बचा सका उस समय जिनेन्द्र भगवान द्वारा प्ररूपित चारित्र धर्मको तृने વિષયના રાગભાવ દર કર જોઈએ તાત્પર્ય એ છે કે–સ્ત્રીના વિષયમાં મનની પ્રવૃત્તિ થવાથી ચારિત્રની મલિનતા આદિ અનેક દોષ ઉત્પન્ન થાય છે એ ને વિચાર કરીને મુનિ પિતાના મનને તે તરફથી પાછુ હઠાવતા સમપ્રેક્ષાનું અવલબન કરીને એ રાગરહિત થઈ જાય કે જે તે સ્ત્રીને દેખતા પહેલા તે દોષોનો વિચાર આ પ્રમાણે કરે-હે મન ચારિત્રના પ્રાણ સમાન બ્રહ્મ ચર્ચને જીવનપર્યત પાળવાની તે પ્રતિજ્ઞા કરી છે પહેલા કરેલી પ્રતિજ્ઞાને હવે પરિત્યાગ કરતા તને શરમ નથી આવતી? જે સમયે તુ સસારરૂપી તીવ્ર દાવા- નળથી સતત થયે અને લેકમાં કોઈ પણ તને બચાવી ન શકયુ, તે સમયે જીતેન્દ્ર ભગવાને પરૂપેલા ચારિત્ર ધર્મને તે સ્વીકાર કર્યો અને જે હેય વિધાથી ११८ श्रीदनकालिकम निरस्तः सफलः सन्तापः, फिमिदानी पुनन्तिापलेटी व भवसाननुस्मरद् विस्म रस्यात्मानम् । अरे । सिम्मृतः किं ब्रमचर्यमहिमा ? यत्ममाणाऽल्पीयर कालेन लोकपू जितैरपि मुरासुरमनुजेन्द्रः पूज्यमानमसि पुनः किं तदेव रिस्मरसि ? । इदमप्य- नुचिन्तय- “चिरायुप• मुसस्थाना, दृढसहनना नराः। तेजस्विनो महावीर्या, भवेयुनपर्यतः॥१॥" इति । अपिच अनाप्तपरमार्थतचास्वादनमुग्याना ससाराभिनन्दिना विपयामिपो- पभोगसुखकामुकानामपिवेकिफनामेर कामिनी यमनीया भवतु नाम, परन्तु एत- स्वीकार किया और जिन हेय पियोंसे मुग मोड़कर सकल जजाल छोड दिये उन्ही विपयोंको चमनचाटनेवाले श्वानके समान फिर स्वीकार करना चाहता है ? ऐ अधम मन ! अपने स्वरूपका विचार कर । अरे मन ! देय,ब्रह्मचर्यकी महिमासे ही लोकमें पूजे जानेवाले सुरेन्द्र असुरेन्द्र और नरेन्द्रोंके द्वारा तृ पूज्य समाननीय हुआ है, ऐसे अमित- महिमावाले ब्रह्मचर्यको भी तृ क्यों भूल गया है ? कहा भी है- "ब्रह्मचर्यसे दीर्घ आयु, सुन्दर आकार, और दृढ़ सहननप्राप्त होते हैं, ब्रह्मचर्यसे ही मनुष्य, तेजस्वी और महाशक्तिशाली होते है" ॥१॥ हे जीव ! किपाकफल सरीखे विपयभोग सुगन्ध, सुरूप, सुशब्द, और सुस्पर्श अविवेकी जीवोंको भलेही मनोहर लगें, पर तृतो વિમુખ થઈને બધી જ જાળને છોડી દીધી, તેજ વિષયે વમનચાટનારા શ્વાનની પેઠે ફરીથી તે સ્વીકાર કરવા ચાહે છે? તે અધમ મન ! તારા પિતાના સ્વરૂપને તુ વિચાર કરી અરે મન! જે, બ્રહ્મચર્યના મહિમાથી જ, લેકમ પુજાતા સુરેન્દ્ર અસુરેન્દ્ર અને નરેન્દ્રોની દ્વારા તુ પૂજ્ય સમાનનીય થયો છે, એવા અપાર મહિમાવાળા બ્રહ્મચર્યને પણ તુ કેમ ભૂલી ગયે છે? કહ્યું પણ છે – “બ્રહાચર્યથી દીર્ઘ આયુષ્ય, સુદર આકાર, અને દઢ સહનન પ્રાપ્ત થાય બ્રહાચર્યથી જ મનુષ્ય તેજસ્વી અને મહાશક્તિશાલી થાય છે ” (૧) હે જીવ! કિંધાકફળ જેવા વિષયભેગ, સુંદર, સુરૂપ, સુશબ્દ અને સુસ્પર્શ અવિવેકી જીવેને ભલે મનોહર લાગે, પરન્તુ તુ તે સયમીઓમાં શ્રેષ્ઠ બનવા अ ययन २ गा. ४ कामरागदोपानुचिन्तनम् ११९ दीयानुरागपरिणामदारणता निम्मरतस्तथापि कि सयताग्रगणनीयताऽभिलापो नोपहासाय जायेत । अरे मूढ़ ! अस्याः खलु पिलासकलाकलापवैदुप्य विलोक्य लुब्धकमसा- तिजाले कुरङ्ग उब, मार्गवर्तिनि गर्ने तुरग इप, ज्वलति प्रदीपे पतग इव किमा- स्मान निरये निपातयसि ? | अहो ! अयोमयशृङ्खलामप्य परयति रागपाशः, यत् खलु मधुपः कठिनतर- काप्ठकृन्तनदक्षोऽपि न क्षमो भाति सकुचितकमलपुप्पानुरागनिवद्धमात्मान परित्रातुम् । सयमियोंमें श्रेष्ठ बननाचाहता है फिर इनमें अनुराग करनेसे जो भयकर फल उत्पन्न होते हैं उन्हें क्यों भूल जाता है ? इससे तेरी वह उच्च अमि- लाषा क्या हास्यास्पद नहीं होगी ? अवश्य होगी। अरे मूढ़ ! जैसे व्याध (शिकारी) के फैलाग हुए जालमें कुरग (हरिन) फस जाता है, रास्तेके गडेमे तुरग गिर जाता है, जलते हुए दीपकको ज्वालामें पतग गिर पडता है वैसेही स्त्रीके हास विलास और हार-भावकी चतुराई देखकर क्यों अपनी आत्माको नरकमे गिराता है ? अहो! इस रागके बन्धनके आगे लोहकी वेडीभी तुच्छ है, देखा, भोरा कठिनसे कठिन काष्ठको काट डालनेमें कुशल होता है परन्तु सूर्यके अस्त होजाने पर सकुचित कमल पुष्पके अनुरागके यन्धनमें यधी ઈરછે છે, તે પછી એમાં અનુરાગ કરવાથી જે ફળ ઉત્પન્ન થાય છે તેને કેમ ભૂલી જાય છે ? તેવી તારી એ ઉરચ અભિલાષા શુ હાસ્યાસ્પદ નહિ થાય ? અવશ્ય થશે અરે મૂઢ જેમ વ્યાવે (શિકારીએ) ફેલાવેલી જાળમાં ३२ (९) ફસાઈ જાય છે રસ્તામાના ખાડામાં તુરગ (ઘેડ) પડી જાય છે, બળતા દીવાની જવાળામા પતગ હેમાઈ જાય છે, તેમ સ્ત્રીના હાસ્યવિલાસ અને હાવભાવની ચતુરાઈ જોઈને કેમ તારા આત્માને નરકમાં પાડે છે ? અહો ! આ રાગના ધનની આગળ લેવાની બેડી પણ તુચ્છ છે જુઓ ! ભમરે કનિમાં કઠિન કાષ્ઠને કાપી નાખવામાં કુશળ હોય છે પરતુ સૂર્યને અસ્ત થતાની સાથે જ બીડાયેલા કમળ પુષ્પના અનુરાગના मचाया ભય કર ઘમ ધનમાં १२० श्रीदकालिकमूत्रे इह यादरमणीयतास्पदे, नितान्ताशुचिपदे, चपलापरमतिपचपलरूपलावण्ये, योपिदपचने किमि नाम शोभन रिपते, यद् पालपिघुलेसेर, अमृतावपत्रनिर्मि- तेव, चन्द्रमण्डलादुद्भूतेत्र, इय नीरकमलदलायताक्षी महारनयनाभ्या जीव- लोकमाश्चासयन्तीर कमनीया निरीक्ष्यते । १ स्त्रीचेष्टारिशेपो हारस्तेन सहिते सहारे ते च ते नयने च-सहावनयने ताभ्यामित्यर्थः। हुई अपनी आत्माकी रक्षा करने में समर्ध नहीं होता। इसलिए हे मन! ऐसे रागमें फंसने की इच्छा क्यों कर रहा है? ऐजीव ! ऊपर-ऊपरसे मनोहर मालूम होनेवाले, अन्यन्त अपवित्र- ताके स्थान, चपला (पिजली) की नाई पल-पलमें चपलरूप-लावण्यवाले, स्त्रीके शरीरमें तुझे क्या अच्छापन दिखाई देता है ? जिससे त उसे यह समझ रहा है कि-मानो वह द्वितीयाके चद्रमाकी कला है, अमृतके अवयवोंसे बनी हुई है, चन्द्रमाको फाहकर निकल पडी है, नीलकमलके दल (पत्ता) के समान विशाल नेत्रवाली, तथा लीलायुक्त लोचनोंसे लोकको अवलम्बन देनेवाली मनोहर दीख पडती है। १ मूर्य ड्यने वाद, कमलके भीतर पड़ा हुआ भौरा, तकलीफ सहकर सारी रात विताता है किन्तु अनुराग (प्रीति) के कारण, कमलके कोमल (मोलायम) पत्तोंको भी काटकर उस तकलीफको रफा करनेका साहस नहीं कर सकता ।। પિતાના આત્માની રક્ષા કરવામાં સમર્થ નથી બનતે? તે હે મન ! એવા રાગમાં ફસાવાની ઈરછા કેમ કરી રહ્યા છે? હે જીવ! ઉપર ઉપરથી મને હર માલુમ પડતા, અત્યત અપવિત્રતાનું સ્થાન વિજળીની પેઠે પલ–પલમા ચપળ રૂપ–લાવણ્યવાળા સ્ત્રીના શરીરમા તને કઈ સુદરતા દેખાય છે? કે જેથી તુ તેને માની રહ્યો છે કે- આ બીજના ચંદ્રમાની કલા છે અમૃતના અવયથી બનેલી છે, ચદ્રમાને ફાડીને નીકળી પડી છે, નીલ કમળના દળ (પાદડીઓ)ની સમાન વિશાળ નેત્રવાળી તથા લીલાયુક્ત લેચ નથી લેકને અવલ બન આપનારી મને હર દેખાય છે ૧ સૂર્ય અસ્ત પછી કમળની અદર ગધાઈ ગએલો ભરે તકલીફ સહન કરીને આખી રાત વીતાવે છે, પરન્તુ અનુરાગ (પ્રીતિ) ને કારણે કમવની કોમળ (મુલાયમ) પાદાઓને કાપી નાખીને એ તકલીફ દુર કરવાનું સાહસ નથી કરી શકો પાગ્યા शुक्रगोणिते एव कारणम् , अ ययन २ गा. ४ कामरागदोपानुचिन्तनम् १२१ अनालोन्य प्रवर्तमानः खलु पराभूयते, तस्मादियदपि तावद् विभावय विला- सिनीविलसन कुतः स्थानादिदमुद्भवति ? किं चास्य कारणम् ? कथमिद तिष्ठति ? किमेतस्मानिःसरत् सतत दरीदृश्यते ? इति, विरम विरमानानुरागकरणाद , अस्य हि शरीरस्य मूत्राशुपइतमुद्भवस्थानम् , अगितपीतादिना च स्थितिः, एतस्मानिःसरीसति च मलमूनफफादिकमेव, किंबहुना मृदुतममनोरमवसनविनिर्मितया मलमूनास्थि- हे आत्मन् ! स्मरण रख, जो विना विचारे किसी विषयमें प्रवृत्ति करता है उसकी बडी दुर्गति होती है। तू अपना कल्याण चाहता है तो विलासिनियोंके विलामका अच्छीतरह विचार करले। यह सोच देख कि यह शरीर कहांसे उत्पन्न होता है ? इसका क्या कारण है ? कैसे ठहरता है और इससे क्या घिनौने (घृणाजनक) पदार्थ निकलते हुए दिखाई देते हैं ? यस कर, रहेनेदे, इस शरीरमें अनुराग मत कर,मलमूत्रसे भरे हुए स्थानसे यह शरीर उत्पन्न हुआ है, रज-वीर्य इसके कारण हैं, खाया पीया भोजन इसकी स्थितिका निमित्त है, और इसके नौ द्वारोंसे मल-मूत्र आदि घृणित पदार्थ निकला करते हैं, अधिक क्या कहें? कोमल और मनोहर कपडेसे धी-हुई मल-मूत्रकी गठरीमें पामर प्राणीभी अनुराग नहीं करता, फिर अशुचि आदि भावनाओंका समीचीन હે આત્મન ! યાદ કર કે, જે વિના વિચારે કઈ વિષયમાં પ્રવૃત્તિ કરે છે તેની ભારે દુર્ગતિ થાય છે તે પિતાના કયાણને ચાહે છે તે વિલાસિનીઓના વિલાસને સારી પેઠે વિચાર કરી લે એટલું વિચારી જે કે આ શરીર કયાથી ઉત્પન્ન થયું છે? એનું શું કારણ છે? તે કેવી રીતે ટકે છે? અને એમાથી કેવા કેવા ગધાતા (ધૃણાજનક) પદાર્થો નીકળતા જોવામાં આવે છે? બસ કર, રહેવા દે, આ શરીરમા અનુરાગ કર, મળમૂત્રથી ભરેલા સ્થાનમાથી આ શરીર ઉત્પન્ન થયું છે, રજ-વીર્ય એનું કારણ છે, ખાધેલુ–પીધેલ ભજન, એની સ્થિતિનું નિમિત્ત છે, અને તેના નવ દ્વારે વાટે મળ-મૂત્ર આદિ ધૃણિત પદાર્થો નીકળ્યા કરે છે વધારે શું કહીએ? કેમળ અને મને હર કપડાથી બાધેલી મળમૂત્રની ગાડીમાં પામર પ્રાણી પણ અનુરાગ નથી કરતે, તે પછી અશુચિ આદિ ભાવનાઓનું સમીચીન ચિંતન કરવામાં ચતુર મુનિઓની તે , . .

- १२२ श्रीदनकालिकसूत्रे कफादिपोहलिकया न पामरोऽपि रज्यते, का कया पुनर्माश्नाकुशलगना मुनीनाम् । उक्तश्च-"अम्माकुम्भशतै पुर्ननु पहिर्मुग्धाः ! शुचिस्व कियत् , काल लम्भयथोत्तम परिमल कस्तृरिकायेस्तथा । विष्ठाकोष्ठकमेतदनमहो! मध्ये तु शौच कय,- कार नेप्यथ सूचयिष्यथ यथकार च तत्सौरभम् " ॥१॥ अन्यच-"चिरम चिरम सगान्मुत्र मुच प्रपञ्च, गिराज विष्टज मोह रिद्धि सिद्धि सतत्त्वम् । कलय कलय एत्त पश्य पश्य स्वरूप, कुरु कुरु पुरुषार्थ निर्वृतानन्दहेतोः ॥ २ ॥ इति," चिन्तन करनेमें चतुर मुनियोंका कहना ही क्या है ? वे तो उस ओर आखभी नही उठाते । कहा भी है- "शरीरको सैकडों घडोंसे चाहे जितना नहलाओ धुलाओ, और केशर कस्तृरी गुलाय आदिकी सुगन्धसे सुगन्धित करो, परन्तु यह शरीर तो मल-मृत्रका भाजन है। हे भव्यो! इसे कैसे पवित्र बनाओगे? और कैसे इसकी सुगन्धि फैलाओगे" ॥१॥ "हे आत्मन् ! तृ स्त्री आदिकी ममतासे विरक्त हो विरक्त हो, मोहका त्यागकर त्यागकर, आत्माके स्वरूपको पहचान पहचान, और मोक्षसुखके लिए पुरुपार्थ कर पुरुषार्थ कर ॥२॥ १ यहा प्रत्येक कर्तव्यको दुहरानेसे अत्यन्त तीन प्रेरणा प्रगट होती है । શી વાત? તેઓ તે તેની તરફ ઉચી આખે નેતા પણ નથી શરીરને મેકડો ઘડા પાણીથી ચાહે તેટલું હવા, ધુઓ, અને કેશર કસ્તુરી ગુલાબ આદિની સુગધથી સુગંધિત કરે, પરંતુ આ શરીર તે મળ-મૂને ભાજન છે હે ભવ્ય તેને કેવી રીતે પવિત્ર બનાવશે અને કેવી રીતે તેના ५२॥ (शेरम)न सावश ? " (१) “હે આત્મન ! તુ સ્ત્રીઆદિની મમતાથી વિરક્ત થા વિરત થા, મેહને ત્યાગ કર ત્યાગ કર, આત્માના સ્વરૂપને જાણ જાણું, ચારિત્રને અભ્યાસ અભ્યાસ કર, પિતાને પિછાણ પિછાણ, અને મોક્ષ સુખને માટે પુરૂષાર્થ કર ५३पार्थ ९” (२) ૧ અહીં પ્રત્યેક કર્તવ્યને બેવકવવાથી અત્યંત તીવ્ર પ્રેરણા પ્રકટ થ » , " अन्ययन २ गा. ४ कामरागदोपानुचिन्तनम् १२३ अपरश्च-"अमेयपूर्णे कृमिनाल्समुले, स्वभावदुर्गन्धविनिन्दितान्तरे । कलेवरे मूत्रपुरीपभाविते, रमन्ति मृढा विरमन्ति धीराः ॥३॥" इति । यद्यपि ससारभीरुभिः परिहेयोऽन्यसद्गो दुस्त्यजः, तथापि ब्रह्मचर्यमहिमान- मनुस्मरता मुनीना केवल स्त्रीसद्गपरिहारेण द्रव्यादिसगः स्वयमेव निवर्तते। यथा स्वयम्भूरमणमहासागरमुत्तीर्णस्य पुरतः क्षुद्राकृतिगङ्गासमानाऽपि नदी सुखसमु- तरणीया भवति । उक्तञ्च भगाता उत्तराध्ययनसूत्रस्य द्वाविंशेऽध्ययने- एए य सगे समइकमित्ता, मुहुत्तरा चेव हवति सेसा। जहा महासागरमुत्तरित्ता, नई भवे अवि गगासमाणा ॥ १ ॥” इति , अशुचि पदार्थोंसे भरा हुआ, जूं आदि कीडोंसे व्याप्त, स्वाभाविक दुर्गन्धके कारण भीतर भी घृणित और मल-मूत्रसे वेष्टित (स्त्रियोंके) शरीरमे रमण वे करते है जो मृढ हैं, और धुद्धिमान् पुरुप महान् निकृष्ट समझ कर उससे अलग रहते हैं ॥३॥' यद्यपि विपयोंके सग ससारभीरु पुरुषोंके लिए त्याज्य है और उनका त्याग होना कठिन है, तथापि ब्रह्मचर्यकी महिमाका स्मरण करने- वाले मुनियोंको एक मात्र स्त्रीसगके त्याग देनेसे अन्य विषयोंके सग दुस्त्यज होनेपर भी स्वयमेव निवृत्त हो जाते है । अर्थात् ब्रह्मचर्यमे दृढ़ रहनेवालों पर कोई भी विपय, अपना प्रभाव नहीं डाल सकता । जो पुरुप स्वयम्भूरमण महासमुद्रको पार कर चुका है उसके लिए गगा जैसी छोटी२ नदिया पार करना क्या बड़ी बात है । भगवान्ने उत्तरा ययन અશુદ્ધ પદાર્થોથી ભરેલા, જુ-આદિ કીડાઓથી વ્યાપ્ત, સ્વાભાવિક દુર્ગ ધિને કારણે અ દર પણ ધૃણિત અને મળ-મૂત્રથી વેષ્ટિત (સ્ત્રીઓના) શરી રમા તેઓ રમણ કરે છે કે જેઓ મૂઢ છે, અને બુદ્ધિમાન પુરૂષ તે તેને અત્યંત निष्ट समलने तनायी सलग रहे छ” (3) જો કે વિષયને સગ સ સારીરૂ પુરૂષને માટે ત્યાજ્ય છે અને તેને ત્યાગ થ કઠિન છે, તે પણ બ્રહ્મચર્યના મહિમાનું સ્મરણ કરનારા મુનિઓને એક માત્ર સ્ત્રીસગને ત્યાગ કરવાથી, અન્ય વિષને સગ દુજ્ય જ હોવા છતા પણ આપોઆપ નિવૃત્ત થઈ જાય છે અર્થાત્ બ્રહાચર્યમા દઢ રહેનારાઓ પર કોઈ પણ વિષય પિતાને પ્રભાવ પાડી શકતા નથી જે પુરૂષ સ્વયમ્ભરમણ મહાસમુદ્રને પાર કરી ચૂક્યું છે તેને માટે ગગા જેવી નાની નાની નદીઓ પાર શી મોટી વાત છે ? ભગવાને પણ ઉત્તરાધ્યયન-સૂત્રના ૩૨ મા અધ્યયનમાં કરવામાં " ओर - १२२ श्रीशिवकालिकमचे कफादिपोहलिकया न पामरोऽपि रयते, का क्या पुनर्भावनाकुमलाना मुनीनाम् । उक्तश्च-"अम्माकुम्भशपुर्ननु पहिर्मुग्याः ! शुचिव कियत् , काल लम्भययोत्तम परिमल कस्तूरिकायेस्तथा । विष्ठाकोष्ठकमेतदद्कमहो ! मध्ये तु शौच क्य,- झार नेप्यथ मूचयिप्यथ यथद्वार च तत्सौरमम्" ॥१॥ अन्य-"रिम चिरम सगान्मुन मुश्श प्रपन, मिज रिएज मोह रिद्धि रिदि स्वतचम् । कलय फलय वृत्त पश्य पश्य स्वरूप, कुरु कुरु पुरुषार्थ नितानन्दहेतोः ॥ २ ॥ इति, चिन्तन करनेमें चतुर मुनियोंका कहना ही क्या है ? वे तो उस आखभी नही उठाते। कहा भी है- "शरीरको सैकड़ों घड़ोंसे चाहे जितना नहलाओ धुलाओ, और केशर कस्तूरी गुलाय आदिकी सुगन्धसे सुगन्धित करो, परन्तु यह शरीर तो मल-मृत्रका भाजन है। हे भव्यो! इसे कैसे पवित्र बनाओगे? और कैसे इसकी सुगन्धि फैलाओगे" ॥१॥ "हे आत्मन् ! तृ स्त्री आदिकी ममतासे विरक्त हो विरक्त हो, मोहका त्यागकर त्यागकर, आत्माके स्वरूपको पहचान पहचान, और मोक्षसुखके लिए पुरुषार्थ कर पुरुपार्थ कर' ॥२॥ १ यहा प्रत्येक कर्तव्यको दुहरानेसे अत्यन्त तीन प्रेरणा प्रगट होती है । શી વાત? તેઓ તે તેની તરફ ઉચી આખે જોતા પણ નથી કહ્યું છે કે- “શરીરને સેકડે ઘડા પાણીથી ચાહે તેટલું નહવર, ધુઓ, અને કેશર કસ્તુરી ગુલાબ આદિની સુગધથી સુગંધિત કરે, પરંતુ આ શરીર તે મળ-મૂમનું ભાજન છે હે ભવ્ય ! તેને કેવી રીતે પવિત્ર બનાવશે અને કેવી રીતે તેના ५ (शेरभ)न साप ? " (१) “હે આત્મન ! તુ સ્ત્રી આદિની મમતાથી વિરકત થા મેહને ત્યાગ કર ત્યાગ કર, આત્માના સ્વરૂપને જાણ જાણ, ચારિત્રને અભ્યાસ અભ્યાસ કર, પિતાને પિછાણ પિછાણ, અને મોક્ષ સુખને માટે પુરૂષાર્થ કર (२) ૧ અહીં પ્રત્યેક કર્તવ્યને બેવડાવવાથી અત્યંત તીવ્ર પ્રેરણા પ્રકટ થાય છે " વિરકત થા, પુરૂષાર્થ કર” अ ययन २ गा. ४ कामरागदोपानुचिन्तनम् १२५ दोषा विविधशस्त्रास्त्रधारिणः प्रपलशत्रा इस समुचिप्ठन्ति । तत्रादावारौद्रध्यान हृदये पदमारोपयति, तस्मिंश्च विद्यमाने प्रमादः साहस-मज्ञान-मधर्मो-सिद्धिस्तथा- ऽन्येऽपि दोपाः समायान्ति । अब्रह्मचर्यस्य सफलममादस्थानत्वेन प्रमादः, अविचारितकार्यकरणपुद्धिसमुत्पादकत्वेन साहस, योधिपीजविनाशकत्वेन अज्ञानम् , अधोगतिकारकत्वेन अधर्मः, अष्टविधर्मजनकत्वेन असिद्धिश्च, एते दोपावेतोगृहे सयमरत्नापहाराय यथेच्छमाशु मविशन्ति । किञ्च-विपयरागः, सफलपापाना निदानम् , कुठार इव चारित्रतरु छिनति, दोप इस प्रकार आ खड़े होते हैं मानों अनेक अस्त्र-शस्त्र लेकर प्रबल शत्रु आ डटे हों। पहले पहल तो आध्यान और रौद्रध्यान हृदयमे स्थान पा लेते हैं। इनके स्थान पाते ही प्रमाद, साहम, अज्ञान, अधर्म, असिद्धि आदि अनेक दोष उपस्थित होते हैं । अब्रह्मचारीको प्रमादके सय कारण मौजूद रहते है इसलिए प्रमाद, पिना विचारे कार्य करनेसे साहस, योधि-रूपी बीजका विनाशक होनेसे अज्ञान, अधोगतिमें लेजानेके कारण अधर्म, और आठो कर्मोंका जनक होनेसे असिद्धि, और इस प्रकारके अनेक दोप शत्रुकी तरह चित्तरूपी घरमे सयमरूपी रत्नको लूटने के लिए इच्छानुसार प्रवेश कर जाते है। विपयराग सकल पापोंका मूल कारण है, चारित्र-वृक्षको, काटनेके लिए कुठार है, जिस प्रकार कजल, सफेद वस्त्रको मलिन कर देता પડા થાય છે, જાણે કે અનેક અસ્ત્ર શસ્ત્ર લઈને પ્રબળ શત્રુઓ આવી પહેચા હેય પહેલા તે અત્ત-યાન અને રોદ્રધ્યાન હૃદયમાં સ્થાન જમાવી લે છે તેને ન મળતા જ પ્રમાદ, સાહસ, અજ્ઞાન, અધર્મ, અસિદ્ધિ આદિ અને દે આવી , J ઊભા રહે છે અબ્રહ્મચારીની સમીપે પ્રમાદના બધા કારણે હાજર રહે છે એથી પ્રમાદ, વગર વિચારે કાર્ય કરવાથી સાહસ, બધિરૂપી બીજનું વિનાશક હેવાથી અજ્ઞાન, અર્ધગતિમાં લઈ જવાને કારણે અધર્મ, અને આઠે કર્મોનું જનક હેવાથી અસિદ્ધિ અને એવા જ બીજા અનેક દે શત્રુની પેઠે ચિત્તરૂપી ઘરમાં રૂપી રનને લૂટી લેવાને ઈરછાનુસાર પ્રવેશ કરે છે છે, ચારિત્ર વૃક્ષને કાપનારો કેહાડે છે સ યમ Anna... ............

१२४ श्रीदशवकालिकसूत्रे इय दृष्टिरिषा नागीय सन्दर्शनादेव सयमिना शमलक्षण जीवन विनिहन्ति । अथा किमिय प्रगाहान्धारा रजनी ? यदनोलूका इन चारः काया पिचरन्ति, अमानपिशापश्चात्र चारित्ररक्षणगुणशरीरनसनाय जागरूको लक्ष्यते । हे चित्त-सहचर ! ज्ञानप्रकाशेन रागात्कारमपनीय रात्रिकृतोपसर्ग निवार- यता भवता मदीयसाहाय्य क्रियताम् । अपि चेद माननीयम्-मुनीना ब्राह्मचर्यपरित्यागो महाऽनर्थकरः, क्या हि ब्रह्मचर्यपरित्यागेच्छायामपि सत्या बहवो सूत्रके ३२ घे अध्ययनमें 'om य सगे इस गाथासे यही प्रतिपादन किया है। जैसे जिस नागिनकी दृष्टिमें विष होता है उसके देखनेसे ही जीवनका अन्त होजाता है, इसी प्रकार स्त्रीके भी सानुराग देखनेसे चारित्र- रूपी जीवन नष्ट हो जाता है। अथवा यह कैसी प्रगाढ़ अन्धकारमय रजनी है, जिसमें चारों कषाय- रूपी उल्लुओंका राज्य है, और चारिग्र रूपी शरीरको निगलनेके लिए अज्ञानरूपी पिशाच सदा ताकता रहता है । हे मित्र मन ! ज्ञानके प्रका- शसे रागरूपी अन्धकारको निवारण कर, वीरूपी रानि द्वारा किये गए उपसर्गको हटानेमे मेरी सहायता कर । ब्रह्मचर्यका परित्याग करनामुनियोंके लिए महान् अनर्थ करनेवाला है। यहाँ तक कि ब्रह्मचर्य परित्याग करनेकी इच्छा होते ही बहुतसे एए य सगे से आयाथी से प्रतिपादन यु छ જેવી રીતે જે નાગણીની રુણિમા વિષ હેય છે તેને જેવાથી જ જીવનને અત આવી જાય છે, તેવી રીતે સ્ત્રીને અનુરાગપૂર્વક જેવાથી ચારિત્રરૂપ જીવન નષ્ટ થઈ જાય છે અથવા એ કેવી ગાઢ અંધકારમય રાત્રિ છે કે જેમાં ચારે કોરૂપી ઘુવડનું રાજ્ય છે, અરે ચારિત્રરૂપી શરીરને ગળી જવા માટે અજ્ઞાનરૂપી પિશાથ સદા તાકી રહેલો છે હે મિત્ર મન ! જ્ઞાનના પ્રકાશથી રાગરૂપી આ પ્રકારનું નિવારણ કર, અને સ્ત્રીરૂપી રાત્રિથી ઉત્પન્ન થતા ઉપસર્ગોને હઠાવવામાં મને સહાય કર બદ્મચર્યને ત્યાગ કર એ મુનિઓને માટે મહાન અનર્થકારક છે, એટલે સુધી કે બ્રહ્મચર્ય ત્યજવાની ઈરછા થતા જ અનેક દે એવી રીતે આવીને अ ययन २ गा. ४ कामरागदोपानुचिन्तनम् १२५ दोपा विविधगस्त्रास्त्रधारिणः प्रबलशत्रय इस समुत्तिष्ठन्ति । तत्रादावार्तरौद्रध्यान हृदये पदमारोपयति, तम्मिश्च विद्यमाने प्रमादः साहस-मज्ञान-मधर्मो-ऽसिद्धिस्तथा- ऽन्येऽपि दोपाः समायान्ति । अब्रह्मचर्यस्य सकलप्रमादस्थानत्वेन प्रमादः, अविचारितकार्यकरणबुद्धिसमुत्पादकत्वेन साहस, चोधिवीजविनाशकत्वेन अज्ञानम् , अयोगतिकारकत्वेन अधर्मः, अष्टविधर्मजनस्त्वेन असिद्धिश्च, एते दोपावेतोगृहे सयमरत्नापहाराय यथेउमाशु प्रविशन्ति । फिश्च-विपयरागः, सफलपापाना निदानम् , कुठार इव चारित्रतरु उिनत्ति, दोप इस प्रकार आ खड़े होते हैं मानों अनेक अस्त्र-शस्त्र लेकर प्रबल शत्रु आ डटे हों। पहले पहल तो आर्तयान और रौद्रध्यान हृदयमें स्थान पा लेते हैं। इनके स्थान पाते ही प्रमाद, साहस, अज्ञान, अधर्म, असिद्धि आदि अनेक दोप उपस्थित होते हैं । अब्रह्मचारीको प्रमादके सब कारण मौजूद रहते है इसलिए प्रमाद, विना विचारे कार्य करनेसे साहस, बोधि-रूपी वीजका विनाशक होनेसे अज्ञान, अयोगतिमें लेजानेके कारण अधर्म, और आठों कर्मोंका जनक होनेसे असिद्धि, और इस प्रकारके अनेक दोप शत्रुकी तरह चित्तरूपी घरमें सयमरूपी रत्नको लूटनेके लिए इच्छानुसार प्रवेश कर जाते है। विपयराग सकल पापोंका मूल कारण है, चारित्र-वृक्षको, काटनेके लिए कुठार है, जिस प्रकार कजल, सफेद वस्त्रको मलिन कर देता ખડા થાય છે, જાણે કે અનેક અસ્ત્ર શસ્ત્ર લઈને પ્રબળ શત્રુઓ આવી પહોંચ્યા હેય પહેલા તે આનં–થાન અને રૌદ્રધ્યાન હૃદયમાં સ્થાન જમાવી લે છે તેને સ્થાન મળતા જ પ્રમાદ, સાહસ, અજ્ઞાન, અધર્મ, અસિદ્ધિ આદિ અને દે આવી ઊભા રહે છે અબ્રહ્મચારીની સમીપે પ્રમાદના બધા કારણે હાજર રહે છે એથી પ્રમાદ, વગર વિચારે કાર્ય કરવાથી સાહસ, બધિરૂપી બીજનું વિનાશક હોવાથી અજ્ઞાન, અધોગતિમા લઈ જવાને કારણે અધર્મ, અને આઠે કર્મોનું જનક હેવાથી અસિદ્ધિ અને એવા જ બીજા અનેક દે શત્રુની પેઠે ચિત્તરૂપી ઘરમાં સંયમ રૂપી રત્નને લૂટી લેવાને ઈરછાનુસાર પ્રવેશ કરે છે વિષયરાગ બધા પાપનું મૂળ કારણ છે, ચારિત્ર વૃક્ષને કાપનારે કહાડે છે १२६ श्रीदनवकालिकम्त्रे फजल इस मलिनयति स्वन्टमम्बरमिवात्मानम् , भाति चार्गला मोक्षमार्गद्वारस्य नरकनिगोदाघनन्तदुःखानाच निधानमिति सर्वथा तमपहाय परात्रन्ति चञ्चत्तपः सयमाचरणचतुरास्तपस्विनः । ननु बद्दयो मन्त्रास्तथाविधाः सन्ति ये देवाना दानपानामुपरि प्रभावमावि र्भावयन्ति, परन्तु किमेतदाथर्यम् ? यत् स्त्रीणा चरित्रे तेऽपि मन्त्रा इतमाया: किमपि कर्तुं न प्रभवन्ति । अयासा चरित्रस्यैतादृशप्रभावशाल्तिा, यत्पुरतो मन्त्रा अपि पराभूय निवर्तन्ते, वहि क उपायस्तदुद्भावितरागरज्जुकर्तनाय सयताना--मिति चेत्, हन्त ! हृदय-सहचर ! योपित्सरिधसस्थितिपरित्याग एव तदीय चरित्राऽऽ- है उसी प्रकार आत्माको मलिन करने वाला है, मुक्तिके मार्गकी अर्गला है, नरक निगोदके दुःसोंका निधान है और विविध व्याधियोंका उत्पत्तिस्थान है, अत एव तप और सयमके पालनेमें चतुर तपस्वी लोग इस (विषय राग) को बिलकुल छोड़कर अलग होते हैं । जो मन्त्र, देवों और दानवों पर भी अपनाप्रभाव शीघ्रही दिखलाते हैं वे भी स्त्रीजनित राग पर प्रभाव नहीं डाल सकते । यह बड़े आश्च यकी घात है । स्त्रियोंका चरित्र इतना प्रभावशाली होता है कि उसके सामने मन्त्र भी प्रभावहीन हो जाते हैं तब उनके विपयमें उत्पन्न होने वाले राग-रज्जूको काटनेके लिए मुनियोंको क्या उपाय करना चाहिये' हे हृदय-सुहृद् ! स्त्रियोंके समीप रहनेका त्याग करदेना ही उनके જેમ કાજળ સફેદ વસ્ત્રને મલિન કરી નાખે છે તેમ આત્માને મલિન કરનાર છે, મુક્તિના માર્ગની અર્ગલા છે, નરક નિગેદના હું એનું નિશાન છે, અને વિવિધ વ્યાધિઓનું ઉત્પત્તિસ્થાન છે તેથી કરીને તપ અને સચમને પાળવામાં ચાર એવા તપસ્વી લેકે આ (વિષયરાગ)ને બિલકુલ છોડીને તેથી દર જતા રહે છે જે મત્ર, દેવે અને દાનવે પર પણ પિતાને પ્રભાવ તુક્ત બતાવી આપે છે, તે માત્ર પણ સ્ત્રી જનિત પાડી શકતા નથી, એ મેટા આશ્ચર્યની વાત છે સ્ત્રીઓનું ચરિત્ર એટલું પ્રભાવશાળી હોય છે કે તેની સામે મત્ર પણ પ્રભાવહીન બની જાય છે તે તેના વિષયમાં ઉત્પન્ન થનારા રાગરજજુને કાપવા માટે મુનિઓએ ક ઉપાય કરવું જોઈએ ? હે હૃદય-સુહૃદ ! સ્ત્રીઓની સમીપે રહેવાનું છેડી દેવું એજ રાગ ૫૨ પ્રભાવ ।

9 अध्ययन २ गा. ४ कामरागदोपानुचिन्तनम् पादितरागभङ्गोपाय इति धारणामुपैहि । उक्तश्च- "शृणु हृदय ! रहस्य यत्प्रशस्त मुनीना, न सलु न खलु योपित्सनिधिः सविधेयः । हरति हि हरिणाक्षी क्षिप्रमक्षिक्षुरमः, पिहितशमतनुत्र चित्तमप्युत्तमानाम् ॥ १ ॥ शास्त्रज्ञोऽपि प्रकटविनयोऽप्यात्मवोऽपि गाढा, ससारेऽस्मिन् भवति विरलो भाजन सद्गतीनाम् । येनैतस्मिन् निरयनगरद्वारमुद्धाटयन्ती, वामाक्षीणा भवति कुटिला भूलता कुचिकेव" ॥२॥ वस्तुतस्तु इहाऽनादिससारे स्वस्मिन्नपि शरीरे जीवस्य किं नाम स्वातन्त्र्यम् विषयमें होनेवाले प्रेम-पाशके काटनेका उपाय है। कहा भी है- " मन ! मुनियोकी आत्माका कल्याण करनेवाले रहस्यको सुन, वह यह है कि-स्त्रियोका सम्पर्क (ससर्ग) सर्वथा नही करना चाहिये, क्योंकि शम-रूप कवच पहने हुए उत्तम पुरुपोंके अन्तःकरणको भी स्त्रिया अपनी आखेंरूपी छुरीकी धारसे छिन्न-भिन्न कर डालती है "॥१॥ प्रवचनमे प्रवीण, विनयवान् और गभीर आत्मज्ञानवान होते हुए भी कोई विरला ही व्यक्ति सद्गतिकी प्राप्ति कर पाता है। क्योंकि ससारमें एक ऐसी कुजी मौजूद है जो जल्दी नरकका द्वार खोल देती है, वह कुजी क्या है ? स्त्रियोंकी टेढ़ी भौह" ॥२॥ सच है-अनादि-कालीन ससारमें, जीवोंको अपने शरीरमें भी ઉત્પન્ન થતા પ્રેમપાશને કાપવાને ઉપાય છે કહ્યું છે કે-હે મન ! મુનિઓના આત્માનું ક૯યાણ કરનારા રહસ્યને શ્રવણ કર તે આ પ્રમાણે છે. સ્ત્રીઓને સપર્ક (સ સર્ગ) સર્વથા ન કર જોઈએ, કારણ કે શમરૂપ કવચ પહેરેલા ઉત્તમ પુરના અત કરણને પણ સ્ત્રીઓ પોતાની આખરૂપી છુરીની ધારથી છિન્ન-ભિન્ન કરી નાખે છે” પ્રવચનમાં પ્રવીણ, વિનયવાન અને ગભીર આત્મજ્ઞાનવાનું હોવા છતા પણ વિરલ વ્યકિત જ સદ્ગતિને પ્રાપ્ત કરી શકે છે કારણ કે સંસારમાં એક એવી કુચી મેજુદ છે કે જે જદી નશ્કનું દ્વાર ખેલી નાખે છે એ કુચી કઈ છે ? સ્ત્રીની વાકી ભમ્મર ખરૂ છે અનાદિકાલીન સંસારમા, જી પાસે પોતાના શરીરની પણ - 4 १२८ श्रीदनवैकालिकात्रे दृश्यते हि लोकेऽपटमनुनपशुपतिसरीएपादिशरीरोपभोगमवाटतोऽपि माणि- नस्तत्तदहयोगेन अनारतदेशावस्थानाऽभिमताऽन्नपानाऽनवाप्तिशीतवातातपो- पलदृष्टिदशमशकादिजनिताऽनेकरिधदुनिगारदुःग्योपभोगः सोढव्यों भवतीति, स्वातन्ये तु न कोऽपि तत्तदद्गमगीकुर्यात् । अगसयोग हातवियोगेऽपि नाम्ति जीवस्य सातव्यम् , तनुप्रियोगमनिन्छतामपि मुखसमन्विताना मरणदर्शनात् , तमिच्छता दुःखदग्धाना पिादिभक्षणेऽप्येकान्तिामरणादर्शनाच । स्वाधीनता नहीं है। अपकृष्ट-मनुष्य पशु पक्षी सॉप आदिके हीन शरीरको जो प्राणी चाहते ही नहीं, उन्हें भी वह शरीर धारण करना पड़ता है, और उसके सयोगसे अनिष्ट स्थानका निवास, अन्न-पानकी अप्राप्ति, गर्मी, सर्दी, ओलोंकी वर्षा, हवा, डास मन्टर आदिसे होनेवाले अनेक प्रकारके दुःख भोगने पड़ते हैं। यदि ऐसे शरीरको धारण करना अपनी इच्छा पर निर्भर होता तो कोई भी प्राणी ऐसा दुखदायी शरीरको धारण न करता । जिस प्रकार शरीर धारणमें जीव स्वाधीन नहीं है उसी प्रकार उसके त्यागने में भी स्वाधीन नहीं है। ससारमें जो प्राणी सुखसम्पन्न है वे वर्तमान शरीरका त्याग नहीं करना चाहते, फिरभी उनकी मृत्यु जाती है। और मृत्युकी कामना करनेवाले दु.ग्वी जीव विष आदि भक्षण कर लेते है तो भी कभी कभी बच जाते हैं, अत: सिद्ध हुआ कि अपना शरीरभी अपने अधीन नही है। સ્વાધીનતા નથી અપકૃષ્ટ-મનુષ્ય પશુ પક્ષી સાપ આદિના હીન શરીરને જે પ્રાણી ચાહતા જ નથી, તેમને પણ એ શરીર ધારણ કરવા પડે છે અને તેના સ ગથી અનિષ્ટ સ્થાનને નિવાસ, અન્નપાનની અપ્રાપ્તિ, તાપ, ટાઢ, કરાને વસા હવા, ડાસ મચ્છર આદિથી ઉત્પન્ન થતા અનેક પ્રકારના હું એ ભગવવા પડે છે જે એવા શરીરને ધારણ કરવાનું પિતાની ઈરછા પર જ નિર્ભર હોત તે કઈ પણ પ્રાણું એવા દુખદાયી શરીરને ધારણ ન કરત જેવી રીતે શરીર ધારણ કરવામાં જીવ સ્વાધીન નથી, તેવી રીતે તેને ત્યજવામાં પણ સ્વાધીન નથી સંસારમાં જે પ્રાણીઓ સુખસ પન્ન છે તેઓ વર્ત મન શરીરને ત્યાગ કરવા ઇચ્છતા નથી, તે પણ એમનું મૃત્યુ થઈ જાય છે અને મૃત્યુની કામના કરનારા દુખી જી વિષ આદિ ભક્ષણ કરી લે છે તે પણ કઈ કઈ વાર બચી જાય છે એ ઉપરથી સિદ્ધ થયું કે આપણું શરીર પણ આપણને આધીન નથી अ ययन २ गा. ५ कामरागदोपानुचिन्तनम् १२९ जीवस्य स्वातन्त्र्येण शरीरस्वामित्वे सति अनेकेपा कुमुममुकुमाराणा सुन्दरा- वयवाना कतिपयानामतीतदेवादिशरीराणा विनाशः कथ न वारितः १ तस्माद् देहगेहादि किमपि वस्तु कस्यापि नास्ति, किन्तु अज्ञानवशाज्जीवाः 'इद मम, इय ममे' त्यादिस्वरूप ममत्व कुर्वन्तीति निश्चीयते । इत्थ च स्वकीयदेहगेहादौ ममत्वकरणमनानमूल, कर्मवन्धहेतुश्चेति विवेकिनः स्वदेहेऽपि ममत्व न कुर्वन्ति, किं पुनरन्यदीयदेहगेहादौ-इत्यनुचिन्तनेन समुत्प- नया "न सा मम, नाह तस्याः" इत्याकारया विवेकबुद्धया मनसि ममृत राग मशमयेदिति भावः ॥ अत्र गाथाया 'परिव्ययतो' इत्यत्र सौत्रत्वात्पष्टयर्थे मथमा, 'वहिद्धा' इति प्राकृतत्वात् , यद्वा रहिर्धावतीति विग्रहे पृपोदरादित्वा- द्वकारादिलोपः । इति गाथार्थ. ॥ ४ ॥ यदि शरीर पर प्राणीका अधिकार होता तो फलसे कोमल तथा सुन्दर अवयववाले अतीतकालीन देव आदिके शरीरके वियोगको क्यों न रोक लेता? सत्य यात तो यह है कि-देह गेह आदि कोई भी वस्तु किसीकी नही है। जीव अज्ञानके कारण 'यह मेरा है' 'यह मेरी है' इस प्रकारकी ममता करते हैं, अत एव शरीरमे ममता करना ही अज्ञान-मूलक और परिग्रह होने से कर्म-बन्धका कारण है, ऐसा समझ कर विवेकी जन अपने शरीरमे भी स्नेह नहीं करते तो दुसरेकी देहमें कैसे स्नेह करेगे ऐसा सोच कर, मनमे उत्पन्न हुए भी रागादिको “न वह मेरी है" और "न मै उसका हूँ" इस प्रकारकी भावनासे दूर कर मुनि, उस निकले हुए मनको फिरसे सयम-धरमे लावे ॥१ જે શરીર પર પ્રાણીને અધિકાર હોત તે ફૂલથીય કેમળ તથા સુંદર અવયવાળા અતીતકાલીન દેવાદિના શરીરના વિયેગને કેમ રેકી રાખત નહિ ? સાચી વાત એ છે કે દેહ ગેહ આદિ કઈ પણ વસ્તુ કોઈની નથી જીવ અજ્ઞાનને stal 'भा भारो छे' से ' से भारी छ' से मारनी ममता राणे छ भेटवे શરીર પર મમતા રાખવી એજ અજ્ઞાનમૂલક અને પરિગ્રહરૂપ હેવાને કારણે કમળ ધનુ કારણ છે એવું સમજીને વિવેકી જન પિતાના શરીર પર રાખતા નથી, તે પછી બીજાના દેહ પર કેમ સનેહ કરે ? એમ વિચારીને મનમાં ઉત્પન થએલા રાગાદિને, “એ મારી નથી કે હુ તેને નથી” એવી ભાવનાથી દૂર કરીને, મુનિએ યમઘરથી બહાર નીકળેલા મનને પાછુ યમઘરમાં લાવે (૪) , પણ સ્નેહ , . २ ५ , १३० श्रीदशवकालिकसूत्रे पूर्वगाथया 'रागव्यपनयः कर्तव्यः' इत्युक्त, स च याप्रक्रियामन्तरेण न सम्भवतीत्यतस्तत्मतिपादनार्थमाह-आयाण्याही' इत्यादि । मूलम्-आयावयाही चय सोगमलं, कामे कमाही कमिय खुदुक्ख । छिंदाहि दोसं विणएज राग, एवं सुही होहिसि संपराए ॥५॥ छाया-आतापय त्यज सौकुमार्य, कामान् काम क्रान्तमेव दुःखम् ॥ छिन्धि द्वेष व्यपनय रागम् , ए मुसी भविष्यसि सम्पराये ॥५॥ सान्वयार्थ:-स्वीपरसे मोह हटानेका उपाय कहते है-- आयावयाही शरीरको तपस्यासे भूखाडालो, सोगमल्ल मुकुमारता अमीरी- को चय त्यागो, कामे विपयकी उच्छाओको कमाही काम करो रोको, (ऐसा करनेसे) खु-निश्चय करके दुख-दुःख कमियन्दर होगा, दोस- द्वेपको छिंदाहिडेदी-नष्ट करो, राग-रागको विणण्ज घटाओ-दर करो, एक- इस मकार करनेसे (तुम) संपराएससारमें सुरी-मुखी रोहिसि होवोगे ॥५॥ टीका-हे शिष्य ! व श्रामण्ययोगादहिनिर्गत चित्त प्रतिरोद्भुम् आतापय== शीतोष्णादिसहनो-स्कुटुकासनाचवलम्बना-ऽनशनादिदुप्फरतपोविधानस्तनु तापय सौकुमार्य-शरीरसुकुमारता त्यज-परिहर, यद्वा आतापयतिपदेन बोधितमेवार्थ पूर्व गाथामे, उत्पन्न हुए रागका परित्याग करना कहा किन्तु रागका त्याग तप आदि बाह्य क्रियाओंके विना नहीं हो सकता। इसलिए अब उनकी प्ररूपणा करते है- 'आयावयाही-' इत्यादि, है शिष्य ! तपस्या कर-आतापना ले, सुकुमारताका त्याग कर इन्द्रियों के विषयोंमे राग न कर, रागके त्यागसे दुःखोंका नाश होही પૂર્વ ગાથામા, ઉત્પન્ન થએલા રાગને પરિત્યાગ કરવાનું કહ્યું, કિન્તુ રાગને ત્યાગ તપ આદિ બાહ્ય ક્રિયાઓ વિના થઈ પાકને નથી તેટલા માટે એની પ્રરૂપણા ७२ छ आयावयाही. त्या હે શિષ્ય તપસ્યા કર-આતાપના લે, સુમાતાનો ત્યાગ કર, ઈદ્રિના વિમા રાગ ન કર, શગના ત્યાગથી દુ ખેને નાશ થઈ જ જાય છે તે દ્વેષને अध्ययन २ गा. ५ कामरागनिवारणोपायः १३१ , विशदयति-सौकुमार्य त्यजेति शरीरसुखसाधने दत्तचित्तो मा भव, शीतवातादिपरि- पहसहनयोग्यता सम्पादयेति भावार्थः । काम्यन्त इति कामाः शब्दादिविपयास्तान् क्रामः अतिक्राम-सन्त्यजेत्यर्थः । कामातिक्रमणे सति तु दुःख क्रान्तमेवगतमेव नष्टमेवेत्यर्थः । कामा ए हि दुःखसमुदायनिदानम् । ननु ' यथा बुभुक्षापिपासादीनामशनपानादिभिरेव नित्तिस्तद्वत्कामानामु- पभोगेन भविष्यति जाता है । तृ ढेपका लेश न रहने दे, और रागको छोड दे, तो तृ ससारमें सुखी, अथवा परिपह उपसर्गोके युद्धमें विजयी होगा। तात्पर्य हे शिष्य ! श्रामण्ययोग (सयमरूप घर) से बाहर मन निकल जाय तो शीत उष्ण आदि सह कर और उत्कुटुकासन आदिका आश्रय लेकर, तथा अनशन आदि तप करके शरीरको सुखा डाल, शरीरकी कोमलताका त्याग कर, अर्थात् अपने शरीरको शीत-आतप प्रभृति परिपह सहने योग्य बना ले, शारीरिक सुखोकी सामग्रीमें मन न लगा । जिनकी कामना की जाती है, उन्हें काम करते है, उन कामों (शब्द, रूप, गध, रस, स्पर्श आदि इन्द्रिय- विपयो) की अपेक्षा न रख । ऐसा करनेसे दुखोंका अस्तित्व रह नही सकता, उनका नाश ही समझ, क्योंकी काम ही दु.खोका कारण है। शका-हे गुरुमहाराज ! जैसे भोजन करनेसे भूख शान्त हो जाती है, और पानी पीनेसे प्यास बुझती है, वैसेही विपयोंका सेवन करनेसे અશ પણ રહેવા ન દે અને રાગને છેડી છે, તેથી તુ સંસારમાં સુખી અથવા પરિગ્રહ ઉપસર્ગો સાથેના યુદ્ધમાં વિજયી થઈશ તાત્પર્ય એ છે કે-હે શિષ્ય 1 શ્રામણ્યગ (સાયમરૂપ ઘર) થી બહાર ન નીકળી જાય તે ટાઢ-તાપ આદિ પરિષહ અને ઉકુટુક આસન આદિને આશ્રય લઈને, તથા અનશન આદિ તપ કરીને શરીરને સુકાવી નાખ, શરીરની મળતાને ત્યાગ કર, અર્થાત્ પિતાના શરીરને ટાઢ તાપ આદિ પરિષહ સહેવાને યોગ્ય બનાવી લે શારીરિક સુખેની સામગ્રીમાં મન ન લગાડ જેની કામના કરવામાં આવે છે તેને કામ કહે છે એ भाभी (२०६, ३५, 14, से, स्पर्श मान्द्रिय-विषये )नी अपेक्षा એમ કરવાથી દુ ખેનું અસ્તિત્વ રહી શકશે નહિ, એને નાશ જ સમજ, કેમકે કામ જ દુખનું કારણ છે શકા–હે ગુરૂ મહારાજ 1 જેમ ભેજન કરવાથી ભૂખ શાન્ત થઈ જાય છે અને પા પીવાથી તરસ છીપે છે, તેમજ વિષયેનું સેવન કરવાથી વિષય , , . શંખ - मृत्युका समाचार १३२ श्रीदवेकालिकम मैवम् , हे शिष्य ! पिपयगासनेत्र तारत्मकगऽनर्यमूलम् , विशेषतश्रारित्र- मुच्छेदयन्ती रागद्वेपो दृढीकुरुते । यथा पिटेग गतस्य कस्यचित् प्रेयसो जीवित स्यापि श्रुताया मरणयातया जना रुदन्ति न तथा तम्मिन्मृतेऽप्यश्रुताया तदीय- मरणमरत्ती, तस्मायेतोरिकतिरेर मुग्यतः मुखदुःखरन्धहेतुः, पियवासनाया. समुन्छेदमन्तरेण पुनः पुनरष्टविधाना कर्मणामरण न शक्यते प्रतिरोद्ध, तेपा विपयसनामूलपत्वात् । उक्तश्च- विपयसेवनकी इच्छा भी शान्त हो जायगी तो फिर आतापना आदि पाय तप क्यों करना चाहिए? उत्तर-हे शिष्य ! ऐसी शमा करना उचित नहीं है, क्योंकि विष- योकी वासना (इच्छा) ही सय अनाँको जड़ है, और चारित्ररूपी वृक्षकी जडको उसाड़नेवाली है। यह रागद्वेषको दृढ़ करती है । परदेश गया हुआ कोई इष्टमित्र जीचित हो परन्तु उसकी मिले तो सम्बन्धी लोग रोने लगते हैं, और यदि वह मर जाय किन्तु मरनेका समाचार न मिले तो कोई भी नहीं रोता। इससे ज्ञात होता है कि चित्तका विकार ही सुख-दुःखका मुख्य कारण है। इसलिए जब तक मनसे विपयवासनाका समूल त्याग नही होता तब तक आठों कर्मोंकी उत्पत्ति नही रुक सकती, क्योंकि उनका मृल, विषय वासना है। कहा भी है- સેવનની ઈરછા પણ શાન્ત થઈ જાય, તે પછી આતાપના આદિ બાહ્ય તમે કરવાની શી જરૂર ? ઉત્તર-હે શિષ્ય! એવી શકા કરવી ઉચિત નથી, કારણ કે વિષયેની વાસના (ઈચ્છા જ બધા અનર્થોનું મૂળ છે અને ચારિત્રરૂપી વૃક્ષના મૂળને ઉખાડનારી છે તે રાગદ્વેષને દૃઢ કરે છે પરદેશ ગએલો કઈ ઈચ્છમિત્ર જીવને હૈય પરત તેના મૃત્યુના સમાચાર મળે તે સગા સબંધીઓ રોવા લાગે છે, અને જે તે મરી જાય પણ મરવાના સમાચાર ન મળે તે હેઈ પણ રેતુ નથી, સમજાય છે કે ચિત્તને વિકારજ સુખદુ ખનું મુખ્ય કારણ છે એ કારણથી જ્યા સુધી મનમાથી વિષયવાસનાને સમૂળ ત્યાગ નથી થતું ત્યાસુધી આઠે કર્મોની ઉત્પત્તિને રોકી શકાતી નથી, કારણ કે તેનું મૂળ વિષય વાસના છે કહ્યું છે કે- એથી अध्ययना २.गा: ५ कामरागनिराकरणोपायः १३३१ "विचारितमल शास्त्र, चिरमुद्राहित मिथः । सन्त्यक्तासनान्मौनाद्, ऋते नास्त्युत्तम पदम् ॥” इति । यथा पवनपथे पतत्रिणे. स्वच्छन्द विहरन्ति तथाऽनुपमाऽलौकिकाऽऽनन्दमय- मोक्षमार्गसचारिणः सयमिनः प्रतिवन्धरहित विहरन्ति, परन्तु जालबद्धा विहङ्गमा उत्पतनयत्नवन्तोऽपि यथा निबन्धविहाराय न प्रभवन्ति, तद्वद् विषयसेवनाऽऽ- शालक्षणविषयवासनाकलितचेतसो मुनयोऽनुपलभ्य मोक्षमार्गमप्रतिवन्धविचरण- वञ्चिता भवन्तीति शिष्य ! जानीहि तावद् विपयाशा दुस्तरमहानदीसमानाम् । "भले ही कोई कितनेही शास्त्रोंका मनन करले,या दूसरोंको सिख- लादे, पर जर तक वासनाका परित्याग करके समिति-गुप्ति-आदिरूप सयमकीआराधनानही कर लेतातबतक मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता" ॥१॥ जैसे-पक्षी आकाशमें स्वच्छन्द विहार करते हैं, उसीप्रकार अनुपम अलौकिक आनन्दमय मोक्षमार्गमें विहार करनेवाले सयमी भी अप्र- तियन्धविहारी होते हैं। किन्तु जिस प्रकार जालमें फँसे हुए पक्षीउडनेका यत्न करते हैं पर उड नहीं सकते, उसी प्रकार विषयसेवनकी आशारूप वासनासे मुनि मोक्षमार्गको न पाकर अप्रतिवन्ध विहारसे वचित रहते हैं। हे शिष्य ! इस विषय-वासनाको ऐसी विशाल नदी समझ कि जिसका पार पाना अत्यन्त कठिन है। कहा भी है- “ભલે કે ગમે તેટલા શાસ્ત્રોનું મનન કરી લે, અથવા બીજાઓને શીખવે, પરંતુ જ્યાસુધી વાસનાને ત્યાગ કરીને સમિતિ-ગુપ્તિ આદિરૂપ સયમની ધના કરી લેતે નથી ત્યા સુધી મોક્ષ પ્રાપ્ત કરી શકતું નથી” (૧) જેમ પક્ષી આકાશમાં વુછદ વિહાર કરે છે, તેમ અનુપમ અલૌકિક આન દમય મેક્ષમાગમા વિહાર કરનારા સયમી પણ અપ્રતિબધ વિહારી હોય છે. પરતુ જેવી રીતે જાળમાં ફસેલા પક્ષીઓ ઉડવાને યત્ન કરે છે પણ ઉડી શકતા નથી, તેવી રીતે વિષયના સેવનની આશારૂપ વાસનાથી વાસિત અત કરણ વાળા મુનિએ મોક્ષમાર્ગને ન પામતા અપ્રતિબધ વિહારથી વિચિત રહે છે હે શિષ્ય! આ વિષયવાસનાને એવી વિશાળ નદી સમજ કે જેને પાર પામવે અત્યંત કઠિન છે કહ્યું છે કે- આરા . १३२ श्रीदशवकालिमृत्रे मैषम् , हे शिष्य ! पियवासनेत्र तारत्सकलाऽनयमूलम् , विशेषतारित्र- मुच्छेदयन्ती रागद्वेपी दृढीकुरुते । यथा विदेश गतम्य कस्यचित् यसो जीवित स्यापि श्रुताया मरणया या जना रुदन्ति न तथा तम्मिन्मृतेऽप्यश्रुताया तदीय- मरणप्रत्ती, तस्मागेतीविकृतिरेव मुग्यत' मुग्यदुःसपन्यहेतुः, विषयवासनाया' समुन्छेदमन्तरेण पुनः पुनरष्टविधाना कर्मणामारण न शक्यते प्रतिरोड, तेपा पियवासनामूल्रत्वात् । उक्तश्च- विपयसेवनकी इच्छा भी शान्त हो जायगी तो फिर आतापना आदि याध तप क्यों करना चाहिए ? उत्तर-हे शिष्य ! ऐसी का करना उचित नहीं है, क्योंकि विष- योकी वासना (इच्छा) ही सय अनौँको जड़ है, और चारित्ररूपी वृक्षकी जड़को उखाड़नेवाली है। यह रागदेयको दृढ़ करती है । परदेश गया हुआ कोई इष्टमित्र जीवित हो परन्तु उसकी मृत्युका समाचार मिले तो सम्बन्धी लोग रोने लगते हैं, और यदि वह मर जाय किन्तु मरनेका समाचार न मिले तो कोई भी नहीं रोता। इससे ज्ञात होता है कि चित्तका विकार ही सुखदुःखका मुरय कारण है। इसलिए जब-तक मनसे विषयवासनाका समूल त्याग नहीं होता तब तक आठों कर्मोंकी उत्पत्ति नही रुक सकती, क्योंकि उनका मूल, विषय वासना है। कहा भी है- સેવનની ઇરછા પણ શાન્ત થઈ જાય, તે પછી આતાપના આદિ બાહ્ય તક કરવાની શી જરૂર ? ઉત્તર-હે શિષ્ય! એવી શકા કરવી ઉચિત નથી, કારણ કે વિષેની વાસના (ઈચ્છા) જ બધા અનર્થોનું મૂળ છે અને ચારિત્રરૂપી વૃક્ષના મૂળને ઉખાડનારી છે તે રાગદ્વેષને દઢ કરે છે પરદેશ ગએલે કેઈ ઈછમિત્ર જીવને હિય પરતું તેના મૃત્યુના સમાચાર મળે તે સગા સબંધીઓ રેવા લાગે છે, અને જે તે મરી જાય પણ મરવાના સમાચાર ન મળે તે કઈ પણ રીતુ નથી, એથી સમજાય છે કે ચિત્તને વિકારજ સુખદુ ખનું મુખ્ય કારણ છે એ કારણથી જ્યા સુધી મનમાથી વિષયવાસનાને સમૂળ ત્યાગ નથી તે ત્યાસુધી આઠે કર્મોની ઉત્પત્તિને રોકી શકાતી નથી, કારણ કે તેનું મૂળ વિષય વાસના છે કહ્યું છે કે अन्ययन २ गा. ५ कामरागनिराकरणोपायः - सेवन, तदेवमाकलय तावत्-सुखाशया दीपकोपगमन पतङ्गानाम् , दारुधिया ग्राह-ग्रहण-पुरस्सर नदीतरण मनुष्याणाम् । किञ्च बुभुक्षापिपासादिदृष्टान्तस्यात्र वैपम्य विद्यते, नहि कामा उपभोगेन शाम्यन्ति प्रत्युताभ्यासवशादतितरा रद्धि- मेवोपगच्छन्ति, यदुक्तमन्यत्रापि- "न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविपा कृष्णवर्मेव, भूय एवाभिवर्षते ॥१॥” इति, लोकेऽपि च दृश्यते-यथा यथा वह्नाविन्धनानि प्रक्षिप्यन्ते तथा तथाऽसौ बस तृयही समझ ले-जैसे सुख पानेकी इच्छासे पतगोंका दीपकमें गिरना है, अथवा कोई भोला मनुष्य लकडीसमझकर ग्राहको पकड लेवे और उसीका महारा लेकर नदी पार करना चाहे तो वह कभी सफल- मनोरथ नहीं होगा वरन् उसे प्राण त्यागने पडेंगे, इसी प्रकार 'विपय भोगनेसे विपयोंकी वासना मिट जायगी' यह विचारना ठीक नहीं है। भूख-प्यासका दृष्टान्त भी यहा मेल नहीं खाता,क्योंकि विपय-सेवनसे काम शान्त नहीं होते, बल्कि अधिक-अधिक पढ़ते है। कहा भी है- "कामोंका सेवन करनेसे काम कदापि शान्त नहीं होते, जैसे धीके डालनेसे अग्नि शान्त नही होती वरन् बढ़ती ही जाती है ॥१॥" तथा लोकमे भी देखा जाता है कि-अग्निमें ज्यों-ज्यो इन्धन डाला जाता है, त्यों त्यों वह अधिक प्रचल होती जाती है, बुझती नहीं है। કે-જેમ સુખ પામવાની ઈચ્છાથી પત દીપકમા હેમાય છે, અથવા કઈ ભેળે માણસ લાડુ સમજીને ગ્રાહ (મગર)ને પકડી લે અને તેને આધારે નદી પાર કરવા ઈચ્છે તે કદાપિ તેને મને રથ સફળ ન થાય પરંતુ તેને પ્રાણ ત્યજવાનો જ વખત આવે, તેમ “વિષય ભોગવવાથી વિશેની વાસના મટી જશે એમ વિચારવું એ બરાબર નથી ભૂખ તરસનું દૂછાત પણ અહીં બધ બેસતુ નથી, કારણ કે વિષય–વનથી કામ શાન્ત થતું નથી, પરંતુ વધારે ને વધારે વધે છે કહ્યું છે કે- સેવન કરવાથી કામ કદાપિ શાન્ત થતી નથી, જેમ ઘી નાખવાથી અગ્નિ શાન્ત થતું નથી, પરંતુ વધતું જાય છે ” (૧) તેમજ જગતમાં પણ જોવામાં આવે છે - અગ્નિમાં જેમ-જેમ ઈધન નાખવામાં આવે છે, તેમ–તેમ તે વધારે પ્રબળ - " मेनु १३४ श्रीदशवकालिकसने आशा नाम नदी मनोरथजला तृष्णातरशाला, रागग्राहवती पितर्कविहगा धैर्यद्रुमध्वसिनी । मोहाऽऽवर्तमुदुस्तराऽतिगहना प्रोत्तुगचिन्तातटी, तस्याः पारगता पिशुदमनसो नन्दन्ति योगीश्वराः॥१॥" इति अपर चाऽऽफर्णय- "पिपयाशामहापाशाद् , यो विमुक्तः मृदुस्त्यजात् । स एप कल्पते मुक्त्यै नान्यः पट्शास्रवेपि ॥१॥” इति, हे शिष्य ! एर विपयभोगस्पृहाऽपि महतेऽनय कल्पते, किं पुनस्तदुप- आशा, नदीके समान है, इसमें मनोरथरूपी जल भरा हुआ है। तृष्णाकी तरगे छलागे मार रही हैं,रागरूपी ग्रार इसमें निवास करते हैं, नानाप्रकारके सोच विचार ही इसमें पक्षी है, यह नदी धीरता-रूपी वृक्षको विध्वस करनेवाली है, चिन्तारूपी इसका तट है, इसका पार करना बहुत कठिन है,जोमुनीश्वर इस नदीको पार कर लेते हैं वे हीसुखी होते हैं॥१॥" और सुनो- "विपयोंका आशापाशदुस्त्याज्य है । जोइस पाशसे मुक्त हो जाते हैं वेही मोक्ष-मार्गके अधिकारी होते हैं, अन्य नहीं, चाहे वह सभी शास्त्रोंके पारगत क्यों न हो! ॥१॥" हे शिष्य ! इसप्रकार विषय भोगनेकी इच्छा भी महान् अनर्थको उत्पन्न करती है, तो विषयों के सेवनके विषयमे तो कहना ही क्या है? આશા નદીના જેવી છે, તેમાં મને રથરૂપી જળ ભરેલું છે તૃષ્ણના તરો ઉછળી રહ્યા છે, રાગરૂપી ગ્રાહ એમાં નિવાસ કરે છે, નાના પ્રકારના વિચારે તેમાં પક્ષીરૂપ છે, એ ધીરતારૂપી વૃક્ષને ધ્વસ કરવાવાળી છે એનું તટ છે એ નદીને પાર કરવી અત્યંત કઠિન છે, જે મુનીશ્વર એ નદીને પાર रे छे ते सुभी थाय छ,” (१) मने वणी श्रवण ४२१- “વિષયને આશાપાશ ત્યાજ્ય છે જેઓ એ પાશથી મુક્ત થઈ જાય છે તેઓ જ મેક્ષમાર્ગના અધિકારી બને છે–બીજા નહિ, પછી ભલે તેઓ બધા शास्त्रोना पात उभ न य?" (१) હે શિષ્ય એ રીતે વિષય ભેગવવાની ઈચ્છા જ મહાન્ અનર્થને ઉત્પન્ન કરે છે, તે વિયેના સેવનની બાબતમાં તે કહેવું શું ? બસ, a " ચિન્તા સમજી ।

अभ्ययन २ गा. ५ कामरागनिराकरणोपायः १३७ १ . अथ च-तात्कालिकमेव बुभुक्षाधुपशम मति भोजनादेरन्वयव्यतिरेकत' कारणता विद्यते, अतस्तादृशभुक्षायुपशमनकामनयैव भोजनापादीयते, अन तु यावजीवन विपयसेवनेच्छामशमः साधुननाऽभिलापविषय इति तादृशमशममुद्दिश्य प्रवर्तमानाना मुनीना विषयसेवन कदापि नोपादेयम् , विपयसेवनसमये हि तदीयवासना रागमनुवर्द्धयन्तीन्द्रियाणि च सवलयन्ती विविधाशुभभावनामुद्भावयति-'अयमुपभोगो न जातु नश्यतु, उत्तरोत्तर चानुवर्द्ध- ताम्, न चैन प्रतिवनन्तु केऽपि विनाः' इत्यादि । एव च विपयसेवनेन नेव तदभिलापोपशमः प्रत्युत तद्विपरीन प्रतिक्षण वर्द्धमान एवं तदभिलापः पाशवद्ध- जय भोजन किया जाता है तोक्षुधाकी तात्कालिक शान्ति होजाती है विना भोजन किये नहीं होती, इसलिए अन्वय-व्यतिरेकडारा भोजन तात्कालिक क्षुधा-निवृत्तिके प्रति कारण होता है । इसी कारणसे क्षुधा आदि शान्त करनेके लिए भोजन आदि किया जाता है । साधु जीवन- पर्यंत विपय-सेवनकी अभिलापाकी शातिकी इच्छा रखते है। इस शान्तिके लिए प्रवृत्ति करनेवाले मुनियोंको कदापि विषयसेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि विषयवासना, विपयसेवनके समय राग-भावकी वृद्धि करती है और इन्द्रियोंको सबल बनाकर नाना प्रकारकी दुर्भावना उत्पन्न करती है कि-'यह भोग कभी नष्ट न होजाय, उत्तरोत्तर बढ़ता जाय, इमके भोगनेमें कोई विघ्न न आजावे' इत्यादि । अत एव विषय- सेवन करनेसे विषयकी अभिलापा शान्त नही होती, बल्कि प्रतिक्षण अधिक-अधिक बढ़ती जाती है । यहा तक कि यह विषयलालसा पुरुषको જ્યારે ભેજન કરવામા આવે છે ત્યારે મુધાની તાત્કાલિક શાતિ થઈ જાય છે, જન વિના શાતિ થતી નથી, તેથી અન્વય વ્યતિરેક દ્વારા ભેજન, તાત્કાલિક સુધાનિવૃત્તિને પ્રતિ કારણ બને છે આ કારણથી સુધા આદિ શાન્ત કરવાને માટે ભેજન આદિ કરવામાં આવે છે સાધુ જીવનપર્યત વિષયસેવનની અભિ લાષાની શક્તિની ઈરછા રાખે છે આ શાન્તિને માટે પ્રવૃત્તિ કરનારા મુનિઓએ કદાપિ વિષયસેવન કરવું ન જોઈએ, કારણ કે વિષયવાસના વિષયસેવનને સમયે રાગ-ભાવની વૃદ્ધિ કરે છે, અને ઈદ્ધિને સબળ બનાવીને એવી નાના પ્રકારની દુર્ભાવનાઓ ઉત્પન્ન કરે છે કે-આ ભેગ કદાપિ નષ્ટ ન થાય, ઉત્તરોત્તર વધતું જાય, એને ભેગવવામા કાઈ વિન ન આવે” ઈત્યાદિ, એટલે વિષયસેવનથી વિષયની અભિલાષા શાન્ત થતી નથી, બકે પ્રતિક્ષણ અધિક–અધિક વધતી જાય છે, તે એટલે સુધી કે એ વિષયલાલસા પુરૂષને કેવળ નામે બનાવી દે છે , श्रीदनकालिगमूत्रे मारल्पमधिगच्छति । अन्यञ्च दट्ठरोगप्रशमनामिपिणा यथा यथा तदीयकाडू- यनादरः क्रियते, तथा तथा दगुरोगो पर्षमान एरानुभूयते न तु जातु तदु. पशमो लक्ष्यते कुनाऽपि, तद्वद् विषयसेग्नतो न विपयवृष्णोपशमः । अपर चात्र पम्य, तथाहि-पिपयसेपनेच्छोपगम प्रति विषयसेवनस्य, बुभुक्षा- घुपशम मति भोजनादेरिस कारणत्वमहीकत्य यत् तदुपादेयता त्वयोपपायते तन्न मनोरमम्, अन्वयव्यतिरेको हि सर्वसमतों कार्यकारणभारनियामकी, तत्रा:- न्वयः-'तत्सत्त्वे तत्सत्तारूप: व्यतिरेकस्तु- तदभावे तदभारस्पः । यथा सर्व- विरतिसत्वे साधुत्वसत्ता, तदभावे च साधुसत्ताया अभार इत्यन्वय व्यतिरेकाभ्या साधुत्वकारण सपिरतिचारितमिति गम्यते । अथवादादको खुजलानेसे दाद रोग मिटतानहीं किन्तु घड़नाही जाता है । उक्त दृष्टान्तमें और भी विषमता है सो करते-जैसे बुभुक्षा (भूख) आदिको शान्त करने में भोजन आदि कारण है, इसी प्रकार विपय-सेवनकी इच्छाको शान्त करनेमें विषयोंका सेवन कारण है, ऐसा मानकर तुम विषय-सेवनको उपादेय करते हो सो ठीक नहीं है। यह सब मानते हैं कि अन्वय-व्यतिरेकसे कार्यकारणभावका निश्चय होता है, कारणके होने पर ही कार्यका होनाअन्वय कहलाता है, और कारणके अभावमें कार्यका न होना व्यतिरेक कहलाता है। जैसे सर्वविरतिरूप चारित्रके होने पर ही साधुता होती है और सर्वविरतिरूप चारित्रके अमावमें साधुता नहीं रहती। इस अन्वयव्यतिरेकसे ज्ञात होता है कि विरति साधुत्वका कारण है । થતો જાય છે, એવો નથી અથવા દાદરને ખજવાળવાથી દાદર મટતી નથી પણ વધતી જાય છે ઉકત દાતમાં બીજી પણ વિષમતા છે તે કહે છે- જેમ ભૂખ આદિને શાન્ત કરવામાં ભેજન આદિ કારણ છે, તેમ વિષય-સવાની ઇચ્છાને શાન્ત કરવામાં વિષેનું સેવન કારણ છે, એમ માનીને તમે વિષયસેવનને ઉપાદેય કહે છે તે બરાબર નથી સૌ એમ તે માને છે કે-અન્વય વ્યતિરેકથી કાર્ય કારણભાવને નિશ્ચય થાય છે કારણ હોવાથી જ કાર્યનું બનવુ અન્વય કહેવાય છે અને કારણના અભાવમા કાર્યનું ન બનવુ એ વ્યતિરેક કહેવાય છે, જેમ સર્વવિરતિરૂપ ચારિત્ર હોવાથી જ સાધુતા હોય છે અને સર્વવિરતિરૂપ ચારિત્રના અભાવમાં સાધુતા રહેતી નથી આ અવય વ્યતિરેકથી સમજાય છે કે વિરતિ સાધુત્વનું કારણ ६ 3 १ अ ययन २ गा. ६ त्यक्तभोगाङ्गीकरणे सर्पदृष्टान्तः १३९ उक्तमर्थ दृष्टान्तेन स्फुटीकरोति-'पक्खदे० ' इत्यादि, मूलम्-पक्खंदे जलियं जोइ, धूमकेउ दुरासय । नेच्छंति तय भोत्तु, कुले जाया अगंधणे ॥६॥ छाया-प्रस्कन्दन्ति ज्वलित ज्योतिप, धूमकेतु दुरासदम् । नेच्छन्ति वान्त भोक्त, कुले जाता अगन्यने ॥६॥ सान्वयार्थ:- अगधणे अगन्धननामक कुले-कुलमें जाया उत्पन्न हुए (सर्प) जलिय= जलती हुई धूमकेउ धुआँ निकालती हुई (और) दुरासय-असह्य नहीं सहने योग्य (ऐसी) जोह-अग्निमें पक्खदे प्रवेश कर जाते है,(किन्तु) वतय-उगले विपको भोत्तु भोगनेकी नेच्छति इच्छा नही करते । अर्थात् अगन्धन सर्प भी त्यागे हुएको फिर ग्रहण नहीं करना चाहते ॥६॥ टीका-गन्यना-गन्धनभेदेन भुजगा द्विविधास्तत्र गन्धनास्ते ये मन्त्रमयो- गादिवशाद्दष्टपदेशे चान्त विप पुनश्शूपन्ति, तद्भिन्ना अगन्धनास्तत्कुलमगन्धन तस्मिन्, कुले जाता' समुत्पन्ना. सर्पा इति शेषः, चलित-पदीप्त धूमकेतु-म केतु-श्चिह्न यस्य त धूम-वजमित्यर्थः, अत एव दुरासदम्-दुःखेन आसयते-धातूना- मनेकार्थत्वात् सह्यते सवेयते इति वाऽयस्त दुष्पवेशमिति यावत् , ज्योतिषम् अग्निम् मस्कन्दन्ति पविशन्ति, किन्त्वितिशेप', वान्तम्-उद्गीर्ण सन्त्यक्तमितियावत् इसी विषयको दृष्टान्तद्वारा स्पष्ट करते है- 'परखदे०' इत्यादि। सँॉप दो प्रकारके होते हैं-(१) गन्धन और (२) अगन्धन, गन्धन सर्प उन्हें कहते हैं जो मन्त्रादिके बलसे विवश होकर काटेहुए स्थानसे उगले विषको फिर चूस लेते है। अगन्धन इनसे विपरीत होते है। उस अगन्धन कुलमे उत्पन्न हुए सौंप अगन्धन सर्प कहलाते है।वेसर्प मा विषयने हटान्त द्वारा स्पष्ट ४२ छे-पक्खद० पत्या સાપ બે પ્રકારના થાય છે (૧) ગ ધન અને (૨) અગ ધન ગ ધન સર્ષ એ કહેવાય છે કે જે મ ત્રાદિના બળથી વિવશ થઈને ડ ખેલા સ્થાનમાં નાખેલું ઝેર તેમાથી પાછુ ચૂસી લે છે અગધન સર્પ તેથી વિપરીત પ્રકાર હોય છે એ અગ ધન કુળમાં ઉત્પન્ન થએલે સાપ અગધન સર્ષ કહેવાય છે એ સર્ષ . १३८ श्रीदशवकालिकमूत्रे मित्र पुरुप पुरुषार्थसाधनाक्षम कुरुते, तस्मात् कार्यकारणभावनियामकाऽन्वय- व्यतिरेकामावेन यानीवन रिपयसेवनकृष्णापशम प्रति विपयसेवनस्य कारणता- ऽनुपपत्त्या तादृशोपशमाऽभिलापरता सयतानामनुपादेयत्व सिद्धम् । इत्य पूर्वार्द्धन गाह्यकामपरित्यागमुक्त्या पश्चानाऽऽभ्यन्तरकामपरित्याग- माह-'छिंदाहि०' इति, शब्दादिविपयेपु द्वप लिन्धि-मुश्च, तथा राग-कामराग व्यपनय दूरीकुरु, एवम् एव कृते सति, सम्पराये जन्ममरणरूपत्वेन नाशमये ससारेऽपीति भावः । यद्वा परीपहोपसर्गरूपे सग्रामे,यमितिशेपः, मुखी-स्वात्मि- कानन्दभाग भविप्यसीति गाथार्थः ॥५॥ इतना निकम्मा बना देती है कि वह पुरुपार्थ-साधनमें सर्वधा असमर्थ हो जाता है, जैसे फन्देमे फंसा हुआ पुरुप कुछभी पुस्पार्थ नहीं कर सकता। इसलिए यहाँ कार्य-कारणभावका निश्चय करानेवाले अन्वय- व्यतिरेकका अभाव होनेसे यावज्जीवन विषय लालसाकी शान्तिके प्रति विषयसेवन कारण नहीं हो सकता। अतः यावजीवन विषयाभिलाषाकी शान्ति चाहनेवाले मुनियोंको यह उपादेय नहीं है। इस प्रकार पूर्वार्द्धमें सूत्रकार बाह्य विषयोका त्याग पताकर उत्त रार्द्धमें अन्तरङ्ग- विषयोंके त्यागका उपदेश देते हैं कि-हे शिष्य ! शब्दादि-विषयोंमें द्वेष तया रागको दूर कर। ऐसा करनेसे तृजन्म मरण स्वरूपवाले विनश्वर ससारमें सुखी, अथवा अनुकूल प्रतिकूल परीषह और उपसर्ग रूप सग्राममें विजयी होगा ॥५॥ અને તે પુરૂષાર્થસાધનમાં સર્વથા અસમર્થ બની જાય છે, કે જેવી રીતે ફદામાં (હેડમા) ફલે પુરૂષ કોઈ પણ પુરૂષાર્થ કરી શકતું નથી તેથી કરીને અડી કાર્ય-કારણભાવને નિશ્ચય કરાવનારા અન્વય-વ્યતિરેકને અભાવ હોવાથી જીવન પયત વિષયલાલસાની શાન્તિની પ્રતિ વિષયસેવન કારણ થઈ શકતું નથી, એટલે જીવનપર્યત વિષયાભિલાષાની શાતને ચાહનારા મુનિઓને માટે એ ઉપાદેય નથી એ પ્રકારે પૂર્વાર્ધમા સુરકાર બાહા વિના ત્યાગ બતાવીને ઉત્તરાર્ધમાં અતરગ વિષયેના ત્યાગને ઉપદેશ આપે છે કે-હે શિષ્યા શબ્દાદિ વિષમ દ્વેષ તથા રાગને દૂર કર એમ કરવાથી જન્મ મરણસ્વરૂપવાળા વિનવર સંસારમાં સુખી, અથવા અનુકૂળ પ્રતિકૂળ પરીષહ તથા ઉપસર્ગના સંગ્રામમાં વિજયી થઈશ (૫) , अ ययन २ गा. ७ रथनेमि प्रति राजीमत्युपदेशः १४१ अरिष्टनेमी भगति प्रजिते तत्कनिष्ठभ्राता रथनेमी राजीमती चक्रमे, सातु कामवासनाविरक्ता कदाचन मुशासितसरसपायस भुक्त्वा कस्मिंश्चित्कटोरके समुद्वम्य 'भुज्यता'-मित्युक्त्वा स्थनेमये दत्तवती, रथनेमिना च कथमिद वान्त क्षत्रियवशारतसेन मया भोक्ष्यते' इत्युक्ता सा पोवाच- तहि कथमरिष्टनेमिना स्वद्भाना समुज्झिततया वान्ततुल्या मामभिलप्यसि ? न च त्रपसे 'इति, ततश्च तद्वचनश्रवणसञ्जातवैराग्योऽसौ पात्रानीत् । जर वाईसवें तीर्थकर भगवान् अरिष्टनेमिने दीक्षा ग्रहण कर ली तर उनके छोटे भाई रथनेमिने राजीमतीकी इच्छा की, किन्तु सती- शिरोमणि राजीमती, कामकी वासनासे विरक्त हो चुकी थी। उसने एक रोज सुगन्धित तथा स्वादिष्ट खीर खाई और एक कटोरेमे वमन करके वह रयनेमिको देने लगी और बोली-लीजिये खीर खाइए । रय- नेमि यह सुनकर आगबबूले (क्रुद्ध) हो गये और बोले-'म क्षत्रियों के वशका भूपण होकर चमन की हुई ग्वीर कैसे खाऊगा "राजीमतीजी कहने लगी-'अहो श्रेष्ठक्षत्रिय ! तुम वमन की हुई ग्वीर नहीं खाते तो, अपने बडे भाई श्रीअरिष्टनेमिद्वारा वमन की हुई यानी त्यागी हुई मुझको क्यों चाहते हो मेरी इच्छा करते तुम्हें लज्जा नही आती, सती राजीमतीकी हृदयमे चुमनेवाली घात सुनतेही रथनेमिको ससारसे विरक्ति होगई। उन्होंने दीक्षा लेली। कुछ दिनोंके बाद राजीमतीने भी જ્યારે બાવીસમા તીર્થંકર ભગવાન અરિષ્ટનેમિએ દીક્ષા ગ્રહણ કરી, ત્યારે તેમના નાના ભાઈ રથનેમિએ બાજીમતીની ઈરછા કરી, પરંતુ સતીશિરોમણિ રાજીમતી કામની વાસનાથી વિરકત થઈ ચૂકી હતી તેણે એક દિવસ સુગંધિત અને સ્વાદિષ્ટ ખીર ખાધી અને એક વાડકામાં તેનું વમન કરીને તે રથનેમિને આપવા લાગી અને બેલી ત્યે, ખીર ખાઓ ” રથનેમિ એ સાભળીને ક્રોધા વિષ્ટ થઈ ગયું અને બે ‘હુ ક્ષત્રિયેના વશનું ભ્રમણ થઈને વમેલી ખીર કેમ ખાઈ ?” રાજીમતી કહેવા લાગી “ અહીં શ્રેષ્ઠ ક્ષત્રિય ! તમે મેલી ખી- નથી ખાતા તે તમારા મેટાભાઈ શ્રીઅરિષ્ટનેમિએ વમેલી એટલે ત્યજેલી એવી મને કેમ ચાહે છે ? મારગ માટેની ઈરછા કરતા તમને રામ નથી આવતી ?” હૃદયને ડખે એવી સતી રામતીની વાત સાંભળતા જ રથનેમિને સ સારથી વિરકિત આવી ગઈ એમણે દીક્ષા લીધી કેટલાક દિવસ પછી રાજીમતીએ પ १४० श्रीदशवकालिकस्बे विपमितिशेपः भोक्त नेन्छन्तिम्माभिलपन्ति । तिर्यनः सर्पा अपि वहिमवेशा- पेक्षया दुःसहमनुचित च वान्ताशनमेव मन्यन्ते । तस्मात् शिष्य ! प्रवचनतत्वाभिझेन त्वया निःसारतया परित्यक्तस्य रिपयस्य पुनः स्वीकरण न विरेयमिति भावः । मुर्मुरादिशान्तज्वालाग्निव्यवच्छेदार्थमाह-'जलिय' इति, अारोल्कादिव्याहत्यर्थम् अमेदिप्यमाणत्ववोतनाथै चाह-'धूमकेउ' 'इति, । तीनतमत्वबोधनाथै 'दुरासय इति । अग्निपर्यायो ज्योति:-शब्दः पुंल्लिाः। 'जलिय' मित्यादिविशेषणत्रयेण 'यत्रामा प्रवेशे सद्यो भस्मसाद् भवति वाहशेऽप्यगन्धनमाः सर्पाः प्रविशन्ति किन्तु परित्यक्तविपमापातु नैव वान्छन्ति, एव सत्पुरुषा अपि परित्याकान् विषयान् मरणान्तेऽपि न पुनः सेवितुमिच्छन्तीति.वोध्यते, इति गाथार्य॥६॥ असह्य और जलती अग्निमें प्रवेश कर जाते हैं, किन्तु त्यागे हुए विषको फिर नहीं चूसते। है शिष्य!जय तिर्यश्च सर्प भी उगले.एको निगलना नहीं चाहते तय तू.तो प्रवचनमें प्रवीण है अत एव निःसार समझ कर त्यागे हुए विषयोंका सेवन तुझे तो भूलकर भी नहीं करना चाहिए । अग्निके 'ज्वलित' आदि तीन विशेषण दिये हैं, उनका अभिप्राय यह है कि जिस अग्निमें प्रवेश करतेही तत्काल भस्म हो जावे उस मकारकी अग्निमे भी अगन्धन कुलके सर्प प्रवेश करजाते है पर त्यागे हुए विषको ग्रहण नहीं करते । इसी प्रकार कुलीन पुरुषभी त्यागे हुए विषयोंको प्राणसकटमेभी ग्रहण नहीं करते। अर्थात् वे दुष्कर्म करके क्षणभर भी जीना नहीं चाहते ॥६॥ અસહ્ય અને બળતી આગમાં પ્રવેશ કરે છે પરંતુ એકવાર મૂકેલા ઝેરને પાછું ચૂસી લેતે નથી દે શિષ્ય! જ્યારે તિર્યંચ સર્ષ પણે મૂકેલા ઝેરને પાછું ગળી જવા ઈચ્છતે નથી તે તુ ત્યારે પ્રવચનમાં પ્રવીણ છે, એટલે નિ સાર સમજીને ત્યજેલા વિષયેનું સેવન તારે તે ભૂલેચૂક્યું- પણ ન કરવું જોઈએ मनिन 'ज्वलित' मा विशेषणे। आपेक्षा छ, तर सेतु मे छ :- જે અગ્નિમાં પ્રવેશ કરતા જ તત્કાળ ભસ્મ થઈ જવાય એ પ્રકારના અગ્નિમાં પણ અગધન કુળને સર્પ પ્રવેશ કરે છે, પરંતુ ત્યજેલા વિષને ગ્રહણ કરતે નથી એ પ્રમાણે કુલીન પુરૂ પણ ત્યજેલા વિષયેને પ્રાણસ કટમા કરતા નથી અર્થાત તેઓ દુષ્કર્મ કરીને ક્ષણભર પણ જીવવા ઇરછતા નથી' (૬) પણ ગ્રહણ 3 २ १ ४ ५ ७ १२ 13 - अध्ययन २ गा. ७ रयनेमि प्रति राजीमत्युपदेशः १४३ रसौ राजीमती पुनर्यदुक्तवती तदेव तिसृभिर्गाथाभिः सूत्रकारो ब्रूते-'घिरत्यु०' इत्यादि । मूलम-धिरत्यु ते जसोकामी, जो तं जीवियकारणा। वतं इच्छसि आवेडं, सेय ते मरणं भवे ॥७॥ छाया-धिगस्तु त्वा (ते) यशःकामिन् , यस्त्व जीवितकारणात् । वान्तमिन्स्यापातु, श्रेयस्ते मरण भवेत् ॥७॥ रथनेमिके प्रति राजीमती कहती है- सान्वयार्थः-जसोकामी हे यशके अभिलापी ते तुझे घिरत्यु-धिकार हो, जो-जो तस्तू जीवियकारणा=असयमजीउन मुखके लिये वत-वमन किये -त्यागे हुएको आवेउ-पीना इच्छसिचाहता है, (इससे तो) ते तेरा मरण= मरजाना सेय अच्छा भवे है । अर्थात-सयम धारण करके फिर असयममें आना अत्यन्त निन्दनीय है, और उस असयमकी अपेक्षा सयमी अवस्थामें मृत्यु होजाना अच्छा है ॥७॥ देव- टीका-कामयते चान्छति तच्छील कामी, यशसः सयमस्य कीतर्वा कामी यशाकामी, तत्सम्बुद्धी हे यशःकामिन् !, यद्वा अकारच्छेदाद् हे अयशाकामिन्= कुछ कहा उसे सूत्रकार तीन गाथाओंसे कहते हैं- 'धिरत्यु०' इत्यादि। हे यशके अभिलापी ' तुझे धिक्कार है, जो असयम जीवनके सुखके लिए वमन किये हुएको खाना चाहता है,इस प्रकारके जीवनसे मर जाना ही अच्छा है। हे यश अर्थात् सयम अथवा कीर्तिकी इच्छा करनेवाले ! अथवा हे असयम और अपयशके कामी ! तुझे धिक्कार है,तृ अत्यन्त निन्दाका રમણીય રાજીમતીએ જે કાઈ કહ્યું તે વાત સૂત્રકાર ત્રણ ગાથાઓમા કહે છે घिरत्यु० त्यात હે યશના અભિલાષી ! તને ધિક્કાર છે, જે અસથમ જીવનના સુખને માટે વમેલાને ખાવા ઈચ્છે છે, એ પ્રકારના જીવનથી તે મરવું જ વધારે સારું છે ચશ અર્થાત્ સયમ અથવા કીર્તિની ઈરછા કરનારા, અથવા અસયમ અને અપયશના કામી ! તને ધિકાર છે, તે અત્યંત નિદાને પાત્ર છે અથવા તે કામી !

श्रीदशवकालिकम अर्थकदा गृहीतपत्रज्या सा राजीमती साधीभिः परिगता रक्तकपर्वतसम- वस्त भगानमरिष्टनेमि पन्दितु नजन्ती मन्येमागै जलपरष्टवरजर मुलधारया- ऽऽर्द्रगानकाकिनी काकतालीयन्यायेन तदेव गिरिकन्दरमाससात, यत्रासौ पत्र- जितो रथनेमिरपि ततः पूर्व गत्वा स्थित आसीत् , तमनालोक्यत्र 'विविक्तोऽय प्रदेश' इति रिचार्याऽऽवखाणि प्रसारयामास । तदानीं ता यथाजाता (नग्ना) विलोक्य भनाऽभ्यन्तरगोऽनगोपहतचित्तरनिनित्तिपरिच्युतो रथनेमिः पुना रथनेमिवान्तभावः समपद्यत । त भूयो जातकाममालोक्य प्रकामकमनीयाकृति- दीक्षा लेली । राजीमती, बहुतसी साध्वियोंके परिवारसे परिवृत होकर रैवतक पर्वतपर पधारे हुए भगवान् अरिष्टनेमिको चन्दना करने गई तर मार्गमें अचानक ही पानीकी मुसलधार वर्षा होने लगी, सारा शरीर और वस्त्र, पानीसे भीग गया। सयोगसे राजीमतीने भी उसी गुफामे प्रवेश किया जिसमें रथनेमि पहलेसे ही ठहरे हुए थे। जिस स्थानपर रचनेमि बैठे थे उधर दृष्टि न पडनेके कारण वे दृष्टिगोचर न हुए। राजीमतीने एकान्त स्थान समझ कर भीगे कपडे फैला दिये । राजीमतीको कपडेरहित देखकर रथनेमिका चित्त चलित होगया। उनके मन पर काम विकारने आक्रमण कर लिया। वे सयम च्युत होगये । रथकी-नेमि (पहिये) की भाँति उनका चित्त घूमने लगा। रयनेमिको इस प्रकार कामातुर देखकर रतिसी रमणीय राजीमतीने जो मार्गसे દીક્ષા લીધી રાજીમતી અનેક સાધીઓના પરિવારથી વિટાઈને રવતક પર્વત પર પધારેલા ભગવાન અરિષ્ટનેમિને વંદના કરવા ગઈ, ત્યારે માર્ગમાં અચાનક મૂશળધાર વરસાદ વરસવા લાગ્યું તેનું આખુ શરીર અને વસ્ત્રો પાણીથી ભીંજાઈ ગયા સગવશ રાજીમતીએ એજ ગુફામાં પ્રવેશ કર્યો કે જે ગુફામાં રથનેમિ પહેલેથી આવીને રહ્યા હતા જે સ્થાન પર રથનેમિ બેઠા હતા તે સ્થળ પર દષ્ટિ ન પડવાને લીધે તે રાજીમતીને દષ્ટિગોચર ન થયા તેથી તે એકાન્ત પ્રદેશ જાણીને પિતાના ભજાયેલા લૂગડા ફેલાવી દીધા ત્યારે તે રાજીમતીને વસ્ત્ર હત જોઇને રથનેમિનુ ચિત્ત ચલિત થઈ ગયુ આક્રમ ણ કર્યું તે સયમમાર્ગથી ભ્રષ્ટ થઈ ગયા स्थनी नमि (ड)नी पेठे તમનું ચિત્ત બ્રમવા લાગ્યું નેમિને એ પ્રમાણે કામાતુર જઇને રતિ જેવી એમના મન પર કામવિકારે २ 3 ૫ ४ ८ १० ६ ૧૨ अध्ययन २ गा. ८-९ रथनेमि प्रति राजीमत्युपदेशः १४५ होकर सजम-सयमको चर-पालो । भावार्थ-राजीमती स्थनेमिसे कहती है कि हम दोनो उच्च कुलोमें उत्पन्न हुए है, अतः उगले हुए विपको वापिस पीजाने- वाले गन्धन सापोके समान हमको नीच न होना चाहिए ॥ ८ ॥ टीका-'अह च' इत्यादि । चद्वय समुच्चयार्थम् , हे स्थनेमे ! अह-राजीमती भोगराजस्य-तन्नम्ना प्रसिद्धस्य अस्मीतिशेपः, अह भोगराजस्य पौत्रीति भावः । स्वच अन्यपणेतनाम्ना प्रसिद्धम्य असि, अन्यस्वृष्णिापौत्रोऽसीत्यर्थः। ततः किं तदाह-कुले बशेऽर्थानिष्फलके गधनौबन्धनकुलसम्भूतसर्पसदृशी, 'आवा' मिति गम्यते, माभूवनभवेच, तस्मात् निभृतः निश्चलो विपयादिभिरक्षोभ्यः सन् सयमम् अनश्वरसुससाधनभूत निरवयक्रियाऽनुष्ठान चर पालय। इति गाथार्थ:८ मूलम्-जइ त काहिसि भावं, जा जा दिच्छसि नारिओ। वायाविद्ध व्व हडो, अहिअप्पा भविस्ससि ॥९॥ छाया~यदि त्व करिष्यसि भाव, या या द्रक्ष्यसि नारीः । वातापिद्ध इच घडो,ऽस्थितात्मा भविष्यसि ॥ ९ ॥ सान्वयार्थ:-जइ यदि त-तुम जा जाजो-जो नारिओ=स्त्रीको दिच्छ सि=देखोगे (उन उनपर) भाव-भुरे विचार काहिसि-करोगे तो वायाविद्धब्ध= "अह च' इत्यादि । हे रथनेमि ! मैं (राजीमती) भोगराजकी पोती और उग्रसेनकी बेटी हैं, और तुम अन्धकवृष्णिके पौत्र तथा समुद्रविजयके पुत्र हो, इसलिए दोनोही निर्मल कुलोंमे उत्पन्न हुए हैं। हमें गन्धन कुलमें उत्पन्न होने वाले सर्पोके समान नहीं होना चाहिये । अत विपय आदिको त्याग करके अनन्त सुखके कारणभूत निरतिचार सयमका पालन करो ॥८॥ अह च त्याहि यनमि! (भती) लोन पोत्री भने ઉગ્રસેનની પુત્રી છું, અને તમે અ ધકવૃષ્ણના પૌત્ર તથા સમુદ્રવિજયના પુત્ર છે, એ રીતે આપણે બેઉ નિર્મળ કુલેમાં ઉત્પન્ન થયા છીએ આપણે ગધન કુવામાં ઉત્પન્ન થએલા સર્પના જેવા ન થવું જોઇએ માટે વિષય આદિને ત્યજીને અનત સુખના કારણભૂત નિતિચાર સયમનું પાલન કરે (૮) . २ ४ 3 ९ ५ ८ १२ ११ 13 १४४ श्रीदशकालिकमूत्रे हे असयमापयशोऽर्थिन् ! त्वा धिगस्तु, निन्योऽसि त्वमित्यर्थः 'ते' इति द्वितीयायें पष्ठी, यद्वा 'ते' इति पष्टचन्तमेन, तर 'पीरुप'मित्यस्य शेपः, पिगित्यनेन सम्बन्धः, तेन्तब पौरुप घिगित्यर्थः । यद्वा हे कामिन् । तेता यश: ' अहो धन्योऽय तीनतपासयमत्रतपरिपारको महात्मेत्येव लोकमतीता कीत्तिम् , अथवा अयश = मा दृष्ट्वैव दुष्टचेष्टनरूप पाप धिगस्त्वित्यर्थः, इति वयम् , यस्स्व जीवितकारणाव- असयमजीवितसुखार्थमिति भारः, वात भगवता परित्यक्तत्वाद्वान्तसदृशीं माम् , यद्वा सयमसेवित्वेन परित्यक्तस्य विषयस्यैवमभिलापोदयाद्वान्ततुल्य विषयम् आपातम्-उपसर्गवशेन धात्वर्थभेदादुपभोक्तम् इच्छसिकामयसे, ते-तब मरण- मृत्युः श्रेयः प्रशस्य श्रेष्ठ भवेत् , न पुनरित्थमनाचरणीयाऽऽचरणमिति गाथार्य ।। मूलम्-अह च भोगरायस्स, त च सि अंधगवण्हिणो। मा कुले गधणा होमो, सजम निहुओ चर ॥ ८॥ छाया-अह च भोगराजस्य, त्वचासि अन्धककृपणेः । मा कुले गन्धनौ भूव, सयम निभृतश्वर ॥८॥ सान्वयार्थः-अचम्मै (राजीमती) भोगरायस्स-भोगकुलकी हूँ, च और त-तुम अधगवरिणो अधकप्णिकुलके सि हो, कुले ऐसे उच्च कुलमें गधणा=(दोनो) गन्धन मा नही होमो हो । (अत') निहुओ-निश्चल पात्र है । अथवा हे कामी 'जगतमे तुम्हारी इस प्रकारकी जो कीर्ति फैली हुई है कि "यह रथनेमि मुनि, अत्यन्त उत्कृष्ट सयमका पालन करने- वाला महात्मा है" इस कत्तिको धिक्कार है, क्योंकि तुम असयम रूप जीवितके लिए, भगवान् अरिष्टनेमिके द्वारा त्यागी हुई मुझको, अथवा सयम पालनके लिए त्यागे हुए विषयोंको फिर चाहते हो, तुम्हें मर जाना अच्छा है किन्तु असयमकी वाछा करना अच्छा नहीं है ॥७॥ જગતમા તારી એ પ્રકારની જે કીતિ ફેલાઈ છે કે “આ રથનેમિ મુનિ અત્યંત ઉત્કૃષ્ટ સયમનું પાલન કરનારા મહાત્મા છે,” એ કીર્તિને ધિક્કાર છે કેમ કે તમે અસયમરૂપ જીવિતને માટે, ભગવાન અરિષ્ટનેમિએ ત્યજેલી એવી મને, અથવા સયમપાલનને માટે ત્યજેલા વિષયેને પાછા ચાહી છે. તમારે મરી જવું જ સારું છે, પરંતુ અસયમની વાછના કરવી સારી નથી (૭) , , १ ૨ 3 ૫ ४ ८ ६ ૧૨ अ ययन २ गा. ८-९ स्थनेमि प्रति राजीमत्युपदेशः होकर सजम-सयमको चर=पालो। भावार्थ-राजीमती रथनेमिसे कहती है कि हम दोनो उच्च कुलोमें उत्पन्न हुए है, अतः उगले हुए विपको वापिस पीजाने- वाले गन्धन सापोके समान हमको नीच न होना चाहिए ॥८॥ टीका-'अह च' इत्यादि । चद्वय समुच्चयार्थम् , हे स्थनेमे ! अह-राजीमती भोगराजस्यन्तन्नम्ना प्रसिद्धस्य अस्मीतिशेपः, अह भोगराजस्य पौत्रीति भावः। व च अन्धकटपणेतनाम्ना प्रसिद्धस्य असि, अन्धकवृष्णिपौत्रोऽसीत्यर्थः। ततः किं तदाह-कुले-वशेऽर्थानिष्कलङ्के गन्धनो आन्धनकुलसम्भूतसर्पसदृशौ, 'आवा' मिति गम्यते, माभूवनभवेव, तस्मात् निभृतः निश्चलो विपयादिभिरक्षोभ्यःसन् सयमम् अनश्वरमुखसाधनभूत निरवयक्रियाऽनुष्ठान चर=पालय। इति गाथार्थः८ मूलम्-जड त काहिसि भावं, जा जा दिच्छसि नारिओ। वायाविद्ध व्व हडो, अहिअप्पा भविस्ससि ॥९॥ छाया–यदि त्व करिष्यसि भाव, या या द्रक्ष्यसि नारीः । वाताचिद्ध इव हडो,-ऽस्थितात्मा भविष्यसि ॥ ९ ॥ सान्वयार्थ:-जह-यदि त-तुम जा जा-जो-जो नारिओ-स्त्रीको दिच्छ- सि=देखोगे (उन उनपर) भाव-भुरे विचार काहिसि-करोगे तो वायाविद्धब्ध अह च' इत्यादि । हे स्थनेमि ! मै (राजीमती) भोगराजकी पोती और उग्रसेनकी बेटी हूँ, और तुम अन्धकवृष्णिके पौत्र तथा समुद्रविजयके पुत्र हो, इसलिए दोनोही निर्मल कुलोमे उत्पन्न हुए हैं। हमे गन्धन कुलमें उत्पन्न होने वाले सर्पोके समान नहीं होना चाहिये। अत'विपय आदिको त्याग करके अनन्त सुखके कारणभूत निरतिचार सयमका पालन करो ॥८॥ મઃ ઈત્યાદિ હે રથનેમિ' હુ (રાજીમતી) ભેગરાજની પૌત્રી અને ઉગ્રસેનની પુત્રી છું, અને તમે અ ધકવૃષ્ણિના પૌત્ર તથા સમુદ્રવિજયના પુત્ર છે, એ રીતે આપણે બેઉ નિર્મળ કુલેમા ઉત્પન્ન થયા છીએ આપણે ગધન કુળમાં ઉત્પન્ન થએલા સર્પોના જેવા ન થવું જોઈએ માટે વિષય આદિને ત્યજીને અનત સુખના કારણભૂત નિરતિચાર સયમનું પાલન કરે (૮) - २ 3 १४६ श्रीदर्शवकालिकसूत्रे हवासे उडाये हुए एडो हडपनस्पतिकी भांति अहिअप्पा-अस्थिर आत्मावाले- चचलचित्त भविस्ससि हो जाओगे ॥९॥ टीका-'जइत०' इत्यादि । त्वया या नारीची द्रक्ष्यसि अवलोकिप्यसे यत्तदोनित्यसम्बन्धात् 'तास ताम्' यदि भार-कलपिताध्यवसायतया दुष्टा दृष्टिं करिष्यसि तदा वाताविद्धाच्यातेनम्यायुना आद्धिमेरितः हडः निर्मूलो वनस्पतिविशेप इस, शैवालमिव या अस्थितास्मा अस्थितः अस्थिरः आत्मा यस्य स तथोक्तो भरिप्यसि, जन्म-जरा-मरणजन्य-जगदटवीपर्यटनदुःखपरम्परा निराकरणकारणेभ्यः सयमगुणेभ्यः प्रस्खल्याऽपारससारपारावारे विपयवासना- वातविकम्पितचेता' शान्ति न गमिष्यसीति भावः, इति गाय. ॥९॥ एवं राजीमत्या प्रतियोधितो रथनेमिधर्मनिष्ठोऽभवदित्याह-'तीसे सो०' इत्यादि । मूलम्-तीसे सो वयण सोच्चा, सजयाइ सुभासियं । अंकुसेण जहा नागो, धम्मे सपडिवाइओ ॥१०॥ 'जइ त' इत्यादि । यदि तुम जिस जिस स्त्रीको देखोगे उन सव पर विकारदृष्टि डालोगे तो आधीसे उडाये हुए हड वनस्पति अथवा सेवालकी तरह अस्थिर हो जाओगे, अर्थात् जन्म-मरणसे होनेवाले जगतरूपी अटवीमे भ्रमण करनेके कष्टोको दूर करनेवाले सयमगुणोसे च्युत होनेके कारण ससाररूप अपार समुद्रमे विषयवासनारूपी वासे चचलचित्त होकर भटकते फिरोगे ॥२॥ राजीमतीजीके द्वारा प्रतिबोध पाकर रथनेमि सयममे स्थिर होगया। इसी विषयको सूत्रकार प्रतिपादन करते है- 'तीसे' इत्यादि । ડુિં તઈત્યાદિ, જે તમે જે જે સ્ત્રીઓને જોશે તે બધી પર વિકારદષ્ટિ નાખશે તે આધીથી ઉડેલી હડ વનસ્પતિ અથવા શેવાલની પેઠે અસ્થિર થઈ જશે, અર્થાત્ જન્મ-મરણથી ઉત્પન્ન થતા જગતરૂપ અટવીમાં ભ્રમણ કને દૂર કરનારા સમગુણોથી ભ્રષ્ટ થવાને લીધે સસારરૂપ અપાર સમુદ્રમાં વિષયવાસનારૂપી હવાથી ચચળ ચિત્તવાળા થઈને ભ્રમણ કરતા ફરશે (૯) રાજીમતીથી એ પ્રતિબંધ પામીને રથનેમિ સયમમાં સ્થિર થઇ ગયા से विषयनु प्रतिपादन सूत्रधार ४२ छ-तीसे० Vत्या १० ફરવાના अध्ययन २ गा. १० स्थनेमेधर्म सस्थितिः १४७ छाया-तस्याः स वचन श्रुत्वा, सयतायाः सुभाषितम् । अकुशेन यथा नागो, धर्म सम्पतिपातितः ॥१०॥ सान्वयार्थः-सो-वह (स्थनेमि) तीसे-उस सजयाइ-सयमवती (राजी- मती) के सुभासिय-सुभापित चयण वचनको सोचा-सुनकर धम्मे धर्ममें सपडिवाइओ-आगया-प्राप्त होगया, जहा-जैसे अकुसेण अकुशसे नागो हाथी मार्गमें जा जाता है ॥१०॥ टीका-सारथनेमि', सयतायाः सयमवत्याः तस्याम्राजीमत्याः, सुभापित- मिति वैराग्यसारगर्भितत्वात् पचन=सदुपदेश, श्रुत्वा समाफर्ण्य 'स्थितः' इति शेषः अन्यथा 'सम्पतिपातितः' इत्यनेन समानकर्तृकत्वाऽभावात् क्त्वाप्रत्ययोत्प- त्तिरसङ्गता स्यात् , यद्वा 'सम्पतिपातित' इत्यस्य णिजाऽविवक्षया 'सम्पति- पन्नः' इत्यर्थः कर्त्तव्यः। अड्डुशेन हस्तिचालनार्थ-लौहमयवक्राग्रास्त्रेण नागो यथा हस्तीच, उम=निनोक्तमवचनरूपे, सम्प्रतिपातितः सस्थापितः सस्थित इति वा, यथाऽङ्कुशेन प्रशमितमदो मतङ्गजोऽनुकूल मार्गमालम्पते तथा राजीमतीवच- नेन दूरीकृतमदनमदो रथनेमिरपि जिनोक्तधर्ममार्गमवलम्बितवानिति भावः ॥१०॥ जैसे अकुशसे हाथी ठीक मार्ग पर आजाता है वैसे ही रथनेमि सयमवती राजीमतीके वैराग्य-परिपूर्ण वचन (सदुपदेश) सुनकर जिनेन्द्र भगवानके प्रवचन-रूप धर्म-मार्गमे स्थित हो गये, अर्थात् जैसे महावतके अकुशसे मदोन्मत्त हाथीका मद चकनाचूर हो जाता है और वह सन्मार्ग पर आजाता है, उसी प्रकार राजीमती-रूपी महावतके वचन-रूपी अकुशसे स्यनेमि रूपी हाथीका विषयवासना रूपी मद' दूर होगया और वे जिनोक्त धर्ममार्गमें प्रवृत्त होगये ॥१०॥ જેમ આ કુશથી હાથી બરાબર માર્ગ પર આવી જાય છે, તેમજ રથનેમિ સયમવતી રામતીના વૈરાગ્યપૂર્ણ વચન (સદુપદેશ) સાભળીને જિનેન્દ્ર ભગ- વાનના પ્રવચનરૂપ ધર્મમાર્ગમાં સ્થિર બની ગયા અર્થાત્ જેમ મહાવતના અ કુશથી મદેન્મત્ત હાથીને મદ ચૂર્ણ થઈ જાય છે, અને તે રાહ આવી જાય છે, તેમ રામતીરૂપી મહાવતના વચનરૂપી આ કુશથી રથનેમિરૂપી હાથીને વિષયવાસનારૂપી મદ દૂર થઈ ગયે અને તે જિનેકત ધર્મમાર્ગમાં પ્રવૃત્ત થઈ गया (१०) . પર २ . १४८ श्रीदशवकालिकसूत्रे सम्मत्युपसहरन्नाइ-'एर करति०' इत्यादि । मूलम्-एवं करति संयुद्धा, पंडिया पवियक्खणा ॥ विणियति भोगेसु, जहा से पुरिसुत्तमो ॥११॥ त्तिवेमि॥ छाया-एव कुर्वन्ति सम्बुद्धाः, पण्डिताः प्रविचक्षणाः ॥ विनिवर्तन्ते भोगेभ्यो, यथा स पुरुषोत्तमः ॥११॥ इति ब्रवीमि ।। सान्वयार्थः-सवुद्धा-सत् असत् के विवेकी पडिया-विषयदोपोंके ज्ञाता पवि- यक्खणा=आगमके मर्मज्ञ पुरुष एव-ऐसा ही करति करते हैं, (वे) भोगेसु- भोगोंसे विणियति-निवृत्त होजाते हैं, जहां-जैसे सेबह पुरिसुत्तमो-पुरु- पोंमें श्रेष्ठ (रथनेमि विपयोंसे निगृत्त हो गया) तिमि(पूर्ववत् ) । भावार्थ- जो विवेकी होते हैं वे विषयोके दोपोको जानकर उनका परित्याग कर देते हैं, जैसे रथनेमिने परित्याग कर दिया था ॥ ११ ॥ ॥ इति द्वितीया ययनस्य सान्त्वयार्थ ॥२॥ टीका-सम्=सम्यग् बुद्धाःबोध प्राप्ताः हेयोपादेयज्ञानसम्पन्ना इत्यर्थः, सम्बु- द्धत्वमेव विशेपयति-'पण्डिताः मविचक्षणा" इति विशेपणाभ्याम् । तत्र पण्डिता विषयप्रवृत्तिदोपज्ञा , प्रविचक्षणा: विचक्षणश्रेष्ठा. आगममर्मवेदिनः प्राप्तचरण- परिणामा वेत्यर्थ', एव तथा कुर्वन्ति-समाचरन्ति । किं समाचरन्तीत्याह- 'विणियति भोगेसु' इति, भोगेभ्यः विपयेभ्य. विनिवर्तन्ते- उपरता भवन्ति, यथा सरथनेमि , पुरुषोत्तम -पुरुषेषु श्रेष्ठ । उपसहार- 'एव करति०' इत्यादि । हेय और उपादेय वस्तुओंको सम्यक प्रकार समझनेवाले सयुद्ध, विषयोंमें प्रवृत्तिके दोषोंके ज्ञाता, आगमके रहस्यको जाननेवाले अथवा चारित्रके फलको प्राप्त करनेवाले प्रविचक्षण मुनिजन ऐसे ही करते हैं, S२-एव करति० त्यादि હેય અને ઉપાદેય વસ્તુઓને સમ્યક પ્રકારે સમજનાર સબુદ્ધ, વિષમાં પ્રવૃત્તિના દેના જ્ઞાતા, આગમના રહસ્યને જણનારા અથવા ચારિત્રના ફળને પ્રાપ્ત કરનારા પ્રવિચક્ષણ મુનિજને એમ જ કરે છે, અર્થાત ભેગોથી નિવૃત્ત अध्ययन २ गा. ११ स्थनेमेः पुरुषोत्तमत्वसिद्धिः १४९ ननु कथमसौ पुरुपोत्तमो यो गृहीतसयमो भ्रातृजायामचीकमत ? उच्यते-- विचिना खलु कर्मणा गतिः, गृहीतसयमस्यापि रथनेमेश्चेतसि विपयवासना मोहनीयकर्मोदयवशादुद्द्धा, परन्तु वैराग्यवारिधारावरेण राजीमतीवचनेन यदा विषयवलयदावानलजनिततापकवलितो म्लानतामापन्नो रथनेमिचेतस्तर: सेचितस्तदैव पुनरसौ सयमामृतरसास्वादनपरो विपद्विपयविधिदोपाकर नेन अर्थात् भोगोंसे निवृत्त होते हैं जैसे कि-पुरुपोंमे उत्तम रथनेमिने भोगोंकी निवृत्ति की। प्रश्न-जिन्होंने सयम लेकर भी विपयवासनामे लीन होकर परम अनुचित जो कि गृहस्थभी नहीं करता ऐसी साक्षात् अपने-भाईकी भार्यापर कुदृष्टि करके भोगोंकी प्रार्थना की, विपयभोगोंकी इच्छामात्र भी करना चारित्रको मलिन करनेवाला और आत्माको दुर्गतिदाता है तो फिर भगवानने विषयानुरागी रथनेमिको पुरुपोंमें उत्तम कैसे कहा उत्तर-कर्माकी गति विचित्र होती है, मोहकर्मके उदयसे यद्यपि विषयभोगकी अभिलापा हुई तो भी विपयरूपी दावानलसे उत्पन्न सतापसे सतप्त हो मुरझाया हुआ रयनेमिका चित्त-रूपी वृक्ष वैराग्य- रसकी यरसा करनेवाले राजीमतीजीके वचनरूपी मेघसे सीचे जाने पर शीघही सयमरूप अमृतरसके आस्वादनमें तत्पर होगया। 'विषय परम कटुक फल देनेवाले और आत्माको चतुर्गतिमे परिभ्रमण करानेवाले हैं। થાય છે, કે જેવી રીતે પુરૂષોમાં ઉત્તમ સ્થનેમિએ ભેગની નિવૃત્તિ કરી પ્રશ્ન–જેમણે સયમ લઈને પણ વિષયવાસનામા લીન થઈને પરમ અનું ચિત-કેટ ગૃહસ્થ પણ ન કરે એવી, સાક્ષાત્ પિતાના ભાઈની ભાર્યો પર કુદૃષ્ટિ કરીને ભેગની પ્રાર્થના કરી, વિષયભોગેની ઈચ્છા માત્ર પણ ચારિત્રને મલિન કરનારી અને આત્માને દુર્ગતિ દેનારી છે, તે પછી ભગવાને તેવા વિષયાનુરાગી રથનેમિને પુરૂમા ઉત્તમ કેવી રીતે કહ્યો? ઉત્તર––કર્મોની ગતિ વિચિત્ર હોય છે મેહકર્મના ઉદયથી જે કે વિષયભેગની અભિલાષા ઉત્પન્ન થઈ, તેપણ વિષયરૂપી દાવાનળથી ઉત્પન્ન થએલા સતાપથી સતત થઈને બેભાન બનેલા રથનેમિનું ચિત્તરૂપી વૃક્ષ, વૈરાગ્ય રસની વૃદ્ધિ કર નારા રામતીના વચનરૂપી મેઘથી સિંચિત થતા पछी, तुरता સયમરૂપી અમૃતરસનું આસ્વાદન કરવામાં તત્પર બની ગયું વિષયે અત્યંત દેનારા અને આત્માને ચતુતિમા પરિભ્રમણ કરાવનારા છે” એ પ્રકારની કડવા પર 4 १५० श्रीदशवकालिकसूत्रे शान्तिमुपगतः परमदुश्चरतपःसेवनपरायणो झटिति बभूति पिपयसानियेऽपि चित्तनिग्रहकारित्वेन झटिति पियोपरतत्वेन च पुरुषोत्तमत्व तस्य निर्वाधर्मवे- त्यल पल्लवितेन । न चाधुनिकरथनेमेरुदाहरणोपलम्मादिद दशकालिकमूनमनित्य स्यादिति वाच्यम्, पर्यायार्थिकनयमपेक्ष्याऽनित्यत्वेऽपि द्रव्यायिकनयापेक्षया नित्यत्वात् । इस प्रकारकी परम वैराग्यभावना द्वारा, एकान्त स्थानमें विषयका सान्निभ्य रहनेपर भी इन्द्रिय निग्रह करके विषयोंको विपतुल्य समन कर तत्काल त्याग दिया और उग्न तप-सयमको पालन किया, इसलिये भगवानने उन्हे पुरुषोंमें उत्तम कहा है। प्रश्न-हे गुरो ! प्रवचन अनादि और नित्य है, क्योंकि आचाराग आदि बत्तीसों शास्त्र अनादिकालसे चले आते है, और यह दशवैका- लिक सूत्र भी उन्ही यत्तीसोंमें हैं तो आधुनिक रथनेमि और राजीमतीका उदाहरण आनेसे तो यह सादि और अनित्य सिद्ध होता है। उत्तर-हे शिष्य ! पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षासे प्रत्येक पदार्थ अनित्य है, इसी नयकी अपेक्षा दशकालिक भी अनित्य है, किन्तु द्रव्याधिक नयकी अपेक्षासे वह नित्य है। अर्थात् दशवैकालिकमे प्ररूपित मुनिका आचार सर्वज्ञोक्त है । सब सर्वज्ञोंका कयन एकहीसा होता है । जिस आचारका प्ररूपण चरम तीर्थकर श्रीमहावीरस्वामीने વૈરાગ્યભાવના દ્વારા એકાન્ત સ્થાનમાં વિષયનું સાન્નિધ્ય હોવા છતા પણ ઈન્દ્રિય નિગ્રહ કરીને વિષને વિષતુલ્ય સમજીને તત્કાળ ત્યજી દીધા અને ઉગ્ર તપ સયમનું પાલન કર્યું, તેથી ભગવાને તેમને પુરૂમ ઉત્તમ કહ્યા છે પ્રશ્ન–હે ગુરે પ્રવચન અનાદિ અને નિત્ય છે આદિ બત્રીસે શાસ્ત્ર અનાદિકાળથી ચાલ્યા આવે છે અને આ દશવૈકાલિક સૂત્ર પણ એ બત્રીસમાનું જ છે, તે આધુનિક રથનેમિ અને રામતીનું ઉદાહરણ આવવાથી તે એ સૂત્ર સાદિ અને અનિત્ય સિદ્ધ થાય છે ઉત્તર-હે! શિષ્ય પર્યાયાર્થિક નયની અપેક્ષાથી પ્રત્યેક પદાર્થ અનિત્ય છે એ નયની અપેક્ષાએ દશવૈકાલિક પણ અનિત્ય છે પરન્તુ દ્રવ દ્રવ્યાર્થિક નયની અપેક્ષાથી તે નિત્ય છે અર્થાત્ દશવૈકાલિકમાં પ્રરૂપેલે મુનિને આચાર સર્વોક્ત છે બધા સર્વાનું કથન એકસરખું જ હોય છે જે આચારનું પ્રરૂપણ ચરમ તીર્થકર શ્રી મહાવીર સ્વામીએ કર્યું છે તેની જ પ્રરૂપણ અનાદિ કાળથી કારણ કે આચારાગ, બધા अध्ययन २ गा. ११ अध्ययनपरिसमाप्तिः १५१ ' इति ब्रवीमि' इति पूर्ववत् ॥ इति गाथार्थः ॥ ११ ।। इति श्री-विश्वविख्यात-जगदल्लभ-मसिद्धवाचक-पञ्चदशभापा-कलित-ललित- कलापाऽऽलापक-प्रविशुद्ध-गद्य-पद्य-नैकग्रन्थनिर्मापक-धादिमानमर्दक- श्रीशाहू छत्रपति-कोल्हापुररानप्रदत्त-जैनशास्त्राचार्य-पद-भूपित- कोल्हापुरराजगुरु-बालब्रह्मचारि-जैनाचार्य-जैनधर्मदिवाकर- पूज्य श्रीघासीलालप्रतिविरचिताया श्रीदशवकालिकसूत्र- स्याऽऽचारमणिमञ्जूपाख्याया व्याख्याया द्वितीय आमण्यपूर्वकाख्यमध्ययन समाप्तम् ॥२॥ किया है उसीकी प्ररूपणा अनादिकालसे सब सर्वज्ञ करते आये है अत एव द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षासे यह दशवकालिक अनादि और नित्य है।११॥ इति हिन्दीभापानुवादमें श्रामण्यपूर्वकाख्य द्वितीय अध्ययन समाप्त हुआ ॥२॥ - સર્વ કરતા આવ્યા છે એટલે દ્રવ્યાર્થિક નયની અપેક્ષાથી આ દશવૈકાલિક અનાદિ અને નિત્ય છે (૧૧) ઈતિ “શ્રામણ્યપૂર્વક” નામના બીજા અધ્યયનનું गुराती-सापानुवाद समास (२) १५४ श्रीदशवेकालिकमरे कोऽप्यात्मीय इति, रागादयश्च जीपमृगवागुरायमाणत्वान्महागनर इत्यहो ! शत्रु- हस्तगतोऽह स्वकीयाऽभ्युदयनिःश्रेयससाधनाक्षमः सजातोऽस्मि, घिद माम् । उक्तञ्च- "इह हि मधुरगीत नृत्यमेतद्रसोऽय, स्फुरति परिमलोऽय स्पर्श एपोऽङ्गनानाम् । इति हतपरमार्थ-रिन्द्रियैर्धाम्यमाणः, स्वहितकरणधूर्तेः पञ्चभिर्वश्चितोऽस्मि ॥१॥” इति, एवविधविविधभावनाभिः सर्वथा रागादितो मुक्ताः विप्रमुक्तास्तेषाम् , कर चुकी है, वास्तवमें ससारमें कोई भी मेरा नहीं है। यह रागादि दोष, जीवरूपी हरिणके लिए व्याधके समान होनेके कारण महान् शत्रु है। खेद है कि मै उन वैरियोंके वशमे पडकर अपने परम अभ्युदय-स्वरूप मोक्षके साधनमें भी असमर्थ होगया हूँ मुझे धिक्कार है । कहा भी है- "कैसा कर्णमधुर गीत है, कैसा नेत्रोंको लुभानेवाला नृत्य है, कैसा जिहाका प्रिय स्वाद है, कैसा नासिकाको आकर्षित करनेवाला सुगन्ध है और स्त्री आदिका स्पर्श कैसा सुखकारी है। इस प्रकार अनु- भव कराकर परमार्थका सत्यानाश करनेवाली अपना स्वार्थ साधनेमे धूर्त इन दगाबाज पाचों इन्द्रियोंने हाय ! मेरी आत्मिक-सम्पत्तिसे मुझे वचित कर दिया-मुझको लूट लिया ॥१॥" इस प्रकारकी भावनाओं द्वारा राग आदि शत्रुओसे सर्वथा मुक्त એને અનુભવ કરી ચૂક્યા છેવાસ્તવમાં સંસારમાં કઈપણ મારૂ નથી, આ રાગાદિ દેવ આવરૂપી હરણને માટે વ્યાધ (પારધી)ની સમાન હોવાને કારણે મહાન શત્રુ છે, ખેદની વાત છે કે હુ એ વેરીઓને વશ પડીને પિતાના પરમ અસ્પૃદય સ્વરૂપ મેક્ષના સાધનમાં પણ અસમર્થ બની ગયું છું, મને ધિક્કાર છે - કેવુ કર્ણમધુર ગીત છે, કેવુ નેને લેભાવનારૂ નૃત્ય છે, કે જિવાને પ્રિય સ્વાદ છે, કેવી નાકને આકર્ષિત કરનાર સુગધ છે, અને સ્ત્રી આદિને સ્પર્શ કે સુખકારી છે, એ પ્રમાણે અનુભવ કરાવીને પરમાર્થનું સત્યાનાશ વાળનારી પિતાને સ્વાર્થ સાધવામાં ધૂત એ દગાબાજ પાચે ઈદ્ધિએ, હાય! મને મારી આત્મિક-સપતિથી વિચિત કરી નાખે-મને લુટી લી” (1) એ પ્રકારની ભાવનાઓ દ્વારા રાગાદિ શત્રુઓથી સર્વથા મુક્ત થનારા, . . अध्ययन ३ गा. १ महोणाम् (५२) अनाचीर्णानि । त्रायिणाम्बाण स्वस्य परस्योभयस्य च रक्षण त्रायः, सोऽस्त्येपामिति त्रायिण,, प्रत्येकयुद्धाः स्वस्य, तीर्थङ्कराः परस्य, स्थविरा उभयस्येतीमे सर्वे त्रायिण उच्यन्ते । निर्ग्रन्थानाबाह्याऽऽभ्यन्तरपरिग्रहरूपाद् ग्रन्थानिर्गताः निन- न्यास्तेपाम् । महीणाम्-महान्तश्च ऋपय इति महर्पयस्तेपाम् , यद्वा 'महपिणाम्' इतिच्छाया, महः जन्मजरामरणदुःखरहितत्वेनैकान्तोत्सवरूपो मोक्षस्तम् ऋपन्ति= गत्यर्थधातूना प्राप्त्यर्थत्वात् प्राप्नुवन्तीत्येवशीला महर्पिणस्तीर्थङ्करगणधरादय- स्तेपाम् , एतत् द्वापश्चाशता भेदैर्वक्ष्यमाणम् , अनारीणम् अनासेवितम् , अस्तीति शेपः। अत्र महर्पिणामित्यन्तेपु कर्तुः शेपत्वविपया पष्ठी । यतः सयमे मुस्थितात्मानोऽत एव विषमुक्ताः, यतो विषमुक्ता अतस्त्रायिणः, यतस्त्रायिणोऽतो निग्रन्थाः, यतो निग्रन्था अतो महर्पयः, इति यथोत्तर पूर्व-पूर्वस्य हेतुत्वेन भवति विशेपणसतिरिति बोद्धव्यम् । १ अत्र 'अत इनिठना'-विति मत्वर्थीय इनि, तान्छील्यणिनिस्तु न, तस्य मुग्न्तपूर्वपदकत्व एव प्रवृत्तेरिति वयम् ।। होनेवाले, ससारभ्रमणसे भयभीत भव्य जीवोंकी तथा आत्माकी रक्षा करनेवाले, बाह्य और आभ्यन्तर परिग्रहरूपी ग्रन्यिसे रहित, महान् ऋपि-तीर्थकर आदि या जन्म-जरा-मरणके दुखोंसे रहित होनेके कारण एकान्त आनन्दस्वरूप मोक्षको प्राप्त करनेवाले मुनियोंके, आगे कहेजाने वाले पावन अनाचार (अनाचीर्ण) हैं। अर्थात् ये पावन अनाचार मुनियोंके सेवने योग्य नहीं है ।यहाँ पष्ठी विभक्तिवाले अनेक विशेषण दिये गये हैं, उन सबमें पहले के विशेपण कारण हैं और आगे आगे के कार्य है। जैसे-सयममें भली भाँति स्थित होनेके कारण विप्रमुक्त है, સસાર બ્રમણથી ભયભીત ભવ્ય જીની તથા આત્માની રક્ષા કરનારા, બાહ્ય અને આભ્ય તર પરિગ્રહરૂપી ગ્રંથિથી રહિત, મહાન ઋષિ તીર્થ કર આદિ, યા જન્મ જરા મરણના દુ ખેથી રહિત હોવાને કારણે એકાત આનંદસ્વરૂપ મેક્ષને પ્રાપ્ત કરનારા મુનિઓને માટે, આગળ કહેવામાં આવનારા (અનાચીણ) છે અર્થાત્ એ બાવન અનાચાર મુનિઓને નેવવા યોગ્ય નથી અહીં છઠ્ઠી વિભકિતવાળા અનેક વિશેષણે આપવામાં આવ્યા છે, એ બધામાં પહેલા–પહેલાના વિશેષણ કારણ છે અને પછી પછીના કાર્ય છે જેમકેન્સયમમાં સારી રીતે સ્થિત હોવાને કારણે વિપ્રમુક્ત છે, વિપ્રમુકત હોવાથી સ્વ પરના . બાવન અનાચાર ત્રિાતા श्रीदशकालिकसूत्रे नन्वेतावता 'ययन्महापुरुपैरनाचीर्ण तत्तदनाचरणीय, यवत्वाचीणे तत्तदा- चरणीयमेवेत्यायात ततश्च तीर्थदराथै सुरसम्पादितैरष्टविधमहापातिहायस्तीर्थरा युक्ता इति वयमप्यस्मदर्थ सम्पादितैः कथ न युक्ता भवेमेति चेद् ? भ्रान्तोऽसि, ते हि वीतरागत्वात् कल्पातीताः, वय तु कल्पस्थिता इति, कल्पातीताना तेषा जिनेश्वराणामष्टमहामातिहार्याणि तीर्थङ्करगोत्रनाममकृत्युदयमहिम्ना प्रतिभासि- तानि भवन्ति, न तु तानि सुरैः सपाघन्ते, अत एव औपपातिकमत्रे- " आगासगएण चण आगासगएण छत्तेण आगासियाहिं चामराहि" इत्यस्य व्याख्यायाम्- विप्रमुक्त होनेसे स्व-पर के प्राता (रक्षक) हैं, माता होनेसे निर्ग्रन्थ हैं, निर्ग्रन्थ होनेसे महर्षि है। शङ्का इस गाथासे यह तात्पर्य निकला कि महापुरुषोंने जिस जिस का आचरण नहीं किया वह वह अनाचरणीय है, उन्होंने जिस जिसका आचरण किया वे सय आचरण करने योग्य है, यदि ऐसा ही है तो तीर्थङ्कर भगवान् देवनिर्मित आठ महाप्रातिहार्योसे युक्त होते हैं इसलिए हम भी हमारे लिए बनाये हुए पदार्थोंसे युक्त क्यों न होवें। समाधान-हे वत्स ! ऐसा नहीं है, क्यों कि वे वीतराग होनेसे कल्पातीत है, और हम कल्पस्थित हैं, इसलिए उन कल्पातीत जिनेश्वरों के तीर्थङ्करगोत्र नाम-प्रकृतिके उदयकी महिमासे अष्ट महापातिहार्य केवल भासित होते है किन्तु देवताओंसे समर्पित नहीं किये जाते, अत एव औपपातिक सूत्रके "आगासगएण चक्केण" इत्यादि पदोंकी (રક્ષક) છે, ત્રાતા હોવાને કારણે નિગ્રંથ છે, નિગ્રંથ હોવાને લીધે મહર્ષિ છે શકા–-આ ગાથામાથી એ તાત્પર્ય નીકળ્યું કે મહાપુરૂષોએ જેનું જેનું આચરણ નથી કર્યું છે તે અનાવરણીય છે, અને તેમણે જેનું જેનું આચરણ કર્યું તે બધું આચરણ કરવા યોગ્ય જે એમ છે તે તીર્થકર ભગવાન દેવ નિમિત આઠ મહાપ્રાતિહાર્યોથી યુક્ત હોય છે, તેમ આપણે પણ આપણા માટે બનાવેલા પદાર્થોથી યુકત કેમ ન થવુ? સમાધાન–હે વત્સ! એમ નથી, કારણ કે તે વીતરાગ હોવાથી કપાતીત છે, અને આપણે કપસ્થિત છીએ એ કપાતીત જિનેશ્વરના તીર્થ કર-શેત્ર-નામ પ્રકૃતિને ઉદયના મહિમાથી આઠ મહાપ્રાતિહાર્ય કેવળ ભાસિત થાય છે, પરન્તુ देवता तथा समर्पित All नथी, ३ भोपाति सूना आगासगएण अन्ययन ३ गा. २ (५२) अनाचीर्णानि १५७ आगासगएण चक्केण "-ति आकाशवतिना चक्रेणधर्मचक्रेण, 'आगासग- एण छत्तेण'-ति छत्रत्रयेण 'आगासियाहि '-ति, आकाशम् अम्बरम् इताभ्या पाप्ताभ्याम् आकर्पिता-या वा-आकृष्टाभ्यामुत्पाटिताभ्यामित्यर्थः, 'चामराहिँ'- ति चामराभ्या प्रकीर्णकाभ्या माकृतत्वाच लिङ्गव्यत्ययः, 'लक्षितः इति सर्वत्र गम्यम्" इत्युक्तम् । अत्र 'लक्षितः' इत्युक्त्याऽन्यकृत इति स्पष्ट निराक्रियते, यथा-अर्द्धमागध- भापया प्रवृत्ताऽपि तीर्थङ्करवार समवसरणगताना देवाना मनुष्याणा तिरथा च स्व-स्व-भाषानुरूपा प्रतिभाति किन्तु न सा तादृशी, तस्मादस्मादृशा तदसदृशा तदुक्तकल्प एव स्थातव्य, न तु तथाऽनुकरणीयमिति दिक इति गाथार्थः ॥१॥ अनाचीर्णान्याह-'उद्देसिय०' इत्यादि, व्याख्यामें कहा है-"आकाशस्थित चक्र, छत्र और चामरोंसे भगवान् लक्षित होते हैं। यहाँ पर 'लक्षित' ऐसा कहनेसे साफर यह दिख- लाया गया है कि-औरोंको उन चामरादिसे युक्त भगवान लक्षित होते हैं किन्तु वे चक्र उन्नादि अन्य-(देव)-कृत नहीं हैं। जैसे अर्द्धमागधी- भापारूप भी तीर्थङ्कर की वाणी, समवसरणमे आये हुए देव मनुष्य तिर्यचोंकी अपनी अपनी भाषाके स्वरूपमे ही प्रतीत होती है किन्तु वस्तुत• वह वैसी नहीं है, अत एव उन कल्पातीतोंकी तुलनामें नहीं पहुचे हुए हम छमस्योको तो उनके कहे हुए कल्पमे ही रहना चाहिए, न कि उनका अनुकरण करना चाहिए ॥१॥ अय (५२)-अनाची)को दिखलाते हैं-'उद्देसिया' इत्यादि । चक्केण त्याहि पाना व्याध्यानमा ४यु छ है- " मशस्थित न्य, ચામરથી ભગવાન લક્ષિત થાય છે” અહીં “લક્ષિત' કહેવાથી એમ સાફ સાફ બતાવ્યું છે કે બીજાઓને છત્ર ચામરાદિ યુકત ભગવાનૂ લક્ષિત થાય છે, પરંતુ તે ચક્ર-છત્રાદિ અન્ય (દેવ) કૃત નથી હોતા જેમ અર્ધમાગધીભાવારૂપ પણ તીર્થંકરની વાણું સમવસરણમાં આવેલા દેવ-મનુષ્ય-તિર્થને પિાતપિતાની ભાષાના સ્વરૂપમાં જ પ્રતીત થાય છે, કિન્તુ વસ્તુત તેવી નથી હોતી એટલે એ કપાત તેની તુલનામાં નહિ પહેલા આપણે છઘેએ તે એમણે કહેલા ક૯પમાં જ રહેવું જોઈએ, નહિ કે તેમનું અનુકરણ કરવું જોઈએ (૧) वे (५२)--मनाची व छ-उद्देसिय. त्यादि છત્ર અને १५८ श्रीदशवकालिकसूत्रे ५ . मूलम्-उद्देसिय कीयगड, नियागमभिहाणि यः। राइभत्ते सिणाणे य, गधमल्ले य वीयणे ॥२॥ छाया-औद्देशिक क्रीतकृत, नियागमभ्याइतानि च । रात्रिभक्त स्नान च, गन्ध-माल्ये च वीजनम् ॥ २॥ सान्वयार्थ:-(१) उद्देसिय औदेशिक-क्सिी एक साधुके लिए बनाया हुआ आहार (२) कीयगड-साधुके लिए खरीदा हुआ आहार (३) नियाग- निमत्रणसे ग्रहण किया हुआ आहार (४) अभिडाणि सामने लाकर दिया हुआ आहार (५) राइभत्ते रात्रिभोजन (६) सिणाणे स्नान य और (७) गध-चन्दनादिलेप (८) मल्ले पुष्पादिमाला (९) वीयणे-पन्या ॥२॥ टीका-औदेशिकम्-उद्देशनमुद्देशस्तत्र भव तत्मयोजनमस्येति वा औदेशिक- साध्वादिकमुद्दिश्य निष्पादितमित्यर्थः (१), क्रीतकृत-क्रीतेनक्रयणेन कृत-सम्पादित साधुकृते मूल्येन गृहीतमिति यावत् (२), (१) औद्देशिक, (२) क्रीतकृत, (३) नियाग, (४) अभ्याहृत, (५) रात्रिभोजन, (६) स्नान, (७) गन्ध, (८) माल्य, (९) पखा चलाना । (१) साधु आदिके लिए जो आहार बनाया जाता है उसे औदेशिक कहते हैं। (२) साधुके लिए मूल्य देकर जो आहारादि खरीद किया गया हो उसे क्रीतकृत कहते हैं। (१) भौशिक्ष, (२) तकृत, (3) निया1, (४) भक्ष्याहत, (५) विमान, (G) स्नान, (७) 14, (८) भा८य, (6) ५ मा यसा (૧) સાધુ આદિને માટે જે આહાર બનાવવામાં આવ્યું હોય તેને દેશિક કહે છે (૨) સાધુને માટે મૂલ્ય ખર્ચીને જે આહારાદિ ખરીદ કરવામાં આવેલ હોય તેને કીતકૃત કહે છે , , अध्ययन ३ गा. २-३ (५२) अनाचीर्णानि १५९ नियाग-नि-निरतिगयो यागो निमन्त्रणादिरूपः सस्कारो यस्मिंस्तत्-आम- त्रितपिण्डस्य कदाचिदपि ग्रहणम् , अनामन्त्रितस्य नित्यग्रहणमिति भावः (३), अभ्याहतानि-स्व-पर-ग्राम-गृहादिभेदभिन्नानि साधुनिमित्त सम्मुखमानीय दत्तानि, बहुवचन सर्वेपामेवाऽभ्याहृतानामनाचीर्णत्वस्यापनार्थम् (४), रात्रिभक्त रात्रिभोजन राज्यादिगृहीन भक्त वा (५), स्नान प्रसिद्धम् (६), गन्धमाल्ये-गन्धः चन्दन-केतकादिसौरभम् (७)- माल्य-पुष्पादिमाला, तयोरितरेतरयोग इति गन्ध-माल्ये (८), (३) गृहस्थका निमन्त्रण पाकर कभी भी आहार लेनाअथवा प्रतिदिन एक ही घरसे आहार लेना नियागपिण्ड है। (४) अपने गाँवसे पर गाँवसे अथवा घरसे साधुके सामने लाया हुआ आहार अभ्याहृत पिण्ड है। अभ्याइतके लिए गायामे यदुवचन आया है उसका यह अभिप्राय है कि जितनेभी अभ्याहृत (सामने लाये हुये) है वे सभी अनाचार है। (५) रात्रिमे आहार लेना, दिनमे लेकर रात्रिमें खाना आदि रात्रि- भक्त है (६) देशत. सर्वतः स्नान करनेको स्नान-अनाचार कहते हैं। (७-८) चन्दन केतक अतर आदिकी सुगन्ध तथा फूलमाला आदिका सेवन करना गन्ध-माल्य-अनाचार है । (૩) ગૃહસ્થનું નિમંત્રણ મેળવીને કેઈવાર પણ આહાર લે અથવા પ્રતિ દિન એકજ ઘરથી આહાર લે એ નિવાગપિડ કહેવાય છે (૪) પિતાના ગામથી, પરગામથી અથવા ઘરથી સાધુની સામે આવેલે આહાર અભ્યાહૂત-પિંડ કહેવાય છે અભ્યાહુતને માટે ગાથામા બહુવચન આવ્યું છે તેને એ હેતુ છે કે- જેટલા અભ્યાહુત (સામે લાવેલા) હેય તે બધા અનાચાર છે (૫) રાત્રે આહાર લે, દિનમાં લઈને રાત્રે ખાવે, ઈત્યાદિ રાત્રિ ભક્ત वाय छ (6) शिथी (या मागे ) साथी (माणे शरी२) स्नान સ્નાન અનાચાર કહેવાય છે (७-८) यन, 341, अत्तर माहिती सुगम તથા ફૂલ માલા સેવન કરવું એ ગધ માથે અનાચાર કહેવાય છે લાવવામાં કરવું એ આદિનું १६० श्रीदवकालिकमूत्रे तथा वीजन ग्रीष्मादिऋतौ तालगृन्तादिना वातादिसञ्चालनम् (९), अत्राऽऽरम्भादयो दोपा जायन्त इति सयमगन्तव्यम् । औदेशिकक्रीतक- तयोः स्वरूप समपञ्च पञ्चमाध्ययने रक्ष्यते ॥२॥ १२ १३ मूलम्-सनिही गिहिमत्ते य, रायपिंडे फिमिच्छए । सवाहणा दतपहोयणा य, सपुच्छणा देहपलोयणा य॥३॥ (छाया)-सनिधि-गृह्यमन च, राजपिण्डः किमिच्छकः । सवाहन दन्तमधारन च, समच्छन देहमलोकन च ॥३॥ सान्वयार्थः-(१०)सनिही रानिमें आहार आदिका सचय (११) गिहि- मत्ते-गृहस्थके पानमें भोजन करना य और (१२) रायपिंडे-राजाके लिए बनाया हुआ आहार (१३) किमिच्छए दानशाला या अन्नक्षेत्र आदिका आहार (१४) सवारणा शरीरकी मालिश करना (१५) दतपहोयणादात माजना य=और (१६) सपुच्छणा-गृहस्थसे कुशलप्रश्न पूछना य=और (१७) देहप- लोयणा दर्पण या जलमें मुख आदि देखना ॥३॥ टीका-सनिधीयते सम्यक्तया नितरा स्थाप्यते नरकादिष्वात्माऽनेनेति सनिधि सभवादन घृतादिसञ्चयकरणम् (१०), (९) ग्रीष्मादि कालमे पखा चलाना यह व्यजन-अनाचार है । इनसे आरम्भ आदि दोष होते है सो स्वय समझना चाहिये । औदेशिक और क्रीतकृतका विस्तारपूर्वक विवेचन पाचवें अध्ययनमे किया जायगा ॥२॥ (१०) सनिधि जिस अनाचारका सेवन करनेसे आम्मा नरकादि कुगतियोंमें गिरती है अर्थात् घृत औषध आदिका रात्रिमे बासी रखना सनिधि अनाचार है। (© ગ્રીષ્માદિ કાળમાં ૫ચલાવ એ વ્યજન–અનાચાર એથી આરભ આદિ દેષ લાગે છે તે પોતેજ સમજવું જોઈએ ઓશિક અને કીતકૃતનું વિસ્તારપૂર્વક વિવેચન પાચમા અધ્યયનમાં કરવામાં આવશે (૨) (૧૦) સનિધિ-જે અનાચારનું સેવન કરવાથી આત્મા નરકાદિ દુર્ગતિમાં પડે છે, અથાત્ ઘી એસડ આદિ રાત્રે વાસી રાખવા તે સનિધિ-અનાચાર છે अध्ययन ३ गा. ३-४ (५२) अनाचीर्णानि १६१ गृह्यमत्रम्-गृहिणा-गृहस्थानाम् अमत्र-पात्र प्रसगादत्रतस्मिन्नभ्यवहरणादि (११), राजपिण्डा रानार्थ निप्पन्नाऽऽहारः (१२), किमिच्छा-'कः किमिच्छत्याहारादिक'-मित्येव पृच्छयते यस्मिन् कर्मणि वद , अनसन (सदावत)-शालादित आहारादिग्रहणमित्यर्थ (१३), सवाहनम् अस्थ्यादिमुखविशेषजनक तैलादिना शरीरसमर्दनम् (१४), दन्तप्रधावन-दन्तमार्जनम् (१५), सपन्छन-गृहस्थ प्रति कुशलादिरूपसावधप्रश्नकरणम् (१६), देहप्रलोकन-जलदर्पणादिपु मुखादिनिरीक्षणम् (१७), चकाराः समुचयार्थाः । सनि यादिपु परिग्रहादयो दोपाः प्रतीताः ॥३॥ (११) गृह्यमन्त्र-गृहस्थके पात्रमे आहार आदि करना गृह्यमत्र है। (१२) राजपिण्ड--राजाके लिए बनायाआआहार लेनाराजपिंड है। (१३) किमिच्छक-जिसमे यह पृछा जाता है कि कौन क्या चाहता है ? अर्थात् दानशाला (सदाव्रत) आदिसे आहार लेना किमिच्छक है। (१४) सवारन-अस्थि, मास, त्वचा, रोमको आनन्ददायक चार प्रकारका मर्दन करना सवाहन है । (१५) दन्त-प्रधावन-दात धोना। (१६) सप्रच्छन-गृहस्थसे कुशल आदि रूप सावद्य प्रश्न पूछना । (१८) देहप्रलोकन-जलमे अथवा दर्पण आदिमे अपना मुख आदि देखना । सन्निधि आदिमे परिग्रहादि दोप प्रसिद्ध है ॥३॥ પત્રમાં (११) गृह्यमत्र-स्थना આહાર આદિ કરે તે ગ્રામત્ર કહેવાય છે (૧૨) રાજપિંડ–રાજને માટે બનાવેલે આહાર લે તે રાજપિંડ છે (૧૩) કિમિરછક–જેમાં એ પૂછવામાં આવે છે કે તેને શું જોઈએ છે ? અર્થાત્ દાનશાલા (સદાવ્રત) આદિ પાસેથી આહાર લે તે કમિરિછક કહેવાય છે (१४) सवान-मस्थि, भास, (पया, रोमन ચાર પ્રકારનું મર્દન કરવું એ સ વાહન ડે (૧૫) દતપ્રવાહન-દાત દેવા (૧૬) સ પ્રચ્છન-ગૃહસ્થને કુશળ આદિ રૂપ સાવધ પ્રશ્નો પૂછવા (૧૭) દેહલેકન-જલમાં અથવા દપ, આદિમા પિતાનું મુખ આદિ नेपा, सन्निधि माहिमा परियाहि हप प्रसिद्ध छ (3) માનું દદાયક श्रीदवेकालिकसूत्रे २० ૨૨ . मूलम्-अट्ठावए य नालीए, छत्तस्स य धारणहाए । तेगिच्छ पाहणा पाए, समारंभं च जोडणो ॥ छाया-अष्टापद नालिझया, त्रस्य धारणार्याय (धारणाऽटया)। चैकित्स्यमुपानही पादयोः, समारम्भश्व ज्योतिपः ॥४॥ सान्वयार्थः-(१८) नालीए-जूएके उपकरण-साधनसे अट्ठावर चौपड़ शतरल आदि खेलना, (१९) अट्टाए-मुट्ठीसे छत्तस्सम्जतेका धारण-धारण करना (२०) तेगिच्छरोगकी चिरित्सा करना (२१) पाए पाहणा-पैरोंमें जूते चपल मौजे आदि पहिनना च-और (२२) जोडणी अमिका समारभ-आरभ करना ॥४॥ टीका-च-तथा, नालिका यथाऽभिमतपतनाथ यया पाशाः पात्यन्ते सा- पाशपातनद्रव्यम् तया, उपलक्षणमेतत्-छूतोपकरणमात्रस्य, अष्टापदम्-अष्टौ अष्टौ पदानि स्थानानि (गृहाणि) सर्वभागेपु यस्मिंस्तत्तथा वस्त्राऽऽधारस्थानम् , इह च लक्षणया घूतसामान्यम् (१८), च-किञ्च छत्रस्य आतपत्रस्य धारणार्थाय ग्रहणमिति शेषः ॥ यद्वा-'धारणा अट्ठार ' इतिच्छेद , 'अट्ठा' इत्यस्य 'मुष्टि'-रित्यर्थः, "चउहि अट्टाहि लोय करेइ' १ 'चतमभिरष्टाभिौंच करोति' इतिच्छाया ॥ (१८) अष्टापद- 'नालीए' अर्थात् पासा फेंककर चौपड़, शतरज आदि खेलना, अथवा अन्य प्रकारसे जुआ खेलना। (१९) छत्रधारण करना। गाथामे 'धारणहाए' ऐसा पद है उसे अलग अलग करनेसे 'धारणा अट्टाए' होता है। यहाँ आहा शब्दका अर्थ 'मुट्ठी' है । जम्बूदीपप्रज्ञप्तिमे कहा है कि- 'चउहिं अहाहि लोय करेइ' (१७) मा५६-नालीए अर्थात- पास डीन या५४, शत, આદિ ખેલવા, અથવા અન્ય પ્રકારે જુગાર ખેલ (૧૯) છત્ર ધારણ કરવું ગાથામાં ધારદા એવુ પદ છે, એને છૂટા પાડ पाथी धारणा+अहाए याय छे म भट्ट ने अर्थ 'नही' छ गम्भू alमतिमा -चउहि अहाहि लोय करेइ भात-पाय मापाने, , अध्ययन ३ गा. ४ (५२) अनाचीर्णानि १६३ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्त्यादौ तथादर्शनात् , ततश्च अहाए'-अष्टयामुष्टया छत्रस्य धारणा ग्रहणमित्यर्थः । न च त्रादिधारण मुष्टयादिनैव सभवतीति 'अढाए' इत्यस्य 'मुखेन पठती'-इत्यादिषु मुखादिवद्वैयर्थ्य मिति शङ्कनीयम् , 'चक्षुभ्यो पश्यति, कर्णाभ्या शृणोति, जिवया लेढि' इत्यादि-लोकोक्तिपु चक्षुरादीनामिव यथास्थितवस्तुप्रतिपादनमात्रतात्पर्येणाऽपोनरुक्त्यात् , अत्रैव गाथायामुत्तरार्दै 'पाहणा अर्थात्-पभदेव भगवान्ने चार मुट्ठी लोच किया । अतः 'धारणहाएका अर्थ 'मुट्ठीसे छत्रको ग्रहण करना' हुआ । प्रश्न-छन तो मुट्ठीसे ही पकडा जाता है फिर 'अट्ठाए'की क्या आव- श्यकता है ? जैसे "मुखसे चोलता है" इस वाक्यमें 'मुखसे' इतना अश व्यर्थ है, क्योंकि सिवाय मुखके और किसी अगसे नहीं बोला जाता, इसी प्रकार यहा 'मुट्ठीसे' कहना भी वृथा है ? उत्तर-यह प्रश्न ठीक नहीं, क्योंकि लोकमें "आँखोंसे देखता है, कानोंसे सुनता है, जिहासे चखता है" इत्यादि वाक्योंमें 'आँखोंसे' 'कानोंसे', 'जिहासे' इन पदोंके योलनेका अभिप्राय यथास्थित वस्तुका प्रतिपादन करना है, इस गाथाके उत्तरार्द्धमे 'पाहणा पाए पद् आया है इसका अर्थ है कि-पैरोंमें उपानह (जूता), उपानह यद्यपि पैरोंमे ही पहने जाते हैं हाथ या सिरमे नही पहने जाते फिरभी 'पाए' कहनेसे ચાર મુઠી લેચ કર્યો એટલે ધારણાઇ ને અર્થ “મુઠીથી છતને ગ્રહણ કરવું એ થયે પ્રશ્ન-છત્ર તે મુઠીથી જ પકડવામાં આવે છે, પછી માની શી જરૂર રહે છે જેમકે “મુખથી બેલે છે” એ વાકયમાં 'भुमथी' मेटा વ્યર્થ છે, કારણ કે મુખ વિના બીજા કેઈ અગથી બેલી શકાતુ નથી રીતે ત્યા “મુઠીથી” એમ કહેવું એ પણ વૃથા છે उत्तर-मे प्रश्न १२।१२ नथी, ४२ मा 'मामाथी नवे छ,' 'नयी सालणे छ,' 'मथी या छ,' (त्यादि पाध्यामा 'मामाथी,' કાનથી,” “જીભથી” એ શબ્દો આપવાને હેતુ યથાસ્થિત વસ્તુનું પ્રતિપાદન કરવાને છે આ ગાથાના ઉત્તરાર્ધમાં પા પા પદ આપ્યું છે તેને અર્થ છે– “પગમાં ઉપાન (જેડા), જે કે જેડા પગમાં જ પહેરવામાં આવે છે, હાથે કે માથે નહિ, તે પણ g કહેવાથી પુનરૂક્તિ થતી નથી, કારણ કે એ શબ્દથી અશ તે જ , . . १६४ श्रीदशकालिकसूत्रे पाए' इत्यत्र 'पाए' इतिपदिति, उपलक्षणमेततिरसि छायाकरणमात्रस्य (१९), चैफित्स्य-चिकित्सा व्याधिमतीकारः, कफपित्तादिवैगुण्य, प्रधादिगुण्य च व्याधुनिदान तत्पशमन तदुपायोपदेशादिनेत्यर्थः (२०), पादयोःचरणयोः, उपानहौचर्मपादुके, उपलक्षणमिद काप्ठपादुकादीना- मपि (२१), चनकिञ्च ज्योतिपावः समारम्भः आरम्भकरणम् (२२), दोपास्त्वत्राऽलीकत्वादयः स्वयुद्धयाऽगन्तव्याः, चकाराइहापि समुच्चयार्थाः।४। १- गुणवचननाह्मणादिभ्यः कर्मणि च (५।१।१२४) इत्यत्रत्यब्राह्मणादेरा- कृतिगणत्वात्स्वार्थे प्यञ् तत आदिवृदिरालोपश्च, यत्तु 'चिकित्साया भावश्चैकि- स्स्य' मिति टीकान्तरकृतस्तद् व्याररणाऽनवयोधमूलकमेव, भावमत्ययान्ताद्भाव- पत्ययस्याऽनुत्पत्तेः, 'चिकित्सायाः कर्म त्यर्थकल्पनमपि केपाचिम्मामादिकमेव चिकित्साया रोगापनयनक्रियारूपायाः पत एव कर्मभूतत्वेन वर्मपर्यायत्वात् , ष्यविधायकमूत्रे हि 'कर्म क्रियेति वैयाकरणा ॥ पुनरुक्ति नहीं है, क्योकि इस पदसे यथावस्थित वस्तुका प्रतिपादनमात्र किया गया है, इसलिए 'मुट्ठीसे छत्र धरना ऐसा कहना अयुक्त नहीं है। (२०) चैकित्य-चिकित्सा करना, अर्थात् वैद्यक करना, या ग्रह आदिको मत्र वगैरहसे शात करना, या इस विषयका उपदेश देना। (२१) उपानह (जूना) या मौजा आदि पहनना । (२२) अग्निका आरम्भ करना, इनसे भी असत्य आदि दोष समझना चाहिए, अर्थात जूआखेलनेसे असत्य, क्लेश, आर्तभ्यान, परिग्रह आदि,छत्र धारण करनेसे सुकुमारता યથાવસ્થિત વસ્તુનું પ્રતિપાદન માત્ર કરવામાં આવ્યું છે તેથી મુઠીથી છત્ર ધરવું” એમ કહેવું એ અયુક્ત નથી (૨૦) ચિકિત્સ્ય-ચિકિત્સા કરવી અર્થ વૈદુ કરવું, અથવા ગ્રહાદિ ને માત્ર વગેરેથી શાન્ત કરવા અથવા એ વિષયને ઉપદેશ આપે (૨૧) ઉપનિહ (જેડા) અથવા મજા આદિ પહેરવા (૨૨) અગ્નિને આર ભ કર એથી પણ અસત્ય આદિ દેષ સમજવા જોઈએ અર્થ-જુગાર ખેલવાથી અસત્ય, કલશ, આર્તધ્યાન, પરિગ્રહ આદિ, છત્ર ધારણ કરવાથી સુકુમારતા, પરિવહન સહન કરવામાં અસામર્થ્ય આદિ અનેક अध्ययन ३ गा. ५ (५२) अनाचीर्णानि १६५ २3 ૨૫ २७ . मूलम् -सिज्जायरपिंडं च, आसदी पलियंकए । गिहतरनिसिज्जा य, गायस्सुव्वदृणाणि य ॥५॥ छाया-शग्यातरपिण्डश्च, आसन्दी पर्य(ल्य)ङ्ककः । गृहान्तरनिपया च, गात्रस्योद्वर्तनानि च ॥५॥ सान्वयार्थः-च और (२३) सिज्जायरपिंड-शग्यातरका आहार, (२४) आसदी कुर्सी या खाट (२५) पलियकए-पलग पालखी डोला आदि, (२६) गिहतरनिसिज्जा-गृहस्थके घरमें बैठना, य=और (२७) गायस्स-शरीरका उन्चट्टणाणि-उवटन करना ॥५॥ टीका-शय्यतेऽस्यामिति शय्या वसति., शग्ययार्थात्तदानेन तरति ससार- सागरमिति शग्यातरः, यद्वा शग्या पोक्तरीत्या वासस्थानम् , 'आतरः ससार- १-'आतरस्तरपण्य स्या'-दित्यमरः, 'उतराई' इति लोकमसिद्धम् । परिपके सहने में असामर्थ्य आदि अनेक दोष, चिकित्सा करनेसे आरम्भ असत्य आदि दोप, उपानह पहननेसे दीन्द्रिय आदि जीवोंका उपमर्दन आदि, तथा अग्निकायका आरम्भ करनेसे छह कायका उपमर्दन आदि दीप होते हैं ॥४॥४॥४॥ (२३) शय्यातरका पिण्ड लेना। जिसमें शयन किया जाता है उसे शग्या या वसति कहते हैं। उस शय्याके दानसे ससार-समुद्रको तैरनेवाला शय्यातर कहलाता है। अथवा शग्या है ससाररूपी सागरसे पार होनेका आतर (शुल्क) દોષ, ચિકિત્સા કરવાથી આરભ, અસત્ય આદિ દેવ, જેડા પહેરવાથી કીન્દ્રિય આદિ જીવેનું ઉપમઈન આદિ, તથા અગ્નિકાયને આર ભ કરવાથી છ કાયનું ઉપમઈને આદિ દેવ લાગે છે (૪) (૨૩) શય્યાતરને પિંડ લેવો જેમાં શયન કરવામાં આવે છે તેને શય્યા યા વસતિ કહે છે એ શય્યાના દાનથી સ સાર-સમુદ્રને તરનાર શય્યાતર કહેવાય છે અથવા સંસાર રૂપી સાગરથી પાર થવાનું આતર (શુક) જેનું, તેને શય્યાતર કહે છે, જેમ શચ્યા છે श्रीदशवेकालिकमूत्रे पारागरोतरणशुल्क यस्य स शग्यातरः । अत्र पक्षे यथा कभिन्नदी-पार जिग- मिपुर्नाविकाय नदीतरणशुल्क दत्त्वा तत्पार गच्छति तथा समारसमुद्रपार जिग- मिपुगृहस्थस्तन्नाविकस्वरूपाय महापुरुषाय मुनये शग्या (वसतिस्थान)-रूप- मातर (तरणशुल्क) दवा तत्पार व्रजतीति भानार्थोऽनुसन्येयः। पक्षद्वयेऽपि सा- वासार्थमाज्ञादायक इति फलितम् , तस्य पिण्डः आहारौष यादिःशग्यातरपिण्ड इति। शग्यातरविचारः। यद्यपि निवासार्थ साघवे स्वानुमतिप्रकाशको वसतिस्वामी शग्यातरशब्द- स्यार्थः, तथापि तस्य तदैव शय्यातरत्व भवति यदा तत्र वसती साधुर्भाण्डोपकर- णानि स्थापयेत् , प्रतिक्रमणमाचरेत् , रागी शयीत च । अत्राय विवेकः- जिसका उसे शय्यातर कहते हैं। जैसे कोई नदी पार करनेकी इच्छावाला बटोही (मा) नाविकको नदी पार उतारनेका मृल्य देकर पार उतरता है उसीप्रकार ससाररूपी समुद्रके पार उतरनेकी इच्छावाला गृहस्थ नाविकके समान साधु महापुरुषोंको शय्या (वसति-स्थान)रूपी उतराई (पार उतरनेका मूल्य) देकर ससारसागरसे पार उतरता है, यह अभि- प्राय समझना चाहिए। दोनों पक्षोंका अर्थ एक ही है कि शय्यातर उसे कहते हैं, जो साधुको ठहरनेके लिए मकानकी आज्ञा देता है । उसके आहार औषध आदि पिण्डको शग्यातर-पिण्ड करते है। शय्यातर-विचार साधुको ठहरनेके लिए अपनीअनुमति प्रगट करनेवाला उपाश्रयका स्वामी शय्यातर कहलाता है,तथापि वह इन अवस्थाओंमे शय्यातर होता है- કિઈ નદી કરવાની ઈરછા-વાળે ઊતારૂ નાવિકને નદી ઊતરવાનું ભાડું આપીને પાર ઊતરે છે, તેમ જ સારરૂપી સમુદ્રને પાર ઊતરવાની ઈચ્છા-વાળો लन्थ, नावि-समान साधु-भा५३पार शय्या-(वसति-स्थान ) ३५ मा (પાર ઊતરવા માટેનું મૂય) આપીને સસાર-સાગરથી પાર ઊતરે છે, એ અર્થ સમજવું જોઈએ બેઉ પક્ષને અર્થ એક જ છે કે શાતર એને કહે છે કે જે સાધુને રહેવાને માટે મકાનની આજ્ઞા આપે છે, એના આહાર ઔષધ આદિ પિંડને શાતર-પિંડ કહે છે શય્યાતર—વિચાર સાધુને રહેવાને માટે પિતાની અનુમતિ આપનાર ઉપાશ્રયને સ્વામી શાતર કહેવાય છે, તથાપિ તે આ અવસ્થામાં શય્યાતર થાય છે પાર - अध्ययन ३ गा. ५ शग्यातरविचारः १६७ भाण्डोपकरणस्थापन-प्रतिक्रमणाचरण-शयनाना त्रयाणामत्येक शल्यातरत्वे हेतुत्वम् , तेन प्रतिक्रमणाचरण-शयनाभ्या प्रागपि भाण्डोपकरणस्थापनानन्तर वसतिस्था- मिनः शग्यातरत्वम् , पूर्वगृहीतवसतौ स्थानसकीर्णताया सत्या क्रियान् मुनिरन्य- साधुसका स्वकीयभाण्डोपकरणानि निपाय अन्यस्मिन् समीपतरवत्तिन्युपाश्रये तत्स्वामिनिदेशमादाय प्रतिक्रमण कुर्वीत तदा तत्र भाण्डोपकरणस्थापनाभावेऽपि तटीयस्वामिनः शग्यातरत्वम् । अन्यत्र प्रतिक्रमण कृत्वा स्थानसकीर्णताण सत्या (१) साधु वसतिमें भाण्डोपकरण रख देवे । (२) प्रतिक्रमण करे, और (३) रात्रिमे शयन करे। (१) इन तीनोंमेसे प्रत्येक क्रिया शग्यातर होने मे कारण है। इसलिए प्रतिक्रमण और शयन करनेसे पहले भी भाण्डोपकरण रख देनेपर वस- तिका स्वामी शग्यातर हो जाता है। (२) पहले जिस वसतिको ग्रहण कर लिया हो उसमे स्थानकी सकी- र्णता होनेपर कुछ साधु अपने भाण्डोपकरण अन्य साधुओंके समीप रखकर, पासके दूसरे उपाश्रयमे उसके स्वामीकी आज्ञा लेकर प्रतिक्रमण करें तो वहा भाण्डोपकरण न रखने पर भी जहा प्रतिक्रमण किया हो उस वसतिका स्वामी शय्यातर कहलाता है, इस वसतिका नहीं। (३) दूसरे स्थानमें प्रतिक्रमण करके, स्थानकी सकीर्णताहोने पर जहा (૧) સાધુ વસતિમાં ભાડેપકરણ (પાત્ર વગેરે) રાખે (૨) પ્રતિક્રમણ કરે અને (3) रात्रे शयन ४२ (૧) આ ત્રણેમાની પ્રત્યેક ક્રિયા શય્યાતર થવામાં કારણ છે, તેથી પ્રતિક્રમણ અને શયન પૂર્વે પણ ભાડેપકરણ રાખી દે તે વસતિને સ્વામી શય્યાતર થઈ . જય છે (૨) પહેલા જે વમતિનું ગ્રહણ કરી લીધું હોય, તેમા સ્થાનની સકીર્ણતા (સકડાશ) હોવાથી કોઈ સાધુ પિતાના ભાડાપકરણ બીજ સાધુઓની સમીપે રાખીને, પાસેના બીજા ઉપાશ્રયમાં તેના સ્વામીની આજ્ઞા લઈને પ્રતિક્રમણ કરે તે ત્યા ભાડેપકરણ ન રાખવા છતા પણ જ્યાં પ્રતિક્રમણ કર્યું હોય તે વસતિને સ્વામી શય્યાતર કહેવાય છે, આ વસતિને નહિ (૩) બીજા સ્થાનમાં પ્રતિક્રમણ કરીને સ્થાનની સકડાશને કારણે ક્યા १६८ श्रीदशवकालिकसूत्रे शयनमात्र यत्राचरित तत्स्वामिनोऽपि भग्यावरत्यम् । परन्त्यय विशेपो बोदव्यः-- अन्यसाधुसविसकीयभाण्डोपकरणानि सस्थाप्याऽन्यत्र गयनपतिक्रमणाचरणे मूलोपाश्रयस्वामिनो न शग्यावरत्वम् , माण्डादिस्थापने साघुसानि-यस्यैव निमित्तता न तु तत्स्वामिनः, साधोरभावे भाण्डादिस्थापनस्य शास्त्राविहित्तत्त्वात् । शग्यातरत्वनितिकरणाय तु पुनः पुनः शग्यातरपरिवर्तन नाचरणीयम् । पुनः पुनः शय्यातरपरिवर्तन हि साधोमिक्षालोभ प्रकाशयति, तर बहवो दोपा अपि चापतन्ति, तथाहि-शग्यातरपरिवर्तने पूर्वशग्यातरो भिावयति-अव मम गृहे १-वसतिस्वामिनः । सिर्फ शयन किया हो उस स्थानके स्वामीको भी शय्यातर कहते हैं अर्थात् उस अवस्थामे दोनों शय्यातर है। विशेष यह है कि-दूसरे साधुओंके पास भाण्डोपकरण रखकर अन्य ही किसी स्थानपर प्रतिक्रमण और शयन करेतोजहा भाण्डोपकरण रक्खें है, उस स्थानका स्वामी शय्यातर नही कहलाता। क्योंकि भाण्डो- पकरण साधुके नेसराय (अधीनता) में ही रखे जाते हैं, गृहस्थके नेस- रायमें रखना शास्त्रविरुद्ध है। शय्यातरत्वकी निवृत्ति करने के लिए चारवार शय्यातरका परिवर्तन नहीं करना चाहिए। ऐसा करनेसे यह प्रगट होता है कि साधु भिक्षाका लोभी है, इसमे यदुतसे दोष भी उत्पन्न होते है। जैसे-शग्यातरका परिवर्तन करनेसे पहला शय्यातर इस प्रकार માત્ર શયન કર્યું હોય તે સ્થાનના સ્વામીને પણ શય્યાતર કહે છે અર્થાત એ સ્થિતિમાં બેઉ ચાતર છે વિશેષ વાત એ છે કે-બીજા સાધુઓ પાસે ભાડેપકરણ રાખીને બીજા જ કઈ સ્થાન પર પ્રતિક્રમણ અને શયન કરે તે જ્યા ભાડાપકરણ રાખેલા હોય, તે સ્થાનને સ્વામી શખ્યાતર નથી કહેવાતે, કેમકે ભાડેપકરણ સાધુની નેસરાય (अधीनता) भार રાખવામાં આવે છે, ગૃહસ્થની નેસરાયમાં રાખવા એ શાસ્ત્રવિરૂદ્ધ છે શશ્ચાતરત્વની નિવૃત્તિ કરવાને માટે વાર વાર શય્યાતરને પરિત્યાગ કરે ન જોઈએ એમ કરવાથી એવુ પ્રકટ થાય છે કે સાધુ ભિક્ષાને લેભી છે, એમાથી અનેક દે પણ ઉત્પન્ન થાય છે જેમ-શાતરનું પરિવર્તન કરવાથી પહેલે શય્યાતર આ પ્રમાણે વિચારે છે- अध्ययन ३ गा. ५ वसतियाचनाविधिः १६९ त्यक्तमदीयोपाश्रयः साधुरसौ निश्वितमागमिप्यतीति तदर्य मुरसमन्नादिक साध- नीयमिति कृत्वा निष्पादितस्यान्नपानादेराधाकर्मिकत्वापत्तिः । यदि तु स्वार्थ साधुनिमित्त च निष्पादित तदा मिश्रजातदोपापत्तिर्दुर्निवारैव । पूर्व शय्यातरेण त्यक्तोपाश्रयाय साधवे कस्यचिद् वस्तुनः स्थापने स्थापनादोपः कथ साधुना वारणीयः। अन्ये दोपाः स्वयमूहनीयाः । तस्माद् झटिति शय्यातरपरिवर्तन न साधुना विवेयम् । वसतियाचनाविधिः। अथोपाश्रयस्वामिनस्तदनुपस्थितीतत्सरक्षकाद्वा वसतियाचनाविधिरभिधीयते- सोचता है-आज मेरे उपाश्रयकी आज्ञा सतोंने छोड़ दी है, अतः मेरे यहाँ अवश्य आवेंगे, इसलिए उनके वास्ते स्वादिष्ट अन्न आदिक बनाना चाहिए, ऐसा विचार कर बनाया हुआ अन्नादिक आधार्मिक होगा। यदि पहला शय्यातर अपने और साधुके लिए इकट्ठावनावेगा तो मिश्र- जात दोष लगेगा । साधुके आनेकी सभावनासे वह किसी वस्तुको स्थापना करेगा तो स्थापना (ठवणा) दोप होगा । -इत्यादि अनेक दोप स्वय समझ लेने चाहिये । इसलिए साधुको यारम्बार शय्यातर बदलना नहीं कल्पता है। उपाश्रय-याचनाकी विधि । वसति-स्वामीसे अथवा उसकी गैर-मौजूदगीमे उसके सरक्षकसे वसति-याचनाकी विधि कहते हैं- આજ મારા ઉપાશ્રયની આજ્ઞા સતએ છોડી દીધી છે, એટલે મારે ત્યા જરૂર આવશે, તેથી એમને માટે સ્વાદિષ્ટ અન્નાદિ બનાવવા જોઈએ એ વિચાર કરીને બનાવેલું અન્નાદિ આધાકર્મી બનશે, જે પહેલે શય્યાતર પિતાના માટે અને સાધુને માટે એકઠું બનાવશે તે મિશ્રજાત દેવ લાગશે સાધુ આવવાની સભાવનાથી તે કેઈ વસ્તુને સ્થાપન કરશે તે સ્થાપના-(ઠવણી-દેષ લાગશે -ઈત્યાદિ અનેક દે પિતાની મેળે સમજી લેવા એ કારણથી સાધુને વારવાર શિય્યાતર બદલવા ક૫તા નથી (ઉપાશ્રય-ચાચનાની વિધિ) વસતિના સ્વામી પાસે અથવા તેની ગેરહાજરીમાં એના સરક્ષકની પાસે વસતિ–વાચના કરવાની વિધિ કહે છે- १७० श्रीदशवकालिन मुनि देत्-हे आयुष्मन् ! अस्या मती म्यातुमिच्छामि, यावति समये स्थातुमादेशो भवदीयो भवेत् तानेर कालो यापनीयः, तत्रापि यावान् वसति- भूमिभागो ममारस्थानाय भाते रोचेत तावानेर ममापेक्षणीय इति । ततो गृहस्थः प्रतिव्रयात्-भगवन् ! मुनीश्वर ! कियतः कालानवस्थास्यते ? तदा ऋतुपद्धशेपकाले सति साधुः "एकमासारधिकाले कल्प्ये यावटवसर स्था- स्यामि" इति, पर्पाकाले तु " चतुरो मासानन यापयिप्यामी"-ति वदेत् । सागारिकेण साधुकल्प्यकालमुपलक्ष्य-"एतारत' कालानत्राह न स्थास्यामि ग्रामान्तर गमिष्यामी"-ति कथने तु साधुरेर कययेत्-'अब भादुपस्थितिसमया- मुनि-हे आयुष्मन् ! हम इस वसतिमें ठहरना चाहते हैं। तुम जितने समय तक ठहरनेकी आज्ञा दोगे, उतने समयसे अधिक नहीं ठहरेंगे। उसमें भी तुम भूमि का जितना भाग में ठहरनेके लिए देना चाहो, उतनाही हमारे लिए पर्याप्त है। गृहस्थ पूछे कि-हे मुनिराज! आप कितने समय तक ठहरना चाहते हैं । तय मुनि-ऋतुबद्ध शेपकाल होतो 'एक मासके कल्पमें जब तक अवसर होगा तब तक रहेंगे' ऐसा, यदि चातुर्मास हो तो 'चार मास ठहरनेका हमारा कल्प है' ऐसा कहे। यदि साधुका कल्प-काल सुनकर गृहस्थ कहे कि-मै तो थोडेही दिन यहाँ रहूँगा फिर ग्रामान्तर जाऊँगा, तो साधुको कहना चाहिए कि-"जब तक तुम यहाँ रहोगे तब तक ही भुनि-3 सायुज्मन् । अमे आ वसति (मान-स्थान) मा છીએ તમે જેટલા સમય સુધી રહેવાની આજ્ઞા આપશે, તેટલા સમયથી વધારે સમય રહીશુ નહિ તેમાં પણ તમે ભૂમિને જેટલે ભાગ અમને રહેવાને માટે આપવા ઈચ્છે તેટલે જ અમારે માટે પર્યાપ્ત (પૂર) છે ગૃહસ્થ-હે મુનિરાજ ! આપ કેટલા સમય સુધી રહેવા ઈચ્છે છે? ત્યારે મુનિ-ઋતુબદ્ધ રોષકાળ હોય તે–એક માસના ક૮૫માં જ્યા સુધી અવસર હશે ત્યા સુધી રહીશુ એમ કહે, અથવા જે ચાતુર્માસ હોય તે- ચાર માસ રહેવાને અમારે કહ્યું છે એમ કહે જે સાધુને ક૫ડાળ સાભળીને હસ્થ કહે કે હુ તે ચેડા જ દિવસ અહીં રહીશ તે સાધુએ કહેવું જોઈએ કે જ્યાં સુધી તમે અહીં રહેશે ત્યાં સુધી જ અમે રહીશુ, તમે જશે . રહેવા ઈચ્છીએ - अ ययन ३ गा. ५ शग्यातरगृहे कल्प्याकल्प्यविधिः १७१ वधिरेव कालो मया क्षपणीयः, तदनन्तरमिमा वसतिं परिहास्यामीति । पुनः सागारिकेण-'कियन्तः साधवो भवन्तः ?' इति पृष्टः साधुरभिदधीत- समुद्रतरङ्गवत् साधनामियत्तावधारण क कुर्यात् , यतः क्रियन्तो गच्छन्ति, कियन्तश्चागच्छन्ति, ये चागमिष्यन्ति तेऽप्यावस्थान करिष्यन्ति । इत्य सागारिकाज्ञामादाय तदीयनामगोत्रे विज्ञायोपाश्रये साधुस्तिष्ठेत् । गोचरी गन्तुमुद्यतो भिक्षुः शय्यातरनामगोत्रे अविज्ञाय भिक्षार्थ न पर्यटेत् । कल्प्याकल्प्यविपिः । शय्यातरगृहे साधोरकल्प्यानि कथ्यन्ते, यथा- हम ठहरेगे, तुम्हारे जाने पर इस वसतिको छोड देंगे।" यदि गृहस्थ पृछे कि-'आप कितने साधु हैं?' तो मावु उत्तर देवें कि-'समुद्रकेतरङ्गोंकी तरह साधुओंकीमर्यादानही है क्योंकि कितने ही साधु आते हैं और कितनेही चले जाते हैं, जोआवेगेवे भी यही ठहरेंगे। इस प्रकार गृहस्थकी आज्ञा लेकर, उसका नाम और गोत्र जानकर सायुको ठहरना चाहिए । जबतक साधुको ग्यातरका नाम और गोत्र न मालूम हो जावे तर तक भिक्षाके लिए न जावे । . कल्प्याकल्प्य-विधि । निम्नलिखित वस्तुएँ शय्यातरके घरकी कल्पनीय नहीं हैं- ત્યારે આ સ્થાનને અમે છેડી દઈશુ ” જે ગૃહસ્થ પૂછે કે “આપ કેટલા સાધુઓ છે?” તે સાધુ ઉત્તર આપે કે- “સમુદ્રના તરગેની પેઠે સાધુઓની મર્યાદા નથી, કેમકે કેટલાય સાધુઓ આવે છે અને કેટલાય ચાલ્યા જાય છે, જેઓ આવશે તેઓ પણ અહીં જ રહેશે એ પ્રમાણે ગૃહસ્થની આજ્ઞા લઈને, એનું નામ અને ગેત્ર જાણીને સાધુએ રહેવું જોઈએ જ્યા સુધી શાતરનું નામ અને ગોત્ર સાધુના જાણવામાં ન આવે ત્યા સુધી ભિક્ષા માટે જાય નહિ kયાકથ્થ-વિધિ નીચે લખેલી વસ્તુઓ શાતા ઘરની સાધુને કલ્પ નહિ- " , १७२ श्रीदशवकालिकम्ने (१) अशनम् , (२) पानम् , (३) खाद्यम् , (४) स्वायम् , (५) वसम् , (६) पात्रम् , (७) कम्बल , (८) रजोहरणम् , (९) दोरकम् , (१०) सूची, (११) कतरी, (१२) छरिका, (१३) नखहरणी, (१४) कर्णशोधनी (कानखुचरनी), (१५) दन्तशोधनी (दातसुचरनी), (१६) कण्टकोद्धारणी (काटाकानी- चींपिया) (१७) कण्टकः कण्टकोद्धारणीपात्रच (कण्टककुस्थलिका ), (१८) औषधम् , (१९) भैपज्यम् , (२०) शतपासहस्रपाकादितैलम् , (२१) पात्र- रञ्जनद्रव्यम् (रोगान सपेदा आदि), (२२) पानादी रन्धारणाशुपयोगी शस्त्र- विशेषः (सियार, रेती, इत्यादि), (२३) करगलम् , (२४) लेखनी, (२५) मसी, (२६) मसीपात्रम् , (२७) हिङ्गुलम् , (२८) खटिका, (सडी), इत्यादीनि । अथ शय्यावरगृहे साधोरुपादेयानि (कल्प्यानि) निर्दिश्यन्ते- " (६) पात्र, (७) , . (१) अशन, (२) पान, (३) खाद्य, (४) स्वाय, (६) वस्त्र, कम्बल, (८) रजोहरण, (९) डोरा, (१०) सुई, (११) कैंची, (१२) चाकू, (१३) नखहरणी (नहरनी), (१४) कर्णशोधनी (कानकुचरनी), (१५) दन्तशोधनी (दातकुचरनी), (१६) चींपिया, (१७) काटे और काटोंकी कोथली, (१८) औपध, (१९) भेषज, (२०) शतपाक-सहस्रपाक आदि तेल (२१) पात्र रगने के लिए रोगन, सुपेता आदि, (२२) पात्रमें छेद आदि करनेके काममे आनेवाले स्थार, रेती आदि ओजार, (२३) कागज, (२४) लेखनी, (२५) स्याही, (२६) हिंगलु, (२७) खड़ी इत्यादि । निम्नलिखित वस्तुएँ शग्यातरके घरसे साधुको कल्पनीय हैं- (१) मन, (२) पान, (3) माध, (४) स्वाध, (५) १, (६) पात्र, (७) मणी (८) २२९, (६) al, (१०) सोय, (११) तर, (१२) यY, (१३) नम उतार पानी ने२, (१४) आन-मोती, (१५) हात-पात, (१) यीपाया, (१७) ट मथवा टानी यमी, (१८) मास, (१८) नेपर, (२०) शता-सस પાક આદિ તેલ, (૨૧) પાત્ર રંગવા માટે ગાન સફેત વગેરે, (૨૨) પાત્રમાં છિદ્ર આદિ કરવાના કામમાં આવવાના સારડી, રેતી વગેરે જાર, (૨૩) કાગળ, (५४) म, (२५) 08, (२१) गणो, (२७) 41, त्यादि નીચે લખેલી વસ્તુઓ શય્યાતરના ઘરની સાધુને કહપે- अध्ययन ३ गा. ५ शय्यावरगृहे कल्प्याकल्प्यविधिः १७३ (१) तृणम् , (२) लोप्टम् , (३) शिलापट्टकः (पेपणी), (४) शिलापुत्रकः, (४) भस्म, (६) पापाणग्वण्डम् , (७) इष्टका, (८) युलिः, (९) पीठम् , (१०) फलकम् (आसन- विशेषः), (११) शग्या (शरीरप्रमाणा), (१२) सस्तारकम् (माईद्वयहस्त- प्रमाण आसनविशेषः), (१३) गोमयम् , (१४) सोपधिकशिप्य., (१५) स्वाध्या- याद्यर्थ मातिहारिक (पडिहारी) पुस्तकम् , इत्यादीनि । इदमप्यनुसन्येयम्- यस्योपाश्रयस्य स्वामिने निवासशुल्क दत्त्वा गृहस्थो निवासार्थ साधु निमन्त्रयेत् स उपाश्रयः साधोरकल्प्य इति । उपाश्रयस्यानेफस्वामिनि सति कश्चिदेक एव शग्यातरत्वेन स्थापनीयः, न तु सर्वेऽपि । एतादृशशग्यातरस्य पिण्डे चत्वारो भगा भवन्ति, यथा- (१) एकत्र रन्धनम् , एकत्र भोजनम् , तिनका, (२) पत्थर, (३) शिला, (४) लोढ़ी, (६) राख, (६) पत्थरका- टुकड़ा, (७) ईट, (८) धूल, (९) छोटा बाजोट, (१०) फलक (आसन), (११) शय्या (शरीरप्रमाण), (१२) सस्तारक (ढाह हाथका आसन ), (१३) गोयर, (१४) उपधि-सहित शिप्य, (१५) स्वायाय आदिके लिए • पडिहारी (वापस दी जानेवाली) पुस्तक आदि । यह भी स्मरण रखना चाहिए कि-जिस उपाश्रयको भाडेपर साधुके लिए खरीदा हो वह उपाश्रय मायुको कल्पनीय नहीं है। उपाश्रयके अनेक स्वामी हो तो उनमेंसे एक शय्यातर होता है। ऐसे शय्यातरके पिण्डमें चार भग होते हैं। वे इस प्रकार- (१) उसी घरमें बनाना उसी घरमे जीमना । (१)तम, (२) पत्थर, (3)शिखा, (४)ोटी, (५) राम, (6) पत्थरना टुडा, (७) ४८, (८) धूण, (6) नाना ४8, (१०) ५१४ (आसन), (११) शय्या (शरीर प्रमाणुनी), (१२) सन्तार (मटी डायनु मासन), (१3) छण, (१४) 64धि સહિત શિષ્ય, (૧૫) સ્વાધ્યાય આદિને માટે પડકારી (પાછી આપી દેવાય તેવી) . પુસ્તક આદિ એ પણ યાદ રાખવું જોઈએ કે જે ઉપાશ્રય સાધુને માટે ભાડે રાખે હોય તે ઉપાશ્રય સાધુને કાપે નહિ ઉપાશ્રયના અનેક સ્વામીએ હોય તે તેમાથી એક શય્યાતર થાય છે એવા શય્યાતરના પિંડમા ચાર ભાગા હેય છે, તે આ પ્રમાણે-(૧) એજ ઘરમા १७४ श्रीदशकालिकाने (२) एकत्र धनम् , अन्यत्र गेहादी भोजनम् । (३) पृथक्-पृथय् रन्धनम् , एकत्र भोजनम् । (१) पृथक् पृथग् रन्धनम् , पृथक्-पृथग् भोजनम् । तत्र द्वितीयचतुर्थभगौ साधोः कल्प्यौ। द्वितीयभङ्गे एकत्र यनेऽपि पश्चात् शय्यातरेतराशस्य पृथकारे शग्यातरमालाश विहायाऽन्येपा पिण्ड उपादेयः, तत्र तदानीं शय्यातरस्वत्वापगमात् । चतुर्थकल्पे तु पिण्डे शग्यातराशलेशससर्गशक्कापि नास्ति । शग्यातरस्वत्वापगम एपोपादेयताहेतुरिति निष्पर्पः । एव मोपितभर्तृगामु अनेकामु सपत्नीप्वेकैच काचित् शय्यातरा कर्तव्या । (२) उसी घरमें बनाना दूसरे-दूसरे घरमें जीमना । (३) दुसरे-दूसरे घरमें बनाना उसी घरमें जीमना । (४) दूसरे-दूसरे घरमे बनाना और दूसरे-दूसरे घरमें जीमना । इन चार भगोंमेंसे दूसरा और चौथा भग साधुको कल्पनीय है। दूसरे भगमें एकत्र रन्धन होने पर भी शय्यातरसे भिन्न मनुप्यके अशके अलग होजाने पर शय्यातरका भाग छोडकर अन्यका पिण्ड कल्पनीय है, क्योंकि वहाँ शय्यातरका स्वामित्व नहीं रहता। चौथे भगमें तो शय्यातरके स्वत्वके ससकी तनिक भी आशका नहीं है। तात्पर्य यह है कि जहा शय्यातरका स्वत्व (हक) नहीं रहता वही वस्तु साधुको ग्राह्य होती है। इसी प्रकार यदि एक शय्यातरकी अनेक पत्नियाँ हों और वह જન બનાવવું અને એજ ઘરમાં જમવું (૨) એ ઘરમાં ભોજન બનાવવુ અને બીજા ઘરમાં જમવું (૩) બીજા–બીજા ઘરમાં બનાવવું અને એ ઘરમાં જમવું (૪) બીજા–બીજા ઘરમાં બનાવવું અને બીજા–બીજા ઘરમાં જમવું આ ચાર ભાગમાથી બીજા અને ચોથા ભાગો સાધુને કલ્પ છે બીજા ભાગમાં એકત્ર સેઈ થતી હોય તે પણ શય્યાતરથી ભિન્ન મનુષ્યને ભાગ જુદા થઈ જતા શાતરને ભાગ છોડીને અન્યને પિંડ કપે છે, કારણ કે ત્યાં શતરનું સ્વામિત્વ રહેતુ નથી ચેથા ભાગમાં તે શય્યાતરના સ્વત્વના સ સર્ગની જરા પણ આશકા નથી તાત્પર્ય એ છે કે જેમાં શય્યાતરનું સ્વત્વ રહેતુ નથી, તે વસ્તુ સાધુને માટે . ગ્રાહ્ય બને છે એજ રીતે જે એક શય્યાતરની અનેક પનીઓ હેાય અને એ (શય્યાતર) अध्ययन ३ गा. ५ शय्यातराहारविवेकः १७५ चत्वारो भड़ा अत्रापि पूर्ववदेव । अमोपितभर्तृकामु तु यया निष्पादितमन्नादिक नियत शग्यातरो भुक्तेि सैव शय्यातरा, यधनियत भुक्ते तदा सर्वा अपि शग्यातरा मन्तव्याः, पूर्वोक्त- तृतीयभङ्गेऽय विशेपो बोद्धव्यः-यदा पृथक् पृथग् स्वन कृतम् , एकत्र कृत्वा भुक्त च तदाऽवशिष्टमन्नादिक विभज्य यदि स्व-स्वगृह नयेत् तादृश शय्यातरस्वत्व- विरहितमन्नादिक साधोः कल्प्यमेवेति । एकत्रीकृतमविभक्त चेन्न कल्प्यमिति तदाशय: । (शय्यातर) परदेश चला गया हो तो उनमें किसी एकको ही शय्यातर बनाना चाहिए । पहलेकी नाई यहा भी चार भग समझना चाहिए। उनका पति परदेश न गया हो तो वह जिस पत्नीके यहां नियमित रूपसे जीमता हो वही शय्यातर होती है । यदि नियमित रूपसे न जीमता हो-कभी कहीं कभी कहीं जीमता हो तो सभीको शय्यातर मानना चाहिए। पहलेके चार भगोंमेंसे तीसरे भगमे इतना विशेष समझना चाहिए- यदि अलग अलग भोजन बनाया गया हो और एकत्र करके जीमा हो तोबचे हुए अन्न आदिको याँट लेने पर साधु शग्यातरसे अन्यका आहार आदि ले सकते हैं, क्योंकि उसमेसे शय्यातरका हिस्सा अलग निकल चुका है । हा इकट्ठा कर लिया हो और बाटा न हो तो साधुको कल्प- પરદેશ ચાલ્યા ગયે હોય તે તે પત્નીઓમાથી કોઈ એકને જ શય્યાતર વવી જોઈએ પહેલાની પિઠે એમાં પણ ચાર ભાગા સમજવા જેએ એને પતિ પરદેશ ન ગયે હેય તે તે જે પત્નીને ત્યા નિયમિત રીતે જ જમતે હોય તે શય્યાતર બને છે જે નિયમિત રીતે ન જમતે હોય અને કઈવાર એકને ત્યા અને કઈવાર બીજીને ત્યાં જમતું હોય તે બધી પત્નીઓને શાતર માનવી જોઈએ પહેલાના ચાર ભાગામાના ત્રીજા ભાગમાં એટલું વિશેષ સમજવું કે- જુદુ જુદુ ભેજન બનાવ્યું હોય અને એકત્ર કરીને જમતા હોય તે વધેલા અન્નદિને વહેચી લીધા પછી સાધુ શય્યાતરથી જૂદાને આહાર આદિ લઈ શકે છે, કારણ કે એમાથી શય્યાતરને ભાગ કે કાઢવામાં આવી ચૂ હેય છે હા, એકઠું કરેલું અને વહેચ્યું ન હોય તે સાધુને કલ્પ નહિ કેઈ શપ્યા મના १७६ श्रीदर्शवेकालिकमत्रे कोऽपि शग्यातरो देशान्तर मस्थितः सगृहा हिर्गस्या कुत्रचित् तिष्ठेद , तत्र यदि गृहादन्यस्थानाद्वाऽशनपानादिक तदर्थमानीतम् , अथवा बहिःप्रदेश एव निष्पादित चेत् तदा तदशनादिक साधोरकल्प्यम् , रानियासार्थ बहिर्गतस्य साधोस्तु पुनः कल्प्यमेव । यदि शय्यातरोऽन्यदीयगृहेऽन्यदीयमन्नादिक परिवेपयेत् , तत्रापि शग्यात- रेण दीयमानमन्यदीयमप्यशन-पानादिक साधोरकल्प्यम् । साधोभिक्षादाने शग्यातरस्य सहगमनरूपनिमित्तत्वे सति भिक्षाग्रहणमकल्प्यम् । ग्रामादहिरपि शग्यातरीयगोशालादिसत्त्वे तदीयदुग्पादिक साधोरकल्प्यम् । नीय नही है। कोई शय्यातर परदेश जा रहा हो, और घरसे निकलकर कही बाहर ठहर गया हो, तो भी उसका अन्न-पान ग्राह्य नहीं है, भलेही वह अन्न पान घरसे उसके लिए लाया गया हो या अन्य स्थानसे लाया गया हो अथवा वहीं पर तैयार किया गया हो । यदि रात्रिमें निवास करनेके लिए साधु बाहर चला गया हो तो कल्पनीय है। शय्यातर, दूसरे गृहस्थके यहा उसी दूसरे गृहस्थका अन्नादि परोस रहा हो तो भी उसके हाथसे दिया हुआ आहार कल्पनीय नहीं है । यदि किसी भिक्षाकी प्राप्तिमें शय्यातर निमित्त हो अर्थात् दलाली करे तो वह भिक्षा भी साधुको ग्राह्य नहीं है। गावसे बाहर शय्यातरकी गोशाला आदि हो तो वहांका दूध आदि भी साधुको ग्राह्य नहीं है। તર પરદેશ જઈ રહ્યો હોય અને ઘરમાંથી નીકળીને કયાંક તે પણ એનું અન્ન-પાન ગ્રાહ્ય બનતું નથી, પછી ભલે એ અન્ન-પાન ઘેરથી એને માટે લાવવામાં આવ્યું હોય અથવા અન્ય સ્થાનથી લાવવામાં આવ્યું હોય, યા ત્યાજ તૈયાર બનાવવામાં આવ્યું હોય જે રાત્રે નિવાસ કરવાને માટે સાધુ બહાર ચાલ્યા ગયા હોય તે કપે શય્યાતર, બીજા ગૃહસ્થને ત્યા એ બીજા ગૃહસ્થના અન્નાદિ પીરસે તે પણ એના હાથથી અપાતે આહાર કલ્પે નહિ જે કઈ ભિક્ષાની પ્રાપ્તિમા શાતર નિમિત્ત હોય અથર્ દલાલી કરે તે એ ભિક્ષા પણ સાધુને ગ્રાહ્ય થતી નથી ગામની બહાર શય્યાતરની ગોશાળા આદિ હોય તે ત્યાનું દૂધ વગેરે પણ સાધુને ગ્રાહા બને નહિ , બહાર રહ્યો હોય अभ्ययन ३ गा.५शग्यातराहारविवेकः १७७ शग्यातरगृहे भोक्ता भृत्यादिरपि शग्यातर' । शग्यातरस्य स्वसा दुहिता च तस्मिन् दिवसे पुनरागमनमनिश्चित्य भर्तृकुलादागच्छेत् , तदा साऽपि शय्यातरा। यदि तस्मिन्नइनि भर्तृकुल पुनर्गन्तुकामा शग्यातरगृहमागता चेत् सा शग्यातरगृहे एव शग्यातरत्वमुपयाति अन्यगृहे तु न तस्याः शग्यातरत्वमिति योन्यम् । उपाश्रयस्वामिनि देशान्तरस्थे सति उपाययसरक्षकानाज्ञामादाय यत्र साधु- स्तिष्ठेत् तत्रोपाश्रयस्वामिनि समागते साधुना शग्यातरत्व स्वामिन्येव कल्प- नीयम् , न सरक्षके । शय्यातरप्रदत्तमन्येन स्वीकृतमप्यशनादिक शय्यातरगृहे सापोरकल्प्यम् , व्यवहारशुद्धयादिदोपात् । शग्यातरके घर जीमनेवाले नोकर-चाकर भी शग्यातर हैं। शय्या- तरकी बहिन या बेटी उस दिन वापस लौटनेका निश्चय न करके अपनी ससुरालसे आई हो तो वह भी शय्यातर है, यदि वापस लोटनेका विचार करके आई हो तो वह शग्यातरके घरमें ही ग्यातर है, दुम- रेके घरमें नहीं, अर्थात् ढसरेके घरमें दसरेका आहारादि यदि वह परोसे तो साधु ले सकते है। जब उपाश्रयका स्वामी परदेशमे रहता हो और उपाश्रयके रखवाले से आज्ञा लेकर साधु उसमे ठहरे तो जब उपाश्रयका स्वामी आजावे तव वही शय्यातर होता है, रखवाला नहीं । शग्यातरने अशन आदिक दुसरे को दे दिया और दूसरेने चाहे उसे स्वीकार भी कर लिया हो तो भी शग्यातर के घर पर साधु को वह लेना नहीं શશ્ચાતરના ઘેર જમનારા નેર–ચાકર પણ પાશ્ચાતર છે, શય્યાતરની બહેન ય પુત્રી એ દિવસ પાછા જવાનો નિશ્ચય કર્યા વિના પિતાને સાસરેથી આવી હોય તે તે પણ શય્યાતર છે જે પાછા જવાને વિચાર કરીને આવી હોય તે ઘરમાં જ તે શય્યાતર છે, બીજાના ઘરમા નહિ, અર્થાત બીજાના ઘરમા બીજાને આહારાદિ જે તે પીરસે તે સાધુ લઈ શકે છે જે ઉપાશ્રયને સ્વામી પરદેશમાં રહેતું હોય અને ઉપાશ્રયના રખેવાળની આજ્ઞા લઈને સાધુ તેમાં રહે તે જ્યારે ઉપાશ્રયને સ્વામી આવી જાય ત્યારે તે શાતર બને છે, રખેવાળ નહિ શિયાતરે અશનાદિ બીજાને આપી દીધું હોય અને બીજાએ ભલે એને સ્વકારી પણ લીધુ હોય, તે પણ શતરને ઘેર સાધુએ તે લેવું જોઈએ નહિ, શશ્ચાતરના १७८ श्रीदभवेकालिकम तथा शग्यातरेण दत्तमन्येनास्पीकतमन्नादिक भग्यावरहा बहिरपि साधोरकल्प्यम् , तत्र शग्यावरस्सत्यापगमाभावात् । शय्यावरगृहाद् वहिरन्येन स्वीकृत चेत् तदा साधोः कल्प्यमेव, तत्र शग्या- तरस्वत्वापगमादिति चोभ्यम् । शग्यातरगृहादहिस्तेन (शग्यातरेण) दत्तमन्येनाऽस्त्रीकृत चेत् तत्राऽस्वी कृताशनपानादेः स्वीकारार्थ 'गृयतामिद-मित्यादिपररूपा प्रवचनाऽपि साधो- रकल्प्या । शल्यातरपिण्डग्रहणादिदोपशङ्कासभवात् । चाहिए, क्योकि स्वीकार कर लेनेसे शय्यातरका स्वामित्व तो नहीं रहा पर यहा व्यवहारसे अशुद्धि है। यदि शय्यातरद्वारा दिये हुए अन्नादिको अन्य गृहस्थ न स्वीकार करे तो शय्यानरके घरमे या घरसे यार कहीं भी साधुको नहीं प्राण करना चाहिए, क्योंकि उस आहारादिमें शय्यातरका स्वत्वरहता है। शय्यातरके घरसे बाहर दूसरेने स्वीकार कर लिया हो तो साधुको कल्पनीय है, क्योंकि उसपर शय्यातरका स्वत्व नहीं रहा। शग्यातरके घरसे बाहर शग्यातरने किसी दूसरेको दिया हो और दूसरेने स्वीकार न किया हो तो उस-अशनादिके स्वीकार करानेके लिए 'तुम ले लो' इत्यादिरूपसे गृहस्थको प्रेरणा करना भी साधुका कल्प नहीं है, क्योकि उसमें शग्यातरका पिण्ड लेने आदि अनेक दोषोंकी शका होती है। કારણ કે સ્વીકારી લેવાથી શય્યાતરનું સ્વામિત્વ તે રહ્યું નહિ, પણ તેમા વ્યવ હારથી અશુદ્ધિ રહેલી છે જે શય્યાતરે આપેલું અન્નાદિ અન્ય ગૃહસ્થ ન સ્વીકારે તે શાતરના ઘરમાં થા ઘબહાર કયાય પણ તે સાધુએ ગ્રહણ કરવું જોઈએ નહિ, કારણ કે તે આહા રાદિમા શાતરનું સ્વત્વ રહેલું હોય છે શયતાના ઘરથી બહાર બીજાએ સ્વીકારી લીધુ હોય તે તે સાધુને કાપે, કેમકે તે ઉપર શય્યાતનું સ્વત્વ રહેતું નથી શય્યાતરના ઘરની બહાર શય્યાતરે કૈઈ બીજાને આપ્યું હોય અને બીજાએ સ્વીકાર્યું ન હોય તે તે અશનાદિને સ્વીકાર કરાવવા માટે तात्यो' ઈત્યાદિ રૂપે ગૃહસ્થને પ્રેરણા કરવી એ પણ સાધુને કડપે નહિ, કારણ કે તેમા શય્યાતરના પિંડ લે વગેરે અનેક દેની ચકા રહે છે . , . अध्ययन ३.गा. ५ शग्यातरपिण्डग्रहणे दोषाः १७९ अथ शग्यातरपिण्डग्रहणे दोपाः प्रदयन्ते-- (१) वसतिदोलभ्यम् , वसतिस्वामिनो गृहेऽशनपानादिग्रहणनियमे-स्वकीया- नादिव्ययमालोन्य सोपाश्रयनिवासार्थमाज्ञा साधवे न कोऽपि दद्यात् , इत्याशयः। (२) प्रवचनलाघवम् , (३) स्वावासस्थान एव भिक्षाराभसभावनया परिभ्रमणा: ल्स्ये सजाते कदाचित् शग्यातरगृहे आहारायलाभेऽकालभिक्षाचर्याप्रसङ्गः, वेलातिक्रमे सति आर्जरौद्रध्यानमसद्गः, स्वाध्यायान्तरायः, आत्मलान्तिश्च, शय्यातरका पिण्ड ग्रहण करने में दोष बतलाते हैं- (१) शय्यातरका पिण्ड ग्रहण किया जाय तो वसति मिलना दुर्लभ (मुश्किल) हो जायगा। गृहस्थ यह विचारेगे कि इन्हें स्थान देनेसे अन्न- पान आदि भी देना पडेगा। ऐसा सोचकर गृहस्थ अपने स्थानमें रहनेके. लिए साधुओंको स्थान नहीं देगा (२) प्रवचनका लाघव होगा। (३) अपने निवासस्थान पर ही भिक्षा मिल जानेकी सभावनासे साधु भ्रमण करनेमे आलस्य करेंगे, और जर शय्यातरके घर पर आहार नहीं मिलेगा तो अकाल-(असमय)-मे गोचरी करनेका प्रसग होगा, और असमयमे भिक्षा न मिलने से आर्त-रौद्र यान होंगे, स्वा' याय आदिमें अन्तराय पडेगा, और आत्माको खेद होगा। શય્યાતરને પિંડ ગ્રહણ કરવામાં રહેલા દેશે બતાવે છે- (૧) શધ્યાતનો પિંડ ગ્રહણ કરવામાં આવે તે વસતિ (રહેવાનું સ્થાન) भान (भुस) બની જાય ગૃહસ્થ એમ વિચારશે કે એમને સ્થાન આપવાથી અન્ન-પાન આદિ પણ દેવા પડશે એમ વિચારીને ગૃહસ્થ પિતાના સ્થાનમાં રહેવાને માટે સાધુઓને સ્થાન આપશે નહિ (૨) પ્રવચનનુ લાઘવ થશે (૩) પિતાના નિવાસસ્થાન પર જ ભિક્ષા મળી જવાની સંભાવનાથી સાધુ ભ્રમણ કરવામા આળસ કરશે, અને જે શય્યાતરના ઘેરથી આહાર નહિ મળે તે અકાલે (અસમ) ગોચરી કરવાને પ્રસંગ આવશે, અને અકાલ ભિક્ષા ન મળવાથી આ —દ્ર ધ્યાન થશે, સ્વાધ્યાયાદિમા અતરાય પડશે અને આત્માને ખેદ થશે - १८० श्रीदशालिकमूत्रे (४) तीर्यवराज्ञामगोऽपीत्यादयो दोपाः प्रसनन्ते, (२३), इति शय्यातरविचारः। आसन्दी वेत्रासन, सविका च (२४), पर्यः मञ्चविशेषः, स एव पर्यटक स्वार्थे कः । चकाराच्छिविका दोला- -ताम्रयानादिग्रहणम् (२५), गृहान्तरनिपघा गृह-गृहिनिकेतन तस्याऽन्तरम् अभ्यन्तर मध्यमिति यावत् , तस्मिन् निपधा-निपदनम् उपवेशनमित्यर्थः, यद्यपि व्याकरणादौ निपी- दन्त्यस्या' मिति विगृह्य 'निपया आपणः' इत्युक्त तयाप्यत्र शास्त्रसङ्केतितत्वा द्भावक्यवन्तोऽय निपद्याशब्दः (२६), गात्रस्य शरीरस्य उद्वर्तनानि मलापनयनद्रव्येण समालेपनानि 'उपटन' इतिलोकमसिद्धानि, चकारादन्येपामपि शरीरसम्बन्धिना सस्काराणा ग्रहण बोदव्यम् (२७), एषु चारित्रघातादयो दोपा' मुस्पष्टा एव ॥५॥५॥ (४) इसके सिवाय तीर्थकर भगवानने शय्यातर-पिण्डको अकल्प- नीय बताया है, इसलिए उनकी आज्ञाका भग होगा, इत्यादि अनेक दोष आते हैं। इति शल्यातर-विचार समाप्त । (२४) आसन्दी-धेतकी बनी हुई छिद्रवाली कुर्सीपर बैठना । (२५) पर्यट-एक प्रकारका पलग, पालखी, डोला, तामजाम आदिका ग्रहण करना। (२६) गृहान्तरनिषद्या-गृहस्थके घरमें बैठना । (२७) गानोदर्तन-शरीर पर उबटन आदि करना ॥५॥ (૪) એ ઉપરાત તીર્થકર ભગવાને શાતર વડને અકલ્પનીય બતાવે છે, તે માટે એમની આજ્ઞાને ભગ થશે, ઈત્યાદિ અનેક દે ઉત્પન્ન થાય છે ઈતિ શઆતર-વિચાર સમાપ્ત (૨૪) આસન્દી-નેતરની બનાવેલી છિદ્રવાની ખુરશી પર બેસવું (२५) पर्य-४ रन ५ , पाली, गो, भ्यानो (૨૬) ગૃહાન્તરનિષદ્યા–ગૃહસ્થના ઘરમાં બેસવુ (૨૭) ગાધર્તન-શરીર પર સુગધી પદાર્થો ચળવા (૫) - .

अध्ययन ३ गा. ६ (५२) अनाचीर्णानि १८१ ૨૮ २९ 30 ३१ मूलम्-गिहिणो वेयावडिय, जाइयाजीववत्तिया । तत्तानिव्वुडभोइत्त, आउरस्सरणाणि य ॥६॥ छाया-गृहिणो वैयारत्य, जात्याजीवत्तिता (आजीववर्तिता) तप्तानिवृतभोजित्व,-मातुरस्मरणानि च ॥ ६ ॥ सान्वयार्थः-(२८) गिरिणो गृहस्थकी वेयावडिय-वैयावच करना, (२९) जाइया-जातिसे-अपनी ऊची जाति बताकर आजीववत्तिया जीविकानिर्वाह करना, (३०) तत्तानिव्वुडभोइत्त अग्निमें सिर्फ तपाया हुआ किन्तु शस्त्रसे अप- रिणत-मित्र भोजन करना, य और (३१) आउरस्सरणाणि बीमार होनेपर पूर्वमुक्त वस्तुका स्मरण करना ॥ ६ ॥ टीका-गृहिणः गृहस्थस्य, वैयावृत्य-गृहस्थायान्नाऽऽनयनप्रदानादि-लक्षण- शुश्रूपाकरणम् (२८), जात्या= अहमेतादृशजातिविशिष्ट" इत्याचाघोपणेन, उपलक्षणमिद कुलादी- नामपि, आजीवत्तिता-आजीवे जीविकाया वृत्तिः स्थितिर्यस्य तद्भाव', यद्वा 'आजीववनिता' इतिच्छाया, आजीवे जीविकाया वर्तितु शील यस्यासौ आजीववर्ती तस्य भाव इति तदर्थ (२९), तप्तानिवृतभोनित्व-तप्त-हिनोप्णीकृत च तत् अनिवृत शस्त्रापरिणत तप्ता- नितम् अपकमिति भावस्तभोक्तु शीलमस्य तत्त्रम् , मियानादिसेवनमित्यर्थ (३०) आतुरस्मरणम् आतुरा'-रोगादिग्रस्तास्तेपा स्मरण-तकर्तृकपूर्वोपभुक्त (२८) गृहस्थकी बैयाबृत्य (सेवा-शुश्रूपा) करना। (२९) अपनी जाति या कुल आदि बताकर भिक्षा लेना। (३०) आधा पका आधा कच्चा अर्थात् मिश्र अन्न-पानी आदि लेना। (३१) रोग आदिकी अवस्थामे पहले सेवन किये हुए विपयोका (२८) स्थनी वैयाकृत्य (मेवा-Yषा) 3.4 (૨૯) પિતાની જાતિ યા કુળ બતાવીને ભિક્ષા લેવી (૩૦) અધપાકા-અધકાચા અર્થાત્ મિશ્ર અન્નપાણી આદિ લેવા (૩૧) રેગાદિની અવસ્થામાં પહેલા સેવેલા વિષયનું સ્મરણ કરવું અર્થત, ૩૨ 33 34 38 ३७ 3८ १८२ श्रीदशवकालिको वस्तुम्मरणमिति फलितम् , यद्वा आतुरशन्दोन भावप्रधाननिर्देगस्तयाचाऽऽतुरत्वे स्मरणमिति समासः, रोगाद्यपस्थाया पूर्वानुभूतवस्तुस्मरणमित्यर्थ (३१)। चकार उहापि समुच्चयार्थः । अत्रासयमादयो दोपा जायन्ते ॥ ६ ॥ मूलम्-मूलए सिंगवेरे य, उच्छुखडे अनिव्वुढे । कदे मूले य सञ्चित्ते, फले वीए य आमए ॥७॥ छायाः-मूलक शृङ्गनेर च, इक्षुखण्डमनितम् । कन्दो मूल च सचित्त, फल वीज चामरम् ॥ ७ ॥ सान्वयार्थ.-य=और (३२) मूलए-मूला (३३) सिंगवेरे-अदरख (३४) उच्छुखडे गन्ना (सेलडी) अनिव्वुडे शस्त्रसे अपरिणत (३५) कदे कन्द य- और (३६) मृलेशिफा (तथा) सचित्ते सचित्त (३७) फले-फल य और आमए सचित्त (३८) बी वीज । भावार्थ-इनके सेवनसे अनन्तकाय आदि वनस्पतिकायकी विराधना होती है ॥ ७ ॥ टीका-मूला प्रसिद्धम् (३२), शृङ्गार शृतवद्धेर शरीर यस्य तत् आर्द्रक- मित्यर्थ (३३), च-तथा इक्षुखण्डम् इक्षुशकलम् , एतत्रयम् अनिवृत शस्त्रापरिणतम् (३४) चन्द -शूरणादिः (३५), मूल=शिफा (३६), च=पुनः, सचित्त सजीवम् , स्मरण करना अर्थात् बीमारीमें हाय! हाय! करना ॥६॥ (३२) सचित्त मूलाका सेवन करना । (३३) सचित्त अदरख (आदा) का सेवन करना। (३४) सचित्त इक्षुखण्डका सेवन करना। (३५) सचित्त शरण आदि कन्दोका सेवन करना। (३६) सचित्त मूलका सेवन करना। जिभादशमा 'डाय | हाय !' ४२वी (६) (૩૨) સચિત્ત મૂળાનું સેવન કરવું (33) सथित माइनु सेवन ४२७ (३४) सथित सीना पतlt-४४31- सेवन र (૩૫) સચિત્ત સૂરણ આદિ ક દેનુ સેવન કરવું (૩૬) સાચા મૂળનું સેવન કરવું अध्ययन ३ गा. ७-८ (५२) अनाचीर्णानि १८३ फलम् कर्कटी-त्रपुपादिकम्(३७),च-तथा बीज-तिलादि, आमकम् सचित्तम्(३८), अत्रानन्तकायादिविराधनादिदोपा जायन्ते ॥ ७॥ 38 ૪૨ ४3 ४६ -सोवच्चले सिधवे लोणे, रुमालोणे य आमए । मूलम्- सामुद्दे पसुखारे य, कालालोणे य आमए ॥८॥ छायाः-सौवर्चल सैन्धवो लवणो, रुमालवणचामकः । सामुद्रः पाशुक्षारच, काललवणश्यामकः ॥८॥ सान्वयार्थः-आमएसचित (३९) सोवच्चले सौवर्चल-सचरनमक (४०) सिंधवे लोणे सैन्धव-सींगानमक (४१) रुमालोणे-रुमानदीसे निका हुआ नमक (४२) सामुद्दे समुद्री नमक य और (४३) पसुखारे ऊपर नमक य= और आम सचित्त (४४) कालालोणे काला नमक । भावार्थ-उल्लिखित नमकोंका सेवन करनेसे पृथ्वीकाय आदिकी विराधना होती है ॥ ८॥ टीका-सुवर्चले देशविशेष भवः सौवर्चल: रुचकलवण. (३९), सिन्धुनापलक्षितदेशीयपर्वते भव. सैन्धवः, लगा लुनाति-दिनत्ति दूरयति कफादिकमिति लवण', इद सौवर्चलादेविशेपणपदम् (४०), चम्-तथा, रुमालवण =रुमा विशिष्टलवणारभूता काचिन्नदी तस्या लपणा, आमक =सचित्तः, अस्य पूर्वाः सर्वत्र सम्पन्ध (४१), (३७) सचित्त ककडी खीरा आदि फलोंका सेवन करना । (३८) सचित्त बीजका-तिल आदिका सेवन करना ।। ७॥ (३२) सचित्त रुचक (सौवर्चल सोचर) नमकका सेवन करना। (४०) सचित्त सैन्धव (सेधा) नमकका सेवन करना। (४१) सचित्त रुमा (नदीविशेषके) नमकका सेवन करना । (૩૭) સચિત કાકડી ખીરા આદિ કનુ સેવન કરવુ (७८) भथित मी त मानिनेपन २७ (७) (३८) सथित ३५४ सूर ( सौवर्थ-सया)नु मपन ४२५ (૪૦) સચિત્ત સિંધાલૂણુનું બેવન કરવું (૪૧) સચિત્ત રૂમ (નદીવિશેષમાથી નીકળેલા) મીઠનું સેવન કરવું श्रीदशवकालिको सामुद्रा समुद्रोत्थलवणः (४२), पारधारा-ऊपरलपणः (४३), च-तथा काललवणा-कृष्णलवणः 'विइलवण' इतिमसिद्धः (४४), आमका सचित्तः, 'आमा' इत्यस्योत्तराते सर्वत्र सम्बन्धः । अत्र पृथ्वी फायविराधनादयो दोपा भान्ति ॥ ८ ॥ ૪૫ ४९ ४८ मूलम्-धुवणेत्ति वमणे य, वत्थीकम्म-विरेयणे। ૫૦ ५. ૫૨ - अजणे दतवण्णे य, गायब्भगविभूसणे ॥९॥ छाया:-धूपनमिति वमन च, वस्तिकर्म विरेचनम् । अञ्जन दन्तवर्णश्च, गात्राभ्यग-विभूपणे ॥ ९॥ सान्वयार्थः-(४५) धुवणेत्ति रोग मिटाने आदिके लिए किसी स्थानमें धूप देना, (४६) वमणे प्रयत्नपूर्वक वमन करना, (४७) वत्थीकम्म बस्तीकर्म करना, य और (४८) विरेयणे-विरेच-जुलान लेना, (४९) अजणे अजन- सुरमा आदि आजना, (५०) दतवण्णे-दातून मसी आदिसे दाँत साफ करना, (५१-५२) गायब्भगविभूसणे-शरीरको तैल आदिसे मालिश करना (५१) तथा बस्त्र आदिसे भूपित करना (५२) ॥९॥ टीका-धूपन-रोगाद्युपशान्तिनिमित्त स्थानकादिषु धूपदानम् , त्पत्तिनिमित्तमशुझादीना धूपादिना वासनश्च (४५), (४२) सचित्त समुद्री नमकका सेवन करना। (४३) सचित्त ऊपर नमकका सेवन करना। (४४) सचित्त काले नमकका सेवन करना ॥ ८॥ (४५) रोग आदिकी शान्ति अथवा सुगधिके लिए स्थानक या वस्त्र आदिमे धूप देना। (૪૨) સચિત્ત સમુદ્રના લૂણુનું સેવન કરવું (૪૩) સચિત્ત ઉપર લૂણ (ખારા) નું સેવન કરવુ (४४) सथित्त ston भी अपन ४२७ (८) (૪૫) રેગાદિની શાન્તિ અથવા સુગ ધિને માટે સ્થાનક યા વસ્ત્રાદિને ધૂપ કરે सौगन्यो- अध्ययन ३ गा. ९ (५२) अनाचीर्णानि १८५ , वमन-वमिजनकभेपजादिप्रयोगेण वान्तिकरणम् (४६), वस्तिकम वसतः तिष्ठतः, मूत्रपुरीपावत्रेति, वस्ते आच्छादयति मूत्राऽऽ- शयपुटमिति वा वस्तिः नाभेरधोभागः, तस्याः कमतच्छोधनव्यापारो वस्ति- कर्म-मलादिशोधनार्थमपानादिमार्गे वर्तिकादिप्रवेशनम् , अपानमार्गेण जलकर्षण वेत्यर्थः (४७), विरेचनम्-कोष्ठशुद्धयर्थ स्वर्णमुख्यादिविरेचनसेवनम् (४८) अञ्जन शोभावगीकरणावर्थ नयनयोः कज्जल-सौवीरादिदानम् (४९), दन्तवर्णः-वर्णन-वर्णः, दन्ताना वर्णः=उज्ज्वलीकरण दन्तवर्णः अद्गुली दन्त- शाण(मसी)काष्ठादिभिर्दन्तर्पणम् (५०)। गाताभ्यग-विभूपणे अभ्यङ्गश्च विभूपण चेत्यनयोरितरेतरयोगद्वन्द्व इत्यभ्यग- विभूपणे, गात्रस्य अभ्यद्ग-विभूपणे गावाभ्यगविभूपणे, 'द्वन्द्वान्ते चन्दादौ वा श्रूयमाण पद प्रत्येकमभिसम्बध्यते' इतिन्यायाद् गात्रशब्दस्य प्रत्येक सम्ब- न्धस्तत्र गानाभ्यङ्ग गात्रस्य शरीरस्य अभ्यगः शतपाफ-सहस्रपाकादितैला दिनाऽभ्यजन मर्दनमिति यारत् (५१), गाविभूपण वस्त्रालङ्करणादिना शरीरपरिष्करणम् (५२), १ चौरादिकाद्वर्णयते वे छन् । (४६) दवाई लेकर वमन करना। (४७) मल आदिके शोधनके लिए बस्तिकर्म करना । (४८) कोठेकी शुद्विके लिए सनाय आदिका जुलाय लेना। (४९) नेत्रोंमे कजल आदि लगाना । (५०) मिस्सी आदि लगाकर दात रगना । (८१) शतपाक, सहस्रपाक आदि तेलसे गरीरकी मालिश करना। (५२) शरीरका वस्त्र आभूपणोंसे मण्डन करना। (४६) या धने वमन . (૪૭) મલાદિના શેધન માટે બસ્તિકર્મ કરવુ (૪૮) ઉદ ની શુદ્ધિને માટે સેનામુખી આદિને જુલાબ લે (૪૯) આખેમ કાજળ (મેગ) આજવું (૫૦) મક્ષ્મી વગેરે લગાડીને દાત - ગવા (૫૧) શતપાઠ, સહસપાઠ આદિ તેલથી શરીરને મર્દન કરવુ (५२) शरी२र्नु भउन ४२९ (शालायु) ८ 3 ५ ४ १ १८६ श्रीशिवकालिकमले धूपनादिनाऽनिकायप्रभृतिपिराधनादिदोपा जायन्ते ९ ॥ सम्पत्युपसहरन्नाह-'सत्यमेय'-इत्यादि । मूलम्-सवमेयमणाइन्न, निग्गयाण महेसिण। सजममि अ जुत्ताण, लहुभूयविहारिणं ॥१०॥ छाया:-सर्वमेतदनाचीर्ण, निन्याना महर्षीणाम् । सयमे च युक्ताना लघुभूतविहारिणाम् ।। १० ।। सान्चयार्थ:-निग्गवाण=परिग्रहरहित महेसिण-महर्षियोके सजममि- सयममें जुत्ताण लगेहुए य और लभूयविहारिण-बायुके समान अपतिब- न्धविहार करनेवालोके ण्यन्ये-पूर्वोक्त वावन सच्च-सर अणाहन्न अनाचीर्ण है। भावार्थ-निग्रन्थ महर्पियोने पूर्वोक्त इन पाचन रिपयोका आचरण नहीं किया, अत. ये अनाचीर्ण कहलाते है । साधुओको इनका आचरण नहीं करना चाहिये ॥१०॥ टीका-ग्रन्थान्निर्गता निर्ग्रन्था' कनक-रजतादिद्रव्यग्रन्थि-मिथ्यात्वादिभाव- ग्रन्थिरहितास्तेषाम् , मीणाम् महान्तच ते रुपय महर्पयस्तेपाम् , यद्वा 'महैषिणा' मिति छाया, महो-निजहित तम् एपयन्तिावेपयन्तीति महैषिणस्तेपाम् । सयमे सफलसावयव्यापारोपरमलक्षणे युक्ताना=च्यावृताना दत्तचित्तानामित्यर्थः, इन धृप आदिसे अग्निकाय आदि जीवोकी विराधना आदि दोष होते है ॥९॥ अब उपसहार करते है-'सव्वमेय०' इत्यादि। याह्याभ्यन्तर परिग्रहकी अधिसे रहित, अपने हितका अन्वेषण करनेवाले महर्षि तीन करण तीन योगसे सावध व्यापारके त्यागरूप એ ધૂપ આદિથી અગ્નિકથ આદિ જીની વિરાધના આદિ દેવ લાગે છે (૯), 64सा ४२ सन्त्रमेय. त्या બાહ્યાભ્યતર પરિગ્રહની ગ્રથિથી રહિત, પોતાના હિતનું અનવેષણ કરનારા મહર્ષિઓએ ત્રણ કર ત્રણ યુગથી સાવધ વ્યાપારને ત્યજવા રૂપ સકળ સયમથી - २ 3 ૫ ६ ७ ८ अध्ययन ३ गा. १०-११ अनाचीर्णत्यागिमुनिस्वरूपम् १८७ च-पुनः लघुभूतविहारिणाम् लघुभूतोवायुस्तद्वदप्रतिवद्ध विहरन्ति तच्छीला- स्तेपा वायुवदतिवन्धविहारिणामित्यर्थः । एतत्=पूर्वोक्त सर्व द्विपञ्चाशत्मकारकम् अनाचीर्णम् अनासेवितम् 'अस्ती-ति शेषः ॥ १० ॥ १० ॥ अनाचीर्णत्यागिनो मुनयः कोदृशा भवन्ति ?-इत्याह- मूलम्-पंचासवपरिन्नाया, तिगुत्ता छसु सजया । पचनिग्गहणा धीरा, निग्गथा उज्जुदसिणो ॥११॥ छाया:-पश्चाभूवपरिज्ञाता,-स्त्रिगुप्ताः पदमु सयताः । पञ्चनिग्रहणा धीरा, निग्रन्था ऋजुदर्शिनः ॥ ११ ॥ सान्वयार्थ.-पचासवपरिन्नाया पाच आस्रवोके त्यागी, तिगुत्ता-मनोगुप्ति १ वचनगुप्ति २ कायगुप्ति ३ से युक्त, छसु-छह कायमें सजया-सयमवान् , पचनि- ग्गणा-पाच इन्द्रियोके निग्रह करनेवाले धीरा-परीपह उपसर्ग सहनेमें धीर निग्गथा-मुनि उज्जुदसिणो मोक्षमार्गके आराधक होते है। भावार्थ-जो अनाची)का त्याग करते हैं वे गाथोक्तविशेषणोसे विशिष्ट होते हैं ॥११॥ टीका-पञ्चास्रवपरिज्ञाता: आस्रवति-आक्षरति मिथ्यात्वादिनालिकाभ्यः कर्मसलिलमात्मतडागे यैस्ते आस्रवा हिंसादयः, पञ्च च त आस्रवाथेति पश्चासरा सकल सयमसे युक्त और चायुकी तरह अप्रतिबन्ध विहार करनेवाले मुनिराजोंके ये पूर्वोक्त बावन अनाचीर्ण हैं ॥१०॥ अनाची)का त्याग करनेवाले मुनि कैसे होते है ? सो कहते हैं- 'पचासक०' इत्यादि। जिनके द्वारा आत्मारूपी तालावमे मिथ्यात्वादिरूप नालाओंसे कर्मरूपी जल आता है उन्हें आस्रव कहते हे। वे आस्रव मिथ्यात्व યુક્ત અને વાયુની પેઠે અપ્રતિબધ વિહાર કરનારા મુનિરાજના એ પૂર્વોક્ત બાવન અનાચીણું છે અનાચીને ત્યાગ કરનારા મુનિઓ કેવા હોય છે? તે કહે છે. पचासव० त्यादि જેની દ્વારા આત્મારૂપી તળાવમાં મિથ્યાત્વાદિ-રૂપ નાળાએથી કર્મ—રૂપી જળ આવે છે તેને આસવ કહે છે એ આ મિથ્યાત્વ અવિરતિ આદિ ભેદ श्रीदशवकालिकसूत्रे ८ ७ धूपनादिनाऽनिकायप्रभृतिविराधनादिदोपा जायन्ते ९॥ सम्पत्युपसहरबाह-'सत्यमेय -इत्यादि । मूलम्-सवमेयमणाइन्न, निग्गयाण महेसिण। सजममि अ जुत्ताण, लहुभूयविहारिण ॥१०॥ छाया:-सर्वमेतदनाचीर्ण, निर्ग्रन्थाना महपीणाम् । सयमे च युक्ताना लघुभूतविहारिणाम् ॥ १० ॥ सान्वयार्थ:-निग्गथाण-परिग्रहरहित महेसिण=महर्पियोके सजममि- सयममें जुत्ताण लगेहुए य और लहुभूयविहारिणवायुके समान अपतिव न्धविहार करनेवालोके ण्य ये-पूर्वोक्त वावन सब-सा अणाइन्न अनाचीर्ण है। भावार्थ-निर्ग्रन्थ महर्पियोने पूर्वोक्त इन पावन पिपयोका आचरण नहीं किया, अत' ये अनावीर्ण कहलाते है । साधुओको इनका आचरण नहीं करना चाहिये ॥१०॥ टीका-ग्रन्थान्निर्गता निर्ग्रन्थाः कनक-रजतादिद्रव्यग्रन्थि-मिथ्यात्वादिभाव- ग्रन्थिरहितास्तेपाम् , महीणाम् महान्तश्च ते रुपय. महर्पयस्तेपाम् , यद्वा महैषिणा' मिति च्छाया, महो=निजहित तम् एपयन्तिम्भवेपयन्तीति महैपिणस्तेपाम् । सयमे सकलसावधव्यापारोपरमलक्षणे युक्ताना व्यापताना दत्तचित्तानामित्यर्थः, इन धूप आदिसे अग्निकाय आदि जीवोंकी विराधना आदि दोष होते है ॥९॥ अब उपसहार करते है-'सव्वमेय.' इत्यादि । बाह्याभ्यन्तर परिग्रहकी ग्रन्थिसे रहित, अपने हितका अन्वेषण करनेवाले महर्षि तीन करण तीन योगसे सावध व्यापारके त्यागरूप એ ધૂપ આદિથી અગ્નિકાય આદિ ની વિરાધના આદિ દોષ લાગે છે (૯), हवे ५२ ४२ --सबमेय० त्या બાહ્યાભ્યતર પરિગ્રહની ગ્રથિથી રહિત, પિતાના હિતનું અન્વેષણ કરનારા મહર્ષિઓએ ત્રણ કરણ ત્રણ વેગથી સાવધ વ્યાપારને ત્યજવા રૂપ સકળ સયમથી अ ययन ३ गा. १२ अनाचीर्णत्यागिमुनिस्वरूपम् १८९ छाया-आतापयन्ति ग्रीष्मेपु, हेमन्तेष्वमादृताः । वासु प्रतिसलीनाः, सयताः मुसमा(हिताः)धिकाः ॥ १२ ॥ सान्वयार्थ:-सुसमादिया प्रशस्त समाधिवाले सजया सयमी मुनि गि- म्हेसु-ग्रीष्मऋतुमें आयावयति आतापना लेते है, हेमतेसु-हेमन्त ऋतुमें अवा- उडा=अल्पवस्त्र या वस्वरहित रहते है, वासासु-वर्पाकनमें पडिसलीणा कछु- एकी भाति इन्द्रियोका गोपन करते है, अर्थात् जिस ऋतु में जिस प्रकारकी तपस्यासे अधिक कायकेश होता हो उस ऋतमें वही तपस्या करते है ॥ १२ ॥ टीका-मुसमाधिका-समाधीयतेऽम्मिन् मनो विवेकिभिरिति समाधिः-प्रश- स्तभावाऽवस्थानम् , मुशोभन. समाधिर्यपाते तथोक्ता. विनय-श्रुतादिसमाधि- सम्पन्नाः । यद्वा 'सुसमाहिता" इतिच्छाया, 'निरववव्यापारविधानदत्तावधाना' इति तदर्थः । सयता माचनमननयतनावन्तः, मुनय ग्रीप्मेपु-धर्मर्तृषु आतापय- न्ति ऊर्वाभिमुखावस्थानादिना परितापयन्ति स्वतनुमिति शेप', आतापना विदधतीति यावत् । घ्नन्ति नाशयन्ति शैत्याधिक्येन चित्तसमाधिमिति हेमन्ताः हिमोऽन्तोऽवयवोऽस्त्येपामिति वा पृपोदरादित्वाद् हेमन्तास्तेपु हिम पुअप्राकृताः= १ ('हन्तेर्मुट् हि च ' उणादिम् . ३ । १२९) इति अच् इन्तेहिरादेशो मुडा- गमो गुणश्च । . जिस अवस्थामे आत्मज्ञानी जन प्रशस्त-भावोंसे रमण करते हैं उसे समाधि कहते हैं । अनाची)का त्याग करनेवाले साधु उस विनय श्रुत आदि चार प्रकारकी समाधिको प्राप्त करते हैं, अथवा निरवद्य व्यापार करनेमे सदा सावधान रहते हैं । तथा प्रवचनके मनन करने में यत्नवान् रहते हैं। ग्रीप्म ऋतुमे सूर्यके समुख मुख करके भुजाएँ फैलाकर आतापना लेते है । शीत ऋतुमे घोडे कपडे रखते, या कपडोको જે અવસ્થામાં આત્મજ્ઞાની જન પ્રશસ્ત–ભાથી મણ કરે છે તેને સમાધિ કહે છે અનાચીણુંને ત્યાગ કનારા સાધુઓએ વિનય કૃત આદિ ચાર પ્રકારની સમાધિને પ્રાપ્ત કરે છે અથવા નિરવવ વ્યાપાર કરવામાં સદા સાવધાન તથા પ્રવચનનું મનન अरवामा નવાનું રહે છે. ગ્રામ તુમાં સૂર્યની સન્મુખ મુખ રાખીને ભુજાઓ ને પહોળી કરીને આપના લે છે શીત કપડા રાખીને કપડા દ- કરીને ઠડીની આતાપના લે છે, તુમાં ચેડા યા " ४ १८८ श्रीदकालिकमूत्र परि-सर्वतोभावेन नाता परिझातोऽनर्थमूलमनुभाषिताः प्रत्याग यानपरिजातो इयत्वेन परित्यक्ता यैस्ते तथोक्ताः, त्रिगुप्ता' तिमभिर्मनोपायगुप्तिभिप्ता', पटुसु-पृथिव्यादिकायपट्केषु सयताम्सम्यग् यतनापन्त -पडूजीरनिकायाप मर्दनविरता इत्यर्थः, पञ्चनिग्रहणाः पञ्च-मसगात् पत्रेन्द्रियाणि निगृहन्ति वश- यन्तीति तथोक्ताः, धीराः परीपहोपसर्गादिपु धृतिमन्त', निन्या: भुनयः, ऋजुदर्शिनः बाजु-अवकम् अटिल्सभार यथा स्यात्तथा द्रष्ट शील येषा ते तथोक्ताः सरलहृदया इत्यर्थः, यहा अर्जते-उपार्जयतिसम्पादयत्यविचरमुखमिति ऋजुः सम्यग्ररत्नत्रयलक्षणो मोक्षमार्गस्त पश्यन्ति तच्छीला इति ऋजुदर्शिनः, मोक्षमार्गसाधका इत्यर्थ ॥११॥११॥ मूलम्-आयावयति गिम्हेसु, हेमतेसु अवाउडा । वासासु पडिसलीणा, सजया सुसमाहिया ॥१२॥ १ 'पञ्चास्रवपरिज्ञाताः' अत्र आहिताग्न्यादित्यान्निष्ठान्तस्य परनिपात । २ 'पञ्चनिग्रहणाः अत्र नन्यादित्वाकर्तरि ल्युः ।। अविरति आदिके भेदसे पाच प्रकारके है। उन आस्रवोको ज परिज्ञासे अनाँका कारण जानकर प्रत्याख्यान-परिज्ञासे त्यागते है। अर्थात् अनाची!का त्याग करनेवाले पाँच आस्रवोंसे विरत हो जाते हैं, मन वचन कायरूप तीन गुप्तियोंसे युक्त होते है, पृथिवी आदि षटकायकी यतनामे सावधान रहते है, अर्थात् षड्जीवनिकायकी विरोधनासे रहित शेते है, पाच इन्द्रियोंका दमन करते हैं, परीषद और उपसर्ग सहनेमे दृढ़ ऐसे मुनि, सरल हृदय होते है, अथवा अविनाशी सुखको प्राप्त करनेवाले या मोक्षमार्गके साधक होते है ॥११॥ કરીને પાચ પ્રકારના છે એ આને પરિજ્ઞાથી અનર્થોના કારણરૂપ જાણીને પ્રત્યાખ્યાન પરિફાથી ત્યજે છે, અર્થાત્ અનાચીને ત્યાગ કરનારાઓ પાચ આસોથી વિપત થઈ જાય છે, મન વચન કાયા–રૂપ ત્રણ ગુણિએથી યુક્ત થાય છે, પૃથિવી આદિ છ કાયની યતનામાં સાવધાન રહે છે, અર્થાત છે નિકાયની વિરાધનાથી રહિત થાય છે, પાચ ઈદ્રિયેનું દમન કરે છે, પરીષહ અને ઉપસર્ગ સહેવામાં દઢ એવા મુનિઓ સરલહુદય બને છે, અથવા અવિનાશી સુખને પ્રાપ્ત કરનારા યા મેક્ષમાગના સાધક બને છે (૧૧) જીવ १ २ પ 3 १० ७ ૧૧ अध्ययन३ गा. १३-१४ उपसहारः १९१ उपशम प्रापिताः परीपहरिपवो यैस्ते तथोक्ताः, धृतमोहाः मुह्यति सदसद्विवेक- रहितों भवत्यात्माऽनेनेति मोहोऽज्ञान व्रतः समुज्झितो मोहो यैस्ते तथोक्ताः, जितेन्द्रियाः जितानि-रागद्वेपवशात्स्वविषयप्रवृत्त्युपरोधपूर्वक वशीकृतानि इन्द्रि- याणि चक्षुरादीनि यैस्ते एवविधा महर्पया मुनयः सर्वदुःश्वप्रहीणार्थ' महीण'. मिति सौनत्वाद् भावक्तान्त गृह्यते, तथा च-सर्वाणि च तानि दुःखानि च सर्व- दुःखानि सर्वदु खाना पहीण-परित्याग. सर्वदुःसमीण, सर्वदुःखमहीणाय इद सर्वदुःखमहीणार्थम् 'अर्थेन नित्यसमासो विशेष्यलिङ्गता चेति वक्तव्य '-मिति समासः । यद्वा 'पक्षीणार्थ '-मिति तदर्थ., सर्वदुःखमक्षीणार्थ शारीरिक-मानसिक- निखिलदुःखविनाशार्थ प्रक्रामन्ति समुाजते स्वीया शक्ति स्फोरयन्तीत्यर्थः ॥१३॥ सम्प्रत्यययनमुपसहरन्नाह-'दुक्कराइ' इत्यादि- मूलम्-दुक्कराइ करित्ताणं, दुस्सहाइ सहेत्तु य । केइत्थ देवलोएसु, केड सिज्झति नीरया ॥१४॥ छाया'-दुष्कराणि कृत्वा, दुस्सहानि सोट्वा च । केचिदत्र देवलोकेपु, केचित् सिध्यन्ति नीरजस्काः ॥ १४॥ सान्वयार्थ- F-दुक्कराड-दुष्कर आतापना आदि करित्ताण-करके य और दुस्सहाद-कायर पुरुपोके असद्य ( परीपह आदि) सहेत्तु सह करके केई- १-'निष्ठान्तस्य न पूर्वनिपात', 'लक्षणहेत्वो क्रियाया.' इति मूत्रनिर्देशेन पूर्वनिपातप्रकरणस्याऽनित्यत्वात् । सत्-असत्के बोधसे वचित करनेवाले मोहको नष्ट कर देते हैं। इन्द्रियोंकी अपने अपने विषयमे जो प्रवृत्ति होती है, उस प्रवृत्तिको रोक कर इन्द्रियोंको वशमे करके जितेन्द्रिय होते है, ऐसे महर्पि शारीरिक और मानसिक समस्त प्रकारके समस्त दु खोका विनाश करनेके लिए पराक्रम फोडते है ॥१३॥ સત્ અસના બેધથી વિચિત કરનારા મહિને નષ્ટ કરી નાખે છે ઈદ્રિયેની પિતા પિતાના વિષયે માં જે પ્રવૃત્તિ થાય છે, તે પ્રવૃત્તિને રેકીને ઇદ્રિને વશ રાખીને જિતેન્દ્રિય બને છે, એવા મહર્ષિઓ શારીરિક અને માનસિક બધા પ્રકારના દુ ને વિનાશ કરવાને માટે પરાક્રમ કરે છે (૧૩) n . બધા ५ ६ श्रीदशवकालिकमूत्रे 'अनुदरा कन्ये'-त्यत्रेय नमोऽल्पार्थकत्वेन अल्पपापरणाः, यद्वापावरणरहिताः, वर्पासुम्पारट्कालेषु, मतिसलीना: कर्मादिन्द्रियगोपनतत्परा भान्तीत्यर्थः। ग्रीप्मादिषु बहुवचनमयोगः प्रतिवत्सरमेफरणसमूचनाय ॥ १२ ॥ १२ ॥ मूलम् परीसहरिउदता, धूयमोहा जिइदिया। सव्वदुक्खप्पहीणहा, परमति महेसिणो ॥१३॥ छाया-परीपहरिपुदान्ता, धूतमोहा जितेन्द्रिया । सर्वदुःखपहीणार्थ, प्रक्रामन्ति महर्पिणः ॥१३॥ सान्वयार्थ -परीसहरिउदता-परीपहरूपी शत्रुओको जीतने वाले धूयमोहा- मोहममताके त्यागी जिइदिया इन्द्रियोंके दमन करनेवाले महेसिणो महर्षि- मुनिराज सन्चदुक्खप्पहीणहा-समस्त दुःखोके नाशके लिए पकमति शक्ति फोडते है-उद्योग करते है ॥ १३ ॥ टीका-'परीसह०' इत्यादि । परीपहरिपुदान्ता. परीपहाः क्षुधा-पिपासादय एव रिपया शत्रवः पराभव- कारित्वात् परीपहरिपवः, दाताः अन्तर्भावितण्यर्थतया दमिता निगृहीता दूर कर शीतकी आतापना लेते हैं, वर्षा ऋतुमे कछुवेकीतरह इन्द्रियोंका गोपन करनेमे तत्पर होते हैं । ग्रीष्म, हेमन्त, और वर्षा-शब्द गाथामें बहुवचनान्त है, इससे यह आशय निकलता है कि प्रत्येक वर्षकी ऋतुओंमे ऐसा करते हैं ॥१२॥ 'परीसह इत्यादि। क्षुधा पिपासा प्रभृति परीपहरूपी शत्रुओंको पराजित करते है। વર્ષાઋતુમા કાચબાની પિઠે ઈન્દ્રિયનું ગેપન કરવામા તત્પર રહે છે ગ્રીષ્મ, હેમન્ત અને વર્ષો શબ્દ ગાથામાં બહુ-વચનાન્ત છે, તેથી એ આશય નીકળે છે કે પ્રત્યેક વર્ષની હતુઓમા એમ કરે છે (૧૨) परीसह. त्या भूम, तस, त्या परीष ३पी शत्रुभाने पारित छ , १९३ अध्ययन ३ गा. १५ अध्ययनपरिसमाप्ति छाया-तपयित्वा पूर्वकर्माणि, सयमेन तपसा च । सिद्धिमार्गमनुमाप्ता,-स्त्रायिण परिनिर्वृताः ॥१५॥ इति ब्रवीमि । सान्वयार्थ:-सिद्विमग्गमणुप्पत्ता-मोक्षमार्ग में प्राप्त हुए ताइणो-पट्कायके रक्षक (मुनि) सजमेण=मयमके द्वारा य और तवेण-तपके द्वारा पुवक- म्माड-पहले गये हुए कर्मोको खवित्ता-खपा करके परिनिव्वुडे मुक्त होते हैं। त्ति वेमि-पूर्ववत् ॥ १५॥ इति उतीयाध्ययनस्य सान्वयार्थः । टीका-सिद्धि' अविचलसुखनिप्पत्तिस्तस्या मार्ग'-उपायो ज्ञानादिः सिद्धि- मार्गस्तम् अनुपाप्ता'-अनुगता', त्रायिणः-पड्जीवनिकायत्राणपरायणान्तःकरणा. सयमेन=सावधव्यापारविरतिलक्षणेन सप्तदशविषेन, च=तथा तपसा ऊनोदरता- दिरूपेण द्वादशविन तपश्चरणेन पूर्वकर्माणि-माग्भवोपार्जितज्ञानावरणीयाधष्ट- जो मुनि कर्म बाकी रहेनेसे देवलोकमे जाते हैं, वे भी देवलोक- सम्बन्धी आयुष्यको भोग कर, वहासे चव कर आर्य क्षेत्रमें मनुष्यजाति, और सुकुलमे जन्म लेकर उसी भवमें सिद्धि प्राप्त करते हैं। इसी विषयको सत्रकार आगेकी गाथामें कहते हैं-"खवित्ता." इत्यादि । वे मुनि, मोक्षमार्गमे प्राप्त होकर सर्वसाबद्यव्यापारके त्यागरूप सत्रह प्रकारके सयमसे, तथा अनशन ऊनोदर आदि बारह प्रकारके तपसे, पहले भवोंमे बाधे हुए ज्ञानवरण आदि आठ प्रकारके समस्त પણ દેવ- જે મુનિ કર્મ બાકી રહેવાને લીધે દેવલોકમાં જાય છે, તેઓ લોકસબ ધી આયુષ્યને ભેળવીને, ત્યાથી ચડીને આર્યક્ષેત્રમાં મનુષ્ય જાતિ અને સુકુળમાં જન્મ લઈને એજ ભવમા સિદ્ધિ પ્રાપ્ત કરે છે આ વિષયને સૂત્રકાર मानी गाथामा ४१-खवित्ता त्याहि તે મુનિ, મેક્ષ-માર્ગમાં પ્રવેશ કરીને સર્વસાવદ્ય-વ્યાપારના સત્તર પ્રકારના સયમથી, તથા અનશન ઉનેદરી આદિ બાર પ્રકારના તપથી પહેલાના જમા ધેલા જ્ઞાનાવરણ આદિ આઠ પ્રકારના બધા કમેને નાશ ત્યાગરૂ૫ 3 ૫ ४ १९२ श्रीशिवकालिकात्रे कोई-कोई देवलोपसु-स्वाँमें (उत्पन्न होते है), केई-कोई-कोई नीरया-कर्म रजसे रहित-मुक्त होकर अत्यासी भामें मिमति सिट होजाते है-मोक्ष चले जाते है ॥१४॥ टीका-दुःखेन कर्ने योग्यानि दुफराणि आचरितुमशम्यानि कष्टसा या- न्यातापनादीनि कृत्वा विधाय, चम्तथा दुःसहानिकातरचित्त' सोडुमशक्यानि परीपहोपसर्गादीनि सोदा ससद्य केचिम्मुनयः आशिष्टकर्माणः देवलोकेषु- सौधर्मादिमुरलोकेषु 'यान्ती'-ति शेप., केचित् कतिपये नीरजस्का' कर्मरजो- विनिमुक्ताः अत्र-अत्रैव भवे सियन्ति-सिद्धा भवन्ति, शिवपदमासादयन्तीत्यर्थ । अत्र टीकान्तरेपु-'अ' त्यस्य 'देवलोकेपु' इत्यनेन सहान्वयकरण सर्वथा प्रमाद- विजृम्भितम् ॥ १४ ॥ १४ ॥१४॥ फर्मावशेषेण ये मुनयो देवलोक गच्छन्ति ते तत्र देवायुप्फमुपभुज्यततश्च्युता आर्यक्षेत्रे मनुष्यजातौ सुकुले च समुत्पद्य तद्भवमोक्षगामिनो भवन्तीति दर्शयितुमाह-'खवित्ता' इत्यादि- मूलम्-खवित्ता पुवकम्माइ, सजमेण तवेण य । सिद्धिमग्गमणुप्पत्ता, तायिणो परिनिव्वुडे ॥१५॥त्ति बेमि॥ उपसहार करते हुए कहते हैं- 'दुक्कराइ०' इत्यादि । पूर्वोक्त गुणोंसे विशिष्ट मुनि दुष्कर आतापना आदि क्रियाओंका आचरण करके, तथा कायर पुरुष जिन्हें सहन नही कर सकते ऐसे परीष और उपसर्गोंको सह कर अवशिष्ट-कर्मवाले कोई मुनि सौधर्म आदि देवलोकमे जाते है । जो कर्मरजसे सर्वथा मुक्त होजाते हैं वे इसी मनुष्य-भवमें सिद्धिपदको प्राप्त करते है । दूसरे टीकाकारोने 'अत्र' शब्दको देवलोकके साथ जोडा है वह ठीक नहीं है, अत्र अर्थ-यहाँ-"इसी भवमें" ऐसा है ॥१४॥ वे उपसारता -दुक्कराइ० छत्या પૂર્વોકત ગુણેથી વિશિષ્ટ મુનિ દુષ્કર આતાપના આદિ ક્રિયાઓનું આચરણ કરીને તથા કાયર પુરૂષે જે સહન કરી શકતા નથી એવા પરીષહ અને ઉપસર્ગો સહીને અવશિષ્ટ કર્મવાળા કોઈ મુનિ સૌધર્મ આદિ દેવલોકમાં જાય જેઓ કર્મજથી સર્વથા મુક્ત થઈ જાય છે તેઓ આ મનુષ્યભવમા સિદ્ધિપદને કરે છેબીજા ટીકાકાએ સત્ર શબ્દને દેવક સામે જે છે તે બરાબર નથી अत्र हो अर्थ ही 'भा सभा' मेवो छ (१४) ૨ , शब्दका પ્રાપ્ત अध्ययन ४ सु.१ प्रवचनस्याप्तोपदिष्टत्वम् १९५ ॥ अथ चतुर्थाध्ययनम् ॥ गत तृतीयाध्ययन सम्पति चतुर्थमारभ्यते-पूर्वा-ययने 'अनाचीर्णानि विहायाऽऽचारे धृतिः सधार्या सयमिने 'त्युतम् , आचारश्च पविधजीवाना यथावस्थितस्वरूपमवयुध्य तत्सरक्षणपुरस्सर भवत्यतोऽत्र पड्जीवनिकायानामाऽ- ध्ययने तत्स्वरूप तत्सरक्षणोपाय च प्रतिपादयिष्यन् प्रवचनस्याऽऽतोपदिष्टल प्रदर्शयति-'सुय मे' इत्यादि, मूलम्-सुय मे आउस । तेणं भगवया एवमक्खाय-इह खल्लु छज्जीवणियानामज्झयण, समणेण भगवया महावीरेण कासवेणं पवेइया सुअक्खाया सुपन्नत्ता, सेय मे अहिजिउ अज्झयण धम्म- पन्नत्ती ॥१॥ चौथा अध्ययन । अय चौथा अध्ययन कहते हैं- तीसरे अध्ययनमे यह प्रतिपादन किया है कि महापुरुषों को अना- चीर्णों का त्याग करके, आचार-(सयम)-मे दृढता रखनी चाहिए। आचारमें दृढता तय ही होती है जब पटकाय के जीवोंका वास्तविक स्वरूप जानकर उनकी रक्षा की जाय, इसलिए इस 'पड्जीवनिकाय नामक अध्ययनमें पड्जीवनिकायका स्वरूप और उसकी रक्षाका उपाय बताते हुए 'यह प्रवचन आप्त-( भगवान्)-द्वारा उपदिष्ट है' इस यातको कहते हैं- 'सुय मे०' इत्यादि । અધ્યયન ૪ થુ હવે શું અધ્યયન કહે છે – ત્રીજા અધ્યયનમાં એમ પ્રતિપાદન કરવામા આવ્યું છે કે મહાપુરૂષોએ અના ચીને ત્યાગ કરીને આચાર (સયમ)માં દઢતા રાખવી જોઈએ દઢતા ત્યારે જ આવે છે કે જ્યારે કાયના જીવોનું વાસ્તવિક સ્વરૂપ જાણીને તેમની રક્ષા કરવામાં આવે, તેટલા માટે આ “પજીવનિકાય” નામના અધ્ય ચનમાં છ-કાયનું સ્વરૂપ અને તેની રક્ષાના ઉપાય બતાવતા मास (मावान्) द्वारा टि' से वातने ४९ छे-सुय मे० त्या આચારમાં બ પ્રવચન १९४ श्रीदशवकालिकस्ने विधकर्माणि क्षपयित्वासय नीत्या परिनिताः परि सर्वतोभावेन निता = कमजनित-सन्तापराहित्येन शीतलीभूताः 'भान्ती'-ति शेपः, सिध्यन्तीत्यर्थः । इति ब्रीमीति पूर्ववत् ॥ १५ ॥ इति श्री-विश्वविख्यात-जगहलम-मसिद्धवाचक-पञ्चदशभापा-कलित-ललित- फलापाऽऽलापक-परिशुद्ध-गय-पय-नैकग्रन्यनिर्मापक-बादिमानमर्दक- श्रीशाहू छत्रपति-कोल्हापुरराजमदत्त-जैनशास्त्राचार्य-पद-भूपित- कोल्हापुरराजगुरु-पालब्रह्मचारि-जैनाचार्य-जैनधर्मदिवाकर- पूज्य-श्रीधासीलालप्रतिविरचिताया श्रीदशकालिकमूत्र- स्याऽऽचारमणिमपारयाया व्याख्याया तृतीय क्षुल्लकाचारकथा'ऽऽख्यम' ययन समाप्तम् ॥ ३॥ . - कर्मोंको नाश करके सर्वथा मुक्त हो जाते हैं-कर्मजन्य सतापसे रहित होकर परमशीतलीभूत होते है अर्थात् सिद्ध हो जाते है। श्रीसुधर्मा स्वामी जम्बूस्वामीसे कहते है-है जम्बू ! तीसरे अध्य- यनका जैसा भाव भगवानने फरमाया है, वैसा ही तुमसे कहताहूँ॥१५॥ इति क्षुल्लकाचारकथा” नामक तीसरे अध्ययनका हिन्दीभापानुवाद समाप्त ॥३॥ કરીને સર્વથા મુક્ત થઈ જાય છે-કર્મજન્ય સતાપથી રહિત થઈને પરમશીતલી ભૂત થાય છે, અર્થાત્ સિદ્ધ થઈ જાય છે સુધર્મા સ્વામી જબૂ સ્વામીને કહે છે–હે કબૂ ! ત્રીજા અધ્યયનને જે ભાવ ભગવાને ફરમાવ્યું છે તે હું તને કહુ છુ (૧૫) ઈતિ “ક્ષુલ્લકાચારકથા” નામક ત્રીજા અધ્યયનનુ शुशती-सामानुपाठ सभापत (3) .

अध्ययन ४ मू. १ भगवच्छब्दार्थः १९७ गुरुमारा'य शिक्षा लब्धपतः शिप्यस्य शास्त्राभ्ययन सफलीभवतीति घोतितम् । अथवा 'आउस तेण' इत्यस्य 'आवसता' इति सस्कृतम् , तस्यापि 'मये- त्यनेनैव सम्पन्धः, आद माग्वन्मर्यादार्थकस्तथाच-आ-शिष्योचितमर्यादया वसता- भगवदन्तिके निवास कुर्वता मयेत्यर्थः । अनेन शिष्यस्य गुरुकुलनिवासः सूचितः । भगवता भगः=ज्ञान सकपदार्थविषयकम् (१), माहात्म्यम् अनुपम- महनीयमहिमसम्पन्नत्वम् (२), यश =विविधानुकूलपतिकलपरीपहोपसर्गसहनसमुद्- भूता जगद्रक्षणप्रज्ञासमुत्था वा कीर्ति(३), वैराग्यम्माधादिकपायनिग्रहल- क्षणम् (४) मुक्तिः सकलकर्मक्षयलक्षणो मोक्षः (५), रूपम्-मुरासुरनरहृदयहारि सौन्दर्यम् (६) वीर्यम् अन्तरायान्तजन्यमनन्तसामथ्र्यम् (७), श्रीः यातिककर्म 'गुरुकी सेवा करके सीखनेसे ही शास्त्रका अध्ययन सफल होता है। यह सचित होता है (२), 'आवसता' ऐसी भी छाया होती है, अर्थात् शिष्यके योग्य मर्यादा पूर्वक भगवानके समीप रहनेवाले मैने (सुना), इस पदसे गुरुकुलमे निवास करना सूचित किया है। यहा 'भग' शब्दके दश अर्थ है-(१) समस्त पदार्थोंको विपय करने- वाला ज्ञान, (२) अनुपम-महिमा, (३) विविध प्रकारके अनुकूल और प्रतिकूल परीपहोंको सहन करनेसे उत्पन्न होनेवाली या ससारकी रक्षा करनेवाले अलौकिक ज्ञानसे उत्पन्न होनेवाली कीर्ति, (४) क्रोध आदि कपायोंका सर्वथा निग्रहरूप वैराग्य, (५) समस्त कर्मोंका क्षयस्वरूप मोक्ष, (६) सुर-असुर और नरोंके अन्त'करणको हर लेनेवाला सौन्दर्य, સેવા કરીને શીખવાથી જ શાસ્ત્રનું અધ્યયન સફળ થાય છે એ સૂચિત થાય છે (૨), માતા એવી પણ છાયા થાય છે અર્થાત્ શિષ્યને મેગ્ય મર્યાદા પૂર્વક ભગવાનની સમીપે રહેનાના એવા મે (સાભળ્યું ), એ પદથી ગુરૂકુળમાં નિવાસ કરવાનું સૂચન કરેલ છે गाडी भग' राना દસ અર્થ છે (૧) બધા પદાર્થોને વિષય કરવા વાળુ જ્ઞાન, (૨) અનુપમહિમા (૩) વિવિધ પ્રકારના અનુરળ અને પ્રતિકૂળ પરીવહાને સહન કરવાથી ઉત્પન્ન થનારી અથવા જગતની રક્ષા કરનારા અલૌ કિક જ્ઞાનથી ઉત્પન થનારી કીર્તિ, (૪) ક્રોધ આદિ કષાયેના સર્વથા નિગ્રહ રૂપ વૈરાગ્ય, (૫) બધા કર્મોના ક્ષય સ્વરૂપ મેક્ષ, (૬) સુર અસુર અને નરેન અત કરણને હરનારૂ સૌદર્ય, (૭) અતરાય કર્મના નાશથી ઉત્પન્ન થનારૂ . १९६ श्रीदवेकालिकमा छाया-श्रुत मया आयुष्मन् । तेन भगरता परमार यातम्-इह ग्बलु षड्जीव- निकायानामाभ्ययन, अमणेन भगाता महागीरेण काश्यपेन प्रवेदिता म्वारयाता सुमज्ञप्ता, श्रेयो मेऽध्येतुमभ्ययन धर्मप्रताप्तिः ॥१॥ सान्वयार्थः-आउम-हे आयुप्मन् शिष्य तेण उस भगवया भगवानने एव ऐसा अग्वाय कहा है, मेमने सुय-गुना है, यहा इस भवचनमें खलु निश्चय करके उन्जीचणियानामज्ययण पटजीपनिकाय नामका अध्य- यन है, (वह)समणेण-श्रमण भगवया भगरान् कासवेण-मध्यपगोत्रीयमहा- वीरेण महावीरने पवेइया पवेदित की है, सुअखाया सम्यक्प्रकारसे कही है, सुपन्नत्ता-सम्यक्तया बताई है। धम्मपन्नत्ती-धर्ममज्ञप्ति (नामा यह) अज्म- यण अ ययन मे मुझे अहिजिउ-पढनेमो सेयरल्याणकारी है। अर्थात् भगवान् महावीर द्वारा प्ररूपित इस अध्ययनका अध्ययन करना मुझे कल्याण- कारी है ॥१॥ टीका-एतिगच्छतीत्यायुः सयमलक्षण नीरुज दीर्घ वा जीवितमस्यास्ती- त्यायुष्मान तत्सम्बुद्धौ हे आयुष्मन् ! गुणवच्छिष्यामन्त्रणमेतत् । अनेन धर्माचरणे माधान्येनायुपोऽपेक्षा विधते इति सूचितम् । तेन लोकत्रयमसिद्धेन, यद्वा 'आउसतेण' इत्येकपदस्य 'आजुपमाणेन' इति सस्कृत तस्य मयेत्य- नेन सम्बन्ध', तथा च आडिति मर्यादायाम् , आ-शास्त्रश्रवणमर्यादया जुपमा णेन शुरून् सेवमानेन मयेत्यर्थः । विधिमन्तरेण हि श्राणे शास्त्ररहस्य श्रोतु- रधोमुखकुम्भस्येव न किञ्चिदष्यन्तः पविशति । 'आजुपमाणेने '-ति विशेषणेन हे आयुष्मन् । अर्थात् सयमरूपी-जीवनवाले । नीरोग-जीवनवाले ! या दीर्घजीवी !, इस सम्बोधनसे धर्मके आचरणमे आयुष्यकी प्रधानता सूचित की है (१), अथवा 'आउसतेण' यह एक पद है, इसकी छाया 'आजुषमाणेन' होती है, अर्थात् गुरुकी सेवा करनेवाले मैने, इस पदसे उ माथु भन् । अर्थात् सयभ-३पी-वन-पा। नीराणी-पन-वाय ! ચા દીર્ઘજીવી છે, આ સ બે ધનથી ધર્મના આચરણમાં આયુષ્યની सुथित ४॥ छ (१), मया आउमतेण में 25 ५६ छे, मेनी छाया आजुपमाणेन એ પ્રમાણે થાય છે, અર્થાત ગુરૂની સેવા કરનાર એવા મે, આ પદથી “ગુરૂની પ્રધાનતા - अध्ययन ४ म. १ महावीरशब्दार्थः १९९ सा च पड्जीवनिकाया' इत्यध्याहियते उत्तरवाक्याऽऽझाडोत्थानाय, श्रम- णेनाम्यति-तपस्यतीति श्रमणस्तेन सार्द्धद्वादशवर्षाणि घोरतपश्चरणाच्छ्रमण इति प्रसिद्धिं रब्धवता, भगवता, काश्यपेन कश्यपगोत्रोत्पन्नेन महावीरेण= चीरयति-पराक्रमते मोक्षानुष्ठाने इति वीरः' , यद्वा वि-विशेषेण ईरयतिगमयति मापयति मोष प्रति भव्यजनानिति, वि=विशेषेण ईमाच्छति क्षपिताखिलफर्मा मोक्षमिति, विविशेषेण ईरयति कम्पयति कपायादिपरिपन्थिन इति, वि-विशे- पेण ईस्यति प्रतिपति घनघातिकर्मपटलमरकरनिकरमिवेति, वि-विशेषेण ईस्य- ति-प्रेरयति प्रवर्त्तयति सयमायनुष्ठाने माणिन इति वा वीरः, महाँथासौ वीरश्च महावीरस्तेन श्रीवमानस्वामिनेत्यर्थः । प्रवेदिताअर्पण सकलपाणिगणस्य स्वस्वभापापरिणमनरूपेण यथावस्थितार्थद्वारेण च वेदिता केवलाऽऽलोकेन १ 'वीर विक्रान्ती' अस्मात्पचायच् । २ 'ईर गतौ कम्पने च' इत्यादादिकात् 'ईर क्षेपे' इति चौरादिकाचधातोः पचायच् । साढे बारह वर्ष तक घोर तपश्चरण करनेके कारण श्रमण नामसे प्रसिद्ध काश्यप गोत्रमें उत्पन्न होनेवाले भगवान महावीरने, वीर शब्दके छह अर्थ है, अर्थात्-(१)मोक्षके अनुष्ठानमे पराक्रम करनेवाले, अथवा (२) भव्य जीवोंको मोक्षकी प्राप्ति करानेवाले, या (३) समस्त कोको करके मोक्षको प्राप्त होनेवाले, (४) कपाय आदि शत्रुओंको सर्वथा हरानेवाले, (५) चार घन-घातिया कोंको कचरेकी तरह दूर करनेवाले (६) प्राणियोंको विशेष रूपसे सयमके अनुष्ठानमे प्रवृत्ति करानेवाले श्रीवर्द्धमान स्वामीने, प्रत्येक प्राणीकी अपनी २ भापामें परिणत होने- वाले इस प्रवचनको केवल ज्ञानसे जानकर प्रतिपादन किया है, पूर्वापर- સાડા બાર વર્ષ સુધી ઘેર તપશ્ચર્યા કરવાને કારણે શ્રમણ નામથી પ્રસિદ્ધ, કશ્યપ ગેરમા ઉત્પન્ન થએલા ભગવાન મહાવીરે (વીર શબ્દના છ અર્થ છે ), અર્થ (૧) મેક્ષના અનુષ્ઠાનમાં પરાક્રમ કરનારા, અથવા (૨) ભવ્ય જીને મેક્ષની પ્રાપ્તિ કરાવનારા, યા (3) સર્વ કર્મોને દૂર કરીને મોક્ષને પ્રાપ્ત થએલા, (૪) કષાય આદિ શત્રુઓને સર્વથા હઠાવનારા, (પ) ચાર ઘનઘાતી કર્મોને કચ- રાની પડે દુર કરી દેનારા, (૬) પ્રાણુઓને વિશેષ–રૂપથી સયમના અનુષ્ઠાનમાં પ્રવૃત્તિ કરાવનારા એવા શ્રી વર્ધમાન સ્વામીએ, પ્રત્યેક પ્રાણીની પિત-પિતાની ભાષામાં પરિણત થવાવાળું આ પ્રવચન કેવળ જ્ઞાનથી જાણીને પ્રતિપાદન કર્યું છે, , - १९८ श्रीदशकालिकमूत्रे ,पटलविघटनननितानन्तचतुपयलक्ष्मीः (८), धर्मः अपर्गदारकपाटोबाटनसाथ नम् , श्रुतादिरूपो यथारयातचारित्रस्पो पा (९), ऐश्वर्य बैठोग्याधिपत्य (१०) चाऽस्यास्तीति भगवान् तेन तथोक्तेन, एवम् धम्मो मगमुष्टि-मित्याचा रभ्य 'तायिणो परिनिन्छुढे' इत्यन्त यारन् पूर्वोपदिएरूपेण, आग्यातम्-परस्प रासङ्कीर्णतया कथितम् , मे-मया श्रुतम् अण्णगोचरीकृतम् । सलश दो वाक्या- लकारे । इह-अस्मिन् प्राचने, पड्जीपनिकारनामाध्ययनम् पट् च ते पृथिव्य सेजोवायुवनस्पतिनसलक्षणा जीनाथेति पडूजीवास्तेपा निकाय समूहः प्रतिपा- द्यत्वेनाऽस्ति यस्यामागमपद्धती सा 'पड्जीपनिकाया' तन्नाम यस्य तच्च तद- ध्ययन चेति पड्जीवनिकायानामाध्ययनम् 'अस्ती'-तिशेप' । १ सूत्रे 'छज्जीवणिया' इति पद 'स्वरायस्य' (४।४।६२)इति निकाया- घटकयकारस्य लोपे, 'कग च ज त द प य-या पायो लुर' इति ककारलोपे कृते नि+आ+आ+' इति स्थिते 'सवर्गे दीर्घः' (१।२१७) इति द्वयोराकारयो स्थाने दीकादेशे 'आों यश्रुतिः' इति यकारश्रुत्या णत्वेन च सिद्धम् । .(७) अन्तराय कर्मके नाशसे उत्पन्न होनेवाला अनन्त यल, (८) घातिया कर्मरूपी पटलके हट जानेसे प्रादुर्भूत होनेवाली अनन्त-चतुष्टय लक्ष्मी, (९) मोक्षके द्वारको खोलनेका साधन अत-चारित्र-ययाख्यातचारित्र रूप धर्म, (१०) तीन लोकका आधिपत्य रूप ऐश्वर्य । ये सब भगशब्दके अर्थ जिनमे पाये जाते है उन्हें भगवान कहते हैं। हे आयुष्मन् । 'धम्मो मगलमुकि?' से लेकर 'तायिणो परिनिब्बुडे' तक सब भगवानने ही कहा है और मैंने सुना है। इस अध्ययनका नाम ‘पड्जीवनिकाया' है । पर इसलिए कि इसमे पृथिवी आदि पजीव निकायोंका वर्णन है। બળ () ઘાતી-કમ-રૂપી પડળ હડી જવાથી ઉત્પન્ન થનારી અનત ચતુષ્ટય લક્ષ્મી, (૯) મોક્ષના દ્વારને ખેલવાના સાધન થત-ચરિત્રન્યથા ખ્યાત–ચારિત્ર-રૂપ ધર્મ, (૧૦) ત્રણ લેકના આધિપત્ય-રૂપ એશ્વર્ય આ બધા ભગ શબ્દના અર્થો જેનામાં મળી આવે છે તેને ભગવાન કહે છે આયુષ્ય' धम्मो मगलमुक्ट्टि थी बने तायिणो परिनिव्वुडे सुधा બધુય ભગવાને જ કહ્યુ છે અને મે સાભળ્યું છે આ અધ્યયનનું નામ જીવનિકાયા છે તે એટલા માટે કે એમા પૃથિની આદિ છ જવનિકાયનું વર્ણન છે અન ત अध्ययन ४ सू. २-३ पड्जीवनिकायस्वरूपम् २०१ पवेइया प्रवेदित की है, सुअक्खाया सम्यम्मकार कही है, सुपन्नत्ता सम्यक्तया पताई है। वह धम्मपन्नत्ती अज्झयणं-धर्मप्रज्ञप्ति अपरनामक अ ययन अहिजिउ-पढना मे मुझे सेय-श्रेय है ॥२॥ टीका-सा-पूर्वोक्ता पड्जीवनिकाया खलु कतरा=किंभूता या अध्ययन नाम=अध्ययनत्वेन प्रसिद्धेत्यर्थः, या च काश्यपेनेत्यादि व्याख्यातपूर्वम् । 'कयरा' इत्यनेन मोक्षाभिलापिणा शिष्येण सकलक्रियाकलापे स्वाभिमानपरित्यागपूर्वक गुरुः प्रष्टव्य इति सचिवम् ॥२॥ सम्पति सुधर्मस्वामिन उत्तरयन्ति-'इमा खलु०' इत्यादि । मूलम्-इमा खलु सा छज्जीवणिया नामज्झयणं समणेणं भगवया महावीरेण कासवेण पवेइया सुअक्खाया सुपन्नत्ता, सेय मे अहिजिउ अज्झयण धम्मपन्नत्ती ॥३॥ छाया-इय खलु सा पड्नीवनिकाया नामाध्ययन श्रमणेन भगवता महावीरेण काश्यपेन प्रवेदिता स्वाख्याता सुमज्ञप्ता, श्रेयो मेऽन्येतुमध्ययन धर्ममज्ञप्तिः ॥३॥ सान्वयार्थ -साम्बह छजीवणिया-पड्जीवनिकाया खलु-निश्चय करके इमा=यह है जो अज्झयण नाम अध्ययन नाम से प्रसिद्ध है,और जो कास- वेग-कश्यपगोगीय समगेण अमग भगवया भगवान् महावीरेण महावीरने हे भगवन् ! पहले यताई हुई पड्जीवनिकायाका स्वरूप क्या है ? जो इस अध्ययनरूपसे कही गई है अर्थात् जिसका इस ममस्त अ-य- यनमें वर्णन किया गया है, और भगवान महावीर स्वामीने यावत् प्ररूपित किया है? और धर्मप्रज्ञप्ति अपरनामसे प्रसिद्ध उस अ ययन का पढना मेरे लिये कल्याणकर है' इस प्रश्नसे यह आशय निकलता है कि- मुमुक्षु शिष्यको अहकार त्यागकर समस्त क्रिया गुरुसे पूछनी चाहिए ॥२॥ श्री सुधर्मा स्वामी उत्तर देते हैं-'इमा खलु०' इत्यादि । હે ભગવાન્ ! પહેલા બતાવેલી વડજીવનિકાયાનુ સ્વરૂપ કેવુ છે કે જે આ અધ્યયનરૂપથી કહેવામાં આવી છે? અર્થાત્ જેનું આ આખા અધ્યયનમાં વર્ણન કરવામાં આવ્યું છે, અને ભગવાન મહાવીર સ્વામીએ જેનુ પ્રરૂપણ કર્યું છે? અને ધર્મપ્રજ્ઞપ્તિ એમ બીજા નામથી જે પ્રસિદ્ધ છે તે અધ્યયનનું અધ્યયન કરવુ મારે માટે કલ્યાણકારક છે ? આ પ્રશ્નથી એ આશય નીકળે છે કે-મુમુક્ષુ શિષ્ય અડ કારને ત્યાગ કરીને બધી ક્રિયાઓ ગુરૂને પૂછવી જોઈએ (૨) श्री सुधर्मा पाभी उत्तर आपे छ है-इमा खलु० इत्यादि २०० श्रीदशकारियो रिलोक्य प्रतिपादिता, स्वाख्याता-मुष्ठ-पूर्वापरापिरोधियुक्तयुक्तिभिरुपपनतया- ऽऽख्याता-उता, मुभशप्ता-मुष्ठु-सदेवमनुनामुरसमाया दिव्याचनिना प्रसा- प्ररूपिता, यद्वा धातूनामनेकार्थत्यादुपसर्गसममिव्याहारवलामो इपिरासेवनार्यः, तथा च-येनैव रूपेणारयाता तेनैव रूपेग मग बसाप्रासेरिता, अशु- मात्रतोऽपि हिंसा परिहरता भगरता यथाकथितमाचरितेत्यर्थः। तदेतद ययन पड्नीपनिकायाख्य धर्ममनप्तिः धर्ममरूपकम् , यद्वा धर्मप्राप्तिः एतदपरसमक मे-मम अ येतुम् अभ्यसिनु श्रेया मशस्य निःश्रेयसकरमित्यर्थः ॥ १॥ एतनिशम्य जम्बूस्वामी परिपृच्छति- कयरा.' इत्यादि । मूलम् कयरा खल्ल सा छज्जीवणिया नामज्झयण समणेण भगवया महावीरेणं कासवेण पवेइया सुअखाया सुपन्नत्ता, सेयं मे अहिजिउ अज्झयण धम्मपन्नत्ती ? ॥२॥ छाया-कतरा खलु सा पड्जीवनिकाया नामा ययन श्रमणेन भगवता महावीरेण काश्यपेन मवेदिता स्वाख्याता मुमज्ञप्ता, श्रेयो मेऽध्येतुम् अध्ययन धर्ममज्ञप्तिः ॥२॥ सान्वयार्थः-सा खलुबह छज्जीवणिया पड़जीवनिकाया कयरा कौनसी है ' जो अज्झयण ना ययन नाम से मसिद्ध है, जो कासवेग कश्यपगोत्रीय समणेण श्रमण भगवया भगवान महावीरेण महावीरने विरोध-रहित और युक्तियो सहित कहा है, देव मनुष्य और असुरोंकी सभा-समवसरण मे दिव्य ध्वनिसे मरूपित किया है। अथवा भगवानने जैसा कहा है वैसा ही उन्होंने आचरण किया है। इसलिए यह पड्जीवनिकाया नामक, धर्मकी प्ररूपणा करनेवाला अध्ययन मेरे अभ्ययन करनेके लिए श्रेय है-कल्याणकारी है ॥१॥ यह सुनकर जम्बूस्वामी प्रश्न करते है-'कयरा खलु' इत्यादि । પૂર્વાપર વિધ રહિત અને યુકિતઓ સહિત કહ્યું છે, દેવ મનુષ્ય અને અસુરેની સભા-સમવસરણમાં દિવ્ય ધ્વનિથી પ્રરૂપિત કર્યું છે અથવા ભગવાને જેવું કહ્યું છે એવું તેમણે આચરણ કર્યું છે તેથી કરીને આ વજીવનિકાયા નામક ધર્મની પ્રરૂપણ કરનારૂ અધ્યયન મારે અધ્યયન કરવાનું શ્રેય છે કલ્યાણકારી છે (૧) मा सासगीन ४ भूपाभी प्रश्न ४३ -कयरा खलु० धत्यादि अध्ययन ४ मू. ४ पड्जीवनिकायस्वरूपम् २०३ तेजश्चित्तवढाख्यातम् , अनेकजीव, पृथक्मत्त्वमन्यत्र शस्त्रपरिणतात् । वायुश्चित्त- वानाख्यातो ऽनेक्जीवः पृथक्सत्त्वोऽन्यत्र शस्त्रपरिणतात् , बनस्पतिश्चित्तवाना- ख्यातोऽनेकजीवः पृथक्सचोऽन्यत्र शत्रपरिणवात् ॥४॥ सान्वयार्थः-तजहा-वह इस प्रकार है- (१) पुढविकाइया पृथ्वीकायिक, (२)आउकाइया-अफायिक,(३)तेउकाइया-तेजस्कायिक, (४)वाउकाइया वायुकायिक,(५)वणस्सडकाइया बनस्पतिकायिक,(६)तसकाइयात्रसकायिक। अर आचार्य महाराज एक-एककी सचित्तता बतलाते हैं - (१) पृथ्वीकाय. सान्वयार्थ:-(भगवानने) पुढवी-पृथ्वीको चित्तमत-सचित्त अक्खाया कही है, वह अणेगजीवा अनेकजीरवाली है-अनेकजीवोका पिण्डभूत है, पुढोसत्ता- उसमें अनेकजीव भिन्न-भिन्न रहे हुए है, अन्नत्य-सिवाय सत्यपरिणएण-शस्त्र- परिणतके, अर्थात् जहा शस्त्र नहीं लगा है वहाका पृथ्वीकाय सव सचित्त है । इसी प्रकार छहों कायोमें समझ लेना चाहिये ॥१॥ (२) अपकाय. सान्चयार्थ:-आऊ जल चित्तमतसचित्त अक्खाया कहा है, वह अणेग- जीचा अनेक जीवोका आश्रयभूत है, पुढोसत्तावे अनेक जीव भिन्न२ रहे हुए है, अन्नत्य-सिवाय सत्यपरिणएण-शस्त्रपरिणतके ॥२॥ (३) तेजस्काय तेऊ तेजस्काय चित्तमत सचित्त अक्खाया कहा गया है, वह अणेगजीवा अनेक जीवोका आश्रयभूत है, पुढोसत्ता=वे अनेक जीव भिन्न- भिन्न रहे हुए है, अन्नत्य-सिवाय सत्यपरिणएण-शस्त्रपरिणतके ॥३॥ (४) वायुकाय वाऊ वायु चित्तमत-सचित्त अक्खाया कहा गया है, वह अणेगजीवा अनेक जीवोका आश्रय है, पुढोसत्ता-भिन्न-भिन्न जीयोवाला है, अन्नत्य-सिवाय सत्यपरिणण्णशत्रपरिणतके || (२) वनस्पतिकाय वणस्मई-वनस्पति चित्तमत-सचित्त अक्खाया कही गई है, वह अणे- २०२ श्रीदवेकालिको पवेडया भवेदित की है, सुअम्पाया मम्यरुमकार कही है, सुपनसा- सम्यस्तया बताई है। यह धम्मपन्नत्ती अजयण-धर्मप्रनप्ति अपरनामक अध्ययन अहिनिउम्पढना मे मुझे सेय-श्रेयस्कारी रे ॥३॥ टीका-'उमा' उत्पनेन 'मिनीतग्नेियाय करणासवारचारुहृदयेन गुरुणा शास्त्रोपदेशः कर्त्तव्य ' इति सूचितम् । अन्यत्माग्वत् ॥३॥ तामेर पड्जीपनिकाया सूत्रकारः प्रदर्शयति तजहा' इत्यादि । मूलम् तजहा-पुढविकाइया, आउकाइया, तेउकाइया, वाउका- इया, वणस्सइकाइया, तसकाइया। पुढवी चित्तमतमक्खाया अणेगजीवा पुढोसत्ता अन्नत्थ सत्थपरिणएणं ।आऊ चित्तमतम- क्खाया अणेगजीवा पुढोसत्ता अन्नत्थ सत्थपरिणएण। तेऊचित्तम- तमक्खाया अणेगजीवा पुढोसत्ता अन्नत्थ सत्थपरिणएण । वाऊ चित्तमंतमक्खाया अणेगजीवा पुढोसत्ता अन्नत्थ सत्थपरिणएणं । वणस्सई चित्तमतमक्खाया अणेगजीवा पुढोसत्ता अन्नत्थ सस्थपरिणएण ॥४॥ छाया-तयथा-पृथिवीकायिका' (१), अप्रकायिका. (२), तेजस्कायिका (३), वायुकायिका' (४), वनस्पतिकायिकाः ५), सकायिका. (६) । पृथिवी चित्तवत्याख्याता, अनेकजीवा, पृथसत्त्वा, अन्यत्र शत्रपरिणताया । आप- श्चित्तवत्य आख्याता., अनेकजीवा', पृथसत्त्वा., अन्यत्र शस्त्रपरिणताभ्य । इस पाठका व्याख्यान पहले किया जा चुका है। 'इमा पदसे यह सूचित होता है कि करुणासागर गुरु महाराज विनीत शिष्यको शास्त्रका उपदेश अवश्य देवें ॥३॥ उस पड्जीवनिकायको सूत्रकार दिखाते है-'तजहा' इत्यादि । આવ્યું છે રૂમ શબ્દથી એમ સૂચિત થાય છે કે કરૂણાસાગર ગુરૂ મહારાજ વિનીત શિષ્યને શાસ્ત્રને ઉપદેશ જરૂર से ५३००नियने २ शव छ-तजहा- त्या આ પાઠનું વ્યાખ્યાન પહેલા કરવામાં आधे (3) २०५ अभ्ययन ४ सू. ४ पृथिवीकायस्य सचित्ततासिद्धिः पृथिवीकायः । पृथिवी, चित्त-चेतनाऽस्त्यस्या इति चित्तवती-सात्मिका आख्याता- केवलज्ञानाऽऽलोकावलोकितासिललोकालोफलक्षणेन भगवता कथिता । ननु पृथिव्याः कथ सचेतनत्वमिति चेदाफर्णय-(१) पृथिवी सचेतना खानित- खनिभूम्यादिषु तत्सजातीयावयवान्तरद्वारा परिपूर्तिदर्शनात् मनुष्यादिशरीरवत् , तद्यथा-मनुष्यशरीरस्थ प्रणादिक स्वय भ्रियते, एवमेव खानित खनिभूम्यादिक स्वसमानजातीयावयवैभ्रियमाण प्राइसमानरूपता भजते तस्माद् गम्यते पृथिव्याः सचेतनत्वम् । पधिवीकाय । केवल-ज्ञानरूपी आलोकसे समस्त लोक और अलोकको प्रत्यक्ष जाननेवाले भगवानने पृथिवीको सचेतन कहा है । प्रश्न-पृथिवी सचेतन कसे है, उत्तर-(१) पृथिवी सचेतन है, क्यों कि उसमें खोदी हुई खान आदिकी भूमि सजातीय अवयवोसे स्वयमेव भर जाती है, जो सजातीय अवयवोंसे स्वय भर जाता है वह सचेतन होता है, जैसे मनुष्यका शरीर । अर्थात् मनुष्यके शरीरमे घाव हो जाता है वह उसी तरहके अवयवोंसे स्वय भर जाता है, उसी प्रकार खोदी हुई खान आदिकी भूमि उसी प्रकारके अवयवोसे भर जाती है और पहलेके समान हो जाती है इसलिए पृथिवी सचेतन है। 'पृथिवीडाय' કેવળજ્ઞાન-રૂપી પ્રકાશથી બધા લેક અને અલેકને પ્રત્યક્ષ જાણવા- વાળા ભગવાને પૃથિવીને સચેતન કહી છે પ્રશ્ન-પૃથિવી સચેતન કેવી રીતે છે ? ઉત્તર-(૧) પૃથિવી સચેતન છે, કારણ કે તેમા બેલી ખાણ આદિની ભૂમિ સજાતીય અવયથી પિતાની મેળે ભરાઈ જાય છે જે સજાતીય અવય વેથી સ્વયમેવ ભરાઈ જાય છે તે સચેતન હેય છે, જેમકે મનુષ્યનું શરીર અર્થાત્ મનુષ્યના શરીરમાં ઘા પડે છે તે એવી તરેહના અવયથી પિતાની મેળે ભરાઈ જાય છે, એ જ રીતે દેલી ખાણ આદિની ભૂમિ એ પ્રકારના અવયથી ભરાઈ જાય છે અને પહેલાની જેવી બની જાય છે, તેથી પૃથિવી સચેતન છે २०४ श्रीदकालिको गजीया अनेक जीका आधार है, पुढोसत्ता-भिन्न-भिन्न जीववाली है, अन्नत्य-सिवाय सत्थपरिणपणं-शस्त्रपरिणतके । भावार्थ:-पाची स्थापरकाय सचित्त ने अनेक जीवरूप है, उन जीवोंका अस्तित्व पृथक्-पृथर है, । इन कायोंके जो जो शख है उनसे यदि ये परिणत हो जाये तो अचित्त हो जाते है ||५|| टीका-तद्यथा-तदेव प्रदर्श्यते-पृथिवी-पठिनस्वभाषा सैव काया भरीर येपा ते पृथिवीकायास्त एम पृथिवीकायिकाः ("पिनयादित्वात्स्वार्थे ठक, तस्येवा. देशः' एवमग्रेऽपीय प्रक्रिया ज्ञेया)। आप द्रवलक्षणास्ता एप कायो येषा तेऽप् कायास्त एवाप्कायिकाः। तेजाम् उष्णलक्षण तदेव कायो येपा ते तेजस्कायिकाः। वायुः चलनस्वभावः स एव कायो येपा ते वायुकायिकाः । वनस्पतिकायिका:- वनस्पति लतातरुगुल्मादिलक्षणः कायो येपा ते तथोक्ताः । प्रस्थति शीतातपा- दिजनितपीडया उद्विजते इति सः, सनस्वभावः कायो येपा तथोक्ताः। अथ प्रत्येक सचित्तता दर्शयन्नाह- कठिनता-स्वभाववाली पृथ्वी ही जिनका शरीर है उन्हें पृथ्वीका- यिक कहते हैं। द्रवत्व-स्वभाववाला जल ही जिनका शरीर है उन्हें अपकायिक कहते है। उष्णता-स्वभाववाला तेज ही जिनका शरीर है उन्हें तेजस्कायिक कहते है । चलन-स्वभाववाला वायु ही जिनका शरीर है उन्हें वायुकायिक कहते है। लता वृक्ष गुल्म आदि वनस्पति ही जिनका शरीर है उन्हे वनस्पतिकायिक कहते हैं। जिन्हें शीत-आतप (गर्मी) आदि- द्वारा उत्पन्न हुई पीडासे त्रास होता है ऐसा चलने-फिरनेवाला काय जिनका होता है उन्हें प्रसकायिक कहते है। अब एक-एककी सचित्तता दिखलाते हैं- ૧-કઠિનતા-સ્વભાવવાળી પૃથ્વી જ જેનું શરીર છે તેને પૃથ્વીકાયિક કહે છે ૨–વત્વ-સ્વભાવવાળું જળ જ જેનું શરીર છે તેને અપ્રકાયિક કહે છે ૩-ઉષ્ણતા સ્વભાવવાળું તેજ જ જેનું શરીર છે તેને તેજસ્કાયિક કહે છે ૪-ચલન–સ્વભાવ વાળ વાયુ જ જેનુ શરીર છે તેને વાયુકાયિક કહે છે પ-લતા, વૃક્ષ ગુમ (ગુચ્છ) આદિ વનસ્પતિ જ જેનું શરીર છે તેને વનસ્પતિકાયિક કહે છે –જેને ઠડી ગરમી આદિ દ્વારા ઉત્પન્ન થએલી પીડાથી ત્રાસ થાય છે એવી હરવા ફરવાવાળી કાયા જેની હોય છે તેને ત્રસકાયિક કહે છે હવે અકેકની સચિતતા દેખાડે છે अध्ययन ४ सू. ४ पृथिवीकायस्य सचित्ततासिद्धिः २०७ (४) विद्रुमायात्मिका पृथिवी सचित्ता, छेदादौ तत्सजातीयधातृत्पत्ति- दर्शनाद अर्शोऽङ्कुरवत् , तद्यथा-अर्शसोऽङ्गुरे छिन्नेऽपि पुनस्तत्समान एवाड्कुरः मादुर्भवति, एव चिट्ठमशिलावात्मिकायाः पृथिव्याः खन्यादी छेटेऽपि तत्सजा- तीयधातुभिस्तट्रिक्तभागः परिपूर्यते, तस्मात्सिद्ध पृथिव्याः सचित्तत्वम् । जनेकजीवा जनेके बहवो जीनाः एकेन्द्रिया यस्या सा तथोक्ता । पृथक्- सत्त्वा-पृथक्-पृथग्भूताः अगलासख्येयभागमात्रावगाहनामाश्रित्याऽनेके विभिन्न- रूपेण स्थिताः सत्त्वाः स्पर्शनेन्द्रियवन्तो जीवा यस्या सा तथोक्ता 'आरयाता' इति पूर्वोक्तेनान्वयः, भगवता मरूपितेति तदर्थः । ननु तर्युक्तेस्वरूपाया जीवपिण्डभूताया पृथिव्या गमनागमनादिक्रिया कुर्वता (४) विट्ठम आदिरूप पृथिवी सचित्त है, क्योकि उसे काट देने पर भी सजातीय धातुकी उत्पत्ति देखी जाती है, जैसे शरीरमे मसा। अर्थात् जैसे मसाको ऊपरसे काट डालने पर भी फिर उसीके समान अवयव ऊग आते हैं, वैसेही-विट्ठम और शिला आदिको खानमे काट देने पर भी सजातीय स्कन्धोंसे कटा हुआ भाग फिर भर जाता है, अतः पृथिवीकी सचेतनता सिद्ध है। वह पृथिवी अनेक जीववाली है और वे स्पर्शनेन्द्रियवाले पृथिवी- कायके जीव अगुलके असल्यातवें-भाग-प्रमाण अवगाहनाको आश्रय करके भिन्न-भिन्न स्वरूपसे स्थित हैं, ऐसा भगवानने कहा है। शिष्य गुरुसे पूजता है-हे गुरु महाराज ! जनकि पृथिवी जीवोंका (૪) વિદ્યુમ આદિ રૂપ પૃથિવી સચિત્ત છે, કારણ કે તેને કાપી નાખવા તા પણ સજાતીય ધાતુની ઉત્પત્તિ જોવામાં આવે છે, જેમકે શરીરમાં મસા, અર્થાત જેમકે મસાને ઉપરથી કાપી નાખ્યા છતા પણ તેના સમાન અવયવે ઊગી આવે છે, તેમ જ વિમ અને રિલા આદિને ખાણમાં કાપી સજાતીય ઋથી કાપેલે ભાગ પાછે ભરાઈ જાય છે તેથી પૃથિવીની સચેત નતા સિદ્ધ થાય છે એ પૃથિવી અનેક-જીવ–વાળી છે, અને એ સ્પર્શનેન્દ્રિય-વાળા પૃથિવી કાયના જી આગળના અસખ્યાતમાં ભાગ પ્રમાણની અવગાહનાને આશ્વય કરીને ભિન્ન-ભિન્ન સ્વરૂપે સ્થિત છે, એવુ ભગવાને કહ્યું છે શિષ્ય ગુરૂને પૂછે છે-હે ગુરૂ મહારાજ ! જે પૃથિવી, જેના પિંડ-રૂપ છે , , નાયા 911 २०६ श्रीदशवकालिकात्रे (२) यद्वा-पृथिवी समीया देनियर्षणोपचयसदर्शनात् चरणतलवत् , तथथा- चरणतल धृप्यते पुष्यति च तद्वत् पृथिव्यपि प्रत्यह घृष्यते उपचीयते च तस्मा तस्याः सजीवत्यम् । अथरा- (३) विद्रुमपापाणादिरूपा पृथिवी सचेतना काठिन्ये सस्यपि वृद्धयादिदर्शनाव शरीरस्थिताऽस्थ्यादिवत् , तपथा-शरीरस्थितमस्थ्यादिक कमठपृष्ठकठिन सदपि चित्तवदनुभूयमानमुपचय च गच्छत् सदृश्यते । एत विद्रुमशिलाघात्मिकायाः पृथिव्याः काठिन्ये सत्यपि दृद्धचादिक मत्यक्ष दृश्यते तस्मात्तस्याः सचेतनत्वम् । अथ च-- , (२) पृथिवी सचेतन है, क्योंकि उसमें प्रतिदिन घर्पण और उपचय देखा जाता है जैसे पैरका तलुवा । अर्थात् जैसे तलुवा घिसकर फिर भर जाता है वैसे ही पृथिवी भी घिस कर भर जाती है इसलिए वह सजीव है । अथवा- (३) विदुम (मृगा) पाषाण आदि-रूप पृथिवी सचेतन है, क्योंकि कठिन होने पर भी उसमें वृद्धि देखी जाती है जैसे शरीरकी हड्डी आदि। अर्थात् जैसे शरीरकी हड्डी आदि कछुएकी पीठकी भाँति कठोर होने पर भी सचेतन है और बढती है उसी प्रकार विद्रुम, शिला आदि रूप पृथिवीमे कठिनता होनेपर भी वृद्धि आदि गुण प्रत्यक्षसे हैं इससे सिद्ध है कि पृथिवी सचेतन है । अथवा- (૨) પૃથિવી સચેતન છે, કારણ કે તેમાં પ્રતિદિન ઘર્ષણ અને ઉપચય જોવામાં આવે છે, જેમકે પગનું તળી અથતિ જેમ પગનું તળીઉ ઘસાઈને પાછું ભરાઈ જાય છે, તેમ પૃથિવી પણ ઘસાઈને ભરાઈ જાય છે, તેથી પૃથિવી સજીવ છે અથવા- (3) विम (प्राण) पत्थर माहि-३५ पृथिवी सन्यतन छ, ५६न રહેવા છતા તેમાં વૃદ્ધિ જોવામાં આવે છે, જેમકે શરીરના હાડકા વગેરે, અર્થાત્ જેમ શરીરના હાડકા વગેરે કાચબાની પીડાની જેમ કઠેર હોવા છતા સચેતન છે અને વધે છે, તેવી રીતે વિમ, શિલા આદિ–રૂપ પૃથિવીમા કઠિનતા પહેલા છતા તેમાં વૃદ્ધિ આદિ ગુણ પ્રત્યક્ષ છે એથી સિદ્ધ થાય છે કે પૃથિવી સચે તન છે અથવા अ ययन ४ मू. ४ अफायस्य सचित्ततासिद्धिः २०९ कृष्णमृत्तिका शस्त्रमित्यादि, परकायशस्त्र-जलाग्निगोमयचरणसमर्दनादि । उभय- कायशस्त्र-जलादिमिश्रमृत्तिका । एव च शस्त्रपरिणतायाः पृथिव्या अचित्ततया न तत्रोचार-प्रस्रवणादिक्रियासम्पादने काऽपि क्षतिर्मुनीना सयमपालन इति सिद्धम् । अफायः । आपा भौमाऽऽन्तरिक्षोभयलक्षणाः, चित्तवत्यः सचेतनाः, आख्याता! भगवताऽभिडिताः, तथाहि-भूमिगता आपः सचेतनाः खातभूमिसजातीयस्वभाव- पीली मिट्टीका शस्त्र काली मिट्टी है। जल, अग्नि, गोवर तथा पैरोंसे रौंदना आदि परकाय शस्त्र है । जल आदिसे मिली हुई मिट्टी उभय- काय शस्त्र है। इस प्रकार शस्त्रपरिणत पृथिवी अचित्त है, अतः उस पर आहार- विहार आदि क्रियाएँ करनेसे मुनियोंके अहिंसाव्रत पालनेमे कुछ भी क्षति नहीं होती। (अपकाय) पार्थिव और आकाशीय दोनों प्रकारके जलोंको भी भगवानने सचित्त कहा है। (१) भूमिमें रहा हुआ जल सचेतन है, क्योंकि खोदी हुई भूमिमे सजातीय स्वभाववाला जल उत्पन्न होता है, जैसे मेढको भूमिको खोदनेसे जैसे मेंढक निकलता है और वह सचेतन होता है उसी प्रकार पानी પૃથિવીનું સ્વકાય-શસ્ત્ર છે, જેમ પીળી માટીનું શસ્ત્ર કાળી માટી છે જળ, અગ્નિ, છાણ તથા પગ વડે ખુદવુ વગેરે પરકાય-શસ્ત્ર છે જળ આદિથી મળેલી માટી એ ઉભયકાય શસ્ત્ર છે એ રીતે શસ્ત્રપરિણત પૃથિવી અચિત્ત છે, તેથી એની ઉપર આહાર વિહાર આદિ ક્રિયાઓ કરવાથી મુનિઓના અહિંસા વ્રતના પાલનમાં કોઈ પણ ક્ષતિ આવતી નથી અકાય પાર્થિવ અને આકાશીય બેઉ પ્રકારના જળને પણ ભગવાને સચિત્ત કહ્યું છે (૧) ભૂમિમા રહેલું જળ સચેતન છે, કારણકે ખોદેલી જમીનમાં સજાતીય સ્વભાવવાળું જળ ઉત્પન્ન થાય છે, જેમકે દેડકે ભૂમિને ખેદવાથી જેમ દેડકે નીકળે છે અને તે સચેતન હોય છે, તેમ પાણી પણ નીકળે છે તેથી તે પણ २०८ श्रीदशकालिको सयमिनामहिंसाप्रतम्य संरक्षण कथ भाति ? प्रत्युताऽवश्यकरणीयोचारप्रमणादि- क्रियया हिंसर भरत्यतोऽहिंसाप्रतपालन यामृतपालनव-मम्भवमित्यत आह-'अन्यत्रे'ति, शस्त्रपरिणताया अन्यत्र परिणता पृथिवीं वयित्वाऽन्या पृथिवी सजीवेत्यर्थः, शस्यते-हिंस्यते माणिगगोऽनेनेति शम्र, तद् द्विविध-ष्य भावभेदात् । तत्र द्रव्यशस्त्र-स्सपरोभयकायउक्षणम् , भावशस्त्र पृथिवीं प्रति दुष्ष णिहितमनोवाधायात्मकम् , मरमेयान्येपा तत्तत्कायानामपि भावशय बोदव्यम् । स्वकायशस्त्र पृथिव्या. स्वेतरवर्णगन्धादिमती पृयिव्येर, यया पीतमृत्तिकायाः पिण्डरूप है तो उस पर अहिंमावतकी रक्षा कैसे होगी ? उचार-प्रस्रवण आदि क्रियाएँ अनिवार्य हैं, और इन क्रियाओंके करनेसे हिंसा अनि- चार्य है, इसलिए अहिंसावतका पालन ऐसा हीअसभव है जैसा वन्न्याके पुत्रका पालन करना। उत्तर-हे शिप्य ! शस्त्रपरिणत पृथिवीके सिवाय अन्य समस्त पृथिवी सचित्त है। जिससे प्राणियोंकी हिंसा होती है उसे शस्त्र कहते हैं। शस्त्र दो प्रकारका है-(१) द्वन्य शस्त्र और (२)भाव-शस्त्र। उनमेसे स्व-काय, पर-काय और उभय-कायको द्रव्य-शस्त्र कहते है। पृथियो विषयमे मन-वचन-कायकी दुष्परिणति करना भाव-शस्त्र है । इसी प्रकार अन्य सब कायके जीवोंके भाव-शस्त्र समझ लेने चाहिए। अपनेसे भिन्न वर्णगन्धवाली पृथिवी ही पृथिवीका स्वकाय-शस्त्र है, તે તેની ઉપર ગમનાગમન આદિ ક્રિયાઓ કરનારા સયમીઓના અહિંસાવતની રક્ષા કેમ થશે ? ઉચ્ચાર, પ્રસવણ આદિ ક્રિયાઓ અનિવાર્ય છે, અને એ ક્રિયાઓ કરવાથી હિંસા અનિવાર્ય છે, તેથી અહિંસા-ત્રતનું પાલન એવું અસભવિત છે કે જેવુ વધ્યાના પુત્રનું પાલન કરવુ અસભવિત છે ઉત્તર-હે શિષ્ય ' શસ્ત્રપરિણત પૃથિવી સિવાયની બધી પૃથિની સચિત્ત છે જે વડે પ્રાણુઓની હિંસા થાય છે, તેને શસ્ત્ર કહે છે શસ્ત્ર બે પ્રકારના છે (૧) દ્રવ્યશસ્ત્ર (૨) ભાવ-શસ્ત્ર પરકાય અને ઉભયકાયને દ્રવ્ય-શસ્ત્ર કહે છે, પૃથિવીના વિષયમાં મન કાયાથી દુષ્પરિણતિ કરવી એ ભાવશસ્ત્ર છે એજ રીતે બીજી બધી જીના ભાવશસ્ત્ર પિતાથી ભિન્ન વર્ણ–ગધ-વાળી પૃથિવીજ जैसे એમાં સ્વકાય, વચન કાયાના સમજી લેવા - अध्ययन ४ मू. ४ तेजस्कायस्य सचित्ततासिद्धिः २११ नन्वेवमपा जीवपिण्डभूततयाऽद्धिविना सयमिना सयमयात्रा असभवन्निर्वाहा स्यादित्यत आह-शवेत्यादि,शस्त्रपरिणताभ्योऽन्यत्र-शस्त्रपरिणता अपो विहायान्या आपः सचित्ता इत्यर्थः। शस्त्र-द्रव्यभावभेदाद्विविध, द्रव्यशस्व-स्वकायपर-कायो- भयकायस्वरूप, भावगस्त्रम् -अपः प्रति मनोवाकायाना दुप्पणिहितत्वम् । तर स्वकायशस्व-तडागाशुदकस्य कृपादकम् । एवविधशस्त्रपरिणत जल व्यवहारतोऽ- शुद्धत्वाइगवदनादिष्टत्वाच्च सर्वथैवाग्राह्यम् । परकायशस्व-द्राक्षा-शाक-तण्डुल-पिष्ट- दाली-चणकादि । अपा शस्त्रपरिणतत्व च वर्णादिना पूर्वावस्थावलक्षण्यरूपम् । हे गुरो ! जलके विना मयमियोंका निर्वाह नहीं हो सकता और वह जीवोंका पिण्ड है, इसलिए उसको पीने आदिके काममे लानेसे सयमकी रक्षा नहीं हो सकती। ऐसी आशङ्का होनेपर गुरु कहते है- हे शिष्य ! शस्त्रपरिणत जलके सिवाय अन्य जल सजीव है। यहां परभी शस्त्र, द्रव्य और मावके भेदसे दो प्रकारका है। उसका कथन पहले किया जाचुका है। यह विशेप समझना चाहिए कि तालाय आदिके अलका कृप आदिका जल स्वकायशस्त्र है। इस प्रकारका शस्त्र- परिणत जल व्यवहारसे अशुद्ध होनेके कारण ग्राह्य नहीं है। तथा ऐसे जलके लेने में भगवानकी आज्ञा भी नहीं है। दाग्व, शाक, चावल, आटा आदि परकायशस्त्र हैं। जलमें पहले जैसा वर्ण गन्ध आदि था उसका बदल जानाशस्त्रपरिणत होना कहलाता है। હે ગુરુ જળ વિના સયમીઓને નિર્વાહ થઈ શકતે નથી અને એ જીને પિંડ છે તેથી તેને પીવા આદિના કામમાં લેવાથી સયમની રક્ષા નહિ થઈ શકે એવી આવક થતા ગુરૂ કહે છે હે શિષ્ય શસ્ત્ર-પણિત જળ સિવાયનું અન્ય જળ સજીવ છે એમાં પણ શસ્ત્ર, દ્રવ્ય અને ભાવના ભેરે કરીને બે પ્રકાગ્ના છે એનું કથન પહેલા કરવામા આવ્યુ છે વિશેષ એટલું સમજવું કે તળાવ આદિને જળનું પાદિનું જળ એ સ્વાય શસ્ત્ર છે એ પ્રકારનું શસ્ત્ર- પણિત જળ વ્યવહારથી અશુદ્ધ હોવાને કારણે ગ્રાહ્ય નથી તથા એવુ જળ લેવાની ભગવાનની આજ્ઞા પણ નથી દ્રાક્ષ, શાક, રેખા, આટે ઇત્યાદિ પરકાય શસ્ત્ર છે જળમાં પહેલા જેવા વર્ણ ગધ આદિ હતા તેનું બદલાઈ જવુ એ શસ્ત્રપરિણુત થવુ કહેવાય છે १ -- २१० श्रीदशवकालिकसने सम्भवात् मण्डावत् । आनरिक्ष्योऽ प्यापः मोतनाः मेगादितिको स्वाभाविक- सम्भूयसपतनशीलत्वान्मीनरन् । यहा-आपः सचेतनाः, श्रीप्महेमन्तयोः स्वामा विकशैत्योण्ययाप्पायुपलम्मान्मनु' यशरीरयन् , तपथा-भूमिगृहस्थितनरस्य भरीर ग्रीष्मे शीतल हेमन्ते चोष्ण भाति, मुसाच पापमुहन्नति, एपमेव गभीरतर तडागकृपादिस्थसलिल हेमन्ते समाप्पोद्मामुष्णता, ग्रीष्मे च गीतलता पते । अनेकजीवाः पृथक्सचाः, आख्याता इत्यनेनान्वय', व्याग्या चैषा पदाना प्रवदो या । निकलता है, अतण्य वह भी सचेतन है। आकाशमा भी जल मचेतन है, क्योंकि मेघादि-विकार होने पर स्वय ही गिरने लगता है-जैसे मछली । अथवा- (२) जल सजीव है, क्योंकि उसमें ग्रीष्म और हेमन्त ऋतुमें स्वाभाविक शीतता उष्णता और भाफ आदि देखे जाते हैं, जिसमें ग्रीष्मादि ऋतुओमें शीतता आदि पाये जाते है वह सजीव होता है, जैसे मनुष्यका शरीर । जैसे भोयरेमे स्थित मनुष्यका शरीर ग्रीष्म ऋतुमें शीत और हेमन्त ऋतुमे उष्ण होता है, तथा हेमन्त ऋतुमें मुँहसे भाफ निकलती है, वैसेही खूब गहरे तालाव या कुण्का जलभी हेमन्तमें भाफवाला और उष्ण होता है तथा ग्रीष्ममें शीतल होता है । अनेकजीव और पृथसत्त्व आदि पदोका व्याख्यान पहले कहे हुए पृथिवीकायके आलापकके समान समझना चाहिए। સચેતન છે આકાશનુ જળ પણ સચેતન છે, કારણ કે મેઘાદિ-વિકાર થવાથી સ્વય પડવા લાગે છે, જેમકે માછલી (૨) જળ સજીવ છે, કારણ કે તેમાં ગ્રીષ્ય અને હેમન્ત વતુમાં સ્વાભાવિક શીતતા ઉષ્ણુતા અને બાફ આદિ જોવામાં આવે છે જેમા ગ્રીષ્માદિ હતુઓમાં શીતળતા આદિ જણાઈ આવે છે તે સજીવ હોય છે, જેમકે માણસનું શરીર જેમ ભયરામાં રહેલા માણસનું શરીર ગ્રીમ-તુમા શીતલ અને હમ –ઋતુમાં ગરમ હોય છે તથા હેમ ત–પતુમાં મહેમાથી બાફે (વરાળ) નીકળે છે, ખૂબ ઉડા તળાવ યા કુવાનુ જળ પણ હેમત ઋતુમાં બાફવાળુ અને ઉષ્ણ હોય છે તથા ગ્રામમા શીતળ હોય છે અનેક જીવ તથા પૃથસવ આદિ શબ્દનું વ્યાખ્યાન પહેલા કહેલા પૃથિવી કાયના આલાપકની જેમ સમજવું मथा-- એજ રીતે th . अययन ४ मू. ४ तेजस्कायस्य सचित्ततासिद्धिः २१३ अंगारादीना प्रकाशनशक्तिर्यावदात्मसयोगभाविनी देहस्थत्वाद, खयोत- शरीरपरिणामवत् । अङ्गारादीना तापोऽपि आत्मसयोगसझावहेतुक', शरीरस्थत्वात् ज्वरतापवत् , न देनेसे हानि (मन्दता) होती है, जैसे मनुष्यका शरीर । अर्थात् मनु- ज्यका शरीर आहार देनेसे बढता और न देनेसे घटता है, अतः वह सचेतन है। इसी प्रकार तेजस्काय भी ईधन देनेसे बढती और न देनेसे घटती है, अतः वह भी सचेतन है । अगार आदिकी प्रकाशन शक्ति जीवके सयोगसे ही उत्पन्न होती है, क्योंकि वह देहस्थ है, जो जो देहस्थ प्रकाश होता है वह वह आत्माके सयोगके ही निमित्तसे होता है, जैसे जुगनूके शरीरका प्रकाश। जुगनूके शरीरमें प्रकाश तब तक ही रहता है जब तक उसके साथ आत्माका सयोग रहता है । इसी प्रकार अगार आदिका प्रकाश भी तय तक ही रहता है जातक उसमें आत्मा रहती है। अगार आदिका ताप भी आत्माके सयोगके ही कारण है क्योंकि वह शरीरस्थ है, जितने शरीरस्थ ताप होते है वे सब आत्माके निमित्तसे ही તેની વૃદ્ધિ અને ન આપવાથી હાનિ (મદના) થાય છે, જેમકે મનુષ્યનું શરીર અર્થાત મનુષ્યનું શરીર આહાર આપવાથી વધે છે અને ન આપવાથી ઘટે છે, તેથી તે સચેતન છે, એજ રીતે તેજસ્કાય પણ ઈધન આપવાથી વધે છે અને ન આપવાથી ઘટે છે, તેથી ત મચેતન છે, અગારા આદિની પ્રકાશન–શક્તિ જીવના સાગથી જ ઉત્પન્ન થાય છે કારણ કે એ દેહસ્થ છે, જે જે દેહસ્થ પ્રકાશ હેય છે તે તે આત્માના સગના જ નિમિત્તથી હોય છે, જેમકે આગીયાના શરીરને પ્રકાશ આગીયાના શરીરમાં પ્રકાશ ત્યાસુધી જ રહે છે કે જ્યા સુધી તેની સાથે આત્માને સગ રહે છે, એ રીતે અગારા આદિને પ્રકાશ પણ ત્યા સુધી જ રહે છે કે જ્યાસુધી તેમા ચેતન રહે છે આદિને તાપ પણ આત્માના સગના જ કારણે છે, કેમકે તે શરીરસ્થ છે જેટલા શરીરસ્થ તાપ હેય છે તે બધા આત્માના નિમિત્તથી જ અગારી - २१२ श्रीदशवेकालिको तर-पूर्णतो धूसरवादिरूपम् , गन्धतम्ततस्तुगम्बन्धिाचम् , रसतम्तिक्तबटु कपायत्वादिरूपम् , स्पर्गतः स्निग्धशावादिरूपम् । इत्यमुक्तपकारहासादियाननल भामुकत्वान्मुनिग्राद्यम् । उपलक्षणमेतदग्निशस्त्रपरिणतम्योटकस्यापि । भस्ममिश्र जलमग्राह्य, तत्र मिश्रशङ्कायाः सद्भागात् , शास्त्रे कचिदप्यमतिपादितत्याच । उभय- कायशस्व-मृत्तिकामिनजलम् । भावगतमुक्तस्वरूपमेवेति । तेजस्कायः । तेजविचयत् सचेतनम् आख्यातम् उक्तम् , तथाहि- तेजयतनापत् इन्धनाचाहारोपादानहानाभ्या तद्धिमान्योपलम्भात् , मनुष्यादिशरीरवत् । जैसे-धूसर वर्ण हो जाना, जो वस्तु उसमें डाली गई हो उसकी गन्ध आने लगना, तीसा, कडवा, कपायला आदि रस हो जाना, स्निग्ध या रुक्ष आदि स्पर्श हो जाना। इस प्रकार यह दाख, शाक, चावल, आटा, दाल, वेसन आदिका धोवन प्रासुक होनेसे मुनिके लिए ग्राह्य है । यह तो उपलक्षण है, इससे यह भी समझना चाहिये कि- अग्निशस्त्रपरिणत अर्थात् उष्ण जल भी मुनिको ग्राथ है। राखका पानी ग्राह्य नहीं है, क्योंकि उसमें मिश्रकी शङ्का रहती है। मृत्तिका आदिसे मिला हुआ जल उभयफाय शस्त्र है । भावशस्त्र पहले कह चुके हैं। (तेजस्काय) तेजस्कायको भी भगवानने सचेतन कहा है, यही कहते है- तेजस्काय मजीव है, क्योंकि इन्धन आदि आहार देनेसे उसकी वृद्धि और જેમકે ધુધળા વણનું થઈ જવુ, જે વસ્તુ તેમા નાખવામાં આવી હોય તેની ગધ આવવા લાગવી, તીખ કો કસાયલે આદિ રસ થઈ જ, સ્નિગ્ધ ચા રૂક્ષ આદિ સ્પર્શ થઈ જ એ પ્રકારે એ દ્રાક્ષ, શાક, ચેખા, આ, દાળ, વેસણ આદિનુ વણ પ્રાસુક હેવાથી મુનિને માટે ગ્રાહ્ય છે એ ઉપલક્ષણ છે, એથી એમ પણ સમજવું જોઈએ કે- અગ્નિશસ્ત્ર–પરિણત અર્થાત Cષ્ણ જળ પણ મુનિને ગ્રાહ્ય છે રાખનું પાણી ગ્રાહ્ય નથી, કારણ કે એમાં મિશ્રની શકા રહે છે મટ આદિથી મળેલું જળ ઉભયકાય શસ્ત્ર છે (૨) ભાવશસ્ત્ર પહેલે કહી દીધુ છે ( तेय) તેજસ્કાયને પણ ભગવાને સચેતન કહી છે, એ હવે કહે છે તેજસ્કાય સજીવ છે, કારણ કે લાકડા (ઇંધણા) આદિ અકાર આપવાથી - अन्ययन ४ सू. ४ तेजस्कायस्य सचित्ततासिद्धिः २१३ अङ्गारादीना प्रकाशनशक्तिर्यावदात्मसयोगभाविनी देहस्थत्वात् , खद्योत- शरीरपरिणामवत् । अनारादीना तापोऽपि आत्मसयोगसद्भावहेतुकः, शरीरस्थत्वात् ज्वरतापवत् , न देनेसे हानि (मन्दता) होती है, जैसे मनुष्यका शरीर । अर्थात् मनु- ष्यका शरीर आहार देनेसे बढता और न देनेसे घटता है, अतः वह सचेतन है। इसी प्रकार तेजस्काय भी ईधन देनेसे बढती और न देनेसे घटती है, अतः वह भी सचेतन है। अगार आदिकी प्रकाशन शक्ति जीवके सयोगसे ही उत्पन्न होती है, क्योंकि वह देहस्थ है, जो जो देहस्थ प्रकाश होता है वह वह आत्माके सयोगके ही निमित्तसे होता है, जैसे जुगनूके शरीरका प्रकाश। जुगनूके शरीरमें प्रकाश तब तक ही रहता है जब तक उसके साथ आत्माका सयोग रहता है। इसी प्रकार अगार आदिका प्रकाश भी तय तक ही रहता है जबतक उसमे आत्मा रहती है। अंगार आदिका ताप भी आत्माके सयोगके ही कारण है क्योंकि वह शरीरस्थ है, जितने शरीरस्थ ताप होते है वे सब आत्माके निमित्तसे ही તેની વૃદ્ધિ અને ન આપવાથી હાનિ (મદતા) થાય છે, જેમકે મનુષ્યનું શરીર અથમનુષ્યનું શરીર આહાર આપવાથી વધે છે અને ન આપવાથી ઘટે છે, તેથી તે સચેતન છે, એજ રીતે તેજસ્કાય પણ ઈધન આપવાથી વધે છે અને ન આપવાથી ઘટે છે, તેથી તે સચેતન છે, અગારા આદિની પ્રકાશન-શક્તિ જીવના સાગથી જ ઉત્પન્ન થાય છે કારણ કે એ દેહથ્થ છે, જે જે દેહવ્ય પ્રકાશ હેય છે તે તે આત્માના સગના જ નિમિત્તથી હોય છે, જેમકે આગીયાના શરીરને પ્રકાશ આગીયાના શરીરમાં પ્રકાશ ત્યાસુધી જ રહે છે કે જ્યા સુધી તેની સાથે આત્માને સગ રહે છે, એ રીતે અગારા આદિને પ્રકાશ પણ ત્યાસુધી જ રહે છે કે જ્યાસુધી તેમા ચેતન નહે છે આદિને તાપ પણ આત્માના સગના જ કારણે છે, કેમકે તે શરીરસ્થ છે જેટલા શરીરસ્થ તાપ હોય છે તે બધા આત્માના નિમિત્તથી જ અગારા . २१२ श्रीदवेकालिको तर-वर्णतो धुसरत्यादिरूपम् , गन्धताउस्तुसम्पन्विायम् , रसनम्तिक्त कटु कपायत्यादिरूपम् , स्पर्शतः स्निग्धक्षयादिस्पम् । इत्यमुक्तमारहासादिपावनजन्न मामुकत्यान्मुनिग्रागम् । उपलक्षणमेतदमिशनपरिणतस्योदकस्यापि । भस्ममिश्र जलमग्राय, तर मिश्रशङ्कायाः सहारा , गाने कचिदप्यपतिपादितत्याश्च । उमय फायशस्त्र मृत्तिकामिश्रजलम् । भारशवमुक्तस्वरुपमैवेति । तेजससायः । तेजश्चित्तवत् सचेतनम् आख्यातम्-उक्तम् , तथाहि- तेजश्वतनापत् इन्धनायाहारोपादानहानाभ्या तद्विमान्योपलम्माद , मनुष्यादिशरीरवत् । जैसे-धूसर वर्ण हो जाना, जो वस्तु उसमें डाली गई हो उसकी गन्ध आने लगना, तीसा, कटुवा, कपायला आदि रस हो जाना, स्निग्ध या रूक्ष आदि स्पर्श हो जाना। इस प्रकार यह दाख, शाक, चावल, आटा, दाल, वेसन आदिका धोवन मासुक होनेसे मुनिके लिए ग्राह्य है । यह तो उपलक्षण है, इससे यह भी समझना चाहिये कि अग्निशस्त्रपरिणत अर्थात् उष्ण जल भी मुनिको ग्राह्य है। राग्वका पानी ग्राह्य नही है, क्योंकि उसमे मिश्रको शङ्का रहती है। मृत्तिका आदिसे मिला हुआ जल उभयकाय शस्त्र है। भाचशस्त्र पहले कह चुके हैं। (तेजस्काय) तेजस्कायको भी भगवानने सचेतन कहा है, यही कहते हैं- तेजस्काय सजीव है, क्योंकि इन्धन आदि आहार देनेसे उसकी वृद्धि और જેમકે-ધુધળા વર્ણન થઈ જવુ, જે વસ્તુ તેમાં નાખવામાં આવી હોય તેની ગધ આવવા લાગવી, તીખો કડવે કસાયલે આદિ રસ થઈ જ, સ્નિગ્ધ ચા રૂક્ષ આદિ સ્પર્શ થઈ જ એ પ્રકારે એ દ્રાક્ષ, શાક, ચોખા, આ, દાળ, વેસણ આદિનું વણ પ્રાસુક હોવાથી મુનિને માટે ગ્રાહ્ય છે એ ઉપલક્ષણ એથી એમ પણ સમજવું જોઈએ કે- અગ્નિશસ્ત્ર–પરિણત અર્થાત ઉષ્ણ જળ પણ સુનેને ગ્રાહી છે રાખનું પાણી ગ્રાહ્ય નથી, કારણ કે એમા મિશ્રનો શકા માટી આદિથી મળેલું જળ ઉભયકાય શસ્ત્ર છે (૨) ભાવશસ્ત્ર પહેલે કહી દીધુ છે (तेराय) તેજસ્કાયને પણ ભગવાને સચેતન કહી છે, એ હવે કહે છે તેજસકાય સજીવ છે, કારણ કે લાકડા (ઈધણ) આદિ આહાર આપવાથી - , अययन ४ मु. ४ वायुकायस्य सचित्ततासिद्धिः २१५ शस्त्रपरिणताचित्तानिकायमाह-उप्णमन्न-कृगरौदनादि, उप्णपानफ शाकी- दनादीनामवलावणादि (ओसामण इति भापा), तप्तेष्टका सिकतादि च, एतेप्वग्नि- सयोगनिष्पायवादचित्ताग्निकायशब्दो व्यपदिश्यते, क्षुधायुपशमनार्थ ग्राह्योऽसौ। वायुकायः॥ वायुश्चित्तवानारयातः। कथमस्य सचेतनत्वमिति चेत्तत्ममाणाद् गृहाण, तथाहि-वायुश्चेतनावान् अनन्यरिताऽनियततिर्यग्गमनत्त्वात् , हरिणगवयादिवत् , स च 'अनेकजीवः, पृथक्सवः आरयातः, शस्त्रपरिणतादन्यत्र' इत्यादिकाना भाग्वद्वयाख्या वोद्धच्या । खिचडी, भात आदि उप्ण अन्न, शाकका ओसामण और चावलोंका मण्ड आदि उष्ण पान, तपी हुई ईट, चालू आदि शस्त्र-परिणत अचित्त अग्निकाय कहलाते है। ये सब अग्निके सयोगसे निष्पन्न होते हैं इसलिए इनमें अचित्त अग्निकाय शब्दकी प्रवृत्ति होती है। (वायुकाय) वायुकायको भी भगवानने सचित्त कहा वायु कैसे सचित्त है सो कहते हैं। वायु सचेतन है, क्योंकि दुसरेकी प्रेरणाके विना अनियत रूपसे तिर्यक्गमन करनेवाला है, जैसे हिरन यारोझ (गवय)। अनेकजीव और पृथक्सत्त्व आदिकी व्याख्या पहलेके समान समझनी चाहिए। ખિચડી, ભાત આદિ ઊનું અન્ન, શાકનું ઓસામણ અને ખનું એસા- મણ, આદિ નું પાન, તપેલી ઇટ, ગરમ રેતી આદિ શસ્ત્રપરિણત અચિત્ત અનિડાય કહેવાય છે એ બધા અગ્નિના સગથી નિષ્પન્ન થાય છે, તેથી એમ અચિત્ત અગ્નિકાય શબ્દની પ્રવૃત્તિ થાય છે (૩) (वायु) વાયુકાયને પણ ભગવાને સચિત્ત કહી છે વાયુ કેવી રીતે સચિત્ત છે તે કહે છે – વાયુ સચેતન છે, કારણ કે બીજાની પ્રેરણા વિના અનિયતરૂપે તિર્યક ગમન કરનારે છે, જેવુ કે હરણ અથવા રોઝ (નીલગાય) અનેક જીવ અને પૃથસવ આદિની વ્યાખ્યા પહેલાની પિડે સમજવી २१४ श्रीदर्शवेकानिकलने न हि कचिदपि पिरहितात्मानो ज्वरतापोष्णगापाः सधूयन्ते न पोपलभ्यन्ते, एव मेव निस्तेजस्काहारादितोऽणुमात्रोऽपि तापो न जन्यते, तस्माद्याटास्मसयोगः भाव्यवाहारादीना तापजनकन्यमतः सिद्ध तेजसः सवेतनत्यम् । 'अनेकनीत्र, पृधसत्त्वम् ' इति माग्नत् , 'आरख्यात '-मित्यनेना पयः, 'शत्रपरिणतादन्यत्र' इति च पूर्ववत् । शस्त्रस्वरूपमाइ, तत्र स्त्रकापशस्त्र-फरीपाग्नेम्तृणामि., एवविधशस्त्र- परिणतोऽप्यमिः सर्वथैवाग्राह्यो व्यवहारतोऽशुद्धत्वात् । परकायशम-जलमृत्तिका- दि। उभयकायशस्त्रमुप्णोदकादि । भारशस्नममिकाय प्रति मनसो दुप्पणिधानम् । होते हैं, जैसे ज्यरके ताप। आत्मारहित शरीर (शय-मुर्दा) में कभी ज्वरका ताप नहीं सुना जाता न उपलघहोता है। इसीप्रकार निस्तेजस अंगारमें अणुमात्र भी ताप नहीं होता, अतएव सिद्ध है कि अगार आदिमें तापजनन शक्ति जय-तक आत्मा रहती है तय तक होती है। इसलिए तेजस्काय सचेतन है। 'अनेकजीव और पृथसत्त्व' आदि पदोंकी व्याख्या पहलेकी भाँति है। यह भी समझ लेना चाहिये कि वही तेजस्काय सचित्त है जो शस्त्र-परिणत न हो। तेजस्कायके शस्त्र ये है-जैसे छाणाकी अग्निका शस्त्र तृणकी अग्नि है । इस प्रकारकी शस्त्रपरिणत अग्नि ग्राह्य नहीं है। क्योंकि वह व्यवहारसे अशुद्ध है। तथा इसके ग्रहण करनेमें भगवानकी आज्ञा भी नही है। जल मृत्तिका आदि पर-काय शस्त्र है। उष्णजल उभयकाय शस्त्र है। હોય છે, જેમકે વરને તપ આત્મારહિત શરીર (મુડદુ કદિ જવાને તાપ નથી સાંભળવામાં આવી કે નથી લેવામાં આવતા, એ રીતે નિતેજસ અગારામાં અણુમાત્ર પણ તાપ હેત નથી તેથી સિદ્ધ થાય છે કે અગારા આદિમા ત્યા સુધી આત્મા હોય છે ત્યાસુધી જ તાપ-જનન-શકિત રહે છે તેથી તેજશકાય સચેતન છે અનેક જીવ અને પૃથ-સવ આદિ શબ્દોની વ્યાખ્યા પહેલાની જેમ છે એ પણ સમજી લેવું જોઈએ કે એજ તેજસ્કાય સચિત્ત છે કે જે શરુ પરિણત ન હોય તેજસ્કાયના શસ્ત્ર આ છે –જેમ છાણાના ચાતિનું શ તરણાને અગ્નિ છે એ પ્રકારને શસ્ત્રપરિણત અગ્નિ ચાહ્ય નથી, કારણ કે તે વ્યવહારથી અશુદ્ધ છે વળી તેને ગ્રહણ કરવાની ભગવાનની આજ્ઞા પણ થી જળ, માટી વગેરે પરકાયાસ્ત્ર છે ઉન મા ઉભયક अध्ययन ४ मू. ४ वनस्पतिकायस्य सचित्ततासिद्धिः २१७ , पूरितोऽपि मिश्रवादग्राह्य एव सचित्तयत् । (४) बनस्पतिकायः । वनस्पतिश्चिचवान् आख्यातः, व्यारया तु पूर्ववत् । चैतन्यवत्त्वसिद्धिश्चत्यम्- वनस्पतिः सचेतनः, वाल्यायवस्थासन्दर्शनात् , छेदन-भेदनादिभिर्लानतादि- दर्शनाच मनुष्यशरीरवत् । शेप पूर्ववत् । शस्त्र द्रव्यभावभेदाद्विविध, तत्र द्रव्यशस्खें- स्वपरोभयकायात्मकम् । स्वकायशस्व-यष्टयादि। परकायशस्त्र पापाणाऽसिफर्यादि, अचित्त वायु साधुओंको ग्राय है, किन्तु दूसरे प्रहरका मिश्र वायु मचित्त वायुकी तरह अग्राह्य है । (४) ( वनस्पतिकाय.) वनस्पतिकायको भी भगवानने सचित्त कहा है। वनस्पति सचित्त है, क्योंकि उसमें बाल्यावस्था आदि, तथा छेदन भेदन करनेसे म्लानता आदि सचेतनके गुण देखे जाते है, जैसे मनुष्यका शरीर । अर्थात् चाल्य-तरुण आदि अवस्थाएँ और छेदन-भेदन आदि करनेसे म्लानता होनेके कारण जैसे मनुष्य-शरीर सचेतन है वैसेही वनस्पतिकाय भी सचेतन है। 'अनेकजीव' आदि पदोंका व्याख्यान पहलेकी भॉति जानना चाहिए। वनस्पति-कायके शस्त्र दो प्रकारके हैं-(१) द्रव्यशस्त्र और (२)भावशस्त्र । द्रव्य-शस्त्र स्वकाय, परकाय और उभयकाय है, लकडी आदि स्वकाय शस्त्र है। लोह पत्थर आदि परकाय शस्त्र हैं, परशु કિન્તુ બીજા પ્રહરનો મિશ્રવાયુ સચિત્તવાયુની પેઠે અગ્રાહ્ય છે (૪) (वनस्पतिशाय) વનસ્પતિકાયને પણ ભગવાને સચિત કહી છે વનસ્પતિ સચિત્ત છે, કારણ કે તેમાં બાલ્યાવસ્થા આદિ તથા છેદન ભેદન કાથી માનતા આદિ સચેતનના ગુણ જોવામાં આવે છે, જેમકે મનુષ્યનું શરીર, અર્થાત બાલ્પતરૂણ આદિ અવસ્થાઓ અને છેદન ભેદન આદિ કરવાથી સ્તનતા થવાને કારણે જેમ મનુષ્યનું શરીર સચેતન છે તેમ વનસ્પતિકાય પણ સચેતન છે અનેક–જીવ આદિ શબ્દોનું વ્યાખ્યાન પહેલાની પ જાણવું વનસ્પતિકાયના શસ્ત્ર બે પ્રકારના છે (૧) દ્રવ્યશાસ્ત્ર અને (૨) ભાવાશ્વ દ્રવ્યશસ્ત્ર સ્વકાય, પકાય અને ઉભયકાય છે લાકડી આદિ સ્વકા રાસ્ત્ર છે લેહ २१६ श्रीदनवैकालिको शस्त्र चास्य द्रव्य-मारमेदाद्विविध, तत्र द्रव्यशम्न 'स्व पर तदुभय-कायमेदा- त्रिविधम् । स्कायान-पौरस्त्याटियायोः पामत्यादिपायुः। परकायमसमनलादि। उभयकायशत्रमनलादिसतप्तो पापुरेर । मावशम तु गर्यु प्रति मनसो दुष्पतिः । चायुः सचिनाचित्तमिश्रमेदात्रिधा, तत्र सचित्तो धनगातादिः, अचित्तो इति पभृतिषु पूरितः, सोऽप्यन्तर्मुहर्ता यावदेक याममचेतनः, तदनु पूर्णद्वितीययाम यावन्मिश्रः, तत्पशात्सचित्त ए, रोगावस्थाया पायोराध्यात्वे इत्यादि १ भगवतीमत्रस्य द्वितीयशतके प्रथमोशे पायधिशारे- " से भते ! किं पुढे उद्दाइ अपुढे उदाइ ? गो० ! पुढे उदाइ नो अपुढे उदाइ" छाया-'स (वायु.) भगवन् ! किं स्पृष्टः अपदाति (म्रियते) अस्पृष्टः अपद्रवति ? गौतम ! स्पृष्टः अपद्रवति नो अस्पृष्टः अपद्रपति'। अस्य टीका-'स्पृष्टः स्वकाय- शस्त्रेण परकायशस्त्रेण वा अपद्रवति=म्रियते'। वायुकायका शस्त्र द्रव्य-भाव-भेदसे दो प्रकारका है, द्रव्यशस्त्र-स्व पर-उभयकायके भेदसे तीन प्रकारका है। वहा स्वकाय-शस्त्र पूर्व आदि दिशाके वायुका पश्चिम आदि दिशाका वायु, परकाय-शस्त्र अग्नि आदि है, उभयकाय शस्त्र अग्नि आदिसे तपा हुआ वायु ही है । वायु तीन प्रकारका है- (१) सचित्त, (२) अचित्त, (३) मिश्र । घनवात आदि सचित्त है, दृति या रबरकी थैली आदिमे भरी हुई हवा अचित्त होती है, किन्तु अन्तर्मुहर्त्तके बाद एक प्रहर तक अचित्त रहती है, उसके बाद दूसरे पहर तक मिश्र अवस्थामे रहती है बादमें सचित्त होजाती है। रोग आदि अवस्थामे वायुकी आवश्यकता होने पर दृति आदिमे भरा हुआ વાયુકાયને શસ્ત્ર દ્રવ્ય ભાવભેદે બે પ્રકાર છે દ્રવ્યશસ્ત્ર સ્વ પર ઉભયકાયના ભેદે કરી ત્રણ પ્રકારનું છે, ત્યા સ્વાયશસ્ત્રપૂર્વઆદિ દિશાના વાયુને પશ્ચિમ- આદિ દિશાને વાયુ, પરકાયશસ્ત્ર અગ્નિ આદિ છે, ઉભયકાયશસ્ત્ર અગ્નિઆદિથી તપેલે વાયુ જ છે ભ વસ્ત્ર પહેલાની જેમ સમજી લેવુ વાયુ ત્રણ પ્રકાર છે- (१) सयित्त, (२) अथिरा, (3) मिश्र धन पाd All वायु सस्थित छ, બરના થેલી આદિમ ભરેલી હવા અચિત્ત છે, પરંતુ અતર્મુહુર્તની પછી એક પ્રહર સુધી અચિત્ત રહે છે, ત્યારપછી બીજા પ્રહર સુધી મિશ્ર અવસ્થામાં હે છે, અને ત્યારબાદ સચિત બની જાય છે ગાદિ અવસ્થામાં વાયુની આવશ્યક્તા પડતા મસક આદિની અંદર ભરેલે અચિત્ત વાયુ સાધુઓને ગ્રાહ્ય છે, . મસક યા अध्ययन ४ म. ५ वनस्पतिभेदाः मूलबीजाम् मूलमेर रोज येषा ते कमलकन्दप्रभृतयः । पर्वबीजापर्वणि-ग्रन्यौ प.व वा वीज येषा ते तथा इक्षुममुम्वा । स्कन्धवीजाम्किन्या-स्युइ स एव वीज येषा ते तथा शलसीप्रभृतयः। पीजरुहा: बीजाद् रोहन्ति-भादुर्भवन्तीति ते तथा शालिगो प्रमादय । सम्मच्छिमा समर्छन्ति-वीन विनापि दग्धभूमावपि समुद्भवन्तीति ते तथोक्ताः पृथिवीजलसयोगमात्रमनिताम्तणविशेषा इत्यर्थः । आर्पत्वारिसद्धिः। तथा तृणलता:-तृणानि लताश्चेत्यर्थः । वनम्पतिकायिका अवशिष्टाः समस्तवनस्पत्य इत्यर्थः । यद्वा 'वणलतावनस्पतिकायिकाः' इत्येक मलबीज-मृलही जिनका घीज हो वर, कमलका कद आदि मृल- . बीज हैं। पर्वबीज-पोर (गांठ)मे या पर्वही जिनका बीज है ऐसे, गन्ना (साठा) आदि पर्वबीज कहलाते हैं। स्कन्धवीज-स्कन्ध (युड)ही जिनका बीज है उस गल्लकी आदिको स्कन्धबीज कहते है। बीजरूह-चाँवल गेह आदि चीजसे उगनेवाली वनस्पतिको पीजरूह कहते है। समझिम-बिना वीजके जलीहुई भूमिमें भी जो पृथ्वी और जलके सयोगसे उग जावे ऐसी घाम आदिको समृमि कहते है। तृणलता-तिनका (घास) और लताएँ सय वनस्पतिकायिक है। अधचा " तृणलतावनस्पतिकायिका: 1 यह एकही पद है। दर्भ મૂલબીજ–મૂળજ જુનું બીજ છે તે કમળને કદ આદિ મલબીજ છે પર્વ બીજ–ગા યા પૂર્વમાં જેનું બીજ છે એવી શેરડી આદિ પર્વ બીજ કહેવાય છે સ્ક ઘણીજ--રક ઘર્થડજ જેનું બીજ છે એવા શકી આદિ ને ક ઘબીજ કહે છે બીજરૂહ -ળા ઘઉં આદિ બીજથી ઉડનારી વનસ્પતિને બીજરૂહ કહે છે સમૃછિમ-બજ વિના બળી ગએવી ભૂમિમાં પણ જે પૃથ્વી અને જળના સુગથી ઉગે એના ઘાસ આદિને સામૂહિમ કહે છે લતાણા (ઘાસ) અને લત એ બધા વનસ્પતિકયિક છે भूया वृणलतावनस्पतिकायिका એ એક જ ૫૬ છે દર્થ (દાભડે) २१८ श्रीदशकालिको उभयकायशव-परशुदात्रादि । भावगन तु न पति मनोमालिन्यम् ॥ ४ ॥ सम्मति वनस्पतिमेर सरिशेप वर्णयति-तजा' इत्यादि । मूलम्-तजहा-अग्गवीया मूलवीया पोरवीया,खंधषीया बीय- रुहा समुच्छिमातणलया वणस्सडकाडयासवीया चित्तमतमक्खाया अणेगजीवा पुढोसत्ता अन्नत्थ सत्थपरिणएणं ॥५॥ छाया-तपथा-अप्रवीजा मूलपीजाः पपीजाः मन्धवीजाः बीजरूहाः सम्मूछिमास्तृणलता वनस्पतिकायिकाः सीजाश्चित्तान्त आग्याता अनेकजीवाः पृथग्सचा अन्यत्र शस्त्रपरिणतेभ्यः ॥५॥ यहा वनस्पतिकायका विशेप वर्णन करते हैं- सान्ययार्थः-तजहा=बह इस प्रकारसे है-अग्गयीया जिनका बीज अग्र भागमें होता है, मूलवीया जिनका वीज मूलभागमें होता है, पोरयीया-जिनका चीज पोर (सन्धि) में होता है, खधीया जिनका वीज स्कन्ध (डाले) में होता है, बीयरुदा बीजसे उगनेगाले, समुच्छिमापिना वीजके उत्पन्न होनेवाले, तणलया-तृण और लताएँ, ये सभी वणस्सइकाइया बनस्पति- कायिक है, सबीया ऊक्त अपने-अपने नाममकृतिके उदयसे उत्पन्न हुए वीजसहित सर वनस्पतिकाय चित्तमत-सचित्त अक्खाया कहे गये हैं, अन्नत्थ-सिवाय सत्यपरिणएण-शस्त्रपरिणतके, ये वनस्पतिकाय अणेगजीवा- अनेक जीववाले और पुढोसत्ता-भिन्न भिन्न सत्तावाले है ॥५॥ टीका-तथाहि-अग्रवीजा अग्रे-अग्रभागे वीज येपा ते तथा कोरण्टकादयः। (फरसा) दात्र आदि उभयकाय शस्त्र है । भावशस्त्र उसके प्रति मनके परिणाम दुष्ट करना ॥४॥ अब वनस्पतिकायका विशेष वर्णन करते है-'त जहा' इत्यादि । अग्रवीज-जिनके बीज अग्र-भागमे होते है ऐसे कोरटक आदि अग्रबीज कहलाते है। પત્થર આદિ પરકાયશસ્ત્ર છે કે હાડ, દાતરડુ આદિ ઉભયકાય શસ્ત્ર છે ભાવશા એની પ્રતિ મનને પરિણામ દુર કરવા તે वे वनस्पतिशायर्नु विशेष वर्णन रे छ-तजहा त्या અગ્રણીજ–જેના બીજ અગ્રભાગમાં હોય છે એવા કેર ટક (હજારી ગુલ) આદિ અગ્રણીજ કહેવાય છે । अ ययन ४ सू. ६ त्रसकायवर्णनम् २२१ जेसि केसिचि पाणाणं अभिकंतं पडिक्कत सकुचियं पसारिय रुयं भंतं तसिय पलाइय,आगइगइविन्नाया।जे य कीडपयगा। जा य कुथुपिपीलिया ।सवे वेइंदिया, सवे तेडदिया, सवे चउरिंदिया, सवे पचिंदिया, सवे तिरिक्खजोणिया, सवे नेरइया, सवे मणुया, सो देवा, सत्वे पाणा परमाहम्मिया । एसो खलु छटो जीवनिकाओ तसकाउ-त्ति पवुच्चड ॥६॥ छाया-अथ ये पुनरिमेऽनेके वहवस्त्रसाः प्राणिनस्तयथा-अण्डजाः पोतजा जरायुजा रसनाः सस्वेदजा. सम्मूच्छिमा उद्भिजा औपपातिकाः, येपा केपा- श्चित्माणिनामभिकान्त प्रतिक्रान्त सकुचित प्रसारित रुत भ्रान्त नस्त पलायितम् , आगतिगतिविज्ञातारः। ये च कीटपतङ्गा.। याश्च कुन्थुपिपीलिकाः। सर्वे द्वीन्द्रिया., सबै त्रीन्द्रियाः, सर्वे चतुरिन्द्रियाः, सर्वे पञ्चेन्द्रियाः, सर्वे तिर्यग्योनिका', नैरयिकाः, सर्वे मनुजाः, सर्वे देवाः सर्वे प्राणाः परमधर्माणः । एप खलु पष्ठो जीवनिकायस्त्रसकाय इति पोच्यते ॥६॥ (६) सफायवर्णन. सान्चयार्थः -से-अय पुण और जे-जो इमेये (आगे कहे जानेवाले) अणेगे अनेक प्रकारके घरवे बहुतसे तसा घस पाणापाणी हैं, तजहावे इस प्रकार है-(१) अटया अपडेसे उत्पन्न होनेवाले, (२) पोययाविना जेर (जरायु-आवल-जड)के अर्थात् विना ही कुछ मलभागके वस्त्रसे पूछे हुएके समान उत्पन्न होनेवाले, (३) जराउया जेरसे लिपटे हुए उत्पन्न होनेवाले, (४)रसया रसमें उत्पन्न होनेवाले, (५) ससेइमा पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले, (६) समु- च्छिमा समूच्छिम, (७) उन्भिया पृथ्वीको भेदकर उत्पन्न होनेवाले (शलभ आदि), (८) उववाइया-उपपात जन्मवाले-देव और नारकी, जेसिं-केसिंचि इनमेंसे जिन फिन्हीं पाणाणपाणियोका अभिमत अभिमुख गमन होता है, पडिक्त पतिकूल गमन होता है, सकुचिय-गरीरमें सकोच-सिकुडन होता है, पसारिय-शरीरमें फैलार होता है, रुय शब्दका प्रयोग होता है, भत-इसर-उपर भ्रमण होता है, तसिय उद्वेग होता है, पलाइय-डरसे भागना देखा जाता है, (वे उस) आगइगडविन्नाया आगमन और गमनको जाननेवाले, य और जे-मो २२० श्रीदनेकानिकी पदम् , तत्र तृणानि दोंदीनि, लता पम्पकाऽशोकवासनत्यादयः, उनम्पति- फायिका:-धनस्पतिकायमेटा:-अग्रवीजादयः सर्वेऽपि वनस्पतिगायिका एक, पुनर्वनस्पतिकायिकग्रहण स्वगतसूक्ष्मादिसकलभेदरयापनार्थम् । स्वबीमा पूर्व विहितस्वस्वनामगोत्रमकृत्युदयात्मककारणवन्तः, अर्थात् पूर्वोक्ता अप्रवीजादयं सर्वेऽपि चित्तान्तः, इत्यादीनां व्याग्या पूर्ववत् । इति पञ्चस्थायरफायनिरूपणम् ॥५॥ साम्मत क्रममाप्त सरायस्वरूपमाह-'से जे०' इत्यादि । मूलम् से जे पुण इमे अणेगे वहवे तसा पाणा, तजहा-अंडया पोयया जरायुया रसया ससेइमा समुच्छिमा उब्भिया उववाइया। (द्व आदि) तृण, चम्पक, अशोक और वासन्ती आदि लताएँ और वनस्पतिकायके भेद अग्रवीज आदि सय वनस्पतिकायिक हैं। सूत्रमें दूसरी चार 'वनस्पतिकायिक' पदका ग्रहण इसलिए किया है कि-ऊपर बताये हुए भेदोके सिवाय सूक्ष्म चादर आदि और भी समस्त भेदोंका ग्रहण होजावे । ये सब पहले दिखलाये हुए अपने अपने नाम-गोत्ररूप प्रकृतिके उदयरूप कारणवाले हैं। अर्थात् पूर्वोक्त वीज आदि सब सचित्त हैं और पृथक्-पृथक् स्पर्शरूप एक इन्द्रियवाले हैं ॥५॥ यह पाच स्थावरकायका निरूपण समाप्त हुआ। अब क्रमप्राप्त सकार्यका स्वरूप कहते हैं-'से जे' इत्यादि । તૃણ, ચ પક, અશેક, અને વાસંતી આદિ લતાઓ અને વનસ્પતિકાયને ભે અગ્ર બીજ આદિ બધા વનસ્પતિકાંયિક છે સૂત્રમાં બીજી વાર “વનસ્પતિકાયિક શબ્દનું ગ્રહણ એટલા માટે કરવામાં આવ્યું છે કે-ઉપર બતાવેલા ભેદ ઉપરાત સૂક્ષમ બંદર આદિ બીજા પણ બધા ભેદનું ગ્રહણ થઈ જવા પામે એ બધા પહેલા બતાવેલા પિત પિતાના નામ ગોત્રરૂપ પ્રકૃતિના ઉદય રૂપ કારણવાળા છે અર્થાત્ પૂર્વોક્ત બીજ આદિ બધા સચિત્ત છે અને પૃથફુ-પૃથક્ સ્પર્શરૂપ એક ઈન્દ્રિયવાળા છે (૫) ઈતિ ૫ ચ-સ્થાવર કાયનું નિરૂપણ સમાપ્ત હવે ક્રમ પ્રાપ્ત ત્રસકાયનુ સ્વરૂપ કહે છે से जे त्या , अध्ययन ४ मु. ६ बसकायवर्णनम् २२३ एव परिस्पन्दादिसामोपेता' पोतजाः। यद्वा पोतो वस्त्रम्-(इति शब्दकल्पद्रुमः), तेन तत्समार्जिता लक्ष्यन्ते, तथा च-पोता इवम्बलसमार्जिता इव गर्भवेष्टनचर्माड- नास्तत्वात् , जायन्ते-उत्पयन्ते इति, पोताना वेष्टनचर्मरहितगर्भात् जायन्त इति वा पोतजा" कुञ्जर-शल्लक-शश-नकुल-मूपिक-चर्मचटिका-बल्गुलिकादयः । जरायुजाः जरामेति गच्छतीति जरायुः गर्भवेष्टनचर्म तस्माज्जायन्त इति ते= नर-महिप-गवादयः । रसजा असेम्मद्यलक्षणे 'रसजो मद्यकीटः, इति हेमाद , जायन्त इति, रसेविकृतमधुरादौ जायन्त इति वा रजसाः । सस्वेदजासस्वेदात् धर्माज्जायन्त इति ते यूमा-लिक्षा-मत्कुणप्रमुखाः । सम्मूछिमा: सम्मूर्छन सम्मृर्छ =गर्भाधानमन्तरेणैव स्वय समुत्पत्तिः, ('मूर्छा मोह-समुच्छ्ाययोः अस्माद्भावे घन, व्युत्पत्तिप्रदर्शनमेतत् , शब्दोऽय मनोविकले १ 'अन्येष्वपि दृश्यते'-इति ड निकलते ही गमन-आगमन आदि क्रियाएँ करनेकी सामर्थ्यसे युक्त पूर्ण अवयववाले, या वस्त्रसे पोंछे हुएके समान साफ उत्पन्न होनेवाले हाथी, शल्लकी, खरगोश, नौला, चूहा आदि पोतज कहलाते है (२), जरायु (आँवल जड) सहित उत्पन्न होनेवाले मनुष्य महिषादि जरायुज कहलाते हैं (३), मदिरा आदि रसोंमें उत्पन्न होनेवाले तथा स्वादसे चलित अर्थात् सडे हुए मधुरादि रसोंमें उत्पन्न होनेवाले रसज कहलाते हैं (४), पसीनेसे पैदा होनेवाले जू, लीख, खटमल आदि सस्वेदज कहलाते हैं (५) गर्भा- धानके विना शरीरनाम-कर्मके उदयसे शरीरके अवयवोंका सग्रह हो जानेसे स्वय ही उत्पन्न होनेवाले जीव समृमि कहलाते हैं (६), નીકળતા જ ગમનાગમન આદિ ક્રિયાઓ કરવાના સામર્થ્યથી યુક્ત પૂર્ણ અવયવ દ્વારા રેલાની પેઠે સાફ ઉત્પન્ન थना। हाथी, शेणी, સસલા, નેળિયા, ઉદર આદિ પિતજ કહેવાય છે (૨) જરાયુ (નાળ વગેરે મળ ભાગ) સહિત ઉત્પન્ન થનારા મનુષ્ય, મહિષાદિ (ભેશ વગેરે) જરાયુજ કહેવાય છે (૩) મદિરા આદિ માં ઉત્પન્ન થનારા તથા સ્વાદથી ચલિત અર્થાત્ સડેલા મધુરાદિ સોમાં ઉત્પન્ન થનારા રસજ કહેવાય છે (૪) પ્રસ્વે દથી પેદા થનારા જૂ - લીખ, માકણ, આદિ સર્વેદજ કહેવાય છે (૫) ગર્ભા ધાન વિના શરીરનામ-કર્મના ઉદયથી શરીરના અવયને સંગ્રહ થઈ જવાથી સ્વય ઉત્પન્ન થનાર છે સામૂછિમ કહેવાય છે (૬) પૃથ્વીને ભેદીને ઉત્પન્ન वाणा ચા નવ -- ।

मचुरा ૨૨૨ श्रीवकालिको कीडपयगा-कीट-कीटे और पयगा पतगिये है,य-औरजा-जोकुयुपिवीलिया- कुथवा और चींटियाँ है, वे मचे येहदिया र द्वीन्द्रिय सम्ये तेदिया-मर श्रीन्द्रिय सव्वे घउरिदिया सर चार इन्द्रियाले सबै पचिंटिया सब पभेन्द्रिय सव्वे तिरिक्सजोणिया सर तिर्यनगतिमाले सन्चे नेरहया सत्र नारकी सब्वे मणुयाम्मर मनुष्य मब्वे देवा-सा देर सन्वे=पूर्वोक्त सत्र पाणाम्भाणीमात्र परमारम्मिया-मुसके अमिलापी है। एमो ग्रह बलु-निश्चय करके छहो उठा जीवनिकाओ-जीपनिकाय तमकाउत्ति=" प्रसकाय ऐसा पयुचइ-कहा जाता है ॥६॥ टीका-'से भय स्थापरपञ्चकनिस्पणानन्तर पुनः इमे वक्ष्यमाणभेदार अनेके द्वीन्द्रियादिभेदेनाऽनेकमकाराः पहा एकैकस्या जाती भिन्नयो नयो वा प्रसाः बसनामकर्मोदयात् , स्यन्ति आतपायभिपीडिता उद्विजन्ते पच्छायशीतल स्थल प्रयान्ति वेति तथोक्ताः, पाणन्ति जीवन्त्येभिरिति, पाण्यन्ते जीन्यन्ते माणिन एभिरिति या (मोपरष्टा-दनिते., अण्यतेर्वा करणे घ) प्राणा' उच्छ्वासादयस्ते सन्त्येपामिति माणाः माणिन इत्यर्थः, तयथा- अण्डे-पक्ष्यादिमादुर्भावककोपे जायन्ते-उत्पयन्ते इत्यण्डजापति सर्पदय । पोता एव जाता पोतजाः न जरायवादिना वेप्टिताः पूर्णावयवयोनिनिर्गतमात्रा १ 'से. पचाय' २ 'अशआदित्वादच्' जो ये आगालप्रसिद्ध दीन्द्रिय आदिके भेदसे अनेक, एक एक जातिमे बहुतसे अथवा भिन्न-भिन्न योनिवाले आतप (गर्मी) आदिसे पीडित होनेपर त्रास (उद्वेग) पानेवाले, अथवा छायादार शीतल और निर्भय स्थरमे चले जानेवाले, व्यक्त चेतनावान् , उच्छ्वास आदि प्राण वाले बस कहलाते हैं, उनके भेद इस प्रकार है- पक्षी सर्प आदि अण्डज हैं (१), जरायुसे वेष्टित न होकर योनिसे જે એ આબાલ-પ્રસિદ્ધ કીન્દ્રિયાદિના ભેદે કરીને અનેક, એક એક જાતિમાં અથવા ભિન્ન-ભિન્ન નિવાળા, ગરમી આદિથી પીડિત થતા ત્રાસ (ઉદ્વેગ) પામનારા, અથવા છાયાવાળા શીતળ અને નિર્ભય જનારા, વ્યક્ત ચેતનાવાનું ઉસ આદિ પ્રાણવાળા ત્રસ કહેવાય છે, તેના ભેદ , , घणा સ્થળમાં ચાત્યા मा अरे छ પક્ષી સર્ષ આદિ અડજ છે (૧) જરાયુથી વેષ્ટિત ન હોઈને યોનિમાથી - . . . अध्ययन ४ सू. ६ त्रसकायवर्णनम् २२५ तयोविनातारः वेदितारः ओघसज्ञया प्रत्तिमन्तः स्वस्त्राभिकान्तमतिकान्तादि- स्वपयकाऽवमोचसम्पन्ना भवन्तीत्यर्थः । इन्द्रियादिविभागमदर्शनेन तानेव परिचाययति 'ये चे' त्यादि, ये च कीट- गाः कीटा:-कृमयो गण्डोलकमभृतयः, तज्जातीया अन्ये द्वीन्द्रियाच, पतगा:- भाश्चतुरिन्द्रियास्तज्जातीया भ्रमरादयश्च । याश्च कुन्यु-पिपीलिका , कुन्थवश्व सिलिकाश्चेत्यनयोरितरेतरयोगे 'परवल्लिङ्ग द्वन्द्व तत्पुरुषयो -रिति परवल्लिङ्गता। चलन्त एप परिज्ञेया न स्थिताः ममत्वात् लघुकायजीवाः, पिपीलिका. की कास्तजातीयास्त्रीन्द्रियाच, द्वि-नि-चतुरिन्द्रियक्रममुलवथ द्विचतुस्त्रीन्द्रियेति व्यु णोपादानमार्फत्वात्मत्रगते.चिच्याञ्च । तत सर्वे द्वीन्द्रिया , सर्वे त्रीन्द्रियाः, स गरिन्द्रिया., सर्वे पश्चेन्द्रिया', सर्वे तियग्योनिकाः, सर्वे नैरयिका., सर्वे प्रा करनेवाले होते हैं। अनुकूलता और प्रतिकूलताको सामान्यतया ओ अज्ञासे जानते है। न्द्रियोंका विभाग करके फिर उनका कथन करते हैं- मि,लट, गण्डोल आदि उनकी जातिवाले डीन्द्रिय हैं। शलभ और उनर जातिके भ्रमर आदि चार इन्द्रियवाले होते हे । कुन्यु और पिपी- लि (चिउटी) तथा उनकी जातिके अन्य जीव तीन इन्द्रियवाले होते हैं। यहीन्द्रिय बताने के बाद पहले चार इन्द्रिय फिर तीन इन्द्रियवाले जीव यम है, यह कथन आप होनेसे किया गया है, इसलिए सर हीन्द्रिय, स्त्रीन्द्रिय,सवचतुरिन्द्रिय,सब पचेन्द्रिय,सव तिर्यञ्च,सव नारकी, सव પ્રતિકૂળતાને સામાન્ય રીતે ઘ– જ્ઞાએ કરી જાણે છે ઈદ્રિના વિભાગ કરીને હવે એનું કથન કરવામાં આવે છે કૃમિ (કરમિયા), લટ, અળસીયા વગેરે એ ન જાતિવાળા દ્વીન્દ્રિય છે તીડ અને ની જાતિવાળા ભ્રમર આદિ ચાર ઈદ્રિયવાળા છે કુ થવા અને કીડી તથા તેની તિવાળા બીજા જ ત્રણ ઇન્દ્રિયવાળા હોય છે અહીં દ્વાન્દ્રિય બતાવ્યા પછી પહેલા ચાર ઇદ્રિયવાળા અને પછી ત્રણ ઈદ્રિયવાળા બતાવ્યા છે, એ કથન આ હિાવાથી કરેલ છે એ રીતે બધા પ્રિન્દ્રિય, બધા ત્રિીન્દ્રિય, બધા ચતુરિન્દ્રિય, બધા પચેદ્રિય, બધા તિર્યંચ, બધા નાકી, બધા મનુષ્ય, બધા દેવ, એ પ્રકારે २२४ श्री नालियो रूला,) गदा समन्ततो देहम्य मूर्चनम् भायामयोगम्तेन निरता' सम्मूणिमा मातापिठसयोग निा सग मात्पनगः पिपीलिया मक्षिका मलोटकादया, (आपत्वात्सिदिः) । उशिना उद्विय पृथिवी भित्ला जायन्त इति ते ब्रममा दयः । औपपातिकाः उपपतनमुपपातः (पतधातीमांचे घन) देवनारकाला प्रसि- द्धगर्मसम्मूर्छनरूपजन्मप्रारद्वय विलक्षण उद्भयम्तेन निर्वृत्ताः औषपातिकाः देर नारका., देवा हि पुष्पाग्याया नारकाम कुम्भ्यादिपु म्बय समुत्पद्यन्ते । तानेर विशिनष्टि-'येपा'-मित्यादिना, येपा केपानिपोक्ताना माणानावासोच्छ्या- सादिपाणरताम् , अमिफ्रान्तम् आभिमुग्येन अभिमुख का मन्त्रापास्य क्रमण गमनममिकान्त 'भरती' ति शेपः । प्रतिक्रान्त पति-पातिपल्येन प्रतिकूल का प्रज्ञापकस्य क्रमणम् , यद्वा भतिक्रान्त-परायत्य गमनम् , सकुचित सकीचा गात्रा वकुञ्चनम् , प्रसारित करचरणादिमसारण, रुन शब्दकरणम् , भ्रान्तम्-इतस्ततो भ्रमणम् , अस्तबासा-उद्वेग , पलायित पलायन भयादिना स्थानान्तरगमन 'भवती' त्यभ्याहृतेन प्रत्येक सम्मन्यः । सर्व एौतेऽभिकान्तादय. शब्दा. भाष- न्तिाः। ते प्रसाः, आगतिगतिविज्ञातार =आगति. आगमनम् , गति वामन पृथ्वीको भेदकर उत्पन्न होनेवाले शलम (टिड्डी) आदि उद्भिज हैं (७), गर्भ और समूच्र्छन जन्मोंसे भिन्न देव और नारकोके जन्मको उपपात कहते हैं, उससे उत्पन्न होनेवाले देव और नारकी औपपातिक कह- लाते हैं (८), देव शग्या पर और नारकी कुम्भीमे स्वय उत्पन्न होते हैं । ये सब पूर्वोक्त जीवोंके प्रज्ञापककी अपेक्षा सामने आना, लौटके पीछे जाना, इसी प्रकार अगको सिकोडना, हाथ पैर फैलाना, बोलना, भ्रमण करना, उद्विग्न होना, भय आदि कारणोसे भागना आदि क्रियाएँ होती है। वे गमन आगमन आदिके जाननेवाले अर्थात् ओघसज्ञासे થનારા શલભ (ટીડ) આદિ ઉસિજજ કહેવાય છે (૭) ગર્ભ અને સમૂર્ઝન જન્મથી ભિન્ન દેવ અને નારાના જન્મને ઉપપત કહે છે, તેથી ઉત્પન્ન થના દેશ અને નારકી પપાતિક કહેવાય છે (૮) દેવ શવ્યા કુભીમ સ્વય ઉત્પન્ન થાય છે એ બધા પૂર્વોકત જીનું પ્રજ્ઞાપકની અપેક્ષાઓ સામે આવવુ, કરીને પાછા જવું, એ જ રીતે અગ સ કોચવા, હાથ-પગ ફેલાવવા, બોલવું, બ્રમવું, ઉદ્વિગ્ન થવું, ભયાદિ કારણે ભાગી જવું, વગેરે ક્રિયાઓ હોય છે તેઓ ગમનાગમન આદિને જાણનારા અર્થાત્ એઇસજ્ઞાથી પ્રવૃત્તિ કરનારા હોય છે અનુકૂળતા પર અને નારકી अ ययन ४.७ पइजीपनिकायाना दण्डपरित्यागः २२७ योके दडदण्ड-हिंसा आदि-को सय स्वय नेवन समारभिज्जा आरम्भ करे, नेव=न अन्नेरि दुसरोसे दड-दण्डको समारभाविज्जा आरम करावे, दर्ड दण्डका समारमतेवि आरम्भ करते हुओको भी अन्ने दुसरीको न नहीं समणुजाणेजा-भलाजाने,जायज्जीवाए यावज्जीवन-जीवनपर्यन्त तिचिह-कृत- कारित-अनुमोदनारूप तीन-करण-पूर्वक (इस प्रकार) तिविहेण-तीन प्रकारके मणेण-मनसे वायाए वचनसे कारण कायासे न करेमि=नही क्रूँगा, न कारवेमि नही कराऊँगा, अन्ने-दूसरे करतपि करनेवाले कोभी न समणुजा- णामि भला नही समझंगा। भते! हे भदन्त तस्स-पूर्वोक्त उस दण्डसे पडि- कमामि-पृथक होता हूँ, निंदामि आत्मसाक्षीसे जुगुप्सा करता हूँ, गरिहामि गुरुसाक्षीसे गहीं करता हूँ (और) अप्पाणदडसेवन करनेवाले आत्माका वोसिरामि त्याग करता हूँ ॥६॥ टीका-इत्येपा पूर्वोक्तस्वरूपाणा पण्णा जीवनिकायानावसस्थावरलक्षण- जीवसमुदायानाम् , दण्डयते सारहीनः क्रियते आत्माऽनेनेति दण्ड' माणव्य- परोपणादिस्तम् , स्वयम् आत्मना नैवम्न कदापि समारभेत=विदधीत, नैव अन्यैः- स्वव्यतिरिक्त कैरपि जनैस्तद्वारेति भावः, दण्डम् उक्तलक्षणव्यापार सामारम्भयेत्- कारयेत् , दण्ड समारममाणान् कुर्वाणान् अपि अन्यान् न समनुजानीयात् अनुमन्येत। फियत्समयपर्यन्त ' मित्याद-'जावजीवाए' इति, अत्र यावच्छन्द परिमाणार्थको मर्यादार्थकोऽवधारणार्थकचाव्ययः, जीवन जीवा ('जीव माणधारणे अस्मात् 'गुरोध हल.'(३।३।१०३) इतिपाणिनिवचनेन स्त्रियामकारपत्यये स्त्रीत्वा- साप 'ईहा, अहे त्यादिवत् ,) तया जीवया जीवामित्यर्थः ('ततोऽन्यापि दृश्यते') इति वचनालाद यावच्छब्दयोगे द्वितीयाया' प्राप्तावपि सौरवात्तृतीया, तेन यावन्मम जीवन तावदिति, जीवन मर्यादीकृत्णर्थान्न केवल मरणकाल जिससे आत्मा ज्ञान दर्शन चारित्रसे रहित होजाय उस हिंसा आदि व्यापारको दण्ड करते हैं । मुनि पूर्वोक्त छह कायोके दण्डका यावज्जीव न स्वय समारभ करे न दूसरोंसे करावे और न समारभ करनेवाले જેથી આત્મા જ્ઞન દન ચારિત્રથી રહિત થઈ જાય, એ હિસા આદિ વ્યાપારને દડ કહે છે મુનિ પૂર્વોકત કાના દડને ચાવજજીવન પિતે ન કરે, ન બીજાઓ પાસે કરાવે અને સમાર ભ કરનારા બીજાઓની ન સમર ભ २२६ श्रीदकालिको मनुष्याः, सो देवाः, सर्वे प्राणा: भूोक्ताः मालपाणिनः परमधर्माण परम मुखमेव धर्मों येषा ते मुखामिलापुका इत्यर्थः 'परमा' इत्यत्र दीर्घ आपसात । एपः अनन्तरोदीरितस्परूपोऽण्डजादिलक्षणः खलु-निभयेन पष्ट' स्थावरपत्रका पेक्षया पष्ठत्वमापन्नः जीरनिकाय माणिसमूहः 'प्रसकाय'-इति प्रोच्यते कथ्यते प्रसकायनाम्ना रयात इत्यर्थः ॥६॥ सर्वे माणिनः सुखाभिलापिणो भवन्ति, सुखं च तेपामनारम्भेणव सम्पयतेऽत इदानीमनारम्भोपदेशः-'इञ्चेसिं' इत्यादि । मूलम् इञ्चेसि छण्ह जीवनिकायाण नेव सय दड समारभिजा, नेवन्नेहिं दड समारभाविजा, दड समारभतेवि अन्ने न समणुजा- गिजा, जावज्जीवाए तिविह तिविहेण मणेण वायाए कारण न करेमि न कारवेमि करतपि अन्न न समणुजाणामि । तस्स भते । पडिकमामि, निदामि, गरिहामि, अप्पाण बोसिरामि ॥७॥ छाया-इत्येपा पण्णा जी निकायाना नैव स्वय दण्ड समारभेत, नैवान्यै दण्ड सामारम्भयेत् , दण्ड समारभमाणानप्यन्यान् न समनुजानीयात् , यावजीवया त्रिविध निविधेन मनसा वाचा कायेन न करोमि न कारयामि कुर्वन्तमप्यन्य न समनुजानामि । तस्य भदन्त ! प्रतिक्रामामि निन्दामि गर्दै आत्मान व्युत्सृजामि।७। पट्कायका आरम्भ न करनेका उपदेश देते है- सान्वयार्थ - इच्चेसिं-इन पूर्वोक्त छह-छह जीवनिकायाण जीवनिका मनुष्य, सब देव, इस प्रकार पूर्वोक्त सब प्राणी सुखकी अभिलाषावाले हैं। इस छठे जीवनिकायको भगवानने त्रसकाय कहा है ॥६॥ समस्त प्राणी सुखके अभिलाषी है, किन्तु सुखकी प्राप्ति तब ही हो सकती है जब आरभका परित्याग कर दिया जाय, इसलिए आरभके त्यागका उपदेश देते हैं-'इच्चेसिं' इत्यादि। પૂર્વોક્ત બધા પ્રાણ સુખની અભિલાષાવાળા છે એ છઠા જીવનિકાયને ભગવાને स-14 ४ (6) બધા પ્રાણી સુખના અભિલાષી છે, પરન્તુ સુખની પ્રાપ્તિ ત્યારે થાય છે કે જ્યારે આર ભને પરિત્યાગ કરવામાં આવે, તેથી આરભના ત્યાગને ઉપદેશ આપે છે- इच्चेसिं त्या , अ ययन ४ म. ७ पड्जीवनिकायाना दण्डपरित्यागः २२९ त्रिविन कायेने 'त्यन्वये मनोवाकायाना मत्येक त्रैविध्य प्राप्नोति तच्चानिष्ट, नह्यन मनादीनि प्रत्येक प्रैविध्यमईन्ति कि तहि तद्व्यापारा एवेति चेन्न, तदभावे हि 'मनसा वाचा कायेन' इत्येतावन्मात्रोक्तो 'न करोमि न कार- यामि, कुर्वन्तमप्यन्य न समनुजानामी '-त्यनेन सह 'यथासख्यमनुदेशः समा- नाम् ' (१।३।१०) इति वचनानुरोपेन 'शत्रु मिन्न विपत्ति च जय रञ्जय भञ्जये'-त्यादिवत , एचोऽयवायावः' (६।१।७८) इत्यादिवद्वा क्रमिका- न्वये 'मनसा न करोमि, वाचा न कारयामि, सायेन कुर्वन्तमप्यन्य न समनुजा- अर्थ होगा कि तीन प्रकारके मनसे, तीन प्रकारके वचनसे और तीन प्रकारके कायसे आरम्भ न करे । अर्थात् मन वचन कायके तीन तीन भेद होंगे। ऐसा अर्थ शास्त्रविरुद्ध है-शास्त्रोंमें भगवानने मन आदिके तीन तीन भेद नहीं बताये हैं, किन्तु मन आदिके न्यापारोंको तीन प्रकारका बताया है। उत्तर-यह शका ठीक नहीं है । यदि 'त्रिविधेन' न कहकर केवल 'मनसा वाचा कायेन' कह देते तो अर्थ ठीक न बैठता, क्योंकि जैसे कोई कहे कि "हेय और उपादेयको त्यागो और ग्रहण करो।" तो इस वाक्यमें क्रममे 'हेय' के साथ 'त्यागो'का सम्बन्ध होजाता है और 'उपादेय के साथ 'ग्रहण करो'का। इसी प्रकार 'चोलपट्टा चादर पहनो, ओढो' कहनेसे यह अर्थ होता है कि "चोलपट्टा पहना-और चादर ओढो।" इसीप्रकार 'त्रिविधेन' (तीन प्रकारसे) पद न रखते મનથી, ત્રણ પ્રકારના વચનથી, અને ત્રણ પ્રકારની કાયાથી આભ અર્થાત મન પણ ત્રણ ભેદ બનશે એ અર્થ શસ્ત્રવિરૂદ્ધ છે શાસ્ત્રમાં ભગવાને મન આદિના ત્રણ ભેદ બતાવ્યા નથી, પરંતુ મન આદિના વ્યાપારને તે ત્રણ પ્રકારના બતાવ્યા છે उत्तर- १२ नथी ने त्रिविन न ४हीन मनसा वाचा જાન કહ્યું હતું તે અર્વ બાબર બંધ બેસત નહિ કારણ કે જેમ ઈ કહે કે “હેય અને ઉપ દેયને ત્યાગે અને ગ્રહણ કરે” તે એ વાકયમાં ક્રમાનુસાર “હેય”ની સાથે “ત્યાગીને સ બંધ થઈ જાય છે અને “ઉપાદેયની સાથે “ગ્રહણ કરેને એજ રીતે “લપ ચાદર પહેરે એ કહેવાથી એ અર્થ થાય છે 'यसपट्टी पड़े। सने या६२ साठी' ये शते त्रिविधेन (त्रय पारे) વચન દુાયાના २२८ श्रीदनकालिको एपापितु ततः मागपीति, जीवन पर न तदुत्तर परलोकेऽपीत्यर्थः । दम किंधि? मित्पाह-त्रिविध-तिम्रो रिया:-कारा यस्य स तम्-कृत-कारितानुमत- रूपम् , तत्र कृत-म्मतन्त्रेणाऽऽत्मना सम्पादितम् , पारितम् अन्य (व्यक्यन्तर) द्वारा निष्पादितम् , अनुमत सारव्यापारमारममाणम्य 'त्व साधु करोषि, एवमेव कुर्वन्नास्व' इत्यादिना प्रोत्साहितम् , निशियन-प्रकारत्रयविशिष्टेन फरणभूतेन, केने ? त्याह-'मनसा नाचा कायेने 'ति । ननु तिषियनेत्यनेन यत्मकारत्रय गृह्यते तत् 'मनसे' त्यादिना प्रतिपदमेवो- क्तम् , एष सति त्रिविपनेत्युपादान पौनरस्यदोपग्रस्त भाति । यद्वा 'त्रिवियेने ति विशेषण 'मनसे'-त्यादेरेर समाति, ततश्च 'त्रिविवेन मनसा, त्रिविधया वाचा, दूसरोंकी अनुमोदना करे । दण्ड तीन प्रकारका है-(१)कृत, (२) कारित, (३) अनुमोदित । कृत-अपनी इच्छासे स्वय करना । कारित-दूसरे व्यक्तिसे कराना । अनुमोदित-जो सावद्य व्यापार कर रहा हो उसे अच्छा समझना। यह सब सावध व्यापार तीन करण तीन योगसे न करे। वे तीन योग ये हैं-(१) मन, (२) वचन, (३) काय । प्रश्न-सूत्रमें 'त्रिविधेन' (तीन प्रकारसे) कहा ही है फिर 'मनसा' (मनसे) 'वाचा' (वचनसे) 'कायेन' (कायसे) कहनेसे पुनरुक्ति (कहे हुए को पुनः कहना) होती है। या तीन प्रकारसे यह विशेषण 'मन, वचन, काय' का ही हो सकता है। यदि ऐसा मान लिया जाय तो इसका मनुभहना ४२ ६४ नए प्रारना छ (१) पृत, (२) रित, (3) मनुमाहित કૃત–પિતાની ઈચ્છાથી પોતે કરવું કારિત–બીજી વ્યક્તિ પાસે કરાવવું અનુદિત-જે સાવધ વ્યાપાર કરી રહ્યો હોય, તેને સારૂ જાણવું એ બધા સાવદ્ય વ્યાપાર ત્રણ કરણ ત્રણ યેગથી ન કરે તે योग, मा छ-(१) भन, (२) क्यन, (3) अया प्रश्न-सूतमा निविधेन (RY प्रा२) दु छ, पछी मनसा (भनथी), याचा (वयनथी,) कायेन (याथी) पाथी धुन३हित (डसाने श ४) થાય છે આ ત્રણ પ્રકારે' એ વિશેષણ “મન, વચન, કાયા” નુ જ હોઈ શકે છે જે એમ આવે તે એને અર્થ એ થશે કે “ત્રણ પ્રકારના त्रय . માનવામાં अध्ययन ४ स.७ भदन्तशब्दार्थः २३१ दण्डादित्यर्थः, अत्रापादानस्य शेपत्वविवक्षया पष्ठी । भते ' भदन्त " भन्दते कल्याण मुख वा प्रापयतीति भदन्तः, ('अन्तर्भावितण्याद् 'भदि कल्याणे मुखे चे' त्यस्माद्धातो. 'मन्देनलोपश्चे 'त्यौणादिकमूत्रेण झन् चातुनकारलोपयोः 'झोऽन्त' इति अस्यान्तादेश ।) यद्वा भव-ससारमन्तयति दूरीकरोतीति, ('कर्मण्यण् (३ । २।१) इत्यण शकन्वादेराकृतिगणत्वात्पररूपे पृपोदरादि- त्वावस्य दः ।) अथवा भवस्य समारस्याऽन्तोऽवसान येनेति व्यधिकरणपदो बहुचीहि पररूपादेशो प्राग्वत् । भयस्य जन्म-जरा-मरण-निमित्तकस्याऽन्तो= नाशो येनेति भयान्तः, स एव भदन्त इति वा, पृपोदरादित्वादेकस्याफारस्य लोपो यस्य च दः । अपिवा भय ददतीति भयदा भोगास्तानन्तयतीति कर्मण्य- णिति सूत्रविहिताऽणन्त-भयदान्त-शब्दस्य पृपोदरादित्वाद् भदन्त इति । यद्वा दान्त भय येन स भयदान्तः 'निष्ठान्तस्य परनिपात आहिताग्न्यादि- पाठात् ' स एव भदन्तः 'यलोप-इस्त्री पृपोदरादिपाठकृतौ । अथच भान्ति-दीप्यन्ते (समुलसन्तीत्यर्थात् ) स्वस्ववियेष्विति भानि इन्द्रियाणि, तानि दान्तानि येन स भदान्त', स एव भदन्तः ( निष्ठान्तपरनि- पृपोदरादित्वादाकारस्य हस्व.)। यद्वा भाति-सम्यग्नान-दर्शन- . पातः भाग्य, व्याकरणमें 'भते' शब्द अनेक प्रकारसे सिद्ध होता है, इसलिए उसके अर्थ बहुतसे हैं। जैसे (१) कल्याण और सुखको देनेवाले, (२)ससारका अन्त करनेवाले, (३)जिनकी सेवा भक्ति करनेसे ससारका अन्त हो जाता है, (४) जन्म-जरा-मरणके भयका नाश करनेवाले, (५) भोगोंको त्याग देनेवाले, (६) भयको दमन करनेवाले निर्भय, (७) इन्द्रियोंका दमन करनेवाले, (८) सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन , વ્યાકરણમાં મત્તે શબ્દ અનેક પ્રકારે સિદ્ધ થાય છે, તેથી એના અર્થ ध छ वा (१) ४क्ष्याए! भने सुमने मापना२, (२) ससार मत ७२नार, (૩) જેની સેવાભક્તિ કશ્વાથી સસારનો અંત આવી જાય છે, (૪) જન્મ મરણના ભયને નાશ કરનાર, (૫) ભેગોને ત્યાગ ४२नार, (६) मय हमन કરનાર-નિર્ભય (૭) ઈદ્રિનું દમન કરનાર, (૮) સભ્યજ્ઞાન, સમ્યગ્દર્શન જs २३० श्रीदशवकालिक नामी'-त्यनभीष्टोऽर्थ आपघेत तद्वारणाय प्रिमियनेत्युक्तम् , तेन मनसा न करोमि, न कारयामि, फुन्तिमप्यन्य न समनुनानामि पाचा न करोमि न कारयामि कुन्तिमप्यन्य न समनुनानामि पर कायेन न करोमि न कारयामि कुर्वन्तमप्यन्य न समनुनानामीस्यों भाति, या पूर्व सामान्यतस्त्रिविषनेत्युक्त्वा केन त्रिवि- धेनेति जिज्ञासाया तत्मकारान् दर्शयितु शिपेणाऽऽर- 'मनसे'-स्यादीति नास्ति पौनरुत्तथदोपाऽऽपात | केचित् 'मनसा या चाचा वा कायेन वेति विकल्पसग्रहार्य 'त्रिपियने'-त्युतमित्यूचिरे । 'न कारयामी' त्यत्राऽन्येने 'ति. शेपः पूरणीयः । न समनुनानामि नानुमन्ये । तस्येति-तस्माद-पूर्वोक्तरूपा तो ऐसा अनिष्ट अर्थ होजाता कि-मनसे न करे, वचनसे न करावे और कायसे अनुमोदना न करे । इस अनिष्ट अर्थका परिसर करनेके लिए 'त्रिविधेन' पद रमनेसे यह अर्थ हुआ कि-(१) मनसे न करूँ, (२) न कराऊँ, (३) न करते हुए को भला जानूं। (४) वचनसे न करूँ, (५) न कराऊँ, (६) न करते हुएको भला जाने । (७) कायसे न करूँ, (८) न कराऊँ, (९) न करनेवालेको भला जाने । अथवा पहले सामान्य रूपसे कहा है कि तीन प्रकारसे न करूँ, परन्तु तीन प्रकार कौन-कौनसे हैं ? ऐसी जिज्ञासा होने पर विशेष बता दिया कि "मनसा वाचा कायेन" ये तीन प्रकार हैं, इसलिए पुनरुक्ति आदि कोई दोप नही है। अथवा मन वचन और कायके निमित्तसे होनेवाले तीन भेदोंका सग्रह करनेके लिए 'त्रिविधेन' पद रखा है। શબ્દ ન રાખે છે તે એ અનિષ્ટ અર્થ થઈ જાત કે મનથી ન કરે, વચ નથી ન કરાવે અને કાયાથી ન અનુમોદના કરે. અનિછ અર્થને પરિહાર કરવાને માટે ત્રિવિધેન શબ્દ આપે છે, એમ ત્રિવિન શબ્દ આપવાથી એ मथ थये3-(१) भनथी न ३३, (२) न ४२, (3) न ४२नारने Hat anty, (४) क्यनयी न ३, (५) - ४२।यु, (६) न ४२नारने at MY, (७) आयाथी ન કરૂ, (૮) ન કરાવુ, (૯) ન કરનારને ભલે જાણું અથવા પહેલા સામાન્યરૂપે કહ્યું છે કે “ત્રણ પ્રકારે ન કરૂ प्रा२ ४या या छ ? वा विज्ञासा यता विशेष मतापी मायु छ : मनसा वाचा જેને એ ત્રણ પ્રકાર છે એથી કરીને પુનરૂકિત આદિ કે ઈ દેવ તે નથી અથવા મન વચન અને કાયાના નિમિત્ત થનારા ત્રણ ભેદને સંગ્રહ रवाने माटे त्रिविवेन शहरायो પરન્ત ત્રણ अन्ययन ४ सू. ७ पड्जीवनिकायाना दण्डपरित्यागः २३३ चतुर्थी 'नेष्यते, 'निन्दामि, गर्दै' इत्यनयोस्तस्येत्यनेन मागुक्तेन सम्बन्धस्तेन- अतीतदण्डसम्बन्धिनी स्वसाक्षिी गुरुसाक्षिकी च निन्दा करोमीति निर्गलितोऽर्थः, तस्येत्यत्र सम्बन्ध-सामान्ये पष्ठयाः प्रागुक्तत्वात् । यद्वा 'आन्मान'-मित्यस्यैव मध्यमणिन्यायाद् देहलीदीपन्यायाद्वा व्युत्सृजामीत्यनेन 'निन्दामि, गर्हे' इत्याभ्या च सम्बन्धस्तेन भूतकालिकदण्ड विधायिनमप्रशस्तमात्मान जुगुप्से व्युत्सृजामि= विविधाऽनित्यादिभावनया विशिष्य वा परित्यजामीत्यर्थः ॥७॥ १ "धगुहेाऽस्यार्थाना य प्रति कोपः” (१।४।६४) इत्यत्र शन्देन्दुशेखरे 'न-ह्यकुपितः क्रुध्यती'-ति भाष्येण प्ररूढकोप एव क्रोध इति कुपेस्तदर्थत्वाभावेन न तयोग इदम् 'कुप्यति कस्मैचि'-दित्यायसा वेवेति । इसका अर्थ यह होता है कि-हे भगवन् । अतीत कालमे दण्ड (सावध व्यापार) करनेवाले आत्मा (आत्मपरिणति) को अनित्य आदि भावना भाकर त्यागता है, निन्दा करता हूँ, गर्दा करता है। जैसे घरकी देहलीपर दीपक रखनेसे भीतर भी प्रकाश होता है और वाहर भी प्रकाश होता है इसको 'देहली-दीपक न्याय कहते हैं। कहा भी है-"परै एक पद बीचमें, दुहु दिस लागै सोय । सो है 'दीपक देहरी', जानत है सब कोय ॥१॥" बीचमें मणि जड देनेसे दोनो ओर मणिका प्रकाश होता है,यह 'म यमणि' न्याय कहलाता है, इसी प्रकार 'अप्पाण' कादोनोंके साथ सम्बन्ध होता है । अर्थात् सावध व्यापारवाली आत्माको त्यागता हूँ और उसकी निन्दा करता हूँ, तथा गर्दा करता हूँ ॥७॥ એનો અર્થ એ થાય છે કે-- હે ભગવન્! અતીત કાળમાં દડ (સાવદ્ય વ્યાપાર) કરનારા આત્મા (આત્મપરિણતિ)ને અનિત્ય આદિ ભાવના ભાવીને ત્યાગુ છુ, નિંદુ છું, હું છું, જેમ ઘરની ડહેલી (બારણુ) પર દી રાખવાથી અદર પણ પ્રકાશ થાય છે અને બહાર પણ પ્રકાશ થાય છે તેને “દેહલી-દીપક ચાય” કહે છે કહ્યું છે કે- “ એક પદ બીચમે, દુહુ દિસ લાગે છે, सो हप-ही' नत સબ કેય (૧)” વચમાં મણિ જડી દેવાથી બેઉ બાજુ મણિને પ્રકાર વાય છે તેને “મધ્ય-મણિ ન્યાય કહે છે, એ રીતે अप्पाण ને બેઉની સાથે સબંધ થાય છે અર્થાત્ સાવવ-વ્યાપારવાળા આત્માને ત્યાગુ છું અને તેની નિંદા કરૂ છુ, તથા ગઈ કરૂ છુ (૭) .

૨૩૨ श्रीदशवकालिकास्त्रे चारित्रैर्दीप्यते इति भान्तः ('मा दीप्ती' अस्मादौणादिकोऽन्तमत्ययः) स एव भदन्तः, ('सिदिः प्रपोदरादित्याग)। (एर ययामति व्युत्पत्यन्तरेष्वपि निरक्कोक्तभाटायनादिमतिपादितरीत्या साधनमक्रिया योद्धव्या।) तत्सम्योधने हे भदन्त हे भगान् । अनेन सम्बोधन निर्देशेन प्रतमत्पाख्यानादिक' सोऽपि क्रियालापो गुरुमाक्षिक एव विधातव्य इति योधितम् । पतिकामामिम्मतिनिातं भूतदण्डात्पृथग्भपामीत्यर्थः । यत्तु टीकान्तरेपु 'पडिघमामी ' त्यस्य 'मतिकमामी 'ति दायोपलभ्यते सा प्रमाद विजृम्भितेव, ('क्रमः परस्मैपदेपु' (७३१७६) इति पाणिनिवचनवलेन क्रमे रुपधादीर्घस्य दुर्वारत्वात् ।) निन्दामि-जुगुप्से । गर्दै मजुगुप्से इत्येवार्थः । ननु तर्हि निन्दा-गईयोः 'कुत्सा निन्दा च गईणे-ति कोशरीत्या पर्यायत्वेन पौनरुत्य वज्रलेपायितमेवेति चेन्न, यतः स्वसासिकी निन्दा, गुरुसाक्षिकी च गहेंति परस्पर भाति भेदः । यद्वा निन्दासाधारणी कुत्सा, गर्दा सेवाति भूयसी -ति परस्परमर्थभेदान्नास्ति पर्यायता, यथा प्रद्ध एव कोपः क्रोधी न साधारण इति कोप-क्रोधयोः पर्यायत्वाभावेन जयस्वाभावात् कुपधातुयोगे और सम्यक्चारित्रसे दीपनेवाले । इन सपको "भते' कहते है। इसी प्रकार और अर्थ भी समझने चाहिए । 'भदन्त!' इस सम्बोधनसे यह प्रगट होता है कि समस्त क्रियाएँ गुरुमहाराजकी साक्षीसे ही करनी चाहिए। हे भगवन् । मैं दण्डसे निवृत्त होता है, निन्दा करता हूँ, और गर्दा करता है। कोशोंमे निन्दा और गहीं शब्दका एक ही अर्थ है इसलिए पुनरुक्ति होती है, ऐसा नही समझना चाहिए, क्योंकि निन्दा आत्मसाक्षीसे होती है और गर्दा गुरुसाक्षीसे होती है । अथवा निन्दा साधारण कुत्साको कहते हैं और गर्दा अत्यन्त निन्दाको करते हैं। मने सन्य-शास्त्रिया विमान, मे मधान भते छ मेर शत भात मों ५] सम सेवा 'भदन्त' से समाधानका सेभ थाय के गधी लिया। ગુરૂ મહારાજની સાક્ષીએ જ કરવી જોઈએ ભગવન! હુ દડથી નિવૃત્ત થઉ છુ, નિન્દા કરૂ છુ અને ગઈ કરે છે શબ્દકોશોમાં “નિદા” અને “ ગહ' શબ્દને એકજ અર્થ છે, તેથી પુનરૂકિત થાય છે, એમ ન સમજવું કારણ કે નિદા આત્મસાક્ષીએ થાય ગુરૂ સાક્ષાએ થાય છે અથવા નિદા સાધા ણ કુત્સાને કહે છે અને ગર્ણ નિદાને કહે છે . છે અને ગર્લ્ડ સ્મિીત अध्ययन ४ सू.७ दण्डपरित्यागस्य सामान्यविशेषभावः २३५ परिमाणविशेपे तादाम्यसम्बन्येन ( अभेदसम्पन्वेन) अन्वये सति द्रोणाभिन्न परिमाणमिति घोषः, ततश्च प्रत्ययार्थपरिमाणस्य परिच्छेद्य-परिच्छेदकभावेन व्रीहिपदार्थेऽन्वये द्रोणाभिन्न यत्परिमाण तत्परिन्छिन्नो (तत्परिमितो) व्रीहिरिति वोधः, अत्र प्रत्ययार्थस्य बीहावन्वयमदर्शन प्रकृतानुपयोग्यपि प्रसङ्गतः कृतम् । यद्वा-यथा 'उपा-यायो मुनि'-रित्यत्रोपा-यायशब्दार्थ उपाध्यायपदधारिणि मुनिविशेषे मुनिशब्दार्थस्य मुनिसामान्यस्य तादात्म्यसम्बन्येन (अभेदसम्बन्धेन) अन्वयः, तथा च-उपाध्यायाभिन्नो मुनिरिति बोधः, तत्र विशेपत्वेन विवक्षित- पदार्थे उपा-यायपदधारिणि मुनिविशेषे मुनिशब्दार्थस्य मुनित्वस्य सत्त्वादुभयो द्वारा अन्वय होता है। इस अन्वयसे "चार आढकरूप परिमाण" (एक प्रकारका तौल) ऐसा बोध होता है। उस प्रत्ययार्थ परिमाण- सामान्यको परिच्छेद्य-परिच्छेदक-भाव सम्बन्धसे व्रीहि पदार्थमे अन्वय होनेसे 'उस परिमाणसे परिमित (मापा हुआ) व्रीहि" ऐसा बोध होता है । यहा व्रीहिमें अन्वय प्रसगवश दिखलाया गया है। अथवा- "उपायायो मुनिः" यहाँ उपाध्याय शब्दका अर्थ है उपाध्याय- पद्धारी मुनिविशेष (१), तथा मुनि शब्दका अर्थ मुनिसामान्य (२), अतः जो उपा-याय है वही मुनि है, अर्थात् मुनिसे अन्य उपा याय नहीं है इसलिए उपा-याय शब्दार्थको मुनि शब्दार्थके साथ अभेद सम्बन्धसे अन्वय होता है तो 'उपाध्यायसे अभिन्न मुनि' ऐमा बोध होता है। या विशेष याने उपा यायपदधारी (व्यक्ति) में मुनिके અન્વયથી ચાર આઢક રૂપ પરિમાણ” (એક પ્રકારને તેલ) એ બોધ થાય છે એ પ્રત્યયાર્થ–પમિાણુસામાન્ય પરિચ્છેદ્ય-પરિચ્છેદ-ભાવ સબ ધથી શ્રીહિ પદાર્થમા અન્વય થવાથી “એ પરિમાણથી પરિમિત (માપેલા) વ્રીહિ” એ બંધ થાય છેઅહી ત્રીહિમા અવય પ્રસગવશ બતાવવામાં આવ્યા છે અથવા– उपा-यायो मुनि मेमा उपाध्याय शहन म छे-याय यारी भुनि-विशेष (१), तथा मुनि शहना अर्थ छ भुनि-सामान्य (२), मेरे ઉપાધ્યાય છે તે મુનિ છે, અર્થાત્ મુનિથી જૂદ ઉપાધ્યાય નથી એથી કરીને ઉપાધ્યાય શબ્દાર્થને મુનિ શબ્દાર્થની સાથે અભેદ સંબધથી અન્વય થાય છે, અને તેથી “ઉપાધ્યાયથી અભિન્ન મુનિ” એ બોધ થાય છે એમા વિશેષ કરીને ઉપાધ્યાય-પદધારી (વ્યકિત)માં મુનિના સામાન્ય ઘર્મરૂપ મુનિત્વનું २३४ श्रीदनकालियो दण्डपरित्यागो लिपिघः सामान्यविशेषभेदान , सामान्यतो दण्दपरि त्यागोऽहिंसासामान्यम् , विशेषतो दण्डपरित्यागन पत्र मातानि । ननु पञ्चसु महातेपु सत्यादिवतानामहिंसातो भेट सुस्पष्ट प्रतीयत उति फयमसिया पत्राना महानताना सामान्य-विशेषमार उपपयेत ? सामान्यविशेष भारो हि विशेषत्वेन पिशितपदार्थम्य सामान्यपर्माकान्तत्वादेर सपचते, अत एव व्याप्यव्यापकभावापन्नयोःसामान्यविशेषमाः उत्युद्वीपः, यया 'द्रोणो नीति' रित्यत्र प्रथमारिभक्तर्यस्य परिमाणसामान्यस्य द्रोणशन्दार्थ चतुराहकात्मक दण्डपरित्याग दो प्रकारका है-(१) सामान्य-दण्टपरित्याग और (१)विशेप दण्डपरित्याग। अहिंसा-सामान्यको सामान्य-दण्डपरित्याग करते हैं और पच महावतोंको विशेष दण्डपरित्याग करते हैं। प्रश्न-पांच महावतोंमें सत्य आदि महावतोंका अहिंसासे स्पष्ट भेद प्रतीत होता है, फिर अहिंसाके साथ सत्य आदि महावतोंका सामान्य विशेषभाव कैसे हो सकता है ? सामान्य-विशेषभाव वही होता है जिसको विशेप बनावें उसमें सामान्य धर्म भी पाया जाय । इसीलिए यह कहा गया है कि 'व्याप्य-व्यापफमाव जिनमें होता है उन्होंमें मामान्य विशेषभाव पाया जाता है। जैसे "द्रोणो व्रीहिः" इस वाक्यमें प्रथमा विभक्तिका अर्थ परिमाण-सामान्य है। इस परिमाण-सामायका द्रोण शब्दके अर्थ चार आढकरूप परिमाण-विशेपमे अभेद सम्बन्धके દડપરિત્યાગ બે પ્રકાર છે (૧) સામાન્ય-દડપરિત્યાગ અને (૨) વિશેષ-પરિત્યાગ અહિંસા સામાન્યને સામાન્ય દડ–-પરિત્યાગ કહે છે, અને પચ મહાવ્રતને વિશેષ-દડપરિત્યાગ કહે છે પ્ર–પાચ મહાવ્રતમાં સત્ય આદિ મહાવતેનો અસાથી પણ ભેદ પ્રતીત થાય છે, તે પછી અહિંસાની સાથે સત્ય આદિ મહાવ્રતેને સામાન્ય વિશેષ-ભાવ કેવી રીતે હોઈ શકે છે? સામાન્ય-વિશેષ-ભાવ તેમ હોઈ શકે છે કે જેને વિશેષ બતાવે તેમાં સામાન્ય ધર્મ પણ મળી આવે તેથી કરીને એમ કહેવામાં આવ્યુ છે કે જેમાં વ્યાખ્ય–વ્યાપકભાવ હોય છે તેમ જ શિવ-ભાવ મળી આવે છે જેમકે રોજે રીદિ એ વાક્યમાં પ્રથમ વિભકિતને અર્થ પરિમાણ–સામાન્ય છે એ પરિમાણુ સામાન્ય, દ્રોણ શબ્દને બર્થ ચાર આહક રૂપ પરિમાણ-વિશેષમાં અભેદ સંબધની સામાન્ય દ્વારા અન્વય વાય अध्ययन ४ मू. ७ दण्डपरित्यागस्य सामान्यविशेषभावः २३७ दितो विशेषत्व प्रतीयते, यथा च नीलघटो घट इत्यादौ नीलगुणविशिष्टत्वेन नील्घटे घटसामान्यापेक्षया विशेषत्व विद्यते, विशेपत्व चात्र व्याप्यत्वमेव, तथा प्रकृते पञ्चमहानतलक्षणेऽहिंसाविशेपे कथ विशेपत्वमिति चेच्छृणु- माणातिपातविरमणत्वादिना व्याप्यधर्मेण पञ्चसु महारतेषु विशेषत्व सुवच- मेवेति । ननु तहि अहिंसासामान्यस्य किं लक्षण यत् पञ्चसु महाव्रतेषु व्यापक भवे' दिति चेद् उच्यते-पड्जीवनिकायेपु दण्डसमारम्भवर्जनत्वमेवाऽहिंसा-सामान्यस्य आढकरूप परिमाणमें चार आढकत्व आदि धर्मसे विशेषता प्रतीत होती है । अथवा "जो नीला घडा है वह घडा ही है" इत्यादि वाक्यों में अन्य घडोंकी अपेक्षा नीले घडेमे नीलेपनसे विशेषता पाई जाती है और वह विशेपता व्याप्यतारूप है, वैसे पच महाव्रतरूप अहिंसा- विशेपमें विशेषता किस धर्मके कारण है। उत्तर-प्राणातिपातचिरमणत्व आदि व्याप्यधर्मोंसे पाच महाव्रतोंमें विशेषता पाई ही जाती है। अर्थात् जहॉ प्राणातिपातविरमणत्व आदि व्याप्य धर्म पाये जाते हैं वहाँ अहिंसा सामान्यका अस्तित्व रहता ही है। प्रश्न-अहिंसासामान्यकालक्षण क्या है जिससे वह पाच महाव्रतोंमें व्यापक होजावे। उत्तर-पड्जीवनिकायोंमें दण्डका परित्यागकरना अहिंसा-सामान्यका પરિમાણમા ચાર આઢકત્વ આદિ ધર્મથી વિશેષતા પ્રતીત થાય છે, અથવા નીલે ઘડે છે તે ઘડેજ છે” ઈત્યાદિ વાક્યમાં અન્ય ઘડાની અપેક્ષાએ નીલા ઘડામાં નીલાપણાથી વિશેષતા મળી આવે છે અને તે વિશેષતા વ્યાખ્યાતારૂપ છે તેમ પચમહાવ્રતરૂપ અહિંસા--વિશેષમાં વિશેષતા કયા ધર્મને કારણે છે? ઉત્તર–પ્રાણતિપાત વિરમણત્વ આદિ વ્યા–ધર્મોથી પાચ મહાત્રને મા વિશેષતા મળી આવે છે અર્થાત્ જ્યાં પ્રાણાતિપાત વિરમણત્વ આદિ વ્યાપ્ય મળી આવે છે ત્યાં અહિંસા–સામાન્યનું અસ્તિત્વ રહેલું જ હોય છે પ્રશ્ન–અહિંસા–સામાન્ય લક્ષણ કર્યું છે કે જેથી તે પાચ મહાવ્રતેમાં વ્યાપક થ5 ાય છે ? ઉત્તર–પજીવનિકાયમ દડને પરિત્યાગ કરે એ અહિંસા સામાન્યનું २३६ श्रीदकाविसमा पदार्ययोः सामान्य विशेषमागोऽभेदाचया माति, नया प्रतेऽनयों न समवति, सत्यादिमहानतानामहिंसातः गुस्पष्ट मेदमतीतिरलादभेदालयम्य बाधादिति चेल- पन्नानामपि महारताना पस्तुवोऽहिंसात्मक्त्वा सामान्य-विशेषमाः सुपोष एर । अहिंसासामान्यम्वरूपारदातकरणाय मियागां सुस्पष्टपतिपनये च दण्ड परित्यागस्य द्वविध्य कृतम् , पकैयाऽहिंसा पत्रधा विभाजिता । ननु यथा 'द्रोणो नीटिरित्याही टोणादिशदार्थचतुराहकात्मकपरिमाणे चतुरादकत्यादिधर्मेण परिमाणत्वादिसामान्यधर्माकान्तात् प्रत्ययार्थपरिमाणा- सामान्यधर्म मुनित्वका अस्तित्व पाया जाता है, अत एव दोनों पदायाँका सामान्य-विशेपभावमें अभेदान्वय होता है। अर्थात् जैसे इन दो उदाहरणोंसे अभेदमें सामान्य-विशेषभाव पाया जाता है, वैसा अहिंसाके साथ सत्यादि व्रतोंका अभेद नहीं है, अत एव सामान्य-विशेपभाव नहीं हो सकता, क्योंकि उनका स्पष्ट भेद, प्रतीत होता है। उत्तर-पाँचों महाव्रत वास्तवमें अहिंसास्वरूप हैं, इसलिये अहिंसासे भिन्न नहीं हैं। अहिंसाके स्वरूपको स्पष्ट करने के लिए और शिष्योंको स्पष्ट बोध करानेके लिए दण्डपरित्यागके दो भेद कर दिये हैं, अर्थात् एक ही अहिंसाको पांच महावतोंमे विभक्त कर दिया है। प्रश्न-जैसे "द्रोणो व्रीहिः" इत्यादि वाक्योंमें परिमाणत्व आदि सामान्यधर्मसे युक्त प्रत्ययार्थ परिमाण-सामान्यसे द्रोण शब्दार्थ चार અસ્તિત્વ મળી આવે છે, તેથી કરીને બેઉ શબ્દોના અર્થોને સામાન્ય-વિશેષ ભાવમાં અમેદાન્વય થાય છે અર્થાતુ-જેમ એ બેઉ ઉદાહરણથી અભેદમાં સામાન્ય-વિશેષ આવે છે, તેમ અહિંસાની સાથે સત્યાદિ વ્રતોને અભેદ નથી, તેથી સામાન્ય વિશેષભાવ થઈ શકતું નથી, કારણ કે એને મ્પષ્ટ ભેદ પ્રતીત થાય છે ઉત્તર–પાશે મહાવ્રત વત્તાએ અહિંસાસ્વરૂપ છે, તેથી કરી અહિંસાથી ભિન્ન નથી અહિંસાના સ્વરૂપને સ્પષ્ટ કરવાને માટે અને શિષ્યને સ્પષ્ટ બંધ કરાવવાને માટે દડ પરિત્યાગના બે ભેદ કરવામા આવ્યા છે, અર્થાત એક જ અહિંસાન પાચ મહાવતેમાં વિભકત કરી ના મવામાં આવી છે પ્રશ્ન-જેમ દ્રોણો રીદિ ઈત્યાદિ વાકમાં પરિમાણત્વ આદિ સામાન્ય ધર્મથી યુક્ત પ્રત્યયાર્થ પરિમાણ-સામાન્યથી કોણ શબ્દાર્થ ચાર આકરૂપ મળી ભાવ अध्ययन ४ सु. ८ (१)-प्राणातिपातविरमणस्वरूपम् २३९ " आत्मपरिणामहिंसनहेतुत्वात्सर्वमेव हिंसैतत् । अनृतवचनाटिकेवल,-मुदाहत शिष्यवोधाय ॥२॥" किश्च- एग चिय इत्य वय, निदि जिणवरेहि सव्वेहिं । पाणाइवायविरमण, मवसेसा तस्स रक्खट्टा ॥३॥" अतश्चादौ प्राणातिपातविरमणाख्य प्रथम महारतमाह-'पढमे०'इत्यादि । मूलम्-पढमे भते । महत्वए पाणाडवायाओ वेरमणं, सवं भते। पाणाइवायं पञ्चक्खामि, से सुहुमं वा वायर वा तस वा थावर वा नेव सय पाणे अइवाइज्जा, नेवन्नेहि पाणे अइवायाविजा, पाणे अइवायतेवि अन्ने न समणुजाणिज्जा जावज्जीवाए तिविहं तिविहेण मणेण वायाए कारण न करेमि, न कारवेमि, करतपि अन्न न समणुजाणामि, तस्स भते । पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाण "असत्य-वचन बोलने आदिसे भी आत्माके परिणामोंकी हिंसा होती है, अतः असत्य आदि सभी हिंसारूप है। असत्य आदिका अलग कथन शिष्योंको स्पष्ट समझानेके लिए किया गया है ॥२॥" तथा- "भगवानने एक प्राणातिपातविरमणको ही मुख्य कहा है अन्य व्रत उसीकी रक्षाके लिए हैं ॥॥" इसलिये पहले-पहल प्राणातिपात-विरमण महाव्रतका कथन करते हैं- "पढमे भते." इत्यादि । અસત્ય વચન બોલવા વગેરેથી પણ આત્માના પરિણામની હિંસા થાય છે, તેથી અસત્ય આદિ બધા હિંસારૂપ છે અસત્ય આદિનું જૂદુ કથન શિષ્યને સ્પષ્ટ સમજાવવાને માટે કરવામાં આવ્યું છે … (૨) तथा- “ભગવાને એક પ્રાણાતિપાત વિરમણને જ મુખ્ય કહ્યું છે, અન્ય વ્રતે तनी रक्षाने भाटे छे" (3) તેથી કરીને સૌથી પહેલા પ્રાણાતિપાત-વિરમણ મહાવ્રતનું કથન કરે છે- पढमे भते. त्या - श्रीनवकालिको लक्षणम् , तब पशामु महातेपु भत्येक मशीति लागसमन्वयो गोया, तया व महानतान्यत्र व्याप्यानि सामान्य दण्डपरित्यागी च्यापरम्तम्य पत्रमहावतरू पापविशेषनिष्टत्यादतो व्यापकम्परूपमामान्यदण्डपरित्याग व्यायाय विशेष दण्डपरित्यागलक्षणमहानतान्यभिधत्ते, तेगु प्राणातिपातरिरमणात्मिकाया अहि सायाः प्रधानत्वम् , इतरेपा सस्यक्षेत्राति गृति (पाड़) पत्तत्परिपालनार्यतया वदगत्यात् , तथाचोक्तम्- " अहिंसैका मता मुग्या, मनमोक्षमसाधनी । अस्याः सरक्षणार्थ च, न्याग्य सत्यादिपालनम् ॥ १॥" अन्यच्च- लक्षण है । यह लक्षण पांचाही महावतोंमें पाया जाता है, अत मरावत व्याप्य हैं और सामान्य-दण्डपरित्याग व्यापक है। व्यापकरूपसामान्य-दण्डपरित्यागका पूर्व सूत्र में न्यारयान किया है। अव विशेप-दण्डपरित्यागरूप पाच महाव्रतोंका व्याख्यान आरभ करते है, उनमे माणातिपातविरमणरूप अहिंसा प्रधान है, जैसे धान्यकी रक्षाके लिए खेतके चारो ओर बाड़ होती है, उसी प्रकार अन्य महाव्रत अहिंसाके रक्षक होनेसे अग है । "स्वर्ग और मोक्षको सिद्ध करनेवाली एक अहिंसा ही मुख्य है इसीकी रक्षाके लिए सत्यादि महानतोका पालन करना उचित है ।।१।। और भी कहा है- લક્ષણ છે, એ લક્ષણ પાચે મહાવ્રતમાં મળી આવે છે, તેથી મહાવ્રત અને સામાન્ય–દડપરિત્યાગ વ્યાપક છે વ્યાપકરૂપ–સામાન્ય-દડપરિત્યાગનું વ્યાખ્યાન પૂર્વ–સૂત્રમાં કહેલુ છે હવે વિશેષ-દડપરિત્યાગરૂપ પાચ મહાવ્રતનુ વ્યાખ્યાન શરૂ કરવામાં આવે છે, તેમાં પ્રાણાતિપાતવિરમણરૂપ અહિંસા પ્રધાન છે જેમ ધાન્યની રક્ષા માટે ખેતરની ચારે બાજુએ વાડ હોય છે, તેમ અન્ય મહાવતે અહિંસાના રક્ષક હોવાને લીધે અગરૂપ છે કહ્યું છે કે- “સ્વર્ગ અને મોક્ષને સિદ્ધ કરવાવાળી એક અહિંસા જ સુખ છે તેની રક્ષાને માટે સત્યાદિ મહાવ્રતનું પાલન કરવું ઉચિત છે ” (૧) વળી કહ્યું છે કે- , कहा भी है- व्यास्य छ, - , अध्ययन ४ सू. ८ (१)-प्राणातिपातविरमणव्रतम् २४१ (१) प्राणातिपात-विरमणव्रतम् । टीका-भदन्त ' हे भगवन् ! प्रथमे आये महारते-महत्-विशाल प्रत-शास्त्री- यमर्यादानुसरणम् , महच्च तद् व्रत च महानतम् , महत्त्व चास्य श्रावकाणुव्रतापेक्षया, द्रव्य-क्षेत्र-काल-भावत' सर्वव्यापकत्वेन, महद्भिस्तीर्थकरगणधरादिभिराचरि- तत्वेन, महापुरुषाचर्यमाणत्वेन चास्ति, तस्मिन् , माणातिपातात्-प्राणा: स्पर्श- नेन्द्रियादय. सन्त्येपामिति प्राणा' एकेन्द्रियादयो जीवाः ('अर्श आदित्वाद') तेपामतिपातो-वियोजन हिंसनमित्यर्थ., तस्माद् विरंमण-निवर्तनम् 'अस्ती 'ति शेपः, अतोऽह भदन्त ! हे भगवन् ! सर्व स्थूलसूक्ष्मादियाबद्भेदविशिष्ट कृत- कारिताऽनुमोदितस्वरूप वा प्राणातिपात प्रत्यारयामिपति-पातिकूल्येन आख्यामि-कथयामि सर्वथा परित्यजामीति भाव., तदेव विशेषयति-''से" इति, से-भय-अनन्तरम् अद्यारभ्य सूक्ष्म-मृक्ष्मनामकर्मप्रकृत्युदयसपन्नम् । यथ- १ देशीशब्दोऽयम् । (१) प्राणातिपातविरमण । ये श्रावकके व्रतोकी अपेक्षा विशाल होनेसे महाव्रत कहलाते हैं (१), अथवा सर्व द्रव्य क्षेत्र-काल-भावकी अपेक्षा प्राणातिपात आदिका सर्वथा त्याग होता है इस कारण महावत कहलाते है (२), या तीर्थकर गणधर आदि महापुरुपोंने इनको अगीकार किया है और वर्तमानमें भी महापुरुप इनको अगीकार करते हैं इससे ये महावत कहलाते है (३)। हे भगवन् ! प्रथम महाव्रतमे प्राणातिपातसे विरमण होता है इसलिए हे भगवन् ! मै कृत-कारित-अनुमोदनासे सूक्ष्म-स्थूल सब प्रकारके प्राणा- तिपातका परित्याग करता है । अर्थात् सूक्ष्म नामकर्मकी प्रकृतिसे उत्पन्न (૧) પ્રાણાતિપાતવિરમણ એ શ્રાવકના તેની અપેક્ષાએ વિશાળ હોવાને લીધે મહાવ્રત કહેવાય છે (૧) અથવા સર્વ દ્રવ્ય-ક્ષેત્ર-કાળ-ભાવની અપેક્ષાએ પ્રાણાતિપાત આદિને સર્વથા ત્યાગ થાય છે એ કારણે તે મહાવ્રત કહેવાય છે (૨) આદિ મહાપુરૂષે એને અગીકારે છે તેથી એ મહાવ્રત કહેવાય છે (૩) ' પ્રથમ મહાવ્રતમાં પ્રાણાતિપાત થી વિરમણ હોય છે, તેથી, હે ભગવન્! હુ કૃત-કારિત-અનુમોદનાથી સૂમ બૂલ પ્રકારના પ્રાણાતિ- પાતને પરિત્યાગ કરૂ છુ અર્થાત્ સૂફમ-નામકર્મની પ્રકૃતિથી ઉત્પન્ન સૂમ મયમાં તીર્થકર ગણધર હે ભગવ સ - . . २४० श्रीदनकालिने वोसिरामि । पढमे भंते ! महयए उवहिओमि सव्वाओ पाणाइवा याओ वेरमणं ॥८॥ छाया-प्रथमे भदन्त ! महारते पाणातिपाताद्विरमण, सी भदन्त ! पाणा विपात मत्याख्यामि, अथ सक्ष्म पापारमा प्रसपा स्थायर वा नेव स्वय प्राणा नतिपातयामि, नेरायः माणानतिपातयामि, माणानतिपातयतोऽप्यन्यात्र समनु जानामि यानीपया निधि नितिन मनसा पाचा कायेन न करोमि न कारयामि कुन्तिमप्यन्य न समनुजानामि, तस्माद् भदन्त ! प्रतित्रामामि निन्दामि गर्दै आत्मान पुत्राजामि, मयमे भदन्त ! महारते उपस्थितोऽस्मि सर्वस्माद प्राणातिपाताद्विरमणम् ॥ शिष्य पट्कायको निराधना का त्याग करके अर पॉच महाव्रत और छठे रानि भोजनविरमणातको ग्रहण करता है- (१) प्राणातिपातविरमण. सान्ययार्थ'-भते! हे भदन्त हे भगवन् । पदमे प्रथम महत्वपमहाव्रतमें पाणाइयायाओ-माणातिपातसे वेरमण-विरमण होता है, (अतः म) भते ! हे भगवन् ! सव्व-सर प्रकारके पाणाइचायन्माणातिपात (हिंसा) का पञ्च क्खामि त्याग करता हूँ। से अथ-अपसे लेकर (मैं) सुहम मुक्ष्म वा अथवा बायरम्यादर वा-अथवा तस-त्रस वा सय स्वय-खुद नेव-नही अइवाइज्जा अतिपात हनन करूँगा, अन्नेहि दूसरीसे पाणे प्राणियोको अइवायाचिजा हनन कराऊँगा, (और) पाणे-माणियोंको अइवायतेवि हनन करते हुए भी अन्ने दूसरोको न-नहीं- समणुजाणेजाभला जानूंगा, जावजीवाए जीवनपर्यन्त (इसको) तिवि- कृतकारितअनुमोदनारूप तीन करणसे (तथा) तिविहेण तीन प्रकारके मणेण=मनसे बाधाए वचनसे काएण-कायसे न करेमिम्न करूँगा, न कारवेमि=न कराऊँगा, करतपि-करते हुए भी अन्न-दूसरेको न समणु- जाणामि-भला नहीं समझूगा । भते । हे भगवन् ! तस-उस दण्डसे पडिकमामि-पृथक् होता हूँ, निंदामि आत्मसाक्षी से निन्दा करता हूँ, गरिहामि-गुस्साक्षीसे गर्दा करता हूँ, अप्पाण-दण्ड सेवन करनेवाले आत्माको चोसिरामि त्यागता हूँ। भते हे भगवन् । पढमे प्रथम महत्व महाव्रतमें मैं उवडिओमि उपस्थित हुआ है, इसलिये मुझे सव्वाओ सब प्रकारके पाणाइवायाओ-माणातिपातमा वेरमण-त्याग है ॥८॥ (१) रा यावर स्थावर पाणे आणियोका -- अध्ययन ४ सू. ९ (२)-मृपावादविरमणव्रतम् २४३ सम्पति शिष्यः स्वस्य- महाबतित्व ख्यापयन्नुपसहरति-हे भगवन् ! प्रथमे महारते उपस्थितोऽस्मि अभ्युद्यतोऽस्मि कृतोत्रमोऽस्मीत्यर्थः । अतोऽयमभृति मम सर्वस्मात् प्राणातिपाताद् विरमण सकलपाणातिपातालम्बनसावयव्यापारमत्या- ख्यानम् 'अस्ती'-ति शेपः ॥८॥ (१) सलिलेन तरुगुल्मलतादीनामिव प्राणातिपातविरमणम्य परिपुष्टिर्मपावाद- परित्यागेन भवतीत्यतस्तदनन्तर मृपावादपरित्यागलक्षण द्वितीय महाव्रतमाह- 'अहावरे दोचे' इत्यादि । मूलम् अहावरे दोच्चे भंते । महत्वए मुसावायाओ वेरमण, सब भते । मुसावाय पञ्चक्खामि,से कोहावा लोहा वा भया वा हासा वा नेव सय मुस वइज्जा, नेवन्नेहि मुस वायाविज्जा, मुसं वयतेवि अन्ने न समणुजाणिज्जा | जावजीवाए तिविह तिविहेणं मणेण वायाए कारण न करेमि न कारवेमि करतपि अन्न न समणुजाणामि। तस्स भते । पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाण वोसिरामि। दोचे भते । महत्वए उवडिओमि सबाओ मुसावायाओ वेरमण ॥९॥ छाया-अथापरे द्वितीये भदन्त ! महावते मृपावादाद्विरमण, सर्व भदन्त ! मृपावाद मत्याख्यामि, अथ क्रोधाद्वा लोभावा भयावा हासाद्वा नत्र हे भगवन् ! मैं प्रथम महाव्रतको पालनेके लिए उद्यत हुआ हूँ, इस- लिए आजसे मुझे समस्त प्रकारकेप्राणातिपातका प्रत्याख्यान है (१)॥८॥ जैसे वृक्ष-लता आदि पानीसे पुष्ट होते हैं वैसेही मृषावादका त्याग करनेसे प्राणातिपातविरमण महाव्रतकी पुष्टि होती है, अत प्राणानि- पातविरमणके बाद दूसरे मृपावादविरमण महाव्रतका व्याख्यान करते है- 'अहावरे दोच्चे' इत्यादि । હે ભગવન્! હુ પ્રથમ મહાવ્રતને પાળવા માટે ઉદ્યત થયે છુ, તેથી આજથી મારે બધા પ્રકારના પ્રાણાતિપાતના પ્રત્યાખ્યાન છે (૧) (૮) જેમ વૃક્ષ-લતા આદિ પણીથી પુષ્ટ થાય છે તેમ મૃષાવાદને ત્યાગ કરવાથી પ્રાણાતિપાત વિરમણ મહાવ્રતની પુષ્ટિ થાય છે એટલે પ્રાણાતિપાતવિરમણની પછી भी भूषापाविरभ भारतनु व्याभ्यान रे छे-अहावरे दोचे. त्या ।

२४२ श्रीदनौकाविसमत्रे प्यस्य कायिकी हिंसा न भाति तथाऽपि तदाणं 'न केवल कापियेव हिंसा किन्तु हमनसयोर्दुप्पणिधानेनापि हिंसा सभापति ज्ञापनार्थम् । यद्वा मुश्म-मधु, कायिक कुन्ध्वादिगम् , यादरलकायिक गोगजादिकम् , अनयोरपि त्रसम्बार- भेदाहैविध्य, तदाह-प्रस स्थावर च, तत्र सूक्ष्मतम कुन्वादिकम् , सूक्ष्मस्थावरंभ पनकादिवनस्पतिम् गदरत्रसम् अन-गन-गायाटिकम् ,बादरस्थावर-भूम्यादिकम् , इतीमान् प्राणान-जीमान् नैांस्वयम् आत्मनाअतिपातयामि=न्मि, नैवान्यैःप्राणा नतिपातयामि यातयामि,माणानविपातयतोऽन्यान न समनुजानामि,इत्यादि प्राग्वत् । सूक्ष्म अथवा सूक्ष्म कायवाले कुयुवा आदि और यादर (स्थूल) कायवाले गो-हस्ती आदि जीवोंके प्राणोंका कभी अतिपात नरीं करूंगा। यद्यपि सूक्ष्म नामकर्मकी प्रकृतियाले सूक्ष्म प्राणियोंकी कायिक हिंसा नहीं होती परन्तु वचन और मनसे हो सकती है, जैसे-'यह मर जाय तोअच्छा है' ऐसा कहना वचनसे हिंसा है, और घातकी भावना करना मनसे हिंसा है, इसलिए सूक्ष्मका भी यहाँग्रहण किया है। सूक्ष्म और बादरके. भी दो दो भेद हैं-(१) त्रस और (२) स्थावर । सूक्ष्म-त्रस कुथुवा आदि हैं, सूक्ष्म-स्थावर पनक आदि वनस्पति (नीलण फुलण) हैं। बादर-बस मेढा घोड़ा रोझ आदि । और यादर-स्थावर भूमि आदि हैं। इन सब प्राणियोंको कभी प्राणोसे वियुक्त नहीं करूँगा, न दूसरेसे कराऊँगा, न करनेवालेको भला जानॅगा। અથવા સક્ષમ કાયવાળા કથવા આદિ અને બાદ (સ્થલ) કાયવાળા આદિ ના પ્રણેને કદાપિ અતિપાત નહિ કરૂ છે કે સુહમ-નામકર્મની પ્રકૃતિવાળા સૂક્ષમ પ્રાણુઓની કાયિક હિંસા થતી નથી, તે પણ મનથી થઈ શકે છે, જેમકે-“એ મરી જાય તે સારૂ” એમ કહેવું હિંસા છે, અને ઘાતની ભાવના કરવી એ મનથી હિસા છે, તેથી કરીને સૂમને પણ અહીં ગ્રહણ કરેલ છે સૂફમ અને બારના પણ બે-બે ભેદ છે (૧) રસ, અને (૨) મથાવર, સૂકમ નસ કથવા આદિ છે સૂક્ષ્મ સ્થાવર લીલન-ફૂલન આદિ વનસ્પતિ છે બાદર ત્રસ–મેઢા ઘેડા રેઝ વગેરે છે બાદર સ્થાવર-ભૂમિ આદિ છે એ સર્વ પ્રાણીઓને કદાપિ પ્રાણથી નિયુકત કરીશ નહિ, બીજા વડે કરાવીશ નહિ અને કરનારને ભલે જાણીશ નહિ ગાય હાથી વચન અને ત વચનથી અને , अध्ययन ४ सू. ९ (२)-मृपावादविरमणत्रतम् २४५ मित्यनेन सम्बन्धो वक्ष्यते । मृपावादो हि सद्भावप्रतिषेधा-ऽभूतोद्भावना-ऽर्थान्तरा- भिधान-गतिभेदैश्चतुविधः, तत्र सद्भावप्रतिषेधान्जीवानीवादिपदार्थसत्तानिरा- करणम् , यथा-'नास्त्यात्मा, परलोकः, पुण्यपापादिक चेति (१)। अभूतोद्भावनम् जीवाजीवादितत्त्वानामतद्रूपत्वेन प्रतिपादनम् , यथा-"आत्माऽयमङ्गुष्ठमात्रो, निष्क्रियः, सर्वगतो वेत्यादि (२)। अर्थान्तराभिधानम्=पसिद्धपदार्थस्य पदार्थान्त- रत्वेन कथनम् , यथा-गोगर्दभत्वेन, गर्दभस्य गोत्वेनाभिधानम् (३) । गर्दा गहित हीनतापदर्शनम् , यद्वा हिंसापारुष्यादियुक्त सत्यमपि वचः, यथा-'अय हन्तव्यः' इत्यादि, 'एहि अन्ध!, आयाहि धिर !, आगच्छ पनो!' इत्यादि च(४)। विरमण होता है। मृपावाद चार प्रकारका है-(१) सद्भावप्रतिपेध, (२) अभूतोद्भावन, (३) अर्थान्तराभिधान, (४) गर्दा।जीच अजीव आदि पदार्थोके अस्तित्वका निराकरण करना सद्भावप्रतिषेध मृपावाद है, जैसे-'आत्मा नहीं, परलोक नहीं, पुण्य नही, पाप नही' इत्यादि (१)। जीव अजीव आदि तत्त्वोका अयथार्थ स्वरूप प्रतिपादन करना अभूतो- दावन मृपावाद है, जैसे-'आत्मा अगूठेके बराबर है, निष्क्रिय है या सर्वगत है' (२)। एक पदार्थको दूसरा पदार्थ कह देना अर्थान्तराभिधान मृषावाद है, जैसे-'गायको गधा बताना, या गधेको गाय कहना' (३)। दुसरेकी हीनता प्रगट करना, अथवा हिंसा और कठोरतायुक्त सत्य वचन कहना गर्दारूप असत्य है, जैसे-'यह मार डालने योग्य है, ओ अधे! इधर आ, ओ बहिरे! या लगडे । यहाँ आ' इत्यादि (४)। હોય છે મૃષાવાદ ચાર પ્રકાર છે (૧) સાવપ્રતિષેધ, (૨) અભૂતભાવન (3) मन्तानिधान, (४) गों જીવ અજીવ આદિ પદાર્થોના અસ્તિત્વનું નિરાકરણ કરવું એ સદ્ભાવપ્રતિષેધ મૃષાવાદ છે, જેમકે–આત્મા નથી, પરલેક नथी, पुष्य नथी, ५ नयी' या (१) અજીવ આદિ તનું અધ થાર્થ સ્વરૂપ પ્રતિપાદન કરવુ એ અભૂતભાવન કૃષાવાદ છે, જેમકે- “આત્મા અગૂઠા જેવડે છે, નિષ્ક્રિય છે યા સર્વગત છે” (૨) એક પદાર્થને બીજે પદાર્થ કહી દે એ અર્થાન્તરાભિધાન મૃષાવાદ છે, જેમકે- “ગાયને ગધેડે કહે યા ગધેડાને ગાય કહેવી' (૩) બીજાની હિનતા પ્રકટ કરવી, અથવા હિંસા તથા કઠોરતા-યુક્ત સત્યવચન કહેવા એ ગરૂપ અસત્ય છે, જેમકે- “એ મારી નાખવા એગ્ય છે, એ આધળા 1 અહી આવ, એ બહેરા ! એ લગડા ! અહીં આવી त्यादि (४) . , . , २४४ श्रीदोगामित्र स्वयं मृपा सदामि नेगन्पर्मपा पादयामि, मृषा नवतोऽप्यम्यान म समानानामि । यापनीया, निषि, निविन मनप्ता चाचा कायेन न.करोमिन कारणमि न्तमप्यन्य न समनुमानासि । तस्माद्भदन्त ! प्रतिकामासि निन्दामि गो आत्मानं व्युत्सृजामि। द्वितीये भदन्त ! महारते उपस्थितोऽस्मि (मता) सर्वस्मात् मात्रा दाद्विरमणम् ॥९॥ (२) मृपागदरिमण. सान्वयार्थ:-भते! हे भगवन् ! अहावरे-इसके पोट दो-दूसरे महन्वए- महानतमें: मुसावायाओ-मृपावादसे वेरमण विरमय होता है (अतः में) भते = हे भगवन् । सव्व-सब प्रकारके मुसावायं मृपावादका पचक्खामि- त्याग करता हूँ। से अय-अप से लेकर में कोरोवा कोषसे लोहावा लोपसे भयावा भयसे, हासावा हास्यसे. सयद, ,मुसावाय-असत्य काही वहजागोल्गा, नेव-नअन्नेरि-इसरोसे मुम-असत्य वायाविना बोलाऊँगा, मुस-असत्य वयतेवियोलते हुएभी अन्ने दसरोंको न समणुजाणिवा भला नहीं जानूंगाजावनीवा=जीवनपर्यन्त (इसको) तिविर-कृत-कारित-अनुमोद नारूप तीन करणसे (त्या) तिविहेण तीन प्रकारके मण-मनसे वायाए- वचनसे काएण कायसे, न करेमि=न करूँगा..त कारवेमिन करतपि-करते हुएभी अन्न-दूसरेको न समणुजाणामि भला,नहीं समझंगा। भते ! हे भगवन् ! तस्स-इस दण्डसे पडिक्कमामि पृथक होता हूँ, निंदामिन आत्मसाक्षीसे निन्दा करता हूँ, गरिहामि शुरु साक्षीसे गर्दा करता हूँ, अप्पाण: दण्ड सेवन करनेवाले आत्माको बोसिरामि त्यागता हूँ, भते । हे भगवन् ! दोचे दुसरे महत्वए महाव्रतमें, उचहिओमि उपस्थित हुआ है, इसलिये मुझे सव्वाओ-सव मकारके मुसावायाओ-असत्यसे वेरमण त्याग है ॥९॥(२) (२) मृषावादविरमणव्रतम् । टीका-अय-प्रथममहाव्रतानन्तर हे भदन्त ! हे भगवन् ! अपरे समनन्तरो दीरितमहारतापेक्षया भिन्ने द्वितीये महानते मृषावादाव-मिथ्याभाषणात् विरमण: (२) मृषावादविरमण। हे भगवन् ! प्रथम महाव्रतके अनन्तर दूसरे महाव्रतमें मृषावादसे ।। (२) भृपावाजविरमा હે ભગવન! પ્રથમ મહાવતની છી બીજા સહાવ્રત कराऊँगा, .

अध्ययन ४ सू. ९ (२)-अदत्तादानविरमणव्रतम् आत्मनः क्रोधमोहनीयप्रकृत्युदयेन स्वपरचित्तविकृतिजनको निरनुकम्पक्रौर्यवैभा- विकपरिणामविशेपस्तस्मात् । लोभात्-लोभा-लोभमकृत्युदयवशाव्याघभिलाप- लक्षणो जीवस्य वैभाविकपरिणामस्तस्मात् । भयात् भय-भयमोहनीयप्रकृत्युदये- नोद्वेगाऽऽवेदको विकारविशेपस्तस्मात् । हासा-हासा-हास्यमोहनीयमकृत्यु- दयेन वागादिविकृत्या कपोलयुगलोलासन-लोचनसकोचन-दशनमकाशन-सहकृत- सशब्दमाय-बदनव्यादानादिलक्षणश्चेतोविकाशस्तस्मात । नैव स्वय मुपा-मिथ्या वदामि, नैवान्यैर्मृपा वादयामि, मृपा बदतोऽप्यन्यान्न समनुजानामीत्यादि पूर्ववत् ।। ९ ।। (२) करनेवाला अनुकम्पारहित क्रूरतारूप वैभाविक परिणाम क्रोध है ! लोभ प्रकृति के उदयसे द्रव्य आदिकी अभिलापास्पजीवके वैभाविक भावको लोभ कहते हैं, भय मोहनीयके उदयसे उद्धगको उत्पन्न करनेवाला विकार भय कहलाता है। हास्य-मोहनीयके उदयसे वचनोंकी विकृतिके साथ गाल फुलाकर ऑखें कुछ२ मूंदकर दात निकालकर 'ही-ही' शब्द करके मुखको प्रफुल्लित करना हास्य कहलाता है। इन सब कारणोंसे मृपावाद होता है। मैं इन कारणोंके वश होकर न स्वय मृपा बोलूंगा, न दूसरोंसे बोलाऊँगा, न किसी मृपा बोलते हुएको भला जानूंगा (२) ॥९॥ વાળે અનુક પારહિત ક્રૂરતારૂપ જીવને વિભાવિક–પરિણામ એ ક્રોધ છે લેભપ્રકૃતિને ઉદયે કરીને દ્રવ્ય આદિની અભિલાષારૂપ જીવના વૈભાવિક ભાવને લાભ કહે છે ભય-મેહનીયન ઉદયથી ઉદ્વેગને ઉત્પન્ન કરવાવાળા વિકાર ભય કહેવાય છે હાચ્ચ-મહયના ઉદયથી વચનની વિકૃતિની સાથે ગાલ ફુલાવીને આ કઈક મીંચીને દાત કાઢીને હી–હી શબ્દ કરીને મુ અને પ્રફુલ્લિત કરવું એ હાસ્ય કહેવાય છે એ સર્વ કારણથી મૃષાવાદ ઉત્પન્ન થાય છે હુ એ કારણેને વશ થઈને મૃતા (જૂઠું) બાલુ, નહિ બીજા પાસે બેલાવું, કે નહિ મૃષા MY (२) (6) , નહિ અવય એલનારને ભલે 4 २४६ श्रीभवकालिकमरे इमेऽपि (पस्यारो भेदाः) प्रत्येक पार्षा-द्रय क्षेत्र मार मार मेदात । तत्र दम्य विपयकमनामतिपेप:-धर्माधर्मादिपटायाणामन्यथा मरूपणम् । क्षेत्रविषयक सङ्गापमतिषेधः-लोकालोकगोरन्यया निरूपणम् । पापियामढ़ावप्रतिषेधः- सण-मुहूर्त-दिवसादिम्वरूपाणामन्यथा निम्पणम । भाषियासद्भावमतिषेधः- रागद्वेपादीनामन्यथा प्रतिपादनम् । एउमेवाऽभूतोशानादित्रयेऽपिद्रव्यादिचतुर्भनी योजनीया । तस्माभिरमणमिति । हे भगवन् ! सौम्ममस्त मृपावाद प्रत्याख्या मीति पूर्यपद्धोद्धव्यम् । तदेव विशदयति-'से'-इति, अथ अनन्तरम्-अधारभ्य-क्रोधा-क्रोधः इन चार प्रकारके मृपावादोंके भी द्रव्य क्षेत्र काल भावके भेदसे चार चार भेद होते हैं । धर्मास्तिकाय अधर्मास्तिकाय आदि पट्टन्यों के स्वरूपकी अन्यथा प्ररूपणा करना द्रव्य-सद्भावप्रतिपेध है। लोक और अलोकका अयथार्थ निरूपण करना क्षेत्र-सद्भावप्रतिषेध है। क्षण मुहत्त दिन आदिके स्वरूपका मिथ्या कथन करना काल-सद्भावप्रतिषेध है। राग देप आदि भावोंका विपरीत स्वरूप घताना भाव-सद्भावप्रतिषेध है। इसी प्रकार अन्य तीन भेदोंकी चतुर्भगी समझ लेनी चाहिए, जैसे- द्रव्य अभूतोद्भावन, क्षेत्र अभूतोद्भावन, इत्यादि । हे भगवन् ! मै सब प्रकारके मृपावादका प्रत्याख्यान करता हूँ। मृपावाद किस किस कारणसे होता है सो कहते है- जीवके क्रोध-मोहनीय प्रकृतिके उदयसे स्व-परके चित्तमे विकार એ ચાર પ્રકારના મૃષાવાદના પણ દ્રવ્ય ક્ષેત્ર કાળ ચાર ચાર ભેદ થાય છે ધર્માસ્તિકાય અધમસ્તિકાય આદિ છ દ્રવ્યના સ્વરૂપની પ્રરૂપણ કરવી એ દ્રવ્ય-સર્ભાવપ્રતિષેધ છે લેક અને અલોકનું અયથાર્થ નિરૂપણ કરવું એ ક્ષેત્ર-સભાવપ્રતિષેધ છે, ક્ષણ મુહૂર્ત દિન આદિના સ્વરૂપનું મિથ્યા કથન કરવું એ કાલ–સદભાવપ્રતિષેધ છે રાગ દેવ આદિ ભાવનું વિપરીત સ્વરૂપ બતાવવું એ ભાવ-ભાવપ્રતિષેધ છે એ પ્રકારે અન્ય ત્રણ લોદની ચતુર્ભ સમજી લેવી, જેમકે-દ્રવ્યઅભૂતભાવના, ક્ષેત્ર-અભૂતભાવન, ઈત્યાદિ હે ભગવન્! હું સર્વ પ્રકારના મૃષાવાદના પ્રત્યાખ્યાન કરૂ છુ મૃષાવાદ ક્યા કયા કારણથી થાય છે ! તે હવે કહે છે – જીવના ક્રોધ-મેહનીય પ્રકૃતિના ઉદયથી સ્વ-પરના ચિત્તમાં વિકાર કરવા ભાવના ભેદે કરીને અન્યથા अध्ययन ४ सू. १० (३)-अदचादानविरमणातम् २४९ मै) भते! हे भगवन् ! सव्व-सव प्रकारके अदिन्नादाण अदत्तादान (चोरी)का पचक्खामि-प्रत्याख्यान करता हूँ से अथ-अब से लेकर मैं-गामे वा=ग्राममें नयरे वा नगरमें रपणे वा अरण्यमें अप्प वा अल्प-थोडा बहु वाम्बहुत-घणा अणु वा सूक्ष्म-छोटा यूल वा स्थूल-मोटा चित्तमत वा-सचेतन अचित्तमत वा=अचेतन (आदि किसीभी) अदिन्न-विना दिये हुए पदार्थको सय स्वय नेव- नहीं गिहिज्जा ग्रहण करूगा, नेवन्नेहिम्न दूसरोसे अदिन्न-विना दिया हुआ गिहाविज्जा ग्रहण कराऊँगा, अदिन्न-विना दिये हुए पदार्थको गिण्हतेवि- ग्रहण करते हुए भी अन्ने-दूसरेको न समणुजाणामि-भला नही जानूंगा, जाव- ज्जीवाए जीवनपर्यन्त (इसको) तिविम्कृत-कारित-अनुमोदनारूप तीन करणसे (तथा) तिविहेण-तीन प्रकारसे मणेण-मनसे वायाए बचनसे कारण कायसे न करेमिन करूँगा, न कारवेमिन कराऊँगा, करतपि-करते हुए भी अन्न दूसरेको न समणुजाणामि-भला नहीं समझूगा । भते ! हे भगवन् ! तस्स-उस दण्डसे पडिकमामि-पृथक् होता हूँ, निंदामिआत्मसाक्षीसे निन्दा करता हूँ, गरिहामि गुरुसाक्षीसे गर्दा करता हूँ, अप्पाण-दण्ड सेवन करनेवाले आत्माको वोसिरामि त्यागता हूँ। भते =हे भगवन् ! तच्चे-तीसरे= मवए-महाव्रतमें उवडिओमि-उपस्थि हुआ हूँ, इसलिये मुझे सव्वाओ सब अदिन्नादाणाओ- अदत्तादानसे वेरमण-विरमण-त्याग है ॥१०॥ (३) (३) अदत्तादानविरमणतम् टीका-हे भगवन् ! अथमृपावादविरमणानन्तरम् अपरेस्तृतीये महावते अदत्तादानात्न्न दत्तमदत्त-देवगुरुभूपगाथापतिसाधर्मिकैरननुज्ञात तस्याऽऽदान- ग्रहणमदत्तादान तस्माद्विरमणम् , सर्व भगवन् ! अदत्तादान प्रत्याख्यामि, एतत्तु (३) अदत्तादानविरमण । मृपावादविरमणके याद तीसरे महाव्रतमे देव गुरु राजा गाथापति और सार्मिकके द्वारान दिये हुए पदार्थके ग्रहणका त्याग किया जाता है, इसलिए हे भगवन् ! मै सर्व अदत्तादानका परित्याग करता हूँ। वह इस प्रकार- (3) महत्तानविरम. મૃષાવાદવિરમણની પછી ત્રીજા મહાવ્રતમા દેવ ગુરૂ, રાજા, ગાથાપતિ અને સાધર્મિકે ન આપેલા એવા પદાર્થનું ગ્રહણ કરવાને ત્યાગ કરવામાં આવે છે, તેથી હે ભગવન્! હું સર્વ અદત્તાદાનને પરિત્યાગ કરૂ છુ તે આ પ્રકારે २४८ श्रीदकालिको सस्पपरिपालन पाइदगादान-(पौर्य)-परित्यागपूर्वक कनु मुत्रमिति मन न्तरमदनादानविरमणसम्म तृतीय महासतमार-'आवरे तस्यादि । मूलम्-अहावरे तच्चे भते ! महबग अदिन्नादाणाओ वेरमण, सर्व भते! अदिन्नाटाणं पञ्चस्वामि, से गामे वा नगरे वा रख्ने वा अप्पं वा वहुं वा अणु वा शूलं वा चित्तमंतं वा अचित्तमंतं वा नेव सय अदिन्न गिहिज्जा, नेवन्नेहि अदिन्न गिण्हाविज्जा, अदिलं गिण्हंतेवि अन्ने न समणुजाणिजा, जावजीवाए तिविह तिविहेण मणेण वायाए कारणं न करेमि, न कारवेमि, करतपिअन्न न सम- णुजाणामि। तस्स भते । पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि। तच्चे भते । महत्वए उवहिओमि सबाओ अदिन्नादा- णाओ वेरमणं ॥१०॥ छाया-अथापरे तृतीये भदन्त ! महारतेऽदत्तादानाद्विरमण, सर्व भदन्त ! अदत्तादान प्रत्याख्यामि, अथ ग्रामे वा नगरे वा अरण्ये वा अल्प वा बहु वा अणु वा स्थूल वा चित्तवद्वा अचित्तवद्वा नैव स्वयमदत्त गृह्णामि नैवान्यैरदत्त ग्राहयामि, अदत्त गृह्णतोऽप्यन्यान समनुजानामि, यावजीवया त्रिविध त्रिविधेन मनसा वाचा कायेन न करोमिन कारयामि कुर्वन्तमप्यन्य न समनुजानामि । तस्मात् भदन्त ! प्रतिक्रामामि निन्दामि गहें आत्मान व्युत्सृजामि । तृतीये भदन्त ! महावते उपस्थितोऽस्मि सर्वस्माददत्तादानाद्विरमणम् ॥१०॥ (३) अदत्तादानविरमण सान्वयार्थ -भते ! हे भगवन् ! अहावरे-इसके बाद तच्चे-तीसरे मर व्वए महाव्रतमें अदिनादाणाओ-अदत्तादानसे वेरमण-विरमण होता है (अत' सत्य महाव्रतका पालन अदत्तादानका त्याग करनेसेंही हो सकता है, इस कारण सत्य महाव्रतके पश्चात् अदत्तादानविरमण नामक तीसरे महाव्रतका कथन करते है-'अहावरे तच्चे' इत्यादि । સત્ય મહાવ્રતનું પાલન અદત્તાદાનને ત્યાગ કરવાથી જ થઈ શકે છે, તે કારણથી સત્ય મહાવ્રતની પછી અદત્તાદાન વિરમણ નામના ત્રીજા મહાવ્રતનું કથન उरेहे-अहावरे तच्चे त्या .

अन्ययन ४ रु. १० (३)-अदत्तादानविरमणव्रतम् २५१ इत्युक्तलक्षण तस्मिन् । अरण्ये अर्यते-गम्यते एकान्तविविक्तदेशप्रियैर्याना- थिभिः, काष्ठायाहर्तु काष्ठहारकैर्वेत्यरण्य तस्मिन् , उपलक्षणात्खेटकादौ । एतेपा मध्ये कस्मिंश्चिदपि स्थले अल्प मूल्यतो न्यून दन्तादिपरिशोधनार्थ तृणादिकम् , बहु अधिकमूल्यफ सुवर्णादिकम् , अणु-प्रमाणतो लघु माणिक्यादिकम् , स्थूलम्= प्रमाणतो विशालमेरण्डकाष्ठादिकम् , चित्तवत्-सचेत्तनम् , अचित्तवत् अचेतन वा, एतत्सर्वम् एतदन्यतम वा अदत्त-तत्स्वामिना ग्रहणायाऽननुमत नैव स्वय गृहामि, नैवान्यैरदत्त ग्राहयामि, अदत्त गृङ्गतोऽप्यन्यान्न समनुजानामीत्यादिक सर्व व्याख्यातपूर्वम् । ननु सामान्येनाऽदत्तादानस्य स्तेयत्वे प्रतिक्षणमनन्यदेयकर्माण्याददानस्य एकान्त और पवित्र स्थानके अभिलापी ध्यानार्थी योगी अथवा लकडी लानेके लिए लकडहारे जहाँ जाते हैं वह अरण्य कहलाता है। इन ग्राम, नगर, अरण्य और उपलक्षणसे खेटक (खेडा) आदि किसी स्थानमे कम मूल्यवाला-दाँत खुजानेका तिनका आदि, अधिक कीमतवाला-सुवर्ण आदि, प्रमाणकी अपेक्षा अणु-माणिक्य आदि, प्रमाणकी अपेक्षा वडा-एरण्डकाष्ठ आदि, सचेतन अथवा अचेतन कोई पदार्थ या सय पदार्थ विना स्वामीकी अनुमति न स्वय ग्रहण करूँगा, न दूसरोंसे ग्रहण कराऊँगा और न ग्रहण करनेवालेको भला जानूंगा। प्रश्न-हे गुरु महाराज । विना दी हुई सय वस्तुओंको ग्रहण करना यदि अदत्तादान है तो मुनियोंको भी अदत्तादानका प्रसग आवेगा, એકાન્ત અને પવિત્ર સ્થાનના અભિલાવી ધ્યાનાથી ચગી અથવા લેવાને માટે કઠિયારા જ્યા જાય છે તે અરણ્ય (જગલ) કહેવાય છે એ ગામ નગર અરણ્ય અને ઉપલક્ષણે કરીને ખેટક (ગામડુ) આદિ ઈ સ્થાનમાં ઓછા મૂલ્યવાળું દાત ખોતરવાનું તણખલ વગેરે, વધારે મૂલ્ય- વાળુ તેનુ વગેરે, પ્રમાણુની અપેક્ષાએ નાનું માણિયાદિ, પ્રમાણુની અપેક્ષાએ મોટુ એર ડાનું લાકડુ આદિ, સચેતન અથવા અચેન કે પદાર્થ યા સર્વ પદાર્થ, તેના સ્વામીની અનુમતિ વિના, નહિ વય હુ ગ્રહણ કરે, નહિ બીજા પાને ગ્રહણ કરવું અને નહિ ગ્રહણ કરનારને ભલે જાણુ પ્રશ્ન–હે ગુરુ મહારાજ ! આપવામાં આવ્યા વિનાની બધી વસ્તુઓને ગ્રહણ કરવી એ જે અદત્તાદાન છે તે મુનિઓને પણ અદત્તાદાનને પ્રસંગ , E31 २५० श्रीदनकालियो व्याख्यातपूर्वम् । तदेव विशदयति-से-ति, अय-अनन्तरम्-अधारभ्य-नामे अस्यन्ते मान-निाश्यन्ते दिगियाशिवेकाटयो गुणा यत्र स इति, गम्यो गोमहिपादीना करेरिति पा ग्रामः (सिद्धिः पृषोदरादिस्वाद ) कपिपरम्मामो, इटादिशून्पासतिः, कण्टरमयतिपरिवेष्टितठसमूहसम्पन्नो वा तस्मिन् । नगरे- न गन्उन्तीति नगा=पाः पाताल, तर समुन्नताः प्रासादादयो यम्भिस्त- नगरम् , ('नग पांम-पाण्डभ्य'-ति पार्तिकेन नगन्दार.) नकरमिति छायापक्षे तु न पिचते गोमहिपादीनामष्टादशविधः करम्बामग्राममानः (जकात) यत्र तत् । यद्वा-- " पुण्यपापक्रियापित, दयादानप्रवर्तकः । कलाकलापकुशले, सवर्णः समाकुलम् ।। भापाभिरिरिधाभिश्व, युक्त 'नगर-मुच्यते ॥" जहाँ रहनेसे बुद्धि, विद्या, विवेक आदि गुण नष्ट हो जाते हैं उसे ग्राम कहते है । अथवा जहाँ गाय भैंस आदिका कर (टेक्स) लिया जाता हो, अथवा पृथ्वीके अधिक भागमें कृषि होती रो, पाजार या दुकाने न हों, कॉटोंकी वाइसे घिरे हुए घरहोंउस वस्तीको ग्राम (गाँव) करते हैं। जहाँ वृक्ष तथा पर्वतकी तरह अत्यन्त उन्नत महल-हवेलियाँ हों, अथवा गो महिप आदि पर कर (जकात) न लगता हो, अथवा जिस वस्तीमे पुण्य पाप क्रियाओंके ज्ञाता, दया-दानके प्रवर्तक, कलाओंमें कुशल चारों वर्ण हों, और जहाँ नाना देशकी भाषा बोलनेवाले मनुष्य रहते हों उसे नगर कहते है। જ્યા રહેવાથી બુદ્ધિ, વિદ્યા, વિવેકાદિ ગુણે નષ્ટ થઈ જાય છે તેને પ્રામ કહે છે અથવા જ્યા ગાય ભેંશ આદિને કર (ટેકસ) લેવામાં આવે છે, અથવા પૃથ્વીના વધારે ભાગમાં ખેતી થાય છે, બજાર અથવા દુકાને હોય નહિ, કાટાની વાડથી ઘેરેલા ઘર હેય એ વસ્તીને ગ્રામ (ગામ) કહે છે જ્યાં વૃક્ષ કે પર્વત જેવી અત્યત ઉચી મહેલ–વેલીઓ હોય, અથવા ગાય-ભેશ આદિ પર (જકાત) ન લાગતું હોય, અથવા જે વસ્તીમાં પુય-પાપ ક્રિયાઓના જ્ઞાતા, દયા–દાનના પ્રવર્તક, કળઓમાં કુશળ ચાર વર્ષે હિય, અને જ્યા જુદા જુદા દેશની ભાષાઓ બેલનારા મનુષ્ય રહેતા હોય, તેને નગર કહે છે 1 अध्ययन, ४ सू. १० (४)-मैथुनविरमणव्रतम् २५३ धर्ममुपार्जयतवाऽममत्तत्वाचीर्यकराणा-धर्मार्जनोपदेशाच न स्तेपासङ्गः, अत एवा-ऽल्प-बहु-स्थूलाऽणुग्रहण सूत्रे कृतमिति ॥ १०॥ (३) ............ -"मैथुनविरमणमन्तरेण ह्यहिंसादिमहावताना संरक्षण ने भवितु शक्नोति, यतो मैथुनपरायणः माणी बस-स्थावर जीवान् हिनस्ति, मिथ्या चदति, अदत्त चाऽऽ- दत्तेऽतस्तेपा निरपायपरिपालनाय "मैथुनविरमण-नामधेय चतुर्थे महाव्रतमाह- 'अहावरे चउत्थे' इत्यादि। जिससे कर्म, यध जाते हैं । रहा धर्मोपार्जन, सो तीर्थकर भगवानने धर्मोपार्जन करनेका आदेश तथा उपदेश दिया है इसलिए अदत्तादानका प्रसंग नहीं आता। सूत्रमें अल्प, यदु, स्थूल, और अणु, इन शब्दोंका ग्रहण भी इसी आशयसे किया गया है, अतएव, कर्मोंके बन्धन तथा समिति-गुप्ति बारा धर्मोपार्जनमें अदत्तादान,नहीं लगता है ॥१०॥ (३) मैथुनविरमणके विना अहिंसा आदि महाव्रतोंकी रक्षा नहीं हो सकती, क्योंकि मैथुन सेवन करनेवाला त्रस स्थावर जीवोंकी हिंसा करता है, असत्य बोलता है, और अदत्तका आदान करता है। अत एव अहिंसादि महाव्रतोंका निरतिचार पालन करनेके लिए मैथुन-विरमण नामक चतुर्थ महावतका प्रतिपादन किया जाता है-'अहावरे चउत्थे' इत्यादि। ધર્મોપાજ, તે તીર્થકર ભગવાને ધર્મોપાર્જન કરવાને આદેશ‘તથા ઉપદેશ આપ્યો છે તેથી તેમાં અનાદાનનો પ્રસંગ આવ નેથી સૂત્ર એ બહુ સ્થલ, અને એનું ગ્રહણ પણ એ જ આશયથીકવામા આવ્યું છે એટલે કર્મોનાબધન સંથ સમિતિ ઝુક્તિ દ્વારા धर्भापान, 'मेमा महत्ताहान सातु नथी (3) (१०) મૈથુનવિરમણ વિના અહિંસા આદિ મહાવ્રતની રક્ષા થી શકતી નથી, કારણ કે-મથુન સેવન કરવાવાળે ત્ર-સ્થાવર જીવેની હિંસા કરે છે, અસત્ય બેલે છે અને અદત્તનું આદાન કરે છે તેથી કરીને અહિંસાદિ મહાવતેનું નિરતિચાર પાલન કરવાને માટે મૈથુનવિરમણ નામનું ચેથુ મહાવ્રતનું પ્રતિપાદન ४२वाभा-भाव छ,-अहावरे चउत्थे त्या , । 14 ।

२५२ श्रीदनकालियो रामिविगुप्तिमतिभिर्धर्म । ममुपानगाः गापोरदतादानापतिमसक्तिरिति चेत्र, लोकमसिददस्तादिकरणपटानाऽऽदानादिन्याहारम्य कर्मादिप्वभावान् । तथाहि लोके पशुपानादिकमन्यस्मै हस्तेन दीयतेऽन्यस्मानाऽऽदीयते, इत्येव दा नाऽऽदानादिव्यपहारो दृश्यते तस्य न यर्मविषयका समाति, तेषां ममत्वात् । नदि मृक्ष्म फर्मादिक इम्तादिपरणकग्रहणवितरणयोग्यता भजते इति । क्योंकि मुनि चिना दिये एप कमाको प्रतिक्षण ग्रहण करते हैं और समिति-गुसिका पालन करके धर्मका भी उपार्जन करते हैं। उत्तर-हे शिप्य ! ऐमा नरी है। राघोंसे लेने-देनेका जैसा व्यवहार लोकमें प्रसिद्ध है वैसा कर्मों में नहीं हो सकता, अर्थात् लोकमें ऐसा व्यवहार होता है कि-'चन पात्र दुसरोंको शायसे दिया जाता है, दूसरेसे लिया जाता है। इस प्रकारका व्यवहार कोंके विपयों नहीं होता क्योंकि कर्म अत्यन्त सक्षम है, वे इन्द्रियके विषय भी नहीं होते तो उनका लेन-देन कैसे हो सकता है ? । दसरी बात यह है कि प्रमादके योगसे अदत्त पदार्थका आदान (ग्रहण) करना अदत्तादान करलाता है, मुनिराजको तद्विपयक प्रमाद नहीं है इसलिए उन्हें अदत्तादानका दोष नहीं लगता । मुनिराज तो कभी नहीं चाहते कि ग्रहण करे, कितु समारी आत्मा और कोंका स्वभाव ही ऐसा है कि આવશે, કારણ કે મુનિ વિના અપાયેલા કને પ્રતિક્ષણ ગ્રહણ કરે છે અને સમિતિ ગુપ્તિનું પાલન કરીને ધર્મનું પણ ઉપાર્જન કરે છે ઉત્તર-હે શિષ્ય ! એમ નથી હાથેથી લેવા દેવા જેવો વહેવાર લોકમાં પ્રસિદ્ધ છે તેવો વહેવાર કર્મીમાં નથી હઈ શકત, અર્થાત કેમ એ વડે વાર થાય છે કે–વસ્ત્ર પાત્ર બીજાઓને હાથથી આપવામા આવે છે, બીજા પાસેથી લેવામાં આવે છે એ પ્રકારનો વહેવાર કર્ભોની બાબતમાં થતો નથી, કેમકે-કર્મ અત્યત સૂમ છે, તે ઇન્દ્રિયને વિષય જ નથી હોતે તે એની લેણ-દેણ કેવી રીતે થઈ શકે? બીજી વાત એ છે કે પ્રમાદના યુગથી અદત્ત પદાર્થનું આદાન (ગ્રહણ) કરવુ એ અદત્તાદાન કહેવાય છે મુનિરાજને તદ્ધિષ યક પ્રમાદ હેત નથી તેથી તેમને અદત્તાદાન દેવ લાગતે નથી મુનિરાજ તે કદાપિ એમ નથી ઈચ્છતા કે હુ કર્મોનું ગ્રહણ કરૂ, કિન્તુ સસારી આમાં અને કમેને સ્વભાવ જ એ છે કે જેથી કમ બધાઈ જાય છે બાકી રહ્યું कोको अध्ययन ४ सू. ११ (४) मैथुनविरमणप्रतम् २५५ दण्ड सेवन करनेवाले आत्माको बोसिरामि त्यागता हूँ। भते ! हे भगवन् ! चउत्थे चौथे महन्वए-महाव्रतमें उवडिओमि उपस्थित होता हूँ , इसलिये मुझे सवाओ सब प्रकारके मेहुणाओ-मथुनसे वेरमण-त्याग है ।।११।। (४) (४) मैथुनविरमणप्रतम्. टीका - हे भगवन् ! अथ अपरे चतुर्थे महारते मैयुनात्-मिथुनेन त्रीपुसाभ्या नित्त कर्म मैथुन प्रत्याख्यामीति प्राग्वत् , तदेव विशदयति-से' इति । अथ अनन्तरम्-अधारभ्य दैव=देवानामिद मानुप-त्री पुससम्बन्धीत्यर्थः, तैर्यग्योन तिर्यग्योनीनामिद तैर्यग्योन=पश्चादिसम्बन्धीत्यर्थः, मैथुन नैव स्वय सेवे, इत्यादि सर्व पूर्ववत् । द्रव्यादिचतुर्भद्यपि प्राग्वद्योजनीया ॥११॥ (४) (४)-मैथुनविरमण हे भगवन् ! चौथे मरावतमें समस्त प्रकारके मैयुनसे विरमण किया जाता है, इसलिए हे भगवन् ! मै सय तरहके मैथुनका प्रत्याख्यान करता हूँ । अप्सराओं सम्बन्धी देवी, स्त्री-पुरुप सम्बन्धी मानुपिक, पशु आदि सम्बन्धी तैर्यग्योनिक मैथुनको मैं न स्वय सेवन करूंगा, न दूसरोंसे सेवन कराऊँगा, न सेवन करते हुएको भला जानूंगा। द्रव्य क्षेत्र काल भावकी चौभगी यहाँपर भी लगानी चाहिए, अर्थात् द्रव्यसे- स्त्री आदिके साथ, क्षेत्रसे-किसी क्षेत्रमें, कालसे-किसी कालमें और भावसे-किसीभी भावसे, तीन करण तीन योगसे मैथुन सेवन नही करूँगा ॥११॥ (४) (૪) મેથુનવિરમણું હે ભગવન માં ચોથા મહાનતમાં સર્વ પ્રકારના મૈથુનનું વિરમણ કરવામાં આવે છે, તેથી હે ભગવન્! હું સર્વ પ્રકારના મૈથુનના પ્રત્યાખ્યાન કરૂ છુ मसरामा सधी हैवी, श्री-५३५-सपी भानुषि, पशु-माह- -સ બ ધી તેગેનિક મૈથુન નહિ હુ સ્વય એવું, નહિ બીજાઓ પાસે સેવન કરવું અને નહિ સેવન કરનારને ભલે જાણું દ્રવ્ય-ક્ષેત્ર-કાળ-ભાવની ચૌભાગી એમાં પણ લગાડવી, અર્થાત્ દ્રવ્યથી સ્ત્રીઆદિની સાથે, ક્ષેત્રથી કોઈ પણ ક્ષેત્રમા, કાળથી કે કાળમાં અને ભાવથી કોઈ પણ ભાવે કરીને ત્રણ કરણ ત્રણ યુગથી મૈથુન સેવીશ नडि (४) (११) .

- ! पा २५४ श्रीकालिको मूलम् अहावरे चउत्थे भते ! महाए मेहुणाओ वेरमणं, सर्व भंते! मेहुण पञ्चम्सामि, से दिवं वा माणुस वा तिरिम्खजोणिय वा नेव सयं मेहुण सेविजा, नेवन्नेहि मेहुण सेवाविजा, मेहुणं सेव- तेवि अन्ने न समणुजाणिजा, जावजीवाए तिविह-तिविहेण मणेणं वायाए कारण न करेमि, न कारवेमि, करतंपि अग्नं न समणुजा णामि। तस्स भते। पडिकमामि निंदामिगरिहामिअप्पाण वोसिरामि। चउत्थे भते। महत्वए उवहिओमि सदाओ मेहुणाओवेरमण।।११॥(४) छाया-अथापरे चतुर्थे भदन्त ! महारते मैथुनाद्विरमण, सर्वे भदन्त ! मैथुन प्रत्याख्यामि, अथ देव ना मानुप या तैर्यग्योन नैव स्त्रय मैथुन सेवे नैवान्यैर्मधुन सेवयामि, मैथुन सेवमानानप्यन्यान्न समनुजानामि, यावजीवया विविध त्रिविधेन मनसा गांचा कायेन न करोमि, न कारयामि, कुर्वन्तमप्यन्य न समनुजानामि । तस्माद् भदन्त ! प्रतिक्रामामि निन्दामि गर्दै आस्मान व्युत्म' जामि । चतुर्थे भदन्त ! महारते उपस्थितोऽस्मि सर्वस्मान्मैथुनाद्विरमणम् ॥११॥ (४) मैथुनविरमण सान्वयार्थ:-भते! हे भगवन् ! अहावरे इसके बाद चउत्थे चौथे मह- व्वए=महाव्रतमें मेहुणाओ-मैथुनसे वेरमण-विरमण होता है, (अत. मै) भते ! हे भगवन् ! सब्व-सा प्रकारके मेहुण-मैथुनका पञ्चक्खामि- प्रत्याख्यान करता हूँ, से अव से लेकर मै दिव्व वा देवसम्बन्धी माणुस मनुष्यसम्बन्धी तिरिक्खजोणिय वा-तिर्यश्चसम्बन्धी मेहण मैथुनको सय स्वय नेवन सेविज्जा-सेवन करूँगा, नेवन्नेहिम्न दूसरोंसे मेहुण- मैथुन सेवाविज्जा सेवन कराऊँगा, मेहुण-मैथुन सेवतेवि सेवन करते हुएभी अन्ने दूसरोको न समणुजाणिज्जा-भला नही समझंगा, जाव- ज्जीवाए जीवनपर्यन्त (इसको) तिविह-कृत कारित अनुमोदनारूप तीन करणसे (तथा) तिविहेण तीन प्रकारके मणेण-मनसे वायाए वचनसे कारण कायसे न करेमि-न करूँगा न कारवेमिन कराऊँगा करतपि- करते हुएभी अन्न-दूसरेको न समणुजाणामि भला नहीं समझूगा । भते ! हे भगवन् ! तस्स-उस दण्डसे पडिकमामि=पृथक होता है, निंदामिन आत्मसाक्षीसे निन्दा करता है, गरिहामि=गुरु साक्षीसे गर्दा करता . . अध्ययन ४ सू. १२ (५)-परिग्रहविरमणप्रतम् २५७ धूलवा-स्थूल मोटा चित्तमतवा-सचेतन अचित्तमतवा अचेतन परिग्गह- परिग्रहको सय स्वय नेवघ्नही परिगिहिजा ग्रहण करूँगा, नेवन्नेहि न दूसरोसे परिग्गड परिग्रहको परिगिहाविज्जा ग्रहण कराऊँगा, परिग्गड्=परिग्रहको परिगिण्यतेविग्रहण करनेवालेभी अन्ने दूसरोको न समणुजाणिज्जा-भला नहीं जानूंगा। जावज्जीवाए=जीवनपर्यन्त (इसको) निवि-कृत कारित अनु- मोदनारूप तीन करणसे (तथा) तिविहेण-तीन प्रकारके मणेण मनसे वायाए वचनसे काएण कायसे न करेमिन्न करूगा,न कारवेमि-न कराऊँगा,करतपि करते हुएभी अन्न-दूसरेको न समणुजाणामि-भला नहीं समझूगा । भते=! हे भगवन् ! तस्स-उस दण्डसे पडिकमामि-पृथक होताह, निंदामि आत्मसाक्षीसे निन्दा करता हूँ, गरिहामि शुरुसाहीसे गर्दा करता हूँ, अप्पाण-दण्ड सेवन करनेवाले आत्माको वोसिरामि त्यागता हूँ। मते हे भगवन् ! प्रचमे पाचवें महव्वए महाव्रतमें उवडिओमि-उपस्थित होता है, इसलिये मुझे सव्वाओ= सब परिग्गहाओ=परिग्रहसे वेरमण=विरमण-त्याग है ॥१२।। (५) (५) परिग्रहविरमणव्रतम् । टीका -हे भगवन् ! अथापरे पञ्चमे महाव्रते परिग्रहात-परि-सर्वतोभावेन गृ- ह्यते जन्मजरामरणादिजनितदुःखैर्वेष्यते आत्माऽनेनेति, यद्वा परिगृह्यते समूर्च्छ स्वीक्रियते इति परिग्रहः 'मुच्छा परिग्गहो वुत्तो' इति वचनाद , धर्मोपकरणभिन्न (६)-परिग्रहविरमण हे भगवन् ! चतुर्थ महाव्रतके पश्चात् पाँचवें महाव्रतमे परिग्रहका पूर्ण प्रत्यारयान किया जाता है। जिससे आत्मा जन्म-जरा मरण-आदि- जनित नाना दु खोंसे गृहीत होता है, अयथा जो मृपूर्वक स्वीकार किया जाता है वह परिग्रह कहलाता है, क्योंकि भगवानने मृीको ही परिग्रह बतलाया है। अतएव तीन करण तीन योगसे ग्राम नगर आदिमें (૫) પરિગ્રહવિરમણ હે ભગવન 1 ચતુર્થ મહાવ્રતની પછી પાચમા મહાવ્રતમાં પરિગ્રહના પૂર્ણ કરવામાં આવે છે જેથી આત્મા જન્મ જરા મણદિજનિત નાના પ્રકારના દુખેથી ગ્રસ્ત થાય છે અથવા જે મૂરપૂર્વક સ્વીકારવામાં આવે છે તે પરિગ્રહ કહેવાય છે, કારણ કે ભગવાને મૂરછને પરિગ્રહરૂપ બતાવી છે તેથી કરીને ત્રણ કરણ ત્રણ ગે ગ્રામ નગર આદિમાન સ્વય પરિગ્રડ ધારણ પ્રત્યાખ્યાન २५६ श्रीदवकालिको मेधूनविरमण च परिग्रहरिरमणमन्तरेण न भक्नुि मनामिति मेधुनविरमया नरंतर परिग्रहरिरमणनामक पत्रम महायतमाह-'हावरे पबमे इत्यादि। मूलम्-अहावरे पंचमे भते !महबए परिग्गहाओ बेरमण, भते। परिग्गह पञ्चम्खामि, से अप्प वा बहु वा अणुं वा थूल वा चित्तमंत वा अचित्तमत वा नेव सय परिग्गह परिगिव्हिज्जा, नेव नेहिं परिग्गह परिगिण्हाविजा, परिग्गह परिगिण्हतेवि अन्ने न समणुजाणिज्जा, जावजीवाए तिविह तिविहेणं मणेण वायाए कारणे न करेमि, न कारवेमि, करतंपि अन्नं न समणुजाणामि। तस्स भते! पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि। पचमे भते। महत्वए उबहिओमि सबाओ परिगहाओ वेरमण ॥१२॥ (५) छाया-अथापरे पश्चमे भदन्त ! महाव्रते परिग्रहाद्विरमण, सर्व भदन्त ! परिग्रह प्रत्याख्यामि, अथ अल्प मा बहु वा अणु वा स्थूल वा चिसवन्त वा अचित्तवन्त वा नैव स्त्रय परिग्रह परिगृहामि, नैवान्यैः परिग्रहं परिग्राहयामि, परिग्रह परिगृह्नतोऽप्यन्यान्न समनुनानामि, यावज्जीवया त्रिविध त्रिविधेन मनसा वाचा कायेन न करोमि न कारयामि कुर्वन्तमप्यन्य न समनुजानामि । तस्मात् भदन्त ! प्रतिक्रामामि निन्दामि गर्दै आत्मान व्युत्सृजामि । पञ्चमे भदन्त । महाव्रते उपस्थितोऽस्मि सर्वस्मात्परिग्रहाद्विरमणम् ॥१२॥ (५) (५) परिग्रहविरमण सान्वयार्थ:-भते ! हे भगवन् ! अहावरे-इसके बाद पचमे-पाच मर व्वए-महानतमें परिग्गहाओ-परिग्रहसे वेरमण-विरमण होता है, (अत. में) ते ! हे भगवन् ! सव्व-सव मकारके परिग्गरम्परिग्रहको पञ्चक्खामि- त्यागता हूँ, से=अब से लेकर मैं अप्पवा अल्प बहुधा बहुत अणुवा अणु छोटा मैथुनविरमण, परिग्रहके त्यागे विना नहीं हो सकता, इसलिए मैथुनविरमणके अनन्तर परिग्ररविरमणनामक पाचवा महाव्रत कहते है- 'अहावरे पचमे' इत्यादि । મિથુન વિરમણ, પરિગ્રહનો ત્યાગ વિના થઈ શકતું નથી, તેથી મૈથુન વિરમણની पछी परिविरमा नामर्नु पायभु महावत हे छे-अहावरे पचमे त्या अन्ययन ४ स. १३ (६)-रात्रिभोजनविरमणातम् २५९ मणेण वायाए कारण न करेमि न कारवेमि करतंपि अन्न न सम- णुजाणामि। तस्स भते। पडिकमामि निदामि गरिहामि अप्पाण वोसिरामि। छठे भते । वए उवहिओमि सबाओ राइभोयणाओ वेरमण ॥१३॥ (६) छाया-अथापरे पण्ठे भदन्त ! व्रते रात्रिभोजनाद्विरमण, सर्वे भदन्त ! रोत्रिभोजन प्रत्यारयामि, अथ अशन वा पान वा खाध वा स्वार वा नैव स्वय रात्रौ भुजे, नैवान्यान् रानौ भोजयामि, रामो भुञ्जानानप्यन्यान्न सम- नुनानामि, यावज्जीवया त्रिविध त्रिविन मनसा वाचा कायेन न करोमि न कारयामि कुर्वन्तमप्यन्य न समनुजानामि। तस्माद् भदन्त ! प्रतिकामामि निन्दामि गर्दै आत्मान व्युत्सृजामि । पप्ठे भदन्त !ते उपस्थितोऽस्मि सर्वस्माद्वात्रिभोज- नाद्विरमणम् ॥१३॥ (६) (६) रात्रिभोजनविरमण सान्वयार्थ.-भते' हे भगवन् ! अहावरे-इसके अनन्तर छठे छठे वए= प्रतमें राइभोयणाओ-रात्रिभोजनसे वेरमण-विरमण होता है, (अत' मै) भते! हे भगवन् ! सव्व-सवप्रकारके राडभोयण रात्रिभोजनको पञ्चक्खामि त्यागता हूँ, सेब से लेकर मै-असण वा-लद्दू पूरी घी सत्तू आदि अशन, पाण वा-दूध शर्यत आदि पान-पीने योग्य, खाइम वा-गख खजूर आदिखाय, साइम वा लोग इलायची आदिखाय, नेव-नसय स्वय राइ-रात्रि भुजिज्जा खाऊँगा, नेवन्नेहि न दूसरोको राइ रात्रि भुजाविज्जा-खिलाऊँगा, राइ भुज- तेवि अनेरात्रिमें भोजन करनेवाले दूसरोकोभी न समणुजाणिजा-भला नहीं जानूंगा, जावज्जीवाए-जीवनपर्यन्त (इसको) तिवि-कृत कारित अनुमोदना- रूप तीन करणसे (तथा) तिविहेण तीन प्रकारके मणेण मनसे बायाए= वचनसे कारण कायसे न करेमिन्न क्रूँगा न कारवेमिन्न कराऊँगा, करतपि करते हुएभी अन्न दूसरेको न समणुजाणामि-भला नहीं समझूगा । भते! हे भगवन तस्स उस दण्डसे पडिकमामि-पृथक होता है, निंदामि= आत्मसाक्षीसे निन्दा करता हूँ, गरिहामिगुरुसाक्षीसे गर्दा करता हूँ, अप्पाण= दण्ड सेवन करनेवाले आत्माको वोसिरामि-त्यागता है, भते ' हे भगवन् ! छोटे-छठे वए-व्रतमें उवडिओमि उपस्थित होता है, इसलिये मुझे सव्वाओ= सरकारकेराइभोयणाओ-रात्रिभोजनसे वेरमण-विरमण त्याग है ॥१३॥(६) , - २५८ श्रीदत्रयकालिकाने समित्पर्यस्तस्माद्विरमणम् । है मगास परिप्रद प्रत्यास्यामि, अब ग्राम या नगरे वेत्यादि भावदोदव्यम् ॥१२॥ (८) द्वाविंशतितीर्थकरणासने ऋजुमामपुरुषापेक्षयाऽस्योत्तरगुणत्वेऽपि आपा न्तिमतीर्थकरसाधूनामजुनड-जडत्वादनयपतिरोधार्य स्फुटमतिबोधार्य च महारतानन्तर मूलगुणत्येनोपादानु पष्ठ रात्रिभोजनविरमणतमाह-'अहावरे घटे' इत्यादि । मूलम्-अहावरे छठे भते । वए राडभोयणाओ वेरमणं, सब भंते । राइभोयणं पञ्चमखामि, से असणं वा पाणं वा खाइम वा साइम वा नेव सयं राइ भुजिज्जा, नेवन्नेहिं राड भुजाविजा, राइ भुंजतेवि अन्ने न समणुजाणिजा, जावजीवाए तिविह तिविहेणं न स्वय परिग्रह धारण करूँगा, न दूसरेसे धारण कराऊँगा, न धारण करते हुएको भला जानूंगा ॥१२॥ (५) अजितनाथ भगवानसे लेकर पार्श्वनाथ जिनेन्द्र पर्यन्त बाईस तीर्थंकरोंके शिष्य ऋजु (सरल स्वभावके) और प्राज्ञ (समझानेसे समझनेवाले) होते हैं। उन शिष्योंकी अपेक्षासे रात्रिभोजन उत्तरगुण है। किन्तु अपभदेवके शिष्य ऋजु-जड तथा वर्द्धमान-स्वामीके शिष्य चक्र और जड होते हैं, अत एव अनर्थको रोकने के लिए और स्पष्ट बोध करानेके लिए पच महाव्रतोके बाद मूल-गुणोंमें गिनानेके लिए छठे रात्रिभोजनविरमण व्रतको कहते है-'अहावरे छठे' इत्यादि । ई शश, न બીજાઓ દ્વારા ધારણ કરાવીશ, ન ધારણ કરનારને ભલે oriefle (4) (१२) અજિતનાથ ભગવાનથી લઈને પાર્શ્વનાથ જિનેન્દ્ર સુધીના બાવીસ તીર્થ- કરેના શિષ્યો નાજુ (સરલ સ્વભાવવાળા) અને પ્રાણ (સમજાવવાથી સમજ નારા) હતા, તે શિષ્યની અપેક્ષાએ રાત્રિભેજન ઉત્તરગુણ છે, પરંતુ આ દેવના શિષ્ય ઋજુ જડ તથા વર્ધમાનસ્વામીના શિષ્ય વક અને જડ હતા તેથી અનાથને સેકવાને માટે અને સ્પષ્ટ બાધ કરાવવાને માટે પંચ મહાવ્રતની પછી भूख शुभा गणपणाने भाटे ४ निविरम प्रत ) अहावरे છે ઈત્યાદિ अध्ययन ४ स. १३ (६)-रात्रिभोजनविरमणततम् २६१ घदनमप्राणातिपातायोक्तम् । अपिच-रात्रिभोजनव्यवस्थापने, रातो भुक्त्वाऽऽ- स्मनः साधुत्वकथने च मृपावादः। रागावभ्यवहरणे हन्यमानमाणिनिदेशमन्तरेण तत्माणापहरणाद्रजन्यधिकरणकभोजननिषेधलक्षणजिनाज्ञामगाच स्तेयम् । रात्रि- भोजनशीलस्यावश्यमेव भिक्षार्थ रात्रावितस्ततः परिभ्रमतः स्यादिससर्गादब्रह्म- दोपप्रसङ्गः । रात्रिभोजने सग्रहोऽनिवार्यस्तेन च मूर्छाऽवश्यम्भाविनी, सैव परिग्रहः 'मुच्छा परिग्गहो वुत्तो' इति भगवता स्वयमेवाऽभिधानादतो निशाशनमशेप- दोपराशिभूतम् , न तत्त्यागाहते तपरिपोपस्तस्मात्सर्व भगवन् ! रात्रि- करनेसे ही हिंसाका परिहार हो सकता है। रात्रिभोजनका कर्तव्यरूपसे निरूपण करना और रात्रिभोजन करके अपनेको साधु कहना मृपावाद है। रात्रिभोजनसे विराधित होनेवाले प्राणियोंकी आज्ञाके विना ही उनके प्राणोंका अपहरण करनेसे, तथा रात्रिभोजन न करनेकी जिन भगवानकी आजाका लोप करनेसे अदत्तादानका दोप लगता है। रात्रिमें भोजन करनेवाला भिक्षाके लिए रात्रिमें भ्रमण भी करेगा, भ्रमण करते समय स्त्री आदिका ससर्ग होनेसे अव्रह्मचर्यका भी दोप लगेगा। रात्रिभोजन करनेसे अन्न आदि सामानका भी संग्रह करना पडेगा इससे सनिधि-दोप लगेगा। सग्रह करनेसे मृा भी होगी, मूर्छाको भगवानने स्वय परिग्रह कहा है, इसलिए रात्रिभोजन सब दोपोका कोप है, उसका त्याग किये विना व्रतोंका पालन नहीं हो सकता। इस થઈ શકે છે રાત્રિભેજનનું કત વ્યરૂપે નિરૂપણ કરવું અને રાત્રિભૂજન કરીને પિતાને સાધુ કહેવડાવ એ મૃષાવાદ છે રાત્રિભૂજનથી વિરાધિત થનારા પ્રાણીઓની આજ્ઞા વિના જ એમના પ્રાણનું અપહરણ કરવાથી થતા ત્રિભેજન ન કરવાની જિનભગવાનની આજ્ઞાને લિપ કરવાથી અદત્તાદાનને દોષ લાગે છે રાત્રે ભજન કરનારાઓ ભિક્ષાને માટે રાત્રે ભ્રમણ પણ કરશે ભ્રમણ કરતી વખતે સ્ત્રીઆદિને સ સર્ગ થવાથી અબ્રહ્મચર્યને પણ દોષ લાગશે રાત્રિભેજન કરવાથી અન્ન આદિ સામાનને પણ આ ગ્રહ કરવો પડશે, તેથી સનિધિદેવ લાગશે સગ્રહ કરવાથી મૂઈ પણ ઉત્પન્ન થશે મૂકીને ભગવાને પિને પરિગ્રહરૂપ કહી છે, તેથી રાત્રિભૂજન સર્વ દેને કેપ છે એને ત્યાગ કર્યા વિના તેનું પાલન થઈ શકતું નથી તેથી હે ભગવન્!

२६० श्रीदर्शकालिको (६) रात्रिभोजनविरमणवतम् । टीका-हे भगान् ! अयापरे पप्ठे आते रात्रिभोजनात रात्री निधि भोजन रात्रिभोजन तस्माद् चिरमणम् । रात्रिभोजनेन हि सकलमहावतेषु दोषो जन्यते, तथाहि-रात्री दिनकरफिरणामागनानाविधमूक्ष्मतनुपारिजन्तुजातसमुत्पातावपात- सञ्चारमाहुल्या हिंसाऽवश्यम्मापिनी, दीमापदणसमये प्रतिज्ञा कता यदयाभृति न फस्यापि प्राणिनः प्राणान् पीडयिष्यामीति, रात्रिभोजनेन तु माणिवपस्याऽ निवार्यत्वात्कृतपतिशामहो मरितमईतीति मृपागदः, यद्वा तीर्यकरलोकालोकाञ्च'. लोकिकेवलालोकेनै तत्सयमनिराधमालोक्याऽऽदिस्यालोके आलोकितामपाना- १ केवलालोकस्य फरणस्य कर्तृत्वविवक्षया णिनिः। एतत्वात्रिभोजनम् । (६) रात्रिभोजनविरमण । हे भगवन् ! पाच महाव्रतोंके पश्चात् छठे व्रतमें रात्रिभोजनसे विरमण किया जाता है।रात्रिभोजनसे समस्त मरावतोंमें दोष लगता है। रात्रिके समय सूर्यकी किरणोंके अभावसे सूक्ष्म-शरीरवाले भाँति- भाँतिके जन्तु इधर-उधर उडते हैं, नवीन उत्पन्न रोते हैं, नीचे ऊपर आते-जाते हैं, इसलिए हिंसा अवश्य ही होती है। दीक्षा लेते समय ऐसी प्रतिज्ञा की थी कि-'आजसे किसी प्राणीके प्राणोंको पीडा नहीं पहुँ चाऊँगा' जब रात्रिभोजन किया तो हिंसा अवश्य हुई, इसलिए मृषा वादका भी दोपलगा।अथवा लोक और अलोकको अवलोकन करनेवाले अलौकिक केवल-आलोकसे अवलोकन करके केवली भगवान ने कहा है कि-सूर्यके आलोकमे अवलोकन किया हुआ अशन आदिक सेवन (૬) રાત્રિભજનવિરમણ હે ભગવન્ ! પાચ મહાવ્રતની પછી છઠ્ઠા વ્રતમા રાત્રિભોજનથી વિમણું કરવામા આવે છે રાત્રિભેજનથી સવ મહાવતેમા દેષ લાગે છે રાત્રિને સમયે સૂર્યના કિરણના અભાવથી સૂકમશરીરવાળા ભાત-ભાતના જતુઓ અહી તહી ઉડે છે, નવીન ઉત્પન્ન થાય છે, નીચે ઉપર આવ જા કરે છે, તેથી હિંસ જરૂર થાય છે દીક્ષા લેતી વખતે એવી પ્રતિજ્ઞા કરી હતી કે પ્રાણીના પ્રાણેને પીડા નહિ ઉપજાવુ જે રાત્રિભૂજન કર્યું તે હિંસા અવશ્ય થઈ તેથી મૃષાવાદને દેષ લાગે અથવા લેક અને અલેકનું અવલોકન કરનારા અલૌકિક કેવળ જ્ઞાનથી અવકન કરીને કેવળી ભગવાને સૂર્યના પ્રકાશમાં અવલોકન કરેલ અશન આદિ સેવવાથી જ હિંસાને પરિહાર આજથી કોઈ - अध्ययन ४ स. १३ (६)-रात्रिभोजनविरमणातम् २६३ (१) रानी गृहीत्वा रानी मुदक्ते, (२) रात्री गृहीत्वा दिवा भुक्ते, (३) दिवा गृहीत्वा रानौ भुक्ते, (४) दिवा गृहीत्वा (रात्रिन्यवधानेन) दिवा भुक्ते। उक्तञ्च भगवता निशीथमनस्यैकादशोदेशे- "जे भिक्खू दिया असण वा पाण वा खाइम वा साइम वा पडिगाहित्ता दिया भुजइ भुजत वा साइना ॥ ७३॥ जे भिक्यू दियाअसण पा ४ पडिगाहित्ता रति भुजइ भुजत वा साइजइ ।।म. ७४|| जे भिकम्बू रति असण वा ४ पडिगाहित्ता दिया भुजड भुजत वा साइज्जइ ॥म.७५।। जे भिक्खू रति असण वा ४ पडिगाहित्ता (१) रात्रिमें ग्रहण करके रात्रिमें ही भोजन करना । (२) रात्रिमें ग्रहण करके दिनमें भोजन करना। (३) दिनमें ग्रहण करके रात्रिमें भोजन करना । (४)दिनमें ग्रहण करके (रात्रिभर रग्वकर दूसरे) दिनमें भोजन करना। भगवान्ने निशीय सूत्रके ग्यारहवें उद्देशमे कहा है- "जो भिक्षु दिनमें अशन पान ग्वाद्य स्वाद्य ग्रहण करके (दुसरे) दिन भोगे, दुसरेको भोगवावे और अन्य भोगनेवालेको भलाजाने ॥७॥ जो साधु दिनमें अशनादिक लेकर रात्रिमे स्वय भोगे दूसरेको भोगवावे और अन्य भोगनेवालेको मला जाने ॥सू ७४।। जो सायु रात्रिमें अशनादिक लेकर दिनमें भोगे भोगवावे या भोगनेवाले अन्यको भला जाने ।। स ७५॥ (૧) રાત્રે ગ્રહણ કરીને રાત્રે જ ભોજન કરવુ (૨) રાત્રે ગ્રહણ કરીને દિવને ભોજન કરવુ (૩) દિવસે ગ્રહણ કરીને રાત્રે ભેજન કરવુ (૪) દિવસે ગ્રહણ કરીને (રાતભર રાખીને બીજે દિવસે ભોજન કરવું ભગવાને નિશીથ-સૂત્રના અગીઆરમા ઉદેશમાં કહ્યું છે– "२ मिनु सभा मशन-पान-मा-पाय अडए शन (मार) पिसे ભેગવે, બીજાને ભેગવા, અન્ય ભેગવનારને ભલે જાણે (સૂ ૭૩) જે સાધુ દિવસે અનાદિ લઈને અત્રે પિતે ભેગવે, બીજાને ભેગવા અને અન્ય ભેગવનારને ભલે જાણે (સુ ૭૪) જે સાધુ રાત્રે અશનાદિ લઈને દિવસે ભેગે, ભગવા યા ભેગવનારને सa ad (भू ७५) - २६२ श्रीदवकालिकमरे भोजन प्रत्याग्यामि, तदेव विशदगति में पति, अब अनन्तरम्-भधारभ्य अशनम् अश्यते-भुज्यते भुधोपशमनार्थ यत् तन-मोदन नप सक्त मुद्दामोदर-घृतपूर-लपन श्रीमभृतिकम् , पान-पीयते यत्नत्पान दुग्पादिक, तितण्डलादिधावनोक च । खायपादितु योग्य ग्यापम् अचित्तद्राक्षापर्जुरादि । स्वा=पादितु योग्य स्वार- लपगचूर्णपूगीफलादिरात्रिभोजनमपिद्रव्य-क्षेत्र-काल-भारमंदाचतुर्दा, तत्र द्रव्यतोऽ शनपानादिरम्, क्षेत्रतोऽत्तीयद्वीपसमुद्रक्षित, तदतिः प्रसिद्धदिनराव्यभावात् , फालतो राजौ, भारतो निगाशनामिलाप । रात्रिभोजनस्य मरूपतचतुर्भङ्गी यथा- लिए हे भगवन् ! में ममस्त-रात्रिभोजनमा प्रत्याग्यान करता है। अर्थात् भात, दाल, मत्तू, मगके लड्डू, घेवर, लप्सी आदि अशन, ध, तिल और चावलका चोवन आदि पान, प्रासुक दास, खजूर आदि ग्वाय, लोंगका चूर्ण, सुपारी आदि स्वाय, इन चार प्रकारके आरारों से किसी एक प्रकारका भी आहार रात्रिमें नहीं करूँगा। रात्रिभोजन भी द्रव्य क्षेत्र काल भावसे चार प्रकारका है । अशन पान आदि द्रव्यसे रात्रिभोजन है । अढाई दीपमे रात्रिभोजन करना क्षेत्र-रात्रिभोजन है, क्योंकि अढाई दीपके बाहर दिन रात्रिका व्यवहार नही है । रात्रिमे भोजन करना कालकी अपेक्षा रात्रिभोजन है । रात्रि भोजन करनेकी इच्छा करना भाव-रात्रिभोजन है। रात्रिभोजनकी चतुर्भगी इस प्रकार है- સર્વ–રાત્રિભેજનના પ્રત્યાખ્યાન કરૂ છુ અર્થાત–ભાત, દાળ, મગજ, મગના લાડુ ઘેબર, લાપસી આદિ અશન, દૂધ, તલ અને ચેખાનું છેવણ આદિ પાન, પ્રાણુ દ્રાક્ષ, ખજૂર આદિ ખાદ્ય, લવગનું ચૂર્ણ, સોપારી આદિ સ્વાઘ, એ ચારે પ્રકારના આહારમાથી કઈ પણ એક પ્રકારને આહાર રાત્રે હુ કરીશ નહિ રાત્રિભેજન પણ દ્રવ્ય-ક્ષેત્ર-કાળ-ભાવથી ચાર પ્રકારનું છે અન-પાને આદિ દ્રવ્યથી રાત્રિભોજન છે અહી– દીપમાં રાત્રિભોજન કરવું એ ક્ષેત્ર–રાત્રિભેજન છે, કેમકે-અઢી કપની બહાર દિવસ–રાત્રિને વ્યવહાર નથી રાત્રે ભજન કરવું એ કાળની અપેક્ષાએ રાત્રિભેજન છે રાત્રે ભજન કરવાની ઈરછા કરવી એ રાત્રિભેજન છે રાત્રિભોજનની ચતુર્ભગી આ પ્રમાણે છે. ભાવ - , - अध्ययन ४ सू. १४-१५ (१)-पृथिवीकाययतना २६५ टीका-इत्येतानि समनन्तरोदीरितलक्षणानि रात्रिभोजनविरमणपष्ठानि- रात्री भोजन रात्रिभोजन, रात्रिभोजनाद्विरमण रात्रिभोजनविरमण, पण्णा पूरण पष्ट पट्सख्यामपूरक, रात्रिभोजनविरमण पष्ठ येषु तानि पञ्च महारतानि आत्महितार्थाय आत्मने हितम्-इष्टमिति आत्महितम् , आत्मनो हित-मगल- मस्मादिति वाऽऽत्महितो मोक्षा,स एवार्थ:=प्रयोजनम् आत्महितार्थस्तस्मै तथोक्ताय उपसम्पय-सामस्त्येन स्वीकृत्य विहरामिम्सयमविपये विचरामि ॥१४॥ यतनापुरस्सरमेव प्रतग्रहण सफल भवतीत्यतस्तद्यतनास्वरूप प्रदर्श्यते- "से भिक्खू वा" इत्यादि। मूलम्-से भिक्खू वा भिक्खुणी वा सजयविरयपडिहयपच्चक्खाय- पावकम्मे दिया वा राओ वा एगओ वा परिसागओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा से पुढविं वा भित्ति वा सिलं वा लेल वा ससरक्ख वा काय ससरक्ख वा वत्थ हत्थेण वा पाएण वा कटेण वा किलिंचेण वा अगुलियाए वा सिलागाए वा सिलागहत्थेण वा न आलिहिज्जा न विलिहिज्जा न घहिज्जा न भिंदिज्जा, अन्न न आलिहाविजा, न विलिहाविज्जा, न घट्टाविजा, न भिदाविज्जा, अन्न आलिहत वा, विलिहत वा, घट्टत वा भिदत वा न समणुजाणिज्जा, जावज्जीवाए तिविह तिविहेण मणेण वायाए कारण न करेमि न कारवेमि हे भगवन् । मैं पाच महाव्रतोंको और छठे रात्रिभोजनविरमण व्रतको आत्माके हित-मोक्ष-के लिए स्वीकार करके सयममार्गमें विचरता हूँ ॥४॥ व्रतोंको यतनापूर्वक स्वीकार किया जाय तभी वे सफल होते हैं, इसलिए यतनाका कयन करते है-'से भिक्खू०' इत्यादि । હે ભગવન્! હુ પાચ મહાવ્રતને અને છઠા રાત્રિભેજનવિરમણ વ્રતને આત્માને હિત–સ્વરૂપ મેક્ષને માટે સ્વીકાર કરીને સયમમાર્ગમા વિચરૂ છું (૧૪) વતને યતનાપૂર્વક સ્વીકાર કરવામા આવે ત્યારે તે સફળ થાય છે, તેથી यतार्नु ४थन ४३ जे-जे भिक्खू० त्या म ३६४ श्रीदत्रयकालिकसूत्रे रत्तिं भुनइ मुजत या सारनाxxxxआवजा चाउम्मासिय परिहारहाण मू, ७६||" इति । तच सर्वमशनादिक रात्रौ ना स्वयं मुझे, इत्यादि सा व्यायातपूर्वम् ।।१३॥ सम्मति गृहीतमहारतः शिष्य उपसहरनाद होयाइ' इत्यादि । मूलम्-इच्चेयाइ पच महदयाई राइभोयणवेरमणछटाइ अत्तहि- ययाए उवसपजित्ताण विहरामि ॥१४॥ छाया-इत्येतानि पञ्च महानतानि रात्रिभोजनविरमणषष्ठानि आत्महिता योपसम्पद्य पिहरामि ॥१४॥ उपसहार. सान्वयार्थ ---इच्चेयाइ-ये पहले कहे हुए राहभोयणवेरमणछट्ठाइ छठे रात्रिभोजनविरमण प्रतके साथ पच महव्ययाह-पाच महाव्रतोको अहिय ट्ठयाए आत्मकल्याणके लिये उवसपजित्ताण स्वीकार करके विरामि- सयममें विचरता हूँ ॥१४॥ जो साधु रात्रिमे अशनादिक लेकरके रात्रिमें भोगे दुसरेको भोगवावे और अन्य भोगनेवालेको भला जाने ॥सू.७६॥ उसे चातुर्मासिक प्रायश्चित्त लगता है । इन सब अशन आदि चार प्रकारके आहारको सत्रिमे नहीं भोगूंगा, इत्यादिका व्याख्यान पहले कर चुके है ॥१३।। (६) अब महाव्रतोको स्वीकार करनेवाला शिष्य उपसहार करता हुआ कहता है-'इच्चेयाइ' इत्यादि । જે સાધુ રાત્રે અશનાદિ લઈને રાત્રે ભગવે, બીજાને ભેગવા અને અન્ય ભેગવનારને ભલે જાણે ( ૭૬) તેને ચાતુર્માસિક પ્રાયશ્ચિત્ત લાગે છે” એ સર્વ અશનાદિ ચાર પ્રકારના આહારને રાત્રે નહિ ભેગવુ, ઈત્યાદિના વ્યાખ્યાન પહેલા કરવામાં આવેલુ છે (૧૩) (૬) હવે મહાવ્રતને સ્વીકાર કરવાવાળે શિષ્પ ઉપસાર કરતે છતે કહે છે- इच्चेगइ त्या . अध्ययन ४ सू. १४-१५ (१)-पृथिवीकाययतना २६५ टीका-इत्येतानि समनन्तरोदीरितलक्षणानि रात्रिभोजनविरमणपष्ठानि%3D रात्रौ भोजन रात्रिभोजन, रानिभोजनाद्विरमण रात्रिभोजनविरमण, पण्णा पूरण पष्ट-पदसरयापपूरक, रात्रिभोजनविरमण पष्ठ येपु तानि पञ्च महाव्रतानि आत्महितार्थाय आत्मने हितम् इष्टमिति आत्महितम् , आत्मनो हितमगल- मस्मादिति वाऽऽत्महितो मोक्षा,स एवार्थः प्रयोजनम् आत्महितार्थस्तस्मै तथोक्ताय उपसम्पयन्सामस्त्येन स्वीकृत्य विहरामिम्सयमविपये विचरामि ॥१४॥ यतनापुरस्सरमेव प्रतग्रहण सफल भवतीत्यतस्तयतनास्वरूप प्रदर्श्यते- "से भिक्खू वा” इत्यादि । मूलम्-से भिक्खू वा भिक्खुणी वा सजयविरयपडिहयपच्चक्खाय- पावकम्मे दिया वा राओ वा एगओ वा परिसागओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा से पुढवि वा भित्ति वा सिलं वालेलं वा ससरक्ख वा काय ससरक्ख वा वत्थं हत्थेण वा पाएण वा कटेण वा किलिंचेण वा अगुलियाए वा सिलागाए वा सिलागहत्थेण वा न आलिहिज्जा न विलिहिज्जा न घटिज्जा न भिदिज्जा, अन्न न आलिहाविजा, न विलिहाविज्जा, न घट्टाविजा, न भिदाविज्जा, अन्न आलिहत वा, विलिहत वा, घट्टत वा भिदत वा न समणुजाणिज्जा, जावज्जीवाए तिविह तिविहेण मणेण वायाए काएण न करेमि न कारवेमि हे भगवन् । मैं पाच महाव्रतोंको और छठे रात्रिभोजनविरमण व्रतको आत्माके हित-मोक्ष-के लिए स्वीकार करके सयममार्गमें विचरता हूँ ॥४॥ व्रतोंको यतनापूर्वक स्वीकार किया जाय तभी वे मफल होते हैं, इसलिए यतनाका कथन करते हैं-से भिक्खू०' इत्यादि । હે ભગવન્! હુ પાચ મહાવ્રતને અને છડા નત્રિભેજનવિરમણ વ્રતને આત્માને હિત–સ્વરૂપ મેલને માટે સ્વીકાર કરીને સયમ–માર્ગમા વિચર છું (૧૪) વ્રતનો યતનાપૂર્વક સ્વીકાર કરવામાં આવે ત્યારે તે સફળ થાય છે, તેથી यतनार्नु ४५न 3रे छे-जे भिक्खू. त्या TM २६६ श्रीदशवकालिकमरे करतपि अन्न न समणुजाणामि! तस्स भते ! पडिकमामि निदामि गरिहामि अप्पाण बोसिरामि ॥१॥१५॥ छाया-समिभुर्ग मिकी या मयत-पित प्रतिहत-प्रत्याख्यातपापकर्मा दिवा वा रात्रौ या एकको मा परिणतो या गुप्ता नाग्रहा, स पृथिवीं वा मिति था शिला पा लेष्टु पा सरजस्तं पाशाय सरजम्क पा महम्तेन वा पान वा फाप्ठेन या फिलिश्चेन या अगुल्या पा शाकया ग शाकाहस्तेन वा नाऽऽलिखेत् न पिलिग्येन् न घट्टयेत् न मिन्यात, अय नाऽऽ लेखयेन्न ग्लेिखयेन पट्टयन मेदयेद, अन्यमालिग्मन्त पा रिलियन्त वा घट्ट यन्त वा भिन्दन्त पा न समनुजानीयात् ,, याराग्नीश्या निसि निविधेन मनसा वाचा कायेन न करोमि न कारयामि कुन्तिमप्यन्य न समनुनानामि । तस्माद् भदन्त । प्रतिक्रामामि निन्दामि गर्दै आत्मान व्युत्सनामि ॥२॥१५॥ (१) पृथ्वीफाययतना सान्वयार्थ:-सजयविरयपडित्यपचासायपावकम्मेवर्तमानकालीन सावध व्यापारोंसे रहित, भूत-भविष्यकालीन सापय व्यापारोंसे रहित, वर्तमान कालमें भी स्थिति और अनुभागकी न्यूनता करके तथा पहले किये हुए अविचारों की निन्दा करके साथ व्यापारके त्यागी, सेवह पूर्वोक्त भिक्ख वा-साधु भिक्खुणी वा अथवा साध्वी दिया वादिनमें राओ वा=अथवा रानिमें एगओ वा अकेला परिसागओ वा अथवा सबमें स्थित सुत्ते वा सोया हुआ जागरमाणे वा अथवा जागता हुआ रहे, वहा से बह पुढवि वा-पृथ्वीको भित्ति वा भीत-दीवार को सिल वाशिलाको लेन वाढेलेको ससरक्ख सचित्तरजसहित काय वा शरीरको ससरक्ख-सवित्त रजसहित वत्थ वा वस्त्रको हत्थेण वा हायसे पाएण वा-पैरसे कद्वेण वा-काठसे किलिंचेण वा-यास आदिरी खपञ्चसे अगुलियाए वा अगुलीसे सिलागाए वा-उडसे सिलागहत्येण वाम्बहुतसी छडोसे न आलिहिजा- जराभी सघर्पण न करे, न विलिहिजाघारम्बार सघर्पण न करे, न घटिज्मा- न घन करे-न चलावे, न मिदिज्जा न भेदे, अन्न दूसरेसे न आलिहावि ज्जाजराभी सघर्षण न करावे, न विलिहाविजा-न बारम्बार सघर्पण करावे, न घटाविज्जा-न घटन करावे, न भिदाविज्ञान भेदन करावे, आलिहत बार- सघर्पण करनेवाले विलिहत याचार पार सघर्पण करनेवाले घरत वा-बहन करनेवाले भिंदत वाम्भेदन करनेगले अन्न= दूसरेको न समणुजाणिज्जा- भला न समझे । इसलिय मैं जावज्जीवारा-जीरनपर्यन्त (इसको) तिविह-कृत- अन्ययन ४ सू. १५ भिक्षुत्वसिद्धिः २६७ कारित अनुमोदनारूप तीन करणसे (तथा) तिविहेण तीन प्रकारके मणेण== मनसे वायाए-बचनसे काण्ण-कायसे न करेमि-न करूँगा, न कारवेमि-न कराऊँगा,करतपि-करते हुए भी अन्न दूसरेको न समणुजाणामि=भला नहीं समझूगा। भते! हे भगवन् ! तस्स-उस दण्डसे पडिकमामिम्-पृथक होता हूँ, निंदामि=आत्मसाक्षीसे निन्दा करता हूँ, गरिहामि गुरुसाक्षीसे गर्दा करता हूँ, अप्पाण=दण्ड सेवन करनेवाले आत्माको चोसिरामि त्यागता हूँ ॥१॥१५॥ टीका-से-स-भिक्षात्तिकत्वेन प्रसिद्धः, भितुः-भिक्षितु-याचितु शील धर्मों वा यस्य स भिक्षुः । ('भिक्ष याश्चायामलाभे लाभे चे'-त्यस्माद्धातोः 'आकेस्तच्छील तद्धर्म-तत्साधुकारिपु' इत्यधिकारे 'सनाशसभिक्ष उ' (३।२।१६२) इत्युप्रत्यये भिक्षुपद सि यति)। 'उ' प्रत्ययेन ताच्छील्ययोतनाद् भिक्षणशीलत्व भिक्षुत्वमिति पर्यवस्यति । ननु कापायाम्बरधारिणामपि भिक्षोपजीवित्वेन तमोक्तभिक्षुलक्षणमतिव्याप्त- मिति चेन्न- भिक्षावृत्तिसे प्रसिद्ध भिक्षु कहलाते हैं, अर्थात् याचना करके आहारादि लेनेवालेको भिक्षु कहते हैं । सस्कृत व्याकरणके अनुसार 'भिक्षु' पदमे 'उ' प्रत्यय लगा हुआ है। उससे यह प्रगट होता है कि-भिक्षु उसे कहना चाहिए जो किसी वस्तुको विना भिक्षाके न लें, अर्थात् भिक्षणशील भिक्षु कहलाते हैं। प्रश्न-गेरुआ या अन्य किसी प्रकारके रगसे रगे हुए कपडे पहनने- वाले सन्यासी आदि भी भिक्षु माग कर अपने जीवनका निर्वाह करते हैं, इसलिए यह भिक्षुका लक्षण उनमे भी चला जाता है, वे भी भिक्षु कहलावेंगे। ભિક્ષાવૃત્તિથી પ્રસિદ્ધ હોય તે ભિક્ષુ કહેવાય છે અર્થાત્ યાચના કરીને આહારાદિ લેનારાને ભિમુ કહે છે, સકૃત વ્યાકરણને અનુસરીને મિલ્લ શબ્દમાં ૩ પ્રત્યય લાગે છે તેથી એમ પ્રષ્ટ થાય છે કે ભિક્ષુ એને કહે જોઈએ કે જે કઈ વસ્તુને ભિક્ષા વિના લે નહિ, અર્થાત ભિક્ષણશીલ હોય તે ભિક્ષુ કહેવાય છે પ્રશ્ન-ગેરથી યા અન્ય કોઈ પ્રકારના રંગથી રંગેલા કપડા પહેરનારા સન્યાસી આદિ પણ ભિક્ષા માગીને પિતાના જીવન નિર્વાહ કરે છે તેથી એ ભિક્ષુનું લક્ષણ એને પણ લાગુ પડે છે, તેઓ પણ ભિમુ કહેવાશે ?

- २६६ श्रीदनकालिको करतपि अन्न न समणुजाणामि । तम्स भते । पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाण चोसिगमि ॥१॥१५॥ छाया-गमिभुर्ण मिरी पा गयत गित मनिहत--प्रत्याम्यातपापकर्मा दिवा पा रात्री या पकी या परिणस्तो सोनाहा, स पृथिवी वा भित्रि पा शिला या लेटु या सरजस्क या काय सरजम्फ राम इस्तेन वा पादन वा फाप्ठेन गा फिलिश्शेन या अगुल्या या भगकया ग भाकाहस्तेन वा नालिखेत् न पिटिपेत् न घयेत् न मिन्यान् , अय ना लेखयेन विलेखयेन घट्येन भेदयेद, अन्यमालियन्त ग मिलिग्बत वा घट यन्त या भिन्दन्त पा न समनुजानीयात् , यानीपया निमि त्रिवियेन मनसा वाचा कायेन न करोमि न कारामि कन्तिमप्यन्य न समनुनानामि । तस्माद् भदन्त ! मतिकामामि निन्दामि गहें आत्मान व्युत्मजामि ॥१॥१५॥ (१) पृथ्वीकाययतना सान्वयार्थ:-सजयविरयपंडित्यपचवायपावकम्मे धनमानकालीन सावा व्यापारोंसे रहित, भूत-भविष्यकालीन सामय व्यापारोंसे रहित, वर्तमान कालमें भी स्थिति और अनुभागकी न्यूनता करके तथा पहले किये हुए अतिचारों की निन्दा करके साथ व्यापारके त्यागी, सेबह पूोत भिक्ख वा साधु भिक्खुणी चा अथवा साध्वी दिया वा-दिनमें राओ वा अथवा रात्रिमें एगओ वा अकेला परिसागओ वा अथवा सौ स्थित सुत्ते बा-सोया हुआ जागरमाणे वा अथवा जागता हुआ रहे, वहा से वह पुढवि वा पृथ्वीको भित्ति वा भीत-रीवार-को सिलवा-शिलाको लेल वाढेलेको ससरक्ख-सचित्तरजसहित काय वा शरीरको ससरक्ख-सचित्त रजसहित वत्थ वा-वस्त्रको हत्थेण चाहायसे पाएण वा-पैरसे कट्टेण धा-काठसे किलिचेण वा वास आदिती खपञ्चसे अगुलियाए वा भगुलीस मिलागाए वा-उडसे सिलागहत्थेण वाम्बहुतसी छडीसे न आलिहिला- जराभी सघर्पण न करे, न विलिहिजा बारम्बार सघर्पण न करे, न घटिज्जा- न घटन करे न चलावे, न भिदिज्जा-न भेदे, अन्न-दूसरेसे न आलिहाधि ज्जा-जराभी सघर्षण न करावे, न विलिहाविजा=न वारम्बार सर्पण करावे, न घट्टाविज्जाम्न घट्टन करावे, न भिदाविज्जा-न भेदन करावे, आलिस्त वा- सघर्पण करनेवाले विलिहत या चार बार सघर्पण करनेवाले घहत वाहन करनेवाले भिदत वा भेदन करनेवाले अन्न- दूसरे को न समणुजाणिज्जा- भला न समझे । इसलिये मैं जावज्जीवाण् जीवनपर्यन्त (इसको) तिविह-कृत- , २६९ अध्ययन ४ म्. १५ भिक्षुत्वसिद्धिः तथाहि शब्दस्य द्वे निमित्ते व्युत्पत्निनिमित्त मचिनिमित्त चेति, तत्र व्युत्पत्तिलभ्या- थमतीतौ प्रकारीभूतो धो व्युत्पत्तिनिमित्तम् , यथा पङ्कजशब्दस्य पङ्कजनिकर्तृत्वम् । सङ्केत्तग्रहे प्रकारीभूतो धर्मः प्रचिनिमित्तम् , यथा पद्मत्वजातिः । न च शब्दाना व्युत्पत्तिनिमित्वमेव प्रतिनिमित्तमिति वाच्यम् , पाचकादि- शब्दे तथात्वेऽपि पङ्कजादिशब्दे तद्व्यभिचारात् । तथाहि-पङ्कजपद 'पड्काजायते' शब्दोंकी प्रवृत्ति दो प्रकारसे होती है। जैसे कमलका वाचक एक पङ्कज शब्द है दूसरा पद्म शब्द है। पकज शब्दका अर्थ है कीचडसे उत्पन्न होनेवाला, कमल कीचडसे उत्पन्न होता है इसलिए पकजत्व व्युत्पत्तिनिमित्त है । अर्थात् पङ्कज शब्दकी व्युत्पत्ति करनेसे जो अर्थ निकलता है वही अर्थ उसके वाच्यमें (अर्थमें) ठीक-ठीक घट जाता है, इसे व्युत्पत्तिनिमित्त कहते हैं । दूसरा प्रवृत्तिनिमित्त है। शब्दके सकेतसे योध्य अर्थमे विशेषणभूत धर्मको प्रवृत्तिनिमित्त कहते हैं, जैसे पद्मत्व या कमलत्व(कमलपन)जाति। यदि कोई कहे कि- 'जो व्युत्पत्तिनिमित्त है वही प्रवृत्तिनिमित्त है तो ठीक नहीं है, क्योंकि यद्यपि 'पाचक' आदि शब्दोंमे जो व्युत्पत्ति- निमित्त है वही प्रवृत्तिनिमित्त है तथापि पङ्कज आदि शब्दों में यह कथन नहीं घटता, क्योंकि "पक (कीचड)से उत्पन्न होनेवाला पकज है" શબ્દોની પ્રવૃત્તિ બે પ્રકારે થાય છે જેમકે-કમળને વાચક એક શબ્દ છે, બીજો પદ્મ શબ્દ છે પકજ શબ્દને અર્થ કીચડમાં ઉત્પન્ન થએલું એ થાય છે કમળ કીચડમાં ઉત્પન્ન થાય છે, તેથી પકજવ વ્યુત્પત્તિનિમિત્ત છે અર્થાતુ પકજ-શબ્દની વ્યુત્પત્તિ કરવાથી જે અર્થ નીકળે છે તે જ અર્થ તેના વાચમા (અર્થમા) બરાબર બંધ બેસે છે, તેથી તેને વ્યુત્પત્તિનિમિત્ત કહે છે બીજે પ્રવૃત્તિનિમિત્ત છે શબ્દના સ કેતથી બોધ્ય અર્થમાં વિશેષણભૂત ધર્મને પ્રવૃત્તિનિમિત્ત કહે છે જેમકે–પદ્ધત્વ યા કમલત્વ (કમળપણ) જાતિ જે કઈ કહે કે-જે વ્યુત્પત્તિનિમિત છે તેજ પ્રવૃત્તિનિમિત્ત છે, તે તે બરાબર નથી કારણ કે જે કે “પાચક આદિ શબ્દમાં જે વ્યુત્પત્તિનિમિત્ત છે તેજ પ્રવૃત્તિનિમિત્ત છે, તથાપિ પકજ આદિ શબ્દમા એ કથન બંધ બેસતુ નથી, કારણ કે “પક (કીચડ)માથી ઉત્પન્ન થવાવાળું પકજ છે, –એ વ્યુત્પત્તિથી , लेते सकते हैं और न करते समय भी कर सकते है। दोनो अवस्थाओंमें २६८ श्रीदनकामित्र भिक्षाचिकये सति मितिरपिरहितरा हि मिश्रुस्तम् , तथा च स्वामि निदेशमन्तरेणापि जलाशमादितोऽपि स्वाम्येनापि जगदिग्रहणम्य तदीयजीविका न्तर्गतत्पेन,तथा पनाचिद् मिक्षाया अनामे परन पापनादिक्रियया, कन्ट मूलफला दिना च जीवननिहारोपामुक्तक्षणमियुयामागान् । न च 'मिक्षयो यदामिक्षमाणाम्तदातास्तु मिथुन परस्पभिक्षमाणस्वावस्था फथ तेपु गिधुशन्दः पात तदानी मिक्षणव्यापारामागा' दिति वाच्यम् , उभ- ग्यामप्यवस्थाया भिगन्दस्य प्रनिनिमित्तसनानेन मियुशन्दप्रवृत्तिसमवात् । उत्तर-जो मिक्षामे ही अपना निर्वाह करते और सिवाय भिक्षाके अन्य घृत्तिको कदापि स्वीकार नहीं करते वे ही मिल कालाते हैं, सन्यासी आदि स्वामीकी आजाके बिना भी जलाशय आदिसे मी जल आदि अपने हाथोंसे ले लेते है । जर भिक्षा नहीं मिलती तब पचन पाचनादि करते कराते हैं, तथा कन्द-मूल-फल-आदिसे निर्वाह कर हैं, इसलिए वे भिक्षु नही कहला सकते । प्रश्न-अच्छा, जो भिक्षासे ही अपना निर्वाह करे उसे भिक्षु कहते हैं तो साधु जय भिक्षाकी गवेपणा करेंगे तब ही भिक्षु कहलावेंगे, जिस समय स्वाध्याय आदि अन्य क्रिया करते होंगे उस समय भिक्षु कैसे कहलावेंगे ? उत्तर-भिक्षाकी गधेपणा करते समय भी साधुको भिक्षु कह भिक्षु शब्दकी प्रवृत्तिका कारण मौजूद है। ઉત્તર-જેઓ ભિક્ષાથી જ પિતાને નિર્વાહ કરે છે અને શિક્ષા સિવાય અન્યવૃત્તિને કદાપિ સ્વીકારતા નથી તેઓ જ ભિક્ષુ કહેવાય છે સન્યાસી આદિ સ્વામીની આજ્ઞા વિના પણ જળાશય આદિથી પણ જળ આદિ પિતાના હાથે લઇ લે છે, જ્યારે ભિક્ષા નથી મળતી ત્યારે રાધવા-રધાવવાની ક્રિયા કરે છે, તથા કઇ મૂળ ફળ આદિથી નિર્વાહ કરી લે છે, તેથી તેઓ ભિમુ કહેવાઈ શકતા નથી પ્રશ્ન-ઠીક, જેઓ ભિક્ષાથી જ પિતાને નિર્વાહ કરે તેમને ભિક્ષુ કહે છે તે સાધુ જ્યારે ભિક્ષાની ગવેષણા કરશે ત્યારે જ ભિમુ કહેવાશે, જે સમયે સ્વાધ્યાય આદિ અન્ય ક્રિયા કરતા હશે તે સમયે ભિક્ષુ કેવી રીતે કહેવાશે ! ઉત્તર-ભિક્ષાની ગોવણુ કરતી વખતે સાધુને ભિમુ કહી શકાય છે અને ન કરતી વખતે પણ કહી શકાય છે બેઉ અવસ્થામાં ભિક્ષુ શબ્દની પ્રવૃત્તિનું કારણ જુદ છે अध्ययन ४ स. १५ भिक्षुत्वसिद्धिः २७१ निकाऽऽशसाविरहेण समितिगुप्त्यादिधारित्वरूपप्रतिनिमित्तमादाय भिक्षुत्व-समि त्यादिपालकत्वयोभिभुलक्षणैकार्थसमवायेन कथश्चित्तादात्म्यलक्षणेन भिक्षमाणे - भिक्षमाणे वा भिक्षौ भिसुशब्दप्रवृत्तः, वर्तमानपर्यायमात्रग्रहणलक्षणऋजुसूत्रनया- भिप्रायाच भिक्षुत्वसिद्धिः । ननु पूर्वोक्तलक्षण प्रवृत्तिनिमित्त कापायाम्परधारिप्रभृतिष्वपि विद्यते, तेऽपि मार्ग पश्यन्त एव गच्छन्ति, तेन च तेपा समित्यादिपालकत्व, मौनादिसमवलम्ब- नेन गुप्तिपालकत्व चास्ति, ततश्च समिति गुप्तिपालकत्वरूपप्रवृत्तिनिमित्तस्य तेष्वपि सत्त्वेन कुतो न तेपा भिक्षुशब्दव्यवहार्यत्वमिति चेत् ? यत्त इहलोकायाशसाविरहिततया समित्यादिपालकत्वमेव भिक्षुशब्दमटत्ति- निमित्तसे भिक्षु शब्दकी प्रवृत्ति होती है, क्योंकि भिक्षुत्व और समिति- गुप्तिपालकत्व दोनों धर्म भिक्षुमे कथञ्चित् तादात्म्यसम्बन्धरूप एकार्थ- समवायसे रहते हैं। इसलिए भिक्षा न करते समय भी 'समितिगुप्ति- पालकत्व' -रूप प्रवृत्ति-निमित्तसे भिक्षु शब्दकी प्रवृत्ति होती है। शङ्का-समिति-गुप्तिपालकता तो गेरुआ आदि वस्त्र पहननेवालोमे भी पाई जाती है। वे भी मार्ग देखकर ही चलते हैं इसलिए वे समितिका पालन करते हैं । और कभी-कभी मौन रखते हैं इसलिए गुप्तिका भी पालन करते है । जर उनमें समिति-गुप्तिपालकता पाई जाती है तो उन्हें भी भिक्षु क्यों नही करना चाहिए? समाधान-इहलोक और परलोक सम्बन्धी आकाक्षा या स्वार्थरहित શબ્દની પ્રવૃત્તિ થાય છે, કારણ કે ભિભુત્વ અને સમિતિગુપ્તિ પાલકત્વ બેઉ ધર્મો ભિક્ષુમા કોઈપણ રીતે તાદાઓ સબ ધરૂપ એકાર્થ–સમવાયથી રહે છે તેથી ભિક્ષા ન કરતી વખતે સમિતિગુપ્તિ પાલકત્વ રૂપ પ્રવૃત્તિનિમિત્તથી ભિક્ષુ શબ્દની પ્રવૃત્તિ થાય છે શતા-સમિતિગુપ્તિ પાલકતા તે ગેરૂઆ આદિ વસ્ત્ર પહેરનારાઓમાં પણ જોવામાં આવે છે તેઓ પણ માર્ગ જોઈને જ ચાલે છે, તેથી તેઓ સમિતિનું પાલન કરે છે, અને કઈ કઈવાર મૌન રહે છે તેથી ગુપ્તિનું પણ પાલન કરે છે, જે તેઓમા સમિતિગુપ્તિ પાલકતા જોવામાં આવે છે, તે તેમને પણ ભિક્ષુ કેમ ન કહેવા જોઈએ? સમાધાન-ઈહલેક અને પરલોક સબધી આકાક્ષા અથવા સ્વાર્થ રહિત થઈને પણું साई २७० श्रीरभदेकालिन रति प्युटपाया पकननियापन्नेि शक्तनया पनरूपायोधक सदपि वैसा लादिप्यविमसनवारणाय पनव(जाति)रूप प्रतिनिमित्तमाढायत पत्रं बोपनि न लितरया। एपमत्रापि मिभुगन्दस्य भिक्षण प्पुस्पतिनिमित्तम्, भिक्षत इरपेशीलो भिधु रिति घ्युत्पतः । तथा चाऽभिक्षमाणस्वारस्थाया भिस्वापसक्तावपि ऐरिकपार इस व्युत्पत्तिसे पफज द कमलका ग्रोध तो कराता है परन्तु साथ शैवाल तथा इस प्रकारसे पैदा होनेवाले गहलके फूल आदिका अर्थ भी उससे निकलता है, क्योंकि वे भी कीचड़से पैदा रोते हैं। यदि व्युत्पत्तिनिमित्तको ही शादकी प्रवृत्तिमें कारण माना जाय तो शैवाल आदिमें भी पफज शब्दका प्रयोग हो जायगा, इस आपत्तिका निवारण करनेके लिए व्युत्पत्तिनिमित्तके सिवाय प्रवृत्तिनिमित्त कमलत्व धर्मकी भी आवश्यकता है, इससे शैवाल आदिका निराकरण हो जाता है, दोनों निमित्तोंस टीम-टीक अर्थका प्रतिपादन रोजाता है किजो कीचडसे 'उत्पन्न हो और जिसमें कमलत्वरूप सामान्य (जाति) पाया जाय उसे पङ्कज करते हैं। इसी प्रकार यहाँ 'भिक्षु' शब्दका व्युत्पत्तिनिमित्तमिक्षण (याचना) धर्म है, जिस समय साधु भिक्षण नहीं करते उस समय व्युत्पत्तिनिमित्तसे भिक्षु नही कला सकते, फिरभी 'समितिगुतिपालकत्व' -रूप प्रवृत्ति પકજ શબ્દ કમળને બેધ તે કરાવે છે, પરંતુ સાથે શેવાળ પૈદા થનાર વીતેલા શીંગડા આદિને અર્થ પણ તેમાંથી નીકળે છે, કારણ કે તે પણ કીચડમાથી પેદા થાય છે જે વ્યુત્પત્તિનિમિત્તને જ કારણરૂપ માનવામાં આવે તે શેવાળ આદિમા પણ પકજ જશે એ આપત્તિનું નિવારણ કરવાને માટે વ્યુત્પત્તિનિમિત્ત ઉપરાત પ્રવૃત્તિનિમિત્ત કમળ ધર્મની પણ આવશ્યકતા છે તેથી શેવળ આદિનું નિરાકરણ થઈ જાય છે બે નિમિત્તાથી બરાબર અર્થનું પ્રતિપાદન થઈ જાય છે કે જે કીચડમાથી ઉત્પન્ન થાય અને જેમાં કમલત્વરૂપ સામાન્ય (જાતિ) મળી આવે તેને પકજ કહે છે એ રીતે અહીં ‘ભિમુ” શબ્દને વ્યુત્પત્તિનિમિત્ત શિક્ષણ (યાચના) ધર્મ છે જે સમયે સાધુ ભિક્ષણ કર્તા નથી, તે સમયે વ્યુત્પત્તિનિમિત્તથી ભિક્ષુ નથી કહેવાતે, તે પણ समितिति-पार' રૂપ પ્રવૃત્તિનિમિત્તથી ભિક્ષુ તથા न्य प्रकार શબ્દની પ્રવૃત્તિમાં શબ્દને પગ થઈ अध्ययन ४ सू. १५ भिक्षुत्वसिद्धिः २७३ तेपामुद्गमोत्पादनादिदोपदुष्टान्नभोजित्व-सचित्ततोयकन्दमूलायासेवित्व-पचन-पाच- नादिक्रियेच्छानिवृत्त्यभावादिदोपदूपितत्वात् , अतो ये समितिगुप्तिधारका भिवा- मात्रोपनीविनोऽचित्तामेपणीयामुगमोत्पादनादिदोपराहित्येन विशुद्धा प्रमागोपेता च भिक्षा गृह्णन्ति, माणात्ययसमयेऽपि पचनपाचनादिनवकोटिविशुद्धिं नैव खण्ड- यन्ति त एव भिक्षुपदव्यवहारयोग्यता लभन्ते, इति विदेलिमम् । यद्वा क्षोभते शुभ्यति वा अन्तर्भावितण्यर्थतया क्षोभयति-सचालयति चतुर्गतिकससारे सकलपाणिन इति क्षुप्-अष्टविध कर्म (अन्तर्भावितण्याद् भौवादिकाद् देवादिकाद्वा 'क्षुभ सञ्चलने' अस्माद्धातोः 'सम्पदादित्वात किए) तद् ज्ञानदर्शनादिना भिनत्तिक्षपयतीति भिभुः (पृपोरादित्वात्सिद्धि) ॥ वाले सन्यासी आदि वास्तवमें भिक्षु नही कहला सकते, क्योकि वे उगम-उत्पादना आदि दोपोंसे दुपित अन्न आदि अगीकार करते सचित्त जल लेते हैं, सचित्त कन्द मूल आदिका सेवन करते है, पाचनादि क्रियाएँ करते हैं और इच्छाका दमन नहीं करते ह । 17 वास्तवमें वे ही भिक्षु कहलाने योग्य है जो समिति-गुप्तिके धारक नर भिक्षामात्रसे उपजीवी है, अचित्त एपणीय उद्गम आदि दोपरहिन विशुद्ध प्रमाणोपेत भिक्षा लेते है और प्राण जानेका अवसर आ जाने पर भी पचन-पाचन आदि नव कोटिकीविशुद्धताको खण्डित नहीं करते। अथवाससारके समस्त शरीरधारियोको क्षोभित करनेवाले ज्ञाना- वरणीय आदि आठ कर्मोंको भेदनेवाले भिक्षु कहलाते हैं । આદિ વરસ્તુત ભિક્ષુ કહેવાઈ શકતા નથી, કારણ કે તેઓ ઉદ્દગમ ઉત્પદ ! દેથી દૂષિત અન્ન આદિ અગીકારે છે, સચિત્ત જળ લે છે, નચિત્ત - મૃ. આદિનું સેવન કરે છે, પચન–પાશનાદિ ક્રિયાઓ કરે છે અને ઈરછાનું દાન નથી એથી કરીને વડુત તેઓ જ ભિક્ષુ કહેવાવા ગ્ય છે કે જેઓ સમિતિ ગુણિના ધારક તથા ભિક્ષામાત્રથી ઉપજીવી છે, અચિત્ત, એષણય, ઉદગમાદિ–દેષથી રહિત, વિશુદ્ધ, પ્રમાણપત ભિક્ષા લે છે, અને પ્રાણ જવાને અવસર આવે તે પણ પચન-પાચનાદિ નવ કેટિની વિશુદ્ધતાને ખડિત હતા નથી અથવા સમાજના સર્વ શરીરધારીઓને ભિત કરનારા જ્ઞાનાવરણીય આદિ આઠ કર્મોને ભેદનારા ભિક્ષુ કહેવાય છે , २७२ श्रीदवकालिको निमिषम्, तग तेपुन पिते तेपासमाविषमरते, रिकाण्टकादिनित्यर्थस्वाद, ग्रशस्फीर्यादिसम्पादनार्थत्वाग, नालम्तेषां प्रस्तुतः समितिगुप्त्यादिपामास विद्यते । अन्यथा-'गारनिगडयो तापटेन न नियामि, यावत्र समालपामि तापदद मृपात्यागी, यारत्मनिद्रोह तापनीर्यवती'-स्यामिमाना अपि केचिद् प्रतधारित्न व्यारियरन, मिन्तु नेपामान्तरिकेनायाः सततानुबन्धितया विध मानत्वान्न प्रतित्वमस्ति। किञ्च मिभुम्मन्येषु पायाम्बरधारिषु नैपाध्य मिथुशब्द आत्मसत्ता लमते, होकर जो समिति-गुप्तिका पालन करते है वे ही भिक्षु कालाते हैं। उनमें ऐसा नहीं पाया जातावितिसासे पचने के लिए मार्ग देख कर गमन नहीं फरते, किन्तु काँटे आदि लग जानेके भय मार्ग देवकर गमन करते हैं, और यश कीर्ति सम्पादन करनेके लिए मौन रगते हैं, इसलिए ये वास्तवमें समिति-गुप्तिके पालक नहीं हो सकते। यदि उन्हें समिति गुप्तिका पालक माना जाय तो वह मनुष्य भी व्रती ऐसी प्रतिज्ञा करे कि-"मैं जब तक वेडीमें जकड़ा हुआ है तब तक इसे नहीं मारूँगा" "जब तक न बोलू ता तक मृपावादका त्यागी हैं." "जय तक सोया रहँगा तथ तक अनौर्य व्रतका पालन करूँगा" वास्तवमें ऐसे मनुष्य व्रती नहीं कहलाते हैं, क्योंकि उनकी आन्तरिक इच्छा पापोंसे निवृत्त नहीं हुई है। गेरुआ आदि वस्त्र धारण करनेवाले और अपनेको भिक्षु समझने જેઓ સમિતિ ગુપ્તિનું પાલન કરે છે તેજ ભિક્ષુ કહેવાય છે તેઓને એવું જેવામાં આવતું નથી તેઓ હિંસાથી બચવા માટે માર્ગ જોઈને ગમન કરતા નથી, પરંતુ કાટા વગેરે વાગી જવાના ભયથી માગ જોઈને ચાલે છે અને યશ કીર્તિ સંપાદન કરવાને માટે મૌન રાખે છે, તેથી તેઓ વસ્તુતાએ સમિતિ-ગુમના જે તેમને સમિતિ મિના પાલક માનવામા આવે તે એ માણસ પણ વ્રતી કહેવાશે કે જે એવી પ્રતિજ્ઞા કરે કે- “ જ્યા સુધી હું બેડીથી બ ધાયલે છે ત્યાસુધી હું તેને નહિ મારૂ” “જ્યા સુધી હું ન બોલ ત્યાસુધી મૃષાવાદને ત્યાગી હું જવા સુધી સૂઈ રહીશ ત્યા સુધી અચૌર્યગતનું વસ્તુત એ માણસ વતી નથી કહેવાતે, કારણ કે એની આતરિક ઈચ્છા પાપથી નિવૃત્ત થઈ નથી ગેરૂઆ આદિ વસ્ત્રો ધારણ કરનારા અને પિતાને ભિક્ષુ માનનારા સન્યાસી करलायगा, जो પાલક નથી થઈ શક્તા पालन रीश " अभ्ययन ४ सू. १५ (१) पृथिवीकाययतना २७५ - रेकान्तस्थानस्थितोऽद्वितीयः, भावतो रागद्वेपरहितो वा, परिपद्गतः परि समन्ततः सीदन्ति-गच्छन्ति गत्वा सहता भवन्ति जना अस्यामिति परिपत् सभा, ता गतः परिपट्टतः साचादिसवस्थित इत्यर्थः, मुप्तावा यायादिजनितश्रमाप- नोदाथै रजनीमध्यमयामयुगलमात्र निद्रितः, जाग्रत-इन्द्रियादिकरणकविषयज्ञान- योग्यावस्था प्राप्त-निद्राविमुक्तो भवेत् । एवविधो भिभुर्वक्ष्यमाणरीत्या दुष्कृत्य न करोतीतिप्रदर्यते-'से'इति,सः-भिक्षुःपृथिवीं खनिसमुद्भतमृत्तिकारूपाम् ,भित्ति- सरित्तीरमृत्तिकाम् , शिला-विशालपापाणलक्षणाम् , लेट-पिण्डात्मकमृत्खण्डम् , सरजस्क सचित्तरजोऽवगुण्ठितम् , काय शरीरम् , वस्त्र-चोलपट्टप्रमुख च, पात्रा- दीनामप्युलक्षणमेतत् , एतेषु अन्यतम किमपि वस्तु हस्तेन करेण, पादेन चरणेन, काप्ठेन-खदिरादिदारुखण्डेन, फिलिश्चनप्रशादिकश्चिकया, अगुल्या करचरणा- वयवविशेषेण, शलाकया लोहादिरचितया, शलाकाहस्तेन पुजीकृतशलाकाभित्रा नाऽऽलिखे सकृत् अल्प वा न सघर्पयेत् , न विलिखेत् बहुशोऽविरत विशेषतो वा स्थित और भावसे रागद्वेपरहित होनेसे एकाकी, अथवा साधुओंके सघमे स्थित, स्वाध्याय आदिसे उत्पन्न श्रमको दूर करनेके लिए रात्रिके बीचके दो प्रहरोंमे सोते हुए, तथा जागते हुए भिक्षु, आगे कहे हुए सावध व्यापार नहीं करते है । खानसे निकली हुई मृत्तिकारूप पृथ्वीपर, नदीके किनारेकी मिट्टी पर, पत्थरकी शिलापर, मिट्टीके ढेलेपर, सचित्त धूलीसे धूसर काय, चोलपट्ट आदि वस्त्र तथा पात्र पर, अर्थात् इनमेसे किसीभी पदार्थपर हायसे, पैरसे, काष्ठसे, वास आदिकी सटक (छडी-खापटी)से, अगुलीसे, लोहे आदिकी बनी हुई छडसे, अथवा बहुतसी छडों (सलाइयों)से, न स्वय एकबार लकीर खीचे, न घार-पार लकीर खींचे अर्थात् इनको રહિત હોવાને કારણે એકાકી અથવા સાધુઓના સઘમા સ્થિત, સ્વાધ્યાય આદિથી ઉત્પન્ન થત શ્રમને દૂર કરવાને માટે રાત્રિની વચ્ચેના બે પહારમા સૂતા તથા જાગતા ભિક્ષુ, આગળ કહેલા સાવદ્ય વ્યાપાર કરતા નથી ખાણમાથી નીકળેલી માટીરૂપ પૃથ્વી પર, નદીના કિનારાની માટી પર, પત્થરની શિલા પર, માટીના ઢેફ પર, સચિત્ત ધૂળથી ધૂસર કાય, ચલપટ્ટો આદિ વસ્ત્ર તથા પગ પર અર્થાત એમાના ડેઈ પણ પદાર્થ પર હાથથી, પગથી, કાઠથી, વાસ આદિના ખપાટથી, આગળીથી, લેઢા આદિની સળીથી અનેક સળીઓથી ન પિતે એકવાર રેખા દોરે, ન રેખા રે, અર્થાત્ અથવા વારંવાર २७४ श्रीदनौकालिको गिनुकीसाध्वी । 'समय' इत्यादीनि मिणिपणानि मिक्या अपि योध्यानि उमपोः समानामगरणीरगन् । (१) पृथिवीपाययता। सयत-पिरत-प्रतिहत-पत्मा यात पापपर्मासयत'-वर्तमानकालिकमर्वसा वानुष्ठाननिटरः, पिरतः-अतीतकारिकपापा-जुगुप्मापूर्वक, भविष्यति च सारपूर्वकमुपरतो नित्त इत्यर्थः, अत पर प्रतिहत वर्तमानकाले स्थित्य नुभागहासेन नाशित, मत्पाण्यात कतातिचारनिदया भविष्यत्यकरणेन निराकृत पापकर्म-पापानुष्ठान येन स प्रतिहतमत्यार यातपापफर्मा, सयत वासी विरतश्च (विशेषणयोरपि परम्परविशेयरिगेपणभावविवक्षया समासो गतमत्यागतादिवत् ) सयतविरतबासौ प्रतिहतमत्याग्यातपापकर्मा चेति तथोक्त', दिवा-दिवसे, रातो-रजन्याम् , एका-एकाकी-द्रव्यतो ध्यानादिहेतो भिक्षुकी साध्वीको कहते है । सजय आदि विशेषण सा वीके साथ भी समझना चाहिए क्योंकि साधु और साध्वीका आचार प्रायः समान है। (१) पृथिवीकाययतना। वर्तमान कालके सब प्रकारके सावध व्यापारसे निवृत्त होनेके कारण सयत, अतीतकालीन पापोसे जुगुप्सा पूर्वक और भविष्यकालीन पापोंसे सवर-पूर्वक निवृत्त होनेसे विरत, सयत और विरत होनेके कारण वर्तमान कालमे स्थितियन्ध और अनुभागन्धको हास करके पापकर्मको नष्ट करनेवाले, दिनमे, रात्रिमे, द्रव्यसे ध्यान आदिके लिए एकान्तमे ભિક્ષુદી સાધ્વીને કહે છે સજય આદિ વિશેષણ સાધ્વીની સાથે પણ સમજવાનું છે, કારણ કે સાધુ અને સાધ્વીને આચાર પ્રાય સમાન છે (૧) પૃથિવીકાયયતના વર્તમાનકાળના સર્વ પ્રકારના સાવધ-વ્યાપારથી નિવૃત્ત હોવાને કારણે સયત, અતીતકાલીન પાપથી જુગુપ્સાપૂર્વક અને ભવિષ્યકાલીન પાપથી સવાર પૂર્વક નિવૃત્ત હેવાથી વિરત, સયત અને વિસ્ત હેવાને કારણે વર્તમાન કાળમાં સ્થિતિબધ અને અનુભાગધને હાસ કરીને પાપકર્મને નષ્ટ અને રાત્રે, દ્રવ્યથી ધ્યાન આદિને માટે એકાન્તમા સ્થિત અને ભાવથી રાગ-દ્વેષ , કરનારા, દિવસમા.

अध्ययन ४ सू. १६ (२)-अप्काययतना २७७ मणेणं वायाए कारणं न करेमि न कारवेमि करतंपि अन्नं न सम- णुजाणामि । तस्स भते । पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोलिरामि ॥२॥१६॥ छाया—स भिक्षुर्वा भिक्षुकी वा सयत-विरत-प्रतिहत-प्रत्याख्यातपापकर्मा दिवा वा रात्रौ वा एकको वा परिपद्गतो वा मृप्तो वा जाग्रद्वा स उदक वा अवश्याय वा हिम वा मिहिका वा करक वा हरतनु वा शुद्धोदक वा उदहा वा काय,उदका वा वस्त्र,सस्निग्ध वा काय,सस्निग्ध वा वस्त्र नाऽऽमृशेन सस्पृशेन्नाऽऽ- पीडयेन्न प्रपीडयेन्नास्फोटयेन्न प्रस्फोटयेन्नातापयेन्न प्रतापयेत् ,अन्येन नाऽऽमर्शयेन्न सस्पर्शयन्नाऽऽपीडयेन प्रपीडयेन्नाऽऽस्फोटयेन्न प्रस्फोटयेन्नाऽऽतापयेन्न प्रतापयेत् , अन्यमामृशन्त वा, सस्पृशन्त था, आपीडयन्त था, पपीडयन्त चा,आस्फोटयन्त वा, प्रस्फोटयन्त वा, आतापयन्त वा, प्रतापयन्त वा न समनुजानीयात् । यावज्जीपया त्रिविध त्रिविषेन मनसा वाचा कायेन न करोमि, न कारयामि, कुर्वन्तमप्यन्य न समनुजानामि । तस्माद् भदन्त ! प्रतिक्रामामि निन्दामि गर्दै आत्मान व्युत्सृजामि ॥२॥१६॥ (२) अपकाययतना. सान्वयार्थ:--सजयविरयपडित्यपचक्खायपावकम्मे वर्तमानकालीन सावध व्यापारोंसे रहित, भूत-भविष्यकालीन सावध व्यापारोसे रहित, वर्तमान कालमें भी स्थिति और अनुभागकी न्यूनता करके तथा पहले किये हुए अतिचारोंकी निन्दा करके सावध व्यापारके त्यागी से यह पूर्वोक्त भिक्खू वा साधु भिक्खुणी वा अथवा साध्वी दिया वा-दिनमें राओ वा अथवा रात्रिमें एगओ वा अकेला परिसागओवा अथवा सघमें स्थित सुत्तेवा-सोया हुआ जागरमाणे वा अथवा जागता हुआ रहे, वहा से बह-उदग वाजलको हिम वा-हिमको महिय वाकुहरे-धूअर-को करग वा-ओलेको हरतणुग वाधास पर चूद-बूद पड़ा हुआ जलविशेषको सुद्धोदग वा=आकाशसे गिरे हुए निर्मल जलको (और) उदउल्लवा-जलसे भीने हुए-गीले काय-शरीरको उदउल्ल वा वत्थ-जलसे भीगे हुए वस्त्रको ससिणिद्ध वा काय-कुछ-कुछ गीले शरीरको ससिद्धि वा वत्य- कुछ कुछ गीले वस्त्रको न आमुसिज्जा-जराभी स्पर्श न करे, न सफुसिज्जा अधिक स्पर्श न करे, न आवीलिज्जा-पीडित न करे, न पीलिज्जा अधिक पीडित न करे, न अक्खोडिज्जास्फोटन न करे, न पश्खोडिज्जा मस्फोटन नकरे, न आयाविज्जास्तपावे नही, न पयाविज्जा अधिक तपावे नहीं, अg- आवीलतं वा पवीलत वा, अक्खोडत वा, पक्खोडत वा, आयात २७६ श्रीनकारिको न पट्टयेन पाल्येत्, न भिन्मान पिटारगेदन विदीर्णतां नयेत् , तथाऽन्येन- (सूत्रे स्वाद्वितीया) मतिरिक्तननेन नालेगये , न विलेयेत्, न घोम्न मेदगेन, मालिगत निनियन्तं रायन्न राभिदन्त वा अन्य- व्यन्यन्तर न समनुनानीयान् नानुमन्येत, इत्पा भगादुपदिष्टाचारपद्धतिसर क्षणपरायणान्तःकरणोऽर यापनीया त्रिवि प्रिविधेनेत्यादि पूर्ववत् ॥११ ॥६५॥ सम्मति क्रममाप्तामप्काययतनामार-से भिर घा०' इत्यादि । मूलम् से भिक्खू वा भिस्खुणी वा सजय-विरय-पडिहय पञ्च- क्खायपावकम्मे दिया वाराओ वा एगओ वा परिसागओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा से उदग वा ओसं वाहिम वामहियं वा करगवा हरतणुगं वासुद्धोदगंवा उदउल्लवा कायं उदउल्लवा वत्थ ससिणिद्ध वा कार्य ससिणिद्व वा वत्थ न आमुसिना न सफुसिजा न आविलिज्जा न पविलिजा न अम्खोडिना, न पक्खोडिज्जा, न आयाविजा, न पयाविजा, अन्न आमुसत वा, संफुसत वा , वा, पयावतं वा न समणुजाणिज्जा ।जावजोवाए तिविह तिविहेण न घिसे तथा न हिलावे, न विदारे, न दुसरेसे ये सत्र क्रियाएँ करावे और न ये सब क्रियाएँ करते हुए अन्यको भला जाने । हे गुरुमहाराज । इस प्रकार सर्वज्ञ भगवान द्वारा उपदेश किए हुए आचारको रक्षा करनेमे मनको तत्पर रखनेवाला में तीन करण तीन योगसे यह सब कार्य नहीं करूँगा ॥२॥१५॥ अब अपकायकी यतनाका प्रतिपादन करते हैं-'से भिक्खू०' इत्यादि । એને ન ઘસે તથા ન હતા, ન વિદ્યારે, ને બીજા પાસે એ બધી ક્રિયાઓ કરાવે અને ન એ બધી ક્રિયાઓ કરનારા અન્યને ભલે જાણે હે શુરૂ મહારાજ એ પ્રકારે સર્વજ્ઞ ભગવાને ઉપદેશેલા આચારની રક્ષા કરવામાં મનને તત્પર રામનાર એ હુ ત્રણ કરણ ત્રણ યુગથી એ બધા शश नह (१) (१५) है मायनी यतनानु प्रतिपादन ४२ छे-से भिक्खू त्याlt કાર્ય अध्ययन ४ सू. १७ (३)-तेजस्काययतना २७९ शुद्धोदकम् आकाशात्पतित स्वभावनिर्मल सलिलम् । तथा उदकान्जलक्नि काय वस्त्र च । सनिग्यम्-स्निग्यमिति भावक्तान्तम् , स्नेहः-लिग्धत्वमिति तद- र्थस्तेन सह वर्तमान तत्-विन्दुरहितमीपदाई काय वस्त्र च, स्वय न आमशेद-आ ईपन 'आडीपदर्थेऽभिव्याप्तौ सीमार्थे धातुयोगजे' इति कोशात् , मृशेत्-स्पृशेत् , न स्पर्शयुक्त कुर्यादित्यर्थः। न सस्पृशेत्न्न सम्भकर्षेण स्पृशेत् । नापीडयेत्, न प्रपीड- येत् । नाऽऽस्फोटयेत् , न पस्फोटयेत् । नाऽऽत्तापयेत् , न प्रतापयेत् । शेष सुगमम् । एषु ('आमृशेत् सस्पृशेत्' इत्यादिपु) सर्वत्र धात्वर्थाऽविशेपेऽप्युपसर्ग(आ. स. प्र.)- कृतवाच्यबैलक्षण्यान्न पौनरुक्त्यदोपावसर इति यो-यम् ॥२॥१६॥ सम्पति तेजस्काययतनामाह-से भिक्खू वा' इत्यादि । मूलम् से भिक्खू वा भिक्खुणी वा सजय-विरय-पडिहय-पच्च- क्खाय-पावकम्मे दिया वा राओ वा एगओ वा परिसागओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा, से अगणि वा इगाल वा मुम्मुर वा अच्चि वा जाल वा अलाय वा सुद्धागणि वा उक्क वा न उजेजो न घज्जा न भिंदेजा न उज्जालेजा न पज्जालेज्जा न निवावेजा, अन्न आदिके अकुरोंपर जमनेवाले जलबिन्दु), वर्षाका निर्मल जल, इन सरको, तथा जलसे बहुत गीला या योडा गीला शरीर या वस्त्र, इन सबको स्वय एक बार स्पर्श न करे, बार-बार स्पर्श न करे, वस्त्रको एकबार न निचोडे, चार-चार न निचोडे, न एकबार झटके, न बार-बार झटके, न एकनार धूपमें सुखावे, न बार-बार सुखावे, न ये सब क्रियाएँ दूसरेसे करावे, न करते हुएको भला जाने, शेप सुगम है ॥२॥१६॥ अग्निकायकी यतना कहते हैं-से भिक्खू वा०' इत्यादि। જળ એ સવને, તથા જળથી બહુ લીલુ અથવા થેડુ લીલું શરીર યા વસ્ત્ર, એ સર્વને સ્વય એકવાર સ્પર્શ નહિ કરૂ, વાર વાર સ્પર્શ નહિ કરું, વસ્ત્રને એકવાર નહિ નીચેવુ, વાર વાર નહિ નીચેવુ, એકવાર નહિ ઝાટક, વારવાર નહિ ઝાટક, એકવાર તડકામાં નહિ સુકાવુ, વાર વાર નહિ સુકાવુ, નહિ એ બધી ક્રિયાઓ બીજા પાસે કરાવુ, અને કરનારને નહિ ભલે જિ सईदो छ (२) (१९) मनियनी यतना ४ छ-से भिक्खू वा० त्या , " શેષ ભાગ -- २७८ श्रीदशानियो दारेसे न मामुसायिजामनगगी पर्न न राणे, न समाविना अधिक पर्श न फरारे, न आपीलायिजा पीडिन न करावे, न पश्रीलाविजा- अधिक पीदित न पराने, न अपोटायिजाम्फोटन न करावे, न पक्लो टानिज्ज्ञा-मम्फोटन न परान आयारिजातपाते नहीं, न पयाविजा- अधिक तपगरे नहीं, आमुमत या मराभी म्पर्म करनेगले सफुसतं वा- अधिक स्पर्श करनेगले आगीलंत या पीडित करनेवाले पीलत वा अधिक पीडित करनेवाले अस्पोदत याम्फोटन करनेवाले पक्म्वोडत वा प्रस्फोटन करनेगले आयात चाम्पानेारे पयावतं वाषिक तपानेवाले अन्न-दूसरेको न ममणुजाणिज्जा-भला न रामझे। जावज्जीवा- जीवनपर्यन्त ( उसको ) निविरत कारित अनुमोदनारूप तीन फरणसे (तया) तिविहेण तीन ममारके मणेण मनसे वाया-वचनसे काण्ण-कायसे न करेमिःन करूँगा, न कारवेमिन कराऊँगा, करतपि- करते हुएभी अन्न दसरेको न समणुजाणामि-भला नहीं समझंगा । भते ! हे भगवन् ! तस्स-उस दण्डसे पडिकमामि पृथक होता है, निंदामि- आत्मसाक्षीसे निन्दा करता है, गरिरामिरु साक्षीसे गर्दा करता हूँ, अप्पाण-दण्ड - सेवन करनेवाले आत्माको वोसिरामि त्यागता हूँ ॥२॥१६॥ (२) अप्काययतना। टीका-सू भिक्षुर्वेत्यादि पूर्ववत् । उदक-प्रसङ्गात्तूपादिजलम् भूगर्भोगत स्रोतोजलमित्यर्थः, अवश्याय मेघमन्तरेण रानी-पतित सूक्ष्मतुपाररूपमप्कायम् । हिम-शीतत्तौं शीताधिक्येन घनीभूतमपकायम्-वर्फ'इति लोके प्रसिद्धम् । मिहिका- हेमन्त-शिशिरयो. कदाचित सान्द्रतया धमवत्प्रतिभासमानस्वरूपा कुज्झटिकाम् 'धूअर' इति लोकपसिद्धाम् । करक किरतिक्षति पानीयमिति करक-वर्षांप लम् । हरतनुम् भूमिमुद्भिद्य तृणावराशुपरि बिन्दुरूपेण स्थितमपकायविशेषम् । (२) अप्काययतना। भिक्षु और भिक्षुकी आदि पदोंका- अर्थ पहलेकी भाँति समझना चाहिए। कुण्का पानी अर्थात् भूमिमे सोता (अरना से निकलनेवाला जल,ओस,पाला,कुहरा (धूअर),ओला (गडा),हरतनु(भूमिको भेद कर गेहूँ (૨) અપૂકાયયતના ભિક્ષુ અને ભિભુકી આદિ શબ્દને અર્થ પહેલાની પેઠે સમજ કૂવાનું પાણી અર્થાત્ ભૂમિમાના સાત ઝરણ) થી નીકળતું જળ, ઓસ, ઠાર, ઝાકળ, કરા, હસ્ત (ભૂમિને ભેદીને ઘઉ આદિના અકરે ઉપર જામનાર જલબિન્દુઓ), વરસાદનું નિર્મળ .

२८१ - . , अध्ययन ४ मू. १७ (३)-तेजस्काययतना न घटेजा-चलावे, नहीं, न भिदेज्जा= भेदे नहीं, न उजालेज्जा-थोडाभी जलावे नही, न पज्जालेज्जा-भज्वलित करे नहीं, न निब्यावेज्जा-बुझाचे नहीं, अन्न-दूसरेसे न उजावेज्जाबढवावे नहीं, न घडावेज्जा-चलावे नहीं, न भिंदावेज्जा-भिदावे नहीं, न उज्जालावेज्जान जलवावे, न पज्जा. लावेज्जाम्न प्रज्वलित करावे, न निव्वावेज्जा-न बुझवावे, उजत वा वढानेवाले घट्टत वा-चलानेवाले भिदत वा भेदनेवाले उजालत वा- जलानेवाले पज्जालत वा प्रज्वलित करनेवाले निव्वावत वा-बुझानेवाले अन्न दूसरेको न समणुजाणिज्जा भला न समझे । जावज्जीवाए-जीवन- पर्यन्त ( इसको ) तिवि-कृत-कारित-अनुमोदनारूप तीन करणसे (तथा) तिविहेण तीन प्रकारके मणेण-मनसे वायाएबचनसे कारण कायसे न करेमिन्न करूँगा, न कारवेमिन्न कराऊँगा, करतपि% करते हुएभी अन्न-दसरेको न समणुजाणामि भला नही समझूगा । भते ! हे भगवन् ! तस्स उस दण्डसे पडिकमामि-पृथक होता हूँ, निंदामि आत्मसाक्षीसे निन्दा करता हूँ, गरिहामि गुरु साक्षीसे गर्दा करता हूँ, अप्पाण-दण्ड सेवन करनेवाले आत्माको वोसिरामि-त्यागता हूँ ॥३॥१७॥ टीका-अनि वहिम् ,अङ्गार-निर्धमज्याल ज्वलदिन्धनम् ,मुर्मुर अविरलस्फुलिङ्ग- समिश्रमस्मरूप तुपानल बा, 'मुर्मुरस्तु तुपानल.' इति वैजयन्तीकोशात् , अजा- लिण्डिकाग्निं वा, अचिन्मूलानिविच्छिन्ना ज्वालाम् , ज्वाला-दह्यमानणादिस- पद्धाऽऽमूलोद्ववमसारितेजोराशिम्, अलात ज्यलदग्रभाग काष्ठम् , शुद्धानिम्= अयापिण्डानुसबद विशुदादिरूप वा, उल्का मूलबझेविन्धि२ समन्तात्मसर्पद- मिकणात्मिकाम्, (चिनगारी, तडगिया, इति भापा) स्वय न उत्सिञ्चेत् न तो (३) तेजस्काययतना। अग्नि, अगारा, भूभल (गर्म राख) पकरीकी लेंडीकी आग, मूलसे टूटी हुई ज्वाला, मूलसे अविच्छिन्न ज्वाला, लुआठा (जलती हुई लकडी), गर्म लोहेके गोलेकी या विजलीकी अग्नि, अथवा चिनगारी (૩) તેજસ્કાયયતના અગ્નિ, અગારા, ગરમ રાખ, બકરીની લીંડીની આગ, મૂળથી તૂટેલી જવાળા, મૂળથી અવિચ્છિન્ન વાલા, બળતા લાકડા, ગરમ લેખડના ગોળાને અથવા વિજળીને અગ્નિ, અથવા ચણગારી આદિમા પોતે ઈધન (બળતણ) નહિ , - वा-साधु भिक्खुणी वा अथवा साध्वी, दिया वादिनमें राओ वा अथवा २८० श्रीववेकशामित्रे न उंजावेजा न घटावेजा न भिंदावेजा, न उन्नालावेज्जा न पज्जालावेज्जा न निघावेज्जा, अग्नं उजतं वा घट्टत वा भिदतं वा उज्जालत वा पज्जालंतं वा निद्यावत वा न समणुजाणिज्जा। जावज्जीपाए तिविह तिविहेण मणेणं वायाए कारणं न करेमि न कारवेमि करतपि अन्न न समजाणामि। तस्स भते! पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाण बोसिरामि ॥३॥१७॥ छाया-स मिथुर्ग मिसुकी गा सपतरितमविशवप्रत्याख्यातपापा दिवा वा रात्री पा एकको गा परिपगतो या मुप्तो पा जाग्रता, सः अनि वा र वा मुर्मुर वा अर्चाि चाला या अलात वा शुद्धानि वा उल्का वा नोत्सित् न घट्टयेत् न मिन्यान्नोज्ज्यालयेन्न प्रचालयेन्न निर्वापयेद्, अन्येन नोत्सेचयेन्न घट्टयेन भेदयेन्नोज्ज्वालयेन प्रज्यालयेन निर्वापयेद , अन्यमुत्सिश्चन्त वा घड्यात वा भिन्दन्त पा उज्ज्यालयन्त पा मज्वालयन्त वा निर्वापयन्त वा न समनुनानी यात् । यावज्जीवया विविध त्रिविधेन मनसा वाचा कायेन न करोमि न कारयामि कुर्वन्तमप्यन्य न समनुजानामि । तस्माद् भदन्त ! प्रतिक्रामामि निन्दामि गर्ने आत्मान व्युत्सृजामि ॥३॥१७|| (३) तेजस्काययतना. सान्वयार्थः-सजयविरयपडिहयपचक्खायपावकम्मे वर्तमानकालीन साव व्यापारोसे रहित, भूत-भविष्यत्कालीन सावध व्यापारोंसे रहित, वर्तमान कालमें भी स्थिति और अनुभागकी न्यूनता करके तथा पहले किये हुए अतिचारोंकी निन्दा करके सावत्र व्यापारके त्यागी, सेबह पूर्वोक्त भिक्ख रात्रिमें, एगओ वा-अकेला परिसागओ वा अथवा सघम स्थित, सुत्ते वा सोया हुआ जागरमाणे वा अथवा जागता हुआ रहे, यहा से वह अगणिं था-अग्निको इगाल वा=अगारेको मुम्मुरथा-पुर्मुर-भूभूदर (तुपानि) को अचि वा ज्योति मूलाग्निसे विच्छिन्न ज्वालाको, जाल वामूलाग्निसे अविच्छिन्न जलती हुई ज्वालाको, अलाय वा-निसका अग्रभाग जल रहा हो ऐसे काठको, सुद्धागणिं वा शुद्ध अनि लोहपिण्डमें सबद्ध अग्नि अथवा विजलीरूप अग्निको, उक्क वा-चिनगारियोको न उजेजा=इधन डालकर बढावे नही, , अध्ययन ४ स. १८ (४) वायुकाययतना. २८३ ननेन वा तालहन्तेन वा पत्रेण वा पत्रमद्देन वा शाखया या शाग्यामरेन । पिहनेन वा पिहुनहस्तेन वा चैलेन वा चैलकर्णेन वा हस्तेन गा मुखेन या, आत्मनो चा काय बाह्य वाऽपि पुद्गल न फूत्कुर्यात्, न पीजयेत् , अन्येन न फूत्कारयेश वीजयेद्, अन्य फूत्कुर्वन्त वा वीजयन्त वा न समनुजानीयात। यापज्जीपया विविध त्रिविधेन मनसा वाचा कायेन न करोमि न कारयामि कुर्वन्तमप्यन्य न समनु जानामि। तस्य भदन्त ! प्रतिकामामि निन्दामि गर्दै आस्मान व्युत्पजामि॥४॥१८॥ (४) आयुकाययतना. सान्वयार्थ:-सजयविरयपदित्यपचयायपावकम्मेपर्तमानकालीन सावध व्यापारोंसे रहित, भूत-भविष्यत्कालीन सारय व्यापारोंसे रहित, वर्तमान कालमें भी स्थिति और अनुभागकी न्यूनता फरके तथा पहले किये हा अगि- चारोंकी निन्दा करके सापय व्यापारके त्यागी से पद पूर्वोक्त भिरा पा- साधु भिक्खुणी चा=अथवा साध्वी दिया चा-दिनमें राओ चा-अथवा रात्रि एगओ चा अकेला परिसागओवा अथा सबमें स्थित सुत्ते घा-सोया प्रमा जागरमाणे वा अथवा जागता हुआ रहे, यहाँ से बह सिण्ण चा-यामरसे, विषुणेणवा-पखेसे, तालिअटेण घाताडके पखेसे, पत्तेण घा-पसे, पत्तभगेण चा-बहुतसे पत्तोंसे, साराचा गाग्वा टाली-से, माहामंगेण या शाखाके खण्डसे, पिटुणेण वा मोरपीठीसे, पितृणहत्येण धागोरपीरियों के समूहसे, चेलेण वा-कपडेसे, चेलकण्णेणा-कपटेके गोर-पो मे, पत्थेण वा हायसे, मुहेणवा-मुरवसे, अप्पणो पा-अपने काय शरीरको, घा-अषया योहिर वि पुग्गल बाहरी पुद्गाटोको भी न फुमेना-फान मारे,न घोगजात चवर आदिसे हवा न करे, अन्न-दूसरेसे न कुमारजाक न माराये, न वीआवेज्जा हवा न करावे, फुमतं चायनेगा यीमत याया फररोया अन्नदूसरेको नसमणुजाणिज्जा मगनमम । जावज्जीयाप भीगापर्यन (उसको)तिविह-कृत कारित अनुमोदनाम्प तीन फरणमे (तया) तिपिहितीन प्रकारके मणेण मनसे वाया चचनसे फागण यायमेन फरेमिकाँगान कारवैमिनकराऊँगा, करतंपि-करते हुए भी अनदगारको नाममणुगाणामि भला नहीं समझेंगा। मते!द, मगन ! तम्म उम दण्टम पश्मिामामि-- पृथक् होता है, निंदामि आत्ममासीसे निन्दा याना। गर्दा करता हूँ, अप्पाण-दण्ट मेवन यरनेपाटे मामाका त्यागता हूँ ॥१८॥ * २८२ श्रीनवेकालिकसूत्रे न्धनादिक प्रतिपेन्, न घटयेत्न समालयेन् , न भिन्याण्डेटकरवाडादिना न स्फोटयेत्, न उग्ग्यालयेन्तालयन्तादिना मारल्प पान मापयेत् न वर्षयेदि- त्यर्थः, न मनालयेत्=मतत ग्रहगो या न प्रचलित कुर्यात्, न निर्वापयेत्न पिण्यापयेत् न निर्वाण नयेदित्यर्थः, अन्येन न उनसे यदित्यानि सामुगमम् ॥३॥१७॥ पापुकाययतनामाइ-से भिर चा०' इत्पादि । मूलम्-से भिक्खू वा भिक्खुणी वा सजय-विरय-पडिहय-पञ्चक्खाय- पावकम्मे दिया वा राओ वा एगओ वा परिसागओ वा सुत्ते जागरमाणेवा, से सिएण वा विहुणेण वा तालिअंटेण वा पत्तेण वा पत्तभगेण वा साहाए वा साहाभगेण वा पिहुणेण वा पिहुणहत्थेण वा चेलेण वा चेलकन्नेण वा हत्येण वा मुहेण वा अप्पणो वा काय चाहिर वावि पुग्गलं न फुमेजा न वीऐजा, अन्न न फुमावेजा न वीआवेजा, अन्न फुमत वा वीअत वा न समणुजाणिज्जा । जावजीवाए तिविह तिविहेण मणेण वायाए कारण न करेमि, न कारवेमि,करतपि अन्न न समणुजाणामि। तस्स भते । पडिक्कमामि निदामि गरिहामि अप्पाण वोसिरामि ॥४॥१८॥ छाया-स भिक्षुर्वा भिक्षुकी वा सयतविरतपतिहतमत्यारयातपापकर्मा दिवा वा रात्रौ वा एकको वा परिपद्गतो वा सुप्तो वा जाग्रता, स सितेन वा विधू- आदिमे स्वय इन्धन न डाले, न सचालन करे (न सघटा करे), न दड ईट आदिसे उसे भेदे, न पखा आदिसे एकवार प्रज्वलित करे, न वार-चार प्रज्वलित करे, न वुझावे । न ये सब क्रियाएँ दूसरेसे करावे, न करते हुएकी अनुमोदना करे, इत्यादि सब पूर्ववत् ॥३॥१७॥ वायुकायकी यतना कहते हैं-'से भिक्खू वा०' इत्यादि । નાખે, નહિ સ ચાલન કરે (નહિ સમઘટન કરે, નહિ દડ કે ઈટ આદિથી તેને ભેદે, નહિ પખા વગેરેથી તેને એકવાર પ્રજવલિત કરે, નહિ વાર વાર કરે, નહિ બુઝાવે, નહિ એ બધી ક્રિયાઓ બીજા પાસે કરાવે, કરનારની નહિ मनुभाहना ४२ त्यादि पूर्ववत् (3) (१७) पायुआयनी यतना 3 छे-से भिक्खू वा. त्या પ્રજવલિત अ ययन ४ सू.१९ (५)-वनस्पतिकाययतना २८५ मूलम्-से भिक्खू वा भिक्खुणी वा सजय-विरय-पडिहय-पञ्चक्खाय- पावकम्मे दिया वा राओ वा एगओ वा परिसागओ वा सुत्त वा जागरमाणे वा, से वीएसु वा बीयपडद्वेसु वा रूढेसु वा रूढपइटेसु वा जाएसु वा जायपडढेसु वा हरिएसु वा हरियपडढेसु वा छिन्नेसु वा छिन्नपडढेसु वा सचित्तेसु वा सचित्तकोलपडिनिस्सिएसु वा न गच्छेज्जा न चिडेजा न निसीडज्जा न तुयहिज्जा, अन्न न गच्छाविजा न चिहाविजा न निसीयाविजा न तुयट्टाविजा, अन्न गच्छत वा चिट्टतं वा निसीयत वा तुयदृतं वान समणुजाणिज्जा ।जावजीवाए तिविह तिविहेण मणेण वायाए काएण न करेमि न कारवेमि करतपि अन्न न समणुजाणामि। तस्स भते । पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाण वोसिरामि ॥५॥१९॥ छाया-सभिक्षुर्वा भिक्षुकी वा सयतविरतप्रतिहतमत्याख्यातपापकर्मा दिवा वा रात्रौ वा एकको वा परिपगतो वा मुप्तो वा जाग्रता, स पीजेपु वा पीजप्रतिष्ठि- तेषु चा रूढे पा रूढपतिष्ठितेषु वा जातेषु वा जातपतिष्ठितेपु वा हरितेपु वा हरितपतिप्ठितेपु वा उिन्नेषु वा छिन्नमतिष्ठितेषु चा सचित्तेपु वा सचित्तकोल- प्रतिनिधितेषु का न गच्छेन्नतिष्ठेन्न निपीदेन त्वर्तियेत्, अन्य न गमयेन्न स्था- पयेन निपादयेन्न त्वग्वर्त्तयेत् , अन्य गच्छन्त वा तिष्ठन्त वा निपीदन्त वा त्वम्व- तयन्त वा न समनुजानीयात् । यावज्जीवया निविध त्रिवियेन मनसा वाचा कायेन न करोमि न कारयामि कुर्वन्तमायन्य न समनुजानामि । तस्य भदन्त ! प्रतिक्रामामि निन्दामि गई आत्मान व्युत्सृजामि ॥५॥१९॥ (५) बनस्पतिकाययतना. सान्वयार्थ -सजयविरयपडियपच्चक्खायपावकम्मे वर्तमानकालीन सावध व्यापारीसे रहित, भूत भविष्यत्तालीन सावध व्यापारीसे रहित, वर्तमान कालमें भी स्थिति और अनुभागकी न्यूनता करके, तथा पहले किये हुए अतिचारोकी निन्दा करके साथ व्यापारके त्यागी से यह पूर्वोक्त भिक्खू वा साधु भिक्खुणी चा अथवा साची दिया वा=दिनमें, राओ वा अथवा २८४ श्रीवाडालियो (४) पायुकाययतना। टीका-सितेन चामरेण श्रेत्तरयगुणागेनोपचाराद, विघूननेन-वीजनकेन, तालवृन्तनम्ताले करतले= वृन्त बन्यनमम्गति, तालस्येव वृन्तमस्येति, तान्यते- फरादिनाऽऽान्यत इति तालम् , उभपोरेकम्पम्मरणाद, तारा हन्तं यम्मेति या ताल्पृन्ततालपत्रादिरचित न्पनन तेन, उपलक्षणमिद निशुद्रयानादीनामपि, पत्रेण कमलिनीदलादिना, पत्रमनेनन्दलशकलेन, भाग्वया-सभुजया, शाखाम- डेन तदेकदेशेन, पिहनेन-धर्दियण (मपूपिन्टेन) पिडुनहस्तेन-पुजीकृतमयूर- पिन्छेन, चैलेन-बनेण, चैलकर्णेनश्चलेन(वखमान्तेन) हस्तेन करेण, मुखेन वदनेन, आत्मनः स्त्रस्य काय-शरीर पावमपि पुद्गलम् उष्णदुग्धादिक वास्त्रय न फूत्कुर्यात्-न मुखेन धमेद् , न पीजयेत्-चामरादिना वात न सञ्चालये, अन्येन चा न फूत्कारयेत्, इत्यायन्यत्सुरोधम् ॥४॥१८॥ वनस्पतिकाययतनामाह-'से भिस्खू घा०इत्यादि (४) वायुकाययतना। चॉवरसे, पखेसे,ताड़के बने हुए पखेसे अथवा अन्य पिजली आदिके किसी प्रकारके पखेसे, कमल आदिके पत्तेसे, पत्तेके टुकड़ेसे, वृक्षकी शाखासे, शाखाके खण्डसे,मयूरके पिच्छसे, मयूरके बहुतसे पिच्छोंसे, घनसे, वस्त्रके पल्ले (छोर)से, हाथसे, मुखसे, अपने शरीरको तथा अन्य गरम द्ध आदि पुद्गलोंको न स्वय फॅके, न चॉवर आदिसे वीजे वायुका सचालन करे, न दूसरेसे फूकावे, न वोजावे, न फेंकते हुए तथा वीजते हुए अन्यको भला जाने, इत्यादि सुगम ही है ॥ ४ ॥१८॥ वनस्पतिकायकी यतना कहते हैं-से भिक्खू वा०' इत्यादि। (४) वायुआययतना. ચામરથી, પખાથી, તાડના બનાવેલા પખાથી, અથવા આદિ કઈ પ્રકારના પખાથી, કમળ આદિના પાદડાથી પાદડાના ટુકડાથી, વૃક્ષની शामाथी, शान थी, मयूरना vिथी, मयूरना मने पाथी, परथी, વશ્વના છેડાથી, હાથી, મુખથી, પિતાના શરીરને, તથા બીજા ગરમ દૂધ આદિ પુગલેને નહિ સ્વય ફૂકે, નહિ ચામર આદિથી વિઝ-વાયુનું સંચાલન કરે નહિ બીજા પાસે કુકાવે, કે કુકનાર તથા વીંઝનાર અન્યને ભલે જાણે ઈત્યાદિ સરલ छ (४) (१८) बनस्पतियनी यतना डे छ-से भिकम्बू वा. त्या અન્ય વિજળી अ ययन ४ मू. १९ (५)-वनस्पतिकाययतना २८५ मूलम् से भिक्खू वा भिक्खुणी वा सजय-विरय-पडिहय-पच्चक्खाय- पावकम्मे दिया वा राओ वा एगओ वा परिसागओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा, से वीएसु वा वीयपइडेसु वा रूढेसु वा रूढपइडेसु वा जाएसु वा जायपइटेसु वा हरिएसु वा हरियपइटेसु वा छिन्नेसु वा छिन्नपडढेसु वा सचित्तेसु वा सचित्तकोलपडिनिस्सिएसु वा न गच्छेज्जा न चिटेजा न निसीइजा न तुयटिज्जा, अन्न न गच्छाविज्जा न चिहाविजा न निसीयाविजा न तुयथाविजा, अन्न गच्छत वा चिट्टतं वा निसीयत वा तुयदृतं वा न समणुजाणिज्जा ।जावजीवाए तिविह तिविहेणं मणेण वायाए काएण न करेमि न कारवेमि करतपि अन्न न समणुजाणामि।तस्स भते । पडिकमामि निदामि गरिहामि अप्पाण वोसिरामि ॥५॥१९॥ छाया-स भिक्षु भिक्षुकी वा सयतविरतप्रतिहतमत्याख्यातपापकर्मा दिवा वा रानो वा एकको वा परिपद्गतो वा सुप्तो वा जाग्रद्वा, स पीजेपु वा वीजप्रतिष्ठि- तेषु वा रूढेषु पा रूढपतिष्ठितेषु वा नातेषु वा जातप्रतिष्ठितेषु वा हरितेषु वा हरितप्रतिष्ठितेषु वा छिन्नेषु वा छिन्नमतिष्ठितेषु वा सचित्तेपु वा सचित्तकोल- प्रतिनिश्रितेषु चा न गच्छेन्नतिष्ठेन्न निपीदेन त्ववर्त्तयेत् , अन्य न गमयेन्न स्था- पर्यन्न निपादयेन्न त्वग्वर्त्तयेत्, अन्य गच्छन्त वा तिष्ठन्त वा निपीदन्त वा त्वग्व- वा न समनुजानीयात् । यावज्जीवया त्रिविध त्रिवियेन मनसा वाचा कायेन न करोमि न कारयामि कुर्वन्तमायन्य न समनुजानामि । तस्य भदन्त! प्रतिक्रामामि निन्दामि गर्दै आत्मान व्युत्सृजामि ॥५॥१९॥ (५) बनस्पतिकाययतना सान्वयार्थ -सजयविरयपडियपचक्खायपावकम्मे वर्तमानकालीन सावध व्यापारोसे रहित, भूत भविष्यकालीन सामन्य व्यापारोसे रहित, वर्तमान काल्में भी स्थिति और अनुभागकी न्यूनता करके, तथा पहले किये हुए अतिचारोंकी निन्दा करके साथ व्यापारके त्यागी से यह पूर्वोक्त भिक्खू वा-साधु भिक्खुणी वा अथवा साध्वी दिया वा-दिनमें, राओ वा अथवा त्यन्त , श्रीदभवेकालिकमरे रात्रिमें, एगओ घा-अकेला परिमागओ चा अथवा सौ स्थित सुसे चा-सोया हुआ जागरमाणे वा अया जागता हुआ रहे, वहाँ से वह पीण् था-शालि आदि चीजोपर, पीयपहहेसु या वीजॉपर रखे हुए शयन आसन आदि पर, रूदेसु वा अदुरित वनस्पति पर, रूढपहेसु वा अङ्कुरित वनस्पति पर रखे हुए शयन आसन आदि पर, जासु वा-पत्ते आनेकी अवस्थावाली वनस्पति पर, जायपढेसु चा-पत्ते आनेकी अवस्थावाली वनस्पति पर रखे हुए शयन आसन आदि पर, हरिण्सु वा हरित पर, हरिय- पइटेसु या हरित पर रखे हुए शयन आसन आदि पर, जिनेसु वा-कटे हुए हरित पर छिन्नपहेसु वा कटे हुए हरित पर रखे हुए आसन आदि पर, सचित्तेसु चा-फिर अन्य सचित्त अण्डा आदि सहित वनस्पति पर, सचित्त- कोलपडिनिस्सिएसु वा धुने हुए-सडे काठ पर न गच्छेना=गमन न करे, न चिटज्जान खड़ा होवे न निसीइज्जा-न वैठे, न तुअहिज्जा- न सोचे, अन्न दुसरेको न गच्छावेज्जान चलावे न चिट्ठावेज्जा-न खडा करे न निसीयावेज्जान बैठावे, न तुअाविज्जान मुलावे, गच्छत वा-चलते हुए चिढत वाखडे होते हुए निसीयत वा बैठते हुए तुयदृत वा सोते हुए अन्न-दूसरेको न समणुजाणेज्जाम्भला न जाने । जावज्जीवाए जीवनपर्यन्त ( इसको ) तिवि-कृत कारित अनुमोदनारूप तीन करणसे (तथा) तिविहेण तीन प्रकारके मणेण मनसे वायाए बचनसे कारण-कायासे न करेमि=न करूँगा, न कारवेमिन कराऊँगा, करतपि3 करते हुएभी अन्न दूसरेको न समणुजाणामि भला नही समझूगा । भते! हे भगवन् ! तस्स उस दण्डसे पडिकमामि-पृथक होता हूँ, निंदामि%D आत्मसाक्षीसे निन्दा करता हूँ, गरिहामि-गुरुसाक्षीसे गर्दा करता हूँ, अप्पाणा-दण्ड सेवन करनेवाले आत्माको चोसिरामि-त्यागता हूँ ॥५॥१९॥ (५) वनस्पतिकाययतना टीका-वीजेषु-शाल्यादिषु, बीजप्रतिष्ठित्तेपु-बीजोपरिस्थितेषु शयनाऽऽस- नादिषु, एमग्रेऽपि प्रतिष्ठितपदव्याख्या कार्या, रूढेषु अङ्कुरितेपु, जातेपु-परो (९) वनस्पतिकाययतना । शालि आदि बीजों पर,बीजों पर रखे हुए शय्याआसन आदि पर,अकुरों (૫) વનસ્પતિકાયયતના ડાગર આદિ બીજો પર, બીજે પર મુકેલા શયા - - ५२, . अ ययन ४ मू. १९ (५)-वनस्पतिफाययतना २८७ हणाऽनन्तरकालिकास्था सम्माप्तेषु पत्रितेपिन्यर्थः, इरितेपु-कीरमयूरपक्षसच्छा- यता गते', छिन्नेपु-कुठारादिना सछिय पृथाकृतेषु आर्टेपु, सचिचेपु अन्येष्वपि सजीवाण्डादिपु, सचित्तकोलप्रतिनिश्रितेपु सचितैः सचेतनैः, कोलैः घुणैः पति- निश्रितेपु-आश्रितेपु जीवघुणयुक्तकाष्ठादिप्वित्यर्थः, न गन्छेत् , न तिष्ठेत् , न निपीदेत् नोपविशेत् , न त्वग्वर्तयेत् वर्तन वर्तः परिवर्तनम् (भावे घन्) त्वचा त्वगिन्द्रियस्य शरीरस्येत्यर्थात् वर्तः त्वयतः यामपार्वतः परारत्त्य दक्षि- णपार्थेन, दक्षिणपार्श्वत' परावृत्त्य वामपार्थेन वा स्वपनम् , त्वग्वः करोति त्वग्व- यति, (त्वग्वर्त्तशब्दात् 'तत्करोति तदाचष्टे' इति णिचि टिलोपे धातुत्वाल्लडादयः) तस्य विधी त्वग्वर्त्तयेत्-मुप्यादित्यर्थः ॥५॥१९॥ अब त्रसकाययतनामाह-'से भिक्खू वा०' इत्यादि । पर अकुरोपर रखे हुए शयन आदि पर,अकुर अवस्थाके पश्चात् पत्रित अवस्थाको प्राप्त वनस्पतिपर, अथवा उसपर रक्खे हुए शयन आदिपर, कटी हुई वनस्पतिपर, हरी वनस्पतिपर, तथा इनके सिवाय सजीव अडा आदिपर, घुने (सुले) हुए काष्ठ आदिपर न स्वय गमन करे, न खडा होवे, न बैठे, तथा याँयाँ पसवाडा बदलकर दाहिने पसबाडेसे और न दाहिना पसवाडा बदलकर घायें पसवाडेसे सोवे अर्थात् पसवाडा न बदले, ये सब क्रियाएँ दूसरेसे भी न करावे, न करते हुएको भला जाने । इसलिए तीन करण तीन योगसे इनका त्याग करता हूँ, इत्यादि व्याख्यान पूर्ववत् ॥५॥१९॥ अव त्रसकायकी यतना कहते हैं-'से भिक्खू वा०' इत्यादि । અકુર પર, અકુરો ઉપર મૂકેલા શયનાદિ પર, અકુર અવસ્થા પછી પત્રિત અવસ્થાને પ્રાપ્ત થએલી વનસ્પતિ પર, અથવા તે પર મૂકેલા શયનાદિ પર, કાપેલી વનસ્પતિ પર, લીલી વનસ્પતિ પર તથા એ ઉપરાંત સજીવ ઈંડા આદિ પર, સળેલા કાણ આદિ પર નહિ હુ સ્વય ગમન કરૂ, નહિ ઉભે રહુ, નહિ બેસુ, તથા ડાબુ પડખુ બદલીને જમણે પડખે અને જમકુ પડખું બદલીને ડાબે પડખે નહિ સૂઉં અર્થાત્ પડખા નહિ બદલુ, એ બધી ક્રિયાઓ બીજા પાને નહિ કરાવું, નહિ કરનારને ભલે જાણ એ રીતે ત્રણ કરણ ત્રણ યુગથી એને ત્યાગ કરૂ છુ त्या व्याभ्यान पूर्ववत् (५) (१८) वे असायनी यतना छे-से भिक्खू वा० ४त्यादि . , २८८ श्रीदशवेकालिकसूत्रे मूलम् से भिक्खू वा भिक्खुणीवा संजय-विरय-पडिहय-पञ्च- क्खाय-पावकम्मे दिया वा राओ वा एगओ वा परिसागओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा से कीड वा पयग वा कुथु वा पिवीलियं वा हत्थसि वा पायसि वा वाहुसि वा ऊरुसि वा उदरसि वा सीससि वा वत्थसि वा पडिग्गहसि वा कवलसि वा पायपुच्छणंसि वा रय- हरणंसि वा गोच्छगसि वा उडगसि वा दंडगसि वा पीढगसि वा फलगसि वा सेज्जसि वा सथारगसि वा अन्नयरंसि वा तहप्पगारे उवगरणजाए तओ सजयामेव पडिलेहिय पडिलेहिय पमज्जिय पमज्जिय ऐगतमवणेजा नोण सघायमावज्जेजा ॥६॥२०॥ छाया-स भिक्षुर्वा भिक्षुकी वा सयतविरतप्रतिहतमत्याख्यातपापकर्मा दिवा वा रात्रौ वा एकको वा परिपगतो वा मुप्तो वा जाग्रद्वा स, कीट वा पतङ्ग वा कुन्थु वा पिपीलिका वा हस्ते वा पादे वा वाहौ वा ऊरौ वा उदरे वा शीर्षे वा वस्त्रे वा पाने वा कम्बले वा पादमोन्छनके वा रजोहरणे वा गोच्छे वा उन्दके वा दण्डके वा पीठके वा फलके या शन्याया वा सस्तारके वा अन्यतरस्मिन् वा तथामकारे उपकरणजाते तत सयत एव प्रत्युपेक्ष्यर प्रमृज्यर एकान्तेऽपनयेन्नैन सघातमापादयेत् ॥६॥२०॥ (६) सहाययतना. सान्वयार्थ:--सजयविरयपडियपञ्चक्खायपावकम्मेवर्तमानकालीन सावध व्यापारोंसे रहित, भूत-भविष्यकालीन सावध व्यापारोसे रहित, वर्तमान कालमें भी स्थिति और अनुभागकी न्यूनता करके तथा पहले किये हुए अतिचारोंकी निन्दा करके सावध व्यापारके त्यागीसे वह पूर्वोक्त भिक्खू वा-साधु भिक्खुणी वा अथवा साध्वी दिया चा-दिनमें गओ वा अथवा रात्रिमें एगओ वा- अकेला परिसागओवा अथवा सघमें स्थित सुत्ते वा सोया हुआ अथवा जाग. रमाणे चा-जागता हुआ रहे, वहा से बह कीड वा-पीडेको पयग वा पतगेको कुथुवा कुथुवाको पिचीलिय वा-बीडी-चिऊटीको हत्यसि वा-हाय परपायसि वा-पैरपर घासिवा-भुजापर अरसि वा-नाउपर उदरसिवा-पेटपर सीससि वासिरपर वत्यसि वावधपर पडिग्गहसि वा-पात्रपर . अध्ययन ४ सू. २० (६)-सफाययतना २८९ कम्बल पर पायपुच्छणसि चार पोउनेके उपकरणविशेपपर रयहरणसि वा-रजौहरण पर गोच्छगसि चा=पूजनी पर उडगसि वा स्थण्डिलपात्र पर दडगसि वान्दड पर पीढगसि वाम्चीकी पर फलगसि वा=पाटे पर सेज्जसि या शरीरपरिमित शयन करनेके उपकरण पर सथारगसि वा-सस्तारक-साढे तीन हाथ परिमित विछौने पर (अथवा) अन्नयरसि वा-फिर दूसरे तहप्पगारे-इसी प्रकारके उवगरणजाए-उपकरणो पर (लगे हुए पूर्वोक्त कीडे आदिको) तओ=उस स्थान-हाथ पैर आदिसे सजया- मेवयतनाके साथही पडिलेहियर बार-बार मतिलेखन करके पमज्जिय२% वार-चार पूजकर एगत-एकान्त-निरुपद्रव स्थान में अवणेज्जा ले जाकर रखदे, (किन्तु उनको) नोण सघायमावजेज्जा-एकठा न करे ॥२०॥ (६) समाययतना । टीका-हस्ते, पादे, वाहौ, ऊरौ जानूपरिभागे, उदरे, शी, वस्त्रे-मुख- वत्रिकाचोलपट्टादौ, भतिग्रहे पतिगृहाति आधत्ते स्वस्मिन् भक्तपानादिकमिति प्रतिग्रहः पात्र तस्मिन्, कम्बले, पादप्रोन्टनेन्पोच्यते-अमृज्यतेऽनेनेति मोउनम्पमार्जनसाधनम् , पादयोः प्रोन्छन-पादमोन्छन तस्मिन् पादपोख्छन- साधने पत्रखण्डे, रजोहरणे, गोच्छे सचित्तरजः समृष्टचरणममा निकायाम् 'पूँजनी' इति भापामसिद्धायाम्, उण्डके स्थण्डिलपात्रे, दण्डे वृद्धत्वादिना मस्थानविप्लवगतिभिर्मतिभिरवलम्पनाय धार्यमाणे, नान्यथा, "थेराण थेरभूमि- पत्ताण कप्पइ दडए वा” इत्यादिना स्थविर-स्थविरभूमिमातातिरिक्तमुनीना (a) उसकाययतना। हाथ, पैर, भुजा, जाँध, उदर, मस्तक, मुखस्त्रिका, चोलपट्ट आदि घस्त्र, पात्र, कम्बल, पाद-प्रोग्छन-पैर पोंछने का वस्त्रखण्ड, रजोहरण, गोठा-पूँजनी (पैरोंमें लगी हुई रजको पोंछनेका उपकरण), स्थण्डिलपात्र, वृद्धावस्था आदिके कारण गमन करनेमें असमर्थ मुनिके (चलनेमें) सहायक दण्ड, क्योंकि भगवानने " स्थविर और स्थविरभूमिको प्राप्त मुनियोंको ही दण्ड धारण करना (૬) ત્રસકાયયતના હાથ, પગ, ભુજ, જાગ ઉદર, મસ્તક, મુખત્રિકા, ચેળપટે આદિ વસ્ત્ર पात्र, आभvी, पY, डर, પૂજણ, સ્થડિલપાત્ર, વૃદ્ધાવસ્થાઆદિને કારણે ચાલવામાં અસમર્થ મુનિને સહાયક એ દડ, કારણ કે ભગવાને સ્થવિર અને સ્થવિર ભૂમિને પ્રાપ્ત મુનિઓને માટે જ દડ ધારણ કપનીય છે એવું કહ્યું છે, .

२९० श्रीदनकालिकात्रे दण्डागायत्वस्य भगवता स्पष्ट प्रतिपादितवाद, पीठके काष्ठनिर्मितचतुरस्रावा. सनविशेपे "चौकी, चौरग' इति-भापामसिद्धे, फलफेन्शयनोपयोगिकाष्ठविर- चितपट्टादिरूपे, शग्याया-शयनोपकरणरूपाया पसती ना, अस्या अपि धर्मोप करणत्वात् , सस्तारके सस्तार्यते-रिस्तार्यते शयनायिमिरिति सस्तारः (स+ स्तृतः कर्मणि घ) स एर सस्तारकाम् ( स्वार्थिक' का) अर्द्धतृतीयहस्त- ममाणस्तस्मिन् , दर्भादिनिर्मितास्तरणे इत्यर्थः । अन्यतरस्मिन् वा तथाप्रकारे तत्सदृशेसयमोपयोगिनि उपकरणजाते-उपक्रियन्ते उपयुज्यन्ते सयमादिदाढर्थकृते यानि तान्युपकरणानि-साधूना सयमसाधनागीभूतोपकारकवस्त्रपात्रादीनि तेपा जात-समूहस्तस्मिन् उपकरणमात्रे इत्यर्थः, समापतित कीटादिकत्रसजीवम् , ततः तस्मात् हस्तादे स्थानात् सयत एव-सम्यग् यतमान एव 'सजयामेव' इति मूलपाठे आपत्वादी! मकारश्च, प्रतिलेख्यर-अत्यवेक्ष्य२ सम्यगवलोक्येत्यर्थः, ममृज्यर-पौनःपुन्येन प्रमार्जनिकादिद्वारा निस्सार्य एकान्ते-निरुपद्रवस्थाने अप नयेत्-नीत्वा स्थापयेत् किन्तु सघातम्-एकत्र पुञ्जीकरणेन पीडाजनकपरस्परशरीर- सघर्पकारणदृढसयोग सामान्येन सम्मेलन वा नो नैव आपादयेत् सभापयेत् 'ण'- मिति वाक्यालङ्कारे । 'सघातो दृढसयोगः' इति वाचस्पत्यम् । यत्तु केचित्- कल्पनीय है" ऐसा कहा है, अन्यको दण्ड धारण करना मना है । अत एव उनके द्वारा गृहीत दण्ड पर तथा चौकी पाटा (पह) शय्या अर्थात् उपाश्रय, क्योंकि यह भी एक धर्मोपकरण है, सस्तारक अर्थात् दर्भ आदिका विछौना, तथा सयममें उपयोगी इस प्रकारका अन्य कोई उपकरण, इन सबमे कीट आदि त्रस जन्तु हों तो उन्हें सयमी स्वय सम्यक् प्रकार प्रतिलेखन करके बार-बार पूंजनी आदिसे पूँजकर बाधा- रहित एकान्त स्थानमें यतनासे रक्खें, किन्तु उन्हें इकट्ठा करके न रक्खें, क्योंकि ऐसा करनेसे उनको पीडा होने की संभावना है । कितनेक અન્યને દડ ધારણની મનાઈ છે, એટલે એમણે ધારણ કરેલા દડ પર, તથા ચેકી, પાટ, ચા અર્થત ઉપાશ્રય, કારણ કે એ પણ એક ધર્મોપકરણ છે સસ્તારક અર્થાત્ દર્ભ આદિનું બિછાનું, તથા સયમમાં ઉપગી એ પ્રકારના ઉપકરણે, એ સર્વમા કીડી-કડા આદિ ત્રસ જતુ હોય તે તેને સાયમી સમ્યફ પ્રકારે પ્રતિલેખન કરીને વાર વાર પૂજણા આદિથી પૂજીને બાધારહિત એકાન્ત સ્થાનમાં યતનાથી મૂકે, પરંતુ એને એકઠા કરીને ન રાખે, કારણ એમ કરવાથી તેમને પીડા થવાની સંભાવના રહે છે કેટલાકે કહે છે કે રક્ષાને અન્ય સ્વય 3 ४ ८ ९ ८ ૧૨ अध्ययन ४ गा. १ अयतनाया दुःखदफलम् २९१ एकान्तमदेशे रक्षाथै त्रसजीवाना स्थापने साधूनामसर्गतवैयावृत्यदोषेण महारत- भगो भवतीत्याहुस्तदेतद्भगवदानाविरुद्धम्, अनेनापि सूत्रेण वर्मोंपकरणस्थाना सजीवाना निरुपद्रवपदेशे रक्षार्थ यतनया म्यापनविधानात् ॥६॥ ॥२०॥ इत्येव पट्काययतनामभिधाय सम्पति तदपरिपालनपरिणामढारुणत्व वर्ण्यते- 'अजय चरमाणो' इत्यादि । मूलम् अजय चरमाणो य, पाणभूयाइ हिसइ । वधई पावयं कम्म, त से होड कडुय फलं ॥१॥ छाया-अयत चरश्च, माणभूतानि दिनस्ति । वध्नाति पापक कर्म, तत्तस्य भवति कटुक फलम् ॥१॥ यतना न पालन करने का बुरा फल कहते हैं- सान्वयार्थः-अजय-अयतनापूर्वक चरमाणो गमन करता हुआ साधु पाणभूयाइ-बस स्थावर जीवोकी हिंसा हिंसा करता है य और पावय कम्मम्पापकर्मको बधई बाधता है, त-उस कारण से उस पाप कर्मका फल-फल कडुय-दुःखदायी होइ होता है ॥१॥ कहते हैं कि-रक्षाके लिए बस जीवको एकान्त स्थानमें रखने में साधुको असयतिकी वेयावच करनेरूप दोप लगता है और उससे महाव्रतका भग होता है। यह उनका कहना भगवानकी आज्ञासे विरुद्ध है, क्योंकि इस सूत्रसे भगवानने स्पष्ट विधान किया है कि धर्मोपकरणमें स्थित त्रस जीवोंको रक्षाके लिए निरुपद्रव स्थानमें यतनासे रखना चाहिये ॥ ६ ॥ २०॥ इस प्रकार पटुकायकी यतना कहकर "उसकी रक्षा नहीं करनेसे भयङ्कर परिणाम होता है" इस वानका उपदेश देते हैं-'अजय चरमाणो' इत्यादि । માટે ત્રસ જીવને એકાત સ્થાનમાં રાખવામાં માધુને અસયતિની વૈયાવચ્ચ કરવા રૂપ દેવ લાગે છે અને તેથી મહાવ્રતને ભગ થાય છે એમનુ એવુ કથન ભગવાનની આજ્ઞાથી વિરુદ્ધ છે, કારણ કે આ સૂત્રથી ભગવાને સ્પણ વિધાન કર્યું છે કે ધર્મોપકરણમા સ્થિત ત્રસ જીવેની રક્ષાને માટે નિરૂપદ્રવ સ્થાનમાં થતનાથ तेभने भूत्वा न (6) (२०) એ રીતે પકાયની યતના કહીને એમની રક્ષા નહિ કરવાથી परिणाम मा छ, मे पातन अपहेश मापे छे-अजय चरमाणो त्या ભયર ' . . २९२ श्रीदनवैकालिकमूत्रे टीका-अयत यतनारहित यथास्यात्तथा चरन गन्छन् 'सयतः' इति शेषः, माणभूतानि माणन्तीति माणा: उन्यासादिमन्तो द्वीन्द्रियप्रभृतयो जीवाः, भूतानिभानशीला एकेन्द्रियाः पृथिव्यादयः, माणाश्च भूतानि चेति प्राणभूतानि (द्वन्द्वत्वात्परवल्लिङ्गता) तानि प्रसस्थावराणीत्यर्थः, हिनस्ति हन्ति, च-तथा पापफ==पविलमर्थान्मलिन भावमापयति पापयतीति, प-क्षेमम् आ समन्ताद पिपति-नाशयतीति, पान-पास्तमात्माणिनामात्मानन्दरसपानम् आमोति- माप्नोतिगृहातीति, नरकादिकुगतिपु जीगन् पातयतीति, कर्मरजोभिरात्मान पाशयति =मलिनयतीति पा पाप तदेव पापक (कुत्साया कन्) ज्ञानावरणीयादि, कर्म-तत्सम्बन्ध्यतिमूक्ष्मपुलसञ्चय पनाति-उपार्जयति, तत तेन हेतुना, तस्य- पापकर्मणः, फल=परिणतिः कटुक-दुःखदम्, यद्वा 'कटुफफल'-मिति च्छाया, १ पाशयति-पाशुधूलिः, 'पार्ना न द्वयो रजः' इत्यमर', सोऽस्यास्तीति पाशुमान् , पाशुमन्त करोति पाशयति 'तत्करोति तदाचष्टे' इति णिचीष्ठ वद्भावात् 'विन्मतो ग्' इति मतुपो लुक्' ततष्टिलोपः । यतनारहित गमन करनेवाला सयत (साधु) द्वीन्द्रिय आदि प्राणोंकी तथा एकेन्द्रिय पृथिवीकाय आदि भूतोंकी अर्थात् ब्रस और स्थावर जीवोंकी हिंसा करता है, और ज्ञानावरणीयादि पापकर्मका उपार्जन करता है । पाप (१) मलिनताको प्राप्त कराता है, (२) नरक आदि अधो- गतिमें पहुँचाता है, (३) आत्माके हितका नाश करता है, (४) प्राणियोंके आत्मिक आनन्द रसको सुखा डालता है, (५) आत्माको कर्मरूपी रजसे मलिन कर देता है, इसलिए उसे पाप कहते है । अर्थात् अयतनापूर्वक प्रवृत्ति करनेसे जीवोंकी हिंसा होती है,और ज्ञानावरणीय आदि अशुभ कोका बन्ध भी होता है, और उस पापकर्मका परिणाम दुखदायी યતનારહિતપણે ગમન કરનાર સયત (સાધુ) દ્વીન્દ્રિય આદિ પ્રણેની તથા એકેન્દ્રિય પૃથિવીકાય આદિ ભૂતની અર્થાત્ ત્રસ અને સ્થાવર જીવેની હિંસા કરે છે અને જ્ઞાનાવરણીયાદિ પાપકર્મનું ઉપાર્જન કરે છે પાપ-(૧) મલિનતાને પ્રાપ્ત કરાવે છે, (૨) નરક આદિ અધોગતિમાં પહોંચાડે છે, (૩) આત્માના હિતને નાશ કરે છે, (૪) પ્રાણીઓના આત્મિક આનદ રસને સુકાવી નાખે છે (૫) આત્માને કર્મરૂપી રજથી મલિન કરી નાખે છે, તેથી તેને પાય અર્થાત અયતના પૂર્વક પ્રવૃત્તિ કરવાથી જીવેની હિંસા થાય છે, અને જ્ઞાનાવરણીય આદિ અશુભ કર્મોને બધ પણ ઉત્પન્ન થાય છે એ પાપકર્મનું પરિણામ દુ ખ ७ 3 ४ १० ૧૩ , अध्ययन ४ गा. २-५ अयतनाया दुःखदफलम् २९३ तत्-पापकर्म तस्य अयतनया गच्छतः कटुकफल=कटुकम् अनिष्ट फल परिणामो यस्य तत् अशुभफलपदमित्यर्थः, भवति जायते । अत्र पक्षे 'कटक'-मित्यत्रानु- स्वार आवृत्वात् ॥१॥ मूलम्-अजय चिट्ठमाणो य पाणभूयाई हिंसइ । वधई पावय कम्म, तं से होइ कडुय फलं ॥२॥ छाया-अयत तिष्ठेच, पाणभूतानि हिनस्ति । वनाति पाप कर्म, तत्तस्य भवति कटुक फलम् ॥२॥ सान्वयार्थ:-अजय-अयतनापूर्वक चिट्ठमाणो-खडा होता हुआ साधु पाणभूयाइनस स्थावर जीवोंकी हिंसा-हिंसा करता है य और पावयं कम्म=पाप कर्मको यधई बाधता है, त-उस कारण से उस पापकर्म का फल-फल कड्डयन्दुःखदायी होइ-होता है ॥२॥ टीका-'अजय चिट्ठमाणो' इत्यादि । अयत=यतनारहित तिष्ठन्करचर- णादिप्रसारणेनाऽनवहित दण्डवचिस्थान कुर्वन् । शेप प्राग्वद्वयाख्येयम् ॥२॥ मूलम्-अजय आसमाणो य, पाणभूयाइं हिसइ । वधई पावयं कम्म, त से होइ कडुय फल ॥३॥ छाया-अयतमासीनथ, प्राणभूतानि हिनस्ति । बध्नाति पापक कर्म, तत्तस्य भवति कटुक फलम् ॥३॥ सान्वयार्थ -अजय-अयतना-पूर्वक आसमाणो बैठता हुआ साधु पाण- भूयाइ-त्रस स्थावर जीवोंकी हिंसइ-हिंसा करता है, य और पावय कम्म=पापकर्मको बधई-वाधता है, त-उस कारण से उस पापकर्म का फल-फल कड्डय-दुःखदायी होइ होता है ॥३॥ होता है, तथा उसका कडुआ फल भोगना पडता है ॥१॥ 'अजय चिट्ठमाणो' इत्यादि । अयतनापूर्वक खडा होनेसे पापकर्म वधता है और उसका कटुआ फल होता है ॥२॥ દાયી આવે છે, તથા એના કડવા ફળ ભેગવવા પડે છે (૧) अजय चिहमाणो त्या मयतनापूर्व मा रहेवावाथी पाप माय છે અને તેના કડવા ફળ આવે છે (૨) ८ ६ ७ १० ૧૩ ૧૨ १ २ ५ 3 ४ ८ ९ 13 १२ २९४ श्रीदशकालिकात्रे टीका-'अजय आसमाणो' इत्यादि । अयतमामीनापमार्जन विनाऽनुप युक्तोऽनरहित उपविशन्नित्यर्थः । शेष पूर्वपत् ॥३॥ मूलम्-अजयं सयमाणो य पाणभूयाई हिंसइ । वधई पावय कम्म, त से होइ कडुय फल ॥४॥ छाया-अयत स्वपश्व, प्राणभूतानि हिनस्ति । मनाति पापक फर्म, तत्तस्य भाति कटुक फलम् ||४|| सान्वयार्थ:-अजय-अयतना-पूर्वक सयमाणो सोता हुआ साधु पाण- भूयाइ-बस-स्थावर जीवोंकी हिंसा-हिंसा करता है, य और पावय कम्म- पापकर्मको वधई-नाधता है, त-उस कारण उस पापकर्म का फल-फल कडय-दुःखदायी होइ होता है ॥४॥ टीका-'अजय सयमाणो' इत्यादि । अयत वपन्-शग्याप्रमार्जनादिक विना प्रकामशय्यादिना दिवसे वा शयानः । शेप पूर्ववत् ॥४॥ मूलम्-अजय भुजमाणो य, पाणभूयाइ हिंसइ । वधई पावय कम्म, त से होइ कडुय फलं ॥५॥ छाया-अयत भुञ्जानश्च, प्राणभूतानि हिनस्ति । वनाति पापा कर्म, तत्तस्य भवति कटुक फलम् ॥५॥ सान्वयार्थः-अजय-अयतना-पूर्वक भुजमाणो-खाता हुआ साधु पाण- भूयाइनस स्थावर जीरोकी हिंसा-हिंसा करता है, और पावय कम्म=पाप- । 'अजय आसमाणो' इत्यादि। भूमि आदिकी विना प्रमार्जना किये ही अयतनापूर्वक वैठनेसे पापकर्म वधता है और उसका कडुआ फल होता है ॥३॥ 'अजय सयमाणो' इत्यादि । अयतनासे अर्थात् शय्याकी प्रमार्जना न करके शयन करनेसे पापकर्म वधता है और उसका कडुआ फल होता है ॥४॥ अजय आसमाणो त्याह भूमि माहिना प्रभारी ना र्या विना भयतना પૂર્વક બેસવાથી પાપકર્મ બંધાય છે, અને તેના કડવા ફળ મળે છે (૩) अजय सयमाणो त्या मयतनाथा मर्यात प्यानी मानना या વિના શયન કરવાથી પાપકર્મ બંધાય છે અને એના કડવા ફળ મળે છે (૪) १ ૨ ૫ 3 ४ ७ ८ १० १३ २ ५ 3 ४ ६ ७ १३ ૧૨ अध्ययन ४ गा. ६ अयतनाया दुःखदफलम् २९५ कर्मको बधई-पाधता है, त-उस कारण से उस पापकर्मका फल-फल कडय-दुःखदायी होइ होता है ॥५॥ टीका-'अजय भुजमाणो' इत्यादि । अयत भुञ्जाना यथारलपलब्धान्त- मान्तायाहार सयोजनादिमण्डल्दोपापरिहारेण चपड-चपड-शब्दपूर्वकमभ्यवहरन् । अन्यत् मुबोधम् ॥५॥ मूलम्-अजय भासमाणो य, पाणभूयाइ हिसइ । वधई पावय कम्म, त से होइ कडुअं फलं ॥६॥ छाया-अयत भापमाणश्च, प्राणभूतानि हिनस्ति । वध्नाति पापक कर्म, तत्तस्य भवति कटुक फलम् ।।६।। सान्वयार्थ.-अजय-अयतना-पूर्वक भासमाणोचोलता हुआ साधु पाण- भूयाइस स्थावर जीवोकी हिंस-हिंसा करता है, य=और पावय कम्म पापकर्मको बधईयाधता है, त-उस कारण से उस पापकर्म के फल-फल कडय-दुःखदायी होड होता है ॥६॥ टीका-'अजय भासमाणो' इत्यादि । अयत भापमाण =अयतनया ब्रुवन् । 'अजय भुजमाणो' इत्यादि । साधुके कल्पके अनुसार प्राप्त हुए आहारका सयोजना आदि मण्डल दोपोका परित्याग न करके 'चपड- चपड' आदि शब्द करते हुए भोजन करनेसे पापकर्म बधता है और उसका फल कडुआ होता है ॥६॥ 'अजय भासमाणो' इत्यादि । अयतनापूर्वक भापण करनेसे हिंसा होती है और पापकर्मका पध होता है। उस पापकर्मका फल कडुआ होता है। अजय भुजमाणो त्यादि साधुना ४८५ने अनुमार प्राप्त थमेला माहीरना સયેજના આદિ મ ડલ દેને પરિત્યાગ કર્યા વિના “ચપડ–ચપડ” કરતા ભેજન કરવાથી પાપકર્મ બંધાય છે અને તેના કડવા ફળ આવે છે (૫) अजय भासमाणो ध्या€ भयतनापूर्व४ माघ ४२पाथी हिंसा थाय छ અને પાપકર્મ બંધાય છે એ પાપકર્મના ફળ કડવા આવે છે ભુવાજી 1 २ 3 ८ ७ १२ २९४ श्रीदशवकालिको टीका-'अजय आसमाणो' इत्यादि । अयतमासीनापमानन विनानुप युक्तोऽनवदित उपविशन्नित्यर्थः । शेष पूर्ववत् ॥३॥ मूलम्-अजयं सयमाणो य पाणभूयाई हिंसइ । वधई पावय कम्म, त से होड़ कडुय फलं ॥४॥ छाया-अयत स्वपश्च , माणभूतानि हिनस्ति । वनाति पापफ फर्म, तत्तस्य भाति कटुक फलम् ॥४॥ सान्वयार्थ:-अजय-अयतना-पूर्वक सयमाणो सोता हुआ साधु पाण भूयाइ-स-स्थावर जीरोंकी हिंसा-हिंसा करता है, य और पावय कम्म पापक्रमको बधईयाधता है, त-उस कारण उस पापकर्म का फल-फल कडय-दुःखदायी होइ-होता है ॥४॥ टीका-'अजय सयमाणो' इत्यादि । अयत स्वपन्=शग्याप्रमार्जनादिक विना प्रकामशय्यादिना दिपसे वा शयानः । शेप पूर्ववत् ॥४॥ मूलम्-अजय भुजमाणो य, पाणभूयाइं हिसइ । वधई पावय कम्म, त से होइ कडुय फलं ॥५॥ छाया-अयत भुञ्जानश्च, प्राणभूतानि हिनस्ति । वनाति पापर कर्म, तत्तस्य भवति कटुक फलम् ॥५॥ सान्वयार्थ.-अजय-अयतना-पूर्वक भुजमाणोखाता हुआ साधु पाण- भूयाइ-स-स्थावर जीवोकी हिंसा-हिंसा करता है, य-और पावय कम्म-पाप 'अजय आसमाणो' इत्यादि। भूमि आदिकी विना प्रमार्जना किये ही अयतनापूर्वक बैठनेसे पापकर्म बधता है और उसका कडुआ फल होता है ॥३॥ 'अजय सयमाणो' इत्यादि । अयतनासे अर्थात् शय्याकी प्रमार्जना न करके शयन करनेसे पापकर्म बधता है और उसका कडुआ फल होता है ॥४॥ अजय आसमाणो त्या मृमि माहिनी प्रभार्या विना मयतना પૂર્વક બેસવાથી પાપકર્મ બધાય છે, અને તેના કડવા ફળ મળે છે (૩) अजय सयमाणो त्या मयतनाथी अर्थात यानी अभाना यो વિના શયન કરવાથી પાપકર્મ બધાય છે અને એના કડવા ળ મળે છે ) ૨ ५ 3 ८ ८ १० ૧૩ ૧૨ ११ अध्ययन ४ गा. ८-९ यतनावतो न पापकर्मगन्धः २९७ शिष्यः पृच्छति- कह चरे' इत्यादि । टीमा-हे भगवन् ! ययेव तर्हि सयतः कथ-केन प्रकारेण चरेत्-विहरेत् ?, कय केन प्रकारेण तिष्ठेत्-स्थितो भवेत् , कथ=केन रूपेण आसीत-उपविशेत् ?, कय शयीत-स्वप्यात् ', कथ वा भुजाना=अभ्यवहरमाणः, भापमाणश्च पापकर्म व्याख्यानपूर्व न वनाति ? ॥७॥ गुरुरुत्तरयति-'जय चरे' इत्यादि । मूलम्-जय चरे जयं चिढ़े, जयमासे जयं सए । - ૨ 3 ५ ६ ७ ८ 1 १२ 13 - . जयं भुजंतो भासतो, पावकम्म न बंधई ॥८॥ छाया-यत चरेद् यत तिष्ठेद् , यतमासीत यत शयीत । यत भुञ्जानो भापमाण', पापकर्म न बनाति ॥८॥ सान्वयार्थः-गुरु महाराज उत्तर देते है-जय-यतनापूर्वक चरे गमन करे जय यतनापूर्वक चिट्टे-खडा होवे जय=यतनापूर्वक आसे बैठे जय-यतना- पूर्वक सम्सोवे (और) जय-यतनापूर्वक भुजतो-खाता हुआ तथा भासतो- वोलता हुआ पाव कम्म-पापकम न बधई-नहीं पाता है | टीका-यतम् ईर्यादिसमितिसमन्वित यथा तथा चरेत्-विहरेत् , यत तिष्ठेत्- शिष्य पूछता है-'कह चरे०' इत्यादि । हे भगवन् ! यदि ऐसा है तो मुनि कैसे चले ? कैसे खड़ा रहे ? कैसे बैठे? कैसे शयन करे? कैसे आहार करे? और कैसे बोले ? जिससे पापकर्म न वधने पावे ॥७॥ गुरु महाराज उत्तर देते हैं-'जय चरे०' इत्यादि । हे शिष्य ! सयत ईर्यासमितियुक्त होकर चले, यतनासे खड़ा रहे, शिष्य पूछे छ-कह चरे. त्यात હે ભગવન્! જે એમ છે તે મુનિ કેવી રીતે ચાલે? કેવી રીતે ઉભે રહે? કેવી રીતે ? કેવી રીતે સૂએ? કેવી રીતે આહાર કરે? અને કેવી રીતે બેલે? કે જેથી પાપ કર્મ બ ધાવા ન પામે ? (૭) २३ भास त• आपे है-'जय चरे' याle હે શિષ્ય ' સયત ઈસમિતિયુક્ત થઈને ચાલે, યતનાથી ઉભું રહે, २ 3 ५ ६ ८ १२ 13 १४ , श्रीदशवकालिको ननु यतनापूर्वकभापणार्थमेव मुनिर्मुखपत्रिका बध्नातीति त प्रति पुनरयं विधियर्थ एवेति चेन्न, यथाविधिनिबद्धमुखवत्रिकस्यापि मुनेरनृतकर्कशादिसावा भापणेऽनारतमुखेन भापणादयतना भरतीति सर्वथा भाषासमितिसमाराधना:- वधानमाधातुमस्योपदेशस्य सार्थक्यात् । शेप पूत्रद्वयाख्येयम् ॥६॥ मूलम् कह चरे कह चिट्टे, कहमासे कह सए। कह भुजतो भासतो, पावकम्म न वधई ॥७॥ छाया—कय चरेत् कथ तिष्ठेत्, कथमासीत कय शयीत । कथ भुजानो भापमाणः, पापकर्म न वनाति ॥७॥ सान्वयार्थ -शिष्य पूछता है-(अगर ऐसा है तो हे गुरु महाराज !) कह कैसे चरे गमन करे', कह कैसे चिढे-खडा हो?, कह कैसे आसे- बैठे?, कह कैसे सए सोवे?, कर-किस प्रकार भुजतो आहार करता हुआ (तथा) भासतो-बोलता हुआ पावकम्म पापकर्म न बधई- नहीं वाधता है ॥७॥ प्रश्न-हे गुरुमहाराज ! अयतनाको दूर करनेके लिए ही मुखत्रिका मुख पर बाँधी जाती है, फिर उनके प्रति 'अजय भासमाणो य' ऐसा उपदेश देना कैसे सगत है । उत्तर-हे शिष्य ! सुनो, मुग्व पर मुखवस्त्रिका सदा बाँधी रहने पर भी असल कर्कश कठोर आदि बोलनेसे तथा सावध उपदेश देनेसे उसी प्रकार अयतना होती है जिस प्रकार खुले मुख बोलनेसे होती है। साधुको भाषासवधी सब प्रकारकी अयतनाका त्याग करना चाहिए इसलिए यह अयतनाके त्यागका उपदेश दिया गया है ॥६॥ પ્રશ્ન- હે ગુરૂ મહારાજ ! અયતનાને દૂર કરવાને માટે જ મુખવસ્ત્રિકા મુખ ५२ माधवाभा मावे छ, पछी मनी प्रत्ये 'अजय भासमाणो य वा पहेश આપ કેવી રીતે સગત છે? ઉત્તર- શિષ્ય! મુખ પર મુખવસ્ત્રિકા સદા બાધી રહેવા છતા પણ અસત્ય કર્કશ કઠેર આદિ બલવાથી તથા ઉપદેશ આપવાથી એવા પ્રકારની અયતના થાય છે કે જેવા પ્રકારની અયતના ઉપાડે મહાએ બાલવાથી થાય છે સાધુએ ભાષાસબધી સર્વ પ્રકારની અગતનાને ત્યાગ કર જોઈએ, તેથી આ અયતનાના ત્યાગને ઉપદેશ આપવામાં આવ્યા છે સાવધ les अध्ययन ४ गा. ९-यतनावतो न पापकर्मन्यः २९९ डाया-सर्वभूतात्मभूतस्य, सम्यग् भूतानि पश्यतः । पिहितासवस्य दान्तस्य, पापकर्म न यते ॥९॥ सान्वयार्थः-मब्यभृयप्पभृयस्सम्सन प्राणियोको अपने समान समझनेवाले सम्म सम्यक् प्रकार आगमानुसार भूयाइ-जीवोको पासो देखने-समझने- वाले पिहिआसवस्स-आस्रवको रोकनेवाले दतस्स-जितेन्द्रिय साधुके पाव- कम्म पापकर्म न बधईन्नहीं पता है ॥९॥ टीका--सर्वभूतात्मभूतस्य सर्वाणि च तानि भूतानि सर्वभूतानि एकेन्द्रिया- दारभ्य पञ्चेन्द्रियपर्यन्त सर्वे जीवास्तेषु आत्ममूतः आत्मसटश', जीव आत्मान रक्षितु यथा प्रयतते तथा यथाविपिसकलजीवरक्षासावधान इत्यर्थः, तस्य, भूतानि सम्यम्=पाचनप्रतिपादितस्वरूपेण पश्यतः प्रेक्षमाणस्य निखिलपाणिगणस्वरूप याथातथ्येन पर्यालोचयत इत्यर्थः । पिढितात्रवस्य-पिहिताः आन्छादिता आत्र- वा=कर्मागमतमो येन स पिहितानका पतिरुद्धर्मद्वारस्तस्य, दान्तस्य दमयति- वग नयति इन्द्रियाऽश्वानिति दान्तजितेन्द्रियम्तस्य पापकर्म न उ-यते नस्य पापलेपो न जायत इत्यर्थः ॥९॥ ननु क्रिया पापकर्माचरोधश्चेत्तर्हि तदर्थमेव यतनीय कृत ज्ञानेनेति चेद- त्रोच्यते- नहि ज्ञानमन्तरेण क्रिया कदाचिदपि फलाय कल्पते प्रत्युतोन्मत्तक्रियावदना- समस्त प्राणियों में आत्मतुल्य बुद्वि रखनेवाले, तथा आगमके अनुसार जीवोंका स्वरूप समझनेवालेको, कर्मोके आगमनके कारण (आस्रव)का निरोध करनेवालेको पापकर्मका ध नहीं होता है ॥२॥ प्रश्न-हे गुरुमहाराज ! यदि केवल क्रियासे पापकर्मोंका निरोप हो जाता है तो क्रिया ही करनी चाहिए, जानकी क्या आवश्यकता है ? उत्तर-हे शिप्य ! जानके विना क्रियाका कुछ फल नहीं होता, બધા પ્રાણીઓમાં આમતુલ્ય બુદ્ધિ રાખનારા, અને આગમને અનુસાર જીનું સ્વરૂપ સમજનારાને, કર્મોના આગમનના કારણે (આપ)ને નિધિ કરનારાઓને પાપકર્મનું બધન થતુ નથી (૯) પ્રશ્ન–હે ગુરૂ મહારાજ ! જે કેવળ ક્રિયાથી પાપકર્મોને નિરાધ થઈ જાય છે તે ક્રિયા જ કરવી જોઈએ, જ્ઞાનની ની આવશ્યકતા છે? ઉત્તર–હે શિષ્ય જ્ઞાન વિના ક્રિયાનું કશું ફળ હેતુ નથી જ્ઞાનરહિત , .

३२८ श्रीशिवकालिकम ७ ८ ८ करचरणादिकमविक्षिपन् समाहितो दण्डारस्थिति विदयात् , यतमासीत- यतनया-हस्तपादायाचनमसारणादिकमन् सोपयोगमुपविशेद-हासनादिना स्थिरः सनावश्यककार्यमन्तरेण नेतस्ततो भ्राम्येदित्यर्थः, यत शयीत-भकाम- शयनीयादिपरिहारेण सप्यात्, यत भुआनः यथाकल्पमाताहार सयोज- नादिमण्डलदोपचनपुरस्सर 'चपड़-चपड़' इतिशब्दमकुर्वाणोऽभ्यवहरमाणः, यत भापमाणः निबद्धमुखपत्रिकः सन् हितमितमृद्वादिनिरवधभापयाऽवसरे समाल- पन् पापकर्म न पनातिन्न वनीयात् ॥८॥ किञ्च-'सव्वभूयः' इत्यादि । मूलम्-सबभूयप्पभूयस्स, सम्मं भूयाइ पासओ। पिहिआसवस्स दंतस्स, पावकम्म न वधर्ड ॥९॥ अर्थात् हाथ-पैर न हिलाता हुआ सावधान होकर दडकी तरह खडा रहे, यतनासे बैठे अर्थात् वृथा हाथ पैर न हिलावे, उपयोग-सहित दृढासन आदिसे बैठे, विना कार्यके इधर उधर न हिले, यतनासे शयन करे अर्थात् प्रकाम शय्याका परिहार करता हुआ सोवे, यतनासे आहार करे अर्थात् जैसा निरचद्य आहार मिल जाय उसीमें सन्तुष्ट रहे और 'चपड- चपड' आदि शब्द न करते हुए भोजन करे, न भोजनमे राग-द्वेष करे। यतनासे भाषण करे अर्थात् हित मित मधुर और निरवद्य भाषा बोले,खुले मुह न घोले, तथा कर्कश कठोर शब्दोंका उचारण नकरे और निष्प्रयोजन न योले । ऐसा करनेसे पापकर्म नहीं बधता है॥८॥ और-'सव्वभूयः' इत्यादि । અર્થાત્ હાથ-પગ ન હલાવે ને દડની જેમ ઉભે રહે યતનાથી બેસે અર્થાત્ વૃથા હાથ-પગ ન હલાવે, ઉપગ સહિત દહાસન આદિથી બેસે, કાર્ય વિના આમ-તેમ હલે નહિ, ચતનાથી શયન કરે, યતનાથી આહાર કરે, અર્થાત જે નિરવા આહાર મળી જાય તેમાં જ સંતુષ્ટ રહે અને “ચપડ-ચપડ અવાજ કયાં વિના ભેજન કરે, ભેજનમા રાગ-દ્વેષ ન કરે ચેતનાથી ભાષણ કરે અર્થાત્ હિત મિત મધુર અને નિરવ ભાષા બેલે, ખુવે મોઢ બેલે નહિ એમ કરવાથી પાપકર્મ नथी (८) भने-सबभूय० त्या બ ધાતુ 3 २ ४ ૫ ७ ८ ८ ૧૧ ૧૨ अ ययन ४ गा. ११-ज्ञानप्राप्त्युपाय: एवम् अनेन प्रकारेण क्रियाया ज्ञानपूर्वकत्वाऽयोधरूपेण सर्वसयतः सर्वपिरतः साधुरित्यर्थः, तिष्ठतिवर्तते, कथमिदमुच्यते' इत्याशङ्कायामाह-ज्ञानी तत्वातत्वविवेकक्षणज्ञानविरहितः किं करिप्यतिकि विपास्यति, किं वा कथ या डेर-पापक, छेक्श्च पापक चानयोः समाहारे पापक, तर छेक-कल्याणम् उपादेयमित्यर्थः, पापकम्-अकल्याण हेयमित्यर्थः. ज्ञास्यति वेत्स्यति जन्मना:- न्ययन्न किश्चिदपीत्यर्थः, जतो ज्ञानार्थमेव प्रथम यतनीयम् “हया अन्नाणिण किया" इत्युक्तेः ॥१०॥ ज्ञानमहत्त्व मदर्य सम्पति तत्माप्त्युपायमाह-"सोचा जाणइ" इत्यादि । मूलम्-सोचा जाणड कल्लाण, सोचा जाणड पावग। उभयपि जाणई सोचा, ज सेय त समायरे ॥११॥ छाया-श्रुत्वा जानाति कल्याण, श्रुत्वा जानाति पापकम् । उभयमपि जानाति श्रुत्वा, यन् यस्तत्ममाचरेत् ॥११॥ समस्त क्रियाओंका ग्रहण होता है। अर्थात् मम्यग्ज्ञानपूर्वक की हुई ही क्रिया सफल होती है, इसलिए मुनि ज्ञानपूर्वक ही क्रियाएं करते हैं, क्योंकि तत्त्व और अतत्त्वके विवेकसे रहित अज्ञानी क्या कर सकता है? अर्थात् कुछ नहीं कर सकता, और जन्मान्धके समान उसे हेय-उपादेयका ज्ञान ही कैसे होसकता है ? अर्थात् नहीं होसकता, अत पहले ज्ञानके लिए प्रयत्न करना चाहिए। कहा भी है-" ज्ञानके विना क्रिया निरर्थक है" ॥१०॥ जानका महत्व बताकर अब उसकी प्रासिका उपाय करते हैं- "सोचा जाणइ०" इत्यादि । થાય છે અર્થાત સમ્યગ જ્ઞાનપૂર્વક કરેલી ક્રિયા જ સફળ છે તેથી મુનિ જ્ઞાનપૂર્વક જ ક્રિયાઓ કરે છે કારણ કે-તવ અને અતત્ત્વના વિવેકથી રહિત અજ્ઞાની શું કરી શકે? અર્થાત્ કશું નથી કરી શકતે, અને જન્માધની પેઠે એને હેય-ઉપાદેયનું જ્ઞાન કેવી રીતે થઈ શકે? અર્થાત નથી થઈ શકતુ, તેવી પહેલા જ્ઞાનને માટે પ્રયત્ન કર્વે જેએ કહ્યું છે કે-“શન વિનાની ક્રિયા નિરર્થક છે (१०) ज्ञानर्नु महत्व तापान के मनी प्रातिना पाय उडे छ-सोचा जाणइ० ઈત્યાદિ થાય 1 3 ५ ८ ८ १० ૧૨ 13 श्रीदशवकालिको नुवन्धिनी स्यादिति ज्ञानविरहितकेरलक्रियाप्रतिर्लोकाना मा स्म भूहतो ज्ञानस्य क्रियापेक्षया प्रायम्य दर्शयति-पढम नाण' इत्यादि । मूलम्-पढम नाण तओ दया, एव चिट्टइ सबसंजए। अन्नाणी किं काही, किंवा नाही छेय-पावग ॥१०॥ छाया-प्रथम ज्ञान ततो दया, एर तिष्ठति सर्यसयतः । अज्ञानी किं करिष्यति, किं वा ज्ञास्यति छेक-पापकम् ॥१०॥ सान्वयार्थः-पढम-पहले नाण-ज्ञान है तो उसके पश्चात् दयान्दया अर्थात् चारित्र है एव-इसी प्रकार सव्वसजए-सर्वसयत साधु चिट्ठइ-आचरण करते है, अन्नाणी-सम्यग्ज्ञानसे रहित पुरुष किंकाही क्या कर सकता है-कैसे सयम पाल सकता है अर्थात् नहीं पाल सकता ? (और) किं वा कैसे छेयपावग- उपादेय और हेयको नाही-जान सकता है?, अर्थात् नहीं जान सकता ॥१०॥ टीका-प्रथमम् आदौ ज्ञान ज्ञायन्ते युध्यन्ते जीवाजीवादयः पदार्था येन यस्माद् यस्मिन् वा तज्ज्ञान-स्वपरस्वरूपपरिच्छेदलक्षणम् , अपेक्ष्य भवतीत्याशयः, क्रियामात्रस्य ज्ञानपूर्वकत्वे हि स्वाभीष्टसिद्धिकत्वात् , ततः तदनन्तर दया-क्लेशा- कुलमाणिसकटमोचनेच्छालक्षणाऽनुकम्पा, दयाशब्देन चात्र क्रियामात्रमुपलक्ष्यते, ज्ञानरहित क्रिया उन्मत्त (पागल) पुरुषकी क्रियाके समान अनर्थको उत्पन्न करती है। 'कोई जीव ज्ञानरहित क्रिया न करे' इस अभिप्रायसे 'पहले ज्ञान फिर क्रिया होनी चाहिए', इस बातको शास्त्रकार करते हैं-'पढम नाण' इत्यादि । जिससे स्व-परका बोध होता है उसे ज्ञान कहते है । वह ज्ञान प्रथम है, क्योंकि जीवआदि नव पदार्थका ज्ञान होने पर ही सयम अर्थात् षड्जीवनिकायकी दयाका पालन हो सकता है। यहाँ दया शब्दसे કિયા ઉન્મત્ત (ગાડા) પુરૂષની ક્રિયાની પેઠે અનર્થને ઉત્પન્ન કરે છે “કઈ જીવ જ્ઞાનરહિત ક્રિયા ન કરે એવા હેતુથી “પ્રથમ જ્ઞાન પછી ક્રિયા હેવી જોઈએ? मा वातने सूत्रधार ४ छे-पढम नाण. त्यात જે વડે સ્વપરને બોધ થાય છે તેને જ્ઞાન કહે છે એ જ્ઞાન પ્રથમ છે કેમકે જીવ આદિ નવ પદાર્થનું જ્ઞાન થયા પછી જ સયમ અર્થાત્ જીવનિકાયની દયાનું પાલન થઈ શકે છે અહીં દયા શબ્દથી બધી ક્રિયાઓને ગ્રહણ अ ययन ४ गा. १२-जीवादिज्ञानस्योत्तरोत्तरसम्बन्धः ३०३ २ 3 ४ ५ ६ ८ ११ 13 १२ १४ मूलम्-जो जीवे वि न याणेड अजीवे वि न याणइ । जीवाजीवे अयाणतो, कहं सो नाहीइ सजम ॥१२॥ छाया-यो जीवानपि न जानाति, अजीवानपि न जानाति । जीवाऽजीवानजानन् कथ, स ज्ञास्यति सयमम् ॥१२॥ सान्वयार्थ -जो जो जोवेवि जीवोकोभी न याणेह नही जानता है (और) अजीवेवि-अजीकोभी न याणेइ नही जानता है, जीवाजीवे जीवो और, अजीवोको अयाणतो नहीं जानता हुआ सो वह सजम सयमको कह कैसे नाहीइ जानेगा ? अर्थात् नहीं जान सकता ॥१२॥ टीका-'जो जीवेवि' इत्यादि । यः जीवन एकेन्द्रियादीन् , जीवलक्षण तु मत्कृतात्तत्वमदीपाद्विशेपतोऽगन्तव्यम् , न जानातिन वेत्ति, तथा अजीवान जीवविपरीतलक्षणान् सयमपरिपन्थिन काञ्चनरजतादीन् धर्मास्तिकायादीन् वा न जानाति, इत्य जीवाजीवान जीवान् अजीवांचोभयानपि अजानन् सन् स सयमन्माणातिपातविरमणादिलक्षण सप्तदशविर कथकेन मकारेण ज्ञास्यति वेत्स्यति, सयमस्य जीवाजीवोभयविपयकज्ञानजन्यत्वात् ॥१२॥ ननु कस्तहि सयम विज्ञातुमर्हती ? त्याह-'जो जीवे वि०' इत्यादि । 'जो जीवे वि०' इत्यादि।जो पुरुष एकेन्द्रिय आदि जीवोंके स्वरूपको नहीं जानता और न जीवसे भिन्न पुद्गल आदि अजीवोंको जानता है। इस प्रकार दोनोंको ही नहीं जानता हुआ वह अज्ञानी प्राणातिपात आदिसे विरमणरूप सत्रह प्रकारके सयमको कैसे जानेगा? अर्थात् नहीं जान सकेगा, क्योंकि सयम तब ही हो सकता है जब जीव और अजीवका ज्ञान हो जाय ॥१२॥ सयमका ज्ञाता कौन हो सकता है ? सो कहते है-'जो जीवे वि०' इत्यादि । Rો ની વિ. ઈત્યાદિ જે પુરૂષ એકેન્દ્રિય આદિ જીના સ્વરૂપને જાણ નથી અને જીવથી ભિન્ન પુદ્ગલ આદિ અજીને જાણતા નથી, એ રીતે બેઉને જાણતો નથી તે અજ્ઞાની પ્રણાતિપાત આદિથી વિરમણરૂપ સત્તર પ્રકારના સયમને કેવી રીતે જાણશે ? અર્થાત્ નહિ જાણું કે, કારણ કે સયમ ત્યારે જ થઈ શકે છે કે જ્યારે જીવ અને અજીવનું જ્ઞાન થાય છે. (૧૨) सयभना ज्ञात हो य श छ १ ते ३ -जो जीवे वि० त्या श्रीदशकालिकमूत्र अप जानने का उपाय पताते है- सान्याथ:-सोचा गुरुमुखसे सुनकर कालाण-कल्याण-दयारूप सयमको जाणइ जानता है, (तथा) सोचा-गुनकर ही पावग-पाप-हिंसारूप असयमको जाणइ-जानता है, (और) उभयपि दोनोंको भी सोचा-सुनकर ही जाणई जानता है। (अतः) जम्नो सेय आत्माके हितकारी हो तं-उसका समायरे आचरण करे ॥११॥ टीका-श्रुत्वा गुरुमुखादाकर्ण्य श्रुतज्ञानपिपयीकृत्येत्यर्थः, कल्याणम् बल्यो मोक्षः कर्मपद्धसफलोपाधिव्याधिगधाविधुरत्वात् , तम् आसमन्तादणति-भापत्र तीति, कल्येन=आरोग्येण आरोग्यफरणेनेत्यर्थः शानदर्शनचारिक्षणमोक्षमार्गो- पदेशद्वारेति भावः, आनयति जीपयति सासारिकविशालविपयकाननसलग्नेष्ट वियोगानिष्टसयोगदावानलज्वालामालावलीढान् पाणिन इति कल्याण-दयामि धानसयमस्वरूप, निपातनाण्णत्वम् , तदुपादेयभूत जानाति, श्रुत्वा च पापक नरकादिकुगतिपातिन हेयभूतमसयम जानाति, उभयमपि उपादेयानुपादेयभूत सयमासयमलक्षण द्वयमपि श्रुत्वैव जानाति । निष्कर्षमाह-अत्र यत् श्रेय,हित तत् समाचरेत-विदभ्यात् ॥११॥ कर्मोंसे उत्पन्न होनेवाली समस्त आधि-व्याधि और बाधासे रहित मोक्षकी प्राप्ति करानेवालेको, अथवा ज्ञान-दर्शन-चारित्र रूपी आरोग्यसे, हितवचन अथवा उपदेशसे ससारके विषयरूपी विशाल वनमे धधकती हुई इष्टवियोग-अनिष्टसयोगरूप दावाग्निकी ज्वालाओंमें जलते हुए जीवोंको शान्ति देनेवालेको कल्याण कहते हैं। इस कल्याण (सयम) का ज्ञान गुरुमुखसे सुनकर ही होता है। पाप अर्थात् नरक आदि कुग- तियों में गिरानेवाले अमयमका ज्ञान भी सुननेसे ही होता है, तथा इन दोनोंका भी ज्ञान सुननेसे ही होता है । इसलिए इनमेसे जो श्रेष्ठ (हितकर) हो उसमें प्रवृत्ति करनी चाहिए ॥११॥ કર્મોથી ઉત્પન્ન થનારી બધી આધિ-વ્યાધિ અને બાધાથી રહિત મોક્ષની પ્રાપ્તિ કરાવનારને અથવા જ્ઞાન દર્શન ચારિત્રરૂપી આરોગ્યથી, હિતવચન અથવા ઉપદેશથી સસારના વિષયરૂપ વિશાળ વનમા ભભુકતા ઈષ્ટવિયોગ-અનિટસ ગરૂપી દાવાસ્ક્રિની જવાળાઓમા બળતા જીવેને શાન્તિ દેનારને કલ્યાણ કહે છે આ કયાણ (સયમોનું જ્ઞાન ગુરૂમુખથી શ્રવણ કરવાથી જ થાય છે પાપ અર્થાત નરક આદિ મુગતિઓમા પાડનારા અસયમનું જ્ઞાન પણ સાભળવાથી જ થાય છે, તથા એ બેઉનું જ્ઞાન પણ સાભળવાથી જ થાય છે, તેથી એમા જે શ્રેષ્ઠ અહિતકર, હાય એમાં પ્રવૃત્તિ કરવી જોઈએ (૧૧) - - " अध्ययन ४ गा. १५-पुण्यस्वरूपम् ३०७ " दया भूतेषु वैराग्य, विधिवद्गुरुपूजनम् । विशुद्धा शीलवृत्तिश्च, पुण्य पुण्यानुवन्ध्यदः ॥१॥ इति. (स्थानाङ्गे१स्था. टीका) हरिभद्रसरिरप्याह- "गेहाद् गेहान्तर कश्चिच्छोभनादधिक नरः । याति यद्वत् मुधर्मेण, तद्वदेव भवाद्भवम् ॥ १॥” इति । एतच्च मोक्षार्थिनामप्यादरणीयमेव, पुण्यानुवन्धिपुण्यस्याऽपतनशीलमोक्ष- सम्पजनकत्वात् , तथा चोक्तम्- शुभानुवन्यतः पुण्य, कर्तव्य सर्वथा नरैः । यत्मभावादपातिन्यो, जायन्ते सर्वसम्पदः ॥१॥” इति । प्राणियों पर दया रखना, वैराग्य-भाव होना, आगमके अनुसार गुरुओंकी भक्ति करना, शुद्ध शीलका पालन करना, यह पुण्यानुयन्धि पुण्य है । (स्थानाङ्ग०१स्था टीका) हरिभद्रसूरिने भी कहा है- "जैसे कोई मनुष्य एक अच्छे गृहसे दूसरे बहुत ही अच्छे गृहमे जाता है वैसेही पुण्यके प्रभावसे जीव अत्यन्त शुभ गतिको प्राप्त होता है ॥१॥" यह पुण्य मोक्षार्थी पुरुपोके लिए भी उपादेय है, क्योंकि इससे अविनश्वर-शाश्वत-मोक्षरूपी सम्पत्तिकी उत्पत्ति होती है। कहा भी है- "मनुष्योको पुण्यानुवन्धि पुण्य अवश्य करनाचाहिए, जिसके प्रभावसे कभी नष्ट न होनेवाली सर प्रकारकी सम्पदाएँ प्राप्त होती है ॥१॥" પ્રાણુઓ ઉપર દયા રાખવી, વૈરાગ્યભાવ થે, આગમને અનુસાર ગુરૂઓની ભકિત કરવી, શુદ્ધ શીલ પાળવું, એ પુણ્યાનુબધિ પુણ્ય છે (स्थाना1०१भ्या०री) હરિભદ્રસૂરિએ પણ કહ્યું છે કે- જેમ ઈ મનુષ્ય એક સારા અહમાથી બીજા બહુ જ સારા ગૃહમા જાય છે તેમ પુણ્યના પ્રભાવથી જીવ અત્યંત શુભ ગતિને પામે છે ” એ પુણ્ય મેક્ષાથી પુરૂષને માટે પણ ઉપાદેય છે, કારણ કે તેથી અવિન શ્વર-શાશ્વત-મેક્ષરૂપી સંપત્તિની ઉત્પત્તિ થાય છે કહ્યુ છે કે- મનુબેએ પુણ્યાનુબધિ પુણ્ય અવશ્ય કરવું જોઈએ જેના પ્રભાવથી કદાપિ નષ્ટ ન થાય તેવી સર્વ પ્રકારની સંપદાઓ પ્રાપ્ત થાય છે . " श्रीदशकालिकमूत्रे वोधिनीनजिनधर्मादिमाप्तिायते, किंबहुना तीर्थकरगोत्रमपि पुण्येनैव वध्यते, यो डि पुण्य साया हेय मन्यमानस्तत्यति असी समुपेक्षिवतरिरिवाऽभातपरवीरो मध्येसमुद्र मन्नन्नवसीदति । ननु पुण्यपापक्षयानन्तरमेव मोक्षमाप्तिः शास्त्रे श्रूयते इति पापवत्पुण्यमप्यनुपादेय मोक्षार्थिनामिति चेन, द्विविध हि पुण्य पुण्यानुनन्धिपापानुवरिच, तत्र पुण्यानुवन्धिपुण्यस्य लक्षणमुक्तम्- प्रासि-होती है । अधिक क्या कहा जाय ? तीर्थङ्कर गोत्र भी पुण्यसे ही वधता है। जो पुण्यको सर्वथा हेय मानता हुआ उसका त्याग करता है वह ससार-सागरमे गोते लगाता है। जैसे मध्य समुद्रमें नौकाका त्याग कर देनेवाला पुरुष समुद्र में डूबता हुआ दुःख पाता है । शङ्का-पुण्य और पाप दोनोंका क्षय होनेके बाद मोक्षकी प्राप्ति होती है, ऐसा शास्त्रों में सुना जाता है, इसलिए पापकी तरह पुण्य मोक्षार्थियोंके लिए उपादेय नहीं है। समाधान-ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि पुण्य दो प्रकारका है- (१) पुण्यानुबन्धि पुण्य, (२) पापानुवन्धि पुण्य । पुण्यानुबन्धि पुण्यका लक्षण यह है- વધારે શું કહેવું? તીર્થકર–ત્ર પણ પુણ્યથી જ બધાય છે જે પુણ્યને સર્વથા હેય માનીને તેને ત્યાગ કરે છે, તે સસાર-સાગરમાં ગોથા ખાય છે, જેમકે મધ્ય-સમુદ્રમા નૌકાને ત્યાગ કરી નાખનાર પુરૂષ સમુદ્રમાં भी , , ડુબતા દુ ખ પામે છે શકા-પુણ્ય અને પાપ એ બેઉને ક્ષય થયા પછી મેક્ષની પ્રાપ્તિ થાય છે, એવું શાસ્ત્રોમા સાભળવામાં આવે છે તેથી પાપની પિઠે પુણ્ય પણ મોક્ષાર્થીઓને માટે ઉપદેય નથી સમાધાન-એમ કહેવું તે બરાબર નથી, કારણ કે પુણ્ય બે પ્રકારના છે (૧) પુણ્યાનુબધિ પુણ્ય, (૨) પાપાનુબધિ પુગ્ય, પુણ્યાનુબપિ પુણ્યનું લક્ષણ , अध्ययन ४ गा. १५-पुण्यस्वरूपम् ३०९ "शरीरमाह' नावत्ति, जीवो उच्चइ नाविओ। ससारो अण्णवो वुत्तो, ज तरति महेसिगो ॥१॥" इति । तत्रैव दशमा ययने मनुष्यजन्मनो दौर्लभ्य चोक्तम्- दुल्लहे खलु माणुसे भवे, चिरकालेणवि सबपाणिण" इति । स्थानागसूत्रेऽपि तृतीयस्थानके च- " तओ ठाणाइ देवेवीहेजा त जहा- (१) माणुस भव, (२) आरिए खेत्ते जम्म, (३) सुकुलपच्चायाति ।" इति । १ "शरीरमाहुः नौः इति, जीव उच्यते नाविकः । ससार अर्गवः उक्तः, य तरन्ति महर्पय' शा" २ दुर्लभः खलु मानुष्यो भवः, चिरकालेनापि सर्वप्राणिनाम् । ३ त्रीणि स्थानानि देवा अपीहेरन् , तयथा-(१) मानुष्य भवम् , (२) आर्ये क्षेने जन्म, (३) मुकुलमत्यायातिम् । “(मनुष्यका) शरीर, नौकाके समान है, जीव, नाविक (खेवटिया) के सदृश है और ससार, समुद्र सरीखा है, इसे महर्पि पार करते हैं।" इसी उत्तराध्ययनके दसवें अध्ययनमे मनुष्य-जन्मकी दुर्लभता यताई है- "चिरकाल तक सब प्राणियोके लिए मनुष्य-भव अत्यन्त दुर्लभ है।" स्थानागसूत्रमे तीसरे स्थानकमे कहा है- "इन तीन चोलोकी देव भी अभिलापा रखते है-(१) मनुष्य-भव, (२) आर्यक्षेत्रमे जन्म, (३) सुकुलकी प्राप्ति"। ' (मनुष्यनु) शरी२, नोt समान छ, ७५, नावि४ (मशासी) समान छ અને સસાર, સમુદ્ર સરખો છે, તેને મહર્ષિ પાર કરે છે " એજ ઉત્તરાધ્યયનના દસમા અધ્યયનમાં મનુષ્ય જન્મની દુર્લભતા બતાવી છે- “ચિરકાળ સુધી સર્વ–પ્રાણુઓને માટે મનુષ્યભવ અત્યત દુર્લભ છે” સ્થાનાગ-સૂત્રમાં ત્રીજા સ્થાનકમાં કહ્યું છે કે- ત્રણ બેની અભિલાષા દેવ પણ રાખે છે (૧) મનુષ્યભવ, (२) मायक्षेत्रमा सन्म, (3) सुननी प्राति" , " AL तया ३०८ श्रीदवकालिको किञ्च-मनुष्यजन्मनोऽपि मोक्षमाप्तिकारणत्वेन शास्त्रे प्रतिपादनात्पुण्य मो- क्षार्थिनामुपादेयमेवेत्यासीयते, पुण्यमन्तरेण मनुष्यजन्मनो दुर्लभस्वात्, चोकमुत्तराध्ययनम्ने तृतीयाध्ययने- "चत्तारि' परमगाणि, दुलहाणि य जतुणो । माणुसत्त मुई सद्धा, सजमम्मि य वीरियं ॥१॥" इति । ससारार्णयोत्तरणाय नरशरीरस्य नाकारूपत्वेन प्रतिपादनान्मोक्षकारणत्व गम्यते, तथा चौत्तराध्ययनसूने त्रयोविंशाध्ययने- १ " चत्वारि परमाद्गानि, दुर्लभानि च जन्तोः । मानुपत्त शुचिः श्रद्धा, सयमे च पीयम् ॥१॥" दूसरी बात यह है कि-शास्त्रोंमें मनुष्यभवकी प्राप्ति पुण्यके उदयसे कही गई है, और मनुष्य-भव मोक्ष-प्राप्तिका कारण माना गया है, इससे भी यही सिद्ध होता है कि पुण्य मुमुक्षुओंके लिए उपादेय है, क्योंकि पुण्यके विना मनुष्य-पर्याय मिलना दुर्लभ है। उत्तराध्ययन सूत्रके तीसरे अध्ययनमे कहा है- "चार परमाग जीवके लिए दुर्लभ हैं-(१)मनुष्य भव, (२) शुचिता, (३) सत्य धर्ममे श्रद्धा, (४) सयममें पराक्रम ॥" मनुष्य-शरीर ससाररूपी समुद्रको पार करनेके लिए नौकाके समान है, इसलिए ज्ञात होता है कि मनुष्य-शरीर मोक्षका कारण है। उत्तराध्ययन सूत्रके तेईसवें अध्ययनमे कहा है- બીજી વાત એ છે કે-શાસ્ત્રમાં મનુષ્યભવની પ્રાપ્તિ પુણ્યના ઉદયથી કહી છે અને મનુષ્યભવ મેક્ષપ્રાપ્તિનું કારણ માન્યું છે, તેથી પણ એમ સિદ્ધ થાય છે કે પુણ્ય મુમુક્ષુઓને માટે ઉપાદેય છે, કારણ કે પુણ્ય વિના મનુષ્ય પર્યાય મળવો દુર્લભ છે ઉત્તરાધ્યયન સૂત્રના ત્રીજા અધ્યયનમાં કહ્યું છે કે- " या२ परभारी अपने भाटे दुल छ-(१) मनुष्यलय, (२) शुचिता, (3) सत्यधर्ममा श्रद्धा, (४) सयममा पराम" મનુષ્ય શરીર સંસારરૂપી સમુદ્રને પાર કરવાને માટે નૌકા–સમાન છે, તેથી સમજાય છે કે મનુષ્યનારીર મેક્ષનું કારણ છે ઉત્તરાધ્યયન સૂત્રના તેવી સમા અધ્યયનમાં કહ્યું છે કે- . अध्ययन ४ गा. १५-पुण्यस्वरूपम् एवं तरणितो विप्रयुक्तः पान्यः स्वावलम्बनो भूत्वा सुखेन सत्वर स्वकीय धाम समवाप्नोति, तथा भन्यजीवः ससारतः परस्मिन् पारे विद्यमान मोक्ष गन्तुकामो- ऽपरपारे मनुष्यशरीरे तिष्ठन् विभावयनि-"कथमह दुःखवहुल चतुर्गतिकमसार तरिष्यामि?" इति, तदानी मुनिजनोपदेशश्रवणतो जैनागमाद्वा दयादानादिपुण्य- महिमानमवगत्य तत्र यदि विवेकी पुण्यमाश्रयते तदास मुखेन ससारसागरमुत्तरति । अथवा यथाऽङ्गारकामस्तावत् काष्ठादिषु वह्नि प्रज्वालयति, अन्येन वा मज्वालित वनिमुपादत्ते, ततः काठगतानल जलेन निर्वापयति, वहिनिाशे च सति अङ्गारोत्पत्तिर्भवति, एव वह्नयुपादान विनाङ्गारो लब्धुमशक्यः यथाऽङ्गार परले पार पहुँचा देती है, आगे गति करने में असमर्थ होनेसे पथिक उसका त्याग करके स्वावलम्बी बन कर अपने घर पहुँच जाता है। इसी प्रकार भव्य जीव ससारसे परले पार पर अर्थात् मोक्षको जाना चाहता है। वह मनुष्यशरीररूपी इस पार पर ठहरा हुआ विचार करता है कि-'मैं दुःखोंसे भरे हुए चतुर्गतिक ससार-सागरको कैसे पार कर सकूँगा?' तब मुनिजनोंके उपदेशसे, अथवा शास्त्रोंसे दया दान आदि पुण्यकी महिमा जान कर पुण्यका आश्रय लेवे तो सुख- पूर्वक ससार-सागरके पार पहुँच सकता है । अथवा जैसे कोयले चाहनेवाले पुरुप काष्ठ आदिमें अग्नि जलाता है, अथवा दूसरेके द्वारा जलाई हुई अग्निको प्ररण करता है, फिर उस अग्निको वुझा देता है। अग्नि बुझ जाने पर कोयला उत्पन्न होता है। इस प्रकार अग्निका आश्रय लिए विना कोयला कदापि नहीं प्राप्त हो सकता। નકા આગળ ગતિ કરવામાં અસમર્થ હોવાથી પથિક એને ત્યાગ કરીને સ્વાવલંબી બનીને પિતાને ઘેર પહોંચી જાય છે એ પ્રકારે ભવ્ય જીવ સસારને પેલેપાર અર્થાત મોક્ષે જવા ઇરછતે હેય છે તે મનુષ્ય-શરીરરૂપી આ કિનારા પર ઉભે રહીને વિચાર કરે છે કે “ ભરેલા ચતુર્ગતિક સસાર-સાગરને કેવી રીતે પાર કરી શકીશ?” ત્યારે મુનિજનેના ઉપદેશથી, અથવા શાસ્ત્રો દ્વારા દયા દાન આદિ પુણ્યને મહિમા જાણીને પુરૂને આશ્રય લે તે સુખપૂર્વક સારસાગરને પેલે પાર પહોંચી શકે છે અથવા જેને કોયલા જોઈતા હોય છે તે પુરૂષ લાકડાને અગ્નિ લગાડે છે અથવા બીજાઓએ સળગાવેલા અગ્નિને ગ્રહણ કરે છે, અને પછી એ અગ્નિને હલાવી નાખે છે અગ્નિ હોલવાઈ જતા કેયલા ઉત્પન્ન થાય છે, એ રીતે અગ્નિને આશ્રય લીધા . હું દુખેથી ३१२ श्रीदशवकालिको यच्छूयते शास्त्रे तत् पारमासाथ तरणिपरित्यजनमित्र मुक्तिमाप्तिममयापेक्षम् । यथा समुद्रस्य परस्मिन् पारे विधमान गृह गन्तुकामः पथिकोऽपरतीरे विभावयति- 'फयमह तरिष्यामीति, तदानीं नार पिलोग्य "नौरिय परपारमापिकेच न तु मदीयगृहमापिका, अलमस्या आश्रयणेन" इत्यालोच्य यदि नाव नावलम्बते तदाऽसौ गृह गन्तु न शक्नोति । यदि कविनावि सस्थितः समुद्रमध्ये पूर्वोक्तभावना कुर्वाणो नाव परित्यजेत् तदाऽपि नासौ गृहमुपैति मत्युत समुद्रस्य तरलतरक्लोला- वर्तयुक्ताऽगाजले पतितो निमजति प्रियतेऽपि च । यस्तु पुनविकी पथिको नावमाश्रयति तयाऽसौ पर पार प्राप्य तत पर चल्तुिमक्षमा तरणि परित्यजति, क्षय होनेसे मोक्षकी प्राप्ति होती है" सो इस प्रकार समझना चाहिए कि- जैसे समुद्रको पार करके फिर नौकाको त्याग किया जाता है। जैसे समुद्रके दूसरे किनारे पर यने हुए घरमें जानेकी इच्छा करनेवाला पधिक सोचता है कि-'मैं समुद्रको कैसे पार कर सकूँगा?" उसी समय नौकाको देख कर वह पथिक यदि यह विचार करने लगे कि 'इससे तो मैं परले पार तक ही पहुँच सकूँगा घर तक नहीं पहुँचूंगा' ऐसे विचारसे नौकाका अवलम्बन न करे तो कभी घर नहीं पहुँच सकता । यदि नौकामे बैठा हुआ कोई पथिक बीच समुद्र में उक्त विचार करके नौकाका त्याग करदे तो भी घर नहीं पहुँच सकता, बल्कि समुद्रकी चचल तरगों और भंवरोंसे युक्त अथाह जलमें गिर पडेगा और मृत्युको भी प्राप्त हो जायगा किन्तु जो विवेकी पथिक नौकाका सहारा लेता है उसे नौका પ્રાપ્તિ થાય છે તે એ પ્રકારે સમજવું કે-જેમ સમુદ્રને પાર કરીને પછી નૌકાને ત્યાગ કરવામાં આવે છે જેમ સમુદ્રના બીજા કિનારા પર બનેલા ઘરમાં જવાની ઈચ્છા કરનાર પથિક વિચારે છે કે “હું સમુદ્રને કેવી રીતે ઊતરી શકીશ?” એ વખતે નૌકાને જોઈને એ પશ્ચિક જે એમ વિચાર કરવા લાગે કે આથી તે હુ પિલા કિનારા સુધી જ પહોંચી શકીશ, ઘર સુધી નહિ પહોચી શકે, એવા વિચારથી નોકાનું અવલબન ન કરે તે તે કદાપિ ઘેર પહેચી શકશે નહિ જે નકામા બેઠેલ કોઈ પથિક સમુદ્રની વચ્ચે એ વિચાર કરીને નોકોને ત્યાગ કરી દે તે પણ ઘેર પહોચતું નથી કે સમુદ્રના ભમરીઓથી યુક્ત અથાગ જળમાં પડી જશે અને મરણ પણ પામશે પરન્તુ જે વિવેકી પથિક નૌકાનો આશ્રય લે છે તેને નૌકા પેલે પાર પહોંચાડી દે છે " ग ચ ચળ તર ગે અને अध्ययन ४ गा. १५-जीव-कर्मणोर्बन्धसिद्धिः ३१५ तोपणीटीकातोऽवगन्तव्यः । बन्यम् अध्यते परतन्त्रीक्रियतेऽनेनाऽऽत्मेति बन्या- अभीप्सितस्थानप्राप्तिगतिपतिरोधलक्षण , जीवकर्मणोरयोगोल कवयोरिव तादा- स्यापनत्व वा, स च द्रव्यतो निगडादिः, भावतो रागद्वेपादिः, यथा द्रव्यपन्धन- बद्धो जनोऽभिमतस्थानलाभाभावेन कारागारादावेव विविधवेदनादारुणा दशामा- सादयन् विपीदति, तथाऽयमात्मा नानावरणीयादिकर्माष्टकनिगडसन्दानितोऽनन्ता- क्षय्यमुखसम्पदुल्लसिताऽव्यागधाऽभिमतशिवस्थानप्राप्ति विना जन्मजरामरणादि- जन्यानन्यसामान्यरष्टसमष्टिं स्पष्टमनुभवन्निदेव ससारगहरे विपीदति, तम् । आत्मा जिमसे यद्ध-परतन्त्र हो जाती है, वह अर्थात्-अभीष्ट स्थानकी प्राप्ति करानेवाली गतिको रोकनेवाला बन्ध कहलाता है। अथवा जैसे लोहेका गोला और अग्नि एकमेकसे हो जाते हैं, उसी प्रकार जीव और काम एकताका ज्ञान करानेवाला बन्ध होता है। वेडी आदि द्रव्यगन्ध है और रागडेप आदि भावन्ध है। जैसे द्रव्यगन्ध-निगड आदि-से पधा हुआ मनुष्य अभिमत स्थान पर न पहुँच सकनेके कारण कारागार आदिमे ही विविध वेदनाओंके द्वारा दारुण दशा प्राप्त करता हुआ दुःख पाता है, वैसे ही जानावरण आदि आठ कर्म-स्वरूप भाव- वन्धरूपी वेडीके कारण अनन्त अविनाशी सुखरूपी सम्पत्तिसे शोभित, अव्यानाध और अभीष्ट मोक्ष-स्थानकी प्राप्तिके विना जन्म जरा मरण आदिसे होनेवाले अपरिमित दुःख भोगता हुआ इसी ससाररूपी गड्डेमें पडा हुआ कष्ट उठाता है। આત્મા જેથી બદ્ધ-પતુત્ર થઈ જાય છે તે અર્થાત્ અભીષ્ટ સ્થાનની પ્રાપ્તિ કરાવનારી ગતિને રેડનાર બધ કહેવાય છે અથવા જેમ લેઢાને ગળે અને અગ્નિ એકમેક બની જાય છે, તેમ જીવ અને તેમા એકતાનું જ્ઞાન બધ હોય છે બેડી આદિ દ્રવ્યો જ છે અને રાગ દ્વેષ આદિ ભાવ ન ધ છે જેમ દ્રવ્ય બધ હેડ કે બેડી આદિથી બધાયલે મનુષ્ય ધારેલે સ્થાને ન પહાચી, શકવાને કારણે કારાગાર આદિમાં જ વિવિધ વેદનાઓ દ્વારા દારણ કષ્ના દુખ પામે છે તેમ જ્ઞાનાવરણ આદિ આઠ કર્મસ્વરૂપ ભાવ બ ધરૂપી બેડીને કારણે, અન ત અવિનાશી સુખરૂપી સંપત્તિથી ભિત, અવ્યાબાધ અને અભીષ્ટ મોક્ષસ્થાનની પ્રાપ્તિ વિના જન્મ જરા મરણ આદિથી થતા અપરિમિત દુખ ભેગવતા જીવ આ સંસારરૂપી ખાડામાં પડીને કણ ભેગવે છે કરાવનાર પ્રાપ્ત . । ३१४ श्रीदशकालिकभूत्रे मति दिवसस्य कारणता, भयस्य च प्रतियोगिसापेक्षस्येव प्रतियोगी वहिरुपा देयो भाति, तद्वत् मोक्ष प्रति पुण्य प्रसस्य कारणताया तत्पतियोगितया पुण्य मप्युपादेयमेव । पुण्यमर्जयित्वा शुभपरिणामस्प पुण्य ध्यानादिशुद्धपरिणामेन क्षपयित्या मोक्षो लधु शक्यते । इत्य चाऽऽगमप्रामाण्येन पुण्यम्य भव्यकर्त्तव्यता मुस्पष्ट सि यति, भव्यकर्तव्यतयाऽऽगमे मतिपादितत्वात् , शुद्धभावकारणस्वाश्चेति । पापम् पातयति-शुभपरिणामासयत्यात्मानमिति, यद्वा पाति क्षत्यात्म नोऽशुभपरिणाममिति पाप-पुण्यपरिपन्यि तत् , पिस्तरस्तु श्रमणमृत्रीय-मत्कृतमुनि अर्थात् जैसे कोयलेकी प्राप्तिके लिए अग्निका ध्वस कारण रोता है और ध्वस प्रतियोगिसापेक्ष होता है इसलिए अग्निके विसका प्रतियोगी अग्नि भी उपादेय होती है। इसी प्रकार मोक्षका कारण पुण्यका ध्वस है, अत' ध्वसका प्रतियोगी पुण्य भी मोक्षके लिए उपादेय है। उसका उपादान किये विना मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो सकती, क्योंकि पहले शुभ परिणाम रूप पुण्यका उपार्जन करके फिर ध्यान आदि शुद्ध परिणामोंसे उनका क्षय करके मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार आगममें कर्तव्यरूपसे प्रतिपादन करनेसे तथा शुद्ध भावका कारण होनेसे यह भली भाँति सिद्ध हो गया कि पुण्य अवश्य कर्तव्य है जो शुभ परिणामोंसे आत्माको दूर रखता है-शुभ परिणाम नहीं होने देता उसे पाप कहते हैं। वह पुण्यका विरोधी है। વિના કેયલા કદાપિ પ્રાપ્ત થતા નથી અર્થાત્ જેમ કેયલાની પ્રાપ્તિ માટે ને વસ કારણ બને છે અને વસ પ્રતિયોગિ-સાપેક્ષ હોય છે, માટે અગ્નિને ધ્વ સને પ્રતિવેગી અગ્નિ પણ ઉપાદેય બને છે એજ રીતે મિક્ષનું કારણ પુણ્યને વસ છે એટલે દેવ સનું પ્રતિવેગી પુણ્ય પણ મિક્ષને માટે ઉપાદેય છે એનું ઉપાદાન કર્યા વિના મોક્ષની પ્રાપ્તિ થઈ શકતી નથી કારણ કે પહેલા શુભ-પરિણામરૂપ પુણ્યનું ઉપાર્જન કરીને પછી ધ્યાન આદિ શુદ્ધ પરિણામેથી એને ક્ષય કરીને મોક્ષ પ્રાપ્ત કરી શકાય છે એ રીતે આગમમાં કર્તવ્યરૂપે પ્રતિપાદન કર્યું હોવાથી તથા શુદ્ધ ભાવનું કારણ હોવાથી એ સારી રીતે સિદ્ધ થઈ ગયું કે પુણ્ય અવશ્ય કર્તવ્ય છે આત્માને શુભ પરિણમેથી દૂર રાખે છે-શુભ પરિણામ થવા દેતુ નથી તેને પાપ કહે છે તે પુણ્યનું વિરોધી છે अध्ययन ४ गा. १५-जीव-कर्मणोर्वन्धसिद्धिः ३१७ किञ्च-यथा मूर्तामूर्तयोः घटाकाशयोः सयोगरूपः सम्बन्धः, करक्रिययोर्मू- मूिर्तयोः समवायसम्बन्यः परैरङ्गीक्रियते तथाऽऽत्मकर्मणोरमूर्त-मूर्तयो सम्बन्ये न काचिदनुपपत्तिर्नाम । अपि च यथा शरीरमिदमात्मसम्बद्ध प्रत्यक्षमुपलभ्यते वथा मेत्य भवान्तरगमननिमित्त कार्मणलक्षण शरीरान्तरमप्यात्मसम्बद्धमिति स्त्री- काव्यम् । नन्नपूर्वापरपर्यायाऽदृष्टहेतुकमिदमेव गरीर तनास्ति न कार्मणशरीरमिति चेत् , अदृष्टममूर्त मूर्त वा ? अमृतत्वे कय स्थूलमूर्तशरीरेण तत्सम्बन्धः ? भवन्मते अथवा जैसे आकाश अमृत है और घट मृर्त है तथापि उन दोनोंका सयोग-सम्बन्ध होता है, और जैसे मृत हाय तथा हाथसे होनेवाली अमूर्त क्रियाका दूसरोंने समवाय-सम्बन्ध स्वीकार किया है, उसी प्रकार अमूर्त आत्मा और मृत कर्मका बन्ध भी युक्ति-युक्त ही है। अथवा जैसे आत्मासे सबद्ध यह शरीर प्रत्यक्षसे सिद्ध है उसी भकार परलोकमें गमन करानेवाला कार्मण शरीर भी आत्मासे संबद्ध है, ऐसा स्वीकार करना चाहिए। यदि ऐसा कहो कि-'अपूर्व' या 'अदृष्ट'के कारण यही शरीर परलोकके लिए गति कराता है तो हम पूरेंगे कि यह अदृष्ट अमूर्त है या मृत्तं', अमृत है तो स्थूल मूर्त शरीरके साथ अदृष्टका सयोग कैसे . અથવા જેમ આકાશ અમૂર્ત છે અને ઘટ મૂર્ત છે, તથાપિ એ બેઉને સગા-સબંધ થાય છે, અને જેમ મૂર્ત હાથ તથા હાથથી થનારી અમૂર્ત ક્રિયાને બીજાઓએ સમવાય-સ બધ ગ્વીકાર્યો છે, એ પ્રકારે અમૃત આત્મા અને મૂર્ત કર્મને બધ પણ યુડિતયુકત જ છે અથવા જેમ આત્માથી સબદ્ધ આ શરીર પ્રત્યક્ષથી સિદ્ધ છે, તેમ પલેકમાં ગમન કરાવનારૂ કામણ શરીર પણ આત્માથી નબદ્ધ છે એને સ્વીકાર કરે જોઈએ જે એમ કહે કે “અપૂર્વ” યા અદા’ને કારણે આ શરીર પરલેકને માટે ગતિ કરાવે છે, તે અમે પૂછીશુ કે એ અદણ અમૂર્ત છે કે મૂર્ત ?, અમૂર્ત છે તે સ્થૂલ મૂર્ત શરીરની સાથે અને સંગ કેવી રીતે થયે?, તમારે મને .

श्रीदशवकालिकसूत्रे नन्यात्मनोऽमूर्तताकर्मणा च मूर्तत्वान्न तयोः परस्पर सम्पन्न सभवति, अमूर्चत्वेऽपि सम्बन्धस्वीकारे आकागधर्माधर्मास्तिकायकाले: सहापि सम्बन्ध- मसह इति चेन्न, आत्मनः कर्मणा सह सम्पन्धामाऽऽपादने हेतुत्वेनोपन्यस्तममृतव किं सर्वथारूपेण किं वा कथञ्चिद्रूपेण स्वीक्रियते ? नायः, हेत्वसिद्धः, ययाऽमूर्तभू तस्य सिद्धात्मनः फर्मसम्पन्धाभागो मयाऽपीप्यत एर। आत्मत्वावच्छिन्नस्य सर्वथैवाऽमूत्व तु दुच, ससारिजीयाना कथनिन्मृत्वसद्भागत् । कयश्चित् स्वीक्रियेत चेत्तदा यदपेक्षया मूर्तत्व तदपेक्षया सम्पन्योऽसन्दिग्ध एव । मुक्तात्म नश्च मूर्त्तत्वाभावान्न सम्पन्धाभ्युपगमः । प्रश्न-आत्मा अमृत (अरूपी) है और कर्म मूर्त (रूपी) है। इस कारणसे इन दोनोंका परस्पर वन्ध कैसे हो सकता है ?, यदि मृतका यन्ध अमूर्त्तके साथ हो सकता है तो आकाशास्तिकाय, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय और कालके साथ भी कर्मोंका बन्ध हो जायगा, क्योंकि वे भी अमृत है। उत्तर-तुम कहते हो कि आत्माअमूर्त है, सोयह बताओ कि आत्मा सर्वथा अमूर्त है या कथेचित् अमूर्त है, यदि कहोगे कि आत्मा सर्वथा अमूर्त है तो हेतु असिद्ध हो जायगा, क्योकि आगममे आत्माको सर्वथा अमृत नहीं माना गया है। अगर 'कथञ्चित् अमूर्त' कहोगे तोकथञ्चित मूर्त भी होगी,और जिस (ससारावस्थाकी) अपेक्षासे आत्मा मृत है उसी अपेक्षासे कर्मोंका बन्ध होता है । मुक्तात्मा मूर्त नहीं है इसलिए वहाँ बध भी नहीं होता। પ્રશ્ન–આત્મા અમૂર્ત (અરૂપી) છે અને કર્મ મૂર્ત (રૂપી) છે એ કારણે એ બેઉને પરસ્પર બધ કેવી રીતે થઈ શકે ? જે મૂતને બધ અમૂર્તની સાથે થઈ શકે તે આકાશાસ્તિકાય, ધમસ્તિકાય, અધર્માસ્તિકાય અને કાલની સાથે પણું કર્મોને બધ થઈ જશે, કારણ કે તે પણ અમૂર્ત છે ઉત્તર—તમે કહે છે કે આત્મા અમૂર્ત છે, તે બતાવે કે આત્મા સર્વથા અમૂર્ત છે કે કથચિત્ અમૂત છે? જે કહેશે કે આત્મા સર્વથા અમૂર્ત છે તે હેતુ અસિદ્ધ થઈ જશે, કારણ કે આગમમા આત્માને સર્વથા અમૂર્ત માન્ય નથી અગર “કથાચત અમૂર્ત” કહેશે તે કથ ચિત્ મૂર્ત પણ થશે, અને જે (સસારાવસ્થાન) અપેક્ષાએ આત્મા મૂર્ત છે તે અપેક્ષાએ કમને બધ થાય છે મુકતાત્મા મૂર્ત નથી તેથી તેને બંધ પણ થતો નથી अध्ययन ४ गा. १५-बन्धस्वरूपम् ३१९ मारोहु प्रभवेदिति चेन्न, जीवकर्मणोः खनौ सुवर्णोपलयोरिव सयोगस्याऽनादि- कालिकत्वात् । नच 'जीवकर्मणोः सम्बन्धस्याऽनादित्वे मोक्षो नैव सभवति अनादेरन्ताभावा- दाकाशात्मनोरिवे'-ति वाच्यम् , अनायनन्तत्वयोरविनाभाराऽभावात्, अनादेरपि घटादिमागभावस्य सान्तत्वोपलम्भात्, अनादेरपि पीजाङ्कुरादिसन्तानस्य दाहा- दिकारणवशात्सान्ततादर्शनाच, इत्यलमतिविस्तरेण | बन्धस्वरूपमुच्यते- उत्तर-जैसे खानमें रहे हुए सुवर्ण तथा पाषाणका सम्बन्ध अनादि- कालीन है, वैसेही जीव और कर्मका भी सम्बन्ध अनादिकालीन है। कोई-कोई ऐसा कहते हैं कि जिसकी आदि नहीं होती उसका अन्त भी नही होता है, जैसे जीव और आकाशका सम्बन्ध कभी नष्ट नही होता, इस नियमके अनुसार यदि जीव-कर्मका सम्बन्ध अनादि- कालीन है तो कभी उसका भी अन्त न होगा, फिर किसीको मोक्ष मिल ही नहीं सकेगा। उनका यह कथन दृपित है, क्योंकि घट आदिका प्राग् अभाव यद्यपि अनादिकालीन है फिर भी घट उत्पन्न होते ही उसका अन्त होजाता है। योज तथा वृक्षकी परम्परा भी अनादिकालीन है तथापि यदि बीज जल जाय तो उस परम्पराका अभाव हो जाता है, इसलिए आत्मकर्म- सयोग अनादि होनेपर भी सान्त हो सकता है ।बन्धका स्वरूप कहते हैं- ઉત્તર-જેમ ખાણમાં રહેલા સુવર્ણ તથા પાષાણને સબધ અનાદિ કાળને છે તેમ જીવ અને કર્મને પણ સબધ અનાદિકાળને છે કેઈ—કઈ એમ કહે છે કે જેની આદિ નથી તેને અત પણ હેતે નથી, જેમકે જીવ અને આકાશને સબધ કદાપિ નષ્ટ થતું નથી એ નિયમાનુસાર જે જીવ-કર્મને સ બધ અનાદિકાળને છે તે કદાપિ તેને અત થશે નહિ, પછી કેઈને મોક્ષ મળી શકશે નહિ એનું એ કથન દૂષિત છે, કારણ કે ઘટ આદિને પ્રાર્ અભાવ છે કે અનાદિ- કાળને છે, તે પણ ઘટ ઉત્પન્ન થતા જ તેને અત થઈ જાય છે બીજ તથા વૃક્ષની પરપરા પણ અનાદિકાળની છે તથાપિ જે બીજ બળી પર પરાને અભાવ થઈ જાય છે તેથી આત્મક–સગ અનાદિ હોવા છતા પણ સાન્ત થઈ શકે છે બધો સ્વરૂપ કહે છે- જાય ३१८ श्रीदशवेकालिकात्रे वदसम्भवात् । सम्भवे चाऽऽस्मर्मसयोगेन किमपरादम् ?, अथ मूर्तस्वमग्री क्रियते तदाऽन्धसर्पविलमयेशन्यायेन मूर्तामूर्तयोः सम्बन्धः स्वीकृत एवं ॥ ननु फर्मसयोगादात्मनो मूर्चय सपरते, तस्मिँत्र सति बन्धसम्बन्धी युज्यते, कमान्धात्पूर्वं तु आत्मनो मूर्तत्वाभावात् कथमिव बन्धः सभावनासरणि- हुआ? क्योंकि तुम्हारे मतसे ऐसा रोना असभव है। विना अदृष्टके सम्बन्धके स्थूल शरीरमें चेष्टा नहीं हो सकती। सभव मानो तो आत्मा और कर्मके सयोगने क्या अपराध किया है। अर्थात् जय अमूर्त अदृष्ट और मृत शरीरका सम्बन्ध हो सकता है तो आत्मा और कर्मका भी सयोग हो सकता है। अगर अदृष्ट (भाग्य) को मूर्त मानो तो अमूर्त आत्माके साथ उसका सम्बन्ध स्वीकार करनेसे यह मान ही लिया कि अमूर्त और मूर्त्तका सम्बन्ध होता है । जैसे अन्धा सर्प इधर उधर भटककर फिर बिलमें प्रवेश करता है वैसेही तुमने कल्पनासे इधर उधर दौडकर अन्तमें अमूर्त्तका मृतके साथ सबन्ध स्वीकार करही लिया। प्रश्न-कर्मका सयोग होनेपर आत्मामूर्त होती है और मूर्त होजाने पर बन्ध हो सकता है किन्तु कर्मबन्ध होनेसे पहले तो आत्मा मूर्त नही थी-अमूर्त थी, फिर बन्धकी सभावना कैसे हो सकती है । એમ થવુ અસભવિત છે અષ્ટના સબધ વિના સ્થલ શરીરમાં ચેષ્ટ થઈ શકતી નથી સભવ માને તે આત્મા અને કર્મના સિગે શો અપરાધ કર્યો છે? અર્થાત જે અમૂર્ત અદષ્ટ અને મૂત શરીરને સ બધ થઈ શકે છે તે આત્મા અને કર્મને પણ સોગ થઈ શકે છે અગર અદષ્ટ (ભાગ્ય)ને મૂર્ત માને તે અમૃત આત્માની સાથે એને સબંધ સ્વીકારવાથી એમ માની લીધું કે અમૂર્ત અને મૂર્તિને સબધ થાય છે, જેમ આધળે સર્ષ અહીં-તહીં ભટકીને પછી દરમાં પ્રવેશ કરે છે, તેમ તમે કલ્પનાથી અહીં-તહીં દોડીને છેવટે અમૂર્તને મૂર્તની સાથે સબધ સ્વીકાર કરી લીધો પ્રશ્ન-કર્મને સવેગ થયા પછી આત્મા મૂર્ત થાય છે અને મૂર્ત થયા પછી બંધ થઈ શકે છે, પરન્તુ કર્મબધ થયા પહેલા તે આત્મા મૂર્ત ન હેતે, અમૂર્ત હો, પછી બધની સ ભાવના કેવી રીતે હેઈ શકે છે? A , अययन ४ गा. १५-पन्धस्वरूपम् ३२१ दानादिपतिरातमत्वम् (८), तद्रूपो वन्यः प्रकृतिपय १ । स्थिति जयन्यादिभेदेन कर्मणामात्मना सहावस्थान, वलक्षणो वन्धः स्थितिजन्यः २॥ अनुभागो-रसः कर्मणा फलदातृत्वशक्तितारतम्य, तत्स्वरूपो बन्योऽनुभाग- वन्धः ३ । प्रदेशः कर्मदलसञ्चयस्वरूपः अनन्तानन्तकर्मपदेशानामियत्तारूपेण जीव- प्रदेशेषु सम्बन्धम्तलक्षणो वन्यः प्रदेशवन्धः ४ । उक्तञ्च- स्वभावः प्रकृति प्रोक्तः, स्थितिः कालावधारणम् । अनुभागो रसो ज्ञेयः, प्रदेशो दलसञ्चयः ॥१॥” इति । भोग उपभोग और वीर्यमें विघ्न डालना अन्तराय कर्मका स्वभाव है ८॥ इसीको प्रकृतिवन्ध कहते हैं । (२) स्थितिबन्ध-पधे हुए कर्म आत्माके साथ जघन्य कितने काल तक रहेंगे और उत्कृष्ट कितने काल तक रहेंगे, इस कालकी मर्यादाको स्थितिवन्ध कहते हैं। () अनुभागवन्ध-फल देनेवाली कर्मोंकी शक्तिके तारतम्यको अनुभागवन्ध करते है। (४) प्रदेशरन्ध-कितने कर्म आत्माके साथ बन्धको प्राप्त हुए हैं, इस प्रकार कर्मप्रदेशोंकी परिगणनाको प्रदेशयन्ध कहते हैं। कहा भी है- "स्वभावको प्रकृतिवन्ध, कालकी मर्यादाको स्थितिवन्ध, रसको अनुभागवन्ध और कर्मपुगलोंके समूहको प्रदेशबन्ध कहते हैं ॥१॥" એ ગેરકર્મને સ્વભાવ છે ૭ તથા દાન લાભ ભેગ ઉપગ અને વીર્યમા વિન નાખવું એ અતરાય-કમને સ્વભાવ છે ૮ એને પ્રકૃતિ-ધ કહે છે (૨) સ્થિતિ બ ધ–બધાયલા કર્મ આત્માની સાથે જઘન્ય કેટલા કાળસુધી બહેશે અને ઉત્કૃષ્ટ કેટલા કાળસુધી રહેશે એ કાળની મર્યાદાને સ્થિતિબધ કહે છે (3) અનુભાગ બધ-ફળ આપનારી કર્મોની શકિતના તારતમ્યને અનુભાગ -हे (૪) પ્રદેશ બધ–કેટલા કર્મો આભાની સાથે બધાને પ્રાપ્ત થયા છે એ પ્રકારે કર્મપ્રદેશની પરિગણુનાને પ્રદેશ બધા કહે છે કહ્યું છે કે- સ્વભાવને પ્રકૃતિબધ, કાળની મર્યાદાને સ્થિતિ ધ, રસને અનુભાગ બંધ અને કર્મ- પુના સમૂહને પ્રદેશબધ કહે છે”(૧) - .३२० श्रीशिवकालिकम्त्रे बन्धमतुधिः प्रकृति म्यित्य-नुभाग प्रदेशमेदाद, तत्र-प्रकृति स्वभाव आत्मगृहीतकर्मपुद्गलाना ताक्तिरूपतया परिणमनलक्षण', यथा-निम्बस्य तिक्तत्यम् , गुडस्य मधुरत्वमित्यादि, तथा सानापरणीयस्य जीवादिपदार्यानव वोधकत्वम् (१), दर्शनावरणीयस्प जीवादीनामनालोचकत्वम् (२), वेदनीयस्या- ऽन्यावाधगुणवाधयत्यम् (३), मोहनीयस्य तचारुचिलमातिय व (४), आयुपो भाधायफत्वम् मोक्षस्य साधनन्तस्थित्याच्छादकत्वमित्यर्थः (१), नाम्नोऽमूर्त त्वगुणनिरोधकत्वम् (६), गोत्रस्यागुरुलघुगुणधावकत्वम् (७), अन्तरायस्य च बन्ध चार प्रकारका है-(१) प्रकृतिवन्ध, (२) स्थितियन्ध, (३) अनु- भागवन्ध और (४) प्रदेशयन्ध । (१) प्रकृतिवन्ध-प्रकृति स्वभावको करते हैं। अर्थात् आत्माके द्वारा ग्रहण किये हुए कर्मों में अमुक अमुक प्रकारकी शक्तिका आजाना। जैसे नीमका स्वभाव कटुकता, गुड़का स्वभाव माधुर्य, इत्यादि। इसी प्रकार ज्ञानावरण कर्मका स्वभाव है-आत्माके ज्ञानको आच्छादित करना १ । दर्शनावरणका स्वभाव है-दर्शनको रोकना२। अव्यायाध गुणको प्रगट न होने देना वेदनीय कर्मका। जीवादि तत्त्वोंमे रुचि न होने देना तथा चारित्रको रोकना मोहनीय कर्मका ४। किसी शरीरमें रोक रखना आयुकर्मका ५ । अमृतत्व गुणको प्रगट न होने देना नामकर्मका ६ । अगुरु-लघुत्व गुणका नाश कर देना गोत्रकर्मका ७१ तथा दान लाभ ५५ यार प्रश्न छ (१) प्रति-14, (२) स्थिति-५८, (3) मनुभाग ५५ मन (४) प्रश-14 (૧) પ્રકૃતિ બધ-પ્રકૃતિ સ્વભાવને કહે છે, અર્થાત્ આત્મા વડે ગ્રહણ કરી થલા કમૅમાં અમુક-અમુક પ્રકારની શક્તિ આવી જવી તે જેમ ભી બડાને સ્વભાવ કટુતા (કડવાશ) છે, ગોળને સ્વભાવ મધુરતા (મિઠાશ) છે, ઈત્યાદિ એ રીતે જ્ઞાનાવરણીય કર્મને સ્વભાવ આત્માના જ્ઞાનને આછાદિત કરવાને (ઢાકવાને) છે ૧ દર્શનાવરણને સ્વભાવ દર્શનને રેકવાને છે ૨ અવ્યાબાધ ગુણને પ્રકટ ન થવા દેવા એ વેદનીય-કર્મને સ્વભાવ છે ૩ જીવાદિ તમા રૂચિ ન થવા દેવી તથા ચારિને રેકવુ એ મોહનીય-કર્મને સ્વભાવ છે ૪ કે શરીરમાં આત્માને રોકી રાખવે એ આયુ-કમને સ્વભાવ છે ૫ અમૂર્તવ ગુણને પ્રકટ થવા ન દેવે એ નામકર્મને સ્વભાવ છે ૬ અગુરૂ- -- JI..

अध्ययन ४ गा. १५-वन्धस्वरूपम् ३२३ पमा, कस्यचिच्चान्तर्मुहूर्तपरिच्छिन्ना, एव विभिन्नकर्मणा नियतकालावस्थान स्थिति- चन्धः (२)। यथा कस्यचिन्मोदकस्यानुभागो(रसो)ऽतिमधुरः स्वल्पमधुरो वा, कस्यचि- दतिकटुकः स्वल्पकटुको वा, कस्यचिच्च नातिमधुरो नाप्यतिकटुको भवति, द्विगुणी- करणादिना च स एव मन्द-मन्दतरत्वादिव्यपदेश च लभते, तथा कर्मणामपि शुभाशुभादिरूपेण तीन-तीनतर तीव्रतम-मन्द-मन्दतर मन्दतमत्वादिभेदभिन्नो वन्धोऽनुभागवन्धो रसबन्धव्यपदेश्यः (३) । १ शुभकर्मणामनुभागो (रसो) द्राक्षेक्षुक्षीरमाक्षीफवदतिमधुरो भवति, यदनुभ- किसीकी सत्तर कोडाकोडी सागरोपमकी होती है, किसी कर्मकी अन्त- मुहर्त मात्रकी होती है, इस प्रकार विभिन्न कर्मोंका अमुक समय तक आत्माके साथ स्थित रहना स्थितिबन्ध कहलाता है । (३) जैसे किसी मोदकका स्वाद (रस) बहुत मीठा होता है, किसी मोदकका कम मीठा होता है, किसीका स्वाद बहुत कडुआ होता है, किसीका कम कडुआ होता है, किसीका स्वाद न अधिक मीठा होता है, न अधिक कडुआ होता है, उसे ही द्विगुण आदि करदेनेसे वही मन्द मन्दतर आदि कहलाने लगता है। वैसे ही कोंका रस शुभ अशुभ रूपसे तीव्र, तीव्रतर, तीव्रतम, मन्द, मन्दतर और मन्दतम आदि भेदोंसे विविध प्रकारका होता है। उसे ही अनुभागबन्ध या रसबन्ध कहते हैं। १ शुभकाँका अनुभाग (रस) दाख, साठा (गन्ना), ध या मधुके समान હોય છે, કોઈ કમની સ્થિતિ માત્ર અતિમુહૂર્તની હોય છે એ પ્રકારે વિભિન્ન કર્મોનું અમુક સમય સુધી આત્માની સાથે સ્થિત રહેવું એ સ્થિતિબધ કહેવાય છે, (૩) જેમ કે મોદકને વાદ (રસ) બહુ મીઠે હોય છે કે મોદકને ઓછો મીઠો હોય છે, કે મેદાને સ્વાદ બહુ કડ હેય છે, કેઈન એ છે કડ હોય છે, કોઈને સ્વાદ ન વધુ મીઠે કે વધુ કડે હોય છે, તેને દ્વિગુણ (બેવડ) કરવાથી તે મદમદતર આદિ કહેવાવા લાગે છે, એજ રીતે કને રસ શુભ અશુભ રૂપથી તીવ્ર, તીવ્રત, તીવ્રતમ, મદ, મદત, મદતમ આદિ ભેદેએ કરીને વિવિધ પ્રકારનો થાય છે એને અનુભાગાબ ધ યા સુધ ૧ શુભ કર્મોનો અનુભાગ (રસ) દ્રાક્ષ શેરડી દૂધ યા મધના જે અતિમપુર હોય છે " . ३२२ श्रीदशकालिकम्त्रे एतेपा सस्प च मुखामोधाय मोग्यदृष्टान्तेन प्रदर्यते- यथा फस्यचिदौषधमोदयस्य मातितिहारिका, कस्यचिरिपतहारिका, कर चित्कफहारिणी, फस्यचिद् घुद्धिनाशिनी, तया फम्यचिकर्मणः प्रकृतिज्ञानावर कारिणी, कस्यचिनापरणनिधायिनीत्येवमादिविभिन्न शक्तिमता कर्मणा बन प्रकृतिपन्धः (१)। यथा कस्यचिन्मोदकस्य स्थितिः सप्ताहोरात्रव्यापिनी, कस्यचित्पक्षव्यापि कस्यचनकादिकमास यारत् स्थितिस्तथा कस्यचित्कर्मणसिंगकोटीकोटीसागरोप स्थितिः, कस्यचिविंशतिकोटीकोटीसागरोपमा, फस्यचन सप्ततिकोटीकोटीसाग सरलतासे समझनेके लिए मोदकका दृष्टान्त देकर चारों बन्धों स्वरूप दिखलाते है- (१) जैसे किसी औपध-मोदककी प्रकृति वातको हरनेवाली होती किसीकी पित्तको हरनेवाली होती है, किसीकी कफको हरनेवा होती है और किसी मोदककी प्रकृति बुद्धिको नष्ट करनेवाली होती इसी प्रकार किसी कर्मकी प्रकृति ज्ञानका आवरण करनेवाली होती और किसीकी दर्शनका आवरण करनेवाली होती है । इस प्रकार नि भिन्न शक्तिवाले कर्मोंका बन्ध होना प्रकृतिबन्ध है। (२) जैसे किसी मोदककी स्थिति एक सप्ताहकी रोती है, कि मोदककी स्थिति एक पक्ष (पखवाड़े)की होती है, किसी मोदककी स्थि एक मासकी रोती है, वैसे ही किसी कर्मकी स्थिति तीस कोडाको सागरोपमकी होती है, किसीको वीस कोडाकोडीसागरोपमकी होती સરળતાથી સમજવાને માટે મોદકનુ દુછાત આપીને ચારે બ નું સ્વા બતાવે છે – (૧) જેમ કોઈ ઔષધ–દકની પ્રકૃતિ વાયુને હરવાવાળી છે att શકિત પિત્તને હરવાવાળી છે, કેઈની કફને હરવાવાળી છે, અને કેઈ મેદ પ્રકૃતિ બુદ્ધિને નષ્ટ કરવાવાળી હોય છે એ રીતે કઈ કર્મની પ્રકૃતિ જ્ઞા આવરણ કરનારી હોય છે, કેઈની દર્શનનું આવરણ કરનારી હોય છે, એ જ ભિન્ન ભિન્ન શકિતવાળા કર્મોને બંધ થ એ પ્રકૃતિબધ કહેવાય છે (૨) જેમ કઈ મેદાની સ્થિતિ એક સપ્તાહની હોય છે, કે મેદ સ્થિતિ એક પક્ષ (પખવાડિયું)ની હોય છે, કઈ મેદાની સ્થિતિ એક હોય છે, તેમજ કઈ કર્મની સ્થિતિ ત્રીસ ડાકોડી સાગરોપમની હય કઈની વીસ ડિડી સાગરોપમની હોય છે, કેઈની સત્તર કડકડી સાગરોપમાં . , માટે , अध्ययन ४ गा. १५-मोक्षस्वरूपम् ३२५ यथा कस्यचिन्मोदकस्य प्रदेश कणिकादिदलसञ्चयः परिमाणेन द्विकर्पमितः, कस्यचित्कर्षनयमितः, एव कस्मिंश्चित् कर्मदले परिमाणतोऽधिकसल्यकाः, कस्मि- श्चिन्न्यूनसख्यकाः, इत्येव न्यूनाधिक्यरूपेण कर्मवर्गणाभिरात्मनोऽभिसम्बन्धः प्रदेशवन्धः (४)। मोक्षम् मोक्षण मोक्षः, स च द्रव्यभावभेदाद्विविधः, तत्र द्रव्यतो निगडादितः, भावतो ज्ञानावरणीयावष्टविधर्मपाशतः पृथग्भवनमात्मनः, प्रकृते च भावमोक्षस्य आत्मनः पुनरमादुर्भाव्यशेपकर्मक्षयादनन्तज्ञानशाश्वतावस्थिति-कृतकृत्यत्वाऽव्या- वाधमुखस्वरूपस्य ग्रहणम् । (४) जैसे किसी मोदकमे आटे आदिके प्रदेश, परिमाणमें दो तोला होता है, किसीका तीन तोला होता है । इसी प्रकार किसी कर्मदलमें अधिक सख्यावाले प्रदेश है, किसी कर्मदलमे कम सख्यावाले प्रदेश होते है, अतः न्यूनाधिक रूपसे कर्मवर्गणाओके साथ आत्माका सम्बन्ध होना प्रदेशवन्ध है। छूटनेको मोक्ष कहते हैं, मोक्ष भी दो प्रकारका है-(१) द्रव्यमोक्ष और (२) भावमोक्ष । वेडी आदिसे छूटना द्रव्यमोक्ष है और ज्ञानावरण आदि आठ कर्मस्पी पाशसे आत्माका मुक्त हो जाना भावमोक्ष है। यहा समस्त कर्मोके आत्यन्तिक अभावसे उत्पन्न होनेवाले अनन्त ज्ञान, शाश्वत स्थिति, कृत-कृत्यता, अव्यायाध सुखस्वरूप भाव-मोक्षका ग्रहण किया गया है। (૪) જેમ કે મેદકમા આટા આદિને પ્રદેશ પરિમાણમાં બે તોલા હોય છે, કોઈમાં ત્રણ તલા હોય છે, એજ રીતે કોઈ કર્મદળમા અધિક સખ્યા- વાળા પ્રદેશ છે, કોઈ કમંદળમા ઓછી સંખ્યાવાળા પ્રદેશો હોય છે, એમ જૂનાધિક રૂપે કર્મવર્ગણુઓની સાથે આત્માને સબધ થે એ પ્રદેશબંધ છે છૂટવાને મોક્ષ કહે છે મોક્ષના પણ બે પ્રકાર છે (૧) દ્રવ્ય–મેક્ષ અને (૨) ભાવમેક્ષ, બેડી વગેરેથી છૂટવુ એ દ્રવ્યમેક્ષ છે અને જ્ઞાનાવરણ આદિ આઠ કર્મરૂપી પાશથી આત્માનુ મુક્ત થઈ જવું તે ભાવભેક્ષ છે અહી સર્વ કર્મોના આત્યંતિક અભાવથી ઉત્પન્ન થનારા શાશ્વત-સ્થિતિ, કૃતકૃત્યતા, અવ્યાબાધ-સુખ-સ્વરૂપ ભાવભેક્ષને ગ્રહણ કરવામા આવેલ છે અનત જ્ઞાન, ३२४ श्रीववेकालिको . वेन जीयः सान्द्रानन्दसन्दोहन्दिलान्तःकरणो जायते । अशुमार्मणां रसस्तु निम्न किराततिकादिनदतितरा तिक्तो भवति, यदनुभवेन जीवोऽनिननीय व्याकुलीमाव भजते, तीव्रतीयतरत्वादियोधनार्थ च शान्तः मयते-इवनिम्बयोरन्यतरस्य चतु शेटकपरिमितो रसः 'स्वाभाविकरस' इत्युच्यते, गहिनापद्वारोस्कालितो यदा शेटकचतुष्प्रयस्थाने शेटकत्रितयमात्रोऽनशिप्येत तदाऽसौ 'तीर' इत्युच्यते, पुनर कालनेन शेटकद्वितयमात्रोजशिष्येत तदा 'तीनवर' इत्यभिधीयते, पुनरप्युस्का- लनेन शेटकैकमात्रेऽवशिष्टे 'तीनतम' इति कथ्यते । इक्षु-निम्बयोरेव शेटकैकमात्रो रसः 'स्वाभाविकरसः' इत्युच्यते, एकशेटक- जलमेलनेन 'मन्दरस' इति, द्विशेटकजलसयोजनेन 'मन्दवरो रस' इति, शेटक त्रितयपरिमितजलसम्मन्येन 'मन्दतमो रस' इति व्यपदेश लभते । अतिमधुर होता है, इसके उपभोगसे आत्मामें अत्यन्त आनन्द उत्पन्न होता है । अशुभ कर्मों का फल नीम चिरायता आदिके समान अत्यन्त तिक्त होता है, इसका अनुभव करनेसे जीव अतिशय व्याकुलता प्राप्त करता है। तीन तीव्रतर आदि समझानेके लिये उदाहरण देते हैं-इक्षु या नीमसे किसीका चार सेर रस 'स्वाभाविक रस' कहलाता है, यदि अनिमें उकालने पर तीन सेर रह जाय तो वह तीव्र कहलाता है, फिर उकालने पर दो सेर वच जाय तो तीव्रतर कहलाता है, यदि फिर उकालने पर सिर्फ एक सेर वाकी रह जाय तो वह तीनतम कहलाता है। इक्षु और निम्बका एक सेर रस स्वभाविक रस, उसमें एक सेर जल मिला दिया जाय तो मन्द, दो सेर मिलानेसे मन्दवर, तीन सेर मिलानेसे मन्दतम रस कहलाता है। એના ઉપભેગથી અમામાં અત્યંત આનદ ઉત્પન્ન થાય છે અશુભ કર્મોનું ફળ લીંબડે કરિયાતુ આદિની કે અયત તિક્ત હોય છે અને અનુભવ કરવાથી જવ અતિશય વ્યાકુળતા પ્રાપ્ત કરે છે તીવ્ર તીવ્રતર આદિ સમજાવવાને ઉદાહ આપે છે-નોરડી યા લબડામાંથી કાઢે કોઈને ચાર શેર રસ સ્વાભાવિક રસ કહેવાય છે જે તેને અગ્નિ પર ઉકાળવાથી ત્રણ શેર રહે તો તે તીવ્ર કહેવાય છે ફરી ઉકાળવાથી બે શેર રહે તો તે તીવ્રતા કહેવાય છે અને તેને ફરીથી ઉકાળતા રહે તે તે તીવ્રતમ કહેવાય છે શેરડી અને લીંબડાના એક શેર સ્વાભાવિક સમા જે એક શેર પાણી મેળવવામાં આવે તો મદ બે શેર પાણી મેળવતા મદતર અને ત્રણ શેર પાણી મેળવવાથી મદતમ રસ કહેવાય છે માત્ર શેર બાકી अध्ययन ४ गा. १५-मोक्षस्वरूपम् ३२७ तस्मादात्मनः सकलकर्ममलविरहिता सद्भावस्वरूपा काचिदवस्थाऽवश्यम्भाविनी । न च 'दीपस्याऽभ्रस्य वा निरन्वयविनाशदर्शनादात्मनः स (निरन्वयविनाश:) कथ ने-'ति शङ्कनीयम्, तयोरपि निरन्वयविनाशानभ्युपगमात् , यथा कर्पूरस्य 'पिपरमेण्ट' इति ख्यातपदार्थस्य वा पातेन हियमाणस्य परिणमनसोक्षम्यादि- न्द्रियगोचरत्वापायेऽपि न सर्वथाऽभावः किन्त्ववस्थान्तरेण परिणतिमानम् , तथैव प्रदीपपर्यायाऽऽपन्नाः पुद्गलास्तमस्त्वेन परिणमन्ति, एवमभ्रस्यापि विशीयमाणम्य पुद्गलपुञ्जः परिणामसूक्ष्मत्वेन दृष्टिपथमप्राप्तोऽपि न पुद्गत्वेनाऽसद्भूतः। एवमेवा- नहीं होता। जब सत् पदार्थका अभाव नहीं हो सकतातो आत्माकी भी समस्त कर्मोंसे रहित विद्यमान अवस्था अवश्य होनी चाहिये । बौद-जव दीपककी ज्वालामा तथा मेघका निरन्वय नाश देखा जाता है तो आत्माका निरन्वय (सर्वथा) नाश क्यों नहीं हो सकता। जैन-यह कहना मल नहीं है कि दीपककी ज्वाला और मेध का निरन्वय नाश होजाता है। वह सूक्ष्मरूपसे परिणमन होनेसे यद्यपि इन्द्रियगोचर नहीं होता तथापि उसका सर्वथा अभाव नहीं होजाता, वह दूसरी सूक्ष्म अवस्था को प्राप्त होजाता है। इसी तरह प्रदीप अवस्था चाले पुद्गल अन्धकाररूपमे परिणत होजाते हैं । मेघ जब छिन्न-भिन्न हो जाता है तो सूक्ष्मरूपमे परिणत होजाने से इन्द्रियोंजारा गृहीत नहीं हो सकता तथापि पुल के रूपमें विद्यमान रहता ही है। ऐसे ही समस्त તે નથી જે સત પદાર્થને અભાવ થી શકતું નથી તે આત્માની પણ સર્વ કર્મોથી રહિત વિદ્યમાન અવસ્થા અવશ્ય હેવી જોઈએ બોદ્ધ-– દીપકની જવાળાને તથા મેઘને નિરન્વય ના જોવામાં આવે છે, તે આત્માને નિરન્વય (સર્વથા) નાશ કેમ ન થઈ શકે? જેન–એમ કહેવું સત્ય નથી કે દીપકની જવાળા અને મેઘને નિરન્વય નાશ થઈ જાય છે સૂમરૂપથી પરિણમન થવાથી જે કે તે ઈન્દ્રિયગેચર થતા નથી, તથાપિ એનો સર્વથા અભાવ થઈ જતું નથી તે બીજી સૂક્ષમ અવસ્થાને પામે છે એ રીતે પ્રદીપ અવસ્થાવાળા પુદ્ગલ અધતા-રૂપમાં પરિણત થઈ જાય છે મેઘ જ્યારે ગ્નિ-ભિન્ન થઈ જાય છે ત્યારે તે સૂમરૂપમાં પરિણત થઈ જાવાથી ઈદ્ધિદ્વારા ગ્રહીત થઈ શકતો નથી. તેપણ પુદગલના રૂપમાં વિદ્યમાન श्रीदनवैकालिकमूत्रे अत्र चौद्धा-"दीपनिर्वाणदात्मनो निर्माण मोक्षः" यथोक्तम्- "दीपो यथा नितिमभ्युपेतो, मेगानि गन्छति नान्तरितम् । दिश न काचिद्विदिन न कान्निद , स्नेहक्षयात्केलमेति गान्तिम् ॥१॥ जीवस्तथा नितिमभ्युपेतो, नेवानि गन्छति नान्तरिक्षम् । दिश न काश्चिद्विदिश न यान्चित, हे शक्षयाकेवलमेति शान्तिम् ॥२॥" इत्याहुस्तन्छाश्वतारस्थितिपदेन निराहतम् , सतोऽत्यन्तविनाशाभावात् , चौद्धमतावलम्नी मानते है कि-"जैसे दीपक बुझ जाता है उसी प्रकार आत्माका अभाव हो जाना मोक्ष है"कहाभी है- "जैसे दीपककी ज्वाला जर नष्ट हो जाती है, तय न भूमिकी ओर जाती है न आकाशकी ओर जाती है, न किसी दिशामे जाती है, न विदिशामे जाती है, किन्तु स्नेह (तेल) का अभाव हो जानेसे शान्त हो जाती है ॥१॥ इसी प्रकार मुक्त जीव न भूमिकी ओर जाता है, न आकाशकी ओर जाता है, न किसी दिशामे जाता है, न किसी विदिशामें जाता है, हा, दु खोका क्षय होजानेसे शान्त होजाता है, अर्थात् मुक्त अवस्थामें जीवका अभाव होजाता है ॥२॥" ऐसा माननेवाले बौद्धोंका खण्डनमोक्षके लक्षणमे आये हुए 'शाश्वत अवस्थिति' पदसे किया गया है, क्योंकि सत् पदार्थका कभी अभाव બોદ્ધમતાવલ બીઓ માને છે કે-જેમ દીપક બુઝાઈ જાય છે તેમ આત્માને અભાવ થઈ જે એ મેક્ષ છે” કહ્યુ છે કે- જેમ દીપકની જ્વાળા જ્યારે નષ્ટ થઈ જાય છે, ત્યારે નથી તે ભૂમિની તરફ જતી, નથી આકાશની તરફ જતી, નથી કઈ દિશામાં જતી, નથી વિદિશામા જતી, પરંતુ સ્નેહ (તેલ)ને અભાવ થવાથી શાન્ત થઈ જાય છે (૧) એ રીતે મુક્ત જીવ નથી ભૂમિનું તરફ જતે, નથી આકાશની તરફ જો, નથી કઈ દિશામાં જ, નથી કે વિદિશામાં જતે, હા, હું એને ક્ષય થઈ જવાથી જાય છે, અર્થાત્ મુકત અવસ્થામાં જીવને અભાવ થઈ जय छ” (१) એમ માનનારા બૌદ્ધોનું ખંડન મોક્ષના લક્ષણમાં આવેલા “શાશ્વત સ્થિતિ” શબ્દ વડે કરવામા આવ્યું છે, કારણ કે સત પદાર્થને કદાપિ અભાવ - , " શાન્ત થઈ અનું । , . अध्ययन ४ गा. १५-मोक्षस्वरूपम् ३२९ मोक्षः। भिन्नाश्चेत्तहिं वदिशैत्ययोरिव तयोर्गुणगुणिभावोऽनुपपन्नः समवायस्या- ऽसिद्धत्वाव, अत एव न बुद्धयादीनामात्मगुणत्वम् । अनु वा अयौक्तिकोऽपि गुणगुणिभावस्तथापि ज्ञानमुखायभावादात्मान को जडीक मुघच्छेदिच्छेदपि ? ईदृशावदभिमतान्मोक्षात्ससारावस्थैव सम्यक्तराऽस्माकमस्तु, यस्मिन् सत्यपि क्लेशे कादाचित्क स्वल्पमपि मुख लभ्यत एव । लोकेऽपि भवदभिमतमोक्षमाहात्म्यमुपदस्यते, यथा- नाश होजायगा तो मोक्ष किस का होगा। अगर कहो कि ये गुण आत्मासे भिन्न हैं तो उनका आत्मा के साथ गुण-गुणीका सम्बन्ध कसे हुआ, भिन्न होनेके कारण जैसे अग्नि और शीतलता में गुण-गुणि सम्बन्ध नहीं होता वैसे ही आत्मा और बुद्धि आदि का भी सम्बन्ध नहीं हो सकता। यदि समवाय सम्बन्ध से गुण गुणिभाव मान लोगे तो बुद्धि आदि गुणों का नाश नहीं हो सकता,क्योंकि समवाय सम्बन्ध को तुमने नित्य माना है, अतः बुद्धि आदि आत्मा के गुण ही सिद्ध नहीं होते । यद्यपि यह सम्बन्ध युक्ति से तो सिद्ध नहीं होता फिर भी मान लोगे तो जयकि मोक्षमें ज्ञान और सुख आदिका अभाव हो जाता है तो कौन बुद्धिमान् अपनी आत्मा को इन गुणों से रहित जड के समान बनाने का प्रयत्न करेगा? तुम्हारे इस मोक्षसे तो ससार ही भला जिसमें दुखोंके साथ-साथ कभी-कभी थोडा बहुत सुख भी मिल जाता है । लोकमै भी तुम्हारे माने हुए मोक्ष की हँसी उडाई जाती है,सुनो- પછી મોક્ષ કેને થશે ? અગર જે કહે કે એ ગુણ આત્માથી ભિન્ન છે તે આત્માની સાથે એને ગુણ ગુણને સબ ધ કેવી રીતે થયે? ભિન્ન હોવાને કારણે જેમ અગ્નિ અને શીતલતામાં ગુણ ગુણ સ બ ધ નથી હોતે, તેવી રીતે આત્મા અને બુદ્ધિ આદિને પણ સબધ નથી હોઈ શકતા જે સમવાય ધથી ગુણ ગુણભાવ માની લેશે તે બુદ્ધિ આદિ ગુણેને નાશ નથી થઈ શકતે, કારણ કે સમવાય સ બ ધને તમે નિત્ય માન્ય છે એથી બુદ્ધિ આદિ આત્માના ગુણ જ સિદ્ધ થતા નથી જે કે એ સબધ યુક્તિથી તે સિદ્ધ નથી થતું, તે પણ માની લેશે તે જે મેક્ષમાં જ્ઞાન અને સુખ આદિને અભાવ થઈ જાય છે તે કયે બુદ્ધિમાન પિતાના આત્માને એ ગુણેથી રહિત જડની સમાન વવા પ્રયત્ન કરશે ? તમારા એવા મોક્ષ કરતા તે સ સાર નારે કે જેમાં દુખેની સાથે સાથે કઈ કઈવાર થોડું ઘણું સુખ પણ મળી જાય છે તેમાં પણ તમારા માનેલા મેક્ષની હાસી ઉડાવવામા આવે છે સાભળે-- સ બ મના श्रीदकालिको ऽऽरमाऽपि कृत्स्नर्मफलापविममुक्तः शुदः सिदो युद्धोऽनन्तगुणसमृद्धो मोलावस्था यामपि विद्यत एवेति । अत्र 'अनन्तशाने'-तिविशेषणेन नेयायिकशेषिकाभिमत मत निरस्तम् । तथाच-- "घुद्धि-मुख-दुःखेचा द्वेप-प्रयत्न धर्मा-ऽधर्म-सस्कारस्वरूपाणा नत्रानामा- स्मविशेषणगुणानामत्यन्तरिन्छेदो मोक्षः" इति । अत्रोच्यते-बुद्रथाढयो गुणा आत्मनो भिन्ना अभिन्ना ना ?, अभिन्नात्तद्विनाशे आत्मनोऽपि विनाशोऽवश्य- म्भावी तत्स्वरूपत्वात् , औण्यविनाशे पहिविनाशात् , तथा च तदानीं कस्य कर्मोंसे रहित, शुद्ध, सिद्ग, बुद्ध और अनन्त गुणों से समृद्ध आत्मा मोक्ष-अवस्थामें भी विद्यमान रहती है। 'अनन्तज्ञान' विशेषण से नैयायिक-वैशेषिक मत का निराकरण किया गया है। उनकी मान्यता है कि-"धुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म और सस्कार, इन आत्मा के नौ विशेष गुणोंका अत्यन्त विनाश हो जाना मोक्ष है।" यहाँ पूछना यह है कि-धुद्वि आदि गुण आत्मा से भिन्न हैं या अभिन्न', यदि अभिन्न है तो गुणोंका नाश होनेपर आत्माका भी नाश हो जायगा, क्योंकि आत्मा और गुण भिन्न नहीं है-एक ही है, जैसे उष्णताका नाश होनेपर अग्निका नाश होजाता है । जब आत्मा का તે રહે જ છે એવી જ રીતે સર્વ કર્મોથી રહિત, શુદ્ધ, સિદ્ધ, બુદ્ધ અને અને ગુણથી સમૃદ્ધ આત્મા મેક્ષ અવસ્થામાં પણ વિદ્યમાન રહે છે “અનન્ત જ્ઞાન” વિશેષણથી તૈયાયિક-વૈશેષિક મતનું નિરાકરણ કરવામાં આવ્યું છે તેની માન્યતા એવી છે કે “બુદ્ધિ, સુખ, દુ ખ, ઈરછા, દ્વેષ, પ્રય ધર્મ, અધર્મ અને સંસ્કાર, એ આત્માના નવ વિશેષ ગુણેને અત્યંત વિનાશ થઈ જ એ મોક્ષ છે” અહીં પૂછવાનું એ છે કે બુદ્ધિ આદિ ગુણ આત્માથી ભિન્ન છે કે અભિન્ન જે અભિન્ન છે તે ગુણેને નાશ થયા આત્માને કારણ આત્મા અને ગુણ ભિન્ન નથી–એક જ છે, જેમકે ઉષ્ણુતાને નાશ થવાથી અગ્નિને પણ નાશ જાય છે, જે આત્માને નાશ થઈ જશે તે મદ પણ નાશ થઈ જશે, . - अ ययन ४ गा. १५-मोक्षस्वरूपम् ३३१ 'आत्मनः' इतिपदेन प्रत्यादिष्टम् । किञ्च-तन्मते प्रकृति-पुरुपयोः सयोगोऽपि न घटते कुतो मोक्षचर्चा ?, तथाहि-नित्या प्रकृतिः प्रवृत्तिस्वभावा तदितरस्व- भाषा वा तयोरायः सावधः पक्षः, तत्र तत्महत्तेरुपरत्यभावेन मोक्षासम्भवात, उपरत्यभ्युपगमे च प्रकृतेरनित्यत्वप्रसङ्गः। द्वितीयोऽपि पक्षो न क्षोदक्षम महत्तेरे- वाऽसम्भवतः कथमिव भवसम्भवः१, भवाभावे कस्य मोक्षः एव तन्मते मोक्ष- स्यैवायौक्तिकत्वाकय तल्लक्षणस्य समीचीनत्व सिध्येत् । हो जाता है, इसी अवस्था को मोक्ष कहते है। ऐसी साख्यमतानुयायिओंकी मान्यता है। 'आत्मनः' पदसे उसका निराकरण किया गया है । साख्यमतमे प्रकृति और पुरुपका सयोग ही सिद्ध नहीं होता तय मोक्ष की चर्चा ही क्या करना' सोही आगे दिख- लाते हैं कि प्रकृति का स्वभाव प्रवृत्ति करनेका है या नही ', पहला पक्ष दूपित है,क्योंकि प्रकृतिका स्वभाव यदि सर्वदा प्रवृत्ति करने का है तो उस प्रवृत्तिकी निवृत्ति नहीं होसकती और इसी कारणसे कभी मोक्ष भी नहीं होगा। दूसरा पक्ष भी विचार करनेसे बाधित होजाता है । जय प्रकृति प्रवृत्ति ही नहीं करेगी तो ससार कैसे होगा, और जर ससार (कर्मसहित अवस्था) ही नहीं तो मोक्ष किससे होगा, अर्थात् किसी प्रकार मोक्ष ही नहीं बनता । जब मोक्ष नही बनता तो उसके लक्षण की निर्दोपता भी सिद्ध नहीं होसकती । થઈ જાય છે, એ અવસ્થાને મેક્ષ કહે છે ” ग्मेवी साम्यमतानुयायामानी मान्यता छ आत्मन. २०४थी मेनु निराए કરવામાં આવ્યું છે સામ્યમતમાં પ્રકૃતિ અને પુરૂષને સગ જ સિદ્ધ નથી થતું તે મેક્ષની ચર્ચા જ શુ કરવી? તેજ આગળ બતાવવામાં આવે છે કે-પ્રકૃતિને સ્વભાવ પ્રવૃત્તિ કરવાને છે કે નહિ? પહેલો પક્ષ દુષિત છે, કારણ કે પ્રકૃતિને સ્વભાવ જે સર્વદા પ્રવૃત્તિ કરવાને છે તે એ પ્રવૃત્તિની નિવૃત્તિ થઈ શકતી નથી, અને તે કારણે કદાપિ મેક્ષ પણ થશે નહિ બીજે પક્ષ પણ વિચાર કરવાથી બાધિત થઈ જાય છે જે પ્રકૃતિ પ્રવૃત્તિ જ નહિ કરે તે સસાર કેવી રીતે થશે? અને જો સંસાર (કર્મસહિત અવસ્થા) જ નથી તે મોક્ષ શાનાથી થશે ? અર્થાત્ કે ઈ પ્રકારે મોક્ષ જ નથી બનતુ, જે મિક્ષ નથી બનતુ તે તેના લક્ષણની નિર્દોષતા પણ સિદ્ધ થઈ શકે નહિ . ३३० श्रीरभवेकालिकसूत्रे "पर वृन्दापने रम्ये, शृगालय ग्रमाम्यहम् । न तु पैशेपिकी मुक्ति, मार्थयामि यदाचन ॥१॥" इति । यतु "अनन्तमुखरूपो मोक्षः" इति तदप्यसमीचीनम् , तथाहि-तदनन्त- मुख मुक्तात्मनो शानगोचर भरति न पा?, आगे पक्षे ज्ञानाऽऽनन्स्यपसर, तद- न्तरेणाऽनन्तमुखसवेदनाऽसम्मपात् । द्वितीये च मुखस्त्रमावतामापसा, सा- तसवेदनस्यैव सुखस्यात् ,अत एपाऽनन्तज्ञानविरहितमुखस्त्रमावस्व मोतस्य न सि यति। "प्रकृतावुपरताया' पुरुषस्य स्वस्वरूपेणाऽजस्थान मोक्षः" इति हि साया, तद् १ उपरताया=निटत्तायाम् । "मैं मनोहर वृन्दावन में शृगाल से जाना पसद करता है, किन्तु वैशेपिकका मोक्ष नहीं चाहता ॥१॥" जो कहते हैं कि-"मोक्ष अनन्तसुखस्वरूप है" अर्थात् मोक्ष में सुख ही अवशिष्ट रह जाता है और कुछ नहीं रहता।उनका यह मानना समीचीन नहीं है । यह अनन्त सुख मुक्तात्मा के ज्ञानका विषय है या नहीं' पहला पक्ष स्वीकार करो तो अनन्त सुखको जाननेके लिए अनन्त ज्ञान भी चाहिए। अनन्त ज्ञानके विना अनन्त सुखका बोध नही होसकता। दूसरा पक्ष अगीकार करो तो सुखस्वभावता सिद्ध नही होसकती, क्योकि, सातारूप सवेदनको ही सुख करते है। जब सवेदन ही नहीं तो सुख हो ही नहीं सकता है, इसलिए "अनन्त ज्ञानसे रहित सुखस्वभाववाला मोक्ष" नही मानना चाहिए । 'प्रकृति जब उपरत होजाती है तब पुरुष अपने स्वरूपमे स्थित હુ મનહર વૃન્દાવનમાં શુગાળ (શિયાળ) થઈ જવાનું પસંદ કરે છે પરંતુ વૈશેષિકને મોક્ષ નથી પસંદ કરતા ” (1) જેઓ કહે છે કે “મેક્ષ અનત સુખસ્વરૂપ છે” અર્થાત્ મોક્ષમાં સુખ જ અવશિષ્ટ રહી જાય છે. બીજુ કશુ નથી રહેતુ, તેઓનું એ માનવું પણ સમીચીન નથી એ અનત સુખ સુદ્ધાત્માના જ્ઞાન વિષય છે કે નહિ ? પહેલે પણ સ્વીકારે છે અનત સુખને જાણવા માટે અનત જ્ઞાન પણ જોઈએ અનત જ્ઞાન વિના અનત સુખને બંધ થઈ શકતું નથી બીજે પક્ષ સ્વીકારે તે સુખ સ્વભાવતા સિદ્ધ થઈ શકતી નથી કારણ કે સાતારૂપ સ વદેનને જ સુખ કહે છે જે સવેદન જ હેતુ નથી તે સુખ થઈ જ શકતું નથી તેથી “અનત જ્ઞાનથી રહિત સુખસ્વભાવવાળે મોક્ષ” નહિ માનવે જોઈએ પ્રકૃતિ જ્યારે ઉપરત થઈ જાય છે ત્યારે પુરૂષ પિતાના સ્વરૂપમાં સ્થિત .

१ , अययन ४ गा. १५-मोक्षस्वरूपम् ३३१ 'आत्मनः' इतिपदेन प्रत्यादिष्टम् । किञ्च-तन्मते प्रकृति-पुरुपयोः सयोगोऽपि न घटते कुतो मोक्षचर्चा ?, तथाहि-नित्या प्रकृतिः प्रवृत्तिस्वभावा तदितरस्व- भावा वा' तयोरायः सावधः पक्षः, तत्र तत्मत्तेरुपरत्यभावेन मोक्षासम्भवात् , उपरत्यभ्युपगमे च प्रकृतेरनित्यत्वप्रसङ्गः। द्वितीयोऽपि पक्षो न क्षोदक्षम प्रवृत्तेरे- वाऽसम्भवतः कथमिव भवसम्भवः१, भवाभावे कस्य मोक्षः एव तन्मते मोक्ष- स्यैवायोक्तिमत्वाकय तलक्षणस्य समीचीनत्व सिध्येत् । हो जाता है, इसी अवस्था को मोक्ष कहते है।" ऐसी सारयमतानुयायिओंकी मान्यता है। 'आत्मनः' पदसे उसका निराकरण किया गया है। सांख्यमतमे प्रकृति और पुरुपका सयोग ही सिद्ध नहीं होता तय मोक्ष की चर्चा ही क्या करना सोही आगे दिग्व- लाते हैं कि प्रकृति का स्वभाव प्रवृत्ति करनेका है या नही , पहला पक्ष दूपित है,क्योकि प्रकृतिका स्वभाव यदि सर्वदा प्रवृत्ति करने का है तो उस प्रवृत्तिकी निवृत्ति नही होसकती और इसी कारणसे कभी मोक्ष भी नही होगा। दूसरा पक्ष भी विचार करनेसे बाधित होजाता है । जय प्रकृति प्रवृत्ति ही नही करेगी तो ससार कैसे होगा', और जव ससार (कर्मसहित अवस्था) ही नहीं तो मोक्ष किससे होगा, अर्थात् किसी प्रकार मोक्ष ही नही बनता । जब मोक्ष नहीं बनता तो उसके लक्षण की निर्दोपता भी सिद्ध नहीं होसकती । થઈ જાય છે, એ અવસ્થાને મોક્ષ કહે છે ” मेवी साम्यमतानुयायी-मानी मान्यता छ आत्मनः २०४थी मेनु निरार! કરવામાં આવ્યું છે સાખમતમાં પ્રકૃતિ અને પુરૂષને સગ જ સિદ્ધ નથી થતું તે મોક્ષની ચર્ચા જ શુ કરવી? તેજ આગળ બતાવવામા આવે છે કે પ્રકૃતિને સ્વભાવ પ્રવૃત્તિ કરવાનો છે કે નહિ? પહેલે પક્ષ દૂષિત છે, કારણ કે પ્રકૃતિને સ્વભાવ જે સર્વદા પ્રવૃત્તિ કરવાનું છે તે એ પ્રવૃત્તિની નિવૃત્તિ થઈ શકતી નથી, અને તે કારણે કદાપિ મોક્ષ પણ થશે નહિ બીજો પક્ષ પણ વિચાર કરવાથી બાધિત થઈ જાય છે જે પ્રકૃતિ પ્રવૃત્તિ જ નહિ કરે તે સસાર કેવી રીતે થશે? અને જે સસાર (કર્મસહિત અવસ્થા) જ નથી તે મેલ શાનાથી થશે ? અર્થાત્ કે ઈ પ્રકારે મોક્ષ જ નથી બનતુ, જે મેક્ષ નથી બનતુ તે તેના લક્ષણની નિર્દેવતા પણ સિદ્ધ થઈ શકે નહિ Popm- - ३३२ श्रीवशवकालिकमंत्र यचाऽऽजीरकाः (सम्पदापरिगेपाः) मुक्तः सकाशादात्मनः पुनरागमन मामनन्ति, तथाहि- "शानिनो धर्मतीर्थस्य, कर्तारः परम पदम् । गयाऽऽगच्छन्ति भूयोऽपि, भर तीर्थनिमारतः ॥१॥" इति, तत् 'पुनरमादुर्भारतये'-ति पदेनाऽपातम्, यतो मोक्षः कर्मनाशे सति सम्पद्यते, कर्म च कर्मणेर जन्यते, ततय मुक्तावस्थाया कर्मामात्रात्कृत पुनः कर्मोत्पत्तिः?, तदभावे च कुतस्तरा ससारागमनम् ? ससारस्य कर्महेतुक्त्वात् , कारणमन्तरेण कार्योत्पत्तिरिति सर्वसमतत्वाचेति । आजीवक सम्प्रदाय वाले ऐसा कहते है कि-"आत्मा मोक्ष से वापस लौट आती है। कहाभी है- "धर्मतीर्थ की स्थापना करने वाले ज्ञानी परम पदको प्राप्त होकर जय तीर्थका अनादर होने लगता है तय मोक्षसे फिर ससारमे आ जाते है॥१॥" इनका यह मत 'पुनरप्रादुर्भावतया' इस विशेषण से खण्डित हो गया है। क्योकि कर्मोके नाश होने पर ही मोक्ष होता है, और कर्म कर्मोंसे ही उत्पन्न होते हैं। मोक्षमे कर्मोंका अभाव होजानेसे कर्मोंकी उत्पत्ति नहीं होती, इसलिए ससारमे आगमन संभव नहीं है। कारणके विना कार्यकी उत्पत्ति नही होसकती, ऐसा सब सिद्धान्तवाले स्वीकार करते है। સ પ્રદાયવાળા આજીવક એમ કહે છે કે-“આત્મા મેક્ષથી પાછા ફરી આવે છે કહ્યુ છે કે- ધર્મતીર્થની સ્થાપના કરનારા જ્ઞાનીઓ પરમ પદને પ્રાપ્ત થઈને જ્યારે તીર્થને અનાદર થવા લાગે છે ત્યારે મેક્ષમાથી પાછા સ સારમાં આવી જાય मेनो मे मत 'पुनरप्रादुर्भावतया' से विशेषथी पति थ गयो छे કારણ કે કર્મોને નાશ થવાથી જ મેક્ષ થાય છે અને કર્મ કર્મોથી જ ઉપન્ન થાય છે ક્ષમા કર્મોને અભાવ થઈ જવાથી કર્મોની ઉત્પત્તિ થતી નથી, તેથી સંસારમાં ફરી આવવાને સંભવ નથી કારણ વિના કાર્યની ઉત્પત્તિ થઈ શકતી નથી, એવુ સર્વ સિદ્ધાન્તવાળાએ સ્વીકારે છે , अध्ययन ४ गा. १५-मोक्षस्वरूपम् ३३३ "आत्मनः सततर्ध्वगतिर्मुक्ति" -रिति मण्डलीमतानुयायिनः, तच्च प्रमत्त- मलपनप्रायम् , लोकामाशानन्तर धर्मास्तिकायस्यास्तित्वाभावात् । धर्मास्तिकायस्य जीवपुगलाना गतिनिमित्तल प्रमाणसिद्ध, तथाहि-गमनोन्मुखाना जीवपुद्गलाना गतिर्वानिमित्तसापेक्षा गतिलात बाह्यनिमित्तमत्रधर्मास्तिकायोऽन्यस्यासम्भवात् , लोकामाशाऽनन्तर तदभावान्न तस्मादूर्ध्व गतिसभवः । अत एवागणार्हमाईत- मतामिमतमुक्तिस्वरूपमेवेति । ननु नरामरतिर्यडनारकपर्यायस्वरूप एव ससारस्तेभ्यः पृथग्भावेन न कस्य- मण्डलीमत के माननेवाले कहते हैं कि-"आत्मा सदा ऊपर चली जाती है कहीं ठहरती नहीं है" यह कथन उन्मत्त पुरुपके प्रलापके सदृश है, क्योंकि लोकाकाशके बाद धर्मास्तिकायका सद्भाय नहीं है । यह पात प्रमाण से सिद्ध है कि धर्मास्तिकायके विनाजीव और पुद्गलोंकी गति विना याह्य कारण के नहीं होसकती, क्योंकि-'यह गति है, जो जो गति होती है वह बाह्य निमित्तकी अपेक्षा रखती है। गति में बाह्य निमित्त धर्मास्तिकाय ही होसकता, क्योंकि अन्य किसीमे ऐसी शक्ति नहीं है । यह धर्मास्तिकाय लोकाकाशसे आगे नहीं है, इमलिए लोकाकाशसे आगे आत्मा गमन भी नहीं कर सकती । अत एव सिद्ध हुआ कि 'आईतमत (जिनमत) में माना हुआ मोक्षका लक्षण ही सर्वथा निर्दोप है। प्रश्न-मनुष्य, देव, तिर्यश्च और नारकी-पर्यायस्वरूप ही ससार है મડલીમતના માનનારાઓ કહે છે કે “આત્મા સદા ઉપર ચાલ્યા જાય છે, કયાય થોભતે રહેતે નથી” આ ઉન્મત્ત પુરૂષના પ્રલાપ જેવું છે, કારણ કે કાકાશની પછી ધર્માસ્તિકાયને સભાવ જ નથી એ વાત પ્રમાણથી સિદ્ધ થએલી છે કે ધમસ્તિકાય વિના જીવ અને પુદ્ગલેની ગતિ બાહ્ય કારણ વિના થડ શકતી નથી, કારણ કે “એ ગતિ છે, જે જે ગતિ હોય છે તે તે બાહા નિમિત્તની અપેક્ષા રાખે છે? ગતિમાં બાહ્ય નિમિત્ત ધર્માસ્તિકાય જ હોઈ શકે છે કારણ કે અન્ય કોઈ એવી શકિત નથી એ ધર્માસ્તિકાય (કાકાશથી આગળ નથી, તેથી કાકાળથી ગમન કરી શકતું નથી એટલે સિદ્ધ થયું કે આહતમત (જેનામત)મા માનેલુ મોક્ષનું લક્ષણ જ सर्वथा निषि छ" પ્રશ્ન-મનુષ્ય, દેવ, તિર્યંચ અને નારકી–પર્યાય સ્વરૂપ જ કથન આગળ આત્મા એ સાર 24 . ३३६ भीदवेकालिकाने नापि श्रदानक्रियामात्रेण मानाऽभागन् (६)। एवमेव मोक्षोऽप्यन्यतमा भावे न सभात्यपि तु समुदितरत्नत्रयादेवेति । त मोक्ष च जानीयाद-विधादि स्पः ॥१५॥ और पापाणको पृथा नहीं कर सकते, क्योंकि वहां क्रिया नहीं है। (५) शान और क्रियामात्रसे भी पृथक् नहीं कर सकते,क्योंकि प्रदान नहीं है। (६) अद्वान और क्रियामात्रसे भी पृथा नहीं कर मकते, क्योंकि जानका अभाव है। इसी प्रकार मोक्ष भी समुदित तीनोंसे प्राप्त होता है, किसी एकके अभावमें नहीं होसफता। जिस प्रकार वन में आग लगने पर, वहाँ रहे हुए अन्धा नेत्रों के अभावसे, पङ्ग चरणों के अभावसे और अश्रद्वाल अग्निकी दाहकता शक्ति के प्रति श्रद्धा के अभावसे उस वन से नहीं निकल सकते हैं उसी प्रकार सम्यग्ज्ञानरूपी नेत्रों से रहित होनेके कारण अन्ध जीव,सम्यक्चारित्र से रहित होने के कारण पङ्गु जीव और सम्यग्दर्शन के अभाव से अश्रद्धाल जीव भी जन्म-जरा-मरण रूपी भीपण दु खोंकी प्रचण्ड अग्नि से जलते हुए इसससार रूपी वन से नहीं निकल सकते है। जैसे-अन्ध,पगु, और अश्रद्धालु वनाग्नि में जल मरते है उसी प्रकार ये भी ससाराग्निमें जल मरते है । परन्तु जिनके नेत्र और दोनों चरण अक्षत है, और अग्निकी दाहकता-शक्ति के प्रति भी श्रद्धा है वे जिस प्रकार दावाग्नि-प्रज्वलित वनको पार कर जाते हैं उसी प्रकार जो जीव सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र કરી શકાતા નથી કારણ કે ત્યા ક્રિયા નથી (૫) જ્ઞાન અને ક્રિયા માત્રથી પણ અલગ કરી શકાતા નથી, કારણ કે શ્રદ્ધાન નથી (૬) શ્રદ્ધા અને ક્રિયાથી પણ અલગ કરી શકાતા નથી કારણ કે જ્ઞાનને અભાવ છે એ રીતે મોક્ષ પણ સમુદિત ત્રણેથી પ્રાપ્ત થાય છે, કેઈ એકને અભાવ હોય તે મોક્ષ પ્રાપ્ત થતું નથી જેમ વનમાં આગ લાગવાથી, ત્યાં રહેલે આપળે ને ન હોવાથી, લગડો પગો ન હોવાથી, અને અશ્રદ્ધાળુ અગ્નિની દહકતા-શકિત પ્રત્યે શ્રદ્ધા ન રહેવાથી તે વનમાથી નીકળી શકતું નથી તેમ સમ્યજ્ઞાનરૂપી ને ન હોવાથી આધળે છે, સભ્યચરિત્ર ન હોવાથી લગડે જીવ, અને સમ્યગ્દર્શન ન લેવાથી અશ્રદ્ધાળુ છે પણ જન્મ-જા-મરણરૂપી ભીષણ દુ ના પ્રચડ અગ્નિથી પ્રજ્વલિત આ સંસારરૂપી વનમાથી નીકળી શકતા નથી જેમ આધળે, લગળે અને અશ્રદ્ધાળુ વન ગ્નિમાં બળી મરે છે તેમ આજી પણ સસરાગ્નિમાં બળી મરે છે પરંતુ જેના ને અને બેઉ ચરણે સાબૂત છે, અને અગ્નિની દાહકતા શકિત પ્રત્યે પણ શ્રદ્ધા છે તે જેમ દાવનિ પ્રજવલિત વનને પાર કરી જાય છે તેજ પ્રકારે જે છ સભ્યજ્ઞાન, સમ્યારિત્ર અને સમ્યગ્દર્શનથી अ ययन ४ गा. १६-पुण्यादिज्ञाने भोगनिर्वेदः ३३७ १ २ 3 ४ १ ૧૩ ૧૪ १५ मूलम् जया पुण्णं च पाव च, वध मोक्ख च जाणइ। तया निविदए भोए, जे दिवे जे य माणुसे ॥१६॥ छाया-यदा पुण्य च पाप च, वन्य मोक्ष च जानाति । तदा निर्विन्ते भोगान्, ये दिव्या ये च मानुपा. ॥१६॥ सान्वयार्थः-जया जर पुण्ण च पाव च-पुण्य और पापको, च-तथा वध मुस्खध और मोक्षको जाणड-जानता है, तया 11 जे दिव्ये जो देव सम्बन्धी य और जे माणुसे जो मनुष्यसम्बन्धी (भोग है, उन) मोए भोगोको निविदा तवसे विचारता है, अर्थात् निस्सार समझने लगता है ॥१६॥ टीका-'जया पुण्ण'-मित्यादि। यदा पूर्वपतिपादितलक्षणलक्षित पुण्यादिक जानाति तदा ये दिव्याः दिवि-स्वर्गे भवाः देवसम्बन्धिन', च-तथा ये मानुपा =मनुष्य- सम्बन्धिनः (भोगाः सन्ति तान् सर्वानपि) भोगान् भुज्यन्ते निर्विश्यन्ते तत्त- दिन्द्रियनोइन्द्रियानुफलतयोपयुज्यन्त इति भोगा.-शब्दादिविषयास्तान् निर्विन्ते= तत्वतो विचारयति-"भोगिभोगोपमाः खल्लिमे भोगा अशुचयोऽशुचिसम्भवाः शटन पतन विश्वसनस्वभावा अशाश्वताच, को नाम विवेकी एवविधानिमान् भोगा- और सम्यग्दर्शन से युक्त हैं वे भी जन्म-जरा-मरणरूप भीपण दु.ग्वोंके प्रचण्ड-अग्नि से जलते हुए इस ससाररूपी वनको पार कर जाते हैं। इससे सिद्ध है कि रत्नत्रयमेसे किसी एककी भी कमी होनेसे सिद्धि नहीं प्राप्त होमकती । उस प्रकारके मोक्षको जाने ॥१५॥ 'जया पुण्ण' इत्यादि । जब पूर्वोक्तस्वरूपवाले पुण्य, पाप, बन्ध और मोक्षको जानता है तब देवों तथा मनुष्यों के सम्बन्धी भोगोंका वास्तविक विचार करता है । इन्द्रिय और मनकी अनुकूलतारूपसे जिनका उपयोग किया जाता है उन्हे भोग कहते है । भोगों के विषयमे साधु ऐसा विचार करते है कि-"ये भोग भुजगके ममान भयकर है, યુકત છે તે છે પણ જન્મ જરા મરણરૂપ ભવણ ૬ ખેના પ્રપડ અગ્નિથી પ્રજવલિત આ સંસારરૂપી વનને પાર કરી જાય છે એથી સિદ્ધ થાય છે કે એ રત્નત્રયમાથી કોઈએક પણ જે ઓછુ હોય તે સિદ્ધિ પ્રાપ્ત થઈ શકતી નથી, એ પ્રકારના મેને જાણે (૧૫) जया पुण्ण त्याहि न्यारे पूर्वोत- १३५पास पुष्य पाप મધ અને મેક્ષને જાણે છે ત્યારે દેવે તથા મનુષ્ય બધી ભેગેને વાસ્તવિક વિચાર કરે છે ઈદ્રિય અને મનની અનુકૂળતારૂપે જેને ઉગ કે વામા આવે છે એને ભેગ કહે છે ભેગેના વિષયમાં સાધુ એ વિચાર કરે છે કે "ये लोग ભુજ ગ (સર્પ)ના જેવા ભયકર છે, અશુચિ છે, અશુચિ પદાર્થોથી ઉત્પન્ન થાય છે ८ २ . ૧૨ ३३८ श्रीदकालिकभूत्रे नुपभोक्तुभिलपेदपि? यस्य या विकिनो गन्ताशनेन्न, अतिपूतिगन्धिपूयरुधिर माहेऽवगाहनाऽऽझावा, शार्दूलसदननिासाभिटापा, कल्कलायमाने सीसक कटाहादौ पतनस्पृहा, समन्ततो दन्ददामानमानान्तरालपरिभ्रमणसाहसम्, अजगर विपधरमपधानीकृत्य शयनेन्छा मानायेत?! "ग्वणमित्सुक्खायहुकालदुक्खा' इत्यादि पर्यालोचयन् निद मामोतीत्यर्थः ॥१६॥ मूलम्-जया निविंदए भोए, जे दिवे जे य माणुसे । तया चयइ सजोग, सभितर-बाहिरिय ॥ १७ ॥ छाया-यदा निर्विन्ते भोगान, ये दिव्या ये च मानुपाः । तदा त्यजति सयोग, साभ्यन्तर-बाह्यम् ॥१७॥ सान्वयार्थ:-जया नर जे दिवे जो देवसवधी और जेयमाणुसेन्मनुष्य अशुचि हैं, अशुचि पदार्थोसे उत्पन्न होते हैं, सड़ जाते हैं, गल जाते हैं, नष्ट होजाते हैं, नित्य नही रहते। कौन विवेकी ऐसे भोगोंको भोगनेकी अभिलापा करेगा, किस विवेकशील व्यक्तिको वमन भक्षण करनेकी इच्छा होगी , अहा ! कौन चाहेगा कि-'मैं अत्यन्त दुर्गन्धवाले पीप और रुधिरके प्रवाहमे अवगाहन (स्नान) करूँ, क्या कोई सिंहकी माद (गुका)में निवास करने की इच्छा करता है ?, उकलते कडाहीमें कौन बुद्विमान् कूदनेकी कामना करता है? कोई नहीं करता है। अथवा चारों ओरसे धधकते हुए घरमें घुसनेका कौन साहस कर सुकता है , और अजगर सर्पको उपधान (उसीसा-सिरहाना) बनाकर कौन शयन करना चाहेगा ये विषय-भोग क्षणमात्र सुख देनेवाले हैं और बहुत काल तक दु ख देनेवाले हैं ॥" ऐसा विचार कर मुनि जन निर्वेद (वैराग्य)को प्राप्त करते है ॥१६॥ જાય છે, નષ્ટ થઈ જાય છે, નિત્ય રહેતા નથી કે વિવેકી મનુષ્ય એવા ભેગે ભેગવવાની અભિલાષા કરશે?, કઈ વિવેકશી વ્યક્તિને વમન કરેલાનું ભક્ષણ કરવાની ઈચ્છા થશે?, અહા ! કેણ ઈચ્છશે કે- હું અત્યંત દુધવાળા પરૂ અને રૂધિરના પ્રવાહમાં અવગાહન (સ્નાન કરીશ? શું કઈ સિંહની ગુફામ નિવાસ કરવાની ઈરછા કરે છે? ઊકળતા સીસાની કડાઈમાં કયે બુદ્ધિમાન મનુષ્ય કૂદી પડવાની કામના કરે ?, કઈ કરે નહિ અથવા ચારે બાજુએથી અગ્નિથી ધગી રહેલા ઘરમાં પિસવાનું સાહસ કેણ કરી શકે? અને અજગર સર્ષને ઉપધાન (ઓશીકુ) બનાવીને સૂવાની ફેણ ઈચ્છા કરશે? એ વિષય-ભેગ ક્ષણમાત્ર સુખ દેવાવાળા છે અને ઘણા કાળ સુધી દુખ વાવાળા છે” એ વિચાર કરીને મુનિજન નિર્વેદ (વૈરાગ્યને પ્રાપ્ત કરે છે (૧૬) . हुए शीशेकी - સડી જાય ગળી ४ 3 २ ६ ७ ८ ८ अध्ययन ४ गा.१७-१९--सयोगादित्यागः सरधर्मस्पर्शः ३३९ सम्बन्धी भोए-भोगोको निम्बिदए-तत्त्से विचारता है, तया तव सभितर- बाहिरिय-आभ्यन्तर और वाह्य सजोग-सयोगको चयड त्याग देता है ॥१७॥ टीका-'जया निविदए' इत्यादि। यदा दिव्य-मानुप-भोगोपभोगेपु निवेदो जायते तदा साऽऽभ्यन्तरवाह्यम् बहिर्भवो बाह्य =सुवर्णमणिमाणिक्यादिः, अभ्य- न्तरे अन्त करणे भव आभ्यन्तर क्रोधादिः, आभ्यन्तरेण सहित साऽऽभ्यन्तरः स चासौ वाद्यथेति साभ्यन्तरवाह्यस्तम्, सयोग-सयुज्यते सम्ब-यतेऽनेनाऽऽत्भे- ति सयोगः ममत्वकृतसम्बन्धस्तम् त्यजति-परिहरति ॥१७॥ मूलम्-जया चयइ संजोग, सभितर-वाहिरियं । तया मुडे भवित्ताण, पवइए अणगारियं ॥१८॥ छाया-यदा त्यजति सयोग, साभ्यन्तर वाह्यम् । तदा मुण्डो भूत्वा, प्रबजत्यनगारिताम् ॥१८॥ सान्वयार्थ -जया जब सभितरवाहिरिय-आभ्यन्तर और बाह्य सजोग- सयोगको चयइत्याग देता है, तया तव मुडे-द्रव्यभावसे मुण्डित भवित्ता होकर अणगारिय साधुपनेको पब्वइए प्राप्त होता है ॥१८॥ टीका-'जया चयइ' इत्यादि । यदा वाह्याऽऽभ्यन्तरसयोगविरहितो भवति तदा मुण्ड मुण्डन मुण्ड ('मुडि वण्डने' इत्यस्माद्भावे घन) स च द्वेधा-द्रव्यतो 'जयानिचिदए.' इत्यादि । जब देवसम्बन्धी और मनुष्य सम्बन्धी भोगोंकों जान लेता है, तब सुवर्ण-मणि-माणिक्य आदिबाह्य परिग्रहका तथा क्रोधादि आन्तरिक परिग्रहका अर्थात् वाह्याभ्यन्तर परिग्रहका त्याग कर देता है॥१७॥ 'जया चयइ' इत्यादि । जय बाह्याभ्यन्तर परिग्रहका परित्याग करता है तब मुण्डित हो जाता है । मुण्डन दो प्रकारका होता है- जया निविदए. त्या न्यारे हेक्सी भने मनुष्यसाधी सोगाने જાણ લે છે, ત્યારે મુનિ સુવર્ણ–મણિ-માણિકયાદિ બાહ્ય પરિગ્રહને તથા ક્રોધાદિ આતરિક પરિગ્રહને અર્થાત્ બાહ્યાભ્યતઃ પરિગ્રહને ત્યજી દે છે (૧૭) जया चयइ० पत्याहि ब्यारे मावास्यतर परिवहन मुनि परित्याग २ છે ત્યારે સુડિત થઈ જાય છે મુડન બે પ્રકારના હોય છે-(૧) દ્રવ્ય મુડન ७ ३४० श्रीदनकालिने भावतश्र, तत्र द्रव्यतो मस्तफकेशापनयनम् , भारतो रागद्वेषापनयनम् , मुण्डन- धर्मयोगादर्ग्यपि मुण्डा मुण्डित इत्पर्यः, भूया अनगारिताम् अनगारिणो भावोऽ नगारिवा-साधुत्व सचिरविलक्षण सामायिकादिकमित्यर्थ , ताम् प्रवनति- मामोति-भजितो भातीत्यर्थः ॥१८॥ मूलम्-जया मुडे भवित्ताण, पवइए अणगारिय । तया संवरमुकिट, धम्मं फासे अणुत्तरं ॥ १९ ॥ छाया-यदा मुण्डो भूत्या, मनजत्यनगारिताम् । तदा सरमुत्कृष्ट, धर्म स्पृशत्यनुत्तरम् ॥१९॥ सान्वयार्थ:-जया जर मुडे-द्रव्यभारसे मुण्डित भवित्सा होकर अण गारियम्साधुपनेको पब्बइमाप्त होता है, तया तव उकिट अत्यन्त प्रशस्त अणुत्तर सर्वश्रेष्ठ सवर-सवर धम्म-धर्मको फासे स्पर्श करता है-माप्त होता है। टीका-'जया मुडे०' इत्यादि । यदा मुण्डो भूत्वाऽनगारिता जति भानोति, तदा उत्कृष्टम् अतिप्रशस्तम् , अनुत्तर=निरविचारतया सर्वश्रेष्ठम् । यद्वा स्थिर- निश्चलम् । अथवा जिनागमसिद्धत्वात् भतिजल्पविवर्जितम् , यद्वा 'अनुत्तर मित्ये वन क्रियाविशेषणम् , अनुत्तरम् उक्तार्थक यथा स्यात्तथा स्पृशतीति सम्बन्धः । १ अनुत्तरमश्रेष्ठ, प्रतिजल्पविवर्जित, स्थिरमिति शब्दकल्पद्रुमः । (१) द्रव्यमुण्डन, (२) भावमुण्डन । मस्तकके केशोंकालुश्चन करना द्रव्यमुण्डन कहलाता है । राग द्वेप आदिको दूर करना भावमुण्डन है। दोनों प्रकारोंसे मुण्डित होकर सर्वविरतिरूप सामायिक आदि चारित्रको प्राप्त होता है ॥१८॥ 'जया मुडे' इत्यादि । जय मुण्डित होकर सर्वविरतिको प्राप्त होता है तब अत्यन्त प्रशस्त निरतिचार होनेके कारण सर्वश्रेष्ठ निश्चल 'आचरणीय सवर धर्मको स्पर्श करता है । आते हुए कर्म जिस आत्म- અને (૨) ભાવ મુડન મસ્તકના કેશનું લુચન કરવું એ દ્રવ્યમુંડન રાગ દ્વેષ આદિને દૂર કરવા એ ભાવ મુડી છે બેઉ પ્રકારે મુડિત થઇને સર્વ વિરતિરૂપ સામાયિક આદિ ચારિત્રને પ્રાપ્ત થાય છે (૧૮) जया मुढे त्या न्यारे मुखित न सर्प वितिन प्राप्त અત્યત પ્રશસ્ત નિરતિચાર થવાને કારણે સર્વશ્રેષ્ઠ નિશ્ચલ આચરીય સવર - કહેવાય છે . થાય । ४ २ ૫ 3 ७ ८ ८ अध्ययन ४ गा. २०-सवरधर्मस्पर्श कर्मरजोधुननम् ३४१ सवर सत्रियते--निरुध्यते आस्रवत्कर्म येन सः, यद्वा सवरण सवरः स्थगनम् । स द्रव्य भावभेदाभ्या द्विविधः । तत्र द्रव्यतस्तथाविधद्रव्येण (मरणमृत्तिकादिना) सलिलोपरि तरतरण्यादेरनारतमविशन्नीराणा विवराणा पिपानम् , भावतः-समि- ति गुप्तिप्रभृतिभिरात्मतरण्या क्षरकर्मसलिलाना स्थगनम् । अत्र च भावसपरश्चारि- लक्षणो गृह्यते, त तलक्षण धर्म स्पृशतिप्राप्नोति, अन्तःकरणत आत्मना सम्ब- न्धयतीत्यर्थः ॥१९॥ मूलम्-जया सवरमुकिट धम्म फासे अणुत्तरं । तया धुणड कम्मरय, अवोहिकल्लुसकड ॥२०॥ छाया- यदा सवरमुत्कृष्ट, धर्म स्पृशत्यनुत्तरम् । तदा धुनाति कर्मरजो नोधिकलपकृतम् ॥२०॥ सान्वयार्थ.-जया जव उकिट्ट-अत्यन्त प्रशस्त अणुत्तर-सर्वश्रेष्ठ सवर= सबरधम्मधर्मको फासे स्पर्श करता है, तया तव अयोहिकलुसकड आत्माके मिथ्यात्व परिणाम द्वारा उपार्जित किये हुए कम्मरय-कर्मरूपी रजको धुणइ- हटा देता है ॥२०॥ परिणामसे रुक जाते हैं उसे सवर कहते है। सवर, द्रव्य-मावके भेदसे दो प्रकारका है । जल पर चलती दई नौकाके छेदोंसे उसमें प्रवेश करने- वाले जलको चिकनी मिट्टी वस्त्र आदिसे बन्द कर देना द्रव्य-सवर है। आत्मारूपी नौकामे आस्रवरूपी छिद्रों द्वारा आनेवाले कर्मरूपी जलको रोक देना भाव-सवर है । यहा भाव-सबर अर्थात चारित्रकाअधिकार है। अर्थात् सर्वविरत मुनि भाव सवर रूपी धर्मको प्राप्त करते हैं । अथवा अनुत्तर रूपसे स्पर्श करते हैं, क्योंकि 'अनुत्तर' यह क्रियाविशेषण भी हो सकता है ॥१९॥ ધર્મને સ્પર્શ કરે છે આવતા કર્મ જે આત્મપરિણામથી રેડાઈ જાય છે તેને સાવર કહે છે સ વર દ્રવ્ય–ભાવના ભેદે કરીને બે પ્રકાર છે જળપર ચાલતી નોકાના છિદ્રવાટે નૌકામાં પ્રવેશ કરનારા જળને ચીકણી માટી, વસ્ત્ર આદિથી બંધ કરી દેવુ તે દ્રવ્યસવર છે આત્મારૂપી નોકામા આસવરૂપી છિદ્રોદ્વારા આવનારા કર્મરૂપી જળને રેકી દેવું એ ભાવસ વર છે અહીં ભાવ વર એટલે ચારિત્રને અધિકાર છે અર્થાત્ સર્વવિત મુનિ ભાવસ વરરૂપી ધર્મને પ્રાપ્ત કરે છે, અથવા અનુત્તર–રૂપે સ્પર્શ કરે છે, કારણકે “અનુત્તર એ ક્રિયાવિશેષણ પણ હેઈ શકે છે (૧૯) ३४० - - 1 १ 3 ५ Y ७ भीवनकालियो भाववश्व, तत्र द्रव्यतो मस्तफकेशापनपनम् , भावतो रागद्वेपापनयनम् , मुभमन- धर्मयोगादपि मुण्डा मुण्डित इन्ययः, भूत्या अनगारिताम् अनगारिणो भावो नगारिता साधुत्व सचिरविलक्षण सामायिकादियमित्यर्थः, ताम् मनति- मामोति-प्रयजितो भवतीत्यर्थः ॥१८॥ मूलम्-जया मुडे भवित्ताणं, पवइए अणगारियं । तया सवरमुक्किट्ठ, धम्म फासे अणुत्तरं ॥ १९ ॥ छाया-यदा मुण्डो भूत्वा, प्राजत्यनगारिताम् । वदा सदरमुत्कृष्ट, धर्म स्पृशत्यनुत्तरम् ॥१९॥ सान्वयार्थ:-जया-जन मुडेन्व्यमारसे मुण्डित भवित्साहोकर अण गारिय-साधुपनेको पव्वइरा=माप्त होता है, तया तव उकिट अत्यन्त प्रशस्त अणुत्तर-सर्वश्रेष्ठ सवर-सवर धम्मधर्मको फासे स्पर्श करता है-माप्त होता है। टीका-'जया मुडे०'इत्यादि । यदा मुण्डो भूत्वाऽनगारिता प्रव्रजति मोति, तदा उत्कृष्टम् अतिमशस्तम् , अनुत्तर=निरविचारतया सर्वश्रेष्ठम् । यद्वा स्थिर- निश्चलम् । अथवा जिनागमसिद्धत्वात् पतिजल्पविवर्जितम् , यद्वा 'अनुत्तर' मित्ये तत् क्रियाविशेषणम् , अनुत्तरम् उक्तार्थक यथा स्यात्तथा स्पृशतीति सम्बन्धः। १ अनुत्तरम् श्रेष्ठ, मतिजल्पविवर्जित, स्थिरमिति शब्दकल्पद्रुम । (१) द्रव्यमुण्डन, (२) भावमुण्डन । मस्तकके केशोंकालुश्चन करना द्रव्यमुण्डन कहलाता है । राग द्वेष आदिको दूर करना भावमुण्डन है। दोनों प्रकारोंसे मुण्डित होकर सर्वविरतिरूप सामायिक आदि चारित्रको प्राप्त होता है ॥१८॥ "जया मुडे' इत्यादि । जब मुण्डित होकर सर्वविरतिको प्राप्त होता है तब अत्यन्त प्रशस्त निरतिचार होने के कारण सर्वश्रेष्ठ निश्चल -आचरणीय सवर धर्मको स्पर्श करता है। आते हुए कर्म जिस आत्म અને (૨) ભાવ મુડન મસ્તકના કેશ લુચન કરવુ એ દ્રવ્યમુંડન કહેવાય છે રાગ દ્વેષ આદિને દૂર કરવા એ ભાવ મુડન છે બેઉ પ્રકારે મુ ડિત થઇને સર્વ વિરતિરૂપ સામાયિક આદિ ચારિત્રને પ્રાપ્ત થાય છે (૧૮) जया मुडे० या न्यारे भुति ने सर्प वितिने भारत અત્યત પ્રશસ્ત નિરતિચાર થવાને કારણે સર્વશ્રેષ્ઠ નિશ્ચલ આચરણેય સવર થાય अध्ययन ४ गा. २०-द्रव्य-भावकर्मणोः कार्यकारणभावः ३४३ , उक्तश्व- "जीवस्याशुद्धरागादिभावाना कर्म कारणम् । कर्मणस्तस्य रागादिभावः मत्युपकारिवत् ॥१॥” इति । ससारी खल्वात्माऽनादिकालतः कर्म वनाति, तदुदयादात्मनि रागद्वेपानुत्पत्तिः, वदनु यथा वहिसतप्तायःपिण्डः समन्तात् स्वससृष्टजलमाकर्पति तथाऽऽत्मैकक्षेत्रा- वगाहिकर्मपुद्गलानादत्ते, तैश्च रागादिक भावकर्मोत्पाद्यते, तच्च पुनरपि द्रव्यकर्मों- भाव है, अतः द्रव्यकर्म, भावकर्मका कारण भी है और कार्य भी है। कहाभी है- "जीवके राग आदि अशुद्ध भावोंका कारण द्रव्यकर्म है और रागाटि अशुद्ध भाव द्रव्यकर्मके कारण हैं । जैसे काई पुरुप किसीका उपकार कर देता है तो वह उपकृत पुरुप उस उपकारीका पीछा उपकार करता है ॥१॥" ससारी जीव अनादिकालसे कर्मोंका बन्ध कर रहा है। उन यधे हुए कर्मोंके उदय होनेपर आत्मामें राग-द्वेप आदि की उत्पत्ति होती है। रागादिके उदय होनेपर जैसे तपा हुआ लोहेका गोला आस पासके जलको आकर्पित करलेता है वैसे ही आत्मा एकक्षेत्रावगाही अर्थात् जिस आकाशके प्रदेशमे आत्मा स्थित है उसी आकाश प्रदेशमे स्थित कर्मके पुद्गलोको ग्रहण करती है, उन रागादि-भावोंसे फिर द्रव्यकर्म કર્મમાં કાર્ય કારણભાવ રહેલું છે તેથી દ્રવ્યમ, ભાવકર્મનું કારણ છે અને કાર્યપણું છે, તેમજ ભાવકર્મ દ્રવ્યકર્મનું કારણ છે અને કાર્ય પણ છે કહ્યું છે કે- રાગાદિ અશુદ્ધ ભાવેનું કારણ દ્રવ્યકર્મ છે, અને રાગાદિ અશુદ્ધ ભાવ દ્રવ્યકમનું કારણ છે, જેમ કેઈ પુરૂષ કેઈને ઉપકાર કરે છે તે એ ઉપકૃત પુરૂષ એને પાછો ઉપકાર કરે છે (૧)” સ સારી જીવ અનાદિ કાળથી કર્મોને બધ કરી રહ્યો છે એ ધાયલા કર્મને ઉદય થતા આત્મામાં રાગદ્વેષ આદિની ઉત્પત્તિ થાય રાગાદિને ઉદય થતા જેમ તપાવેલો લેખડને ગળે જળને આકર્ષિત કરી લે છે તેમ આમાં એક ક્ષેત્ર વગાહી અર્થાત્ જે આકાશના પ્રદેશમાં સ્થિત છે એ આકાશપ્રદેશમાં રહેલા કર્મના પુત્રને ગ્રહણ કરે છે, એ રાગાદિ-ભાવથી ફરી દ્રવ્યકર્મ બાધે છે એ રીતે દ્રવ્યકર્મ અને ભાવકમ . " જીવન અાસપાસના આત્મા ३४२ श्रीश्वकालिकमूत्रे टीका-'जया सपर०' इत्यादि । यदा उत्कृष्टम् अनुतर सार धर्म स्पृशति तदा अयोधिफलपमतम्बोधन योधिः भात्मनः सम्यासपरिणाम, तद्विपरीतोऽ वोधि-मिथ्यात्वाध्ययसापः स पर पप-पापं तेन हनम्ननितम् अबोरिकलुष कृवम् , तद, 'फलुप'-मिस्पत्रानुसार आपः। कर्मरजा=क्रियते मिथ्यात्वादि परिणामः सम्पायते यत्तत् कर्म, तहिया-द्रव्य-मात्रभेदात् , तत्र द्रव्यता-कृषिकास भृतकजलपत् सकललोकसभृता आत्मना सह पदा बध्यमाना बन्याश्चि तथा विधपुद्गलपरमाणः । भारतस्तु-आत्मनो रागद्वेपादिपरिणामः, अनयोश्च बीज क्षयोरनादिकालिककार्यकारणभावपत् पारस्परिकार्यकारणभाषः, तथा च-द्रव्य फर्म भावकर्मणः कारण कार्य च । भापकर्म च द्रव्य-कर्मणः (कारण कार्य च)। 'जया सवर' इत्यादि । जय साधु उत्कृष्ट अनुत्तर सवरधर्मको स्पर्श करते हैं तर आत्माके मिथ्यात्वपरिणामरूपी पापसे उत्पन्न हुए कर्मरूपी रजको धो डालते हैं। कर्मरज दो प्रकारका है (१) द्रव्यकर्मरज, और (२) भावकर्मरज । कुप्पीमें भरे हुए कजलकी तरह समस्त लोकाकाशमें व्याप्त तथा आत्माके साथ बधे हुए या यधनेवाले और बधते हुए विशेष प्रकारके (कार्मण जातिके) पुद्गलपरमाणुओंको द्रव्यकर्म कहते हैं । आत्माके राग-द्वेष आदि विभाव-परिणामोंको भावकर्म कहते हैं। वृक्षसे बीज उत्पन्न होता है और पीजसे वृक्ष उत्पन्न होता है। दोनों में कार्य-कारणभाव अनादिकालीन है। इसी प्रकार द्रव्यकर्म और भावकर्ममें कार्य कारण जया सवर० ७त्या न्यारे साधु Gट अनुत्त२ सयभाने स्पर्श ४३ ત્યારે આત્માના મિથ્યાત્વ-પરિણામરૂપી પાપથી ઉત્પન્ન થએ કમરૂપ રજને ધોઈ નાખે છે કરજ બે પ્રકારની છે –(૧) દ્રવ્યકરજ, અને (૨) ભાવકર્મજ કચ્છમાં ભરેલા કાજળની પેઠે સમસ્ત કાકાશમાં વ્યાપ્ત તથા આત્માની સાથે તથા બોધનારા અને બધાના વિશેષ પ્રકારના (કાણ જાતિના) પુદગલપર માણુઓને દ્રવ્ય કર્મ કહે છે આત્માના નાગદ્વેષ આદિ વિભાવ-પરિણામે ભાવકર્મ કહે છે. વૃક્ષથી બીજ ઉત્પન છે અને બીજથી વૃક્ષ ઉત્પત થાય છે બેઉ કાર્ય–કારણભાવ અનાદિકાળને છે એ પ્રકારે દ્રવ્ય કર્મ અને ભાવ એ ધાયલા થાય , अध्ययन ४ गा. २०-भुलल्यानस्वरूपम् ३४५ यिक-पर्यायाथिकादिनानानयैरर्थव्यञ्जनयोगसक्रान्तिसहितानुचिन्तनं पृथक्त्ववितर्क- सविचारम् । तत्रार्थसक्रान्तिस्तावत्-ध्येयस्यैकपर्यायपरित्यागेन पर्यायान्तरे, व्यञ्जने, योगे वा सक्रमः । व्यञ्जन चात्र चतुर्दशपूर्वात्मकश्रुतसम्पन्विशब्दाः, तनत्य किश्चिदेक व्यञ्जनमुपादाय -यानमारभ्य व्यञ्जनान्तरेऽथे योगे वा सक्रमण व्यञ्जनसक्रान्तिः। योगसक्रान्तिश्च पुनः काययोगतो मनोयोगे, मनोयोगतो वाग्योगे, इत्येवमेकस्माद् योगादन्यतरस्मिन् योगे सक्रमणम् । त्रिविधमेतत्सक्रमण च ध्यातुरनिच्छायामपि तादृश-(असक्रान्त) ध्यानसपादनसामर्थ्याभावानायते । उत्पाद आदि पर्यायोंका द्रव्याधिक या पर्यायार्थिक आदि विविध नयोंसे, अर्थ, व्यजन और योगकी सक्रान्ति सहित चिन्तन करना पृथक्त्ववितर्क शुक्ल ध्यान है । ध्येय वस्तुकी एक पर्यायको छोड़कर दूसरी पर्यायका ध्यान करना या व्यन्जन अथवा योगमें सक्रान्त होजाना अर्थसक्रान्ति है। यहाँ चौदह पूर्वरूप श्रुतके शब्दोंको व्यञ्जन कहा है। उन शब्दोंमेंसें किसी एक शब्दका ध्यान आरम्भ करके फिर किसी दूसरे व्यञ्जनका ध्यान करने लगना, अथवा अर्थया योगमें सक्रान्त होजाना व्यञ्जनसक्रान्ति है। काययोगसे मनोयोगमें, मनोयोगसे वचनयोगमें, इस प्रकार एक योगसे दूसरे योगमें सक्रान्त होजाना योगसक्रान्ति है। यह तीनों तरहका सक्रमण ध्याताकी इच्छा न होनेपर भी उतनी अधिक सामथ्र्य न होनेके कारण होता है। આદિ નાના પ્રકારના પર્યાયનું દ્રવ્યાર્વિક યા પર્યાયાર્થિક આદિ વિવિધ નથી, અર્થ વ્યજન અને યુગની સક્રાન્તિસહિત ચિંતન કરવું એ પૃથક્વવિતર્ક શુકલ ધ્યાન છે, ધ્યેયવસ્તુના એક પર્યાયને છોડીને બીજા પર્યાયનું ધ્યાન કરવું યા વજન અથવા યુગમાં સક્રિાન્ત થઈ જવુ એ અર્થસક્રાતિ છે. અહીં ચોદ પૂર્વરૂપ કૃતના શબ્દોને વ્ય જન કહેલ છે, એ શબ્દોમાથી કોઈએક શબ્દનું ધ્યાન આર ભીને પછી કે બીજા જનનું ધ્યાન લગાવવું અથવા અર્થ યા વેગમા સ ક્રાન્ત થઈ જવું એ વ્ય જનસ ક્રાન્તિ છે કાયયેગથી મને ગમા, મનેયેગથી વચનગમ, એ પ્રકારે એક યુગથી બીજા યુગમાં સક્રાન્ત થઇ જવુ એ યુગ સક્રાન્તિ છે એ ત્રણે જાતનુ સંક્રમણ ધ્યાતાની ઈચ્છા ન હોવા પણ એટલું અધિક સામર્થ્ય ન હોવાને કારણે થાય છે छता ३४४ श्रीदशकालिको पादपति, वदेव रज का रजो जीपम्य मारिन्यहेनुन्यान् घातिकर्मचदृष्टयमित्यर्थः, तद् धुनातिव्यपनयति-दीकरोतीत्यर्थः । फर्मरजोधुनन च यद्यपि धर्मध्यानेनापि जायते तथापि आस्यन्तिकतद्विधनन शुम यानेनैव भाति, यया मतापगमेन शुचिताधर्मामिसम्बन्धात् पटः शुरू इस्यु च्यते तया रागद्वेषमलापनयनान्मुचिधर्मसम्बत्याद् ध्यानमपि शुक्रमित्युच्यते, तचतुर्विधम्-(१) प्रथरत्यापित सपिचारम् , (२) पयत्वपितर्काविचारम् , (३) भूक्ष्म क्रियानिनि, (४) समुच्छिन्नक्रियाऽमतिपाति, इति । तत्र पूर्वगतश्रुतमानानुसारेण ध्येयविशेषगतोत्पादादिनानापर्यायाणा द्रव्या घधते हैं । इस प्रकार द्रव्यकर्म और भावकर्म एक दमरेके उत्पादक हैं। इन्हों कर्मोको रज करते हैं, क्योंकि ये आत्मामें मलिनता उत्पन्न कर देते हैं। सवरधर्मको ग्रहण करनेसे यह चार-घातिकर्मरूपी रज दर होजाती है। कर्मरजका दूर होना यद्यपि धर्म-ध्यानसे होता है तथापि आत्य न्तिक रूपसे तो शुक्ल-व्यानसे ही होता है। जैसे मैलको दूर करनेसे शुचिताधर्म आजाता है, इसलिए वस्त्रको शुक्ल (सफेद) वस्त्र कहते हैं, इसी प्रकार राग-द्वेपरूपी मैलके हट जानेपर शुचिताधर्मके सम्बन्धसे ध्यान भी शुक्लध्यान कहलाता है। शुक्लध्यान चार प्रकारका है-(१) पृथक्त्ववितर्क सविचार, (२) एक त्ववितर्क अविचार, (३) सूक्ष्मक्रिय-अनिवत्ति, (४) समुच्छिन्नक्रिय अप्रतिपाति । (१) पृथक्त्ववितर्क पूर्वगत श्रुतज्ञानके अनुसार किसी ध्येय पदार्थकी બીજાના ઉત્પાદક છે એજ કમેને રજ કહે છે, કારણ કે તે આત્મામાં મલિ સ વરધર્મને ગ્રહણ કરવાથી એ ચાર જો કે કરજ ધર્મધ્યાનથી દૂર થાય છે તે પણ આત્યન્તિક રૂપથી તે શુકલ યાનથી જ થાય છે જેમ મેલ દૂર કરવાથી શુચિતા-ધમે આવી જાય છે તેથી વસ્ત્રને શુક્લ (સફેદ) વસ્ત્ર કહે છે, તેમ રાગદ્વેષરૂપી મેલ હટી જતા શુચિતાધર્મના સબધથી ધ્યાન પણ શુકલધ્યાન કહેવાય છે शु४८ प्यानना न्यार २ छे (१) पृथपवित-सपियार, (२) त्व વિતર્ક-અવિચાર, (૩) સૂમક્રિય અનિવર્તિ, (૪) સમુછિન્નક્રિય અપ્રતિપાતિ (૧) પૃથફત્વવિતર્ક–પૂર્વગત થતજ્ઞાનને અનુસાર કે ધ્યેય પદાર્થના ઉત્પાદ , નતા ઉપન્ન કરે છે દૂર થઇ જાય છે ઘાતિકર્મરૂપી રજ A अ ययन ४ गा. २०-शुरुध्यानस्वरूपम् ३४५ थिक-पर्यायाथिकादिनानानयरर्थव्यञ्जनयोगसक्रान्तिसहितानुचिन्तनं पृथक्त्ववितर्क- सविचारम् । तत्रार्यसक्रान्तिस्तावत्-ध्येयस्यैकपर्यायपरित्यागेन पर्यायान्तरे, व्यञ्जने, योगे वा सक्रमः । व्यञ्जन चात्र चतुर्दशपूर्वात्मकश्रुतसम्बन्धिशब्दाः, तत्रत्य किञ्चिदेक व्यञ्जनमुपादाय ध्यानमारभ्य व्यञ्जनान्तरेऽर्थे योगे वा सक्रमण व्यञ्जनसक्रान्तिः। योगसक्रान्तिश्च पुनः काययोगतो मनोयोगे, मनोयोगतो वाग्योगे, इत्येवमेकस्माद् योगादन्यतरस्मिन् योगे सक्रमणम् । त्रिविधमेतत्सक्रमण च ध्यातुरनिच्छायामपि तादृश-(असक्रान्त) ध्यानसपादनसामर्थ्याभावाज्जायते । उत्पाद आदि पर्यायोंका द्रव्याधिक या पर्यायार्थिक आदि विविध नयोंसे, अर्थ, व्यञ्जन और योगकी सक्रान्ति सहित चिन्तन करना पृथक्त्ववितर्क शुक्ल ध्यान है । ध्येय वस्तुकी एक पर्यायको छोडकर दूसरी पर्यायका ध्यान करना या व्यञ्जन अथवा योगमें सक्रान्त होजाना अर्थसक्रान्ति है। यहाँ चौदह पूर्वरूप श्रुतके शब्दोंको व्यञ्जन कहा है। उन शब्दोंमेसे किसी एक शब्दका ध्यान आरम्भ करके फिर किसी दूसरे व्यञ्जनका ध्यान करने लगना, अथवा अर्थया योगमें सक्रान्त होजाना व्यञ्जनसक्रान्ति है। काययोगसे मनोयोगमें, मनोयोगसे वचनयोगमें, इस प्रकार एक योगसे दूसरे योगमें सक्रान्त होजाना योगसक्रान्ति है । यह तीनों तरहका सक्रमण ध्याताकी इच्छा न होनेपर भी उतनी अधिक सामर्थ्य न होनेके कारण होता है। આદિ નાના પ્રકારના પર્યાયનું દ્રવ્યાર્થિક યા પર્યાયાર્થિક આદિ વિવિધ નથી, અર્થ વ્યજન અને ગની સક્રાન્સિસહિત ચિંતન કરવું એ પૃથફત્વવિતર્ક શુક્લ ધાન છે, એયવસ્તુના એક પર્યાયને છોડીને બીજા પર્યાયનું ધ્યાન કરવું યા જન અથવા ભેગમાં સક્રાન્ત થઈ જવું એ અર્થસ ક્રાન્તિ છે અહીં ચૌદ પૂર્વ કૃતના શબ્દોને વ્યસન કહેલ છે, એ શબ્દોમાથી કોઈ એક શબ્દનું ધ્યાન આર ને પછી કઈ બીજા વ્ય જનનું સ્થાન લગાવવું અથવા અર્થ યા યુગમાં સક્રિાન્ત થઈ જવુ એ વ્ય જનસ ફાતિ છે કાયગથી મને ગમા, મનેગથી વચનયોગમા, એ પ્રકારે એક ચોગથી બીજા વેગમાં સક્રાન્ત થઈ જવું એ યુગ સત છે એ ત્રણે જાતનું સક્રમણ થાતાની ઈચ્છા ન હોવા છતા એટલું અધિક સામર્થ્ય ન હોવાને કારણે થાય છે પણું न्तिक रूपसे तो शुक्ल- यानसे ही होता है। जैसे मैलको दूर करनेसे ३४४ श्रीकालिको त्पादयवि, तदेव रज हारनी जीपम्य मानिन्यनुत्वान् पातिकर्मचतुष्टयमित्यर्थः, तद् धुनाति-यपनयति-दीपरोतीम्पर्थः । परिजोधुनन च यधपि धर्मध्यानेनापि जायते तथापि आस्यन्तिकवविधूनन ध्यानेनै माति, यथा मलापगमेन शुचिताधर्मामिसम्बन्चात् पटः इत्यू च्यते वया रागद्वेपमलापनयनान्दुविधर्मसम्बन्धाद् ध्यानमपि शुक्रमित्युच्यते, तचतुर्विधम्-(१) पृथस्त्वरितसपिचारम् , (0) एक्सवितर्काविचारम् , (३) सूक्ष्म क्रियाऽनियति, (४) समुन्छिन्नक्रियाऽपतिपाति, इति । तत्र पूर्वगतश्रुतशानानुसारेण ध्येयविशेषगतोत्पादादिनानापर्यायाणा द्रव्या पधते हैं । इस प्रकार द्रव्यकर्म और भावकर्म एक टमरेके उत्पादक हैं। इन्हों कोको रज करते हैं, क्योंकि ये आत्मामें मलिनता उत्पन्न कर देते हैं। सवरधर्मको ग्रहण करनेसे यह चार-पातिकर्मरूपी रज दर होजाती है। कर्मरजका दूर होना यद्यपि धर्म-ध्यानसे होता है तथापि आत्य शुचिताधर्म आजाता है, इसलिए वस्त्रको शुक (सफेद) वस्त्र करते हैं, इसी प्रकार राग-द्वेषरूपी मैलके हट जानेपर शुचिताधर्मके सम्बन्धसे ध्यान भी शुक्लध्यान कहलाता है। शुक्लध्यान चार प्रकारका है-(१) पृथक्त्ववितर्क सविचार, (२) एक त्ववितर्क-अविचार, (३) सूक्ष्मक्रिय-अनिवत्ति, (४) समुच्छिन्नक्रिय अप्रतिपाति। (१) पृथक्त्ववितर्क पूर्वगत श्रुतज्ञानके अनुसार किसी ध्येय पदार्थकी બીજાના ઉત્પાદક છે એજ કમને રજ કહે છે, કારણ કે તે આત્મામા મલિ સ વરધર્મને ગ્રહણ કરવાથી એ ચાર જે કે કરજ ધર્મધ્યાનથી દૂર થાય છે તે પણ આત્મત્તિક રૂપથી શુકલ યાનથી જ થાય છે જેમ મેલ દૂર કરવાથી શુચિતા-ધર્મ આવી જાય છે તેથી વસ્ત્રને શુક્લ (સફેદ) વસ્ત્ર કહે છે, તેમ રાગદ્વેષરૂપી મેલ હઠી જેલ શુચિતાધર્મના સબધથી ધ્યાન પણ શુકલધ્યાન કહેવાય છે શુકલ ધ્યાનના ચાર પ્રકાર છે (૧) પૃથફવિતક-સવિચાર, (૨) એકત્ર वित-अवियार, (3) सूक्ष्माय अनियर्ति, (४) सचिनाय अप्रतिपाति (૧) પૃથફત્વવિતર્ક-પૂર્વગત મુતજ્ઞાનને અનુસાર ડેઈ ધ્યેય પદાર્થના ઉત્પાદ . २१ નતા ઉત્પન્ન કરે છે દૂર થઈ જાય છે ઘાતિકરૂપી તે अध्ययन ४ गा. २०-शुक्लध्यानस्वरूपम् ३४७ नन्वर्यव्यञ्जनयोगान्तरेषु सक्रान्तस्य मनसः स्थैर्यासम्भवाद् ध्यानत्वमनुपप- नमिति चेन्न, एकमेव ध्येय लक्ष्यीकृत्य प्रवृत्तस्य ध्यानस्यार्थादौ सक्रमणेऽपि ध्येयेफमात्रोद्देश्यकतया मनःस्थिरीकरणरूपाया ध्यानक्रियायास्तत्रापि सद्भावात् । इद च ध्यान भनिकश्रुतपाठकाना योगत्रयवता वा मुनिपुङ्गाना भवति । अनेन ध्यानेन क्षपफश्रेण्या समाख्दो मुनिरष्टमगुणस्थानादारभ्य क्रमशो दशमगुणस्थान- चरमसमये बलबदपि मोहनीयकर्म क्षपयित्वा द्वितीयध्यानमाश्रित्य द्वादश गुण- स्थानमधिरोहति । उपशमश्रेण्या समावस्तु तदानी मोहनीयकर्म शमयित्वा एकादशमुपशान्त- मोहगुणस्थानमारोहति । इद च प्रथम ध्यानमष्टमगुणस्थानादारभ्य क्षपश्रेण्य- प्रश्न-हे गुरुमहाराज! इस ध्यानमें अर्थ, व्यञ्जन और योगोंमें मन सक्रान्त होता रहता है, इस कारण स्थिरता नहीं रह सकती, फिर इसे ध्यान कैसे कह सकते हैं। उत्तर-हे शिष्य ! परिवर्तन तो होता रहता है, परन्तु ध्येय एक ही रहता है । ध्येयकी एकताके कारण यह ध्यान कहलाता है। यह ध्यान पूर्वधारी तीन योगवाले श्रेष्ठ मुनियोंको ही होता है। इस ध्यान से दशवें गुणस्थानके अन्त समयमें क्षपकश्रेणी में आरूढ मुनि बलवान् मोहनीय कर्मका क्षय करके बाहरवें गुणस्थानमे पहुँच जाते हैं, और यदि उपशमश्रेणिमें आरूढ हों तो ग्यारहवें उपशान्तमोह गुणस्थानमें जाते हैं। यह प्रथम ध्यान उपशमश्रेणीकी अपेक्षासे आठवें પ્રશ્ન–-હે ગુરૂમહારાજ આ ધ્યાનમાં અર્થ વ્યજન અને ગમ મન સક્રાન્ત થયા કરે છે તે કારણથી સ્થિરતા રહી શકતી નથી, તે પછી તેને ધ્યાન કેમ કહી શકાય ? ઉત્તર––હે શિષ્ય ' પરિવર્તન તે થયા કરે છે, પરંતુ ધ્યેય એકજ રહે છે યેયની એકતાને કારણે એ ધ્યાન કહેવાય છે એ ધ્યાન પૂર્વધરી ત્રણ ગવાળા શ્રેષ્ઠ મુનિઓને જ થાય છે આ દયાનથી દસમા ગુણસ્થાનના અત સમયે ક્ષપકશ્રેણમા આરૂઢ મુનિ બળવાન મેહનીય-કમને ક્ષય કરીને બાનમાં ગુણસ્થાનમાં પહોંચી જાય છે, અને જે ઉપશમ-શ્રેણીમાં આરૂઢ હોય તે અગ્યામા ઉપશાન્તદેહ ગુણસ્થાનમાં એ પ્રથમ સ્થાન, ઉપશમ-શ્રેણીની અપેક્ષાએ કરીને આઠમા ગુણસ્થાનથી લઈને . - જાય - ३४६ श्रीदशकालिको इदमा तात्पर्यम्- अत्र पूर्वगताः शब्दास्तदा पायेया भान्ति, परन्तु ज्यातुम्तान सामर्थ्य न भाति येन स कविदेक शब्द पाय पा ध्यायेत् , अत एवं विदेकमर्य तत्पर्याय वा परित्यज्येवरमर्थमितरपर्यायं पा ध्यायति । इदमेव च परिवर्तन सक्रमणशन्देनोच्यते । उक्त- " अर्यादयन्तरे शन्दान्छन्दान्तरे च सक्रमः । योगाद् योगान्तरे यत्र, सरिचार तदुच्यते ॥ द्रव्याद् द्रव्यान्तर याति, गुणाद् याति गुणान्तरम् । पर्यायादन्यपर्याय, सपृथक्ल भात्यतः ॥” इति, तात्पर्य यह है कि इस ध्यानमें पूर्वगत शब्द या उसके अर्थका ध्यान किया जाता है, किन्तु इतनी सामर्थ्य नहीं होती कि एक ही शन्द या एक ही अर्थका ध्यान करतेरहें,अत एव एक पदार्थ या उसकी पर्यायको छोड़ कर दूसरी पर्यायका ध्यान करते हैं। इसी प्रकारके परिवर्तन या बदलनेको सक्रमण कहते हैं। कहा भी है- " एक अर्थसे दूसरे अर्थमें, एक शब्दसे दूसरे शब्दमें, तथा एक योगसे दूसरे योगमें सक्रमण होता है, अतः उसे सविचार (सक्रान्ति) कहते है ॥१॥ अर्थ व्यञ्जन और योगकी सक्रान्ति रूप होते हुए निज शुद्ध आत्म- द्रव्यको, एक गुणसे दूसरे गुणको, एक पर्यायसे दूसरी पर्यायको प्राप्त होता है, अतः उसे संपृथक्त्व कहते हैं ॥२॥" તાત્પર્ય એ છે કે-આ ધ્યાનમાં પૂર્વગત શબ્દ યા તેના અર્થનું ધ્યાન કરવામાં આવે છે, કિંતુ એટલું સામર્થ્ય હેતુ નથી કે એકજ શબ્દ मे અર્થનું ધ્યાન કરતો રહે તેથી કરીને એક પદાર્થ યા એના પર્યાયને છોડીને બીજા પર્યાયનું ધ્યાન કરે છે આ પ્રકારના પરિવર્તનને યા બદલાવાને સંક્રમણ કહે છે કહ્યુ છે કે– “એક અર્થથી બીજા અર્થમા, એક શબ્દથી બીજા શબ્દમાં ગથી બીજા વેગમાં સક્રમણ થાય છે, તેથી તેને અવિચાર (સ ક્રાન્તિ) ४ छ (१) અર્થ વ્ય જન અને યુગની સક્રાન્તિરૂપ થતા નિજ શુદ્ધ આત્મ-દ્રવ્યને, એક ગુણથી બીજા ગુણને, એક પર્યાયથી બીજા પર્યાયને પ્રામે થાય છે, તેથી તેને સપૃથફત્વ કહે છે ” (२) , , યા તથા એક अध्ययन ४ गा. २०-शुक्लध्यानस्वरूपम् ३४७ नवर्यव्यञ्जनयोगान्तरेषु सक्रान्तस्य मनसः स्थैर्यासम्भवाद् ध्यानत्वमनुपप- समिति चेन्न, एकमेव ध्येय लक्ष्यीकृत्य प्रवृत्तस्य ध्यानस्यार्थादौ सक्रमणेऽपि ध्येयैकमात्रोदेश्यकतया मनःस्थिरीकरणरूपाया ध्यानक्रियायास्तत्रापि सद्भावात् । इद च ध्यान भकिश्रुतपाठकाना योगत्रयवता वा मुनिपुङ्गाना भवति । अनेन ध्यानेन क्षपकश्रेण्या समारूढो मुनिरष्टमगुणस्थानादारभ्य क्रमशो दशमगुणस्थान- चरमसमये बलबदपि मोहनीयकर्म क्षपयित्वा द्वितीयध्यानमाश्रित्य द्वादश गुण- स्थानमधिरोइति । उपशमश्रेण्या समाख्नस्तु तदानीं मोहनीयकर्म शमयित्वा एकादशमुपशान्त- मोहगुणस्थानमारोहति । इद च प्रथम ध्यानमष्टमगुणस्थानादारभ्य क्षपकश्रेण्य- प्रश्न-हे गुरुमहाराज! इस भ्यानमें अर्थ, व्यञ्जन और योगोंमें मन सक्रान्त होता रहता है, इस कारण स्थिरता नहीं रह सकती, फिर इसे ध्यान कैसे कह सकते हैं । उत्तर-हे शिष्य ! परिवर्तन तो होता रहता है, परन्तु ध्येय एक ही रहता है । ध्येयकी एकताके कारण यह ध्यान कहलाता है। यह ध्यान पूर्वधारी तीन योगवाले श्रेष्ठ मुनियोंको ही होता है। इस ध्यान से दशवें गुणस्थानके अन्त समयमें क्षपकश्रेणीमे आरूढ मुनि बलवान् मोहनीय कर्मका क्षय करके याहरवें गुणस्थानमें पहुँच जाते हैं, और यदि उपशमश्रेणिमें आरूढ हों तो ग्यारहवें उपशान्तमोह गुणस्थानमें जाते हैं। यह प्रथम ध्यान उपशमश्रेणीकी अपेक्षासे आठवें પ્રશ્ન-~હે ગુરૂમહારાજ આ ધ્યાનમાં અર્થ વ્યજન અને વેગમાં મન સક્રાન્ત થયા કરે છે તે કારણથી સ્થિરતા રહી શકતી નથી, તે પછી તેને ધ્યાન કેમ કહી શકાય ? ઉત્તર– હે શિષ્ય આ પરિવર્તન તે થયા કરે છે, પરંતુ ધ્યેય એકજ રહે છે ધ્યેયની એકતાને કારણે એ ધ્યાન કહેવાય છે એ સ્થાન પૂર્વધરી ત્રણ ગવાળા શ્રેષ્ઠ મુનિઓને જ થાય છે આ ધાનથી દસમા ગુણસ્થાનના અત સમયે ક્ષપકશ્રેણીમાં આરૂઢ મુનિ બળવાન મોહનીય-કમને ક્ષય કરીને બારમા ગુણસ્થાનમાં પહોંચી જાય છે, અને જે ઉપશમ-શ્રેણીમાં આરૂઢ હોય તે અગ્યારમા ઉપશાન્તહ ગુણસ્થાનમાં એ પ્રથમ સ્થાન, ઉપશમ-શ્રેણીની અપેક્ષાએ કરીને આઠમા ગુણસ્થાનથી લઈને જય . ३४८ श्रीदशवेकालिकात्रे पेक्षया दशमगुणस्थानं यार , उपभमप्यपेक्षया तु पकादत्रगुणस्थान यादव तीति विवेकः । (२) ततौरतरितोऽपिचारमारमते, यथा सिदगारुडिकादिमन्त्रः सकल- शरीरस्यापि विपम विप मन्त्रसामान सर्वाग्योभ्यः समाकप्य दशस्थाने समा नीय सस्तम्भयति, तथा पूर्वगतश्रुतानुसारतोऽर्थ व्यञ्जन योगसक्रान्तिराहित्येना शेपविपयेभ्यः सहत्यकस्मिन्नेर पर्याये योगस्य निर्यातस्थाने दीपशिखावस्थिरी फरणम्-एकत्वरितोऽपिचारम् । गुणस्थानसे लेकर ग्यारहवें गुणस्थान तक होता है। क्षपकश्रेणीकी अपेक्षासे तो अष्टमसे लेकर दशम गुणस्थान तक रोता है, ग्यारहवा गुणस्थान उपशातमोर होनेसे क्षपकोणीमें आरूढ मुनि उसका स्पर्श न करते हुए दूसरे ध्यानका आरम्भ करके यारवें गुणस्थान में जाते हैं। (२) एकत्ववितर्क-अविचार-जैसे मन्त्र जाननेवाला पुरुष समस्त शरीरमें व्याप्त विपको मत्रकी शक्तिद्वारा अन्य-अन्य अवयवोंसे खींच कर दशस्थान (जहा विपैला जन्तुने काटा है उस जगह ) पर स्तभित कर देता है, वैसे ही पूर्वगत श्रुतके अनुसार अर्थ, व्यञ्जन और योगोंके परिवर्तनसे रहित होकर समस्त विषयोंसे विमुख होकर एक ही पर्यायके ध्यानमे वायुरहित स्थानमे रखे हुए दीपककी शिखा के समान स्थिर होजाना 'एकत्ववितर्क' ध्यान कहलाता है । અગ્યારમા ગુણસ્થાન સુધી થાય છે ક્ષપક-શ્રેણીની અપેક્ષાએ કરીને તે આ માથી લઈને દસમા ગુણસ્થાન સુધી થાય છે, અગ્યારમુ ગુણસ્થાન ઉપશાન્ત મહે હેવાથી ક્ષેપક શ્રેણીમાં આરૂઢ મુનિ એને સ્પર્શ ન આર ભ કરીને બારમા ગુણસ્થાનમાં જાય છે (૨) એકવિતર્ક-અવિચાર–જેમ માત્ર જાણવાવાળા પુરૂષ આખા શરીરમાં વ્યાપેલા વિષને મત્રની શકિતદ્વારા અન્ય અન્ય અવયવોમાથી ખેચી લઈને દશસ્થાન (જ્યા ઝેરી જતુ કરડ્યું હોય તે સ્થાન) સ્ત ભિત કરી દે છે, તેમ પૂર્વગત કૃતને અનુસાર અર્થ વ્ય જન અને રોગના પરિવર્તનથી રહિત થઈને બધા વિષયથી વિમુખ થઈ એકજ પર્યાયના “યાનમ, વાયુરહિત સ્થાનમાં રાખેલા દીપકની શિખાની પેઠે સ્થિર થઈ જવુ એ “એકવિતક” કહેવાય છે . કરતા બીજા ધ્યાનને પર SH अध्ययन ४ गा. २०-शुरुध्यानस्वरूपम् ३४९ अयमाशयः-प्रथम ध्यान सपृथक्त्व भवति, इद तु पृथक्त्वरहितम् । अत्रैकमर्थ विहायार्थान्तरे, तथैक शब्द विहाय शब्दान्तरे, तथा योगाद् योगान्तरे सक्रमण न भाति तस्मादिदमेकल्लविताभिधान ध्यानमिति । इद च ध्यान मनोवाकाय- योगान्यतमयतामेव महामुनीना जायते, अन योगाना सक्रमणाभावात् । वथा चोक्तम्--"निजात्मद्रव्यमेक वा, पर्यायमथवा गुणम् । निश्चल चिन्त्यते यत्र, तदेकत्व विदुर्बुधाः ॥१॥ यद्वयञ्जनार्ययोगेपु, परावर्तविवर्जितम् । चिन्तन तदविचार, स्मृत सद्धयानकोविदैः ॥२॥” इति ॥ तात्पर्य यह है कि पहला ध्यान पृथक्त्व (अनेकप्रकारता) सहित होता है किन्तु दूसरे भेदमें पृथक्त्व नहीं रहता। इसमें एक अर्थसे दूसरे अर्थमें सक्रमण नही होता, इसलिए इसे एकत्ववितर्क-ध्यान करते हैं। यह ध्यान मन वचन काय योगोंमें से किसी एक योगवाले मुनिराजको ही होता है, अर्थात् इस यानके समय एक ही योगमें स्थिर रहते हैं, क्योंकि इसमें योगोंका सक्रमण नहीं होता। कहा भी है- "जिस ध्यानमें केवल निज आत्मा का अथवा उसकी एक पर्यायका या एक गुणका ध्यान किया जाता है उसे 'एकत्व' कहते हैं ॥१॥ जो व्यञ्जन अर्थ और योगोंके परिवर्तनसे रहित चिन्तन किया जाना है उसे 'अविचार' कहते हैं ॥२॥" તત્પર્ય એ છે કે પહેલું ધ્યાન પૃથફવ (અનેક-પ્રકારત) સહિત હોય છે કિન્તુ બીજા ભેદમાં પૃથત્વ રહેતુ નથી એમ એક અર્થમાથી બીજા અર્થમા, એક શબ્દમાથી બીજા શબ્દમાં અને એક યુગમાથી બીજા બેગમ સક્રમણ થતું નથી, તેથી એને એકવિતર્ક ધ્યાન કહે છે એ ધ્યાન મન વચન કાયાના ગેમાના કેઈ એક ગવાળા મુનિરાજ ને જ થાય છે, અર્થાત્ એ ધ્યાનને સમયે એકજ એગમાં સ્થિર કારણ કે એમા એગોનું સંક્રમણ થતુ નથી કહ્યું છે કે- છે જે ધ્યાનમાં કેવળ નિજ આત્માનું અથવા એના એક પર્યાયનું યા એક ગુણનું ધ્યાન કરવામાં આવે છે, તેને ‘એક’ કહે છે (૧) ૦૫ જન અર્થ અને ગન પરિવર્તનથી રહિત ચિંતન કરવામા આવે છે તેને અવિચાર ४ (२)" ३४८ श्रीववेकालिबाने पेक्षया दशमगुणस्थानं याप, उपशमश्रेप्पपेक्षया तु एकादत्रगुणम्थान यापन तीति विवेकः । (२) ततौरतरितकोऽपिचारमारमते, यथा सिदगारुडिकादिमन्त्रः सकल- शरीरस्यापि पिम पि मन्त्रसामयेन सापयवेभ्यः समाकृष्य दंशस्थाने समा नीय सस्तम्भयति, तथा गतश्रुतानुसारतोऽर्थ-व्यञ्जन योगसक्रान्तिराहित्येना शेपरिपयेभ्यः सत्येकस्मिन्नेर पर्याय योगस्य निर्वावस्थाने दीपशिखावस्थिरी फरणम्-एकत्यवितोऽपिचारम् । गुणस्थानसे लेकर ग्यारहवें गुणस्थान तक होता है। क्षपकश्रेणीकी अपेक्षासे तो अष्टमसे लेकर दशम गुणस्थान तक रोता है, ग्यारहवां गुणस्थान उपशातमोह होनेसे क्षपकोणीमें आरूढ मुनि उसका स्पर्श न करते हुए दूसरे ध्यानका आरम्भ करके पाररवें गुणस्थान में जाते हैं । (२) एकत्वचितर्क-अविचार-जैसे मन्त्र जाननेवाला पुरुष समस्त शरीरमें व्याप्त विपको मनकी शक्तिद्वारा अन्य-अन्य अवयवोंसे खींच कर दशस्थान (जहा विपैला जन्तुने काटा है उस जगह ) पर स्तभित कर देता है, वैसे ही पूर्वगत श्रुतके अनुसार अर्थ, व्यञ्जन और योगोंके परिवर्तनसे रहित होकर समस्त विषयोंसे विमुख होकर एक ही पर्यायके ध्यानमे घायुरहित स्थानमे रखे हुए दीपककी शिखा के समान स्थिर होजाना 'एकत्ववितर्क' ध्यान कहलाता है। અગ્યારમા ગુણસ્થાન સુધી થાય છે ક્ષપક-શ્રેણીની અપેક્ષાએ કરીને તે આ માથી લઈને દસમા ગુણસ્થાન સુધી થાય છે, અગ્યારમુ ગુણસ્થાન ઉપશાન્ત મોર્ડ હિાવાથી ક્ષેપક શ્રેણીમાં આરૂઢ મુનિ એને સ્પર્શ આર ભ કરીને બારમા ગુણસ્થાનમાં જાય છે (૨) એકવિતર્ક-અવિચાર–જેમ માત્ર જાણવાવાળા પુરૂષ આખા શરીરમાં વ્યાપેલા વિષને મત્રની શક્તિદ્વારા અન્ય અન્ય અવયમાથી ખેચી લઈને દશસ્થાન (જ્યા ઝેરી જતુ કરડે હોય તે સ્થાન) તેમ પૂર્વગત શ્રુતને અનુસાર અર્થ વ્યજન અને એગના પરિવર્તનથી રહિત થઈને બધા વિષયેથી વિમુખ થઈ એકજ પર્યાયના સ્થાનમા, વાયુરહિત સ્થાનમાં રાખેલા દીપકની શિખાન પઠે સ્થિર થઈ જવું એ એકત્વવિતક કહેવાય છે કરતા બીજા ધ્યાનને પર સ્ત ભિત કરી દે છે, अध्ययन ४ गा. २१-कर्मरजोधुनने केवलज्ञानमाप्तिः ३५१ टीका-यहाबोधिफलुपकृत कर्मरजो धुनाति तदा सर्वत्रग-सर्वत्र गच्छति व्यामोतीति सर्वग-सकललोकालोकव्यापि तत, ज्ञान ज्ञायन्ते परिच्छियन्ते द्रव्य-गुण-पर्यायादयोऽनेनेति ज्ञान केवलज्ञानमित्यर्यस्तत्, दर्शन दृश्यन्ते साक्षा- क्रियन्ते द्रव्यादयो येनेति दर्शनम् केवलदर्शनमित्यर्थस्तत् । “सामान्याविबोधो दर्शन, विशेपार्यावयोघो ज्ञान"-मित्युभयोर्भेदः, तथाहि- "ज सामण्णग्गहण दसगमेय विसेसिय नाण" इति, चः समुच्चये, अभि- गच्छतिकमजनितसकलाऽऽवरणाभावादतिशयेन सम्पामोति सयोगिकेवलिगुण- स्थानमारोहतीत्यर्थः ॥२१॥ केवलज्ञान केवलदर्शनयोः फलमाह-'जया सब्वत्तग' इत्यादि । जय साधु मिथ्यात्वरूपी पापसे उत्पन्न हुए कर्मरजको नष्ट कर देते हैं ता समस्त लोकामाश और अलोकाकाशमें व्यापी इन्य पर्यायोको जाननेवाला केवलज्ञान तथा केवलदर्शन प्राप्त होता है। पदार्थोका सामान्य ज्ञान होना दर्शन है और विशेष ज्ञान होना ज्ञान है, यही दोनोंमें भेट है, कहाभी है- "सामान्यका ग्रहण होना दर्शन है और विशेष का ग्रहण होना ज्ञान है।" कर्मोंसे उत्पन्न हुए समस्त आवरणोंके अभावसे इन दोनों (ज्ञानदर्शन)को प्राप्त करते हैं ॥२१ ।। केवलज्ञान और केवलदर्शन का फल कहते हैं-'जया सव्वत्तग' इत्यादि। જ્યારે સાધુ મિથ્યાત્વરૂપી પાપથી ઉત્પન્ન થએલી કર્મ જને નષ્ટ કરી નાખે છે, ત્યારે સમસ્ત કાકાશ અને અલકાકારામા બાપેલા દ્રબ પર્યાને જાણવાવાળુ કેવળજ્ઞાન તથા કેવળદન પ્રાપ્ત થાય છે પદાર્થોનું સામાન્ય જ્ઞાન થવું એ દર્શન છે અને વિશેષ જ્ઞાન થવુ એ જ્ઞાન છે એ બેઉમા ભેટ છે કહ્યું છે – સામાન્યનું ગ્રહણ થવુ એ દર્શન છે અને વિશેષનું ગ્રહણ થવુ એ " સાન છે ” કમથી ઉત્પન્ન થએલા સર્વ આવરણના અભાવથી એ બેઉ (જ્ઞાન દર્શન)ને પ્રાપ્ત કરે છે (૧) पान मन ननु ण ४३ -जया सब्वचग त्यात 1 ४ 3 २ ३५० भीदकासिम इदं ध्यान क्षीणमोहनीयगुणस्पाने एन मावि, पतदपानचरमसमये सपा श्रेप्पारदो मुनिनावरणीय दर्शनावरणीयमन्तरायाय च श्रीणि कर्माणि युग पद क्षपयति, अम्य ध्यानम्य फलं केरलमानकेवलदर्भनाऽनन्तवीर्यमाप्तिरेव, महतध्यानद्वयमन्तरेण कालज्ञान लधुमशक्यम् । एतबोमय ध्यान छपस्यानो जायते, वतीयचतुर्थे तु केलिनामेव भवत इति बौदव्यम् ॥२०॥ पातिकर्मक्षयजनितफल मदर्शयितुमुक्रमते-'जया धुणई' इत्यादि । मूलम्-जया धुणइ कम्मरयं, अवोहिकलसंकडं । तया सवत्तगं नाण, दसण चाभिगच्छइ ॥२१॥ छाया-पदा धुनाति फर्मरजोऽवाधिकलपकृतम् । तदा सर्वत्रग ज्ञान, दर्शन चाभिगच्छति ॥२१॥ सान्वयार्यः-जया जब अयोरिकलुसकट आस्माके मिथ्यात्तपरिणाम द्वारा उपार्जित किये हुए कम्मरय-कर्मरूपी रजको धुणइ-हटा देता है, तपा- तब सव्वत्तग-सब जगह जानेवाले-सब पदार्थों को जाननेवाले नाणसानको च और दसण-दर्शनको अभिगच्छह बाप्त करता है ॥२१॥ यह ध्यान क्षीणमोहनीय गुणस्थानमें ही होता है। इस ध्यानके अन्तमें ज्ञानावरणीय,दर्शनावरणीय और अन्तराय नामक तीन धाति कोका एक साथ ही क्षय हो जाता है । इस ध्यानका फल केवलज्ञान, केवलदर्शन और अनन्तवीर्यकी प्राप्ति है। इन दोनों व्यानोंके विना केवलज्ञान नहीं प्राप्त होसकता । ये दोनों ध्यान छनस्थोंको होते हैं, तथा तीसरा और चौथा ध्यान केलियों को होता है ॥२०॥ घातिकर्मोके क्षय होनेसे उत्पन्न होनेवाला फल बतलाते है-'जया धुणइ' इत्यादि । એ ધ્યાન ક્ષીણમેહનીય ગુણસ્થાનમાં જ થાય છે એ સ્થાનના જ્ઞાનાવરણીય, દર્શનાવરણીય અને અન્તરાય નામના ત્રણ ઘાતિ-કમેને એક સાથે જ ક્ષય થઈ જાય છે એ દયાનનું ફલ કેવળ જ્ઞાન, કેવળ દર્શન અને અનો વીર્યની પ્રાપ્તિ છે એ બેઉ ધ્યાન વિને કેવળ જ્ઞાન પ્રાપ્ત થઈ શકતું નથી એ બેઉ ધ્યાન છદ્ધને થાય છે, તથા ત્રીજુ અને શુ ન કેવળીને थाय छे (२०) घाताना क्षय पायी Sun या३ ॥ मतावे -जया धणइ અ તમા ' ઈત્યાદિ ३५३ अ ययन ४ गा. २२-लोकस्वरूपम् मस्माभिरवलोक्यते तावानेव लोकः १, नहि, अनन्तज्ञानसम्पन्नेन सर्वजेन यो लोक्यते स लोक इति । नन्वेतेनाऽलोकस्यापि लोकलप्रसनस्तस्यापि सर्वज्ञेनावलोकितत्वात् , तथा- चाऽलोकोऽपि किं लोकः ? न, यतो लोक्यते धर्मास्तिकायायाधारभूत आकाश- विशेपो यः स लोक इत्यवधार्यम् । स च कटितटोभयपाधंतोनिहितहस्तद्वयो विस्फारितपादयुगलोऽवस्थितः पुरुष व नृत्य.वोपासकाकृतिको वा अर्ध्वाऽध- -स्तिर्यग्भेदभिन्नचतुर्दशरज्जुपरिमितोऽसख्यातप्रदेशात्मक आकाशविशेपस्तम् । तद्वि- परीतोऽलोकः । उत्तर-उतना ही नहीं है। अनन्तज्ञानी सर्वज्ञ भगवान द्वारा जितना देखा जाता है उतना लोक है। प्रश्न-केवली भगवान् अलोकको भी देखते हैं तो उनके देखनेसे अलोक भी लोक हो जायगा? उत्तर-नहीं होगा। भगवान्ने धर्मास्तिकाय आदि द्रव्यों का आधार- भूत जो आकाश देखा है उसे लोक कहते है, ऐसा समझना चाहिये। वह लोक कमरपर दोनों हाथ रग्वकर, पैर फैलाकर खडे हुए पुरुष के आकारका, अथवा नाचते हुए भैरवोपासक (भोपा) की आकृतिका है। इसके तीन भेद हैं-(१) उर्ध्वलोक, (२) म यलोक, (३) अधोलोक । यह चौदह राजू जितना ऊचा और असख्यात-प्रदेशमय है। अलो- काकाश इससे विपरीत है। ઉત્તર–એટલે જ નહિ અનતજ્ઞાની સર્વજ્ઞ ભગવાન દ્વારા જેટલું જોવાય છે એટલે લોક છે પ્રશ્ન-કેવળી ભગવાન તે અલોકને પણ જુએ છે તે એમના જેવાથી અલેક પણ લેક થઈ જશે ? ઉત્ત-નહિ થાય ભગવાને ધર્માસ્તિકાય આદિ દ્રવ્યનું આધારભૂત જે આકાશ જેયુ છે અને લોક કહે છે, એમ સમજવું જોઈએ એ લે કે કમર પર બેઉ હાથ રાખીને, પગ ફેલાવીને ઊભેલા પુરૂષના આકારને, અથવા નાચતા ભરપાસક (ભુવા)ની આકૃતિને છે તેના ત્રણ ભેદ છે (૧) ઊદુર્બલેક, (૨) મધ્યલેક, (૩) અલેક એ ચૌદ રાજુ જેવડે ઉચે અને અસખ્યાત પ્રદેશમય છે અલોકાકાશ એથી વિપરીત છે ३५२ মান্তিক . १२ जाणड सान, मूलम्-जया सवत्तग नाणं, दसण चाभिगच्छद। तया लोगमलोग च, जिणो केवली ॥२२॥ काया-यदा सर्वत्रग दर्शन चामिगति । ता लोकमलोक च, निनो जानाति केली ॥२२॥ सा यार्य:-जया-नर सब्यत्तग-अब जगह जानाले-सत्र पदायाँको जाननेगले नाण-ज्ञानको घऔर दसणदर्शनको अभिगच्छा प्राप्त करता है, तथान्तर जिणोधीतराग केवली केलशानी होते हुए लोगमलोग च- लोक और अलोकको जाणइ-जानते है ॥२२|| टीकायदा केवलज्ञान केवलदर्शन च मामोति तदा जिना यातिर्मविजेता, केवली केवलज्ञानी सन् लोक लोक्यत इति लोकस्त जानाति-करतलामलकर ज्ज्ञानविपयीकरोति । आह-ननु कोऽय लोकपदार्यः? यदि केनचिदेको ग्रामोऽवलोकितस्तहि किं तावानेव लोकः? न, अपरेण ततोऽप्यधिग्रामदर्शनात् । तहिं यावद् प्रामादिक्र- जब सर्वव्यापी ज्ञान तथा दर्शनको प्राप्त करते हैं तब केवली होकर लोक और अलोकको जानते हैं। जो देखा जाता है उसे लोक कहते हैं। प्रश्न-यदि किसीने एक ग्राम देखा हो तो लोक क्या उतना ही रोगा? उत्तर-उतना ही नहीं होगा, क्योंकि दुसरे उससे अधिक ग्राम देखते हैं? प्रश्न-तो हमलोग जितने ग्रामोको देखते है उतना ही लोक है જ્યારે સર્વવ્યાપી જ્ઞાન તથા દર્શનને પ્રાપ્ત કરે છે ત્યારે કેવળી થઈને લોક અને અલકને જાણે છે જે જોઈ શકાય તેને લેાક કહે છે પ્રશ્ન—-જે કેઈએ એક ગ્રામ જેયુ લેય તે લેક શુ એટલે જ હેાય ? ઉત્તર–એટલે જ નહિ હોય, કારણ કે બીજા એથી વધારે ગ્રામ १ જુએ છે પ્રશ્ન-તે આપણે જેટલા ગ્રામેને જોઈએ છીએ એટલે જ લેક છે?

अध्ययन ४ गा. २२-लोकस्वरूपम् मस्माभिरवलोक्यते तावाने लोकः १, नहि, अनन्तनानसम्पन्नेन सर्वजेन यो लोक्यते स लोक इति । नन्वतेनाऽलोकस्यापि लोकलप्रसङ्गस्वस्यापि सर्वजेनावलोकितत्वात् , तथा- चाऽलोकोऽपि किं लोकः ? न, यतो लोक्यते धर्मास्तिकायावाधारभूत आकाश- विशेषो यः स लोक इत्यवधार्यम् । स च कटितटौभयपार्श्वतोनिहितहस्तद्वयो विस्फारितपादयुगलोऽवस्थितः पुरुष इव नृत्यदैवोपासकाकृतिको वा ऊर्चाऽध- स्वियम्भेदभिन्नचतुर्दशरज्जुपरिमितोऽसख्यातपदेशात्मक आकाशविशेषस्तम् । तद्वि- परीतोऽलोक। उत्तर-उतना ही नहीं है। अनन्तजानी सर्वज्ञ भगवान द्वारा जितना देखा जाता है उतना लोक है। प्रश्न केवली भगवान अलोकको भी देखते हैं तो उनके देखनेसे अलोक भी लोक हो जायगा? उत्तर-नहीं होगा। भगवान ने धर्मास्तिकाय आदि द्रव्यों का आधार- भूत जो आकाश देखा है उसे लोक कहते है, ऐसा समझना चाहिये। वह लोक कमरपर दोनों हाथ रखकर, पैर फैलाकर खडे हुए पुरुष के आकारका, अथवा नाचते हुए भैरवोपामक (भोपा) की आकृतिका है। इसके तीन भेद है-(१) उर्ध्वलोक, (२) म यलोक, (३) अधोलोक । यह चौदह राजू जितना ऊचा और असख्यात-प्रदेशमय है। अलो- काकाश इससे विपरीत है। ઉત્તર––એટલે જ નહિ અનતજ્ઞાની સર્વજ્ઞ ભગવાન દ્વારા જેટલો જેવાય છે એટલે લેક છે પ્રશ્ન–ડેવળી ભગવાન તે અલકને પણ જુએ છે તે એમના જેવાથી અલેક પણ લેક થઈ જશે ? ઉત્તર–નહિ થાય ભગવાને ધર્માસ્તિકાય આદિ દ્રનું આધારભૂત જે આકાશ જોયું છે એને લેક કહે છે, એમ સમજવું જોઈએ એ લેક કમર પર બેઉ હાથ રાખીને, પગ ફેલાવીને ઊભેલા પુરૂષના આકારને, અથવા નાચતા ભવેપાસક (ભુવા)ની આકૃતિને છે તેના ત્રણ ભેદ છે (१) सो, (२) मध्य, (3) अपोलो मे न्यो२०५२ अन्य! भने અસખ્યાત પ્રદેશમય છે અલકાકાશ એથી વિપરીત છે ३५२ श्रीवकाभिकमत्रे २ 3 स . १२ ८ मूलम्-जया सवत्तगं नाणं, देसणं चाभिगन्छ। तया लोगमलोगं च, जिणो जाणड केवली ॥२२॥ 'डाया-यदा सर्वत्रग शान, दर्शनं गाभिगन्छति । ता लोकमलोक घ, जिनो जानाति काठी ॥२०॥ सा यार्थ:-जया जा सचत्तगमा जगह जानेवाले-सब पदार्थों को जाननेगले नाणम्मानको च-और दसणदर्शनको अभिगच्छामात करता है, तया तर जिणो-धीतराग केवली केल्यानी होते हुए लोगमलोग च- लोक और अलोकको जाणइ जानते है ॥२२॥ टीका-यदा केवलज्ञान केल्दर्शन च माप्नोति तदा जिनाम्यातिर्मविजेता, केवली केवलज्ञानी सन् लोक लोक्यत इति लोकस्त जानाति-करतलामलकर ज्ज्ञानविपयीकरोति । आह-ननु कोऽय लोकपदार्यः? यदि केनचिदेको ग्रामोऽवलोकितस्तहिं कि तावानेव लोकः? न, अपरेण ततोऽप्यधिग्रामदर्शनात् । तहिं यावद् प्रामादिक जय सर्वव्यापी ज्ञान तथा दर्शनको प्राप्त करते है तर केवली होकर लोक और अलोकको जानते हैं जो देखा जाता है उसे लोक करते हैं। प्रश्न यदि किसीने एक ग्राम देखा हो तो लोक क्या उतना ही होगा ? उत्तर-उतना ही नहीं होगा, क्योंकि दूसरे उससे अधिक ग्राम देखते है ? प्रश्न-तो हमलोग जितने ग्रामोंको देखते है उतना ही लोक है' જ્યારે સર્વવ્યાપી જ્ઞાન તથા દર્શનને પ્રાપ્ત કરે છે ત્યારે કેવળી થઈને લોક અને અલકને જાણે છે જે જોઈ શકાય તેને લેક કહે છે પ્રશ્ન–જે કેઈએ એક ગ્રામ જેવું હોય તે લેક શુ એટલે જ હોય ? ઉત્તર–એટલે જ નહિ હોય, કારણ કે બીજાએ એથી વધારે ગ્રામ જુએ છે પ્રશ્ન–તે આપણે જેટલા ગ્રામેને જોઈએ છીએ એટલે જ લેક છે?

अध्ययन ४ गा २२-अलोकस्वरूपम् लोकः सपतिपक्षा, व्युत्पत्तिमच्छुद्धपदाभिषेयत्वाद , यो हि व्युत्पत्ति- मच्छुद्धपदाभिधेयः स सपतिपक्ष एव भवति, यथा घटः। यश्च लोकप्रतिपक्षः स एव सद्भूतोऽलोकः, अस्तित्ववत एव प्रतिपतित्वसम्भवात् । ननु 'न लोकोऽलोकः' इति व्युत्पत्त्या घटादिष्वन्यतम एवालोकः सि यति किं पदार्थान्तरकल्पनया ? इति चेदुच्यते-'न लोकः' इत्यत्र नत्र पर्युदासार्थक- लोक अपने प्रतिपक्ष (विरोधी-अलोक)की अपेक्षा रखता है, क्योंकि वह व्युत्पत्तिवाले समासरहित पदका वाच्य (अर्थ) है। जो जो व्युत्प- त्तिवाले समासरहित पदका वाच्य होता है वह प्रतिपक्षसहित ही होता है, जैसे घट । घट व्युत्पत्तिवाला है और समासरहित है, अर्थात् दो पद मिल कर नहीं बना हुआ है, अत एव घटके प्रतिपक्ष-अघट-पट, मुकुट, शकट, कट आदि भी अवश्य होते हैं। लोकका जो प्रतिपक्ष है वह अस्तित्ववान अलोक है, क्योंकि अस्तित्ववान् पदार्थ ही किसीका प्रतिपक्ष हो सकता है। गधेका सींग आदि नास्तित्ववान् पदार्थ किसीके प्रतिपक्ष नहीं होते। प्रश्न-'जो लोक नहीं वह अलोक है। ऐसा माननेसे लोकसे भिन्न जितने घट पट आदि पदार्थ है वे सय अलोक होंगे, क्योंकि वे लोक नहीं है-लोकसे भिन्न हैं। फिर घट आदि पदार्थोंसे भिन्न एक अलग अलोक क्यों मानते हो? લેક પિતાના પ્રતિપક્ષ (વિરોધી અલેક) ની અપેક્ષા રાખે છે, કારણ કે એ વ્યુત્પત્તિવાળા સમાસાહિત શબ્દને વાચ્ય (અર્થ) છે વ્યુત્પત્તિવાળા સમાસહિત શબ્દને વાચ્ય હોય છે તે પ્રતિપક્ષસહિત જ હોય જેમ ઘટ, ઘટ વ્યુત્પત્તિવાળે છે અને સમાસરહિત છે, અર્થાત બે શબ્દ મળવાથી બનેલું નથી, તેથી ઘરને પ્રતિપક્ષ-અઘટ-પટ, સુકટ, શકટ, કટ આદિ પણ અવશ્ય હેય છે લેકને જે પ્રતિપક્ષ છે તે અસ્તિત્વવાન અલેક છે, કારણ કે અસ્તિત્વવાન્ પદાર્થ જ કોઈને પ્રતિપક્ષ થઈ શકે છે ગધેડાનું શીંગડુ વગેરે નાસ્તિત્વવાન્ પદાર્થ કોઈને પ્રતિપક્ષ થતું નથી પ્રશ્ન-બજે લેક નથી તે અલેક છે એમ માનવાથી લેકથી ભિન્ન જેટલા ઘટ પટ આદિ પદાર્થો છે તે બધા અલક થશે, કારણ કે તે લેક નથી–લેકથી ભિન્ન છે પછી ઘટ આદિ પદાર્થોથી ભિન્ન એક જૂદે અલેક કેમ માને છે ?

- ३५४ श्रीदशकालिमा अस्तु लोको नीलादीनागनाधारतयाऽस्थानासम्भवात् , अलोकस्तु कथम्, तस्याऽमूर्तत्वेनेद्रियागोचरतयाऽग्निवसाधर पमाणामावाद, इन्द्रियागोचरे चावे मन परोः कदाऽप्यसम्मगदिति न शनीयम् , इन्द्रिग्नोऽन्द्रियविषयवाभावमात्र- दर्शनेन तदस्तित्वनिराारणस्याऽशस्यत्वात् , अन्यथा हि प्रपितामहादीनामपि तत एकामावः माप्नुयात् । यतः 'मासन् प्रपितामहादयोऽस्मादादिभरीरम्याऽन्यथानु पपुलस्वाद' इत्यनुमानेन तेपामस्तिस्त्र साध्यते चेदलोकस्याप्यनुमानेन मिदिरन वथैव, तथाहि- प्रश्न-जीव और पुगल आदि विना आधारके नहीं ठार सकते, अनः लोकाकाश मानना तो ठीक है, परन्तु अलोकाकाशके अस्तित्वमें क्या प्रमाण है ?, कारण यह कि इन्द्रियोंका या विषय नहीं है, क्योंकि अमूर्त है। जिस विषयमें इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति नरों रोती उसमें मन भी प्रवृत्त नहीं हो सकता। अत एव न इन्द्रियोंसे अलोकाकाशको जान सकते हैं और न मनसे । उत्तर-यह प्रश्न ठीक नहीं है, क्योकि इन्द्रिय और मनका विषय न होनेसे उसके अस्तित्वका खण्डन नहीं हो सकता, अन्यथादादे परदादे आदि पूर्वजोंका भी अस्तित्व सिद्ध नहीं होगा, क्योंकि वे भी इन्द्रिय और मनके विषय नहीं होते। यदि कोई इस अनुमानसे पूर्वजोंका अस्तित्व सिद्ध करे कि-पितामह (दादा) आदि पूर्वजोंका किसी समयमें अस्तित्व था, क्योंकि उनके विना हमारा शरीर नहीं बन सकता तो अनुमानसे ही अलोककी भी सिद्धि मान लेनी चाहिए। अनुमान यह है- પ્રશ્ન-જીવ અને પુદગલ આદિ આધાર વિના રહી શકતા નથી, તેથી લકાકાશ માનવું એ તે બરાબર છે, પરંતુ અલૈકાકાશના અસ્તિત્વનું શું પ્રમાણ કેન્દ્રની પ્રવૃત્તિ થતી નથી તેમ પણ ન થઈ શકતું નથી એથી કરીને છે. કારણ એ છે કે બંને એ વિષય નથી કેમકે અમૂર્ત છે જે વિષયમાં ઇજિપથી અલકાકાશને જઈ શકાતું નથી તેમજ નથી પણ જાણી શકાતું નથી ઉત્તર–એ પ્રશ્ન બરાબર નથી કેમકે ઇન્દ્રિય અને મનને વિષય છે રહેવાથી તેના અસ્તિત્વનું ખડન થઈ શકતું નથી એમ તે દાદ પૂર્વજોનું પણું અસ્તિત્વ સિદ્ધ નહિ થાય, કેમકે તે પણ ઈન્દ્રિય અને મનની વિષય નથી હોતા જે કઈ અનુમાનથી પૂર્વજોનું અસ્તિત્વ સિદ્ધ કરે કે પિતા મહ (દાદા) આદિ પૂજન્ કોઈ સમયે અસ્તિત્વ હતું, કારણ કે એના વિન આપણું શરીર બની શકે નહિ, તે અનુમાનથી જ અલેકની પણ સિદ્ધિ માની देवी धमे, मनुमान छ- - પડદાદા આદિ , अध्ययन ४ गा. २२-अलोकस्वरूपम् ३५५ लोकः सपतिपक्षः, व्युत्पत्तिमच्छुद्धपदाभिरेयत्वात् , यो हि व्युत्पत्ति- मच्छुद्धपदाभिरेयः स सपतिपक्ष एव भवति, यथा घटः। यश्च लोकमविपक्ष: स एव सद्भूतोऽलोकः, अस्तित्ववत एवं प्रतिपक्षित्वसम्भवाद । ननु 'न लोकोऽलोकः' इति व्युत्पत्त्या घटादिप्वन्यतम एवालोकः सि यति किं पदार्थान्तरकल्पनया? इति चेदुच्यते'म लोकः' इत्यत्र नत्र पर्युदासार्थक- लोक अपने प्रतिपक्ष (विरोधी-अलोक)की अपेक्षा रखता है, क्योंकि वह व्युत्पत्तिवाले समासरहित पदका वान्य (अर्थ) है। जो जो व्युत्प- त्तिवाले समासरहित पदका वाच्य होता है वह प्रतिपक्षसहित ही होता है, जैसे घट । घट व्युत्पत्तिवाला है और समासरहित है, अर्थात् दो पद मिल कर नहीं बना हुआ है, अत एव घटके प्रतिपक्ष-अघट-पट, मुकुट, शकट, कट आदि भी अवश्य होते हैं । लोकका जो प्रतिपक्ष है वह अस्तित्ववान् अलोक है, क्योंकि अस्तित्ववान् पदार्थ ही किसीका प्रतिपक्ष हो सकता है। गधेका सींग आदि नास्तित्ववान पदार्थ किसीके प्रतिपक्ष नहीं होते ॥ प्रश्न-'जो लोक नहीं वह अलोक है। ऐसा माननेसे लोकसे भिन्न जितने घट पट आदि पदार्थ हैं वे सब अलोक होंगे, क्योंकि वे लोक नहीं है-लोकसे भिन्न हैं। फिर घट आदि पदार्थोसे भिन्न एक अलग अलोक क्यो मानते हो? લેક પિતાના પ્રતિપક્ષ (વિરોધી અલેક) ની અપેક્ષા રાખે છે, કારણ કે એ વ્યુત્પત્તિવાળા સમાસારહિત શબ્દને વાચ્ય (અર્થ) છે વ્યુત્પત્તિવાળા સમાસ રહિત શબ્દને વચ્ચે હોય છે તે પ્રતિપક્ષસહિત જ હોય છે જેમ ઘટ, ઘટ વ્યુત્પત્તિવાળે છે અને સમાસરહિત છે, અર્થાત્ બે શબ્દો મળવાથી બનેલ નથી, તેથી ઘટને પ્રતિપક્ષ-અઘટ-પટ, મુકુટ, શકટ, કટ આદિ પણ અવશ્ય હેય છે લેકને જે પ્રતિપક્ષ છે તે અસ્તિત્વવાનું અલેક છે, કારણ કે અસ્તિત્વવાન પદાર્થ જ કેઈને પ્રતિપક્ષ થઈ શકે છે ગધેડાનું શીંગડુ વગેરે નાસ્તિત્વવાન્ પદાર્થ કોઈને પ્રતિપક્ષ થતું નથી પ્રશ્ન-બજે લેક નથી તે અલક છે એમ માનવાથી લેકથી ભિન્ન જેટલા ઘટ પટ આદિ પદાર્થો છે તે બધા અવક થશે, કારણ કે તે લેક નથી–લેકથી ભિન્ન છે પછી ઘટ આદિ પદાર્થોથી ભિન્ન એક જુદો અલેક કેમ માને છે ?

3 अस्तित्व सिद्ध करे कि-पितामह (दादा) आदि पूर्वजोंका किसी समयमें ३५४ श्रीदवकामिनो अस्तु लोको नीरपुरलादीनागनापारतयारस्थानासम्भवात् , अलोकस्तु कथम्, तस्याऽमूत्वेनेन्टियागोचरतपाऽस्तित्वमापमाणामागत् , इन्द्रियागोचरे चायें मनामटरो कदाऽप्यसम्मादिति न मानीया , इन्द्रियनोइन्द्रियविषयवाभावमात्र- दर्शनेन तदस्तित्वनिराकरणस्पाऽशस्यत्वात् , अन्यथा हि प्रपितामहादीनामपि तत एकामाव' माप्नुयात् । यतः 'आसन् प्रपितामहादयोऽस्मादादिभरीरस्याऽन्ययात्रु पपप्तस्वाव' इत्यनुमानेन तेपामस्तित साध्यते चेदलोकस्याप्यनुमानेन सिदिरन वघेव, तथाहि- प्रश्न-जीव और पुद्गल आदि पिना आधारके नहीं ठर सकते, अनः लोकाकाश मानना तो ठीक है, परन्तु अलोकाकाशके अस्तित्वमें क्या प्रमाण है ?, कारण यह कि इन्द्रियोंका या विषय नहीं है, क्योंकि अमूर्त है। जिस विषयमें इन्द्रियों की प्रतिनीं रोती उसमें मन भी प्रवृत्त नहीं हो सकता। अत ण्यन इन्द्रियोंसे अलोकाकाशको जान सकते हैं और न मनसे । उत्तर-यह प्रश्न ठीक नहीं है, क्योकि इन्द्रिय और मनका विषय न रोनेसे उसके अस्तित्वका खण्डन नहीं हो सकता, अन्यथादादे परदादे आदि पूर्वजोंका भी अस्तित्व सिद्ध नहीं होगा, क्योंकि वे भी इद्रिय और मनके विषय नहीं होते। यदि कोई इस अनुमानसे पूर्वजोंका अस्तित्व था, क्योंकि उनके विना हमारा शरीर नहीं बन सकता तो अनुमानसे ही अलोककी भी सिद्धि मान लेनी चाहिए। अनुमान यर है- પ્રશ્ન –જીવ અને પુદ્ગલ આદિ આધાર વિના રહી કાકાશ માનવુ એ તે બરાબર છે, પરંતુ અલકાકાશના અસ્તિત્વનું શું પ્રમાણ છે કારણ એ છે કે ઈદ્રિયને એ વિષય નથી કેમકે છેજે વિષયમાં ઈન્દ્રની પ્રવૃત્તિ થતી નથી તેમ મને પણ પ્રવૃત્ત થઈ શકતું નથી એથી કરીને ઈન્દ્રિથી અલેકાકાશને જાણી શકાતું નથી તેમજ મનથી પણ જાણી શકાતું નથી ઉત્તર–એ પ્રશ્ન બરાબર નથી કેમકે ઈન્દ્રિય અને મનને વિષય : રહેવાથી તેના અસ્તિત્વનું ખડન થઈ શકતું નથી એમ તે દાદ પૂર્વજોનું પણું અસ્તિત્વ સિદ્ધ નહિ થાય, કેમકે તે પણ ઈન્દ્રિય અને વિષય નથી હોતા જે કઈ અનુમાનથી પુર્વજોનું અસ્તિત્વ સિદ્ધ કરે કે પિતા મહ (દાદા) આદિ પૂનૂ કાઈ સમયે અસ્તિત્વ હતું, કારણ કે એના વિના આપણું શરીર બની શકે નહિ, તે અનુમાનથી જ અલકની પણ સિદ્ધિ માની લેવી જોઈએ, અનુમાન એ છે કે- શકતા નથી, તેથી પડદાદા આદિ મનની , अध्ययन ४ गा. २२-अलोफस्वरूपम् ३५५ लोकः सप्रतिपक्षः, व्युत्पत्तिमच्छुद्धपदाभिषेयत्वात् , यो हि व्युत्पत्ति- मच्छुद्धपदाभिषेयः स सपतिपक्ष एव भवति, यथा घटः। यश्च लोकमतिपक्षः स एव सद्भूतोऽलोकः, अस्तित्ववत एवं प्रतिपक्षित्वसम्भवात् । ननु 'न लोकोऽलोकः' इति व्युत्पत्त्या घटादिष्वन्यतम एवालोकः सि यति किं पदार्यान्तरस्ल्पनया' इति चेदुच्यते-'न लोका' इत्यत्र नत्र पर्युदासार्थक- लोक अपने प्रतिपक्ष (विरोधी-अलोक) की अपेक्षा रखता है, क्योंकि वह व्युत्पत्तिवाले समासरहित पदका वान्य (अर्थ ) है । जो जो व्युत्प- त्तिवाले समासरहित पदका वाच्य होता है वह प्रतिपक्षसहित ही होता है, जैसे घट । घट व्युत्पत्तिवाला है और समासरहित है, अर्थात् दो पद मिल कर नहीं बना हुआ है, अत एव घटके प्रतिपक्ष-अघट-पट, मुकुट, शकट, कट आदि भी अवश्य होते हैं। लोकका जो प्रतिपक्ष है वह अस्तित्ववान अलोक है, क्योंकि अस्तित्ववान् पदार्थ ही किसीका प्रतिपक्ष हो सकता है । गधेका सींग आदि नास्तित्ववान् पदार्थ किसीके प्रतिपक्ष नहीं होते ॥ प्रश्न-'जो लोक नहीं वह अलोक है। ऐसा माननेसे लोकसे भिन्न जितने घट पट आदि पदार्थ हैं वे सब अलोक होंगे, क्योंकि वे लोक नहीं है-लोकसे भिन्न हैं। फिर घट आदि पदार्थोसे भिन्न एक अलग अलोक क्यों मानते हो? લેક પિતાના પ્રતિપક્ષ (વિધી અલેક) ની અપેક્ષા રાખે છે, કારણ કે એ વ્યુત્પત્તિવાળા સમાસાહિત શબ્દને વાચ (અર્થ) છે વ્યુત્પત્તિવાળા સમાસહિત શબ્દને વાચ્ય હોય છે તે પ્રતિપક્ષસહિત જ હોય છે જેમ ઘટ, ઘટ વ્યુત્પત્તિવાળે છે અને સમાસ રહિત છે, અર્થાત્ બે શબ્દો મળવાથી બનેલ નથી, તેથી ઘટને પ્રતિપક્ષ-અઘટ-પટ, મુકુટ, શકટ, કટ આદિ પણ અવશ્ય હેય છે લેકને જે પ્રતિપાલ છે તે અસ્તિત્વવાન અલેક છે, કારણ કે અસ્તિત્વવાન પદાર્થ જ કોઈને પ્રતિપક્ષ થઈ શકે છે ગધેડાનું શીંગડુ વગેરે નાસ્તિત્વવાન પદાર્થ કોઈને પ્રતિપક્ષ થતું નથી –“જે લેક નથી તે અલેક છે” એમ માનવાથી લેકથી ભિન્ન જેટલા ઘટ પટ આદિ પદાર્થો છે તે બધા અલેક થશે, કારણ કે તે લેક નથી–લેકથી ભિન્ન છે પછી ઘટ આદિ પદાર્થોથી ભિન્ન એક જૂદો અલેક કેમ માને છે ? प्रश्न- भीदवकालिको त्वात्, 'पर्युदासः सदृशग्राही'-ति नियमानिषेध्यरानेर भाष्यम् , निषे यथात्र जीवाजीवाऽऽदिद्रव्याधारभूत आकाशविशेषात्मको लोकः, अतोऽलोकोऽप्या फाशविशेषरूप एत भरिनु योग्यः, यया 'अधनोऽयम् । इत्युक्त धनरहितो मनुष्य एप गृह्यते न तु घटपटादिः, तदाऽप्यलोको लोकानुरूप एव बोदव्य इति ॥२२|| उत्तर-जो लोक नहीं यह अलोक है। यहाँ नन्समास है। नमर्थ दो प्रकारका होता है। एक ननर्थ ऐसा होता है कि वह जिसका निषेध किया जाता है उस निपेध्यके समानका ही ग्रहण करनेवाला होता है उसे पर्युदास करते हैं। कहा भी है कि- "पर्युदास सदृशका पोधक होता है। अत एच लोकका निषेध रूप अलोक भी लोकहीके समान होना चाहिए । निषेध्य यहा जीव अजीव आदि द्रव्योंका आधारभूत आकाशविशेष है, अतः अलोक भी आकाशविशेष (जीव अजीव आदि द्रव्योंके आधारसे भिन्न) होना चाहिए। जैसे किसीने कहाकि यह 'अधन' है। इस वाक्यमें 'अधन' शब्दसे यह नहीं समझा जाता है कि यह घड़ा है या कपडा है, किन्तु धनररित मनुष्य अर्थ ही समझा जाता है। इसी प्रकार यहाँ 'अलोक' शब्दसे घड़ा नही समझना चाहिए किन्तु आकाशविशेष ही समझना चाहिए। केवली भगवान् इन लोक और अलोक दोनोंको जानते हैं ॥२२॥ St२-२ या नथी ते मा छ मेभा ना सभास छ नबर्थ है પ્રકારના હોય છે એક નઝર્થ એ હેય છે કે તે જેને નિષેધ કરવામા આવે છે એ નિધ્યની સમાનના જ ગ્રહણ કરનાર હોય છે, તેને પથુદાસ કહે છે, કહ્યું છે કે- પર્યદાસ સદશનો બેધક હોય છે” તેથી કરીને લેકના નિષેધરૂપ અલક પણ લેકની જ સમાન હવે જોઈએ અહી નિષેધ્ય જીવ-અજીવ આદિ દ્રવ્યને આધારભૂત આકાશવિશેષ છે, તેથી અલેક પણ આકાશવિશેષ (જીવ અજીવ આદિ દ્રવ્યના આધારથી ભિન્ન) હવે જોઈએ, જેમકે કોઈએ કહ્યું કે એ “અધન” છે, એ વાક્યમાં “અધન” શબ્દથી એમ નથી સમજાતુ કે એ ઘડે છે યા ક૫ડુ છે, કિન્તુ “ધનરહિત મનુષ્ય” એ અર્થ જ સમજાય છે એ રીતે અહી અલેક” શબ્દથી ઘડે યા કપડુ ન સમજવું જોઈએ, કિન્તુ આકાશવિશેષ જ સમજ જોઈએ કેવળી ભગવાન એ લેક અને અલેક બેઉને જાણે છે (૨૨) अध्ययन ४ गा. २३-शैलेशीकरणस्वरूपम् ३५७ १ ४ ५ ६ २ ७ ३ ૧૨ मूलम् -जया लोगमलोगं च, जिणो जाणइ केवली। तया जोगे निलंभित्ता, सेलेसि पडिवजइ ॥ २३ ॥ छाया-यदा लोकमलोक च, जिनो जानाति केवली । तदा योगानिरुध्य, शैलेशी मतिपयते ॥२३॥ सान्वयार्थः-जया जब जिणोधीतराग केवली केवलज्ञानी होये हुए लोगमलोग चम्लोक और अलोकको जाणइ जानते हैं, तया तब जोगे मन- वचन-कायके योगोका निरुभित्ता-निरोध करके सेलेसि-शैलेशीकरणको पडि- वजह-माप्त करते हैं ॥२३॥ टीका-'जया लोग'-मित्यादि । यदा जिनः केत्रली लोकालोक जानाति तदा योगान-मनोवाकायलक्षणान् निरु य, तथाहि-मुक्तिपदेऽन्तर्मुहूर्तभाविनि आयुप्यन्तर्मुहूर्त्तमागावशेषे सति यवघातिकर्मचतुष्टय स्वभावतः समस्थितिक स्यचिदा निष्कलङ्कः परमकल्याणाऽऽस्पदीभूतः केवली मक्ष्मक्रियाऽनिवाख्य ध्यानमारभते । उत्कृष्टत आयुपः पण्मासावशेषे समुत्पन्न केवलस्य भगवतस्तु तदा- "जया लोग" इत्यादि । जब घातिकर्मोंको जीतनेवाले केवली भगवान् लोक और अलोकको जान देते हैं तब योगोंका निरोध करके शैलेशी अवस्थाको प्राप्त करते हैं। (३) अन्तर्मुहर्त मात्र आयु शेष रहने पर यदि बाकी रहे हुए चारों अधातिया कर्मों की स्थिति स्वभावसे ही बराबर हो तो निष्कलङ्क परम कल्याणके आश्रयभूत केवली प्रभु सूक्ष्मक्रिय नामक शुक्ल ध्यानके तीसरे पायेका ध्यान प्रारम्भ करते हैं, किन्तु जिन्हें उत्कृष्ट आयुकर्म छह मास अवशेप रहने पर केवलज्ञान उत्पन्न होता है उन्हें नियमसे केवलिसमुद्धात जया लोग इत्यादि न्यारे घाती भनि वाणा वी भगवान અને અલકને જાણી લે છે ત્યારે વેગોને નિરોધ કરીને તૈલેશી અવસ્થાને પ્રાપ્ત કરે છે (3) અન્તર્મુહૂર્ત માત્ર આયુ શેષ રહેતા જે બાકી રહેલા ચારે અઘાતી કર્મોની સ્થિતિ સ્વભાવથી બરાબર હૈોય તે નિષ્કલક પરમ કલ્યાણના આશ્રયભૂત કેવળી પ્રભુ સૂક્ષમક્રિય નામના શુકલ યાનના ત્રીજા પાયાનું ધ્યાન પ્રારભે છે કિન્તુ જેમને ઉત્કૃષ્ટ આયુકર્મ છ માસ અવશેષ રહેતા કેવળજ્ઞાન ઉત્પન્ન થાય છે, તેમને નિયમથી કેવળી સમુઘાત કરે પડે છે, કારણ કે એમનું આયુકર્મ , - ३५८ श्रीदनवेशालिकमरे युपोऽल्पत्वाद् वेदनीयनामगोप्रार्मणा च स्थितिबाहुल्याच नियतममुद्भातस्ताद , तत्कृत्वा वेदनीयादिषु चतुर्प समस्थितिकेगु सम्मु तयारम्भः । यदा जघन्ययोगवनः सन्जिपर्याप्तम्य मनोन्याणि समयेर निरुन्धन असरया- समयैः सम्पूर्ण मनोयोग, तत्पश्रात्पर्याप्तीन्द्रियस्य वाग्योगपर्यायतोऽसस्यात गुणन्यूनवाग्योगपर्यायान् पतिसमय निरुन्धन असख्यातसमयेः सम्पूर्णवाग्योग, ततश्च प्रथमसमयसमुत्पन्ननिगोदजीवस्य जघन्यकाययोगपर्यायतोऽसण्यातगुणहीन फाययोग प्रतिसमय निरुन्धन् असख्यातसमयेदरकाययोग च सर्वथा निरुद्धि करना पडता है, क्योंकि उनका आयुकर्म अल्प होता है और उनके वेदनीय नाम गोत्र कोकी स्थिति अधिक होती है. इसलिए वे पहले समुद्धातके द्वारा चारों कर्मोंकी स्थिति यरायर करके फिर तीसरे पायेका ध्यान आरम्भ करते हैं। जय जघन्य योगवाले सज्ञी पर्याप्तकके मनोद्रव्य और मनोद्रव्य के व्यापारोंसे असरयात गुणहीन मनोद्रव्योंका प्रतिसमयमें निरोध करते हुए असख्यात समयोंमें सम्पूर्ण मनोयोगका निरोध कर देते हैं । तब मनोयोगका निरोध करके पर्याप्त दीन्द्रियके वचनयोगकी पर्यायोंसे असख्यात गुणहीन वचनयोगकी पर्यायोंका प्रतिसमय निरोध करते हुए समस्त वचनयोगका निरोध करते हैं। वचन योगका सम्पूर्ण निरोध करके प्रथम समयमें उत्पन्न निगोदिया जीवके जघन्य काययोग की पर्यायो से अमख्यातगुणहीन काययोगका प्रतिसमय निरोध करते हुए असख्यात समयोंमे यादर काययोगका भी सर्वथा निरोध कर देते हैं । અપ હોય છે અને એમના વેદનીય નામ ગોત્ર કર્મોની સ્થિતિ વધારે હોય છે તેથી કરીને તે પહેલા સમુદઘાતની દ્વારા ચારે કર્મોની સ્થિતિ પછી ત્રીજા પાયાનું ધ્યાન આર લે છે જ્યારે જઘન્ય ગવાળા સશી પર્યાપ્તકના મનદ્રવ્ય અને મદ્રવ્યના વ્યાપારથી અસ ખ્યાતગુણહીન મનને પ્રતિ સમયે નિરોધ સમયમાં સંપૂર્ણ મનેયેગને નિરિધ કરીને પર્યાપ્ત હીન્દ્રિયના વચનગના પર્યાથી અસખ્યાતગુણહીન વચનગાના પર્યાયે પ્રતિસમય નિરોધ કરતા સમસ્ત વચનગને નિરોધ કરે છે વચનગને સંપૂર્ણ નિરોધ કરીને પ્રથમ સમયમાં ઉત્પન્ન નિગેદિયા જીવના જધન્ય કાગના પયાથી અસ ખ્યાતગુણ હીન કાગને પ્રતિસમય નિધિ કરતા અસખ્યાત સમયે મા બાદર કાયેગને બરાબર કરીને કતા અસ ખ્યાત अध्ययन ४ गा. २३-शैलेशीकरणस्वरूपम् ३५९ तदेद सूक्ष्मक्रियाऽनिवर्ति-यानमुपक्रमते । तर श्वासोच्छापरारूप मूक्ष्ममपि काय- योग निरु य अयोगित्व माप्येत्यर्थः, शैलेशीम् शैलाः पर्वतास्तेपामीशः शैलेश सुमेरुस्तद्वत् स्थैर्य यस्यामवस्थाया सा, यद्वा शील यथारख्यातचारित्र तस्येश:= स्वामी शीलेशस्तस्येयमवस्था शैलेशी ता प्रतिपद्यते मध्यमगलेन 'अ-इ-उ-ऋ-ल' इत्येवरूपपश्चलघ्वक्षरोचारणसमकालस्थितिक समुच्छिन्नक्रियाऽमतिपातिध्यानमनुः भवतीत्यर्थः अर्थात् समस्त मनोयोग और वचनयोगका तथा बादर काययोगका निरोध होने पर सूक्ष्मक्रियाऽनिवत्ति नामक तीसरे ध्यानको आरम करते हैं। तीसरे भ्यानके समय श्वासोच्छ्वासरूप काययोगकी सूक्ष्म- क्रिया ही रहनी है । इस ध्यानसे उस सूक्ष्मक्रियाका भी निरोध करके अयोगी हो जाते हैं । अयोगी होकर अर्थात् तेरहवें गुणस्थान से चौद- हवें गुणस्थानमें पहुचकर शैलेशी अवस्थाको प्राप्त होते हैं। जिसमें शैलों (पर्वतों) के ईश (स्वामी) सुमेरु पर्वतके समान स्थिरता रहती है उसे शैलेशी अवस्था कहते हैं। अथवा-शील (यथाख्यातचारित्र) के ईश(स्वामी) को शीलेश करते है, उनकी अवस्थाको शैलेशी कहते हैं। इस शैलेशी अवस्थाको प्राप्त होकर न धीमे न जल्दी अर्थात् मध्यम काल से 'अ-इ-उ-ऋ-ल' इन पाच हस्व अक्षरोंके उच्चारणमें जितना समय लगता है उतने समय तक चौदहवें अयोगिकेवली गुणस्थानमें रह कर समुच्छिन्नक्रियाऽप्रतिपाति ध्यान याते हैं। પણ સર્વથા નિધિ કરી નાખે છે અર્થાત્ સમસ્ત મનેયેગ અને વચગને તથા બાદર- કાગને નિરોધ થતા સૂફમક્રિયાશનિવર્તિ નામના ત્રીજા સ્થાનને આર ભ કરે છે ત્રીજા સ્થાનને સમય શ્વાસે શ્વાસરૂપ કાયાગની સૂમ ક્રિયા જ રહે છે, એ ધ્યાનથી તે સૂકમ ક્રિયાને પણ નિરોધ કરીને અયોગી થઈ જાય છે અગી થઈને અર્થાત તેમે ગુણસ્થાનેથી ચોદમાં ગુણસ્થાનમાં પહોચીને રિલેશી અવસ્થાને પ્રાપ્ત થાય છે જેમા લે (પર્વત)ના ઈશ (વામી) સુમેરૂ પર્વતની પેઠે સ્થિરતા રહે છે તેને તેની અવસ્થા કહે છે, અથવા શીલ (યથા ખ્યાત ચારિત્ર)ના ઈશ (સ્વામી)ને શલેશ કહે છે, એની અવસ્થાને રેશનશી કહે છે એ ટૉલેશી અવસ્થાને પ્રાપ્ત થઈને, નહિ ધીમે કે નહિ જલદી અર્થાત, मध्यम तथा अ इ-उ-ऋल 2 पाय - मक्षशना यारमा । સમય લાગે એટલા સમય સુધી ચોમે અગિકેવળી ગુણસ્થાનમા રહીને સમુ છિન્નક્રિયાપ્રતિપતિ વાન થાવે છે ३६० श्रीदनवैकालिकसूत्रे ननु सक्ष्मक्रियाऽनियर्यायस्य शक यानस्य कय ध्यानपदप्रतिपात्रता, ध्यान हि नाम मनास्थैर्यम् , केलिना तदानीं मनसोऽसचादिति चेन्न, स्थैर्यावस्थापन्नत्यमेव ध्यानत्वम् , तच्च यथा स्थिरीभावमापनस्य उग्रस्थीय मनसस्तथैव केरलिफाययोगस्यापि मुस्थिरतया मुवचम् । नन्वेवमपि समुन्छिन्नक्रियाऽमतिपात्याग्यस्य शम यानस्य कय ध्यानत्त्रम् ? तत्र काययोगस्याप्यमागत् , इति चेदुच्यते-यथा कुम्भकारचक्र तद्भ्रामकदण्डा दिसम्बन्धाभावेऽपि माषालीनवेगतो भ्रमति तथा मनोवाकाययोगनिरोघेऽप्ययो गिन: मास्कृतध्यानधारावेगतो ध्यान सम्पयते । प्रश्न-हे गुरुमहाराज ! मनकी स्थिरताको ध्यान कहते है। केवली भगवान के उस समय मन नहीं रहता, अतः सूक्ष्मक्रियाऽनिवत्ति शुक्ल ध्यान को ध्यान कैसे कहा जा सकता है । उत्तर-स्थिरता को ही ध्यान करते है। वह स्थिरता जैसे छद्मस्थके मनोयोगकी होती है वैसे ही केवलीके काययोगकी स्थिरता रोती है इसलिए उसे ध्यान करते हैं। प्रश्न-तो समुच्छिन्नक्रियाऽप्रतिपाति-शुक्ल -ध्यानको ध्यान कैसे कर सकते है ? क्योंकी वहा काययोगका भी अभाव है । उत्तर-जैसे कुभारका चाक, घुमानेवाले दण्ड आदिके सयोग न होनेपर भी पूर्वकालके वेगसे घूमता रहता है वैसे ही मन वचन काय का निरोध होजाने परभी पूर्व ध्यानकी धारा के वेगसे अयोगी केवलीके ध्यान होता है। પ્રશ્ન–હે ગુરૂ મહારાજ ! મનની સ્થિરતાને ધ્યાન કહે છે કેવળી ભગ વાનને એ સમયે મન રહેતું નથી એટલે સુમક્રિયા:નિવર્તિ શુકલ ધ્યાનને મ્યાન કેવી રીતે કહી શકાય ? ઉત્તર–સ્થિરતાને જ ધ્યાન કહે છે એ સ્થિરતા જેવી છઘસ્થના મને ગની હોય છે તેવી જ કેવળના કાગની સ્થિરતા હોય છે, તેથી તેને ધ્યાન કહે છે –તે સમુછિન્નક્રિયા અપ્રતિપતિ–શુકલ-યાનને દાન કેવી રીતે કહી શકાય? કારણ કે ત્યા કાગને પણ અભાવ છે ઉત્તર–જેમ કુભારને ચાકડે, તેને ધુમાવનારા દડ આદિને સાગ ન થવા છતા પણ પૂર્વકાળના વેગથી ઘુમ્યા કરે છે, તેમજ મન વચન કાયને નિધિ થઈ ગયા પછી પણ પૂર્વ ધ્યાનની ધારાના વેગથી અગી કેવળીને ધ્યાન હોય છે प्रश्न- ४ ૫ ६ १० ८ अध्ययन ४ गा. २४-अयोगिनो ध्यानसिद्धिः किञ्च-तत्र द्रव्ययोगाभावेऽपि भावयोगस्य सत्त्वाद् ध्यानमुपपयते, जीवोप- योगरूपस्य भावमनसस्तत्रापि सद्भावात् । अब च-यथा पुत्रभिन्नोऽपि पुत्र कार्यकरणेन पुन उच्यते तथा भवोपग्राहिकर्मनिर्जरणरूपस्य व्यानकार्यस्य करणेन ध्यानत्वोपा- चाराद् ध्यानशब्दाभिरेयत्व सिद्धम् । अथ च-यथैकस्य नानार्थकशन्दस्य रहनोऽर्था भवन्ति, तथा यातूनामनेका- र्थत्वाद् ध्यैधातुनिष्पादितस्य ध्यानशब्दस्यापि समुच्छिन्नक्रियाख्य शुरुध्यानम- प्यर्थः । अपर च-उक्तशुक्र यानस्य यानत्वेन जिनागमप्रतिपावतया ध्यानत्वं निधिमित्यलम् ॥२३॥ मूलम्-जया जोगे निरुभित्ता, सेलेसि पडिवजह । तया कम्म खवित्ताण, सिद्धिं गच्छड नीरओ ॥२४॥ अथवा-द्रव्ययोगका अभाव होने पर भी भावयोगके सद्भावसे ध्यान होता है, क्योंकि जीवका उपयोगरूप भाव-मन उस अवस्थामें भी रहता है अथवा जैसे पुत्र न होकर भी यदि कोई पुत्रका कार्य करता है तो वह पुत्र कहलाता है, वैसे ही भवोपनाही कर्मोंकी निर्जरारूप व्यानका कार्य करनेसे उपचारसे वह ध्यान कहलाता है। अथवा जैसे नानार्थक शब्दके बहुतसे अर्थ होते है वैसे ही धातुओके भी अनेक अर्थ होते हैं, इसलिए यहाँ 'ध्यै' धातुसे बने हुए -यान शब्दका अर्थ समुचिनक्रियाऽप्रतिपाति-शुक्ल-ध्यान अर्थात अयोगी गुणस्थानवालोंकी क्रिया भी समझ लेना चाहिए। अथवा जिनागममें इसको ध्यान कहा है अत इसमे ध्यानत्व निर्वाध है ॥२३॥ અથવા દ્રવ્યોને અભાવ થયા છતા પણ ભાવગના સદૂભાવથી ધ્યાન હેય છે કારણ કે જીવના ઉપગરૂપ ભાવમન એ અવસ્થામાં પણ રહે છે અથવા જેમ પુત્ર ન હોવા છતાં જે કોઈ પુત્રનું કાર્ય કરે છે તે તે પુત્ર કહેવાય છે, તેમજ ભપગ્રહી કર્મોની નિર્જરારૂપ ધ્યાનનું કાર્ય કરવાથી ઉપચારે કરીને તે ધ્યાન કહેવાય છે અથવા જેમ વિવિધાર્થક શબ્દના ઘણાય અર્થો થાય છે તેમ ધાતુઓના પણ અનેક અર્થે થાય છે, અહી જે ધાતુથી બનેલા ધ્યાન શબ્દનો અર્થ સમુચ્છિન્નક્રિયાપ્રતિપાતિ–શુ-લ-ધ્યાન અર્થાત અગી ગુણસ્થાન વાળાઓની ક્રિયા પણ સમજી લેવી અથવા જિનગમમાં એને વાન તેથી એમા ધ્યાનત્વ નિબંધ છે (૨૩) .

- ३६० श्रीदनवैकालिकम्त्रे ननु सक्ष्मक्रियाऽनियाख्यस्य शायानस्य क्य ध्यानपदप्रतिपाधता?, ध्यान हि नाम मनःस्थैर्यम् , केलिन वदानी मनसोऽसचादिति चेन्न, स्थैर्यावस्थापन्नत्यमेव ध्यानत्वम् , तग यथा स्थिरीभावमापन्नस्य उग्रस्थीय- मनसस्तधेर केलिफाययोगस्यापि सुस्थिरतया सुपचम् । * नन्वेषमपि समुन्छिन्नक्रियाऽमतिपात्याग्यस्य शुभ यानस्य कय ध्यानस्त्वम् । तत्र काययोगस्याप्यमागद , इति चेदुन्यते-यथा कुम्भकारचक्र तभ्रामकदण्डा दिसम्पन्धाभावेऽपि मापालीनयेगतो भ्रमति तथा मनोवाकाययोगनिरोधेऽप्ययो गिनः प्राकृतध्यानधारावेगतो ध्यान सम्पद्यते । प्रश्न-हे गुरुमहाराज ! मनकी स्थिरताको ध्यान करते है । केवली भगवान के उस समय मन नहीं रहता, अतः सूक्ष्मक्रियाऽनिवर्ति शुक्ल ध्यान को ध्यान कैसे कहा जा सकता है। उत्तर-स्थिरता को ही ध्यान करते है। वह स्थिरता जैसे छद्मस्थके मनोयोगकी होती है वैसे ही केवलीके काययोगकी स्थिरता होती है इसलिए उसे ध्यान कहते हैं। प्रश्न-तो समुच्छिन्नक्रियाऽप्रतिपाति-शुक्ल-ध्यानको ध्यान कैसे कह सकते है ? क्योंकी चहा काययोगका भी अभाव है। उत्तर-जैसे कुभारका चाक, घुमानेवाले दण्ड आदिके सयोग न होनेपर भी पूर्वकालके वेगसे घूमता रहता है वैसे ही मन वचन काय का निरोध होजाने परभी पूर्व ध्यानकी धारा के वेगसे अयोगी केवलीके ध्यान होता है। પ્રશ્ન-હે ગુરૂ મહારાજ ! મનની સ્થિરતાને ધ્યાન કહે છે કેવળી ભગ વાનને એ સમયે મન રહેતું નથી એટલે સૂકમકિયાડનિવર્તિ શુકલ ધ્યાનને ધ્યાન કેવી રીતે કહી શકાય? ઉત્તર–સ્થિરતાને જ ધ્યાન કહે છે એ સ્થિરતા જેવી છઘસ્થના મને ગની હોય છે તેવીજ કેવળીના કાગની સ્થિરતા હોય છે, તેથી તેને ધ્યાન કહે છે પ્રશ્ન-તે સમુરિછત્રક્રિયા અપ્રતિપાતિ-શુકલ-ધ્યાનને ધ્યાન કેવી રીતે કહી શકાય? કારણ કે ત્યા કાગને પણ અભાવ છે ઉત્તર–જેમ કુભારને ચાકડે, તેને ઘુમાવનારા દડ આદિને સવેગ ન થવા છતા પણ પૂર્વકાળના વેગથી ઘુમ્યા કરે છે, તેમજ મન વચન કાયને નિરોધ થઈ ગયા પછી પણ પૂર્વ ધ્યાનની ધારાના વેગથી અગી કેવળને ધ્યાન હોય છે अययन ४ मा. २५-सिद्धानामूर्ध्वगतिस्वरुपम् ३६३ टीका-'जया कम्म' इत्यादि । यदा सर्वकर्मक्षय कृत्वा नीरजा सिद्धि गच्छति तदा लोकमस्तकस्थः सालोकोपरिस्थितः, शाश्वत. दग्धकर्मवीजत्वात्पुनः ससारससरणरहितो नित्यः, सिद्धाकृतकृत्यो भवतीति । ननु सिद्धाना सर्वकर्मक्षयात् बसनामकर्मणोऽप्यविद्यमानत्वेन कथ गति- सम्भवः ? इति चेदुच्यते- यथा धनुर्मुक्तस्य वाणस्य तद्विरहेऽपि पूर्वभयोगसामर्थ्यानतिर्भवति तथा ससारावस्थायामपवर्गप्राप्तये कृतानेकविधमणिधानवलान्मुक्तात्मनोऽपीति । ननु भवतु गति. किन्तु सा तिर्यगयस्ताद्वा न भूत्वो ब्रमेव भवतीति कथ- 'जया कम्म' इत्यादि । जब सब कोका क्षय करके निष्कर्म होकर मोक्षगमन करते हैं तय लोकके अग्रभाग पर स्थित, सब कर्मोंसे रहित होनेके कारण कभी ससारमें न आनेसे शाश्वत, सिद्ध होजाते हैं। प्रश्न-हे गुरुमहाराज ! सिद्धोंके समस्त कर्मोंका नाश होजाता है अत एव बस नाम कर्म भी नहीं रहता, फिर सिद्ध भगवान् लोकके अग्र- भाग तक किस प्रकार गमन कर सकते हैं। उत्तर-हे शिष्य जैसे धनुपसे छूटा हुआ याण धनुपका सम्बन्ध न होने पर भी गति करता है, क्योंकि उसमें पहलेके व्यापारका सामर्थ्य रहता है। वैसे ही ससार अवस्थामें मोक्ष प्राप्त करनेके लिए किये हुए अनेक प्रकारके अनुष्ठानके वेगसे मुक्तात्मा भी गमन करते हैं । प्रश्न-हे गुरुमहाराज ! गति तो होती है पर ऊर्च गति ही क्यों जया कम्म प्रत्याहि न्यारे सर्व मुर्भाना क्षय शने निभाने मोक्ष ગમન કરે છે, ત્યારે લોકના અગ્રભાગ પર સ્થિત, સર્વ કર્મોથી રહિત હોવાને કારણે કદાપિ સંસારમાં ન આવવાથી શાશ્વત સિદ્ધ થઈ જાય છે પ્રશ્ન–હે ગુરુ મહારાજ ! સિદ્ધોના બધા કર્મોને નાશ થઈ જાય છે, એટલે સનામ-કર્મ પણ રહેતું નથી, તે પછી સિદ્ધ ભગવાન લેકના અગ્રભાગ સુધી કે પ્રકારે ગમન કરી શકે છે? ઉત્તર–હે શિષ્ય જેવી રીતે ધનુષ્યથી ટેવ બાણ ધનુષ્યને સ બ ધ ન હોવા છતા ગતિ કરે છે, કારણ કે તેમાં પહેલાના વ્યાપારનું સામર્થ્ય રહેલું છે, તેવી રીતે સમાન અવસ્થામા મોક્ષ પ્રાપ્ત કરવાને માટે કરેલા અનેક પ્રકારના અનુષ્ઠાનના વેગથી મુતાત્મા પણ ગમન કરે છે પ્રશ્ન- હે ગુરૂ મહારાજ ! ગતિ તો હોય છે પણ ઊર્ધ્વ ગતિ જ કેમ श्रीदभवेकालिकमरे छाया-~यदा योगानिरुध्य, शैलेशी प्रतिपयते । वदा कर्म क्षपयित्वा, सिद्धिं गन्छति नीरजाः ॥२४॥ सान्वयार्थ:-जया जर जोगे योगोंका निमित्ता-निरोध करके सेलेसि शैलेशीकरणको पडियजा-माप्त करते है, तया-तत्र कम्मर्ममात्रको खवित्ता- खपा फरके नीरओ कर्मरजरदित-सब काँसे मुक्त होकर सिद्धि मोक्षको गच्छइ-नाते हैं ॥२४॥ टीका-'जया जोगे' इत्यादि । यदा योगनिरोध कृया शैलेशी प्रामोति तदा कर्म वेदनीयाऽऽयुर्नामगोताख्यमघातिकर्मचतुष्टयलक्षण क्षपवित्रा अय नीत्वा सर्वथा विनाश्येत्पर्थः 'ण'-मिति वास्यालद्वारे, नीरजा निर्गत रज सकलकर्म मल यस्मादिति, रजस =उक्तलक्षणानिधान्तो नानीरजासर्वकर्मोपाधिरहितः साधितात्मा प्रमुः सिदि-सियन्ति निष्ठितार्या भवन्ति यस्या सा सिद्धियुकि- लक्षणा वा गच्छवि भामोति, गत्यर्थधातूना प्राप्त्यर्थत्वात् ॥२४॥ मूलम्-जया कम्म खविताण, सिद्धिं गच्छह नीरओ। तया लोगमत्थयत्थो, सिद्धो हवइ सासओ ॥२५॥ छाया- यदा कर्म क्षपयित्वा, सिद्धिं गच्छति नीरजा' । तदा लोकमस्तकस्थः, सिद्धो भवति शाश्वत ॥२५|| सान्वयार्थ -जया जब कम्म कर्ममात्रको खवित्ता खपा करके नीरओम कमरजरहित होकर सिद्धि मोक्षको गच्छइ जाते है, तया तब लोगमत्थयत्यो- लोकके अग्रभाग पर स्थित सासओ-शाश्वत-नित्य सिद्धो सिद्ध हवइन होजाते हैं ॥२५॥ 'जया जोगे' इत्यादि । जब योगोंका निरोध करके शैलेशी अवस्थाको प्राप्त होते है तब वेदनीय, आयु, नाम और गोत्र, इन चार अधानि कर्मोका क्षय करके सर्व कर्मोसे मुक्त होकर भगवान् मोक्षको प्राप्त होते है ॥ २४॥ નવા નો ઈત્યાદિ જ્યારે એને નિરોધ કરીને શેલેશી અવસ્થાને પ્રાપ્ત થાય છે, ત્યારે વેદનીય, આયુ, નામ અને ગોત્ર એ ચાર કરીને સર્વ કર્મોથી મુક્ત થઇને ભગવાન મને પ્રાપ્ત થાય છે (૨૪) ७ 10 ६ . અઘાતી કર્મોને ક્ષય - अध्ययन ४ गा. २५-सिद्धानामूर्ध्वगतिस्वरूपम् जलोपरिमतिष्ठाना भवति तथाऽपविधकर्मलेपसमारभराक्रान्त आत्मा जगज्जलधौ निमज्जति, वद्विरहितचोर्चगतिधर्मत्वादूर्वमेव गच्छति । तथा चोक्त भगवता- ''जह मिउलेवालित, गरुय तुन अहो वयइ एव । आसवयफम्मगुरू, जीवा बच्चति अहरगइ ॥१॥ त चेव तन्चिमुक, जलोवरि ठाइ जायलहुभाव । जह वह कम्मविमुका, लोयग्गपइडिया होति ॥२॥” इति । १ छाया-" यथा मुल्लेपाऽऽलिप्त, गुरुक तुम्बमधो जत्येवम् । आश्रवकृतकर्मगुरवो, जीवा ब्रजन्ति अधरगतिम् ॥१॥ तदेव (तुम्ब) तद्विमुक्त (मूलेपविमुक्त), जलोपरि तिष्ठति जातलघुभावम् । यथा तथा कर्मविमुक्ता (सिद्धा.) लोकाग्रप्रतिष्ठिता भवन्ति ॥२॥" आजाती है। इसीप्रकार आठ कर्मरूपी लेपके भारसे भारी आत्मा ससाररूपी समुद्र में डूबी रहती है। जब कर्मरूपी लेपसे रहित होजाती है तर अर्ध्वगमनका स्वभाव होनेसे ऊर्ध्वगमन करती है। भगवानने कहाभी है- "जैसे मिट्टीके लेपसे लिप्त तुम्बी भारी होनेसे नीचेकी ओर जाती है वैसेही आस्रवसे उत्पन्न कर्मोंसे आत्मा अधोगतिको प्राप्त होती है ॥१॥ जैसे तुम्बी लेपसे मुक्त होनेपर लघु होकर जलके ऊपर आजाती है उसी प्रकार कर्मसे मुक्त होकर आत्मा लोकके अग्रभाग पर विराजमान हो जाती है ॥२॥" એ તુ બડી નીચેથી ઉઠીને જળની ઉપર આવી જાય છે એજ પ્રકારે આઠ કર્મ રૂપી લેપના ભારથી ભારે એ આત્મા સંસારરૂપી સમુદ્રમાં ડુબી રહે છે જ્યારે કર્મરૂપી લેપથી રહિત થઈ જાય છે ત્યારે ઊર્ધ્વગમનને સ્વભાવ હોવાથી ઊદ્ધ ગમન કરે છે ભગવાને કહ્યું પણ છે કે- જેમ માટીના લેપથી લિસ તુ બડી ભારે હોવાથી નીચેની બાજુએ જાય છે, તેમજ આસવથી ઉત્પન્ન થએલા કર્મોથી આત્મા અર્ધગતિને પ્રાપ્ત થાય છે (૧) જેમ તુ બડી લેપથી મુકત થતા લઘુ થઈને જલની ઉપર આવી જાય છે, તેમ કર્મથી મુક્ત થઈને આત્મા લોકના અગ્રભાગ પર વિરાજમાન થઈ જાય છે (૨)” .

३६४ श्रीदवेकासिकाचे मवसीयते ? इति चेन्यनाम्-तेपा गुरुत्यगुणाभानाधस्तात् , कायादियोगपर प्रेरणयोरमााच न तिर्यग्गतिनाति, यथा-नीरधामतिप्कामनुपहतां चाऽलावू कुशादितणेः परितः सवेष्टय तदु परि स्निग्धमृत्तिकया सान्द्र रिलिप्याऽऽतपे सशोपयेत्, इत्यमष्टवारानुक्तमक्रियया यथाक्रम तृणवेष्टन मूल्लेपन-सशोपणादीनि शिधायाऽगाधसलिले प्रक्षिप्ता साऽलाबू रएकत्वीदत्तमुल्लेपननितगौरवेणोर्षसलिलवलमतिक्रम्य तदधस्ताद् भूतलसलना भवति, तदनु मन्दमन्दमनुक्रमतस्तेष्वष्टवारविनिहितमूल्लेपेषु सातामुपगम्य विशी गेषु सत्सु मृत्तिकाले पजन्यभारराहित्येन रघुनामुपगता साऽलाएरधोभूतलमतिक्रम्य होती है? नीचेकी ओर अथवा तिरछी गति क्यों नहीं होती? उत्तर-हे शिष्य ! नीचेकी ओर उसीकी गति रोती है जिसमें गुरुत्व गुण (भारीपन) पाया जाता है । सिद्धोंमें गुरुत्व गुण नहीं है अत एव उनकी गति नीचेकी ओर नहीं होती। काय आदि योग और दुसरेकी प्रेरणा न होनेसे तिरछी गति भी नहीं होती। जैसे-छिद्ररहित बिलकुल सूखी हुई, विना टटी फूटी तुम्बीको चारों ओर तृणपुञ्जसे वाध करके धूपमें सुखा ले, आठ वार ऐसा करके अगाध जलमें तुम्बीको डाल दे तो आठवारके लेपके भारीपनसे जलके तलमें पहुँचकर वह पृथ्वीसे लग जाती है। उसके पश्चात् गीलेपनसे जब धीरे-धीरे वह मिट्टीका लेप छूटने लगता तो क्रमश मिट्टी के भारसे रहित होकर लघुता (हलकापन) पाकर वह तुम्बी नीचेसे उठकर जलके ऊपर થાય છે? નીચેની બાજુએ અથવા તિછી ગતિ કેમ નથી થતી? ઉત્તર–હે શિષ્ય! નીચેની બાજુએ તેની ગતિ થાય છે કે જેમાં ગુરૂવ ગુણ (ભારેપણુ ) હેાય છે સિદ્ધોમાં ગુરૂત્વ ગુણ નથી, તેથી તેમની ગતિ નીચેની બાજુએ નથી થતી કાય આદિ વેગ અને બીજાની પ્રેરણા ન હોવાથી તિથી ગતિ પણ થતી નથી જેમ છિદ્રરહિત, બિલકુલ સુકાયલી, તૂટયા કુટયા વિનાની તુંબડીને ચારે બાજુએ ઘાસ-તરણથી બાધીને તેની ઉપર ચીકણી માટીને સારી પેઠે લેપ કરીને તડકામાં સૂકવી નાખે, અઠ વાર એમ કરીને અગાધ જળમા એ અબડીને નાખી દે તે આઠ વારના લેપના ભારે પણાથી જળને તળીયે પહોચીને તે પૃથ્વીને અડીને રહે છે પછી જ્યારે લીલાપણાથી ધીરે ધીરે એ માટીને લેપ છૂટવા લાગે છે ત્યારે ક્રમશ માટીના ભારથી રહિત થઈને લઘુતા (હલકાપણુ) પામીને .

-- अध्ययन ४ गा. २५-सिद्धानामवगाहनास्वरूपम् ३६७ उक्तस्वरूपा' सिद्धाधरमशरीरतस्तृतीयमागन्यूना उत्कृष्टतो द्वात्रिंशदङ्गल- समधिकरयस्त्रिंशदुत्तरशतत्रयधनुःपरिमिताः, जघन्यतोऽष्टागुलाधिकरविप्रमाणाः । यच मरुदेवीदेइममाणस्य सपादपञ्चशतधनुष्ट्वात्तत्तृतीयभागे पातिते तस्याः साईत्रिशतधनुःपरिमिताऽवगाहना भवति तेनात्र न विरोधः, गजाधिरूढत्वेन वृद्धत्वेन वा शरीरसकोचसम्भवात् । यत्तु जघन्यतः सप्तहस्तोन्डिताना सिद्धिः शास्त्रेषु श्रूयते तत्तीर्थकरापेक्षया, सिद्धोंके चरम शरीरसे त्रिभाग कम, उत्कृष्ट तीनसौ तेंतीस (३३३) धनुष और बत्तीस (३२) अगुलकी, तथा जघन्य एकरत्नि और आठ अगुलकी अवगाहना होती है। मरुदेवीके शरीरकी अवगाहना सवा पाँचसौ (५२५) धनुपकी थी, उसमेंसे तीसरा हिस्सा कम करनेसे साढे तीनसौ (३५०) धनुपकी अवगाहना होती है, किन्तु यहाँ पर उत्कृष्ट अवगाहना तीनमौ तेतीस धनुप और बत्तीस अगुलकी बताई गई है, इससे यहा विरोध नहीं सम- झना चाहिए, क्योंकि मरुदेवी हाथी पर आरूढ थी, इसलिए या वृद्धा- वस्थाके कारण शरीरका सिकुडना (सकुचित होना) सभव है। यह जो आगममें सुना जाता है कि जघन्य सात हाथ ऊचे शरीर- वालोंको मोक्ष प्राप्त होता है सो यह नियम तीर्थंकरोंकी अपेक्षासे समझना चाहिए। तीर्थंकरोंके सिवाय अन्य भव्य जीव दो हाथ ऊँचे સિદ્ધોના ચરમ શીરથી ત્રિભાગ ઓછી, ઉત્કૃષ્ટ ત્રણસો તેત્રીસ (૩૩૩) ધનુષ અને બત્રીસ (૩ર) આગળની તથા જઘન્ય એક નિ અને આઠ આગળની અવગાહના હોય છે મરૂદેવીના શરીરની અવગાહના સવા પાસે (૫૨૫) ધનુષ્યની હતી, તેમાથી ત્રીજો ભાગ ઓછો કરવાથી સાડા ત્રણ (૩૫૦) ધનુષ્યની અવગાહના હે છે કિન્તુ અહીં ઉત્કૃષ્ટ અવગાહના ત્રણસને તેત્રીસ ધનુષ અને બત્રીસ આગળની બતાવી છે, તેથી વિરોધ સમજે નહિ, કારણ કે મરૂદેવી હાથી પર આરૂઢ હતી તેને લીધે યા વૃદ્ધાવસ્થાને કારણે શરીરનું સંકુચિત થવું એ સભવિત છે આગમમાં જે સભળાય છે –જઘન્ય સાત હાથ ઉચા શરીરવાળાઓને જ મોક્ષ પ્રાપ્ત થાય છે તે નિયમ તીર્થકરની અપેક્ષાએ સમજે જોઈએ તીર્થ કરે સિવાયના બીજા ભવ્ય છે બે હાથ ઉચા શરીરવાળા હવા છતા પણ મુક્ત , भीश्वकालिकमले अथवा-यथा पातादिस्पाधारिरहादूर्भगविस्वमायाः प्रदीपकलिकाया', चीनबन्धविन्दादीनशगतेरण्डवीजस्य चोर्धगतिः सजायते तथाऽस्मनोऽपि ताशगतिसमारस्य विरोधियर्मनन्धविच्छेदागतिरेवेति । यथैरण्डवीजमू गत्वा पुनःपतति क्या तु न मुक्ताम्मनः पातसम्भवः, अपः पतनहेतुभूतगुरुत्वगुणाभागदिति मागुक्तमेर । ननु शरीराभागनेपामात्मप्रदेशाः पारदद्रव्ययत् कय न विकीर्गा भवन्तीति चेन्न, तद्विसर्पकनामांमारात्मदेशाचगुणसद्वाराच । अथवा-जैसे हवा आदि किसी पाधकके न रोनेसे दीपककी लो ऊपरको जाती है, पीजकोपके बन्धके टटनेपर एरण्डका बीज ऊपरको जाता है, उसी प्रकार आत्माके ऊर्ध्वगमनके विरोधी कर्मयन्धका सर्वथा अभाव होजानेसे आत्मा ऊर्ध्वगति करती है। जैसे एरण्डका वीज पहले ऊपरको जाकर फिर नीचे गिर पड़ता है वैसे आत्मा नहीं गिर सकती, क्योंकि नीचे गिरानेका कारण गुरुत्वगुण आत्मामें नही है, यह पहले ही कर चुके हैं। प्रश्न-हे गुरुमहाराज । शरीरका अभाव होनेसे सिद्धोंके आत्माके प्रदेश पारेके समान फैल क्यों नहीं जाते। उत्तर-हे शिष्य । आत्मप्रदेशोंको फैलानेवाले नामकर्मका अभाव होनेसे तथा प्रदेशवत्व गुणके सद्भावसे सिद्धोंके आत्मप्रदेश नहीं फैलते हैं। जय छ, અભાવ થઈ જવાથી અથવા, જેમ હવા આદિ કઈ બાધક ન હોવાથી દીપકની ત ઉપર જ જાય છે, બીજકોષને બધ તૂટવાથી એરડાનુ બીજ ઉપર તેમ આત્માના ઊધ્વગમનના વિરોધી કર્મ નો સર્વથા આત્મા ઊર્ધ્વગતિ જ કરે છે જેમ એર ડાનું બીજ પહેલા ઉપર જઈને પછી નીચે પડી જાય છે, તેમ આત્મા પડી શકતો નથી કારણ કે નીચે પાડવાનું કારણ ગુરૂવ ગુણ નથી એ પહેલા કહેવામાં આવેલું જ છે પ્રશ્ન–હે ગુરુ મહારાજ ! શરીરને અભાવ હોવાથી સિદ્ધોના આત્માના પ્રદેશે પારાની પેઠે ફેલાઈ કેમ જતા નથી ? ઉત્તર–હે શિષ્ય ! આત્મપ્રદેશને ફેલાવનારા નામકર્મને અભાવ હોવાથી તથા પ્રદેશવત્વ ગુણને સદભાવ હેવાથી સિદ્ધોના આત્મપ્રદેશ ફેલાતા નથી, માત્મામાં अध्ययन ४ गा. २६-सुगतेदीलभ्यम् छाया-मुखास्वादकस्य श्रमणस्य, शाताकुलकस्य निकामशायिनः । उत्सालनामधौतस्य, दुर्लभा सुगतिस्तादृशकस्य ॥२६॥ मुगति की दुर्लभता बतलाते हैं- सान्वयार्थ:-सुहसायगस्स-मुखकी आसक्ति रखनेवाले सायाउलगस्स- मुखके लिए व्याकुल रहनेवाले निगामसाइस्स-मर्यादासे अधिक सोनेवाले उच्छोलणापहोयस्स-शरीरकी विभूपा करनेवाले तारिसगस्स-ऐसे समण- स्सम्साधुको सुगई-मुगति दुल्ला दुर्लभ है ॥२६॥ टीका-मुखास्वादकस्य-मुखस्य-माप्तमनोरमशब्दागुपभोगस्य आस्वादका आसक्या ग्राहकस्तस्य, शाताकुलकस्य-शातार्थम्=मुखार्थम् आकुलका व्यग्रः उद्विग्नो वा तस्य, निकामशायिनः निकामम् अतिशयित मध्यवत्तियामद्वयादधिक रात्री, निष्कारण दिवसे वा शेते स्वपिति तच्छीलो निकामशायी-सुनार्थमन नादिसमयमुल्लङ्घन्य शयानस्तस्य, उत्क्षालनामधौतस्य-उत्सालनया पक्षालनया म-प्रकर्षार्थ-विभूषार्थ धौतानि-उज्ज्वलीकृतानि नयन-बदन-नख-पर-चरण- वस्त्रादीनि येन स तस्य शरीरादिविभूपाकारिण इत्यर्थः । तादृशकस्य तीर्थकरा- ऽऽज्ञाऽनाराधकस्य, श्रमणस्य श्रमणब्रुवस्य वेशमात्रेण साधोः सुगतिः-सिद्धि- लक्षणा गतिः दुर्लभा दुप्पापा 'भवती'-ति शेषः । प्राप्त हुए मनोज शब्दादि उपभोगोंको आसक्तिपूर्वक ग्रहण करने- वाले, सुखप्राप्ति के लिए व्याकुल रहनेवाले, दो मय प्रहरोंसे अधिक रात्रिमें, या कारणविशेप विना दिनमें अर्थात् सूत्रार्थके मनन करनेके समयका उल्लघन होने तक सोनेवाले, तथा विभूपाके लिए आँख, मुख, नख, हाथ पैर, वस्त्र आदिको धोनेवाले अर्थात् शरीरको विभूपित करने- वाले, अत' तीर्थकरकी आज्ञाके विराधक, ऐसे श्रमणको सिद्धिगतिकी प्राप्ति दुर्लभ है। પ્રાપ્ત થએલા મનેz શબ્દાદિ ઉપભેગોને આસકિતપૂર્વક ગ્રહણ કરનારા, સુખપ્રાપ્તિ માટે વ્યાકુળ રહેનારા, બે મધ્ય પહેરેથી વધુ રાત્રિમાં વિશેષ વિના દિવસમાં અર્થત સ્વાર્થનું મનન કરવાના સમયનું ઉદલ ઘન ત્યા સુધી સૂનારા તથા વિભૂષા (ભા) ને માટે આખ, મુખ, વસ્ત્ર આદિને ધનાર અર્થાત્ શરીરને વિભૂષિત કરનારા એટલે કે તીર્થંકરની આજ્ઞાન વિરાધક, એવા શ્રમણને સિદ્ધિગતિની પ્રાપ્તિ દુર્લભ છે या भरण- થાય નમ હાથ પગ ३६८ श्रीदवेकानिकम ૨ ७ ५ अन्ये तु विहस्तोच्छिता अपि मि यन्ति, तदपेक्षया हि प्रोत्तस्वरूपा जघन्याऽवगा हनाडासेया। एपमुक्तस्वरूपो जन्म जरा-मरणा-ऽऽधि-व्यापिगधापटलीकलङ्कलीमावगर्भ निवासत्राससन्ततिरिनिष्फ्रान्तः शाश्वतः सिदो मातीत्यर्थः। 'शाचत' पदेन चात्र "सम्माप्तसिद्धिपदोत्मा न पुनः ससारित्वमयानोति हेतोरभावात्, न च कारण मन्तरेण कार्योत्पत्तिर्जायते" इति योधितम् ॥२०॥ उक्त मुगतिरूप धर्मफल, सम्पति तत् यस्य दुर्लभ भाती?-विदर्भयति-'सुह सायगस्स.' इत्यादि। मूलम्-सुहसायगस्स समणस्स, सायाउलगस्स निगामसाइस्स। उच्छोलणापहोयस्स, दुल्लहा सुगई तारिसगस्स ॥२६॥ शरीरवाले होनेपर भी मुक्त होजाते हैं। उनकी अपेक्षासे ही सिद्धोंकी जघन्य अवगाहना एक रत्नि और आठ अगुलकी कही गई है। ऐसे सिद्ध जन्म-जरा-मरण, आधि, व्याधि, बाधा, कलङ्कलीभाव (ससारपरिधमण), गर्भवासके दु.खोंसे रहित शाश्वत सिद्ध रोजाते है। यहाँ 'शाश्वत'पदसे यह योधित किया है कि सिद्धि पदको प्राप्त आत्मा फिर ससारी अवस्थाको प्राप्त नहीं होती है, क्योंकि ससारमें आनेके कारणभूत कर्मोंका अभाव है। कारणके विना कार्यकी उत्पति नही होती ॥२५॥ यहाँ तक धर्मका सुगतिरूप फल कहा, यह फल किसे दुर्लभ होता है सो दिखाते है-'सुहसायगस्स' इत्यादि । થઈ જાય છે. એમની અપેક્ષાએ જ સિદ્ધોની જઘન્ય અવગાહના એક પત્નિ અને આઠ આગળની કહેવામાં આવી છે मेवा सिa wri-०४२-भरए, माधि-व्याधि, माधा, sa seीमा (ससार- પરિભ્રમણ, ગર્ભવાસના દુખોથી રહિત શાશ્વત સિદ્ધ થઈ શાશ્વત” શબ્દથી એમ બોધિત કરવામાં આવ્યું છે કે સિદ્ધિપદને પ્રાપ્ત થયો આત્મા ફરી સાસરી અવસ્થાને પ્રાપ્ત થતી નથી, કારણ કે કારણભૂત કર્મોને અભાવ છે કારણ વિના કાર્યની ઉત્પત્તિ થતી નથી (૨૫) અહીં સુધી ધર્મનું સુગતિરૂપ ફળ કહ્યું, એ ફળ કેને દુર્લભ થાય शविछे-सुहसायगस्स या જાય છે. અહીં સંસારમાં આવવાના अन्ययन ४ गा. २९-उपसहार: ३७३ शीघ्रम् अमरभवनम्न म्रियन्त इत्यमरा'-सिद्धा आयुपोऽभावात्, तेपा भवनम् आलयः सत्ता वा तत् सिद्धक्षेत्र सिद्धस्वरूप वेत्यर्थः । यद्वा न म्रियते यत्र तद- मरम्-अविनाशि तच्च तद् भवन स्थान तत् सिद्धपदमित्यर्थः । अथवा न म्रियन्ते अकालमृत्युना इत्यमरा-देवास्तेपा भवन तत् स्वर्गलोकमित्यर्थः । बहुवचन चोभ- यार्थद्योतनार्थम् , गच्छन्ति यान्ति ॥२८॥ उपसहारमाह-'इच्चेय' इत्यादि। मूलम् इच्चेय छज्जीवणिय, सम्मदिट्टी सया जए। दुल्लह लहित्तु सामन्नं, कम्मुणा न विराहिज्जासि-त्तिवेमि ॥२९॥ छाया-इत्येत पड्जीवनिकाय, सम्यग्दृष्टिः सदा यतः। दुर्लभ लकवा श्रामण्य, कर्मणा न विराधयेत् ॥२९॥ इति ब्रवीमि । १ ૨ 8 ४ ५ ૧૨ उपसहार करते हैं- - सान्वयार्थ -सम्मद्दिट्ठी सम्यक्त्वी मनुष्य सया सदैव जएभ्यतनावान् होकर दुल्लह दुर्लभ ऐसे सामन्न=साधुपनेको लहितु-माप्त करके इचेय-इस पूर्वोक्त स्वरूपवाले उज्जीवणिय-पड्जीवनिकाय-छह प्रकारके जीवसमूह-की कम्मुणा मन वचन कायके व्यापारसे न विराहिज्जासि-विराधना न करे, त्तिवेमि श्रीसुधर्मा स्वामी जम्यूस्वामीसे कहते हैं कि मैंने भगवान् महावीर स्वामीसे जैसा सुना है वैसा ही तुमसे कहता हूँ ॥२९॥ ॥ इति चतुर्थाध्ययनस्य शब्दार्थ ॥४॥ समान फिर मयमको ग्रहण करके शीघ्रही अमरभवन-(सिद्धिस्थान अथवा स्वर्गलोक) को प्राप्त होते हैं। 'अमरभवन' के दो अर्थ होते है-(१) जहा मृत्यु नहीं होती ऐसा स्थान मोक्ष है, क्योंकि वहा आयुकर्मका सर्वथा अभाव है, और (२) अमरभवन स्वर्गलोकको भी कहते हैं, क्योंकि स्वर्गलोकमें अकाल मृत्यु नहीं होती ॥२८॥ उपसहार करते हैं-'इच्चेय' इत्यादि। આદ્રકુમાર, પુડરીડ આદિની પેઠે ફરી સયમને ગ્રહણ કરીને શીત અમરભવન (સિદ્ધસ્થાન અથવા સ્વર્ગલક) ને પ્રાપ્ત થાય છે અમરભવનના બે અર્થ થાય છે (૧) જ્યા મૃત્યુ હતુ નથી એવું સ્થાન મેક્ષ છે, કારણ કે ત્યા આયુકર્મને સર્વથા અભાવ હોય છે અને (૨) અમર ભવન સ્વલેકિને પણ કહે છે, કારણ કે સ્વર્ગલેકમાં અકાલમૃત્યુ થતુ નથી (૨૮) S५ २ ४२ -इच्चेय. त्यादि १. १२ . 3 ८ ७ - श्रीदनकालिमा चारित्रस्य महाचमाद-'पारिते' इत्यादि । मूलम्-पच्छावि ते पयाया, खिप्पं गच्छति अमरभरणा । जेसि पिओ तयो संजमो य खती य वंभर च ॥२८॥ छाया-पथादपि ते मयाता, शिम गच्छन्त्यमरमवनानि । येपा मिय तपः सयमत्र, शान्तिश्च ब्रह्मचर्य च ॥२८॥ चारित्र का महच बतलाते है- सान्वयार्य:-जेसिंमिनको तवोतपस्या सजमोम्मयम य और खती क्षमा यम्-तथा पभचेर ब्रह्मचर्य पिओ प्रिय है,ते ये पच्छाविपचाभी अर्थात् एकवार चारित्र खण्डित हो जानेपर पापस, अथवा वृद्धावस्थामें भी पयाया=आये हुए अर्थात् चढते परिणामोंसे सयम स्वीकार कियेहुए खिप्प-शीघ्र अमरभव णाइस्वर्ग अथवा अपर्ग-मोक्ष कोभी गच्छन्तिम्माप्त हो जाते है ||२८|| टीका-येपा (श्रमणाना) तपः अनशनादि द्वादशविधम् , सयमा सावय व्यापारविरविलक्षणः समदविधः, क्षान्तिा अमर्पोत्पादकाऽऽक्षेपवचनादिसहन स्वरूपा, ब्रह्मचर्य-विपयसेवनपरिहारलक्षणम् , चकाराः समुच्चयार्थाः, मियम्- अभीष्ट रुचिरमित्यर्थ , ते (श्रमणा') पश्चादपि चारित्रखण्डनानन्तरमपि वृद्धत्वेऽपि वा मयाता.अद्धभावेन गृहीतसयमाः सन्त आर्दकुमार-पुण्डरीकादिवत् , तिम- चारित्रका महत्व दिखाते हैं-'पच्छावि ते-' इत्यादि। जिन श्रमणोंको अनशन आदि बारह प्रकारका तप, सावा व्यापारका त्यागरूप सत्रह प्रकारका सयम, क्रोधजनक आक्षेपपूर्ण वचनोंका सहन करनारूप क्षान्ति, सर्वधा मैथुनका परित्याग, ये प्रिय होते हैं, वे कदाचित् मोहकर्मके उदयसे खण्डित-चारित्र होकर भी, अथवा वृद्ध होनेपर भी चढते परिणामोसे आर्द्रकुमार, पुण्डरीक आदिके यारिननु ममताछ- पच्छावि ते. या જે પ્રમાણેને અનશન આદિ બાર પ્રકારને તપ, સાવવ વ્યાપારના ત્યાગરૂપ સત્તર પ્રકારને સયમ, ફોધજનક આક્ષેપૂર્ણ વચનેને સર્વચા મિથુનને પરિત્યાગ, એ પ્રિય હોય છે, તેઓ કદાચિત કર્મના ઉદયથી ખડિતચારિત્ર થઈને પણ અથવા वृक्ष डा। ચડતા પરિણામેથી , સહન કરવારૂપ ક્ષાતિ, ५ ७ ८ . २ 3 ४ ५ ८ ૧૨ अध्ययन ४ गा. २९-उपसहार: ३७३ शीघ्रम् अमरभवनम्न म्रियन्त इत्यमरा' सिद्धा आयुपोऽभावान्, तेपा भवनम् आलयः सत्ता वा तत् सिद्धक्षेत्र सिद्धस्वरूप वेत्यर्थः । यद्वा न म्रियते यत्र तद- मरम्-अविनाशि तच्च तद् भवन स्थान तत् सिद्धपदमित्यर्थः । अथवा न म्रियन्ते अकालमृत्युना इत्यमरा:=देवास्तेपा भवन तत् स्वर्गलोकमित्यर्थः। बहुवचन चोभ- यार्थयोतनार्थम्, गच्छन्ति यान्ति ॥२८॥ उपसहारमाह-'इच्चेय' इत्यादि। मूलम् इञ्चेयं छज्जीवणिय, सम्मदिट्टी सया जए । दुल्लह लहित्तु सामन्नं, कम्मुणा न विराहिज्जासि-त्तिवेमि ॥२९॥ छाया-इत्येत पड्जीवनिकाय, सम्यग्दृष्टिः सदा यतः। दुर्लभ ल वा श्रामण्य, कर्मणा न विराधयेत् ॥२९॥ इति ब्रवीमि । उपसहार करते हैं- सान्चयार्थः-सम्मद्दिट्टी-सम्यक्त्वी मनुष्य सया सदैव जए यतनावान् होकर दुल्लह टुर्लभ ऐसे सामन्न=साधुपनेको लहितु-माप्त करके इचेय इस पूर्वोक्त स्वरूपवाले छज्जीवणिय-पड्जीवनिकाय-उह प्रमारके जीवसमूह-की कम्मुणा मन वचन कायके व्यापारसे न विराहिज्जासि-विराधना न करे, त्तिवेमि-श्रीसुधर्मा स्वामी जम्यूस्वामीसे कहते हैं कि मैने भगवान् महावीर स्वामीसे जैसा सुना है वैसा ही तुमसे कहता हूँ ॥२९॥ ॥ इति चतुर्थाध्ययनस्य शब्दार्थ ॥४॥ समान फिर मयमको ग्रहण करके शीघ्रही अमरभवन-(सिद्धिस्थान अथवा स्वर्गलोक) को प्राप्त होते हैं। 'अमरभवन' के दो अर्थ होते है-(१) जहा मृत्यु नहीं होती ऐसा स्थान मोक्ष है, क्योंकि वहा आयुकर्मका सर्वथा अभाव है, और (२) अमरभवन स्वर्गलोकको भी कहते हैं, क्योंकि स्वर्गलोकमें अकाल मृत्यु नही होती ॥२८॥ उपसंहार करते हैं-'इच्चेय' इत्यादि । અદ્રકુમાર, પુડરીક અદિની પેઠે ફરી સયમને ગ્રહણ કરીને શીટ (સિદ્ધસ્થાન અથવા સ્વર્ગલક) ને પ્રાપ્ત થાય છે અમરભવન'ના બે અર્થ થાય છે (૧) જ્યાં મૃત્યુ હોતુ નથી એવું સ્થાન મેક્ષ છે, કારણ કે ત્યા આયુકમને સર્વથા અભાવ હોય છે અને () અમર ભવન સ્વગલેકને પણ કહે છે, કારણ કે સ્વર્ગલેકમાં અકાલમૃત્યુ થતુ નથી (૨૮) SA२ ४२ छ-इच्चेय. त्यादि , અમરભવન .

३७४ श्रीदवकालिकमूत्रे टीका-सम्यग्दष्टि सम्पय-ययाऽस्थितनाविपर्यस्ता दृष्टितचरुचिर मिमायो पा यस्य स तथोक्तः, सम्यग्दर्शनपानित्यर्थः, सदा-नित्य यता यवना वान् दुर्लभ दुप्पाप, श्रामण्य-श्रमणमा ध्या-मम्माप्य इत्यैतम्-उक्तलक्षणम्, पड्नीनिकाय फर्मणाम्मनोपायल्यापारेण न विराधयेत् देशतः सर्वतो वा न प्रमर्दयेत् न पीडयेदित्पर्यः । 'इति प्रीमी'-ति भाग्यम् ।।२९।। इति श्री विश्वविख्यात-जगदल्लम-प्रसिद्धवाचक-पञ्चदशमापा-कलित-ललित- फलापाऽऽलापक-परिशुद्ध-गध-पघ नैग्रिन्यनिर्मापर-मादिमानमर्दक- शाहूनपत्ति-कोल्हापुररान मदत्त-जैनशास्त्राचार्य-पद-भूपित- कोल्हापुरराजगुरु पालनह्मचारि-जैनाचार्य-जैनधर्मदिवाकर- पूज्य-श्रीघासीलालपतिविरचिताया श्रीदशकालिकर- स्याऽऽचारमणिमपाख्याया व्याख्याया चतुर्थ 'पजीवनिकाया'-ऽऽख्यमध्ययन समाप्तम् ।। ४ ।। तत्वोंके यथार्थ स्वरूपका श्रद्धान करनेवाला सम्यग्दृष्टि जीव दुर्लभ श्रमणताको प्राप्त करके सदैव पहले कहे हुए स्वरूपवाले पडजीवनिकायकी मन वचन कायसे एकदेश या सर्वदेशसे कभी भी विराधना न करे- पीडा न पहुँचावे ॥ श्रीसुधर्मास्वामी जम्बूस्वामीसे कहते है-हे जम्बू ! अन्तिम तीर्थकर भगवान महावीरसे जैसा मैने सुना है वैसा ही तुझे कहा है-इत्यादि पहले के समान समझ लेना ॥२९॥ इति "पड्जीवनिकाया"-नामक चौथा अध्ययनका हिन्दीभाषानुवाद समाप्त ॥४॥ વચન ન ઉપજાવે તને યથાર્થ સ્વરૂપનું શ્રદ્ધાન કરવાવાળે સમ્યગ્દષ્ટિ જીવ દુર્લભ શ્રમણ તને પ્રાપ્ત કરીને સદેવ પહેલા કહેલા સ્વરૂપવાળા જીવનિકાયની મન કાયાથી એકદેશ યા સર્વદેશ કરીને કદાપિ વિરાધના કરે પીડા શ્રીસુધર્માસ્વામી જબૂસ્વામીને કહે છે-હે જ બૂ! અતિમ તીર્થકર ભગવાન મહાવીર પાસેથી જેવુ કે સાંભળ્યું છે તેવું જ તને કહ્યું છે ઈત્યાદિ પહેલાની પેઠે सम यु (२८) અતિ પછવનિકાયા” નામક ચોથા અધ્યયનનું ગુજરાતીભાવાનુવાદ સમાસ (૪) अध्ययन ५ अन्ययनोपक्रमः ३७५ , . अथ पञ्चमाध्ययनम् । गत चतुर्था ययनम् , तत्र च पद्जीवनिकायरक्षणलक्षणो भिक्षोराचारः पतिपा- दितः, स हि शरीरस्थित्यधीनपालनमः, शरीर चाक्षम्रक्षणमन्तरेण शक्टमित्र इङ्गाल विना पाप्पयन्त्रमिव जठरानलतापव्याधियाधोपशमनोपधीभूतमाहारमन्तरेण चनिनुमक्षममतोऽस्मिन् पञ्चमाध्ययने 'सयमिना कढा, कस्मात् , केन विधिना, कीदृगाहारो ग्रहीतन्यः" इति सविस्तर प्रतिपादयितुमुपक्रमते- यद्वा-चतुर्थाध्ययने मूलगुणाः सन्दर्शिताः, इह तु मूलगुणपोपकोत्तरगुणा- पांचवां अध्ययन। चौथे अध्ययनमें पड्जीवनिकायकी रक्षा-रूप भिक्षुका आचार प्रतिपादित किया गया है। इस आचारका पालन शरीरकी स्थिति पर निर्भर है। जैसे विना आंगन (वागण) के गाडी नहीं चल सकती, विना कोयलेके रेलगाडी नहीं चल सकती, उसी प्रकार जठराग्निके सताप रूप व्याधिकी बाधाको शान्त करनेके लिए औपपिके समान आहारको ग्रहण किये बिना शरीरकी स्थिति नहीं रह सकती। इसलिए पाचवें अध्ययनमें विस्तारसे यह प्रतिपादन करते हैं कि 'सयमीको कर, किससे, किस विविसे, और किस प्रकारका आहार ग्रहण करना चाहिये। अथवा-चौथे अध्ययनमें मृल गुणोंका वर्णन किया गया है, इस अध्ययनमें मूलगुणोको पुष्ट करनेवाले उत्तर गुणोंमेंसे पिण्डैपणाका પાચમું અધ્યયન ચોથા અધ્યયનમા વડૂજીવનિકાયની રક્ષારૂપ ભિભુને આચાર પ્રતિપાદિત કરવામાં આવે છે આ આચારનું પાલન શરીરની સ્થિતિ પર નિર્ભર છે જેમ ઉ જણ વિના ગાડુ ચાલી શકતું નથી અને કેટલા વિના રેલગાડી ચાલી શકતી નથી તેમ જઠરાગ્નિના સતાપ વ્યાધીની બધાને કર્યા વિના શરીરની સ્થિતિ રહી શકતી નથી તે માટે પાચમા અધ્યયનમા વિસ્તારથી એ પ્રતિપાદન કરવામા આવ્યુ છે કે “સ યમીએ કયારે, કેની પાસેથી, કેવી વિધિથી અને નવા પ્રકારનો આહાર ગ્રહણ કરે ઈએ? અથવા-ચોથા અધ્યયનમાં મૂળ ગુણેનું વર્ણન કરવામાં આવ્યું છે, આ અધ્ય યનમાં મૂળ ગુણોને પુષ્ટ કરનારા ઉત્તર ગુણેમાથી પિંડેષણનું કથન કરવામા આવે છે ૩૫ શાન્ત ३७६ গম্বান্দিকদম न्तर्गता पिण्डैपणाऽभिधीयते । पिटयणा पिण्डम्य-समयमापया प्रसिदस्यान्न पानस्यैपणारूपा, तत्र पिण्डन पिण्ड'=पय गमुन्तिरारूपदार्थसमुद्रायः, सद्विविध'- द्रव्यपिण्डो भारपिण्डस, तत्र क्षुधाविघातकत्येनाशनादिरूपोद्रव्यपिण्डः, कर्मविघात- फत्वेन मानादिलक्षणः प्रशस्तमारपिण्डः, अप्रशस्तभापिण्डस्वसयमादिरूपः मकृतानुपयोगित्वादुपेक्षितःद्रव्यपिण्डो हिमशस्तभारपिण्डपरिपोषकस्त विना तस्या सम्पावत्वात् , तथाहि-शानापात्मरमशस्तमारपिण्डस्याराधना शरीरम्थित्यधीना, शरीरपरिस्थितिशाहार विना न ययात्साधनायालम्, आहारादिरश्च व्यपिण्ड एवेति सिद्ध द्रव्यपिण्डस्य मरास्तभारपिण्डपरिपोषकत्वम् । तस्य च सावपनिरवा कथन करते है। पिण्ड' शास्त्रीय भाषामें अन्न-पान नामसे प्रसिद्ध है, उसकी एपणा करना 'पिण्डेपणा' है। एक स्थानपर यहत पदार्थोंका समुदाय होना पिण्ड कहलाता है। पिण्ड दो प्रकारका है-(१) द्रव्यपिण्ड और (२) भावपिण्ड अशन आदिको द्रव्यपिण्ड करते हैं, क्योंकि उससे क्षुधाका नाश होता है। ज्ञानादि प्रशस्त-भावपिण्ड है, क्योंकि वह कर्मोंका नाश करनेवाला है, अप्रशस्त-भावपिण्ड असयमादिरूप है, उसका यहाँ अधिकार नहीं है। द्रव्यपिण्ड, प्रशस्त-भावपिण्डका पोषक है, क्योंकि उसके विना प्रशस्त-भावपिण्डकी प्राप्ति नही होसकती, अर्थात् ज्ञानादिरूप प्रशस्त-भावपिण्डकी आराधना शरीरकी स्थितिके और शरीरकी स्थिति आहारके विना नहीं होसकती । आहार आदि द्रव्यपिण्ड ही है। इससे यह सिद्ध हुआ कि द्रव्यपिण्ड प्रशस्त भाव પિંડ” શબ્દ શાસ્ત્રીય-ભાષામાં અન્નપાનના નામે ઓળખાય છે, તેની એષણા કરવી એ પિંડેપણ કહેવાય છેએક સ્થાન પર પદાર્થોને સમુદાય હવે એ પિંડ' કહેવાય છે પિંડ બે પ્રકારના હોય છે, (૧) વ્ય-પિંડ અને (૨) ભાવપિંડ અશન આદિને વ્યપિંડ કહે છે કારણ કે તેથી શુધને નાશ થાય છે જ્ઞાનાદિ એ પ્રશત-ભાવપિંડ છે, કારણ કે તે કર્મોનો નાશ અપ્રશરત–ભાવપિંડ અસયમાદિરૂપ છે, એને અહી અધિકાર નથી દ્ર યપિડ એ પ્રશસ્ત-ભાવપિંડને પિષક છે કારણ કે તેના વિના પ્રરાસ્ત- ભાડની પ્રાપ્તિ થઈ શકતી નથી અર્થાત્ જ્ઞાનાદિ–રૂપ પ્રશસ્ત-ભાવપિંડની આરાધના શરી ની સ્થિતિને અધીન છે, અને શરીરની સ્થિતિ આહાર વિના હોઈ શકતી નથી આષાદિ દ્રવ્યપિંડજ છે તેથી એ સિદ્ધ થયુ કે વ્યપિડ अधीन है, , ઘણા કરવાવાળુ છે अध्ययन ५ उ. १ गा. १-भक्तपानगवेपणाविधिः ३७७ ૨ 3 भेदाभ्याद्वैवि-येऽपि सयमिभिनिरवद्यपिण्ड एव ग्राह्य इति तदेपणाधिकार:-'सपत्ते' इत्यादि। मूलम् संपत्ते भिक्खकालम्मि, असंभंतो अमुच्छिओ। इमेण कमजोगेण, भत्तपाण गवेसए ॥१॥ छाया-सम्भाप्ते भिक्षाकालेऽसम्भ्रान्तोऽञ्चितः । अनेन क्रमयोगेन, भक्तपान गवेपयेत् ॥१॥ ॥ अथ पञ्चमाध्ययनम् ॥ सान्वयार्थ:-मुनिको आहारपानी लेनेकी विधि कहते हैं-भिक्खकालम्मि गोचरीका समय सपत्तेहोनेपर असमतो-उद्वेगरहित (और) अमुच्छिओ- आसक्तिरहित होकर इमेण कमजोगेण इस आगे वताई जानेवाली विधिसे भत्तपाण-भात-पानीकी गवेसएगवेपणा करे ।। टीका-भिक्षाकालेयोचरीसमये, सम्मानस्वाध्यायाधनन्तर द्रव्यक्षेत्र- कालभावानुकूलतया समायाते 'मुनि'-रिति शेपः, असम्भ्रान्त'न्यत्किञ्चिन्नि- मित्तजनितचित्तव्याक्षेपजन्यत्वरारहित -अनाक्षिप्तचित्त इत्यर्थः, ईर्योपयोगवानिति भाव., 'कदा कुत्र वाऽशनादिप्राप्तिर्भविष्यती' त्यादिचिन्ताऽऽहितचाश्चल्यरहित इति पिण्डका पोपक है। द्रव्यपिण्ड, सावध भी होता है और निरवद्य भी होता है। सयमीको निरधद्य पिण्ड ही ग्रहण करना चाहिए, इसलिए द्रव्यपिण्डकी एपणाका अधिकार आरम्भ किया जाता है 'सपत्ते इत्यादि। द्रव्यक्षेत्रकालभावके अनुसार स्वायाय आदि क्रियाओंके पश्चात् जर गोचरीका समय हो तब मुनि किसी कारणवश उत्पन्न हुए चित्त- विक्षेपजन्य धान्तिरहित होकर, अर्थात् ईर्या (गमन) में उपयोग रखकर, अथवा ' का और कहा अशन आदिकी प्राप्ति होगी" इस પ્રશસ્ત ભાવપિંડને પિષક છે દ્રવ્યપિંડ સાવદ્ય પણ હેાય છે અને નિરવદ્યા પણ હેય છે સયમીએ તે નિશ્વદ્યપિંડ જ ઝડણ કરે જોઈએ એટલા માટે દ્રવ્ય पिंडनी मेपाना मधिार पार लवामा आवे छे-सपत्ते भिरखकाल म्मि या દ્રવ્ય-ક્ષેત્ર-કાળ-ભાવને અનુસાર સ્વાધ્યાયાદિ ક્રિયાઓની પછી જ્યારે ગોચરીને સમય થાય ત્યારે મુનિ કેઈ કારણવશ ઉત્પન્ન થએલા ચિત્તવિક્ષેપથી જન્મેલી બ્રાતિથી રહિત થઈને અથાત્ ઈ (ગમન)મા ઉપગ રાખીને, અથવા જ્યારે અને કયા અશન આદિની પ્રાપ્તિ થશે? એ પ્રકારની ચિંતાજન્ય ३७६ श्रीदनवेकालिकम न्तर्गता पिण्टेपणाऽभिधीयते । पिण्टेपणा पिण्डम्य समयभाषया प्रमिदस्यान्न- पानम्यैपणारूपा, तत्र पिण्डन पिण्ड'=पका समुन्तिवा पदार्थममुटाया, सद्विविध:- द्रव्यपिण्डो भारपिण्डा, तब भुधारिपातकनाशनादिरूपोद्रव्यपिण्ड', कर्मविघात- फत्वेन ज्ञानादिलक्षणः प्रशस्तभारपिण्ड', अप्रगम्तमापिण्डस्वसयमादिरूप' मतानुपयोगित्वादुपेक्षित द्रव्यपिण्डो दिमशस्तभावपिण्डपरिपोषकम्त विना तम्या सम्पायवात् , तथाहि-शानाधात्मस्मशस्तभारपिण्डस्याराधना शरीरस्थित्यधीना, शरीरपरिस्थितियाहार रिना न यथावत्साधनायालम्, आहारादि द्रव्पपिण्ड एवेति सिद्ध द्रव्यपिण्डस्य प्रशस्तभारपिण्डपरिपोपपत्वम् । तस्य च सावनिरव कथन करते हैं। पिण्ड' शास्त्रीय भाषामें अन्नपान नामसे प्रसिद्द है, उसकी एपणा करना 'पिण्डैपणा' है। एक स्थानपर बहुत पदार्थोका समुदाय होना पिण्ट कहलाता है। पिण्ड दो प्रकारका है-(१) द्रव्यपिण्ड और (२) भावपिण्ड अशन आदिको द्रव्यपिण्ट करते हैं, क्योंकि उससे क्षुधाका नाश होता है । ज्ञानादि प्रशस्त-भावपिण्ड है, क्योंकि वह कर्मोंका नाश करनेवाला है, अप्रशस्त-भावपिण्ड असयमादिरूप है, उसका यहाँ अधिकार नहीं है। द्रव्यपिण्ड, प्रशस्त-भावपिण्डका पोषक है, क्योंकि उसके विना प्रशस्त-भावपिण्डकी प्राप्ति नही होसकती, अर्थात् ज्ञानादिरूप प्रशस्त-भावपिण्डकी आराधना शरीरकी स्थितिके अधीन है, और शरीरकी स्थिति आहारके विना नहीं होसकती । आहार आदि द्रव्यपिण्ड ही है। इससे यह सिद्ध हुआ कि द्रव्यपिण्ड प्रशस्त भाव પિંડ” શબ્દ શાસ્ત્રીય-ભાષામાં અન્નપાનના નામે ઓળખાય છે, તેની એષણા કરવી એ પિંડેષણ કહેવાય છે એક સ્થાન પર પદાર્થને એ પિંડ” કહેવાય છે પિંડ બે પ્રકાર હોય છે, (૧) દ્રવ્ય-પિંડ અને (૨) ભાવપિંડ અશન આદિને પિંડ કહે છે કારણ કે તેથી સુધાને નાશ થાય છે નાદિ એ પ્રશત-ભાવપિંડ છે, કારણ કે તે કને નાશ કરવાવાળુ છે અપ્રશસ્તભાવપિંડ અસયમાદિરૂપ છે, એને અહી અધિકાર નથી દ્રવ્યપિંડ એ પ્રશસ્ત–ભાવપિંડને પિષક છે કારણ કે તેના વિના પ્રવાસ્ત- ભડની પ્રાપ્તિ થઈ શકતી નથી અર્થાત્ જ્ઞાનાદિ રૂપ પ્રશત-ભાવડિંડની આરાધના શરી ની સ્થિતિને અધીન છે, અને શરીરની સ્થિતિ આહાર વિના હોઇ શકતી નથી આહારાદિ દ્રવ્યપિંડજ છે તેથી એ સિદ્ધ થયુ કે વ્યપિંડ ઘણુ હૈ. સમુદાય २ 3 ४ ५ ७ अध्ययन ५ उ. १ गा. १-मक्तपानगवेपणाविधिः ३७७ भेदाभ्या द्वैवि-येऽपि सयमिभिर्निरवयपिण्ड एव ग्राह्य इति तदेपणाधिकार:-'सपत्ते' इत्यादि। मूलम् संपत्ते भिक्खकालम्मि, असंभंतो अमुच्छिओ। इमेण कमजोगेण, भत्तपाणं गवेसए ॥१॥ छाया-सम्माप्ते भिक्षाकालेऽसम्भ्रान्तोऽमूठितः । अनेन क्रमयोगेन, भक्तपान गवेपयेत् ॥१॥ ॥ अथ पञ्चमाध्ययनम् ।। सान्वयार्थ:-मुनिको आहारपानी लेनेकी विधि कहते हैं-भिक्खकालम्मि= गोधरीका समय सपत्ते होनेपर असमतो उद्वेगरहित (और) अमुच्छिओ- आसक्तिरहित होकर इमेण कमजोगेण इस आगे वताई जानेवाली विधिसे भत्तपाण-भात-पानीकी गवेसएगवेपणा करे। टीका-भिक्षामाले गोचरीसमये, सम्माप्त-स्वाध्यायाधनन्तर द्रव्यक्षेत्र- कालभावानुकूलतया समायाते 'मुनि'-रिति शेपः, असम्भ्रान्तः यत्किञ्चिन्नि- मित्तननितचित्तव्याक्षेपजन्यवरारहित -अनाक्षिप्तचित्त इत्यर्थः, ईर्योपयोगवानिति भावः, 'कदा कुत्र वाऽशनादिप्राप्तिर्भविष्यती त्यादिचिन्ताऽऽहितचाश्चल्यरहित इति पिण्डका पोपक है। द्रव्यपिण्ड, सावद्य भी होता है और निरवद्य भी होता है। सयमीको निरवद्य पिण्ड ही ग्रहण करना चाहिए, इसलिए द्रव्यपिण्डकी एपणाका अधिकार आरम्भ किया जाताहै 'सपत्ते' इत्यादि। द्रव्यक्षेत्रकालभावके अनुसार स्वा याय आदि क्रियाओंके पश्चात् जन गोचरीका समय हो तब मुनि किसी कारणवश उत्पन्न हुए चित्त- विक्षेपजन्य धान्तिरहित होकर, अर्थात् ईयां (गमन ) में उपयोग रखकर, अथवा कब और कहाँ अशन आदिकी प्राप्ति होगी પ્રશસ્ત ભાવપિંડને પિષક છે દ્રવ્યપિંડ સાવદ્ય પણ હોય છે અને નિરવદ્ય પણ હોય છે સયમીએ નિવઘપિંડ જ ગ્રહણ કરવું જોઈએ એટલા માટે દ્રવ્ય પિંડની એષણને અધિકાર પ્રારંભવામાં मार छ-सपत्ते भिक्खकालम्मि या દ્રવ્ય-ક્ષેત્ર-કાળ-ભાવને અનુસાર સ્વાધ્યાયાદિ ક્રિયાઓની પછી જ્યારે ગોચરીને સમય થાય ત્યારે મુનિ કેઈ કારણવશ ઉત્પન્ન થએલા ચિત્તવિક્ષેપથી જન્મેલી ભ્રાનિતથી રહિત થઈને અથાત્ ઈ (ગમન)મા ઉપગ રાખીને, અથવા કયારે અને કયા અશન અદિની પ્રાપ્તિ થશે? એ પ્રકારની ચિંતાજન્ય . " - ४ ५ २ श्रीदशकालिको यार, अन्तिभाहारादी मनोरमान्दादिपिपयेषु या नासक्तः सन् अनेन- वक्ष्यमाणेनैतदध्ययनल्याणितस्वरूपेण क्रमयोगेन-कारेण मक्तपान-भक्त च पान चेत्यनयोः समादारे भक्तपानम् , भक्तम्, भोदनादिकम् , पान द्राक्षादिजल मुनियोग्य गवेपयेत् अन्वेषयेत् (अविच्छेद)। सपणे' इत्पनेन मुनिना यथासमय फार्य सम्पादनीय' मित्याविष्फतम् । 'अप्तमंतो' स्यतो मनास्थैर्य विप्रेयमित्युष दिएम् । 'अमुच्छिमओ' इत्यनेन विपयनुत्वमपाकृतम् ॥१॥ गवेपणाविधिमार-से गामे चा' इत्यादि। मूलम्-से गामे वा नयरे वा, गोयरग्गगओ मुणी। चरे मदमविग्गो, अधक्खित्तेण चेयसा ॥ २ ॥ छाया~स ग्रामे वा नगरे वा, गोचराप्रगतो मुनिः। चरेन्मन्दमनुद्विमोऽव्याक्षिप्तेन चेनसा ॥२॥ सान्वयार्थ:-से-वह मुणी-साधुगामे गाँवधा अथवा नगरे नगरमें वा- निश्चयसे गोयरग्गगओ-निर्दीप भिक्षाके लिए गया हुआ अणुब्विग्गो उद्वेग प्रकारको चिन्ताजन्य चचलतासे रहित होकर आहार तथा मनोज शब्दादि विषयोमे आसक्त न होता हुआ, जैसा इस अध्ययनमे वर्णन किया गया है उस विधिसे, मुनिके योग्य ओदन आदि भक्त तथा दाख आदिका धोचनरूप पानकी गवेपणा करे। गाथामे 'सपत्ते' पदसे यह सूचित्त किया है कि मुनिको समय पर ही कार्य करना चाहिए । 'असभतो' पदसे यह प्रगट किया है कि साधुको मनकी स्थिरतारखनी चाहिए । 'अमुच्छिओ'पदसे विषयों में आसक्तिका निराकरण किया गया है ॥१॥ ચચલતાથી રહિત થઈને આહાર તથા મને જ્ઞ-શબ્દાદિ વિશ્વમાં આસકત ન થતા, આ અધ્યયનમાં વર્ણવ્યા પ્રમાણે તો વિધિથી, મુનિને ચેતવ્ય એદન આદિ ભાત તથા દ્રાક્ષ આદિના વણરૂપ પાનની ગવેષણ કરે ગાથામાં સત્ત શબ્દથી એમ સૂચિત કરવામાં સમય પર જ કાર્ય કરવું જોઇએ નમો શબ્દથી એમ પ્રકટ કર્યું છે કે સાધુએ મનની દિથતા રાખવી જોઈએ શદથી વિમા આસકિતનું નિરા કરણ કરવામાં આવ્યું છે (૧) આવ્યું છે કે મુનિએ अ ययन ५ उ१ गा. २-गोचर्या चित्तस्थैर्योपदेशः ३७९ रहित होता हुआ अव्यक्तित्तण गान्त-स्थिर चेयसा-चित्तसे मदर्या- समिति सोधता हुआ चरे जावे ||२|| टीम से अथ-पिण्डगवेपणासमये, यद्वा 'से' इति तन्छन्दस्य प्रथमै- कचनरूप तेन सः-पक्रान्तः मुनि'-मुणति मतिजानीते सर्वसावधव्यापारोप- रतिमिति, मन्यते-जानाति जिनाज्ञयाऽनेकान्तात्मफनीवाऽजीवादिपदार्थसार्थ- मिति वा मुनि =अनगारः, स च द्विविधा-द्रव्यतो भावतश्च, तत्र द्रव्यतः-मुनि- कर्तव्य क्रियाक्लापविकलो लिङ्गमात्रोपजीवी, भावतस्तु-मोहनीयकर्मक्षय-क्षयो- पशमसमुद्भूतज्ञानादिरत्नत्रयमकटीभूतात्मस्वरूपः, प्रकृते च भावमुनि भसद्गगम्यः। १ आने 'मुण पतिताने' अस्मादौणादिक इन्, पृपोदरादित्वाण्णस्य न. । द्वितीये-'मन नाने' इति धातो. 'मनेरुच्चे'-त्यौणादिकमृत्रेण इन्मत्ययः स च कित् झारस्योकारादेशश्च । यद्वा 'मुगी' इति प्राकृतसम. सस्कृत एव, शब्दसिद्धि- रप्युक्तंच, तदा छायाया 'मुणि.' इत्यपि समावेशमर्हति । अब गवेषणाकी विधि बताते हैं-'से गामे वा०' इत्यादि । 'मुनि' शब्दके अनेक अर्थ हैं-(१) जो समस्त सावध व्यापारके स्यागकी प्रतिज्ञा करते हैं उन्हे मुनि कहते है। (२) जिनेन्द्र भगवान्की आनाके अनुमार जीव अजीव आदि पदार्थोंको अनेकान्तस्वरूप जानने वाले मुनि कहलाते हैं । मुनि दो प्रकार के होते हैं-(१) द्रव्यमुनि और (२) भावमुनि । मुनियोंके आचारका पालन न करनेवाला मुनिवेषधारी द्रव्यमुनि कहलाता है । मोहनीय कर्मके क्षय और क्षयोपशमसे उत्पन्न हुए सम्यग्ज्ञान सम्यग्दर्शन सम्यक्चारित्ररूप रत्नत्रयके द्वारा जिनकी आत्माका स्वरूप प्रकट होगया है उन्हें भावमुनि कहते हैं। यहा भाव- मुनिका अधिकार समझना चाहिए। डवे गवेषानी विधि भावे छे-से गामे त्रा० छत्याहि મુનિ શબ્દના અનેક અર્થો છે (૧) જે સર્વ સાવદ્ય વ્યાપારના ત્યાગની પ્રતિજ્ઞા કરે –તેને મુનિ કહે છે (૨) જિનેન્દ્ર ભગવાનની આજ્ઞાને અનુસાર આદિ પદાર્થોને અનેકાન્તસ્વરૂપ જાણવાવાળા મુનિ કહેવાય છે મુનિ બે પ્રકારના હોય છે (१) ६०यमुनि भने (२) सावमुनि भुनियाना આચારનું પાલન કરનારા મુનિએષધારી દ્રવ્યમુનિ કહેવાય છે, મેહનીય કર્મના ક્ષય અને પશમથી ઉત્પન્ન થએલા સભ્ય જ્ઞાન સમ્યગદર્શન અને સમ્મચારિત્રરૂપ રત્રયની દ્વારા જના આ માનું સ્વરૂપ પ્રકટ થઈ ગયું છે તેને ભાવમુનિ કહે છે અહી ભાવમુનિને અધિકાર સમજે ઈએ, અજીવ ३८० श्रीदववेकानिको ग्रामे पा-अयग नगरे, दितीय-या शन्दा खेटक टाटी, गोचरागत:- गोरिस चरणव्ययायोग्य सल्पस्वल्पग्रहण गोचरः, अग्नः आगार्मादिदोषरहित तया श्रेष्ठः, स चासौ गोचरोति गोचरान , आर्पवाद्विशेषणपूर्वनिपाताभाव , अग्रगोचर इत्यर्थः, तत्र गवा वर्षमानः गोचराग्रगतः अन्याक्षिप्तेन-स्थिरेण मिक्षागतसकलदोपोपयोगरतेत्यर्थः, चेतसा-चित्तेन अनुमिः अामादिपरीपर जनितक्षोभरटितः, मन्दशर्यथास्यात्न्या ईर्यापथ शोधयमित्यर्थः, चरेत् गन्छेत् । 'गोयरग्गगओ' इत्यनेन नोटिरिशुद्धाहारो ग्रहीतव्य इति सूचितम् । 'अवविखत्तेण चेयसा' इत्यनेन चित्तस्थैर्येणे मिक्षादिशुद्धिर्भवतीति ध्वनितम् । 'अणुन्विग्गो' इत्यतः परीपडसइनसामर्थ्य योधितम् ॥२॥ गोचरीगमनप्रकारानाद-पुरओ' इत्यादि । वह भाषमुनि पिण्ड-गवेपणाका समय होने पर ग्राम, नगर खेडा, कर्वट आदिमें यथायोग्य थोड़ा थोडा निर्दीप आहार ग्रहण करता हुआ भिक्षाके समस्त दोपोंका उपयोग रखनेवाले अर्थात अव्याक्षिप्त चित्तसे अलाभ आदि परीपह जनित क्षोभसे रहित होकर ईर्यापथ शोधते हुए मन्दगतिसे चले। 'गोयरग्गगओ' पदसे यह सूचित हुआ है कि साधुको नवकोटि विशुद्ध आहार लेना चाहिए। 'अब्यरिखतेण चेयसा इससे यह द्योतित होता है कि चित्तकी स्थिरतासे ही भिक्षाकी शुद्धि निभ सकती है। 'अणुब्बिग्गो' पदसे परीपद सहनेका सामर्थ्य प्रगट किया है ॥२॥ गोचरीके लिए गमनविधि बताते हैं-'पुरओ' इत्यादि । એ ભાવ મુનિ પિગલેષણને સમય થતા ગ્રામ, નગર, ગામ, આદિમ યથા૫ છેડે ઘેડો નિર્દોષ આહાર ગ્રહણ કરતા, ભિક્ષાના બધા રોનો ઉપયોગ રાખવાવાળો અર્થાત અવ્યાક્ષિત-ચિત્તથી અલાભ આદિ પર બહથી ઉત્પન્ન થતા ક્ષેભથી રહિત થઈને ઈર્યાપથ ધતા મદ ગતિએ ચાલે गोयरग्गगओ शव्या मेभ सूचित थयु छ ? साधुम्मे नरिये विशुद्ध सेवा नो अबविश्वत्तेण चेयसा मेथी मेम प्र४८ थाय स्थिरताथी मिक्षानी शुद्धि नही हे छ, अगुब्बिग्गो शाथी परी सह વાનું સામર્થ્ય પ્રકટ કર્યું છે (૨) गोयरीन भाटे गमनविधि सतावे -पुरओ त्या કર્વર આહાર છે કે ચિત્તની अध्ययन ५ उ. १ गा. ३-गोचर्या गमनविधिः ३८१ 3 e ५ ८ ७ मूलम्-पुरओ जुगमायाए, पेहमाणो महि चरे वजतो वीयहरियाइ, पाणे य दगमट्टिय ॥ ३ ॥ छाया-पुरतो युगमात्रया, प्रेक्षमाणो मही चरेत् । वर्जयन् पीजहरितानि, माणांश्च दकमृत्तिकाम् ॥३॥ गोचरी में चलने की विधि कहते है- सान्वयार्थ:-पुरओ-सामने जुगमायाए धूसर प्रमाण दृष्टिसे महिं पृथि- चीको पेहमाणो देखता हुआ वीयहरियाइ-बीज, हरी, पाणे-द्वीन्द्रियादिक पाणी य और दगमयिम्सचित्त जल तथा सचित्त मिट्टीको बजतोवर्जता हुआ चरे-चले ॥३॥ टीका-युगमात्रया जूसरममाणया तत्पमाणममृतयेत्यर्थः 'दृष्टयेति शेपः । वस्तुतस्तु 'कचिद्वितीयादे.' इति नियमादत्र द्वितीयार्थे पष्ठी, तेन 'जुगमायाए' इत्यस्य 'युगमाना'-मिति च्छाया, तथाच-युगमात्रा मोक्तार्थो स्वशरीरममितामिति भावः, महीं भृमि मार्गभूमिमिति भावः, पुरत' स्वाग्रतः भेक्षमाणः सम्यगवलो- कयन् वीजहरितानि पसिद्धानि, प्राणान्द्वीन्द्रियादिमाणिनः, दकमृत्तिका सचित्त जल मृत्तिका च वर्जयन्=परिहरन् चरेत् गच्छेत ॥३॥ मूलम् ओवाय विसम खाणु, विजल परिवजए। सकमेण न गच्छिज्जा, विजमाणे परकमे ॥ ४॥ छाया-अवपात विपम स्थाणु, विजल परिवर्जयेत् । सक्रमेण न गच्छेत् , विद्यमाने पराक्रमे ||४|| सान्वयार्थ -परक्कमे दूसरे मार्गके विजमाणे होनेपर (साधु) ओवाय जिस मार्गमें गिर पडनेकी शका हो विसम-खड्डे आदिके कारण विकट हो खाणु काटे हुए धान्यके डठलोसे युक्त (और) विजल कीचडवाला हो उस अपने शरीर प्रमाण रास्ता सामने भली भाँति अवलोकन करता हुआ, वीज, वनस्पतिकाय, हीन्द्रिय आदि प्राणी सचित्तजल और सचित्त मृत्तिकाको बचाता हुआ गमन करे ॥३॥ પિતાના શરીર પ્રમાણ રસ્તા સામે સારી રીતે અવકન કરતા, બીજ, વનસ્પતિકાય, કીન્દ્રિયાદિ પ્રાણુ, સચિત્ત જળ અને સચિત્ત માટીને વાચાવી खेता गमन रे (3) 3 ४ ૫ ७ e १० ૨ .

३८. श्रीदनवेकानिकलने ग्रामे गाभयरा नगरे, द्वितीय पालन्दात् खेटकरटादी, गोचराप्रगतः- गोरिच चरण यथायोग्यं स्वल्पस्वल्पग्रहण गोचरः, अप्रामारामादिदोषरहित वया श्रेष्ठः, स पासौं गोचरणेति गोचराग्र , आर्पस्वाद्विशेषणपूनिपाताभाव', अग्रगोचर इत्यर्थः, तत्र गतापमानः गोचराप्रगतः अयाशिन-स्थिरेण भिक्षागवसफलदोपोपयोगरतेत्यर्थः, चेतमा-चिनेन अनुद्विमा अलाभादिपरीषद जनितक्षोभरहितः, मन्द-शनैर्ययास्यागया ईर्यापथ गोधयमित्यर्थः, चरेत् गच्छेत् । 'गोयरग्गगो' इत्यनेन नोटिरिशुद्धाहारो ग्रहीतव्य इति सूचितम् । 'अनक्खित्तेण चेयसा' इत्यनेन चिचस्ययेणेव मिक्षादिशदिर्भवतीति ध्वनितम् । 'अणुविग्गो' इत्यतः परीपहसइनसामथ्र्य चोधितम् ॥२॥ गोचरीगमनमकारानाद-पुरओ' इत्यादि । वर भामुनि पिण्ड-गवेपणाका समय रोने पर ग्राम, नगर खेडा, कर्वट आदिमें यथायोग्य थोड़ा थोडा निर्दोप आरार ग्रहण करता हुआ भिक्षाके समस्त दोपोंका उपयोग रखनेवाले अर्थात् अन्याक्षिप्त चित्तसे अलाभ आदि परीपह जनित क्षोभसे रहित होकर ईर्यापथ शोधते हुए मन्दगतिसे चले। 'गोयरग्गगओ' पदसे यह सूचित हुआ है कि साधुको नवकोटि- विशुद्ध आहार लेना चाहिए। 'अव्वक्तित्तण चेयसा इससे यह द्योतित होता है कि चित्तकी स्थिरतासे ही भिक्षाकी शुद्धि निभ सकती है। 'अणुब्बिग्गो' पदसे परीषर सरनेका सामर्थ्य प्रगट किया है ॥२॥ गोचरीके लिए गमनविधि बताते है-'पुरओ' इत्यादि । એ ભાવ મુનિ પિડગવેવણને સમય થતા ગ્રામ, નગર, ગામ, આદિમાં યથાયોગ્ય શેડ ડે નિર્દોષ આહાર ગ્રણ કરતા, ભિક્ષાના બધા ને ઉપગ રાખવાવાળે અર્થાતુ અવ્યાક્ષિત-ચિત્તથી અલાભ આદિ પર પહથી ઉત્પન્ન થતા લેભથી રહિત થઈને ઈયપથ શોધતા મદ ગતિએ ચાલે गोयरग्गगओ शया मेम सूभित थयु छ ? साधु नपटिये विशुद्ध આહાર લેવું જોઈએ એશ્વવિવેક ચેક્ષા એથી એમ પ્રકટ થાય છે કે ચિત્તની स्थिरताथी भिक्षानी शुद्धि नला श छ, अगुब्बिग्गो शहथी परीष सई વાનું સામર્થ્ય પ્રકટ કર્યું છે (૨) गायरीने भाट गमनविधि मताछे-पुरओ Vत्यादि કવટ ३८३ अ ययन ५ उ.१ गा. ५-विपममार्गगमने विराधना तर गच्च्तो हानिमाइ-पवडते' इत्यादि । मूलम्-पवडते व से तत्थ, पक्खलते व सजए । ૨ 3५ १ ४ ५ ७ 1२ ८ हिसेज पाणभूयाई, तसे अदुव थावरे ॥५॥ छाया-प्रपतश्च स तत्र, प्रस्खलॅश्च सयतः । हिंस्यात्माणभूतानि, सान् अथवा स्थावरान् ॥५॥ पूर्वोक्त मार्गसे जाने में दोप पताते है सान्वयार्थ:-से उस मार्गसे जानेवाला वह सजए-साधु वयदि तत्थ वहा पवडते-गिर जाय -अथवा पस्खलते रपट पडे तो तसेन्त्रस-द्वीन्द्रियादि अदुवअथवा थावरे स्थावर-पृथिव्यादि पाणभृयादम्पाणी भूतोकी हिंसेजा हिंसा करे। अर्थात् ऐसे मार्ग में जानेसे साधुको आत्म और सयम दोनोकी विरा- धनाका सभव है ॥५॥ टीका-त-तस्मिन् अवपातादो प्रपतन् प्रस्खलँश्च स सयताम्साधुः त्रसान्- द्वीन्द्रियादिलक्षणान्, स्थावरान् पृथिव्यायेकेन्द्रियान्, अथवा माणभूतानि= उसस्थावरोभयविधान् प्राणिनो हिंस्यात् मर्दयेत् पीडयेदिति यावत् । पतनादिना चाऽऽत्मविरावनायपि नियत भावीति भावः ॥५॥ मार्ग न हो तो यह निषेध नहीं है-अर्थात् अन्य मार्गके अभावमें ऐसे मार्गसे भी जा सकते है ॥४॥ ऐसे मार्गमें चलनेसे होनेवाली हानि बताते है-'पवडते.' इत्यादि। यदि अवपात आदि पूर्वोक्त मागोंमें गमन करनेसे गिर पडे या रपट जावे तो दीन्द्रिय आदि धस या पृथिवीकायिक आदि स्थावर जीवोंकी अथवा दोनों प्रकारके जीवोंकी हिंसा होती है तथा गिरने आदिसे आत्मविरावना भी अवश्य होती है ॥६॥ તે એને નિષેધ નથી–અર્થાત્ અન્ય માર્ગને અભાવે એવા માર્ગથી પણ જઈ शाय छ (४) मेवा भाभा यासपाथी यनारी जनिता छ- पवडते. त्या જે અવયાત આદિ ધૂત માર્ગોમા ગમન કરવાથી પડી જાય ત્યા લાપસી જાય તે દીન્દ્રિયાદિ ત્રસ યા પૃથ્વીકાયિક આદિ સ્થાવર જીની અથવા બેઉ પ્રકારના જીની હિંસા થાય છે, તથા પડવાથી આત્મવિરાધના પણ અવશ્ય ३८२ श्रीग्यकालिका मार्गको परिवजा गोडे, तया मामेणगी आदिके कारण निम मार्गमें ईट काठ आदि लापने के लिए रसे हो उसमें भी न गनेजा नहीं जावे ||४|| टीका-'ओगाय' इत्यादि । 'परणमें इति आक्रमणमाक्रमः अबलम्बन परधासागक्रमश पराक्रमः परस्याऽऽक्रमो या पराक्रमस्तस्मिन् , यद्वा 'परक्रमे इविच्छाया, तवय परमासो क्रमच परक्रमस्वम्मिन सर्वथा गत्पन्तरे' इत्यर्थस्तथा च-पराक्रमे अपना परक्रमे उपाये विद्यमाने वर्गमाने सति अवपातः स्खलन स्थान सत्यप्यालोके येन सश्चरणे स्खलनमाश्यसम्भाव्य तम् , विषम =दुर्गमस्वा द्विकट मागै स्थाणु-नसम्यादिस्थुड तद्गुल क्षेत्रादिमार्गमित्यर्थः, विजल-विगत जल यस्माचत् तथोक्त पङ्किलस्थल परिवर्जयेत् परित्यजेत् , सक्रमेण सक्रम्यते- समुध्यते जलकर्दमादिरहुलम्पिमस्थान येन स सक्रम' उष्टका-काष्ठ-पापाणादि- निर्मितमार्गविशेपस्तेन न गन्छेत् न समरेत् । 'विनमाणे परकमे' इत्यनेनोपा यान्तराभावे नाय प्रतिषेध इत्यपादः सचित॥४॥ १ गतमयतया सभावितस्सलनकम् । २ उन्नताऽचनतत्वादुर्गमम् । 'ओवाय' इत्यादि । पर अवलम्बको यहाँ पर परक्रम अथवा पराक्रमसे कहा गया है अत एव अर्थ यह है कि दूसरे मार्गके रहते हुए, जिसमे चलनेसे गिर पडनेकी सभावना हो, दुर्गम होनेके कारण विकट हो, जिसमे काटे हुए ज्वार आदिके डठल हों, और जो कीचट वाला हो, जल-कीचड आदिकी अधिकता होनेसे लापने के लिए ईट, काष्ठ, पत्थर आदि रखे हुए हों, उस विषम मार्गसे गमन न करे। 'विजमाणे परकमे' इस पदसे यह सूचित किया है कि दूसरा ગોવા, ઈત્યાદિ પર અવલ બને અહીં પરકમ અથવા પરાક્રમથી કહેવામાં આવેલ છે, એથી એવો અર્થ થાય છે કે બીજે માર્ગ હોવા છતા, જેમા ચાલ વાથી પડી જવાની સંભાવના હોય, દુર્ગમ હેવાને લીધે વિકટ છે, જેમાં કાપેલી કૂડા હોય, અને જે કીચડવાળે હોય, પણ કીચડ વગેરે વધુ હોવાના કારણે એળગવા માટે ઈટ, લાકડુ કે પત્થર આદિ રાખેલા હોય, એવા વિષમ માર્ગથી ગમન ન કરે विजमाणे परक्मे मे हाथी मेम भूयव्यु छ है भाने भान 4 , જુવાર अ ययन ५ उ.१ गा. ५-विपममार्गगमने विराधना ३८३ तत्र गच्छतो हानिमाह-'पवडते' इत्यादि । ૨ 3 ४ ७ मूलम्-पवडते व से तत्थ, पक्खलते व सजए। ૧૨ १० - हिसेज पाणभूयाइ, तसे अदुव थावरे ॥५॥ छाया-प्रपतश्च स तत्र, मस्खलँश्च सयतः । हिंस्यात्माणभूतानि, सान् अथवा स्थावरान् ॥५॥ पूर्वोक्त मार्गसे जाने में दोप बताते है- सान्वयार्थः-से-उस मार्गसे जानेवाला वह सज-साधु व=यदि तत्थ-वहा पवडते-गिर जाय व अथवा पक्खलते रपट पडे तो तसे त्रस द्वीन्द्रियादि अदुवः अथवा थावरे-स्थावर-पृथिव्यादि पाणभृयाइमाणी भूतोकी हिंसेज्जा-3 हिंसा करे। अर्थात् ऐसे मार्गमें जानेसे साधुको आत्म और सयम दोनोकी विरा- धनाका सभव है ॥५॥ टीका-त-तस्मिन् अवपातादौ प्रपतन् प्रस्खलँश्च स सयतः साधुः त्रसान्- द्वीन्द्रियादिलक्षणान् , स्थावरान् पृथिव्यायेकेन्द्रियान्, अथवा माणभूतानि- त्रसस्थावरोभयविधान् प्राणिनो हिस्यात्मर्दयेत् पीडयेदिति यावत् । पतनादिना चाऽऽत्मविराधनायपि नियत भावीति भाव ॥५॥ मार्ग न हो तो यह निषेध नहीं है-अर्थात् अन्य मार्गके अभावमें ऐसे मार्गसे भी जा सकते हैं ॥४॥ ऐसे मार्गमें चलनेसे होनेवाली हानि बताते है-'पवडते.' इत्यादि। यदि अवपात आदि पूर्वोक्त मागों में गमन करनेसे गिर पडे या रपट जावे तो दीन्द्रिय आदि वस या पृथिवीकायिक आदि स्थावर जीवोंकी अथवा दोनों प्रकारके जीवोंकी हिंसा होती है तथा गिरने आदिसे आत्मविराधना भी अवश्य होती है ॥५॥ તે એને નિષેધ નથી–અર્થાત્ અન્ય માર્ગને અભાવે એવા માર્ગથી પણ જઈ शाय छ (४) मेवा भाभा यासाथी थनारी हानि सतावे छ- पवडते. त्या જે અવત આદિ પૂર્વોકત માર્ગોમાં ગમન કરવાથી પડી જાય થી લપસી જાય તે દ્વીન્દ્રિયદિ ત્રસ યા પૃથ્વીકાયિક આદિ સ્થાવર જેની અથવા બેઉ પ્રકારના જીની હિંસા થાય છે, તથા પડવાથી આત્મવિરાધના પણ અવશ્ય थाय छे (५) मायाहिनी यतना ४ छ-न चरेज्ज वासे० ईत्याहि पारे १२साई ३८६ श्रीकारियो अपकायादियतनामार-'न परेन' इत्यादि । मूलम्-न चरेज चासे वासते, मिहियाए पङतिए । महावाए व वायते, तिरिच्छसंपाइमेसु वा ॥८॥ छाया-न परेद् पति, मिहिकायां पवन्याम् । महागते या गति, विपइसपातेपु वा 110 अफाय आदिकी यतना कहते हैं- सान्वयार्थ:-चासे चासते रसते हुए मिरियाग पडति-धूअर कुहरा गिरते हुए बतया महागग यायते महायु-आँधी के चलते हुए वा और तिरिच्छसपाइमेसु-तीड-पतगादिकोके उडते हुए (साघु) न चरेज-गोचरीन टीका-वर्षे वर्षति-पृष्टौ सत्याम् , मिहिकाया धूमिकाया पतन्या सत्या महावाते-पचण्डपाने गति यति सवि, तिर्यसम्पातेपु तिर्य पतनशीलेषु शलभादिपु सत्सु न चरेत् । 'वासे वासते' इत्पनेन शीकरपातसमयेऽपि गमन निषेधः तस्यापि दृष्टान्तर्भावात् अप्कायचिराधनासाधनत्वाच ॥८॥ उता प्रथममहारतविराधनाऽधुनाचतुर्थमहात्रतविराधनाया इतरमहाव्रतविराधना अप्कायादिकी यतना कहते हैं-'म चरेन वासे० ' इत्यादि । जब वर्षा बरस रही हो, कुहरा (धूअर) पड रहा हो, आँधी चल रही हो, टिड्डी आदि उड रहे हो, तब साधु गमन न करे। 'वासे वासते इस पदसे यह भी ग्रहण कर लेना चाहिए कि जब फुहारे पड रहे हो तब भी गमन न करे, क्योंकि वह भी वर्षाही में अन्तर्गत है और उस समय जानेसे अपकायकी विराधना होती है ॥८॥ प्रथम महाव्रतकी विराधना बनाने के बाद अब अन्यमहाव्रतोंकी विराधना जावे ॥८॥ વસી રહ્યો હેય, ધુમસ (ઝાકળ પડી રહ્યો હોય ધી ચાલી રહી હોય, ટીડ ઉર્ડ રહ્યા હોય, ત્યારે સાધુ ગમન ન કરે વારે વારે એ પાબ્દથી એમ પણ ઝડ કરી લેવું જોઈએ કે જ્યારે વરસાદની ફરફર પડી રહી હોય ત્યારે ન કરે, કારણુ કે તે પણ વરસાદમાં જ આવી જાય છે અને તે સમયે જવાથી અપકાયની વિરાધના થાય છે (૮) પ્રથમ મહાવ્રતની વિરાધના બતાવ્યા પછી હવે બીજા પણ गभन વિરાધનાના 3 ૨ ७ १ वश: अध्ययन ५ उ. १ गा. ९-ब्रह्मचर्यातयतना ३८७ हेतुभूततया तामाह-'न चरेज्ज वेस०' इत्यादि । मूलम्-न चरेज वेससामते, बंभचेरवसाणुए। वंभयारिस्स दतस्स, हुज्जा तत्थ विसुत्तिया ॥९॥ छाया-न चरेद् वेशसामन्ते, ब्रह्मचर्यवशानुगः । ब्रह्मचारिणो दान्तस्य, भवेत्तत्र विस्रोतसिका ॥९॥ ब्रह्मचर्य ही सर व्रतो का कारण है, अतः चतुर्थात की यतना कहते है- सान्चयार्थः-बभचेरवसाणुए ब्रह्मचर्यकी रक्षा चाहनेवाला साधु वेस- सामते वेश्याके पाडे-मुहल्ले में न चरेज्जगोचरी नही जावे, (क्योकि) तत्थ बहा (गोचरी जानेसे) दतस्स-इन्द्रिय और मनको कावूमें रखनेवाले वभयारिस्सब्रह्मचारी साधुके भी विसुत्तिया मानसिक विकार हुज्जा पैदा हो जाता है, साधारण मनुष्यकी तो बातही क्या ? अर्थात् उसके मानसिक विकार जरूर उत्पन्न हो जाता है ॥९॥ क्योरि- टीका--ब्रह्मचर्यवशानुगः ब्रह्मचर्य-कामवासनापरित्यागलपणन, स्वायत्तताम् अनुगमयतिमापयतीति स तथोक्तः ब्रह्मचारीत्यर्थः । यद्वा 'ब्रह्मच- विसानके' इति, 'ब्रह्मचर्यवशाऽऽनये' इति वा सस्कृत, तस्य 'वेशसामन्ते' इत्यनेन विशेपणतया सम्बन्धस्तथा च-ब्रह्मचर्यस्यावसानम् अन्तो यस्मात्स तस्मिन्-ब्रह्मचर्यविनाशके इति प्रथमस्यार्थः । ब्रह्मचर्य वशमानयति दर्शनादिना स्वाधीन करोतीति ब्रह्मचर्यवशानयस्तस्मिन् ब्रह्मचर्यभ्रशके इति द्वितीयस्यार्थः। वेशसामन्ते=वेशः वेश्यागृहम् 'वेशो वेश्यागृहे गृहे' इति कोशात्, तस्य सामन्ते समीपे वेश्यापाटके वा न चरेत्न्न गच्छेत् । का हानि' रित्याह- 'ब्रह्मे-ति, तत्रवेशसामन्ते गमनेनेति प्रसङ्गलभ्यम् , दान्तस्य जितेन्द्रियस्यापि के कारण होनेसे चतुर्थ महावतकी विराधनाका कथन करते हैं-'न चरेज वेस०' इत्यादि । ब्रह्मचारी साधु गोचरीके लिए, ब्रह्मचर्यका नाश करनेवाले वेश्या- घरके समीपमें या वेश्याके पाडे (मुहल्ले) मे न जावे । वहाँ जानेसे क्या हानि है? सो बताते हैं वेश्याके पाडेमे गमन करनेसे जितेन्द्रिय ब्रह्म- કારણહેવાને લીધે ચતુર્થ મહાવ્રતની વિરાધનાનું કથન કરે છે વરે જેa૦ ઈત્યાદિ બ્રહ્મચારી સાધુ ચરીને માટે, બ્રહ્મચર્યને નાશ કરવાવાળા વેશ્યાગૃહની સમીપે યા વેશ્યાઓના મહેલમાં ન જાય ત્યા જવામા શી હલ્કત છે? તે હવે બતાવે છે –વેશ્યાના મહોલ્લામાં ગમન કરવાથી જિતેન્દ્રિય બ્રહ્મચારી 1. १ ३ Y उक्ता प्रथममहाप्रतविराधनाऽधुना चतुर्थमहारतविराधनाया इतरमहाव्रतविराधना ३८६ भीशकालिको अपकायादियतनामाह-'न गरेज' त्यादि । मूलम्-न चरेज वासे वासते, मिहियाए पडतिए । महावाए व वायंते, तिरिच्छसपाइमेसु वा ॥ ८॥ छाया--न घरेद् वर्षे पर्पति, मिहिकायां पतन्याम् । महापाते या गति, तिर्यरसपातेपु वा ॥८॥ अफाय आदिकी यतना कहते है- सान्वयार्थ.-घासै चासतेचा परसते हुए मिरियाग पडति=अर कुहरा गिरते हुए यन्तया महागण घायते महागयु-ऑपी के चलते हुए वा और तिरिच्छसपाइमेसु तीड-पतगादिकोके उडते हुए (साधु) न वरेज-गोचरी न टीका-वर्षे पति-पृष्टी सत्याम्, मिहिकाया धूमिकाया पतन्या सत्या महाबाते प्रचण्डपपने नातिन्यति सति, तिर्यसम्पातेषु-तिर्य पतनशीलेषु शलभादिपु सत्सु न चरेत् । 'वासे वासते' इत्यनेन शीकरपातसमयेऽपि गमन निषेधः तस्यापि दृष्टान्तर्भावात् अपफायचिरापनासाधनत्वाच ॥८॥ जावे ॥८॥ , अपकायादिकी यतना कहते हैं-'म चरेज वासे० ' इत्यादि । जब वर्षा परस रही हो, कुहरा (धूअर) पड रहा हो, आँधी चल रही हो, टिड्डी आदि उड रहे हो, तव साधु गमन न करे। 'वासे वासते' इस पदसे यह भी ग्रहण कर लेना चाहिए कि जब फुहारे पड रहे हों तव भी गमन न करे, क्योंकि वह भी वर्षाहीमे अन्तर्गत है और उस समय जानेसे अपकायकी विराधना होती है ॥८॥ प्रथम महाव्रतकी विराधना बतानेके बाद अन्यमहाव्रतोंकी विराधना मायाहिनी यना डे -न चरेज्ज वासे. त्या न्यारे १२५ વરસી રહ્યો હેય, ધુમસ (ઝાકળ પડી રહ્યો હોય આથી ચાલી રહી હોય, ટીડ ઉર્ડ રહ્યા હોય, ત્યારે સાધુ ગમન ન કરે તો તારે એ પાબ્દથી એમ પણ શ્રો કરી લેવું જોઈએ કે જ્યારે વરસાદની ફરફર પડી રહી હોય ત્યારે પણ ન કરે, કારણ કે તે પણ વરસાદમાં જ આવી જાય છે, અને તે સમયે જવાથી અપકાયની વિરાધના થાય છે (૮) પ્રથમ મહાવ્રતની વિરાધને બતાવ્યા પછી હવે બીજા મહા- વિરાધનાના अध्ययन ५ उ. १ गा. १०-११-ब्रह्मचर्यत्रतयतना ३८९ छाया-अनायतने चरतः ससर्गेणाऽभीक्ष्णम् । भवेदाताना पीडा, श्रामण्ये च संशयः॥१०॥ वेश्या के पाडे में एकगार जाने का दोप कह कर अब अनेक वार जानेका दोष कहते हैं- सान्वयार्थः-अणाययणे वेश्याके पाडे अथवा इस प्रकारके दूसरे अयोग्य स्थानों में चरतस्स गोचरी जानेवाले साधुके अभिक्ख गधारवार ससग्गीए ससर्ग होने के कारण चयाण-महानतोको पीला-पीडा हुज होती है अर्थात् वे पित हो जाते हैं। (इतना ही नहीं किन्तु उस साधुके) सामन्नम्मि य चारित्र- साधुपने-में भी ससओन्सन्देह हो जाता है॥१०॥ टीका-अनायतने अयोग्यस्थाने वेश्यागृहसमीपादौ अभीक्ष्ण वारवारम् चरतः पर्यटतः सागः ससर्गेण प्रेक्षणादिसपर्केण (मूले प्राकृतलात्त्रीत्वम्) प्रता- ना=ब्रह्मचर्यादीना पीडा-विरापना, चकारोऽप्यर्थे, नैतावत्येव हानिः किन्वन्या- ऽपीत्याह-श्रामण्ये चारित्रेऽपि सगया पालनीयतासन्देहो भवेत्, तथाहि- दुश्चरब्रह्मचर्यादेर्भविष्यति फल न वा'। चेन्न जाने कियत् कीहा, कदा वा तद्भविष्यति ॥१॥ तथाऽमाप्तमुखप्राप्ति, मुद्दिश्य विहितो मया । उपस्थितमुखत्याग उचितः किं न योचितः ॥२॥” इत्यादि। वेश्या-घरके समीप या ऐसेही अन्य अयोग्य स्थानोंमें बार बार गमन करनेवाले साधुके वेश्याको देखने आदि ससर्गसे ब्रह्मचर्य आदि व्रतोंमें पीडा होजाती है, अर्थात् व्रत दूषित होजाते है। यही एक हानि नहीं है किन्तु उसके श्रामण्य (चारित्र)में भी सदेह होजाता है कि- "इस दृश्चर ब्रह्मचर्यका फल मिलेगा या नहीं, यदि मिलेगा भीती न जाने कितना मिलेगा, कैसा मिलेगा, और का मिलेगा ॥२॥ मैंने अप्राप्त सुखकी प्राप्तिके लिए प्राप्त सुखका त्याग कर दिया है सो यह-उचित किया है या अनुचित ? ॥२॥" इत्यादि । વેશ્યાગ્રહની સમીપે યા એવાજ અન્ય અગ્ય સ્થાને મા વારંવાર જવાવડ વેશ્યાને જેવા આદિ સ સર્ગથી સાધુના બ્રહ્મચર્ય આદિ વ્રતમાં પીડા થઈ જાય છે, અર્થાત્ વ્રત દૂષિત થઈ જાય છે આ એક જ હાનિ નથી પરંતુ એના શ્રમણ્ય (ચારિત્ર)માં પણ આ દેહ ત્પન્ન થાય છે કે-“આ દુર બ્રહ્મચર્યનું ફળ મળશે કે નહિ ?, જે મળશે તે પણ શી ખબર કેટલું મળશે, કેમ મળશે અને કયારે મળશે? (૧) મે અપ્રામ સખની પ્રાપ્રિને માટે પ્રાપ્ત સુખને ત્યાગ કરી નાખ્યો છે "त्यादि 3 ४ ૨ ५ ८ ३८८ श्रीनौकालिकमूत्र घामचारिणा साधोखिोतसिफास्तापलाग्यालोक्नचिन्तनादिपनवरेण चेतो नलिकासमागन्नानासलिनमगारनिरोधे श्रदाभूमिसमुत्पन्नग्रामचर्यमूलकाऽ हिंसासत्याऽम्तेयाऽपरिप्रदरूपाऽऽन्यासादित-मान-क्रियास्कन्धमुर-ममितिगु त्यादिशाखामशाखारिवता-अष्टादशसहस्रशीलापन ध्यान-गुममा-उपवर्ग फलसम्प समृद्धसयमद्रुमशोपिणी चिनफिविर्भवेदिति नत्रार्थः ॥९॥ सकृद्मनदोप प्रतिपादानीमसामनदोपान प्रदर्शयति-'अणायपणे' इत्यादि। मूलम् अणाययणे चरतस्स, ससग्गीए अभिस्खण । हुज्ज वयाण पीला, सामन्नम्मि य ससओ ॥१०॥ १ 'कूड़ा-करकट' 'कचरा' इति मापा । चारी साधुके भी मनमें विकार उत्पन्न होसकता है। अर्थात् वेश्याके रूप-लावण्यका अवलोकन करने और विचार करनेरूप कचरेसे चित्त- रूपी नलद्वारा आत्मामें आता हुआ विशुद्धभावनारूप जलका प्रवाह रुक जाता है। भावना-जलका प्रवार रुक जानेसे वह सयमरूपी तक सूख जाता है, जो तरु श्रद्धारूपी भूमिमें उत्पन्न होता है, ब्रह्मचर्य जिसकी जडे हैं, अहिंसा सत्य-अस्तेय-अपरिग्रह रूपी क्यारी है, जो ज्ञान और क्रियारूपी स्कन्धसे दृढ़ है, समिति-गुप्ति आदि शाखा-प्रशाखाएँ जिसकी फैली हुई हैं, अठारह हजार शीलाङ्ग जिसके पत्ते हैं, ध्यान ही जिसके पुष्प हे, और मुक्ति सम्पत्तिही जिस वृक्षके फल है ॥९॥ एकवार गमन करनेके दोष बताकर बारयार गमन करनेके दोष कहते है-'अणाययणे०' इत्यादि । સાધુના મનમાં પણ વિકાર ઉત્પન્ન થઈ શકે છે અર્થાત વેશ્યાના રૂપ-લાવણ્યનું અવલોકન, વિચાર, ઈત્યાદિરૂપ કચરાથી ચિત્તરૂપી નળદ્વારા આત્મામાં આવતી વિશુદ્ધ ભાવનાજળને પ્રવાહ રોકાઈ જવાથી એ યમરૂપી તરૂ સુકાઈ જાય છે, કે જે તરૂ શ્રદ્ધારૂપી ભૂમિમાં ઉત્પન્ન થાય છે, બ્રહ્મચર્ય જેના મૂળ છે, અહિંસા સત્ય અસ્તેય અપરિગ્રહરૂપી કયારી છે, જે જ્ઞાન અને ક્રિયારૂપી થડ વડે छ, સમિતિ ગુપ્તિ આદિ શાખા પ્રશાખા જેની ફેલાઈ રહી છે, અઢાર હજાર શીલાગ જેના પાદડા છે, ધ્યાન જ જેના પુષ્પ છે અને મુક્તિપત્તિજ તે તરૂના ફળ છે (૯) એકવાર ગમન કરવાના દેષ બતાવીને વાર વાર ગમન કરવાના पताछे-अणाययणे. त्यात .

२ 3 ४ १ ५ १० ૧૨ अध्ययन ५ उ. १ गा. १२-मार्गगमनयतना ३९१ लक्षण विज्ञाय-अवध्य एकान्तम्-एका अद्वितीयः अन्तो-निश्चयो व्रत- रक्षणविषयको मोक्षमाप्तिविपयको वा एकान्तस्तम् आश्रित: आस्थितो मुनिः वेशसामन्त वेश्यापाटकगमन पर्जयेत्=परित्यजेत् । 'पियाणित्ता' इत्यनेन सम्यगवरोधमन्तरेण दोपपरित्यागो याथातथ्येन न सभवतीति, 'एगतमस्सिए' इत्यनेन च मुनिना सतत मोक्षफलक्ष्येण भवितव्यमिति सूचितम् ॥११॥ मार्गयतनामेव विशिप्याऽऽह-'साण' इत्यादि । मूलम्-साण सूइय गावि, दित्तं गोण हय गय । सडिब्भ कलह जुद्ध, दूरओ परिवजए ॥१२॥ छाया-श्वान मूता गा, दृप्त गोण हय गजम् । सडिव्भ कलह युद्ध, दूरतः परिवर्जयेत् ॥१२॥ साधु जहाँ भिक्षा के लिये न जावे उन स्थानो को विशेष रूपसे कहते हैं- सान्वयार्थ -साण जहा काटनेवाला कुत्ता हो सूइयथोडे कालकी व्याई हुई गावि-गाय हो दित्त मदमस्त गोण-गोधा साण्ड अथवा वैल (और) य- घोडा (अथवा) गय हाथी हो (तथा) सडिभ-जहा बच्चे खेल रहे हों कलह परस्पर वाग्युद्ध-गाली-गलोच-हो रहा हो जुद्ध शस्त्र आदिसे युद्ध होता हो (ऐसे स्थानको साधु) दूरओ-दरसे ही परिवनम्वर्जे, अर्थात् ऐसी जगह साधु जानकर व्रतोकी रक्षा और मोक्षकी प्रासिके निश्चयमे स्थितमुनि वेश्याके पाडे (चकले)मे भिक्षा आदिके लिए न जावे । 'वियाणित्ता' पदसे यह सूचित किया है कि भलीभाँति जाने विना दोपका अच्छी तरह परित्याग नहीं हो सकता। 'एगतमस्सिए' पदसेयर प्रगट किया है कि मुनिको सदा मोक्षप्राप्तिका लक्ष्य रखना चाहिये ॥११॥ मार्गकी पतनाको विशेषरूपसे बताते हैं- 'साण' इत्यादि । જાણુને તેની રક્ષા અને મોક્ષની પ્રાપ્તિના નિશ્ચયમાં સ્થિત મુનિએ, વેશ્યાના મહેડલામાં ભિક્ષા આદિને માટે જવું નહિ વિવાળા રાબ્દથી એમ સૂચિત કર્યું છે કે-સારી રીતે જાણ્યા વિના દેને સારી પેઠે પરિત્યાગ થઈ શખ્ત નથી જગતમક્ષિણ શબ્દથી એમ પ્રકટ કર્યું છે કે મુનિએ સદા મોક્ષપ્રાપ્તિનું લય રાખવું જોઈએ (૧૧) માર્ગનીયતનાને વિશેષરૂપે બતાવે છે હાથ ઇત્યાદિ २ ५ 3 - ८ ३९० श्रीदशवकालिकमंत्र यद्वा-चकारादत्र' याहा रिचिकित्सा-भेटी-न्माद दीर्घकालिकरोग केवलि- भशप्तधर्मभ्रशादयो दोषाः समृदान्ते ॥१०॥ उपसहरति-'तमा एय' इत्यादि । मूलम् तम्हा एय वियाणिता, दोस दुग्गइवण वजए वेससामत, मुणी एगतमस्सिए ॥११॥ जया-तस्मादेत विज्ञाय, दोप दुर्गविपद्धनम् । पर्जयेद्वेगसामन्त, मुनिरकान्तमाश्रित ॥११॥ सान्वयार्थ:-तम्हा=इसलिए दुग्गइवडण दुर्गतिको बढानेवाले एय-इस दोस-दोपको चियाणित्ता मानकर एगतमस्सिा-मोक्षाभिलापी मुणी-भुनि वेससामते वेश्याके पाडे-मोहल्ले-को बनए वर्जे अर्थात् भिक्षादिके लिए वहा नही जावे । भावार्थ-इस प्रकारके ससर्गसे साधुफा मन उद्विग्न हो जानेसे मनमें अनेक कुतर्कणाए होने लग जाती है, तब उसका मन ज्ञान भ्यान-आदि शुभ कार्यों में नहीं लगकर आन-रौद्र ध्यान करने लगता है। इसलिए साधु ऐसे ससर्गको ही टाले ॥१२॥ टीका-तस्माद्धेतो. एत=पूर्वोक्त दुर्गतिवर्दन दुर्गतिमापक दोपतविराधनादि अथवा गाथामें आये हुए 'च' शब्दसे विपयसेवनकी आकाक्षा, सयमसे घृणा, भेद, उन्माद, दीर्घकालिक रोग और केवलीप्ररूपित धर्मसे भष्टता आदि अनेक दोप समझ लेना चाहिये । अर्थात् ऐसे अयोग्य स्थानोमे गमन करनेसे इत्यादि दोष होते हैं ॥१०॥ उपसहार करते हैं-'तम्हा एय' इत्यादि । इसलिए इस दुर्गतिको बढानेवाले, व्रतोंकी विराधनारूप-दोषको અથવા ગાથામાં આવેલા જ શબ્દથી વિષય–સેવનની આકાલા, સયમથી ઘણા, ભેદ, ઉન્માદ, દીર્ધકાલિક રેગ અને કેવળી પ્રરૂપિત ધર્મમાથી ભ્રષ્ટતા આદિ અનેક દેશે સમજી લેવા અર્થાત્ એવા અગ્ય સ્થાનેમા ગમન એ પ્રકારના દેવ થાય છે (૧૦) पसार ४२ छ-तम्हा एय त्यादि એટલા માટે, એ દુર્ગતિને વધારવાવાળ, તેની વિરાધના૫ દેશને કરવાથી ૨ 3 ६ ७ 10 १२ अध्ययन ५ उ.१ गा. १२-मार्गगमनयतना ३९१ लक्षण विज्ञाय अवध्य एकान्तम्-एका अद्वितीयः अन्तो-निश्चयो प्रत- रक्षणविषयको मोक्षमाप्तिविपयको वा एकान्तस्तम् आश्रितः आस्थितो मुनिः वेशसामन्त=पेश्यापाटकगमन वर्जयेत् परित्यजेत् । 'पियाणित्ता' इत्यनेन सम्यगमोधमन्तरेण दोपपरित्यागो याथातथ्येन न सभवतीति, 'एगतमस्सिए' इत्यनेन च मुनिना सतत मोकलक्ष्येण भवितव्यमिति सूचितम् ॥११॥ मार्गयतनामेव विशिप्याऽऽह-'साण' इत्यादि । मूलम् साणं सूइय गार्वि, दित्तं गोण हय गय । सडिब्भ कलह जुद्ध, दूरओ परिवज्जए ॥१२॥ छाया-श्वान मूता गा, दृप्त गोण हय गजम् । सडिब्भ कलह युद्ध, दूरतः परिवर्जयेत् ॥१२॥ साधु जहाँ भिक्षा के लिये न जावे उन स्थानो को विशेप रूपसे कहते हैं- सान्वयार्थ.-साण-जहा काटनेवाला कुत्ता हो सूइयथोडे कालकी व्याई हुई गावि-गाय हो दित्त मदमस्त गोण=गोगा साण्ड अथवा वैल (और) य= घोडा (अथवा) गय हाथी हो (तथा) सडिभ जहा बच्चे खेल रहे हों कलह परस्पर वाग्युद्व-गाली-गलोच-हो रहा हो जुद-शस्त्र आदिसे युद्ध होता हो (ऐसे स्थानको साधु) दूरओ-दसे ही परिवज्जवर्जे, अर्थात् ऐसी जगह साधु जानकर व्रतोकी रक्षा और मोक्षकी प्राप्तिके निश्चयमे स्थितमुनि वेश्याके पाडे (चकले)में भिक्षा आदिके लिए न जावे । 'वियाणित्ता' पदसे यह सूचित किया है कि भलीभाँति जाने विना दोषका अच्छी तरह परित्याग नहीं हो सकता। 'एगतमस्सिए' पदसे यह प्रगट किया है कि मुनिको सदा मोक्षप्राप्तिका लक्ष्य रखना चाहिये ॥११॥ मार्गकी यतनाको विशेषरूपसे बताते हैं- 'साण.' इत्यादि । જાવીને તેની રક્ષા અને મેક્ષની પ્રાપ્તિના નિશ્ચયમાં સ્થિત મુનિએ, વેશ્યાના મહોલ્લામાં ભિક્ષા આદિને માટે જવું નહિ વિશાળના રાબ્દથી એમ સૂચિત કર્યું છે કે–સારી રીતે જાણ્યા વિના દેને સારી પરે પરિત્યાગ થઈ શરતે નથી રમણિ શબ્દથી એમ પ્રકટ કર્યું છે કે મુનિએ સદા મેક્ષપ્રાપ્તિનું લક્ષ્ય રાખવું જોઈએ (૧૧) માર્ગનીયતાને વિશેષરૂપે બતાવે છે સાળ૦ ઈત્યાદિ १ ૨ ५ ३९२ श्रीदशवकालिकास्त्रे कदापि गोचरी नहीं जाये। मानार्थ-पेसे स्थानमें गोचरी जानेसे कुत्ते आदिके फाटखाने आदिके फारण तया पात्रे पटनाने आहार गिरनाने आदि अनेक प्रकारसे सयम और आत्मा दोनोकी गिराधना होती है ॥१२॥ टीका-पान फुरफुर, 'दप्त'-मितीदाऽपरुप्य सम्बध्यते, तथाच-दप्तम्-उद्धत दशनस्वभारम् उन्मादिन येत्यर्थः, नरममतशुन्या अप्युपलक्षणमेतत् । मूतानव- प्रसूता गा-सौरभेयी, नवमगृतमहिप्या अप्युपलक्षणाद् ग्रहणम् , हम-चण्डस्वभाव गोणपभ, इयचोटक, गज हस्तिन च, सढिन्म-शिशुक्रीडनस्थान, कलह- वाग्युद्ध, युद्धम् दण्डादण्डि-शधाशस्ति-प्रभृतिकम् दूरतः परिवर्जयेत् , आत्मसयमो भयविराधनाहेतुसात् ॥१२॥ गमनमकारमाइ-'अणुन्नए' इत्यादि। मूलम्-अणुन्नए नावणए अप्पहि? अणाउले । इदियाइ जहाभाग दमइत्ता मुणी चरे ॥१३॥ छाया-अनुन्नतो नावनतोऽमहष्टोऽनाकुलः । इन्द्रियाणि यथाभाग, दमयित्वा मुनिश्चरेत् ॥१३॥ जहां उन्मत्त (पागल-हडक्या) या काटनेवाला कुत्ता, नयी बियाई हुई (प्रसूता) कुतिया, नवप्रसूता गाय या नवप्रसूता भैस आदि, मदो न्मत्त थैल, घोड़ा राथी हों उस स्थानको, तथा बच्चोंके खेलनेके, कलह (मुंहकी लडाई) के और युद्ध (शस्त्रकी लडाई) के स्थानको साधु दूरसे त्यागे । अर्थात् जहाँ ये मय हो वा न जावे-दूर ही रहे, क्योंकि इससे आत्मविराधना सयमचिराधना और उभयविराधना होती है ॥१२॥ चलनेका प्रकार करते है-'अणुन्नए.' इत्यादि । જ્યા ઉન્મત્ત (ગા-હડકાયે) અથવા કરડનાર કૂતરો, નવી વિયાયલી (પ્રસૂતા). કુતરી નવપ્રસૂતા ગાય એ નવપ્રસૂતા મેશ આદિ, મન્મત્ત બળદ ઘેડે હાથી ઇત્યાદિ હોય સ્થાનને, તથા બાળકોએ રમવાના, કલહ (હોની લડાઈ)ના અને યુદ્ધ (શસ્ત્રની લડાઈ)ના સ્થાનને સાધુ દૂરથી જ ત્યાગે, અર્થાત્ જ્યા બધા ય ત્યા ન જાય–દૂર જ રહે, કારણ કે તેથી આત્મવિરાધના, સયમવિરાધના અને ઉભયવિરાધના થાય છે (૧૨) यासवान ४९ छे-अणुन्नए०४त्यादि ।

अध्ययन ५ उ. १ गा. १३-गोचर्या कायचेष्टामकारः ३९३ गोचरी में घूमते हुए साधु को किस मकार की चेष्टा रखनी चाहिये सो बताते हैं- सान्वयार्थः-मुणी-गोचरीमें घूमता हुआ साधु अणुन्नर-द्रव्यसे ऊचा नहीं देखनेवाला, भावसे जात्यादिगवरहित नावणए-द्रव्यसे शरीरको अत्यन्त नहीं नमानेवाला, भावसे दीनतारहित अप्परिटे-मिलनेवाले आहार आदिके विचा- रसे रहित अणाउले इष्ट अनिष्ट आहार आदिकी प्राप्ति होना न होना आदि व्याकुलतासे रहित (साधु) इदियाइन्श्रोत्र आदि इन्द्रियोका जहाभाग-यथाक्रम अर्थात् जिस समय जिस इन्द्रियका विषय उपस्थित हो उस समय उस इन्द्रियका दमइत्ता दमन-निग्रह-करके चरे-विचरे ॥१३।। टीका-अनुन्नतः-अनुच्छूितः, स च द्रव्यत ऊर्जानवलोकयिता, भावतो जात्यादिगवरहितः, नापनतः नातिमहः, स द्रव्यतो नातीवनताग , भावतो देन्य- रहितः। अमहट. अप्रमुदितः उपलप्स्यमानाहारवस्त्रपानादिभावनाजन्यप्रमोदरहित इत्यर्थः । अनाकुलः अक्षुब्धः इष्टाऽलाभाऽनभीष्टलाभभावनाजनितमनःक्षोभवजित इत्यर्थः, मुनिः इन्द्रियाणि श्रोत्रादीनि यथाभाग भन्यते-सेव्यते इति भागा= विपयः, भागमनतिक्रम्य यथाभाग-यथाविपय यस्येन्द्रियस्य यो विषयः सम्प्राप्त स्तमनुसृत्येत्यर्थः, दमयिखा-निगृह्य मनोज्ञा ऽमनोज्ञशब्दादिविषयेषु रागापरागपरि- त्याग कृत्येत्यर्थः, चरेत् । मार्गमे चलते समय साधु अनुन्नत अर्थात् द्रव्यसे ऊपरकी ओर न देखता हुआ, और भावसे जाति कुल आदिके अभिमानसे रहित, नाव- नत अर्थात् न्यसे अत्यन्त न झुका हुआ, तथा भावसे दीनतारहित, अप्रहृष्ट अर्थात् मिलनेवाले आहार आदिके विचारसे प्रमोदरहित, अनाकुल अर्थात् इष्टकी अप्राप्ति तथा अनिष्टकी प्राप्तिके विचारसे उत्पन्न होनेवाली व्याकुलतासे रहित मुनि जहाँ जिस इन्द्रियका विषय उपस्थित हो वहाँ उस इन्द्रियका दमन करके अर्थात् मनोजविषयमेंरागऔर अम- नोज्ञ विषयमे द्वेपका परित्याग करता हुआ भिक्षा आदिके लिए विचरे। માર્ગમાં ચાલતી વખતે સાધુ અનુન્નત અર્થાત દ્રયથી ઉપરની બાજુએ ન જેતા અને ભાવથી જાતિકુળના અભિમાનથી રહિત, નાવનત અર્થાત દ્રવ્યથી અત્યન્ત ન નમ્યા વિના તથા ભાવથી દીનતા રહિત અપાઠુણ અર્થાત મળવાના આહારદિના વિચારથી પ્રદરહિત, અનાકુવ અર્થાત ઈછની પ્રાપ્તિ તથા અનિચ્છની પ્રાપ્તિના વિચારથી ઉત્પન્ન થનારી વ્યાકુળતાથી રહિત જ્યા જે ઈદ્રિયને વિષય ઉપસ્થિત હોય ત્યા તે ઈદ્રિયનું દમન કરીને અર્થાત્ મને ન વિષયમાં રાગ અને અમનેણ વિષયમા હેપને પરિત્યાગ કરતા, ભિક્ષા આદિને માટે વિચરે १ ३९४ श्रीदर्शकालिको २ 3 ४ ५ ७ १० . 'अणुन्नए' 'नारणए' इत्येताभ्यामीर्यायतनाऽङ्गारसर्जनदेन्यराहित्यानि सचितानि । 'अप्पहिडे' इत्यनेन मा यस्थ्य योधितम् । 'अगाउले इतिपदेन सायो रसलोलपत्य निराकृतम् । 'जहामाग' इत्यनेन च यत्र यस्येन्द्रियस्य विषय माप्तिस्तत्र तस्यैपदमन वास्तविकमिन्द्रियदमन, न तु दर्शनविषये कर्णपिधानमित्यादि घोध्यम् ॥१३॥ मूलम् दवदवस्स न गच्छेना, भासमाणो य गोयरे। हसतो नाभिगच्छेना, कुल उच्चावय सया ॥१४॥ छाया-द्रुतगुवस्य न गच्छेत्, भापमाणश्च गोचरे । इसन् नाभिगच्छेत्, कुलमुच्चारच सदा ॥१४॥ सान्वयार्य:-गोयरे-भिक्षाचरीमें (साधु) दवदवस अति शीघ्रतासे दडबड दौडता हुआ य तथा भासमाणो बोलता हुआ न गच्छेजा-नही चले (और) हसतोहँसता हुआ भी नाभिगच्छेना नहीं जावे, (तथा) उच्चावय- उच्च-द्रव्यसे सप्तभूमिक महलोंगाले, भारसे-धन-धान्यादिसे समृद्ध, नीच-द्रव्यसे घासफूसकी झोपडीवाले, भावसे धन-धान्यादिरहित कुल-कुलमें सया-हमेशा जावे। (२श्रु १अ २उ.) आचारागसूत्रमें बताये हुए सब कुलोंमें भिक्षाके लिए जावे 'अणुन्नए' और 'नावणए' इन दो पदोंसे ईर्याकी यतना, अह कारका परिहार और दीनताका त्याग सूचित किया है। 'अप्पहिले' पदसे मध्यस्थता प्रगट की है। 'अणाउले' पदसे साधुकी रसलोलुपताका निराकरण किया है । 'जहाभाग' पदसे यह प्रदर्शित किया है कि जहाँ जिस इन्द्रियकाविषय उपस्थित हो वही उसका दमन करना ही वास्तवमे इन्द्रियदमन कहलाता है, किन्तु चक्षुइन्द्रियका विषय उपस्थित होनेपर यदि कान मूंद लिए जायँ तोइन्द्रिय दमन नही कहलासकता, इत्यादि॥१३॥ अणुन्नए भने नारणए मे मे शहाथी ध्यानी यता मा परि હાર અને દીનતાને ત્યાગ સૂચિત કર્યો છે મદદે શબ્દથી મધ્યસ્થતા પ્રન્ટ श छ अणाउले श०४थी साधुनी सोलुपतातु निरा४२९ ४यु छ जहाभाग શબ્દથી એમ પ્રદર્શિત કર્યું છે કે જ્યા જે ઈદ્રિયને વિષય ઉપસિથત હોય ત્યાં તેનું દમન કરવું એજ વસ્તુત ઈદ્રિયદમન કહેવાય છેકિંતુ ચક્ષુ ઈદ્રિયને વિષય ઉપસ્થિત થતા જે કાન સ કેચવામાં આવે તે 'તે ઇંદ્રિયદમન કહેવાતું नथी त्याहि (13) अ ययन ५ उ १ गा. १४-गोचो कायचेष्टामकारः ३९५ अर्थात् जिस समय जिस देशमें जो कुल दुगुछित न हो उन सब कुलोमें गोचरी जावे, साधुको चाहिए कि ईर्यासमिति सोधता हुआ रागद्वेपरहित होकर भिक्षाके लिए विचरे ॥१४॥ टीका-गोचरे-मिक्षाया भिक्षार्थमित्यर्थः, द्वतद्रुतस्य शीघ-शीघ्रम् ‘दवदवे' त्यस्याव्ययत्वेऽप्यार्पवात्सविभक्तिकत्वम्, यद्वा क्रियाविशेषणवेन द्वितीयान्त'- तौचित्येऽप्यात्विात्पप्ठयन्तखम् , न गच्छेत्न्न यायात् । भापमाण: सलपन चन्तया इसन् हास्य कुर्वन् नाभिगच्छेत् । उच्चावचम्-उदक् च अवाक् च इत्यु- चावचम्-('मयूरव्यसकादयश्व' (२।११७२) इति निपातनात्समासः सिद्भिश्च ) उच्चनीचात्मकमनेकविधमित्यर्थः । 'उच्चावच नैकभेद'-मित्यमरः । कुल गृहम् । तर द्रव्यत उच्चगृह-सप्तभूमिस्मासादादिम् , शारदशशाङ्क घनसार-हार-नीहार कुन्दा- बदातमुधोज्ज्वलहादिक प्रोत्तद्गतोरणादिक च । भावत उच्चगृह-धनधान्यादि- १ धातूपात्तभावना पति फलाशस्य कर्मीभूततया फलसामानाधिकरण्ये द्वितीया। २ 'कुल जनपदे गोत्रे, सजातीयगणेऽपि च । भवने च तनौ क्लीव'-मिति मेदिनी।। दवदवस्स० ' इत्यादि ।साधु गोचरीके लिए जल्दीर (दडपड२) न चले। यातचीत करता हुआ, तथा हँसता हुआ भी गमन न करे।उच्चनीच अर्थात् धनवान् और निर्धन आदिके कुलोंमें सदा भिक्षाके लिए जावे । उच्च कुल दो प्रकारका है-(१) द्रव्यसे उच्च और (२) भावसे उच्च । (१) सतमजिला आदि, शरदऋतुके चन्द्रमा, कपूर, हार, बर्फ, या कुन्द पुष्पके समान स्वच्छ, कलई (चूना) पोतनेसे जगमगाता हुआ, और जिसका फाटक खून ऊचा हो ऐसे महल आदि द्रव्य-उच्च कहलाते हैं। (२) धन-धान्यरूपी सम्पत्तिसे समृद्ध कुल भावसे उच्च कहलाता है। नीचा कुल भी दो प्रकारका है- दवदवस्स० त्या साधु गोयरीन भाटे आपण ताqat વાત ચીત કરતે કે હસતે હસતો પણ ન ચાલે ઉચ્ચ નીચ અર્થાત્ ધનવાન નિર્ધન આદિના કુળમા સદા ભિક્ષાને માટે જાય ઉચ્ચકુળ બે પ્રકારના છે (૧) દ્રવ્યથી ઉચ્ચ અને (ર) ભાવથી ઉચ્ચ (१) सात मला त्य, श६.तुन। यद्रमा ५२, (भातीनो) २, ३२६ या કુદપુષ્પની પેઠે વરછ (ત) હોય, ચૂને પેળવાથી ઝગમગતે હોય અને જેનું ફાટક ખૂબ ઉચુ હોય એ મહેલ આદિ દ્રવ્ય-ઉચ્ચ કહેવાય છે (૨) ધન ધાન્યરૂપી સંપત્તિથી સમૃદ્ધ કુળ ભાવથી ઉચ્ચ કહેવાય છે નીચકુળ પણ બે પ્રકારના હોય છે -- ન ચાલે - ३९६ श्रीदनवैकालिकम्त्रे सम्पदा समृद्रम् । ट्रव्यतो नीचगृह-धनधान्यादिरहित दरिगृहम् , सदा सर्वदा अभिगन्द्र चरेत् । अथवा उच्चारचशन्देन उग्रकुलादीनि गृह्मन्ते, तथाहि- 'उग्गकुलाणि या भोगलाणि पा राइनकुलाणि पा सत्तियकुलाणि वा इक्खागकुलाणि वा हरिपसकुलाणि पा सियकुलमणि पा रेसियकुलगणि वा गडागकुलाणि या कोहागकुलाणि या गामरक्सकुलमणि या सुवासकुलाणि वा अन्नयरेस वा तहापगारेसु कुलेमु अदुगुछिएस गरहिएस असण वा४ फामुय जाव पडिगाहिज्जा (म. ११- आचाराग २ श्रु० १ अ. २ उ)। अत्र 'अदुगुछिएम' 'अगरहिए' इति पदाभ्या यस्मिन् समये यत्कुल मजुगुप्सितमगर्हित भोत्तदा तस्मिन्नेर कुले गन्तव्यमिति योध्यते । अब 'दपदवस्से '-त्यादिना पट्कायरक्षणविचक्षणता समाख्याता । (१) द्रव्यसे नीचा, और (२) भावसे नीचा। (१) घास, लफडी, घास, फससे घनेष्टुए झोंपडेको द्रव्यसे नीचा कहते हैं । (२) धन-धान्य आदि सपत्तिसे रहित निर्धनके कुलकोभावसे नीचा कहते हैं । इन सब प्रकारके घरोंमें साधु भिक्षाके लिए जावे । अथवा 'उच्चावच' शब्दसे उग्रकुलादि समझ लेना चाहिए। वे बारह प्रकारके कुल आचाराग सूत्र में (२श्रु०१अ०२० ११मे)भगवानने कहे हैं । आचाराग सूत्रमे आये हुए 'अदुगुछिए' और 'अगरहिए' पदसे यह सूचित किया है कि जिस देश और जिस समयमे जो कुल अनिन्दित और अगहित हो उसमें मुनि, भिक्षाके लिए जावे । यहा 'दवदवस्स' इत्यादि पदसे पटकायकी रक्षामे सावधानी प्रगट की है। (१) व्यथी नीयु मने (२) लापथा नीयु (१) पास, सास, घास-पाथी બનેલા ઝુપડાને દ્રવ્યથી નીચુ કહે છે (૨) ધન ધાન્યાદિ સંપત્તિથી રહિત નિધનના કુળને ભાવથી નીચુ કહે છે એ સર્વ પ્રકારના ઘરમા સાધુ ભિક્ષાને માટે જાય અથવા રચાવા શબ્દથી ઉગ્નકુળાદિ સમજી લેવા જોઈએ એ બાર પ્રકારના કુળ આચારગ સૂત્રમા (રહ્યુ-૧૨ઉ સુ૧૧મા) ભગવાને કહ્યા છે આચારગ સૂત્રમાં આવેલા ગછિ અને ગાઝિપ શબ્દથી એમ સૂચિત કર્યું છે કે જે દેશ અને જે સમયમાં જે કુલ અનિદિત અને અગહિત હોય તેમા મુનિ ભિક્ષા માટે જાય ही दवदवस्य त्या शहाथी ५६४ायनी रक्षामा सावधानी ८४श छ ૨ ७ अध्ययन ५ उ.१ गा. १५-गोचर्या कायचेष्टामकारः ३९७ 'भासमाणो' पदेनैकस्मिन् समये कार्यद्वय सोपयोग निष्पत्तु न सभवतीति, 'इसतो' इत्यनेन गाम्भीर्यम् , 'उच्चावच०' इत्यादिना प्रतिवन्धराहित्य समतासाहित्य च घोतितम् ॥१४॥ मूलम्-आलो थिग्गलं दारं, सधि दगभवणाणि य । चरंतो न विणिज्झाए, सकहाण विवजए ॥१५॥ छाया-आलोक विग्गल द्वार, सन्धि दकभवनानि च । चरन् न विनिर्ध्यायेत्, शङ्कास्थान विवर्जयेत् ॥१५॥ सान्वयार्थः-चरतों=भिक्षाके लिए घूमता हुआ साधु आलोय जाली-झरो- खेकी तरफ थिग्गलट आदिसे भरे हुए भीतके छिद्रकी तरफ दारदरवाजेकी तरफ सधि भीतकी साधकी तरफ अथवा चोरीद्वारा किये हुए भीतके छेदकी तरफ य-तथा दगमवणाणि=पलेण्डा आदिकी तरफ न विणिज्झाएटकटकी लगाकर नही देखे, (क्योकि ये सर) सकट्ठाण शङ्काके स्थान हैं, (इसलिए इन्हें) विवज्जए विशेषरूपसे त्यागे। भावार्थ ऐसे स्थानोको देखनेसे गृहस्थको साधुके प्रति चोर लम्पट आदिका सन्देह उत्पन्न हो जाता है, तथा एपणाकी यथोचित शुद्धि भी नहीं होती ॥१५॥ टीका-'आलोअ.' इत्यादि। चरन-भिक्षितु गच्छन् मुनिः आलोक वाता- यनजालिकाप्रभृति, थिग्गल-देशीयभापया प्रसिद्ध भित्यामिष्टकादिरचितम् , 'भासमाणो' पदसे यह प्रगट किया है कि एक ही साथ दो कार्य उपयोगपूर्वक नहीं हो सकते।'हसतो' पदसे गभीरता द्योतित की है और 'उच्चायय०' इत्यादि पदसे प्रतिध (नेसराय)-रहितता और समतासे सहितता प्रगट की है ॥१॥ 'आलोय.' इत्यादि । भिक्षा लेनेके निमित्त गमन करता हुआ मुनि झरोखा, जाली, भीत, दरवाजा, सेंध (चोरों द्वारा दीवार में किया માસનાળો શબ્દથી એમ પ્રકટ કર્યું છે કે એકીસાથે બે કાર્યો ઉપગપૂર્વક થઈ શક્તા નથી તો શબ્દથી ગભીરતા પ્રકટ કરી છે અને સાવિ ઈત્યાદિ શબ્દોથી પ્રતિબધ (મરાય) રહિતતા અને સમતાથી સહિતના ४२री छ (१४) पालोय त्याहि भिक्षाने भाटे गमन तो मुनि ३३, नी, नीत, દરવાજે, ચારે પલ્લુ બાકુ (બારીયાથી પડેલ બાકરૂ) અને ઉદકભવન અર્થાત મકર २ 3 ७ ३९८ श्रीदशकालिको द्वार-विपरम् , सन्धि-तस्करादिखातमित्तिमाग दकभवनानिमलस्थानानि, 'चे ति समुचपे, न नै चिनिर्यायेत् सविशेष पिलोकयेत् । यत एतानि (आलो- कादीनि) शङ्कास्थानानिम्साघोराचारपिययसन्देहोत्पादास्थानानि, सूत्रे जाताचेकवचनम् , अतस्तानि विवर्जयेतविशेषेण परित्यजेत् ॥१५॥ मूलम्-रन्नो गिहवईणं च, रहस्सारखियाण य । सकिलेसकर ठाण, दूरओ परिवजए ॥ १६ ॥ छाया-रामो गृहपतीना च, रहस्यमारक्षकाणा च । सक्लेशकर स्थान, दूरतः परिवर्जयेत् ॥१६॥ सान्वयार्थ:-रन्नो चक्रवर्ती आदि राजा महाराजाओंके च-तथा गिह वईण-शेठ आदि सद्गृहस्थोंक च=और आरक्खियाण-नगरके रक्षक-कोतवाल आदिके रहस्स-सलाह करनेके एकान्त स्थानको (साधु) दूरओ-दहीसे परि- वज्जए त्यागे; (क्योंकि ऐसे) ठाणं स्थान सकिलेसकर असमाधिको पैदा करनेवाले होते हैं । भावार्थ राजा आदिकोके एकान्त स्थानकी तर्फ देखनेसे अथवा वहा जानेसे उनको साधुके पति क्रोध अश्रद्धा होना आदि अनेक दोषोंकी सभावना है ॥१६॥ टीका:~ रन्नो' इत्यादि । राज्ञः चक्रवर्द्धचक्रिमभृतेः, गृहपतीना-गृहस्वा मिना श्रेष्ठयादीनाम् आरक्षकाणा नगररक्षिणा च रहस्य-रहसि-एकान्ते भव हुआ छेद-सन्धि) और उदकभवन अर्थात परेंडा आदि की तरफ दृष्टि न डाले, क्योकि ये शकास्थान हैं, इनकी ओर देखनेसे लोगोंको साधुके चारित्रमें सन्देर उत्पन्न होता है, अतण्व इन शकास्थानोका विशेष रूपसे परित्याग करना चाहिए ॥१५॥ 'रन्नो०' इत्यादि। जिस एकान्त भवनमें चक्रवर्ती, अर्द्धचक्री, माण्डलिक आदि राजा, श्रेष्ठी (सेठ) आदि गृहस्थ और नगरकी रक्षा પાણી આરાની તરફ દૃષ્ટિ ન નાખે, કારણ કે એ બધા શકાસ્થાને છે તેની તરફ જોવાથી લેકેને સાધુના ચરિત્રમાં સદેહ ઉત્પન્ન થાય છે તેથી એ શકાસ્થાને વિશેષરૂપે પરિત્યાગ કર (૧૫) રન્ના ઈત્યાદિ, જે એકાન્ત ભવનમાં ચક્રવતી, અર્ધચકી, માલિક આદિ રાજા, શ્રેણી (શેઠ) આદિ ગૃહસ્થ અને નગરની રક્ષા કરનારા (કેટવાળ) વગેરે સલાહ .

२ ७ १३ अ ययन ५ उ. १ गा. १६-१८-गोचर्या कुल(गृह)प्रवेशविधिः .३९९ रहस्य मन्त्रगृहम् , सक्लेशकरम् असमाधिजनक स्थान हेतु गर्भमिद विशेषण तथा च सकेशकरत्वादित्यर्थः, दूरतः परिवर्जयेत् सर्वथा सत्यजेत् ॥१६॥ मूलम्-पडिकुठं कुलं न पविसे, मामग परिवजए। अचियत्तं कुल न पविसे, चियत्तं पविसे कुल ॥१७॥ छाया-मतिकष्ट कुल न भविशेत , मामा परिवर्जयेत् । अचियत्त कुल न भविशेद , चियत्त प्रविशेत्कुलम् ॥१७॥ सान्वयार्थः-पडिकुट शावनिषिद्ध कुल-कुल घर में न पविसेम्प्रवेश नहीं करे, मामग-कृपणके परको परिवजए घरजे-नही जावे, अचियत्तंमतीति- रहित अथवा मीतिरहित कुल-कुल घर में न पविसेम्प्रवेश न करे, (किन्तु) चियत्त-प्रतीति और प्रीतिवाले कुल-घरमें पविसेम्प्रवेश करे ॥१७॥ टीका-'पडिकुटु०' इत्यादि । प्रतिनिपिद्ध, कुल=गृह न पविशेष, मामा'मा मदीय गृह श्रमणा' प्रविशन्तु'-इति प्रतिषेधकारिणो गृह तथा- सामयिकन्याख्यादर्शनात् , परिवर्जयेत् । अचियत्त=देशीयशब्दोऽयम् अभीतिमन्, यत्र साधुप्रवेशेन गृहिणामप्रीतिर्भवेत् तत् , अप्रतीतिमद्वा अविश्वस्तमित्यर्थ., यत्र गमनेन परेपा साधुविपयेऽप्यविश्वासो भवेत् , तादृश कुल न भविशेत् , करनेवाले (कोटवाल) आदि सलाह करते हों उस भवन को दरहीसे त्यागे, क्योंकि ऐसे स्थान असमाधिको उत्पन्न करनेवाले होते हैं ॥१६॥ पडिकुट' इत्यादि । शास्त्रोंमें निषेध किये हुए घर मे साधु प्रवेश न करे। जिसने अपने घरमे आनेका निपेद्य कर दिया हो कि श्रमण निर्ग्रन्थ हमारे घर पर न आवे उन घरोंका भी साधु त्याग करे । सायु के प्रवेश करनेसे जिस घरवालेको अप्रीति उत्पन्न हो, या जिस कुलमें विश्वास न हो ऐसे कुलमें भी प्रवेश न करे, क्योंकि इससे (ત્રણ) કરતા હેય, એ ભવનને મુનિ દૂરથી જ ત્યાગે, કારણ કે એવા સ્થાને અસમાધિને ઉત્પન્ન કરવાવાળા હોય છે (૧૬) पडिकुछ त्या शास्त्रीमा निषेध ४२। गृहमा माधु प्रवेश न ४२ रे પિતાના ઘરમાં આવવાને નિષેધ કર્યો હોય કે “શ્રમણ નિર્બળે અમારા આવવું નહિ” એવા ઘરને પણ સાધુ ત્યાગ કરે સાધુએ પ્રવેશ કરવાથી જે ઘરવાળાને અપ્રીતિ ઉત્પન્ન થાય, યા જે કુળમાં વિશ્વાસ ન હેય એવા કુળમાં પણ સાધુ પ્રવેશ ન કરે, કારણ કે એથી સાધુયરથી બીજાઓને પણ વિશ્વાસ - ઘરમાં भ २ - श्रीदशवकालिकम्त्रे गृहस्थाना सरलेशसभात् । नन्वेर वार्ड पुत्र मरिशेतदाह-चियतीतिमद भतीतिमद्वा कुल मरिशेत् ॥१७॥ मूलम्-साणीपावारपिहियं, अप्पणा नवपंगुरे । कवाड नोपणुटिजा, उग्गहं सि अजाइया ॥१८॥ छाया-शाणी-भागारपिडितम् आत्मना नाऽपटणुयात् । कपाट नो प्रणुदेव, अपग्रह तस्याऽयाचित्वा ||१८|| सान्वयार्य:-सि (से)-उस गृहस्वामी की उग्गह-आज्ञा अजाइया- लिये विना साणीपावारपिहियम्सन आदिके बने हुए परदेसे ढके हुए घरको अप्पणा-साधु खुद नावपगुरे नहीं खोले, (तया) कवाडं-किवाडको भी नोप- णुल्लिज्जा नहीं उघाडे, तात्पर्य यह है कि गृहस्सामीको पूछकर ही उघाडना चाहिए ॥१८॥ टीका-'साणीपावार०' इत्यादि । तस्य गृहस्वामिनः अवग्रह-निदेशम् , अयाचित्वा अगृहीत्वा आज्ञामन्तरेणेत्यर्थः, शाणीमावारपिडित-शाणी-शणवल्कल- निर्मितजवनिका, भावारम् ऊर्णादिरचितकम्बलादिस्ताभ्या पिहितम् आवृतम् , यद्वा शणीमावारेण-शणरचितपरदया' स्थगित 'द्वार'-मितिशेषः, आत्मना-स्व यम् न अपवृणुयात् नापसारयेत् । तथा कपाटम् अररम् 'किवाडे-ति भाषाप्रसिद्ध नो प्रणुदेदन प्रेरयेत् नोद्घाटयेदित्यर्थ., तदुद्धाटनस्य सानभोजनादिसमासक्ताना १ परदा-परान्-परपुरुपान् दर्शनादानेन धति खण्डयतीति परदा । दूसरोंका साधुपरसे भी विश्वास हट जाता है । साधु उस घरमे प्रवेश करे जिसमें प्रवेश करनेसे गृहस्थको भीति और विश्वास हो ॥१७॥ 'साणीपावार' इत्यादि । गृहस्वामीकी आज्ञा लिये बिना दहर या कम्बल आदि किसी वस्तुसे ढंके हुए या सनके परदासे बद द्वारको तथा किवाडको स्वय न खोले, क्योंकि ऐसा करना स्नानादि હડી જાય છે સાધુ એ ઘરમાં પ્રવેશ કરે છે જેમા પ્રવેશ કરવાથી ગહસ્થને પ્રીતિ અને વિશ્વાસ ઉપજે (૧૭) साणीपावार० ४त्यादि पानीनी माज्ञा सीधा विना टट या क्षणी આદિ કઈ વસ્તુથી ઢાંકેલુ યા સણના પડદાથી બધ કરેલું એવું દ્વાર તથા કમાડ, સાધુ પિતે ન ખેલે, કારણ કે એમ કરવું એ સ્નાનાદિ કરતી સ્ત્રી આદિને , 3 ४ ७ ८ अध्ययन ५ उ. १ गा. १९-गोधयो मलमूत्रव्युत्सर्जनविधिः स्त्यादीनामप्रतीतिकारणत्वाव, तादृशव्यवहारानौचित्याञ्च, तस्मादावश्यकताया तत्स्वामिन पृष्ट्वैवोद्घाटयेदिति भावः ॥१८॥ मूलम्--गोयरग्गपविट्ठो य, वच्च-मुत्त न धारए। ओगासं फासु नचा, अणुनविअ वोसिरे ॥१९॥ छाया-गोचराग्रप्रवष्टिश्च, वर्गों-मूत्र न धारयेत् । अवकाश प्रामुक ज्ञात्वा, अनुज्ञाप्य व्युत्सृजेत् ॥१९॥ सान्धयार्थः-गोयरग्गपविहो-गोचरीमें गया हुआ मुनि वच्च-मुत्तमल और मूत्रको नधारए-नहीं रोके अर्थात् मल-मूत्र-की वापा उपस्थित होनेपर उनके वेगका अबरोध न करे, (किन्तु) फासुय-पाशुक-जीवरहित ओगास स्थण्डिल- भूमिको नचा-जानकर अणुनविय-गृहस्थकी आज्ञा लेकर वोसिरे मल मूत्रका त्याग करे ॥१९॥ टीका-'गोयरग्ग०' इत्यादि । पूर्व निवृत्तवापोऽपि गौचराग्रमविष्टो मुनिः पुनस्तद्वाधायामुपस्थिताया वर्ची-भूत्र-मल प्रस्राव च न पारयेत्नावरुन्ध्यात् । यत उक्तम्-- "ओ मुत्तनिरोहे चक्खूबधाओ भवति, पचनिरोहे जीविओवधाओ करती हुई स्त्री आदिको अप्रतीतिका कारण है, तथा लोकव्यवहारसे भी अनुचित है, अत. आवश्यकता होने पर उसके स्वामीको पूछ करके ही किवाड परदा आदि खोलना चाहिए ॥१८॥ 'गोयरग्ग०' इत्यादि । गोचरी जानेके पहले लघुनीत और वडीनीतकी शकाको निवृत्त करलेने पर भी यदि गोचरीके लिए चले जाने पर पुन लघुशका आदि की शकाहोजाय तोमल-मूत्र को रोके नहीं, क्योंकि कहा है- "मूत्रके निरोध करने से नेत्रोंको हानि होती है और मलका અપ્રતીતિનું કારણ બને છે, તથા લેકવ્યવહારથી પણ અનુચિત છે પડતા તેના ગ્વામીને પૂછી લઈને જ કમાડ પડદો આદિ ખેલવા જોઈએ (૧૮) गोयरग्ग. त्याहि गायशो नया पडा धुनीति भने पहानातिनी શિવાને નિવૃત્ત કરવા છતા પણ જે ગોચરી માટે નીકળી ગયા પછી દુરી લધુ રાકા આદિની શકી થઈ જાય તે મળમૂત્રને રડવા નહિ, કારણ કે કહ્યું છે કે- મૂત્રને નિરોધ કરવાથી તેને હાની થાય છે અને મળને નિરોધ કરવાથી , તેથી જરૂર २ श्रीदशकालिकसूत्रे गृहस्थाना सक्लेशसभवात् । नन्वेर तर्हि कुत्र मरिशेतदाह-चियत्त भीतिमद् प्रतीतिमा कुल प्रविशेत् ॥१७॥ मूलम् साणीपावारपिहियं, अप्पणा नवपंगुरे । कवाडं नोपणुल्लिज्जा, उग्गहं सि अजाइया ॥१८॥ छाया-शाणी मापारपिहितम् आत्मना नाऽपरणुयात् । कपाट नो मणुदेव, अवग्रह तस्याऽयाचित्वा ॥१८॥ सान्वयार्थ:-सि (से)-उस गृहस्वामी की उग्गर थाना अजाइया- लिये विना साणीपावारपिहिय-सन आदिके बने हुए परदेसे ढके हुए घरको अप्पणा साधु खुद नावपगुरे नहीं खोले, (तथा) कवाड-किवाडको भी नोप- णुल्लिज्जा=नहीं उघाडे, तात्पर्य यह है कि गृहस्वामीको पूछकर ही उघाडना चाहिए ॥१८॥ टीका-'साणीपावार०' इत्यादि । तस्य-गृहस्वामिनः अत्रग्रह-निदेशम् , अयाचित्वा अगृहीत्वा आज्ञामन्तरेणेत्यर्थः, शाणीमावारपिडित-शाणी-शणवल्कल- निर्मितजवनिका, पावार अर्णादिरचितकम्बलादिस्ताभ्या पिहितम् आवृतम् , यद्वा शणीमावारेण शणरचितपरदया' स्थगित 'द्वार'-मितिशेपः, आत्मना-स्व- यम् न अपवृणुयात् नापसारयेत् । तथा कपाटम् अररम् 'किंवाडे' ति भाषापसिद्ध नो मणुदेद्न मेरयेत् नोद्घाटयेदित्यर्थः, तदुद्घाटनस्य स्नानभोजनादिसमासक्ताना १ परदा-परान्-परपुरुषान् दर्शनादानेन यति खण्डयतीति परदा । दूसरोंका साधुपरसे भी विश्वास हट जाता है। साधु उस घरमें प्रवेश करे जिसमें प्रवेश करनेसे गृहस्थको प्रीति और विश्वास हो ॥१७॥ 'साणीपावार' इत्यादि । गृहस्वामीकी आज्ञा लिये विना रहर या कम्बल आदि किसी वस्तुसे ढंके हुए या सनके परदासे बद द्वारको तथा किवाडको स्वय न खोले, क्योंकि ऐसा करना स्नानादि હઠી જાય છે સાધુ એ ઘરમાં પ્રવેશ કરે છે જેમાં પ્રવેશ કરવાથી ગૃષ્ણને प्रीति मन AALA S५२ (१७) साणीपावार त्या पाभीनी माज्ञा सीधा विना टट या simul આદિ કોઈ વરતુથી ઢાકેલુ યા સણના પડદાથી બંધ કરવું એવું દ્વાર તથા માડ, સાધુ પિતે ન ખેલે, કારણ કે એમ કરવું એ સ્નાનાદિ કરતી આ આદિ . , अध्ययन ५ उ.१ गा. २०-२२-भिक्षार्थ गृहप्रवेगरिधिः ४०३ . + १ 3 ૫ २ ७ ८ e १० . नेत्याह-यत्रयस्मिन् कोष्ठकादौ, अचक्षुर्विपया अत्र 'अ' 'चक्षुपियः' इति पृथक पदद्वय, तत्र 'अ' इति निपातो नार्थकः 'अभावे नद्य-ऽ-नो-नाऽपी'-त्यमरात् , तथाच-चक्षुविषयः चक्षुरिन्द्रियजन्यव्यापारप्रसरः अन्न भवेदिति शेपः, ततः किमित्याहयाणाः द्वीन्द्रियादयः दुष्पतिलेखकाः दुनिरीक्ष्या भवन्ती'-ति शेपः, तत्र भिक्षा गृहतः साधोरीमैं-पणयोः शुदिन जायते ॥२०॥ मूलम् जत्थ पुप्फाडं वीयाइ, विप्पइन्नाई कुट्ठए । अहुणोवलित्तं उल्ल, दवण परिवजए ॥ २१ ॥ छाया-यत्र पुष्पाणि बीजानि, विपकीर्णानि कोष्टके । अधुनोपलिप्तमाद्र, दृष्ट्वा परिवर्जयेत् ॥२१॥ सान्चयार्थ:-जत्य-जिस कुट्ठए कोठेमें पुप्फाइ-फूल (और) बीयाइ-बीन विप्पइन्नाइविखरे हुए हो उस कोठेको, तथा अहुणोवलित्त-तुरन्तके लिपे हुए उल्लगीले कोठेको दट्टण-देखकर परिवज्जए-बरजे ॥२१॥ टीका--'जत्य' इत्यादि । यत्र कोष्ठके गृहे वा सचित्तानि पुष्पाणि वीजानि वा विप्रकीर्णानि-इतस्ततः प्रस्तानि भवेयुः, यद्वा तत्काललिप्तमत एवाट्टै कोष्ठकादि तत् साधुः परिवजयत्तत्र न गन्छेदित्यर्थः ॥२१॥ ग्रहण न करे। तात्पर्य यह है कि जिस कोठेमें अन्धकारके कारण नेत्रीकी प्रवृत्ति न होती हो, और इसीलिए द्वीन्द्रिय प्राणी सरलतासे दिखाई न देते हों उसमें भिक्षा लेनेसे ईर्या और एषणा की शुद्धि नहीं होती ॥२०॥ 'जत्थ पुष्फाइ० इत्यादि । जिस कोठे आदिमे सचित्त पुष्प सचित्त बीज बिखरे हुए हों, तथा तत्काल लिपनेसे जो गीला हो उस कोठे या अन्य-गृह आदिमे प्रवेश न करे ॥२१॥ છે કે જે ઓરડામા અધકારને કારણે નેત્રે કામ ન કરી શકતા હોય અને તેથી કરીને કીન્દ્રિયાદિ પ્રાણ સહેલાઈથી ન જેડ શકાતા હોય તેમાં ભિક્ષા લેવાથી સાધુની ઈર્યા તથા એષણની શુદ્ધિ જળવાતી નથી (૨૦) जत्य पुप्फाढ० त्याहि २ मा२31 माहिमा सथित पुष्प सयित भी વેરાયલા હોય તથા તત્કાળ લીંપવામાં આવ્યું હોવાથી લીલે હોય તે ઓરડામાં યા ગૃહાદિમાં પ્રવેશ ન કર (૨૧) . २ . ४ ७ ५ ८ ४०२ श्रीदशवकालिकसूत्रे असोहणा य आपपिराइणा इत्यादि। नन्वेव तर्हि किं कुर्यात् ? इत्याह-मासम-निर्जन्तुक निरवयमित्यर्थः, अब- काश-स्थण्डिल ज्ञावा, अनुशाप्य गृहस्थ समून्य तदाज्ञामाठायेत्यर्थः, व्युत्सजे- परित्यजेत् ॥१९॥ मूलम्-णीयदुवार तमसं कुटगं परिवज्जए । अचम्खुविसओ जत्थ, पाणा दुप्पडिलेहगा ॥२०॥ छाया-नीचद्वार तामस, कोष्ठक परिवर्जयेत् । अचक्षुर्विपयो यन, प्राणाः दुष्पतिलेखकाः ॥२०॥ सान्वयार्थः-णीयद्वार नीचे द्वारपाले तमसम्प्रकाशरहित कुट्टगं कोठेको परिवज्जए-बरजे अर्थात् वहा आहार-पानी नही लेवे, क्योकि जत्थ-जहा अचक्खुविसओ आँखका प्रसार नहीं होता (पहा) पाणा द्वीन्द्रिय आदि पाणियोका दुप्पडिलेगा=अतिलेखन नही हो सकता ॥२०॥ टीका–णीयदुवार०' इत्यादि। नीचद्वार नीच-निम्न द्वार प्रवेश-निर्गम- मार्गो यस्य स त तथोक्तम् , तादृशप्रदेशे प्रवेश-निर्गमाभ्यामात्मसयमविराधनायाः सभवात, तामसम्=तमोयुक्तमप्रकाशमित्यर्थः, कोष्ठक-गृहाभ्यन्तरमपवरकादिक परिवर्जयेत् न तत्राऽऽहारादिक गृहीयादित्यर्थः । किं सामान्येनाय निषेध. ' निरोध करने से जीवन को हानि पहुंचती है, तथा बुरी तरह आत्म- विराधना होती है।" तो क्या करे सो बताते है-जीवरहित (निरवद्य) स्थान देखकर गृहस्थकी आज्ञा लेकर उस स्थानमे मल मूत्रका त्याग करे ॥१९॥ 'णीयदुवार०' इत्यादि। नीचे द्वारवाले कोठेमे भिक्षाके लिए नहीं जाना चाहिये, क्योंकि उसमे जाने आनेसे आत्मा और सयमकी विराधनाका सभव है । तथा अन्धकारयुक्त कोठेमे भी आहार आदि જીવનને હાનિ પહોંચે છે, અને ખરાબ રીતે આત્મ વિરાધના થાય છે, તે શું કરવું, તે હવે બવે છે-જીવરહિત (નિરવદ્ય) સ્થાન જોઈને ગૃહસ્થની આજ્ઞા લઈને એ સ્થાનમાં મળ મૂત્રને ત્યાગ કરે (૧૯) णीयदुवार त्या नाया areatm मा२मा निक्षाने भाटे न , કારણ કે તેમાં જવા આવવાથી આત્મા અને સયમની વિરાધનાને સ ભવ તથા અધકારયુક્ત ઓરડામાં પણ આકાર આદિ ગ્રહણ ન કરવા, તાત્પર્ય એ ૫ ૨ ७ १० अध्ययन ५ उ. १ गा. २३-भिक्षार्थ स्थितस्य कायचेष्टामकारः ४०५ प्रलोकेत-पश्येत् , अन्यथा रागादिसम्भवात् । अतिदूर-दातरागमनपदेशात्पर नावलोकेत, साधौ तस्करतादिशङ्कासभवात् । उत्फुल्ल-स्मेर यथा स्यात्तथा नेत्रे विस्फार्येत्यर्थः न विनिर्यायेत्=न पश्येत् । कदाचिद्भिक्षाया अलाभे अजल्पन= दैन्योपालम्भवचनानि अब्रुवन् निवर्चेत अत्यावर्चेत । 'अससत्त' इति पदेन दृष्टयनुरागोऽपाकृतः । 'नाइरा' इत्यादिना साधी चौरवायाशङ्का निराकृता । 'उप्फुल्ल' इत्यादिना, वराकेणानेन साधुना नाव- लोकितो नाप्यनुभूत एतादृशो विभवोऽतोऽय दीनः' इत्यायाशङ्का व्युदस्ता ॥२३॥ मूलम्-अडभृमि न गच्छिज्जा, गोयरग्गगओ मुणी। कुलस्स भूमि जाणित्ता, मिय भूमि परकमे ॥२४॥ अवलोकन न करे। दाता जिस स्थानसे आता हो उस स्थानसे ज्यादा दूर न देखे, क्योंकि दूर तक देखनेसे किसीको ऐसी शका हो जाय कि 'यह चोर है' इत्यादि । किसी पदार्थकी ओर आखें फाड-फाड़ कर न देखे । यदि भिक्षाकी प्राप्ति न हो तो दीन वचन न बोले-न घडघडावे, किन्तु मौनसहित पीछा फिर जावे। अससत्त' पदसे नेत्रविषयक अनुराग का त्याग प्रगट किया है। 'नाइदूरा०' इत्यादि पदसे यह सूचित किया है कि माधुको ऐसा आचरण करना चाहिए जिससे किसीको चोर आदि होनेका सन्देह न हो। उप्फुल्लू' इत्यादि पदसे इस सन्देह को दूर किया है कि कोई यह न समझे कि-'अरे। इस बेचारे साधुने ऐसी विभूति न कभी देखी है और न कभी भोगी है इसलिए यह बडा दीन है ॥२॥ દાતા જે સ્થાનમાથી આવતે હેય એ સ્થાનથી વધારે દૂર ન જેવુ, કારણ કે દૂર સુધી જેવાથી ડેઈને એવી શકા આવી જાય કે “આ ચેર છે” ઈત્યાદિ જે ભિક્ષાની પ્રાપ્તિ ન થાય તે દીન વચન ન બોલવા, કે ન બડબડવું, પરન્તુ મોનસહિત પાછા ફરવું अससत्त० शया नविषय अनुगना त्या ५४८ छ नाइदूरा० ઈત્યાદિથી એમ સૂચિત કરવામાં આવ્યું છે કે સાધુએ એવું આચરણ કરવુ જોડએ કે જેથી કંઈને ચાર આદિ હેવાને સ દેહ ન પડે ૩૦ ઇત્યાદિ શબ્દથી એ સદેહ દૂર કર્યો છે કે કોઈ એમ ન સમજે કે “અરે! આ બિચાર સાધુએ એવી વિભૂતિ નથી કેઇવાર જોઈ અને નથી કોઈવાર ભેગવી તેથી એ गहु दान छ (२) श्रीदशवकालिकसूत्रे 3 १२ " ६ ७ १० ८ मूलम्-एलग दारग साणं, वच्छगं चावि कोहए । उल्लधिया न पविसे, विउहित्ताण व सजए ॥ २२॥ छाया-एडस दारक धान, वत्सम नाऽपि कोष्टके। उल्लसच न भरिशेत, व्यूह्य ा सयतः ॥२२॥ सान्वयार्थ:-एलगभेडदारकचालकसाण=कुत्ते वच्छगबउडे अपिवा- इस प्रकार दूसरे अर्थात् धरा-बकरी पाडा-पाडी आदिको उल्लधिया लाय करके, वा अथवा विहिताण हाय आदिसे हटाकर सजा साधु कोहए- कोठे-घर में न पचिसे प्रवेश नहीं करे ॥२२॥ टीका-एलग' इत्यादि । सयता मिला, एडम्बाहक, दारकम् अर्भकम्- श्वान कुक्कुर, वत्सम गोशिशु पा, अपिशदादजामहिप्यादिशिशुग्रहणम् , उल्ल ध्यअतिक्रम्य व्यूह्य-अपोह्य हस्तादिनाऽपसार्येत्यर्थः, कोष्टके न भविशेत् ।।२२।। मूलम्-अससत्त पलोडज्जा, नाइदूरावलोयए । उप्फुल्ल न विणिज्झाए, नियहिज अयपिरो ॥२३॥ छाया-अससक्त मलोकेत, नातिदमवलोकेत । उत्फुल्ल न विनिायेत् निवताऽजरपन् ॥२३॥ सान्चयार्थः-अससत्त-आसक्तिरहित होकर पलोइजा देखे अर्थात् रागादि पूर्वक किसीको न देखे, नाइदुरावलोयए अत्यन्त दर दृष्टि डालकर लम्बी दृष्टि से न देखे तथा अफल आँखे फाड-फाडकर अथवा मुसकराता हुआ टकटकी लगाकर नविणिज्झाए नहीं देखे, (भिक्षाकी प्राप्ति न हो तो) अयपिरो-कुछभी नहीं बोलता हुभा अर्थात् बडवडाहट नहीं करता हुआ वहासे नियहिज्ज वापस टीका-'अससत्त०' इत्यादि। अससक्तम्-आसक्तिरहित यथास्यात्तथा एलग' इत्यादि । भेड तथा बकरा, बालक, कुत्ता, बछड़ा तथा पाडा-पाडी आदिका उल्लघन करके, अथवा उनको हाथ आदिसे हटाकर साधु कोठे आदिमें प्रवेश न करे ॥२२॥ अससत्त०' इत्यादि । आसक्त होकर रागादिपूर्वक किसीका જ ઈત્યાદિ ઘેટુ તથા બકરૂ, બાળક, કૂતરૂ, વાછડા તથા પાડા પાડી આદિને એળગીને અથવા તેને હાથ આદિથી હઠાવીને સદ્ધ ઓરડામાં પ્રવેશ ન કરે (રર) મત્ત ઈત્યાદિ આસક્ત થઈને ગાદિપૂર્વક કેઈનું અવલોકન ન કરવું - लौट जावे ॥२३॥ ।

२ ४ ५ ७ अध्ययन ५ उ. १ गा. २४-२६-गृहस्थगृहे स्थितिविधिः ४०७ भूमिको पूजकर खडा रहे और सिणाणस्स-स्नानघरकी तर्फ य-तथा वचस्स- टट्टी-पेशाव घरकी तर्फ सलोग दृष्टि परिवज्जए-न डाले ॥२५॥ टीका-'तत्येव०' इत्यादि । विचक्षणः निपुणः तत्र स्वाधिष्ठानस्थान एव भूमिभाग प्रतिलिखेत् सपश्येत् , स्वानस्यन्नानगृहस्य वर्चसम्बर्धेगृहस्य च मलपरित्यागगृहस्येत्यर्थः, सलोकप्रेक्षण परिवर्जयेत् । 'विअक्खणो' इत्यनेना- गीतार्थस्य स्वतन्त्रतया गोचरीगमन निपिद्धम् । 'सिणाणस्स' इत्यादिना च नमस्त्यादिदर्शनाद्रागादिसभव इति सूचितम् ॥२५॥ मूलम् दगमहियआयाणे, वीयाणि हरियाणि य । परिवजतो चिहिज्जा, सविदियसमाहिए ॥२६॥ छाया-दफमृत्तिकाऽऽदान, नीजानि हरितानि च ॥ परिवर्जयस्तिष्ठेत् , सर्वेन्द्रियसमाहितः ॥२६॥ सान्वयार्थ.-(और वहाभी) दगमहियआयाणे सचित्त जल और मिट्टीयुक्त मार्गको बीयाणिशालि आदि बीजोको य=और हरियाणि हरित कायको परिवज्जतोवरजता हुआ अर्थात् उससे हटकर सव्विदियसमाहिए सर इन्द्रियोको गोपता हुआ चिद्विज्जाखड़ा रहे ॥२६॥ 'तत्येव०' इत्यादि । विचक्षण भिक्षु जिस मर्यादित भूमिपर खडा है वहींके भूमिभागका प्रतिलेखन करे, स्नानघर तथा उच्चार आदिके स्थानकी ओर दृष्टि न डाले। 'वियफ्षणो' पदसे अगीतार्थ साधुको स्वतन्त्र गोचरी करनेका निपेध किया गया है। 'सिणाणस्स' इत्यादि पदोंसे-'नग्नस्त्री आदि दीखजानेके कारण रागादि भाव उत्पन्न होना सभव है' यह सूचित किया गया है ॥२५॥ તો ઈત્યાદિ વિચક્ષણ ભિક્ષુ જે મર્યાદિત ભૂમિ પર ઊભે હોય ત્યાના ભૂમિભાગનું પ્રતિવેખન કરે, સ્નાન-ઘર તથા ઉચ્ચાર આદિના સ્થાન (onar३)नी तर नि ३३ वियक्खणो थी ताय साधुन स्वतत्र ગોચરી કરવાનો નિષેધ કરવામાં આવ્યું છે તાર ઈત્યાદિ પદેથી સ્ત્રી આદિ દેખાઈ જવાને કારણે રાગાદિ ભાવ ઉત્પન્ન થવા સભવ છે એમ સૂચિત કરવામાં આવ્યું છે (૫) .

3 श्रीशिवकालिकाने छाया-भतिभूमि न गच्छेद , गोचराग्रगतो मुनिः । फुलस्य भूमि शाखा, मिता भूमिं पराकामेत् ॥२४॥ सान्वयार्थ:-गोयरग्गगओ-गोचरीमें गया हुआ मुणी सातु आभूमि- गृहस्थकी मर्यादित भूमिसे अगाडी उसकी आमाके पिना न गच्छिना नहीं जावे, (किन्तु) कुलस्स-गृहस्थके घरकी भूमिम्मर्यादित भूमिको जाणिसा- जानकर मिय भूमि जिस घरमें जहातक जाने की मर्यादा हो वहातक ही परकमेावे ॥२४॥ टीका-'अइभूमि' इत्यादि । गोचराग्रगतो मुनिः अतिभूमि-परमवेशाय गृहस्थाननुमता भूमिमतिक्रम्य उद्ध्य न गच्छेत् । तर्हि किं कुर्याद ? इत्याह- कुलस्य भूमिमर्यादा स्थित्याधि ज्ञात्वा मिता-परिच्छिना स्वावस्थानयोग्या भूमि स्थान पराक्रामेत् गत्वा तिप्ठेव , विपरीताचरणे हि गृहस्थरोपादि- सम्भव. ॥२४॥ मूलम्-तत्येव पडिलेहिज्जा, भूमिभाग वियक्खणो। सिणाणस्स य वच्चस्स, सलोग परिवजए ॥२५॥ छाया-तत्रैव प्रतिलिखेत् , भूमिभाग विचक्षण । म्नानस्य च वर्चस , सलोक परिवर्जयेत् ॥२५॥ सान्चयार्थ:-तत्थेव-जिस मर्यादित भूमिपर खडा है उसी भूमिभागे भूमि- भागको वियक्वणो विचक्षण साधु पडिलहिज्जामतिलेखन करे, अर्थात् वहाकी 'अभूमि० इत्यादि । जिस धरमे भूमिकी जितनी मर्यादा हो उसे उल्लघन करके मुनि गृहस्थकी आज्ञा विना आगे नही जावे, किन्तु उस कुलकी मर्यादाको जानकर गमन करने योग्य परिमित स्थान तकही जाफर वडा हो जाय अर्थात किसीकी मर्यादाका उल्लघन न करे। इसके विपरीत आचरण करनेसे गृहस्थको क्रोध आने आदिकी सभावना रहती है ॥२४॥ અમૂર્ષિ૦ ઈત્યાદિ જે ઘરમા ભૂમિની જેટલી મર્યાદા હોય એને ઉલઈને મુનિ ગૃહસ્થની આજ્ઞા વિના આગળ ન જાય, પરંતુ એ કુળની મર્યાદાને જાણીને ગમન કરવા એગ્ય પરિમિત સ્થાન સુધી જ જઈને ઊભે રહે, અર્થાત-ઈની મર્યાદાનું ઉલઘન ન કરે, એથી વિપરીત આચરણ કરવાથી ગૃહસ્થને ફોધ આદિ ઉત્પન્ન થવાની સંભાવના રહે છે (૨૪) ५ ८ अध्ययन ५ उ. १ गा. २७-२९-आहारग्रहणविधिः १ ૨ 3 ८ ૧૦ १२ गृहिण्यादिः पानभोजन-पान-पेय तिलतण्डुलादिधावनजलम् भोजन-भोज्यमन्ना- दिकम् आहरेत-उपनयेत्-दधादित्यर्थः । तत्राय विशेष-उपनतेपुपानभोजनादिपु अकल्पिक कल्पितुमयोग्यमनेपणीयमित्यर्थ , न गृह्णीयाव-नाददीत, कल्पिक कल्प्य निरवा प्रतिगृहीयात् ॥२७॥ मूलम्-आहरती सिया तत्थ, परिसाडिज भोयण । दितियं पडियाइक्खे, न मे कप्पइ तारिसं ॥२८॥ छाया-आहरन्ती स्यात्तत्र, भोजन परिशाटयेत् । ददती मत्याचक्षीत, न मे कल्पते तादृशम् ॥२८॥ सान्वयार्थः-और-आहरती-आहार-पानी देवी हुई बह-दात्री सिया-कदा- चित् अगर तत्यवहा भोयण-भोजन-पान परिसाडिज्जम्नीचे गिरावे तो दितिय देती-हुई उस बाईसे (साधु) पडियाइक्खे कहे कि तारिस-इस प्रकारका आहार-पानी मे मुझे न कप्पड नहीं कल्पता है ॥२८॥ टीका-'आरती०' इत्यादि । आहरन्ती भिक्षामानीय ददती गृहिणी स्यात्-कदाचित् तत्र स्थाने भोजनम् आहार परिशाटयेत्-इतस्ततो पिकिरेन जानुप्रमाणोच्चमदेशात् कणादिमात्रमपि, तदधम्मदेशाच्च निरन्तर पातयेदिति वृद्धाः, तदा ददतीं पति भिक्षुः आरक्षीत ब्रवीत, तादृशम् उक्तमकारकमन्नादिक मे मम न कल्पतेन्न-युज्यते न ग्राह्यमिति भावः । आदि तिल तण्डुल आदिका धोधन, तथा अन्नादिक देवे तो उनमेसे अकल्पनीय (अनेषणीय) पदार्थोंका ग्रहण न करे, कल्पनीयका ग्रहण करे ॥२७॥ 'आहरती' इत्यादि। अशनादि देते समय दाताके हाथसे घुटनेसे ऊपरके प्रदेशसे यदि एक भी कण गिर जाय, अथवा घुटनेसे नीचेके प्रदेशसे निरन्तर गिर रहा हो तो भिक्षु दातासे कहे कि ऐसा अन्नादिक मेरे लिए ग्राह्य नहीं है। તલ તદુલ (ચેખ) આદિનું ધાવણ તથા અન્નાદિક આપે તે એમાથી અક-૧ નીય (અનેષણય) પદાર્થોને ગ્રહણ ન કરે, કપનીયને ગ્રહણ કરે (૨૭) आहरती. त्या अशनाती मते હાથમાથી ધુ ટણની ઉપરના પ્રદેરાથી જે એક પણ કણ પડી જાય, અથવા ઘુટણથી નીચેના પ્રદેશથી નિરતર પડી રહ્યું હોય તે ભિક્ષુ દાતાને કહ્યું કે એવા અનાદિ મારે ગ્રાહ્ય નથી દાતાના ४०८ . 3 १ ७ १० . भीदवेकालिको टीका-'दगमहियः' इत्यादि । 'दकमृत्तिकाऽऽदान-दक च मृत्तिका वेवि दकमृत्तिके, आदीयते-मानीयतेऽनेनेत्यादान-मार्गः, दमृतियोरादान दक- मृनिकाऽऽदान-जलमृत्तिकाऽऽनयनमार्गस्तत् । पीनानि-सचितानि शारयादीनि, हरितानिनस्पतिमात्राणि, चकारादन्यान्यप्यकलप्यवस्तुलातानि परिवर्जयन्- परित्यजन् सन्द्रिपसमाहितः तत्तदिन्दियविषयच्यासारहितस्तिष्ठेत् अवस्थिति कुर्यात् ॥२६॥ मूलम् तत्थ से चिट्ठमाणस्स, आहरे पाणभोयणं । अकप्पियं न गेण्हिज्जा, पडिगाहिज कप्पिय ॥२७॥ छाया-तत्र तस्मै तिष्ठते, आहरेत्पान-भोजनम् । अकल्पिक न गृह्णीयात , प्रतिगृह्णीयात्कल्पिकम् ॥२७॥ सान्वयार्थः-तत्य बहा चिट्ठमाणस्स-खड़े हुए तस्स उस साधुके लिए (गृहस्थ) पाणभोयण आहार-पानी आहरे लाकर देवे तो (साधु उसमें) अप्पिय अकल्पनीय आहार आदि न गेण्हिज्जा नहीं लेवे, (किन्तु)कप्पिय- कल्पनीय हो तो पडिगाहिज्ज-लेवे ॥२७॥ टीका--'तत्थ से०' इत्यादि । तत्र गृहस्थगृहे तिष्ठते तस्मै भिक्षवे १ दकशब्दो जलपर्यायवचन:-'मोक्त प्राज्ञैर्भुवनमत जीवनीय दक च।' इति हलायुधकोशात् । २ सूत्रे प्राकृतत्वाचतुर्थ्याः षष्ठी । 'दगमट्टिय०' इत्यादि । सचित्त जल और मृत्तिका लाने के मार्गका, और शालि आदि सचित्त बीज, वनस्पतिकाय तथा अन्य अकल्प्य पदार्थों का वर्जन करता हुआ-उनसे दूर हट कर सब इन्द्रियोंका सयम करता हुआ खडा होवे ॥२६॥ 'तत्य से' इत्यादि । गृहस्थके घरमें खडे हुए सायुको गृहिणी (स्त्री) दगमट्टिय० त्याहि सयित्त भने भाटीनु भने शालि (12) मा સચિત્ત બીજ, વનસ્પતિકાય તથા અન્ય એક પદાર્થોનું વર્જન કરતા તેનાથી દૂર હઠીને સર્વ ઈદ્રિયને સયમ કરતા ઊભે રહે (૨૬) તત્ય જે ઈત્યાદિ ગૃહસ્થના ઘરમાં ઊભેલા સાધુને ગૃહિણી (સ્ત્રી) આદિ अध्ययन ५ उ.१ गा. ३०-३१-सहरणस्य चतुर्भद्यः ४११ २ 3 ४ ५ ९ ११ 13 १४ ૧૭ ૧૫ मूलम् साह? निक्खवित्ताण, सचित्तं घट्टियाणिय । तहेव समणहाए, उदगं संपणुल्लिया ॥३०॥ ओगाहइत्ता चलइत्ता, आहरे पाणभोयणं । दितियं पडियाइक्खे, न मे कप्पइ तारिसं ॥३१॥ छाया-सहत्य निक्षिप्य, सचित्त घट्टयित्वा । तथैव श्रमणार्थम् , उदक सप्रणुद्य ॥३०॥ अवगाह्य चालयित्वाऽऽहरेत्पानभोजनम् । ददती प्रत्याचक्षीत, न मे कल्पते तादृशम् ॥३१॥ सान्वयार्थः-समणट्ठाए साधुके लिए साहु-सहरण करके अर्थात् एक वरतनसे दूसरे वरतनमें डालकरके, निक्खिवित्ताण-सचित्त वस्तु पर आहारादिको रखकर अथवा आहारादिके ऊपर सचित्त वस्तुको रखकर, सचित्त-सचित्त वस्तुका घटियाणिय सघट्टा स्पर्श-करके, तहेव-उसीमकार उद्ग-सचित्त अप्कायको सपणुल्लिया इधर-उधर रखकर, ओगाहइत्ताचर्पासे आँगनमें भरे हुए पानीमें अवगाहन-प्रवेश-करके, चलइत्तारुके हुए जलको नालीद्वारा या हायसे बाहर निकालकर यदि पाणभोयण आहार-पानी आहरे देवे तो दितिय देती हुई उस वाईसे (साधु) पडियाइक्ख कहे कि तारिस-इस प्रकारका आहारपानी मे-मुझे न कप्पइनही कल्पता है ॥३०-३१॥ टीका-'साहटु०' इत्यादि, 'ओगाहइत्ता' इत्यादि च । यदि श्रमणार्थ- भिक्षुनिमित्त सहत्य-भाजनाद्भाजनान्तरे सहरण कृत्वा , अवस्थामे आहार लेनेसे मुझे भी इस हिसाका भागी बनना पडेगा' ऐसा विचार करके मुनि उससे आहार न ले ॥२९॥ 'इत्यादि, और 'ओगाहइत्ता' इत्यादि । यदि श्रमणके लिए एक वर्तनसे दूसरे वर्तनमें सहरण करके (निकालकर), निक्षेपण મારે પણ એ હિસાના ભાગી બનવુ પડશે ” એ વિચાર કરીને મુનિ તેન હાથથી આહાર લે નહિ साहट्ट त्याल, भने ओगाहइत्ता. त्यात વાસણમાથી બીજા વાસણમાં સહરણ કરીને (કાઢીને, નિક્ષેપણ કરીને (એકને જો શ્રમણને માટે એક 'साह ५ २ ७ श्रीदनौकालिकमूत्रे पाकादिगृहकार्याणा प्रायः ख्यधीनत्वेन तत्रोपस्थितिमाधान्यात्तद्रहणम् ॥२८॥ मूलम्-संमदमाणी पाणाणि, वीयाणि हरियाणि य । असजमकर नच्चा, तारिसं परिवजए ।। २९ ॥ छाया-समर्दयन्ती माणान् , बीजानि हरितानि च । असयमकरी ज्ञात्वा तादृशी परिचर्जयेत् ॥२९॥ सान्वयार्थः-तथा-पाणाणि इन्द्रियादिक प्राणियोको थीयाणि-शालि आदि चीजोको य और दरियाणि-हरी वनस्पतिकायको समभाणी-पैरोसे कुचलती हुई (आहार-पानी देवे तो) उसे असजमकरि साधुके लिये अयतना करनेवाली नचा=जानकर (साधु) तारिस-सदोष आहार देने वाली उसे परिवज्जए घरजे अर्थात् उसके हायसे आहार-पानी नहीं लेवे ॥२९॥ टीका-'समद्दमाणी०' इत्यादि । प्राणान् पीजानि इरितानि च समर्दयन्ती- पादसघट्टनादिना पीडयन्ती अशनादिक दद्यादिति शेषः, तदा असयमकरी-साधु- निमित्तमयतनाकारिणीम् ज्ञात्वा तादृशीम्-उक्तस्वरूपा सदोपमाहारादिक ददती ता परिवर्जयेत्-प्रत्यादिशेत् , तद्धस्ततो नान्नादिक गृह्णीयादित्यर्थ । इय भिक्षादा- नार्थमागच्छन्ती प्राणादीनि मर्दयतीति तद्विराधना मय्यप्यापयेतेति भावयन् भिक्षा न गृह्णीयादिति भावः ॥२९॥ रसोईका काम प्रायः स्त्रियों के अधीन रहता है और रसोईमें मुख्य- तथा स्त्री मौजूद रहती है, अत एव गाथामें स्त्रीका ग्रहण किया है।॥२८॥ 'समद्दमाणी.' इत्यादि। प्राण बीज वनस्पति आदि सचित्तको कुचलती-रौंदती हुई अन्नादि देवे तो साधुके लिए अयतना करनेवाली समझकर उसे त्याग देवे, अर्थात् उसके हाथसे अन्नादि ग्रहण न करे। तात्पर्य यह है कि-'यह भिक्षा देनेके लिए जो अयतना कर रही है ऐसी રસેઈનું કામ પ્રાય સ્ત્રીઓને અધીન રહે છે અને ઈમા મુખ્યત્વે સ્ત્રી હાજર રહે છે, તેથી ગાથામાં સ્ત્રીને ગ્રહણ કરવામાં આવી છે (૨૮) समद्दमाणी. या प्राणू पी वनस्पति माह सथित्तन यती-- ઢળતી (સ્ત્રી) અનાદિ આપે તે સાધુને માટે અયતના કરનારી સમજીને તેને ત્યજી દે અર્થાત્ એના હાથથી અન્નદિ ગ્રહણ ન કરે તાત્પર્ય એ છે કે આ ભિક્ષા આપવાને જે અયનના કરી રહી છે, એની અવસ્થામા N - આહાર લેવાથી अध्ययन ५ उ. १ गा. ३०-३१-निक्षेपणचतुर्भङ्गन्यः ४१५ निक्षिप्य एकस्योपर्यन्यस्य निक्षेपण कृत्वा । निक्षेपण च त्रिधा-सचित्तमचित्त मिश्र चेति, एतानाश्रित्य तिस्रश्चतुर्भद्यो भवन्ति । तत्र- [१] सचित्ता-ऽचित्तयोश्चतुर्मगी यथा- (१) सविते सचित्तस्य, (२) सचित्तेऽचित्तस्य, (३) अचित्ते सचित्तस्य, (४) अचित्तेऽचिचस्य निक्षेपणम् । १ । [२] सचित्तमिश्रयोश्चतुर्भङ्गी यथा- (१) सचित्त सचित्तस्य, (२) सचित्ते मिश्रस्य, (३) मिश्रे सचित्तस्य, (४) मिश्रे मिश्रस्य निक्षेपणम् । २। [३] अचित्त मिश्रयोश्चतुर्भद्री यथा- (१) अचित्तेऽचित्तस्य, (२) अचित्ते मिश्रस्य, (३) मिथेऽचित्तस्य, (४) मिश्रे निक्षेपण दोप तीन प्रकारका है-(१) सचित्त, (२) अचित्त, और (३) मिश्र । इन तीनोंको आश्रित करके तीन चौभगियाँ होती हैं। [१] सचित्त-अचित्तकी चौभगी- (१) सचित्तपर सचित्तका, (२) सचित्तपर अचित्तका, (३) अचित्त पर सचित्तका, (४) अचित्तपर अचित्तका । १ । [२] सचित्त मिश्रकी चौभगी- (१) सचित्त पर सचित्तका, (२) सचित्त पर मिश्रका, (३) मिश्रपर सचित्तका, (४ मिश्रपर मिश्रका निक्षेप करना । २ । [३] अचित्त-मिश्रकी चौभगी- (१) अचित्त पर अचित्तका, (२) अचित्त पर मिश्रका । (३)मिश्रपर निक्षेप होपत्र प्रश्न छ (१) सचित्त, (२) मथित्त, (3) मिश्र એ ત્રણને આશ્રિત કરવાથી ત્રણ ચૌભગીઓ થાય છે [૧] સચિત્ત અચિત્તની ચૌભાગી (१) सथित्त ५२ सन्धित्तनु, (२) सथित्त५२ अथित्तनु, (3) मयित्त પર સચિત્તનું (૪) અચિત્તપર અચિત્તનું ના [२] सचित्त भिलनी योनी- (१) सायत्त ५२ सथित्तनु, (२) सथित ५२ मिश्रनु, (3) भित्र ५२ સચિત્તન, (૪) મિશ્ર પર મિશ્રનું, નિક્ષેપણ કરવું હરા [3] मयित्त मिशनी यौन जी- (१) मथित्त ५२ भूचित्त, (२) मथित्त ५२ मिश्रनु, (3) भित्र ५२ ४१४ श्रीदशवकालिकम , (४) घडा बहुशुप्यस्य सहरणम् । [१] 'आर्दै आईस्ये'-ति चतुर्थमङ्गस्य चतुर्भद्री यया- (१) अल्पाऽल्पास्य, (२) अल्पा-पहाईस्य, (३) बहाऽल्पास्य, (४) पदाढ़े यहाईस्य सहरणम् । आम पूर्वोक्तमगीषु मत्येकचतुर्भद्याः 'अल्पशुप्केऽल्पशुप्कस्य' 'वहुशुष्केऽल्प- शुष्कस्ये-यादिरूपी प्रथम स्वीयभद्गी कल्प्यो शेपावाल्यौ, तथाग्रहणे पात्रोत्था- पनादिना दातुः कष्ट पारस्फुटन तद्गतत्रस्तुतिकरणाऽपीत्यादिसम्भवात् । (३) यहुत गीलेमें थोड़े सूखेका, (४) घात गीलेमें यहत मुखेका । [४] 'गीलेमें गीलेका' इस चौथे भगकी चौभगी- (१) थोडे गीलेमें थोडे गीलेका (२) थोडे गीलेमें बहुत गीलेका। (३) बहुत गीलेमें थोडे गीलेका, (४) बहुत गीलेमें बहुत गीलेका । इन चारों चौभगियोंमेंसे 'थोडे सूखेमें थोडा सूखा मिलाना' और बहुत सूखेमे थोड़ा सूखा मिलाना'ये पहले और तीसरे भग ग्राह्य हैं। दूसरे और चौथे भग ग्राह्य नहीं हैं । इस प्रकारके ग्रहण करनेसे वर्तन उठानेके कारण दाताको कष्ट, वर्तनका फूटजाना, और वस्तुका विखर- जाना, और अप्रीति होना आदि पण होते है। जैसे किसी दाताने बहुत गीलेका या बहुत सूखेका सहरण करनेके लिए घडा भारी वर्तन उठाया तो उसे कष्ट रोगा। (3) मई सीमामा था सूनु, (४) गहु लामामा म सूधानु [४] बीमामालीसानु' याथा भागानी योनी-- (१) थेalaman यो दासानु, (२) था31 सीमामा समानु, બહુ લીલામા છેડા લીલાનું, (૪) બહુ લીલામા બહુ લીલાનું આ ચાર ચૌભગીઓમાથી છેડા સૂકામા હુ કુ મેળવવું” અને બહુ સૂકામાં ચેડુ સૂકુ મેળવવું એ પહેલા અને ત્રીજા ભાગા ગ્રાહ્ય છે બીજા અને ચોથા ભગા ગ્રાહ્ય નથી એ પ્રમાણે ગ્રહણ કરવાથી વાસણ ઉપાડવાને કારણે દાતાને કણ, વાસણ ફૂટી જવું અને વસ્તુ વેરાઈ–ળાઈ જવી, અને અપ્રીતિ થવી આદિ દુષણ થાય છે, જેમકે કઈ દાતાએ બહુ લીલાનુ યા બહુ સુકાનું સહરણ કરવાને માટે બહુ ભારે વાસણ ઉપાડ્યું હોય તેને કષ્ટ થાય अध्ययन ५ उ. १ गा. ३०-३१-निक्षेपणचतुर्भङ्गन्यः ४१५ निक्षिप्य एकस्योपर्यन्यस्य निक्षेपण कृत्वा । निक्षेपण च त्रिधा-सचित्तमचित्त मिश्र चेति, एतानाश्रित्य विसश्चतुर्भङ्गयों भवन्ति । तत्र- [१] सचित्ता-ऽचित्तयोश्चतुर्भगी यथा- (१) सचित्ते सचित्तस्य, (२) सचित्तेऽचित्तस्य, (३) अचिचे सचित्तस्य, (४) अचित्तेऽचित्तस्य निक्षेपणम् । १। [२] सचित्तमिश्रयोश्चतुर्भही यया- (१) सचित्त सचित्तस्य, (२) सचित्ते मिश्रस्य, (३) मिश्रे सचित्तस्य, (४) मिश्रे मिश्रस्य निक्षेपणम् । २। [३] अचित्त मिश्रयोश्चतुर्भही यथा- (१) अचित्तेऽचित्तस्य, (२) अचित्ते मिश्रस्य, (३) मिश्रेऽचित्तस्य, (४) मिश्रे निक्षेपण दोप तीन प्रकारका है-(१) सचित्त, (२) अचित्त, और (३) मिश्र । इन तीनोको आश्रित करके तीन चौभगियाँ होती हैं । [१] सचित्त-अचित्तकी चौभगी- (१) सचित्तपर सचित्तका, (२) सचित्तपर अचित्तका, (३) अचित्त पर सचित्तका, (४) अचित्तपर अचित्तका ।१। [२] सचित्त-मिश्रकी चौभगी- (१) सचित्त पर सचित्तका, (२) सचित्त पर मिश्रका, (३) मिश्रपर सचित्तका, (४ मिश्रपर मिश्रका निक्षेप करना । २ । [३] अचित्त-मिश्रकी चौभगी- (१) अचित्त पर अचित्तका, (२) अचित्त पर मिश्रका । (३)मिश्रपर निक्षेप होप वर प्रश्न छ (१) सथित्त, (२) अथित्त, (3) भित्र એ ત્રણને આશ્રિત કરવાથી ત્રણ ચૌભાગીઓ થાય છે [૧] સચિત્ત અચિત્તની ચૌભાગી (१) सथित ५२ सथित्तनु, (२) सथित्त५२ अथित्तनु, (3) भयित्त પર સચિત્તનું (૪) અચિત્તપર અચિત્તનું ૧ [૨] સચિત્ત મિશ્રની ચૌભાગી— (१) सवित्त ५२ सथित्तनु, (२) सथित्त ५२ भितु, (3) मिश्र ५२ સચિત્તન, (૪) મિશ્ર પર મિશ્રનું, નિક્ષેપણ કરવું રા [3] अथित्त मिनी यौली- (१) मथित ५२ मथितर्नु, (२) अस्थित्त ५२ मिश्र, (3) मिश्र ५२ . श्रीदशवकालिकसूत्रे मिश्रस्य निक्षेपणमिति । ३। पुनरपि पृथिव्यादिकायपट्कोपरि पृथिव्यादीना निक्षेपणेन प्रथमचतुर्भङ्गी- स्थितप्रथमभङ्गस्य 'सचिने सचित्तस्ये-त्येषरूपस्य पत्रिंशद्भेदा भवन्ति, तपथा- (१) पृथिव्या पृथिव्याः, (२) अपाम्, (३) तेजसः, (४) पायोः, (५) वन- स्पतेः, (६) प्रसस्य निक्षेपणमिति पट् (६) । एवमकायादावपि प्रत्येककायस्य निक्षेपणेन पद्गिद् भेदा जायन्ते । एव शेपभङ्गत्रयस्यापि प्रत्येक पनिशद् भेदा भवन्ति । सकलनया प्रथमचतुर्भङ्गया- अचित्तका, (४) मिश्रपर मिश्रका निक्षेप करना। ३ । फिर भी पृथिवी आदि पट्काय पर पृथिवीकायका निक्षेपण करनेसे प्रथम चतुर्भगीके 'सचित्त पर सचित्तका' इस प्रथम भगके छत्तीस भग होते हैं। वे इस प्रकार हैं- (१) पृथिवी पर पृथिवीका, (२) अपका, (३) तेजका, (४) वायुका, (६) वनस्पतिका और (६) त्रसका निक्षेपण करना। इसी प्रकार अपकाय आदि पर पृथिवीकाय आदि छह कायोंका निक्षेपण करनेसे छत्तीस भग होते हैं, अर्थात् छह काय पर छह कायका निक्षेपण होता है अत छहसे छहका गुणन करनेसे प्रथम भगके छत्तीस भेदोंकी सख्या निकलती है। ऐसे 'सचित्त पर सचित्तका' 'सचित्त पर मिश्रका' मिश्र पर सचित्तका, और 'मिश्र पर मिश्रका' इन सब (४) भगोंकी छत्तीस छत्तीस सख्या जोड देनेसे(३६+३६+३६+३६)- અચિત્તનું, (૪) મિશ્ર પર મિશ્રનું નિક્ષેપણ કરવું પડ્યા વળી પણ પૃથિવી આદિ પટકાય પર પૃથિવીકાયનું નિક્ષેપણ કરવાથી પ્રથમ ચઉભગીના “સચિત્ત પર સચિત્તનું એ પ્રથમ ભાગાના છત્રીસ ભાગા તે આ પ્રમાણે છે- (१) पृथिवी. ५२ पृथिवानु, (२) म५ (orm)नु (3) तेनु (6) पान, (५) वनस्पतिनु, (6) उसनु निक्षेप ४२७ એ રીતે અપકાય આદિ પર પૃથિવીકાય આદિ છે કાનું નિક્ષેપણ કરવાથી છત્રીસ ભાગ થાય છે, અર્થાત્ છે કાય પર છકાયનું નિક્ષેપણ થાય છે એટલે છને છએ ગુણવાથી પ્રથમ ભાગ છત્રીસ ભેદની સખ્યા નીકળે છે એમ સચિત્ત પર સચિત્તનું “સચિત્ત પર મિશ્રનું મિશ્ર પર સચિત્તનું અને મિશ્ર પર મિશ્રનું એ બધા (૪) ભાગાની છવીસ છત્રીસ સખા જેડી થાય છે દેવાથી अध्ययन ५ उ. १ गा. ३०-३१-निक्षेपणचतुर्भङ्गन्यः ४१७ श्चतुश्चत्वारिंशदुत्तरमेकशत भट्टा भवन्ति । उक्तमकारेण शेपचतुर्भगीतिकस्यापि भगसम्पादने सकलनया सर्वे भेदा द्वात्रिंशदधिकानि चतु:शतानि(४३२) सम्पयन्ते। इमे एककायस्योपर्यकस्यैव कायस्य निक्षेपणभेदाः प्रदर्शिताः, किन्तु 'एक- काये कायद्वयस्य, कायद्वये चैकस्ये-त्यादिनिक्षेपणेन चाऽन्येपामपि सभवः, यथा- 'पृथिव्या पृथिव्यप्काययो'-रित्यादि, पृथिव्यफाययोर्वनस्पते-रित्यादि च स्वयमसेयमिति विस्तरभयाद्विरम्यते । पूर्वोक्तपु भङ्गसमुदयेषु 'अचित्तेऽचित्तनिक्षेपण-क्षणभद्गस्य कल्प्यत्वम् , शेपा एकसौ चवालीस (१४४) भग हो जाते हैं। दूसरी दो चौभगियोके भी इतने ही भग होते हैं, उनको जोडनेसे चारसौ बत्तीस (४३२) भग होते हैं। ये चारसौ यत्तीस (४३२) भग एक काय पर एक कायका निक्षेपण करनेसे होते हैं, किन्तु एक काय पर दो कायका, जैसे- पृथिवीकाय पर पृथिवीकायका और अप्कायका निक्षेपण करनेसे, तथा दो कायो पर एक कायका, जैसे पूर्वोक्त दो कायों पर वनस्पति आदि किसी एक कायका निक्षेपण करनेसे और भी बहुतेरे भग होते है। सयोगसे बननेवाले इन उत्तर भगोंको स्वय समझ लेना चाहिए, विस्तार भयसे यहाँ नहीं बताते । पूर्वोक्त भगोंमेसे अचित्त पर अचित्तका निक्षेपण करनेरूप एक भग करपनीय है, अवकोप साक्षात् या पारम्परिक निक्षेपणरूप सव (३६+६+3+36) मे से। युवाणास (१४४) मा थाय छे मील मेन्योल भी એને પણ એટલાજ ભેદ થાય છે, એને જોડવાથી ચારને બત્રીસ (૪૩૨) ભાગ થાય છે એ ૪૩૨ ભાગે એક કાય પર એક કાયનું નિક્ષેપણ કરવાથી થાય છે, પરતુ એક કાર્યો પર બે કાયનું, જેમકે– પૃથિવી કાય પર પૃથિવી કાયનું અને અપકાયનું નિક્ષેપણ કવાથી, તથા બે કા પર એક કાયનુ જેમ પૂર્વોક્ત બે કાર્યો પર વનસ્પતિ આદિ કેઈ એક કાયનું નિક્ષેપણ કરવાથી બીજા પણ ઘણા ભાગા થાય છે એ સગથી થતા ઉત્તર ભાગા પિતાની મેળે સમજી લેવા, બહુ વિસ્તાર થવાને કારણે અહીં આપ્યા નથી પૂર્વોક્ત ભાગમાથી અચિત્ત પર અચિત્તનું નિક્ષેપણ કરવારૂપ એક ભાગે .

. ४१८ श्रीदशवेकालिकर आनन्तर्यस्वरूपाः पारम्पर्यस्वरूपा वा निसिला अकल्प्या एवेति बोद्धव्यम् । सचित्त-सचिनधिव्यादिक घटयित्या सस्पृश्य सचाल्य वा, सस्पर्शन सचि चाऽचित्त मिश्रभेदात्रिविध, तदपि पृथिव्यादिकायपट्केन भिवमानमष्टादशविध पुनर्दार-देय-भेदाभ्या द्विविधतया सकलनया पत्रिंशद् भेदा जायन्ते, एतेषामपि पुनः-आनन्तर्य-पारम्पर्यमेदाद् द्वासप्ततिभैदा भान्ति । एत्र कायद्वयकापत्रिकादिः सस्पर्शनेनोत्तरोत्तरभूरिभेदाः सयभूहनीयाः प्रेक्षावद्भिरिति । ननु पारम्परिकसघटनेन दीयमानाऽऽहारादिवर्जने पृथ्वीसघट्टनमनिवार्यमिति भग अकल्प्य हैं। सस्पर्शन तीन प्रकारका है-(१) सचित्त सस्पर्शन, (२) अचित्त सस्पर्शन, और (३) मिश्र सस्पर्शन। इन तीनोंके पृथिवी आदि षटकायके भेदसे अठारह भेद होते हैं । दाता और देय (वस्तु) के भेदसे छत्तीस भेद होते हैं । और अनन्तर तथा परम्पराके भेदसे परत्तर (७२) भेद होजाते हैं। इनके सिवाय दो कायका या तीन कायका स्पर्श करनेसे और भी भेद होजाते हैं, वे भेट धुद्धिमानोंको स्वय विचार लेने चाहिए। प्रश्न-हे गुरुमहाराज ! यदि पारम्परिक सघनसे दिये हुए आहार आदिका भी त्याग किया जायगा तो साधु कभी आहार नहीं ले सकेंगे क्योंकि पृथ्वीका सघन अनिवार्य है-आहार आदि पृथिवीपर रहते हैं और सचित्त जल भी पृथ्वी पर रहता है, अत. सचित्त जलकापृथिवीका કપનીય છે, બાકીના સાક્ષાત્ યા પાર પરિક નિક્ષેપણરૂપ બધા ભાગા અકલ્પનીય છે સસ્પર્શન ત્રણ પ્રકારના છે –(૧) સચિત સપર્શન, (૨) અચિત્ત સસ ર્શન, અને (૩) મિશ્ર સસ્પન એ ત્રણેના પૃથિવી આદિ ષટકાયના ભેદ કરીને અઢાર ભેદ થાય છે દાતા અને દેય (વસ્તુ)ના ભેદે કરીને છત્રીસ ભેર થાય છે અને પછી તેવી જ પરંપરાના ભેદ કરીને બોતેર (૭૨) ભેદ થાય છે તે ઉપરાંત બે કાયને યા ત્રણ કાયને સ્પર્શ કરવાથી બીજા પણ ભેદ થાય છે તે ભેદે બુદ્ધિમાનેએ સ્વયં વિચારી લેવા પ્રશ્ન–હે ગુરૂ મહારાજ! જે પારસ્પરિક સ ઘટનથી આપવા આહારદિને પણ ત્યાગ કરવામાં આવશે તે સાધુ કદાપિ આહાર લઈ શકશે નહિ, કારણ કે પૃથિવીનું સઘન અનિવાર્ય છે–આહારદિ પુથિવી પર રહે છે અને સચિન જળ પણ પૃથિવી પર જ રહે છે એટલે સચિત્ત જળનું પૃથિવી સાથે સધન છે , अ ययन ५ उ. १ गा. ३०-३१-सघनप्रकार: ४१९ तत्सघट्टनेऽपि वर्जनप्रसको भिषणा सर्वदाऽऽहारप्रतिषेधप्रसङ्ग इति चेन्न, पृथिव्या अवलतया तत्सञ्चलनायभावेन तत्सबट्टने जीवाधाया असम्भवात् , तत्सघट्टि- ताऽऽहाराऽऽदान मिलणामप्रतिपेयमिति भावः । उक्तपारम्परिकसहिताऽऽहा- राऽऽदानविपये प्रतिषेपश्चलाऽऽधारविषयः, तत्र प्राणिपीडासभवात् व्यवहारदो- पाचेति भावः। एतेषु मध्ये गायोक्त सचित्तम् , अन्तर्गमितत्वान्मित्र च सस्पृश्य सञ्चाल्य वा तथैव-पुनरपि उदकम् अप्काय 'सचित्त'-मित्यनुवर्तते सम्प्रणुय-समेय इतस्ततः कृत्वेत्यर्थः ॥३०॥ तथा- अगाह्य वर्षाकाले 'गृहागणप्रतिरुद्धजलान्त' प्रविश्य, चालयित्वाम्भणालि- कादिना निस्सार्य च पानभोजनमाहरेत् तदा ददतीमित्यादि पूर्ववत् ॥३१॥ पुरकर्मदोपमाह-'पुरेकम्मेण' इत्यादि । १ 'गृहागने 'ति तु सम्यक, तवर्गपञ्चमान्तस्याङ्गनशब्दस्यैवाकरग्रन्थेषु निर्णीतत्रादिति श्रीरुचिपत्युपा यायाः । सघटा है और पृथिवीका आहारादिके साथ सघटा है, इसलिए आहा- रादिका तथा सचित्त जलका पारम्परिक सघटा होता ही है। उत्तर-हे शिष्य ! पृथिवी अचल है, उसका मचलन नहीं होता, अत एव ऐसे सघटेसे जीवोंको बाधा नहीं होती, इसलिए पृथिवीसे सघहित आहारका ग्रहण करना साधुओंके लिए निपिद्ध नहीं है। पहले पारम्परिक सघहित आहारका जो त्याग बताया गया है उसे चल-आधार विपयक ही समझना चाहिये, क्योंकि उस सघनसे प्राणियोंको पीडा होती है तथा व्यवहारदोप भी लगता है ॥ ३० ॥ ३१ ॥ अब पुर कर्मदोप कहते हैं-'पुरेकम्मेण.' इत्यादि અને પૃથિવીનું આહારાદિ સાથે સઘટન છે, તેથી કરીને આહારાદિતુ સચિત્ત જળનુ પારસ્પરિક સઘટન થતું જ હોય છે ઉત્તર-હે શિષ્ય ! પૃથિવી અચલ છે, તેનું સ ચલન થતું નથી, તેથી એવા સ ઘટનથી ને બાધા થતી નથી એથી કરીને પૃથિવીથી સઘટિત આહારનું ગ્રહણ કરવું એ સાધુઓને માટે નિષિદ્ધ નથી પૂર્વે પારસ્પરિક સઘટિત આહા અને જે ત્યાગ બતાવવામાં આવ્યું છે, તેને ચલ-આધાર વિષયક જ સમજે જોઈએ, કારણ કે એ સઘટનથી પ્રાણીઓને પીડા થાય છે તથા વ્યવહાદેવ पार खाणे (30-3१) ये ५२ महा५ -पुरेकम्मेण त्याह તથા ४१८ श्रीदवेकालिकसूत्रे आनन्तर्यस्वरूपाः पारम्पर्यस्तस्पा वा निसिला अकल्प्या एवेति बोदव्यम् । सचित्त सचित्तपृथिव्यादिक घयित्वासस्पृश्य सचाल्य वा, सस्पर्शन सचि- ताऽचित्त-मिश्रभेदातिविध, तदपि पृथिव्यादिकायपट्केन मित्रमानमष्टादशविध, पुनर्दार-देय-भेदाभ्या द्विविधतया संकलनया पत्रिंशद् भेदा जायन्ते, एतेपामपि पुन:-आनन्तर्य-पारम्पर्यमेदाद् द्वासप्ततिभेदा भान्ति । एव कायद्वयकायत्रिकादि- सस्पर्शनेनोत्तरोचरभूरिभेदाः स्वयभूइनीयाः मेक्षावद्भिरिति । ननु पारम्परिकसघट्टनेन दीयमानाऽऽहारादिवर्जने पृथ्वीसघट्टनमनिवार्यमिति भग अकल्प्य हैं। सस्पर्शन तीन प्रकारका है-(१) सचित्त सस्पर्शन, (२) अचित्त सस्पर्शन, और (३) मिश्र सस्पर्शन। इन तीनोंके पृथिवी आदि पटकायके भेदसे अठारह भेद होते हैं । दाता और देय (वस्तु) के भेदसे छत्तीस भेद होते हैं । और अनन्तर तथा परम्पराके भेदसे बहत्तर (७२) भेद होजाते है । इनके सिवाय दो कायका या तीन कायका स्पर्श करनेसे और भी भेद होजाते हैं, वे भेद बुद्धिमानोंको स्वय विचार लेने चाहिए। प्रश्न-हे गुरुमहाराज ! यदि पारम्परिक सघनसे दिये हुए आहार आदिका भी त्याग किया जायगा तो साधु कभी आहार नहीं ले सकेंगे क्योकि पृथ्वीका सघन अनिवार्य है-आहार आदि पृथिवीपर रहते हैं और सचित्त जल भी पृथ्वी पर रहता है, अत. सचित्त जलकापृथिवीका કદનીય છેબાકીના સાક્ષાત્ યા પાર પરિક નિક્ષેપણરૂપ બધા ભાગ અકલ્પનીય છે सस्पशन व प्रारना --(१) सवित्त सस्पर्शन, (२) अथित स२५ ર્શન, અને (૩) મિશ્ર સ્પર્શન એ ત્રણેના પૃથિવી આદિ પટકાયના ભેદ કરીને અઢાર ભેદ થાય છે દાતા અને દેય (વસ્તુ)ના ભેદે કરીને છવીસ બેઠ થાય છે અને પછી તેવી જ પરંપરાના ભેદે કરીને તેર (૭૨) ભેદ થાય છે તે ઉપરાંત બે કાથને યા ત્રણ કાયને સ્પર્શ કરવાથી બીજા પણ તે ભેદે બુદ્ધિમાનેએ સ્વય વિચારી લેવા પ્રશ્ન-હે ગુરૂ મહારાજ! જે પારસ્પરિક સઘટનથી આપેલા આહારદિને પણ ત્યાગ કરવામાં આવશે તે સાધુ કદાપિ આહાર લઈ શકશે નહિ, કારણ કે પૃથિવીનું સ ધટન અનિવાર્ય છે–અહારાદિ પૃથિવી પર રહે છે અને સચિન જળ પણ પૃથિવી પર જ રહે છે એટલે સચિત્ત જળનું પૃથિવી સાથે સઘટન છે , . ભેદ થાય છે अ ययन ५ उ. १ गा. ३०-३१-सघट्टनमकारः ४१९ तत्सघट्टनेऽपि वर्जनप्रसक्तौ भिक्षूणा सर्वदाऽऽहारमतिषेधप्रसङ्ग इति चेन्न, पृथिव्या अचलतया तत्सञ्चलनायभावेन तत्सघट्टने जीवत्राधाया जसम्भवात् , तत्सघटि- ताऽऽहाराऽऽदान भिलणाममतिपेयमिति भावः । उक्तपारम्परिकसपट्टिताऽऽहा- राऽऽदानविपये मतिपेपश्चलाऽऽधारविषयः, तत्र प्राणिपीडासभवात् व्यवहारदो- पाचेति भावः। एतेषु मध्ये गाथोक्त सचित्तम् , अन्तर्गमितत्वान्मिय च सस्पृश्य सञ्चाल्य वा तथैव-पुनरपि उदकम् अप्काय 'सचित्त'-मित्यनुवर्तते सम्प्रणुय-सपेय इतस्ततः कृत्वेत्यर्थः ॥३०॥ तथा-- अवगाह्य-वर्षाकाले 'गृहागणपतिरुद्धजलान्तः प्रविश्य, चालयित्वा प्रणालि- कादिना निस्सार्य च पानभोजनमाहरेत् तदा ददतीमित्यादि पूर्ववत् ॥३१॥ पुरःकर्मदोपमाह-'पुरेकम्मेण' इत्यादि । १ 'गृहाङ्गने 'ति तु सम्यक, तवर्गपञ्चमान्तम्यागनशब्दस्यैवाकरग्रन्थेषु निर्णीतत्वादिति श्रीरुचिपत्युपान्यायाः । सघटा है और पृथिवीका आहारादिके साथ सघटा है, इसलिए आहा- रादिका तथा सचित्त जलका पारम्परिक सघटा होता ही है। उत्तर-हे शिष्य ! पृथिवी अचल है, उसका सचलन नहीं होता, अत एव ऐसे सघटेसे जीवोंको वाधा नही होती, इसलिए पृथिवीसे सघटित आहारका ग्रहण करना साधुओंके लिए निषिद्ध नहीं है। पहले पारम्परिक संघटित आहारका जो त्याग बताया गया है उसे चल-आधार विषयक ही समझना चाहिये, क्योंकि उस सघनसे प्राणियोको पीडा होती है तथा व्यवहारदोष भी लगता है ॥ ३० ॥ ३१ ॥ अब पुरकर्मदोष कहते हैं-'पुरेकम्मेण' इत्यादि અને પૃથિવીનુ આહારાદિ સાથે સઘન છે, તેથી કરીને આહારાદિનું તથા સચિત્ત જળનુ પારસ્પરિક સઘટન થતુ જ હોય છે ઉત્તર-હે શિષ્ય પૃથિવી અચલ છે, તેનું સાચલન થતું નથી, તેથી એવા સ ઘટનથી જીવોને બાધા થતી નથી એથી કરીને પૃથિવીથી સઘટિત આહારનું ગ્રહણ કરવું એ માધુઓને માટે નિષિદ્ધ નથી પૂર્વે પારસ્પરિક સ ઘટિત આહા રને જે ત્યાગ બતાવવામાં આવ્યું છે, તેને ચવ–આધાર વિષયક જ સમજે જોઈએ, કારણ કે એ સ ઘટનથી પ્રાણીઓને પીડા થાય છે તથા વ્યવહાદેવ पर लागे छ (30-3१) वे ५२ भदोष -पुरेकम्मेण त्या ४१८ श्रीदशवकालिको आनन्तर्यस्वरूपाः पारम्पर्यस्वरूपा वा निखिला भाल्प्या एवेति बोद्धव्यम् । सचित्त सचित्तपृथिव्यादिक घट्टयित्वा सस्पृश्य सचाल्प वा, सस्पर्शन सचि- चाऽचित्त-मिश्रभेदालिविध, तदपि पृथिव्यादिकायपट्केन भिवमानमष्टादशविध, पुनर्दान देय-भेदाभ्या विविधतया सकलनया पत्रिंशद् भेदा जायन्ते, एतेषामपि पुनः आनन्तर्य पारम्पर्यभेदाद् द्वासप्ततिभैदा भवन्ति । एव कायद्वयकायत्रिकादि- सस्पर्शनेनोत्तरोत्तरभूरिभेदाः स्वयभूहनीयाः प्रेक्षावद्भिरिति । ननु पारम्परिकसघटनेन दीयमानाऽऽहारादिवर्जने पृथ्वीसघट्टनमनिवार्यमिति भग अकल्प्य हैं। सस्पर्शन तीन प्रकारका है-(१) सचित्त सस्पर्शन, (२) अचित्त सस्पर्शन, और (३) मिश्र सस्पर्शन। इन तीनोंके पृथिवी आदि षटकायके भेदसे अठारह भेद होते हैं । दाता और देय (वस्तु) के भेदसे छत्तीस भेद रोते हैं। और अनन्तर तथा परम्पराके भेदसे बहत्तर (७२) भेद होजाते हैं । इनके सिवाय दो कायका या तीन कायका स्पर्श करनेसे और भी भेद होजाते हैं, वे भेट वुद्धिमानोंको स्वय विचार लेने चाहिए। प्रश्न-हे गुरुमहाराज ! यदि पारम्परिक सघनसे दिये हुए आहार आदिका भी त्याग किया जायगा तो साधु कभी आहार नरी ले सकेंगे क्योकि पृथ्वीका सघन अनिवार्य है-आहार आदि पृथिवीपर रहते हैं और सचित्त जल भी पृथ्वी पर रहता है, अत. सचित्त जलकापृथिवीका કપનીય છે, બાકીના સાક્ષાત્ યા પાર પરિક નિક્ષેપણરૂપ બધા ભાગા અકલ્પનીય છે સસ્પર્શન ત્રણ પ્રકારના છે –(૧) સચિત્ત સસ્પન, (૨) અચિત સભ્ય ર્શન, અને (૩) મિશ્ર સમ્પર્શન એ ત્રણેના પૃથિવી આદિ કાયના છે કરીને અઢાર ભેદ થાય છે દાતા અને દેય (વસ્તુ)ના ભેદે કરીને છત્રીસ ભેદ થાય છે અને પછી તેવી જ પરંપરાના ભેદ કરીને બેતર (૭૨) ભેટ થાય છે તે ઉપરાંત બે કાયને યા ત્રણ કાયને સ્પર્શ કરવાથી બીજા પણ ભેદ થાય છે તે ભેદે બુદ્ધિમાને એ ય વિચારી લેવા પ્રશ્ન–હે ગુરૂ મહારાજ! જે પારસ્પરિક સઘટનથી આપેલા આહારદિને પણ ત્યાગ કરવામાં આવશે તે સાધુ કદાપિ આહાર લઈ શકશે નહિ, કારણ કે પૃથિવીનું સઘટન અનિવાર્ય છે–આહારાદિ પૃથિવી પર રહે છે અને સચિન જળ પણ પૃથિવી પર જ રહે છે એટલે સચિત્ત જળનું પૃથિવી સાથે સઘટન છે .

अययन ५ उ.१ गा. ३०-३१-सपट्टनप्रकारः ४१९ तत्सघटनेऽपि वर्जनप्रसक्तौ भिक्षूणा सर्वदाऽऽहारपतिषेधप्रसङ्ग इति चेन्न, पृथिव्या अचलतया तत्सञ्चलनायभावेन तत्सघट्टने जीपवाधाया असम्भवात् , तत्सटि- ताऽऽहाराऽऽदान भिषणाममतिपेयमिति भावः । उक्तपारम्परिकसहिताऽऽहा- राऽऽदानविपये प्रतिषेधश्चलाऽऽधारविषयः, तत्र माणिपीडासभवात् व्यवहारदो- पाचेति भावः। एतेषु मध्ये गाथोक्त सचित्तम् , अन्तर्गर्भितत्वान्मिश्र च सस्पृश्य सञ्चाल्य वा तथैव-पुनरपि उदकम् अष्काय 'सचित्त'-मित्यनुवर्तते सम्भणुयसप्रेर्य इतस्ततः कृत्वेत्यर्थः ॥३०॥ तथा-- अवगाह्य धर्पाकाले 'गृहाङ्गगप्रतिरुद्धजलान्तः प्रविश्य, चालयित्वा प्रणालि- कादिना निस्सार्य च पानभोजनमाहरेत् तदा ददतीमित्यादि पूर्ववत् ॥३१॥ पुरकर्मदोपमाह-'पुरेकम्मेण' इत्यादि । १ 'गृहागने'ति तु सम्यक, तवर्गपञ्चमान्तस्याङ्गनशब्दम्यैवाकरग्रन्थेषु निीतत्वादिति श्रीरुचिपत्युपाध्याया । सघटा है और पृथिवीका आहारादिके साथ सघटा है, इसलिए आहा- रादिका तथा सचित्त जलका पारम्परिक सघटा होता ही है। उत्तर-हे शिष्य ! पृथिवी अचल है, उसका सचलन नहीं होता, अत एव ऐसे सघटेसे जीवोंको बाधा नहीं होती, इसलिए पृथिवीसे सघहित आहारका ग्रहण करना साधुओके लिए निपिद्ध नही है। पहले पारम्परिक सघहित आहारका जो त्याग बताया गया है उसे चल-आधार विषयक ही समझना चाहिये, क्योंकि उस सघटनसे प्राणियोको पीडा होती है तथा व्यवहारदोप भी लगता है ॥ ३० ॥ ३१ ॥ अब पुर कर्मदोप कहते हैं-'पुरेकम्मेण.' इत्यादि અને પૃથિવીનુ આહારાદિ સાથે સ ઘટન છે, તેથી કરીને અહારાદિનું સચિત્ત જળનુ પારસ્પરિક સઘટન થતું જ હોય છે ઉત્તર-હે શિષ્ય! પૃથિવી અચલ છે, તેનું સાચલન થતું નથી, તેથી એવા સ ઘટનથી અને બાધા થતી નથી એથી કરીને પૃથિવીથી સઘટિત આહારનું ગ્રહણ કરવું એ સાધુઓને માટે નિષિદ્ધ નથી પૂર્વે પારસ્પરિક સઘટિત આહા રને જે ત્યાગ બતાવવામાં આવ્યું છે, તેને ચલ-આધાર વિષયક જ સમજ જોઈએ, કારણ કે એ સ ઘટનથી પ્રાણીઓને પીડા થાય છે તથા વ્યવહાદિષ पर दागे छ (30-3१) वे पु२ भोप ४ छे-पुरेकम्मेण त्यादि તથા ४२० श्रीदशवकालिकमूत्रे ५ मूलम्-पुरेकम्मेण हत्थेण, दवीए भायणेण वा । दितिय पडिआइक्खे, न मे कप्पड तारिस ॥३२॥ छाया-पुरकर्मणा हस्तेन, दा भाजनेन वा । ददती प्रत्याचक्षीत, तादृश मे न फ्ल्पते ॥३२॥ पुरःकर्म दोप कहते हैं- सान्वयार्थ -पुरेकम्मेण साधुके आनेके पहले या सामने साधुके लिए सचित्त जलसे किया हुआ हस्तादिधावन पुरस्कर्म कहलाता है, उस पुरसम्म वाले हत्थेण हाथसे दब्बीए-उस प्रकारकी कडठी अथवा चमचासे वा-अथवा भायणेण-दूसरे परतनसे (आहारादि) दितिय देती हुईको पडियाइक्खे-कहेकि तारिस-इस प्रकारका आहार मे मुझे न कप्पइ-नहीं कल्पता है ॥३२॥ टीका-पुर.कर्मणा=पुर:=पूर्वम् अग्रतो पा कर्म-क्रिया पुरःकर्म, तेन पुरः कर्मणा, लक्षणया पुरःकर्मयुक्तेनेत्यर्थः, अस्य च इस्तादिभित्रिभिः सम्बन्ध , हस्तेन करेण, दा-खजाऊया, भाजनेन अमत्रेण वा ददती प्रत्याचक्षीतेत्यादि पूर्ववत् । नन्धेव गृहस्थाना पचन-पाचनादिक्रियामन्तरेणाऽऽहारायसभव इति सावा गमनात्माक पचनादिक्रियाऽवश्य कर्तव्या, तथा सति पुरःकर्मदोपपितत्वेन साधूके आनेसे पहले या सामने की जानेवाली क्रिया को पुर कर्म करते हैं। पुर कर्मयुक्त हाथसे, कुडछी (चमचा) से, अथवा वर्तनसे देनेवालीके प्रति साधु कहे कि ऐसा आहार मुझे नहीं कल्पता है । प्रश्न-हे गुरुमहाराज | गृहस्थ जबतक पचन-पाचन आदि क्रिया न करे तब तक आहार बन नहीं सकता है, अत एव मुनिके आगमनके पहले पचन-पाचन आदि क्रिया अवश्य करनी पड़ती है। ऐसा करनेसे वह आहार पुर कर्मसे दूषित होगा तो भिक्षु कभी भिक्षा ग्रहण नहीं સાધુ આવતાની પહેલા યા સાધુની સામે કરવામાં આવતી ક્રિયાને પર કર્મ કહે છે, પુર કર્મયુક્ત કડછીથી કે વાસણથી દેનારીની પ્રત્યે સાધુ કહે કે એ આહાર મને કરતે નવી પ્રશ્ન-૭ ગુરૂ મહારાજ ! ગૃહસ્થ જ્યાસુધી પચન પાચન આદિ ક્રિયા કરે નથી, ત્યા સુધી બહાર બની શકતું નથી, એટલે મુનિના આગમન પહેલા પચન પાચનદિ કિયા જરૂર કરવી પડે છે એમ કરવાથી એ આહાર પર કર્મથી દૂષિત થાય તે ભિક્ષુ કદાપિ ભિક્ષા ગ્રહણ કરી શકે નહિ સાધુની સામે કરવામાં . अध्ययन ५ उ. १ गा. ३२-पुरःकर्मस्वरूपम् ४२१ साधनामाहारग्रहणामसक्तिः, साधुसमक्ष क्रियमाणाना क्रियाणा पुरकर्मत्वे गृहस्थ- कृताऽभ्युत्थानादिक्रियाणामपि पुरकर्मत्वापत्तौ तद्गृहस्थमदत्तभिक्षाया अपि पुर:- कर्मदोपयुक्तत्वेन ग्रहणाभावप्रसङ्गः' इति चेत्, अत्रोच्यते- व्युत्पत्त्याऽभ्युत्थानगमनपचनपाचनादीनामपि पुर कर्मत्वसमवेऽपि समय- परिभाषावलात् केवल भिक्षादानतः माक् साधुमुद्दिश्य सचित्तोदकेन हस्तभाजना- दिमक्षालनस्यैव पुरकर्मवेन सिद्धान्तितत्वम् , न तु पचन-पाचनाभ्युत्थानादेरपीति। अत्र दात-द्रव्य गृहाण्याश्रित्याप्टौ भङ्गा भवन्ति यथा- कर सकते, साधुके सामने की जानेवाली क्रियाको भी पुरस्कर्म माना जाय तो गृहस्थकी अभ्युत्थान-चन्दन-आदि क्रियाएँ भी पुरःकर्म कहलायेंगी, इसलिए उसके द्वारा दिया हुआ पुरस्कर्मसे दूपित आहार साधु कैसे ग्रहण करेंगे? , उत्तर-हे शिष्य ! व्युत्पत्तिसे पचन-पाचन आदि क्रियाएँ भले ही पुरःकर्म कहलावें, किन्तु समय (शास्त्र ) की परिभापासे भिक्षादानसे पहले साधुको उद्देश्य करके सचित्त जलसे हाथ या वर्तन आदिका प्रक्षालन करना ही पुरःकर्म कहलाता है, पचन-पाचन आदि क्रियाओंको अथवा खडे होने आदिको पुरःकर्म नहीं करते। इस पुरःकर्मके, दाता, द्रव्य और गृहकी विवक्षासे आठ भग होते हैं, वे यहाँ बताते है- આવનારી ક્રિયાને પણ જે પુરકમ માનવામાં આવે તે ગૃહસ્થની અદ્ભુત્થાન વદન આદિ ક્રિયાઓ પણ પુર કર્મ કહેવાશે, તે પછી તેને હાથે આપવામા આવેલા પુર કર્મથી દૂષિત આહાર સાધુ કેવી રીતે ગ્રહણ કરશે? ઉત્તર-હે શિષ્ય! વ્યુત્પત્તિથી પચન પાચન આદિ ક્રિયાઓ ભલે પુરા કર્મ કહેવાય, પરંતુ સમય (શાસ્ત્ર)ની પરિભાષા પ્રમાણે ભિક્ષાદાનની પહેલા સાધુને ઉદ્દેશ્ય કરીને સચિત્ત જલથી હાથ યા વાસણ આદિ દેવા એ જ પુરા કર્મ કહેવાય છે પચન પાચન આદિ ક્રિયાઓ અથવા ઊભા થવા અદિની ક્રિયા છે પુર કમ કહેવાતા નથી આ પુર કર્મના, દાતા, દ્રવ્ય અને ગૃહની વિવાએ કરીને આઠ ભાગ થાય છે. તે અહીં બતાવે છે– ४२० श्रीदशवकालिको . मूलम्-पुरेकम्मेण हत्थेण, दवीए भायणेण वा । दितिय पडिआइक्खे, न मे कप्पड़ तारिस ॥३२॥ छाया-पुरसकर्मणा इस्तेन, दा भाजनेन वा । ददती प्रत्याचक्षीत, वादश मे न क्ल्पते ॥३२॥ पुरम दोप कहते हैं- सान्वयार्थ:-पुरेकम्मेण साधुके आनेके पहले या सामने साधुके लिए सचित्त जलसे किया हुआ हस्तादिधापन पुरस्कर्म कहलाता है, उस पुरःवर्म- वाले हत्येण दायसे वीए उस प्रकारकी कडछी अथवा चमचासे वा-अथवा भायणेण-दूसरे परतनसे (आहारादि) दितिय देती हुईको पडियाइक्खे-कहेकि तारिस इस प्रकारका आहार मे=मुझे न कप्पह नही कल्पता है ॥३२॥ टीका-पुर'कर्मणा=पुर:=पूर्वम् अग्रतो का कर्म-क्रिया पुरःकर्म, तेन पुर:- कर्मणा, लक्षणया पुरस्कमयुक्तेनेत्यर्थः, अस्य च हस्तादिभित्रिभिः सम्बन्ध , हस्तेन- करेण, दा-खजाऊया, भाजनेन-अमत्रेण वा ददती प्रत्याचक्षीतेत्यादि पूर्ववत् । नन्वेव गृहस्थाना पचन-पाचनादिक्रियामन्तरेणाऽऽहारायसभव इति सावा गमनात्माक् पचनादिक्रियाऽवश्य कर्तव्या, तथा सति पुरकर्मदोषदृपितत्वेन साधुके आनेसे पहले या सामने की जानेवाली क्रिया को पुर कर्म करते है। पुर'कर्मयुक्त हायसे, कुडछी (चमचा) से, अथवा वर्तनसे देनेवालीके प्रति साँधु कहै कि ऐसा आहार मुझे नहीं कल्पता है । प्रश्न-हे गुरुमहाराज ! गृहस्थ जबतक पचन-पाचन आदि क्रिया न करे तब तक आहार धन नही सकता है, अत एव मुनिके आगमनके पहले पचन-पाचन आदि क्रिया अवश्य करनी पड़ती है। ऐसा करनेसे वह आहार पुर कर्मसे दूपित होगा तो भिक्षु कभी भिक्षा ग्रहण नही સાધુ આવતાની પહેલા યા સાધુની સામે કરવામાં આવતી ક્રિયાને પર કર્મ કહે છે, પુર કર્મયુકત કડછીથી કે વાસણધી દેનારીની પ્રત્યે સાધુ કહે કે એ આહાર મને ક૫તે નથી પ્રશ્ન-હે ગુરૂ મહારાજ ! ગૃહસ્થ જ્યાસુધી પચન પાચન આદિ ક્રિયા કરતે નથી, ત્યાસુધી બહાર બની શકતું નથી, એટલે મુનિના આગમન પહેલા પંચને પાચનદિ ક્રિયા જરૂર કરવી પડે છે એમ કરવાથી એ આહાર પર કર્મથી દૂષિત થાય તે ભિક્ષુ કદાપિ ભિક્ષા ગ્રહણ કરી શકે નહિ સાધુની સામે કરવામાં अध्ययन ५ उ. १ गा. ३२-पुरस्फर्मस्वरूपम् ४२१ साधूनामाहारग्रहणामसक्तिः, साधुसमक्ष क्रियमाणाना क्रियाणा पुरःकर्मत्वे गृहस्थ- कृताऽभ्युत्थानादिक्रियाणामपि पुरस्कर्मत्वापत्तौ तद्गृहस्थप्रदत्तभिक्षाया अपि पुर:- मदोपयुक्तत्वेन ग्रहणाभावप्रसद्गः' इति चेत् , अत्रोच्यते- व्युत्पत्त्याऽभ्युत्थानगमनपचनपाचनादीनामपि पुर कर्मत्वसमवेऽपि समय- परिभाषाबलात् केवल भिक्षादानतः प्राक् साधुमुद्दिश्य सचित्तोदकेन हस्तभाजना- दिमक्षालनस्यैव पुरःकर्मत्वेन सिद्धान्तितत्वम्, न तु पचन-पाचनाभ्युत्थानादेरपीति । अत्र दाव-द्रव्य-गृहाण्याश्रित्याष्टौ भगा भवन्ति यथा- कर सकते, साधुके सामने की जानेवाली क्रियाको भी पुरकर्म माना जाय तो गृहस्थकी अभ्युत्थान-वन्दन-आदि क्रियाएँ भी पुरःकर्म कहलायेंगी, इसलिए उसके द्वारा दिया हुआ पुरःकर्मसे दूपित आहार साधु कैसे ग्रहण करेंगे? उत्तर-हे शिष्य ! व्युत्पत्तिसे पचन पाचन आदि क्रियाएँ भले ही पुरस्कर्म कहलायें, किन्तु समय (शास्त्र) की परिभापासे भिक्षादानसे पहले साधुको उद्देश्य करके सचित्त जलसे हाथ या वर्तन आदिका प्रक्षालन करना ही पुर कर्म कहलाता है, पचन-पाचन आदि क्रियाओंको अथवा खडे होने आदिको पुरस्कर्म नहीं करते । इस पुर कर्मके, दाता, द्रव्य और गृहकी विवक्षासे आठ भग होते है, वे यहाँ यताते हैं- આવનારી ક્રિયાને પણ જે પુર કર્મ માનવામાં આવે તે ગૃહસ્થની અદ્ભુત્થાન વદન આદિ ક્રિયાઓ પણ પુર કર્મ કહેવાશે, તે પછી તેને હાથે આપવામાં આવેલ પુર કર્મથી દૂષિત આહાર સાધુ કેવી રીતે ગ્રહણ કરશે? ઉત્તર-હે શિષ્ય ! વ્યુત્પત્તિથી પચન પાચન આદિ ક્રિયાઓ ભલે પુરા કર્મ કહેવાય, પરન્તુ સમય ( શાસ્ત્ર) ની પરિભાષા પ્રમાણે ભિક્ષાદાનની પહેલા સાધુને ઉદ્દેશ્ય કરીને સચિત્ત જલથી હાથ યા વાસણ આદિ ધેવા એ જ પુરા કર્મ કહેવાય છે પચન પાચન આદિ ક્રિયાઓ અથવા ઊભા થવા અદિની ક્રિયા એ પુર કર્મ કહેવાતા નથી આ પુર કમેના, દાતા, દ્રવ્ય અને ગૃહની વિવક્ષાએ કરીને આઠ થાય છે, તે અહીં બતાવે છે– सागर ४२० श्रीदशवकालिकसूत्रे Y ५ ८ . मूलम्-पुरेकम्मेण हत्थेण, दवीए भायणेण वा । दितियं पडिआइक्खे, न मे कप्पड़ तारिस ॥३२॥ छाया-पुरकर्मणा हस्तेन, दा भाजनेन वा । ददती प्रत्याचक्षीत, तादृश मे न कल्पते ॥३२॥ पुरस्कर्म दोप फहते है- सान्वयार्थ:-पुरेकम्मेण साधुके आनेके पहले या सामने साधुके लिए सचित्त जलसे किया हुआ हस्तादिधावन पुरस्कर्म कहलाता है, उस पुरस्कर्म वाले हत्थेण हायसे वी=उस प्रकारकी कडली अथवा चमचासे वा-अथवा भायणेण दुसरे रतनसे (आहारादि) दितिय देती हुईको पडियाइक्खे कहेकि तारिस-इस प्रकारका आहार मे=मुझे न कप्पइ=नही कल्पता है ॥३२॥ टीका-पुरःकर्मणा-पुर.=पूर्वम् अग्रतो वा कर्म=क्रिया पुरःकर्म, तेन पुरः कर्मणा, लक्षणया पुरकर्मयुक्तेनेत्यर्थः, अस्य च हस्तादिभित्रिभिः सम्बन्ध , हस्तेन- करेण, दा-खजाकया, भाजनेन=अमत्रेण वा ददतीं प्रत्याचक्षीतेत्यादि पूर्ववत् । नन्वेव गृहस्थाना पचन-पाचनादिक्रियामन्तरेणाऽऽहारायसभव इति साचा गमनात्माक पचनादिक्रियाऽवश्य कर्तव्या, तथा सति पुरःकर्मदोपपितत्वेन साधूके आनेसे पहले या सामने की जानेवाली क्रिया को पुर कर्म कहते है। पुरकर्मयुक्त हाथसे, कुडछी (चमचा) से, अथवा वर्तनसे देनेवालीके प्रति साधु कहे कि ऐसा आहार मुझे नहीं कल्पत्ता है । प्रश्न-हे गुरुमहाराज । गृहस्थ जबतक पचन-पाचन आदि क्रिया न करे तब तक आहार बन नहीं सकता है, अत एव मुनिके आगमनके पहले पचन-पाचन आदि क्रिया अवश्य करनी पड़ती है। ऐसा करनेसे वह आहार पुर कर्मसे दूपित होगा तो भिक्षु कभी भिक्षा ग्रहण नहीं સાધુ આવતાની પહેલા યા સાધુની સામે કરવામાં આવતી ક્રિયાને પુર કર્મ કહે છે, પ્ર કર્મયુક્ત કડછીથી કે વાસણથી દેનારીની પ્રત્યે સાધુ કહે કે એ આહાર મને ક૫તે નથી પ્રશ્ન: હે ગુરૂ મહારાજ ! ગૃહસ્થ જ્યાસુધી પચન પાચન આદિ ક્રિયા કરતે નથી, ત્યાસુધી આહાર બની શકતું નથી, એટલે મુનિના આગમન પહેલા પચન પાચનદિ કિયા જરૂર કરવી પડે છે એમ કરવાથી એ આહાર પર કર્મથી દુષિત થાય તે ભિક્ષુ કદાપિ ભિક્ષા ગ્રહણ કરી શકે નહિ સાધુની સામે કરવામાં " , -- अध्ययन ५ उ. १ गा. ३२-पुरःकर्मपिताहारनिषेधः ४२३ सानुद्दिश्य करदादिप्रक्षालने पुरकर्मनिमित्तको दोपो भवत्येवेति न तद्दिने तनाशनादिक ग्राद्यम् । ननु कस्मिंश्चिद्भवने येन पुरस्काचरित वदिवरस्य करतो भिक्षोपादाने कथ दोपः ? इति चेदुच्यते- यथा येन विपाक्तमन्न सम्पाद्यते तदितरस्य इस्वादप्युपादीयमान तदेवान्न महतेऽनर्थाय कल्पते, तथा पुरस्कर्मपितमपि । अत्राय विशेपः-यत्र गृहे पुरकर्म समाचरित तत्र तस्मिन् दिवसे सर्व द्रव्यमकल्प्यमेव ॥३२॥ यह सदा स्मरण रखना चाहिये कि यदि साधुके निमित्त हाथ या कुडछी आदिको धोया हो तो पुरःकर्म दोप लगता ही है, इसलिये उस घरमे साधु, भिक्षा नही लेवे। प्रश्न-हे गुरुमहाराज! किसी मकानमें एकने पुर कर्म किया तो उससे आहार आदि न लेकर, दुसरे वर्त्तन या दूसरे व्यक्तिके हाथसे लिया जाय तो क्यों दोष लगता है ? उत्तर-हे शिष्य ! जैसे-किसीने विष-मिश्रित आहार बनाया हो तो बनाने वालेसे न लेकर दूसरेके हाथसे लिया जाय तो भी वह आहार महान् अनर्थकारी होता है, उसी प्रकार, पुरःकर्म दृपित आहार आदि भी अनर्थकारक होता है। इतनी फिर विशेषता समझनी चाहिये कि, जिस घरमें पुर. कर्म किया गया हो उस घरमें उस दिन सब द्रव्य अकल्प्य होते है ।। ३२ ।। એ વાત સદા યાદ રાખવી કે જે સાધુને નિમિત્તે હાથ યા કડછી આદિને ધેવા હોય તે પર કર્મ દેષ લાગે છે જ, તેથી એ દિવસે એ ઘરમાં સાધુ ભિક્ષા લે નહિ પ્રશ્ન-હે ગુરુ મહારાજ ! કોઈ મકાનમાં એકે પુર કર્મ કર્યું હોય તે ત્યા તેનાથી આહારાદિ ન લેતા, બીજા વાસણથી યા બીજી વ્યક્તિના હાથથી લેવામાં આવે તે કેમ દેષ લાગે? ઉત્તર-હે શિષ્ય' જેવી રીતે કેઈએ વિષમિશ્રિત આહાર બનાવ્યા હોય તે બનાવનારના હાથથી ન લેતા બીજાના હાથથી લેવામાં આવે તેમણે એ આહાર મહાન અનર્થકારી થાય છે, તેમ પુર કર્મદૂષિત આહારદિ પણ અનર્થકાશ્ક થાય છે એટલી વિશેષતા સમજવી જોઈએ કે, જે ઘરમાં પુર કમ હોય તે ઘરમા એ દિવસે બધા દ્રવ્યો અકલ્પનીય બને છે. (૩૨) કરવામાં આવુ ४२२ श्रीदशकालिकमूत्रे (१) स दाता (पुरकर्मफर्ता), अन्यद् द्र पम् , अन्यद्गृहम् । (२) स दाता, अन्यद्रव्यम् तद्गृहम् (यत्र पुरस्कर्म कृतम्) । (३) स दाता, तद्रव्यम् (यद्रव्यमुद्दिश्य पुरस्कर्म कृतम्), अन्यद्गृहम् । (४) स दाता, तद्रव्य, तद्गृहम् । (५) अन्यो दाता, तद्रव्य, तद्गृहम् । (६) अन्यो दाता, तद्रव्यम् , अन्यद्गृहम् । (७) अन्यो दाता, अन्यद्रव्य, तद्गृहम् । (C) अन्यो दाता, अन्यद्रव्यम् , अन्यद्गृहम् । एवष्टस भङ्गेपु पथमाऽष्टमी भगौ साधूना कल्प्यौ, तदितरे भङ्गा अकल्प्या । १- वही (पुरःकर्म करनेवाला) दाता, अन्य द्रव्य, अन्य गृह । २- वही दाता, अन्य द्रव्य, वही गृह । ३-वही दाता, अन्य गृह । ४-वही दाता, वही गृह। ५- अन्य दाता, वही गृह। ६ अन्य दाता, 9- अन्य दाता, अन्य द्रव्य, वही गृह । अन्य दाता, अन्य द्रव्य, अन्य गृह। इन आठ भगोमेंसे पहला भग और आठवॉ भग साधुके लिये कल्प्य है और अन्य सब अकल्प्य हैं। मे (५२ ४ ४२॥२) हाता, અન્ય દ્રવ્ય, એજ ગૃહ वही द्रव्य, वही द्रव्य, वही द्रव्य, वही द्रव्य, - अन्य गृह । અન્ય ગૃહ ૨ 3 ४ ५ અન્ય ગૃહ એજ ગૃહ એજ ગૃહ અન્ય ગૃહ એજ ગૃહ અન્ય ગૃહ આ આઠ ભાગમાથી પહેલો ભાગ અને આઠમે ભાગે સાધુને માટે કલ્પનીય છે અને બીજા બધા અકલ્પનીય છે सन हाdi, એજ દાતા, એજ દાતા, અન્ય દાતા, અન્ય દાતા, अन्य हाता, अन्य हाता, અન્ય દ્રશ્ય, એજ દ્રવ્ય, सन द्रव्य, એજ દ્રવ્ય, એજ દ્રવ્ય, અન્ય દ્રવ્ય, અન્ય વ્ય, ७ ८ . अध्ययन ५ उ १ गा. ३३-३५-पश्चात्कर्मपिताहारनिषेधः ४२५ विन्दुनिपातरहित इति यावत् , सरजस्का सचित्तरजोऽवगुण्ठितः, हस्तादिवोद्धव्यः, तथा मृत्तिका साधारणसचित्तमृत्तिका, ऊपः क्षारमृत्तिका, हरिताल स्वनामम- सिद्धपीतवर्णधातुविशेषः, हिड्लफ-स्वनामख्यातपार्थिवरागद्रव्यविशेषः, मनः- शिला-स्वनामख्यातरक्तवर्णधातुविशेषः 'मेनसील' इतिपसिद्धः अञ्जन सौवी- राञ्जनम् , लवण सचित्तसामुद्रिकलवणम्, गैरिक-वर्णिक-सेटिका-सौराष्ट्रिका-पिष्ट- कुकुसा इति, मूले आपत्वाल्लुप्तविभक्तिक पदम् , तत्र गैरिका स्वनामप्रसिद्धो धातुः, वर्णिका-पीतवर्णमृत्तिका, सेटिका-श्वेतमृत्तिका 'खडी' इतिभापापसिद्धा, सौराष्टिका-गोपीचन्दन पिष्ट-गोध्रमादिचूर्णम् , कुकुसः तत्कालकण्डितधान्यतुप., च-पुनः उत्कृष्ट-कूप्माण्डा-लासू त्रपुप-तरम्मुजादीना शस्त्रकृत श्लक्ष्णखण्डम् , एतैर्मृत्तिकादिभिरससृष्टः साधवे भिक्षा ददामीतिकृत्वा ससर्गसम्मानेन तदलिप्त., ससृष्टः तत्ससर्गसम्मार्जनेनापि तलिस एव कृतः विहितो हस्तादिर्वोध्य' । पुरः- कर्मयुक्तेन हस्तादिनेव उदकार्दादिहस्तादिना, तथामृत्तिकादिसमृष्टहस्तादिक केनापि विधिना साधुनिमित्तमससृष्टीकृत्य सम्माज्य, एव मृत्तिकादिससृष्टहस्तादिना च ददती प्रत्याचक्षीत-तादृश मे न कल्पत इति ॥३३॥३४॥ (हाथकी रेखा गीली हो), सचित्त रजसे सहित तथा साधारण सचित्त मिट्टी, खारी मिट्टी, हरताल, हिंगुल, मैनसील, अजन, सचित्त नमक, गेरू, पीली मिट्टी, खडिया मिट्टी, गोपीचन्दन, ताजा पीसा हुआ गेट्ट आदिका आटा, तत्काल खाडा हुआ धान्यका तुष (वुस्सा), कुम्भडा (कहू), तुम्बा (ककडी), तथा तरबूजके छोटे२ खड, इन सबसे हाय लिप्त हो अथवा किसी प्रकारसे सावुके लिये उसे (सचित्तसे लिप्त हाथको) अलिस किया रो और उस हायसे भिक्षा देवे तो साधु कहें कि ऐसा आहार हमे नही कल्पता है' ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ રેખાઓ લીલી હેય,) સચિત્ત રજથી સહિત, તથા સાધારણ સચિત્ત માટી, ખારી માટી, હરતાલ, હિંગળ, મણસીલ, સુર, સચિત્ત મીઠું, ગેરૂ, પીળી માટી, ખડીની માટી, ગેપીચ દન, તાજા દળેલા ઘઉ આદિને અ ટે, તાજા ખાડેલા ધાન્યના તુષ (ચૂલુ ), કેહવુ, દુધી તથા તડબૂચના કકડ, એ બધાથી હાથ લિપ્ત હય, અથવા કોઈ પ્રકારે સાધુને માટે તેને (સચિત્તથી ખડાયેલા હાથને) અલિપ્ત કર્યા હોય અને એ હાથથી ભિક્ષા આપે તે સાધુ કહે કે 'वो माडार भने scudो नथी' (33-3४) ४२४ श्रीदशकालिको २ ३ ४ ५ ૧૨ 13 १४ मूलम्-एव उदउल्ले ससिणिद्धे ससरक्खे महिया उसे। हरियाले हिंगुलए, मणोसिला अजणे लोणे ॥३३॥ गेरुय-वन्निय-सेडिय, सोरहिय-पिट-कुक्कुस कए य । उकिह-मससह, ससहे चेव बोद्धये ॥ ३४ ॥ छाया-एवम् उदकाः सस्निग्या, सरजस्को मृत्तिका ऊपः । हरिताल हिगुलक, मनःशिलाऽञ्जन लवणम् ॥३३॥ गैरिक-चणिक -सेटिका, सौराष्ट्रिका-पिष्ट-कुकुसाः कृतश्च । उत्कृष्टमसमृष्टः, समृष्ट एर चोद्धन्यः ॥३४॥ सान्वयार्थः-एव इसी प्रकार उटउल्ले-टपकते हुए जलसहित ससणिद्धे- गीली रेखाओसे सहित या ससरक्खे सचित्त रजसे गुण्ठित सहित हाय आदि हो, (तथा) मटिया सचित्त मिट्टी ऊसेसाजीखार हरियाले हरताल हिंगुलए- हिंगलू मणोसिला मैनसिल अजणे-सौवीराजन लोणे सचित्त नमक | गेरुय- गेरु वन्नियः-पीली मिट्टी सेडिय-श्वेत मिट्टी-खड़ी सोरडिय-सोरठी मिट्टी गोपी चन्दन पिट्ट-तत्कालका पीसा हुआ आटा (तथा) कुक्कस-तत्कालके खाडे हुए धान्यके तुप-भूसे-से भरे हुए य और उकिट-चाकूसे बनाये हुए कोले, तरे, ककडी आदिके कोमल कोमल टुकडे, इन पूर्वोक्त किसी वस्तुसे भी अससटे- खरडे-लिपे-हुए हाथ आदिको साधुके लिए किसी प्रकारसे अलिप्त बनाया हो, धोकर या पूछकर साफ किया हो, ऐसे हाथको ससट्टे-चेव कए लिप्तही बोद्धब्बे जान लेवे, अर्थात् इस प्रकारके असमृष्ट हाथ आदिसे अथवा इनसे ससृष्ट हाथ आदि से साधु आहार-पानी नही लेवे, यह प्रकरणगत सम्बन्ध है ॥३३-३४|| टीका---' एवम् उदउल्ले.' इत्यादि । एवम् इत्यमेव पुर कर्मवदित्यर्थः । उदका गलत्सचित्तजलबिन्दुक , सस्निग्ध =ईपदा =आर्द्राभूतहस्तरेखादिन - एव उदउल्ले' इत्यादि, 'गेरुय' इत्यादि च । इसी प्रकार, गिरते हुए सचित्त जलकी बूदोसे युक्त, थोडा, गीला एवं उदउल्ले प्रत्यादि गेरुय त्या એ પ્રમાણે, પડતા સચિત્ત જળના બિંદુઓથી યુક્ત, ડા લીલા (હાથની . 3 २ ५ ७ १० ૧૨ अध्ययन ५ उ. १ गा. ३६-३७-जाहारग्रहणविवेकः सचित्तजलेन तत्करादिक्षालनसम्भवः, तथ प्रक्षालनादिक भिक्षुनिमित्तकमिति पश्चात्कर्मदोपो विजेयः, योवपिनापि हस्तादिना स्वय मुजीतान्यस्मै वा परिवेपये- तदा न पश्चात्कर्मदोपः, तत्र पवादाग्नि. प्रक्षालनादेभिक्षुनिमित्तत्वाभावात् , यत्र दाढी पथाकर्मदोपसम्भावनाया अभावस्तत्र नाय प्रतिपेप इत्याशयः ॥३५॥ मूलम्-ससटेण य हत्थेण, दवीए भायणेण वा । दिजमाण पडिच्छिज्जा, ज तत्थेसणियं भवे ॥३६॥ डाया-समाप्टेन च हस्तेन, दा भाजनेन वा । दीयमान प्रतीन्छेत् , यत्तत्रेपणीय भवेत् ॥३६॥ सान्वयार्थ -ससट्टेण व्यञ्जनादिसे लिप्त हत्थेण हाथ य-या दवीए- कटडी चा अथवा भायणेणवरतनसे दिजमाण-दियाजानेवाला आहारादि हो तत्यम्बदा उस आहारादिम जम्जो एसणिय-उद्गम-उत्पादना-आदि दोप- रहित मवेहो, उसे पडिच्छिज्जा लेवे ॥३६॥ टीका--'ससट्टेण' इत्यादि । टीका स्पष्टा ॥३६॥ और वह प्रक्षालन साधुके निमित्तसे होगा, इसलिये वहाँ पश्चात्कर्मदोप लगता है। यदि ऐसे (लिप्त किये हुए) ही हाथसे स्वय भोजन करे या दसरेको परोसे तो पश्चात्कर्मदोप नहीं लगता, क्योंकि बादमें होने- वाले उस प्रक्षालन आदि कर्मका निमित्त, साधु नही रहता है-अर्थात् जिस कुडली आदिमें पश्चात्कर्म होनेकी सम्भावना न हो वहाँ यह निषेध नहीं है-यानी वह लेना कल्पता है ॥३५॥ समद्वेण' इत्यादि । ससृष्ट हाय, कुटठी और वर्तनसे दिये जाने- वाले आहारमेंसे जो एपणीय अर्थात् उद्गम-उत्पादना-आदिदोपरहित हो वह साधु ग्रहण करें॥३६॥ પ્રક્ષાલન સાધુના નિમિત્તે થાય, તેથી તેમા પશ્ચાદ્ધર્મદેષ લાગે છે જે એવા (લિસ કરેલા–ખાયેલા)જ હાથથી પિને ભજન કરે યા બીજાને પીરને તે પશ્ચાકર્મદેવ લાગતું નથી, કારણ કે તારબાદ થનારૂ પ્રક્ષાલન–આદિ કર્મનું નિમિત્ત સાધુ રહેતો નથી અર્થાત્ જે કડકી આદિમ પાત્ર થવાની સંભાવના નહિ હોય, ત્યા એ નિવેધ થી એટલે કે એ આહાર લેવે સાધુને કાપે છે (૩૫) સળ ઈત્યાદિ સહ હાથ, ડકી અને વાસણુથી આપવામાં આવતા આહા માથી જે એણય અર્થત ઉદ્દગમ ઉત્પાદના આદિ દેથી રહિત હોય તે સાધુ ગ્રહણ કરે (૩૬) C ४२६ श्रीदशवकालिकसूत्रे ४ ५ ७ ८ १. ૨ 3 मूलम्-अससटेण हत्थेण, दहीए भायणेण वा । दिजमाणं न इच्छिज्जा, पच्छाकम्म जहिं भवे ॥३५॥ छाया-अससृष्टेन हस्तेन, दा भाजनेन वा । दीयमान नेन्छेत् , पश्चात्कर्म यत्र भवेत् ॥३५॥ सान्वयार्थ:-जहिं जहा पच्छाकम्म पश्चात्कर्म साधुको आहार आदि देनेके बाद सचित्त जलसे हाथ आदिका धोना भवे-होनेवाला हो उस प्रकारके अससटेण-व्यञ्जन शाफ कड़ी आदि-से अलिप्त याने साफ 'ऐसे' रत्येण हाथ दवीए कडछी धा=अथवा भायणेण परतनसे दिज्जमाण-दिये जानेवाले आहार आदिकी साधु न इच्छिज्जा=इच्छा न करे, अर्थात् उस आहारादिको साधु न लेवे ॥३५॥ टीका-पश्चाकर्म-दोपमाह-'अससटेण' इत्यादि । यत्र-हस्तादौ पश्चात् दानानन्तर कर्म भवेत् सम्भवेत् तादृशेन अससृष्टेन व्यञ्जनादिनाऽलिप्लेन हस्तेन दा भाजनेन वा 'अससृष्टेने'-त्येतत्मत्येक सम्बध्यते, दीयमानमाहारादिक नेच्छेत्-नाभिलपेत् मनसाऽपीत्यर्थात् । यत्र स्वार्थ व्यञ्जनादिना इस्तादिक नोप- लिप्त किन्तु भिक्षुमुद्दिश्य भक्तादिदानार्थं हस्तागुपलेपो जायते, तत्र दानानन्तर अब पश्चात्कर्मदोष बताते है-'अससटेण' इत्यादि । भिक्षा देनेके अनन्तर गृहस्थको साधुके निमित्तसे सचित्त जल आदिके द्वारा हाथ आदि प्रक्षालन करनेकी सभावना हो तो माधु, ऐसे व्यञ्जन आदिसे अलिप्त हाय, कुडछी अथवा वर्तनसे दिये जानेवाले आहारकी अभिलाषा न करे। गृहस्थके हाथ अपनेलिये व्यञ्जन आदिसे लिप्त न हों तो उन हाथोंसे साधुको भिक्षा देवे, तदनन्तर सचित्त जलसे हाथका धोना सम्भव है ४३ पश्चाभ होप मतावे छे-अससष्टेण त्या ભિક્ષા આપ્યા પછી સાધુને નિમિત્તે સચિત્ત જળ આદિ દ્વારા હાથ આદિ ધોઈ નાખવાની ગૃહસ્થને માટે સભાવના હોય, તે સાધુ એવા વ્યજન આદિથી અલિપ્ત હાથ, કડછી અથવા વાસણથી આપવામાં આવનારા આહારની અભિલાષા ન કરે ગૃહસ્થના હાથ પિતાને માટે વ્યાજનાદિથી લિપ્ત ન હોય તે એ હાથથી સાધુને ભિક્ષા આપે, પછી સચિત્ત જળથી હાથ દેવાને સંભવ છે અને એ अध्ययन ५ उ. १ गा. ३८-३९-आहारग्रहणविवेकः ४२९ ૨ ४ 3 ५ १२ ७ ८ ૧૦ २ 3 ૫ ७ ८ मृलम्-दुण्ह तु भुजमाणाण, दोवि तत्थ निमतए । दिज्जमाण पडिच्छिज्जा, ज तत्थेसणिय भवे ॥३८॥ छाया-द्वयोस्तु भुञ्जानयो,विपि तत्र निमन्त्रयेताम् । दीयमान प्रतीच्छे, धत्तत्रैपणीय भवेत् ॥३८॥ सान्वयार्थः-अगर-भुजमाणाण-भोजन या खाद्य पदार्थों के रक्षण करते हुए दुण्ड दो से तुयदि तत्थ बहा दोविन्दोनो ही निमतए-निमन्त्रण करे-आहा- रादि वामे तो तत्व-उस आहारादिमेंसे जजो एसणियएपणीय-निदोप हो वह दिजमाण दिया जानेवाला आहारादि पडिच्छिज्जा लेवे ॥३८॥ टीका-यधुभावपि निमन्त्रयेता तदा तत्र यदेपणीय तद् गृहीयादित्यर्थः ॥३८॥ मूलम् गुविणीए उवपणत्थ, विविह पाणभोयण । भुजमाण विवजिज्जा, भुत्तसेस पडिच्छए ॥३९॥ छाया-गुविण्यै उपन्यस्त, विविध पान भोजनम् । भुज्यमान विवर्जयेद् , भुक्तशेप पतीन्छेत् ॥३९॥ सान्वयार्थः-गुश्विणी गर्भवतीके लिए उवण्णत्यम्बनाकर रखा हुआ विविह नाना प्रकारका पाणभोयण-खान पान (यदि वह) भुजमाण-खा रही हो तो (उस आहारादिको साधु) विवज्जिज्जाबरजे न लेवे, (किन्तु) भुत्तसेस-गर्भवतीके भोजन करलेनेके वाढ जो शेप रहा हो तो उसे पडिच्छए-लेवे ॥३९॥ टीका-'गुन्विणीय' इत्यादि। गुर्बिण्यै गर्भवत्यै, उपन्यस्त गर्भपोपणार्थ= तदीयरुच्यनुरुलतया सम्पादित स्थापित वा विविध प्रकार पान-भोजन= यदि वे दोनो आहार देनेको उद्यत हों और वर आहार एषणीय हो तो ग्रहण कर लेवे ॥३८॥ 'गुग्विणीए.' इत्यादि । गर्भवती स्त्रीकी इच्छा के अनुसार अर्थात् उसके लिये बनाये हुए तथा गर्भको पुष्ट करनेवाले अनेक प्रकारके पान જે આહાર આપવામા બેઉ ઉદ્યત હોય અને એ આહાર એષણીય હોય તે સાધુ તે ગ્રહણ કરે (૩૮) गुत्रिणीए. Uया यती श्रीनी २७ने मनुसशन अर्थात् गेने માટે બનાવેલા તથા ગર્ભને પુષ્ટ કરનામાં અનેક પ્રકારના પાન અને ભેજન , ४२८ श्रीदसवेकालिकसूत्रे - ४ ५ १ ७ ८ ११ मूलम्-दुण्ह तु भुंजमाणाणं, एगो तत्थ निमंतए । दिजमाण न इच्छिज्जा, छद्र से पडिलेहए ॥३७॥ छाया-द्वयोस्तु भुजानयोः, एफस्तत्र निमन्त्रयेत् । दीयमान नेच्छेत् , छन्द तस्य प्रतिलेखयेत् ॥३७॥ सान्वयार्थः तत्व बहा भुजमाणाण-भोजन करते हुए दुर-दोनों से तु- यदि एगो-एक आदमी निमत=निमन्त्रित करे-आहारादि देना चाहे तो दिज्जमाण यह दियाजानेवाला आहारादि (साधु) नइच्छिज्जान्न चाहेन लेवे, (किन्तु) से उस नही निमन्त्रण करनेवालेके उद-अभिप्रायको पडिलेहए- देखे ॥३७॥ टीका-'दुण्ड तु' इत्यादि । तत्र तयोः एकवस्तुस्वामित्वेन प्रसिद्धयोः, द्वयो' भुञ्जानयोः (अत्र सप्तम्यर्थे पष्ठी भुजधातुश्च पालनाभ्यवहारोभयार्थक- स्ततश्च) पालयतोः, भोक्तुमुद्यतयोश्च मध्ये (पालनार्थकत्वेतु परस्मैपद स्वयमूहनीयम्) (यदि) एका अन्यतर. निमन्त्रयेत दातुमुचतेत, तदा दीयमानम् (आहारादि) भिक्षु नेच्छेत् , किन्तु तस्य दानोद्यतेतरस्य छन्द=अभिप्राय भू नेत्रविकारादि- रूपचिह्नः प्रतिलेखयेत् क्षेत-'दानमस्येष्ट न वे'-ति निश्चिनुयादित्यर्थः ॥३७॥ ततः किं कुर्यादित्याह-'दुण्ह तु' इत्यादि । 'दुण्ड तु०' इत्यादि । यदि एक वस्तुके दो स्वामी हों तथा दो गृहस्थ भोजन करनेके लिये उद्यत हुए हों, और उन दोनोमेसे एक व्यक्तिआहार देनेके लिये उद्यत हो तो ऐसे आहारकी इच्छा भिक्षु न करे, किन्तु दूसरेके भोर नेत्र आदि विकारसे अभिप्रायका अनुभव करे कि बहराने (देने)में इसकी सम्मति है या नहीं? ॥ ३७॥ इसके पश्चात् क्या करे ? सो कहते है-'दुण्ड तु०' इत्यादि। ૩૬ ૪૦ ઈત્યાદિ જે એક વસ્તુના બે સ્વામી હોય તથા બે ગૃહસ્થ ભેજન કરતા હોય અને એ બેમાથી એક આહાર આપવા માટે ઉદ્યત હોય તે એવા આહારની ઈચ્છા ભિક્ષુ ન કરે પરંતુ બીજાના ભ્રમરો, નેત્ર, આદિના વિકારથી અભિપ્રાયને અનુભવ કરે કે વહેરાવવામા એની સમિતિ છે કે નહિ? (૩૭) से पछी शु ४२१ ते ४ छ-दुण्द्द तु० त्या - अध्ययन ५ उ. १ मा. ४०-४१आहारग्रहणविवेका त तु-तो वह भत्तपाण=आहार-पानी सजयाण-साधुओके लिए अकप्पिय= अकल्पनीय भवे होता है, (अत:) दितिय देनेवालीसे (साधु)पडियाहक्ख कहे फितारिस-इस प्रकारका आहारादि मे-मुझे न कप्पड-नहीं कल्पता है।४०४१॥ टीका-सिया य०' 'त भवे' इत्यादि । च-पुनः उत्थिताण्डवत्समवस्थिता, कालमासिनी कालमासशब्देनात्र प्रसवकालमासो गृह्यते, स च सप्तमासादारभ्य सार्दसप्तरानाधिक नवमास यावत् , तद्वती-प्राप्तमसवयोग्यसमयेत्यर्थः, गुर्विणी गर्भवती, स्यात् कदाचित् , अमणार्थ साधुनिमित्त-सा पवे दातुमित्यर्थः, निपीदेव- उपविशेत् , वा=अथवा, निपण्णा-उपविष्टा पुनरुत्तिष्ठेत् , तदा तत्-तया दीयमान भक्त-पान तु सयताना-सयमवताम् अकल्पिक(त)म् अग्राह्यम् , अतो दढती मत्याचक्षीतेत्यादि पूर्ववत् । 'सबै वाक्य सावधारण भरती-तिन्यायेन उन्थिता यदि दातुमुपविशेदेव, 'सियायः' इत्यादि त भवे०' इत्यादि च । प्रसव-काल-मासवाली अर्थात् सातवें महीनेसे आरम्भ करके साढ़े सात रात सहित नववें महीने तक, अर्थात् सातवें महीनेके याद प्रसव होनेतकके समयवाली स्त्री, यदि खड़ी हुई हो और साधुको भिक्षा देने के लिये बैठे, अथवा पैठी हुई हो किन्तु भिक्षा देने के लिये उठे तो उसके द्वारा दिया जानेवाला आहार, सममियोंके लिये कल्प्य नहीं है, अतः देनेवाली (स्त्री) से कहे कि ऐसा आहार हमें कल्पता नहीं है।' सय वाक्य, 'सावधारण अर्थात् निश्चय करानेवाले होते हैं। इस न्यायके वलसे यहाँ पर यह तात्पर्य निकलता है कि यदि देनेवाली बैठी हो और बड़ी होकरके ही आहार देवे, याग्वडी हो किन्तु बैठ करके ही सिया य. त्यात भवे. त्यात असा भासपाणी अर्थात् सातमा મહીનાથી આર સીને સાડા સાત રાત સહિત નવમા મહીના સુધી, એટલે કે સતમા મહિના પછી પ્રસવ થાય ત્યાસુધીના સમયગાળી સ્ત્રી જે ઊભી હોય અને સાધુને ભિક્ષા આપવાને માટે બેસે, અથવા બેઠી હાથ પરતું ભિક્ષા આપ વાને માટે ઉઠે તે તેણે આપેલે આહાર સંયમીઓને માટે કલ્પનીય નથી, દેનારી સ્ત્રીને કહેવું કે “એ આહાર મને પતે નથી” બધા વાક્યે “સાધારણ અર્થાત નિશ્ચય કરાવવાવાળા હોય છે એ ન્યાયા નુસાર અહીં એ તાત્પર્ય નીકળે છે કે જે આપનારી બેઠી હોય અને ઊભી થઈને જ આહાર આપે યા ઊભી પરંતુ બેસીને જ આહાર આપે તે એ ८ ७ 1२ १० २० २३ २२ २४ २१ ४३० श्रीदर्शवकालिमूत्रे पान-पेय-पाणकादिक, भोजन भोज्य मोदकादिक (तया) भुज्यमानम् उपभुज्यमान च रिपर्जयेत् न गृहीयात् यतस्तदोपल्पिताऽऽहारादिग्रहणे यथा रुच्याहाराधभावातदिनाभद्गस्ततय गर्भपीटा-तत्पातादिसम्भवः । ननु तर्हि किं सर्वथा विर्जयेदित्याह-'शुक्ते'ति-भुक्तशेप-भुक्तादागिष्ट प्रतीच्छेद उपाददीत ॥३९॥ मूलम्-सिया य समणटाए, गुविणी कालमासिणी। उहिया वा निसीएजा, निसन्ना वा पुणुटए ॥४०॥ तं भवे भत्तपाण तु, सजयाण अकप्पिय । दितिय पडिआइक्खे, न मे कप्पड़ तारिसं ॥४१॥ छाया-म्याच श्रमणार्थ, गुविणी मालमासिनी । उत्थिता वा निपीदेव, निपण्णा वा पुनरुत्तिष्ठेत् ॥४०॥ तद्भवेद्भक्त-पान तु, सयतानामकल्पिक(त)म् । ददती प्रत्याचक्षीत, न मे कल्पते तादृशम् ॥४१॥ सान्वयार्थ:-य और कालमासिणी-नजदीक मसवकालवाली गुब्विणी- गर्भवती स्त्री सिया यदि कदाचित् उहिया वा-पहलेसे खडी हो (किन्तु) सम- णट्ठाए साधुके लिए अर्थात् साधुको आहारादि देनेके लिए निसीएज्जा बैठे वा अथवा निसन्ना-पहले से बैठी हुई (साधुके लिए) पुण-फिर उहा-ऊठे, और भोजन (मोदक आदि) का और वह जिसका उपभोग कर रही हो उस आहारका (माधु) त्याग करे-ग्रहण न करे। क्योंकि उसके लिये बनाये हुए भोजनको ग्रहण करनेसे उसकी इच्छाका भग होकर गर्भको पीडा पहुँचेगी, और गर्भपात तक होनेका सम्भव हो जायगा। तो क्या वैसा आहार लेवे ही नही? सो कहते है-गर्भवती के भोजन कर लेने बाद जो आहार अवशेष रहे उसे ग्रहण करनेमे दोष नहीं है ॥३९॥ (દક આદિ)ને અને તે જેને ઉપભેગ કરી રહી હોય તે આહારને સાધુ ત્યાગ કરે-ગ્રહણ ન કરે, કારણ કે એને માટે બનાવવામાં આવેલા ભેજનને ગ્રહણ કરવાથી તેને રૂચિને અનુસાર ભજન નહિ મળે, તેથી એની ઈચ્છાને ભગ થશે અને ગર્ભને પીડા પહેચશે અને ગર્ભપાત પણ થઈ જવાને સ ભવ રહેશે તે શુ એ આહાર લેવેજ નહિ તે માટે કહે છે કે-ગર્ભવતી ભજન કરી રહે ત્યારપછી જે આહાર અવશેષ રહે તેને ગ્રહણ કરવામા દેવ નથી (૩૯) hip अध्ययन ५ उ.१ गा. ४२-४३-आहारग्रहणविधिः ४३३ , छाया-स्तन्य पाययन्ती (च), दारक वा कुमारिकाम् । त निक्षिप्य रुदन्त,-माहरेत्पान-भोजनम् ॥४२॥ तद्भवेगा-पान तु, सयतानामकल्पिक(त)म् । ददतीं प्रत्याचक्षीत, न मे कल्पते तादृशम् ॥४३॥ सान्वयार्थः-दारग लडके कुमारिय-लडकी वा अथवा नपुसक किसीभी बच्चेको थणग स्तन्य-द्ध पिज्जमाणी-पिलाती हुई त उस बच्चेको रोयत रोते हुएको निक्खिवित्तु भूमि आदि पर रखकर (यदि) पाण-भोयण आहार- पानी आहरे देवे, त तुम्तो वह भत्तपाण आहार-पानी सजयाण साधु- ओके लिए अकप्पिय अकल्पनीय भवे होता है, (अतः) दितिय देनेवालीसे पडियाइक्खे कहे कि तारिस-इस प्रकारका आहारादि मे=मुझे न कप्पइ= नहीं कल्पता है ॥४२-४३॥ टीका-'थणग' इत्यादि । दारफ-शिशुम् , कुमारिकाबालिकाम् , 'वा' शब्दासगृहीत नपुसकञ्च, स्तन्य दुग्ध पाययन्ती, त-पिवन्त शिशुपभृतिक रुदन्त= क्रन्दन्त निक्षिप्य भूम्यादौ निधाय पान-भोजनमाहरेत् तदा तद्भक्त-पान तु सय- तानामकल्पिक(न) भवेत् , अतो ददतीं प्रत्याचक्षीत-तादश मे न कल्पत इति । अत्रायमभिसन्धिः-यदि दारकादिः केवल स्तन्यपानोपजीवी स्तन्यपानान्न- भोजनोभयोपजीवी वा भवेत् त पाययन्ती स्तन्यपान सन्त्याज्य पानभोजन दद्यात्, 'थणग' इत्यादि, 'त भवे' इत्यादि। स्त्री यदि, लडके, लडकी या नपुसकको दूध पिलाती हो और उस पीनेवाले रोते हुए बालक आदिको, जमीन पर रख कर, पान-भोजन देवे तो साधु कहे कि 'ऐसा आहार, मुझे नही कल्पता है, यहाँ तात्पर्य यह है कि, यदि चालक दूधमुहाँ हो अथवा दूध भी पीता हो और अन्न भी खाता हो, उस बालकको स्तनपान छुडा कर आहार पानी देवे, थणग० ईत्याहि, त भवे. त्याहि જે સ્ત્રી પુત્ર પુત્રી કે નપુસકને દૂધ પાતી હોય અને એ પીનારા રેતા બાળક આદિને જમીન પર મૂકીને ભેજન પાન આપે તે સાધુ કહે કે “એ આહાર મને ક૫તે નથી ” અહી તાત્પર્ય એ છે કે જે બાળક દૂધમુખ (દૂધ પર જ) હોય અથવા દૂધ પીતુ હાય તથા અન્ન પણ ખાતુ હોય, તે એવા બાળકને સ્તનપાન છોડાવીને આહાર પણ આપે, અથવા કેઈ બાળક સ્તનપાન , .

५ २ १० ८ ૧૬ ૧૨ 13 ૨૧ ૨૦ २२ । ४३२ ধীমাগি उपविष्टा पोतिप्ठेदेव तदा दीयमानमाहारादिकमकल्पिक(त) म्यादिति । तत्ताप- र्याऽवधारणेनेदमायाति-उत्थिता तादृशी गर्भवती यस्थितेत्र, उपविष्टा योपविष्टैच दद्यात्तदा साधूना नाऽकल्पिक(न) चिन्तु ग्रामेति स्थनिरकल्पिकापेक्षमिदम् । जिनकल्पिमिस्तु प्रथमदिवसादेव तया दीयमान न गृह्यते इति रद्धाः ॥ ‘कालमासिनी' पदेन, पाष्टमासानन्तर गर्भस्य गुरुत्वेनोत्थानादिक्रिपाया तत्सञ्चलनादिना तस्या गर्भस्य च पीडावश्यमारिनीति सरचितम् ॥४०॥४१॥ मूलम्-थणग पिज्जमाणी (य), दारगं वा कुमारियं । त निरिखवितु रोयतं, आहरे पाण-भोयण ॥४२॥ त भवे भत्त-पाण तु, सजयाण अकप्पिय । दितिय पडियाइक्खे, न मे कप्पइ तारिस ॥४३॥ आहार देवे तो उससे दिया जानेवालाआहार अकल्प्य होता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि ऐसी गर्भवती स्त्री यदि वैठी हो और बैठी बैठीही आहार देवे या खडी हो और खडी खडी ही आहार देवे तो साधुओके लिये अकल्प्य नहीं है, किन्तु कल्पनीय ही है। यह बात, स्थविर-कल्पकी अपेक्षासे समझनी चाहिये। वृद्धोंका मत है कि जिनकल्पी महाराज, गर्भके प्रथम दिनसे ही गर्भवती स्त्रीके हाथसे दिया जानेवाला आहार सर्वथा नहीं लेते है। 'कालमासिनी' पदसे यह सूचित किया है कि-उठे महीनेके बाद गर्भ भारी हो जाता है, इस कारण हिलने डोलनेसे गर्भवतीकोतथा उसके गर्भको पीडा अवश्य होती है ॥ ४० ॥ ४१ ॥ રીતે આપવામાં આવતે આહાર અકસ્થ બને છે એનું તાત્પર્ય એ થયું એવી ગર્ભવતી સ્ત્રી જે બેઠી હોય તે બેઠી બેઠી જ આહાર આપિ યા ઊભી હોય તે ઊભી ઊભી આહાર આપે તો સાધુને માટે તે અકદ નથી, પરંતુ કાય છે આ વાત સ્થવિર કપની અપેક્ષાએ સમજવી જોઈએ વૃદ્ધોને મત એ છે કે જિનકલપી મહારાજ ગર્ભના પ્રથમ દિવસથી જ ગર્ભવતી સ્ત્રીના હાથથી આપવામાં આવતે આહાર સર્વથા લેતા નથી પત્રમાપિની એ શબ્દથી સૂચિત કરવામા આવ્યુ છે કે છઠા મહીના પછી ગર્ભ ભારે થઈ જાય છે તેથી હીલચાલ કરવાથી ગર્ભવતી તથા એના ગર્ભને सपश्य पी. थाय छे (४०-४१) अध्ययन ५ उ.१ गा. ४२-४३-आहारग्रहणविधिः ४३३ छाया-स्तन्य पाययन्ती (च), दारक वा कुमारिकाम् । त निक्षिप्य रुदन्त,-माहरेत्पान-मोजनम् ॥४२॥ तद्भवेद्भक-पान तु, सयतानामकल्पिक(त)म् । ददतीं प्रत्याचक्षीत, न मे कल्पते तादशम् ॥४३॥ सान्वयार्थः-दारग लडके कुमारिय-लड़की वा अथवा नपुसक किसीमी बच्चेको थणग-स्तन्य द्ध पिज्जमाणी-पिलाती हुई त उस बच्चेको रोयत-रोते हुएको निक्खिवित्तु भूमि आदि पर रखकर (यदि) पाण-भोयण आहार- पानी आहरे देवे, त तुम्तो वह भत्तपाण=आहार-पानी सजयाण=साधु- ओके लिए अकप्पिय अकल्पनीय भवे होता है, (अतः) दितिय देनेवालीसे पडियाइक्खे-कहे कि तारिस इस प्रकारका आहारादि मे मुझे न कप्पड़ नहीं कल्पता है ॥४२-४३।। टीका-यणग' इत्यादि । दारस-शिशुम्, कुमारिका बालिकाम् , 'वा' शब्दात्सगृहीत नपुसकञ्च, स्तन्य दुग्ध पाययन्ती, त=पिनन्त शिशुप्रभृतिक रुदन्त- क्रन्दन्त निक्षिप्य भूम्यादौ निधाय पान-भोजनमाहरेत् तदा तद्भक्त-पान तु सय- तानामकल्पिक(त) भवेत् , अतो ददती प्रत्याचक्षीत-तादश मे न कल्पत इति । अवायमभिसन्धिः-यदि दारकादिः केवल स्तन्यपानोपजीवी स्तन्यपानान्न- भोजनोभयोपजीवी या भवेत् त पाययन्ती स्तन्यपान सन्त्याज्य पानभोजनदद्यात्, 'यणग' इत्यादि, 'त भवे' इत्यादि । स्त्री यदि, लडके, लडकी या नपुसकको दूध पिलाती हो और उस पीनेवाले रोते हुए बालक आदिको, जमीन पर रख कर, पान-भोजन देवे तो साधु कहे कि 'ऐसा आहार, मुझे नही कल्पता है, यहाँ तात्पर्य यह है कि, यदि चालक दूधमुहाँ हो अथवा दूध भी पीता हो और अन्न भी खाता हो, उस बालकको स्तनपान छुडा कर आहार पानी देवे, थणग० (त्या, त भवे० ५त्यादि જે સ્ત્રી પુત્ર પુત્રી કે નપુસકને દૂધ પાતી હોય અને એ પીનાગ રતા બાળક આદિને જમીન પર મૂકીને ભજન પાન આપે તે સાધુ કહે કે “એ આહાર મને ક૫તે નથી ” અહી તાત્પર્ય એ છે કે જે બાળક દૂધમુખ (દૂધ પર જ) હેાય અથવા દૂધ પીતુ હોય તથા અન્ન પણ ખાતુ હોય, તે એવા બાળકને સ્તનપાન છોડાવીને આહાર પણ આપે, અથવા કોઈ બાળક સ્તનપાન . , श्रीदनकालियो . - ३ २ ६ ७ १० ૧૨ 13 १४ ૧૫ ૧૭ २१२० २२ १६ उपविष्टा योनिप्ठेदेव तदा दीयमानमाहारादिकमरल्पिक(त) म्यादिति । तत्तात्प योऽवधारणेनेदमायाति-उत्थिता तादृशी गर्भवती यत्यितेच, उपविष्टा योपविष्टैच दद्यात्तदा साधुना नाऽकल्पिक(न) स्न्तुि ग्रादामे येति स्थरिकल्पिकापेक्षमिदम् । जिनकल्पिमिस्तु प्रथमदिवसादेव तया दीयमान न गृह्यते इति रद्धाः ॥ 'कालमासिनी' पदेन, पष्टमासानन्तर गर्भस्य गुरुत्वेनौत्यानादिक्रियाया तत्सञ्चलनादिना तस्या गर्भस्य च पीडाऽवश्यमारिनीति सचिवम् ॥४०॥४१॥ मूल्म-थणग पिजमाणी (य), दारग वा कुमारियं । त निरिखवित्तु रोयतं, आहरे पाण-भोयण ॥४२॥ त भवे भत्त-पाण तु, सजयाण अकप्पिय । दितिय पडियाइक्खे, न मे कप्पड तारिस ॥४३॥ आहार देवे तो उससे दिया जानेवाला आहार अकल्प्य होता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि ऐसी गर्भवती स्त्री यदि बैठी हो और वैठी बैठीही आहार देवे या खड़ी हो और खडी खडी ही आहार देवे तो साधुओंके लिये अकल्प्य नहीं है, किन्तु कल्पनीय ही है। यह बात, स्थविर-कल्पकी अपेक्षासे समझनी चाहिये। वृद्धोंका मत है कि जिनकल्पी महाराज, गर्भके प्रथम दिनसे ही गर्भवती स्त्रीके हाधसे दिया जानेवाला आहार सर्वथा नहीं लेते है। 'कालमासिनी' पदसे यह सूचित किया है कि छठे महीने के बाद गर्भ भारी हो जाता है, इस कारण हिलने डोलनेसे गर्भवतीको तथा उसके गर्भको पीडा अवश्य होती है ॥४०॥ ११ ॥ રીતે આપવામાં આવતા આહાર અક બને છે એનું તાત્પર્ય એ થયુ કે એવી ગર્ભવતી સ્ત્રી જે બેઠી હોય તે બેઠી બેઠી જ આહાર આપે યા ઊભી હેય તે ઊભી ઊભી આહાર આપે તે સાધુને માટે તે અકપ નથી, પરંતુ કલ્પનીય છે આ વાત સ્થવિર ક પની અપેક્ષાએ સમજવી જોઈએ વૃદ્ધોને મત એ છે કે જિનકલ્પી મહારાજ ગર્ભના પ્રથમ દિવસથી જ ગર્ભવતી સ્ત્રીના હાથથી આપવામાં આવતે આહાર સર્વથા લેતા નથી ત્રિમાસિની એ શબ્દથી સૂચિત કરવામા આવ્યુ છે કે છઠા મહીના પછી ગર્ભ ભારે થઈ જાય છે તેથી હાલ ચાલ કરવાથી ગર્ભવતી તથા એના ગર્ભને मपश्य पी. थाय छ (४०-४१) 1 २ 3 ५ ६ ८ १० ८ ૧૨ ૧૩ ૧૬ २० २३ २० २४ २१ अध्ययन ५ उ. १ गा. ४४-४६-शद्धित-मुद्रिताहारनिषेध: टीका-'जभवे' इत्यादि । यद्भक्त-पान तु कल्प्याकल्प्ये कल्प्य च अक- ल्प्यश्चेति समाहारद्वन्द्वे कल्प्याकल्प्य तस्मिन् , भावप्रधानचाय निर्देशस्ततच कल्प्य- त्वेऽकल्प्यत्वे चेत्यर्थः, कल्प्यत्यमुद्गमादिदोपरहितत्वमकल्प्यत्व च तत्सहितत्यम् , तत्र शङ्कित-शङ्का(सशय)युक्तत्वम् 'इद भक्तपान कल्प्यमकल्प्य वे'-त्येवविधसशय- विषयीभूतमित्यर्थः, भवेत् तत् ददती प्रत्याचक्षीत-तादृश मे न कल्पत इति ॥४४॥ मूलम्-दगवारेण पिहिय, नीसाए पीढएण वा । लोढेण वा विलेवेण, सिलेसेण वि केणड ॥४५॥ त च उभिदिआ दिज्जा, समणटाए व दावए । दितिय पडियाइक्खे, न मे कप्पड़ तारिस ॥४६॥ छाया-दकवारेण पिहित, निश्रया पीठकेन वा । लाप्टेन वा विलेपेन, श्लेषेण वा केनापि ॥४५॥ तच्चोयि दद्यात् , अमणार्थ वा दापयेत् । ददतीं प्रत्याचक्षीत, न मे कल्पते तादृशम् ॥४६।। सान्वयार्थ:-दगवारण जलके भरे हुए घडेसे नीसाण्यटीके पुडियेसे या पीसने की शिलासे वा अथवा पीढएण-पीढेसे लोदेण-लोडेसे वा=अथवा विलेवेण-मिट्टी आदिके लेपसे वि-अथवा केणइ दूसरे किसी प्रकारके सिले- सेणमोम लाख आदि चिकने पदार्थसे पिरिय-आच्छादित या मुद्रित किया- हुआ अशनादिका वरतन हो, त च=उसे यदि समणट्ठाए साधुके लिए उभि- दिआ उघाड (खोल) कर दिज्जा पुढ देवे वा=अथवा दावए-दूसरेसे दिलावे तो दितिय देती हुईसे साधु पडियाइक्खे-कहे कि तारिस-ऐसा आहारादि मे मुझे (लेना) न कप्पा-नही कल्पता है ॥४५-४६॥ 'ज भवे' इत्यादि । 'यह भक्त पान करप्य है या अकल्प्य' इस प्रकार जिममे सन्देह हो वह भक्त-पान देनेवालीसे साबु कहे कि ऐसा आहार मुझे ग्राह्य नहीं है ।। ४४ ॥ ज भवे. त्या 'मासोन पान (प्य छ भय से मारना જેમાં સ દેહ ઉત્પન્ન થાય તે ભજન પાન આપનારીને સાધુ કહે કે એ આહાર મને ગ્રાહ્ય નથી (૪૪) . २ 3 ५ ७ ८ . ४३४ श्रीदशवकालिकम अथवा य शिशुः स्तन्यमपिपन्न समीपे गा तिप्ठेत्त परित्यज्य दातु पृथग्भूवाया तस्या यदि स रुचात् तदापि तया दीयमानमाहारादिक सयतानामकल्पिकतम्, शिश्याचाहारान्तराय-कर्फशहस्त-भूमि-मश्चकादिस्पर्शजनितपीडा-मासागि मामार- कुफुरादिजन्तुकतीपघातादिसम्मपात् , दश्यते हि कचन निर्जनादौ स्थाने शृगा- लादयो पालानपहत्य पलायन्त इति ॥४२॥४३॥ मूलम्-ज भवे भत्तपाण तु, कप्पाकप्पंमि संकिय । दितिय पडियाडक्खे, मे कप्पड़ तारिस ॥४॥ माया-~यद्भवेद्भक्त-पानन्तु, कल्प्याकल्प्ये शतितम् । ददतीं प्रत्याचक्षीत, न मे कल्पते तदृशम् ॥४४॥ सान्वयार्थ -ज-जो भत्तपाण तु-अशनादि कप्पाकप्पम्मि-कल्प्य अल्प्यके विषयमें सकिय-शङ्कित शङ्कास्पद भवे-हो तो दितिय देनेवालीसे पडिया- इक्खे-कहे कि तारिस-इस प्रकारका आहारादि मे मुझे न कप्पइ-नहीं कल्पता है ॥४४॥ या कोई पालक, स्तन पान न करता हुआ भी गोदमें या समीपमे बैठाहो, उसे छोडकर स्त्री आहार देनेके लिये जावे और चालक रोने लगे तो भी उसके द्वारा दिया जानेवालाआहार, सयमियोको ग्राह्य नहीं है, क्योंकि इससे उसके बालकके आहारमें अन्तराय पडती है, भातृ-विरहजन्य दु.ख होता है, कठोर हाथ, भृमि, खाट आदिके स्पर्शसे पीडा होती है और मासभोजी बिलाच कुत्ते आदि जानवरोके द्वारा उपघात होनेका सम्भव रहता है। कहीं२ (पहाडी प्रदेशोंमे) शृगाल (गीदड), बालकोंको उठा कर ले भागते है ऐसा देखा जाता है ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ ન કરતું હોય પણ મેળામા યા સમીપમાં બેઠું હોય, તેને છેડીને સ્ત્રી આહાર આપવાને માટે જાય અને બાળક રેવા લાગે તે પણ તેણે આપેલે આહાર સ થમીઓને માટે ગ્રાહ્ય નથી, કારણ કે તેથી તેના બાળકના આહારમા પડે છે, માતૃવિરહજન્ય દુ ખ થાય છે, કઠેર હાથ, ભૂમિ, ખાટલા આદિના સ્પર્શથી પીડા થાય છે અને માસભેજી બીલાડા કૂતરા આદિ જાનવરે દ્વારા ઉપઘાત થવાને પણ સંભવ રહે છે કયાક કયાક (પછાડી પ્રદેશમા) શિયાળ બાળકોને ઉઠાવી જાય છે, એવું જોવામાં આવે છે (૪૨-૪૩) . ” તરાય अध्ययन ५ उ. १ गा. ४७-४८-दानार्थोंपकल्पिताहारनिषेधः ४३७ छाया-अशन पानक वापि खाय स्वाध तथा । यज्जानीयात् शृणुयाद्वा, दानार्थ प्रकृतमिदम् ॥४७॥ तद्भवेद्भक्त-पान तु, सयत्तानामकरिपक(त)म् । ददती मत्याचक्षीत, न मे कल्पते तादृशम् ॥४८॥ सान्वयार्थ:-ज जो असण=ओदन आदि अशन पाणग-दाख आदिका धोवन बावि-अथवा खाइम केला आदि खाद्य तहा और साइम-एलची लूग आदि स्वाध इम यह 'दाणवा' पथिकोको देनेके लिए पगड-उपफल्पित- निकाला हुआ है जो अपने या अपने कुटुम्बके लिए काममें नहीं लाया जावे ऐसा जाणेज्ज-जान लेवे वा अथवा सुणिज्जा-किसीसे सुन लेवे तो तम्बह भत्तपाण तु-आहार-पानी सजयाण-साधुओके लिए अकप्पिय अल्पनीय भवे होता है, (अतः) दितिय देती हुईसे साधु पडियाइक्खे-कहे कि तारिस इस प्रकारका आहारादि मे मुझे (लेना) न कप्पड़ नहीं कल्पता है ।।४७-४८॥ टीका-'असण.' इत्यादि, 'त भवे०' इत्यादि च । यत् अशन भोज्य- मोदन-पूरिकादिक, पानकन्द्राक्षादिजलम् , अपिवा अथवा खाध कदलीफला- दिक, स्वायम्एला-लबग-कर्पूर-पूगीफलादिकम् , 'दानार्थ देशान्तरादागतेन वणिगादिना साधुवादार्थ स्वकीयप्रशसानिमित्त दातुम् , इद प्रकृत-नियतरूपेणोप- कल्पितम्' इति जानीयात् आमन्त्रणादिना अवगच्छेत् , शृणुयाद्वा=कुतश्चि- 'असण.' इत्यादि, तथा 'त भवे.' इत्यादि । ओदन आदि अशन, दाखका जल आदि पान, केला आदि खाद्य, लोंग, कपूर, इलायची, सुपारी आदि स्वाद्य, 'यह देशा तरसे आये हुए वणिक आदिने अपनी प्रशसाके निमित्त देनेके लिये रक्खा है।' ऐसा जो समझे या किसीसे सुने तो वह अशनादि, सयमियोंको कल्पनीय नहीं है, असण त्यादि, तथा त भवे. त्यादि એદન આદિ અશન, દ્રાક્ષના ધાવણનું જળ આદિ પાન, કેળા આદિ भाध, सचीन, अपूर, सायची, मापारी मा स्वाध, આ દેશ ન્તથી આવેલા વણિક આદિએ પિતાની પ્રશંસાને લીધે આપવાને માટે રાખેલ છે ” એવુ જે સમજવામાં કે કોઈ પાસેથી સાભળવામાં આવે તે એ અનાદિ સયમીઓને .

२ 3 ५ १ ८ ७ ૧૨ 13 १४ २० ४३६ श्रीदर्शवकालिगभूत्रे टीका-'दगवारेण' 'तच' इत्यादि । दकेति दयनल (पोक्त माझे वनममृत जीवनीय दक च' इति हलायुधः,) पारयतिम्पदिनिःसरणतो निरुणदीति दक वारः जलप्सभृत कलसादिभाजन तेन, निश्रयान्चरटेन पेपणचण शिलापट्टेन (पेपणार्थपापाणेन) या, पीठकेन-काप्ठनिमिताऽऽसनेन, लोप्टेन शिलादि खण्डेन, विलेपेन=पृत्तिकादिले पेन, केनापि प्रले पेण-सिम्य लाक्षादिना वा पिहि- वम् आच्छादित मुद्रित पा यदन्नादिभाजनमिति प्रसद्गलभ्य भोत्, तच्च श्रमणार्थ मुद्भिध-उद्घाटय (स्वय) दयादापयेद्वा तदा गुरुतरवस्तूत्यापनशहिंसादि- सम्भावनया ददती प्रत्याचक्षीतेत्यादि पूर्ववत् ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ मूलम् असण पाणगं वा वि, I, खाइम साइम तहा। ज जाणेज्जा सुणेज्जा वा, दाणहा पगडं इम ॥४७॥ त भवे भत्त-पाण तु, सजयाण अकप्पिय । दितिय पडियाइक्खे, न मे कप्पड तारिस ॥४८॥ 'दकवारेण.' इत्यादि, 'त च' इत्यादि। जलसे भरेहुए वर्तनसे, चक्की के पुडसे, मसाला आदि पीसनेकी शिलासे, पीड़े (याजोट) से,लोढे (मसाला आदि पीसनेके वजनदार पत्थर) से ढके हुए, तथा मिट्टी आदिके लेपसे,अथवा अन्य किसीसे छादे या लाख आदिसे मुद्रित किया हुवा अन्न-पान, साधुके लिये उघाडकर स्वय देवे या दूसरेसे दिलावे तो क्लेश और हिंसाकी सम्भावनाके कारण देनेवालीको कहे कि ऐसा आहार हमे ग्राह्य नहीं है। तात्पर्य यह है कि, भारी वस्तुके उठानेमे स्व-पर-विराधना आदि अनेक दोषोंकी सम्भावना होनेसे यह निषेध किया गया है ॥४५॥४६॥ दकवारेण त्याहि तच त्या જળથી ભરેલા વાસણથી, ઘટીના પડથી, મસાલે વાટવાના એરશિયાથી બાજોઠથી, મસાલે વાટવાના વજનદાર પત્થરથી, ઢાકેલુ તથા માટી આદિના લેપથી અથવા અન્ય કઈ પદાર્થથી છાદેલ કે લાખ આદિથી બધ કરેલ વાસણ સાધુને માટે ઉઘાડીને અન્ન-પાન પિતે આપે યા બીજા પાસે અપાવે તે કલેશ અને હિંસાની સભાવનાથી આપનારીને સાધુ કહે કે એ આહાર અને ગ્રાહ્ય નથી તાત્પર્ય એ છે કે ભારે વસ્તુ ઉપાડવામાં સ્વપર-વિરાધના આદિ અનેક દેશની સંભાવના હેવાથી એ નિષેધ કરવામા આવ્યા છે (૪૫-૪૬) २१ २२ २५ २४ २९ २३ , - अध्ययन ५ उ. १ गा. ४९-५०-पुण्यार्थीपकल्पिताहारनिषेधः माणत्वादन दीनेभ्यो वितरणार्थमिद प्रकृतम्-उपकल्पितम्-स्व-स्वपोष्यवर्गोभयो- पभोग्यभिन्नतया स्थापितमिति यावत्' इति जानीयात् शृणुयाद्वा तद्भक्तपान- मित्यादि पूर्ववत् । पूर्वगायाया 'दाणहा' इत्यत्र दान-शब्देन स्वपशसाथै दान गृह्यते, प्रकृते 'पुण्णहा' इत्यत्र पुण्य शब्देन प्रशसाव्यतिरिक्तफलाभिसन्धानेन दान गृह्यते, इति दानपुण्ययोर्भेदः । 'महात्रतधारिभ्य एवं यद्दीयते तत्रैव पुण्यं न तु तदितरेभ्यः प्रदाने, तथा सति हि प्रत्युत पापकलापः समुत्पद्यते' इति केचिदाहुः, ('तेरहपथी' शब्देन प्रसिद्धाः साधर आहुः,) तद् भ्रान्तिविलसितम्, देनेके लिये है-अर्थात् पुण्यार्य बनाया गया है। ऐसा जाने या सुने तो वह सयमीके लिये ग्राह्य नहीं है, अत एव ऐसा आहार देनेवालीसे कहे कि-'यह भक्त-पान लेना मुझे नही कल्पता है। पहली गथामें आये हुए 'दाणट्ठा' पदके 'दान' शब्दसे 'अपनी प्रशसाके लिये दिया जानेवाला दान' अर्थ ग्रहण किया है, किन्तु इस गाथा 'पुण्णट्ठा'के 'पुण्य' शब्दसे अपनी प्रशसाके सिवाय अन्य किसी प्रयोजनसे दिया जानेवाला दान' अर्थ होता है-दान और पुण्यमें यही अन्तर है। कोई कोई कहते है कि-"महाव्रतधारी मुनियोको जो दान दिया जाता है उसीमें पुण्य है-दुसरोको देनेमें नहीं, दूसरोको देनेसे उलटा पाप लगता है" | उनका यह कहना भ्रान्ति-मूलक है, क्योकि, भगवान्ने १ तेरहपथी सप्रदाय के साधु । માટે છે, અર્થાત્ પુણ્યાર્થે બનાવવામાં એવુ જાણવામાં યા ળવામાં આવે તે એ સચમીને માટે ગ્રાહ્ય નથી તેથી કરીને એ આહાર આપનારીને સાધુ કહે કે–એ ભજન પાન લેવા મને ક૯પતા નથી પહેલી गथामा मात दाणहा पहना दान શબ્દથી પિતાની પ્રશ સાને માટે આપવામાં આવતુ દાન” એ આર્ય ગ્રહણ કર્યો છે, પણ આ गाथामा पुण्णहा भाना पुण्य शण्थी पोतानी પ્રશસા સિવાયના અન્ય કઈ પ્રજનથી આપવામાં આવતુ દાન” એ અર્થ થાય છે દાન અને પુણગમા એ અતર છે ૧ કાઈ કહે છે કે- “મહાવ્રતધારી મુનિઓને જે દાન આપવામાં આવે છે તેમ પુણ્ય છે બીજાઓને દેવામા પુણ્ય નથી, બીજાઓને દેવામાં ઉલટું પાપ લાગે છે ” એમનું એવું કહેવુ બ્રાતિમૂલક છે, કારણ કે ભગવાને પુષ્પા પહ ૧ર૮પ થી રસપ્રદાયના સાબુ ! આવ્યા સાભ 3 Y ७ ૧૨ . 10 २० १८ २१ २५४ २३ न ४३८ श्रीदशकालिको दाकर्णयेद्वा तद्भक्तपान तु सयतानामकल्पिक भवेत्, अतस्तददतीमत्याचक्षीत-तान मे न कल्पत इति ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ मूलम्-असण पाणग वावि, खाइम साइमं तहा । ज जाणेज्ज सुणेज्जा वा, पुण्णट्टा पगडं इम ॥४९॥ त भवे भत्त-पाण तु सजयाण अकप्पिय । दितिय पडियाइक्खे, न मे कप्पड़ तारिस ॥५०॥ छाया-अशन पानक वापि, खाद्य स्वाध तथा । यजानीयाच्छृणुयाद्वा, पुण्यार्थ प्रकृतमिदम् ॥४९॥ तद्भक्तपान तु, सयतानामकल्पिर(तम् । ददती प्रत्याचक्षीत, मे कल्पते तादृशम् ॥५०॥ सान्वयार्थः- :-ज असण पाणग वावि खाइम तहा साइम-जो अशन पान खादिम स्वादिम इम पुण्णट्टा पगड=' यह करुणाधुद्धिसे दीन हीन-जनोंके लिए पुण्यार्थ निकाल रखा है' इस प्रकार जाणेज जान लेवे वा अथवा सुणिज्जा- किसी दूसरेसे सुन लेवे तो त=बह भत्तपाण तु-आहार-पानी सजयाण- साधुओके लिए अकप्पिय अल्पनीय भवे होता है, (अत.) दितिय देती हुईसे साधु पडियाइक्खे-कहे कि तारिस-इस प्रकारका आहारादि मे-मुझे (लेना) न कप्पइन्नहीं क्ल्पता है ॥४९॥-५०॥ टीका-'असण' इत्यादि, 'त भवे.' इत्यादि च । यदशनादिक 'पुण्यार्थ=पुण्याय सुकृतायेद दयाधिया,वनीय(प)क-श्रमणार्थोपकल्पितस्याग्रे वक्ष्य- इसलिये ऐसा भक्त पान आदि देनेवाली से कहे कि यह मुझे नही कल्पता है ॥ ४७॥४८॥ असण' इत्यादि, तथा त भवे०' इत्यादि। जो 'अशन, पान, ग्वाद्य, स्वाद्य दया बुद्धिसे दीन हीन जनोंको માટે કપનીય નથી તેથી એવા ભેજન પાન આદિ આપનારીને સાધુ કહે કે को भने ४८५ता नथी (४७-४८) असण. त्यादि, तया त भवे. त्यात * આ અશન, પાન, ખાધ, સ્વાદ્ય, દયા બુદ્ધિથી દીનહીન જાને આપવાને છે . .

अध्ययन ५ उ. १ गा. ४९-५०-पुण्यार्थोपकल्पिताहारनिषेधः ४३९ माणत्वाढत्र दीनेभ्यो वितरणार्थमिद प्रकृतम्-उपकल्पितम्-स्व-स्वपोष्यवर्गोभयो- पभोग्यभिन्नतया स्थापितमिति यावत्' इति जानीयात् शृणुयाद्वा तद्भक्तपान- मित्यादि पूर्ववत् । पूर्वगायाया 'दाणट्टा' इत्यत्र दान शब्देन स्वप्रशसाथै दान गृह्यते, प्रकृते 'पुण्णहा' इत्यत्र पुण्य शब्देन स्पगसाव्यतिरिक्तफलाभिसन्यानेन दान गृह्यते, इति दानपुण्ययो.दः । 'महारतधारिभ्य एव यदीयते तत्रैव पुण्य न तु तदितरेभ्यः प्रदाने, तथा सति हि प्रत्युत पापकलापः समुत्पयते' इति केचिदाहुः, ('तेरहपथी' शब्देन प्रसिद्धा' साधर आहुः,) तद् भ्रान्तिविलसितम्, देनेके लिये है-अर्थात् पुण्यार्य बनाया गया है। ऐसा जाने या सुने तो वह सयमीके लिये ग्राह्य नहीं है, अत एव ऐसा आहार देनेवालीसे कहे कि- यह मक्त-पान लेना मुझे नही कल्पता है। पहली गथामे आये हुए 'दाणट्टा' पदके 'दान' शब्दसे 'अपनी प्रशसाके लिये दिया जानेवाला दान' अर्थ ग्रहण किया है, किन्तु इस गाथामें 'पुण्णट्टा के 'पुण्य' शब्दसे अपनी प्रशसाके सिवाय अन्य किसी प्रयोजनसे दिया जानेवाला दान' अर्थ होता है-दान और पुण्यमें यही अन्तर है। 'कोई कोई करते है कि-"महाव्रतधारी मुनियोको जो दान दिया जाता है उसीमें पुण्य है-दुसरोको दनेमे नहीं, दूसरोको देनेसे उलटा पाप लगता है" । उनका यह कहना भ्रान्ति-मूलक है, क्योंकि, भगवान्ने १ तेरहपथी संप्रदाय के साधु । માટે છે, અથૉત્ પુણ્યાથે બનાવવામાં આવ્યા છે ” એવુ જાણવામા યા સાભ ળવામાં આવે તે એ સયમને માટે ગ્રાહ્ય નથી તેથી કરીને એ આહાર આપનારીને સાધુ કહે કે-એ ભજન પાન લેવા મને ક૫તા નથી પહેલી પદના સાર શબ્દથી પોતાની પ્રશંસાને માટે આપવામાં આવતુ ઘન” એ અર્વ ગ્રહણ કર્યો છે, પણ આ ગાથામાં પુઠ્ઠા શબ્દયી પિતાની પ્રશમા સિવાયના અન્ય કોઈ જનથી આપવામાં આવતુ દાન” એવો અર્થ થાય છે દાન અને પુણ્યમા એ અતર છે કૈઇ ઈ કહે છે કે- “મહાવ્રતધારી મુનિઓને જે દાન આપવામાં આવે છે તેમ પુષ્ય છે ખીઓને દેવામાં પુય નથી, બીજાઓને દેવામાં ઉલટું પાપ पाये छ " मेमनु मे से प्राति छ, र 3 सपाने पुण्णहा पगड , ગાથામાં मावा दाणा માના ગુર તેરાપથી સંપ્રદાયના માનુ છે ४४० श्रीदशवकालिकमूत्रे भगवता हि 'पुण्णट्ठा पगड' इत्यनेन 'पुण्यार्थमुपकल्पित द्रव्य साधनामकल्प्य मिति चोधित, तत्र महाप्रतधारकेतरेभ्यः प्रदातमुपरिपतस्य द्रव्यस्य तन्मते पुण्यार्थत्वाभावेन 'पुण्णहा पगह' इति गास्य निविषयतामपयेत । ननु पुण्यार्थोपकल्पित्तद्रव्यस्यारत्यत्वस्वीकारे साधोः शिष्टकुले मिक्षाग्रहण मेवाकल्प्य स्यात्, पुण्यार्थमेव तेपा पारपत्तेने तु क्षुद्रनन्तवस्त्रोदरपूर्तिमात्रार्थ मिति चेन्न, तथाहि-यपि शिष्टकुले सम्पादितमन्न पुण्यार्थप्रकृत तथापि यदन्येभ्यो 'पुणटा पगड' इस कथनसे पुण्यके लिये निकाले हुए द्रव्यकोसाधुओंके वास्ते अकल्पनीय बताया है। यदि महावतियोंको छोड़कर अन्य किसीको देनेमें पुण्य न हो तो भगवान का किया हुआ यह निषेध किस पर लागू पडेगा ,तात्पर्य यह है कि पुण्यके लिये निकाले हुए द्रव्यको, मुनियों के लिये अकल्प्य बतानेसे यह सिद्ध होता है कि दूसरोंको दान देनेसे भी पुण्यकी प्राप्ति होती है। शका-यदि पुण्यार्थ निकाला हुआ द्रव्य, साधुओंको ग्राह्य नहीं है तो शिष्टकुलमे साधु, कभी भिक्षा ग्रहण कर ही नहीं सकते, क्योंकि शिष्ट जन, पुण्यके लिये ही रसोईका आरम्भ करते हैं, साधारण (क्षुद्र) प्राणियोंकी तरह अपने ही उदरकी पूत्तिके लिये नहीं । समाधान-यद्यपि शिष्टकुलमे तैयार किया हुआ आहार पुण्यके लिये ही सपादित होता है तथापि जो आहार दूसरोंको ही देने के लिये बनाया એ કથન વડે પુણ્યને માટે કહેલા દ્રવ્યને સાધુઓને માટે અકલ્પનીય બતાવ્યું છે જે મહાતીઓ સિવાયના બીજાઓને આપવામા પુણ્ય ન હોય તે ભગવાને કરેલે એ નિષેધ કેને લાગુ પડશે?, તાત્પર્ય એ છે કે પુણ્યને માટે કહેવા દ્રવ્યને મુનિઓને માટે અકસ્થ બતાવ્યું હોવાથી એમ સિદ્ધ થાય છે કે બીજા ઓને દાન આપવાથી પણ પુણ્યની પ્રાપ્તિ થાય છે શકા–જે પુણ્યાર્થ કાઢેલુ દ્રવ્ય સાધુઓને માટે ગ્રાહ્ય કુળમાં સાધુ કદાપિ ભિક્ષા ગ્રહણ કરી શકશે જ નહિ, કારણ કે શિષ્ટજન પુથને માટે જ રોઈને અ ર ભ કરે છે સાધારણ (સુદ) પ્રાણીઓની પેઠે માને પિતાનું જ ઉદર ભરવાને માટે નહિ સમાધાન-જે કે રિા કુળમાં તૈયાર કરવામાં આવતે આહાર પુણયને માટે જ સપાદિત હોય છે, તે પણ જે આહાર બીજાઓને આપવાને માટે બનાવવામાં भावे, पोताना भागने भाटे नडि, ते पुण्णहा पगड (पुण्यार्थ निष्पादित - ન હોય તે શિષ્ટ अध्ययन ५ उ. १ गा. ५१-५२-चनीपकार्थोपकल्पिताहारनिषेधः ४४१ २ 3 ५ ४ १ ८ ७ १ ૧૨ 13 १४ ११ ૧૦ , दातुमेव निष्पादित न तु सोपभोगार्थ तदेवान्न 'पुण्यार्थप्रकृत' शब्देनात्र गृयते, एतदेव देयमित्युच्यते । ईदृशस्यैव ग्रहणे प्रतिपेपः, आरम्भान्तरायादिदोपभस- गात् । यत्तु स्वस्य स्वपोष्यवर्गस्य चोपभोगार्थमुदारसुद्धया सम्पादित, तच्चानियत- दानार्थवाददेयमित्युच्यते । अस्य ग्रहणे सापो रम्भादिदोपप्रसङ्गः, साध्वर्थपा- कमवृत्तेरभावात् । किञ्च-शास्त्रे, शिष्टकुले भिक्षाग्रहणस्य विधानान तथाविधाऽऽ- हारग्रहणे दोप इत्यल पलवितेन ॥४९॥ ५० ॥ मूलम्-असण पाणग वावि, खाइम साइम तहा । जं जाणेज सुणेजा वा, वणिमट्ठा पगड इमं ॥५१॥ जाता है अपने उपभोगके लिये नही, वही 'पुग्णहा पगड' (पुण्यार्थ निष्पादित) और वही 'देय' कहलाता है । इस प्रकारके आहारको ही ग्रहण करनेका निषेत्र किया गया है। क्योकि, उसे लेलेनेसे आरभ और अन्तराय आदि दोपोंका प्रसग होता है। जो आहार, अपने और अपने आश्रित जनोके उपभोगके लिये उदार बुद्धिसे निप्पन्न किया जाता है, वह अनियत दानके लिये होनेसे अदेय' कहलाता है। इस अदेय आहारको ग्रहण करनेसे सावुको आरम्भ-आदि दोप नहीं लगते हैं, क्योंकि वह साधुके निमित्त नहीं बनाया जाता है, तथा शास्त्रमें, शिष्टकुलमें भिक्षा ग्रहण करनेका विधान है, इसलिये भी शिष्टकुलमे आहार ग्रहण करने में दोप नहीं आसकता, इतना ही समाधान काफी है ॥ १९ ॥५०॥ અને એજ “દેય' કહેવાય છે એ પ્રકારના આહારને પણ પ્રાણ કરવાને નિષેધ કરવામાં આવ્યું છે, કારણ કે એ લેવાથી આભ અને અતરાય આદિ દેને પ્રસગ ઉત્પન્ન થાય છે જે આહાર પિતાને માટે અને પિતાના આશ્રિત જનેના ઉપભેગને માટે ઉદા-બુદ્ધિથી નિષ્પન્ન કરવામાં આવે છે તે અનિયત દાનને માટે લેવાથી “અદેય’ કહેવાય છે એ અદેય આહાર ગ્રહણ કરવાથી સાધુને આર ભ આદિ દે લાગતા નથી, કારણ કે એ સાધુને માટે બનાવવામાં આવેલા હોતા નથી તથા શાસ્ત્રમાં શિફળમાં ભિક્ષા ગ્રગણું કરવાનું વિધાન છે, તેવી પણ શિશ કુળમાં આહાર ગ્રહણ કરવામા દેય લાગી શકતો નથી એટલું જ ५२तु छ (४८-५०) . સમાધાન ४४२ श्रीदशकालिकमरे ૨ त भवे भत्त-पाणं तु, सजयाण अकप्पिय । दितिय पडियाइस्खे, न मे कप्पड तारिस ॥५२॥ छाया-अशन पानक पापि, खाध साध तथा । यज्जानीया तृणुयाद्वा, पनीय (प)-कार्य प्रकृतमिदम् ॥५१॥ तद्भवेदक्त-पान तु, सयतानामाल्पिकम् । ददती प्रत्याचक्षीत, न मे रत्पते तादशम् ॥५२।। सान्वयार्थः :-ज असण पाणग वावि पाहम तहा माहम जो अशन पान खादिम स्वादिम इम वणिमट्ठा पगट=यह भिखारीऔर दस्ट्रिोके लिए उपकल्पित है ऐसा जाणेज जान लेवे धा=अथवा सुणिना=किसी दूसरेसे सुन लेवे तो त वह भत्तपाण तु आहार-पानी सजयाण-साधुओके लिए अकप्पिय अकल्पनीय भवे-ढोता है, (अतः) दितिय देती हुईसे साधु पडियाहस्खे-कहे कितारिस- इस मकारका आहारादि मे=मुझे (लेना) न कप्पडनहीं कल्पता है ॥५१-५२।। टीका-'असण' इत्यादि न भवे.' इत्यादि च । यद अशनादिक वनीय- (प)कार्यम्बनीय(प)क =याचरमात्र, यद्वा सिद्धान्नमानोपजीवी, बनी स्वकीयदुरवस्थामदर्शनपुर सर मियाऽऽलापादिना लभ्यद्रव्य, ता याति- मामोतीति वनीय', स एव वनीयका, 'वनीपके'तिपाठपक्षे तु ता पूर्वोक्ता वर्षी पिबति आस्वादयतीति, पाति रक्षति वा वनीपः, स एव वनीपक', अथवा वनुते भायो दातु सम्माननीयेप्वात्मनो भक्तिं प्रस्टयन याचत इति वा, ('वनु याचने' अस्माद्धातोरौणादिक ईपक्प्रत्यय 1) यदिवा सान्त्वन-बुभुक्षाजनिततापो- 'असण.' इत्यादि, तथा 'त भवे' इत्यादि । याचकमात्रको अथवा सिद्ध (तैयार) भिक्षा लेकर जीवन-निर्धार करनेवालेको वनीयक करते है, 'वनीपक' पाठपक्षमें-दाताके माननीय गुरु आदिमें भक्ति प्रकट करके लीजानेवाली भिक्षाको वनी कहते हैं, और ऐसी भिक्षा लेनेवाला 'वनीपक' कहलाता है, अथवा जो, भूखका ताप असण. त्यादि तथा त भवेत्यादि યાચક માત્રને અથવા સિદ્ધ (તેયાર) ભિક્ષા લઈને જીવન નિર્વાહક नाराने 'पनीय' ४३ ले वनीपक पाना पक्षमा-ताना भाननाय ४३माहिभा ભક્તિ પ્રકટ કરીને લેવામાં આવતી ભિક્ષાને જેની કહે છે, અને એવી ભિક્ષા લેનાર વની કહેવાય છે અથવા જે ભૂખને તાપ મિટાવીને સાત્વના આપે अथवा . ૨ 3 ७ १२ 13 १४ ૧૧ १० , १७ १८ ૧૯ ૨૧ ૨૨ ૨૫ ૨૪ ૨૬ 3 , अध्ययन ५ उ १ गा. ५३-५४ श्रमणार्थोपफल्पिताहारनिषेधः ४४३ पशमनलक्षण नयतिमापयतीति वनीः, यद्वावन्यते याच्यते-भिक्ष्यत इति वनी भिक्षणीयद्रव्यम् , ('वनु याचने' अस्मादौणादिक इन् कृदिकारादिति डीप्) ता पाति-उपफल्प्य रक्षतीति बनीपः गृहस्थस्त कायति पार्थयते मियोक्त्यादिनेति वनीपस्तदर्थमिद प्रकृतमित्यादि पूर्ववत् ।। ५१ ॥ ५२ ।। मूलम्-असण पाणगं वावि, खाइमं साइम तहा । ज जाणेज सुणेज्जा वा, समणट्टा पगडं इमं ॥५३॥ त भवे भत्त-पाण तु, सजयाण अकप्पियं । दितिय पडियाइक्खे, न मे कप्पइ तादिस ॥५४॥ छाया-अशन पानक वापि, खाच स्वाय तथा । यजानीयान्छृणुयाद्वा, अमणार्थ प्रकृतमिदम् ॥५३॥ तद्भवेत-पान तु, सयतानामकल्पिकम् । ददतीं प्रत्याचक्षीत, न मे कल्पते तादृशम् ॥५४॥ सान्वयार्थ: :-ज असण पाणग वावि खाइम तहा माडम-जो अशन पान खादिम स्वादिम इम समणट्ठा पगड-यह निर्ग्रन्थ शाक्य तापस गैरिक और आजीवक, इन पाच प्रकारके श्रमणोके लिए उपकल्पित है, ऐसा जाणेज्ज-मान लेवे वा अथवा सुणिज्जा किसी दूसरेसे मुन लेवे तो तबह भत्तपाण तु% आहार-पानी मजयाण साधुओके लिए अकप्पिय अल्पनीय भवे होता है, (अत) दितिय देती हुई से साधु पडियाइक्खे-कहे कि तारिस-इस प्रकारका आहारादि मे=मुझे (लेना) न कप्पा नहीं क्ल्पता है ॥५३-५४॥ मिटाकर सान्त्वना प्रदान करे उसे वनी (भिक्षा देने के लिये रखा हुआ अन्नादि) कहते हैं, उसको सुरक्षित रखनेवाला गृहस्थ 'वनीप' कहलाता है, और उस धनीप (गृहस्थ)से प्रार्थना करके भिक्षा प्राप्त करने वालेको वनीपक' कहते हैं। उस वनीपकके लिये बनाया हुआ देवे तो देनेवा- लीसे कहे कि ऐसा आहार मुझे कल्पता नही है ॥ १ ॥ ५० ॥ તેને તેની શિક્ષા આપવાનું રાખેલા અન્નાદિ) કહે છે એને સુરક્ષિત રાખનાર न्य वनीप वाय छ, भने मे बनीप (न्य) प्रार्थना शत मिक्षा પ્રાપ્ત કરનારને વન કહે છે એ વનપકને માટે બનાવેલ આહાર આપે તે આપનારીને સાધુ કહે કે એ આહાર મને કહપતે નથી (૫૧–૫) , 3 ४४४ श्रीदशकालिकमूत्रे टीका-'असणं.' इत्यादि, तथा 'त मो०' इत्यादि । श्रमणार्थ श्रमणाः लोकमसिद्धयनुरोधतो निग्रंन्य शाश्य तापस-गेरिका-ऽऽजीवकमेटेन पञ्चधा, तत्र निर्ग्रन्थाः पञ्चमहारतधारिणः, भाग्या मोगताः, तापसा: जटा गरिणा, गैरिका रक्तपर्णधातुविशेपरञ्जितरत्रधारिण', परिमानका इत्यर्थः, आजी वकाः गोशालकमतानुयायिनस्तदर्थमिद प्रकृतमित्यादि मागत् ॥५३॥५४॥ मूलम्-उद्देसिय कीयगड, पूडकम्म च आहडं । अज्झोयरय पामिच्च, मीसजाय विवजए ॥५५॥ छाया-औद्देशिक क्रीतकृत, पुतिम चाभ्याइतम् । अभ्यापूरक प्रामित्य, मिश्रजात विवर्जयेत् ॥५५।। सान्वयार्थः-उद्देसिय=ौदेशिक-किसी एकको उद्देश करके बनाये हुए अशनादिको कीयगड-खरीदे हुएको पूइकम्म आधार्मादिदोपसे दृषित ऐसे आहारसे मिले हुएको आइड-सामने लाये हुएको पामिच-उधार लाये हुएको च और मीसजाए अपने तथा साधुओके लिए मिश्रित (भेला) करके बनाये हुए अशनादिको (साधु) विवज्जए घरजे, अर्थात् ऐसा आहार हो तो नहीं लेवे ॥ ५५॥ असण' इत्यादि तथा 'त भवे०' इत्यादि । लोकमें पाँच प्रकारके श्रमण होते है-(१)निर्ग्रन्थ (पच महाव्रतधारी), (२) सौगत (बुद्धके अनुयायी), (३) तापस (जटाधारी), गैरिक (गेरुआ वस्त्र पहिननेवाले), (५) आजीवक (गोशालके मतानुयायी)। इनके लिये जो आहार बनाया गया हो वह, सयमियोके लिये कल्प्य नही है, अत एव ऐसा आहार देनेवालीसे साधु कहे कि मुझे नहीं कल्पता है ॥५३ ॥ ५४॥ असण० छत्यादि तथा त भवेत्यादि લેકમા પાચ પ્રકારના શ્રમણ હોય છે (૧) નિર્ચ થ (પચમહાવ્રતધારી), (२) सौगत (शुद्धना सनुयायी), (3) तापस (०४ाधारी) (३२मा पत्रो परना२३), (५) मा०१४ ( नाना मतानुयायी) भने માટે જે આહાર બનાવવામા આવ્યું હોય તે સયમીઓને માટે કપ્ય નથી, તેથી એ આહાર આપનારીને સાધુ કહે છે તે મને કતે નથી (૫૩-૫૪) (૪) ગરિક , अध्ययन ५ उ. १ गा. ५५-औदेशिकक्रीतकृताहारस्वरूपम् ४४५ टीका-'उदेसियः' इत्यादि । १-ओद्देशिकम्-उन्शनमुद्देशस्तेन कृत मौदेशि- कम् । तद्विविध-सामान्यौदेशिक विशेषौदेशिक च, तत्राग-प्रतिदिन स्वार्थ सम्पाधते तावत्सम्पादनप्रवृत्ती सत्या 'भिक्षादान गृहस्थाऽऽचार'' इति युदया 'या कश्चित्साधुरागच्छेत्तस्मै देय'-मिति सामान्यत उद्दिश्य समधिर निष्पादितम् । द्वितीय-कमप्येक साधु व्यक्ति-विशेषरूपेणोद्दिश्य सम्पादितम् । २-क्रीतकृत-क्रयण गृहम्मकर्तृक, तेन सम्पादित क्रीतकृत क्रीतमित्यर्थः, तत्रिविष-द्रव्यक्रीत, भावक्रीत, मिश्रक्रीतच, तर द्रव्य क्रीत-स्वपरतदुभयभेदेन त्रिधा-स्वद्रव्यक्रीत, परद्रव्यक्रीतम् , उभयद्रव्यफ्रीतञ्च। तदपि सचित्ताऽ-चित्त-मित्रभेदात्मत्येक 'उद्देसिय०' इत्यादि । [१]किमीको उद्देश करके बनाया हुआ आहार, औदेशिक कहलाता है। वह दो प्रकारका है-१-सामान्य-औद्देशिक और २-विशेप औद्देशिका जितना आहार, प्रतिदिन गृहस्थ बनाता है उतना आहार बनाते समय ऐसा विचार करना कि 'भिक्षा देना गृहस्थका कर्तव्य है, इसलिये जो कोई साधु आवेगा उसे दे देंगे' ऐसा विचार कर बनाया हुआ आहार 'सामान्य-औदेशिक' और किसी एक साधुके निमित्त बनाया हुआ आहार, 'विशेप-औद्देशिक' कहलाता है। [२]खरीद किया हुआ आहार क्रीतकृत करलाता है। वह तीन प्रकारका है (१)-द्रव्य क्रीत(२)-भावक्रीत (8)-मिश्रक्रीत।द्रव्यनीत तीन प्रकारका है- (१)-अपने द्रव्यसे खरीदा हुआ, (२)-पराये द्रव्यसे खरीदा हुआ, (3)-दोनों द्रव्योंसे खरीदा हुआ। ये तीनों भेद तीन२ प्रकारके हैं। स्वद्रव्य उद्देसिय. त्याहि (१)देशीन udal माहा मौशि उपाय छे તે બે પ્રકાર હોય છે (૧) સામાન્ય ઓશિક અને (२) विशेष मो४ि જેટલે આહાર પ્રતિદિન ગૃહસ્થ બનાવે છે એટલે આહાર બનાવતી વખતે એ વિચાર કરો કે “ભિક્ષા આપવી એ ગૃહસ્થનું કર્તવ્ય છે, તેથી જે ઈ સાધુ આવશે તે તેને આપીશ” એ વિચાર કરીને બનાવેલો આહાર સામાન્ય ગિક, અને કોઈ એક સાધુને નિમિત્તે બનાવેલે આહાર વિશેષ-ઓરિક કહેવાય છે (૨) ખરીદ કરેલ આહાર ઠીતકૃત કહેવાય છે તે ત્રણ પ્રકારને છે-- (१) ६०ila (२) मापात, (3) भितीत द्रव्यहीत व मारना छ-(१) यातना દિવ્યથી ખરીદેલે, (૨) પરાયા દ્રવ્યથી ખરીદેલે, (૩) બેઉ દ્રવ્યોથી ખરીદેલે , श्रीदनकालिमूत्रे विविध-सचित्तस्पद्रव्यगीतम्, अचित्तम्पद्रव्यगीत, मिश्रम्पद्रव्यक्रीत, सचित्तपर द्रव्यक्रीतम् , अचित्तपरद्रव्यक्रीत, मिश्रपरदपत्रीत, सचित्तोभयद्रव्यतीतम्, अचित्तोभयन्यक्रीत, मिश्रोमयद्रव्यमीतश्चेति । इत्य द्रव्य क्रीत नापा भवति । भार-क्रीत द्विविध-स्वभाकीत परमाफीतम, तत्र समारोत-सारी समुपागते तदर्थे गृहस्थेन स्वविधा- मन्त्रादि दवा क्रीतम् । परमावक्रीत-चित्रा १-विद्या-ससाधना रोहिणीमज्ञप्त्यादिरूपा, मन्त्रा-असाधनो वशीकरणादि । क्रीतके भेद-(१) अपने सचित्त द्रव्यसे खरीदा हुआ, (२)-अपने अचित्त द्रव्यसे खरीदा हुआ, (३)-अपने सचित्त और अचित्त, दोनों प्रकार के द्रव्यसे ग्वरीदा हुआ। परद्रव्यनीतके भेद-(१)-दुसरेके सचित्त द्रव्यसे खरीदा हुआ, (२)-दुसरेके अचित्त द्रव्यसे ग्वरीदा हुआ, (३) मरेके दोनों प्रकारके द्रष्यसे खरीदा हुआ। उभयक्रीतके भेद-(१)-दोनोंके सचित्त द्रव्यसे खरीदा हुआ (२) दोनोंके अचित्त द्रव्यसे खरीदा हुआ (३) दोनोंके सचित्त और अचित्त द्रव्यसे खरीदा हुआ। ये सब द्रव्यनीत हैं। भाव क्रीत, दो-प्रकारका है-(१)-स्व-भावक्रीत, (२)-पर-भावक्रीत। साधुके आने पर, साधुके लिये, अपनी विद्या या अपना मन्त्र दे कर, गृहस्थद्वारा खरीदा हुआ आहार स्वभावक्रीत है, दूसरेने विद्या मन्त्र એ ત્રણે ભેદ ત્રણ ત્રણ પ્રકારના છે સ્વદ્રવ્યકતિના ભેદ-(૧) પિતાના સચિત્ત દ્રવ્યથી ખરીદેલ, (૨) પિતાના અચિત્ત દ્રવ્યથી ખરીદેલો, (૩) પિતાના સચિત્ત અને અચિત્ત બેઉ પ્રકારના દ્રવ્યથી ખરીદેલે પદ્રવ્યક્રતના ભેદ-(૧) બીજાના સચિત્ત દ્રવ્યથી ખરીદેલ, (૨) બીજાના અચિત્ત દ્રવ્યથી ખરીદેલે, (૩) બીજાના બેઉ પ્રકારના દ્રવથી ખરીદેલે ઉભયક્રતિના ભેદ-(૧) બેઉના સચિત્ત દ્રવ્યથી ખરીદેલ, (૨) બેઉના અગિત દ્રવ્યથી ખરીદેલે, (૩) બેઉના સચિત અને અચિત દ્રવથી ખરીદેલે એ બધા દ્રવ્યકત છે ભાવકીત બે પ્રકારને છે (૧) સ્વ ભાવકોત, (૨) પર ભાવકૃત, સાધુ ત્યારે સાધુને માટે પોતાની વિદ્યા યા પિતાને માત્ર આપીને ગૃહસ્થદ્વારા ખરી દેલે આહાર એ સ્વ ભાવકીત છે બીજાએ વિદ્યા માત્ર આ સાધુને માટે આવે अध्ययन ५ उ. १ गा. ५५-क्रीतकृताहारम्वरूपम् ४४७ मन्त्रादि दत्त्वा साधुकृते परेण क्रीतमुपलभ्यान्येन गृहस्थेन दीयमान सदनेकविध स्वयमूह्यम् । मिश्र-(द्रव्य-भावरूप)-क्रीवस्य च नव भगाः, यथा- १-स्वकीयेन द्रव्येण स्वकीयेन भावेन । २- स्वकीयेन द्रव्येण परकीयेण भावेन । ३--परकीयेण द्रव्येण स्वकीयेन भावेन । ४-परकीयेण द्रव्येण परकीयेण भावेन । ५-स्वकीय-द्रव्य भावाभ्या परकीयेण द्रव्येण । ६--स्वकीय-द्रव्य भावाभ्या परकीयेण भावेन । देकर, साधुके लिये आहार आदि खरीदा हो और साधुके आने पर उस आहारको दूसरा लेलेवे तो उसे परभाव-क्रीत करते हैं, वह अनेक प्रकारका है सो स्वय समझ लेना चाहिये। मिश्र (द्रव्य-भावरूप)क्रीतके नौ भग होते हैं- १-अपने द्रव्यसे अपने भावसे । २-अपने द्रव्यसे परके भावसे। ३-परके द्रव्यसे अपने भावसे। ४-परके द्रव्यसे परके भावसे। ५-अपने द्रव्य-भावसे परके द्रव्यसे। ६-अपने द्रव्य-भावसे परके भावसे । આહાનાદિ ખરીદેલા હોય અને સાધુ આવે ત્યારે એ આહારને બીજે લઈ લે તે તે પરભાવકીત કહેવાય છે તે અનેક પ્રકાર હોય છે તે પિતાની મેળે સમજી લેવુ મિશ્ર (દ્રવ્ય ભાવરૂ૫) કીતના નવ ભાગા થાય છે ના દ્રવ્યથી પિતાના ભાવથી ૨ પિતાના દ્રવ્યથી પરના ભાવથી ૩ પરના દ્રવ્યથી પિતાના ભાવથી ૪ પરના દ્રવ્યથી પરના ભાવથી ૫ પિતાના દ્રવ્ય ભાવથી પરના દ્રવ્યથી ૬ પિતાના દ્રવ્ય ભાવથી પરના ભાવો -- -- १ ४४६ श्रीदनकालिको विविध-सचित्तस्मद्रव्याक्रीतम्, अचित्तस्यकीत, मिश्रस्नद्रव्यकीत, सचित्तपर द्रव्यफ्रीतम् , अचित्तपरदन्यक्रीव, मिश्रपरद्रव्पक्रीत, सचित्तोभयद्रव्यफ्रीतम्, अचित्तोभयद्रव्यक्रीत, मिश्रोमयद्रश्यक्रीतश्चेति । इत्य द्रव्य क्रीत नाघा भवति । भाष क्रीत द्विविध-स्वभावकीत परभाकीतभ, ता समावक्रीत-सागरी समुपागते तदर्थं गृहस्थेन स्वविधा- मन्त्रादि दवा क्रीतम् । परभावक्रीत-वित्रा १-दिया-ससाधना रोहिणीप्राप्त्यादिरूपा, मन्त्र:-असाधनो वशीकरणानि । फ्रीतके भेद-(१) अपने सचित्त द्रव्यसे खरीदा हुआ, (२)-अपने अचित्त द्रव्यसे खरीदा हुआ, (३)-अपने सचित्त और अचित्त, दोनों प्रकार के द्रव्यसे खरीदा हुआ। परद्रव्यक्रीतके भेद-(१)-दुसरेके सचित्त द्रव्यसे खरीदा हुआ, (२)-दुसरेके अचित्त द्रव्यसे खरीदा हुआ, (8) दूसरेके दोनों प्रकारके न्यसे खरीदा हुआ। उभयत्रीतके भेद-(१)-दोनोंके सचित्त द्रव्यसे खरीदा हुआ (२) दोनोंके अचित्त द्रन्यसे खरीदा हुआ (३) दोनोंके सचित्त और अचित्त द्रव्यसे खरीदा हुआ। ये सब द्रव्यक्रीत हैं । भाव क्रीत, दो-प्रकारका है-(१)-स्व-भावक्रीत, (२)-पर-भावक्रीत। साधुके आने पर, सावुके लिये, अपनी विद्या या अपना मन्त्र दे कर, गृहस्थद्वारा खरीदा हुआ आहार स्व भावक्रीत है, दूसरेने विद्या मन्त्र એ ત્રણે ભેદ ત્રણ ત્રણ પ્રકારના છે સ્વદ્રવ્યકિતના ભેદ-(૧) પિતાના સચિત દ્રવ્યથી ખરીદેલે, (૨) પિતાના અચિત્ત દ્રવ્યથી ખરીદેલ, (૩) પિતાના સચિત્ત અને અચિત્ત બેઉ પ્રકારના દ્રવ્યથી ખરીદેલે પદ્રવ્યકતિના ભેદ–(૧) બીજાના સચિત્ત દ્રવ્યથી ખરીદેલે, (૨) બીજાના અચિત્ત દ્રવ્યથી ખરીદેલે, (૩) બીજાના બેઉ પ્રકારના ૮ થી ખરીદેલે ઉભયક્રતના ભેદ-(૧) બેઉના સચિત્ત દ્રવ્યથી ખરીદેલ, (૨) બેઉના અતિ દ્રવ્યથી ખરીદેલે, (૩) બેઉના સચિત્ત અને અચિત દ્રવ્યથી ખરીદેલે એ બધા દ્રવ્યકત છે माqld R ना छे (१) २१ लापत, (२) ५२ भात, साधु भावे ત્યારે સાધુને માટે પિતાની વિદ્યા યા પિતાને માત્ર આપીને ગૃહસ્થદ્વારા ખરી દેલે આહાર એ સ્વ ભાવીત છે બીજાએ વિદ્યા માત્ર આ , - સાધુને માટે अध्ययन ५ उ.१ गा. ५५-आहृतायाहारस्वरूपम् ४४९ यानपि मुराससर्गः, यद्वा पायसादिपवित्रभोक्तव्यपदार्थे शतादिक्षरद्रक्त-पूयादि- विन्दुमात्रस्यापि मिश्रणम् । भावतः-विशुद्ध आहारादावाधाकर्मादिदोपपितानादेः सिक्थमानेणापि मेलनम्, तदशनेन च साधूना चारित्रमालिन्य भवतीति भावपूतिभिधीयते । दोपोऽयमाधाकर्मादिदोपपितान्नादिसमएहस्तभाजनादिनिमित्वेनापि सम्भ- वति । ४-आहृत-साधुनिमित्त गृहादितोऽभिमुखमानीतम् । ५-'अज्झोयरय' इति लुप्त- विभक्तिक पदम् , 'अध्यवपूरक मिति तच्छाया, स्वार्थ पाकक्रियाया समारब्धाया खाने योग्य खीर आदिमें रक्त पीप आदि अपवित्र पदार्थका मिल जाना। (२) विशुद्ध आहार आदिमें आधाकर्मी आदि दोपोंसे पित अन्नका एक भी सीथ (कण) मिल जाना, भाव-प्रतिकर्म है। ऐसा आहार लेनेसे मुनियोंके चारित्रमें मलिनता आजाती है, इस कारण इसे भावप्रति करते हैं। आधाकर्मी दोपसे पित अन्न आदिसे भरे हुए हाथ या वर्तनके निमित्तसे भी यह दोप लग जाता है। [४]-आहत-साधुके लिये साधुके सामने लाया हुआ आहार आदि अभ्याहृत कहलाता है, ऐसा आहार लेना अभ्याहृत-दोष-पित आहार है। [५] अध्यवपूरक-अपने लिये भोजन बनाना प्रारम्भ किया हो उस समय, 'गाँउमे माधु पधारे हैं' यह सुनकर और अधिक मिला कर લેહી પરૂ આદિ અપવિત્ર પદાર્થનું પડી જવુ (૨) વિશુદ્ધ આહારાદિમા આધા કમી આદિ દેથી દૂષિત અને એક પણ કણ મળી જ એ ભાવપૂતિ કર્મ છે એ આહાર લેવાથી મુનિઓના ચારિત્રમા મલિનતા આવી જાય છે તેથી તેને ભાવપૂતિ કહે છે આધાકમી દેવથી દૂષિત અાદિથી ભરેલા હાથ યા વાસણના નિમિત્તથી પણ એ દોષ લાગી જાય છે (૪) આહૂત-સાધુને માટે સાધુની સામે લાવેલ આહાર આદિ અભ્યાહુત કહેવાય છે એ આહાર અભ્યાહત દેવ દૂષિત આહાર છે (૫) અથવપૂરક-પિતાને માટે ભેજન બનાવવાને પ્રારભ કર્યો હોય, તે સમયે ગામમાં સાધુ પથાય છે” એમ સાભળીને બીજુ વધારે મેળવીને અને ४४८ श्रीदशकालिको , ७-परकीयदय मागाभ्यां सीयेन द्रव्येण । ८-परकीय-द्रव्य-मागाभ्यां स्वकीयेन मावेन । ९-स्वकीय-द्रव्य-मागाभ्या परकीय-द्रव्यभावाभ्यान क्रीतम्, इति । एप च दोप उद्गमदोपान्तर्गतत्वेन गृहम्पोस्थितः, उक्तन- "सोलस उग्गम-दोसे, गिहिणो उ समुटिए रियाणाहि । उप्पायणा य दोसे, साहओ समुहिए जाण ॥१॥ इति' ३-पूतिकर्म-पूतेः अपवित्रस्य कर्म-मिलनरूप पूतिकर्म लक्षणया तेन युक्त पूतिकर्म । पूतिकरण द्रव्यभारभेदाद्विमकारकम् , तर- द्रव्यतो यथा-शुचिद्रव्येऽपवित्र-सम्मेलन, यया पेय-पयःपरिपूरितपात्रेऽस्यी ७-परके द्रव्य-भावसे अपने द्वन्यसे। ८-परके द्रव्य-भावसे अपने भावसे। ९-अपने द्रव्य भावसे और परके द्रव्य-भावसे खरीदा हुआ। यह क्रीतकृत दोप, उद्गमदोपोंके अन्तर्गत है, इसलिये गृहस्थके द्वारा लगता है। कहा भी है- "सोलह उद्गम दोप, गृहस्थके द्वारा लगते हैं और उत्पादना दोष, साधु द्वारा लगते हैं। [३] पूतिकर्म-पवित्र वस्तुमे अपवित्र वस्तुके मिल जानेको पूतिकर्म कहते हैं, यह दो प्रकारका है-(१)-द्रव्य पूतिकर्म और (२) भाव पूतिकर्म। (१)-पवित्र द्रव्यमें अपवित्र द्रव्य मिलाना द्रव्य पूति-कर्म है, जैसे पीने योग्य धसे भरे हुए वर्तनमें थोडीसी भी मदिराका मिलजाना, अथवा ૭ પરના દ્રવ્ય ભાવથી પોતાના દ્રવ્યથી ૮ પરના દ્રવ્ય ભાવથી પિતાના ભાવથી ૯ પિતાના દ્રવ્ય ભાવથી અને પરના દ્રવ્ય ભાવથી ખરીદેલે એ ફીતકૃત દેષ ઉદ્દગમ દષની અંદર રહેલો છે, તેથી કરીને ગૃહસ્થની દ્વારા લાગે છે કહ્યુ છે કે-“સેળ ઉગમદેષ ગૃહસ્થદ્વારા લાગે છે અને ઉત્પા દાદોષ સાધુદ્વારા લાગે છે ? (૩) પૂતિકમ–પવિત્ર વસ્તુમાં અપવિત્ર વસ્તુ મળી જાય તેને પૂતિકર્મ छ में प्रार्नु छ (१) द्रव्य पूतिम माने (२) मा पूतिम (१) पवित्र દ્રવ્યમા અપવિત્ર દ્રવ્ય મેળવવું એ દ્રવ્ય-પૂતિકર્મ છે, જેમકે પીવા ગ્ય દૂધથ. ભરેલા વાસણમાં થોડીક મદિરાનું મળી જવું, અથવા પીવા ગ્ય ખીર આદિમાં , , अध्ययन ५ उ.१ गा. ५५-आहृतायाहारस्वरूपम् ४४९ यानपि मुराससर्गः, यद्वा पायसादिपवित्रभोक्तव्यपदार्थे शतादिक्षरद्रक्त-पूयादि- विन्दुमात्रस्यापि मिश्रणम् । भावतः-विशुद्ध आहारादावाधाकर्मादिदोपपितानादेः सिक्थमात्रेणापि मेलनम् , तदशनेन च साधूना चारित्रमालिन्य भवतीति भावपूतिरभिधीयते । दोपोऽयमाधाकर्मादिदोपपितान्नादिसमएहस्तभाजनादिनिमित्तेनापि सम्भ- वति । ४-आहृत-साधुनिमित्त गृहादितोऽभिमुखमानीतम् । ५-'अज्झोयरय' इति लुप्त- विभक्तिक पदम् , 'अध्यवपूरक' मिति तच्छाया, स्वार्थ पाकक्रियाया समारब्धाया खाने योग्य खीर आदिमें रक्त पीप आदि अपचित्र पदार्थका मिल जाना। (२) विशुद्ध आहार आदिमें आधाकर्मी आदि दोपोंसे दूषित अन्नका एक भी सीथ (कण) मिल जाना, भाव-पूतिकर्म है। ऐसा आहार लेनेसे मुनियोंके चारित्रमे मलिनता आजाती है, इस कारण इसे भावपूति करते हैं। आधाकर्मी दोपसे दृपित अन्न आदिसे भरे हुए हाथ या वर्तनके निमित्तसे भी यह दोप लग जाता है । [४]-आहृत-साधुके लिये साधुके सामने लाया हुआ आहार आदि अभ्याहृत कहलाता है, ऐसा आहार लेना अभ्याहृत-दोष-दूषित आहार है। [५] अध्यवपूरक-अपने लिये भोजन बनाना प्रारम्भ किया हो उस समय, 'गाँवमे साधु पधारे हैं। यह सुनकर और अधिक मिला कर લેહી પરૂ આદિ અવિત્ર પદાર્થનું પડી જવું (૨) વિશુદ્ધ આહારદિમા આધા કમી આદિ દેથી દૂષિત અન્નને એક પણ કણ મળી જ એ ભાવપૂતિ કર્મ છે એ આહાર લેવાથી મુનિઓના ચારિત્રમા મલિનતા આવી જાય છે તેથી તેને ભાવપૂતિ કહે છે આધાકમી દષથી દષિત અન્નાદિથી ભરેલા હાથ યા વાસણના નિમિત્તથી પણ એ દોષ લાગી જાય છે (૪) આહુત-સાધુને માટે સાધુની સામે લાવેલે આહાર આદિ અભ્યાહુત કહેવાય છે એ આહાર અભ્યાહત દેવ દૂષિત આહાર છે, (૫) અથવપૂરક-પિતાને માટે ભેજન બનાવવાનો પ્રારંભ કર્યો હોય, તે સમયે “ગામમાં સાધુ પધાર્યા છે એમ સાભળીને બીજુ વધારે મેળવીને બના - -- . ४५. भीवनकाम्किन ग्रामे साधुसमागमन निगम्य ताधिानिक्षेपणेन सम्पादितमिति तयः । इन्द्र मत्र हृदयम्-ययेवमन्यलिङ्ग निमितमधिक परिन, तत्र तानानन्तरमवभिष्टमन्नादिक साधुभिहा, तनान्तराय पानातारादिति। ६मामित्य-साधुनिमितमुदाररूपेण कुतचिदानीय दीयमानम् 1७ मिश्रजात=मियण मिश्रमावेन पूर्वत एव दात मिक्षा चरोभयानुसन्धानेनेत्यर्थः नात-निप्पनम् । तद्विविध सामान्यमिश्रजात विशेषमि थनात चेति, वत्र-सामान्यमिश्रमात सामान्यरूपेण स्वपोष्यवर्गार्थ गृहस्याहस्थ साधु-पाखण्डिमभृतिभिक्षाचरार्थश्चैकन रन्धितम् , शेिपमिश्रणात यहाउनिमित १ पूर्वतः पाकार्य प्रत्तेः मागेत्र । यनाया हुआ आहार अन्यवपूरक कहलाता है, तात्पर्य यह कि यदि अन्यलिङ्गियों के निमित्त अधिक आर मिला कर बनाया से तो उन्हें दे देनेके याद बचा हुआ आहार, साधुओंको ग्राह्य है, क्योंकि वहाँ अन्तराय दोप नहीं लगता। [६] प्रामित्य साधुके निमित्त कहींसे उधार लेकर दिया जानेवाला आहार, प्रामित्य कहलाता है। [७] मिश्रजात-पहलेसे ही दाता और भिक्षु दोनोंके लिये बनाया हुआ आहार, मिजात है। मिश्रजातके दो भेद है-(१) सामान्य मिश्रजात और (२) विशेष मिश्रजात । (१) साधारण तौर पर अपने पोष्यवर्गके लिये तथा गृहस्थ, अगृहस्थ, साधु, पासण्डी आदिके लिये मिलाकर राधा हुआ आहार सामान्य मिश्रजात' कहलाता है । (२)-जो आहार आदि अपने लिये વેલે આહાર અધવપૂરક કહેવાય છે તાત્પર્ય એ છે કે જે અન્યલિંગી (અન્યધમીએ)ને નિમિતે વધારે આહાર મેળવીને બનાવ્યો હોય તે તેને આપી દીધા પછી વધેલો આહાર સાધુઓને માટે ગ્રાહ્ય બને છે, કારણ કે તેમાં અતરાય દેષ લાગતું નથી (૬) પ્રામિત્ય-સાધુને નિમિત્તે કહીંથી ઉધાર લાવીને આપવામા આવેલ આહાર મામિત્ય કહેવાય છે (૭) મિશ્રજાત–પહેલા જ દાતા અને ભિક્ષુ બેઉને માટે બનાવેલે આહાર મિશ્રજાત છે મિશ્રજાતના બે ભેદ છે (૧) સામાન્ય મિશ્રજાત (૨) વિશેષ મિશ્ર જાત (૧) સાધારણ રીતે પિતાના વ્યિવર્ગને માટે તથા ગૃહસ્થ, અગ્રહસ્થ, સાક પાખડી આદિને માટે એકઠો કરીને રાધે આકાર સામાન્ય મિ. કહેવાય છે ७ ૫ १ २ 3 ४ ૧૨ 13 १० अध्ययन ५ उ. १ गा. ५६-निःशविताहारग्रहणाज्ञा ४५१ केवल साधुनिमित्तञ्च सहैव निष्पन्नमन्नादिकम् , तद् विवर्जयेत् परित्यजेत् न गृह्णी- यादित्यर्थः, साधुरिति शेषः । ओदेशिका-ध्यवपूरक-मिश्रजातेषु परस्परमेप विशेष:- औदेशिक-पाकवृत्त्यनन्तर साचागमनात्मागेकमेव साधु सामान्यरूपेण विशे- परूपेण वोदिश्य सम्पादिते सम्भवति । अयवपूरस-साधुसमागमश्रवणसमनन्तर- मधिकनिक्षेपेण जायते । मिश्रजात-पाकमचिसमय एव गृहस्थ-भिक्षाचरयो। कृते समिथितेऽन्नादौ समुत्पयते ।। ५५ ।। मूलम्-उग्गम से अ पुच्छिज्जा, कस्सहा केण वा कड। सुच्चा निस्सकिय सुद्ध, पडिगाहिज संजओ॥५६॥ छाया-उद्गम तस्य च पृच्छेत्कस्याथै केन वा कृतम् श्रुत्वा निशङ्कित शुद्ध, प्रतिगृह्णीयात्सयतः ॥५६॥ १ इतरभिक्षाचरण्यतिरेकेण । और साधुके लिये मिलाकर बनाया जाय उसे 'विशेपमिश्रजात' कहते हैं। ऊपर कहे हुए सब प्रकारके आहारका अनगारको परिहार करना चाहिये। औदेशिक, अध्यवपूरक और मिश्रजात दोपोमें यह भेद है-भोजन बनानेमें प्रवृत्त होनेके पश्चात् और साधुके आनेसे पहले, किसी भी एक साधुके लिये अथवा अमुक एक साधुके लिये बनाये हुए आहारमें औद्देशिक दोष होता है। आहार बनाते समय, साधुका आगमन सुन कर अधनमे अधिक ऊर (डाल) कर बनानेसे अयवपूरक दोप होता है। भोजन बनाते समय, गृहस्थ और भिक्षु, दोनोके लिये भोजन बनानेसे मिश्रजात दोष लगता है ॥५५॥ (૨) જે આહાર આદિ પિતાને માટે અને સાધુને માટે એક કરીને બનાવવામાં આવે તેને વિશેષ મિશ્રજાત કહે છે ઉપર કહેલા બધા પ્રકારના આહારને અણગારે પરિહાર કર જોઈએ દેશિકઅધ્યવપૂરક અને મિશ્રજાત દેશમાં આ ભેદ છે-ભેજન બનાવવામાં પ્રવૃત્ત થયા પછી અને સાધુ આવ્યા પહેલા, ડેઈ પણ એક સાધુને માટે અથવા અમુક એક સાધુને માટે બનાવેલા આહારમાં ઓશિક દેવ લાગે છે આહાર બનાવતી વખતે સાધુનું આગમન સાભળીને આધણમાં વધારે એરી દેવાથી અધ્યપૂરક દેષ લાગે છે ભેજન બનાવતી વખતે ગૃહસ્થ અને ભિક્ષુ બેઉને માટે ભોજન બનાવવાથી મિજાત દેય લાગે છે (૫૫) श्रीदनौकानिया ग्रामे साधुसमागमन निशम्य तदर्थमधिरनिक्षेपणेन सम्पादितमिति तयः । मत्र हृदयम्-यपमन्यलिङ्गनिमितमधिफ पूरित, तत्र तहानानन्तरमवभिटमन्नादिक साधुभिाग, तत्रान्तरायदोपानातारादिति । ६-मामित्य साधुनिमित्तमदाररूपेण फुधिदानीय दीयमानम् ।७ मिश्रनात-मिश्रेण मिश्रमावेन 'पूर्वत एव दात मिक्षा चरोभयानुसन्धानेनेत्यर्थः नात-निप्पन्नम् । तद्विविध सामान्यमिश्रमात विशेषमि थनात चेति, तत्र-सामान्यमिश्रजात सामान्यम्पेण स्वपोष्यवर्गाथै गृहस्थायदस्य साधु-पाखण्डिमभृतिभिक्षाचरार्थश्चकत्र रन्धितम्, विशेषमिश्रनात यहाउनिमित १ पूर्वतः पाकाथै प्रत्तेः मागे । पनाया हुआ आहार अयवपूरक कहलाता है, तात्पर्य यह कि यदि अन्यलिगियोंके निमित्त अधिक आहार मिला कर बनाया हो तो उन्हें दे देनेके बाद बचा हुआ आहार, साधुओंको ग्राह्य है, क्योंकि वहाँ अन्तराय-दोप नहीं लगता। [६] मामित्य साधुके निमित्त कहींसे उधार लेकर दिया जानेवाला आहार, प्रामित्य कहलाता है। [७] मिश्रजात-पहलेसे ही दाता और भिक्षु दोनोंके लिये बनाया हुआ आहार, मिश्रजात है। मिश्रजातके दो भेद हैं-(१) सामान्य मिश्रजात और (२) विशेष मिश्रजात । (१) साधारण तौर पर अपने पोष्यवर्गके लिये तथा गृहस्थ, अगृहस्थ, साधु, पाखण्डी आदिके लिये मिलाकर राधा हुआ आहार सामान्य मिश्रजात' कहलाता है । (२)-जो आहार आदि अपने लिये વેલે આહાર અધ્યપૂરક કહેવાય છે તાત્પર્ય એ છે કે જે અન્યલિંગી (અન્યધમઓ)ને નિમિત્તે વધારે આહાર મેળવીને બનાવ્યું હોય તે તેને આપી દીધા પછી વધેલા આહાર સાધુઓને માટે ગ્રાહ્ય બને છે, કારણ કે તેમાં અતરાય દેષ લાગતું નથી (૬) પ્રામિત્ય-સાધુને નિમિત્તે કહીંથી ઉધાર લાવીને આપવામાં આવે આહાર મામિત્ય કહેવાય છે (૭) મિશ્રજાત-પહેલા જ દાતા અને ભિક્ષુ બેઉને માટે બનાવેલ આહાર મિશ્રજાત છે મિશ્રજાતના બે ભેદ છે (૧) સામાન્ય મિશ્રજાત (૨) વિશેષ મિશ્ર જાત (૧) સાધારણ રીતે પિતાના પિષ્યવર્ગને માટે તથા ગૃહસ્થ, અગૃહસ્થ, સાફ પાખડી આદિને માટે એકઠા કરીને રાધેલો આહાર “સામ કહેવાય છે . २ ४ 3 ५ ६ ८ ૧૨ ૧૧ 13 १४ १७ अध्ययन ५ उ. १ गा. ५७-५८-पुष्पादिमिश्रिताहारनिषेधः ४५३ सान्वयार्थः-असण पाणग वावि खाइम तहा साइम अशन पान खादिम तथा स्वादिम (यदि) पुप्फेसु-सचित्त फूलोसे वीएसु-शालि आदि बीजोसे वा- अथवा हरिएम हरित कायसे उम्मीस-मिश्रित होज हो तो तबह भत्त- पाण तु अशनादि सजयाण साधुओके लिए अकप्पिय अकल्पनीय भवे है, (अतः) दितिय देती हुईसे साधु पडियाइक्खे-कहे कि तारिस इस प्रकारका आहारादि मे-मुझे (लेना) न कप्पड़ नहीं कल्पता है ॥५७॥-५८॥ टीका-'असण.' इत्यादि, 'त भवे०' इत्यादि च । यदशनादिक सचित्त- पुष्प-बीज-हरितकायैरुन्मिश्र-सयुक्त भवेत्तदकल्प्यमिति वाक्यार्थः । सूत्रे 'पुप्फेस' इत्यादौ तृतीयार्थे सप्तमी ।।५७।।५८।। मूलम्-असणं पाणग वावि, खाइम साइम तहा । उदगम्मि होज निक्खित्तं, उत्तिंगपणगेसु वा ॥५९॥ त भवे भत्तपाण तु, सजयाण अकप्पिय । दितिय पडियाइक्खे, न मे कप्पइ तारिस ॥६॥ छाया-अशन पानक वापि, खाद्य स्वाय तथा । उदके भवेनिक्षिप्तमुत्तिगपनकपु बा ॥५९।। तइवेद्भक्त-पान तु, सयतानामकल्पिक(त) म् । ददती पत्याचक्षीत, न मे कल्पते तादशम् ॥६०॥ सान्वयार्थ:-असण पाणग चावि खाइम तहा साइम जो अशनादि चार प्रकारका आहार (यदि) उदगम्मि सचित्त जलके ऊपर वा अथवा उत्तिंगपणगेसुकीडियोके दरके ऊपर या लीलन-फूलन पर निक्खित्तवा 'असण' इत्यादि, तथा 'त भवे' इत्यादि। जो अशन पान आदि, सचित्त पुष्प, सचित्त धीज और हरितकायसे युक्त हो वह, सयमीके लिये कल्पनीय नहीं है, अत ऐसा आहार देनेवालीसे साधु कहे कि- ऐमा आहार मुझे नहीं कल्पता है ॥७॥५८॥ असण. त्यादि, तथा त भवे. त्यादि मशनपान मा, मयित्त ૫૫, સચિત્ત બીજ અને હરિતકાય (વનસ્પતિ) થી યુક્ત હોય તે સચમીને માટે પનીય નથી, એટલે એ આહાર આપનારીને સાધુ કહે કે–એ આહાર भने पता नथी (५७-५८) ૨3 ૨૨ २४ ૨૧ . ! २ ४ 3 ५ १३ ૧૨ १० ॥ ४५२ भीदवेकालिको साधयार्थ:-सेन्डग भादारादिकी उग्गम उत्पत्ति पुच्छिज्जा-पूछे कि-(यह अशनादि) कस्महा-पिसके लिए चा और केण-किमने कर बनाया है ?, फिर सुचा=गृहस्थ मुग्यसे अशनादिकी उत्पत्ति सुनकर (यदि वह) निस्सक्रियम्भादेशिक आदि शहारहित य और सुद्ध निर्दोष हो तो सजए-साधु पडिगारिज्जग्रहण कर लेवे ॥५६॥ टीका-'उग्गम' इत्यादि । फस्या किंनिमित्तम्, केन वा ; कृत= निष्पादितम् , अन्नादी 'रिशुदमविशुद्ध वेति सशये तन्निराकरणाय तस्य सशयितस्यानादेः उद्गमम् उद्गमनमुद्गमस्तम् उत्पत्तिमित्यर्य , पृच्छेत् अतिवचनेन ज्ञातुमिच्छेत् , श्रुत्वा प्रतिवचन'-मितिशेषः, सयतः शशिताऽऽहारग्रहणभीरुः साधु', निम्शङ्कित दोपशङ्कापर्जितम् अत एव शुद्ध निरवध प्रतिगृह्णीयाव-निरचयत्वेन निश्चये सतीति भावः ॥ ५६ ॥ मूल्म्-असणं पाणगं वावि, खाइमं साइम तहा । पुप्फेसु होज उम्मीस, वीएसु हरिएसु वा ॥५७॥ त भवे भत्त-पाण तु, संजयाण अकप्पिय । दितिय पडियाइक्खे, न मे कप्पड़ तारिस ॥५८॥ -अशन पानक वापि, खाद्य स्वाय तथा । पुष्पैर्भवेदुन्मिश्र, वीजैईरिता ॥५७॥ तद्भवेद्भक्त-पान तु, सयतानामकल्पिक(त)म् । ददती प्रत्याचक्षीत, न मे कल्पते तादृशम् ॥५८॥ 'उग्गम०' इत्यादि । 'आहार अशुद्ध है या विशुद्ध है' इस प्रकारक सन्देह होने पर साधु, ऐसा पूछ ले कि यह आहार, किसके लिरे बनाया गया है और किसने बनाया है, इसका उत्तर सुन कर निर वद्यताका निश्चय करके निःशक्ति अत एव निरवद्य आहार हो त साधु, ग्रहण करे ॥५६॥ उग्गम० प्रत्याहि 'मा२ शुद्ध छ विशुद्ध छे' से પડતા સાધુ એવું પૂછી લે કે આહાર કેને માટે બનાવેલ છે અને કહું બનાવ્યું છે ?, એને ઉત્તર સાભળીને નિવઘતાને નિશ્ચય કરીને નિ શકિત એટલે નિરવદ્ય આહાર હોય તે સાધુ ગ્રહણ કરે (પદ) १४ १६ ૧૫ ૧૮ २० ૨ २४ २३ ૨૫ छाया પ્રકા ને સ દે अध्ययन ५ उ.१ गा. ५९-६४-तेजोविराधनायामाहारनिषेधः ४५५ " . १ ૨ 3 ५ ७ ८ ૧e १७ खादिम स्वादिम तेउम्मि-तेजस्काय पर निरिखत्त-रखा हुआ हुज्ज हो च- अथवा त-उस तेजस्कायको सघटिया सघट्टा (छू) करके दए-देवे तो तबह भत्तपाण तु-अशनादि सजयाण-साधुओके लिए अकप्पिय अकल्पनीय भवे-है, (अत) दितिय देती हुईसे साधु पडियाइक्खे कहे कि तारिस-इस प्रकारका आहारादि मे मुझे न कप्पइनही कल्पता है ॥६॥६२॥ टीका-'असण०' इत्यादि, 'त भवे०' इत्यादि च । यदशनादिक तेजसि- तेजस्कायोपरि निक्षिप्त निहित भवेत् , यच तत् तेजः-अग्निकायमित्यर्थः, सघय सस्पृश्य दद्यात् , तत्-उभयविध भक्तपान तु सयेतानामकल्पिक(त) भवेत् , अतस्त- इदती प्रत्याचक्षीत-ताश मे न कल्पत इति ॥६१॥६२|| मूलम्-एव उस्सिकया ओसिकिया, उज्जालिया पन्जालिया। निवाविया उस्सिचिया,निस्सिचिया ओवत्तिया ओयारियादए।॥६३॥ त भवे भत्त-पाण तु, सजयाण अकप्पियं। दितिय पडियाइक्खे, न मे कप्पइ तारिस ॥ ६४ ॥ छाया-एवम् उत्क्षिप्य अवक्षिप्य, उज्ज्वाल्य प्रज्वाल्यू । निर्वाप्य उत्सिच्य, निपिच्य अपवर्त्य अवतार्य दद्यात् ॥६३॥ तद्भवेद्भक्त पान तु, सयतानामल्पिक(त) म् । ददती प्रत्याचक्षीत, न मे फ्ल्पते तादृशम् ॥६४॥ अनिकायके साक्षात सघका निषेप करके अप परम्परा-संघट्टेका निषेध करते हैं- सान्वयार्थ ==जिस प्रकार अग्निकायको स्पर्श करके दिया जानेवाला अशनादि नहीं लेते, उसी प्रकार उसिसकिया चूल्हे आदिमें इन्धनको अन्दर 'असण.' इत्यादि, तथा'त भवे०' इत्यादि । जो अशन पान आदि, तेजस्काय पर रक्खा हो अथवा अग्निकायका सघट्टा करके देवे तो वह, साबुके लिये ग्राह्य नहीं है। अत देनेवालीसे कहे कि-'ऐसा आहार, मुझे नहीं कल्पता है ।।६१॥३२॥ असण. त्याहि तथा त भवे. त्याहि २ मशन पान माह तय પર રાખેલે હેય અથવા અગ્નિકાયનું સઘટન કરીને આપે છે તે માધુને માટે ગ્રાહ્ય નથી એટલે તે આપનારીને સાધુ કહે કે “એ આહાર મને ક૫તે नयी' (६१-१२) १८ ૧૯ २२ २१ २३ २० - . m 113 ૧૨ १४ १५ २० ૧૮ ४५४ श्रीदनकामिकसूत्रे हुआ हज्ज हो तो तमह भत्तपाण तु-अगनादि मजयाण-साअंकि लिए अप्पिय-अकल्पनीय मवेशी, (अत:) दितिय देती हुईसे साधु पडियाइक्खे- फहे कि तारिस-इस प्रकारका आहारादि मे-मुने (टेना) न कप्पा-नहीं फ्ल्पता है ॥५९॥६०॥ टीका-'असण' इत्यादि, 'त भये' इत्यादि च । यदशनादिकमुदके- सचित्तनलोपरि, उत्तिद्गपनकादिपु-उनिगाः भूमी पर्नुलविरविघायिनो गर्दभमु खाऽऽकृतयः क्षुद्रकीट विशेपाः, कीटिकानगरादयो पा, पनरः अङ्कुरितोऽनङ्कुरितो वा पञ्चवर्णानन्तकायरनस्पतिविशेप', तर निक्षिप्त स्थापित भवेद , तद्भक्त पान सयतानामकल्पिक(त)-मित्यादि पूर्ववत् ॥५९॥६०॥ मूलम्-असण पाणग वावि, खाइम साइम तहा । तेउम्मि हुज निम्खित्त, त च सघट्टिया दए ॥६१॥ त भवे भत्तपाण तु, सजयाण अकप्पियं । दितिय पडियाडक्खे, न मै कप्पड़ तारिस ॥६२ ॥ छाया-अशन पानक वापि, खाद्य स्वाय तथा । तेजसि भवेन्निक्षिप्त, तच्च सय दद्यात् ॥६१॥ तद्भवेक्तपान तु, सयतानामकल्पिक(त)म् । ददती प्रत्याचक्षीत, न मे कल्पते तादृशम् ॥६२|| सान्वयार्थ:-असण पाणग वावि खाइम तहा साइम-जो अशन पान असण' इत्यादि, तथा 'त भवे.' इत्यादि । जो अशन, पान, खाद्य, स्वाद्य सचित्त जल पर रखा हुआ हो तथा किडीनगर (चिउँ- टियोके समूह) या लीलन फूलन पर रक्खा हो वह, सयमियोंके लिये कल्प्य नहीं है, अत ऐसा आहार देनेवालीसे कहे कि 'ऐसा आहार मुझे कल्पता नहीं है' ॥ ५९॥ ६०॥ असण. त्यादि, तथा त भवे. त्यात २ मशन, पान, माध, स्वाध સચિત્ત પર રાખે હેય, તથા કીડીનગર (કીડીઓનો સમૂહ) ચા લીલન-ફૂલન પર રાખેલો હોય, તે સયમીઓને માટે કલ્પનીય નથી એટલે એ આહાર આપનારીને સાધુ કહે છે-“એ અવાર મને કપતે નથી” (૫૯–૬૦) , २ ५ ४ 3 ८ ७ 10 ૧૨ 13 ૧૫ १४ २० २४ २४ ૨૫ २३ १७ अध्ययन ५ उ. १ गा. ६५-६६-दुर्गममार्गगमननिषेधः ४५७ निधाय, अवतार्य=अन्नादिसहित भाजनमेवोत्तार्य वा दद्यात् , तद्भक्त पान तु सयता- नामकल्पिक(त) भवेदतस्तद्ददती प्रत्याचक्षीत-'तादृश मे न कल्पते' इति ६३॥६॥ मूलम्-हुज कट्ट सिल वावि, इट्टाल वावि एगया। ठवियं संकमहाए, त च होज चलाचल ॥६५॥ न तेण भिक्खू गच्छेजा, दिडो तत्थ असंजमो। गभीरं झुसिर चेव, सबिदिय-समाहिए ॥ १६ ॥ छाया-भवेकाप्ठ शिला वाऽपि, इट्टाल वाऽयेकदा । स्थापित सक्रमाथै, तच्च भवेच्चलाचलम् ॥ ६५ ॥ न तेन भिक्षुर्गच्छेदृष्टस्तत्रासयमः ।। गम्भीर शुपिर चैत्र, सर्वेन्द्रिय-समाहितः ॥६६॥ सान्वयार्थ -गया किसी समय अर्थात् वर्पा आदिके समय सकमट्ठाए जाने-आनेके लिए कट-काठ वाचि-या सिलशिला वावि अथवा इटाल- ईटका टुकडा ठविय-रखा हुआ हुज-हो च और तम्बद (यदि) चलाचल- अस्थिर-डग मगाता हुज्ज हो तो तेण=उस मार्गसे तथा जोगभीर-उडा-गहरा और झुसिर-पोला स्थान हो उससे सबिदियसमाहिए समस्त इद्रियोको वशमें रखनेवाला भिक्खू साधु न गच्छेज्जा नहीं जावे, (क्योंकि) तत्यवहा पर केवली भगवानने असजमो-असयम दिट्ठो देखा है ॥६५॥६६॥ टीका-'हुज्ज कह०' इत्यादि, 'न तेण' इत्यादि चा एकदा एकस्मिन् काले वर्षादौ यत् काष्ठ-सञ्चरणोपयोगि दारु, अपिवा शिला-मस्तरखण्डम् अपित्रा वर्तनको नीचे उतार कर यदि आहार देवे तो वह आहार अनगारके लिये ग्रहण करने योग्य नहीं है। अत देनेवालीसे कहे कि-'ऐसा आहार मुझे नहीं कल्पता है ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ हुन्ज कट्ट०' इत्यादि, तथा 'न तेण०' इत्यादि। नदी आदिमे बरसात आदिके समय, जाने-आनेके लिये जो काठ, ઊતારીને જે આહાર આપે છે તે આહાર અનાર ને માટે ગ્રહણ કરવા ગ્ય નથી એટલે તે આપનારીને સાધુ કહે કે–એ આહાર મને કલ્પત નથી ”(૬૩-૬૪) हुन कढ० या तथा न तेण. त्या નદી આદિમાં વરસાદને વખતે આવવા જવા માટે જે લાકડા, પત્થર, ઈટ .

४५६ श्रीदवेकालिको सरका फर ओमिफिया अधिक इन्धनको चून्हे के अन्दरमे बाहर निकालकर उज्जालियाधुझी हुई भमिको पृफ आदिसे उपित-सलगा-परपज्जालिया- जलती हुई अमिको अधिक प्रदीप्त कर नियायिया अनिको पानी आदिसे घुझाकर उस्सिपिया भमिपर पकते हुए अन्नाटिको कुछ बाहर निकाल कर निस्सिचिया उमरते हुए दुग्धादिमें जल लिडकार ओवतिया-अभिपर रहे हुए अन्नादिको दूसरे परवनमें निकालकर ओयारिया अग्निपर रहे हुए अन्ना दिके यरतनको नीचे उतारकर अर्थात अनिकायका परम्परासे सपटा करके द=अशनादि देवे तो त=पद भत्तपाणं तु अशनादि सजयाण साधुओं के लिए अकप्पिय माल्पनीय भवे है, (अत) दितिय देती हुईसे साधु पडि याइक्खेकहे कि तारिस इस प्रकारका आहारादि मे मुझे (लेना) न कप्पइ- नहीं कल्पता है ॥६३॥६४॥ टीका-'एच०' इत्यादि, 'त भवे०' इत्यादि च । एवम् उक्तप्रकारेण तेज स्कायविपय इवेति भार., उत्क्षिप्य='यावत्काल साधनेन्नादिक ददामि तावत्कार मग्निर्मा प्रशाम्यतु' इति युद्धया चुल्लथादागिन्धनमुत्सार्य, अप्रतिप्य दाहभया दिधन निःसार्य, उज्ज्वाल्य अनुज्ज्वलित फूस्कारादिनोद्दीप्य, प्रज्वाल्य उद्दीप्त प्रकर्पण सवय, निर्वाप्य प्रशान्तीकृत्य, उत्सिच्य अग्न्युपरिस्थितमन्नादिक किश्चि द्वहिप्कृत्य, निपिच्य-उद्वर दुग्धादिक जलेन प्रशाम्य, अपवर्त्य-भाजनान्तरे 'एव उस्सिक्किया०' इत्यादि, तथा 'त भवे' इत्यादि । जब तक आहार देती तब तक, अग्नि न वुझ जाय ऐसा विचार कर चूल्हेमे इधन सुलगाकर, अन्न आदि जलनेके भयसे इधन बाहर निकाल कर, फॅक आदिसे चूल्हा जला कर, जलती अग्निको तेज कर या बुझा कर, अग्नि पर पकते हुए आहारको कुछ एक ओर कर, तथा पानी डाल कर उयाल (उफान) को शान्त कर, अथवा अन्न आदि सहित एक उस्सिक्यिा० ईत्यादि, तथा त भवे. त्या જ્યા સુધી આહાર આપતી હઉ, ત્યા સુધી અગ્નિ હોલવાઈ ન જાય, એ વિચાર કરીને ચૂલામાં ઈધણ સળગાવીને, અન્નાદિ બળી જવાના ભયથી ઈધણ બહાર કાઢીને, કુક આદિથી ચૂલા સળગાવીને, બળતા અગ્નિને તેજ કરીને યા બુઝાવીને, અગ્નિ પર પાકતા આહારને કોઈ એક બાજુએ કરીને તથા પાણી નાખીને ઊભરાને શાંત કરીને, અથવા અન્નાદિ સહિત વાસણને નીચે , ५ 3 ८ १ १० ૧૨ 13 ૧૫ १४ २० २४ ૨૫ 3 अध्ययन ५ उ. १ गा. ६५-६६-दुर्गममार्गगमननिषेधः ४५७ निधाय, अवतार्य-अन्नादिसहित भाजनमेवोत्तार्य वा दद्यात् , तद्भक्त-पान तु सपता- नामकल्पिक(त) भवेदतस्तद्ददती प्रत्याचक्षीत-तादृश मे न कल्पते' इति ६३||६|| मूलम् हुज कह सिल वावि, इट्टालं वावि एगया। ठवियं संकमहाए, त च होज चलाचल ॥६५॥ न तेण भिक्खू गच्छेज्जा, दिट्टो तत्थ असंजमो। गभीरं झुसिर चेव, सबिदिय-समाहिए ॥ ६६ ॥ छाया-भवेत्काष्ठ शिला वाऽपि, इट्टाल वाऽयेकदा । स्थापित सक्रमार्थ, तच्च भवेच्चलाचलम् ॥ ६५ ॥ न तेन भिक्षुर्गच्छेदृष्टस्तत्रासयमः ॥ गम्भीर शुपिर चैव, सर्वेन्द्रिय-समाहितः ॥६६॥ सान्वयार्थ -एगया=किसी समय अर्थात् वर्पा आदिके समय सकमट्टाए जाने-आनेके लिए कट-काठ वाविन्या सिलशिला वावि-अथवा इटाल- ईटका टुकडा ठविय-रखा हुआ हुज्ज-हो च और तम्बह (यदि) चलाचल अस्थिर-डग मगाता हुज्ज हो तो तेण-उस मार्गसे तथा जो गभीर-ऊडा-गहरा और झुसिर-पोला स्थान हो उससे सबिदियसमाहिए समस्त इन्द्रियोको चशमें रखनेवाला भिक्खू साधु न गच्छेज्जा नहीं जावे, (क्योंकि) तत्थ-बदा पर केवली भगवानने असजमो असयम दिट्टो देखा है ॥६५॥६६॥ टीका-'हुज्ज कह' इत्यादि, 'न तेण' इत्यादि च। एकदा एकस्मिन् काले वर्षादौ यत् काष्ठ-सञ्चरणोपयोगि दारु, अपिवा शिला-मस्तरखण्डम् अपित्रा वर्तनको नीचे उतार कर यदि आहार देवे तो वह आहार अनगारके लिये ग्रहण करने योग्य नहीं है। अत. देनेवालीसे कहे कि-'ऐसा आहार मुझे नहीं कल्पता है' ।। ६३ ॥ ६४ ॥ हुन्ज कट्ट०' इत्यादि, तथा 'न तेण.' इत्यादि । नदी आदिमे बरसात आदिके समय, जाने-आनेके लिये जो काठ, ઊતારીને જે આહાર આપે તે તે આહાર અનેગાર ને માટે હુણ કરવા યોગ્ય નથી એટલે તે આપનારીને સાધુ કહે –“એ આહાર મને ક૫તે નથી ”(૬૩-૬૪) हुज्ज कट्ट० त्या तथा न तेणत्याहि નદી આદિમાં વરસાદને વખતે આવવા જવા માટે જે લાકડા, પત્થર, ઈટ - । ४५८ श्रीदवेकानिकसूत्रे इटालम् इष्टकाशकल, सकमार्च-गमनागमनाय स्यापितम् भारोपित मवेत्, तब फाप्छादिक यदि चलाचलम् अस्थिर कम्पमान भवेत् तदा तेन काष्ठादिना सन्द्रि यसमाहितः शीतसफलेन्द्रियो भिः साधुः न गरे । 'व' अन्दः समुच्चये अपिवेत्यर्थः, गम्भीर-निम्नत्वेन प्रकाशशून्यं, शपिर गहरसरमावकाश 'प्रदेश' मिति शेषः, न गच्छेदिति पूर्वेण सम्बन्धः । अगमने हेतुमाह-तत्रेति, तत्र तस्मिन् असयमा स्वपरपिराधनादिरूपो ए भालोपितः केवलिभिरिति शेषः । चलाचलविशेपणककाष्ठादिपदेन प्रस्खलन पतनादिनाऽऽरमविराधना, एकेन्द्रिय द्वीन्द्रियादिपाणिगणोपमर्दनेन पर-निराधनासम्भावना च भूचिता । गम्भी रादिपदेशगमनेनापि मोक्तदोषसमधिकहिंसादिजन्तुजनितोपघातादिभचुरदोष सम्भव. मृचितः । 'सबिदियसमाहिए' इतिपदेन साधोरिन्द्रियविपयाऽऽसक्तिनिराकरण पत्थर या ईंट आदि रोप दिया रो और यदि वर हिलता हो तो समाधि मान सयमी, उस मार्गसे गमन न करे। और जो प्रदेश, नीचा होनेसे अन्धकारमय हो या खट्टेवाला हो उससे भी साधुको गमन नहीं करना चाहिये, क्योंकि ऐसे मार्गमें गमन करनेसे स्व-पर-विराधना-रूप असयम केवली भगवान्ने देखा है। हिलते हुए काठ आदिपर चलनेसेरपटने या गिर पडनेसे आत्मविराध- नाकी और एकेन्द्रिय द्वीन्द्रिय आदि प्राणियोंके उपमर्दनसे पर-विराधनाकी सम्भावना सूचित की है। गहरे (नीचे) प्रदेशमें गमन करनेसे उक्त दोषोंके सिवाय हिंसक जन्तुओंसे उत्पन्न होनेवाला उपघात आदि बहुतसे दोषोंका होना सूचित किया है। 'सचिदियसमाहिए' पदसे यह વગેરે પેલા હોય અને જે તે હલતા હોય તે સમાધિવાન સયમી એ માર્ગે ગમન ન કરે અને જે પ્રદેશ નીચે રહેવાથી અધકારમય હોય યા ખાડાવાળે હેય તે માર્ગે પણ સાધુએ ગમન કરવું ન જોઈએ, કારણ કે એવા માગે ગમન કરવાથી સ્વ પર વિરાધનારૂપ અસયમ કેવળી ભગવાને જે છે હલતા લાકડા આદિ પર ચાલવાથી લપસી જવાથી યા પડી જવાથી આત્મ વિરાધનાની અને એકેન્દ્રિય કન્દ્રિય પ્રાણીઓના ઉપમર્દનથી સભાવના સૂચિત કરી છે નીચાણવાળા પ્રદેશમાં ગમન કરવાથી ઉતા ઉપરાત હિંસક જતુઓથી ઉત્પન્ન થનાર ઉપઘાત આદિ ઘણા દેજે હેવાનું સૂચિત કર્યું છે રિચાદિ પદથી એમ કહેવામા આવ્યુ છે કે સાધુઓએ - પર વિરાધનાની अध्ययन ५ उ. १ गा. ६७-६९-मालाइतभिक्षानिषेधः ४५९ ४ ५ १२ ८ 3 १ 13 १४ ૧૫ २० २१ २२ 13 २५ २७ 3. , 38 ३२ 33 3४ ૨૯ परायणता प्रतिपादिता । 'भिक्खु' पदेन च यमनियमपूर्वकमेव भिक्षाग्राहित्वमिति बोधितम् ॥ ६५ ॥ ६६ ॥ मूलम्-निस्सेणिं फलगं पीढं, उस्सवित्ताणमारहे। मचं कीलं च पासायं, समणहाए व दावए ॥ ६७ ॥ दुरूहमाणी पवडेज्जा, हत्थं पायं च लुसए। पुढवीजीवेवि हिसेज्जा, जे य तन्निसिया जगे ॥६८॥ एयारिसे महादोसे, जाणिऊण महेसिणो। तम्हा मालोहड भिक्खं, न पडिगिण्हति सजया॥६९॥ छाया-निश्रेणिं फलक पीठम्, उत्सृज्य आरोहेत् । मञ्च कीलञ्च प्रासाद, श्रमणार्थमेव दायिका ॥६७॥ दुरा (द) रोहन्ती प्रपतेत , हस्तौ पादौ च लूपयेत् । पृथ्वीजीवानपि हिंस्या,-धानि च तन्निःयितानि जगन्ति ॥६८॥ एतादृशान्महादोपान्, ज्ञात्वा महर्षयः । तस्मान्मालापहृता भिक्षा, न गृह्णन्ति सयताः ॥६९।। सान्वयार्थ -दावए दान देनेवाली स्त्री यदि समणट्ठा ण्व-साधुके लिएही निस्सेणिम्नसैनी-निसरणी-सीढी फलग-पाटे पीट-पीढे मच-खाट व और कील कीलेको उस्सचित्ताण ऊचा-खडा करके पासायमासाद--मजिल पर आरुहे-चढे तो दुरूहमाणी-इस प्रकार कष्टसे चढती हुई वह पवडेज्जा शायद गिर जायगी व और अपना हत्य-हाथ पाय पैर लूसए-तोड़ बैठेगी तथा पुढ- वीजीवे अवि-पृथिवी कायके जीवोको नी च और जे-जो तन्निस्सिया उस पृथ्बीकी नेसरायमें रहे हुए जगे-द्वीन्द्रियादि जीव हैं उन्हें भी हिंसेज्जा मारेगी ॥६७।६८॥ प्रकट किया गया है कि साधुओंको इन्द्रिय चपलताका त्याग करना चाहिये । 'भिक्खु पदसे द्यौतित किया गया है कि साधुओंको यम- नियमोंका पालन करते हुए ही भिक्षा ग्रहण करना चाहिये ॥६५॥६६॥ ઈન્દ્રિય ચપલતાનો ત્યાગ કરવે જઈએ મિડુ શબ્દથી એમ પ્રકટ આવ્યું છે કે સાધુઓએ યમ નિયમનું પાલન કરતા જ ભિક્ષા ગ્રહણ કરવી કરવામાં ने (१५-१६) ४५८ श्रीदवेकालिको इटारम्-इष्टफाशकल, सरमा-गमनागमनार्य म्यापितम् भारोपित भवेत् , तक फाप्ठादिक यदि चलाचलम् अस्थिर कम्पमान मवेत् तदा तेन काष्ठादिना सन्द्रि यसमाटिन: शीतसकलेटियो मितुः साधुः न गरगेन् । 'वेव शन्दः समुपये अपिचेत्यर्थः, गम्भीर-निम्नत्वेन मान्य, पिरमारवामावरान 'प्रदेश' मिति शेपः, न गच्छेदिति पूर्वेण सम्पन्धः । भगमने हेतुमाह-तत्रेति, तत्र-तस्मिन् असयमः स्वपरविराधनादिरूपो हटा भालोकित' केवलिमिरिति शेषः । चलाचलविशेषणककाष्टादिपदेन प्रस्खलन पतनादिनाऽऽत्मविराधना, एकेन्द्रिय दीन्द्रियादिमाणिगणोपमर्दनेन पर-रािधनासम्भावना च मृचिता । गम्भी रादिप्रदेशगमनेनापि मोक्तदोपसमधिकहिंस्रादिजन्तुजनितोपयातादिषचुरदोष- सम्भवः मूचितः । 'सबिदियसमाहिए' इतिपदेन साधोरिन्द्रियविषयाऽसक्तिनिराकरण पत्थर या ईट आदि रोप दिया रो और यदि वह हिलतारो तो समाधि मान सयमी, उस मार्गसे गमन न करे। और जो प्रदेश, नीचा रोनेसे अन्धकारमय हो या खड्डेवाला रो उससे भी साधुको गमन नहीं करना चाहिये, क्योंकि ऐसे मार्गमें गमन करनेसे स्व-पर-विराधना-रूप असयम केवली भगवान्ने देखा है। हिलते हुए काठ आदिपर चलनेसेरपटनेया गिर पडनेसे आत्मविराध नाकी और एकेन्द्रिय द्वीन्द्रिय आदिप्राणियोंके उपमर्दनसे पर विराधनाकी सम्भावना सूचित की है। गहरे (नीचे) प्रदेशमें गमन करनेसे उक्त दोपोंके सिवाय हिंसक जन्तुओंसे उत्पन्न होनेवाला उपघात आदि बहुतसे दोषोंका होना सूचित किया है। 'सब्धिदियसमाहिए' पदसे यह વગેરે પેલા હોય અને જે તે હલતા હોય તે સમાધિવાન સયમી એ માગે ગમન ન કરે અને જે પ્રદેશ નીચે હોવાથી અધકારમય હોય યા ખાડાવાળા હેય તે માગે પણ સાધુએ ગમન કરવું ન જોઈએ, કારણ કે એવા માગે ગમન કરવાથી સ્વ પર વિરાધનારૂપ અસયમ કેવળી ભગવાને જે છે હલતા લાકડા આદિ પર ચાલવાથી લપસી જવાથી યા પડી જવાથી આમ વિરાધનાની અને એકેન્દ્રિય દ્વીન્દ્રિય પ્રાણીઓના ઉપમનથી પર વિરાધનાની સભાવના સૂચિત કરી છે. નીચાણવાળા પ્રદેશમાં ગમન કરવાથી ઉકત ઉપરાત હિંસક જતુઓથી ઉત્પન્ન થનારો ઉપઘાત આદિ ઘણા દે હેવાનું સૂચિત કર્યું છે ક્ષત્રિમાદિ પદથી એમ કહેવામાં આવ્યુ છે કે સાધુઓને . अध्ययन ५ उ. १ गा. ६७-६९-मालाहतमिक्षास्वरूपम् थितानि जगन्ति माणिनस्तानि हिंस्यादिति पूर्वेण सम्बन्धः तस्मात् यतो निश्रे- ण्यादिना समारोहणे पतनादिद्वारा दातुः स्व-परोभयरािपना सम्भवति अतः कारणात् एतादृशान्-उक्तलक्षणान् महादोपान्दामभृतीना मृत्योरपि सम्भवेन दारुणकर्मविपाकहेतुत्वात्मकृष्टपणानि ज्ञात्वा सयताः सरलसावययोगसमुपरताः महर्षयः घोरपरीपहोपसर्गसहिष्णुतान्महामुनयः, मालापहृता-मालो भूमिका- वाची देशीयशब्दः, ततः अपहृताम् आनीता भिक्षा न पतिगृहन्ति न स्वीकुर्वन्ति । मालापहृता भिक्षा भूमिकाया ऊर्धाधस्तिर्यग्भेदेन विविधा-ऊ-मालापहृता, अधोमालापहृता, तिर्यमालाऽपहता चेति । ततो मालापहृता पूर्व व्याख्याता। अयोमालाऽपहृताम्यस्या भूमिकाया निश्रेण्यादिनाऽबरुह्य आनीता । तिर्यमाला- १ माल: 'मजिल' इति भाषापसिद्धः । तथा जो प्राणी, पृथ्वीपर सञ्चार कर रहे हों उनकी भी हिंसा होजाय, इसलिये ऐसी अवस्थामें स्व, पर और उभयकी विराधनाका होना सम्भव है, यहाँ तककि दाताकी मृत्यु भी हो जा सकती है, अत. इन महादोपोंको अत्यन्त दु.ग्वदायी जान कर, सयमी महामुनि, नसैनी(सीढ़ी) आदि द्वारा माला (मजिल) से उतारा हुआ आरार आदि स्वीकार नहीं करते ॥ मालाके भेदसे मालापहृत भिक्षा, तीन प्रकारकी है-(१) ऊर्व-माला पहृत (२)-अधो-मालापहृत और (३)-तियंग्मालापहृत । इनमे, ऊर्ध्व- मालापहृत भिक्षाका विवेचन, पहले कर आये है। ऊपरके मजिलसे नीचेकी ओर नसैनी (निसरणी) लगाकर, लाई हुई भिक्षा, अधोमाला- વિરાધના થાય, તથા જે પ્રાણ પૃથ્વી પર સચાર કરી રહ્યા હોય તેમની પણ હિંસા થઈ જાય, તેથી એવી અવસ્થામાં સ્વ, પર અને ઉભયની વિરાધના થવી સભવિત છે, એટલે સુધી કે દાતાનું મૃત્યુ પણ થઈ જઈ શકે છે, તેથી કરીને એ મહાદેને અત્યંત દુખદાયી જાણીને સયમી મહામુનિ નિસરણ આદિદ્વારા માળથી ઉતારેલ આહાર આદિ ગ્વીકારે નહિ માળ મજલાના ભેદે કરીને માલાપત ભિક્ષા ત્રણ પ્રકારની છે (૧) ઉર્વી માલાપત, (૨) અધેમાલાપત અને (૩) તિર્યંગ માલાપહુત એમા ઊધ્વ માલાપત ભિક્ષાનું વિવેચન પહેલા કરવામાં આવ્યું છે ઉપરના મજલાથી નીચેની અને નીસરણ લગાવીને લાવેલી ભિક્ષા અહેમાલાપહુત કહેવાય છે , ४६० श्रीकालियो तम्हा-इसीलिप पगारिसे ऐसे पूर्वोक्त मकारके महादोसेबाताकी मृत्यु तक होनेकी समारनाके कारण महादोपको जाणिकण-नानार सजया- सफल सापत्र च्यापारसे पिरत हुए महमिणो मापि लोग मालोहर-मालापात (मालसे लाई हुई) भिसमिक्षाको न परिगिहति नहीं लेते हैं ॥६९।। टीका-मालापरतमिक्षादोपमाह-'निस्सेणि' उस्यादि । 'दाव' इत्यत्र मारुतत्वालिट्व्यत्ययस्तथा च दायिकादात्री, श्रमणार्थमेव साधुनिमित्त मेर साधवे भिक्षादानार्थमेवेत्यर्थः, निश्रेणियशादिनिर्मित सोपान, फलक-शय नोपयोगि दारुमयाऽऽसन, पीठ-मानिमितोपवेशनोपयोगि ध्यासन 'पीड़ा' इति प्रसिद्ध, मञ्च-खट्वा पशदलादिरचितोचासन पा, कील-गक, चकारान्मु सलादिकम् उत्सृज्य अधीहत्य, प्रासादम् उच्चगृह तत्रानेकभूमिकासम्भवेना ऽऽरोहणादिक युज्यत इति तदमिकाया लक्षणा, तथा च-उच्चगृहभूमिकामित्यर्थः, आरोहे-उपलक्षणया गच्छेदित्यर्थः । तेन विसषु वक्ष्यमाणामु मालापहता भिक्षामु समन्वयः । निश्रेण्यादिना सदुःखमारोहण भवतीत्यत आह-दुरा (दू) रोहन्ती=सदुःखमूर्ध्वपदेशमासादयन्ती सती भपतेत , हस्तौ पादौ च लूपयेत्- त्रोटयेत् , पृथ्वीनीवानपि हिंस्यात्-पीडये, यानि च तन्नि श्रितानि पृथिव्या मालापहृत भिक्षाके दोप घताते हैं-'निस्सेणि' इत्यादि, 'दुरूहमाणी' इत्यादि, तथा 'एयारिसे' इत्यादि । दाता, यदि साधुके लिये नसैनी, सीढी (निसरणी), पाटा, पीढा (बाजोट), माचा, खूटी अथवा मृसल आदिको ऊंचा करके ऊँचे मकानकी दूसरी मजिल पर चढ़ कर, आहार लावे तो वह आहार आदि, मालापहृत कहलाता है । नसैनी (सीढी) आदि पर चढनेसे यदि गिर पडे तो हाथ पैर ट जाय, पृथ्वीकाय आदि जीवोंकी विराधना होजाय वे भावात भिक्षाना हो गता। -निस्सेणि त्यान, दुरहमाणी. त्याहि, तथा एयारिसे त्यादि नाता साधुने भाटे सात (नीसए), पाट, मासे, भायो, भूट અથવા મૂશળ (સાબેલુ) આદિને ઉચા કરીને ઉચા મકાનના બીજા મજલી પર ચઢીને આહાર લાવે છે તે આહાર માલાપહુત કહેવાય છે સીડી આદિ પર ચડવાથી જે પડી જાય તે હાથ-પગ તૂટી જાય, પૃથ્વીકાય આદિ જેની .

. अध्ययन ५ उ. १ गा. ६७-६९-मालाहतभिक्षास्वरूपम् ४६१ श्रितानि जगन्ति माणिनस्तानि हिंस्यादिति पूर्वेण सम्बन्धः तस्मात् यतो निये- ण्यादिना समारोहणे पतनादिद्वारा दातुः स्व-परोभयविरापना सम्भवति अतः कारणात् एतादृशान्-उक्तलक्षणान् महादोपान्यात्मभृतीना मृत्योरपि सम्भवेन दारणकर्मविपाकहेतृत्वात्मकृष्टपणानि ज्ञात्वा सयताः सकलसावययोगसमुपरताः महर्पयाम्योरपरीपहोपसर्गसहिष्णुत्वान्महामुनयः, मालापहृता-मालो भूमिका- वाची देशीयशब्दा, ततः अपहृताम् आनीता भिक्षा न प्रतिगृह्णन्ति-न स्वीकुर्वन्ति । मालापहृता भिक्षा भूमिकाया ऊर्धाधस्तिर्यग्भेदेन विविधा-ऊ-र्वमालापहृता, अधोमालापहृता, तिर्यमालाऽपहृता चेति । तत्रो मालापहृता पूर्व व्याख्याता। अयोमालाऽपहृता यस्या भूमिकाया निश्रेण्यादिनाऽबरुह्य आनीता । तिर्यमाला- १ माल: 'मजिल' इति भाषाप्रसिद्धः । तथा जो प्राणी, पृथ्वीपर सञ्चार कर रहे हों उनकी भी हिंसा होजाय, इसलिये ऐसी अवस्थामें स्व, पर और उभयकी विराधनाका होना सम्भव है, यहाँ तककि दाताकी मृत्यु भी हो जा सकती है, अतः इन महादोपोंको अत्यन्त दुःखदायी जान कर, सयमी महामुनि, नसैनी (सीढ़ी) आदि दारा माला (मजिल) से उतारा हुआ आहार आदि स्वीकार नहीं करते ॥ मालाके भेदसे मालापहृत भिक्षा, तीन प्रकारकी है-(१) ऊर्ध्व-माला पहृत (२)-अधो-मालापहृत और (३)-तिर्यग्मालापहृत। इनमे, ऊर्ध्व- मालापहृत भिक्षाका विवेचन, पहले कर आये है। ऊपरके मजिलसे नीचेकी ओर नसैनी (निसरणी) लगाकर, लाई हुई मिक्षा, अघोमाला- વિરાધના થાય, તથા જે પ્રાણી પૃથ્વી પર સચાર કરી રહ્યા હોય તેમની પણ હિંસા થઈ જાય, તેથી એવી અવસ્થામાં સ્વ, પર અને ઉભયની વિરાધના થવી સભવિત છે, એટલે સુધી કે દાતાનું મૃત્યુ પણ થઈ જઈ શકે છે, તેથી કરીને એ મહાદેને અત્યંત દુખદાયી જાણને સયમી મહામુનિ નીસરણ આદિદ્વારા માળથી ઉતારેલે આહાર આદિ સ્વીકારે નહિ માળ મજલાના ભેદે કરીને માલાપહત ભિક્ષા ત્રણ પ્રકારની છે (૧) ઉર્ધ્વ માલાપહુત, (૨) અહેમાલાપહુત અને (૩) તિર્યંગ માલાપહુત એમાં ઊર્ધ્વ- માલાપહત ભિક્ષાનું વિવેચન પહેલા કરવામાં આવ્યું છે ઉપરના મજલાથી નીચેની બાજાએ નીસર લગાવીને લાવેલી ભિક્ષા અહેમાલાપહુત કહેવાય છે , । ४६० श्रीश्वकामित्र तमा-इसीलिए एयारिसे ऐसे प्रोक्त प्रकारके महादोसेन्दाताकी मत्यु तक होनेरी समारनाफे कारण महादोपको जाणिऊण जानकर सजया सफल सावध व्यापारसे पिरत हुप महेसिणोम्मापि लोग मालोहर-मालापात (मालसे लाई हुई) भिसमिक्षाको न पदिगिण्डतिम्नहीं लेते हैं ॥६९।। टीका-मालापदतमिक्षादोपमार-'निस्सेणि' इत्यादि । 'दावर' इत्यत्र माकृतत्वालिग यत्ययस्तया च दायिकान्दात्री, श्रमणार्थमेव साधुनिमित्त मेर-साध भिक्षादानार्थमेवेत्यर्थः, नियणि शादिनिर्मित सोपान, फलाम्य नोपयोगि दारुमयाऽऽसन, पीठ-काष्ठनिमितोपवेशनोपयोगि रवासन 'पीड़ा' इति प्रसिद्ध, मञ्च-खट्दा शहलादिरचितोचासन , कील-बक, चकारान्मू सलादिकम् उत्सृज्य ऊर्थीहत्य, मासादम् उचगृह तत्रानेकभूमिकासम्भवेना ऽऽरोहणादिक युज्यत इति तदमिकाया लक्षणा, तया च-उचगृहभूमिकामित्यर्थः, आरोहे-उपलक्षणया गच्छेदित्यर्थः । तेन विसपु वक्ष्यमाणास मालापहतास भिक्षामु समन्वयः । निश्रेण्यादिना सदुःखमारोहण भवतीत्यत आह-दुरा (द) रोहन्ती सदुःखमूमदेशमासादयन्ती सती प्रपतेत् , हस्तौ पादौ च लूपये- त्रोटयेत् , पृथ्वीजीपानपि हिंस्यात्-पीडयेत्, यानि च तन्निःश्रितानि पृथिव्या मालापहृत भिक्षाके दोप बताते हैं-'निस्सेणि' इत्यादि, 'दुरूहमाणी' इत्यादि, तथा 'एयारिसे' इत्यादि । दाता, यदि साधुके लिये नसैनी, सीढी (निसरणी), पाटा, पीढा (बाजोट), माचा, खूटी अथवा भूसल आदिको ऊंचा करके ऊँचे मकानकी दूसरी मंजिल पर चढ़ कर, आहार लावे तो वह आहार आदि, मालापहृत कहलाता है । नसैनी (सीढी) आदि पर चढनेसे यदि गिर पडे तो हाथ पैर टट जाय, पृथ्वीकाय-आदि जीवोंकी विराधना होजाय वे भासत निक्षाना या मतावे -निस्सेणि त्याEि, दुरुहमाणी ઈત્યાદિ, તથા ચારિતે ઈત્યાદિ ने हाता साधुने भाटे सीटी (नीसए), पाट, one, भाया, भूट અથવા મુશળ (સાબેલ) આદિને ઉચા કરીને ઉચા મકાનના બીજા મજલા પર ચઢીને આહાર લાવે છે તે આહાર માલાપહત કહેવાય છે બીડી આદિ પર ચડવાથી જે પડી જાય તે હાથ-પગ તૂટી જાય, પૃથ્વીકાય આદિ જવાની .

. 3 ७ ૧૨ ૧૪ 13 ૧૫ १७ २१ अध्ययन ५ उ.१ गा. ७०-७२-आहारग्रहणविवेकः ४६३ टीका-'कद्' इत्यादि । कन्द, मूलम् , इमे माग्व्याख्याते, वा अथवा मलम्ब-तालादिफलम् आमम् अपश्व-सचित्तमित्यर्थः । चन्पुनः छिन्न कत्ति- मपि सन्निर-पत्रशाफ पास्तूकादिक, तुम्बकम् अलापूविशेप, शृङ्गरम् आईक चकारादन्यदपि प्रत्येकसाधारणवनस्पतिमानम् आमकम्-अपक्व सचित्त परि- वर्जयेत् त्यजेत् -न गृह्णीयादित्ययः ॥७०॥ मूलम् तहेव सतुचुन्नाइ कोल-चुन्नाई आवणे । सक्कुलि फाणिय पूअ, अन्न वावि तहाविह ॥७१॥ विकायमाण पसढं, रएण परिफासिय । दितिय पडियाइक्खे, न मे कप्पड़ तारिसं ॥७२॥ छाया-तथैव सक्तु-चूर्णानि, कोल-चूर्णानि आपणे। शप्कुली फाणित, पूपमन्यद्वापि तथाविधम् ॥७॥ विक्रीयमाण प्रसा, रजसा परिम्पृष्टम् । ददतीं प्रत्याचक्षीत, न मे कल्पते तादृशम् ॥७२॥ सान्वयार्थ'-तहेव-जिसमकार सचित्त फन्दादि अग्राह्य है उसीमकार सत्तु- चुन्नाइन्भुने हुए जौ या चनेकाआटा-सत्तू कोलचुन्नाइ बेरोका चूरा सक्कुलिं- तिलपापडी फाणिय-गीला गुड पूय मालपूचा (तथा) तहाविह उसीपकारके अन्न वावि औरभी पदार्थ जो आवणे दुकानपर विकायमाणम्येचने के लिए रखे हुए है वे (यदि) पसढ स्त्रसे आच्छादित होनेपर भी रएण-सचित्त सूक्ष्म रजसे परिफासिय-व्याप्त हो तो दितिय देनेवाली से पडियाइक्खेकहे कि कद' इत्यादि । सचित्त कन्द, मूल, ताड फल आदि तथा कटा हुआ भी सचित्त पत्तोका शाक बथुआ आदि, और सचित्त तुम्बा तथा अदरख भी मायु ग्रहण न करे । 'च' शब्दसे यह भी समझना चाहिये कि इनके सिवाय कोई भी सचित्त-प्रत्येक या साधारण वास्पति, साधुको नहीं कल्पती है।॥ ७० ॥ ૪૦ ઈત્યાદિ સચિત્ત કદ, મૂળ, તાડફળ આદિ તથા કાપેલા હોવા છતા સચિત્ત પાદડાનું શાક-બથુઆની ભાજી આદિ અને સચિત્ત દધી આદિ તથા આદુ પણ સાધુ પ્રહણ ન કરે છે શબ્દથી એમ પણ સમજવું કે તે ઉપરાંત કેઈ પણ સચિત્ત-પ્રત્યેક યા સાધારણ વનસ્પતિ સાધુને કલ્પતી નથી (૭૦) ४६२ - ४ , ५ 11 १२ पद्धता यस्गो भूमिमा यिका निष्ठेराम्यामेर, नयादी जनमवाहावरोधिसेतु यमिओपादिकं तिर सस्थाप्प हारा भगशिशापामागे गमनागमनेनाऽऽनीता) दुप्पापशिश्यादिस्यस्यातिगम्भीरामूलादिम्पस्य नानादेहणे चरणोन्नमनादिनाऽ- नेकरिधष्टसम्मादेविधापि मिशा वदन्तयेति ॥६७।६८||६९॥ मूलम् कंद मूल पलव वा, आम छिन्नं च सन्निर । तुवाग सिंगवेर च, आमगं परिवनए ॥ ७० ॥ छाया-चन्द मूल मलम्ब पा, आम दिन च समिरम् । तुम्पर शृगरञ्च, आमक परिपतयेत् १७०॥ सान्ययार्थ-आम सचित्त कम्मरण आदि कन्द मूल विदारिकादि मूल पलंग ताल आदिके फल वा तया छिन चकाटी हुई भी सन्निर-वधुए आदिकी भाजीको (तथा) आमग-सचित्त तुयागस्तूरे च और सिंगवेर- अदरख-आदे-को साधु परिवज्जबरजे ॥७॥ पहृत कहलाती है। जिस मजिलमें देनेवाली मौजूद हो उसीकी बराबरी पर, दूसरी ओर जानेके लिये पुलकी तरह नसैनी (निसरणी) या लकड़ी आदिको तिरछा रख कर चढे तो वहाँसे लाई दुई भिक्षा, तिर्यग मालापहृत कहलाती है । बडी कठिनाईसे पहुँचने योग्य छींके या आलेमें तथा गरी कोठरीमे रक्खी हुई भिक्षा ग्रहण करनेसे पैर उठाने आदि अनेक कष्ट होते हैं इसलिये, ऐसी भिक्षा भी इसी मालापहृत भिक्षामें अन्तर्गत समझनी चाहिये। यह सब प्रकारकी भिक्षा साधुको अकल्प्य है॥॥६७॥ ६८॥ ६९॥ જે મજલામા ભિક્ષા આપનારી હાજર હોય, તેની બરાબર જવાને માટે પૂવની પકે નિસરણી યા લાકડું પાટિયુ તી રાખીને ચડે તે ત્યાથી લાવેલી શિક્ષા તિયાલાપહત કહેવાય છે. બહુ મુશ્કેલીથી પહોચી ૧ શકાય એવા સીકા, થા છાજલીમ તથા ઉડી કેટડીમાં રાખેલા અશનાદિ ગ્રહણ કરવાથી પગ ઉપાડવા આદિના અનેક કષ્ટો પડે છે, તેથી એવી ભિક્ષા (માલાપત) ભિક્ષામાજ સમાયલી સમજી લેવી એ સર્વ પ્રકારની ભિક્ષા સાજીને भाटे मध्य छे (१७-१८-१९) બીજી બાજુએ 241 પણું . 3 ११ ४ ५ ६ १० १४ 13 ૧૫ २०१८ २१ अध्ययन ५ उ. १ गा. ७०-७२-आहारग्रहणविवेक: ४६३ टीका-'कद' इत्यादि । कन्द, मूलम्, इमे माग्व्याख्याते, वा अथवा मलम्ब-तालादिफलम् आमम् अपश्य-सचित्तमित्यर्थः । च-पुनः छिन्न कतित- मपि सन्निर-पत्रशाफ-वास्तुकादिक, तुम्बकम् =अलारूविशेष, शृङ्गरम् आर्द्रक चकारादन्यदपि प्रत्येकसाधारणवनस्पतिमात्रम् आमकम् अपक्च सचित्त परि- वर्जयेत्त्यजेत्-न गृह्णीयादित्यर्थः ॥७० मूलम् तहेव सन्तुचुन्नाई कोल-चुन्नाई आवणे । सक्कुलि फाणिय पूअ, अन्न वावि तहाविह ॥७१॥ विकायमाण पसढ, रएण परिफासियं । दितिय पडियाइक्खे, न मे कप्पइ तारिस ॥७२॥ छाया-तथैव सक्तु-चूर्णानि, कोल-चूर्णानि आपणे। शप्कुली फाणित, पूपमन्यद्वापि तथाविवम् ॥७१॥ विक्रीयमाण प्रसद्य, रजसा परिम्पृष्टम् । ददतीं प्रत्याचक्षीत, न मे कल्पते तादृशम् ॥७२॥ सान्वयार्थ:-तहेव-जिसमकार सचित्त कन्दादि अग्राह्य हैं उसीमकार सत्तु- चुन्नाइ-भुने हुए जौ या चनेकाआटा-सत्तू कोलचुन्नाइपेरोका चूरा सक्कुलिं- तिलपापडी फाणिय-गीला गुड पूय-मालपूवा (तथा) तहाविद उसीप्रकारके अन्न वावि-औरभी पदार्थ जो आवणे-दुकान पर विकायमाणनेचने के लिए रखे हुए हैं वे (यदि) पसढ यस्खसे आच्छादित होनेपर भी रएण-सचित्त मूक्ष्म रजसे परिफासिय-व्याप्त हो तो दितिय देनेवालीसे पडियाइक्ख कहे कि कद' हत्यादि । सचित्त कन्द, मल, ताड-फल आदि तथा कटा हुआ भी सचित्त पत्तोका शाक बथुआ आदि, और सचित्त तुम्बा तथा अदरख भी साधु ग्रहण न करे । 'च' शब्दसे यह भी समझना चाहिये कि इनके सिवाय कोई भी सचित्त-प्रत्येक या साधारण वनस्पति, साधुको नही कल्पती है ॥ ७० ॥ ક૨૦ ઈત્યાદિ સચિત્ત કદ, મળ, તાડફળ આદિ તથા કાપેલા હોવા છતા સચિત્ત પાદડાનું શાક-બથુઆની ભાજી આદિ અને સચિત્ત દધી આદિ તથા આદુ પણ સાધુ પ્રહણ ન કરે ૬ શબ્દથી એમ પJ સમજવું કે તે ઉપજત કેઈ પણ સચિત્ત-પ્રત્યેક યા સાધારણ વનસ્પતિ સાધુને કપતી નથી (૭૦) বৰিষ= ૨ 3 ५ ८ १३ ४६४ श्रीदोभालिका तारिमवस मकारका आहारादिमे मुझे (लेना)नकपा नहीं पता है ।।७२।। टीका-'सहे' इत्यादि. 'शिकायमाणं' इत्यादि च। तयेम्पया पूोक सचितफन्दादिकमग्रा ने प्रकारेण सक्तु-चूर्णानि सकन एव चूर्णानि तानि सनित्यः, मायादिन्यत्र सत्ता उन्यन्ते, कोल-चूर्णानि-बदरी- फलचूर्णानि, गप्कुलीं-तिलपर्पटिया, फाणित-श्रुतगुड, पूपम् अपूपम्, वादृशम् अन्यदपिया दयादिकम् , आपणे क्रय कियस्थाने, विक्रीयमाण- विक्रयाथै स्याप्यमान, रजसा-सचित्तरेणुना, प्रसाठा वस्त्रादिनाऽऽदनेपि ययाकश्चित्मकारेणेति भार, परिम्पृष्ट व्याप्त-पायुसमुस्थितरजासस्पृष्टम् ददती मत्याचक्षीत-'तादृश मे न फल्पत' इति ॥७१॥७२॥ मूलम्-बहुअहिय पुग्गल, अणिमिस वा बहुकटयं । अच्छिय तिदुय विल्ल, उच्छुखड व सिंवलि ॥७३॥ अप्पे सिया भोयणजाए, बहु उज्झणधम्मिए । दितिय पडियाइक्वे, न मे कप्पड तारिस ७४॥ 'तहेव' इत्यादि, तथा 'विकायमाण' इत्यादि । जैसे, सचित्त कन्द, मृल आदि त्याज्य हैं वैसेही सत्तू, बेरोंका चूर्ण, तिलपापडी, पिघला हुआ गुड, पूआ तथा ऐसी दही आदि अन्यान्य वस्तुएँ, बेचनेके लिये दुकानमें रक्खी हों, और सचित्त रजसे व्याप्त हों, अर्थात् वस्त्रसे ढंक रखने पर भी पवनके द्वारा पहुँची हुई सूक्ष्म सचित्त रजसे युक्त हों तो वर आहार कल्पनीय नहीं है। इसलिये साधु, देनेवालीसे कहे कि 'ऐसा आहार, मुझे नही कल्पता है ॥७१ ॥७२॥ तहेब इत्यादि तथा विकायमाण इत्यादि જેમ સચિત્ત કદ મૂળ આદિ ત્યાજ્ય છે, તેમજ સત્ત, બેરનું ચૂર્ણ તલપાપડી, નરમ ગોળ, તથા એવા પ્રકારની બીજી દહી આર્દિ નરમ વસ્તુઓ વેચવાને માટે દુકાનમાં રાખી હોય અને સચિન રજથી વ્યાસ હોય અર્થાત વસ્ત્રથી ઢાકી રાખ્યા છતા પવનદ્વારા પહોચેલી સૂમ સચિત્ત રજથી યુકત હોય તે તે આહાર કપનીય નથી તેથી સાધુ તે આપનારીને કહે કે એ આહાર મને કડપ નથી (૭૧ ૭૨) १२ 14 १७ १८ २१ २० २२ S अध्ययन ५ उ १ गा. ७३-७४-फलपकरणे त्याज्यफलनामानि ४६५ छाया-बठिक पुद्गलम् , अनिमिष वा बहुकण्टकम् । अक्षीव तिन्दुक पिल्वम् , इक्षुखण्ड वा शाल्मलिम् ॥७३॥ अल्प स्यादोजनजात, बहूज्झनधर्मिकम् । ददती प्रत्याचक्षीत, न मे कल्पते तादृशम् ||७४|| सान्वयार्थः-यहुअद्विय बहुवीजा अर्थात् सीताफल अणिमिस अनन्नास यहुकट्य-पनस-कटहल अच्छिय-शोभाञ्जनकी फली, जो 'मुनगा' नामसे प्रसिद्ध है, तिंदुय-तेन्दु पिल्ल=वेल सिंचलिं-सेमल इन नामके पुग्गल-फलोको व=और उच्छुखड-गन्ने-शेरडी के टुकडोको, तथा जिस पदार्थमें भोयणजाए- खानेयोग्य अश अप्पे सियाथोडा हो और उज्अणधम्मिए डालदेनेयोग्य अश यह पहुत हो ऐसे फल आदि दितिय देनेवालीसे माबु पडियाइक्खे- कहे कि तारिस-इस प्रकारका आहारादि मे=मुझे (लेना) न कप्पड़ नहीं कल्पता है ॥७३॥७॥ टीका-'यहुअट्टियः' इत्यादि, 'अप्पे सिया' इत्यादि च। वहम्थिकम् बहूनि, अस्थीनि-बीजानि-अस्थिवीमिति रायमुकुटः, वैद्यकश्चेति शब्दकल्पद्रुमः, यस्मिन् , यद्वा बहुनि अस्थिकानि ‘अस्थिकधीजे मेदोजधातौ चेति राज- निघण्टु' इति वैद्यरशब्दसिन्धु., यस्मिंस्तत्, वहुवीजक-योगरूढमेतत् , सीताफलादिकमित्यर्थ - बहुअट्टिय' इत्यादि तथा 'अप्पे सिया' इत्यादि । 'अस्थि' शब्दका अर्थ, बीज होता है, रायमुकुट तथा वैद्यकोपोमें 'अस्थि' शब्दका वीज ही अर्थ है, ऐसा 'शब्दकल्पद्रुम' अभिधानमे भी लिखा है । अत एच वहस्थिक शब्दका अर्थ है बहुत बीजोंवाला । यह शब्द योगरूढ है, अत एच सीताफल अर्थ होता है । निघण्टुमें भी सीताफल (सरीफा)के इतने नाम गिनाये हैं- बहुअट्ठिय० त्यादि, तथा अप्पे सिया. त्या मस्थि' शहनी मर्थ બીજ (બી) થાય છે રાયમુકુટ તથા વૈદ્યકેમ અસ્થિ શબ્દને બીજ એ જ અર્થ છે, એમ શબ્દકપદ્દમ” મા પણ લખ્યું છે એટલે ચિ શબ્દનો અર્થ થાય છે બહુ બી વાળુ, એ ગબ્દ ગઢ છે, એટલે સીતાફળ અર્થ થાય છે નિઘ ટુએ પણ મીતાફળના આટલા નામ ગણાવ્યા છે- - - . ४६६ भीदप्रकाशित "सीतारन गडमात्र, नदीम तया। कृष्णपीनं गानिमाम्यमाउण्य पहलीनाम् ॥१॥"रतिनिघण्टुकोष. यहा 'याभडिय' इत्यस्य 'यति मितिमाया, 'फलपीजे पुमानष्ठि" इति फोपात , अर्धस्नूक्त ए। पुलम्मादागरमकपूरणपरिपाकानन्तावापतनामका- लाधर्मपत्वात्पुनः फलमामान्य तम् , अग्रेऽप्यस्य सम्बन्धः, सीताफलाग्निामक फलमिति मारः। अनिमिपम् भनझामम् अन्तसिफण्टक वादिदेशभसिद्धम् । पहुकण्टक-पष्ट पिफर-पनस 'कटहर' इत्यनेन प्रमिदम् , अस्य स्तरमावे, सर्वा यादेन यण्टयच्याप्त्या बहुमण्टयम सिध्यति, अनिमिषपदार्थस्य स्वन्तर्बहिन सरण्टरत्येऽपिपिलपत्यादस्मा३द भसीन्शोभाजनम् फलप्रकरणात्तत्फलिकाम्, वचः स्थौल्य काश्याधिक्यदीपेभ्यो पीनाना वाहुल्याचात्यधिपत्याज्यभागा 'मुनिगा' इति देशविशेषमसिद्धाम् । तिन्दुर भण्डाकृतिक फलविशेषम् अल्पा कारस्याप्यस्य फलस्य योजाना स्यात्याल्यादिद त्याज्याशबहुल 'तेंदु' इति "सीताफल, गण्डमात्र, वैदहीवल्लभ, कृष्णयीज, अग्रिम, आतृप्य और पानीजक ॥१॥ इनमें 'ययोजक' शब्द भी सीताफलके लिये आया है, और यह ऊपर बताया ही जा चुका है कि 'अस्थि' शब्दका अर्थ बीज होता है । इसलिये बहुवीजक और बहस्थिक एक ही है, अतः बदस्थिकका अर्थ सीताफल ही है। अधवा 'अट्टिय' की छाया, 'अप्टिक' होती है, कोपमे लिखा है कि फलके बीजको 'अष्ठि' कहते है । इससे भी पूर्वोक्त अर्थ ही सिद्ध होता है, इसलिये, सीता फलको तथा बग आदि अन्य अन्य देशोंमे प्रसिद्ध अनन्नाश(अनास)फल विशेष, कटहर, मुनिगा (सोहिजन) की फली, तेन्दु, बेल, गन्नेका खण्ड “સીતાફળ, ગડમાત્ર, વૈદેહીવલભ, કૃષ્ણબીજ અગ્રિમ, આપ્યા અને બહુબીજક" એમાં “બહુબીજક' શબ્દ પણ સીતાફળને માટે આવ્યું છે, અને ઉપર બતાવવામાં આવ્યું જ છે કે “અસ્થિ શબ્દને અર્થ બીજ થાય છે એટલે બહુબીજક અને બલૈનિક એક જ છે, અર્થાત્ બસ્થિકનો અર્થ સીતાફળ જ છે અથ अद्विय न छाया अप्टिक थाय छ, आमा सयु छ ? 01 मारने 'अष्ठि કહે છે તેથી પણ પૂર્વોકત અર્થે જ સિદ્ધ થાય છે એ રીતે સીતાફળ, તા બગ આદિ અન્ય-અન્ય દેશોમાં પ્રસિદ્ધ અન્નનાસ, કટર, મુનિશાની (એક પ્રકારની ફળી, તેજું, બિવફળ, (ખાવા) શેરડીની કાતળી સેમલ આદિ ફળ, જેમા ખાદ્ય - 3 . ५ ६ e अध्ययन ५ उ.१ गा. ७५-पानग्रहणविधिः ४६७ मसिद्वम् । विल्यम्, इक्षुखण्ड, शाल्मलि च, एतानि प्रसिद्धार्थकानि । तथा यत्र भोजनजात भोज्याशः अल्प-स्वल्पम् , उज्झनधर्मिक-त्याज्याशः बहु-अधिक स्यात् भवेत् तत्फलादिकमन्यदपि ददती प्रत्याचक्षीत-तादश मे न कल्पते इति । सामान्यलक्षणेन त्याज्यफलादिज्ञान शिष्याणा दुष्कर स्यादिति प्रथम विशेषरूपेण कतिचित्फलानि मदर्य त्याज्यसामान्यलक्षण निरूपित तेन न पूर्वगाथायास्ता- त्पर्यानुपपत्तिरिति दिक् ||७||७४|| मूलम् तहेवुञ्चावय पाण, अदुवा वार-धोयण । ससेइम चाउलोदग, अहुणाधोय विवज्जए ॥७५॥ एव सेमल आदि फल, जिनमें खाद्य अश कम हो तथा त्याज्य अंश अधिक हो उन सर फल आदिको देनेवालीसे कहे कि ऐसा आहार, मुझे नहीं कल्पता है। अनन्नासमें भीतर भी काँटे होते हैं और बाहर भी, और कटहरके छिलकेमें सर्वन काँटे ही काँटे होते हैं। दोनों यहुकण्टक हैं, किन्तु अनन्नासमें कॉटे कम और तीखे रोते हैं, अतः वह कटहरसे भिन्न है। अन्य भेद लोक प्रसिद्ध ही हैं। सामान्य लक्षण करनेसे त्यागने योग्य फलोंका ज्ञान शिष्योंको कठिनतासे होता, अत. पहले कुछ विशेष फलोंके नाम गिना कर, उस प्रकारके सभी फलोंका त्याग बताया है। इसलिये, पहली गाथासे इसका सम्बन्ध ठीक बैठता है ।। ७३ ॥ ७४ ॥ અશ ઓછો હોય તથા ત્યાજ્ય અશ વધારે હોય એ બધા ફળ આદિ આપનારીને સાધુ કહે કે એ આહાર મને કરતે નથી અનન્નાસમાં અદર કાટા હોય છે અને બહાર પણ હોય છે, અને કહરના છેતરામાં સર્વત્ર કાટા જ હોય છે બેઉ બહુક ટક છે, પરંતુ અનાસમાં કાટા ઓછા અને તીખા હોય છે, તેથી તે કટરથી જુદુ ફળ છે અન્ય ભેદ લેક પ્રસિદ્ધ છે સામાન્ય લક્ષણ બતાવવાથી ત્યાગવા યોગ્ય ફળનું જ્ઞાન શિષ્યને મુશ્કેલીથી થાય છે, એટલે પહેલા કેટલાક વિશેષ ફળના નામ ગણવીને એ પ્રકારના બધા ફળને ત્યાગ બતાવ્યું છે તેથી પહેલી ગાથાથી આને સબધ ઠીક બધ બેસ (७३-७४) ४६६ श्रीनरेशालिकमा सा "सीताफर्म गन्दमान, मेटेडीयम तया । रुग्णयीन पानिमाम्यमावप्प पहनीनाम् ॥१॥" इति निघण्टुकोष यदा गहभडिय' इत्यस्य 'यष्टिर' मितिन्ाा, 'फलत्रीजे पुमानष्ठिः' इ। फोपात् , भर्धनत एर। पुशलम् रमटयारमकपूरणपरिपाकानन्तरामापतनाग्मः लाधर्मपत्वात्पुलः फसामान्य तम् , अग्रेऽप्यस सम्बन्धः, सीताफलादिनाम फलमिति भावः। अनिमिपम् मनमासम् अन्तर्वसिरण्टक बङ्गादिदेशप्रसिद्धम् पहुकण्टक-अटरिफर-पनस 'कटहर' इत्यनेन मसिद्धम् , अम्य स्वरमावे, चयापच्छेदेन कष्टयच्याप्रया बहुरष्टयत सिध्यति, अनिमिषपदार्थस्य सन्तर्वहि सफण्टरत्वेऽपिपिरलरवादस्माद भी गोमाञ्जनम् फलप्रकरणातत्फलिकाम् स्वचः स्थौल्य कार्यश्याधिवपदोपेभ्यो वीजाना पाइल्याचास्यधिस्त्याच्यभाग 'मुनिगा' इति देशविशेषमसिद्धाम् । तिन्दुस्म् अण्डाकृतिक फलविशेषम् अल्पा कारस्याप्यस्य फलस्य चीजाना स्थौल्यवाहुल्यादिद त्याच्याशबहुल 'तंदु' इति " सीताफल, गण्टमात्र, चैदहीवल्लभ, कृष्णपीज, अग्रिम, आतृप्य और यहुचीजक ॥१॥" इनमें 'वीजक' शब्द भी सीताफलके लिये आया है, और यह ऊपर बताया ही जा चुका है कि 'अस्थि' शब्दका अर्थ वीज होता है। इसलिये बहुवीजक और यहस्थिक एक ही है, अतः यहस्थिकका अर्थ सीताफल ही है। अथवा 'अट्ठिय 'की छाया, 'अप्टिक' होती है, कोपमे लिखा है कि फलके बीजको 'अष्ठि' करते है । इससे भी पूर्वोक्त अर्थ ही सिद्ध होता है, इसलिये, सीता फलको तथा यग आदि अन्य अन्य देशोमे प्रसिद्ध अनन्नाश(अनास)फल विशेष, कटहर, मुनिगा (सोहिंजन) की फली, तेन्दु, बेल, गन्नेका खण्ड “સીતાફળ, ગડમાત્ર, વૈદેહીવલભ, કૃષ્ણબીજ અગ્રિમ, આપ્યું અને એમાં “બહુબીજક' શબ્દ પણ સીતાફળને માટે આવ્યું છે, અને ઉપર બતાવવામા આવ્યુ જ છે કે “અસ્થિ શબ્દનો અર્થ બીજ થાય છે એટલે બહુબીજક અને અલ્લથિક એક જ છે, અર્થાત બડ્ડસ્થિકનો અર્થ સીતાફળ જ છે अहिय ना धाया अष्ठिक थाय छ, औषमा वायु छ , ना पीने 'अप्ठि કહે છે તેથી પણ પૂવક્ત અર્થ જ સિદ્ધ થાય છે એ રીતે સીતાકળ, તથા બગ આદિ અન્ય-અન્ય દેશોમાં પ્રસિદ્ધ અન્નનાસ, કટર, મુનિશાની (એક પ્રકારની) ફળી, તેન્ડ, બિડવફળ, (બાલા) શેરડીની કાતળી ગેમલ આદિ ફળ, જેમા પદ્ય - । , , gul અથવા अध्ययन ५ उ. १गा. ७५-पानग्रहणविधिः मुंह+न्तर्घात चेदित्यर्थस्तदा विवर्जयेत्न गृह्णीयात् । उपलक्षणमेतत् , उक्तञ्चाऽऽचारातें श्रीभगवता- "से भिक्खू वार जाव अणुपचिट्ठे समाणे से ज पुण पाणगजाय जाणेजा, त जहा-उस्सेइम वा ससेइम वा चाउलोदग वा अन्नयर वा तहप्पगार पाणगजात अहुणाधोय अणविल अवोक्त अपरिणत अविद्धत्य अफासुय जाप णो पडि- गाहेज्जा । अह पुण एव जाणेजा चिराधोय अविल वोक्कत परिणत विद्धत्थ फासुय जाव पडिगाहेज्जा । से भिक्खू वार जाच अणुप्पविद्वे समाणे से ज पुण पाणगजात छाया-१-"अथ भिक्षुर्वा भिक्षुकीवायावत्-अनुपविष्टः सन् स यत्पुनः पानक- जात जानीयात् , तद्यथा-उत्स्वेदिम वा सस्वेदिम वा तण्डुलोदक वा अन्यतरवा तथामकार पानकजातम् अधुना पौतम् अनम्लम् अव्युत्क्रान्तम् अपरिणतम् अवि- ध्वस्तम् अमामुक यावत् नो प्रतिगृह्णीयात् । अथ पुनरेव जानीयात्-चिरयौतम् अम्ल व्युत्क्रान्त परिणत विध्वस्त प्रामुक यावत् प्रतिगृह्णीयात् । अथ भिधुर्वा २ यावत् अनुपविष्टः सन् स यत्पुन. पानकनात जानीयात्, तद्यथा-तिलोदक वा इनको ग्रहण न करे । ये तो उपलक्षण मात्र हैं, आचाराग सूत्रमे भगवानने का है- साधु अथवा साध्वी पानीके लिए गृहस्थके घरमे प्रवेश करके- आटेके बरतनका धेोवन, शाक आदिका बाफा हुआ पानी, चावलोंका धोवन तथा इस प्रकारका और भी कोई पानी तुरतका धोया हुआ हो, स्वादसे चलित न हुआ हो अर्थात् जिसका पोवन हो उस वस्तुका स्वाद न आता हो, जिसका वर्ण रस् गन्ध स्पर्श न बदला हो-सर्वथा अचित न हुआ हो, शस्त्र परिणत न हो तो ग्रहण न करे। यदि तुरतका धोया हुआ न हो बहुत देरका धोया हुआहो, स्वादसे चलित हो गया हो અથતુ અતર્મુહૂર્તની અંદર અદરની છેએવા હેય તે તેને ગ્રહણ કરવા નહિ એ તે ઉપલક્ષણમાત્ર છે આચારાગ સૂત્રમાં ભગવાને કહ્યું છે કે- સાધુ અથવા સાધ્વી પાણીને માટે ગૃહસ્થના ઘરમાં પ્રવેશ शन, આટાના વાસણનું વણ શાક આદિ જેમાં બાફેલા હોય તે પાણી, ચાખાનું ધાવણ, તથા એ પ્રકારનું બીજુ પણ કાઈ પાણી તુરતનું ઘેએલ હેય, સ્વાદથી ચલિત થયું ન હોય, અર્થાત્ જેનું ધાવણ હોય તે વસ્તુને સ્વાદ ન આવતે હાય, જેના વર્ણ સં ગધ સ્પર્શ ન બદલાયા હેય સર્વથા અચિત્ત ન થયું હોય, શસ્ત્રપરિણુત ન હોય, તે તે ગ્રહણ ન કરે છે તુરતનું ધાએલું ન હાય બહુ વખતનું ધાએલ હાય, સ્વાદથી ચલિત થયુ હૈય, અને શસ્ત્રપરિણત હોય તે , " ૪૬૮ श्रीदशालिकमरे छाया-वयोचारा पान, मया पारधावनम् । सस्पेदिम रालोदाम्, अनाधीत चियेत् ।।७५|| अप पान ग्रहण करने की धिपताते- सान्वयार्थ:-तहेव जैमे अशन उसीमयार पाण-पान उबावयउप मुन्दर वर्णादिसे युक्त, जैसे दाग्य आदिका धोपन, आच-मुन्दर वर्णादिसे रहित जैसे मेयी केर आदिका धोपन पारधोयण गुटके घडेका धोरन मसेडम भाजीका तथा आटेकी थालीका धोपन अदुवा अपरा चाउलोदग-चॉपलका घोवन (ये सर यदि) अणाधोय-तुरन्तका धोया हुआ हो तो उसे (सा) विवज्जा- वर्जे-न लेचे ॥७५|| टीका-अशनग्रहणधेिरनन्तर पानग्रहणविधिमाह'तहेपुच्चाय' इत्यादि । तथैवन्ययाऽशन तेनैव प्रकारेण, पान-पेय, मणि न्युर, उच्चावचमिति-उदक च अवारु च उचावचम्-अनेकमकारम् , उत्कृष्टानुकप्टमित्यर्थः, तत्र उत्कृष्ट रुचिर वर्णगन्धरसस्पर्शयुक्त द्राक्षादिधाननल प्रपाणकादिक च, अनुत्कृष्ट-रुचिर वर्णादिहीन मेथिका करीर-शमीफलिका-तिलादिधावनजलम् । वारकधावन गुड घट-घृतघटादि धावनजल, सस्वेदिमचायितशाकादिजल पिष्टस्थालीप्रक्षालनजलश्च, तण्डुलोदक-तण्डुलधावनजलम् । एतत्सर्वम् अधुनाधौतम् तत्काल धौतम् अन्त अशन ग्रहण करनेकी विधि बताकर अब पान ग्रहण करनेकी विधि दिखाते हैं-'तहेवुच्चावय' इत्यादि । उच्च (उत्कृष्ट) मनोज वर्ण गन्ध रम स्पर्शवाला दाख आदिका घोवन तथा शर्वत आदि पान, अवच (अनुत्कृष्ट) अमनोज वर्ण गन्ध रस स्पर्शवाला मेथी केर साँगरी तथा तिल छाउ आदिका धोवन आदि पान, गुड या घीके घडेका धोवन, औटाये (उवाले) हुए हरा शाक आदि का पानी, आटेकी थाली आदिका धोवन, चावलका धोवन । ये सब यदि तत्कालके धोये हुए हों अर्थात् अन्तर्मुहर्त्तके अभ्यन्तरके धोये हों तो અરાન ગ્રહણ કરવાની વિધિ બતાવીને હવે પાન ગ્રહણ કરવાની વિધિ सतावे छे-तहेवुच्चावय त्या ઉચ્ચ (ઉત્કૃણ) મનેષર વર્ણ ગધ રસ સ્પર્શવાળુ દ્રાક્ષ આદિનુ ધાવણ તથા શરબત આદિ પાન, અવચ (અનુત્કૃષ્ટ) અમનેસ વર્ણ ગધ રસ સ્પર્શવાળુ મેથી, કેરા, ખીજડની ફળો (સાગરિએ) તથા તલ છાશ આદિનુ ધાવણ આદિ પાન, ગોળ યા ઘીના ઘડાનું વણ, ઉકાળેલા લીલા શાક આદિનું પાણી આટાની થાળી આદિનું વર્ણ, ચેખાનું વણ, એ બધા જે તાન 9..

अध्ययन ५ उ.१गा. ७६-७७-पानग्रहणविधिः ४७१ २ 3 ५ ૧૨ १३ ૧૫ २० २१ ૨૨ २३ , "तिलवडुल-उसणोदय, चणोदय-तुसोदय-अविद्धत्य । अण्ण तहाविह बा, अपरिणद णेव गेण्हिज्जा ॥४७३॥” इति । इति गाथार्थः ॥७॥ तहि कीदृश पान गृह्णीयात ' इत्यत आह-'ज जाणेज' इत्यादि, 'अजीव' इत्यादि च । मूलम्-ज जाणेज चिराधोय, मईए दसणेण वा । पडिपुच्छिऊण सुच्चा वा, ज च निस्सकिय भवे ॥७६॥ अजीव परिणयं नच्चा, पडिगाहिज्ज संजए। अह सकिय भविज्जा, आसाइत्ताण रोयए ॥७७॥ छाया-यज्जानीयाचिराद्धौत, मत्या दर्शनेन वा । पतिपृच्छय श्रुत्वा वा, यच्च निश्शङ्कित भवेत् ॥७६।। अजीव परिणत ज्ञात्वा, प्रतिग्रहीयात्सयतः। अथ शङ्कित भवेत, आस्वाध रोचयेत् ॥७७|| सान्वयार्थ -मई-बुद्धिसे वा अथवा दसणेण=देखनेसे पडिपुच्छिऊण= छाया-१ तिलतण्डुलोप्णोदक चणकोदक तुपोदरम् अविध्वस्तम् । अन्यत् तथाविध वा, अपरिणत नैव गृह्णीयात् ॥४७३॥ लिलोदक, तन्दुलोदक, उष्णोदक, चनेका पानी, तुपका पानी, तथा इस प्रकारका और भी जल यदि अवि वस्त (सचित्त) हो और शस्त्रपरिणत न हो तो ग्रहण नहीं करना चाहिए अर्थात् शस्त्रपरिणत हो तो लेना कल्पता है ॥१॥" (मूलाचार गा (४७३) ॥७५ ॥ कैसा धोवन ग्रहण करना चाहिए ? सो बताते है-'ज जाणेज्ज' इत्यादि, 'अजीव' इत्यादि । તિલેદક, તલેદક, ઉદક, ચણાનું પાણી, તુષનું પાણી તથા એ પ્રકારનું બીજુ પણ જળ જે અવિશ્વસ્ત (સચિત્ત) હોય અને ઋરિણુત ન હોય તે પ્રહણ કરવું ન જોઈએ અર્થાત્ શસ્ત્રપરિણત હોય તે લેવુ કપે છે (भूलायार ॥ ४७3) (७५) ॐ धापा प्राय ४२ मे ? ते मा छ -जं जाणेज्ज. त्याम તથા માત્ર ઈત્યાદિ ४७० श्रीदकालिकम्ने जाणेला वनहा-तिलोदगं ा गोदग या योदगा आयाम पा मोवीर वा मुदरियट या अन्गगर पातहप्पगारं पाणगनायं पुवामेर आलोपना-आउसोचि वा० ७। से मिरा नार समाणे मे ज पुण नाणेना ननहा-अपाणग या अडगपाणगा करिछपाणग ग मालिंगपाणग पा मुहियापाणग वा दालिमपाणग या खजूरपाणग पानालिकरपाणग पा करीरपाणग पा कोलपाणग आमलगपाणग पा चिंचापाणग या अनयरं पातहप्पगार पाणगजाय"इत्यादि। उक्त दिगम्बराचार्येण सकेरस्वामिनाऽपि मूलाचारे- तुपोदक या योदक या आयाम पा सोचीर गा शुदकित पा अन्यतरत् वा तथा मकार पानकजात पूर्वमेर आलोचयेत्-आयुष्मन् ! इति या ७ । अथ मिभुरि यावत् अनुमपिष्ट सन् स यत्पुनर्जानीयात् , ताया-आम्रपानक या आम्रातकपानक वा कपित्यपानक वा मातुलुङ्गपानक या मृद्वीफापानक या दाडिमपानक वा खरे पानक या नालिकेरपानक वा करीरपानक पा कोलपानक वा आमलपानक वा चिश्चापानक पा, अन्यतरद्वा तथाप्रकार पानकजातम्" इत्यादि । और शस्त्रपरिणत हो तो ग्रहण करे । तिलोदक, तुषोदक, यवोदक, ओसामण, सोवीर (अगछण), उष्णोदक तथा इस प्रकारका और भी पानी गृहस्थका दिया हुआ कल्पता है। साधु यदि आमका धोवन, अयाडगका धोवन, कविठ (कैथ)का धोवन, विजौरेका धोवन, द्राक्षका धोवन, अनारका धोवन, खजूरका धोवन, नारियलका पानी (धोवन ), केरका धोवन, बेरका धोवन, आँवलेका धोवन, इमलीका धोवन, अथवा इस प्रकारका और भी धोक्न जाने और यदि वह अत्यम्ल न हो, तुरतका धोया हुआ न हो, स्वादचलित हो और शस्त्रपरिणत हो तो कल्पता है।" दिगम्बराचार्य वट्टकेर-स्वामीने भी मूलाचारमें कहा है- ગ્રહણ કરે તિલેદડ, તુષેદક, વેદક, ઓસામણ, સેવીર ઉણાદક તથા પ્રકારનું બીજુ પણ પાણી ગૃહસ્થ આપેલ હોય તે કરે છે જે સાધુ કેરી ધવણ અબાડેગ (આળિયાનું) ધવણ, કોનું વણ, બીજેરાનું ધાવણ દ્રાક્ષનું ધાવણ અનારનું વર્ણ, ખજૂરનું જોવણ, નારિયેળનું પાણી (ધાવણ) કેરાનું વણ, બેરનું ધોવણ, આબળાનું ધોવણ, આબલીનું બેવણ, અથવા પ્રકારનું બીજુ પણ ધોવણ જાણે અને જે તે બહુ અમ્લ (ખાટુ ) નું હેય સુરતનું ધોએલ ન હોય, વાદચલિત હોય અને શસ્ત્રપરિણત હોય તો કહ્યું છે દિગબરાચાર્ય વકેર–સ્વામીએ પણ મૂલાચારમાં કહ્યું છે – . .

अध्ययन ५ उ.१ गा. ७६-७७-पानग्रहणविधिः ४७१ ७ 3 ४ प १०११ ૧૨ 23 १४ ૧૮ १७ ર २३ "तिलवडुल-उसणोदय, चणोदय-तुसोदय-अविद्वत्थ । अण्ण तहाविह वा, अपरिणद णेव गेण्दिजा ॥४७॥" इति । इति गाथार्थः ॥७॥ तहि कीदृश पान गृहीयात ' इत्यत आह-'ज जाणेज' इत्यादि, 'अजीवं' इत्यादि च । मूलम्-ज जाणेज चिराधोय, मईए दंसणेण वा। पडिपुच्छिऊण सुच्चा वा, ज च निस्सकिय भवे ॥७६॥ अजीव परिणय नच्चा, पडिगाहिज्ज संजए । अह सकियं भविजा, आसाइत्ताण रोयए ॥७७॥ छाया--यज्जानीयाच्चिरादौत, मत्या दर्शनेन वा। प्रतिपृच्छय श्रुत्वा वा, यच्च निश्शङ्कित भवेत् ॥७६।। अजीर परिणत ज्ञात्वा, पतिगृहीयात्सयतः । अथ शङ्कित भवेत्, आस्वाध रोचयेत् ।।७७॥ सान्वयार्थ:-मई-बुद्धिसे वा अथवा दसणेण-देखनेसे पडिपुच्छिऊण= छाया-१ तिलतण्डुलोप्णोदक चणकोदक तुपोदरम् अविध्वस्तम् । अन्यत् तथाविध वा, अपरिणत नैव गृह्णीयात् ।।४७३॥ तिलोदक, तन्दुलोदक, उष्णोदक, चनेका पानी, तुषका पानी, तथा इस प्रकारका और भी जल यदि अविश्वस्त (सचित्त) हो और शस्त्रपरिणत न हो तो ग्रहण नहीं करना चाहिए अर्थात् शस्त्रपरिणतो तो लेना कल्पता है ॥१॥” (मलाचार गा (४७३) ॥७५ ॥ कैसा धोवन ग्रहण करना चाहिए । सो बताते है-'ज जाणेज्ज' इत्यादि, 'अजीव' इत्यादि । 'तियोs, तन्दुats, ecles, यानु पाणी, तुपनु पाणी, तथा ये પ્રકારનું બીજુ પણ જળ જે અવિશ્વસ્ત (સચિત્ત) હોય અને શસ્ત્રપરિણત ન હોય તે ગ્રહણ કરવું ન જોઈએ અત્યંત શાપરિણત હોય તે લેવું કપે છે (भूताया२ ॥ ४७३) (७५) उषु पाप अY ४२७ नये ? ते मताव छ – जाणेज्ज. त्यादि, तया अजीव इत्यादि , श्रीदप्रकाणिकत्र पूरपर या भया सुगा-पान पर हुप सुनार जलनिग घोपनको पिराधोय- रिपोत गत देरणा घोगा भाजाणेज-नाने,गम्या जनोनिस्सकिय- 'इससे ठपा शान्त होगी या नहीं? कारकी महारहित भव हो तो उस अजीव-नीति-भगिरा-और परिणय-शमपरिणत नमा जानकर सजा- साधु पडिग्गाजि आर-मग-अगर मकिय'इससे पाबूप्रेगी या नहीं?' इस प्रकारको गलामे युक्त भरिन्जादी तो उसे आसाइसाणचख करके रोय निर्णय फरे ॥७६||७७|| टीका-मत्या शुद्धया दर्शनेन या राघौतनले तदीयवर्णादिपरिज्ञानाय तत्राऽऽगमानुगामिन्या मनीपया दृष्टिनिपातेन चेति मार, मतिपय सम्यक् पृष्ट्वा श्रुत्वा वा तत्मविवचन मनमन्तरेणाऽपि कस्यचिन्मसात निशम्य यत् चिरा rौत जानीयात् , या निश्शतितम् अनुपयोगित्वशङ्कारहित भवेत् तद् अजीव-भा मक परिणत-स्वपरशखादिनाजस्थान्तर HARAT सयत साधु प्रतिगृवीयान् । ये तु 'घटिकाद्वयानन्तर धावनजल सचित्त भातीति मुहर्तात्पर तत्तोयमनुपा देय' मित्याहु , तन्न समीचीनम्, व्यञ्जनाशुपलिप्तकरदवीधावनार्थ पारप्रदेशे पूर्व आगमानुसार बुद्धि अथवा दृष्टिसे धोवनका वर्ण आदि जान कर पूछ कर अथवा किसीसे सुन कर धोवन बहुत देरका धोया हुआ हो तो ग्रहण करे । तथा 'उपयोगी है या अनुपयोगी" इस प्रकारकी शकाका निर्णय करके प्रासुक तथा अवस्थान्तरको प्राप्त होगया जानकर साधु ग्रहण करे। जो लोग यह कहते हैं कि-' धोवन जल दो घडीके बाद सचित्त होनेसे अग्राह्य है। यह उनका कहना ठीक नहीं, क्योकि, यदि दो घडीके बाद धोवन जल सचित्त हो जाय तो शाक आदिसे लिप्त हाथ આગમાનુસાર બુદ્ધિ અથવા દૃષ્ટિથી પૈવણ વદિ જાણી પૂછીને અથવા કાઈ પાસેથી સાભળીને ધાવણ બહુ વખતથી ઘેએલ હોય તે તે ગ્રહણ કરે તેમજ ઉગી છે કે અનુપયોગી?” એ પ્રકારની શકાને નિર્ણય કરીને પ્રાસુક અવસ્થાતને પ્રાપ્ત થએલુ જાણીને સાધુ તે ગ્રહણ કરે જે લોકો કહે છે કે ધાવણનું પણ બે ઘડી પછી સચિત્ત હોવાથી અગ્રાહ્ય છે”તે તેમનું કહેવાનું બરાબર નથી કારણ કે જે બે ઘડી પછી છેવનું જળ સચિત્ત થઇ જાય તે શાક तथा આદિથી મરડાયેલા યા કડછી આદિ , अध्ययन ५ उ. १ गा. ७६-७७-पानग्रहणविधिः] ४७३ स्थापितजलस्य मुहूर्तानन्तर तन्मते सचित्तताया तदानीं तदुदकक्षालितकरदा- दिना निरवद्याशनग्रहणमपि तेषा दोपावह भवेत्, तत्संमतसचित्तजलसंसृष्टकरदों- संसर्गवचात् । मुहूर्तात्परमेव धारनजलस्य सचिचत्वाङ्गीकारे 'अहुणाधोय विव- ज्जए' इति प्रकृतम्नस्य 'ज जाणेज्जचिराधोय' इति प्रकृतसूत्रस्य च विरोधा- पत्तिः, तथाहि-अधुनाधीतस्य मुहूर्तान्तर्गततया तत्र तन्मते सचित्तताया अभावे तवर्जनोपदेशाऽसङ्गतिः,चिरादौतस्य च मुहर्त्तानन्तर तन्मते सचित्ततया तदुपादा- नोपदेशस्य चासङ्गतिः स्यात् , तस्मात् पिपासापनोदनशक्तिशालिनश्चिराद्धौतस्य ग्रहण शास्त्रसंमतमित्यवधेयम् । या कुडडी आदि धोने के लिए गृहस्थ (रसोया) रसोर्डके समय अपने पास एक पानीका वरतन रखता है, उस जलसे हाथ और कुडछी यो धो कर दाल आदि परोसता है, ऐसी दशामे उक्त मतसे देर तक रक्खे रहने के कारण यदि वह हाथ या कुडली आदिका धोवन सचित्त हो जाता है तो उस धोवनमे धोयी हुई कुडछी या हायसे दिया जानेवाला निरवद्य अन्नादि भी उनको अग्राह्य हो जायगा । 'तहेचुचाचय' इस गाथाके अन्तिम चरणमें 'अहुणाधोय विवजए' यह कह कर भगवानने यह स्पष्ट कर दिया है कि तुरतका घोया हुआ जल अग्राह्य है, और इसीको 'विद सुबद्ध भवति' इस न्यायसे 'ज जाणेज चिराधोय' इस गाथासे सुस्पष्ट कर दिया है कि देरका धोया हुआ धोवन ग्रहण करना चाहिए । अतः दो घडीके बाद धोवनमें जीवोंकी उत्पत्ति मानना जैनागमसे विरद्ध है और उत्सूत्र-प्ररूपणाका भागी बनना है । લેવાને માટે ગ્રડસ્થ (સઈ) રસોઈને સમયે પિતાની પાસે પાણીનું એક વાસણ રાખે છે, એ જળથી હાથ અને કડછી ઈ–જોઈને દાળ આદિ પીરસે છે, એવી દશામા ઉક્ત મત પ્રમાણે કેટલાક સમય સુધી રહેલું હેવાને કારણે જે એ હાથ યા કછી આદિ ઘેવણ સચિત થઈ જાય તે એ વણમા એલી કાછી યા હાથથી આપવામાં આવતુ નિરવદ્ય અન્નાદિ પણ એમને અગ્રાહ્ય सनी लय तहेवुञ्चावय मे गायाना अतिम २२मा अहुणाधीय विवज्जए એમ કહીને ભગવાને એ સ્પષ્ટ કરી આપ્યું છે કે તુરતનું ઘેલું જળ અગ્રાહા छ, भने मेने द्विद्ध सुबद्ध भवति से न्याय प्रशने ज जाणेज्ज चिराधोय ये ગાથાથી સુસ્પષ્ટ કરી આપ્યું છે કે કેટલાક સમય પહેલાનુ ધામેલુ દેવણુ ગૃહ કરવું જોઈએ એટલે બે ઘડી પછી ધાવણમાં છની ઉત્પત્તિ માનવી એ જેનાથી વિરૂદ્ધ છે અને ઉ સૂત્રપ્રરૂપણના ભાગી બનવું છે ५ । ४७४ श्रीदशकालिको अथ शक्तिपिपासाऽपनोदक ना?" नि संशयपियो भवेतटा आस्वाथ- उक्तसंशयापनोदयार्थ किशित्पीत्वा रोचयेत् निर्णयेत् ।। "अजी"-मित्पनेन जीराहित्य परिणत-मित्यनेन च सर्वथाऽचित्तस्य सूचितम् ॥७६||७७|| आस्वादननिधि प्रदर्शयन् निर्णयप्रकारमाह-'धोव०' इत्यादि । मूलम्-थोवमासायणटाए, हत्थगम्मि दलाहि मे। मा में अच्चविल प्रय, नाल तिह विणित्तए ॥७८॥ छाया-स्तोकमास्वादनार्य, हस्तके देहि मे। मा मे अत्यम्ल पूति, नाल तृष्णा पिनेतुम् ॥७८॥ सान्वयार्थः-(निर्णय करने के लिए साधु दातासे कहे कि-हे आयुष्मन् !) आसायणट्टाए चखनेके लिए धोध-योडासाधोवा मे मेरे हत्यगम्मि-हाथमें दलाहिदो, (हाथमें लेकर चखने पर यदि निश्चय हो जाय कि वह धोवन) अचयिल अत्यन्त खट्टा पूय दुर्गन्धित और तिण्ड-प्यास विणित्तए-बुझानेके लिए नाल समर्थ नहीं है इसलिये यह मे मेरे लिए उपयोगीमा नहीं है।।७८।। तथा 'इससे प्यास मिट जायगी या नहीं" ऐसासन्देह उत्पन्न हो जाय तो उस सन्देहको दूर करनेके लिए थोडासा पानी चख कर निर्णय करे। 'अजीव' पदसे जीवराहित्य और 'परिणय' पदसे मिश्रकी शकाका अभाव सूचित किया है ।। ७६॥ ७७॥ आस्वादन (चखने) की विधि बताते हुए निर्णय करनेका प्रकार बताते हैं-'थोव०' इत्यादि । તેમજ “એથી તરસ મટશે કે નહિ?” એ સદેહ ઉત્પન્ન થાય તે એ સદેહ દૂર કરવાને ડુ પાણી ચાખીને નિર્ણય કર સગી શબ્દથી જીવરાહિત્ય मन परिणय ०४थी भिधनी शनी अमाप सूचित ध्यछ (७६-७७) આસ્વાદન (ચાખવા)નો વિધિ બતાવતા નિર્ણય કરવાને પ્રકાર બતાવે छे-थोव० त्यादि १ ૨ 3 ૫ १११२ १३ १० अ ययन ५ उ.१ गा. ७८-८१-पानग्रहणविधिः ४७५ टीका-आस्वादनार्थम्-उपयोगित्वाऽनुपयोगित्वज्ञानार्थ स्तोक स्वल्प तिल- तण्डुलादिजल मे=मम हस्ते 'देहि' इति दात्रीमुद्दिश्य वदेदिति भावः । तदत्त धौतजलमास्वाय निश्चिनुयात्-इदम् अत्यम्ल पूति-अनिष्टगन्धयुक्त कृष्णा-पिपासा विनेतुम् अपाकर्तुं नालन समर्थम्, इति मे मम माम्नहि उपयोगीति शेपः॥७८॥ निश्चयानन्तर कर्तव्यमाह-तच' इत्यादि । मूलम्-तं च अञ्चविल पूय, नाल तिण्ह विणितए । दितिय पडियाइक्वे, न मे कप्पड तारिसं ॥ ७९ ॥ छाया-तचाऽत्यम्ल पूति, नाल तृष्णा त्रिनेतुम् । ददती प्रत्याचक्षीत, न मे कल्पते तादृशम् ॥७९।। तब वह साधु क्या करे , सो पताते है- सान्वयार्थ -अञ्चचिल अत्यन्त खट्टे पूयदुर्गन्धियुक्त और तिण्ड विणित्तए नाल प्यास मिटानेके लिए असमर्थ त च-उस धोवनको दितिय= देनेवालीसे साधु पडियाइक्खेकहे कि तारिस इस प्रकारका धोवन मे मुझे न कप्पड नही कल्पता है ॥७९|| टीका-तच्च धौतजलमत्यम्ल पूति तृष्णा विनेतु नालमिति ददती प्रत्याच- क्षीत-ताश मे न कल्पते इति ॥७९॥ 'धोवन उपयोगी है या नही" इस शकाका निवारण करने के लिए देनेवाली बाईसे साधु कहे कि-'मेरे हायमे थोडासा पानी दो ।' उस दिये हुए धोवनका आस्वादन करके निश्चय करे कि-'यह बहुत खट्टा है, दुर्गन्धवाला है, प्यास शान्त करने के लिए समर्थ नहीं है अतः मेरे लिए उपयोगी नहीं है ॥७८॥' ऐसा निश्चय करके क्या करना चाहिए ? सी कहते है-तच' इत्यादि। उस बहुत खट्टे, दुर्गन्धित और प्यास बुझानेमे असमर्थ धोवनको देनेवाली बाईसे कहे कि ऐसा धोवन मुझे नहीं कल्पता है ॥ ७९ ॥ ધાવણ ઉપગી છે કે નહિ ? એ શકાનું નિવારણ કરવાને માટે જોવણ આપનારી બાઈને સાધુ કહે કે “મારા હાથમાં થોડું પાણી આપે ” એ આપેલા વણનું આસ્વાદન કરીને નિશ્ચય કરે કે “આ બહું ખાટું છે, દુર્ગધ વાળું છે, તરસ શાંત કરવા માટે સમર્થ નથી, તેથી મારે માટે ઉપયેગી નથી ” (૭૮) એ નિશ્ચય કરીને શું કરવું જોઈએ? તે હવે કહે છે–ત ૪૦ ઈત્યાદિ એવા બહુ ખાટા, દુર્ગધિત અને તરસ છીપાવવામાં અસમર્થ ધાવણને આપનારી બાઈને સાધુ કહે કે એવુ ધવણ અને કલ્પતુ નથી (૯) ४७६ श्रीदशवेकालिकमरे . २ 3 ११ 13 १ २ 3 ४ मूलम्-त च होज्ज अकामेण, विमणेण पडिच्छियं । त अप्पणा न पिवे, नो वि अन्नस्स दावए ॥८॥ छाया-तग भवेद् अफामेन, पिमनसा प्रतिगृहीतम् । तद् आत्मना न पिन्, नो अपि अन्यस्मै दापयेत् ।।८०॥ सान्वयार्थ'-तम्बह उस मकारराधोपन यदि अकामेण विना इच्छासे दाताके अनुरोधसे च-तथा चिमणेणअनके मरी तरफ होनेके कारण पडि छियम्लेलिया गया हो तो त-उस धोपनको नमन तो अप्पणा अपने खुद पिये-पिये और नो-न अन्नम्स अवि दूसरोंफोभी दावदेवे ॥८०॥ टीका-'तच' इत्यादि। तच धौतजल यदि अफामेन स्वानिया, दाभ्यनु रोधेनेति भावः, विमनसा=अन्यमनस्कतया, 'हेती उतीया' प्रतिगृहीत तद् आत्मना स्वय न पियेत् नो अपि अन्यस्मै दापयेत् ।।८०॥ तर्हि किं कुर्यात् ? इत्याह-गत०' इत्यादि । मूलम्-एगतमवक्कमित्ता, अचित्त पडिलेहिया। जय परिदृविज्जा, परिहप्प पडिक्कमे ॥ ८१ ॥ छाया-एकान्तमवक्रम्याऽचित्त प्रत्युपेक्ष्य । यत परिष्ठापयेत् , परिठाप्य प्रतिक्रामेत् ॥८१ ॥ उस धोवनका क्या करे ? सो बताते है- सान्वयार्थ -एगत=एकान्त स्थानम अवमित्ता जाकरके अचित्त-एके न्द्रियादिपाणीरहित अचित्त स्थानको पडिलेहिया-पूजकर उस धोवनको जय-- त च' इत्यादि । यदि ऐसा पानी अनिच्छापूर्वक दाताके अनु रोधसे अथवा विना ध्यानसे ग्रहण कर लिया हो तो स्वयं उसे न पिये और न दूसरेको पिलावे ॥८॥ फिर क्या करे सो कहते हैं-'एगत०' इत्यादि । ઈત્યાદિ જે એવું પણ અનિષ્ઠાપૂર્વક દાતાના અનુરોધથી અથવા બે-ધ્યાનથી ગ્રહણ કરી લીધુ હોય તે પોતે તે ન પીએ અને ન पीवावे (८०) पछी १ २ ते ४९ छे-एगत. त्या ૫ બીજાને १ २ 3 ५ e ૧૦ ११ १४ ૧૨ 13 १७ १६ ૧૫ अध्ययन ५ उ. १ गा. ८२-८३-कारणे गोचया भोजनविधिः ४७७ यतनासे परिदृविज्जा-परिठवे-डाले, परिहप्प परिठवके आकर पडिक्कमे इरि- यावडिया पडिफमे-करे ||८|| टीका-एकान्त विविक्तमदेशम् , अवक्रम्ययात्वा तत्र अचित्तम् एकेन्द्रि- यादिमाणिवर्जित मत्युपेक्ष्य निरीक्ष्य यत-सयत्न यथास्यात्तथा परिष्ठापयेत्, सविधि “बोसिरे" इति त्रिरुचार्य व्युत्सृजेत् । परिष्ठाप्य परिष्ठापनानन्तर ग्रामा- वहिरवहिर्वाऽऽसन्नभूमिमागत्य प्रतिक्रामेत् ऐर्यापथिकी कुर्यात् ॥८१॥ अशनपानग्रहणविषेरनन्त र भोजनविरिमाह-'सिया' इत्यादि, 'अणुन्नवित्तु' इत्यादि च । मूलम्-सिया य गोयरग्गगओ, इच्छिज्जा परिभुत्तुर । कुट्टग भित्तिमूल वा, पडिलेहिताण फासुयं ॥८२॥ अणुन्नवितु मेहावी, पडिच्छन्नम्मि सवुडे । हत्थग सपमजित्ता, तत्थ भुजिज्ज सजए ॥८३॥ गया-स्याच गोचराग्रगत. इन्छेत् परिभोक्तम् गोष्ठक मित्तिमूल वा, प्रत्युपेक्ष्य प्रासुकम् ॥८२॥ अनुज्ञाप्य मेधावी, प्रतिच्छन्ने सहते । हस्तक सममृज्य तत्र भुञ्जीत सयत. ॥८३॥ एकान्त स्थानमे जाकर एकेन्द्रिय आदि प्राणियोंसे रहित स्थान देखकर यतनापूर्वक "वोसिरे” ऐसा तीन बार उच्चारण करके परिठवे। परिठचनेके पश्चात् गाँवमे या गाँवके बाहर ठहरनेके स्थान पर आकर इरियावहियाका प्रतिक्रमण करे ।। ८१॥ अशन-पान ग्रहण करनेकी विधि बतानेके बाद आहार करनेकी विधि 3 बताते है-'सिया य' इत्यादि, 'अणुनवित्तु' इत्यादि । એકાત સ્થાનમાં જઈને એકેન્દ્રિય આદિ પ્રાણુઓથી રહિત સ્થાન જોઈને यतनापू' 'चोसिरे' मेवु नपा२ स्यारण प्रशने पा२४वे परि४०या पछी યા ગામની બહાર રહેવાના સ્થાન પર આવીને ઈરિયાવડિયાનું પ્રતિક્રમણ કરે (૮૧) અગન-પાન ગ્રહણ કરવાની વિધિ બતાવ્યા બાદ આહાર કરવાની વિધિ सतावे छे-सिया य त्या तया अणुन्नवित्त त्या , ગામમાં ४७८ श्रीदनकामियो मानयार्थ:-गोयरग्गगओ-गोनरीम गया दुभा मेहावी-सामाचारीका जानकार मंजसाधु मिया य-पदाचिन अगर बाल्यावस्थाके अथवा म्लान पने के कारण वहीं परिभुत्तुर-माहार करना इच्छिज्जा चाहे तो वहां कासुप- मामुरु-पकेन्द्रियादिप्राणी रहित कुटग कोठेको वा अथवा भित्तिमूल मीतके समीपके स्थानको पहिलेहिसाण-पूजकर क्या दृष्टिसे देखकर अणुभवितुः गृहस्थकी आमा मागकर तत्यपहा पहिउन्नम्मि ऊपरसे छाये हुए और सवुटे चारो तर्फसे घिरे हुए स्थानमें हस्थग-हायोंको अथवा अपने शरीरको सपमज्जित्ता-पूजकरके (साघु) भुजिज्ज आहार करे ॥८२||८३॥ टीकास्याच कदाचित् गोचराप्रगतः-मिक्षामनुपविष्टो मुनिः, वाल्याला नत्य-पिपासादिकारणपशात्परिभोक्तुमिच्छेत् तदा मामुकम्-एकेन्द्रियादिप्राणि विवर्जित कोष्ठकम् अन्तहादिक वा अया भित्तिमूल-डयसमीपवर्तिप्रदेश मत्यु पेक्ष्यदृष्ट्या विलोक्य अनुज्ञाप्य तत्स्वामिनोऽनुलामादाय तत्र प्रतिउन्ने तस्तृणादिभिराच्छादिते, सहते समन्तत आवृते किन्तु भकाशयुक्त प्रदेशे, यद्वा 'सवृतः' इति प्रथमान्त सयतस्य विशेपण तेन, मेधावी साधुसामाचारीकुशलः सयत. साधु. सवृतः मनोवाकायगुप्तः सन् इस्तम्म्हस्तौ सप्रमृज्य सशोध्य, अथवा 'हस्तकम्' इति तृतीयाथै प्रथमा, तथा च-हस्तकेन-इस्त कायविधातूना यदि भिक्षाके लिए गये हुए भिक्षुको बालकपन, ग्लानता अथवा प्यास आदि किसी कारणसे आहार करनेकी इच्छा हो जाय तो वहाँ मासुक कोठा अथवा भीतके पास कोने आदिकी प्रतिलेखना करके मकानके स्वामीकी आज्ञा लेकर ऊपरको तृण आदिसे छाये ओरसे बन्द किन्तु प्रकाशयुक्त स्थानमें स्थित होकर मन वचन कायकी सम्यक प्रकार प्रवृत्ति करता हुआ साधुसामाचारीका ज्ञाता मुनि हाथोंको જે ભિક્ષા માટે ગએલા ભિક્ષને બાળકપણ, ગ્લાનતા અથવા તરસ આદિ કે કારણે આકાર કરવાની ઈચ્છા થઈ જાય છે ત્યા પ્રાસુક હે અથવા ભી તની પાસે ખૂણુ આદિની પ્રતિલેખના કરીને મકાનના સ્વામીની આજ્ઞા આદિથી છાએલા ચારે બાજુથી બધ પરતુ પ્રકાશન સ્થાનમાં રહીને મન વચન કાયાની સમ્યફ પ્રકારે પ્રવૃત્તિ કરતા સાધુ સમાચાર જ્ઞાતા મુનિ હાથને પ્રમાર્જિન કરીને સાફ કરીને) થા હસ્તક (હસ્તગત રહ) चारों લઇને ઉપર ઘાસ " अध्ययन ५ उ. १ गा. ८२-८३-कारणे गोचयों भोजनविधिः ४७९ मनेकार्थत्वात्मामोतीति इस्तकम् , ('आतोऽनुपसर्गे का' इति कात्ययः,) रजो- हरण तेन, तस्य धारणे हस्तस्य सर्वथा निमित्तत्वात् , मायः कक्षपदेशे धारणेऽपि हस्ताश्रय विना तदीयधारणासम्भवाच । सप्रमृज्य तत्स्थान काय च सशोध्य भुञ्जीत=अभ्यवहरेत् । यत्तु "हस्तक मुखवखिकारूपमादाय तेन काय सप्रमृज्य" इति व्याख्यान तदयुक्त, 'हस्तक' पदार्थस्य 'सप्रमृज्य पदार्थेऽन्वयसम्भवे आदाये-तिपदान्तराक्षेप- पूर्वकमन्यपदार्थेऽन्वयफल्पनाया अनौचित्यात् । किञ्च कोप-व्याकरणादिषु हि हस्तक- शब्दो मुखवस्विकारूपेऽर्थे न दृश्यते । शास्त्रेऽपि-"मुहपत्तिं पडिलेहिता" इत्यादि दृश्यते न तु 'हत्यग' पडिलेहिता' इत्यादि । यच्च "विधिना तेन मुग्ववत्रिकारूपेण हस्तकेन काय प्रमृज्य तत्र भुञ्जीत" प्रमार्जित (साफ) करके या हस्तक अर्थात् हस्तगत रजोहरणसे काय और स्थानकी प्रमार्जना करके आहार करे । किसी-किसीने 'हस्तक मप्रमृज्य' का ऐसा अर्थ किया है कि 'मुखवस्त्रिका लेकर उससे शरीर प्रमार्जना करे ऐसा अर्थ करना ठीक नहीं है, क्योंकि मुखवस्त्रिकाके साथ प्रमार्जन करनेका सम्बन्ध मिलते न देख उन्हें एक 'आदाय' शब्द (लेकर) अपनी ओरसे मिला दिया है। इस प्रकार सम्बन्ध मिलाना उचित नहीं है। इसके सिवाय कोपोंमें कही 'हस्तक' शब्दका अर्थ मुखवस्त्रिका नहीं किया है और न व्याक- रणमें ही ऐसा देखाजाता है। आगमोंमें 'मुहपत्तिं पडिलेहिता' इत्यादि पद देखे जाते हैं, किन्तु 'हत्यग पडिलेहित्ता' कही नहीं देखा जाता। तथा "मुखवस्त्रिकारूप हस्तकसे कायकी प्रमार्जना करके आहार करे" કાયા અને સ્થાનની પ્રમાર્જન કરીને આહાર કરે धन्मे हस्तक सप्रमृज्य न येवो मथयो छ -'भुमरिया લઈને તેથી પારીરની પ્રાર્થના કરે,” પણ એ અર્થ કે એ બરાબર નથી, કારણ કે મુખવસ્ત્રિકાની સાથે પ્રમાર્જન કરવાને સબંધ મળતો નહિ જેવાથી તેમણે એક માત્ર શબ્દ (લઈને) પિતાની તરફથી મિલાવી દીધું છે આ પ્રમાણે સ ધ મિલાવી દે એ ઉચિત નથી વળી કોમ કયાય स्त શબ્દને અર્થ મુખવશ્વિના કર્યો નથી અને વ્યાકરણમાં પણ એ અર્થ જેવામાં मावत' नथी, भागभामा मुहपत्तिं पडिले हित्ता त्या ५६ नेपामा माये छ, डिन्तु हत्थम पडिलेहिता उयाय नपामा भापतु नथी મુખવસ્ત્રિકારૂપ હસ્તકથી કાયની પ્રમાર્જના કરીને આહાર કરે” - . १ તથા ४८० श्रीदशवकालिकमंत्र इति व्याख्यात तदप्ययुक्ततरम् । हस्ते मुगानिकाधारणे मुग्पत्रिमागरणोगेश्यभू तायाः समन्यापिसम्पातिमायुकायादिनीरहिंसानिटनेरसिद्धया मुग्यासिरा मुख पर धारणीयेत्याशयम्य जागरूकत्यान् , अत प भगाताऽपि मूक्ष्मव्यापि सम्पातिमायुकायादिजीगाऽयतनानिलये मुग्योपरि धारणीयसटोरकाष्टपुटमुख मगाणरखरखण्डरूपेऽयं मुखाग्निकागन्दः प्रयुक्तो, न तु हस्तपत्रिगन्द इति स्थ मपि दस्तक देन मुखानिकारूपोऽयों न लभ्यते । एव च तेन कायममार्जन कथन सर्वथाऽगमपिरमेवेति गोध्यम् ॥८॥८॥ ऐसी व्याख्या करना भी अत्यन्त अयुक्त है, क्योंकि मुग्ववस्त्रिका धारण करनेका प्रयोजन मूक्ष्म, व्यापी, सम्पातिम तथा वायुकाय आदि जीवोंकी हिमाका परिहार करना है। मुगवत्रिकाको हाथमें रग्बनेसे उक्त प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। इससे यह सिद्ध होता है कि मुख चस्त्रिका मुग्वपर ही धारण करनी चाहिए। इसलिए मुग्वके निमित्तसे होनेवाली, सूक्ष्म, व्यापी, सम्पातिम और वायुकाय आदि जीवोंकी विराधनाकी निवृत्तिके लिए मुख पर धारण करने योग्य उस मुग्व परिमाण सदोरक और आठ पुडयाले वस्त्रखण्डको भगवानने 'मुख चस्त्रिका' शब्दसे कहा है, 'हस्तचस्त्रिका' शब्दका प्रयोग कही नहीं किया, अत एव 'हस्तक' शब्दसे मुखवस्त्रिकाका अर्थ किसीभी प्रकार नहीं निकल सकता। इस प्रकार 'उससे कायकी प्रमार्जना करना' यह अर्थ आगमसे सर्वथा विरुद्ध है ।। ८२ ॥ ८३ ।। એવી વ્યાખ્યા કરવી એ પણ અત્યત અયુકત છે, કારણ કે મુખવસ્ત્રિક ધારણ કરવાનું પ્રયોજન સૂક્ષમ વ્યાપી, સમ્પતિમ તથા વાયુકાય આદિ જની હિંસાનો પરિહાર કરે એ છે મુખવસ્ત્રિકાને હાથમાં રાખવા ઉક્ત પ્રજા સિદ્ધ થતુ નથી એથી એમ સિદ્ધ થાય છે - મુખત્રિકા મુખ પ જ ધારણ કરવી જોઈએ તેથી મુખના નિમિત્ત થનારી સૂક્ષમ, વ્યાપી, સાપતિમ અને વાયુકાય જીની વિરાધનાના નિવૃત્તિને માટે મુખ પર ધારણ ખ્યા છે એ મુખ પરિમાણ દેરા સાથેના અને આઠ પડવાળા વસ્ત્રખડને ભગવાને “મુખત્રિકા કહી છે, “હસ્તવસ્વિકા” શબ્દને પ્રવેશ કર્યો ત્થી એટલે મુખાસિકને અર્થ કે ઈ પણ પ્રકારે નીકળી શકતે નવી એ રીતે “મુખવઝિ કથી કયાની પ્રાર્થના કરવી” એ અર્થ આગમથી સવથા વિરૂદ્ધ છે (૮૨-૮૩) . . 1 આદિ તક’ શબ્દથી अध्ययन ५ उ. १ गा. ८४-८६-आहारगतपीनादिपरिठापनविधिः ४८१ २ ५ ૧૨ ८ ७ १० 13 १७ २० २२ २३ २४ मूलम् तत्थ से भुंजमाणस्स, अहिय कटओ सिया । तण-कट्ट-सकर वावि, अन्नं वावि तहाविहं ॥८४॥ तं उक्खिवित्तु न निक्खिवे, आसएण न छड्डए । हत्थेण त गहेऊण, एगतमवकमे ॥ ८५ ॥ छाया-तत्र तस्य भुञ्जानस्य, अष्ठिक कण्टका स्यात् । तृण-काष्ठ-शर्कर वाऽपि, अन्यद्वापि तथाविधम् ।।८४॥ तद् उक्षिप्य न निक्षिपेत, आस्थेन नोज्झेत् । हस्तेन तद् गृहीत्वा, एकान्तमपक्रामेत् ॥८५॥ सान्वयार्थः-तत्य बहा कोठे आदिमें भुजमाणस्स आहार करते हुए से- उस साधुके (आहारमें) अडिय-धीज कटओ-काटा तण तिनका कट्टकाठ वावि और सफर छोटा ककर वा तथा अन्न चावि औरभी तहाविह उस प्रकारका पदार्य सिया आगया हो तो त-उसे उक्खिवित्तु=निकालकर न निक्खिये इधर-उधर नहीं डाले, तथा आसाण-मुखसे भी न छदुए न फेंके- न यूके (किन्तु)त-उसे हत्थेण हाथसे गहेऊण लेकर एगत एकान्त स्थानमें अवकमे जावे ॥८४॥८५|| टीका-'तत्थ से' इत्यादि, 'तउक्खिवित्तु' इत्यादिच। तत्र कोष्ठकादिस्थाने भुञ्जानस्य तस्य भिक्षोभॊजने अठिन्धीज, कण्टक' तीक्ष्णाग्रो टुम-गुल्म लता- घनविशेपः, अपिवा वृण-काष्ठ-शरवण च काष्ठ च शर्करा चैतेपा समाहारः। तत्र वण-कुशादिक, काट-खदिरादिसमुद्भव दारु, शर्करा क्षुद्रपापाणखण्डम् । अन्यदपि वा तथाविध तज्जातीय स्यात् भवेत् तद्-अप्ठिकादिकम् उत्क्षिप्य न निक्षिपेत् उत्क्षेपण कृत्वा यत्र तत्र न सिपेत्, आस्येन-मुखेनापि नोज्झेत्-थूत्कृत्य तत्थ से' इत्यादि, 'तक्खिवित्तु' इत्यादि । उस कोठे आदिमें आहार करनेवाले भिक्षके मोजनमें बीज, काँटा, तिनका, लकडी, किरकिरी-ककर या और कोई उम प्रकारकी वस्तु हो तो उसे निकाल कर जहाँ तहाँ न डाले तथा मुपसे भी न यूके किन्तु उसको हाथमें तत्थ से० पत्या, तथा त उरितरित्तु० त्या मे मा मासार કરનાર ભિક્ષુના ભજનમા બીજ કાટા તણખલા લાકડુ, કાકી કાકરાય એવા પ્રકારની બીજી ઈ વસ્તુ હોય તે તે કાઢી નાખી જ્યા ત્યા નાખે નહિ, તથા .

४८० श्रीदवेकालिममत्र इति च्यारयात तदप्ययुक्ततरम् । हस्ते मुपात्रिकाधारणे मुग्यवधिसागरणोगेश्यभू तायाः मक्ष्मव्यापिसम्पातिमायुकायादिनीपहिंसानिटत्तेरसिद्धया मुखारिस मुख एर धारणीयेत्यागयम्य जागरूफयान् , अत प भगाताऽपि मूक्ष्मव्यापि सम्पातिमगयुकायादिजीराऽयतनानिटनगे मुग्योपरि धारणीयसदोरकाष्टपुटमुम्ब भयाणखरपण्डरूपेऽर्थे मुसासिमागन्दः मयुक्तो, न तु हस्तपस्विकामन्द इति स्थ मपि हस्तगादेन मुखानिकारूपोऽयों न लभ्यते । एरच तेन कायप्रमार्जन कथन सर्वयाऽऽगमविरुद्धमेवेति चोध्यम् ||८||८३।। ऐसी व्याख्या करना भी अत्यन्त अयुक्त है, क्योंकि मुग्ववस्त्रिका धारण करने का प्रयोजन सूक्ष्म, व्यापी, सम्पातिम तथा वायुकाय आदि जीवोंकी हिंसाका परिहार करना है। मुग्पयस्त्रिकाको हाथमें रग्बनेसे उक्त प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। इससे यह सिद्ध होता है कि मुख पत्रिका मुग्वपर ही धारण करनी चाहिए। इसलिए मुखके निमित्तसे होनेवाली, सूक्ष्म, व्यापी, सम्पातिम और वायुकाय आदि जीवोंकी विराधनाफी निवृत्तिके लिए मुख पर धारण करने योग्य उस मुख परिमाण सदोरक और आठ पुडवाले वस्त्रखण्डको भगवानने 'मुख यस्त्रिका' शब्दसे कहा है, 'हस्तवत्रिका' शब्दका प्रयोग कहीं नहीं किया, अत एव 'हस्तक' शब्दसे मुखवस्त्रिकाका अर्थ किसीभी प्रकार नही निकल सकता। इस प्रकार 'उससे कायकी प्रमार्जना करना' यह अर्थ आगमसे सर्वथा विरुद्ध है ॥ ८२ ॥ ८३ ॥ એવી વ્યાખ્યા કરવી એ પણ અત્યત અયુકત છે, કારણ કે મુખવસ્ત્રિકા ધારણ કરવાનું પ્રયોજન સૂક્ષમ વ્યાપી, સમ્પતિમ તથા વાયુકાય આદિ ની હિસાને પરિહાર કરે એ છે મુખવશ્વિકાને હાથમાં રાખવા ઉક્ત પ્રત્યે જન સિદ્ધ થતુ નથી એથી એમ સિદ્ધ થાય છે કે મુખવસ્ત્રિકા મુખ પર જ ધારણ કરવી જોઈએ તેથી મુખના લિમિત્ત થનારી સૂક્ષ્મ, વ્યાપી, સાપતિમ અને જીવોની વિરાધનાની નિવૃત્તિને માટે મુખ પર ધારણ કરવા એગ્ય એ મુખ પરિમાણ દેરા સાથેન અને આઠ પડવાળા વસ્ત્રખડને ભગવાને “મુખવસ્ત્રિકા કહે છે, “હરતવસ્ત્રિકા” શબ્દને પ્રગ કર્યો નથી એટલે મુખપત્રિકાને અર્થ કઈ પણ પ્રકારે નીકળી શકતું નથી એ રીતે “મુખવામિ કથી કાયાની પ્રાર્થના કરવી” એ અર્થ આગમથી સર્વથા વિરૂદ્ધ છે (૮૨-૮૩) . આદિ વાયુકાય . त શબ્દથી ४८३ अध्ययन ५ उ.१ गा. ८७-८८-उपाश्रयागतस्य भोजनविधिः विनयेन पविश्य, सफाशे गुरोर्मुनिः । ऐर्यापथिकीमादाय, आगतश्च प्रतिक्रामेत् ॥८८॥ सान्वयार्थ:-सिया य-अगर भिक्खू साधु सिज्ज वसति उपाश्रयमें ही आगम्म आफर भुत्तुउ आहार करना इच्छिज्जा चाहे तो सपिंडवाय-भिक्षाके सहित आगम्म आकर विणएण='मत्थएण वदामि निस्सीहि' इस प्रकार वोलनेरूप विनयसे पविसित्ता-उपाश्रयमें प्रवेश करके से-वहा उडय-भोज- नके स्थानको पडिलेहिया अन्छी तरह देखकर गुरुणो-रत्नाधिकके सगासे- समीप आगओ य-आया हुआ मुणी=मुनि इरियावयि=इरियावहियाका पाठ आयाय-लेकर पढकर पडिकमेकायोत्सर्ग करे । तात्पर्य यह है कि प्रयल पिपासा आदि खास कारण के बिना तो उपाश्रयमें आकर ही साधुको आहार करना चाहिये किन्तु गृहस्थके घरमें नही करे ।।८७।८८।। टीका-'सियाय' इत्यादि, 'विणएण' इत्यादि च । भिक्षुः साधुः शय्या वसतिं स्यात्-एव आगम्य भोक्तुमिच्छेत् । 'अत्र स्यादित्यव्ययमवधारणार्थ तेन 'प्रवलपिपासादिकारणाभावे वसतिं विहायाऽन्यत्र न भोक्तव्य'मिति तात्पर्य गम्यते। तदा सपिण्डपात पिण्डपातो-भिक्षालाभस्तेन सहाऽऽगम्य विनयेन=" मत्थएण बदामि निस्सीहि" इतिपठनलक्षणेन पविश्य उपाश्रयमिति शेप., सेन्सः, यद्वा सेशब्दो मगधदेशपसिद्धः 'तत्र'-शब्दार्थे वर्तते तेन से-तत्र उन्दुक स्थान प्रत्यु- सिया य' इत्यादि, 'विणएण' इत्यादि। साधु उपाश्रयमें आकर ही आहार करनेकी इच्छा करे। यहाँ 'स्यात्' अव्यय निश्चय- चोधक है इससे यह तात्पर्य प्रगट होता है कि पिपासा आदि किसी प्रबल कारणके विना उपाश्रयके सिवाय अन्यत्र आहार नहीं करना चाहिए । अत एव भिक्षा लाकर "मत्थरण वदामि निस्सीहि" यह पाठ उच्चारण करके उपाश्रयमे प्रवेश करे फिर भोजन करने के स्थानकी सिया य. त्याततथा विणएण त्या साधु पाश्रयमा मापान । આહાર કરવાની ઈચ્છા કરે, અહી થી અવ્યય નિશ્ચય બેધક છે, તેથી એ તાત્પર્ય પ્રકટ થાય છે કે તરસ આદિ કે ઈ પ્રબળ કારણ વિના ઉપાશ્રય સિવાય मन्यत्र मा२ नरो नमे सरसे लक्षा सापान मत्थएण वदामि निस्सीहि એ પાઠ ઉચારીને ઉપાશ્રયમાં પ્રવેશ કરે પછી ભે જન કરવાના સ્થાનની સભ્ય .

- ५ ४८२ श्रीदवेकालिकमले न क्षिपेत् । तर्हि किं कुर्यात् ? इत्याह-तद् ास्तेन ग्रीवा एकान्तमपक्रामेल- गोत् ।।८४॥८५॥ मूलम्-एगंतमवकमित्ता, अचित्त पडिलेहिया । जय परिदृविजा, परिहप्प पडिकमे ॥ ८६ ॥ छाया-एकान्तमपक्रम्याऽचित्ता मस्युपेक्ष्य । यत परिष्ठापयेत्, परिष्ठाप्य प्रतिकामेत् ॥८६॥ एकान्त में जाकर क्या करे ? सो यताते है- सान्वयार्थ -गत एकान्त स्थानमें अवकमित्ता जाकरके अचित्त एके न्द्रियादिपाणीरहित अचित स्थानको पडिलेरिया-पूजकर उस धोवनको जय- यतनासे परिविज्जा=परिठवे डाले, परिदृप्प पस्टिवके आकर पडिक्कमेइरि यावहिया पडिकमे करे ॥८६॥ टीका-'एगत०' इत्यादि। विजनमदेश गत्वा अचित्ताभूमि चक्षुषा निरीक्ष्य वीजादिक सयत्न व्युत्सृजेत्, तदनु स्थानमागत्य प्रतिकामेव ऐपिथिकी कुर्या दिति भावः। मूलम्-सिया य भिक्खू इच्छिज्जा, सिन्जमागम्म भुत्तुउ । सपिडपायमागम्म उडुअ से पडिलेहिया ॥ ८७ ॥ विणएण पविसित्ता, सगासे गुरुणो मुणी। इरियावहियमायाय, आगओ य पडिकमे ॥ ८८ ॥ छाया-स्याच भिक्षुरिच्छेत्, शय्यामागम्य भोक्तुम् । सपिण्डपातमागम्य, उन्दुक से (तत्र) प्रत्युपेक्ष्य ॥८॥ लेकर एकान्त स्थानमे जावे ॥८४ ॥ ८ ॥ एगत०' इत्यादि । एकान्तमें जाकर अचित्त भूमि देख कर वहाँ यतनाके साथ उस बीज काटे आदिको डाले। फिर अपने स्थान पर आकर ईग्यिावरियाका प्रतिक्रमण करे ॥८६॥ મુખથી પણ ચૂકે નહિ, પરંતુ તેને હાથમાં લઈને એકાન્ત સ્થાનમાં જાય cત ઈત્યાદિ એકાન્તમાં જઈને અચિત્ત ભૂમિ જોઇને ત્યા એ બીજ કાટ આદિને નાખે પળ પિતાના સ્થાન પર આવીને ઈરિયાવહિયાર્ડ પ્રતિક્રમણ કરે (૮૬) ७ 3 ५ ६ ८ १३ ૧૨ १४ १० te २० १७ २२ (८४-८५) યતના પૂર્વક अध्ययन ५ उ.१ गा. ८९-९१-गोचरीगतातिचारालोचनाविधिः ४८५ टीका-सयता कायोत्सर्गस्थो मुनिः, गमनागमनेगतागते चैव भक्त पाने च सनात निश्शेप-समग्रम् अतिचार-मुनिमर्यादालङ्घनलक्षणम् यथाक्रमम् आभोग्य- सोपयोग विचिन्त्य ऋजुमज्ञः सरलघुद्धिः अनुद्विमा प्रशान्तः, अव्याक्षिप्तेन अव्या- कुलेन चेतसा मनसा गुरुसकाशे शुद्ध प्रमादादिवशेनाऽशुद्ध वा यद् यस्माद् यत्र वा यथा गृहीत भवेत् तदपि गुरुसमीपे कथयेदित्यर्थ । 'उज्जुप्पन्नो' इत्यनेनाऽकुटिलमतिरेव सम्यगालोचयतीति सूचितम् । 'अणु- विग्गो' अनेन क्षुधादिपरिपइजेवत्वमावेदितम् । 'अव्वक्खित्तेण चेयसा' इत्यनेन 'एकाग्रचित्तेनैवाऽतिचारस्य सम्यक् स्मरण भवती'-ति स्पष्टीकृतम् ।।८९॥९०॥ कायोत्सर्गमें स्थित होकर गमनाऽऽगमनमें, तथा-आहार पानीके लेनेमें जोअतिचार लगे हों उन सबका क्रमशः चिन्तन करके सरलबुद्धि शान्त चित्तवालासयमीव्याकुलतारहित चित्तसे गुरुके समीप आलोचना करे। प्रमाद आदिके वशसे जहा जैसा शुद्ध या अशुद्ध आहार आदि लिया गया हो वह भी गुरुसे निवेदन करे। 'उज्जुप्पन्नो' पदसे यह सूचित किया है कि कुटिलतारहित बुद्धि- वाला ही यथार्थ आलोचना कर मकता है। 'अणुब्बिग्गो' पदसे क्षुधा आदि परीपहोंका जीतना प्रगट किया है। 'अव्वक्खित्तेण चेयसा' पदसे यह सूचित किया है कि एकाग्र-चित्तसे ही अतिचारोंका अच्छी तरह स्मरण हो सकता है ॥ ८९॥९०॥ કાયેત્સર્ગમાં સ્થિર થઈને ગમનાગમનમા, તથા આહારપાણે લેવામાં જે અતિચાર લાગ્યા હોય તે સર્વનું ક્રમશ ચિતન કરીને સરલબુદ્ધિ શાન્ત-ચિત્તવાળ સયમી વ્યાકુળતા-રહિત ચિત્તથી ગુરૂની સમીપે આલેચના કરે પ્રમાદ આદિન વશ થઈને જ્યા જે શુદ્ધ યા અશુદ્ધ આહાર આદિ લેવામા આવેલ હોય તે પણ ગુરૂને નિવેદન કરે उज्जुप्पन्नो शथी मेम सूथित ४२वामा माव्यु છે કે કુટિલતારહિત भुद्धिा यथार्थ मासोयना जी शर्ड छ, अणुधिग्गो शव्या क्षुधा माह પરીષહેને तपार्नु ८ ४२पामा माव्यु छ अन्चक्खित्तेण चेयसा था એમ સૂચિત કર્યું છે કે એકાગ્ર-ચિત્તથી જ અતિચારોનું સારી રીતે સ્મરણ થઈ श छे (८-८०) २ १५ १८ ४८४ भीदशवशालिकमरे पेक्ष्प-सम्पद निरीक्ष्य गुरो! रत्नाशिकम्य सफाशे आगत मुनिः ऐयोपविकीम् "इच्छामि पडिय मिउ" इत्यादिलक्षणाम् आदायम्पटिया प्रतिक्रामत्कायोत्सर्ग कुर्यात् ॥८७॥८॥ तत्र (कायोत्सर्गे) किं कुर्यात? इस्याइ-'आभोडताण इत्यादि, 'उज्जुप्पन्नो' इत्यादि । मूलम्-आभोइत्ताण नीसेस, अइयार जहकम । गमणागमणे चेब, भत्ते पाणे य सजए ॥ ८९ ॥ उज्जुप्पन्नो अणुविग्गो, अवस्वित्तेण चेयसा। आलोए गुरुसगासे, ज जहा-गहिय भवे ॥९० ॥ छाया-आभोग्य निश्शेपम्, अतिचार ययाक्रमम् । गमनागमने चैव, भक्त पाने च सयतः ॥८९।। ऋजुमनः अनुद्विग्नः, अव्याक्षिप्लेन चेतसा। आलोचयेद् गुरुसकाशे, यद् यथा गृहीत भवेत् ।।९०॥ सान्वयार्थ:-सजए-कायोत्सर्गमें रहा हुआ मुनि गमणागमणे-जानेआनेमें चेव और भत्ते-आहार य-तथा पाणे-पानीके ग्रहण करनेमें (लगे हुए) नीसेसम्सर पकारके अइयार अतिचारोंको, तथा ज-जो अशनादि जहा- जिस प्रकार गयि भवेग्रहण किया हुआ हो उसे भी, जहकम यथाक्रम अनुक्रमसे आमोइत्ताण-उपयोगसहित चिन्तन करके, उज्जुप्पन्नो-सरल बुद्धि- वाला अणुविग्गो-उद्वेगरहित वह मुनि अव्वक्खित्तण-विक्षेपरहित-एकाग्र चेयसा-चित्तसे गुरुसगासेन्गुरुके समीप आलोए-आलोवे ॥८९॥९०॥ सम्यक् प्रकार प्रतिलेखना करके दीक्षामे बडे मुनिके समीप आकर "इच्छामि पडिक्कमिउ, इत्यादि ईरियावहियाका पाठ घोल करके कायोत्सर्ग करे ॥ ८७॥ ८८ ॥ कायोत्सर्गमे क्या करना चाहिए सो कहते है-'आभोइत्ताण इत्यादि, 'उज्जुप्पन्नो' इत्यादि। प्रहारे प्रतिमन रीन. दीक्षामा भाटा मुनिना सभाधे माने इच्छामि पडिकमिउ ઇત્યાદિ ઈરિયાવહિયાને પાઠ બેલીને કાર્યોત્સર્ગ કરે (૮૭-૮૮) કાસગંમા શુ ४२ ते ४ -आमोइत्ताण. त्यात . तथा उज्जुप्पन्नो. त्या . + २ ५ ४ ९ ८ १ अययन ५ उ. १ गा. ९२-९४-कायोत्सर्गादौ चिन्तनमकारः ४८७ छाया- अहो ! जिनैः असावया, वृत्तिः साधुभ्यो देशिता । मोक्षसाधनहेतोः, सावुदेहस्य धारणाय ||९२॥ सान्वयार्थः-अहो आश्चर्य है कि-मोक्खमाणहेउस्स-मोक्ष प्राप्तिके निमित्तभूत साहुदेहस्स-साधुशरीरके धारणा निर्वाह-स्थितिमात्र के लिए साहण-मुनियोको जिणेटिं-तीर्थकर भगवानने असावज्जा-निर्दोप वित्ती- भिक्षायत्ति-(आचार) देसिया बताई है ॥९२॥ टीका-अहो आश्चर्ये मोक्षसाचनदेतो =अपवर्गसिद्धिनिमित्तभूतस्य साधु- शरीरस्य धारणाय स्थितिमानार्थ साधुभ्यः मुनीनुद्दिश्य जिन. तीर्थङ्करैः, असा- वद्या द्रोपरहिता वृत्ति भिक्षालक्षणा देशिता उपदिष्टा ॥१२॥ मूलम् णमुक्कारेण पारित्ता, करित्ता जिणसंथव । सज्झाय पट्टवित्ताण, वीसमेज्ज खण मुणी ॥९३॥ छाया-नमस्कारेण पारयित्वा, कृत्वा जिनसस्तवम् । साध्याय पठित्वा, विश्राम्येत् क्षण मुनिः ॥१३॥ सान्वयार्थः-कायोत्सर्ग में पूर्वोक्त प्रकार से चिन्तन करनेके बाद मुणी साधु नमुकारेण नमस्कार मन्त्रसे पारित्ता-कायोत्सर्गको पार-समाप्त करके जिण- सथव="लोगस्स उज्जोयगरे" इत्यादि सपूर्ण जिणसथव (जिन भगवान्की स्तुति) करित्ता-करके तथा सज्झाय-मज्झाय-मसे कम मूलगाम्बकी पाच गाथाओका स्वाध्याय पट्टवित्ता-पढकर खण-क्षणभर 'जितने में दूसरे मुनिराज भी शामिल हो जाते हैं। इस अभिप्रायसे कुछ देर वीममेज्ज-विश्राम करे ॥१३॥ टीका-णमुकारेण' इत्यादि । मुनि सयतः नमस्कारेण= णमो अरिहताण' इत्युचारणलक्षणेन कायोत्सर्गमिति शेपः, पारयित्वा समाप्य जिनसस्तव"लोगस्स अहो! यह शरीर मोक्षकी सिद्विका कारण है अतः इसकी स्थितिके लिए तीर्थडूर भगवानने साधुओंको निर्दोष भिक्षा लेनेका उपदेश दिया है ॥ ९२ ॥ 'णमुकारेण' इत्यादि । मुनि ‘णमो अरिहताण' पदका उच्चारण करके कायोत्सर्गको समाप्त करे । फिर 'लोगस्स उन्जोयगरे' इत्यादि અહે' આ શરીર મેક્ષની સિદ્ધિનું કારણ છે, એટલે એની સ્થિતિને માટે તીર્થકર ભગવાને સાધુઓને નિર્દોષ ભિક્ષા લેવાને જ ઉપદેશ આપે છે (૨) णमुक्कारेण त्या भुनि णमो अरिहताण पतु यार ४ीन या ત્સર્ગને સમાપ્ત કરે, પછી સ્ત્રીનસ ઉજ્જોયારે ઈત્યાદિ જિનસસ્તવ પૂર્ણ કરીને - 1५ १४ ४८६ भीदवेकालिको मूल्म्-न सम्ममालोइय हुजा, पुति पच्छा व ज कडं । पुणो पडिकमे तस्स वोसहो चिंतए इमं ॥ ९१ ॥ छाया- मम्यगालोचित भयेव, पूर्व पत्राद्वा यस्कृतम् । पुनः प्रतिकामेत्तस्य, व्युत्पभिन्तयेदिदम् ।।९।। सान्ययार्थ:-जनो अतिगार पुन्धि-पहले व तथा पच्छा-पीछे कड- किया है वह सम्म सम्पर प्रफारसे-अन्छी तरह याने-'पहले लगे हुए पापको पहले आलोवे और पीछे लगे हुए पापको पीठे आलोवे' इस प्रकार आलो इय-आलोचित न कुज्जा नहीं किया हो तो तस्स-उस अतिचारको पुणो- फिरसे पडिफामे आलोवे, (और) बोसहोम्कायोत्सर्गमें रहा हुआ साधु इम- इस- आगे कहा जानेगाला' प्रकार चिंत=चिन्तन करे ॥११॥ टीका-'न सम्म०' इत्यादि । यत्-यस्मादेतोः पूर्व पश्चाद्वा कृतमतिचार सम्यक्पाकृत भागालोचितव्य पश्चात्कृत च पश्चादालोचितव्यमिति क्रमेण आलो चितम्भकाशित न भवेदतः तस्य अविचारस्य (सम्बन्धसामान्ये पष्ठी) पुनः पतिक्रामेत् । व्युत्सए. कायोत्सर्गस्थः इद-वक्ष्यमाण चिन्तयेत् ॥११॥ तदेवाऽऽह-'अहो' इत्यादि । मूलम् अहो जिणेहि असावजा, वित्ती साहूण देसिया । मोक्खसाहणहेउस्स, साहुदेहस्स धारणा ॥ ९२॥ 'न सम्म०' इत्यादि । आगे पीछे किये हुए अतिचारोंकी सम्यक प्रकार अर्थात् पहले किये हुए अतिचारोंको पहले और पश्चात् किये हुएकी पश्चात्-आलोचना न की गई हो तो अतिचारोंका पुन प्रतिक्रमण करना चाहिए और कायोत्सर्गमे स्थित होकर ऐसा (अगली गाथामें कहे जानेवाला) विचार करे ॥२१॥ उसी विचारको कहते हैं-'अरो' इत्यादि । न सम्म० त्यादि मा पा रेसा अतियारीनी सभ्य रे मात પહેલા કરેલા અતિચારેની પહેલા અને પાછળ કરેલા અતિચારની પાછળ આચના ન કરવામાં આવી હોય તે અતિચારને પુન પ્રતિક્રમણ કરવું જોઈએ અને કત્સર્ગમાં સ્થિત થઈને એ (આગવી ગાથામાં કહેવામાં આવનાર) વિચાર કરે (૯૧) विया३ ४ छ-अहो० इत्यादि ५ G २ 3 अ ययन ५ उ. १ मा. ९४-९५-अन्यमुनिभ्य आहारग्रहणपार्थना ४८९ ૨ 3 ८ ८ १३ एवं विचिन्त्य स पूर्व स्वभागमन्नादिक ग्राहयितु सर्वेषु मुनिषु रत्नाधिक पार्थयेत् । यदि गृहीयानर्हि सम्यक्, नाङ्गीकुर्याचेदेव निवेदयेत्-"आर्यपादाः । कस्मैचिन्मुनये भवद्भिः स्वयमेर वितीयता"-मिति । अथ रत्नाधिको यथेच्छ दद्यात् । यदि चाऽदत्वा रत्नाधिकः 'त्वमेव यथेच्छ प्रयच्छे-ति ब्रूयात् तदा तेन शिष्येण किं कर्तव्यम् ? इत्याह-'साहो' इत्यादि । मूलम्साहवो तो चियत्तेण, निमतिज जहक्कम । जह तत्थ केड इच्छिज्जा, तेहि सद्धिं तु भुजए ॥९५॥ छाया--साधून ततः चियत्तेण, निमन्त्रयेद् यथाक्रम्म् । यदि तत्र केऽपि इच्छेयु., तैः सार्द्ध भुञ्जीत ॥१५॥ कर्मोंकी निर्जराकाअभिलापी साधु विश्राम करते समय इस मुक्ति रूप हितके करनेवाले अर्थका चिन्तन करे-यदि कोई मुनिराज मुझ पर अनुग्रह करके मेरे भागके अन्न आदिको ग्रहण करे तो मैं इस दुस्तर भवसागरसे तिर जाऊँ॥१४॥ ऐसा विचार करके प्रथम सत्र मुनियोंमे जो रत्नाधिक (दीक्षामें घड़े ) हों उनसे अपना भाग ग्रहण करनेकी प्रार्थना करे । यदि ग्रहण करे तो अच्छा ही है । न ग्रहण करे तो ऐसा निवेदन करे-'हे भदन्त । आप ही किसी मुनिको यह आहार वितीर्ण कीजिए' फिर रत्नाधिक इच्छानुसार देदेखें। यदि वे न देकर यह आज्ञा देवें कि-'तुम्ही इच्छा- नुसार देदो' तो शिष्यको क्या करना चाहिए ? सो बताते हैं-'साहवो' इत्यादि। કર્મોની નિજરને અભિલાષી સાધુ વિશ્રામ કરતી વખતે આવા મુક્તિરૂપ હિતના કરવાવાળા અર્થનુ ચિતન કરે-જે કઈ મુનિરાજ મારા પર અનુગ્રહ કરીને મારા ભાગના અન્ન આદિને ગ્રહણ કરે તે હું આ દુસ્તર ભવસાગરથી તરી જઉ (૯) એ વિચાર કરીને પહેલા બધા મુનિઓમાં જે રત્નાધિક (દીક્ષામાં વડા) હેય તેમને પિતાને ભાગ ગ્રહણ કરવાની પ્રાર્થના કરે છે તે ગ્રહણ કરે તે સાર, ન ગ્રહણ કરે છે એવું નિવેદન કરે કે- હે ભદત આપ જ કોઈ મુનિને આ આહાર વહેચી આપ” પછી રત્નાધિક ઈરછાનુસાર આપે છે તે ન આક્તા એવી આજ્ઞા કરે કે “તમે ઈછાનુસાર આપી દો તે શિષ્ય શું नये ? ते मता छ-साहवो. त्या . 10 १२ 23 ४८८ श्रीदशवकालिको उजोयगरे" इत्यादिलक्षण सम्पूर्ण पत्ताधायपाध्याय="धम्मो मगर मुक्टि" इत्पादिगाथापादन्यून मूल्गार पटिया क्षणक्षणमात्र 'मण्डलेऽन्यमुनयोऽपि समागत्य समिलिता भान्तु' इत्यागयेन विश्राम्येद-विश्रान्ति कुर्यात् ॥१३॥ रिश्राम्यन् मुनिः किं कुर्यात् ? इत्याह- मूलम् वीसमतो इमं चिंते, हियमह लाभमहिओ । जइ मे अणुग्गह कुज्जा, साहू हुज्जामि तारिओ ॥९४॥ छाया-विश्राम्यन् (मुनिः) इट चिन्तयेत. हितमथै लाभार्थिकः । यदि मम अनुग्रह कुर्यात्, साधुभवामि तारितः ॥१४॥ विश्रामके समय मुनि क्या करे ? सो बताते है- सान्वयार्थः-वीसमतो-विश्राम करता हुआ लाभमटिओ=कर्मनिर्जराका अभिलाषी साधु इम इस इसी गाथाके उत्तरार्द्धमें कहेजानेगाले प्रकार हिय- मोक्षप्राप्तिरूप हितके करनेवाले अट्ट-भागी भयोजनको चिते-चिन्तन करे, जैसे जइ-यदि-अगर साह कोईभी मुनिराज मे मेरे ऊपर अणुग्गर कुज्जा अनुग्रह करें अर्थात् मेरे भागके आहारमें से कुछ आहार लेलें तो मैं तारिओ हुज्जा इस ससार-समुद्रको तैर जाऊ पार कर जाऊ ।।९४॥ टीका-विश्राम्यन्-विश्रान्ति कुर्वाणो लाभार्थिका कर्मनिर्जराभिलाषी इद- गायोत्तराते वक्ष्यमाण हित=मुक्त्यवाप्तिरूपम् अर्थ=भाविभयोजन चिन्तयेत-विचार येत्, यदि कोऽपि साधु-मुनि. मम मदुपरि अनुग्रह मया मदर्थ योपनीतस्याना देहणलक्षण कुर्यात् तर्हि अह तारित =दुस्तरभवसागरतः समुत्तारितो भवा- मीत्यर्थः ॥१४॥ जिन सस्तव पूर्ण करके 'धम्मो मगलमुकिह' इत्यादि कमसे कम पाच गाथाओंकी मूल शास्त्रकी सज्झाय करके थोड़ी देर विश्राम करे कि जिससे अन्य मुनि भी आकर शामिल हो जावे ॥ ९३ ॥ विश्राम करता हुआ मुनि क्या करे सो करते हैं-'वीसमतो' इत्यादि। धम्मो मगलमुकिट्ट त्या माछामा माछी पाय मायामानी भूशास्वनी Arआय કરી ઘડીવાર વિશ્રામ કરે કે જેથી અન્ય મુનિ પણ આવીને શામિલ થઈ જાય (63) विश्राम तो मुनि शु ४३ ते ४ छ-बीसमती. त्यात अध्ययन ५ उ.१ गा. ९६-९७-आहारपरिभागविधिः ४९१ २ 3 ४ ५ ६ ८ ૧૦ १५ १७ - छाया-अथ कोऽपि न इच्छेत्, ततो भुञ्जीत एककः । आलोके भाजने साधुः, यतम् अपरिशातयन् ॥१६॥ सान्वयार्थः-अह अथ-यदि कोह-कोई न इच्छिज्जा-आहार लेना नहीं चाहे वो तो-फिर साह-वह साधु एगओ=अकेला-द्रव्यसे स्वय एक ही, भावसे राग-द्वेप-सग-रहित आलोए प्रकाशयुक्त चौडे मुहवाले भायणे पात्रमें जय यतनापूर्वक अर्थात् माडलेके दोपोको टालकर अपरिसाडिय-सीथ-कणका विन्दु मात्र भी आहार नहीं गिराता हुआ भुजिज्ज आहार करे ।।१६।। टीका-'अ' इत्यादि। यदि कोऽपि ग्रहीतु नेच्छेत् तदनन्तर साधु एकका द्रव्येण स्वयमेव, भावेन रागद्वेपरहितः आलोके प्रकाशमाने भाजने मशकादि- क्षुद्रजन्तवो यथा दृष्टिपथमागच्छेयुस्तदर्थमिति भावः । यत-सयतन मण्डलदोप- भावानुसन्धानपूर्वकम् अपरिशातयन् सिक्यादिकमविकिरन् भुञ्जीत ॥१६॥ मूलम्-तित्तग च कडुय च कसायं, अविल च महुर लवणं वा। एय लद्धमन्नहपउत्तं, महुधय व भुजिज्ज सजए ॥९७॥ छाया-तिक्तक च कटुक च कपायम्, अम्ल च मधुर लवण वा । एतल्लब्धमन्यार्थप्रयुक्त, मधु-घृतमिव भुञ्जीत सयतः ॥१७॥ सान्वयार्थ:-बह आहार यदि-तित्तग-तीखा कड्डय-कड़वा च और कसायझपायला च और अविल खट्टा च और महुर-मीठा वा अथवा अह' इत्यादि । यदि कोई भी मुनि आहार ग्रहण करने की इच्छा प्रकाशित न करे अर्थात् न लें तोअकेला रागढेपरहित वह साधु, ऐसे पात्रमे भोजन करे जिसमे प्रकाश पड रहा हो । प्रकाश-युक्त पात्रमें आहार करनेका विधान इसलिए किया है कि मच्छर आदि सूक्ष्म जन्तु दीख सके । मण्डल दोपोंका विचार करता हुआ सीथ मात्र भी अन्नादि न विखेरता हुआ आहार करे ॥ ९६ ॥ બ૦ ઈત્યાદિ જે કંઈ પણ મુનિ આહાર ગ્રહણ કરવાની ઈચ્છા પ્રકારિત ન કરે અર્થાત્ ન લે તે એકલા-રાગદ્વેષરહિત તે એવા પાત્રમાં ભેજન કરે કે જેમાં પ્રકાશ પડતે હેય પ્રબશયુકત આહાર કરવાનું વિધાન એટલા માટે કર્યું છે કે મરછર આદિ સૂક્ષ્મ જતુ દેખી હાકાય મ ડલ દેને વિચાર કરતા એક કણ જેટલું પણ અન્ન ન વેરાવા દેતા આહાર કરે (૯૬) પત્રમાં ४९० भीदशवकालिकसने पूर्वोक्त मकार से चिन्तन करके अपने हिस्से का अशनादिको लेनेके लिये सर मुनियों में से रत्नाधिक-दीक्षा म बड़े मुनिसे पहले प्रार्थना करे, यदि वे लें तो अच्छा ही है, अगर न लें तो उनसे कहे-'हे भगान् ! आपही अपने हाथ से किसी दूसरे सन्त को दीजिये। ऐसा कहने पर यदि वे अपने हाथ से किसी को दें तो ठीक ही है, यदि सुद न देकर उसीसे यह कि 'तुमही तुम्हारी इच्छा के अनुसार जो लेवे उसको दे दो' तर उसे क्या करना चाहिये, सो बताते हैं- सान्वयार्थः-तो-इस प्रकार गुरु महारानकी आज्ञा प्राप्त होने पर वह साधु साहवो सर सन्तोको चियत्तेण त्याग दिसे अर्थात् उदार चित्तसे जरकम- रत्नाधिकके क्रमानुसार निमनिज्ज-निमन्त्रण करे-आहार धामे, जह-यदि-अगर तत्य-उनमें से केइ-कोई साधु इच्छिज्जा-आहार लेना चाहें तो (उन्हें देकर) तेहिं सद्धि तु-उनके साथ बैठकर भुजए खुद भी आहार करे ॥९५।। टीका-तो-ततः गुरोरादेशाऽनन्तरम् असौ साधून चियत्तेण=देशीयशब्दो ऽयम्' परमप्रीत्या उदारचेतसेत्यर्थ , यथाक्रम रत्नाधिकक्रममनुसृत्य निम त्रयेत्- स्वभागग्रहणाय प्रार्थयेत्-'इद गृहीत्वाऽनुगृह्यता'-मिति वदेदित्यर्थः । यदि तत्र- मुनीना म ये केपि मुनय इच्छेयु' ग्रहीतुमभिलपेयुस्तदा तेभ्योऽपि वितीय तै साई स्वयमपि भुञ्जीत='चपड चपडे' ति शब्दमकुर्वन्नभ्यवहरेत् ॥१५॥ मूलम्-अह कोइ न इच्छिज्जा, तओ भुजिज्ज एगओ। आलोए भायणे साहू, जयं अपरिस्साडियं ॥ ९६ ॥ गुरुकी आज्ञा मिलनेके अनन्तर प्रसन्न चित्तसे उदारताके साथ दीक्षामे यडे-छोटेके क्रमसे साधुओंको अपना भाग ग्रहण करनेकी प्रार्थना करे, अर्थात् 'यह आहार ग्रहण करनेका अनुग्रह कीजिए.. ऐसा कहे। उन मुनियोंमेसे कोई ग्रहण करनेकी इच्छा करें तो उन्हें वितीर्ण करके उनके साथ आप भी चपड चपड शब्द न करता हुआ आहार करे ॥ ९५॥ ગુરૂની આજ્ઞા મળ્યા પછી પ્રસન્ન ચિત્તથી ઉદારતાની સાથે દીક્ષામાં મેટા કેમે કરીને સાધુઓને પિતાને ભાગ ગ્રહણ કરવાની પ્રાર્થના કરે અર્થાત આ આહાર ગ્રહણ કરવાને અનુગ્રહ કરે” એમ કહે એ મુનિએમાથી કઈ ગ્રહણ કરવાને ઈ- કરે તે તેમને વહેચી આપીને તેમની સાથે પિતે પણ ચાડ ચપડ અવાજ કર્યા વિના આહાર કરે (૯૫) ૧ २ 3 ४ ૫ ૧૨ ७ १० 11 નાનાના .

. अध्ययन ५ उ.१ गा. ९८-९९-आहारपरिभोगविधिः ४९५ यद्वा अर्द्धस्विन्नमापः 'उडदवाकुला' इति भापामसिद्ध । एतत् पृषौक सर्वम् उत्पन्न शास्त्रमर्यादयोपलब्ध, मासक-निर्जीप, मुधालब्धम्मन्नतन्त्रादिप्रकारमन्त- रेण माप्त, तद् यदि अल्प-सल्प सरसमन्नादिक, पा=अथवा बहु प्रचुरम् असार- मशनादिकम् , उपलक्ष्येति शेपः, नातिहीलयेत्न निन्देत् । अल्पीयसि सरसवस्तुनि लन्धे-"कथमेताववैयोदरपूतिर्भवेत्" इति, एवमसारवस्तुनि प्रचुरतरे लब्धे सति "किमनेन प्रचुरतरेणापि निष्प्रयोजनेने" त्येवरूपा निन्दा न कुर्यादिति हृदयम् । किन्तु मुधाजीवी-मुधा-व्यर्थ-निप्पयोजन शरीरेन्द्रियपुष्टिप्रयोजनविकल जीवितु शीलमस्येति सः, सयमयात्रानिर्वाहार्थमेव भिक्षाग्रहणशील इति भावः। यद्वा सुधाजीवी निर्दोपभिक्षाजीवी-जात्याधनाविष्करणपूर्वकभिक्षाग्राहक इत्यर्थः, दोप- चर्जित-सयोजनादिमण्डलदोपा यथा न भवेयुस्तथा भुञ्जीत । 'उत्पन्न' इत्यनेन भोजन। ये सथ यदि शास्त्रोक्त विधिसे प्राप्त हुए हों, प्रासुक हों, मत्र- तत्र आदिका प्रयोग किये बिना मिले हों, थोडे हो या बहुत हों अर्थात् मरस अन्नादि धोड़ा हो और नीरस आहार पहुत हो लो मुधाजीची- अर्थात् सयमयात्राके निर्वाह के लिए जीवन धारण करनेवाला, अथवा निर्दोप अर्थात् जाति-आदिको न प्रगट करके भिक्षा लेनेवाला साधु उस आहारकी अवहेलना न करे । तात्पर्य यह है कि सरस आहार कम मिले तो ऐसा न कहे कि-'इतने थोडे आहारसे उदरपूर्ति कैसे होगी।' नीरस आहार अधिक मिले तो ऐसा न कहे कि-'इस बहुतेरे व्यर्थ आहारसे क्या लाभ।' इस प्रकार आहारकी निन्दा न करे, किन्तु आहारके सयोजना आदि मण्डल दोपोंको टाल कर भोगे। અથવા કળથી યા અડદને બાકળાનું જન, એ સર્વ જે રાસ્ત્રોક્ત વિધિથી પ્રાપ્ત થયા છે, પ્રાસુક હોય, મત્ર તત્ર આદિને પ્રયોગ કર્યા વિના મળ્યા હોય, થડ હાથ યા વધારે હોય, અર્થાત્ સરસ અન્નાદિ ઘેડુ ય અને નીરસ આહાર વધારે હોય, તે મુધાજીવ-અર્થાત સયમયાત્રાના નિર્વાહ માટે જીવન ધારણ કરનારે અથવા નિર્દોષ અર્થાત્ જાતિ આદિને પ્રકટ કર્યા વિના ભિક્ષા લેનાર સાધુ એ આહારની અવહેલના કરે નહિ, તાત્પર્ય એ છે કે સરસ આહાર એ મળે તે એમ ન કહે કે “આટલા શેડ આરિથી ઉદરપૂર્તિ કેવી રીતે થશે?” નીરસ આહાર વધારે મળે તે એમ ન કહે કે “આ ઘણા બધા વ્યર્થ આહા રથી શો લાભ?” એ પ્રમાણે આહારની નિન્દા ન કરે, પરંતુ આહારના સાથે જના આદિ મડવ દેને ઢાળીને ભગવે ४९४ श्रीदशवकालिकमूत्रे छाया-अरस पिरस पाऽपि, सचित वा अनचितम् । आई या यदि वा शुष्क, मन्यु-कुल्माप-भोजनम् ॥९८॥ उत्पन्न नातिदीलयेत् , अल्प पा पा मारकम् । मुधाल ध मुधाजीती, भुञ्जीत दोपवर्जितम् ।।९।। सान्वयार्थः-अरस-नमक आदि रसरहित वावि तथा विरस अधिक दिनोंकी बनी हुई विरस-चासी-मूखी-रोटी आदि या पुराने चाँवल आदिका भोजन सूइयम्हींग आदिका बघार (छोक) दिया हुआ वा अथवा असहय- नहीं बघार दिया हुआ शाक आदि उल्लगीला करवा, राइता आदि वा तथा सुष-भूखा-भुने हुए चने भूगडे-आदिजइवा अथवा मयुकुम्मासमोयण बेरके चूरेका भोजन या कुलथीका भोजन अथवा उड़दका वाकुला (यह पूर्वोक्त सत्र मकारका अशनादि) उप्पण्ण-जो गोचरीके समय शास्त्रमर्यादासे मिल गया वह अप्प-थोड़ा हो वाम्या बहु-बहुत हो उसकी नाइहीलिज्जा अबहेलना न करे, किन्तु फासुयमामुक-अचित्त और मुहालद्ध-निष्काम-बिना किसी मत्युपकारके माप्त हुए-उस अशनादिको मुहाजीवी-निष्काम-सिर्फ सयम यात्राका निर्वाहसे जीनेवाला अर्थात् निरपेक्ष भिक्षा लेनेवाला साधु दोसवज्जियम्भोजनके सयोजनादि दोपोको टालकर भुजिज्जाम्भोगवे ॥९८॥१९॥ टीका-'अरस' इत्यादि, 'उप्पण्ण' इत्यादि च । अरस-लवणादिरसरहितम्, अपाप्तरस वालचणकादिनिष्पादित वा, अपिवा विरस-चिरकालनिष्पादितत्वेन विगतरस, पुराणौदनादिक वा, सूचित हिड्न्वादिसस्कृत वा अथवा अमुचित तवर्जितम् , आईकरम्भादिक, शुष्क भर्जितचणकादिकम् । मन्थुकुल्मापभोजन- मन्थुश्च कुल्मापश्चाऽनयो. समाहारे मन्युकुल्माप, तद्, भुज्यते यत्तद्भोजन, मन्थुकु ल्माष च तद्भोजन चेति विग्रह., तत्र मन्युः बदरचूर्णादिकम् , कुल्माष: कुलत्या, 'अरस' इत्यादि, 'उप्पण्ण' इत्यादि च । नमकरहित तथा बाल चणक आदि अरस या बहुत पुराना ओदन आदि विरस, हींग आदि द्वारा छोंका हुआ या न छोंका हुआ, गीला करबा आदि, सूखे भुने चने आदि, वेरका चूर्ण आदि, अथवा कुलथी या उड़दके बाकलाका अरस त्यादि, तथा उप्पण्ण. त्या भीथी रडित तथा આદિ અસ યા બહુ જૂને એદન-આદિ વિરસ, હીગ આદિથી વઘારેલ યા ન વઘરેલુ, લીલે કર બે આદિ, સૂકા-ભૂજેલા ચણા આદિ, બોરનું ચૂર્ણ આદિ વાલ રાણા अध्ययन ५ उ. १ गा. १००-मुधादायि-मुधाजीविनोर्मोक्षावाप्तिः ४९७ रसार-निरपेक्ष-लेनेवाले भी दुलहा दुर्लभ है, क्योंकि मुहादाई-निकाम देने- वाले और मुहाजीवी-निष्काम-निरपेक्ष लेनेवाले दाविन्ये पूर्वोक्त दोनो ही सुग्गइ-मोक्षगतिरो गच्छति प्राप्त होते हैं। श्री सुधर्मास्वामी जम्बूस्वामीसे कहते हैं कि हे जम्मू! ति=भगवान् महावीर स्वामीने जैसा फरमाया है वैसा ही तुझे वेमिमैं कहता ह ॥१०॥ ॥इति श्रीदशवैकारिक सूत्रके पाचवें अ ययनके पहले उनेशका सान्वयार्थ सपूर्ण।। टीका-'दुल्लहाओ' इत्यादि । मुरारातामत्युपकारानभिलापिणो दायका. दुर्लभाः दुप्पापास्तादृशाना विरलत्वात्, मुपानीविनोऽपि दातृकार्यान- पेक्षनिरपेक्षभिक्षाग्राहिणोऽपि दुर्लभाः, मुधादातारः मुधाजीविनश्च द्वावपि-दाता भिक्षुश्च उभावप्युक्तवियो मृगति सिद्धगति गच्छतः पाप्नुत । 'मुपादातारः' 'मुपाजीपिनः' इत्यत्र बहुवचन व्यक्तिरिक्षया । 'द्वावपि' इत्यत्र द्विवचन तु मुधादातत्व-मुपानीवित्योभय धर्मगतद्वित्वसरयाश्विक्षयेति योध्यम् ॥ इति ब्रवीमीति माग्वत् ॥१०॥ । इति श्री दशकालिकमस्याऽऽचारमणिमञ्जूपारयाया व्यारयाया पञ्चमा ययनस्य प्रथमादेशक : समाप्त' ।। ५-१। दुलहाओ' इत्यादि । प्रत्युपकार (बदला) की आशा न रखनेवाले दाता दुर्लभ हैं, और दाताका कार्य न करके भिक्षा ग्रहण करनेवाले साधु भी बिरले होते है । प्रत्युपकारकी चाह न रखनेवाले दाता और किसीका कार्य विना किये भिक्षा ग्रहण करनेवाला आत्मार्थी सायु, इन दोनोंको मोलगतिकी प्राप्ति होती है। श्रीसुधर्मास्वामी जम्बूस्वामीसे कहते है-हे जम्बू । चरम जिनेश्वर भगवान महावीर स्वामीने जैमा उपदेश दिया है वैमा मैंने कहा है ॥१०॥ इति दशकालिक सूत्रके पाँचवें अध्यनके पहले उद्देशका हिन्दी-मापानुवाद समाप्त ॥५-१॥ दुल्हाभो० त्या निजाम प्रत्यु५४।२ (Men) દુર્લભ છે અને નિષ્કામ–દાતાનું કાર્ય ન કરતા ભિક્ષા ગ્રહણ કરના-સાધુ પણ વિરલ જ હોય છે પ્રત્યુપડાની ઈ ન રાખનાર દાતા અને કેડનું કાર્ય કર્યા વિના ભિક્ષા ગ્રહણ કના આત્માર્થી માધુ, એ બેઉને મેક્ષ ગતિની પ્રાપ્તિ થાય છે શ્રી સુવર્મા સ્વામી જ બુ સ્વામીને કહે છે કે હું જ બૂ ! ચમ જિનેશ્વર ભગવાન મહાવીર સ્વામીએ જે ઉપદેશ આપે છે તે જ મેં કહ્યો છે (૧૦૦) ઈતિ દશવૈકાલિકબૂરના પાચમા અધ્યયનને પહેલા ઉદ્દેશાનો ગુજરાતી- भाषानुवाई सात (५-१) . न રાખનાર દાતા ४ ६ ७ ८ 1. सुग्गइ ॥१०॥ इति ब्रवीमि ।। ४९६ श्रीदशकालिगमूने शास्त्रमर्यादयैर गीतार्थेनानादि ग्रामिति रचितम् । 'फामुय' अनेन सचित्तमचित्त वेति परीक्ष्य ग्रहीतव्यमिति दर्शितम् । 'मुहालद्ध' इतिपदेन दातुरुपकार विधाय भिक्षाग्रहणे आधारुर्मादयो हो दोपाः समापतन्तीति तथा नोपादेयमिति प्रकटितम् । 'दोसज्जिय' इतिपदेन निर्दोपमिक्षामातापि मण्डलदोपवत्त्वेन सदोपत्त दुर्निधारमिति मण्डलदोपरहित भोक्तव्यमिति मादुष्कृतम् ॥९८॥१९॥ मूला-दुल्लहाओ मुहादाई, मुहाजीवी वि दुल्लहा । मुहादाई मुहाजीवी, दोवि गच्छंति ॥तिवेमि॥ छाया-दुर्लभा मुधादातारः, मुधानीविनोऽपि दुर्लभाः। मुधादातारः मुधाजीविनः, द्वावपि गच्छतः मुगतिम् ॥१०॥ सान्चयार्थ:-मुहादाई-निष्काम-प्रत्युपकारकी आशा न रखकर-देनेवाले दुल्लहाओ=दुर्लभ हैं और मुहाजीवीवि-निष्काम-दाताके कार्यकी अपेक्षा न 'उप्पन्न' पदसे यह सूचित किया है कि गीतार्थ साधुको शास्त्रकी मर्यादाके अनुसार ही आहार ग्रहण करना चाहिए । 'फास्य' पसे सचित्त-अचित्तकी परीक्षा करके ग्रहण करना द्योतित किया है। 'मुहालद्ध' पदसे यह दर्शाया है कि दाताका उपकार करके भिक्षा ग्रहण करनेसे आधाकर्म आदि बहुतसे दोष आते हैं, अतः ऐसी भिक्षा नहीं लेनी चाहिए । 'दोसज्जियः पदसे यह प्रगट किया है कि निर्दोष भिक्षा उपलब्ध होजाने पर भी मण्डल दोष लगनेसे वह भिक्षा अवश्य दुषित होजाती है, इसलिए उनका परिहार करके ही आहार करना चाहिए ।। ९८॥९९॥ उप्पन्न शम्था सेभ सूचित ४२वामा माव्यु છે કે ગીતાર્થ સાધુએ શાસ્ત્રની મર્યાદાને અનુસાર જ आ२ अषु ४२॥ न फासुयं Aथी સચિત્ત અચિત્તની પરીક્ષા કરીને ગ્રહણ કરવાનું કહેવામાં આવ્યું છે મુદા શબ્દથી એમ દર્શાવવામા આવ્યુ છે કે દાતાને ઉપકાર કરીને ભિક્ષા ગ્રહેણ કરવાથી આધાકર્મ આદિ ઘણું રે લાગે છે, તેથી એવી ભિક્ષા ન લેવી જોઈએ दोसबज्जिय शया मेम तापामा भाष्य छ । निषि लिAL Euary વતા પણ મડલ દેવ લાગવાથી એ ભિક્ષુ અવશ્ય દૂષિત થઈ જાય છે, તેથી એને પરિહાર કરીને જ આહાર કરે જોઈએ (૯૮-૯૯) , , 1 २ 3 ७ ८ e 13 ૧૪ २० २१ १५ १८ अध्ययन ५ उ. २ गा. १-आहारपरिभोगविधिः ४९९ निष्पादित शीतमुप्ण वाऽन्नम्, अम्लतक्रपाचितपल्लचणकचूर्ण निष्पादित शीतमुष्ण वा शाफविशेषादिक, पर्युपिततक्रादिरूप पान च, तेपाममनोज्ञगन्धवत्त्वादिति भावः। सुगन्ध-मुरभिगन्धयुक्त वा घृतपूरपायसादि तस्यैलालबग केसरकर्पूरादिमनोज्ञगन्ध- उत्त्वादिति भावः। सर्प-मनोज्ञामनोज्ञरूपं सफल भुञ्जीत न तु मुश्चेत्=परित्य- जेत्-नावशेपयेदिति भावः ॥ १॥ मूलम्-सेज्जा निसीहियाए, समावन्नो य गोयरे । अयावयट्टा भुच्चाणं, जइ तेण न सथरे ॥२॥ तओ कारणमुप्पण्णे, भत्तपाण गवेसए । विहिणा पुत्वउत्तेण इमेणं उत्तरेण य ॥३॥ छाया-शय्याया नैपेधिक्या, समापन्नश्च गोचरे । अयापदर्थ भुक्त्वा, यदि तेन न सस्तरेत् ॥ २॥ ततः कारणे उत्पन्ने, भक्त-पान गवेपयेत् । विधिना पूर्वोक्तेन, अनेन उत्तरेण च ॥३॥ सान्वयार्थ:-सेज्जा वसति-उपाश्रय में निसीदियाए आहार करने के स्थान पर य अथवा गोयरे-भिक्षाचरीमें समावन्नोन्माप्त हुआ मुनि अयावयहा जरूरीसे कम अर्थात् थोड़ा भुच्चाण-खाकर-खालेने पर जइम्यदि-अगर तेण= उस अशनादिसे न सथरे न सरे अर्थात् सयमयात्रामा निर्वाह के लिए पर्याप्त -पूरा न हो तओन्तो कारण क्षुधा वेदनीयकी शान्ति न होनेरूप कारण के उप्पने-उत्पन्न होनेपर साधु पुचउत्तेण-पूर्वोक्त-" सपत्ते भिक्खकालम्मि" खट्टी छाछकी बनी हुई ठढी या गर्म कढी आदि शाक, पर्युपित (वासी) खट्टी छाछ आदि पान, ये अमनोज्ञ गन्धवाले होते हैं। और घेवर पायस आदि, एलची लवग केसर आदिके मिश्रित होनेसे मनोज्ञ गन्धवाले होते हैं, इन सबको समभावसे भोगवे ॥१॥ ચણું આદિની બનાવેલી ઠંડી યા ગરમ રોટલી આદિ અન્ન, ખાટી છાશની બનેલી ઠડી ચા ગરમ કઢી આદિ શાક, પર્કષિત ખાટી છાશ આદિ પાન, એ બધા અમનેશ ગધવાળા હોય છે सन गर, पायस (घ) माहि, એવચી, લવીગ કેસર આદિથી મિશ્રિત હેઈને મનેz ગધ વાળા હોય છે, એ બધાને સમભાવે ભેગવે (૧) ९ ८ ४९८ श्रीदशकालिकम्त्रे ॥ अथ पञ्चामाध्ययनस्य द्वितीय उद्देशः॥ मथमोद्देशकथितपिण्डेपणाया आशिष्टविधिमाद-'पडिग्गह' म्यादि । मूलम्-पडिग्गह संलिहिताणं, लेवमायाइ सजए । दुगंध वा सुगंध वा, सब भुंजे न छड्ए ॥ १ ॥ छाया-प्रतिग्रह सलिमा, लेपमर्यादया सयतः । दुर्गन्ध या सुगन्ध था, सबै भुञ्जीत न मुश्चेत् ॥१॥ सान्वयार्थ:-पटिग्गर पानेको लेवमायाए-लेपकी मर्यादासे अर्थात् जब तक छाछ आदिका लेप लगा रहे तर तक सलिहिताण अगुलीसे पोंछकर सजए-साधु दुगध वा अनिष्ट गन्धवाला हो चाहे सुगध वा-मुरभि गन्धवाला पदार्थ हो उस सच-सको भुजे भोगवे; किन्तु न छडुए कुछभी न छोडे जूठन न डाले ॥१॥ टीका-प्रतिग्रह पात्र लेपमर्यादया लेप मर्यादीकृत्य यथा लेपसम्बन्धः पात्रे नावतिष्ठेत तथा सल्ह्यि पात्रस्थ तक्रादिलेपमगल्यादिना निश्शेष प्रोउय सयतः=मुनि, दुर्गन्धम् अनिष्टगन्धयुक्त पुरातनगोधूमवर्जरिकावल्लचणकादि । पांचवॉ अध्ययनका दूसरा उद्देश । प्रथम उद्देशमे कही हुई विधिके अतिरिक्त-अवशिष्ट पिण्डैषणाकी विधि इस दूसरे उद्देशमे करते हैं-'पडिग्गह' इत्यादि । आहार करनेके पात्रमे जो लेप लगा रह जाय उसे अगुली-आदि द्वारा पोंछकर मुनि अमनोज्ञ गन्ध या मनोज्ञ गन्धवाले समस्त अन्न पानको भोगे, उसे छोडे नहीं, अर्थात् सीथ मात्र भी जूठा न डाले। पुराने गेहूँ, बाजरे, बाल, चने आदिकी बनी हुई ठडी या गर्म रोटी आदि अन्न, અધ્યયન પાચમુ-ઉદેશ બીજે પ્રથમ ઉદ્દેશમાં કહેલી વિધિ ઉપરાત અવશિષ્ટ પિડેવણની વિધિ આ भी देशमा ४ ---पडिग्गह त्या આહાર કરવામા પાત્રમાં જે લેપ લાગેલે રહી જાય, તેને આગળ આદિ વડે લુછીને મુનિ અમનેશ ગધ યા મનોજ્ઞ ગધવાળા બધા અન્ન પાનને ભગવે, તેને છેડે નહિ, અર્થાત્ જરા પણ બાકી ન રાખે જૂના ઘઉં, બાજરી, વાલ, .

८ घूमे ॥४॥ अध्ययन ५ उ. २ गा. २-४-आहारापर्याप्तौ पुनर्गोचरीगमनविधिः तमेव रिधिमुपदर्शयन् कालयतनामाह-कालेण' इत्यादि। मूलम् -कालेण णिक्खमे भिखू , कालेण य पडिक्कमे । अकाल च विवजित्ता, काले काल समायरे ॥४॥ छाया-कालेन निष्कामे भिक्षुः, कालेन च प्रतिक्रामेत् । अकाल च पिवयं, काले काल समाचरेत् ॥ ४ ॥ अर भिक्षा लेने की विधि बताते हैं- सान्वयाथः-भिक्खू-मुधाजीवी मुनि कालेण-गोचरीके समयसे-जिस देशमें जो समय भोजनका हो उस समय के होनेसे णिक्खमे भिक्षाके लिए जावे, य% और कालेण-समयसे ही वापस आनेका उचित समय हो जानेसे पडिकमे वापस लौट आवे, च-और अकाल-भिक्षाके अनुचित समयको विवज्जित्ता- छोडकर काले उचित समयमें काल-भिक्षादिकसमायरे आचरे-गोचरीके लिए टीका-भिक्षुम्बुधाजीनी मुनिः कालेन-भिक्षोचितसमयेन यस्मिन् देशे यो गृहस्थाना भोजनसमय स एव भिक्षुणा भिक्षागलस्तेनेत्यर्थः निष्कामेत्-निर्ग- च्छेनु, भिक्षायै इति शेप', कालेनैव-मस्यागमनोचितसमयेनैव, यथा स्वाध्याय- पतिवन्धो न भवेत् तथा भिक्षा गतस्य साधोः परावर्तनसमयो निर्दिष्टस्तेनैवेति भावः । (करणे सहाथै वा तृतीया)। 'चारोऽत्र 'एव'-कारार्थक.' पति- कामेत्-पत्यागच्छेत् । अकाल-भिक्षानुचितसमय विवय=परित्यज्य काले भिक्षो- चितवेलाया काल-लक्षणया तत्कालोचितकृत्य भिक्षादिक समाचरेत-मिक्षार्थ उसी विधिको दिखाते हुए कालकी यतना कहते हैं-'कालेण' इत्यादि । जिम देशमे गृहस्थोंके भोजनका जो समय हो वही समय भिक्षुको भिक्षाके लिए उचित है, अत एव भिक्षाके लिए उसी समय जाना चाहिए और गोचरीके लिए गये हुए साधुको ऐसे उचित समय पर लौट आना चाहिए, जिमसे स्वायाय आदि क्रियाओंमे अन्तगय न पड़े। ये विधिन सतायत आती यता -पालेण. त्या જે દેશમાં ગૃહના ભજનને જે સમય હોય તે સમય ભિક્ષાને માટે ઉચિત છે, તેથી ભિલાને માટે તે સમયે જવું જોઈએ અને ગોચરીને માટે ગએલા સાધુએ એવા ઉચિત સમયે જોઈએ કે જેથી સ્વાધ્યાય આદિ ક્રિયાઓમાં પડે તથા જે સમય ભિક્ષાને પાછા અતરાય ५०० श्रीदशवकालिकसूत्रे इत्यादिरूप निधिसे य-तथा इमेण इस उत्तरेणं आगे कहे जानेवाली-"कालेग णिक्खमे भिक्खू" इत्यादिरूप विधिसे भत्तपाण-आहार-पानी गवेस गवेषे अर्थात् मिक्षा लेनेके लिए जावे ॥२॥३॥ टीका-'सेज्जा' इत्यादि, 'तो' इत्यादि च। शग्यायावसती, नैपेधिक्या- निपदनस्थाने सान्यायभूमिकायामित्यर्थः, गोचरे-मिक्षाचर्याया चबा समा पन्न -सम्प्राप्तो मुनि', उपलब्धमन्नादिकम् अयापदर्थम् अपरिसमाप्तम् अल्प- क्षुधोपशमनानईमित्यर्थः सयमनिहाथै याताऽनादिकेन भाव्य तावन्नेति यावत्, भुक्त्वा यदि तेन भोजनेन न सस्तरेत् सयमयात्रा निर्णोड न शक्नुयात् ।२। तत तदनन्तर कारणे अयोजने आपस्यात्सप्तम्यर्थे प्रथमा, उत्पन्ने सति- क्षुधावेदनोपशमनाभावे पूर्वोक्तेन "सपत्ते भिखकालम्मि" इत्यादिरूपेण अनेन उत्तरेण=" कालेण णिक्खमे भिक्खू०” इत्यादिवक्ष्यमाणलक्षणेन विधिना=प्रकारेण भक्तपान गवेपयेत् अन्वेपयेत् पुनर्भिक्षार्थ गच्छेदिति सूत्रार्थ ।३। 'सेज्जा' इत्यादि, 'तओ' इत्यादि । उपाश्रयमें बैठनेके स्थानमें अर्थात् स्वाध्याय भूमिमे तथा गोचरीमें गए हुए मुनिको अल्प, अर्थात् क्षुधाकी शान्ति न हो सकने योग्य अन्न आदि मिला होऔर उससे सयमयात्राका निर्वाह न हो सके, अर्थात् लाया हुआ आहार पर्याप्त न हो तो ऐसा कारण उत्पन्न होने पर, अर्थात् क्षुधावेदनीयके शान्त न होने पर "सपत्ते भिक्खकालम्मि" इत्यादि पूर्वोक्त विधिसे, तथा "कालेण णिक्खमे भिक्खू" इस गाथासे प्रारम्भ करके आगे बताई जानेवाली विधिसे भक्त पानकी गवेषणा करे, अर्थात् भिक्षाके लिए फिर गमन करे ॥२॥३॥ सेज्जा. त्याल, तथा तओ० त्या पाश्रयमा सपाना स्थानमा मर्थात् સ્વાધ્યાયભૂમિમાં તથા ગેરીમાં ગએલા મુનિને અ૮૫ અર્થાત યુધાની શરત ન થઈ શકે અર્થાત્ લાવેલો આહાર પૂરતે ન હોય, તે એવું કારણ ઉત્પન્ન થતા અર્થાત્ સુધાવેદનીય શાન્ત न यवान सीधे सपत्ते भिक्खकालम्मि त्या पूर्वरित विधिथी, तथा कारण णिक्खमे भिवखू मे आयाथी આગળ બતાવવામાં આવનારી વિધિથી ભકત પાનની વેવણ કરે અર્થાત ભિક્ષાને भाटे शथा गमन ४२ (२-३) . પ્રાર ભ કરીને 3 ६ ५ अध्ययन ५ उ. २ गा. ५-६-समयमर्यादया गोचरीगमनोपदेशः ५०३ पडिलेहिसी नहीं देखते, अतः अप्पाण-आत्माको किलामेसि-किलामना- खेद-पहुचाते हो च=और सनिवेस गामकी गरिहसि निन्दा करते हो । तात्पर्य यह हुआ कि गोचरीका समय हुए बिना घूमनेसे साधु भगवानकी आज्ञाका विराधक होता है, और दीनता प्रगट करनेके कारण उसके चारित्रमें मलिनता होती है; अतः जिस देशमें जो भिक्षाका समय हो उसी समयमें साधुको भिक्षाके लिए जाना चाहिये ।।५।। टीका-हे भिक्षो ! त्वम् अकाले असमये चरसि-भिक्षार्थ गच्छसि किन्तु कालभिक्षोचितसमय न प्रत्युपेक्षसेन्नाद्रियसे, तेन च हेतुनाऽऽत्मान मयसि पीडयसि मिक्षालाभाभावेन भ्रमणाधिक्येन चेवि भाव । सनिवेश ग्राम च पुनः गईसे-निन्दसि । भगवदाज्ञाविराधकत्वेन दैन्यप्रकाशनेन च चारित्रमालिन्य जायते, ततोऽनुचितकाले भिक्षार्थ न गन्तव्यमिति ॥ ५ ॥ मूलम्-सड काले चरे भिक्खू , कुजा पुरिसकारिय । अलाभु-त्ति न सोइज्जा, तवु-त्ति अहियासए ॥६॥ छाया-सति काले चरेद् भिक्षुः, कुर्यात्पुरुपकारम् । अलाभ इति न शोचेत्, तप इति अधिपहेत ॥६॥ सान्वयार्थः-भिक्खू-साधुको काले भिक्षाका समय सइ-होनेपर चरे-- गोचरीके लिए घूमना चाहिए और पुरिसकारिय-उत्साह पूर्वक घूमनेरूप हे भिक्षु ! आप असमयमे भिक्षाके लिए जाते हैं, समयका खयाल नहीं रखते। इसी कारण अधिक भ्रमण करनेसे या भिक्षाके न मिलनेसे तुम अपनी आत्माको पीडित करते हो, और ग्राम नगरकी निन्दा करते हो। अकालमें भिक्षाके लिये गमनरूप भगवानकी आज्ञाकी विराधना करनेसे तथा दीनताप्रगट करनेसे चारित्रमें मलिनता आती है इसलिए अनुचित समयमें भिक्षाके लिए नहीं जाना चाहिए ॥५॥ હે ભિક્ષુ! આપ અસમયમા ભિક્ષાને માટે જાઓ છે, સમયને ખ્યાલ રાખતા નથી એ કારણે વધારે ફરવાથી યા ભિક્ષા ન મળવાથી તમે તમારા આત્માને પીડિત કરે છે અને ગ્રામ નગરની નિદા કરે છે અકાળે ભિક્ષાને માટે જવારૂપી ભગવાનની આજ્ઞાની વિરાધને કરવાથી તથા દીનતા પ્રકટ કરવાથી ચારિત્રમાં મલિનતા આવે છે, તેથી અનુચિત સમયે ભિક્ષા માટે જવું ન न (५) २ ३ ७ ८ ५०२ श्रीदशवकालिको कामेदित्यर्थः । यहुशः कालगन्दोपादान 'मुनीना ययाकालमेव सक्ल कस्य विषय-मिति धनयति ॥ ४ ॥ अालचारित्वेनामिक्षो मितुः केनचिस्साधुना "म: ! मिक्षा स्वया लब्धा न पा" इति पृष्टो वदति-" कृतोत्र मितम्पचाना हीनदीनाना ग्रामे भिक्षालामः? " तदाऽसी अकालचारिण कथयति-'अकाले' इत्यादि । मूलम्-अकाले चरिसी भिक्खू, काल न पडिलेहिसि। अप्पाणं च किलामेसि, संनिवेस च गरिहसि ॥५॥ छाया-अफाले चरसि भिक्षो!, काल न प्रत्युपेक्षसे । आत्मान च लमयसि, सनिवेश च गईसे॥५॥ अकालचारी होने के कारण भिक्षा नहीं मिलने पर असन्तुष्ट हुए साधुको कालचारी साधु पूछता है-हे साधु ! आपको भिक्षा मिली कि नहीं?, तब वह कहता है-इस कंजूसों के गाम में भिक्षा कहाँ पड़ी है। इस पर वह कालचारी साधु उससे कहता है- सान्वयार्थ:-भिक्खू हे भिक्षु ! आप अकाले असमयमें भिक्षाका समय न होनेपर ही चरिसी-गोचरी फिरते हो, च और कालगोचरीका समय न तथा जो समय भिक्षाके लिए उचित न हो उसका परिहार करके द्रव्य क्षेत्र काल भावसे उचित समय पर ही भिक्षाके लिए जाना चाहिए। गाथामें बहुत चार काल शब्दका प्रयोग करनेसे यह आशय प्रगट होता है कि साधुओंको प्रत्येक क्रिया उचित समय पर ही करनी चाहिए ॥४॥ कोई साधु असमयमें भिक्षाके लिए जानेवाले दसरे साधुसे पूछा गया कि-'हे भिक्षु । तुम्हें भिक्षाका लाभ हुआ या नहीं। तत्र उसने कहा-'इन कगाल कजूसोंके गाँवमें भिक्षाकहाँ प्राप्त होसकती है। तब वह अकालमे गोचरी करनेवाले के प्रति कहता है-'अकाले०' इत्यादि। માટે ઉચિત ન હોય તેને પરિહાર કરીને દ્રવ્ય ક્ષેત્ર કાળ ભાવથી ઉચિત સમયે જ ભિક્ષાને માટે જવું જોઈએ ગાથામાં ઘણીવાર કાલ શબ્દને પ્રગટ કરવાથી એ આશય પ્રકટ થાય છે કે-સાધુઓએ પ્રત્યેક ક્રિયા ઉચિત સમયે જ કરવી જોઈએ (૪) કઈ સાધુ અસમયમાં ભિક્ષાને માટે જનારા બીજા સાધુને પૂછયું કે- હિં ભિમુ! તમને ભિક્ષાને લાભ થયે કે નહિ?” ત્યારે તેણે કહ્યું કજૂસના ગામમાં ભિક્ષા કયાથી પ્રાપ્ત થઈ શકે ?' ત્યારે એ અકાળે ગોચરી २ना२। साधु प्रत्ये 3 छ-अकाले० या 'मा , २ 3 ५ ६ ७ ८ १० परकमे जावे ॥७॥ " अध्ययन ५ उ. २ गा. ७-८-गोचर्या क्षेत्रयतना क्षेत्रयतनामाइ-तहेवु०' इत्यादि । मूलम्-तहेवुच्चावया पाणा, भत्तट्टाए समागया। त उज्जुयं न गच्छिज्जा, जयमेव परकमे ॥७॥ छाया-तथैवोच्चावचाः प्राणाः, भक्तार्थ समागताः। तेपात्ररजुक न गच्छेत, यतमेव पराक्रामेत् ॥७॥ सान्वयार्थ:-तहेव-उसीप्रकार उच्चावया उच्च जातिके हसादिक अवच-नीच जातिके कौए आदि पाणा-माणी (यदि) भत्तहाए चुगा-पानीके लिए समा गया-आये हो-इकठे हुए होतोत उज्जय-उन प्राणियोके सामने न गच्छिज्जा- नही जावे, (किन्तु) जयमेव यतनापूर्वक ही आसपाससे अथवा अन्य मार्गसे अर्थात् जिस तरह उन भाणियों को किसी प्रकारका त्रास न पहुचे उसीतरह टीका-तथैव तद्वत् उचायचाः तत्र उदश्चः उच्चजातीया हसादयः, अवाश्चा नीचजातीयाः माकप्रभृतयः, यद्वा उच्चावचा: अनेकविधाः, "उच्चावच नैकभेद". मित्यमरात् , माणा माणिनः भक्तार्थम् अन्न-पानार्थ मार्गादौ समागताः=समा- याता भवन्ति चेत् 'त'--तेपाम् , आपत्वात् पष्ठीबहुत्वे प्रथमैकवचनम्, ऋजुक- समुख न गच्छेत्, तेपामन्नपानान्तरायादिपचुरदोपापातात् । तहि किं कुर्यात् ? यतमेव-सयतनमेव यथा तेपा सत्रासो न भवेत्तथा पराक्रामेत्-चरेत् अन्यमार्गेण अब क्षेत्रकी यतना हैं-'तहेवु० इत्यादि । हस-आदि उच्च-जातीय और काक-आदि नीच-जातीय प्राणी यदि भोजन पान के लिए रास्तेमे आये हों तो उनके सामने न जावें । सामने जानेसे उनके चुगे-पानीमे विन्न पड जानेके कारण अन्तराय आदि अनेक दोष लगते है, अतः यतना-पूर्वक, अर्थात् जिससे वे भयभीत न हों उस प्रकार दूसरे मार्गसे या एक किनारेसे गमन करें। वे क्षेत्रना यतना ४ छ -तहेवु. त्या હસ- માદિ ઉચ્ચ-જાતીય અને કાગડે–આદિ નીચ જાતીય પ્રાણી જે ભોજન-પાનને માટે કરવામા આવેલા છે તે તેની સામે ન જવું સામે જવાથી તેમને પાણી પીવા ચણવા વગર ન પડવાથી ભકત પાનનો અનેક છે લાગે છે એટલે યતનાપૂર્વક અર્થાત્ જે રીતે તેઓ ભયભીત થાય એ રીતે બીજે માગે યા એક બાજુએથી ગમન કરવું તાત્પર્ય એ છે કે भक्त पानकी અ તરાય આદિ " श्रीदर्शवेकालिमत्रे पुरुषार्थ भी कुना-करना चाहिये, और मिक्षा न मिलनेपर वह अलाभु-आज मुझे भिक्षा नहीं मिली त्ति-इस प्रकार न सोडजा-सोच न करे, किन्तु तवु= आज मेरे अनशन ऊनोदरी आदि तप हुआ है तिम्स प्रकार सोचकर अरियासरा क्षुधा परीपहको सहन करे-सन्तुष्ट रहे । तात्पर्य यह है कि-साधु ओको सिर्फ भिक्षाके ही लिए गोचरीमें घुमना नहीं हैं पिन्तु पीर्याचारके लिए भी भगवान्ने गोचरीमें घुमना कहा है ॥६॥ टीका-'सह' इत्यादि । भिक्षुः काले-भिक्षोचितसमये पाते सति, यद्वा 'सइकाले' इत्यस्य 'स्मृतिकाले' इतिच्छाया तत्र स्मर्यन्ते साधनो दातृभिर्दानार्थ यस्मिन् समये तस्मिन्नित्यर्थ , चरेत् भिक्षार्य गच्छेत् । पुरुषकार पराक्रमम् उत्साहपूर्वकभिक्षार्थभ्रमणलक्षण कुर्यात्-पिद यात् । कदाचिदलाभे सति अाभ- अव भिक्षालाभो न सजात इति न शोचेन परितपेत्, किन्तु तपा= अग्र मेऽनशनावमौदरिकादिरूप तप सम्पन्नमिति कृत्वा अधिपहेत-सन्तुष्येत् । भिक्षाया अलाभेऽपि वीर्यचारो मया सम्यगाराधित', यतो न केवलमन्नायर्थमेव भिक्षा चरण भिषणा, स्न्तुि वीर्याचारार्थमपि भगवता समादिष्टमिति भावार्थः ॥ ६॥ 'सइ काले' इत्यादि । भिक्षु उचित समय प्राप्त होनेपर ही मिक्षाके लिए जावें। उत्साहपूर्वक भिक्षार्थ भ्रमणरूप पुरुपार्थ करे। कभी भिक्षाका लाभ न हो तो ऐसा सोच न करें कि-'आज मुझे भिक्षा नही मिली, किन्तु ऐसा विचार करके सन्तुष्ट रहे कि-आज भिक्षा न मिली तो सहज ही मेरे अनशन आदि तप होगया, अर्थात् भिक्षाका लाभ न होनेपर भी मैने भली भाँति वीर्याचारका आराधन किया है। माधु केवल अन्नादिककी प्राप्तिके लिए भिक्षाचरी नहीं करते किन्तु वीर्या चारकी आराधनाके लिए भी भिक्षाचरीमें जानाभगवान ने बताया है ॥६॥ सद काले. त्यात लिनु GAt समय यता ४ लिखाने भाटे ઉત્સાહપૂર્વક ભિક્ષાર્થ ભ્રમણરૂપ પુરૂષાર્થ કરે કેઈવાર ભિક્ષાને તે એ વિચાર ન કરે ક આજ મને ભિક્ષા ન મળી ” પરંતુ એ વિચાર કરીને સંતુષ્ટ રહે છે-“આજ ભિક્ષા ન મળી તે સહેજે મારાથી અનશન આદિ તપ થઈ ગયું અર્થાત ભિક્ષાને લાભ ન થવાથી પણ મે ભલી પેઠે વર્યાચારનું આરાધન કર્યું છે સાધુ કેવળ અાદિની પ્રાપ્તિ માટે જ ભિક્ષા ચરી કરતા નથી, કિન્તુ વિચારની આરાધનાને માટે પણ ભિક્ષાચરીમાં જવું ભગવાને બતાવ્યું છે (૬) । , જાય લાભ ન થાય अध्ययन ५ उ. २ गा. ७-८-गोचर्या क्षेत्रयतना ५०५ . ૨ 3 ५ ७ ८ 11 क्षेत्रयतनामाइ-तहेवु०' इत्यादि। मूलम्-तहेवुच्चावया पाणा, भत्तट्टाए समागया । त उज्जुयं न गच्छिज्जा, जयमेव परकमे ॥७॥ छाया-तथैवोच्चावचाः प्राणाः, भक्तार्थ समागताः । तेपास्त्रजुक न गच्छेत्, यतमेव पराक्रामेत् ॥ ७॥ सान्वयार्यः-तहेव-उसीभार उच्चावया उच्च जातिके हसादिक अवच-नीच जातिके कौए आदि पाणा-माणी (यदि) भत्तहाए चुगा-पानीके लिए समा- गया आये हो-इकटे हुए हो तोत उज्जुय-उन माणियोके सामने नगच्छिज्जा नहीं जावे, (किन्तु) जयमेव यतनापूर्वक ही आसपाससे अथवा अन्य मार्गसे अर्थात् जिस तरह उन प्राणियों को किसी प्रकारका त्रास न पहुचे उसीतरह परक्कमे जावे ॥७॥ टीका-तथैव तद्वत् उच्चावचाः तत्र उदश्चः-उच्चजातीया हसादयः, अवाञ्चः= नीचजातीया' कारुप्रभृतय , यद्वा उच्चावचा! अनेरुविधा', "उच्चावच नैकभेद". मित्यमरात् , प्राणा माणिन भक्तार्थम् अन्न-पानार्थ मार्गादो समागताः समा- याता भवन्ति चेत् 'त'-तेपाम् , आपत्वात् पष्ठीबहुत्वे प्रथमैकवचनम् , ऋजुक- समुख न गच्छेत्, तेपामन्नपानान्तरायादिमचुरदोपापातात् । तर्हि किं कुर्यात् ? यतमेव-सयतनमेव व्यथा तेपा सत्रासो न भवेत्तथा पराकामेत् चरेत् अन्यमार्गेण अब क्षेत्रकी यतना हैं-'तहेवु० इत्यादि । हस-आदि उच्च-जातीय और काक-आदि नीच-जातीय प्राणी यदि भोजन पानके लिए रास्तेमें आये हो तो उनके सामने न जावें । सामने जानेसे उनके चुगे पानीमें विश्न पड जानेके कारण भक्त-पानकी अन्तराय आदि अनेक दोष लगते है, अत यतना-पूर्वक, अर्थात् जिससे वे भयभीत न हों उस प्रकार दूसरे मार्गसे या एक किनारेसे गमन करें। हुवे क्षेत्रनी यतना ४९ छ -तहेवु. (त्यादि હસ-આદિ ઉજાતીય અને કાગડો–આદિ નીચ જાતીય પ્રાણું જે ભેજન–પાનને માટે રસ્તામાં આવેલા હોય તે તેની સામે ન જવુ સામે જવાથી તેમને પાણી પીવા ચણવા વગેરેમાં વિન પડવાથી અતરાય આદિ અનેક દે લાગે છે એટલે યતનાપૂર્વક અર્થાત્ જે રીતે તેઓ ભયભીત ન થાય એ રીતે બીજે માગે યા એક બાજુએથી ગમન તાત્પર્ય એ છે કે ભકત પાનનો કરવું . । %3D ५०४ श्रीदशकालिको पुरुषार्थ भी कुना-करना चाहिये, और मिक्षा न मिलने पर वह अलाभु-आज मुझे भिक्षा नहीं मिली ति इस प्रकार न सोहज्जासोच न करे, किन्तु त: आज मेरे अनशन उनोदरी आदि तप हुआ है ति-इस प्रकार सोचकर अहियास-क्षुधा परीपहरो सहन करे-सन्तुष्ट रहे । तात्पर्य यह है कि-साधु ओको सिर्फ भिक्षाके ही रिए गोचरीमें घुमना नहीं है रिन्तु पीर्याचारके लिए भी भगवान्ने गोचरीमें घुमना कहा है ॥६|| दीका-'सह' इत्यादि । भिक्षुः कालेभिक्षोचितसमये प्राप्ते सति, यद्वा 'सइकाले' इत्यस्य 'स्मृतिकाले' इतिच्छाया तत्र-स्मर्यन्ते साधवी दातभिर्दानार्थ यस्मिन् समये तस्मिन्नित्यर्थ , चरेत्-भिक्षार्थ गन्छेत् । पुरुषकार पराक्रमम् उत्साहपूर्वकभिक्षार्थभ्रमणलक्षण कुर्यात्-पिद यात् । कदाचिदलाभे सति अलाभ अब भिक्षालाभो न सजात इति न शोचेत्न परितपेत्, किन्तु तप= अय मेऽनशनावमौदरिकादिरूप तप सम्पन्नमिति कृत्वा अधिपहेत सन्तुप्येत् । भिक्षाया अलाभेऽपि वीर्यचारो मया सम्यगाराधित', यतो न केवलमन्नापर्थमेव भिक्षा चरण भिक्षणा, रिन्तु वीर्याचारार्थमपि भगवता समादिमिति भावार्थः ॥ ६॥ 'सइकाले' इत्यादि। भिक्षु उचित समय प्राप्त होनेपर ही भिक्षाके लिए जावें। उत्साहपूर्वक भिक्षार्थ भ्रमणरूप पुरुषार्थ करे । कभी भिक्षाका लाभ न हो तो ऐसा सोच न करें कि-'आज मुझे भिक्षा नहीं मिली,' किन्तु ऐसा विचार करके सन्तुष्ट रहे कि-आज भिक्षा न मिली तो सहज ही मेरे अनशन आदि तप होगया, अर्थात् भिक्षाका लाभ न होनेपर भी मैने भली भाँति वीर्याचारका आराधन किया है। साधु केवल अन्नादिककी प्राप्तिके लिए भिक्षाचरी नहीं करते किन्तु वीर्या चारकी आराधनाके लिए भी भिक्षाचरीमे जानाभगवान ने बताया है ॥६॥ सद काले० त्या लक्षु यित समय यता ५ लक्षाने भाटे तय ઉત્સાહપૂર્વક ભિક્ષાર્થ ભ્રમણરૂપ પુરૂષાર્થ કરે કઈવાર ભિક્ષાને તે એ વિચાર ન કરે કે “આજ મને ભિક્ષા ન મળી ” કરીને સંતુષ્ટ રહે કે-આજ ભિક્ષા ન મળી તે સહેજે મારાથી અનશન આદિ તપ થઈ ગયું અર્થાત્ ભિક્ષાને ન થવાથી પણ મે ભલી પડે વિર્યાચારનું આરાધન કર્યું છે સાધુ કેવળ અન્નદિની પ્રાપ્તિને માટે જ ભિક્ષા ચરી કરતા નથી, કિન્તુ વચારની આરાધનાને માટે પણ ભિક્ષાચરીમાં लगवाने मतायुंछ (६) લાભ ન થાય પરંતુ એ વિચાર साल જવું होती है ॥१२॥ २ 3 ४ ५ ७ अध्ययन ५ उ. २ गा. १२-१३-मिक्षार्थ गृहप्रवेशविधिः ५०९ छाया-चनीपकस्य वा तस्य, दायकस्योभयो । अमीतिक स्याद् भवेत्, लघुत्ल प्रवचनस्य वा ॥ १२ ॥ पूर्वोक्त विधिके अपालन में दोप बताते हैं- सान्वयार्थः-(ऐसा न करनेसे) सिया कदाचित्-शायद तस्स-उस वणी- मगरसम्श्रमणादि वनीपक पर्यन्तको वा अथवा दायगस्सन्दाताको चाया उभयस्सब्दोनो-दाता और याचक को अप्पत्तिय अप्रीति द्वेप या मनमें खेद हो जाती है, वा और पवयणस्स-जिनशासनकी लहुत्त लघुता हुज्जा टीका-स्यात् कदाचित् वनीपफस्य याचकविशेपस्य वा अथवा तस्य= श्रमणादेः, दायकस्य दातुर्वा, उभयोः दातृ-याचकयोर्वा अप्रीतिक द्वेपः, मन:- खेदो वा भवेत्, प्रवचनस्य-जिनशासनस्य लघुत्व लघुता वा भवेदिति सम्पन्धः॥१२॥ कदा गन्तव्य -मित्याह-'पडिसेहिए' इत्यादि। मूलम्-पडिसेहिए व दिन्ने वा, तओ तम्मि नियत्तिए । उवसकमिज भत्तहा, पाणहाए व संजए ॥ १३ ॥ छाया-प्रतिपेधिते वा दत्ते वा, ततस्तस्मिन् निवृत्ते । उपसकामेत् भक्तार्थ, पानार्थ वा संयतः ॥१३॥ कव जाना चाहिये, सो बताते हैं- सान्वयार्थ:-पडिसेहिए-दाताके निषेध कर देने पर व=अथवा दिने अन्नादिके दिये जाने पर वाया दाताके मौन साधने पर तओ=उस स्थानसे सभव है, उन्हें उल्लङ्घन करके जानेसे या उनके सामने खडे रहनेसे उस वनीपक या दाताको अथवा दोनोंको ढेप तथा खेद उत्पन्न होजाय। तथा प्रवचनकी लघुना होती है। अत. उन्हें उल्लंघन करके जाना सायुका कल्प नहीं है ॥१२॥ कर जाना चाहिए ' सो कहते हैं-'पडिसेहिए' इत्यादि । સભવિત છે તેમને એળગીને જવાથી યા એમની સામે ઊભા રહેવાથી એ વનપક યા દાતાને અથવા બેઉને દ્વેષ તથા ખેદ ઉત્પન્ન થઈ પ્રવચનની લઘુતા થાય છે, એટલે એમને ઓળગીને જવું એ સાધુને કાપ ध्यारे नये ? छ-पडिसेहिए. त्या १२ १० १९ ८ . , જાય તથા नथी (१२) ५०८ श्रीशिवकालिकमूत्रे सान्चयायः-सजग-साधु भत्तहा अन्नके लिए और पाणट्ठा सव=पानीके लिए ही उसकमत-गृहस्थके घर पर आते हुए समण-निर्ग्रन्य मुनिको वावि- अथवा मारणामणको किविण=कृपण वा अथवा वणीमग-दरिद्री भिखारीको (देखकर) तम्उन श्रमणादिको आकमित्तु लापकर न पविसे: गृहस्थके घरमें न जावे, नवि औरन चरयुगोयरे-उनके दृष्टिगोचर दृष्टिमार्गमें चिट्टे-ठहरे, (किन्तु) एगत एकान्त स्थानमें-जहा उनकी दृष्टि न पडती हो ऐसी जगह अबफमित्ता-जाकर सजए-इन्द्रियोका सयम करता हुआ-चुप-चाप तत्थबहा चितुम्खडा रहे ॥१०॥११॥ टीका-'समण' इत्यादि, 'तमह' इत्यादि च। सयतः, गृहस्थद्वारे भक्तार्यमेव पानार्थमेव, एवशब्दस्योभयत्र सम्बन्धः । उपसकामन्त समीपमायान्त यान्त वा श्रमणादिक दृष्ट्रेति शेषः। तत्र वनीपका याचकविशेपः, अन्यत् सुग मम् । त=श्रमणादिकम् अतिक्रम्य उल्लङ्घय तस्याग्रतो भूत्वेत्यर्थ. गृहस्थगृह न पविशेत् , एतावदपि न, तेपा चक्षुर्गोचरेऽपि दृष्टिपथेऽपि न तिष्ठेत किन्तु स सयत एकान्त यत्र तेपा दृपिन पतेत् तमदेशम् अवक्रम्य गत्वा तत्र तिष्ठेत् ॥१०॥११॥ पूर्वोतविधेरपालने दोपमाह-वणीमगस्स' इत्यादि । मूलम्-वणीमगस्स वा तस्स, दायगस्सुभयस्स वा। अप्पत्तिय सिया हुजा, लहुत्त पवयणस्स वा ॥१२॥ समण' इत्यादि, 'तमइ०' इत्यादि । श्रमण, ब्राह्मण, कृपण और वनीपकको गृहस्थके दर्वाजे पर भोजन या पानीके लिए आया देखकर साधु उसे उल्लङ्घन करके गृहस्थके घरमें प्रवेश न करें, इतना ही नहीं, जहाँ उनकी दृष्टि पडती हो ऐसे स्थान पर भी खडे न हो, किन्तु एकान्त प्रदेशमें जाकर स्थित होवें, जहा उनकी दृष्टि न पहुँचे॥१०॥१२॥ ऐसा न करनेमें दोप कहते है-'वणीमगस्स' इत्यादि । સમળ૦ ઈત્યાદિ તથા તમg૦ ઈત્યાદિ શ્રમણ બ્રાહ્મણ, કુપણું અને વની પકને ગૃહસ્થના દરવાજા પર ભેજન યા પાને માટે આવેલા જેઈને સાધુ એમને ઓળગીને ગૃહસ્થના ઘરમાં પ્રવેશ ન કરે, એટલું જ નહિ દૃષ્ટિ પડતી હોય એવા સ્થાન પર પણ ઊભે કિંતુ એકાત પ્રદેશમાં જઈને ઊભે રહે કે જ્યાં એમની દષ્ટિ પહોચે નહિ (૧૦–૧૧) सभ न पामा ५ ४ है-'वणीमगस्स.. त्या २ 3 ४ ५ १ १२ १० . જ્યા એમની , . १ ४ 3 २ ८ 13 १४ ૧૫ ૨૦ १७ ૧૮ ૨૨ ૨૫ ૨૪ 23 अ ययन ५ उ. २ गा. १४-१७-पुष्पसस्पर्शकहस्ताद्भिशानिषेधः ५११ टीका---'उप्पल' इत्यादि 'त भवे' इत्यादि च । उत्पलश्यामल-धवल- लोहित-भेदेन निविध कमलम् , अपित्रा पद्मसूर्यविकासि कमल, कुमुदचन्द्र- विकासि कमल वा अथवा मगदन्तिका-मालतीपुष्पम् , अन्यद्वा पुष्पसचित्त= पुष्पेषु सचित्त पुष्पसचित्त सचित्तपुष्पमात्रमित्यर्थः, तच सलुम्च्य-सद्धि यदि दात्री भक्त-पान दद्यात्, तर्हि तद् भक्तपान तु सयतानामग्राह्यं भवेदिति ददती मत्याचक्षीत-ताश-दोपयुक्त मे मम न कल्पत इति ॥ १४ ॥१५॥ मूलम्-उप्पलं पउमं वावि कुमुयं वा मगदतिय । अन्न वा पुप्फसचित्तं, त च समदिया दए ॥ १६ ॥ त भवे भत्तपाणं तु, सजयाण अकप्पिय । दितिय पडियाडक्खे, न मे कप्पइ तारिस ॥ १७ ॥ छाया-उत्पल पद्म वाऽपि कुमुद वा मगदन्तिकाम् । अन्यद्वा पुष्पसचित्त तच्च समय दद्यात् ॥ १६ ॥ तद् भवेद् भक्तपान, तु सयतानामफल्पिकम् । ददती प्रत्याचक्षीत न मे कल्पते तादृशम् ॥ १७ ॥ सान्वयार्थः-उप्पल नील कमल पउम-रक्त कमल बाधिम् अथवा कुमुय चन्द्रविकासी कमल वान्या मगदतिय मालती-मोगरेके फूलको वा अथवा अन्नदूसरे भी इसी प्रकारके जो पुप्फसचित्त सचित्त पुष्प हैं तच उनको भी (अगर) समद्दिया-पैरो आदिसे कुचलकर दए देवे तो तबह भत्तपाण तु= 'उप्पल' इत्पादि, 'त भवे' इत्यादि। दाता नीला सफेद और लाल कमल, सूर्यविकासी कमल, चन्द्रविकासी कमल, मालतीका फूल तथा अन्य सचित्त पुष्प तोड कर आहारपानी देवे तो वह सयमियोके लिए ग्राह्य नहीं है इसलिए देनेवालीसे कहे कि ऐसा दोपयुक्त आहार मुझे नहीं कल्पता है ॥१४॥ १५ ॥ उप्पर. त्या तथा त भवे. त्याहिले. हाता, नीयु स या કમળ, સૂર્યવિકાસી કમળ, ચદ્રવિકાસી કમળ, માવતીનું પુલ તથા અન્ય સચિત્ત સુખ તાડીને પછી આહાર પણ આપે તે સમીઓને માટે ગ્રાહ્યા નથી તેથી તે આપનારીને સાધુ કહે કે એ દોષયુકત આહાર મને કલ્પ . લાલ नया (१४-१५) -- 8 २ ५ ७ ८ ११११ १३ ૧૫ २० १७ २२ ૨૫ ૨૪ श्रीदशवकालिकम्ने तम्मि उन अमणादिकोके नियत्तिए चले जाने पर सजा-माधु भरावा आहार व अथरा पाणहाए-पानी के लिए उवसकमिज्ज-जावे ॥१३॥ टीका-प्रतिषेधित यात्रा प्रतिषेध मा वा-अयमा दत्ते अनादिके, वाश. दादातुस्तूप्णीभागवलम्पनाद् रिलम्मादिनिमित्ताशाहा तवा तत्स्थानात् तस्मिन-धनीपकादौ निटत्ते प्रतिनिवृत्ते सति सपतः भक्तार्थ पानार्थ वा उपस- कामेत्-भिक्षा ग्रहीतु गच्छेत् ।। १३ ॥ मूलम् उप्पलं पउम वावि, कुमुय वा मगदतियं । अन्न वा पुप्फसञ्चित्त, त च सलंचिया दए ॥ १४ ॥ त भवे भत्तपाण तु, संजयाण अकप्पिय । दितिय पडियाइक्वे, न मे कप्पइ तारिस ॥१५॥ छाया-उत्पल पद्म वाऽपि, कुमुद वा मगदन्तिकाम् । अन्यद्वा पुष्पसचित्त, तच्च सलन्च्य दद्यात् ॥ १४ ॥ तद् भवेद् भक्तपान तु सयतानामकल्पिकम् । ददतीं प्रत्याचक्षीत, न मे कल्पते तादृशम् ॥ १५ ॥ सान्वयार्थ -उप्पल नील कमल पउम-रक्त कमल वावि अथवा कुमुय- चन्द्रविकासी कमल वा-या मगदनिय-मालती-मोगरेके फूलको वा अथवा अन्न-दूसरे भी इसी प्रकारके जो पुप्फसचित्त सचित्त पुष्प हो तच उनको भी (अगर) सलुचिया-लोच करके दए देवे तो त-बह भत्तपाण तु-आहार- पानी सजयाण=सयमियोको अकप्पिय अकल्पनीय भवे होता है, अत दितिय दनेवालीसे पडियाइवखे-कहे कि तारिसइस प्रकारका आहार मे मुझे न कप्पइ नही कल्पता है ॥१४॥१५॥ दाताके वनीपक आदिको दान देनेकी मनाकर देने पर, अथवा अन्न आदिके देदेने पर या मौन साध लेने पर, अथवा विलम्ब होने आदिके कारणसे जब वह धनीपक आदि उस घरसे लौट जाय तब सयमीको भक्त पानके लिए उस घरमे जाना चाहिए ॥१३॥ દાત એ વનપક આદિને દાન દેવાની મનાઈ કર્યા પછી અથવા આદિ આપી ચૂક્યા પછી યા મૌન સાધી લીધા પછી અથવા વિલ ળ ઈત્યાદિને કારણે જ્યારે એ વનપક આદિ એ ઘરથી ભત પાનને માટે એ ઘરમાં જવું જોઈએ (૧૩) . - અન્ન ક t ४ 3 २ ५ ८ ८ ૧૧ ૧ર 13 ૧૫ ૨૦ १७ ૧૯ २१ ૨૨ २५२४ २३ अध्ययन ५ उ. २ गा. १४-१७-पुष्पसस्पर्शकहस्ताद्भिशानिषेधः टीका-'उप्पल' इत्यादि 'त भवे' इत्यादि च । उत्पल-श्यामल-धवल- लोहित भेदेन विविध कमलम् , अपिवा प=मूर्यविकासि कमल, कुमुद-चन्द्र- विकासि कमल वा अथवा मगदन्तिका मालतीपुष्पम् , अन्यद्वा पुष्पसचित्त पुष्पेषु सचित्त पुप्पसचित्त सचित्तपुष्पमात्रमित्यर्थः, तच्च सलन्स्य-सछिप यदि दात्री भक्त-पान दद्यात्, तर्हि तद् भक्तपान तु सयतानामग्राह्यं भवेदिति ददतीं मत्याचक्षीत-तादृशम्दोपयुक्त मे मम न कल्पत इति ॥ १४ ॥ १५ ॥ मूलम्-उप्पलं पउमं वावि कुमुय वा मगदतिय । अन्न वा पुप्फसचित्त, त च समदिया दए ॥ १६ ॥ तं भवे भत्तपाणं तु, संजयाण अकप्पिय । दितिय पडियाडक्खे, न मे कप्पइ तारिसं ॥१७॥ छाया-उत्पल पद्म वाऽपि कुमुद वा मगदन्तिकाम् । अन्यद्वा पुप्पसचित्त तच्च समय दद्यात् ॥ १६ ॥ तद् भवेद् भक्तपान, तु सयतानामकल्पिकम् । ददती प्रत्याचक्षीत न मे कल्पते तादृशम् ॥ १७ ॥ सान्वयार्थ:-उप्पल नील कमल पउम-रक्त कमल वाचि अथवा कुमुय% चन्द्रविकासी कमल वा-या मगदतिय-मालती-मोगरेके फूलको वा अथवा अन्न-दूसरे भी इसी प्रकारके जो पुप्फसञ्चित्त सचित्त पुष्प हैं तच उनको भी (अगर) समद्दिया पैरो आदिसे कुचलकर दण्=देवे तो त=बह भत्तपाण तु- 'उप्पल' इत्पादि, 'त भवे' इत्यादि । दाता नीला सफेद और लाल कमल, सूर्यविकासी कमल, चन्द्रविकासी कमल, मालतीका फूल तथा अन्य सचित्त पुप्प तोड कर आहारपानी देवे तो वह सयमियोंके लिए ग्राह्य नहीं है इसलिए देनेवालीसे कहे कि ऐसा दोपयुक्त आहार मुझे नही कल्पता है ॥ १४ ॥ १५ ॥ उप्पल० त्या तथा त भवे. त्याने हाता, नीड स या કમળ, સુવિકસી કમળ, ચદ્રવિકાસી કમળ, માલતીનું ફુલ તથા અન્ય સચિત્ત શા તેડીને પછી આહાર પણ આપે છે તે સમીઓને માટે ગ્રાહ્યા નથી આપનારીને સાધુ કહે કે એ દોષયુકત આહાર મને કાતે લાલ તેથી તે नधी (१४-१५) . ५१२ श्रीदशवकालिनमूत्रे आहार-पानी सजयाण-सयमियोको अप्पिय अल्प्य भवेदोता है, (अतः) दितिय देनेवालीसे पडियाक्रो-कहे कि तारिस-इस प्रकारका आहार मे= मुझे न कप्पहनही कल्पता है ॥१६॥१७॥ टीका-'उप्पल' इत्यादि, 'त भवे' इत्यादि । उत्पलादिक सम- करचणादिना तत्समर्दन कृत्या, अशनादि दधात् तद् भक्त-पान तु सयतानाम- ग्राह्यमित्यादि पूर्वपद् व्याख्येयम् । अत्र 'समर्थ' शब्देन समर्दन यथा कथञ्चि स्पर्शमानमपि गृह्यते, उत्पलादिगतमक्ष्मजीगना तापताऽपि पीडोत्पत्तेरवश्यम्भा वात् । 'समदमाणी पाणाणि वीयाणि हरियाणि य' इत्यस्यैव प्रथमोद्देशके सपस्तवनस्पतीना ग्रहणेऽपि पुनरोत्पलादीना ग्रहण न पुनरुक्तिदोपजनक, पूर्वत्र सामान्यरूपेणाऽन च विशेषरूपेणोपादानादिति बोध्यम् ॥ १६ ॥ १७ ॥ 'उप्पल' इत्यादि, 'त भवे' इत्यादि। पूर्वोक्त उत्पलादिकोंमेंसे किसी सचित्त फूलको मर्दन करके अथवा सघटा मात्र भी करके आहार देवे तो देनेवालीसे साधु कहे कि ऐसा आहार लेना मुझे नहीं कल्पता है। यहा 'मर्दन' शब्दसे स्पर्शमात्रका भी ग्रहण होता है, क्योंकि कमल आदिके जीवोंको स्पर्श करनेसे भी अवश्य पीडा होती है। प्रथम उद्देशमे "समद्दमाणी पाणाणि बीयाणि हरियाणिय' इस पदसे ही सब वनस्पतिकायका ग्रहण कर लिया था, यहाँ फिर उत्पल आदिका ग्रहण किया है यह पुनरुक्ति दोष नहीं समझना चाहिए, क्योंकि पहले सामान्यरूपसे निषेध किया था और यह विशेषरूपसे निषेध किया है ॥१६॥१७॥ उप्पल छत्याल, तथा त भवे त्या पूरित भ७ माहिभाथी । સચિત્ત ફૂલનું મર્દન કરીને અથવા માત્ર સઘન પણ કરીને આહાર આપે તે આપનારીને સાધુ કહે કે એ આહાર લેવે મને કલ્પ નથી અહી “મને શબ્દથી સ્પર્શ—માત્રનું પણ ગ્રહણ થાય છે, કારણ કે સ્પર્શ કરવાથી પણ અવશ્ય પીડા થાય છે प्रथम दे-रामा समद्दमाणी पाणाणि वीयाणि हरियाणि य ये पहथी । मधी वनस्पतिशायर्नु अहए ४२वामा भाष्य હતુ, અહી ફરીથી કમળ આદિનું ગ્રહણ કર્યું છે, એ પુનરૂકિત દેષ સમજ નહિ, કારણ કે પહેલા સામાન્યરૂપે નિષેધ કર્યો હતે. અને અહીં વિશેષરૂપે निषेध यो, (१६-१७) કમળ આદિના ને .

अध्ययन ५ 3. २ गा.१८-२०-सचिचहरितफायनिषेधः २ 3 ४ ८ ८ ૧૭. ૧૮ १२ ૧૧ , २० ૨૧ मूलम्सालयं वा विरालियं, कुमुयं उप्पलनालिय। मुणालियं सासवनालियं, उच्छुखडं अनिव्वुडं ॥१८॥ तरुणगं वा पवालं, खस्स तणगस्त वा । अन्नस्स वावि हरियस्स, आमगं परिवजए ॥१९॥ छाया-शालक वा चिरालिका, कुमुदम् उत्पलनालिकाम् । मृणालिका सर्पपनालिकाम् , इक्षुग्वण्डम् अनितम् ॥ १८ ॥ तरुणक वा प्रवाल, वृक्षस्य, तृणरुस्य वा। अन्यस्य चापि हरितस्य, आमक परिवर्जयेत् ॥ १९ ॥ सान्वयार्थः-सालय कुमुदादिका मूल विरालियः-पलासका कन्द-साधारण वनस्पतिविशेष कुमुय चन्द्रविकासी श्वेत कमल उप्पलनालिय-कमलनाल मुणालिय कमलतन्तु सासवनालिय सरसोकी भाजी या कान्दल वा अथवा उच्छुखड-गनेके टुकडे, (ये सब यदि) अनिव्वुड शस्त्रपरिणत-अचित्त-न हो तो, (तथा) रुक्खस्स-इमली आदि वृक्षके वा अथवा तरुणगस्स-मधुर तृणादि- कोके वा और अन्नस्सवि-दूसरे प्रकारके भी हरियस्स-हरित कायके तरु- णग-कोपल पत्ते आदि वा अथवा पवालकची कोपल-नहीं खिले हुए पत्ते- आदि आमग-सचित्त हों तो उन्हें परिवज्जएचरजे-नही लेवे ॥१८॥१९॥ टीका---'सालुय' इत्यादि 'तरुणग' इत्यादि च। शालूका कुमुदादिमूल, विरालिका-पलाशकन्द साधारणवनस्पतिजातिविशेप, कुमुदचन्द्रविकासिश्वेत- कमलम्, उत्पलनालिका कमलनाल, मृणालिका-विस 'भे' इति भाषापसिद्धा, सर्पपनालिका-सर्पपपत्रशाक, सर्पषकन्दलीं था, इक्षुखण्डम् इक्षुशकल वा, एत- सर्वम् अनिर्वृतम् शस्त्राऽपरिणतम् । तथा वृक्षस्य अम्लिकादेः वा अथवा 'सालुय' इत्यादि, 'तरुणग' इत्यादि। कमलका मूल, पलाश (ढाक) का मूल अर्यात साधारण वनस्पतिकी जातिविशेष, तथा सफेद कमल, कमलकी नाल, सरमोंके पत्तेका शाक, गन्नेका खण्ड, सालय त्याle, तरुणाग. याl६ भातु भूग, पक्षाशर्नु भूव, अर्थात સાધારણ વનસ્પતિની જાતિ વિશેષ, તથા સફેદ કમળ, કમળની નાળા, પાદડાનું શાક, શેરડીની કાતળી એ બધા ને શસ્ત્રથી પરણિત ન હોય તે એને ये सब સરસવના ५१४ श्रीदवेकालिमत्रे कृष्णकस्य मधुरतृणादे', अन्यस्य हरितस्यापि मा हरितकायमात्रस्य तरुण-तरुण- दशाऽऽपन्न पत्रादिक, प्रपालमुकुमार पत्रादिक बा, आमासचित्त परिवर्जयेत् ॥ १८॥ १९ ॥ ४ 3 १२ मे: मूलम्-तरुणियं वा छिवार्डि, आमिय भन्जिय सह। दितिय पडियाइक्खे, न मे कप्पड तारिस ॥ २० ॥ छाया-तरुणिरा पा लिगाडीम्, आमिका भजिता सकृत् । ददती प्रत्याचक्षीत, न मे कल्पते तादृशम् ।। २० ।। सान्चयार्थः-तरुणिय-कची जिसके पीज पके नहीं हो ऐसी वा अथवा सह एक बार भज्जियम्भुनी हुई आमिय-सचित्तग्विार्डि-फलीको दितिय% देनेवालीसे (साधु) पडियाइक्खे कहे कि तारिस-इस प्रकारका आहार मुझे न कप्पइ-नहीं कल्पता है ॥ २० ॥ टीका-'तरुणिय' इत्यादि। तरुणिकाम् अपरिपक्वीजाम् अपरित्यक्तत्वक्- सश्लेपावस्थापन्नामित्यर्थः, छिवाडी देशीयोऽय शब्द.' मुद्न चवल तुवरिका: दिफरिका सकृद्भर्जिताम्-एकवार भृष्टा चा=अथवा आमिका सचित्ता ददतीं प्रत्याचक्षीत ताश मे न कल्पत इति । ॥२०॥ यदि शस्त्रसे परिणत न हों तो इनका, तथा-इमली आदि वृक्षके, मधुर तृण आदिके तथा अन्य हरेक वनस्पतिके पत्ते कोंपल आदि जो सचित्त हों तो उनका त्याग करना चाहिए ॥१८॥१९॥ 'तरुणिय' इत्यादि। जिसके बीज न पके हो ऐसी मूंग, चवला, तुअर (अरहर) आदिकी फली एक वार पूँजी हुई हो तथा सचित हो तो देनेवाली बाईसे साधु कहे कि यह लेना मुझे नहीं कल्पता है ॥ २० ॥ તથા આબલી આદિના વૃક્ષના મધુર તા આદિના, તથા બીજી બધી વનસ્પતિના પાદડા, કુળ, આદિ જો સચિત્ત હોય તે એને ત્યાગ કરે એ (૧૮) (૧૯) રાજ ઈત્યાદિ જેના બીજ પાકયા ન હોય એવા મગ, ચાળા, તુવેર આદિની સીગ એકવાર ભૂજેલી હોય તથા સચિત્ત હોય તે તે આવનારી બાઈને સાધુ કહે કે એ લેવી અને કલ્પતી નથી अध्ययन ५ उ. २ गा. २१-२२-सचित्ताहार-पाननिषेधः ५१५ ५ ८ ४ मूलम्-तहा कोलमणुस्सिन्न, वेल्लुयं कासवनालिय । तिलपप्पडग नीम, आमगं परिवजए ॥ २१ ॥ छाया-तथा कोलमनुत्स्विन्न, वेणुक काश्यपनालिकाम् । तिलपर्पटक नीपम् , आमक परिवर्जयेत् ॥ २१ ।। सान्ग्यार्थः-तहा-उसी प्रकार अणुस्सिन्न-विना आले हुए कोलमेर तथा वेलुय केर या वासकी कोपल कासवनालिय-श्रीपर्णीका फल तिल- पप्पडग-तिलपापड़ी नीम-कदम्मका फल (ये सब यदि) आमग-सचित्त हो तो उन्हें परिवज्जएवजे ॥२१॥ टीका-तहा' इत्यादि । तथा तद्वत् अनुत्स्विन्न सलिलानलसयोगेनाऽनु- स्वालितम् - अकथितमित्यर्थः, कोलम्बदरीफलम् , कोलम्बदरीफलम्, आमकम् अशस्त्रोपहतम्, अस्य वेणुकादौ सर्वत्र सम्बन्धः, वेणुक-वशरीर वशाङ्कुरमित्यर्थः, काश्यप- नालिका-श्रीपर्णीफलम्, अत्र - 'आमग'-मित्यस्य लिङ्गविपरिणामेनान्वयः। तिलपर्पटक प्रसिद्धमेव, 'नीप-कदम्पफल परिवर्जयेत् ।। २१ ॥ मूलम् तहेव चाउल पिट्ट, वियड वा तत्तनिव्वुड । तिल-पिट पूइ-पिन्नागं, आमगं परिवजए ॥२२॥ छाया-तथैव ताण्डुल पिष्ट, विकट वा तप्तनिप॒तम् । तिलपिष्ट पूतिपिण्याकम् , आमक परिवर्जयेत् ॥ २२ ॥ सान्वयार्थः-तहेव-उसी प्रकार चाउल पिट-चाँवलोका आटा तथा और भी किसी तरहका आटा वा अथवा तत्तनिवुड-पहले गर्म किया हुआ किन्तु १ 'नोम' इत्यत्र 'नीपाऽऽपीडे मोवा' (पा. ८।१।२३४) इतिमाकृतमत्रेण पस्य मः।। 'तहा कोल.' इत्यादि । इसी प्रकार जल और अग्निमें नहीं उबाले हुए वेर, सचित्त बाँसके अक्कुर तथा काश्यपनालिका (गभारीफल) तिलपापडी और कदम फल ये सब यदि सचित्त हों तो इनका लाग करे-ग्रहण न करे ॥ २१ ॥ तहा कोल० त्याह से प्रभा १७ भने भनिभा ना Branार, તથા કશ્યપનાલિકા (ગભારી ફળ), તલપાપડી અને કદમ્બના ફળ ને સચિત્ત હોય તે એને ત્યાગ કરવ-ગ્રહણ કરવા નહિ (૨૧) સચિત્ત વાસના આ કુર श्रीदशकालिको फिर ठडा होया हुआ वियह पानी तिलपिट-तिलयुट्टा पूपिन्नाग-सरसों खल (ये) आमग सचित्त हों तो परिवज्जपवरजे ॥२२|| टीश-'तहेच' इत्यादि । तथैवमतेनैव मकारेण ताण्डल-तण्डुलसम्बन्धि पिट-चूर्णम्, उपलक्षणमेतद्गोधूमादेरपि, पा-भधका तप्तनित-पूर्व तप्त पधान्नि त-शीतल यत्तत्तथोक्तम्, उप्णोदक यदा शेत्यापन्न ततः कालादारभ्य ग्रीष्मे यामपञ्चकाचं शीतकाले यामचतुष्टयात्पर, वर्षाकाले च प्रहरत्रयानन्तर सचित्त जायते । अत्रेय सङ्ग्रहगाया- "जम्मि समयम्मि उण्डो,-दग च सीय भवे तओ पच्छा । पच चउ तिय-जामा, गिम्हे हेमत पाऊसे ॥१॥" इति ॥ विकट समयपरिभापया सलिलं, तिलपिष्ट-तिलकुट प्रसिद्ध, पूतिपिण्या: सर्पपपरकम् आमरं सचित्त परिवर्जयेत् ॥२२ ।। १ छाया-" यस्मिन् समये उष्णोदक च शीत भवेत्तत पश्चात् । पञ्चचत खिमयामाः, ग्रीष्मे हेमन्त-मावृपो ॥१॥ 'तहेव' इत्यादि । इसी प्रकार तत्कालका पीसा हुआ चाँवल गे? आदिका आटा तथा पहले अचित्त होने पर भी कालकी मर्यादा व्यतीत होने पर पुनः सचित्त हुआ जल, तुरतका बना हुआ तिलकुद, तत्कालकी सरसों आदिकी खली, इन सचित्त वस्तुओंको ग्रहण न करे। गर्म पानीके अचित्त रहनेकी मर्यादा-ठढा होजाने पर ग्रीष्म ऋतुमे पाच पहर, शीतकालमे चार पहर और वर्षाकालमें तीन पहरकी होती है, उसके बाद वह (जल) सचित्त होजाता है। इस विषयमें एक सग्रह गाथा है जो सस्कृत-टीकामें लिखी गई है ॥ २२ ॥ तहेव० त्यादि मे प्रभारी ने यो योमा Us આદિને આટે, તથા પહેલા અચિત્ત હોવા છતા પણ કાળની મર્યાદા વ્યતીત થતા પુન સચિત્ત થએલુ જળ, તુરતને બનાવેલો તલકુટ, સુરતની સરસવ આદિની ભેળ એ સચિત્ત વસ્તુઓને પણ ગ્રહણ ન કરે ગરમ પાણી અચિત્ત રહેવાની મર્યાદા ઠંડુ થઈ ગયા પછી શ્રી હનુમા પાચ પહેર, શીયાળામાં ચાર પહેર અને વર્ષાઋતુમાં ત્રણ પહેરની હોય છે, ત્યારબાદ એ જળ સચિત્ત બની એ વિષયમાં એક સગ્રહગાથા છે તે સસ્કૃત ટીકામાં લખી છે (૨૨) જાય છે अभ्ययन ५ उ २ गा. २३-२४-सचित्ताहारनिषेधः ५ 3 ४ ७ ८ . मूलम् कविट्ठ माउलिग च, मूलग मूलगत्तियं । आमं असत्थपरिणय, मणसावि न पत्थए ॥ २३ ॥ छाया--कपित्य मातुलिङ्ग च, मूलक मूलकर्तिकाम् । आमम् अशस्त्रपरिणते, मनसाऽपि न मार्थयेत् ॥ २३॥ सान्वयार्थ :-कवि-कैय-कविठ माउलिंग-विजौरा मूलगं-मूला च और मूलगत्तियन्मूलेके कन्दका टुकडा आमचा असत्यपरिणय-स्वकाय पर- काय आदि शस्त्रसे परिणत न हुआ हो तो उसे मणसाविमनसे भी न पत्थए न चाहे ॥२३॥ टीका-'कविह' इत्यादि । कपित्य 'कैय कविठ' इति भापाया, मातु- लिङ्ग-धीजपूरक 'विजौरा नीनू' इति भापाया, मूलम् सपत्र, मूलकर्तिका मूलक- कन्दखण्डम्, आमम् अपकम् , अशस्त्रपरिणतम्-अलब्धस्वपरकायादिशस्त्रयोग मनसाऽपि न माधयेत् एतद्विपयिणीमिच्छामपि न कुर्यादित्यर्थः। 'आमम्' इत्यस्य 'अशस्त्रपरिणतम्' इत्यस्य च लिगविपरिणामेन 'मूलकत्तिका'-मित्यत्र सम्बन्यः । मूलकस्याऽनन्तकायत्वात् शस्त्रपरिणतिर्दुष्करेति बोधयितुमेकार्थकस्या- ऽऽमादिशब्दद्वयस्योपादानम् ।। २३॥ मूलम्-तहेव फलमणि, वीयमथूणि जाणिय । विहेलग पियाल च, आमग परिवजए ॥२४॥ छाया-तथैव फलमन्यून वीजमन्यून ज्ञात्वा । विभीतक मियाल च, आमक परिवर्जयेत् ॥ २४ ।। 'कविटु' इत्यादि । कैथ (कविठ) विजौरा नीबू, मृला और मूलेके खण्ड यदि अचित्त-शस्त्रपरिणत न हो तोइन्हें ग्रहण करनेकी इच्छा भी नहीं करनी चाहिए। मूला अनन्तकाय है, अत. उसका शस्त्रपरिणत होना कठिन है इसीसे यहा एक अर्थवाले 'आमक' और 'अशस्त्र- परिणत' ये दो शब्द दिये है ॥ २३ ॥ कविट्ठ- त्या , मीन-दीभु, भूगा अने भूगाना અચિત્ત-શસ્ત્રપરિણત ન હોય તે તે ગ્રહણ કરવાની ઈચ્છા પણ ન કરવી જોઈએ મૂળે અન તકાય છે એટલે એ શપરિણુત કે કઠિન છે, તેથી અહી એક અર્થવાળા “આમક અને “અશસ્ત્ર પરિણત એવા બે શબ્દો આપેલા છે (૨૩) २ 3 ૫ ७ e Bha ५ ६ ४ ३ २ ७ ५१८ श्रीदर्शवकालिकमंत्र सावयार्थः-तहेव-इसी प्रकार फलमधूणिचेर आदि फलोंका चूर्ण चरा घीयमधूणि-शालि आदि चीजोंका चूर्ण-चरा विहेलग-बहेडा च और पियालरायण अथवा दाख (इन्हें) आमग-सचित्त जाणिय जानकर-नाने तो परिवज्जए घरजे-न ले ॥ २४ ॥ टीका-'तहेच फल०' इत्यादि । तथैव-तद्वत् फलमन्यून-बदरादिचूर्णान्, वीजमन्धून-फलपीजचूर्णान्, विभीतक 'हेडा' इति प्रसिद्ध, च-पुन. मियाल-राजादनफल 'रायण' इति भापापसिद्धम् । यद्वा 'मियाला'-मिति चाया, मियाला द्राक्षाम् , आमा-सचित्त ज्ञात्वा परिवर्जयेत्, सचित्त चेन्न गृही यादित्यर्थः । यद्वा 'जाणिय' इत्यस्य 'याँथे-ति छाया, याँश्च वीजमन्यूनि- त्यन्वयः ॥ २४ ॥ मूलम्-समुयाण चरे भिक्खू , कुल उच्चावय सया। नीय कुलमइकम्म, ऊसढ नाभिधारए ॥२५॥ छाया-समुदान चरेद् भिक्षु , कुलमुच्चावच सदा । नीच कुलमतिक्रम्य, उच्छित नाभिधारयेत् ॥२५॥ सान्त्रयार्थ -भिक्खू-साधुको सया हमेशा उच्चावय-ऊच-नीच अर्थात् धनवान् और गरी कुल कुल-घर में समुयाण शुद्ध भिक्षाका अनुसन्धान पूर्वक चरे-घूमना चाहिए, (किन्तु) नीयगरीव कुल-कुल घर को अइक्कम्म-छोडकर जसढन्धनवान के घरपर नाभिधारए-नहीं जाना चाहिए ॥२५॥ टीका-'समुयाण' इत्यादि । भिक्षुः सदा-नित्यम् उच्चावचम्-उद- उच्च निधान्यादिसमृद्धम् , अवाक् अवच-तद्विकल कुल प्रति समुदान-गृहस्थ तहेव फल०' इत्यादि। इसीप्रकार बेर आदिका चूरा, फलके पीजोंका चूरा, तथा बहेडा, रायण अथवा दाख,ये सचित्त हो तो ग्रहण न करे ॥२४॥ 'समुयाण' इत्यादि । भिक्षु सदा धन-धान्य आदिसे समृद्ध कुलोंमें तथा धन-धान्यहीन कुलोंमें समुदानी भिक्षाके लिए गमन करें। एकही તવ ૮૦ ઈત્યાદિ એ પ્રકારે બેર આદિનું ચૂર્ણ, ફળના બીજનું ચૂર્ણ તથા બહેડા, રાયણ અથવા દ્રાક્ષ એ સચિત્ત હોય તે ગ્રહણ કરવા નહિ (૨૪) समुयाण. या भिक्षु सहा धन धान्य माहिया समृद्ध गोमा तथा ધન ધાન્યથી હીન કુળોમાં સમુદાની ભિક્ષા માટે એક જ ઘેરથી . ગમને ४२ ३ २ ५ अध्ययन ५ उ. २ गा. २५-२६-भिक्षाचरणे विवेकोपदेशः समुदायसम्बन्धि भैक्ष्य, न त्वेकस्मिन्नेव गृहे तत्राऽऽधाकर्गदिदोषसम्भवादिति भावः, चरेत् गच्छेत् । नीच-विभवविधुर कुलम् अतिक्रम्य-उलवच परित्यज्येति यावत्, उचित समृद्ध कुल नाभिधारयेत् न गच्छेत् प्रचुरसरसभक्तपानादि- लिप्सया निर्धन विहाय विभवसपन्न सदन नाभिगच्छेत् , किन्तु उभयत्रापि याया- दिति भावः। 'समुयाण' इति-पदेनाऽनेकगृहतः स्वल्प-स्वल्प ग्रहणादु भिक्षाया निर्दोपता मुचिता । 'उच्चावय' इति-पदेन समभावो व्यक्तीकृतः । 'नीय कुल' इत्युत्तरार्द्धन रसलोलुपतापरित्याग आविष्कृत इति ॥ २५ ॥ मूलम्-अदीणो वित्तिमेसिजा, न विसीएज पडिए । अमुच्छिओ भोयणम्मि, मायन्ने एसणारए ॥ २६ ॥ छाया-अदीनः वृत्तिमेपयेत्, न विपीदेत् पण्डितः। अमच्छितो भोजने, मात्राज्ञ एपणारतः ॥२६॥ सान्वयार्थः-पडिए बुद्धिमान् साधु भोयणम्मि-भोजनमें अमुच्छिओ= गृद्धि-लोलुपता-रहित मायने आहार-पानीकी मात्राको जाननेवाला एसणारए= आहारकी शुद्धिमें तत्पर अदीणोदीनता नही दिखलाता हुआ वित्ति-भिक्षा- गोवरी की एसिज्जा-गवेपणा करे, (किन्तु भिक्षा न मिलने पर)न विसीएज्ज- खेद न करे ॥२६॥ घरसे भिक्षा न लें, क्योंकि आधाकर्म आदि दोपलगनेकी सभावना है। निर्धन कुलको छोडकर सरस भक्त पानकी लालसासे सम्पत्तिशाली कुलमें भिक्षाके लिए नहीं जाना चाहिए । 'समुयाण' पदसे यह सूचित किया है कि अनेक कुलोंसे थोडी- थोड़ी भिक्षा लेनेसे ही भिक्षाकी निर्दोषता होती है। 'उच्चावय' पदसे समभाव सूचित किया है। 'नीय कुल' इत्यादि उत्तरार्द्धसे रसलोल- पताका त्याग व्यक्त किया है ॥ २५ ॥ ભિક્ષા ન લે, કારણ કે આધાકર્મ આદિ દેવ લાગવાને સભવ છે નિર્ધન કુળને છોડીને સરસ ભક્ત પાનની લાલસાથી સપત્તિશાળી કુળમાં ભિક્ષાને માટે જવું ન જોઈએ समुयाण पहथा अभ सूथित ४२वामा આવ્યું છે કે અનેક કુળમાથી ઘેડી ડી ભિક્ષા લેવાથી જ ભિક્ષાની નિર્દોષતા के उच्चावय शथी સમભાવ સૂચિત કર્યો છે ના ૩૪ ઈત્યાદિ ઉત્તરાર્ધથી રસ-લુપતાને ત્યાગ વ્યક્ત કર્યો છે (૨૫) જળવાય श्रीदशवकालिकमूत्रे टीका-'अदीणो' इत्यादि । पण्डितः सकलभिक्षादोषज्ञः साधुः भोजने आहारे अमन्धित अनुः मात्रामा माग भक्तपानेन स्वकीयोदरपूर्तिप्रमाण सुनिमित्तवैकल्यमशमनैकसाधनप्रमाण वा जानातीति मात्राज', प्रमाणायिक भोजनेन पमादादिदोपोद्भवस्य सभवेन सायनामाहारममाणमवश्य विधेयमिति । एपणारत =उद्गमादिपणव्यतिरिन्यमानगवेषणपरायणः, अटीन देन्यरहितः सन् ति=भिक्षालक्षणाम् एपयेत् अन्वेपयेत, अलाभे सति न विपीदेव- न खिधेत् । 'अदीणो' इति-पदेन स्पदैन्याऽऽपिरणेनाऽऽत्मनोऽध:पतन शासन लघुता च पसज्यते, इति व्यज्यते । 'न विमीएज्ज' अनेन भिक्षाया अलाभेऽपि स्वात्ममसन्नता न परित्यजेदिति गोतितम् । 'पडिा' इत्यनेन सर्वथापरिशुद्ध 'अदीणो' इत्यादि। भिक्षाके समस्त दोषोंका ज्ञाता मुनि आहारमें मूळ न रखें और आहारके परिमाणका ख्याल रखें। जितने आहारसे क्षुधावेदनीय उपशात होजाय वही आहारका परिमाण है, उससे अधिक आहार करनेसे प्रमाद आदि दोप उत्पन्न होते हैं, इसलिए साबुओको आहारका परिमाण अवश्य करना चाहिए । साधु उद्गम आदि दोपोंको नलगाते हुए दीनताका त्याग करके भिक्षाकी गवेषणा करें, और भिक्षाका लाभ न हो तो खेद् न करें। 'अदीणो' पदसे यह प्रगट होता है कि दीनता दिखानेसे आत्माका अधःपतन और जिनशासनकी लघुता होती है। 'न विसीज' पदसे यह सूचित किया है कि आहार-लाभन हो तो भी आत्मिक प्रसन्नताका परित्याग न करना चाहिए । 'पडिए' पदसे सर्वथाशुद्ध भिक्षा ग्रहण अदीणो. त्या निक्षाना गया हषाना ज्ञाता मुनि माडामा भूर्भ में રાખે અને આપના પરિમાણને ખ્યાલ રાખે જેટલા આહારથી ક્ષુધા વેદનીય ઉપશાન્ત થઈ જાય તે જ આહારનું પરિમાણ છે. એથી વધારે બહાર કરવાથી પ્રમાદ આદિ દેષ ઉત્પન્ન થાય છે, તેથી સાધુઓએ આહારનું પરિમાણ અવશ્ય કરવું જોઈએ સાધુ ઉદ્ગમ આદિ દે ન લાગવા દેતા દીનતાને ભિક્ષાની ગવેષણ કરે, અને ભિક્ષાને લાભ ન થાય તે તેથી ખેદ ન કરે अदीणो शपथा सेभ 42 थाय છે કે દીનતા બતાવવાથી આત્માનું અધ પતન અને જિનશાસનની લઘુતા થાય છે જે રિલીજન શબ્દથી એમ સૂચિત કર્યું છે કે અષારલાભ ન થાય તે પણ આત્મિક પ્રસન્નતાને પરિત્યાગ ન કરો એ પતિ શબ્દથી સર્વથા શુદ્ધ ભિક્ષા ગ્રહણ કરવાની યોગ્યતા ત્યાગ કરીને ५ . 3 ४ मूलम्-वहु ३ ८ ००१ अ ययन ५ उ. २ गा. २७-२८-भिक्षाचरणे विवेकोपदेशः ५२१ भिक्षाग्रहणयोग्यताऽऽवेदिता। 'अमुच्छिओ' इतिपटेनाऽऽहारादिलोलुपता निराकृता । 'मायने' इत्यनेन नि:पसरसभक्तपानादो प्राचुर्येण दीयमानेऽपि पमाणाधिक न ग्रायमिति स्पष्टीकतम् । 'एमणारण ' इति-पदेनाऽऽयाकर्मादि- सकलभिक्षादोपानुसन्धानेनैव विशुद्धभिक्षाग्रहण भवितुमर्हतीत्याविष्कृतम् ॥२६॥ परघरे अस्थि विविह खाइम साइम । न तत्थ पडिओ कुप्पे, इच्छा देज परो न वा ॥२७॥ छाया--बहु परगृहे पस्ति विविध साय स्वायम् । न तत्र पण्डित कुप्येत् , इच्छा दयात् परो न वा ॥२७॥ सान्वयार्थ -परघरे गृहस्थके परमें विवि नाना प्रकारका खाइमन्दाग्य पिस्ता बादाम आदि खाय साइम-एलची लग आदि स्वाध बहु-बहुत अस्थि- हैं, (किन्तु) इच्छा इच्छा मरजी है कि परो-गृहस्थ देज-देवे वा अथवा नन्न देवे । नहीं देने पर नत्य-उस गृहस्थ पर पडिओम्भुद्धिमान साधु न कुप्पे कुपित न होवे ||२७|| टीका-'बई' इत्यादि। परगृहे-गृहस्थभवने विविध प्रकार खायन्द्राक्षा- पिस्तपादामादिक, स्वायम् एलालबगादिकम् बहु-प्रभूतमम्ति, किन्तु इच्छा चेत् करनेकी योग्यता व्यक्त होती है। 'अमच्छिओ' पदसे आहार आदिकी लोलुपताका त्याग ध्वनित होता है । 'मायने पदसे यह सूचित किया है कि निर्दोष और सरस आहार अधिक प्राप्त हो राहतो भी प्रमाणसे अधिक नहीं ग्रहण करना चाहिए । 'एसणारए' पदसे यह द्योतित किया है कि आधाकर्म आदि भिक्षाके समस्त दोपोंका अनुसन्धान करनेसे ही विशुद्ध भिक्षाका ग्रहण होना सभव है ॥ २६ ॥ 'ब' इत्यादि । गृहस्थके घरमे भॉति-भांतिके खाद्य और भौति- भौतिके स्वाद्य विद्यमान रहते है, उसकी इच्छा हो तो देवे, न हो तो વ્યકત થાય છે મમુકિયો શબ્દથી આહાર અદિની લેલુ રતાને ત્યાગ ઇવનિત થાય છે મારે શબ્દથી એજ સૂચિત કરવામાં આવ્યું છે કે નિર્દોષ અને સરસ આહાર વધારે પ્રાપ્ત થઈ રહ્યો હોય તે પણ પ્રમાણુથી વધારે ગ્રહણ ન કરવું જોઈએ एसणारए शपथी मेम सूयित वामा आत्यु छ उ माघाभ माह मिक्षाना બધા દેનું અનુસંધાન કરવાથી જ વિશુદ્ધ ભિક્ષાનું ગ્રહણ સભવિત છે (૨૬) वहु० त्या गृहस्थना घरमा त तना ખાદ્ય અને ભાત ભાતના સ્વાદ્ય વિદ્યમાન હોય છે, તેની ઈચ્છા હોય તે આપે અને ન હોય તે ન આપે ५२२ श्रीदशवकालिको ૨ 3 ४ r ७ १२ १० परम्-गृहस्थः दधात् न ना दद्यात्, तर दातरि, यहा तर ग्यारे सारे तु अटी यमाने सति न कुप्येत्-न क्रु येत्-'कीदृशोऽयमपिवेकी ? प्रचुरेऽपि बहुविध- खाचादिके विद्यमाने साधवे न ददातीति क्रोधावेशदपितान्तःकरणो न भवेत् । अत्र 'पडिए' इति पदेन सदसद्विवेकशालिव, तेन च मनोविजयित्वमादितम् ॥२७॥ एतदेव प्रपन्च्यते-'सयणा' इत्यादि । मूलम्-सयणासणवत्थ वा, भत्त पाण व सजए । अदितस्स न कुप्पेजा, पञ्चक्वेवि य दोसउ ॥२८॥ छाया-शयनासनवस्त्र वा, भक्त पान पा सयतः। अददतो न कुप्येत्, प्रत्यक्षेऽपि च दृश्यमाने ॥२८॥ पूर्वोक्त विषय को ही विशद करते हुए कहते हैं- सान्वयार्थः-सयणासणवत्थ-शयन वसति, आसन-पाटलादिक, वस्त्र-चादर आदि वा=अथवा भत्त-आहार व-तथा पाण=पानी आदि किसी भी वस्तुके पञ्चखेवि य-प्रत्यक्ष-सामने पड़ी दीसउदीखने पर भी अदितस्स नहीं देते हुए गृहस्थ पर सजरा साधु न कुप्पेज्जाकोप न करे, (क्योकि)-"इच्छा देज परो न वा" देवे न देवे गृहस्थकी मरजी है, ऐसा पूर्व गाथासे सबध है ।।२८।। टीका-सयतः शयनासनवस्त्र-शयन च आसन च वस्त्र चेत्येपा समाहार:, तत्र शग्यतेऽस्मिनिति शयन वसतिः, आस्यते-उपविश्यतेऽस्मिन्निति आसन- पीठफल कादिक, वस्यते आच्छाधते शरीरमनेनेति वस्त्र-शाटकादिक, भक्त- न देवे । यदि न दे तो साधुको ऐसा क्रोध न करना चाहिए कि-'यह कैसा अविवेकी है कि इतना बहुत खाद्य स्वाद्य मौजूद होने पर भी साधुको नहीं देता।' यहाँ 'पडिए' पदसे सत् और असत्का विवेक प्रगट किया है और उससे मनको जीतना सूचित किया है ॥२७॥ इसीका विस्तार पूर्वक कथन करते हैं-'सयणा' इत्यादि । यदि कोई गृहस्थ शय्या, आसन, वस्त्र, भक्त या पान सामने જે ન આપે તે સાધુએ એ ક્રોધ ન કરવો જોઈએ કે, “આ કેવો અવિવેકી છે કે “આટલા બધા ખાદ્ય સ્વાદ્ય હાજર હોવા છતા પણ સાધુને આપતે નથી અહીં કિg શબ્દથી સત અને અસતને વિવેક પ્રકટ કર્યો છે, અને તેથી મનને જીતવાનું સૂચિત કર્યું છે (૨૭) मनु विस्तारपूर्व ४थन ४२ छे-सयणा० त्यात २न्य शष्या, मासन, पक्ष, સામે દેખાતા , ભક્ત યા પાન ૨૩ 3 २ ५ ७ ८ . 10 ૧૨ ११ 13 ૧૫ अध्ययन ५ उ. २ गा. २९-३०-भिक्षाचरणे विवेफोपदेशः भोज्य, पान-पेयम् अददतः अप्रयच्छतः, (अत्र सम्बन्धसामान्ये पप्ठी,) प्रत्यक्षेऽपि दृश्यमाने शयनादो न कुप्येत्-कोपावेशेन चिनविकृतिं न कुर्यादिति भूत्रार्थः॥२८॥ मूलम् इस्थिय पुरिस वावि, डहर वा महल्लग । बदमाण न जाएजा, नो अ ण फरस वए ॥२९॥ छाया-त्रिय पुरुष वाऽपि, डहर वा महान्तम् । चन्दमान न यावेत, नो च त परुष वदेत् ।। २९ ।। सान्चयार्थ:-इत्थिय-त्री वावि अथवा पुरिस-पुरुप डहर छोटा-बालक वा-या मरलगंबडा-जुवान या बुड्डा हो वदमाण-वन्दना करते हुएको नजाण्ज्जान जाँचे-उससे भिक्षाके लिए याचनान करे, (और दूसरे समय याचना करने पर यदि किसी कारण वश वह भिक्षा न दे तो) ण-उस गृहस्थ के प्रति साधु फरुसम्मठोर वचन नो यम्नही वयोले ॥२९॥ टीका-'इत्थिा' इत्यादि । स्त्रियम् अपिवा पुरुष डहर बालक, 'देशीयोऽय शब्द" जन्मतः पञ्चदशवर्षे यावत्, वा अथवा महान्त तरुण स्थविर वा वन्दमान%D वन्दना कुर्वन्त न याचेत-न-भिक्षेत। वन्दनप्रवृत्तस्य गृहस्थस्य याचनाया चित्त- चित्तौरस्यप्रसङ्गश्च 'कीदृशोऽय कुक्षिम्भरिः साधु- यद्वन्दनसमयेऽपि न धैर्य दधाति, भिक्षायामेव दत्तचित्तो रङ्क'-दित्यादि । दिखाई देने पर भी माधुको न दे तो भी साधु क्रोध न करे ॥ २८॥ 'इथिय' इत्यादि । स्त्री, बालक, युवक (जुवान) या वृद्ध, बन्दना कर रहा हो तो उससे उस समय भिक्षाकी याचनानही करनी चाहिए। कोई वन्दना कर रहा हो और उससे याचना करे तो वन्दनामें अन्तराय पडती है, और गृहस्थके मनमें ऐसा विचार आता है कि-'देखो यह साधु कैसा पेट्र (पेट-भरा) है कि वन्दना करते समय भी धीरज नहीं હોવા છતા પણ સાધુને ન આપે તે પણ સાધુ કોધ ન કરે (૨૮) इथिय० त्याहि श्री, ४, नुवान या વૃદ્ધ વ દના કરી રહ્યા હોય તે તે વખતે તેમની પાસે ભિક્ષાની યારાના કરવી ન જોઈએ કેઈ કરી રહ્યા હોય અને તેમની પાસે યાચના કરવામા આવે તે વદનામ પડે છે, અને ગૃહસ્થના મનમાં એવો વિચાર આવે છે કે “જુઓ, આ સાધુ કે પિટ ભરે છે કે વદન કરતી વખતે પણ ધીરજ ધરતે નથી, રકની પેઠે . विक्षेपादिना वन्दनान्तराय, . - कहना અતરાય - १ १ 3 ५४ ८ १० १२ ५२४ श्रीदनवेकालिकमरे अन्यदा याचितेऽपि भकपानाधभागादददाने त च गृहम्य परप-निष्ठुरवाक्य न वदेव मुनिरिति शेप' । यथा व्यर्थव वहन्दनचेष्टा, नाल साधुतोपाय, केवल- किंशुककुसुमबद्धाह्यरमणीयतामानमाफलयसी' त्यादि ।॥२९॥ मूलम्-जे न वदे न से कुप्पे, वदिओ न समुक्कसे । एवमन्नेसमाणस्स, सामन्नमणुचिट्टई ॥३०॥ छाया-यो न चन्दते न तस्य कु'येत्, वन्दितो न समुत्कर्पयेत् । एवमन्वेपमाणस्य, श्रामण्यमनुतिष्ठति ॥ ३०॥ सान्वयार्थ:-जे-जो गृहस्थ न वदे-साधुको वन्दना न करे तो से उस पर न कुप्पे-क्रोध न करे (और) वदिओ-वन्दना किया हुआ न समुक्कसे-गवित न होवे-घमड न करे। एव इस प्रकार अन्नेसमाणस्स-जिनशासनकी आराधना करनेवालेके सामन्न-साधुपना चारित्र अणुचिटइ-आराधित स्थिर होता है, अर्थात् मान अपमानमें समान रहनेवाले मुनिको ही सम्यक् प्रफारसे चारित्रकी आराधना होती है ॥३०॥ टीका-'जे' इत्यादि । यो गृहस्थः साधु न वन्दते सेन्तस्य अवन्दमानस्य न कुप्येत् कीदृगय विवेकविकल', यन्मामुपस्थित साधुमवमन्यते' इति कृत्वा धरता, रककी तरह केवल भिक्षाकी चिन्ता कर रहा है। अन्य समय याचना करने पर भी यदि गृहस्थ भिक्षा न दे तो कठोर वचन न बोले कि-'बस रहने दे, तेरी वन्दना वृथा है, इससे साधुओंको मन्तोष नही हो सकता, तू टेसू (पलाश केसूडा) के फूलकी नाई दिखावटी रमणीयता (नम्रता) धारण करता है' इत्यादि ॥२९॥ 'जे' इत्यादि। कोई साधुको वन्दनान करे तो उसे उसपर कुपित न होना चाहिए कि-'यह कैसा अविवेकी है कि सामने उपस्थित साधुका કેવળ ભિક્ષાની ચિંતા કરી રહ્યો છે ” બીજા સમયે યાચના ગૃહસ્થ ભિક્ષા ન આપે તે સાધુ કઠોર વચન ना 'स, २२वा हो, તારી વદના વૃથા છે, તેથી સાધુઓને સતેષ નથી થઈ શકત, તુ કેસૂડાના ફૂલની પેઠે દેખાડવાની રમણીયતા (નમ્રતા) ધારણ કરનાર છે, ઈત્યાદિ (૨૯) ને ઈત્યાદિ કઈ સાધુને વદન ન કરે તે સાધુએ તેના પર કુપિત ન આ કે અવિવેકી છે કે સામે ઊભેલા સાધુને અનાદર કરે છે ? થવું . उरता પણ . ' २ 3 ७ ८ ૧૨ अ ययन ५ उ. २ गा. ३१-३२-भिक्षाऽपनवनिषेधः, तदोपाव ५२५ कोपावेशेन मनो विकृत न विद्यात् । वन्दितः सार्वभौमादिनाऽपि नमस्कृतश्च न समुत्कर्पयेत् आत्मानमिति शेपः, 'अहमेताहशो माननीयो जगति, यदेवविधा नरेन्द्रादयोऽपि मम चरणी प्रणमन्ती'-त्यापभिमान न कुर्यादित्यर्थः। एवम् उक्तप्रकारेण अन्वेपमाणस्य-जिनशासनमनुतिष्टत' सापोः श्रामण्य-साधुत्व चारित्रमिति यावत् अनुतिष्ठति-स्थिरीभवति, मानापमानसमानमानसस्यैव साधोनिरतिचारचारित्र सम्पद्यत इति भावः ॥ ३० ॥ स्वपक्षे चौर्य निषेधयवि-'सिया' इत्यादि । मूलम्-सिया एगइओ लद्धं, लोभेण विणिगृहइ । मामेयं दाइय सत, दद्दूण सयमायए ॥३१॥ छाया स्यात् एकक' लवा, लोमेन विनिग्रहते । ममेद दर्शित सद, दृष्टा सयमाददीत ।। ३१ ।। अब स्वपक्ष-साधुपक्ष में चोरी का निषेप बताते ह- सान्वयार्थः-सिया कदाचित् अगर एगइओ-जयन्यप्रकृतिवाला अकेला गोचरी गया हुआ साधु ल-सरस अशनादि पार लोभेण खानेके लोभसे (उसे) विणिगृह-छिपा लेवे-नीरस वस्तुको ऊपर रखकर सरस वस्तुको उसके नीचे दया रखे, क्योकि मम-मेरी दाइय सत-दिखलाई हुई एय-इस वस्तुको दद्दण-सरस देखकर सय स्वय आचार्य आदि खुद आय-लेलेंगे अर्थात् मुझे नहीं देंगे या थोड़ी देंगे ॥३१॥ अनादर करता है, तथा चक्रवर्ती आदि राजा महाराजा भी वन्दना करे तो आत्मप्रशसा (धमड) न करे कि-'मैं ससारमें ऐसा माननीय हूँ कि ऐसे राजा महाराजा भी मेरे चरणोंमें गिरते हैं । इस प्रकार जिन शासनमें स्थित साधुका चारित्र स्थिर (दृढ) रहता है, अर्थात् मत्कार और तिरस्कार होने पर अन्त करणमें विकार न करनेवाले अन- गारका आचार निरतिचार पलता है ॥३०॥ स्वपक्षमें चौर्यका निषेध करते है-'मिया' इत्यादि । તથા ચક્રવતી આદિ २ तो (ઘમડ) ન કરે કે હું જગતમાં એ માનનીય છું કે એવા રાજા પણ મા ચામાં પડે છે ” એ રીતે જિનશાસનમાં સ્થિત એવા સાધુનું ચરિત્ર સ્થિર (દઢ) રહે છે, અર્થાત્ સત્કાર અને તિરસ્કાર થતા પણ અત કરણમાં વિકાર ન કરે અનગારનો આવાર નિતિચાર પણે પલે છે (૩૦ १५क्षमा योयना निषेध -सिया त्या રાજી મહારાજ પણ વંદના આત્મપ્રશંસા મહારાજ २ ४ ५ 23 श्रीदशकालिकमूत्रे टीका-स्यात्-दाचित् एकका कविज्जघन्यकतिषः साधुः लवा= माप्य आहारादिकमिति शेपः लोभेन-उत्कटसरसास्तुलिप्सया विनिगृहते-सत्र- गुने नीरस वस्तुजातमुपरि कृत्वोत्कृष्टरसाद्वस्तु समपाते । अपहवे हेतुमाह-ममे- दमुत्कृष्ट वस्तु 'दाइय-दर्शित सत् दृष्ट्वा आचार्यादिः स्वयमेवाऽऽददीत-गृही- यात्, न मम दास्यति अल्प पा दास्यतीति भारः ॥ ३१ ।। अपहनकरणस्य दोपमाइ-'अत्तहा' इत्यादि । मूलम्-अत्तहागुरुओ लुडो, वहु पाव पकुवई । दुत्तोसओ य से होइ, निवाण च न गच्छई ॥३२॥ छाया-आत्मार्थगुरुको लुध., बहुपाप भकुरुते । दुस्तोपरश्च स भवति, निर्वाण च न गच्छति ॥ ३२ ।। पूर्वोक आचरण करने वाले साधु की क्या दशा होती है? सो बताते हैं- सान्वयार्थ -अत्तहागुरुओ अपने स्वार्थ साधनमें लगा हुआ लुद्धो जिहाफा लोलुपी से वह साधु यहुबहुत पाव-पाप पकुव्बई-करता है, य% और (इस भवमें) दुत्तोसओ=असन्तोपी होइ बना रहता है, च=तथा निव्वाण- मोक्षको न गच्छा नहीं पाता है, अर्थात् अनन्तससारी होकर चतुर्गतिमें भट- कता है।॥३२॥ टीका-आत्मार्थगुरुका आत्मनः अर्थ प्रयोजनमित्यात्मार्थ स एव गुरु:- मधान यस्य स तथोक्त. स्वार्थसाधनसमर्थ इत्यर्थः, यद्वा आत्मार्थमेव गुरु प्रधान वस्तु यस्य स तथोक्त. अन्याऽलक्षितोत्कृष्टसरसवस्तुजाताऽऽस्वादकः अत एवं लुब्ध =मनोरमरसाभिलापी सन् बहु-प्रचुर पापम् आत्ममालिन्यजनक दुष्कर्म जो क्षुद्रप्रकृतिवाला साधु उत्कृष्ट सरस आहार प्राप्त करके इस विचारसे उसे छिपा लेता है कि मैं इसे दिखा द्गातो आचार्य आदि इसे ले लेंगे-मुझे न देंगे अथवा थोडासा देंगे ॥३१॥ 'अत्तट्टा' इत्यादि । वह दूसरोंसे छिपाकर सरस आहार करनेवाला स्वार्थ साधनमें समर्थ साधु मनोज रसका अभिलापी होकर अत्यन्त ही જે મુદ્ર પ્રકૃતિવાળે સાધુ ઉત્કૃષ્ટ સરસ આહાર પ્રાપ્ત કરીને એવા વિચારથી એને છુપાવ કે-હુ એને બતાવીશ તે આચાર્ય આદિ એ લઈ લેશે, મને નહિ આપે અથવા થેડે જ આપશે” (૩૧) अत्तहा० इत्याहि मे भीतथा छुपायाने सरस આહાર કરનારે સ્વાર્થ સાધના સમર્થ સાધુ મને રસને અભિલાષી થઈને અત્યત પાપકર્મનું , . .

२ ५ 3 ६ ७ अध्ययन ५ उ. २ गा. ३३-गुरुपरोक्षे भिक्षापहारिलक्षणम् ५२७ करोति-विधत्ते, स चाऽस्मिन् जन्मनि दुस्तीपका अन्तमान्तायाहारेण दु.सम्पा- दनीयतोप:-असन्तोपी भवति, निर्वाण मोक्ष च न गच्छतिनोपैति । 'अत्तहागुरुओ' इत्यनेन पुद्गलानन्दित्व, 'लुद्धो' अनेन मायापरत्व तस्करवृत्तित्व च प्रकटितम् , 'दुत्तोसओ' इत्यनेन चेप्सितवस्त्वमाप्तौ सन्तोपा- भावः चितः ॥ ३२॥ गुरुसमक्षापहारकमुक्त्वा गुरुपरोक्षतोऽपहारकमाह-'सिया' इत्यादि । मूलम्-सिया एगइओ लद्ध, विविह पाण-भोयण । भद्दगं भहगं भोच्चा विवन्नं विरसमाहरे ॥३३॥ छाया-स्यात् एकक. लब्ध्वा, विविध पान-भोजनम् । भद्रक भद्रक भुक्ता, विवर्ण विरसमाहरेत् ।। ३३ ॥ सान्वयार्थ -गगइओ अफेला पूर्वोक्त स्वभाववाला रसलोलुपी साधु गोचरी गया हुआ सिया कदाचित्-कोई वख्त ऐसा भी करे कि विवि नाना प्रकारके पाण भोयण आहार-पानीको लद्ध-पाकर (उसमेंसे) भद्दगं-भद्दग-अच्छे-अच्छे सरस आहारको भुच्चा-बही कहीं एकान्त स्थानमें खाकर विविन्न-विकृत वर्ण- पापकर्मका उपार्जन करता है । वह इस जन्ममें साधारण, नीरस आहारसे कभी सन्तुष्ट नहीं होता, न मोक्ष प्राप्त कर सकता है। अत्तहागुरुओ' इस पदसे पुद्गलानन्दीपन, 'लुद्धो' पदसे मायाचारमें परायणता तथा तस्करवृत्ति (चोरी) और 'दुत्तोसओ' पदसे अभीष्ट वस्तु न मिलने पर असन्तोष सचित किया है ॥३२॥ गुरुसमक्षका अपहार कहकर अय गुरुके परोक्षका अपहार कहते हैं- 'सिया' इत्यादि। ઉપાર્જન કરે છે તે આ સાધારણ નીરસ આહારથી કદાપિ સંતુષ્ટ ન થતા મેક્ષને પ્રાપ્ત કરી શક્યું નથી अत्तहागुरुनो मे पधा पुमान, लुद्धो पन्थी પરાયણતા તથા તસ્કવૃત્તિ (ચોર્યવૃત્તિ) અને કુસગો પદથી અભણ વસ્તુ ન મળવાથી ઉપજેતે અગતા સૂચિત કર્યો છે (૩૨) ગુરૂ સ ને અપહાર કડીને હવે ગુરૂની પક્ષનો અપહર सिया. त्या ' જન્મમાં માયાચા૨માં १२ ४ ५ ७ ५२८ श्रीदशवकालिकम्त्र वाले वाल चने आदिका बना हुआ तुप आदि जिसमें बहुत ही ऐसे (तया) विरसम्लवणादि रस सहित अशनादिको आररे-उपाश्रयमें लाये ॥३३॥ टीका--स्यात् कदाचित् एकका कश्चित् रसलोलुपी विविध पान भोजन लब्ध्वा भिक्षाचर्यायामेन यत्र कुत्रचिदलक्षितपदेशे भटक भद्रयम्-उत्कृष्टमुस्कृष्ट बहुविधानादिपु प्रशस्त प्रशस्तमेव घृतपूराऽपूपादिकं भुक्त्वा विवर्ण-विकृतवर्ण बल्लचणकादिनिप्पन्न तुपादिबहुल विरसम्रपणादिरसन्तिमन्नादिकम् आहरेद= आनयेत् वसताविति शेपः ॥३३॥ एव करणे किं प्रयोजनम् ? इत्याह-'जाणतु' इत्यादि । मूलम्-जाणतु ता इमे समणा, आययही अय मुणी सतुट्टो सेवई पत, लहवित्ती सुतोसओ ॥३४॥ छाया-जानन्तु तावत् इमे श्रमणाः आत्मार्थी अय मुनि । सन्तुष्टः सेवते प्रान्त, रूक्षत्तिः मुत्तोपकः ॥ ३४ ॥ वह ऐसा क्यो करता है। इसमें कारण कहते है- सान्वयार्थ-ता-प्रथम इमे-ये-उपाश्रयमें रहे हुए दूसरे समणा-साधु (मुझे इस प्रकार) जाणतु-जानें कि अयम्यहमुणी-साधु आययट्टी-मोक्षार्थी आत्माओं है, सतुहोम्जैसा मिला उसीमें सन्तोप करनेवाला लूहवित्तीसरस स्निग्धादि आहारकी अभिलापारहित सुतोसओ थोडे आहारसे भी सतोपी है और पतवासी कुसी तथा निस्सार अन्नादिका सेवई-सेवन करता है ॥३४॥ कदाचित् कोई रसलोलुपी साधु विविध प्रकारका पान भोजन पाकर अच्छा-अच्छा भोजन भिक्षाचरीमें ही किसी एकान्त स्थानमें खावे, और बाल चणक आदि अन्त-प्रान्त तथा विना नमक मसालेका ठढा आहार उपाश्रयमे ले आवे ॥३३॥ ऐसा करनेका प्रयोजन कहते हैं-'जाणतु' इत्यादि । કદાચિત્ કોઈ રસલોલુપી સાધુ વિવિધ પાન ભેજન મેળવીને સાર-સારૂ ભજન ભિક્ષાચરીમા જ કઈ એકાંત સ્થાનમાં ખાઈ લે અને ચણા આદિ અત-પ્રાત તથા મીઠા મરચા વિનાને નીરસ ઠડે આહાર ઉપાશ્રયમાં सा मावे (33) सेभ ४२वानु प्रयोजन ४ छे-जाणतु० पत्यादि પ્રકારના વાલ अभ्ययन ५ उ २ गा ३४-३५-भिक्षापहारे दोपाः ५२९ टीका-तावत् निश्चयेन इमे-मानसमत्यक्षविषयाः उपाश्रयस्थाः अमणा: साधवः- 'अयमुनिःआत्मार्थी आत्महितार्थी सन्तुष्टः यथालयसन्तीपी क्षत्तिः- सरसाऽनभिकाडी सृतोपका अल्पेनापि परितोपशीलः प्रान्त=पर्युपित निस्सार वाऽन्नादिक सेते' इति मा जानन्तु ।। ३४ ॥ किमर्थ स्वदोपगोपनमाचरती -त्याह-'पृयणटा' इत्यादि । 1 २ 3 मूलम् -पूयणट्टा जसोकामी, माणसम्माणकामए । ४ ६ ५ ८ बहु पसबई पाव, मायासल्ल च कुबड ॥३५॥ छाया-पूजनार्थः यश कामी, मानसम्मानकामुकः । बहु प्रमते पाप, मायाशल्य च कुरुते ॥३५॥ उपर्युक्त साधु के दोष बताते है- सान्वयार्थ -पृयणटा-वस्त्र-पात्रादि से सत्कार चाहनेवाला जसोकामी अपने महत्त्व और प्रसिद्धिका इच्छुक माणसम्माणकाममान-सम्मानका अभिलापी साधु यह बहुत पाव-पाप मोहनीयादि को पसवई पैदा करता है, च-और मायासह-कपटरूप भावशल्यको कुव्बइ-उत्पन्न करता है। तात्पर्य यह है कि हदयमें खुचे हुए पाणके अग्रभागरूप द्रव्य शल्यकी तरह हृदयमें रहा हुआ यह मायारूप भाव-शल्य मनुष्यको, अनन्त दुस्सह दु खोका कारणभूत चतु- गैतिक समारमें घृमाता हुआ अविचलशान्तिमय सुखसे वञ्चित कर देता है ॥३५॥ ये उपाश्रयमें स्थित साधु मुझे ऐसा समझें कि-' यह साधु आत्मार्थी है, जैसा मिला उसीमे सन्तीपी है,मरस आहारकी आकाक्षा नहीं करता, थोडे ही आहारसे मन्तुष्ट हो जाता है और साररहित ठढा अन्त-भान्त आहारका सेवन करता है' ॥३४॥ अपना दोप छिपाता क्यो है? सो कहते है-'प्रयणट्ठा' इत्यादि । આ ઉપાશ્રયમાં રહેલા સાધુ મને એવું માને કે-આ સાધુ આત્માથી છે, જે આહાર મળે તેમા સંતોષ માનનારે છે, સરસ આહારની આકાંક્ષા કર નથી છેડા જ આહારથી સ તુષ્ટ तय छ, भने साहित બત પ્રાત આહારનું સેવન કરે છે,” (૩૪) पाता उभ छुपा२ छ ? ते ४ -पूयणहा० पत्यादि . , ५३० श्रीदशवकालिममत्रे टीका-पूजनार्थः पूजन-पत्र पात्रा ऽन्न पानादिना सत्कारः स एवार्य प्रयोजन यस्य स तयोक्तः प्रशस्तपस्तूपभोगार्थीत्यर्थः, अत एव यश कामी यशः= स्वमहत्त्वमसिद्धिमतत्कामयते इस्तीति 'अहो ! अयमेव सः' इत्येव मशंसावचना भिलापीत्यर्थः, मानसम्मानकामुका-मानश्च सम्मानधेति मान सम्मानी तयोः कामुक इति विग्रहः, तत्र मान =अभ्युत्थानादिलक्षण आदरः, सम्माना= गुणोत्कीर्तनेन गौरमफटनम् , आदरगौरवामिलापुक इत्ययः । एर कुर्वन् साघु. किं सम्पादयती? स्याह पहु-भूत पाप-दुष्कृत प्रमूते जनयति, च-पुनः माया शल्य-माया शाठयेन मनोवाकायप्रवृत्तिः, सैव शल्य-शल्यतेबाध्यते पीडयते आत्माऽनेनेति विग्रहः, मायालक्षण भावशल्य कुरुते-उत्पादयति, हृदयनिखात त्रुटितनाणाग्ररूपद्रव्यशल्यवदिद मायारूप भावशल्य हृदयस्थित सत् निरन्तराऽनन्त दुस्सहदुःखकारणीभवत् चतुर्गतिकससारे भ्रामयत् अविचलशान्तिमुखाद् दूर तरीकरोति तादृश साधुमिति भावः ॥३५।। अच्छे-अच्छे वस्त्र पात्र अन्न पान आदिसे अपनासत्कार चाहनेवाला, प्रशस्त वस्तुओंके भोगका लोलुपी, 'अहो! यह वही है ऐसे यशका अभिलाषी, मान (आनेपर खड़ा होजाना) तथा सम्मान (गुणगान द्वारा गौरव प्रगट करना) की इच्छावाला साधु बहुत पापोंको तथा कपटरूप मायाशल्यको उत्पन्न करता है । छातीमें चुभकर वही टूट जानेवाले द्रव्य-शल्य (तीरकी नोंक) की तरह हृदय में स्थित मायारूप भाव- शल्य निरन्तर असीम व्यथाका कारण होता है, तथा चतुर्गति ससारमें इधर-उधर भटकाता हुआ अविचल शान्तिमय सुखसे उस साधुको वश्चित (अलग) कर देता है ॥३५॥ સારા-સારા વસ્ત્ર પાત્ર અન્ન પાન આદિથી પિતાને સત્કાર ચાહનાર, પ્રશસ્ત વસ્તુઓનાગને લુપી–અહે! એ આ જ છે એવા યશને અભિલાષી, માન (આવતા જ ઉભા થઈ જવું) તથા સન્માન (ગુણગાન દ્વારા ગૌરવ પ્રકટ કરવું) ની ઈચ્છાવાળા સાધુ ઘણુ પાપને તથા કપટરૂપ માયા શયને ઉત્પન્ન કરે છે છાતીમાં પિસીને ત્યાં જ તૂટી જનારા દ્રવ્ય શલ્ય તીરની અણી) ની પેઠે હૃદયમાં રહેલ માયારૂપ ભાવ શલ્ય નિરતર અસીમ વ્યથાનું કારણ બને છે, તથા સ સારમાં અહીતહીં ભટકાતા અવિચલ શાન્તિમય સુખથી એ સાધુને વચિત (२हित) N नाणे छ (34 ચતુર્ગતિ अध्ययन ५ उ. २ गा. ३६-मद्यपाननिषेधः ५३१ ५ ८ ८ ૧૨ 13 ૧૪ ૧૫ मद्यपानप्रतिषेधमाह-'सुर वा' इत्यादि । मूलम् सुर वा, मेरगं वावि, अन्न वा मजगं रस । ससक्ख न पिवे भिक्खू, जस सारखमप्पणो ॥ ३६॥ छाया-सुरा वा मेरक वाऽपि, अन्यद् वा मायक रसम् । ससाक्षि न पिवेद भिक्षु', यशः सरक्षन् आत्मनः ॥३६॥ अर मयपान का दोप बताते हैं- सान्चयार्थ:-भिस्य साधु अप्पणो अपने जसम्सयमको मारक्व:- चचाता हुआ सुर-गौडी, मा यी और पैष्टी, इन तीनो मकारकी मदिराको वा 'या' शब्दसे अथवा पारहो प्रकारकी मदिराको वावि-तथा मेरग सरकेको अन्न वा और भी दूसरे प्रकारके मज्जग-मदजनक भग गाजा अफीम चरसनादि मादक रसरस द्रव्य को ससक्ख केवली भगवान की साक्षीसे अर्थात उनका ज्ञान सर्वव्यापक होनेसे एकान्तमें भी न पिवे नही पिये ॥ मदिराके बारह भेद इस प्रकार है-(१) महुआ, (२) फणस, (३) दाख, (४) खजूर, (५) ताड (ताडी), (६) गन्ना शेरडी, (७) धावडीके फूल, (८) मक्खियोकी शहद, (९) बैठ (कठोती), (१०) मधु (अन्य प्रकारकी शहद), (११) नारियल, और (१२) पिष्ट (आटा), मदिरा इन बारह वस्तुओसे बनती है ॥३६॥ टीका-भिक्षु आत्मन' स्वस्य यश'=मयम सरक्षन् सुरा-मदिरा, सा च त्रिविया गौडी, मावी, पैष्टी चे'-ति । तत्र गौडी-गुडनिपादिता, मा वी-मधु- (महुडा) सपादिता, पैटीजीद्यादिपिटनिर्धत्तेति । यद्वा 'पिटेण सुरा होइ' इति मद्य पानका निषेध कहते है-'सुर वा' इत्यादि । जो साधु अपने सयमकी रक्षा करना चाहते है उन्हें मदिरा या सिरका एकान्तमे भी कदापि न पीना चाहिए। मदिरा तीन प्रकारकी है (१) गोडी (२)मा बी और (३) पैप्टी। गुडसे बनाई हुई गौडी, महुआसे बनाई हुई माची तथा धान्य आदिके पिष्ट (आटे) से बनाई हुई पैष्टी कहलाती है। 'पिटेण सुरा होड' इस वचनसे यही जान पडता है कि- भधपान निषेध -सुर वा० ७त्यादि જે સાધુ પિતાના મયમ ની લા કરવા ઈચ્છે છે, તેણે મદિશ યા સુરકે એકાતમાં પણ કદાપિ પી ને એ મદિગ ત્રણ પ્રકારની છે (૧) ગોડી, (૨) માધ્વી, (૩) પછી ગોળમાંથી બનાવેલી ગૌડી, મહુડામાંથી બનાવેલી માવી તથા ધાન્ય આદિના પિષ્ટ (આટા) માથી બનાવેલી પિછી કહેવાય છે . - - , ५३२ श्रीदशवकालिकमरे वचनाद् नीतादिपिष्टनिवृत्तव मुरेत्युच्यते । चद्रहासाभिध मयमिति वा । मेरक- सरकानामधेय मघम् । अन्यद्वा माचक-मदजनक रसम् । मादपरवेन द्वादशविध मनस्य तदितरस्य विजयादेश सर्वस्य सग्रहः, तदुक्तमितरत्र मदहेन्द्रबद्रव्य मय मित्यभिधीयते' इति । द्वादश विधमधानि यथा- " माध्वीक पानस द्राक्ष, खार्जुर तालमैक्षवम् । मेरेय माक्षिक साङ्क, माधक नारिकेलजम् ।।१।। मुख्यमन्नविकारोत्य, मद्यानि द्वादशैव च।" इति । एतत्सत्र सुरादिक ससाक्षि न पियेत्, सातिभिः केवल्यादिभिः सहेति ससाक्षि धान्य आदिके आटेसे मदिरा बनती है।अथवा पैप्टी मदिरा 'चन्द्रहास' नामकी मदिरा समझनी चाहिए। इनके सिवाय भग गाजे आदि और कोई भी नशैली वस्तुका साधुको सेवन नहीं करना चाहिए जैसा कि कहा है-'मदके कारण-स्वरूप पिघले हुए पदार्थको मद्य कहते है।' मद्य चारह प्रकारके समझने चाहिए वे ये हैं- "(१) महुआका, (२) पनसका, (३) दाखका, (४) खजूरका, ताडका (ताडी), (६) साठेका, (७) मैरेय-धौ-धावडीके फूलका, (८) माक्षिक (मक्खियोंकी शहद) का, (९) टक (कवीठ कैथ) का, (१०) मधुका, (११) नारियलका और (१२) पिष्ट (आटे) का बना हुआ मद्य । ये मद्यके मुख्य भेद बारह हैं।" इन सबको केवली भगवानकी साक्षीसे न पिये । केवल भगवानकी पिढेण सुरा होइ मे क्यनथी मेम भावुभ प छ -धान्य माहिना साथी મદિર બને છે અથવા પછી મદિરા ચદ્રહાસ’ નામની મદિરા સમજવી જોઈએ તે ઉપરાત ભાગ, ગાજે, બીજી બીજી કોઈ પણ કેરી વસ્તુનું સેવન સાધુ 1 ३,भ यु छ है- મદના કારણ સ્વરૂપ પીગળેલા પદાર્થને મદ્ય કહે છે સમજવા, તે નીચે મુજબ– "(१) माना, (२) ३४सना, (3) द्राक्षना (४) भन्पूरना (५) asat (ताडी), (६) शेराना, (७) भैरेय पाहीना दूसना, (८) भाक्षि-भधना (6) (it)ना, (१०) मधुनो, (११) नारियजनो, भने (१२) पिट (मास) ने બનેલે મધ એમ માના મુખ્ય ભેદ બાર છે એ બધાને કેવળી ભગવાનની સાક્ષીએ પીએ નહિ કેવળી ભગવાનની સાક્ષી . મા બાર પ્રકારના ७ D 3 ८ ૧૦. & 13 अ ययन ५ उ २ गा. ३७-मद्यपायिनो दोपप्रस्टनम् ५३३ केवल्यादीना साहित्य कदापि कचिदपि प्रतिरो मशक्य, तेपा सर्वज्ञत्वात्सर्वदशि- वाच, तेन एकान्तेऽपि न पिदित्ययः ॥३६॥ मूल्म्-पियए एगओ तेणो, न मे कोई वियाणड । तस्स पस्सह दोसाड, नियडि च सुणेह मे ॥ ३७॥ छाया-पिरति एकरू. म्तेनः, न मे कोऽपि विजानाति । तस्य पश्यत दोपान , नितिं च शृणुत मे ॥३७॥ सान्वयार्थ -तेणो जो भगवानकी आज्ञाके विना ग्रहण करनेवाला होनेके कारण चोर साधु एगओ अकेला, एका तमें रहा हुआ अर्थात् अपने सहचर धर्मको भी छोडा हुआ, 'मे मेरे-इस मदिरापान-को या मुझे कोई-कोईभी न वियाणइ नही जानता है' (ऐसा समझ कर) पियए-मदिरा पीता है, तस्स- उस साधुके दोसाइ-सयममें मलिनता पैदा करनेवाले दोपोको पस्सह-देखो, च और नियडिं-एक कपटको छिपानेके लिए किये जानेवाले दूसरे कपटको मे मेरेसे सुणेह-सुनो ॥३७॥ . टीका-'पियए' इत्यादि । य. स्तेन. तीर्थङ्करानादिष्टत्वेनाऽदत्ताऽऽदायि त्वाचौरः, एका-एकान्तस्थितः आत्मसहचर धर्ममपि विहाय वर्तमानः सन् 'न मेम्न मा, न मम सुरादिपान वा कोऽपि विजानाति' इति मत्वा पिवतिबाल- रिलाध सयोगानुलव्यापारविषय करोति सुरादिकमिति शेषः, तस्य-द्रव्यलि- साक्षी कभी कही नहीं रुक सकती, क्योंकि वे सर्वदर्शी है, अतः तात्पर्य यह हुआ कि एकान्तमें भी मद्य न पिये ॥ ३६ ॥ 'पियए' इत्यादि । हे शिष्य । भगवान् तीर्थङ्करकी आज्ञाके विना ग्रहण करनेवाला, अत एव चोर, आत्माके सहचर धर्मको भी त्याग कर एकान्तमे स्थित होकर ऐसा समझता है कि-'मुझे या मेरे मदिरा-पानको कोई नहीं जानता ऐसा जानकर मदिरा पान करता है, उस व्यलिंगी કદાપિ કયાય રકાતી નથી, કારણ કે તે સર્વદર્શી છે, એટલે તાત્પર્ય એ છે કે એકાતમા પણ મધ પીવે નહિ (૩૬) पियए० त्या शिष्य । मावान् तीर्थ नी माज्ञा विना अड ४२नार એટલે એને આત્માન સહચર ધર્મને પણ ત્યાગીને એકાતમાં સ્થિત થઈને એમ સમજે છે કે મારા આ મદિરાપાનને કોઈ જાણતુ નથી” એમ સમજીને જે મદિરાપાન કરે છે તે દ્રવ્યલિગી સાધુના સયમને દૂષિત કરનારી ચેષ્ટાએ , . १३ ५ 3 १२ ५३४ भीदशवकालिकमूत्र शिनः साधोः दोपान-सयममालिन्यकारिचेष्टाविशेषान पश्यत-ज्ञानविषयीकुरुत, च=पुनः निकृति पूर्णकृतकपटापरणाय कपटान्तरकरणलक्षणा माया, मयमक्रपट मुरापान, द्वितीयमनृतभाषणेन तस्सगोपनमिति भावः, मे मम निरूपयतः सकाशात् शृणुत-श्रवणगोचरीकुरुत । गुरुः शिप्यानामन्य कथयतीति भावः ॥३७॥ पूर्वपतिज्ञातदोपानुपदर्शयति-वडई' इत्यादि । मूलम् वडई सुडिया तस्स, माया मोसं च भिक्खुणो। अयसो य अनिवाण, सययं च असाहुया ॥ ३८ ॥ छाया-बर्दते शौण्डिका तस्य, माया मृपा च भिक्षोः । अयशश्च अनिर्वाण, सतत च असाधुता ॥३८॥ सान्चयार्थः-तस्स-उस मदिरा पीनेवाले भिक्खुणो साधुकी सुडिया- मद्यपान सबन्धी आसक्ति माया कपट च और मोसम्झूठ अयसो अपकीर्ति य-तथा अनिव्वाण अतृप्ति, ये सब दोप सपय=निरन्तर वडइ-बढते रहते हैं च=और (आखिर उसके) असाहुया असाधुता हो जाती है, अर्थात् वह असाधुपनको प्राप्त हो जाता है, यानी चारित्रसे भ्रष्ट हो जाता है ॥३८॥ टीका-तस्य-मुरापायिनः भिक्षो. साधोः सतत-निरन्तर शौण्डिका-मय- पानविषयासक्तिः, च=पुनः, माया निकृतिः, मृपा असत्यभाषणम् , यद्वा 'माया साधुके सयमको दक्षित करनेवाली चेष्टाओं (दोषों) को तो देखो ! एक तो मदिरापानका मायाचार, फिर उसे छुपानेके लिए दूसरे अनेक मायाचार और मृषावाद आदिका सेवन किया जाता है सो मुझसें सुनो, अर्थात् गुरुमहाराज शिष्यको आमन्त्रित करके कथन करते हैं॥३७॥ पूर्वप्रतिज्ञात दोष कहते है-'वडई' इत्यादि । मदिरापान करनेवाला साधु सदा मदिरा पीनेमें ही मन रहता है। वह मायाचार करता है, मृषा बोलता है, अथवा कपट-सहित झूठ (દોષ)ને તે જુઓ ! એક તે મદિરાપાનને માયાચાર, વળી તેને છુપાવવા માટે બીજા અનેક માયાચાર અને મૃષાવાદ આદિનું સહન કરવામા આવે છે તે મારી પાસેથી સાભળે-અર્થાત્ ગુરૂ મહારાજે શિષ્યને આમત્રિત કરીને કથન કરે છે (૩૭) પૂર્વ પ્રતિજ્ઞાત દે કહે છે-ઈત્યાદિ મદિરાપાન કરનાર સાધુ સદા મદિરા પીવામાં જ મગ્ન રહે છે તે માયા ચાર કરે છે, મૃષા બેલે છે, અથવા કપટસહિત જુહુ બેલે છે દુરાચારી હોવાને अध्ययन ५ उ २ गा. ३८-३९-मयपायिनो दोपप्रकटनम् मोम' उत्येक पद तेन मायया सह मृपा मायामृपा-परमतारणपूर्वकमसत्यभापण- मित्यर्थः, च=पुनः, अयश: असदनत्वेनाऽपकोतिः, अनिर्वाणम् अनुपशान्तिर- उप्तिः उत्तरोत्तरस्पृहावर्द्धनात् , च तथा असाधुता-असयतत्व साधूचिताचार- रादित्येन साधुपदाऽनहत्वमित्यर्थः, वर्द्धतेन्वृद्धि गन्छति । 'सुडिया' इत्यनेन मद्यपायिनो मत्रासकिरपरिहार्या भवतीति सूचितम् । मद्यासकौ सत्या माया मृपा च कदापि त न विजहाति, मायामृपादृद्धौ स्वपरपक्षे निन्दाऽवश्यम्भाविनी, निन्दायामपि सत्या मद्यपानासक्तस्याऽनितिः साहचर्य न मुञ्चति, तथा मति सर्वथा साधुपदानधिकारित्वमुपजायतेऽत' सर्वानर्थमूल मद्यपानमिति गो यम् ॥३८॥ योलता है। दुराचारी होने के कारण उमकी अपकीति फैल जाती है। उसकी लोलुपता अधिकाधिक बढती चली जाती है-उसे कभी तृप्ति नहीं होती । तथा मुनिके योग्य आचरणसे हीन होनेके कारण वह साधु कहलाने योग्य नहीं रहता, अतः उसकी असाधुता बढती है। 'सुडिया' पदसे यह सूचित किया है कि शरायीकी शराब पीनेकी आदत छूटनी कठिन होती है। मदिरामे आसक्ति होने पर माया मृपा मदिरापायीका काना पीज नहीं छोडती, अर्थात् वह माया-मृपा दोपोंमें तत्पर रहता है। माया और मृपाकी वृद्धि होनेपर स्वपक्ष परपक्षमें निश्चय ही निन्दा होती है और निन्दा होनेपर भी मदिरा पानमें मस्त होकर मदिरा-पान नही त्यागता। ऐसी अवस्थामें वह साधु कहलाने योग्य बिलकुल ही नहीं रहता ॥ ३८ ॥ કારણે તે પણ અપકીર્તિ ફેલાઈ જાય છે, એની લેલુપતા અધિકાધિક વધતી જાય છે, તેથી કદાપિ તૃપ્તિ થતી નથી મુનિને એગ્ય આચરણથી હીન હોવાને કારણે એ સાધુ કહેવાવાને યોગ્ય નથી રહેતો, એટલે એની અસાધુતા વધે છે 'मुडिया' शण्यो मेम सूथित पुर्यु छ , रामानी शराम पीवानी આદત છૂટવી કઠિ હોય છે મદિરામા આસકિત થતા માયા મૃષા મદિરાપાન કરનારને પીએ છેડતી નથી, અર્થાત્ એ માયા મૃષા દેમા તત્પર રહે છે અને મૃષાની વૃદ્ધિ થતા વિપક્ષ પર પક્ષમાં જરૂર નિદા થાય છે, અને નિદા થતા છતા પણ મદિરાપાનમાં મસ્ત થઈને તે મદિરાપાન ત્યાગતું નથી એવી અવસ્થામા તે જરાએ સાધુ કહેવાવાને યોગ્ય રહેતું નથી (૩૮) , માયા 1 २ 3 ६ ५ ७ %3D श्रीदशवकालिको उक्तमेगाथै प्रकारान्तरेण ढयति-'निच्चुब्बिग्गो' इत्यादि । मूलम्-निच्चुविग्गो जहा तेणो, अत्तकम्मेहिं दुम्मई । तारिसो मरणतेऽपि, नाराहेड सवर ॥३९ ॥ छाया-नित्योद्विमः यथा स्तेनः, आत्मकर्मभिर्दुर्मतिः । तादृशः मरणान्तेऽपि, न आराधयति सवरम् ॥ ३९ ॥ सान्वयार्थ:-जहा-जिस प्रकार तेणो चोर अत्तकम्मेहि अपने किये हुए दुश्चरित्रोसे निच्चुधिग्गो हमेशा व्याकुल बना रहता है, उसी तरह तारिसो-मदिरा पीनेवाला यह दुम्मई-दुर्बुद्धि साधु भी निस्य उद्विग्न बना रहता है, फिर वह मरणतेविस्मरण समय तक भी सवरम्सवरधर्म- चारित्रको नाराहेइ-नहीं आराध सकता है, अर्थात् वह साधु जिन्दगीभर चारित्रसे वञ्चित रहता है ॥३९॥ टीका-यथा स्तेन तस्करः आत्मकर्मभिः स्वकीयदुश्चरितैः नित्योद्विना सदा व्याकुलः चित्तोपशान्तिरहितो भवति, तादृशः स्तेनसदृशः, यथा चौर.- 'मदीयमिद दुचरित कोऽपि मा विद्यात् , अन्यथा राजगृहीतस्य मम पाणाद्यप- हारो भवे-दिति चिन्तया कदाचिदपि चेतसि नोपशान्ति गन्छति, तथा मद्यसेवी साधुरपि स्वकीये दुश्चरिते प्रकटिते सति पूजाप्रतिष्ठादिमतिघातशङ्कया स्वकृत- इसी विषयको दूसरी तरहसे कहते हैं-'निच्चुग्विग्गो' इत्यादि। जैसे चोर अपने कुकर्मोके कारण सदा व्याकुल बना रहता है अर्थात् उसे सदा यही भय बना रहता है कि मेरे कुकर्मको कोई जान न ले, नहीं तो राजा मुझे पकड लेगा और प्राणोंसे हाथ धोना पडेगा । इस प्रकारकी चिन्तासे चोरके चित्तमे सदा धुक धुकी (खल बली) मची रहती है। उसी प्रकार मदिरा पान करनेवाले मुनिके मनमें हमेशा असमाधिरहती है कि कही मेरामदिरा पानका दुराचार प्रगट न होजाय, नहीं तो मान सम्मान सब मिट जायगा। इस प्रकारकी आशकासे वह से विषयने भी शेते हे छ-निच्चुबिग्गो. त्यादि જેમ એર પિતાના કુકર્મોને કારણે સદી વ્યાકુળ રહ્યા કરે છે, અર્થાત તેને સદા એ ભય રહે છે કે મારા કુકમને કઈ જાણી ન લે નહિ તે રાજા મને પકડી લેશે અને પ્રાણ ગુમાવવા પડશે એ પ્રકારની ચિતાથી ચારના ચિત્તમા સદા ખળભળાટ મચ્યા કરે છે એ જ રીતે મદિરાપાન કરનાર મુનિના મનમા હમેશા અસમાધિ રહે છે કે-કયાક માર મદિરાપાનને દુરાચાર પ્રકટ ન થઈ જાય, નહિ તે માન સન્માન બધુ નાશ પામશે એ પ્રકારની આશકાથી તે २ ५ ४ 3 १ १२ १३ ७ 10 अध्ययन ५ उ. २ गा. ४०-४१-मद्यपायिनो दोपप्रकटनम् दुष्कृतसगोपनाय नवनवमायामृपाझल्पितवचनरचनादिनानाप्रकारकोपायमनुस- दधानो न जातु सयमसमाधिमधिगतीति भावः । दुर्मतिः विपर्यस्तबुद्धिः साधुः, मरणान्तेऽपि मरणावधिसमयेऽपि सवर सर्वसावधविरतिलक्षण चारित्र कदापि नाराधयतिन्न निष्पादयति, चारित्रसाधकशुद्धपरिणामाभावात् । 'निच्चुम्विग्गो' इत्यनेन पापात्मना नित्यशङ्कितत्व सचितम् । 'दुम्मई- पदेन व्यसनिना मतिमालिन्यमवश्यम्भावीत्याविष्कृतम् ॥ ३९ ॥ मूलम्-आयरिए नाराहेइ समणे आवि तारिसो। गिहत्था वि गं गरिहति, जेण जाणति तारिस ॥४०॥ छाया-आचार्यान् नाराधयति, श्रमणाश्चापि तादृशः । गृहस्था अपि त गहन्ते, येन जानन्ति तादृशम् ॥४०॥ सान्वयार्थः-तारिसो–उस पूर्वोक्त-प्रकारका दुराचारी साधु आयरिए= रत्नाधिकोको अवि य-तथा समणे साधुओको भी नाराहेइ-विनय वैयावच्च आदिसे नहीं आराध सकता है, जेण जिस कारणसे गिहत्था वि-गृहस्थ भी ण: अपने किये हुए दुराचारको छिपानेके लिए मायाचार और असत्य आदिके नये नये उपाय सोचा करता है। उसकी सयम सम्बन्धी समाधि किसी प्रकार भी नहीं रहती। ऐसा दुर्बुद्धि साधु मृत्युकी अवधिके समय भी सर्वसावद्ययोगके त्यागरूप सवर की आराधना नहीं करता, क्योंकि उसके वैसे विशुद्ध भाव नहीं होते। 'निच्चुग्विग्गो' इससे ऐसा सूचित किया है कि पापी सदा सशक रहता है । 'दुम्मई' पदसे यह प्रगट किया है कि कुव्यसनीकी मतिमें मलिनता अवश्य आजाती है ॥ ३९॥ પિતાના દુરાચારને છુપાવવાને માયાચાર અને અસત્ય આદિના ઉપાયે વિચાર્યા કરે છે એની સ મ સ બધી સમાધિ કઈ પ્રકારે રહેતી નથી એવે ટુબુદ્ધિ સાધુ મૃત્યુની અવધિના સમયે પણ સર્વસાવદ્યાગના ત્યાગરૂપ સવરની આરાધના કરતું નથી, કારણ કે તેના એવા વિશુદ્ધ ભાવ થતા નથી निच्चुचिग्गो शहथी मेम सूथित ४२वामा भाव्यु छ है पापी सहा સશક રહે છે દુશ્મ શબ્દથી એમ પ્રકટ કર્યું છે કે દુર્વ્યસનીની મતિમા મલિ नता अवश्य भाव के (36) . , નવા નવા १ २ 3 ૫ ७ ८ श्रीदर्शवकालिकमूत्र उसे तारिस-उस प्रकारका अर्थात मय पीनेवाला जाणति जानलेते है (अतः वे उसकी) गरिरति-निन्दा करते हैं ॥४०॥ टीका-'आयरिण' इत्यादि । तादृश' पुरोदीरितदुराचारशीलः साधुः आचार्यान् अपिच श्रमणान् रत्नाधिकान साधन नाराधयति कलुपितान्तः- करणत्वादिति भाव , येन हेतुना गृहस्था अपि तादृग-तथाविध दुराचारिण जानन्ति तेन हेतुना ण-त साधु गईन्ते निन्दन्ति, स सारजननिन्दनीयो भव- तीति सूनार्थः ॥ ४० ॥ अकृत्यसेविदोपानुपसहरनाह-'एव तु' इत्यादि । मूलम्-एव तु अगुणप्पेही, गुणाण च विवजए । तारिसो मरणतेवि, नाराहेड सवर ॥४१॥ छाया-एव तु अगुणप्रेक्षी, गुणाना च पिवर्जकः । तादृशः मरणान्तेऽपि, नाराधयति सवरम् ॥४१॥ सान्वयार्थ -एव तु इस प्रकार अगुणप्पेही प्रमादादि दोपोको ग्रहण करने- वाला च और गुणाण-ज्ञानादि गुणोका विवज्जए त्यागी तारिसो उस प्रका- रका साधु मरणतेविस्मरणकालमें भी सवर-सवर चारित्र की नाराहेइ-आरा- धना नहीं कर सकता ॥४१॥ टीका-एवम्-उक्तरीत्या तु अगुणमेक्षी-दोपदर्शी प्रमादादिदोपनिरत 'आयरिए' इत्यादि। ऐसा दुराचारी साधु आचार्य तथा रत्नाधिक श्रमणकी भी आराधना नहीं करता, क्योंकि उसका अन्तःकरण कलुपित होजाता है, जिससे कि गृहस्थ भी उस साधुको पहचान लेते हैं और उसकी निन्दा करते हैं। तात्पर्य यह है कि ऐसा साधु सबका निन्दनीय बन जाता है ।। ४०॥ 'एव तु ' इत्यादि । प्रमाद आदि दोषोमे लीन, सम्यग्ज्ञान-दर्शन- आयरिए० त्याहि वो दुराचारी साधु भाथाय तथा Eि४ श्रभनी પણ આરાધના કરતું નથી, કારણ કે એનું અત કરણ કલુષિત થઈ જાય જેથી ગૃહસ્થ પણ એ સાધુને પિછાણું લે છે અને એની નિદા કરે છે તાત્પર્ય એ છે કે એ સાધુ સોને નિદનીય બની જાય છે (૪૦) પ્રમાદ આદિ મા લીન, સમ્યજ્ઞાન દર્શનચારિત્ર छ, एव तु त्याह ७ ८ १ ४ अध्ययन ५ उ. २ गा. ४२-४३-मधादिविरतस्य गुणपकटनम् इत्यर्थः, गुणाना च=ज्ञानदर्शनचारित्रलक्षणाना सान्त्यादीना वा विवर्जक परि- स्याजकः गुणाऽनारापक इत्यर्थः, तादृशो मरणान्तेऽपि सवर नाराधयतीति व्यारयातपूर्व सुगम चेति ॥ ४१ ॥ पूर्वोक्तदोपपरित्यागिनो गुणानाह-'तव' इत्यादि । मूलम् तवं कुबड मेहावी, पणीय वजए रसं । मज्जप्पमायविरओ, तपस्सी अडउक्कसो ॥ ४२ ॥ आया-तपः कुरुते मेधावी, प्रणीत वर्जयति रसम् । मद्यप्रमादविरतः, तपस्सी अत्युत्कर्षः ॥४२॥ सान्वयार्थ -मज्जप्पमायविरओ जो मन और प्रमादसे रहित तवस्सी तपस्वी साधु मेहावी आगमोक्त मर्यादामें चलनेवाला अडउफासो घमड नहीं करता हुआ तव-तपस्या कुबड करता है, (और) पणीय-स्निग्ध रसम्रसवाले पदार्थ घी ध घेवर आदिको वन त्यागता है ॥४२॥ टीका~यः तपस्वी साधु' मयप्रमादविरता मादयति-विवेकविकलीकरी- स्यात्मानमिति मा-मादकद्रव्य, तदेव प्रमादजनकत्वात्ममाद इति मद्यप्रमादस्त- स्माद्विरतस्तद्वनंक इत्यर्थः, मेगावीआगमोक्तविध्यनुस्मरणशीलः सयममर्यादाs- वस्थित इत्यर्थः, अत्युत्कपः उत्कर्ष'='अह तपस्वी'-त्यागभिमानस्तमतिक्रम्य= उल्लङ्घन्य-परित्यज्यवर्तत इति अत्युत्कर्पः, तपःप्रधानगुणाभिमानशून्यः सन् तप- चारित्र तथा क्षान्ति आदि गुणोंका त्याग करनेवाला ऐसा साधु मृत्यु- समय भी सवरकी आराधना नहीं करता।॥४१॥ पूर्वोक्त दोपोंके त्यागीके गुण कहते हैं-'तब' इत्यादि । जो तपस्वी साधु आत्माको विवेक-विकल बनानेवाले शराबसे विरत रहते हैं, प्रवचन-प्रतिपादित सयम मर्यादामें स्थित हैं, 'सबसे बड़ा तपस्वी में ही हूँ' ऐसा तपका दर्प (अभिमान) नहीं करते हुए चतुर्थ તથા ક્ષત્તિ આદિ ગુણને ત્યાગ નર એ સાધુ મૃત્યુ સમયે પણ સવરને આરાધના કરતું નથી (૪૧) પૂર્વોક્ત દેના ત્યાગીના ગુણ કહે છે–૨૦ ઇત્યાદિ જે તપસ્વી સાધુ આત્માને વિવેકવિકળ બનાવનાર શરાબથી વિરત રહે છે, તે પ્રવચન પ્રતિપાદિત સયમમર્યાદામાં સ્થિત રહે છે, “સૌથી મટે તપસ્વી એ તને દઉં (અભિમાન) ન કરતા ચતુર્થ ભક્ત આદિ તપ કરે .

५४० श्रीदशकालिको १ ६ १ 3 ४ ८ ८ चतुर्थभक्तादिक करोति पुनरपि प्रणीतालस्नेहमिन्दुक गृढस्नेह या भोज्य, स्ने- हावगाढ कृशरादि, गृढस्नेह घृतपादिक, रस-घृतदुग्पादिक पर्नयति परि- त्यजति ॥४२॥ मूलम्-तस्स पस्सह कल्लाणं, अणेगसाहुपूडय । विउल अस्थसजुत्त, कित्तइस्स सुणेह मे ॥ ४३ ॥ छाया-तस्य पश्यत कल्याणम् , अनेकसाधुपूजितम् । विपुलार्थसयुक्त, कीर्तयिष्यामि शृणुत में ॥४३॥ सान्वयार्थ:-तस्स-उस साधुके अणेगसाहपृश्य-अनेक मुनियोंके वन्दनीय विउल=मुक्तिपदका साधक होनेसे महान् अत्थसजुत्त-मोक्षरूप अर्थ प्रयोजनसे युक्त ऐसे कल्लाण-कल्याण सयम को पस्सर देखो, (और मैं उसके गुणोका) कित्तइस्स-वर्णन करूगा, (तुम) मे=मुझसे सुणे-सुनो ॥४३॥ टीका-'तस्स' इत्यादि । तस्य उक्तगुणवत सापो अनेकसाधुपूजित- मुनिन्दवन्दित विपुल-महत् मुक्तिपदसाधकत्वात् , अर्थसयुक्तम् अर्थ' मुमुक्षुणा प्रयोजन मोक्षलक्षण तेन सयुक्त सवलित तत्फलदातृत्वात् , कल्याण-नितान्तसु- खावहत्वात्सयम पश्यत अवलोफयत भोशिष्याः ! इति शेप'। कीर्तयिष्यामि तद्गुणान् वर्णयिष्यामि मे=मम सकाशात् शृणुत-आफर्णयत ॥४३॥ भक्त आदि तप करते हैं, तथा घेचर आदि प्रणीत भोजनको और घी दूध आदि पुष्टिकर रसीको त्याग देते है ॥ ४२ ॥ तस्स' इत्यादि । हे शिष्य । उस उक्तगुणविशिष्ट साधुके अनेक-मुनि-समूहसे प्रशसित, मुक्तिपदका साधक होनेसे महान, मोक्षरूपी अर्थसे युक्त, अनन्त सुखदाता कल्याण अर्थात् सयमको देखो। मैं उसके गुणोंका वर्णन करूगा, तुम मुझसे सुनो ॥४३॥ તથા ઘેવર આદિ પ્રણીત ભજનને અને ઘી દૂધ આદિ પુષ્ટિકારક સેને त्यागे छ (४२) तस्स. त्या शिष्य ! तगुणविशिष्ट सेवा साधुना भने:-मुनि- સમૂહથી પ્રશસિત, મુકિતપદને સાધક થવાથી મહાન, મેક્ષરૂપી અર્થથી યુક્ત, અનસુખદાતા કલ્યાણ અર્થાત્ સયમને જુએ હું એના ગુણેનું વર્ણન કરીશ, ते तमे साल (४३) - कर्मग्रन्यस्य टवार्य कहेता दुगच्छा मोहनी २, मिथ्यात्व मोहनी १, कपाय १६ अनतानुनधीक्रोध, मान, माया, लोभ, ४ एम अप्रत्यारयानी ४ पछी प्रत्याख्यानी ४ सज्वलन ४, जानापरणी ५, दर्श- नापरणी ४, अतराय ५, ए सन सडताळीस ४७ प्रकृति पाधि छे ए मध्ये नव नामकर्मनी ९ ओगगीरा मोहनीनी १९ पाच ज्ञानापरणी ५, दर्शनावरणी च्यार ४, पाच अतराय ५, एव ४७ मुडताळीस पनधी जाणवी द्वार १ ॥२॥ तणुवांगिईसंघयण, जाई गई खगई विजिणसास। उज्जोया यवे परचो, तसवीसौं गोर्य वेयणिय ॥३॥ अर्थ-हवे अवधि ७३ कहे छ, तिहा तणु कहेता शरीर १, औदारिक १, वैक्रिय २, आहारक ३ तैजस, कार्मण ध्रुवनाधिमे गण्या छ माटे इहा न कह्या उपाग ३, अने सस्थान ६ सघयण ६, जाति ५, गति ४, खगति कहेता विहायोगति २, आनुपूर्वी ४, जिननाम १, उश्वास १, उद्योत- नाम १, आतप १, पराघात १, बस दशक थावरनी दस एव वीस गोन २, वेदनीयकर्म २, हास्य रतिनो जोडो , अरति शोकनो जोडो एव जुगल ॥३॥ हासाइजुयलदुर्ग, वेय आउँ तेवुत्तरीअधुववधीदा। भगा अणाइ साइ, अणत सतुत्तरा चउरो ॥४॥ अर्थ-हास्यादि जुगल बे, वेद ३, आउखा ४ च्यार ए ७३ अवधि ते कोइवार बधाय कोइवार न बधाय, ए मध्ये ७ प्रकृति मोहनीनी, २ वेदनीयनी, २ गोत्रनी, ४ आ- कर्मग्रन्थस्य टवार्थ युनी, ५८ नामकर्मनी छे एव ७३ छे अने ध्रुवबधि ४७ अनुववधी ७३ मिळ्या १२० एकसोवीस प्रकृति थइ, हवे चउ ४ भगी अणाइ कहेता अनादि १, साइ सादि २ तथा अनत तथा सात जोडीये, तिवार अनादिअनत १, प्रथमभग अनादि सान्त ए द्वितीयभग, सादि अनत ए पीजो भग सादिसान्त ए चोथो भग, ए चोनगी जाणवी ॥४॥ पढमवियाधुवउदइनु, धुववधिसु तइय वज्जभग तिग। मिच्छमि तिन्निभगा, दुहावि अधुवा तुरिय भगा॥५॥ अर्थ-तिहा ब्रुवउढयी प्रकृतिमध्ये प्रथम १, तथा २, बीजो ए वे भागा छे-अनादि सान्त भव्यमे २, ए वे भगा छे तथा जुधवधि प्रकृतिनेविपे नीजो वर्जीने तीन भग छे तिहा अभव्य आअयि अनादि अनत छे जे कारणे अनादि- काल जाधे छे, अने ते सदाकाल बाधे तिणे अनतबध छे, भव्यजी ने अना दे सान्त छे, ए योग्यतानो सून छे सादि अनत ए भग कर्म स्वरुपे सभवे नहीं अने सादिसान्त भग जीव उपशम श्रेणिए चढी इग्यारमे गुणठाणे सर्व प्रकृ- तिनो अबध थयो, ते वळी पाछो पडीने सर्व बध करे ते सादि, अने ते जीव वळी कर्म क्षय करीने सिम थाय तिवारे सान्त थाय, ए तीन भग छे, मिथ्यात्वने गुवोदये तीन एहिज भग छे, तथा अवध तथा अब्रुवोदयनेविषे एक चोथो भागो सादिसान्त ए छे ॥५॥ निमिणे यिरं अथिर अगुरुये, सुहे असुहे तेअ कम्म चउवन्ना। नाणं तरायें दसणं, मिच्छ धुवउदय सगवीसौं ॥६॥ १०७ कर्मग्रन्यस्य टपार्य कहेता दुगच्छा मोहनी २, मिथ्यात्व मोहनी १, कपाय १६ अनतानुनधीकोष, मान, माया, लोभ, ४ एम अप्रत्यार यानी ४ परी प्रत्यार यानी ४ सज्वलन ४, ज्ञानापरणी ५, दर्श- नावरणी ४, अतराय ५, ए सर्व सडताळीस ४७ प्रकृति माधि छे ए मध्ये नव नामकर्मनी ९ ओगणीरा मोहनीनी १९ पाच ज्ञानापरणी ५, दर्शनाररणी च्यार ४, पाच अतराय ५, एव ४७ सुडताळीस ध्रुपमधी जाणवी द्वार १ ॥२॥ तणुवांगिईसंघयण, जाई गई खगई ऍधि जिणसासं। उज्जोयो यवं परघा, तसवीसी गोये वेयणिय ॥३॥ अर्थ-हवे अवधि ७३ कहे छे, तिहा तणु कहेता शरीर १, औदारिक १, वैक्रिय २, आहारक ३ तैजस, कार्मण ध्रुवबधिमे गण्या छे माटे इहा न कह्या उपाग ३, अने सस्थान ६ सघयण ६, जाति ५, गति ४, खगति कहेता विहायोगति २, आनुपूर्वी ४, जिननाम १, उश्वास १, उद्योत- नाम १, आतप १, पराघात १, बस दशक थावरनी दस एव वीस गोत्र २, वेदनीयकर्म २, हास्य रतिनो जोडो १, अरति शोकनो जोडो एव जुगल ॥३॥ हासाइजुयलदुर्ग, वेय आउँ तेवुत्तरीअधुववधी"।दार। भगा अणाइ साइ, अणत सतुत्तरा चउरो ॥४॥ अर्थ-हास्यादि जुगल बे, वेद ३, आउखा ४ व्यार ए ७३ अवधि ते कोइवार बघाय कोइवार न बधाय, ए मध्ये ७ प्रकृति मोहनीनी, २ वेदनीयनी, २ गोवनी, ४ आ- , , ,

कर्मग्रन्थस्य टवार्थ
६८७
युनी, ५८ नामकर्मनी छे एव ७३ छे अने ध्रुववधि ४७
अवववधी ७३ मिळ्या १२० एकसोवीस प्रकृति थइ, हवे
चउ ४ भगी अणाइ कहेता अनादि १, साइ सादि २ तथा
जनत तथा सात जोडीये, तिवार अनादिअनत १, प्रथमभग
अनादि सान्त ए द्वितीयभग, सादि अनत ए पीजो भग
सादिसान्त ए चोयो भग, ए चोभगी जाणवी ॥४॥
पढमवियाधुवउदइनु, धुववधिसु तइय वनभग तिगं।
मिच्छमि तिन्निभगा, दुहावि अधुवा तुरिय भगा॥५॥
अर्थ-तिहा ब्रुवउदयी प्रकृतिमध्ये प्रथम १, तथा २,
वीजो ए वे भागा छे-अनादि सान्त भव्यमे २, ए वे भगा
छे तथा ध्रुवनधि प्रकृतिनेविषे नीजो वर्जीने तीन भग छे
तिहा अभव्य आअयि अनादि अनत छे जे कारणे अनादि-
काल वाधे छे, अने ते सदाकाल बाधे तिणे अनतबध छे,
भव्यजी ने अना दे सान्त छे, ए योग्यतानो सून छे सादि
अनत ए भग कर्म स्वरुपे सभवे नही अने सादिसान्त
भग जीव उपशम श्रेणिए चढी इग्यारमे गुणठाणे सर्व प्रकृ-
तिनो अबध थयो, ते वळी पाछो पड़ीने सर्व बध करे ते
सादि, अने ते जीव वळी कर्म क्षय करीने सिम थाय तिवारे
सान्त थाय, ए तीन भग छे, मिथ्यात्वने ध्रुवोदये तीन
एहिज भग छे, तथा अवध तथा अध्रुवोदयनेविषे एक
चोथो भागो सादिसान्त ए छे ॥५॥
निमिण थिरै अथिरै अगुरुव, सुहे असुहे ते कम्म
,
चउवन्नों।
नाणं तराय दसर्ण, मिच्छ धुवउदय सगवीसौं ॥६॥

६८८ समग्रन्थस्य टमार्य --- Lune - - अर्प-निर्माण नाम १, स्थिरनाम १, अगुल्टर नाम १, शुभ नाम १, अशुभनाम १, तेजसशरीर १, कार्मणशरीर १, वर्णनाम १, गमनान १, रसनाग १, स्पर्शनाम १, एम १२, पार नाम कमनी प्रकृति पाच ज्ञानापरणी ५, पाच उतराय ५, च्यार दर्शनापरणी ४, एक मिय्यान मोहनी १, ए सत्तावीस २७, प्रकृति सदयी जाणी ते मले वर्ण गध रस, स्पर्श, ४, नी एरीत छे, जे पाच वर्ण मने को- इक वर्ण नियमा मुख्यताए उदय हो, तिणे नुपउदयी इम गधादिकनो जाणवो ए सत्तावीस मध्ये ज्ञानापरणी पाच, जतराय पाच, दर्शनावरणी ४, मोहनी १, नाम कर्मनी १२, एप २७ छे ॥६॥ थिरै सुमि अरं विण अधुव-वधी मिच्छ विणुमोह धुववधा। निदो वधाय मीस, सम्म पण नवई अधुवुदया॥७॥ अर्थ-हवे अध्रुवोदयी कहे छे-जे अनुवधि प्रकृति ७३, ते मध्ये थिर १, अथिर २, शुभ ३, अशुभ ४, ए ४, च्यारविना ६९ लेवी, अने मोहनीनी १९ गुववधि कही छे, तेमाथी मिथ्यात्व मोहनी वरजीने शेष १८, रहे ते पिण अघ्रवोदयमे गणी छे शरीर ३, उपाग ३, सस्थान ६, सघयण ६, जाति ४, गति ४, विहायोगति २, आनुपर्वी ४, जिननाम १, श्वासोच्छवास १, उद्योत १, आतप १, पराघात ', थिर १, शुभविना सादि ८, जयिर अशुभविना थावरादि ८,गोत्र २, वेदनीय २, हास्य १, रति १, अरति १, शोक १, वेद १, आउ ४, ए ६९, सोळ कसाय भय १, २०८ . , कर्मग्रन्थस्य टवार्थ ६८९ दुगा १, निद्रा ५, उपवात १, मित्र १, सम्यक्त्वमोहनी १, ए ९५ अब्रुवउदयी सर्व गतिना जीवने सर्वकाळे उदय न हुवे ते माटे अनुवकहीजे ए मध्ये दर्शनावरणी, ५, वेदनीय २, मोहनीय २७, आयु ४, नामकर्मनी ५५, गोत्र २, ए ९५, अववोदय जाणवी ॥७॥ तसवन्नवीस-सगतेयकम्म धुवबधिसेस वेयतिग। आगिइतिगवेयर्णिय, दुजुयले सगउरलं सासचउ ८॥ अर्थ-वे ब्रुवसत्ता-त्रसवीस कहेता बस १०, थावर १०, वर्ण २०-५, वर्ण २, गव ५, रस ८, स्पर्श, एव २०, तैजसकामण ७ तैजसशरीर, तेजसबधन २, तैजससघातन ३, कार्मणशरीर ४, कार्मणवधन, ५, कार्मणसघातन ६, तैजसका- मणबधन ७, शेष ब्रुवबधि ४१, ज्ञानावरणी ५, दर्शनावरणी नव ९, मोहनीय १९, अगुरुलघु १, निर्माण १, उपघात १, अतराय ५, एव ४१, वेद ३, आकृतित्रिक ३, वेहनी प्रकृति १७ सस्थान ६, सघयण ६, जाति ५, एव १७, वेदनीय २, हास्य १, रति १, अरति १, शोक १, ए च्यार औदारिक सात-औदारिक शरीर १, औदारिकउपाग २,औदारिकबधन ३, औदारिक तैजसबधन ४, औदारिक तैजसकार्मणबधन ५, औदारिक सघातन ६, औदारिककामणबधन ए ७, एव सात शासोच्छ्वासयी च्यार ४,-वासोश्वास १, उद्योत १, आतप १, परावात १, ए च्यार ॥८॥ खगई तिरिदुर्गनीय, धुवतता सम्ममीसमणुयदुग। विउविकारजिणाऊ, हारसगुच्चा अधुवसता ॥९॥ 87 १०२ .

६८८ सम्मग्रन्यस्य वार्य --- . अर्थ-निर्माण नाम १, स्थिरनाम १, अगुल्लर नाम १, शुभ नाम १, अगुभनाम १, तेजसशरीर १, कार्मणशरीर १, वर्णनाम १, गधनाम १, रसनाग १, स्पर्शनाम १, एस १२, वार नाम कमनी प्रकृति पाच ज्ञानापरणी ५, पाच अतराय ५, च्यार दर्शनावरणी ४, एक मिथ्यात्व मोहनी १, प सत्तावीस २७, प्रकृति गुवउदयी जाणी ते मध्ये वर्ण गर रस, स्पर्श, ४, नी ग रीत छे, जे पाच वर्ण मध्ये को- इक वर्ण नियमा मुस्यताए उदय होने, तिणे गुवउदयी इम गधादिकनो जाणवो ए सत्तावीस मध्ये ज्ञानाचरणी पाच, अतराय पाच, दर्शनावरणी ४, मोहनी १, नाम कर्मनी १२, एव २७ छे ॥६॥ थिरै सुभिं अरे विण अधुव-,वर्धा मिच्छ विणुमोह धुववधी। निदोवघाये मौस, सम्म पण नवई अधुवुदया॥७॥ अर्थ-हवे अध्रुवोदयी कहे छे-जे अनुवबधि प्रकृति ७३, ते मध्ये थिर १, अथिर २, शुभ ३, अशुभ ४, ए ४, च्यारविना ६९ लेवी, अने मोहनीनी १९ ध्रुवबधि कही छे, तेमायी मिथ्यात्व मोहनी वरजीने शेष १८, रहे ते पिण अध्रवोदयमे गणी छे शरीर ३, उपाग ३, सस्थान ६, सघयण ६, जाति ४, गति ४, विहायोगति २, आनुपूर्वी ४, जिननाम १, श्वासोच्छवाम १, उद्योत १, आतप १, पराघात थिर १, शुभविना सादि ८,जथिर अशुभविना थावरादि ८, गोत्र २, वेदनीय २, हास्य १, रति १, अरति १, शोक १, वेद १, आउ ४, ए ६९, सोळ कसाय भय १, n , कर्मग्रन्थस्य वार्थ ६८९ . दुगछा १, निद्रा ५, उपवात १, मिश्र १, सम्यक्त्वमोहनी १, ए ९५ अब्रुवउदयी सर्व गतिना जीवने सर्वकाले उढप न हुवे ते माटे अब्रुवकहीजे ए मध्ये दर्शनावरणी, ५, वेदनीय २, मोहनीय २७, आयु ४, नामकर्मनी ५५, गोत्र २, ए ९५, अवबोदयि जाणवी ॥७॥ तसवन्नवीस-सगतेयकम्म धुववधिसेस वेयतिग। आगिइतिगंवेयर्णिय, दुजुयल सगउरलँ सासचउ ८॥ अर्थ-वे ध्रुवसत्ता त्रसवीस कहेता नस १०, थावर १०, वर्ण २०-५, वर्ण २, गध ५, रस ८, स्पर्श, एव २०, तैजसकामण ७ तेजसशरीर, तैजसबधन २, तैजससघातन ३, कार्मणशरीर ४, कार्मणवधन, ५, कार्मणसघातन ६, तैजसका- मणधन ७, शेष अवधि ४१, ज्ञानावरणी ५, दर्शनावरणी नव ९, मोहनीय १९, अगुरुलधु १, निर्माण १, उपघात १, अतराय ५, एव ४१, वेद ३, आकृतित्रिक ३, वेहनी प्रकृति १७ सस्थान ६, सघयण ६, जाति ५, एव १७, वेदनीय २, हास्य १, रति १, अरति १, शोक १, ए च्यार औदारिक सात-औदारिक शरीर १, औदारिकउपाग २,औदारिकवधन ३, औदारिक तैजसमधन ४, औदारिक तैजसकामणबधन ५, औदारिक सधातन ६, औदारिककार्मणबधन ए ७, एवं सात श्वासोच्छ्वासयी च्यार ४,-वासोश्वास १, उद्योत १, आतप १, परावात २, ए च्यार ॥८॥ खगई तिरिदुर्गनीय, धुवसता सम्ममीसमणुयदुग। विउविकारजिणाऊ, हारसगुच्चा अधुवसता ॥९॥ , 87 ६९० फर्मग्रन्थस्य टवार्य अर्थ-खगतिद्ग-गुमनिहायोगति १, शुभविहायोगति २, तिरिदुग कहेता नियंगति १, निर्यचानुपूर्वी २, नाच- गोन १, पुरुसोनीस गुमसत्ता जागी ज्ञानापरणी ५, दर्श- नावरणी ९, वेदनी २, मोहनीय २६, नामकर्मनी ८२, गोन १, अतराय ५, एर १३० गुवसत्ता जाणवी ग्रुप ने च्यार ४ गतिना जीवमा सदा छती पामीये ते त्रुब कहीने हवे अनुासना २८ ना नाम कहे छे समीतमोहनी १, मिश्र मोही २, मरगति १, मनुष्यावर्षी २ वेक्रिय शरीर १, वैक्रिय उपाग २, वक्रिय बधन ३, वैक्रियतैजसनवन ४, वैक्रियकार्मणपवन ५, वैक्रियतैजसकामणधन ६, वैक्रिय सवातन ७, नरकगति १, नरकानुपूर्वी २, देवगति १, देवा- नुपूर्वी २, एव ११, जिननाम १२, आयु ४, आहारक ७, आहारक शरीर १, आहारक उपाग २, आहारक सघातन ३, आहारक बवन ४, आहारकतेजसघन ५, आहारककार्म- णमधन ६, आहारकतैजसकामणधन एव ७ मिळ्या २८ अठ्ठावीस अध्रुवसत्ता ए मध्ये २ मोहनी, २१ नामकर्मनी, ४ आउखो, १ गोन, एव २८ अब्रुवसत्तानी प्रकृती जाणवी , पढमतिगुणेसुमिच्छ, नियमाअजयाइ अट्ठगे भन्न। सासाणे खलु सम्म, रात लिच्छाइ दसगे वा ॥१०॥ अर्ध-हवे सत्ताने भागा को छ-परप्रतिगुणे-पेहेला तीन गुणठाणा मध्य मिथ्यात्व मोहनीनी सत्ता नियमा छे, एतले मिथ्यात्व गुणठाणे मिथ्यात्वनो उदय नियमा छे, तेहनी सत्तापिण नियमा-छे, सास्वादन गुणठाणे २८ नी सत्ता नि- कर्मग्रन्थस्य टवार्थ यमा छे ने मिश्र गुणस्थाने २८, २७ ने २४ ए रण सत्तामा मिथ्यात्व अवश्य होय माटे, तथा अयत कहेता चोथा गुणठाणाथी ११ मा गुणठाणा लगे आठ गुणठाणे भजना जाणवी तिहा उपशम समझीतीने तथा क्षयोपशमकीतीने मिथ्यात्वनी सत्ता के अने क्षायिक समकीतीने सप्तक क्षय गयो छे तेहने ए मिथ्यात्वनी सत्ता नयी सास्वादन गुणठाणे समकीत मोहनी नियमा सत्ताये होय हवे मिथ्यात्वयी माडी उपशान्तमोह पर्यंत दस गुणठाणे समकीत मोहनी सत्तानी भजना जाणवी तिहा अनादि मिथ्यात्व तथा समकीत मो- हनी उद्वेली हुवे ते जीवने मिथ्यात्व गुणठाणे वर्तते समकीत मोहनीनी सत्ता नयी, अने जे निपुजीकरण करीने मिथ्यात्वे आव्या छ तेहने छ सम्यकत्वमोह उवेलीने जे मिश्र गुणठाणे आव्या छे, त्या तेहने समकीत मोहनीनी सत्ता नथी उवेलया विना जे मित्र गुणठाणे आव्या छे, तेहने सत्ता छे अने चोथा गुणठाणायी इग्यारमा पर्यंत, तथा उपशमीने सम- कीत मोहनीनी सत्ता के क्षायिकसमकीतीने अणे मोहनीनी सत्ता नयी ते माटे भजना जाणवी ॥ १० ॥ सामणमीसेसु धुव, मीस मिच्छाइ नवसु भयगाए। आइदुगे अण नियमा, भइया मीसाइ नवगमि ॥११॥ अर्थ-सास्वादन गुणठाणे, मिश्र गुणठाणे व नीश्चयथी मित्रमोहनीयनी सत्ता छेजे कारणे कृतत्रिपुजी-जीव ए गुण- ठाणे आवे, अने मिथ्यात्व १, अविरति समकौतयी उपला उपशान्तमोह सुघी एव ९ नव गुणठाणे भजना जाणवी हवे न होवे तिहा अनादि मिथ्यात्वी छवीस सत्तावत छे, ६९२ कर्मयन्यस्य टवार्य -- --- तेहने मिव्याय गुणटाणे उता मित्रमोहनीनी सत्ता नयी, अने जे निपुजीकरण करीने पड्या जे मिथ्यात्व गुणटाणे आया छे तेहने मिथ्यात्वनी सत्ता हुरे ए भजना, ए अविरति सम- कौतयी माडी उपशान्तमोह पर्यंत ८ गुणटाणे उपशम समीतीने मिनी सत्ता होय क्षायिक समीतीने सप्तक क्षय थयो छे, ते माटे मिअमोहनीनी सत्ता नयी ते माटे भजना जाणवी आईदुगे-मिथ्यात्व, सास्वादन ए वे गुणटाणे अनतानुनधीनी सत्ता नियमा होवे अने मिश्रादिक नव गुणटाणे भजना जाणवी तिहा मोहनी कर्मनी २४ सत्तापाळो क्षयोपशमसमकीती जीव चोथायी पडीने मि आव्यो, वेहने मित्र गुणटाणे अन- तानुनधीनी सत्ता नयी, अने जे २८ अट्ठावीस सत्तावत क्षयो- पशमसमकिती चोयायी पड़ी मिश्रे आव्यो, ते अथवा २८ सत्ता- वत मिथ्यात्वी मिथ्यात्व मुकी मिश्रे आव्यो, तेहने अनतानु- बधीनी सत्ता छे, तथा अविरतियी उपशान्तमोह सुधी क्षायिक- समकीतीने नयी, तथा उपशमीने छे ए भजना जाणवी ॥११॥ आहारगसत्तगवा, सवगुणेवितिगुणे विणा तित्थ। नोभयसतेमिच्छो, अतमुहुत्तं भवे तित्थे ॥ १२॥ अर्थ आहारकसप्तकनी सत्ता सर्व गुणठाणे १४ गुण- ठाणानेविषे वा कहेता भजना होय अथवा न होय जे जीव ७ तथा ८ गुणठाणे आहारक बाधीने ते पड्यो अथवा चड्यो, तेहने तो आहारक्नी सत्ता होय, अने जे जीव अरारक बाध्यानिय पडे अथवा चडे तेहने न होय अथवा आहारक करी उवेली काड्यो तेहने ११२

कर्मग्रन्थस्य टमार्थ
६९३
पण आहारक ७ नी सत्ता नयी तथा तित्थे-तीर्थकर, नामनी
सत्ता वीजे सास्वादने नीजे मिश्र गुणठाणे सर्वथा नयी मि-
व्यात्व तथा अविरति समकीती प्रमुख अयोगी पर्यंत १२
बार गुणटाणे भजना जाणवी जिणे जीव ४, तथा ५, तथा
६, तथा ७ मेने ८ में गुणठाणे जिननाम बाधी ए १२ गुणटाणे
आया होवे, वेहने जिननामनी सत्ता पामीजे जिणे बाध्यो
न होय अथवा वाघीने उवेली आव्यो होय, तेहने जिनना-
मनी सत्ता न होये तथा जिननाम, आहारकनी युगपत् सत्ता
जेहने होय, ते उभय सत्नावत मिथ्यात्व गुणठाणे न आवे
तथा जेहने तीर्थकर नाम विपाकी सत्ता होय, ते जो मिथ्या-
त्व गुणटाणे (नरकायुना) निकाचित उदय माटे आवे, ते
पिण अतर्मुहर्तकाल मिथ्यात्वपणे रहे, पिण ववतो काल रहे
नहीं इम जाणवो ॥ १२ ॥
केवलजुयलावरणों, पणनिदो वारसाइमकसायों।
मिच्छे ति सबघाई, चउनाणं ति दसणावरणां ॥१३॥
अर्थ-हवे घातीमध्ये २०, सर्व घाती कहे छे-केवल-
जुगल केहेता २, केवलज्ञान १, तथा केवलदर्शन २, तेहना
आवरण-केवलज्ञानावरणी १, तथा केवलदर्शनावरणी २, पाच
निद्रा ५, आदि पुरला १२, कषाय अनतानुवधी ४, अप्र-
त्याख्यानी ४, प्रत्याख्यानी ४, ए १२, मिथ्यात्व १, ए
२०, वीस सर्वघाती जाणवी, तथा देशघाती २५, पचीस
प्रकृति छे ते कहे छे, च्यार ४, ज्ञानावरणी ४, त्रण्य दर्श-
नावरणी ॥१३॥

६९४, कर्मयन्यस्य टमार्थ- . . सजलण नोकसाया, विग्घ इअदेसघाइये अघाई । पत्तेय तणुढाउ, तसवोसा गोअदुगवण्णा ॥१४॥ अर्थ-सजलणा ४, नोरुपाय ९, अतराय ५, एम पोक्त मेळवता २५, पचीस ए देशपाती छे तया अराती ७५, छे तिहा पराघात १, उश्वास १, आतप १, उद्योत १, निर्माण १, अगुरुलघु १, तीर्थकर १, उपवात १, तणु आटनी प्रकृति ३५, शरीर ५, उपाग ३, सस्थान ६, सब- यण ६, जाति ५, गति, खगति २, आनुपूर्वी ४, आउखा ४, नस १०, यावर दस १०, गोयदुग-वे गोन २, वेदनी वे २, वर्ण १, गध, २, रस ३, स्पर्श ४, ए' ७५, अघाती प्रकृति जाणवी, जे गुणनो घात न करे ते अघाती कहेवी ॥१४॥ सुरनरतिगुच्चसाय, तसदस तणुवर्ग वर चउरस। परघासगं तिरिआउ, वन्नचउँ पणिदि सुभखगई।१५॥ अर्थ-हवे पुन्यप्रकृतिना ४२, भेद कहे छे-सुरत्रिक- देवगति १, देवायु २, देवानुपूर्वी ३, तथा मनुष्यगति १, मनुष्यानुपूर्वी २, मनुष्यायु ३, नरविक मळी ६, उच्चोन ७, सातावेदनी ८, सदशक, १८, शरीर पाचः २६, उपाग त्रण २६, वज्ररुषभनाराच २७, समचोरस सस्थान-२८, परावात सप्तक पराघात २९, उश्वास ३०, आतप ३१, उद्योत-३२, अगुरुलघु ३३, निर्माण ३४, तीर्थकरनामकर्म ३५, तिर्यच- आयु:३६, शुभवर्ण ३७, गधः ३८, रस ३९, स्पर्श ४०, पचेन्द्री जाति ४१, शुभविहायोगति ४२, ए. ४२, बेताळीस पुण्यप्रकृति जाणवी जेहना विपाक भोगवता मीठा लागे ते पुन्यप्रकृति ॥१५॥ - .

कर्मग्रन्यस्य स्वार्थ •६९५ , वायालपुन्नपगई, अपढम सठाणं खगइ सघयेणा। तिरिढुंग असायं नीओ-बघाय इगं विगंल निरयतिग१६ अर्थ-४२, पुण्यप्रकृति यइ हवे ८२, पाप प्रकृति कहे छे, अपढम-पेहेलु सस्थान, पेहेली खगति-विहायोगति, सवपण ए ३ वर्जीने बीजी सर्व पाप प्रकृति छे न्यग्रोध स- स्थान १, सादि, २, वामन, ३, कुन्ज, ४, हुट ५, ए पाच सस्थान, तथा अशुभविहायागति ६, तथा रुषभनाराच सघयण ७, नाराच ८, अर्धनाराच ९, कीलिका १०, छेवठ्ठो ११, तिरिदुग-तिर्यंचगति १२, तिर्यंचानुपूर्वी १३, असातावेदनी १४, नीचगोन १५, “उपचात १६, एकेन्द्रीनी जाति १७, विगलतिग द्वीन्द्रिय १८, त्रीन्द्रिय १९, चौरेन्द्रीनी जाति २०, नरकत्रिक ते नरकगति २१, नरकानुपूर्वी २२, नरकायु २३, ।। १६ ॥ थावर दमै वन्नचउक्क, घाइपणयालेसहिअ वासीई। पावपयडित्ति दोसुवि वन्नाइगहा सुहा असुहा॥१७॥ अर्थ-थावरनो दशक ३३, अशुभवर्ण ३४, रस ३५, गध ३६, रपर्श ३७, तया घातीनी ४५, ते ज्ञानावरणी ५, मोहनी २६, अतराय ५, एव ४५, सहीत करीये, एटले ८२, प्रकृति पापली जाणवी इहा पापना: ८२, भेद, तथा पुण्यना ४२ भेद, ते भेळता १२", । या ते बनी तो १२०, छे? तेत्तो उत्तर-जे शुभवर्णादि ४, पुन्यम गवेग्या, अशुभवर्णादि पापमे गवेधा, ते माट दुवारे (बेवार) गणता १२४, याय छे इमज ॥१७॥ , कर्मग्रन्थस्य दयार्य - . नामधुववधि नवग, दंसणे पणनाणं विग्धं परघाय। भय कुच्छ मिच्छ सास, जिणगुणतीसाअपरिअत्ता १८ अर्थ-हवे अपरापर्तमान प्रकृति कहे छे-नामनी सुख- बधी ९, वर्णादि ४, निर्माण १, अगुरुलघु १, उपवात १, तैजस १, कार्मण १, ए ९, तया दर्शनावरणी ४, पणनाण- ज्ञानावरणी पाच, विग्य-अतराय पाच, परावात १, भय, दुगछा, मिथ्यात्व, उवास, जिननाम ए इगुणनीस २९, ए अपरावर्त्त- मान जाणवी अपरावर्त्तमान एटले जे प्रकृति कोनो जव तथा उदय रोक्या विना पोताना हेतु सद्भावे बधाय, तथा उदय आवे, ते अपरावर्तमान कहीये ॥१८॥ त]अट्ठ वेअदुजुअल, काय उज्जोअगोअंदुगनिदाँ। तसवीसा उ परित्ता, खित्तविवागाणुपुबीओ ॥१९॥ अर्थ-~-परावर्तमान प्रकृति ९१, कहे छे, जे तणुअठ्ठ- शरीर ३, उपाग ३, सस्थान ६, सघयण ६, जाति ५, गति ४, खगति २, आनुपूर्वी ४, एव ३३, तथा वेद त्रण ३६, दुजुयल-हास्य रति, तथा शोक अरति ४०, कषाय सोळ ५६, उद्योत ५७, आतप ५८, गोत्र बे ६०, वेदनीय बे ६२, निद्रा पाच ६७, बस थावरना दसकानी मळी वीस ८७, चार आउखा ९१, ए एकाणु परावर्त्तमान प्रकृति जाणवी जे ए बध तथा उदयमा एकने रोकीने बधाय अथवा उदये आवे ते परावर्त्तमान कहीजे हवे क्षेपविपाकी-क्षेत्र कहेता आकाश तिहा जेहनो विपाक जे ते क्षेनविपाकी च्यार ४, आनुपूर्वी छे, जे एक भवयी वीजे भव जता वाटे विपाके , IN कर्मग्रन्थस्य स्वार्थ उदय पाभीये छीये, जो प्रदेशोदय न मानीयेतो एहनी स्थिति किहा भोगवाये ते माटे ॥ १९ ॥ घणघाई दु गोअ जिणा, तैसिअरैतिग सुभग दुभंग चउ सांस। जाइ तिग जियविवागा, आऊ चउरो भववि- वागा ॥२०॥ अर्थ-हवे जीवविपाकीनी ७८, प्रकृति कहे छे तिहा जे कार्मण वर्गणापणे जे बाध्यो कर्म, ते मुख्यपणे जीवनेज विपाक देखाडे, ते जीवविपाकी कहीये तिहा धनघाती ४७, जे ज्ञानावरणी पाच, दर्शनावरणी नव, मोहनी अठ्ठावीस, अत- राय पाच, ए ४७, दुगोय बे गोन, बे वेदनीय ४, जिननाम १, त्रसरिक नस १, बादर २, पर्याप्त ३, इअर-थावरत्रिक थावर १, सूक्ष्म २, अपर्याप्त ३, सुभगचउ-सुभग १, सुस्वर २, आदेय, जश ४, दुभगचउ-दुर्भग १, दु स्वर २, अनादेय ३, अजश ४, श्वासोश्वास १, जातित्रिक कहेता-जाति ५, गति ४, खगति २, ए ११ इग्यार ए सर्व मिळी ७८ प्रकृति जीवविपाकी जाणवी तथा आउखा च्यार ४ भववि- पाकी जाणवा आउखा पोताना भवमेज उदये आवे, पण बीजे भवे सक्रमण तथा देशपणे पिण उदय न आवे, ते माटे भवविपाकी कह्या ॥२०॥ नामधुवोदय चउतणु, वघाय साहारणियर जोयतिग। पुग्गलविवागि वधो, पयइटिइ रस पएसत्ति ॥२१॥ " 88 ६९८ कर्मग्रन्थस्य टमार्थ , अर्थ-नामझर्मनी योदयी १२, वर्णादि ४, तेजस १, कार्मण १, निर्माण १, अगुस्ल १, थिर १, अथिर १, अशुभ १, ए १२ चउतणु-शरीर ३, उपाग ३, सस्थान ६, सवयण ६, ए १८ तथा उपपात १, सावारण १, प्र- त्येक १, उद्योतनिक-उद्योत १, आतप २, परावात ३ एस ३६ उनीस प्रकृति पुद्गलनिपाकी जाणी पुद्गलविपाकी कहेता जे बधकाले कार्मण वर्गणाधणे बाध्या, ते उदयकाले शरीरप्रत्ये विपाक देखाडे, ते पुद्गलविपाकी कहीजे इहा कोई पूछस्ये जे कार्नणनी तो वर्गणा नविलेवाये, ते पिण सोल- गुणी रे, तो उन्तामनीपर जीवविपाकीम का गणता नथीतेहने उत्तर जे.-कार्मणवर्गणा तो आहारपर्याप्तिने वले लेवाये, ते माटे पुद्गल विपाकी छे श्वासोश्वास, सु- स्वर, ते तो उश्वासपर्याप्ति तथा भाषापर्याप्तिने उदयबले ले छे ते माटे जीवविपाकी गणी छे हवे नवना भेद ४ च्यार कहे छे प्रकृतिबध १, स्थितिबध, २, रसबध ३, प्रदेशबध ४ तिहा पेहेला प्रकृतिधना भेद कहे छे ॥ २१ ॥ मूलपयडीण अड सत्त, छेग बघेसु तिन्निभूगारा। अप्पत्तरा तिअ चउरो, अवट्ठिआन हुअवत्तवो॥२२॥ अर्थ-मूळ कर्म आठ छ, तिहा मूळ आठ प्रकृति एक समे एक जीव बाधे जे नवा भवनो आउखो बाधतो हुवे ते आठ बाधे, जे जीव आउखो न बावतो हुवे ते सात बाधे, तथा दसमे गुणठाणे वर्त्तता मुनिने आउखो, मोहनी, न बाघे तिवारे छ ६ बधाये, तथा इग्यारमे, बारमे, तेरमे गुणठाणे एक सातावेदनीय बाधे, ते माटे एकविध बध छे . , .

कर्मग्रन्थस्य टमार्थ- ६९९ एतले मूळ नवना यानक ४ च्यार छे इहा तीन ३ भूय- स्कार जाणवा, इग्यारमे गुणठाणे एक वधक हतो, ते इग्यार- मायी पडी दशमे आवी ६ 7 बावे, तिवारे १ भूयस्कार, वळी नवमे गुणठाणे आवे तिवारे ७ सात बाधे, ते चीजो मूयस्कार, तथा ते जीव जीवारे आठ बाधे तिवारे त्रीजो म्य- स्कार जाणवो, अल्पतर तीन छे, ते जे आठनो बधक ते सात बाघे तिवारे एक अल्पतर, सातयी उ बाधे ते वीजो अल्प- तर, अने छ थी एक साधे तिवारे नीजो अल्पतर, ए तीन अल्पतर जाणवा तथा आटनो १, अवस्थित सातनो बीजो अवस्थित, उनो चीजो अवस्थित, एकनो चोयो अवस्थित, ए ४ च्यार अवस्थित जाणवा मूळ पधे अवक्तव्य वध नयी, जे मूळयी अनधक थइने पाठो बधक थतो नयी ॥ २२ ॥ एगादहिगे भूओ, एगाईऊणगम्मि अप्पतरो। तम्मत्तोऽवट्ठियओ, पढमे समये अवत्तयो॥ २३ ॥ अर्थ-एकादिक अल्पनधयी जे अधिक बाधे तेभपस्कार बध कहीये जिम एक बप करतो तिण वळी एक अधिको माध्यो, तिणे पहेले समये भूयस्कार कहीये, अने जे पूर्व वयवी एक तथा घणा पिण ऊणा बाधे ते अल्पतर जिम जाठनोव करतो ते सात बाधे ए अल्पतर जाणवो, अने जे थानक बावतो हतो तेहिज वीजे समे बाधे, ते अवस्थित कहीये, ते मान ते ते प्रमाणेज आधे ते अवस्थित बध जाणवो, अने अपध थइ प्रथम समये जे बाचे तेहने अवक्तन्य कहीये, जिम दसमे, इग्यारमे, मो- हनी कर्मनो अग्धक हतो, ते पडता नवमे गुणठाणे आवे - .

६९८ कर्मग्रन्थस्य यार्थ . - अर्थ-नामकर्मनी नवोदयी १२, वर्णादि ४, तैजस १, कार्मण १, निर्माण १, अगुरुलघु १, घिर १, अथिर १, अशुभ १, ए १२ चउतणु-शरीर ३, उपाग ३, सस्थान ६, सरयण ६, ए १८ तथा उपपात १, साधारण १, प्र- त्येक १, उद्योतनिक-उद्योत १, आतप २, परागत ३ एप ३६ उनीस प्रकृति पुद्गलविपाकी जाणवी पुद्गलत्रिपाकी कहेता जे बधकाले कार्मण वर्गणापणे वाच्या, ते उदयकाले शरीरप्रत्ये विपाक देखाडे, ते पुद्गलविपाकी कहीजे इहा कोई पूउस्ये जे कानणनी तो वर्गणा नविलेवाये, ते पिण सोल- गुणी , नो उचामनीपर जीवविपाकीम का गणता नधी? तेहने उत्तर जे.-कार्मणवर्गणा तो आहारपर्याप्तिने वले लेवाये, ते माटे पुद्गल विपाकी छे श्वासोश्वास, सु- स्वर, ते तो उश्वासपर्याप्ति तथा भाषापर्याप्तिने उदयबले ले छे ते माटे जीवविपाकी गणी छे हवे नवना भेद ४ च्यार कहे छे प्रकृतिबध १, स्थितिबध, २, रसबध ३, प्रदेशबध ४ तिहा पेहेला प्रकृतिबधना भेद कहे छे ॥ २१ ॥ मूलपयडीण अड सत्त, छेग वघेसु तिन्निभूगारा। अप्पत्तरा तिअ चउरो, अवट्ठिआन हुअवत्तबो॥२२॥ अर्थ--मूळ कर्म आठ छे, तिहा मूळ आठ प्रकृति एक समे एक जीन बाचे जे नवा भवनो आउखो बाधतो हुवे ते आठ बाधे, जे जीव आउखो न बावतो हुवे ते सात बाधे, तथा दसमे गुणठाणे वर्तता मुनिने आउखो, मोहनी, न बाघे तिवारे छ ६ बधाये, तथा इग्यारमे, बारमे, तेरमे गुणठाणे एक सातावेदनीय बाधे, ते माटे एकविध बध छे कर्मग्रन्यस्य यार्थ ७०२ " उद्यो ५ नो, सातमो ४ नो, आठमो ३ नो, नवमो २ नो, दसमो १ नो, ए दस वधस्थानक जागवा, इहा नव मूयस्कार बध छे तिहा एकयी वे चाधे ते पेहेलो भुवस्कार, वेथी तीन बाघे ते वीजो भ्यस्कार, तीनयी च्यार ४ बाघे ते चीजो भूयस्कार, च्यारयी पाच बाधे ते चोयो भूयस्कार, पाचथी नबनो पाचमो, नवी तेरनो छटो, तेरयी सत्तरनो सातमो, सत्तरयी एकवी- सनो आठमो, एकवीसयी २२ नो नवमो भूयस्कार जाणवो, अल्पतरमा बावीसी २१ एकवीसनो वध करे नही, जे माटे मिथ्यात्वयी सास्वादन गुणठाणे जीव न आवे, ते माटे बावीसयी सत्तरनो पेहेलो अल्पतर, सत्तरयी १३ नो बीजो, तेरयी ९ नो त्रीजो, नवयी पाचनो, पाचयी ४ नो, ४ थी ३ नो, ३ थी बेनो, बेयी एकनो, ए ८ अल्पतर जाणवा तेह दस स्थानक ते दस अवस्थित जाणवा ते जे मुनि इग्यारमें चढी मोहनीकर्मनो अनधक थयो, ते पडतो नवमे आवी पेहेले समये १ लोभ बाघे, ते माटे एकनो अवक्तव्य बाघे ते पेहेलो अव- क्तव्य, एह कोयी अधिको पथी अल्प नथी अने अवध थइ प्रथम बाध्यो ते माटे १ नो अवक्तव्य कहीये, तथा जे जीव इग्यारमें काल करे ते चोथे गुणठाणे आवी १७ सत्तर आधे ए बीजो अवक्तव्य, इहा भूयरकार, तथा अल्पतर, तथा अव- क्तव्य बधनो एक समय काल छे शेष सर्व अवस्थितनो काल छ ।॥ २४॥ ति पण अद्वै नहिया,वीसा तीसगैंतीस इंगनामे छस्संग अटें ति बधा, सेसेसु य ठाण मिक्किक ॥२५॥ पयडिवधो समत्तो॥

७०० कर्मग्रन्यस्प टवार्य . एक नाधे एहने अवक्तव्याध कहीये, कोययी अधिको नयी तिणे भूयस्कार नहीं, कोयथी ऊणो नथी, तिणे अल्पतर नयी, तेनो ते पण नथी ते माटे अपस्थितपण नथी ए अपकतन्य कहीये ॥ २३ ॥ नव छ चउ दसे दु दु, तिदु मोहे दुइगवीस सत्तरस। तेरस नवपणचउतिदु, इकोनव अट्ठ दस दुन्नि ॥२४ अर्थ-हवे दर्शनावरणी कर्मना बधस्थानक ३ तीन छे पेहेलो नवनो स्थानक छे, ए मिथ्यात्व, सास्वादन गुणठाणे छे पछे सास्वादनने अते थीणद्धी तीन काढीजे तिवारे, मि- श्रथी माडी आठमा गुणठाणा सीम छनो बध स्थानक छे, तथा आठमाना वीजा भागथी माडी दसमा गुणठाणाना सीम च्यार ४ नो वध इम थानक च्यार ४ नो छे, दर्शनावरणी कर्मने मूयस्कार बे छे जे दसमे गुणठाणे च्यार ४ बाधतो हतो ते आठमे आव्ये ६ छ बाधे ते एक भूयस्कार, छथी सास्वादनमे आवी नव बाघे ते बीजो भूयस्कार, ए बे भूय- स्कार जाणवा अथवा नव बाधी छ बाघे ए पेहेलो अल्पतर, तथा ६ बाधी, ४ बाघे ते बीजो अल्पतर, तथा ९, तथा ६, तथा ४ ए तीन अवस्थित, तथा कोइ जीव इग्यारमे गुणठाणेथी पडी १० मे आवे ते अबधक थइ च्यार ४ बाधे ते पेहेलो अवक्तव्य, अथवा इग्यारमे मरण पामीने चोथे आवी ६ बाधे ए वीजो अवक्तव्य जाणवो हवे मोहनीय कर्मना बधस्थानक १० छे ते प्रथम २२ नो पीजो २१ नो, बीजो १७ नो, चोथो १३ नो, पाचमो ९ नो, , १२० कर्मयन्यस्य सार्थ ७०३ वीसयरकोडिकोडी, नामे गोएय सत्तरी मोहे । तीसयरचउसुउदही, निरय सुराउमि तित्तीसा॥२६॥ अर्थ-हवे मूळ कर्म आठ त्हेनी उत्कृष्ट स्थिति छे ते कहे छे-धीसयर-वीसकोकोडी सागर नामकर्म तथा गोन- कर्मनी उत्कृष्टी स्थिति छे ते जाणवा, मोहनीकर्मनी ७० सीत्तेर कोडाकोडी सागरनी उत्कृश स्थिति छे, चउसु-ज्ञानावग्णी, १ दर्शनावरणी २, वेदनीय ३, अतराय ४, ए च्यार ४ कर्मनी ३० कोडाकोडी सागरनी उत्कृष्टी स्थिति जाणवी नरकना आयु तथा देवताना आउखानी उत्कृष्टी स्थिति, तेत्रीस सागरोपमनी जाणवी उत्कृष्ट स्थिति उत्तर प्रकृतिनी पिण इहाथी गणज्यो हवे मूल कर्मनी जवन्य स्थिति कहे छे, मुत्तु-अपायवेदनीयनी स्थिति, वर्जिने शेष सकपायीजीव, वेदनीयकर्मनी स्थिति जघन्य अतम हूतनी बार्य छे अथवा १२ मू हूर्तनी बाधे छे ए दसमे गुणठाणे नावे इहा दसमा गुणठाणाना आदि अध्यवसायें ॥२६ मुत्तंअकसायठिइ, वारमुहुत्ता जहन्न वेअणिए । अठ्ठट्टनामगोए-सु सेसएसु मुहुत्ततो ॥ २७ ॥ अर्य--अकपायी ते ११ मु, १२ मु, १३ मु, ए ३ गुण- टाणामा काषायिक स्थिति जे छ तेने मुकीने एटले १० दसमे गुणठाणे जे जीव छे ते जीवने वेदनीयनी स्थिति १२ बार मुहूर्त जघन्यथी होय, दसमा गुणठाणाना पेहेले अध्यवसाये मुहर्त मोटो लेवो, अत्यअध्यवसाय मुहूर्त न्हानो लेबो, तया क्षपकथी उपशमणिमा विमणो बच जाणवो, नामकर्म, गोत्रकर्मनी जघन्य स्थिति आठ मुहूर्तनी छे शेष जे ज्ञानावरणी तथा दर्शना- १२३ ७०२ कर्मग्रन्यस्य वार्य , - अर्प-हवे नामकर्मना स्थानक ८ जाट छे, तिहा पेहेलो नेवीसनो, चीजो २५ नो, पीजो २६ टवीसनो, चोयो अट्ठा- वीस २८ नो, पाचमो २९ नो, छठो ३० नो, सातमो एक गीसनो ३१ नो, आटमो एक १ नो, ए भूयस्कार ६ जाणवा, तेवीसपी पचवीसनो पेहेलो भूयस्कार, पचवीसी २६ नो वीजो, २६ यी २८ नो नीजो, २८ यी २९ नो चोथो, २९ थी ३० नो पाचमो, ३० यी ३१ नो उद्यो, मूयस्कार छे अल्पतर ७ छे ते ३१ थी १ नो पेहेलो अल्पतर, ३१ थी ३० नो बीजो अल्पतर, इहा कोइक जीन ३० थी १ नो बध करे, पिण ते एकना अल्पतर मध्येज गण्यो तिणे जुदो गणवो नथी, तथा ३० यी २९ नो पीजो, २९ थी २८ नो चोथो, २८ यी २६ नो पाचमो, २६ थी २५ नो उठो, २५ थी २३ नो सातमो अल्पतर जाणवो, बधस्थानक तेहज . अवस्थित जाणवा इहा अवक्तव्य ३ तीन छे-ते जे मुनि इग्यारमे गुणठाणे नामकर्मनो अबधक छे, ते इग्यारमाथी पड्या १० मे आवी १ बाधे, ए पेहेलो अवक्तव्य, तथा जे इग्यारमे काल करे ते चोथे आवे ते देवप्रायोग्य २८ नाघे ए बीजो, अयवा कोइक जीव २९ जिननाम सहित बाघे ए बीजो अपक्तन्य, ३१ थी १ नो पहेलो, ३१ थी ३० नो बीजो, ३० थी २९ नो त्रीजो, ए नामकर्मना ३ अवक्तन्य जाणवा शेष जे ज्ञाना- वरणी आयु, वेदनीय, गोत्रकर्म अतराय, ए पाच कर्मनो एकेक बधस्थानक, वेदनीय विना ४ च्यार कर्मने अवस्थित तथा अव- क्तव्य ए बे बध छे, वेदनी कर्मने एक अपस्थित बध छे, वेदनीयनोअबधक थइ बध करे नही,ते माटे अबक्तय नथी ए प्रकृतिबंध अधिकार कयो, इति प्रकृतिबध समाप्त द्वा०१७॥२५॥ १२२ कर्मग्रन्थस्य सार्थ वीसयरकोडिकोडी, नामे गोएय सत्तरी मोहे । तीसयरचउसुउदही, निरय सुराउमि तित्तीसा॥२६॥ अर्थ-हवे मूळ कर्म आठ रहेनी उत्कृष्ट स्थिति छे ते कहे छे-चीसयर-वीसकोटाकोडी सागर नामकर्म तथा गोत्र- कर्मनी उत्कृष्टी रियति छे ते जाणवी, मोहनीकर्मनी ७० सीत्तेर कोडाकोडी सागरनी उत्कृष्ी स्थिति छे, चउसु-ज्ञानावग्णी, १ दर्शनावरणी २, वेदनीय ३, अतराय ४, ए च्यार ४ कर्मनी ३० कोडाकोडी सागरनी उत्कृष्टी स्थिति जाणवी नरकना आयु तथा देवताना आउखानी उत्कृष्टी स्थिति, तेनीस सागरोपमनी जाणवी उत्कृष्ट स्थिति उत्तर प्रकृतिनी पिण इहाथी गणज्यो हवे मूल कर्मनी जवन्य स्थिति कहे छे, मुत्तु-अकपायवेदनीयनी स्थिति, वर्जिने शेष सकषायीजीव, वेदनीयकर्मनी स्थिति जवन्य अतम हूतनी काच छे अथवा १२ मू हुर्तनी बाधे छे ए दसमे गुणठाणे बाधे इहा दसमा गुणठाणाना आदि अध्यवसायें ॥२६ मुत्तुअकसायठिइ, वारमुहुत्ता जहन्न वेअणिए । अट्ठट्टनामगोए-सु सेसएसु मुहुत्ततो ॥ २७ ॥ अर्थ--अकयायी ते ११ मु, १२ मु, १३ मु, ए३ गुण- ठाणामा कापायिक स्थिति जे छ तेने मुकीने एटले १० दसमे गुणठाणे जे जीप छे ते जीवने वेदनीयनी स्थिति १२ बार मुहर्त जवन्ययी होय, दसमा गुणठाणाना पेहेले अध्यवसाये मुहूर्त मोटो लेवो, अत्यअध्यवसाय मुहूर्त न्हानो लेवो, तथा क्षपकथी उपशमणिमा विमणो बच जाणवो, नामकर्म, गोत्रकर्मनी जघन्य स्थिति आठ मुहूर्त्तनी छे. शेष जे ज्ञानावरणी तथा दर्शना १२३ ७०२ कर्मग्रन्यस्य टमार्य AMMA - अर्थ-हवे नामकर्मना स्थानक ८ आठ छे, तिहा पेहेलो नेवीसनो, वीजो २५ नो, नीजो २६ वीसनो, चोयो अट्टा- वीस २८ नो, पाचमो २९ नो, उठो ३० नो, सातमो एक- त्रीसनो ३१ नो, आठमो एक १ नो, ए भूयस्कार ६3 जाणवा, तेवीसपी पचवीसनो पेहेलो भूयस्कार, पचवीसी २६ नो वीजो, २६ थी २८ नो त्रीजो, २८ पी २९ नो चोथो, २९ यी ३० नो पाचमो, ३० यी ३१ नो उद्यो, मूयस्कार छे अल्पतर ७ छे ते ३१ यी १ नो पेहेलो अल्पतर, ३१ थी ३० नो वीजो अल्पतर, इहा कोइक जीप ३० यी १ नो बध करे, पिण ते एकना अल्पतर मध्येज गण्यो तिणे जुदो गणवो नथी, तथा ३० यी २९ नो चीजो, २९ थी २८ नो चोथो, २८ थी २६ नो पाचमो, २६ थी २५ नो छटो, २५ थी २३ नो सातमो अल्पतर जाणवो, बधस्थानक तेहज ८ अवस्थित जाणवा इहा अवक्तव्य ३ तीन छे-ते जे मुनि इग्यारमे गुणठाणे नामकर्मनो अबधक छे, ते इग्यारमाथी पड्या १० मे आवी १ बाधे, ए पेहेलो अवक्तव्य, तथा जे इग्यारमे काल करे ते चोथे आवे ते देवमायोग्य २८ माघे ए पीजो, अथवा कोइक जीव २९ जिननाम सहित वाधे ए चीजो अवक्तन्य, ३१ यी १ नो पहेलो, ३१ थी ३० नो बीजो, ३० यी २९ नो त्रीजो, ए नामकर्मना ३ अवक्तव्य जाणवा शेष जेज्ञाना- वरणी आयु, वेदनीय, गोत्रकर्म अतराय, ए पाच कर्मनो एकेक बधस्थानक, वेदनीय विना ४ च्यार कर्मने अवस्थित तथा अव- क्तव्य ए बे बध छे, वेदनी कर्मने एक अवस्थित बध छे, वेदनीयनोअपवक थइ बध करे नही,ते गाटे अवक्त य नथी ए प्रकृतिग्ध अधिकार कह्यो, इति प्रकृतिबध समाप्त द्वा०१७॥२५॥ , कर्मग्रन्थस्य टवार्थ ७०५ सागरनी स्थिति जाणवी, मिउ-मृदुस्पर्श सित-उजळो वर्ण, मधुर-- मीठो रस, ए उ प्रकृतिनी दस कोडाकोडी सागरोपमनी उत्कृष्टी स्थिति जाणवी, तथा हवे एफ वणे एक रसे अढी कोडाकोडी वधारवी एटले हालिद-पीळोवर्ण, अविल-खाटो रस वेहनी साटापार १२॥ कोडाफोडी सागरनी स्थिति जाणवी, रातो वर्ण, कसायलो रस, तेनी पनर कोडाकोडि स्थिति, नीलोवर्ण, कडवो रस तेहनी १७॥ साडासत्तर कोडाकोडी सागर स्थिति, काळोवर्ण, तीखोरस तेनी वीस कोटाकोडी सागरोपमनी स्थिति जाणवी ॥२९॥ दससुहविहगइ उच्चे, सुरदुगथिरछक्कपुरिसरइहासे। मिच्छे सत्तरि मणदुग, इत्थीसाएसु पण्णरस ॥३०॥ अर्थ-शुभ विहायोगति १, उच्चगोन १, सुरदुग-देव- गति, देवतानुपूर्वी २, थिरछक-थिर १, शुभ २, सुभग ३, सुस्वर ४, आदेय ५, यश ६, ए छ थिरछक्क पुरुषवेद १, रति १, हास्य १, ए १३, तेर प्रकृतिनी दस कोडाकोडी सागर उत्कृष्टी स्थिति छ मिथ्यात्व मोहनीनी सित्तेर ७०, कोडाकोडी सागरनी उत्कृष्टी स्थिति छे, मनुष्यगति, मनुष्यानु पूर्वी, स्त्रीवेद, सातावेदनी ए ४ नी पन्नर १५ सागर कोडा- कोडी स्थिति छे ॥ ३० ॥ भयकुच्छ अरइ सोए, विउवि तिरि उरल निरयदुग नीए। तेयपण अथिर छक्के, तस चउ थावर इगपणिदि ३१ अर्थ-भयमोहनी १, कुच्छ-दुगछा १, अरति १, 89 ७०४ कर्मग्रन्थस्य वार्य Nar.--- वरणी, आउखो तया मोहनी, तथा अतरायनी जवन्य स्थिति १ एक अतर्महर्तनी जाणवी ॥ २७ ॥ विग्धों वरण असाए, तीस अट्ठार मुहुम विगलतिगे। पढमागिई सघर्यणे, दसटुसुचरिमेसु दुगवुद्वी ॥२८॥ अर्थ-हवे उत्तर प्रकृतिनी उन्कृष्ट स्थिति जणावे छे अतराय पाच ५, ज्ञानापरणी पाच, दर्शनावरणी ना एवं आवरण १४ असातावेदनीय १ ए चीस प्रकृतिनी तीस कोडाफोडी सागर उत्कृष्ट स्थिति जाणवी तथा सूक्ष्मनिक, विकलत्रिक, ए 3 प्रकृतिनी अढार कोडाकोडी, प्रथम सधयण वज्रऋषभनाराच, प्रथम संस्थान समचउरसनी उत्कृष्ट स्थिति दस कोडाकोडी सागर, पछी उपरले एक सवयणे एक सस्थाने दुग केहेता बे कोडाकोडी सागरनी स्थिति वधाखी, एटले ऋषभनाराच सव- यणे तथा न्यग्रोध सस्थाने बार कोडाकोडी सागरनी स्थिति, तथा नाराच सवयणे, सादि सस्थाने चउद १४ कोडाकोडी सागरनी स्थिति, अर्द्ध नाराचसघयणे, वामनसस्थाने १६ सोळ कोडाकोडी सागरोपमनी स्थिति, किलीकासघयणे, कुब्ज सस्थाने अढार १८ कोडाकोडी सागरनी स्थिति, छेवा सघयण, हुडक सस्थाननी स्थिति वीस कोडाकोडीनी जाणवी ए गाथा मध्ये ३८ प्रकृतिनी स्थिति कही ॥२८॥ वालीसकसाएसु, लिउ लहु निझुण्ह सुरहि सिय महुरे। दस दोसह समहिया, ते हालिदविलाईण ॥२९॥ अर्थ-सोळ १६ कषायनी स्थिति ४० चालीस कोडाकोडी कर्मग्रन्थस्य पार्थ. ७०७ आहारक दुगनी स्थिति उत्कृष्टी जाणवी तथा अपघा प्रदे- शोदयनी भिन्नमुह-अतर्मुहूर्त्तनी जाणवी जवन्य स्थिति सख्यात गुण ऊणी ते जे अत कोडाकोडी स्थिति के वेहने सख्यातगुणी ऊणी करीये, जेटली याय तेटली ऊणी जघन्य स्थिति जाणवी एटले असख्याता अध्यवसायनो फेर पडे छे नर-मनुम्यनु आयु तथा तिर्यंचायुनी उत्कृष्टी स्थिति तीन ३ पल्योपमनी जाणवी ॥ ३३ ॥ इगविगलपुत्वकोडि, पलियाऽसखस आउचउअमणा। निरुवकमाण छ मासा, अवाह सेसाण भवतसो ३४ अर्थ-हवे जे जीवो आवता भवनो आयु जेटलो बाघे ते कहे छे एकेन्द्रि तथा विकलेन्द्रिय आवता भवन, आयु उत्कृष्ट वाधे तो पूर्वकोडि १ एकनो बाघे एयी अधिक न बाचे. तथा अमणा असज्ञि पचेन्द्रितिर्यंच पर्याप्ता च्यार ४ गतिनो आउखो बाघे तो उत्कृष्टो पत्योपमने असख्यातमें भाग प्रमाण बाधे, निरुपक्रम आउखावाळा देवता तथा नारकी तथा युग- लिया एटला छ मास शेप यकी नवा भवनो आउखो बाधे. शेष जे सोपक्रमी तथा निरुपक्रमी मनुष्य तिर्यंचनु आयुष्य ते, भवने चीजे भागे शेपे बाधे पिण पेहेला वे भाग मध्ये न बाधे, जो धीजे भागे न बघाय तो नवमा भागे, अथवा २७ मे भागे इम त्रिभाग करता शेष अतर्मुहूर्ते पिण बाधे. वर्णादिक वीसनी जुदी स्थिति कही तिणे एकसोछवीस प्रकृ- तिनी उत्कृष्टी स्थितिकही हवे जघन्य स्थितिकहे छे ॥३४॥ लहु ठिइवधो सजलण, लोहपणविग्धनाण दसेसु । भिन्नमुहुत्त ते अट्ठ, जसुच्चे वारस य साए॥३५॥ १२७ ७०६ कर्मग्रन्यस्य टमार्य " शोकमोहनी १, पेकिय शरीर, वैक्रिय उपाग, ए के, तिर्यंचगति तिर्यंचानुपूर्वी, ए वे, औदारिक शरीर, औदारिक उपाग एवे, नरकगति, नरकानुपूर्वी ए बे, नौगोन १ तेजस पाच तेजस १, कार्मण २, अगुरुलघु ३, निर्माण ४, उपचात ५, ए पाच अधिरळक ते अधिर १, अशुभ २, दुर्भग ३, दु स्वर ४, अनादेय ५, अजस ६, ए छ नस ४, स, बादर, प. प्ति, प्रत्येक ए च्यार ४, थावर १, एकेन्द्री १, पपेन्द्री १ ॥३१॥ नपुकुखगइसासचउ, गुरु कक्खड रुख्खसीय दुग्गधे। वीस कोडाकोडी, एवइआवाहवाससया ॥ ३२॥ अर्थ-नपुसकवेद १, अशुभविहायोगति १, श्वासोश्वास चतुष्क-४, उश्वास १, उद्योत १, आतप १, पराघात १, गुरु-भारेफरस १, कर्कश फरस १, रुक्ष-लूखो फरस १, शीत- टाढो फरस १, दुर्गव १, ए ४२ बेताळीस प्रकृतिनी उत्कृष्टी स्थिति वीस २० कोडाकोडी सागरनी जाणवी एवइया एटला वरस सय-सो वर्ष अबाधा जाणवी एटले जे कर्मनी जेटली कोडाकोडी स्थिति तेटला सो वरसनी अबाधा बाध्या पछी तेटला सो वरस सीम (सुधी) उदय न आवे ते अबाधा कहीये ॥३२॥ गुरु कोडि कोडिअतो, तित्थाहाराणभिन्नमुहुवाहा। लहुठिइसखगुगुणा, नरतिरियाणाउपल्लतिग ॥३३॥ अर्थ--गुरु केहेता उत्कृष्टी अतो केहेता माही एटले काइक उणी एक कोडाकोडी सागर तीर्थकर नामनी तथा - १२६ कर्मग्रन्थस्य ठनार्थ. ७०७ आहारक दुगनी स्थिति उत्कृष्टी जाणवी तथा अमावा प्रदे- शोदयनी भिन्नमुट-अतर्मुहूर्त्तनी जाणवी जघन्य स्थिति सरन्यात गुण ऊणी ते जे अत कोटाकोडी स्थिति छ वेहने सरस्पातगुणी ऊणी करीये, जेटली थाय तेटली ऊणी जवन्य स्थिति जाणवी एटले असख्याता अध्यवसायनो फेर पटे छे नर-मनुष्यनु आयु तथा तियेचायुनी उत्कृष्टी स्थिति तीन ३ पत्योपमनी जाणवी ॥३३ ।। इगविगलपुवकोडि, पलियाऽसखस आउचउ अमणा। निरुवकमाण छ मासा, अवाह सेसाण भवतसो ३४ अर्थ-हवे जे जीवो आवता भवनो आयु जेटलो बाघे ते कहेछे एकेन्द्रि तथा विकलेन्द्रिय आवता भवनु, आयु उत्कृष्ट वाघे तो पूर्वकोडि १ एकनो बाधे एयी अधिक न बाधे. तथा अमणा असज्ञि पचेन्द्रितियेच पर्याप्ता च्यार ४ गतिनो आउखो बाघे तो उत्कृष्टो पत्योपमने असख्यातमें भाग प्रमाण बाचे, निरुपक्रम आउखावाळा देवता तथा नारकी तथा युग- लिया एटला छ मास शेष यकी नवा भवनो आउखो बाधे. शेष जे सोपक्रमी तथा निरुपक्रमी मनुष्य तिर्यचनु आयुष्य ते, भवने त्रीजे भागे शेपे बाधे पिण पेहेला वे भाग मध्ये न बाधे, जो त्रीजे भागे न बधाय तो नवमा भागे, अथवा २७ मे भागे इम निभाग करता शेष अतर्मुहूर्ते पिण बाधे. वर्णादिक वीसनी जुदी स्थिति कही तिणे एकसोछवीस प्रकृ- तिनी उत्कृष्टी स्थितिकही हवे जघन्य स्थितिकहे छे. ॥३४॥ लहु ठिइवधो सजलण, लोहपणविग्घनाण दसेसु । भिन्नमुहुत्त ते अट्ठ, जसुच्चे वारस य साए ॥३५॥ १२७ कर्मग्रन्यस्य टमार्य. अर्य-जे सज्वलन लोम , तया पाच अतराय ५, तथा पाच ज्ञानापरणी तथा दसेसु च्यार ४, दर्शनावरणी १५ पनर, प्रकृतिनी जवन्य स्थिति अतर्मुहूर्तनी जाणवी तथा जसनामकर्म, उच्चगोन १ नी आठ मुहर्तनी जवन्य स्थिति जाणवी सातावेदनीयनी जवन्य स्थिति चार मुहूर्तनी ते दसमे गुणठाणे नाचे, इग्यारमे, बारमे, तेरमे गुणटाणे साता बधाय ते वे समयनी वधाय ॥३५॥ दो इगमासो पक्खो, सजलणतिगेपुमट्ठवरिसाणि। सेसाणुकोसाओ, मिच्छत्तठिईए ज लद्ध ॥३६॥ अर्थ-सज्वलनना क्रोधनी जघन्य स्थिति मास वेनी छे सज्वलननामाननी १, एक मासनी छे, सज्वलन मायानी पक्ष १, ते पदर दिवसनी छे, तिहा जे प्रकृति नवमे गुणठाणे वेहेली खपे तेहनी स्थिति जघन्यपणे कही हवे जे मोडी खपे तेहनी जघन्य स्थिति थोडी जाणवी पुरुषवेद खपे तिहा सर्व प्रकृतिनी स्थिति एटलीज बधाय छे, पुरुषवेदनी स्थिति जघ- न्य छे, हवे शेष जे एकसोएक प्रकृति वर्णादिक वीसनी उत्कृष्टी स्थितिने मिथ्यात्वनी उत्कृष्टी स्थितिथी भाग आपता ज्या जे आवे ते त्या प्रकृतिनी जघन्य स्थिति जाणवी तिहा निद्रा पाचनी जघन्य स्थिति सागर १ एकना जे सात भाग एहवा तीन भागनी जाणवी असातावेदनीय पिण सात इया तीन भागनी जाणवी, बार कषायना जवन्ये सातइया ४ च्यार भागनी जाणवी हास्य १, रतिनी सातइया बे भाग भय, दुगछा, अरति, शोक ए च्यार ४ प्रकृतिनी जघन्य स्थिति बे भाग, नपुसकवेदनी स्थिति सातइया बे भाग, कर्मग्रन्थस्य टमार्थ. ७०९ - स्त्रीवेदनी स्थिति सातइयो दोढ भाग, नामकर्ममध्ये देवगति देवानुपूर्वीनी एक हजार भाग नरकगति, नरकानुपूर्वीनी सात- इया बे हजार भाग, मनुष्यगति, मनुष्यानुपूर्वीनी दोढ भाग एकेन्दी जाति, पचेन्द्री जातिनी जवन्य स्थिति सातइया वे भाग, विकलनिकनी सातइया पोणा वे भाग झाझेरा, औदा- रिक शरीर, औदारिक उपागनी वे भाग, वैक्रिय शरीर वैक्रिय उपागनी वे हजार भाग, तैजसकामणना वे भाग, प्रथम सघ- यण प्रथम सस्थाननी सातइयो १, एक भाग, बीजो सघयण वीजा सस्थाननी स्थिति ३५ सीया छ ६ भाग, नीजो सघ- यण बीजो सस्थान ३५, सीया ७, भाग चोथे सवयणे चोथे सस्थाने पानीसीया ( ३५ या)८, भाग पाचमो सघयण पाचमो सस्थानना पात्रीसीया नव ९ भाग, छठ्ठो सघयण, छटो सस्थानना पानीसीया दस भाग, एटले सातइया वे भाग श्वेतवर्ण मधुररसनी १, भाग पीतवर्ण खाटारसनी सवा भाग रातावर्ण कसायला रसनी दोढ भाग नीलोवर्ण, कडयो रस पोणावे भाग, काळोवर्ण, तीखारसनी बे भाग सातइया, सुरमिगध, मृदुस्पर्श, लघुस्पर्श, स्निग्धस्पर्श, उणस्पर्श, नो सातइयो १, भाग शुभविहायोगतिनो जघन्य सातइयो १, एक भाग अशुभविहायोगति, पराघात, उश्वास, आतप, उद्योत, अगुरुलघु, निर्माण, उपघात, नस, अथिरछक, थावरनाम ए सर्वना सातइया वे भाग, आहारक शरीर, आहारक उपागनी, जिन नामनी एक कोडाकोडी सागर केटलाएक सागरोपमना सेंकाला ओछा, सूक्ष्मत्रिकनी सातइया पोणा बे भाग झाझेरा, थिर ५ नो सातइयो १, भाग जघन्य स्थिति जाणवी ॥३६॥ -

७१०
कर्मग्रन्यस्य टवार्य
अयमुक्कोसो गिदिसु, पलियाऽसखस हीणलहुवधो।
कमसोपणवीसाए, पन्ना सय सहस्ससगुणिओ॥३७॥
अर्थ-एक भाग 3 भाग तीनभाग प्रमुख स्थिति कही
ते एकेन्द्रीने उत्कृष्ट स्थिति जाणवी, नादर पर्याप्तो उत्कृष्टी पाघे,
ए जे एकेन्द्रीयनी उत्कृष्ट स्थिति कही, ते माहेयी पत्योपमनो
असख्यातमो भाग हीण कहेता ओडो करीये, तिवारे एके-
न्द्रीयनी जवन्य स्थिति जाणवी कमसो अनुक्रमे पणवी-
साए एकेन्द्रीयी वेन्द्री पचपीस गुणी स्थिति नाचे, तेन्द्री
पचासगुणी स्थिति नावे, चोरेन्द्री १०० सोगुणी पावे, अने
असज्ञि पचेन्द्री हजारगुणी स्थिति वाघे ॥ ३७ ।।
विगलि असन्निसुजिट्ठो, कणि?ओ पल्लसखभागूणो
सुरनिरयाउ समादस, सहस्स सेसाउखुडु भव ॥३८॥
अर्थ-विकलेन्द्री (बेन्द्री, तेन्द्री, चौरेन्द्री) ने, असज्ञिने
ए स्थिति उत्कृष्टी जाणवी कणिओ-जघन्य स्थिति पल्यनो
सख्यातमो भाग ऊणी, करवी ते पल्यनो सख्यातमो भाग
ऊणो कीजे तिवारे बेन्द्रीयादिकनी जघन्य स्थिति जाणवी
सुर देवतानो आउखो, नरय-नारकीनाः आउखानी जघन्य
स्थिति हजार १० दस हजार वरसनी जाणवी शेष जे म-
नुष्य तिर्यंचना आउखानी जघन्य स्थिति क्षुल्लक भव प्रमाण,
क्षुल्लक भव २५६ आवळीनी छे ते जघन्य जाणवी ॥३८॥
सवाणवि लहुवधे, भिन्नमुहु अवाह आउजिठेवि।
केइ सुराउसमजिण, मतमुहू विति आहार ॥३९॥

कर्मग्रन्थस्य दयार्थः
७११
"
अर्थ सर्व प्रकृतिना जवन्य स्थितिनधे जघन्य अनाधा
अतर्मुहूर्तनी जाणवी एटले सर्वजवन्य स्थितिनी जवन्य अाधा
अंतर्मुहर्तनी ते उपर स्थिति कडक एक ववे एक समय
अवाघा वधे इम उत्कृष्ट स्थितिमा उत्कृष्ट अबाधा जाणवी, अने
आउखा च्यारनी उत्कृष्टी स्थिति जघन्य अबाधा हुवे, इहा
चौभगी छे, आउखो उत्कृष्टे अपाचा उत्कृष्टी १, आउखे उ-
त्कृष्टे अनाधा जवन्य २, आउखो जघन्य अबाधा उत्कृष्ट ३,
आउखो जवन्य अाधा जवन्य ४ जाणवी वळी वाचनान्तर
कहे छे कोइक आचार्य जिन नामनो जवन्य स्थितिमय
देवताना आयु प्रमाण जाणवो, एटले आठमा गुणठाणाना उठा
भागना चरम समये जीननामकर्मनो जन्य स्थितिवध १०
हजार वर्ष प्रमाणनो होय छे आहारक दुगनी विपाकनी जघन्य
स्थितिय अतर्मुहूर्तनी छे, जे आठमा गुणठाणाना छठा भा-
गना चरम सभये-आहारस्नो जघन्य स्थितिवध अतर्मुहूर्त
होय छे ॥३९॥
सत्तरसमहियाकिर, इगाणुपाणुंमिहुतिखुडुभवा।
सगतीस सयतिहुत्तर, पाणू पुण इग मुहुत्तमि ॥१०॥
अर्थ-हवे क्षुलकभवनो मान कहे छे एक आणपाण
श्वासोश्वास मध्ये सत्तर भव पुरा अदारमा भवना १३९५ भाग
अधिक पहले सत्तर भव झाझेरा एक श्वासोश्वास माहे थाय.
ए क्षुल्लक भव जाणवो, क्षुलक एटले सर्वथी न्हानो भव ए
भाग उश्वासना ३७७३ भाग करीये तेहवा १३९५ भाग
लेवा, सडनीसमे तिहुत्तर ३७७३ पाणू, पुण कहेता श्वासोश्वास
गये एक मुहूर्त थाय, ॥ ४० ॥

कर्मग्रन्पस्य टमाय पणसहि सहसपणसय, छत्तीसाइगमुहुत्त खुडभवा । आवलियाण दोसय, छप्पन्ना एग खुइभवे ॥११॥ अर्थ-एक मुहूर्त ते वे घडी प्रमाणमे पेंसठहजार पा- चसे छत्रीस भव थाये, सूक्ष्मनिगोदीयायी माडी समुछिम मनुष्य पर्यंत ए प्रमाण जाणनो, तया दुल्लक भव मध्ये आवली, २५६ जाये एटले मुहूर्तमे एक कोडि सडसठ लाख सित्तोत्तर हजार दोयसेने सोळ आवली जाणवी ॥४१॥ अविरयसम्मोतित्थं, आहारदुगामराउ अपमत्तो। मिच्छदिठि बधइ, जिटुंठिइसेस पयडीण ॥४२॥ अर्थ-हवे उत्कृष्टी स्थितिधना स्वामी कहे छे तीर्थंकर नामनी उत्कृष्टी स्थिति अविरति समकीतीबधक, समकितथी माडी अपूर्वकरणना छठा भाग पर्यंत छे, ते सर्व जीवथी अधिक कषायी अविरति समकीती छे, ते अधिक कषायी वेयी स्थिति ते उत्कृष्टी बाधे आहारकदुग-२ आहारक शरीर तथा उपाग ए बे अमर-देवतानो आउखो उत्कृष्ट स्थिति अप्रमत्त गुण- ठाणे बाचे, तिहा आहारक अप्रमत्त अति सक्लेशना अध्यव- साये बधक उत्कृष्ट स्थिति बधे देवायु अप्रमत्त विशुद्धाध्यवसाये उत्कृष्ट स्थिति बाधे, शेषप्रकृति वर्णादिक वीस मिन्नगवेखेतो, १३२, तथा वर्णादि ४, गवेखीयेतो ११६, नी उत्कृष्टी स्थिति सज्ञीपचेन्द्री पर्याप्तो मिथ्याइष्टि बाधे ॥ ४२ ॥ विगलसुहुमाउतिगं, तिरिमणुया सुरविउवि निरयदुग एगिदिथावरायव, आईसाणा सुरुक्कोस ॥ ४३ ॥ .

कर्मयन्यस्य टवार्य ७१३ अर्थ---हवे मिथ्यात्वे च्यार ४ गतिना छे ते ते मध्ये जे वाघे ते लिखीये छे विगल ३ सूक्ष्म ३ तिर्यंचायु १, मनु- प्यायु १, नरकायु १, ए ३ आउखा देवगति ? देवानुपूवीं, १ ए देवद्धिक, वैक्रिय शरीर, वक्रिय उपाग, एबे वैक्रियदुग, नरसंगति, नरकानुपूर्वी, ए नरकादिक, ए १५ प्रकृतिनी उत्कृष्टी स्थिति सज्ञिपचेन्द्रीपर्याप्तमिथ्यात्वी तियेच मनुष्य बाधे एना उधक एज छे तथा एकेन्द्रीजाति, थावरनाम, आतपनाम, ए तीन प्रकृति आइसाणा-भवनपति, व्यतर, ज्योतिषी, सुधर्म, इशान देवलोक पर्यंतना देव उत्कृष्टी स्थिति बाधे, आकरे तीन अशुद्धता ए परिणम्यो ए जीव एकेन्द्रीपणो उपाजें पीजी हीणी गतिमा एने जबु नयी ते माटे ॥ ४३ ॥ तिरिउरलदुगुज्जोअ, छिवछ सुरनिरय सेसचउगडया आहारजिणमपुत्वो, अनियहि सजलण पुरिसलहु।४।। अर्थ-तिर्यचद्ग, औदारिकदुग, उद्योतनाम, छेवठो- संघयण, ए ६ प्रकृतिनी उत्कृष्टी स्थिति मिथ्यात्वी देवता अथवा मिथ्यात्वी नारकी बाधे, शेष १०८ एकसो आठ, प्रकृतिनी उत्कृष्टी स्थिति च्यार गतिना मिथ्यात्वी बाधे, सज्ञि- पर्याप्ता बाधे अथ जवन्य स्थितिना स्वामी कहे छे आहारक तथा जिननामनी जवन्य स्थिति अपूर्वकरण गुणठाणे बाचे, ए प्रकृ- तिना बधक मध्ये अति निर्मल परिणाम अहिज छे अनिवृत्ति गुणठाणे सजलना कषाय च्यार, पुरुषवेद, ए पाच प्रकृतिनी जघन्य स्थिति बाधे ॥ ४४ ॥ an .25 ७१४ कर्मग्रन्थस्य टवार्य साय सुच्चावरणा, विग्ध सुहुमो विउवि छ असन्नि। सन्नीवि आउ वायर, पज्जेगिंदी उ सेसाण ॥१५॥ अर्थ-सातावेदनीय १, जसनाम २, उचगोंन १, नाना- वरणी पाच ५, दर्शनाररणी ४, अतराय पाच ५, ए १७ प्रकृतिनी जवन्य स्थिति सूक्ष्मसपराय दसमे गुणटाणे पाधे देवद्विक २, नरकद्विक २, वैक्रियद्विक २, ए ६ 3 प्रकृतिनी जवन्य स्थिति असज्ञिपचेन्द्री पर्याप्तो बाचे, जे कारणे एहनो प्रथमवध एहिज छे, आउखा ४, नी जघन्य स्थितिनो बचक सज्ञीपण छे असजीपिण छे एहनो बघ परिणामनी तीव्रम- दताये छे, शेष १०१, अथवा ८५, प्रकृतियोनी जघन्य स्थितिना बधक बादरपर्याप्ता एकेन्द्री जाणवा स्थितिबधमें मुश्मसपरायी साधुयी बीजे बोले स्थितिबधक एकेन्द्री पर्याप्तो छ ॥४५॥ उक्कोसजहण्णीयर, भगासाई अणाइ धुवअधुवा। चउहा सग अजहन्नो, सेसतिगे आउ चउसुदुहा॥४६॥ अर्थ-वे स्थितिबधना भागा कहे छे-तिहा उत्कृष्ट १, जघन्य १, इतर अनुत्कृष्ट अजघन्य १, ए ४, च्यार भागा छे तिहा जे प्रकृतिनी जे उत्कृष्टि स्थिति छे ते बाधे ते उत्कृष्टबध कहेवाय, उत्कृष्टबध एक जीवने लागट रहे तो अतर्मुहूर्त रहे ते माटे ए सादि अध्रुव छ, तथा जे प्रकृतिनी जवन्य स्थिति जे बाधे जघन्य बधक कहीये ते एकएक समयमाज बाघे, एहने पिण सादि अध्रुव भेदज लागे, तथा उत्कृष्टी नही ते अनुत्कृष्ट, ते इहा १३४ कर्मग्रन्थस्य टवार्थ ७१५ . उत्कृष्टोरव सादि अध्रुव जे हुवे पर ए अर्य इहा लीधो नयी (टमामा लीयो नयी एम छे) इहा तो जवन्य बधकयी वीजो वध ले सर्व अजवन्यमें गवेख्यो छे, अने प्रथम अर्थ करीये तो पिण अनादि सूक्ष्मनिगोदीया जीरने सदा अजय- न्य नय छ जे जघन्य व तो बादर एकेन्द्रीने छे, अथवा गुणाधिकने छे ते माटे ए भागे ४, भेद भासे छे, सातकर्म (आउखा विना) अजवन्य स्थिति बाधेतो सादि एक १, अनादि २, ध्रुव ३, अध्व ४, ए च्यारभेदे बाधे जे 3 कर्मनो जघन्य व १०, मे गुणटाणे, मोहनी कर्मनो जघन्य वय नरमे गुणठाणे अत्य अध्यवसाय क्षपकणिने, अने उप- शमश्रेणि ते क्षपकयी बमणी स्थितिबाचे, ते माटे अजघन्य बधक छे, वेहने इग्यारमे आव्ये अपय थयो, ते अव, पालो पडी वळी बाचे ते सादि, ए गुणठाणे आव्यो नयी वेहने अनादि, अभव्यने ध्रुव भव्यने अब्रुव ए रीते जाणज्यो १, सर्व जीवने अजघन्य बध ते ए गुणठाणे चढ्या पड्याने सादी, चडस्ये वेहने अध्रुव, तया अमव्यने अनादि ब्रुव छे, तेयी एज सात- कर्म उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट, जघन्य ए तीन भागे सादि अध्रुव बध छे, ए ३, ना बधनो काल अल्प छे, तथा आउखो कर्म उत्कृष्ट जघन्य, जजधन्य, ए ४, च्यारे भागे स्थिति बाधे तो सादि अध्रुवकालज बाधे, जे कारणे भवमें आयु एकवार तथा अत- मुहूर्त सीम बवाय ते माटे वे भेदज छे, शेष तीन उत्कृष्ट अनुत्कृष्ट जघन्य १, अनुत्कृष्ट भागे बाधे तो सादि अनुवकालसीम बाधे, जे कारणे जघन्यनवनो एक समय काल छे, उत्कृष्ट पधनो १, समयकाल छे, अनुत्कृष्ट ते उत्कृष्ट पछी याय ते माटे सादि अव छे, उत्कृष्टयी एक समये ऊणाचे ते अनुत्कृष्ट बध, - - कर्मग्रन्पस्य च्यार्य कहीये ए पिण उत्कृष्ट नवक यया पठी बाचे ते माटे सादि अवन लाभे, तथा जयन्यधिक पइने एक समय अधिक अधिक वधाय ते अजवन्य गणीये तो ॥४६॥ चउभेओ अजहन्नो, सजलणावरणनवगविग्घाण । सेस तिगिसाइ अधुवो, तहचउहा सेसपयडीण ॥४७॥ अर्थ-अजघन्यध च्यार मेदे पामीये, सजलण च्यार 6, ज्ञानावरणी पाच, दर्शनावरणी ४, ए नर, अतराय पाच, ए १८ प्रकृतिनी अजवन्य स्थिति च्यार ४, भेदे छे, जे ए १८ प्रकृतिनो जवन्यग्ध नवमे, दसमे, गुणठाणे छे तेहयी बीजा जीव सर्व अजघन्यधिक छे, तेहमा जे ए गुणठाणे चढी पड्या छे तेहने सादि अब्रुव छे, अभव्यने अनादि ध्रुव छे एहिज अढार प्रकृतिना, शेप तिग-शेष ३ भागा सादि १, अव २, भेदेछे, भावना पूर्ववत् शेष १०२ प्रकृ- तिनी, उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट, जघन्य, अजघन्य, ए च्यार ४ प्रकारनी स्थिति सादि अत्रुव भागे बधाय, तिहा ७३ प्रकृति तो अवुव बधिज छे ते माटे किवारे बवाये किवारे न बधाये ते माटे सादि अनुव छे, २९ ब्रुवबधिमाहेली छे ते सदा बधाय, पिण ए २९ नो जघन्यधिक पिण एकेन्द्रीय छे, ते एके- न्द्रीयपणामे जवन्यबध करे ते माटे जघन्य कर्या पछी अज धन्यबध ते म्णि सादि अध्रुव छे, ते माटे ए २९ प्रकृतिने सादि अव छे ॥४७॥ साणाई अपुवते, अयरतो कोडि कोडिओ नहिगो, बधोन हु हीणो नय, मिच्छे भवियर सन्निमि ॥४८॥ Twom कर्मग्रन्थस्य ट्वार्थः अर्थ-हवे गुणठाणे स्थिति कहे छे. सास्वादन गुणठा- णायी माटी अपूर्वकरण पर्यंत अयर-सागरोपम अतो-कोडा- कोडी एक काइक ऊणी स्थिति बाघे, एटले ए ७ गुणठाणे १ कोडाकोडी देशे उणी स्थिति बाचे, पिण नहिगो-आधिकी न बाधे, समकीतीथी देश विरति नवपल्य ओछी बाचे, तेथी सर्वविरति केटला सागर ओछी बाधे, तेथी अपूर्वकरण स- ख्याता सागरना सेंकडा ओछी बाधे, तथा मिथ्यात्व गुणठाणे अत कोडाकोडीथी ओछी न बाचे, अनादि मिथ्यात्वी जघन्य अत कोडाकोडी, उत्कृष्ट ७० कोडाकोडी बाघे ए मिथ्यात्वी भव्य तथा अभव्य सज्ञी आश्रयि कह्यो छे ॥४८॥ जइ लहुवधोवायर, पज्जअसखगुण सुहुम पजहिगो। एसिं अपज्जाण लहू, सुहमेअर अपजपजगुरु ॥४९॥ अर्थ-हवे ३६ बोलना स्थितिनो अल्पबहुत्व कहे छे सर्वथी यती लहु-जधन्य स्थिति बधके सूक्ष्मसपराय चरमस- मयी सर्वथी थोडी १ बाधे १ अतर्मुहूर्त बाघे छे तेहथी बादर पर्याप्तो जघन्य स्थितिबधक असख्यातगुणी बाधे, ए सागरना भागनो बधक छे ते असख्यातो काल छे ते माटे तेहथी सूक्ष्म एकेन्द्री पर्याप्तो जवन्यबधक काइक अधिकी बाधे, पढने योडो काल वधे छे, एहज बे अपर्याप्ता लशु- जघन्यबधकना बे बोल कहेवा वेहयी बादर पर्याप्तो जघन्यबधक स्थिति अधिकी बाधे ४, तेहथी सूरमाप्तिो जघन्यबधक अ- धिकी बाधे ५, तेहथी सूक्ष्म अपर्याप्तो उत्कृष्टबधक अधिकी बाधे ६, तेहथी बादर अपर्याप्तो उत्कृष्ट स्थितिषधक अधिकी बाघे ७, तेहथी सूक्ष्म अपर्याप्तो उत्कृष्टबधक अधिकी बाधे८, ७१ कर्मग्रन्यस्य टमार्थ तेहथी बादर पर्याप्तो उत्कृष्टधक स्थिति अधिकी नावे एके- न्द्रीपणामे एज उत्कृष्टयधक छे ९ ॥४९ ।। लहु विअ पन्ज अपज्जे, अपज्जेयर विअगुरु हिगो एव। तिचउअसन्निसुनवर,सखगुणो विअ अमणपचे ५० अर्थ-लर-जवन्यधिक वेन्द्री पर्याप्तो सर यातगुणी बाघे १० तेहथी बेन्द्री अपर्याप्तो जघन्यधक अधिकी बाचे, ११ तेहथी बेन्द्री अपर्याप्तो उत्कृष्टबधक अधिकी बाधे. १२ तेहपी वेन्द्री पर्याप्तो उत्कृष्टवयक अधिकी बाधे १३ इहा एकेन्द्रीयी बेन्द्रीने २५ गुणो बध, ते माटे पेहेले बोले सख्यातगुणो कह्या पछी ते पल्पना असख्यातमे भागे वृद्धि छे, ते माटे अधिकी बाघे एव-ए रीते च्यार ४ बोल कहेवा तिहा १४ मे बोले तेन्द्री पर्याप्तो जघन्यवधक स्थिति अधिकी बाचे, तेहथी १५ मे बोळे तेन्द्री अपर्याप्तो जघन्यवधक स्थिति आधिकी बाचे, तेहथी केन्द्री अपर्याप्तो उत्कृष्टबधक अधिकी बाघे १६ तेहथी तेन्द्री अपर्याप्तो उत्कृष्टचक्क ते अधिकी बाधे १७ तेहथी चौरेन्द्री पर्याप्तो जघन्यबधक अधिकी बाधे १८ वहीं चोरेन्द्री अपर्याप्तो जघन्यबधक अधिकी बाधे, १९ तेहथी चोरेन्द्री अपर्याप्तो उत्कृष्टबधक आधिकी बाधे २० तेहथी चो- रेन्द्री पर्याप्तो उत्कृष्टबधक अधिकी बाधे, २१ तेहथी असशि पचेन्द्री पर्याप्तो जघन्य बे० सख्यात गुणबधक छे ते २२ ए हजारगुणी बाधे ते चोरेन्द्रीथी नवगुणी साधिक थइ छे. ते माटे तेहथी असज्ञि पचेन्द्री अपर्याप्तो जघन्यबधक अधिकी बाधे २३ तेहथी असज्ञि पचेन्द्री अपर्याप्तो उत्कृष्टबधक अ-' विकी बाधे २४ वेहथी असज्ञि पचेन्द्री पर्यासो' उत्कृष्टी कर्मग्रन्थस्य स्वार्थ ७१९ बधक अधिकी वाधे २५ नवर-विशेष एटलो फेर छे जे वेन्द्री तथा असज्ञि पर्याप्तो तेनो पाठ ते सख्यातगुणो कहेवो ॥५०॥ तोजइ जिट्ठो वंधो, सखगुणो देसविरयहस्सिअरो। सम्मचउ सन्निचउरो, ठिइवधाऽणुकम सखगुणा ५१ अर्थ तेहथी प्रमत्त गुणठाणे वर्तमान वे मुनिपणामे उत्कृष्ट बधक छे सख्यात गुणी स्थितिमाघे २६ ॥ केटलाएक सागर उणी एक कोडाकोडीना बधक छे, तेहयी देशविरति जधन्यवधकनी सख्यातगुणी स्थिति वृद्धि तो योडी छे ते पर स्थितिस्थानक कषायनी चोकडीना वध्या, माटे असख्यातगुणा वघे छे ते माटे असख्यातगुणपणे लीधी छे २७ । वेहयी देशविरति उत्कृष्ट बधक असख्यात गुणीवावे २८ । वेहथी समकीतीना न्यार गेल कहेवा, तिहा समकिति पर्याप्तो जघन्य बधक सख्यातगुणी बाघे २९। तेहथी समकिनी अपर्याप्त जघन्यत्रचकने सख्यातगुणी बवाय ३० । तेहथी समकिती अप- प्तिो उत्कृष्ट बधक सख्यातगुणी बाधे ३१ । तेहथी समकिती अपर्याप्तो उत्कृष्टबधक सख्यातगुणी ३२ । तेहथी समकिती पर्याप्तो उत्कृष्टवधक अधिकी बाधे, तेहयी सज्ञी पर्याप्तो जघन्यबधक सख्यातगुणी बाधे ३३ । तेहथी सज्ञी अपर्याप्तो जघन्यबधक सख्यातगुणी बाधे ३४ । तेही सज्ञी अपर्याप्तो उत्कृष्टबवक सख्यातगुणी बाचे ३५। तेहथी सज्ञी पर्याप्तो उत्कृष्टवघक सख्यातगुणी बाचे ३६ । एम स्थितिवध सख्यातगुणा छ ॥५१॥ सवाणवि जिट्ठठिई, असुहाज साइसकिलेसेण । इअरा विसोहिओ पुण, मुत्तु नरअमर तिरिआउ ५२ ७२० कर्मग्रन्यस्य टमार्थ अर्थ-सर्व प्रकृतिनी जिट्ट-उत्कृशी स्थिति के अशुभ जाणवी, जे साई-ते अति सक्लेश परिणामे एटले जिननामनो बध चोथा गुणटाणायी मानी जाटना गुणटाणा लगे छे, पिण चौधे स्थिति उत्कृष्टी बावे में गुद परिणाम छे ते माटे जवन्य बावे ए सर्व प्रकृतिनी ई-।-जवन्य स्थितिने विशुद्ध परिणामे बाधे, एक तीन प्रकृति नर-मनुष्पायु, देवायु, तिर्य- चायु, ए तीन प्रकृति मूकीने, एटले ए तीन प्रकृतिनी जघन्य स्थिति सक्केश परिणामे बाधे, उत्दृष्टी स्थिति विशुद्ध परिणामे बाधे ॥५२॥ सुहुमनिगोआइखणप्प-जोगवायरय विगलअमणमणा अपजलहु पढमदुगुरू, पजहस्लिअरोअसखगुणो।५३॥ अर्थ-हवे २८ बोलना योगचलनो अल्पबहुत्व कहे छे सूक्ष्मनिगोदादि प्रथम क्षणे प्रथम समये उपनो अपर्याप्त पणाथीज आव्यो तेहनो सर्वथी योगबल अल्प जाणवो ? तेहथी बादर एकेन्द्री अपर्याप्तो प्रथम समय उपनो अपर्याप्तो अपर्याप्तपणाथीज आन्यो, तेहनो सर्वथी योगबल अल्प जाणवो १ तेहथी बादर एकेन्द्री अपर्याप्तो प्रथम समय उत्पन्न ज- घन्ययोगीनो योगबल असख्यातगुणो, २, वेहथी बेन्द्री अ- पर्याप्ता जघन्ययोगीनो योगबल असख्यातगुणो, ३ तेथी तेन्द्री० ४ तेथी चोरेन्द्री० ५ तेहथी अमण-असज्ञि अप- प्तिानो जघन्य योगबल असख्यातगुणो, ६ तेहथी मणा- सज्ञि अपर्याप्तानो जवन्य योगबल असख्यातगुणो ७, तेहथी पढम-पेहेला बे बोल गुरु-उत्कृष्टबधक एटले सूक्ष्म अपर्याप्तानो उत्कृष्ट योगबल असख्यातगुणो, ८ तेहथी बादर अपर्याप्तानो कर्मग्रन्थस्य टमार्य ७२१ उत्कृष्ट योगाल असख्यातगुणो ९ सूक्ष्म पर्याप्त जवन्य यो- गीनो योगल असख्यातगुणो १० तेहथी बादर पर्याप्त ज- घन्य योगीनो योगल असख्यातगुणो, ११ तेहथी सूक्ष्म पर्याप्त उत्कृष्ट योगीनो योगबल असख्यातगुणो १२ वेहथी बादर पर्याप्त उत्कृष्ट योगीनो योगरल असख्यातगुणो १३ ॥५३॥ असमत्ततमुक्कोसो, पज्जजहन्नियर एव ठिइठाणा । अपजेयर सखगुणा, परमऽपजवीए असंखगुणा॥५४॥ अर्थ-असमत्त-अपर्याप्त ५, नो उत्कृष्ट योगीनो योग- बल असख्यातगुणो ते पछी उस ५, पर्याप्ता जघन्य योगीनो योगबल असल्यातगुणो, तेयी सना ५, पर्याप्ता उत्कृष्टयोगीनो असख्यातगुणो योग छे ते कहे छे-चौदमे बोले अपर्याप्त बेन्द्रि उत्कृष्टयोगीनो योगबल असख्यातगुणो १५, तेहयी अप- र्याप्त चौरेन्द्रिनो उत्कृष्टयोग असख्यातगुणो, १६, तेहथी अप- यप्ति असज्ञिपचेन्द्रिनो उत्कृष्ट योगबल असख्यातगुणो १७ तेहयी अपर्याप्त सज्ञिपचेन्द्रिनो उत्कृष्टयोग असख्यातगुणो १८, तेहयीं पर्याप्त बेइन्द्रिनो जवन्ययोग असख्यातगुणो १९, ते- हथी पर्याप्त तेइन्द्रिनो जघन्ययोग असख्यातगुणो २०, तेहथी पर्याप्ता चौरेन्द्रिनो जघन्ययोग असख्यातगुणो २१,तेहथी पर्याप्ता असज्ञिपचेन्द्रिनो जव ययोग ख्यातगुणो २२, तेहथी पर्याप्ता सज्ञिपचेन्द्रिनो जवन्य योग असख्यातगुणो, २३ तेहयी पर्याप्त बेन्द्रिनो उत्कृष्टयोग असख्यातगुणो, २४ तेहथी तेन्द्रिपर्याप्तो तेनो उत्कृष्ट योग असख्यातगुणो, २५ तेथी चौरेन्द्रि पर्याप्ता- नो उत्कृष्ट योग असख्यातगुणो, २६ तेहथी असज्ञिपचेन्द्रि पर्याप्तानो उत्कृष्ट योग असख्यातगुणो, २७ तेयी सज्ञिपचेन्द्रि ७२२ कम्मग्रन्यस्य टमार्य - - पर्याप्तानो उत्कृष्ट योग जसरख्यातगुणो २८ ए रीते स्थिति स्थानकनो अल्पबदुत्व २८ गोटनो जाणवो, वीर्यनी दिए स्थितिनी तीनमदताना मेद पडे ते इहा लेज्यो अपर्याप्ताया इअर-पर्याप्ताना रियतिस्थानक असरयातगुण छे, इहा जीव भेद एफै स्थिति जवन्य मिथ्यात्वनी एकसागर पल्यने असरल्या- तमे भागें ऊणी नाचे, पिण कोइक तीन नाचे, कोइक जीव मद तथा मदतर रीतें एक स्थितिस्थानक ते स्थिति बाधवा- ना अव्यवसाय स्थानक असख्यात याये एहवा एक जीवमेद सूक्ष्म अपर्याप्ताने पाधवाना अव्यवसाय स्थानक असख्यात छे तेहथी सूक्ष्मपर्याप्ताना बघाघ्यवसाय सख्यातगुणा छे, वेयी बादर अपर्याप्ताना सख्यातगुणा छे, तेथी बेइन्द्रि अपर्याप्ताना बधा- ध्यवसाय असख्यातगुणा छे, तेथी वेन्द्रिपर्याप्ताना बघाव्यवसाय सख्यातगुणा छे इम १४ जीवभेदें कहेता पण एटलो भेद जे बेइन्द्रि अपर्याप्ताना असख्यातगुणाज जसपणानो वीर्य तेहने वाध्यो ते माटे तथा इहा स्थिति अपेक्षाए पहेला (१) ॥५४॥ पइ खण मसखगुणविरिय, अपजपइठिइमसखलोग- समा। अज्झवसाया अहिया, सत्तसु आउसुअसखगुणा ५५॥ अर्थ--हवे जीवने क्षयोपशमी वीर्य जे उपजवाने प्रथम समये छे ते असर-यातो छ ते पछी पइखण-प्रतिसमये एटले समय समयमे असख्यातगुणो वीर्य वधे पण अपर्या- प्तावस्थासीम इम वीर्यवृद्धि जाणवी एटले पेहेला समयथी बीजे' समये असख्यातगुणो वीर्य वधे, जीजे समये असख्यातगुणो कर्मग्रन्यस्य वार्थः ७२३ वीर्य वधे, अने वळी पइटिइ-प्रतिस्थितिए (स्थितें) अध्य- वसाय असंख्याता छे, ते अलोकमध्ये लोक जेहवा असंख्याता खड कल्पीये तेहना प्रदेश जेटला एकस्थितिस्थानक स्थिति- बधना अध्यवसाय छे, ते ए सर्व जीवभेदे जाणज्यो कपायना तरतमयोगें अध्यवसायना भेद जाणवा, ए अध्यवसाय अनंत- जीवमा पण पामीये अने कोइक वेळा असख्याता अध्यवसाय जीव रहित पिण पामीये हवे सातकर्मनी जघन्य स्थिति बाधे तेहना अध्यवसाय असख्याता छे, अने एक समयाधिक बाधे तेहना पुटली स्थितिना अध्यवसायथी काइक अधिक जाणवा इम तृतिय समयाधिकना अध्यवसाय अधिका इम वधारते २ उत्कृष्ट स्थितिस्थानकसीम अधिकाधिक कहेवा, आउखाक- मना जघन्य स्थितिस्थानकथी समयाधिकनो जे स्थितिस्थानक तेहना अव्यवसाय असख्यातगुणा कहेवा, सर्व वर्त्ततो आउखो बाघे पिण आउखानी स्थिति थोडी तिणे स्थितिस्थानक थोडा अने कपायस्थानकने क्हेंचता असख्यातगुणा आवे, इम सात कर्मने पण स्थितिस्थानके करी कपायस्थानकनो अल्प बहुत्व कहेवो, हवे जे प्रकृति जेटला काल अबव रहे ते प्र- कृतिनो अवधकाल कहे छे तिहा ४७ प्रकृति तो वववधि छे ते निरतर बधाये छे, तेथी वीजानी भावना करीये छे ॥५५॥ तिरिनिरय तिजोयाण, नरभवजुअस चउपल्ल तेसह। थावर चउइग विगलाय-वेसुपणसीइसयमयरा ५६ अर्थ-तिहा तिर्यच ३, नरक ३, उद्योतनामकर्म ए ७ सात प्रकृतिनो उत्कृष्ट मनुष्यभवयुक्त पल्योपम च्यार अने एकसो तेसष्ठ सागरोपम पर्यत बाधे नहीं, तिहा भावना-कोइ ७२४ कर्मग्रन्पस्य सार्य युगलपणे तीन पल्योपम रही सौधर्म देवलोके एक फ्ल्यने आउखे उपनो, तिहा समकित रहीत, ते मारे ए प्रकृति ७ न बाधी तिहायी मनुष्यपणे समकित सहित विरतिपणे रही अच्युतनो २२, सागरनो आउखो पापी देवलोक गयो, ति- हाथी मनुष्य, वळी पारमे देवलोक, तिहायी मनुम्य, बळी ३१ सागरने आउखे नवमे वेयके, तिहायी मनुम्य, ३३ सागरने आउखे अनुत्तर विमाने, इम एकसोनेसठ १६३ सागर पल्य ४ च्यार केटलाएक मनुप्यभव अधिककालसीम ए७ सात प्रकृति न बांधे तथा यावर ४, एकेन्द्रि जाति १ विगल ३ आतप- नाम ए नव प्रकृति एकसो पच्यासी १८५ सागर पल्प ४ केटलाएक मनुष्यभव अधिककालसीम नपाचे तिहा भावना- जे छठ्ठी नरकें नारकीपणे २२, सागरने आउखे समकितीपणे रही त्यांथी चवी मनुष्य थयो ते युगलीयो पल्य ३ ने आ- उखे, तिहाथी पल्य १ ने आउखे देवता, तिहायी मनुष्य, तिहाथी अच्युत, एम एकातरे ३ वार मनुष्य ३ वार अच्युते जइ मनुष्य थइ ३१ सागरने आउखे नवमात्रैवेयके जाय तिहाथी मनुष्य थइ ३३ सागरने आउखे विजयादिविमाने, तिहाथी मनुष्य थइ ३३ सागरने आउखे विजयादिविमाने जाय इम, सर्व भवें १८५ एकसो पच्यासी सागर, पल्य ४ नरभव अधिककाल सीम ए नव प्रकृति जाणवी ॥५६॥ अपढमसघयणागिइ, खगई अण मिच्छ दुभगंथीण तिग। नियनपु इथि दुतीस, पणिदिसुअवघठिइपरमा ५७ अर्थ-पेहेला सघयण विना पाच सवयण, पेहेला संस्थान कर्मग्रन्थस्य टवार्य ७२५ विना पाच सस्थान, अशुभविहायोगति १, अनतानुवघी ४, मिथ्यात्वमोहिनी १, दुर्भग ३, थीणद्वी ३, नीचगोन १, नपुस- कवेद १, स्त्रीवेद १, ए पचीस प्रकृति १३२ सागर, पल्य ४ नरभव अधिककाल्सीम न बाचे तिहा कोइक युगलिओ पल्य ३ आयुवाळो ते देवता पल्य १ ने आउखे उपजे, ते मनुष्य थइ तीनवार बारमे देवलोके २२ सागरने आउखे जाय, ए ६६ सागर थाय, वळी मनुष्यभव करी विजयादिविमाने जाय इम सर्व भवे एकसोबतीस सागर पल्य ४ मनुष्यभव प्रमाण अधिककाल थाय ए सर्व पचेन्द्रीपणे रहे ते जीवने ए प्रकृति ४१ नी अपय स्थिति परमा-उत्कृष्टी कही जघन्ये सर्वनो अबधकाल एक समय १ नो छे, शेष प्रकृतिनो उत्कृष्ट काल गवेख्यो नथी ते नीयमित नयी ते मारे इम घाखो ॥५॥ विजयाइसुगेविज्जे, तमाइ दहिसय दुतीस तेसट्ठ । पर्णसीइ सयय वधो, पल्लतिगं सुरविउवि दुगे॥५॥ अर्थ-विजयाइसु-बे भवे विजयादिविमाननी, आदि शब्दयी तीन भव अच्युतना भेळा करीये तो १३२ सागर कालमान थाय, ते बारमाना ३ भव कर्या पछी १ भव न- वमा वेयकनो थाय तो एकसोसठ सागरनो मान थाय, अथवा तमाई-तमा ६ छही नरकथी आदि भव माडी अ- च्युतना ३ भव, ग्रेवेयकनो १ भा विजयादिकना वे भव, इम गवेखायतो १८५ एकसोपच्यासी सागरमान काल थाय ए रीते सर्व भावज्यो हवे ७३ अवधीनो सतत-निरतर बधका- सनो मान कहे छे-तिहा सुर-देवदुग, वैक्रियदुग, ए ४ प्र- ऋतिनो पल्य ३ तीन सीम निरतर बंगाये, जे ३ पल्यने ७२६ कर्मग्रन्पस्य मार्य आउखे युगलिया तेहने पीजी गति जायो नयी ते माटे नि- रतर ए ४ प्रति नाचे ॥५८॥ समयादसखकाल, तिरिदुगनीएसुआउअतमुहू। उरलि असखपरहा, सायट्ठि पूर्वकोहणा ॥५९॥ अर्थ-समया-जघन्ये १ समय उत्कृष्ट असख्यातोकाल, तिरिदुग २, नीचगोन, ए ३ तीन प्रकृति निरतर वधाय, जे कारणे सातमी नरकनो नास्की ३३ सागर सीम ए प्रकृति निरतर बाचे, जे मिथ्यात्वी होय तेहने पीजी गति, ऊच- गोनो बध नथी, आउखो जघन्ये तथा उत्कृष्टे अतर्मुहूर्त सीम निरतर बाधे, जघन्य मुहूर्त्तयी उत्कृष्ट मुहूर्त मोटो जाणवो, औदारिक शरीर, असख्याता पुद्गलपरावर्त सुधी निरतर बाघे, सूक्ष्म, बादर, निगोद, प्रत्येक, एकेन्द्रि मळीने गवेखी जोज्यो जासीम (ज्या सुधी) वेदनीयनो बध तासीम अतर्मुहूर्तयी अ- धिककाल ए बे माहेली प्रकृति बधाय नहां परावर्तन छे ते माटे, सातावेदनी देशेऊणी पूर्वकोडि सीम निरतर बाघे ए सयोगी केवळी गुणठाणानी अपेक्षाए छे ॥ ५९॥ जलहिसय पणसीय, परघुस्सासेपणिदितसचउगे। बत्तीस सुहविहगइ, पुम सुभगतिगुच्च चउरसे ॥६०॥ अर्थ-पूर्व रीते १८५ एकसोपच्यासी सागर, पल्य ४ नरभव अधिक कालमान सीम, पराघात, उश्वासनाम, पचेन्द्रि जाति, सच्यार ४, (त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रसेक) एम ए ७ प्रकृति निरतर बधाये तथा आगळ कहेशे ते प्रकृति एकसो- बीस कालमान निस्तर बाधे १३२ सागरोपम पूर्वोक्त रीते कर्मग्रन्थस्य स्वार्थ ७२७ . . निरतर वाघे शुभविहायोगति १, पुरुपवेद १, सुभगत्रिक ३, उचगोन १, समचौरस १ ॥ ६० ॥ असुहखगइ जाइ आगिइ, सघयणाहारनिरयुजोयदुर्ग। थिरसुभजसथावरदस, नबुइत्थीदुजुअलमसाय ॥१॥ अर्थ-अशुभविहायोगति १, एकेन्द्रि, विकलनिक, ए जाति ४ अशुभ सस्थान पाच, अशुभ सवयण पाच, आहारकद्विक, नरकद्विक, २ उद्योत, आतप, २, स्थिरनाम १, शुभनाम १, जसनाम १, यावरदसक १०, नपुसकवेद १, स्त्रीवेद १, दुजुयल- हास्य, रति, २ अरति,शोक,२ ए४ असातावेदनीय १ ॥६॥ समयादतमुहुत्त, मणदुगजिणवइरउरलुवगेसु, तेत्तीसयरा परमी, अतमुहलहु वि आउ जिणे ॥३२॥ अर्ग-ए सुडताळ स (टबामा ४१ लखी छे) प्रकृति जघन्य एक समय बाधे, उत्कृष्ट अतर्मुहूर्तमान काल बाधे, मनुष्य दुग-मनुष्य गति, मनुष्यानुपूर्वी २, जिननाम १, वज्र- ऋषभनाराच सवयण १, औदारिक उपाग १, ए पाच प्रकृति तेत्रीस सागरोपम सीम निरतर बाधे, समकिती सर्वार्थसिद्ध विमाने रह्यो निरता बाधे ते अपेक्षाए उत्कृष्ट काल जाणवो, जघन्य बवकाल, जाउखा ४, जिननाम १, ए पाच प्रकृति, जघन्य पण एक अतर्मुहूर्त कालमान जाणवो शेष प्रकृति ६८ नो जवन्य बधकाल एक समय जाणवो ॥ ६२ ॥ ए स्थितिबध अधिकार पूरो थयो हवे रसबध अधिकार कहे छे इति सततबध द्वा० १८ wink--- m , ७२८ कर्मग्रन्मस्प टमार्थ तिवो असुहसुहाण, सकेसविसोहिओविवज्जयओ। मंदरसोगिरिमहिरय, जलरेहा सरिसकसाएहि॥३॥ अर्थ-तिबो-तिन उल्कष्टो अशुभनो तीबरस सक्केश परिणामे पाघे, शुभनो तीवरस विशुद्ध परिणामे नाचे, विपर्ययपणे मदरस नाचे, जिहा अशुभनो तीवरस नाघे तिहा शुभनो मदरस नाचे, जिहा शुभनो तीन वाघे तिहा अशुभनो मदरस बाधे, इहा दृष्टात जे अनतानुवधि कषाय गिरिरेखा समान तेथी चोठाणीयो रस, तथा अप्रत्याख्यान कषाय महीरेखा समान एपी निठाणीयो रस, प्रत्याख्यानी रजरेखा समान एथी बेठाणीयो रस, सज्वलनो जलरेखा समान तेथी एकठाणीयो रस जाणवो ए दृष्टान्ते जाणवो ॥ ६३ ॥ चउठाणाई असुहो, सुहन्नहा विग्ध देसघाइआवरणा। पुम सजलणिग दुति-चउट्ठाणरसासेस दुगमाई६४ अर्थ-चउठाणी-चोठाणीयादि (प्रमुख) रस अशुभनो तेयी अन्यथा बीजी रीते शुभ, एटले जिहा अशुभनो चोठा- णीयो तिहा शुभनो बेठाणीयो, जिहा अशुभनो त्रिठाणीयो तिहा शुभनो बेठाणीयो, जिहा अशुभनो बेठाणीयो तिहा शुभनो निठाणीयो, जिहा अशुभनो एकठाणीयो तिहा शुभनो चोठाणीयो एग भाववु तिहा विग्ध-पाच अतराय, तथा देशघाती आवरण ज्ञा- नावरणी ४, दर्शनावरणी ३, ए सात, पुरुषवेद १, सजलणा- कषाय ४ ए १७ प्रकृति तेनो एकठाणियो रस बाधे, तथा बेठाणीयो बाधे, तथा त्रिठाणीयो बाधे, चोठाणीयो बाघे, कर्मग्रन्थस्य टमार्थ ७२९ शेप-बाकी रही जे १०३ प्रकृति, तेहनो दुगमाइ-वे ठाणीयो, निठाणायो, चोठाणीयो, ए ३ जातिनो रस नाघे ॥ ६४॥ निंबुइच्छरसो सहजो, दु तिचउ भाग कढिइक्क भा- , गतो। इगठाणाई असुहो, असुहाण सुहो सुहाणं तु ॥६५॥ अर्थ-अशुभ प्रकृतिनो रस लीनडाना रससमान जाणवो तथा शुभ प्रकृतिनो रस इक्षु सेलडीना रससमान जाणवो, तिहा सहज मूलगो रस ते इकठाणीयो जाणवो, ते मध्ये बे भाग कढ़ीय-उकाज्यो एटले अर्द्ध उकाळ्यो, अई रह्यो ते बेठा- णीयो रस जाणवो तथा तिठाणीयो रस ते तीन भाग कढी उकाळ्यो ने १ भाग रह्यो ते तिठाणीयो रस, अने चउभाग-जे मध्ये च्यार ४ भाग उकाळ्यो अने एक भाग रह्यो ते चोठाणीयो रस जाणवो, ए अशुभ कर्मनो जेम रस वधे तेम अशुभ थाय, शुभ कर्मनो रस शुभ थाय, ए सर्व अशुभ कपाये अशुभ रस बाधे, शुभ कषाये शुभ रस बाधे ॥६५॥ तिवमिग थावरायव, सुरमिच्छा विगल सुहुम निरय- तिग। तिरिमणुआउ तिरि नरा, तिरि दुग छेवट्ठ सुरनि- रया ॥६६॥ अर्थ हवे उत्कृष्ट रसबध स्वामी कहे छे-तीव्र उत्कृष्टो रस एकेन्द्री जाति १, थावर नाम १, आतप नाम, ए तीन 92 १४१ - RALA-- ७२८ कर्मग्रन्पस्प टार्य तिवो असुहसुहाण, सकेसविसोहिओविवज्जयओ। मदरसोगिरिमहिरय, जलरेहा सरिसकसाएहि॥३॥ अर्थ-तियो-तिन उत्कटो अशुभनो तीबरस सक्लेश परिणामे नाचे, शुभनो तीनरस विशुद्ध परिणामे बाधे, विपर्ययपणे मदरस गधे, जिहा अशुभनो तीबरस बावे तिहा शुभनो मदरस नाचे, जिहा शुभनो तीन वाघे तिहा. अशुभनो मदरस बाघे, इहा दृष्टात जे अनतानुबधि कषाय गिरिरेखा समान तेथी चोटाणीयो रस, तथा अप्रत्याख्यान कषाय महीरेखा समान एपी निठाणीयो रस, प्रत्याख्यानी रजरेखा समान एथी वेठाणीयो रस, सज्वलनो जलरेखा समान तेथी एकठाणीयो रस जाणवो ए दृष्टान्ते जाणवो ॥ ६३ ॥ चउठाणाई असुहो, सुहन्नहा विग्घ देसघाइआवरणा। पुम सजलणिग दुति-चउट्ठाणरसासेस दुगमाई६४ अर्थ-चउठाणी-चोठाणीयादि (प्रमुख) रस अशुभनो तेथी अन्यथा बीजी रीते शुभ, एटले जिहा अशुभनो चोठा- णीयो तिहा शुभनो बेठाणीयो, जिहा अशुभनो त्रिठाणीयो तिहा शुभनो बेठाणीयो, जिहा अशुभनो बेठाणीयो तिहा शुभनो निठाणीयो, जिहा अशुभनो एकठाणीयो तिहा शुभनो चोठाणीयो एग भाववु तिहा विग्ध-पाच अतराय, तथा देशघाती आवरण ज्ञा- नावरणी ४, दर्शनावरणी ३, ए सात, पुरुषवेद १, सजलणा- कषाय ४ ए १७ प्रकृति तेनो एकठाणियो रस बाधे, तथा बेठाणीयो बाधे, तथा त्रिठाणीयो बाधे, चोठाणीयो बाधे, कर्मग्रन्थस्य यार्थ ७२९ शेय-बाकी रही जे १०३ प्रकृति, वेहनो दुगमाइ-वे ठाणीयो, निठाणीयो, चोठाणीयो, ए ३ जातिनो रस वाघे ॥ ६४ ॥ निंबुइच्छरसो सहजो, दु तिचउ भाग कढिइक भा- गतो। इगठाणाई असुहो, असुहाण सुहो सुहाणं तु ॥६५॥ अर्थ-अशुभ प्रकृतिनो रस लींनडाना रससमान जाणवो तथा शुभ प्रकृतिनो रस इक्षु सेलडीना रससमान जाणवो, तिहा सहज मूलगो रस ते इकठाणीयो जाणवो, ते मध्ये बे भाग कट्ठीय-उकाव्यो एटले अर्द्ध उकाळ्यो, अर्द्ध रह्यो ते बेठा- णीयो रस जाणवो तया तिठाणीयो रस ते तीन भाग कढी उकाळ्यो ने १ भाग रह्यो ते तिठाणीयो रस, अने चउभाग-जे मध्ये च्यार ४ भाग उकाळ्यो अने एक भाग रह्यो ते चोठाणीयो रस जाणवो, ए अशुभ कर्मनो जेम रस वधे तेम अशुभ याय, शुभ कर्मनो रस शुभ थाय, ए सर्व अशुभ कषाये अशुभ रस बाधे, शुभ कषाये शुभ रस बाधे ॥६५॥ तिवमिग थावरायव, सुरमिच्छा विगल सुहुम निरय- तिग। तिरिमणुआउ तिरि नरा, तिरि दुग छेवट्ठ सुरनि- रया ॥६६॥ अर्थ हवे उत्कृष्ट रसबध स्वामी कहे छे-तीन उत्कृष्टो रस एकेन्द्री जाति १, थावर नाम १, आतप नाम, ए तीन , . 92 ७३० कर्मग्रन्पस्य वार्य . प्रकृतिनो सुरमिला-मिप्यावी देवता उत्कृष्ट रस नाघे, तथा विगल ३, सुक्ष्म ३, सूक्ष्म, अपोत, साधारण ए ३, नरक- गति १, नरकानुनी २, नरकायु ३, ए नरकनिक तथा तिरिआयु १, मनुष्यायु १, ए ११ प्रकृतिनो उत्कृष्टो रस तिर्यंच तया मनुष्य मिथ्यात्वी नाचे, तथा तिर्यंच दुग-तिर्यंच गति १, तियेचानुपूर्वी ए वे अने छेनटो सवयण ए ३ प्र- कृतिनो उत्कट रस देवता, नारकी मिथ्यात्वी नाचे ॥६६॥ विउविसुराहारग दुग, सुखगड वन्न चउ तेय जिण साय समचउपरघा तसदस, पणिदि सासुच्च खवगा उ॥६७ अर्थ-वैक्रिय दुग-वेक्रिय शरीर १, वैक्रिय उपाग २, देवद्विक २, आहारकदिक २, शुभ विहायोगति १, वर्णादि ४, तैजस शरीर १, कार्मण १, अगुरुलघु १, निर्माण १, जिननाम १, सातावेदनीय १, समचौरस सस्थान १, पराघात १, सनो दशको १०, पचेन्द्री जाति १, श्वासोश्वास १, उच्चगोत्र १, ए बनीस ३२ प्रकृतिनो उत्कृष्ट रस खवगाउ- क्षपकश्रेणिमा बाधे तिहा साता वेदनीय १, उच्चगोत्र १, यशनाम १, ए ३ तीन प्रकृतिनो सूक्ष्मसपराय गुणठाणे उत्कृष्ट रस बाधे, शेष २९ प्रकृतिनो उत्कृष्ट रस अपूर्वकरण गुणठाणे बाघे ॥६७ तमतमगा उज्जोय, सम्मसुरा मणुय उरलदुग वइर। अपमत्तो अमराउ, चउगइमिच्छा उ सेसाण ॥६॥ अर्थ उयोतनामकर्मनो उत्कृष्ट रस तमतमगा-तमतमा नरकना नारकी बाधे, मनुष्यद्ग २, औदारिकदुग २, वज्र ऋषभनाराचसघयण १, ए पाच प्रकृतिको - , निकात रस सर-

कर्मग्रन्थस्य टवार्थ
७३१
KA
किती सुरा-देवता उत्कृष्ट रस नाथे, तथा अमराउ-देवतानो
आउखो उत्कृष्टरसे अप्रमत्त गुणटाणे नाचे, शेष ६४ प्रकृतिनो
उत्कृष्ट रस च्यार ४ गतिना मिथ्यात्वी तीवकपायी जाधे ए
उत्कृष्ट रसना स्वामी कह्या ॥८॥
थीणतिग अण मिच्छ, मदरस संजमुम्मुहो मिच्छो।
वियतियकसाय अविरय, देसपमत्तो अरइ सोए ॥६९॥
अर्थ-हवे जघन्य रसना स्वामी कहे छे--थिणद्धी तीन
निद्रानिद्रा १, प्रचलाप्रचला २, थिणद्धी ३, ए तीन, अन-
तानुनधी ४, मिथ्यात्वमोहनी १, ए आठ प्रकृति मदरसे
सयमने सन्मुख मिथ्यात्वी बाधे, एह प्रकृतिना बधकमे वि-
शुद्ध परिणामी एहिज जीव छ, वियकपाय-बीजो कषाय
अविरय-अविरति समकीती बाधे, नीजो कपाय जघन्य रसे
देशविरति बाधे, अरति, शोक, ए बे प्रकृति प्रमत्त गुणठाणे
मुनि जघन्यरसे बाधे ।। ६९ ।।
अपमाइ हारगदुग, दुनिद असुवन्न हास रइ कुच्छा।
भयमुवघायमपुचो, अनियट्टी पुरिससजलणे ॥७॥
अर्थ-अपमत्त गुणठाणाना आदि समये आहारकदुग ज-
घन्यरसे बाधे, बे निद्रा, निद्रा १, तथा प्रचला २, अशुभव-
दि ४, हास्य, रति, दुगछा, भय, उपघात, ए इग्यार ११
प्रकृतिनो अपूर्वकरण गुणठाणे जघन्यरस बाधे, पुरुषवेद, सज-
लणा ४, ए पाच प्रकृति अनिवृत्तिनादर गुणठाणे जघन्यरसे
पावे ॥ ७० ॥

७३२ कर्मग्रन्यस्य टमार्य विग्यावरणेसुहुमो, मणुतिरिआ मुहुम विगलतिगआऊ वेउवि छकममरा, निरया उज्जोय उरलदुग ॥७१ ॥ अर्थ-निग्ध-अतराय पाच, आवरण-जानापरणी पाच, दर्शनावरणी ४, ए ९, एम वी मळी १४, चोद प्रकृतिनो सुहुमो-सूक्ष्मसपराय गुणठाणे जपन्य रस नाचे, तथा सूक्ष्मनिक ३, विकलनिक ३, आउखा ४, बयिठक-देवदिक २, नर- कद्विक २, वैकियदिक २, ए ६, उ मली सर्व १६, प्रकृति मणुतिरिय-मनुम्य ने तियेच जवन्यरसे नाधे, उद्योतनाम, औ- दारिक २, अमरा-देवता निरया-नारफी जवन्य रसे बाघे॥७१ तिरिदुग निय तमतमा, जिण मविरय निरयविणिग थावरया आसुहु मायव सम्मो, वसाय थिर सुह जसा सियरा७२ अर्थ-तिर्यचद्विक २, नीचगोत्र १, ए ३ प्रकृतिनो जघन्य रस तमतमानारक ७ मीना नारकी बाधे जिननामकर्मनो जवन्य रस अविरति समकिती बाधे, एकेन्द्री जाति थावरनामकर्म, नरक- गतिविना तीन गतिना जीव जघन्य रसे बाधे, आतपनामकर्म आसुहुमा-सौधर्म देवलोक पर्यतना देवता, जघन्य रसे बाधे, सौवर्म कहेवाथी इशान पिण ग्रहवो, सम्मोवसाय-सातावेदनी १, थिरनाम १, शुभनाम १, जश १, ए ४, प्रकृति समकिती पटतो जपन्यरसे बाधे सिरा-एहथी इतर असाता, अथिर, अशुभ, अजश, ए ४, प्रकृति समकिती चढतो होय त्यारे जघन्यरसे बाधे ॥ ७२ ॥ १५२ कर्मग्रन्थस्य टयार्थ ७३३ . तस वन्न तेअचउमणु,खगइ दुग पणिदि सास परधुञ्ची संघयणा गिइ नपु थी, सुभगिअर ति मिच्छचउ गइआ॥७३॥ अर्थ-वस, बादर, प्रत्येक, ए ४, तथा वर्णादि ४, तैजस, कार्मण, अगुरुलघु, निर्माण, ४ मणुअनुग-मनुष्यहिक २, खगईदुग--शुभ, तथा अशुभविहायोगति, पचेन्द्रीनीजाति, श्वासोश्वास, पराघात, उच्चैगात्र, सवयण ६, सस्थान ६, नपु- सफोद १, स्त्रीवेद १, सुभगनिक ३, इअर-दुर्भगनिक ३, एव ४० चाळीस प्रकृति मिच्छ-मिथ्यात्वी च्यार गतिना जवन्य रसे बाघे इहा भावना कहीये छीये-शुभ प्रकृति जिहा प्रक- मथी वाय तिहा उत्कृष्टरसे बाधे, अने अशुभप्रकृति प्रथम बधाये तिहा उत्कृष्टरसे बाघे अने जिहा खपे तिहा जघ- न्यरसे बाधे, ए रीते विचारखो. ॥ ७३ ।। चउतेय वन्न वेअणि, अनामणुक्कोस सेस धुववधी। घाईण अजहन्नो, गोए दुविहो इमो चउहा ॥७॥ अर्थ-हवे उत्कृष्ट रसबधना भागा कहे छे-चउतेय तेजस च्यार ४ तेजस, कार्मण, अगुरुलघु, निर्माण, ए ४, तथा वर्णादि ४, च्यार ४, वेदनीय शब्दे साता वेदनीय, नाम कहेता जसनाम अणुकोस-अनुत्कृष्ट बाधेतो चउहा- च्यारभेदे-सादि १, अनादि २, ब्रुव ३, अव ४, ए च्यार भेदे बाधे तिहा ए प्रकृतिनो उत्कृष्टरस क्षपकणि ए चढतो जीव बाधे, तथा वीजा जीव सर्व अनुत्कृष्टरस बाधे, ते अभ- व्यने अनादि व छे भव्यने घोलना परिणाभे, सादि छ, - ७३२ कर्मग्रन्याय आर्य . विग्यावरणेमुहुनो, मणुतिरिआ मुहम विगलतिगआऊ वेउवि छकममरा, निरया उज्जोय उरलदुग ॥ ७१ ॥ अर्थ-विग्ध-अतराय पाच, आवरण-जानावग्णी पाच, दर्शनावरणी ४, ए ९, एम पी मळी १४, चाद प्रकृतिनो सुमो-सूक्ष्मसपराय गुणठाणे जपन्य रस नाचे, तथा सूक्ष्मनिक ३, विकलनिक ३, आउखा ४, क्रिया-देवद्रिक २, नर- कद्रिक २, वैकियद्विक २, ए ६, उ मली सन १६, प्रकृति मणुतिरिय-मनुष्य ने तिर्यंच जवन्यरसे नाधे, उद्योतनाम, औ- दारिक २, अमरा-देवता निरया-नारकी जघन्य रसे बाघे॥७१ तिरिदुग निय तमतमा, जिण मविरय निरयविणिग थावरय। आसुहु मायव सम्मो, वसाय थिर सुह जसा सियरा७२ अर्थ-तिर्यचद्विक २, नीचगोत्र १, ए ३ प्रकृतिनो जघन्य रस तमतमानारक ७ मीना नारकी बाधे जिननामकर्मनो जवन्य रस अविरति समकिती बाधे, एकेन्द्री जाति थावरनामकर्म, नरक- गतिविना तीन गतिना जीव जघन्य रसे बाधे, आतपनामकर्म आसुहुमा-सौधर्म देवलोक पर्यंतना देवता, जघन्य रसे बाधे, सौवर्म कहेवाथी इशान पिण ग्रहवो, सम्भोवसाय-सातावेदनी १, थिरनाम १, शुभनाम १, जश १, ए ४, प्रकृति समकिती पटतो जपन्यरमे आधे सिरा-एहथी इतर असाता, अथिर, अशुभ, अजश, ए ४, प्रकृति समकिती चढतो होय त्यारे जघन्यरसे बाधे ॥ ७२ ॥ , कर्मग्रन्थस्य यार्थ ७३३ तस बन्न तेअचउमणु,खगइ दुग पणिदि सास परघुच्ची सघयणा गिइ नपु थी, सुभगिअर ति मिच्छचउ गइआ॥७३॥ अर्थ-प्रस, पादर, प्रत्येक, ए ४, तया वर्णादि ४, तैजस, कार्मण, अगुरुलघु, निर्माण, ४ मणुअद्ग-मनुष्यद्विक २, पगईदुग-शुभ, तथा अशुभविहायोगति, पचेन्द्रीनीजाति, श्वासोश्वास, पराघात, उच्चेोन, सवयण ६, सस्थान ६, नपु- समवेद १, स्त्रीवेद १, सुभगनिक ३, इअर-दुर्भगनिक ३, एव ४० चाळीस प्रकृति मिच्छ-मिथ्यात्वी च्यार गतिना जवन्य रसे नाचे इहा भावना कहीये छीये-शुभ प्रकृति जिहा प्रथ- मयी धाय तिहा उत्कृष्टरसे बाघे, अने अशुभप्रकृति प्रथम बधाये तिहा उत्कृष्टरसे बाघे अने जिहा खपे तिहा जघ- न्यरसे बाधे, ए रीते विचारखो. ॥ ७३ ।। चउतेय वन्न वेअणि, अनामणुकोस सेस धुववधी। घाईण अजहन्नो, गोए दुविहो इमो चउहा ॥७॥ अर्थ-हवे उत्कृष्ट रसमधना भागा कहे छे-चउतेय तैजस च्यार ४ तेजस, कार्मण, अगुरुलधु, निर्माण, ए ४, तथा वर्णादि ४, च्यार ४, वेदनीय शब्दे साता वेदनीय, नाम कहेता जसनाम अणुक्कोस-अनुत्कृष्ट बाधेतो चउहा- च्यारभेदे-सादि १, अनादि २, व ३, अब्रुव ४, ए च्यार भेदे बाधे तिहा ए प्रकृतिनो उत्कृष्टरस क्षपकणि ए चढतो जीव बाधे, तथा बीजा जीव सर्व अनुत्कृष्टरस बाधे, ते अभ- व्यने अनादि व छे भव्यने घोलना परिणामे सादि छ, - ७३४ कर्मग्रन्यस्य टवार्य . अने अश्व यशे ते माटे असुन छे, ने घाती साधी जे १९ ओगणीस अने मोहनी पाच, जानादरणी पाच, दर्शना- वरणी ९, अतराय पाच ए३० नो, अजवन्यरस ४, च्यारेमेदे जधाय, इहा पण अवन्पयी वीजो ते सर्व अजयन्य, ते ए ३८ प्रकृतिनो जघन्य बघ जिगारे प्रकृतिनो स टळे तेही मथम समये छे, तेतो एक समये व छे, तेहया पेहेला अजघन्यरस वध छे, ते अभव्यने अनादि म छे, भव्यने घोलना परिणामे सादि छे, अने अभय यये अनुव छ, तथा गोनकर्ममध्ये उच्चगोत्रनो अनुत्कृष्टरस सादि, अनादि, गुव, अनुव, पूर्वनीपेरे जाणवो, नीचगोन अजवन्यरसे सादि, अनादि, गुव, अनुव, ए च्यार ४ भेदे छ, घातीनीपेरे भावना करवी तथा इहा पयडीने आशये अर्थ लिखीये छीये-जे वेदनीय नामकर्म ए मूळकर्मनी अपेक्षाये अनुत्कृष्ट रस च्यार ४, प्रकारे कहेवो पण-उत्तर प्रकृतिमा वर्णादि ४, तेजस च्यार ४, ए आठनो अनुत्कृष्टरस सादि, अनादि, नुव, अब्रुव, कहेवो, Qव- बधी छे ते माटे पण जशनाम सातावेदनीयना कोईभागे च्यार ४, प्रकार न कहेवा अव बधी छे ते माटे बे सादि, अध्रुवपणोज पामीये, इम गोत्रकर्मनो पिण मूळकर्मनी अपेक्षाये च्यार ४, भेद कहेवा पिण उच्चगोत्र, नीचगोत्र, ए बे अव बधी छे ते माटे सादि अध्रुब बे भेदे पामीये इम जाणवो, एटळे सात मूळकर्ममा च्यार भेद कद्या इम जाणज्यो ॥७४॥ सेसम्मि दुहा (अनुभाग वधोसमत्तो) इग दुग, णुगाइजाअभवणत गुणिआणू। खधा उरलोचिअवग्गणाउ, तह अगहणतरिया ॥७५ , कर्मग्रन्मस्प टवार्थ ७३५ अर्थ-सेसम्मि-तैजसादि १०, प्रकृतिनो उत्कृष्ट, सब- न्य, ए तीन ३, भागे रस नाघे, दुहा सादि, अध्रुव, ए वे भेदे बाधे, जे एहनो वकाल अल्प छे ते माटे, तथा घाती ३८ नो उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट, जघन्यरस, सादि, अनुव बे भेदे बधाये तथा उच्चगोवनो, उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट, जघन्य, अजघन्य- रस सादि अनुव वे प्रकारे बधाय छे, तथा नीचगोननो उत्कृष्ट अनत्कृष्ट, जघन्य ए तीन भागे रस बावे ते सादि अवुव बावे तथा शेष प्रकृति ७२ नो जघन्य, अजघन्य, उत्कृष्ट, अनु. स्कृष्ट ए च्यारे ४, प्रकारनोरस ते सादि, अधुवभेदे बाधे, इहा पयडीने आशये शेषप्रकृति ७४ ग्रहे छे, गोवनी प्रकृति पिण अवव बधी छे ते माटे तथा उपघात १, बुववधी छे, पर ए प्रकृतिको गुववधी छे ते माटे ए अनुभाग रसवधनो अधिकार को हवे प्रदेशवध अधिकार कहे छे-तिहा प्रथम वर्गणानु स्वरुप कहे छे-ग-एकपरमाणु दुग-बे परमाणुआनो स्कध, इम यमुक, इम सख्याताणुक, असख्याताणुक, अनतापरमाणु मिळे तेअभव्यर्थी अनतगुणा मिळे जेखध नीपजे तिवारे उरलोचिअ- औदारिकने उचित कहेता ग्रहेवा योग्य वर्गणा जघन्य थाय, तह-तिमहीज अतरित-एयी पाळली ते सर्व अग्रहण जाणवी ए औदारिक वर्गणा बादर वीसगुणी छे ॥ ७५ ॥ एमेव विउवा हार, तेय भासा णुपाण मण कम्मे। सुहुमा कमावगाहो, ऊणूणगुल असखसो ॥७६॥ अर्थ--एमेव-इमही विउव्व-बैकिय वर्गणा, बीजी २, अने त्रीजी आहारक वर्गणा ३, तैजस वर्गणा ४, भाषावर्गणा ७३४ कम्मग्रन्यस्य टरार्य . . अने अनघ यशे ते माटे अधूप छे, ने घाती ननधी जे १९ ओगणीस अने मोहनी पाच, ज्ञानापरणी पाच, दर्शना- वरणी ९, अतराय पाच ए ३० नो, जजवन्यरस ४, च्यारमेदे जधाय, इहा पण जवन्ययी चीजो ते सर्व अजवन्य, ते ए ३८ प्रकृतिनो जघन्य बध जिगारे प्रकृतिनो बा टळे वेयी प्रथम समये छे, तेतो एक समये व छे, तेही पेहेला अजघन्यरस बध छे, ते अभव्यने अनादि व छे, भव्यने घोलना परिणामे सादि छे, अने अपघ यये अनुव छ, तथा गोनकर्ममध्ये उच्चगोननो अनुत्कृष्टरस सादि, अनादि, ब्रुव, अनुव, पूर्वनीपेरे जाणवो, नीचगोन अजवन्यरसे सादि, अनादि, ब्रुव, अब्रुव, ए च्यार ४ भेदे छ, घातीनीपेरे भावना करवी तथा इहा पयडीने आशये अर्थ लिखीये छीये-जे वेदनीय नामकर्म ए मूळकर्मनी अपेक्षाये अनुत्कृष्ट रस च्यार ४, प्रकारे कहेवो पण-उत्तर प्रकृतिमा वर्णादि ४, तेजस च्यार ४, ए आठनो अनुत्कृष्टरस सादि, अनादि, ब्रुव, अत्रुव, कहेवो, व- बधी छे ते माटे पण जशनाम सातावेदनीयना कोईभागे ध्यार ४, प्रकार न कहेवा अव बधी छे ते माटे बे सादि, अब्रुवपणोज पामीये, इम गोत्रकर्मनो पिण मूळकर्मनी अपेक्षाये च्यार ४, भेद कहेवा पिण उच्चगोत्र, नीचगोत्र, ए बे अध्रुव बधी छे ते माटे सादि अब बे भेदे पामीये इम जाणवो, एटले सात मुळकर्ममा च्यार भेद कह्या इम जाणज्यो ॥७॥ सेसम्मि दुहा ( अनुभाग वधोसमत्तो) इग दुग, णुगाइजाअभवणत गुणिआणू । खधा उरलोचिअवग्गणाउ, तह अगहणतरिया॥७५ , कर्मग्रन्थस्य ट्वार्थ. ७३७ ए ४ छ शेष ४ नयी तैजसवर्गणा किहाएक सुक्ष्म कही ॥७६ ॥ इकिकहियासिद्धा-णतसो अतरेसु अग्गहणा । सवत्थ जहन्नुचिया, नियणतसाहिआ जिट्ठा ॥७॥ अर्थ-जे वर्गणा मोटी याये ते पिण सिद्धने अनतमे भागे जेटला परमाणुआ थाये एक वर्गणाना, एम अनती- वर्गणा जे एक समयमा अनत प्रमाण दलिक थाय एह अ- नता दलिक एक समय मध्ये जीव ग्रहण करे, ग्रहणने आतरे विचाले ते अग्रहण जाणवी, कार्मण उत्कृष्ट थाय पिण अधिका ते अग्रहण जाणवा सर्व जघन्य वर्गणायी निय-पोताने अनतमे अशे अधिक वे उत्कृष्ट वर्गणा जा- णवी ॥ ७७ ॥ अतिम चउफास दुगध, पचवन्नरस कम्मखधदल। सबजियणंतगुणरस, अणुजुत्त मणतयपएसं ॥७॥ अर्थ-हवे कर्मपणे जे परमाणुआ लेवराये तेहनो स्वरूप कहे छे-अतिम छेहेला जे च्यार स्पर्श-गाढो, उन्हो, लूखो, चीकणो, तिमहीज वे गध तथा पाच वर्ण तथा पाच रस सयुक्त सोल गुणी खध तेहनो समूह ते कर्मपणे लेवा योग्य दल जाणवो ते दलना जे परमाणुआ तेमाहे जे रस कषाय प्रत्ययी ते स्र्वे जीवयी अनतगुणो रस एक एक परमाणुमा हुवे ते अणुयुक्त-परमाणुआयुक्त अनत प्रदेशी कहेता अनता परमाणुआनो खध वे कर्मपणे लेवाने योग्य जाणवो. ॥ ८ ॥ 93 ७३६ कर्मग्रन्थस्य पार्य NA Auth---- . ५, स्वासोश्वासपर्गणा ६, मनोवर्गणा ७, कार्मणगंगा ८, ए आटवर्गणा कमा-अनुक्रमे-हम छे-एटले आदारिकी क्रिय सूक्ष्म, भाषायी उधास मूक्ष्म, उवासयी मन मूहम, मनी कार्मण सूक्ष्म जाणवी, अवगाहना एक वर्गणानी अगुलने अस- रयातमे भागे छे, एकयी बीजी वर्गणानी तेहथी ऊणी अवगा- हना छे, एक एक परमाणु मारता जे औदारिक जघन्य ग्रहणयोग्य वर्गणा तेहने अनतमे भागे जेटला परमाणुआ तेटला परमाणुआ वधे, तिवारे औदारिक उत्कृष्ट ग्रहणयोग्य वर्गणा याय, ते वर्गणामध्ये एक परमाणु वघे ते वर्गणा औ- दारिकने मोटा पडे, वेक्रियादिकने न्हाना पडे ते माटे अ- ग्रहणयोग्य जाणवी, इम ओदारिक उत्कृष्ट ग्रहणयोग्य वर्गणार्थी अनतगुणा परमाणु पधे एहयो जे खध ते वैफीयनी जवन्य ग्रहण योग्य वर्गणा जाणवी ते वैक्रिय जघन्य ग्रहणयोग्य वर्गणा एक एक परमाणुए वधता ( वधारता) जिवारे वैक्रिय जघन्य वर्गणायी अनतमा भाग जेटला परमाणुआ वधे ते वैक्रीयने उत्कृष्ट ग्रहणयोग्य वर्गणा थाये तेहथी उपरात ते अग्रहण- योग्य जाणवी ते वैक्रीय उत्कृष्ट ग्रहण वर्गणायी अनतगुण परमाणुआ वधे, तिबारे आहारकनी जघन्य ग्रहणयोग्य वर्गणा थाये आहारक जघन्य ग्रहणयोग्य वर्गणार्थी अनतमें भागे वधे, तिवारे आहारकनी उत्कृष्ट ग्रहणयोग्य वर्गणा थाये, ते जिवारे अनतगुणी ववता सीम अग्राह्य पछी तैजसनी ग्रहण योग्य थाये,ए रीतेते कार्मणपर्यंत वर्गणा केहेवी ए मध्ये औदारिक १, वैक्रिय २, आहारक ३, तैजस ४, ए च्यारे वर्गणा बादर वीसगुणी छे, अने भाया, उश्वास, मन, कार्मण, ४ ए च्यार वर्गणा सूक्ष्म, सोलगुणी छे, स्पर्श-रुक्ष, स्निग्ध, शीत- उम्ण, १५६ कर्मग्रन्यस्य स्वार्थ ७३९ नाम गोपनी स्थिति घणी ते माटे घणा दल आवे, इहा कोई पूछस्ये जे आउखाथी नामनी स्थिति सख्यातगुणी छे तो ते सख्यातगुणो भाग का न कह्यो ? इहा उत्तर जे ए दलिक भोगवता काल वधतो लागे, आउखाना दलिक भोगवता काल योडो लागे ते माटे, तथा सक्रम्या दल ७ मध्ये घणा छ, वणी स्थिति सीम पहोचे पर दलिक अधिका लेवे पर स- ख्यातगुणा न लेवे एम सर्वन भाषज्यो ए अर्थ ॥८०॥ निअजाइलद्वदलिआ-णतसो होइ सबघाईण । वज्झतीण विभज्जइ, सेस सेसाण पइसमयं ॥१॥ अर्थ-हवे उत्तरप्रकृतिनो वहेचवो कहे छे तिहा निय- पोतानी जे जाति ज्ञानावरणी आदिक तेहने भाग प्रमाण लीधा जे दल वेहनो अनतमो भाग ते सर्वघातीने आवे, शेष रहे ते याकती प्रकृतिने आवे, तिहा जे ज्ञानावरणीने भागे आव्या जे दल तेहनो अनतमो भाग अति रसवत ते केवलज्ञानावरणीपणे परिणमे, शेष रह्या जे दल ते च्यार ४ भागे मतिज्ञानावरणी प्रमुखने आवे, तथा दर्शनावरणीने ६ भागे आवे, शेप रयो ते चक्षुदर्शनावरणी प्रमुखने ३ भागे आवे मोहनीने जे भाग आब्यो तेहना बे भाग याय, ते- मायी एक भागनो तेने मले तथा मोहनीनु अर्व दल मिथ्या- त्वने मळे छे, ए प्रमाणे तेमाहे जे स्थानके जेटला बधाता हुवे तेरले भागे आवे, शेष रही जे ते जेटली देशवाती ब- वाती दुवे तेटला भाग पडे, अतरायने सर्ववाती नयी, तिणे एहना ५ भाग पडे नामकर्मनो भाग जे काले २३ थी ३१ कर्मग्रन्थस्य वार्य Murarhar- , एगपएसागाढ, निअसदपएसओ गहेइ जिओ। थोवो आउ तटसो, नामे गोए समोअहिओ ॥७९॥ अर्थ-एक प्रदेश अवगायो जे कर्मदल तेने आत्मा सर्व प्रदेशने बले करीने ग्रहण करे, एटले एक प्रदेशे ले तो अ- सख्यावे लेवराय, अने एक प्रदेशनो कर्म ले तो वीर्य चलनानो कपन सर्व प्रदेशनो याय, ते माटे सर्व प्रदेशे ग्रहे इम कयो छे ते जे आकाशप्रदेशे कर्मदल ते प्रदेशे जे आत्मप्रदेश हुवे (होये ) ते आत्मप्रदेशे ग्रहे, मिन्न मदेशी दल न ग्रहे, हवे ते जीव एक समये आठ कर्म बाघे, ते कर्मदलिकनो वेहेचण कहे छे जे सर्वथी थोडा दल आउखाने भागे आवे, तेथी नाम कर्म तथा गोनकर्मने अधिका दल आवे पिण बेने माहो- माहे समान आवे ॥ ७९ ॥ विग्यावरणे मोहे, सबोवरिवेअणीइ जेणप्पे । तस्स फुडत्त न हवइ, ठिई विसेसेण सेसाण ॥८॥ । अर्थ-नाम गोत्रथी विग्य-अतराय तथा ज्ञानावरण, दर्श- नावरणीने आधिक आवे, ए तीनने परस्पर समान आवे, एहथी मोहनीकर्मने दल आधिक आवे सर्व सात कर्मथी उपरि कहेता अधिका दल वेदनीय कर्मने आवे, जे कारणे तस्स-ते वेदनीय कर्मनो फुड-प्रगट उदयपणो थोडे पुद्गले थाय नही, जे बीजा कर्मथी वेदनीनो विपाक व्यक्त छे, शेष जे सात कर्म तेहने जे दलनो भाग आव्यो ते स्थितिने विशेषे एटले आउखानी स्थिति थोडी तिणे सर्वथी थोडा दल आवे. तेथी कर्मग्रन्थस्य व्यार्थ ७४१ , गीकेवळी तेरमागणठाणा रुप श्रेणि १०, इग्यारमी अयोगीके- वळी ये चौदमा गुणठाणारूप श्रेणि ११ ए इग्यारे श्रेणि जा- णवी ॥८२ ॥ गुणसेढी दलरयणा, णुसमयमुदया दसखगुणणाए। एअगुणा पुण कमसो, असखगुण निज्जराजीवा ॥३॥ अर्थ-गुणसेढी-गुणश्रेणि ते दलरचना कहीये, दल्नो वहेचवो एटले दलसमवपणे हतो ते चल करी जुदा जावा योग्य करवा ते दलरचना कहीजे, तथा ग्रेणिमध्ये जे दल उदय आवे ते प्रथम समयथी बीजे समये असख्यातगणा दल उदय करे अने श्रेणि वर्तते जीवने ज्ञानादिकने असख्यात गुणा वधारे निरावरण थाये वळी श्रेणि चढ्यो जीव प्रतिसमयें असख्यातगुण निर्जरा करे, इम श्रेणि पेहेलीथी वीजीए अस- ख्यातगुणी निर्जरा थाय, इम सर्वश्रेणिमा जाणज्यो हवे गुण- ठाणानो अतर कहे छे-१४ चौद गुणठाणामे बारमो, तेरमो, चौदमो गुणटाणो जीव एकवार पामे, वीजीवार कोइ जीवने स्पर्शवो न पडे, तिणे तेहने अतर न कहेवाये, अने ११ गुणठाणा एक जीव अनेकवार पामे ते माटे ते इग्यार गुणठाणानो अतर कहुछु ॥८३॥ पलियासखसमुह, सासणइअरगुणअतरहस्स। गुरुमिच्छि वे छसट्ठी, इयरगुणे पुग्गलद्धतो॥४॥ अर्थ-पलियासखस-पल्योपमनो असख्यातमो भाग -सासाणि-सास्वादन गुणठाणानो अतर हस्स-जघन्य आतरो छे जे कारणे सास्वादनथी मिथ्यात्वे आवेला जीवने सम्यक- ~ 1७४० कर्मग्रन्यस्य दयार्थ . सुधीना स्वस्थानमा जेटली प्रकृतिनु चस्यान व तेटला भाग पडे, तेमा धन सवातनने शरीर नामकर्ममायी भाग मले, तथा वर्णादि मूल प्रकृतिना भागमा आगेला दलिक ते पोतानी उत्तर प्रकृतिमाज व्हेंचाय कारणके एक समये सर्व वर्णगपादि जधाय छे तथा गत्यादि पीड प्रकृतिओना भागमा जावेलु दलिक ते सर्व एकेक प्रकृतिनुज होय, कारणके एक समयमा गत्यादि एकज प्रकृति बघाय छे तथा गोन वेदनीयने आ- युष्य ए रण मूलकर्मनो भाग नवाती एकेक प्रकृतिनेज मले ए सर्व वहेंचण जे समये बाघे तेज समये करेछे एटले बध. समयेज वहेंचे छे ते सर्व कार्य एक समये याय छे सम्म देस (दर) सबविरई, उअणविसजोअ दस खवगेअ। मोह सम सत खवगे, खीण सजोगीअर गुणसेढी ८२ अर्थ-हवे ११ श्रेणि कहे छे-तिहा प्रथम सन्म-सम- कितनी श्रेणि १,वीजी देशविरतिनी श्रेणि २, त्रीजी सम्वविरइ- सर्व विरतिनी श्रेणि ३, चोथी अण-अनतानुबधी सत्तामाथी काढवा खपाववानी ते श्रेणि ४, पाचमी दस-दर्शनमोहनी ३ खपाववा रूप श्रेणि ५, तथा छठी ते मोहनीनी २१ प्रकृति शमाववा रुप आठमागुणठाणाथी दसमाना अतलगें मोहशमरुप श्रेणि ६, सातमी सर्व मोह उपशमी रह्यो एहवी ११ गुण- ठाणा रूप अणि ७, आटमी पवग-मोहनीनी २१ प्रकृति खपाक्वारुप आठमाथी दशमापर्यंत श्रेणि ८, नवमी सर्वमोह खप्यो ते रुप क्षीणमोह गुणठाणारुप श्रेणि ९, दशमी सयो- - , कर्मग्रन्थस्य टमार्य ७४३ समये एक केश-वालाय अवारो-(काढता) योजननो कुवो खाली यये उभार (पल्योपम ) थाय, तथा सो वरसे एक वालाय काढीये तो कुबो खाली यये अघा पत्योपम याय, तथा एक समये योजन प्रमाण कुवानो एक आकाश प्रदेश काढीये कुत्रो खाली थये क्षेत्र पल्योपम थाय तिहा द्वीप समुद्रनो गिणवो ते उझार पल्योपमे करवो पचवीस कोटा- कोडी पल्योपमना जेटला समय याय तेटला द्वीप समुद्र के आउखो ते अमा पल्योपमे गिणवो, स जीवनो मान ते क्षेनपल्योपमे गिणवो, जिम पल्योपमना ३ तीन मेद तिम सागरोपमना तीन भेद जाणवा ॥८५ ॥ हवे पुद्गल परावर्त्तनो स्वरूप कहे छे दवे खित्ते काले, भावे चउह दुह वायरो सुहुमो। होइ अणतुस्सप्पिणि, परिमाणो पुग्गलपरहो ॥६॥ अर्थ-ते पुद्गल परावर्तनना मेद आठ छे तिहा द्रव्य पुद्गल परावर्तन १, क्षेत्र पुद्गल परावर्तन २, काल पुद्गल पराव- र्तन ३, भाव पुद्गल परावर्तन ४, ए च्यार ४ भेद ते एकेकना बे भेद छे-द्रव्य पुद्गल परावर्तन बादर १, द्रव्य पुद्गल परावर्तन सूक्ष्म २ ए के, इम क्षेत्र पुद्गल परावर्तन बादर १, क्षेन पुद्गल परावर्तन सूक्ष्म २, काल पुद्गल परावर्तन बादर १, काल पुद्गल परावर्तन सूक्ष्म २, भाव पुद्गल परावर्तन बादर १, भाव पुद्गल परावर्तन सूक्ष्म २, ए आठे भेद जाणवा, वादर पुद्गल पराव- तन ते न्हानो छे, सूक्ष्म पुद्गल परावर्तन ते मोटो छे अनत उत्सपिणी, अवपिणी प्रमाणे पुद्गल परावर्तननु मान थाये ८६॥

७४२ कर्मग्रन्यस्प टमार्य , . त्व ने मिश्रपुज अवश्य सत्तामा होय, ते पन्ने पुजने मिथ्या- त्वे प्रथम समययों उबेलमा माडे ते यावत पल्योमना अस- रपातमे भागे उवेली रहे, ने ज्यासुधी ए वे पुज सत्तामा होय त्या सुधी पुन उपशम पामे नहि, ने सास्नादने पण न आवी शके, ते माटे जवन्य अतर पण पल्योपमनो अस- ख्यातमो भाग पडे, तथा इयरगुण-वीजा जे गुणटाणा- मिथ्यात्व १, मिश्रादिक उपशान्तमोह पर्यंत नप १० गुणठाणे जघन्य अतर अतर्मुहूर्त्तनो पडे, जे कारणे ए गुणठाणे चढतो तथा पडतो पिण आवे ते माटे तया गुरु-उत्कृष्टो अतर मिथ्यात्व गुणठाणानो वे उसठ्ठी-१३२ एकसोरनीस सागरो- पमनो उत्कृष्टो अतर पडे, जे कारणे ठासठ सागर क्षयोपशम समकितपणे रहे, पछी अतर्मुहूर्त मिश्रपणे रही वळी छासठ सागरोपम क्षयोपशम समकितपणे रहे तिवारे मनुष्यभव साधिक १३२ सागर काल पर्यंत मिथ्यात्व स्पश्यों नही, ते मिथ्यात्वनो अतर इयर-सास्वादनादिक दश गुणठाणानो उत्कृष्ट अतर अर्द्ध पुद्गल परावर्तकाल देश ऊणो जे एटलो काल समकीतथी पड्यो मिथ्यात्वमे रही पछी पाछो समकित पामी मोक्षे जाय ते माटे अतर कहो ॥८४॥ उद्धार अद्ध खित्त, पलिय तिहा समयवाससयसमए। केस वहारोदीवो, दहि आउतसाइ परिमाण ॥५॥ अर्थ-हवे पुद्गल परावर्त्तननो मान कहेवा माटे पल्यो- पमनो स्वरुप कहे छे पल्योपमना ३ त्रण भेद छे उद्धार- पल्योपम १, अदापल्योपम २, क्षेत्रपल्योपम ३ ए पल्योप- -मना ३ तीन भेद छ, तिहा उद्धार पल्योपमनो मान समये , कर्मग्रन्यस्य स्वार्थ ७४५ अनुक्रमे बधो लोक मरणे स्पर्शे ते आवा पाछा प्रदेशे जे मरण थाये ते न गणीये, इम सपूर्ण लोक स्पर्श त्यारे क्षेनयी सूक्ष्म पुद्गल परावर्त थाय तथा एहनो जवन्य अतर २५६, आवळीनो उत्कृष्ट अतर अनतकालनो तथा उत्सपिणी अपसपिणीने प्रथम समये जन्म पाम्यो, तेहिज वळी किहाक मरण पाम्यो, इम जे क्षेने जे प्रदेशमे मरण पाम्यो, इम अनुक्रम विना जे हरकोइ स्थानकनो प्रदेश स्पश्यों, तिम उत्सर्पिणी अवसप्पिणीना समय मरणे स्पश्ये तिवारे कालयी पादर पुद्गल परावर्त थाये तेहज कोई उत्सर्पिणी अपसप्पिणीना प्रथम समये मरे पछी जघन्ये वीस कोडाकोडी सागर जाय तिवारे वळी वीजा काल- चक्नो बीजो समय आवे तिवारे मरण पामे अथवा अनतेकाले अनतमा कालचक्रने वीजे समये मरण, वळी जघन्ये वीस कोडाकोडी सागर पछी अथवा अनताकाल पछी बीजे समये मरण, इम अनुक्रमे मरण करता उत्सर्पिणी अवसप्पिणीना समयो मरणे करी स्पर्शे अनुक्रमे, तिवारे कालथी सूक्ष्म पुद्गल परावर्तन थाये, इम रसबधना स्थानक जे मरणे करी जेम वेम स्पर्शे ते भावयी बादर पुद्गलपरात थाये, तेहिज रस- बधना स्थानक अनुक्रमे, मरणे स्पर्श सारे भावयी सूक्ष्म पुद्गल परावर्तन थाये ते भाव पुद्गल परावर्त कोइ जीवने थयो नयी इम आठ मेद जाणवा ॥८॥ अप्परपयडिवधी, उक्कडजोगी अ सन्निपज्जत्तो कुणइ पएसुक्कोस, जहन्नयं तस्स वच्चासे ॥ ८९॥ अर्थ-जे जीव अप्पयर-अल्पतर थोडी प्रकृति बावे, उकडयोगी-योगे उत्कृष्ट योगी हुवे अ कहेता च शब्द सशि 94 कर्मयन्यस्य मार्ग ----------- Mar-Pusta उरलाइ सत्तगेण, एग जिओ मुअइ फुसिय सवअणु। जित्तिअ कालि सथूलो। दवे सुहुमो सगऽनयरा।।८७॥ अर्थ-हवे द्रव्य पुद्गल परावर्तननो मान कहे छे उरलाइ- ओदारिकादिक सात वर्गणा, आहारक विना, ते एक विना ते एक जीव सर्व पुद्गल ए ७ सात वर्गणाए फुसीय-स्पर्शने मुइय-मूक्या जे सर्व परमाणु पिण अनुक्रमे नही जिवारें जे, फरमे ते तिवारे गणीये तेहनो जे काल लागे ते द्रव्ये वादर पुद्गल परावर्त्तन थाये तथा सर्व परमाणु सगन्नयरा-सात वर्ग- णापणे अन्यतर एक एक वर्गणापणे फरसे ते विचे वीजी व- गणापणे फरसे ते स्पर्शना गणवी नही, इम अनुक्रमें एक एक वर्गणापणे सर्व पुद्गल फरसी मुके तिवारे द्रव्यथी सूक्ष्म पुद्गल परावर्तन थाये ॥७॥ लोगपएसोसप्पिणि; समयाअणुभागवधट्ठाणा य। जह तह कममरणेण, पुट्ठाखित्ताइथूलियरा ॥८॥ अर्थ-लोकप्रदेश सर्व स्पर्श क्षेत्रपुद्गलपरावर्त, उत्सर्पिणी अवसप्पिणीना समय स्पर्शे ते काल पुद्गल परावर्त्त, अनुभाग बधना स्थानक स्पर्श भावपुद्गलपरावर्त, ते जहतह-जेम तेम स्पर्श तो ए ३ तीने धूल-बादर पुद्गलपरावर्त, अने अनुक्रमे स्पर्श'तो सूक्ष्म थाये ते देखाडे छे जे लोकना प्रदेशमा लोकना अतपदेशे मरण पामे, इम जेम तेम आगल पाछल करीने बधो लोक भरणे करी स्पर्श तिवारें क्षेत्रथी थूल-बादर पुद्गलपरावर्त्तन थाये, तेहज जे लोकने अत्यप्रदेशे मरण करी वळी ते प्रदेशथी लगते' प्रदेशे मरण करे ते भव गणवो, इम कर्मग्रन्थस्य टवार्थ ৩৪৩ . , अर्थ-सजलणा ४, पुरुषवेद १, ए पाच प्रकृति अनि- वृत्ति गुणठाणे उत्कृष्ट प्रदेशे बाचे, शुभविहायोगति १, मनु- प्यायु १, सुरनिक ३, सुभगनिक ३, वैक्रियदुग २, समचौरस सस्थान १, असातावेदनीय १, वज्रऋपभनाराच सघयण १,ए १३ प्रकृतिनो उत्कृष्ट प्रदेशव मिथ्यात्वी बाघे अथवा सम- किवी बाधे ॥ ११ ॥ निद्दा पयला दुजुअल, भयकुच्छातित्य समगोसुजई। आहारदुग सेसा, उकोस पएसगा मिच्छो ॥९२ ॥ अर्थ-निदा १, प्रचला १, दुजुअल-हास्य १, रति २, अरति १, शोक २, भय १, दुगछा १, तीर्थंकर नाम १, ए नव प्रकृति समकिती उत्कृष्ट प्रदेशबधे बाधे, सुजई- जे अपूर्वकरणी अथवा अप्रमत्त, आहारक दुगनो उत्कृष्ट प्र- देशवव बाधे, शेष ६६ छासठ प्रकृतिना उत्कृष्ट प्रदेश सज्ञि मिथ्यात्वी बाधे ॥ ९२ ।। सुमुणी दुन्नि असन्नी, नरयतिगसुराउ सुरविउवि दुर्गा सम्मोजिणे जहन्न, सुहुमनिगोआइखणि सेसा ॥१३॥ अर्थ-हवे जघन्य प्रदेशबध बाधे ते कहे छे सुमुणी- भलो मुनि अप्रमादी, दुन्नी-आहारक दुगनो जघन्यबध बाचे, असज्ञी बाधे, नरकत्रिक ३, देवत्रिक ३, वैफियदुग (वामा सुराउनो अर्थ नथी लख्यो माटे देवनिकने ठेकाणे देवायु पछी देवद्विक अने बैक्रियद्विक, एम बेसे छे, तत्त्व बहुश्रत जाणे) ए६ प्रकृतिनो जघन्य प्रदेशमध असज्ञी पर्याप्तो बाघे, जिन नामनो जघन्य प्रदेशाध समकिती बाधे, शेषा-शेष १०९ , - १६७ ७४६ कर्मग्रन्यस्य टमार्य पर्याप्तो कुणई-करे, प्रदेशय उत्कृटपणे साधे, एटले योडी प्रकृति बाचे वेहने भाग थोडा उत्कृष्ट योगाल्पत प्रदेश लेवे, घणा ते माटे, उत्कृष्टयोग वाला जे जीर ते जने अतिशये अल्प प्रकृति पथ करे, जहन्नय-तेहयी विपर्यासे जवन्य प्रदेश बाचे, जे प्रकृति घणी वाचतो हुने, योग मद दुवे, असशि पर्याप्तो हुवे ते प्रदेशमय जवन्य वावे इम भामो ॥८९॥ मिच्छ अजय चउ आऊ, विति गुणविणुमोहि सत्त मिच्छाइ। छह सतरस सुहुमो,अजया देसा विति कसाए॥१०॥ अर्थ-हवे प्रदेसनव उत्कृष्टना स्वामी कहे छे-मिथ्यात्व गुणठाणे अजयचउ-चोथा गुणठाणायी माडी ४ च्यार गुण- ठाणा एटले मिथ्यात्व १, अविरति १, देशविरति १, प्रमत्त १, अप्रमत्त १, ए पाच गुणटाणे आउखा कर्मनो उत्कृष्ट प्रदेश बाघे, वीजा नीजा गुणठाणाविना मिथ्यात्व १, अविरति १, देशविरति १, प्रमत्त १, अप्रमत्त १, अपूर्व १, अनिवृत्ति, १, ए ७ सात गुणठाणे मोहनीकर्मना उत्कृष्ट प्रदेश बाधे मूल कर्म छनो, तथा उत्तर प्रकृति ज्ञानावरणी पाच, दर्शना- वरणी ४ च्यार, अतराय पाच, सातावेदनी १, उच्चगोन १, यशनाम १, ए १७ सत्तर प्रकृतिनो उत्कृष्ट प्रदेशवध सूक्ष्म सपराय गुणठाणे बाधे, तथा अविरति गुणठाणे बीजी चोक- डीनो उत्कृष्ट प्रदेशबाधे, देशविरतित्रीजी चोकडीनो उत्कृष्ट प्रदेश' बाधे ॥ ९० ॥ पणअनिअद्दी सुखगइ, नराउसुरसुभगतिग विउविदुग समचउरसमसाय, वइर मिच्छो व सम्मो वा ॥११॥ , , . 1 कर्मग्रन्थस्य टवार्थ , - अर्थ--सजलणा ४, पुरुषवेद १, ए पाच प्रकृति अनि- वृत्ति गुणठाणे उत्कृष्ट प्रदेशे वाचे, शुभविहायोगति १, मनु- घ्यायु १, सुरनिक ३, सुभगनिक ३, वैक्रियदुग २, समचौरस सस्थान १, असातावेदनीय १, वऋषभनाराच सघयण १, ए १३ प्रकृतिनो उत्कृष्ट प्रदेशमध मिथ्यात्वी वाघे अथवा सम- किती नाधे ॥ ९१ ॥ निद्दा पयला दुजुअल, भयकुच्छातित्य समगोसुजई। आहारदुग सेसा, उक्कोस पएसगा मिच्छो ॥१२॥ अर्थ-निद्रा १, पचला १, दुजुअल-हास्य १, रति २, अरति १, शोक २, भय १, दुगडा १, तीर्थकर नाम १, ए नव प्रकृति समकिती उत्कृष्ट प्रदेशबधे बाधे, सुजई- जे अपूर्वकरणी अथवा अप्रमत्त, आहारक दुगनो उत्कृष्ट प्र- देशवध बाधे, शेष ६६ छासठ प्रकृतिना उत्कृष्ट प्रदेश सज्ञि मिथ्यात्वी बाधे ॥ ९२ ॥ सुमुणी दुन्नि असन्नी, नरयतिगसुराउ सुरविउवि दुगो सम्मोजिणे जहन्न, सुहुमनिगोआइखणि सेसा॥१३॥ अर्थ-हवे जघन्य प्रदेशन बाधे ते कहे छे सुमुणी- भलो मुनि अप्रमादी, दुनी-आहारक दुगनो जवन्यबध बाधे, असज्ञी बाधे, नरकनिक ३, देवत्रिक ३, वैक्रियदुग (वामा सुराउनो अर्थ नथी लख्यो माटे देवगिकने ठेकाणे देवायु पछी देवद्विक अने वैक्रियद्विक, एम बेसे छे, तत्व बहुश्रत-जाणे ए ६ प्रकृतिनो जघन्य प्रदेशमध असज्ञी पर्याप्तो बाधे, ज़ेिन नामनो जघन्य प्रदेशवध समकिती बाधे, शेषा-शेष १०९ ७४६ कर्मग्रन्यस्य टमार्य पर्याप्तो कुणई-करे, प्रदेशनय उत्कृटपणे बाघे, एटले योडी प्रकृति वाघे ठेहने भाग योडा उत्कृष्ट योगरलयत प्रदेश लेवे, घणा माटे, उत्कृष्टयोग वाला जे जीर ते अने अतिशये अल्प प्रकृति पय करे, जान्नय-तेही विपर्यासे जवन्य प्रदेश वाचे, जे प्रकृति घणी पावतो हुवे, योग मद दुवे, असशि पर्याप्तो हुवे ते प्रदेशय जवन्य बाचे इम भावो ॥८९॥ मिच्छ अजय चउ आऊ, विति गुणविणुमोहि सत्त मिच्छाइ। छपह सतरस सुहुमो,अजया देसाविति कसाए॥१०॥ अर्थ-हवे प्रदेसमय उत्कृष्टना स्वामी कहे छे-मिथ्यात्व गुणठाणे अजयचउ-चोथा गुणठाणायी माडी ४ च्यार गुण- ठाणा एटले मिथ्यात्व १, अविरति १, देशविरति १, प्रमत्त १, अप्रमत्त १, ए पाच गुणठाणे आउखा कर्मनो उत्कृष्ट प्रदेश बाधे, वीजा वीजा गुणठाणाविना मिथ्यात्व १, अविरति १, देशविरति १, प्रमत्त १, अप्रमत्त १, अपूर्व १, अनिवृत्ति १, ए ७ सात गुणठाणे मोहनीकर्मना उत्कृष्ट प्रदेश बाधे मूल कर्म छनो, तथा उत्तर प्रकृति ज्ञानावरणी पाच, दर्शना- वरणी ४ च्यार, अतराय पाच, सातावेदनी १, उच्चगोत्र १, यशनाम १, ए १७ सत्तर प्रकृतिनो उत्कृष्ट प्रदेशबध सूक्ष्म सपराय गुणठाणे बाधे, तथा अविरति गुणठाणे बीजी 'चोक- डीनो उत्कृष्ट प्रदेशबाधे, देशविरतित्रीजी चोकडीनो उत्कृष्ट प्रदेश बाघे ॥ ९० ॥ पणअनिअट्टीसुखगइ, नराउसुरसुभगतिगविउविदुग समचउरस मसाय, वइर मिच्छो व सम्मो वा.॥९१॥ --

कर्मग्रन्यस्य टमार्थ
७४९
सेडिअसखिजसे, जोगट्ठाणाणिपयडिठिइभेआ।
ठिइबंधज्झवसाया, णुभागठाणा असखगुणा ॥१५॥
अर्थ-धनीकृत लोकनी सातराजनी एकप्रदेशी श्रेणि तेहने
असख्यातमे भागे जेटला आकाश प्रदेश वेटला योग स्थानक
छे, तेयी प्रकृतिना स्थानक तीव्र भदता रुप असख्यात गुणा
छे, तेथी स्थितिभेद स्थितिना स्थानक असख्यातगुणा छे, तेथी
स्थितिवधना अव्यवसाय जीवभेदें तीन मदतारुप ते असख्या-
तगुणा छे, जे एकेके स्थितिस्थानके स्थितिमवना अध्यवसाय
असख्यात छे, ते माटे ४ तेयी रसरधना स्थानक असख्यात-
गुणा छे, जे उटाणवृद्विरुप रसरधना स्थानक अग्निकायनी
सुइ छ दिशा फरतीना आकाशप्रदेश प्रमाण छे ॥ ९५ ॥
तत्तो कम्मपएसा, अनतगुणियातओरसच्छेआ(या)।
जोगापयडिपएस, टिइ अणुभाग कसायाओ॥९६॥
अर्थ-तेमाटे तेहथी कर्मवर्गणाना एकसमयगृहीत परमाणुआ
अनतगुणा छ, ६ वेहयी कर्मबयपणे जे परमाणुआ उधाणा
तेमा जे एक परमाणु वेमाहे कपायप्रत्ययी रसना छेद ते अन-
तगुणा छे, जे कारणे सर्व जीवथी अनतगुणो रस हुवे (होय)
तेहिज कर्मपणे बधाय ७, ते माटे, तथा प्रकृतिग्ध, १ ते
योगथी बधाय, स्थितिबघ तथा रसमध ते कपायथी बाधे, मि-
थ्यात्व, अविरत ते दृढीकरणनो हेतु छे ॥ ९६ ॥
चउदसरजूलोगो, बुद्धिकओ होइ सत्तरज्जु घणो
तहीहेग पएसा, सेढी पयरो अ तत्वग्गो ॥ ९७ ॥

कर्मग्रन्थस्य व्याय -- अर्थ-हवे अणिनो स्वरुप कहे छे-चौदराज प्रमाण टोक छ, बुजियें करीये तिगार सातराज प्रमाण धन थाप तेहनी दी लानी एकमदेशनी अणिने सेढी कहीये, ते सेढीनो वर्ग एटले तद्गुणो-गुणाकार करीये ते प्रतर थाय, वेहने वर्ग करे धन याय ॥१७॥ अणदस नपुंसि त्थी, वेअ छक्क च पुरिसवेअ च । दो दो एगतरिए, सरिसे सरिस उवसमेइ ॥१८॥ अर्थ-हवे उपशम श्रेणि कहे छे-इहा उपशम श्रेणे उप- शम समकिती लीधो छे, ते कहे छे-प्रथमयी चोथाथी माडी सातमा गुणठाणा सीम अनतानुवधी ४ उपशमावे, पछे दर्शन मोहनी ३ तीन उपशमावे, पठी आठमे गुणठाणे आवी स्थिति घातादिक पाच ५ करण करीने नवमे गुणठाणे आवी नपु- सकवेद उपशमावे, १ पठी स्त्रीवेद उपशमा १, पछी हास्पछक ६ उपशमावे, पछी पुरुषवेद उपशमावे, पछे वे बे-कषाय उप- शमावे, पछे एक उपशमावे (१) आतरे अप्रत्याख्यानी प्रत्या- ख्यानी कोध २, उपशमावे, पछे सजलणो क्रोध, १ उपशमावे पछे अप्रत्याख्यानी प्रत्याख्यानी मान उपशमाव्या पछी सज- लणमान उपशमावे पछी अप्रत्याख्यानी, प्रत्याखानी माया उपशमावे, पछी सजलणनी माया उपशमावे, पछी प्रत्या- ख्यानी अप्रत्याख्यानी लोभ उपशमावी, सजलना लोभनी किट्टी करे, तेहनो अनतमो भाग सजलना लोभनो ते दसमे गुण- ठाणे उपशमावे ए रीते सरखु सरखु उपशमावे पछी उपशात- मोही थाय. हवे क्षपकणिनो क्रम कहे छे ॥९८ ॥ , कर्मग्रन्थस्य स्वार्थ ७५१ . , अणमिच्छ मीससम्म, तिआउ इग विगल थीण तिगुजो। तिरिनिरय थावर दुग, साहारायव अड नपुत्थी॥१९॥ अर्थ-जे कोइ जीव लाधे स्वकृत्व रसे ससारोद्विग्न आ- मालवी थको चोथे तथा पाचमे, छठे, सातमे गुणठाणे क्षयो- पशम, अनतानुबधी ४ खपावे, पछी मिथ्यात्वमोहिनी खपावे, पछी मिअमोहिनी खपावे, पछी समकितमोहनी खपावे, पछी देवता १, नारकी १, तिर्यच १, ना आउखा खपावे, खपावीने नवमे गुणठाणे चढे पछी नवमाने बीजे भागे इग-एकेन्द्री- जाति, विगल ३, थीणद्धी ३, उयोत १, तियेचद्विक २, नरक- द्विक २, थावर, सूक्ष्मद्विक २, साधारण १, आतप १, ए १० सोळ प्रकृति नवमाने बीजे भागे खपे, अड-आठ कषाय खपावे, श्रीजे भागे, तेथी पछी चोथे भागे नपुसकवेद खपावे, पाचमे भागे स्त्रीवेद खपावे ॥ ९९ ॥ छग पु सजलणा दो, निदाविग्धावरण खए नाणी। देविदसूरि लिहिअ, सयगमिणं आय सरणट्ठा ॥१०० इति शतकनामा पचमकर्मग्रथः समाप्त. ॥५॥ अर्थ-पछे छठे भागे हास्य ६ छ खपावे, पछी पुरुष- वेद खपावे, पछी आठमे भागे सज्वलन क्रोध खपावे, नवमे भागे सज्वलन भान खपावे, नवमा गुणठाणाने अते सज्वल- ननी माया खपावी दसमे सूक्ष्मसपरायगुणठाणे आवी सज्वल- ननो लोभ खपावी बारमे गुणठाणे आवे तिहा वे निद्रा .

७५२ कर्मग्रन्यस्य टमार्य AN- खपावे, पछी पारमाने अते अतराय पाच, ५, ज्ञानावरणी, ५, दर्शनादरणी च्यार, ४, ए १४ चौदने सपे जात्मा नाणी- केल्ज्ञानी याये-लोकालोक प्रत्यक्ष देसे, प देवेन्द्रमरि आ- चार्य महाराजे लिख्यो शतक नामे कर्मय पिण आय-पोताने सरणटा-सभारखाने अयें इति पचम कर्मयय टगार्य समाप्त १०० अथ टयाकार प्रशस्तिकार का यम् श्रीमत् पाटक राजसारकृतिना शिष्या जिनाज्ञापरा । श्रीमत् पाटक ज्ञानधर्मप्रवरा श्रीदीपचन्द्राहया । अर्हन् मार्गसुपाटका गुणलया तद्वाक्यसेवानुग । सत्रार्थ गणिदेवचन्द्रमतिमान् सदर्शयन् शोभते ॥१॥ इति ॥५॥ सबत् १८६८ श्रावण शुक्लाटम्या (श्रावण सुदि ८) रवि- वासरे लिपिकृते सकल पडित सिरोमणि भट्टारक तपागच्छा- धिराज पुरदरप्रभु भट्टारक श्रीश्रीश्री १०८ श्रीश्रीश्रीश्रीश्रीश्री कीर्तिरत्नसूरीश्वरान् चिरजीवी तत्शिष्य प० बुद्धिरत्नेन लिपिकृते तत् शिष्य मुनि कान्तिरत्न पठनार्थं पठित श्रीसूर्यपुरवरे श्री शान्तिनाथचरणप्रसादात् श्रीकल्याणमस्तु ( ए जे उपरथी प्रेसकॉपी थइ ते प्रति लिख्यानी शाल विगेरे तेमायी लीधेल छे) इतिश्रीपचम शतकाख्य कर्मग्रथस्यटवार्थः समाप्तः॥ १७२ . । श्रीमद् देवचद्रजी कृत विचार रत्नसार. प्रणम्य श्रीमहावीर, शंकर परमेश्वर । विचाररत्नसारस्य, क्रियते वालबोधक ॥ १॥ श्री जीनवाणीमहिमा वर्णन. , श्रीवीतरागनी वाणी भववेलकृपाणी, ससारसमुद्र तारिणी, महामोहान्धकार दिनकरानुकारिणी, कोधदावानलोपामिनी, मुक्तिमार्गप्रकाशिनी, कलिमलपलयिनी, मिथ्यात्वछेदिनी, त्रिभु- वनपालिनी, पापविशोधिनी, मन्मथस्तमिनी, अमृतरस आस्वादिनी, हृदय आल्हादिनी, आगमोद्गारिणी, चतुर्विध सघमनोहारिणी, भव्यजनकर्णामृतश्राविणी, सकल कुमतिनिवारिणी, सर्वसशय निवारिणी, योजनप्रमाण विस्तारिणी, एहवी श्रीवीतरागनी वाणी महा प्रभाविक अतिशयवत जाणवी ते वाणी भव्य प्राणीओए अवश्य सदगुरु पासे साभळवी, केमके १ जीव, २ अजीच, ३ पुण्य, ४ पाप, ५ आत्रक, ६ सवर, ७ निर्जरा, ८ बध, ९ मोक्ष, १० वर्म, ११ अ- वर्म, १२ हेय, १३ जेय, १४ उपादेय, १५ निश्चय, १६ व्यवहार, १७ उत्सर्ग, १८ अपवाद, १९ आस्रव, २० परि- सव, २१ अतिचार, २२ अनाचार, २३ अतिक्रम, २४ व्य- तिक्रम, इत्यादि साभळ्या विना शाखना भेद न जणाय. 95 विचार रनतार. परतु पुण्यानुनधी पुण्य बिना श्रीजिनवाणी प्रभवानी रुचि जीवने यती नयी, केम जे मुटाम, मुगाम, मुजात, सुप्रात, सुतात, सुमात, सुवात, मुकुल, मुगल, गुखी, सुपुत्र, मुपात्र, सुक्षेन, सुदान, मुमान, मुरुप, मुविधा, सुदेव, मुगुरु, सुधर्म, सुवेश, सुदेश, ए वाशि मकारनी उत्तम जोगवाइ सुपुण्य विना न पमाय, अने ते पुण्याय तो सत्सगसेवन तथा कु- सगना त्यागवडेज पाय छे, माटे सुमति, शीलवत, सतोपी, स्वजन, साचारोज, सत्पुरुष, सुमेला, सुलक्षण, सुकुलीन, ग- मीर, गुमवत, गुणाज्ञ, एहवा पुरुषोनो सग करीए तो धर्म मामीए, तथा चुगल, चोर, ठल्याही, अधी, अधम, अवि- नीत, अधिकबोला, अनाचारी, अन्यायौ, अधीर, अधुरा, नि स्नेही, कुलक्षणा, कुबोला, कुपान, कूटाबोला, कुशीलिया, कुशासनी, कुलखपण, मूडा, मूछ एहवा घुरूपोनो सम न कीजे . प्रश्नोत्तर रत्नसार १ प्र०-जीव धर्म केम पामे-१ उ० जीव रण प्रकारे धर्म पामे-१ गुरुना उपदेशयी, २ पूर्वभवना अभ्यासथी, ३ सहज स्वभावे-वैराग्यादिर सयोगे पामे एम उपदेशसार नदीपञ्चीशीमा कयु-छे २ प्र०-अभ्यास केटला प्रकारना छे ? उ०-चार प्रकारना-१ सूत्रअभ्यास, २ अर्थ अभ्यास, ३ वस्तु अभ्यास, ४ अनुभव अभ्यास, . २

विचार रत्नसार
७५६
३ प्र०-जीवने पुण्य, पाप, अने वैर केवी रीते बधाय छे,
अने ते केवा फळरूपे परिणमे छे ?
उ०-जीवने दयावडे पुण्य उपजे छ, अने हिसावडे पाप
निपजे छे, छकायना जीवने हणवाना परिणाम थाय,
त्या पाप निपजे, ते छकायना जीवने निकरण योगे
हणता, वैर अने पाप वे निपजे, त्या पापना उदये
अशाता, आकुळता, उद्वेगता, अस्थिरता उपजे,
तथा वैरना योगे ते जीव आवी यथायोगे पीडे
४ प्र०-धर्म, पुण्य, अने पाप कर्म शायी उपजे ?
७०-ण प्रकारे -१ दर्शनमोहनीय कर्मना क्षयोपशमयी
धर्म उपजे, २ चारित्रमोहनीयना उदययी पुण्य पाप
उपजे, तेमा अविरतिनो उदय मद थाय तया क्षयो-
पशम थाय त्यारे विरतिनो उदय थाय, ते वारे
षट्कायना नीव उपर दया परिणाम उपजे, तेथी
पुण्य उपजे, ३ अविरतिना तीन उदये पाप निपजे
हषे जे पुण्य पाप छे, ते चारित्रमोहनीयना उदयना
मदपणाए तीव्रपणाए होया अने धर्म, दर्शनमोहनीय कर्मना
क्षयोपशम के क्षययी होय; तथा पुण्य पापना फळ भोगवावे,
ते वेदनीय कर्म तेना उदय वेदावे (फळ देखाडे ), तथा
पुण्य पापनो बध पडे ते मोहनीय कर्मनी मुझवणे पुण्य पाप
परिणमे ते अतराय कर्मने क्षयोपशमे
ज्या राजा न्यायी अने सौम्यदृष्टि होय, अमे आचार्य
निस्पृही होय, त्या जैन धर्म विशेष प्रकारे प्रबर्ने छ
५ प्र०-देशना कोने कहिये।
३

७५६
विचार रत्नसार
उ०-ज्या मिथ्यात्वनी पुष्टि न याय, मार्ग विरुद्ध न
प्रकाशे, जात्मरकल्प उपादेयको प्रम्प, तया शुभ
कियाने अत्यादरपणे प्रस्पे, झुग क्रियाना फळनी
वाठा न कराने, पापनी जामेवना दाटे, निरस्कार
रखावे इत्यादि जागमोक्तरीते शुभ प्ररुपणा ते
देशना कहीये
६ प्र०-पुण्य क्रिया अत्यादरपणे सेसी, पण तेना फळनी
वाछा न करवी तेनु रहस्य शु?
उ०-जो पुण्यक्रिया शुभ व्यापारे शुभयोगे न आदरे तो
मार्ग विरुद्ध याय, परपराए पण वीतराग मागें न
जोडाय, अने जो पुण्यना फळनी वांछा करे तो
निदान (नियाणा) रूप मिथ्यात्व परिणमे, जो
सहजस्वरूपे शुभ किया करे तो कर्मनो काट निवारी
शीघ्र मुक्तिपद पामे, ए रहस्य छे
७ प्र०-हेय, ज्ञेय, उपादेय एटले शु ?
उ०-समभावे हेय, यथार्थ ज्ञेय, स्वरूपे उपादेय, साराश
के आत्मा स्वभावमा रहेता सर्व अनात्मिक परभा-
वनो हेय एटले त्याग थाय छे, यथार्थ ज्ञान थये
ज्ञेय एटले जाणवा योग्य पदाथोनु ज्ञान थाय छे,
अने ज्ञान दर्शनादि गुणोने अनुयायी चेतना थये
स्वरूप ग्रहणरुप उपादेय थाय छे, एटले आत्मानु
पोतानु स्वरूप आत्माए ग्रहण करवु ते उपादेयनो
भावार्थ छ
८ मकाउस्सग्गनु विशेष स्वरुप कहो ?
-
-
४

विचार रत्नसार - उ० काउस्सग्ग द्रव्य अने भाव वे प्रकारे करो छे उव- वाइ सुसमा द्रव्य काउरसग्ग चार मकारना छे- शरीर काउस्सग्ग, २ उपधि काउस्सग्ग, ३ भत्तपाण काउस्सग्ग, अने क्रोधादि चार कपायना त्याग रूप काठस्सग्ग (कपायकायोत्सर्ग) भाव काउस्सग्ग त्रण प्रकारे छे-१ कपाय काउ- स्सग्ग, २ ससार काउस्सग्ग, ३ कर्म काउस्सग्ग, वे मध्ये कपाय काउस्सग्ग क्रोधादि चार प्रकारमा छे, ससार काउस्सग्गने (देव, मनुष्य, तिर्यच, अने नरक ए गतिनी इच्छा रहितपणा रुप) चार प्रकारनो जाणवो, कर्म काउस्सग्ग आठ प्रकारनो; ते ज्ञाना- वरणीयादि आठ कर्मना भेदे आठ प्रकारनो जागवो ९ प्र०-विधि अने अविधिए करेली क्रिया यथाक्रमे केवा फळ रूपे परिणमे १ उ०-शुभ क्रिया जे विधिनी छे ते स्वभावरूपे परिणमे, त्या निर्जरा निपजे, तथा शुभ क्रिया जे अविधिनी छे ते बधरुपे परिणमे, ते लौकिक यश सौभाग्यादि फळरुप परिणमे, तथा पुण्यरुप परिणमे ते बवरुप थाय, अने तेथी ससार भ्रमण विशेष निपजे १० प्र०-जीवने खेद उपन्यो केम टळे ? उ०-जीवने खेद निवारखाने अथै पूर्वकृत कर्म सभारीए जेवा जीवे पूर्व कर्म बाध्या छे, तेवा उदये आवे छे, ते मध्ये केटलाएक कर्म प्रदेशयी वेदीने खेखें छे, केटलाएक निविड कर्म बाध्या ते विपाके (रसो- ५

७५८
विचार रत्नसार
Son
AAMA
दये) वेदीने से, पण दृष्टिमान् जानी तो, ते कोंने
समभागे भोगरता यका उदयने निष्फळ को छे,
आलोइ, निंदी, पश्चात्ताप रे, तेपारे अल्पाय
याय, बहु निर्जरा करे, ते माटे व निवारवाने
अयें उदय निष्फळ करे, एटले कर्मनो विपाक
समभावे भोगो, अने शुशोपयोगे स्वरूप विचारे
त्यारे नव अल्प करे
११ प्र०-धर्म कथा केटला प्रकारनी ?
उ०-चार प्रकारनी-१ आक्षेपिणी, २ निक्षेपिणी, ३ निर्वेदिनी
४ सवेदिनी, त्या सत्य मार्गने विपे जीवने जोडावे
ते आक्षेपिणी, अने मिथ्यात्व मार्गयी निवर्तावे ते
विक्षेपिणी, तथा निर्वेदिनी ते वैराग्य उपजावे एटले
ससार जे विषयकपायनी मलीनपरिणति वे थकी
जीवने उद्विग्न रखावे, अने सवेदिनी ते मोक्षामि-
लाप उत्पन्न करावे
१२ प्र०-भावथकी नव निधान कया ?
उ०-केवळीआश्रिने नव क्षायिक लब्धि उपजे ते नव
निवान जाणका, अने मुनिआधि पाच इद्रिपना
विषयना विकारथकी, 'तथा क्रोधादिक चार कषाय
थकी जे निवर्त्या ते महाभागने भाव थकीअखुट
नव निधान प्रगट्या जाणवा
१३ प्र०-पाच इदियोना विकार मटे त्यारे कया गुण निर्मळ
थाय?
उ०-चक्षु इद्रियनो विकार मटे त्यारे हृदयने विषे निर्मळ

विचार रत्नसार. ज्ञानचक्षु प्रगटवारूप गुण निपजे, श्रोनेन्द्रियनो वि- कार मटता जिन वचन श्रवण प्रीतिसहित प्रतीति पूर्वक याय, जीव्हा इद्रिय विकार मटता आत्मिक अनुभव रसस्वाद प्रगटे, घ्राणेन्द्रिय विकार मटता आत्मिक गुण सुवासना प्रगटे, स्पर्शदिय विकार गये आत्मप्रदेशे स्वभाव परिणति स्पर्शन गुण प्रगटे १४ प्र०-क्रोध, मान, माया, लोभ गये कया गुण प्रगटे ? उ.-क्रोध गये समता गुण प्रगटे, मान गये मार्दव गुण प्रगटे, माया गये आर्जव गुण प्रगटे, लोभ गये सतोष गुण नीपजे १५ प्र०-चार प्रकारे मिथ्यात्व छे ते केवी रीते? उ०-१ प्रदेश मिथ्यात्व, २ परिणाम मिथ्यात्व, ३ प्र- रूपणा मिथ्यात्व, ४ प्रवर्तन मिथ्यात्व, ते मध्ये जीव व्यवहार समकित पामे त्यारे प्ररुपणा तथा प्रवर्तन मिथ्यात्व टळे, अने अथिभेद यई उपशम, क्षयोपशम, समकित पामे त्यारे परिणाममिथ्यात्व टळे, अने क्षायिक समकित पामे त्यारे प्रदेश मि- , थ्यात्व टळे १६ प्र०-देशना केटला प्रकारनी छे ? उ०-१ धर्म देशना, २ गति देशना, ३ बध देशना, ४ मोक्ष देशना, ते मव्ये वर्म एटले जीवनी शुद्धात्मपरिणति तेनी सन्मुख जीव जेयी थाय, तत्त्वामिलाष जेयी प्रगटे, एवो उपदेश ते धर्म दे- शना, जे थकी जीवने विषय कषायनी मलीन परि- ७ ७६० विचार रत्नसार -------- . . णति धे, चतुर्गति गमण विस्तार पामे एवी सावध देशना ते गति देशना, जे उपदेशथकी जीवने नाना प्रकारना कोनो व पडे एवी प्रवृति कर- पानु मन वाय ते पर देशना, जे साभळपायी जीव वैराग्य परमरस पामी, ययार्थ जोध लही पोतानु शुद्ध आत्मस्वरूप जे सकळ कर्मयी रहित मोक्षरुप छे, ते निपजावनानी तीन रुचि प्रगटे ते मोक्ष देशना कहिए १७ प्र०-अनर्थ दटना चार प्रकार कया ? उ.-१ अपध्यान एटले आर्त अने रौद्र ध्यान, २ प्रमा- दाचरण, ३ हिंसकशनप्रदान, अनर्थ दड एटले जीव हिंसाना सावनो शस्त्रादि पूरा पाडवा ते, ४ पापनो उपदेश देवो १८ प्र०-आठ प्रकारना वचन परिसह कया १ उ०-१, हीलणा परिसह ते मुनिनी पूर्व गृहस्थाश्रम अवस्था हीन जात्यादि दूषणो काढी कठोर मर्म वचने साधुने हीले निंदे ते, २ खिसणा परिसह ते साधुना पूर्व कृत कर्म (जनित) अवगुण उघाडा पाडी निदे, ३ निंदण परिसह ते साधुपुरुषनो निरादर करे दुगछादि दर्शावे, ४ गर्हणा परिसह ते साधुओना समक्ष छता अछता अवगुणो बोले, ५ ताडणा परिसह ते साधुने मारे, कुटे, ६ तर्जना परिसह ते साधु प्रत्ये अतिशय आक्रोश करी अत्यत कठोर वचन कहे, भयकरता दर्शावे, ७ पराभव विचार रत्नसार ७६१ परिसह ते साधुना वस्त्र पानादिक सजम उपकरणो हरे, भागे, तोडे, फोडे ८ एषणा परिसह ते सा- जुने भातपाणी प्रमुखनो अतराय पाडवानो भय देखाडी नास उपजावे, ए आठ वचन परिसह, साधु पुरुपे सम्यक् प्रकारे सहन करवा, पण वर्मयी च- लायमान यवु नहि १९ प्र०-१ सिइझइ, २ वुझ्झइ, ३ मुच्चइ, ४ परिनिव्वाइ एटले शु? उ०-१ सिइझइ एटले परिणामनी निर्मळताबडे कर्मनु ओछु करखु, आत्मप्रदेशथफी कर्माश पुद्गलो घटा- ट्वा ते २ मुझ्झइ एटले वस्तु स्वरूपनु तदनतर ज्ञान थ७ ते ३ मुच्चइ एटले कर्मपुद्गलोनु आत्मपदेशयी क्षय थवु, कर्म सत्तानो नाश थवो, फरी तेवो वध कदी न पडे तेवा परिणाम ते ४ परिनिव्वाइ एटले आत्मा ठरणपणाने पाम्यो, मिज- स्वरुप आलबि समाधिष्ठ थयो ते २० प्र०--बुद्धे, मुत्ते, पडिनिन्वुडे, अडगडे शब्दोनो भावार्थ कहो? ३०-१ बुद्धे एटले आत्मा सपूर्ण ज्ञानस्वरूपी थयो ते २ मुत्ते एटले सर्व कर्मयी मुकाणो माटे मुत्ते ३ पडिनिब्बुडे एटले सर्व कर्म शिथिलमत एटले जर- जरित थया ते ४ अड़गडे एटले अतकवे कहेता ससारनो अत कर्यो भवे स्थिति सदतर नाश करी ते 96 ७६२ विचार रत्नसार २१ म०-चार प्रकारे चर्म केवी रीते छे? ते तेना फळ परि- णाम सहित यथार्थ समजागो उ०-१ आचार धर्म ते रुटा आचारनु सेवन कखु जेयी अनाचारनो त्याग याय २ दया धर्म ते सर्व प्राणी- मानने जात्मवत् जाणी सर्व प्रत्ये समान मनीभाव दावी, यथाशक्ति उपकारादि करी, तेमनु निरतर भलु चिंतवधु, पण अतमा कदापिकाळे अपराधी उपर पण बुरु चितववाना द्वेषिपरिणाम न राखे, तेम बेपरवाइ प्रवृत्ति पण न दाखवे ३ क्रिया वर्म ते सामायिक, पोसह, प्रतिक्रमण, पूजादि शुभ क- रणी विधिए आदर सहित करे, जेयी कर्मनो काट उतरे, भवसतति घटे, परपराये मुक्ति मागें जोडाय अने ४ वस्तुधर्म ते जे थकी वस्तु एटले आत्म स्वरूपानुगत पूर्ण बोध उपजे, स्वरूपाचरण स्वरूप- रमण थाय अने शुभाशुभ समस्त कर्म निर्जरे तेवो सर्वोत्तम धर्म, एम ए धर्मना चार प्रकार वस्तुगते परमात्माए प्रकाश्या छे, अने तेना कारणरुप चार व्यवहार वर्म ते दान, शियळ, तप अने भाव धर्मों छे, आ चार धर्मवडे अनाचार दूर थाय, लौकिक- यश प्रतिष्ठा पामे, अन्य तीर्थओ पण जैनधर्मनी प्रशशा करे, जैनाचार अनुमोदे, माटे आचार प्रथमो वर्म इति वचनात् , दयाधर्मवडे हिंसक कर्म प्रवृत्ति टळे, शुभ पुण्य पुष्ट करी परपराये जीव मुक्तिने योग्य थाय, ए रीते फळ परिणाम पूर्वक वर्मना . N विचार रत्नसार ७६३ चार प्रकारने यथाशक्ति सविनय सेवम करी कोड परस्पर दुपाय नहि, एम जे उत्तम माणी यथार्थ स्यावाद रीते जाणीने पाळे ते सुलभगोधी यइ वहेलो सिद्धि वरे, एवीज रीते जे प्राणी क्रियाविधि आदरे, ध्यानपूर्वक उपयोग शुद्ध राखे, ते प्राणीना सर्व मनोवाछित पूर्ण यवा सावे शीघ्र परमात्मस्वरूपने पामे २२ प्र०-त्रण प्रकारना कर्मनु स्वरूप समजावो ? उ०-द्रव्य कर्म ते ज्ञानावरणीयादि आठ कर्मोनी पुद्गगल- दलिक वर्गणा, २ नोकर्म ते औदारिकादि पाच शरीर ३ भावकर्म ते आत्मानी अनादि काळनी प्रदेशे लागेली रागद्वेषनी अशुभ परिणति, ते मध्ये द्रव्यकर्म तथा नोकर्म पुद्गगलानित छे, भावकर्म आत्माश्रित छ, पहेला वे कर्म विनाशी छे कमजे अनादि अनत अभव्याधि अने भव्याधि अनादि तथा सादि सात भागे आत्मप्रवृत्तिरुप होवाथी छे, तथा होल्लास ते भावकर्म आश्रित छ अहि दृष्टातथकी आ वात विशेष स्पष्ट यशे तेथी कहीए छीए के जेम एक चोखा नामना वान्यनी कोठी छे, तेमा धान्य जे छे ते द्रव्य कर्म, अने कोठी ते नोकर्म, अने चोखाने लागेलो जे मिणो ते समान भावकर्म चीकासरुप आत्मानी अशुभ परि- णति जाणवी २३ प्र०-अरिहतादि नव पदनो भावार्य तया ते प्रत्येकनु - ७६४ विचार रत्नसार -- SARA तन्मय ध्यान करता यका गु? शु ? गुण निपजे ते मिन मिन कहो? 30-अरिहतादि पचपरमेष्टिमहाराजनु स्मरण करता उद- यकर्मनु निवारण याय, अरिहतादिनु द्रव्ययी शरण करे तो द्रव्ययी उदय जारता सर्व पाय निष्फळ थाय, विपाफ वेदना पण अल्प याय, इत्यादि धणो गुण निपजे, सर्व दन्यपापनो नाश याय, एम आत्मा आत्मानु स्मरण करे, ध्यानगत् वज्रपिंजरवत् पोताने स्वरूपे परिणमे, त्यारे सर्व कर्मनो नाश करे, एम आत्मस्मरण तथा निमित्तस्मरणम् स्वरूप जाणवु, हवे अरिहतने सभारता, समरता, परिणमता आत्माने जे गुण निपजे ते कहिए छीए, १, अरि एटले रागद्वेषरूप भावशत्रु तेनो नाश थाय, अने वीतराग स्वरूप प्राप्त थाय, २ तेम सिद्धपदनु तन्मय व्यान वरता आत्मा निष्पन्न अरुपि परमात्मभावने पामे, ३ तेम आचार्यपदनु ध्यान वरता शुद्ध पचा चार प्रवर्तन शुलभ उदय आवे, भवातरे आचार्य गणधरादिपद पामे, ४ उपाध्यायपदनु व्यान वरता शास्त्रार्थ सूत्रार्थ सुलभ थाय, अध्यापक शक्ति भवा- तरे प्रगटे, साधुपदनु ध्यान धरता मुक्तिमार्गनी साधना सुगम थाय, सुलभबोधिपणु प्रगटे, वळी चारिन सुकर थाय, गजसुकुमालनी पेठे शीघ्र मुक्ति- पद पामे, ६, दर्शनपद आराधता सम्यक्त्व निर्मळ करे, वस्तु प्रतीति दृढ थाय, परमात्मस्वरूपनो , विचार रत्नसार ७६५ - अवगाढ पुष्ट परिचय निपजे, ७ ज्ञानपद आरावता बोवशुद्धि याय, तत्वभासन प्रकाश विस्तरे, ८ चारि- उपद आराधता निरतिचारपणे पच महाबतनी शुद्ध प्रतिपालना पूर्वक सामायकादि पाच भावचारित्र परि- णति थाय, स्वरूप रमणता सुलभ थाय, ९ तपपद आराधता इच्छा निरोध याय, समस्त पौद्गलिक पीपासा टळे, तृष्णा दाह उपशमे, अने ममत्वभाव मळ गळी जाय इति भाव २४ प्र०-कर्मनो उदय तथा बध जीपने केवी रीते याय छे ? ते स्पष्ट समजावो उ० बाध्या कर्म उदय आवे छे,जेवे रसे बाध्या होय, तेवेज रसे तथाविध द्रय क्षेत्र काळ भाव पामीने, प्रदेशे तथा विपाके भोगवे, ते भोगवता जेवा नवा बधाय पण समभावे वेदेतो निर्जरा थाय, अने विषम भावे एटले रागद्वेषादि मलीनभावे वेदे तो नवा बवाय तथा विषमभावे भोगवीने पछी पश्चात्ताप करे तो कर्मबधनो रसघात करी चीकास मदाडे, ते उदयकाळे सुगमतायी खरी जाय, अने जो कर्म विषमभावे भोगवे, दुर्ध्यान करे तो, उदयकाळे अत्यत दोहिला भोगवीने खपावे, वळी वेदता थका नवा कर्मनो गाढ ब करे २५ प्र०-बोध अने समाधिनु स्वरूप समजावो उ०-सम्यक् ज्ञान, दर्शन, चारित्र, रत्नत्रयी सुगम प्राप्ति ते बोध, अने अहिं वेम भवान्तरने विपे निर्वेदन-

पिचार रत्नसार
पणे तेनी सुलभता ते समाधि, एटले चित्तनी स्थिरता
वित्रातिभार जाणो
२६ प्र. वैराग्य अने सवेगमा शो फेर ?
3०-ससार एटले विषय कपायादि महा मलीनताना का-
रणरुप शरीर, स्वजन परिवार, भोग वैभवादिधकी
चिरक्त बुद्धि एटले रागनो साग तेने नैराग्य कहीए
अने एकात मोक्षनीज अमिलापा, शास्वत स्वाभा-
विक चिदानदधनमय परमात्मप्राप्तिनीज इच्छा तेने
सवेग कहीए, अने एपा समेगे करीने सहित होय
तेज खरासवेगी जाणवा
२७ प्र०-दान, शील, तप अने भान ए चार कया साधनना
वळवडे प्राप्त याय?
उ०-दान, धनळयी | शील, मननळयी । तप, तननळ
वडे । अने भाव, सुज्ञान वळे
२८ प्र०-कई वस्तुनी प्राप्ति खरा भाग्योदयवडे थाय?
उ०-१ सद्गुरुनी देशना, २ सुदेवनी सेवना, ३ अने
सुधर्मनी आराधना
२९ प्र०-तिर्यक् परिचय अने ऊर्ध्व परिचय कोने कहिए?
उ.-धर्मास्तिकायादि पाच द्रव्यो जे सप्रदेशी छे, तेनी
तिर्यक परिचय सज्ञा छे, अने अप्रदेशी एक का-
लद्रव्यने ऊर्ध्व परिचय सजा छे
३० प्र०-धर्मनु स्वरूप चतुर्विध का छे ते केवी रीते ?
ज०-१ वस्तुनो मूळ खभाव ते वर्म, २ क्षमादि दशविध

विचार रत्नसार यति धर्म, ३ दर्शन जान चारिनरुप रत्नत्रयीधर्म, ४ छकाय जीवनी रक्षास्प वर्म ३१ ०-मुनिने चतुर्विध सयम छे ते शी रीते ? उ०-१ प्राण सयम, ते घटकायजीववधनी अविरति टळी माटे, २ इदिय सयम ते पाच इद्रियोना विषय पिकारोने टाळे माटे, ३ कपाय सयम ते प्रण कषायनी चोकडींना उदय मट्या माटे, ४ मन सयम ते द्रव्य तथा भाव मनना विकल्प सवर्या मारे ३२ प्र०-द्रव्य मन अने भावमननो अर्थ समजावो उ०-द्रव्य मन ते पाच इद्रियोना विषयरुप, मनोवर्गणा दलिकने अवल्बन मनन शक्ति, मनोयोगद्वाराए चिंतन परिणाम, निर्विकारी निर्विकल्पी शक्ति विशेष ते केवळीने पण होय भावमन ते व्यक्ताव्यक्त सकल्प विकल्यरुप विकारी मोहजनित, शुभाशुभ परिणामम्प छे ३३ प्र०-स्वभावे तथा विभावे आत्मानु परिणमन याय त्या शु शु फळ निपजे? 3०-आत्मा स्वभावे परिणभे तिहा सम्यकत्व गुण निपजे, तेना फळ ज्ञान अने आनद ए वे उपजे, अने ज्यारे आत्मा देहगेहादि परभावे परिणमे तिहा मिथ्यात्व निपजे, तेना फळ विषय कपायरूप मलीन परिणति, चतुर्गति प्रमणरूप ससार सतति छे सुख दुखरूप छे, एम जाणी उत्तम जीवोए विभावद- शानो त्याग करी जेम बने तेम सत्सगे रही स्व- ७६८ पिचार रत्नसार. M आरपन, सभार परिणमन, गदोपयोगे क्सा - यत्न करवो ३४ १०-जीरना ट्रय गुण पर्यायना घातक कोण छे। उ.-१ अज्ञानपणु ते जात्मद्रय पातक छे, २ मि- व्यात्व ते आत्मगुण घातक छे, ३ अविरति ते आत्मिक सुस पर्याय घातक छे, ४ तथा अजान अने मिथ्यात्व ते आत्मानु जीवपणु दावे छे, आ- त्मस्वभाव परिणति रुधे छे, अने अविरति दोष, आत्मिक सुख रुधे छे ३५ प्र०-जीन द्रव्यनिर्जरा अने भावनिर्जरा केवी रीते करे? उ०-जीव शुद्ध ज्ञानोपयोगे भावनिर्जरा करे छे, अने वैराग्यभाव उदासीनताए द्रव्यनिर्जरा करे छे ३६ प्र०-पौद्गलिक इच्छा तथा मू भावे करी जीव शु पुष्ट करे? उ०-इच्छाए अज्ञानपणु, अने मूर्छाए मिथ्यात्व पुष्ट करे ३७ प्र०-गुण पर्यायना घातक कोण १ तेनु स्वरूप कहो उ०-आत्माना गुणपर्यायना घातक -१ ज्ञानावरणीय, २ दर्शनावरणीय, ३ मोहनीय, ४ अतराय ए चार घनघाती कर्म के अने शेष वेदनीय आदि मूळ तो अघाती छे, पण मोहमिश्रित थये ते पण घातकपणे परिणमे छे, ते मध्ये अतिप्रबळ मोह कर्म छे, तेनी अठ्ठावीस प्रकृतियो छे ते मोह, राग अने द्वेष ए त्रण भागे वहेचीए त्या मोहशब्दे मिथ्यात्व मोह- नीय जाणवी, राग, द्वेष शब्दे चारित्र मोहनीय जाणवी,

विचार रत्नसार
,
प्रथमनी मिथ्यात्वमोहनीयनी त्रण प्रकृति छे, ते
निर्मळ सभ्यक्त्व गुणनी घातक छे, अने वीजी
चारित्रमोहनीय कर्मनी पचीस प्रकृतियो छे, ते
मध्ये क्रोध मान ए वे चार चोकडीनी लेता आठ
थाय, अने नव नोकषायमाथी अरति, शोक, भय
अने दुगछा ए चार गणता सर्वे मळी ए बार प्रकृति
द्वेषना घरनी वा अथवा रागद्वेष जनित छे, अने
शेष माया लोभादि आठ कषाय अने हास्य, रति,
अने त्रण वेद ए पाच मळीने तेर प्रकृतिओ रागना
घरनी छे
३८ प्र०-शरीरगति, परिणामगति, श्रधागति, जे रीते परिणमे
छे ते रीते कहो?
उ०-१ शरीरनीगति औदयिकभावे वेदनीय मध्ये छे, २
परिणामगति, विषय कषायनी प्रवृत्ति मध्ये इष्टानि-
ष्टरूपे छे, श्रदानी गति, तत्व अतत्त्व विवेचन
कर्णरुपे छे
३९ प्र०-जीवना द्रव्य, गुण, अने पर्याय शाथी समरे एटले
सुधरे ?
,
उ०-दर्शन, ज्ञान, अने चारित्र गुणे करी अनुक्रमे समरे
४० प्र० ते शी रीते छे, ते विस्तारथी स्पष्ट समजावो ?
उ०-आत्मा द्रव्य असख्यात प्रदेशी छे, तेनो जिन
वचन प्रतीते तथा अनुमाने करी अनुभव करे ते
दर्शन, तथा परोक्ष अने प्रत्यक्षे जे प्रतीतात्मक
धर्म भासन थयो, जे आत्मद्रव्य दर्शन द्वाराए
97

७६८ विचार रत्नसार. आरपन, सभार परिणमन, शुद्धोपयोगे करपा प्र- पत्न करतो . ३४ म०-जीरना इन्य गुण पांपना घातक कोण छे ? उ०-१ अज्ञानपणु ते आत्मद्रप पातक छे, २ मि- प्यार ते जात्मगुण घातक छे, ३ अविरति ते आत्मिक मुख पर्याय घातक छे, ४ तथा अज्ञान अने मिथ्याल ते आत्मानु जीरपणु दावे छे, आ- त्मस्वभाव परिणनि रुघे छे, अने अविरति दोष, आत्मिक मुख रुधे छे ३५ प्र०-जीव द्रव्यनिर्जरा अने भावनिर्जरा केवी रीते करे ? 30-जीव शुद्ध ज्ञानोपयोगे भावनिर्जरा करे छे, अने वैराग्यभाव उदासीनताए दयनिर्जरा करे छे ३६ प्र०-पौद्गलिक इच्छा तथा मूर्छाभावे करी जीव शु पुष्ट करे? उ०-इच्छाए अजानपणु, अने मूर्छाए मिथ्यात्व पुष्ट करे ३७ प्र०-गुण पर्यायना घातक कोण १ तेनु स्वरूप कहो 3०-आत्माना गुणपर्यायना घातक-१ ज्ञानावरणीय, २ दर्शनावरणीय, ३ मोहनीय, ४ अतराय ए चार घनवाती कर्म छे अने शेष वेदनीय आदि मूळ तो अघाती छे, पण मोहमिलित थये ते पण घातकपणे परिणमे छे, ते मध्ये अतिप्रबळ मोह कर्म छे, वेनी अठ्ठावीस प्रकृतियो छे ते मोह, राग अने द्वेष ए त्रण भागे वहेचीए त्या मोहशब्दे मिथ्यात्व मोह- नीय जाणवी, राग, द्वेष शब्दे चारित्र मोहनीय जाणवी.

विचार रत्नसार
७७१
४१ म०-योगप्रत्ययिक सत्तागत, मिथ्यात्वप्रत्यायिक अने अवि-
रतिप्रत्ययिक बवतकमो शी रीते टळे ?
उ०-अशुभ योगे वाघेला कर्म तप सजमादि शुभ किया
व्यापाखटे, सत्तागत कमों शुद्धोपयोगे, स्वद्रव्य पर्याय
परिणाम वडे, स्वभावाचरण शुद्ध व्यानालगनवडे
निर्जरे, सम्यग्दर्शनवडे मिथ्यात्व प्रत्यइया टळे, अने
अविरति मत्यइया, विरति परिणामे रळे, ते विषे
का छे जे
हा
आगमे अध्यातमतणा, कदा घणा मध,
द्रव्यगुणयोगे परिणमे, तो सोनु अने सुगध
४३ प्र०-कपाय, प्रमाद, इद्रियविषयराग, अने योग प्रत्यइया
बाधेला कर्म टाळवाना उपाय कया ?
उ०-कषाय प्रत्यइया, उपशमादि समताभावे टळे, प्रमादे
बाघेला अपमाद दशावडे टळे, विषय राग प्रत्यइया
तपस्यावडे टळे, अने योग प्रत्याया अयोगी दशाए
शैलेशीकरणे प्रवर्तता टळे
४४ ३०-निश्चयनय अने व्यवहारमय जीवने शु गुणकारी छे ?
उ०-सम्यकदृष्टि जीव श्री जिणप्रणीत स्याद्वादना जाण,
जैनशेलिना उपयोगी बोववान भव्यप्राणीओने नि-
बयनय दृढता, आस्तिकना करणहेतु छे, अने
व्यवहारनय ते जीवना पर्याय शुभाशुभ कर्मरूपे जे
भर्या छे, तेने सभावाना हेतुरूप छे, व्यवहारनय
केडे उद्यम छे, अने निश्चयनय केडे चित्तनी स्थि-
-
,

पिचार रत्नसार A भास्यो दिटो ते ज्ञान, ते सम्यकदर्शन गुणे करी आमद-य समरे, सम्यग्दर्शन गुण हेतु ते द्रव्य दर्शन, तया ते प्रतीतात्मक वर्मन्प अनत गुणनु जाणपणु थयु ते गुण हेतु सम्पाजान जाणा, तया दन्य ने गुणरूपे जे उपयोगना पलटणपणा रूप परिणमन याय तेने पर्याय कहिये, ते पर्यायनो हेतु स्वरूपाचरण चारिन गुण हेतु छे, अर्थात् जीरना पर्याय चारिन गुणे करी समरे, अने ज्ञान गुणे जीपना गुण समरे, तथा दर्शनगुणे आत्म व्य समरे, सुधरे ए भाव जाणतो ४१ म०-जन्म, जरा, अने मरणनु दु ख केम टळे ? उ०-शुद्ध रत्ननयीनी प्राप्तिप, ते आवी रीते के जीवे पूर्वे सम्यक्त्व पाम्या पहेला अनत पुद्गल परावर्तन काळ सुधी जन्म कर्या ते हवे सम्यकदर्शन पाम्यो, माटे उत्कृष्ट कदाच जन्म करे तोपण अर्घ पुगल -परावर्तन काळ उपरात जन्म न करे, माटे दर्शन- गुणे जपनी पीडा टळे, तथा जरा जे शुभाशुभ कर्म उदयागते आवे छे ते सुखद् खरूप वेदावे, वेदनीय विपाके सम्यग्ज्ञान गुणे टळे, अने स्वरूपा चरण एटले शुद्ध बताचरण रूपे चारित्र गुणे मरण पर्याय, गत्यतर जर टळे एटले चारित्रगुणे मरण सम्यकदर्शने जन्मनी, ज्ञान गुणे जरावस्थानी, अन चारित्र गुणे मरणनी वेदना टळे छे, ए भाव जाणा वेदना टळे साराश

विचार रत्नसार
७७१
४१ प्र-योगप्रत्ययिक सत्तागत, मिथ्यात्वप्रत्ययिक अने अवि-
रतिप्रत्ययिक कृतकों शी रीते टळे ?
30-अशुभ योगे बाघेला कर्म तप सजमादि शुभ क्रिया
व्यापारवटे, सत्तागत कमों शुद्धोपयोगे, स्वद्रव्य पर्याय
परिणाम वडे, स्वभावाचरण शुद्ध व्यानालजनवडे
निर्जरे, सम्यग्दर्शनवडे मिथ्यात्व प्रत्यइया टळे, अने
अविरति प्रत्यइया, विरति परिणामे टळे, वे विषे
.
का छे जे
दुहा
आगमे अध्यातमतणा, कह्या घणा प्रय,
द्रव्यगुणयोगे परिणमे, तो सोनु अने सुगध
४३ प्र०-कषाय, प्रमाद, इद्रियविषयराग, अने योग प्रत्यइया
बाघेला कर्म टाळवाना उपाय कया?
उ०-कषाय प्रत्यइया, उपशमादि समताभावे टळे, प्रमादे
बाघेला अप्रमाद दशावडे टळे, विषय राग प्रत्यइया
तपस्यावडे टळे, अने योग
प्रत्यइया
जयोगी
दशाए
शैलेशीकरणे प्रवर्तता टळे
४४ प्र०-निश्चयनय अने व्यवहारनय जीवने शु गुणकारी छे ?
उ०-सम्यष्टि जीव श्री जिणप्रणीत स्याद्वादना जाण,
जैनशैलिना उपयोगी बोधवान भव्यमाणीजोन नि-
अयनय दृढता, आस्तिकना करणहेतु छे, अने
व्यवहारनय ते जीवना पर्याय शुभाशुभ कर्मरूपे जे
भर्या छे, तेने सभासाना हेतुरूप छे, व्यवहारनय
केडे उद्यम छे, अने निश्चयनय केडे चित्तनी स्थि-

७७२ विचार रत्नसार रता, दृढता छ, एम परे नयो जात्मन्यने समा. खामा समझाळे गौणता मुर यताए गुणकारी छे, माटे एमायी एफपण नपने उत्यापे के एकावे निपेघे तो जीव एकातपादी मिथ्यात्वी जाणतो, एम श्री जिनेश्वर भगवतनी वाणी छे, ते यथार्य सदहवी ४५ प्र०-निश्रय अने व्यवहारनु सम्यरुस्वरूप स्पष्ट समजावो' उ०-श्री जिनवाणी प्रतीते ग्रहिने पर द्रव्यना यथार्थ- पणे गुणपर्याय वारे, अनुभव प्रत्यक्षे स्वरूपने वेदे, तथा गुणपर्यायमु विलेखन करे, तथा पुद्गलादिक कर्म पर्यायमा तदाकार न परिणमे, पाच इद्रियना भोग विषयो इप्टानिष्टरूप न वेदे, पोताना स्वरूपने भेद रत्नत्रयीरूपे आराधे, तेने व्यवहार सम्यक्त्वी कहिये, तथा पोताना गुण गुणी पर्याय अभेदरूपे रत्ननयरूपे, निर्विकल्प समाधि परिणमे तेहने नि- श्चयसम्यक्त्वी कहीए, त्या व्यवहार सम्यक्त्व वे निश्चय सम्यक्त्वनु कारण छे, अने निश्चय सम्यक्त्व ते केवळज्ञाननु कारण छे ४६ प्र०-पूर्वोक्त उमय सम्यक्त्वीने व्यवहार प्रवृत्तिए शु लाभ याय १ उ०-नवतत्व, पद्रव्यादिकनु आस्तिकभावे दृढ श्रद्धान, देव गुरु वर्मनु यथार्थ श्रद्धान, तच बुजिना विशेष प्रकाशे करी तत्त्वातत्वनु नयभगरुपे, अनेकात मार्ग विशेष रीते अवलबन यता आगळ परपराए , २०

विचार रत्नसार
७७३
,
वस्तु व्यवहारसम्यक्त्व जे पूर्व का छे, ते रूपने
मेळवी आपे
३७ प्र०-धर्म, कर्म, पुण्य अने पाप केवी रीते थाय छे, अने
तेना मिन्न भिन्न फळ शा शा छे १ ते बराबर कहो
3०-जीव शुझोपयोगे वर्तता एटले पोताना द्रव्यगुण
पर्याययी तन्मयपणे परिणमे या ते वर्म करे, अने
रागद्वेषमय अशुधोपयोगे वर्तता कर्म बाधे, एम
शुझोपयोगे धर्म अने अशुशोपयोगे कर्म निपजे
छे, तथा शुझोपयोगे शुभयोगे पुन्य नाघे, अर्थात्
मन वचन कायाना योग प्रशस्तभावे तथाविध
गुणानुरागे पूजा, सामायक, प्रतिक्रमण, पोसह,
सिद्धात श्रवण, अभ्यास, मनन, दानादि शुभ योगे
प्रवर्तता जीव पुण्यानवधी पुण्यनो रस ढाळे तेमज
वळी अशुभ मन वचन कायाना योगे विषयादि
प्रवृत्तिए, अप्रशस्तभावे, तदाकार अमिरूपे परिणमता
जीव निविड पापरव कर, हवे तेना फळ कहिये
छीए-पुन्यथी शुभ गति, शुभ सामग्री, शाता,
अनुकुळतादि शुभ सयोग जीव पामे, तथा शुद्धो-
पयोगी वर्मदडे कर्मनी निर्जरा करी मुक्तिपद
पामे, तथा अशुद्धोपयोगे वर्तता पाप वाचे, तेथी
जीव ससारमा घणो काळ रहे, घणा भव करे,
अशुभोपयोग कठीन पापरव करीने जीव ज्या त्या
घणी अशाता पामे, साराश जे पापे अशाता, पुण्ये
शाता, कमें ससार अने म मोक्ष थाय छे
२१

७७४ विचार रत्नसार m . ४० प्र०-अल्प पापध जने जाप कर्मयशी रीते थाय? ते तेनी चाभगी सहित कहो उ०-पाच इद्रिय अने पण योगना अशुभ व्यापारमा तदाफारपणे न परिणमे, सखेद प्रत तो अल्प पापच याय, ते जालोयणे निंदागहीं करता रटे, तथा शुद्धोपयोगे जे कर्म वर नीपजे ते भोगने छुटे, पाप प्रवृत्ति करता तीन मलीन परिणाम त- न्मय थता तीनरसे घणा निविड कर्म नाचे, अने घणी जशुभ योगनी हलचले पाप पुद्गल घणा मे- ळवे, पण तदाकारपणे तीन कपाय अनुसंध न होय तो शिथिल बध करे, एम कोइ जीवने पाप घणु अने कर्मवध अल्प, कोइने कर्मनध बहु अने पाप अल्प, कोइने पाप घणु अने कर्मध पण घणो, अने कोइने पापबध कर्मबंध एके नहि, एम कर्म- बध अने पापबध आश्रि चौभगी जाणवी ४९ प्र०-वर्म, कर्म अने भर्म शाथी नीपजे ? उ०-शुद्धोपयोगे धर्म अने क्रियाए कर्म अने मिथ्यात्वे भर्म निपजे ५० प्र०-पाप, पुण्य अने वर्म ए एक वस्तु छे के जुदी ? उ०-धर्म, पुण्य अने पाप ए त्रणे वस्तुभिन्न, गतिमिन्न, उपयोगे भिन्न अने फळपणे भिन्न भिन्न छ, धर्म क्षमादि दशविध यति धर्मरूप छे, शुद्धोपयोग परि- णति ए सवररूप छे, अने तेनु फळ मोक्ष छे,, पुण्य नव प्रकारे बधाय छे शुभ परिणामे करी, वे २२ विचार रत्नसार बेताळीश मेदे अनुकुळपणे शाताफळरूपे भोग- वाय छे, पुण्य पौगालिक जट वस्तु सोनानी बेडी रूप विनाशी ससार हेतुल्प होवायी मुनिने निश्च- यनय त्याज्य छ, पाप अशुभ परिणामे अदार प्र- कारे वाय छे, वीयासी प्रकारे प्रतिकुळपणे अ- शाता फळरूपे दुखदायिपणे रोटानी वेडी समान भोगवाय छे, ते तो सर्वथा प्रकारे हेय छे एम वर्म स्वभाव जनित आत्मिक छे, अने पुण्य पाप कर्म जनित पौद्गगलिक छे, धर्म उपादेय छे सर्वथा प्रकारे, शुभ कर्म व्यवहारे, अपवादे उपादेय छ, निश्चय स्वरूपे हेय छे, अने अशुभ कर्म तो स- वथा प्रकारे बने नये हेय एटटे त्यागवा योग्य छे. ५१ प्र०-धर्म जीवने शाथी निपजे ? उ०-ज्या मुवी जानमा परिणाम सकल्प विकल्पमा वर्ते छे, त्या सुवी शुभाशुभ कर्मवध निपजे, अने ज्यारे निर्विकल्प दशामा परिणमे, पवते त्यारे शुध धर्म प्रगटे, एम विकरपे कर्म लाभ अने निर्विकल्पे धर्म- लाभ जाणवो ५२ प्र०-स्वाभाविक रत्नायी गुणनु लक्षण स्वरूप कहो ? 30-बोधप्रकाश अने विलक्षण विचक्षणताए ज्ञाननु स्वाभाविक लक्षण जाणवु, हृढ आस्तिकता, प्रती- तात्मक श्रद्धानगुण ते स्वाभाविक दर्शन लक्षण जाणवु, तथा चित्तनी स्थिरता, अनुकुळता, स्वरूप रमणता ते स्वाभाविक चारिन लक्षण जाणवु, एम २३ , ৬৪ विचार रत्नसार ४८ ०-अल्प पापमय अने अस्प कर्मनाशी रीते थाय? ते तेनी चौभगी सहित कहो उ०-पाच इद्रिय अने गण योगना अशुभ व्यापारमा तदाफारपणे न परिणमे, ससेद परते तो अल्प पापाय याय, ते जालोयणे निंदागहीं करता स्टे, तथा शुदोपयोगे जे कर्म ध नीपजे ते भोगने छुटे, पाप प्रवृत्ति करता तीन मलीन परिणामे त. न्मय थता तीनरसे घणा निविउ कर्म चाचे, अने घणी अशुभ योगनी हलचले पाप पुद्गल घणा मे- ळवे, पण तदाकारपणे तीन कपाय अनुराध न होय तो शिथिल बध करे, एम कोइ जीवने पाप घणु अने कर्मवध अल्प, कोइने कर्मबंध बहु अने पाप अल्प, कोइने पाप धणु अने कर्मनध पण घणो, अने कोइने पापव कर्मवध एके नहि, एम कर्म- बध अने पापबध आधि चौभगी जाणवी ४९ १०-धर्म, कर्म अने भर्म शाथी नीपजे ? उ०-शुद्धोपयोगे धर्म अने क्रियाए कर्म अने मिथ्यात्वे भर्म निपजे ५० प्र०-पाप, पुण्य अने वर्म ए एक वस्तु छे के जुदी ? उ०-धर्म, पुण्य अने पाप ए चणे वस्तुभिन्न, गतिमिन्न, उपयोगे भिन्न अने फळपणे भिन्न भिन्न छे, धर्म क्षमादि दशविध यति धर्मरूप छ, शुद्धोपयोग परि- णति ए सवररूप छे, अने तेनु फळ मोक्ष छे,. पुण्य नव प्रकारे बधाय छे शुभ परिणामे करी, ते २२ विचार रत्नसार . मूळ वे भेद छे ~~-१ ज्ञानचेतना, २ अज्ञान- चेतना, वे मध्ये अज्ञानचेतना वे प्रकारे छे ते १ कर्मचेतना, २ कर्मफळ चेतना, तेमा कर्मचेतना ते रागदेषादिने विषे जीवन परिणमन जाणबु, अने शुभाशुभ कर्मफळनु वेदवु ते कर्मफळ चेतना जा- णवी, ज्ञानचेतनानो कोई भेद छे नहि, ते आ- त्माना शुझोपयोगरूप शुभ परिणति स्पर्शन जानरूप छे, ते सम्यगदृष्टि आत्माने होय छे, अने अज्ञान- चेतना अशुद्धोपयोगना घरनी विभाविकपरिणतिरूप मोहितमिथ्यादृष्टि जीवने होय छे, ज्ञानचेतना जीवने प्रगटे त्यारे ते कर्मचेतना तथा कर्मफळ वेतनारुप अज्ञानचेतना टळे ५५ प्र०-त्रणे काळे जीव जे पापकर्मनो बच करे छे तेना निवारण हेतु कया? उ०-गया काळना पापकर्म ते प्रतिक्रमणे मटे, अने वर्त- मानकाळना पापकर्म ते आलोयणे मटे, अने अना- गतकाळना पापकर्म पञ्चख्खाणे टळे ५६ प्र०-चार प्रकारे व्यवहार छे ते कया ? उ०-१ अनुपचरित सद्भूतव्यवहार ते अनत ज्ञान, अनत दर्शन, अनत सुख, अनत वीर्य आदे दइने आत्मानी अनत गुणात्मक शुद्धतारूप जाणवो, २ उपचरित सद्भूत व्यवहार ते क्षयोपशमिकज्ञान- दर्शन, चारिनादिरूप जाणवो, ३ अनुपचरित्त अ- सद्भुत व्यवहार ते जीवना अनादि कर्मसबध ए.

७७६
विचार रत्नसार
ए सामान्यपणे रत्ननयीनु वस्तुगते लक्षण जाणषु,
विशेष प्रकारे तो, वस्तु अनत धर्मात्मक सामान्य
अने विशेष स्वभारत समकाळे छे, तेमा जे विशे-
पात्मक चर्म एटले वस्तुने जाति क्रियादि अनेक
विशेषणोयुक्त यथार्य जाणवी ते ज्ञानगुण, अने
वस्तुगते सामान्यामोध ते दर्शन गुण, तथा स्वपर
वहेंचण भेदज्ञानरूप जे विवेक, सदाचरण, अपि तु,
स्वरूपाचरण ज ज्ञानना फलरूप विरति परिणति
गुण छे ते चारिन लक्षण जाणवु
५३ प्र०-धर्म साभळवो, जाणवो, अने आदरखो ते केवी रीते ?
उ०-वीतरागनी वाणी स्याद्वादरूपे छे तेने आत्मस्वरूप
प्ररुपणानी मुख्यताए, जे धर्मनो सद्गुरु महाराज
उपदेश करे छे, ते वर्मने अत्यादर सहित साभळवो,
स्वसमय एटले स्वशास्त्रानुसार अने परसमय एटले
परशास्त्रावबोध एम स्वपरज्ञान परीक्षापूर्वक जेम शुद्धा-
शुद्ध वर्मनो प्रकाश भासन याय, तेम ते शुद्ध
रत्नत्रयी आराधनरूप धर्मने विवेक बुद्धिए जाणवो,
तथा जेने पोताना द्रव्यगुण पर्याय पोतानाज शु-
दात्म द्रव्य गुण पर्यायपरिणतिरूपे परिणम्या छे,
तेनो प्ररुपेलो धर्म आदरवो इतिभाव
५४ प्र०-चेतना एटले शु१
उ०-ज्ञान दर्शन स्वभावरूप आत्मलक्षण एटले सुखदु खनु
जे भान थवु, चेतबु एटले सुखे दुखे जे चेते तेने
चेतना कहिये ते जीवनु लक्षण छे हवे ते चेतनाना

विचार रत्नसार ७७९ ५९ १०-निविध मोक्षभेद समजावो ? उ०-१ भावमोक्ष सम्यग्दृष्टिने होय, २ द्रव्य मोक्ष सा- धुने होय, ३ गुणमोक्ष ते तेरमा चौदमा गुणस्थानि केवली भगवतने होय ६० म०--निविध चेतना केवी रीते कोने होय ते कहो उ०-१ कर्मचेतना सजीवने, २ कर्मफळ चेतना एके दियादिकने, ३ ज्ञान चेतना सम्यग्दृष्टिनेज होय ६१ प्र०-निविध ससारी जीवनु स्वरूप समजावो ? 30-१ भवामिनदी जीव ते जेने ससारने विषे देह, गेह, स्त्री, पुन, वनादि परियह उपर तन्मय राग आनद वर्तवारूप ससाराभिमुखपणु मस्तपणे होय, विषय कषायादिमलीनपरिणतिमा औक्यता वर्ते, अने धर्म- ध्यानादि साधनमा भेदभाव रहे एषु भवामिनदी- पणु मिथ्याहृष्टि मोहमूढ जीवोने होय छे, तेना नाम -लोमि, कृपण, दयामणो, कपटी, मत्सरी एटले अदेखो, विकण एटळे सदा भयवान, अज्ञानि जेना सघळा आरभ कामो निष्फळ थाय छे एवो ते कठोर जाणवो, २ युद्गलानदि ,जीव ते सम्यत्विने कहिये, केम जे तेने शुभाशुभ कर्मोदयो पुद्गलनेविपे रति वेदावे एटले उपरथी सारा लागे, पण अतरमा सुखरूप वेदवापणु न होय, खेद थाय, केम जे ससारमा तेने काइपण खरेखरा आनदरूप नथी, एम एणे जिनवचनानुसार अतरग प्रतीतिपूर्वक जाण्यु छे भाटे तेने ससार प्रवृत्ति करता अनादि भववा- - २७ विवार रत्नसार. टले जानापरणीयादि अट कर्मपदलोनु जात्मप्रदेशे अवस्थान छे ते जाणो, ४ उपचरित असमूत व्यवहार ते सैकिक मान्यतारूप देशाचार रुढिरूप, ज्ञाति, पच विगेरेना कल्पित कायदा, नियमरूप, तथा अनादिकाळयी जीपने लागेली परवस्तुनेविपे मारापणानी बुद्धिरूप स्त्री, पुन, वर, माता, पिता, स्वजनपरिवार, मिन, शन, घर, हाट, वस्त्रादि सर्व परिग्रह ममतानी मिथ्या कल्पनारूप उपचरित अस- मूतव्यवहार जाणवो ५७ प्र०-विविध कर्मनु स्वरूप समजावो ? उ०-१ द्रव्यकर्म ते ज्ञानावरणीयादि आठ कर्मपुद्गलो जे आत्मप्रदेशे लागेला छे ते, २ भावकर्म ते रागद्वेषादि आत्मानी अशुझविभाविक परिणति, ३ नोकर्म ते औदारिकादि पाच शरीररूप जाणवा ५८ प्र०-चतुर्विध दयानु स्वरूप कहो ? 3०-१ द्रव्यदया ते मिथ्यादृष्टिः अज्ञानी जीवने होय ते परपौद्गलिकभावरूप परहस्ते वेचाणी, रागद्वेष हणाइ ते नथी जाणतो एवी जे अनुपयोगरूप नाम मात्र दयास्वरूप, ते द्रव्यदया एक रीते परदयामा, पण अतरवे छे, २ परदया ते खटकाय जीवरक्षारूप विरतिवत जीवने होय ते सम्यक्दृष्टि अने मिथ्या- दृष्टि बनेने सभवे छे, ३ भावदया ते शुद्धात्मोपयोग- रूप सम्यग्दृष्टिने ज होय, केम जे पोतानो आत्मा दयारूपज छे एम जाणीने ते प्रवर्ते छे, ४ स्वदया ते सम्यग्दृष्टि मुनि, क्षपकश्रेणि आरुढने होय छे. २६

विचार रत्नसार
७८१
उ०-घणो काळ रहे ते रोग कहिए, अने तत्काळ मा-
णघात करे ते आनक
६४ प्र०-चळ, वीर्य, अने पराक्रममा शु फेर ?
उ०-शारीरिक शक्ति ते वळ, अने आत्मिक शक्ति ते
वीर्य अने शुभाशुभ कर्मोदयानुसार पराक्रम जाणवु
६५ प्र०-सम्यकत्वी अने मिथ्यात्वीने मोहादिकर्मवध स्थि-
तिमा शो फेर छे१
उ०-सम्यक्त्व ते जीवनी सत्तारुप स्वद्रव्य तत्वमत छे,
ते प्यारे पोतानो समय पामीने पड़े तोपण तेने
मिथ्यात्व पर्याय, द्रत्यगुणरुपे न परिणमे तेथी तेने
मोहादिकर्मनी उत्कृष्ट स्थिति बवाती नथी, माटे
तेने मिथ्यात्व पर्याय परिणमता तीनकषायोइये
पण सम्यस्त्व प्राप्तने एक कोटाकोड सागरोपम माठेरो
स्थितिबध थाय छे, एम समजाएल छे, पठीतो
ज्ञानवत बहुश्रुत कहे ते सत्य, अने अनादि गाढ
मिथ्याष्टिने तो तिबकपायोदये उत्कृष्ट सित्तर कोडा-
कोडी सागरोपमनो मोहनीयमय पडे छे
६६ प्र०-हवे पुद्गल ते कर्म छे, अने जीव ते पण कर्म छे,
ते शी रीते?
उ०-पुद्गल परमाणु विभागरूपे परिणमे त्यारे द्वयणुकादि
स्कधर्म निपजे, अने जीवपण पोतानो स्वभाव
म्हेलीने विभावरूपे परिणमे त्यारे ते पण कर्मरूप
थइ पुद्गल कर्मवर्गणाने ग्रहे, तेथी जीव पण परमार्थे
,

७८० विचार रत्नसार m , सना आवी जनारुप पुहानद होय पण भवामि- नदिपशु टन्यु छे माटे सम्यगदृष्टि जीरने पुद्गला- नदि कहिये, ३ आत्मानदि जीन ते जेने के आत्मिक आनद, शुद्ध रत्ननय वम, तन्मयपणे, स्वरूप लीनताए, समस्त व्याकुता रहित, सहजस्वभाव विला- सिपणारूप मुनि महात्माओने-योगीश्वरोने होय छे ६२ प्र-सद्गति अने दुर्गति ते शायी थाय छे ? ते विस्ता- रथी स्पष्ट समजावो उ०-शुभोपयोगे सदगति, अने अशुभोपयोगे दुर्गति, अशुभोपयोगे ससार लाभ अने शुझोपयोगे एटले स्वभाव परिणतिए तन्मयपणे परिमणता मुक्ति थाय, कारण के शुभ प्रकृतिने उदये जीवना योग शुभ वते, तेथी बर्म हेतु शुभ क्रिया साधना करे, तेयी पुण्य बाधे अने तेथी सद्गति थाय छे, तथा अ- शुभोपयोगे अशुभ कर्मनो उदय थता योग अशुभ वर्ते, तेथी अशुभ क्रिया विषयादि सेवे तेथी पाप वधाय छे, अने तेथी दुर्गति याय छे, ते माटे पुण्य पाप शुभाशुभयोगने आयत छे, अने वर्मावर्म ते शुद्धाशुल उपयोगने आयत छ, अर्थात् राग, द्वेष, मोहजनित अशुद्धोपयोगे अधर्म छे, तेज मिथ्यात्व छे, अने अशुद्धोपयोग ते रत्नत्रयरूप शुद्वात्म परिणति, वीतरागभाव तेज वर्म छे, असे तेज सम्यकत्व छे ६३ प्र०-रोगातक ते शु१ अथवा रोग अने आतक एटले शु" विचार रत्नसार ७८३ गुण, ४ अधोगति, सक्लेशख्य अशातादि दुख आपे ते पापनो गुण, ५ शुभाशुभ कर्मनु आवबु ते आस्रवनो गुण, ६ शुशोपयोगे शुभाशुभ कर्म आ- अवनो निरोव ते सवरनो गुण, ७ नर्वा कर्म पूर्व कर्मनी साथे मळीने माय ते बघनो गुण, ८ शु- भाशुभकर्म, आत्मप्रदेशयी साटन थाय, देशथकी ते निर्जरे ते निर्जरानो गुण, ९ आत्मप्रदेशयी सर्वांगे कर्म पुगलोनो क्षय ते मोक्षनो गुण जाणवो ६९ प्र०-केवा श्रावकने स्वसमय परसमयना जाण कहिये ? उ०-जीवाजीवादिक नवतत्त्वने यथार्थ जाणे एटले जीव निर्जरा, सपर अने मोक्षने उपादेयरूपे जाणी आदरे, अने अजीर पुण्य, पाप, आस्रव, अने बधने हेयरूपे जाणी तेनो त्याग करे तथा नव तत्तने चार प्रमाणे, साते नये, चार निक्षेप, द्रव्य- भाव मेदे, स्याद्वादशेलिए पह द्रव्यादि वेना गुण पर्यायना यथार्थ स्वरूप भासन पूर्वक जेणे भले प्रकारे जाण्या छे तेने ज्ञानी श्रावक कहिये ७० प्र०-कर्ताए कर्म अने क्रियाए बध ते शी रीते ? उ०-जेबो कर्त्ता होय तेवु कर्म निपजे, तथा ज्या जेवा हेतु त्या तेवी किया थाय, अने ते शुभाशुभ क्रियाए शुभाशुभ कर्म बध नीपजे, का छे के - दुहो कर्ता परिणामी द्रव्य, कर्मरूप परिणाम, क्रिया परजायकी फरे, वस्तु एक त्रय नाम ७८२ पिचार रत्नसार - . कर्मरूप जड जजीवन कहेबाय, ते ज्यारे सम्यक्त्व पामे त्यारे पोतापणु ओळसे, परवी पोताने न्यारो रखे अने तेयी ते परपराये अकर्मल्प पाय छे, माटे तेने पुरस्कर्म पुगल प्रत्यइया उदयआभि रट्या पण आत्मप्रतइया गया ए भार जाणवो ६७ प्र०-चार प्रकारे नर तत्चनु स्वरुप विस्तारयी कहो? उ०-१ नामयी एटले जीव अजीप पुण्य पापादि नव तत्वना नाम सूनयी गाथानुसार जाणे, २ गुणयी एटले जीवाजीवादि नर तत्त्वना गुण भेदादिक अर्थयी जाणे, लक्षण, स्वरूप लक्षणी एटले जीवन लक्षण चेतना, अजीवन लक्षण अचेतनपणु इत्यादि लक्षण स्वरूपे नव तत्त्व ओळखे, ४ परिणामयी एटले 'जीव जीवरूपे परिणमे, अजीव अजीवरूपे परिणमे इत्यादि नवे तत्त्व आप आपरूपे परिणमे ते परिणामयी चोथो मेद जाणवो ६८ प्र०-नवे तत्त्वोनु टुक लक्षण स्वरूप कहो उ०-१ जीव असख्यात प्रदेशी, अनत गुणमय ते शुद्ध चेतनागुण ते जीवनु लक्षण जाणवु, २ वर्णादि पाच अजीवना गुण ते जेम धर्मास्तिकायनो गुण चलण सहायकता, आकाशास्तिकायनो गुण अव- गाहन दान समर्थता, काळनो गुण समयवर्तना लक्षण अने पुद्गलास्तिकायनो सडण, पडण, नाश, मिल्ण, विखरणादि वर्ण गध रसादिरूप जाणवो, ३ तथा उर्ध्वगति, इद्रियसुख, शाता आपे ते पुण्यनो

विचार रत्नसार
७८५
जीव परिणामे द्रव्य छे, तेने सगे जीवने बुद्धि-
पूर्वक निज परिणाम देखाया -वादळे ढाकेलो सूर्य
मेष घटाए आच्छादित छे, तोपण सूर्यप्रभा प्रगट
अनुमाो करी जाणी लोको दिवस अने रात्रिनो
विभाग समजी के छे, तेयी सूर्य टीटो जेम Afr
तेम आत्मा पण जिन बचत
परिणामद्वाराए निर्मळ
जेम वूम दिठे अ
आत्मा, सम्यग्रह
अनुभवरूपे देखे
छे, एवीज रीते ।
पणु याय तेने से
निज स्वरूपे एकाते
जाण्यो, तेवोज रागद्वेष
स्वरूपाचरण चारित्र म
पूआइसु वयसहिय पूर्ण
मोहकोहविहीणो, परिण
ए स्वरूप चोथा गुणठाणेथ
विशुद्धतर, विशुद्धतम यथाय
(६३ प्रश्न)
७३ प्र०-निर्जरानु स्वरूप, द्रव्यथी तथा
अने मिथ्यादृष्टिने जेम होय ते
उ०-निर्जरा एटले कर्मनु साटन करवु,
मिय्यादृष्टिने निर्जरा, आस्रवचपर्व..
99

७८४ विचार रत्नसार -- . माटे श्री जैन दर्शन, उपयोगे तथा अमियभाने छे जैन दर्शन श्रद्धान शुद्धोपयोगे छे, जने शुद्धोपयोग आत्मभावे छे, अमियभारे छे, जने वीजा योगे क्रिया पर्म छे, एम स्यावाद शैली पूर्णतारूप सर्वो- कए सात्तम रीते महा कल्याणदायक श्री जिन- शासन जयतु वर्ते छे, तेने हे चेतन ।।। तु अत्यत आदरपूर्वक स्विकार । ७१ म०-सवरतत्त्वनु स्वरूप द्रव्ययी अने भावी कहो? उ०-योग प्रत्ययिक कर्मने मुनि तप सजमादिके करी निर्जरावे छे, अने वीजा आता कर्मनो रोव करे छे, तथा अशुशोपयोग प्रत्ययिक कर्मने रत्नग्यीरूप आत्मिकधर्मने विपे प्रणमावी शुशोपयोगे करी आ- त्मसत्ताने शुद्ध करी कर्म मळयी मुक्त थाय छे एम योगसवर आराधक मुनि, उदय आवता कर्मने निष्फळ करे, रोके ते द्रव्यसवर, अने उपयोग सवरे करी मुनि आत्मसत्ता शोधे एटले प्रदेशयी कर्म क्षय करे ते भावसवर, अर्थात् योग सवर ते द्रव्य अने उपयोग सवर ते भाव ७२ प्र०-छद्मस्थ सम्यक्हृष्टि, प्रत्यक्ष स्वरूप केम देखे ? उ०-परोक्ष प्रत्यक्ष अनुभवगोचर अनुमान प्रमाण प्रतीते प्रत्यक्ष वस्तु स्वरूप देखे एटले माने, ते आवी रीते -पोताना परिणाम जे शुभाशुभ कर्म जनित छे ते रागद्वेषद्वारे, सम्यक् बुद्धिमार्गे ते परिणा- मने पोते यथार्थ लखे, ते प्रत्यक्ष देखवु कहिये ते परिणाम आत्मद्रव्यथी शाथी उठे छे १ तो के विचार रत्नसार उ०-आत्मद्रव्यमा व्यनी शक्ति ते सम्यग्दर्शन, गुणनो प्रकाश ते सम्यगजान, अने पर्यायनु ठरणपणु अ- र्थात् स्थिरता ते सम्यरचारिन जाणयु, एमज दर्शन गुणे द्रव्य शक्ति प्रगटे, ज्ञानगुणे गुणो प्रकाशे अने चारितगुणे स्थिरता गुण एटले स्वरूप रमणता प्रगटे, वधे ७६ प्र०-उपयोग एटले शु? ते केटला छे, वगेरे फळ भेद स्वरूप स्पष्ट कहो उ०-चेतनानु शुभाशुद्ध परिणमन, तेने उपयोग कहिये ते वे प्रकारे छे, एक शुभ अने बीजो अशुञ्ज, शुद्धोपयोगे सिद्धिगति एटले मोक्ष याय, अने अ- शुद्धोपयोगमा बे मेद छे, एक शुभ अने वीजो अशुभ, त्या दान पूजादि परिणाम ते शुभोपयोग कहिये, तेणे करी पुण्यबध थाय, अने तेथी सद्गति पामे, अने हिसादि पापपरिणाम ते अशुभोपयोग कहिये, तेथी पापग्ध थाय, अने तेथी जीव दुर्गति पामे (प्र ६८) ७७ प्र०-पूर्वोक्त शुद्धाशुझोपयोग सम्यग्दृष्टि तथा मिथ्यादृष्टि आश्रि केवी रीते होय ते समजावो उ०-शुशोपयोग सम्यक्त्व पाम्या पछी होय छे, माटे ते सम्यक्दृष्टिने जाणवो, ते चोया गुणठाणाथी बा- रमा मुधी शुभोपयोग मिश्रित होय छे, पछी तेरमे पूर्ण पद थाय छे, अशुद्धोपयोग सेवे ससारी मि- थ्यावष्टि जीवोने होय छे, ते मन्ये मिथ्यावष्टिने , - ३५ विचार रत्नसार H- दृष्टिने सरक स्यभारनिर्जरा होय, केमजे तेने जानशक्ति अने पराग्यनु नळ छे तेथी, त्या जानशक्ति ते शुद्र सम्पनो अनुभम, जने पराग्याळ ते अशुद्रोपयोगनु निवारण, हवे जानोपयोगे भाव निर्जरा शी रीते थाय? ते देखाडे छे-राग, द्वेष मोहादि मलीनपरिणतिने घटाटवी ते भाव निर्जरा अने कर्मवर्गणानु घटाटा याय त्या द्रव्य निर्जरी जाणवी, एटले जे उदय आये ते निर्जरे, तेवा पाछा न पाय, बप जत्प अने निर्जरा वणी, एवी रीते ज्ञानशक्तिये वैराग्यनळे सम्यग्दृष्टि, द्रव्य भाव नि- जरा करे छे, मिथ्याटिने कर्म निर्जरा अल्प अने फरी व घणो थाय छे मार्गानुसारी सन्मुखभावी पण कर्म निर्जरा अवसरे अल्प बध करे, तोपण वस्तुगते सत्ता एटले कर्म शक्तिनी निर्जरी तो स- म्यग्दृष्टिने ज थाय छे (प्रन्न पा ६४) ७४ प्र०-आत्मप्रदेशे गुण पर्यायनी घटना शी रीते छे ? उ०-आत्माना असख्यात प्रदेश छे, एकेक प्रदेशे अनता ज्ञानादि गुणो, अनत शक्ति छे, वळी एकेक प्रदेशे उपयोग पलटणरूप ज्ञानादि गुणोना अनत पर्यायो छे, आवी शुझात्मप्रदेशे घटना जाणवी, अने अशुद्ध आत्मप्रदेशे पूर्वोक्त गुण पर्यायो एकेक प्रदेशे रहेली अनत कर्म वर्गणायुक्त छे, तेथी अशुद्ध संसारीपणे वते छे (पा प्र ६५) ७५ प्र०-दर्शन, ज्ञान, चारित्रनी प्राप्ति, आत्माना द्रव्य गुण पर्यायथकी सिम करो ३४ विचार रत्नसार ७८९ ARRAPARA छे के चढी गयो छे, ते जाणवा माटे ते टोपमाथी एक चोखो तपासी जोता सर्वनी खानी थाय छे, तेम लक्षणेलक्षित सम्यग्दर्शननु स्वरूप जाणवु ७९ (पाम ७०) प्र०-सम्यग्दृष्टि देशविरति तथा सर्वविरति महात्माओ सम्यग्दर्शनवडे आत्मानो अनुभव केवी रीते करे? उ०-जेम वस्तु विचारता, व्यान धरता भन विश्राम पामे छे, रस स्वाद सुख उपजे छे, परिणाम टरे छे, ते अनुभव प्रत्यक्ष जाणवु, जेम साकरना एक गाग- टाने चाखी जोता हजार मण साकरनो अनुभव थाय छे, तेम सम्यगृहष्टि जीव असे आत्माने बळी केवळी सदृश प्रत्यक्ष अनुभवे तेथीज का छे जे- असे होय इहा अविनाशी पुद्गल तमासीरे, चिदानद घन सुजश विलासी, केम होय जगनो आसीरे ए गुण वीरतणो न विसारु, सभारु दिन रातरे, पशु टाळी सररूप करे जे, समकितने अवदातरे ८० (पा प्र ७०म०-मुनिने सम्यग्दर्शननाबळे आत्मा स्वरूप प्रत्यक्ष अनुभवगोचर केवी रीते होय ? उ०-ज्या द्रव्य गुण पर्याय एकीमत अभेद रत्ननयरूपे मुनि प्रणमे, त्या स्वरूप निजपद कद प्रत्यक्ष देखे, स्वरूप रमण सुखास्वादन अनुभवे ८१ प्र०-दर्शन अने ज्ञानमा मूळ शु फेर छे १ तथा छद्म- स्थ सम्यग्दर्शनी अने केवळदर्शनी ए बेना देखावामा शो फेर ? na ७८८ विचार रनसार शुभ क्रिया होय पण शुभोपयोग नदि, केमजे गुभो- पयोग तो शुदना घरनो छे, ते तो सम्यग्दृष्टिने अणइच्छारूपे निकभारे होय छे, जने मिथ्या- वीने शुभोपयोग शुभ कियाम्प, शुभाचाररूप होय पण नियाणारूप एटले पौलिक गुस पाठास्प होय, ते माटे अशुभ जाणो (प्रत्यन्तरमा प ६९) ७८ प्र०-सम्यग्दर्शननु स्वस्प अनुमाने तथा लक्षणे सिद्ध करो उ०-श्री वीतराग देवना पचननी हद प्रतीति एटले श्री जिने भारस्यु तेज सत्य ते कदापि काळे अन्यथा न होय, भले मारी बुद्धिमा नयी आवतु तोपण वीतराग देवने मिथ्या कथन करखानु कइ पण प्रयो- जन दिसतु नयी, जेवु पोते केवळज्ञाने दीठ छे, तेवुज योग्य प्राणियोने केवळ हित बुद्धिए परम- करुणाभावे प्रकाश्यु छे, माटे सुइनी अणी जेटला प्रदेशमा अनता जीवो पण तेज वचन प्रतीतिरूप आगम अने अनुमान प्रमाणे सम्यक्त्वी माने ते तेवीज रीते आत्मा पण साक्षात् दीठो माने छे, वळी जीव चेतना लक्षणवत छे, चेतना ते सुख दुखनु भान, अने सुख दुखनो अनुभव वेदनीय कर्म द्वारे प्रत्यक्ष छे, तेथी ते लक्षणे सुख दुखनो जाणनार आत्मा छे, एम प्रतीति करे छे एम अश प्रत्यक्षे सर्व प्रत्यक्ष ययो, जेम एक मोटा टोपमा एक खाडी भात रधायेल तैयार थयो छे, ते काचो विचार रत्नसार ७८९ " छे के चढी गयो छे, ते जाणवा माटे ते टोपमाथी एक चोखो तपासी जोता सर्वनी खानी याय छ, तेम लक्षणेलक्षित सम्यग्दर्शननु स्वरूप जाणवु ७९ (पा ७०)प्र०-सम्यग्दृष्टि देशविरति तथा सर्वविरति महात्माओ सम्यग्दर्शनवडे आत्मानो अनुभव केवी रीते करे? उ०-जेम वस्तु विचारता, ध्यान धरता मन विश्राम पामे छे, रस स्वाद सुख उपजे छ, परिणाम ठरे छे, ते अनुभव प्रत्यक्ष जाणवु, जेम साकरना एक गाग- टाने चाखी जोता हजार मण साकरनो अनुभव याय छे, तेम सम्यगृहष्टि जीव असे आत्माने वली केवळी सहश प्रत्यक्ष अनुभवे तेथीज का छे जे- असे होय इहा अविनाशी पुद्गल तमासीरे, चिदानद घन सुजश विलासी, केम होय जगनो आसीरे ए गुण वीरतणो न विसारु, सभारु दिन रातरे, पशु टाळी सररूप करे जे, समकितने अवदातरे ८० (पा प्र७०)प्र०-मुनिने सम्यग्दर्शननाबळे आत्मा स्वरूप प्रत्यक्ष अनुभवगोचर केवी रीते होय ? उ०-ज्या द्रव्य गुण पर्याय एकीभूत अभेद रत्नत्रयरूपे मुनि प्रणमे, त्या स्वरूप निजपद कद प्रत्यक्ष देखे, स्वरूप रमण सुखास्वादन अनुभवे ८१ प्र०-दर्शन अने ज्ञानमा मूळ शु फेर छे' तथा छद्म- स्थ सम्यग्दर्शनी अने केवळदर्शनी ए वेना देखावामा शो फेर? M ૭૮૮ विचार स्नसार शुभ क्रिया होय पण शुभोपयोग नहि, केमजे गुभो- पयोग तो शुद्धना घरनो छे, ते तो सम्यग्दृष्टिने अणइच्छफरूपे निभाने होय छे, अने मिथ्या- वीने शुभोपयोग शुभ क्रियारूप, शुभाचाररूप होय फ्ण नियाणारूप एटले पौगलिक मुस पाठास्प होय, ते माटे अशुभ जाणो (प्रत्यन्तरमा म ६९) ७८ प्र०-सम्यग्दर्शननु स्वरूप जनुमाने तथा लक्षणे सिद्ध करो उ०-श्री वीतराग देवना पचननी हट प्रतीति एटले श्री जिने भाख्यु तेज सत्य ते कदापि काळे अन्यथा न होय, भले मारी बुद्धिमा नयी आवतु तोपण वीतराग देवने मिथ्या कथन करवानु कइ पण प्रयो- जन दिसतु नयी, जेवु पोते केवळज्ञाने दीठु छे, तेवुज योग्य प्राणियोने केवळ हित बुद्धिए परम- करुणाभावे प्रकाश्यु छे, माटे सुइनी अणी जेटला प्रदेशमा अनता जीवो पण तेज वचन प्रतीतिरूप आगम अने अनुमान प्रमाणे सम्यक्त्वी माने छे, तेवीज रीते आत्मा पण साक्षात् दीठो माने छे, वळी जीव चेतना लक्षणवत छे, चेतना ते सुख दुखतु भान, अने सुख दुखनो अनुभव वेदनीय कर्म द्वारे प्रत्यक्ष छे, तेथी ते लक्षणे सुख दुखनो जाणनार आत्मा छे, एम प्रतीति करे छे एम अश प्रत्यक्षे सर्व प्रत्यक्ष ययो, जेम एक मोटा टोपमा एक खाडी भात रवायेल तैयार थयो छे, ते काचो .

विचार रत्नसार ७९१ तथा काययोगे पटकायनी दयारूपे जयणापूर्वक प्रवर्तन छे जयचरेजयचिट्टे, इत्यादि ८३ प्र०-मुनि, रत्ननयना शुद्राराधनथी जन्म जरा अने मर- णना भय शी रीते टळे । उ०-सम्यग्दर्शनयी घणा जन्म मटे, सम्यगजानथी जरा दुख जे वेदना ते मटे, तया सम्यग्चारित्र गुणे मरण भय टळे, एम वण गुणे जन्म जरा मरणना भय मटे ८४ (७१)प्र०-आगमप्रमाण, अनुमानप्रमाण, उपमाप्रमाण, अने प्रत्यक्षप्रमाणे, आत्मानी सिद्धि दाखवो, अने ते प्रत्येक प्रमाण मानता जे फळ याय ने कहो उ०-१ आगमममाणे, पदव्य, पड्कायस्वरूपे जे वीत- रागे भाख्या छे ते वचनोने तहत्ति करी मानवा, पण सदेह के युक्तायुक्तपणु न करबु, ते मानता आत्माने प्रतीतिरूप सम्यग्दर्शन वर्मनी पुष्टि थाय, २ अनुमानप्रमाणे लक्ष्य लक्षणे निर्धार थाय, जेम मुख दुख वेदता' आत्मानु चेतना लक्षण जणाय छे, तथा जेम चूम दिठे अग्नि होयानी प्रतीति थाय छे, अहि आत्माने वस्तुगते अनुभवीने वस्तु- ना गुणनो अशे प्रत्यक्ष अनुभव थाय, ३ उपमा कहेवी ते, जेम " आजने काळे सम्यक्त्व पाम्यो ते जाणे केवलजान पाम्यो " एम, ए मानता आत्माने विनयगुणनी पुष्टि थाय, ४ प्रत्यक्ष प्रमाणे जेवा परमात्माए कया छे, तेवाज अने पुण्य पापना 20 पिचार एनसार छे तथा उ०-छद्मस्पने प्रथम देस एटले दर्शन उपयोग अने पछी जाणतु एटले ज्ञानोपयोग होय, उउमल्याण दसणपुव- नाण ॥ दर्शन ते सामान्यामोग, जने जान ते पिशे- पारोध जाणयो, दर्शन ते सामान्यानोव छे झात्काररूप प्रतिभास पाय योटो काल रहि पछे ज्ञान माहे मले ज्ञान विशेपानमोय छे वणो काल रहे ते माटे आत्मदर्शन जेणे कयु । तेणे मुद्यो भवभय कूपर " एम श्रीयशोविजयजीए पण का प्रवचन जजन जो सद्गुरु करे तो देखे परमनिपान जिनेशर एषु श्री लाभानदजीए पण का छे उद्मस्थ सम्यगदृष्टि आत्मस्वरूपने देखे, पण साक्षात् करामल्कात् एटले हायनी हथेलीमा रहेला पाणीमाजे होळीनी रेखाओ स्पष्ट देखाय तेम साक्षात् जसख्यात प्रदेशी, अरूपी आत्माने केवळदर्शनी ज देखे, पण उद्मस्य तो प्रतीते, अनुमाने अनुभवे, स्वरूपे देखे एटले जिनवचनप्रतीते आत्मद्रव्य स्वरूप दितु, अनुमाने चेतनालक्षणगुणे प्रत्यक्ष दिठो, अनु- भवे से परिणमनपर्यायरूपे अने स्वरूपे ते अभेद- रत्नानयात्मकनिजपदकद दिठो ए रीते आत्मस्वरूपनु दर्शन छमस्थ सम्यग्दृष्टिने सभवे छे ८२'प्र०-मुनिने प्रणयोग रत्नत्रयरूपे केवी रीते परिणमे छ। उ०-मनयोगे दर्शन श्रद्धानरूपे छे, जे वस्तुना निर्धारथी चळे नहि, वचनयोगे ज्ञान भणबु, यथार्थ उपदेश करे छे, सत्य प्ररूपा ज्ञानरूप परिणमन होय, , विचार रत्नसार तथा काययोगे पटकायनी दयारूपे जयणापूर्वक प्रवर्तन के जयचरेजयचिहे, इत्यादि ८३ प्र०-मुनि, रत्ननयना शुद्वाराधनयी जन्म जरा अने मर- णना भय शी रीते टळे ? उ०-सम्यग्दर्शनथी घणा जन्म मटे, सम्यगजानयी जरा दुख जे वेदना ते मटे, तया सम्यग्चारित्र गुणे मरण भय टळे, एम प्रण गुणे जन्म जरा मरणना भय मटे ८४(७१)प्र०-आगमप्रमाण, अनुमानप्रमाण, उपमाप्रमाण, अने प्रत्यक्षप्रमाणे, आत्मानी सिजि दाखवो, अने ते प्रत्येक प्रमाण मानता जे फळ याय ने कहो उ०-१ आगमप्रमाणे, षड्द्रव्य, षड्कायस्वरूपे जे वीत- रागे भाख्या छे ते वचनोने तहत्ति करी मानवां, पण सदेह के युक्तायुक्तपणु न करवु, ते मानता आत्माने प्रतीतिरूप सम्यग्दर्शन वर्मनी पुष्टि थाय, २ अनुमानप्रमाणे लक्ष्य लक्षणे निर्धार थाय, जेम मुख दुख वेदता' आत्मानु चेतना लक्षण जणाय छे, तथा जेम वृन दिठे अग्नि होयानी प्रतीति थाय छे, अहि आत्माने वस्तुगते अनुभवीने वस्तु- ना गुणनो अशे प्रत्यक्ष अनुभव थाय, ३ उपमा कहेवी ते, जेम " आजने काळे सम्यक्त्व पाम्यो ते जाणे केवलजान पाम्यो " एम, ए मानता आत्माने विनयगुणनी पुष्टि याय, ४ प्रत्यक्ष प्रमाणे जेवा परमात्माए कया छे, तेराज अने पुण्य पापना ७९२ पिचार रत्नसार प्रत्यक्ष फळ देगीए छीए, इत्यादि जाणा, एमा- नता आत्माने भराग्यता गुणनी पुष्टि याय, विषय कपायपी नितें एणी रीते चार प्रमाणे आत्माने गुण नीपजे . ८५ प्र०-निविध कर्मरोग कयो? उ०-१ द्रव्यकर्म ते आठ कर्मनी वर्गणा, २ भावकर्म ते अशुद्धोपयोग एटले आत्मानी रागद्वेपादि अशुद्ध परिणति, ३ नोकर्म ते औदारिकादि पाच शरीर, द्रव्यकर्मनी समीपे कारण कार्यभावे रह्या माटे तेने नोकर्म कहिये, ते नण कर्मरोगना वैद्य श्री परमा- त्मा तथा गणवरादि महात्माओ छे, तेओ पण विविध औषधरूप ण प्रकारनी देशना आपे छ- १ यथार्थवाद, २ विधिवाद, ३ चरितानुवाद, तेनो अर्थ-१ यथार्थवाद देशनामध्ये जीवाजीवादिक स्वरूप वार्यो, परिणम्या तेथी वस्तु तत्त्वनो प्रकाश थाय, तेणे करी, भावकर्म रोग मटे, रागद्वेषादि विपर्यासपणु टळे, अज्ञाननो उच्छेद थाय, २ वि- विवाद देशना मध्ये देशविरतिपणु, सर्वविरतिपणु इत्यादि क्रियानो आदर, शुभोपयोगे आचरतो, प्रा- णीनो द्रव्यकर्म रोग नाबुद थाय, अनादि कर्मकाट उतरे, आत्मप्रदेश निर्मळता निपजे, तेयी जीवने घणी शाति प्रवते, ३ तथा चरितानुवाद देशना मध्ये शरीर सबधी काम भोग विषयकषायादि म- लिनतानु निवर्तन थाय, जेम जबुस्वामी, सुदर्शन

विचार रत्नसार
७१३
"
शेठ, मेतार्यजी आदि महात्माओना चारिन साभळे
थके परम वैराग्य शात रस प्रगटे, तेथी नोकमनो
रोग टळे
८६ प्र०-दर्शनादि जनत चतुक प्राप्तिना कारण तथा स्थान
कहो
उ०-१ वर्म रूचि साभळयो, तथा ज्ञानाभ्यासमा उद्यम
रूचि होय तेटलायी सम्यग्दर्शन गुण प्रगटे, २
तत्त्वातत्त्वगवेपक बुद्धि होय तेथी सम्पम् ज्ञानगुण
प्रगटे, ३ पाच इद्रिय विषय विकार, क्रोवादि कषाय,
पाच प्रमाद इत्यादिनी जे त्याग बुद्धि होय तेथी
चारित्रगुण निपजे, ४ वस्तुगते, स्वरूपानुभव लग्नता,
तल्लीनता होय तेयी वीर्यगुण प्रगटे, हवे ते चारेना
स्थान कहे छे-दर्शनगुणनु स्थान चक्षु, ज्ञानगुणन
स्थान हृदय, चारित्रगुणनु स्थान चरण, अने उत्साह
इच्छादिरूप वीर्यगुणनु स्थान बाह छे
८७ प्र०-अहिंसानु स्वरूप तथा तेना विविधमेदो हटात सहित
समजावो उ० मूल जूनी हस्तलिखित प्रतिमा हिंसाना
भेदो सत्रधी प्रश्न छे स्वरूप हिंसा, अनुवध हिसा,
द्रव्य हिंसा, भाव हिंसा, बाह्य हिंसा, परिणाम हिंसा,
योग हिंसा, इत्यादि हिंसाना घणा मेद छे साधुजी नदी
उतरे छे पण मोक्षवर्ति (मुख्यताए) हिंसाना परिणाम
नयी तेथी तेस्वरूप हिंसा जाणवी तथा सभ्यगरिने
देव पूजा, गुरुवदना, साधुने आहारदान इत्यादि कार्ये
हिंसा अल्पवरूप छेते माटे ते स्वरूप हिंसा कहेवी,
100

७९४ विचार रत्नसार रागद्वेप परिणामे जे मदबुद्धियी उकाय जीमोने हणे ते तरतमअव्यवसाये महाफर्मय करे तेना अशुभ विपाक उदये आये ते अनुरूप हिंसा जाणी अ- नुपयोगे दन्यहिंसा अने तीन परिणामे भाव हिंसा याप स्वरूप हिंसामाहे बाह्य हिंसा तथा योग हिंसा भळे छे तथा एफ जीवमे हिंसा अल्प पण उदयकाले दुख विशेप पामशे ते शेणे ' दुष्ट अथ्य- सायना अभावे उदय आव्या कर्म निष्फल करे छे दढ महारीनी पेठे इत्यादि चोभगीजो अहिंसा अष्टक ग्रन्थमध्ये विस्तारे छे यथा एकस्यात्पाहिंसा ददाति काले तथा फलमनल्प अन्यस्यमहाहिंसा स्वल्पफला• भवतिपरिपाके इत्यादि । 3०-१ स्वरूप आहिंसा, ते जीववध न करखो, वेनु बीजु नाम बाह्य अहिंसा के योग अहिंसा पण छे, २ हेतु अहिंसा ते जयणाए प्रवर्तन, छकाय जीवनी रक्षा प्रवृत्ति, ३ अनुबध अहिंसा ते रागद्वेषादि म- लिन अध्यवसाय, तीव्र विषय कषायना परिणामे हिंसानो त्याग जेथी फळ विपाकरूपे आकरो कर्म- बध न पडे ते, ४ द्रव्यआहिसा एटले अनुपयोग हिंसानो त्याग, ५ परिणाम अहिंसा के भाव अ- हिंसा ते उपयोग पूर्वक परिणमीने इरादायी जे हिंसा करवी तेनो त्याग इत्यादि अनेक भेद जाणवा, हवे क्रिया फळ भेदरूप चौभगी देखाडे छे-१ हिंसा अल्प, फळ विपाक अल्प, २ हिंसा अल्प, फळ विपाक तीव्र, ३ हिंसा तीव्र, फळ विपाक अल्प,

विचार रत्नसार
७९५
४ हिंसा तीत्र, अने फळ विपाक तीन, ए भेद
जीवना अध्यवसाय भेद विपेशे, विपाक फळनो पण
भेद जाणवो, अहि जमाली, द्रढमहारी, चिलाती पुत्र
कुर्गडुजी इत्यादि दृष्यातो यथासभवे भाववा
८८ प्र०-इच्छादिक त्रण योगनु स्वरूप समजावो
उ०-१ इच्छायोग ते शुभ करणी वतादि आदरखानी
उत्साह इच्छा, दश प्रकारे यतिधर्म आदरखानी इच्छा
२ शास्त्रयोग ते हेय, ज्ञेय अने उपादेय मध्येथी
उपादेय ते अगीकार कखु ते प्रमाणे शास्त्रानुसार
विधिपूर्वक व्रतादि पाळवु ते, ३ सामर्थ्ययोग ते
कोइ आत्मा, ज्ञान अने वैराग्यनी माळ शक्तिये
अनत काळ भोगबवा योग्य जे कर्म तेने योडा
काळमा भोगवी क्षय करे, योगदृष्टिसमुच्चय ग्रन्थे
पण योगनी व्याख्या करी छे श्री गजसुकुमालजीनी
पेठे, का छे जे
,
१
क्रियायोग अभ्यास हे, फळ हे ज्ञान अवध,
दोनुकु ज्ञानी भजे, एकमति मतिअव
इच्छा शास्त्र समर्थता, निविध योग हे सार,
इच्छा निज शक्ति करी, विकल योग व्यवहार २
शास्त्रयोग गुणठाणको, पूरण विधि आचार
पद अतीत अनुभव कह्यो, योग तृतीय विचार ३
रहे यथावळ योगमे, ग्रही सकळ नय सार,
भावजनता सो लहे, चहे न मिथ्याचार

७९६ विचार रत्नसार -------- ८९ प्र०-द्रन्य, गुण, पर्याय, शायी गड्या छे ? उ०-द्रय, ज्ञानापरणीदि कर्मना आवरणे,तथा गुण, रागद्वेष विभावपरिणतिए, अने पर्याय, मनोयोग कपनाए विकारभारने पाम्या छे ९० प्र०- मति तथा सूतज्ञानी अने अज्ञानी जे जिनवाणी साभळे तेने शी रीते परिणमे' उ०-मति अज्ञानीने विकल्परूपे तथा डामाडोळपणे परि- गमे, तया मतिजानीने निविकर पपणे तया निर्धा- रतारूपे परिणमे, श्रुत ज्ञानीने वैराग्यरूपे तथा आ- स्तिकपणे परिणमे, श्रुत अज्ञानीने विषयरूप तथा नास्तिकरूपे परिणमे, एटले (माटे) सम्यग्दृष्टि जीवो जिनवाणी साभळवाना अधिकारी जाणवा ९१ प्र०-जीव कर्म साथे केवी रीते मळेल छे ? ते दृष्टात सहित समजावो उ०-द्रव्यार्थिकनये जीव, तुवीमृत्तिका न्याये कर्म सगाथे मळेल छ, एटले जेम तुबडी उपर माटीनो थर लाग्यो होय पण तुबडीनी अदर कई बगाड न होय तेम आत्माने कर्मनो सबव जाणवो, तथा पर्या- याथिकनये आत्मा, कर्म सगाथे खीरनीरपरे, एकरूपे लोलिभूत थयो थको चतुर्गति भ्रमण करे छे ९२ प्र०-सोळ सज्ञा ते कइ अने तेमाथी कया जीवने के- टली होय ते कहो? उ०-१ आहार, २ भय, ३ मैथुन, ४ परिग्रह, ५ क्रोध, ६ मान, ७ माया, ८ लोभ, ९ ओघ, १० लोक,

विचार रत्नसार
११ सुख, १२ दुख, १३ मोह, १४ वितिगिच्छा,
१५ शोक, १६ वर्म, ए सोळ सज्ञाओमाथी पेहेली
दस सज्ञा एकेन्द्रियने, तथा ओघ सिवाय बाफीनी
पदर बेन्द्रियादिकने होय अने पचेन्द्रियने सोळे
सज्ञा होय
,
.
-
९३ प्र०-क्रोधादि दोयोनी मुख्यता जीवभेद विशेषताए कहो
उ०-चारगतिमा, क्रोध, नरकमा, मान मनुष्यमा, माया
तिर्यचमा अने लोभ देवगतिमा मुख्य होय छे, हवे
मनुष्य जातिमा क्रोध रजपुतने, मान क्षत्रियादि
कुळवानने, माया गणिका तथा वणिकने, लोभ
ब्राह्मणने, राग स्नेही भिनादिने, खेद तथा द्वेष ते
कायर क्लेशी, अदेखा, तथा दीनदु खीआ सोगीने
होय, शोक जुगारीने, चिन्ता चोरनी माताने, भय
ते कायरने तथा कृपणादिने विशेष होय
९४ प्र०-धर्म अने कर्म विपे यथायोग्य खुलासो करो
उ०-धर्म ते आत्मभावे शुद्धोपयोगे होय, अने कर्म ते
अशुद्धोपयोगे करणी क्रियाए तथा शुभाशुभभावे
भवितव्यताए याय, कर्म ते क्रियाए अने धर्म ते
अक्रियारूपे होय जेवी शुद्धोपयोगनी तीव्रता तेवी
धर्मनी वृद्धि जाणवी
९५ प्र०-जिनना चार निक्षेपाना स्थान शरीरमा क्या छ ?
उ०-नाम जिननु स्थान जीभमा छे,स्थापना जिननु चकुमा,
द्रव्यजिननु मनोयोगमा, केम जे श्रद्धा मनमध्ये छे
तेथी, अने भावजिननु स्थानक हृदयमा छे

विचार रत्नसार ८९ प्र०-द्रय, गुण, पर्याय, शायी गच्चा छे ? उ०-द्रय, जानापरणीदि कर्मना आवरणे, तथा गुण, रागद्वेप विभावपरिणतिए, अने पर्याय, मनोयोग कपनाए विकारभारने पाम्या छे ९० प्र०- मति तथा ऋतज्ञानी अने अज्ञानी से जिनवाणी साभळे तेने शी रीते परिणमे ? उ०-मति अज्ञानीने चिमत्परूपे तथा डामाडोळपणे परि- णमे, तथा मतिज्ञानीने निविकपपणे तथा निर्धा- रतारूपे परिणमे, श्रुत ज्ञानीने वराग्यरूपे तथा आ- स्तिकपणे परिणमे, श्रुत अज्ञानीने विषयरूप तथा नास्तिकरूपे परिणमे, एटले (माटे) सम्यग्दृष्टि जीवो जिनवाणी साभळवाना अधिकारी जाणवा ९१ प्र०-जीव कर्म साथे केवी रीते मळेल छे ? ते दृष्टात सहित समजावो उ०-द्रव्यार्थिकनये जीव, तुवीमृत्तिका न्याये कर्म सगाथे मळेल छे, एटले जेम तुबडी उपर माटीनो थर लाग्यो होय पण तुबडीनी अदर कई बगाड न होय तेम आत्माने कर्मनो सबध जाणवो, तथा पर्या- यार्थिकनये आत्मा, कर्म संगाथे खीरनीरपरे, एकरूपे लोलिभूत ययो यको चतुर्गति भ्रमण करे छे ९२ १०-सोळ सज्ञा ते कइ अने तेमाथी कया जीवने के- टली होय ते कहो? उ०-१ आहार, २ भय, ३ मैथुन, ४ परिग्रह, ५ क्रोध, ६ मान, ७ माया, ८ लोभ, ९ ओध, १० लोक, ,

विचार रत्नसार
७९७
११ सुख, १२ दुख, १३ मोह, १४ वितिगिच्छा,
१५ शोक, १६ वर्म, ए सोळ सज्ञाओमाथी पेहेली
दस सज्ञा एकेन्द्रियने, तथा ओघ सिवाय बाकीनी
पदर वेन्द्रियादिकने होय अने पचेन्द्रियने सोळे
सज्ञा होय
,
९३ प्र०-क्रोधादि दोपोनी मुख्यता जीवभेद विशेषताए कहो
उ०-चारगतिमा, क्रोध, नरकमा, मान मनुष्यमा, माया
तिर्यंचमा अने लोभ देवगतिमा मुख्य होय छे, हवे
मनुष्य जातिमा क्रोध रजपुतने, मान क्षनियादि
कुळवानने, माया गणिका तथा वणिकने, लोभ
ब्राह्मणने, राग स्नेही भिनादिने, खेद तथा द्वेष ते
कायर क्लेशी, अदेखा, तथा दीनदु खीआ सोगीने
होय, शोक जुगारीने, चिन्ता चोरनी माताने, भय
ते कायरने तथा कृपणादिने विधेप होय
९४ प्र०-धर्म अने कर्म विपे यथायोग्य सुलासो करो
उ०-धर्म ते आत्मभावे शुद्धोपयोगे होय, अने कर्म ते
अशुद्धोपयोगे करणी क्रियाए तथा शुभाशुभभाये
भवितव्यताए याय, कर्म ते क्रियाए अने धर्म ते
अक्रियारूपे होय जेवी शुद्धोपयोगनी तीव्रता तेवी
धर्मनी वृद्धि जाणवी
९५ प्र०-जिनना चार निक्षेपाना स्थान शरीरमा क्या छ ?
उ०-नाम जिननु स्थान जीभमा छे,स्थापना जिननु चक्षुमा,
द्रव्यजिननु मनोयोगमा, केम जे श्रद्धा मनमध्ये छे
तेयी, अने भावजिननु स्थानक हृदयमा छे

७९८ विचार रत्नसार ९६ ०-द्रव्येदिय तथा भांदिपनो भेद समजारो तया ते शायी भरेल छे' ते कहो उ०-द्रव्येंद्रिय ते जाकार शिप जाणनी ते मळ, मूत्र, रुधिर, मासादि अशुभ पुगटयी भरी छे, भायेंद्रिय ते इदियद्वाराए उपल ध निकारी ज्ञान ते रागद्वेषादि विकारोयी भयु छे ९७ प्र०-आहारादि चार सज्ञानु स्वरूप सविस्तर कहो उ०-१ आहारसज्ञाथकी जीप अनादिकाळनो पुद्गल खान- पानादि वासनाथी निरतर भरेलो अतृप्त वर्ते छे, २ भयसज्ञाए चारे गतिमा सदा कपतो रहे छे, भैथुनसज्ञाए इद्रिय विषयभिलाषिपणे भमतो फरे छे, ४ परिग्रहसज्ञाए धन, स्त्री, पुनादिनी निरतर ममताए मेळवु मेळवु करी रह्यो छे, तेणे करीनेज सदा कषायतापे तपेलो, ससारमा ढोकळानी पेठे सीजाय छे, छता सुख मानी रह्यो छे, ए चार सज्ञामध्येयी पहेली आहारसज्ञा ते वेदनीय कर्म- जनित छे, शेष त्रण मोहनीयजनित छ, वळी आ- हारसज्ञाए शरीरपरत्वे हिंसादि अनेक पापकर्म हेतु प्रवर्ते छे, हिंसाथी कमों घणा थाय छे, एथी पापमध वधे छे, अने तेथीज अशाता वेदनीय प्रबळ पामे छे, तथा भयसज्ञाए कल्पना कर्मयोगे व्यक्ताव्यक्तकर्म बधाय छे, तथा मैथुनसज्ञाए विष- यना अने परिग्रहसज्ञाए कषाय वृद्धिना धणा तीव्र कर्म बवाय छे, एम चारने जोरे जीव अधोगतिए , विचार रत्नसार. - जाय छे, ससार परिभ्रमण घणो थाय छे, वळी यीजी रीते विचारीए तो आहारसज्ञाए शरीरपुष्टि तेणे करी हिंसक प्रवत्ति, तेणे करी दुख प्राप्ति, तेथी जातध्याननी वृद्धि तेथी दुर्गतिमा अनतोकाळ जीव भमे छे, माटे उत्तम जीवोने आहार अने निद्रा अल्पज होय छे, एमज भयसज्ञाए कल्पना- जाळ वधे छे, तेथी रागदेषादि मलिनपरिणति ववे छे, तेथी अष्टकर्मनो निविडयव थाय छे, चतुर्गति- भ्रमण वारवार याय छे, तेमज भैयुनसज्ञाए विषय सेवे, तेथी पोताना रत्नत्रयी गुणने आवरे, तेथी जीव ससारमा सर्वर हीणअकल, मूढ, दरिद्री यो थको घणी अशाता सर्वन पामे, एवी रीते परिग्रह सज्ञाए कपायबध घणो याय, तेथी ससार दीर्घ थाय, एम आ ससारना मूळ हेतुरूप जीवने आ महा बावककारी अनादिकाळनी लागेली भव- वासना टाकणोरूप चार सज्ञाओ छे, वेने जेम बने तेम उत्तम जीवे ज्ञान ने वैराग्य शक्तिये, परमात्मा- ना शरणे जइने वश करवानो प्रयत्न करवो, ए चारमाथी पहेली बे आहार अने भय सज्ञा साधुने छठा सातमा गुणठाणाथी निवतेंछे मैथुनसज्ञा नवमे गुणठाणे निवर्ते छे, अने परिग्रह, लोभ, ममतादि दसमे गुणठाणे निवर्ते छे, माटे गुणटाणानी विशुद्ध परिणति पामवा माटे ए चार सज्ञानी मदता थवी जोइए, तेनी तीव्रताए जीव निगोद सुधी जाय छे, अने मदताए उर्ध्वगतिए चढे छे, केम जे जीवने ८०० विचार रत्नसार. - . मूळ ज्ञान, दर्शन जने चारिन ए मुख्य गुण छे, तेमा दर्शन तो सामान्य अपनोवरूप होवाथी ते विशेप अपनोवस्प ज्ञानगुणमा समाय छे, तेथी जान अने चारिन ने रखा, वेमा ते निमित्त कारण, अने चारिन ते उपादान कारणरूप छे, ते उपादान कारण सेचनम्पे चार सजानी मदताए जीव उचो चढे छे ९८ प्र०-सिदना जीवने अनता गुण छे, ते समपणे छे के विषमपणे छे? उ०-निरावरणआश्रयी समगुणे छे, पण आप आपणा गुणना पर्याय वर्माश्रयीविषमपणे छे ९९ प्र०-पाणेकरी जे जीवे तेने जीव कहिए तो सिद्धने जीव केम कहेवामा आवे छे? उ०-सिद्धने द्रव्यप्राण नथी, पण भावमाण चार छ, देना नाम -१ अनतज्ञान, २ अनतदर्शन, ३ अनतमुख, अने ४ अनत वीर्य, ए चार भावप्राणे सिद्ध जीवे छे, तेथी सिद्धने जीव कहीए, ए भावमाण आवरणे द्रव्यप्राण सापडे छे, ते कर्मजनित छ केम जे स्वाभाविक अनतदर्शनरूप भावप्राणने आवरणे ई. द्रियप्राण थया, तेमज स्वज्ञानरूप भावप्राणने आब- रणे श्वासोश्वास प्राण उपज्यो, स्वाभाविकसुखरूप -भावप्राणने आवरणे आयुप्राण उपज्यो, स्वामाविक अनतबळ वीर्यप्राणने आवरणे मनोवळ, वचनबळ, कायबळ, ए विभाविक प्राण उपज्या ए अधिकार । अध्यात्मसार ग्रन्थ मध्ये कयो के -

विचार रत्नसार
२०० प्र० लेश्या कया कर्मयोगे छ ।
उ०-लेश्या, योग प्रत्ययिक नामकर्मजनित छे, अने शुभा-
शुभ परिणामरूप लेश्या भापकर्मजनित छे
१०१ प्र०-वीस विहरमान तीर्थंकरो सनी जघन्य, मध्यम,
अने उत्कृष्ट, समकाळे जन्म दीक्षा, ज्ञानादि हकी-
कत सविस्तर समजामो
उ०-महाविदेहक्षेत्रमा श्री विहरमान तीर्थंकरो केवळीपणे
विचरे छे, वळी कोड पाळकपणे, कोइ राज्यावस्थाए,
कोई गर्भमा होय, त्यारे जघन्यकाळे अढीद्वीपमा
१६० विजयमा १६८० होय, ह्ये हाल वीस प्रभु
छे, ते जेवारे जन्मयकी एक लाख पूर्व आयुना
याय त्यारे वीजा प्रभु जन्मे, वळी गर्भमा पण
होय, एम गर्भना तीर्थकर प्रभु न गणाय, तेथी
चोरासी लाख पूर्वायुमा तीर्यकरना जीवो बाल्या-
वस्थामा, युवास्थामा, राज्यावस्थामा तथा श्रमणा-
वस्थामा तथा केवळी अवस्थामा सर्वे मळी ८३
तीर्थकरो होय, ते सख्याने वीसगुणा करीए त्यारे
१६६० थाय, ते मध्ये वीस विचरता मेळीए त्यारे
१६८० याय, अने ज्यारे उत्कृष्टपणे अढी द्वीपमा
१७० प्रभु केवलिपणे विचरे छे, त्यारे एकएकना
अवतारमाहे ८३ तीर्थकर उपजे, तेने १६० गुणा
करिए त्यारे १३२८० थाय तेमा १७० वर्तता
मेळीए त्यारे १३४५० थाय एटलु अचलगच्छ
नायके का छे, जिम साभळ्यु तिम लख्यु छे
पछे तो जेम केवलज्ञानीए प्रकाश्यु तेम सत्य,
101

विचार रत्नसार. मूळ ज्ञान, दर्शन जने चारिम प मुत्य गुण छे, तेमा दर्शन तो सामान्य आगोवरूप होवायी ते विशेष अनोपम्प जानगुणमा समाय छे, तेथी जान अने चारित्र रेखा, तेमा ते निमित्त कारण, अने चारिन ते उपादान कारणरूप छे, ते उपादान कारण सेचनरूपे चार सजानी मदताए जीव उचो चढे छे ९० प्र०-सिद्धना जीवने अनता गुण छे, ते समपणे के के विषमपणे छे ? उ०-निरावरणआश्रयी समगुणे छे, पण आप आपणा गुणना पर्याय धर्माश्रयीविषमपणे छे ९९ प्र०-माणेकरी जे जीवे तेने जीव कहिए तो सिद्धने जीव केम कहेवामा आवे छे ? उ०-सिद्धने द्रव्यमाण नथी, पण भावप्राण चार छे, वेना नाम -१ अनतज्ञान, २ अनतदर्शन, ३ अनतमुख, अने ४ अनत वीर्य, ए चार भावप्राणे सिद्ध जीवे छे, तेथी सिद्धने जीव कहीए, ए भावप्राण आवरणे द्रव्यप्राण सापडे छे, ते कर्मजनित छे केम जे स्वाभाविक अनतदर्शनरूप भावप्राणने आवरणे ई. द्रियमाण थया, तेमज स्वज्ञानरूप भावप्राणने आव- रणे श्वासोश्वास प्राण उपज्यो, स्वाभाविकसुखरूप -भावप्राणने आवरणे आयुप्राण उपज्यो, स्वामाविक अनतबळ वीर्यप्राणने आवरणे मनोवळ, वचनबळ, कायबळ, ए विभाविक प्राण उपज्या ए अधिकार । अध्यात्मसार ग्रन्थ मध्ये कयो के ,

विचार रत्नसार
८०३
,
Ms
.
आटमायकी नयी वळी, एम सित्तरादि याय,
परपरा पूर्वे जेम कही, लेवी एम सदाय ११
दशवीशना एकण समे, जिनवर जन्म कहात,
भरतरवते दिन हुए, पाच पिदेहे रात १२
आगमे एणिपरे भाखियु, च्यवन जन्म अवरात,
भरतखत रजनि होय, दिवस विदेह विख्यात १३
वीश सिंहासन सहु, दोय मेरु पच लाब,
दो दो पूर्व पश्चिमे, एक दक्षिण उत्तर साध १४
चार जन्म एक विदेह प्रत्ये, पाचे मळीने वीश,
भरतरवते दश हुए, एक समये जन्म ल्हीश १५
वीश पाश जन्मे विदेहे सही, साठसो विजय पुराय,
लाख चोराशी पूर्वायु तस, वनुष्य पाचशे काय १६
चढते दोय पटते उणे, आरे वर्म कहाय,
भरतखत ते सही, विदेहे वर्म सहाय
परावर्तन काळ भरहेखय, लेखो इहायी लेय,
चोथो नित्य विदेहमा, आणदरुचि भणेय
१८
जिनवर ए नित्य समरता, लहिये सपद कोट,
पडित पुण्यरुचि गुरु, शिष्य कहे करजोड
१०२ प्र०-चक्रवर्तिना १४ रत्न कया अने ते क्या उपजे?
3०-१ चक, २ असि, ३ न, अने ४ दड ए चार
रत्नो आयुधशाळामा उपजे, ५ मणि रत्न, ६ का-
गणी रत्न, ७ चर्म रत्न, एरण निवानमा निपजे
८ पुरोहित ९ सेनापति, १० गायापति, ११ वा-
बिक, ए चार रत्नो पोताने नगरे उपजे १२ स्त्री

८०२ शिवार रत्नमार - १ २ गापा-सत्तरिसयमुकोस, सहाय वीस मिहरमाण जिणा, समयसित्ते दस पा, जम्मपा वीसदसग पा॥ ए प्रवचन सारोबार ग्रन्थनी गाया जाणी तथा दोहरायी गायानो भाव जाणमो विरमान जिन चैत्यवदन विवरो ए गायातणो, कार लेन्यो सभाल, सित्तरिसो जिनपर हुरे, कहे के अड काल चढते काळ उत्सपिणी, वार जटम जिन, एकसो सित्तर जिनपर हुवे, एणीपरे सुणो सज्जन पाच विदेहे मेळवी, साटसो विजय उप्पन, भरतैरवत दस मीळे, सित्तेरसो होय जिन ३ पटते काळे अपसपिणी, सोलम जिन लगे हुत, भरतपरते जिन हुवे, साठसो विदेह लहत केवळी कइ बाळ परण्या, वयणे एहज सोय, आठमा जिनयी सोलम लगे, विरह विदेह न होय ५ सोलमा जिन साथे सहु, मुक्ते जाय जिन भाण, विरहसमे सहु क्षेत्रमा, अक्षर एह पिछाण सत्तरमा जिन होय भरह, पच जैवत मली दश, समयक्षेन दश कह्या, लेवा एह अवश्य सत्तर अढारह जिन वचे, जन्मे वीश विदेह, वीस एकवीसमा बचे, सयम केवळ देह भरतैरवत दश मळे, मध्यम साप्रत त्रीश, चोवीशमा जिन शिव गये, विदेह विचरे वीश अनागत चोवीशी सातमा, आठमा बच्चे निर्वाण, विरह पडे सह क्षेत्रमा, अष्ट्रमे न होय जिनभाण १० , , or विचार रत्नसार ८०५ 3०-जघन्यथी साडापार लाख अने उत्कृष्टयी साड़ीपार क्रोड सोनैया वरसावे अद्भतेरस कोडी, उकोसा तत्य होई वसुधारा । अद्वतेरस लक्खा, जहनिया होई वसुधारा ॥ १ ॥ १०५ ०-चउद मोटी विद्याना नाम कहो ? उ०-१ नभोगामिनी, एटले आकाशमा गमन करवानी विद्या, २ परशरीर प्रवेशिनी, ३ रूप परावर्तिनी, ४ स्तभिनी, ५ मोहिनी ६ सुवर्ण सिद्धि, एटले सोनु जनाववानी विद्या, ७ रजत सिद्धि, एटले रुपु बना- बवानी विद्या, ८ रससिद्धि, एटले रससिकादि रस करवानी विद्या, ९ बध मोक्षिणी, एटले गमे तेवा बधनमायी मुक्त करवानी विद्या, १० शन पराभ- विनी, ११ वश्य करणी, १२ भूतादि दमिनी, खुटले सर्व अग्निना उपदाने समापनारी विद्या, १३ सर्व सपत्करी, १४ शिवपद प्रापिणी १०६ प्र०-आचार्य महाराज आत्मस्वरूप पच प्रस्थानने ध्यावे एटले शु? उ०-ध्याननी पाच अवस्था साचवामा सावधान आचार्य भगवत, पचपद आराधे छे, तेना नाम १ अभय, ते जरिहतनु व्यान, २ अकरण, ते सिघ्नु ध्यान, ३ अहमिंद्र, ते आचार्यनु ध्यान, ४ तुल्य एटले उपाध्यायनु ध्यान, ५ कल्प एटले साधुनु ध्यान, ते समान अवस्थाए पच प्रस्थानमय आचार्यजी के

८०४
पिचार रत्नसार
रत्न ते राजकुरळे उपजे, गजरत्न अने अश्वरत्न ए
रेतात्म्य पत उपर उपजे
१०३ प्र०-ना निधान ते कया अने ते त्या प्रगटे ?
उ०-गगानदीने तटे नानिधाननी ना पेटी प्रगटे छे,
ते प्रत्येक पेटी १२ योजन लायी, नव योजन
पहोळी, अर्घ योजन उची, ते योजन आत्मागुल
प्रमाण जाणना, अने नानिधि मजुसने आकारे छे,
डुर्यमणिरत्नमय कमाड छे, तेना तथा तेमानी
वस्तुना नाम कहे छे-१ नैसप्पिक, तेमा नगर
निवेस ग्रामादि उत्पादक विधि छ, २ पाडुक, तेमा
वान्य वीजादिकनी सर्व सपत्ति छ, ३ पिंगळ, तेमा
नर नारी हय गयना विविध आभरणो छे ४
महापद्म, तेमा चउदे जातिना रत्नो छ, ५ मल्लि,
तेमा विविध प्रकारनी सुगधि पुष्पादि विगेरे वस्तुओ
छे, ६ काळ, तेमा त्रिकाळ ज्ञानना, पुस्तको छे,
७ महाकाळ, तेमा सोनु, रुपु, झवेरात, लोह वि-
गेरे सर्व द्रव्य अखट छे, ८ माणक नामे तेमा
राजनीति, युजनीति अने सर्व हथीयार युद्धनी नीति
छे ९ सुखनिधि, तेमा चतुर्विध नाटकादि सगीत
शास्त्रादिना ग्रथो छे, ते प्रत्येक निधाने एक हजार
व्यतर , देवो अधिष्ठायक छ, तेनु आयु एक पल्यो-
पमनु छे
१०४ प्र०-प्रभु ज्या पारणु करे त्या बनवृष्टि देवताओ केडली
करेछे

विचार रत्नसार पामे, अने अविरति उदये चारिन गुणस्थान न पामे, पण ज्यारे जीवने तथाविध परिणमन उपयोग एकाग्रता थाय, त्यारे ते सुखरूप ज्ञानचारित्रमय सपूर्ण वर्मने पामे ११० प्र०-द्वादशागीना केटला पदो छ? उ.-" कोटीशत द्वादशश्चै व कोट्यो लक्षाण्यशीति अधिकानिचैव पञ्चशदष्टौ च सहस्र सरस्यामेतत्त पञ्चपदननामि " ॥ १ ॥ एटला पद छे, एकावन्न कोडीओ, लक्खा अढे व सहस्स चुल- सिही। सयछक साढा, एकवीस पयगथा ॥१॥' एटला एक पदना होकनी सरल्या जाणवी १११ प्र०-चौढ पूर्वना नाम तथा ते प्रत्येकना पदनी सख्या कहो ? 3०-१ उत्पाद पूर्व, पदसख्या ११ कोट, २ अग्रायणीय पूर्व, तेमा ९६ लाख पद छे, ३ वीर्यप्रवाद पूर्व तेमा ७० लाख पद छे, ४ अस्ति नास्ति प्रवाद पूर्व, तेमा ६० लाख पद छे, ५ ज्ञान प्रवाद पूर्व, तेमा ३६ क्रोड पद छे, ६ सत्य प्रवाद पूर्व, वेमा एक क्रोड अने ६० लाख पद छे, ७ आत्म प्रवाद पूर्व, तेमा ३६ क्रोड पद छे, ८ कर्मप्रवाद पूर्व, तेमा एक क्रोड आठ लाख पद छ,” ९ प्रत्याख्यान प्रवाद पूर्व तेमा ८४ लाख पद छे, १० विद्या प्रवाद पूर्व तेमा ११००१५००० पद छे, ११ कल्याण मवाद पूर्व, तेमा ६२ कोड पद छ, १२ प्राणवाद पूर्व, तेमा एक क्रोड ५६ लाख पद छे, १३ क्रियाविशाल , ८०६ पिवार रत्नसार १०७ प्रा-जीपने मिगुगटाणु चढता के पटता कोने केवी राते आने ते कहो 3०-अनादि मिथ्यात्वी होय तेने चइता नजारे केमने ते प्रथम उपशम सम्यकत्व पामे, यविभेद करी चोथे आपे, माटे अनादि मिथ्यात्वी पहेलेयी चोवे आवे, माटे तेने नीज मित्र चढता न आवे, अने सादि मिथ्यात्वी जीन सम्परत्व पामीने पडयो होय ते पाठो क्षयोपशम सम्यक्त्व पामे, तेने नीजु चढता पटता आरे १०८ प्र०-समोहिया, असमोहिया, मरण ते कोने कहीए ? उ०-समोहिया मरण ते जीन अहिंथी नीकळे त्यारे सम- काळे सर्व प्रदेशे नीकळी परभवे जाय, जेम सीधो दटो फेंकता दडाना प्रदेश एक वखते दडा साथेज जाय छे तेम जाणवु, अने असमोहियामरण ते जीवना प्रदेश श्रेणिबद्ध आगळयी जाय, एटले अहि तथा परभवे आत्म प्रदेशनी मरणावसरे श्रेणि मडाय ते ओम पतगनी दोरी हाथने अने पतगने लागेली छे तेनी पेठे जीव प्रदेश नीकळे ते १०९ प्र०-जीवनो शुझोपयोग गुण जे सम्यक्त्व, तथा ठरण गुण ते चारिन तेने आवरखाने कोण बळवत्तर छे ? उ०-आत्मोपयोग गुण, आत्मवस्तु जीवन गुण जे सम्य- क्त्व छे, तेने आवरवाने मिथ्यात्व समर्थ छे, अने एनु परिणमनसुख एटले स्थिरता गुण आवरखाने अविरति समर्थ छे, माटे मिथ्यात्वोदये समकित न विचार रत्नसार ८०९ ते तेमज क्षायिकसमकितीने तथा क्षयोपशमसम- कितीने वीजु त्रौजु न होय पण उपशमसमकिती पटता बीजे त्रीजे आवे तेने जिननामनो बब नथी, बीजे नीजे सत्ताए १४७ प्रकृति होय, उपशम सम- कित आखा भवमा पाच वखत आवे छे, तेमा चारवार श्रेणिगत अने पाचमीवार पडता आठमे गुण- ठाणे अटकी क्षपकश्रेणि माडीने केवळज्ञान पामे ११३ प्र०-क्षयोपशम, उपशम अने क्षायिक सम्यक्त्वनु स्वरूप तेना भेद सहित टुकमा कहो उ०-क्रोधादि चार अनतानुबधी चारित्रमोहनी प्रकृति अने मिथ्यात्वमोहनीनी त्रण प्रकृति, ए सातने उपसमावे त्यारे उपशमसमकित अने सातेनो क्षय करे त्यारे क्षायिक अने सात प्रकृतिना उदयनो क्षय करे अने उदयमा न आवेला उपशमावे तेने क्षयोपशम सम्य- रुत्व कहे छे हवे ते विषे जे काइ विशेष जाणवा योग्य छे ते कहे छे चार खपे रण उपशमे, पच क्षय उपशम दोय, पद् उपशम एक एम, क्षयोपशम विक होय अथवा क्षयोपशम वरते निविध, वेदक चार प्रकार, क्षायिक उपशम युगल युत, नवधा समकित धार दुहानो खुलासो:---- सात प्रकृति मन्ये चार चारित्रमोहनीनी छे, नण प्रकृति 102 -- विचार रत्नमार. पूर्व तेना ना मोड पद१४ लोक बिंदुसार तेमा साडातेर कोई परे, त्या एक परमा ५१८८८४० अक्षर ११२ प्र०-वीजे गुणटाणेजिननामफर्मसत्तारत जीप केम न आने? उ०-क्षयोपशम समकिती, जिननाम बाधी पटता पहेले आपेछे, तेने सत्ताए १४८ प्रकृति होय छे, कर्म- ग्रयनी अपचूर्णिमध्ये का छे सतेअडयालसय जाऊ वसमपिजिणु वियतइय-जस्यार्य सत्ता ए कर्मनी प्रकृति १४८ मिय्यात्व गुणटाणामाडी यावत ११ अगियारमा सुधी होय, पण वीजे नीजे गुणटाणे जिन नामकर्म विना १४७ प्रकृति सत्ताए होय ते केम १ तेनो अभिप्राय कहे छे चोथे गुणठाणे क्षयोपशम समकित छे ते जिन नामकर्म बाघे ते बाधीने पाछो पडे समकितयी पडेतो ते मिथ्यात्वे आवे पण वीजे गीजे गुणठाणे नावे तेमाटे मि- य्यात्व गुणठाणे १४८ प्रकृति होय अने सासादन गुणठाणु ते उपशम भाव आश्रयी छे, अने उपशम समकित छता जिन नामकर्म न बाघे चोथे गुण- ठाणे ज्या सुधी उपशम समकित होय त्या सुधी जिन नामकर्म न बाधे स्तोतकाल माटे, क्षयोपशम तथा क्षायिकसमकित छते जिननाम बाधे ते पाछो वमे ते क्षयोपशम समकितथी पडतो जिन नामकर्मवाळो प्रथम गुणस्थानके आवे पण बीजे बीजे"नावे, तिहा १४८ प्रकृतिः सत्ताए होय वेथी विचार रत्नसार ८११ जिनवचन मध्ये शकाकखादि काइक विम्रमतारूप चित्त मलिनता करावे ते तथा अनतो छ अनुवध कर्मविपाकरस जेनो तेने अनतानुबधि कषाय कहिये ११४ प्र०-सापेक्ष अने निरपेक्ष ते केवी रीते? उ०-सापेक्ष एटले अपेक्षा सहित एटले कार्य पडे त्यारे कदाच प्रसगने लइने ताटना तर्जनादि करखु पडे तोपण ते अतरथी के बहारथी निर्दयपणे, अविचारी रीते न करे, जीवने कोइ व्यथा न उपजे तेनी सभाळ राखीने काम जेटलो आक्रोशादि होय ते करे, अने तेयी विपरीतपणे, निर्दय रीते निष्कारण गमे तेम माठु बोले तथा करे ते निरपेक्षव्यवहार जा- णवो, वळी वर्मने विषे सापेक्ष एटले वस्तु स्वरूपनी अपेक्षा राखीने उत्सर्गने तथा निश्चयने पामवा माटे जे अपवाद के व्यवहारनु सेवन करवु ते, अने ते यकी रहित एकात व्यवहारप्रवृति, अविवेके आचरे ते निरपेक्ष जूटो व्यवहार जाणपो, अने ज्या व्यव- हार जूटो छे, त्या वर्म तो होयज क्यायी।।। का छे जे- वचन निरपेक्ष व्यवहार जूटो कयो, वचन सापेक्ष व्यवहार साचो, वचन निरपेक्ष व्यवहार ससार फळ, साभळी आदरी काइ राचो ११५ प्र०-समदृष्टिनु स्वरूप उपादान अने निमित्तथी कहो 3०-सम्यकदृष्टिने उपादानपणे रागद्वेपनी हलचलधारानु पिचार रत्नसार d-man- - मिथ्यात्वमोहनींनी छे ते मध्ये 3 पहेली ते पावण जेहवी छे, एक सम्यक्तमोहनी ते कुतरी सरीसी छे तेहनो विपरो ए सात प्रकृति जिहा उपशमे तिहा उपशम समकीत कहिए ए साते प्रति सत्तामाहिंयी क्षय करे तिहा क्षायिक समकीत ए सातमाहियो काईक खपे काई उपशमे तिहा क्षयोपशम समकित कहिए ज्या ऐ सातमानी चार खपे, वे उपशमे, अने एक वेदे ते पहेलो भेद, तथा ए सातमानी पाच खपे, एक उपशमे अने एक वेदे ते बीजो मेद, एम वे प्रकारे क्षयोपशम वेदक छे, तथा हवे नण प्रकारे क्षयोपशम समकित छे, ते कहे छे ते आवी रीते-१ चार खपे त्रण उपशमे, २ पाच खपे बे उपशमे, ३ छ खपे एक उपशमे, एम ए निविध क्षयोपशमसमकित अने पूर्वोक्त द्विविध वेदक भावनों मळी क्षयोपशम पचविध स्वरूप का, हवे क्षायिकवे- दकनो एक भेद ते किम' छ खपावे, एक वेदे ते क्षायिकवेदक कहिये तथा छ उपशमावे अने एक वेदे ते उपशमवेदक कहिये, तथा सातने क्षये क्षायिक अने सातने उपशमे, उपश- मिक एम सम्यक्त्व नव प्रकारे का ११४ म०-मोहनीयकर्मनु लक्षणस्वरूप कहो उ०-१ जे विनमपणे आत्मस्वरूपने विपरीत जाणे, जेम छीपने रूपु कहे ते मिथ्यात्व मोहनी, २ मिश्र- मोहनी ते काइक डामाडोळपणे, सदेहयुक्त, अनि- र्धारपणे जाणे, पण आत्मज्ञान प्रते पामवा न दे, ३ सम्यक्त्व मोहनी ते सम्यम् वस्तु उपर मोह उपजावे, देवगुरुआदिपर मारापणारूप ममता करावे, - विचार रत्नसार मोहतु दरिद्रपण जाय, चरण टरण गुण प्रगटे तया कर्मनु देवु एटले करज टळे ते जागी रीते के- दर्शनगुणे जन्म करवा रुप भरपरपग मटे, जा- नगुणे जरानी वेदना मटे, चारित्रगुणे मग्ण भय मटे, वेयी अमरपद पामी सिभित्ररे, एम दर्शनगण जान चारित वेळ जनुझमे प्रगटे जने ॥ रत्नत्र- यना लामे जन्मजरामरणाटि भय 22, जेम कोई निर्वनने लक्ष्मी वणी मळे, त्यारे वेन दजने दरिदपणु ने ले छे, रत्नत्रय प्राप्तियी आत्मधर्म- रूप वन प्रगटे, रागद्वेष मोहरूप दरिद्रपण जाय, अने जन्म जरा मरणरूप करनना भयटके ११८ म०-मोहराजानो मूळ मन कयो भने तेथी जीवन प्रकारे घणा की गाये ये ते की ते ? उ०-रागद्वेप ते जीरना परिणाममा तं, तेथी कर बाचे, ते उदय आरे त्यारे आन अने रोद्र यान थाय, तेथी विपय कपाय से, तेथी तन घणा की बवाय, वेयी भर परपग जीपने टो नहि, एमो. हनो मुक्रमननीज जाणो ११९ प्र०-सम्यग्दृष्टिनो शन्दार्य तथा कहो. उ०-सम्पर कहेता यथार्य, दृष्टिकदेता अमान, सम्यग ज्ञान ते यथार्य जाण, गम्यक, धाग्नि पयार्य आचरब, तथा उदयका सम्या प्रकारे गदनको अने स्वरूपे जोन प रक्षणा. गम्यमाथि साधुना जाणवा ८१२ विचार रत्नसार समपणु ययु, परिणति मध्यस्थ पइ तथा निमित्त. पणे पुण्य पापना उदय काळे हर्ष के रोद न करे, मध्यस्थ साक्षिरूप रहे ११६ मा-जिननी चार निक्षेपे भक्ति शी रीते करवी ? ३०-पविनतायी एकाग्रचित्तेआशातना वाळी, जिननु नाम जपीए ते नाम निक्षेपे जिनभक्ति, २ स्थापना निक्षेपे जिनप्रतिमाजीनी अष्ट प्रकारी, सत्तर भेदी आदि पूजा भक्ति विधियी करता भापपूजा तन्मय यइ परिणमे ते, ३ तथा द्रव्यनिक्षेपे जिनभक्ति ते, जिनना जीव तेना गुणे भागे जिनना जीव जाणी तेमनी भावथकी वदनादि करवु ते, ४ तथा भाव निक्षेपे जिनभक्ति ते, निगटे बेठा समोसरणे अनेक भव्यजीवोने प्रतिबोव आपता एवा जेम हाल श्री सीमधरादि स्वामी छे तेमने वदना नमस्कार गुण स्तुति इत्यादि करवी ते ११७ प्र०-जीवने कर्म सबधी करज तथा कर्म जनित भाव- दरिद्रपणु केम टळे उ०-जीव अनादि काळनो राग द्वेष मोहे परिणमे छे, तेने देवु तथा दरिद्रपणु बेउ वधे छे, ते टाळवानो उपाय ए छे जे समकित गुणनी प्राप्ति थए, शुद्ध रत्नत्रय वर्म प्रगटवाथी टळे, ते आवी रीते के दर्शनगुण थए द्वेपभाव के समभाव प्रगटे, तेथी ज्ञान गुण प्रगटे माटे, तेथी पुद्गलादि परवस्तु उपर मोह टळे, वैराग्य प्रगटे, तेथी चारित्रगुण प्रगटे, तेथी " विचार रत्नसार ८१५ परमारथी, शुभमति, एकात निस्पृही, निर्ममत्वी, नि- रमिमानी, सपूर्ण रीते सरळ, प्रौढपणे गमीर, परम- समान, दृष्टिमत, दयाळु, कृपाळु, पोताना आश्रितोने विषे पूर्ण विश्वासी, सर्वमिथ्याश्रम रहित यया थका सदानदपणे प्रवर्तमान होय पण हा । इति खेदे आ विषम काळना प्रभावे उपर कडा तेवा सुशि- प्यो तथा सुगुरुओ मळवा दुर्लभ छे, अने ज्या होय त्या तेओ निश्चय कल्पवृक्ष समान जाणवा १२१ प्र०-शाता, अशाता, सुख, दुख विषे निमित्त तथा उपादान कारण समजावो उ०-शाताऽशातासुखदु खयोश्चाय विशेष शाताऽशाताऽ- नुक्रमेण उदयप्राप्ताना वेदनीयकर्मपुद्गलाना अनुभव- रूप तया सुखदु खेन परोदीर्यमाणवेदनीय अनुभव- रूप शातादि पूर्वोक्त चारे अनुक्रमे उदयप्राप्त शातादि वेदनीय कर्मना पुद्गलोनो शाता, अशाता, सुख, दुखरूप अनुभव छे, तथा सुख दुखने उदयमा लावनारा उदीरणारूप जे मूळ हेतु ते वेदनीयकर्म अनुभवरूप शातादि उपादान कारण छे, अने शाता अशाता उदय आव्या जे कर्मपुगलो तेनु वेदवु, भोगवबु ते अशुभ उपादानरूप छे, अने सुख, दुख तेहना फळ छे, ते फळ पाक्या एटले उ- दय आव्या ते वेदनीयकर्मनु भोगववु ते भोगवटो निमित्तरूप थयो, अर्थात् सुख दुखने भोगवता थका जो हर्ष शोक करे, मदोन्मतता के झूर्णा , विचार रत्नसार १२० प्र०-गुणग्राही, गुणगवेपी, सहजकारी (सहायकारी) ते शु ? उ०-१ गुणयाही एटले जे जीन सद्गुरू पासे सूत्र सिमान्त साभळीने घणी प्रशसा करे, कीर्ति करे, गर्वादिकना कोइ कर्म आदयिक अपगुण देखीने तेने द्वेप न उपजे, केमके जो सेद के अरूचि थाय तो भक्ति विनयादि रूचिकर मन भग्न थइ जाए, तेथी आगळ गुण यतो अटके, अने होय ते पण कदाच वमी नाखे, २ गुणगवेधी एटले गुर्वादिमाहे कोइपण उपकारादि गुण होय ते स- भारीने आक्रोशादिकने लीधे खेदाय नहि, कदाच माठु लागे पण पाछु तेमयी हित बुद्धि, प्रीति, विश्वास, कृपादि अनेक निस्पृहिपणे करेला उप- कारने सभारी मन निर्मळ थाय, अवगुण, दृष्टिमा न आवे, तेथी विनयादि भक्ति चूके नहि, ३ स- हायकारि ते गुर्वादिकने अन्न, पाणी, वस्त्र, औप- धादिथी घणी सहाय करे, पोते गाठयी, खरचे, गाठे न होय तो कोइ योग्य जीव पासेथी लावीने गुरुनी सहाय करे, तथा सेवा, भक्ति, वैयावच्च, पोते जाते त्रिकरण शुद्धिए करी महा शाता उपजावे, प्रसन्नता करावे, जेने परिणामे पोताने अनत पापनी निर्जरा अने ज्ञानादिकनी परम शुद्धि तथा वृद्धि थाय, जेम शिष्योमा गुर्वादि उपर अतरग प्रेम, भक्ति, रुचि, विशेष रसिकता सहित दीप्तिमान् दिन प्रतिदिन अधिकने अधिक थता जाय तेम उत्तम ६२ विचार रत्नसार ८१७ ते अभ्युपगामिनी वेदना अने एक उदीरणाइ करी उदय लावीने वेद कर्मना पुद्गल समभावे वेदी खपावे ते उपक्रामिकी वेदना जाणवी ए भाव, १२३ प्र०-देशना शुञ्ज स्याद्वादे जेनधर्मनी छे एम क्यारे कद्देवाय ? 30-जिनवचनानुसार देशना चतुविध छे-१ कारण कार्यरूप, २ निमित्त उपादान सहित, ३ द्रव्य भाव युक्त, ४ निश्चय व्यवहारनययुक्त १२४ प्र०-बावीस परिषहमा शीत केटला अने उध्ण केटला ? शीत अने उण ते शु' अनुकुल अने प्रतिकुळ केटला, अष्ट कर्मना विभागे कया कर्मना कया कया परिषहो छ? उ०-स्त्री अने सत्कार ए वे शीत एटले मनने शाता- कारी माटे अनुकुळपरिपहो छे, बाकीना उष्ण एटले मनने सतापकारी माटे प्रतिकुळ छे, एम आचारागे तृतीयाध्ययने बुरेटीकामध्ये का छे तथा उत्तराध्ययनसूत्रमा का छे हवे ज्ञानावरणीयना क्षयोपशमे प्रज्ञा अने ज्ञानावरणना उदये अज्ञान ए बे छे, वेदनीयना उदये-१ क्षुधा, २ पिपासा,३ शीत, ४ उष्ण, ५ डस, ६ चर्या, ७ मळ, ८ सज्जा, ९ वध, १० रोग, ११ तृण स्पर्श, मोहनीयना उदये -१ अचेलक, २ स्त्री, ३ अरति, ४ आ- क्रोश, ५ याचना, ६ निसिहिया, ७ सत्कार अने ८ सम्परत्व परिषह ते मिथ्यात्वमोहना उदये . 103 ८१६ पिचार रत्नसार . करे तो फरी तेजाज शाता अशातारूप वेदनीकर्म पाचे, ते नर उपादान कारण जाणा, अने पूर्वोक्त हर्प शोकादि प्रवृत्ति ते निमित्त ययु जाण, एम कारण कार्य निमित्तथी उपादान अने उपादानयी निमित्त एम जेना वृक्ष तेवा फळ तया जेम वीज- मायी वृक्ष अने पक्षमायी वीज नीपजे छ तेम कर्मयी शाता अशातादि जीव पामे छे, अने फरी अज्ञानपणे समभावे न रहेवायी एवाज बाधी स- सार परपरामा भमे छे, शाता अशाता आत्माश्रित जीवविपाकी प्रकृति छे, अने सुख दुख पुद्गलाश्रित होवाथी पुद्गलविपाकी प्रकृति छे १२२ प्र०-वेदना केटला प्रकारनी, कइ, तेनु स्वरूप दृष्टातथी समजावो उ०-१ वेयणादुविहा, अम्भोपगमिया उवक्वमिया, स्वय- मभ्युपगम्यते वेद्यते यया साधव केशलुचनातापना- दिमि वेदयन्तीति अभ्युपगमिकी वेदना, उपक्रामिकी तु स्वयमुदीर्णस्योदीरणाकरणेन च उदय उपनीतस्य वेद्यस्य अनुभव इत्यर्थ , जे वेदनीयकर्म काळ परि- पाके स्वयमेव सहज उदय आवे ते समभावे वेदीने खपावे ते उपनामिकी, अने २ जेम साधुमहाराजा केशलोच आतापनादि परिषह वेदनाने पोते उदीर- णाए उदीरी समभावे वेदी कर्मनी निर्जरा करे छे ते वेदनाने अभ्युपगामिकी कहिये तथा पाठान्तरे जूनी प्रतिमा नीचे प्रमाणे छे-एक वेदनीकर्मकाले पाकीस्वभावे उदय आपे ते समभावे वेदीने खपावे - ६४ विचार रत्नसार अक्कोसेअरईईत्यी, निसिहिआचेव जायणाचेव, सकारपुरस्समारो, ईनारसवेयणिजम्मि ॥२॥ पचेवअणुपु-वी, चरियासिज्जातहेवजल्लेय । वहरोगतणुफासा, सेसेसुनस्थिवियारो ॥३॥ इति भाव १२८"प्र०-उपसर्ग अने परिपहमा शो फेर छे ? उ०-उपसर्ग ते आत्मकर्मजनित छे, उपसमीपे स्रष्ट उपसर्ग ते माटे, तथा परिषह ते परजनित छे परना निमित्तथी कह्या ते सहेवु ' परिसमन्तात्सह्यते इति परिपह' इति उपसर्ग परिपहनो अर्थ विचारखो इति भाव १२९ प्र०-चार प्रमाणे करी वीर परमात्मा मळ्या क्यारे गणाय ? ते सिद्ध करो उ०-जूनी प्रतिमा नीचे प्रमाणे पाठ छे "तद्यथा अथ प्रमाण च्यार अनुयोगसूत्रे कडा छे, अनुमान प्रमाण १, उपमान प्रमाण २, आगम प्रमाण ३, प्रत्यक्ष प्रमाण ४, ते मध्ये आज श्री वीर स्वामी प्रत्यक्ष प्रमाणे किम मले १ ते थापना निक्षेपाथी मले ते किम ? समभाव शात महापर्यकासननो उत्पादे अने रागद्वेषनो विनाश एहवी असलनी नकल (थापना) जिनप्रतिमा ते देखीने भावी श्रीवीरस्वामी प्रत्यक्ष प्रमाणे मिले जिन प्रतिमा ते जिन सरिखी ते जिनमतिमानी भक्ति जिनभाने कीवाना श्रापकने महानिसियसूत्रे का छे 'अयकएसटो, इति वचनात्, तिहवारे जिन प्रतिमानी भक्ति कीधी

८१८
विचार रत्नसार
होय, तथा जलाभ ते अतरायना उदये होय ते
समें मुनिमहाराजा शुदात्मोपयोगस्वल्प विचारी महा
वैराग्यभारने भारतायका सम्यकमकारे सहे पण
अस्थिरता के खेदादि काई न करे, त्या परिपह
एटळे समस्त प्रकारे समभा राहवु, जे कर्मोदये
आवे ते, अने उपसर्ग ने स्वकृत या परकृत पीडा
जे प्रगटे ते समभावे सहेवी, अपवा मतातरे उप
एटले समीपे अने सर्ग एटले आवीने उपजे जे ते
उपसर्ग स्वामित छे अने पराश्रित परिपह छे
१२५ म०-बध, उदय, उदीरणा अने सत्ता ए चारमा केटली
आत्मिक अने केटली पोलिक छे ?
उ०-उदय अने सत्ता पोद्गलिक, बध अने उदीरणा आ-
त्माश्रित छ
१२६ प्र०-अष्ट पुद्गल वर्गणानु अल्प बहुत्व कहो
उ०-आठ वर्गणामाहे औदारिकना थोडा, तेथी अनत-
गुणा वैक्रिय, तेयी घणा आहारक, तेथी घणा तै-
जस, तेथी घणा भाषाना, तेथी घणा श्वासोच्छ्वा-
सना, तेथी घणा मनना अने तेथी घणा कार्मणनी
वर्गणाना पुद्गलो जाणवा
१२७ प्र०-बाबीश परिषह पैकी कया कया परिषहो कया कया
कर्मथी उपजे छ ?
उ०-ज्ञानावरणीथी २, मोहनीना ८, वेदनीना ११, अत-
रायनो १, ए कर्मथी उपजे अब गाथा
दसणमोहेदसण परिसहोपनाणनाण पडममि ।
चरिमेअलाभ परिसहसत्तेव चरित्तमोहमि ॥ १ ॥

विचार रत्नसार ८२१ परिपह उपसर्ग सहन करवामा निर्भय, साहसिक, केसरि सिहसमान पराक्रमी, वीरपरमात्मा उपमा प्रमाणे पण सिद्ध यया जाणवा, ४ प्रत्यक्ष प्रमाणे जिनप्रतिमा जिन सरखी होवायी वीरपरमात्मा- स्थापना निक्षेपे सिह थया, कारण जे समभान, शात मुद्रा, विशुद्ध पर्यकासन इत्यादिनो उत्पाद, रागद्वेपनो व्यय, अने मूळस्वरूपे ब्रुव, सच्चिदानद घनमय एवी असलनी नकल श्री जिन प्रतिमाजी छे ते देखी भावथी श्री वीरपरमात्मा प्रत्यक्ष सिद्ध थया जाणवा, स्थापनाजीनी भक्ति ते साक्षात्नी बराबरज छे, कारणे कार्य उपचारे सत्य छे १३० प्र०-जीव अष्टकर्मवर्गणादलिक केवी रीते वहेची आठे कर्मने आपे छ ? उ०-समय समय जीव कर्मवर्गणा ग्रहे छे, वे आठे कर्मने वहेची आपे छे ते आवी रीते-सर्वथी योडा आयुकर्मने, तेथी विशेषाधिक नाम अने गोनने, ते बेउमा माहोमाहे सरखा, तेथी १ ज्ञानावरणीय, २ दर्शनावरणीय, ३ तथा अतराय ए वणने विशेषा- धिक पण माहोमाहे सरखा दळ आपे, तेथी मोह- नीयने सख्यातगुणाधिक, तेथी वेदनीयने अधिक, एम वेदनीयकर्मने सर्वयी अधिक दळ मळे छे, केम जे वेदनीय विपाक जीवने थोडा दळे प्रगटपणे जणाय नहि तेयी इति भगवतीसरे का छे १३१ प्र०-जीव विग्रहगति करे तो तेनो उत्कृष्ट काळ केटलो ? - विचार रत्नसार - . ते जिननी कीधी इम 'कारणे कार्योपचारात् । इम जिननी स्थापनापी जाज प्रत्यक्ष प्रमाणे श्री वीर मत्या कहीए 'अन सदेहोनास्ति' इति भाव " तथा छापेली प्रतिमा नीचे प्रमाणे पाठ छे अविरोध, अस्खलित, अविसवादि, निस्वार्थ, एकात, दयामय, सपूर्ण सत्य, मधुर, प्रिय, गमीर, अमर्म प्रकाशक, सर्वज्ञ अने सर्वदर्शिपणाना लक्ष- णोए पूर्ण, तथा मुद्राकारे शात सुधारसमय रागद्वे- पादि चिन्ह रहित इत्यादि अनेकशास्त्रवचन गोचर वीरपरमात्मा आगमपणे सिद्ध करीए २ अनुमान प्रमाणे जेम चूम दिठे अग्निनो निश्चय थाय तेम पूर्वापर महात्माओना अतिहासिक सबध तेना विविध उत्कृष्ट सदाचार प्रवर्तक पुरूषोना प्रमाणोए ज्यारे ऐसी नेवु वातो अनुभवथी सत्य सिद्ध थाय तो तेनी शेप दस वातो पण सत्यज मानी लेवाय छे, अने होय छे पण तेमज एवीज रीते श्री वीर परमात्माना अनेक वचनो अत्यारे बीजा अन्य दर्शनिना वचनो करता सत्य, अविरोधी, अने प्रमाणभूत थाय छे, तो कोइक सूक्ष्म, अगम, अगोचर वात छद्मस्थ मदबुझिना ग्राह्यमा न आवी शके, तोपण बीजी घणी वात मळे छे तेने अनु- नाते ते पण सत्यज होवी जोइए, एम वीरप्रभुना वचनो पण युक्ति तथा न्याय सिम सत्य होवाथी वीरपरमात्मास अनुमानपणे पण सिझ थया, ३ उपमा प्रमाणे पुरिसससिहाणु एटले तप वेजे तथा

विचार रत्नसार
१
करे तो अधिक गुणठाणी कहेवाय, नहि तो भावनी
शुद्धाशुद्ध तारतम्यता कहेवाय
१३४ प्र०-सम्यक्त्व मोहनीयने कोण वेदे, अने क्या सुधी वेदे,
अने तेनु स्वरूप शु
उ०-क्षयोपशम समकितीने समकित मोहनीनो उदय होय
अने उपशमिक अने क्षायिकने ते न होय, तेमज
वेदकने एक समयनोज अतिमूक्ष्म काळ होवायी
गणत्रीमा लीघु नथी, सम्यक्त्व मोहिनी ते क्षयो-
पशमीने होय तया उपशमीने सत्ताए होय, तेथी
प्रदेशे अने रसे अनुक्रमे, ते सकाकखादि सहज
विममता वेदे, कोइक जिनप्रणीत सूक्ष्म अर्थभाव मध्ये
मुझाय ते सम्यस्त्वमोहनीयनु स्वरूप जाणवु
१३५ १०-उत्सर्ग अने अपवादनु शु स्वरूप छे ?
30-उत्सर्ग ते व्यवहारमार्ग अपवाद ते निश्चयमार्ग यथा
साउने पृर्य कायादि षट्कायनी विराधना निषेधी
छे कदाचित् कारणे नदी उतरवी पडे तथा आहा-
रादिकने अर्थे गुरुदेव वदनाने अर्थ चालता विरा-
वना थाय ते उत्सर्ग ते माटे अपवावादे पञ्चक्खाण
महाबतना होई अने काइक अण कारण पडे
उत्सर्गमार्ग होय, तथा वाचानान्तरे कोइक ग्रन्ये
उत्सर्ग ते उत्कृष्टो निश्चयमार्ग को छे. अने
-अपवाद के कोमलमार्ग माटे व्यवहारमार्गको
छे, तेहनो स्वरूप आगे लख्यो छे ए भाव, उत्सर्ग
मार्गनी चर्चा घणी छे, पण इहा तो अल्पबुद्धिए
जेहबू जाण्यु तेहबु लस्यु छे इति भाव

८२२ पिचार रत्नसार, उ०-सनाढी रहार एकेंद्रियथावरकायजीव विदिशीए उपजनारने पाच समय लागे छे १३२ प्र०-अमिसधिवीर्य अने अनमिसधिवीर्य ते शु? उ०-अमिसधि वीर्य ते उपयोग पूर्वक आत्मवीर्य, अने अनुपयोग आत्मवीर्य ते अनमिसधिवीर्य १३३ म०-समकिवी आवकने गृहस्थपणे छठु गुणठाणु स्पर्श के नही? उ०-सम्यग्दृष्टिए देशविरति गृहस्थावास उता कोइ जा- णस्ये जे ते चोथा पाचमा गुणठाणावालाने निर्मल अध्यवसाए ध्यानदशाए शुभयोगे शुभ धर्मव्याने छठा सातमा गुणठाणाना परिणाम आवे पछे ते कालान्तरे अतर्मुहूर्तमात्र रहीने पछे मटी जाय पोताना गुणठाणा माफक परिणाम रहे एवु कहे ते असत्य स्वमति कल्पना पण कोइ ग्रन्थोक्त नहीं तनोत्तर चोथा पाचमाथी भावचारित्र गुण आवे चढते १३ मा १४ सुधी चढीने मरुदेव्यादिनापरे पुण्याढ्यराजानीपरे सिडिवरे पाछोते गुणठाणा फरसीने पडे नहि गृहस्थवासी गमे तेवो उत्कृष्ट श्रावक होय, तोपण तेने गुणठाणु पाचमुज होय छे, पण छठ सातमु न कहेवाय, केमजे गुणठाणानी प्राप्ति कषायना क्षयोपशमने आधीन छे, अने अध्यवसायनी-निर्म- ळता ते निज परिणतिने आधीन छे, ते परिणति पोताना अध्यवसायनी निर्मळताए कषायनो क्षयो- पशम् करीने अधिक उचा गुणठाणानी परिणतिरूप

विचार रत्नसार
करे तो अधिक गुणटाणी कहेगाय, नहि तो भावनी
शुद्धाशुद्ध तारतम्यता कडेवाय
३४ प्र०-सम्परत्व मोहनीयने कोण वेदे, अने क्या सुधी वेदे,
अने तेनु स्वरूप शु?
उ०-सयोपशम समकितीने समकित मोहनीनो उदय होय
अने उपशमिक अने क्षायिक्ने ते न होय, तेमज
वेदकने एक समयनोज अतिमूक्ष्म काळ होवायी
गणीमा लीधु नदी, सम्यक्त्व मोहिनी ते क्षयो-
पशमीने होय तथा उपशमीने सत्ताए होय, तेथी
प्रदेशे अने रसे अनुक्रमे, ते सकाकखादि सहज
विग्रमता वेदे, कोइक जिनप्रणीत सूरम अर्थभाव मध्ये
मुझाय ते सम्यस्त्वमोहनीयनु स्वरूप जाणवु
१३५ म०-उत्सर्ग अने अपवादनु शु स्वरूप छे ?
उ०-उत्सर्ग ते व्यवहारमार्ग अपनाद ते निश्चयमार्ग यथा
साउने पूर्व कायादि पदकायनी विराधना निपेधी
छे कदाचित् कारणे नदी उतरती पडे तथा आहा-
रादिकने अर्थ गुस्देन वदनाने अर्ये चालता विरा-
बना थाय ते उत्सर्ग ते माटे अपवासादे पञ्चरखाण
महाव्रतना होई अने काइक अण कारण पढे
उत्सर्गमार्ग होय, तथा वाचानान्तरे कोइक ग्रन्थे
उत्सर्ग वे उत्कृष्टो निश्चयमार्ग को छे. अने
-अपवाद ते कोमलमार्ग माटे व्यवहारमार्ग-कयो
छ, तेहनो स्वरूप आगे लख्यो छे ए भाव. उत्सर्ग
मार्गनी चर्चा घणी छे, पण इहा तो अल्पबुद्धिए
जेहवु जाण्यु तेहव लस्यु छे. इति भाव,

विचार रत्नसार.
.
,
१३६ म०-दीरा प्रमुस ज्योतिमय पदार्थोना प्रकाश पडे छे,
ते दीपामध्ये रहेला अग्निकाय जीरना पर्याय छे ?
उ०-दीना मध्ये जे अग्निना जीप छे, ते माहेज परि-
णमी रया छे, पण दाहकल्प पर्याय छे ते बाहेर
नीकळे नहि, तपा दीवाना प्रकाशरूप पुदल जे बाहेर
दीसे छे, तेतो विनसा पुद्गल्नी पर्याय ठाया छे तथा
दीवानी बाहेर जे प्रकाशरूप पुद्गल दीसे छे ते, तथा
प्रकाशरूप पुद्गगल्ना निमित्ते, अपर विससा पुद्गल
श्रेणिरद्ध जमाव थाय छे ते अचित्त दीसे छे पण ते
अग्निकाय जीवना पर्याय नहि, तेना (अग्निना) गुण
पर्याय तो दाहक रूपे छे, ते ज्या व्यापे त्या बाळी भस्म
करे, माटे बाहिर पटतो प्रकाश विस्रसा पुद्गल पर्याय
(अचित) जाणवा, जेम आरसीमा मुख जोता आपणा
शरीर समान सर्व प्रतिबिंबित पुद्गल दीसे छे, ते काइ
आपणा शरीरना पर्याय, आरसीमा जता नथी, पण
ते आरसीनु निमित्त पामीने त्या शरीर मुखादि
जेवा विस्रसा पुद्गल, तत्काल श्रेणिबद्ध तद्रूप परि-
णमिने जमाव थाय छे, पण ते जीवना पर्याय न
जाणवा, एवीज रीते शरीरनी छाया विगेरे विस्रसा
पुद्गलजमाव जाणवो, तेम दीवा प्रमुखना प्रकाशा-
दिमा पण जाणबु
* श्रीमद् देवच द्रजीए दीवाना प्रकाशने विलसा पुद्गल मानी
अचित कह्यो छे आ बाबतमा बे मत छे केटलाक मुनियो श्रीमद
देवचन्द्रजीनी पेठे दीपकना प्रकाशने विलसा पुद्गल मानी अचित गणे छे
"
७२

विचार रत्नसार ८२५ १३७ प्रवक्ता तथा श्रोताना चांद चौद गुण कया कया छे ते कहो 3०-वक्ताना चौद गुणो -१ आगमोक्त सोळबोलना जाण, २ शास्त्रार्य विस्तारवत, ३ वाणीमा मीठाश, ४ प्रास्ताविक अवसर ओळसे, ५ सत्य बोले, ६ साभळनारना सदेह छेदे,७ बहु शास्त्रवेत्ता गीतार्थ उप- योगी होय, ८ अर्य विस्तारी सबरी जाणे, ९ व्याकरण रहित कठिनभाषा के अपशब्द न बोले, १० वा- णीए सभाने रीझावे, ११ वाणी साभळीने श्रोता रसस्वाद पामे, १२ प्रश्नार्थवत, १३ अहकार रहित, १४ सतोपादिधर्मवत ओताना चौद गुणो १ भक्तिवत, २ प्रियभापी, ३ निरमिमानी, ४ साभ- अने रात्रे उपाश्रयमा दीपकना प्रकाशमा पुस्तको वाचे के शरीरपर प्रकाश पडे छे ते अदाहरविन्नसा पृद्गरम्प छे एम माने छे अनन्त परमाणुओनो स्का बने छे तेनी अवश्य डाया होय छे. अग्निकायना पुद्गलोनी, मणिनी यानी पठे छाया पटेले दीवानी चारे तरफ प्रकाश मय विवसा पुद्गलो , तेज अग्निना छाया-प्रतिबिंब पुद्गलो छ माटे या प्रतिवित्र पुदलो छे ते विस्रमारूप होई अचित्त के अन्य सचित्त मनुष्य वगरे कायना प्रतिविच छाया पुद्गलोनी पेठे-ए प्रमाणे आगमो- क्तयुक्तियो अनेक जणाये श्रीमद् देवचन्द्रनी बहुश्रुत गीतार्थ द्रव्या- नुयोगी हता तेमना गुरुआना परपरापण ए मान्यतावाळी होवी जोईए तपागच्छमा पण केटलाक मुनियोनी तेवी मान्यता तथा प्रवृत्ति सभळाय छ वीना पक्षवालाजो दीवाना पुद्गलोनी उमेही माने छे तेओ ग्रथना पाठनी साक्षी आपे छ (तत्त्व क्वलिगम्यम् ) ७३ शो सू 104 ८२८ विचार रत्नसार माण, ३ काळयी अनादिजनत, ४ भाषयी अस्पी (अवर्गादि), ५ गुण चरणसहायक २ अधर्मारितकाय-१ द्रव्ययी एक, २ क्षेनी लोकम- माण, ३ कालथी अनादिअनत, ४ भाषयी अरूपी (अवर्णादि), ५ गुण स्थिरतासहायक ३ आकाशास्तिकाय -१ इत्ययी एक, २ क्षेत्रयी लो- कालोकममाण, ३ काल्थी अनादिअनत, ४ भावथी अरूपी (अवर्णादि ), ५ गुण अवकाशदानसमर्थ ४ काळ-१ द्रव्यथी अनेक एटले अनताअनत, २ क्षेत्रथी मनुष्य रोक मध्ये, ३ काल्थी अनादिअनत, ४ भावथी अरूपी (अवर्णादि ), ५ गुण नवा, पुराणा, वर्तना लक्षण ५ पुद्गलास्तिकाय -१ द्रव्यथी अनेक एटले अनता, २ क्षेनथी लोक मध्ये, ३ काळथी अनादिअनत, ४ भावथी रूपी एटले वर्णादियुक्त, ५ गुण पुरण, गलण, मिलण, विख- रण, सडण, पडण, विध्वसन, वर्मलक्षण ६ जीवास्तिकाय -१ द्रव्यथी अनेक एटले अनत, २ क्षेत्रथी लोक मध्ये, ३ कालथी अनादिअनत, ४ भावथी अरूपी (अवर्णादि), ५ गुण चेतनाउपयोगवत एवी रीते पद्रव्यना द्रव्यादि अपेक्षाए, त्रीश भेद दर्शाव्या प्रकारातरे, प्रकारातरे निश्चयव्यवहारनये द्रव्य क्षेत्र काल भावे कथचित् सप्रदेशी, कयचित् अप्रदेशी, एम भज- नाए विध विध अपेक्षाए अनेक भेद स्वरूप विस्तारित ग्रथा- तरथी गुरुगम्य जाणी लेवु जूनी प्रत्यन्तरे नीचे. मुजब छे विचार रत्नसार. ८२९ पुनरपि द्रव्ययी क्षेनथी कालयी भावयी स्यु ? वे कहे छे १द्रव्ययी अप्रदेशी, धीजु क्षेत्रयी अमदेशी २, गीजें कालयी अमदेशी ३, चोथे भावयी अप्रदेशी ४, हवे क्षेत्रयी ते नियमा अमदेशी ते द्रव्ययी स्यात् समदेशी अमदेशी ४ हवे कालथी स्यात् समदेशी अमदेशी कालयी पण भजना, क्षेत्रथी स्यात् सप्रदेशी स्यात् अप्रदेशी, हवे भावी स्यात् समदेशी स्यात् अभदेशी एणी रीते लेजो ए भाव, हवे जे द्रव्ययी समदेशी ते क्षेनथी समदेशी छे, जे काल्थी समदेशी छे ते भावधी समदेशी छे ४ हवे समदेशी ते क्षेत्रयी स्यात् सप्रदेशी, अम- देशी ते द्रव्यथी समदेशी नियमा ते द्रव्यथी स्यात् सप्रदेशी स्यात् अमदेशी ते द्रव्ययी समदेशी होइने अपदेशी पण छे हवे अप्रदेशी कालथी स्यात् सप्रदेशी, सप्रदेशी स्यात् अप्र- देशी, कालथी स्यात् सप्रदेशी स्यात् अप्रदेशी, ते क्षेत्रथी स्यात् समदेशी स्यात् अप्रदेशी, हवे भावथी स्यात् समदेशी स्यात् अप्रदेशी भावथकी भजना भावथकी स्यात् सप्रदेशी स्यात् अप्रदेशी ने कालथी पण स्यात् सप्रदेशी स्यात् अप्र- देशी इति भाव १४२ प्र०-पद्रव्यना गुणपर्यायनु शुभाशुष स्वरूप यथार्थ विस्तारे समजावो उ०-पद्रव्यमध्ये प्रथम जीवद्रव्य ल्इए, ए जीव वे प्रकारे छे, एक शुम अने बीजो अशुद्ध, द्रव्यकर्म, भावकर्म अने नोर्मादि सर्व कर्मकलके रहित शुद्ध निष्पन्न, स्वरूपी सिघालये अनादि तथा सादि अनत भागे, लोकाग्रे विराजता सिद्धपरमात्माओना ७७ ८३० विचार रत्नसार. - जीवद्रव्य शुस जाणा, तया कर्माचरणे सहित म. लिन आत्मप्रदेशी, रागद्वेपादि भार मलिन परिण- तिवत चतुर्गप्ति भमण लक्षणरूप अशुद्ध जीवद्रव्य जाणवा, हवे तेना गुण अने पर्याय विषे लखीए छीए -जीपना गुण पण वे प्रकारे छे. १ शुक, २ अशुद्ध, त्या शुद्धगुण ते केवळज्ञानादि अ- नतगुणलक्ष्मीरूप परमगुद्धक्षायिक भावना गुण ते तथा मतिज्ञानादि दश भेद शुद्धाशुश क्षायो- पशमिक भावना गुण ते अशुद्ध जाणवा हवे जीवना पर्याय पण वे मेदे छे, एक व्यजनपर्याय अने वीजा अर्थ पर्याय, वळी व्यजन पर्याय पण वे भेदे छे, एक शुद्ध अने वीजा अशुद्ध, त्या शुद्ध व्यजन पर्याय ते चरम शरीर प्रमाण किंचित् उणी अवगाहनावत, सिद्धावस्थावत ते शुद्ध व्यजन पर्यायवत जीव जाणवा, तथा नरनारकादि चतु- गतिरूप अशुद्ध व्यजनपर्याय जाणवा, अर्थ पर्याय पण बे भेदे छे ---एक शुद्ध अने बीजा अशुद्ध त्या आपणी गुणणि मध्ये षड्गुणहानिवृशिरूप- अगुरुलघुपर्याय ते शुद्धअर्थपर्याय, अने मति- ज्ञानादि अवलोकन अवस्थिति एक अक्षरने अन- तमे भागे पर्यायरूप जे ज्ञानादि चेतन उपयोग स्थिति ते अशुद्ध पर्याय जाणवो, तथा उत्पाद व्ययव्रवरूप जीवना शुभाशुद्ध द्रव्यगुणपर्याय जाणवा, जेम मतिज्ञान उपयोगनो व्यय, श्रुतज्ञानो- पयोगनो उत्पाद अने ज्ञानगुण ध्रुव ते शुद्ध भेद, विचार रत्नसार तथा मनुष्यगतिनो व्यय, देवगतिनो उत्पाद अने जीवद्रव्य तो शाश्वत ध्रुवरूपे छे, ते अशुभमेद जाणवो हवे पुलद्रव्यना गुणपर्याय विचारीए, त्या ते पुद्गलद्रव्य पण वे भेदे छे, एक शुद्ध अने चीजो अशुद्ध, आकाशप्रदेशे रहेल शुद्ध अविभागी अच्छेद अभेदरूप परमाणुओ ते शुभ पुद्गलद्रव्य, अने द्वयणुक श्यणुकादि परमाणुओना चनेला जे स्कयो ते अशुद्ध पुद्गलद्रव्य, हवे पोद्ग- लिक गुण पण बे भेदे छे, एक शुद्ध अने बीजो अशुद्ध, त्या शुभ ते निविभागी वीसगुणयुक्त पुद्गलद्रव्यगुण जाणवा वीसगुणादि सहित अनत गुणमिश्रित द्वयणुकादि स्कवरूप मुख्य गमन रूपान्तर गुणनी गौणता अने सत्तागुणनी मुख्यता तेने अशुफपुदल गुण कहीए, वळी पुद्गलपर्याय पण शुम अने अशुद्ध एम वे भेदे छे, ते पण व्यजन अने अर्थना भेदे द्विविध छे, त्या शुभ आकाशप्रदेशे अविभागी पदगुणहानिवृद्धिरूप शुद्ध परमाणु पर्याय ते अने अशुद्धन्यजनपर्याय ते स्थूल सूक्ष्म परिणामरूप द्वयणुकादि स्कध पर्याय ते, वळी शुद्धअर्थपर्याय ते पोतानी गुणश्रेणि मध्ये परगुणहानिवृद्धिरूप परिणमन पर्याय ते, तथा अशुद्धअर्थपर्याय ते द्वयणुकादि स्कधरूप गुण- विगति, तीव्र मन्द तारतम्यभेद परिणमन पर्याय ते, जेम पूर्व स्कवनो व्यय, वर्तमाननो उत्पाद ८३२ विचार रत्नसार. - अने पुद्गल द्रव्य तो शाश्वत छे, एटले जेम सो. नानो कदोरो भागीने सोनाना नाजुराम कराव्या त्या कदोरानो व्यय, गानुनमनो उत्पाद अने सोनु ते र हवे वर्मास्तिकायना इन्य गुण पर्याय विचारे छे धर्मास्तिकाय शुभदन्य रोकपमाण, असख्यात प्रदेशी, अखट, एक आकृतिरूप अरूपि शुहव्यजन पर्यायरूप वर्मास्तिकायद्रव्य जाणमु, तथा पो. तानी गुणणि मध्ये पद्गुणहानिद्विरूप परिण- मन करे त्या शुद्ध अर्थपर्याय वर्मास्तिकायना कहिये, गुण ते जीव पुद्गलने गतिसहायकरूप, तथा उत्पादव्ययध्रुवपणे पदगुणहानिवृद्विरूप पर्याय जाणवा-जेम चलणगतिनो उत्पाद, स्थितिनो व्यय अने द्रव्यसत्ता व शाश्वत जाणवी, एवीज रीते अधर्मादि बीजा पण द्रव्योनु पण किंचित स्वरूप लखीए छीए -अधर्मनो गुण जे पुद्गलने स्थितिसहायक, असख्यातप्रदेशी, लोकममाण, अखड, पद्गुणहानिवृद्धिरूप परिणाम, ते शुध र्याय, त्या अखडआकृतिरूप शुद्ध व्यजनपर्याय जाणवो अने ज्या पद्गुणहानिवृद्धि करे त्या शुद्ध अर्थपर्याय जाणवो, जेम स्थितिनो उत्पाद, गतिनो व्यय, अने द्रव्यसत्ता व जाणवी, काळ द्रव्यनो गुण वर्तना लक्षण, पचद्रव्यनो वर्तना पर्याय सर्व द्रव्यनो पर्याय, असख्यात लोकप्रमाण शुद्ध पर्याय वहीए वर्तमान समयनो व्यय, अनागत समयनो ८० विचार रत्नसार उत्पाद, द्रव्य सत्ता ध्रुव, उपचारे एक कारदव्य आकृति ते शुझ व्यजनपर्याय, वे आकाशद्रव्पनो गुण अवकाशदानलक्षण, रोकालोकप्रमाण, अ- नतप्रदेशी, घटाकाशनो उत्पाद, पूर्ववटाकाशनो व्यय अने द्रव्य सत्ता ध्रुव जाणवी तथा लोकालोक प्रमाण अखटआकृतिरूप शुद्धन्यजनपर्याय क- हीये, एम पद्व्यनु पर्यायादि किंचित् स्वरूप क- हिने तेमा जे काइ विशेष जाणवा योग्य छे ते कहे छे - . गाथा-~-परिणामी जीवमुत्ता, सपएसा एगखित्तकिरियाय णिचकारणकता, सवगय इयर अप्पवेसे (१) १ जीव अने पुगल परिणामी, शेष चार अपरिणामी, २ जीवद्रव्य ते जीव चेतनरूप अने शेष पाच अजीव अचेतन जरूप छे, ३ पुद्गल रूपी मूर्तिमत छे, शेष पाच अरूपी छे, ४ काल, अप्रदेशी छे, शेष पाच सप्रदेशी छे, धर्म, अधर्म अने आकाश ए वण एक अने शेष त्रण अनेक, ६ आकाश क्षेत्र छे, अने शेष पाच क्षेत्री छे, ७ जीव अने पुल वे सक्रिय छे, शेष चार अक्रिय छे, ८ जीव अने पुद्गल वे व्यवहारथी अनित्य शेष चार नित्य छ, ९ जीव अकारणरूप अने शेष पाच कारणरूप छ, १० जीव कर्ता अने शेष पाच अकर्ता छे, ११ आकाश सर्वगत छे, अने शेष पाच असर्वगत के. - 105 -- ८३२ विचार रत्नसार. अने पुद्गल द्रय तो शाधन छे, एटले जेम सो- नानो कदोरो भागीने सोनाना पावर कराव्या त्या कदोरानो व्यप, पारसनो उत्पाद अने सोनु ते र हवे चर्मास्तिकापना द्रव्य गुण पर्याय विचारे छे धर्मास्तिकाय शुभदन्य लोकममाण, असख्यात प्रदेशी, अखट, एक आकृतिरूप अरूपि शुदपजन पर्यायरूप धर्मास्तिकायदव्य जाण, तथा पो- तानी गुणश्रेणि मध्ये पद्गुणहानिद्विरूप परिण- मन करे त्या शुद्ध अर्थपर्याय वर्मास्तिकायना कहिये, गुण ते जीव पुद्गलने गतिसहायकरूप, तथा उत्पादव्ययध्रुवपणे पदगुणहानिवृद्धिरूप पर्याय जाणवा -जेम चलणगतिनो उत्पाद, स्थितिनो व्यय अने द्रव्यसत्ता व शाश्वत जाणवी, एवीज रीते अधर्मादि बीजा नण द्रव्योनु पण किंचित् स्वरूप लखीए छीए -अधर्मनो गुण जे पुगलने स्थितिसहायक, असख्यातप्रदेशी, लोकप्रमाण, अखड, षट्गुणहानिवृद्धिरूप परिणाम, ते शुद्ध प- र्याय, त्या अखडआकृतिरूप शुद्ध व्यजनपर्याय जाणवो अने ज्या षट्गुणहानिवृद्धि करे त्या शुद्ध अर्थपर्याय जाणवो, जेम स्थितिनो उत्पाद, गतिनो व्यय, अने द्रव्यसत्ता व जाणवी, काळ द्रव्यनो गुण वर्तना लक्षण, पचदव्यनो वर्तना पर्याय सर्व द्रव्यनो पर्याय, असख्यात लोकप्रमाण शुद्ध पर्याय कहीए वर्तमान समयनो व्यय, अनागत समयनो - ८० विचार रत्नसार कथन स्वरूप, ३ गणितानुयोग ते द्वीप, समुद्र, क्षेत्रादिनु, क्षेत्रफळादिमापनु गणित कयन स्वरूप, ४ चरणकरणानुयोग ते क्रियानुष्ठान चारिनादि बत पञ्चखाण नियमादि विधि कथनस्वरूप १४७ प्र०-जीव दुर्लभनोधिपणु केटला कारणे पामे ? उ०-छहिठाणेहिंदुल्लभनोहिमाणकम्मपकरति अरिहताणअब- नवयमाणे ॥१॥ अरिहतपन्नत्तस्सवम्मस्सअवनवयमाणे ॥२॥ आयरियाण अवन्नवयमाणे ॥३॥ उवज्झायाण अवनवयमाणे ॥४॥ चाउवनस्ससवस्स अवनवयमाणे ॥५॥ समदीठीदेवाण अवनवयमाणे ॥ ६ ॥ १ श्रीअरिहत, २ तया तेमनो भाखेलो जे धर्म तथा तेमनी प्रतिमाजी तथा तेमना वचनरूप जे सिद्धात इत्यादिक अरिहत सधी अवर्णवाद निंदा, द्वेषादि करवारूप अविनयादि कारण थकी, ३ जिन आज्ञाकारी, जिनशासनस्थभरूप श्रीआचार्यभग- वतनो अवर्णवाद करवा यकी, ४ श्रीसूत्रसिद्धा- तना पारगामी आचार्यपदने योग्य, अनेक शिष्योने सारणापारणादि हित शिक्षा, सूत्रसिद्वातार्थ अभ्या- सना दाता श्रीउपाध्यायजी भगरतनो अवर्णवाद करवा थकी, ५ ज्ञाने करीने एकात मोक्षमार्गनाज पाचक श्रीसाधु मुनिमहाराजानो अवर्णवाद करवा यकी, ६ जिन आज्ञाकारी सुशील श्रीअरिहतादिकने ने पूजनिक एवो श्रीचतुर्विधसब तेनो अवर्ण- की, जीव दुर्लभबोधिपणु पामे, अर्थात् - - ८३४ विचार रत्नसार - १४३ प्र०-वेदना समधी चाभी कहो उ०-१ अस्पोदना अल्पनिजरा ते देवताओने, २ महा- पेदना अत्पनिर्जरा ते नारकीने, ३ महापेदना महा- निर्जरा ते अप्रमत्त साधने, गजमुकुमालनीपरे, ४ अल्पवेदना महानिर्जरा ते शैलेशीकारकमहात्मा चीदमा गुणटाणी परमात्मस्वरूप सन्मुसी जाणवा १४४ प्र०-सम्यक्त्व अने मिथ्यात्वनी चाभगी मिन्न भिन्न जी- वामित कहो उ०-अनादिअनतमिथ्यात्व अभव्यने, २ अनादिसात मिय्यात्व भव्यने, ३ सादिसातमिथ्यात्व प्राप्त सम्यक्त्ववमनारने, ४ सादि अनत भागो शून्य छे १४५ प्र०-व्रतअगीकार तथा पाल्नमा सिंहपणा तथा शिया- ळपणानी चौभगी दृष्टात सहित कहो 3०-१ सिंहपरे व्रत ग्रहे अने सिहनी परे पाळे ते जबुस्वामी स्थूलभद्रादिनी परे, २ सिहपरे ग्रहे अने शियाळनीपरे पाळे, ते मरिचादिवत्, ३ शियाळ- परे ग्रहे अने सिहनी परे पाळे, ते मेतार्यमुनि- आदिवत्, ४ शियाळपरे ग्रहे अने शियाळपरे पाळे ते अगारमर्दकाचार्य, कुलवालुकादिवत् जाणवा अर्थपया रयोग ते कया व्यय, अने" गुण वर्तना लक्षणे, पदव्य विषयक गुणपर्याय स्वरूप द्रव्यनो पर्याय, असत्य विवेचनमुख्याधिकार, २ धर्म- क्हीए वर्तमान समय सती महात्माओना चरित्रोन ८० विचार रत्नसार ८३५ AM कथन स्वरूप, ३ गणितानुयोग ते द्वीप, समुद्र, क्षेत्रादिनु, क्षेत्रफळादिमापन गणित कथन स्वरूप, ४ चरणकरणानुयोग ते क्रियानुष्ठान चारिनादि व्रत पञ्चखाण नियमादि विधि कथनस्वरूप १४७ प्र०-जीव दुर्लभनोधिपणु केटला कारणे पामे ? उ०-उहिठाणेहिंदुल्लभगोहिमाणकम्मपकरति अरिहताणअव- नवयमाणे ॥१॥ अरिहतपन्नत्तस्सधम्मस्सअवन्नवयमाणे ॥२॥ आयरियाण अवन्नवयमाणे ॥३॥ उवज्झायाण अवन्नवयमाणे ॥४॥ चाउचन्नस्ससघस्स अवन्नवयमाणे ॥५॥ समद्दीठीदेवाण अवनवयमाणे ॥६॥ १ श्रीअरिहत, २ तथा तेमनो भाखेलो जे धर्म तथा तेमनी प्रतिमाजी तथा तेमना वचनरूप जे सिद्धात इत्यादिक अरिहत सबधी अवर्णवाद निदा, द्वेषादि करवारूप अविनयादि कारण थकी, ३ जिन आज्ञाकारी, जिनशासनस्थभरूप श्रीआचार्यभग- वतनो अवर्णवाद करवा यकी, ४ श्रीसूत्रसिद्धा- तना पारगामी आचार्यपदने योग्य, अनेक शिष्योने सारणावारणादि हित शिक्षा, सूचसिद्धातार्थ अभ्या- सना दाता श्रीउपाध्यायजी भगवतनो अवर्णवाद करवा थकी, ५ ज्ञाने करीने एकात मोक्षमार्गनाज साधक श्रीसाघु मुनिमहाराजानो अवर्णवाद करखा यकी, ६ जिन आज्ञाकारी सुशील श्रीअरिहतादिकने पण पूजनिक एवो श्रीचतुर्विधसव तेनो अवर्ण- वाद करवा थकी, जीव दुर्लभबोधिपणु पामे, अर्थात् विचार रत्नसार अनतकाळ ससारपरिप्रमण करता थका पण धर्म सामयीनी जोगवाइ पामवी महादुर्लभ थइ पडे, तो पछी चर्म मातिनी दुर्लभतानी पातन तो कदेवज शु ? १४८ प्र०-आठ प्रकारना आत्मा ते कया ? उ०-१ द्रव्यात्मा एटले असख्यातमदेशी शुग्मजीव- द्रय स्वगुणपर्यायसहित सत्ताए छे ते शुद्ध न्या- स्मा, अने तेना ज्ञानदर्शनादि उपयोगे रहित ते अशुद्धद्रव्यात्मा कहीये, २ कपायात्मा, सोळ कपाय तथा नर नोकपाय प्रवर्तमान जीव ते कपायात्मा, ३ मनवचनादि योगमवर्तमान आत्मा ते योगात्मा, ४ ज्ञान अज्ञानादि उपयोगी आत्मा ते उपयोगात्मा, ५ ज्ञानात्मा एटले जीवाश्रित सच्चिदानदघन ज्ञानस्वरूपे प्रवर्तमान आत्मा ते, ६ दर्शनात्मा ते सम्यग्दृष्टिजीव ते, ७ चारित्रात्मा ते सत्तागत स्वरूपरमणरूपस्थिरतागुणे प्रवर्तमान जे जीव ते, ८ वीर्यात्मा, मन वचन कायादिना बळ पराक्रम- रूप अशुद्ध वीर्यात्मा कहीए, पण आत्मसत्तागत रहेल अनतशक्तिनी स्फुरतिए शुद्धात्मोपयोगे प्रवृति करी अनादि अनतकाळना कर्म मळने निकदन कर- णरूपशक्तिनी व्यक्ति ते शुद्धवीर्यात्मा कहीए १४९ प्र०-पूर्वोक्त अष्टविध आत्माओमायी कई गतिमा केटला होय ते कहो उ०-नारकी तथा देवताओ मध्ये सात आत्मा होय, पण चारितात्मा न होय, तथा एकेंद्रिय मध्ये छ आत्मा , विचार रत्नसार ८३७ Aw सभवे पण ज्ञानात्मा अने चारित्रात्मा नहि, तथा तिर्यचपचेद्रिय अने मनुष्यगतिमध्ये आठे आत्मा होय, तया पचमगतिमध्ये एटले श्रीसिहपरमात्माने अनतगुणभाजनरूप शुद्ध जीवद्रव्य ते श्रीसिद्ध भगव- तनु छे, तेने विपे चतुर्विधआत्मा छे, वे ज्ञानात्मा, दर्शनात्मा, उपयोगात्मा तथा शुद्ध द्रव्यात्मा १५० प्र०-अष्टविध नसजीवो छे ते कया ? ते दृष्टात सहित कहो उ०-१ अडजा ते पक्षीआदि, २ पोतजा ते गजादि, जरादि ते गवादि, ४ रसजा ते कीटकादि, ५ स्वेदजा ते यूकादि, ६ समूच्छिम ते पतगादिक, ७ उद्भिज ते गिंगोटादि, ८ उत्पादिका ते देव नरकादि १५१ प्र०-जीवना दस प्रकारना परिणाम ते कया उ०-१ गति, २ इद्रिय, ३ कषाय, ४ लेश्या, ५ योग, ६ उपयोग, ७ ज्ञान, ८ अज्ञान, ९ दर्शन, १० चारिन इति पनवणा सूचना मा पद मध्ये छे। १५२ प्र०-जीवपरिणमन केटला प्रकारे छ? उ०-"बवण १ गई २ सठाणा ३ मेय ४ वन्न ५ गय ६ रस ७ फास ८ अगुरुलघु १० परिणामा ए दसहुतिअजीवा ॥१॥ १ बधन, २ गति, ३ सस्थान एटले आकृति, ४ जाति, ५ वर्ण, ६ गव, ७ रस, ८ स्पर्श, ९ अगुरु लघु, १० शब्द, ए दस रीते परिणमे छे १५३ १०-अतर्मुहूर्त कोने कहीए ? १ - निधार रत्नसार अनतफाळ ससारपरिममण करता थका पण धर्म सामग्रीनी जोगनाइ पामनी महादुर्लभ यइ पडे, तो पछी धर्म मातिनी दुर्लभतानी पातनु तो कडेवुज शु ? १४८ प्र०-आठ प्रकारना आत्मा ते कया ? उ०-१ द्रव्यात्मा एटले असर यातप्रदेशी शुद्धजीव- द्रय स्वगुणपर्यायसहित सत्ताए छे ते शुद्ध द्रव्या- त्मा, अने तेना ज्ञानदर्शनादि उपयोगे रहित ते अशुद्धद्रव्यात्मा कहीये, २ कपायात्मा, सोळ कपाय तथा नव नोकपाय प्रवर्तमान जीव ते कयायात्मा, ३ मनवचनादि योगमवर्तमान आत्मा ते योगात्मा, ४ ज्ञान अज्ञानादि उपयोगी आत्मा ते उपयोगात्मा, ५ ज्ञानात्मा एटले जीवाश्रित सच्चिदानदधन ज्ञानस्वरूपे प्रवर्तमान आत्मा ते, ६ दर्शनात्मा ते सम्यग्दृष्टिजीव ते, ७ चारित्रात्मा ते सत्तागत स्वरूपरमणरूपस्थिरतागुणे प्रवर्तमान जे जीव ते, ८ वीर्यात्मा, मन वचन कायादिना बळ पराक्रम- रूप अशुद्ध वीर्यात्मा कहीए, पण आत्मसत्तागत रहेल अनतशक्तिनी स्फुरतिए शुद्धात्मोपयोगे प्रवृति करी अनादि अनतकाळना कर्म मळने निकदन कर- णरूपशक्तिनी व्यक्ति ते शुभवीर्यात्मा कहीए १४९ प्र०-पूर्वोक्त अष्टविध आत्माओमायी कइ गतिमा केटला होय ते कहो उ०-नारकी तथा देवताओ मध्ये सात आत्मा होय, पण चारित्रात्मा न होय, तथा एकेद्रिय मध्ये छ आत्मा

विचार रत्नसार
.
अचानक सर्ने साभरी आवे, अने तेथी पोते पूर्व
कोण हतो तथा क्या एवीरीते वगेरे समस्त
निजपणानु भान थट आवे तेने जातिस्मरण कहे
छे, ते वे प्रकारे छे, एक शुभक्षयोपशमानुसार
ते प्रर्वभवना सम्यग्दृष्टि गाढ धर्माभ्यासी महात्मा-
ओने याय ते, जेम श्रीवज्रस्वामी प्रमुखने, अने
वीजु अशुद्धक्षयोपशमानुसार ते पूर्वभवना मोहादि
विषय कषायादि चेष्टादि स्मरण रागद्वेषजनित निर-
र्थक जाणवू, जातिस्मरणमा जघन्ययी एक बेत्रण
भव हेखे, मध्यम चार पाच छ आदि अने उत्कृष्ट
नव भव सुधी देखे ( इति पत्रवणादि वचनात् )
१५५ म०-पुण्य अने वर्ममा शु फेर ?
उ०-पुण्य ते शुभकर्मपुल प्रकृति छे, ते जीवना शुभ
परिणामे ए.ले सुपात्रने अन्नपानादि भक्ति नम-
रकारादि कग्वे करीने नव प्रकारे बधाय छ, तेना
नाम अन्नपुण्णे १ पाणपुण्णे २ लेहणपुण्णे ३
सयणपुण्णे ४ वत्थपुण्णे ५ मनपुण्णे ६ वयणपुण्णे ७
कायपुण्णे ८ नमोक्कारपुण्णे ९ ए नब मेद पुण्यना
कया अने बेंतालीस प्रकारे शातादिरूपे भोगवाय छ,
जूनी प्रतिमा चउद रत्ननो प्रश्न छ तेना उत्तरमा
गाथा--" चक्कासिछत्तदडा, आयुहसालाइडत्तिवत्तारि ।
चम्मगणितागणीनिहि, सिरिगेहेचक्कीणोहुति ॥१॥
सेणावईगाहावई, पुरोहियवदईनीययनगरे ।
थीरयणरायकुले, वेअइढतटेगयतुरया ॥ २ ॥

८३८ विचार रत्नसार. - उ०-"जीवेणकहविफासिप, अतमुनुत्तपिजेणसमत्त । निय- माअवाहपुग्गल, परियोचेरासारो ॥१॥ पुद्र- लानापरावर्त पुरलपरावर्त, अपकृष्ट किनिम्यूनोऽ- पुद्गल परावर्त अपगलपरावर्त अय अन्तर्मुहूर्सनु प्रमाण. अन्तर्मुहूर्त अष्टसमयोद्धचरिद्धय यावदित्यर्य तघसम्पत्विोपशमिक अवक्षेपपुद्गलपरावर्तनाधिकार न द्रव्यादि पुद्गलपरावतेत्युपदेशकम् । एक चपटी वगाडीए अथवा आखमीचीने उपा- डीए वेटला वखतमा असख्यातासमय याय तेवा नव समययी माडीने एक मुहूर्त जे एक सामायि- कनो काल वेघडी प्रमाण छे, तेमा एक समय ओछो, तेटला कालने अतर्मुहूर्त कहीए, अर्थात् जघन्यथी नवसमय, उत्कृष्ट बे घडीमा एक समय ओछो, अने ए बेनी वचमा जेटला समयनी सख्या ते सर्वे मध्यमअतर्मुहूर्त जाणवा, एवी रीते अत- मुहर्तना असख्याता भेद थाय छे १५४ प्र०-जातिस्मरण ने शु १ तेना केटला भेद अने तेमा केटला भवनु ज्ञान थाय ? उ०--अवगाथा "पुब्वभवासोपिछई, एकदोतिनिजावनवगवा उवरितस्सअविसओ, सभावओजाईसमरणस्स ॥१॥ कोइपण वस्तु शब्दरूपादि जे पूर्व भवातरमा गाढ परिचितअभ्यास सहवासरूप थएल होय एवा घर, हाद, वाडी, वस्त्र, भूषणादि आकृति मात्र देखता, शब्द मात्र साभळता थका, पूर्वभवसबधि जे - विचार रत्नसार ८४१ अर्थ-सर्वार्थसिद्धविमानवासि देवताओं निश्चययी एक भवमा सिद्धि पामे छे अने विजयादि विमान वासि देओनी स्थिति सख्याताभवनी होय छे १६० म०-आवक जवन्य पदे केटला लामे ? उ०-क्षेत्रपल्योपमने असख्यातमे भागे इति आवश्यक- नियुक्तो जवू द्वीपमन्ये 'कीटिकानव्य अथवा नरा- नहव तमोत्तर यदासमूच्छिमाणा विरह तदाकीटिका- स्तोकानरामहव १६१ प्र०-चार सामायिक ते कया, अने ते प्रत्येकमा कयु सम- कित तया गुणठाणु होय ते कहो उ०-१ श्रुतसामायिकमा दीपकसमकित अने पहेलु गुणठाणु होय, ते अभव्यने पण होय, कारण जे जिनवचनानुसार प्ररूपणा करे तेयी परने मार्ग दीपावे, वर्म पमाडे पण पोताने अधारु होय, अ- पितु श्रद्धा, पाप, नासादि न होय तेथी, २ दर्शन सामायिक सम्यग्दृष्टि चोथागुणठाणीने होय, ३ देशविरतिसामायिक पाचमें गुणठाणे श्रावकने होय, ४ सर्वविरतिसामायिक ते छठेसातमेगुणठाणे वर्तता मुनिमहाराजने होय, ए सर्व गुणठाणानी परिणतिरूप कषायना क्षयोपशमने लीधे होय छे १६२ प्र०-छकाय जीवोनी महाविरावनारूप पाच स्थान कया कह्या छ ? 3०-१ घटी स्थान, २ च्ला स्थान ते रसोड, ३ पाणी- आरु, ४ वासिंदु, ५ उखण मसळादि खाडण

विचार रत्नसार
Parent
ज्यारे धर्मतो गुफात्मपरिणनिरूप चित्तनी निर्मळता,
पिपपकपायादिरहित शुदज्ञानानदीआत्मारामाप छे
१५६ प्र०-चारउपयोगमा रूपी केटला ओ अन्पी केटला,
अने वेशा माटे,
3०-केवलज्ञान अने केरलदर्शन प वे आत्मगुणरूप
होवायी अरूपी छे, अने शेष दस आत्मपुद्गलाश्रित
मिश्रित होवायी रूपी छे.
१५७ प्र०-पाच समकितमा, रूपी केटला अने अरूपी केटला!
ते कारण सहित कहो
उ०-पाच मध्ये एक क्षायिक ते शुझात्मगुण प्राप्ति भणी
अरूपी छे, अने शेपचार पुद्गल उपष्टमी अल्पका-
लिक किंचित् पराधीनता भणी रूपी छे
१५८ प्र०-छआवश्यकमध्ये केटला रूपी अने केटला अरूपी
तथा तेमा सवरमा केटला अने निर्जरमा केटला ?
ज०-सामायिकादि पाचआत्मगुण भणी अरूपी छे, अने
एक प्रतिक्रमण आवश्यक पापनिंदा, गहऱ्यारूप आत्म
सन्मुखी पण मदता भणी रूपी छे, तथा सामायिक
चउवीसत्थो तथा वादणा ते त्रण सवरतत्वमा छे,
अने शेष त्रण निर्जरातत्वमा छे
१५९ १०-सवार्थसिद्ध विमानना देवताओ अने विजयविमानना
देवताओ केटला भवमा सिद्धि पामे
उ०-" सव्वढाओनियमाएगमिभवमिसिज्झईअवस्स । वि-
जयादिविमाणेठ्ठिय, सखिज्जभवाओनायव्वा ॥ १॥

विचार रत्नसार ८४३ लक्षणे लक्षित, स्वसपदाए पूर्ण, परसगे परिणम्यो यको ससार उभो कयों, स्वज्ञानादिगुणे परिणम्यो यको सिद्धता करे, एवा आत्मद्रव्ययी ओळखाण अनतनये, अनतनिक्षेपे याय ए रीते जे आत्मप- तीति करे तेने जैनमागी जैनमार्गमा गणे छे, एवो आत्मा अनेकातपणे जैनमागी छे, एनी जे प्रतीति ते सम्यग्दर्शन, एनु जे ज्ञान ते सम्यग्जान, एमा जे रमवु ते सम्यरुचारिन कहीए १६४ प्र०-द्रव्यास्तिकनयना छ सामान्य स्वभाव कहो उ०-१ अस्तित्व, २ वस्तुत्व, ३ द्रव्यत्व, ४ प्रमेयत्व, ५ प्रदेशत्व, ६ अगुरुलघुत्व १६५ प्र०-वस्तुना अग्यार विशेष स्वभाव कहो उ०-१ नित्य, २ अनित्य, ३ एक, ४ अनेक, ५ सत्य, ६ असत्य, वक्तन्य, ८ अवक्तव्य, ९ भेद, १० अभेद, ११ परम स्वभाव १.६६ प्र०-प्रकारातरे वीजा नव आत्मवस्तुस्वभाव कहो उ०-१ स्वप्रदेश, २ अप्रदेश, ३ चेतन, ४ अचेतन, ५ मूतिमत, ६ अमूतिमत, ७ कर्तृत्व, ८ भोक्तृत्व, ९ परिणामिक १६७ प्र०-पड्व्यमध्ये प्रत्येकना चार चार गुण छे ते कहो उ०-१ धर्मास्तिकायना-अरूपी, अचेतन, अक्रिय अने गतिसहायक २ अधर्मास्तिकायना-अरूपी, अचेतन, अक्रिय, अने स्थिरसहायक

मा सनरार
पीसण स्पान, ए पाच उसाय हिंसाना स्पान, त्या
उत्तमजीवो निशकपणे न पर्तता अतिपतनाए पते
छे, तेयी आकरो कर्मम पडनो नयी
१६३ म०-आत्मस्वरूप सूचक केटलाएक अन्वय अने व्यति-
रेकभारे विशेषणो कहो
३०-असख्यातप्रदेशी, अनतज्ञानमयी, अनतदर्शनमयी,
अनतचारिनमयी, अनतदानमयी, अनतवीर्यमयि,
अनतलाभमयी, अननभोगमयी, अनतउपभोगमयी,
अरूपी, अखड, अगुरूलधुमयी, अक्षय, अजर, अमर,
अशरीरी, अत्येन्द्री, अणाहारी, अलेशी, अनुपाधिक,
अरागी, अद्वेषि, अक्रोधी, अमानी, अमायी, अलोमी
मिथ्यात्वरहित, अविरतिरहित, कपायरहित, योगरहित,
अयोगी, सिद्धस्वरूपी,ससाररहित,स्वात्मसत्तावत, परसत्ता
रहित, परभाव अकर्ता, स्वभाव कर्ता, परभाव अभोक्ता,
स्वभाव भोक्ता, क्षायिक वेत्ता, स्वक्षेत्रावगाहि, परक्षेत्र
अनावगाहि, लोकप्रमाण अवगाहनवत, वर्मास्तिकायथी
मिन्न, अधर्मास्तिकायथी भिन्न, आकाशास्तिकाययी
मिन्न, पुद्गलथी मिन्न, परकालथी मिन्न, स्वद्रव्यवत,
स्वक्षेत्रवत, स्वकालवत, स्वभाववत, अवस्थानपणे
स्वगुणयी अभिन्न, कार्यभेदे भिन्न, अवस्थितसत्ता-
वत, परिणमनसत्तावत, स्यास्तिकपणे नित्य,
पर्यायास्तिकपणे नित्यानित्य, द्रव्ययणे एक, गुण
पर्यायपणे अनेक, अनतद्रव्यास्तिकधर्मवत, अनत
पर्यायास्तिकधर्मवत इत्यादि स्वसपदामपी, चेतन
९०

विचार रत्नसार . लक्षणे लक्षित, स्वसपदाए पूर्ण, परसगे परिणम्यो थको ससार उभो कयो, स्वज्ञानादिगुणे परिणम्यो यको सिद्धता करे, एवा आत्मद्रव्ययी ओळखाण अनतनये, अनतनिक्षेपे याय ए रीते जे आत्मप्र- तीति करे तेने जेनमागी जैनमार्गमा गणे छे, एवो आत्मा अनेकातपणे जैनमागी छे, एनी जे प्रतीति ते सम्यग्दर्शन, एनु जे जान ते सम्यग्ज्ञान, एमा ने रमवु ते सम्यरुचारित कहीए १६४ प्र०-द्रव्यास्तिकनयना छ सामान्य स्वभाव कहो उ०-१ अस्तित्व, २ वस्तुत्व, ३ द्रव्यत्व, ४ प्रमेयत्व, ५ प्रदेशत्व, ६ अगुरुलवुत्व. १६५ प्र०-वस्तुना अग्यार विशेष स्वभार कहो उ०-१ नित्य, २ अनित्य, ३ एक, ४ अनेक, ५ सत्य, ६ असत्य, ७ वक्तव्य, ८ अवक्तन्य, ९ भेद, १० अमेद, ११ परम स्वभाव १.६६ प्र०-प्रकारातरे वीजा नव आत्मवस्तुस्वभाव कहो उ०-१ स्वप्रदेश, २ अप्रदेश, ३ चेतन, ४ अचेतन, ५ मृतिमत, ६ अमृतिमत, ७ कर्तृत्व, ८ भोक्तृत्व, ९ परिणामिक १६७ प्र०-पद्रव्यमध्ये प्रत्येकना चार चार गुण छे ते कहीं उ०-१ वर्मास्तिकायना-अरूपी, अचेतन, अक्रिय अने गतिसहायक २ अधर्मास्तिकायना-अरूपा, अचेतन, अक्रिय, अने स्थिरसहायक , .

८४४
पिचार रत्नसार
-
,
२ आमास्तिरापना-अम्मा, जयेनन, जक्रिय, अने
अरकाशदानरत
४ पुद्गास्तिकायना-रूपी, चेतन, सक्रिय, अने
पूरणगटण
५ कालना-अरूपी, अचेतन, जक्रिय, अने वर्तना
६ जीरना-अरूपी, चेतन, सक्रिय, चेतनालक्षणवत
१६८ प्र०-पर्यायास्तिकनयना उ मेद कहो, तथा तेनु किंचित्
विशेषकयन गुणपर्यायस्वरूप कहो
उ०-१ पर्यायत्व, २ भन्यत्व, ३ सित्त, ४ अभव्यत्व,
५ कारणत्य, ६ कार्यत्व
वळी प्रकारातरे गुणपर्याय स्वरूप कहे छे.
दव्यव्यजनपर्याय असख्यमदेशत्व, गुणपर्याय
गुणातरभेद क्षात्यादिभेद, गुणव्यजनपर्याय, एक
गुणना अनतपर्याय, स्वभाव पर्याय, ते षद्गुणहानि
वृधिरूप, अने विभावपर्याय ते नर नरकादिपर्या-
यास्तिक सामान्य पारिणामिक, अखड, अलख,
असहायी, सक्रियना अनतगुणपर्याय समुदायनो
बादर द्रव्यभेद कहीए
१६९ प्र०-द्रव्य अभेदी ते शु?
उ०-द्रव्यना बे भाग न थाय माटे
१७० प्र०-भेद द्रव्य ते केम ?
उ०-गुण गुणना करनार जुजुवा भणी भेदस्वरूपी कहीए
जेम के -ज्ञान गुण, दर्शन गुण, चारित्र गुण, सुख
९२

विचार रत्नसार गुण, दान गुण, लाभ गुण, भोग गुण, वीर्य गुण, इत्यादि अनतगुणमेदे भेदस्वरूपी कहीए १७१ प्र०-सम्यस्त्वना पर्यायनामो कहो 3०-आस्ता, बझा, प्रतीति, निर्धार, रूचि, अमिलाप, बहुमान, अर्थिपण, तत्वइहा, गुण अद्भुतता, गुण गुणी आश्चर्यता, तद्विरहाकारकता, वस्तु प्रेम, तत्वार्थ सदहणा, इत्यादि १७२ प्र०-सम्यगजानना पर्यायनामो कहो उ०-अवलोकन, भासन, परिच्छेदन, विवेचन, अमूर्ति- चेतनत्न, सर्ववेत्ता, अप्रतिपातित्व निरावरणत्व, ज्ञाय- कता, स्वरूपओळखाण, स्वरूपानुभव इत्यादि १७३ प्र०-सम्यक्चारित्रना पर्याय नामो कहो उ०-स्थिरता, तत्वरमण, निश्चयत्वानुम् ति, परमक्षमा, प- रममार्दव, परमआर्जव, परमनिलाभता, अकामता, अनासगता, सुख, स्वरूपविलास, ठरणता, सतोप, समता, स्वरूपस्वादता, स्वरूपानद, सहजता, खा- धीनता, इत्यादि १७४ प्र०-सम्यस्त्वनी दशरुचि कहो 3०-१ निसर्ग रुचि, २ उपदेश रुचि, ३ ज्ञान रुचि, ४ सूत्र रुचि, ५ बीज रुचि, ६ अमिगम रुचि, ७ विस्तार रुचि, ८ क्रिया रुचि, ९ सक्षेप रुचि, १० वर्म रुचि १७५ प्र०-सम्यक्त्वना पाच लक्षण कहो " , विचार रत्नसार AALAAN- उ०-१ सम एटले उपशम कहेता पारमाधिक अकयायि- पणु एटले अपराधिशउनु पण चित्तमा अतरंग परिणामे रदी माठ चितसे नहि, २ सपेग ते एकात गुदपरमात्मस्वरूपसुखनीज अमिलापा, ३ निद ते ससार यकी उदासीनता तीवउद्वि- ग्नता, ४ अनुकपा, ते प्राणीमानने आत्मवत् लेसी कोइ उपर पण मारातारापणानो मिनभाव न गणे, लुखा व्यवहारे वत, अतरगर्या सदा न्यारो रखे उता सर्वउपर आप समान दया भाव दृष्टि, ५ आस्तिकता ते शुफ जिनवचन उपर एकात हट चित्त प्रतिनधरूप अमा, गाढ सत्य मान्यता १७६ म०-आत्मा बधक छे, जनवक छ, भोक्ता छे, अभोक्ता छे, कर्ता छे, अकर्ता छे ते शु ? 3०-निश्चयनये अनधक, व्यवहारनये बधक, एमज भोक्ता कर्तादि व्यवहारे आत्मा जाणवो, अने निश्चये एटले मूळस्वरूपे अपरिणामिकपणे एटले स्वरूपपरिणामे अभोक्ता, अकर्ता, स्वरूपभोक्ता स्वरूप कर्ताज कहिये १७७ प्र०-प्रणआत्मानु मूळस्वरूप कहो उ०-१ बहिरात्मा ते देहादिकने आत्मबुद्धिए अहभावे एकाते बाह्यदृष्टिए पोतारूप समजे, जेवु देखे ते- वुज माने, पण अतरगहष्टिए कई विचारे नहि के समजे नहि ते एकातमिथ्यादृष्टि पहेलेगुणठाणे जाणा, २ अतरात्मा ते आत्मा अने देहादिक ९४ विचार रत्नसार पौद्गलिक भावने मिन्नभिन्न रखे स्वरूप गवेखे प- रथी उदासीनता चितवे इत्यादिभेदज्ञानी चोयेथी वारमा गुणटाणा सुधी जाणा, ३ परमात्मा ते अतिनिर्मळ, शुद्धस्वरूपानुभवी, निष्कलकी निरा- वरणी सच्चिदानदवनस्वरूपमय, अतरात्माने ध्येय व्यानरूप जाणवा जूनि प्रतिमा नण आत्मानु स्व. रूप नीचे प्रमाणे छ हवे आत्मानो स्वरूप रखे छे आत्मा नण म- कारे ते आत्मानो स्वरूप सम्यग्दृष्टिए पारवो जेम स्थिरता याय ते रखे छे ते रण प्रकार ते कया ? एक बहिरात्मा १, एक अतरात्मा २, एक परमात्मा ३ वे बहिरात्मा कहे छे शरीर, कुटुन, माल, बन, घर, परिवार, नगर, देश, रागद्वेष, मिथ्यात्व, मे मायो, “ जीवाड्यो, मे सुखी कर्यो, में दुखी कयो, र सेविमोहप्रमुख ए सब निजस्वभाव जाणे तेहने बहिरात्मा कहिए तेहने बहिरदृष्टि होइ ते प्रथम मिथ्यात्वगुणठाणे होवे १ अथ अतरात्मा- नो स्वरूप कहे छे प्रथम कर्मना-यानो कारण जाणे ते लखे छे मिथ्यात्व ५ अविरति १२ कपाय २५ योग १५ ए सत्तावन हेतु एजीन कर्मबाधे ते बरता भोगवे ते भोगवता मोहनीकर्मना जोरे दुख पामे तिहारे इम जाणे जे मारो स्वभाव नहि किसी वस्तु जाइ तथा मरण आवे तिहारे इम जाणिजे माहरा प्रदेशथी काइ जातो नथी, हु सर्व वस्तुथी , ९५ ८४८ विचार रत्नसार न मिन्न छ किनारे कुलाभ पामे तिबारे जाणे जे ए वस्तुपी सना रच्यो छे वेदनादिक दृष्टि आने सम- भावे राखे परभर पुलादिक आत्मापी भिन्न जा- णवो उड्यानीखपफरी परमात्मानी वाडा करे ध्यान सन्झाय विशेष करे भावना सीणखीण भावे सवर आदरे निज स्वभावे जे ज्ञान तेहने विशेपे इम मन रहे ते अतरात्मा ध्यान करवा परमात्माने जोग्य चोथा गुणठाणाथी बारमा गुणठाणा सुधि अतरात्मा जाणवो, एहवो जे अतरात्मा ओलखे तिवारे पर- मात्मा पामे, परमात्मानो स्वरूप लखिए छीए सा- क्षात् पोतानो स्वरूप देखे कर्मनी उपाधि रहित ते परमात्मा तेरमे तथा चोदमे गुणठाणे होय तथा सिद्ध जाणवा ए परमात्मा ध्यान योग्य, अतरात्मा ध्याव- वा योग्य ता ध्येय ते परमात्मा ध्यान ते एकाग्रता एम त्रणआत्माना स्वरूप जाणवा इति भाव १७८ प्र०-सदहणा, फरसणा अने प्ररूपणा, सबधी अष्टभगी दृष्टात सहित कहो उ०-सद्दहणा, फरसणा अने प्ररूपणा, एटले जाणे आ- दरे अने पाळे, ते भागे श्री गौतमादि महात्मा जाणवा, २ सद्दहणा, फरसणा, पण प्ररुपणाए असमर्थ ते जे सामान्य साधु उपदेश देवाने असमर्थ छे, पण पोते पाळे छे तेने जाणवो, ३ सद्दहणा पण फरसणा, मरुपणा नहि, ते अनुत्तर विमानवामी देवने, जाणे न आदरे पण पाळे ते भागे जाणवु, ४ सदहणा विचार रत्नसार. ८४९ तथा प्ररुपणा पण फरसणा नहि ते सवेगपाक्षि- कने जाणे, आदरे पण पाळवा असमर्थ ते भागे जाणवु ५ फरसणा पण सदहणा ने प्ररूपणा नहि, ते बाळ तपस्वी प्रमुखने न जाणे पण आदरे अने पाळे ते भागे जाणबु, ६ प्ररूपणा होय पण सह- हणा अने फरसणा नहि, ते आदरे पण न जाणे अने न पाळे ए भागो असजयति सन्यासी आदिने, ७ फरसणा तथा प्ररुपणा होय पण सदहणा नहि, ते न जाणे पण आदरे पाळे ते भागो पासत्था- दिकने तथा अभव्यदीपकसमकितीने पण होय, ८ असद्दहणा, अमरुपणा ते अनादिमिथ्यात्विने, न जाणे न आदरे न पाळे ए भागो जाणवो, ते निगोदिया प्रमुख एकेंद्रियादिकने होय १७९ प्र०-श्रीतीर्थकर प्रभुना दानाधिकार सबधी अतिशयो वर्णवो उ०-प्रतिदिन एकक्रोड अने आठलाख सोनया आपे, ते सोनयो आठरति के मतातरे असीरति- नो पण कह्यो छे, छ घडी दहाडो चढता आपवा माडे ते पोणावेपहोर सुधी जमवानी वेळा पर्यंत मनवाछित दान सोने भाग्यप्रमाणे प्रभु आपे, सोनैयामा प्रभुनु तथा प्रभुना मातपिताना नाम होय, ते एक दिवसना दानना सोनैया नवहजार मण थाय, चालीस मणनु एक गाड भरता कुल २२५ गाडा भराय, ते गाडा तथा मण वगेरे सर्व 107 ८५८ पिचार ग्नसार. मिन छु किनारे फुलाभ पामे तिवारे जाणे जे ए वस्तुथी सनथ रच्यो छे वेदनादिक दृष्टि आने सम- भावे राखे परभर पुद्गलादिक आत्मापी भिन्न जा- णमो छड्यानीखपकरी परमात्मानी वाडा करे ध्यान सज्झाय विशेष करे भावना सीणखीण भावे सवर आदरे निज स्वभावे जे ज्ञान तेहने विशेपे इम मन रहे ते अतरात्मा ध्यान करसा परमात्माने जोग्य चोथा गुणठाणाथी चारमा गुणठाणा सुधि अतरात्मा जाणवो, एहवो जे अतरात्मा ओलखे तिवारे पर- मात्मा पामे, परमात्मानो स्वरूप लखिए छीए सा- क्षात् पोतानो स्वरूप देखे कर्मनी उपाधि रहित ते परमात्मा तेरमे तथा चौदमे गुणठाणे होय तया सिद्ध जाणवा ए परमात्मा ध्यान योग्य, अतरात्मा ध्याव- वा योग्य ता ध्येय ते परमात्मा ध्यान ते एकाग्रता एम त्रणआत्माना स्वरूप जाणवा इति भाव १७८ प्र०-सदहणा, फरसणा अने प्ररूपणा, सबधी अष्टभगी दृष्टात सहित कहो उ०-सदहणा, फरसणा अने प्ररूपणा, एटले जाणे आ- दरे अने पाळे, ते भागेश्री गौतमादि महात्मा जाणवा, २ सद्दहणा, फरसणा, पण प्ररुपणाए असमर्थ ते जे सामान्य साधु उपदेश देवाने असमर्थ छे, पण पोते पाळे छे तेने जाणवो, ३ सदहणा पण फरसणा, मरुपणा नहि, ते अनुत्तर विमानवामी देवने, जाणे न आदरे पण पाळे ते भागे जाणवु, ४ सदहणा - विचार रत्नसार . अप्पाणभावेमाणेविहरई । इम आत्मध्यान करे छ ते सर्व कर्म खपावाने अर्थ ते किहा कर्म ख- पावे, खपाववाना तो त्रण कर्म छे, उदयकर्म अने वकर्म ने सत्ताकर्म, उदीरणाकर्म तो उदयना पेटा मव्ये गवेरवीए, तथा कर्म ते मध्ये उदय सेणे खपावे छे, तथा सत्ताकर्म सेणे शोधे छे, इति अधकर्म किम मटे? उ०-शुभयोगे पाच महावत सवररूपक्रियाए नवा बध पडे ते कर्मनिवारे ते माटे बधकर्म निवारे ते बता. दिक शुभक्रियाए तथा पाच प्रकारना सज्झाय ध्याने उदयकर्म खपावे छे, ते निष्फल करे छे, तथा शुझोपयोगे आत्मध्याने सत्ताए जे कर्म छे ते सोधे खपावे इम मुनि आत्मगुणे निर्मल करी सिद्धि वरे ए भाव १८१ प्र०-ज्ञानीने आस्रव ते सवररूपे केवी रीते परिणमे छे उ०-ज्ञानीने शुनोपयोगे आत्मपरिणामे आस्रवना कारण ते सवररूपे थाय छे आचाराग सूत्रना चोथा । अध्ययने द्वितीयोद्देशके समकितना अध्ययन मध्ये आसवा ते परिसवा । एवी गाथा छ १८२ प्र०-हवे श्रीजीवामिगमसूत्र मध्ये निर्लेपपदे श्रीगौतमे पूछयु के स्वामिन् १ पाच स्थावरना जीव हमणा वर्तमा- नमा जेटला छे ते निलेप थाशे गत्यन्तरे जाशे ? उ०-एक वनस्पतिकायविना पाचकायना जीव निलेप थाशे पृथ्वीअप्पतेउवाउनसकायना जीव सर्वस्था- ८५० विचार रत्नसार. . माप जे जे समयमा मभु पया होय ते वे समय तथा ते ते देशना जाणवा, समत्सरी दानना सोनेया सें। इदोना आदेशे वैधमण देवता आठसमयमा मिपजावी प्रभुना गृहभटारमा भरे, हवे ते दानना उ अतिशय कहे छे-१ तीर्थकरना हाथने विषे सौधर्मेंद्र एवी स्थिति करे के जेयी प्रभु दान देता थाके नहि, जोके प्रभुतो अनत शक्तिना धणी छे, तोपण आ उत्सव अवसरे ए प्रथमइदनो अधि- कार ल्हावो लेवारूप छे, ते अनादिनी एवी मर्यादा जाणवी, इशानेंद्र सुवर्णमय रत्नजडित छडी, दड ल्इ उभो रहे अने चोसठइद्ध सिवाय वीजा सा- मानिक प्रमुख देवोने दान लेता निवारे, अने याचकना भाग्यानुसार इशानेंद्र तेना मुखे बोलावे अने २ चमरेंदें तथा बळीन्द्र प्रभुनी मुठीमा वधारे होय तो पाडी नाखे, अने ओछु होय तो पूरु करी आपे, सामानी प्राप्तिने अनुसारे मळे, ३ भुव- नपतिदेवता भरतक्षेत्रना मनुष्यने तेडी, आवे, ४ अने वाणव्यतर देवो तेमने पाछा, मूकी आवे, ५ ज्योतिषी, देवो, विद्याधरोने मभुना दाननी खबर आपे, ६ तथा प्रभुना पिता घण मोटी दानशाळा करावे, एकमा भरतक्षेत्रना मनुष्यने अन्नपानादि खाद्य वस्तु आपे, बीजीए, वस्त्र आपे, अने श्रीजीए आ- । भरण आपे १८० प्र०-हवे साधु सज्झाय करे छे. शुभयोगे व्रतादिकनी शुभक्रिया करे छे तथा शुशोपयोगे, शुभ स्वभावे

विचार रत्नसार.
८५३
,
चरवळो, ५ पटलाइ ते गोचरीए जाता पात्रा उपर
कपडु राखे ते, ६ रयत्ताण वे पारवींदवानु लूगड,
७ गुडओ ते कालमयखड पानाउपर बांटेछे ते,
ए सात पानाना उपगरणो जाणवा, तथा ८, ९,
१० वे सुतराउ कपडा, अने एक उननु मळी प्रण
कपडा राखे, ११ ओघो, १२ मुहपत्ति, ए बार
जिन कल्पिने होय, तथा १३ मातरीउ, १४ चो-
लपटो एव चउदस्थविरकल्पने जाणवा
१८६ प्र०-श्री युगप्रधानआचार्यना विहार शोभा लक्षण कहो.
उ०-काव्य येषाहिवस्त्रे न पतति यूका,
न राष्ट्रभङ्गो न च देशचिन्ता ।
गदा प्रणश्यतिपदोदकेन,
युगमधाना (मुनिवृन्दपूज्या.) ॥१॥
उत्तम शारीरिकसौंदर्यबळयुक्त, आचार्यना छत्रीस
गुणे सहित, तथा ज्या विचरे त्या अढीयोजन प्रमाण
मरकीप्रमुखनो उदद्व न थाय, उत्कृष्टपणे दशविध
यतिधर्म पाळता पळावता, निजकाळने विषे सर्वयी
श्रेष्ठपुरुष एकावतारी महात्मा युग प्रधान आचार्य-
भगवत जाणवा
१८७ प्र०-नीचे जणावेला शब्दोनो अर्थ कहो
भावना, अध्यात्म, मुनि, मैत्री, कारुण्य, मध्यस्थ,
अने प्रमोद भावनाओ
उ०-जूनि प्रतिमा नीचे प्रमाणे लखेल के
दुर्गतीप्रपतज्जन्नूनधारयतीतिधर्म
सयमादिदशविधसर्वज्ञोक्तोभवति ॥१॥

८५२ विचार रत्नसार. नान्तरे निलंप थाशे, पण वनस्पतिकायनिगोदगो- लकना जीव निलेप " नत्यितत्पअत्यिअणता जीवा जेहिनपत्तोतसाई परिणामो। उपयन्तियचयतियपुणोवि- तत्वेवतत्येव ॥१॥ एणे न्याये बनस्पतिकायना जीव निलेप न पाय ए भाव १८३ प्र०बादरअप्पकाय उपरदेवलोकमा स्या, सुभी छे ? तथा तेउकाय केटले मुघी छे ? उ० बादरअप्पकाय बारमादेवलोक सुधी अने बादरतेउकाय तीळ मनुष्यलोकरूपअढीद्वीपमाहे, उची मेरुपर्वतनी चुलिका सुधी १८४ प्र०-सातमी तथा छट्ठी नरकमा, कुमिमा उपजवानु थाय छे के आलियामा थाय छे उ०-सातमी तथा उट्ठी नरके आलीया छे जेम नदीनी मेखडे वील होय छे एटले सूला छे ते उपर शरीर विधाय तिवारे पडे एम साभळ्यु छे ए भाव. १८५ प्र० साधुना १४ उपगरणो ते कया कया उत्पत्तपत्ताबधो, पायठवणचपायकेसरिया । पडलाईरयत्ताण, गोच्छओपायनिज्जोगो ॥१॥ तिन्नेवयपत्च्छागा, स्यहरणचेवहोइमुहपत्ती। एसोदुवालसविहो, उवहीजिणकप्पियाणतु ॥२॥ एएचेवदुवालस, मत्तगअइरेगचोलपट्टोउ । एसोचउदसरुवो, उवहिपुणत्थेरकप्पमि ॥३॥ पत्त कहेता पात्रु, २ पत्ताबध ते झोळी, ३ पायठवण ते काबळीनो कडको, ४ पायकेसरीया ते विचार रत्नसार ८५३ " चवळो, ५ पटलाइ ते गोचरीए जाता पाना उपर कपडु रासे ते, ६ रयत्ताण ते पानी खानु लूगड, ७ गुठओ ते कालमयखड पागाउपर बांटछे ते, ए सात पानाना उपगरणो जाणवा, तथा ८, ९, १० वे मुतराउ कपडा, अने एक उननु मळी प्रण कपडा राखे, ११ ओवो, १२ मुहपत्ति, ए बार जिन कल्पिने होय, तथा १३ मातरीउ, १४ चो- लपटो एव चउदस्थविरकल्पने जाणवा १८६ प्र०-श्री युगप्रधानआचार्यना विहार शोभा टक्षण कहो. उ०-काव्य येषाहिवस्त्रे न पतति यूका, न राष्ट्रभङ्गो न च देशचिन्ता । गदा प्रणश्यतिपदोदकेन, युगमधाना (मुनिवृन्दपूज्या)॥१॥ उत्तम शारीरिकीदर्यरळयुक्त, आचार्यना छत्रीस गुणे सहित, तथा ज्या विचरे त्या अढीयोजन प्रमाण मरकीप्रमुखनो उदद्रव न थाय, उत्कृष्टपणे दशविध यतिधर्म पाळता पळावता, निजकाळने विषे सर्वयी श्रेष्ठपुरुष एकावतारी महात्मा युग प्रधान आचार्य- भगवत जाणवा १८७ प्र०-नीचे जणावेला शब्दोनो अर्थ कहो भावना, अध्यात्म, मुनि, मैनी, कारुण्य, मध्यस्थ, अने प्रमोद भावनाओ उ०-जूनि प्रतिमा नीचे प्रमाणे लखेल के दुर्गतीप्रपतज्जन्नुन्धारयतीतिधर्म, सयमादिदशविधसर्वज्ञोक्तोभवति ॥१॥ . " ६५२ विचार रत्नसार नान्तरे निर्लेप थाशे, पण वनस्पतिकायनिगोदगो- लफना जीव निलेप " नत्थितत्यअत्यिअणता जीवा जेहिंनपत्तोतसाई परिणामो। उपयन्तियचयतियपुणोवि- तत्वेवतत्वेन ॥१॥ एणे न्याये बनस्पतिकायना जीव निलेप न याय ए भाव १८३ प्र०बादरअप्पकाय उपरदेवलोकमा स्या सुनी छ ? तथा तेउकाय केटले मुधी छे ? उ०-चादरअप्पकाय पारमादेवलोक मुधी अने बादरतेउकाय तीळ मनुष्यलोकरूपअढीद्वीपमाहे, उची मेरुपर्वतनी चुलिका सुधी १८४ प्र०-सातमी तथा उट्ठी नरकमा, कुमिमा उपजवानु थाय छे के आलियामा थाय छे उ०-सातमी तथा छट्टी नरके आलीया छे जेम नदीनी भेखडे वील होय छे एटले मूला छे ते उपर शरीर विधाय तिवारे पडे एम साभळ्यु छे ए भाव, १८५ प्र०-साधुना १४ उपगरणो ते कया कया. उ०-पत्तपत्ताबधो, पायठवणचपायकेसरिया । पडलाईरयत्ताण, गोच्छओपायनिज्जोगो ॥१॥ तिन्नेवयपत्च्छागा, रयहरणचेवहोइमुहपत्ती ।। एसोदुवालसविहो, उवहीजिणकप्पियाणतु ॥२॥ एएचेवदुवालस, मत्तगअइरेगचोलपट्टोउ । एसोचउदसरुवो, उवहिपुणत्थेरकप्पमि ॥ ३ ॥ पत्त कहेता पाठ, २ पत्ताबध ते झोळी, ३ पायठवण ते काबळीनो कडको, ४ पायकेसरीया ते । .

विचार रत्नसार, इशान देवलोके, अने नवयी सोळ सुधीना प्रभुना पिता जीजा सनत्कुमारदेवलोके, अने सत्तरथी घो- वीस सुधीना पिता चोया महेंद्रदेवलोके प्राप्त थया छे प्रथमना आउजिननी माताओ मोक्ष, नवयी सोळसुधीना जिननी माताओ जीजा सनत्कुमार देवलोके, अने शेष सत्तस्यी चोवीस सुधीना आठ जिननी माताओ चोथा महेद्रदेवलोकने प्राप्त थएल छे १८९ म०-श्रीजिनवाणीश्रवण, चारवातीकर्मना क्षयोपशमे केवी रीते थाय? उ०-१ अतरायकर्म तथा दर्शनावरणीयकर्मना क्षयोप- शमे जिनवाणी साभळवानी रुचि थाय, २ दर्शना- वरणीय तथा जानावरणीयकर्मना क्षयोपशमे वाणी काने सामळे तथा समजे, अने ३ मिथ्यात्वमोह- नीयमा क्षयोपशमे जिनवचन आत्मस्वरूप ज्ञानरूप ययार्यसम्हणामा आवे १९० प्र०-श्री जिनवाणीनु ध्यानरूप एकाग्रमणमन महाफल दायक क्यारे थाय उ०-धर्मान्तरायना क्षयोपशमे सयमफलपामीने एकाग्रता- रूपध्यानमाहि सिमि बरे, तथा चारकर्म क्षायिक भावे थये थके केवळज्ञान अने केवळदर्शनादि अनतलक्ष्मी प्रगट करी महानदपद पामे १९१ प्र०-चारसकारनी बुद्धिनु स्वरूप टुकमा दृष्टात सहित समजावो 3०-१ औत्पातिकी बुद्धि ते मतिजानावरणीयकर्मना क्षयो- १ ८५४ विचार रत्नसार- हवे-आत्मानभानयतीतिभावना, आत्मानअधिकृत्यकरोतीति अध्यात्म, मन्यतेजगत तस्य, स मुनि प्रकीर्तित सम्यक्त्वमेवतन्मौन, सम्यस्त्वतत्त्वमेव ॥ १ ॥ इतियोगविन्दुग्रन्ये हरिभद्रसरिणा अव्यात्मभावनाच- बुर्धाकथिता यथा ॥ परहितचिंतामनी, परदु खविनाशिनीतयाकरुणा । परसुखतुष्टिर्मुदिता, परदोपोपेक्षणमुपेक्षा॥१॥ ए भाव, हवे छद्मस्थजीवानाध्यानकथित, अतमुहुत्तमित्त, चिंता- वत्थाणमेगपत्थुमि, च्छछउमत्याणज्झाण, योगनिरोहों- जिणाणतु इतिध्यानम् । आत्मामत्ये भाववु अने आत्मचित्वन कर वे भावना, आत्माने अधिकारीपणे कार्य करनार ते अध्यात्मपचास्तिकायरूपजगत्तत्त्वने जे यथार्थ माने तेने मुनि कहीए, परहित चिंता ते मैत्री भावना, परदु ख विनाशनी इच्छा ते कारूण्य भावना, परसुखदिठे सतोप तथा प्रमोद आणे ते प्रमोद भावना, पर दोषनी उपेक्षा ते मध्यस्थ भावना १८८ प्र०-वर्तमानचोवीसजिनना मातपितानी गति कहो. 3०-उसभपियानागेसु, सेसाणसत्तहुतिईसाणे । अठ्य सणकुमारे, माहिंदे अट्ट बोधव्वा ॥१॥ अकृण जणणीओ, तित्थयराण इति सिद्धिओ। अठ्ठय सणकुमारे, माहिदेअबोधव्वा ॥२॥ प्रथमतीर्थकरना पिता श्री नामिराजा ते नागकुमार मध्ये; वीजायी आठमा सुधीना प्रभुना पिताओ बीजा -- विचार रत्नसार , एहने आत्मिएकाग्ररूप परिणमे तिवारे ए सुखरूप सुखमय सपूर्णधर्म पामे ए भाव । १९५ प्र०-भावकर्म, द्रव्यकर्म, अने नोकर्म ते शु? उ०-अनादिअशुद्धोपयोगरूप विभावताइ रागद्वेषमोहरूप आत्मा परिणमे ते भावफर्म, ते आकर्षणेकर्मरूप वर्गणा धाय ते द्रन्यकर्म, ते वर्गणा जेवारे पाच शरीररूपे परिणमे ते नोकर्म कहिए एम वण प्रकारे कर्मनी वक्तव्यता जाणवी १९६ प्र०-अविरतिसमकिती, देशविरति तथा प्रमत्त अप्रमत्तादि मुनि सम्यस्त्व वमी मिथ्यात्वे जाए तो तेओ प्र- त्येककर्मनी स्थिति उत्कृष्ट केटली बाचे ? उ०-अविरतिसमकिती, वमीने मिथ्यात्वे उत्कृष्ट स्थिति आयुवर्जिने शेष सातकर्मनी एकपल्योपमने अस- ख्यातमेभागे अतर्मुहर्त्तन्यूनएककोडाकोडीसागरोपम- माहे बाधे, तथा देशविरति उत्कृष्ट नव पत्योपमन्यूनएककोडाकोडीसागरोपम उत्कृष्ट बध करे, पण नेयी अधिक न करे जूनि प्रतिमा नीचे प्रमाणे छे सम्यरष्टिजीव मिथ्यात्वने उदये सम- कितमीने पालो मिथ्यात्वगुणठाणे जाय तोपण आयुवर्जित सातकर्मनी स्थिति पल्योपमने असख्या- तमेभागे ऊणा एककोडाकोडीसागरनो बच करे, उत्कृष्टो बध एटलो क्रे, देशविरति नवपल्योपम ऊणा एककोटाकोडीसागरनो बध उत्कृष्टो करे तथा मुनिपणु पामीने पडे पालो मिथ्यात्वे जाय, - ८५६ विचार रत्नसार पशमे क्याय पण न दिनु होप न साभव्यु होय छता सहज स्वभाने पोतानी बुद्धिने जोरे सम- यसूचककार्य करी शके, अभयकुमार तथा रोहानी परे, २ वैनयिकी ते गुर्खादिकनो विनय बहुमान करता मतिज्ञानावरणीयकर्मनो क्षयोपशम थइने बुद्धि उपजे ते नागार्जुनादिकनी परे, ३ कार्मणिकी ते विज्ञान, कळा, व्यापारादिनो अभ्यास करता करता जे बुद्धि प्रगटे वे, ४ पारिणामिकी ते वृक्ष अनु- भवी पुरुषोनी सगते रहेवायी तथा वयना परिपाके जे बुद्धि उत्पन्न थाय ते १९२ प्र०-जातिस्मरणज्ञान अने विभगज्ञान ते शामा समाय छे ! उ०-जातिस्मरणज्ञाननो मतिज्ञानमा समावेश थाय छे, अने विभगज्ञाननो अवधिदर्शनमा समावेश थाय के १९३ प्र०-राशिगतसूर्य प्रश्न उ०-मेषराशिनो सूर्य होय त्यारे कन्याराशिना सूर्यनी तथा चन्द्रनी चाल उत्तरभणी थाय, तथा तूलाराशि थकी माडी मीनराशि सुधिना चन्द्रनी चाल दक्षिणदिशा तरफ थाय छ १९४ म०-मिथ्यात्वअविरतिना हेतुनो प्रश्न , उ-जेहवो आत्मानो शुद्धोपयोग वस्तु आवखाने जेम मिथ्यात्वबलवत्तर छे, तेम आत्माना परिणमन सुख निवारवाने अविरति बलवत्तर छे, अविरतिनो उदय रळवाथी आत्मानु विरतिपरिणमन थाय छे ने वेयी सुखमय आत्मा स्वस्वरूपे परिणमे छे विचार रत्नसार एहने आत्मिएकाग्ररूप परिणमे तिवारे ए सुखरूप सुखमय सपूर्णधर्म पामे ए भाव। १९५ प्र०-भाषकर्म, द्रव्यकर्म, अने नोकर्म ते शु? उ०-अनादिअशुद्धोपयोगरूप विभावताइ रागद्वेषमोहरूप आत्मा परिणमे ते भापकर्म, ते आकर्षणेकर्मरूप वर्गणा धाय ते इत्यकर्म, ते वर्गणा जेवारे पाच शरीररूपे परिणमे ते नोकर्म कहिए एम त्रण प्रकारे कर्मनी वक्तव्यता जाणवी १९६ प्र०-अविरतिसमकिती, देशविरति तथा प्रमत्त अप्रमत्तादि मुनि सम्यक्त्व वमी मिथ्यात्वे जाए तो तेओ प्र- त्येककर्मनी स्थिति उत्कृष्ट केटली बाधे ? उ०-अविरतिसमकिती, वमीने मिथ्यात्वे उत्कृष्ट स्थिति आयुवर्जिने शेप सातकर्मनी एकपल्योपमने अस- ख्यातमेभागे अतर्मुहर्त्तन्यूनएककोडाकोडीसागरोपम- माहे बाघे, तथा देशविरति उत्कृष्ट नव पल्योपमन्यूनएककोडाकोडीसागरोपम उत्कृष्ट बध करे, पण नेयी अधिक न करे जूनि प्रतिमा नीचे प्रमाणे छे सम्यक्हष्टिजीव मिथ्यात्वने उदये सम- कितवमीने पालो मिथ्यात्वगुणठाणे जाय तोपण आयुवजित सातकर्मनी स्थिति पल्योपमने असख्या- तमेभागे ऊणा एककोडाकोडीसागरनो बब करे, उत्कृष्टो बध एटलो करे, देशविरति नवपल्योपम ऊणा एककोडाकोडीसागरनो बध उत्कृष्टो करे तथा मुनिपणु पामीने पडे पालो मिथ्यात्वे जाय, 108 ८५८ विचार रत्नसार तोपण आयुरर्जित सातकर्मनो स्थितिन नवसागरे ऊणा एककोडाफोडीसागरोपमनो उत्कृष्ट बच करे तथा उपशमणियी पढीने मिथ्यात्वे जाय तेपण आयुपखित सातकर्मनी उत्कृष्टि स्थिति पाघे तो नव हजारसागरोपममे ऊणी एककोडाकोटीसागरनो उत्कृष्टो च करे इति भुवनभानुचरिमे का छे १९७ प्र०-जीव मार्गाभिमुख यइ समकिन क्यारे पामे ? उ०-भवित यताने योगे अकामनिर्जराए कर्मखपावता ये पुद्गलपरावर्तकाल ससार रहे, त्यारे जीव आस्तिकपणे जिनमार्गसन्मुखी याय, पछी साथी ससारपरिभ्रमण करतो जीव उचो आवे त्यारे ते मार्गपतित दोढ- पुद्गलपरावर्तससार रहे सारे जिनोक्त मागें रुचिवत थाय, वळी कर्मयोगे त्यायी पडी ससारभ्रमण करतो ज्यारे एकपुद्गलपरावर्तकालससार रहे, त्यारे जीव मार्गानुसारीपणु पामे, त्या मिनादिकदृष्टि प्रगटे, न्यायसपन्नविभवादि पात्रीशगुणयुक्त थाय, त्या जि- नोक्त मागे चाली मिथ्यात्व मद करतो करतो नदी गोळपाषाण न्याये घचना घोळ परिणामे (एटले जेम नदी काठेथी छुटो पड्यो एक पत्थर, ते जेम पाणीनी छोळमा अथडातो कुटातो पोतानी मेळे गोळ थइ जाए एम) ज्यारे जीव अर्धपुवलपरावर्तकाल माहे आवे सारे आर्यदेश, सज्ञीपचेन्द्रियमनुष्य उत्तम जैनकुल सपन्न थइ सद्गुरु उपदेशे के सहजस्वभावे कोई निमित्तपामीने यथाप्रवृत्तिकरण लही उज्वल आत्म- ११६ विचार रत्नसार ८५९ १ वीर्योल्लास यकी अपूर्पकरणे रागद्वेषनी ग्रथि भेदी मिथ्यात्वमोहनीयनी सातमकृतिने उपशमावतो अतर- करणमा थइ अनिवृत्तिकरणे आवी सम्यग्दृष्टि याय, त्यारे जीरने मार्गमाप्त कहीए, वस्तु सत्ता वर्म अशे प्रगट को त्या तेनी केवी दृष्टि बते तो का छे के - काव्य जशे होय इहा अविनाशी, पुदल जाल तमाशी, चिदानदधन स्वरूप विलासी, केम होय जगनो आसी, ए गुण वीरतणो न वीसारु सभारु दिन रातरे, पशु टाली सुररूप करे जे, समकितने अपदातरे १९८ प्र०-साधुने जे प्रणयोग छे ते रत्ननयगुणे प्रणम्या छे ते केवी रीते? उ०-मनोयोग ते सम्यग्दर्शनगुणे दृढासक्तिकरूपे परिणमे छे, तथा वचनयोग ते जिनवाणीमाहे ज्ञानगुणे प्र- णम्यो छे, तथा काययोग ते चारिनगुणे "जयचरे जयचिठे जयमासे जयसये " इत्यादिकरूप प्रगट्यो छे तेथी यावज्जीवसुधि सावद्ययोगयी निवर्तीने मुनि सयमयोगे परिणमे छे इतिभाव १९९ प्र०-ससारमा जीव भव्यअभव्यादि प्रणप्रकारना छे ते कया ? तेनु स्वरूप दृष्टातसहित स्पष्ट समजावो 3०-१ भव्य, २ अभव्य, ३ भव्याभव्य अथवा जातिभव्य, त्या भव्य प्रणप्रकारे छे -निकटभवी, मध्यमभवी, अने दुर्भवी, निकटभवी सोहागण स्त्री समान, ते जेम सोहागणी स्त्री पतिसमागमे 3 मासमा गर्भ ८६० विचार रत्नसार माप्त यइ पुनप्राप्ति फळ ल्हे, तेम निकटभवी सद्गुरु उपदेश योगपामी शुद्ध अदा रही, शुरू चारिन पाळी तत्काळ सिद्धि वरे, वीजा मध्यमभवि ते कोइ सीने पति समागमे वे चार वर्षे गर्भ रही पुनमाप्ति थाय तेम मध्यमभवी थोडा सख्याता भवमा सिद्धि वरे, अने नीजा दुर्भवि ते जेम कोइ स्त्रीने घणे कटे घणे काळे पतियोगे गर्भ रही पुत्र प्राप्ति याय तेम वर्मपिराधक, पडवाइ बहुलकर्मी भारेकर्मीपणाने लीधे घणे काले, घणे कटे, घणे उप- देशे कर्मखपावी सिद्धि वरे २ अमव्यस्वरूप वाझणी स्त्री समान जाणवु, एटले जेम वध्यादोषवत स्त्रीने पतिनो समागम छता पुत्र प्राप्ति थायज नहि, तेम अभव्यने मुक्तिगमन यो- ग्यतास्वभाव न होवाथी गमे तेटली वर्म सामग्रीनी जोगवाइ मळे, तोपण शुज श्रद्धारूप खरेखरु ससार यकी उद्विग्नपणु, स्वपरओळखाणपणु भेद ज्ञान न थाय पण पोद्गलिकआशीभावे चारित्रादिक पाळे, नवमा ग्रैवेयक सुधी जाय छे, पण तेनु सपळु फोक निम्फळ जाय छे, केम जे तेना ज्ञानक्रियादि मो- क्षने अर्थे यथार्थ न होय तेयी ३ तथा भव्याभव्य जीवने सत्ताए भव्य समान योग्यता वरावे छे, तोपण कोइ भवितव्यताज ज्ञा- नीए एवी दिठेली के तेनो स्वभाव व्यवहारराशिमा आववारूप न थाय अन गाथा- विचार रत्नसार "सामग्गी अभावाओ ववहारराशीअप्पवेसाओ। भब्वावितेअणता, जे सिदिसुहनपावति ॥ १ ॥ अर्थात् ते अव्यवहारराशियोज जीव रह्यो यको अनताअनतकाळ बाळविधवा स्त्रीनी परे सूक्ष्म- निगोदादिमा जन्ममरण करतो रहे, जेम वाळविधवा स्त्रीने सुकुलीनताने लीधे कदी पण भरथारनो योग न याय तेयी पुन प्राप्ति न सभवे एम जाणवू २०० प्र०-अध्यात्मसारग्रन्यमा रणनकारना जीव कह्या छे ते कया? उ०-भवामिनदी ते मिथ्यादृष्टि १ वीजो पुद्गलानदी, से चोथा पाचमा गुणटाणावाळा सम्यग्दृष्टि, २ आत्मा- नदी ते मुनि, ३ इतिभाव २०१ प्र०-वैराग्यना त्रणप्रकारनु टुक स्वरूप कहो उ०-दु खगर्भित वैराग्य, त्या जीव ससारमा नानाविध दुख क्लेश पामतो विषयकपाययी विरक्तबुद्धि- वाळो थइ धर्मसन्मुखी थाय पण सम्यग्ज्ञान न होवाथी पाछु पौगलिकसुख मळता वैराग्य नष्ट थवानो सभव छे, तेने दुखगर्भितवैराग्य कहीए, पण ते जो धर्म साधन करता थका सद्गुरु उप- देशयोगे भेदज्ञान पामे तो पछी तेनो वैराग्य सत्य स्थायी जानगर्भित कहेवाय, एटले ज्ञानगर्भित वैरागी परमार्थे ससारनो एकात त्यागी होय, लूखी वृत्तिए ससारमा रहे अने पूर्णमोक्षामिलाषी होय, ज्यारे मोहगर्मितवैरागी कोई स्त्री, पुत्र, धनादि ,

८६२
विचार रत्नसार
वस्तुना जभावे मोहमयविषयफपाययुक्तमलिन परि-
णतिनत यो थको मोहित खना भारने लीधे
ससारयी उद्विग्न रहे, पण ते साचो दु खगर्भित वैराग्य
भागे पण न गणाय
२०२ प्र०-चतुर्विध ससारीप्राणीनु स्वरूप दृष्टातयी समजावो
उ०-१ सघनरानि समान, एटले घन कहेता ने मेघनी
घमघोर घटाए आच्छादित पएली अमासनी रानिमा
काइपण मूझ न पडे तेम जीवने गादमिथ्यात्वना
उदये तीबमोहनी प्रपलताए कइपण हिताहित
सत्यासत्य के कृत्याकृत्यनी सूझ न पडे तेवा प्रथम
गुणठाणी भवामिनदी मिथ्यात्वदृष्टि जीव जाणवा,
२ अपनरानि समान ते जेम मेघना वादळा रहित
रात्रिमा घटपटादिक सूझे, तेम जीव काइक मि-
य्यात्वनी मदताए मोहादिकना किचितक्षयोपशमे
वर्ममार्गसन्मुखी मार्गानुसारीजीव अघनरात्रि समान
जाणवा, ३ सघनदिन समान ते जेम वादळाए
आच्छादितसूर्यवाळा दिवसमा निर्मळ रात्रि करता
विशेष स्पष्ट घटपटादि पदार्थों सूझे छे, तेम
मिथ्यात्वनय क्षयोपसमादि गुणेकरी सम्यग्दृष्टि
चोथा गुणठाणाथी बारमा गुणठाणा सुधीना परमा-
स्माना मार्गप्राप्त ज्ञानिमहात्माओ जाणवा, ४ अने
अवनदिन समान एटले मेघरहित निर्मळमर्यवत
दिवसनी परे पूर्णज्ञान प्रकाशवत केवळज्ञानी भगवतो
जाणवा.
२०३-प्र०-ससारीजीवने आठ दृष्टि कहि छ तेना नाम कहो

विचार रत्नसार उ०-१ मिना, २ तारा, ३ बला, ४ दीमा, ५ स्थिरा, ६ काता, ७ प्रभा, ८ परा, ए आठ हष्टि कहि तेनो विस्तार योगष्टिसमुच्चयथकी जाणतो २०४ प्र०-सर्वपदार्यमानमा चारकारण छे ते हयातयी कहो उ०-१ उपादानकारण ते जेम घटमा मृत्तिका, २ नि- मित्तकारण ते जेम घटनी उत्पत्तिमा चक्र, दट, ची- वरादि छे तेम जाणा, ३ असाधारणकारण ते जेम पर निपन्न करवामा कुमार हेतुभूत छे तेम जाणबु, ४ अपेक्षा कारण ते वस्तु जेम छे तेमनी तेम रहे पण तेना आलाने, सहायताए आश्रये आपणु कार्य करीए, जेम घट नीपन्यो तेमनो तेम रहे पण तेहनी साहाये जलभरणपानरूप काम नीपजे, तथा जेम सूर्य दीपे छे, तेनी साहाये आपणा काम करीए छीए तेम जाणवु, वळी वीजा पण रण कारण कया छे -समवायिकारण ते सहचारी सबंध कारण जेम घटनु उपादान मृत्तिका छे तेम, २ अस- मवायिकारण ते असहचारी मिन्ननिमित्त, जेम चटनी उत्पत्तिमा कुभार छे तेम, ३ निमित्तकारण ते चक्रदटचीवरादिरूप जाणबु २०५ प्र०-सर्ववस्तु, द्रन्याथिकनय अने पर्यायाथिकनय बढे प्ररूपाय छे ते माहेयी सातनय ते कया ? उ०-१ नेगम, २ सग्रह, ३ व्यवहार, ४ ऋजुमन, ५ शब्द, ६ समसिरुट, ७ एवमूत ए सात नय ते- हना उपनय ए विस्तारनयचक्रयी जाणवो, तथा ८६४ विचार रत्नसार -------- कपाय उपने पूर्वकोडिनु पारयुचारिन क्षप कर ते उपर गाथा आचारगनी दीपिका मध्ये छे यत " सामणमणुचरतस्स, कसायजस्सउमडाइति, मनामि- ईलुपुप्फब, निष्फल्तस्ससामण्णम्।।१॥जअजियचरित, देसूणएविपू-बकोडीए तपिकसायमित्तोहारेईनरोमुहु- त्तेण ॥२॥" २०६ प्र०-आविल एटले शु? उ०-आवश्यकनी टीका मध्ये का छे के आय कहेता ओसामण कादयु होय ते मव्येयी जेम अन्न काढीए ते रीते काढीने आहार करयो, अने जे आम्ल जे खाटोरस पविगय ए वे वर्जिने ते आविल कहिए २०७ प्र०-नियाणानो प्रश्न उ०-नियाणानव प्रकारे दशाश्रुतस्कघ मध्ये कह्या छे, तथा जे नियाणु समकितनु छे, अने बीजु अवतनु छे ए बे मध्ये जे समकितनो घात करी नियाणु बाधे ते समकित पामवो दुर्लभ करे, तथा अविर- तनु भोगप्रतियुनियाणु बाधे ते भोग पूरा थये बत उदये आवे जेम द्रौपदीना जीवे भोगप्रतियु नियाणु बाध्यु ते पाच भर्तारी यइ भोग पुरा थया पछी व्रत उदये आव्यु ते माटे अविरतिआसरीनियाणु कहीये पण ते समकितनो -णी इत्यर्थ २०८ प्र०-चार प्रकारना सामा उ०-१ श्रुतसामायिक, २१ सामायिक,४, विचार रत्नसार . लाभ ते भव्यमिथ्यात्विने होय अभन्यने पण द्रव्ययी तनो लाभ याय, तथा समकितसामायिक ते स- म्यग्दृष्टिने होय पाचमे गुणटाणे देशविरतिसामा- यिकनो लाभ होय, सर्वविरतिसामायिक ते उद्या गुणटाणायी मुनिने होय २०९ प्र०-व्यवहार अने निश्चय समकितीनु टुक स्वरूप कहो उ०-जिनवाणी प्रतीतेग्रहीने प्रत्यक्षस्वरूपने वेदे, गुण पर्यायनो विलउन करे, भेदरूप रत्ननयने आराधे, तेने व्यवहारसमकिती कहीए, तथा जेने जिनवाणी गुण पर्यायअभेदरूपरनये द्रव्य व्यरूपे निर्विकल्प समाधिपणे परिणमे तेने निश्चयसमकिती कहीण, ते आगळ जता व्यवहारे प्रवर्तता वस्तुधर्मरूप शुझात्मनिश्चयपरिणतिरूप समकितने मेळवे २१० प्र०कया ज्ञानयी अने कइक्रियाथी मोक्ष याय' उ०-किया वेप्रकारनी छे -१ योगक्रिया ते शुभाशुभ बधरूप छे, अने उपयोगक्रिया ते पोताने स्वरूपे परिणमे, त्या कर्म निर्जरा याय, योगक्रिया जाते आस्रवरूप होइ कर्मवध निपजावे, अने उपयोग क्रिया ते स्वरूप प्रकटावे, एटले योगक्रिया कर्म ग्रहण त्यागरूप मुलट पुलट छे, परंतु सर्वथा मोक्षार्थे नथी, केम जे सर्वथा मोक्षरूप पर्म ते शुदोपयोगे छे, माटे उपयोगशून्यक्रिया आस्रवरूप मोक्षनी एटले आत्मस्वरूपनी कत्तरणी एटले आच्छादन कर- नारी छे (नाश करनारी छे) 100 ८६४ विचार रत्नसार " ? ऊपाय उपने पूर्वकोडिनु पात्युचारिन क्षय करे ते उपर गाया जाचारगनी दीपिका मध्ये छे यत सामणमणुचरतस्स, कसायजस्सउकाडाहुति, मनामि- ईलुपुप्फर, निष्फल्तस्ससामण्णम्॥१॥जअजियचरित, देसूणएविणू-बकोडीए तपिकसायमित्तोहारेईनरोमुहु- त्तेण ॥२॥" २०६ प्र०-आविल एटले शु उ०-आवश्यकनी टीका मध्ये का छे के जाय कहेता ओसामण काढ्यु होय ते मव्येयी जेम अन्न काढीए ते रीते कार्डीने आहार करयो, अने जे आम्ल जे खाटोरस पविगय ए वे वर्जिने ते आविल कहिए २०७ प्र०-नियाणानो प्रश्न उ०-नियाणानव प्रकारे दशाश्रुतस्कध मध्ये कह्या छ, तथा जे नियाणु समकितनु छे, अने वीजु अवतनु छे ए बे मध्ये जे समकितनो घात करी नियाणु बाधे ते समकित पामवो दुर्लभ करे, तथा अविर- तनु भोगप्रतियुनियाणु बाधे ते भोग पूरा थये व्रत उदये आवे जेम दौपदीना जीवे भोगप्रतियु नियाणु बाध्यु ते पाच भारी थइ भोग पुरा थया पछी व्रत उदये आव्यु ते माटे अविरतिआसरीनियाण कहीये पण ते समकितनो नथी इत्यर्थ २०८ प्र०-चार प्रकारना सामायिक कया ? उ०-१ श्रुतसामायिक, २ समकितसामायिक, ३ देशविरति- सामायिक, ४ सर्वविरतिसामायिक तेमव्ये श्रुतसामायिकनो - ११२ विचार रत्नसार २१३ प्र०-स्थावर पर्याप्तानी निभाए अपर्याप्त जीव केटला होय? उ०-पृथ्वी, पाणी, आग्नि, वायु, वनस्पति प्रत्येक एटले स्थानके एकेका पर्याप्तानी निआए असख्याता अप- र्याप्त होइ पण सूक्ष्म निगोदीया पर्याप्तानी निश्राये अनता अपर्याप्ता न होइ, ते अनता अपर्याप्ताना शरीर जूदा तेहनो पण आयु बसेंछपन आवलिनु होय पण अपर्याप्तो मरे इम नहोय सर्वे क्षुल्लक भविया छे ते माटे तथा पर्याप्तानु आयु एटलु पण तेटला माहे पर्याप्ति पुरीने मरे एहवु वायु छे इति तत्त्वम् २१४ प्र०-व्यवहारराशियोजीव निगोदमा जाय तो त्या उत्कृष्ट केटलो काळ रहे ? उ०-ते क्षेत्रथकी अढीपुद्गलपरावर्तनकालप्रमाण पछी सूक्ष्मवादरनिगोदमा आवी वळी जाय तो उत्कृष्ट अढीपुद्गलपरावर्तन, वळी त्यायी नीकळी एकेंद्रियादि चक्रमा भ्रमण करी पाठो जायतो वळी उत्कृष्ट एटलो काळ रहे एम आव जा करता सर्व काळ तिर्यंच- गति आश्रिने गणीए तो उत्कृष्ट असख्याता पद्गल- परावर्तन काळ रहे, ते केटला ? स्तोके एक आव- ळीना असख्यातमे भागे जेटला समय थाय वेटला असख्याता प्रमाण पुद्गल परावर्तन जाणवा एम पन्नवणा मध्ये तथा कायस्थितिस्तोत्रनी टीका मध्ये का छे.

विचार रत्नसार २११ मनपअनताए जे जे पदाथों छे वे कहो 3०-प्रयमना प्रणअनते कोइ पदार्य न होवायी शून्य छे, अने घोचेअनते अभयजीवराशि छे, पाचमे अनते मध्यम मागे सम्यक्त्व पडवाइ छ, वळी तेहज पाचमे अनते शुफ सिदना जीवो छे, पण ते पूर्वोक्त पटवाइलोयी जनतगुणा जाणवा, पठी उठो अनतो शून्य, सातमु शून्य पठी आटमे अ- नते सर्वे निगोदीयाजीयो, तथा तेयी अनता अ- नतगुणा पुहलपरमाण, तेथी काळ, तेयी सर्व आ- काश प्रदेश, तेथी केवळज्ञान तथा केवळदर्शनना पर्याय, ए सर्वे एक एकयी अनतगुणा पण आठमे अनते छे, नवमेअनते कोइ वस्तु विशेष नयी, माटे शून्य जाणवो २१२ प्र०-सर्व समकितमा पहेलु कयु समकित उत्पन्न थाय छे ? उ०-सिद्धान्त आगममाहि प्रथम क्षयोपशम सम्यक्य पामे, उपशमनो तत नहि ते श्री जिनभद्गणि क्षमा- श्रमणनी कीधेली समकिन पचवीसी मध्ये का छे, जे पहिलो क्षयोपशम सम्यक्त्व पामे उपशमनो तत नहि तथा कर्मग्रन्थमध्ये पहिलो उपशम समकित पामे त्यारपछी क्षयोपसमकित पामे उपशमनो तत नहि एहवो आचार्यनो मत छ अथ त्यारपछी कालसित्तरी ग्रन्थमध्ये कालिकाचार्य त्रण जुदा कह्या छ तथा कलकी ,यास्ये ए अधिकार पण कालसि- तरी मध्ये छे विचार रत्नसार ८६७ २१३ म०-स्थावर पर्याप्तानी निश्राए अपर्याप्त जीव केटला होय? उ०-पृथ्वी, पाणी, अग्नि, वायु, वनस्पति प्रत्येक एटले स्थानके एकेका पर्याप्तानी निभाए असख्याता अप- याप्त होइ पण सूक्ष्म निगोदीया पर्याप्तानी निभाये अनता अपर्याप्ता न होइ, ते अनता अपर्याप्ताना शरीर जूदा तेहनो पण आयु बसेंउपन आवलिनु होय पण अपर्याप्तो मरे इम नहोय सर्वे शुल्लक भविया छे ते माटे तथा पर्याप्तानु आयु एटल पण तेटला माहे पर्याप्ति पुरीने मरे एहवु वार्य छे इति तत्त्वम् २१४ प्र०-व्यवहारराशियोजीव निगोदमा जाय तो त्या उत्कृष्ट केटलो काळ रहे ? उ०-ते क्षेत्रयकी अढीपुद्गलपरावर्तनकालप्रमाण पछी सूक्ष्मनादरनिगोदमा आवी वळी जाय तो उत्कृष्ट अढीपुद्गलपरावर्तन, वळी त्याची नीकली एकेंदियादि चक्रमा भ्रमण करी पाठो जायतो वळी उत्कृष्ट एटलो काळ रहे एम आव जा करता सर्व काळ तियेच- गति आश्रिने गणीए तो उत्कृष्ट असख्याता पुद्गल- परावर्तन काळ रहे, ते केटला १ स्तोके एक आर- लीना असख्यातमे भागे जेटला समय थाय तेटला असख्याता प्रमाण पुद्गल परावर्तन जाणवा एम. पन्नवणा मव्ये तथा कायस्थितिस्तोत्रनी टीका मध्ये का छे.

विचार रत्नसार. - २१५ प्रदर्शननी क्षपफ अणि कया गुणटाणायी माडे अने चारिननी पफ अगि कया गुणटाणायी माडे ? उ०-दर्शननी क्षपक गि ते चोया गुणटाणायी माडे, चारितनी क्षपक आणि आटमाथी माडे २१६ प्र.-ज्ञानापरणीय कर्मनो जन्य अने उत्कृष्टनव केटलो' उ-कमनोनय जवन्यथी एक समयनो, जवन्य स्थिति ते अतर्मुहूताइ भोगरे, उत्कृष्ट जानादरणीय कर्मनी वीस कोडाकोडी इम ए रीते छे २१७ प्र०-सर्व जीवोनी मूळ मृमिका कइ ? उ०-भव्य, अभव्य, सर्व जीव सूक्ष्म निगोदधी नीकन्या छे मूल मूमिका ते जाणवी २१८ प्र०-जवन्य अने उत्कृष्ट योगनो काल केटलो छ ? उ०-मनोयोगनो जघन्यकाल एक समयनो, उत्कृष्टो अत- मुहूर्तनो काल एम वचनयोगनो पण काल एरीते छे एम घायु छे २१९ प्र०-वस्तुने विपे षड्गुण हानि वृद्धिनु स्वरूप तुकामा कहो उ०-गुण पर्याय सहित जे वस्तु तेने द्रव्य कहीए, ते उत्पाद, व्यय अने गुवरूप ण अवस्थाए सहित छे, परिणामी छे, ते परिणमन उत्पाद व्ययरूप पर्यायरूपे परिणमन, जघन्य, मध्यम, अने उत्कृष्ट स्वरूपे छे, वेने लइने वस्तुमा षड्गुण हानि वृद्धि- रूप अगुरुरुधु पर्याय जे दरेक वस्तु मात्रमा नि- रतर वत छ, ते निपजे छे, ते आवी रीते

विचार रत्नसार
सख्यातगुण वृद्धि, २ असख्यातगुण वृद्धि, ३ अनत
गुण वृद्धि, ४ अनत भाग हानि, ५ असख्यात
भाग हानि, ६ सख्यात भाग हानि, एम द्रव्ययी
द्रव्य परिणमन पड्गुण हानि वृद्धि रूप अगुरूलघु
पर्याय सिद्वमा पण छे
२२० प्र०-आठ कर्मनी वर्गणा अने कामण शरीरमा शो फेर छे?
उ०-कार्मण शरीर ते नामकर्मनी प्रकृति ते नामकर्मनी
वर्गणारूपे कार्मण शरीर जाणीए, बाकी बीजा सात
कर्मनी वर्गणा ते एहने विपे छे इम आधाराधेय
भावे छे जेम कणनी गाठडी पिण वस्त्रमिन्नतिम
कर्मोंनी वर्गणा जुदी ते किम जाणीइ ? जिम के-
वली भगवतने ज्ञानावरणीयादि चार कर्मनी वर्गणा
मूलथी गइ पण तोहि कार्मण शरीर छे त्यारे ते
अनुमाने अन्य कर्मनी वर्गणामिन्न, कार्मण शरीर
ते मिन्न, इम कार्मण शरीरनो स्वरूप जाणवो, पछी
तो जेम तीर्थकर देवे का ते सत्य सद्दह्यो छे
इति भाव।
२२१ प्र०-चतुर्विध बध हेतु पूर्वक कहो
उ०-योग अने कषाय प्रतैया बध चार प्रकारे छे, त्या
एकला योगनी हलचले प्रकृतिग्ध अने प्रदेशबध
थाय छे, अने कषाये करी स्थितिबध अने रसबध
निपजे छे
२२२ प्र०-केवळी भगवतने योग प्रतैयो शाताबध छे, ते शी
रीते १

विचार रत्नसारa उ० केवळी भगतने काइ गुभ सम्परूप व्यपहार नयी, तेमने एक शुक लेइयानो उदय छे, ते योगद्वारे परिणमे छे, अने योगनु परिणमन ते जौदायिक भावे जइ परिणमे, केम जे पुगलने पुद्गलनो निश्राम छे, तेयी ते लेश्याए योग प्रत्यइक एक साता प्रकृतिनो एक समयनो ना छे, ते पीजे समये सक्रमे, अने पीजे समये खेखे अर्यात उत्तम पुद्गल ग्रहे, बीजे समये तेने वेदे अने गीजे समये खेखे एटले खपावे २२३ प्र०-सम्यग्दृष्टिने अने मिथ्याष्टिने शुभाचार अने शुभ उपयोग केवी रीवे होय छे ? उ०-मिथ्यादृष्टिजीवने शुभाचार होय पण शुभोपयोग न होय, अने सम्यग्दृष्टि जीवने शुद्धोपयोग होय वेहने शुभोपयोग आचरणरूपे होय पण आदर न होय अने मिथ्यादृष्टि जीवने शुभाचाररूप होय पण अशुझोपयोगना धरनो अशुभोपयोग होय पण अशुभोपयोग उपचारे कहिए इति भाव, हवे चोथे गुणठाणे सम्यग्दर्शन पामे अनतानुबधिया रागद्वेष तथा गिथ्यात्वमोहनोक्षय तथा क्षयोपशम थाय २२४ प्र०-भामडल करवानी शी जरूर छे ? उ०-आणद श्रावकनी सधि खरतरगच्छे मुनिश्रीसारनी कीधी गाथा त्रणसेने एकासीमी छे ते मध्ये अष्ट- प्रतिहार्य अधिकारे देवता भामडल किम करे छ। तत्र गाथा-वेज अरिहत अतिघणो ए, खमी न शके नरनारी। ते तेज लइ सुख करे ए, पुठे भामडलसार ॥१॥ परमउदारिक शरीरना वेज ११८ विचार रत्नसार - विशेष छे ते तेजना पुद्गल सहरीने प्रभुने पुढे भामडल करे इति भाव। २२५ प्र०-आनन्द श्रापकने पाचसे हलबडे मनि सेटवानु मान केवी रीते हतु ? उ०-तन गाथा-क्षेत्र सेटयु हल पाचस्ये, मुझने अवि- रति एतिरे । घरबरनी पण मोकली, एक सानी वरती जे तिरे ॥१॥ तेनी वरतीनो अर्य लसीए छीए दशमि हस्तरकोवश पिंगत्यावशे एकोनितिन पञ्चशते निवर्तने एकदल इदृशी हलमूमिका पञ्चशत- भूमीघरधरीनी जावी एतद भूमिका पर रहेबानी छे टाकी पाचसे हलमूमीका हल खेटवानी छे उघाडी इतिभाव। २२६ प्र०-कर्मचतुर्थकनपनी विधि केवी रीते छे ? 3०-पूर्व अष्टम १, चतुर्य ८०, प्रान्ते अट्टम इति तपो- दिन ६६, पारणक दिन ६२, उभयदिन मलीने दिन १२८ इति कर्मचतुर्थतपयतोवसुदेव हिंटी- सापउमाअज्जिया, तेनीज्जाएसयासोओ। कम्मचउत्थ उपवणा, दुगितिरित्ताणी सहिचउत्याणिति ॥ १ ॥ ते पदमाआर्याएते चणे आदिनेसमीपेकर्म चउत्थतप कीवो, इति शान्तिनाथ भवाधिकारे, इदुपेणबिंदुषेण भवाधिकारे गुणीकाने भवे ए तप कीघो इतिभाव। २२७ प्र०-धर्मचक्रवाल तपनी विधि केवी रीते छ। उ०-अट्टम १, एकातर चतुर्थ ३७, प्राते अष्टम इति . वर्म चक्रवाल तपनी विधि जागवी, अथ विधि प्रथम ११२ विचार रत्नसार उ०-केवळी भगतने काइ शुभ समपरूप व्यवहार नयी, तेमने एक ट्रक लेश्यानो उदय छे, ते योगद्वारे परिणमे छे, अने योगनु परिणमन ते औदायिक भावे जइ परिणमे, केम जे पुद्गटने पुद्गलनो विश्राम छे, तेथी ते लेश्याए योग प्रत्यइक एक साता प्रकृतिनो एक समयनो च छे, ते वीजे समये सक्रमे, अने गोजे समये खेखे अर्थात् उत्तम पुद्गल ग्रहे, बीजे समये तेने वेदे अने गांजे समये खेखे एटले खपावे २२३ प्र०-सम्यग्दृष्टिने अने मिथ्याष्टिने शुभाचार अने शुभ उपयोग केवी रीते होय छे ? उ०-मिथ्याष्टिजीवने शुभाचार होय पण शुभोपयोग न होय, अने सम्यग्दृष्टि जीवने शुद्धोपयोग होय वेहने शुभोपयोग आचरणरूपे होय पण आदर न होय अने मिथ्यादृष्टि जीवने शुभाचाररूप होय पण अशुद्धोपयोगना घरनो अशुभोपयोग होय पण अशुभोपयोग उपचारे कहिए इति भाव, हवे चोथे गुणठाणे सम्यग्दर्शन पामे अनतानुबधिया रागद्वेष तथा गिथ्यात्वमोहनोक्षय तथा क्षयोपशम थाय २२४ प्र०-भामडल करवानी शी जरूर छे ? उ०-आणद श्रावकनी सधि खरतरगच्छे मुनिश्रीसारनी कीधी गाथा त्रणसेने एकासीमी छे ते मध्ये अष्ट- प्रतिहार्य अधिकारे देवता भामडल किम करे छ? तत्र गाथा-वेज अरिहत अतिघणो ए, खमी न शके नरनारी । ते तेज लइ सुख करे ए, पुठे भामडलसार ॥१॥ परमउदारिक शरीरना तेज विचार रत्नसार . हना नाशवडे झेर टळे, वळी मुनिने उद्या गुणठा- णायी आगळ विषयराग उदयमाथी टळे विषय, कपाय, उत्सूतप्ररूपणा दोपो दूर थाय, अने राग- देष अने मोह सत्तामाथी टळता आत्मा परमात्मा वीतराग स्वरूपी केवळजानी केवळदशी आदि अन- तगुणी अनतसुखमय नने छे २३१ प्र०-उद्वेगता, अस्थिरता, असाता, आकुळता ए चार जीवने शाथी उपजे छे ? 3०-१ अज्ञान अने मिथ्यात्वना उदये उद्वेगता, २ वेदनी कर्मना उदये अशाता, ३ अविरति तथा चारिन मोहना उदये आकुळता अने ३ वीर्यातरायना 3- दये अस्थिरता जीवने उपजे छे २३२ प्र०-१ अपात्रदान, २ कुपानदान, ३ पात्रदान, ४ सु- पानदान ते कोने कहीए 3०-१ अपानदान ते श्वानादि पशु तथा बदिवानादिने आपवु ते, तेनु फळ आ लोकनेविषेज यश प्र- तिष्ठारूप लेशमात्र फळ छे २ कुपायदान ते वेरागी सन्यासी, कापडी, तापसादिकने आपबु ते, तेनु फळ परभवे राज्यादिक प्राप्ति करी पापानुबधिपुण्य बाधी कुगति दळ मेलवी ससार भ्रमण वधारे, ३ पानदान ते सम्यगदृष्टि देशविरति साधर्मी प्रमुखने भक्ति ब- हुमानथी पोषवा ते, तेथी पुण्यानुअघी पुण्य उपार्जन करी भवभ्रमण घटाडे, ४ सुपानदान ते महामुनि गणवर तीर्थकरादि योगी महात्मारूप पारने बद्ध , 110 पिचार रत्नसार १ पष्ठ तत एकान्तरोपपास ६ इति प्रकार द्वयेन धर्मचक्रवाल तपनीविधि तर प्रथम प्रकारे दिन सर्माय ८२ द्वितीय प्रकारे दिन सांय १२३ २२८ प्र०-तीर्थकरनी माता चउद स्वप्नने मुखमा पेसता देखे' उ०-शान्तिनाथ चरिनाधिकारे तीर्थकरनी माता १४ स्वप्न मुखमाहे पेसता देखे यत चतुर्दश महास्वप्नान् सुख सुप्ता तदाचसा मुसे प्रविशतोपश्यन्ती तत्तस्या- कारधारिण, इतिश्री उत्तराध्ययनेभाव विजयनी टीका मध्ये तथा शान्तिनाथ चरिताधिकारे का छे आवश्य चूर्णों पञ्चाशकवृतौ योगशास्त्रवत्तौ नवपदप्रकरण वृत्ती, आददिनकृतौ श्राद्धविधि प्रमुखे छ । २२९ प्र०-श्रावकनो दिग्वत सबधी प्रश्न ? उ०-प्रथम सामायिक पश्चात् इर्यावथिकी श्रावकने दिग्- व्रत होय पण साधुने नहीं मेरुरुचक जवा माटे इत्यर्थ । २३० प्र०-चोथे गुणठाणे सम्यक्त्व गुण प्रगटे अने खार, वैर, अने झररूप अवगुण टळे ते शी रीते ? उ०-सर्व गुणमा अग्रेसरी गुण सत्य स्थायी गुण, परप- राए, परमात्म स्वरूपने पमाडनार, ज्ञान व्रतादि अ- नेक गुणने खेची लावनार, अने ते गुणना प्रति- पक्षी अनेक दोषने टाळनार, जीवने परम हितकारी सदा सर्वदा एक सम्यग् दर्शनरूप समकित गुण छे, ते गुण प्रगटे यके खार टळे, सम्यग् ज्ञानगुणे वैरभाव टळे, अने मिथ्यात्व मोह अने चारित्रमो- १२१ , विचार रत्नसार . प्रमाण अतर छेटेथी आवेला पुद्गलोनो अष्ट प्रकारे स्पर्श छे तेना निकारो ९६ छ,२ रसेन्द्रियनी आ- कृति सरपलो तथा कमळना पर सरीखी छे, नव योजन अतरे रहेला पुदलोनो स्वाद वायुयी खें- चाइ आवे थके थाय, तेना छ रसरूप छ नि पयना ७२ विकारो छे, ३ घ्राणेन्द्रियनी आकृति तलना फूल सरखी छे, तेनो विषय क्षेत्रफळ नव योजननो तेना विषय २ अने विकार १२ छे, ४ चाइद्रिय, तेनी आकृति मसुरनी दाळ समान, एक लाख योजन विषय क्षेत्रफळ, तेना विषय पाच अने तेना विकार ६०, काननो बार योजन आत्मागुल प्रमाणे चार गाउनो योजन जाणवो तथा सूर्यनो निंब तो आत्मागुल प्रमाणे घणा लाख योजन थाय ते माटे चक्षुनो एटलो विषय नयी तो सूर्यनो बिन किं, देखाय छे तनोत्तर सूर्यनो विमान देवका एक योजनना एकसठिया अटतालीस भागनो छ तेना आपणा गाउ १३०० ने आशरे मोटो विमान छे. ते सपूर्ण आखे देखातो नयी पण तेना वि- मानना तलीयाना तेजनो आभासमान झलक काति दिसे छे पण सपूर्ण विमान आखे न देखाय ते माटे आत्मागुल प्रमाणेनो लाख योजन विषय कठेवो ओनेन्द्रियनी आकृति अग आ वृक्षना फूल समान, तेनो १२ योजन विषय क्षेन, तेना विषय ३ अने विकार १२ एम एकदर पाच इदिय वि. पय २३ अने विकार २५२ ते विकारो रहित मात्र विचार रत्नसार मानधी अन पानादिनु दान देता का जीव महा पुण्यानुनधी पुण्य उपार्जीने देव मनुध्यादि उत्तम भव करता का शीत्र सिद्धि वरे २३३ प्र०-छकायना गोगना नाम कया ? 7०-१ सदियापरकाय, २ मीथानरकाय, ३ सिपिधावर- काय, ४ समुइथापरकाय, असस्सिथावरकाय, जगम यावरकाय, इन्द्रियथावरकायनु पृथ्वीकाय गोत्र, पी- तवर्ण पुढवीनाम जीव, इन्द्र देवता, मी यावरनो अपकायगोन, श्वेतवर्ण ब्रह्म देवता अपकाय जीव, सिपीथावरकायनो ते जसगोन रक्तवर्ण शिल्य देवता तेउकाय जीव, समुइथावरकायनो गोत्र, वायुकाय, हरितवर्ण समुद्रदेवता वायुकाय जीव, आवशाइथावर- कायना वनस्पतिगोत्र, नानावर्ण पातालदेवता, वनस्पति जीव, सात नरकना गोत्रनी पेठे ए पण जाणवा २३४ प्र०-दश प्रकारना सत्य ते कया ? उ०-१ जनपद सत्य, २ समय सत्य, ३ स्थापना सत्य, ४ नाम सत्य, ५ रूप सत्य ६ प्रत्येय सत्य, व्यवहार सत्य, ८ भाव सत्य, ९ योग सत्य, १० उपमा सत्य गाथा- जपावयण समयवणा, नामरूपेपछुच्च सच्चे य । ववहारभाव योगे, दसमे उवमसच्चे य॥ २३५ प्र०-पाच इद्रियोनी आकृति तेमनो विषय क्षेत्र, तथा विषय विकार, केटला अने कया कया छे ते कहो ३०-१ स्पर्शेन्द्रियनो आकार अने प्रकारे छे, नव योजन १२२ र विचार रत्नसार ८७७ , गध, स्पर्शादि ग्रहण शक्ति उपजे तेनी उपयोग उपलब्धि ते भाषेन्द्रिय कहेवाय छे, अने आकृति ते द्रव्य इदिय जाणवी एम पन्नवणामा का छे- मनुष्य यको सिजे तेने आठ इन्द्रिय जाणवी नारकी यकी मनुम्य थइ सिजे तेने १६, सोळ इन्द्रिय जाणनी तिर्यंचयकी तया पृथिवीयकी मनुष्य थइ सिजे तेने १७, सत्तर इन्द्रिय तथा देवताथकी पृथिवी मनुष्य थइ सिजे तेने १७ सत्तर इन्द्रिय जाणवी तथा पृथिवी, पाणी वनस्पति माहेयी मनुष्य यइ सिजे तो ९ नर इन्द्रिय तथा इम सर्व विचार पन्नवणा मध्ये कह्यो छे पण एनो अर्थ आम्नाय गीतार्थगुरुयी जाणवो २३७ प्र०-आत्मबोधरूप सम्यक्त्व प्राप्तिमा पाच लब्धिनी आ- वश्यकता छे, ते पाच लब्धिनु रवरूप कहो 3०-१ काळ लब्धि, ते आयुवर्जित शेष सात कर्मनी उत्कृष्ट स्थितिने घटाडी एककोडाकोडी सागर प्रमाण करे, एवा यथाप्रवृत्तिकरणपूर्वक चर्मावर्ते जीव आयो त्यारे काळलब्धि पाकी कहीए, पहेली लब्धि पाम्या पछी छेली एकठी एकसमे प्रगटे २ इद्रिय लब्धि ते सज्ञि पचेद्रियपणु, ३ उपदेश लब्धि ते सद्गुर्वादि- कना योगे उपदेश पामी बूझे, ४ उपशम लन्धि ते निर्मळ परिणामनी वाराए चढतो विषय कषायनी उपशाति भावमा अपूर्वकरणे करी ग्रथिभेद करे, ५ प्रयोग लब्धि, पछी अत करण पूर्वक अनिवृत्ति- करणना परिणामे रह्यो को स्वपर भेदज्ञानरूप १२५

विचार रत्नसार
इदियोना आकार युक्त पोताना आत्मधर्मनु एकाते
प्रतिपालन करता थका, दशविर सयम चर्मनो उत्तम
रीते निर्वाह करता, एमा जे महा मुनि महाराजो,
तेमने मारो किरणशुरिये नमस्कार छे रण प्र.
कारना शन्द शुभ, अशुभ भेदे उभेद थया राग
अने द्वेप ए चार भेद चा इन्द्रिययी पाचपर्ण तेने
शुभ अशुभ वे भेदे गुणता दश तेने सचित्त अ
चित्त ए रणे गुणता ३०, रागद्वेपे गुणता साठ
थाय सुरमिदुरमिगवने सचित्तादि पण भेदे गुणता
६ थाय तेने रागद्वेपे गुणता बार मेद याय दशने
शुभ अशुभे गुणता पार याय तेने सचित्तादि त्रण
भेदे गुणता ३६ थाय तेने रागद्वेपे गुणता ७२
याय आठ प्रकारना स्पर्श तेने सच्चित्तादि त्रण भेदे
गुणता २४ थाय, तेने शुभाशुभे गुणता ४८ थाय
तेने रागद्वेषे गुणता ९६ थाय सर्व सख्याए
२५२ थाय गाथा-
जारसहितो सोतस्स, सेसाण नवहिजोयणेहितो।
गिण्हतोपत्तगथ्थ, एतो परतोनगिण्हति ॥
२३६ प्र०-पाच इदियोनु द्रव्य तथा भावथी स्वरूप कहो
उ०-१ द्रव्येन्द्रिय, बे प्रकारे छे सूक्ष्म अने बादर, बादर
ते बाहेर दिसे छे, आकृतिरूप छे ते, सूक्ष्म ते
विषय ग्रहणव्यापारे आभ्यतर प्रवृत्तिरूप, जघन्यथी
अंगुळनो असख्यातमो भाग, अने उत्कृष्ट पूर्वे कयु
छे तेटलो विषय क्षेत्र जाणवु, २ भावेन्द्रियपणु ते
जीवने दर्शनावरणीकर्मना क्षयोपशमे शब्द, रूप, रस,
१२४

विचार रत्नसार . - जाणे ते अमहविध ४, कोइक तुरतग्रहे ते क्षिम ५, कोइक शेषग्रहे ते वीर कहीये ६, कोइक धू- मादिक लिंगे करी अग्न्यादिक जाणे ते सलिंग ७ तया जे लिंग विना जाणे ते अलिंग ८, एक सदेहालो जाणे ते सदिग्ध कहीए ९, सदेह रहित जाणे ते असदिग्ध १०, कोइकवेला का ते बीजी- वेलाए अणको ते जाणे ते ब्रुव कहीए ११, को- इक वारवार जणावे जाणे ते अध्रुव १२, एम अवग्रहादिक २८ भेद ते चार गुणा करता ३३६ भेद याय एटला अतनिश्रितना भेद तथा अश्रुत- निश्रितना ४ भेद ते १ ओत्पातिकीबुधि, २ वनयिकीबुधि, ३ कम्मीया ते कामणिकीबुद्धि, ४ परिणामिया ते पारिणामिकीबुद्धि, एव ते अश्रुत- निधित सब मली मतिज्ञानना ३४० मेद कर्मय- यनी टीका मचे कया छे २४० प्र०-ज्योतिष देवतामा कया जीवो न उपजे ? उ०-पन्नवणा सूचना उछा वक्वतिपद मध्ये का छे के ज्योतिपि देवतामाहे समूच्छिममनुष्यअसज्ञियो तथा तिर्यच असज्ञियो समच्छिम असख्यात आयुष्य- वाळा युगलिया पखी तथा अतरद्वीप युगलिया मनुष्य एटला माहेयी आव्यो ज्योतिपि देवतापणे न उपजे २४१ प्र०-एक योजननु प्रमाण परमाणुयी माडीने शी रीते थाय छे १ ते कहो १२७ ८७८ विचार रत्नस.र. -- सम्यक्त्व पामे, त्यारे वीतराग चर्मनी रुचिपूर्वक प्रतीतात्मक चर्मरूप शुद्ध तच्चार्य अद्राने आत्म- स्वरूपनु दर्शनज्ञान, स्वरूपाचरणम्पे जीपने याय २३० म०-आत्मागुल उच्छेदागुल प्रमाणागुलना मान क्या केवा छे ? उ०-आवश्यक नियुक्तिमा तेनु मान नीचे प्रमाणे का छे गाधा--उस्सेहगुलमेग, हाई पमाणागुल सहसगुण । तव दुगणीयखल, वीर सायगुल भणिय ॥१॥ आयगुल्नवथ्यु, सरीर मुस्मेहगुलेण तहा। नग पुढवी विमाणाइ, मिणसुयमाणुगुलेणतु ॥२॥ २३९ प्र०-मतिज्ञानना केटला भेद छ ? उ०-मतिज्ञानना श्रुतनिश्रित अने अश्रुतनिश्रित ते मध्ये श्रुतनिश्रितना ४ भेद अवग्रह, १ ईहा, २ अपाय, ३ धारणा ४ अवग्रहना वे भेद १ व्यजनावग्रह,२अर्थावग्रह व्यजनावग्रहना ४ भेद १ स्पशेद्रिय, २ सेंद्रिय, ३ घ्राणेंद्रिय, ४ श्रोनेंद्रिय, अर्थाग्रहना ६ भेद पाच इदिय छ? मनएम छ चोक चोवीस अने ४ व्यजनावग्रहना इम ईहा अपाय धारणा करता एवं २८ एम ऐकेकना १२ भेद थाय १ बहु, २ अ- बहु, ३ बहुविध, अबहुविधादिक बार भेद तिहां अनेक जीव वाजिंबना शब्द साभले छे ते मध्ये क्षयोपशमिक विचित्रताए करी कोइक जीव घणा शब्दग्रहे ते बहु १, कोइक जीव थोडायहे ते अबहु २, कोइक शब्दना व्यापार माहे इत्यादिक घणा विशेष जाणे ते बहुबिव ३, कोइक थोडा विशेष विचार रत्नसार ८८१ काढता जेटल समयमा ते पल्य खाली याय तेटला काल्ने एकवादरउद्धारपल्योपम कहिए, ते सख्यातो कहिए केमके वालाग्रखडसख्याता थाय माटे पछी ते वाळायखटना एक एकना असख्याताखड क- ल्पिए, अने ते कल्पनाखड समय समय काढता जेटला काळमा खाली पाय तेटला समयने एक सू,मउद्वारपल्योपम कहिए, एवा पचीस कोडाकोडी- उद्वारपल्योपम एकअढीउद्वारसागरोपम प्रमाणे तिमलोके द्वीप अने समुद्र असख्य छे, २ पछी पूर्वोक्त वाळारखड एक एकने सो सो वरसे काढता ज्यार खाली याय तेटला समयने एक पारअद्धाप- ल्योपम कहिए, अने ते वाळायखटना, असरयाताखट कल्पिने प्रत्येक खड सो सो बरसे काढता जेटला समयमा पल्य खाली थाय तेटला वखतने एक सू- श्मअदापल्योपम कहिए, तेवा दशकोडाकोडीपल्योपमे एक सागरोपम, तेवा दसकोडाकोडीसागरोपमे एक अवसपिणी ने उत्सपिणी काळ, ते बे मळीने वीसकोडाकोडीसागरोपम प्रमाण एक कालचक्र, एवा अनताकाळचक्रे एक पुद्गलपरावर्तनकाल प्र- माण आ जीव ससार मध्ये निगोदादिकयी माडीने जन्म मरण करतो करतो अकाम निर्जराए कुटातो पीटातो, कोइ महापुण्यना उदये शुभपरिणामे करी नदी गोळपाषाणना घचनाघोळ न्याये करी आ अत्यतदुर्लभ एबो उत्तम कुळ सयोगवाळो उत्तम निरोगी देहसहित मनुष्यभव पाम्यो छे, उता 111 ८८० विचार रत्नसार उ०-अनता सूक्ष्म परमाणुप एक परहार परमाण, आठ सरेणुए एक उर्वरण, जाट उपरणए एक स्थ रण, आठ रय रणुए उत्तर कुरु गुगलीयाना तुरत जन्मेला पाळकनो एक पाळाय, पया आठ घालाये एक महा हिमपन्त क्षेत्र युगठीक पाळ वाळाय, एना जाठ पाळाये, एक महाविदेह क्षेन मनुष्य वाळाय, एका आठ पाळाये एक भरतक्षेत्र मनुष्य पाळाय, एका आठ बाळाये एक लीख, आठ लीखे एक जु, आठ जुए एक जन, आठ जव एक आ- गळ, २४ आगळनो एक हाथ, चार हाथनो एक वनुप, अने वे हजार धनुपे एक कोश, एवा चार कोशनो एफ योजन जाणतो २४२ प्र०-पविध पल्योपमनु स्वरूप कहो उ०-उद्धार, अद्वा, क्षेत्र पल्योपम, सूक्ष्म अने बादर मेदे करीने छ प्रकारे छे ते आवी रीते-१ पूर्वोक्त योजन चार प्रमाणे लामो पहोळो, अने उडो कुवो कल्पिए तेने पल्य कहिए, तेनी छे उपमा ते जेने तेने पल्योपम कहिए ते पल्यने देवकुरु उत्तरकुरु क्षेत्रना युगलिक तुर्त जन्मेला बाळकना वाळाय एकना आठ आठ खड सातवार करीए, ते वाळाय खडे करी टासी टासीने भरवो, एवो के ते उप- रथी चक्रवर्तिनी सेना चाली जाय, तथा गगा नदी- नो प्रवाह पूर जोरथी ते उपरथी वहन करे, तोपण एक पण वालाग्र तेमाथी खसे नहि, एवो ठासीने भरीए, पछी ते वालाग्रने समय समय एक एक १२८ विचार रत्नसार वादमा एकेंद्रिय के प्रसादि जीव सख्यानुमान कराय छे ए असरख्यातउत्सप्पिणी प्रमाणे इम त्रण सूक्ष्म- पल्यो शास्रने विसे उपयोगी होइ तिन बादर कळ्या ते सुश्मनो सुखावरोधार्य इहा प्राय घणो अदा- पल्योपमनो प्रयोजन छे, इम कोटाकोडी सागरोपमें एककालचक तेणे अने ते कालचके पुद्गलपरावर्त होइ ते आठ प्रकारना छे ते त्यायी जो जो अस्य गाथा-उझार अदखित्त, पलियतिहा समय वा समय समए किसवहारोदीवोदही, आउसस्साइ परिमाण ॥१॥॥ पाचमें कर्म ग्रन्थे उक्त २४३ प्र०-आत्मसमअवस्थानउपयोगरूप ध्यानदशा केवी रीते पमाय? उ०-मोहवशे जीव परभावअनुयायि प्रवृत्ति करे छे मिथ्या सुखनी तृष्णाए मूल्यो यको ससार भ्रमण करे छे, ज्यारे मोहस्थिति घटे त्यारे परप्रवृत्ति छुटे, अने ज्यारे परप्रवृति टळे त्यारे विषयथफी विरक्त बुद्धि याय, अने तेणे करी मनोरोध थाय, केमजे कारण विना कार्य बनतु नथी, मनने भमवानु कोइ कारण के ठाम न होवाथी ते सकल्प विकल्प श्याना करे १ जेम तृण विनानी भूमिमा एटले उखर भूमिमा पडेलो आग्नि केने बाळे, अर्थात् पोतानी मेळे उपशमी जाय छे, तेम विषय वाठा टळवायी मन पोतानी मेळेज स्वाय अने मन रुधायाथी मननी चचळता मटे, वेवारे मन एकाग्र थइने आ- पिचार रत्नसार का - . अनादिकाळना अज्ञान, मोह, मिथ्यात्व, प्रमादादि रूपभपासनाना जोर आनी उत्तम योगवाइवाळा मनुष्यभानु लेशमान पण पदुमान नयी आवत, हा। इति सेदे केनी अफसोसनी पात छे, माटे हे चेतन । आ परमात्माना पचने करीने हवे चेता अने जे कुळमा उत्तम मुळना प्रभारे करीने हि- सानो आचारज नयी तेवा अहिंसक कुळनी प्राप्ति उता श्रीजिनेश्वरभगतनो धर्म पाळवामा प्रमा- दने नोट, अने तारु खरु कर्तव्य आ मनुष्य भव- मा शु? छे, तेनो विचार करी विषयकपायनी प्र- उत्तिनो जेम बने तेम सकोच कर, अने तत्त्वमार्गने आदर, सुदेव, सुगुरु, अने सुधर्मने ओळख, अने ते ओळखाण पूर्वक शुदक्यिानु सेवन कर, अने सरळता, कोमळता, विनयादि गुण धारण करता शीख जेयी परपराये तारा आत्मानु चिरकाळ के- ल्याण थशे, तथास्तु शुभभवतु, शाति शाति शाति । पूर्वोक्त सूक्ष्मअद्वा काळे करी आयुष्य- मान, कर्मस्थिति, कायस्थिति, तथा अन्य काळ- मानादिनु प्रमाण थाय छे, ३ पूर्वोक्त वाळायखड स्पा जे आकाश प्रदेश तेने प्रत्येकने समय समय काढता जेवारे पल्यवाळायथी खाली थाय तेटला काळने बादरक्षेत्रपल्योपम कहिए, अने वाळायने स्पश्र्या सर्व आकाश प्रदेश पल्यना समय समय खाली करता जेवारे पल्य निर्लेप थाय एटला का- ळने सूक्ष्मनपल्योपम कहिए, तेणे करी दृष्टि- विचार रत्नसार ८८५ २४४ प्र०-उत्सर्ग अने अपवाद मार्ग परमार्थे एकज आत्मार्थि- पणारूप मोक्ष सावक दशाज छे, ते शी रीते १ - उ०-उत्सर्गमार्ग घणो कठीण, घोरतपस्या शुद्धनम- चर्यादि पाळे, जिनकल्पिपणे प्रहत्ते ते जाणवो, अने अपवादमार्ग ते पूर्वोक्त उत्सर्गनी अपेक्षाए एटले ज्यारे ते उत्सर्गदशामा न टकी शकाय, त्यारे तेमा पाठा स्थिर थवाने माटे, जे काइक कोमळ मार्गनु अबलमन साधनादि करवु एटले मुनि पच- महाबत शुद्ध पाळे, उपविहार तपस्यादि करी श- रीर गाळे, जेथी विषय कपायादि मोहवासना गाळे, शिष्य, गच्छ, शाखादिनी धारणा करे, ते प्रत्ये पर- स्पर स्वाध्याय करे करावे, भव्यमाणीओने धर्मा- पदेश आपी स्वपर महानिर्मलता करे करावे, पोते उत्तम मार्गे चाले वीजाने चलावे, अने चालता होय तेने अनुमोदनरूप उपष्टभ एटले सहायतादि दइ स्थिर करे, इत्यादि अपवादमार्गनु सेवन करी, मुनि पाछा उत्सर्गमार्गमा लीन रहे छे, एम परमार्थे उत्सर्ग अने अपवादमागी आत्मार्थीज छे, उभय मार्ग शास्त्रानुसार छे, पण जे निष्कारण दूषित मार्गनु सेवन करे, अने कहे जे अमे उत्सर्गने माटे अपवाद सेवीए छीए, वे चारित्रघातीनी मिथ्या वात छे, केमजे मुनिने कोइ अतिचाररूप दूषण प्रास- गिक लागीजवारुप सभव छ, पण मन यकी अ- तिचार सेवनकरवारूप प्रमादादि कदापि काळे न १३३ ८८४ विचार रत्नसार . स्माने विपे प्रत्त, यत जोसमेइ मोहखल, सोविसय विरचो मणो णिरुमित्ता। समाहिदोसाभावे, सो अप्पाण हवई झाया ॥ १ ॥ इति उक्त प्रवचनसारे, आत्म- भावनानी गाथा-रण ल्खीए छीए एगोहहोमिपरे सिं, णमे परे णत्थि मज्झमिहफिवि। इय आय भावणाए, रागदोसाविल्य जति ॥ १ ॥ नाणस्सनिसुनिए, अ. प्पा एगतउण ससुद्धो। जम्मानाणअप्पा, अप्पाणच अ- णवा ॥२॥ आयासामाइए, आयासामाइयस्सअठोत्ती । तेणेव इमसुत्त, भासई आयपरिणाम ॥३॥ ए सूत्रे पण चारिनने आत्मपरिणामरूपज कहीए छीए पण बाह्यक्रियारूप नथी का तर काव्य-येषानचेतो ललनासुलग्न, मग्न न साहित्यसुधासमुद्रे । ज्ञास्यति ते किंममहाप्रयासानन्धो यथा वावधूविलासान् ॥ इत्यर्थ ॥ त्यारे शुद्धात्मोपयोगअवस्थानरूप निर्मळ ध्यानदशानी परम शीतळ शात सुगधिनी अनुभवलेहेरीओनु आत्मा आस्वादन करे, ते सुख आपणे पौद्गलिक सुखना भीखारीओ शु जाणीए, - का छे जे. १ सघळु परवश ते दुख लक्षण, निजवश ते सुख लहिए, ए दृष्टे आतमगुण प्रगटे, कहो सुख ते कोण कहीएरे भविका वीरवचन चित्त धरीए नागर सुख पामर नवी जाणे, वल्लभ सुख न कुमारी, अनुभव विण तेम ध्यानतणु सुख, कोण जाणे नरनारीरे भ २ विषय भोग क्षय शात वाहिता, शिव मारग व नाम, कहे असग क्रिया इहा योगी, विमल सुजस परिणामरे भ ३ विचार रत्नसार पक्रमि तथा निरुपझमिभेदे जघन्यथी अतर्मुहूर्त अने उत्कृष्ट ३३ सागरोपम सुधीनु अध्यवसायनी तारतम्यताए भिन्न भिन्न जीवने नानाविध बधाय छ, त्या देवता नारकीने आ भव आयु छमास या- कता बाकी रहेता परभवायु वधाय, तथा युगलिक मनुन्यो तथा तियेच तेमज तीर्थंकरादि निषष्ठि श- लाकापुस्प अने चरमशरीरी एटलानु आयु निरु- पक्रमि बवाय, शेषने सोपक्रमी आयुनध होय, त्या उपक्रम एटले उपवातादि कारण विशेषे आयु टूटे, एवो मद मदतरादि परिणामविशेपे जीवे आयुवर कयों होय, तेवो उपक्रम पण आयुना बधनी साधेज वधाय छे, एथी जेम तेले करीने वाट सहित सपूर्ण रीते दीवानु कोडीउ भरेलु होय, ते दीवाने कोइ- पण पवनादि उपवात न लागे तो तो ते ठेठ सुधी सारी रीते वळे छे, नहि तो पवनना एक सखत स- पादार उते तेले अने वाटे ठरी पण जाए, एम सोपक्रम आयुना वध पण एवाज ढीला जाणवा, ते व्यवहारे विष, शस्त्र, अकस्मातादि सात कारणे बेटे छे, पण निश्चये तो जीवे तेवीज रीतनु तेटलाज समयकाळनु बाघेलु ज्ञानीनी दृष्टिए दीठेल भोगवे छे, एक समयमात्र पण आधु पाछु करवाने कोइ पण समर्थ नथी, देव नारकीआदि शिवायना सोप- क्रमी आयुवत प्राणीओ घणु करीने पोताना भव आयुना अतमा अतर्मुहूर्त थाकता परभव आयु बाधे छे, ते बाधता जीवने अतर्मुहूर्त लागे छे, ते बध , ८८६ विचार रत्नसार पर - , होय स्थविरफर पमा पण जा कालमा सापेक्ष अ. परादनी मुर यताप पारिन छे २४५ म०-पाच नोधम्मीया प्राणी क्या छे ते कया ? 30-महोदेवायचो, विसयासत्तो अज्जियापुत्तो । गुरु देवा- यणदुट्टो, नोधम्मा पचपनत्ता ॥ १ ॥ अस्यार्थ- १ प्रष्ट ज्ञात कुळयी वठेला जीव, २ देवादिक धर्म- खाताना नि शूक मने हराम दानते पगार खानारा पूजारादिक तथा देव गुर्वादिक द्रव्यना खानारा, ३ विषयाशक्त लोलुपी लपटी, ४ व्यभिचारवडे साध्वीने पेटे अवतरेल पुन, ५ देव, गुरु, धर्मादि- कनो निंदक, घातक उत्थापक ए पाच अधर्मी एटले नोधम्मिया जाणवा, ते वीतराग भाषित धर्मयी पराङ्मुख रहे २४६ प्र०-समृछिममनुष्य मरी केटला दडकमा जाय छे' उ०-दशदडकमा जाय छे ५ पाच थावरमा ३ विकलेन्द्रियमा ९ पचेन्द्रियमनुष्यमा १० पचेन्द्रिय तिर्यंचमा जाय पण युगलियो न थाय तथा ए दशदडकमा तेउकाय वायुकाय ए बे दडक वर्जिने बीजा आठ दडकना आव्या समूच्छिममनुष्य थाय २४७ प्रल-जीवते परभवआयु शी रीते बधाय छे, अने ते केटला प्रकारनु छ ? उ०-जीवने आयुकर्म परभवसबाधिनु आ भव भोगवता थका एफजवार निकाचितपणे त्रण आकर्षे करी सो- १३

विचार रत्नसार
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३, आरमिकी ४, मायाप्रत्ययिकी ५, ए पाच क्यिावती
जीवोनु अल्पबहुत्व कहो
उ०-मिथ्यात्वप्रत्ययिफ्रीक्रियावाळा सर्वथी योटा, १ ते
थकी अपच्चख्खाणीक्रियारतजीव असख्यातगुणा
अधिक केमजे तेमा अविरति भळ्या, २ ते यकी
परिग्रहिकीक्रियावतजीनो असख्यातगुणाधिक जे
भणी तेमा देशविरति भळ्या माटे, ३ ते यकी
आरमिकीक्रियावत असख्यातगुणाधिक जे भणी
सर्वविरति उद्या गुणठाणाना मुनि तेमा भळे तेथी,
४ मायामत्ययिकीक्रियावत तेथी सख्यातगुणाधिक
जे भणी तेमा नवमा गुणठाणावति मुनि ध्या तेथी
ए भार पन्नवणासूनमन्ये छे इति ।
२५० प्र०-देवगतिने विपे छ लेश्या आसरी अल्पनहुत्व कहो
उ०-१ शुक्ललेश्यावतदेवताओ सर्वयी योटा, २ ते
थकी पद्मलेश्यावत असख्यातगुणाधिक, ३ तेथी
कृष्णलेश्यावत असख्यातगुणाधिक, ४ ते थकी
नीललेश्यावत असख्यातगुणाधिक, ५ ते थकी का-
पोतलेश्यावत असल्यातगुणाधिक, ६ ते यकी तेजो-
लेश्यावत ज्योतिपीदेवो असख्यातगुणाधिक जाणवा
२५१ प्र०-सोपक्रमिआयुषपतजीव आयु पुरु भोगवता थका पण
अकाळे चेवजीवियाओववरोविया-॥ मरण पाम्यो एम
कहे छे तेनु शु समजवु?
उ०-जेम राजाए कोइएक चोरने पकडीने शळीये के
फासीए दीयो, त्या ते जीवे सर्व आयु कर्मना दळ
112

८८८ पिचार रत्नसार . . दरमियाने रण आर्य (उचका) र छे, जेम गाय पाणी पीती वीसामे वीसामे पाये, तेम जीव पण आयुकर्मना पुदल्ने लेड आकर्षि नाघे, त्या मति तेवी गति अथरा गति तेवी मति अनुसारना परिणाम विशेपे च पडे २४८ प्र०-आकुट्टी, दर्प, प्रमाद अने कप ए चार शब्दार्य कहो 3०-आकुट्टीकया अनाभोगतयाउपेत्यसारयकरणोत्साहो- त्मिका १, दोधारनप्लपनादिक वल्गनादिक । हास्पजनको वा नाट्यादिकदर्परूपोवा २, प्रमादो रानौ दिवाप्रतिलेखनाप्रमार्जनाद्यनुपयुक्तता ३, कल्प- कारणे दर्शनादिचतुर्विशतिम्पेसति गीतार्थस्यकृत- योगी उपयुक्तस्य अयतनतया आवाकांद्यादानरूपा ४, इति । अस्यार्थ । आकुट्टी एटले अनाभोगे उपयोग रहित सहसात्कारे उद्धतपणे सावद्यकार्य प्रवृत्ति, २ दर्प एटले अह- कारे वा इर्ष्याए चडसाचटसीए नाटक कौतकादि जोवा जता वाटमा अश्ववृषभादिने ,खूब दोडाववा वगेरे अयत्नाए निर्दय सावध कर्माचरण, ३ प्रमाद एटले राने वा दिवसे प्रमार्जन प्रतिलेखनादि सावध क्रिया अयत्नाए जेम तेम बेदरकारीथी करवी ते ४ कल्प एटले गीतार्थ बहुश्रुतादिना वचन निरपे- क्षपणे निष्कारण आधाकर्मादि दूषित आहार ग्रहण करवो वगेरे मार्गथी भ्रष्ट आचार प्रवृत्ति ते २४९ प्र०-मिथ्यात्वप्रत्ययिकी १,अप्रत्याख्यानिकी २, परिग्रहिकी

विचार रत्नसार
३, आरमिकी ४, मायाप्रत्ययिकी ५, ए पार स्पिारनी
जीवोनु अत्पनहत्व कहो
उ०-मिथ्यात्वमत्ययिफीक्रियाळा सर्वयो योटा, १ ते
यकी जपच्चस्साणीक्रियारतजीव जमरस्यातगुणा
अधिक केमजे तेमा अविरति भळ्या, २ ते यकी
परियहिकीनियारतजामो असख्यातगुणाधिक जे
भणी तेमा देशविरति भळ्या माटे, ३ ते यकी
आरमिकीरियारत असख्यातगुणाधिक जे भणी
सर्वविरति उद्या गुणटाणाना मुनि तेमा भळे तेथी,
४ मायापत्ययिकीनियावत तेयी सरस्यातगुणाधिक
जे भणी तेमा नपमा गुणटाणावति मुनि ध्या तेथी
ए भार पनपणामृतमन्ये छे इति ।
२५० प्र०-देवगतिने विपे 3 लेश्या आसरी अत्पमहत्व कहो
उ०-१ शुखलेश्यानतदेवताओ सर्वयी योटा, २ ते
थकी पद्मलेश्यावत असख्यातगुणाधिक, ३ तेथी
कृष्णलेश्यावत असख्यातगुणाधिक, ४ ते थकी
नीलेश्यावत असख्यातगुणाधिक, ५ ते यकी का-
पोतलेश्यावत असर यातगुणाधिक, ६ ते थकी तेजो-
लेश्यावत ज्योतिपीदेवो असरल्यातगुणाधिक जाणवा
२५१ प्र०-सोपक्रमिआयुषवतजीव आयु पुरु भोगवता थका पण
अकाळे चेवजीवियाओववरोधिया-॥ मरण पाम्यो एम
कहे छे तेनु शु समजवु ?
उ०-जेम राजाए कोइएक चोरने पकडीने शलीये के
फासीए दीयो, त्या ते जीवे सर्व आयु कर्मना दळ
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"

८९० पिचार रत्नसार हता ते आत्मप्रदेशोदये भोगपी, आयुकर्म वायु हतु तेग्लु पूरु भोगी लीर, तया काळ आसरी अकाळे मुओ एडले जे आयु मुसे समाधे जीव विपाकोदये भोगवीने मरत, ते पोडा काळमा ते आयुना दळने प्रदेशोदये वेदीने सपावीने मुओ वेयी तेने अफाळमरण कहे छ अर्थात् जेटलु आयुप ध्यु हत तेलु प्रदेशोदये भोगवीने पूरु कीधु तेथी सपूर्ण आयुपे मुओ तेम कहेवाय अने घणा काळे विपाकोदये भोगववानु आयु कर्म थोडा काळमा भोगवीने खपाव्यु माटे अकाळ मरण कहिये २५२ प्र०-कोने सपनी बहार काढवो तथा कोने दीक्षा न आपवी जोइए ? उ०-अथ प्रास्ताविक गाथा- जो भणईनत्थिधम्मो, न सामाइय न चेव वयाइ । सो समणसघबज्झो, कायव्वो समणसघेण ॥ १ ॥ अट्ठारसपुरिसेसु, वीसइत्यीसु दसनपुसेसु । जिणपडीकुतित्थियाओ, पव्यावेउ न कप्पति ॥२॥ बालेवुद्वेनपुसयेय, किवेजडेयबाहिए । तेणेरायावगारिय, उमत्ते य अदसणे ॥३॥ दासेदुद्वेअमूढेय, अणतेजुगए एय । अवबधए यमिएय, सेहेनिप्फोडीयाइय ॥ ४॥ एटलाने दीक्षादेवी न कल्पे, २५३ प्र०-सोळ सज्ञाओ कइ ?

विचार रत्नसार --- उ०-गाथा-- आहारभयपरिग्गह, मेहुणतह कोहमाणमायाए । लोहोहलोगसण्णा, दससनातिसम्बेसि ॥ १ ॥ मुहदुहमोहसना, वितिगिच्यायउद समुणेयवा। सोगे तहधम्मसन्ना, सोल्स ए इति मणएस ॥ २ ॥ २५४ प्र०-दश सजा कया कया जीवोमा छे उ०-गाथा-- स्खाणजलाहारो, सकोयणीयाभएण सकुयइ । नीयततुएण वेदइ, वलीस्खेण परिग्गहेय ॥३॥ इत्यापरिरमेण, कुरुमकतरुणोफल्ती मेहुणे । तहकोकनदस्सकदो, हुकारोमुयइ कोहेण ॥४॥ माणेण झाईदती, च्छायई वल्ली फलाईमायाए । लोहेवील्लपलासा, खिवतिमूले धणाणुवरि ॥५॥ रयणीए सकोओ, कमलाण होईलोगसन्नाह । ओहे चईत्तु मग्ग, चढति रुखेसु वल्लीओ ॥ ६ ॥ इति १० सज्ञाना उदाहरण । २५५ प्र०-अढार भावदशा तथा अढार द्रव्यदशानु स्वरूप कहो उ०-तत्र गाथा--- तिरियामणुआकाया, तह अग्गवीयाय चउरो। देवाय नेरड्या-अद्वारसभावरासीओ ॥१॥ बेरेन्द्रिय, तेरेन्द्रिय, चोरेन्द्रिय, पचेन्द्रिय, ए चार तथा समूछिममनुष्य कर्मभूमिजा अकर्मभूमिजा ८९२ विचार रत्नसार - , अतरद्वीपना, हो अयनीज, मूरनीज, पर्वनीज, स्क- चनीज, ए चार वनस्पतिना भेद पृथ्वीकाय, अप्- काय, तेउमाय, वाउझाय, एर चार तथा देवता अने नारकी एज अढार १८ भानदिशा आचाराग सूनमध्ये शत्रपरिजाअन्ययनमाहे भारदिशा वखाणी छे तया अदार द्रन्यदिशा चारदिशि, चारविदिशि, आटदिशि, विदिशिना आतरा ऊर्वदिशा, अघोदिशा ए १८ द्रव्यदिशा जाणवी २५६ प्र०-नीलीगलीए रंगेला पलमा केटला वखतमा जीव पडे छ । उ०-नीलीगलीए रगेला वस्त्राथी मनुष्यससँगै तत्काल कुथुप्रमुख सजीव घणा उपजे छे एम रत्नसचय ग्रन्थमा का छे २५७ प्र०-लब्धिपर्याप्तानु तथा करणपर्याप्तानु केवु स्वरूप छे ? उ०-पर्यातिद्विधा लब्धि करणश्च तन ये स्वयोगपर्याप्ति सर्वाअपि समर्था नियन्ते न अर्वाग् ते लब्धिपर्याप्ता ये पुन करणानि शरीरेन्द्रियादीनि निवर्तन्त ते करणपर्याप्ता इति, ननुचास्यशरीरपर्याप्तौ च शरीरभवि- ष्यति कि प्राग अभिहितेन शरीरनाम्ना ? नैतदस्ति साध्यभेदात् तथा जयसोमकृत बालावबोधमा एम लख्यु छे २५८ प्र०-छ पर्याप्तिनु स्वरूप कहो उ०-जे कर्मना उदयथी आरमी पर्याप्ति पूरी कर्या विना न मरे ते पर्याप्तिनामकर्म, तेणे एकेन्द्रियने चार विचार रत्नसार विगलेन्द्रिय तथा असज्ञीपचेन्द्रियने भाषा होय सज्ञीपचेन्द्रियने मन होय उत्पत्ति प्रथम समयर्थी आरमी पर्याप्ति परी कर्या विना न मरे पूरी करने मरे ते लब्धिपर्याप्तो जाणवो शरीर इन्द्रिय पर्याप्ति पूरी न पाय त्या मुधी तेने अकरणपर्याप्तो कहेबो जथवा जे जे पर्याप्ति पूर्ण नयी यइ वेनी अपेक्षाए जकरणपर्याप्तो जाणवो जे जे पर्याप्ति परी करी ते अपेक्षाए करणपर्याप्तो जाणवो जे कर्मना उदये आरमेली पर्याप्ति पूरी कर्या विना मरे ते लन्धिजपर्याप्त नामकर्म पुदल्ना उपचययी ययो पुद्गल परिणमन हेतु शक्ति विशेप पर्याप्ति विषय भेदे छे २५९ प्र०-पर्याप्ति ने प्राणमा शो फेर छे ? उ०-पर्याप्ति ते उपजतीवेलाए होय अने प्राण ते जावजीव लगे होय २६० प्र०-सम्यग्दृष्टिनी केवी दशा होय ? उ०-गाथा- अधोअविरइहेउ, जाणतो रागदोसनधच । विरइसह इच्छतो, पिरइ काउच जसमत्यो ॥१॥ एस असजयसम्मो, निदतोपावकम्मरणच । अहिगयजीवाजीवो, अचलियदिट्टीलियमोहो ॥२॥ सम्मदसणसहिओ, गिण्हतोचिरइमापसत्तिए । एगवइयचरमो, अणुमइमित्तत्तिदेसजई ॥ ३ ॥ , ८९२ विचार रत्नसार अतरद्वीपना, हवे जगनीज, मूल्नीज, पर्वीज, स्क- वनीज, ए चार पनस्पतिना भेद पीकाय, अप्- काय, तेउमाय, पाउमाय, एर चार तथा देवता अने नारकी एप अनार १८ भारदिशा आचाराग सूत्रमध्ये शत्रपरिज्ञाअन्ययनमाहे भारदिशा वखाणी छे तया अनार दन्यदिशा चारदिशि, चारविदिशि, आटदिशि, विदिशिना आतरा ऊर्वदिशा, अघोदिशा पु १८ दन्यदिशा जाणनी २५६ प्र.-नीलीगलीए रगला पखमा केटला वखतमा जीव पडे छे ? उ०-नीलीगलीए रगेला वस्त्राथी मनुष्यससँगै तत्काल कुयुप्रमुख नसजीव घणा उपजे छे एम रत्नसचय ग्रन्थमा का छे २५७ प्र०-लब्धिपर्याप्तानु तथा करणपर्याप्तानु केबु स्वरूप छे ? उ०-पर्यातिद्विधा लब्धि करणश्च तन ये स्वयोगपर्याप्ति सर्वाअपि समर्था नियन्ते न अर्वाग् ते लब्धिपर्याप्ता ये पुन करणानि शरीरेन्द्रियादीनि निवर्तन्त ते करणपर्याप्ता इति, ननुचास्यशरीरपर्याप्ती च शरीरभवि- ष्यति कि प्राग अभिहितेन शरीरनाम्ना ' नैतदस्ति साध्य मेदात् तथा जयसोमकृत बालावबोधमा एम लख्यु छे २५८ प्र०-छ पर्याप्तिनु स्वरूप कहो उ०-जे कर्मना उदययी आरभी पर्याप्ति पूरी कर्या विना न मरे ते पर्याप्तिनामकर्म, तेणे एकेन्द्रियने चार १४० विचार रत्नसार ८९५ सतो जीप सिधि गतिए जाय, पण वचमा विषम अणिना आकागप्रदेश न फरसे माटे ते अपेक्षाए सिझनी अफुसमाणगति कहिए, तथा समश्रेणिए आकाशप्रदेश फरसतो फरसतो जाय, ते अपेक्षाए क्षेनआत्रिफुसमाणगति कहीए, अने एक समययी वीजा समयना अतरने न फरसे ते माटे आश्रि अफुसमाण गति कहे छे २६५ प्र०-त्रणमकारना पुद्गलो दृश्शातथी समजावो उ०-विअसा ते स्वभावे कोइ निमित्त पामी तदाकार थाय, जेम इद्रधनुष्यादि अप्रयत्, २ प्रयोगसा ते जीव व्यापारे, उद्यमे करीने जे निपजे, जेम भवन, घटपटादि, ३ मिअसा वे काइक सहज स्वभावे अने वाइक प्रयोगे जेम ते माणसे जुनो पटो बाध्यो अयवा जुनी पाघडी बाधी इत्यादिमा पुद्गलोनु जीर्ण पणु यचु ते स्वभावे कहीए, अने बधनकर्म ते मनुष्यना प्रयोगवडे थाय छे, एम स्वभाव अने प्रयोगे मळी बनेल वस्तुने मिश्रसा पुद्गल कहे छे २६६ प्र०-श्रीतीर्थकरना जन्मादिककल्याणक वखते साते नरके केटलु अजवाळु थाय ते कहो उ०-पहेली नरके सूर्यसमान उद्योत, २ वीजीए वादळे ढाकेला सूर्यसमान, ३ नीजीए पूनमना चद्रसमान, ४ चोथीए वादळे ढाकेला चद्रमासमान, ५ पाच- मीए ग्रहोना उद्योत समान, ६ उठीए नक्षत्रना उद्योत समान, ७ सातमीए ताराना उद्योत समान १४३ ८९४ विचार रत्नसार ए गाथानो गुरुगमयी अर्थ वारज्यो सम्यग्दृष्टिने उदयस्थिति प्रतियोव होय पण आत्मप्रतियोबध न होय २६१ प्र०-छद्मस्थ कोने कहे छ ? उ०-छाद्यते केवलज्ञानदर्शने आत्मन अनेनेतिउद्म- ज्ञानावरण दर्शनावरण मोहनीयान्तरायकर्मोदयेसति तस्य केवलज्ञानदर्शनस्यानुत्पादात् तदपगमानन्तर चोत्पादात् ज्ञानावरणादिछद्मनि तिष्ठतीतिउद्मस्थ ॥ केवलज्ञान विना बाकीना चार ज्ञान प्रगटता पण छद्मस्थ गणाय छे २६२ प्र०-मुनिने अप्रमत्तदशाए समय समय अनतगुणविशुद्धि कही छे ते शी रीते? उ०-आत्मोपयोग एकाग्रध्यान भणी मुनिने आत्मप्रदेशे रहेल अनतीकर्मवर्गणानी निर्जरा थता आत्मानी अनती विशुद्धि समय समय थाय छे २६३ प्र०-आहारकआहारक मिश्र जीव किम करे ? उ०-जेवारे पूर्वधरे सदेह पुछवा निमित्ते आहारकशरीर मोकल्यु होय तिहा ज्ञानवत नही तिवारे तिहायी वली बीजु आहारक करे ते करती वेलाए पूर्वआ- हारक सघावे मिश्र होय ते माटे इति भावार्थ । २६४ प्र०-सिद्धने अफुसमाण के फुसमाण गति शी रोते समजवी १ उ०-एक समयमा समश्रेणिना सर्वआकाशप्रदेश, फर- विचार रत्नसार ८९७ . रनी छाया उता छायटो धूमाडा वगेरेना पुद्गलो नजरे देखाय छे, पण हाथमा ग्रहवाय नहि, माटे बादरसूक्ष्म, ४ मूहमवादर ते गध, रस, स्पर्श शब्दादिकना पुद्गलो आखे देखाता नथी, परतु स्पर्शादिके लक्षणे जणाय छे, माटे तेने मुश्मबादर कहिए, ५ मुक्ष्म ते अष्टकर्मवर्गणाना पुद्गलो चार स्पर्शवाळा छे ते नजरे देखाता नथी माटे, ६ सू- श्मसूक्ष्म ते छुटो शुद्धपरमाणपुद्गल ते बे स्पर्श- वाळा अत्यतसूक्ष्म छे माटे ए रीते छ प्रकारना पुद्गल ससारमन्ये व्यापी रह्या छे, जेम उ कायना जीव व्यापी रह्या छे तेम जाणवा २६८ प्र०-ज्ञानावरणीयादिकर्मनो बध, उदय, उदीरणा, सत्ता केटला गुणठाणा सुधी होय उ०-ज्ञानावरणीयनो बध गुणटाणा १० मासुधी, दर्शनावरणी- यनो बध १० मा सुधी, वेदनीयनो बध गुणठाणा १२ मा सुधी, मोहनीयनो वध गुणठाणा नवमा सुधी, आयुकर्मनो बध गुणठाणा सातमा सुधी, नाम- कर्मनो बध गुणठाणा १० सुधी, गोनकर्मनो बध गुणठाणा दशमा सुधी, अतरायकर्मनो बध गुणठाणा दशमा सुधी, हवे ज्ञानावरणीयकर्मनो उदय गुणठाणा १२ मा सुधी, दर्शनावरणीयकर्मनो उदय गुणठाणा १२ मा सुधी, वेदनीयकर्मनो उदय गुणठाणा १४ मा सुधी, मोहनीयकर्मनो उदय गुणठाणा १० मा मुधी, आयुकर्मनो उदय गुणठाणा १४ मा सुधी, ८९६ विचार रत्नसार. अथ प्रास्ताविक गाया- कालेसुपत्तदाणा, समत्तविसद्विमोहिलाभ च । अते समाहिमरण, अभवजी न पापति ॥१॥ अखडियचउत्थो, वयगहणाउ जोय गीयत्यो। तस्स सगासे दसण, वयगहणसोहिगहण च ।। २ ॥ कत्थय जीवो चलीओ, कत्यय कम्माइ हुति चलीआइ । जीवस्सय कम्मस्सय ॥३॥ कालसहामोनियइ, पुवकयपुरसकार ए गता। मिच्छ तत चेवओ, समासओ होतिसमत्त ॥४॥ नव हि जीववहकरण, करायण अणुमोदिय जोगेहि । कालतिएहिगुणीए, पाणीबहदुस्सतेयाल ॥५॥ अस्यार्थ साधुने पहेलानतना नवकोटी पच्चरखाण छे पण तेहना भागा २४३ थाय इम २७ करवाना २७ कराववाना २७ अनुमोदवाने विपे निषेधे इम ८१ थाय ते काले त्रणेगुणगुणी त्रिगुणाकरता २४३ भेदे साधुने पच्चस्खाण होय जावजीवलगे इत्यर्थ । २६७ प्र०-छ प्रकारना पुद्गलनु स्वरूप कहो उ०-१ बादर ते खडी माटी पाषण प्रमुख जाणवा, केमजे ते पदार्थोंने छेद्या थका तेना खडो एकमेक न रहे, पण भिन्नभिन्न नजरे देखाय छे, माटे बादर बादर ते पहेलो भेद, २ बादर ते घी, दूध, पाणी, तेल, मध, गोळ, खाड इत्यादिकना पुद्गलने बादर कहिये, केमजे तेमने छेद्या थका मिन्नन थाय एकमेक मळेलाज रहे छे ३ बादरसूक्ष्म ते शरी- , विचार रत्नसार ९०१ - माहेली एकनिगोद लइए ते निगोदमा अनता जीव छे, ते माहेलो एकजीव रइए तेमा अस- ख्याता प्रदेश छे, ते एकजीवने प्रदेशे प्रदेशे अनतीकर्मवर्गणा छे, ते माहेली एक कर्मवर्गणा लीजीए ते माही अनतापुद्गलपरमाणुआ छे, ते माहेलो एक परमाणु लीजीए, ते माही अनता पर्याय समकाळे परिणमे, एवी जीन अने पौगलिक शक्तिनी अत्यतसूक्ष्मता जाणवी, एबु श्रीवीतराग वचन तहत्ति करी मानीए हवे निगोदीआ जीवना भवनी संख्या काळ मान विचारे छे--असख्यात समयनी एक आपली याय, २५६ आवलिनो एक निगोदीआ जीबनो क्षुठक भव थाय, एक श्वासो- च्छयासमाहे चुवालीससेने साडीच्छेतालीस आवली याय तेवा भव निगोदीओ जार एक श्वासोच्छ्वासमा १७ भव झाझेरा करे, एटले ते जीव सत्तरवार मरे अने अढारमी वार उपजे, केमजे एक श्वासोच्शवसमा १७ भव अने ९४॥ आवळी जेटलो काळ याय छे ते प्रमाणे गणता बे घडीमा ३७७३ श्वासो- च्छावस थाय छे, तेटलामा निगोदिआ भव ६५५३६ थाय, ए लेखे एक दिवसमा श्वासोच्छ्वास ११३१९० अने तेमा भव एटला श्वासोच्छ्वास निरोगी युवान पुरुषना याय, वेवा एक दिवसमा १९६६०८० भर निगोदिओ जीव करे, ते हिसावे एक मासना श्वासोच्छ्वास ३३९५७०० गणता निगोदीआ भव ५ क्रोड ८९ लाख ८२ हजार अने ८०० थाय, १४९ ९०० विचार रत्नसार MAHAR वान् समुद्रात आठ समयनो करे पण वीजा नहि, पठी एम पोताना आत्मप्रदेशे चोदेराजलोकमा रहेल प्राणीमानना जात्मप्रदेश साये मेळवी प्रदे- शोदये कर्म भोगीने दद, कपाट, मथानादि अनु- क्रमे सबरीने अयोगी यया या सिद्धि वरे इत्यादि सरूप विस्तारे, ग्रथान्तरथी (लोकप्रकाशान्ये का छे) गुरुगमयी जाणन २७० प्र०-निगोदनु स्वरूप कहो तया जीन अने पुद्गल्नी शक्तिनी सूक्ष्मता जिनपचनानुसार दर्शावो उ०-असख्यातप्रदेशी लोक ते प्रमाणे गोला पण अस- ख्याता छे, गोलो ते शु१ असख्याति निगोदे एक गोलो इति ते उपर गाया- लोएअसखजोयण, माणेपईय ज़ोयणगुला सम्खा । पइत असखअसा, पइअमसखया गोला ॥ १ ॥ गालो असख निगोओ, सोअणअसखपईपएस । कम्माणवग्गणाणता ॥ २ ॥ पइवग्गणाअणता, अणुअ पइअणत पज्जाया । एवं लोगसरुव, भाविज्ज तहत्तिजिणवुत्त ॥३॥ अस्यार्थ- चौदराजलोक असख्याती कोडाकोडी जोजननो छे, ते मध्ये एक जोजन लइए, तेना अगुल असख्याता थाय, ते मध्येयी एक अगुल लीजीए, तेना अस- ख्यातमा भागप्रमाण, एकभाग लइए, ते माहे असख्याता गोळा छे, ते माहेलो एकगोळो लइए ते एकगोळामाहि असख्याति निगोद छे, ते विचार रत्नसार ९०३ ३ माहि आव्या छे अनताकदादिक माहे छे तया जेटला जीव सूक्ष्मनिगोदगोलकमाहेयी निकल्या छे ते व्यवहारराशिमाहे आव्या ते कालादिक लब्धि पामी सिद्विवरे तेटला अव्यवहारनिगोदमाहेयी नी. कळी उचा व्यवहारराशिमाहे आवे पण व्यवहार- राशि तो ओडा न याय, कदापि मुक्ति जावानो विरहकाल होय तेटला काल सुधी सूक्ष्म अव्यवहार- राशि निगोदनो जीव कोइ व्यवहारराशिमा न आवे एहर उपमितिभवप्रपचग्रथमाहे का छे २७१ प्र०-बादरसाधारणवनस्पतिकायमायी जीव मरीने सूक्ष्म गोळकनिगोदमा जाय तो त्या केटलो काळ उत्कृष्ट रहे उ०-अढीपुद्गलपरावर्तन, मतातरे असख्याति उत्सर्पिणी अवसपिणी स्थी पण का छे, त्याथी नीकळी बादर निगोद कदमळ माहि उत्कृष्ट ७० कोडाकोडी सा- गरोपम सुधी रहे, एकनिगोदनो गोळो असख्या- ताआकाशप्रदेश अवगाही रह्यो छे, तथा अव्य- वहारराशिया निगोदीआ जीव जे गोलकमा छ ते भवस्थितिपाकता उचा आवे ते एकसमये उत्कृष्ट केटला नीक्ळे ? तोके जेटला अढीद्वीप माहीथी सकळकर्म खपावी एकसमये जेटला जीव सिजि वरे, तेटला सूक्ष्मनिगोदमायी नीकली व्यवहारराशीमा आवे, ते जवन्य एकसमयमा एक, बे, रणर्थी उत्कृष्ट १०८, अने तेटलाज सूक्ष्म ९०२ विचार रत्नसार - अने एक वरसमा ४ कोड, ७ लाख, ४८ हजार अने ८०० गणता तेने विपे निगोदीओ जीव ७० कोडी ७७ लाख ८८ हजार अने ८०० वार जन्ममरणरूप भन करे, एसा भर आ जीवे असख्यातेकाले असर याता अधिक भर कीधा, एम अनताकाले अनता भव कीधा, अनता अतीतकाळमा अनताअनत भव कर्या, ते श्री वीतराग परमात्मानु वचन सद्दहिने, हे चेतन । तु मनमा काइक पापनो नास आण अने आ तारा पोताना जीवनी दया चितवीने तेने आवा भयकर जन्ममरणना फेरामायी मुक्त करवानो श्रीजिन प्रणीत मार्ग छे, तेने अप्रमत्तपणे यथार्थ आदर इतिभाव जूनी प्रतिमा नीचे प्रमाणे पाठ छे तया एक गोलामाहे अस- ख्याति निगोद छे निगोदशरीर एकशरीरे अ- नता जीव छे, एटले अनते जीवे मलीने एक शरीर बाध्यु छे, आप आपणा तेजसकार्मण जूदा छे औदारिक एक छे साधे आहारनिहार साथे मरण २५६ आवलीनो आयु भोगवी पर्याप्ति पूरी करीने मरे तेहनी निश्राए वीजा कोइ अपर्याप्ता होय नहीं ते अनत केटला छे ? जेटला कदमूल मध्ये अ- नता छे ते कदमूल चौदराज प्रमाणे ढग करीए तेमाहे पण सूक्ष्मनिगोदना एकशरीरना अनता निकल्या तेमाहे न समाय एहना अनताअनत भव घणा छे. तिहाना निकळ्या तेमाहेज समाय, तथा कदमूलना ते जादरनिगोदिया छे व्यवहारराशि-

विचार रत्नसार
९०७
सिद्धपरमात्माओ विराजे छे, तेमने मारो त्रिकरण
शुद्धिए नमस्कार हो
२७३ प्र०-अष्टमहासिदिना नाम अर्थसहित कहो
3०-प्रयमलघिमा ते शरीरनु हलपापणु थाय जलपुष्प
उपरि तया कटकउपर मुनि चाले पण किलामना न
पामे १, बीजी वसिमासिद्धि तेहथी सिंह, सर्प,
देवमनुजादिक वश्य थाय २, नीजी सत्यसिद्धि
परमेश्वर्यपणु पामे चापति इद्रादिक यकी अधिकी
ऋद्विविकुनै ३, चोयी काम्यसिद्धि तेथी अत्यत
जलसपदाहोय, पृथ्वीपर्वतादिक उपाडे अचितित परा-
क्रमी होय ४, पाचमी महिमासिफि तेथी मोड
लाखजोजनु शरीर करे ५, छट्टी अणिमासिद्धि तेथी
नाहनु कुयुआ जेवडु रूप करीने भीतमायी तथा
पर्वतमायी निकळे अने पोते विघ्न न पामे ६, सा-
तमी यनकामावसायित्वसिहि तेथी जिहा उपयोग
दे तिहा जाणे निर्मल श्रुतज्ञान अवधिज्ञानने योगे
७, आठमी प्राप्तिसिद्धि तेथी सकल मोटीवस्तु
प्रत्यक्षपणे देखे रूपिवस्तु देखे अवधिज्ञानदर्शन
नण योगे ८, ए अष्टमहासिद्धि मुनिराजने होय
तेहना शब्दार्थ जाणा
२७४ म०-क्षणमात्र सुख अने बहुकाळ दुख ते शी रीते ?
उ०-आ जीव आ ससारना अनुकुळ इद्रिय विषयना
भोगादिकने रिपे लुम्ध थयो थको मचिदुआना
दृष्टाते क्षणमान सुख अने बहुकाळ दुख भोगव्या

विचार रत्नसार. तो अनता सुधी एफसमये निकले पण अव्यव- हारिया ते एकममये उत्कृष्ट १०८ निकळे तेमाहे भव्य अभव्य वे होय ते सूक्ष्मनिगोदना अनता निकळ्या नादरमाहि समाय वीजामा नहीं, तथा एक सूक्ष्मनिगोदमाहे अनताजीर केटला छे ते त्रण काल्ना समय अनता छ तेहथी अनताजीर एक निगोदमाहे छे, तेणेकरी जेवारेजेबारे पुछीए तेबारे जिनेश्वर कहे छे जे "एकरसनिगोअस्स अणत तमो भागो य सिद्धिगओ एटले सूक्ष्मनिगोदथी नादर- निगोदमाहे निरतर आवे छे ते ते आवे तो एक- समये १०८ सुधी उत्कृष्टे आने तथाचोक्त- सिन्झति य तियाखलु, इहय ववहाररासिमझाओ । इतिअणाईवणस्सईमज्झाओ, तित्तियाचेव ॥ १ ॥ इतिश्रीभुवनभानुकेवली चरिनम ये उक्त एम निगोदनो विचार लख्यो छे २७२ प्र०-सिद्धशिलानु किचित् स्वरूप वखाणो उ०-जेम साबुनो गोळो उपर जाडपणे समो अने नीचे टेकरारूपे विस्तरतो तेम अथवा उधी उघाडी राखेल अर्धछनआकारे, श्वेत, सुवर्णमय, स्फटिकरत्नमय सरखी निर्मळ मध्ये आठजोजन जाडी परिधि- विस्तारमा ४५ लाख जोजन प्रमाणे अढीद्वीपरूप मनुष्यक्षेननी उपरे ढाकण समान, छेडे जाता - माखीनी पाख समान पातळी, लोकना अग्रभागे रहेली अतिनिर्मळ सिद्धशिला शोभी रही छे, जेनी उपर 4 गाउए एटले एक गाउने छठे भागे अनता १५३

विचार रत्नसार
९०७
MAMAN
सिद्धपरमात्माओ विराजे छे, तेमने मारो पिकरण
शुद्धिए नमस्कार हो
२७३ प्र०-अष्टमहासिदिना नाम अर्थसहित कहो
उ०-प्रथमलचिमा ते शरीरनु हलवापणु थाय जलपुष्प
उपरि तथा कटकउपर मुनि चाले पण किलामना न
पामे १, वीजी वसिमासिद्धि तेहथी सिंह, सर्प,
देवमनुजादिक वश्य याय २, नीजी सत्यसिद्धि
परमेश्वर्यपणु पामे चक्रवर्ति इद्रादिक यकी अधिकी
ऋद्धिविकु ३, चोयी काम्यसिद्धि तेथी अत्यत
बलसपदाहोय, पृथ्वीपर्वतादिक उपाडे अचितित परा-
क्रमी होय ४, पाचमी महिमासिद्धि तेथी मोटु
लाखजोजनु शरीर करे ५, उट्टी अणिमासिद्धि तेथी
नाहनु कुथुआ जेवडु रूप करीने भीतमायी तथा
पर्वतमाथी निकळे अने पोते विघ्न न पामे ६, सा-
तमी यनकामावसायित्वसिद्धि तेथी जिहा उपयोग
दे तिहा जाणे निर्मल अतज्ञान अवधिजानने योगे
७, आठमी प्राप्तिसिद्धि तेथी सकल मोटीवस्तु
प्रत्यक्षपणे देखे रूपिवस्तु देखे अवधिज्ञानदर्शन
त्रण योगे ८, ए अष्टमहासिद्धि मुनिराजने होय
तेहना शब्दार्य जागवा
२७४ प्र०-क्षणमान सुख अने बहुकाळ दुख ते शी रीते ?
उ०-आ जीव आ ससारना अनुकुळ इदिय विषयना
भोगादिकने विषे लुम्म थयो यको मनिदुआना
दृष्टाते क्षणमान मुख अने नहुकाळ दुख भोगव्या
.

९०८ विचार रत्नसार. " करे छे, ए मवना एकटीपानी तृष्णामा पोतानी आसपास अनतगणु व्यापी रहेलु दुस हिसाबमा गणतो नयी, तेम खीसेवनमा जाणे साक्षात् अ. मृतसार महास्वादिष्टभोजन प्राप्त न थयु होय, तेवो लोलुपी थयो थको भुड सुकरनी पेठे निज स्वरूपने तन्न निसारीने अथवा उपेखीने खरज खणवाना स्वादना परे अथवा मधुलिप्त खड्गधाराने चाटवानी परे प्रथम सेवन करता सुख वेदे, अने पाडळयी तत्काळ एकक्षणवारमा शरीर वीर्य क्षय यता घाभरा जेवो थइपडी निर्माल्य नपु- सकरूप अनुभवे छे, अने त्यारेज ते पोतानी भुटसुकरपणानी निर्लज्ज बाळचेष्टाने अतरदृष्टिए धि- कारे छे, तेम आ ससारने विपे चक्रवर्ति आदिना विषयना उत्कृष्ट पौद्गलिक सुख नर्कादिकने विषे तेना विपाककाळ आगळ तुच्छ अल्पकालिक क्षणिक छे, छता हा। इति खेदे आ भवनी अ- नादि काळनी विषय वासना जाणताने पण बाळ- रूप करनार एवी महामोहमय प्रबळताथी चेत- नने सावधान रहेवानु छ, जुओ बारमा ब्रह्मदत्त चक्रवर्तिनु आयुष्य मात्र ७०० वरसनु हतु ते भोगवीने नरके गयो, तिहा ३३ सागरनु आयु भोगवे छे तेटलो काल विषयसुख भोगव्या ते उपर केटलु दु ख तेहनी विगत वर्ष १०० दिवस ३६००० थाय तेवारे ७०० वर्षना दिवस २५२००० याय विचार रत्नसार. ००० तेहना मुहूर्त ७५६००० ते एकमुहूर्त्तना ३७७३ श्वासोच्छ्वास याय ७५६००० ते गुणा करता २८५२३८८०००० एटले ७०० वर्पना एटला श्वासोच्यास याय तथा सागगेपम ३३ ना पल्यो- पम अणसेनीसकोडाकोडी याय तेहना आक ३३००००००० तेवारे एकश्वासो- च्छवास सुधी ससारमध्ये विषयना सुख भोगन्या ते उपरे ११५६९८५ ईग्यारलाख उपनहजार नवसेंने पचासी एटला पल्योपम थाय सातमी नरके दुख भोगवे छे एटले "खणमित्तसुखबहुकालदुरकम्" ए पद सूने का छे तेहनो ए भावार्य जाणवो अने वेटलामा अतिअधर्मपणे नि शूकताथी भोगवेला जे विषयभोगो तेना दारूणविपाको ते सातमी नर- कने विपे ज्या आख मीचीने उवाडीए एटली वार पण जीवने लेशमान सुख नयी तेने विषे जीव एकलो निराधारपणे भोगवी रह्यो छे माटे ज्ञानी कहेछे जे- प्रभाति विषयवासना त्यागो चेतन, साचे मारग लागोरे, तप जप क्रिया दानादिक सहु, गीणति एक न आवेरे, इद्रिय सुखमे झूल्यु ए मन, वक्र तुरग ज्यु धावेरे इत्यादि एम जाणी आ ससारना मूळ जे विषय कषाय मोहादि छ तेनो जय करवाने माटे परमात्माना वचनमा ज्ञानपूर्वक विरक्तबुद्धि राखी इद्रियोनो जय करवो, जेयी विषय त्यागे पचमहावतादि प्रवज्या उदय आये, कषायनी मदताए गुण- - ९१० विचार रत्नसार ठाणानी अणिए चढे अने सरूपाचरण चारिनरूप शुझात्मो- पयोग तीन वर्ते २७५ प्र०-मिथ्यादृष्टि अने सम्यग्दृष्टिना आचार तथा उपयोगने सरखामो उ०-मिथ्याटिजीरने शुभाचार होय पण शुभोपयोग न होय, अने सम्यग्दृष्टिजीवने शुझोपयोग होय तेने गुभोपयोग आचरणरूपे होय पण आदरण न होय, अने मिथ्याटिजीवने शुभआचाररूप होय, पण ते अशुद्धोपयोगना घरनो अशुभोपयोग होय छता तेने शुभोपयोग उपचारे कहिये २७६ 4०-युगप्रधानना गुणो कहो उ०-युगप्रधानना गुणो १४ छे तत्र गाथा- पडिरबोवेयस्सि, जुगप्पहाणागमोमहुखको । गंभीरोधीमतो, उवएसपरोयआयरिओ ॥ १ ॥ अपरिस्सविसामो, सगहसिलो अमिग्गहमईय । अविकत्थणोअचवलो, पसतहियओगुरुहोई ॥२॥ एव चतुर्दशगुणा भवन्ति । २७७ प्र०-कया ठेकाणे वणयोयो करवी उ०-भद्रबाहुस्वामीकृत ओघनियुक्तिमा ७२ मी गाथामा प्रणयोयो कवी कही छे, यथा-- अवस्सगतुकाओ, जिगोपइगुरुवएसेण । तिन्निथुईवडिलेहा, कालस्सविहिइमोतत्य ॥ १ ॥ २७८ म०-तपदान अने अनशननु शु फल छे' १५८ विचार रत्नसार ९११ 1 3०-तबसयमेण मुस्खो, दाणेणहुतिउत्तमाभोगा। देवचणेणरज्ज, अणसणमरणेणईदत्त ॥ १॥ २७९ प्र०-अभव्यजीवो शु नयी पामता ३०-इदत्त चकीत्त, पचोत्तरविमाणवासित्त । लोगतादेवत्त, अभधजीना नपावति ॥१॥ २८० प्र०-क्रया अभव्यजीवो यया 3०-सगमकालयमरि, कविलाअगारपालयादोवि । एएसत्तअभब्बा, उदाइनिवमारओचेव ॥१॥ २८१ प्र०-तुच्छनु स्वरूप कहो 3० तुच्छभत्तपाणु, तुच्छानिंदाय तुन्छमारभो। तुच्छा जहा कसाया, ताह तुतुच्छससारे ॥१॥ २८२ प्र०-कया जीव अहीयी मरीने महाविदेहमा नवमे वर्ष केपली थाय छे? ३०-इहभरहेकेइजीया, मिच्छादिट्ठीभद्दयाभव्वा । तेमरीउणनवमे, बरसे होहतिकेवलीणो ॥ १ ॥ २८३ प्र०-चमरेन्द्रनो केवो परिवार छ ? उ०-चमरेन्द्रने पाचअग्रमहिपी छे आइआठसहस्त्र दे- वीनो परिवार एम ४० सहस्र देवीओयी भोग भोगवतो विचरे छे २८४ प्र०-पट्दर्शनना नाम कहो 3०-१ बौद्ध, २ नैयायिक, ३ सारख्य, ४ जैन, ५ वै- शेषिक, तथा ६ चार्वाकदर्शन ए छ दर्शनना नाम, ९१० विचार रत्नसार ठाणानी अणिए चढे अने स्वरुपाचरण चारितरूप गुलामो- पयोग तीन वर्ते २७५ प्र०-मिथ्यावृष्टि अने सम्यगष्टिना आचार तथा उपयोगने सरखामो उ०-मिथ्याष्टिजानने शुभाचार होय पण शुभोपयोग न होय, अने सम्यग्दृष्टिजीवने शुझोपयोग होय तेने शुभोपयोग आचरणरूपे होय पण आदरण न होय, अने मिथ्याष्टिजीपने शुभआचाररूप होय, पण ते अशुद्धोपयोगना घरनो अशुभोपयोग होय छता तेने शुभोपयोग उपचारे कहिये २७६ 4०-युगप्रधानना गुणो कहो उ०-युगप्रधानना गुणो १४ छे तत्र गाथा- पडिरुबोतेयस्सि, जुगप्पहाणांगमोमहुखको । गंभीरोधीमतो, उवएसपरोयआयरिओ॥१॥ अपरिस्सविसामो, सगहसिलो अमिग्गहमईय । अविकत्थणोअचवलो, पसतहियओगुरुहोई ॥२॥ एवं चतुर्दशगुणा भवन्ति । २७७ प्र-कया ठेकाणे णयोयो करवी उ०-भद्रबाहुस्वामीकृत ओपनियुक्तिमा ७२ मी गाथामा त्रणयोयो कवी कही छे. यथा- अवस्सगतुकाओ, जिगोपइगुरुवएसेण । तिनिथुईवडिलेहा, कास्सविहिइमोतत्य ॥ १ ॥12 २७८ म०-तपदान अने अनशननु शु फल छे ? N विचार रत्नसार ९११ उ०-तबसयमेण मुस्खो, दाणेणहुतिउत्तमाभोगा । देवचणेणरज्ज, अणसणमरणेणईदत्त ॥ १ ॥ २७९ म०-अभव्यजीवो शु नयी पामता उ०-इदत्त चक्कीत्त, पचोत्तरविमाणवासित्त । लोगतादेवत्त, अभवजी नपावति ॥१॥ २८० म०-कया अभव्यजीवो थया उ०-सगमकालयमरि, कविलाअगारपालयादोवि । एएसत्तअभव्वा, उदाइनिवमारओचेव ॥१॥ २८१ प्र०-तुच्छनु स्वरूप कहो उ० तुच्छभत्तपाण, तुच्छानिदाय तुन्छमारभो । तुच्छा जहा कसाया, ताह तुतुच्छससारे ॥१॥ २८२ प्र०-कया जीव अहीथी मरीने महाविदेहमा नवमे वर्ष केवली धाय छे ? उ०-इहभरहेकेइजीया, मिच्छादिट्ठीभद्दयाभव्वा । तेमरीउणनवमे, बरसे होहतिकेवलीणो ॥१॥ २८३ प्र०-चमरेन्द्रनो केवो परिवार छ ? उ०-चमरेन्द्रने पाचअयमहिपी छे आठआठसहस्त्र दे- वीनो परिवार एम ४० सहस्र देवीओयी भोग भोगवतो विचरे छे २८४ प्र०-पट्दर्शनना नाम कहो उ०-१ बौद्ध, २ नैयायिक, ३ साख्य, ४ जैन, ५ वै- शेषिक, तथा ६ चार्वाकदर्शन ए छ दर्शनना नाम, ९१० विचार रत्नसार ठाणानी अणिए चढे अने सम्पाचरण चारितरूप शुमामो- पयोग तीन वंत २७५ प्र०-मिथ्यादृष्टि अने सम्यग्दृष्टिना आचार तथा उपयोगने सरखामो उ०-मिथ्याष्टिजीपने शुभाचार होय पण शुभोपयोग न होय, अने सम्यग्दृष्टिजीपने शुझोपयोग होय तेने शुभोपयोग आचरणरूपे होय पण आदरण न होय, अने मिथ्याष्टिजीवने शुभआचाररूप होय, पण ते अशुद्धोपयोगना घरनो अशुभोपयोग होय छता तेने शुभोपयोग उपचारे कहिये २७६ पं०-युगप्रधानना गुणो कहो उ०-युगप्रधानना गुणो १४ छे तर गाथा- पडिखोतेयस्सि, जुगप्पहाणागमोमहुखको । गंभीरोधीमतो, उवएसपरोयआयरिओ॥ १ ॥ अपरिस्सविसामो, सगहसिलो अमिग्गहमईय । अविकत्थणोअचवलो, पर्सतहियओगुरुहोई ॥२॥ एव चतुर्दशगुणा भवन्ति । २७७ प्र-कया ठेकाणे त्रणयोयो करवी उ०-भद्रबाहुस्वामीकृत ओपनियुक्तिमा ७२ मी गाथामा त्रणयोयो कवी कही छे. यथा- अवस्सगतुकाओ, जिणोवइगुरुवएसेण । तिनिथुईवडिलेहा, कास्सविहिइमोतत्य ॥ १ ॥ २७८ म०-तपदान अने अनशननु शु फल छे।

विचार रत्मसार ९१३ ४४४५३२८००००००००००००००० त्यारपछी एकलाखएवं दीक्षाफेवलपणे रहा तेहना फेटला वर्ष सित्तेरहज्जारकोडाकोडी पाचसेकोडाकोडी ते उपरे ६० कोटाकोडी तेहना आक ७०५६००००००० ००००० एटला वर्ष थया एम सबै चोरासीलाखपूर्वना वर्ष सरवाले ५९ लाखकोडाकोडी २७ हज्जारकोडाकोडी ते उपरे वली ४० कोटाकोढी पटला वर्ष जील्या एटला वर्ष श्रीऋषभदेव सायु जीव्या, एकडा उपर १९ मोंटा आवे त्यारे कोडाकोडी थाय एकटा उपर २१ मीडा आवे त्यारे कोडाकोडीकोडाकोडी थाय तथा एफडा उपर २९ मीडा आवे तेरार कोडा- कोडीकोडाकोडी थाय इत्यर्थ ८४ लक्षपूर्वनो जाणवो २८७ प्र०-प्रकृतिवध, स्थितिनध, रसनच, तथा प्रदेशाध क्यारे क्यारे नीपजे उ०-योगे प्रदेशय प्रकृतिवध नौपजे ते कर्मवर्गणाद- लनो सचय याय, तथा योगनें लेश्या वे एकठा मले त्यारे प्रकृति ने प्रदेशव नीपजे, तथा व्यान- कपाय ए वे मले त्यारे स्थितिमय रसव नीपजे, तथा जिहा कषायन्यान आवे त्यारे च्यार मेला थाय इत्पर्य । २८८ प्र०-शास्त्रमा कहेला मारनु प्रमाण कोटक कहो ? उ०-सरसपनो एक जव, ३ जवनी एक गुजा (च 115

९१२
विचार रत्नसार
२८५ प्र०-सठशलाकापुरुषोना जीयो केटला तथा माता
पिताना जीयोनी सरया केटली छे ?
उ०-वेसठशलाका पुरुयोना जीर ५९ छे. तेहनी
विगत-त्रणजीर चक्रत्तिनी पदवीना ओडा थया
तथा एफ वासुदेव यया ए ४ जीने घट्या तेयी
५९ यया तथा ५९ जीपना माता ६० पिता ५१
क्या छे तेहनी विगत २४ जिननी माता, ९
चक्रीनी माता, ९ पासुदेवनी माता, ९ बलदेवनी
माता, ९ प्रति वासुदेवनी माता एव ६० माता
जाणवी हवे पिता ५१ तेहनी विगत, २४ जि-
नना पिता, ९ चक्रीना पिता, ९ वासुदेव तथा
बलदेवना पिता, ९ प्रतिवासुदेवना एव ५१ पिता
जाणवा एणी रीते पदवी ६३, जीव ५९, माता
६०, पिता ५१ ए रीते अर्थ
२८६ प्र०-श्रीऋषभदेवस्वामी केटला वर्षनो काल गृहस्थाश्रमे
वस्या तथा सर्वायु केटला वर्ष जीव्या
उ०-ऋषभदेवस्वामी वीसलाखपूर्व कुमारपणे रह्या तेहना वर्ष
केटला चौदलाखकोडाकोडी इग्यारहजारकोडाकोडीवली
बसेंकोडाकोडी१४११२००००००००००००००००
एटला वर्ष कुमारपणे रह्या त्यारपछी ६३ लाखपूर्व
राज्यावस्था भोगवी तेहना वर्ष केटला? चुवालीसलाख
कोडाकोडी पीस्तालीसहज्जारकोडाकोडी बत्रीसें
कोडाकोडी एसीकोटाकोडी तेहना
.
आक

विचार रत्नसार २१५ ते स्त्रीओने समागमे पचिस पचिस छोकरा रूप नानाविध रोगोनी उत्पत्ति छे, पूर्वोक्त प्रत्येक रोगने २५ गुणा करता १०० रोग याय, ते मध्ये आठ वीजा रोग भेळीए तेवारे वैदकशास्त्रमा वर्णवेल १०८ रोगनी सख्या थाय छे तेनी चिकित्सा निपुण नाडीपरीक्षाना अनुभवी वैद्य यथार्थ करी शके, पण ते सर्वव्यरोग, अने तेना मटाङ- नार पण द्रव्यवैद्य जाणवा, पण जे थकी ते द्रव्यरोगो उत्पन्न याय छे ते भावरोग जीवनी विषयकपायरूप अनादिकाळनी मलिन विकारी परिणति छे, तेना वैद्य तो सनत्कुमार सरखा परि- णतिवत महात्माओ गणधर तीर्थकरादि जाणवा, जे सर्वऔषधना जाण, तथा सर्वरोगना मटाडनारा छे, माटे हे चेतन । तु मिथ्या शारीरादिकनी ममताने छोडीने तेओने शरणे जा, तेमना वचनने आदरथी स्वीकार अने तेमने मागें चालतो अनादि अनतअव्याबाध सुखने अचलपणे अनुभवीश २९२ प्र०-एकसौधर्मेंद्रना आउखामा केटली इद्राणीओ चवे? उ०-कोडाकोडी दुविस, पचासीलक्खाहुतिकोडीओ। इगुत्तरीसहसाकोडी, चत्तारिसयायतहकोडी ॥१॥ अठ्ठावीसकोडी, सत्तावन्नहवतिलक्खाइ । सहस्साचउदससया, च्छासीइदेगजमित्थि ॥ २ ॥ इयसक्खादेवीओ, चवतिइगइदजम्ममि ॥ ३॥ इद्र विषयसुख भोगवता एकलाख अठावीस

विचार रत्नसार
4N
णोठी ), ३ गुजानो एक वाल, सोळपाटनो एक
गदीआणो, दशगदीआणे एक पल, दोडसोपले
एकमण, दशमणनी एफपी, दश बडीनो एक
भार जाणो
२८९ प्र०-अद्वारभारवनस्पति कहेवाय छे त्या भारनु प्रमाण
केटल, तथा ते वनस्पति अदारभार कइ कइ छे
ते कहो
उ०-३ क्रोट, ८१ लाख १२ हजार नवसें सीतोतेर
मणे एकवनस्पतिभार थाय छे, तथा प्रत्येक
जातनी वनस्पतिनु एक एक पान लइने एकटो
दुगलो करीए, ए प्रमाणमा चारभार वनस्पति
केवळ फुलमय छ, तथा आठभार वनस्पति फळ
फुलपानमय छे तथा उभार वनस्पति वेलनी छे,
एम एकदर १८ भार वनस्पति जाणवी
२९० प्र०-मुनिराज कया चोविसपरिग्रहना त्यागी होय
उ०-क्षेत्रवास्तुधनधान्यद्विपदचतुष्पदयानशज्जासयन भाण्ड
कुप्यचेति बहिर्दश, मिथ्यात्ववेदहास्यादिषट्कषाय
चतुष्टयरागद्वेषावाभ्यतरा चतुर्दश ।
२९१ प्र०-महारोग केटला तथा तेनो सतानपरिवार केटलो
कह्यो छे१
उ०-चार मोटा रोग कडा छे--१ ज्वर, २ भगदर, ३
कोट, ४ धातुक्षय तेनी चार स्त्रीओना नाम
तावनी स्त्री तरस, भगदरनी स्त्री हेडी, कोढनी स्त्री
भूख, धातुक्षयनी स्त्री निद्रा तथा ते
-
साता
१६२

विघार रत्नसार. उदय न आवे, आठमाना धणीने सर्वविरति उदय न आवे, नवमाना वणीने मुक्ति न याय २९५ प्र०-पुरुपवेद, खावेद, नपुसकवेद, पचेद्रियपणु, अने सपण, कायस्थितिए लागल्गाट तेने तेज पर्याये रहे तो उत्कृष्ट केटलो काळ रहे ? उ० १ पुरुपवेद, उत्कृष्ट ६०० सागरोपम झाझेरा, २, स्त्रीवेद, ११० पत्योपम ६ क्रोडपूर्व सुधी, ३, नपुसकवेद, अनती उत्सर्पिणी अवसर्पिणी सुधी, ४, पचेन्द्रियपणु, १००० सागरोपम झाझेरा, ५, बसपण, २००० सागरोपम झाझेरा, प्र० २९६-पाचजान त्रणअज्ञान कालयकी जघन्य तथा उ- त्कृष्ट केटलो काल रहे 30-मतिज्ञान अने श्रुतज्ञाननोकाल जघन्यथी एकसमय उत्कृष्ट ६६ सागरोपझाझेरो, अवधिज्ञान एकसमय ते केम १ विभगज्ञान समकित पडवजे तेवारे विभग फीटी अवधिज्ञान थाय त्यारे एकसमय रहिं वली पडे, विभगजाननो विभगज्ञानेज आवे एम अवधिज्ञान जघन्ययी एकसमय होय, मन पर्यज्ञान- जघन्ययी एकसमय उत्कृष्टे देशेउणा पूर्वकोडी एक समय ते किम १ जेवारे अप्रमत्तगुणठाणे वर्तता मन पर्यवज्ञान उपजीने जाय, तिहा एकसमय जाणवो, केवलज्ञानना बणीने सादिअनतोकाल जाणवो हवे मतिअज्ञानने श्रुतअज्ञानना भागा कालआसरी त्रण- जाणवा, एकअनादि ने अनतए अभव्यने १ अनादि पिचार रत्नसार. ... हजाररूप विक, तेनी आटअग्रमहिपीओ प्रत्येक १६ हजारकप विकुम, त्यारे ते हिसाने इदनु आयुष्य जे वेसागरोपमनु छे तेमा २२ कोडा- कोडी ८५ रास ७१ हजार चारसो अठावी- स कोड ५७ लाख १४ हजार बसो छीयासी उपर आठ गुणी एटली देवागनाओ एकइदना आयुष्यमाहि चये २९३ प्र.-पाच स्थावर, विगलेन्द्रि तथा पचेन्द्रिय क्याक्या होय उ०-एगेन्दियफ्चेंदीया, उड्ढेअहेयतिरियलोएय । विगलेंन्दियजीवापुण, तिरियलोएसु मुणेयव्व ॥१॥ पुढवीआउवणस्स, बारसकप्पेसु सत्तपुढवीसु । फुटवीजा सिद्धसिला, तेउनरखित्तितिरियलोए ॥२॥ सुरलोए वावीमज्झे, मच्छअनत्थीजलयराजीवा । गेविज्झेनऊवावि, वाविअभावेजलनत्थी ॥३॥ २९४ प्र०-नवनियाणानु स्वरूप तथा ते नियाणाना करनारने केवा हीनफळनी प्राप्ति थाय छे ते कहो उ०-१ राजादिक थवानी इच्छा, २ अमात्य थवानी इच्छा, ३ स्त्री थवानी इच्छा, ४ देवभोगनी इच्छा, ५ देवीभोगनी इच्छा, ६ भोग न पामवानु निवाणु, ७ श्रावक थवानी इच्छा, ८ दरिद्र थवानी इच्छा, ९ कर्मरहित थवानी इच्छारूपनिवाणु, प्रथमना उ नियाणाना धणी दुर्लभबोधी थाय, प्राय धर्म सदहे नहि,, सातमानियाणाना धणीने देशविरति " विचार रत्नसार ९२१ आत्मा अतद्वापरटाचेव ५ सापराधने निरापराधे करी वसा २॥ अपराधे हणे पण निरापराधे नहीं २॥ सापेक्षने दया निरपेक्षे वसो ११ रहे तथा अन गाथा, तसायावराय जीवा, सकप्पारभओभवे दुविहा । सावराहनिरावराहा, सावक्खा चेव निरवक्खा ॥१॥ जीन के प्रकारे सूक्ष्म ने बादर जे मध्ये सूक्ष्मना १० भेद तथा १० बादरना, मुश्मना १० ते पाच स्था- वर पर्याप्ता ने अपर्याप्ता, एव १० नी दया श्रावकने न होय, एव १० बादर वे किहा ' बेइदि ? तेंद्रि २ चैरेंद्रि ३ पचेन्द्रि ४ ए पर्याप्ता ने अपर्याप्ता एव भेद ८ पचेन्द्रिसज्ञीनो ९ ने असजीनो १० एव भेद बादरना यया, ते मध्ये श्रावकने सकल्पी न मारलु आरमे जयणा एव ५ मेद रह्या, ते मध्ये अपरावे हणे निरपराधे नहीं एटले २॥ वसा रह्या, ते मध्ये सापेक्ष अने निरपेक्ष निर्दयपणे न हणे एव १। वसानी दया श्रावकने उसजीवनी रही इति प्राणापातनी जीवदया १ । वसानी इति । मृषावाद- अणुव्रत २ समस्तमृषावादनियम साधुने २० वसा सूक्ष्म ने बादर करता वसा १० उपयोगे अनुपयोगे अतहापरट्ठा आत्मपर एव ५ स्वजन परजन करता एव २॥ वर्म अपर अधर्म परमार्थे ११ तत्र गाथा- सुहमवायरमलीय, अप्पाणपरमेयग भवे दुबिह । सयण परंग च तहा, यम्मत्थ केवलपरमत्थ ॥१॥ 116 ९२० विचार रत्नसार . गुण ८, आचार्यना ३६, "पबिंदियसवरगोग इत्यादि गाथा थी जाणज्यो, उपाध्यायना २५ इग्यार अग भणे भणारे एम १२ उपाग भगे भणारे तथा चरण- सित्तरि करणसित्तरि जाराो एष २५ हवे साधना २७गुण ते छात पाले उफायरसगाले १२ पचेन्द्रियनो निग्रह १७ लोभनिग्रहसचर १८ कोधनिग्रहक्षमागुण एव १९ भावविशुद्ध २० पडिलेहणाविशुद्ध २१ सग्रहयोगयुक्त २२ मनपचनकायनु कुशलपणु २५ शितादिक पीडानो सहबो २६ मरणात उपसर्गनो सहवो २७ ए सर्व मली १०८ गुण पचपरमेष्ठिना तेहनी नोकारवाली कहिए इत्यर्थ इति । प्र० ३०१-साधु सोएवसा पचमहावत पाले अने श्रापक सवाछ वसाए पचअणुव्रत पाले ते केवी रीते उ०-पहेलु प्राणातिपात श्रावकने अणुव्रत सिंहा दया श्रावकने वसा १। नी होय पाचस्थावर ते सूक्ष्म ने बादर एव १० ते पर्याप्ताने अपर्याप्ता एव २० एम एणि रिते साधु सोवसाए पचमहावतपाले,श्रावकने पाचअणु- व्रतमलीने सवाच्छवसा इत्यर्थ, तथा वली पाच अणुव्रत श्रावक्ने होय तेहनो विवरो लखीए छीए, स्थूलबेंद्रियादिक सजीन रािराध उपेतकरणी न हणे ए प्राणानिमात अणुव्रतनी दया वसा ?। नी होय ते पूर्व ल्ल्यु तेहथी जो जो, तथा वीजा अणुव्रत मन्ये आपणे काजे स्वसाधुने समस्तजीव रक्षा ( वसा २० सूक्ष्म ने बादर वसा १० काढ्याने परने विचार रत्नसार ९२३ यल साधु पाले तिहा वसा १॥ नु होय श्रावकने इति । अथ परिग्रहअणुव्रत पाचमु साधु वे समस्त विरमण २० अभ्यन्तरने बाह्य करता १० " अ- तहा य परछा " ए के भेदे ५ स्त्रीपिहरआत्मनिटानु २॥ स्त्री आत्मदत्त एव वसा १। तन गाथा- अब्भतरबाहिर परिगहो परसकीयगाचेवईत्थी। पियअप्पोईत्थी नियदत्तनीउय ॥१॥ बनधान्य १ खेतवत्थु २ रुपुसोनु ३ कुवइते वासण ४ द्विपद चतुष्पद एव ५ ते बाह्यने अभ्यतरे १० ते इच्छामु रूपे २० ते मध्ये श्रावकने वसा १ । परिग्रहपले इति पूर्ण । अथ गाथा- तसाथावरायजीवा, सकप्पारभओ भवे दुविहा । सावराहानिरावराहा, सावक्खा चेव निरवक्खा ॥१॥ इति प्राणातिपातविरमण । सुहुमबायरमलीय, अप्पाणपरभेयग भवे दुविह। सयण परगचतहा, वमत्थ केवलपरमत्थ ॥१॥इति।२॥ सुहुमथुलमदिनदाण, निवरायदड कारिय । रायगहकारियएण, दुविहकहियगुरुजणेहिं ॥१॥ नविराह० १ इति ३, मणवयकायमेहुण० १ इति ४ । अम्भ० १,५ । स्वजनकाजे धर्मकाजे मुकी पर- काजे बोलवानियम ए मृषावादअणुव्रत समस्तमृषा नियम २० सूक्ष्मने बादरभेदे १० आत्मकाजे पर- काजे ५ स्वजनपरकाजे २॥ वर्मपरकाजे ११ एवं द्वितीय, हवे तृतीयअणुवत राजनिग्रहकारिज परायु - ९२२ विचार रत्नसार पाच मोटकानूटा ते सुक्ष्म ने पादर एर १० ते उपयोगे ने अनुपयोगे एप २० वसानु मृपापाद साधु न बोले पण आपकने ११ वसानु मृपावाद आवकयो पले इति भाव । अप अदत्तादानअणुप्रत ३ समस्त अदत्तविरमणसाने २० वसा सूक्ष्म पादर मेद थइने वसा १० सराजनिग्रह ने निराजनिग्रहथी ५ आत्म- निमित्त परनिमित्तथी २॥ याच्यु तथा अणयाच्यु १॥ वसा तर गाथा- मुट्ठमयुलमदिनदाण, निवरायदडकारिय । रायनिगहकारियपुण, दुविहकहिय गुरुजणेहिं॥१॥ नविराहनिगहकर, अप्पाणमेयग दुविह । दिन्नमदिनच पर, भासियव निउणबुद्धिहिं ॥२॥ अदत्त पाच स्थूलजीव अदत्त १ जिन २ गुरु ३ स्वामी ४ सागारिअदत्त ५ ते सूक्ष्म ने बादर एव १० उपयोगे तथा अनुपयोगे एव २० वीसगुणी ए इति । हवे मैथुनअणुव्रततुर्य ४ साधुने समस्त मैथुनविरमण २० मनवचनकाया ३ एव १० स्वदारा परस्त्री करता एव पाच वेश्या तथा परस्त्री २॥ कुमारी तथा अपरस्त्री १। तत्र गाथा- मणवयकायमेहुण, मविनिययअविरई । इत्थीओवेसापरत्थीओ, कुमारीपरईत्थीनियमो य ॥१॥ स्वदारा १ परस्त्री २ वेश्या ३ दासी ४ कुमारी ५ एव ते मनवचन तथा कायाए करी एव १० ते सुपने तथा जागृतपणे एव वीस २० वसानो शी- १७० , विचार रत्नसार ९२५ स्त्रीआत्मा एवं स्त्रीआत्मादत्तआत्मा १ अभ्यन्तर परिग्रह क्रोधमानादिकनो नहीं पले अने बाह्य प- रिग्रह १० प्रकारनो ते ते पलसे एवं १० बाह्य परिग्रहमाहि वे भेद ते किया ? एक आत्मपरिग्रह अने परपरिग्रह ते मध्ये आत्मपरिग्रहनो नहा पले, परपरिग्रहनो पलसे एव ५ वली परिग्रहमा वे भेद ते किया ? आत्मनियोग अने स्त्रीपिहरआत्मनियोग अने स्त्रीपिहरआत्मनियोग ते शु कहीए ? जे वाणोतरादिकनो जे गर्व ते आत्मनियोग पलसे अने स्त्रीना पिहरनो जे परिग्रह ते आत्मनियोगनो नही पले एव २॥ स्त्रीना पिहरनो परिग्रह वेहना बे भेद ते किया ? एक स्त्रीदत्त अने अस्त्रीदत्त एव १॥ सवावसो थयो इति पचाणवतानि एम श्राव- कने ५ अणवते १। सवावसानो होय ते विवरण का इति सपूर्ण। ३०२ प्र०-ससारमा सार शु? उ०-ससार पोतेतो निसार छे, एटले ससार जे विषय कषायनी परिणति तेमा आत्माने काइपण सारभूत नथी, अने अधर्म मार्गमा सम्यग्दर्शनरूप धर्म सार छे, तेमा पण सम्यग्ज्ञान सार छे, वळी तेमा पण सम्यञ्चारिन सारमत छे, तेमा निर्वाणपद जे मोक्ष ते सारभूत छे ३०३ म०- चौदपूर्वी आहारकशरीर केटलीवार करे ?

९२४ विचार रत्नसार अणदिषु लेगा नियम समस्त अदत्तादानपञ्चरखाण २० सश्मनादरभेदे १० सराजनिग्रह निराजनिग्रह ५ आत्मकाजनिग्रह परकाजनिग्रह २॥ पियारी दिघी पियारीअणदीधी १। एप्र राजनिग्रह पडे तेहनो पञ्चक्खाण ते सराजनिग्रहमाहि वे भेद एक आत्म- राजनिग्रह परराजनिग्रह कहिए, हवे ते आत्मराज- निग्रह ते मोकळो, परराजनिग्रहनु पञ्चरखाण, हवे परराजनिग्रहना ये भेद ते किया ? एक पियारी दीधी, पीयारीअणदीघी परकीयवस्तु आणी आपे ते कोइनी दृष्टि वची न लीये एटले सवावसो नीजा वतनो जाणवो, अथ चतुर्थ स्वदारासतोष परदारा विवर्जनारूप ए माहे सर्व फलामणी छे, समस्त मैथुनविरमण मनवचनकाया १० स्वदारा परस्त्री ५ वेश्या अपरखीमाहे बे भेद ते किया ? वेश्याने अपरस्त्री ते मध्ये वेश्यानो नहीं पले, अपरस्त्रीनो पलसे एव २॥ अपरस्त्रीमाहि वे भेद छे ते किया ? कुमारी अने परणी अपरस्त्री ते कुमारी नहीं पले परणीतीनो पलसे कुमारीश्या माटे मोकळी १ जे विवाह मल्यो छे परण्या नथी ने ते उपरे स्त्रीनो अमिलाप धरे ते माटे एटले सवावसो रह्यो “आणद श्रावकस्य सपादो विशेषाधिक " आपणोपरिग्रह स्त्रीयाद्रिकनो करी आपणे कार्य आण्यो होय ए परिग्रहअणुव्रत तिहा समस्तपरि- ग्रहविरमण २० अभ्यन्तर ने बाह्य परिग्रह विश्वा १० परआत्म एव ५ स्वीमिहर आत्मा एव २॥ अथ पाचमे +९७२ विचार रत्नसार ९२७ . उ०यथा एटले जेवा कर्म उदय आवे वेवा प्रवृत्ति एटले वेदीने खेरवे, करण एटले शुभ परिणामे करी, अर्थात् यथाप्रवृत्तिकरणमा जीव अकाम निर्जराए तथा कपा- यनी मदताए पूर्वना औदयिककर्मने खपावे, पण नवा रागद्वेषप्रत्ययिक बध न करे एम यथाप्रवृत्ति- करणमा जीव अकाम निर्जराए तथा कषायनी मद- ताए पूर्वना औदयिककर्मने खपावे, पण नवा राग- द्वेष प्रत्ययिक बव न करे एम यथाप्रवृत्तिकरणे तो अभवीजीव पण असख्यातीवार गठीदेश सुधी आवे, पण ते गठीने भेदवाना अपूर्वकरणरूपी परि- णाम न थाय तेथी पाछो पडे, इहा गठी ते अ- नादिरागद्वेषनी निविडगाठ, जेम कोइ वृक्षना काष्ठप्रमुखनी निविडगाठ भेदी न जाय, तेम आत्मानो पुद्गल उपर तन्मय एकीभावरूप ममता ते ग्रथि जाणवी ते अपूर्वकरणपरिणामविशेषे भेद प्रारमे तेहने अते मेदाने अनिवृत्तिकरण पामे ए सर्व क्रियाअतर्मुहूर्तनी त्यारपछी मिथ्यात्वनो जाणवो उपशम समकितनु थवु ते अतकरण एकसमयनो इति ४ करणनो भावार्थ । ३०९ प्र०-सम्यक्त्वनी प्राप्तिए झु पामे शु समरे उ०-समकित पामे थके जीवनो शुद्धोपयोग समर्यो, ते उपयोग समरे, जीव समर्यो, जीव समरे योग स- मयों, योग समरे परिणाम समर्या, परिणाम समरे अध्यवसाय समर्या, वळी वीजी रीते कहीए तो ९२६ विचार रत्नसार 30-गाया- चतारियगारानो, चन्दसपुची रेइ आहार । ससारमिनसतो, एफभरे दुनिताराओ ॥ १॥ ३०४ प्र०-जाहारशरारनु जयन्य अने उत्कृष्ट आतरु केटल' समयोजहानमतर, उकोसेणजारउमासा ॥ 3०-आहारसरीराण, उझोसेण तु नसहसा ॥ २ ॥ ३०५ प्र०-पाच प्रकारना समकित जिनेश्वरे कया प्ररुप्या छे ? उ०-खईउ खओवसमीय, वेयगमुवसामीय च सासाणा । पचविह समत्त, परुवियजिणवरदहि ॥१॥ . ३०६ १०-क्षेत्र अने कालमायी सूक्ष्म कोण छे उ०-सुहुमोयहोइकालो, ततोसुहुमतरहवइखित्ते । अगुसेठीमित्ते, उसप्पिणीओअसखिज्जा ॥१॥ ३०७ प्र०-अभव्य, दुभव्य, अने निकटभव्य, ए वणने ग्रथि- भेदयी पाछा पाडवामा मुख्य हेतु कोण छे ? उ०-अनादिमिथ्यात्वनी वासनाए पतितपणु ते अभव्यने होय तथा विषय लालसाए पतितपणु दुर्भव्यने होय, कर्मवर्गणामायी कोइककोदये पतितपणु निकट भवीने यथाप्रवृत्तिकरणग्रथिदेश थकी कोइ कर्मना उदये पतित थाय, पण विषयवासनाए के लाल- साए नहि, आमा अभव्यने मदता यथाप्रवृत्तिकरणे करी तीवभाव एटले उत्साहने पामे, निकटभवीनी मदता क्षयोपशमभावने पामे ३०८ प्र०-यथाप्रवृत्तिकरणनो शब्दार्थ कहो - , विचार रत्नसार ९२९ रसातिरेकयोजनसहस्रमानत्वादौदारिक, वैक्रियद्विधा भवधारणीय उत्तवैक्रिय च यदेकम्त्वा अनेकभवति अनेकम्त्वा एकचभवति शेषशरीरापेक्षया वृहत्प्रमाण वैक्रिय ॥ उक्तच ॥ कजमि समुप्पन्ने, सयकेवलिणाविसुद्धलद्धिए । जएत्यआहारिज्जइ, भणियआहारक ततु ॥१॥ अथतैजस सबस्ससिद्धरसाइ, आहारपाकजणगच । तेयगलफिनिमित्त, तेयग होइ नायब ॥१॥ भुक्ताहारपरिणमनकारण ३। अत्यतशुभक्रियत्वात् इत्याहारक ४। कर्मणाजातकार्मण कर्मपरिणामच आ- त्मप्रदेशसहक्षीरनीरवत् , कर्मणो विकार कार्मण इतिवा, यदुक्त यत ॥ कम्मविगारोकम्मण, मट्टविहचित्त कम्मनिप्पन्न । सम्वेसि सरीराण, कारणभूत्तमुणेयव्य ॥ १ ॥ ३१४ प्र०-मिथ्यात्व अने चारितमोहनो तात्त्विक अर्थ कहो उ०-शुद्धआत्मादि नवतत्त्वने विषे जे विपरीतबुद्धि तेज मिथ्यात्व, निर्विकारी आत्मज्ञानथकी विपरीत प्रवर्तन, अर्थात् वीतरागचारिनने विषे मुझवण, विकळता ते चारित्र मोह ३१५ प्र०-रागद्वेष ते कर्मजनित छे के जीवजनित छे उ०-एकदेशे शुद्धनिश्रयनये ते कर्मजनित छे, अने अ- शुद्धनिश्चयनये जीवजनित छे, पण वास्तविक रीते शुद्ध परम अर्थ ग्रहता वस्तुगते, रागद्वेष ए नयी पुद्गलनो स्वभाव, के नथी जीवनो स्वभाव मूळरूपे, पण ते बनेना सयोगिकभावथकी एक नवीन वर्ण- 117 १७७ ९२८ विचार रत्नसार जीपर समरे शुद्रोपयोग समरे, जने तेयी शुद्ध अदानम्प समकित पामे, तेवीं योग समरे, वेयी नतपचरसागादि रुटी रीते उदय आरे तेयी परि- णाम सारा थाप, तेथी अममत्तता जीपने आवे, अने तेयी जीवना अध्यवसाय समरे, अने शुक- ध्यान प्रगटे, जने तेने योगे क्षपकणिआरोही कर्मक्षय करी केवळजान पामी मुक्तिपद वरे, एम परिपाटि सुधारा अने नगाडानी उलट पुलट जाणवी ३१० प्र०-पर्याप्ति अने प्राणमा शु फेर ? उ०-भवोप्तत्तिकाले जतर्मुहूर्तमा जीव जे करे ते पर्याप्ति, पठी जीवेत्यासुधी सहचारी रहे ते प्राण कहिए, अर्थात् भवभव प्रत्ये उपग्रहण थाय ते पर्याप्ति अने सहचारी भवोपयाही सबध ते प्राण जाणवा ३११ प्र०-परमाणु अने प्रदेशमा शु विशेष 3०-स्वाभाविक ते परमाणु, अने विभाविक ते प्रदेश, जे परमाणु स्कधने वळग्यो छे, त्यासुधी प्रदेश कहेवाय, छुटो पडे तेने परमाणु कहिए. ३१२ प्र०-श्रीआदीश्वर भगवान् सिद्धाचळजी पूर्वनवाणु वार आव्या तेनी अक सख्या लखो ? उ०-६९ कोडाकोडी ८५ लाख ने ४४ हजार कोडवार आव्या, एने पूर्वनवाणुवार कहिए ३१३ प्र०-पाच शरीरनो शब्दार्थ कहो उ०-पन्नवणानी टीका मध्ये का छे, यत उदार प्रधान शरीरमौदारिक तीर्थकरगणधरमधिकृत्य तथा उदा- विचार रत्नसार ९२९ रसातिरेकयोजनसहस्रमानवादौदारिक, वैक्रियविधा भवधारणीय उत्तखैक्रिय च यदेकभूत्वा अनेकभवति अनेकमत्वा एकचभवति शेषशरीरापेक्षया बृहत्प्रमाण वैक्रिय ॥ उक्तच ॥ कन्जमि समुप्पन्ने, सयकेवलिणाविसुद्धलदिए । जएत्थआहारिज्जइ, भणियआहारक ततु ॥१॥ अर्थतैजस सन्चस्ससिद्धरसाइ, आहारपाकजणगच । तेयगलझिनिमित्त, तेयग होइ नायव्व ॥१॥ भुक्ताहारपरिणमनकारण ३। अत्यतशुभवक्रियत्वात् इत्याहारक ४। कर्मणाजातकार्मण कर्मपरिणामच आ- त्मप्रदेशसहक्षीरनीरवत् , कर्मणो विकार कार्मण इतिवा, यदुक्त यत ॥ कम्मविगारोकम्मण, मट्टविहचित्त कम्मनिप्पन्न । सवेसि सरीराण, कारणमत्तमुणेयब्व ॥ १ ॥ ३१४ प्र०-मिथ्यात्व अने चारिनमोहनो तात्त्विक अर्थ कहो उ०-शुद्धआत्मादि नवतत्त्वने विषे जे विपरीतबुद्धि तेज मिथ्यात्व, निर्विकारी आत्मज्ञानयकी विपरीत प्रवर्तन, अर्थात् वीतरागचारित्रने विषे मुझवण, विकळता ते चारिन मोह ३१५ प्र० रागद्वेष ते कर्मजनित छे के जीवजनित छ उ०-एकदेशे शुद्धनिश्रयनये ते कर्मजनित छे, अने अ- शुद्धनिश्चयनये जीवजनित छे, पण वास्तविक रीते शुद्ध परम अर्थ ग्रहता वस्तुगते, रागद्वेष ए नयी पुद्गलनो स्वभाव, के नथी जीवनो स्वभाव मूळरूपे, पण ते बनेना सयोगिकभावथकी एक नवीन वर्ण- 117 , ९३० विचार रनसार. शकर उपत्ति छ, तैयाज जे जीप रागद्वेषी छे वेओ वर्णशकररूप देसार ससारमा करे छे, अने तेओने पाळलीलावतभानाट्यने पि मग्न जोइ रया छे ३१६ म०-श्री युगप्रधान आचार्यजी महात्मांना चार मुख्य अ. तिशय कया ? 3०-१ जेमना वनमा जुन पडे, २ ज्या विचरे ते देशनो भग न याय, ३ तथा ते देशमा चिंता न उपजे, ४ तेमना पग पोइने पीए तेना सर्व रोग नाश पामे ३१७ प्र०-उत्सेधागुल, आत्मागुल, अने प्रमाणागुल नो अर्थ कहो, तथा वेणे करी कइ कइ वस्तुओ मपाय छे ते पण कहो 30-१ उत्सेधागुल एटले स्वदेशे, स्वक्षेत्र, स्वकाळे पोतानु जेवटु शरीर होय तेना प्रमाणनो एकआगुल जाणवो तेणे करी शरीरादिक मपाय छे २ आ- त्मागुल ते उत्सेधागुलथी बमणो जाणवो, अंने तेणे करी घर, हाट बगेरे मपाय छे, ३ आत्मागुलथी हजारगुणो प्रमाणआंगुल जाणवो, 'तेणे करी पृथ्वी, पर्वत, विमानादि मपाय छे ३१८ प्र०-भावना, अध्यात्म मौनपणु, 'मुनि अने सम्यक्त्व तेनो टुक ताविकशब्दार्थ कहो उ०-१ आत्माने ज्ञानादिकेकरी भावीए ते भावना, २ आत्माने अधिकारी करीने जे करीए ते अध्यात्म ३ सत्य यथार्थ जिनवचनानुसार बोलवु, ते खरु मौन एटले मुनिपणु जाणवु तथा '४ जगत्तत्त्वने विचार रत्नसार ९३१ पचास्तिकायने यथार्थ माने तेने मुनि कहीए, अने जे मुनिपणु के तेज खरु सम्यक्त्व कहिये ३१९ प्र०-दीक्षाने अयोग्य केवा प्राणीओ कया छे उ०-१८ मकारना पुरुष, २० प्रकारनी स्त्रोओ, तथा १० प्रकारना नपुसक जातिना पाणीओने दीक्षा आपवाने जिनराजे वर्जन यु छे, तेमा प्रथम १८ प्रकारना पुरुष कया ते कहे छे-१ बाळ, २ वृद्ध, ३ क्लीव ते नपुसक, ४ जड वे मूर्ख, ५ रोगिष्ट, ६ चोर, ७ राजानो अपराधी, ८ उन्मत्त, ९ अध, १० दास एटले कोइनो गोलो प्रमुख, ११ दुष्ट कपायवत एटले अत्यतकोधी मानी वगेरे, १२ मूढ वे मोहमयी, १३ करजदार, १४ हीनजाति- वत, १५ विद्यादिक कोइपण गूढस्वार्थरागवत, १६ भिक्षुक मागीखानार निर्लज्ज प्रमुख, १७ चो- रीने के भरमावीने के अन्य कोईपण अयोग्य प्रकारे मेळवेला शिष्यने, १८ हीनसचवत ते वीकण प्रमुख, ए रीते ए अढारदोषवत पुरुष तथा १९ गर्भवती स्त्री तथा २० स्तनपान करनार बाळकवत स्त्री ते धावप्रमुखखी एम ए बे युक्त वीशदोषवत स्त्री जातिना प्राणीओ दीक्षाने अयोग्य कह्या छे, वळी एज रीते दशप्रकारना नपुसक पण ग्रथातरथी जाणी लेवा ३२० प्र०-कोइ जे अल्पससारी छे ते कया लक्षणथी जाणीये उल-अल्पआहार, अल्पनिद्रा, अल्पआरभ, तथा अल्प- कपाय होय ते नियमा अल्पससारी जाणीये १७९ ९३२ विचार रत्नसार ३२१ म०-साम, दाम, मेदअने दडएचार नीतिनोटकशब्दार्यकहो उ०-१ साम ते प्रेमनाठु मर वचन, २ दाम ते दड आपीने झवडो माझो सतोपो ते, ३ मेद ते शनुवर्गमा कोइ उळभेदारी सब रुशवतादिके पुरुषोने फोढी शनुनी अदरने अदर फाटफुट पडा- ववी ते, अपना एकपक्षनी सामे बीजापक्षनी तर- फेण करीने भेद पडायो ते, ४ दड पूर्वोक्त प्रणयी न माने तो छेवटे युद्धादि करी शिक्षा आपवी ते ३२२-आजकाल कोइने पण सम्यक्त्वगुण प्रगट्यो छे, तेनी कोइ पण शीव जणाय एवी कोइ परीक्षा रीति छे तेनी खानी शी रीते करी शकाय ? उ०-वीतरागपरमात्मा श्रीअरिहत जिनेश्वरदेवनु नाम साभ- ळता जे जीवने रोमाच खटा याय, तीन शोकाव- स्थामा पण जेमनु गुण स्वरूप साभळता, मुद्रा नीहा- ळता तमाम शोक दुख पीडादि मूली जइने अतरग अने बहार अत्यत हर्षोल्लास प्रगटे, ए परमात्मा उपर परिणतिनु शीघ्र परखाय एवु खास लक्षण चिह्न छे इति श्रीविचाररत्नसारग्रन्थसिद्धान्तना प्रश्न । प श्री देवचन्द्रजीकृत प्रश्न समाप्तम् ॥ श्रेय म्यात् सवत् १८७५ ना वर्षे माहसुदि २ दिने बुधवारे लि प श्रीरूपचन्द्रजीगणि तच्छिष्य रत्नचन्द्रेण श्रीम- त्खरतरगच्छे भट्टारकक्षेमशाखाया श्रीअहमदावादे घाचीनीपोल मध्ये श्रीसभवनाथप्रसादात् लिपीचके अधिकहीननामिथ्यादुष्कृतम् ॥ ग्रन्थाक २५२७ ॥ , १८० श्री देवचंद्रजीकृत छूटक प्रश्नोत्तर ग्रन्थ ॥ अथ छुटक प्रश्नोत्तर लिख्यते ॥ श्री खरतरगच्छे प प्र महाराज श्रीदेवचद्रजीने श्रावके प्रश्न कर्या तेना उत्तर दिधा ते प्रश्नोत्तर अमोए देवचद्रजी महाराजनी चोपडीमाहे दीठा ते लख्या छे राधनपुरना सधे प्रश्न पूज्यु जे श्रापक सूत्र वाचे अथवा न वाचे । तेहनो उत्तर-आगम रीते जे छे ते लिखीए छीए,जे सूत्र नदीसुनमन्ये जेटलाना नाम छे तथा ठाणगे पण सूत्र ४ ना नाम छे ए सूत्रमध्ये श्री ४५ योगनी विधि श्री अनुयोगद्वारचूर्णिमध्ये छे तेहथी पीछज्यो तथा अनुयोगद्वारसून मध्ये सून भणवानी विधिना बोल छे ते चूणांमध्ये ए अधिकार छे तथा योगवही सून भणवा ए परमार्ग छे श्रीउत्तराध्ययन मुत्रे कयो छे ॥ गाथा ॥ सबगुरूकुलेनिचे, जोगवहउवहाणव । पीयकरे पीयवाई, चेसिक लडुमरिहइ ॥१॥ इहा योगवत उपधानवत ते शीखवा योग्य छे तथा श्रीठाणागे" तिहिंठाणेहिंसपन्नेअणगारे अणाइय अणवदग्गदी- हमद चाउरतससारकतारविइवएज्झा त अणिदाणयाए, दिठिसपन्न- याए, जोगवाहियाए " इहा जोग वहेबाना अक्षर के केइक दुर्मतिजीव इहा योगशब्दे मनवचनकायाना योग कहे तेने कहीए जे मनवचनकाया विना सजी जीव कोण छेतो योगवाही ए पद किम उपजे ? तथा शुभयोगपणे ते शुभपद १ - ९३४ भी देवघद्रजीत एटफ प्रश्नोत्तर. तो सूरमव्ये दीसतो नयी तथा टाणागवत्रमे दशमेटाणागे कमु छे "दसहि टाणेहिं जीना आगमेसिभदत्ताएकम्म पगरेति त अनिदाणयाए, दिठीसपनयाए, योगाहीययाए, सतीखमणपाए, जीइदियाए, अमाइल्लयाए, अपासत्यपाए, सुसामनपाए, पवयण- वडल्लयाए, पवयणउज्झारणयाए तथा उत्तराव्ययने पण कप छे नीयावत्तीअचवले, अमाइ अकुतूहले। विणीय विणएदते, जोगवं उवहाणव ॥ १॥ इत्यादि, वचन अनेक छे रत्तीसयोगसग्रहमव्ये पिण- सून भणवानो मतोरय कल्यो नयी तथा सर्व सूत्रे प्रावक लट्ठा कह्या छे, पण आचारागादिकसूनना, पारगामी निहाइ कह्या नयी तथा उत्तराध्ययने १३ मा अध्ययनमाहे गाथा छे जे॥ महत्थरूवा वयणप्पभूआ, गाहाणुगीयानरसघमजे। ज भिकुणो सीलयुगोवरेया,इहज्जयतेतमणोमिज़ाओ ए गाथामे करो. एहवी गुणवत, गाथा वे मिक्षु भणे. ते माटे दु पिण श्रमण ययो इहा पण सूत्र भणवाना अधिकारी मुनि दीसे छे, तथा सुगडागे १४ मा अध्ययने कह्यो छे गथ विहाय इहसिखमाणा, उठायसुबभचेरे वसिजा। उवयुकाराविणुग्रसिरके, जे छोएवि पमायनकुजा ॥१॥ ए गाथाइ पण अथ छे ते मुनि योग्य छे इम छे, दम अनेक सूत्रे पाठ छे, तथा समवायाग सूत्रे” सेणअगढ़ायाएपढ़ो २ श्री देवचदजीकृत छटक प्रश्नोत्तर ९३५ अगेदोसुअवधापणवीस अज्झयणापचासी उदेसणकाला, पचासी- समुदेसणकाला," इम सर्व आगमनाउद्देशासनाकालग्रहण कह्या छे ते पिण कालग्रहण ते जोगवह्ये थाय ते माटे योग वह्या 'विना सून भण्या नयी कह्या इम नदी तथा मगवतीसूत्र 'मध्ये पाठ छे 'तथा व्यवहारसूत्रे सर्व आगमनना भणवानो पर्याय कह्यो छे दीक्षाथी वीस 'वरस पर्याय, सर्व आगम भणे तथा 'निशीथ मुत्रमाहे कह्यो छे" जेमिरकु अणत्थियवागारत्थिय वा वाएइय तसाइज्जइ तस्सचाउम्मासीयपरिहारठाण " इहा जे गृहस्थने वाचनादे अथवा ग्रहस्थने वाचता अनुमोदन करे तेहने च्यार भासनो पाल्योचारिन जाय इत्यादि प्रगटाक्षर 'छे ते माटे गृहस्थने सूत्र भणवो वाचवो नही तथा प्रश्नव्याकरण सूत्रे कह्यो छे" त सब भगव तित्थगरसुभासिअ दसविह चउदसपुत्वेह पाढुडत्यपवेदिअ महरिसीणसमप्पदिन देविदनारदाणमासीअत्य" इहा पण सावुने भूत्र दीवो, अर्थे देविंदनरिंदने दीधो तथा कोइ कहेसे जे सुबुद्धीमनीये च्यार महाव्रतरूपधर्म कंधो ते माटे अम्हे कहु छु तेतो सुबुद्धीमनीये वातरूप उपदेस कह्यो, पण अंगादिक वाच्या नथी ज्ञातासूने सुबुद्धीमत्रीने अधि- कारे दीक्षा लीवा पछे आचारागादि भण्या, जो गृहस्थपणे आचारादि भण्या होत तो दीक्षा लीधा पछे स्याने भणे ते "विचारज्यो तथा बली कोइक कहेस्ये जे आवक मुंअपरिग्ग- 'हिआ, कंद्या छ तेतो फक्त शब्दे आवश्यकादिक तथा अर्थ- नोधारणतेपिणश्रुत छे ते माटे 'सुअपरिग्गहिआ कह्या"छे शुभज्ञानी समकिती देशविरतीने कहा छ, आचारागादि सूत्र "नी ना छे तथा ठाणगे तो" अवायणिज्जापन्नत्ता तजहा अवि- जीए, विगयपंडिबद्धे असिआ पाहुडे, विगयवडिबद्धेनो अर्थ ३ ९३४ ओ देवघद्रीत एटक प्रश्नोत्तर तो सूतमध्ये दीसतो नयी तया टाणागमत्रमे दशमेटाणागे का छे."दसहि टाणेहिं जीवा आगमेसिभदताएकम्म परेंतित अनिदाणयाण, दिठीसपनपाए, योगमाहीययाए, सतीखमणयार, जीइदियाए, अमाइलपाए, अपासत्यपाए, मुसामनपाए, पवरण- वउल्लयाए, परयणउज्झापणयाए तथा उत्तराव्ययने पण कम छे नीयावत्तीअचवले, अमाइ अकुतूहले। विणीय विणएदते, जोगवं उवहाणव ॥१॥ इत्यादि, वचन अनेक छे बत्तीसयोगसग्रहमत्ये पिण- सून भणवानो, मनोरथ कट्यो नयी तथा सर्व सूत्रे श्रावक लहा कया छे, पण आचारगादिकसूचना, पारगामी किहाइ कया नयी तथा उत्तराध्ययने १३ मा अध्ययनमाहे. गाथा छे जे॥ महत्थरूवा वयणप्पभूआ, गाहाणुगीयानरसघमजे। ज भिकुणो सीलगुणोववेया,इहजयतेतमणोमिज़ाओ ए, गाथामे, कयो, एहवी गुणवत, गाथा वे मिक्षु भणे. ते माटे हु पिण श्रमण थयो इहा पण सूत्र भणवाना अधिकारी मुनि दीसे छे, तथा सुगडागे १४ मा अध्ययन कह्यो छे गथ विहाय इहसिखमाणा, उठायसुवभचेरे वसिजा। उवयकासविणुयसिरके, जे, छेएवि पमायनकुजा ॥१॥ ए गाथाइ पण ग्रय छे ते मुनि योग्य छे इस छे. इस अनेक मुझे पाठ छे तथा समवायाग सूत्र” सेणअगढ़ायाएपढ़ने २ ९३५ श्री देवचद्रजीकृत छूटक प्रश्नोत्तर अगेदोसुअवधापणवीस अज्झायणापचासी उदेसणकाला, पचासी- समुदेसणकाला," इम स आगमनाउद्देशासनाकालग्रहण कह्या 'छे ते पिण कालग्रहण ते जोगवह्ये थाय ते माटे योग वह्या 'विना सूत्र भण्या नयी कह्या इम नदी तथा भगवतीमून मध्ये पाठ छे 'तया व्यवहारसुने सर्व आगमनना भणवानो पर्याय को छे दीक्षायी वीस वरस पर्याय, सर्व आगम भणे तथा 'निशीथ सुबमाहे कह्यो छे" जेमिरकु अणत्थियवागारत्थिय वा वाएइय तसाइज्जइ तेस्सचाउम्मासीयपरिहारठाण" इहा जे गृहस्थने वाचनादे अथवा ग्रहस्थने वाचता अनुमोदन करे वेहने च्यार मासनो पाल्योचारिन जाय इत्यादि प्रगटाक्षर छे ते माटे गृहस्थने सून भणवो वाचवो नहीं तया प्रश्नव्याकरण सूत्रे कह्यो छे" त सब भगव तित्यगरसुभासिअ दसविह चउदसँपुवेह 'पाडत्यपैवेदिअ महारिसीणसमप्पदिन देविदनरिंदाणमासीअत्य" इहा पण साधुने मूत्र दीगो, अयें देविंदनरिंद्रने दीधो तथा कोइ कहेसे जे सुबुद्धीमवीये च्यार महाव्रतरूपधर्म कहो ते माटे अम्हे कहु छु तेतो सुबुद्धीमत्रीये वातरूप उपदेस कह्यो, पण अगादिक वाच्या नयी ज्ञातासूने सुबुद्धीमत्रीने अधि- कारे 'दीक्षा लीधा पछे आचारागादि भेण्या, जी गृहस्थपणे आचारादि भण्या हीत तो दीक्षा लीधा पछे स्याने भणे? ते 'विचारज्यो तथा वली कोइक कहेस्ये जे श्रावक सुंअपरिग्ग- 'हिआ, कंद्या छ तेतो फक्त शब्दे आवश्यकादिक तथा अर्थ- नोधारणतैपिण श्रुत छे ते माटे 'सुअपरिग्गहिंआ कह्या छ शुभज्ञानी समकिती देशविरतीने कहा छ, आचारागादि सत्र "नी ना'छे तथा ठाणगे तो" अवायणिज्जापिन्नत्ता'तजहा अवि- गीए, विनयपंडिबद्धे अंबुसिआ पाहुडे, विगयवडिबद्धेनो अर्थ ९३४ श्री देवघद्रजीत एटक प्रश्नोत्तर तो सूपमध्ये दीसतो नयी तया टाणागप्रमे दशमेटाणागे का छे “दसहिं टाणेहि जीपा आगमेसिभदत्ताएकम्म पगरेति त अनिदाणयाए, दिठीसपनयाए, योगमाहीययाए, खतीसमणपाए, जीइदियाए, अमाइल्लयाए, अपासत्ययाए, मुसामनयाए, पवयण- वउल्लयाए, पवयणउज्झावणयाए तथा उत्तराव्ययने पण कप छे नीयावत्तीअचवले, अमाइ अकुतूहले। विणीय विणएदते, जोगवं उवहाणव ॥१॥ इत्यादि, वचन अनेक छे पत्तीसयोगसग्रहमव्ये पिण- सून भणवानो मतोरथ कट्यो नयी तथा सर्व सूत्रे श्रावक लट्ठा कमा छ, पण आचारागादिकसूनना, पारग्रामी. किडाइ कह्या नयी तथा उत्तराध्ययने १३ मा अध्ययनमाहे गाथा छे जे॥ महत्थरूवा वयणप्पभूआ, गाहाणुगीयानरसघमजे। ज भिकुणो सीलगुणोववेवा,इहज्जयतेतमणोमिजाओ ए गाथामे कह्यो एहवी. गुणावत, गाथा वे मिक्षु भणे. ते माटे हु पिण श्रमण थयो इहा पण सूत्र भणवाना अधिकारी मुनि दीसे छे, तथा सुगडागे १४ मा अध्ययन कह्यो छे गथ विहाय इहसिखुमाणा, उठायसुबभचेरे-वसिज्जा। उवयकाराविणुयसिरके, जे छएवि पमायनकुज्जा ॥१॥ ए गाथाइ पण, ग्रथ छे ते मुनि योग्य छे इम छे. इम अनेक सूत्रे पाठ के. तथा समवायाग सूत्रे" सेणअगढ़ायाएपढने २ श्री देवचन्द्रजीकृत छ्टक प्रश्नोत्तर - साधुने पिण उपदेश देवानी प्रपाहरीति नथी, तो गृहस्थलिंगे उपदेश करे ते किम पाल्वे ? घणु स्यु लखीइ ? आगमगीरमुखे मिल्या अनेकअर्थ कहेवाये इम पीछज्यो तथा कडकमती कहेछ जे पोरसीप्रमुखपञ्चक्खाणे जो पहोरथी वधतो काल याय तो दोष छे तेहनो उत्तर जे पञ्चस्खागनी शुद्धि ६कही तिहा तीरीयसमदायकाल ए पाठ आवश्यकनियुक्ति- प्रवचनसारोद्वार परवखाणभाष्यने विपे छ वली भगवती टीका- भव्येखदाधिकारे तीरइतिप्रणेपि भवो स्तोककालावस्पानातए पाठ छे तथा कडकगच्छना चउसठ अठम तपने अधिकारे आगल पाउल बे एकासमा करे तेवारे चउत्थादिक तप याय ते माटे अनेक कुयुक्ति करे छे वेहनो उत्तर श्रीभगवती टीकामध्ये खदाधिकारे चउत्थचउत्येण विचतुर्थभक्तयावद्भक्तत्यज्यते याच- तुर्थमियचोपवासस्यसजाएव पष्ठादिकमुपवासद्यादेरिति तथा केइक सडासा पूजवो मानता नयी तिहा श्रीभगव- तीसून टीकामध्ये एवनिसीइयवति निपितव्य उपवेष्टव्य सदसक- मिप्रमार्जनादिन्यायेनेत्यर्थ तथा श्रीनवानगरना सघे मह० अमरचदशेठ जादवजी सा मदन मह० रायचद भ० डोसा मह० मीम मह० माहवीजे प्रमुखे नवानगरथी यूछाव्या तेहनो आगमशाखें उत्तर लीखीइ छे. प्रश्न पुब्यु जे देवता शय्यामे उपजे ते देवतानो मूलगो शरीर शय्यामे रहे केनरहे? तेहनो उत्तर जे देवता शय्यामे उपन्या पछी रहे नहीं देवता देवलोक मध्ये जे कार्य करे ते मूलगे रूपे करे छे तिहा श्रीरायपश्रेणिमूने का छे" तयाणसेसुरीयाभेदेवे वेर्सि सरिसविव- 118 श्री देवपटनीमत 2 प्रश्नोत्तर -- टाणगे टीसमे उपपानतप पिना गियप्रतिव ते अवाध नीक छे ते माटे योग उपपानानने मन भणया कह्या छे तथा कोइक कहेरये ले यतिलिंगे योगरमा विना मूत्र वाचे छे ते किम नाचे छे ? तेहनो उतर जे योगवद्या विना जे सूर गावे तेहने अरिहत आणानी निराधनाछे जो पोताने उदो करे तेने कोण कहे ? पण जो पोताने तथा ओताने लाभना अर्थ होय ते तो आज्ञा प्रमाणे ते श्रीअनुयोगद्वार टीकाएजे अपिधिरी मून वाचेते पोते ज्ञानावरणीयकर्म चीकणो करे छे, अने जे साभले छे ते दर्शनावरणीय कर्म चीकणो करे छे तथा साठिसो प्रकरणे करो उस्सुत्तभासगाण, वोहीनासोअणतससारो। पाणचएवि धीरा, उस्सुत्त त न भासति ॥ १॥ इमजाणी उत्सून न बोलबो तथा जीतव्यवहारेसर्वनेयोग- वहीनेज सिद्धात भणवा एहनी हुडी तथा हीरप्रश्न तथा विधि- प्रपाप्रमुख अनेकयथे अधिकार छे इहा कोइकधन्नोअणगार वेरस्वामीप्रमुखनो दृष्टात देइने कुयुक्ति करे ते पोताना आ- त्माने अहित करे छे वनोअणगारप्रमुखआगम व्यवहारे छे तेहने जीतनो निर्धार नही, पण हवणा तो जीतनो व्यवहार छे ते माटे योगवही सिद्धात वाचे तेपिण नयप्रमाणसप्तभगी निक्षेपातथाद्रव्यभावतथा निमित्तउपादान उत्सर्ग अपवादनाजाण हुवे ते प्रश्नव्याकरणमे बोल कह्या तेहनो जाण हवे ए सि- दातनो उपदेश करे ए मार्ग के मुख्यपणे अर्थना कथक आचार्य, सूत्रना दायक उपाध्याय गुणवतने आज्ञा छे जीजा श्री देवचद्रजीकृत छूटक प्रश्नोत्तर ९३९ प्रगट छे तेपण तुम्हे जोज्यो तथा विचरता तीर्थकरने फूले पजे एहमे शका आणे तेहनी बुद्धिनो दोष छे, उवबाइमध्ये अप्पेगरयापृयणवत्तीया ए वचन छे ते ए पदनी टीका पूजनपुष्प- मालादिना ए अर्थ कह्यो छे, अभयदेवसू रिकृत टीकामध्ये पाठ M दीसे छे तीर्थकरसचित्तने अडके नहीं इम कहे तेपण समझता नयी केवलीना पगयी तीतरना पचा कुकडाना बचा पारेवाना बचा मरे तोपण सपरायफीकिरिया न लागे ए पाठ भगवतीसूत्र- मध्ये प्रगट छे ते जोजो तो भक्तो फूल चढावे तेमध्ये स्यो दोप छ । तथा बुचे पाणी पीता अरधो पाणी कलसीयामे रहे ए मध्ये समूर्छिम उपजवानो तत दीसतो नयी पनवणा टीकाने आसयैइम जणाय छे पिण ए चालकरखो नहीजी तथा राते तो अपकायजीवनी तमसकाययी वृष्टि थाय छे ते अगासे थाए एतो निरधार दीसे छे अने ते वृष्टि में बीजा जीव तो जाण्या नथी अने किहाइक ग्रथे अन्यजाति मध्ये उपजता पण कह्या छे योगशास्त्र टीकामे ए चरचा लिखी छे, ते माटे उपजता पिण जणाय छे, शीतस्पर्शने योगे रसीया उपजवानी हा दीसेतो छ पिण घणेकाल गये योनिपलटे उपजे परभाते रविकिरण उवडे ते हणाय छे ए जाणवो पिण आगमरीते तमसकायिया ठरे छे तथा आहारकशरीर करे प्रदेशवीछेभागे जे दिशे केव- लीने निर्धार ते दिशे नीकले छ, दसमाद्वारनो काइ प्रयोजन नयी किहाइ पाठ पण नयी अने मुख्यपणे हृदय प्रमुख आगला ७ ९३८ श्री देवचन्द्रनीत छटक प्रश्नोत्तर. गाणदेवाण अतीयेण्यमटसोधा निसम्महतुटेजान सणि भाउ अ. म्भुठेइ अम्भुठियत्ता उपायसभाए पुरिधिमिळेण दारेण नि- ग्गछेइ जेणेपदारे तेणेवयागच्छति हरपअणुप्पदाहिणीरमाणे पुरिखिमिलेण तोरणेण अणुप्परिसति" इत्यादि पाठे नवविक्रिय कर्या विना सर्व पाठ छे ते माटे शय्यामध्ये कोइ देवनानो शरीर न रहे तो शय्या खाली रहे छे, ए पाठ जीरामिगम मध्ये विजयदेवाधिकारे छे तथा भगवतीम चमरोत्पातअधिकारे सौधमेंद्रे वज्र मुक्या पठी श्रीवीरनिआसातना जाणी तेवारे वज्रने ठेवा माटे उत्तरवैक्रिय अणकरे पडतो मुक्यो इहा पण उत्तरवेकियनो पाठ नयी तेमाटे देवलोकमध्ये मुलगेरूपेज प्रवर्ते पण उत्पात शय्यामध्ये मूलगोरूप रहे ए पाठ कीहाइ नथी तथा बीजे प्रश्नेसगमाने देवलोकी मूलगेशरीरे काढियो छे जेसगमानी देवागनाए इद्र आगल विनती करी जे अम्हने सी आज्ञा छे तेवारे इदे कद्य जे तुम्हे मेरु जाबो अने वली पाछा उहा सुखे आवज्यो पिण सगमाने देवलोकमध्ये आण- स्योमा इणेकरी जाणीये छ जे ते मूलगो' शरीर तिहा रह्यो हवे तो देवागनाने स्याने जावो पडे तेमाटे मूलगा शरीरे काढ्यो छे ए कल्पकिरणावलिमध्ये अधिकारछे तथा केवलीसमुद्घात जे केवलीने छ मासनो शेष आउखो हवे ए अबसरे केवलज्ञान उपजे ते नियमा समुद्घात नियमा करे तेहथी अधिक आउखा वाला केवलीने समुद्घातनी भजना छे करे अथवा न करे ए अधिकारपन्नवणा टीका तथा गुण- स्थानकमारोह टीका मध्ये छे ॥३॥ तथा पुष्प परोवानो पाठ पचासकमध्ये तथा हीरप्रश्न मध्ये श्री देवचन्द्रजीकृत छुटक प्रश्नोत्तर ९४१ तथा साधुजीने चोथे कर्मयथ मध्ये भगवती २५ मे शतके लेश्या छ दीसे छे ते माटे तेजससमुद्घाते परने बालबाने तेजो लेश्या मूके ते काले कृष्णलेश्या पण हवे बीजी पिण हवे जा सीम शासनकामे करे ता सीम प्रशस्त लेश्या हवे पछी परिणाम पलटे अप्रशस्तपणे परिणमे तो अप्रशस्त लेश्या पिण हवे इम बाखोजी ए प्रश्ननी शाखतो पुस्तकयी जोइ लेजो नवानगरना श्रावक भणसाली डोसाए प्रश्न पूच्या तेना उत्तर लख्या छे-समवसरणमध्ये फूलनी वृष्टि थाय छे ते उपर साधुजी किम चाले छे तेहनो उत्तर तदुलवेयाली पयन्नानी टीका मध्ये लिख्या छे ते कोइक आचार्य कहे छे जेविचे मारग रहे छे जिम वाडी मध्ये जेम क्यारी करे छे तिम मारग रहे छे पिण ए उत्तर पचागीने लेखे ठहरतो नयी ते वली एहज टीका मध्ये कयो छे जे फूलतो सर्वन व्यापीने वृष्टि करी छे ते उपर साधु चाले छे तिहा ते टीका मध्ये पूज्यु छे जे फूलने किलामना उपजे के न उपजे ? तिहा इम उत्तर छे, जे कोइक समवसरणे देवना विकुा फल करे से तो अचित्त छे अने समवायागने पाठे सचित्त फूल छे पण देवताने सामर्थे वेदना थाती नथी तथा कदापि थाय तो पण साधुजीने प्राणातिपातकी क्रिया न लागे तथा जिन- भक्ते हिंसानो बध न थाय इम जाणवो, गुरु साहमा सून सुण्याना फल उत्तराध्ययनमध्ये कह्यो छे ते श्रीअरिहत विचरता ते गुरुतत्त्वमध्ये छे उपदेशक माटे तथा वली पूज्यो जे समवसरण उपाडे तेबारे फूलनो किम पाय छे १ तेहनो उत्तर जे फूल सचित्त छे वेतो कमलाय एटले देवता विखेरी ९ ९४० श्री देवचन्द्रजीकृत स्टक प्रश्नोत्तर vie - प्रदेशयी निकले छे इम अधिकार छे ए अधिकार चरितानुवाद मध्ये छे अने कर्मग्रथना आशययी पिण इम जणाय छे तथा महीयपुइए ए पाटनो अर्थ नदीटीकामे नयी ते नदीटीका तो अम्ह पासे नयी पण अनुयोगद्वार जावश्यक वृतिमध्ये ए पाटना अर्थ कला छे तेहया जाण्या छे नदी टीका मध्ये वीजो कोइ अर्थ लीरयो नयी सुगम माटे स्युलीसे ए रीते वारज्यो तथा अष्टापदना चैत्यनो तथा नि भरान्यानो अधिकार आवश्यकनियुक्तिमध्ये तथा पावीसहजारीमध्ये छे तथा भगवती टीकामध्ये विरपरचीयो सिगोयमा ए आलावामें अधिकार छे तथा चावर्तिने कोइकने मिथ्यात्वगुणटाणो छे अने भरतादिक जीगोने चोथो वली परिणाम वधे तो मुनिपणो सातमो तथा छठो गुणटाणो थाय पण पाचमो फरसे नहीं ए अधिकार पदवीना लाभना अधिकार पन्नवणाटीकाप्रमुखे ते वली अवसरे सभाखुजी पलाल्याधानमध्ये अनताजीव उपजे ते ए प्रत्येक छे तेम मध्ये साधारण किम उपजे तथा" सम्बोकिसलयखल उगवमाणोअ- णत उ भणीओ" इहा पहिला अनतकाय छे ते मध्ये पछी प्रत्येक उपजे इम पिण छे तेहनो उत्तर जे मनुषणीना शरीरे योनि मध्ये असख्यातासमूर्छिमनीयोनिचलू छे पिण अवसरे गर्भज जीव पण उपजे छे ते माटे अन्यनी, योनिपणो थाय छे सुगडागसूत्रे पृथवीप्रमुख स्थावरमध्ये अपप्रमुखस्थावर तथा समूर्छिमनी योनि कही छेजी -- श्री देवचन्द्रजीकृत छूटक प्रश्नोत्तर ९४३ इहा सख्यानो नियम कयो छे पण भव्य अभव्य नियम नयी ते माटे पचागीनी रीते इम जणाय छे पछी तो श्री केवलीना जाण्यामे हुवे ते प्रमाण छेजी तया समवसरण मध्ये फूल्नी वृष्टि थाय छे ते सचित्तफलनी छे श्री यशोविजय उपाध्यायी प्रतिमाशतकमध्ये पण ए घणो चच्यों छेजी इम सदहवो जे कारणे प्रशस्तमार्ग जे करे ते मध्ये आ स्रव नथी ए भूवनी परिपाटी ठेजी कोइक प्रगटाक्षरमार्ग तो उत्तराव्ययन मूने मृगी पुनाध्ययने को ले अपसत्थेहिदारेहि, सवओपिहीयासवो । अजप्पज्झाणजोगेहि, पसत्यदमसासणो॥१॥ इत्यादिक अनेकआचारादिसूने घणा पाठ छे ते जोड़ लेजो तथा प ज्ञानकुसल्नो प्रश्न जे सूत्रे द्रव्य छ कया छे तथा विशेषावश्यक मध्ये पाचज द्रव्य कथाछे तेहनो स्वरूप लिखीये छ जे वस्तुगते विचारता हालनो वस्तुपणो पिंडरूप द्रव्यपणो नथी ते माटे आस्तिकायपणो नयी अस्तिकायपणो बहुप्रदेश मिले बहुपरमाणु मिले थाये ते कालने नथी को- इक कालना रेणु असरन्याता माने छे लोकाकाशप्रदेशप्रमाण माने छे पिण ए वात प्रमाण नथी जे रेणुआमान्या अ- स्तिकायपणो थाय कदापि रेणुआने मिन्नद्रव्य मानीये तो का- लद्रव्य असख्याता याये अने सूने कालद्रव्य अनतो मान्यो ते माटे रेणुआनो मानवो तो सभवे नहीं तथा सूत्र परपाटीय श्रीजीवामिगमसूते पण इम दिसे " जे किम- यभतेकालोत्तिबुच्चइ गोयमा जीवाचेव अजीवाचेव" एटले जीव

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९४२ श्री देवचद्रनील घटक मनोत्तर
नाखे छे, जने मभु पिहार पीपण निरोरी नासे छे तपा
फल समोसरणमाहे सचित्तनी मुग्पताछे इम जाणजोजी तथा
तीजे प्रश्न पूज्यो जे प्रभुनी मानाए सरोपर दीटो ते किवा
छे ते कल्पनी टीकामव्ये तथा जदीयफ्नतिनी अपेक्षाये तो
चुल्हेमरत उपर पद्मदहते जणाय छेजी. जेम कमलप्रमाण
ए रीतनो सर्व वर्णयो छेजी. तया प्राचमे प्रमे जे व्यवहार
रासी मध्ये जेटला जीप मोक्ष जाय तेटला अन्यवहारीनिगो-
दमायी नीकले ए पाठ छे तेहना उत्तर माटे लिखाये छे जे
अव्यवहारीनिगोदमध्ये पिण भन्य तथा अभव्य वे जीव छे
व्यवहारराशिमव्ये पिण भव्य अभव्य वे जातिना जीव छे
ते मध्ये भुवनभानुफेवली चरिने भवभारनीटीका तथा उपमि-
तिभव प्रपचामव्ये अनादिनिगोदयी अभव्य नीकली व्यवहार-
राशिमध्ये आवे छे ए प्रगट अक्षर छे ते माटे इहा
पूउस्ये जे भव्यजीव तो व्यवहारराशिमायी अवसरे मोक्ष
जाय छे तिणे वधे नहीं पिण अभव्य जे व्यवहारीया थया
ते तो व्यवहा 'शिमध्ये छता पामीये तेहनो उत्तर जे घणो
काल तो भा समाले छे अने कोइक वेला १० जीव मोक्ष
जाय तेवारे धानमध्येशनिगोदयी १० जीव नीकले ९' भव्य
१ अभव्य ण किम निकले छे केइक कहस्ये जे ए रीते
करता व्यव ओशशि वधती जणाय छे तेहनो उत्तर जे मूल
तो इम वधे नही कदापि कोइ कला उपजे तो पिण अल्प
माटे गिण्या नथी तथा ॥
सिज्जतिजित्तीयाकिर, गुणयोगेणविवहाररासोओ।
एइतितित्तियाकिर, अणाइनिगोयरासीओ ॥१॥

श्री देवचद्रजीकृत छुटक प्रश्नोत्तर ९४५ इम पाठ छे पण मूलद्रव्यानुयोगमध्ये नजर देता तथा जीवामिगम अनुयोगद्वारसूत्र तया पनवणा भगवतीना अल्प बहुत्व विचारता कालद्रव्य जूदो नयी पचास्तिकायनी वर्तना छे, तिहा कोइ पूछस्ये जे जेवारे पचास्तिकायनीवर्तनाने काल मा- नीये तेबारे काल्ने एकलो अरूपीपणोटहरे नहि जे पुद्गलास्ति- कायनी वर्तना रूपी जोईये, तेहनो उत्तर जे पुद्गलनी वर्तना मुख्यपणे रूपी सभवे पिण वर्तना ते पिंड नही वर्णादिक तथा अगुरुलधुनो पलटण उत्पादव्ययरूप छे ते व्यक्तअवस्था याये नही तेमाटे अरूपीज बहु यतिये गिण्यो तथा कोइक पूछस्ये जे काल जेवारे जीवनी बर्त्तना गवेपीये तेवारे कालने चेतनपणो आवस्ये तेने कहे छे जे जेवारे पर्यास्तिकनयनी मेद व्याख्या करे तेबारे चारित्रादिक गुणमध्ये ज्ञानगुणनी नास्ति कहीइ जे सर्वगुणस्वरूपे अस्ति छे पररूपे नास्ति छे तो वर्त्तनापर्या- यने चेतनपणो किम कहेवाये १ तेमाटे कालद्रव्यने पिण अचे- तनज कयो, इम कालने उपचारे निक्षेपा द्रव्यादिक च्यार गुण पर्याय सर्व कहेवा, पिण मूलव्याख्याये काल ते पचास्तिकायनी वर्त्तना छे सूत्र तथा नियुक्ति तथा भाष्यकार सर्व गीतार्थ तथा गणवर सर्वनी एहिज व्याख्या छेजी, तथा पुछे जे द्रव्य 3 छे के पाच छ१ ते जीवामिगमसूने तो द्रव्य पाच कडा छे अने भगवतीप्रमुखमध्ये द्रव्य ६ कया छे, पिण सूत्रना वचन विरोधी हुवेज नही तेहनो परमार्थ वारखो पण जिहा उत्तराव्ययन भगवती तथा टीकाप्रमुख सर्वत्र जिहा ६ द्रव्य एहवो पाठ तिहा नियमापचास्तिकायनी वर्तना तेहने उपचारे मिन्न व्याख्याये मिन्न द्रव्य करो ते सर्वन उपचार जाणज्यो तथा कोइक कहेस्ये जे एहनी साख किहा छ तेहने कहीये 119 ९४४ श्री देवानीकन पटक प्रभातर. अजीपनी वर्तनालराण काइक पयाय पर्तना ते काल जाणको ए सून वचन ले तया उत्तराध्ययो २८ असपने। अननाणिय दवाणिकालो पुग्गलजनमो" ए पाठ ए पाठे कालद्रय अ- नता का ते जीवजनीवद्रव्य जनतानी जुदी जुदी वर्तना तेहने काल्य मानीने अनतद्रव्य कमाते माटे काल- दत्य उटो बस्तुगते जूदो नयी अने पर्याय ते वस्तुनो आरोप करीये तो एहने द्रव्यपणे कहीये जिम बद्धन्य ते घट के ते पुद्गल्नो नच ले ते विभाग पर्याय ते पिण उपचारे द्रव्य कहीइ छ तिम ए पिण जाणयो तथा कोइ पूछे जे काल ए उतो छ के अउतो ? उत्तर-जे कालवर्तनारूप पर्याय पचास्तिकायमध्ये छतो छ, पण पचास्तिकायी मिन्न नधी ते माटे इम कहेवो अने जे भगवतीमूने उठो कालद्रव्य छे ते अढीद्वीपप्रमाण ज्योतिश्चकने वारे जे व्यवहारकाल तेहने कालपणे मानीने ए वचन कयो छे ते माटे व्यवहारनये छ कहीजे, निश्चयनये तो पचास्तिकाय के तथा तत्वार्थटीका मध्ये का छे जे द्रव्यास्तिकायनयन गवेपीये तो पर्यायास्तिकायने द्रव्य मानीये तेवारे कालद्रव्य कहीये, तेमाटे ए श्रद्धा राखवी तथा सिद्धातना आलावा तथा द्रव्यानुयोगनीपरिणति सर्व इम ठरे छे तथा धर्मसग्रहणीमध्ये बे मत कया छे तत्वार्थकारे पिण" सोऽनतसमय” ए सूत्रसद्दहवो ते काल छ द्रव्य अनतसमय रूप छे इम कह्यो तथा श्री हेमाचार्य पिण कालना रेणुक कह्या ते पाठ जो जो ॥ लोकागप्रदेशस्याभिन्ना कालाणवस्तुयेभावानां । परिवर्त्तापिमुख्य. कालसउच्यते ॥१॥ (१) ९४७ श्री देवचदजीकृत उटक प्रश्नोत्तर " अतुस्वभावादि बोल्या ए सर्व व्यवहारनय तथा आदित्यादिगति परिछित्तिरूप वाराकाल लेइने बोल्या छे, वे परमार्थे नथी ते श्रीभगवतीसूते प्रश्न छे जे केटलीक वनस्पति उष्णकाले फले ते स्वामि कीम छे? तेवारे श्रीवीतराग कहे छे ए जीवने उम्ण फरसी पुद्गल्नो आहार घणो लेवराय छे तेमाटे उनाले फले छे तिहा जीवनो उदीतकर्मकारण छे, पिण एकात कालनी मुस्यता नथी वली काल अपरिणामी अकाद्रव्य के ते स्याने परमव्ये परिणमे स्याने परकार्य करे, तेमाटे वृक्षादिकनो जीव पुद्गलद्रव्य छे तेमाटे ते फलजीव पुद्गल मध्ये एहनी वर्त्तना मान्याज सर्व समो पडे, पिण मिन्नद्रव्य मान्या कोइ समो पडे नही, वली कोइक पूछस्ये जे वर्मास्तिकायपण अप- रिणामी अक्रिय अकाव्य छे ते किम चलणसहायी थाय छ ? तेहनो उत्तर जे गति परिणामी जीवद्रव्य तथा पुद्गल द्रव्यने सहायी थाय छे पिण ते वास्तिकायरूप छे अने काल ते अस्तिकाय नयी तथा भावप्रकरणे "कालोऽतिकलन काल एवं द्विधा वर्तना लक्षण १ समयावलिकादिलक्षणश्च अतस्त- अवर्ततेभवति भावास्तेनतेन रूपेण तान् प्रतियोजकत्व वर्तना सा लक्षणलिंगऽस्येतिवर्तना लक्षण अय समस्तद्रव्यक्षेत्रभावव्या- पीति" १ एहनो अर्थ जेवते थाये ते रूपे प्रतियोगी सहका- रीपणे ते वर्तना कहीये, ते वर्तमानज छे लक्षण जेहनो ते वर्तनालक्षण काल कहीये द्रव्य वर्मादिक क्षेत्र सर्वना प्रदेश- भाव सर्व द्रव्यना गुणपर्याय ते मध्ये व्यापकपणे छे एटले पचास्तिकायनी वर्तना तेहज निश्चयकाल कयो, ए मध्ये जूदा कालद्रव्यनी ना यई बीजो समयावलिकालक्षण ते व्यवहार- काल जाणज्यो ते समय वर्तमान एक उतो मिन्नद्रव्य मानीये ९४६ श्री देवचन्दनीपत एक प्रश्नोतर. HAPAN ---inds जे जीनामिगम तथा महाभाग्ययी पपती सास कोनी मागो हो ? वली उग्ये जे पटले टेागे ६ दर मा छे तो पाच किम मनाय ? तेहने महीये जे जीवामिगम तथा भाग्य- कारे ते ए अक्षर सर्व जाण्या हता तेहयी अजाण्या नहीं अनयोगदारे अनादिसिद्ध क्या ते पण ए उपयोगेज कट्या छे, तथा च्यायफभाने काल्नो नियम दो क्यो छेवैमाटे दय जूटो वाच्यमा सभो घटे छे, तेहने उत्तर सपरतत्वे- वाचक नाम तो कयो छे, तेहनो पाच्यज्ञान चारिनादिक पण छे तेमाटे सपरपदार्य कयो पण सर ते जीवनी परिणति छे पण पिंडपणे जीपी सबर जूदो नहीं तथा वली कहेस्ये जे सवरने द्रव्य कयो नथी पण द्रव्ययी प्राणातिपातादिक कह्या तथा प्राणातिपातादिविरमण पण द्रव्यभाव आगम मध्ये कद्या, तेमाटे ए सर्वयी काई द्रव्य जूदो थाय नहीं तथा कोइक पूछस्ये जे ए ५ समान उटो द्रव्य कयो, तिहा उत्तर जे पचमहावत मेलो छठो रानीभोजनव्रत कयो, पिण अपेक्षाए कयो, तेमाटे रागीभोजन काइ मूलगुण महाव्रतरूप न थाये सर्व गुण, सर्व पर्याय, सर्व परिणाम, सर्वेवाच्यवाचकभाव, सयुक्त छे तेमाटे मिन्नपिडी द्रव्यपणो न पामे अने पर्यायने द्रव्य कहीये एहवे नये पिण जैन बोले, ए दीक्षा लेवा माटे का- लने छठो द्रव्य कह्यो ते रीते कहीये, यावत्मात्र अमिलाप्यभाव होवे ते वाच्यवाचकभावसयुक्तज होवे, तेमाटे द्रव्यपणो न पामे, जिम धर्मास्तिकाय अधर्मास्तिकायनो देशपणो तथा पुद्ग- लास्तिकायनो देशपणो कदापि खधथी जूदो नयी, अने अजी- वना भेद करता दो करो, तेमाटे ते रीते एपण मानज्यो प्रवचनसारोद्वारमध्ये तथा पचकारणमध्ये जे वसतादिकना श्री देवचदनीकृत छूटक प्रश्नोत्तर , अतुस्वभावादि बोल्या ए सर्व व्यवहारनय तथा आदित्यादिगति परिछित्तिरूप बाराकाल लेइने पोल्या छे, ते परमाथै नयी ते श्रीभगवतीमूने प्रश्न छ जे केटलीक वनस्पति उष्णकाले फले ते स्वामि कीम छे ? तेवारे श्रीवीतराग कहे छे ए जीवने उम्ण फरसी पुद्गल्नो आहार घणो लेबराय छे तेमाटे उनाले फले छे तिहा जीवनो उदीतकर्मकारण छे, पिण एकात कालनी मुख्यता नयी वली काल अपरिणामी अकीदत्य छे ते स्याने परमध्ये परिणमे स्याने परकार्य करे, तेमाटे वृक्षादिकनो जीव पुद्गलद्रव्य छे तेमाटे ते फलजीव पुद्गल मध्ये पहनी वर्तना मान्याज सर्व समो पडे, पिण मिन्नदव्य मान्या कोड समो पडे नहीं, वली कोइक पृउस्ये जे वर्मास्तिकायपण अप- रिणामी अक्रिय अकाद्रव्य छे ते किम चलणसहायी थाय छ ? वेहनो उत्तर जे गति परिणामी जीवद्रव्य तथा युगल द्रव्यने सहायी याय छे पिण ते बर्मास्तिकायरूप छे अने काल ते अस्तिकाय नयी तथा भाषप्रकरणे "कालोऽतिकलन काल एस द्विधा वर्तना लक्षण १ समयावलिकादिलक्षणश्च अतस्त- अवतवेभवति भावास्तेनतेन रूपेण तान् प्रतियोजकत्व वर्तना सा लक्षणलिगऽस्येतिवर्तना लक्षण अय समस्तद्रव्यक्षेनभावव्या- पीति” १ एहनो अर्थ जेवते याये ते रूपे प्रतियोगी सहका- रीपणे ते वर्तना कहीये, ते वर्तमानज छे लक्षण जेहनो वे वर्तनालक्षण काल कहीये द्रव्य वर्मादिक क्षेत्र सर्वना प्रदेश- भाव सर्व द्रव्यना गुणपर्याय ते मध्ये व्यापकपणे छे एटले पचारितकायनी वर्तना तेहज निश्चयकाल कयो, ए मध्ये जूदा कालद्रव्यनी ना यई बीजो समयावलिकालक्षण ते व्यवहार काल जाणज्यो ते समय वर्तमान एक उतो मिनद्रव्य मानीवे ९४८ श्री देवचनीकृत पटक प्रयोत्तर तोते समयनो क्षेत्र झिहा मानीये, जिहा माये तिहा एक प्रदेश मध्ये रयो जोइये मार सटोक अलोक मये उत्पादयपनी पर्तना किम पाये १ तेमाटे पचास्तिकायनी वर्तना ते फाल्ज मान्पो गये कही नाजीरणता एपण कालनोलक्षण स्थूल छे नाजीरणवर्म सानो छे अने कालनी वर्तना सर्पदय मध्ये छे ते पुदलपरमाणु तो नवजीरण यतो नया तेपार ए ग्याहारकाटनी अपेक्षाए जाणवो, तथा नवजीरणता पुद्गलपरमाणुनोपर्याय छे इम लिस्यो ते ए परमाणु तो एकटानो पर्याय छे नही, खवनो उत्पन्न पयाय छे, जिम शब्दपणो के तिम छे, अन तेहने एम के तेमाटे वर्तमान समय एक छे ते सर्व जीव पुद्गलादिकमें वर्ते छे, ते माटे कालद्रव्य अनतो कहेवाय छे, जो अणुकादिक कोइ काल मानीये तो "जीवापुग्गलसमवा" ए गाथाद्रपानुयोगनाअल्प- बहुत्वनी भगवती टीकामव्ये छे तथा पन्नवणारे “एसिणभते- तीणपुग्गलाण' इत्यादि प्रश्नसूने उत्तर कह्यो छे “सबथोवाजीवा पुग्गलाअणतगुणा अदासमया अणतगुणा सव्वदचाविसेसाहीया ए पाठ छे, तेह जीव अनता, वेहथी पुद्गल अनतगुणा, तेहथी कालसमयअनतगुणा, ते सर्वथी काल अनतगुणो, व्यवर्तना गवेखीये तोज पूखे (पालवे) जो काल मिन्नद्रव्य मानीये तो पूरवे जे कारणे जे एक आकाशप्रदेशे अनताकाल द्रव्य मानीये तो पूरखे जे कारणे जे एक आकाशप्रदेशे अनताकाल द्रव्य मानीये तो अस्तिकायपणो वई (टळी) जाये, अने एक आ- काशप्रदेशे एकएक काल द्रव्य मानीये तो असख्यातो द्रव्य थाय, पण अनतो न थाय तेवारे सूत्रनो अल्पबहुत्व किम मिले ? तेमाटे जीप तया पुद्गल वर्म अवर्म आकाशनीवर्तना मान्याज -2 - श्री देवचन्द्रजीकृत छटक प्रश्नोत्तर ९४९ - पूखे ए सूननो पण एहज आशय छे, जिहा "उदवापन्नता" इत्यादिक सून पण व्यवहारकालने उपचार मानी 3 का ए आशयसहित छे, तेमाटे एहि आशय सिद्धातकारनो छे सिद्धातवादी पण इमज कहे छे इहा जूदो पोतानी मतिना दोपे समझण विना सिद्धातवादीपणो दो माने तेहने ससार वधे, अने सिद्धातअनुयायी सिद्वातवादी श्रीजिनभद्रगणि क्ष- माश्रमणथी वधतो बीजो कोइ नथी, सिद्धातनी खरी आजा प्रमाणजीव छ तेहथी वचतो हीनो चित्तमा विकल्प करे तेहने ससार वधे इम वारज्यो, एटले आवलिकादि व्यवहार- काल ते सर्व लौकिक के परमार्थे पचास्तिकायनीवर्तनाने काल कहीये छे पण दो नथी, अने कालद्रव्य कह्यो ते उपचारे छे, तिहा वली पूछे जे उपचार वस्तुनी उती राखीने को छे के वस्तु पाचज छ ? तेहनो उत्तर जे वस्तुपणे मूलसूत्रने प्रमाण पाचज वस्तु छे छठो वस्तुपणे नर्थी, अने पचास्ति- कायमध्ये स्वकालरूप एक स्वभावपर्याय छे, तेहने काल मान्यो छे ते स्वकालरूप पर्याय ते पचास्तिकायमव्ये छतो छ तेमाटे उत्तानो उपचार छे इहा कोइ पूछस्ये जे उतो तेहने उप- चार छ किम कहीये १ तेहनो उत्तर जे, जिम छे तेहथी वधती अपस्या कहेवी ते उपचार, जे वर्तना ते पर्याय स्वभाव हतो तेहने द्रव्यपणो कहेवो ते उपचार के एटले द्रव्यपणो अछतो छे, इम पारयो, तथा अजीवना १४ भेदमध्ये तथा ५६० भेदमध्ये अठतो होवे तो किम गण्यो ? तेहनो उत्तर जे वर्मास्तिकायदेश १ अधर्मास्तिकायदेश २ ए भेद अछता छ, पण ए भेद मध्ये गण्या छे तेमाटे ए भेद सर्व वस्तुगति तथा उपचार ए वे मेलीनेज प्ररूप्या छे, पाचसेसाठ भेदमध्ये ।

९५० श्री देवघद्रजीफन स्टफ प्रश्नोत्तर . वीजा पण उपचारी भेद वणा छे, सिदातनो भाग्यकारनो आशय एफज छे, जने व्यार याद छे नया रोइ कहेस्ये जे कोइफ गीतार्य पोतानो जाशय फेणे, ते तो जे पोयानो आशय पोपे ते गीतार्य नया गीताने तो सिद्धातना सर्व आलापा अनाधक रहे ते जयने मुरप कहे वीजा कोइक ग्र अर्थ कया हो तो ते कहे पण तेपणे कहे ए रीत छे इहा पचारितकाय मध्ये, स्वमाल तेहज काल छे, पण उदो नयी, उत्पाद व्यय ते सर्व दन्यमा समये समये पाय छे ते समय जुदो मानीये तेपारे सिद्धनो तथा वर्मास्तिकाय अधर्मा- स्तिकायमा आकाशमा काल मिन न्यथी उत्पादव्यय मानवो पडे तेवारे सिद्धादिफनो उत्पादव्यय परअपेक्षाये (थाय) ते परअपेक्षाये उत्पादव्यय मानता उत्पादव्यय ध्रुवता ते द्रव्यनो लक्षण (परापेक्षाए याय) जे लक्षण होवे ते स्वरूपेज होवे परअपेक्षाये थाय नहीं (स्वस्वरूपेणलक्षणनपरस्वरूपेणलक्षण) तथा तुझे सूननी साक्षी मागी ते जीवामिगममध्ये "किमिदभ- तेअदासमएत्तिबुच्चेइ गो. जीवाचेव अजीवाचेव " ए पदमध्ये ए आव्यु छे तथा जिहा छ द्रव्य कह्या तिहा लगतोज पूज्यो जे “ कतिणभते अत्थिकायापन्नत्ता १ गो० पचअत्थिकाया पन्नत्ता” ए पदमध्ये अस्ति ते छतानो नाम छे, तेटला छता पिंडपणे केटला छे ? तो का जे पाच छे एटले एथी वधतो अक्षर स्यो मागो छो' तथा उपचार हस्ये तो किवारे कैलोक थई जस्ये, सिद्धमे ससारीपणो थास्ये ते एहवी कल्प- ना स्याने करीये १ जे धणीये तथा पूर्वाचार्ये जे उपचार कयों ते करीये पण नवा न कल्पीये अने करीये ते पण कोइक कार्य माटे करीये 7 सिद्ध उपचार ४

श्री देवचन्द्रजीकृत स्टक प्रश्नोत्तर
९५१
.
-
कह्या उपचारे, इम अनेक उपचार छे ते केटला लिखीये,
असतस्थापनादिक ए सर्व उपचार छे, पण कार्य माटे छे
तथा कोइक चापी बोलाय ते मध्ये कोइ जीवने लाभ नहींजी
तेमाटे एटलो बोलवानो मन करीये, पण खीचाताण मध्ये
न पेसीये तया श्रीभगवतीमूनमध्ये वर्मास्तिकायना नामपर्याय
कह्या छ, तिहा वर्मास्तिकाय कहीये प्राणातिपातसवर कहीये
इम अवारसवर ते वर्मास्तिकायना नाम कह्या तथा अढार
पापस्थानने अवर्मास्तिकायना नाम कह्या ते पण सर्व
उपचारे को छे तेमाटे एहवा उपचार सूने अनेक छे
तेमाटे पचास्तिकायनी वर्तना तेहजने काल कह्यो छे अन
श्रीतीर्थकरदेवे पण छ द्रव्य कह्या, तेपण आशय मध्ये एहज
उपयोगे कया छे बीजो कोइये नवे ए आशय न को
"अणागयद्वाजीयद्वा जीवाजीवइ " इत्यादिक जोज्यो तथा
श्रीजिनाशय पी भिन्न को नयी वीरमुखयी सुधर्मास्वामीए
अर्थ इमहीज चार्यों हतो ते परपराये चउदपर्वधारी भद्रबाहु
स्वामी नियुक्ति मध्ये पण एहज जिनभद्रगणिक्षमाश्रमण
तेपण दशपूर्ववर छे ए वात गणवरसार्धशतक गणवरदोढसा-
वृत्ति तथा कल्पचणि मध्ये सुणी छे व्याख्यात छे तेह सुखे
करीये पण आशयमूलगो राखीने करीये इम चारखो तेमाटे
ए व्याख्या ए रीतेज करज्यो जे वस्तुपिडपणे पाच छे, अने
पाचना स्वकालपर्यायने कालद्रव्य कही बोलाव्यो छे, ते आरो-
पेज छे ए आरोप ते जिम निश्चयअर्यावग्रह एक समयनो
के अने व्यवहारे अर्थावग्रह असख्यात समयी लोकने बो-
चवा माटे मान्यो, तिम मानज्यो तथा वली जे प्रमाणप्रत्यक्ष
मध्ये वस्तुगते केवलज्ञान ते सर्व प्रत्यक्ष मान्यो अवधिमन,

. ९५२ श्री देवबद्रजीत प्टक प्रयोत्तर पर्यपने देशप्रत्यक्ष मान्पो पठी लोपाहार उपचार करीने पोदा इद्रियसीकपदी जे ज्ञान ययो तेहने पण व्यवहारे प्रत्यक्ष मान्यो । रीत नदीपादिक मयेतेपण कारणे छे तिम कारनी रे व्यारया कारणे छे. पण मूल व्याख्याने निजरासीने सर्व व्यास्या परीये परीते कल्याण छे तथा विशेषापइयके "नतुपश्यतिक्षेन काटासा तयोरमूर्तत्वादयधिश्च- मुर्तविपयत्वात्, पर्तनारपतुकाल्पश्येत्तदन्यपर्यायत्वात् ,तस्येति' इहा पुद्गल्नीवर्तनानी अपेक्षायफारने रूपीगोल्यो छे तथा गावीसहजारीमध्ये तथा " कालस्यानादित्पत्वात् , द्रन्यपर्याय- त्वात्, द्रयोपक्रमएमोपचारात्, " श्रीभगवतीमूने १३ मे शतके उदेसे ४ थे कालस्पर्शनाधिकारे नत्यिइकेणनि ए अधिकारे टीकामध्ये पुद्गलादिकनी वर्तना तेहिज काल गोध्यो छे राधन- पुरयी प वीरचद गणीए पूज्यु तेहनो पडुत्तरजे वेक्रियशरीर करे तेवारे, अथवा आहारकशरीर करे तेवारे सर्वप्रदेश आहा- रकशरीर मध्ये छे पण ओदारिक मव्ये नयी तेहनो उत्तर जे आहारकवेनियलब्धिकाले ठाणागवृत्ते त्रण शरीर छे तया कर्मग्रथ कम्मपयडीमध्ये पण उत्तरवक्रिय तया आहारक करता उदयस्थानक नामकर्मना कडा छे आहारक सयताना उ- दयस्थानानि भवति तयथापचविंशति सप्तविशति अष्टाविंशति एकोननिशत् " " तर आहारकमाहारकोपागसमचतुरस्रसस्थान उपघातमत्येकइति पचप्रकृतय प्रागुक्तायामनुष्यगतिप्रायोग्याया मेकविशतौ प्रक्षिप्यते मनुष्यानुपूर्वीचापनीयते ततोजातापच- विंशति रित्यादिपाठे, आहारकवालाने औदारिकोदय दीसतो नथी वली जो एहने औदारिकउदय होवे तो सवयणनो पण उदय जोइये तेमाडे ते आहारकशरीरकाले औदारिक उदय श्रीदेवचन्द्रजीकृत छस्क प्रश्नोत्तर ९५३ दीसतो नयी तथा कोइ पलस्येने औदारिकशरीर रतो दे- शनादेतो दीसे छे ते एहनो आशय छे, जे आहारकनो अत मुहूर्त नान्हो जणाय छे ते लोकने खबर पढे नहाँ तथा जो ए शरीर मध्ये आत्मप्रदेश छे तेपण तैजसकार्मणशरीरी छे, पण औदारिकाबगाही नयी अने जो ए शरीरे आत्मप्रदेश सर्वथा न मानीए तो आहारकशरीरनो सकेलो सभवे नहीं तथा तिहा उत्तर साभलताज आहारक टली जाय छे अने आत्मप्रदेशो ओदारिकशरीरमध्ये समाय छे तथा कोइक पूछस्ये जे मूलगे शरीरयी जास्ये आहारक जाइ तां सीम आत्मप्रदेशनी श्रेणि छे ते तैजसकामणवत छे, जे समी अवगाहनापन्नवणा सूत्रे पाचराजनी कही छे कार्मणनी अवगाहना १४ राजनी कही छे उत्कृष्टयी जघन्य अगुलने असख्यातमे भागे कही छे, अने आहारक करता शरीरादि पर्याप्ति नवी करवीं पडे छे वे कर्म- ग्रथटीकामव्ये का छे "शरीरपर्याप्तापर्याप्तस्यसप्तविंशति " इत्यादि तथा जे आहारकनी अवगाहनामुड हस्ते छे तेमाटे मध्यप्रदेशे तैजसकार्मण छे इम जाणवु तथा औदारिकशरीखंत प्रथ- मयी आहारकपुद्गलग्रहे तेपण औदारिकशरीरथी लेतो नथी, जे औदारिकआहारकबधन नयी तेपण आत्मप्रदेशगत आहारक- नामकर्मनी प्रकृति तेपण कार्मणवर्गणारूप जे उदय थइ तेहने उदये आहारकसमुद्घात करे, तेणे प्रदेश बाह्य नीकले ते प्रदेश तैजसकार्मणशरीर छे ते शरीरयी नवा आहारकवर्गणाना पुद्गल आहारे ते सर्वप्रदेशे आहारे ते पछे सर्व प्रदेशे आहारकशरीर छे एक अष्टप्रदेश ते अचल छे तथा श्रेणिगत प्रदेश सर्वने तैजसकामण शरीर छे ते पछे आहारकशरीर उदय छे इम जणाय छे, इहा किहा औदारिक उदय मान्यो हवे तेजो प्रशस्तआचार्य वचन . 120 . ९५४ आदेवचन्दनीगन टक प्रोत्तर ए तेजोमदेशोदयाप गणो पण निपाती नी तया यरिय शरीरने पण इमहीन जागयो हा गजे, चक्रपति भोगकाले ६४ हजाररूप र छे निहा खीरत्न साये भोग मूल्गेम्प र ले ते मूल्गो आदारिक शरीर छेतिहा इम छे जे चक्रानि ६४ हजाररूप रछे ते पनुरूपिणी विद्यानी पेर आदारिक शरीरनाज छे पण किय नवी तथा श्रीभग- वतीने "पडाजोपडसहरस बडाजोवडसहरसाए पाठे घडा एक- मायी हजारमा घटा काढे प पण पक्रिय नथी अवकरीया भेदे घडामायी घटा काढे छे तिम औदारिक शरीरमाथी ओदा- रिक शरीर काढे छे ए अक्षर पण ग्रयातरे दीटा छे पण ते ग्रय पासे नथी आहारक कर्यायका पूर्वशरीरमध्ये आत्मप्रदेश छे ते तैजसकार्मणशरीरी छे पण जौदारीक शरीरी नथी अने आहारक करे तेपण इहा ३ वर्गणानो करे छे तथा आहा- रकशरीरी करता औदारिकमिश्र मान्यो छे ते पूर्वग्रहीत औ- दारिक पुद्गल ने छे, अने नवा ग्रह्या जे आहारक पुद्गल ते मेला यया माटे मिश्र छे पर आहारकथी औदारिक ग्रहण नथी आहारक मूकताकाले पण प्रथमथी औदारिकपुद्गल ते कार्म- णथी लेवराइ छे इम जणाय छे, पछे तो आगम अनत छे तथा तुम्हे विष्णुकुमार आश्री लिख्यु ते वैक्रियशरीर करता औदारिक शरीर ते पण वैक्रिय माहेज समाणो छे अने ते औ- दारिक पुद्गल ते वैकियने उदयनले वैक्रियपणे परिणमे, पुद्गलनो पलटणस्वभाव छे तेमाटे जे वैक्रियसमुद्घात करता सोल जाति रत्नना पुद्गल तेह पलटावी वैक्रियपणे परिणमावी लेवे छे, अने जे वैक्रियशरीर घणा करे छे तेहने औदारिक मन्ये जे प्रदेश छे-वेहनी बे परिपाटी छेजी मूलगा शरीर पण पलटीने २२ श्रीदेवचन्द्रजीकृत उटक प्रश्नोत्तर ९५५ , वैक्रिय थयो छे, अने रोक औदारिक जेवो देखे तो शक्ति विशेष छे, जिम इद्र कालिकाचापपासे निगोदस्वरूप पूञ्चा आव्या वृद्धद्विजरूप करीने ते शरीर वैक्रिय हतो पण लोके औदारिकपणे दीठो, आचाय पण पछे उपयोग दीधे जाण्यो तिम मनुष्य वैक्रिय करे ते मूल शरीर पण वैक्रिय छे, अने वीजा शरीर तेपण बक्रिय छे ए वैनियसमुद्घातनी उत्कृष्ट अवगाहना लाख योजननी छे तेमाटे अने जे राख योजनयी उपरात छे ते तो मूल शरीरे या अतरालवत्ती प्र- देश सर्वमव्ये तैजसकामणशरीर छे, समुद्घातगत केवली शरीरपरे पण औदारिकशरीर नथी जे उत्तरक्रियकाले औदारिकना उदयनी ना कही छे कर्मग्रथने विषे तेमाटे इहा कोइ कहे जे एकरूपे ३ शरीर कद्या छे पण रूपभेदे वैक्रियादिक हवे तेहने उत्तर जे कर्म उदय न.हवे ते सर्व प्रदेशेज हवे पण कोइ प्रदेश हवे कोइ प्रदेशे न हवे इम हवे नहीं यद्यपि शुभ- नामकर्म अशुभनामकर्म तेना "भुवरिसिराइमुह ए पाठे नाभि सीम नामियी हेटले अशुभ इम उदय को छे पर तिहा तत्त्वार्थ टीकाकारे कयो छे जे नामिपर्यत शुभनो विपाकोउदय ओ नामिथी हेटल शुभनामकर्मनो प्रदेशोदय छे अशुभनो उदय के इम जाणवो पण कर्म उदय हवे तेदल योडावणा चीकणा लूखानो फेर हवे पण कोइ प्रदेशे न हवे इन न हवे, तेमाटे इम जाणवुजी तथा तुम्हे पूछयु जे मनुष्यगतिमार्गणा तथा तिर्यचगतिमार्गणा मन्ये औदारिकदिक नरकदिक वनस्पभना- राचसघयण ए पाच ५ प्रकृति मूलओचे धनयी तो औदा- रिकमिश्रकाययोगनी मार्गणाए चोथे गुणठाणे ७५ प्रकृतिनो बघ तेमध्ये ए५ प्रकृति गवेषी ते स्य् ? तेहनो उत्तर परपराइ इम २३ ९५६ श्रीदेवचन्द्रनीत ट्रफ प्रभातर. साभल्योछे, मनुष्यगति तिर्यंचगतिमार्गणामा उत्तरपक्रिय करते काले वैक्रिय करता क्रियधिक देवदिक न साधे पण उत्तरपत्रिय काल गवेरयोज नयी उपाधिकृत ते कारणिक छे ते गोखना नयी, इम जणा यो छे, अने जे मनुष्यतियच उत्तरक्रियपणे वर्तमान ते वैकिययी क्रियदिक न पाचे, तेगारे औदारिकद्विकनरदिक नाघे, अने औदारिक प्रत्ययि प्रयमसवयण पण समकितीपणा मादे नाचे, ते जीव वैक्रियशरीर मूकता बली औदारिकश- रीरी याता औदारिकमित्रकाय योगी याइ ते कोइककाल सीम ए पाच प्रकृति वाघे ते ए आशय जणाववाने ए पाच गोखी छे, वैक्रिय मूकता औदारिक मित्र थाइ ए सिद्धातनो मत छे सभारवाने सुक्ष्म ऋजुसूलनयनो आशय छे, ए अक्षर किहाइ दीठा नयी, परपरामध्ये साभल्यो छे तथा जयसोम पन्यासे कर्मग्रंथ विषमपदपर्यायना पर १०-१२ कर्या, छे ते मध्ये लिरयो छ तिहा वृहदधस्वामित्वटीकानी साख लिखी छे ए पण एकवार जीर्णश्चतधर पासे धारयो छे पण अक्षर दीठा नथीजी ए प्रश्नपडत्तर तथा कडूआमती शा लाधा ए प्रश्न पूछयोजे, आत्माना मध्ये आठप्रदेश किम रह्या छे ? अथवा सावरण छे, निरावरणं छे ? तेहनो उत्तर आठ प्रदेश छे ते च्यार उपर छे, ने च्यार हेठल छे ते निर्मल छे निरावरण छ तेहनी साख लिखीइ छे मध्यात्मप्रदेशा- टाकस्य न कर्मबध यदुक्त श्रीआचारागटीकाया लोकविजया- ध्ययने प्रथमोदेशकस्यादौ , तदनेन पचदशविधेनापियोगेना- त्माऽष्टौ प्रदेशान्विहायतप्तभाजनोदकवदुद्वर्त्तमानै सवैरेवात्म प्रदेशैरात्मप्रदेशावष्टवाकाशदेशस्थ कार्मणशरीरयोग्य कर्मदलिक यद्वन्नाति तत्प्रयोगकर्मेत्युच्यते एहवा पाठी आठ प्रदेशनिरा- , २४, श्रीदेवचन्द्रजीकृत छुटक प्रश्नोत्तर ९५७ . वरण छे सिद्धसमान छे केवलज्ञानादिक अनतगुण निरा- वरण छ, तिहां वळी पूछयो जे आठप्रदेश निरावरण, केवल- ज्ञानमयी छे तो लोकालोक का जाणता नयी ? तिहा उत्तर जे पचास्तिकाय मध्ये जड च्यार अस्तिकाय छे. ते अकर्ता छे, जे सर्वप्रदेशे कार्य मिन्नमिन्नपणे करे छे, अने जीवद्रव्य कर्ता छे ते एक जीवना असख्याता प्रदेश बधा मिलीने जाणवारूप कार्यने करे , ते सर्व प्रदेश मिल्या जाणपणो करी शके तेमाटे आठ प्रदेश निरावरणा छ पण केवलज्ञान- मयी, छ पण सर्व पदार्थ जाणी न शके जे आठ निर्मला पण असख्याता सावरण छ तेह प्रदेशे तो केवलज्ञानादिगुण अ- वराणा छे ते प्रवृत्ति करी शकता नयी आठ प्रदेशे सर्व भाव जाणी शके नहां वली कोइ पूछस्ये जे ए आठ प्रदेश नि- रावरण केमा रह्या १ तेहनो उत्तर जे भगवती सूत्रे जे "एअइ वेअइ चलई फदई से बधई ते जे प्रदेशचलपणे वते ते बधाये तेमाटे ए आठ प्रदेश निश्चल छे तत्त्वार्थवृत्तौ "क्रियावत्व पर्या- योपयोगिता प्रदेशाष्टकनिश्चलता एवप्रकारा- सति भूयास" तथा भगवती सुने अनादिअनत सबध क्यो छे, तिणे ए आठ प्रदेश अचल छे, बीजा: सर्व प्रदेश कटाहगत तेल उकालता जिम तेल उपरनो नीचे आवे छे, नीचायी उपर आवे छे तिम- सर्व प्रदेश चली रह्या छे, प्रदेशने चटवे वीर्यनी चलता छे जेकेइ एकला वीर्यनी चलता. माने ते न घटे, जे द्रव्यनोक्षेत्र जे प्रदेश के मुफ्रीने गुणने अन्यक्षेने जवो घटे नहीं, ए तत्त्वार्थकारनो आशय छे तिहा कम्मपयडीमध्ये वीर्यविभागने अधिकारे आत्मप्रदेशे वीर्यनो तरतमपणो को छे ते क्षयो- पशमज ए रीते छे. परकोइ प्रदेशनो वीर्यकोइ मध्ये आव्यो 1 श्रीदेवचन्द्रजीकृत पदक प्रभात्तर- - साभल्योछे, मनुष्यगति तिर्यंचगतिमार्गणामा उत्तरमैक्रिय करे वे काले वैक्रिय करता क्रियदिक देवदिक न पाघे पण उत्तरपत्रिय काल गवेरयोज नयी उपाधिकृत ते कारणिक छे. ते गरेखता नयी, इम जणान्यो छे, अने जे मनुष्पतियच उत्तरक्रियपणे वर्तमान ते वैक्रिययी पक्रियधिक न नाचे, तेगारे औदारिकद्रिकनरद्विक पाचे, अने औदारिक प्रत्ययि प्रयमसवयण पण समकितीपणा माटे पाचे, ते जीन वैक्रियशरीर मूकता वली औदारिकश- रीरी याता औदारिकमित्रकाय योगी थाइ ते कोइककाल सीम ए पाच प्रकृति वाधे ते ए आशय जणावपाने ए पाच गोखी छे, वैक्रिय मूकता औदारिक मित्र थाइ ए सिद्धातनो मत छे सभारवाने सूक्ष्म ऋजुसूतनयनो आशय छे, ए अक्षर किहाइ दीठा नयी, परपरामध्ये साभल्यो छे तथा जयसोम पन्यासे कर्मग्रंथ विषमपदपर्यायना पर १०-१२ कर्या, छे ते मध्ये लिरयो छे तिहा वृहद्वधस्वासित्वटीकानी साख लिखी छे ए पण एकवार जीर्णश्रुतधर पासे धारयो छे पण अक्षर दीठा नथीजी ए प्रश्नपडत्तर तथा कडूआमती शा लाधा ए प्रश्न पूछयोजे, आत्माना मध्ये आठप्रदेश किम रह्या छे ? अथवा सावरण छे, निरावरण छ ? वेहनो उत्तर आठ प्रदेश छे ते च्यार उपर छे, ने च्यार हेठल छे ते निर्मल छे निरावरण छे तेहनी साख लिखीइ छे मध्यात्मप्रदेशा- टाकस्य न कर्मबध यदुक्त श्रीआचारागटीकाया लोकविजया- ध्ययने प्रथमोदेशकस्यादौ । तदनेन पचदशविधेनापियोगेना- त्माऽष्टौ प्रदेशान्विहायतप्तभाजनोदकवदुद्वर्त्तमानै सवैरेवात्म प्रदेशैरात्मप्रदेशावष्टवाकाशदेशस्थ कार्मणशरीरयोग्य कर्मदलिक यद्वन्नाति तत्प्रयोगकर्मेत्युच्यते एहवा पाठथी आठ प्रदेशतिरा- , २३।

श्री देवचन्द्रजीकृत छटक प्रश्नोत्तर ९५९ न हुवे तो सर्व प्रदेशने इद्रियज्ञान वेत्तापणो किम याये ? तेमाटे इम सदहबोनिर्धार के इहा इद्रियक्षयोपशमना माननो अधिकार है, तेह मध्ये युक्ति अनेक उपजे पण नव भेदे चारवा ते सर्व आगम रीते सापेक्ष डेजी अथवा " यद्यपि अमिलाप्याना भावानामनतभाग एवऋतनिरस्तथापिप्रसगत सर्वेऽप्यमिला या अतविषय न जानति इति उच्यते ए पाठ भग- वती टीका मध्ये आटमे शतके उत्शे २ सा हरखचद दल्ला प्रश्न पूल्यो मामूदावादी जे पुद्गलपरमाणुने विषे वर्णादिक परिणमे १ वेहनो उत्तर कारणमेवतदत्यसूक्ष्मनित्यश्चम- वति परमाणु एकरसवर्णगधाद्विस्पर्श कार्यलिंगीच " ए तत्वार्थ- वृत्तिनो वचन , जे सर्वखबनो अत्य कहेता ठेहलो कारण के एटले यणकाटि सर्वखध परमाणुयी नीपजे पण परमाणुनो कोई कारण नयी ए अनादिअनत शास्वत सिहद्रव्य ले ते मुक्ष्म तेहनो परमार्य जे एक जीवनो एक प्रदेश, तथा आकाशनो एक प्रदेश तथा परमाणु एक सर्वनी अवगाहना तुल्य ले पण एक आकाशप्रदेशमध्ये एक जीवना जसख्याता अने अनताजोवना अनतापदेश मावे, एक प्रदेशे कर्मवर्गणापणे परिणम्या अनता परमाणु समाइ रहे ते माटे आकाशप्रदेशयी आत्मप्रदेश समाय वे सूक्ष्म , अने आत्मप्रदेशथी परमाणु समाय वे सूक्ष्म छे, तेमाटे सर्वथी परमाणु सुक्ष्म , तथा ते परमाणु दव्यपणे नित्य छे ते एक परमाणुमे एकवर्ण, एक रस, वे फरस हवे, ते मन्ये फरस लखो तथा चीकणो, उन्हो तथा ताडो, ए न्यार माहेला वे हवे लुखो उन्हो ए वे अथवा लुखो तादो ए वे अथवा चीकणो उन्हो ए बे, अथवा चीकणो टाढो ए बे ए रीते हवे तेजे परमाणु श्वेत वर्ण हवे ते विश्रसापरि- ९५८ श्री देवचन्द्रजीकृत घटक मन्नोत्तर - -- नयी तिहा कोइ पछे जे, कार्याम्यासे सब मदेशनो वीर्य मिली कार्य करे , ते इहा आत्मानो क्तपणो सर्व प्रदेश मिल्याज छे ते माटे सर्व प्रदेशनो वीर्य स्वस्व प्रदेशे यो साहाय्य करे छे, पण परक्षेनीगुण पाय नहीं तथा पली पू- व्योजे "अखरस्स अणतमो भागो निचुग्वाडीयो चिटइ" तेएस्यू ? वेहनो उत्तर जे आत्माने असरयात प्रदेशे अक्सर कहेता ज्ञानगुण तेहनो अनतमो भाग जेम तेनो अश तथा श्रुतनो अश ते सदा उवाडो ले ते क्षयोपशमी , एटले ए अनतमोभाग जे उवाडो थयो , ते एकेन्द्रियथी माडी पचेन्द्रियपर्यंत वेत्तापणो करे वली कोइ पूछस्येजे ए अन- तमोभाग जे उवाटो ते सदा उवाडो ? तेहने उत्तर जे अनतमो भाग उवाडो तेतो वली अयथार्यपरभावानुयायी प्र- वृत्तिकार तो जे मतिज्ञानावरणी बधाणी तेहने उदये अवराय छे, पण जे आत्मानो वीर्यक्षयोपशमी छे ते वली वीजा मतिज्ञानाशने क्षयोपशम करे छे, इम सतति रीते सदा ज्ञा- ननो अनतमोभाग प्रतिप्रदेशे क्षयोपशमी उघाडो पामीये छ तेहनी साखश्रीविशेषावश्यकयी लिखीये छीए“ तनह्यक्षर शब्देनाविशेषितएवज्ञान अभिप्रेततथापिरूढिवशात् " तथात्रा- प्यऽक्षर शब्दोवर्णएववर्त्तते इत्यादि पाठथी जोइ लेज्यो ‘सर्व प्रदेश क्षयोपशम प्रतिपादकसूत्र इत्यादि तथानद्या तदपिवाक्षर द्विधाज्ञान आकारादिवर्णजात च इहा नदीटीकामध्ये अधिकार घणो छे वर्णश्वश्रुत ए विशेषावश्यक वचनथी श्रुतज्ञाननो अनतमो अश गवेख्यो छे ते श्रुतज्ञाननो क्षयोपशम ते सर्व प्रदेशीय हवे ए कम्मपयडी प्रमुखथी जोइ लेज्यो तेमाटे अक्षरनो अनतमोभाग ते सर्व क्षयोपशमी छे जो सर्व प्रदेशे - २६ ओ देवचन्द्रजीकृत छटक प्रश्नोत्तर ९५९ न हुवे तो सर्व प्रदेशने इद्रियजान वेत्तापणो किम याये ? तेमाटे इम सदहवोनिर्धार के इहा इद्रियक्षयोपशमना माननो अधिकार के, तेह मन्ये युक्ति अनेक उपजे पण नव भेदे चारवा ते सर्व आगम रीते सापेक्ष रोजी अथवा " यद्यपि अमिलाप्याना भावानामनतभाग एवश्रुतनिवस्तिथापिमसगत सर्वेऽप्यमिलाग्या श्रुतविषय न जानति इति उच्यते” ए पाठ भग- वती टीका मध्ये आटमे शतके उद्देशे २ के सा हरखचद दल्ला प्रश्न पूठ्यो मकसूदावादयी जे पुद्गलपरमाणुने विपे वर्णादिक परिणमे १ तेहनो उत्तर “ कारणमेवतदत्यसूक्ष्मनित्यश्चम- वति परमाणु एकरसवर्णगधाद्विस्पर्श कालिंगीच" ए तत्वार्थ- वृत्तिनो वचन , जे सर्वखवनो अत्य कहेता रेहलो कारण के एटले द्वयणकादि सर्वखध परमाणुयी नीपजे पण परमाणुनो कोई कारण नयी ए जनादिअनत शास्वत सिदव्य ले ते सूक्ष्म उ तेह्नो परमार्थ जे एक जीवनो एक प्रदेश, तथा आकाशनो एक प्रदेश नथा परमाणु एक सर्वनी अवगाहना तुल्य हे पण एक आकाशप्रदेशमध्ये एक जीवना जसख्याता अने अनताजीवना अनताप्रदेश मावे, एक प्रदेशे कर्मवर्गणापणे परिणम्या अनता परमाणु समाइ रहे ते माटे आकाशप्रदेशयी आत्मप्रदेश समाय वे सूक्ष्म छे, अने आत्मप्रदेशयी परमाणु समाय वे सूक्ष्म छे, तेमाटे सर्वथी परमाणु सश्म छे, तथा ते परमाणु व्यपणे नित्य छे ते एक परमाणुमे एकवर्ण, एक रस, बे फरस हवे, ते म ये फरस लूखो तथा चीकणो, उन्हो तथा ताडो, ए न्यार माहेला बे हवे लुखो उन्हो ए वे अथवा लुखो तानो ए वे अथवा चीकणो उन्हो ए वे, अथवा चीकणो टाढो ए बे ए रीते हवे तेजे परमाणु श्वेत वर्ण हवे ते विश्रसापरि- N श्री देवचद्रलीकृत चहक प्रश्नोत्तर. "Makan- णामेज कालो थयो वेतपणानो व्यय कालापणानो उत्पाद, इत्यादिक चारखो, तया तुम्हे पथ्यो जे प परमाणमें पूरणग. ल्न ते किम डे १ तेहनो उत्तर एफपरमाणु जे वर्णादिक गुण हवे ते एकगुणो हवे ते समयमावे सखगुण पाय * थवा असखगुण थाय, अपना अनतगुण याय, अयवा अनत गुणो हवे, ते असखगुण सखगुणा एकगुण यइ जाये कोइक समये वर्ण इम थया, कोइक समे वर्ण ते प्रमाणेज रहे तो गधादिक वधे घटे, कदाकाले वर्णादिक च्यार तेह प्रमाणे ते हनो तेज रहे पण अगुरुलघुगुणतो एकसमययी वीजे समये पट्गुणहानि अपना वृद्धिपणे नियमापरिणमे ते पूरणमलनतानि- यमा छे पण अगुरुलघुनी पूरणगलनतागवेखी नयी वर्णादि- कनी जे गवेखी छे तथा परमाणुमध्ये एक परमाणु अन्यथी मिलवारूप स्निग्धताले तेपण घटेवघे "द्वाम्याद्वाभ्या अधि- काम्या 'सबध " ए तत्त्वार्थनो वचन छे ते रस शब्दे तीखा कडुआ माहिली नवी, तथा फरस माहिलो नथी जे रस मध्ये स्वाद धर्म छे, पण मिलवानो धर्म नथी तथा फरस माहिला स्निग्धता लेवे तो "रुखस्सरुखेण दुयाहिण्ण" एटले लुखो पर- माणुओ बीजा लुखा परमाणुथी द्विगुण अधिकने मिले ए पाठ न ठरे किम तेमाटे 'मिलवो कारणरूपज स्निग्धता ते पूरणग- लनगुणनी छे ते पण घटेवघे छे, जे पुराणु ते पूरण, घटे ते गलन थयो, तथा एक परमाणु एक लाभे अस्तिकाय कहेवाय के ते स्यामाटे जे अन्य परमाणुथी मिलाय तेहनो कारण पूरण गलननी आद्रता ते परमाणुमध्ये छे तेमाटे आस्तिकायना छ जे अगुरु सर्व द्रव्यमा छे तेमाटे ते- परप 7 वर्णादिक ४ नी तथा हुनो पर श्रीदेवचन्द्रजीकृत छुटक प्रश्नोत्तर पूरणगल्ननी जे हानिरद्धि ते पूरणगल्नपणे लेवी ए रीते ते वळी पुद्गलव्य , तेपण नित्यादिक अनतस्वभावी , अनतगुणपर्यायी छे, सदाकाल के कटुकमतीगच्छे सा लादा कृत प्रश्नमे वीरस्वामीनो जीव सातमीनरकयकी सिहपणे उपन्यो ते किम १ तेहनो उत्तर "सप्तम्या उत्त तिर्यच्येव उत्प- द्यते" प्रायोमत्स्येण तथा औविशेषावश्यकमध्ये “सत्तममहिनेर- ईया ते उचाउ अणतरुवटा नयपावेइमणुस” इतिवचनात् तिरिज- चमध्येउपजेमत्स्यतोकाइनियामकनही तथा सिंहथी नरके गये पण सर्वसिंह नरके जाये ए नियम नयी उक्तंच “वालादा- दीपरकीहवति नरगागयाउ अराजति पुणोनिरएसुनहल्लेण न उण नियमो " ते माटे नियम नयी मनुष्य मरी चक्रवर्ति यया ते किम घटे । तथाच करपटीकायासमयसुदरोपाव्याये "सुरनेरइए- हिचियहवतिहरि अरिहचक्किालदेवाइत्युक्तत्वात्कथमनुष्योमृत्वा- चक्रवर्तिर्जात "तमोत्तर " यथास्मिन्क्षेत्रेदशाश्चर्याणिजातानि तथा तस्मिनक्षेनेइढमाश्चर्यमध्येगणितमस्ति पुनस्तरनागकुमारतस्तीर्थ- करोजातोस्तिइद विस्तारार्थिनादेवभद्रकृतवीरचरित्रद्रष्टव्य " तथा खीपचानुत्तरविमानआश्री पूज्यु तेहनो उत्तर जे "श्रीनेमिनाथस्य सप्तमेभवे स्वयवरा यशोमती भार्या, तथा द्वावपि अपराजिते- महाविमानेदेवत्वेनोत्पन्नौ” इति भवभावनाटीकाया तथा स्त्रीने वज्रऋषभनाराचसहननअस्ति "तनाक्षराणिपचसग्रह कम्मपयडीयथे नामकर्मोदयभगाधिकारमनुध्यस्त्रीषुषट्सहनन तस्यभगकाकृता, दिग- बराम्नायेपि गोमठ्ठसारे एवमेववाक्य च मणुस्सणीसु छसपयणा इतिवाक्यात्, तथादिग्पटीयभिग्यायोनिमतीस्त्रीक्षपकणिस्वरूप तवमथमनपुसकवेदसताक्षय पश्चातपुरुषवेदसत्ताक्षय उदितवेद- स्यमातेक्षतिरितिनीति " दडकने अधिकारे सक्षेप विस्तर व्याख्या 121 ९६२ श्री देवचद्रजीत घटक प्रश्नोत्तर. दिखायाने अर्थे ए कपन करयो छे रायनपुरी आविका आणदमाईकृत प्रश्नोत्तराणिपुलाफचारिनीयाने श्रुत जवन्य नवमा पूर्वना तीनस्तु उत्कृष्ट नापूर्व पुरा श्रीभगवती २५ मे शतके कसो छे, ते मुलाफचारिनीयाने इन्पलिंग तीन कमा छे, गृहलिंग, अन्पलिग, स्वलिग ते गृहलिंगी अन्पलिंगी पूर्वकिमभणे १ तेहनो उत्तर जे श्रीभगवतीम्नेकया छे जे "भावालिंग पहचनियमासलिंगेनुज्झा " ए पाटना आशयथी जे जे द्रव्यथी तीनलिंग कया ते पैकियलन्धिकरता कारणे साघु गृहस्थलिंग अन्यलिंग करेपरे ते साउ छे पण गृहस्थ नयी तथा वीजे प्रने भगवतीमूने सनो उदयनो नीम छे पर सत्तानो नाम नयी ते भगवतीले सर्वअधिकार सम- काल कहे ते नियामक नयी पर पन्नवणा तथा समवायागे सत्तानो पाठ छे तथा तीजे प्रश्ने धर्मलाभनो पाठ किहा छ? वेहनो उत्तर जे भवभावना टीका तथाउपमितिभवप्रपचादिक ग्रन्थे पाठ छे चोथे प्रश्ने आलोयणनो तुम्हे कह्यो ते किहा करो छे १ तेहनो उत्तर जे परपरा जीत दीसे छे तथा नादि माडे तिहा अखीयाणा मुकवानो अधिकार विधिप्रपाप्रमुखविधि - थमे छे तथा स्त्रीनी असज्झाई चोवीसपहोरनो मान, आव- श्यकनियुक्ति तथा प्रवचनसारोद्धारटीका मध्ये छे तथा ति- येचणीनी असज्झाइनो जीत दीठो नथी तथा सिद्धातरासामध्ये कह्यो छे तिर्यचणीनी असज्झाइकालेदुहली वातु झरे छे पण रुधिर झरतो नथी ते माटे वातु झरे, असिज्झाइ नथी तथा मनुष्यने वातु झरवा काले पाणीयेसुचि करे ते समूछिमनी नथी तिर्यचना धातुप्रमुख- मलथी सम् जे कुयुक्ति करी जे जीत उपज टालवाने २ श्री देवचदजीकृत छुटक प्रश्नोत्तर ९६३ उथापे तेहने जीतनी श्रद्धा नथी पण आगमनी आजाये इम छ जे गीतार्थनो करयो जीत मानवो तिहा साख छ असढाइन्नवणज्झ, गीअत्यअवारीयतिमज्झत्था । आयरणाविहुआणति, वयणओसुवहुमन्नंति ॥१॥ ए वचनी उत्तम आचार्य जे जीत करयो ते प्रमाण छे तथा चूर्णिकार टीकाकारना कीधा जे वीजा ग्रथ ते मध्ये जे वचन ते पण पचागीनेपरे प्रमाण करवो इति तथा थिरा- दनासघे सा टोकर प्रमुखे पूज्यो प्रश्न तेहनो उत्तर जे तुम्हे पूज्यु जे पुस्तकनी आगमनी पूजा किम छ ? केटला प्रकारनी छे तेह्नो उत्तर जे जलनी तो पूजा पुस्तकनी नथी अने परपरागत ज्ञानपूजानी गाया ले ते गाथा । नमतसामतमहीवनाह, देवेहिपुज्झसुविहीयपुर । भत्तिहिमुत्तित्तेमणिदामएहि, मदारपुप्फपसवेहि- नाण ॥१॥ तहेवसहामणिमुत्तिएहि, सुगंधपुप्फेहिवरसुएहि । पूयति वदति नमति नाण, नाणसलाभायभवक्ख- याय ॥२॥ आशयथी मणि कहेता रत्नजाति, पुप्फ कहेता फूलजाति असुकवस्त्रजाति मोतीनीजातिना पूजाना अक्षर छे तथा श्रीपालचरिने तथा नवपदप्रकरण श्रीरत्नप्रभसरिकृतमध्येसिद्ध चक्रनी पूजामध्ये ज्ञानपदनी पूजा अष्टमकारी करी छे तथा शनुजयमहात्ममध्ये धनेश्वरसरिजीए सोनाने कमले जानपूजानो ९६४ श्रीदेवचन्द्रजीत घटक प्रश्नोत्तर अधिकार छे तपा रूपानाणे सोनहाये गौतमपदनी पूजानो अधिकार तथा ज्ञानपचीनी कथामव्ये तया पूजापटल, श्री तत्त्वार्थकारछत , वेमध्ये पासपूजा, नाणानापूजा, मोतीनी, वीटगानी, दीनानी, यूपनी, पटली पूजा लिसी तया जीत- कल्पचूणिमध्ये जिहा आचायांदिक पुस्तक वाचे तिहा वासपूजा वीटणा निमित्त वस्त्रपूजा रूपा सोनाना फल तथा नाणो तथा ओफल तथा दीप तथा धूपनी प्रजा ज्ञाननी करवी पण गुरु आचार्य ते सचित्तने अडकता नथी जे पुस्तकथी गुरुने अ- टकवो पडे तेह पुस्तकने तो वासनी तथा सोनारूपाना फल्नी तथा नाणानी रत्ननी तथा लगानी एटली पूजा करवी ए जीत के चूपपूजा आपक पोते गुरुने अडकवा विना करे तथा गुरुपूजा गुरुने ना अगे रत्नेकरी नाणेकरी सोनारूपाने फूले करी करवी ए अधिकार हीरप्रश्नमध्ये साखसहित छे तथा गु- रुने तथा पुस्तकने वधारवाने चोखे तथा मोतीए तथा सोना- रूपाने फूले वधाववा एटलानो जीत के वधतो जीत नथी तथा गृहलीनो अधिकार श्रीविशेषावश्यकमध्ये गणधरस्थापना अधिकारे इद्गाणीए करी ए सर्व पचागीने रीते लिख्यो छेजी “यत जेणेव वसायसभाणेव उवागच्छति लोमहत्थगपरामु- सति पोत्थयरयण लोमहत्थएण पमज्झतिदिवएदगधाराअगेहिव- रेहि गधेहि यमलेहि अचेति " ए पाठथी पाणीनी धारा फूलनी पूजानो अक्षर सूरीयाभने अधिकारे छे शाह लाधाजीना पूछया प्रश्ननो उत्तर तुम्हे पूज्यु जे वायुकायने वैक्रियशरीर छे ते लब्धिप्रत्ययी के भवप्रत्ययी नथी जे पन्नवणानो वचन छे तिरिगति मनुष्यने लब्धिप्रत्ययी वैक्रियज हुवे तेमाटे वायु- काय-ते तिरियचना ४८ भेदमध्ये छे तथा जे पटलेभवे जे. ३२ श्रीदेवचन्द्रजीकृत एटक प्रश्नोत्तर ९६५ वैफियद्ग बाध्यो हवे एहबो पर्चेदी तिरियच मनुष्य मरीने बादरएकेन्द्रिपर्याप्तामे उपन्या छे औदारिकशरीरने उदये भोगवता पछे लब्धिरूप उदय थाइ तया सर्व विजयमध्ये ३२ हजार देश के आर्य २५ जणाय छे पण अक्षर दीठा नी तथा महानिशीथे सुमतिप्रष्ट यया ने परमाधर्मि यया ते अनेक पुद्गलपरावर्त ससारभम्यो ते जे समकीतितो अर्वपुद्गलपरावर्त ससारभमे अधिकोभमे नही ते किम मिल्यो । एहनो पडत्तर जे पडवाइने अर्धपुद्गलपरावर्त्त कह्यो ते कालपुद्गलपरावर्त लीघो ठे अने जिहा अनेक पुद्गलपरावर्त कह्या छे ते कालपुद्गलप- रावतमध्ये द्रव्यपुद्गलपरावर्त्त अनेक थाई तथा अभव्यजीव आश्री श्रीभुवनभानुकेवलीचरित्रमध्ये अव्यवहारराशिमध्येथी निकल्या ए पाठ दीटो ते अव्यवहारमध्ये अभव्य छे इम ठहरथा उजी तथा मासआधी लिख्यो ते आचारागटीकामध्ये तथा आचारागचूर्णिमध्ये तथा निशीथचूर्णिमध्ये एहज अर्थ करयो ते बीजे कोणे नवो कल्पायेजी तथा जे साधु अव्यापकपणे जे असुज्झताआहारादिक करे वेहने बच नहीं आत्मानो कपिणो स्वरूपानुयायी हवे तेवारे जे हिंसादिक ते प्रशस्त छे अने प्रशस्तआस्रवनी आलोयण नयी वदित्तुमध्ये "आयरि- यमप्पसत्थे” इत्यादि पाठ जोज्यो ए चर्चा मुहडामुहडे कहेवराइ

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॥ कर्मसंवेधप्रकरण ॥ ॥६०॥ ऐनम ॥ श्रीमज्जिनकुशलसूरिसद्गुरुम्योनम ॥ सिरिवीरनाहनाण । वदिअपम्भठकम्मरयगण । गुणमग्गणठाणे- सु अ । भणामि कम्माणसवेह ॥ १ ॥ नाणतरायदुगभग। दसे- इक्कार खीणमोहजा । केवलदुगेअभावो । वेअणसता अहरकाए ॥२॥ गोयम्मि सत्तभगा। अठयभगाहवतिवेअणीए। पण नव नव पण भगा । आउचउक्केवि अणकमसो ॥३॥ चउ- छसुदुनिसत्तसु एगेचउगिणसुवेअणीअभगा । गोएपणचउदोतिसु । एगठसुदुनिइक्कम्मि ॥ ४ ॥ अट्टच्छाहिगवीसा । सोलसवीसचबा- रछदोसु । टोचउसुतीसुइक्क । मिछाइसुआउएभगा ॥ ५॥ दो- दोतिनिअदोदो । दुगछगदुगसतखीणमोहजा । गुणपच्चईयाभगा। भग्गणठाणेसुणेयहा ॥६॥ दर्शनावरणीयभगा मार्गणास्थानेषुभगा मग पचे १ स १ यो ११ अजान ३ लेश्या ५ अ- ३ चक्षु अचक्षु द २ नाहारक १ अ १ गति शुक्ल १ भव्य १ सजी ? ३॥ आहा १॥ १२ वेद ३ कसाय ४॥ ७ यथारख्यात ? ज्ञान ४ अ. दक्षाय ९| केवल २ .

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कर्मसवेधप्रकरण होज्झा ॥ १२ ॥ इक्कगक्तिकारस दससत्तचउकइक्कगचेव एए चउवीसगया चोविसगिकम्मिइक्कारा ॥ १३ ॥ सिछेसगाइचउरो सासणमीसेसगाइतिन्नुदया उपचचउरचउगाइ चउचउउदयापमत्तता ॥ १४ ॥ चउगइतिनियुब्वे दुगइक्कोबायरेइगोसुहुमे भगाणचप- माण पुलुहिणनायव ॥ १५ ॥ इक्कछडिक्कारिकारसेवइकार- सेवतिन्नि एएचउवीसगया पारदुगिपचइक्कम्मि ।। १६ ।। अटग- चउचउचउरठ, गाय चउरोय हुतिचोवीसा, मिछइअपुचतो, बार- सपणगचअनियट्टी ॥१७॥ अदृट्टीबत्तीस बत्तीस सहिमेवचा- वन्ना चोआलदोसु वीसा, गुणेसुपयसखचोवीसा ।। १८ ।। मार्गणासु गोन भगा मार्गणासुआयु कर्मभगा ९ गति २ इद्री ४ याव ५ मनुष्यगति अस १२ ३॥ नरकगति गतिदेव २ वे ३ ले ५/भ अज्ञान ३ क ४ अवि १ ५ तिर्यचगति अभ १ मि १ १९ देवगति म ग १ पचेंद्रीय १ स इन्द्रिय ४ पृ १ अप ? १ भव्य अनाहारक १॥५ वनस्पति १ सा १ छेद १ परि ११ | तेज १ वायु १ पचेंद्री १ नस १ योग ३२८ यो ३ चक्षु १ अचक्षुद ६ शुक्ल १ सज्ञी १आहा८ क ४ दर्श २ लेश्या ६ अज्ञा ३ अच १ मि १ देसवि मिश्र २ २ भन्य १अभ.सज्ञी १॥२५ 122 १ २ सूक्ष्म १। ३ ३ ९६८ कर्मसधप्रकरण. म या ५ इदिय ४ अभ १/२ उपशम ? अस १ मि १ सा ॥१३ सामायक १ छेदोप २ ५ मूक्ष्म सपराय ? २/ वे स मित्र देशवि ३ परिहारविशुद्धि ? मार्गणासुवेदनीयभगा म ग पचेन्द्रिय १ स १ क्षायिक अनाहारक १॥ ५ केवल २ यथारख्यात १॥ ३ सूक्ष्मसपराय १ शेषमार्गणा ५३ बावीसइक्वीसा। सत्तरस(स)तरसेवनवपच । चउतिगद्गचइक्क। बधठाणाणिमोहस्स ॥ ७॥ छबावीसेवेअति । हासद्गअरइदुग- नतमगुणीआ। चउगवीसिअसढा । अणिछिदुगभगसतरतिगे ॥८॥ पचाइसु विणुजुअल । भगेक्क मोहणिज्झउदयाइ । इग दो चउ पण छ सग अड नव दस इयपयाइ नव ॥ ९ ॥ दसबावीसे नवइग । वीसेसत्ताइ उदयठाणाणि । छाइनवसत्तरसे। तेरेपचाइअठेव ॥ १०॥ चत्तारिआइनववधएसु उक्कोससत्तमुद- यसा पचहिबधगेपुण उदउदुण्हमुणेयवो ॥ ११ ॥ इत्तोचउब- धाई इक्विक्कुदयाहवतिसत्वेवि बधोचरमेवितहा उदयाभावेविवा- २ कर्मसवेधप्रकरण ९७३ . इअणहारगेदुवीसतिग, छाईपणेगवीसाई, अगुदयातेअअन्नाणे ॥३४॥ सतेचउवीसचउ तेउपम्हासुनवगजाबधे चउराईदसउदये इगवीसडवीस जा सते ॥३५॥ मणसामाइयछेए नवओइगजावत्र- वइउदए इगसत्तजासते, छवीससगवीसविणुसेसा ॥३६॥ परि- हारेनववधो चोराइसत्तवेअइसते, इगद्गतिगचउअडजुअवीसा सुहमेनववस्स, ॥३७॥ उदयइगसतेइग, चउअटयअवीसइग, अहरकाएअणुदयइगसतविणा, देसे अवस्सतेरेव ॥३८॥ पचाईअ- डउदए सतेइगदुतिचउठजयवीसा तिरीएदुवीसओतेरपणओ दस- एगवीसओवरिमा ॥३९॥ उपसमगेसत्तराई इगजानधेयएगओ- अडजा, चउअडवीसासते खरगे युदयएमेव ॥४०॥ सतेदुगवी- साइ छगविणुसक्वेअवेअगेबधो सतराईनवणओ नवजातिचउड- वीसता ॥४१॥ मीसेसतरसनधो सगअटनवउदयचउसगठयआ- वीसा वीसासतसापुण सासाणेवइगवीस ॥४२॥ उदयएसगठ- नवग सतेअडवीसमग्गणाठाणे, बधाइतिगमोहस्स भणिअभगाय- पुवुत्ता ॥४३॥ तेवीसपत्नवीसा उबीसाअठवीसागुणतीसा तीसे- गतीसमेग बघठाणाणिनामस्स ॥४४॥ चउपणवीसासोलस नव- बाणईसयायअडयाला एयालुत्तुरछायाल सयायइक्किक्कबवविहा ॥४५॥ बुवबधिनवगतिरिदुग एगिदीअजाइउरलतणुहुड थावर- मपझ्झमथिर असुभमणाइइझदुगबधे ॥४६॥ एगिदिगमणजुग्गो धूलओपरित्तइयरवाजोगे बाइमिच्छेअणिरय सुहमओदेवविणदुगइ ॥४७॥ परघुस्सासक्खेवे पणवीसइच्छपरित्तथूलाओ थिरमुभजस- इयरेसु भगठयतिगाइपञ्चइया ॥४८॥ बायरसाहारणओ सुहम- पत्तेअईयरओभगा जसविणुचउइगजुग्गा दुगडआवीसमिच्छत्ते ॥४९॥ तेवीसमधठाणे थावरएगिदिविणुठविइझतस उबरिमजाइ- मुअणा छेवठोरलउवगच ॥५०॥ चउभगाजाइदिचउटिं तिरी.

९७२ कर्मसपेयमारण गुणस्थानेशु मोह सत्तास्पानानि मि २८१२७१२६ जम २८१२४॥२३२२२२२१ सा २८ जा २८१२४१२१ मि २८२७५२४ अनि २८१२४॥२१॥१३॥१२॥ १११५।४।२।१ २८१२४।२३।२२।२१ मुश्म) २८१२४१२११ २८१२४।२३।२२।२१ | उपश] १८१२४१२१ २८१२४।२३।२२।२१ दे म ध्वीसतिगदसगे नवगेगावीसडकअडगेअ इगवीसाइसत्तग स- तेवीसविणुएए ॥ २५ ॥ तेपणगेठस्सगवीसविणुचउक्किइग- चउडवीस अडचउइगवीसतेरस बारसइक्कारसचदुगे ॥ २६ ॥ दुगतिगछगसगीस तेरसद्गविण्इगेयसमसता मीसतिगदुवीसे इगवीसेअठवीसति ॥ २७ ॥ विणुछब्बीसइगवीसछक्क, सत्व- रसेतेरसेनवेपच, सगवीसविणापणगे, अडचउइगवीसतेरतिग ॥ २८ ॥ अटचउइगवीसतिग इक्कारसपचउचउगबधे तिग- बधाइसुतिगसत, सतद्गखवगपञ्चइआ ॥ २९ ॥ नरत- सपणदिसुक्का, चक्खुदुआहारभवसन्नी, सुयोअकसाएवेऐ, सवे- बधुदयसतसा ॥३०॥ बावीसिगवीसिबधे, भूजलइगविगलतरुअ- सन्नीसु, सगअडनवदसउदये, सतेअटसगछहिअवीसा ॥ ३१ ॥ गइतसमिउदुगवीसअठवीसता, बघेदुवीससते छावीसिगसेसपुव ॥३२॥ नागतिगओहिदसे, बावीसिगवीसहीणअडबधे दसविणु- उदयासते, तेरसकेबलदुगेनस्थि ॥३३॥ लेसतिगदेवनिरये, अवि- कर्मसवेवप्रकरण ९७५ +m बधामा ६२८ २९ ३०|३१| १ ४२०१६ एकेन्द्रिय वेन्द्रिय o तेन्द्रिय चोरिन्द्रिय तिर्यचपच १ ४६०८४६०८ - मनुष्य १ ४६०८ १ देवता १ १ १ नारकी सर्व ४२५/१६ ९/९२४८४६४१ १ ११ १३९४५ इगविगलथावरेसु अजिणविउवाअनाणतिरिएसु मिच्छअस- नीअभब्वे अजिणाहारा सजिणअजए ॥६७ ॥ अविगलविउ- विनिरए अविरयजासम्मनाणुवहिदमे चरणतिदेसेसुरजा अहरका- यदुकेवलेनस्थि ॥ ६८ ॥ देवपरित्तबायर तिरीअनरासेसयासुठा- णभवा भगामग्गणठाणे बधठाणाणनेयवा ॥ ६९ ॥ अणहारे- निरयभवा आहारगतणुभवायनोभगा मणनाणेसामईआभगसखा- मुणेयब्वा ॥ ७० ॥ मिच्छेतेवीसाइ । साणाइसुअठ्ठवीसओबधे । छतिन्निदोतिदोदो। चउपणसेसेसुजसबयो ।। ७१ ।। मिच्छेअ- जिणाहारा । अवियलनिरछेवहुडसासाणे । दुहगतिसघयणागिइ।। चउविणुदुगइज्जमीसद्गे ॥ ७२ ॥ सजिणासमत्ताओ, देसदुगे- देवजायसाहारा जपमत्तदुर्गभगा अनिट्टिदुगेयइक्किक्क ॥७३॥ देवभवादेसद्गे अपमत्तदुगेअदेवनरजुग्गा, ९ ९७४ कर्मसोमकरण आणतिरिद्गविहीण मणदुगनुत्तमगुण एगभगापणअपझ्झे २५५ । २५भ॥ ॥५१॥ वायरपरित्तपणवीस मज्झेजायाजुअठवीसनि अहनाउनोजअ भगाअडदुगणइगग्गा ॥५२॥ धुबनवपण- दितसचउ परवावेउविदेवदुगमुगइ समथिरइपरटगेवा देवडवीसेट- पुव्वता ॥५३॥ मिच्छेदसअपसत्यहिं इगभगोनिरयजुग्गअडवीसे पिवविजलेपणवीसे कुखगइपइझत्तपरिचदुगदुसर ॥५४॥ असम- तहीणनवीसा भगाचोवीसवियलपञ्चईया इतिरिनरमिच्छा घुवतिरिपरवायउरलदुग ॥५५॥ तसचउपणदिवीसे, सवयणागि- इसुअनतमदुतय थिरमथिरसाठक, खगईइगसब्वगुणतीस ॥५६॥ यसओसगपयदुगणा सवयणगुणायआगइगुणआ उयालसयठभगा तिरीएमणएविएमेव ॥५॥ देवटवीसेजिणजुअ भगठगसम्मओ- अपुबजा विअल्पणदीयतिरिजुग्ग गुणतीसेजोअजुअतीस ॥५८॥ पुबिवभगसामीअ नरगुणतीसेसजिणअडभगा सुरअडवीसेसाहार भगमिगनरअपुटवजा ॥५९॥ आहारतीसजिणजुअ बधइसुमुणी- अएगजसपगइ एगविहबधठाणे, अपुवओसुहुमटाणजा ॥६॥ इगविगलथावरेसु अडविसिगतीसएगविणुपच, देवेसुतीसगुणतीस छवीसपणवीसतेवीसा ॥१॥ तसजोअकसाऐसु चक्खुदुआहार- भवनरसन्नी पचदीयविएसु सब्वेदेसेनवडवीसा ॥६२॥ तिरिअ विरयअन्नाणे आइतिलेसेअभब्वअणहारे मिच्छअसन्निसुठाणा णेया- इगतीसएगविणा ॥६३॥ एगविणातेउए तिवीस छब्बीसहीणप- म्माए सासाणेअटवीसतिअ इगतीसजुयचपरिहारे ॥६४॥ ना- णचउओहिदसे, उवसमपवगेअछेअसामाइए आइतिबध विणायण एगविणावेअगेएए ॥६५॥ अहखायकेवलदुगे अबधसुहुमेएग- विहबधो गुणतीसतीसनिरये मीसेअडवीसगुणतीस ॥६६॥ सुक्काएतेवीसगछवीसहीणाय तेउएभगानिरविगलमुहमतिगे- हीणाइगविणुपम्माअतिरिसुक्का ॥१॥ इति मा० बधस्था० ॥ ८ ८ . १ १ 123 सामाय छद्मस्थ ३ परि १ १ १ ० ८ ० ८ १ . १८ . . . १ १ ० . ० . . देस मिश्र . ८ २४ . . सासा . ३२०० . . . m W लेश्या ३ ४ २५ ६ . कर्मसवेधप्रकाण ६४०० ९ ९२४८ ८ ९२२४ ९२४८ ९६०८ ० १३९४२ १३८७७ ० १३९४१ लेश्या ते अनहारक १ . ९६१७१ ४६४० ४ ८ . . . . . . D के २ यथा लेश्या प लेश्या शु ० ८२२४ २ १ ० ८ ४६१७ । १ ९१ ४६४० १ ० १३८५२ ४६३६ ० १३९४१ ४६१६ ९। ९२४८ अवि ४ २५ กรดA ० बधस्थानानिमार्गणासु २५ २६ २८ २९ ३० ३१ om a ४ nd ९. ९२४८ । ४६४१ १ १ १३९४५ म पत्र यो ३ वे ३क ४ दशे २ आ- हाभ सजा १ शुक्व॥ था ५ इग १ विग ३ ४ | २५ १ ६ . ९२४० ४६३२ . . कर्मसोचमकरण ४ २५ Am ९ ९२४० ४६३२ ० ० ति १ मि असअभ ८ अजा ३ ० . सम ३ अवधि ७द नाण ३ ९ १ १ ३५ देव १ १ . ९२१६ ४६१६ . . १३८५० नारकी १ . . . . ० १३८३२॥

AAAM - कर्मसवेधप्रकरण ९७९ भगणाइज्ज सुहमेयरदहअजसेण यूलपज्जत्तजसपच ॥ ७७ ॥ एगिदिअइगवीसे, अदुयावरइगवितसथूलजुअ पज्जेजसअजसेणय, अजसापज्जेविगल्नवग ॥७८॥ नामघुवोदयतिरिदुग पणिदित- सथूलओअ इगभगोलद्विपज्जे असमत्तदुभगणाइजअजसेण कर- णअपजेपज्जे असमत्तगचउगसेअरेण तिरिदुगठाणेनरदुग खेवे- नवभगपुर्विव ॥ ८०॥ नामधुवमणअपणतस थूलपज्जत्तसुभग- आइज्ज जसवीसेभगेग कम्मणगेफेवलीअजिणे ॥१॥ जिण- जुअइगवीसते भगेगतत्थमणुअइगवीसे अनरदुसरदगजोगे अ- डनिरयेअसुहइगभगो ॥८२॥ एगिदिअ इगवीसे पुब्विविणुउरल- हुडउबघाया पत्तेगेअरवादस युलपवणेविउब्विइग ॥८३॥ इगच- उवीसेसपरिघ पणवीसथूलओपरित्तिअरे जसअजसेचउसुहुमे परि- त्तजुअभगअटगति ॥८५॥ एवनरखेउव्वे अटसाहारेपसत्थइगभगो देवेअडनिरयेइग भगाइगवीसउदउच्च ।।८६॥ इगपणवीसेउसास अहदुउज्जोअचारपुचिव पवणेइगइगवीसे विअलेतिरिपुविअवहारे ॥८७॥ उरलदुगहुडछेवट्ट परित्तउवधायसहिअनवभगा तिरिइग- वीसेपुव्वी हरखिवउवधायपत्तेअ ॥८८॥ उरलदुगागिइछक्के छग- सवयणेसुअन्नतमदुतय सवयणागिइगुणिया अडभगादुसयअडसीइ ॥८९॥ अपजत्तेइगअसुहो एवमणुए सुदुसयगुणनवइ बायरइग- उब्बीसे आयवउज्जोअ अन्नछग ॥९०॥ वेउन्धिअपणवीसे ति- रीएपरवासुगइजुअअठ्ठ एवनराभगा पणवीसुदउव्वनेअब्वा॥११॥ विअलछवीसेकुखगइ परवाजुअअट्टवीसभगछग तिरिछब्बीसेपरवा खगइसुअअन्नतमएगा ॥९२॥ पुन्बुत्तदुसयअटसीखगई दुगुणा वेउव्विसगवीसेतिरीयेउसासेवा उज्जोएभगसोलसग ॥९३॥ तिरि- अव्बउरलमणुए वेउवेसत्तवीसउस्सासे खित्तेअडउज्जोए इगआहारे- दुभगसुहा ॥९४॥ सुरसगवासेउसास उज्जोएवासोलइगनिरये- ९७८ कर्मसपेधप्रकरण घस्पान २३ २५ २६ २८ २९ ३० ३१ मिथ्यात्व ४, २५, १६ ४/२५/१६ ९९२४०४६३२ . . सासा . ० . . ८६४०० ३२०० मित्र . ० . ० o अवि ८ . ६ देस . ० . . . . v प्रमत्त ८ . . . अप्रमत्त o ८ . १ १ १ १ १ ० ० अपूर्व अनिवृत्ति ० ० ० १ १ १ . . . . o . . . सजिणाहाराभंगा, अनिअट्टिदुगे अइक्किक्क॥७३॥ वीसिग- वीसाचउवीसगाउ, एगाहीआअइगतीसा उदयठ्ठाणाणिभवे नवअङ्क यहुतिनामस्स ॥ ७४ ॥ एगबियालिकारस तित्तीसाछस्सयाणि- तित्तीसा बारससत्तरससया णहिगाणिबिपचमीईहिं ॥७५॥ अउ- णित्तीसिक्कारस सयाणहिअसतरपचसठ्ठीहि इक्किक्कगचवीसा दछु- दयतेसुउदयविही ॥७६॥ नामवोदयतिरिदुग थावरएगिदिद प्रायोग्यउदय २० २१ २४ २५|| २७ २८ २९ ३० ३१ ९ ८ एकेन्द्रिय ७ . १३ बेन्द्रिय ३ २ ६ ४ ० वेन्द्रिय ६ ४ चौरेन्द्रिय RW २ ४ ६ CC कर्मसवेधप्रकरण. मा तियेच २८९ ५७६ ११५२१७२८११५२ तिर्य वैकि ८ मनुष्य २८९ ५७६ ५७६११५२ मनुष्यवैक्री ८८ ८ ९ आहा २ २ ९८० कमसमेधप्रकरण. उसासेअपसत्यो १२०१२२८ गुणतीसेनिरिअजादुगुणा ।।९५।। विअलेतिरिजीसे उसासोजोअतमसे वेउनीअतिरीएपुण सगवीसेसुसरऊसासे ॥१६॥ ऊसासेउज्जोए सितेचासोल मणुअ अडबीसे ऊसासएपणसय उसयरिउगीए ॥९७|| आहार २ देव १६ निरए १ अटानीसुलभग २९ तीमुदये पियल्द्वानीसे- खिवसास १ सरअनचउभगा ॥९८॥ भासाअपज्जत्ताण सासो- ज्जोएसुभगद्गमेर भगाद्वारसरिअले सोसासेतिरिजगुणतीसे ॥९९॥ मुसरेवादुसरेवा सहीएनापन्निगारसयभगा वणसयउसपरि मुसरेसोज्जोएतिरिअगुणतीसे ॥१०॥ वेविअसगीसे सोसा- सोजोअसरपुअडभगा मणुएउज्जोअपिणा चावनिक्कास्सयभगा १०१ वेउविअसगवीसे ऊसासोज्जोअसरयुअ एगमुहभगआहारे एव- देवेसुअडभगा ३० ॥१०२॥ उज्जोअरहीअतिसे उज्जोएणेवहो- दुइगतीस भगानारसविअले बावनिक्कारसयतिरिए ३१ ॥१०३॥ केवलिअसमुग्वाए वासेसुषिवज्जउरल्दुगरिसह उवधायपत्तेअ सट्टा- णदइयछवीसुदओ ॥१०४॥ एसुहवतिअतीस परवा १ ऊसास ९ खगइसुरयोए वयणनिरोहेसरविणु २९ गुणतीसटवीससासविणा २८ ॥१०५॥ इगवीससत्तवीसा इगतीसाजिणवराणतिउज्जुआ योगनिरोहेसि तीसगुणतीसगानेआ ॥१०६।। मणुअगईजाइतस बायरचपद्यत्तसुभगआइज्ज जसतिछपरइयनव अडजिणरहीआअ- योगगुणे ॥१०७॥ उदयभगासम्मत्ता ॥बधेउदयस्थानानि॥ तिप- णअहिअवीसेउदया ९ इगवीसओअडइगतीसा एवगुणतीसवीसे चउवीसविणायअडवीसे ॥१०८॥ इगतीसेएगेपुण तीसमबधेसु- सेसदसट्ठाणा चउपणवीसयरहिआ भगानेआयपुव्वत्ता ॥१०९॥ तिरिगइक्वसायअन्नाण-अचखुअविरयअभव्वचउसेसे मिछअसन्नी- असढे १८ उदयानववीसअढविणा ॥११०॥ वेचउवीसविणाअड- कर्मसवेधप्रकरण. सासाणेइगचउपण उनववीसायतीसइगतीसा विणुअडनवतणुयोए सुक्वाएतेअचउवीसा ३ ॥११६॥ इतिमार्गणासुउदयस्थानानि ॥ अथमार्गणासुभगका ॥ मणुआइचउगईसु । तिगईविणुनिअगईभ- वाभगा एगेदिअायाला पुढवीगुण चत्तअविउवा ६ ॥११॥ तावविणावणउदगे तेउसज्जोअहीणसविउव्वा पवणेविअलेविअला तसेसुएगिदिभगविणा ८ ॥११८॥ इगविगलविणासगळे कसाय- चउगे जिणभगविणा ससुएभगावयणे मणवेएतेअविगलविणा ७ ॥११९॥ इगविगलनिरयजिणपिणु पुरिसेइत्यीसुहारविणुतेविआ- हारतिछसुरविणु सढेतिगनाणुवहिदसे ॥१२०॥ इगविगलदिअ- जिणविणु पज्जचउगइभवायसामईए छेएनरपज्जुसुहा मणपरहारे- अणाहारा ॥११॥१२१॥ सुमेदुसयरितीसा सजिणाहक्खायगे- अअन्नाणे २ मिछाभवेहारग तिछविणासव्वभब्वेसु ७ ॥१२२॥ केवलदुगिजिणज्झुग्गा तिरिनरसुहेदेससयमेभगा मिछुम्भवपज्जत्ता इगविगलविणाविभगम्मि ४ ॥१२३॥ अजिणाहाराअजए साहा. रालेसतिगअचक्ख सुचक्खुसु इगबितिइदियजिणविणु वेअगितिना- गुव्य ७ ॥ १२४ ॥ खबगेतेजिणजुत्ता मीसदुगेठाणगायसन्नास जिणविणुपणदिभगा अडवीसजानरअपज्जा ४ ॥१२५॥ सवयणा- गइपणविणु विउविविणुतिरिअज्जअसन्निसु सेलेससमुग्वायग तणु- अपज्जअणाहारे २ ॥१२६॥ पम्हासुनिरयइगजिण विगलविण- - तिउगेअइगजुत्ता सुक्कासुसजिणइगविणु नाणुव्वाहारविणुवसमे ४ ॥२७॥ नवअडविणुतणयोए मिच्छेआहारतित्यविणुवीए बायरर विगल ६ गतिरि ८ नर ८ सुर८ पज्जाहुतिनत्तीस ॥१२८॥दोपु- णबायरपज्जा पणवीसेअठ्ठदेवपञ्चईया छब्बीसे ५८२ एगिदिय १३ अपज्ज ५ विणुनवइगुणतीसे ॥ १२९ ॥ तिसेतिरि ११५२ नर ११५२ सुर ८ जा इगतीसेतिरयजायपज्जत्ता तईए अणेगविगला

केवली
१
]
ne
१
१
--
१
८
१
८
देवता
ow
१
सर्व
१
१
O
कर्मसयेचमकरण
२८
नारकी
१॥
१
१ ४२ ११ ६००
१७८५ २९१०
३३ १२०२ १७८५२९१७११६५, १
नाणतिगचक्सुओहिवेअदुगे उबसमनेअगसीपम्हाअसुए असग-
२३।२५।२६, २१।२४।२५।२६।२७॥
पणवीसा ॥१११॥ विगले छगतेनिरपे इगपणसगअटनरहिआ.
२८१२९।३०१३१
२१।२५।२६।२७१२८१ | वीसा देवेते ६ तीसयुआ सुहमेपरिहारगेतीस ७ ॥११२॥ पण
२९।३०३१ सगअटनवसहिआ चीसातीसमणे १ दुसामईए २ देसेइगतीस-
२९।३० | २१।२४।२५।२६।२७) | युआ ६ गुणतीसतिमीसमणरयणे ७ ॥११३।। सबैभन्ये १
२८१२९।३०३१
नरतस पणदिखबरोसनच्छिचउवीस इगवीसाईज्झा सगतीसाइग-
३१११
थावरेपच ११ ॥११४॥ दसचउपणदीसविण केवल्दुगिसुदस-
अवध २०१२११२६।२०२८
२९॥३०॥३०॥३१॥९८
जमेउदया वीसिगपीसनवजड ४अणहारेसेस ८ आहारे॥११५॥

तेज १०] ३ ३ 124 ७ पवन ५/ ११ स ११३७ ० २६५८७ २७१२०२ १७८५२९१७११६५ कषाय ४ ०४१ ११ ३३/६०० ३२/१२०२१७८४२९११ ११६४ ७७८३ वचन १७२९११,११६५ ४०९३ कर्मसवेधप्रकरण m २८९९ मन १७२८९९/११५३ (४०६९ ०७६७० ० २६ ० २५५७८ २५/११९५ १७७१ २८९८११५२ . यु स्त्री २६ ० २४५७८ २४११९३ १७६९२८९७११५२ नपुसक १ ३३ ११) २४६०० २३११८४१७६६ २९०७११६४ ०७७१२ ज्ञा ३अ द. १ वेदक ११५ २१ । २६५७६/ २६/११९६ १७७२ २८९८ ११५२ ०७६७५ ९८५ २८ २९ १ मार्गणासुउदय २० २१ २४ २५ २६ २७ स्थानानि ९ ९८४ मनुज १ ९२८९, १० ५८७१ ५८८ ११५५ १ ११ १२६५२ तिर्यच ? २३/११/ १५/३११, १४५९८११८०१७५४११६४ . ०,५०८० देवता १ ८ ० ६ १६ ८ . . . नारकी १ १. १ कमसमेधारण ० एकेन्द्रिय ४२ विगल ९ ९ ९॥ १२ १८ पचेन्द्रिय १] २८ ०२६/५७८२७११९६१७७३२८९९ ११५३ ॥ १७६८३ म् ६ १२] जलवण ५/ १० ६ १२॥

२६५८४ चक्षु ० २६५८१ २६११९८१७७६ २९०४|११५६ ७६५७ ०/३०॥ २६/११९८ १७७६ २९०४ ११५६ . अचलेशा ३ ०७७८३ ०४१ ११, ३३६०० ३२१२०२१७८४ २९१६११६४ ०३० १० ३१५९० ३१११९५/१७७१२८९८ ११५२ तेज ७७०८ पद्म ० ०२६] ०२५५७८ २५/११९५ १७७१२८९८ ११५२ ७६७० १/ २७ ० २५/५७८ २६/११९५/१७७२२८९९११५३ ० ०७६७६ कर्मसवेधप्रकरण भव्य १४२ १११ ३३२६०० ३३/१२०२१७८५२९१७११६५ १ १७७९१ उपशम ० २७ ०२५/५७८ २५/११९४ १७७०२८९७११५२ . ०७६६८ क्षायिक २८॥ ०[ २६/५७८, २७११९६१७७३२८९९११५३ १७६८३ M मिश्र १७७०२९९७११५२ ०५८१९ ०३२ २ १९८२ ° ९२३१२ ११५२ ४०९७ ९८७ मनपर्याय १ ७४ | १४५ २९५ . ७४ १ १ १ १ १२ ०,७७७६ . केवल २ १ ११॥ १ २ २ अज्ञान ३मिछ १० ४१ ११ ३२६०० ३११२०० १७८२२९१५/११६४ १अभव्या५ विभग १६, २४ १७६९ २८९६ ११५२ . ०५८७३ २० सामा छे कासपेयमारणा ३०२ ० . ७६ ० ७६ १४६ परिहार १ .१४५ १४५ सूक्ष्म १ ७२ यथाख्यात १ २ ७४ १ ८४ ० २०१८४ २२० ३६२ १४४ देशविरति अविरतति ०१ ४११ ११, ३२६०० ३११२०० १७८२२९१५।११६४ ०,७७७६ कर्मसवेधप्रकरण ९८९ दुगअह्वसुरदुग रहिआठलसीइअहअसीईयूआनिरयसुरउक्कअसई उच्चलिआतेणउकेण ॥१३८ ॥ तेअनरदुअडसयरी उवसमसता- निरयतिरिदुचऊजाई यावरआयव दुग साहारणविणासीई॥१३९॥ जिणविण्तेगुणसीई ते आहारगविहीणउस्सयरी जिणविणतेपणस- यरी अडनवसताविउदउच्च ॥१४०॥ तेवीसतिगेणग अडवी- सेचउगसत्तगुणतीसे तीसेइगतीसइग इग बधेअटसतसा ॥१४१॥ उदयेसत्तास्थानानि ।। दुगअडपणसगनवसग अडनवनवपणतिग- तिगचकमा वीसाइसुउदएसु सतठाणाणिनेआणि ॥१४२॥ तिदु- नउईगुणनऊई अठयउलसीअसीईअडसयरी अविरयपणलेसासुअ- तिनउईविणमिछअन्नाणे १० ॥१४३॥ तेविणुगुणनबई इगया- वरविगलामणेसुतिरिए असब्वेतसपणभव्ये अणहारेनवडविणुयोए १८ ॥१४४॥ अडसयरिविणामणुए ११ नवठविणुदसकसायच- चक्खुदुगे सुक्काहारगसन्नीअ वेएसुय १३ नाणुवहिदसे ॥१४५॥ उलसीअडसयरीविणुअदपवेअगदेसदेवपरिहारे उवसमगेतिदुनबई गुणनवईचेवअडसीई ५ ॥१४६॥ युआसीगुणसीई उपणसय- रीहिंसुहमसामईए छेएनवसहीआ खवगाहक्खावगेनेआ ५ ॥१४७॥ तिनवईचउविणुकेवल दुगिछठाणादुसासणेमीसे दोन- वईअडसीईगुणनवईयुआयतेनिरए ५ ॥१४८॥ अडसीछलसीसीई अडसयरीमिछसभवाभब्वे १ उगद्गद्गचउपचसु सुअडतिसु- चउछगमेग ॥१४९॥ उदस्सुदीरणाए सामित्ताएनविज्जईविसेसो मूत्तूणयइगुयाल सेसाणसव्वपयडीण ॥१५०॥ नवउदओअयोगे उईरणातरमेअबुछिन्नामणुआउवेअणीए उईरणाअपमत्तजा ॥१५१॥ सेसाणपयडीण छेअसमयाउआलिगामोत्तू पडगहीआणयसमग अपडिग्गहीआणविसमति ॥१५२॥ अविभागवग्गफडुग अतर- ठाणचकडगायकमा लोगासखगुणाते योगठाणादलनिमित्त॥१५३॥ २३ सज्ञी ० २७ २६/१२७८ २६/११९६ १७७२ २८९८ ११५२ . ७६७५ असशी ३२ ११ ७ ४० ६ ३८ ४४ ६ ४४ ० २४८ आहार ० १११ ३३६०० ३३/१२०२१७८५२९१७११६५ . ०/७४६ अनाहार १ ४२ भ १ ४५ का यो १ ११४२ ११ ३३६०० ३३३१२०२१७८५२९१७११६५ . °४८९ २२ कमसमेधमकरण. अजएमेवदेसेवि ॥१३०॥ सुरनिरयदुहगतिविणा सुहसाहारामण्अजारहे अणहाराअपमत्ते पुरेसरपण- तिविणाते ॥१३१॥ इक्किक्कगचपरओ ठाणाइगवीस माइनवमिच्छे चउवीसविणासम्मे गुणतीसतिमीसिसा- साणे ॥१३२॥ इगवीसाइसत्तग सगट्टवीसविणएगतीसजा देसेसगवीसाई पणपणवीसेणयुत्ताते ॥१३३॥ इगतीसविणुपमाए गुणतीसअप्पमत्तगिअपुवा खीणजातीसेग अयोगिनवअदुगटाणा ॥१३४॥ योगी- जिणेवीसद्ग बावीसग छचअठ्ठठाणाइ-अपज्जत्तभवाभगा पिविखिआनत्यिमयभेजा ॥१३५॥ तिदुनाई- गुणनवई छलसीअसीइगुणसीइ अठयछपन्नत्तरिनवअट्टयनामसताणि ॥ १३६ ॥ तिनसनेसम्मे जिणवज्झुवसतजाव(नऊई आहारचेगविणुगुण नवइअटसीईजिणरहिआ ॥ १३७ ॥ निरपस- कर्मसवेवप्रकरण ९९१ मुहमनिगोआइखणप्पजोगवायरविगलअमणमणा अपज्जलहपढम- दुगुरू पज्जहसीअरोअसखगुणो ॥१५४॥ असमत्ततसुक्को सो पज्ज जहनिअरएवटइठाणा इगओणपएसा-अभवओणतगुणी- अदला ॥१५५।। सिद्धाणणतभाए उरलाईवग्गणातीअगुणओ सब्वेतेअगमाई चउफासविहीणणतगुणा ॥१५६॥ दुवअवुवाय- अचित्ता सुन्नापत्तेअवायरेसुहुमे गुस्खघेअवगाहो अणुणगुलअ- सखसो ॥१५७॥ जजाइलद्वदलीज णतसोसम्वदेसघाईण तत्तो- अघायधाण रसभेएअप्पबहुगति ॥१५८॥ अप्पेपयडीधे योग- ठाणेगुरूअगेगुरूओ ल्हुएल्हुओबधो दलमाणेदब्बमाणमिण ॥ १५९॥ अवगाहणायखित्त फुसणाअगुलअसखभागोज मुहमा- उदयेसत्तास्थानानि २३।२५। ५९।८६२०२७९।७५ ८०1७८ २१८९३।९२।८९८८१८६ २८ ४.९२१८९४८८ ८०७८१७६ २४५९२।८८८६८०७८ ७९३।१२।८९२५ ७९३।१२।८९।८८८६ ८८१८६१८० ८०/७८ २६) १९३२९२।८९८८१८६ ७९३३९२१८९ ८०.७९७८१७५ ८८१८६८०२७ ७९३३९२।८९८८१८६ ८०७६ १९३ २८८९३३९२१८९८८१८६। ९३३९२।८९ ७९१७५८० ८८१८०७९/२९ ९९३।१२।८८८६८० ७६३७५ ८९/७९।७६।७५ ३० ९९३।९२८९।८८८६॥ ८०.७९७६७५ ३१ ५९२।८८१८६८०७६ ९. ३८०७६९ ८३७९/७५८ २९ ३० ९ २० २१ २४ २५ २६ २७ २८ २९ ० ९९० ० . . ०२५/ . गुणस्थानेषुउदय- स्थाना मिथ्यात्व सासादन मिश्र अविरत देशविरत प्रमत्त अममत्त अपूर्व अनिवृत्ति सूक्ष्मसपराय उपशातमोह क्षीणमोह सयोमि अयोगि ०४१/ ११ ३२६०० ३१/१२०० १७८२२९१५/११६४ ३२, २ ८५८२ ९२३१२११५२ १७७०२८९७,११५२ २५५७६ २५/११९४ १७७०२८९७,११५२ २१४८/ २२० ३६२ २] ७६ ७६ १४६ ७२ १४४ ७२ ७२ ७२ ७२ २४ १] १ १ २ कर्मरायमरण २ १ ॥ प्रतिमापुष्पपूजासिद्धि॥ (आगमसारनो अन्तर्भाग--जूनी आगमसारनी प्रतियोमा आ विषय छे ) ऐनम सवत् १८०० ना वर्षे पूजाउपरि फूलनी चर्चा ते उपरे श्रीपडित श्रीदेवचद्रजीकृत प्रश्नोत्तराणि लिख्यते ॥ तथा कोइ पूछे जे प्रतिमानी पूजा तो पहेला आश्रवमध्ये लखी छे वेतो तुम्हे मृषावाद बोलो छो इहा प्रश्न व्याकरणमूनमा पाठ इम छेनही तिहा पाठ छे ते लिखीये छे ॥ अविजाणओ परिजाणओ विसयहेउ इमेहिंकारणेहिंकिते करीसणपोरकरणीवा विवप्पणीकूवसरतलागचितिवेतिखाति आरामविहार, धूमपागार, दारगोपूर अट्टालगचरीय सेतुसकमपासायविकप्पभवणघरसरणिले- णआवणचेइयदेवकुलचित्तसभाएवाआयतणवसई मूमिवरमडवाण- कएहींसति इहा पाच थावरना पाच आलावा छे तेहने छेहडे कोहा माणा, माया, लोभा, हिंसा, रती इत्यादि पाठ छे ते जे जीव इदीना सवादने माटे घेईअकहेता प्रतिमादिक करे ते आश्रवखाते ए पाठ छे पण एजानो पाठ नयी ते मृषास्ये (शा माटे) बोलो छो तथा प्रश्न व्याकरणसूत्रे वीजे सबरद्वारे जे आलावो छे ते लिखीये छे खबगपत्ति आपरीय उवज्झायसेह साहमी- एतवसिसिसवृद्धकुलगणसपचेईयडेनिज्झरठी वेयावच्च अणस्सी- ओदशविहबहुविहकरेई एआलावे आचारज प्रमुखचेईय कहेता जिनप्रतिमानो वैयावच्च करे निर्जरानाअर्थी अणस्सीओ कहेता जस कीर्तिनी वाठारहितयको वैयावञ्च दश प्रकार तथा अनेक - 125 ९९२ धर्मसोमण -- गुरूआलोओ कालोटिटाणमाण ||१६॥ अतग्मामालो अणुदपसरोजरामारोप समागणनभागे लोगग्गअगसमेभागे ॥१६१।। मोदेवममोमासो आगुनटसम्मगुरमेसा भाषा- पुणजहसभर मग्गणटाणेगुनेमा ॥१६२।। चउद्गतिगपण- चउतिग, तीसातीसासगठ दुगीसा, पीसगुणपीसतेरस बारमभाषा- गुणटाणे ॥१६३॥ योगाणुगाउस नामेगोएसमोरअहिओअ तत्तोनिग्यावरण दुनहिलोमोदेत नोनहीजो ॥१६४॥ तविपये जणिज्ज अहिलगुणमग्गणासुयोगानो उद्धरीअसमयाओ कम्मस- वेहगयमिण ॥१६५।। इयमम्मनपदा तन्वेअणओअसुहदु- हपत्ता तत्ययसमभापत्य कम्मसरजनिभावेज्जा ॥१६६।। परम- प्पानाणपुण झाणटाणचसिपयनिहाण तपुणकम्मरिगे कम्म- विवेगोअतनाणे ॥१६॥ अप्पगहोपरचाओ मज्जत्यत्तचधम्म- ज्जाणच आयमसुमहबई कम्मसरूपस्सनाणेण ॥१६८॥ अग्गा- हणीअपुवाओ उरीआपगईसगहागया तत्तोदेविदेण कम्मग- थाकयासुकया ॥१६९॥ ततोऊदरिऊण वाईसुकम्मभगसवेह सिरिजिणचदमुनिसर रज्जेभणीअसमासेण ॥१७०॥ सुविहियख- रयरगच्छे ॥ युगवरजिणचदसुरिसाहाए पाटगपुन्नपहाणा तस्सी- सासुमइसागरापुज्जा ॥ १७१॥ वरसाकुरगवायग तस्सीसापाठ- गासुयसमुद्दा सिरिएयसारअज्जा पुज्जाविज्जानिहाणाण ॥१७२।। सुयवायगागुणहा नाणधम्मा सुनाणधम्मधरा निवईणविसपुज्जा रायहसागणिप्पवरा ॥१७३।। तस्सीसेणयभणीअ देवचदेणआ- यसरणट्ठा नाणच्छ(पाययेपाय) सावगवरदेवरायस्स ॥ १७४ ॥ इतिश्रीकर्मसवेधभगप्रकरण समाप्त ॥ शुभभवतु ॥ कल्याणमस्तु॥ स १२७१ वर्षे द्वि आपाढ सुदि १ दिने श्रीजेसलमेर महादुर्गमध्ये लिखित भोजक किशोरचद श्रीमद् विक्रमपुरवास्तव्य प्रतिमापुष्पपूजासिद्धि ९९५ चम्मायरीया ए पाठ जूदो छे ज्ञाननो अर्थ करे ते सुयए पाठ जुदो छे तेमाटे चेइय शब्दे जिनप्रतिमानो अर्थ छे तथा तुम्हे पुछो जे द्वारका राजग्रहमें देहरा तथा प्रतिमानो पाठ किहा छ ? तेहनो उत्तर नदीसूत्रे अणुत्तरोक्वाइ तथा अत- गडना नोवनो पाठ जोज्यो तथा तुम्हे कहेस्यो इतला बोल उपासकदशाप्रसुखे दीसता नयी तेहनो उत्तर जे नदी तथा समवायागमे जे पाठ तेहनो कोण उत्थापि शके ते जोज्यो तथा पुज्यु जे किणे श्रावके प्रतिमा पुजी छे ? तेहनो उत्तर घणे श्रावके प्रतिमा पुजी छे ते पाठ श्रीभगवतीसूले तुगीया नगरीना श्रावको वरणव्या तिहा अमिगयजीवाजीवा इत्यादिक पाठ घणा छ तिहा एहवो पाठ छे असहिइझदेवासुरनागसू- वनजरकररकसकिन्नरकिंपुरिसगरुलगवाव महोरगादीएहिं देव गणेहिं निग्गथाओपादयणाओ अणतिकम्मणिज्झा निग्गथे पाद- यणेनिस्सकीयानिक्कखीयालद्वठ्ठागहीयठा इत्यादि जे आवक कोई जातिना देवतानो सहाज वाछता नयी तो कोई बीजा देव- तानी पूजा किम करे ? एहवा श्रावक जे देवने देव बुद्धि मानता हवे तेहनेज पूजे ते श्रावक थिवर आल्या तेवारे एक- वार सर्व एकठा मिल्या एहवो विचार कह्यो जे एहवानिय- थनो नाम साभल्यानो पिण महा लाभ छे तो तेहने वाइवा जाता सेवा करता तो महानिर्झरा महापर्यवसान कहेता मोक्ष थयो इम विचारी पोते पोताने घरे गया पछी सूने पाठ छे ण्हायाकयबलिकम्माकयकोउयमगलपायछित्ताशुदाप्पासाइसरपरि- हीआ अप्पमहग्वाभरणालकीयशरीरा सयाओगिहाओपडिनिरकमति तिहा नाह्या ते अपोल कीवा, कयनलिकम्माते देवपूजा कीधी कयकोउयमगल ते तिलकादिक कर्या पछी वस्त्र पेहरीने ३ ९९४ प्रतिमापुष्पपूजासिनि प्रकारनो कर, इहा चईप रहेता प्रतिमा छ तो खोटी कट- पना स्यामाटे को मे १ तथा पीजे मने पउपो जे अहिं- साना ६० नाम कमा छे अभओरा पराजिनाराओनुरकाय- पित्तीपपापिमलप्पभा निम्मलकरीति पर माइणीनियगुणनिम्मि- याइ पजपनामाणितिनाहिसाए ॥ तिहा प्रतिमा तथा पूजानो नाम नयी वेहनो उत्तर तिहा अहिंसानो नाम जाणो वेदनो अर्थ देवपूजा छे एजा पहनो दयानो नाम छे तो अजाण्पोइमस्य प्ररुपणाकरो को ? वीजु पूजातो श्रीअरिहत प्रतिमानी ते तो विनय तया वेयापच ते अम्भ- तर तपना मेद छे ते तप मोक्षनो मार्ग छे श्रीउत्तराध्ययन सूने २८ मे अध्ययने तप ने मोसना च्यार कारण क्या ते मध्ये गण्यो छे तथा तो परये पुग्यो जे नोलनी खबर नहवे ते विचारी बोलीये तथा आवके कोणे देहरा कराव्या १ तथा प्रतिमा पूजी? तेहनो उत्तर श्रीसमवायागसूने तथा नदीसूत्रे सर्व आगमनो नूध छे तेमध्ये ए पाठ छे तिहा उपासकदशानो नोध छे ते आलावो छे ते लखीये छे सेकिंतउवासगदसाओ उवासगदसासणसमणोवासगाण नगराईउज्झाणाइ चेइआइवणसडाइ समोसरणाइरायाणोअम्मापियरो धम्मायरिया धम्मकहाओ इहलो आपारलोईया इद्रिविसेसा भोगापरीआउ सुअपरिग्गहीआ तवोव- हाणाइसीलव्वयगुणवेरमणपच्चख्खाणपोसहोक्वासपडिवज्झणापडि- माओउवसग्गसलिहणाओ भत्तपञ्चरकाणइयाउवगमण देवलोगगमण सुकुलपच्चायापुणबोहिलाभो अतकिरीयाआधरिज्झति ए पाठ छे इहा चेइयाइशब्दे देहरा तथा जिन प्रतिमा जाणज्यो इहा चेइय एहनो अर्थ बीजो थाये नही, जेवननो अर्थ करे तेतो उद्यानवनखडनो पाठ जूदो छे कोइ साधुनो अर्थ करे ते

प्रतिमापुष्पपूजासिद्धि
सूनमध्ये गुरुनी पाटनी आशातना टाल्वी कही छे, ते पाट
अजीव छे तेपीण सर्व गुरुनो बहुमान छे, प्रतिमाने बहुमानें
सिद्धनो बहुमान छे तथा सुधर्मा सभामाहि जिननी दाढा छे
ते वदनी पूजनीक छे, तेतो अजीव स्कव छे तथा तुमे लख्यो
जे परदेशी राजाए प्रतिमा का न करी ? ते परदेशी पावक
थया पछी केटलोक जीव्या छे ते तथा सर्व भावक एकज
करणी करे ए स्यो नियम छे १ तथा परदेशीए तथा आणद
श्रावके कोइक साधुने पडिला या नथी तेमाटे तुझे साधुनी
वीहराव्यामे दोष मानस्यो ? ए विचारी ज्योज्यो तथा लख्यु
छे जे सूरीयामे जे प्रतिमा पूजी ते राजधानीना मगलीक
माटे पूजा करी तेतो खोड बोलो छो, ए पाठ सूबमें नयी
सूत्र में तो एहवो पाठ छे "हीयाए सुहाए खेमाए निस्सेसाए
आणुगामीयत्ताए भविस्सइ निश्रेयस कहेता मोक्षभणी ए अर्थ
छे तथा पच्छा शब्दे जे इहलोकनो अर्थ छे इम कहे छे ते
मूढ़ छे, दर्दुर देवताने अधिकार पछा शब्दे आवता भवनो
अर्थ छे तथा आचारागसूने जस्सपूबियिनो तस्सपछायिनो
इहा पूर्व शब्दे पूठलो भव पछा शब्द आवतो भव लीधो छे
तथा ए भवे समकितनो लाभ ते घणो छे तथा तीर्थंकर
बाद्याना फलनो पाठ उवायि मध्ये तथा पचमहानत पाल्यानो
पाठ आचाराग मध्ये तिहा पण हियाए इत्यादिक पाठ छे ते
बे ठेकाणे लाभ मानो होतो जिनप्रतिमा ठामे ना स्याने कहो छो
अने विहा जिनप्रतिमा प्रजानो पापकयो नयी अने होय तो देखाडो
तुमे लिख्यु जे भगवते हिंसानी ना कही छे तेतोअमे किहा कहछु
जे हिसा करवी, पण भगवते किसे सूबे प्रतिमा पूजानी ना कही
नयी प्रतिमानी १७ प्रकारनी पूजा सूत्रे कही छे तथा तुमे

९९६
मतिमापुष्पालासिदि.
PARAN
आभरणारभार पहेयो, घरयी निया ए राते सिद्धार्थ राजा
तथा रुसमदत्त, गुदरशन शेठ इम गुभद्र पुन आपकरायपुष्कली
आपक कार्तिक शेठ पाया गया छे मारे कपत्रटिकम्मा
तथा पठी घरे आनी साहमीपटल करीने दाक्षा ठेवा नि-
फ्ल्या तेवगरे न्हाया कपारिश्म्मा ए पाठ छे, इत्यादिक श्रावक
अन्य देवनी पूजा न करे गोरज न पजे, अरिहत देवनेज पूजे,
तथा कोइ कहेस्से कपालिकामा पाठ कठीयारा प्रमुख अनेक
थानके छे तेमा स्याना छे ? पोते जेहने देवयुद्धे माने ते वेहने
पुजे तथा देवदत्त नाटके कीम पुजा करी हशे वेतो वाल्कने
मावीने पुजा करावी तो का न करे ? आज पण पालक पुजा
करता दीसे छे तो कयनलीकम्मा ए पाटनो वीजो अर्थ शाने
करो छो ? तथा दीक्षा महोच्छव घणा दीसे छे पण तिहा
देहरा प्रतिमानो पाठ नयी तेहनो उत्तर जे दीक्षाने उतावला
थयो तेवा, साधुने वहोराव्या रह्या नयी तो देहरा कराववा तो
घरे स्याने रहे ? अने पहेला देहरा प्रतिमा छे तेतो नदीसूत्रे
आगमनो घणो पाठ जोस्यो तो सर्व समो पडशे तथा तुम्हे पुछयु
जे तीर्थक्रग्रहस्स्छपणे उता साधु साध्वी श्रावक श्राविकाए
वाया नथी तेनो उत्तर घणा वाया छे ते पाठ ज्ञातासूत्रमा
छे तया तुमे लख्यो जे प्रतिमा एकेन्द्रिदल छे तेहवो वचन
ससारनो जेहने भय नहवे ते बोले १ जे कारणे श्रीभगवतीजी
तो जिणपडीमा क्ही बोलावी छे देहराने सिद्धायतन कही
बोलाव्यो तो तुमे कटोर वचन स्याने बोलो छो तथा तुमे
दिसीवदना करो हो ते दीसी तो अजीव छे तो कीम वादो
छो ? तिहा तुम्हे कहेस्यो जे अम्हारा मनमें तो सिद्ध छे
तो जिनपडिमा वादता पिण अमारा मनमा सिद्ध छे तथा

प्रतिमापुष्पपूजासिद्धि ९९९ नाणनाओजिणवरेहिं ॥१॥ एहनो अर्थ गीतार्थ होय वे पोते विहार करे अथवा गीतार्थनी निश्राये पिहार करखो एयी तिजो विहार अरिहते आज्ञा दीधी नथी ते माटे तुमे किस्या गी- तार्थनी निश्राये विहार करो ठो, तथा योग उपधानवहीने सिद्धात भणे तेपण श्रावक आचारागादिक सून भणे नही ते निशीथमा कयो छे जे भिक्खुअन्नत्यीय वागारस्थियवावा- यण वायजत्त साइज्जति तस्सचोमासीयपरिहारठाण जे ग्रहस्थने सूत्र बचावे अथवा वाचताने अनुमोदे वेहने चारमासनो पाल्यो चारित्र जावे तथा प्रश्न व्याकरणमूने अकेरिसीयपुणसबनुभा- सियत्व जत्थदवेहिगुणेहिंपज्जवेहि कम्महि बहुविहेहिं आगमेहि नामरकाय निराय उवसग्ग तद्विअ समास सधिपद जोग उणादि कीरियावीहीणसर धाउ सर विभत्ति वन्न जुत्त भासियत्वे तथा अनुयोगद्वारे ७ नय ४ निक्षेपाकाल तिन, लिंग तीन, जाण्या पछी उपदेश देवो ते मारग नथी इत्यादिक अनेक बोल छे ते गीतानी सेवनाथी पामीये इतिभद्र ॥ जे केइ श्रीजिनप्रतिमानी पूजा मध्ये फूल पूजानी शका करे तेहने कहीये जे श्रीरायपसेणीसने १७ भेद प्रजाना पाठ छे पुप्फारुहण १ मालारुहण २ तहवन्नयारुहण ३ तथा पुप्फ- पगिहपुप्फपगर एतलीपृजा फूलनी छे ८ तेमाटे पूजा फूलनी ते प्रमाण छे तथा श्रीभगवतीमूचे पण सूरीयाभनी पेरे पूजानी भलामणना पाठ अनेक छे तथा ज्ञातासूत्रे द्रौपदीने अधिकारे १७ प्रकारी पूजाना पाठ छे तथा समवायागसूते चोत्रीस अति- शयने अधिकारे " जलय थलय भासुरदसद्ववन्नणजाणुस्सेहप्प- माणमित्तेण पुप्फपूजोवयारकरइ इत्यादि पाठ छे" इहा समवायाग सूत्रमे देवता मनुष्यनो नाम कह्यो नयी तथा श्रीउववाईसूत्रे ७ ९९० मतिमापुष्पालासिति प्रतिमानी पूजा हिसांग गणोते इम नी प्रतिमानी पूजा तो विनय तया या धर्ममा जे. तया पूजा हिंसामे गणी तो टाणागे नदी में पहली सालीने साकाडे तेमा हिंसा गणी नहीं, तथा नाचारागम्प पीजा सा अजाणे पण शर्क रानी भूले लूण पीहरीने परे जागे जे लूण वोहरायो ते जाणी ते पोते साये ते पोते पीये तया जीजा सासभोगाने आपे के सायेपीए तथा साउमिपमाटे वेटने रूपने स्ताने गुठाना अपलनी उत्तरे जे ए पाठ जाचारागमूनेछे तथा भग- वती सुतमे साधुना हरस काढे तेहने क्रियाकर्म लागे नहीं तथा मल्लिनायजी पतलीमे काला मूझ्या तेमाटे धर्म माटे हिंसा करी तथा सुवुद्धि मनिए पाणी पलटान्यो ते धर्म माटे करी पिण मदबुद्धी न कया ते भगवतीसूने २५ मे शतके साघु शासन माटे वेजोलेश्या मुके तेहने आराधक कह्यो, तथा जबूद्वीपपन्नत्तीए निर्वाण महोटल कोंछे बूभकर्यातेजिणभत्तिए धम्मेत्तिए पाठछे इम केटला पाठ लीखीये ? अनेक पाठ छे। तथा नदी सूने जे आगम कदा ते उत्थापीने ३२ भानो छो ते केनी आज्ञा छे १ तथा आवश्यक सूनपडिकमणा विना साधुपणो श्रापकपणो हुवेज नही ते तुम्हे आवश्यक सूत्रपडि- कमणो मानता नथी तो श्रावकपणो ने साधुपणो केम धरो' छो ? धरावो छो' श्रीभगवतीसुने साधु साध्वी श्रावक श्राविका पचमाआराना छेहटा पर्यंत कद्या छे ते तुमारी श्रद्धा हिवणा साधु सावी कोण छे १ तथा सूत्रे आचारज उपाध्याय कुल- गणनीनिश्राये विचरे ते आराधक ते तमे कोनी निभाये विचरो छो१ ते लिखज्यो, तथा श्रीभगवतीसुत्रे गाथा छ । पढमोगीयत्थवीहारो वीयोगीयत्थयनिसीओभणीओ इत्तोतइयविहारो ६ प्रतिमापुष्पपूजासिद्धि ९९९ नाणनाओजिणवरेहिं ॥१॥ एहनो अर्थ गीतार्थ होय ते पोते विहार करे अथवा गीतार्थनी निश्राये रिहार करवो एथी तिजो विहार अरिहते आज्ञा दीधी नयी ते माटे तुमे किस्या गी- तार्थनी निश्राये विहार करो छो, तथा योग उपधानबहीने सिद्धात भणे तेपण आवक आचारागादिक सूर भणे नहीं ते निशीथमा कयो छे जे मिक्खुअन्नत्यीय वागारत्थियवावा- यण वायजत्त साइज्जति तस्सचोमासीयपरिहारठाण जे ग्रहस्थने सूत्र वचावे अथवा वाचताने अनुमोदे तेहने चारमासनो पाल्यो चारित्र जावे तथा प्रश्न व्याकरणमूने अटकेरिसीयपुणसबनुभा- सियन जत्थदहिगुणेहिंपज्जवेहि कम्भेहि बहुविहेहिं आगमेहि नामरकाय निवाय उपसग्ग तद्विअ समास सधिपद जोग उणादि कीरियावीहीणसर वाउ सर विभत्ति वन्न जुत्त भासियचे तथा अनुयोगद्वारे ७ नय ४ निक्षेपाकाल तिन, लिग तीन, जाण्या पछी उपदेश देवो ते मारग नयी इत्यादिक अनेक बोल छे ते गीतानी सेवनाथी पामीये इतिभद्र ॥ जे केइ श्रीजिनप्रतिमानी पूजा मव्ये फूल पूजानी शका करे तेहने कहीये जे श्रीरायपसेणीसने १७ भेद पूजाना पाठ छि पुप्फारुहण १ मालारुहण २ तहवनयारुहण ३ तथा पुप्फ- पगिहपुप्फपगर एतलीप्रजा फूलनी छे ८ तेमाटे पूजा फूलनी ते प्रमाण छे तथा श्रीभगवतीमूने पण सूरीयाभनी पेरे पूजानी भलामणना पाठ अनेक छे तथा ज्ञातासूत्रे द्रौपदीने अधिकारे १७ प्रकारी पूजाना पाठ छे तथा समवायागसूते चोनीसं अति- शयने अधिकारे " जलय थलय भासुरदसवन्नणजाणुस्सेहप्प- माणमित्तेण पुष्फपजोवयारक्रेइ इत्यादि पाठ छे" इहा समवायाग सूत्रमे देवता मनुष्यनो नाम कहो नथी तथा श्रीउववाईसूने ७ ९९० मतिमापुष्पाजासिनि. मतिमानी पूजा हिसाम गणोते इस नयी प्रतिमानी पूजा तो पिनय तथा यायचर्ममा . तया जा हिसामे गणी तो टाणागे नदाम पनी साधीन सा काढे तेमा हिंसा गणी नहीं, तथा आपरागम्यमीजा सा अजाणे पण शर्क- रानी भूले लण पीहरीने पछे जागे जे लूण वीहराम्यो ते जाणी ते पोते साये ते पोते पाये नया वीजा सासभोगीने आपे के सायेपीए तथा साउ पिपमपाटे वेलने रूपने स्ताने गूठाना अपनी उत्तर जे प पाठ आचारागमूछे तथा भग- वती सुनमे सावुना हरस काढे तेहने क्रियाफम लागे नहीं तथा महिनायजी पतलीमे काला मूझ्या तेमाटे धर्म माटे हिंसा करी तथा सुबुद्धि मनिए पाणी पल्टायो ते धर्म माटे करी पिण मदबुद्धी न कया ते भगवतीसूने २५ मे शतके साधु शासन माटे तेजोलेइया मुके तेहने आराधक कह्यो, तथा जबूद्वीपपन्नत्तीए निर्वाण महोग्य कर्यो छे थूभकर्यानेजिणभत्तिए धम्मेत्तिए पाठछे इम केटला पाठ लीखीये १ अनेक पाठ छे ।। तथा नदी सूने जे आगम कह्या ते उत्थापीने ३२ मानो छो ते केनी आज्ञा छे ? तथा आवश्यक सूरपडिकमणा बिना साधुपणो आवकपणो हुवेज नहीं ते तुम्हे आवश्यक सूत्रपडि- कमणो मानता नथी तो श्रावकपणो ने साधुपणो केम वरो छो ? धरावो को ? श्रीभगवतीसने साधु साध्वी श्रावक श्राविका पचमाआराना छेहटा पर्यत कया छे ते तुमारी श्रद्धा हिवणा साधु सान्वी कोण छे' तया सूने आचारज उपाध्याय कुल- गणनीनिश्राये विचरे ते आराधक ते तमे कोनी निश्राये विचरो छो१ ते लिखज्यो, तथा श्रीभगवतीसुरे गाथा छे k पढमोगीयत्थवीहारोबीयोगीयत्थयनिसीओभणीओइचोतइयविहारो द प्रतिमापुष्पपजासिद्धि १००१ स्सीओजावअण्णेनहवेवाणमतरादेवादेवीउ अप्पेगतियाउप्पलहत्थ- गताजावसतसहस्सपत्तहत्थगयाविजयदेवपिओअणुगच्छइरत्ता" इहा फूल चूटी लीधा छे ए आलावे विजयदेवे पोते वावडी में उतरीने फुल चटी लीधा तथा सामानिक देवता तथा बीजे देवताये पिण फल पोताना हाथयी लीधा छे इहा कोइ पूछस्ये जे तिहा कोई माली नथी ते माटे पोते लिया तेहनो उत्तर जे माली नयी पिण देवता चाकर लोक घणा छ तेहनेज पासे का न मगावे जो पुष्प आण्यानो विधि होवे तोपण पोताना हायी लीधानो विधि छे तेमाटे पोते वावडी मध्ये उतरी लीधा छे तथा श्रीरायपसेणीसूने सूरीआभाधिकारे " ततेण से सरियामेदेवे पोत्थरयणगिण्हइ, पो र गिता पोत्थरयणमुयइ, पोत्यरयणविहाडेइ,त्ता२ पोत्यरयणवाएति,त्ता२ धम्मियववसायगिण्हइ, २ त्ता पोत्थरयणपडिणिकखमति २ त्ता सीहासणाओअब्मट्टेइ २ त्ता ववसायसभाओपुरत्यिमिल्लेण दारेण पटिणिकखमइ २ त्ता जेणेव णदापोरकरिणि तेणेव उवागच्छइ २ त्ता णदापोकखरिणी पुरत्यिमल्लेण तोरणेणतिसोयाणपडिरूवेण पञ्चोरुहत्ति २ त्ता हत्यपायपकखालेइ २ ता आयते चोक्खे परमसुइभूए एगसेयमहरययामय विमलसलि लपुण्ण मत्तगयमुहा- गितिसमाणमिगार पगिण्हति पच्चोरुहइ २ ता जाइतत्यउप्पला- इजावसयसहस्सपत्ताइगिण्हति णदाओ पुस्खरिणीओ पच्चोरुहइ २त्ता जेणेव सिद्धायतणे तेणेव पहारेगमणाए तएण त मुरिया- भदेव चत्तारिसामाणियसाहस्सीओ जाव सोलसआयरस्खदेवसा- हस्सीओ अण्णेयबहवेसरियाभविमाणे जाव देवा देवीओअप्पे- गइया उप्पलहत्यगया जापसत्तसहस्सपत्तहत्थगया सूरियाभ देवपिठ्ठओसमुणुगच्छति ततेण सूरियाभदेवरहवेआमिओगिय 126 ९ प्रतिमाएपनामिबि. कोगिफने अधिकार र समोसा रोवार नेकजन चपायी निरल्या जे "अगइमापदणातियाए अपंगड्यापूयणवत्तियाए अप्पेगइयागुपसुपरसामो जगइयापिउलाइ जहाजोदेओलाई अ. सिगाइगहिरसामो" इत्यादि पाठछे तिहा पूपणपतीयाए ए पाटनो अर्यटकामध्ये पूजनपुष्पमारादिना इम कमो छे इहा श्रीती- करने पूफनी गजा दीसे छे ए पाठयी श्रीभगतीमूने पण छे तथा नदीसूने अवज्ञाने पाठे जेम मरिहतेहिं भगवतेहिं उप्पानाणदसणधरेहिं निल्लुकनिरस्सीय महीअपईणह पाटनो अर्थ टीकाकार पिण महीय शब्दे चदनादि पुइपहिंपुष्फमालादिके करीने ए पाठ अनुयोगद्वारमध्ये पण छे इम पुष्फपूजाना अनेक पाठ छे, ते मारे सफा न करवी पली केइक इम कहे छे जे फूल वेचाता जडे ते चाववा पण पोते चूटी चढाववा नहीं तेपण अजाण्यु कहे छे जे " श्रीजीवामिगमसूरे "ततेणसेवि- जएदेवेपोत्ययरयणगिण्हइ पो र गि पोत्ययरयणमुयति पो २ त्ता पोत्थयरयणविहाडेति पो २ ता पोत्ययरयणवाइए पो २ त्ता धम्मियववसायपिगेण्हेतिध २त्ता पोत्थयरयणपडिनिख्खमति पो २त्तासीहासणतोअम्भुटेतिसी २ त्ताववसायसभातोपुरथिमिल्लेण- दारेणपडिनिख्खमइ प२ ताजेणेवणदापुफ्खरणीतेणे व उवागच्छति २ ताणदापुख्खरिण अणुप्पयाणिकरमाणे पुरथिमिल्लेण तोरणेण अणुपविसति २त्ता पुरथिमिल्लेण तिसोपाणेपडिरूवेण पच्चो- रुहति २ त्ता हत्थपाद पख्खालेति ह २ ता एगमहसेतरजता- मय विमलसलिलपुण्णमत्तगयमहामुहागिइ समाणभिंगार पगिण्हति प २त्ता जाइतत्थउप्पलाइपउमाइजावसत्तपत्ताइसहस्सपत्ताइताइगि- ण्हति २ त्ता णदातोपुख्खरिणिओपच्चुत्तरेइप २ ताजेणेवसिद्धा- पतणेतेणेवपाहारेत्थगमणाइतएणतविजयदेवचत्तारि सामाणियसाह- ८ प्रतिमापुष्पपजासिद्धि १००१ स्सीओजावअण्णेयवेवाणमतरादेवादेवीउ अप्पेगतियाउप्पलहत्य- गताजावसतसहस्सपत्तहत्थगयाविजयदेवपिठ्ठओअणुगच्छइरता" इहा फूल चूटी लीधा छे ए आलावे विजयदेवे पोते वावडी में उतरीने फूल चटी लीधा तथा सामानिक देवता तथा बीजे देवताये पिण फूल पोताना हाथयी लीया छे इहा कोइ पूछस्ये जे तिहा कोइ माली नयी ते माटे पोते लिया तेहनो उत्तर जे माली नयी पिण देवता चाकर लोक घणा छे तेहनेज पासे का न मगावे जो पुम्प आण्यानो विधि होवे तोपण पोताना हाथथी लीधानो विधि छे तेमाटे पोते वावडी मध्ये उतरी लीया छे तथा श्रीरायपसेणीसू सूरीआभाधिकारे ततेण से सरियाभेदेवे पोत्थरयणगिण्हइ, पो र गि त्ता पोत्थरयणमुयइ, पोत्थरयणविहाडेइ, ता२ पोत्यरयणवाएति, ता२ चम्मियववसायगिण्हइ, २ त्ता पोत्थरयणपडिणिकखमति २ ता सीहासणाओअमुझेइ २ ता ववसायसभाओपुरथिमिल्लेण दारेण पटिणिकखमइ २ ता जेणेव णदापोरकरिणि तेणेव उवागच्छड़ २ त्ता णदापोकखरिणी पुरत्थिमल्लेण तोरणेणतिसोयाणपडिरूवेण पच्चोरुहत्ति २ त्ता हत्थपायपकखालेइ २ त्ता आयते चोक्खे परमसुइभूयु एगसेयमहरययामय विमलसलि लपुण्ण मत्तगयमुहा- गितिसमाणमिगार पगिण्हति पच्चोरुहइ २ त्ता जाइतत्थउप्पला- इजावसयसहस्सपत्ताइगिण्हति णदाओ पुस्खरिणीओ पच्चोरुहइ २ ता जेणेव सिद्धायतणे तेणेव पहारेगमणाए तएण त मरिया- भदेव चत्तारिसामाणियसाहस्सीओ जाव सोलसआयरक्खदेवसा- हस्सीओ अण्णेयबहवेसरियाभविमाणे जाव देवा देवीओअप्पे- गइया उप्पलहत्यगया जावसत्तसहस्सपत्तहत्थगया सूरियाभ देवपिठ्ठओसमुणुगच्छति ततेण सूरियाभदेवरहवेआमिओगिय 126 १००२ मनिमापुपानासिद्धि देशप देवीओय जगपाल राहत्यगपाओ जापअप्पेगइया यू उकडहत्यगया इस्राष्टानामनागरिमाम देशपिटओसमगुगच्छति तेतेण णे मूरिया नेदो चउहि सामागियसाहसीहिजारअण्णेहियर- हृहिंसरियामपिमाणातीहिं दोहि देवी दिपराद्विसपरिबुडेरावडीए जारणाइसरोण जेणे सिद्धापपणे तेणे गन्इ सिमायणपुर- त्पिमिल्लेग दारेणे अगुपविराति रत्ता जेणे देवउदए जेणेच जिण पडिमाउ तेणे यागन्इ जिगपडिमाणआलोए पणामक्रेतिरना रोमहत्यगगिण्इ २ ता जिणपडिमाण लोमहत्वएण पमज्झइ २त्ता जिणपडिमाओमुरमिणागधोदएणण्हाणेति ण्हाणित्तासरसेण गोसीसचदणेणगायाण अलिप्पइ २ ता जिणपडिमाणअहि- याइदेपदसाइ जुयलाइ णियसेइ २ ता पुफरदण मल्लारहण चुणारुण गवारुहण गारुहण नुण्णरुहण वत्यारहण आमरहण करेइ करेताआसत्तासत्तविउलवववग्वारियमल्लदामक- लाव करेइ२ त्ता कपग्गहगहित्तकरयल पम्भठ्ठ विष्पमुक्केण दस- दवण्णेण कुसुमेण सुफपुप्फ पुजोवयारफलिय करेति करेत्ता जि- णपटिमाण पुरतोअच्छेहिसण्हेहिंसेएहिरयणामएहिं अच्छरसतदुले- हिं,अट्ठमगलेआलिहइ तजहासत्थियजावदप्पणतयाणतरचणचद- प्पहरयणवइवेरुलियविमलदडकचणमणिरयणभत्तिचित्तकालागुरुप- वरकुदरक तुरुस्कवूवमघमघतगवत्तामाणुचिकृति ववद्विविणिमुयत वेरुलियमयकडुछयपग्गहियपयतेणधूवदाऊण जिणवराण अठ्ठसय- विसुद्धगधजुत्तेहिंअपुणरत्तेहि महाचित्तेहि सथूणइ सत्तकृपयहि पच्चोसरूहइ २त्ता वामजाणुअचेइ दाहिण जाणुधरणितलसिनिहट्ट- तिक्खूत्तोमुदाण वरणितलसि णिब्बोडेत्ति २ ता इसपच्चूण्णमई इसिंपच्चूणमित्ता करयलपरिग्गहियसिरसावत्त मत्यएयज एव- वयासी णमोत्युणअरिहताणजावसपत्ताणवदति णमसइ २ त्ता प्रतिमापुष्पपूजासिद्धि १००३ ए रायपसेणीमूने पाठ छे सूरीयाभे पोते हाथे फूल चूटी लीधा छे, सामानीक ममुख पासे मगाव्या नयी तथा जबुद्धी- पपन्नतीमे जन्माभिषेक जेणेवरखीरोदसमुद्दे तेणेव आगमखीरो- दग गिएहति २त्ता जाइतत्थ उप्पलाइ पउमाइ जावसहस्समत्ताइ तावगिण्हति २त्ता इत्यादि मूत्रमे पाठ हायना चुट्या फूल लेवाना छे तथा कोइक कहेसे जे एतो चुट्या नी सहेजे पड्या लीधा छ तेहने कहीये छे, जे हजारगमे सहेजे यूट्या वा- वडीमध्ये हवेज नही, तथा निगाइने अधिकारे निगाइ राजाए आनानी माजरीयो पोते चुटी लीधी तेवारे कटक बधे चुटी लीधी ते पाठ उपवायीमध्ये जोजो अन्नयाजुत्तनिग्गओपेड़ कुसुमाचूअराइणायेगामजरागहीयाएवरकधावरेणलयोण मजरी- पत्त पवाललयाइ कठ्ठाविसेसो कओ पडिनियत्तओपुच्छइ कहे सोरुस्खोअमच्चणादसलओ कहए सयावेत्थोभणइ तुम्हेहि एगा- मजरीगहीयापच्छसव्वणगहेतेण एवकओ ॥ इहा गहीय शब्दे चू- ट्यानो अर्थ छे, तथा कोइ कहेस्ये जे एतो देवताये कयों होते आवके करयानो किहा पाठ नयी तेहने कहीये जे जो देव- तानी करणी ताहरे न करवी तो शकस्तव किम करे छे ? तथा स्नान केम मानो छो ? स्नार नो कलस ढोलो छो ते देवतानी करणीज छे, तथा सूरीयाभनी पूजानी भलामण द्रौप- दीने पाठे छे देव अने पूजाकरणी तथा मनुष्यनो पाठ एकज छे तेमाटे देवतानी करणी प्रावक करे ए अद्वाप्रमाण छे तथा जे फूल चुटवानी ना कहे ते बीटनी जीवनि कामना माटे तेवारे फूलनी पूजा किम करी शके' अने फलनी पूजानो तो मुने पाठ छे तथा जे पूजाने हिंसामें गणे तेहने कहीये जे श्री प्रश्नध्याकरण भत्रे प्रथम सवरद्वारे अहिंसाना ६० नाम का sridewq- १००४ मनिमाणानासिद्रि छे तिहा ना ते दया का छे ते पाठ लिखीइ छे. अभ- उसयरसविलनायो मापवत्तीपयादिमटप्पभानिम्मरकत्ति एवमाणिनियगुणनिम्मिपाइपम्झापनामाणिति अहिंसाए भगवइ प इत्यादि पाठे ना ते हिंसामे गगी छे, तो तुम्हे हिंसामे किम गणो ? नया भगाती गर्ने "शुभयोगपटुच्च- अणारभा प पाठ शुभयोग प्रत्तिने आरभनी ना कही छे पिनय तथा वेयानच ते तपना भेद छे तप ते मोक्षमार्ग- मध्ये श्रीउत्तराध्ययने २८ मे अध्यपने को ते तुमे हिंसामें केम कहो ओ तथा निहारमूने सिद्धवेयापञ्चेण महानिज- रामहापज्झनसाणभति" तेमाटे सिद्धक्यावच्च ते पूजाछे तथा कोइ पूछे जे आरके प्रतिमा किहा पुजी छे वेहने केहवो जे श्रीभगरतीम्ने तूगीया नगरीने पावके पुजा करी छे शख पुष्क्ठीये पूजा करी छे तथा समपायागमूने द्वादशागीनी हूडीने अधिकारे उपासकदशानी हूडीमध्ये दश श्रावकना चैत्य एहयो पाठ छे ए पाटमे चैत्य तो साधु थाय नहीं, जान थाय नही, वृक्ष थाय नही ते सर्वना पाठ जुदा छे, तथा नदीमूने पिण पाठ छे तथा नदीमध्ये जे आगम कह्या ते सर्व माने तेज समकिती जाणवो श्रीअनुयोगद्वारसूत्रे नि- युक्तिनी हा कही छे ते नियुक्तिमध्ये पूजाना अनेक अधि- कार छ, तथा तदूलवेयालीपयन्नानी टीकामध्ये समवसरणना फूल सचित्त ते उपर साबु सान्वी चाले प्रवचनसारोदार टीकाये पण ए मत छे तथा कोइ कहेरये जे फूल्ने ग्रोइ नहो तेहने क्हीये जे हीरप्रश्नमध्ये का छे ते पाठ ॥ आददिनकृत्य तथा पचास- कमध्ये फुल मोवानो पाठ छे तेह हीरप्रश्नमध्ये जोइ लेज्यो ।

॥गुणठाणाअधिकार॥ (आगमसारान्तर्गत) , प्रथम गुणटाणानो विचार लखीइ छे प्रथम मिय्यात्वगु- णटाणु १, सास्वादनगुणटाणु २, मिश्रगुणठाणु ३, अविरत समकित गुणठाणु ४, देशपिरति गुणठाणु ५, प्रमत्तगुणठाणु ६, अप्रमत्तगुणटाणु ७, अपूर्वकरण गुणटाणु ८, अनिवृत्तिनादर गुणठाणु ९, सूक्ष्मसपराय गुणठाणु १०, उपशातमोह गुणठाणु ११, क्षीणमोह गुणटाणु १२, सयोगीकेवली गुणठाणु १३, अयोगिकेवलि गुणठाणु १४, अरिहतनाभाख्या वचन साचा करी सद्दहेनहि ते मिथ्यात्व गुणठाणो कहीइ, तेहना मेद पाच छे अभिग्गहिय मिथ्यात्व जे लीधो हठ मुकी सके नही १, अनमिग्रहिक मिथ्यात्व जे देव तथा कुदेव तथा गुरु तथा कुगुरु वर्म, अधर्म सरिखा करी माने परीक्षाबुद्दीनही २, अ- मिनिवेशमिथ्यात्व जे खोटाने खोट जाणे पण हठ मुकि सके नही ३, साशयिक मिथ्यात्व जे केवलिनाभाख्या वचन तेमा सशय उपजे पूरीपरतीत आवे नही ४, अनाभोग मिथ्यात्व जे काई जाणपणु उपजे नहि एकदीविकलेदीनी पेरे तथा श्रीठाणा- गमूने मिथ्यात्वना दसबोल कह्या छे, जीवने अजीव करी माने ते मिथ्यात्व १, तया अजीवने जीव करी माने ते मिथ्यात्व २, तथा वर्मने जवर्म परी माने ते मिथ्यात्व ३ तया अव- मने धर्म करी माने ते मिथ्यात्व ४, मोझोमार्ग ज्ञानदर्शन चारिनतप तेहने मोक्षमार्ग न माने ते मिथ्यात्व ५, तथा मोझनो मार्ग नयी ससारनो हेतु छे तेहने मोक्षमार्ग करि माने ते मिथ्यात्व ६, तथा मोक्ष गया नयी तेहने मोक्ष माने . . , १००६ गुणटाणाधिकार ते मिपाव ७, जे मोक्ष गया तदने मोल न माने ते मि- व्याय८,जे सा] पियविकार त्यागी तहने जसा माने ते मिथ्याय ९, तथा जे सा] नयी तेहन सा करी माने ते मिथ्याच १० ते मिप्यायनी चाल तीन प्रकारनी छे देव- गत मिथ्यात्व ते देव मरागि तेटने देवकरी माने १, बीजो गुस्गत जे कुगुरुने गुरु करी माने श्रीजो पर्यगत मिथ्यात्व ससा- रिपने धर्मनापर्ष करी माने ते मिथ्यात्व ते मिथ्यात्वनी स्थिति तीन प्रकारनी छे अनादि जनतनी अभव्य जापने, अनादि सात भन्यजीउने, सादिसात पडयाइने, ते जपन्य अतर्मुहूर्त उत्- ऋी अपुद्गल्परापत काईक उणी छे वीजु गुणटा सा- स्वादन ते कोईक जीन उपसमकितथी पटतो मिथ्यात्व गुण- ठाणे पोतो नयी चे उजापलिका रहे ते सास्वादन गुणठाणु कहीइ तेहनो दृष्टात छे कोइ पुरुष सीरखाड वृत जमीने तुरत वमतो होइ ते मता काईक स्वाद आबे तिम सम- कितियी पटता पिण काइक पासना रहे तेहने सास्वादन कहिइ २ नीजो गुणठाणो मिश्र कोइ जीप क्षयोपशम समकितथी पडी मिश्रमोहनीने उदये मित्रगुणठाणे आवे अथवा मिथ्या- त्वयी निकली समकित गुणठाणे आवता वचे मिश्रमोहनीने उदये मिश्र गुणठाणे आवे ते जीव अतमुहूर्त्तकालसीम रहे । एड्ने समकित मिथ्यात्वदृष्टि कहीइ एहनो दृष्टात कहे छे जे कोई जीव नालियरदीपमा वसतो होइ ते नालियरखाइ तेहने अनदीठे राग न उपजे तेम द्वेष पण न उपजे तिम ए जीवने जिनधर्म साचो साभलता राग पण न उपजे द्वेष उपजे नहीं एहवा जीवने मिश्रगुणठाणु कहीइ एहनी स्थिति अतमुहूर्तनी ३ चोथो अविरत समकित, तेहना बे भेद छेत्रण छे, तेहनो गुणटाणाअधिकार १००७ पेहलो भेद उपसमसमकित जे जीर अनादि मिथ्यात्व सज्ञी पचेंद्री पर्याप्तो कोई कारण पामीने ससारथी उभगे नरक निगो- दथी ते पामे, जनममरणना दुखयी वीहे तेबारे ए सर्व ससार खोटो जाणे, वर्म जाणवानी रुचि घणी करे, दयापाले, सनदे, तप करे, श्रावकना बार व्रत पाले, साधुना महावत पाले ते जीव यथाप्रतिकरणे वर्तता कहीइ, एतली करणीसुधी भव्य तथा अभव्य जीप आवे, नवग्रेवेयकसुवी जाए पण समकित पाम्यो नयी ते माटे लेखामा नावे, तोपण कोई जीव वैराग्य परिणाम सहित ससारने असार जाणतो साचा वर्मनी परीक्षा कस्तो सातकर्मनी थीति उत्कृष्टी खपावे, एक कोडाकोडी सा- गरोपम बाकी यीति सातकर्मनी रहे तेवारे अपूर्वकरण करे तेवारे एक ज्ञान मार्ग साचो की माने, द्विमदमभाव जाणवानी विशेष याइ तेवारे पछे एक आत्मा पोताना शरीरने रिपे रह्यो, पण अशरीरिछे अरुपी छे, अविनासी छे, अनतज्ञानमयी अनतदर्शनमयी, अनरुचारित्रमयी,अनतअगुरुलघुमयी, अनततप- मयी, अनतवीर्यमयी, निर्मल अलेप अखड छे, तेहना प्रदेश असख्याता छे, प्रदेशे २ जनता गुण अनता पर्याय छे, उप- योग लक्षण ते माहरो धर्म छे, ए वर्म जे जे करता प्रगट थाये, गुणीश्री, अरिहत, सिद्ध, आचारज, उपाध्याय, साबु तथा सिद्धात तेहनो विनय तथा वैयावच्च करवो, अरिहतना आगम प्रमाणप्रतीत राखे ते समकित कहीइ, ते समकितना तिन भेद छे उपसम समकित १ क्षयोपशम समकित २ क्षायकसमकित तिहा अनतानुनधिकपाये मिथ्यात्वमोहनी, मिश्रमोहनी, सम- कितमोहनी एसातप्रकृति उदये आवे ते खपावी अने उदये नयी आवी ते विपाकेउपसमावी छे, प्रदेसे उदये छे, समकितमोहनी उदय , , , ३ १००६ गुणटाणामधिकार ते मिपात्र ७, जे मोक्ष गया तहने मो-न न माने ते मि- प्यात्व ८, जे सा] पिपरिकार त्यागी तेहने असा माने ते मिथ्यात्व ९, तथा जे सार नयी तेहने सारी माने वे मिथ्यान १० ते मिथ्यात्वनी चाल तीन प्रकारनी छे देव- गत मिथ्यात्व ते देर सरागि तेहने देव करी माने १, वीजो गुरुगत जे कुगुस्ने गुरु करी माने जो परंगत मिथ्यात्व ससा- रिपने धर्मनाप करी मान ते मियाल ते मिथ्यात्वनी स्थिति तीन प्रकारनी छे अनादि अनतनी अभय जीरने, अनादि सात भन्यजीने, सादिसात पडझाइन, ते जवन्य अतर्मुहूर्त उत्- ऋष्टी अपुद्गल्परावर्त काईक उणी छे पीजु गुणटाणु सा- स्वादन ते कोईक जीन उपसमकितथी पटतो मिथ्यात्व गुण- टाणे पोतो नयी वचे उजापलिका रहे ते सास्वादन गुणठाणु कहीइ तेहनो दृष्टात छे कोइ पुरुप सीरखाड वृत जमीने तुरत वमतो होइ ते पमता काईक स्वाद आबे तिम सम- कितियी पटता पिण काइक वासना रहे तेहने सास्वादन कहिइ २ पीजो गुणटाणो मिश्र कोइ जीन क्षयोपशम समकितयी पडी मिश्रमोहनीने उदये मिश्रगुणठाणे आवे अथवा मिथ्या- त्वथी निकली समकित गुणठाणे आवता वचे मिश्रमोहनीने उदये मिश्र गुणठाणे आवे ते जीव अतमुहूर्त्तकालसीम रहे । एहने समकित मिथ्यात्वदृष्टि कहीइ एहनो दृष्टात कहे छे जे कोई जीव नालियरदीपमा वसतो होइ ते नालियरखाइ तेहने अनदीठे राग न उपजे तेम द्वेष पण न उपजे तिम ए जीवने जिनधर्म साचो साभलता राग पण न उपजे द्वेष उपजे नही एहवा जीवने मिश्रगुणठाणु कहीइ एहनी स्थिति अतमुहूर्तनी ३ चोथो अविरत समकित, तेहना बे भेद छेत्रण छे, तेहनो .

गुणठाणाअधिकार १००९ साचा जाणे ते निसर्गरुचि १ अभिगमरुचि जे जिनागमनासूक्ष्म अर्थ जाणवानी रुचि गुस्ना मुखथी उपदेशी जाणे ते उपदेशरुचि २ श्रीअरिहतफेवलीना कद्या वचननी आणा प्रमाण करे ते आ- णारुचि ३ मुनरुचि जिनसून साभलता साचा मारगनी परतीत उपजे समकित पामे ४ वीजमचि सिद्धातनु एकपद साभलता बनामोल्नु जागपणु आरे अद्धासमीयाड ५ अभिगमरुचि जे ११ अगादिक ८४ आगम तथा नियुक्तिनाग्य चर्णिटीका- ना अर्थ जाणे सर्व बोलना परमार्थ जाणानी रुचि ६ वि- स्ताररुचि ६ द्रव्यनाभार ४ निक्षेपेसातनये करी च्यार प्रमाणे करी जाणे ७ किया रुचि जे जीव जिनशासननी क्रिया साची करी सूत्रमा कही ते रीते कर आधीपाछी न करे ८ सक्षेपरुचि, जे जीव सिद्धातना जाणगीतार्थ आगमने अनुसारे जे अर्थ कहे ते साचा करी माने ९ वर्मरचि, आतमानो वर्म ज्ञानदर्शन चारिनमयी अरूपी आतमानो परिणाम भावदया प्रमुख गुणी श्री अरिहतादिकनो बहुमान वेयावच्च ते वर्म करी माने वीजा बाह्य तपनाह किरिया जे आगमना कद्या परमाणे करे ते वर्मनो कारण करी माने ते वर्मरुचि समकित मोक्षमार्ग मूल छे, समकित विना जे करणि ते ससार खाते छे (पण) मोक्षमारगनीन जाणे ए चोथो गुणठाणो कह्यो ४ पाचमो देशविरति गुणटाणो इहा जीरने तपञ्चखाण जावे जघन्ये एक नवकारसीपञ्चरकाण तथा कदमूल्ना पच्चखाण साची श्रद्धा सहीत थया होवे ते। आवक कहीइ उत्कृष्टे इद्रीसुखनी वाछा विना श्रावकना बारप्रतपाले ते उत्कृष्टो प्रावक कहीइ बारवतना नाम ? स्थूलप्राणाति पात विमरण, जे त्रस जीवने निरापराध हणे नहि २ स्मूलमृधाबाद विरमण, जे मोटका पाच , 127 مدد गुणटाणामधिकर. .. आरो छे तेणे समाप्तिमा जतिमा राग के तेहने यो पशम समक्ति कहीइ, पहनी पिनियतहत छे उत्कृष्ट ६६ साउठिसागरोपम नलाएक गायमा अधिक पतली स्थिति रहे प समस्तिने पाय जतिवार रागे तेहना नाम ॥ सका जे आगममा कमोते साचो पिण कार्टक सदेह उपजे १, अतिचार ॥ कसा पीजा मतना शान नया देव हरिहरादिक सगगि तथा ते मत गुरुमपिशर तेहने काईक स्टापणे जाणि पाठा करिए २ अनिवार, रितिगछाजे वर्मअ- रिहतनो कलो करीइ पण पहनो फल पामे के नहीं थाय अथरा जिन सासनयी वीजा काईक नीजा मतनी करणी रुडी छे एहवो परिणाम आने ते पीजो ३ जतिचार पसस जे परमतनी परससा करे जे वीजा मतना देव तथा लिंगीयाता कएकरणी तथा कोई चमत्कार देखीने ते उपरे राग आवे तेहने पगे लागे वेहना गुण गोले ए चोथो ४ अतिचार जाणवो ॥ सथवो जे वीजा मतना देव तथा गुरु तथा ते मतना जे सेवक तेहनो परिचय मेलाप घणो करे वीजा मतनी वात करे साभले पाचमो अतिचार ॥ ए क्षयोपशम समकित एक जीवने असख्यातीवार आवे अने वली असख्यातीवारजाए, जे आगमने आवारे राखे तेहने रहे तेपछे क्षायिक समकित थाइ ते क्षायिकनो अर्थ लिखीइ छे अनतानुबधी च्यार ४ मिथ्यात्व मोहनी १ मिश्रमोहनी २ समकितमोहनी ३ ए सात प्रकृति सर्वथा जे जीव खपावीने निरमलीपरतीतकिधी ते क्षायिकसम- किती कहीइ ए आव्या पछे जाय नहा ए समकितवाला जी- वने दस जातिनी रुचि उपजे ते लिखीइ छे निसर्गरुचि नव तत्त्व ९ छे द्रव्य तेहना ४ निक्षेपा सातनय पोतानी बुद्धिथी गुणठाणाअधिकार साचा जाणे ते निसर्गरुचि १ अभिगमरचि जे जिनागमनासूक्ष्म अर्थ जाणवानी रुचि गुस्ना मुखयी उपदेशथी जाणे ते उपदेशरुचि २ श्रीअरिहतकेलीना कद्या वचननी आणा प्रमाण करे ते आ- णारुचि ३ मूलरुचि जिनसूत्र साभल्ता साचा मारगनी परतीत उपजे समकित पामे ४ वीजरुचि सिद्धातनु एकपद साभलता बधानोल्नु जाणपणु आवे अढासमीथाइ ५ अभिगमरुचि जे ११ अगादिक ८४ जागम तथा नियुक्तिभाज्य चुणिटीका- ना अर्थ जाणे सर्व बोलना परमार्य जाणवानी रुचि ६ वि- स्ताररुचि ६ द्रव्यनाभाव ४ निक्षेपेसातनये करी च्यार प्रमाणे करी जाणे ७ किया रुचि जे जीव जिनशासननी क्रिया साची करी सूत्रमा कहीं ते रीते कर आधीपाछी न करे ८ सक्षेपरुचि, जे जीन सिद्वातना जाणगीतार्थ आगमने अनुसारे जे अर्थ कहे ते साचा करी माने ९ वर्मरुचि, आतमानो धर्म ज्ञानदर्शन चारिनमयी अरूपी आतमानो परिणाम भावदया प्रमुख गुणी श्री अरिहतादिकनो बहुमान वेयावच्च ते धर्म करी माने वीजा बाह्य तपपाह्य किरिया जे आगमना कह्या परमाणे करे ते वर्मनो कारण करी माने ते धर्मरुचि समकित मोक्षमार्ग मूल छ, समकित विना जे करणि ते ससार खाते छे (पण) मोक्षमारगनी न जाणे ए चोथो गुणठाणो कह्यो ४ पाचमो देशविरति गुणठाणो इहा जीउने व्रतपच्चखाण आवे जघन्ये एक नवकारसीपच्चरकाण तथा कदमूलना पच्चखाण साची श्रद्धा सहीत थया होवे तेने श्रावक कहींइ उत्कृष्टे इद्रीसुखनी वाछा विना आवकना बारसतपाले ते उत्कृष्टो आवक कहीइ बारबतना नाम ? स्मूलप्राणाति पात विमरण, जे स जीवने निरापराध णे नहि २ स्मूलमृषाद विरमण, जे मोटका पाच 137 गुणटाणाअधिकार --- कन्पालीक १, गाली २, भोमाटिक ३, थापिणमोसो ४, कुढीसास नबोले ५ ॥ ३ मूलभदतादान मिरमण, जे योरी कीवे राजा दरे तया न्यार त्ा माणग ठपको दे अयमा पोताने भय लागे अया सामाना जीपने नाको पढे ते मोटी चोरी करवी नहि ४ लमयुन चिरमणमत, जे परस्त्री मनुष्यणी तथा तिर्यंचणी तथा देवतानी भोगासीनही पाय इदीना स्वाद घणा मगनपणे सेवे नही ५ ल्परिग्रह रिमण जे बनादिक नव भेदनो परिग्रहनो पञ्चसाग कर, इंठा परिमाण कर अथवा पोता पासे जे धन होइ ते रायी नीजानो पन्चरकाण करे ६ दिक परिमाणनत जे न्यार दिश तथा ऊचो तथा नीचो दिसी जावानो मान करे ७ भोगोपभोग परिमाण व्रत जे नीम सा- चवे पन्नर कर्मादान न कर, जे पोताने खावेपीने तथा वस्त्रोनु मान राखे ८ अनर्थ दड पिमरणात, ते जे मोटका पाप रगवा खेतर खेडवा, भाठी जे चूना प्रमुखनी करवाना पचरकाण करे ९ सामायिकवत जे जवन्य २ घडी सुद्धी ससारना काम मूकी कुटुन बननो राग तजी कोइयी द्वेप न करवो एहवो समपरिणाम राखयो ते सामायिक कहिइ १० देसावगासिक- व्रत जे बे घडीयी च्यार पोहोरयी उणुकाल दिसनु मानकरि- थीरचित्तसमतापणे रहेवु ते देसावगासिकवत जाणवु ११ पो- पधवृत च्यार पोहर अथवा आठ पोहोर सूधी समतापणे साधुपेरे श्रावकवरते, मन वचन काया समताइ राखे ते पोष- धवत कहीइ १२ अतिथिसविभाग बारमुव्रत जे श्रावक जे ते साधुने विहरावीने पछे जिमवु जो तेहवा साधुनो योग न मिले तो सावर्मिक श्रावकने जीमाडीने जमवा बेसवु बेठा पछे थोडीसीक्वार साधुजीनी वाटजोवी इम करता ६ गुणठाणाअधिकार १०११ साधूजी नाव्या तो एहवी भावना भाववी जे वन ते श्रावक जे साधुजीने वहोरावीने जिमता हस्ये इम करता चितवी जिमवा बेसे ए बारवत वरे ते श्रावक कहीइ आवकने जवन्य ३ वार उत्कृष्ट ७ वार चैत्यवदन करवु, अरिहतदेवसिद्ध भग- वतने वदना करवी तथा नित्य पडिक्कमणु वे वार करवु जो नित्य न याये तो पाखीनो पटिकमणु नियमा करवु तथा पच्चरकाण प्रभातना नोकारसी, अवस्य साचववी, रविचउ विहार तिविहार दुविहार ए ३ माहि एक पच्चरकाण अवस्य करवु ए पाचमा गुणठाणानी स्थिति जघन्य अतमुहूर्त उत्कृष्ट उणी पूर्वकोडी चर्पनी जाणवी ए जीव अढार पाप स्थानक आलोइने निर्मल ययो चारितफरसे ते कहे छे, अथ अढारे पाप स्थान लिखीइ छ कोइ भव्य जीव अ- वसर पामीने जैनागम सुणता ससारथी उभग्यो थको मोक्ष सुखनो अमिलाप करे पण आलबन विना कार्य नीपजवो दुक्कर छे तेथी प्रथम देवतत्व श्री वीतराग अनत ज्ञानमय अनतदर्शनमय शुद्ध स्वरूपी आत्म रुद्विभोगी आत्मालबी अ- त्मपरणामी जेहने अवलबीने अनता जीव अव्यायाध सुख वरे ते देवतत्व तेहने सेववे सर्व जीन ससारभययी छुटे तथा निग्रथपच महाव्रतवारी सवरस्वरूपी एक निर्मल मोक्षमार्गने विषे जेहनी दृष्टि छे, शरीर इद्रीय, कषाय, जोगनी प्रवृत्तिजापता मुनिराज अतीतकाल विषय सभालता नथी, वर्तमानविपे रम णता नथी, अनागतकाल विषयनी आससा नथी, पोताना अनत- गुणपर्याय निर्मल करवाने उत्कृष्ट उद्यमवत छे ते साधु महा- त्मा गुरुपणे वारवा, तया वर्मतच जे जीव द्रव्य असख्यात प्रदेशी स्याद्वाद रीते पोतानी गुणाय परणति ते धर्म श्री गुणटाणा-पिता a- Himate-Moaashaitana कन्याठीक १, गारीफ २, भोमाटिक ३, थापिणमोसो ४, कुडीसास नगोले ५ ॥ ३ भूभत्तादान पिग्मण, जे चोरी की राजा दरे तया न्यार त्या मागग ठपको दे अयमा पोताने भप लागे अयरा सामाना जीपोतारको पडे ते मोटी चोरी करवी नहि ४ भूलमयुन विरमणात, जे परस्त्री मनुष्यणी तथा तियचणी तया देतानी भोगासीनही पाच इद्रीना स्वाद घणा मगनपणे से नहीं ५ मूल्परिग्रह चिरमण जे चनादिक नव भेदनो परिग्रहनो पञ्चसागर, ईटा परिमाण रे अथवा पोता पासे जे चन होड ते रामी नीजानो पन्चरकाण करे ६ दिर परिमाणनत जे न्यार दिश तथा ऊचो तथा नीचो दिसी जावानो मान र ७ भोगोपभोग परिमाण नत जे नीम सा- चवे पनर कर्मादान न कर, जे पोताने खायेपीवे तथा वस्त्रोनु मान राखे ८ अनर्थ दड विमरणनत, ते जे मोटका पाप रगवा खेतर खेडबा, भाठी जे चूना प्रमुखनी करवाना पच्चरकाण करे ९ सामायिकनत जे जवन्य २ घडी सुद्धी ससारना काम मूकी कुटुन धननो राग तजी कोइयी द्वेष न करवो एहवो समपरिणाम राखयो ते सामायिक कहिइ १० देसावगासिक- व्रत जे बे घडीथी च्यार पोहोरयी उणुकाल दिसनु मानकरि- थीरचित्तसमतापणे रहेवु ते देसावगासिकवत जाणवु ११ पो. पधवृत च्यार पोहर अथवा आठ पोहोर सूधी समतापणे साधुपेरे श्रावकवरते, मन वचन काया समताइ राखे ते पोष- धव्रत कहीइ १२ अतिथिसविभाग बारमुव्रत जे श्रावक जे ते साधुने विहरावीने पछे जिमवु जो तेहवा साधुनो योग न मिले तो सावर्मिक श्रावकने जीमाडीने जमवा बेसबु बेठा पछे थोडीसीक्वार साधुजीनी वाटजोवी इम करता . ६ गुणटाणाअधिकार तेउकाय, वाउकाय, वनस्पतिकाय, उसकाय हण्या, सताप्या छेद्या भेद्या, तपाव्या, परने सक्लेश उपजाव्यो, परणति सकरपे प्रवत्ते हे श्रीवीतराग तुम सर्व जाणो ठो, ते हिसाने वर्म करी मान्यो हिसामध्ये राच्यो ए रीते हिसा जो ते ए भागे पाडले अन- तेभवे जे जे हिसा परणति करी, करावी, करता, अनुमोदि मने वचने कायागु ते सर्व श्रीप्रभुजीनीसाखे गुरुसा मिच्छामिदु- कड ए प्रथम पापरथान १ हवे बीजो पापस्थान ते मृपावाद जे जूतु गोलबु, लेकिक ससारमध्ये लोकोत्तर वर्मकार्यमध्ये ते पिणा भाव मृपावाद स्वस्वरूपशुद्ध अध्यात्मभाव पोतानी पर- गतिने पोतानी न माने, शरीर इन्द्रिय चन कुटुर ते परभान ससार हेतु दुष्टता मूल तेहने पोताना कहे क्रोधेमृपा बोले, भयेमृपा बोले, लोमेमृषा बोले ते सर्व माहरे जीने ससार भमता चार गतीमाही जे मृपावाद बोल्या होय, बोलाव्या होय, बोलता अनुमोद्या होय, ते मने बचने कायाए ते सर्व श्रीप्रभुजीनीसाखे गुरुसाखे आत्मसाखे मिच्छामिदुक्कड २ हवे गीजो पापस्थानक अदत्तादान ते जे पारकी वस्तु अणदीवा लेवी ते लौकिक जे ससारी असयमीना बनकचन द्विपद चतु पद आदिक अणदीपा लेवा, लोकोत्तरते जे चैत्यउपगरण पूजाउपगरण चारिउपगरण तेहनो चोखो ते दव्य बाह्य वस्तुनो लेगो भाव तप जीवपर पुद्गल खवादिकनो आत्मानेविषे ग्राहकतारुप परिणमन करतो हवे, कराव्यो, हवे, करता अनुमोद्यो हवे, ते मन वचन कायाए ते सर्व श्रीप्रभुजीनी सासे गुरुसाखे आत्मसाखे मिच्छामिदु- कड ३ हवे चोयो पापस्थान मेथुन जे कामी भोगीपणे दी विपे पुद्गना वर्णादिकनो भोगको लोकोत्तर चलिगे वमी महाजन सा सा वी मोपकरण चैत्यादिने विधे योनी पो- २ १०१२ मुगाटाणा सिद्ध भगवानने मगर गीत आदम्योगापार ते चर्म सामने जानादिक पवारभाजपा यायजी ते चर्मनी घोषणा र ४, गा निगा वर्ग मायाने राज्य तजी दिय पिनाममा गलामो जया एरला पासी पनवासी गुफानिवासी पानी शीग पर उनाले जा तापना शीतसाडे नगी तो शीत गेछ, जपन्ययी जया- पकपणे रागद्वेग वारसा समतामनामाचाभिरापापिचर छे तया देशविरति ने मुद्रधर्म प्रगट या पाग्ने देसपिरत लेड सर्वपिरतीनी रहा तो ससार कार्य ते निविपीनी पेर उदा- सीनपणे रे छे, सम्यग्दृष्टि ते जर्मनी इहा करता काईयासिद्धीलमो कईयासवेगुणनिरावणा कईयाअवावाह सुहसमुहमयेसिजे ॥१॥ कईयापुग्गलरहियो रमामिसिवमयल निरुवमसहावो,पासतोसबपय भुजतोअप्पणोभाव२॥ ए भावना भाविने वर्मनो जमिलाप करता ससारप्रवृत्ती तप्त लोहपट्ट परवानी रीते करी छे ससारसपदा बालक रम- वाना वूलघर समान जाणे छे, ते धर्म प्रगट करवानी रुचि सर्व जीवे करवी, पण ते धर्म आठ कर्म आवरयो छे ते आठ कर्मने क्षये प्रगटे ते आठ कर्मनो क्षय, पापस्थान आलोचता थाये ते पापस्थाननी आलेयगा करवी जे माहरे जीवे ससार भमता स्वस्वरूपनी भूले हिसा पापस्थान करयो आपना ज्ञा- नादिक प्राण हण्या ते भावहिला अने रागद्वेपे असयने परना माग हण्या ते द्रव्यरिसा ते लोकिक रीते पृथ्वीकाय अप्काय गुणटाणाअधिकार १०१५ पापस्थान मान, अहकार रुपनो, बननो, राज्यनो, परिवारनो, बल- नो, तपनो, विद्यानो, कुल्नो तथा गुणी नहीं ते गुणीनो मान आचार्य उपाध्याय साघुपणानो अभिमान ससारकार्य यशामि- लापे मान वर्मकायें सयानाचैत्य प्रमुखनो कराव्या रखवाल्या- नो मान कर्यों हवे, लोकिक बाह्यलोकोत्तर गुणनो गुणीयी, महत्व को हवे ते सर्व मने वचने कायाइ करि कर्या हवे कराव्यो होवे करता अनुमोद्यो होने ते श्रीप्रभुजीनी सासे आत्म साखे मिठामिदक्कट ७ वे आठमो पापस्थान माया कपट नियडि वक्ता जे कोइयी वचननो द्रोह ठगाई करवी ते माया अलौकिक ससारी सबवी लोकोत्तर आचार्य साधु सा- वर्मिकथी वर्म पद्धतिनो कपट करलो ते द्रव्यत कोइने वचवो भावत आजवता रहित परिणामे जे माहरे जीवे कर्यो कराव्यो करता अनुमोद्यो ते मने बचने कायाये करी श्रीजगवत्सल परम करुणानिधिनी साखे गुरु यथार्थवादिनी साखे, आत्म साखे मि- गामि दुक्कड ८ हवे नवमो पापस्थान लोभ, लालच परिणाम इच्छा गृवता ते लौकिक बाह्य पोताने इष्ट वस्तु तेहनी लालच जे घणी जडे इद्रीय सुख प्रमुख आवे एहवो परिणाम ते लोभ ते लोकोत्तर वर्मलिंगे वन विषय जसनो लाभ वाछे तथा द्रव्यत का जे भावत परभावामिलाप सर्व ते जे मा- हारे जीवे का कराव्यो करता अनुमोद्यो ते मने करि वचने करि कायाये करि श्रीमभुजीनी साखे गुरु साखे आत्म साखे मिछामिदुक्वड ९ हवे दसमो पापस्थान रागप्रीत परिणाम वा- ल्हारसे जीव पोताने विपे पोषणीये लौकिक तथा लोकोत्त- स्थी द्रव्य तथा भावी ते राग परणति अनती आत्माथी उपनी अन्य व्यने विषे रागनी रीजते माहारे जीवे करी गुणटागानाधिकार atala.larunauja पणा सी से डीपी द३ उदय ने कामविकारीपणे भोगविलासादिक, भारता आत्मपरणति परभोगीपणे पर वस्तु गुपिपरिणाममध्ये ग्मगीता से माहार जी, एकेन्द्रिपणे रिन्दिपणे,तेरिन्दिपगे, चोरिन्द्रिाणे, पपेन्द्रिपणे फरसन १ रसन २ वाण ३ घ ४ ओन्द्रिय ६ इन्द्रीना बीस विषये वाच्य । सेन्या सेवाया मेपना अनुगोपा होई ते मन वचन कायाए करी श्रीप्रभुजीनी सासे आत्मसासे मिच्छामिदुक्कड ४ हवे पाचमो पापस्थान परिग्रह जे कोई आत्मपर्मयी अन्यभाव सरक्षणा परिणामे राखरा ते गफिक परिग्रह द्विपद चतु पद बनवान्य गृहसेन सप्रमुस, रोकोत्तर परिग्रह सम्पक्त्वनो हेतु मोक्षकारण श्रीअरिदतनो चैत्य तथा जिनतिन तथा ज्ञा- ननो कारण पुस्तक नफारपाली प्रमुखचारिनना उपगरण तेहने ममत्वभावे गृहे भ्य परिग्रह पुद्गल खधादि ममत्वभावे ग्रहे भावपरीग्रह क्रोधादिक अशुद्ध परिणाम परभावस्वामित्व- ग्राहकत्वादिक परिणति ते परिग्रह राख्यो हवे परद्रव्यनी इच्छा करे हवे, परिग्रह सुख मान्यो हवे, परिग्रह वासते धर्मआचरण करयो हवे ते परिग्रह पापस्थान मने वचने कायाए करी सेव्यो होये सेवता अनुमोद्यो होवे ते श्रीअरिहतनी साखे गुरुसाखे आत्मसाखे मिच्छामिदुक्कड ५ हवे उठो पापस्थानक क्रोधतप्त परिणाम क्षमानो रोधक ते लौकिक भाई पिता प्रमुख कुटुब उपर तथा अन्य जीव उपर क्रोध परिणाम लोकोत्तर देवगुरु सावर्मिक उपर क्रोध परिणामते द्रव्यत तथा सकठोरता भाव तथा रुद्र परिणाम ते जो कोई रीतनो अप्रशस्त क्रोध कयों होवे कराव्यो होवे करता अनुमोद्यो होवे तेथी विभुवनपति निरजन देवनीसाखे गुरुसाखे आत्मसाखे मिछामिदुक्कट ६ हवे सातमो गुणठाणाअधिकार १०१७ वोलबोते बोल्यो हो बोलान्यो होवे बोल्ताने अनुमोद्यो होवे ते मन वचन कायाए करीने श्रीमभुजीनी साखे गुरु साखे आत्म सारखे मिछामिदुक्कड १४ पन्नरमो पापस्थान रति तथा अरति उपजे असाता दुखवियोग हानि प्रमुख उपजे ने अरति आकुलता किहाइ सुहाय नहीं ते अरति लौकिक विपेनी ऊणी असुहा- मणे तथा लोकोत्तर आगम सुणता देवयाताये तप सामायकपो. सह भणवो प्रमुख ते मध्ये अरति करि होवे तथा रति, इद्री विषे-मध्येरीझ सुहामण रक्तता विश्राम ते रति लौकिक तथा लेकोत्तर चैत्य पुस्तकादिकनी शुद्धता देखीने जे इद्री विपे रीझ पामे ते रीझ ए नवा कर्म बाधवाने आकरिचिकणता जे माहरे जीवे करी, करावी, करता अनुमोदी ते मने वचने का- याये करी श्रीपरमात्मानी साखे गुरुनी साखे आत्म साखे मि- छामिदुक्कड १५ हवे सोलमो पापस्थान पैशुन्य पारकी चाडी करवी ते जे द्वेपे थाये आगल्या जीवनेकष्ट असातानो हेतु राजा तथा आचार्यादिक अधिक आगळे वेहना छता अथवा अछता दोप कही तेहनो आश्रय भाजवो ते पैशुन्य कहिये ते जे माहारे जीवे करयो कराव्यो करता अनुमोद्यो मनेवचने कायाए करी श्रीप्रभुजीनी साखे, आत्मसाखे गुरुसाखे मि- छामिदुक्कड १६ हवे सत्तरमो पापस्थान माया मृषा कपटे परने ठगवा वारते मिठु बोले, कोइ कपटलिंग बगलानी पेरे देखाडीने गुणी नहि ने गुणी रीते वदाववो, पूजाववो मनावबो कराववो अथवा लौकिक वचने व्यापार प्रमुख मध्ये कपटे मृषा गोले तथा धर्मचाले जैनागम मध्ये कपट रीते प्रवृत्ति करवी ते लिगी जीव प्रमुख करवा ते जे माहारे जीवे करया करान्या करता अनुमोया ते मने बचने कायाए करी श्रीप्रभुजीनी साखे 128 माटाणा-या - कराणी रता मोहिमा माग व पाया परी बीजरिएनना माग गुलामा निमानि हो अग्यारमो पापमानात गारणार नया अजीन उपर पोनानी गियादि गना जे महामणा ते लौकिक उपाग नया लेोत्तर उपर दस्यों होने करायो सोनापत्ये मो यो दोर त मन पचने कायाये करी ते बासर्वजनी मारी गुरु सारी निठामिदद ११ हो पारमो पापस्यान कलह विवाद कोईवी इन्य पारने जस - डाई पासते आक्रोश वचनादिक रमा तया चर्म मत्येना- मार्ग पारते क्युक्ति पोतानो मत पापाने जे कलह करखे प्रशस्त करता आगशस्त थयु हो त सब मने पचने कायाए करी कर्यु करान्यु अनुमोयु ते देवसासे गुरुसासे आत्मसाखे मिच्छामिदुक्कट १२ तथा तेरमो पापरथान म्यार यान कुटोआल देवोद्वेपे तथा हास्ये गुणीना गुण ओल्बना, आगलाने सहसा- कारे हिणो वचन कहेगो तथा वस्तुगते लोपीने फरकार क- खो ते लौकिक अन्यजीपने ससारी रीते लोकोत्तर अरिहत सिफ आचार्य उपाध्याय साघु सापम्मिक देशविरति समकिती तेहनी औदयि चाल देखी कलक देवो ते अभ्याख्यान कर्या होवे कराया होवे करता अनुमोद्या होवे ते मने वचने कायाए करी श्रीप्रभुजीनीसाखे गुरुसाखे आत्मसाखे मिच्छामिदुक्कड १३ हवे चउदमो पापस्थान परपरिवाद परकी निद्या ते द्वेषे पारका अवगुण कह्या, कोइना अपजस वासती पारकी कुयली करी अथवा सामा मनुषने खिसाणो पाडवा वासते जे निद्या करी ते मध्ये लौकिक ते जे ससारी जीवनी लोकोत्तर गुणी जैनमार्ग अवलबता मार्गानुसारिथी माडी सिद्धभगवान लगे जे अवर्णवाद १२

गुणटाणाअधिकार
१०१९
awww
पोताना आत्माने तथा अन्य ससारी जीवने सिण (स्नेह) सरा-
गता, परिग्रहता हिंसादिकनो हेतु थाये तिणे गुणीनी भक्ति
जोडतो निरधिकरणी याये ते माटे जे अरिहतनी भक्ति कारजे कों
जे वनादिक ते देवको कहिये ते जे खायो होवे अथवा पोते
विणसाड्यो होवे अथवा उवेख्यो होवे ते सबै देयकाना दूषण
थयो ते माटे देवका दोनी आरोषणा करवी ते लखीये छे
जे माह्यरे जीवे एकेंद्री पृथवीकायपणे जिनपिंगादिकनी आसा-
तना करी अथवा पृथवीकायपणे मूस्या जे शरीर तेहथी जे
गुणी अथवा गुणीनी थापना चैत्यादिक तेहने व्याघात थयो
तथा अपकायपणे पाणिमे चैत्य वहराया पड्या जिन दिन
वहाव्या तथा अग्निकायपणे जे चैत्यनिनादिक बाल्या होवे,
तथा वायुकायपणे चैत्य पड्यो होवे तथा वनस्पतिकायपणे
जे चैत्य मध्ये रुखडा झाड खापणे उगीने चैत्य पड्या होवे,
सकायपणे चैत्यमध्ये मालादिक करी रह्या हवे पखीने भवे
चैत्य तथा जिनमित्र उपर वेसी असमजस आचरण करया होवे,
तथा देवकाद्रव्य मनुष्यपणे जाणि तथा जाण्या विना खाधा
होवे अथवा अवधि वावर्या होवे तथा देवका उपर अन्याय हुक्रम
कर्या होवे, अथवा देवकी वस्तु वावरीने पोताना यश बोलाव्या
होवे, देवका दोकडा व्याजे राखे थोड़ो व्याज भरी आप्यो
होवे अने घणो लाभ लीधो होवे, तथा बीजो पण देवयी
इद्री सुख यशवडाई प्रमुख जे करी होवे तथा अरिहत देव
प्रते सासारिक कामे मान्या ईछा होवे ते मने वचने कायाए
करी मिछामिदुक्कड हिवे माहारे ए कार्य अशुद्धाचरणरूप न
करवु आज पछी माहारो आत्मा अनतगुणमयी प्रगट करवानी
रुचि करखी श्रीअरिहतनो को मार्ग तहत्त करी सदहवो,

१०१८ गुणसणाधिकार गुरु सासे आरम सारे मिनिरहये आरमो पाप- स्थान मिपाल जे देय पिपी मापीन परग्रहना पुग्य प्रकृति भोगि तेहने देव माने, गुरु पारिनचर्म रहित जे अन्य लिंगी तथा सलिगी गुणाट परगृहनो रोमी अतार पापस्थान भरपा ते गुरु की माने, धर्म पयार्य आत्मपरगति विना अ. परा वेदना साधन विना धर्म माने तथा जीपादिक ना तत्र जिम वस्तुममें वस्तुपणे पोनानी परगति के परदये जिम पोतानी परणति गुगपर्याय सभार स्यादाद रीते जिम छ तिम न सहहे कल्पित रीते सदहे तेने मिथ्यात्व कहे छे, तेहना मूल भेद ५ अभिग्रहभिव्यात्न खोटोकदाग्रह झाल्यो मूके नहि १ अनमियह मिथ्यात्व गुणगुणना परख्या विना सर्व सरिखा माने २ अमिनिवेश मिथ्यात्व जाणीने खोटो कदायह खेंचे ३ सशयमिथ्यात्व जे सर्व सशय मध्ये रहे ४ अनाभोग मिथ्या- त्व जे काइ जाणे नहि तथा साध्य साधननिमित्त तथा उपा. दान उत्सर्ग अपनाद विपर्यास रीते करि एहवी अशुद्ध सह- हणा जे वेदातादिकनी ते सर्व मिथ्यात्व जाणवो, ते जे सेव्यो होवे, सेवाव्यो होवे सेवता अनुमोयों होवे मने वचने कायाए करीने ते श्रीप्रभुजीनी सोखे गुरुसाखे आत्मसाखे मिच्छामि वुक्कड ते मिथ्यात्व जीवने महादु खकारी छे, अनादि ससारनो वीज छे, लोकोत्तर श्रीजिनेंद्रनो केद्यो शुद्धमार्ग जीव पामे नही ते मिथ्यात्व महीपापस्यान छे ते था धर्म करणी पिण साधक न थाये ते मोटे मिथ्यात्वनों पश्चात्ताप घणो कर- वो ते मिथ्यात्व टॅलतो नी ते जे पूर्व जीवे गुणीनी आशातना तया गुणनो अनादर कयों छे ते महागुणी अरिहत देव तेहनी भक्तिने काजे उत्तम भव्यजीवे जे धनादिक रह्यो थको गुणठाणाअधिकार १०२१ यतिना वर्मना पानयका निराशसी एक आत्मा निरमल कर- वाना उद्यमयकी विचरे ते पच महावत तिहा पहेलो, महावत सव्वाओपाणाईवायाओविरमण" विवहारे उकायना जीवना द्रव्य प्राण १० हणे नहीं हणावे नहीं हणताने अनुमोदे नहीं मन वचन कायाए करीने निश्चयी जानदर्शन चारिन सुख प्रमुख भारप्राण पोताना परना कर्म आवरणपणे हणे नहि, हणावे नहि, हणता अनुमोये नहीं, तथा बीजे महावते, सवाओ मोसा वायाओ वेरमण द्रव्यत क्रोधि मानने भये लोभी सूक्ष्मदर लौकिक तथा लोकोत्तर जूठ पोते बोले नही बोलावे नहि पोलता अनुमोघे नहि मन वचन कायाए करी भावथी सर्व द्रव्य पर्यायनो यथार्थ जाणवो, सत्य भासनरूप ज्ञायकता शक्ति साधि ज्ञान सत्यपणे पाले तथा श्री वीतरागना आगम प्रमाणे अर्थ भाव छे वेहनी सझाय करि जेहथी पोताना ज्ञानदर्शन चारित निर्मल थाये ते भाषा बोले पीजो महावत सन्चाओ अदिन्नादाणाओ वेरमण जे द्रव्य ते प्रणतुस मान पण अण दीवो लेवे नही, लेवरावे नही, जे लेवे तेहने सारो कहे नही, मने वचने कायाए करीने लौकिक चोरी जे ससारी जीवनी वस्तु चोरी लेवी, लोकोत्तर चोरी जे तीर्थकर आणमे जे न लेवानो को ते लेवो ते चोरी न करे, भावथी आत्मानी ग्राहकता शक्ति ते स्वरूप ग्रहणरूप कार्यना कर्ता छे ते अनादिनी परभाव ग्राहकता करी रा छे ते निवारीने स्वरूप ग्राहकपणे परणमावे, ते अदत्तादान विमरणवत थयो ते अदत्तादान चार भेदे छे ते तीर्थकर अदत्तजे तीर्थकरनी आणामे न लेवो क्ह्यो सर्व परभाव ते लेवे १ बीजो गुरुअदत्त जे गुरु परपरा वि- नामूत्र अर्थ कहेवा २ तीजो स्वामी अदत्त जे वस्तुनो जे १०२० गुणठाणाअभिकार. १ अन्य सब मिया, श्रीनिरागे यो निगये आचर्या समकिती जीने सग्यो श्रीगणपर देखें नागम मरे गुल्यो गुद्ध धर्म माहरो तथा सर्व जापनो हित छे ते माहार प्रमाण ने सद हमो. ते जाणतो ते जादसोते नीपनायो जे समये समये गुणस्थान चढी कर्मज्ञप करी सलेशी अने पोनानी सिद्ध स- पदा प्रगट पास्ये ते समयमार मानो जने जेने ए मारगनी परतीत प्रगटी तेने शरणे रद्देयो तया माध्य गुद्रसत्ता साधन गुणटाणे चढी ते रत्नपी परणमी ए मार्ग माहगे सा अविहड होज्यो इति ॥ ॥ दूहा ॥ परम अध्यात्मने लखे, सद्गुरुकेरे सग, तिणकु भर सफलो होवे, अविहड प्रगटे रंग धर्मव्यानको हेत यह, शिव साधनको खेत, ऐसो अवसर का मिले, चेत सके तो चेत वक्ता श्रोता सम मिले, प्रगटे निजगुणरूप, अक्षय खजानो ज्ञानको, तीन भवनको भूप एह पन अनुपहे, समझे जे चित्तलाय, देवचद्र कवि इम कहे, निज आतम थिर थाय ४ इति अनार पापस्थान जाणवा सारु हवे छठो गुणठाणो प्रमत्त साधु एहवे नामे कहीये जे प्रत्याख्यानी चोकडीनो उदय टल्यो सर्व विरति प्रगटी, सयम साधन माटे पौद्गलिक भावे ग्रहेपण पुद्गलने भोगिपणे पुद्गलीक थाय नहीं स्वरूपरमणी आत्मधर्म थिरता रुप सर्वपरभाव उपर अग्राहकतारूप चारित्रधर्म प्रगट्यो छे ते साधु उत्सर्ग अपवाद मार्गेपचमहाव्रत पाले छ, तिहा द्रव्यभाव पच महावत सहित पाच समिति तीनगुपतिना दश , - गुणठाणाअधिकार १०२३ तीन पहोर लगे बेसबु नहीं, पोथी वाडे स्त्रीनु रूप नजर जोडीने जोवु नहीं पाचमी वाडे जिहा स्त्री भरतार काम भोग भोगवता होवे ते भीतने अतरे ब्रह्मचारीये राते रहेवु नहीं, तेहना शब्द काने पटवा देवा नहीं छछी वाडे गृह- स्थपणे जे भोग भोगन्या ते सभारवा नहीं सातमी वाडे सरस आहार जेहथी काम दीपे ते आहार करवो नहीं, आ- ठमी वाडे अतिमात्राए आहार करवो नहीं, नवमी वाडे शरीर सिणगार लूगडाना तथा घरेणानो करवो नहीं, सनान उगटणा न करवा, एकली स्त्री साथे एकलु वाटे चालत्रु नहीं, तथा नानु बालक तथा बालिकाथी एक शय्याए सुबु नहीं, सात वरस पछी, पाचमे महावते सवाओ परिग्गहाओ वेरमण जे द्रव्यथी परिग्रह सूक्ष्मवादर राखे नहीं रखावे नहीं राखे तेहने अनुमोदे नही जे सयम पालवा माटे सुखे सिझाय थाये तेमाटे उपगरण १४ राखे, कारणे अधिको जोइए तो गृहस्थ- नायका पाडेरु वावरे एथि थिरकल्पीनो विवहार छे, जिनकल्पी कोई उपगरण न राखे, अपवादे दस उपगरण राखे, बार कपाय उदय टल्या तेहने छटो गुणठाणो कहीये साधु कहीये पण ५ परमाद सेवे निद्रा १ विकथा २ अग्हार ३ अल्पविषय ४ मानादिक ५ ए अल्प सेवे अनाभोगे जाणे, सेवे नहीं, ए छठ्ठा गुणठाणानी स्थिती जयन्ये एक समय उत्कृष्टे अतर्मुहूतए गुणठाणे तीन चारित्र, सामायक, छेदोपस्थापनीय, परिहार विशुद्धि ए तीन चारित्र छे. तेहनो स्वरूप जे परभाव परत्यागे स्वरूप एकत्वते चारित्र कहीये, ते मध्ये जे तजवा योग्य भाव तजे ते द्वेप विना अने रत्नत्रयीज आत्मधर्म ते ग्रहे स्वधर्म माटे पण लौकिकादिक इष्टता राग विना एहवो समपरिणाम ते , -

१०२२
गुणटाणामपिचर
ची होरे तेही अण दीनी जे पातु सेगी ते ३ थोप
जीर अदत्त जे पोइ जारी एम योनी जे माहग प्राण
हणो अने पोनाने वीसपाद माटे परतावना प्राणहणे ते जीव
अदन ४ तथा प्रशस्न काम करता कोइ जीवना प्राणपात
थाये ते श्रीभगरते दौसा कही नी, विनय तथा वैपावञ्च
मागण्यु छे पदव्यभान जदत्तादान प्रिविधि विविधिपणे होवे
चोये महानते समाजो मेहणाओ वेरमण जे द्यपी पाव इदिना
वीस विपे सेवे नही, सेमता अनुमोदे नहीं, मनुष्य तिर्यच
देवताना विपयनी वाडा न करे, न करावे, अनुमोदे नही, भावधी
जे आत्मा द्रव्य आत्म गुणनो भोगी छे ते पण करम करवा
माटे परभारने भोगो ते भान भयुन छे, ते सर्व परभाव
भोगीपणे भोगवे नही, ते आत्मानि कर्मा करवा माटे परभाव
साधनपणे ग्रहे पण अभोग्य अग्राह्यपणे अरमणिक माने जे
माहरो आत्मा आत्मानदनो भोगी ते परभाव अनत जीवे
अनतवार लेइ भोगवीने वम्यो मने ग्रहवो भोगववो घटे
नहीं ए अनत जीवे अनतीवार भोगवीजे अँठ जडचल तेहने हु
भोगवु नहीं इम सर्व परभाव भोगीपणो तजी स्वभाव भोक्ता-
पणे रहेवो ते द्रव्यथी मैथुनना कारणरूपी खध तथा रूपी
खध मिल्या जीवनो, खेनथी मैथुन तीन- लोकने विषे इद्रीना
सवादनी ईच्छा, कालथी मैथुन दिवस तथा रात्री, भावथी मैथुन
रागथी तथा द्वेषथी ते सर्वथी सेववो नहीं तेहनी वाङ नवे
पालवी १ वाडे जे थानके स्त्री पशु पडक रहे ते थानके
ब्रह्मचारी रात्रीये रहेवु नहीं बीजी वाडे स्त्री साथे हासि तथा
कामकथा करवी नहीं, बीजी वाडे जे पीठ पाटले,स्त्री बेठी होये
ते पाटले बे घडी लगे ब्रह्मचारी -पुरुषे-बेसबु नहीं, स्वीये
१८

गुणटाणाआधिकार . - फोखे तेनु साधुपणु जाय नहीं ७ आठमो अपूर्वकरण गुणठाणो जे जीव भावनाभावतो आत्मानो स्वरूप अनतज्ञानमयी, अ- नतदर्शनमयी, अनतचारिनमयी, अनतदानमयी, अनतलाभमयी, अनतभोगमयी, अनतउपभोगमयी, अनतवीर्यमयी, अनतअन्या- बाघसुरवमयी, परमआनदमयी, अरूपी, अवेदी, अकपाई, अलेसी, अशरीरी, अनाहारी, सर्वआनदरूप माहरो धर्म छे । शरीर, आहारतेहुनही, रवी भावनामाहे परणम्यो जीव शुक्लन्या- ननो पेहलो पायो त्यावे, इहा पाच अपूर्वकरणकर पूर्व किंवारे नकरया होय ते कर तेढना नाम पहेलो अपूर्वकग्ण थिति- रात जे जीव कने अमर याता थित स्कपना योकडा हता ते करमथिति सबली खपावी अथवा उपशमावी बीजो अपूर्वसवात जे कामना रस चीकणास हती ते खपावी पानलु कम्बु गीजो अपगुण श्रेणि जे जीवने मत्तामाहे करमल हता ते मरने विखेरी नाखवा, चोथो अपर्वगुणसक्रम आत्माना गुणमे रमवो पाचमोअपूर्व जे नवोस्थितिरव न करवो एवा परिणामी कपाय खपावीने आतमा शीतल परिणामे परणम्यो कम्म निजंग करे ते ए गुणटाणे जपन्य एक समय उत्कृष्ट अर्तमुहूर्तनी स्थिति छे, ए गुणटाणे चाग्नि सामायिक तथा छेनोपग्थापनीय ए ये छे ८ नवमो गुणटाणो अनियत्तिवादर छे ते शुक्ल न्याननो पहलो पायो तेथी आने, ए गुणटाणे वर्तता जीव एक अन्य- वसाये नेटला होवे तेटला सर्वनो एक सरखो परिणाम एक सरखो सवर, एकमरग्वी निर्जग, पहने सामायिक तथा छेनोप- ग्थापनीय ए वे चारिन होवे, पहने अते तीन वेद जाये तथा तीन कषाय मजलनो कोषमान माया लोभ जाये । गुणटाणे सर याता जीव होये ए गुणटाणानी स्थिति जयन्य 1.५ १

१०२४
गुणटाणाअधिकार.
सामापक नहीए, तमा जे सामापफ मध्ये सबस्नना तीवोदये
जे आफरा जतिवारे अपमा चार पायने उदये जराजमपरिणाम
फरने जे पर्व पर्याय छेदीने अमिना निर्मल पोपनो अगीकार
करसो ते छेदोपस्थापनीय नहाये, जने छेदोपस्थापनीपचारिक भरत
५ तथा ऐपत ५ ते मध्ये प्रथम घाम तीवकग्ना साउजीने
होवे तथा तीयार तथा गणपरजीना शिय ना पायी उपरात
अतरत माप युवानयि प्रथम सरयणे अद्वार मासनो उग्रतप
ते अप्रमादी निद्रा रहित नाजणा पनवासी पका जे तप करे
ते परिहार विगुद्र चारित्र कहिजे, दशमे गुणटाणे शुक्लत्यान
सुक्ष्म लोभनो उदय छे ते सुक्ष्म सपराय चारित कहिजे, तथा
सया कपायनो उदय नयी ते यथार-यात चारित कहीये ते
मध्ये ११ मे गुणठाणे उपशात यथास्पात छे १२, १३,
१४ मे गुणटाणे क्षायिक यथाख्यात छे, हवे सातमो अप्रमत्त
गुणठाणो लिखीये छे, छठे गुणठाणे जे भाव साधुजीना कया
ते सर्व होवे पण पाच प्रमाद न होवे, ते माटे अप्रमाद ए
छठे गुणठाणे वरततो साधुजन शासनने कामे लब्धि फोरवे पण
सातमे गुणठाणे वरततो साधु लब्धि न फोरवे, एहनी स्थिति
जघन्य एक समे उत्कृष्ट अतर्मुहूर्तनी छे छठे तथा सातमे
गुणठाणे मिलीने साधु देशे उणी पूर्व कोडी रहे श्री भगवती
सूने ए बे गुणठाणानी देशे उणी पूर्व कोडी स्थिति जूदी
कही छ ते व्यवहार नये छे समे तथा बे समे वच्चे गुणठाणो
पलटे ते गवेख्यो नथी तेमाटे अतर्मुहूर्तनी स्थिति कही छठे
बे गुणठाणे सामायक तथा छेदोपस्थापनीय तथा परिहार वि-
शुद्धि चारित्र छ, तथा सातमे गुणठाणे साधु लब्धि फोरवे
नहीं अने छठा गुणठाणाना साधु जिनशासनने काजे लब्धि
२०

गुणाटाणाधिकार . फोरवे तेनु साधुपणु जाय नहीं ७ आटमो अपूर्वकरण गुणठाणो जे जीप भावनाभावतो आत्मानो स्वरूप अनतज्ञानमयी, अ- नतदर्शनमयी, अनतचारिनमयी, अनतदानमयी, अनतलाभमयी, अनतभोगमयी, अनतउपभोगमयी, अनतवीर्यमयी, अनतअन्या- बावसुखमयी, परमआनदमयी, अरूपी, अवेदी, अकपाई, अलेसी, अशरीरी, अनाहारी, सर्वआनदरूप माहरो धर्म छे । शरीर, आहारतेहुनही, एबी भावनामाहे परणम्यो जीव शुक्लन्या- ननो पेहलो पायो त्यावे, इहा पाच अपूर्वकरणकर पूर्वे किवार नकरया होय ते कर तेहना नाम पहेलो अपूर्वकग्ण थिति- धान जे जीव कने जसर याता थित स्कधना योकडा हता ते करमथिति माली खपावी अथवा उपशमावी बीजो अवसपात जे करमना रस चीकणास हती ते खपावी पातलु कम्बु गीजो अपांगुण श्रेणि जे जीवने सत्तामाहे करमटल हता ते सर वे विखेरी नाखवा, चोथो जपूर्वगुणसक्रम आत्माना गुणमे रमवो पाचमो अपूर्व जे नवोस्थितियव न कग्वो एहवा परिणामी कपाय खपावीने आतमा शीतल परिणाम पग्णम्यो काम निर्जग करे ते ए गुणटाणे जघन्य एक समय उत्कृष्ट अर्तमुहर्तनी रियति छे, ए गुणठाणे चाग्नि सामायिक तथा छेटोपग्थापनीय एबे छे ८ नवमो गुणटाणो अनियत्तिबादर छे ते शुक्ल व्याननो पहेलो पायो तेथी जाये, ए गुणटाणे वर्तता जीन एक अन्य- वसाये जेटला होवे तेटला सर्वनो एक सरखो परिणाम एक सरखो सवर, एकसरग्वी निजंग, एहने सामायिक तथा छेदोप- ग्थापनीय ए ने चारित होवे, पहने अते तीन वेद जाये तथा तीन कपाय सजलनो क्रोपमान माया लोभ जाये ए गुणटाणे सख्याता जीव होये ए गुणठाणानी स्थिति जयन्य 124 गुणटामा NA एक समप हट नाइनी नगमो गुणटाणो सूक्ष्म सपराय हा हम राजस्नो लोभ अप हो। इसा वे जानना जीर पामीये, उपशम अगि नयापक अगि हरमने उपश- मारे उपसपारती जाए पिस्गि म मोहनीने खपाने, । गुणटाणे पक रहम सपगय घारिप हो, व्यान गुल होव परिणाम निरमल होगे, ते अपेदी छे पहनी स्थिति जपन्य एक समय उत्कृष्ट अनमर्तनी छे १० इग्यारमो गुणटाणो उपशातमोह तिहा जे जीन उपशमणि आडमेडतोबोलना परणामशान मोह कमनी प्रकृतिउपशमावतो जाय, तेहनो उटाणपुरवीज उपशमाानो छे ते नवमे आवी मोहप्रकृति उपशमावी दशमे लोभ उपशमापीने कपायना उदयरहीत के ने इग्यारमे आये ते यथाख्यात चारिन पामे, पहने चोवीम सपरायकी क्रिया उतरी पकरिया हिकी क्रिया रहे प्रकति तथा परदेश ॥ ने नव नद्या छ हेतु न पाछे, र एक माता- नीनो छे, व्यान शुकले । गुणठाणे जे जीर मग्ण पाम्या पठी चोथे गुणटाण आमे ते देवता ल्वसत्तमीया पाए, एक'- उतारी यार, अथवा कोडक जीव अगीयाग्मे गुणटाणे उपशात अदा ते जई पालो पटे ते ग्याग्मायी दशमे आये तशमाथी नरमे आरे नवमी आटमे आवे, आटमेथी सातमे आवे सातमेथी उठे आवे, इहायी पाडो पडे नचढे तो पालो पाचमे गुणठाणे आने, पाचमाथी चोथे आवे, जोक्षायक समकिती होए तो चोथे गणटाणे टके अने उपशम समकिती होए नो चोथार्थी पडी बीजे सास्वादन गुणठाणे थईने पहेले मिथ्यात्व गुणठाणे आवे, कोई एक जीव अर्तमुहूर्त रहे, कोइक जीव देश ओणोअर्थ पुद्गल परावर्त मिथ्यात्वीपणे रहे, पछे - २२ गुणठाणाअधिकार १०२७ समकित पामे, एअगीयारमो गुणटाणो एक जीव च्याग्वार पामे, एक जीव एकभवमाहि वेवार पामे, एहनी स्थिति ज- घन्य एक समय उत्कृष्ट अर्तमुहूर्तनी छे एअगीयारमो, हो बारमो क्षीणमोह गुणठाणो ते जे जीव आठमा गुणटाणायी कर्म खपावतो तीन वीज निरमल उपयोग शुद्ध शुक्त व्यानने बले नवमे नगमे गुणटाणे मोहनी कर्म खपावी नाग्मे गुणठाणे जावे, पुढशुद्ध शुक्ल -याननो वीजो पायो एकत्ववितर्क अप्रविचार न्यावे, एहयी आयु बले बनवाती तीन कर्म ज्ञाना- वग्णीय दर्शनावरणीय अतराय खपावे, पहनी स्थिति अर्तमुहूर्तनी छे १२ तेरमो गुणठाणो सयोगी केवली जे जीव बाग्माने अते जानापरणी, दर्शनावरणी, अतराय, एखपे केवलजान केवलदर्शन प्रगटे, रोक अलोकना सर्व भाव जतीतकाल अना- गतकाल वग्तमानकाल सर्व प्रत्यक्ष आत्मवले इन्द्रिय विना जाणे देखे, इहा जे अतगट विली होवे ते केवली समुदघान करीने मोक्ष जाय जने जे केवलीनो आऊखो घणो हावे ते पनेक जीवने उपगार करता अनेकदेशना देता विचर दो उणीपन कोडी लगे विचर तथा जे तीयकग्देव केवलीपण विचरे ते चोवीश अतिशय तथा आठ प्रातिहाग्ज विराजमान थका नवा सोनाना कमले पग यापता चाले योजनप्रमाण माटलसमोसरणे सोनाने मिहासने तीन च माथे वीगजता बे पासे चामग्नी जोट विझता हजार पजा इद्रयजा लहेकता देशना देता जयन्य बहोतेर वग्सने जाऊसे उत्कृष्ट चारासी लाख पुग्वने आऊग्वे विचर, अनेक जीवने चरम उपदगदे, गणधर थापना कर, साधु सान्वी आवक श्राविका । च्यार सर यापे, द्वादशागी सिद्धात प्ररूपे, अने मामान्य केवलीने - Pilam अनीशा नहीं दे पा र जो जाऊग्दो जो भीना एम सरसा होतो का समाधान न र, जान जो जाया करम ना हो तो करली समुदयात र तेहने जाट समपलागे नग्मा गुणटागानी स्थिति ज- पय जतमईतनी के उरे देश उगोगा मोडी पर्गना में १३ चउदगे गुणटाणे योगी केली तेजे जार नरमे गुण- टाण जोगर सा माहे, याम पिया अप्रतिपात गुरु च्याननो नोजो पायो न्यारतों ने च मे गुणटाणे चढे तिहा प्रयमयी बार मनोजोग रोके पड़ी पार पचनजोग के पत्री पार कायाजोग गे पड़ी माम मनोयोग रोके पठी मूक्ष्म पचनजोग गेके पठी मुश्म कायाजोग रोके शरीररहित थाए जेटलो देहमान होरे जान्य बे हायनो उत्क्रप्टो पाचसे वनुपनो गीजे भागे बटाटे, तेवार जपन्य नीस आगुल्नी उत्कृष्ट तीनसेतेवीस धनुष नीस आगुल्नी अवगाहना रहे, तेवार आत्मा अयोगी अफिय, अलेसी, अनाहारी, अशरीरी, शुक्ल ध्याननो चोयो पायो थईने अवाती करम च्यार, वेदनीकर्म १ आउखोकर्म • नामकर्म ३ गोनकर्म ४ नो क्षय करीने मोक्ष जाय ॥ इतिश्री चउरमु गुणस्थानक सपूर्णम् ॥ - श्रीमद् देवचन्द्र प्रथमभागनुं अशुद्धि शुद्धिपत्रक पू प on २५ २ ३ om १८ १ १० २० अशुद्धि सागरोपग जीवाने वीजु पहेलो अमे प्रमाणखद्य शिष्य सगृह द्वयणुक निश्चय अनगत घोढा नाणीहि विना प्रकृति सुतत्थो निजत्ति सुतत्थो सुतत्थो ससारे भाग शुद्धि सागरोपम जीवोने बीजु पहेला अने प्रमाणखद्य शिष्य सग्रह द्वयणुक निश्चय अनागत घोडा नाणीहिं विणा प्रवृत्ति सुत्तत्यो निज्जुत्ति सुत्तत्थो सुत्तत्थो सथारे भागो २५ ९ २१ २४ २४ २४ २५ २५ २५ २५ १५ २३ १४ २९ (0) म " ३५ ३६ ३७ ३८ २३ ६ २४ १५ ४२ २४ १८ २५ १८ ८ १४ २५ २ जगदि मीजी धर्मास्तिकानो चमारिकाय इपियामि मुहूर्तमा कहे सन्चगुण निश्चयी तत्याग दालीने अनमी कियानुवृत्ति राखयो उबराइ वन्हिदिशा उत्तराध्यन निवेद्य परच्छ अनेअने यणाहा आराधक सहा ममुए शुदि नाजो चमाग्निकापनो पर्मास्तिकाय इमिमम्मि मुहूर्त कहेगो सवगुणा. निश्चययी त्यागवत टालीने अनामी क्रियानिवृत्ति राखवी उववाइ वन्हिदसा उत्तराध्ययन निर्वेद परमत्थ अने अणाहा आधार सहाव प्रमुखे ५८ " १० २ ६१ १२ or " ३ नयचक, प पृ ७४ ४ or २५ " ७६ ८० १३ १३ १४ १० २२ १९ ९० अशुद्धि . अव्यावाबाधा वर्णादि वर्मना तथाप्रवृत्ति मतात्रीओ भरणादिक प्रतिप्रदेशे तदन्य अत्यत विसरी परिणामिक क्रियारित्व तिरोभाव्यभाव सत्व उत्पत्ति इत्येव अस्त्वि परिणमयी शुद्धि अन्यावाधा वरणादि धर्मनी यथाप्रवृत्ति मतातरीओ आभरणादिक प्रतिप्रदेश तदन्त्य अन्त्य विखरी पारिणामिक क्रियाकारित्व तिरोभावाभाव सत्त्व उप्पत्ति इत्येव अस्तित्व परिणमइ ९२ ९७ ९७ २ or १०० १०० १०० १०३ १०३ १०३ २० १ om १४ भवेन भयेन १०५ १०५ द्वितियो एफैकन द्वितीयो एकैकेन १६ . प आदि पापोन सफेतिरेन गदि पपायासलेन माकेतिकेन १०७ ५ १९ २ ३ २ ११० १११ १११ ११२ ११६ ११८ ११९ १२० १२२ २ धम आप्पा गुपयर्याय तृतयो स्पादाद प्रदेशादिना काय उत्पादव्यय घटापटादि घटा दिववि सयु उत्पाद गुणीलक्ष सोने उथ्थित ग्रकाश छिन्न पूर्ण योग्यरुप यका आण्यु गुणपर्याय तृतीयो स्याद्वाद् प्रदेशादीना काय उत्पाद घटपटादि ਟ दिव्यपि सयुक्त उत्पाद गुणिलक्ष्य सौने उत्थित प्रकाश च्छिन्न पुरण योग्यताप धर्म २२ ११ १४ १९ ४ ९ ५ ९ ९ १२ १६ ९ २५ १२ " १२५ १२६ १२९ १३० १३१ १३५ कर्म पृ प (५) अशुद्धि सैवरेखा पूर्ण १३९ १४२ शुद्धि सवरेवा पुरण १० १२ " १४३ ८ २० १४४ १४५ . पटगुण षड्गुण नियुत्ति निज्जुत्ति जाणिज्झा जाणिज्जा निरक्खेवनिरिखवे निरकेवनिरिकवे पज्झाया पज्जाया त्यर्थ त्यर्थ जानी ज्ञान वर्तन वर्तमान १४६ १४७ ६ १६ २ " १५२ " १५३ १५६ २१ १२ ६ " २० २३ वस्तु जाता विष लोकिका त्रेधा द्वादशसार ऋजु अवक्रम वक तदेव मात्मीय वस्तू जात विषे लौकिका त्रिधा द्वादशार उज्जु अवक वक्क तएव मात्मीय " १५८ om ५ " ७ " पृ १५८ or १२ " १३ १६२ ए ९ १० ११ १३ १६३ " १६५ दशा " १२ २१ २० " अगदि शुद्धि तस्या तस्प गाही गाही ति त्ति माग मनु इन्दन इन्दन शकन शकन ग्यज्यते व्यज्यते पच्यनाथन वाच्येनान समजू देशा मेको मेक पणे पणो दिनयातर दीन्यवातर प्रवृति प्रवृत्ति लवि लवी सदश्या साहश्या दश दस पण तथा निज्झरा निज्जरा अयोगी अयोगि नाबाधनिरूपाधिनि-नाबाधनिरुपाधिनि- धिरूप चरित्रानयाशा-रूपचरितानायासा पयहिआ उव्ववाइ उववाइ १६६ १६९ १७४ ११ " १७८ २० २५ १८४ १० २१ २२ पइडिआ पृ प " अशुद्धि वग्गो ततशिष्य द्वादशसार उबजाय शुदि वग्ग तच्छिष्य द्वादशार उज्झाय १८८ " १४ श्रीज्ञानसार १९२ १९५ २० ९ " १० १७ " १९७ " ११ १५ " उपेक्षते उपेक्ष्यते शरी शरीर सममिस्टेन सममिरूढत एवमतेन एवमूतत समाधान समाधाय सावरुचिमतो साधनसचिमतो स्याप्य सस्थाप्य द्रव्य द्रव्ये आत्मानतानदसप- आत्मानमनतान- न्नमय दसपन्न निक्षेपाना निक्षेपाणा तेज तेजो चारितादिना चारित्रादीना प्राप्नोति सुख प्राप्नोति पूर्ण पुरण अगमनो आगमतो १९८ १ " २१ २१ २०० २०१ २०४ २ २२ २१३ २१५ मम मम न प. जगद्धि १४ १ २ গরি ज्ञानपान ये " " आसव ज्ञानपान द्रयेन असगादि इत्यादि आपर पर अत ज्योति मिन्त " ११ २१ ५ २२० अत ज्योति मिन्न ur २२१ २२३ २ १३ " तन्न विष्ठा उपशान्ताद्वा २२९ अध्यवसायानि । " २१ २१ २३२ २३३ २३६ २३८ २३९ २४२ २४३ २१ तर विष्टा उपशातादा अध्यवसानानि आगारलेन शुद्धात्मानदने परिष्ट अस्व अतीत जइतव्य ता मुह्यता मृगो स्वरुप द्वद्र १२ आगालेन शुद्धात्मनदने पदिष्ट अश्व अनागत जेतव्य स्ता मूढता गधासक्तो भृगो स्वरूपे om " १९ ६ २५३ २५६ (९) पं अशुद्धि शुद्धि पृ २५७ २६१ २७३ २३ ६ १८ २२ ६ ४ १३ २७८ २८३ " २८४ " १ २२ २८५ २९६ २९७ ३०२ सुगमा यशनाम आलेपेन चित्र यावती एकादशमम मता भागामिभि गनित्व तत् कर्ता धर्मादिना तुलयानापि ऽअनादीन चकमाया तदेव ज्ञानाधिष्ठ कृष्टा निवृत्त पचदशमम् ज्वसनादि व्यवहार रोदयिक सुगमा यशोनाम आक्षेपेण चिन पावत् एकादशम् वन्त भावानि मुनित्व स्तत् कर्त धर्मादीना तुलयानामपि ऽअनादिन चक्रमयी सैव ज्ञानाधिष्ठ कृष्ट निवृत्त पचदशम् ध्वसनादि व्यवहारे रौदयिक भय ९ ૨૦૯ १२ २० ३१४ ३१९ ३२३ २१ भय (१०) प. प ३२५ ३२९ २२ ९ जगदि निर भित शुदि. निधारे सृत भद्र आत्गीय ३३० ३३१ ३३२ २४ ? " ३३४ १४ ४ ५ २० " कार्तम्बरद अनवच्छिना दीनता ममात्मन घोव्यत्व आत्म अह हन्ध्या दुखाना बहि भवति " " मामी तहा कातम्या अनाछिता टीनता गमा मत चौयाय आत्य अय हन्दया दुखामा वाह भवन्ति दा भावद्धि दष्टि मुनि योगिन प्रत्यक्ष मान धर्म ३३८ १९ ३३९ om । " ३४१ ५ १५ २१ १० " भावर्द्धि ਵਾਏ मुनि योगिनो न प्रत्यक्ष माण धर्म- " १० ३४७ १५ (११) प २३ १८ ३५३ अशुद्धि दिष्टता यस्म भवाभोवौ व्यावात तानिश २० ३५४ ३५५ १० " R " ३५८ ३ शुद्धि द्विष्टता यस्य भवाभोधौ व्याघाताः तानिश यथौ विष कश्चिद् सर्प विरत लोकानुयायिना णार्थिनो स्तोका साक्षिक धर्मों साधु क्षयोपशनो मागोपदेशाम् परिग्रहग्रहापेशात् कयमतोऽनुभव प्रयास सद्गुरु तन्व्याप्ति सर्वोत्तमो विप कश्चिवन् सर्व विरित लोकानुयायी णार्थिन स्तोका साक्षिक धर्म साधु क्षयो नमो मामापिदेशक परिग्रहाशत् कथभूतअनुभव प्रवासा " ३६१ १२ २३ ३६८ ३७३० ३७४ २१ " ३८० ३८१ तत्वयाप्ति सर्वोत्तम २४ (१२) अरादि पृ प शुदि. ३८२ ३८४ १४ १४ २२ क्रमात ध्यापया 4 ४०७ करमात् व्याय्यया सान दोपयोग साध्य परिणत ज्ञानमेवात्मा मुपास्व साधको त्वोपयोगसाध्य परिणत ज्ञानवात्मा भवता सावर १२ ४२२ । २२ गुरुगुणपत्रिंशिका. ४३० ४३५ १० १ २ ४ भोजनकाति विणओ चउ कुवते मेहणु भोजनजाति विणए चउ कुबवे मेहण ४४२ " १६ । " ४४४ ४५४ २२ २१ १२ २१ १५ भायय वित्तूण प्यस्सावि प्रभाववना मूरिवराणा देवनदीधे असमान भाय विचूण अस्सावि । प्रभावना सरिवराण देवनदीये समान ४५७ (१३) -- प . २५ पृ ४५८ ४५९ ४६१ ४६२ ४७० शुद्धि ठेप एकले रागादिक १९ १५ ८ ४७२ ६ ११ १२ " " ४७३ १० १७ अशुदि. लेख्य एहकठै रागदिक क्रम काकाताली मय पनि १ च्यार सुधेय वले वटी आपण वैदिक बुहत तत्वतत्व सूषिम गेद सम्मकितर तीम अविधि दुरति वनमय मोहनीन मुष Fa " २० ४७५ ४७८ ४८१ काकताली मद पवित्र ३ च्यार सुध्येय चले क्ली आपण वेदक बहुत तत्त्वातत्व सूक्ष्म चोभेद समकितरो तीन अवधि दुरित वनमें मोदनीना 1 १४ २१ २२ ४८३ १० १० ४८४ " पृ शुद्धि ११ (८) जगदि मुप जीपदया निप्याग्रय मुपयी केर नाने साझ ४८८ ४९० ४९३ । २५ २४ २४ २२ " ४९९ ३ जीवदया मिथ्याग्रह मुखमा करे स्त्रीने साये धर्म मुझाय खन्या मानव शील विध्यो न जात वारण केकी वृक्ष रमणिक . २२ " ५०० १ १० " " ९ मुझीय पड्या मन वशील. विव्योजात भारण केशीर वृष स्मरणिक, आदेय छे गधपेमे- सूद्रा ५०२ ५११ ५१४ १५ आदे अछे.. " ५१५, गधप्रेमे ४ २१ १२ " ५२० ५२१ ५२८ द्वे नित तास उदयाचलि- व्हे नवि नास उदयावलि ३ प - शुद्धि जावे अशुद्धि जीवे शिशि सधिर १५ पृ. ५२९ ५३९ ५४७ ५५१ ५६० ५६१ शशि १२ गाना रे १० १४ १ ५६८ अथिर वधारे सवर पोडशदळ अव्यय यानपान गुणखाण । अलष काय निचे आहर थात जडता. मनपर्यव कुभकरण पष्ट सबर पोटश व्यय थानपान गुणराणा अलेप वाय निये आदरे घात भटता मनपर्ये कुभकरण घष्ठमो or ५७१ ५७२ " १५ २४ ४ १० ५७३ ५७५ ५७९ १० ५८५ ५८९ १२ कर्नग्रन्या विरोप उसन उवग सस्थान विशेष ओसन्न उवग सस्थान ६०२ २२ शुदि. ६२८ नाम्या (१६) पादि. नम्यो तीबरो योगस्याम मगंगाम कमुरन्द्र तीर्थकर न १ ५ ६४० ६४९ ३ १२ १५ ६५३ ६५८ ग अरपतिस्था मार्गगा कम्मुरल मह किण्हा जीव मार्गणामें विरि असत्पामृषा (सर्वत्र) पहेलो मनोयोगे लब्धि मध्यम नरमा चतुर्य- कर्मग्रन्थ समेत समाप्त सवार निहो अवबोदयी आवलिनो ५ फिल्हा जीवमें मार्गणा तिरि असपाअमृपा पहेली मनोयोग लद्वि मध्यय नवामा चतुर्थो कर्मग्रन्य समेत समाप्तम् सद्वार निदो अनुवोदयी आवलीनी ६७३ ६८१ ६८३ " १४ ६८४ ६८८ १३ २० (१७) पृ अशुद्धि शुद्धि ७१८ ७३५ ४ ९ १० " " ७६१ ७६३ १० १४ २३ १ १४ ७६९ ७७२ ७७४ ७७५ पत्ते अब मोटा न्हाना प्रवरा सत्राय श्वरान् भवे सेवम विकल्य कर्ण निश्रय शुद्धोपयोगे निश्चयन एटटे अशुद्रोपयोग विभाग पुव्य विपेशे विषयमिलापी पञ्चशद् ननानि स्तोत गर्वादिक पजे अग्रुव मोटी हानी प्रवरा सुमार्थ श्वराव भर सेवन विकल्प करण निश्चय अशुद्धोपयोगे निश्चयनयथी एटले गुपयोग विभाव पुप चिशेपे विषयामिलापी দখার नमानि स्तोक गुवादिक ७८० १२ २१ २० २ २ ७९५ ७९८ ८०७ " ८०८ 3 पृ प २ २४ ८१८ ८१९ M " २ ६ २५ ८२० ८३५ wr or ८३७ (१८) अगुदि. शुदि. वेद वेदनीय परिसहोपनाणनाण परिसहपत्रमाण पेस घेल पुरस्कारो यसम्मत नष्ट सय पुरिततिहाणु परिरासिंहाण कम्म अवन जीप अजीव समयोच समयोर्व सम्पत्योपशमिक सम्यक्त्वौषनिक पिछड़ पिच्छा गणि मणि रयण रयण वेअइढ खेयङ निर्जर तिर्जरा सबढ़ाओ सबटाओ देओनी देवोनी अत्येन्द्रि अतीन्द्रिय अनावगाहि अनवगाही द्रव्ययणे द्रव्यपणे सत्य सच्च असत्य असत्व स्वप्रदेश सप्रदेश wr " ८३१ १९ २२ २४ २४ २२ ३ ८४१ ८४२ २२ " Go 18 पृ . अशुद्धि - प १५ ८५३ ८५४ ९ ९ २१ २१ १९ ८६२ ८६४ ३ शुद्धि शसंय उपद्रव वत्युम्मि छउम अण्णं जीव मिथ्यात्वना कसाया अज्जिय चरित्त सम्यक्त्व समकित क्षयोपशम तोके नीस मिथ्यात्व सुरवर मुनि निवर्तन " " १५ " उदय वत्थुमि च्छउम अठण जीवने मिथ्यात्वनय कसाय अजिय चरित सम्यक्य समकिन क्षयोप रतोके वीस गिथ्याव सुख मूनि निरर्तन दर तपपतो. वृतो दिनकृती इर्यावथिकी- २० १९ " ८६७ ૯૬૮ " २४ ३ ९ ग ८७२ १० १? १३३ तपव्रत वृत्तौ दिनकृत्य इपिथिकी " (२०) पृ. प. अगदि शुद्धि. ८७४ ५ १० ३० २१ २४ रुदि नमी इति शिल्प जपा रुपे योगे अने चर्माते उच्छेदागुल पमागागुल दुगणिय " ८७८ ४ इदि चमी इदि शिल्प जण ले जोए अनेक चरमारतें उत्सेधागुल पमाणगुल दुगुणिय पीरस्सायगुल पमागगुलेण अर्यावग्रहना आपगुलेन वास सय केस तसाइ आकुट्टिका त्साहात्मिका कदर्प कल्पः योगोप वीरसागुल " " or ८८३ ९ यमाणगुलेण अर्याग्रहना आयगुलन वासमय किस सरसाइ आकुट्टिकया त्साहोत्मिका कदर्प कल्प योगीउप " ८८८ - १ . १० १२ ।

(२१) शुद्धि पृ. प अशुद्धि १२ १९ ८९० २० य मुढेय ८९१ २ ८ १३ " " " ८९२ १५ १५ १६ " " " रुपा उमत्ते उम्मत्ते अमूढ़ेय लोहोह लोहोष वली वही सन्नाह सन्नाए भावदशा भारदिशा द्रव्यदशा दृव्यदिशा स्वयोग स्वयोग्य पर्याप्ति पर्याप्ती समर्या समर्थ्य च हि बलिय दलिय आश्री समयआश्री पुरसकार पुरिसक्कार गुणिए गुणिए पाणीवह पाणीवह दुस्सवेयाल दुसयतेपाल ११ मा सुची १२ मा सुवी पइअमसखया पइअसमसखया यतिया जत्तिया इति इति तित्तिया तत्तिया मणयोयो नणथोयो २१ ८९३ ८९५ ८९६ " ९०० ९०६ १२ १३ (२३) पृ प जगदिन शुदि. १३ १९. २१ ११ ९१९ " पादि गेपिन्ले नियाय निपाणु वणरसइ पादपोपगम अपित्त सचित्त अवः असरूपाता प्राणातिपात विरमण सवा-3 निग्गह ९ ९ १५ " " ९२० वापी गेविश्झे निवाणु निपाणु वणरस पादोपगमः सचित्तः अचित्तः अप असख्यता प्राणातिपात सवाच्छ निगह अगुसेठी सयकेवलि कारण मूत्त उद्देशासना- आगमनना । बडिबच्चे उगवमाणो प्रपचा कला काल १४. ९२२ ९२६ ९२९ १२. अगुल सेठी " . " १४॥ २. ९३५ " सुयकेवलि कारण तैजसम् मूय' उद्देशाना आगमना पडिबध्ये उग्गमर्माणो प्रपच वेला काळे ९४० ९४२ २५: ११७ १२ २१ - ९४४ प अशुद्धि शुद्धि. - ९५८ ९५९ ५ or or मुवरि निचुग्घाडीओ भाग तदत्य सूक्ष्म नवी दुयाहिण्णा तियच्येत्र अरिह मुवरि निच्चुग्वाडीओ भाग तदत्य सूक्ष्मो नयी दुपाहिएण तिर्यंचएव अरिह ९६० १५ १५ ९६१ ५ १३ कर्मसंवेध ९ १ ९७७ ९ अच्छा छदोसु मिठाइ मग अनहारक वणसय इक्कारसय पिवज तिछ जुआ पद्यत्त तिळयर पुत्वचा अछा छदोसु मिच्छाइ म. ग १ अनाहारक पणसय इक्कारसय खविज तित्यजुआ पज्जत तित्ययर पुन्छता , पृ. जगवि. " २४ २४ १० ९८२ : " ११ ९ ९८३ " १२ १२ १३ १८ मिस्नगती पादि नच्छि दीग तित विगउदि परहारे मिडा निल मिटम् अज्ज अविरतति छच तिनइ युआ मिछ कगाय मिच्उअसन्नि पणिदि नन्वि दस नित्य विगलिंदि परिहारे मिच्छा वित्य मिच्छ अपज्ज अविरति पर तिनवई युआ मिच्छ उदयुम्बु पडिगहि जहनियर ठिठागा उणू दलिआ मज्झत्थ ९८६ ९८८ " ११ ९८९ २० २३ " ९९१ " " mr mor पडगही जएनिअर ठइठाणा उणु दलिअ मजत्थ ९९२ १२ (२५) ܩܘ प. १३ " " १५ ९९३ ९९८ २० अशुद्धि शुद्धि जाण झाण अग्गाहणी अग्गायणी ततो तत्तो निज्झर निज्जर निर्जरा निर्जरा ग्रहस्स्छ ग्रहस्थ श्राविक श्राविका जुत्त अणुजुत्त पेइ पेच्छइ कुसुमाचुअराइणा- कुसुमियचूयवेणएगा येगा मजरागहिया मजरी गहिया खचावारेणलयतण खवावारेण लयतेण पडिनियत्तओ पडिनियत्तो कहे कर्हि अमच्चणादसाओ अमच्चेण दसणाओ पच्छसवण पच्छासवेण काविसेसी कट्ठावसेसो उपसमकितयी उपशमसमकितथी अतमुहूर्त अतर्मुहूर्त " ११ ११ १२ १२ " " ww " " १२ ११ " २४ १२ १००७ १०१२ बूद्धि निरावणा मुजतो बुद्धि निरावरणा मुजतो १४ ५ १०१४ " प अगद मिठामि गुद्धि मिश्यामि २२ . १०१६ " " १ प. अशुदि शुद्धि अगे सूचना. पृ ज्या २९ कोडाकोडी" इत्यादि सपा- वधान का छे त्या साधिक पत्योपमना असख्या- तमा भाग अधिक २९ को को इत्यादि जाणवु पृ २ प ३ १ " एक कोडाकोडीसागर " स्थाने देशण एक कोडामोडीसागर वाच पृ २ प ४ यी ९ "मुहून" ने स्थाने अन्तर्मुहूर्त वाचवु पृ - २१ प ९ " अरुपी" स्याने रुपी अरुपी बन्ने ग्रहण करवा. पृ ४० प ८-थी १० "कोई एक प्रदेशे असख्य, अनत, वा सख्यात अगुरु लघु गुण कह्यो छे” परन्तु प्रति प्रदेशे अनत अगुरु लघु सर्वदा होय छे अने समय तथा प्रदेशोमा परस्पर असख्यगुण वा अनत- गुण वा सख्यगुग हानी वृद्धि ए परिणमे ए अर्थ ग्रहण करतो पृ ५२ प ६ पर्याय ते गणमा सक्रमावे इत्यादि वाक्यमा मनोयोगनेज पर्याययी उतारी गुणमा संक्रमावे इत्यादि (२७) जाणणु कारण के द्रव्य, रण, पर्यायनो परस्पर सक्रम होय नहि पृ ५३ मा जीव अधोगतीए दा तीच्छों केम नथी जतो ? एना उत्तरमा मुरय उत्तर जीवनी स्वाभाविक गति ऊर्बज छे एल्लु जाण पृ. ९८ प १२ "दर्शनगुणते विशेष छे" ए स्याने " ज्ञान- गुण ते विशेष छे" एम जागवु पृ ५५० प १७ “ सादि अनादि अगतछेदरे " ए पदना अर्थमा प्रथम अनादि " ने पछी " सादि "ए अनुक्रम राखवो पृ ५५४ प ९ " निर्विधवायु आवार छे" ए स्थाने त्रिवि- ववलय आवार छे" ए अर्थ सभवे पृ ५८५ गाथा ७ मीना अर्थमा पर्यायसमामादिक्ना अर्थमा ज्या ज्या " सर्व । पद आवे त्या त्या " एकयी अधिक " वा ' अनेक " एवो अर्थ करखो पृ ५९० प ६ " एक कोडाकोटी" ने स्थाने " देशूण- पल्योपमना असख्यातमा भाग हीन एक कोडाकोडी" एम जाणवु पृ.६३६ प -१८ " ते आहारपर्याप्त ताइज सास्वादन भावमे वरते " एम का छे परन्तु सामाइनपणं, तो आहार पर्याप्तियी आगळ शरीर पर्याप्ति सुधी होय छे क- रण के आहारपर्याप्ति तो १ समय मान छे ने अने अपचेन्द्रिय जीवोने सास्वादनपेगु समय मान होय सुम कहेवानु प्रयोजन नहि.

(२८) पृ.६५५ गापा ३१ ना मामा केलिने ७ योगमा " असत्य- मनपोग तथा "जसत्यानयोग" गणश्यो छेते स्थाने असत्यामृषामनयोग तपा असत्यापावचन- योग गणो पृ. ६६१ प १० "मानकापीवी कोपीस मायात्री कफ्टी अधिकार छे"ए स्थाने मानकापीयी क्रोधी अ. धिक छे ने क्रोधीयी मापानी कपटी अधिक छे एम वाचन १६६१ प प १४ " च्यारगति समीते सर्व जीव छे." प स्पाने "चरे गतिमा समकीती जीवने अवधि- ज्ञान होय छे माटे " एम नाचर यू ७३६ प २" औदारिकपी वैक्रिय सूक्ष्म, भाषायी उश्वास- मूक्ष्म," एमा मध्ये रही गयेलो पाठ आ प्रमाणे जाणवो औदारिकथी वैक्रिय सूक्ष्म, वैक्रियथी आहा- रक सूक्ष्म, आहारकथी तैजस सूक्ष्म, तैजसथी भाषा- सूक्ष्म, भाषायी उश्वाससूक्ष्म पृ.८०९ “चार वार श्रेणिगत अने पाचमीवार पडता" ए प्रमाणे उपशम सम्यक्त्वनी ५ वार प्राप्ति कही के परन्तु अनादि मिथ्यात्वीने सम्यक्त्वनी प्रथम मा- प्तिमा एकवार अने चारवार श्रेणिमा, एरीवे ५-वार उपशम सम्यक्त्वनी प्राप्ति जाणवी. तथा आठमे गुणठाणे अटकीने क्षपकणि मां- डीने केवल ज्ञान पामे" एम का छे, परन्तु श्रेणियी पडी ७ मे अप्रमत्त गुणठाणे आवीनेज क्षपकश्रेणि माडी शकाय परन्तु ८ मेथी नहि एम जाणवू (२९) घणे स्थाने सयुक्त "" ने बदले मान"" छमायले छे अने “ निर्जरा" शब्दमा ज्झ छपा- यलो छे, “निज्जरा " इत्यादि शब्दमा ज ने स्थाने ज्झ छपायलो छे, ने तेवा घणा शब्दो होवाथी ते सर्व शब्दोनी शुद्धि आपेली नथी तोपण आ सूच- नायी तेवा शब्दो सुधारीने वाचा तथा जे शब्दोनी एकवार शुद्धि आपी के तेवा प्रकारना वीजा सर्व सरखा शब्दो पण तेवीज शुद्धि- वाळा जाणीने वाचवा कारण के तेवा अनेक शब्दो आवेला होवाथी सर्व शब्दोनी शुद्धि दाखल करता ग्रथ वधी जाय छे. तथा कइक स्थाने अक्षरो एक बीजा शब्दमा जोडाइ गयेला होवायी वासक वर्गने अर्थ समजवो अशक्य थाय ते सभषित छे तो तेवे स्थाने अक्षरो अर्थने अनुसार मेलवीने वाचवा तेमाना कइक स्थान नीचे प्रमाणे छे पृ. ५०० प १ " मन वशील विनागत तेज छे रे" ए स्थाने मानव शीलविना गततेज छेरे" एम वाचवु पृ ५०३ प. ७ "करे जसु वाणि रे" ए स्थाने "करेज सुवाणि रे" एम वाचवु पृ ५०६ प १४ चरचित्तकारि जन विसरे रे" ए स्थाने " चलचित्त कारिज नवि सरे रे" एम वाचवु. पृ. ५४४ प. ४ " मोहनीदलय लीन " ए स्थाने " मोहन्दि लयलीन" वाचवु पृ ५५३ प. २१ "कनसे जेम न खन" ए स्याने सब सेजे मन खत " एम वाचवु, इत्यादि.

(२८) गृ. ६५५ गाया ३१ नावामा कालिने ७ योगमा " असरप- मनपोग तपा “अमापाचनयोग" गणपोछे वे स्थाने असत्पामृषामनयोग तपा असत्यायपाश्चन- योग गणो पृ. ६६१ प १० " मानकापीची क्रोधीमु मायावी कफ्टी अधिकार छे"ए स्थाने मानकापीयी क्रोधी अ धिक छे ने मोनीयी मायावी कपटी अधिक छे एम वाचन ६६१ प. प. १४ " च्यारगतिम समझीते सर्व जीव छ । ए स्पाने "चरे गतिमा समीती जीवने अवधि- ज्ञान होय छे माटे " एम वाचमु. पृ ७३६ ५ २ " औदारिकपी वैक्रिय सूक्ष्म, भाषाथी उश्वास- मूक्ष्म, एमा मध्ये रही गयेलो पाठ आ प्रमाणे जाणवो औदारिकथी वैक्रिय सूक्ष्म, वैक्रियथी आहा- रक मूक्ष्म, आहारकथी तैजस सूक्ष्म, तेजसथी भाषा- सूक्ष्म, भाषायी उश्वाससूक्ष्म पृ.८०९ चार वार श्रेणिगत अने याचमीवार पडता" ए प्रमाणे उपशम सम्यक्त्वनी ५ वार प्राप्ति कही छे परन्तु अनादि मिथ्यात्वीने सम्यक्त्वनी प्रथम प्रा- प्तिमा एकवार अने चारखार श्रेणिमा, ए रीते ५-वार उपशम सम्यक्त्वनी प्राप्ति जाणवी. तथा आठमे गुणठाणे अकीने क्षपकणि मा- डीने केवल ज्ञान पामे" एम का छे, परन्तु श्रेणियी पड़ी ७ मे अममत्त गुणठाणे आवीनेज क्षपकणि माडी शकाय परन्तु ८ मेथी नहि एम जाणवू શ્રીમદ્ બુદ્ધિસાગરજી ગ્રન્થમાળામાં પ્રગટ થયેલા પૂ8 ૧ જ ભજન સમૃદ્ધ ભાગ ૧ લો ૨૦૦ ૦-૮-૦ ૧ અબામ વ્યાખ્યાનમાળા ૨૦૬ ૦-૬-૦ ૨ ભજન ગ્રહ ભાગ ૨ જે ૩૩૬ ૦-૮-૦ ૩ ભજનમ ગ્રહ ભાગ - જે ૨૧૫ ૦-૮-૦ ૪ સમાધિ શતકમ ૩૪૦ ૦-૮-૦ ૫ અનુભા પશ્ચિ ૨૪૮ ૦-૮- ૬ આમનદીપ ૩૧૫ ૦-૮-૨ ૭ ભજનમ ગ્રહ ભાગ ૪ છે ૩૦૪ ૦-૮૦ ૮ પરમામદર્શન ૪૩૨ ૦-૧૨.૦ ૯ પરમાત્મજ્યોતિ ૫૦૦ ૦ ૧૨ ૦ ૧૦ તત્વબિંદુ ૨૩૦ -૪-૦ ૧૧ ગુણાનુરાગ (આવૃત બીજી) ૨૪ ૦-૦૦ ૧૨-૧૩ ભજનમ ગ્રહ ભાગ ૫ મે તથા જ્ઞાનદીપિકા ૧૮૦ ૦-૬-૦ ૧૪ તીર્થયાત્રાનું વિમાન આ બીછ) ૧૫ અધ્યમ ભજનમ ગ્ર ૧૬ ગુરૂમાધ ૧૭ ૦૪-૦ ૧૭ તત્વજ્ઞાન કા. ૧૨૪ ૦-૬-૦ ૧૮ મહુલીસ ૧૧૨ ૭-૩- ૧૯-૨૦ શ્રાવકધર્મવરૂપ ભાગ ૧ (આરતિ ત્રીજી) ૪૦-૪૦ ૦૧-૦ ૨૧ ભજન પદ સંગ્રહ ભાગ ૬ હૈ ૨૦૮ ૭ ૧૨ ૦ ૨૨ વચનામૃત ૩૦૮ ૦૧૪ ૦ ૨૩ યોગદીપક ૨૬૮ ૦ ૧૪ ૦ ૨૪ જેને એનિહાસિક રાસમાળા ૪૦૮ ૧૦૦ ૨૫ આનન્દઘન પદય પ્રહ ભાવાર્થ સહિત ૨૬ અધ્યાત્મ શાનિ (આકૃતિ બીજી) ૧૨ ૦-૦૦ ૨૭ કાવ્યસ ગ્ર૯ ભાગ ૭ મે ૧૫૬ ૦-૮૦ ૨૮ જૈનધર્મની પ્રાચીન અને અર્વાચીન સ્થિતિ ૨. કુમારપાલ ચરિત્ર (હિન્દી) ૨૮૭ ૦-૬-૦ ૩૦ થી ૩૪ સુખસાગર ગુરૂગતા ૨૦૦ -૪૦

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શ્રીમદ્ બુદ્ધિસાગરજી ગ્રન્થમાળામાં પ્રગટ થયેલા અન્વે. ૫ અનુભવ પશ્ચિમી ૧ ભજન સંગ્રહ ભાગ લે ૨૦૦ ૦-૮૦ ૧ અધ્યામ વ્યાખ્યાનમાળા ૨૦૬ ૯-૪૦૦ ૨ ભજન ગ્રહ ભાગ ૨ જે ૩૩૬ ૦-૮૦ ૩ ભજન ભાગ - ૨૧૫ ૭-૮- ૪ સમાધિ રતકમ ૩૪૦ ૧-૮-૦ ૨૪૮ ૭-૮ ૬ આમનદીપ ૩૧૫ ૦-૮-૧ ૭ ભજનમ ગ્રહ ભાગ ૪ છે ૩૦૪ ૦-૮૦ ૮ પરમાત્મદર્શન ૪૩૨ ૯-૧૨ ૦ ૯. પરમાત્મજ્યોતિ ૫૦૦ ૦૧૨ ૦ ૧૦ તત્વબિંદુ ૨૩૦ -૪૦૦ ૧૧ ગુણાનુરાગ (આવૃત્તિ બીજી) ૨૪ ૦-૧-૦ ૧૨-૧૩ ભજનમ ગ્રહ ભાગ ૫ મે તથા જ્ઞાનદીપિકા ૧ ૦ ૦-૬-૦ ૧૪ તીર્થયાત્રાનું વિમાન આ બીજી) ૬૪ ૦-૧૨ ૧૫ અધ્યાત્મ ભજન ગ્રહ ૧૮૦ ૦-૬૦૦ ૧૬ ગુરૂધ ૧૭૨ ૦૪-૦ ૧૭ તરવજ્ઞાનક, ૧૨૪ ૦-૬-૦ ૧૮ બહુ લી સ ગ્ર ૧૧૨ ૯-૩- ૧૯૨૦ શ્રાવકધર્મસ્વરૂપ ભાગ ૧ર (આવરિત્રીજી) ૪૦-૪૦ ૦-૧૦૦ ૨૧ ભજન પદ સંગ્રહ ભાગ ૬ ૨૦૮ ૦ ૧૨ ૦ ૪૨ વચનામૃત ૩૦૦ ૦૧૪ ૦ ૨૩ ચગદીપક ૨૬૮ ૦ ૧૪ ૦ ૨૪. જેને એતિહાસિક રાસમાળા ૪૦૮ ૧૦૦૦ ૨૫ આનદઘન પદય ગ્રહ ભાવાર્થ સહિત ૨૬ અધ્યાત્મ શનિ (આકૃતિ બીજી) ૧૨ ૯-૩૦ ૨૭ કાવ્યસંગ્રહ ભાગ ૭ મો ૧૫૬ ૦-૮૦ ૨૮ જૈનધર્મની પ્રાચીન અને અર્વાચીન સ્થિતિ ૨૮ કુમારપાલ ચરિત્ર (હિન્દી) ૨૮૭ ૦૧-૦ ૩૦ થી ૩૪ સુખસાગર ગુરગીતા ૪૦૦ ૦૪-૦ 9

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R
વિજાપુર પાન
૩૭ સાબરમતી કે બી.
૩૮ પતન પા.
૩૯-૪૦-૪૧ જેનોમન બબધુ નમાનિ જનનીતા
૪૨ ન ધાતુતિમા લેખ સમક
૪૩ મિમની
૪૪ બેિનિક
૪૫ નેપનિક
૪-૪૩ ધાર્મિક ગદ્યસન તથા પરતાપ ભાગ ૧ લે ૩૬ ૩૦
૪૮ થીમદ દેવ ૭ પ્રથમમ ગ.
૧૦૨૮ - -
નીચેના ગ્ર ગ્રેસમાં છપાય છે
(1) કમર (૨) જનપધસાગર ભાગ ૮ મો (૩) જેમ દેવજી
4 થત પ્રહ દિતાભાગ
નિયલા સ્થળે પુસ્તકો મળે છે.
મુબાઇ, પાયધુપડી બુબેલ–મેઘજી હીરજી
ચંપાગતી અધ્યાત્મ જ્ઞાન પ્રસાદ ભડળ.

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Shrimad Devchndra Bhag-1

Author
Suri, Budhisagar
Title
Shrimad Devchndra Bhag-1
File name
Shrimad Devchndra Bhag-1
Text
OCR done
Citation
1917
Published
2011/07
Publisher
Mumbai, Champagali, Shreeadhyatmgyanprasarkmandal
Language
Sanskrit
Pages
1123
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
DLI number
313934
Barcode
99999990312098.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
aizIMZJrPyT
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Shrimad Devchndra Bhag-1