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Naagarasara~vasva Kaamashaastrakaa Apuura~va Gran'thaa

Pada~mashrii · 2005-11-28

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OU_184316
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श्रीः
पद्मश्रीविरचित
नागरसर्वस्व
( कामशास्त्रका अपूर्वग्रन्थ )
आयुर्वेद महामहोपाध्याय
६. भगीरथस्वामी द्वारा
परिशोधित संस्करण
प्रकाशक--
श्रीवेंकटेश्वर पुस्तक एजेन्सी,
१९५२, हरिसनरोड, कलकत्ता।

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Private circulation.
( नितान्त गोपनीय )
कविशेखर पद्मश्री विरचित
नागरसर्वस्व
very
अर्थात्
सांसारिक सुखका साधन ।
संस्कृत मूल और सरल भाषाटीका सहित ।
अनुवादक
पण्डित श्रोराजधर झा काव्यतीर्थ
प्रकाशक
श्रीनिवास गिरधारीलाल लोहिया,
मालिक-श्रीवेंकटेश्वर पुस्तक एजेन्सी ;
नं० १५२ हरिसन रोड, कलकत्ता।
प्रथम संस्करण]
[ मूल्य २॥

प्रकाशक श्रीनिवास गिरिधारीलाल लोहिया, मालिक बेंकटेश्वर-पुस्तक-एजेन्सी, नं० ६५।२ हरिसन रोड, कलकत्ता। 33333333333393333 जनवरी १६२६ €€€€€€€€€€€€€EEEEEEEE! मुद्रक- पण्डित नरोत्तम व्यास, मालिक श्रीनारायण-प्रिण्टिङ्ग-वस, ८ चित्पुर स्पर, (मछुआबाजार) भूमिका इस संसारमें कोई भी प्राणी रति आदि नवों भावों या रसोंमेंसे एक न एकका सहारा लिये बिना क्षण भर भी चैन नहीं पा सकता। विशेष कर उनमें रति अर्थात् प्रीत्यात्मक भाव ही प्रायः प्रधान है। यद्यपि अन्यान्य भावोदयके समय उक्त भाव कुछ क्षणके लिये अन्तर्लोन हो जाता है, किन्तु उस भावकी प्रबलता या बलवती वासना बनी ही रहती है। अतएव सब रसोंमें श्रृंगाररस प्रधान अथवा ओदि रस कहानेका श्रेय उसे ही प्राप्त है। रति वस्तु क्या है ? उसका लक्षण संस्कृत साहित्यके सुप्रसिद्ध आलङ्कारिक विद्वान् कविराज विश्वनाथ महापात्र ने अपने साहित्यदर्पणमें यों किया है। "रतिर्मनोऽनुकूले मनसः प्रवणायितम्” अर्थात् मनके अनुकूल पदार्थमें अच्छो तरह मनका आसक्त होना ही रति हैं अथवा यों भी कह सकते हैं कि प्रमाद्र चित्त ही रति है। वही रति देवता, गुरु, माता, पिता, तथा महात्माओंके प्रति भक्ति नामसे कही जाती है। समान वयस्कोंके प्रति मित्रता नामसे व्यवहृत होती है और धर्मपत्नीके प्रति भंगार रसका स्थायी भाव रति कहाता है। इस संसारका गृहस्थाश्रम या "घर-गिरस्ती" का सारा दार-मदार या उत्तर-दायित्व स्त्री-पुरुषके सच्च प्रेम- बन्धनके ऊपर ही निर्भर है। यह सभी जानते हैं कि जिस:)

घरमें स्त्री-पुरुष परस्पर शुद्ध प्रेमके उपासक नहीं होते उस, घरमें निर्जन वनके समान उदासीनता छायी रहती है। महाकवि भवभूतिने कहा है कि 'अद्वैतं सुखदुःखयोरनुगुणं सर्वास्ववस्थासु यद्विश्रामो हृदयस्य यत्र, जरसा यस्मिन्न- हार्यो रसः। कालेनावरणात्ययात्परिणते यत्स्नेह सारे स्थितं । भद्र तस्य सुमानुषस्य कथमप्येकं हि तत्प्राप्यते ॥' अर्थात् जो प्रम, सुख और दुःखमें एक समान रहता है सब अवस्थाओंमें अनुकूल गुणवाला होता है, जिसके सहारे हृदयको विश्राम मिलता है, बुढ़ापेमें भी जो अनिवार्य होता है एवं परिणाममें लज्जा आदिका आवरण हट जानेपर जो स्नेहके साररूपमें परिणत होता अर्थात् प्रेममय हो जाता है, ऐसा प्रेम किसी किसी सौभाग्यशाली सजनके भाग्य में सम्प्राप्त होता है। जिस प्रकार रतिके उत्पादक और संवर्धक सौन्दर्य, वीर्यशालित्व, कलानैपुण्य तथा सुशीलत्व आदि गुण हैं उसी प्रकार उनका सर्वथा अभाव रतिका विघातक भी है। इसी लिए उन गुणों द्वारा प्रीति बढ़ानेके अनेक उपाय तथा स्वदाररक्षण एवं पुत्रप्राप्तिके उपायोंका भली भांति ज्ञान तथा गृहस्थाश्रमको स्वर्ग बनाने और दाम्पत्यधर्मके तत्वों द्वारा जनताको लाम होनेके उद्देश्यसे सकल विद्याओं के आदि उपदेशक भगवान् महेश्वरने 'कामतन्त्रको भी कामका लक्षण है कि "स्त्रीषु जातो मनुष्याणां रघा।

( ग ) खीणाश्च पुरुषेषु वा। परस्पर कृतः स्नेहः काम इत्यभिधी. यते ।" अर्थात् त्रियोंमें मनुष्योंके और मनुष्य अथवा पुरुषोंमें स्त्रियोंके उत्पन्न परस्पर प्रेमको काम कहते हैं। अतएव काम विषयक तन्त्र कामतन्त्र हुआ। वह बहुत विस्तृत रूपमें है, जो आजकलके अल्पायु तथा आलसी मनुष्योंके लिये अधिक उपकारी नहीं हो सकता। इसलिए वात्स्यायन मुनिने सब विषयोंको संक्षेप रूपमें एकत्र कर कामसूत्रको बनाया। तदनन्तर उसी कामसूत्रके आधार पर लोकोपकारार्थ अपने-अपने नवीन अनुभवोंका भी समावेश करके कल्याण मल्ल, कोक्कोक आदि कवियोंने अनङ्ग-रङ्ग तथा रति-रहस्य आदि ग्रन्थोंको बनाया। उसी प्रकार बौद्धाभक्षु विद्वान् पद्मश्रीने इस 'नागर-सख' को भी रचा। बौद्ध भिक्षु अर्थात् परिव्राजक होकर रवा इससे आश्चर्यमें न आना चाहिये, क्योंकि पूर्व कालमें संसार- विरक्त साधु केवल अपनी एक आत्माके लिये ही विरक्त होते थे, किन्तु जनताके उपकारमें सदैव अनुरक्त रहते थे। गुरु महाशय गृहस्थाश्रममें प्रवेश करनेके समय अपने भक शिष्यको काम-शास्त्रका भी उपदेश देते थे, इसलिए इस पुस्तकको भी लोकोपकारार्थ ही संस्कृतसे हिन्दीमें अनुवादित किया गया है। इसका उद्देश्य यह नहीं कि जनताका अकल्याण हो, प्रत्युत् काम-कल्याण-कामनाके लिये ही माषान्तर हुआ है। संस्कृतमें होनेके कारण अब तक ऐसी (घ ) पुस्तकोंसे निर्व्याज प्रेमका पुजारी सजन-युवफ-जगत् वशित था, इसलिए अब संस्कृतके न जाननेवाले भी इससे उचित लाम उठायेंगे तो मेरा परिश्रम सफल होगा। यदि बास्तवमें काम भी एक प्रकारका कटार ही है। इसको मी धार तलवारकी सी है। यदि युवकबृन्द इसका सचा उपयोग करंगे तो संसारका सच्चा सुख पायेंगे अन्यथा इसके विपरीत-इसका दुरुपयोग करेंगे तो तलवार का सच्चा उपयोग जैसे आत्मरक्षा है, वैसे ही उसका दुरु- पयोग अर्थात् निर्दोष व्यक्तिके ऊपर प्रहारकी भांति परिणाम स्वरूप आत्म-विनाश है। ठीक इसी तरह त्रिवर्ग अर्थात धर्म, अर्थ और काम है। इसका सदुपयोग अपनी धर्म- पलीके विषयमें है, किन्तु इसका दुरुपयोग परस्त्री विषयक दुर्वासना है। इस दुरुपयोगका कुफल भी प्रायः प्रति दिन देखनेमें आता है, फिर विशेष लिखना व्यर्थ है। अतएव यह पुस्तक उपयोगिताकी दृष्टिसे देखनेपर सजनों तथा सहदयों को उपयागी ही जंचेगी। इसलिए यह पुस्तक गृहस्थाभम में प्रवेश करनेवाल युवकोंको सच्ची सलाह देगी। प्रस्तुत पुस्तकमें अन्यान्य कामशास्त्र विषयक ग्रन्थोंकी अपेक्षा विशेषता यही है कि इसका नाम ही पहले नागर. सर्वस्व अर्थात् नगर-निवासियों (शहरके रहनेवालों) का रति विषयक सर्वस्व है। प्रामवासियोंकी अपेक्षा नगर-निवासी सदासे सब व्यवहारोंमें चतुर होते माये अत- () है। इसका प्रमाण यही है कि (माजकल सभी) नाग- रिक प्रामीणोंको “देहाती' कहके कोसते हैं। इतना ही नहीं जो प्रामवासी कुछ दिनके लिए भी मगर-निवासका सौभाग्य प्राप्त कर लेते हैं, वे भी अपने गांव के लोगोंको गंवार या देहाती कहनेसे नहीं चूकते। एव यह सिद्ध है कि अनेक पीदियोंसे बसे हुए व्यापारी तथा नगर निवासी ग्रामवासियोंसे कहीं व्यवहार-चतुर होते हैं। मतएव कामकलाओंमें भी उनका कुशल होना जन्मसिद्ध मधिकार है। सुतरां उनके रति विषयक व्यवहार विशेषों का वर्णन होनेसे यह पुस्तक सोनेमें सुगन्धिका काम करती है। इसमें स्त्रियोंका संकेत अर्थात् ताम्बूल, पुष्पमाला आदि देनेका संकेत, नाड़ी संक्षोभण, सशब्द चुम्बन, जिह्वा प्रवेश, चूषण, मर्दन, ग्रहण तथा अगुलि प्रवेश आदि विशेष देखनेमें आते हैं। रत्नोंकी परीक्षा तथा उनके धारणका विषय भी और पुस्तकोंमें नहीं हैं। रमणियोंकी विविध शृङ्गार चेष्टाए हाव भाव आदि परम प्रीतिवर्धक लक्षण भी इसमें विशेष रूपसे वर्णित हैं। मन्त्र विशेषसे कामकला क्षोभण भी अन्यत्र नहीं पाए जाते। सुतोदय अर्थात् पुत्र- लाभके भी उपाय इसमें बताए गये हैं। स्त्री-पुरुषका जाति निर्णय भी वणित है। इस प्रकार कामशास्त्र विष- यक अनेक गण-सम्पन्न होनेसे यह पुस्तक सवथा उपा- देय है।

( च )
अन्तमें हम अपने प्रिय पाठकोंसे नम्र निवेदन करते हैं
कि इसके प्रकाशनका उद्देश्य नव-युवक संसारमें इस
विषयका ज्ञान-वर्धन तथा उसका सदुपयोग ही है, दुरुपयोग
कदापि नहीं। हाँ तब यह भी पहले मैंने कहा है कि
एक ही वस्तुमें अनेककी पृथक् पृथक् अनेक भावनाएं होती
हैं। उस दृष्टिसे किसी सजनको यह प्रतिकूल भी जच
सकती है किन्तु फिर इसका उपाय ही क्या है । अन्तमें उन
से भी मेरी विनीत प्रार्थना और आशा यही है कि वैसी
धारणाको वे
वे अवश्य वित्तसे दूर करेंगे और इसके गुणपर
विचार करेंगे ; क्योंकि संसारमें सर्व गुण-सम्पन्न विषय
वस्तु अथवा व्यक्ति प्रायः विरलेही हैं।
"सन्तः परीक्षान्यतरद्भजन्ते मूढः पर प्रत्ययनेय बुद्धिः ।
॥ इति शुभम् ॥
कलकत्ता,
भाप डोगोंका अनुमहाग्रही
।
B
भाद्रशुक्ला पञ्चमी
सं. १९८२
प्रकाशका

॥श्रीः ॥ सटीकम नागरसर्वस्व प्रथम परिच्छेद मङ्गलाचरण। मुहूर्तमपि यं स्मरन्नभिमतां मनोहारिणी लभेत मदविह्वलां झटिति कामिनी कोम कः। तमुल्लसितडम्बरं सरुचिराङ्गरागारुण नमामि सुमनःशरं सततमार्यमञ्जु श्रियम् कामशास्त्रके इष्टदेव कामदेवजी हैं, इसलिये ग्रन्थकर्ता का कामदेवको प्रणाम करनेके लिये मंगलकी बृद्धिके लिये यह पहला पद्य है। तात्पर्य कि कामदेवजीका ऐसा तीक्ष्ण प्रभाव है कि क्षणमात्रके स्मरणसे कामीजन काम- पीड़िता एवं मन हरनेवाली अपने अभिमत कामिनीको

१०
नागर-सर्वख।
पा लेते हैं। इसलिये ऐसे सदर्प, तथा सुन्दर कन्दर्पको मेरा
बारम्बार * नमस्कार हैं।
केचिद्भाषान्तरकृततया कामशास्त्रप्रबन्धा
दुर्विज्ञ या गुरुतरतया केचिदल्पार्थकाश्च
तत्पद्मश्रीविरचितमिदं सर्वसारं सुबोधं
शास्त्र'शीघ्रशृण त सुधियोऽभीष्ठ धर्मार्थकामाः
कितने ही कामशास्त्र विषयक ग्रन्थ तो अनेक भाषाओं
में हैं (भाषान्तरमें है) इसलिये वे दुरूह हैं अतएव उनका प्राप्त
होना कठिन है अर्थात् सरल नहीं है। कितने बहुत
संक्षेपमें हैं, इसलिये भी दुर्बोध हैं। अतएव विद्वान्
जनोंके स्पष्टतया समझने लायक कामशास्त्रका सारभाग,
जिसे पद्मश्रीने बनाया है, उसको अभीष्ट सिद्धिके लिये यह
नागरसर्वस्व शीघ्र देखना चाहिये।
नाना विचित्र सुरतोपचारैः
क्रीडासु खं जन्मफलं नराणाम् ।
:
* टिप्पनी ग्रन्थकार पद्मश्री बौद्धमती थे; क्योंकि मार्यमन्जुश्री
बुद्धदेवका भी नाम है, इसलिये ग्रन्थके मारम्भमें उनका स्मरण करना
अन्धकारका कर्तव्य है।

नागर-सर्वस्व । किं सौरभेयीशतमध्यवर्ती वृषोऽपि संभोग सुखं न भुंक्ते ॥३॥ गृहस्थ मनुष्योंका जन्म अनेक प्रकारके शास्त्रीय सुन्दर रमणके प्रबन्धोंसे सुरत सम्बन्धी क्रीड़ाओंसे ही सफल है अन्यथा ऐसा न होता तो गौके झुण्डोंमें दिन-रात रहने. वाला वृष ( सोड) भी क्या संभोगका सच्चा सुख नहीं पाता?* हित्वात्म कामं शमयेद्वशी यो नितम्बिनीनां मदनज्वरार्तिम्। कृपान्वितो मन्मथशास्त्रवेदी समाप्नुयात् स्वर्गसुखं स धीरः ॥४॥ जो मनुष्य अपना स्वार्थ त्याग कर कारणवश स्वयं प्राप्त परस्त्रीका कामज्वर अर्थात् मदनके वाण प्रहारसे व्याकुल नीकी पीड़ा शान्त करता है, वह स्वर्गीय सुख * टि. तात्पर्य यह कि केवल सभोग सुख वैलको भी होता है, परंतु रसों तथा भावोंका ज्ञान और विकास केवल सहृदय मनुष्योंको ही होता है । इसीलिये कहा है, कि "माहार निद्रा भय मैथुनंचेत्यादि" अर्थात खाना, पीना, भय, मैथुन, ये सब मनुष्य और पशुमों में समान ही होता है, किन्तु मनुष्यमें ज्ञान विशेष है अन्यथा मनुष्य भी पशु तुल्य है।

१२ नागर-सर्वस्व । पाता है। तात्पर्य यह कि वह पुरुष वशी याने जितेन्द्रिय कृपायुक, कामशास्त्रका मर्मज्ञ एवं धैर्यशाली हो। * जैसा महेश्वर कहते हैं- "कामं त्यक्त्वात्मनः कामी कामव्याधि निपीड़िताम्। चिकित्सयति यो नित्यं पदं प्राप्नोति कामिकम्” ॥ ५ ॥ जो अपने कामदेवको परित्याग कर, कामज्वरसे दुःख- को प्राप्त अपनी स्त्रीकी नित्यप्रति (ऋतुकालमें ) चिकित्सा करता है वह कामिकपदको प्राप्त होता है। ज्ञानेऽस्य शास्त्रस्य धनाशयानां तिष्ठन्तु तावद्धनधान्यलाभाः। * टि. महाभारतका प्रमाण-~-“कामात स्वयमायाता यो न भुंके नितम्बिनीम् । सोऽवश्यं नरकं याति तन्निश्वास हतो नरः।" अर्थात् ---परस्त्री-गमनमें तभी दोष नहीं है जब कि स्त्री स्वय कामात होकर पास आ जाय। ऐसी अवस्थामें सभोग न करनेसे ही महा- पाप है, किन्तु इसका अभिप्राय यह नहीं कि तबसे उसके पीछे पड़ जाय, इसीलिए उक्त श्लोकमें वशी और धीर तथा कामशास्त्रज्ञ कहा है।

नागर-सर्वस्व १३ सुतार्थिनां नापि सुता दुरापाः श्रद्धावतां साधयतां प्रयत्नात् ॥६॥ कामशास्त्रके ज्ञानसे धन चाहनेवालोंको धन मिलना तो अवश्यम्भावी है, किन्तु इतना ही नहीं पुत्र चाहनेवालों को पुत्र भी असम्भव नहीं-यदि श्रद्धावान् व्यक्ति हों और प्रयत्नशील हों। यथोपदेशेन वराङ्गदेशे बीजस्य विन्यास वशेन नारी। सङ्कल्पजव्याधिनिपीड़िताङ्गी समर्पयेत्सद्रविणं शरीरम् ॥७॥ संकल्पसे उत्पन्न हुए कामसे अति पीड़ित जो स्त्री वराङ्ग अर्थात् गुप्त स्थानमें बीज स्थापन कराकर विन्यास पूर्वक बीज स्थापन करावे तात्पर्य यह कि जिससे पुत्र हो फिर उसके बाद पुत्र और धनके साथ अपने शरीरको अपने स्वामीको अर्पण कर दे। * * टि• पूर्व श्लोकमें कहा गया है कि जो मी कामात होकर अन्य पुरुषके पास जाय तो पुरुषको पापके स्थानमें धर्म ही होता है इसीलिये उक्त दोषका परिहार करते हैं कि यदि उक्त कार्य से स्त्रीको पुत्र हो तो-वह क्या करे, अर्थात सीधे हृदयसे स्वामीको सब अर्पण कर दे ।

१४ नागर-सर्वस्व । जगत्रिवर्गप्रभवं यदेतत् कृतं ततः सत्वहितमहद्भिः। बुधैर्विधेयान कुदृष्टिरस्मिन् गुणांशहृद्या वचनेन सन्तः॥८॥ प्राणी मात्रके शुभचिन्तक महान् विधाताने इस संसार- को त्रिवर्ग धर्म, अर्थ और काम इनसे उत्पन्न किया अर्थात् जगत्का कारणीभूत त्रिवर्ग हो है, अतएव किसी भी विवारवान व्यक्तिको इस शास्त्रकी उपेक्षा न करनी चाहिये ; क्योंकि गुण-ग्रहण करनेमें ही चतुरता है। तथा च महेश्वरः- सत्वोपकार परमा हि त्रिवगसाराः सत्वोपकाररचिता विदुषां विभूतिः । सत्वोत्थमेव विदधीत यदाश्रयीत वैशेषिकं यदिह तेन कृतंस शास्त्रम्॥६॥ त्रिवर्गका सार भून धर्म, अर्थ तथा काम ये तीनों प्राणीमात्रके उपकार करनेवाले हैं और इन्हींके आधारपर सजनोंकी सम्पदा है। इसलिये सत्व प्रधान कार्य का ही आश्रय लेना चाहिये जो ऐसा करता है, वह वैशेषिक अर्थात् दर्शन शास्त्रोक्त मोक्ष फलका अधिकारी होता है।

नागर-सर्वस्व । १५ सत्वोपकारपरमा हि ममाग्रपूजा सत्वापकारपरमश्च पराभवः स्यात् । दुःखं सुखं च मम सत्वसमानमिष्टं सत्वेषुः यः प्रहरते स कथंमदीयः॥१०॥ प्राणियोंका उपकार ही मेरा परम धर्म है और सत्व अर्थात् प्राणियोंके अपकारमें ही मेरा पराभव है अर्थात सभी प्राणियोके सुख-दुःखोंमें मेरा समान इष्ट है अतएव प्राणियोंपर जो प्रहार करता है वह मेरा नहीं है। अर्थात् जीवहिंसा करना घोर अन्याय है। ग्रन्थकार बौद्धमता- वलम्बी है। इसलिये उसका जीवहिंसाका घोर विरोध करना उचित है। सुतरां जीवहिंसक बौद्धधर्ममें नहीं रह । सकता। प्रथमः परिच्छेदः।

द्वितीय परिच्छेद प्रज्ञाकलायौवनजातिसम्पत् सौन्दर्यविद्यामदगर्विताभिः सुदुर्लभाभिर्वरसुन्दरीभिः संभोग संजात सुखं यदीच्छेत् ॥ १॥ कालोचितैर्धपित धौतवस्त्र रत्नोज्ज्वलैराभरणैरनेकैः कण्ठोपकण्ठोल्लसिताग्रपुष्प स्त्रम्भिश्च मत्तालिकुलाकुलाभिः॥२॥ नानाविधामोदविदग्धवासः श्रीखण्डताम्बूलशुभाङ्गरागैः। नरोत्तमो मन्मथशास्त्रवेदी प्रसाधयेत् साधु निजं शरीरम् ॥३॥ (श्लोकत्रयेणान्त्य कुलकम् )

नागर-सर्वस्व ।
कामशास्त्रका ज्ञाता सुन्दर नायक यदि सर्वाङ्ग सुन्दरी
रमणीसे सम्भोग करना चाहे तो उसे भी पहले अपने
शरीरको सर्वथा सुसजित कर लेना ठीक है। सुन्दरी
भी जैसी तैसी नहीं, जिसमें बुद्धि, कामसूत्रोक्त चौंसठ
कलाओंका, यौवनका, उत्तम जाति अर्थात पद्मिनी या
चित्रिणीका, सम्पत्तिका, सौन्दर्य और विद्याका अभिमान
हो अतएव इन कारणोंसे जो अलभ्य हो, जो समयो-
चित शृंगारों तथा रत्न जटित आभूषणों तथा पुष्पमालाओं
से अपने शरीरको सुभूषित किये हो, जिसके मुखमें पानकी
लाली हो और अंगरागसे हथेली और चरण जिसके रंगे
हुए हों ऐसी सुन्दरीके लिए अपनेको पूर्णत: उसके योग्य
बनाना चाहिये।
अनेक वाद्य विविधास्त्र पंक्तिकं
सुपुष्पधूपोज्ज्वलराशिवासितम्।
विचित्रसत्पद्दवितानशोभितं
प्रकल्पितात्यन्त मनोरमासनम् ॥४॥
प्रकम्पिपर्यङ्कसुघर्घरीख-
प्रबुद्धपावितकण्ठकूजितम् ।
रथाङ्गहंसस्वन रम्यदीर्घिका
जलोमिसंलासकवातबीजितम् ॥५॥

१८ नागर-सर्वस्व । . . विशुद्धभावोचितचित्रभूषितं सुरागसिन्दूरविराजिट्टिमम्। प्रहृष्टचेतः शुकसारिकारवं विनिमयेद्वासगृहंमनोरमम् ॥६॥ केलिभवन कैसा होना चाहिये, यह कहते हैं। उसकी सजावट के लिये सभी वाद्य हों, सब अस्त्र भी एक स्थान में रक्खे हों, सुगन्धिमय धूप या धूमसे सुवासित हो, फूलोंके विन्यास हों, सफेद चँदवे टंगे हों, नीचे भी सफेद चादर बिछी हुई हों, सुन्दर २ पलंग हों, कहीं कबूतर बोल रहे हों, मकानके पास छोटा तालाब हो, जिसमें चकवे चकवियोंके मधुर कलरव हो रहे हों। शीतल और सुग- न्धित हवा चल रही हो, घरमें दीवारमें सुन्दर २ वित्र लगे हुए हों, दीवार मो रंगीन हों तथा युवक युवती पति- पत्नी शरीरसे अत्यन्त पुष्ट और मनसे अत्यन्त दृष्ट हों तात्पर्य यह कि घरकी सभी चीजें परम मनोरञ्जक और आनन्द-वर्धक हों। इति द्वितीयः परिच्छेदः। । * टि० छंदशास्त्रके नियमानुसार तीन श्लोकोंका एक साथ अन्वय और अर्थ सम्मिलित रहनेसे कुल क होता है इसलिये तीन श्लोक एकत्र हैं।

तृतीय परिच्छेद . अथ रत्न-परीक्षा। रत्नोत्तमानां गुणदोषजातं तद्धारकोणां च शुभाशभानि । वर्णप्रभेदमणिमण्डलानां प्रस्तोवतः सत्व हिताय वच्मि ॥१॥ प्रसंगवश रत्न धारण करनेवाले मनुष्योंके हितार्थ रत्नका वर्ण भेद क्रमसे गुण दोष तथा शुभाशुभ कहते हैं । दोषापमृष्टं मणिमप्रबोधा- द्विभर्ति यः कश्चन कश्चिदेव । तं बन्धदुःखामयबन्धुवित्त नाशादयो दोषगणा भजन्ते ॥ २॥ जो पुरुष जरासा मलिन तथा दूषित रत्न अज्ञानवश धारण करता है, उसके बंधन तथा अनेक रोग होते हैं और बन्धु, धन और इष्ट वस्तुओंका विनाश होता है। ।

नागर-सर्वस्व। गुणाः सु रुग्गौरवकान्तिमत्ताः स्नग्ध्यं महत्वं समताऽच्छता च । दोषास्तथा बिन्दुकलङ्करेखा- स्त्रासोमलः काकपदं लघुत्वम् ॥३॥ हीरेके इतने गुण हैं-वह खूब गोल हो, सुन्दर हो, भारी हो, साफ झलकता हो, खूब चिकना हो, साथ ही जो जितने बड़े होंगे उनका उतना अधिक मूल्य होगा। दोष इतने हैं-यदि उनमें विन्दु हों अर्थात् जलमें जैसे बुलबुले पड़ते हैं उसी प्रकार छोटका चिह्न, कलङ्क अर्थात् जरा स्याही और मैलापन लिये हुए रंग हो, रेखा हो, कटा या टूटा हो, गड्डा हो, कौवेका पाँव जैसा चिह्न हो और हलका हो तो उसे दूषित समझना चाहिये। तीक्ष्णाश्रिधारत्वसविस्तरत्वं गुणौ तु वजूस्य वदन्ति तज्ज्ञाः। शुक्त्युद्भवानां मृद, सूक्ष्मभेद सुवृत्त शुक्लत्वममी गुणाश्च ॥ ४॥ रन परीक्षक अथवा जौहरी लोग हीरेके दो गुण और कहते हैं-उनमें एक यह कि तेज हो और तलवारकीसी धार हो तथा चौड़ा हो। इसी तरह सीपके मोतीके गुण नागर सर्वस्व । । २१ विजातिकं त्वाश यों हैं—मनोहर हों खूब गोल हों जरासा छेद हो और खूब साफ झलकते हों। स जातिरत्नं परिवृद्धिहेतु- निधानलक्ष्मीसु तसेवकानाम् । आरोग्यसौभाग्यफलायुषां च विनाशबीजम् ॥५॥ सुजाति अर्थात् उपर्युक्त शुभ लक्षणोंसे युक्त रत्नोंके धारणसे धनियोंकी आयु और सम्पत्ति बढ़ती तथा सौभाग्य बढ़ता है, परन्तु-विजातीय अर्थात् कुलक्षण युक्त रत्नोंके धारणसे वे सर्वनाशके कारण हैं। * बन्धूकपुस्कोकिलनेत्रगुजा तुल्यच्छवियर्योऽत्र स पद्मरागः। आकृष्टनीलीरसबुदबुदाभो यो वाऽलिपृष्ठा तिरिन्द्रनीलः॥ ६॥ * टि. तथा च रत्न शास्त्र -- “गुणवद्गुणसम्पदा प्रसूतिविपरीतं व्यसनोदयस्य हेतुः ।" इति । गुणवान रत्न सौभाग्य और सम्पदामोंका देनेवाला है और गुणा हीन रल दुःख दारिद्रयका कारण होता है।

२२
नागर-सर्वस्व।
बन्धक गुलदुपहरियाके फलके समान, कोयलकी
आंख जैसा तथा रत्ती विरभटीके समान लाल रंग वाला
पद्मराग होता है या जिसे जौहरी लोग लाल कहते हैं।
निचोड़े हुए नील रसके बुलवुलेके समान वर्णवाला इन्द्र
नील (नीलम ) होता है। अथवा भौंरके पंखके समान
कान्तिवाला भी नीलम होता है।
खद्योतपृष्ठनवशालशैवलानों
तुल्यत्विषो मरकता मणयो भवन्ति ।
रत्नोत्तमस्य हि शुभाश भकारणस्य
व्याख्याऽत्र तन्न, कथिता अधिकाश्चमुख्याः७
जुगनूके पंखकी तरह चमकदार, नयी घास और जलमें
होनेवाले सिवारकी समान हरित कान्तिवाला मरकत मणि
(पन्ना) होता है। यह प्रकरणवश मुख्य रत्नोंका गुण
दोष कह दिया है, किन्तु ग्रन्थके विस्तारके मयसे अधिकतर
रत्नोंका शुभाशुभ नहीं कहा।
वैदूर्य एकः शितिकण्ठनील-
स्तथाऽपरो वेणु दलप्रकाशः।
नानाविधा आकरयोनिभेद-
वंजू च मुक्तामणयश्च सन्ति ॥८॥

नागर-सर्वस्व ।
२३
एक प्रकारका वैदूर्ग मणि ( लहशुनियां ) मोरके कण्ठके
समान वर्णवाला होता है, दूसरा बाँसके पत्ते के समान
होता है। इसी प्रकार हीरा मोतो पन्ना आदि खान और
रंगके भेदसे अनेक प्रकारके होते हैं।
इति तृतीयः परिच्छेदः।

चतुर्थ परिच्छेद नानाविदग्धवासा मुख्या मदनप्रदीपकाः ख्याताः। वरकामुकः प्रयत्ना- च्छित्येतादौ स गन्धशास्त्रभ्यः॥१॥ अनेक प्रकारकी मनोहर सुगन्धित वस्तुए हैं जो विशेषतः कामोद्दीपक हैं इसलिये धनी कामीको पूयत्न पूर्वक पहले ही सुगन्ध शास्त्र या आयुर्वेद शास्त्रसे उनका संग्रह कर लेना चाहिये। लोकेश्वरादिकेभ्यो- ऽपटुमति द बर्बोधगन्धशास्त्र भ्यः। संगृह्य सारभागं प्रविधास्ये सुप्रसिद्ध पदः॥२॥ लोकेश्वर आदि नामके गन्धशास्त्रोंसे सार भाग लेकर अनभिज्ञ जनोंके दुर्बोध विषयको सरल रूपसे कहते हैं।

नागर-सर्वस्व । २५ कुन्तलकक्ष्य गृहोदर वसन वदनसलिलपूगफलवासान । स्नानोद्वर्तनचूर्ण वर्ती दु धूपदीपाख्य ॥३॥ केश (बाल) बाहुमूल ( बग़ल ) का भीतरीभाग, गृह, वन, मुख, जल, सुपारी, इनको सुगन्धित करना। और स्नानके समयका उबटन भी सुगन्धित करना ; और सुगन्धित ध पबत्तीसे घरेको सुगन्धित करना चाहिये। केशपटवासः (बालोंका स गन्धकरण) रात्रिको दीपकमें जलनेवाली बत्तीको भी सुगन्धित करना चाहिये । भाव यह कि जहांतक प्रकाश पहुंचे वहाँतक सुगन्ध आती रहे। नखकपूरकुंकुमा- गुरु शिलमिति च केशपटवासः । क्रमबृद्धिभागरचितं भागत्रयशर्करासहितम् ॥४॥ नख ( नखला ) भाग १, कपूर भाग २, केशल भाग ३, अगुरु भाग ४, शिलारस भाग ५, इसी प्रकार इनके २

२६
नागर-सर्वस्व।
तृतीयांश शक्कर मिलाकर केश-वास अर्थात् बालोंको सुर
न्धित करना चाहिये।
कक्षवास ( बगलका सुगन्धि करण)।
पत्रकशैलजशिल्लक
कुकुममुस्ताऽभया चेति।
त्रिगुडाः काक्षिकवासो
ग्रहतिथिशिखिरुद्रवेदकर भागाः ।।'
तेजपाल भाग , शिलाजीत १५, शिलारस ३, केश
भाग ११ नागरमोथा भाग ४, छोटी हर भाग २ इन
तीन भाग गुड़, सबको मिलाकर लगानेसे कक्ष अर्थात बा।
मूल सुगन्धि प्रस्तुत होती है। अर्थात् बगल
लगानेसे बगलमेंसे भी सुगन्ध आती है। बहुनसे मनुष्र
को पसीनेके कारण बगलसे दुर्गन्ध निकलती है। इस
दुर्गन्ध नष्ट होकर सुगन्ध आती हैं।
गृहवास (घरमें सुगन्ध आना)।
कस्तूरी कपूरं कुकुम
नख मांसि बालागुरुकं च ।
चन्दन गुडकं क्रमशो
बर्धित भागं तु गृहवासः॥६॥

नागर-सर्वस्व ।
कस्तूरी भाग १, कपूर २, केसर ३, नख ४, जटामांसी
५, खस ६, अगुरु ७, सफेद चन्दन ८, गुड़ ९ इनको मिला
कर घरको सुगन्धित करना चाहिये। इसको मिलाकर
घरके नोले, चूहोंके बिल मोरियोंके पास छिड़कनेसे घरमेंसे
दुर्गन्ध नष्ट होकर सुगन्ध आती हैं।
सामान्य मुखवास (मुख सुगन्धित करण)
जातीफलकस्तूरी
कपूरंचूतवारि संस्थितं ।
धूपितमगुरुकशिलक
मधुगुडसितैश्च मुखवासः ॥७॥
जायफल, कस्तूरी, कपूर इनको आमके पत्रके स्वरसमें
पीसकर अगुर, मधु (सहत ), गुड़, चीनी मिलाकर चिलम
में भरकर धूमपान करे तो मुख सुगन्धित हो।
विशेष मुखवास।
क्रमवधितं त्वगेला
मांसी शठ्यगुरु कुकुमं चापि ।
घन चन्दन जाती
फललवङ्ग कङ्कोल कर्पूरम् ॥८॥

नागर-सर्वस्व
अष्टांश वंशरोचन
सुकलितमति स्वल्प शर्करा सहितम् ।
पिष्ट्वा सहकार रस-
र्मुखवासो भूमिपालानाम्॥६॥
दालचीनी भाग १, छोटी इलायची २, जटामांसी ३,
कचूर ४, अगुरु ५, केसर ६, नागर मोथा ७, सफेद चन्दन
८, जायफल ६, लवङ्ग १०, शीतल चोनी ११, कपूर १२,
इनका आठवां भाग उत्तम वंशलोचन और थोड़ासी शर्करा
मिलाकर आमके रसमें पीसकर गोली बनाकर खाना।
इससे राजाओंके सेवन योग्य मुखवास या मुखसुगन्धि
प्रस्तुत होती है। पूर्वोक्त मुखवास सर्व साधारणके लिये
है। किसीका मत यह है इसको भी विलमकी तरह पूर्वोक्त
प्रकारसे पीना चाहिये। मेरे मतमें दोनोंकी गुटिका मुख
में धारण करनेसे मुखमें सुगन्ध आती।
जलवास (जल सुगन्ध करण)
सूक्ष्मैला कस्तूरी
कुष्ठतगर पत्र चन्दनैः सुतनु ।
मलयानिल जलवास
रचय भूमिपालतिलकानाम् ॥ १०॥

नागर-सर्वस्व। २६ हे सुन्दर अङ्ग वाली ! महाराजाओंके लिये इन सुग- न्धित वस्तुओंसे संयुक्त एवं मलयाचलकी वायुसे सुवासित जल बनाओ, वे कौन २ सी सुगन्धित वस्तु हैं सो कहते हैं-छोटी इलायची, कस्तूरी, कूढ़, तगर तेजपात, और सफेद चंदन इनको मिलनेसे जलवास प्रस्तुत होता है । पूगवास ( सुगन्धित सुपारी)। कुष्ठ तगर जातीफल कर्पूर लवङ्गकैलाभिः। वरतनु वासय शीघ्र पूगफलं भूमिपालानाम् ॥ ११ ॥ हे सुन्दरि! कूढ़, तगर, जायफल, और इलायची इनको मिलाकर राजाओंके योग्य सुगन्धित सुपारी तैयार करना चाहिये। स्नानीय चूर्णवासः । त्वगगुरुमस्तकतगरं चौरशठीग्रन्थिपर्णक नखं च । कस्तूरी संयुक्त नानीयं तत्प्रशस्यते सद्भिः॥१२॥ दालचीनी, अगुरु, नागरमोथा, तगर चौर अर्थात् कपूर, लवङ्ग नागर-सर्वस्व। गठिवन या भटेउर, कचूर, तेजपाल, नख और कस्तुरीको बराबर २ मिलानेसे स्नानकालिक सुगन्धित वस्तु प्रस्तुत होती है। इसके जलसे स्नान करनेपर शरीर स गन्धित होता है। चतुस्सम या सुगन्धितकर मसाला । कस्तूरी कर्पर कुंकुम चन्दनमुदाहृतं क्रमशः। शशिकरखेदकलाकृत भागेन चतुस्समो गदितः ॥१३॥ कस्तूरी भाग १, कपूर २, केशल, सफेद चंदन १६ इस क्रमसे इनका भाग मिलनेपर चतुस्सम होता है। इस गणसे समस्त सुगन्धित चीजें बन सकती हैं। सामान्य उद्वर्तन ( उवटना) कस्तूरीकपूर चन्दनशैलेयनागागुरुकं च। उद्वर्तनमिदमत्त- ममविरत सेव्यं नरेन्द्रस्य ॥ १४ ॥ * टि. चतुस्समको भेद-कस्तूरी भाग २, केशर ३, कपूर ४ इनको मिलाकर भी दूसरे ढगका चतुस्सम होता है ।

नागर-सर्वस्व। कस्तूरी, कपूर, श्रीखण्ड, छड़ीला, नागकेशर और अगुरु इनको मिलानेसे राजा महाराजाओंके सदा सेवन योग्य उबटन तैयार होता है। राजयोग्य उद्वर्तन (उबटन)। शैलज (१) वाललवङ्गक त्वकपत्रक सुरभि(२) शितगरं च । मांसीकुष्ठ समेतं चर्ण तितिपालतिलकानाम् ॥१५॥ छाड़ छड़ीला, वाल ( खस ), लवङ्ग, दालचीनी, तेज- पात, हरद्वारीघास, शिलारस, तर, जटामांसी, कूढ़का चूर्ण राजाओंके सेवन योग्य होता है। यह उबटन राजाओंके . योग्य है। राजाई रतिनाथ धूपवर्ती। कर्पूरागुरु चन्दन मुस्तक पूति (३) प्रियंगु वालं च । १शेलजका शिलाजीत अर्थ जगज्ज्योतिर्मलने संस्कृतकी टीकामें किया है। वह प्रकर्णाभावस अशुद्ध है। यहाँ छडीला प्रर्य करना चाहिये। २ संस्कृत टीकाकारने सुरभि शिल्ह इस शब्दसे सुरभि शब्दका भूलकर उत्तम शिल्ह अर्थ किया है । वह अशुद्ध हैं। यहाँ हरद्वारी घासको लेना चाहिये। ३ टीकाकोरन पूति शब्दस पूतिकरे जो लिखा है। वह प्रशुद्ध है यहां रोहिस तृण लेना चाहिये !

३२ नागर-सर्वस्व । मांसी चति नृपाणां योग्या रतिनाथ धपवर्तिरियम् ॥१६॥ कपूर, अगुरु, सफेद चंदन, नागरमोथा, रौहिवत्सा, प्रियंगु, वाल, जटामांसी इनकी धपवत्तो राजाओंके योग्य होती है। इसका नाम रतिनाथ धूपवर्ती है। रतिनाथ कान्ता धूपवर्ती। नखागुरु शिलक वालक शैलेय (१) कुन्दुरुचन्दनश्यामाः(२) ॥ क्रमवृद्धि भागरचिता वर्ती रतिनाथ कान्तयम् ॥ १७ ॥ नख १, अगुरु २, शिहक १, वाल (खस) कुन्दुरु ५, छड़ीला, सफेद चंदन ७, श्यामा ८, कस्तूरी मिलाकर रति- नाथ कान्ता नामकी धूपवर्ती बनती है। मनोद्भव दीपवर्तिका। सुरदारुमरुवमुस्तक १ शैजेयका मथं प्रकरण विरुद्ध शिलोजीत अर्थ किया है। यह भो अशुद्ध है यहां छाडछवीला-छडपुरी सुगधित द्रब्य लेना चाहिये। २ टीकाकारने श्यामा शब्दका अर्थ भूलसे नहीं किया, परन्तु श्यामाका अर्थ कस्तूरी है।

नागर-सवस्व। ३ लाक्षागुरु शालचूर्णकर्पू रम(३)। नृपवासक गृहयोग्या मदनोद्भव दोपवर्तिरियम ॥१८॥ देवदारु, मरुवा, नागरमोथा, लाख अगुरु, शीतलचीनी राल) कपूर इनके योगसे बनी ध पवर्ती कामोद्दीपक है। गन्धरसागुरु गुग्गुलु सर्जरस पूतिकपूरम । श्रीवास शिलक चन्दन- मित्यपरा दोपवर्तिरियम् ॥१६॥ गन्धरस, (सुगन्धित बाल) अगुरु, गुग्गुल, राल कपूर, विरोजासत, शिलारस, सफेद चंदन इनको मिलाकर एक और प्रकार की धू पवर्ती होती है। इति चतुथः परिच्छेदः। ३ शालच फको अर्थ टीकाकारने शालपर्णी भूलसे लिखा है। शाल शब्दका अर्थ सर्जरस ( राल ) है। परन्तु फिर भी च र्णका मर्थ बिलकुल ही चरा समझकरे नहीं लिखा, इससे माल म पडतो है टीकाकार पूर्ण विद्वान् होने पर भी मायुर्वेदसे अनभिज्ञ था। यहां च र्ण शब्दस ककोलमिर्च (शीतलचीनी लेना भूल है च का अर्थ चाहिये )।

पञ्चम परिच्छेद -:tott भाषा संकेत। कलाकलापैश्च गणै समस्तै- गोरसंकेतविद हि कान्तम् । प्रम्लाननिर्माल्यमिवोत्सृजन्ति गुणाधिका नागरिकास्तरुण्यः॥१॥ समस्त गुणों तथा काम सम्बन्धी चौंसठ कलाओंमें निपुण नागरिक तरुणी गुण तथा संकेतहीन स्वामीको मुरझायी हुई पुष्पमालाकी तरह त्याग देती है। ततोऽन्य चिन्तां परिहृत्य कामी यतेत संकेतकशास्त्रकेषु। सतां हि सम्मानसहस्रभाजां यूनां वधू धिक्कृतिरेव मृत्युः॥२॥ अन्यान्य कलाओंमें चाहे युवक सहस्रों सम्मानका पात्र क्यों न हो किन्तु कामकलाकी अनभिज्ञताके कारण यदि नागर-सर्वस्व। ३५ बध का धिक्कार सहन करना पड़ा तो उसका मरण है, इस लिये गृहस्प संसारमें प्रवेश करनेवाले नवयुवकका सर्व प्रथम काम कलाओंमें चतुरता प्राप्त करना ही परम कर्तव्य है। बोलना कुछ और उस नारीसंकेतकं वक्ष्ये वक्रभाषाङ्गमुद्रयोः। पोटलीवस्त्रपुष्पाणां ताम्बूलस्याप्यनुक्रमात् ॥३॥ वक्र भाषा या वक्रोक्ति, अर्थात अर्थात बोलना का अभिप्राय कुछ और हो, अङ्गमुद्रा अर्थात् अङ्गभङ्गी इनके सम्बन्धमें स्त्रीका संकेत कहते हैं। पोटली पोटरी या गठरीमें रखी हुई चीजोंका संकेत ( इशारा ) वस्त्रका फल और पानका संकेत भी क्रमशः कहते हैं। फलं पुसि, स्त्रियां पुष्पं, कुलप्रश्नेऽङ्करः स्मृतः। दोडिम तु द्विजे ज्ञयं, पनसः क्षत्रिये स्मृतम् ॥४॥ पुरुषमें फलका संकेत, स्रोमें फूलका संकेत, कुलमें अंकुरका संकेत, ब्राह्मणमें दाडिम (अनार) का और क्षत्रियमें कटहलका संकेत जानना चाहिये। .

६
नागर-सर्वस्व ।
कदलीजं फलं वैश्य,
तथानं शूद्रजे पुनः।
राजपुत्र द्वितीयेन्दु-
घनाच्छायस्तु भपतिः॥ ५ ॥
वैश्यमें केलेका, शूद्रमें आमका, राजपुत्रमें द्वितीया
चन्द्रका और राजामें मेघका संकेत जानना।
दुष्कुले कालपुष्पं स्यात्
सरः सामन्त पुत्रके।
मध्यशो यून्यपक्वं स्याद
बाले पक्वतु बृद्धके ॥ ६॥
दुष्कुल अर्थात् हीन कुलमें श्याम पुष्प समझना चाहिये।
सामत पुत्रमें सरोवरका संकेत जानना चाहिये। युवामें
मध्याह्न तथा बालकमें अपक्क और वृद्धमें पक्कका संकेत
समझना चाहिये।
ब्राह्मण्यां कुन्द पुष्पं स्या-
द्राजपुत्रयां तु मालती।
मल्लिका वैश्यपुत्रयान्तु
शूद्रपुत्रयान्तु कैरवम् ॥ ७॥

नागर-सर्वस्व । ब्राह्मणीमें कुन्दके फूल, राजपुत्रीमें मालती, वैश्यपुत्रीमें मल्लिका और शूद्रकी पुत्रीमें कुमुदके फूलका संकेत करना चाहिये। वणिक पुत्रयां सरोजं च, महत्यामुत्पलं तथा। कामुके भ्रमरः प्रोक्तः कामिन्यां चूतमञ्जरी ॥८॥ वणिकपुत्रीमें कमलका, मन्त्रोकी पुत्रामें उत्पलका, कामी पुरुषमें भ्रमरका और कामिनीमें आमकी मञ्जरीका संकेत कहा है। तथाहानेऽकुशश्चापि प्राकारो वारणे स्मृतः। छन्नचन्द्रो निशीथिन्या, दिनेऽच्छन्न रविः स्मृतः ॥ ६ ॥ इसी तरह बुलानेमें अङ्कुश, वारण या मना करनेमें प्राकार अर्थात् दीवारका आकार बताना याने उसका सकेत, रातके लिये ढका हुआ चन्द्रका और दिनके लिये प्रकाशमान सूर्यका सकेत करना चाहिये । * * टि० अंकुश अर्थात् अंकुश मुद्रोलक्षण ; यथा-"वीं च नागर-सर्वस्व । आद्य यामेऽपि शङ्खः स्या- न्महाशङ्को द्वितीयके। पद्मस्तृतीयके यामे महापद्मश्चतुर्थके ॥ १०॥ पहले पहरके लिए शङ्खका, दूसरे पहरके लिये महा शङ्खका तीसरेके लिये पद्मका और चौथे पहरके लिय महापद्मका संकेत है। रामस्तु पञ्चमे यामे विरामः षष्ठ उच्यते। प्रवरः सप्तम ज्ञयः प्रत्यूषश्च तथाऽष्टम ॥ ११ ॥ पञ्चम मासके लिए रामका संकेत, छठेके लिय विराम सप्तमके लिये प्रवर और अष्टमके लिये प्रत्यूषका संकेत समझना। इति पञ्चम परिच्छेद । मध्यमां कृत्वा तन्मध्यपर्व मूलतः। तर्जनी किन्चिदाकुल्चेत्सा मुद्रांकुश सज्ञिता ॥" मध्यमा अंगुलीको सीधा करके उसके मध्यपर्वके पास तर्जनीको धानकी बालकी तरह थाही संकुचा ले तो अकुश मुद्रा होगी।

पष्ट परिच्छेद stoopstestostot veyes ॥ अङ्ग सङ्कत। क्षमप्रश्ने कर्णलता. कथिता कथनेऽपि सा। कचदशस्तु कामार्ता वुरः स्नेहे शिरोऽचने ॥ १॥ कुशल प्रश्नमें और कहने में कानका स्पर्श, कामात अवस्थामें बालका स्पर्श और प्रेम प्रकट करने में वक्षस्थलका प्रश्न हाथोंसे करना चाहिये। मध्यमावसरप्रश्ने तर्जनी पृष्ठयोजिता। अवसरेऽञ्जलिज्ञेय आह्वाने कुञ्चितांगुलिः ॥२॥ अवसर या समय सम्बन्धी प्रश्नमें मध्यमा अङ्गुलोको तर्जनी पर चढ़ाना और अवसर आनेपर अञ्जलि बांधना नागर-सर्वस्व। और बुलानेमें उसी अञ्जलिको विपरीत अर्थात् उल्टा कर लेना। अंग ष्ठतर्जनीमध्याः पूर्वदक्षिणपश्चिमाः। उत्तरानामिका चेति दिशो ज्ञया अनुक्रमात् ॥ ३॥ पूर्व दिशाके सकेतके लिये अङ्गुष्ठ, दक्षिणके लिये तर्जनी पश्चिमके लिए मध्यमा और उत्तरके लिए अनामिका इसी तरह चारों दिशाओंके लिए क्रमशः जानना चाहिये। कनिष्ठा मूलमारभ्य रेखाः पञ्चदशक्रमात् । अंगुष्ठस्योर्ध्व रेखान्ताः स्मताः प्रतिपदादिषु ॥४॥ कनिष्ठाके मूलसे आरम्भ कर अंगुष्ठको ऊर्ध्वरेखा पर्यन्त प्रत्येक अंगुलियों में तीन तीन २ रेखा करके पंद्रह होती हैं और उन्हीं रेखाओंमें पंद्रहों तिथियोंका संकेत होता है। शुक्ले वामकरे ज्ञेया असिते दक्षिणे करे।

नागर-सवेस्व। ४१ यद्यत् स्पृशन्ति कामिन्य- स्तस्यायं निपुणः स्मरेत्॥ ५ ॥ शुक्ल पक्षमें बाएं हाथमें रेखा करना और कृष्णपक्षमें दाहिने हाथमें रेखा करना। कामिनियाँ जो जो स्पर करें उन स्थानोंको सङ्केत-कुशल कामी स्मरण करे । इति षष्ठ परिच्छेद । ३ सप्तम परिच्छेद अथ पोटली संकेतम्। ॥ स्नेहे सुगन्धिवस्तूनि पूगं खदिरसारकम् । अतिस्नेहे च सूक्ष्मौला जातीफललवङ्गकम ॥ १॥ स्नेह-सूचनाके लिए सुगन्धित वस्तु, सुपारी, खदिरसार ( कथा ) और अनिशय स्नेहमें छोटो इलायची, जायफल और लवङ्गसे सङ्कत होता है। स्नेहच्छेदे प्रवालं स्या- त्तयुग चिरसङ्गतौ। कामज्वर कटुद्रव्यं, मद्वीका संगमाशय ॥२॥ स्नेहच्छेदकी सूचनामें प्रवाल (मूंगा) बहुत दिनों - नागर-सर्वस्व। ४३ संगममें दो मूंगे, कामज्वरमें कड़वी वस्तु और सद्यः संग. मके तात्पर्या में मुनक्काका संकेत होता है। देहार्पणे तु कार्पास, जीरं जीवसमर्पणे। भल्लातकफलं भीतो. भयाभावे हरीतकी ॥३॥ शरीर-समपणके सकेतमें कपास, जीव-समर्पणके सङ्कनमें जारा, भयके सङ्कतमें ४ भल्लनक या भिलावा और भयके अभावमें हरें। यह संकेत ठीक है, क्योंकि हरेका नाम अभया भी है। सिक्थेन निर्मिता म द्रा पञ्चांगुलिनखाङ्किता। वेष्टनं रक्तसूत्रण पोटलो परिकीर्तिता॥४॥ मोमकी एक टिकिया रुपयेकी तरह बना ले, तब उसमें पांचों अंगुलियोंके नखसे चिन्ह करदे और लाल सूतसे उसे बाँध दे, तो वह पोटली कहाती है।

नागर-सर्वस्व । M मदनासंगतः सिक्थः संरागे रक्तवेष्टनम् । पञ्चवाण क्षतत्वेन पञ्चांगुलि नखक्षतम् ॥ ५॥ मदनकी क्रीड़ाके संकेतमें मोम, अनुरागके लिए लाल धागेका बन्धन और पञ्चवाण अथवा कन्दर्प द्वारा क्षत होनेके कारण पाँचो अंगुलियोंका नख चिन्ह किया जाता है। अतएव यह पोटलो सङ्कत हुआ। इति सप्तम परिच्छेद। शिक अष्टम परिच्छेद वस्त्र सङ्कते। स्मरणोद्भिन्न दहवे सच्छिद्रं वस्त्रमुत्तमम् । संरागे रक्त रागे च रक्त काषायपीतकम ॥१॥ कन्दर्पके बाणसे जिसका शरीर छिन्न-भिन्न हो रहा हो, ऐसी अवस्थाका सङ्कत छिन्न-भिन्न किन्तु उत्तम वस्त्रसे होता है। उत्कट प्रेमको सूचनामें पीला या गेरुआ वस्त्र ही देना चाहिये। छिन्नवस्त्रं तु विच्छेद सदशोग्रन्थि सङ्गमे। एकं स्नेहे तथा चैवो- भयस्नेहे तु तद्यु गम ॥२॥ विच्छेद या वियोगमें छिन्न वस्त्र और मिलनेमें सूतेके साथ बन्धन, एकके स्नेहमें एक वस्त्र और स्त्री पुरुष दोनोंके स्नेहमें दो पलका सङ्केत होता है । इति अष्टम परिच्छेद ।

नयम परिच्छेद ताम्बूल संकेत । ताम्बलबिटकाः पञ्च कीर्तिता नरपुङ्गवैः। कौशलांकुश कन्दर्प पर्यङ्क चतुस्रकाः॥१॥ बड़े-बड़े लोगोंने पानके बाड़ेके पाँच प्रकार कहे हैं। पहला कौशल या शलाका (बीचकी नस) और सूत्रसे रहित (इधर उधरकी नसें) दूसरा अङ्कुशके आकार, तीसरा कन्दर्प याने मध्यमें बाणके आकार, चौथो पयंक या पलङ्गके आकार ओर पांच चौकोन कहा है। कौशला वीटिका, वह जिसमें पानकी नस निकालकर साफ कर बनाया गया हो, त्रिकोण, तीनकोण वाला कन्दर्प कहाता है। कौशलः स्नेहबाहुल्ये चाहृतावंकुशस्तथा।

नागर सर्वस्व ।
४७
मदनातौ च कन्दर्पः
पर्यः सङ्गमाशये॥२॥
स्नेहके आधिक्यमें कौशल नामका बीड़ा अर्थात् जिस
पानके बीड़ेमें लगानेकी कारीगरी अच्छी हो, उसका प्रयो-
ग करना, आहरणमें अङ्कुशाकार बीड़े का प्रयोग करना मदन
व्यथामें कन्दर्पाकार ( तोन कोनेवाला) बीड़ा देना और
सङ्गमके आशय अर्थात् सम्भोग सङ्कतमें पलङ्गके आकारका
पानका बीड़ा देना चाहिये।
चतुरस्राभिधानो यो
बीटोऽनवसरे सदा।
अपूगपर्णमप्रीतो
स्नेह एलादि संयुतम् ॥३॥
सर्वदा अनवसरके सकेतमें चौकोन पानका बीड़ा
दिखाना चाहिये, प्रेमके अभावमें बिना सुपारीका पान और
प्रेमके सद्भावमें इलायचीके साथ पान देना चाहिये।
पृष्ठसंस्लेषपर्ण च
विच्छेदे कृष्णवेष्टनम ।
मुखसंलग्नपणे चा-
विच्छेदे रक्तवेष्टनम् ॥ ४॥

४८ नागर-सर्वस्व । ॥ वियोगके संकेतमें पानको उल्टा लगाकर काले धागेसे बांधकर दिखावे और संयोगके संकेतमें एक पानके मुखको दूसरे पानके मुखमें मिलाकर उसमें लाल धागेसे बांधकर दिखावे। मध्ये विदारितं पर्ण त्यजने कृष्णवेष्टनम संरक्तपटसूत्रण स्यूतं प्राणान्तसंगमे ॥५॥ त्यागके संकेतमें पानको बीचो-बीच फाड़कर काले धागेसे बाँध देना और प्राणान्तिक अवस्थामें लाल धागेसे सी देना चाहिये। निर्भिन्न योजितं पूर्ण मध्ये कुंकुम पूरितम् । बाह्य चन्दनपङ्काक्त- मत्यर्थमनुरागतः॥६॥ जहाँ अत्यन्त अनुराग हो वहाँ पानको टुकड़े-टुकड़ेकर जोड़ देना, मध्यमें केसरसे पूराकर देना और बाहरमें चन्द- नका लेप लगा देना! इति नवम परिच्छेद ।

दशम परिच्छेद पुष्पमाला संकेत। संरागारक्तिरागेषु रक्तकाषाय पिञ्जरैः। सूत्र रस्नेहके कृष्णः पुष्पमाला प्रम्फिता॥१॥ अनुरागमें लाल, विरागमें गेरुआ, ओर स्नेहके अभावमें काले धागेसे गूथी हुई मालाका व्यवहार करना चाहिए। इति दशम परिच्छेद ।

एकादश परिच्छेद यदपि न सुलभेह सा मृगाक्षी सकलकलाकलनासु पण्डिता या। तदपि निरवशेष कामशास्त्रा- भिहितपदे षुमतिं विवद्ध येत् (सा) ॥१॥ सकल कामकला क्षलितको करनेमें चतुर मृगनयनी कामिनी यद्यपि सुलभ नहीं है तथापि पुरुषको भी चाहिए कि समस्त कामशास्रोक विषयोंका पूरा ज्ञान प्राप्त करे । कथमपि यदि संगमस्तया स्याद् ब्रजति तदाहि पराभवं वराकः । *टि. यद्यपि संगीत वाद्य नृत्य मादि कलामोंमें प्रत्येक स्त्रीका निपुण होना असम्भव है तथापि यहां कामशास्त्रक अंगभूत जितनी कलाएं हैं, यथा बालोंको अच्छी तरह सँवारना, कौतुकागारकी सजावट तथा मालिंगन प्रादि कक्षामोंकी कुशलता प्राप्त करना भावश्यक है नागर-सर्वस्व अविदितयुवतीकृतैकसङ्क- तक इति रत्नकुमारको यथैव ॥ २॥ यदि गुणवती स्त्रीसे मूरों का सम्भोग भी होता है तो पश्चात् उसे लजित होना पड़ता और कभी पराभव भी पाता है। यथा युवती द्वारा किये हुए संकेतको न जान कर रत्नकुमारीकी दुर्दशा हुई । इति एकादश परिच्छेद ।

द्वादश परिच्छेद मृदुह्रस्वध्वजो यत्र प्रियोक्तो द्रुतच्युतिः। तत्र स्त्रियश्च काठिन्यात् स तु नीचरतोद्भवः॥१॥ जहाँ स्वामी असमर्थ हो कोमल और छोटा साधन (लिङ्ग) हो, साथही शोघ्र स्खलन होता हो तथा स्त्री कठिनतासे द्रवित होती हो ऐसे रतको नीच रत कहते हैं। नारी नीचरतोद्विग्ना स्वामिनं नाशयत्यपि । श्रूयते चैव कर्णाट कान्तया निहतः पतिः ॥ २॥ कठिनता तथा विलम्बसे द्रवित होनेवाली स्त्री नीच रतसे बहुत घबड़ाती है, यहाँ तक कि स्वामीका मरण भी चाहती है। सुना जाता है कि कर्णाटक (आधुनिक मद्रास प्रान्त) में स्त्रीने स्वामीका वध किया 18 * टि. नीच रतमें स्त्रीको सन्तोष नहीं होता, इसलिये उसको नागर-सर्वस्व । मृदुसाधनतादीनां शमनाय ततोऽधुना। सिद्धप्रयोगसन्दोहान् कथयामि समासतः॥३॥ साधनकी कोमलता, लघुता मादि दोषोंको दूर करनेके लिए सिद्ध या अनुभूत प्रयोगोंको संक्षेपमें कहते हैं द्वढी करण । नवमर्कटिकामुलं छागमूत्रण पेषयेत् । लेपान्निरन्तरतस्य लिंगं लोहोपमं भवेत् ॥ ४॥ कोंचका नया मूल बकरके मूत्रके साथ पीसकर कुछ दिन बराबर लगानेसे साधन अत्यन्त दृढ़ होता है। सन्तोषार्थ पुरुषको औषधोका प्रयोग करना चाहिये । पच्चसायकमें लिखा है कि "तृप्ति नो याति शीघ्र द्रवतिन च रते चण्डवेगा प्रगल्भा।" अर्थात् कर्णाट देशकी स्त्री शीघ्र तृप्त नहीं होती और न द्रवित होती, यही भावार्थ है नागर-सर्वस्व। स्थलीकरण । अश्वगन्धा बचा कुष्ट बला नागबला तथा। माहिषं नवनीतं च गजपिप्पलिकायुतम् ॥ ५ ॥ पिष्ट्वा तेषां विलेपेन स्थूलीकरणमुत्तमम । कुर्यादादौ यदि स्वेद मईनं च प्रयत्नतः॥ ६॥ असगन्ध, बच, कूढ़, बला, ( खरैटी ) नागवला ( गंगे. रन ) गजपीपल इनको समान भाग करके पीसे और भैसके मक्खन में मिलाकर इन्द्रियमें लेप लगावे। किन्तु इन्द्रियमें गरम जलकी भाफसे कुछ पसोना निकालकर तेलका मदन करे, जिसमें रोमकूप खुल जानेसे औषधका प्रभाव पड़े। पश्चात् लेप लगाना चाहिये। यह स्थ लोकरणका अच्छा प्रयोग है। बलीकरणम् । नागवलाद्वयमूलं गोक्षरकं तथाश्वगन्धा च । .

नागर-सस्व। ॥ गोदुग्धन पिबेत्स हि नारीषु दुजयो भवति ॥७॥ खरैटी, नागबला (गगेरन ) का मूल गोखरू और असगन्ध इनको दूधके साथ पीवे तो अतिशय रतिशक्ति बढ़े इसको बलीकरण कहते हैं। शुक्रस्तम्भन । एककरोदरकृत सधवलशरपुङ पारदो नियतम । धारयति बीजवेगं पुंसां वदनार्पिता यावत् ॥८॥ सुरनके समय एक करज बीजके अन्दर सफेद शर- फोंका और पारेको भी कर जमें रखकर मुखमें धरना चाहिए । जबतक रखेगा तबतक वोर्य स्खलित न होगा। यह निश्चित है। योनिद्रावणम् । पारदटकणव्योष- काकमाची मधुलिप्त यत्। S.

नागर-सर्वस्व। नारी स्यन्दति सुचिर बहुच्छिद्रामव कलशम.॥६॥ पारा, सुहागा, चौकिया, कोस, सोठ, कालीमिर्च पीपल काकमाची, ( मकोयके फल) और मधु इनका लेप यदि इन्द्रियमें लगाकर संमोग करे तो पहले स्त्रीका ही शीघ्र रजःपात हो। वशीकरणम्। अलिपक्ष काकजिह्वा स्वकर्णमलमश्रु बीजरक्त च। नयति वशं यां वाञ्छति सुतरामशने विलेपे च ॥ १० ॥ भ्रमरको पल, कौवेकी जोभ, अपना कामल, और मांसू, स्ववीय, अपना रक्त इनको खिलाकर या लगाकर जिसको वश करना चाहे करले। गोरोचना शूकरशोणितेन विभाविताऽनेकदिनं प्रयत्नात् । स्याद्यन्मुखे तत्तिलकं प्रशस्त सर्वे जनास्तस्य वशे भवन्ति ॥ ११ ॥ .

नागर-सर्वस्व । बहुत दिन प्रयत्न पूर्वक गोरोचनको सुअरके रक्कमें मर्दन करके उसका तिलक लगानेसे सभी मनुष्य उसके वश हो सकते हैं। गोरोचना प्रियंगु- मनःशिला नागपुष्पचूर्ण च। अञ्जयेच्चक्षुरमीभि- यस्तस्य वशत्वमेति जनः ॥ १२ ॥ गोरोचन,-प्रियंगु, मैनशिल, नागपुष्प, चम्पापुष्प इनके वर्णको पुरुष आँखोंमें अञ्जनकी तरह लगाकर जिसको वश करना चाहे वश करले। संभोगजं बीजरजो वरांगे तल्लिप्तसशुष्कसितार्कवर्तिः। तदअनेनाञ्जितलोचनायाः सदैव दासत्वमुपैति कान्तः ॥ १३ ॥ वराङ्ग सम्भोगसे पतित रज वीर्य में सफेद मदारके रेशेको (जो रुईकी तरह होता है) भिगोकर बत्ती बनाकर सुखा ले, उस अञ्जनको वह स्री लगावे तो उसका कान्त उसका बन जाय अर्थात् सदाके लिये वशमें आ जाय ।

नागर-सर्वस्व । सुवर्ण बीजं सुतजारयुक्त तत्पूर्णगर्भ कलविंकद हम । तं गोपयेदभूतदिने श्मशाने समुद्धरेदभूत दिनेऽपरस्मिन् ॥ १४॥ पारा और पीले धतूरेके बीजको काला चटक पक्षीके पेटमें रखकर चतुर्दशी तिथिमें श्मशानमें जाकर खूब गुप्त रूपसे जमीनके नीचे गाड़ दे और उसे फिर चतुर्दशी तिथिमें ही उखाड़ लावे। चूर्ण यदषां निजबीजयुक्त- मचिन्त्यमाश्चर्य महाप्रभावम । यस्योदरान्तः पतितं प्रदत्त ननं स दासत्वमुपैति दातुः ॥ १५ ॥ उपयुक्त वस्तु ओंका चूर्ण अपने वीर्य के साथ मिलाकर जिसके पेटपर लगावे या खिलावे तो वह देनेवालेके वशमें अवश्यही आजाय। यह प्रयोग बड़ाही प्रभावशाली और आश्चर्यकारक है। इति द्वादश परिच्छेद ।

त्रयोदश फरिच्छेद शुद्धो शुद्धश्च संकीर्ण- स्त्रिधा भावः प्रकीर्तितः। शद्धोऽपि त्रिविधो मन्द- स्तीक्ष्णस्तीक्ष्णतरस्तथा ॥१॥ शुद्ध अशुद्ध और संकीर्ण ये तीन प्रकारके भाव हैं उनमें शुद्ध भाव भी तीन प्रकारके हैं यथा मन्द तीक्ष्ण और तीक्ष्णतर। ईषत्प्रहसितो मन्द- स्तीक्ष्णस्तु पुलकादयः। तीक्ष्णतरस्तु निःश्वास शोषितावयवोऽत्र यः॥२॥ मन्द मुसुकानको मन्द भाव कहते हैं। साथही यदि इसमें रोमाञ्च आदि हो जाय तो उसको तीक्ष्ण भाव कहते ६. नागर-सर्वस्व 1000 है और यदि गर्म श्वास चले और अङ्ग गर्म हो जाय तो उसको तीक्ष्णतर अर्थात् बहुत तीव्र भाव कहते हैं हेलाविच्छित्ति विव्वोक किलकिञ्चितविभ्रमाः। लीलाविलासो हावश्च विक्षपो विकृतं मदः ॥३॥ मोहायितं कुट्टमितं मौग्ध्यं च तपनं तथा। ललितं चेत्यमी हावा- श्चेष्टाः शृगारभावजाः॥४॥ शृङ्गार रसके भावोंसे उत्पन्न चेष्टाओंका नाम हाव है। यथाः-हेला, १, विच्छित्ति, २, विवोक, ३, किलकिश्चित ४, विभ्रम ५, लीला ६, विलास ७, हाव ८, विपक्ष ६, विकृत १०, मद ११, मोट्टायित ११, कुट्टमित• १३, मुग्धता १४, तपन १५, और ललित १६ बस येहो चेष्टायें हैं। प्रौढेच्छा याऽभिरूढ़ानां नारीणां सुरतोत्सवे।

नागर-सर्वस्व । ६१ शृंगारशास्त्रतत्वज्ञ हेला सा परिकातिता ॥५॥ सुरत कालिक उत्सव में प्रौढ़ा स्त्रीकी उत्कट एवं उद्दाम (तेज) इच्छाको शृङ्गारशास्त्रके तत्त्वज्ञाने हेला कहा है। तद्यथाः- , आसज्य स्वयमेव चुम्बनविधि, याञ्चा विनाऽऽलङ्गनं, तल्पान्ते जघनेन वेपथुमता पर्यायण जानुनि। क्रोधोत्कम्पममर्षयत्यनुनय- स्तन्व्याः स्मरक्रीडया, प्रौढ़च्छाभितिः प्रियस्य हृदयं हेलाबलात्कर्ष ति ॥६॥ पहले स्त्री ही हठात् चुम्बन .करे, विना याचनाकेही आलिङ्गन करे, शय्यापर कम्पायमान जवाओंसे प्रियकी जंघाओंपर जाय और कामक्रीड़ा सम्बन्धी अनेक हाव ६२ नागर-सवस्व। - भाव यदि दिखाने लगे, तो उस चेष्टा विशेषको हेला कहते हैं। प्रसाधनानां दयितापराधा- द्यदीर्णयानादरतः सखीनाम् । प्रयत्नतो वारणमङ्गनाया विच्छित्तिरेषा कथिता बहुज्ञः॥७॥ स्वामीके अपराधसे ईर्षा और क्रोधके वश एवं सखियों के अनादरसे जहां नायिका आभूषण और गारका वारण करे उस चेष्टा विशेषको कामशास्त्रज्ञ पण्डितोंने विच्छित्ति कहा है। तद्यथाः सखि, प्रेयान् स्वामी स्खलितमकरोत्, क्षन्तुमचितं, विधत्स्वालंकारं नहि नहि बलादर्पयसि किम । अयि श्रयश्चिन्त्य सततमबलाभिः प्रणयिनो, नागर सर्वस्व। विभूषां मा मुञ्च प्रतनुमपि विच्छित्तिविषयाम ॥८॥ विच्छित्तिका दृष्टान्त- अरी सखी! माना कि स्वामीने तेरा अपराध किया किन्तु तेरे को इतना बिगड़ना उचित नहीं, अब क्षमा कर दे। ओभूषण पहन ! “नहीं नहीं मैं न मानूंगी बरजोरी क्यों पहनाती हो" सखी--अरी अब भी मान जा! इतना कोप करना ठीक नहीं !! प्रियतमको सर्वथा सन्तुष्ट करना हम लोगोंका कर्तव्य है, इसलिए एक भी आभूषणको रोषसे मत त्याग। अभिमतवस्तूपहृतावपि गुरुदर्पादनादरस्तन्व्याः। स्खलित प्रियस्य संयम ताइनमभिधायि विश्वोकम ॥६॥ स्वामी जहाँ स्त्रीके पसन्द लायक वस्तु लावे तो भी स्त्री बड़े अभिमानसे यदि उसे अनादर पूर्वक त्याग दे और स्वामीपर हाथ भी चला दे तो उस चेष्टाको विव्वोक कहते हैं तद्यथा- अनास्था वस्तूनामभिमतगुणानामपहृतो, घनो गर्वस्तन्व्या रुषि विहसिताडम्बर विधिः।

६४
नागर-सर्वस्व ।
प्रहारः पादाभ्यां यमनमपिकांच्या चरणयोः,
प्रियायाः विव्वोकं तदिदमतिधन्योऽनुभवति॥
दृष्टान्त-स्वामी जो
वस्तु लावे उसपर अनास्था अर्थात्
उपेक्षा, गर्वके साथ उत्तर, क्रोध, आडम्बर, हास्य, पाद-
प्रहार और पावसे काञ्ची (घुघरू ) का त्याग इन चेष्टा-
ओंका नाम विश्वोक है।
स्मितशुष्करुदितहसितत्रासक्रोध
श्रमाभिलाषाणाम ।
सांकर्य प्रियदर्शनहर्षात्
किलकिञ्चितं
प्राहुः॥११॥
जहाँ प्रवाससे स्वामी आया हो और स्त्री उसे देखकर
हर्षसे फूली न समाकर ईषद्धास, कभी सूखा रोना यानी
बिना ऑसूका रोना, क्रोध करना और कभी बहुत हंसना
आदि चेष्टा दिखावे उसे किलकिञ्चित कहते हैं।
तद्यथा:-
क्रन्दत्यवाष्पमभय भयमातनोति.
क्रोधं च नाटयति, तत्क्षणमेव हास्यम् ।
आलम्ब्य हर्णमबला किलकिञ्चिताख्य,
हावं विभावयति पुण्यवतोऽन्तिकस्था ॥१२॥

नागर-सर्वस्व। किलकिश्चितका उदाहरण:-बिना आँसूका रोना, भय- का कारण न रहनेपर भी भय करना, कभी क्रोध प्रकट करना और कभी हंस देना तथा आनन्द प्रकट करना इत्यादि नाना चेष्टाएँ 'किलकिञ्चित' कहाती हैं, जो किसी पुण्यवान् रसिकके ही भाग्यमें बदी होती हैं कि नायिका इस प्रकार करती है। क्रोधः स्मितं च, कुसमाभरणादियाञ्चा, तद्वर्जनं च सहसैव विमण्डनं च। आक्षिप्य कान्त वचनं लपनं सखीभि- निष्कारणोत्थित गतं बत विभ्रमं तत् ॥१३॥ क्रोध, मन्द मुस्कान, फूल या मालाकी याचना, फूल लेकर फिर फेंक देना, फिर उठाकर उससे शृंगार कर लेना, स्वामीके वचनको टालकर सखीके साथ सो जाना निष्कारण इधर उधर करना 'विभ्रम' कहाता है। आस्तां नाथ शुभं भवे, सखि त्वया सिक्ता लता माधवी, कान्तं तन्मम संप्रयच्छ कुसुमं किं वाऽमुना मे फलम्।

६६ नागर-सर्वस्व माल्यं निर्मलयामि, मौक्तिकमिद न्यस्तं त्वया दह्यता- मित्थं विभ्रम संभ्रमो मदयति प्रयांसमणीदृशः ॥ १४॥ हे नाथ ! संसारमें तुम सुखी रहो, तुम्हारा कल्याण हो। अरो सखी! माधवी लताको तूने सींचा, मेरा फूल दे दे, इस फूलसे मुझे क्या ? मैं मालाको साफ करती हूं। तू इस मोतीको जला इत्यादि युवतीका अनेक प्रकार अनाप शनाप बोलना भी आनन्ददायक ही होता है और इसे ही विभ्रम या प्रेम-प्रलाप कहते हैं। अप्राप्तबल्लभसमागमनायिकायाः सख्याः पुरोऽत्र निजचित्तविनोदबुद्धया। आलापवेषगतिहास्यविलोकनाद्यः प्राणेश्वरानुकृतिमाकथयन्ति लीलाम् ॥१५॥ जिस नायिकाको स्वामीस समागम न हुआ हो वह जहाँ अपने मनो विनोदके लिये सखीके आगे, यदि स्वामीके बोलनेके जैसा बोले, स्वामीकी भांति वेष धारण करे, उसी तरह वले, हंसे और हाले तो उसे लीला कहते हैं, तात्पर्य :

नागर-सर्वस्व ६७ -- MN277 vvvN कि स्वामीकी चाल ढालके अनुकरण ( नकल) को लीला कहते हैं। वेणीबन्धकपदिनी, सिततनुः श्रीखण्ड पांसूत्करः, केतक्ये कदलन्दु भृद्विसलता व्यालोपवीतिन्यपि। प्राक पाणि ग्रहणाद्विनोदरभसात् सख्याः पुरो लीलया, कुर्वाणानुकृति हरस्य दिशतु श्रेयांसि वः पार्वती ॥१६॥ लीलाका दृष्टान्तः-सखीके आगे विनोदवश महादेवजी. का पूरा २ अनुकरण करनेवाली पार्वती तुम्हारा कल्याण करें। वह कैसी हैं, सो कहते हैं। जिन्होंने महादेवजीके जैसे मस्तकपर वालोंकी जटासी बना ली है आप तो गौरी हैं अर्थात् सोने जैसी कान्ति है, किन्तु उस गौर वर्णपर चन्दन लेपकर अंगको सफेद बना डाला है। महादेवजीके मस्तकपर इन्दुकला है, पार्वतीने भी केतकी दलके विन्यास से मस्तकपर इन्दुकला धारण कर ली है। उनके अङ्गमें भुजङ्ग लिपटे हैं किन्तु इन्होंने विसलता अर्थात् कमलनाल से इस कमीको पूरा कर लिया है । .

६८ नागर-सर्वस्व । यो बल्लभासन्न गतौ विकारो गत्यासनस्थानविलोकनेषु । वृथास्मितक्रोधचमत्कृतिश्च विकूणनं चास्यगतं विलासः॥ १७ ॥ स्वामीके समीप जाकर जहां स्त्री व्यर्थ हंसी लगाती है, कभी क्रोध करती और कभी मुंह बनाती, अजब चाल चलती तथा आँखें संकुवाती उसे विलास कहते हैं। तद्यथा:-- स्खलितबहुलं पादन्यासे विलोकनमन्यतः, स्थितिरविषय, वक्त्रा- म्भोज प्रयाति विकूणनम्। स्मितमपि मुहुर्व्यथः क्रोधो वृथैव चमत्कृति- दयितमभिगच्छन्त्या- स्तन्व्या विलासरसोह्ययम्॥१८॥ विलास रसका दृष्टान्तः-स्वामीका अनुकरण करती हुई बाला जब चलती है तो कभी पवि कहींसे कहीं रख नागर-सवस्व। देती, कभी किसी ओर निहारती, कभी इधर बैठती कभी उधर बैठती, कभी मुख कमल संकुचाती, कभी व्यर्थ बार २ हँसती, कभी व्यर्थ कोप करती और कभी अपना चमत्कार दिखाती है। बस, बालाके विलक्षण विलास ऐसे ही होते हैं। सवाष्पगद्दालापः सस्मितापाङ्ग बीक्षितम्। प्रेमदाक्षिण्यवृत्तिश्च, तरुण्या हाव उच्यते ॥ १६ ॥ हंसीके मारे रुक २ कर बोलना, विकसित नेत्र कालों- का कटाक्ष चलाना, हार्दिक प्रेम दरसाना तथा स्वामीके अनुकूल आचरण करना हो तरुणीका हाव होता है। तद्यथा:- प्राप्लेषु श्रृंगाररसाश्रयेष हावेष प्रेमांकुरांचह भूतः। उत्पद्यते यस्मित वीक्षितोक्त- मुन्मीलितं बालतया स हावः ॥२०॥ हावका दृष्टान्तः-बाल स्वभावसे श्रृंगाररसका आश्रय हावका प्रसंग आता है। उसमें बाला कटाक्ष चलाती,

नागर सर्वस्व
मन्द २ हंसती और मान करती है। तात्पर्य कि कामका
अङ्कुर यहींसे आरम्भ होता है।
विसंष्ठुलावेशमयो
विकारो विविधः स्त्रियः।
तमामनन्ति विक्षेपं
मुनयः कपिलादयः ॥ २॥॥
अनवस्थित तथा आवेशमय जो बालाका विविध
विकार प्रदर्शन है उसे कपिल आदि मुनियोंने विक्षेप कहा है
दृष्टान्त:-
धम्मिल्लं बद्धमक्त तिलकमसकल
न्यस्तबृतं च धत्त,
दृष्टावेकत्र कालाजनमुरसि रण-
त्किंकिणी रत्नकाञ्चीम्।
अंसोत्क्षिप्ताहाराक्रमकरसकला
मात्रशेषाधरान्ता
कान्ताविक्षेपभावादपहरति मनः
यत्नरुद्धोरुवासाः॥२२॥

नागर-सर्वख। विपक्ष का दृष्टान्त-जूड़ा बँधा हुआ भी खुलासा या ढोला रहे, भालका तिलक भी बेढंगा हो, एक ही आंख में कजल हो, वक्षास्थलमें घुघरू लटका लिया हो, गलेका हार बांहपर चला आया हो, अधरमें पानकी लालीके बदले सिर्फ सुपारीका रस ही शेष हो और खिसकता हुआ अञ्चल कभी इधर सवांरती हो कभी उधर खींचती हो ऐसो भ्रान्तिमयी भावोंसे भव्य भामिनी किसका मन नहीं हरती ? वाच्यानां च पदार्थानां ज्ञानेऽपि यदभाषणम् । नायकेषु मृगाक्षीणां विकृतं तत् प्रकीर्तितम् ॥ २३ ॥ मृगाक्षी यदि जान-बूझकर अपने पतिके प्रति अवाच्य वाक्य कहे, तो उसे विकार कहा जाता है। विकारका दृष्टान्त :- कण्ठे क एष तव, वल्लभ नूपुरोऽयं, तत्पादभूषणमयं वलयस्तदानीम् । इत्यादि वाच्यमभिभाव्य वचो मृगाच्या ज्ञानेऽपि तद्विकृतमुत्सुकतां तनोति ॥२४॥ ।

वनागर-सव।
हे वल्लभ ! तेरे कण्ठमें यह नपुर कैसा है ? यह वलय
पादभूषण वना हुआ है ; मृगाक्षी यदि इस प्रकार विकृत
वाक्य पतिके प्रति प्रयुक्त करे, तो वह विकार है। नायिका.
का यह भाव उत्सुकता उत्पन्न करता है।
मधुपानमदप्राय
स्तारुण्यातिशयोद्भवः।
विकारो यो वरस्त्रीणां
तं वदन्ति मदं बुधाः ॥२५॥
अच्छी स्त्रियोंका जवानीके जोरसे पैदा हुआ विकार,
मधुपानसे पैदा हुए मदकी भांति होता है। ऐसा पण्डित
लोग कहते हैं।
आलापः स्मितकौमुदीसहचरो,
दृष्टिः प्रहर्षोल्लसा,
भ्रूत्याध्वरदीक्षिता,
चरणयोासः समे भंगुरः।
वेशेषु क्षणिकस्पृहा,
मदविधावतवादाश्रय-
स्तन्व्या नकविकारभूमधुमदप्रायो
मदः स्फूजितः ॥ २६॥

नागर-सर्वस्व। ७३ युवतीका आलाप पूर्णचन्द्र के समान प्रसन्न कारक होता दृष्टि हर्षोत्कुल होता है आँखें नो नाचती ही रहती है ल भी निरालो होतो है सदा मदमस्त रहती है वेशभूषा क्ष ण फ स्पृहा रहती है और मनमें यही समझती है कि रे समान संसारमें दूसरी कोई है ही नहीं । दयितस्य कथारम्भे साङ्गभङ्गविज़म्भणम् । कर्णकगडयनं स्त्रीणां मोट्टायितमुदीरितम् ॥२७॥ कान्तके कथारम्भमें युवती जहां अंगड़ाई जम्हुआई ती और कान खुजलाती, उसे मोट्टायित कहते हैं । तस्या िद्वितयं नमन्ति मुनयो ऽसावेककः सर्ववि- तं मृत्युञ्जयमामन्तिविबुधाः सोऽद्याप्यपाणिग्रहः । इत्याकर्ण्य कथां हरस्य विजया पावें विवाहात् पुरा नागर-सर्वस्व। पर भक्त्वाऽङ्गानि विज भितं, गिरिभुवो मोहायितं पातु वः॥२८॥ पार्वतीका मोट्टायित तुम लोगोंकी रक्षा करे। विवाह के पूर्व जिस प्रकार बन सके उस प्रकार शरीरका प्रसार करे। केशस्तनादिग्रहणे हर्षादप्रतिमे सुखे । दुःखाविष्करणं तन्व्या यत्तत्कुमितं मतम् ॥२६॥ सुरतकालमें सुन्दरीके बाल और स्तन आदिके ग्रहण करनेपर उसे अपूर्व आनन्द तो मिलता ही है किन्तु फिर भी यदि वह वहानेसे दुःख दिखावे तो उसे कुट्टमित कहते हैं। किं कान्त निर्दयतरं भुजकन्दलोभ्यां द्वाभ्यां निपीडयसि मां, न सहिष्णुरस्मि । वामभ्र वामिति सुखेष्वपि दुःखभाजां धन्यः श्रु णोति यदि कुमिताक्षराणि ॥३०॥ प्राणनाथ ! इतना निर्दय होकर दोनों भुजाओंसे क्यों पीड़ित कर रहे हो ? मैं इतना सहने योग्य नहीं हूं। इस नागर-सर्वस्व प्रकार नवोढ़ाके सुखमें भी उसके मुखसे दुःखके प्रकाशक इन कुट्टमित अक्षरोंको जो युवक सुना करता है वह धन्य है। मुक्ताफलं तरो कस्ये- त्यादि यत् कृत्रिमं वचः। वल्लभानों पुरः प्रोक्त, मौग्ध्यं वदत तदबुधाः ॥३१॥ हे नाथ! किस वृक्षका मुक्ताफल 'है ? इत्यादि नवोढ़ाका यह अज्ञानता सूचक प्रश्न जहां होता है वहां मुग्धता कहो जाती है। तद्यथा:- के द्रुमास्ते क्व वा ग्राम सन्ति केन प्ररोपिताः। नाथ मत्कङ्कणे न्यस्तं येषां मुक्ताफलं फलम् ॥ ३२॥ हे नाथ! किस ग्राममें कहांपर किसके उगाए तथा जमाए हुए वे वृक्ष हैं, जिनके ये दोनों मुक्ताफल लाकर तुमने मेरे कंगनेमें जड़वा दिया । यह अत्यन्त मुग्धाका दृष्टान्त है।

नागर-सर्वस्व। नागच्छति प्रियतमे प्रहराधमात्र- मुद्व गजं विविधचेष्टितमङ्गनायाः। सख्याः पुरः श्वसनरोदनमात्मभाग्य- निन्दादिकं कविवरास्तपनं वदन्ति ॥३: प्रियतमके आधीरात तक न आनेसे स्त्रीके उद्बगर उत्पन्न हुई इन चेष्टाओं, जैसे सखीके आगे सिसक सिस कर रोना या अपने भाग्यकी निन्दा करना, आदिको की लोग तपन कहते हैं। इसका दृष्टान्त :- नायाते प्रहाधमेव दयिते भङ क्त्वा नितम्बे मिथः संसक्ताऽङ्ग लिजालमध्यमधुना सख्यः कृतार्था इति । व्याहारः स्वपनं पुनरिद गौयर्थनाभ्यर्चन तन्वङ्ग यास्तपनं तनोति कृतिनः प्रमाणमुच्च रैरपि ॥ ३४॥ मुहुः

नागर-सर्वख
अपने नायकके आधीराततक न आनेसे तन्वंगी नायिका
एकान्तमें जाकर नितम्बाको मसलती या पीटती है। अपनी
सखाके हाथों में पंजा डालकर ऐंड़ती है। भूखी रहती है,
सोती है फिर जागकर यहा चेष्टा करती है एवं सखासे
कहती है कि स्वामी मिल जायें ता तेराही मुखमाठा कराऊ।
यह तपन चेष्टाका दृष्टान्त है।
भ्रू नेत्रादिक्रियाशाली
सुकुमारविधानतः।
हस्तपादाङ्गविन्यासस्तरुण्या
ललित विदुः ॥ ३५॥
जिस तरुणीकी भौं और नेत्रादि क्रियाएं सुकुमार विधि
से सम्पादित हैं और इसा प्रकार उसके हाथ-पांव तथा
अंगोंका विन्यास है, उसके उस चेष्टा या स्वरूपको 'ललित'
कहते हैं।
स्कन्धाश्रितैकमणिकुण्डलमुन्नतैक-
भ्रूवल्लि साचिविनिवेशितष्टिपातम्
चेतो न कस्य लालतं हरति प्रियाया
हासोयतों शुकनिरुद्धरदेन्दुकान्तः॥३६॥

नागर-सर्वस्व ।
उस प्रियाकी लालित्यचेष्टा किसका मन नहीं हरती?
जिसके कन्धेतक लटकते हुए मणि कुण्डल शोभित हैं।
भ्र बलो उन्नत है। वह टेढ़ी निगाहसे देखती है। जिसका
चन्द्रमाकी भांति हास्य है एवं जिसका मुख वस्त्रसे ढंका
हुआ है।
इति त्रयोदश परिच्छेद।

चतुर्दश परिच्छेद परिणाहारोहाभ्यां षण्णवद्वादशाङ्ग लैगुह्यः। शशवृषभाश्वाः पुरुषा हरिणी बडवेभिका नार्य :॥१॥ जिस स्त्री-पुरुषकी गुह्य इन्द्रियाँ छ, नौ और बारह अंगुल परिमाणकी चौड़ी और दीर्घ हैं, ऐसो स्त्री हरिणी, घोड़ी और हस्तिनी सज्ञावाली होती हैं एवं पुरुष शशक, वृषभ और अश्व संज्ञक होते हैं। सुवचनसमदन्ताः कान्तिमन्तः प्रहर्षा अविरलकरशाखा वतु लास्यं वहन्तः। चरणजघनहस्ते कर्णदेशे च कार्य सुरभिरतजलाढ्या मानिनस्ते शशाः स्युः॥२॥ वरण, कटि पश्चाद्भाग, हाथ और कर्ण प्रदेशमें दुबलता एवं मधुरभाषी सुन्दर तथा समान दन्तपंक्तिवाला, कान्ति नागर-सर्वस्व। मान्, सवदा प्रसन्नचित्त रहनेवाला, गोल मुख मण्डल, घनी अंगुलियोंवाला और सुगन्धित कार्यवाला तथा अभिमान करनेवाला शश जाताय नायक होता है। स्थौल्यं गलस्य ललितां गतिमावहन्त आरक्तहस्तचरण स्थिरपक्ष्मलाक्षि। कूर्मोदरं मृदुगिरं च, सुपोवराङ्गा मेदस्विनश्च सुभगा वृषभा भवेयुः ॥३॥ जिसका गला मोटा हो, गमन सुन्दर हो हथेली लाल हो, दृष्टि स्थिर हो, अङ्ग गौरवर्ण हो सुन्दर तोंद हो और जो भाग्यवान हो वह वृषभ जातीय नायफ होता है। दीधैः कृशैर्वदनकर्णशीरोभिरोष्ठैः सान्द्रः शिरोरुहचः कुटिलङ्गजकाः। दीर्घाङ गुलीजलदघोषवोलोलनेत्र: पीनोरुशीघ्रषमनैः सुनखाः स्युरश्वाः॥४॥ मुख कान शिर और ओष्ठ कुछ लम्बासा हो, बाल खब घने हों, शरीर दुबेल हो, अंगुलियां लम्बा २ हों, इष्टिमें चपलासो चञ्चलना हो, जाँघ मोटा हो, शंघ्रगामी तथा सुन्दर नखवाला हो तो वह अश्व जातीय पुरुष होता है।

मागर-सवस्व। ललितगमना तन्वी श्यामा हिमा तिशीतला विकटदशना मन्दालापा ससान्द्रशिरोरुहा। समधिकक.फा स्वल्पाहारा सुगूढशिरोस्थिका सुरभिसुरताढ्या च स्निग्धानना हरिणी भवेत् ॥५॥ सुन्दर चाल हो, देह पतलो हो, श्यामवर्ण हो, और चन्द्रकिरणकी तरह अङ्ग शीतल हो, दांत विकट हो, वचन निन्दनीय हो, बाल अधिक घने हों, कफ प्रकृतिकी हो, आहार स्वल्प हो, शिरकी अस्थियां उठी हुई न हों। सुरत सम्बन्धी अल सुगन्धित हो और मुख जिसका चिकना चुड़ा हो तो व हरिणो नायिका होती है। पीनकठिनकुचभागं वक्रास्थिय थिगुल्फमुद्वहती। विपुलजघनमुष्णाङ्ग मृदुसुललितमांसलौ बाहू ॥

८२ नागर-सवस्त्र। स्वेदाम्बुकणोपचीता गौराङ्गी पललगन्धिरतसलिला । तुच्छोदरी समाङ्गी तरुणी पीत्ताधिका वडवा ॥६॥ and अश्व जातीय अथवा बड़वा नायिकाके स्तनयुग पुष्ट तथा कठिन होते हैं, घुटने कुछ टेढ़े होते हैं । जघन विशाल होते हैं। अङ्ग सदा ही कुछ गर्म रहता । बाहें कोमल तथा मोटी होती तथा उनपर पसीनेकी बूंद उठती रहती है। उसका शरीर गोरा होता, सुरत सम्बन्धी रजमें मास की जैसी सुगन्धि होती, पेट छोटा होता, सभी अङ्ग बराबर होते और पित्त प्रकृतिकी होती है। खर्वा स्थूला प्रकटदशना कुन्तलैः स्थलनीले रक्ता वातप्रकृतिरकृशै हस्तपाद वराङ्गी। शीतोष्णाङ्की वहतरवचा- श्चञ्चलाऽनल्पम दो

नागर-सर्वस्व ।
८३
रोमाकीर्ण वहती करिणी
दोनगन्धं वराङ्गम् ॥७॥
हस्तिनी नायिकाका कद छोटा किन्तु देह मोटी होती
है, दांत प्रायः बड़े बड़े होते हैं, वर्ण लाल होता है, वात
प्रकृतिकी होती है, शरीर सुन्दर होता है, शरीर कभी ठंढा
और कभी गर्म रहता है, बहुत बोलनेवाली, चञ्चल होती
तथा हाथीके मदके समान उसके रजमें गंध होता है ।
नरः संलक्षितो व्यक्त
मनेकैरश्वलक्षण ।
एकतो लिङ्गकोमल्या-
च्छशको जायते ध्रुवम् ॥८॥
मनुष्यमें अश्व जातीय अन्यान्य अनेक लक्षण क्यों न
हों, किन्तु यदि साधनमें कोमलता हो तो उसे शशक जातीय
ही कहना चाहिये।
कक्ष पादतल तुच्छ
गुरुत्वं च कुचास्ययोः।
यस्याः सा हरिणी ज्ञया
याऽपाभीलक्षण युता ॥६॥

मागरसर्वस्व बाहुमूल और पॉवका तलवा जिसका छोरा हो, स्तन और मुह जिसके बड़े २ हों, उसमें यदि और लक्षण हल्लिनाके हों तो भी उसे हरिणी ही कहना चाहिये । हरिणी शशयोयोगे वडवा बृषयास्तथाश्व हस्तिन्यो। उभयोः समरतम दितं त्रितय तिशास्त्रतत्वज्ञः॥१०॥ हरिणी नायिका और शश नायक, बडवा नायिका और वृष नायक तथा हस्तिनी नायिका और अश्व नायक इसका परस्पर समान रूपसे सम्भोग होता है, ऐसा रतिशास्त्रके तत्वज्ञोंका मत है। हरिणी वृषयोर्वडवा हययोतिय तथोच्चरतम दितम् । नीचद्वयं च वडवा शशयोवृषहस्तिन्योः ॥११॥ हरिणीका वृषसे बड़वाका अश्वसे उच्च रत होता है और बड़वाका शश नायकसे एवं वृष नायकका हस्तिनी नायिकासे नीचरत अर्थात् असन्तोष कारक रत होता है।

नागर-सर्वख। अत्युच्चमश्वमग्योः, शशकरिण्योश्च नीच रतम् । इति नवधा रतम दितं समसुरतंतत्र साध्यमतम् ॥१२॥ अश्व जातीय पुरुषका मृगी स्त्रीके साथ अत्युच्च रति होती है और शश जातीय पुरुषको हस्तिनीके साथ अति नीच रति होती है। इस प्रकार सुख साध्य रतिके नौ अन्तर्लिङ्गास्पर्शान्नीचे कण्डूतिरप्रतीकारा। उच्च मृदुगुह्यान्तः संपीडा सव्यथं हृदयम् ॥१३॥ अत्युच्च रति और अति नीच रति दोनों सन्तोष कारक क्यों है, इस बातको बनाते हैं कि अति नीच रतिमें गुह्य- स्थानके अन्तस्तल पर्यन्त साधनके न पहुंचनेसे कण्डूति अर्थात् खुजलाहट शान्त नहीं होती और अत्युच्च रतिमें साधन बड़ा होनेके कारण मृगाके अल्प परिमाण गुह्य प्रदेशमें अत्यन्त पोड़ा उत्पन्न करता है। इसी कारण वे हानिकारक हैं। इसलिये समान रतिमें ही सुख है।

८६ नागर-सर्वस्व । मृदुमध्योत्तम शक्तय इह सूक्ष्मा रक्तजाः क्रिमयः। स्मर सद्मसु कण्डति जनयन्ति यथाबल स्त्रीणाम् ॥१४॥ त्रियोंके रक्तसे उत्पन्न सक्ष्म कीट थोड़ा बहुत और अत्यधिक शक्तिके अनुसार स्त्रियोंके स्मरसदनमें कण्डूति अर्थात् खुजलाहट उत्पन्न करते हैं। कण्डूत्यपनयन पटोः कान्ताच्युतिशम हेतुभ तस्य । प्रायोश्वरस्य दयिता सहते न म हूर्त विच्छेदम॥१५॥ स्त्री कण्डूतिको दूर करने में समर्थ स्वामीका वियोग क्षण भर भी सहन नहीं कर सकती, क्योंकि बिना कण्डूति निवृत्तिसे रजःस्खलन नहीं होता और बिना उसके सुख- सन्तोष नहीं मिलता। दवेन यदि कदाचित् कथमपि जायते तस्य विच्छेदः।

नागर-सवस्व। ८७ सहसैव सा वराकी यायादशमी मनोभवामवस्थाम।१६। हठात् यदि कदाचित् स्वामीका वियोग हो जाता है तो वेचारो स्त्री झट प्राण त्याग करने पर प्रस्तुत जाती है। अभिलाषस्तथा चिन्ता- ऽनुस्मृतिर्गुणकीर्तनम् । उद्व गश्च विलापाऽथो- न्मादो व्याधिस्तथाष्टमः॥१०॥ जडता मरणचेति दशावस्थाः प्रकीर्तिताः। प्रमदानां नराणांच स्मरेषूद्भिन्न चेतसाम ॥ १८॥ काममोहित स्त्री हो चाहे पुरुष, उनकी अवस्थाए दश होती हैं जैसे-अभिलाषा १, चिन्ता २, अनुस्मृति या स्मरण ३, गुणकीतन ४, उद्वेग ५, विलाप ६, उन्माद ७, व्याधि ८, जड़ता ५ और मरण १० । इति चतुर्दश परिच्छेद।

पञ्चदश परिच्छेद प्रथममपररामा इङ्गितैलक्षणीयाः, स्वयमथ सुहृदा वा यत्नसाध्या असाध्याः। सकृदपि न च साध्या क्षेमकामैरसाध्या, यदिह विपदसाध्या साधने दुनिवाराः ॥१॥ परस्त्रीको पहले चेष्टाओंसे लक्षित करना चाहिये क्योंकि एक तो पहले परस्त्रीगमन ही महापाप है दूसरी बात यह कि जो स्त्री कुलक्षणा होती है, उसका लक्षण पहले ज्ञात कर लेना चाहिये ; तब यदि उसको देखकर अन्तिम अवस्था आनेकी सम्भावना हो तो साध्य वा यत्न साध्य कर यत्न करना चाहिये, अन्यथा कभी नहीं क्योंकि कल्याण चाहने वालोंके लिये वह सवथा असाध्य है। स्वयं साध्य न हो तो मित्र द्वारा वा दूता द्वारा साध्य होती है और विपत्तिमें भी जो साध्य न हो, उसे सर्वथा असाध्य समझना चाहिये।

नागर-सर्वस्व । ८६ प्रकाशो बाहुमूलस्य कक्षोदरकुचस्य च। बालाना चुम्बनालिङ्गो कबरीमोक्षसंयमौ ॥२॥ स्वागावयव वस्त्राणा निरन्तर विलोकनम । अश्रुपातांगुलीमों श्लेष्मोत्सर्गो मुहमहः ॥३॥ कान्तस्य गुण सौभाग्य संक्रीडागुणसम्पदाम । संकीर्तने महोल्लासाः सांगभंगं विजृम्भणम ॥ ४॥ श्रुति सांगुलिक्षेपः सस्मिते वचनेक्षण। एतान्ययत्नसाध्याना- मि गितानि समुन्नयेत् ॥ ५॥ सहज ही घशमें आनेवाली स्त्रोके इतने लक्षण होते हैं। ६ नागर सर्वस्व । .वह बाहुमूलको प्रकट करतो, पेट दिखानी, किसी न किसी .बहाने स्त मण्डलको दिखातेका चेष्टा करती, यदि पासमें लड़का हो तो उसका चुम्बन तथा आलिङ्गन करती, वार २ बालोंको खोलतो और बांधतो, अपने अङ्ग प्रत्यङ्ग तथा वस्त्रोंकों देखती, आंसू बहानो, अंगुलियोंको मसलतो, बार बार खांस कर थूकती, प्रियके विषयमें पूर्ण प्रशंसा करती तथा दूसरेके मुहसे सुननेपर सावधान हो जाती है। अंगड़ाईके साथ जम्हाई लेनो हुई कानोंमें अंगुलियां डालनो, हंसकर बोलको ओर ताकती है। सव्याधीालु व्यक्ति धाहोनप्रवासिनाम । स्त्रियो यात्रादिस रक्ता- स्ताश्च साध्याः प्रकीर्तिताः॥६॥ व्याधिग्रस्त, इर्षावाला, कुत्र; निर्धन, दुष्ट, कुरूप, परदेशाकी स्त्री और यात्रा तथा उत्सादिमें जानेवालो स्त्रियां साध्य होती हैं। हीभयालङ कृताः कान्ता दुःखाता लोभवर्जिताः।

नागर-सर्वस्व। भय रहता, दुःख पीड़ित साध्यालिग विपर्यस्तः असाध्यास्ताः प्रकीर्तिता ॥७॥ जिस स्त्रीको लजा और जो रहती, जा निर्लोभ रहता ओर जो पूर्वोक्त साध्य लक्षणांसे रहित हाती उसे असाध्य कहते हैं । रजको मालिनो धात्री योगिनी प्रतिवेशिनी। सखी गोपालिका चटी नापिती दूतिका मताः ॥८॥ धोबिन, मालिन, धाई, यागिन, पड़ोसिन, सखी, ग्वालिन, दासो और नाइन ये सब दूनाके योग्य हैं । प्रगल्भा युवता दक्षा परिज्ञातपरेशिता। दूती नियोज्यते कार्ये वक्रभाषितभूषिता ॥६॥ युवती हो, साहसी हो, चतुर हो, अन्य जनकी चेष्टा. ओंको जानती हा एवं वक्रोक्तिको जानती हो पहो दूनी हो सकती है।

१२ नागर-सर्वस्व प्रतिपदमदनप्रदीपकै- स्तैमूदुवचनैयु वती तयाऽभिधेया। कुसुमशररुजा विकीर्ण धैर्या द्रुतमनुयास्यति यः सुतेव दूतीम्॥१०॥ जो युवती मदनके वाणप्रहारसे अधीर हो रही हो, उसे यदि दूनी अनुक्षण मदनाद्दीपक मधुर वचन सुनाने लगे तो वह लड़कीकी तरह अनुगामिनी हो जाती है। सप्रेमदानैमधुर वचोभिः संरक्षितव्याः सततं युवत्यः । अरक्षिता ह्यात्मपतित्रिवर्ग- नाशं करोत्यन्यजनानुरागात् ॥११॥ युवक पतिको चाहिये वह अपनी युवती स्त्रीसे पूर्ण प्रेम करे; उसे मधुर वचनोंसे सन्तुष्ट रखे, उसकी भाव- श्यकताओंको यथाशक्ति पूरा करे और सदा रक्षा करे, अन्यथा पतिके दुर्व्यवहारसे विरक अरक्षिता स्त्री अन्य अनमें आसक होकर धर्म, अर्थ, काम इन त्रिवगोंका नाश करती है।

नागर-सर्वस्य। उद्यानतीर्थनटयुद्धसमुत्सवेषु यात्रादिदेवकुलबन्धुनिकेतनेषु । क्षेत्रष्वशिष्टयुवतीरतिसङ्गमेष नित्यं सतास्ववनिता परिरक्षणोया ॥१२॥ फुलबाड़ियों, तीर्थों, नाचोंमें, युद्ध में किसी महोत्सव या पार्टियों में अधिक दिनोंके हेतु भाइयोंके घर, खेतोंमें और मशिष्ट युवतियोंके संसर्गसे सजनोंको चाहिये कि सदा अपनी खोकी रक्षा करें। तारुण्यमोहमदनस्वजनोपरोधे- धर्मार्थकामकुतुकोत्सुकसुप्रभावः । दृत्याऽभिनन्दितविचित्ररताश्रयेण नार्यों भवन्त्यगणितायकुलोपचाराः॥१३॥ युवावस्थाके मदमें आकर अज्ञानवश, उत्कर कामवश और खजनके आग्रहसे धर्म, अर्थ और काम इनके बहाने, तथा दूनीके बहकावे में पड़कर कुलाङ्गनाए भी दुश्चरित्रा हो नाती है ! चेष्टां विचार्य निभृतं निजसुन्दरोणां रूपोत्तमान्यनरलोचनगोचरेषु।

९५ नागर-सर्वस्व। यस्या न सन्ति सुतरां कथितेंगितानि कान्ताषु सव गृहिणी बहुमाननीया॥१४॥ सुन्दरी युत्तोपर प्रायः युवकोंकी दृष्टि भी जाही पड़ती है, ऐसी दशामें अपनी स्त्रीके चरित्रपर हो सावधान रहना चाहिये। जिस स्त्रामें पूर्वोक्त दुर्लक्षणों या चेष्टाओंका नाम तक नहीं है, स्त्रियोंमें वही गृहिणी पद पर सर्वथा प्रतिष्ठित करने योग्य है। इति पञ्चदश परिच्छेद।

षोडश परिच्छेद सेवनं योषितां कुर्याद बुद्ध्वा पथ्यक्रमं बुधः। बालायोग्याभिरूढाना मृतुयोगविभागतः॥१॥ कामशास्त्रके पण्डित ऋतुके भोग विभागके अनुसार पाला आदि स्त्रियोसे सम्भोगकी व्यस्था करते हैं, क्योंकि वही पथ्य है। बालेति गीयते नारी यावच्छोडशवत्सरम् । ततः परं च तरुणी सा यावरच त्रिशतं भवेत् ॥२॥ तदूर्ध्वमभिरूढास्या- द्यावत् पञ्चाशतं पुनः।

६६ नागर-सर्वस्व । वृद्धा ततः परं ज्ञया सुरतोत्सववर्जिता ॥३॥ सोलह वर्ष पर्यन्त बाला होती है ; सोलहसे तीस वर्ष पर्यन्त तरुणी, तीससे पचास वर्ष पर्यन्त प्रौढ़ा और पचास से ऊपर वृद्धा होती है जो सुरतोत्सवके लिये निषिद्ध है । निदाघशरदोर्वाला पथ्या विषयिणां भवेत् । हेमन्त शिशिरे योग्या, प्रौढा वर्षावसन्तयोः ॥४॥ विषयी या कामी जनोंके लिये प्रेम और शरत् कालमें बाला पथ्य है हेमन्त और शिशिरमें तरुणी तथा वर्षा और वसन्तमें प्रौदा पथ्य है। सततं सेव्यमानाऽपि बाला वर्धयते बलम् । क्षयं (क्षयं ?) नयति योग्या स्त्री, प्रौढा तु कुरुते जराम् ॥५॥ पालाका सेवन सदा ही बलवर्धक है, तरुणो बल क्षय कारक है और प्रौढ़ा वृद्धावस्थाको लाती है।

मागर-सवख। १७ अलोमकाः सतिलका नित्यं सेव्यास्तु योनयः। अलोमकत्वं कक्षण, मुखेन ज्ञायत तिलः॥६॥ लोम हीन और तिल सम्पन्न घराङ्ग सदा सेवनीय है। कक्ष अर्थात् काखमें बाल न होना चाहिये और मुखपर तिल होना चाहिये। आसीने लालयेद बाला, तरुणीं शयने तथा। उत्थिते चाभिरूढां तु, लालनं त्रिविधं मतम् ॥ ७॥ घेठने में घालाका, शयन कालमें तरुणीका और उठनेमें प्रौढ़ाका लालन करना चाहिए। इस तरह तीन प्रकारके लालन या गहरा प्यार है। मोहनं नारभेत्ताव- द्यावनोत्कण्ठिता प्रिया। •टि• गुह्यान्ते तिलको यस्या रक्तककुमसन्निभः । अथवा दक्षिणे भागे प्रशस्ता सा निगद्यते ॥

६८ नागर-सर्वस्व । MONOR अन्यथा तत्सुवोच्छित्ति- रशीतेऽर्ककरादिव ॥८ जबतक प्रिया उत्कण्ठिनो न हो, नब तक मोहन प्रयोग आरम्भ न करना चाहिए। मोहन पदसे यहां सुरतका अभिप्राय है । अन्यथा सुखके बदले दुःख ही होता है। जैसे गर्मो में कड़ी धूप प्रिय नहीं लगती। नाभिहृत्कण्ठदेशेषु दधत् श्वासं न यः क्रमात् । कामोऽहं भावयेत् कामी गायत्री सप्तधा जपेत ॥६॥ जो पुरुष नाभि, हृदय और कंठ प्रदेशमें श्वास धारण करके मैं काम हूं ऐसी भावना करे और गायत्रो पढ़े तो स्त्रीको वशीभूत कर लेता है। गायत्री यथा—ॐ नमो मनोभवाय विद्महे कन्दर्पाय धीमहि तन्नः कामः प्रचो- दयात् ॥ १०॥ व्यायेन चम्बनादीना- मुच्छ्वास पाययेत् प्रियाम् ।

नागर-सर्वस्व। ९९ तेन सा वशमायाति न तस्यास्तु स्वयं पिवेत् ॥ ११ ॥ चुम्बनके छलसे अपनी सांस प्रियाको पिलानेसे वह पूर्ण वशमें आ जाती है, किन्तु स्वयं उसका पान न करे । सीत्कारश्च हकारश्च श्वसितञ्च त्रपाक्षयम्। प्रस्विन्नवदनं चैव विकारोऽथ भगस्य च ॥ १२॥ बुद ध्वा चैतानि लिंगानि प्रियायः सुतरां बुधः। तया तुल्यसु खं चैत- दात्मरागं समारभेत् ॥ १३॥ सीत्कार अर्थात् जीभ तथा तालुके संयोगसे उच्चारित शब्द, हा हा करना, लम्बी सांस लेना, लज्जाका दूर होना, शरीरमें पसीना आना, बराङ्गमें स्फरग और कंडूति आदि लक्षणोंको देखकर कामकला-कुशल व्यक्तियोंको सुरत समागम करे, जिसमें दोनोंको समान सुख प्राप्त हो ।

नागर-सर्वस्व । GIR सुन्दर्यामनिशं यस्यां रमते चित्तमात्मनः। सेवेयं भावनीया स्या- दात्मरागसमुद्भवः ॥ १४॥ जिस सन्दरीमें दिन-रात स्वभावतः वित्त अनुरक्त हो या विशुद्ध प्रेम हो, उसीमें ऐसी भावना करनी चाहिये। अत्राह महेश्वरः- एवं संचोदिता नारी नान्यमिच्छति मानवम्। क्लीवोऽपि हृदयं तस्याः प्राप्नोत्येव न संशयः॥ १५ ॥ इस प्रकार लालन-पालन की हुई स्त्री अन्य पुरुषकी इच्छा कभी नहीं करती है। पुरुषकी कौन बात, नपुंसक पतिसे भी सन्तुष्ट रह सकती है। इति नरविधिना परिसेविता परमशर्म समेत्य नितम्बिनी।

नागर-सर्वस्व। तृणवद जितजीवितनिस्पृहा त्यजति याम्यपुरेऽपि न बल्लभम्॥१६॥ इस प्रकार सत्पुरुषोंसे सुसेवित सुन्दरी सच्चा सुख सम्प्राप्त कर जीवनको तृणकी नरह तुच्छ समझती हुई यम सदनमें भी उक्त सत्पतिको छोड़ना नहीं चाहती। इति षोडश परिच्छेद।

सप्तदश परिच्छेद पादाग्रजकोरुष योनिनाभि- कुक्षौ कुचे हस्ततले गले च। ओष्ठे कपोले नयने श्रुतौ च शीर्षे तथा सर्वशरोरदेशे ॥१॥ स्थानेषु चैतेषु तिथिक्रमेण नितम्बिनीनां समुदति कामः। वामांगभागापरि शुक्लपक्ष कृष्णे च सव्यावयवे तथैव ॥२॥ पवका अग्रभाग, जंघा, ऊरु, नाभि, कुक्षि, कुचद्वय, हथेली, गला, आठ, ललाट, नयन, कान, मस्तक एवं सर्वाङ्ग में तिथि क्रमसे कामका उदय होता है। शुक्लपक्षमें बाए पांवके अंगुष्ठसे कामका आरोहण होता है और कृष्णपक्षमें शिरसे नीचे तक क्रमशः अवरोहण होता है।

नागर-सर्वस्व । १०३ अंगुष्ठमूलात्प्रभृति क्रमेण यावच्छिखामूलमुपैति कामः। कृष्णो तु पक्ष चरणाप्रद शं प्रयाति नित्यं शिरसस्तथैव ॥३॥ कृष्णाक्षमें अंगुष्ठ मूलसे क्रमश: केश पर्यन्त काम संप्राप्त होता है ओर उसी शुक्लपक्षमें शिरसे क्रमशः चरणके अन. भाग तक काम उतर कर चला जाता है। अंगुष्ठमुलेषु अ, आ च जवा- युगे, इ ऊरावपि, ई च योनौ। नाभ्यां उ, ऊ कुक्षतटे, कुचे , करे तथा ऋ,लृ च कण्ठदशे ॥४॥ लु चाधरे, ए सतत कपोल, नेत्र च ऐ, कर्णयुगे तथा ओ। शिखाश्रये औ कथितो रतज्ञ:, सर्वागदशे च सद व अंअः ॥५॥ सर्वा गदशे मदनस्य बीज- मिष्टाक्षर सेन्द सबिन्द शीर्षम्।

१.४ नागर सर्वस्व। बीजं शरच्चन्द्रकलावदातं सञ्चोदयेत्सूर्यनिभं प्रदीप्तम् ॥६॥ अंगुष्ठ मूलोंमें अ, जंघाओंमें आ, ऊरूमें इ, बरांगमें ई, नाभीमें उ, कुक्षिमें ऊ, कुचमें ऋ, करमें ऋ, कण्ठमें ल, अधरमें ल, कपोलमें ए, नेत्रमें ऐ, कणयुगमें ओ, केशमें औ और सर्वाङ्ग प्रदेशमें अं अः । इस प्रकार शरत्कालिक चन्द्रकी तरह उज्ज्वल तथा सूर्यके समान प्रकाशमान प्रयुक्त काम बीजोंकी भावना करनी चाहिए। विभावय त्तदयिताशरीर ततो निरुन्मेषजिलोचनायाः। (नितान्तनिःस्यन्दितनोः प्रियायाः) विहाय बाह्यान विभवान् भवेयुः॥७॥ मु (स?) खे निलीनानि पडिन्द्रियाणि (तृप्तानि सर्वाणि भवन्ति तन्व्याः॥८॥ अपनी स्त्रीके शरीरमें उक्त मन्त्रोंकी भावना करनी चाहिए। उसके बाद एकदम निस्तब्ध-नेत्रा कामिनाके बाय विभव अर्थात् बाहरी रतिको छोड़ कर आन्तरिक रति नागर-सवस्व । पुरुष आरम्भ करनी चाहिए। ऐसा करनेसे स्त्री और दोनोंकी परस्पर छहों इन्द्रियां तृप्त होती हैं। तथा चात्र महेश्वर:- इति चिन्तितमात्रण स्त्रीणां तृप्तिःप्रजायते। विनाऽपि योनिलिङ्गाभ्यां संसर्गेण वरानने ॥६॥ है वरानने ! इन : कामबीजोंकी चिन्ता करनेसे ही मर्थात् स्त्री-पुरुषके संयोग बिना ही परस्पर सन्तोष हो जाता है। इति सप्तदश परिच्छेद। ७ अष्टादश परिच्छेद -: मुखं चतुर्विंशतिनाडिकानां मदावहानां मदनातपत्रम्। नारोवराङ्गोदरमध्यवर्ति प्रचोदयेत्यक्षरबीजयुक्तम्॥१॥ स्त्रीके वरांगके मध्यमें संभोगेच्छा प्रकट करनेवाली चौबीस नाड़ियां हैं, उनका मुख या निर्गम स्थान मदनच्छत्र कहाता है। जो ऊपरका भाग है उसमें व्यक्षर बीज मन्त्र पाठके साथ अंगुलियोंका घर्षण करना चाहिये। उच्चारितानां क्रमशः कलानां द्वितीयकं पञ्चदशस्थमेकम् । विसर्गमध्य प्रणवादिमन्त्र- मघातयेत्यक्षरनामधयम् ॥२॥ ॥ॐ आः अं॥

नागर-सर्वस्व।
१०७
उच्चारित स्वरोंका द्वितीयाक्षर और दशमाक्षर अर्थात्
मध्यमें विसर्ग और आदिमें प्रणव अर्थात् ओंकार इन तीन
अक्षरोंका उच्चारण करते हुए अंगुलि प्रयोग करना
चाहिये।
संप्राप्य वालां करशाखयैव
लिङ्गन चात्मीयसमा समेत्य ।
लिङ्गाङ्ग लिभ्यां तु तथाऽभिरूढ़ां
प्रचोदनीय मदनातपत्रम् ॥३॥
बालाको अंगुलीरूप साधनसे अपना कर प्रयोग करना
तथा प्रौढ़ाके प्रति साधन और अंगुली दोनोंका प्रयोग
करना।
ॐ कामद वाय इदम् मे हर्णय हर्ष स्वाहा ॥
॥ क्षोभन (ण) मन्त्रः॥
द्वे लोचने, द्वे बदने, तथैका
तुण्डे, स्थिता वै मुखचोधनाड्यः ।
अंगुष्ठमूलाश्रितनाडिका तु
तथा पदाङ्ग ष्ठनखेन चोद्या ॥४॥

नागर-सर्वस्व । दो आँखें, दो नाड़ियाँ और दो मुख उसमें स्थित एक नाड़ी है, उसको पावके अंगुष्ठके नखसे परिचालन करना चाहिये। कर्णोरुपार्श्व त्रिकमस्तकेषु संचोदनोयाः करजेन नित्यम् । तृप्तिन तासां तु विपर्ययेण भवेत्कदापीति वदन्ति धीराः॥५॥ कान, ऊरू, पावं ( पसलो) त्रिक अर्थात पृष्ठालिया रीदका अन्तिम अंश ऊरूकी सन्धि और मस्तक्में .नखाघात करना चाहिये। इसके विपरीतमें स्त्रीको तृप्ति नहीं होती, ऐसा सुरत-चतुरोंका कथन है । वायव्यावृतवह्रिमण्डलगत हान्त स्वर्वेष्टित सिन्दूरारुणमिन्दुबिन्दुसहित बीजं त्रिलोक्याऽचितम्। पान्थैरात्मनितम्बिनीखगमुखे ध्येय हिताकाङ क्षिभिः

नागर-सर्वस्व।
१.९
स्वप्नेनापि न ताः प्रयान्ति वशतां
तेनान्ययूनां सदा ॥६॥ हत्यं ॥
प्रवासमें जानेवाले
युवक
यदि चाहें कि मेरी स्त्री अनु-
पस्थितिमें अधिक दिन बीत जानेपर.भी अन्य पुरुषकी ओर
दृष्टितक न डालें। स्वप्नमें भी भावना न करे तो इस
"हं क्ष्य" मन्त्रका प्रयोग करें उसका ध्यान कैसा है।
सो कहते हैं, वायव्य कोणमें वह्नि मण्डलमें संप्राप्त स्वरसे
वेष्टित, सिन्दूरकी भांति लाल, नादविन्दुसे युक्त, त्रिलोक
पूजित हकार बीजको अपनी स्रोके गुह्य प्रदेशमें अभिमन्त्रित
-
करे।
प्रातःसूर्य मरीचिरेव बलवत्
पिण्डो वराङ्गोदरे
दृष्टो नामविभषितः सचपलो
बिन्द्विन्दुनादान्वितः।
ध्यातो भास्वरपद्मरागचिरः
सोमन्तिनोचिन्तितं
सप्ताहेन वशं नयत्यथ पुर
गाम्य प्रियादर्शने ॥ ७ ॥

नागर-सर्वस्व। वराङ्गके मध्य 'ब्लं' बोज मन्त्रका.ध्यान करनेसे एक सप्ताहमें स्त्रीको वशीभूत करता है। वह मन्त्र कैसा सो कहते हैं। बकार उसमें बल कारक है, लकार पिण्ड और चन्द्र-बिन्दुसे अङ्कित या नाद विन्दुसे विनित, प्रकाशमान कमलकी कान्ति जैसा मनोहर अर्थात् रक्तवर्ण और प्रात: कालिक सूर्य किरणके समान उक्त मन्त्रका ध्यान करके मन्त्र सिद्ध कर लेनेपर स्त्रीको भी यमपुरी ले जाता है। अर्थात् मृत्यु होनेपर भी प्रियाका मिलन होता है। मन्त्रका रूप- ॥७॥ रेफस्तं सविसर्गमीश्वरयुत सान्तं पिशङ्गा ति विन्यस्तं मदनातपत्रशिखर स्त्रीणां पर द्रावकम्। यस्य कस्य वशात् पुमानशिथिल श्रद्धाभियोगान्वितः पिण्डाकृष्टिमशीघ्रमेव कुरुत प्राप्तोपदेशः शुचिः ॥८॥ हो।

नागर-सर्वख । १११ सानुसार रेफ-युक्त हकार, दोर्घ इकार युक्त विसर्ग सहित पिशङ्ग (भूरा) वर्ण ह्रीं बीज मन्त्रको स्त्रीके मदन- च्छत्र पर उपदेश-प्राप्त साधक पवित्रता एवं विश्वासके साथ पढ़े। यह मन्त्र परम द्रावक है। कुछ समय इसका प्रयोग करनेसे स्त्री देहका आकर्षण करता है। इति अष्टादश परिच्छेद।

एकोनविंश परिच्छेद सती चैवासतीसंज्ञा सुभगा दुर्भगा तथा। पुत्री दुहित्रिणी चति षडेता मदनाडिकाः॥१॥ सती, असती, सुभगा, दुर्मगा, पुत्री और दुहित्रिणी ये छै स्त्रो जम्नेन्द्रियस्थ मद नाड़ियाँ अर्थात् संभोगेच्छा कारिणी या अहंकारिणो नामकी हैं। योनिमात्रऽपि सन्त्य ताः कथिता मदनाडिकाः। सती वामेऽसती सव्य, द्वे वराङ्गत्वचि स्मृते ॥२॥ योनि मात्रमें उक्त मद नाड़ियां रहती हैं। उनमें वाम भागल सती और दक्षिण भागस्थ असती नाड़ी परागसे निकली हुई जानना चाहिये ।

नागर-सर्वस्व।
११३
किश्चिदभ्यन्तरे चैव
रन्ध्र सव्यापसव्ययोः।
दुर्भगा मुभगा चैव
द्वे नाड्यौ समुदाहृते ॥३॥
बांए और दाहिनेके बीच छिद्रके थोड़े अन्तरपर सुभगा
और दुर्भगा नामकी नाड़ी कहाती हैं ।
सर्वतोभ्यन्तरे चैव
पार्वे खगमुखस्य वै।
वामे पुत्री समाख्याता,
दक्षिणेन दुहित्रिणी ॥४॥
गुह्य प्रदेशके सबसे अन्तस्तलके वाम भागमे पुत्री और
दक्षिण भागमें दुहित्रिणी नाड़ी होती है।
सतीसंचोदनाच्च व
सती रामा प्रकुप्यति ।
असतीचोदनान्नारी
खिद्यते च सती सदा ॥५॥

११४ नागर-सर्वस्व। सतीके सञ्चालनसे असती कुपित होती और असतीके सञ्चालनसे सती सदा सन्तुष्ट होती है । सतीसंचोदनाद व सती हृष्यति निर्भरम्। असतीचोदनाच्च वा- सती तुष्यति नित्यशः ॥ ६॥ सती नाड़ीके अति सञ्चालनसे ही सती पूर्ण सन्तुष्ट होती और असतीके अनि सन्चालनसे ही असती सर्वथा सन्तुष्ट होती है। सुभगाचोदनान्नारी सुभगा प्रियदर्श(शिनी। भवेत् स्निग्धाननाङ्गी च श्यामा पीनपयोधरा ॥७॥ सुभगाके सञ्चालनसे सुभगा प्रियदर्शिनी होती है स्निग्धाननाङ्गी अर्थात् चिकने अङ्ग वाली तथा कठिन कुच वाली होती है। दुर्भगाचोदनेनापि वनिता दुर्भगा भवेत्।

नागर-सर्वस्व । ११५ रुक्षा कृशा विवर्णाङ्गी जरारोगनिपीड़िता ॥८॥ दुभंगाके सञ्चालनसे स्त्री दुभंगा होती है, इतना ही नहीं रूक्ष वर्ण, दुर्बल, विरग और वृद्धावस्थाको प्राप्त होती है। पुत्रीसंचोदनादेव प्रिया पुत्रवतीभवेत् । द हित्रीचोदनेनापि द हिता जायते ध्रुवम् ॥६॥ पुत्री नाड़ोके सञ्चालनसे स्त्री युवती होती है और दुहित्री नाड़ीके सञ्चालनसे स्त्रीको कन्या होती है। उभयोश्चोदनात्सूते क्लीबमेव न संशयः। निपुण चोदयन्नाड़ी यदीच्छेद्धितमात्मनः ॥ १० ॥ पुत्री और दुहित्री दोनों नाड़ाके सञ्चालनसे अवश्य नपुंसक सन्तान होती है। इसलिये जो अपना हित चाहे सो कौशलके साथ नाड़ी सञ्चालन करे ।

नागर-सर्वस्व । मतान्तर कहते हैं :- सती कुचेऽसती कक्षे, सुभगोष्ठे च, द भगा। त्रिके, तुण्डे स्थिता पुत्री, नितम्बे तु द हित्रिणी ॥ ११॥ इस मतसे नाडीका क्षोभण करने में प्रथम स्तन मर्दन करना तदनन्तर कक्षमें नखक्षत करना, तत्पश्चात् अधरपान करना, उसके बाद त्रिक अर्थात् रीढ़ और नितम्ब द्वय इन तीनोंका संवाहन और मुख-चुम्बन करना चाहिये। एवं संचोदिता नारी नान्यमिच्छति मानवम्। क्रीवोऽपि हृदय सर्व प्राप्नोत्येव न संशयः ॥ १२ ॥ इस प्रकार संघटित स्त्री अन्य पुरुषकी इच्छा कमी नहीं करती, यहां तक कि नपुंसक पति भी उसके हृदयमें स्थान पाता है। इति एकोनविंश परिच्छेद ।

विशति परिच्छेद
+G+
नखदशनपद षु मन्दभावाः
प्रहरणकर्षणचुम्बने विरागाः।
अकुटिलमतयश्चरित्रवत्यो
मृदु रतयोऽपिचमध्यदेशनार्यः
मध्य देशकी स्त्रियाँ नखाघात और दन्ताघातको अधिक
नहीं चाहती, प्रहार, आकर्षण तथा
चुम्बन
भी विशेषरूपसे
पसन्द नहीं करती, स्वभाव सीधा सादा होता है। और
रतिमें भी कोमलता चाहती हैं सुतरां सच्चरित्रा होती हैं।
*टि• मध्यदेश-"गंगायमुनयोमध्ये यत्प्रग्विनशनादपि ।
प्रत्यगेव प्रयागाच मध्यदेशः प्रकीर्तितः॥"
गंगा और यमुना नदीक मध्य प्रान्तको मध्यदेश कहते हैं और
प्रयागसे पश्चिम प्रान्तको भी मध्यदेश कहते हैं। वह सम्प्रति एखाहा.
बाद मागरा और दिनी नगर तथा उसके पास पासके प्रदेश हैं।

११८ नागर-सर्वख। नखदशनपद विरक्तचित्ताः प्रहरणचुम्बरताश्च लाटनार्यः । तद दितवनिताजनस्य चेष्टा प्रभवति पश्चिमद शसुन्दरीषु ॥२॥ लाट देशकी स्त्री भी नखाघात और दन्ताघातसे विरक रहती है, किंतु प्रहार और चुम्बनको चाहती है, इसी प्रकार और पश्चिम देशकी सुन्दरीको भी चेष्टाएं जानना चाहिये। पशुकरणरते कृतानुरागाः सुपरिश्लेषकचग्रहप्रसाध्याः। नखदशनपदं सतृष्णभावा लघुसुरता अपि सिन्धुदशनार्यः॥ सिन्धु देशकी स्त्रियाँ पशु ममान सुरतमें अनुराग रखती, दृढ़ आलिंगन, और केश ग्रहण भी पसन्द करती और दन्तक्षत भी चाहतीं, किन्तु सुरत कोड़ा थोड़ी चाहतो हैं। गिरिकुहरखनेषु तत्स्वभावाः, कुरुमरुदशकुरङ्गालोचनाश्च । नखक्षत नागर-सर्वस्व । विविधरतिरताः कलासु कल्पा- श्चतुरतरा अपि सिंहले मृगाक्ष्यः। कुरु और मरु देशकी मृगनयनी स्त्रियां पचत और व को पसन्द करती हैं साथ ही सिंहल याने लंकाक स्त्रिय अनेक प्रकारकी रति कलाओंमें चतुर होती हैं। वैदग्धवासाः शुचयो गुणाढ्यो भवन्ति काश्मीरनितम्बवत्यः । आचारहानाः कृतघातसाध्या भवन्ति जालन्धरद शरामाः॥ ५ ॥ काश्मीरको स्त्रियाँ विविध प्रकारकी सुगन्धित वस्तु को पसन्द करती तथा विशेष विलासिनी होती हैं। पंजा की स्त्रियां आचारहीन होती तथा सुरत कालि : अनेर आघातोंको चाहती हैं। आलिङ्गाने चित्ररतानुरक्ता वेगान्विताः कृत्रिमलिङ्गसाध्याः । चुम्बाभिलाषाः सततं युवत्यः स्त्रोराज्यजाः कोशलदशजाश्च ।६ १२. नागर-सर्वख। स्त्री राज्य अर्थात् भूटान और कोशलदेश अर्थात् प्रांत- की स्त्रियाँ आलिंग और चित्ररतमें अनुरक्त तथा वेगवती होती हैं। कृत्रिम साधनको चाहती तथा चुम्बन भी सतत चाहती हैं। प्रचण्डवेगाः कृतघातसङ्गाः सदोन्मदा इन्द्रियपानलुब्धाः। करांगुलीकृतिमलिङ्गसाध्याः कर्णाटदशे कथितास्तरुण्यः ॥७॥ कर्णाट देशकी स्तियाँ प्रचण्डवेगवाली और आघातोंको चाहती, सदा ही उन्मत्त रहनेवाली इन्द्रियपानलोलुप होती हैं और अंगुलिव्यापार तथा कृतिम साधनको चाहती हैं। सदा चतुःषष्ठिकलाप्रसक्ता रतास्तथालिंगनचुम्बनेषु । करांगुलिदोपविधिप्रसाध्या- श्चण्डा महाराष्ट्रकुरगनेताः॥८॥ महाराष्ट्रकी मृगनयनी सदा चौंसठों कलाओंके व्यापार में आसक्त रहती हैं। आलिंगन और चुम्बन भी चाहती तथा अंगुलि-व्यापारको भी पसन्द करती तथा प्रचण्ड वेगवाली - होती हैं।

नागर-सर्वस्व १२१ केशग्रहालिङ्गनचुम्बनेष जिह्वाप्रवेशे च विमई ने च। संभूषणे मद्द नताड़ने च सदाऽनुरक्ता द्रविड़े रमण्यः॥६॥ द्राविड़ देशकी स्तियां केशग्रहण, चुम्बन, परस्पर जिहा- व्यापार, विमर्दन, ताड़न तथा भूषण पहनने में सदा अनुरक्त रहती हैं। किमपि रसिकचित्तं चुम्बनालिङ्गनादा- वधरमधुसमीहाऽत्यन्तलावण्यद हाः। सुरभिसुरतभावास्तीर्थयाताभिलाषा मृदुलमधुरवाचो गौड़बङ्गानाः स्युः १० गौड़ और बंग देशकी स्त्रियां चुम्बन और आलिंगनमें कम भाग लेतों, उनके अधर बहुत सुन्दर तथा शरीरमें लावण्य बहुत होता है। सुरतका भाव अच्छा होता, तीर्थयात्राकी उत्कट इच्छा रखतीं और मधुरभाषिणी होती हैं। आघाते मदने वा नखदशनपद निःस्पृहाः क्षोभणे च, ८ १२२ नागर-सर्वस्व। नानाक्रीड़ाकलालंकृतिरतिमनसो मन्दवेगोपरागाः। दृष्ट्वा दूरेऽपि यूनः सदपि मनसिजा- वेशसाकाङ क्षनेता, नेपाले कामरूपे सुमधुरव चना- श्चीनदशे च रामाः॥११॥ नेपाल, कामरूप तथा चीनकी स्त्रियां आघात, मर्दन, नखक्षत, दन्तक्षत और क्षोभण या अति सञ्चालनमें निःस्पृह होती हैं, किन्तु अनेक प्रकारकी क्रीड़ाओंको पसन्द करती हैं। मन्दवेगमें अनुरक्त रहती। नवयुवकको दूरसे ही देखकर तुरत मदनातुर होती तथा साकांक्ष हो जाती हैं। योषितां विषयसाम्यतः प्रिय चुम्बनं प्रकृतिकृत्यमिष्यते। तत चेकविषये प्रयुज्यतेऽ- भीप्सितप्रकृतिसाम्यतस्तदा ॥१२॥ देश भेदसे तथा स्त्रियोंके अपने स्वभाव भेदसे चुम्बन आदि प्रिय होते हैं, इसलिये सुरतकालमें, जिसकी जैसी प्रकृति होती है अपना विलास करती हैं।

नागर-सर्वस्व। १२३ अन्यथा हि न सुखस्य साधनं सर्वमेतदनपेक्षितं कृतम्। दुस्सहेन शिशिरेण निर्भर पीडिते व्यजमारुता इव ॥ १३ ॥ अन्यथा इसके विपरीत अर्थात् युवक युवतीके परस्पर प्रगाढ़ इच्छाके विरुद्ध ये सभी सुखके साधन, असह्य जाड़े. से पीड़ित व्यक्तिको पंखेकी हवाको भाँति सर्वथा कष्टप्रद ही हैं ।* इति नागरसर्वस्वे देश विषय विभागो नाम विंशतिः परिच्छेदः। * टि० इस दस्तकमें सिंहल अर्थात् लकाकी तथा नेपालकी स्त्रियों के स्वभावका तो वर्णन किया गया है, परन्तु गुर्जर या गुजरात की स्त्रियोंको वर्णन नहीं किया गया । परन्तु गुजरातकी स्त्रियोंका रति स्वभाव वर्णन सभी कामशास्त्रियोंने किया है तथा रति रहस्यमें- 'लीलालया प्रेमनिधिः प्रियोक्तिः कलाकलापे चतुरा सुकेशी'। "मृ. द्वगयष्टिलघु भोगहेतुः सौख्यकचित्ता भुवि गुर्जरी स्यात् ॥” पुनः अनंगरंगमें-'उपभोगरता सुलोचना लघु सभोगविधि प्रतोषिणी। शुभवेषधरा विचक्षणा कथिता सा खलु गुर्जरी बुधैः ॥” पुनः अन्यान्य ९२४ नागर-सर्वस्व । देशकी स्त्रियोंकी रतिप्रकृति यथा-'आन्ध्री प्रेमनिबन्धनक निपुणा नित्यं महाराष्ट्रिका । सौराष्ट्री मृगलोचना सुवचना द्रव्यप्रिया गुर्जरी ॥ इति ॥ 'कर्णाट देशोद्भवानां नायिकानां योनौ स कीर्णता । गुर्जर देशो- द्भवाना कामिनीनां अधरो मनोहरः ॥ काश्मीर देशोद्भवानां नारीणां कुचौ कठिनौ, मरु देशे चातुर्यबहु दक्षिणदेशोनार्यः सर्वगुण सम्पूर्णः पश्चिम दिशि नारीणां मालिन्य, उत्तरदिशि नार्यः भोगलम्पटाः पूर्व दिशि चोर्यमधिकामिति गुण वैशिष्टयमुक्तम् ॥ .shah efefef एकविशति परिच्छेद सुशक्तिवहिप्रविदार्यमाण- सद्वक्त्रहृद्यस्तिमिताभिरामम् । यत्तालुजिह्वाजनितं प्रशस्तं शृङ्गारविद्भिः स्तनिताभिधानम् ॥ १॥ पूर्ण शक्ति लगाकर जठराग्निसे प्रेरित पूर्ण ऊध्वश्वास से दूर किया हुआ जो वारीक वस्त्र उससे हृदय अर्थात् मनोहर जो तालु और जीभके संयोगसे उत्पन्न शब्द उसे गार रसिकोंने "स्तनितं" कहा है। हृष्यत्कपोतादिविहंगमानां यथा रुतं कूजितमामनन्ति । आयासनिःश्वासनिरोधहृद्य मनीषिणस्तच्छवसितं वदन्ति ॥२॥ हर्षित कबूतर आदि पक्षियोंके जैसा शब्द करनेको १२६ नागर-सर्वस्व । कृजित कहते हैं। और जिसमें अधिक आयाससे श्वास निरोध करना पड़े उसे श्वासित कहते हैं। उच्छवासदन्तौष्ठजसीत्कृतं यत् सीत्कारसंज्ञ विबधास्तदाहुः । श्लिष्टाधरोत्पादितपून्निदानं पूत्कारमन्वर्थकनामधेयम् ॥३॥ दन्त और ओष्ठके संयोगसे निकला हुआ वायुप्रेरित शब्द अर्थात् बाहरसे मुखके भीतरकी ओर खिंची हुई श्वासको सीत्कार कहते हैं और अधरमें ओष्ठ मिलाकर किये गये पूत् शब्दको ठोक अनुकरण होनेसे पूत्कार कहते हैं। हिक्शब्दवच्छ्वासनिरोधपूर्व यच्चुम्बनं हिक्कृदिति प्रसिद्धम्। सन्निप्पतन्मौक्तिकशब्दरम्य तद्द कृतं सर्वजना वढेयुः॥४॥ हित् हिक् शब्दकी भांति अनुकरणात्मक शब्द (जिसमें श्वास निरोध होता है ) करते हुए चुम्बनको हिक्कृत कहते हैं। मोती गिरनेके समान शब्द करनेसे दूत्कृत कहाता है। इति एकविंश परिच्छेद।

द्वाविंश परिच्छेद
अव्यक्तरेखैनखरैः समस्तैः
रोमाञ्चकृत् सत्त्वणिताभिरामम् ।
स्तने कपोले च हनुप्रदेशे
प्रयोज्यतामुच्छ रितं प्रियायाः॥१॥
स्तन कपोल और दाढ़ीमें अस्पष्ट नख रेखाओंसे युवती
की देहमें जो रोमाञ्च होता है एवं उस समय वह भावावेश-
में आकर क्वणित अर्थात् वीणाके झङ्कारोंकी तरह जो
मनोहर शब्द करती हुई नखक्षत कराती है उसे उच्छुरित
कहते हैं।
वक्रोऽर्धचन्द्रः कथितो नखाङ्कः
सद्भिः प्रदिष्टः स्तनयोगले च ।
यदा तु तो सम्पुटतां प्रपन्नी
ब्रूते तदा मण्डलकं मुनीन्द्रः ॥२॥

१२८ व-सस्व। स्तन और गलेके नखक्षतको अर्धचन्द्र कहते हैं और वही नखक्षत यदि सम्पुट अर्थात् : (डबल) हो तो उसे मुनीन्द्र वात्स्यायनने मण्डलक कहा है। किञ्चिच्च दीर्घा क्षतिमूरुपृष्ठ- श्रोणीतटे व्याघ्रपद लिखन्ति दीर्घायतां तां प्रवदन्ति रेखां स्थानं तदीयं यदनन्तरोक्तम्॥३॥ जांघ पीठ तथा कमरकालम्बा नखक्षत व्याघ्रपद कहाता है और वही कुछ कुछ अन्तर पर अधिक लम्बा नखक्षत हो तो उसे क्षतिरेखा कहते हैं। शशप्लुतं पञ्च नखवणानि सान्द्राणि पृष्ठस्तनगुल्फदेशे। स्तनस्य पृष्ठे विरलानि तानि निगद्यतामुत्पलपत्रमेतत् ॥ ४॥ पीठ स्तन और घुटनेमें खूब घने पांच नवविह्न शश- प्लुत कहाता है अर्थात् खरगोशके उछलनेसे जैसे उसका चिन्ह होता है वैसा । एवं स्तनपर यदि विरल विहन हो तो उत्पलपत्र या कमलपत्र चिन्ह नखक्षत होता है।

नागर-सर्वस्व । १२९ हित्वा कनिष्ठांगुलिजत्रणानि चतुर्न खानां विरलोकृतानाम् । कपोलदेशे स्तनमण्डले च वदन्ति मायूरपद मुनीन्द्राः॥ ५ ॥ कपोल-मण्डल पर कनिष्ठा अङ्गुलीको छोड़ शेष चार अंगुलियोंके विरल नख चिन्होंको मायूर पद (अर्थात् मोरकी चंगुलके चिन्ह ) कहते हैं। इति द्वाविंश परिच्छेद।

त्रयोविज्ञ परिच्छेद रागाभिलक्ष्य स्फुटमोष्ठदशे तद्गूढकं दन्तपद वदन्ति । उच्छनकं स्यादधरे च सव्ये गण्ड दृढालिंगनस्तस्तद व ॥ १॥ ओठमें स्पष्ट तथा लालिमा लिये जो चिह्न उसे गूढ़क दन्तक्षत कहते हैं। अधरमें और वाम कपोलमें ढ़ालिङ्गनसे उत्पन्न चिह्नको उच्छूनक कहते हैं । रदोष्टसंज(य)न्त्रणतः प्रवाल- मणिः कपोले कृतिना प्रयोज्यः। द्विदन्तसन्द शयतोऽधरान्तं(न्तर) द्विबिन्द को बिन्दु रिति प्रसिद्धः ॥२॥ दांत और ओष्टको दबा कर कपोलमें किया गया विह्न प्रवालमणि कहाता है। अधरान्तमें दो दांतोंका चिह्न बिन्दु कहाता है।

नागर-सर्वस्व । १३१ रदरनेकर्मणिबिन्द माला (ले?) गले कपोले हृदये लिखन्ती(न्ति?) । तद्गण्डकाख्यं विषमैश्च कूट- वृत्त(त्त?) स्तने नागरका वदन्ति॥३॥ गलेमें कपोलमें हृदयमें अनेक दांतोंसे विह्न बनानेपर विन्दु गण्डक नामक दन्तक्षत होता है। घनाः सुदीर्घा रदनाङ्कराजयो विभिन्नसद्विभ्रमलोहतान्तराः। विमण्डना एव कृताः पयोधर लिखन्ति यनेन वरा वरार्चितम् ॥४॥ घन, खूध लम्बा और अनेक प्रकारके लाल दन्तक्षतकी पक्तियां यदि यत्नसे उठायी जाय तो वराह चर्वित (सूअर- के दन्त) चिनकी तरह होता है। इति त्रयोविंश परिक्छेद ।

चतुर्विज्ञ परिच्छेद
-
आलिङ्गन भेद।
प्रिय मृगाक्षी सरलांगयष्टि-
निवेष्टयन्ती लतिकेव शालम्।
विचुम्बनार्थ नमयेत्तदोयम्
मुख लतावेष्टितकं तदाहुः॥१॥
कृशाङ्गी-मृगाक्षी अपने प्रियसे वृक्षमें लताकी भांति
लिपटती हुई यदि अपने स्वामीका मुख-चुम्बन करे तो लता-
वेष्टित आलिङ्गन होता है।
आक्रम्य पादमबला चरणेन पत्यु-
रूर तथाऽपरपद न समश्चयन्ती।
तत्पृष्ठसंगतभुजाऽन्यतरण दोष्णा
तं संमुख सरभसं स्फुटमुन्नयन्ती॥२॥

नागर-सर्वस्व १३३ किञ्चिच्च खिन्नरुदितेच्छति चम्बनार्ता प्राणोश्वर यदिह वृक्षमिवाधिरोढुम । वृक्षाधिरूढ़मुपगृहनमेतदक्त- याश्लेषयुग्ममदितं स्थितकान्तमेत्य ॥३॥ । स्त्री यदि स्वामीका एक चरणपर दूसरे चरणका आक्र- मण करे ओर दोनों बाहोंसे पतिको अच्छी तरह आलिङ्गन करके चुम्बन करे तो उसे सम्मुख आलिङ्गन कहते हैं । और यदि स्त्री चुम्बनके लिये अधिक अधीर होकर वृक्षपर चढ़नेकी तरह यदि व्यापार करे तो वृक्षाधिरूढ़ नामक आलिंगन होता है। उठते हुए पतिको आलिंगन करे तो उपगृहन होता है। संस्पर्शपूर्वमबलापरिरम्भण' यत् तत् स्पृष्टकं मुनिजनैः कथितं पुराणैः। कुड्याश्रयेषु परिपीड़नमगनायाः कुर्यात् पतिर्यदिह पीडितमेतदाहुः ॥४॥ सम्यक् स्पर्श पूर्वक स्त्रीका आलिंगन करनेसे स्पृष्टक होता है और स्वामी यदि दीवालके सहारे स्त्रीको दबावे तो पीड़ित नामक आलिंगन होता है।

१३४ नागर-सर्वस्व। तल्पे वितन्वदवगृहनकेलिमुच्च- यन्निस्तरंगमिथुनं घटयेत रागात् । रागातिरक्तपरिवर्धितगौरवण तत्कीर्तित मुनिवर स्तिलतण्डुलाख्यम्॥ शय्यापर परस्पर गाढ़ालिगन करके यदि निस्तरङ्ग अर्थात् एकदम निश्चल हो जाय तो तिल-तण्डु ल नामक आलिंगन होता है। अंके स्थिताऽथ शयने मृगशावकाक्षी गात्रेऽपियस्य विशती वनिताऽनुरागात् । गाढोपगृहनवशेन निरन्तर यत् संश्लेषमाहुरिह येन जलाभिधानम्॥६॥ स्त्री यदि स्वामीकी गोदमें एकदम प्रविष्ट होकर निरन्तर दृढ़ आलिंगन करे तो दुग्ध जल अथवा क्षीर-नीर नामक आलिङ्गन होता है ।. तात्पर्य यह कि दूधमें जैसे जल अलग नहीं शात होता उसी तरह स्त्री भी स्वामीकी गोदमें लीन हो जाय। आक्रम्य यत्र जघनं जघनस्थलेन संलंघयेत् प्रियतमा पतिमानतांगी।

नागर-सर्वस्व ।
१३५.
व्यक्तीभवन्नखपदा गलितोत्तरीया
तज्ज्ञ स्तद व कथितं जघनापगृहम् ॥७॥
प्रियतमा पतिको अपनी जघासे आक्रमण करके
सम्यक्
रूपसे लघन करे और उस समय यदि उसका वस्त्र ऊपरसे
हट जाय और वह झुकी रहे तो जघनोपगूहन आलिङ्गन
होता है।
दध्याद रःस्थितभर कुचयुग्ममुच्चै-
स्तन्व्यास्तदा प्रकथयन्ति कुचोपगढम्।
ऊरूपगढ़मपि कीर्तितम गनोवोंः
पीडां यदोरुयुगलेन करोति कान्तः ॥८॥
कुचद्वयको भली भाँति ग्रहण करके जो आलिङ्गन होता
है उसे कुचोपगढ़ कहते हैं और साथ ही जंघाओंके निपी-
डनसे जो आलिङ्गन होता है उसे ऊरूप गूढ़ कहते हैं।
वक्त्र मुख नयनयोनयनैनियुज्य
क्रीड़ासुखानि तरसोन्मनसः प्रियायाः।
हन्याल्ललाटफलकेन ललाटमध्य
लालाटिकं तद पगृहनमामनन्ति ॥६॥

नागर-सर्वस्व ।
प्रियाके मुख पर मुख रखके नयनसे नयनको मिलाके
यदि ललाटमें ललाटका संघर्षण करे तो लालाटिक आलि-
गन होता है।
इति चतुर्विशपरिच्छेद ।

पंकर्विज्ञ परिच्छदे चुम्बन भेद। संचोदनार्थ मदनाडिकानां निपीड्य वक्षःस्तननाभिमीषत् । यच्चुम्ब्यते नागरकर्मुनीन्द्रा निपीड़ितं चुम्बनमेतदाहुः॥१॥ मदन मन्दिरस्थ मद नामक नाड़ीको सञ्चालनके समय वक्षःस्थल और नाभीका निपीड़न कर नागरिक जन जो चुम्बन करते हैं उसे मुनीन्द्रने निपोड़ित चुम्बन कहा है। भ्रान्तेन वक्त्रण ललाटदन्त- च्छदेष तदभ्रामितनामधेयम । उन्नामितोष्ठेन मखेन नेत्र गण्डे तथोन्नामितकं प्रसिद्धम् ॥२॥ ६ नागर-सर्वस्व । पति अपने शिरको घुमाते हुए पत्नीके ललाट और अध रमें यदि चुम्बन करे तो भ्रामित चुम्बन होता है और यति .शिर उठा २ के नेत्र और कपोलमें चुम्बन करे तो उन्नामित चुम्बन होता है। नाभौ कपोले स्फुरिताधरण पयोधरे वा स्फुरितं प्रदिष्टम् । तथोदितं हजघनोरुदशे श्लिष्टाधरोष्ठेन च संहतोष्ठम् ॥३ नाभि कपोल और स्तन, द्वयमें फड़फड़ाते हुए अधररं चुम्बन करने पर स्फुरित चुम्बन होता है। अधर औ ओष्ठ मिलाके तथा अलग करके हृदय जङ्घा तथा ऊरू चुम्बन करनेसे संहतोष्ठ चुम्बन होता है। वक्रीकृतास्येन गले कपोले कुचे च तद्व कृतकं तदाऽऽहुः । सम्यङ नतीकृत्य कपोलयुग्म सर्वाङ्गदेशे नतगण्डमेतत् ॥४॥ मुखको तिज करके गलेमें कपोल और कुचमें चुम्ब करनेसे वैकृतक चुम्बन होता है । भली भांति मुखको झव करके कपोल मण्डल तथा सर्वाङ्गमें चुम्बन करनेसे नतगएः चम्बन होता है।

नागर-सर्वस्व । १३६ एतानि निःशब्दविचुम्बनानि मया यथास्थानमुदीरितानि। अथाभिधास्ये मधुरस्वनानि मुखाधिवासानि विचुम्बनानि ॥५॥ इतान मैंने निःशब्द चुम्बनका स्थान कहा । अब मधुर राब्दयुक्त मुखके भीतरके सशब्द चुम्बन कहते हैं। निश्शब्द वम्बनके सात भेद हैं। इति पञ्चविंशति परिच्छेद ।

पशि फरिच्छेद (जिह्वा प्रवेश) सूक्ष्मीकृताया रसना मुखान्तः प्रवेशिता तां प्रवदन्ति सूचीम् ॥ वितन्यमाना प्रतता मता सा, प्रकम्पमाना यदि वा करी स्यात् ॥१॥ जिह्वाको सूचीके आकार करके स्त्रीके मुखमें प्रविष्ट करनेसे सूची चुम्बन होता है। उसी जिह्वाको फैलाकर चुम्बन करनेसे प्रतता होती तथा इधर उधर चलायमान करनेसे वाकली होती है। इति षड विंश परिच्छेद ।

सप्तर्विज्ञ परिच्छेद चूषण भेद । जिह्वाग्रमात्रस्य विचूषणं य- त्तदुच्यतामोष्ठविमृष्टसंज्ञम् ॥ विचूष्यते शीघ्रतरं यदत- त्तच्च षणं चुम्बितकं वदन्ति ॥१॥ जिह्वाग्र भाग मात्रसे च सने पर ओष्ठ विमृष्ट नामक चूषण होता है और उसीको शीघ्र २ चलायमान करनेसे चुम्बितक होता है। यदत्र दष्ट्वाऽधरचूषण परै- मनीषिभिः कीर्तितमा चुम्बितम् ॥ परस्पर स्त्रीपुरुषौ विचूषतो वदन्ति तत्संपुटकं विलासिनः ॥२॥ दूसरे कामशास्त्रीके पण्डितोंने अधरमें दन्ताघातके चुम्ब. नको आर्द्रच म्बित कहा है। और परस्पर स्त्री पुरुषके चुम्बनको संपुटक कहा है । इति सप्तविंशति परिच्छेद ।

अष्टाविंश पारिच्छेद
उत्तान करण।
वामोरुसंस्थापितदक्षिणोरु-
नारी यदा स्वस्तिकमाह धीरः ॥२
जब नारी वाम ऊरू पर दहिन ऊरू स्थापित करे तो उसे
स्वस्तिक कहते हैं।
यदोरुमूलोपरि योषिदूरू
वदन्ति माण्डूकमिदं मुनिन्द्राः ॥ (२॥)
पुरुषकी जघाके मूलपर जब स्त्रीका उरू रहे तो उसको
मुनीन्द्र माण्डूक अर्थात् मेढ़कका आसन कहते हैं ।
कौम यदोत्तानरतौ प्रयत्ना-
दुभौ भवेतां सरलीकृताङ्गौ ॥
पादौ स्थितावात्महनुप्रदेशे
नार्या यदा तद्धनुपादसंज्ञम् ॥३॥

नागर-सर्वस्व । १४३ स्त्रो पुरुष दोनों जब अपने अङ्ग प्रत्यङ्गको सरल तथा समान करके संयुक्त हो जाय और पुरुष अपने पाँवको स्त्रीके कपोल पर रख दे तो कूर्मासन होता है ? आवद्धपर्यपदप्रियायाः कण्ठ पतिबन्धुरयेद्भुजाभ्याम्। तज्जानुजचान्तरनिःसृताभ्यां पद्मासनं तत् करण प्रदिष्टम् ॥४॥ अङ्गमें स्थित वाम जङ्घाके ऊपर दक्षिण जङ्घा दक्षिण जंघाके उपर वाम जघाको दृढ़ता पूर्वक रखे तो पद्मालन होता है। उत्तान नायिका दाहिना पाँव वाएं उसके मूलमें रखे और वायां पाँव दहिने जघाके मूलमें तो पद्मासन होता टि• * भुजया भुजमाननमाननता जंधामभि जंघामपौ रमते। विन्यस्य नरो यदि कौममिदम् ।' कान्ता कुचाप्रान्त निविष्टपादः तस्याः पदद्वन्द कृतांसभागः। करौ गृहीत्वा स्वकरद्वयेन यभेत यतद्धन कर्मबन्धः ॥ इति अनंगरंगे स्व वाममा निज दक्षिणोराव दक्षिणा- रावपि दक्षपादम् । न्यस्याग तद्रमते गृहोत्वा प्रियश्च पद्मासन मुक्त मेतत् ।। इति रत्न प्रदापिकायाम् । पञ्चसायके-पचासनं संपरिकल्प्य भर्ता क्रोडोप विष्टा युवती रमेत । मन्यान्य कठापित बाहु बन्धात् पद्मासनाख्यं प्रवदन्ति सन्तः ॥” अनेन पद्मिनी रमयेत् ।

१४४ नागर-सर्वस्व। . पर्यकमेकेन पदा निबद्ध तदर्धपद्मासनमच्यते तु ॥५॥ स्त्री एक ही पांव यदि एक जघाके मूलमें रखे और दुसरा पांव सीधा रखे तो अर्ध पद्मासन होता है। यदाऽङ्गना पादयुग निदध्यात् प्रियोरसि स्यादिह पिण्डिताख्यम् । आरोप्यते तत्र यद कपाद तदा भवेत्पिण्डितमधपूर्वम् ॥६॥ जब नायिका अपने दोनों चरण नायकके वक्षःस्थल पर रखे तो पिण्डित करण होता है। जब एक ही चरण वक्षःस्थल पर रखे तो अर्ध पिण्डित करण होता है। संस्थापयरुयुगं मृगाक्षी पुस्कन्धयोज म्भितमुच्यते तत्॥ विन्यस्यते तत्र यदोरेको नार्या तदा वेणविदारण स्यात् ॥७॥ मृगाक्षी जब पुरुषके स्कन्ध (कन्धे ) पर अपनी दोनों जधाओंको रखे तो जम्भित करण होता है। स्त्री यदि एक नागर-सर्वस्व। ही चरण पुरुषके कन्धेपर रखे तो वेणु विदारित करण होता है। स्त्रियः स्वपार्श्व द्वितयापितोरो- रिन्द्राण्यपि स्यात्प्रियजानुयोगात् ॥ पुरुषके पार्श्व अर्थात् बगलमें यदि स्त्री अपनी दोनों जधाओंको अर्पित करे और पुरुष भी उसके बगलमें अपनी जधाओंको अर्पित कर दे तो इन्द्राणी नामक करण होता है। यह अभ्यास साध्य है। एका (स्कंधा ?) श्रित कुञ्चितमेकजानु प्रसारित कपद तरुण्याः यूना समापीडितकण्ठद शं संवेशनं सूच्यभिधानमग्रयम् ॥८॥ पुरुषका यदि एक चरण सीधा हुआ हो और एक संकु- चित हो तथा स्त्रीका कण्ठ पुरुष अच्छी तरह पकड़ तो ऐसे संवेशन या सुरतको सूची सुरत कहते हैं और यह श्रेष्ठ है। आरोपित पादयुगेन चोर्यो- र्या यदा नागरकं प्रशस्तम् ॥

नागर-सर्वस्व । निपीडये दूरुयुगेन मध्ये कान्तस्तदा ग्राम्यम दोरित तत् ॥६॥ स्त्रीके उरु मध्यमें पुरुषका दोनों पांव रखकर सञ्चालन करनेसे नागरक करण होता है। दोनों जघाओं द्वारा -मध्यमें निपीड़न या सञ्चालन करनेसे ग्राम्य करण होता है। पादौ स्थितौ वल्लभनाभिद शे नार्या तदा कार्कटनामधेयम ॥ वस्तो कटोचोदनदोलितो तो तदोच्यते पडणमग्रधीभिः ॥१०॥ पुरुषके नाभि प्रदेशमें यदि स्त्रीका दोनों चरण रहे तो कार्कट केंकड़े जैसा करण होता है । नायकके कटि सञ्चा- लनसे यदि दोनों पवि हिलता रहे तो प्रेक्षण-करण होता है। करण पदसे सर्वत्र आसन समझना चाहिये । आश्लिष्य वामेन भुजेन कान्तः पयोधरे सव्यकर विदध्यात् । टि० नागरक वन्धे नार्या जरूयुग पुरुष कटितो वहिर्याति । उत्ता- नितायाः स्मरमन्दिरे यः स्थितस्तदूरूद्वय मुद्गृहीत्वा संस्थाप्य वाह्य कटितो रमेत फान्तस्तदास्यात्किल नागराख्यः॥

नागर-सर्वस्व । नार्या नजङ्घायुगसंयतांघ्र- बुधस्तदा मार्कटकं तदुक्तम् ॥११॥ पुरुषकी दोनों जघाओंपर स्त्रीका चरण रहे और पुरुष वायीं बांहसे स्त्रीका आलिंगन करे और दाहिने हाथ स्तनपर रखे तो मार्कटक करण होता है। दधाति रामोरुयुग कराभ्यां कान्तस्तदोद्भुग्नकमुच्यते तत् ॥ नीत शिरश्च कपदं तरुण्याः प्रसारित चापरमायताख्यम् ॥१२॥ स्वामी दोनों करोंसे रमणीका उरु युग धारण करे तो उद्गुग्नक करण होता है। तरुणीका एक पैर शिर पर ले ले और दूसरा भरण सीधा कर रखे तो आयत करण होता है। । कण्ठनिज बन्धुरय गुजाभ्यां खजानुजङ्घान्तरनिःसृताभ्याम् । नितम्बिनी यत्र वदन्ति धीरा- स्तन्नागपाश करणप्रधानम् ॥१३

१४८
नागर-सर्वख ।
जिस सुरतमें नितम्बिनी अपने जानु और जघाओंके
मध्यसे अपनी भुजाओंको निकाल कर अपने कण्ठको पकड़े,
यह नागपाश करण होता है।
इति अष्टाविंशति परिच्छेद ।

एकोनत्रिंश परिच्छेद "ATCH द्वयोस्तिरश्चोः सरलोकृताङ्गयो- विघटन संपुटकं तदुक्तम ॥ यदोरुयुग्मन निपोडयं त्पति प्रिया तदा पीडितकं तदाहुः ॥१॥ स्त्री पुरुष यदि दोनों तिरछे हों तथा अङ्गको सीधा करके कटि-सञ्चालन करें तो संपुटक करण होता है। और प्रिया जब उरू युगसे निपीड़न करे तो पीडितक करण होता है। यस्मिन् भर्तुः सरलिततनोः कुञ्चितत्र यस्रनार्या गाढाश्लषो यदिह मु नयो मुद्गक तद्वदन्ति ॥ पृष्ठ पश्चादयितघटना- कुञ्चितत्रयस्रगात्र

नागर-सर्वस्व।
TRA
।
सोमन्तिन्या विम खशयन
यत्परावृत्तक तत् ॥२॥
संकुचित वरांग-युक्ता नारीके संग सरली भूत पुरुषके
गाढालिंगनको मुनियोंने मुद्गक करण कहा है। और स्त्री
यदि विमुख होकर सो जाय तो तब यदि स्वामीके कटि-
सञ्चालनसे स्त्रीकी देह सिकुड़ती रहे तो परावृतक करण
होता
जवाद्वय नैव नरस्य जङ्घ
स्त्री वेष्टय द्वेष्टितकं प्रसिद्धम् ।
भगन लिङ्गस्य निपीडनेतु
वदन्ति तद्वाडवकं मुनीन्द्राः ॥३॥
स्त्री ही यदि पुरुषकी एक जंघाको अपनी दोनों जघा-
ओंसे वेष्टित करे तो वेष्टितक होता है, और स्त्री यदि
अपने वराङ्गसे साधनका निपीड़न करे तो वाड़वक करण
होता है।
आसोनकान्तत्रिकपादयुग्म
नितम्बवत्या यदि युग्मपादम् ।
पावे स्थितानां मृगलोचनानां
गीतानि तज्ज्ञः करुणानि सप्त ॥४॥

नागर-सर्वस्व।
१५१
पाव ( बगल ) में सोयी हुई स्त्रीका यदि चरण सीधा
रहे और दूसरा सिकुड़ा हुआ रहे तब पुरुष सम्मुख होकर
अपनो पांव उसके सीधे चरणके नीचे फैल
कुड़े हुए पांवसे दृढ़ता पूर्वक आलिंगन तथा चुम्बन करे
तो
युग्मपद नामक करण (आसन) होता है।
त्रिकको तिरछा करके स्थित
मृग
नयनीके गीत सात हैं
और तिर्यकरण सात हैं।
इति ऊनत्रिशति परिच्छेद ।

त्रिश परिच्छेद है मयूरकाद्याश्रितया तरुण्या कान्तस्य योगोऽथ विपर्ययण । विधायक कल्पज (क?) शास्त्रविद्भि- स्त्वासीनसंज्ञकरण तदुक्तम् ॥१॥ मायूरव. करण अर्थात् मयूराकार युक्त स्पृष्ट आसनमें आसीन कान्तका योग यदि विपर्ययसे हो तो उसे काम शास्त्रियोंने आसीन नामक करण अर्थात् मयूरासनमें स्थित होकर सुरत करनेका नाम आसीन करण मञ्जीरकान्तिच्छरितत्रिकस्य पर्यबन्धस्थिरभतुरङ्गम् । स्थिताङ्गानाबाहविषक्तकण्ठ प्रशस्तमतललितं विधिज्ञः ॥२॥ नूपुरकी कान्तिसे प्रतिबिम्बित स्वामीका अंग हो और वह पर्यक बन्धकी तरह स्थिर हो और स्त्री अपनी बांहसे पुरुषका कण्ठ संलग्न रखे तो काम कुशल व्यक्ति उस सुन्दर तथा प्रशंसित पर्यबन्ध कहते हैं। इति द्वात्रिंश परिच्छेद ।

एकत्रिंश परिच्छेद अनुच्चैः पूर्वाङ्ग, निजचरणयोः पाणियुगल, तथा यष्टः : पश्चा- स्थितपतिकराश्लिष्टम दरम् । निम्विन्या धीर: पशुकरणम तन्निगदित प्रशस्तं यत्सिन्धी मरुकुरुजनैश्चापि सुतराम्॥१॥ नायिकाको अधोमुखी करके अर्थात् पशुके समान नीचे मुंह करके तथा अपने दोनों हाथोंसे उसका वक्षःस्थल पकड़े अर्थात् बकरेकी भांति रमण करे। इसको पशुबन्ध कहते हैं। तनौ तल्पालीने निजकरधृतं पाणि युगलं १० १५४ नागर-सर्वख। नितम्विन्याः पृष्ठ नतमतिशयोक्षिप्तजघनम्। समुन्नीतं पश्चात् परमदयितेनोरुयुगल स्मृतं व्याघ्रस्कन्द करणमशतं दुष्करमतम् ॥२॥ शय्याशायिनी प्रिया अपने आप दोनों पांव ऊपर उठाये रहे, पीठ, कटि पश्चाद्भाग अधिक उपर ऊठाये रहे और प्रिय दोनों हाथोंसे भी वक्षस्थल ग्रहण करे तो व्याघ्र स्कन्द करण अर्थात् शेर जैसे रमण करता है, वैसा आसन होता है यह बहुत कठिन है इसमें स्त्रीको क्लेश बहुत होता है । पर, अभ्यास साध्य है। इति एकत्रिश परिच्छेद। .

द्वात्रिंश परिच्छेद तन्व्या नरेणोदधृतपादमेकं चान्यं पृथिव्यां हरिविक्रमाख्यम् । कान्तत्रिकारोपितपादमेक तदोच्यते व्यापरनामधेयम ॥१॥ स्त्रीका एक चरण पुरुष उठावे और दूसरा चरण थ्वीपर सीधा रहे तो उसे हरिविक्रम नामक करण कहते । कान्तके त्रिक अर्थात् रीढका अन्तिम अंश पुरुषका तिम्ब द्वयको त्रिक कहते हैं, उसपर यदि स्त्रीका चरण खा रहे तो व्यायत नामक करण होता है। नृहस्तयोः पादतले धृते तु विषक्तकण्ठ्याऽर्पितनामधेयम ॥ धृतं निजे वक्षसि वल्लभेन स्तोपादयुग्मं प्रवदन्ति दोलाम् ॥२॥ पुरुषके दोनों हाथोंसे स्त्रीका कण्ठ संलग्न रहे और स्त्री पुरुषका पांव पकड़े रहे तो अर्पित नामक करण होता १५६ नागर-सर्वस्व । है। स्वामी यदि अपने वक्षःस्थलपर स्त्रीके चरण रखे तो दोला नामक करण होता है। नार्या यदा बाहुविषक्तकण्ट्या नितान्तसंयोजितपादयुग्मम । स्थितस्य कुड्याश्रितनायकस्य त्रयस्र तदा विद्धि विलम्बिताख्यम३ स्त्री अपनी भुजाओंसे पुरुषको गलेमें लगा ले और दोनों चरण भी अच्छी तरह संयुक्त कर ले और नायक दीवालके सहारे खड़ा हो जाय । तो विलम्बित करण होता हैं। नृकूपरद्वन्द्वविलम्बिजानु नितम्बिनीं बाहुविषक्तकण्डीम् । निवेष्टयेबाहुयुगेन मध्ये स्थितः पतिः कूपरजानुसंज्ञम ॥४॥ मध्यमें स्थित पति अपने दोनों कुहनी तक स्त्रीकी जंघा आने दे और स्त्री पुरुषके गलेमें लिपट जाय और पुरुष भी स्त्रीको अपनी भुजाओंसे लिपटा ले तो कूपर जानु नामक करण होता है।* इति द्वात्रिंशः परिच्छेद । .-.

नागर-सर्वस्व। १५ -- * टि० करणानि मासनानि संवेशनानि बन्धाः लयाः स्मरयन्त्र विधयो इति व्यवहृतोनि । अर्थात् करण, भासन, बन्ध, संवेशन और लय सब भासन शब्दके ही समानार्थक हैं। नायिकाकी मंगस्थिति:- उत्तान, करवट, तिरछा, उपविष्ट बंध आसीन करण, ऊर्ध्व बध, व्यानत बंध; अर्थात् खूब झुक कर किया गया बध पशुकरण अर्थात् पशुके समान रमण करना-ये पाच प्रकारके होते हैं। [ सब मिला करे ८४ वध होते हैं; जो प्रसिद्ध ही हैं। ] विस्तार होनेके भयसे अधिक नहीं कहा गया। आरोह और अवरोह अर्थात् दीर्घता पुरुषके साधनमें और गभीरता स्त्रीके वरांगमें इन परिमाणसे उच्च अथवा नीच रति होती है। "उत्ताने च पुरुषस्य पादयोः प्रसारणे स्वजस्य पूर्णः प्रवेशः अर्धापवेशने च न्यून इति। नीच रते पाय उच्च रते चापरो विधिः प्रयोज्यः। सम रति संपादनाय उक्त बधेषु मधोमुखं धेनुकं च नीचरते । मार्कटक नागबधश्च अति नीच रते कौम परम नीच रते, एक पदं उच्च रते, अवनम्बित अत्युच्च रते च प्रयोज्यम् । एवं अन्यत्राब्यूह्यम् ॥ पूर्वोक्तोसानादि पंच भेदेषु नायिकानां प्रायः उत्तान रत्तमेव मान- न्दप्रद जायते । यतः तत्र ताभिः कमल पीडनं पूर्वाग पोडनं च सम्यगनुभूयते । पार्श्वबन्धेषु नितम्ब भारेण स्मरमन्दिरस्य गाढ़- वात् स्मरमन्दिर पार्श्वयोः साधनेन सुष्ठ संघर्षणात् कोप्यानन्दाति शयः जायते, प्रतः शखिनी हस्तिनी विषयकाः प्राय इमे। उपविष्ट बधेषु सरत समये मालिगनादि बायरतेषु सोकर्य लभ्यते । स्थित नागर-सवम्ब। बंधाः क्लिष्टत्वात् रोगोत्पादकत्वाच नात्याद्रियन्ते । ब्यानत बंधास्तु प्राय उत्तान वा समाना पितेषु सीकटि संचालन सौकर्य कमला- वरोहादि गुणत्वात् अध्वजानां प्रियतरा भवन्ति । पुरुष शैथिल्ये तु पुरुषायितं प्रयुज्यते। एभ्यो विलक्षणानि चित्ररतानितेषु स्तनान्तर रतं कक्षारत, जानुरत पादतलमध्य रतं मुष्टिरत, “भमे निक्षिष्य यो विहां यो बिलोल चुम्बति प्रियः । तथैव रमणस्यापि नारी विंग प्रकर्षति ।” स्मर दीपिकाया मुक्त विविध "गेमेहुष" इति पाश्चात्य- देशे प्रसिद्ध मुखरत। निन्द्यामपि क्वचित्प्रवृत्त पायुरतम् । कचिदेशे यथा स्त्री राज्ये बहुभिः कान्त रेका स्त्री रमते भृशम् । कर्णाट युवती- मिव बह्वीभीरमते युवा । वाडवकं प्रांध्रीषु; पशुकरणं सैववी मारभ्यासु ॥ 'दर्शनेन रति कृत्वा नियाः स्पर्शनमाचरेत् । स्पर्शेन इवमुत्पाद्य रानेः सभोगमाचरेत् ॥ प्राश्वेष प्रथम कुर्याद्वितीय चुम्बनं तथा । तृतीयं च नखपातब दन्तापातरचतुर्थकम् । पंचम क्षेपणं प्रोक्त । टि.-षष्ठ प्रहरयां तथा । सप्तमं कण्ठ शब्दश्च वधाख्यं चाष्टम- इतम ॥" अस्मिन् विषये इमे अपि विशेषा बोध्या:-यत अन्न रसादिषड्भातु १ रख रूपः सप्तमो धातुः वीर्य पुरुषामडयोः जन्यते, तव मयनेन लिगस्थ नाड़िकया बहिनिस्सरति । भी वंक्षणयो रन्त- भगि स्याहाशयः ततो रसस उद्भवः यन्मासि मासि बहिर्निगच्छति । परताय पुरुषाणां ध्वजोत्थान मयोक्षितं, स्त्रीयान्तु अतथा विभित्वेपि ध्वजप्रवेशे एव तामां मन्द वेगानामपि सुरतामिमाषो जायते। सुरते मानन्द स्थान पुरषायां ध्वजाप्रएष, सीमान्तु गर्भाशय मुख, यत्र नागर-सर्वस्व १५९ ध्वजाय संस्पर्श मात्र तेषां तासांच अवर्णनीय आनन्दातिशयः स्फुरति तदुक्तं रति कहोलिन्यां-"उदर्भ शय्या वदनान्तिकस्थं चिंचाप्रसन प्रतिम भगान्तः । तद्ब्रह्म सौख्यास्पद माहुराः स्पर्शात्परं प्रावक- मंगनानाम ॥" चिचा प्रसन इमली" त्रि.त्रिज्ञ परिच्छेद यदगुलीनां प्रविधाय कुञ्चनं चतसृणामेव करोति मस्तके। अनल्पतात्कारनिनादि ताड़नं स्मृतं विदग्धेरिह शब्दकर्तनम् ॥१॥ वारों ही अंगुलियोंको सिकुड़ा कर स्त्रीके मस्तकपर पुरुष थोड़ा २ टात् टात् करके चिल्लाए और सुरतासन लगाये रहे तो उसे शब्दकर्तन कहते हैं आबद्धमुष्ट्या यदि मुष्टिसंज्ञ श्रोणीतटे पृष्ठतले विधेयम । गण्डे पदांगुष्टतलेन हन्या- त्तदा बुधा विद्धकमामनन्ति ॥२॥ कटि तटमें, पृष्ठतलमें मुक्केके प्रहार करनेसे मुष्टिसंज्ञक ताड़न होता है और गण्डस्थलमें पैरके अंगूठेसे ताड़न हों तो विद्यक होता है। इति त्रयस्त्रिंश परिच्छेद ।

चतुस्त्रिंश परिच्छेद आदाय मुष्ट्या पशिदनं य- त्तदुक्तमादीपितमधे म । स्पृष्ट्वा यदा हस्ततलेन विद्ध तदोच्यते स्पृष्टकमग्रधीभिः॥१॥ ग्रहण करके मुष्टिसे परिमो आदापित कहते है। स्पर्श करके हस्ततलसे मर्दन करनेपर स्पृष्टक होता है। आकम्पमानेन करेण यद्य मनीषिभिः कम्पितक तदुक्तम् । इतस्ततो यत्र निपीड़मात्र मतं मुनीन्द्रण समाक्रमाख्यम॥२॥ कंपाते हुए हाथोंसे मर्दन करनेपर कम्पित होता और इधर उधर निपीड़न मात्रसे समाक्रम नामक मदन होता है। इति चतुस्त्रिंश: परिच्छेद । ० पञ्चत्रिज्ञ परिच्छेद यः सर्वगात्रषु दृढ करेण ग्रहस्तदा तं वद बद्धमुष्टिम् । संवेष्ट्य यत्रांगुलिकां कचेन वदन्ति तद्वष्टितक मुनीन्द्राः ॥१॥ जो पुरुष समस्त शरीरमें अच्छी तरह हस्त व्यापार करे उसे बद्ध-मुष्टि कहते हैं। जिस सुरतमें केश ग्रहण करके अंगुलि प्रवेश होता है उसे मुनीन्द्रोंने वेष्टित कहा है। संग्रथ्य वामांगलिकाग्रहश्च स्मृतं कृतग्रन्थिकनामधेयम । कण्ठे स्तनेऽङ्ग प्ठकतर्जनीभ्यां तदा समाकृष्टिमुदाहरन्ति ॥२॥ अंगुलियोंमें अंगुलियोंको गूथ कर ग्रहण करनेको कृत- ग्रन्थि कहते हैं। कण्ठ और स्तनमें अंगूठे और तर्जनीसे ग्रहण करनेको तथा खींचनेको आकृष्टि कहते हैं। इति पञ्चत्रिंश परिच्छेद।

पत्रिंश परिच्छेद प्रवेश्यते तर्जनिका वराङ्ग प्रवेशनं तत्करण वदन्ति । सा मध्यमापृष्ठगता यदा स्यात् विदुर्विदग्धाः कनकाभिधानम् ॥१॥ वरांगमें तर्जनीका प्रवेश करनेसे प्रवेशन करण होता है। जब मध्यमा अंगुलीको उसमें संयुक्त करके प्रवेश कराया जाय तो कनक नामक करण होता है। तयाद्वयोः पृष्ठविपर्ययेण वदन्ति धीरा विकनं तदेव । तते तु ते द्व कथिता पताका, तिसः सहानामिकया त्रिशूलः ॥ श्लिष्टा यदा ताः शनिभोगमाहुः ॥२॥ उन दोनों तर्जनी और मध्यमा पृष्ठ विपर्यय करके प्रवेश करानेसे कामशास्त्री पण्डितोंने उसे विकन कहा है। इति षट्त्रिंश परिच्छेद ।

सप्तत्रिंश परिच्छेद इति सुरतमनेकभेदभिन्न स्फुटमुदित परिहृत्य फल्गुवाक्यम्। त्रिविधमृगदृशां स्वरूपवेदि मृदुखरमध्यमकर्म योक्तुमेतत् ॥१॥ इस प्रकार सुरतके अनेक भेद स्पष्टतापूर्वक कहे गये और व्यर्थ बातें छोड़ दो गयौं। तीन प्रकार अर्थात् मृदु- कोमल खर तीक्ष्ण और मध्य अर्थात् न कोमल न तीक्ष्ण और बाला मध्या तथा प्रौढ़ा इन तीन स्त्रो भेदोंसे प्रयोग करना चाहिये। इसी तरह करण परिपाटो सोलह हैं। हतुं हृदयसर्वस्वं यदीच्छेद्भतुरङ्गना। तदा विदग्धकामाना- मित्याचरितमारभेत् ॥ २॥ स्त्री यदि अपने हृदय-सर्वस्व स्वामीका मन हरण करना चाहे तो स्त्री चातुर्णके इच्छुक पुरुषकी इच्छानुसार आच. रण करे।

नागर-सवस्खा १६ वक्ति भूयः कौशलं धूपित धौत वस्त्रमग्राम्यमण्डनम्। दधानाऽऽपीडसद्वेष प्रियान्तिके-॥३॥ (दधाना, पीतसधूपवतिर्भूयात् प्रियान्तिके?) स्नानके बाद भीगे हुए बालोंको सुगन्धित धू पसे सूखा कर ले अग्राम्य-मण्डन अर्थात् देहाती शृंगारको न करके नगरमें प्रचलित प्रणालियोंसे अपनेको सुसजित तथा सुभ- षित करके खूब साफ साड़ी पहन कर स्वामीके पास आवे ससाध्वसं च सस्नेह सवीडं सहसं तथा। ईषदृश्यतनुर्नारी वसेत्कान्तं निरन्तरम ॥४॥ जरा जरा अंग-प्रत्यगको दिखाती हुई कमी छिपाती हुई, कुछ डरती हुई, कुछ लजाती हुई, कुछ मुस्कुराती हुई स्वामीके निकट स्त्री आवे। अथवा इन चेष्टाओंको दिखावे । .

१६६ नागर-सर्वस्व । आकर्षति पुनस्तस्मिन् रतानीकरते प्रिये। जनयेदगसंकोचं क्षण साक्षाद्भयादिव ॥५॥ सुरत युद्धमें जब स्वामी स्त्रीका हाथ पकड़ कर खीं तब एकाएक डरकर कुछ अंग संकोच करे। प्रकान्ते सुरते पश्चात् क्रमाविर्भूतमन्मथा। निःशङ्कमपयेद्द्वात्र- मतिस्नेहादिव प्रिये ॥६॥ यद्यत्समोहते द्रष्ट्र हन्तु वा लिखितुं वपुः। तत्तदापसरच्छीघ्र सोद्वगं, ढोकनीयं च ॥ ७॥ सुरत-समरके समारम्भमें क्रमशः आविर्भूत कामा मर्थात-मदन परवशा नारी जब अपने अंगोंको समर्पशा कर दे तब स्वामी जिन १ अंगोंको देखना चाहें नखक्षत तथा दन्तक्षत करना चाहें उन अंगोंको पहले झट हटा ले फिर उद्वेगके साथ फिर समर्पण कर दे।

नागर-सर्वस्व
१६०
कुर्यात्कूजितमामद,
दशे सव्यथहुंकृतिम् ।
नखक्षतेषु सीत्कार-
माघाते स्तनित स्फुटम् ॥८॥
मर्दन होनेपर शब्द करे, दन्ताघात करनेपर व्यथाके
साथ हुंकार करे और नखक्षत फिर जानेपर तथा स्तन और
गण्डस्थलमें आघात होनेपर सीत्कार करे।
प्रविन्नवदना श्रान्ता
मन्दहाकारनादिनी।
आयासश्वासरोमाञ्च
मुञ्चेत्तद्रागवृद्धये ॥६॥
पसीनेसे तर-बतर होकर परिशान्त होकर , मन्द मन्द
कराहती हुई और श्वास प्रश्वास खींचे साथ ही रोमाञ्च भी
हों ये सब सुरत कालिक रागवर्धनके लिये करे
मा मां निपीडयात्यर्थ
न समर्थाऽस्मि निदय।
इत्येवं गद गदाव्यक्त
प्रियं ब्रयान्नितम्बिनी ॥ १० ॥

१६८ नागर-सर्वस्व । 7 हे निर्दय मुझको इतना मत सताओ । इतने सहने लायक मैं नहीं हूं। इस प्रकार गद् गद् वचन अर्थात अस्पष्टाक्षर बोले। वामत्वमनुबन्धं च प्रौढत्वमसमर्थता। कान्ताकूत स्फुट ज्ञात्वा सुरतेषु प्रदर्शयेत् ॥ ११॥ स्वामीका छल-कपट स्पष्टता पूर्वक जानके सुरत समर में उनको भी अपना कौशल दिखाना चाहिये । वे कौन सो कहते हैं । प्रतिकूलता, अनुराग, प्रौढ़ता और असमर्थत अर्थात् मानमें इनको दिखाना चाहिये । धीरताविनयोच्छेद- मश्लीलमसमञ्जसम । वृद्धि याते रतावेगे व्यवहार समारभेत् ॥ १२ ॥ स्त्रीको सुरतके आवेग आरम्भ होनेपर तथा आवे बढ़ने पर धीरता और विनयका भंग अश्लीलता आदिक व्यवहार आरम्भ करना चाहिये।

नागर-सर्वस्व । ow शिथिलागी निरुत्साहा सन्निमीलितलोचना। प्र(नि?)वृत्ते मोहने तिष्ठत् स्वेदबिन्द कणाचिता ॥ १३ ॥ जब आनन्दमय हो जाये, जब मुग्ध हो जाय तब अंग- को शिथिल ( बेखबर ) कर दे, आलस्य पूर्ण हो जाय आंखें मूद ले और ऐसी अवस्था हो जाय कि सर्वागमें पसीना चलने लगे। नितम्बाच्छादित शीघ्र वैलक्ष्यं ललित स्मृस्मि?)तम्। दृष्टिं खेदालसां कुर्या- द्वयक्तकेविभूषणा ॥ १४ ॥ सुरत सम्भोगके पश्चात् दूसरा न कोई कुछ समझ देख ले इस तात्पर्य से झट नितम्ब को वस्त्रसे ढक ले, मधुर मुसकान हों परिश्रमसे अलसाती आंखें हों और बालोंके भूषण निकल आये हों। तात्पर्य कि सूरतानन्तरके जो लक्षण हों वे सब दीख पड़ते हों। वात्स्यायनादिरचितं विशरीरशास्त्र यह श्यते मृगदृशां मृदु निमित्तम् । ११ नागर-सर्वख। सीमन्तिनीपुरुषयोरुभयोरिद तु, स्त्रीसेवनोत्कठिनता नियता हि लोके ॥१५॥ यह कामशास्त्र स्त्री और पुरुष दोनोंके लाभार्थ वात्स्या- वन द्वारा बनाया गया और उसी वात्स्यायन मुनिकृत काम- सूत्रके आधारपर अन्यान्य कामशास्त्रियोंने मृगनयनियोंके कोमल भाव सूचित किये हैं। क्योंकि संसारमें स्त्री सेवनका सच्चा सुख प्राप्त करना भी कठिन काम है। तत्कुदिनीमतमुदीक्ष्य बराङ्गनानां कान्त विधयमवलाचरितं प्रदिष्टम । स्त्रीसौख्यलिङ्गमवधारयतां नराणां चोक्त स्वरागजननं सुतरामिहैव ॥ १६ ॥ इस कारण वरांगनाओंके व्यवहार सम्बन्धी कुट्टिनीमत नामक पुस्तकोंका अवलोकन करके स्वामीके प्रति स्त्रीका कैसा बर्ताव होना चाहिये वह और अबलाका चरित भी दिखाया। अतः स्त्री सम्बन्धी सौख्य (शौक) के लक्ष- णोंको जानने वालोंके लिये यहाँ ही उनका अच्छी तरह वर्णन कर दिया गया। इति सप्तत्रिश परिच्छेद । -- अष्ठर्विज्ञ परिच्छेद shet मुताथ बद्धचिन्ताना- मपुत्राणां मनोभुवाम। हिताय करुणासिन्धुः कथयामि सुतोदयम् ॥१॥ पुत्रोत्पत्तिके लिये चिन्तित अपुत्र पुरुषोंके हितार्थ करुण- पश पुत्रोत्पत्तिका उपाय हम कहते हैं। रजःस्नानदिने दत्वा भिक्षुसंघातभोजनम् । शक्तितो दक्षिणां दत्वा प्रार्थयेद्वरमीप्सितम् ॥२॥ रजोदर्शनके दिन स्नान करके भिक्षुओंको अच्छी तरह भोजन कराना चाहिये और यथाशक्ति दक्षिणा भी देनी चाहिये। साथ ही अभीष्ट वर मांगना चाहिये।

नागर-सवस्व।
तदोष, पिवेत्कान्ता
तारापूजापुरःसरम ।
कान्तया सहितो रात्री
पुत्रार्थी विधिमुच्चरेत् ॥ ३॥
तारा देवीकी पूजा करके आगे कहे हुए औषधका
पति-पत्नी दोनों पान करें और पुत्रार्थी होकर उक्त विधिका
उचारण करें।
समसौख्य निरुन्मोष (पः)
प्रयोगेषु यथा सुधीः।
धैर्यवान्मोहनात्पूर्व
तारापादाम्बुजं स्मरेत् ॥ ४॥
समान सौख्यके भागी स्त्री-पुरुष पहले निश्चल
दृष्टियोंसे धैर्य पूर्वक सुरतके पूर्व तारा देवीके पद कमलका
स्मरण करें।
यदा सूर्येण मार्गेण
देहे वहति मारुतः।
संचोय नाडिकां पुत्री
पश्चान्मोहनमाचरेत् ॥५॥

नागर-सर्वख जब पिंगला नाड़ीमें अर्थात् दाहिनी नासिकामें श्वास चलती रहे तब पुत्री नामक नाड़ीको सञ्चालित करके मोहन अर्थात् सुरत आरम्भ करना चाहिये। करवीरकुसुमैवी- मार्यतारां वरप्रदाम । त्रिसन्ध्यं पूजयित्वा तु मन्त्रं सप्तशतं जपेत् ॥ ६॥ करवोर ( हयमार ) के फूलोंसे वरदा तारा देवीको त्रिकाल पूजा करके निम्नलिखित मन्त्रका सात सौ जप करे। मन्त्रस्त्वयं-ॐ जम्भे मोहय स्वाहा । पञ्चशिष्या (क्षा?) परो भूत्वा मासमेकं तथाऽचयन्। वंशोद्योतकरं पुत्र लभते नात्र संशयः॥ ७॥ भासन, मुद्रा, प्राणायाम, पूजा और जप इनमें तत्पर शेकर एक मास अनुष्ठान करे तो वंशका मुख उज्ज्वल करनेवाले पुत्रको लाभ करे, इसमें सन्देह नहीं।

नागर-सवस्व। उषित्वा लदमणामूलं तत्मन्त्राधिष्ठितं पिवेत्। सुरभ्या एक वर्णायाः पयसा शबली कृतम् ॥८॥ एक मास उपवास करे और लक्ष्मणा मूलको उछ मन्त्रसे और अभिमन्त्रित या शक्तियुक्त करके एक वर्ण गोके दूधके साथ मिलाके पीवे ।* तदोषधि प्रभावेन शुक्रवृद्धिः प्रजायते। पिण्डाच्छक्राधिकात्पुत्रः कन्या रक्ताधिकाद्भवेत् ॥ ६॥ उक्त लक्ष्मणा जड़ीके प्रभावसे वीर्य वृद्धि होती इसीसे पुत्र होता है और रक्तकी अधिकतासे कन्या होती है । टि. एक मास उपवासका यह तात्पर्य है कि दिन भर उपवास करके रातको अवश्य भोजन करता जाय । “पुष्योद्धृत लक्ष्मणाया मूलं पि च कन्यया । अत्वते घृतदुग्धाभ्यां पीत्वाऽऽमोत्यबला सुतम् ।” पुष्प नक्षत्रमें उखाडी गयी लक्ष्मण जढीको कुमारीके हाथसे पिरवा कर पी और धके साथ पीवे दो पुत्र हो ।

नागर-सर्वस्व। तीर्थको यदि पुत्रार्थी भ देवान्भोजयेत्तदा। दक्षिणां शक्तितो दवा विदध्यावरयाचनम् ॥१०॥ ब्राह्मण यदि पुत्रार्थो हो वह भी ब्राह्मण भोजन करावे साथ ही दक्षिणा भी यथाशक्ति दे देवे। करे। फल मूलाशनो भत्वा पार्वती परमेश्वरी। त्रिसन्ध्य पूजयित्वा तु मन्त्रमेतजपेत्तदा ॥ ११॥ तब वर याचना फल मूल आहार करके निकाल पार्वती शकरजीकी पजा करे और निम्न लिखित मन्गका जप करे। ॐ नमो भगवते महेश्वराय नमःप्रजजा- ननाय,खाहा। परदाराभिगमनं मद्यमांसादि भोजनम्।

नागर-सवस्व। मिथ्याभिलपनं हास्यं मानं क्रोधं च वर्जयेत् ॥ १२॥ परस्त्रीगमन, मद्य मांसका भोजन मिथ्या भाषण हसी मान और क्रोधको त्यागना चाहिये विशेष करके ब्रतके दिनोमें। तदा स्नात्वा सचैलस्तु सुधौतवसनः कृती। मन्त्रोतं जपेन्नित्यं न निद्रां समुदाहरेत् ॥ १३ ॥ सुन्दर तथा स्वच्छ वस्त्र स्नान करके पहने तब उक मन्त्रको विधि पूर्वक जपे किन्तु निद्रित कभी न हो। हेमतारक ताम्राणि एकीकृत्य सुसर्पिषा। दातव्यं लेहनं रतीणों क्षेत्र शुद्धिस्तथा भवेत् ॥ १४॥ सुवर्ण, चांदी, तांबेके भस्मको एकत्र करके गौके पवित्र बीमें मिलाके स्त्रीको खिलाना चाहिये। इससे क्षेत्र शुद्धि होती है।

नागर-सर्वस्व ।
१००
शेषन्तुपूर्ववत्कुर्वान्
कृतार्थो नियतं भवेत
सत्पुत्रा लोकनात्यन्त
प्रीतिस्तिमित लोचनः॥१५॥
शेष विधि पूर्ववत् करके अवश्य कृतार्थ हो सकता है ।
योंकि सत्पुत्रको देख कर सबका मन अत्यन्त हर्षित होता
। विशेषतः नयनानन्दकर होता है। स्मृतिमें भी कहा
या है कि :-"लोकं जयति पुत्रण पौत्रेण नरकं जयेत् ।
ाय पुत्रस्य पौत्रोण परमानन्द मश्नुते।"
विविधविधिविधानं
देवता मन्तु पूजा-
दयितयुवतिशिक्षा
सत्प्रतिग्राहकाणाम्।
प्रथममुदितमस्मिन्
वीक्ष्य सिद्ध कवीरं
परमरतिरहस्यं
शांकरं काम तन्तम् ॥१६॥

नागर-सर्वस्व। यह कामतन्त्र परमश्रेष्ट, अति गोपनीय और पार्वती सहरका संवाद रूप है। विविध विधियोंका विधान है। दो प्रकारका है अर्थात् पति-पत्नी दोनोंको शिक्षा है । इसलिये बो सहृदय इस कामशास्त्रोक्त विधिके अनुसार चलेंगे सिद्ध वीर होंगे। आसीढब्रह्मकुलेकलाग्रनिलयो यो वासुदेवः कृती, तस्य स्नेहवशाच्चिरं प्रति मुहुः संप्रेरणात् साम्प्रतम्। दीप्त यं रतिशास्तू दीपकलिका पद्माश्रिया, धीमते हृद्यार्थान्प्रकटीकरोतु जगतां संहृत्य हाद तमः॥ १७॥ कलाओंमें निपुण, जिस वासुदेवने पण्डित ब्राह्मण वंशमें जन्म लिया था उसीके बारम्बार प्रेरणा करनेसे स्नेह वश पद्मश्री पण्डितके द्वारा विरचित रतिशास्त्र रूपिणी यह दीपकलिक संसारका हार्दिक अन्धकार दूर करके हृद्य अर्थात् मनोहर भोको प्रकट करे।

नागर-सर्वस्व १७९ Duovir राजा धर्मरतोऽस्तु निर्जित रिपुः षड़वगवश्यो वशी निःक्लेशाः कृतिनो भवन्तु मुदिताः सत्कार लाभान्वितः । अन्योन्यप्रियताप्रसन्नमनसः सर्वातू सन्तु प्रजा, नित्यं तिष्ठतु सर्वा सत्व- निचयः सम्पूरिता मेदिनी ॥१८॥ काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य इन छः शत्र पर विजय पाकर राजा धर्ममें निरत हों, अथवा सन्धि, विग्रह, यान, आसन, वैध और आश्रय इन छहोंसे युक्त हों, विद्वान मान और लाभ प्राप्त कर सुखी हों, निक्लेश हों, प्रजा सवथा सुखी हो और पृथिवी धनधान्य तथा सब प्राणियोंके साथ परिपूर्ण हो। इति अष्टत्रिंश परिच्छेद । समाप्त।

रतिवल्लभ
मूल्य १॥) सजिल्द
२)
डाक० ख०)
उपयोगिता-रति-बल्लभको पढ़ अशांतिकी अग्निसे धका-
धक जलनेवाले, नरक समान प्रतीत होनेवाले गृहस्थी जीवनको
स्वर्गवत् शांति और सुखमय बनोइये। विवाह जीवनमें प्रवेश
करनेवाले नवयुवकोंको इसे अवश्य पढ़ना और मनन करना
चाहिये।
अश्लीलता या कामके नामसे चिढ़ने और नाक भौं
सिकोड़ने वालोंको दूरवीनसे देखने पर भी अश्लीलता
न मिलेगी। अतएव निःसंकोच आप पढ़िये युवकों तथा
युवनियोंको पढ़ाकर नित्य गुण्डों द्वारा कलङ्किन होनेसे
बचाइये।
बेचिराग़-निःसन्तान घर सन्तानसे भरिये । प्राणप्या-
रीको सन्तुष्ट करके उनकी झिड़कियों और स्तम्भनवटोके
रुर्च और हानिसे वचकर जवानीका सवा आनन्द
फिर भी नापसन्द होनेसे पुस्तकका मूल-डाक व्यय सहित
वापस देनेकी गारण्टी है।
पता-श्रीवेंकटेश्वर पुस्तक एजेन्सी, (बड़ाबजार) कलकत्ता

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करिशेखर घोतिरीश्यामचिन
कामशास्त्र का टुप्त प्रन्थ
पञ्च-सायक
सरल भागासाय
w
शपियाका का मन बाला काम.
शास्त्र विषयक, खाना Amrk काम कति
की समस्त वातांका चिन्ता वाल: यह वह
पुस्तक है जिसमें अाल शालीन भागनांका
वगान किया गया है। इतना प्रामाणिक पुस्तक
है कि इसका मत्यतामें काई मन्दह हा नहीं
किया जा सकता। शीघ संग्रह कीजिय।
श्रीवेंकटेश्वर पुस्तक एजेन्सी
१६५।२. हरिसन गड, कलकत्ता।

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Naagarasara~vasva Kaamashaastrakaa Apuura~va Gran'thaa

Author
Pada~mashrii
Title
Naagarasara~vasva Kaamashaastrakaa Apuura~va Gran'thaa
File name
Naagarasara~vasva Kaamashaastrakaa Apuura~va Gran'thaa
Text
OCR done
Citation
1926
Published
2005-11-28
Publisher
Shriinaaraayand-aa Prin't'in'ga Vara~ksa
Language
Sanskrit
Pages
194
Classification
Technology
DLI number
369501
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2030020016320.00
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