Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Utsav Ka Nirmam Samay
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उत्सव का निर्मम समय (कविता-संग्रह)
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उत्सव का निर्मम समय
नंद चतुर्वेदी
भारतीय ज्ञानपीठ
ISBN 81-263-0635.1
लोकोदय ग्रन्थमाला · ग्रन्यांक 673
प्रकाशक
भारतीय ज्ञानपीठ
18, इन्स्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड
नयी दिल्ली-110003
लेजर टाइप-सेटिग : भारतीय ज्ञानपीठ
मुद्रक : नागरी प्रिटर्स, दिल्ली-110032
आवरण एव सज्जा : गोपाल नामजोशी
पहला संस्करण : 2001
मूल्य: 105 रु.
© भारतीय ज्ञानपीठ
UTSAV KA NIRMAM SAMAY
(Hindi Poems)
by Nand Chaturvedi
Published by
Bharatiya Jnanpith
18, Institutional Area, Lodi Road
New Delhi-110003
First Edition • 2001
Price: Rs 105
भूमिका अपने लिखने पर किसी भी प्रकार की टिप्पणी करना मोहाविष्ट होना ही है। अपना लिखा हुआ, बोला हुआ, आत्मा का केन्द्र ही होता है, अविछिन्न और अभिन्न। बहुत दिनों वाद और बहुत दूर से देखने के बाद भी उसका लालित्य नशा पैदा करता है। 'अपना कवित्व सरस हो या फीका किसे अच्छा नहीं लगता' ऐसा वर्णन करती तुलसीदास जी की एक चौपाई है। कविता लिखने का कौशल सीखा जाता रहा है, सीखने पर कुछ बात बन भी जाती है, अभ्यास के कारण कुछ लक्षण कविता जैसे, कविता से मिलते-जुलते, नजर आने लगते है लेकिन असली, एकदम सौ-टंच कविता किसने लिखी है ? उस तरह के पारखी, समीक्षक कौन हैं ? भाषा के इस कालातीत जादू की ताक़त कहाँ है ? विहारी ने यह सवाल शायद कवियों को ही सम्बोधित किया हो : कितनी ही जादूगरनियों की बड़ी-बड़ी और अनियारी ऑखें मिल जाएँगी लेकिन सुजनो के मन वाँधनेवाली चितवन तो 'कुछ और' ही होती है। 'कुछ और' यानी कैसी ? कैसे बँधते है सुजनों के मन और क्या परिणाम होता है मन बँधने के बाद, मन का ? यह सब सवाल प्रायः करते हैं। इसलिए कविता लिखने के बारे में उत्तर देते हुए किसी एक उत्तर से बँधना सबसे अधिक क्लेश देनेवाली पराधीनता है। उत्तर नहीं दिए गये हैं। जो उत्तर दिए गये हैं वे सब-के-सव खारिज कर देने जैसे थे यह भी नहीं है। किसी ने उत्तर देखकर, उत्तर देने के लिए ही कविता लिखी हो यह सम्भव है लेकिन सर्जना की चाहत, उसके परिणाम, उसका रसानन्द और प्रज्ज्वलन, उस मझधार में उतरना और पार आ जाना या डूब जाना यह सब दूसरी दुनिया बनाना है। सर्जना में दूसरी कई, पहले से न जानी गयी बातें-अचिन्त्य आवेग, मनोरथ, अन्तर्विरोध और 1 पाँच सपने, रोशनी और अंधेरे-हस्तक्षेप करती है; सारी चीजें जिन्हें में जानता नहीं हूँ-The Things Unknown to me जैसाकि हर्ट रीड ने अपनी पुस्तक को नाम देकर अभिहित किया है। लेकिन तब भी कविता या कोई सर्जना, निरपेक्ष नहीं है, वह (कविता) किसी भी शक्ल में हो-अबूझ या कि उलटवासी या चकित करनेवाली दिव्यता, अनेकार्थी या एक अर्थवाली ललित या अग्निलपट, यथार्थ या 'यूटोपिया' वह मनुष्य की आकांक्षा ही है। आकांक्षा के सहस्राकार, सहस आयाम, सहस्र रूप-सर्जना की स्वाधीनता के पक्ष हैं। एक सर्जनात्मक समाज अपनी सारी धन-दौलत, स्मृति और सम्पन्नता के साथ समाज और समय को इसी तरह समझता है। इस दुनिया को पूरी समग्रता में बदलने, बचाने की इच्छा होती है। यह थात नजर आती है कि रचने की इच्छा महत्त्वाकांक्षा भी है और विखण्डन भी, एक अर्थ को तलाश करना और एक अर्थ की कुरूपता को तोड़ना पिटली शताब्दी की कविता इस अर्थ में, बड़ी और सार्थक है कि वह सर्जना अथवा कविता के स्थापित अर्थों को बदलती है और मनुष्य की विलुप्त, टीजती हुई पहचान को बचाने की अथक कोशिश करती है। संहार, दासता, तिजारत, लालच और धर्मोन्माद दुनिया को कुचलने और आतंकित करते रहने के लिए तरह-तरह के आयुधों का निर्माण और सबसे क्रूरतम, समर्प में भाषा की सौदेबाजी और उसके सामर्थ्य को विज्ञापन के काम में लाना दरअसल कविता के लालित्य और केवल वर्णनात्मक सरहदो की रक्षा का मासूम मामला नहीं है, बल्कि मनुष्य और मनुष्य के बीच के रिश्तों को हर तरफ से फिर से मजबूत करने का बड़ा संकल्प है। फिलहाल सबसे बड़ा, जटिल और । जरूरी। सर्जना और कविता के लिए हम कुछ भी चुन सकते है और यह भी हो सकता है कि हम कौतुकवश सव कुछ खुला रहने दें, विमुक्त-लेकिन तब भी यह ध्यान देने की बात है कि 'विमुक्तता', मनुष्यों के दायरे में गहन सदाशयता है, उच्च सामाजिकता और बराबरी का उच्चतर उल्लास। बड़े और विकसित समाजों के पास विमुक्त होने का नैतिक उल्लास होता है लेकिन वह किसी भी अर्थ में किसी को पराजित करना या दीन वनाना नहीं है। जब बड़े और विकसित समाज, सर्जना के सारे दावे केवल अपनी विमुक्ति, अपने दर्प, अपनी प्रभुता, अपनी संस्कृति की श्रेष्ठता के एक-आयामी विस्तार के लिए कर रहे हो तब सर्जना का आनन्द और कविता की विमुक्ति का एहसास एक दुर्लभ सपना होता है। तव कविता की विमुक्ति, उस व्यवस्था से विमुक्त होने में ही होती है जो दूसरों के लिए पूरी ताक़त से उत्कर्ष के सारे रास्ते बन्द कर देती । याद करता हूँ तो मेरे पास कविता लिखने के बहुत से विकल्प नहीं थे। एक उत्पीडित समाज, अन्दर से दरकता, शक्तिहीन, नृशंस सामन्तो के ऐश्वर्य की कीमत चुकाता हुआ नजर आता था। दूसरे रमणीय दृश्य डरावने, आकस्मिक और षड्यन्त्र लगते थे। उन दिनों कवि पद्माकर के ऋतु वर्णन की रसीली शैली का तिरस्कार करते हुए मैंने जो कवित्त लिखा उसका अन्तिम पदबन्ध इस प्रकार था- दीजै रंगशाला, रतिशाला को हवाला कहा, बिलखत जे है एक-एक ही निवाला को। अंग्रेजों और सामन्तों की दोस्ती और उत्पीड़न से बनी हुई व्यवस्था का अन्त नजर आ रहा था, किन्तु एक हारी हुई वाजी खेलते समय भी वे अपनी सुरक्षा और आर्थिक सम्पन्नता की किलेबन्दी में चौकन्ने और सजग थे। आजादी की कविता लोगों के साथ थी। पहली बार और इतने खुले दिल से। उत्पीड़न के खिलाफ यह पहली बार कविता का संगठित उन्मेप था। शायद पहली बार कविता ने इतने प्रवल स्वर में अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता को केन्द्रित किया था। आजादी के बाद की कविता अधिक गम्भीर और रचनाशीलता के अनेक आग्रहों को स्वीकारती है। इस क्रम में सबसे लम्बी और उग्र बहस राजनीतिक शिविरबद्धता को लेकर हुई है। हुआ यह भी है कि किसी एक चालाकी के साथ विश्व की राजनीति ने अपने रूप बदल लिये हैं और शक्ति के वैश्विक रूप अमूर्त और हिंसक हो गये है। नये और क्रूर अर्थशास्त्र का मिजाज असंख्य तनाव पैदा करता है और संघर्ष के पहले ही पराजय सुनिश्चित कर देता है। भूमण्डलीकरण और नये बाजारवाद ने सिर्फ प्रतिस्पर्धा और पूँजी के वर्चस्व को अमर्यादित हैसियत दी है। मनुष्य की दृष्टि मे जब शक्ति केन्द्र अपने से बाहर 'लोक' में निहित नहीं है। भाषा किसी नैतिक शक्ति का हिस्सा नहीं है, व्यापार और विज्ञापन है। मैने बार-बार यह पूछा है कि कविता ऐसे समय में किसका पर्याय सात है - अकेली खड़ी लालची संस्कृति का, अकेले खड़े लालची आदमी का, अकेले खड़े अभिजात्य का, मानव विरोधी सूचनातन्त्र का, निजीकरण का ? कवि का अकेला खड़ा रहना सम्भव है लेकिन तव वह कविता की लड़ाई नहीं लड़ता, वह कविता-विरोधी लड़ाई लड़ता है। कविता रचने का पर्याय बराबरी की दुनिया रचना ही है। कविता की भाषा, कविता का मुहावरा, कविता के मिजाज बदलने का अभिप्राय मैंने यही समझा है कि कविता की सबसे महत्त्व की लड़ाई गैर-वराबरी वाली दुनिया को बदलने की लडाई है। अपनी कविता की अनेक सीमाओ से मैं परिचित हूँ, उन सीमाओं से मैं निराश भी हूँ लेकिन मनुष्य में अपनी रचनाओ से, मैं गैर-बराबरी और उत्पीड़न के खिलाफ़ उमंग उत्पन्न कर सकता हूँ यह ख़याल मुझे विश्वास से भर देता है। मनुष्य के पास सबसे बड़ी ताक़त समता का पक्ष है। मेरे लिए यही कविता का पक्ष भी है। इस पुस्तक की कविताओं को बार-बार पढ़कर उनकी सराहना में सुचिन्त्य अभिमत व्यक्त करने के लिए मैं भाई नवलजी (डॉ. नवलकिशोर) का हृदय से आभारी हूँ। अपने मितभाषी स्वभाव के बावजूद उन्होने मुझे इन रचनाओं की सार्थकता से आश्वस्त किया। नंद चतुर्वेदी 30, अहिंसापुरी उदयपुर (राजस्थान) आठ अनुक्रम किताव संकल्प सब हमारे पक्ष में हैं किला पुराना घर वे सोये तो नहीं होंगे तरतीब से रखता हुआ स्वतन्त्रता संग्राम का सेनानी दुःख जब नज़र आता है आख़िरी टैम्पो में हर बृहस्पतिवार को हवा-1 हवा-2 हवा-3 दीपित शिखर फैन्सीड्रैस कम्पिटीशन छतरी वाला आदमी बचा रहा विदा दो 15 16 18 20 22 24 25 27 29 30 32 35 36 37 38 39 40 42 43 44 चुन्नू का खेल उत्सव का निर्मम समय साहब-1 46 49 50 51 53 55 57 58 60 61 : 63 65 69 71 73 साहव-2 आह। वेनसॉग कोई दुर्घटना हुई है मृत्यु पर माँ की आतंक शिशिर-1 शिशिर-2 प्रेम के बारे में कविता तुम सार्थक रहो छोटी चिड़िया : तीन कविताएँ अन्धकार होने के पूर्व सड़क-नदी नहीं है वसन्त मे होना तुम्हारे लिए मैं नहीं लिखूगा सोने की चिड़िया चोरी दीर्घायु हों योद्धा नब्बे बरस की माँ यह समय मामूली नहीं धूप की याद का सिलसिला वृद्ध-मण्डली विवाह गोपीनाथ कब पर रोशनी स्मृति गीली लकड़ियो के बीच असलियत जानते हैं लोग फिर से कहें फागुन के आते ही लड़की कूद जाएगी रस्सी के पार दस हजार वर्ष पुराना घर कार्तिक आश्विन अपराहन में 75 78 80 82 83 85 87 89 90 92 94 96 98 100 102 104 106 107 109 110 112
दिसम्बर में
पतन के सम्बन्ध में
कुछ तो होगा ही नागरिको !
थोड़े दिनों बाद
दादी माँ चिन्ता छोड़ो
युद्धोन्माद के विरुद्ध
अकाल
विवशता
स्त्री
तव भी
शक्ति हो तो
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सिर्फ पछतावा
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उत्सव का निर्मम समय
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किताब
उस तरह मैं नहीं पढ़ सका
जिस तरह चाहिए
इस किताव में लिखी इबारत
यह किताव जैसी भी बनी हो
जिस किसी भी भाषा में लिखी गयी हो
लेकिन जब कभी पढ़ी जाएगी
बहुत कुछ विलुप्त हो जाएगा
मैं ही कभी
गा-गा कर पढ़ने लगूंगा
कभी अटक-अटक कर
मैं ही बदल दूंगा
उद्दण्डतापूर्वक कभी कुछ
हँसने लगूंगा
Hormat
इस तरह शब्दों के
RowL
हिज्जे लिखे देख कर
HAN
बहरहाल उस तरह नहीं पढेंगा
जिस तरह चाहिए
बदल-बदल कर पढ़ने से
किताव का कुछ भी नष्ट नहीं होगा
बच जाएगा
जितना बच सकता है
उत्सव का निर्मम समय: 15
संकल्प
बार-बार हम समय को दोप दें
म्लान चित बहस करें
निर्णय निकालें कि कुछ होगा नहीं
यहीं गाड़ दिए जाएंगे
भूखे बच्चे,
यहीं जता दी जाएँगी
ढोल पीट-पीट कर तरुणियाँ
नरम हथेलियों पर
रक्त की लकीरें लिये
खोदते रहेगे लोग
पाताल लोक तक ऊँड़े गड्ढे
इस शोकार्त प्रलय की घड़ी में
हम छोड़ें नहीं
सुख की तृष्णा
चिड़ियों के छोटे-छोटे पंखों और
हमारे पैरों में
हवा जिसने भी बॉधी हो
बँधी रहे
पहाड़ भी रहें
स्वाति नक्षत्र के बादल
वहीं घिरें
वहीं जायें
सागर-आकाश की
अथाह उड़ान भरते चातक
16:. उत्सव का निर्मम समय
हम अपना पक्ष खुद हैं
समय वकील का चोगा पहन कर खड़ा हो
विदूपक की तरह
विका हो मणि-कंचन की दुकान पर
तब भी हम छोड़े नहीं
अपने सपनों का यथार्थ
ऊँचे आकाश तक की छलॉग
उत्सव का निर्मम समय :: 17
सब हमारे पक्ष में हैं
तुम्हारे हाथ अभी धके नहीं हैं
यह कहने का सुख ही
इस कविता का कय्य है
थोड़े से दिन और है
सहने के
फेलाने के लिए यह हाथ नहीं है
निर्द्वन्द्व रहो
यह जगल नहीं है
न होने दें इसे जंगल
नदी यहां नहीं रुकेगी
कोई भी नहीं
इस प्रवाह का
इस चकित कर देने वाली
यात्रा का सुख ही
इस कविता का कथ्य है
किसी को तो छोड़ना ही पड़ेगा
छोड़ना ही पड़ेगा यह सुख
इस नये पत्ते पर इस धुन्ध मे
बूंद तो है
सूर्य के भाग्य में यह सुख नहीं है
छिन्न-भिन्न हुआ मन
लौटता है पीछे
पीछे कुछ नहीं है
सन्नाटा है
डर है
18: उत्सव का निर्मम समय
0
डरो मत
यहाँ दूव है और छोटी चिड़िया
छोटे लोगों को क्या डर है?
क्या डर है भाग्य के मारे लोगों को?
यह शताब्दी क्रूर लोगों की है
लेकिन हमारी भी है
यह युद्ध है
खड़े रहो
कोई पाप आकस्मिक नहीं होता
तुमने होने दिया तो हुआ
सिर्फ़ इच्छाओं से रास्ते बदलते नहीं हैं
सत्ता की हार-जीत
यह दुःख
हमारा नहीं
युद्धरत रहो
जिसे बदलना है
बदलेगा
ये वनस्पतियाँ बदलेंगी नही
न यह कृति अनुर्वरा होगी
अब की बार पकड़ लें
हवा, बादल
और भविष्य
सब हमारे पक्ष में हैं
उन्सव का निर्मम समय: 19
किला
वह किला पूरी तरह ध्वस्त हो गया था
एक पूरे शानदार इतिहास के बावजूद
वे वीराङ्गनाएँ आग में कूद गयी थीं
अपने कृतघ्न और क्लीव पतियों के लिए
जिन्हें प्रेम करना नहीं आता था
वे सुन्दर
और अप्रतिम थीं
क्योंकि मर चुकी थीं
और अब वे स्वतन्त्र थे
उनके पति
प्रेम का विरुद गाने को
कोई नहीं था
वह जिन्दगी देखने वाला
जो उन्होंने दी थी
वे पैदल आयी थीं
या शिविकाओ में
अकेली-अकेली
या एक साथ
शान्त, विक्षुब्ध या रोती हुई
अपने पतियों का आलिंगन करके
या उन्हें शाप देती
सब से आगे कोई वृद्धा थी
या किशोरी
रोशनी बची थी
और बुर्ज पर कोई पुरुप था
20: उत्सव का निर्मम समय
वालक सो गये थे
या चीखते रहे
शान्ति पाठ करने आये तो होंगे
ब्राह्मण
उन्होंने कहा भी होगा
वे फिर यहाँ आएँगी
अपना बचा हुआ जीवन
जीने के लिए
इतिहास सिर्फ मौत बताता है
बाद की बातें तो
जिन्दगी को ही तलाश करनी पड़ती हैं
उत्सव का निर्मम समय :: 21
पुराना घर
अब मुझे वहाँ नहीं जाना था
पचास वर्ष बाद
चतुर्भुज सिलावट का मकान पूछने
रास्ते कहीं-से-कही मिल गये थे
या जिन्हें मैं ही भूल गया था
कैसा मकान और कहाँ
मैंने कहा मैं सुदर्शनलाल जी का पुत्र हूँ
हमारे श्यामा घोड़ी थी
वहाँ मैं चलकर गया
जहाँ वह अब नहीं थी
कभी बँधती रही हो शायद
हमारे घर के पीछे अनार के पेड़ थे
खिड़कियों तक लाल फूल वाले
वहाँ कुण्ड था पीछे
स्फटिक की तरह चमकती सीढ़ियों वाला
दो बहने
मैंने दूर से देखा था जिन्हें
लाल चूनर वाली-वे
वह अचरज से यह वृत्तान्त सुनता
मुझे देखता रहा
आप बहुत दिनों बाद आये हो
शायद
22 :: उत्सर का निर्मम समय
antan
-and
RA
हमारे रहते-रहते भी-
शहर वदल जाते हैं इतने
कुछ बदलता हुआ नजर नहीं आता
जब हम इतनी जगह रुकते हों
पूछते हों अपने पुराने घर
उत्सव का निर्मम समय ::23
वे सोये तो नहीं होंगे
वे सोये तो नहीं होंगे
इतनी बाते हैं
इन दिनों उन्हीं से सम्बन्धित
उनके पास रास्ते ही कौन से हैं
कहाँ जगह ?
सोये तो नहीं होंगे
सड़क के बीचों बीच
मरने के लिए
चचा-पुचा जीवन
व्यर्य नहीं है
वे सोये तो नहीं होंगे
24: उत्मा का निर्मम समय
तरतीब से रखता हुआ
इस तरह मैं विचार करता
बचता रहा
वह बुरा आदमी नहीं है
शायद वह बुरा भी हो
लेकिन बुरा तो हो ही सकता है
अगर आदमी है
उसके धनवान होने के सम्बन्ध में
मै सोचता रहा
परिश्रम से ही मिला होगा
उसे वह धन
न भी किया हो परिश्रम
बुद्धि होगी
न भी हो बुद्धि
भाग्य होगा। न कुछ हो
और धन हो
दिया हुआ या अर्जित
तब भी
मैं अपने सम्बन्ध में
सोचता हूँ। उससे मिलाकर
अर्जित करने के सम्बन्ध में
भाग्य के सम्बन्ध में, बुद्धि के सम्बन्ध में
परिश्रम के और कर्मफल के सम्बन्ध में
उसका मेरा सम्बन्ध
निराशा और मायूसी के
उत्सव का निर्मम समय :: 25
बीच से गुजरता
है
वह मुझे देखकर चला जाता है
एक पुराना मुड़ा हुआ काग़ज्ञ
फाड़ कर
मैं उसे देख कर
अपने चिथड़े हुए कोट की जेब में
हाथ डाल कर
दुनिया के सम्बन्ध में सोचता हूँ
में जैसा चाहता हूँ उसे बनाना
तरतीय से रखता हुआ
एक के बाद एक उम्मीद
6:Tणा का निर्मप ममर
स्वतन्त्रता-संग्राम का सेनानी
वह स्वतन्त्रता-संग्राम का पुराना सेनानी था
उसने कबाड़ से अपने तेजस्वी दिनो की
तस्वीरें निकाली
रपटें जो उन दिनों छपी थीं
वह फ़ाइल
घबरा कर उसने उस मकड़ी को देखा
नहीं, उसके गिरफ़्तार होने के सर्टीफिकेट
असुरक्षित नहीं थे
वे उस मटमैली टोपी में तह किये रखे थे
जहाँ से वह आठ टॉगवाली
आक्रामक मकड़ी
भागी थी निकल कर
नहीं, पहले कुछ नही
अब काँपने लगी हैं अँगुलियों
बार-बार नाक पर ऊपर
करते हुए चश्मा
नही, पहले कुछ नहीं
अब कितना मुश्किल है
साफ-साफ़ छपे
बड़े-बड़े अक्षरों में दगकते
उन शब्दों का पढ़ना
स्वतन्त्रता वगैरा
उत्सव का निर्मम समय :: 27
AIR
कचहरी के मुंशी ने
इधर-उधर से फ़ाइल देखी
स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानी का
चेहरा-मोहग
पूटा अय क्या सोचते हो
उगने चोरते हुए लगभग चिल्लाते हुए करा
साहय ! अय आपण राज आ गया है
:: गापा निर्मम ममर
दुःख जब नज़र आता है
दुःख जब नज़र आता है
तब भी नज़र नहीं आता
एक आशा बनी रहती है
अजीब-सी
दुःख के लिए ही लिखी है
हिम्मत न हारने की सूक्ति
दुकानों की सजावट से
मालूम होने लगता है
कितने प्रकार के
मुझको और देश को
दुःख देखने हैं
दुःख के अन्तिम दिनों में
फाँसी या आत्महत्या की
इच्छा नहीं होती
मुक्त होने या उठने की
इच्छा होती है
दुःख में ही इच्छा होती है रचने की
भापा को इस तरह कि
उसकी हद खतम हो
सहिष्णुता या विनम्रता की
रहस्य न बचा रहे
जिसे जानने के लिए
कोई लालायित हो बाद में
जो फिर दुःख का कारण बने
उत्सर का निर्मम समय :: 29
आख़िरी टैम्पो में
उसका मुँह अच्छी तरह नहीं देखा
जब वह टैम्पो मे चढ़ी
वह सिकुड़ कर बैठी रही
कोई सट कर न बैठे इस उम्मीद में
सव सट कर बैठे थे
नागरिक जन
चरित्र/उजले कपड़े वाले
जब वह टैम्पो पर चढी
मुझे कुछ भी नजर नहीं आया
हॉफती हुई घबराहट
जो प्रायः माँ को होती थी
सीने पर रखा हाथ
जिसकी फूली हुई नसें
दूर से दिखाई देती
उसके चेहरे पर सिर्फ
लम्बी नाक थी
जो मुझे नजर नहीं आयी
जब वह टेम्पो पर चढ़ी
अय जिन्दगी इतनी बेरहम हो गयी है
सौन्दर्य रहित
में उग स्त्री के सम्बन्ध में सोचता हूं
जब वह मेरे मामने होती है
एर गर्ग की तरह बेटी हुई कहीं भी
गिर्ग टैम्पों में
गत मीटती
n:पाना निमम मगर
अपने उदास बच्चों के लिये
सही सलामत
चुपचाप
कोई कुत्ता भी न भौंके
इस तरह सुवह हो
और लगे कि
बहरहाल किसी दंगे-फसाद में
मारी नही गयी
उत्सव का निर्मम समय :: 31
हर वृहस्पतिवार को
मै तुम्हारा चन्द खिड़कियाँ खुलने तक
इन्तजार करता
यह केसा घर है कितना सुनसान
ब्राह्मणों का घर पवित्र और डरावना
साल-दर-साल
वसन्त में एक चिड़िया आती थी
पुराने नेम मे लगी
तस्वीर पर चोच मारने के लिए
उन दिनों वाली वह विकल चिड़िया
जब भी आती में खिड़की खोल देता
एक उदास दिन की सांझ
वचती थी दिगन्त में
खिड़की खुलते ही
इस ऐश्वर्यशाली घर की
सब दरारें नज़र आने लगती
ऊपर तक आच्छादित जाले
जीर्ण और रंगविहीन छत
वाहर पत्ते रहित निर्वान पेड़
दिन बदल गये हों शायद
पूरी दुनिया के
मैं जल्दी-जल्दी चढ़ता
अपनी छत पर
वही से दिखती
32 :: उत्सव का निर्मम समय
वृहस्पतिवार के हाट से लौटतीं
स्त्रियाँ
गठियावात से बेहाल
हर वक्त ठिठुरती, नंगे पैर
इतने से सामान से सन्तुष्ट
पुरुप सिर झुका कर चलते
जेब में रखते
कपड़े में बँधे वीज
आने वाली फ़सल के लिए
ये कौन-सी स्त्रियाँ हैं
कौन-से पुरुष हर वार चलते
थोड़ी ढीली पंडलियों से
कुछ पहले से धीमे गातीं
इन रास्तों पर
हर बृहस्पतिवार को
मैं चुपचाप तुम्हें देखने को
खिड़की खोलता
कहीं पूरा मोहल्ला ही तो देख सुन नहीं लेगा
जहाँ सन्नाटे में
गुजरती हैं दीप्तिहीन तरुणियाँ
अपनी पतली कलाइयो से पकड़े
पानी भरे गगरे
शाम को निकलते
धैंसी ऑखों वाले छैले
ताजा मोगरे की फूलमालाएँ पहने
रेशमी रूमाल वाँधे
दारु पिये
उत्सव का निर्णम समय-33
किसी फ़िल्म में
पिटी लड़की का गीत गाते
खिड़कियाँ बन्द करते ही
तुम चली जाती
हजारों मील के फासले पर
तन्हा बर्फ में लिपटी चिड़िया की तरह
सफ़ेद और कॉपती
l
मैं तुरन्त उस अँधेरे और
प्लास्टर गिरे घर में
अपनी पुरानी लालटेन जलाता
सात रंगों वाली लालटेन
देखता कि वहाँ फिर से
चमक गयी हैं
गाँव की वे सब स्त्रियाँ
जो बृहस्पतिवार के हाट से लौटती हैं
बची हुई सूरज की रोशनी में
अपने गॉव की तरफ़ देखती
कुछ पहले से ज़्यादा उदास
और धीमे से गाती
कोई पुराना गीत
पहले टुकड़ों में फिर एक साथ
मिलाकर
अब वे दिन नहीं हैं
और खिड़कियाँ भी खुली हैं
लेकिन इन चौखटो पर
वृहस्पतिवार की थकी स्त्रियों
अव तक क्यों खड़ी हैं?
34 :: उत्सव का निर्मम समय
हवा-1
बात करती है हवा
स्थिर, शान्त काल-चक्र से
ध्वस्त खाक-धूल हुए इतिहास से
है।
pre ending
HE
कोई बोलता नहीं
हिलता है
जरा-सा पत्ता, पूरा वृक्ष
अनन्त तरंगों वाला समुद्र
निमिप और अनन्त लौट आते हैं
ऐसे ही लौट आएगी हवा
आकाश में सब कुछ उड़ाती हुई
तब जो बचेगा
छितराया हुआ धुंआ या आलोक
वही मैं खड़ा रहूँगा
इस तरह हवा में से हवा को देखता हुआ
उत्सव का निर्मम समय :: 35
हवा-2
.
चलती है हवा
दिगन्त कॉपते है
कोई नहीं वचता
नीचे गिरते पत्ते
फल, विखरते
हुए बादल
सब हवा के खेल हैं
नगारा बजाती है हवा
समय का
इकट्ठे हुए लोग
एक-एक सीढ़ी उतरते हैं
फिर दालान और गली
गॉव और शहर
सब बदल जाते हैं
हवा में उड़ती हैं पताकाएँ
आतंक से कॉपने लगती हैं
काली, हिंन पहाड़ियाँ
सब को कहती है हवा
यहाँ से शुरू करो
शुरू करो यहाँ से
36 :: उत्सव का निर्मम समय
हवा-3
पिताजी!
वन्द कर लें खिड़कियाँ, दरवाजे
हवा ठण्डी है बर्फीली
युद्ध नहीं करती है हवा
फिर भी मफ़लर बाँध लेंगे लोग
अपना गला बचाने के लिए
खिड़कियों पर गर्द फैली होगी
अंकित होंगे भय के पंजे
छोटा-सा फूल
देखेगा हवा को
बाधा रहित उड़ेगी चिड़िया
अँधेरे से लड़ती है हवा
पेड़ों के बीच गाती
वसन्त के उन्मत्त गीत
अकाल का आर्तनाद
हवा हमारे सुख के दिन
बुलाती है
पहाड़ों पर पलाश दहकता है
चमकते हैं दिन
उत्सव का निर्मम समय :: 37
दीपित शिखर
वसन्त मेरा सहचर है
सखा
धूल-धूसरित वीथिकाएँ
नगर और वसन्तसेना
सव कथा है
बीत कर चली जाने वाली
आँधी की तरह अनन्त में
वसन्त एक खिलखिलाती नदी है
उत्तप्त
पत्तों का रंग
कितने रंगों से बना है
क्लान्त पृथ्वी के लिए
दुःख फिर लौट आये तो आये
एक दीपित शिखर पर
खड़ा रहूँगा पलाश की तरह
यहाँ से वहाँ तक देख लूँगा
विलीन होती हुई धूप-छाँह
38 :: उत्सव का निर्मम समय
फ़ैन्सीड्रैस कम्पिटीशन
फैन्सीड्रेस कम्पिटीशन में
मिक्कू विवेकानन्द बना
सब खुश थे
मैं और मिक्कू के माता-पिता
चलो विवेकानन्द बन गया
जब ड्रैस-वैस पहन कर आया
तब सब खुश
एक दम विवेकानन्द
कहीं से भी नहीं रहा मिक्कू
और भी लड़के बने थे
जोगी, जती-संन्यासी
जव कम्पिटीशन हुआ
तब न विवेकानन्द का नाम था
न जोगी का, जती-संन्यासी का
कोई जो सिकन्दर बना था
उसी के नाम पर तालियाँ बजी
जोगी, जती-संन्यासी और
मिक्कू विवेकानन्द तक ने तालियाँ बजायी
हमने फ़िजूल ही बनाया विवेकानन्द
ऐसा पछतावा करते रहे
मिक्कू के मम्मी-पापा
उत्सव का निर्मम समय: 39
छतरी वाला आदमी
बारिश तेज थी
मेरे पास छतरी नहीं थी
मैं पास वाले आदमी तक गया
जो मुझे सभ्य और उदार लगता था
उसकी छतरी पुराने किस्म की थी
ज्यादा बड़ी और रंगीन
मैने कोशिश की
वह मेरी ज़रूरत समझे
न बोलूँ तब भी
मै दूसरे आदमी के पास गया
उसकी छतरी आकर्पक थी
आधुनिक और बटन दबाते ही खुलने वाली
वह मेरी लाचारी पर खुश हुआ
तीसरी छतरी वाला
संन्यासी जैसी मुद्रा में खड़ा था
वह आकाश की ओर देखता था
और जल्दी में था
उसने मुझे नहीं देखा
40 :: उत्सव का निर्मम समय
SHREE NIREED
अन्त में
सिर्फ एक छतरी बची थी
फटी और जर्जर
उस भीगते हुए आदमी के पास
मैं ही नहीं गया
उत्सव का निर्मम समय:41
वचा रहा
एक बार कहा था तुमने
जिसे मैं समझा नहीं
विवेक से या विचार से
यह वर्जित फल था
अग्नि शाखा पर
पका-अधपका
तुम्हारे स्पर्श से ही
उसमें रंगों का
समुद्र उफन गया था
तुम्हारे स्पर्श से ही
लय का
वह कौन-सा शब्द था
जिसे बहुत पास आ कर कहा था
बच रहा वही सुख
हरे पत्ते की तरह
मृत्यु और महाप्रलय मे
2:: उत्सव का निर्मम समय
विदा दो
शिशिर की धूप मे ही
बैठा हुआ हूँ
झुका हुआ है पूरा वृक्ष
ठिठुरन से और
पुष्पभार से
नया होने के लिए
यहाँ वहाँ सरक कर
जाती हुई धूप
हवा की सीढियों पर
धैठी हुई है शाम
मिल गये होंगे थकी चिड़ियों को
अपने पेड़
अगली सुबह तक
विदा दो
जिनके पास कपड़े नहीं हैं
विदा दो
जिनकी रोटियाँ ठण्डी हो गयी हैं
जिनकी बिवाइयों के लिये
मरहम नहीं है
उन्हें विदा दो
उस थोड़ी-सी धूप के लिए
उत्सव का निर्मम समय :: 43
चुन्नू का खेल
चुन्नू अकेला खेलता है
दूसरी तरफ़ कोई नहीं होता
प्रतिपक्ष में
फिर दूसरी तरफ आकर खड़ा हो जाता है
दौड़ने लगता है
गेंद भी नहीं होती
वल्ला घुमाता है तब भी
एक नजर न आने वाली
गेंद की तरफ़
ऐसे भी कोई खेल चलेगा चुन्नू
पहले खड़ा करो उधर कोई
कोई तो भी प्रतिद्वन्द्वी
फिर गेंद-बल्ला
और भागो
इस तरह गिर पड़ता चुन्नू
गेंद का पता नहीं होता
तो भी
फिर खड़ा हो जाता है
देखा भी हो किसी ने
न भी देखा हो
जब बड़े हो जाओगे चुन्नू!
तव अचरज करने के लिए भी
समय नहीं होगा
तुम ऐसे भागे, गिरे
हवा में उड़ती, उछलती गेंद के लिए
44 :: उत्सव का निर्मम समय
M
शायद उस समय का
निशान बच जाए कोई
खरोंच का
या पैर मुड जाने का दर्द
जब बादल आएँ
या शान्त हो चुका हो सब
बच्चे विकिट समेट कर चले जाए
और खेल के मैदान में
कुछ भी नज़र न आए
उत्सव का निर्मम समय::45
उत्सव का निर्मम समय
किसी भी दिन
मैं देखूगा तुम्हारा चेहरा
जिस पर उत्सव के दिन वाली
उदासी का विवरण लिखा मिलेगा
अब उत्सव के दिन होते हैं
सब से अधिक व्यर्थ
चोर की तरह ले जाने वाले
एक स्मृति वची-वचाई
उत्सव में कौन आएगा
वसन्तसेना, वासवदत्ता
माइकल जैक्सन, चिदम्बरम
या जंगली सूअर
वह नहीं आएगी क्या
विश्व-सुन्दरी
क्या तो भी
नाम है जिसका
उत्सव के आतंक में
गाँव पतझड़ के पेड़ जैसा
46:. उत्सव का निर्मम समय
दरिद्र और निस्पृह हो गया है
औरतों के कंधों पर नंग-धडंग
बच्चे बैठे हैं
लज्जा से
अपनी नुन्नी दोनों जंघाओं में छिपाये
दिल्ली कहाँ है जहाँ उत्सव है
वहीं राष्ट्रपति हैं
राष्ट्र कहाँ है
उसकी आँखों में सूर्य-चन्द्रमा हैं
खेतों पर पड़ी दुःख की लम्बी छायाएँ
रोटी के आकार का राष्ट्र
बची-खुची आकांक्षाओं का उत्सव है
वे थक गये हैं
उत्सव के एक दिन पहले
सड़क पर गाँव वाली लड़की की लाश मिली थी
बच्चे को चिपकाये अपने स्तन से
उत्सव के एक दिन पहले
लड़कियों ट्रक में भर दी गयी थीं
वध-स्थल पर ले जाए जाने वाले
मेमनों की तरह
कौन-से उत्सव से आयी हो
वसन्तसेना!
कौन-सा उत्सव है
इन दिनों
इस अँधेरे की राजधानी में
जरा धीरे चलो, प्रिय!
धीरे चलोगी तभी नज़र आएगा
उत्सव का निर्मम समय :: 47
यह वीरान
और तुम्हारे पार्श्व में
तुम्हारे साथ-साथ
चलने वाला
उत्सव का निर्मम समय
48 :: उन्मर का निर्मम समय
साहब-1
तुम लोग समझते नहीं हो
यह कहकर साहब किंचित
खिन्न हुआ
हँसा भी
साहब को खिन्न देख कर
हम भी किंचित खिन्न हुए
हॅसता देख कर हेंसे
साहब ने कहा-तुम लोग समझते नहीं हो
यह कहकर साहब अन्दर चला गया
बहुत देर बाद लौटा
एक बड़ी फ़ाइल उठा कर लाया था साहब
इस बार कुछ ज्यादा ही विचलित होते हुए
उसने कहा
यही तो दिक्कत है तुम लोग समझते नहीं हो
यह वात दुवारा या तिवारा कही थी
साहब ने
इसलिए हम अपनी कम समझ के बारे में
समझने की कोशिश करते बाहर चले गये
दूसरे लोग जब साहव से मिलने गये
उसने हमारी बहुत प्रशंसा की
उसने कहा, वे बहुत समझदार थे
उत्सव का निर्मम समय :: 49
साहव- साहव को देख कर हम दंग रह गये उनकी मूंछे विल्कुल अलग तरह से तराशी गयी थी पहले जैसी नहीं यहादुर रण-याँकुरे की सी ऊपर की तरफ़ मुड़ी हुई साहब का मनोबल ऊँचा था उसने हमे आदर दिया उसकी टेबल पर इस बार दूसरी तस्वीरें लगी थीं जिनकी तरफ़ वह बार-बार ललचायी नजरों से देखता था दूसरे रंग की जिल्द वाली पुस्तकें दूसरा लिबास साहब ने जैसे आत्मालाप करते हुए कहा 'वंडरफुल पीपुल' फिर हमारी तरफ़ मुखातिब होकर 'सफ़ाया हम झुके और साहब की तरफ देखा उसने विनम्रता के साथ हमें बाहर धकेला और दरवाज़ा बन्द कर लिया 50 :: उत्सव का निर्मम समय
आह! वेनसाँग
पारिजात के वन वारूद की सुरगों मे धधक रहे है
प्रत्येक देवदारु के नीचे मृत्यु निःशंक खड़ी है
हवेनसांग क्या तुम इन्ही मार्गों से भारत आये थे ।
इस पीढी के बालकों ने इतिहास के उन पृष्ठों को फाड़ दिया है
जहाँ तुम्हारे देश का नाम लिखा है
तुम्हारी आकृति पर न जाने किन काले-पीले या नीले
रंग के चिह्न अंकित कर दिये हैं
आह स्वेनसॉगउन्हें यह समझाना कठिन हो गया है कि
तुम कोई आक्रान्ता नहीं थे
यायावर थे
सुनो स्वेनसाँग! घृणा विष है
और वह फैल रहा है
युवक इन दिनों प्रेम, शृंगार और युवतियों की बातें
नहीं करते हैं
वयस्क और वृद्ध तेज चलते हैं
तीखे बोलते हैं और अकारण छड़ियाँ घुमाते हैं
युवतियों कुछ भिन्न प्रकार से जूड़े कसती हैं
जनता अनभिव्यक्त व्यथा
आक्रोश और प्रतिशोध
उत्सव का निर्मम समय::51
मुट्ठियों तान-तान कर व्यक्त करती है
बुद्ध को सब श्रद्धा से नमस्कार तो करते हैं
लेकिन बन्दूक चलाने की दीक्षा लेते हैं
क्योंकि वे छले गये हैं।
आह ह्वेनसाँग! माओ-त्से-तुंग ने सेतु नहीं बनाये हैं
उन्होंने इतिहास की निरर्थक सरणियाँ दुहरायी है
क्योंकि उन्हें यह नहीं मालूम कि इतिहास की
स्याही रक्त नहीं है
हिन्दुस्तान ने युद्ध लड़े है, वेनसांग !
किन्तु वे युद्ध ही थे
अव युद्ध और घृणा दोनों है
युद्ध याद नहीं रहते
लेकिन घृणा घायल सर्प है
जो इतिहास के द्वार पर वार-बार
आहत फन पटकता है
और जनता शस्त्र उठाती है
तुम भारत से अपरिचित नहीं हो ह्वेनसाँग
उसका आकाश अभी भी स्वच्छ और नीला है
लेकिन भविष्य की अनेक पीढ़ियो की शिराओ में
यह जो का रक्त बहेगा
उसका दायित्व कौन सॅभालेगा
दुःख है, स्वेनसाँग जब बन्दूक उठती है
लोग बुद्ध को भूल जाते हैं
-भारत-चीन
युद्ध के समय लिखी कविता
52 : उत्सव का निर्मम समय
कोई दुर्घटना हुई है
लोग उदास क्यों हैं
क्यो चल रहे हैं लँगड़ाते हुए
दवे सहमे
शब्द रहित
कोई दुर्घटना हुई है
कोई पेड़ सूख गया है क्या सहसा?
सहसा कोई नदी प्रवाहरहित हो गयी है।
कोई जलाशय डूब गया है
अतल अन्धकार मेर
कुछ तो हुआ ही है मेरे भाई! कुछ तो
तो देव ही गया है इन पत्थरों के बीच
पत्ते एकदम रक्तहीन हो गये हैं, भूरे
ऋतुओं के हरे पत्ते
वादलों का जल मैला हो गया है
लड़के खामोश है
हिरणियो की तरह उछलती लड़कियाँ
रेंगती हुई चलती हैं, बीमार और शोक में डूबी हुई
हो तो गमा ही कुछ वर्षों का बीत जाना
एक-एक दिन मिट्टी में मिल गया है
उत्सव का निर्मभ समय::53
एक-एक ना नि यी माशी में बनायी
सन्नाटे में गागारागी ।
जमीन में गाने के लिए
कोई चीज गगा ना
अगनी पाना के सारे गुरनं
मृट और फरेब की बात में ये है
सवालों के उत्तर
अफसरों की जेब में हैं
घोड़ा पूंट हिलाता बाजार में राड़ा है
युधिष्ठिर महाराज! आपका स्थ
एक वालिश्त
जमीन में उतर गया है
ऐसा समय है
विल्कुल रुका हुआ
(तो भी) पेड़ों पर हवाओ का दवाव है
जल काँपता है थोड़ी-थोड़ी देर याद
शायद सारी ऋतुओं की मृत्यु नहीं हुई है
मेरी कविता!
सूर्य जब तक शेप है
तुम रोशनी का हिस्सा बनी रहो
मेरी कविता! इतिहास जब
निःशब्द होने लगे
तव तुम एक सार्थक शब्द बनो
चाहे हवा, चाहे आकाश, चाहे अग्नि
54:: उत्सव का निर्मम समय
मृत्यु पर माँ की
तुम मरी नहीं
मर कर भी
तुम अपनी तर्ज पर जीती रहीं
अपनी धुन राग-लय
गाती, बनाती
चुपचाप तुम देखती थी
खिड़कियों से
जाती हुई सर्दियों
आती हुई वसन्त की
नयी कोपलें
छोटे-छोटे फूल
फिर जो बड़े हो जाते
आकार लेते फल
लौट कर तुम्हारे
मन में
फिर जीवन की अग्नि
धधकने लगती
इस वार भी तुम
उत्सर का निर्मम समय::55
किंचित भी खिन्न नहीं थीं
जव यमदूत
आ गये थे
सारी पृथ्वी
पलाश की तरह
धधकती रही
अग्निवर्ण चन्द्रमा के प्रकाश में
तुम्हारा दाह-कर्म कर के
में लौट आया था
56 :: उन्सर का निर्मम समय
आतंक
उसने एक कविता लिखी
राष्ट्रभक्ति की
जब वह पढ़ी जाने लगी
तब वे सब लोग खडे हो गये
दुबले-पतले, काले-कलूटे, भूखे,
अनपढ़
उम्मीद के खिलाफ़
वे खड़े हो गये
तब अफसर ने कवि के कान में कहा-
इसे न सुनाएँ
यह कोई कविता नहीं
कवि डर कर बैठ गया
या यह अफ़सर का
आतंक था
लेकिन कभी-कभी इस तरह भी होता है
कविता का अन्त
उत्सव का निर्मम समय :: 57
शिशिर-1
पहाड़ की पीठ पर बैठा है।
शिशिर का सूरज
हाट-बाजार से दिन रहते
घर पहुंचने की जल्दी में हैं सय
वे भी
जिन के नजदीक हैं घर तो भी
नदी के पश्चिम मोड़ पर
हवा से बात करने के लिए
रुकी हुई है दिवसान्त की आभा
घुर्र-धुर्र करती रुक गयी है
गाँव को जाती
आख़िरी वस
एक उदास प्रतिध्वनि के साथ
कन्धों पर उनकी यात्राएँ अभी भी हैं
जो उन्होने निश्चित नहीं की थीं
किसी भी दिन नहीं सोचा
वे व्यर्थ गयीं
या यह कि वे सतरंगी होती
खुले रास्तों पर
चन्द्रमा के साथ
धीरे-धीरे विस्मय और अन्दाज़ से चलते
मुकाम पर पहुंचे तब
58 :. उत्सव का निर्मम समय
IND- .. HAPA 100051 Tex GENTL. डरी ठिठुरती चिड़ियाँ उन्हें पहचान कर वृक्षों पर लौट गयी थीं लोग वे ख़बरें सुन चुके थे वही बार-बार उस तरह की उस तरह की जव उद्घोषिका कहती थी- वर्फ़ पड़ने के बारे में फिर थोड़ी सुन्दर लगती शुभरात्रि उत्सव का निर्मम समय :: 59
शिशिर-2
शिशिर ने माँ से कहा
लीलावती किवाड़ खोलो
सूरज की किरणों का
कोट पहने खड़ी थी हवा
धुंध की छोटी-छोटी डोरियों से बना था
सुनहरी रोशनी का मण्डप
दुपहर से शाम तक
वृक्षों के बीच
निश्चित सोया था दिन
मॉ छत पर गयी
सुखाई हुई दाल समेटने के लिए
चिड़ियाँ जिन्हें चुगती-चुगती
उड़ गयी थीं
शाम के रंग जिनके पंखों पर
चमक कर
विलीन हो गये थे
पीले पत्तों का ढेर आँगन में लगा था
शिशिर जब बीत जाएगा
लम्चे दिन होंगे
पेड़ों की रोशनी-छायाओं से लिपटे
माँ अपना पुराना स्वेटर रखेगी
जतन से सन्दूक में
60:: उत्सव का निर्मम समय
प्रेम के बारे में
हवा से मैंने प्रेम के बारे में पूछा
वह उदास वृक्षों के पास चली गयी
सूरज से पूछा
वह निश्चित चट्टानों पर सोया रहा
चन्द्रमा से मैने पूछा प्रेम के बारे में
वह इन्तजार करता रहा
लहरों और लौटती हुई पूर्णिमा का
पृथ्वी ही बची थी
प्रेम के बारे में बताने के लिए
जहाँ मृत्यु थी और जिन्दगी
सन्नाटा था और संगीत
लड़कियाँ थीं और लड़के
हजारों बार वे मिले थे और कभी नहीं
समुद्र था और तैरते हुए जहाज
एकान्त था और सभाएँ
प्रेम के दिन थे अनन्त
और एक दिन था
यहाँ एक शहर था सुनसान
और प्रतीक्षा थी
उत्सव का निर्मम समय:: 61
यहाँ जो रह रहे थे कहीं चले गये थे
थके और घोझा ढोते
जो थक गये थे लौट आये थे
यहाँ राख थी ओर लाल कनेर
प्रेम था और हाहाकार
62 :: उत्सव का निर्मम समय
कविता तुम सार्थक रहो
हाहाकार करते समय के पास
दुःख का पेड़ खड़ा है
वहीं से तोड़ता हूँ तुम्हें देता हूँ
सारे कसैले, कड़वे
कैंसर की तरह जीम, तालू, कण्ठ
वक्ष, नाभि, पूरा रक्त, पूरी त्वचा को
आग की तरह जलाने वाला फल
कितना डर लगने लगा है
यह कहते
तो यहाँ बैठी इस सघन पेड़ की छाया में
चिन्ता रहित रहने दो मन
गिरने दो पहाड़ों पर मूसलाधार पानी
नहीं, नहीं यह कौन कहेगा
मर्द दिन भर हिसाव लगाता है
कौड़ी कोड़ी का
औरत बूंद-बूंद तेल के लिए तरसती है
तड़का पिता को बेहिसाव गालियाँ देता है
लड़की दाँतों के बीच जिन्दगी की रेत पीसती है
सत्ता की कुतिया मक्खियों से घिरी है
फ़ाइलों में उसकी लटकती दुम पर
शोध-कर्ता, मीमांसक, तत्त्ववेत्ता, दार्शनिक
कवि विमुग्ध-मूर्छित हैं
उत्सव का निर्मम समय:
यहां जो रह रहे थे कही
थक और वोझा टोते
जो थक गये थे लीट आ.
यहाँ राख थी और लाल ,
प्रेम था और हाहाकार
62 :: उत्सव का निर्मम समय
छोटी चिड़िया : तीन कविताएँ
1.
छोटी चिड़िया
यह तुम्हारा वर्प है
हमने जब सब कुछ तुम से
ले लिया है
तुम्हारी जमीन, हवा
जंगल, वृक्ष, आसमान, चुग्गा, पानी
शब्द और बोली
तव तुम्हें दे दिया है यह वर्प
छोटी चिड़िया
हमारी दुनिया निपट पाप की है
हम भेड़ियों का मुख लगाये
कीर्तनकार हैं
हमे कुछ भी याद नहीं
अपने समय की धूप-छाँह
हवा-जल
गीत, कविता और सपने
अपने ध्वस्त वर्तमान के नख से
उत्सव का निर्मम समय :.6-
इस देश में-हमारे लक्ष्मी-प्रिय देश में
चप्पा-चप्पा भूमि व्यवस्था के दलालों ने
अपनी जीभ के नीचे रख ली है
राज-सिंहासन पर बैठे वे
हमें बग़ावत के लिए घासलेट देते हैं
सिपाही को बन्दूक
लम्पटों को बोलने की जगह
फसलों की गन्ध के लिए
तरसते घूमते हैं लोग
नदियों मे अन्धाधुन्ध पानी
मौत के लिए कोई जगह नहीं छोड़ता
आरामदेह कुर्सियो के नीचे
अफ़सरों का जूता और जनता का भाग्य है
वाजार के बीचोंबीच मृत्यु-रथ खड़ा है
इर दुर्घटना के लिए उनके पास तर्क है
हर हिमपात मे वे सुरक्षित है
सारे नरक दूसरों के लिए हैं
मेरी कविता ऐसे खिन्न तथा निष्फल समय में
इस अन्धकार के ठिठके हादसे के इर्द-गिर्द
एक गर्म शब्द, ईट, पत्थर
किसी भी तरह रहो
यह त्वचा बचाने का समय है
अलंकरण का नहीं
मेरी कविता! ऐसे समय जब
आदमी असहाय हो
तुम सार्थक रहो, शस्त्र रहो
64:: उत्सर का निर्मम समय
।
छोटी चिड़िया : तीन कविताएँ
1.
छोटी चिड़िया
यह तुम्हारा वर्ष है
हमने जब सब कुछ तुम से
ले लिया है
तुम्हारी जमीन,
हवा
जंगल, वृक्ष, आसमान, चुग्गा, पानी
शब्द और बोली
तव तुम्हें दे दिया है यह वर्ष
छोटी चिड़िया
हमारी दुनिया निपट पाप की है
हम भेड़ियो का मुख लगाये
कीर्तनकार है
हमें कुछ भी याद नहीं
अपने समय की धूप-छांह
हवा-जल
गीत, कविता और सपने
अपने ध्वस्त वर्तमान के नख से
उत्सव का निर्मम समय : 65
तुम्हारे सारे पंख नोंच कर
तुम्हे लौटा दिया है यह वर्ष
छोटी चिड़िया
वाज के पंख और पंजों से
आच्छादित है आसमान
और मेरा मन विल्कुल नहीं बदला है
यह वर्प तुम्हें देते हुए भी
66 :: उन्मय का निर्मम समय
2.
छोटी चिड़िया
तुम्हारे पंखों में बँधा है आकाश
तरंगवती नदी
तुम जव उड़ोगी या बैठोगी
किसी डाल पर
निडर
तभी चुपचाप आएगा व्याघ्र
और मृत्यु
छोटी चिड़िया
तुम शायद कभी नहीं सुनोगी
इस सभा-गृह में पढ़ी गयी
यह शोक कविता
तुम तक नहीं पहुंचेगा
आकाश का दुःख
नदी का रोना
पेड़, पत्तियो, वन-वनस्पति का क्रोध
छोटी चिडिया
कोई भी हो व्याघ्र या कि व्याध
भेड़िया या बिल्ली
थे अब काँपेगे इन रास्तों पर चलते हुए
जहाँ तुम्हारे कोमल पंख विखरे
धधकती हुई अग्नि की तरह
उत्सव का निभ समय : 67
3.
छोटी चिड़िया
जिस किसी दिन तुम
उड़ती-उड़ती सूर्य-रथ की ध्वजा पर
जा बैठोगी
उस दिन
यहाँ पृथ्वी पर तमाम गुलमोहर
झुलस जाएँगे
हवा कॉपती रहेगी
वृक्ष-पत्तों पर
छोटी चिड़िया जो कुछ यहाँ रह गया है
रूप, रस, गन्ध और शब्द
वह सब तुम्हारे पंखो का सगीत है
तुम्हारे पंखों में बँधे है
रोशनी के पुल
सपनों के द्वीप-द्वीपान्तार
ऋतुओ का पदचाप
फूलो का जुलूस
यहुत छोटी होती हुई दुनिया में
तुम्हीं होती हो
उद्दाम यात्रा की तटहीन नदी
एक स्मृति
अन्तहीन विस्तार वाला आकाश
68 :: उत्सव का निर्मम समय
अन्धकार होने के पूर्व
कितनी देर हो गयी है
जल्दी करो कुछ तेज भी चलो
अन्धकार होने के पूर्व वहाँ पहुँचो
नहीं तो वह नदी की धार
तेज़ हवा में उछालें मारता जल
दिख नहीं पाएगा
मैंने किसी से कहा नहीं
और आज भी कहने में
निर्लज्जता ही है अपनी आत्मा का भेद
और वे स्वप्न जिन्हें सूर्य तक को
देखने नही दिये मैंने
वे सब वहाँ हैं
उन सब को देखकर यह लगता है
जैसे उनकी प्रार्थना हमारे लिए है
धे हमारी स्वप्न गाथा लिख रहे हैं
मुझे कहना नहीं था
लेकिन मुझे भय है
अँधेरा होने के साथ
तुम यह देख नहीं सकोगे
यह उपासना-गृह नहीं
यह सरकारी कार्यालय है
जरा जल्दी करो
यह चक्की खुरदरा आटा पीसती है
यहाँ तमाम प्रार्थनाएँ बदशक्ल हो जाती हैं
उत्सव का निर्मम समय :: 69
तुम से मैने कहा तो नहीं था
लेकिन तुम्हारी हमारी यात्रा का
सिर्फ एक ही सिलसिला
एक ही अन्त था
गरम रेत में हमारे झुलसे हुए तलवे
आयु के इस उत्तरार्ध में
जब तुम्हे शायद आशा भी नहीं होगी
हम मिलेंगे-मिले
और यह कैसी सान्त्वना है
तुम्हें देने के लिए मेरे पास
अब केवल 'हिंसा' का शब्द है
कितने क्षीण प्रकाश वाला
चन्द्रमा यहाँ है
मैं कहता हूँ जरा जल्दी करो
कुछ तेज भी चलो
अन्धकार होने के पूर्व
70: उत्सव का निर्मम समय
सड़क-नदी नहीं है
यह शोक-विह्वल क्रुद्ध सड़क है
खड़ा रखती है कोई भी
ऋतु
हो
मैं जानता हूँ दुर्घटना और सुयोग
दोनों यहीं होंगे
यहीं अघटित घटेगा
राज-सिंहासन पर बैठे लोगों के
पैरों में कील यहीं चुभेगी
जिन्हें प्यार होगा देश के भाग्य से
यहीं होंगे
रंग नहीं बदलेंगे
गले में नहीं होगा यज्ञोपवीत
रसदार फलों से भरी गाड़ी के पीछे
भिखमंगों की तरह नहीं दौड़ेंगे
वे ही सिंहासन पर बैठेगे
जाएगी जरूर वहाँ तक एक दिन सड़क
इस अंधेरे के बीच से गुजरती हुई
सूरज की प्रभामयी लाल आँख तक
बुद्ध डर गये थे
मृत्यु का वृक्ष हथेली पर रखकर
ढूँढ़ते फिरे जंगल-दर-जंगल
छाया-सुख और मोक्ष
उत्सव का निर्मम समय ::71
अब जो लोग चलते हैं वहाँ
नंगे पैर
यहाँ एकदम वहते हुए डामर पर
अपने पैरों के तलवे से
आग का झरना चिपकाये हुए
वे न डरेंगे न भागेंगे ही
पुत्र से, पत्नी से, मृत्यु से
जरा से या जन्म से
समय से दग्ध या कातर नहीं होगे
अपने समय का अस्वीकार नरक है
मनुष्य वृक्ष पर चिपका पत्ता नहीं है
नीले जल वाली नदी नहीं है सडक
यहाँ जूतों की रगड़, लहूलुहान पैर
अपमान की दुर्घटनाएँ हैं
वे जो यहाँ चलेंगे पहचाने जाएंगे
अपने उत्साह और पराक्रम के लिए
अपनी पहचान खोकर चले जाएँगे
उन्हें देख लेना कोई शिनाख्त तक नही करेगा
हमारी यात्राओ का यथावत भयावह एकान्त
सन्नाटा यहीं टूटेगा
मोर्चे के लिए जमीन यहीं कटेगी
हम अपने सु-दिनो के लिए
यहीं खड़े रहेगे और इन्तजार करेंगे
72 :: उत्सव का निर्मम समय
वसन्त में होना
वसन्त में मैं
पुनर्जन्मों की स्मृति में
होता हूँ एक कोंपल
देह होती है
नदी आतुर, तरंगमयी
बहती हुई रेत में उतरती
हँसती हुई
वसन्त में वीत जाने देता हूँ
निर्गन्ध अतीत
अगति, शीत
पुनर्जन्मों की स्मृति में होता हूँ
उल्लसित, दग्ध प्रज्वलित
अग्निवर्ण पलाश
वसन्त का सूर्य ही होता है
सिर्फ सूर्य
न डराता है
न पैदा करता है दुःख
न द्रवित करता है
यहीं होता है
इसी डाल पर
एक-एक किरण बोता है
गहरे भीतर
ताप देता है पृथ्वी के लिए
इसी वसन्त में मैं
पुनर्जन्मों की स्मृति में होता हूँ
उत्सव का निर्मम समय :: 73
देह से भिन्न
देहान्तरों के बीच
एक काँपती अभुक्त तृष्णा
ढूँढ़ता हूँ हवाओ की साक्ष्य
होता हूँ गाछ-पत्ता
फैलता हूँ उन्ही पुनर्जन्मो की स्मृति में
होता हूँ आकाश
74 :: उत्सव का निर्मम समय
तुम्हारे लिए मैं नहीं लिखूगा सोने की चिड़िया
तुम्हारे लिए मै नहीं लिलूंगा
सोने की चिड़िया
पराजय और निराशा के दिनों में भी
मैंने ललचायी दृष्टि से नहीं देखा
जैसे अमूमन देखते है
सोने की चिडिया का कलेवर
मैने कोई सम्बोधन नहीं चुना
असंख्य तरह से मैंने देखा है तुम्हें
आशा, निराशा में,
संघर्ष में, अपमान, अनिच्छा में,
बर्बर आक्रान्ताओं की हँसी में,
प्रतिशोध में
नदियों तक गया
उफनती और सूखती
अकाल के दिनों तक
मेघ-छाया में
चिथड़ों तक में मैंने देखा है तुम्हें
सूने राजपथों पर हाथ फैलाये
उत्सव का निर्मम समय ::75
भूखे बच्चों के अविरल ऑसुओं के साथ
अब भी वही दिन हैं
भय के
संदिग्ध राजपथों पर
निर्भय, निरंकुश पद-ध्वनियों के
सारी गमगीन सध्याओं के बीच चलने के
देखने के
अपनी बाहुओं में
टहनियाँ, फूल-पत्ते समेटे
यहाँ बची हो हमारे भाग्य से
दुपहर की धूप
बचा हो पहाड़ का
उन्नत शिखर
जहाँ से नज़र आ जाएँ
गन्ने, कपास के खेत
दुपहर की धूप जैसे उतरती है
उदासी की सीढ़ियों पर
ठण्डी होती
मैं तुम्हारा इतिहास देखता हूँ
दुःख के अक्षरों में
मन्दिरों के स्वर्ण-कलशो पर
डूबते दिनों की क्लेशपूर्ण छाया में
संदेह की दृष्टियों में छिपी
रिवाल्वर और मृत्यु में
चुपचाप निकल कर जाना भी तो
मुश्किल है
उन सब को देखते हुए
76 : उत्सव का निर्मम समय
जो अनिश्चित जगह पर
अपनी पृथ्वी को बचाने के
निश्चय के साथ अडिग खड़े हैं
उन तमाम उद्विग्न, संशय-ग्रस्त
लोगों के साथ
मेरे देश
मैं तुम्हें सम्बोधित करता हूँ।
उल्लासमय क्षितिजों
असंख्य लहरों वाले समुद्र के लिए
उत्सव का निर्मम समय ::77
चोरी
अनाथालय से निकलते बच्चों को
देखता हूँ
अमरूद और पके लाल अनारों पर
बुरी दृष्टि डालते
'लालच की ऑख से मत देखो
हमारे अमरूद'
कहने को तो कह ही सकता हूँ
मेरी तृष्णा और चोरी
कुछ ज्यादा अलग नही है
शब्द एक खेल है
तिलस्म जैसा
दूसरों पर आक्रमण करूँ
छिपू अपनी चादर के पीछे
किसी वक्त कोई डरता होगा
शब्द से
सन्यासी या कवि
सिर फोड़ लेता होगा
चिमटे से या सत्य से
अव लज्जा, चिथड़े
जूते बह गये है वर्पा-जल मे
78 :: उत्सव का निर्मम समय
मैं अनाथालय के बच्चों से
कहने के लिए दौड़ता हूँ
रुको, अमरूद मत घुराओ
लेकिन मेरे पेट में
गाँठ पकती बढ़ती है
उत्सव का निर्मम समय :: 79
दीर्घायु हों
सुख के
अकाल और भूख के मारे लोग
दीर्घायु हों
एक-एक सपने के लिए तरसते
ललचाते भाई-बहन
दीर्घायु हों
आश्वासन के आनन्ददायी भाषण देने वाले
वक्तागण
दीर्घायु हों
सूखी बंजर जमीन पर
ऋतुओं के रसीले गीत गाने वाले
कवि-पुत्र
दीर्घायु हों
जूते रगडते दफ़्तरों के वाबुओं की
मैले और पैने दॉत वाली हॅसी
सहने वाले
बेकार युवक
दीर्घायु हों
टूटे हैण्डपम्प पर
चुल्लू भर पानी के लिए
सिर फोड़ती कुलवधुएँ
दीर्घायु हो
कैरोसीन के इन्तजार में
खाली डिब्बे पीटते
क्यू में खड़े
पैन्शनर
दीर्घायु हों
80 :: उत्सव का निर्मम समय
हर विपत्ति में
हनुमान चालीसा का पाठ करने वाले
निठल्ले भक्त-जन
दीर्घायु हों
कामसूत्र की रसीली बातों से
किशोरियों के मन जीतने वाले
साधुजन
दीर्घायु हों
दीर्घायु हों
ऑकड़ों के खंख वृक्ष पर
लटकते बुद्धिजीवी
दीर्घायु हो
दीर्घायु हों
दुर्घटना में मरी पलियों का
मुआवजा मांगने वाले
विधुर
दीर्घायु हों
दीर्घायु हों
हमारी कंगाली पर राजनीति करने वाले
देशभक्त
दीर्घायु हों
दीर्घायु हों
हर अवसर पर
हमारी दीनता के लिए
शुभ कामनाएँ देने वाले
वातूनी पोपले मुँह वाले
मृदुभाषी राजनेता
दीर्घायु हों
उत्सव का निर्मम समय ::81
योद्धा
वह योद्धा था या नहीं
बना दिया गया था
अब वह रोज मिलाने लगा
अपनी शक्ल किसी योद्धा से
मूंछे ले आया कई-कई तरह की
लम्बी और नुकीली
आधी गोल और घुमावदार बाद मे
लेकिन बहुत सजधज कर भी वह
पिछली सदी का लगता
शानदार उन्नीसवीं सदी के
विज्ञापन की तरह वह बोलता
चलता अठारहवीं सदी के
सैनिक की तरह
जव पुराने किले के
तरतीब और आकर्षक शिल्प से
जमाए गये पत्थर
गिरने लगे
उसे अचानक लगने लगा
उसके घुटनो मे दर्द है
वर्तमान का युद्ध पेचीदा और
दूसरी तरह का है
82 :: उत्सव का निर्मम समय
नब्बे बरस की माँ
नव्वे वरस की तो रही होंगी माताजी
मैने कहा-माँ नव्ये वरस की थी
यह सन्तोप देने के लिए बहुत था
वे जो दुःख में आये थे
पहले से ही दुःखरहित हो कर
में भी यह माँ से कहता रहता था
जो न आयु की गणना जानती थी
न दीनता
जिसे पछतावा भी नहीं था
नव्ये वर्ष की होने का
जिन्दगी के साथ ही बाँध लिया था
जिसने
यह रागातीत पराक्रम
जव मै कुछ वर्षों का हो गया
तब भी मॉ ने पेटी नहीं खोली
जिसमें वे सिक्के रखती थीं पुराने
एक-एक कल्दार रुपैया
अठन्नियों और हमारे पुराने फ़ोटो
अंगुली पकड़े हुए पिता की
कोट जिसके बटन टूट गये थे
उत्सव का निर्मम समय-83
रुई की वगल-बंदियाँ
जिनकी कसे अलग-थलग हो कर
उलझ गयी थीं
या उधड़ गयी थी-जिनकी सीवन
इस तरह माँ की पेटी में
बन्द रही वेटों की आयु
मॉ नब्बे वर्ष की हो गयीं
84 :: उत्सव का निर्मम समय
यह समय मामूली नहीं
यह समय मामूली नहीं
ठीक सूर्यास्त के समय
पूरी किरणें गिनी जा सकती हैं
प्रवाह भी ऐसा वैसा नहीं
तूफ़ान मे लोग धीरज और पूरे आत्मबल के साथ
धिक्कारते हैं आततायी, अन्यायी को
यह समय मामूली नहीं
भयाक्रान्त लोग भाषा व्यवहार के
सारे हिस्से को अपने पक्ष में करते है
वे बोलते नहीं
लेकिन बोलने वालों की आँख में आँख डाल कर
पूछते हैं सवाल
यह समय मामूली नहीं
जिन्हें पुराने काग़ज़ बहीखाते
निकाल कर देखने हों देखे
भूतकाल में बाप-दादाओं के चेहरे
अच्छे लगते हैं और जुड़ा हुआ
चक्रवर्ती ब्याज
जब आखिरी घड़ी आती है
यही होता है
उत्सव का निर्मम समय-85
आयु की फ़सल और जन्मपत्रियो पर
टिकती हैं लालची आँखे
यह समय मामूली नहीं
इतना बवण्डर धूल-धक्कड़ एक साथ
एक खास किस्म का अभ्यास करना पड़ता है
चलने के लिए
कुछ नज़र नहीं आता
पक्षियों के पंख के सिवा
बहुत देर बाद आता है आकाश
लेकिन आता है अवश्य
यह समय मामूली नहीं
जिन्हें हो खाँसी, दमा या जुकाम
रक्तचाप या सत्ता का गठिया
वे जाएँ
दिखाएँ नब्ज ठीक मृत्यु के समय
बचें ज़रा सत्य की हया बौछार से
अन्धे और मूढ़ उतरें
ऊँड़े कुओ में
जिसमें पानी की बूंद तक नहीं है
ज़मीन इस तरह तो प्यासी नहीं रहेगी
इस तरह तो लोग नहीं देखेंगे
ऋतुओं का सर्वनाश
इस गैर-मामूली समय मे
इतिहास के बन्द किवाड़ खुलेगे
पूरे के पूरे तालाब में
सहस्रों कमल तैरते हुए
फैल जाएँगे
.
86 :: उत्सव का निर्मम समय
धूप की याद का सिलसिला
बहुत दिनो तक
गहरी नीली अत्तलान्त झील की
याद नहीं आती
आती है तो
अकथनीय दुःख की हवा
वर्षा के झिंझोड़े हुए पेड़ की तरह
खड़ा रहता हूँ
चलता हूँ अच्छे-बुरे दिनों की
स्मृति और आतंक के
बीचोंबीच
पुरानी दुनिया का बोझ कन्धों पर है
काल पत्थर को घिसता है
लेकिन तब तक जंगल के तमाम वृक्षों की
नसें टूटी हुई छिन्न-भिन्न
वनस्पतियों का शोक
अन्धेरे में बहती नदी के
क्रुद्ध एकालाप से बढ़कर कुछ नहीं होता
धूप की याद आती ही रहती है
धूप के दिन हवा की थापों से चलते
बादल-पुलों के सपने
उत्सव का निर्मम समय: 87
धूप में नहाये वृक्षों के कुंज
फिर-फिर आश्वस्त होना
अपने प्रति, धूप, वादल और हवा के प्रति
लेकिन इसी बीच
लौटता है वार-बार
रेगता हुआ धीरे-धीरे अँधेरे की तरफ
घिसटता दिन
पीले रक्तहीन लोगों में बैठा हुआ मै
प्रतीक्षा करता हूँ
एक पल की और धूप किरण की
जिसकी स्मृति अव
सिर्फ़ एक व्यंग्य हँसी रह गयी है
हवाओं का वेग थम गया है
माँ जिस पेड़ के नीचे बैठी है
वहाँ पत्ता तक नहीं हिलता
एक पेड़ के सपने का इस तरह मिट्टी में
मिलने का दुःख जो भी हो
हवा का रुकना
असहनीय वास है
यही सोचना, डूयं रहना
हटाना निराशा की धुंध
उटना
यही दिनययां का हिम्गा
फिर इवना,
गापा निर्मप ममर
वृद्ध-मण्डली
रोज बूढ़े लोग इकट्ठे होते है
सब तरह के दुःखों से थके
छोटे डरे बच्चों की तरह
अपने क्लेशों की लम्बी फ़हरिश्त पढ़ते हुए
गठिया, रक्तचाप, डायबिटीज्ञ
लड़कियो के रंगीन चश्मे
लड़कों की वेफ़िक हँसी
चुहल, नादानियाँ
प्रेम और वाँकपन
एक बैंच पर बैठे हैं वे सव
सूर्यास्त की रोशनी में
अपने अतीत की बातें करते
मै
दुपहर
में जिनका
हालचाल पूछता था
अपने तारुण्य पर आत्म-मुग्ध
पकना नहीं हो जैसे
कनटोपा पहनकर इन्हीं के बीच बैठा हूँ
विगत की आँच पर गरमाता हुआ
आज की दुनिया पर शोक करता
जो हमारे लिए नहीं रही
बूढ़े लोगों के पास
अपनी जीर्ण-शीर्ण दुनिया की
शान वधारने के सिवा
बचता ही क्या है?
उत्सव का निर्मम समय :- 89
विवाह
थोड़े समय बाद लड़की इस घर से चली जाएगी
पड़ीस की स्त्रियाँ उसके साथ मोह से बँधी हैं
नीम और पीपल की छाया के नीचे चलती
वह एक चकित हिरनी की तरह
आयु की छलाँग भर कर
आगे बढ़ गयी है
लड़का उन्मत्त नदी की तरह
लडकी के पास है
सारी ऋतुओं के फूल उसकी जेब में हैं
पार कर लेगा वह
जेठ-वैशाख की उमस-ऑधी
सावन भादों की अटूट मूसलाधार वर्षा
पौप-माघ का प्राणों को ठिठुरा देने वाला
क्रूर हिमवात
हज़ारों विपत्तियाँ उतार-चढ़ाव
लड़की लड़के को देखती नहीं है
पर्दा नहीं है
पके धान की तरह
उसकी हथेली है
छोटे-छोटे पैरों से वह दूर तक गयी है
फिर जाएगी डरेगी नहीं
जन्म देगी अपने शरीर-आत्मा के भीतर से
90 :: उत्सव का निर्मम समय
समयातीत समय को
यह समय होगा लड़का या लड़की
इस मिट्टी की सरसता से जिन्हें डर है
डरते हैं जो जिन्दगी की परिक्रमा से
नया समय जिनकी हथेली में चुभता हो
वे अपनी देहली लॉघे
देखें, डरें नहीं
विल्कुल नहीं
लड़की अपने छोटे पैरों से चली गयी है
लड़का उसे जानता नहीं है
लेकिन यह उसके लिए लाया है
नये अन्न की बालियों, फूल, जल और हवा
बूढ़ी माँ ! यह रोने का समय नहीं है
लड़की तुम्हारे आँगन में खड़ी नयी बेल है
लड़का नया पत्ता
उत्सर का निर्मम समय :: 91
गोपीनाथ
गोपीनाथ अपने गाँव से गठरी ले कर चला था
अब शहर में सड़क पार करना है
रास्ते दिखते है कई
कौन-सा जाता है
गया या प्रयाग या हरिद्वार
शहर में असमंजस है गोपीनाथ
सिर पर रखी गठरी तो और भी ग़ज़ब है
ठिठक कर लोग खड़े हैं
गठरी देखने के लिए
विदेशी गठरी में लगी
गांठों पर हतप्रभ हैं
गाँठ में गाँठ में गाँठ
कोई बम तो नहीं है
कहाँ के हो कहाँ जाना है
थाना दूर नहीं है
किस किस का लालच
किस किस का भय
बँध गया है गठरी के साथ
कपड़े बाँध कर चला था गोपीनाथ
92.. उत्सव का निर्मम समय
FVERSE:- st- 4.mad IN hey "mar Mmmy3540. MER r mt HIND- MA. गंगा-स्नान के लिए यह यात्रा निर्मल जल की तलाश में थी MAven- Radi AME me कहाँ गगा और कहाँ जमुना अभी तो सड़क के उस पार जाना है गोपीनाथ को गठरी वह अकारण ही ले आया था सन्देह और तमाशा बनने के लिए उत्सव का निर्मम समय :: 93
क़ब्र पर रोशनी
हम रोज़ एक सपना देखते है
रोज़ दफ़ना कर लौट आते हैं
दरवाज़े पर ही मिल जाते हैं
गमगीन लोग
एक मुट्ठी मिट्टी
और हवा के बीच
एक पत्ते के सूखे सपने के लिए
उदास और बेचैन
पादरी अपनी किताव खोलता है
पढ़ने लगता है
तुम्हें वहाँ अन्न मिलेगा
क्योकि यहाँ तुम भूखे थे
एक उदास पेड़ की पत्तियाँ
गिर गयी थीं
पादरी की किताब पर
एक दयालु आदमी की तस्वीर बनी थी
लोगो ने 'आमीन' कहा
और वे उठा कर ले गये
अपने कन्धो पर
एक रक्तहीन प्यासे सपने को
94 :: उत्सर का निर्मम समय
लौटते वक्त क्रन पर
जो रोशनी उन्हे दिखायी दी
पीली और असहाय
अस्त होती हुई
उसी रोशनी में उन्हे चलना था
दूसरे दिन सुबह उठकर
फिर इस अन्तहीन पृथ्वी पर
इस ख़ाक में मिल जाने के लिए
जहाँ से हरे और बड़े-बड़े पत्तों वाला
पेड़ उगता है
सधन और मजबूत
उलय का निर्मम समय : 95
स्मृति
मेरे दायें हाथ में पैन्सिल का एक टुकड़ा था
वायें में एक दुनिया
पसीने से तर-बतर हथेली पर
कितने रंग थे
क्या हुआ सहसा
उस छोटी पैन्सिल से
मै कविताएं लिखने लगा
हर सीढी पर चढता कविताएँ लिखता
कितने रंग थे ऋतुओं के
आदमी के दुःख के
इम्तहान जव बिल्कुल नजदीक आ गये
मैं छोटी पैन्सिल से सवाल हल करने लगा
किताव के पीछे जो सवालों के जवाब थे
उनसे मेरा एक भी जवाब नहीं मिला
96 .: उत्सव का निर्मम समय
इस बीच वह दुर्घटना हुई
आकाश पर उड़ती हुई चील
एक ही झपट्टे में
हाथ से पैन्सिल ले गयी
तेज ऑधी मे पूरे जड़-मूल से कॉपता हुआ
वृक्ष जहाँ था वहीं मैं खड़ा रहा
पेड़ की पत्तियों का रंग मुझे याद नहीं रहा
सिर्फ़ चील के तलवार जैसे पंख
मूसलाधार वर्षा
एक भी सवाल का जवाब न मिल पाना
यही याद है
बाद वाली दुनिया में
उत्सव का निर्मम समय :: 97
गीली लकड़ियों के बीच
उन देहातीत दिनो में
निपट अन्धकार के बीच
रेल निकलती थी
गाँव के सीमान्त से लगी
लगातार सीटी बजाती
तेज और जादू-सी
'लो नौ बज गये
तव तुम चूल्हा जलाती
ढेर-सी गीली हरी लकड़ियों से
घास से
दूर-दूर तक फैल जाता था धुआँ
बुखार चढने लगता था तुम्हें
हम तुम्हारी थकी बीमार देह पर
लेट जाते
कँपकँपी से बेहोश होती देह पर
जमीन की सारी ठण्ड सीलन
बर्फ की नदी ही बहती थी शायद
तुम्हारे शरीर के बीच
इस तरह खत्म हो जाते
आश्विन
म्लान दिन
98 :: उत्सव का निर्मम समय
LON
May
रेल की लगातार वजती सीटी
सिर्फ उन दिनों बुरी लगती
सुई की तरह ऊँडी चली जाती
नाभि तक और भी नीचे
पिण्डलियों के रास्ते
पैर अँगुलियों तक
पूरे जिस्म मे चुभती दौडती
कुछ ज़्यादा याद तो नहीं रह गया है
दिन वर्प या तारीख
या कि ऋतु
सिर्फ बच गयी है
उस अतल दुःख में तैरती
तुम्हारी ज्वर-तप्त देह
यहाँ-वहाँ
पूरे समय को
विद्ध करती, सिसकती
रेल की लम्बी सीटी
गीली लकड़ियों के बीच की आग
और विपाद की निस्संग स्मृति
उत्सव का निर्मम समय .: 99
असलियत जानते हैं लोग
लगातार विरोध करते रहो
अन्याय और हिंसा का
उन दिनों भी जव
रिवाल्वर की मदद से
मन्त्री पद मिलता हो
फिसलने के समय नजर आओ
वे बाते कहो
जिन्हें सुन कर लोग कहें
मूखों की तरह बातें मत करो
सत्य की और ईमानदारी की
दोस्ती की और दरियादिली की
जब लोग कहें
घर भर लो
यही समय है
हाथ की सफ़ाई और हुनर दिखाने का
तभी आसमान पर
सीढ़ियाँ लगाओ
लोगों से कहो
चढ़ो पहाड़ ऊँचे और दुर्गम हैं
लेकिन वहीं से नजर आती है
दुनिया मनोरम और अप्रतिम
100: उत्सव का निर्मम समय
--
शहद के बाजार में
मक्खियों की तरह भिनभिनाना
दुम हिलाना मरियल घोड़े की तरह
एक भी काँटा न चुभने देना
'जी हुजूर मैं आपका पायजामा हूँ'
ऐसी भाषा से
मर जाता है आदमी
पराजय कब नहीं थी
कब नहीं थे झूठ के लिए वाह-वाह करने वाले
लेकिन तभी दलदल से
निकल आया था समय
करिश्मे और भाग्य से नहीं
मनुष्य के उत्साह और संघर्ष से
-
असलियत समझते हैं लोग
वे नंगी तलवार वालों की
कायरता जानते हैं
उत्सव का निर्मम समय : 101
फिर से कहें
इतना ही मैंने कहा था
जय मैं डर गया था
डर के बारे में
जय जड़ें सूख गयी थीं
पत्ते और टहनियाँ
फल गिरने लगे थे
तब मैंने कहा था
हवा और पानी के बारे में
रोशनी, पृथ्वी और आकाश के
बारे में
डरते हुए भी मैने कहा था
डर के बारे में
यह यूँ ही आ गया था
या सचमुच उस लोक-कथा में था
'शेर आएगा तो नहीं डरोगे'
'नहीं'
मैने भी यूँ ही कहा था
या सचमुच डरा नहीं था
इस बाल-कथा में
जो कुछ था
वह शेर के बारे में नहीं था
102:: उत्सव का निर्मम समय
शेर अव आता नहीं है
लेकिन जो कहते हैं
शेर के आने से हम नहीं डरेगे
वे सब फिर से कहें
शेर के बारे में
,
लोक-कथा के अन्दर ही अन्दर
ताक़त, दाँत, छलाँग
गुर्राहट, लपक
चयन, नरभक्षिता
दहाड़
सब के बारे मे
सावधानी और होश के साथ
फिर से कहें
उत्सव का निर्मम समय :: 103
फागुन के आते ही
फागुन के आते ही
हमारा नींबू सहस्रों छोटे पत्तों
फूलों से दमदमाने लगता है
सुगन्ध से प्रमत्त हवाओं के दिन
मुंडेर पर बैठ जाते हैं
छोटी चिड़िया-से गरदन उठाये
पौष में किसे मालूम था यह होगा
ठण्ड से काँपते, निर्जीव पेड़
हिलने लगेंगे
हरे, नये और ताजा दम
हजारों बार यही हुआ है
पृथ्वी!
तुम ने दी है ठण्डे, पपड़ाये
धूल-धूसरित
पेड़ों-पठारों को
खिलखिलाती हँसी
रोशनी का समुद्र और वसन्त
ठिठुरता हुआ भूखण्ड
बदल गया है
रगों की आतिशबाजी में
104 :: उत्सव का निर्मम समय
पृथ्वी!
तुम कितनी नयी होती हो
उर्वरा और उत्फुल्ल
कितनी तरह देती हो
रूप, आकार
बदलती हो ताल, लय, छन्द,
त्रिकाल
उत्सव का निर्मम समय: 105
लड़की कूद जाएगी रस्सी के पार
यहीं बनाने को है
गौरैया अपना घोंसला
दिन-दिन तिनका, घास
काग़ज, पन्नी फेंकी हुई
टुकड़े-टुकड़े रिविन जोड़कर
पूरे वृक्ष पर घूमती है गिलहरी
ऊँचे किए छोटे पैरों पर खड़ी
वातचीत करती हुई
नीले रंग के आसमान से
वड़ी तो नहीं लगती रस्सी
कूदती ही रहती है लड़की
कूदने के लिए ही है मौसम
जब तक असमंजस और प्रेम है
तब तक यह घोसला बनेगा
आइने के पास
गिलहरी वात करेगी
आसमान में उड़ती तितलियों से
लड़की कूद जाएगी रस्सी के पार
यह मौसम बदलेगा नहीं
तुम्हारी हॅसी सुकुमार फूलों की तरह है
बाहर लाल कनेर के फूल हैं
और
पहाड़ पर पलाश दहकने को है
106.: उत्सव का निर्मम समय
दस हजार वर्ष पुराना घर
रात से ही शुरू है वर्षा
कुछ नजर नहीं आता
अँधेरे के बीच
हरे पत्ते, पीला कनेर
गली का उजास भरा मोड़
जगह-जगह रखता हूँ
तपेला, पुराना लोटा, देगची, भगौना
पूरा घर इतना कमजोर
इतना जर्जर हिलता हुआ
खिड़कियाँ लटकती हुई सड़क पर
सब लोग जगे है
योजनाओं का दफ़्तर ही हो गया है घर
कल ही कही थी पत्नी ने
कल ही कही थी
मेघों का रूपाकार देख कर
द्वापर की कथा
उन्हीं ने कहा था
कृष्ण न होते तो ब्रज डूब जाता
मै गुस्से से तमतमा गया था
तुम ज्योतिषी नहीं हो विभा
हमारा घर दस हजार वर्ष पुराना किला है
हाय! यही तो दुःख है इस घर का
उत्सव का निर्मम समय : 107
लड़का दस हजार वर्ष पुरानी वाल्टी लिये
दौड़ता है पूरे घर में
सहस धाराएं गिरती हैं घर से
लड़की अपने चिथड़े हुए
वस्त्रों की गठरी लिये घूमती है
सब सहता है यह पुराना घर
अथाह जल में डूबते हुए
भव-सागर पार करने की रोमांचक कथा
इत्यादि
राज-द्वार पर खड़ा है
हैलिकॉप्टर
दस हजार वर्ष पुरानी छत पर से गुजरने के लिए
हर वर्प रात से ही शुरू होती है वर्पा
हर वर्ष हमारे मृत्यु ऑकड़ों से
शुरू होता है
बाढ़ के विनाश का वर्णन
प्रतिज्ञाओ का मायालोक
दृश्यावलोकन की तैयारी
आत्मा और घर का
शाश्वत रिश्ता समझते हुए
मैं इस मरणासन्न अँधेरे मे
लटकती ज़्यादातर उखड़ी हुई
छत के नीचे खड़ा हूँ
108:. उत्सव का निर्मम समय
कार्तिक
लौट आयी हैं
कार्तिक की दूध नहायी रातें
घर पिछवाड़े
दूध पी कर
दुबके हुए है माँ के पास मेमने
भयरहित
धीरे से आता है तेंदुआ
चोर की तरह दुवकता
गद्दीदार पैर रखता
दिग्विजयी सुल्तान
रेडएलर्ट, सायरन,
कपy, धारा एक सौ चवालीस
कुछ भी नहीं पहले या बाद में
भेड़ों का शोकार्त स्वर
दिगन्त तक जा कर लौट आता है
सुवह पूछते है लोग गड़रिये से
क्या हुआ था रात को
गड़रिया मेमने गिनता है
दो कम
तेंदुए के पंजे अंकित हैं
निर्जीव लेटी भेड़ें ही इस शोकान्तिका की साक्षी हैं
जो खामोश हैं
उत्सव का निर्मम समय :: 109
आश्विन
आश्विन के छोटे होते हुए दिनों में
मकड़ी के जालों को देखती हुई
माँ अपने दिनो की याद करती हैं
कहाँ कहाँ की बाते याद हैं मॉ को
किस किस के विवाह-बरातों में
हुए वितण्डावाद की
लाल बुखार, अकाल और विधवा किशोरियों के
मुंडे हुए सिरों की
समय के सारे गवाक्षो पर
माँ हजारों दीप लेकर घूमती हैं
सब कुछ फिर से नज़र आने लगता है
शब्द, रंग, स्वाद
तितलियो के पंख पकड़ लेती हों जैसे
बस एक ही बार
उदास पतझर की तरह माँ को देखा था
वे महानाश को देखने लगी थीं
देखने लगीं
खेतो की रोधी हुई फसलों पर
सिर पीटती असहाय स्त्रियों का रोना कलपना
नाना के आंगन में इकहे लोगों का
110 :: उत्मा का निर्मम समय
सितमगरों के विरुद्ध गाली-गलौच
पुजारी का भोग, दलाल का व्याज
दहकती हुई आश्विन की धूप से
माँ के चेहरे का रंग मिलने लगा
मैं फिसलते-फिसलते बच गया
मैने आज सुबह ही लिखी थी
कविता की मायूस इबारत
काल के नीचे दब जाने का संकेत
उत्सव का निर्मम समय : 11
अपराह्न में
अव तो रोज देखता हूँ तुम्हें
अस्वस्थ, औषधियों और इंजैक्शन के
डिब्बों से घिरे
रोज देखता हूँ तुम्हारा धैर्य
देखता हूँ जहाँ से भी
आता हो
पाताल लोक से
तुम्हारे जीवन का झरना
वसन्त के दिनों में
तुम्हारी तरफ़ देखने का
अवकाश ही नहीं था
एक स्त्री होने-होने में
ख़त्म हो गये सब दिन
आकाश की बची-खुची धूप में
अब तुम्हारे साथ बैठने में
अपने स्वार्थ की छाया
लम्बी और लज्जाकारक है
अपने सुख का एक-एक कंकर गिनना
112:: उत्सर का निर्मम समय
नहीं था सार विमा: 13
दिसम्बर में
पूरे दिसम्बर
मैंने खिड़कियों नहीं खोली
गिर गये होंगे सारे पत्ते
फूल बहुत छोटे और प्रसन्न
या न भी गिरे हों
यह देखने के लिए भी नहीं
वे स्त्रियाँ कहाँ जा रही थीं
वची हुई रोशनी में
उस पूरे दृश्य के पार
छोडती हुई अपनी आयु के सपने
सूखते हुए जंगल के बीच
दिसम्बर के मोहक
नीले आकाश और बादलों के लिए
बच्चों के लिए
जिन्हें देखने की मेने इच्छा की थी
नीले सफ़ेद और कई रंग के
मुलायम ऊनी स्वेटरों मे
उन तक के लिए भी
मैने खिड़कियाँ नहीं खोली
114:: उत्सव का निर्मम समय
पतन के सम्बन्ध में
कुछ भी कहें
ये
पतन के सम्बन्ध में
बताएँ जो बता सकते हैं
कारण
ये छोड़ दें पद, ओहदे
जय ये गिर चुके हों
कर चुके हों इकट्ठा धन
और लोग चकित हो
उनके पाखण्ड
उनकी आस्थाओं को ले कर
एक समय ऐसा आता है
देशवासियों !
जय लोग शपथ खाते लेते
देश को या आते हैं
समुर में
सान्या, व्यारया, कारण,
सातव और राजनीति
पड़नाग और गणे
मताह भी पायाना जाता है
समय पत्र
मग Ke:
कुछ तो होगा ही नागरिको !
कुछ तो होगा ही
नागरिको !
सूखा या वाढ़
गरम रेत या कीचड़
भूख या भेड़िया
तुम्हारी यही तो बुरी आदत है
अनाथ लोगों की तरह हाथ फैलाना
मॉगना
शब्दों से खुश होना
आकाश की तरफ़ देखना
रंगीन चिन्दियों की पतंग उड़ाना
अगर मैं तुम्हें मौका दूँ
तुम्हें नागरिको !
तुम अभी मुझ से पूछोगे
बताओ कविराज
क्या होगा इस देश का
कब सस्ते होंगे आलू या गोभी ।
नागरिको !
तुम जानते हो
हर नदी को पार करने के लिए
116: उत्सव का निर्मम समय
हिम्मत चाहिए
सपना देखने वाली आँखें और मन
जो पिछले लद्दड़ इतिहास को
एक मुट्ठी राख में बदल दें
तुम्हारी यही तो बुरी आदत है
जव देखो तब हिसाव मिलाते हो
डरते हो
गये गुजरे जमाने की बातें करते हो
मुझ से पूछते हो
कविराज जमाना कब बदलेगा
तुम जानते हो नागरिको,
जमाना हमारी मुट्ठियों में है
राजकुमारों की जेबों में नहीं
तुम समझते हो
सपने आत्मा घेच दी है
तुम समझते हो
रोशनी से दिन नहीं जगमगाएंगे
लोमड़ियों खा जाएंगी
खेत खोदनसोद कर
नागरिको !
राजा अपना तवादा
छोड़ कर भाग जाएगा
सेनापति अपनी यदी
अगर हम छोड़ दें
नर्म गहों पर सोना
यहीं टिपी है हमारी जिन्दगी
दुख की पदों में
भूरा और मृत्यु में .
मा का सिर-17
कोई देता है किसी को जमीन
अकाल पड़ा है सत्य का
नागरिको
तुम इस कायर भीड़ में
धक्का मारकर घुस जाओ
उनकी हीरे वाली अंगूठी को न देखो
दुनिया बदल जाएगी
118 :: उत्सव का निर्मम समय
थोड़े दिनों बाद
थोड़े दिनों बाद
जब लोग समझ जाएँगे
जल्लाद और सितमगरों के इरादे
तव उन्हें याद आएगा
प्रेम, संगीत का झरना
कविता की सुगन्ध
नीली रोशनी वाला अतलान्त जल
बर्फ़ का सफ़ेद कोट पहने कंचनजुंगा
अन्तःसलिला श्यामला पृथ्वी
थोड़े दिनों याद
जब लोग समझ जाएंगे
सिंहासनारूढ़ लोगो के टुच्चे मन
अपने मन के दर्पण में देखेंगे
एक सहस्रदल कमल
हजारों टहनियों वाले छायादार वृक्ष
एक समयातीत उदार मन की हँसी
थोड़े दिनों बाद
जब वे घमण्ड लगाने वाले
हत्यारों की जिद और मूर्खता से
थक जाएँगे
उत्सव का निर्मम समय : 119
तव वे अपने बच्चों से कहेंगे
एक बदमिजाज और ऐयाश वक़्त के किस्से
निर्दोप बालकों के हत्या प्रसंग
धर्मोन्माद के तंग और हरामी
पड्यन्त्रों की कहानियाँ
कुछ भी हो
आदमी की दोस्ती अमर है
हँसी-मजाक, खेल-तमाशे
खुली जिन्दगी और मनमौजी समय
120 :: उत्सव का निर्मम समय
दादी माँ चिन्ता छोड़ो
दादी माँ तुम हमेशा चिन्ता करती हो
अपने बेटे, बहुओं, पोते-नातियों की
चिट्ठियों की चिन्ता
बाहर जब कभी होता है
अँधेरा या हवा का शोर
या वह ऋतु आती है
जब अमरूद पकते हैं
और शब्द होता है
बीते हुए खामोश दिनों का
उत्सव का निर्मम समय :: 121
अपनी झुकी हुई झुर्रियों वाली
गरदन पर चादर लपेटे
तव तुम धीमी आग, गर्म रोशनी होती हो
दादी माँ, युधिष्ठिर के लिए दुःखी होना
तुम्हारे महाभारत का हिस्सा है
अव दुर्योधन की पीठ पर
प्रतिष्ठा का कम्प्यूटर कारखाना है
गांधारी आँख पर बँधी पट्टी नहीं खोलती
आँख और हाथ के बीच दहशत भरा जंगल है
तुम्हारी आँख के पास दफ़्तर होता
तव यमराज तुम से हँस-हँस कर बातें करता
अश्वत्थामा दूध के लिए रो-रो कर मरता रहा
दूध का दुःख उन दिनों भी था
बाबुओं की जंघाएँ तगड़ी, गरदनें पुष्ट थीं
द्रौपदी की पीठ पर
सांसदों की हँसी, धर्म-व्यापार था
दादी माँ, अब आग तापने
और भूभल में लाल हुए
शकरकंद खाने की चिन्ता छोड़ो
तुम्हारे नाती-पोते
बवलगम चिगलते
अँगरेजी मदरसों में पढ़ते
बड़े हो रहे हैं
122 :: उत्सव का निर्मम समय
युद्धोन्माद के विरुद्ध
अब तो पूरे आकाश में फिर
सूरज की रोशनी फैलने लगे
डरी हुई हिरनियों की ऑखें फिर खुलें
तो मैं खुश रहूँ
बच्चे अख़बारों की लम्बी-लम्बी टोपियाँ पहनें
नाचे और अर्थहीन तुकें जोड़ें
लड़कियाँ जूड़ों में रंगीन खुशबूदार फूल लगाएँ
युवक रोशनी में चलें
सड़कों पर मिले और मुस्कुराएँ
बहुत हुई प्रभु! बहुत हुई
अभिशापों से घिरी मुल्लाओं, पण्डितों
पादरियो की प्रार्थनाएँ
अब तक युद्धोन्मत्त नाबालिग
सेनापतियों के तमगों पर
किसी ने मुट्ठी भर धूल नही फेंकी
उत्सव का निर्मम समय :: 12:
तुम्हारे रास्तों पर चलने वाले लोग नम्र होते हैं
प्रार्थनाघरों में वे बहकते नहीं हैं
मृत्यु कोई भय नहीं है
किन्तु यह सन्दर्भातीत मृत्यु
यह अकारण सूलियों पर चढ़ जाने का उन्माद
जलते हुए शहरों और पुलों की अग्नि
किसी प्रमथ्यु तक नहीं पहुँचती
एक शाप-ग्रस्त अजन्मी पीढ़ी के
काले धुंधलाए चेहरे
आकृतियाँ लेते हैं
जिनके न ऑख होती हैं न कान
कुछ होता है
घड़ी के गोल-गोल अंकहीन डायल जैसा कुछ
मैंने फ़ौजी अफ़सरों के वक्तव्य और
वसीयतनामे पढ़े हैं
बेचारे
यह तक नहीं लिख पाये कि उनकी क़व्र पर
किस रंग के कौन-से फूल चढ़ाए जाएँ
प्रभु! एक युद्ध रहित
भय रहित
सृष्टि के लिए
वरण की स्वतन्त्रता दो
124 :: उत्सव का निर्मम समय
-
अकाल
दो शृगाल रात भर खेत खोदते रहे
गहरा और गहरा और गहरा
अन्न कहाँ है?
कहाँ है अन्न पृथ्वी!
दो शृगाल रात भर
सूर्य को गालियाँ देते रहे
'हो गया तुम्हारे वंशधरों
तुम्हारे शक्ति-सामन्तो का
राज, सूर्य'
अन्न कहाँ है?
कहाँ है अन्न सूर्य!
दो शृगाल
रात भर पंजों से हवाएँ पीटते रहे
उन्होंने रात भर
की जड़ें खोदी
छलाँगें भरी
हाय!
उनकी मृत्यु भी
अविज्ञप्त ही रही
उत्सव का निर्मम समय : 124
- विवशता
दिशाओं तक मेरा हाथ जाता है
लेकिन कुछ छूता नहीं है
मैं एक शब्द के लिए प्रतीक्षा करता हूँ
थोड़ी देर के लिए
हल्का नीला प्रकाश जन्मता है
फिर डूबता है, डूबता जाता है
डूब जाता है
मैं शब्दों के लिए फिर जन्मता हूँ
फिर-फिर प्रकाशित करना चाहता हूँ
नदियों के फैलाव और आत्मा और अग्नि
प्रेम और दर्द और अन्तरंग
लेकिन कोई कृति जन्म नहीं लेती
सब तरफ स्वादहीन सृष्टि फैली रहती है
मैं फिर होता हूँ, होता हूँ, होता हूँ
126:: उत्सव का निर्मम समय
स्त्री
स्त्री का काम प्रेम करना है
स्त्री का काम दया करना है
स्त्री का काम मोहित करना है
पिटना है
पानी भरना है
पीसना है चक्की
उदास दिनों की
हम स्त्री की प्रशंसा करते हैं
उसके धीरज की
माँ बनने की
कपड़े धोने की
झाड़ लगाने की
दिन निकल गया है स्त्री के लिए
उठो
रात हो गयी है स्त्री के लिए
सो जाओ
हमें रंज है तुम वैसी नहीं बनीं
वैसी अमरीकन, फ्रेंच, जर्मन
हमें खुशी है हमने तुम्हें वैसी नहीं बनने दिया
तुम ने किसी से हँसकर बात नहीं की
उत्सव का निर्मम समय : 127
जैसा कहा वैसा ही किया
यह वधस्थल है यहीं बँधी रहीं
स्त्री का काम सेवा करना है
स्वागत करना है
चाय बनाना है
झाडू लगाना है
अपने थके बीमार चेहरे को चमकाना है
स्त्री का काम शान्त रहना है
कबाड़खाने की चीज होना है
पुरानी टूटी-फूटी
लेकिन देखने लायक
128 :: उत्सव का निर्मम समय
तब भी
कुछ
भी नहीं
लिखना, कहना चाहता था
तय भी लिखता कहता रहा
विफलता के सम्बन्ध में
कोई संशय नहीं था
नहीं लिखता तब भी
तब भी लिखता रहा
अपने समय, दुनिया
अपने चारों ओर
विलीन होती रोशनी को
इस तरह देखता
स्वीकार करता
लिखता रहा
यह आशा अजीव है
लिखोगे तो
बच जाओगे
उत्सव का निर्मम समय::129
शक्ति हो तो
गर्व से या मुझे नहीं मालूम कैसे
उसने बीते समर को याद किया
तब जो दिया था उसे
इच्छा से, जो दे सकता था
एक हद को तोड़ने के लिए
शक्ति हो तो दो
उद्विग्न होकर कहने के लिए नहीं
हमने दिया
लो भी इसी तरह
शक्ति हो तो लो
अनाथ हो कर नहीं
पटताते सिर पीटते
राम्तों पर गटरियाँ पाँचकर चतते हैं
टग और कायर
अफले चलते-चलते
शीग होती है आयु
ऐसे ही लेते-देते
राजाने भरते। यानी होते हैं
पासाओं के मन
मान्न नही
13-मा पिरमपर
२
शक्ति हो तो
लुटो
रचना हो तो लो
उमंग जो थक कर बैठने वालो में थी
दुःख जो उस तरह कृपण होने मे था
पछतावा जो पुराना घर देखने का है
एक बार खाली हो कर भी
यात्राएँ व्यर्थ नहीं जाती
एक बार दूसरे देश की
धूप में चलो, खड़े रहो
ठिठुरो, भीगो, नहाओ
शक्ति हो तो
उत्सव का निर्मम समय :: 131
सिर्फ पछतावा
अपने लिए ही
बचाया था
दुवारा
दुवारा बचाया था
प्रेम
पूरा नहीं होने दिया कुछ भी
डर कर
दूसरी बार न मिले
उस वृक्ष के नीचे
ठण्डी, बीतती छाया
दुवारा जाना था
जहाँ पेड़ ढूँढ़ते थे
अपनी पत्तियाँ
बादलों के दिन
पृथ्वी के पास से
कितना दूर चला गया था समुद्र
दुबारा नहीं जाने का
सिर्फ पछतावा वचा था
132 :: उत्सव का निर्मम समय
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नंद चतुर्वेदी जन्म : 1 अप्रैल 1929, रावजी का पीपल्या (स्वतन्त्रता-पूर्व मेवाड़, राजस्थान, अब मध्य प्रदेश, जिला : भवासा में) अध्ययन-अध्यापन : हिन्दी में स्नातकोत्तर महाराष्ट्र और राजस्थान के विभिन्न महाविद्यालयों में प्राध्यापक रहे। प्रकाशन : यह समय मामूली नहीं, ईमानदार दुनिया के लिए, वे सोए तो नहीं होंगे, उत्सव का निर्मम समय (कविता-संग्रह), शब्द-संसार की यायावरी, सुधीन्द्र-व्यक्ति और कविता (आलोचना)। अनुवाद : लेखन से दुनिया के बच जाने की आशा- ऑल्वेयर काम्यू, प्रभाव-आन्द्रे जीद, रसज्ञता-जे.बी. प्रीस्टले. रचना और उसकी समस्याएँ-यूजीन आयनेस्को। 'बिन्दु' (त्रैमासिक, 1966 से 1972), 'मधुमती', "जयहिन्द' एवं 'जनशिक्षण' पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादक। के. के. बिड़ला फाउण्डेशन के 'बिहारी पुरस्कार' एवं मुम्बई के 'लोकमंगल पुरस्कार' से सम्मानित । प्रसार भारती के 'प्रसारण-सम्मान-98' से विभूषित। भारत सरकार के संस्कृति विभाग की फैलोशिप तथा राजस्थान साहित्य अकादमी से 'विशिष्ट साहित्यकार सम्मान' । सम्पर्क : 30 अहिंसापुरी, उदयपुर-313 004 (राजस्थान)