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Jainendra Ki Kahaniyan [ Part - 4 ]
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जैनेन्द्र
की
कहानियाँ
(चौथा भाग)
ISBN 817037013
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this book or portions thereo in any form
प्रदीप कुमार
सम्पादक-निदेशक
0 मूल्य 4000 रु
0 प्रकाशक पूर्वोदय प्रकाशन
718 दरियागज नई दिल्ली 110002
D०प्रतीप कुमार
0 सस्करण 1990 (प्रथम सस्करण 1953)
0 मुद्रक अग्रवात पिटर्स, दिल्ली -110006
JAINENDRA KI KAHANIYAN PART 4
(COLLECTION OF SHORT STORIES)AY
JAINENDRA KUMAR
पूर्वोदय प्रकाशन
दीपावली
तथा अन्य कहानियाँ
(चतुर्थ भाग)
जैनेन्द्र कुमार
भान जानन म नहीं वैसा यनन में है। -जैनेद्र कुमार प्रकाशक की ओर से दुनिया के सभी अष्ठ-साहित्यों में स्त्री पुरुपये परस्पर सम्यधों के विविध सामाजिक रूपा को विशप स्थानरिया गया है। प्रेम और विवार की समस्या या विचन और विचार अनेक साहित्य पारों ने दिया है, और सभी में पाठकों को छ- न-कुछ आफ्षण भी लगता है। वितु सामाजिर जीवन की इस आधारभूत ममस्या के विषय में जैनेन्द्रजी का अपना मौलिप दष्टिकोण है। स्त्री- पुरुषप्रेम और विवादपरक सामाजिक सम्बन्धों को वह एक उदात्त, मानवीय, सूक्ष्म-दष्टि से देखते हैं और उसके यथार्थ सत्य तक पहुचकर जीवन के सतही सम्बाघों के मिथ्यात्व को समझोर देते हैं। इसीलिए 'सेक्स' की समस्याओं के प्रति भी उनका दृष्टिकोण दुमरे साहित्यकारों से भिन्न तथा एक्दम मौलिक है। प्रस्तुत कहानी-सगह में प्रेम और विवाह से सम्बधित या स्त्री-पुरुष के परस्पर सामाजिक सम्बधों की तात्त्विक गहराई की यथार्थता को प्रकट यरने वाली श्रेष्ठ-बहानिया है। 'व्याह', 'भाभी', 'मास्टरजी', निस्तार' आदि सभी कहानिया पाठयां का इस विषय म एक मौलिक दृष्टि ही नही प्रदान करती, बल्कि कहानी क्ला के अद्वितीय उदाहरण के रूप में उनको अपनी ओर आकर्षित भी करती है। .
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क्रम
५ प्रराशकीय
मास्टरजी E
२८
पुषह
अरोमा
॥ समाप्ति
रेल में
सम्बोधन
प्रामोफोन का रिवाड ७२
८२ जाह्नवी
दृष्टिदोष ९२
१०१ विस्मृति
पूषवत्त
परायतन
निस्तार
१४४
व्याह
भाभी
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-
जब ने पडदे जानते हैं न मे ret"
पूरा नाम है महामहिम घोपान । अवस्था चा Tr, rrrr
है और विनोदी स्वभाव के जीव है। डका xit
लियात हाती है, इसम उहान छोटा नाम 10tkarni
अगात दम छोटवर यहा अजीगढ़ firseratorter
घापार महामहिम का गर, इसकी am-trut
को छाडना पठिन हो जायगा। संक्षेप arrrrrrars
मा पिता ऊपर से २४ गये, आग frrrrrr
पान बीज दी मचान म घर में आ
rrrhymers
माना नीघ धराधाम में प्रयाण ren arrest
कामों में पत त लेबर चारो आraz---
महाना बाट जातीर ठीक बेटा
जिरे व अनरीली वस्स पर..m
महामहिम यहा ही असे हैं।
१० जनेद्र की कहानियां [चतुर्थ गप] युवती हो गई है। महामहिम ने पति रे म ग मी अघि माता प्रेम स उसे खिलौो सा लार दिया है और गरई मरतीय मुण्ड तल-सल में पिलाय हैं । अपने को दुनिया म समर्थ पाया, तभी स अपने सामप्य द्वारा गोपनीया वधू को उमो अपो घर म पाया है। मां जव जल्दी ही ऊपर से उठ गई तब बाहर म गिरस्ती ५ पाग्य सामार जुटान और घर के भीतर भी गव कुछ सवारन और मभालन का काम उस पर आ रहा है। यह अयोधा अनजान एप अतिरिमत पाम को ही भाति उस पर रही है । वह रावका निवाहता चला आया है। इन नियाह म उम रम का सरपा अभाव भी कभी नहीं प्रतीत हुआ है। कभी यदि कुछ प्रत्याशा मन म उठी है तो पर मोच रोता रहा है कि यह बरस बीतन-चीतत तो हमारी श्यामा सारी गहस्थी अपन ऊपर स लेन ही गाली है। बस वाला कुछ ही रोग श्यामक्ला भी एम एम कला उदय से साथ निखरती ही आई है। ही से वह धीर धीर करके मनमाहिनी हाने लगी है। पहले पेलती थी अब बाल माढती है। वह तरह-तरह के बाल काटना जानती है। वह चाहती है कि उराव स्वामी देखें कि वह अब बच्ची नहीं रह गई है। देखें कि वह इसे भाति भाति के बाल काटती है और बदल बदलकर नय करने पह्नती है । महामहिम पाते हैं तो पहते है • ओ हो- -श्याम लानिधि श्यामा सुनकर नाराज हो जाता है। वह क्या सदा बहलाने की चीज है । वह सोवती है। महामहिम कहता है "बामाला सी जो श्यामरलीजो कहिये ।' श्यामा अत्यत गुख हो जाती है। स्वामी कहते हैं, ' क्या बात है? और वह ठकर चली जाती है। तब स्वामी देखते हैं चूल्हा ठण्डा है रसोई में कोई तयारी नहीं है। उस समय वह लकडो-वण्डा लेकर चूल्हे को बताने के जतन म लगते हैं। खाना बन-बना चुवता है तब अदर जाकर कोठरी म चादर लिय पडी हई पली से कहत हैं, 'चलो खाना खा लो।
वह चादर जोर से चिपटाकर कहती हैं। "हटो-हटो, मुझे भूख नहीं है।' महामहिम कहते हैं, मैंन मच्छी या झोत बडा स्वादिष्ट बनाया है, चलो तो।' करते करते श्यामका चलतो है, भोजन करती है और चौके की सार- सभात रक महामहिम स्कूल चले जाते हैं । कितु यह तो जब अतरौती आर्य-आये थे, तव की कथा समझनी चाहिए। अब वह बात कही है। अव श्यामकला बच्ची श्यामा नहीं है। अब एक पहाडी नौवर भी घर म है जा रोटी बासन सब काम करता है। श्यामक्ला अप और भी अच्छे बाल का ना जाती है। महीन व नफीस पडे की उस अब ज्यादा अच्छी पहचान है। पहनती भी उह अब वही ज्यादा अच्छे सलीके से है। वे कपड़े उस पर अप वहन अच्छे खिलते हैं। नेविन मा बसी हर एक वात पर वह तुनक नहीं पाती। अब वह महामहिम को ऐसे नहीं देखती कि मैं अब रूठा अब म्ठी अग ता उमके चलन म धीरज रहता हैं और आख ने, हा, आशा। जब तो भगती वह नहीं है जैसे कुछ सामन का और बढना ही चाहती है । अब तो त क भी महामहिम को झिकाने की बात नही सोचती। नही अब वह बहुत समझ दार है। सोनती यह है कि रियाना कैसे हागा। किन्तु यौवन क्या कुछ अपना हक न रखे? क्या अपने वतमान में इतना मग्न वह न हा सके कि अतीत का रिक्त भर जाय? अब जब दि उमम अपेक्षा शील यौवन है तव भी क्या अधिकारापेक्षिण, पत्नी दह न हो सकेगी? पर यह मारटर महामहिम तलका को पढा-पढ़ कर जव आते हैं तो आकर कहते हैं, कामक्ला मी जो श्यामकला पुनि श्यामकले विधी पामरते और श्यामवला इस पर फुरपरहती है। दिन-पर दिन यावर आती हुई यह श्यामरला विमी प्रकार वह नहीं है जो नही मी थी, यह बात महामहिम को तो किसी धाण मूल पाती ही नहीं है। उसके निकट यह "यामा स्नहपोप्या न हो, क्या कभी भी ऐसा होगा १२ जनद्र की कहानिया [चतुर्थ भाग] मोशाय बानू म वालर खूब खुश हैं। उनकी अग्रेजी की याग्यता की मास्टरा म भी खब घार है लहया म तो है ही। स्कूल में अधिकतर अग्रेजी ही वह पहात थे। लेकिन उनक घण्टे म बालर पढ़न म ज्यादा हमते हैं। क्यावि मोशाय वार को नाराज होना नहीं भाता। हम तो वह कहा कि जव उनम गुस्सा तय करते नहीं बनता, तो पढाना ता क्या खार बनेगा ? और यह अमिट सत्य ही समझिय की जा स्वय याग्य है वह मास्टर चतताऊ (Irdifierent) ही है। शिप्य के पीछे डण्डा ता उससे उठात बनगा नही तर जाप ही सादिय, अध्यापकी उससे क्सि प्रकार वन मकेगी। क्लाम म माम्टर मोहामाहिम मोशाय बालका वी पाठयपुस्तक की कहाणी - साय कभी विलायत के इतिहास की कहानिया म पहुच जाते है। वहा म जान च्या महारा पक्डवर अपनी ही कथा पर उतर आते है आमरा दश वगाला ह्य । बहुत सुदर देश ह्य । उहा वाडा-वोडा फ्ल होता हय । बगाना भूमि वहोन जरख ज ह्य । रोक्म गेम उहा मीठाई हाता हय । आमरा देश का इम्त्री नोग वेशी सुदर हय । आमरा बहू का नाम तुम लोग जानता य? बागका नाम श्यामका ता बाला, के श्यामलोता ६ श्यामन नि के याला शामवाला। शब ठीवर । रग अलबन श्याम य । कि तु वहान सुटर दखता ह्य । हामको बहात धन दह्ज म दता था हामही लिया । आमरा बाहू बहोत बोडा घर का ह्य। हामका बहोत प्यार करता य बालक ये कथाए सुनकर बडे प्रसन थे। किताब का जब कि एक भी शब्द उनके मन पर न दग्ना तव देश बगला की तरह तरह की मठाया और भानि भाति द फल मानो उनके सामने वही प्रत्यक्ष हो जाते थे। व दाल मोशाय मास् र यग काम बकाम भी पहुचा करत और तरह-तरह के उपहार जाकर मास्टरनीजी को दिया करते थे। मास्टरनीजी भी वालका का प्यार करती थी। इसस जब मोशाय मास्टर उनकी मास्टरनीजा का जिक्र उह सुनाते तो बड़ा अच्छा लगता था। कहते मास्टरजी किताव पढाइ ये जी, किताब । (जी कहत ओ, तुम लोग वोदमाशी करता हय । किताब पढो -- मास्टरजी 7 किताब। तुम लोग फैल होगा तो आमरा नाक कटेगा। बोलो, "कसा- बियका कोन था? उशका क्या कहनी ह्य। थोडी देर पढाई चलती और मास्टरजी कहते, 'तुम बगला देश में कोलीकाता शहर का नाम सुना ह्य? बहोत बडा शहर हय । रोकम- रोक्म का गाडी उहा चलता हय । रेल चलता हय, इस्टीमबीट चलता हय, ट्राम-गाडी, मोटर गाडी, रिकशा गाडी वोगरा बोगरा बहोत रोकम का गाडी चलता हय । स्टोमबोट तुम लोग जानता हय? वह स्टीम का जोर से चलया हय । अहा हुगली दरिया हय । उसका ऊपर बहोत बडा पुल बना हय । हामने मोही से एफ० ए० पास किया। आमरा शादी उसके वाद हुआ। हाम पहले उजला बोहू चाहता था। शादी का वखत आमरा वोह दश बरश का था। आमरा बोह का उज्जल रग नेई परन्तु अति शुर। हामरा बोहू खूब भोला।" वातक याद दिलाते, "मास्टरजी, कैसाबियका" और मास्ठरजी एक साथ कठोर होकर कहते, "ओ, तुम लोग खेल करना मागता हय । खेल नाही चलेगा। शोबक पढो, शोबक। तुम लोग फेल होगा तो बहोत बुरा बात होगा। हेडमास्टर हामको बोलेगा। हाम बोलेगा लरका लोग बरा शितान हय ।" यो कमची-पूर्वर न पढ़ाते थे तो क्या, वैसे उनके विषय में विद्यार्थी कमजोर नही रहते थे। विद्याथियो का और उनका आपस मे बडा अप- नापा हो गया था। मास्टरजी अपने घर की छोटी-छोटी बाता यो लडको के सामने ऐसे पेश किया करते थे मानो सलाह मागते हा, अबोध बालक उन बातों में से और कुछ सार ग्रहण परते न हो हो, मास्टरजी का स्नेह तो ग्रहण करते ही थे। स्कूल मिडिल स्कूल था और अतरोली कस्बा भी बडा न था। हमारे भोशाय बार में रस्त-जन्त बढाने और बढाकर खुदबढ़ने की सिफत ज्यादा न थी। तीस रुपये के यहां मास्टर लगे और तीन रुपये प्रति वर्ष तरक्की पाते-पाते अब उनके पचास रुपये से कुछ अधिक हो गये थे। वेतन के रूपये पालिये, लम्बी छटो हुई तो कभी अपने देश अंगला धूम माये, नहीं तो शासक विद्यामिरों में और अपने सङ्गी मास्टरों में मिल-बोसकर यह - १४ जैनेद्र की कहानियां [चतुथ भाग) वह रह लिया वरने थे। कोई लडया कभी उनका पानी भर देता, पभी और कुछ और कर देते। इस प्रकार मारटरजी, बिना ज्यादा फिर पाल और बिना ज्यादा मेल मुलाशात वा परिमट बढाये, अपन दामम रियुक्त युवती श्यामपला में भर्तार बने मजे म जिय चलते थे। किन्तु एक आस्था ऐसी होती है कि व्यक्ति प्रेग पाये, इतन ही से उसका जी नही भरता। वह इस याप को भी चाहता है कि यह प्रेम उरी मिल ही नहीं रहा है प्रत्युत वह उस प्रेम को अपने बल स सोच रहा है। यौवन इसी अवस्था का नाम है। जो प्रेम निरपेक्ष होकर दान की तरह दिपा जाता है उसवे स्यीबार पर रहना यौवन ना अपमान भी हो सकता है। जिसे अपनी शक्ति का भरोसा है, वह दान कैसे ले सकेगाउपाजित अप ही उसके लिए अथ है। या विश्व को समस्त सम्पत्ति म भी उस तुप्ति नही है। श्यामला जैसी भी हो इस आर से असम्बद्ध होकर जो उसे दिया ही जाता रहेगा, क्याकि दिया ही जाता रहा है, उस प्रेम को लेकर योवन गर्षिता श्यामकला का जो मे भरे? जो विवश नहीं है, जिस प्रेम में उमाद नहीं है जिसमे चाह की धार नही है, उसका वह श्यामकला क्स- समझ ले कि वह उसका अजित है उसका अपना है, उसका स्वत्व है ' धय पाने पर क्या क्या माता और पिता के सहज प्रेम से बाहर नहीं बढ़ चलनी ? क्या उसम अपेक्षा नहीं जागती कि कोई प्रेम हो जो उसके बेटी यर वन होने के कारण उसे स्वभावत ही न मिलता हो, प्रत्युत उसने अपने ही कारण उसके अपन ही जोर पर उम मिले ? क्या उसे नहीं अनिवाय चाह हो माती उस प्रेम की जो उसने प, उमर यौवन, उसने अतस्य स्त्रीत्व को माग २ उत्तर मे विवश होकर उसमे खिंचा चला आये जी आग म पतग ? ऐमा प्रेम जब तक वय प्राप्त को न मिल, तर तर पिता के साब रोह से होते भी क्या उसम कुछ आकाक्षा अभाव, कुछ पलक बनी ही नहीं रहती। श्यामाला को तो स्वामी की ओर से सदा ही सचिन्त प्रेम मिलता रहा है। वह नाराज हुई है तब भी उस पार से मना लिया गया है। हंसी है तब भी उसके साथ हस लिया गया | उसपी तदीयन दीक्षा रक्षा भ की गयी है। सदा ही मन बातो में उसे बेहुला रखा गया स्नेह के मूल्य को नहीं जानती लेविन- लेकिन महामहिम अपने प्रेम वो किस प्रकार केम गाढा करे कि उसमे उद्वैग दिखाई द वह प्रेमधारा उममे क्या कमी रुक्ती भी है, जो गतिशील दीले ? क्या वह कहीं उपती है, जो कभी उत्लट भी हो? क्या उसमे व है कि वहा विक्षिप्त फेनिल लहरें उठे तरंगहीन, कूलबद्ध एकररा होकर हो तो प्रेम इस महाहिम मे श्यामाला के प्रति बह सकता है क्यापि बह उममें गहरा होता गया है। यह क्या बात है कि वह मुझ पर कभी नाराज भी नहीं हो सकते हैं-- श्यामकला सोचती है.---'क्यो वह नहीं मानते कि मैं पूण स्त्री हू ? क्यो मह मुझे बहलाते ही है धमकाते नही, जस कि मैं बच्ची ह ? मैं नहीं चाहती अन्या पहनना, अच्छा रहना। फिर वह क्यो नये नये कपडे लाकर दिये जाते हैं ? और जब मैं उ है पहनती हू तब क्या गरी निगाह से वे ही कपरे नीचे रह जात है ? क्यो मेरे साथ वह अपने पढने लिखने की और- और तरह की बातें नही कर पाते क्यो कपर के मन की और हल्की ही बातें मुझसे की जाती हैं। क्या मेरा उनके ऊपर कुछ ऐसा बस नहीं है कि मैं उहे फेर सकू और उनके यहां जो रहना है पहाडी नौकर, उसका हियाव होने लगा है कि यह श्यामकला का जरा रोब न माने। उमकी सुनो वह अनसुनी कर देना है । जब श्यामक्ता झल्लाती है तो वह हैसना चाहता है। जब गुस्से म यामवता कापने लगती है तो वह बेहूदा आदमी उस मामने मुह बिरार अपन रास्ते चलता चला जाता है। श्यामकला उसको खूब खबर लेगी।-एक तो कम्बस्न गुस्ताख हो गया है उपर बालो म तेल डालकर पुरले भी काढने लगा है । उसको कपडे श्या बना दिये हैं दि जेण्टिलमन बना डोलता है । उस पहाडी नौकर की सूरत देषकर उसे चिढ़ हो जाती है। यह जोर से चिल्लाई, "महादेवा ओ महादेवा।" महादेव उस उन्नीस-बीस वप रे पहाडी छोरी का नाम है। "सुनता है कि यहा हो गया है?" 7 70 . जनद्र को कहानिया [चतुथ भाग] सामने आपर मुसकराते हुए महादेव न कहा, 'बहोजी, क्या होडम है। हम तो आपके होम या तावेदार है।' बहूजी न कहा 'नालायर सूअर, पाजा दूर हो मेरी आया में । महादेव ने हंसकर कहा 'बहोजी, सफा काहे होती है। हम हजर का गुलाम है। बदमाश, बाला म इतना सेल बाह डाला महादेव ने अपनी धोती का पल्ला उठावर सिर पाछ लेत हुए कही। 'लो बहाजी। रिस मत होओ। अव क्मूर नहीं होगा।" और कहकर वह फिर हमा। बहूजी ने रहा 'पाजी, हमसे हँसी करता है।" महादव ने कहा, "वेलकुल नहीं बहोजी!" हमारा धोती धोरर सोखा लिया?" "सुखा दिया।" बहूजी ने बेहद गुस्सा होकर कहा, कहा सोपाया?" "आममान पर सुखाया।" यह कहकर नल के नीचे पत्थर पर पडी धोती को महादेव जाकर फीचने लगा। श्यामक्ला ने गरजकर कहा 'चोदमाश !" और तम फुफकारती हुई अपने कमरे में चली गई। महादेव धोती धोकर सुखा देता और कोठरी में जाकर बहता, "बहोजी मुखा दिया।" श्यामकला गुस्से म कापकर रह जाती। महादेव बहूजी के पैर पकडकर कहता बहोजी, खफा मत होओ।' बहूजी पर मिटक्कर कहती, 'निकल जा तू मेरे यहा से । -~-इस भाति बहूजी और नौकर दोनो परस्पर निक्ट आत-जाते थे। श्यामकला इस उस्त और जवाब देनेवाले नौकर से नीकर भी भीतर ही भीतर गद का अनुाव करती है। इस नौकर के साथ वह मालिक है। इस नौकर को लेकर उसके अहवार को तृप्ति मिलती है। वह सुष्ट होती है। मानन्द मिलता है। उसे कुछ अपनी सार्थकता अनुभव होती है। उसे लगता, इस नौकर के सामने होकर वह अपने अधिकार में भी कुछ है।
?" वह कृपाकाक्षिणी नहीं है, अनुग्रहदात्री भी है और जब मास्टर महामहिम घर पर आवर अपनी किताबें यथास्थान रखकर पत्नी के सामने पहुनकर कहते हैं 'कामक्ला सी जो श्यामकला पुनि किधों श्यामक्ला तब पलो चुपचाप अपने काम मे ही रहती है, पति वा प्रेम-सम्बोधन उसको बिना छुए हुए ही उसके ऊपर ने निक्लता चला जाता है। पति कहते है, "मैं एक चीज़ तुम्हारे लिए लाया हू, चलो देखती हो?" श्यामकला पूछ लेती है, "क्या है ? वह यह ऐसे पूछती है कि मानो नित्य की तरह पूछती हो, "क्या हाल है।" यह नही कि मास्टरजी इस फोकेपन को नहीं समझते आ रहे, लेकिन वे और भी आग्रहपूवक कहते हैं ' चलो देखो, क्या है।" श्यामक्ला चुपचाप उठकर साथ चली जाती है और देखती है कि पति उसके लिए साडी का एक दूच लाये हैं। महामहिम पूछते हैं, "कैसा है, पसाद आया?" श्यामकला कहती, "अच्छा है।" मास्टरजी कहते, "वह जो धानी साडी है उस पर लगाना, खूर खिलेगा, और लो।' एक दोने मे मावे को गुझिया लेते आये ये सो दे दी। श्यामकला को इस तरह की बात बहुत बुरी लगती है। उसने कहा, "क्या तुमको यही लगता है कि मैं भूखी रहती हूगी?" "नहीं, नही प्रिये, अब ये मैं देश से कुछ सन्देश और रसगुल्ला मगा भेजूगा। यह पहाडी लहका अच्छा खाना नहीं बनाता। मेरी कोइात नहीं, मुझे सब चलता है। तुमको जिस बात की जरूरत हो, मुझसे कह देना । साना तुमको ठीक सगता है।" "मुझे किसी चीज की जरूरत नहीं।" महामहिम को यह सुनकर कुछ खुशी नहीं होती। वह चाहता है कि उससे जरूरतें खुलकर कही जाती रहें और वह उन्हें मघाशक्ति पूरा करता रहे। मानो इस भाति वह प्रमाणित करना और देखना चाहता है मामकला के प्रति उसका प्रेम पूर्ण है।
१८ जनेद की कहानिया [चतुथ भाग) वास्तव म श्यामक्ला उमके जीवन के साथ मिलकर ऐसी स्वत सिद्ध अश हो गई है कि उसके अमाव पर कल्पना भी नही जाती। इसस उसक प्रति अपनी आकाक्षा का उह अनुभव ही होता। जोवन म श्यामक्ला उनके लिए आकाक्षा है प्राथनीय है, यह समझ देसने का उन पर अवमर नही आया। श्यामकला पदा स ही उनके निकट सुप्राप्त है इससे उनके जीवन मे वह है यह भी बोध लगभग उह नहीं होता। एक रोज जव एकाएक कमर में दद हो आता है तब उम कमर अस्तित्व का हमे ठोक ठीक बोध होता है। साधारणतया हम जीते ही चलते हैं, बिना यह चिंता रखे कि कमर भी हमारे है । अत मे एक दिन दद उसे कर उम हमारी कमर को हमारे निकट ही प्रमाणित कर देता है। मास्टर महामहिम स्कूल से आकर कोशिश करके पत्नी श्यामकला के साथ कुछ देर वहल लेते हैं और फिर अपने दिन के क्रम को यथापूर्व चलाने लगते हैं । उनका अधिक काल स्कूली लडका मे जाता है। जब पर मे नौकर है और पत्नी वयस्का है तब घर का कुछ भी अता-पता रखने की ओर से वह निश्चित हैं। जो होता है हो वह वक्त पर स्कूल चले जायेंगे, रात होत होते फिर किताबें लेकर बैठ जायेंग और सवेरे जो वक्त मिलेगा उसमे भी कितावे सामने लिए रहेगे। और ये स्कल के लड़के भी बेवक्त और हर वक्त बस्ता लिए मास्टर के पाम आ पहुचते हैं। जो वक्त मिलना भी है उसे वे खा जाते है। जिस प्रकार स्वस्थ व्यक्ति का अपने शरीर के अगोपाग पो साधा रणतया खबर ही रहती, वसे ही स्वस्थ प्रेम महामहिम को अपने गहस्थ जीयन के किसी विशेष भाग को चिनापूवक अधिक आत्मदान करने की आवश्यकता की खबर नहीं थी। इस प्रकार अतरौली कस्बे के मिडिल स्कूल मे मास्टरी करते दस वर्ष होने को आये, तब सहमा एक दिन पढाकर लौटने पर उन्होने पाया कि पर मूना है श्यामक्ला नहीं है। वह पहाडी नौकर भी नही है । उन दिना वालको की छमाही परीक्षा के दिन निक्ट आ रहे थे। बहुत से लडके मास्टरजी से पढने आया करते थे। उस दिन मास्टरजी ने x X मास्टरजी १६ खाना न खाया था। याद ही नही आई थी किखानाभी खाना है। अभी तक यह भी सुध उहें नहीं हुई थी कि खाना बनायेंगे, तब बनेगा। वह अपनी कोठरी में बैठे थे, वहा बैठे ही रहे। वक्त बीतता गया और दिन ढलने के बाद शाम आती गई। पर वह बैठे ही रहे । इतने में बाहर से बालको की आवाज उनके कानो मे पड़ी, "मास्टरजी, मास्टरजी।" मास्टरजी ने नायास कहा, "आओ भाई," और वह लालटेन जलाने के लिए उठे। बालक शोर मचाते हुए अन्दर आ धमके । वोले, "मास्टरजी, यह तो बडा मधेरा कर रखा है, लाइये बताइये, कहा है लालटेन जलायें।" मास्टरजी ने कहा, "लालटन | देखो चौका मे होगा।" दो बालक उधर गये। औरो ने कहा, "मास्टरनीजी कहा गई हैं, मास्टरजी?" मास्टरजी बोले, "आमरा नौकर का साथ अपना अम्मा के गया हय ।" बालको ने कहा, "वाह मास्टरजी, आपने हमको पहले से कुछ नहीं बताया।हम पहले आकर आपका सब काम कर देते। मास्टरजी ने कहा, "हम सोचता था, हम काल बोलेगा । आमरा बहू बहोत खराब है। हमारा पीछा चला गया।" बालको ने आपस मे सलाह की कि मास्टरजी को कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए। वे लोग तैयार हुए कि पानी न हो तो भरकर रख दें या और जरूरत हो तो कर डालें। जब कहीं से भी दियासलाई लेकर और लालटेन दृढ़कर उसे मालक जलाकर ले आये, तब मास्टर जी बोले, "नाओ, आओ, अब तुम लोग सोबक पढो।" एक ने पूछा, "मास्टरजी, मास्टरनीजी कब आयेंगी?" मास्टरजी ने कहा, "कहने नही शक्ता तुम सोग परीक्षा में पास होना मागता हय । तो खूब मेहनत करना मागता हय । तुम लोगों का इम्तहान मे कितना दिन वाली हर दो हफ्ता से बेशी नही हम । तुम लोग सब अच्छा नम्बर से पास होना मांगता हय। आमरा बोहू चला गया हमे। हाम अब तुम सबको बैंशी बखत दे सकता हम।"
" २० जैनर की पहानिया [पतुय भाग] एक लडद न यहा मास्टरजी पल मैं अपने घर मवेरे शाम दोना वक्त गाना जाऊगा। मारजी न कहा नहीं-नहीं, हम पद बनाना नांगता य।' वालवा न वहा नहीनही मास्टरजी और व अपनी-अपना और से उहनिमत्रण नला। माटरजी न पहा आमरा चोटू वापिस लौटेगा तो बहोत गुगर होगा । बागा -तुम यह क्या दिया-~-अब तुम लोग सोबर पणे सोबका' पढाई हो। लगी। पहन-पात धीर धोरे लालन की रोशनी कम पहन लगो। मारने भी दमा और कान भी दखा दिसलमान है। एक लड़के न रहा लामा मैं तेन डलवा लाऊ। एक दूमर लडके ने पूछा मास्टरती पर म तेल माटरजान चिन्ति मुद्रा भ पहा तेल और सहमा आगे कुछ न कह सके। पहले लडव ने चुपचाप लालटेन ली और तल डलवाने क लिए बाजार घलपडा। काठरीम प्रधेरा हो गया : सडये हसन और दगा करने लगे। भास्टर उस अधेरे ममोपा बैठा रहा। उसन अब देखा दिया अपरा अब उसके लिए बाहर है और भीतर है। तडका ने कहा, 'मास्टरमाती को बुलवाइय।' मास्टर ने सुन लिया और पी गया। एक और ने कहा मास्टरनीजी को दीवाली पर जहर अलवा सीजिए आज मधेरा है, उस रोज हम खूब रोशनी करेंगे। मास्टर ने उस लड़के ने कहा मास्टरजी सुनते नहीं है । दीवाली पर उह जरूर बुलवा लीजियेगा। मास्टर ने धीमे से कहा 'अच्छा। एक बालक ने कहा, मास्टरजी, अंधेरा तो वहा खराब लगता है। रसगता है आपको डर नहीं लगता है मास्टर ने कहा "यो तुम लोग मोमक की रात नहीं करता हय । क्या लिया और चुप रहा।
मास्टरजी २१ एघर-औधर की बात करता हय ।" इतनी देर म लालटेन आ गई। पढाई शुरू हुई। लेकिन मास्टर का जी इस घर मे बैठकर दवा सा ही आता है। उसने कहा, "देखो लरको तुम इहा स रात को अपना घर दूर-दूर जायगा । यह ठीक नहीं हय । हम काल से तुमग ही क्सिीका घर पढाने आयेगा । बालो, किसका घर ठोक बोलता अत मे एक लक का घर निश्चित हुआ और मास्टर ने कहा, 'अच्छा, अव तुम लोग जान सकता हय । हम काल से खुद पढाने आयगा।" वालक छुट्टी पाकर अप्रसन न हुए और उहोने फिर आग्रह करना गुरू किया कि मास्टरनीजी को जल्दी बुला लें, दीवाली पर तो जरूर बुला लें। मास्टरजी ने कहा, "अच्छा, अच्छा' । और हमते-खेलते यालक विदा उनवे याद मास्टर ने उठकर अपना तमाम घर देखा। यह देखने के लिए नहीं कि पत्नी के साथ क्या-क्या और सामान चला गया है। देखने के लिए यह कि वही किमी कोने मे रूठकर छिपी हुई वह पडी ही तो नहीं है । उनको एक धोती मूख रही थी जिमको उहाने चुनकर उनी खूटी पर वैसग दिया जम वह और दिना टगी रहती थी। दोना वाटा को वैसे ही बिछा दिया जैस और दिना विछा करती थी और जव कुछ शेष न रहा तब बचारा माम्टर अपनी साट पर आ रहा वि सोय। x X घर को उस हालत मे रखकर कि जो यहा म चली गई है वह जब आय तो पाये, उसको धरोहर ज्या की त्यो है, महामहिम वहा से अधिकतर अनुपस्थित हो जाता और लडका में ही अपने को भूलता रहता। घर की स्वामिनी आ जाय तो घर मे अपनी बाट जोहना ही पाय, इस भाति उस घर को वह प्रस्तुत और सवारे रखता। सुबह और रात, और जब भी अवकाश हो वह बालको मे पहुच जाता। वाला एक रात पढ़ रह थे। सात बजे से पढ रह थे, अब नो होगा। उ नीद-सी आ रही है । महामहिम पट्टा रहे हैं- - २२ नेद्र की कहानिया [चतुर्थ भाग] "अच्छा नोद आता हय ? तो सीओ । हाम चला जाता हम भूगोल देवो घरती गोल है नारगी का माफिक । ओह, तुम लोग सोओ, हम चला जा रहा हय ।' कहकर मास्टर दरवाजे की तरफ को बढते। कहते, 'देखो, इस मूबा मे कौन-कौन दरया है । गगा जमुना घाघरा, चम्बल, केन। हिस्टी में--- कहते कहते कमरे मे फिर मास्टर वापिस लोट पड़ते। - हिस्ट्री म आय जाति का विजय और उनला शोभ्यता खूब यात करना चाहिए। कोर कौन लोग ने भारतवप पर चढाई किया। आह तुम लोग साआ हाम चला जाता हय । फिर दरवाजे की तरफ बढ़त और अंग्रेजी अथवा गणित या भूगोल- इतिहास की चोई बहुत जरूरी बात बतलात बतलाते फिर लौट पन्त । वास्तव म उनका अभ्य पर उस अपने मकान म इम राषिक अवेर मे अपरे को अयना पाने से बचता था। इन दालका को परीक्षा म ती कराने के प्रति उनकी चिंता भी कम नहीं थी। इसी भाति दिन बीतत जाते रह । दोदालो ज्या ज्या पास आती थी, लडका का आग्रह वहा जाता था कि मास्टरनीजी को अवश्य वुलदा लना चाहिए। मास्टरजी लडको के साथ पहले अनायास ही धध चुन । जब उन्होने एक बार कहा था हाहा।' उमर बाद उहाने लडपा को यह भी कहा था कि उन्हाने अपने श्वसुरालय चिटठी डाल दी है। ल रोज पूरते थे मास्टरजी, मास्टरनीजी का ग्वाय आया मास्टरजी रहते 'हा, ओहा पब ठीक है। लेकिन शन का बापत मुछ नेई लिखा। "मास्टरजी दीवाला के रोज लक्ष्मी पूजन होता है। मारनीर को लिखिमै कि पन्ना, अनी और रामसिंह उसे बहुत याद करत हैं और में। और मैं। ऐप लहान भीगोर मचाया- 'मास्टरजी नपहा 'आच्छा, आच्छा।" सहयो ने कहा ' और सबका पालागन लिषियगा। - - मास्टरजी २३ . "माया, यारधार इस भानि एक राज बालपा कोई ना हो पर गया कि मास्टरनीजी ने तुम गयो अपना बलप्रेम भेजा है और सिला है दीवाती सो आने कोशिश बरगी। भवानी में पहन दिना बारा उगाह पर महामहिम मा दिल बैठना जाता था। वाल पूछते, मामरजी यह आयेंगी ?" मास्टरजी सभी पहले, "हा' भी करते नहीं,' अधिय सर यहा, पहले नेई कारता ।' बालवा न मास्टरजीमा पर माड-यहारपर पूर्व माप पर दिया। मास्टरजी न रहा था कि दीवाली को वह न आइ ताबह गुद उनको लेने जायेंगे । यालपा ने पूछा था, पिर मास्टरजी आप कब सौटेंग?" इसके उत्तर म मार-रजी न पहा था, आमरा वोह यहा पर था है । छोटा शहर ओ पशद नई करता। हाम गया तो पापि नही पिरगा। बोलिराता शहर में रहगा । मोहा आमरा बोहू का मर्जी वा लगगा। इसलिए सहक दत्तचित्त हावर मास्टरजी के पर योगूब साफ करने म लो हैं कि मास्टरनीजी न आता हो, तो भी आ जाय । दीवाली वा दिन आ गया है। वह दिन बाप र अव बीता भी जा रहा है। शाम हो धली, अब रात होगी और लोग गेानी वरेंग। दीपका की पक्तियों पर पक्तिया जणावर आर ये घोतित परामरक्ष्मी पा मावाहन परेंगे। दीपमानियो अमावस्या यो व्यय परती हुइ घर पर नगर नगर ज्योतिष्य हागी, लाग मिलेंग। बच्चे खेलेंगे। मिठाइया घटॅगी। मगल मोद होगा । ऋतु वदनेगी । इलाम ग्रिलगा। ल का न प्रबंध किया है कि यह मय कुछ मास्टरजी ये पर होगा। घुग्गे आ गय । पत्तिया वट डाली गयी हैं। तेल तयार है। हिसाब हो गया है कि कहा कहा और मेवर स्निने रसे जायेंगे । सब काम लडके पर है और मास्टरजी से अनुमति लेते जाते हैं । एक लडवा आता है । कहता है "परली कोठरी आलोन दो दो दिय रखे जायेंगे न, क्यो मास्टरजी?" मास्टरजी कहते हैं, ' हा हा।"
- २४ जनेद्र की कहानिया [चतुथ भाग] दूसरा आकर कहता है 'नही मास्टरजी चार-चार रखे जायेंगे। ठीक है?" मास्टरजी कहते हैं हा हा ।" लडको के उत्साह मे मास्टरजी भी उत्साह ले रहे हैं। कोई पूछना "अभी तक तो वह आई नही, मास्टरजी, अब वल आयेंगी, क्ल बडी दीवाली है। है न?' मास्टरजी उस बालक के प्रति देखकर कहते हैं 'हा-हा । वालक औरो की तरफ देखकर कहता 'देख लो मैं कहता था न, कल बडी दीवाली है, सो कल आयेंगी। देख लो, मास्टरजी भी कह रहे हैं कि कल आयेंगी। सब बालक मास्टरजी की ओर देखकर कहते क्यो मास्टरजी? मास्टरजी अत्यत आशामय बनते हुए कहत ' होने शकता हय ।' जगह जगह कोने कोने मे दिय जलाये गये। अपने थाडे थाडे स्नह को पतली-पतनी बटी रई की बत्तियो के सहारे जलाकर वे दीपक अपने चारो और प्रकाश फैलाय हर तरफ बिछ गये। महामहिम ने पाया कि वह स्वय भी उन दिया को बालका के हाथ म देखकर अथवा उनके हाथा मे से लेकर जगह-जगह प्रस्थापित कर रहा है। घर में आलोक ही-आलोक हो गया है। अधेरा सिमटकर नी कही बैठ सके, इतना भी अवकाश उसे नहीं है। पर मानो वह सबका मव एकत्रित, घना होकर काला-वाला उसके भीतर पुमकर बैठ गया है। वालका ने कहा, मास्टरजी सा अच्छा लगता है मास्टर ने कहा, 'बहोत आच्छा ह्य बालका ने कहा मास्टरजी, आपने यहा लक्ष्मीजी की तमवीर है। 'उनके नीचे एक घा का दिया जलना चाहिए। मास्टरजी ने कहा आमरा पास नेई ह्य । बोई भी तसवीर नहीं ह? विवाह का वार का हम दोना का एक्ठो फोटाग्राफ ह्य।" बाला ने उगीको लिया, उसे एक ऊंची जगह स्थापित किया, उसे .
- माला पहनायी और उमये चरणा मे एक रपया और घी से भरा हुआ 'एक बडा दिया जलाकर रख दिया। फिर वे लोग जान के लिए आना मागने मास्टरजी के पास और बोले, "मास्टग्जी, हम लोग अब जाते हैं।' मास्टरजी गदगद हो आय। और उहाने बस हाना कहा, "आच्छा।" बालका ने पूछा, "मास्टरजी, बल बडी दीवाली को तो मास्टरनीजी आ जायेंगीन मास्टरजी न कहा "हान रास्ता हय।" बालक चले गय । नव महामहिम ने एक गहरा श्वाम छोडा। वह उस यमर म आये जिमम माला-चचित उनका चित्र रखा था। उसके चरणा मे घी का दीपक आलोविन था। उसने देखा वह धाती चुनकर उसी भाति खूटी पर टगी है। दूसरी खार उमी भाति बिछी है। उसका मन दोपा- रोपण करने कही भी जाना नहीं है। वह तो यही देखता है कि वह गच्या अप्रयुक्त ही रहती है । यह योती जनावश्यर स्पन यूटी से टगी ही रहती है । वह खाट पर आकर एभ्य एक्टर देयता हुआ अठा रह गया। मद्धम ज्याति से वुझ-बुयर जनने गए दीपा यो बह देखा दिया । एक- एसर व सव बुझत चल गय । अवम्पित हदर जार स्नेह के साथ जलता हा वर दिया ही उस कमर का प्रकाशित क्यि रहा जो उस विवाहित दम्पति - चरणों म लौ लगाये, उ मुख बैठा था। महामहिम बहुत देर तक इसी भाति बैठा रहा। आज उमन घर के क्विाड भी याद नहीं क्येि, खुले ही रहने दिय । धीरे धीरे उमको आसा पर पलकें गिर सा चली। उसी समय उसे मालूम हुआ जैस कोई घर में आया है । लेकिन नहीं, कोई भी नहीं आया । यह पूरी तरह आख सोलकर बैठ गया। बाहर दिये बुद चुके थे और निविड अमारात्रि फैली थी। शन शन गीद से उसकी आखें कपन लगी। वितु वह चाहता है, जागे ही जाग आज इस रात को उस रात से मिला दे। वह सहमा उठा। उसने देखा--कमर म आलोक फैलता हुआ वह दिया मद्धम हो गया है । उसने सुना है लभ्मी दो तिथिया के सधि क्षण में ठीक रात्रि के मध्य मुहूत में जाती है । वह आयें ता घर को प्रकाशित प्रतीक्षा मे हो पायें। उसने बढ़कर दिय वी वत्ती जनेद्र की कहानिया [चतुथ भाग] उद्योत उज्ज्वलतर हुआ। वह खाट पर आ गया । और हौले हौले सपने फिर पलका पर उतरने लगे । शनं शने वह शय्या पर लेट गया। बाहर दालान म अधकारम भी सिमटती हुई जो नारी बैठी थी उसको अव शनै शनै ढाढस बंधा । नहीं तो उसका डर जाता ही न था। चारा और का प्रकाश, उस मानो डमने आता था। गडकर लुप्त हो जाने के लिए वह अपने तइ रही काली जगह न पाती थी। ड्योढी के बाहर जिस किसी तरह वह तमिस्रा के परम जीती रही। प्रशादा म पडतो तो, हाय राम क्या होता? अब उस कमरे के भीतर जिमम महामहिमामय महिम है जान का साहस उसे न होता था। क्यापि यद्यपि महिम मोना है, पर दीपर जागृत है। उसका प्रकाश मानो उसे लील जायगा। भीतर की ग्लानि म मानो प्रकाश की एक भी किरण पार उमदा जी फ्हें विना रस बचेगा। वह नारी दव पाव कमरे में आकर दीपक की ओर बढी कि उसे वुझा दे और फिर अधेरे म इस सोन हुए महामहिम के पाव पकडकर निशीथ को चीरती हुइ चीख उटे नाथ ।' वितु दीपक को पूक से बुझाय ही कि उसने देखा दीपक ता उही दाना के चरणा के निकट लो वाधे बैठा है । यह देखकर उसने अपनी छाती मसाम ती । कुछ दर स्तव्य, उमी चित्र के आग वह खडी रही और फिर हृदय कठोर करदे वह सोत हुए व्यक्ति की ओर बढ गयी। सावधानतापूवर महामहिम पर उमन परडे और फिर उन चरण-तला मजार जार म वह अपना माया ठोक्ने लगा। जान महामहिम क्या स्वप्न देख रहा था। यह एर साथ उठा। वोला, "ए मा लक्मी, आगुन ।' नारी ने उसके चरणो को और भी जार स पक्ड लिया और फूट- फूटकर रो उठी। महामहिम न दोना हाया में उठाकर उमे शम्या पर विठाया। कहा सवयी जमन एरोटेन, तर फिरे जैते पारिवन ना| आलो निविये दिच्छी, मनकरेजायेन पहार दीपक ना दिया-- x X अगले दिन अपेरे ही दुकान सुनवाकर महामहिम बहुत-गी मिठाई लाया। उसे घर मे रखकर एक बालेज के घर जाकरबहने लगा, और चुनी, ओभी शोता हय । आमरा बोहू तुमर धाइते, एब-सा मिलाई लाया फिर दूसरे बालक के घर जाकर कहा "पोना पोना । शुनो, आमरा बाहू तुमरा वाश्ते मिठाई लाया हय ।" फिर तीसर के यहा, फिर चौथे वे यहा बालक लोग मिले, आपस मे कहने लग, देखो, हम कहते थे न, बडी दिवाली को मास्टरनीजी आयेंगी?" सब लोग मास्टरजी वे घर पहुचे । मास्टरजी को नमस्कार किया। देखा, मास्टरनीजी तो बहुत दुबली हो गई है। वे लोग बोल, 'मास्टरनीजी आपने अपनी बीमारी की कोई खबर भी नहीं दी और आप तो बिल्कुल अचानक आ गई है। पहले मे खवर भी नहीं परी।' मास्टग्जो जव बालका में बर्फी और पडे वाटने लगे तब सूब सुश होकर खाते हुए बातका ने कहा, 'मास्टरनीजी, आप अपनी दशवाली मिठाई क्या नही लाई ? वह रसगुल्ला और दूसरी क्या चीज़ होती है, हा, सदेश मास्टरजी ने झपट कहा "तोमरा देश का चीज़ लाया हय । कोलि- काता मे मब रोक्म का चीज़ मिलता ह्य । रोगगुरला तुम लोग को अच्छा लगेगा? अबका बार जाना होगा तब खूब मा रोशगुल्ला लायगा। मास्टरनीजी इस बातचीत म जाने कैसे अपने आसू रोक रही ।
घुघरू
नीनानाथ न अभी ब' अनमनपनापोन पर मिलाको आवाम्न
दिया कि अच्छा अमुप ममप आऊंगा?
उमिला दूर म आई है। हम ठहरी है। कहती है "जमली हू
और मण्ट में हैं। दानानात्र नहीं जानता कि इस माम उस क्या मत रख
है। अत म वचन 1 ममय आ घण्टे चीतजा पर अपनी गाडी रोकर
वह होटल पहचा।
पीछे का ओर मन द्वार राटसटाया ! म हैरानी दुई विपदर
से बार उत्तर क्या नहीं आ रहा है। आखिर मुह धुमाकर दरवाजे को
तर धनाला बहार गया। भीतर कमरे माफी अधेरा उस मालूम
हुआ। एकाएक छन पार पडा। अतमीला कि उमिला एक और
पल पर सोई पी।
अगव माज। पावा म ण्डन है एम पैर पाठी उधर त्या
हुआ १ दूग्रा बिन्त पर। पोशार धुम्त है, जाली क पा पर स कमर
र आर वहा लपरागई और
मव दसबर कराता हुआ वह एक तरफ कोच पर बैठ गया है।
एक मिनट नोमिन न मिलर ! म उठकर टखन पर म उस छत
और हिलाते हुए कहा जमिता अमिता!'
उर्मिला उदी। उयन अगदाई लो, आखें मिला मुस्कराई बोली
'नौर आपनी राह ते मुझे गद भाग।
दीनानाथ रहा, 'मह क्या वश है"
“मिला बोली बुद्ध ही में नार रही थी अभी जाई।
बहते परत झाले म वालो के जूडे का विर वह उसके गामने से
घराबर लग रम में चला गई।
घुघल २६ दीनानाथ ने हँसना चाहा, पर वह हंस न सका। उमर माथे पर वन पड जाये। उसे बुरा मालूम हुआ, जैसे उर्मिला को चुस्त, चिकनी पोशाक उसे चुनौती हो। वह कामिदा आदमी है, बडा दफ्तर है, कई कम्पनिया हैं । कभी पहले कवि था, अब व्यवसायी है। इस तरह की घडिया उसे नाहन मालूम होती हैं। थाडी देर मे बराबर के कमरे से निकलकर उमिला उमज पास आकर वैठती हुई बोली, "ओह ! इतनी देर आपको कैस लगी?" दीनानाथ ने देखा कि सज्जा अब कुछ और सभल गई है। उसने कहा, "कहो क्या काम है ?" "यो, जाने की जल्दी है ?" 'जानती तो हो काम धाम मे फुरमत कम ही मिलती है।" "नहीं, मैं नहीं जानती काम-धाम काम धाम । इतने अपने से आप नया नाराज हैं ?" दीनानाय ने अपनी अप्रसन्नता को रोस्कर हठान मुस्कराते हुए कहा, "अपनी बात कहो।" उर्मिला ने कोई बात नहीं कही । वह अपनी जगह खड़ी हो आई, पास पडी गोल मेज के गिद होती हुई सामने आकर बोली, 'बहती हूँ, पति-बात यह है कि में बहुत खुश हू, क्योकि आजाद हू, इससे नाचने की तबीयत होती है, बोलो, नाचू ? देखोगे।" दीनानाथ ने कहा, 'क्या इसी के लिए बुलाया था "कोई नेसने को न हो तो क्या नाचना येकार नहीं है "अच्छा, चलो मैं बैठा हूँ। "अह क्या चलू. युधरू तो है नहीं।"- "तो छोडो, सीधे बैठपर अपनी बात रहो, लेकिन जल्दी।" नहीं करती जल्दी और नही बैठती", कहार उमिला अजब वेग से देवतो, दीवार को ओर एक-एक कदम पीछे हठनो गई और समरे में उस रिनारे पर पहबार हापो से उसने बांसुरी बनाई और मुह से सगावर लोसा के कृष्ण की मुद्रा में पड़ी हो गई। देखते-देखते एकाएक फिरसी सेमरनाथ उठी, भी और कभी रापा बनकर इस प्रकार मह " " जनेद्र की कहानिया [चतुप भाग] रास के अभिनय मे फ्रिकी सगाती रही। मिनट-पर मिनट होते गये। दीनानाप चित्र लिसा-सा सब दयता रहा। नाना भगिमाआ म दुहती-मुडती वह नारी उसके मोह और रोप का कारण बन रही थी। वह उसके रूप मे न अटक्कर उसके सत्य को पहचानना चाहता था, पर रह रहार वह रूप ही सत्य बनकर उसपर छाया जा रहा था। देखते-देखते अक्स्मात् दीनानाथ के मुह से निकला, "वाह ।" सुनते ही उर्मिला शरमार एपदम रुक गई। लाज में लाल पडकर रुक्ती हुई बोली 'नहीं-नही, घुधरू तो है नहीं।" अनन्तर बह अपने स्थान पर ठहरी न रह सकी भागी हुई आई और मुह को हाथों में छिपा कर सोफे पर औंधो पड गई। दीनानाप कुछ क्षण न समझ सका । अन्त मे उसने कहा, "उमिला! उर्मिला देखा उसके सम्बोधन पर उमिला और सिसक्ने लगी है। दीनानाथ ने सिर ऊपर नही उठाया, उसकी सिसकी जारी रही। दीनानाथ मे अपने से रोप चढ आया। अपनी जगह से यह डिगना नहीं चाहता था। कठोर भाव से उसने कहा, उर्मिला, सीधे बैठो, बात कही जो बनी है।' उसी तरह मुह छिपाये सुबक्ती पडी उमिता ने कहा, 'आपके काम में देर होगी, आप जा सकते हैं।" छोडो बात कहो अगर कहनी है।' कुछ नहीं कहनी।' दीनानाथ क्ट आया। कहा उमिला, नखरे न बरो, कहना है कुछ तो सीधे कहो नहीं तो तमाशे के लिए में नहीं है, मुझे जाना है।" "जाइये ' सुनकर दीनानाथ चला नहीं गया। वह पास आया, अपने दोनो हाथों से उर्मिला का सिर उठाया और उसे अपने घुटने पर टिका कर झुककर कनपटियों पर हौले-हौले थपकाते हुए कहा, छो', जी हार हैं। मैं वो तुम्हें यहादुर समझता था।" 'जाइये।
n " . उमिला अपने आसुओ के बीच भी मुसराई और यदि योगी "बहादुर दीनानाथ अब उसे सीधा बैठे छोडकर अपनी स्गिहे, उसने कहा, "हा, तुम बहादुर हो, मिला। और हारोगी मही क्या है "उहाने निकाल दिया।" 'क्या मतलब? निकाल दिया अपने हाथ से घर से बाहर कर दिया? नहीं, ऐसा तो वह नहीं है।" "जी, ऐसे वह नहीं हैं।" उमिला अतिशय तिक्त स्वर से दीनानाप को धक्का लगा। उसने कहा, 'ठीप बताओ, हुआ क्या "कहती तो हू। उहोने निकाल दिया। बताइये अब मेरा क्या होगा? क्या आप कुछ ब दोबस्त कर सकते हैं ?" "कर यह सकता है कि उसे बुलाकर देखू, तुम लोगा म कोई वन- बनाव हो सकता है कि नहीं।" "आप कुछ नहीं कर सकते" दीनानाथ ने कहा, "मैं ?" "मेरा कोई कही कुछ भी रन्दोबस्त नहीं कर सकते ?" दीनानाथ ने फिर वही विस्मय से कहा, "मैं ?" "जाइये, आप कुछ नहीं कर सकते। सुनिये, मैं आपके छह सौ रुपये जल्दी ही लौटा दूगी।" दीनानाथ ने जोर से डाटकर कहा, "से छह सौ रपये ? पागल तो नहीं हो गई" "देखिये, मैं आपसे कहती हू, उन्हें आगे भी रकम मत दीदियेगा।" दीनानाथ ने शासन के स्वर में कहा, "उमिला।" उर्मिला बोली, "आप जानते नही, वह इसी तरह डूब रहे हैं। आप उनको और मुझको उबारना चाहते हैं तो पैसा कभी उनके हाथ मे न दीजियेगा।" दीनानाथ ने अत्यत क्रुद्ध भाव से कहा, "उमिला। तुम्हारा दिमाग . उमिला ने कहा, जैनेन्द्र की कहानियां [चतुर्य भाग] सरार हो गया है । होश म बात करो। उगमा सव बच तुम्हारे लिए है। दिवालिया बना लिया है या वनगा नो तुम्हारी खातिर । पिर उम पर दोप रयत तुम्हें शम नही आती?" । शम .. स्वाग न करा और बताया 'कहार उमिता पिलबिनावर हेम पडी। अन म बोली, "आप मुझे वेच नही नमत है खुद सीट नही मयत है? क्या यह शम की बात है ? योलिय में गाऊ' नाच ? नाईट नामिव बहिय, देखेंगे।" दीनानाय ने घणा स भरसर पहा तुम्हारे पास इस समय वितना रुपया ह?' उमिला उस पर वडी खुश हावर अपनी जगह म उठी और वक्स में से पस निकालकर दीनानाय की गाद म डाल दिया, और कहा, 'सब इसम है।' नीनानाथ न मव नोट निकालकर गिन, पुस साढे सात मौ रुपया था। पूछा सब वहा म लाई हो? अजब ढग न मिला मुस्कराकर बोली नही, कमाया है।" 'बनो नही, ठीक वोनो क्तिना रुपया उसने दिया था।" क्या मैं कमा नही सकती ? आपको कुछ भी मालूम नहीं है, पपूर साहब | मैं रपया के ढेर लगा सकती है। मैं मैं लेकिन छोडिये, में पतिव्रता नारी हूँ। मैं मा हूँ। मैं गृहिणी हूँ। म रोटी बनाती करती हू, बरतन घिसती ह, कपडे धोती पति की पद रज लेती हूँ, पर म मीरा नही हू, पतिव्रता हूँ। उमिला की बहा देखकर दोनानाथ ने डाटकर कहा, "सुनती हो, म क्या पूछ रहा हू' क्तिने रुपये उसने दिये थे। ' क्या आप चाहत हैं म हेमू नही नाचू नहीं 'सब नाच हसी रुपये म हैं। पूछता है वह बताओ। क्तिने रुपमै उसने दिये थे?" सहसा गम्भीर बनकर मिला बोली, 'बौदह सौ। "कहा मे आये ये" "मालूम नही। सफाई M . अनुमान भी नहीं?" "है, आपसे लिए गये थे।" दीनानाथ ने जोर से कहा, ' तो तुम कुछ नही जानती ?" "सौ सौ के पद्रह नोट थे। मुझे देकर उहाने कहा, यह तुम्हारे हैं। इनमें से चाहो तो एक मुझे दे सक्ती हो। मने एक नोट उहें दे दिया। उसके दूसरे रोज नौ सौ रुपया म साथ लेकर यहा चली आई है। छह सौ आपके हम पर पहले चाहिए। क्या यह नौ सौ और आप उह भेज सकते हैं ! म उनके एहसान म नही रहूगी।" दीनानाथ यह सब सुनता हुआ बैठा रहा। अत मे उसने कहा, "सुनो उमिला। यह झूठ है कि मेरा कोई रुपया तुम लोगा पर आता है । म वह रोग नही पालता । सहायता या उपकार मे म विश्वास नहीं करता । रुपये का देना मने नही सीखा। पति का एहसान छुड़ाने के लिए रपया मुझसे लोगी, क्यो?" "हा, हा, क्या म इस लायक नहीं हू क्या आप प्रेम-" दीनानाथ हँसा। बोला, "इमीन एक पैमा तुम्हारे लिए खच नहीं कर सकता। प्रेम कौन करता है ? मै? देखती तो हो मैं लखपति ह, करोड- पति होने की तरफ बढ़ रहा है। ऐसा आदमी प्रेम खरीद सकता है, उसे प्रेम करने की जरूरत नहीं होती। इस तरह मैं प्रेम से सदा के लिए मुक्त हूँ। मेरी यह सारी व्यावसायिक मफलता, मेरा क्तिना बडा दुर्भाग्य है, यह तो मैं ही जानता है। इसलिए मुझसे ऐसी बात न करना।" देखते-देखते उर्मिला अपनी जगह से उठ आई और दीनानाय के पायो तले बठकर उनके घुटनो मे अपना मुह छिपाते हुए बाली, "मुझे माफ परो।" दीनानाथ ने शासन के स्वर मे कहा, "उमिला, अलग बैठो। सुनकर और जोर से उसने उन घुटनो गे अपने आलिंगन मे कस लिया और सिर गाडकर वही सिसक उठी। दीनानाथ अपनी जगह कुछ देर बधा नंठा रहा। जी हुआ मि इस अपदार्थ मायाविनी नारी को अपने पैर से सटकर दूर कर दे। जो हुआ कि उसे मस्तक पर धीमे धीमे पपकार कहै-'नहीं नहीं ! रो नहीं, रोते । - लिए नही वर मक्ता। पर यह है कि उससे स्नेह नहीं चाहती, अपमान चाहती है। पति वा प्रेम ही इस अपने और उसके विरुद्ध डालता है। क्यों? क्योकि एक दीनानाथ है जोलपपति भी है। दीनानाथ ने यह सोचा और दीनानाय ने देखा कि बाल उसने बिखर आये हैं। माथा बहुत कुछ ठक गया है आखो मे याचना है। वे आये आसुओ से अभी धुल कर चुकी हैं चिबुक के नीचे की गरदन बेहद सफेद है। वक्ष वा उभार सवथा आवत्त देखकर दीनानाय अकारण आवेश से भर आया। उसके घुटनो की दीनानाय अपन से झगडता हुआ उठा और बोला, "मुझे अब जाना ३४ जनेद्र की कहानिया [चतुर्थ भाग] नहीं।' मैं नहीं जानता था कि वह क्या चाहती है। इस नारी का पति उसका अत्यन्त स्नेहभाजन है। कुछ नहीं है जो वह इस अपनी पत्नी के एक कठिन और क्लिष्ट भाव स वह भर आया। उसने कहा, "उमिला, तमाशा न करो अलग बैठ।' सुनकर, नहीं वह अलग नही बैठी । दीनानाय ने शोककर तश साथ कहा "सुनती नहीं हो । फिर मुझे दोष न देना।" अब उमिला ने उन घुटनो से अपना मुह पर उठाया। और भीगी है । मुह ऊपर होकर जैसे स्वीकृति की प्रतीभा बना दिया है। नहीं है। जह बनी कप मूल त खुनी , उस भरो और गोरी बाह को मुरही में पकडकर जोर से अलग खीचत हुए कहा, 'चल हट, दूर होती है कि नहीं मायाविनी उमिला इस बार आसानी से दूर हो गयी। माथे के ऊपर आये हुए बालो के नीचे उसकी भौंहो पर कोई वक्र नहीं। कोई अप्रसनता वहा नहीं दीखी उल्टे वह चेहरा तप्ति व सन्तोष से मुस्करा आया। होगा। देर कापी हो गयी है। उमिला ने सहमत होकर कहा "अच्छी बात है।" और कहते ही दीनानाप को बढता हुआ देख दौडी हुई वह दरवाजे पर पहुच गयी । से उसे बन्दर, अपनी पीठ मे रोक दीनानाय के सामने के लिए यह सही हो गयी । उसका उता गिरता वक्षहापती सास और शरारत से . घुघरू ३५ हेमता हुआ मुह देखता हुआ दीनानाथ क्षण भर ठिठका रह गया। फिर तेजी से लौटकर वह पीछे वाले दरवाजे की ओर बढा। पलक मारते में उमिला उससे पहले ही उस द्वार पर पहुची और घटसनी को अपने शरीर स रोक्ते हुए उसी प्रकार दीनानाथ के सम्मुख जम गयी। यह कमरा अधेरा था। दीनानाथ को सही-सही कुछ दीख न पाता था, बस उमिला की आखें साफ झलक रही थी और लिपिस्टिक मे रगे ओठो को लेकर उसका मुह ऊपर उठा दीखता था। दीनानाथ ने कहा, "उमिला जाने दो।" "जाओन।" 'हटो सामने से।" "नहीं हटती, जिसे जाना हो जाय ।" दीनानाथ अवश हो आया। उसने कहा, "तुम मुझे देवता न समझो, उर्मिला | न निमम । मैं कमजोर आदमी हू। आखिर तुम मुझते क्या चाहती हो?" उसने पाया कि उत्तर मे दो बाहे बढकर उसके गले मे पड गयी हैं। उसकी सास तजी से चलने लगी। उसने अपने साथ जल्दी मचाकर पहा, 'तो चाहती हो अभी न जाऊ? तो नहीं जाता।" महकर उन बाहा मे से अपने को तुडाकर जल्दी मे चलता हुआ वह पहले वाले कमरे में आ गया। जल्दी जल्दी उसके दरवाजेखोले, खिडकिया भी खोली और फिर उसी अपने कोच में आन बैठा। बैठे-बैठे उसने कमरे को चारा तरफ से देखा, अन्त में उसकी निगाह सामने मेज पर रखे कृष्णजी के उस चित्र पर जा टिकी जिसके आगे फूल पड़े थे। चार, पाच, सात मिनट तक कोई उस कमरे मे नही आया । अनतर उर्मिला बराबर के कमरे से वहा आई तो बदली हुई थी। मेकअप वितकुल नहीं रह गया था, पोशाक मे सादी साडी ही थी। माथे पर चन्दन की बिंदी, पावो मे चप्पल और बाल एक सीधे जूडे मे बघे थे। दीनानाप ने कहा, "आओ, देखो, कैसी भली सगती हो।" उर्मिला गम्भीर भाव से हंसती हुई आकर सोफे पर बैठती हुई बोली, "तो मैं " मिला सिलपिलासर हनी। बोली 'मेरे पतिनवा आप मर शतान उहानही वहा। मुये माथ ले चलियगा न? सोटरी बनाकर बीच मे मिला बोली मैं पराव नहीं लेकिन कुछ दिन पति से अलग और दूर में नहीं रहगी तो मुझे सन्तोपन होगा। तभी वह अपना काम दीनानाथ ने कहा यहा तुम कितने दिन के लिए हो और किम स्थान आयी थी कि अपने को आप पर छोड दू, फिर लौटने की मेरे लिए जनद पीहानिया [चतुर भाग] आपयो भी छा गयी है ! गयारि यह तो मुषे मानत हा अमा है। आपको क्या बुरे होने म विश्वास नही हो सस्ता है?" दीनानाय न पहा मनाती हामि मुझे यह विश्वास नहीं है। तुमग डरता है। श्री शनान होती है । दुम तो और भा । होने का विनाम कग दे नाता में आपकी पडी वृतन हूगी। वह मुस इतना प्यार करत है कि मैं पाहती हू मिनिमी भी तरह उनको नफरत का पात्र बन गा । मेरा प्यार उह विगार रहा है। यह रिसी काम र जानही रह गय है यह म मरी यजह म । नाहती हू मुमर एसा पाप हा कि वह जानें और मुझे पौनाउन प्यार से में इतना थक गयी है कि अब तो चाहती है उनकी मार मुझे मिलने सग। पर आप यह न्या दरार हैं ? मच बताय लदन क्व जा रह है? तुमस यह मिन बहा चलिय, क्यो ? क्या नहीं ल चलियगान ? बोलिय । कहिये।' दीनानाथ और कुछ नही ता असमजस म हँसता हुआ वठा था । एका ए वह कुछ बोला ही । अ त म उसने कहा 'ना, बाबा ना। में इतनी खगव है?' इतनी क्तिनी" जितनी कि आप नही चाहत । दीनानाथ ने कहना चाहा वि उमिला तुम समझोगी नही लेकिन देखने लायक बोंगे। बोलिये ले चलियगा? जरूरत न रहे।' अब तो वह ख्याल नहीं है ? से आयी हो .
'अभी तक आपने नहीं कहा है कि आप मेरा कुछ भी इंतजाम नहीं कर सकते।' कमाइतजाम ?" "मा भी आप चाह ।। अपने यहा तो किमी मिन वे यहा । सच कहती है कि यह एक्दम जरूरी है Fि मैं उनसे अलग रह । वह मुझे इतना चाहन- किम दीना हो उस चाह म घटकर मर रहे है । मैं अपणी मूरत कारदा ने जाऊ जो अब तक खूबसूरत वनी है । हाम मुयें और सब निया की तरह मामाय बनना क्या नहीं मिला? पोलना स्प मुझे लिया गया। दिया भी तो अब तक मुझ पर स वह खिमयता क्या नहीं उनी मेरी वापी हा चुकी है।" नानानाय ने कठिन व्यग्य न कहा, 'तो तुम मामा य नही हो?' मिला म पर खुा भाव गोली हिय कि म मामा य है। FT जापान निमैं मामा.' गेनानाय न झी बहा छाट, वताओ वापिम तुम्हें अपने पति 1-1-निए मैं क्या कर मरता हूँ का पा पाम मग बाइ इन्तजाम नहीं कर सकत जमा तार दने नपल तव वह आ जायगा। मुनो तुम रामाय रहना है। अपन लिए नहीं तो बच्चा के लिए। तुम्हे ख्याल मितुम ची आया हो तो बच्चे पीछे क्या कहते हाग मिशन दोना हाथा म अपना मुह ढका और कठिन पीडा तो वाणी वाये हा आप मो तानही ममयते । क्या कोई नही समगा? आप ता "भारपिया पर छाडित, गायद अकयामी भगवान पिवार काई सिमाकान्हा जनता। दीनानाथ उस वातर वाणी को सुारर चमक आया । म स्त्री को ए मोबात को वह कभी प्रत नहीं मान सपा ण, लेकिन दम पिटनी बारम बरत क्या स्वर का वह निमी भी तरह अनपदासान बर मकानन कहा मिला, मैं मायद नहीं सम्यता। लकिन क्या तुम एन यात मौसमपागी नि मेरे आसपाम की सफलता और सम्पदा निरा मेरा नाम है। यह मैं नहीं है। वह मात्र पागम्बर है। तुम्हारी आवा मे " - वि १.
३८ इमकी तुम कल्पना - जैनेन्द्र की बहानिया [चतुर्थ भाग] उसकी असलियत है। अगर वह असल है तो मैं एक्दम नक्त रह जाता है ! स नकली आगमी को ही गायद तुम जानती हो । शायट हो कि चाला भी हो पर क्या तुम्ह मालूम है उमिला । कि मैं अनाथ बालक था। क्तिना तव जगत स लतिया और दुरदुराया गया है, भी नही कर मक्ती। मैं भीनर से वही निरीह और आवारा आदना है। उस अपनी सचाई को इसी के लिए ढवे फिरता है कि वह किसा व लिए रुचिकर न होगी । नकली आदमी बनकर जगत से व्यवहार चलान में आसानी होती है। वहा मन नहीं, आदमी का मान पूछा जाता है पर जब मेरी मा मरी तो क्या मैं उस ढक्न का क्फन पा सका था। इसलिए मह छिपाकर मैं वहा से भाग खडा हा था। उनका क्रिया करम सुना है पान पडोसिया न क्यिा । मरते वक्त वो मा की निगाह मुझे याद है । वह निगाह मुझे हर वक्त चुभती रहती है। उसमे अमित देय अमित याचना भरी थी, और में दो पसे को दवा का उसके लिए बदोबस्त नहीं कर सका था। उमिला असली म वही हू । आज नहीं जानता कि तुम्हारे सामने वह मन म क्यो कहने बैठ गया। लेकिन वह भ्रम जो मेरी नाम्बरी न तुम्हारी आखा में भर दिया है म उम तुम्हारे माय सफल हुआ नहीं देख सस्ता, इसलिए माफ करना तुम्हे अपने से कोई आशा खन का मैं अवमर नहीं दे सकूगा । तुम मफ्लता चाहती हा नाम चाहती हो प्रसिद्धि चाहता हो तुम स्पसी हो युवती हो, विदुपी हो, क्लावन्त हा सब कुछ तुम्हें मिल सक्ता है लेकिन उस सब म मेरे लिए कही स्थान नहीं हैं । उस एश्वय पी दुनिया में मेरा शव ही रह रहा है । मैं अपना निरीहता म ब हू आर सबसे मुझे कुछ वास्ता नही। सुनती हो, उसस मुझे कुछ मतलब नहीं। इसलिए इस मुझ अभाग से तुम क्सिी सहारे की आस न रखना । मेरी पनी ह बच्चे हैं लेकिन तुम्हें कहता हू मेरा कोई नहीं है। उसका जिसका को नहा है, भला कोई क्यो बने । माफ वरना उर्मिला तुम्हें मेरे दुभाग्य का पता नही है इसी म गायर तुम्हारे मार करन म कठिनाई हो रही है लक्नि । दीनानाथ कह जा रहा था। अब उर्मिला की और उसका ध्यान गया। उसकी नोना आखा से आमू की धार बह रही थी। और वह अचल पत्थर की मूर्ति बनी बैठी थी। देवकर वह स्तब्ध हो आया। आग उमसे कुछ कहा नहीं गया । उर्मिला के उस चेहरे को वह आतक से, अभीप्सा में अभिलाषा से देखता रह गया। उस चेहरे ने कहा, "मा तुम्हें क्या कहत थी?" "दीनू "तो दीनू । मैं लौट जाऊगी। लेकिन क्या सच तुम्हारा मन कहता है कि मैं तुम्हें नहीं तुम्हारे धन को देख रही थी? ओह, कैसे बताऊ कि पहले दिन ही मैंने तु हारी आखो मे देख लिया कि तुम इस दुनिया मे मले, बेहद अकेले हो । उसी क्षण से मैंने अपने लिए जान लिया कि तुम्हारे अकेलेपन को मैं अणुभर बटा सकू तो उसके लिए पाप की सहस्रो वैतरणी पार करने से मैं नही बचूगी दीनू, तुमको अपना मुह खोलकर यह कभी मुझे कहना होगा। यह मपन मे भी न सोचा था। आज मैरी ग्लानि का ठिकाना नहीं है। अपने रूप की सज्जा तुम्हें छलने के लिए मैंने की थी। जानती थी कि तुम छले जाने वाले नहीं हो, पर हाय छलने जाकर मैं ही छली गयी कि तुमने समझा मैं रूपसी हू और कुछ नहीं।' कहकर उसने दीनानाथ के निश्चेष्ट पडे हाथ को अपने हाथ म लेकर अत्यत नम्र अभ्यथना के भाव म माथे से लगाया और कहा, 'दीनू सच कहती हू, वह मायाविनी में न थी। वह थी तो व्यजन की भाति तुम्हारे समक्ष परोसे जाने के लिए ही थी। मैं तो अपने म सिफ परोसने वाली थी। समपते तो न दीनू ? अब निश्चित रहो और जाओ, मैं आज ही लौट जाऊगी और आगे भी तुम कुछ शिकायत न सुनोग।" दोनानाथ इसके लिए तैयार न था। वह भीतर तक भीग आया था। उसने अब उठते हुए उसी भाति उमिला था हाथ लेकर माथे से लगाया और कहा 'उमिला भगवान से प्रायना है कि तुम सदा सौभाग्यवती रहो।" कहने के बाद वह ठहरा नहीं । विदा लेकर धीमे और स्थिर कदमो 'बाहर की ओर बढता चला गया। और उमिला को ऐसा लगा कि अगर घुधरू होते तो वह इस समय ऐसा नाचती ऐसा नाचती कि उम नाच से अलग वह स्वयं मे कही शेष हो ही नहीं।
अकेला इत्यादि। मैं उनसे मिलकर ही जा रहा हू ' मित्र ने कहा 'एक तरफ उडन भीग रहे थे वही कच्ची मूगफली इमली की पत्तिया और उठल-ममेत दो मूली रक्खी थी। यह उनका भाजन था। हमारी पुरानी जान पहिचान है। इसम धुलकर बातें हइ । उहान सव सुनाया विस---" मेर मन म "न तपम्बी के बारे म जिनामा थी। उनके सम्बधम जितना पा उमम अधिक मुना ह । "गन मैंन मित्र से उत्सुकता म पूर्ण 'उनस आपया क्व न परिचय है। महुआ? माधु व कब बने" मेरे बग्न म प्रश्ना को उहान क्या उत्तर दिया उम बताने न पहिले मित्र या परिचय दना आवश्यक है। मित्र मेरे हितंपी हैं बुजुग है पर यरावरो या मम्बध मानत हैं बल्लि मेग आदर करत है। मेरे पारण वह आदर नहा ह उनका स्वभाव ही दूसरा या आदर कराा है। मच तो यह रि मैं उन मामन लग्जिन होता है। व अतिशय मवाभावी तर और समय हैं । वीर म गृह-त्याग कर निस्पृह लोर-मवर हो गय थे। इस अनुभव म लगभग बीम वप उहाा नियम बीच म उनकी पुप्रिया पस्निया हो गया और पनीरोटा हो गयी । अन म गमय आया और प्रश्न पारि अरग प्रयाग या अवपि आ गया है । जीवन पी परिपूणता उम राह नदी है पर न लगा । औरावटयर अपना बा जाता है, और बालाहार माया है। जगत् का पनान 4 लिए परिवार कोपरागमनाई। मनुभव मा परि म उहान पनी या गुरापाता वर गमन नगई। पनी वागमति निमम पापम नहीं होगरता। भय तिर गएपी एमी पगडा है ?
अकेला ४१ मित्र ने कहा, 'मैं अपने पनि सानार रहना चाहता है इसलिए अकेला रहना नहीं चाहता। पत्नी न कहा, "तुम जहा त उठे वहा में तुम्हारी स्मनि को मेरे लिए नीचे उतारना सम्भव नहीं है। वीस वरम तुम्हारी जिस उ नत मुद्रा का ध्यान कर जीती रही हू जीवन का शेप वप भी उसी तरह बिता ले जाऊगी। अत ममय तुम स्वय उस जगह मे उतरना चाहोगे इसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकती। पर प्रकार म अपना ही क्यिामित्र क सामन आया। ब्रह्मचय, परिवार त्याग अथ निवति और असण्ड मेवा के आदश को एक दिन उहोने हा पत्नी म जगाया था। उम पति की पीव को फिर भरपुर चेष्टा से उमनिनना नारी नबत की भाति अपन भीनर गहरा उतार लिया । तब वह कुछ समझी थी, कुछ नही मगया सी। पर मन म मानती थी कि जो ये सोग उसम मेरा कल्याण है। एक दिन पनि प्रस्थान गो उद्यत हुए। पनी ने कहा 'तो और तो मव ठीय है किन दन लडदिया था सा होगा पतिनका मवकाग मेम वहन करन वाना तो भगवान है और सीमामध्य मशा वरतीहा पत्नी ने माना नि पति की वात ठोर ही है। भगवान है और चही मय पार गावगा। यह माचार उमन पति क चरण छू लिय। पति उस क पाणीया के मम्न आगीर्वादार हाय रपार बिन हुए। उसके बाद की क्या पत्नी न पति पा नहीं सुनायी। वह वृछ छोड नहीं गय ।फिर विम नरह घर का काम चलता रहा और पुनिया का विवाह हो गया वीस वपाद लारर ति ने भीम वार म कुछ नही पक्षा। पति ग सरला थी। वह उस समय अग्नी उम मापौवना पनी प्रति माम भीग थे, और यदि जब पिर माय रहदा प्रस्ताव उनकीनार से नापा था भी ता उमन यह भावना था कि वह नतीत सीटछ निरम और म पचिपा नारी को याममात्र ददें। प्रया बह प्रारश्चित करना चाहत थे। पितु पत्नी ने आना मुर हा दवा। उसन पनि या मान सा। ?
समाप्ति
7
बात हो पनि पायल क भीतर नाम है या वह कोयल के
बाहर है
एक ने कहा पर कायल जर आ न होती तो वह कम जल
सम्म था। जब आग पर ही नहा है नद किसी प्रकार कमी प्रयोग ।
वह बाहर आम 47
दूसर न पहा जगर यह बात है तो कोयला हा आग क्या नहीं है।
हमार घर म ढेर काटेर कोयला पर है और एक बच्चा भी उमस मेल
सकता ह । लेनिन जगर 7 जरा भी हो तो मजाल है कि कोई स छू
भसर
मरे दखत रस्त दा निया की बात बहम बन गयी। और जल्दी ही
वह वरम गरम हो आयी । गरम एमी पना चलना मुश्किल हो गया दि
दाना मित्र हति।
एक वहता आग-1
रापहा Hशनह।
पह।। तुम नहीं चानन ।
दुगरा तुमवर पहा।
पना वा गग।
दूसरा गधा पिरावहा-
नगमाया दिया 1 आस्ती चढन वा नोवत ॥ गयी है।
कान म आग न हा पर उन हान न रान ५। लेबर या समुत्र
हा यही वह नहा पडे।
मैंन का मुना माया बार बज गय। अव उन पार्टी मचलना
+fr? चला तयार हो जाआ।'
समाप्ति ४५ हम सभी को एक पार्टी म जाना था। मित्र आय ये कि सब माय साथ चलेंगे। लेकिन हमारी मण्डली का हरएक आदनी स्वाधीन चिनक है। इसलिए हमारे बीच म जव हाहा हीही नहीं होती, तब वहम हो जाती है। अभी यह कोयले की बात आपने सुनी । लेकिन कभी परमात्मा की बात वीच मे आ जाती हैं, कभी समाज सरकार की कभी इनकी कभी उसको। पर बात का आदि परमात्मा की सप्टि से आरम्भ हो कि पत्थर कोयले की आग न, इनि मदा गर्मा गर्मी म होती है। माथा जा चढना है अक्सर आम्नीने आ चढती है और मालूम होता है कि परमात्मा के सष्टि कमित्व का अथवा कोयले म अग्नि की वतमानता का सदा के लिए निपटारा अभी हाल मुक्त के जोर से कर ही दिया जायेगा। एसे समय चाय के प्याल या शरबत के गिलाम का आगमन या मिष्टान का दशन या कि ही महिला की उपस्थिति-आशय रि विमी माग र किंचित सोपलब्धि हमको सुधि दिलाती है कि मुक्का मुक्की द्वारा तत्त्व निणय ही काल यापन का एक उपाय नहीं है, अय भी अनेक कम हैं। जीवन उनमे भी चलना है बल्कि बह 1 की जगह उन कामा को करना, कुछ करना कहला सकता है। उस समय आस्तीन का चढाव गर-जरूरी हा जाता है, मस्तक खुल जाता है और मित्र मित्र के मित्र हो रहते है । सो मैंने जब याद दिलायी कि अर भाइ लोगो, पार्टी मे चलने के लिए तैयार हो जाओ, मैं श्रीमतीजी को भी कहता हूँ तब एकाएक तो जैप वे समझे नही । बहस की चहक जो चढी थी। उहाने ऐस देखा, जसे वेहद जररी काम मे उहें फुमत न हो और मुझ पर करणा करना चाहते हो। मन फिर कहा, दखो घडी चार बजे वहा पहुचना है।' तब उन्होने अनायास घडी देखी। हठात होश पर। और धीर-धीरे स्वस्थ हुए। गोविंदराम ठण्डे होकर कुछ मद्धिम हमे । बोले, 'ठीक तो है अनन्त ! छोडो कोयले को। हम भी क्या खुराफात ले बैठते हैं।' अनन्तराम भी मानो चैन पा उठे। वोले, 'ठीक तो है। यह क्या हम फिजूल की बहस ले बैठा करते हैं जी।' गोविन्दराम अनन्तराम स ज्यादा सही हैं, और ज्यादा बुद्धिमान हैं, अपवा मनन्तराम ज्यादा है, यह प्रश्न उस समय महत्त्वपूर्ण मानो रह ही 1 .
? जैनेद्र की कहानिया [चतुप भाग] नहीं जाता। मित्र मित्र बनकर, न छोटे न बहे, मिले-जुले पार्टी मे चले जाते हैं । खुश जाते हैं, घुश आते हैं, और खुश रहते हैं। आप कहगे यह तो ठीक हैं। इन मित्रो की खुशी मे हम भी खुशी है। दोस्त को हम दुश्मन नही चाहते। लेकिन प्रश्न है कि क्या तत्व चिन्ता और तत्व निणय आवश्यक कम हैं या नहीं हैं ? क्या सबको मव-कुछ मानन और सबको सब-कुछ कहने दें ? यह कंस हो सकता है । झूठ का निराकरण और सत्य का प्रतिपादन किये बिना क्या हम रह जाए जी नही, कदापि नहीं। गोविन्दराम और अन राम अपनी मित्रता को ध्यान मे लाकर तत्त्व निणय की जिम्मेदारी से अपन को बचा लें तो बचा भी लें। लेकिा तत्वज्ञ उस जिम्मेदारी से कैसे बच सकता है ? उस शनुता मित्रता पर तो अटक्कर नही रह जाना है। वह तो तत्व की बात बताकर ही छोडेगा। चाहे उसमे कोई शत्रु ही क्यो न हो जाये । गोविन्द- राम अनन्तराम दुनियादार आदमी होंगे, जो बहस को किसी निणय तक पहुचाए बिना ही छोड बठे। किन्तु दायित्व का तकाजा है कि तक को तर्कान्त (लाजिकल एण्ड) तक ले जाना होगा, वहा जहा फिर अतक है। तत्त्वश भला बीच मे कैसे हार बैठ सकता है। क्या बीच मे उसे छोड देना कापुरुषता ही नहीं हो जायेगी। जुष्टि प्रहार का अवसर आये तो क्या उसमे भयभीत हो जाया जाये ? इस तरह के सवाल आपके मन में भी उठते होगे क्योकि, वे मेरे मन में उठा करते है। बहस के लायक विद्या तो मुझमे नही है। उतनी भाषा भी नहीं आती। लेकिन मालूम होता है कि अधिक ज्ञान मुझे होता और भाषा पर भी कुछ प्रभुत्व होता, तो ऐसे ऐसे प्रबल तक अपने तकस मे से मैं खोचकर निकाल चलाता कि सब-कुछ खण्डित होकर रह जाता और प्रतिपक्षी धराशायी ही दीखता। पर हाय, मैं अक्षम हू। जानता-बूझता बहुत कम है। और जो जानता हू, कह उसे भी नहीं पाता। लेकिन सोचा करता हूँ कि जो कुछ भी मैं ठीक समझता है क्या सवथा वही ठीक नही है। तब अन्यथा समझने वाला को मैं क्यो न उसी (अपनी बाली) ठीक समक्ष पर लाने की कोशिश करू । वे विधारे भूले हुए हैं, भटक रहे हैं। भूत में अपना मर अकल्याण कर रहे हैं । गलत को सही मान रहे हैं । असल मे सही है, तो मैं जानता हू । तब क्यो न चल पड़ और सबको सही राह दिखा डालू । राहें बहुत हैं। जितने धम हैं, वे सब मार्ग ही तो है। लेकिन वे सब पथ झूठे हैं । जो मेरे धम का माग है, वही एक सही और सच्चा माग है वही कल्याणकर है। बाकी धम के नाम पर जो रास्ते है, व मीधे अनान मे और नरक में ले जाकर पटक देते है। वैकुण्ठ धाम को जो समाग पहुचाने वाला है, वह है जो मेरे धम का है। बाकी और पाखण्ड नही तो क्या है? अफसोस यही है कि मेरी जुबान म यह ताक्त नही है और दिल मे वह पक्कापा नहीं है। उस दिन उन मौलाना का लेक्चर सुना था । क्ण साफ बातें कहते थे | बडी बडी मचाइयो पर उनको जुबान ऐसी रपटती चली जाती थी कि दाता तले अगुली देनी पडती।और शास्त्राय मे सामन के वह पण्डित-वाह । क्या अगाध गम्भीर ज्ञान । मानो कोई रहस्य उनसे छिपा नहीं है। जो है उह हस्तामलक्वत है। पण्डितजी को कुरआन के भेद मौलाना से भी अधिक मालूम थे और मौलाना को तो वेदो की असलियत का पूरा हो-पूरा पता था। एक को मालूम था कि सस्वीरत का ईश्वर कैप गलत है और दूसरे को ज्ञात था कि अरबीक का खुदा कैसे अमानता है। और दोना ऐसी ऐसी जोर की और अकाटय बातें कहते थे कि जब एक की सुनता था, तब उसके जैसा मैं हो जाता था और दूसरे को सुनता था, तब वही सही मालूम होता था। भाई यह दुनिया भी अजब पहेली है। पण्डितो ने और मौलवियों ने उसका पार पा लिया है । और ऐसा मालूम होता है कि उस पहेली का पार पाना है तो पण्डित बनो, या मौलवी बनो। या फिर सीधी राह है कि आस मूदकर किसी एक के मुरीद बन जाओ । नहीं तो हालत मेरी जैसी रहगी। दावे के साथ कुछ कहने की हिम्मत ही न होगो और बस नरम बने रहोग। लेक्नि राह छोड हम यहा कहा आ गये। बात अमल पर आयें। गोविन्दराम और अनन्तराम एक रोज फिर कोयले को और कोयले को आग को ले बैठे। तब फिर देर क्या थी। मित्रता दो-एक ता के सपाटो में ही घट कोपने के नीचे आ रही और दरगयी। मामला तूल पकड़ने सगा।
जैनेन्द्र को कह निया [चतुथ भाग] " गाविदराम ने कहा, "तुम कहते हो विकायले मे आग नहीं है ?" जनतराम न उतने ही जार स कहा, और, तुम कहते हो कि कोयले म आग होन के लिए दियासलाई की जरूरत नहीं हैं गावि दराम ने कहा, 'अभी तुम्ह वारीक बातें समझन के लिए समय चाहिए। अनतराम ने कहा गनीमत है पिमरी समक्ष आप जितनी मोटी नहीं है। बात की प्रचण्डता रख मैं चुपचाप उठा । अदर से एक कोयला लिया और खरल उठाया। वहम के मौके पर पहुचकर दोनो चीज़ा को बीच में मेज़ पर रप दिया। वे बोले, 'यह क्या है " मैने कहा "यह कोयला है, और जरूरत होने पर कायने को पीसने के लिए वह खरल है । शायद ये चीजे तत्त्व निदान मे कुछ काम आयें।' थोडी दर बाद अनन्तराम को एक काम का बात मूयी। उन्होने कोयले को हाथ म उठा लिया और कहा, 'यह कोयला है। तुम कहते हो, इनम आग है।' गोवि दगम ने कहा, "सरियत है कि आग वह प्रकट नहीं है। नही तो आपको पता लग जाता।' अनन्तराम ने कहा, "लीजिये, तो आप इममें से आग प्रकट कीजिये। देखें कस करते हैं। क्या इसे तोडकर दिखा सकते हैं कि वह आग इसमे कहा वठी हुई है।" गोविदराम ने कहा, "दियासलाई एक क्तिनी देर तक जलती है। एक मिनट भी तो जलती नहीं। लेकिन प्रगार भी क्या दियासलाई के माय धुझ जाता है ? अगर वह दहलता रहता है, तो क्या वह अगारे की आग दियास्लाई की कही जायेगी। दियासलाई बुझी पड़ी है, कोयला जल रहा है। आग कोयले के अदर न होती तो वह जलता रहता कसे?" अनतराम पर स्वभावत गोविन्दगम की बात का प्रभाव नहीं पड़ा। उन्होंने कहा, "दखो, मैं तुम्हारे सामन कोयले को पीसकर घूल किये देता हूँ। बाग है तो वह जलती क्यों नहीं।' ऐसा कहकर वह सचमुच कोयले ।
समाप्ति ४६. को ठोक ठोककर खरल मे पीसने लगे। कोयला चूर हो गया और तब भी आग का पता न चला । अनन्तराम ने घोषणा की कि चूवि आग का पता नहीं चला है, इसलिए साबित है कि गोवि दराम को कुछ आता जाता नहीं है। गोविदराम ने भी ऐसी ही कुछ बातें कही । दर अधिक न थी। मुकु- टिया मे बल आ चला था। और अब नहीं तो अब, आस्तीने चढी ही 1 दीखती। मैं घबराया। मैंने जोर स कहा, "मुनना, जी जरा सुनना।" तुरन्त तो नही (क्योकि तुरत सुनो का फायदा ही उस बिरादरी मे नहीं है) लेकिन कुछ समय के अन तर श्रीमतीजी ने सुना और कमरे में प्रवेश किया। मैंने कहा, ' ये लोग बंटे है। पान वान कुछ तो भेजो।" श्रीमतोजी ने सुना-शरमाई, मुस्वराई, और बेदात चेहरे को पल्ले की हल्की मी ओट दिम चली गट। पलटकर क्या देखता हूँ कि गोविदराम और अन तराा के चेहरो पर बहस और गरमी अब नही है। वहीं अब शिष्टता है और शालीनता है । मैंन कहा "कोई बात नहीं। आप अपनी चर्चा चलाइये। इतने में पान आते हैं।" अनतराम और गोविदराम दोना तनिक धन्यवाद भाय मे मुस्करा दिये और आगे चर्चा न चला सक। श्रीमतीजी आकर चली गई और मैंने देखा कि उनके इस एक झांकी देवर बेताब चले जाने से दोस्तो के दमियान इक्टठे हुए सब बादल जाने पहा बिला गये हैं। और विसीको रयाल नहीं है कि तत्त्व निणय का तार टूटकर कहा छूा रह गया है । और जब पान के बजाय एक-एा नमकीन, मिठाई और फलो की तश्तरी आ पहुची तो गोवि दराम आतराम रिना भेद भाव और वादयिवाद के असण्ड मित्र की भाति तल्लीनतापूपद उन पर झुक गये। मैंने तब समाप्ति का सार पा लिया। मन में कहा, "खूय !"
मैं इलाहाबाद से आ रहा था। तीसरे दर्जे तक मे ज्यादा भीड न थी। लेकिन रात के वक्त सोना मवको नहीं मिल सकता था। गाडी सवेरे दिल्ली पहुंचेगी, और मुझे रात सी मे विनानी है। दस बज गय, ग्यारह बज गय, बारह बज गये। सोने की जगह का सुभीता न मिला। पाम एक व्यक्ति दरी पर नयी सुजनी विछाये लेटा था। पीछे उसके नया-सा सस्ता दक और उससे लगा हुआ एक झालरदार छोटा तक्यिा या। मैंने देखा, बारह बज गप, यह एक मिनट को भी सोया नहीं। वह पैन क माथ देर तक लेटा भी नहीं रहता था। आराम की जगह पाने पर भी उसकी आखा म नीद नहीं उतरती पो। इटावा का स्टेशन गया और वह विस्तर पर सजग बैठ गया। उसने मुतस पूछा 'वहा जायेंगे बाबूजी।" मैं किसी तरह उसे आप नहीं कह सका। उसकी आकृति मे वह बात न थी जो मुभस 'आप कहलाती । मैंने जवाब मे पूछा, 'तुम कहा जाओगे?" "मैं ? आप टूडला जानते हैं ? फीरोजाबाद, और उसके एक स्टेशान बाद टूडला । टूडला जक्शन है मैं वहा उतरूंगा। आपको मालूम है, आगरा वाली गारी तयार मिल जाती है क्या?" । मैंने कहा, ' नहीं, मुझे नहीं मालूम।' और मैं प्रतीक्षा करने लगा कि वह अब आगे क्या कहता है। उसे अपने से दूसरा कोई चाहिए था। वह अभी तक अपने आप मे समाया रहा, यह जैसे बहुत पात पी। हर स्टेशन के प्लेटफार्म पर उतरता और कभी यह से कभी वह, कभी यही जा, कभी बहा, बब कुछ कर, तब कुछ, इस प्रकार वहनाते हुए समय के साथ अपने रेस में - को लगाये रखता था। "टूटला तो आपने देखा होगा। कभी यस्ती मे गये हैं ? यस्ती कुछ नहीं है। बस, स्टेशन-ही-स्टेशन है। मैं टूडला नहीं रहता। उमा के पास एक जगह है। पांच मील होगी। बस, एक स्टेशन है। मो पैदल भी चले जाओ। रेल मिली मिली, नही तो मैं पैदल हो जाऊंगा। सामान नमा है, थोड़ा-सा है। मैं कलकत्ते से आ रहा है।" मुझे यह कुछ अनजता सा आदमी मालूम हुआ। उसे अपनी ही धुन थी। वह जैसे आशा करता था कि मैं उसकी बात में उतना ही घुलू- मिलूंगा जितना यह । मैंने उसे जांच से देखा। चमकती पालिश के नये सस्ते शू पहने था। पैरो मे बढ़िया मोजे थे। मूछे किनारों से जैसे घसते वक्त ही कटवायी गयी हो । पतलून पी और कोट था। ये नफीस कट के पे, साफ थे। वे बनवाये नही गये, खरीद गये होगे। बार-बार जेब से बूदीदार रेशमी रुमाल निकालकर वह अपने जूनों पर चढ़ी धूल को शाड लेतामा टाईमी और ऑषा मे सुरमा था। "आप अछी तरह बैठ जाइये। घर मा जाइये अजी, मिस्तर आपका ही है । माप देखिये, मेरी आंख लग जाये तो शिकोहावार पर जगा दीजियेगा । जरूर जगा दीजियेगा। तीन बजे गाडी दूग्ला पहनेगी-- क्यो साहब ! पाच होते होते गाव पहष जाऊंगा? गांव, मैंने महाम टूरला से पांच-सात मील है। आप पूछते हैं कलकसे कितने दिमहा? मैं धोखाल कलकत्ते रहा। तब से मम आ रहा है क्या गया ? एक हमारी तरफ का आदमी वहाँ एक मेठ के यहाँ दरबार तो पहले आँख मिची जाती थी-कलकता है frre Arth मोटर ही मोटर, गाडी-ही-गाडी, मकान-ही मकान irror मगमा था। बहो करोडो आदमी रहते है और Reat पर दो महीन तक मुझे कुछ काम नहीं मिला frrenten? रि बारह रुपये की नौकरी मिल गई। परviv dir खोमपा लगाया। रहता उसी गांव min भाने से ज्यादाम वसा या mantra लीजिये, सोचाइये। -- जनेद्र की कहानिया [चतुय भाग] मुझे वेश नीद आ रही थी। अगर मैंने उसकी बातचीत के बीच म 'हा' या ना' कहा तो ममझिये सिफ अपनी नीद टालने के लिए और अपने को और उसको यह जतान २ लिए ही कहा कि मैं सो नहीं रहा है। उसकी कथा चनती ही जाती थी और यदि उसका कुछ भाग मेरे चित्त पर बना रह गया है तोरम त कारण जिसन इसकी सारी बात म अर्थ ला दिया और रम भर दिया। उसने बार-बार कहा कि मैं शिकोहाबाद स्टेशन आने पर उसे अवश्य जगा दू। बार बार कहा कि उमे टूडला उतरना है और कि टूडला बड़ा स्टेशन है । और यह कि वहा म पाच मील उमका गाव है और पात्र वजे तक वह अपने घर पहुच जाएगा। यह स्पष्ट था कि मुझे जगाने का मौका न आना था। नीद उ आ ही नहीं सकती थी। कुछ उमके भीतर से इतना उवल कर आ रहा था कि शऊर म कुछ देर एक स्थान चुप बैठे रहना उसके बस का न था। वह बार बार अपने जूते माफ करता, नकटाई ठीक करता जेब से बार-बार उसी जूते वाले रूमान को निकालकर हाथ और मुह पोंछता, ट्रक खोलता और उसके भीतर के मामान को एतिहात के साथ तहाता। वह जहा पहुचना है पहुचने के लिए बहुत व्यग्र मालूम होता था। वह लोभनीय दीखना चाहता था। वह जम 'रोमास' पहने घर पहुचना चाहता था। पर । मुझे मालूम नही पर उमका क्या है ? क्या यह आदमी पिता है । अपने जूते, अपने चहर, अपने रूमाल, अपने सामान की सज और धज के बारे में जो इतना सम्भ्रमशील है वह पिता है? तब क्या वह पति है। हो सकता है जब मैंने देखा कि नीद पाना मेरे लिए असम्भव है, तब हिम्मत करके पूछा, "घर मे तुम्हारे कौन है 'घर मे कौन है ? मैं दो-ढाई बरस बाद घर जा रहा हू, अब मालूम क्या, कौन है मैंने कहा "कोई तो है, जिसके लिए यह ठाठ है।" वह अपा-सा । मानो वह अब ममस्थल पर छिडा है। मानो जो अब तक पा वह इस स्पल को बावृत्त रखने लिए आवरण पा। अपका रस ?
रेल मे स्थल तक पहुचने के लिए भूमिका रूप पा। जो ये भीतर से यही बात उमगार आना चाहती थी, पर नहीं आने दी जा रही थी। इससे ऊपरी मतह की बातें ही अब तक उसक-उखडकर बाहर की ओर बिखरती थी। उपन कहा, "बापूजी, आप कैसी बात कहते है ? और वह हंसा, फिर वोला, "घर म, हा, है । पर क्या आप समझते हैं, यह सुशीला है ? उसे मेरी फिकर है । वह मेरी बाट देखती होगी। सच बात यह है, वह बडी क्लहमारिणी है । पैसे के लिए उसे मेरो चाहना है। में पहुच रहा है कि ले, पैया ले, अब तो वह मुझे पूछेगी!" मैंने कहा, "क्या वह बहुत नवेली है।" यह बात नहीं है, बाबू जी वह कुछ भी नहीं है । मैं उसे मानता हू, मी हा यह अपने को समझने लगी है। मैं पूछना छाडदू तो उसे सब पता सागर ।" उसके शब्द बिना कठिनाई से निकल रह हैं। वसे ही जस मन की ऊपरी बात साफ मुह से निकल जाती है। झूठ बात चिकनी होती है और मन उस सरलता से बाहर फेंकता है। सच बात को खीचकर निकालना होता है क्याकि वह जी व भीतर बहुत गहरी गई होती है। शब्द मुह से जो निकल रह हा, पर उसके चेहरे पर स्पष्ट लिखा था कि जो वह कह रहा है. हलके मन से बह रहा है। सत्य उससे विपरीत है। माफ था कि यान अाल यह है कि वह उसका (घरवाली का') बहुत मूल्य आकता है। यहा अपना के मानकर उसकी आदाक्षाए और योजनाए अपना पमारा फैलाती हैं। मैंन कहा, "देखो वाबू, वह कही और जाये तो तुम जाने दोगे?" यह एक्दम आहत हो झुक गया। वोला, "आप ऐसी बात कैसे कहते है ? मैं कभी उसकी मरजी को रोकने वाला हू? उसे काहे की छुट्टी नही है। लेकिन, आप नहीं जानते उसने क्या-क्या मेरे लिए झेला है ! वह मेरी माहता नहीं है, लेकिन जो मुमीवत उसने मेरे साथ मिलकर काटी है उम माद करते अब डर होता है।" X X X यह मुझे याद न रहता। लेकिन कुछ और भी हो गया । टूडला स्टेशन
५४ जनेद्र की कहानियां [चतुय भाग]
पर यह उतरा । उसने मुझसे बिदा मागी और मैं साप-साम प्लेटफाम पर
उतरकर माया और काफी दूर तक उसके साथ गया। बिदा सेकर सोटता
है कि राह में मेरा म्यान हात एक भीता चकिता स्त्री के मुख की ओर
घसा गया । ज- एकाएक उस स्त्री का मुख विवर्ण हो उठा हो और यह
उसके लिए अनुप्त हो। उसक साथ एक पुरुष था। दोनों साप उसी
आगरेवाली ट्रेन की ओर जा रहे थे। मैं उनके पास से निकलता है कि
देखा उस स्त्री ने उस पुरुप को यहि थामकर उस रोक लिया है और मानो
जाने से इन्कार कर रही है।
तभी मपटती-सी यह बातचीत मेरे कानाम पही--
क्या है ! चलन।"
नही जाऊगी। तुम्हारे तो आप नहीं हैं। इसीसे वह जा रहा ह।"
.
"कोन"
"कहां जा रहा है"
"गांव जा रहा होगा। मैं अब नही जाऊगी। लौट चलो।"
गरतीयों है कोई उसकी पाहता है ?"
"नहीं-नही-नही । मुझे वह मार डालेगा।"
"R AT दखू, कैसे आंख तक उठाता है। मैं-"
मुझे ऐसा मालूम हुआ कि पुरुष इस पर राजी हुआ। कि तु, में रुका
नहीं, चलता चला आया। और इस घटना की पीठिका पाकर अपने उस
सापी की बातचीत मेरी याद में उभरकर बैठ गयी।
।
सम्बोधन मैं आ गया और मेरे आने का उसे पता न लगा। आख भूदे आराम- कुर्सी पर वह सैटा हुआ था। मैं धीमे धीमे कुर्सी तक गया और खडा रहा। घडी मेज पर टिक टिक कर रही थी। गर्मी थी और पखा बन्द था । मेज पर पेपर-वेट के नीचे कुछ कागज चित्त पडे थे। दूसरी मेज, जहाँ रोज नियम से दो लक बैठे काम करले होते थे, बिलकुल खाली थी और कमरा सुन, व्यवस्थित, अकेला था। ये सो रहे हैं या मोच रहे हैं और मुझे आतुरतापूर्वक बुलाकर आप देखबर हो रहने का प्रयोजन क्या है ? मैं चुपवाए फिर दरवाजे पर लौट गया और वहा से पैरो की आहट करता हुआ वापिस कुर्सी को और बढ़ा। वह एकदम चोककर उठा, उठकर खड़ा हो गया, पहचाना । "ओह, आ गये। मैं जानता था, तुम आओगे। क्यामि न आते तो मेगै मौत माती । मुझे भरोसा था । भरोसा तुम्हारा हो मुझे है । बठो।" -~-कहकर मेरा हाथ पकडकर, अपनी कुर्सी की ओर मुझे खीव लिया और आप दरवाजे की ओर बढा। 'बठो बैठो। क्या पोने दो हो गये । कुशल हुई। तुम खूब ही वक्त पर आये । तो मेरा नसीब बिलकुल नहीं मिट गया है। आप घण्टा और हो जाता नो गजय ही हो गया था। ऐसा गजब कि फिर जाने क्या होता। पर अव ठीक है। बैठो बैठो, मैं भी बैठता है।" मैं उसे देखता रहा। मैं इतना तैयार न था। मुझे गुमान न था कि हालत बढ़ी होगी और अनुमान न था कि बात क्या है उसन जाकर दरवाजे की चटखनी बददर दी, बिजली के पंखे का मुह मरी ओर करके चला दिया और एक कुर्सी पर बैठ गया। मुह उसका घटतनी की ओर था और बाद था। वह बोला नहीं। मैंने कहा, 'क्या - जनेद्र की कहानिया [चतुथ भाग] उसने कहा, ? वह जमे दम ले रहा था। वह कुछ बोल नहीं सका। पर उसकी सम्पूण मुद्रा से उत्तर मिला कि मैं तनिक उसे सभलने दू। मैं रुक गया। कुछ देर बाद फिर पूछा, 'आखिर बात क्या है कुर्सी उसने अब मेरी आर कर ली। कहा, ' बताता हूँ। पर, तीन बजे तक, देखो तुम मत जाना। मैं यही कहता हूँ। मैं जब कह दू, तव जाना।' मैंने उसे देखा । कहा 'नहीं। मैं अमी नही जा रहा है। लेकिन और सब लोग कहा है ? और यह क्या बात है तुम ऐसे क्यो हो?" मैंन म्वका भेन दिया है कि शाम तक न लौटें। इसका इतजाम किया है कि मैं अकेला रहू । सहायता पास न रह । निस्सहाय होकर डूब जाऊ । पर ज्या ज्या मिनट बीते और वह घड़ी पास आने लगी तर आम दापी कि डूबना ही एक गह नही ह, और मेर पास तुम हो। तुम हा तब क्या दूवू नुमको पास बुला लूगा, और मैं किर जाऊगा । और तुम मा गय हा। यह गाने की आवाज सुनते हो?' हा, मैन गाने की आवाज सुनी। हार्मोनियम बज रहा था और उस के साथ कभी भी एक स्त्री कण्ठ नालाप लता था। बाजा और बजाने वाली कही पास-4 । सगीत की जावाज बद कमरे में खासी स्पष्ट आ रही थी। उमने पूछा, 'क्या कहत हो?" मैं समझा नहीं। "गाना कैसा है' आर वजाना कमा है?' मैन कहा "कोई खाम अच्छा नहीं। उसन आवेश म पहा, "सास अच्छा नही, बिलकुल ही अच्छा नहीं है। अच्छाई उसम नाम को नहीं है। तुम जानत हो, गाना अच्छा क्या होता है ? मैं भा एसा नहीं जानता। पर यह किमी तरह अच्छा नहीं है। पिसी तरह नहीं है।-पहा दो बज यहा आमवाली पी। मैं उस दवता र गया। 'पर, अय नही आयेगे। अब तुम हो और द्वार की चटखनी बदहे। देसत हा न, में इनके लिए अपनाया। मैंने सबकोदूर भेग सम्बोधन दिया था कि दो का वक्त पाम आये। पर, अब दो बजते है फिर भी मुझे डर नहीं है । मैं तुम्हें सब बताऊगा। तुमसे जानूगा कि मैं क्षम्य हूँ। तुमसे सुन्गा कि मैं वीर नहीं गया हूँ। मुझे पता नहीं होता कि क्या बात होती है। तुम मेरी पनी को जानते हो। कौन अधा है कि कहेगा वह दम सु दरी है। आर मालन नही तुमने कभी उसका गाना भी सुना या नहीं । सच कहता हूँ खूब गाती है। गौर बजाने म, छात्रावस्था मे, कई पदक पाय हैं । पर घर म मय बद है, और गाने की जगह कलह होता है। उसके बारे में मेरे जी में ऐमा निरुत्साह बस गया है कि वह गाना भूलती जा रही है और बाजा पर धूल जम रही है। और गाने के नाम पर यह चिल्लाना सुना न ? लेकिन सच कहू तो अभी पडा आखें मीचे मैं इमीका रम ले रहा था। इस वेसुरी चीख मे रस कहा है, रस की ठठरी है, पर मैं रम ल रहा था। उसी में अपने को भूल जान का अवसर मैं निकाल लेता है। भाई, यह क्या हाना है ? यह दखते हो, यह कम्बस्त हाथ का बाजा? सीखने के लिए मैंने भगा लिया ह ।-रोज दो घण्टे, तीन घण्टे, यह बाजा "स तरह असुरा सिर पर चीवता है। पर उसी को सुनकर मैं इतना अयश हो उठा मि यह बाजा मगा लिया। इस पर वही गी। सीख रहा हू, जो सुनता हू भाई क्या इस सगीत-सम्बधी अपने उरनाह का कुछ भी भाग में पत्नी तमन होकर अप भीतर कायम नही आर यह लडकी । देख पाओ नो जानो, सोदय हीनता क्या पस्नु है । रग की मैली है। पाडी मी अग्रेजी जरूर पढ गयी है, पर, वह उसके भीतर रहकर नहीं टिक पाती मानो उघडी उघी पड़ी है। पच जाती तो गुण वनकर उसका सौदय बढाती । अब बाहर फलकर पल फैगन वढा पाती है। सब कुछ है, लेकिन मुपे बताओ, मैं क्या करू अज्या ठहो। मैं दिखाता हूँ मैं उस देग्यता ही रह सका। उसने मुझे कुछ बोल्ने का मौका नहीं दिया। बहुत कुछ था उमम जो बन्द था, घुट रहा था, और बाहर हो रहना मोमता पा। उसने चावी स घडी मेज पो दराज खोलो, डिन्या निकाला, इसे भी पानी लगारर खोला और कुछ कागज निकालता था कि पारस दरवाजा हलवे पटरटाया गया। सुपसे पहले टवटाहट सोगे। रखमरता १ 7 "
जनेद्र की कहानिया [चतुष भाग]
उसके कान मानो वही थे। भयत्रस्त हो एकदम सब छोडकर उठकर वह
मेरे पास आ गया। उसने मेरे कान म कहा, "दया करो, कुछ बोलो।
कुछ वाला, और जोर से धालो । वह दो, नही हूँ।
मैंने धीरे से कहा, 'डरो मत। जाकर दरवाजा खोल दो। झूठ का
आसरा मत लो जीत का रास्ता यह नहीं है।'
खटखटाहट ठहर ठहर कर जारी रही।
वह वेद कातर हो उठा। उसने कहा, ' इस वक्त मुझे बचालो । कुछ
जोर स वोलकर अर यह जतवा दी, भीतर कोई और भी है।"
मैंने कहा 'तुम नहीं जाते तो मैं जाकर दरवाजा खोले देता है।'
बाहर स बहुत धीमी-मी आवाज आयो-'शकर
शकर ने मेरे पैर पकड लिय, अच्छा, दो मिनट रुक जाओ। वह भाप
चली जायेगी। देखो
उठो शकर मैंने कहा, जाओ, क्विाड खोला, नहीं तो मैं खोलता
हूँ।" इस बार धीमे धीमे द्वार पर दो थपकी दी गयी।
शकर विमूढ़ खडा रह गया, हिल न सका।
मैंने जाकर चटखनी खोल दी।
दरवाजा खुला और एक सोलह वप की लडकी सामने दिखाई दी।
वह स्तम्ध, फक रह गई।
मैंने कहा, "आइप!'
वह लौट भी न सकी, मा भी न सभी।
मैंने कहा, "आइये, शरदयाल यह हैं।
वह मन्दर मा गई । शयर मूड हो बैठा । उसने नीधे देसा, कसर देखा,
फिर सामने देखता खरा रह गया।
किशोरी ने कहा,
मैंने कहा, 'शारदयाल यह महिला या मागती हैं सुनो।
पिशोरी ने कहा - 'परण' चाहती है। आपने यहां है?'
गंगरदयाल ने चुपचाप एव शेल्फ से 'परख' की एक प्रति निवास पर
पेगी।
किशोरी, "पीमत तो इस समय मेरे पास नहीं है। मैं पूछने ही माई
सम्बोधन . - यो, है या नही।" शकर, "आपले जाइये।" किशोरी, "नही, पिरले जामगी।" सकर, 'विता विकती मेरी दुकान पर हैं।" किशोरी, 'मुझे मालूम नही पा, मैं क्या माती, वही स मा ले। भाई ने कहा था, यहा में मिल जाती हैं। मुझे माफ कीजिपे।" मैंन कहा, "आप यह प्रति ले जाइम । और कीमत आपको नहीं देनी होगी।" किशोरी सकटापन दृष्टि से मेरी और दखने लगी। उसे मेरे बार म जमे बड़ा भारी सदेह हो आया । क्या मैं उसमें प्रणय भेद से परिमित ह मन तुरत पहा, "शरदयाल अवश्य पुस्तक विक्रेता हैं। किन्तु मैं 'परख' का देखा है। मेरी ओर से आप यह प्रति ले जाइय। -शवदयाल यह प्रति उसे दे दो। मूल्प नहीं लिया जायेगा।" बैचारी वह बाला मनु क्त्तव्य हो रही । शबरदयाल में जब वह पुस्तक उसकी और बढायो तो न हाथ फेलाबार ले समो और म स्पष्टता से इनकार कर सकी। मैं कहा, "लेखक की हैसियत त मेरे लिए यह बिलकुल अलाह कि मेरे सामने कोई मेरी पुस्तक माग, और पुस्तक हा, फिर भी वहन मिल। आप निश्चय रखें, मैं कभी मह ने सहूगा)" उसने हाथ बढा दिम मानी होनहार को उन हाथा थामना होगा -~स भाव मे। शकर ने यह प्रति उन हामी म दो। मिशोरी ने कहा, "मैं दाम शाम तक भिजवा दूगी।'--और शोधता स चली जाने को वह तयार हो गयी। मैने कहा, "दाम आप बिलकुल नही भिजवा सकेंगी। और पाकर तुम मिलकुल नहीं ले सकोगे । और आप जाती अभी क्यो हैं ? परख' के लेखक के कहने से कुछ देर भो नहीं ठहर सकती?" इस तरह रोकी जाकर वह बोली, "मुझे काम है। बस रिताब को पूछने पी पी अम्माजी भी बहती पी मैं पड़गी। मुझे मालूम नही पा. ।
जनेद्र की कहानिया [चतुथ भाग] यह गलन है कि यहा किताबें मिलती है। मुझसे भाई ने कहा था, किताब चाहिए तो शकर के यहा पूछ लेना। पूरा नाम भी नहीं जानती थी- शकरदयात । सो, अभी इनका नाम पूछती चली आयी। सोचा, गर्मी क मारे किगड बद कर लिय है, भीतर लोग काम कर रहे हागे । मैं नहा जानती था कि आज आज कोई नहीं है । मुझे माफ कीजिये मैंन आपका हरज दिया। हुई वह और इम कैफियत के बार मे मानो साप ही आप सन्दिग्धचित्त होती अपनी नयी धानी रेशमी साडी मे सकुच कर रह गयी । वह जबोधा नही जान सकी कि एक अजनबी की आखो मे इतना कुछ कहकर अपनी प्रामाणिकता को प्रमाणित करन की केष्टा अपने-आप म हो सदिग्ध होकर प्रकट होती है। उन ममय जी म आया उस कडू कि वेटा, सरय सदा मुपी है । स य म मगल ह, जय है । कितु भी मुझे यह भी प्रतीति हो गया कि कही अप्रिय मत्य को राक रखना ही पम क्या बताया गया है। मुखे तब भती प्रकार जान पडा कि अहिता स्त्य का व्यपहाय रूप क्या है। अपिसा-हान मत्व का मवन आम-हीन प्राण हीन जड का मेवन क्या है। और मैं किमी प्रकार भी उस छाया के यासरे को तोडने कोहठ अपने भीतर नहीं जगा सका जो उस वचारा बाना में विपना की शान म झीरी असत्य की जाती र नानकर अपन लिए छा लिया था। यह माया की जाली पनि अभी अभाछिभिन हारर हट जाय तो वह कस सह सके जीनाम दूभर नहा जाच लाज की मारी विचारी मर न जाय? मैंन कहा में मममा था आप यह जानती हैं। अव जाना कि आप नरा नाम भा नह जानती थी। आप कही पडोस म ही रहती है शायद माहित्य कान्य प्रकार की गुम्त इन यहा आता है। और जो जरूरत हो, यह मगा द ग । वह मर मित्र है मेरी ओर ग आपकी आवश्पद- तासामा निन्य पह आद करेंगे। परस' पदम मारह बताय और अन्य बना जाय और आपको कैसी लगी। मैं इनन पूछूगा।" जहान मदह का और अवज्ञा का उसे भय या दही से सहज विश्वास और अप्रत्याशित आर उसन पाया तो सिर से पांव तक यह लग्जायुक्त आरम-संबोपम यूयन पो हो गयी, और क्षण भी और न ठहर सकी, सम्बोधन झटपट चली गयी। २ म्वस्थना पाकर शकर ने कहा, "यह तुमने क्या किया !" मैंने माना कि सच, मैं कुछ नही पर सका। शकर, "तुमने मुझे इबने के लिए बाकी नहीं छोगाया। वर, तुम्ही ने बचा भी लिया । तुम क्या चाहते थे।" मैंने पूछा, "शकर, तुम क्या चाहते हो?" किंतु शकर क्या, चाहता है ? नही चाहता है जो बहुतो ने चाहा है, कम ने पाया है। कर्तव्य को सामने एक राह उमन बनायी है। चाहता है उसी उसी पर चले, डिगे नहीं। और देखता है, सब कुछ मानो उमे उस पर मे हिगाने पर तुला है। वह नही डिगना चाहता पर हिग बिना भी कमे रहे । वह चाहता है कि कोई उमे बचाये। यह चाहता है कि क्यो की पत्नी ही उसके लिए सब-कुछ न हो रहे, जैस कि यह मब-कुछ हो रहने योग्य है । जो है नहीं, वही तो यह चाहता है। मसे कहा, "मैं तुम्हारी जीत चाहता हू शकर, और बाहता था कि तुम दोनो को एक साथ छोडकर मैं चला जाऊ । तुम दोना एक दूसरे के पोर बनकर न रह सको, सुहृद बनकर रहो। मैं इसका प्रवध करना चाहता पा। पहले भय छोडी। भयभीत होकर जो सतव्य-पालन होता है, समझो, यह टूटने के लिए अवमर की प्रतीक्षा में ही रहना है । वह टूटा भला । भय पर कर्तव्य को मत टिकाओ, उसे सत्य पर खड़ा करो। पहले असच्चरित्र माने जाने की क्षमता जगाओ। फिर अपने बल सच्चरित बनो। भय के अवलम्बन पर खडी मञ्चरितता बालू की भीत पर खडी पताका है लगता है, हम जयी होकर खड़े हैं, पर वह विजय का व्यग्य है । वैसी विजय की इच्छा भी नहीं करनी चाहिए। हार अपनाने की खुली विनम्र सैयारी में से जम बनती है। इसलिए मैं चाहता था कि तुम दोना में मापसी सम्बप के बारे मे स्तेय भाव की चेतना कम हो, और यह चेतना उत्पन हो कि एक है जो साक्षी है, और तुम दोना को इसलिए साम और पास करना चाहता हूँ कि तुममें एक-दूसरे के प्रति मादर भाव उत्पन्न हो।माज तुमने अपने को लाचार पर लिया है कि एक दूसरे का इतना - ६२ जनेद्र की कहानिया [चतुर्थ भाग] भय करे कि प्रेम के लिए छन और चोरी की सहायता लेनी पडे । तुम्हार मन में उसका आदर नहीं, उसके जी मै तुम्हारा नहीं, 1 फिर भी तुम टोह मे रहते हो कि एक क्षण अवसर पाओ, उसे देखो, और मामने कर-धुम्बन के प्रार्थी होकर खडे रह जाओ। फिर, तुम ग्लानि जगाते हो कहन को बाध्य होते हो कि वह असुदर है, होम है, अपात्र है। मैं कहता हूँ, यह विषमता भय ने पदा की है और यह आकपण चोरी की आवश्यकता मे म निकला है। निर्भीक बन सकोगे तो सहज भाय बहेगा। खुल रहोगे तो आवषण तीखा नहीं रहगा, स्निग्ध होगा।" वितु, मैं इतना बोलना चाहता नही था। और मैंने दया कि उसका मुह सूना है। हाय, यह मुझसे क्या चाहता है। मैं तो अपेक्षाहीन सत्य हो कह रहा हूँ। वह विरक्ति के उपदेश-सा नहीं लगता और उनमे भर्त्सना नहीं है, यह तो ठीक ही है। तब क्या वह प्रत्यक्ष तिरस्कार ही चाहता है, गेस नीति ही चाहता है ? किन्तु जो जितना ही ठोस और प्रत्यक्ष है मह नो उतना ही कम भीतरी और उतना ही कम भमोय है। उमन कहा 'अरे विद्याधर तुम क्या-क्या कह रह हो । अरे, मुझे बढ़ावा मत दो, मुझे तो शाति दो।" मैंन तब कहा "मुझे तुम क्या दिखाना चाहते थे। दिखाओ तो " उसे जसे टूटा सिलसिला याद आ गया। वह गया, बस मे से कागल निकाले, वक्स को फिर वही रख दिया और मेरे पास मा गया। कहा, "ये उसकी चिटिव्यां हैं। देखकर बताओ, मैं क्या करूं?" मैंने एक को देख लिया, दो को देख लिया, तीन को देख लिया। फिर सब बद कर रख दी। पूछा, "तुमन कुछ नहीं लिखा?" शकर, ' लाचार होकर लिया। पहली तीन चिट्ठियां उसकी थी।" में, "तुम्हारे पत्र प्रेमपत्र नही थे?"- शंकर, "कैस हो सकते थे?" में, "उन्हें पता दो।' संकर, "असा?" में, 'किताबों की गूठन उनमें बहुत है। हप के पर होवे गोरखने सम्बोधन ! ६३ के लिए मैं भाग लेना । अव उनका उपयोग कुछ नही है।" शकर, "लेकिन जला दू मैं, "जलाना इसलिए आवश्यक है कि ऐसा न हो कि कभी वह बाला उहै देखे, और लज्जित हो।" शकर, "इससे सब-कुछ निवट जायेगा।" मैं, "नही, सब कुछ नही निवट जायेगा। तुम अपनी पत्नी स मिलो। एक एक बात समे कह दो। ऐसे कहो कि उममे मह ध्वनि तनिक न हो कि दूसरे पक्ष का दोष है। और, यह मुझसे सुनो कि दूसरे पक्ष का दोष नहीं है।" शकर, "क्या-आ?" मैं, "दीप या तनिक भी भाग तुम्हारा मन दूसरे पक्ष पर जब तक टाते, ममझो कि मन अनुकूल रही है। वह स्थिति आनी चाहिए कि अनुभव हो, जगत के प्रति मैं ऋणी हु, मैं अपराधी है। जगत को दोष देकर छुटकारा नही मिलेगा। छुटकारे के लिए, सब वात के लिए अपनी और देखना होगा।" शकर, "किन्तु, मैं कह कैमे सकता हू' स्त्री को यह कहू में, "हा स्त्री को यह कहो । स्त्री से न कहकर कहा जाओगे' स्त्री से अधिक अभिन, अधिक निकट, मुझे या और किसीको बना सकने की आशा म मत रहो। उममे न कहोगे जिसके साथ अभिन जीवन होकर रहन की प्रतिमा समाज के, अपने और परमात्मा के सामने लेकर, घर बनाने का अधिकार और आशा पार, आज यहा बैठे हो? और यह भी समझो कि आज चाहने पर भी घर तोडने का हा तुम्हारे अकेले के पास नहीं है। दोनो मिलकर यह कर सकते हो, पर टट पर बने नहीं हैं।" शकर, 'पर यह क्या समझेगी?" मैं, "जो भी समझे, यह समझना आवश्यक है। तुम्हारी ओर से कुछ सुनकर समझना उससे कहीं कम भयावह और कहीं अधिक श्रेयस्कर है, जो वह अपनी सोग से जानकर समझेगी। क्या तुम उस अनिष्ट को चाहते हो?" 2" .
६४ जनेद्र की कहानिया [चतुथ भाग] शकर, शकर, यह भी तो सम्भव है कि म सम्बध में उसम वह उपक्षा और दुर्भावना पदा हो जाय जो मुझ पर म उसका अकुश ही उठाद । निरकुश होकर वह चलने व माग में क्या रुकावट रह जायेगी।' मैं, 'हा, यह सम्भव है । यह खारा तुम्हें उठाना होगा। क्वल तुम्हारी सत्प्रेरणा पर तुम्हारा अवलम्बन हागा। बाहरी हर विसी अकुश के अभाव मे तुम्हे निरकुश न हाना सीखना हागा। पति के सम्मान की अब तुम्हें चिता है। उमे मैं कहता हू पानो। पति की सम्मान रक्षा मनुष्य की सम्मान रक्षा के प्रतिकूल नहीं है । और, फिर मम्मान रक्षा से बडी आत्म रक्षा है। मत्यरूप आत्मा की रक्षा मजा सम्मान खोया जाता है वह खोये जाने लायक है।' तो मैं यह करू ? मैं कर सकूगा?" मैं, हा जरूर करो और जरूर कर सकोगे। और उस लडकी से मिलना बद करो। छिपकर कभी न मिलो। इस प्रकार मिले बिना न रहा जाय तो कुछ चारा नहीं, कि तु पत्नी पर प्रकट कर दो। और दिल से दूर निकालो कि वह सुदर नही है याग्य नहीं है । वह सुदर है और तुम्हारे आदरयोग्य है । प्रेम की अपूर्णता में से यह कदर्य भाव निकलत हैं-~असुदर और अनादत । सहसा अपन निफ्ट उम आदरहीन मत बनाओ। और, अपने को आरहीन मत बनन दो। एक-दूसर मे पक्षा समादर, सम्मान का भाव रखना आरम्भ कराग तो वामना लुप्त होने लगेगी। अपने प्रेम को कम न करो। प्रेम धम है । प्रेम म मोक्ष है । ब धन प्रेम तोडने मे है। किन्तु प्रेम वह नहीं जिसका आधार घृणा हो, और जिसका परिणाम ग्लानि हो। क्या अपने प्रेम पात्र के सम्बध मे घणा से मुक्त नहीं हो सकते' उसमे मुक्त हो जालोग तो प्रेम सात्विक होगा। और प्रेम-पात्र का पूणा करते जाना-छि कसी लज्जाजनक बात है बस पही तुम्हें करना है। अपने प्रेम का इतना सम्पूण बना लेना है कि धणा का अवकाश न रहे। और एक बात और है, पत्नी को पत्नी न समझो बच्चो की माता (अपवा भावी माता) समझो । अर्थात् मान सखो कि उसका अपना व्यक्तित्व है । तुम्हारा उतना ही अधिकार उस पर है जितने तुम उसके प्रति समर्पित हो। इस तरह उसे प्राप्त करके भी तुम उसे मपन - सम्बोधन..६५० लिए प्राप्य बना सकते हो। इसमें कुछ न कुछ अप्राप्य शेष रहने दो और कुछ न कुछ अप्राप्य की झाकी उसमें पाते जाओ, तब तुम्हारा प्रेम शिथिल न होगा और कभी किसी और नये आधार को उसे चाह न होगी।" शकर "भाई, मैं तुम्हारी बात मानूगा । देखूगा।' - वितु, सरल ही कठिन है। हम जीवन को एसा बना बैठे हैं कि सर्वातगत आत्मगत सन्य व्यवहार के लिए असगत और विदशी हो पडा है। छल मे से बाहर आकर जल से निकलो मीन की तरह हम अपने को अशान्त, निष्प्राण, निस्सहाय अनुभव करते हैं। हमार लिए जीवन के व्यापार छल मै रहकर ही सम्भव बनते हैं। जो निश्छल होकर रहना चाहे, हम लगता है, उमरे लिए यही गति है कि वह निर्माण के ध्यान मे जगल मे जा रह, दुनिया मे उसे जगह नही। तभी हमारी ममन्याए वढनो हैं, जीवन आजीवन एक उलयन बना रहता है। मौत तब समाप्ति की भाति आकर अच्छा ही करती है। पाच रोज बाद शकर घर आया। मुह पीका था और वह दीन बना था। उसे दीन बाने की क्या आवश्यक्ता थी? कमाता था, खाता था, दो आदमिया में सभ्रात गिना जाता था और पास गाठ की अकल भी कम नही थी। पर वही फीका, दौन प्राथी बना हुआ-सा देखा मेरे पास आ रहा है । मैंने कहा, ' कहो शकर धोला, ' मैन बहुत काशिश की। स्त्री मे पूरी-पूरी बात खुलकर क्सिी भाति नहीं कह सका। हा बहुत कुछ कह दिया है। पर, उसकी तो उदा- सीनता अगाध है। उसे किसी तरह का अविश्वास, या किसी तरह का विश्वास नहीं होता। तत्सम्बधी दिलचस्पी की आवश्यक्ता ही उसम नही उपजती। क्या परिणाम हुआ है इसका जानते हो? सवनाश के इतन निवट मैं विन आया है कि वह किसी घडी सिर पर फूट सकता है । मैंने कहा ' पबराओ मत चौत्र में हो चोट पाकर वह बोला, “घबराऊ नहीं, यह तुम कहते हो तुमको मालूम है, इस बीच मैंने तीन चिठ्ठिया और पायी है, और " जैनेन्द्रकी कहानियां [चतुर्य भाग] तुम जानते हो, क्या? दो बार मुलाकात हो गयी है। मैं उहें नष्ट नही पर मा। नष्ट कर देने मे उहें एक क्षण सगता है। और उनके रहते दने मे हम क्या था? दे मेरा क्या बिगाड सकती थी। मैंने मोचा जब चाहूगा ग्ला दूगा, फिर मुझे जल्दी पिस बात की है ? मैंने यह तेर लिया और मैं उहें नहीं जला पाया और तुम कहते हो घबराक नहीं । अरे, हम इनन बड आये हैं कि अगला पदम, और नाग । मामने और कुछ नहीं रह गया है और राह मे का सब-कुछ हमने तोड दिया है और हम खिये जा रहे हैं। पदम हम न रखें तो भी मालूम होता है, रखना होगा। मुडने का स्थान नहीं है। संगर पीछे जाने कहा छूट गया है और आप के नीचे यावत है जिसमे हम गिरेंगे और जो हम निगल जायगा । और तुमने पहा पा, मैं मिलना बंद न करू' और कहते हो, मैं घबराऊ नहीं, तो बताओ क्या करू ? तुम्ही बताओगे क्योंकि तुमने ही सब-कुछ होने दिया है। मैं भाग रहा था, तुमन कहा, पीछे भागो मत सामने आगे बढ़ । तुमन मेरे साथ यह भपकर अहाम, निठुर, क्या ममझकर क्यिा था? मैं तुम्हारे पाम आया हू और, जल रहा हूँ। मुझे जलाने की बात न करो। ठीक बात करो।" कहकर वह पहले की भाति निस्तेज हो पडा। मैंने कहा, "तुमने आरम्भ मे मैल जमने दिया। प्रेम स्वच्छ है । सामाजिक सदाचार की सकरी और विषम मान्यताओ में उसका प्रवाह रुका। रुकता रहा, रुकता रहा बघे पानी की नाइ उसमे बास पैदा हो गयी। मैल जम गया। वह उन मा यताओ के शरीर मे व्याप गया। हृदय का मेवन उसे मिला तो कमक देकर पीब बन उठी। तमाम शरीर की मलिनता उसी एक विदु की ओर खिंचकर मचित होती रही। फोहा हो गया। अब पका है मीठी मीठी चसक देता है, पीर देता है। उसके फूट मे ही अब कुशल है । उसे फूटने दो। और स्वास्थ्य लाभ क्रो।" मकर 'क्या विद्रूप परिहाम करते हो । जानते हो, क्या कह रहे हो उसका कौमाय खडित हुआ तो मैं कभी स्वस्थ हो सकूगा और तुम कभी अपने को और मुझे समा कर सकोगे। सम्भलकर बात करो ।" .
सम्बोधन ६७ मैं-कौन अपना कौमाय अखडित चाहता है ? शकर अत्यधिक वन हो आया और बोला, "विद्याधर " मानो मैंने उसकी आत्मा पर पाव रख दिया है। नितु, दैन्य मानव का कब धर्म है ? कातरता को कुचले बिना मनुष्य के लिए जय कहां है । मनुष्य के भीतर क्षुद्र है, वह भी है। विराट् उसीको पद-दलित करके खडा होगा और आवाहन देगा कि ओ धीर, क्लव्य तज, दुर्बलना छोड, धम पहचान और वीरवन युद्ध मे खडा हो जा। मैंने कहा, “तुम समझने हो कि जिसे तुम कौमाय कहते हो उसके खडित हो जाने पर, उस बाला के प्रति सब सम्मान मेरे हृदय मे से नष्ट हो जायेगा ? तुमस मित्रता तक तब मैं न रख सकूगा' नहीं, मैं ऐसा दम्भी नही है । इसलिए बेलाग बात कह देता है। तुम मुझसे सुन लो मानो चाहे न मानो, कि जो रुका है उसे माग देना होग। न दोग, वह खुद बना लेगा। दूसरी बात भयकर होगी। तब तुम दुष्ट होकर ही दम ले पाओगे या बागी होकर जिओगे। तुम अपना अस्तित्व मोर हठात् फिसलोगे, और बहोगे । त्राण पहले मार्ग में ही है। सत्कामना तुम्हार भीतर है तो क्यो नही तुम अपनी पत्नी के चरणो मे आसू बहाकर अपने को खाती कर लेते २ नहीं तो जो वेग बन्द है ऐसा फूटकर बाहर वह जायेगा कि तुम खोखल रह जाओगे। मेरे पास तुम्हारी तरह उस अबोधा किशोरिका के हृत्य का कुछ भी स्नेह और अधिकारहोता, तो मैं कहता-बेटा, तुम अपने को लेकर सकट मे हो । डर रही हो, क्योकि धोरी पर लाचार हो। चलो, जिसकी चोरी करती हो उससे कह दो बहन तुम्हारे घर मे सेंध लगाकर चोरी करने में घुस आयी हूँ। अब अपने को तुम्हारे हायो पकडाय दे रही है। तुम मेरे सम्बध मे आगे भी सावधान रहना।' और यह नही कर सकते, तो मैं कहता हूँ जिसे नाश, सवनाश, नाश बहवर पर रहे हो और डरा रहे हो, उम भूत को ऐसा समझकर देख लो कि साधारण-सा दिखायी पडने लगे। होनहार मे से गुजरकर मन की स्थिरता सदा के लिए नष्ट मत समझ लो मि और बना सो। जो आ ही जायेगा, उसे मा जाने दो, और आकर गुजर जाने -फिर सोच-सोचकर मु-सा भारी अपने को मत बनाओ। हतके होकर सचाई के मार्ग पर सहज भाव से पल -
बनेद्रधी बहानियां (चतुथ भाग]
दो।"
विन्तु शकर का ढादन नहीं हुआ द्विदमन मया। मस्य स अभा
भय पा। जिम मवर म विचा जा रहा है, उस दखत दहलना था, दखने
तर का सामध्य गवा मैठा था। दहशत मिटनी ही चाहिए इसीम विराट,
भीष्म, और भमकर प्रनि मारपण की अनिवायना है। आकपण का
प्रयोजन दाना ओर ममभावयुक्त निर्माता पो मम्पन करना है। उस
आपण + वाभून होकर अयुक्त ग्रा मे उमने कहा कि कभी वह
विना की घडी न आने दगा उसम पहले ही अपने को दूर कर सगा।
ओझल हो जायेगा परम्पर मानवी सम्भावना को असम्भव बना
लेगा। मरा प्रकान नेगा हो तो मिट जायगा-
नहीं लगने देगा।
ऐसी हा उग्र स्थिति म मह मुझसे विदा ले गया।
-मही, यह कालिस
४
अगले सप्ताह उसका पत्र मिला।
भाई चुछ दिनो मैं मुह छिपाने कही बाहर पा रहा है । आत्मह"
नही कगा। मव कुछ ऐसे हो गया है कि आत्मघात सम्भव न रह
गमा । मैं उसे समझने में समम लगाऊगा।
अपनी श्रेणी म सगीत मे प्रथम रही हैं। एवं नाटक भी गया
विद्यालय म हुआ था। अभिनय कौशल म उहाने पर पाया है। वाजा
ऊपर हमेशा से अधिक वजना है। पत्र बहुत आन लगे हैं।
'बताआ मैं क्या करू' मुझमे दुनिया का मुह नहीं दया जाता।
दुनिया जाने कम हैमती है। बाजे के पास में भी कभी हंसी आती है-
वह जाने कैम हँसती है।
मैं नहीं रह सकता हंसी सीखूगा तब आऊगा।
तुम्हें यह नहीं मालूम कि पहले पत्र सरसो गय । किसी नल लिम
किसको उनकी भूय यो? लेकिन मुझे उनको जिता नहीं है । फिर भी डर
है कही श्रीमती के पास ता नही पहुच गये। पर डर ग्यम है । उस आर से
भी मेरे जी म पन नहीं है। कालिख पोतार एक दिन मोवा या कह हि
सम्बोधन ६६ " देखो सुनो, मैं काला है । मैं तुम्हें सब सुनाकर अच्छी तरह बताता हूं कि मैं प्रितना काला हू । तब मन मे कुछ ज्योति सी जगी थी। पर जगी नहीं कि बुझ गयो । ऐनी जमी उपेक्षा से उसने मुझे लिया कि मैं काठ हो रहा । मन की आग भीतर राख औदकर रह गयी। वह मानो कहना चाहती थी. तुम कुछ हो-मैं नहीं मागती। मुझे रहने दो, मरने दो ! अरे छोडो, मरने तो चुपचाप मुझे दो।' 'मो मैं जा रहा हूँ । तुम्हे याद कर सकन की आना चाहता हू । -तुम्हारा-गकर।" ५ मैं तो मन-बुछ भूल जाता, क्याकि छह महीने का काल पर्याप्त होता है कि अचानक शकर का काड मिला। लिखा था- मैं लौट रहा है। किसी अजान हितैषी ने लिखा, पत्नी विपथगा है। मुझ भूल जाने की सुविधा चाहती है छुट्टी चाहती है । मैं लौट रहा हू कि कह-तुम्ह पूरी छुट्टी है, सब हक है । किन्तु मुझे अपना अनय सेवक का रहने दा जो कुछ न कहगा। पा विवाह भी सुना है। उनके घरन छूने की साध भी मिटाना चाहता हूँ। तुममे मिल गा। ---शकर।" और उसी दिन एक और भी पत्र मिला--- "श्रीमन, पापको पत्र लिखता हू, क्योकि आप बार शकरदयाल जी के मित्र हैं, भार मैं शकरदयालजी ये प्रति अपराधी हू। उहें सीधे लिखने का साहस मुझम नहीं है । आपने मुझे देखा है। क्या उस कुरूप, कुचाल, मले, अघपढ़ और कम सुननेवाले क्लक की आप याद कर सकते हैं, जो जब आप बाबू शकरदयालजी के यहा पधारा करते थे, वाचाल होकर अपनी दो चार पक्तिमा हात् आपका सुना दिया करता था? आप कह दते थे, 'अच्छी है और वह सोचताया, क्या यह कृपा करके रहते हैं 'अच्छी हैं, क्या नहीं सुलकर वह देते कि किसी काम को नहीं हैं जैसे कि अपने मित्र से कह देते हो। क्या में इनको कृपा का पात्र हू, और क्या मैं इनकी मित्रता परावरी का पात्र नहीं है और उसी समय बाबू शकरदयात कहते, जैनेन्द्रकी महानिया चितुर्ष माग अच्छी है ? सुन लिया 12-अब पलो, अपना काम करो। वह पासत सिओ। मैं पासल सीन लगता था, क्योंकि मुझे पालीसवें रोज धारह पर मिलते थे। और कविता को मोहबर अण्टी में छिपा मेता था, मोकि पार्सल पर अभी जाना होगा, और कविता जब आप फिर आगे तभी जाकर सुनानी होगी। अब आपको याद आ गया होगा। उसीने बाबू शवरदयालजी के नाम से पुछ प्रेम-पत्र पुराये और यहीं मैं हू । शुरूम इच्छा थी मि जान् विपन लिखे हैं। पर अब वसी उत्सुकता नहीं है। अब तो मैं यह मान पर रह रहा है कि ये मेरे प्रति लिसे गये हैं और जिसने लिखे हैं वह मरी रानी है। यह पर आपको मैं इसलिए लिख रहा है कि मैं अपराध की क्षमा चाहता हू और कि आप मुझे विश्वास दिला सकें, ये पत्र अब मुझमे न छिनेंगे। मेरा वह सर्वम्व है और उनके कारण किसी का अहित न हागा । बाबू शरदयालजी चाह ही ता उनकी प्रतिलिपि में अपने हाथ से बहुत सुदर अक्षरा म करके, उहे भेज सकता है। किन्तु वह सम्पन हैं, एमे जितन पत्र चाहे उहें मिल सकते हैं। मुझे आप हा सोचे कौन पूछता है। चौरी का पाप उठाकर जो मैंने पाये हैं, और जिरें निर तर इन छह महीना के पाठ से मैंने अपना बना लिया है और जो मरी रानी हाय के हैं और जिनम वह मेरी भी मुझे हंसती, कभी रोती, कभी मुझे घूमती दान देती है.---आपका चिरायु कृतज्ञ रहूगा, वह पत्र मेरे पास रहने देने की उनस आशा ले लें-आपका भगवान भला करेगा।' ओ मुपसे यह मत पूछियेगा मैंने क्या चुराये। कुछ होता है जो हा जाताहै कारण काय का भाव जोडकर उस विमी तरह बताया नहीं जा सफ्ता। बाबू शरदयालजी अकेले में एक दिन एक पत्र पढ रहे थे। मेरा काम से कमरे में जाना हुआ तो उहोने जल्दी स मे कापीम पर लिया। मुझसे क्या डर था पर वस्तु ही ऐसी मम ये भीतर छिपाकर रचने की होगी । उस दिन पाच-छह बार मुझे उस कमरे म जाना पड़ा। हर बार मैंन उन्हें कुछ कापी म छिपात हुए पाया। जी, मैं तेईस बरस का है। बारह बरस की उमर से परदेश म और परदेशियो के बीच म अकेला रहा हूँ। क्सिीने मुझे नहीं पूछा और मैं पूछे जाने के लिए तरमता रहा। जी जी हरएक मे होता है। मैं सोचता हू, क्या होता है ? विधाता क्या हमे बिना सम्बोधन उसके नहीं बना देता, कि हम दद मिटा नही सकते, तो उसे अनुभव किये बिना तो रहे। जब साझ डूबती होती थी, और सडक की बत्तिया जल जाती, और निक काम से चैन पाकर मैं ऊपर देखता, ऊपर तारे निकलते होते, और बाहर लोग खुश-खुश इधर से आ रह होते और उधर चले जा रहे होते, और उनमे स्त्रिया भी होती, स्त्रिया । जिह रोज ऐम देखता जैसे सपने देखता हू, जिनम स्पश नहीं, सौरभ है, वह भी जाने है या नही, और देसता, वे स्वच्छ हैं मैं मला हू, वे मिल जुलकर आ-जा और हॅम- बोल रही हैं और मैं अकेला हूँ, न अनगिनत तारा के नीचे और असंख्य जाना के बीच में मैं एक हू अकेला हूँ, तब होता, मैं क्यो अकेला हू जी मे हाता क्यो नही मेरे पास भी कुछ है, जिसे झट दौडकर चुगी की बत्ती की रोशनी में मैं खोल देयू, जिसे दूसरो को आखा से बार बार मैं भी छिपाक और अपनी आखो के लिए बार-बार प्राट मरू, सदा अपनी भीतरी जाकिट की उस जेब मे रख् जिसके नीचे छाती हर घडी धुक धुक् करती है, और अकेला होऊ रि पढ लिया करू । जो ऐसी ही कल्पनाओ को लेकर रोया करता था। सो जब बाबूजी को देखा मन एक सकल्प स भर-सा आया। मैं चोरी कभी कर सकता था? पर यह चोरी मुझे चोरी नही लगी। पद्रह दिन उसम लगाये। विन्तु चित दुखता ही रहा, और आज, जी, मैं लिख रहा हूँ और माफी माग रहा हूँ। आप सब लोग मुझे माफ कर दें। मेरा प्रणाम।" विनयावनत-रामदीन दाना पत्र मैंने पाये, और सोचा, सब ठीक है। अब सब ठीक है। इसलिए तव सब ठीक था।
ग्रामोफोन का रिकार्ड वह अन्त मे पनग पर उठ बैंठी । अलस बठी अगाई ली और बलों पर हाथ फेरन लगी। माडीका मे पता था और बाल मस्त मस्त थे।ठी उठकर बई आईने के सामने गयी, वाल ठीक किय, अपने से हरपाई मिलाई, फिर अगडाई ली और लोकर वह पला को पट्टी पर आठो। दुपहरी का वक्त ह कमरा तीसरी मंजिल पर है। वहा स बाजार भी दीखा है जहर सदा चहल पहल रहती है। कमरा सब तरह के आराम मे भरा है। इम कमर म बैठो बैठो वह एक घडी बिताती है और मह साथ पर उम चन पता है कि चलो मह बीती। लेकिन फिर आग आता हुई घडी की ओर देखकर मोचती है, अब? रमणा की अवस्था वीस-वाईम में अधिक रही हैं । पनि एक मिल मेक्रेटरी है। अच्छे सम्पन्न है, अन् शिक्षित मम्म, सुदर बार स्नेहशीन एक दूसरी मिल सटी करने की बातें चल रही है, उमम बहुत व्यस्त रहते है। कोई वान-बया नहीं है और यह रमणी ग्यारह बारह बजत सर्व खाने-पीन स निवकर यहा अपन दर यमर म आ जाती है और नही सारती क्या रेयान करे। माना चाहती है और अभी नीद भी जा जानी है। आ जाती ह त्व तो ठीक जब नीद नही जाती तब वक्त मिर पर बेहद भारा हा जला है। मोई सपी महेती आ जाय तो या वार नई तो यह मामान म भरे "स कमरे गे सलर डोलती हुई सूनो पहिचान निबटन का अकेली रह जाती है और जान पाता है । तर, नहुआता कभी हारमोनियम घोलकर देर उस पर गुला पता लेती है कभी ग्रामासान मा गवाता है की आरमारी से उस पौधार पढ़ने लगती है, नही तो पिगी नौर ग्रामोफोन का रिकार्ड ७३ चाकर को बुलाकर उसी इधर-उधर की बातें करती है। उसके मन मे प्रतीक्षा भरी बैठी रहती है। उस प्रतीक्षा में बह चिहुक- चिहुक पडती है, अब वह आ जायें ना? अब वह ना जाये तो यह नही कि स्वामी दोपहर को कभी घर आ नही सकत। किन्तु वह वामकाजी आदमी हैं और अनियमितता कही भी उहे पसद नही है । सब काम का समय होना चाहिए और तरीका होना राहिए। प्रेम के लिए क्या व्यक्ति अनियन्त्रित बने? वह आते तो कहते "कहो डियर, वह किताब तुमने पढ़ी अच्छी लगी ॥ पत्नी बहती, "हा, अच्छी लगी। "हा, किताब वह अच्छी है। बस, ऐसे ही अग्रेजी आ जायेगो अच्छा बतन्तिया को बुलाओ तो, कहो तश्नरिया ले आये।" वह वसन्तिया को बुला दती और तश्तरिया आ जाती। नाश्ता हो जाता और इसी तरह दस पद्रह मिनट निकालकर मिस्टर कपूर कहते, "अच्छा डियर, तो मुझे चलने दो।" और वह चले जाते। उनके चले जाने पर वह उठती । जिस किताब को उन्हाने कहा होता उसे खोचकर विस्तर पर जोधी पटक दती, और कमरे में इधर-उधर टहलती । त म पलग पर गिरकर दो चार पन उस किताब क पटन की भी चेष्टा करती। उनके मन का धिरता नही थी। वह अपने को कहा वावे उस मन के भीतर पढाई भी है और प्रेम भी है। लेकिन वह अपन को जैसे स्वीकृत पाता ह । विसने उन चाहा या लिया है ? निम लिए उमका वन मन रहता है तीना लोको मजा उसका अधीश्वर है वह आदमी तो एकदम उम सोने मे और "वय मै दुबो देना चाहता ह-~-वह उस एसा प्या परता है। पर क्या वह सके योग्य है ? क्या वह इतने सयत और दमठ प्रेम को मन सकती है जो उसे आलिङ्गन न दर आभूषण देता है ? वह इसीस अपने को निराभरण निरतवृता, पूजा की सामग्री की भाति शुचि-उज्ज्वल और धूप निखा की भाति श्यामल रखती है कि वह प्रमु पर अर्पित हो और स्वीकृत हो। उसर मन म अव्याहत, अलक्षित कुछ उठना रहता है, जनेर की गहानियाँ [तुर्य भाग] 7 जो बारा-बाला बादल-सा घुमड़ता है-बरसता नहीं। जो एकोहन हो राग नहीं बन पाता, न सगीत, बार जो विधरा-ही विखरा सम हो जाता है। वह अपने मरेरे भीतरही भीतर घूमती है, अपने हृदय में सपा- मारको सेपर रिया पर क्या करे जब नदी अनवती होनी है और मता फ्लपती, तब क्या उनम उनरे हम का समस्न रम भरसर उमा नहीं माना है। श्री माता होन में ही स्त्रीत्व भी पा सम्पूर्ण तार्यता और सप्ति नहीं है। बिमनिए सो उमगती है सजाती है पाती है और भागता हुमा पुरुष या उसमें पिपा पला आता है क्या यही नही रिउम दिया मा म अपना स्वरय- दान मरना है परन रना है जोहा यह थीमनी पपूर एर अनिलिष्ट अभावको भीतर पर दुपहरीमी पहिलो में निराकर अपने समरे म गोगावर और 12-उठकर सोपमो?--यह पारे । अरे यह पारे? उसे धरना नहीं है। Namrat पर मातो ये उमरेपरणीय पमही नही है। उसे सनिम भी नहीं भरते। उनकोपरगेवर पाउदिष्ट मानिस भी पर नहीं पर पाती । उहिमगरियारनामपर्म उगाह है पा उमगा "गि अन्तिम पमिए पदमा "मर पर नहीं मानी । मेपित भीतररागमन प्रगगिती भारतमा उ पुग ५ पीनुमा परमपम ही उमगिरिमारही मिप TRE परम शाह friएगीमामा से मारे मरेगा
ग्रामोफोन का रिकार
घूम घूमकर गामा शुरू करता है-
सया तोरी गोदी मे गेंदा बन जाऊगी। सैया०
जब मेरे सैया को प्यास लगेगी,
गगा-जमुना, तिरवैनी जय जाऊगी। समा०
जब मेरे सैया को भूख लगगी,
पूरी, पचौरी, जलेवी बन जाऊगी । सैया०
वह मास बन्द किये इस राग ये पबो पर बैठी, हिंडोले में झूलती,
निराली, उस देश से पहुच जाती है, जहा सोना और सामान नहीं है और
वह बस सैया की गोद मे फूली फूली गेंदा बनी पड़ी हैं, तुड-मुडकर बस
रसभरी जलेबी-सी सया की माखो के आगे बिछी है। हा, वह क्या नही रस
पार मे खीचकर सबका सब डुबो लेगी, पूरी तरह अपने मै ले लेगी।
और गीत चलता ही जाता है--
सया तोरी गोदी मे०
'जब मेरे सैया को निदिया लगेगी,
तोशम, तकिया और गद्दा बन जाऊगी।
अब के मैया आय तो वह कहेगी-~-देखो तुम अच्छी तरह गोदी बना
पर लो। मैं अभी तुम्हारी गोदी में गेंदा बनकर दिखाती हू । देखो, ऐसे,
और ऐमे मैं गेंदा बन जाऊगी । भौर मैं विवणी भी बनूगी, और मैं जलेबी
भी बनूगी । सैया, मैं तुम्हारे लिए सभी कुछ बन जाऊगी । तुम कुछ मत
करो बस देसने ही रहो मैं कैसे-कैम क्या-क्या बनती है।
इसी तरह में भाव मे मग्न थी, तभी उसी ओर आते हुए स्वामी के
पैरो की आहट असने पायी। झट ग्रामोफोन बद किया और भपटकर
चादर ले वह पतग पर आ लेटी । लेटकर धीमे-धीमे सर्राटे लेने लगी।
सोचती जातो थो मेरी वादर हाकर वह कहगे' ओ बिजी, सोती
हो।
मैं बरक्ट लेकर कहूगी, "क-ॐॐ।'
वह कहेंग, "अजी विजया महारानी, उठो।"
मैं हूगी, ' हटो जी हमे मत छेडो, हातो। हमे नीद आ रही
७४ जनेद्र की कहानिया [चतुर्य भाग] 7 जो काला-काला बादल-सा घुमड़ता है-बरसता नहीं। जा एकीकृत हो राग नही बन पाता, न सगीत, और जो बिखरा ही बिखरा लय हो जाता है। वह अपने कमरे के भीतर ही भीतर घूमती है, अपने हृदय व्यथा- भार को लेकर कि क्या कर, क्या करे। जब नदी जलवती होती है और सता फलवती, तब क्या उनमे उनके हृदय का समस्त रम भर-कर उमड नहीं आता है । स्त्री के माता होने में ही स्त्रीत्व की क्या सम्पूर्ण कृतार्यता और सतप्ति नहीं है ? किसलिए स्त्री उमगती है लजाती है बढती है? और भागता हुआ पुरुष क्या उसमे खिंचा चला आता है ? क्या यही नही कि उस विश्वात्मा मे अपना स्वत्व- दान करना है फल दान करना है जो हो यह श्रीमती कपूर एक अनिर्दिष्ट अभाव को भीतर लेकर दुपहरी की घडिया मे निरानद अपने कमरे में सो-सोफर और उठ उठकर सोचनी है—वह क्या करे ? अरे, वह क्या करे? उसे कुछ करना नहीं है । सब काम करती है, पर मानो वे उसके करणीय क्म ही नहीं है । वे उसे तनिक भी नही भरते । उनको करके जैसे वह अपने उद्दिष्ट कम का तनिक भी अश नही भर पाती । उद्दिष्ट कम ? इस विश्व की योजना मे क्या कम उसका उहिष्ट है क्या उससे इष्ट है ? किस अतिम पल के लिए वह यहा है ? वह यह कुछ नही जानती। लेकिन भीतर का समस्त प्राणरस जिसकी ओर कण्टक्ति हुआ उमुख बैठा है क्या वही उसका परम कम नही है ? वही उमकी मिद्धि और वही उसके लिए धम नहीं है । उसक किस अन्य परम अथ की अपेक्षा हो सकती है? वितु वह इस अपनी परमाकाक्षा, परम साथक्ता परम सफलता को फैमे सम्पन्न पाये? अरे वैसे? वह क्या कर? कोई बताओ, यह 1 क्या करे? २ उसे एक रिकार बहुत ही मन भा गया है। दूसरे के यहां वह रिकार्ड उसने पहले-पहल बजते हुए सुना था । वह जैसे उसके मन की बात की छीनकर ही बना हो। वहीं यह बजाती है वही सुनती है, वही गुनगुनाती हैरफाई मशीन पर बैठ जाता है वह आखें मूद लेती है और रिकाड
ग्रामोफोन का रिकार
धूम धूमकर गामा शुरू करता है-
संया तोरी गोदी में गेंदा बन जाऊगी । समा०
जब मेरे सैया की प्यास लगेगी,
गगा-जमुना तिरवेनी जय जाऊगी। संया
जब मेरे सैया को भूल लगेगी,
पूरी, पचौरी, जलेबी बन जाऊगी । सैया०
वह माल बन्द मिये इस राग के पडो पर बैंग, हिंडोले में झूलती,
निराली, उस देश से पहब जाती है, जहा सोना और सामान नही है और
वह बस संया की गोद मे फूली-फूली गेंदा बनी पड़ी हैं, तुड-मुडवर रस
रसमगे जलेबी-सी सैया की भाखा के आग बिछी है। हा, वह क्या नही रस
धार मे खीचकर सबका-सब हुवा लेगी, पूरी तरह अपने मे ले लेगी।
और गीत चलता ही लाता है--
सैमा तोरी गोदी मे
जन मेरे सैया को निदिया लगेगी,
तोशक, तकिया और गद्दा बन जाऊगी।
अव सया आये तो वह कहगी-देखो तुम अच्छी तरह गोदी बना
पर बैठो। मैं भभी तुम्हारी गोदी मे गेंदा बनकर दिखाती है। देखो, ऐसे
और ऐम मैं गेंदा बन जाऊगी। मौर मैं त्रिवेणी भी बनूगी, और मैं जलेबी
भी बनूगी। सैया, मैं तुम्हारे लिए सभी कुछ बन जाऊगी । तुम कुछ मत
करो बस देखते ही रहो मैं कैसे वैस क्या-क्या बनती हूँ।
इसी तरह के भाव में मग्न थी, तभी उसी ओर आते हुए स्वामी के
पैरा की माहट उसने पायी। झट ग्रामोफोन बद किया और झपटकर
चादर ले मह पतग पर आ लेटी । लेटकर धीमे धीमे सर्राटे लेने लगी।
सोचती जाती थी- मेरी चादर हटान्र वह कहगे ओ बिजी, सोती
हो?'
मैं वरवट लेबर कहूगी, "-3-ऊ।"
वह कहेगे, "अजी विजपा महारानी, उठा।'
मैं कहूगी, हटो भी हमे मत छेडो, हाती। हमे नींद आ रही
।
जनेद्र की कहानिया [चतुर्थ भाग] वह उठायेंगे-मैं नही उठूगी, नही उठूगी, नही उठूगी। मिस्टर कपूर कमरे म आ गये। विजया के कान सुनते रहे---- गये आ गये। वे कान चौक न हो रह कि दखते रहो, वह क्या करते । और वह खर्राटे भी भर रही थी। उहाने आकर आलमारी की चाबी टटोली । यहा देखी, वहा देख नहीं मिली तब तकिये के नीचे देखना चाहा। तकिये के नीचे हाय डा कि विजया ने करवट ली, रिया-'ऊ-----' अर्थात्-'हा, मैं सो हू। लेकिन अजी, तुम वैखटके मुझे जगाकर देखो। सच, मुझे ज लो।' तक्यि के नीचे से उन्हाने जल्दी से हाथ खीच लिया और पिता कि विजया की नीद न उचट जाय। उसके बाद चावी इधर उधर देखें इसीमे एक तश्तरी झन्न स फश पर गिरी। विजया ने नीद से चौक्कर कहा, ' क्या है ?' ओ डियर, कोई बात नहीं। माफ करना । मैं तुम्हें जगाना , चाहता था। आलमारी की चाबी कहा है ?" 'हमे नही मालूम । हा--तो दुपहरी मे भी हमे चन नही है। कहा जौर विजया मुह फेरकर और उस पर चादर लेकर फिर सो गयी इम समय उनका मन रोने का आ गया। उसे बिलकुल पता न र कि यही सैया हैं जिसकी गोद में वह गेंदा भी बन ले जलेबी भी बन या और जो चाह वन ते । समस्त विश्व म इम एक आदमी ही की गोद उसके लिए सव वनन की छुट्टी है । वह सोचने लगी कि यह आदमी नही अपना काम झपट खतम करके यहा मे दूर हो जाता। वितु चाबी का गुच्छा जत्दो नहीं मिला और दो एक मिनट होने विजया को फिर हठात धीमे धीमे खर्राटे भरना शुरू कर देना पडा। अत मे चावी मिल गयी और आलमारी मे स चैक-बुक निराल म डालकर मिस्टर क्पूर चलने को हुए। उस समय वह एक क्षण रुके अ सोचने लग-इसकी नाद को मैन व्यथ ही ताडा। अब क्या मैं उसके ]ि इसस क्षमा की प्राथन करता चलू । विजया को पता था, वह मिरहाने ठिठके खडे हैं । उसने मानो गह ग्रामोफोन का रिकार्ड ७७ नीद मे करवट ली। इससे प्रग के काफी भाग पर मे चादर बेखबर हट गयी। 'क्या विजया की असावधानी में उसका अगदशा नीतिगत है? नहीं नहीं।' उस समय इस प्रकार सोचते हुए मिस्टर कपूर दवे मन, दवे पाव, कि आहट न हो, बाहर चले गये। वह गये। विजया उठी और नीचे पर लटवा कर पलग की पट्टी पर बैठ गयी। हाथ देकर उसने बाल सम्हाले। अगडाई ली और आइने के सामने खडी होकर अपने को देखने लगी। देखती रही। उसने कोसा दि क्या उसका सौदय उस पर से अब तक तनिक ढलकर नही गया है। यह कम्बस्त किस निमित्त वहा वैसा का वैमा ही अडाबडा है, जबकि उसका कोई हेतु नहीं है, उसकी माग नही है। उसने चाहा कि वह कुछ अपरूप क्यों न हुई विकृताग क्यों न हुई ? तव वह पा तो सकती कि वह क्या अस्वीकृता है। कुछ होता तो उमके पास जो स्वय सव दोप का भागी वन कर उसे चैन से रखता । अव चारा ओर से प्रशसित इस रूप को लेकर क्या वह वञ्चिता, अभागिनी अपने अभाग्य का दोप अपने पति पर डाले? तभी वह सहसा मुडकर निश्चयपूर्वक कहती है "नही, नही ।" और गुनगुनाती है, सैया की गोदी म ।" ३ समय अलसाया जा रहा था। वह घूमी, टहली, वाला मे कधी की, साडी बदली, किताब पढी, यह क्यिा वह दिया और फिर सिर पर समय को वैसा ही भरा खडा पार ग्रामोफान के पास आ बैठी। ग्रामोफोन ने गाना आरम्भ किया- सया तोरी गोदी म जब मोरे सया फो उसकी आंखें मुद गयो और गायन एक स्वर चढा- अरे भूख लगगी, बर्फी पेडा, गुलाबजामुन बन जाऊगी 1 सया तोरी जैनेद्र की कहानिया [चतुथ भाग] इस गीत में उसका आधार है, इसमे वल है। इसके स्वरो मे जसे वह चाशनी सी धुल जाती है। उसके भीतर की रिक्तता मे से यह गीत आकूल आप्लावन ला देता है और हृदय के किनारे तक डूबने डूबने को हो आते हैं। तब मानो दुख का बोध लीन हो जाता है और सुख की वाह के लिए भी अवकाश नहीं रहता। यह मिठास और कडवाहट के स्वाद से एकदम भिन प्रकार की निमग्नता वह अपने उच्छलित प्रेम के बल से अपने लिए सष्ट कर लेती है और आप ही उससे डूबती उतराती है। फोन की चूडी नाच-नाचकर कह रही थी- गेंदा बन जाऊगी सैया की गोदी मे वैरिस्टर मनमोहन इस अक्षुण्ण, अतरगित, दीपशिखा पर हैरान थे। वह शलभ न ये पर झुलस उनको भी लगती थी। यह अपने ही स्नेह को प्रति क्षण पान करती हुई प्रदीप शिखा की भाति प्रकाश बिखेरती हुई निष्कम्प, ऊजस्वित, अरक्षणीया, अक्ली खडी है, इस पर उहें विस्मय था। मन की पीडा भी थी। यह तो न बक्र होती है न व्यथ होती है। अपने-आप में ध य नहीं है जल रही है यह भी उसके प्रदीप्त मुख पर कही प्रकट नहीं होगा। वरिस्टर मनमोहन सद्विचारशील और सदभावना शील और सहृदय व्यक्ति हैं। वह किसी के प्रति अप्रस्तुत नहीं हैं। कितु- किन्तु यह नारी, यह विजया, मनमोहन की सद्भावना को क्या कभी निमत्रण दे सकी है ? क्या कभी इस नारी ने अपने अत्यन्त भीतरी क्षत को उमकी सहानुभूति का तनिक भी स्पश, तनिक भी सेंक लगने दिया है ? नहीं, यह अपने व्रण को भीतर हो-भीतर अतिशय सुरक्षित, सेव्य, अति गोपनीय और अस्पृश्य बनाये हैं। इसलिए विजया को कोई अडवन नहीं है कि मनमोहन उमका मित्र हो, वह माये-जाये, मिले जुले और वे दोनों हंस-बोलें। मनमोहन ने सामने जीवन में पहली बार मह खुसेपन की मनुल्लय नीय बाधा पायी है । जहा कुछ छिपाव हो, दुराव हो, आंख जहाँ जरा नीचे भी होती हो, वहाँ मनमोहन नि शक है। किंतु नहा आरम्भ से ही निशक्ति व्यवहार है और हंसी मे निजि उस्लास, मार जहाँ सकोषमा निर ग्रामोफोन का रिकाड । अभाव है वहा मनमोहन जसे निरस्र है। वहा मनमोहन को ढाने के लिए जमे कोई प्रतिवध ही नही है । और भीतर से वासना और प्रेरणा को उमगा कर लाने के लिए जैसे मनमोहन के लिए बाहर किसी तरह की चुनौती कोई अवरोध पाई वहाना ही नहीं पाता है। मनमोहन का इस घर में बुला आना जाना है। और सच ही विजया की त्वीयत भी उससे कम नहीं बहलती। विजया के भीतर एक तरह की इच्छा मुलगी सी भी रहती है कि मनमोहन आये। वह आदमी को दवता नहीं मोती, न अपने को देवी समझती है। मनमोहन के बारे म भी उसकी आखें झपी नहीं है। लेकिन अपने को बिना खोये जो वह पाती है म पाने का रस उम अच्छा ही लगता है। मनमोहन की वत्ति की ओर मै पूणयता विश्वस्त न होत हुए भी उसको प्रीतिकर लगता है कि वह पाय और उनकी उपस्थिति के लिए विजया उपकी कृतज्ञ ही है। चूडी चल रही थी, ' संया की गोदी मे गेंदा बन जाऊगी ।" विजया मौन, मूक, निस्पद, घुली मी जाती हुई बैठी थी। मनमोहन के आने का उसे पता चला। उसकी आख आधी खुली और अनायास उसन कहा "जाओ।" मनमोहन वेलाग आकर आराम कुर्सी पर बैठ गया। उसने कभी पहले य आखें ऐसी आधी खुली न दखी थी। उसका मन एक साथ ही जैसे पुहार के नीचे आकर भीज सा ठा। अनाहूत आनाक्षाए जैरु जाप-ही- आप जग आयी और जैम पल छिन म ही बिना बीज के उग आकर एकदम पल्लवित और पुप्पित हो गूमी। और मानो उह अब अधिकारत फल की भी माग हो आयी। जिनका स्वप्न में भी अगीकरण न किया था, वे ही आकाक्षाए एक्दम पूण यौवन म हुलसित मनमोहन के भीतर लहलहा आयी। उसने कहा "भाभी, वडा अच्छा रिकाड है।" विजया निर्वोघ मुम्बारायी, जमे कहा, 'है न अच्छा ।' जिसकी गोद मे उसे गगा, जमुना, त्रिवेणी होकर बहना है वही तो है, उससे शेप होकर और क्या है? उस जसे लग रहा है-'मनुष्य बस वही है। ससार वही है। आकाक्ष्य यही है। और भाकाक्ष्य जो है, 'सैमा छोड़ वह और क्या हो सकता है ? उसे सव-कुछ अपने सैयामय-सा ही लग रहा है। मनमोहन ने अपनी कुर्मी आगे बढ़ाकर धीरे मे अपन एक हाय म उममा एक हाथ थाम लिया। विजया न कृतज्ञ मात्र से उसकी ओर दवा और मुग्ध काना स मुना- "सैया तोरी गोदी म मनमोहन के शरीर म सिहरन की लहर आयी शरीर म काटे उठने लग। मने कहा 'माभी, भाभी 'जीर अपने हाथ म पड़े हुए इच्छा- शू य कोमल हाथ को गर न दयाया। निजया उसी द्रवीभूत माव से भरी, अधखुली और अधमुदी आवा से मन्मोहन को बस दसकर रह गयी। माना यह उम और अपने छो कहना चाह रही है सया की गोदी म, दखो, मैं इस भाति गंदा बन जाऊगी।" मनमोहन का वा अपन पर म उठता गया। उसने भराय कण्ठ म कहा भाभी, भाभी ।" और एक्दम उठकर पलग पर बठकर भाभी को उसने अक मे भर लिया। वाला, 'ओ मरी पगली रानी भाभी।' विजया ने पाया-मैया वी गोदी म पडवर पखुरिया म सजे गैरे और रस स भरी जलेबी, और त्रिवेणी और गद्दा-तोशक, सबके बनने का समय उमका अब आना ह । वह नितान अवा उसकी गोद में बिखरी- बिखरी हो पड़ी। वहा उस गोद मे रोटी वह पानी पानी होवर बह जायगी। मनमोहन ने उसे बटोरकर अत्यन्त मोहाविष्ट हो जार मे उमका चुम्बन लिया। लिया किसी क्षण पास रखी मेज पर मे दम पीम झननन करती हुई नीचे आ पडी। यह आवाज मोहपटल को चीरती हुई विजया के भीतर तक नहुच गयी। वह चौकी, उठी और-भौंचक रह गयो । सुन, वह खडी की खडी ही रही। उसन मनमोहन को देखा, मानो उस दखन म दष्टि न थी। मनमोहन उसी की तरफ देप रहा था। विजया के मुह स निक्ला, 'तुम । तुम!!' मनमोहन के चेहर पर फ्क, विस्मय लिख गया। .
ग्रामोफोन का रिकार्ड विजया आगे कुछ न कह सकी, माथा पकडकर एकदम धम से फश पर बठ गयी और धरती देखती हुई राने लगी। मनमोहन ने पास आकर, बैठकर, कधे पर हाथ रखकर कहा, "भाभी । विजमा | क्या बात है?" अपने हाथो से उमे अलग हटाते हुए विजया ने कहा, "हाथ जोडती हूँ, तुम जाओ। चले जाओ, अभी चले जाओ।" मनमोहन ने कहा, "क्या है ?" "हाथ जोड़ती हू, हा हा खाती हू, तुम अभी चले जाओ। देखो, तुम्हारे पैरा पड़नी हू।" और उसने मनमोहन के पैरो की ओर अपने हाप बढ़ाये। मनमोहन खो गया । उसो कुछ भी सूझा नहीं। वह पत्थर की मूरत बना वहा खडा ही रह गया। उसने सुना- 'चले जाओ । नहीं तो पटककर मैं अपना सिर यही फोड डालूगी।" सुनकर मनमोहन का अपने पर कुछ भी वश न रहा। मुह मुकाये यह चुपचाप चला गया। जब शाम को स्वामी आये, विजया ने गुस्म से कहा, "नही, यह मूठ है कि तुम मुझे प्रेम करत हो। तुम मुझे प्रेम नहीं करते। मुग्ने अपने घर भेज दो। मैं वही रहूगी, वही रहूगी। स्वामी ने कहा, 'तो चली जाना, पर ऐसी क्या बात हुई ?' "नहीं, मुझे तुम्हारा प्रेम नहीं चाहिए। मैं तुमसे नही वोलूगो। मैं अप्रैजी नहीं जानती इसी मे तो मैंने तुम्हें देख लिया।" आशय कि विजया अपने सैया को छोड कुछ दिन के लिए चली ही गमी। और पति तक पूर्वक भली भांति कायल हुए बिना न रह सके कि अयाय उन्ही का है, और वह पात्र है कि विजया उनसे न बोले ।
जाह्नवी
आज तीसरा रोज है।-तीसरा नही, चौथा रोज है। वह इतवार
की छुट्टी का दिन था। सवेरे उठा और कमरे से बाहर की और झाका
तो देखता हू, मुहल्ले के एक मान को छत पर काआ काओ परत हुए
कौओ मे घिरा हुई एक लडकी खडो है। ख-खड़ी बुला रही है "कौओ
थाओ कौओ आओ।" कौए बत्त काफी आ चुके हैं पर और भी आत
जाते हैं। वे छत की मडेर पर बैठ अधीरता से पस हिला हिलाकर बेहद
शोर मचा रहे हैं। फिर भी उन कौला की मग्या स लडकी का मन जस
भरा नही है । वुला ही रही है कौआ आगो कौओ आओ।"
देखते देवते छत की मुडेर कौआ वित्ल काली पड गयी। उनम
कुछ अब उ• उडकर उस की धोती जा टकराने लगे। कौओ के
खूब आ घिरने पर लडकी मानो उन आर्मात अतिथिया के प्रति गाने
लगी--
कागा चुन चुन खाइयो ।'
गान के साथ उसने अपने हाथ की रोटियाम से लोड तोडकर नहे
नहें टुक्डे भी चारा ओर फेंकन शुरू किये। गती जाती थी। ' कागा
चुन-चुन खाइयो । वह मग्न मालम हाती थी और अनायास उसकी
देह थिरक कर नाच-सी आती थी। कौए चुन चुन खा रह थे और वह
गा रही थी-
'कागा चुन चुत खाइयो ।'
आगे वह क्या गाती है कौओ की काव-काव और उनके पया की
फडफडाहट के मारे साप सुनाई न दिया। कौए लपक लपक कर माना
छूटने से पहले उसके हाया से टुवडा छीन ले रहे थे। वे लडकी के चारो
ओर ऐसे छा रहे थे मानो वे प्रेम से उसको ही खाने को उद्यत हो। और
लडकी कभी इधर कभी उधर झुककर घूमती हुई ऐसे लीन भाव से गा रही
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पाली । थी कि जाने क्या मिल रहा हो। रोटी समाप्त होने लगी। कौए भी यह समझ गये। जब तिम टुकड़ा हाय मे रह गया तो वह गाती हुई उस दुकडे को हाथ मे फरहाती हुई जोर से दो-तीन चक्कर लगा उठी। फिर उसने वह टुकडा ऊपर आसमान की ओर फेंका, "कोयो खामो, कौओ खामो।" और बहुत से कोए एक ही साथ उहकर उसे लपकने झपटे। उस समय उन्हे देखती हुई लडकी मानो आनद मे चीखती हुई-सी आवाज मे गा उठी- "दो नैना मत खाइया, मत खाइयो पीउ मिलन की आस' रोटिया खत्म हो गयी। कौए उड चले। लडकी एक-एक कर उमको उठकर जाता हुमा देखने लगी। पलभर मे छत कोरी हो गयी। अब वह आसमान के नीचे अकेली अपनी छत पर खड़ी थी। आसपास बहुत से मकानो की बहुत-सी छतें थी। उन पर कोई हागा, कोई न होगा। पर सडको दूर अपने कौओ को उडते जाते हुए देखती रह गयी । गाना समाप्स हो गया था। धूप अभी फूटी ही थी। आसमान गहरा नीला था। तहकी के आठ खुले थे, दृष्टि थिर थी। जान भूली सी यह क्या देखती रह गयी थी। योडी देर बाद उसने मानो जागकर अपने आसपास के जगत को दखा । इसी की राह मे क्या मेरी भोर भी देखा? देखा भी हो, पर शामद मैं उस नहीं दीखा था। उसके देखने मे सचमुच कुछ दीखता ही था, यह में रह नहीं सकता। पर, कुछ ही पल के मन तर यह मानो वतमान में प्रति, वास्तविकता के प्रति, घेतन हो आयी । तब फिर बिना देर लगाये पर चट उतरती हुई वह नीचे अपने घर मे चली गयी। मैं अपनी खिडकी में खडा-खडा पाहने लगा कि मैं भी दे कि कोए कहा-यहा 18 हे हैं और वे दितनी दूर चले गये हैं। क्या वे कहीं दीखते भी हैं । पर मुश्किल से मुझे दो एक ही कौए दीखे। वे निरर्षक भाव से महा बठे थे, या वहा उह रहे । वे मुझे भूख और घिनौने मालूम हुए। उनको पानी देह मोर काली चौष मन को दुरी ममी। मने सोचा कि 'नहीं, मपनी देह में कोमो से नही अनयासमा हि जैौद्र की कहानिया [चतुथ भाग] इन्हीके बाल के लिए क्या मरी देह है। मर्गदह और पाय छी।' जान पडता है खड़े-खडे मुझे काफी समय विकी पर ही हो गया, क्योकि इस बार देखा कि ढेरवेर पडे गधे पर लाद वही लहकी फिर उमी छत पर आ गयी है। इस बार वह गाती नहीं है, वहा पडी बाट पर उन कपडा को पटर दती है और उन कपडो मे म एक एक को चुनकर फटक्कर वहीं छन पर फला देती है। छोटे बडे उन कपडा की गिनती काफी रही होगी। वे उठाय जात रहे फट जात रह, फलापे जात रहे, पर उनका अतशीन आता न दौसा। आपिर जव खत्म हो गये तो लडकी ने सिर पर आये लए धोती के पल्ल को पौध विमा। उसने एक अगडाई ली फिर मिर का जो मे हिलाकर अनबधे अपने वाला को छिटका लिया और धीमे धीमे वही डोलकर उन बालो पर हाथ फेरने लगी। कभी वालो की लट को सामने लाकर दसती फिर उसीकी लापरवाही स पीछे फेंक देती । उसके बाल गहरे काले थे और लम्बे थे । मालूम नही उसे अपने इस वंभव पर सुख पाया दुख पा! कुछ देर वह उगतिया फेर फेरकर अपने चाता को अलग-अलग छिटकाती रही। फिर चरत चलते एकाएक उन सय बालो को इक्टठा समेटकर झटपट जूडा सा बाघ पल्ला भिर पर खीच वह नीचे उतर गयी। इसके बाद मैं खिडकी पर नहीं ठहरा। घर म छोटी साली आयी हुई है। इसी शहर के दूसरे भाग मे रहती है और माह न फरक मालिज में पढ़ती है । मैंने कहा, "सुनो यहा माओ।" उसने हंसकर पूछा "यहा वहा खिडकी के पास आकर मैंने पूछा 'वया जी, जाह्नवी का मकान जानती हो 'जाह्नवी । यो वह कहा है। 'मैं क्या जानता हूँ कहा है। पर देखो यह घर तो उमका नहीं है।' उसने कहा, 'मैंने पर नहीं देखा। इधर उसने कालिज भी छोर दिया है।" 'चलो अच्छा है।" मैने कहा और उसे वैसे-तसे टासायोपि यह पूछने साउने लगी थी कि क्या काम है, जाह्नवी को मैं क्या और मसे और " जाह्नवी क्या जानता हूँ। सव यह था कि मैं रत्तीभर उसे नहीं जानता था। एक बार अपन ही घर में इसी साली की कृपा और आग्रह पर एक निगाह एक को देखा था। बताया गया था कि वह जाह्नवी है और मैंन अनायास स्वीकार कर लिया था कि अच्छा, वह जाह्नवी होगी। उसके बाद की सलाई यह है कि मुझे कुछ नहीं मालूम कि उस जाह्नवी का क्या बन गया और क्या नहीं बना। पर किसी सचाई को वहनोई के मुह से सुनकर स्वीकार कर ले तो साली क्या । तिस पर सचाई ऐसी कि नीरस । पर ज्या- त्या मैंन टाला। बात-बात में मैंने कहना भी चाहा कि ऐसी ही तुम जह्नवी को जानती हो एमी ही तुम साथ पढ़ती थी कि जरा बात पर कह दो मालूम नहीं। लेकिन मैंन कुछ कहा नहीं। इसके बाद सोमवार हो गया मगलवार हो गया और आज वुध भी होकर चुका ना रहा है। चौथा रोज है। हर रोज सवेरे खिडकी पर दीवना है कि कोय काव काव छीन झपट कर रह हैं और वह लडकी उहे रोटी के टुक्डा के मिम कह रही है- "कागा चुन चुन खाइयो मुपको नहीं मालूम कि कौए जो कुछ उसका सायेंगे उस कुछ भी उममा सोच है। कौआ को बुला रही है "कोओ आओ, कौओ आओ', गग्रह कह रही है "कौमो साओ कौओ खाओ। वह खुश है कि कौए आ गय है और वे खा रहे है। पर एक बार है कि आ कौओ, जो तन चुन- चुना खा लिया जायगा, उसको पा लेन म मेरी अनुमति है । वह खा- पूकर तुम मघ निवरा दना। लेपि में मेरे भाई कोओ! इन दोनो का छोड दना। इह यही मत खा लना। क्या तुम नहीं जानते कि उन नना म एक आस बसी है जो पराय ये बस है। वे नैना पीज को बाट में है। कोओ, ये मेरे नही है मेर तन में नहीं हैं। द पीउ की आम को बनाप रमन के लिए है । मो, उह छोड देना।' आज येरे भी मैंने यह सव-बुछ देवा। कोमा को रोटी मिलाकर यह उमी तरह नीचे चली गयी। फिर छोटे बड़े बहुत से कपडे घोकर लायी। उमी भाति उह झटककर फैला दिया। येस ही बाल छितरावर ।
निन्द्र की कहानिया [चतुथ भाग] पोडी देर डोली। फिर सहसा ही रहे जूडे म संभालकर नीचे भाग गयो । मालवी को घर में एक बार देखा था। पत्नी ने उस खास तौर पर देष सेमे को कहा था और उसके चले जाने पर पूछा पा, "क्यो, असो । - मैंने कहा था, 'बहुत भली मालूम होती है । सुन्दर भी है। पर क्या "अपने घर के लिए कैसी रहेगी" बिरजू दूर करिश्ते म मेरा भतीजा होता है। इस साल एम० ए० पहुवा है। मैने कहा अरे, प्रजनन्दन वह उसके सामने बच्चा है।' पली ने अपर से कहा, "पण्या है। बाईस बरस का ता हुआ "बाईस छोड बयालीस का भी हो जाम । देखा नही कैसे ठाठ से रहता है। यह सड़की दखा कैसी बस सफेद माडी पहनती है। बिरजू इसरे लाय+ कहा है । या भी कह सकती हो कि यह वेधारी लडकी बिरजू के ठाठ के लायक नही है।' बात मेरी कुछ सही, कुछ व्यग्य भो। पत्नी ने उमे कान पर भी न लिया। दुछ दिनो बाद मुझे मालूम हुआ कि पलीशी की कोशिशा स जालवी के मा-बाप से (-मा के द्वारा बाप से) काफी आग तक बदर गातें कर ली गयी है । शादी के मौके पर पया देना होगा, क्या लेना होगा एक-एक कर सभी धातें पेशगा तय होती जा रही हैं। इतने मे सब क्यि-फिराये पर पानी फिर गया। जब बात बुस किनारे पर आ गयी थी, सभी हुआ क्या कि हमारे ब्रजनन के पास एक पत्र मा पहुंचा । उस पर कारण एक्दम सद पौपट हो गया। इस रग में मग हो जाने पर हमारी पल्लीनी वा मन पहमे मो गिरकर चूर चूरमा होता जाम पा पर फिर वह उसी पर बड़ी घुश मालूम होन लगी। तो मानो इस मामला म अनापरयर प्राणी हो । मामा-माम मुझे सवर तन नाई। जब हुई तो इस तरह-- पत्नीमी एक दिन सामने भापकी । बोली, 'यह तुमने माहवी में बारे मे पहले से क्या मही यतताया" भने रहा नाहया के बारे में मैंने पहले से क्या नहीं बताया जाह्नवी ८७ भाई?" ? "यह कि वह कैसी है?" मैंने पूछा, 'ऐसी कैसी" उहोने कहा, "बनो मत । जैसे तुम्हे दुछ नही मालूम।" मैंने कहा, "अरे, यह नो कोई हाईकोट का जज भी नहीं कह सकता कि मुझे कुछ भी नहीं मालूम ! लेफ्नि, आखिर जाहवी के बारे मे मुझे क्या-क्या मालम है यह तो मालूम हो। श्रीमनीजी ने अकृत्रिम आश्चय स कहा, "बिरजू के पास खत आया है, सो तुमने कुछ नहीं सुना ? आग्रल की लडक्यिा, बस कुछ न पूछो। यह तो चलो भला हुआ वि मामला खुल गया। नहीं तो…' क्या मामला, कहा, म खुला और भीतर से क्या कुछ रहस्य बाहर हो पडा सो सब बिना जाने मैं क्या निवेदित करता? मैंने कहा, कुछ बात साफ भी बह ।' उहोने कहा, वह लड़की आशनाई मे फ्मी थी।--पढी लिखी सब एक जात की हाती है।" मैंने कहा, 'सबकी जात बिरादरी एक हो जाय को बखेडा टले। लेकिन अम्ल बात भी तो बताओ।" असल बात जाननी है तो जाफर पूछो उसकी महतारी से। भली समधिन बनने चली थी। वह तो मुझे पहले ही से दाल म दाता मालूम होता था। पर देखो न कैसी सीधी भोली बातें करती थी। वह तो देर क्या थी, मब हो ही चुका था। बस लगन-महूत की बात थी। राम-राम, भीतर पेट में कमी कालिख रक्खे है, मुझे पता न था। चलो, आखिर परमात्मा ने इज्जत वचा ली। वह लहको घर में आ जाती तो मेरा मुह अब दिखने लायक रहता ? मेरी पत्नी का मुख क्या किम भाति दिखाने लायर 7 रहता, उसमे या विकृति मा रहती सो उनकी बाता से समझ मे T आया। उनकी वाता मे रम पई भाति का मिला, तम्य न मिला। कुछ दर बाद उन बातों से मैंने तथ्य पाने का यल ही छोड़ दिया और अपघाप पाप-पुण्य धम- अधम का विवेचन सुनता रहा। पता लगने पर मालूम हुआ कि यजमोहन .
मैं अपने को दे ही दूगी, आपक चरणो की धलि माये से सगाऊगी। आपकी बनेट की कहानियां [चतुर्थ भाग) के पाम खुद साथी यानी जाह्नवी का पत्र आया था। पत्र मैंने देखा। उस पत्र को देखकर मेरे मन म कल्पना हुई कि अगर वह मेरी लडकी होती तो?--मुझे यह अपना मौभाग्य मालूम नहीं हुआ कि जाह्नवी भरी लडकी नहीं है । उस पत्र की बात कई बार मन म उठी है और घुमड़ती रह गयी है। ऐसे समय चित का समाधान उड गया है और मैं शून्य भाव स हमें जो शूम चारो ओर स ढवे हए है उसकी ओर देखता रह गया है। पर वहा नहीं था। मीधे-मार ढग से उसम यह लिखा था कि 'आप जय विवाह के लिए यहा पहुचेंग तो मुझे प्रस्तुत भी पायेंगे। सकिन मेर चित्त की हालत इस समय ठाब नहीं है और विवाह जसे धार्मिक अनुष्ठान की पात्रता मुझम नहीं है। एक अनुगता आपको विवाह द्वारा मिलनी चाहिए-~~~वह जीवन-सगिनी भी हा। वह मैं हूँ या हो सकती हू इसम मुझे बहुत सरह है। फिर भी अगर आप चाहे आपके माता पिता चाहें तो प्रस्तुत मैं अवश्य है । विवाह म आप मुये लेंगे और स्वीकार करेंगे तो कृपा मानूगी। कृतज्ञ हाऊगी। पर निवेदन है कि यदि आप मुझ पर से अपनी माग उठा लेंगे मुझे छाइ देंगे नो भी में कृना होगी। निणय आपके हाथ है। जो चाहे करें।' मुझे बजन दन पर आश्चम आवर भी आश्चय नहीं होता। उसने दृढता से साथ कह दिया कि मैं यह शादी नही मरूगा । लेकिन उसने मुझसे अकेले में यह भी कहा कि चाचाजी, मैं और विवाह करूगा ही नहीं बरूया तो उसीमे करूगा । उस पर को वह अपने म अलहदा नही करता है । और मैं देखता हूँ कि उस ब्रजनन्दन का ठ-बाट आप ही कम होता जा रहा है। सादा रहने लगा है और अपन पनि सगव विल्कुल भी नहीं दीखता है। पहले विजेता बनना चाहता था, अब विनयावनत दीखता है और आवश्पक स अधिक बात नहीं करता। एक बार प्रशिणी में मिल गया। मैं तो देखकर हैरत मे रह गया। प्रजन दन एकाएक पहिचाना भी न जाता था। मैंन कहा, बजन दन, कहो क्या हाल है?" उसन प्रणाम करके कहा 'अच्छा है।' वह मेरे घर पर भी आमा । - - जाह्नवी - ८६ परली ने उसे बहुत प्रेम किया और बहुत-बहुत बधाइया दी कि ऐसी लडकी से शादी होने स चलो भगवान् ने समय पर रक्षा कर दी। जाही नाम की लडकी की एक एक छिपी वात बिरजू की चाची को मालूम हो गयो है । वह बातें-ओह ! कुछ न पूछो, विरजू भैया । मुह स भगवान 'क्सिीको बुराई न करावे। लेक्नि- फिर कहा, "भई, अव बहू के बिना काम कव तक हम चलायें, तू ही बता । क्या रे, अपनी चाची को बुढापे में भी तू आराम नहीं देगा? सुनता है कि नहो' अजनदन चुपचाप सुनता रहा। पत्नी ने यहा, "और यह नुझे क्या हो गया है ? अपने चाचा की बातें तुझे भी लग गयी हैं क्या? न ढग के कपडे, न रीन की बातें । उह तो अच्चे कपडे लने सोभते नहीं है । तू क्या ऐसा रहन लगा है रे?' अजन दन ने कहा, "कुछ नही, चाची। और कपडे घर रपे है ।" अकेले पाकर मैंने भी उममे कहा, 'वजनदन, वात तो सही है । अब शादी करके वाम म लगना चाहिए और घर बसाना चाहिए । ह कि नही ?" सजन दन ने मुझे देखते हुए बडे ब्ढे की तरह कहा, "अभी तो उमर पडी है, चाचाजी " मैंने इस बात को ज्यादा नहीं बढ़ाया। अव खिडकी के पार इतवार को, मोमवार को, मगलवार को और आज बुधवार को भी मवेरे-ही-मवरे छत पर नित रोटी के मिस कौओ को पुकार-पुकार कर बुलाने खिलानवाली यह जो लडकी देख रहा हूँ सो क्या जाह्नवी है ? जाह्नवी को मैंन एक ही वार दखा है इसलिए मन वो कुछ निश्चय नही होता । क्द भी इतना ही था, लावण्य शायद उम जाह्नवी मे अधिक था। पर यह वह नही है, जाह्नवी नहीं है ऐमी दिलासा मैं मन को तनिक भी नहीं दे पाता हू । सवेर पवर इतने कौए बुला लेती ह कि खुद दीखती ही नहीं, काले काले वे हो- दीखत है । और वे भी उम चारा ओर ऐसी छीन-झपट-सी करते हुए उडत रहते है मानो बडे स्वाद से, बड़े प्रेम से, चोय चोपकर उसे खाने के लिए आपस मे बदाबदी मचा रहे हैं। .
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जैनेन्द्र की कहानिया [चतुथ भाग]
पर उनसे घिरी वह कहती है, "आओ कोओ, आओ।" जब वे था जात है
तो गाती है-
"कागा चुन चुन खाइयो ।"
और जब जाने कहा-वहा के कौए इकट्ठे के इकटठे गाऊ-काऊ करते
हुए चुन-चुनकर सान लगते हैं और फिर भी खाऊ-साफ करके उससे,
उससे भी ज्यादा मागने लगते हैं, तब वह चीख मचाकर चिल्लाती है कि
ओरे कागा नहीं, ये-
दो नैना मत खाइयो।
मत खाइयो-
पीउ मिलन की आस ।"
दृष्टि-दोष बचपन मे जो कुछ हो जाता है, वह याद रहता भी है, नहीं भी रहता है। उसमे से हम 'कुछ उम' को तो भुला देना चाहते है और कुछ इम' को अपने निकट सदा ताजा रखें रखना चाहते हैं। किन्तु बढते चलने मे क्या छूटता जायगा और क्या अपने भीतर सग्रहीत हुआ रहेगा, सो किसी नियम से शोधा नहीं जा सकता। मेरी अवस्था पतालीस वप की होगी। विवाह भी कर लिया है और अपनी डाक्टरी में मजबूती स सभला बैठा हूँ। इस डाक्टरी की अच्छी आय और ऊची प्रतिष्ठा की कुर्सी पर स अब जब बचपन को देखता हू तो वह अच्छा लगता है। अब यह स्वीकार करत हमे आन द ही होता है कि हम छोटे थे तब बडे मूख थे। क्यानि उससे विल्कुल पार हो जाकर, हम अब उस पर असलग्न निगाह से देख सकते हैं। किशोरावस्था वो भी बचपन ही कहिये । अतर इतना ही है कि इस अवस्था मे बच्चे की बेवकूफी यहा तक बढ जाती है कि उसे हिम्मत होती है कि वह अपने को वडा समझे, बच्चा न समझे। उसी किशोरावस्था म एक वात घटी।--अब तो 'बात ही कहना चाहिए, किन्तु जब वह हो रही थी तब कोरी 'बात' ही नहीं थी। क्या थी, यह पाना एक्दम अशक्य है। पर सारी जिन्दगी को एक मोड पर वह डाल गयी और वहा सदा के लिए जैस एक गाठ बैठ गयी। पर मेरा ग्वालियर था, पढता कानपुर था। कानपुर मे एक रिश्तेदार के यहा रहता था। अब 'बात यह थी कि एक सम्भ्रा त पडोसी के घर म सुभद्रा नामक एक लड़की रहती थी। नवी क्लास म पो या दसवीं म, ठीक याद नहीं। स्वभावत हम एक-दूसरे को जानने लगे। परस्पर परिचय पाया, मिले। परिणाम हुआ कि एक रोजमेर मन मे होने लगा कि मैं या तो उसे पा लू या मर जाम । किन्तु इन दोना में से कोई बात होने में .
जैनेद्र की कहानिया [चतुय भाग] नहीं आयी । हुआ यह कि मैंन मुना-लड़की के पिता उसकी मगाई में लिए अयत्र कही ठीक ठार कर रह हैं। -सुनकर जग फोका लगने लगा। उस समय मन में आया कि चलो जी, मर-मराकर पाप कादो। यह भी सोचा कि मैं ता मरू ही, चलो, सुभद्रा को भी तमचे को एक चोट में छुटकारा ददू। फिर कहा रहेगा जगत और कहा रहेगी हमारे मा की विथा। यह विचार मैंने पत्र में सूचित किया कि कहो सुभद्रा, क्या राय है? सुभद्रा के पास म काइ राम भर पास नही आयी। न कोई मेरे लिए सम्बोधन ही आया न उदबोधन । न प्रेम की गपणे आयी नक्षमा की प्रायना । मत्यु के विषय म निर्भीक सकल्प भी नहीं आया, जिसकी मुझे पक्की आशा थी। असल में कोई जवाब ही नहीं आया। तब मेरी आसें खुत-खुलकर पड़ी। मैंने कहा कि मओ सुभद्रा, तू पर क्या न ? आखिर ता तिरिया चरित है । और इच्छा की कि एक लम्बी-मी तलवार क्या न हुई जो दोना के सीने म से निकलकर दोना को आपस म पिराद और मजित तय हो जाय । फिर भी हठात मैं सम्भला और पत्र-पर-पप लिपेपर जवाव पिसीका भी न पाया। फिर अर जव उम रिस्मे स म विनकुल पार है, बहुत दूर हूँ तब झूठ बोलने का मुझे कोई लालच नहीं है। न कह सकता हूं कि हम दोनाक बीच में यदि कुछ रमीला उठा और भरकर फोड़े-मा पक्ता ही आया तो उसमे सुभद्रा निरी निर्दोप न थी । म कितना हो उस सममाने पौरप ऐसी।
दृष्टि-दोप " म कानपुर छोड दूगा, अब से लखनऊ में पढ़ गा। म लखनऊ में जाकर पड़ने लगा। खूब जी को तोड मोडपर मैंने उसे अध्ययन में शोक दिया। मैंने तय कर लिया कि सुभद्रा चाहे जहा हो, वह मुझे नही पानी है । अब तो सफलता और नामवरी ही मुझे पानी है बस पानी है । म पढता गया और पढता गया। बी० एससी० किया, फिर मेडिकल कालिज में गया । व्याह का नाम पास तक न फटक्ने दिया। एम० बी० बी० एस० के बाद दो साल आप्टिक्स मे स्पेशलिस्ट बनने मे निकाले। इस भाति राह को दीघ बनाकर भी जब म उसके पार आ लगा, तब, तीस साल का होकर, अपनी आखो की डाक्टरी म जमने बैठ गया। तीस से आरम्भ करके माज पैतालीस वप के होने के इस काल ने मुझे ठोक-ठाक कर पक्का आदमी बनाया है । इस बीच बार-बार मुझसे कहा गया, ' ब्याह ।" हर बार मने कह दिया, "नहीं।" फिर जिद हुई, "अरे, क्या नही भने शात होकर यही कहा, 'नही। इमीलिए और नही ।" मा बाप हार गये । और भी कहनेवाले हार गये । और म बस डाक्टरी मे गहरे स गहरा गडने मे लगा रहा। डाक्टरी चमकने लगी। वह बढ़ने और जमने लगी। लेकिन मा बाप शिथिल पडन लगे । उन्होने अपने जीवन में देखा कि म कामयाब डाक्टर बन गया है। व प्रसन थे किन्तु किन्तु इसको वे जीते जी तरसा ही किये कि म विवाह करके घर बार लेकर बैठू और उनके वश की बेल आगे बढाऊ । अपने वश मे और वशजो मे व्यक्ति अमर होवर जिये, इससे गहरी प्राणो मे और क्या चाह है ? किन्तु जिक्र हुआ, "व्याह !" । फिर जिरह हुई "अरे क्यो?" मने पिंड छुडाया कहा, ' छोडो, छोडो।" सो उमर आती गयी। मा-बाप छीजते गये। और एक दिन वे मर गये। सब मैं डाक्टरी को पकडकर उसके साथ और भी जोर से आलिंगन में । मैंने कहा, "उह जनेद्र की कहानिया [चतुर्थ भाग] चिपट गया । जसे मने मन मे कहा-'अरी ओ,प्त सत्यानाशिनी डायन डाक्टरी | अब तू मुझसे कहा जायगी? तू भी देख कि मैं तुझे फुला फुला फर क्तिनी कर देता है। पर मोटापा ही तेरे भाग्य मे है, अरीबध्या इम भाति में चालीस वप के लगभग हो आया। स्यूल भी होता गया। पैसे के सिर पर पंसा आवर विपटकर बैठता गया और डाक्टरी फूलपर फूलगी गयी। लेकिन मैं अब कभी कभी अपने को निष्फल-सा भी अनुभव करता। मन गिरा गिरा सा रहता और लगता कि मैं जैसे झड चुका हूँ। मैं अकेला हूँ और दुनिया धन जोडने लिए है, मानो इस बात पर मन अब चिपकाये न चिपक्ता वहा स वह खिसक आना ही चाहता । ऐसे समय अपने बारे मे और सतक होकर मैं अपने को सभाल लेता। खूब चुस्त और कत्तव्य म अत्यन्त लीन होकर कम मे चिपटा ही रहता, व्यस्त ही रहता। सोता बलुत कम । पढता था प्रयोग करता था, परीक्षण करता था, उसके बाद रोग निदान और दवा दान करता था। नौपर बहुत थे और वे सब मुझसे होशियार रहते थे। अपनी भाति मैं उहें भी मशीन की नाइ अयक और चुस्त न देखू, यह मुझे असह्य था। मैं उन पर रह रहकर झल्लाता और झोक्ता था। वक्त का मेरे लिए बहुत मूल्य था, क्योकि उसको अपना सामना करते मैं न देखना चाहता था। म अत्य त उद्यमी डाक्टर था। वितु-~ वितु इस सबसे म तग भी था। इस भाति बयालीस वप का होते होते मने सोचा-'विवाह करूगा। और एक मादा से विवाह मने कर लिया। मादा कहने मे यह मतलब नही कि मने स्त्री से विवाह नहीं किया। नही वह स्त्री थी किसीकी पुत्री भी थी किसी की बहन भी थी । उसका नाम भी था रूप भी पा और उसमे व्यत्तित्व भी तो था ही। किन्तु मैंने विवाह तो नाम, रूप अथवा स्त्री के स्त्रीत्व और व्यक्तित्व आदि से नहीं किया । वह तो मैंने मादा थी, इसमे किया। मादा होने के कारण भर से मैंने स्त्री को विवाहा। घर म चार नौकर हैं इतनी कुर्सी इतने पलग, इतने तौलिये हैं तो के लिए मादा भी क्यो नहीं होसक्ती विवाह की कीमत देकर दृष्टि दोप इसलिए उस जरूरत की चीन को भी मैन अपने तई सुलभ बना लिया। अब मैं लगभग पतालीस व वाहूँ। ऐसी पको अवस्था में अपनी स्थूलागिनी और नाचनदहा डाक्टरी के स्वामित्व-काल के बीच म हो, वर्षाम भीगे हुए एक दिन, जो घटना हो गयी क्या उसको आप समझेंगे? . सररे से बारिश हो रही थी। सर्दी खूब थी। आज मैं कुछ बेकाम-सा या। रोगी मम आये थे। वाल्ल खुलने मे न आत थे। रिमझिम रिममिझ पडती हुई बूदा म मेग भी जी जैसे कुछ विवश हो आ रहा हो । मानो चूर्दै मेरे भीतर चली आफर अतर को भिगे रही होमैं इस तरह की बेमतलब अवस्थाआ को नापसद करता है, जब हम पात हैं कि अपने ही मे हम घुले जा रह हैं धुले जा रह है |~छ । यह क्या आदमियत है इसलिए उन नीरव और गीली घडिया को चुनौती देना हुआ सा मैं पुरुषाभ- पूवर कुर्मी स पडा होकर अपने ही कमरे मैं टहलने लगा। तभी थोडी देर मेमशी ने आरर एर पर्धा मुझे दिया जिस पर लिखा था On Bustness', नीचे हस्ताक्षर स्पष्ट न थे। मैंन पूछा कौन है ?" मुशी के बताने से मालूम हुआ, एक भद्र महिला हैं। महिला । मैं दृढ कदमो से दहल रहा हूँ तब भद महिला मैंन किचित् परप भाव से कहा 'वह क्या चाहती हैं ?' मुशी ने सकेत से बताया कि जहा तक वह समयता है, जो पर्च मे लिखा है वहीं वह महिला चाहती होगी। मैंने अपनी कुसों की ओर बढ़ते हुए कहा, 'अच्छा, उहे आन दो।" महिला आयो। मैं कुर्सी पर बैठा रहा, अभिवादन म झूठे दो तनिक ही उठा हूगा कि बैठ गया। महिला ने कुर्सी खीवी, हाया स ग्लब्स खीचकर तह करके भेज पर रख दिये और खडे ही बडे हठात् मुस्कराते हुए कहा, 'डाक्टर साहब, आप मुझे अपनी मरीजा बनान दीजियेगा ?" यह कहते-कहते वह कुर्सी पर बैठ गयी। मेरे भीतर कुछ वस्तु जोर से उठने और बैठने लगी। मुझे अपने को यह मनाना मुश्किल होता जाता था कि मैं डाक्टर हूँ और यह मरीजा है .
६६ जनेद्र की पहानियो [पयुष माग] " कि मैं अपरिचित हूँ और यह भी अपरिचिता है। मानो अपने बावजूद मैंने यहा, "आपयाँ नार- महिला ने बीच ही में बात को लेकर यहा, "जी हां, मेरा नाम सुभद्रा है, और मैं पूर्व सानद है।' मानो अब में अपन भीतर शात हान लगा और आदतरश अनायास डाक्टर हो चला। मैंने साधारण भाव म कहा, "ओह !" सुभद्रा ने कहा, 'जी हा डाक्टर साहब, मैं बिल्कुल खुश हू । लेक्नि लोग कहते हैं कि मुझे प्टि-दोष है। जरा जोर पड़ने पर आप में पानी उतर आता है । आप आप के विशेषज्ञ है । आज जब काम से देहली आना हो गया है तब मैं आपम पूछना चाहती है कि क्या मुझे आप अपनी मरीजा बनने देंगे" मैंने कहा "अच्छा।" इस जच्छा' म मानो मैंने अच्छी तरह कह दिया कि मैं डाक्टर ही हूँ। मैं उठकर एक नरफ को बढा कहा "आप जरा इधर आइयेगा?" उनकी आख को साधारण रीति से दवा, यथानियुक्त दुरी पर रखे बडे छोटे अक्षग यो पटवाया और मुमराकर कहा, दृष्टि मे तो दोष नहीं मालूम होता।' उहाने कहा आप मे पानी बहुत जन्द आ जाता है।" मैंने कहा तो थोडी तकलीफ और दीजिये। और डाक् रूम म ले गया। वहा अधेरा-ही-अधेरा था। मैंन चट से विजली खोली और आख वे मम्बध मे उनका दतिवत्त जानना आरम्भ किया। वह मुस्कगती जाती थी। मुझे ध्यान रखना पड़ रहा था कि मैं डाक्टर हू । मैंने आवश्यक प्रयोग और परीक्षण कर कहा ' चलिये अब दफ्तर मे चलें। वह कुर्सी पर बैठी थी । मैं बराबर में खडा था। एक दूधिया बती जल रही थी जो इस कमरे की रात को दिन बनाने की भीख मागती लगती पी। कुर्सी पर बैठे-बठे उहांने कहा 'कुछ दवा नहीं दीजियेगा?" मैंने कहा "दवा आपको जरूर चाहिए तो जरूर दूगा दृष्टि-दोप ६७ 711 "जी हा, क्यो जरूर नहीं चाहिए मैंने एक शीशी मे कुछ वनापर तैयार कर दिया। और कहने वाला ही पा, "चलिये 'कि उहोने पूछा, "डाक्टर साहब मेरी निगाह ठीक हो जायगी॥ 1 - मैंने कहा, "निगाह तो ठीक है।" सुनकर वह चुप हो गयी । मैं भी चुप रहा। सब चुप था-~- --जैसे समय भी चुप ठहर गया हो। बाहर दूर्दै टपटप टपकती थी। वह टपटप अस्पष्ट कमरे में आ रही थी। मानो जीवन का वे ही वहा लक्षण थी, या कि हम दोना के निश्वास । तीन मिनट, चार मिनट हो गये। वे तीन चार मिनट बेहद भारी होते गये । हाथ कुछ न आता था जो उन घडियो को टाल दे, और अटल होकर वे एक एम पल मन-मन भर भारी होते जाते थे। मानो अब मिथ्याचार टिकाय न टिकेगा । ' मैं डाक्टर हू" इसको कुचलकर यह प्रतीति मानो ऊपर आ ही रहेगी कि ' मैं पुस्प हूँ" और यह भी कि जो फुर्सी में है वह मरीजा तो चाह हो और चाहे न भी हो पर वह सुभद्रा है। शहद से भी भारी य दो आत्माओ के बीच के सनाटे की घडिया अमह्य होती चली गयी। चौथा मिनट होते होते आखिर मानो मोह तोड, अपने साथ एक्दम झटपट मचाकर मैंने कहा, "चलिये, दवा बन गयी है।" उन्हाने भी जमे खोयी सुध पायो । उन्होने कहा, आप रीज के इत मीनान का इतना ही ख्याल रखते है डाक्टर माहब। रहस्य बतलाइये मेरी आव ठीक हो जायगी ? मैं अब चालीम पी हाने आती है।" मैंने धीमे से कहा, 'हा, जरूर हो जायगी।' फिर हाग उठार बाहर दफ्तर म आ गय। महिला ने वहा धीमे धीमे मानन विचारपूर्वक, हाथा म दस्ताने पहनन गुरू विय । उमी समय होने कहा, ' आपकी कृपा क लिए, डाक्टर साहब मैं बहुत कृतज्ञ हू।" यह कहकर मेरी पीस वे बीस रुपय निकालकर मेरे सामने मेज पर रख दिये। वे दोना नाट, नये, रगीन विस्प, मेरी निगाह के भाग बिछे-के विछ हो रह गये। मालूम हुआ कि इन कागजा का बोझ मेरे हृदय से सम्माला न जायगा । जी मे गा मा मि इन कागजा को और अपना डाक्टरी के यावरण को फाड फेंककर बाहें फैलाकर खडा हो जाऊ और कहू, 'मो ? .
६८ मैंने पहा, जनेद्र की कहानिया [चतुर्ष भाग] सुभद्रा ।" लेकिन वह कुछ भी न हुआ। मेरा हाथ यत्र के समान धीरे धीरे बढा नोटा तक पहुचा और नोटो को अपनी पकड मे मरोडकर उहें चुपचाप मेर जेब म डाल गया । सुभद्रा देखती रही और जब गोट चुप जेब मे बद हो गये तव मानो उसके मुख का सुस बढा। उसने कहा, 'डाक्टर साहब, मैं बाल बच्चेदार स्त्री हू । क्या आप इजाजत देंग कि आपने बाल बच्चा स मिल लू ? मेरे बच्चे सब दूर हैं। मैं यहा अकेली हू।" "आप कह क्या रही है 'म यहा विलकुल अकेली हू डाक्टर माहब, और हाल ही म मेरा पाच वप का एक बच्चा मर गया है। वह किताव म स ए-बी सी डी सुनाया करता था और खाते वक्त रोटी के हरूफ बनाया करता था। यही के अस्पताल में वह मरा है । उसके वाप को छुट्टी नहीं मिल सकी और वह नही आ सके। और बच्चे वाप पास हैं। उनको देखने को मेरा बहुत जी है । पर वह कहा है मैं कहा है? आपके किनन बच्चे हैं डाक्टर साहब मैं विमूढ होता गया। कुछ क्हन के लिए मैंने कहा, 'आप क्या कह रही हैं। उन्हाने कहा "डाक्टर साहब, आप मुये आपके वितन बच्चे हैं यह सव-कुछ मेरे लिए बहुत होता जा रहा था। मैंने एक्दम बहा, 'मेरे कोई बच्चा नही है सुभद्रा मैं म्ह पडन को हो गया। पर मानो वह चलने स हठात इकार करते हु उमन पूछा शालाही की" की है। तब माना मैंने उसके मुह का सम्बोधन सुना वेदार । क्या यह मेरी यल्पना पो 'और मेर कण्ठ तक आया--सुभद्रा । हम अपनी अपनी जगह रहे और मानो एक दूसरे को निगाहा से निगल जाना चाहने लगे। विन्तु यह मभद्रा यो । उसो कहा "आप दुखी है ?" 'नही, दुनी नही हूँ, "मैं मह पला 'दुस जानने नायन मैं नहीं है। उस समय सुभद्रा जो हो पठी, मैं उसे न समझ सका। उसने कहा, दाद 2॥ .
दृष्टि-दोष ८ किन्तु मुझे तो देखो। मैं सुख से किसी तरह भी बचकर दुखी हो सकती हमारा गहस्थ जीवन स्वग है। मैं बच्चो को प्यार करती हू, बच्चे मेरे हैं । पति मुझे प्रेम करते हैं और वह मेरे पति हैं । छि फिर भी तुम दुखी होते हो। सुभद्रा कितने सुख मे है, यह नहीं देखते ?" कहते कहते सुभद्रा की वाणी मानो ममवेधिनी होती गयी। वह मानो चीख चीखकर यह सुना रही थी। तब मुझे मालूम होने लगा कि स्त्री क्या है ? कि वह मादा नहीं है, यह तो स्त्री ही है। मैंने माना उसको सम्बोधन देते हुए कहा, "सुभद्रा उसने महा, "नही, केदार, तुम मेरे सुख को कम नही कर सकते। यह देखो ग्लब्म-वाइस रुपये वे मुझे स्वामी ने लेकर दिय थे। मेरी मोटर बाहर पडी है। बहुत सी चीजा की जौर अपनी मालिक मैं हू। केदार, तुमने शादी कब की? चार वष पहले तक तो तुम ऐसे ही थे।" मैंने कहा, "सुभद्रा ।" 'नही केदार, तुम मेरा सुख पश नहीं कर सकते। तुम कोई नही हो कि मुझ सुखी को लेकर तुम दुखी बनो, जिससे कि मेरा ही मुख मुझे काटे । नहीं, तुम मेरे आन द को नहीं छू सकोगे। मैं बहुत प्रसन है।" 'सुभद्रा 'केदार, तुम्हारे पत्र मुझे नहीं मिले, यही तुम समझो। बताओ, उनम मूखता के सिवा कुछ था? और प्रेम मूखता है। प्रेम मे किसीने सुख पाया है ? इसलिये मैंने उसो भण उन पत्रा को समाप्त किया और उसके बाद सुख के राह की सब अडचन मिटा दी। विवाह हुआ, कुटुम्ब हुआ नही वेदार, तुम ईर्ष्या नहीं कर सकोगे।' मैंने फिर कहा, 'सुभद्रा", ताकि वह रुके और शान्त हो। लेकिन उसने "केदार, तुमने रब ब्याह किया? त्यारम साल ही तो? मैं सव जानती रही। लेकिन ततालिस वष तक तुम कुवारे रहे ? मैं कहती हू मि सुभद्रा पर इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है, कोई फिक्र नहीं है केदार, केदार। क्या तुम माशा किये ही जाते हो? किये हो जाओगे? लेकिन आशा ठगिनी है । आशा सूठ है, जैसे कि तलाक झूठ है । तता- लिस वष व्याह बरके भी सुभद्रा को याद रखो की हिम्मत रखते हो?
। १०० जनेद्र की कहानिया [चतुर्थ भाग] लेक्नि तुम्हारी याद झूठ है, क्योकि सुभद्रा सुखी "सुभद्रा नहीं, मैं विधवा जल्दी होने वाली नहीं है। मैं कभी विधवा नही हो सकती क्याकि मैं सती होऊगी। सतीत्व भारत से मिटा नहीं है, यह मुझमे लोग देखेंगे। तुम आशा करके अपने को ठगो मत, केदार | क्यारि मैं विधवा एक क्षण को भी नही हगी और तुम्हारा मुह भी नहा दयूगी। दृष्टि दोष न होता तो क्या तुम समझते हो मैं याद भी करता वि कतार नाम का कोई डाक्टर है या क्दार कोई आदमी भी है ? माख की वजह से ही मैं तुम्हारे पास आयो हू, यह खूब समझ लो।" मैंने जेब से नोट निकाले। धीमे धीमे हाथ बढाकर उसका हाथ पकडा और उस हाथ की मुटठी बाघ नोटा को मीज दकर उसकी क्लाई का थामे ही कहा, सुभद्रा कुछ दर वह जने अवमग्न हो रही। फिर एक साथ झटके स अपना हाय ग्वीचवर बोली ' आप मुझे यह बताना चाहते हैं कि मैं मरीजा नहीं हू और आप पास इसलिए नहीं आयी हू वि आप डाक्टर हैं ? अजो, मुझ दष्टि-दोप न होता और आप आख के डाक्टर न होत तो मेरा आपम क्या वास्ता पा? य रुपय वापिम कर आप अपने को धोखा देना चाहत हैं दि मेरा आप स वास्ता है?' यह कहार दोना नोट मेज पर ही छोड दिये । वे बागज गुड मुडा हुए मेज पर पडे रह। मैन पहा 'सुभद्रा । सुभदा बडी हो गयी। उसने कहा, अच्छागक्टर साहब मेरी आया को आराम हा जायगान? आपने आठ रोजमी दवा दी है। उसके बा सत भजारमा आदमी भेजकर भी आपके यहा स दया मगायी जा सरता है न ? मेरा माना मुश्किल होगा।' में भी सहा पा। मैंने कहा 'प्यारी मुम.--' लेति मुमहादरवाजेस बाहर पली गयी थी। शाको बीत ग्याद दिन नहीं हुए हैं और मैं नहीं जानता शिम पटना को मगि प्रमारतह पर और अपने सामान में उसे कहाँ रण 10 विस्मृति - । दूसरे विवाह की जो बहू आयी है उनके सिर मे दद अधिक रहता है। और पहली स्त्री का जो लडका है विपिन, वह पाच वप का हो गया है, फिर भी वैदशकर बना हुआ है । उसमे अकल तो खाक भी नही है । अपनी नयी मा का कहना नहीं मानता, इतने परहो बस नही है, वह उनके सामने वेअदबी तक कर घटता है और जवाब देन लगता है। ऐस अवसरो पर अवश्य इन नयी मा न उसे कभी कुछ दुरुस्त भी कर दिया है । पर पिस मा को काख से यह कुलच्छनी उपजा है विपिन, कभी कुछ नही सीखेगा, ऐसा ही कुटवी ना रहगा इसलिए घर चौका-वासन और चीज़-चस्त की सम्भाल और बच्चे विपि को फिरर विपिन की दादी के ऊपर ही आ गयी है। उनकी अवस्था पचास से दो एक साल ऊपर होगा। देह भी अक्षम नहीं है। न दुरुस्ती भी पासी है। सबर नडर उठ जाती है और सध्या तक करने को उहे काम-हा. काम रहते हैं। हारी थकी रात को साती हैं। पर नीद उह बड़े आराम दी और बड़ी गहरी भाती है। काम का यह चक्र आरम्भ मे ही इतने बध रूप से नही चल पडा था तब उसे मन म आपए थी आकाक्षाए थी। वे ही अस तोप पैदा करती पी और काम में बाधा डालती थी। पर, फिर तो वह सब कुछ की निता. जलि दे बैठा और काम में लग गयी। बाम-काम-काम, बच्चे को नहला- खिलार गो नि चूल्हे का समय आ गया फिर बासन मौका, उसने बाद दुध पडे लता का मीना उधेडना हो ल बैंठी, नहीं तो चरमा। और यो बर को दवा दारू और हल भी उह काफी ममम का नाम दे देती थी। पहले सोचती थी-'अब तो यह आ गयी है। बहभागन हो तो का। अब तो मैं पीडे पर वठवर बहूगो-बहू, पान तो लगार एक १०२ जनेद्र की कहानिया [चतुर्थ भाग] लाना। और दुपहर तीसरे पहर कभी फ्हूगी-'बहू, आज तो मेरे मिर की चोटी ठीक कर दे।' और नहीं तो मैं ही उसका सिर गोद मे ले बठा करूगी और उसके वालो को काढर ठीक करके भानू के कमरे म भेज दिया क्रूगी। और विपिन भी एक मा मिलेगी जिस साथ वह खेला करेगा- पर वहू के सिर म तो दद बहुत रहता है और वह चौका वगरह कुछ भी काम नही कर पाती है। और विपिन वेहूदा ऊधमी लडका है--सा, उमके मन की बात पूरी नहीं हुई। मन मे जो था उस मन के ही भीतर कही खूब अच्छी तरह गाडकर से बैठना पड़ा। पर यह सहज न था। पहले तो अडचनें पडी। बहू सास मे कहा-सुनी होती, और फिर बहू एक मे और सास दूसरे कमरे में जाकर पड रहता। इस तरह रोटी कभी बनती भी नहीं बनती। लाला भानामल अपनी दुकान स आकर देखते । बहू के पास जाकर कहते "क्या बात है। बहू मुह पर लेती। भानामल प्रेम से उसका हाथ पकडकर पूछते, "शशि, बात क्या और शशिकला कहती · क्या बात है । जाकर पूछो न अपनी मा से, क्या बात है । और तुम सब लोग मुझे मारना चाहते हो तो एक्दम से क्यो नही मार डालते जो टटा मिटे ।' लाला भानामल घबडाकर पूछते, "ऐसी क्या बात हुई, बताओ भी तो?" शशिकला कहती बात हुई कि मैंने कहा-अम्माजी मेरा सिर बडा दुखता है नेक आज तुम रोटी बना लोगी।" सो इसी बात पर जाने क्या-क्या बात उहाने मुझे नहीं सुनायी। मैं पूछती हू दि जब मैं मरने लगूगी तब भी तुम लोग यही तो समझोग न कि बहाना है वहू से निवटकर भानामल मारे पास जाकर कहते 'मा, क्या बात है। मा कहती, कुछ बात नहीं है, बेटा!"
विस्मृति भानामल कहते, "मा, उसने कहा था तो तुम एक दिन रोटी नहीं बना सकती थी?" मा कहती, "बना सकती थी बेटा, और बना दिया करुगी। रोटी तो मैं बनाती ही थी। सोचती थी-बहू आ गयी है। चलो दो रोज को मुझे भी बिसराम मिल जायगा।--पर न सही बिसराम, मैंडी रोटी बना दिया करगी। मेरा इसमे जाता क्या है और काम मे तो आदमी अच्छा ही रहता है।" भानामल-"अम्मा, उसके सिर मे दर रहता है। और वह कोई झूठ तो बहती नहीं। और रोग ऐसी चीज़ है कि न जाने कब बढ जाय॥ मा हा बेटा, ठीक तो है । चलो, मैं चौके म चलती हूँ। अभी बनाये देती ह रोटी। आरम्भ मे ऐसी कहा-सुनी जिस किसी बात पर हो जाती थी, पर, सदा ही, अत मे मा को अपना मन मार लेना होता था। वह हार जाती और झुक जाती। सोचती-'मेरे दिन, जो दिन थे, गये । तब गदन उठाती तो उठाकर रख भी सक्ती थी। अब, अब तो मेरे दिन झुककर चलने के मा गय हैं।' यह सोच मन के भीतर बडी टीस पैदा कर देता। पर उसीको जी मे बहुत नीचे गाड देकर और काम मे लग जाकर वह मानो थोडा आराम भी अनुभव करती। धीरे धीर अपना मन मारकर वैठने की उनकी बान ही हो गयी। चोट खा-खाकर फन की तरह उठ खडे होने की शक्ति ही मानो उनके मन की सो गयी। मानो उनका मन ऐसा निर्विकार, निस्पद हो गया है कि चोट उहें लगती ही नहीं। एक- बैठ साल के भीतर उस वृद्धा माता के मन नै ऐमी शक्ति उपजा ली (अपवा ऐसी शक्ति खो दी) कि जिससे वह मान-अपमान रोप-क्षोभ माशा स्पर्दा आदि भावा का शिकार होने से मुक्त हो गया । ऐसा समय माने पर साम पे कामो का क्रम और बहू के सिर-दद का सिलसिला यया- यस्थित और अनुपराम गति से चलने लगा। २ परिवार के कई व्यक्तियो के बीच में रहकर भी मानो इस बड़े पर ।
जैनेन्द्रको कहानियां [चतुप भाग] मे यह अकेली रहती थी। अठारह वप की अवस्था मे उसके मह पुत्र भानामल हुआ। अब उम भानामल पी अवस्या पतीस के लगभग है । पन्द्रह साल या था तब उसके पिता उठ गय। तभी से वह अपनी पसारी की दुकान पर बैठना है। पिता उम्ने सिर से उठ गये तभी देखा गया कि भानामल मूख नही है। वह यधकर अपनी दुकान पर बठना है और अपना ब्याह करके अपनी गहस्थी जमा लेना चाहता है । मा ने बड़े उठाह स वेट का ब्याह किया। और अब वही मा बेटे वे जीवन के लिए किसी भी भानि अनिनाय नही रह गयी है। घर का सब काम धाम सम्भालती है ठीक है उसका मा है ठीक है, पर भानामल सवेरे-ही सवरे दुकान चला जाता है और आता है तो चुपचाप जल्दा से खाना खाकर बहू के कमरे म चला जाता है। अपनी मा से बहन-सुनन के लिए जसे उसके पास न कोई बात है न जरूरत ही है। अपन धनी के निधन के बाद आर विशेषकर अपने भाना के विवाह के बाद, मा अपने को सबक निक्ट पराया और सबके बीच बकेली अनुभव करने लगी है। ठीक जब उम जी का प्यार जी का समस्त अपनापन, केद्रहीन लक्ष्यहीन हो जाने व कारण उमड उमड पर भर भर आकर और मानो अपनी बांह पलाकर निमत्रण देता हुआ डोलने लगा अर, कोई है जो मेरा ह ? जरे कौन है जो मेरा है ?' तभी मानो उसे सब ओर से प्रत्युत्तर मिला, 'बुटिया हम मौज म है। तेरो आवश्यकता हमे नहीं है। तुजा। तब वह ऊपर शूम की ओर देख उठता, पूछती, अर ओ मेरे प्राणनाथ मुझे छोडकर, तू उडकर कहा चला गया है ? निर्मोही यहा मेरा कोई नहीं है मेरे लिए ना कुछ भी नहीं ह। इस स्थिति में अधिक रहना उमवे लिए असहनीय हो जाता। भीतर की श यता उ7 नाग ओर व्याप्त होकर भानो उम निगल लेना चाहती। तब वह उठकर काम करन लगती। एस समय अधिकतर भूखे मन स वह बहू के पास जानी। पूछनी 'बहू जी कसाह ? मैं माथा दाव दू बहू एक शब्द म उत्तर दली, नहीं। सास अपने खोखले उपद्रवी मन को बडे अकुश से दावकर कहती, औ मानो - ?"
विस्मृति १०५ , "बहू, मुझे तो अब और कुछ काम नहीं है। ला, थोडा तेरा सिर दाब द्, कुछ चन ही पडेगा।" पर, वह का मन तो हर समय ऐमा खट्टा अनमना सा रहता है कि उसे कुछ नहीं भाता। हर समय मामने सुखी दीवार और आले म रखी हुई ‘दवाई की शीशियो को देखते दखते अपने का और हर किसी को कोसते रहन म ही उमका मन इतना लगा रहता है कि और किसी चीज मे उसे स्वाद ही नहीं रह गया है। वह नहीं समझ सकी कि वह किस प्रकार अपनी सास की उद्यत सेवाआ और उसके स्नेह-सतृष्ण मन का अङ्गीकार करे। वह इतना ही कह सकी, "मुझे कुछ नहीं चाहिए' और करवट लेकर सामने देखती हुई चुप पड गयी । मा को कुछ नहीं सूझा कि वह क्या करे । वह बेहद कातर हो उठी। 'वह उस समम रोन को हो गयी। वह चाहने लगी कि उसे मालूम हो, उसन क्या दुप्पम क्यि है । क्या उसका भाग्य उमस इतना रूठा है । उसने बहुत बहुत चाहा कि वह इस छोटी सी उमर की बहू को अपनी गोद म लेकर प्यार कर ले, पर, उससे इतना बन नही सका, जोर वह भी चुपचाप 'मुह उठाकर लौटती चली पायी। लाटकर उसने क्या किया 'मा तो मोय हुए विपिन को जोर से पकड- कर छाती म लगा लिया आर चूम लिया, विपिन रोने लगा और वह उसे मनाने म लग गयी। या, नही ता वक्म उठावर इसके कपडे उसमे और उसके इमम करन लगी। अयत्रा कमरे ग जोर-जोर से हाड़ ही देने लगी। और नहीं तो कमर म आर ऊपर छत की शहतीरा को देखती बैठ रही। उसपा अतप्त विपन कुण्ठित मन एमे समय सि सि असम्भव स भावना की ओर नही दाइना मोचती~-'वह इस घर को छोडपर भाग जाम । यहा उसका क्या है'-फिर सोचती-बाहर भागन से गया बनगा? क्या नहीं एसी लाख मूदार सो जाय कि उठन की आवश्यकता ही निश्शेप हो जाय? फिर लोग जाने तो कि मुशम भी जी था और मैं जीना भी चाहती थी। नहीं तो मैं मरना भी जानती थी।' सोचत-मोचत एकाएर यह विपिन को देखने को अयन्व भातुर हो
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विस्मति १०७ ३ करती थी। जसे इसके अभाव में उसे जीना ही दूभर हो जाता लगभग उसी तरह जैस हवा के चारा और के अपरिमित दवाव के बीच मे रहकर ही हम जी पाते हैं। वही दबाव वारा आर से यदि लुप्त हो जाय तो हम क्षणभर न जी पायें। बावन वप की अवस्था मे ऐन वह नारी जपने स्नेह हीन जीवन की लो का क्षण क्षण जलाती हुई प्रकाशमान रूप न टिकी हुई थी। एक साप को बासन माजते मारत अनायास बुटिया देख उठी कि बादल साधारण से अधिक नील श्याम होकर एक ओर इकटठे होते जा रहे हैं। शायद उनकी वरसन की इच्छा है। बयार हल्की हो गयो है और उसकी हिलोर में ठण्डक अधिक है। वासन वह माजती ही रही, पर गान का गुनगुनाना उसका रक गया। देखने लगी, पक्षी जैन अधिक उल्लास स अपनी चोचा को नाले आकाश की और उठाकर उड रहे हैं आर चक्कर काट रह है । देखते देखत एकाएक ही उसने फिर गीत गुनगुनाना सारम्भ कर दिया अनायास ही उसकी ध्वनि कुछ स्पष्ट ही उठी। उसने तामा। पर, गीत को एक साथ ही गेकका वह जैम मावधान हो गयी नार मनन योगपूयक वासन माजने लगी। निबटकर वह अपनी कोठरी म आयी । आज उसके भीतर क्या भूता हुआ छिड उठा हकि वह मूक हो गयी है। वह जैसे किसी दूरागत संगीत को सुनने में लगी है स्वय सब-कुछ भूल बैठी है । कुछ देर चुप बैठी रहकर उसने अपना एक बक्स खोला, तह-के-तह कपडे उसम से निकाले और नीचे से जमपत्री की तरह से लिपटा हुआ एक कागज निकाला। उस कागज को लेकर पढने को जल्दी उसने ही पी। जल्दी उसे किसी बात मे, विमी काम मे नही थी। उसने ठीक दग मे कपडे तहकर उसी वक्स मे रखे और फिर वह चिट्टी हाया म लिए इथेली पर अपनी ठाडी रखकर खिडकीम से पार क्षितिज को देखती हुई वठी रह गयी। वह कागज क्या है? उसका वह क्या करेगी? फाड दगी' फेंक १०६ जैनेंद्र की कहानिया (चतुर्थ भाग] उठनी और यदि वह पाम न होता तो वह पुकारती हुई दौडने लगती, "विपिन, विपिन " विपिन ही एक था जिसके कारण उमपा यहा लगाव था। नहीं तो यतमान मे न उमे कुछ लेन-लेन था और न वास्तव से कुछ प्रयोजन हो। कल्पनाआ म यह अवास्तव को वास्तव बनाकर अपने सामने खडा करती और कुछ तृप्ति पाती और स्मृति द्वारा व्यतीत को फिर से प्रत्यक्ष बनाती और रस लेती। यह था पर यह शू य तृप्ति और मखा रस जाने कितने महगे मोल उसे मिलता था। जान किती न वमक, कितनी न दुराशा, बितनी न छलना साथ-साथ इस महती हाती थी। तब इसक लिए उसन आविष्कार करने सहज औपच पा ली काम! पाम मे ही यह लगी रहती। कभी अपने का फुरसत न लेने देती। घडी आध-घडी जहा वह खाली रही कि नारा बार से मोच विचारा से घिरकर घुटो-सो लगी, बस, इतस बह खाली ही नहीं रहती थी। कुछ गुनगुन गाती हुई-सी वह काम में लगी रहती। किमी गीत का छोर उमकी याद मे अटका था, वही हर काम के वन उसकी टेक बना रहता था। पर वह किसी को भी स्पष्ट न सुन पडता था और कभी उसकी ध्वनि गुनगुनाहट से ऊची न होती थी। भानामल को वह सम्भालती और भानामल की उपेक्षा भी उस सम्भालनी होती थी। भानामल ने जीवन के पहले रोज म ही उसे अपनी सेवा में पाया । इसस उसके मूल्य को आप उसे नहीं हुई। भा की छाह सदा सहज रूप म उसके ऊपर छायी रही, घूप नीचे खुले खडे होन का उसे अवसर नहीं आया, इसमें वह नहीं जान सका कि उस छाह म नया है। फिर विपिन को भी वही मम्भाली थी। वह बीमार रह सकती थी, भानामल दुकान की और बहू की सवा मे और सब बाना की ओर से लापरवाह रह सकते थे और विपिन लता-वाता और वह हा या इमी लिए तो कि सबका बोल चुपचाप अपने ऊपर लिए यह बुढ़िया जीती बैठी थी। इस वोझ नै उसको चारो ओर मे मसकर ऐसा दया रखा था कि उसे पता नहीं चलता था और यह जैम अपने को ओर घुसा हुआ अनुभव विस्मति लगभग ३ करती थी। जसे इसके अभाव में उसे जीना ही दूभर हो जाता, उसी तरह जैस हवा के चारो और ये अपरिमित दवाव के बीच मे रहकर ही हम जी पाते हैं। वही दबाव चारो ओर से यदि लुप्त हो जाय तो हम क्षणभर न जी पायें। घावन वप की अवस्था में ऐस वह नारी अपने स्नेह हीन जीवन की लो का क्षण क्षण जलाती हुई प्रकाशमान रूप ने टिकी हुई थी। एक साय को बासन माजते माजत अनायास बुटिया देख उठी कि बादल साधारण से अधिक नील श्याम होकर एर ओर इकटठे होते जा रहे हैं। शायद उनकी वरसने की इच्छा है। वयार हल्की हो गयी है और उसकी हिलोर म ठण्डक अधिक है। धामन वह माजती ही रही, पर गाने का गुनगुनाना उसका रक गया। देखन लगी, पक्षी जन अधिन उल्लास से अपनी चाचो को नीले आकाश की और उठाकर उड रहे हैं आर चक्कर काट रह है। देखते देखते एकाएक ही उसने फिर गीत गुनगुनाना बारम्भ कर दिया • अनायास ही उसकी ध्वनि कुछ स्पष्ट ही उठी। उसने गाया। पर, गीत को एक साथ ही रोककर वह जसे मायधान हो गयी नार मनन योगपूर्वक वासन माजने लगी निबटकर वह अपनी कोठरी मे लायी। आज उसके भीतर क्या भूता हुआ छिड उठा है कि वह मूक हो गयी है। वह जैसे किसी दूरागत संगीत का सुनने में लगी है, स्वय सब कुछ भूल बैठी है। कुछ देर चुप बैठी रहकर उसने अपना एक वक्स खोला, तह-के-तह प. उसम से निकाले और नीचे से जमपत्री की तरह से लिपटा हुआ एक कागज निकाला। उस कागज को लेकर पढ़ने की जल्दी उसने ही भी। जल्दी उसे किसी बात में किसी काम मे नही थी। उसने ठीक ढग मे कपडे तहकर उसी बस मे रखे और फिर वह चिट्टी हाथो म लिए इथेली पर अपनी ठोड़ी रखकर खिडकी मे से पार क्षितिज को देखती हुई बैठी रह गयी। वह कागज क्या है ? उसका वह क्या करेगी? फाड देगी' फेंक 1 ।
? इस टुकडे जनेद की पहानिया [चतुर्थ भाग] देगी? उसपो यह क्या करना चाहती है ? और उस क्या या हाथा म लिए घुप बैठी है? पर यह बठी ही रहो। कुछ दर बार उगने उमे साला। खोलते खोलते अन म उसम एक बहुत छोटा-सा पीले कागज का टुकड़ा निकला जिसम पसिल म कुछ लिया था। उमे भा उसने पढा नहीं और उतन से टुपडे वा फिर हाथा म लिए रहकर वह उमी भाति बैठी रही। बैठी पाठी ही वह कहा पहुच गयी, क्या हो गयी को हाथ म थामे बाल और दश यो समस्त रेखामा कार वह इस समय क्या हो उठी है वि उमका निमप नहीं लगता और उसक चेहरे म नमक आती जा रहा है। उसने अनुभव किया विदह पीला शागज उसके हाथा म अभी हाल आया है, अभी किमी ने पकड़ी मे वाधकर खिडकी की राह उसके चरणा मे फेंक दिया है और भी वह उस पटवर चुकी है। धीरे धार उसन कागज खोला। खोलकर पढा। क्या पढा? कला छत्तीस वरस पुगने उस कागज पर के पेमिल के हरफ पटन में आ सक्त थे पर उस पलिया। पत्र र अक्षर उसने मन के भीतर एक एक अडित थे। पुराने घाव की तरह उबडकर व हर हो गये। उनके उत्तर म आर वह जसे समग्र- की समग्र उद्यन हुई प्रस्तुन वठी ह। 'यारी तैयार रहना'----और आज उमका मन 'प्यारी शब् सुाकर विम वात के लिए तैया' नहीं है ? उसने पाया मगल का रात है, एक बज गया होगा चादनी अभी निकली है और वह घर की चौथी मजिलवाले मून कोठे पर दव पाव पहुच गयी है। वहा ही आ पहुवा वह जिसके लिए वह है और जिसने उस तैयार रहने के लिए लिखा है। आते ही उसने कहा देर न परो लो। रानी ने उस कसकर पक- लिया। कहा 'चल ? मेरो सगाई हो गयी है। मुझे डर लगता है। ' डर लगता है ? - मैं कैस चलू?
विस्मति "क्या ? उस समय उनके मन मे आया-~~'अरे, वह प्रेम के लिए क्या नहीं कर सपर उमरा गला भर उठा और उसने चिपटकर कहा, 'मुझे भूल जाओ।" व्यक्ति ने धीरे से उसे अपने में पथक दिया। कहा "तो नही जा मकोगी। 'नही जा सकूगी। मे जा सकूगी, मुये तुम भूल जाओ।" व्यक्ति तुरत न बोल सका। फिर इतना ही बोला "तो नहीं हो जा सबोगी?" तब मानो जोर के साथ उसने अपने से हो रहा था, "क्या, मैं अपनी है मैं जा मकनी है ?-नहीं, मेरी मगाई हो गया है।" भागो रिसी गहरी चोट के स्थल पर छिडर उस व्यक्ति ने कहा, "तुम अपनी नहीं हो, तो मेरी भी नही हो उसकी नही हो जो तुम्हारे लिए जोता है, और तुम्हारे लिए मरेगा? तुम उसकी हो जो तुम्हें नहीं जानना चाहता, नहीं पाना चाहता, पाने के लिए कुछ करना नहीं चाहता, पर सगाई जिमवै नाम के साथ हुई है ' प्राणा के मोल तुम्हें जो पाना पाहता है, उस प्रेम यी तुम नही हो । गृहस्थी के भार बच्चो के लिए जो तुम्हें में मेगा उस विवाह की तुम हो, क्या तव सरला ने क्या कहा सर जो उसने कहा, क्यिा, अब यहा बावन वर्ष भी अवस्या में बैठी हुई मरला मातो वह नहीं करना चाहती। चाहती है वह उसका महा हुमा, दिया हुआ, फिर जाता और इतिहास नमा उसने तय दौहरा दिया पा, प्रेम और वह अपने ही व्यग मे सहमी- रह गयो पौ। उस प्यक्ति ने पीपर कहा, "क्या" समयानी पीस को सुनकर बह गल जाने को हो गयी. पर धूप स्थान ने गजकर पहा, "क्या चाहती है कि मैं मर जाऊ औरत चौहीए? मैं मेरे बिना नहीं जोगा, और मरगा तो दमे भी जोता नहीं 7" मागम होता।
परसरला ११० जनेद की कहानिया चितुप भाग] छोरगा।" उम ममय जिस उद्वेग और कम्पन और पुलक का सरला ने अनुभव किया था वही मानो उसके गात में अब भी हो उठा। वह मानो अब भी खिडकी म से उसक आ जान की प्रतीक्षा कर रही है जो कहे, तेरे बिन्ग मैं जीऊगा नहीं, और उस आग कहे, 'तरे लिए मरूगा और तुझ भी जीता नहीं छोडूगा। तव कहा था, 'मैं हार जोडती है, जोर से मन बाला, कोई जग जायेगा। और तुम चले जाओ।' व्यक्ति नै भयकर पर्य के साथ कहा, 'मैं चला जाऊ?" सरला डरती हुई उस दखन लगी। पर धौरज रहा नही और वह वाला, "कम्बस्न, तू कहती है मैं चला जाऊ ' जाऊगा और तुझे मिटा क जाऊगा। उस समय सरला व मन मे भय हो उठा था। आज यह माच रही है कि वह आभत्रणपूवक अपने प्रेमी के हाथा मर ज्या नहीं जा सकी। यह भमभात हो कुछ भी नहीं बाल सकी थी। उस व्यक्ति ने तब अलग सडे होकर कहा, 'बोल तू जीना चाहती है' या मरने की हिम्मत भी रखती है ?" सरता न तब क्या हाथ फैलाकर और छाती खोलकर नहीं कहा, 'मुझे गोद में ले लो प्यारे, और मुझे मार दो। मैं जीना नही चाहती।" हाप नही तब वह यह कर मरी क्यो मीता पक्निा-सी गुम ही चठीती। पित न अत्यन्त विपाद घृणा और करुणा के स्वर म पहा, त जोग चाहती है । अभागिन ओछी नारी तू जी।' इसक बाद उस व्यक्ति न अपने दोना हामी म उस ले लिया। देर उमरी आखो म गख लगा देसता रहा। वह उस समय डर रही पी। पुरुप ने रहा, 'डरती हो। नहीं हरा नहीं !" रहकर उसने उसे डोर दिया। पिरपिता पीदे की ओर देखें मुझेर पर चढ़ वह तीन मंजिल नीचे उस गली को स्टो पर गिरर मर गया!
विस्मृति १११ वह आज बैठी-बैठी उस कागज को हाथ में लेकर उसी मरे व्यक्ति को देखन लगी जो उसके लिए ऐसी साध से जिया था और जो उसके लिए क्षण म मर भी गया। वह पाप पुण्य नही जानती। वह इतना जानती है कि वह क्षण उसके जीवन मे फिर आ सके तो वह अपने को मौत से न बचाय और वह उस व्यक्ति के माथ मौत के मुह म ही चाह हो कृतार्थ भाव म चली जाय। इस स्मति के साथ ही अपन विफल यौवन को मानो फिर से अपने भीतर ऐमी तरंगें लेता हुआ अनुभव करती ह कि मृत्यु अपनी विभीपिका मे भा प्रिय और तुच्छ वस्तु हो रहती है। उम दीख उठा-- -वही वही एक छोटा सा अपराध करके मामने मुस्कराता हुआ पडा है और क्षमा माग रहा है । और, वह अपने मान मे विश्वस्त बडी विगडी हुई है । उसने कहा, 'रानी तुम नारान हो रही हो जानती हो, इससे तुम कितनी और गुदर नहीं हो जाती?" तब मन-ही मर वह गव म भर उठी, बोली 'चुप रहो।" उमने कहा, 'तो मुझे सजा ही द दो।" तब भी उसन कहा, 'चुप रहो।" उस पर वह उसके पैग का पकडकर चूमने लगा। उस समय अदभुत भाव मे उद्वेलित हो वह सहसा उठकर खडी हो गया। उस लगा उस पर चूमे जा रहे हैं और वह अपा पर हटा नही रही है जैसे कि उसने तब भी नहीं हटाये थे। तभी क्या देखती है कि एक व्यक्ति उसके सामने आकर कह रहा है, "मा ।' वह कुछ नही पहचान मकी। देखकर उसे यही बोध हुआ कि वह उसका प्रेमी नहीं है। फिर यह क्या है जो उसे 'मा' कहकर पुकार रहा है । उसको जो अविवाहिता है विगोरी है । भानामल ने कहा, मा, शि वी दवा तुमने तयार करके अभी क्यो नहीं दी ?" वह देखती ही रह गयो, कुछ समझ नही पायी।
११२ जने की कहानिया चतुर्थ भाग]
इतने में विपिन ने आकर कहा, "दादी।
"दादी! 'वह स्तम्भित, मानो विडम्बना मे, मन रह गयी।
तभी, क्षण बीलत बीतते एकाएर यमायar का बोध उस पर फटकर
पड़ा। वह खो-मी रही। पिरपिर अत्यत विनीत स्वर म उसने कहा,
"दवाई। अभी बनाये देतोह बेटा, दवाई।"
भानामल न चलते-चलते वहा, ' मा दवा के मामले में अब स
लापरवाही नहीं होनी चाहिए।'
मा ने कहा अच्छा वेटा।'
और मा नै मोचा- एक मिनट खट पर मैं जरा और ३४ लू तो
दवा में बहुत दर तो नहीं हो जायेगा" पर, वह वठी नहीं, दवाईक
लिए पल दी।
पूर्ववृत्त अदासत में आज बडो भीड है। अखबारो मै इसकी खूब पर्चा है। मामला यह है कि प्रशात का कहना है कि शान्ति उसको विवाहिता है। और शान्ति का दावा है कि मह सब उसके पिता से पैसा ऐंठने का उपाय है। उसने अखबार मे यह छपाकर कि मेरा उससे विवाह हुमा है, मुझे भदनाम करने की कोशिश की है। दावा शान्ति की ओर से है। प्रशान के साथ दुमरा अभियुक्त अख• धारका सम्पादक है जिमने यह पबर छापी है। सम्पादक ने कहा कि प्रशात ने खुद उसको रिपोर्ट दी थी। प्रशान्त को में तीन वर्ष से जानता हू। कोई वजह नहीं कि मैं उसकी रिपोर्ट मूठ समझता। यह मौतविर आदमी है, प्रेजुएट है, और मेरे अखवार में अक्सर लेख-कविताए लिखता है। में निजी बातें अक्सर नही छापता, लेकिन मुझे मनाया गया कि लडकी के पिता जबरन उसकी शादी करना चाहते हैं। जा नामुनासिब है। ऐसी अनीति को रोकने के लिए असधार न हो तो सराया हो? इस ख्याल से मैंने खबर छापी थी। उस वक्त में पैसा करना सही और भुनासिब मानता था। लेकिन अगर यह बात गलत है और मुझे को सदमा पहुचा है, तो मुझे उस पर अफसोम है। प्रशान्त ने अदालत मे पत्र पेश फिमे कि मैं अध्यापक हूँ। मेरी सत्पा पी और उसमे पढ़न भाया करती थी। पढन से अधिक पढ़ाने आया करती भो। नहीं, वेतन नहीं देती थी। फीस, हा, देती थी, उसका मुझसे । कुछ कहा, जिसे ठीक तप नहीं पान्ति ने इस पर अपने स्थान सुना जा सका। उस पर प्रशान्त कुछ उत्तर देने को या। सैकिन बदालत ने सबको परिमार और प्रशान्त को अपना बयान जारी रखने को कहा।
११४ जनेद्रमी शहानियां चितुर्थ भाग] प्रगात ने कहा, "मैं प्रेम के लिए अपने को दोष नहीं दे सकता। प्रेम उससे नही आरम हुभा यह कहना मठिन है। मेरी अवस्या पंतीस वर्ष है। पत्नी है, पारह वप की एक क्या । अदासत में जो पा सडकी ने स्वयं लिसे है।" पूछा गया, "उनस तुम क्या सिट करना चाहते हो? प्रेम नहीं, विवाह साबित करना है।" उमर मे उसने कहा, "उन पनी स मेरे प्रति उसकी भावना का पता चल सकता है।" आगे प्रशान्त ने अपना बयान जारी रखते हुए कहा, "प्रेम एक छल हो सकता है। मैं इतना युवक मही है कि इस बात को न समझू । फिर भी मैं उसका निरादर नही कर सकता। मेरा विवाहित जीवन सुदर नही है। बारम्भ शायद हममे सहानुभूति से हुआ मैंने अपने घर की हालत मतलायी। अपने स्वप्न बतलाये। मन कहा कि मुझको समझने वाला जीयन सगी कोई होता तो में कितनी न उनति परता। सह नुभूति की मांग जीवन मे स्वाभाविक है। युवावस्था मे सहानुभूति सुलभ है। यही शायद सपा होकर प्रेम में परिणत हो गयी। पत्रों में आप देख सकते हैं कि प्रेम के स्थायी होने की शप हैं । मैने सुझाया कि प्रेम स्वय पवित्र है। पर विवाह से वह न हो जाता है। वह विवाह के लिए भी राजी हुई। लेकिन उसने कहा कि माता पिता इसमें साप नहीं देंगे, क्या हममे प्रेम ही काफी नहीं है ? और मन में तब वह माता पिता और समाज से डर रही थी। मैंने कहा कि भय उचित नहीं और विवाह होना जरूरी है। मैं विवाह को अन्तिम तो नही मानता, पर मन की रोकथाम के लिए एक मर्यादा अच्छी है। व्यवस्था में भी उससे सुभीता होता है । नहीं, यह गलत है कि मेरी निगाह इसके पिता के पैसे पर पी। समझौते के लिए उनकी भोर से पैसे की बात एक से अधिक बार आयो । मैंने कारी स्वीकार नहीं किया। खैर, इस बात पर राजी हुआ कि विवाह विधिवत् हो, हम लोग एकात भगवान को साक्षी कर एक-दूसरे का हाप थाम लें। येसा ही हुआ। हम अय सम्मिलित रहने का उपाय सोष रहे थे। लेकिन अचाना मह मामला आ गया है। मेरा विश्वास है कि - लड़की अपनी ओर से कुछ नहीं कह रही है। सब माता पिता के दबाव से किया जा रहा है। उसे इसके लिए माग पोटा तक गया है। मैं जानता कि अगर वह अपने मन की बात कह सके तो आप पायेंगे कि मैंने अपने बयान मे कोई अत्युक्ति नहीं की है।" प्रशान्त के बयान के बीच बीच मे लोग ताना कसते और हंसते थे। और इस्तगासे के वकील को जिरह मे प्रशान्त झेंपकर लाल पड आया। उसमे इस तरह के भी सवाल ये कि उसे क्या तुम अपने को खूबसूरत मीजवान समझते हो? क्या अमुक जगह मे तुम्हें इत्यादि। इसके बाद सफाई के वकील ने शान्ति से पूछताछ की। उसमे को जवाब में कहा, यह है- ' मैं अभियुक्त को एक बरस से जानती हूँ । मेरी एक सहेली ने इसके स्कूल का पता दिया था। हा, यह मेरे हैं । यह प्रेम पत्र नहीं हैं । प्रेम इनके लिए मुझमे नहीं हो सकता । जो विवाह कर एक न मुह मोड लेता है, वह दूसरी से प्रेम निभायेगा इसका विश्वास नहीं है। मैं यह बात शुरू से जानती पी । इनकी सस्था मे पहनी थी, इससे इह नाखुश नहीं कर सकती थी। इसलिए यह पत्र लिसे यय हैं। सिरे से ही जब यह पत्र बनावटी हैं, तो उनमे खूब बडी चढी भाषा लियो गयी हो तो उसमे अचरज क्या है ? विवाह की बात सरासर झूठ है । यह इसीसे जाहिर है कि मैंने विवाह की रविषि से इहें विमुख किया। भगवान को साक्षी में आपस मे हाथ- पकड़ने की बात भी इनको बहलाने को हुई है। मुझे परीक्षा पास करनी यी। मेरा अब इनसे कोई वास्ता नहीं है। मैं इनसे नफरत फरती है।" प्रशान्त ने अपनी जगह से निल्लाकर कहा, "शाति, नफरत परती हो" इस पर कमरे मे कुछ गडबडी मधी और अदालत न व्यवस्था स्थापित की- शाति ने बिना उस ओर ध्यान दिये पहना जारी रमा-"नफररा करना अच्छा नहीं है। यह मेरे मास्टर है। मैं समझती थी कि यह पुलो हैं। कुछ अपने स्वाप से और कुछ दया से में इनका मा रपती रही। पर नहीं पानती थी कि यह इतने धूतं निकलेंगे।" -- ११६ जनेद्र की कहानिया [चतुर्य भाग] 'पूर्त' पशब्द पर सफाई के वकील ने आपत्ति की। और एक दस्तावेज सामने किया। कहा, "मेरा मुवक्किल इस बात को इस हद तक नहीं लाना पाहता था। यही उसकी नेकनीयती का सबूत है। लेकिन जैसा कि इस दस्तावेज से जाहिर होता है, शादी गवाहो के सामने बाकायदा को गया पी । मुवक्किल दस्तावेज जान-बूझकर इसलिए पीछे रखना चाहता था कि मुद्दई का सम्मान पहुचे और बिना इसकी जरूरत पडे वह सब कबूल ले। 'पूत' शब्द वापस लिया जाना चाहिए।" शाति ने कहा "यह दस्तावेज आ गया है तब तो मैं 'धूत' शब्द को और भी वापिस नहीं ले सकती । यह काम धूत ही कर सकते हैं।" लोगो ने इस बात में बहुत दिलचसी ली, यहा तक कि शोर मच माया । अदालत ने शातिस्थापित की। अनन्तर उस दस्तावेज को लेकर शान्ति से जिरह की गयी। जिरह मे शाति हटती-सी मालूम हुई । उसने पहले कहा कि उसके दस्तखत बनावटी हैं। फिर कहा, "हो सकता है किसी कोरे कागज पर दस्तखत किये हो। लेकिन पडित के हाथ शादी होने की बात सच नहीं है। फिर मन नहीं तो यह शादी क्या यह दस्तावेज सामने लाते हैं। इहोने वायदा किया था कि कभी इसका इस्तेमाल न होगा। कभी यह किसी को दिखाया न जायगा। दस्तखत, हां मेरे हैं लेकिन यह आदमी कमीना है।" शान्ति इधर उधर को कहने लगी थी। उस प्रलाप से साफ पाकि दस्तावेज पर हस्ताक्षर उसके हैं । और कागज से प्रमाणित या कि विधिवत् पगित ने दो साक्षियो के समक्ष इनका विवाह कराया है। शान्ति ने कहा, 'दस्तखत होने पर भी, दस्तावेज झूठे हैं और मैं हरगिज इनके साथ नहीं रह सकती।" सफाई के वकील ने अपना सारा जोर दस्तावेज पर डाल दिया और उसके सिलसिले मे गवाहियो के लिए फेस को अगली तारीख दी गयी। मदालत उठते समय शान्ति अस्थिर भी और प्रशान्त का मुह नीचे झुका हुमा था। वह पिसी ओर देख नही रहा था। प्रशान्त ने बहुत पेष्टा कीपर गान्ति से मिलना सम्भव न हुआ।न सन्देश भेजा जा सका। यह घूतता है कि .
पूववृत्त शाति अब मानो पहरे मे रहती थी। बाहर लोगो मे उसकी चर्चा थी भार पिता बहुत परेशान थे। प्रशान्त को समझा या दवाने के सब प्रयल निश्प जाधक थे। अब वह भी सोच बठे थे कि इज्जत तो गयी ही तो बात को बीच में न छोड़ेंगे। राह न मिलने पर शान्ति को वह दो एक भार पाठ भी चुके है। स्थानीय पक्ष को महानुभूति शाति की ओर थी। पर बात का जग- जाहिर होना उठे लेता घो। सो भी उहे विचार होता था कि शायद इस प्रकार को निमे सही लडकी के भविष्य का भोई मार निकल आये। से ही समय एक सावजनिक पत्र के सम्पादक उनके पास आये। जहान कहा कि वह उसकी क पा को दृढता से प्रभावित है। और उससे स्वय मिपर वातावरण को साफ करने में मदद देना चाहते हैं। उन्होंने बहुत समझाया तो पिता मुलाकात के लिए राजी हो गये। शान्ति विस्मय मे हो आयी, जब देखा कि सम्पादन के नाम पर प्रशात में मित्र देवचन्द्र उसके सामने उपस्थित हैं। पर इसका आभास उसन विमी को नहीं दिया। पिता ने कहा, "आप पद्रह मिनट ही चाहते है न यह कहकर वह वहा । हट गये। दवघद्र ने कहा, "शाति, तुम्हारे मन की बात पूछने प्रशात ने मुझे ह शाति ने कहा 'वह मेरी स्वारी काफी कर चुके, अभी और वाली है " वचन्द्र ने कहा, शान्ति, उसने क्या किया है ?" गान्ति, "नही, सब मैंने ही किया है !" अब तुम क्या चाहती हो, शाति प्रशात न तुम्हारे मन की बात जान का मुझे भेजा है। वही यह करेगा।" शति ने कहा 'मुझे क्या अब कही जीती रहने लायक उहाने छोडा है। उनग इतनी शम नहीं कि मैं दावा कर रही है तो चुप रहे।" दवच द ने कहा, "तुम चाहती हो कि दोषी बाकर यह चुपचाप जेस ११८ जनेद्र की कहानिया [चतुप भाग] चला जाय? वह आप तो अदालत नही माया, पसीटा गया है तो सफाई भी न दे। शान्ति-"मेरे लिए वे जेल नहीं जा सकते" देवचन्द्र ने विस्मय से पहा, "उसे जेल भेजकर तुम क्या पाओगी" शाति ने कहा, ' तब सुभीता होगा और पि- मेरी शादी कर सकेंगे। बाहर रहकर वह यह न करन देंगे।" "क्या कह रही हो शाति, क्या तुम यही चाहती हो "हां, चाहती है कि जो होनहार हो, वह मुझ पर से हो जाय । वह क्या इतना नही समझ सकते। मैंने पहले भी उह समझाना चाहा। नहीं समझे तो अब अदालत की नौबत आ गयी है । मैं अपने वश को नही है। नारी धर्म म स्वतत्र कुछ नही होता। पिता जब तक पति को सौंपे, कया तब तक उसकी । सुनते हो? कुछ और नहीं हो सकता, इसस अब यही है कि मेरी खैर चाहते हैं तो वह जेल चले जाय।" "शाति, लेकिन उसके साथ एक और बेगुनाह आदमी--" शाति ने कहा, "उसका कुछ न बिगडेगा।" देमचद्र ने घड़ी की ओर देखा। समय जा रहा था। उसने जैब में हाप डाला पर शान्लि की आखा मे इनकार का इशारा देखकर यह हाथ उसने खीच लिया। वह समझता था कि कही अदश्य से दो आखें उहें दख रही हैं। उसने धीरे से कहा देखो, मैं मित्र की ओर से अतिम बार तुमसे कह रहा हू । वह तुम्हे, तुम्ही साफ-साफ न कहो, तब तक नही छोड सकता । तुम्हारे बिना उसे सब सूना है । दूसरी बात यह कि जो तुम कहोगी, वही वह करेगा। तुम कह दो कि मन से उस नही चाहती हो, दूसरा विवाह चाहती हो तो वह आपत्ति न करेगा। वह जो-कुछ कर रहा है इस विश्वास पर कि तुम्हारा मन उसी की तरफ है, माता पिता के दबाव मे जाहिर में फिर कुछ भी करो-अगर ऐसा नहीं है तो कहने भर की देर है कि- शान्तिः- 'मन की बात वृथा है । उहे वह देना कि मन पर दावा नही होता] और मेरी मानें तो अदालत की सजा ले लें और जाकर जेल में " पूववृत्त देवघद्र ने कहा, "एप यही उपाय है ?" शाति ने कहा, "नहीं, दूमरा भी है। वह यह वि साबित कर कि मैं उनकी हू और मदालत ये जोर से मां-बाप में मुझे छोन ले जाये। पहला सरजन का है, दूसरा दुर्जन का। अब वह अपनी ओर देखकर पुन लें।" २ देवचन्द्र ने कहा, "शाति, तुम जानती हो कि तुम्हारा सम्बध-- शान्ति ने बीच मे यहा, "उसी सम्बध के बल पर न उ होने मुझे व्यभिचारिणी प्रसिद्ध कर टोहा । मुझे मजूर है। मेरी कुछ इज्जत यची है किमही रह सक? तुम्हारे मित्र यो शर्म तो नही आयी कि पत्र अदालत मे पढ़वाते हैं। मेरी मानो तो उहकह देना--मेरा होना पामो हो गया, पर भला चाह तो दडस बचें नहीं।" देवच द्र ने कहा, "शाति, अन्याय न करा | उसके दुख को तुम नहीं जानती। दुनिया उसके नाम को थूकतो है। रोजी उसकी गयी, अपने पराये हो गये। मां तक ने छोड दिया। पत्नी तो उसकी थी कब एक इसी आशा का उस सहारा था कि तुम उमे माननी हो। पर जो तुम भी नही मानती तो उसके लिए सब खतम है।" शाति ने श्रोध म कहा, "हो, मेरे पास कुछ नहीं है जो नष्ट नहीं हो गया। अब रही मे पूछना कि क्या बचा है जिसे धूल मे मिलाना और देवच र कुछ कहना चाहते थे कि शाति ने सकत किया। कोई आ रहा था। तव साधारण भाव से उहाने पहा, "तो विवाह के सम्बध मे आप माता पिता को पूर्ण अधिकारी मानती हैं और उनकी विरा अनुमति विवाह को जायज नहीं मान सकती।" "हा, यदि माता पिता चाहे तो क्या को झुकना चाहिए।" इतने मे शाति के पिता वहा आये। और उन्हान यह सुना। बोले, "आपने देख लिया न कि सब उसी आदमी की धूर्तता है।" देवचार ने कुछ हाँ-नान किया, उठकर उनका आभार माना और यहाँ से चले आये। भाकर प्रशात से सब कह सुनाया। प्रशान्त उस समय सोच में पा।
१२० जैनेन्द्र की कहानियां [चतुर्य भाग] सुनकर और भी सोच मे हो गया। कुछ देर रुककर सहसा उसने कहा, "मैं पहेली सुलझा नहीं पाता है, देवघर! तुम बता सकते हो, मैंने कहा मूल की?" "नही मैं नही बता सक्ता।" "तो वह चाहती है, मैं सजा ले तू-तुम्हारी क्या राय है?" "मेरी राप मेरी राम है कि तन से ऊपर तुम्हें मन की कीमत हो तो उसकी कही रखो।" "वह चाहती है- "त्रास पाना और त्रास देना।" प्रशात गम्भीर हो गया। वोला, "देवव द्र, मानता हू मैं कि युग यदल रहा है। मैंने विवाहपूर्वर ही प्रेम को जो स्वीकारना चाहा, उसीका न यह फल है ? देवचन्द्र, वह लडकी एकदम पुश्चली है।" देवच द ने कहा "मित्र, तुम्हारा मस्तक ठिकाने नहीं है।" प्रशान्त ने उत्तेजित होकर कहा, "हा, शायद नहीं है । पर यह नहीं सहा जा सकता कि एक के साथ सम्बध होने पर स्त्री अपना धर्म न निबाहे । शान्ति के बारे में और भी यह नही सहा जा सकता। यह अनीति नहीं होने पायेगी, देवचन्द्र | माता पिता को क्या इतनी हया शर्म नही है " देवपद्र ने कहा, 'अब मैं समताकि भूल कहा है ? यही है कि दूसरे का म्याप तुम अपने हाप मे लेते हो। शाति के चरित्र की रक्षा के नीचे कही तुम अपनी ही कामना को सोनही चाहते हो ? शायद यही है जिसने शाति को भडका दिया है।" प्रशान्त न मा मिकोडकर कहा, 'क्या मतलब ?" देवघद्र ने हँसकर कहा, 'स्त्री पर जाने दो, कुछ नही।" प्रशान ने कहा, स्त्री के शील की हमारे यहाँ मर्यादा है। उसी पर हमारी संस्कृति और हमारे समाज का विधान सहा है। वहीं रिगेगा तो हमारे पास रह क्या जायगा? नहीं, बहन हो पायगा, ? देवर खि फार प्रशान्त की ओर देखता रह गया। मित्र में पूवयत्त १२१ सस्कृति से प्रति ऐसी उत्कटता समय-समय पर उठनी उसने देखी है। लेकिन यह अवसर उसे अनुकूल मालूम हुआ। उसने कहा 'प्रशात आज तुम्हें हो क्या रहा है। पत्नी रहते दूसरे से प्रणय और परिणय रचाते हो, तिस पर सोल और मयादा की बात कहते हो। स्वाय को कही विवेक की भाषा पहनाकर तो बात नहीं कर रहे हो प्रगान्त ने कहा, "शास्त्रो न पुरुप यो एकाधिक विवाह की अनुमति " दी है।" "क्या समस् ॥ देवचन्द्र ने कहा, "शास्त्राम जो खोजो, पाओग । कामधेनु है इसीने वे शास्त्र हैं । पर शाति को तुन क्या समझते हो" 7 अव तो समझना होगा कि वह कुटिल है।' दतचद्र ने कहा, "सुनो प्रशात तुम मेरे मामने उमको कोई अपशब्द नहीं कर सकते । सुनते हो?" मुनकर प्रशा त देखता रह गया । कहा, "क्या?' कहने के बाद देवचन्द्र के देखते देखत एक व्यग्यपूण मुस्कराहट से उमका चेहरा बिगड आया। देवचन्द्र ने कहा, "तुम अपनी निराश कामना म स उर ठीक दख सकते हो, प्रशान्त प्रशान्त ने कहा, "तो भी कुछ कुछ देख सकता हूँ।" उस बात मे भरे व्यग्य पर विस्मय से देवचद्रपुवार उठा 'प्रगाना" देवचन्द्र के मुख पर व्यया दखकर प्रशात कुछ प्रतिस्थ हुलाजार पहा, "टा मैं क्या करू, बताओ।" देवचन पहा, "-तीन भी जोर न भविष्य के प्रति तावा न जताओ। मैं होता तो उसकी मर्जी म जपन को छोड़ देता। प्रेम मिला वहा से त्रास भी उसी ताथ भाव स लता।" प्रशान भीनम होकर कहा दवचन्द्र सच कहा तुम मरे मित्र हा दवचन कहा, " ही यह मरी वात मित्रता की नहा, सत्यता की है । शान्ति परेशान है। एक तरफ माता पिता उम नही समयत मरी सरफ तुम उस समझना नही चाहत । हो पाटो के बीच उसकी जान क्यो .
? " सहा है १२२ जनेद्र की कहानिया [चतुथ भाग] पीस रहे हो? माता पिता के प्रति शानि उद्धत नहीं होना चाहती। तुम उसके पास को ले नहीं सकते। फिर यलिदान ही तो उपाय है। उसी ओर वह चल रही है। यह बात समझ लोगे तो फिर रोप नहीं कर सकोगे।' प्रशान्त मित्र की बात नहीं सुन रहा था। वह दूर चला गया था। बल्कि उसे देवच द्र का बोलना बुरा मालूम हो रहा था। शर समोर मालूम होत थे। उसने कहा, "देवच द्र, तुम नहीं जानते, मुझे आठ दिन में नीद नही आयी । रात दिह वही एक बात घूमती रहती है। यह सच नहा है कि मेरी तकलीफ शाति को नहीं मिलती, पर यह सच है कि वह भी मष्ट मे है। तुम बहुत जानते हो, पर क्या तुमन सहा है? जो मैं रह रहा हू, उसका सौवा हिस्सा भी देवचन्द्र ने कहा, "कहना सहने का लक्षण नहीं है, प्रशात । लो, मैं चला।" 'देवचन्द्र, नाराज न होना । मेरा मन ठीक नहीं है । तो मेरी चिटठी उसने तुम्हारे सामने नही खोली ? नहीं पड़ी? देवच द्र, मुझे विश्वास दिला सक्ते हो कि तुम मेरे मित्र हो" देवचन्द्र ने कहा "प्रशात वृषा अपन पोपट न दा।" प्रशा त न कहा, 'सुनो देवच द्र, मैन मब तुम्ह नहीं बताया है। नौकरी गयी ही । २०००) रुपय मैं मा पा बक्स तोवर चुरा साया है। करीब ४००) स्त्री के जेवर बेचकर वना लिए है। "तना ही मूर पर बन मिल गया है । यह सब मुकद्दमे के लिए। मरे लिए यह जान की बाजी है। लेकिन देयचर, मन अव बैठ रहा है । मेग यह विश्यान छिन रहा है कि वह मुझे चाहती है । तब सब फिजूल है। मन का दुग्प क्या दूसरे व मन को वोट से भरेगा? देवच द्र, आगमी ऐसा ही करता है दुख कोट्स पहुचावर धोना चाहता है । रोज शेत्र रहा है, दवचन्द्र | देख रहा है कि यह आदमी का धोखा है। मेरी चिटठी पा जयाय मिस जाता तो सब तय हो जाता। वह मन की बात मीधी मुझ स महती या नही जैसे मैं सब कुछ नहीं देखता । देवघर, मरी ममन यही है। देवघद्र सुनता हुभा चुप रह गया । उसके मन म शान्ति पी मूनिम पूववृत्त आयी। पर उसे लगा कि वह इस प्रशात के अतिरिक्त किसी को नहीं हो सकेगी। प्रशान्त यदि सब सहेगा तो शान्ति कही रहे, उसी की होकर रहेगी। देवचः के जाने के बाद डाक प्रशात को अपने पत्र का उत्तर मिला। लिखा था- "प्रिय, मैं बहुत नाराज हू। अपनी रखो तो तुम्हे कसम है जो कुछ बाकी छोडो। मैं भी देखती हू तव तुम क्या कर लोगे । मेरी रख सको तो अदालत झूठ बोलकर मुझे और मेरे कुल को बचाना तुम्हारा घम है। तुम्हारी- शान्ति" अगली पेशी के दिन अदालत में सनसनी फैल गयी, जब प्रशा त ने कहा कि वह अपराध स्वीकार करता है। प्रशात ने शात भाव से कहना जारी रवा, ' मैं स्वीकार करता हू कि मैंने झूठ खबर अखबार मे छपवायी । सम्पादक का दोष नही, क्योकि मैंने कहा खबर सच्ची है और मैंने जोर दिया कि इसे छापना सावजनिक हित मे होगा। मेरे मन मे मुद्दई को तग करने, बदनाम करने और मुमकिन हो तो इस तरह उसके बाप से रुपया वसूल करने की नीयत थी। मेरा पहला बयान सच न था। और दस्तावेज भी बनावटी है। पानी-' गिलास से पानी पीकर कहा, "मुझे दुख है कि मेरे कारण एक सम्भ्रात कुमारी की बदनामी हुई और जिस सजा के लायक मुपे समझा जाय, मैं तयार हूँ ।" शाति अपनी जगह कुर्सी पर बठी थी। वह अपने पैर के भगूठे से खुरचे जाते फश को देख रही थी। वहां से हिली न डुली। सबसे बचकर पलभर उसने प्रशान्त की ओर विस्मय से देख लिया था, फिर सट निगाह नीची कर वह अपनी हथेली पर देखने लगी। इस स्वीकारोक्ति के बाद केस के रख को सम्भाला न जा सका और प्रशान्त को छह महीने की सख्त सजा हुई। कांटा टला, पर शान्ति का विवाह मुगमता से न हुआ। अन्त में १२४ जंने द्र की कहानिया [चतुथ भाग] विज्ञापन दिया । शाति ने अपन सम्बध के सम्बध म कुछ भी जानन स इकार कर दिया । उसने कह दिया कि वह पूरी तरह माता पिता के हाय म है। अत म एक जगह रिश्ता पक्का करके तैयारिया शुरू हुई। तिथि बहुत निकट आ गयी तब शाति ने अपने माता पिता से कहा 'प्रशाल की बात सच थी। और मेरा विवाह हो चुका है ।" पिता ने कह दिया वह विवाह न था।" और तैयारिया जारी रखी। और वहा तू जगर गडबड करेगी तो मैं सखिया खा लूगा। माता न लडकी का पक्ष लेकर पिता वो समझाया तो उहाने पत्नी को भी भता बुरा सुनाकर कहा यह विवाह न हुआ तो मैं सखिया खा लूगा जा रही तुम कुछ और मोचती हो।" तव शाति न माता के द्वारा अपन भावी वर को लिखा कि मैं कुमारी नहीं है और मेरा विवाह हो चुका है जाप मुझ पर दया कर सकते है। पर उसका विशेष फल निखार्ट नही दिया। अत म भवितव्य हुआ और विवाह सम्पन हो गया। विवाह के एक मप्ताह जन तर जेल त प्रशात आया। देवच द जेल के द्वार पर ही प्रशात को मिला। कहा लो प्रशान्त मरी प्रतिज्ञा भङ्ग हुई और तुम मूठे हो। मेरे पास जिदा सबूत है कि तुम्हारा दस्तावेज पच था। बडे मूख हो। जेल तुम क्यो गय? मेरा मतिना तुडवान ? घर छोडो। यह क्हो मेरे साथ घर चल रहे हो न प्रशान्त सवस बचना चाहता था। अधिक ठीक यहें तो सबको अपने स बचाना चाहता था। देवघद्रको अनायास भाव म मिलते देखकर कुछ पचरज भी था। उसने कहा नहीं मैं नहीं चल मगा।' दवचने यह उत्तर नहीं लिया और हटान प्रशान्त को साथ चलना 7 वृछ जलपान और बातचीत के अनन्तर नावधू ने आपर प्रशात के पैर छुये और प्रशान्त न आशीर्वाद दिया। मुख पर कुछ घूधर या और मनात मी दष्टि अपर थी किन्तु जव दया कि वह जाति है नव भाजविस्मय नहीं हुआ। इम अविम्मित तटस्थ दूरान दृष्टि पर टूटकर ति प्रशान
पूर्ववत्त
१२५
चरणों मे सिर डालकर फूट उठी। कहा, 'क्या अब मुझे नरक में ही
रखोगे, क्षमा नहीं करोगे?"
प्रशात ने इस पर नववधू के मस्तक पर हाथ रखकर उसे अखण्ड
सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दिया।
तदनन्तर लगभग दो वर्ष अपनी पूर्व पत्नी के साथ गहस्थ मे रहा,
फिर उसने सायास ले लिया।
महाप्रभु स्वामी शान्तानन्द का यही पूववृत्त है।
परावर्तन
दिल्ली
तूबर
प्रिय,
साप का पत्र मने खोल लिया था, दमा करना। साभाहे दुष
पहा-सुनी हो गयी। नहीं तो धर्मशाला : यो रहनो हो। पान का
पढ़ाई में हर्ज न हो रहा होगा। उसके लिए मैं व्यवस्था पर रही है।
पया उसका भी मेरे साप न रहना जरूरी है। खैर जो भी तुम सोचा।
मेकिन भर भी हर तरह की बात मुझसे कह सकता हा का
तुम्हारा
--पायमान
मासती को न बानेरे लिए होम लिखोगी?
पपा
लाहौर
२ अक्तपर
मेरी प्यारी सखी शीला,
सुम तो मुझे मूल ही गयी।परयोस पाम है । लेकिन समसघ यह
क्यो नहीं कहतीं कि हमारे भाई साहब से ही सम्हें फुसत नही मिलती।
सुनती हूँ अब तुम लोग अपने नये मकान में आ गय हो। इनकी एक महीने
की छुट्टी हो रही है। यही मुश्किस स रात्री हुए हैं कि चलो प्रयाग-काशी
हो आयें। अगर सब ठीक रहा तो महीने के आखिर में हम तुम्हारे यहा
थायेंगे, दिल्ली दिखामोगी न? दोरोज मे ज्यादा का वक्त नही मिलेगा।
पर का जवाब जरूर देना। भाई साहब से पुसत न हो तो निकाल लेना।
परावंतन १२७ ऐसी क्या तुम ही की हो गयी, कि मुये भी भूल जाओगी। भाई साहब पिछली बार लाहौर आये तो मिले थे। हमने कहा ठहरो, पर कौन ठहरता है। यो जी, तुमने उनके मन को ऐसा बाध रखा है ? बडी स्वाथिा हो। खैर आऊगी तब देवूगी । ज्ञान को प्यार। तुम्हारी- मालती m दिल्ली 8 अक्तूबर श्रीमान् जी, भालती के लिए साथ का पत्र है। उचित समझ तो भेज दीजियेगा। आपकी चिता के लिए मैं कृतज्ञ हूँ, लेकिन मुझे कोई कष्ट नहीं है। भाई में यहा स मैं खुद ही चली आयी । धर्मशाला में कई और रहते हैं। कुछ जीवो को तो वह भी नसीव नहीं है। इममे चिता का कारण नही। इस महीने का रुपया मुझे अभी तक नहीं मिला है। मेरे नाम का रुपया मेरे हाथ में भाप कर सस्ते तो कोई बुराई म थी। तो भी अदालत मैं नहीं करगी। सब आपकी माय बुद्धि पर है, जो चाहे सो करें। मैंने गान को समझाया है कि बैटी, मा के साथ तो तू दुख ही उठायेगा। बाप के साथ आराम से रहेगा और काबिल बनेगा। पर वह मुझे छोडता ही नहीं है। आप उस ले जा सको तो मुझे छुटकारा हो, पर घर पर मत रखना। उस नयी मां से डर लगता है। किमी बोडिङ्ग में दाखिल कर सकते हो। आपनी कोई नहीं -शीला आप पाहें तो मालती दो आने को लिख सकते हैं । कह दीजियेगा कि मैं मायके, या कही, गभी हू । - -शीसा १२८ जनैट को पहानियां [चतुम भाग] ४ दिल्ली ६मावर मेरी चांद सो वहन मालती मुदत वाद तुम्हारा पत्र मिला। पला शीलामी याद तो आयी । तुम आ रही हो जान कर वही खुशी हुई। ममान नया है और पूर्व जगह है। तुम आती तो ध य हा जाता । पर जो तुमने आन के दिन लिखे है उनमें ठिकाना नहीं है। शायद कहीं बाहर जाना पड़ें। कोशिश करूगी रि ऐसा न हो। तब तुम्हारे भाई साहब तार दे देंगे और तुम जार आ जाना। बाहर जाना पड़ा तो मेरा दुर्भाग्य है, लेकिन फिर बड़े दिन की छुट्टियों में दो रोज को जरूर आना। मालती, तू कमी है ? सुनती हू अब तक अकेली और आजाद है। भाई, तू बड़ी मौज म है। औलाद से ज्यादातर दुख ही निकलता है। पहले तो ससार हो दुःखो है। पर छोड़ो, तेरी गिरस्ती तो मदन कानन होगी। तुम्हारी हो- -शीला मालती, जरूर माना, भूलना नहीं। तुम्हारा- पा० ५ दिल्ली १० अक्तूबर परम प्रिय बा० न किशोर, पत्नी से सूचना मिली है कि आप सब लोग इस महीने के अत म प्रमाग के रास्ते म यहा उतरने का विचार रखते है । मैं अनुगृहीत हूगा यदि आप इस विचार को निश्वय का रूप देने और पाकर आतिथ्य का अवसर दें। उत्तर की प्रतीक्षा मे रहूगा। छपाकांक्षी -कृपादयाल परावतन दिल्ली २७ अक्तूबर शीला मालती आ रही है । सब आ रहे हैं। परसो सवेरे पहुंच रहे हैं । युद आने का मुझे साहस नहीं हुआ, इससे पर है। तुम्हारे बिना कैस होगा। दोपहर गाडी लेवर बाळगा। चाहो तो इन दिनो मजुला का इ तजाम कही होटल में कर सकते हैं। शीला, तुम समझ सकती हो। इकार न वरना में कल आऊगा। -कृपा० दिल्ली २७ अक्तूबर श्रीमान् जी, आदमी ने पत्र दिया। जान मेरा पत्र लाता है। मालती क्यो आ रही है । भने तो उसे इन्कार लिखा था। मुझे कोई उसका दूसरा पत्र भी नहीं मिला। आप जानें आपका काम । कष्ट न कीजियेगा । मैं नहीं आ सकगी। २७ तारीख को मुझे रुपया मिला। अगले महीने पहली या दूसरी को नही मिल गया तो फिर पन्द्रह-बीस की जो नौकरी होगी मुझे कर लेनी होगी, दूसरे के आगे पला तो मैं नही पमार सकती। -शीला 5 प्रयाग नवम्बर प्यारी शीला रानी, मैं क्या कह, महुत-बहुत कृतज्ञ हूं। मुझे ईर्ष्या भी होती है। मेरे पति तुम्हारे ही गीत गाते हैं। सच कहती हूँ शोला, दिल्ली में तुम लोग पास जैसे दिन गुजरे, वैसे जीवन म कम आते हैं । मैं बहुत- जनेद्र की कहानिया (चतुर्थ भाग] बहुत कृतज्ञ हू कि तुम्हारी गिरस्ती आदश है और तुम लोगो मे जो समझ मोहाद है उमपर ईर्ष्या होती ह । हमार यहा ता कुछ पूछो न शीला, आय दिन कुछ न कुछ रगडा-झगडा बड़ा होता रहता है। पर तुम लोगो का घर है कि कहीं क्लेश का वादल नहा। प्रीति स स्वच्छ और मुक्त हास्य ही वहा दिखाई देता है। एक बात कहती हू कही इसका कारण यह तो नहीं कि तुम म पनि के प्रति शवा नहीं है और पूरे विश्वान से तुम उह आजाद रखनी हो। तुम हमारे साथ सिनमा नही गयी नुमाइश नही गयो। पहले तो मैंने ममभा तुम जप न हो पर वह बान नही थी। हमेशा प्रमन हास्य ही तुम्हार चहरे पर दीखता था। मेरे स्वामी साता अधिकतर पाम रहता था और तुम्हारे पति के साथ ही धूमन को मैं लाचार थी । लेकिन तुम्हार चेहरे पर मैंन भी मल नहीं दसा। (इसके बाद री टान पकिनया कटी हुर्द था और पटी नहीं जा सकती थी) शीला मैं तुम्ह बड़ा बहुत धयवाद देती है। तुमन मरी आखे साल टी । इम विश्वाम + कारण ही शायद तुम्हारी गिरस्ती सुप न भरी है। हम लोगा का काशी जान का विचार है। उधर स अयोध्या होते हुए साय” लौटें तव दिल्ली आना न हो सकगा। तुम लागा न घर से दिल्ली हार लौटने का वचन ले लिया था लेकिन वह सम्भव नहीं है शीला रानी और हम माफ करना। बना तो लाहौर स फिर कभा आयेंगे। लेकिन तुमने क्या ऐसा सयास-व्रत ले लिया है जो कही नही टतोगी। तुम लाहौर एक बार क्यों नही आती? तुम्हारी ---मालती दिल्ली १२ नवम्बर शीला मालती का पर फिर मैंने बोल लिया . से आता है। बीच-बीच की लरीर मैंने काटी है। लेकिन अब मालूम होता है फिजूल काटी हैं ।
परावतन अपने बारे मे तुम्हारी अच्छी सम्मति में जरूरी समझता था, पर जरूरी अच्छी सम्मति नही, स्वय अच्छाई है, यह मैं देखता जाता है। मजुला होटल से अब भी नहीं आयी। वह नाराज है। उसे होटल म रखकर तुम्हें घर म क्यो बुलाया गया? मैं नहीं जानता उसे यह बात क्सिने बतायी । लेकिन अब यह ममझने लगा है कि सच बात अपने को स्वय बतलाती है । झूठ बात को ही प्रयत्नपूर्वक बतलाना पडता है। खैर, वह छोडो। तुम गयी। मजुला गयी। घर म अब आराम है। नौकर-चाकर हैं, फौरन हुक्म पर काम करते हैं और दखल नही देते। वे अधीन हैं और घर में मेरी ही इच्छा और हुक्म सब-कुछ ह। पर शीला, अब लगता है कि कोई प्रतिरोध चाहिए। कोई चाहिए जो स्वय है, इससे अधीन नहीं है। बल्कि स्वाधीन है, इमय प्रेमपूर्वक ही अपने को उसके अधीन करके उसे स्वाधीन करना होगा। प्रम पुरुषाथ है, शीला हम प्रम के भोग को चाहते हैं उसके अध्यवसाय को नहीं चाहते । प्राणी के माय सहज है वह तो स्वाथ है, अहकार है। प्रेम तो यत्नमाध्य है । शीला यह मैं नहीं जानताया, धीरे-धीरे जान रहा है। अब ताजा होता है कि कह दू रुपया नहीं आयेगा और चलकर बहू कि लो मैं ही उसकी जगह आ गया है। लेकिन उतना साहस नही है। तुम पर अपने को छोड सकूगा उसी रोज तुम्हारे निणय पर किसी तरह का आरोप लाना पाहूगा उससे पहले नही । तुम्हारा निणय मेरा भाग्य है । रुपया तो पहली तारीम को पहुंचेगा ही। जब कहो सब-का-सब भी तुम्हारे हाथा मे पहच सकता है । वह वात नगण्य है। लेकिन मजुला का क्या करू इमस उसे समझ नही है । रूप के गव मे वह बुद्धि खो बैठी है। इसमें उसका क्या दोष है ? मैंने ही क्या उसके रूप की कीमत उसकी आखो मे नहीं बढायो । पर, वह जाने दो। इस वक्त घर मे मैं एकदम स्वतत्र है। और एकदम आराम से हूँ। तुम चिन्ता न करना। तुम्हारा ? -पा० है
जनेद्र की कहानिया [चतुर्थ भाग]
२ दिसम्बर
१०
दिल्ली
थी.
एक तारीख हो गयी, रुपया नही आया। पर उस धारण नहीं लिख
रही हू ! लेपिन यह क्या सुनती हूँ कि घर में कोई माता है । और तुम
भाराब पीने लगे हो। पौरन उत्तर दो कि यह मुठ है, नहीं तो मैं नहीं सह
सकती । जवाब गान के हाय ही दे दें।
---शीला
दिल्ली
२ दिसम्बर की शाम
श्री.
जान खत तुम्हार वानी मेज की दराज में रख आया है। तुम मिले
नहीं थे। यह डार से भेजती हूँ। जवाब तुरत दो। रुपया आज भी नहीं
मिला।
-शीला
दिल्ली
छीसा देवी,
रुपया इसी खत के साथ है । एक दिन की देर के लिए क्षमा चाहता
है। जो मुना, सच है। लेकिन मैं स्वाधीन है। कोई मेरी चिता क्यो करे।
मेरी जिन्दगी मेरे हाथ है। और अगर आपको आपरा रुपमा वक्त पर
मिलता जाता है तो उमसे अधिक मैं क्या कर सकता हूँ? मजुला ने २५०)
मासिक को वृत्ति के लिए अदालत में मुन्न पर दावा किया है । इल में
उसीसे मिलन गया था, इमसे यहा मान से न मिल सका। २५०) मासिक
म अधिक लेने का उसे हक था। वह आया हूँ कि यह रकम उसे प्रति मास
मिलेगी । दावा अब वापस हो जायगा ।
देखता हूँ रुपया बडी चीज है। उससे झगडे शान्त होते हैं और शराब
प्राप्त होती है। रपया है तो चिता क्या?
--कृपा.
परावतन १३ दिल्ली १० दिसम्बर खबर सुनो शोला, मालती आ रही है उमे मालूम है कि तुम यहा नही हो। मालूम है कि मैं अकेला हू और दुव्यसनी हू। पर यह भी मालूम है कि मुझे पैसे की अच्छी आमदनी ह। मालती तुम्हारी सहेली है। यहा मैं उसके काम को नही जानता। वह १२ तारीख को सुबह पहुच रही है। कहो, तुम क्या कहती हो ? शराब क्या अब भी दुरी चीज है ? -कृपा० १४ दिल्ली ११ दिसम्बर शीला, आज फिर तार आया है। मालती आ रही है । तुम क्या समझती हो मुझे इस वक्त तुम कुछ नहीं लिखना चाहती हो? फिर तुम न कहना । शराब पीता हू । मजुला आने को तैयार है। वह दिन घर रहेगी और मुझे आजाद रखगी । डाम भी देगी । डास वह अच्छा जानती है। फी दिन १००) । मालती का मन रखने को घर पर कोई तो चाहिए। क्यो शीला, क्या कहती हो 7 --कृपा० दिल्ली १४ दिसम्बर सा शीला मजुला गया मालनी गयी। तुमने कुछ खबर नहीं ली न? मालती उपदेश देने आयी थी। मैंने कहा कि मेरे पास धन है । उपदेश की एवज में धन ही ले जाओ। धन का देना आनद देता है। पर उमने धन नहीं १३४ जनेद्र की कहानिया [चतुथ भाग] लिया, फिर भी उपदेश दिया ही। मैंने कहा, पर वह तुमसे मिलने को राजी नही हुई। कहती थी, तुम झेंपोगी। पागल है, वह तुम्हें नही जानती। लेकिन शीला गराव को दोष न देना, वह असलीयत बाहर ले आती है । शीला, मुझे माफ करता। पालती समझदार है। वह तुम जसी नहीं है। वह दुनिया मे धन की कीमत जानती है। और मजुला दो रोज के वार तीसरे रोज भी रही और हिसाब म १००) उसके भी लगे। शीला, वह मेरी पत्नी है। लेकिन धन वडी चीज है । अब तुम शराब को कुछ न कह पाओगी, लेकिन तुम तो इधर कुछ कहती ही नही हो। चलो अच्छा है। मैं भी नजदीक आ रहा है कि तुम्हें लिखने के सिलसिले को अपनी तरफ से छोड दू। तुम्हारा -वृपा० ता तुम घमशाला मे ही रहे जाओगी? घर जो यह पटा है। परतु तुम जानो। मैं शायद कुछ कहने लायक नही हूँ। दिल्ली २६ दिसम्बर लो, शीला यह अतिम पत्र है। मैं विस्तर मे हूँ। फिकर न करना। नस है डाक्टर है । और सब इतजाम है। खुद नही तिस सकता है । इमीम तो खत लिखवाया है। कल बडा दिन था। ईसा काम र चढे थे। मोचता था, तुम्हारे पाम आऊगा और माफी माग लूगा पर साझ न हो रहा था, तभी मजुला ने होटल मे बुला भेजा। बात संक्षेप म कहू । वहा म म घर आया मालूम नहा। होश माया नब डाक्टर को सिर पर देखा। अब ठीक है । चोर ऐमी तो नहीं है लेकिन तुम्हें फौरन आ जाना है। मजुना के पास विमीको हाना चाहिए। वह डरती होगा। गाडी आ रही है। अधिक तुम्हारा मिलने पर- परावर्तन १७ दिल्ली १ जनवरी प्यारी वह्न मालती, नुम यहा आयी थी तव में मिती नही। तब स तुमने खत भी नहीं लिखा, बडी मुह चोर हो जी! तुमन क्या यह समया वि अपना घर में नही सम्भाल सकती? सुनो वहन, अपने मन म तुम मुछ न रखना। अखवारा से तुमने हे चोट आने भी खवर नानी ही होगी। मजुना बुमग में पड़ गयी है । लेकिन मन से काइ बुरा नही हाता आर अगर हम मन म से आदर नहीं सोयेंगे तो एक दिन वह पिर सी घर म आ जायगी। भूत से तो लडा नही जा सकता। जो हो गया उस मानकर ही चलना होगा। जखबारी न बात वटा चढाकर छापी थी। म्पये पैग का झगडा हो गया था। यह ता रपये पर हाथ नहीं भीचत, पर गुण्डा क मामने दवना नहीं चाहा होगा। भजुला ५००) माहवार और १०,०००) नाद चाहती थी। यह राजी नही हुए। इहान कहा कि मजुला के लिए उनका प्रेम मच्चा हाता तो २५०) भी उसे न देते। पर दानी दुश्मनी उसके नाथ नहीं कर सक्त वि ५००) ००) दें। रपय का सवाल नहीं है । पर इसम मजुला का ही भला नहा है। तारीप ता तव ह उव मतुला अपनी तरफ से कुछ न चाह । वह घर में कुछ न चाह । वह घर म क्य नहीं रहती '--"म पर कुछ कहा सुनी हो गयी होगी और मजुला और उसके दो मा गया न इन पर वार किया। मारने की मशा होती ना मार सक्ते य पर जरम गये उहें वहां पर पटवा दिया। अब काफी आराम है। बहन, स्त्री की पुछ न पूछा। मैंन सोचा था कि डिगूगा नही, पर परमात्मा भला किसी रखता है और स्त्री तो टूटने के लिए बनी है । वहन न टूटन में कोई मुख भा नहीं है । खैर, अव बताआ तुम यब आभोगी? इहे अच्छा हो दो, फिर हम भी तीथ-यात्रा पर जायेंगे। तुम्हारी -शीला मात्वार और १०,००० चलागी न हमारे साथ निस्तार बावू माताप्रमाद को हाईकोट की अपील में इलाहाबार जाते समय उनके पडोसी लाला महावीरप्रसाद ने कह दिया था कि वहा से पुष्पा को साप लेते आना, भूलना नहीं। पुष्पा की बड़ी बहन मनोरमा इलाहाबा ही रहती है। बहनोई हाई कोट मे ट्रासलेटर है । पुष्पा यूनिवर्सिटी मे वी० ए० मे पढ़ती है। वावू माताप्रमाद छुटपन से पुष्पा को जानते हैं। उसके विवाह की वातवात भी उनकी माफन चल रही है। लाला महावीरप्रसाद के वे घनिष्ठ मित्र हैं। इलाहाबाद से चलने की बात थी। उससे कुछ घण्टे पहले पुष्पा उनके घर आ गयो । कहने लगी "मेरा पढने का नुकसान होगा। कुल पन्द्रह रोज की छुट्टिया तो हैं, फिर आना पड़ेगा।" माताप्रसाद ने कहा, "तो आ जाना। तुम्हारी मा ने बहुत कह दिया है।" पुष्पा बोली, 'नगे मैं नही जाऊगी। फिर कौन पहुचाने आयगा?" 'शायद मुझे कुछ दिनो मे यहा आना हो। पहुचाने का जिम्मा मुझ पर है। चल जल्दी कर। सामान लादी है?" 'सामान भी नही लायी हूँ। मैं क्या रूगी जाकर ?" 'तेरे पिता ने जरूरी कह दिया था हा काम भी है।" हंसकर बोले, यह आखिरी माल है हमेशा पढे ही थोडे जायगी।' माताप्रसाद का कुछ ढग ही ऐसा था कि पुप्पा का अनमनापन रह गया और दोना साथ इलाहाबाद से रवाना हुए। रितु चलने पर अधिक देर उनका मन स्वस्थ नही रहा । उनको शका धरने लगी। रेल मे धीमे से उहोंने पूछा 'पुष्पा क्या वात है ॥ "कुछ नही।"
निस्तार १३७ सुनवर बह रेल र वाहर देखने लगे । धरती भाग रही थी। किनारे पर प भी धूम रह थे। बिन्नी को राह वह बाहर ही देखत ? पुष्पा स्तिाव पर रही थी। मानाप्रमाद ने कहा 'पुष्पा पानी दना।" पुप्पा न उठवर सुगही मै उडेलकर गिलाम म पानी दलिया। वह गार र दमत रह । आधा गिलास पानी पी-कर गितास वापिन लौटाते हए वहा, 'लो पदा।' फिर ची तरह गौर म कुछ देर पुष्पा को देसतह पुष्पा वरावर मोट पर आ बैठी तो वह उसी तरह खिटकी १ बाहर दपन ला । एस कुछ दरवीतो पर लहान बहुत प्यार से जार वीमे स मनवीयत खराब नी नहीं है पुग न उनकी जात्रा म निगाह जमार कहा चाचाना।" नही तो - भारी कण्ठ म यह कहकर यह फिर अपन मे हा रह । पर मन जमता नहीं था । वह इधर-उधर किसी चीज म नही रुक्ता था। ऐन कानपुर निकल गया। अधेरा हो रहा था। दूसरों कोई वथ साली न थी । वह चाहते थे मौ जाय और पुष्पा भी मा जाय । वह अपने ही भीतर की उठी बात को सुनना नही चाहत थ । 'लो बिस्तर कर ला। पुष्पा सुनकर भी बैठी ही रही, तो बोत, "लाओ में ही किय देना हा जरा उठो तो।" पुष्पा उठकर उनके हाथ में होल्डाल लेकर विस्तर विछान लगी। मानाप्रमाद अलग खड़े हुए उसे गौर से देखने लगे। फिर बिस्तर पर बार और उसने भी बैठ जाने पर हिनाब कण्ठ में बोले, "पुष्पा, तुम्हें कुछ महीने तो नही चढे है " पुप्पा नाचे देखने लगी। और भी स्निग्ध और भीने बण्ड से कहा, घबराओ नही वटी" पुष्पा बेहद धीमे बोली, "हा।"
निस्तार बाबू माताप्रमाद को हाईकोट की अपील में इलाहाबाट जाते समय उनके पडोसी लाला महावीरप्रसाद ने कह दिया था कि वहा से पुष्पा को साथ लेते आना, भूलना नही। पुष्पा की बड़ी बहन मनोरमा इलाहाबार ही रहती है । बहनोई हाई- कोट मे ट्रासलेटर है । पुष्पा यूनिवर्सिटी म वी० ए० मे पढ़ती है। बायू माताप्रमाद छुटपन से पुष्पा को जानते हैं। उसके विवाह की बातचात भी उनकी माफत चल रही है। लाला महावीरप्रसाद के वे घनिष्ठ मित्र हैं। इलाहाबाद से चलने की बात थी। उससे कुछ घण्टे पहले पुष्पा उनके घर आ गयी। कहने लगी "मेरा पढने का नुकसान होगा। कुलपन्द्रह रोज की छुट्टिया तो हैं, फिर आना पडेगा।" माताप्रसाद न कहा, ' तो आ जाना। तुम्हारी मा ने बहुत कह दिया है। पुष्पा बाली, ' नग मैं नहीं जाऊगी। फिर कौन पहुचाने आयगा?" "शायद मुझे कुछ दिनो मे यहा आना हो। पहुचान का जिम्मा मुझ पर है । चल जल्दी कर। सामान ला है" 'सामान भी नही लायी हूँ । मैं क्या रूगी जाकर ?' 'तेरे पिता ने जरूरी कह दिया था आ रहा काम भी है।" हंसकर बोले 'यह आखिरी साल है हमेशा परे ही योडे जायगी।" माताप्रसाद का कुछ ढग ही ऐसा था कि पुष्पा का अनमनापन रह गया और दोनो साथ इलाहाबाद से रवाना हुए। किंतु चलने पर अधिक देर उनका मन स्वस्थ नही रहा । उनको शका घरने लगी। रेल म धीमे से उन्होंने पूछा "पुष्पा, क्या वात है?" "कुछ नहीं ।
निस्तार सुनकर वह रेल में बाहर दखन लग । धरती भाग रही थी। किनारे पर पेड भी घूम रह थे। स्विती की राह वर वाहर ही देखन रह । पुप्पा क्तिान पर रही थी। मानाप्रमाद ने कहा पुष्पा पानी दना। पुप्पा न उठर सुगही मे उदेलकर गिलास में पानी द दिया। वह गारा-पदपत रह । आधा गिलास पानी पीवर गिलास वापिन लौटाते हुए कहा, 'लो रस दो।' फिर उसी तरह गौर म कुछ दर दुप्पा को दसत रह। पुप्पा बरावर सीट पर आ वठी ता वह उमी तरह खिडकी ६ बाहर दवन ताम कुछ देर बीतने पर उहान बहुत प्यार स बार धीमे स पूा कुछ तबीयत खराब ना नहीं है ? ' पुपा न की जावा म निगार जमार रहा नहीं तो चाचाजी" अच्छा।" भारी क्ण्ठ स यह कहकर वह फिर जपन म हा रह । पर मन जमता नहीं था। वह इधर-उधर किसी चीज म नही स्वता था । ऐन कानपुर निकल गया। अधेरा हो रहा था। दूसरी कोई बथ खाली न थी । वह चाहते थे मो जाय और पुप्पा भी मा जाय । वह जपन ही भीतर की उठी बात को सुनना नही चाहते थे। 'लो, विस्तर कर ला। पुष्पा सुनकर भी बैठी ही रही, तो वोल, लाओ, मैं ही क्यि दना है। जरा उठो तो।" पुष्पा उठकर उनके हाय स होल्टाल लेकर विस्तर बिछाने लगी। माताप्रमाद अलग खड़े हुए उसे गौर से देखने लगे। फिर बिस्तर पर बठार और उसके भी बैठ जाने पर स्निग्य कण्ठ स बोले, "पुप्पा, तुम्हें युछ महीने तो नहीं चढ़े है" पुष्पा नीचे देखने लगी। और भी स्निग्ध और भीने कण्ठ स कहा, घबराओ नहीं, बटी पुष्पा वेहद धीमे बोली, 'हा।' . 4 जनेद्र की पहानियां [चतुय भाग] सहसा ठहरे, पिर पूछा क्तिने ?" घोती माथे के आगे लापर पुणा ने कहा शायद चार।' माताप्रसाद सुनकर चुप रह गये । थोडी दर बाद बोल तो यह क्या पर रही हो माता पिता पर जाहिर होना चाहती हो?" 'क्यामरून जाऊ?' माताप्रसाद फिर सोचते रह गय । उह चुप देखकर पुष्पा बोली, अगले स्टान से वापस लौट जाऊ?" माताप्रसाद को इसका कुछ भी उतर नहीं सूझा । 'सोचती थी, दो रोज उनकी आया वे आग रह आती।" गाताप्रसाद अब भी नहीं बोले । उह पता नहीं चलेगा। धल जायगा तो-' सुनकर उहाने पुप्पा को दसा । माया और आसें घोती की विमारी की ओट म हैं। ऊपर पर लेकर हाथ मे अगूठे का नाखून पुग्च रही है। पूछा "लौटना चाहती हो? 'कह तो अगले स्टेशन उतर जाऊ । "अकेली जा सकोगी?" "ज सकूगी।' माताप्रसाद चुप रह गये। काफी देर तक उ हे चुप देखकर पूछा, "तो अगले स्टशन मुझे उतर जाना है माताप्रसाद निरुत्तर रह । उनकी बुद्धि काम नहीं कर रही थी। अच्छा तो यही हो कि माता पिता जान जाए, लेकिन इसके लिए उहें तैयार करना जरूरी है । यो तो लडकी की जान की खर नहीं। फिर मा जाने क्या कर बैठे। कुछ तय न कर पान थे इससे खीज उठती थी। पर उसका अवसरन था। रेल का डिब्बा था और या भी कहने सुनने की जगह से समस्या आगे आ गयी थी। देखा, पुष्पा छोटी मोटी चीजा को समेटकर बैग म रख रही है। . ।
निस्तार सहसा उसने पूछा, 'आप भी उतरेंगे।" चौककर बोले, "मैं?" "कहें तो मैं अकेली उतर जाऊ ?" जवाय अकस्मात उनमे नहीं बना । उहे गुस्सा आ रहा था। पर किसी तरह भी झुझलाहट का तनिक मश भी वह प्रकट नही कर पाते थे। झटके से बोले, "चलो, इटावे म दूसरी गाडी ले लेंगे। पहले उतरकर तुम्ही से निबट लें।" इटादे में वह भी साथ उतरे। वेटिंग रूम मे रात गुजारनी होगी, सबेरे आठ बजे गाडी मिलेगी। मुझे आज ही मेरठ पहुचना था। कचहरी मे केस है। आदि-आदि सोचकर पुप्पा पर रह-रहकर उहें तैश माता था। बोले, "अब बताओ, क्या करना चाहती हो। पुष्पा चारो ओर से पूरी तरह धोती लपेटे, पल्ला आगे ले, नीचे देखती हुई, गुमसुम वैठी रही । बोली नही । माताप्रसाद के मन मे तरह-तरह की बातें उठी । बहुत से दुवचन, बहुत-ते व्यग्य । पर कोई भी तीखी बात इस सामने बैठी लडकी से वह नहीं कह सके, और स्वयं मे झुलसत रह गये। "बताओ जी तुम फिर क्या कहती हो पुष्पा ने धीमी वाणी में कहा, 'मैं रेल के नीचे कट सक्ती है।" सुनकर माताप्रसाद के मन मे लाया कि वह कि रेल के नीचे मरने का वक्त तो था, लडकी | अब तो तू उस वक्त को भी गवा चुकी है। लेकिन वह कुछ भी नहीं कह पाये । कुछ न सूझा तो बोले नहीं, मैं तुम्हारे साथ नहीं चल सकता है।" पुप्पा बोली, "और मैं भी इलाहाबाद वापस की जा सकती हू, चाचाजी?" "क्यो? तो फिर कहा जाओगी?' "कहीं नहीं जाऊगी । अपना अन्त तो कर ही सक्ती हूँ।" "क्यो मनोरमा के पास नही जा सकती ? वह जानती तो होगी?" "नही, कोई नहीं जानता। और जिसे जानना चाहिए वह इस बारे में सोचना नही चाहता।" 2" - १४० जनेद्र की कहानिया [चतुर्थ भाग] कुछ उक्ताकर माताप्रमाद न कहा, 'मुझमे पूछो ता तुम्हें उसीके पाम जाना चाहिए । वह है कौन' पुष्पा न व ऊपर की आर दसा, आखें भरी थीं। कहा, "यह वचना चाहत है चाचानी। हम सबको उह बचाना चाहिए।" 'क्या बचाना चाहिए।' दया धम तायाह चाचाजी।" माताप्रमार का वटुन चुरा ला । धमकाते न वोले "ता तू क्या करगी।' मर गी नहा, तो जिम तिन तरह जी लूगी।" और भी पडद ताक वह वाल "वदनसीब, मरठ के लिए ऐमा हालत न तू मर नाथ क्या चली जायो लाज नही जापी?" पुप्पा रापमा पाला 'कुछ नहा आया, चानाजी कुछ भी समझ म नहीं आया। अब कहा, वरनर माताप्रसाद उधेड युन म इस वक्त टहल रहे थे। ऐसी हालत उनकी कभी नहीं हुई। वथा झमला है | इस लड़की ने मुसीबत में डाल दिया है। वोले, 'तुमने मुझे इलाहाबाद मे सब कुछ क्यो नही कहा मैंन तो कहीं भी कुछ नही कहा, आप ही न कहलाते तो मैं क्या किसी भी तरह कह सक्ती था?" "तो फिर चलो मेरठ । झगडा क्या किये का फल भुगतो।' "उसके लिए ता मैं तैयार हूं, लेकिन मा-बाप के यहा जमी इसीत क्या उनको भी मेरे किये का दण्ड भोगना होगा? मैं यह नहीं होन दूगी। इस उमर में उनकी इज्जत पर बट्टा लगे, इमन पहले मुझे लाख लाख वार मरना मजूर है।" तो फिर ऐमी हिम्मत से मेरठ के लिए मेरे साथ चल क्या ?" पडी थी?" सोचती थी, कोई जानगा नहीं। और उहें अपना मुह दिखाकर और अन्तिम बार उनके दशन कर पीछे जो बने मैं अपना निपटारा कर लेना चाहती थी। उसके बाद जीती भी वचती तो उनका रास्ता न काटती। पर मेरा नसीव जा फूटा है। रास्ते मे आपने ही सब जान लिया। अब निस्तार १४१ आगे मुझमे कमे जिया जायगा" माताप्रसाद सुनते हुए वरावर कमर मे टहलते ही रहे। एकाएक गुस्से में बोने, ' यह कब से चल रहा था।' पुष्पा ने उधर ध्यान नहीं दिया। कहती रही, "शायद सब भले के लिए होता है। इन योडे दिनो मे जो मैंने जाना, वह किसी भी दूसरी तरह नहीं जान सकती थी। अब मुझे कोई भी साध नहीं है। मैं सहज- भाव से मर सकती है । गुस्सा भी मुझे नही है। दोष भी किसी को कैसे दे सकती है। उसका भी कैसे बुरा चाह सक्ती हू जो लाचार है, और अब नहीं निभा सकता। मैं मां-बाप के समक्ष जाकर चरण छूकर मन ही मन उनको दामा पा लेना चाहती थी। पर अब वह नहीं हो सकता तो भाग्य को भी दोष नहीं दूगी। विपत न पडे तो आखें हमारी फैमे खुलें। मैं पढती थी और जानती थी कि पाप कही भी नहीं है। लेकिन अब जाना कि हम जैसो को पाप न हो तो प्राप्त भी कुछ न हो। आज तो मैं पाप मे विश्वास रखती है। उसने मुझे सिखाया। वह किसी तरह भी प्रथा से मुझे न आना। दुख मे मे सान्त्वना मिलती है। पाप म मे धम मिलता है। यह भी शायद ठीक हुआ न कि आप आज आ गये । मरना केवल मैं इसी- लिए चाहती हूं कि जिहें मुझसे प्यार था और आशा थी उह मुझसे ग्लानि और निराशा का दुख न मिले। मैं- माताप्रसाद अपने से झगडते हुए टहले जा रहे थे। आधा उहें मुन पडता था, आधा नहीं सुन पडता या। समझकर सुनने या सुनकर समयने की उहें चिन्ता न थी। सहसा घूमकर बोले क्या बकती हो।' पुष्पा बोली, 'माता पिता स आप कुछ भी कहानी कह दीजियेगा । पर आप विश्वास मानिये कि कोई अभाव-अभियोग लेकर मैं नहीं जाऊगी।" जैसे कुछ न सुना हो, जोर से बोते 'कहां जाने की बात पर रही हो?" पुष्पा को मानो उन पर वरुणा हुई। बोली, 'कही भी नहीं।" "क्यो, मरोगी?" पुष्पा उनकी ओर देखती रह गयी। बोले, "मरला बुरा नहीं है। इससे पहले ही मर जाती तो अच्छा 7 १४२ जैनेद्र की कहानिया [चतुर्य माग] होता।" पुष्पा इस समय सचमुच इस स्नेही वृद्ध-जन के प्रति दया हो आयी। वह बोली नहीं। माताप्रसाद कहते रहे "आज की औलाद को जाने क्या हो गया है मा-बाप उनके लिए जीते हैं, उनके लिए पिसते, माते और इज्जत बनाते है। लेकिन ये हैं कि--अरे, मरना था तो मर क्यो नही गयी ?" पुष्पा देख सकी कि उनका दुख किसी भी तरह उसके निज के दुख से कम नहीं है। बल्कि वह कुछ अधिक ही कष्टकर है, क्योकि मृत्यु म उसका उपाय नहीं है। मैं तो मरने की सोचकर छुटकारा पा जाती है, इनको वह राह भी नही है। इसलिए डबडबाई आखों से वह उहें देखती रह गयो । उत्तर मे कुछ कहने की हिम्मत उसे न हुई । माताप्रसाद मानी पीसकर बोले, "नही मर सकी तो तुम उस लायक नहीं हो। अब यह बात न करना। चलो, मेरठ चलो।' 'मेरठ?" हा । तुम्हारे माता पिता ही यहां नही रहते, और बहुत रहते हैं।" पुष्पा कृतज्ञ आश्चय से क्षणभर उहें ताकती रही। फिर बोलना पाहा- लेकिन तभी मानो उपटवर माताप्रसाद ने कहा, "मस हुआ, अब सोओ। मालूम है क्या बजा है ? दो होगा। सवेरे चलना भी है। सुना नहीं बिस्तर खोलो और सो जाओ।' पुप्पा सुनकर वही बैठी रह गयी और माताप्रसाद कहकर स्वय टहलने लग गये। एकाएक मुडकर उसे वही बैठा देखकर डाटकर बोले, "सुना नहीं ? क्या तुम बहरी हो? विस्तर सोलो और सो जाओ।" को । उठता हुआ देखकर कडककर कहा, "उठो।" जैसे वय कडक गया। पुष्पा को न घेत रहा कि वह बीस वर्ष की है। मानो पाच बरस की ही वह अब भी हो, खुद मे कुछ न हो, आदेश पालन के लिए बस पात्र हो। उस आवाज पर एकदम महमकर वह जसा महा करने लगी। सोफा पर विस्तर विष्ठा लिया और सेट गयी। तत्काल पुष्पा निस्तार १४३ मानाप्रसाद विना उधर ध्यान किये टहलते रहे । सहसा रुककर बोले, "पुष्पा, अपने दिलीप को तो तू जानती है न? पी० सी० एस० मे आ गया है। उसकी सगाई में तोड सक्ता हू । क्यो, सो गयी?" पुष्पा आख फाडे छत देख रही थी। बहुत भीतर की तह फोडकर उसको आतो मे आसू भरे आ रहे थे। पर वह बोली नहीं। इस तरह पडे-पड़े जाने पुष्पा को क्व नीद आ गयी। सबेरे जागी तो आराम-कुर्सी पर माताप्रसाद भी सो रहे थे। ह व्याह बडे भाई के वाद अव घर का बोझ मुय पर पडा। घर का तय भी मेरे हाथ म आया। लेकिन मुझे इसम कुछ दिक्कत नहीं हुई। मेगन जज हू, सात सो पाता हूँ, और घर म मुकाबले को काई नहीं है । मा मवा और आज्ञानुसारण के अतिरिक्त और कुछ नही जाननो, और पत्नी जितनी ही कम शिक्षिता है उतनी ही ज्यादा पतिपगयणा है। वितु भाई माहब, अपने अतिम समय, जिसे खास्तोर में बोझ जतलाकर मुये सौंप गये, मेरे ऊपर छोड गय, उमदे सम्बघ म मुझे अवश्य सतक और चितित रहना पड़ता है। ललिता मैटिक के साथ अपना सोलहवा माल पार कर चुकी है। भाई साहब अपने जीवन-काल म इसे जहा तक हो वहा तक पढाना चाहते थे। शायद कारण यह हो कि वह खुद बहुत कम पढे थे। किंतु आखिरी क्षण आ'चय है, उहाने ललिता को शिक्षा के बारे मे तो कुछ हिदायत न नी, वहा कि देखो ललिता का ब्याह जल्दी कर देना । मेरी वात टालना मत भूलना मत । अब भाई साहब की अनुपस्थिति म, ललिता को देखते ही, र शब्द बडी बेचनी के माय मानो भीतर विद्रोह मचा उठते हैं । मैं उह भीतर-ही- भीतर खूब उलटता-पलटता हूँ सोचता हू- यह क्या कहा गया और मेरा क्या क्त्तव्य है? ललिता को वही जिनासा, अवेषण, अनुवीक्षण आर वडी चिता और निणय देने के भाव से देखता हू । शायद उन शब्दा वा ललिता के व्यक्तित्व से कोई सामजस्य हो । फिर रह रहकर ध्यान होता है मुमक्नि हो सकता है, भाई साहब ने समझा हो मैं ललिता को ठीक प्यार, सभाल और अपनेपन के साय महीं रख पाऊगा, और तभी ऐसा कहा हो। जब यह बात उठती है तो भाई साहब पर बड़ा गुस्सा आता है । उहांने मुझे बे-मरोसे का आदमी समझा 1-जैसे मैं उनसे सगा, उहींका पाला, व्याह १४५ बढाया और पढाया नहीं है ।-जैसे मैं बिल्कुल जानवर है। ऐसी ही सब बातें सोचकर मैं ललिता के ब्याह के बारे मे व्यग्न और उद्विग्न हो उठना नही चाहता। फिर सोचता हूँ भाई साहब की मशा पूरा करने का काम अव मुव पर आ पड़ा है-ललिता को खूब पढाऊगा और फिर खूब धूम से विवाह करूगा। दिया लेकर ऐसा लडका ढूढूगा जो दुनिया मे एक हो । लके को खोजने में मैं खूब वक्त और खूब श्रम लगाना चाहता हूं। ललिता हमारी ऐसी जगह जायगी कि भैया भी स्वग मे खुशी से फूल उठे। -पर जल्दी नहीं। इस तरह लडकी का पढना जारी है। बी० ए० पहुचेगी, तब कही न्याह की सोचूगा। २ यह ललिता भी हमारे घर मे अजीव ही लड़की है। कुछ पार ही नहीं मिलता। कुछ समझ ही नही पडती। जान कैसे फस्ट क्लास में मट्रिक पास कर गयी। पता नही पडता जब पढने में इतनी होशियार है तो व्यवहार में क्यो ऐसी अल्हड है । उसे किसी बान की समझ ही नही है। लोग कुछ कहें, कुछ समझे-जो समाया उसे वह पर ही गुजरती है। नोकर हो सामने, और चाह अतिथि बैठे हा-उस जोर की हमी आती है तो वह कभी उस न रोक सकेगी। गुस्सा उठेगा तो उसे भी बराक निकाल याहर करेगी। सबके सामने बे हिचक मुझ चाचा को चूम- पर प्यार कर डालती है, और मेरी ही तनक सी बात पर ऐसी तुनक पडती है कि बस । हँसती तो वह खूव ही है गुस्सा तो उसका आठवा हिस्सा भी नहीं करती होगी। हा, जब करती है तो पर ही दी है, फिर चाहे कुछ हो कोई हो। मैं चाहता हू, उमे फुल-शील का, सभ्यता शिष्टता का, अदबकायदे का छोटे-बडे का व्यवहार मे सदा ध्यान रखना चाहिए। पर उससे इन सब बातो पर निबध मुझसे अच्छा लिखवा लो, ध्यान नहीं रखवा सकते। नौरा से अपनापा जोडेगी, हमसे, जमे बची बची रहेगी, सहपाठियों और अग्रजीदाआ से हिदो के सिवा और कुछ न बोल सकेगी, नौनरों और देहातिया के साप अग्रेजी बोलेगी। नौकरो को तो कभी-कभी अग्रेजी जैनेद्र की कहानिया [चतुथ भाग] के पाच पाच मिनट तक के लेक्चर सुना दती है जसे मानो दुनिया मे ये ही उमकी बात का मम समझने वाले मिले है। समकलिया और बडो में चीर-गम्भीर और गुम-सुम रहती है जैसे सिर में विचार-ही विचार हैं, जुबान नही छोटा मे ऐसी खिली खिली और वहकती फिरती है कि जैसे इसका सिर खाली है, चलान को वम जुबान ही है । मिसरानी को बडा ही तग करती है। पर मुश्किल यह है कि मिस रानी को इस बात को बिल्कुल शिकायत नहीं है, और इस कारण मेर पास डपटने को पूरा मौका नहीं है। पर ललिता बे-जरूरत चौके में पहुच जाती है, कभी उगली जलाती है कभी नोन अपन हाय स डालने की जिद करके दाल को कडवी बना देती है आटा उसनते उसनते जब बहा. बहा फिरने लायक हो जाता है, तो मिसरानीजी स साहाय्य की प्राथना करती है और मिसरानी उसके दायें कान को हँसते-हँसते अपने वायें हाथ से जरा टेढा तिरछा करके आटा ठीक कर दती है। मालकिन के मुलायम कानो को मसलने का जब अधिकार-सयोग मिले, तो उस अवसर को मिसरानी जान-बूझकर क्यो खोये ? उस दिक होना पडता है तो हो। लेकिन मुझे यह सब अच्छा नही लगता । जते जहा जायगी वहा इसे ही रोटी बनानी पडेगी! फिर क्यो फिजूल ऐस कामो मे हाय डालती है ?—यह तो है नहा कि टेनिस की अपनी प्रेक्टिस बढा ले पायद उसमे चमक उठे, और अखबारो मे नाम हो जाय। इसलिए मैं उस काफी गुरु- मुद्रा के साथ धमका देता हू--"ललिता यह क्या यहा यहा उलझती. फिरती हो। यहा मिसरानी के पास निठल्ली वक्त गवाती हो, कुछ पड़ी सिखो तो नफा भी हो। ललिता मैं कहता हू छोटे लोगो की नही बड़ों की सोबत कर। यह रिक अभी आया था, मैंने कह दिया तुम गयी हो। यह शकल देखता तो क्या कहता! कसे धुए ने आँखा से पानी निकाल निकालकर आंखो को साल कर दिया है और उस पानी ने घुए से सनबर सारे चेहरे को कैसा चिपाना-बुरा बना रखा है । ललिता, मरहता हू मह ठीक नहीं।" समाजवान मलिता ने मोदिपा अगर वह मेरी निजकी माली देती, तो में बरदास्त न कर समता। पर मसितारे मुंह से मुनरम व्याह । १४७ बहुत ज्यादा गुस्मा हुआ न बहुत अचरज । गुस्मा होता भी तो मैं कुछ ज्यादा न कर नक्ता था। मेरे समीप वह भाई साहब की स्मृति थी, उनकी प्रतिभूति थी, मेरे सभोप वह रक्षा मे बहला-बहलाकर, स्नेह पोप्य वस्तु पी। इसलिए में उसका जवाब सुनको चुप न रहकर चाहे और चुछ भी क्यो न कला, उसे उस माग म न हिला सकता। जवाब में उसने कहा था- 'चाचाजी, डिक सफेद आदमी है । मैं वाली हू चाचाजी । आप भी भलिये मत आप भी काले हैं। क्या हम कालो को सफेदा की खुशी-ना- खुशी दूढने के सिवा और कुछ काम नहीं ? हम ही ऐसे है, जो उनके ओठा के और भौंहा के जरा वक्र होने पर या तो अतिशय धय होकर, या फिर पैरो मे पडकर मर जाना चाहते है। लेकिन मैं ऐसी नही रहना चाहती। और यह हम लोगा की बान नहीं है कि होटल की डबल रोटी खायें और चौके मे घिन करें। मुझे तो अपन चौके की रोटी ही अच्छी और मैं चौके से अपना पिण्ड छुडाना नहीं चाहती।' यह लड़की जो जरा दुनिया नही समझती जो समझती है उसकी कोस की किताबो मे और कल्पना-क्षेत्र मे उडते हुए उसके छोटे-से दिमाग में ही दुनिया बन्द है उससे बहस मे कौन पडे ! समझती ही नही, तो करे अपने जी की । पर डिक-- डिक हमारे जिले के डिप्टी कमिश्नर का लडका है। अभी एक वर्ष से विलायत में आया है। ऑक्सफोह मे पढ़ता है । पर पिता ने हिंदुस्तान देखने के लिए बुला भेजा है। पिता की राय है डिक आई० सी० एस० मैं जाय। बड़ा अच्छा है--डिक । घमण्ड उसम नाम को नही । वहा मृदुभाषी सुशील, शिष्ट । जरा आप उसे जानें कि फिर ऐसे मिलता है कि वह आपका ही है। ललिता को जानकर उसने वही प्रसन्नता प्रकट की। सलिता की यही तारीफ करता है। पर मुझे कुछ और लगता है, मुझे कुछ और माशा है । रिक हर लिहाज से मुझे बहुत खुब जनता है। पर मैं उसे और और देखता है, और वह और-और अच्छा सगता है। मैं सोचता हू बात बहुत सुन्दर है।रिक की ओर से पूरी सम्भावना है। लेकिन १४८ जनेद्र की कहानिया [चतुथ माग] लेकिन ललिता तो डिक को सदा क ने ही देती है। यह नहीं कि उससे बोलती नहीं मौके पर खूब बोलती है। पर मानो उन बातो को बीच मे डालकर ही ललिता अपने और डिक के फासले को अनुल्लघनीय बना देती है। यह मैं डिक से सुनकर सब जानता हूँ, और यह भी जानता है कि डिक इस अतर को जितना ही अनुल्लघनीय पाता है उतना ही देखता है कि एक अनिश्चित चाह उसे मानो और विवशता से चावुक मार मारकर भडका रही है। ३ इधर ललिता मे एक अतर देष परने लगा। हँसना एकदम सूक्ष्म हो गया है और हठात् वक्त-बेवक्त पटना शुरू हो गया है। अब वह बहुत पढती है। मानो जी उचाट रहता हो, और उसीको जबरदस्ती लगाये रखने के लिए ये सब प्रयत्न और प्रपञ्च किये जाते हो। इधर एक खवर डिक के बारे में भी लगी है। कुछ दिनो से उसका इधर आना कम हो गया है। अब अचानक पता चला कि उसने एक हि दी टयूटर लगा लिया है और हिंदी प्रवेशिका के पहले भाग को खत्म कर डालने में दत्तचित्त है। ये लक्षण बडे शुभ मालूम होते हैं। मालम होता है, दोना म कुछ खटपट हो गयी है। नजदीक लाने मे इन छोटी-छोटी कलहो से अचूक और अमोघ चीज कोई नहीं। मालूम होता है, ललिता ने एक झिडकी से डिक को ठीक माग दिखा दिया है। और डिक अब उसी माग पर चलने की तैयारी कर रहा है। इतना सब-कुछ समझने पर भी ललिता की ओर से मुझे खटका ही रहता है । मालूम नही वह किस लोक मे रहती है किस प्रणाली से सोचती है। उसके जी का भेद मैं नहीं समझ पाता। मालूम होता है अब उसका भी ऐसी हालत में पहुंच गया है जहा उसे पपक-यपक्कर सुलाये रखने की जरूरत होती है जहां उसे सबकी जिज्ञासु-रप्टियो से छिपाकर रखना पड़ता है जहां से उससे खुद-ही-सुद निबट लेना होता है। में अदालत परसे आया हूँ कपडे पूरे उतार नही पाया कि ललिता ने ब्याह १४६ 4 बेधडक मेरे कमरे में आकर अपनी मेज की शिकायत न जाने कौन-सी बार दोहरायी। "चाचाजी, मैंने कितनी बार आपसे मेज ठीक करवा देने के लिए कहा है 1--यह क्या बात है?" मैं मानता हू, मुझे कई बार कहा गया है। मैंने फिर भी कहा, अच्छा, अच्छा, अब करवा दूगा। "कब से अच्छा-अच्छा ही हो रहा है। अभी करवा के दीजिये।" 'अभी ?--अच्छा, अभी सही।" 'सही वही नहीं। मैं अभी करवा लूगी। आप तो या ही टालते "रहते हैं।" "अब नहीं टालूगा । बस।" "अभी, मिस्त्री काम से लौटे हागे । अभी कोन मिलेगा?' ‘मिस्त्री दस मिल जायेंगे। मिल जाय, तो मैं लगा लू?" 'हा-हा, लगा लो।" यह कहकर उसे टाला, कपड़े उतारे हाथ-मुह धोया, और अखबार सेकर ईजी चेयर पर पड गया । कुछ देर बाद खुट-पुट कानो में पडी। 'नेशन' के अग्रलेख का तक मुझे ठीक नहीं लग रहा था, उसे पढ़ते-पढ़ते ऊघ-सी भी आने सगी थी, तभी यह खुट-खुट सुनकर मैं अन्दर पहुंचा। "यह क्या है ललित?" कहता मैं ललिता के कमरे में दाखिल हुआ कि देखता हूँ कि एक बढई काम मे लग रहा है। "आपने कहा था न कि मिस्त्री लगा लेना?" कहा था तो कहा होगा, पर मुझे उसको कोई विशेष याद नहीं थी। "तो तुम लपकार उसे बुला भी सायी' गोया ही बैठा रसा था।' 'नहीं। बाहर जाता दीख गया मैंने बुला लिया।' 'दिनभर काम करके लौट रहा होगा, सो तुमने घुला लिया । मजदूर पारे पर कोई भी दया नहीं करता--तुम्हारा क्या'" १५० जनेद्र की पहानिया [चतुर्य भाग] "कोई वेगार था ही है।' ललिता ने कहा, "उजरत भी तो दो जायगी। यह तो इसम खुश ही होगा।' और मुडनर मिस्त्री स पूछा, • क्यो-यावा?" मिस्त्री बुडता है। सिक्य है। बड़ी लम्बी मपेट दाढी है सफेन ही सापा है, आपो म स्नह और दीरता का रस है । ललिता के प्रश्न को सुन पर उसने एम दवा जस माना उसकी आखा म की दीनता और स्नह एक्दम छलर आया है ।-वारा 1-मानो इस ललिता के मुह के सम्बोधन की मदुता न उसरे प्राणा मे मुस को एव मिहरन लहरा दी । । उसने कहा- 'नही वेटी मुये सबरे म कोई काम नहीं मिला । मेरा घर यहा नही है। बहुत दूर है-बहुत दूर । पेशावर' तुमने सुना होगा, उसक पाम 'अटव' है अटव के पास मेरा घर है। दरिया सिघ उमको छूकर वहता है। मैं यहा आज ही जाया । काम न मिलता तो न जाने मेरा क्या होता।' दरिया सिघ किनारेवाले हिन्दुस्तान के छोर पर क गाव से यह बुडढा सिक्ख नमदा के किनारे वे हि दुस्तान के बीचो बीच बसे हुए उस होशगावाद म इस प्रकार वे पैसे किस आफ्त का मारा आ पहुचा-सो सब जानना मुये आवश्यर न जान पडा । पर ललिता ने कुरेदकर उसको कहानी पृछी । मैने भी सुनी। जव वह बुड्ढा नही था, जवान था तब की बात है। दरिया में बाढ आ गयी । झापडा वह गया खेन डूब गये। वह उसकी घरवाली और उसका एक छोटा लडवा-इन तीनो ने एक दूर गाव में जाकर आमरा लिया। पर खायें कहा मे जो याडा-बहुत नकद बाढ़ के मुह में से बचा फर ले आ सके थे, उसे ही बैठे कब तक खायें ? ऐसे ही चिन्ता के वक्त उह एक तरवीव सुझायी गयी। मद्रास वह चला जाय तो वहा वहत आदमिया की जरूरत है खूब तनख्वाह मिलती है और भी राब सहूलियत हैं खूब आराम है। थाडे ही दिना मे मालामाल होकर लौट आ सका। मद्रास पहुचा, वहा से फिजी। घर से निकलने पर यह उसके बम का अब न रह गया था कि वह फिजी न जाय । तव फिजी न जाता तो शायद जेल जाना पड़ जाता और क्या ताज्जुब जो जान सही हाथ धो बठने का व्याह १५१ मोका मा जाता । फिजी मे हाड को और जान को पेलवर काम किया। पीछे से वहा कमाने का मौका हो सकता था, पर बच्चे को और घरवाली को याद ने वहा रहने न दिया । जहाज के टिकट लायक पैसा हुआ कि वह चल दिया। मद्राम आया । इन आरी और बसूला गे ही उसने मद्रारा मे एक महीने तक अपना पेट भरा और इनसे ही एक महीने में बम्बई तक का किराया जुटाया। बम्बई में वह जैसे-तैसे पेट तो भर सका पर लाख कम खाने और हजार ज्यादा काम करने पर भी यह ऊपर से कुछ जुटा न सका । आखिर लाचार बेटिक्ट चल दिया। यहा होशगावाद मे टिक्टवाले ने उतार दिया। वहा से वह अपने औजार सम्भाले चला जा रहा था। बहुत समयो, उसकी यह पूजी रेलवाता ने छाड दी। कहानी सुनकर मुझे बुडदे पर रहम करने को जी चाहा । पूछा, "ललित, क्तिन में 'ठहराया था "ठहराया तो कुछ नही ?" " ठहराया नहीं। 'नहीं "अच्छा, जो ठहराती उससे एक आना ज्यादा देना।" 'अच्छा" और मुझमे सिफ यह जरा सा अच्छा' कहकर सिक्ख से उसने पूछा, "बाबा, तुम यहा रहोगे?" "ना बेटी।" 'क्यो, बाबा?" "घर तो अपना वही है। पर क्या छोड़ा जाता है ? फिर बच्चे को कब से नही देखा । बीस साल हो गये। 'बाबा, क्या पता, वह मिलेगा ही। बोस बरम घोडे नहीं होते।" 'हा, क्या पता। पर मैंने अपन हिस्ने की काफी आफ्त भुगन ली है। परमात्मा अव इस बुड्ढे से उसका बचा खुचा सब-कुछ नहीं छीन लेंगे मुझे भरोसा है, वह मुझे जरूर मिलेगा। हा, उसकी मा तो शायद ही मिले।" ललिता के ढग से जान पड़ा, वह इतनी पोडी सी बातें करते सन्तुष्ट नही है । वह इस बुडदे से और बातें करना चाहती है। पर मुझे तो समय १५२ जनेद्र की कहानिया [चतुय माग] वृषा नहीं गवाना । मैं फिर एक आना ज्याला देने की हिदायत दकर चला आया। वह बुहदा तो धीरे धीर मरे पर स हिलन लगा। ज्यादातर घर पर ही दीखता है। किमी-न पिभी चीज को ठोर करता रहता। उसने घर के सारे बवमो नो पालिश म चमवा पर नया पर दिया । नयी नयी चीजें भी बहुत मी बना दी। यह नलिता का विशेष कृपापात्र या और ललिता उसकी विगप कृतनता पात्र थी। उसन एक बड़ा सुदर सिंगारदान ललिता का बनाकर दिया एक कंगा-यम। मेरे लिए हट स्टैण्ड, घटिया वगैरह- वगैरह चीजें बनायर दा। मैंने भी समझा वह अपने लिए इस तरह रवाहमरवाह मजदूरी वा लता है, चला इसम गरीव का भला ही है। लकिन हरण्य चीज की हद हानी चाहिए। गरीव की भलाई की जहा तर वान है वहा तक तो ठोर। पर उनम दोस्ती भी कर सना, उनको अपना ही बना बैठना यह भी कोई बुद्धिमानी है । पर अल्हड ललिता यह कुछ नही समझती । उसका तो ज्यादा समय अब उस वुड्ढे से ही छोटी मोटी चीज बनवाते रहने म और उमस बातें करते रहने म बीतता है। मैं यह भी देखता हू कि दुडढा दीनता के अतिरिक्त और उम्र के अनि रिक्त और क्सिी बात म बुडदा नहीं है । बदन मे सब हट्टा-पट्टा है लम्बा- चौडा ह । दाटी मूछा से भरा हुआ उसका चेहरा एक प्रकार की शक्ति से भी भरा है। यह मुझे अच्छा नही लगता । इसलिए मैंने उसे एक दिन बुला कर कहा- 'बडढे अब गाव कब जाओगे?' गाव? कैसे जाऊगा जी गाव १ "क्या। "जी । देखो, योडी-बहुत मदद की जरूरत हो मैं कर दूगा। पर तुम्हें अब अपने बच्चे के पास जाना चाहिए। और और यहा जब काम होगा बुला लूगा । तुम्हारा फिजूल आना जाना ठीक नहीं।' बुडढा इस पर कुछ न बोला, मानो, उसे स्वीकार है। उसके बाद से यह पर पर बहुत कम दीया। एक बार आया तो मैंने जवाब-तलब ब्याह - 1 क्यिा-"युडढे, क्या आये ?-क्या काम है ?" "जी, बिटिया ने बुलाया था।" ललिता का अब यह विटिया कहेगा । इतना बढन देना ठीक नहीं । मैंने जोर से कहा, 'बिटिया ?--कौन बिटिया ?" 'वही आपकी दखो, वुडढे गुस्ताखी अच्छी नहीं होती।" इस पर वुड्ढा बहुत कुछ गिडागिडाया, 'गुस्ताखी नही,' गुस्ताखी नहीं' और उसने बहुत मी शपथें खाकर विश्वास दिलाया वह कभी अपने को मारी बराबर नही समझता, 'जाप तो राजा हो हम तो किंकर हैं, नाचीज हैं,' और 'वह ता मालकिन है, साक्षात राजरानी है' आदि- और जन्त म धरती पर माथा टेककर चला गया। बुड्ढे की आर से मुझे निश्चितता मिली। पर उसी रात को मेरे पास आया डिक । उमन वताया वह हि दी शिक्षावली दो भाग खतम कर चुका है। वह जब जल्दी ही इग्लड वापस चला जायगा पर ललिता के बिना यसे रहेगा? उसने अपन पैसके, अपनी योग्यता के, अपनी स्थिति के, सक्षेप मे अपने बडप्पन के वणन पेश किये, जपना प्रेम जतलाया और उसके स्थायित्व की शपथ खायो । इस तरह अपना मम्मूण केस रखने के बाद मेरी सहमति चाही । पर मेरी सहमति का प्रश्न नहीं था। मेरी तो उसम हर तरह की मति और सहमति थी । मैंने आश्वासन दिया--- "कल ललित से जिन स्मा। 'दखिये, मैं नहीं जानता क्या बात है। पर मुझे ललिता वो अवश्य पाना चाहिए। मेरी उमसे बातचीत हुई है-बहुई है। वह मेरे गोरेपन से घबराती है, पर मैं उमस भी कह चुका है, आप मे भी कहता हू, इसमे मेरा दोष तो है नही। फिर हिदा मैं मीसता जा रहा है। वह कहती है, मुयमे और उसमे बहुत असर हमैं मानता हू-है। न हाता तो बात ही क्या थी। पर हम एक हुए तो मैं कहता हू, मवअन्तर वह जायगा, मैं सव अन्तर बहा डालूगा। जो वह चाहेगी सो हा वल्गा! मैंने उसे विश्वास दिलाया, में भरमारूगा। किन्तु अध्या होता ललिता को ही माफिक पर लिया जाता।"
१५४ जनेद्र की कहानिया [चतुथ भाग] . उसने कहा ललिता के भारतीय वातावरण म पले होने के कारण बिल्कुल स्वाभाविक है कि यह इस सम्म ध म अपनी आज्ञा अपने अभि- भाव से प्राप्त करे । इसीलिए उसन मुयमे कहना ठीक समया।" मैंने फिर उमे वही विश्वास दिलाया, और वह मेरी चेप्टा म सफलता की कामना मनाता हुआ चला गया। ५ अगले रोज ललिता से जिन छेड़ा। "ललिता रात डिक आया था।' ललिता चुप। "तुम जानती हो, वह क्या चाहता है। तुम यह भी जानता हो कि मैं क्या चाहता हूं। वह चुप । वह चप ही रही। मैंने सब ऊच-नीच उसे बताया, अपनी रपट ८च्छा-यदि आना हो सके तो आज्ञा—जतला दी, एसे सम्बधा का औचित्य प्रतिपादन किया (सक्षेप मे) सब-कुछ कहा। मेरी बात खतग न हो गयी तव तक, वह गम्भीर, मुह लटकाये एक घ्यान एक मुद्रा से, निश्चल खडी रही। मेरी बात खतम हुई कि उसने पूछा- बाबा का आने से आपने मना किया था ?" कहा की बात कहा ? मैं समझ नहीं पाया 'कौन बावा 'वही वुडढा सिक्व मिस्त्री।" हा, मैंने समझाया था, उसके फिजून आन की जरूरत नहीं। "तो उनमे (डिक से) कहिये मैं अपन को इतनी सौभाग्यवती नही बना सक्ती। मुझ नीच नाचीज की फिक्र छोडें।" मुझे बडा धक्का लगा । मुह म निक्ला, ' ललिता "उनस कह दाजियेगा बस । इतना कहत ही वह चली गयी और मैं कुछ भी न ममय सका। अगते रोज कचहरी से लोटा तो घर पर ललिता न थी। कालिज म दिखवाया उसकी महिला मित्रा के यहा पुछवाया। फिर उस वुडो निम्त्री के यहा दृढ़वाया। वह न मिली । वह बुडदा भी गायब था। " व्याह १५५ ६ पूरा यकीन है, पुलिस ने खोज मे कमी न की ओर पूरा अचरज है कि वह खोज काम राब नहीं हुई। पैं समझता हूं वह सिक्ख सीधा आदमी न था । छटा बदमाश है, और उस्ताद है, पुलिस की आख बचाने का हुनर जानता है। डिक को जब इस दुघटना की सूचना और ललिता का सदश मैंने गिया तो डिक बेचैन हो उठा । उमने खुद दौड धूप मे कसर न छोड़ी। पर कुछ नतीजा न निकला। डिक खुद अटक हो आया, पर वहा से भी जमे कुछ खबर न लगा सका। हम सब लोगा ने स्त्रिया के भगाये जाने और वेच दिये जाने की सबरी को याद किया, और यद्यपि इस घटना का उन विवरणो से हम पूरा मेल न मिला सके, फिर भी ममय लिया, यह भी एक वैसी ही घटना हो गयी है । वह बुडढा मिक्व जरूर कोई सी पेशे का आदमी है । चालाक है, जाने ललिता को केमे बहवाले गया। ७ कोई इसके महीने भर के बाद की ही बात है । एक दिन मेरे अदालत के ही कमरे में डिस ने आकर मुझे एक तार दिखाया। कम्वेलपुर के कलक्टर तार था । उक्त विवरण की लडकी के साथ एव बूढा सिक्न पाया गया है। वह गिरफ्तार करपे होशगावाद ही लाया जा रहा है। लडकी ने मुझसे (वलक्टर से) वोलने स इकार कर दिया, इससे मैं उसे समझाकर होशगाबाद न भिजवा मका । हमे बड़ी खुशी हुई। डिक फौरन ही कैम्बेलपुर जाने को उतावला हो उठा, पर मैंने रोष दिया- 'पहले, उसे ना ता जाने दो । देखो, कौन है कौन नहीं।" इसके तीसरे रोज मुये ललिता की एक चिट्ठी मिली। चिट्ठी बहुत सक्षिप्त थी। मैंने अब तक ललिता की कोई चिट्ठी नही पायी, कोई मौका ही नहीं आया। लिखा था- "चाचाजी, पिताजी ने याद बहुत थोडे दिन तक मैन आपदो कष्ट दिया। इसलिए " जैनेद्र की कहानिया [चतुर्थ भाग] पिताजी के नाते भी और अपन निज के नाते भी मेरा आप पर बहुत हक है। उस सबके बदले मे आपसे एक बात मागती है। उसके बाद और कुछ न मागूगी, समझिये मेरा हा हो निवट जायगा। वाबा गिरफ्तार कर लिये गये हैं । उहे छुडवावर घर ही भिजवा दें, खच उनके पास न हो, तो वह भी दे दें। आपकी--ललिता" चिट्ठी में पता नहीं था, और कुछ भी नहीं था। पर ललिता की चिट्ठी मानो ललिता ही बनकर मेर हाथा मे कापती-कापती मुझमे अपना अनु नय मनवा लेना चाहती है। अगले राज जेल-सुपरिण्टेडेण्ट न मुझे धुलवा भेजा। वही बुडता सिक्ख मेरे सामने हाजिर हुमा । आते ही धरती पर माथा टेककर गिड- गिडाने लगा, राजा जी कों वुडढे, मैंा तर साथ रहम वता। तने शतानी राजाजी' और 'हुजूर' यही दा शब्द अदल-बदलकर उसके मुह से निकलत रहे। "अच्छा, अव क्या चाहता है?" हुजूर जो मर्जी।" 'मर्जी क्या, तुझे जेल होगी । काम ही ऐसा किया है। हुजूर नहीनहीराजाजी ।" 'क्योर मेरी लहकी को ले भागनेवालातू कौन था, बदमाश पाजी?" "नहीं नहीं-नही उसके बिना कहे ही मैं ममभना जा रहा था कि वह विही विकट लाचारिमा या शिकार बनाया गया है। लेकिन उस घटना पर जो क्षोम मुझे भुगतना पड़ा था, वह उतरना तो चाहिए। इसलिए मैंने उसे काफी बह-सुन लिया। फिर उस रिहाफर देने का व दोवस्त कर दिया। छूटकर वह मेरे ही पर आया। । राजाजी उनकी गडबड गिडगिडाहट म से मैंने नतीजा निकाला यह खाती हाय है शिराय को पैसा चाहता है तुरत वह पर चला जायगा नहीं तो उससे नौकरी या मजदूरी करता ती जाय । " ब्याह मैंने उसे घर पर रहकर काम करने का हुक्म दिया। हि को मैंने सूचना दी-वह बुडढा सिक्ख आ गया है। डिक ने कहा, "उसे छुडा लिया जाय । उस साथ लेकर उसने गाव चलगे।" "छुटा लिया है। तो गाव चलोगे ?" 'हा, जरूर, अभी।" हम दोना बुडढे को साथ लेकर चल दिये। हमने देखा, बुडढा बिलकुल मनहूस नही है। बडप्पन के आगे तो वह निरीह दीन हो जाता है, पर अगर उमसे सहानुभूतिपूवक हँस खुशकर घोला जाय तो वह बडा खुश- मिजाज निकल आता है। उसने सफर मे तरह-तरह की हमारी सेवाए की, तरह-तरह के किस्से सुनाये लेकिन उस खास विषय पर किसी न जिक्र नहीं उठाया मानो वह विषय सबके हृदग के इतना समीप है कि जरा उगली छुई कि वह कसक उठेगा। सिधु पहराता हुआ बह रहा है और हम स्लेटी-पत्थरा के बीच एक पगडण्डी से चुपचाप चल रहे हैं-पैदल । एक छोटे से गाव के किनारे हम आ गये। पच्चीस तीस पर हागे। नीचे छते हैं, उनसे भी नीचे दरवाजे हैं । शाम हो गयी है। हरित भीम- काय उत्तुग पवतमालाओ की गोद मे, इस प्रशात-स्निग्ध सध्या में यह खेडा, इस अजेय प्रवाह से बहते हुए सिधु के किनारे, विश्व के इस एकान्त, शान्त, मनात और गुप चुप छिपे हुए कोने मे, मानो दुनिया की व्यप व्यस्तता और कोलाहल के प्रतिवाद-स्वरूप विश्राम लेता पड़ा है। प्रकृति स्थिर, निमग्न, निश्चेष्ट मानो किसी सजीव राग में तमय हो रही है । यह खेडा भी मानो उसी राग के मौन समारोह में योग दे रहा है । इन मुट्ठी भर मकानो से अलग-अलग, जरा-ऊची टेकडी सी पर एम नया ही छा-छू लिया हुआ झोपडा आया और बुड्ढे ने हमे खबरदार कर दिया । बुड्ढे ने उगलो ओठा पर रखकर सकेत किया-हमको यही, चुप ठहर जाना चाहिए। हम तीनो वही खड़े हो गये, मानो सास भी रोक लेना चाहते हैं, ऐसे निस्तब्ध भाव से । तभी आवाज आयी |--"अभी नही, सब खतम कर दो।
जैनेद्र की कहानिया [चनुय भाग । । तब चलेंगे।' ओह ललिता की आवाज है | डिक वा तो क्लैजा ही उछलकर मुह तर आ गया । पर हम ज्या ना त्यो रहे । एक भारी अनपट, दवी-मानो आगा के बोझ से दबी-आवाज मे सुनाई पडा- -"टिस इज ए चे चर।" हा चेअर ठीर चेअर । गो मौन।" दो-तीन ऐम लडखडाते वाक्य और पढ़े गए और इसी प्रकार उन पर दावद दी गयी। फिर उसी बारीक, उकसाती हुई और चाहभरी आवाज मे सुा पडा- 'अच्छा, जाने दो। चलो दरिया चलें। लेट स गो।" हम ओट मे छिप रहे। दोना निक्ले । ललिता और वह--वह कौन ? शक्ल ठीक नहीं दीस पडी, पर देखा, खूब डील डोल का जवान है । पटठे भरे हैं चाल में धमक है-पर सब मे सादगी है । ललिता ने उसके बायें हाथ की अगुलिया थाम रखी हैं । उही मगुलियो से खेलती चल रही है। मैंने धुडढे से पूछा-"यह कौन है ?" 'मेरा लडका-पुरमसिंह ।" शायद पुरपसिंह वह ठीक न बोल सका हो। तब उस बुडढे ने कहा 'आओ चलें देखें।" हम चुपचाप उसके साथ चले। सिधु सामने ही तो है । एक वडी-सी चट्टान के पास ऐसे खड़े हो गए कि उन दोनो की निगाहा से बचे रहें । "यू पोरस, वह क्या बह रहा है ? लाओगे ?-ला सकते हो?- कन पू' ललित की आवाज सुन पड़ी। वाह क्या बात !-लो।" कची धोती पर एक लम्बा-सा कुता तो पहन ही रखा था। उतारा और उस सिषु के हिंस्र प्रवाह मे कूद पहा । लकडी का टुकड़ा था, किनारे से १५ गज दूर होगा, हमारे देखते-देखते ले आया।
व्याह 7 हसता-दौडता आया ललिता के पास । बोला, "ले आया । बस पर दूगा नही । गोली चिक्नी लनटी है, तुरी-दूगा नही।" इतना कहकर फिर उसने वह लकडी भरपूर जोर से धार में फेंक दी। ललिता ने कहा--- 'यू नॉटी " । मैं अपने को सम्भाल न सका । चट्टान के पीछे मे ही बोल पडा-- "यू नॉटिएस्ट और बोलने के साथ ही हम तीन, उपठे सामने आविभूत हो पडे । "हलो, अक्लि! एण्ट, ओह, हल्लो, डिक । हाऊ डू यू डू, डाअर डिक? एन, ओह माई डोअर फादर-हाट लक "" यवर उसने वुडहे का हाथ चूमकर पहले उसका अभिवादन किया। सौमू माई पारम,डिक? किंग पारस ऑफ हिस्टी, माइड यू इज हो नाट एज फअर यू योर सेल्फ-डिक को वाग्विमूढ छोड पोरस की ओर मुडकर कहा, 'माई अक्लि मेरे चाचा, एड दैट माई डोअर डोर मेंड डिक, और वह दिक मेरा खूब प्यारा दोस्त ।" पोरम घुटन तक आयी हुई गोली धोती और नगा बदन लिये, डिक अग्रेज और मुझ जा के सामने इस परिचय पर हम दिया। मानो उसे हमारा परिराय खुशी से स्वीकार है। रेस अभी नही फूटी है, बदन और घेहरा भरा पूरा है आखें भोलेपन और खुशी स हंस रही हैं। मुझे यह मूर्ति स्वास्थ्य, सुख और प्रम नता से खिली हुई-मानी गढी हुई--यह मानव मूर्ति अरुचिकर न जान पड़ी। 'पोरस, यू चाचा को सिर नवाओ।" उसने दोना हाथ जोडकर सभक्ति सिर नवाया। तब डिक का हाथ बढा। उसने पोरस का हाथ 'शेक' करते १ बरे वाचा अरे ओह डिक तुम भी सकुशल होने और वाह, पिताजी आप भी। मेरा कैसा सौभाग्मा २ 'मेरे पोरस को देखते हो, डिक वही इतिहास वाला राजा पोरस याद है न ? वह क्या तुम जैसा ही सुन्दर नहीं है ?"
जनेद्र की कहानिया [चतुथ भाग]
हुए कहा-
'पोरस तुम राजा है । हम हारता है और हम खुश है।"
वैसे ही पोरस के हाथ को थामे हुए, ललिता की ओर मुडकर
उसने कहा-
"ललित डीअर, आई काग्रेच्युलेट यू ऑन योर ट्रेजर, ऑन योर
विक्ट्री, ऑन मोर किंग | इन ८ य, आई डू । हीअर'ज माई हैण्ड ।"
और ललिता का हाथ झक्झोर दिया।
"लॉग लिव पोरस, माई से-एण्ड आइ बि सड।"
मालूम नही, इसको आवश्यक्ता थी या नहीं। जिह भाग्य ने
मिलाया जो नमदा के किनारे से इतना दूर यहा मिधु के किनारे आ
मिले, उ हे और क्या चाहिए था। फिर भी मुपमे उनका बाकायदा
पाणिग्रहण करवाया गया।
बुडढा फिर मेरे यहा नौकर हो गया। पर पोरम और उसकी रानी
अपने राज्य से नहीं हटे भौर उ होने मेरी मदद भी नही ली। वही उस
झापडे म, उस हरियाली और शान्ति की गोद म और उस सिधु के तीर
ही रहते रहे।
१ 'प्रिय ललित तुम्हारी इस निधि, इस विज्य और तुम्हार इन
बादशाह पर तुम्हें बधाई देता है। सच, मैं बधाई देता है, और शुभ
मामना के प्रमाण मे यह लो मेरा हाय ।'-'मेक हेगडे' अभिवादन की
पाश्चात्य प्रणाली है यह पाठप जानते ही हैं।
भाभी १ एफ. ए. पास करने के बाद यह पता चला लेन में विनयचद्रको बहुत देने न लगी कि यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं है । इससे दुनिया में जीवन निवाहने मे कुछ बहुत सुभीता हो जाता हो, सो उस दखने मे नहीं आया । बल्कि दिस्त बढ़ जाती है। क्यामि परिस्थिति वही रहती है, आकाक्षाए बेहिसाब बढ़ बढ़ उठनी है। इन द का नाम है फ्लैग। वतमान के सत्य और भविष्य के स्वप्न को लोग एक सूत्र म गुथे हुए एकमएम न देखकर अपनी अज्ञानता से अपने भीतर जब उह टकरा बैठते हैं, तब उत्पन्न होता है विग्रह अथात् दुख । कच्ची पढ़ाई ने आगाए उद्दाम हो जाती हैं, विग्रह बढता है । स्पष्ट है कि विग्रह जितना गहरा हद जितना नीत, परिस्थितिया और आशाआ का अतर जितना दुर्लध्य, और 'जो है उसो सप्ट होकर 'जो चाहिए' उम पा जाने की आसक्ति जितनी हा अधी होगी, दुख उतना ही कष्टकर होगा । एफ० ए० वी० ए० की पढ़ाई मे ऐसा ही होता है। यह तो गनीमत हुई कि विनयचर के म पढाई के अतिरिक्त कुछ और वस्तु भी थी । ठाली बैठे वह चित्र खीचा करता था। सीखा साखा कही नही, यो बिलकुल बुरे चित्र न खीचता था 1 एव बागुरी भी उसके पास थी। इसलिए, कही पढ़ाई का जहर उमे पूरी तरह नहीं चढ पाया। इसीलिए जब दो महीने तक कोई नौकरी का सिलसिला हाय नहीं आया और गाव छोडकर अपनी अकेली मां को साथ लेकर किसी शहर में भाग्य- के लिए जा पहचन आजमाने को उसने अपन यो लाचार पाया, तब जितना और को होता उतना दुस्सह दुख उसे नहीं हुआ। मा के अकेला बेटा है और यटे को अकेला मा है। यह कहिय कि और कोई नहीं है क्योंकि जो हैं, वे इन मा बेटो के लिए नहीं के बराबर २६२ जनैद की कहानियां [चतुप भाग] नहीं है, ऐमा कोई प्रमाण नहीं मिला। एफ० ए० तक विनय क्स पड़ा, इमरा मन हाल हम नहीं जानते । हा, जानना जरूर पाहते हैं। क्याकि हम अचरज है पैस पर लिया । आजक्त की पढ़ाई के लिए जरूरी अमीरी और अपनी निपट गरीयो को इन मां-बेटा न मिलवर सीचतान करप, आज इस एफ. ए. पास करने के दिन तक किस प्रकार जोडे रसा, यह हम भी जान लेना चाहते हैं। पर अब नही चल मकता। बी० ए० के स्वप्न लेना अवश्य छोड दना पडेगा। मी सदा स ऐसी थी सो, हमे मालूम हुआ, नही है। कभी पसा पा, विनय के बाप थे, मवान दुकान और तब कुटुम्बी पडोमी भी थे। पर विनय के बाप आस मृदकर चल दिए। तव पैसा हाट-हवेली भी जाने जल्दी मे कहा खिसककर चल दिय । जैसे यमदेव का पेट छोटा नहीं है, विनय के बाप को चुपचाप खीचकर समा गया, उसी तरह अदालत, सरवार और दुनिया के और लोगो के पेट छोटे नहीं है। बाकी नो कुछ था, बेमालूम ढग मे व उमम समा गया । वह दो साल का विनर भी तब चलने को हो गया था लेकिन मा ने और चारो ओर से मखें मूदकर भरजोर क्सकर इसे परे रखा, जाने नहीं दिया। ऐसे समय शेष वस्तुओ और शेष लोगो को बडा सुमोग प्राप्त हो गया। धूल झोकने की भी जरूरत नही हुई, आखें यो ही मुदी थी । इस तरह दिन और घम दोनों दहाडते रह गये, और सब कुछ लुट गया। और गांव वालो को मानो पता भी न लगा। जाय कहा -यह प्रश्न अव मुह फाडकर सामने खड़ा हो गया। इसके हल का कोई उपाय ही नहीं दिखता। विनय के मित्रो को नामा बली इसके हल मे कुछ भी काम नहीं आती। ऐसे समय मा को बीते दिनो की एक घटना याद आ गयी । वही काम भी आयी। मा ने कहा 'बेटा कानपुर चलो । वहा तुम्हें वही नौकरी भी लग जायगी और बैठने की जगह भी मिल जायगी।' बहुत दिन की बात हुई। विनय पूरा साल का नहीं हुआ था। ये सब लोग तीय-यात्रामो रते थे। रास्ते में एक और परिवार साप हो गया था। उन पर कुछ सक्ट आया था, तभी सयोग से इनका परिचय भाभी हुआ। इनके कारण सकट से उहे छुटकारा मिला । तव कानपुर के उस प्रेमो परिवार न इह अपने से बिछुड ने न दिया। दो महीने की लम्बी यात्रा भर सब साथ रहे । उनके एक पुत्र था, जो विनय से तीन चार साल बड़ा होगा। वे भी तीन ही थे। माता पिता और पुत्र । बच्चो-बच्चो मे दोस्ती हो गयी, पिताओ में सौहाद उत्पन हो गया, और माताओ मे वह अटूट अभिन सम्बध स्थापित हुआ जो स्मरण स मिटे नही । वह मा बडी स्नेहशीला थी। अलहदा होते वक्त विनय को बहुत-बहुत चूमकर इन धमप्राणा मा ने कहा था, 'देखो जब बने कानपुर आना । जरूर आना। अपना ही घर समझना और हमे भूलना मन । और खबर अपनी देती रहना।" यह विछोह दोना और के स्नेहाश्रुओ से एकदम कसा मोठा और कैसा कडुवा हो गया या वह विनय की मा को क्ल की सी बात की तरह याद हो आया । भीतर से तब ऐसा विश्वास और स्नेह का भात उमड आया कि मा ने कहा "बेटा कानपुर चलो।' विनय अब उनीस साल का है। अठारह बरस से ऊपर हो गए इस बात को। इस बीच कितना पानी बह गया। खत पत्र एक भी नही आया-गया। एक को पता नही, दूसरे की दुनिया में क्या कुछ बीत गया। इधर विनय दुधमुहे से कालीजिमेट हो गया है, मा तरुणी से बढते-बढ़ते वदा होने के निकट आ रही है पति महायात्रा कर चुके है और सम्पन्नता को मिटाकर घर मे अकिञ्चनता आकर डट गयी है। उधर क्या कुछ न हो गया हो , ५ लेक्नि मा ने तीन सौ पसठ दिन वाले बडे-बडे अठारह बरसा के पार्थक्य को शून्य बनाकर विनय से कहा, 'बेटा कानपुर चलो।" विनय ने मालूम किया, मा कानपुर जसे बिगाने और बड़े शहर में जाने की बात किस बिरते पर यह रही हैं। कहा वे लाग न मिले तो बडी कठिनता होगी, मा।" मा ने कहा, मिलेंगे । मिलेंगे कसाही' इस जवाब की हठधर्मी और मूखता का भी कुछ ठिकान' है । विनय ने कहा, "इतनी पुरानी जान पहचान के लासरे वहा जा पहुच ठीक नही होगा, मा। और जान पहचान भी खास नहीं । और क्या पता सी जनेद्र की कहानिया [चतुय भाग] लेकिन मा हालत मे हा कसो मे नही | फिर तुम्हें वे पहचान ही लेंग, इसका भी भरोसा नही । और मा, मैं कहता हूं, किस तरह से जाकर उनीस साल पुरानी बात को याद दिलाकर तुम बनाओगी दि तुम उनक आतिथ्य की अधिकारिणो हो । मेरी समझ म तो यह ठीक नहीं है।" के हृदय को अकस्मात वेग से उठ खडे हुए विश्वास ने फैलकर एमा भर लिया है कि सहज बुद्धि से समझ मे आ सक्न वाली इन सकट की सम्भावनाआ को टिकने के लिए वहा नर ठौर नहीं मिल पाता है । मा ने कहा वही चलो, मैं कहती तो हू । नही तो तुम जानो।" किन्तु ऐसी बात जानने का जिम्मा विनय के सिर डालकर जब उस निबटारा करने के लिए स्वतत्र कर दिया जाता है तब वह अपने को असहाय अनुभव करता है । उसने कहा मैं कहता था, यह ठीक नही है। बाकी तुम कहती हो तो वही चलना होगा।" मा, 'हा मैं कहती तो है।" विनय और दूसरी जगह भी अभी दिखाई नहीं देती।" मा "राम चाहेगा तो दूसरी जगह की फिकर करने की जरूरत नहीं आएगी।" राम का भरोसा पकडकर यह मा, जो एकदम अज्ञान अंधेरे में कूद पटने का साहस रवी है, वह साहम एक-म दुस्साहस और बध-साहस है यह विनय मानना है लेकिन उधर से मां को मोडने का बल नही रखता, परन परिस्थितिवश हठात् स्त्रय भी उसी में खिचा जा रहा है। उसने कहा "अच्छी बात है चलो।' सव तयारी कर कराकर आखिर एक दिन यह मा, अपने बेटे के साथ विश्वास के उस मूक्ष्म त तु का सहारा पामे कानपुर के लिए चल पड़ी। यह तन्तु बहुत कम लोगा के हाथ आता है। खोया रहता है। दिल की तह इतना नाजुर है कि छन म लचक जाता है और टूट जाता है। साथ ही इतना अटूट है कि दिलवाले इसी पर अपना सब बोमसालार भव- सागर तर जाते हैं। - भाभी । नाला नोरान के परिवार में इन जगह सालो में धन की ओरजन की वृद्धि ही हुई है। भारसमूहा देशाचा हा ऐलाही पुरा वाचन करता रहता है। पहाते दो को कम कर दिया, कहो कोको जनसारिया। इसको र मेरे निकालकर एक समादेश की ओर काभर उपर दूसरे तमागेका सामान कर दिया। यह बस सेना शौकीन है । तो क्या हम उस्की नोरत पर हमला करें तो बात नहीं होनी चाहिए। धूतप्रेमी न होता भाग्य भास करा रहा । और परमाला बार बदला लेने वाला हो तो देवता पर क्या रह गया, आदमी ही में हुआ। सो, खेत-खेल में उनने दिनर की मां का घर उमारा तो साता धनीराम वे घर को मुलबार बना रखा है। सब आराम है, मडी दुवा है। बल्कि दो दुकानें हैं । घोडा-गाडो भी ह। और सबसे बड़कर है कामिदा जवान पुत्र, और सुशीला पुत्र या । बहू से दो शावर है। बडापुन RTE वरन का होगा, छोटी कया मोतली बोलती है, तीसरे बरस में है, बड़ी अच्छी लगती है। लाला धनीराम पर हो गये हैं, पर खूब सक्षम है। सुबह उठते हो खूब दूर घूमने को जाते हैं। उनकी पत्नी धर्मशीसा है, शरधाग सूव करती रहती हैं। विनय की मा पोडा भटकवर अत में हरा पर पर आ ही लगी। सामान धमशाला में कही छोड़ आयी पी । विनय को साथ लेती आया थी। विराम को बाहर ही छोडा, आप अदर गयीं । उम वक्त ग्यारह बजे होगे । पौके पूरह पा गमय मा ।बड़ी माजी भी और बहू भी चौके में ही थी। सालय रामू गरे भागन ने भोग मे डा होकर मोटर उलटकर बरे गौर मे गमो देव राया। कारण, मोटर चतते चलते शरारत हरणे एREAnी हो गई थी। मामी पूरी खत्म हुई नहीं, फिर यह सुगरी क्या न गयो, सी बाण माग कर दण्डविधान जारी करने पर गम RAMr होगा । इसी अपन दायित्व मे बाण होगे मोतियोगों में यस्त था और पास ही अपने भाई taim onm ३ ।
जनेद्र कीबहानियां [चतुम भाग] " - तुतली पपा सही थी। और एक और नौकरानी इन बालको की निश्चित व्यस्तता के कारण कुछ अवकाश पाकर मेज के आगे खडी होकर दपण में अपनी छवि देसन और वाला कोमपी देवर मरा ठीक करने म लग गयी थी। विनय की मा ने घर में प्रवेश करने और पिसीको सामने न पाकर इस व्यस्त बालक को सम्बोधन करने पूछा, "वहनजी कहा है बालक ने इनकी ओर देखा। पूछा, 'क्या क्या काम है पपा भी इन नवागता को देखती रह गयो। मानो भाई ने न पूछ लिया होता तो यह जवाब-तलब करने को तैयार है ही कि 'क्यो क्या काम है।'' मा न उत्तर दिया, उनमे कहो कि कोई आपमे मिलना चाहता है।" अब तक अपनी छवि देखती हुई उस दामी को भी चेत हो गया था। इस बावे श्याम मोदय के आगे भी वह वहार का छोकरा क्या इधर उधर आव डालता है और लोग क्या इतने मूख हैं कि वे इन चरणा में आकर नही लोट पोट होते पण द सामने खडी होकर वह यही बातें सोचने में लगी थी। और इसी मिलमिल में अभी हाल उसने पता पाया था कि बायी ओर के वान जो माथे के आगे लार चिपकावर, बर डालकर फिर पीछे को ले जाय गये है वे कम आगे आय हैं। घी स उहे और लाने का उपक्रम करती ही थी कि यह औरत आ कूदी। उसने झपटकर सामने पहचकर कहा 'क्या कहती हो क्सेि चाहती हो?' कहने के साथ ही एक निगाह में उमने भर से नीचे तक उसे देख लिया। मा ने दीन होकर कहा ' मैं पृछनी थी कि बहनजी कहा है ? कौन भनजी" वही जिनका यह घर है?" "किन का परह? 'बहनजी का । उन्ही को मैं पूछती हू" "अरे तो फिर वह कौन हैं लाना धनीराम का नाम तो वह जानती है लेकिन उसका नाम इस मौके पर से या न ले यह नही जानती। उसने कहा, "मैं बडी दूर से जायी हूँ। उही के लिए आयी हूँ।
भाभी "प्रया काम है "काम तो क्या, मिलने आयी है।" "क्या मिलने आयी हो?" "या ही मिलने आ गयी हूँ ।" दासी ने कहा मिलने आती हो तो फिर कभी आना । अभी वह नहीं मिल सकती।" उस समय बालक रामू ने जोर से चिल्लावर कहा, 'अम्मा, कोई तुमसे मिलने आयी हैं।" मा जी ने चौके मे से हो जोर से आवाज देकर कहा, "कौन है ? उहे रूपर कमरे मे ले आ।" बालक ने कहा, "चलो। बुलाती हैं।" मा के गये प्राण लौट आये। वह ऊपर कमरे मे गयी और भाति- मालि की चीजो मे भरे हुए उस कमरे मे पहुच र सोच र सकी, क्या करना चाहिए खडी व उमे देवनी रहगी। थोड़ी देर म घर की मालकिन का आना हुआ। अभ्यर नापूषा बठार पूछा, कहा से आमा दुआ? मेरे लिए क्या काम है ?" उन्होने कहा 'बहनजी, मुझे पहचाना नही?' लेकिन बहनजी अब भी पहचान न मकी। विनय की मा की आलो में आसू आने को हो गय। अपने को पहचानवाला होगा, यह कैसी विड- म्बना है । बडा बल लगाकर बोली, 'यो ही मिलने चली आयी और मुछ वाम तो नहीं था।" "चली आयी तो अच्छा ही किया। यह तो तुम्हारा ही घर है- लेकिन मुझे बिलकुल हो याद नहो, मैंने कब और कहा आपको देखा। मेरा असा दुर्भाग्य है कि मैं भूल जाती है । याद मेरी एमो ही है बड़ी कन्ची है। आप मुझे जरा तो मदद कीजिये, फिर सब याद आ जायगा।' विनय की भा ने कहा, "जिसको सुनने अयोप्याजी मे बहन बनाया पा, उसे भूल जाओगी बहनजी" एक ही झटके म स्मति का द्वार खुल पग और बहामी ग Tww. उखहरर ऐसी सामने भाती चली गयी जैसे द्वार के उस और सरपट दौर - १६८ जनेद्र की कहानिया [चतुथ नाग] आने के लिए अवसर पाने की प्रतीक्षा कर रही थी। उस समय गले मिलकर, हंसकर, बोलकर तरह-तरह से उन्होंने अपनी प्रसनता प्रकट को और आग्रहपूवक विनय की मा के अब तक के दिना का इतिहास पूछकर जान लिया। विनय की मा किसी विधि से अपने को रोक न सकी। स्नेह क आगे गोपनीय क्या कुछ रखा जा सकता है और यह भी कह दिया कि वह उ ही क आसरे का भरोसा बांधकर दुनिया में जी रही है और यहा ना गयी है। रामू की दादी ने पूछा, अच्छा, सामान रहा है? "धर्मशाला में रखा है।" 'क्यो, बहा ना रख छोडा और दिनू कहा है ?" "यह तो बाहर ही होगा।" 'हैं वाहर ।' कहकर रामू को आवाज दी। रामू को कहा कि बाहर कोई सडे हैं उहे यहा ले आ। रामू के चले जाने पर विनय की मा से कहा, 'तुम्हारे पोते पोती हो गये और विनय बडा ही न हो। गिरधर यहा नहीं है क्या वह तो अब दुकान पर होगा। वही रहता है। मब काम धाम उमीके ऊपर है नही तो नौकर लोग सभी आ पहुया रामू विनय को लेकर। विनय की युवावस्था की विनयशील और शर्माती हुई मुद्रा को देवर इस महिला के जी म आया कि किसी तरह इस विनयारमा लजीले युवक को प्रत्यक्ष हो जाता कि वह मुश्किल से एक माल का त हा खिलौना मा था, तब वही किन तरह निलंग्ज और जद्धत होकर मुह हाय म मिट्टी लपेपर मैरी गोद में बेधडा पड़ा चला आया करता था। तब यह मेरे सामने अजनबी-मा बन पर पड़ा होना भूल जायगा । खोन, ऐमा बना खडा है जैस मेरा उसस कमी वास्ता नहीं रहा जैन मैं उम भी जान ही नहीं सकती। कहा, 'सग क्या है बैठा नहीं जाता।" विनर एक जगह मार मषित हार वठ गरा। उसरी माने कहा "यह तरी मामेभा ज्यादा मां है सनमा' इसपर साहस पर विनय मैं इन नदी मां को देखा। उहाने पहा, 7" " भाभी १६६ " "इतना बडा हो गया, फिर भी डरना क्यो है' विनय झेंप रहा। ? सुबह स कुछ खाने को नहीं मिला है क्या." इतना कहा और कहने के साथ ही उह सचमुच इन मेहमाना के खाने का स्थाल हो आया। पूछा, "अभी तो तुमने कुछ भी क्या साया होगा और मैं बातो मे लगी रही। बहू, देखो इह खाना खिलाना। जा भई, शर्माने की यह जगह नहीं है। रामू, सह ले जा।" आकस्मिक, अप्रत्याशित रूप मे जब हृदयतन मे ऐसी आवभगत सिर पर बरमी पड़ रही है, तब किस प्रकार वाग्विमूढ हुए बिना रहा जाय गमू विनय को लेकर चला तो। चौक के द्वार पर वह तनिक ठिठक रहा। वही से रामू ने कहा, "भाभी, अम्मा ने 'हे भेजा है। यह खाना पायेंग।' भाभी जिनको कहा गया, जहान झटपट उठ उठाकर पटडा विछा दिया, पाली ला रखी, पानी भरकर रख दिया और फिर खुद चूल्ह के पाम पहुच गयी। इस वक्त तक विनय भी उस कमरे में प्रवेश कर चुका था। इस बालक क बराबर हो अपने को मानकर, उसी के सुर मे सुर मिलाकर वह अव इहें भाभी ही समझ लेग । चुपचाप वह पटडे पर बठ गया। आज जीवन म यह उसका सा दिन है। दिल उछल रहा है और वह पवडा रहा है। इस देवताओ के घर म उसे लावर अवगुण्ठनवती अन्नपूर्णा के सामने ला विठाया गया है। वह क्या किसी तरह यहा स शूय होकर चुपचाप वितीयमान नहीं हो जा सकता। क्याकि बिछुआ को रुन अन जो अभी शा त हुई है वह उसके काना मे बज रही है और उसकी दृष्टि उन चरणा म हठ करके जा पहुचना चाहती है जो यहा वह डाल- पर, एक निराला सगीत उत्थित करक, उसकी गूज अवरोप छोडकर अब चुपचाप उस देवी का सुकोमल भार अपने ऊपर लिए अलकृत और धय होकर विराज रहे है। और वह अपनी दष्टि को किसी भी तरह वहा तक नही पहुचने देना चाहता। चाहता है, यही मै मर जाऊ और ये च गरी मुआखों को ठोकर मारकर स्मश कर जाय । यह मेरे लिए बहुत है।
३ जैनेन्द्र की कहानियां [चतुर्म माग] खुली आखा से मैं उहें नहीं देख सकगा। जीवन मे पहले रोज आज स्त्री उमये मामने पूण वदा यता, भक्त- वत्सलता अपने स्नेह स अलत वरदा देवीमूर्ति के रूप म आयी और अपने को उसने उसके समक्ष तनिक कृपा मोर के अनुग्रह के मिभार्थी भक्त ये रूप में पाया। अब हम अपनी 'भाभी' के पास आ गये हैं। यहा से हमारी कहानी का आरम्भ होता है। थाली म आख गाडकर धीरे धीरे उसने खाना आरम्भ किया, लेकिन बडी कठिनता होती है । मुह मे जो कम ज्यादा ग्रास जाता है इसकी पवाह बिलकुल नहीं है। पर पाली की जोरही दखने रहने का जो अत्यधिक ध्यान रखना पडता है यह मुश्किल है। जब किसी के हाथ आग बनकर विनय की थाली मे रोटी डाल जाते हैं, तब मुश्किल बहुत अढ जाती है । वह हाथ झटपट बढते और काम करने पर उससे भी शीघ्र सिंच जात है, कनी ऊगली के पासवाली उगली में सोने का छल्ला पडा ह, वे हाय बडे चतुर हैं बड़े गोरे गोरे है। क्या वह उह देखना चाहता है ? नही, उहे विलपुल ही देखना नहीं चाहता। पर वही जब बढकर आगे आ पडते हैं, तो क्या किया जाय ! थाली के सिवा किसी भी तरफ देखने से उसे सरो- कार नहीं है दच्छा नहीं है, यह उमया भगवान जानता है। लेकिन आखो का क्या करे जो थाली की परिधि म घिरकर चुप सीधी तरह होकर बठती नहीं, इधर उधर थोडी-बहुत उठ ही जाती है। ऐसे आयातक यत्न की क्या भीड आ पड़ी है। कोई है थोडे ही जो उसको आखा की चौकसी बरता बैठा है। किसने चाहा है कि वह पाली म ही आखें गाडरवठा रहे? कोई उसने इस यत्न की प्रशसा करने वाला नहीं है। यह यत्न सरासर अनावश्यक है । घूघट द्वारा सुरक्षित कुल वधू रोटी पे जलन न जलने म वडी व्यस्त है इस यल को समझ-देखने को अवसर उसक पाम नहीं है, इसमे व्यतिकम पडे तो उसको भी पर्वाह करने पी फुमत उम नही है। पर, हाय, विनय यह सब-कुछ नही जानता । वह नहीं देख सकता, नही भाभी । देख सकता । कैसे दख सकता है। लेकिन भाभी क्या कभी १५-१६ वप की नही रही, कि जब विवाह हुआ न होगा, किंतु विवाह को प्रतीक्षा की आशा स्वण रेखा की भाति उसे स्वप्नाकाश ५। प्राकी दिशा में उदित होपडी होगी और वह उसे विस्मय से देखकर पुलक्ति होती होगी। जब रब ऋतु उनके निकट यस त होगी, और विश्व प्रणय स पूरित होगा। जब वस्तुमात्र उनके हृदय मे हिलार उठा देती होगी, जो उनकी देह को कटक्ति करके, फिर उसम से फूटकर सुख की सिहरन की तरह मह्माण्ड न व्याप्त हो जाय । जब घूघट उधर मुडने की धमकी देता है, तब थाली पर बैठे इस वाल युवक की आखें जो तनिक-तनिक ऊपर उठने का साहस कर रही हैं एकदम मुडकर थाली म आ जमती है-कभी किशोरिका रही हैई भाभी ने बिना देमे भी यह सब देख लिया। तब इस अवोध अल्हड सलोने मुषवाले बालक के पनि आत्मीय स्नेह के भाव से उनका हृदय भर आया। यह भाभी का प्यार था जो मा का प्यार नहीं होता क्याकि उससे स्निग्ध होता है, स्त्री का प्यार नहीं हाता क्याकि उसम निरपेक्ष हाता है। वहन का प्यार नहीं होता, जो क्रमश पुष्ट परिपक्व होता है, यह जसे सोता फूट निकला, हृदय मे स स्वत स्फुरित होता है, फिर भी यह सब कुछ होता है। भाभी ने अब में अपनी वाणी स्फुट करके, घूघट के भीतर से ही, रोटी देते हुए कहा, 'लो।' विनय ने यह मुन लिया। उत्तर में बोल नहीं सका। हाथ थाली के ऊपर फला दिये जिसका आशय था कि वह रोटी नहीं लेगा। हाथा के बीच में किसी तरह रोटी को थाली म छोड देने की भाभी न चेप्टा की। हाया को यूथ अच्छी तरह फैलाकर विनय थाली को ऐसी पूरी तरह ढककर बैठ गया कि रोरी वा पडदा सम्भव न हो सका। भाभी जब अपनी चेष्टा मे कृतकाय न हो सकी तो उन्होने हाय पर हो गोटी छोड़ दी। विनय को आशा क्या कभी इम स्वग ता पहुच सकती थी। बिना आयास के अब वह बोल पडा, "यह रोटी ऐसी ही पड़ी रहेगी। मैं नही - १७२ जनद्र की कहानिया [चतुर्थ भाग] खाऊगा।" भाभी ने उसकी इस बात का कोई उत्तर नहीं दिया, जैसे पर्वाह ही नहीं की। वह अपने काम में लगी रही। विनय ने फिर कहा, "यह जव स्ती करनी अच्छी नहीं होती। मैं नही खाऊगा।" भाभी ने उत्तर में करछी मे साग लिया और उसकी थाली में डाल दिया। विनय अपने हाथ फैलाकर न रोक सका। विनय इस पुण्य प्रसाद की रोटी को छोड दगा तो जीवन म पाएगा क्या? वह पूरी रोटी सतमकर चुपचाप उठकर चला गया। ४ घर में कुछ हिस्सा इन मा बटा को रहन के लिए दे दिया गया है। मा नहीं चाहती कि इस प्रकार दूसरे के अनुग्रह पर रहे लेकिन घर की मालकिन तो अभी किराये की बात सुनने को तैयार नहीं है । कहती हैं.. घर तुम्हारा ही है और विनय कमाने लगेगा तो चाहो तो किराया भी दे देना। मां को लाचार होकर मान लना पडता है। विरोध म आग्रह करें, ऐसी परिस्थिति भी नहीं है। रहते रहते एक दिन लाला धनीराम और गिरधरप्रसाद की सहायता और उद्योग से विनय की एक दफ्तर म नौकरी भी लग गमी । वह ३५) लाकर प्रति मास मा को देने लगा। मा ने अब किराया देना भी आरम्भ कर दिया । अव मानो वह अपने हर के बल पर यहा रहने लगी। पर विनय कवक कुछ नहीं जानता। अपने को इन लोगा का कृपानुजीवी ही मानता है। मौका हो तो वह इनकी चाकरी में अपना जीवन बिता दे। इनके हाया जो स्नह और आदर उसने पाया है उसकी मत क्या रुपया मे आकी जा सकती है। क्या उससे भी बढकर दुनिया मे कोई चीज है ? वह जीवन को हिमाव की बुद्धि स नहीं देख पाता। इमलिए दुनिया में बाजार म जीवन का कोई वहा लाभकारी सौदागर सोगा, ऐमी आशा नहीं की जा सकती। यह ३५) चुपचाप से आता है, औन न ज्यादा पिता करता है न यत्न किहीं से और भी उसे ज्यादा भाभी १७३ मिलने लगे। लोगो ने कहा भी है कि उनकी जनी योग्यतावाले को आनानी से तनिक चेष्टा करने पर ६५) कोई भी दे सकेगा। पर उमे इस पर भरोसा नहीं होता। उसे समझ नहीं आता, वह विधर से योग्य है इसलिए ३५) जो पाता है उसके एवज म वह मालिका का पयाप्त से अधिक कृतज्ञ रहता है, अस तुष्ट बिलकुल नहीं रहता। इसलिए, जिमे बेईमानी कहा जाय, वैसा भाव उमम उपजन नही पाता, वैमे काम की बात तो दूर रही। सक्षेप मे हम कह-वह बुद्धिमान् नही है। जब आदमी यहा मिले एक एक खाली मिनट को काम से और सतत चेष्टा से भर, दुनिया की दौड म आग से आगे जान म लगे हुए हैं, तब यह अपने खाली वक्त को खाली ही रखता है। जिमे ममझदार आदमी काम समझ सकें, ऐपी कोई भी बात वह नौकरी स बचे हुए खाली घण्टा मे नही करता। पदमा नाम की उस तोतली लडकी के साथ तुतलाकर बोलने में और उसे चिढाने मनाने मे घण्टा गवा देता ह और रामू के साथ तो बडी-बडी शरारतें करता है। जब ये और ऐसे ही माथी उसको नहीं मिलते, तब बैठकर चित्र खीचने लगता है। नही तो उठकर चल देता है और बाग मे बसरी बजाता है। ठाली बैठे कभी कुछ लिख भी दता है। उसके पास इधर-उधर के कुछ अखबार आ जाते हैं, पैसे बचाकर कभी-कभी किताबें भी कुछ खरीद लेता ह । यह घर वैसे लाला लोगो का घर है। उन्हें रुपया कमाने मे व्यस्त रहना पडता फिर कमाये हुए धन को रखने की चिता में व्यस्त रहना पडता है। उनके मिनट मिनट की कीमत है। उनका ससार मुद्रामय है । परमात्मा के इस विश्व के साथ रुपया कमाने के प्रयोजन के रास्ते ही अपना सम्बध इ होने जोडा है। नहीं तो यह अलग हैं दुनिया अलग है । रुपया आने-जाने के माग के कारण ही दोनो मे मम्बध है। यह दुनिया म से अपने अर्थ की प्राप्ति करें और दुनिया इनके निकट अथ उवर क्षेत्र रहे---इस घर के पुरुष ससार के साथ इसी रिश्ते को धारणा पर जीवन चलाते हैं। और घर का तत्र पुरुषो के हाय मे रहता है। इन सब कारणा से घर मे अखबार शखबार नहीं आया करते । वितावो मे भूतनाथ, चन्द्र कान्ता को जिन्हें हो सकती हैं, और विशेष किताबें नहीं हैं।
। १७४ जनेद्र की कहानियां [चतुर्य माग] इमलिए रामू जब विनय के पास रिसी अखबार म से तरह-तरह की तस्वीरें और जगह-जगह की विधिन खबर देव-मा पाता है तो बडा खुश होता है। वह जब-तब विनय ये कमरे म मा पहुचता है, और उसकी अनुपस्थिति म भी बिताया और पत्रा में पान उलट-पलटकर अपना मन बहलाया करता है । मौका पाकर इस तरह की चीजें वह कार भी ले जाता है, और अपनी भाभी को और अम्माजी को दिखाया करता है। भाभी और अम्मा बडी पुश होती हैं। भाभी तो एकाध बार रामू के साथ स्वय आकर विनय की अनुपस्थिति म उसके कमरे की जाच पडताल कर गयी हैं। अब उनमे इतना साहस मा गया है कि रामू के भी साथ का आसरा न देखें, और खुद विनय कि किताबो की तलागी लेना आरम्भ कर दें। विनय को यह मब-कुछ भी मालूम नहीं है। एक दिन ऐस ही अकेले आर भाभी ने कोई क्तिाव देखने को उठाई। उमे खोलकर पने एकाध उलटे ही थे कि एक कागज उसमें से निकल पडा । उस दावा, और देखती रह गयी। वह एक चित्र था, पेंसिल से बनाया हुआ था।-कोई महिला परली तरह नह किये हुए खडी है। एक हाथ से दरवाजे की चौखट पर उ रखी है एक पर दहलीज पर रखा है, दूसरा नीचे है, उस पर पर से इसलिए जरा घोती उठ गयी है, और उसकी पिंडलिया तर का कुछ भाग उघड गया है । उसी तरह उठे हुए हाथ की धोती जा सरकी है और कोहनी तक बांह प्रकट हो गयी है । उगली में छल्ला है दो काच की और एक सोने की चूडिया पड़ी हैं। वह बिलकुल मसावधान है दूसरी ओर किसी से कदाचित् कुछ बात कर रही है। भाभी तस्वीर देखती रही, देखती रही । फिर किताब को सभालकर वही-का-वही रख दिया, तस्वीर को पास मे रख लिया और चली गयी। शाम को लौटा विनय । उसे तस्वीर को पूरा करने का ध्यान था। वह अभी अधूरी थी। उसने क्तिाव को जो छोला तो तस्वीर थी। उस वडा अचरज हुआ। समझा, भूल हो गयी। और किताबें देख डाली, तस्वीर नहीं मिली । और जहा रखने की सम्भावना हो सकती थी, वहा देख ली। जब कही न मिली तो बडा सोच थापा | आवाज देकर राम को मुलाया--"राम, तुमने कोई तस्वीर देखी है ?" रामू ने कहा, "कसी - भाभी १७५ तस्वीर ॥ विनय "तस्वीर कमी मामूली तस्वीर । किसी किताब मे तुमने तस्वीर नहीं देखी?" रामू, "बहत-मी किनाबा में बहुत सी तस्वीरें देती है। आप जाने क्सि पूछते हैं।" विनय, "अरे, बहुत-मी नही। इम विताव म मैंने एक खीचकर रखो यो । अभी अधूरी थी। तुने नही देखी।" रामू, "मैंने नहीं देखी।" विनय, "नही देखी तो कहा गयी ? यहा तेरे सिवाय कौन आयेगा?" रामू, “मने नहीं दयी, मैं कहता हूं। मैं लेता तो बता न देता ?' विनय, "जावे भाभी से पूछो, हमारी तस्वीर कहा गयी। अभी हमने पूरी भी नहीं की थी।" रामू "हा हा, उहान ली होगी।' रामू दाटपर भाभी के पास गया। बोला, "विनय बाबू तस्वीर की पूछते हैं । तुमन कोई तस्वीर देखी है ? उहाने किताब मे रखी थी, अब नहीं मिलती।' भाभी ने साश्चय कहा, 'कैसी तस्वीर ? मैं क्या जानू ? मैं जैसे उनकी चीज चुराने को बैठी है।" रामू ने आकर यही बात विनय से कह दी। विनय को गुनकर बड़ा अफसोस हुआ कि क्मो उसने राम का भाभी के पास पूछन भेज दिया। कहा, "हा ठीक तो है। वह कोई यहा आती है जो ले जायेंगी। मेरी भी या मत हुई कि उनम पूछ बैठा।" रामू ने कहा, "यहाँ तो भाभी कई बार मेरे सग आयी हैं।" विनय, 'यहाँ आयो हैं?" राम, "हां, यहाँ आयी हैं । मेरे सग आयी हैं । हम दोनो खूब निता देखते रहे हैं' N यह सुनकह विनय फिर एक क्षण न ठदर मका । सीधे भाभी के पास जाकर बोला, "भाभी, तुमने मेरी तस्वीर ती है । अभी यह ठीक नहीं हुई है. मुझे दे दो।"
जनेद्र की कहानियां [चतुर्य भाग] भाभी इस अनपेक्षित उपद्रव पर ठीक समय पर ठीक ढग स जल्दी मे घूघट नहीं काढ़ सकी। यह बैठी हुई थी, विनय क आने पर, और मुछ बोली नहीं । विनय ने फिर वही बात कही, 'तस्वीर मेरी मुष दे दो।" भाभी ने कुछ उत्तर नही दिया। यह उठवर चुपचाप दूसरे कमरे मे चली गयी। विनय लज्जित होकर चुछ क्षण वही सग रहा। समझ म न आया, क्या परे ? लौटकर आया मा जी के पाम । देखे, तो वहा पास ही भाभी बैठी है उसने मा जी मे कहा, "माजी, देवो भाभी जी ने हमारी एक तस्वीर रस ली है। हम कहते हैं हम दे दा, अभी वह पूरी नही हुई है। यह देती नहीं है।" मा जी को यह लडा वा अच्छा लग रहा है । उहाने हंसकर पूछा। "तस्वीर कैसी?' विनय, "मैंने तस्वीर खीचनी शुरू की थी। किसी न किताब मे स निकाल ली।" मा, "फिर तुझे से मालूम इसने ले लो।" विनय, "इनस ही पूछ लो।" मा जी ने भाभी - कहा, "ली हो ता दे क्या नहीं देती-दखू सी तस्वीर है" भाभी ने घघट ममें धीर से कहा, 'या ही रहत है। मैं स जानू कमी तस्वीर मा जी ने और ज्यादा हंसकर पहा, 'यह ता कहती हू, मैं कुछ नहीं जानती। इसने नही ली होगी, तग भरम है। विनय, "नही ली होगी तो यह जानें । लदिन फिर किसने ली? मा जी वह रही फिर देव मिट जायगी।' विनय ने कहा 'मिलती विलती ता अब क्या है। और गयी है तो जाने दो। लेकिन अभा अधूरी है। किसी ने यह अच्छा नहीं किया, जो ले ली। इतना महकर जब यह लौटकर आया तो सारी याद यह भूल .
भाभी गया था। एक और तरह का दुख उठा है जो उसके हृदय में प्रदेश प्रदेश में समाता जा रहा है। उसे दुख हो रहा है कि वह बिना सोचे समझे विस हिम्मत पर तस्वीर का आरोप भाभी के सिर लगा सका? क्या वह इतना बेवकूफ हो जाता है ? क्या वह चुप होकर नहीं बैठ सका, वहा भाभी के मन को क्लेश पहुचाने के लिए ऊधम करता पहुच गया? मां जी के सामने तक भाभी को लज्जित करते उसे लज्जा नहीं हुई? हाय वह क्या-क्या पर बैठता है। भाभी क्या सोचेंगो, मन में मुझे क्या कहती हागो उसका बस चले तो अभी भाभी के पैर पकड़कर अपराध का प्रतिकार कर डाले । पर, बम नहीं चलता, बेवकूफी के आवेश मे जिस अन्तर को लापकर एक्दम से भाभी के साथ झगडने पहुच गया, वह अन्तर प्रात भवस्या मे वास्तव मे दुलभ्य हो जाता है। मन मे जो दुस्सह क्षोभ और आत्म तिरस्कार का भाव धुए को तरह उठ ठकर घुट रहा है, साभाभी से सफाई का क्षमा याचना का एक भी शब्द बहन का मोका क्या यह ला सकेगा-से ला सकेगा? क्योकि प्रतिस्थ अवस्था म वह भाभी की परछाइ का भी सामना नही कर पाता है इतना डरता है स्नान घर जाते समय विनय के कमरे के पास भाभी गमियो मे सुबह शाम दोपहर जब चाहे नहाने लगती है। बहुन नहाती हैं। शाम को अवश्य नहाता हैं । उहें क्या मालुम आज विनय इस समय कमरे मे ही मौजूद है। स्नान लिए जाते हुए जो अनायास उन्हाने खिडकी मे से कमरे में झाका तो देखा, विनय । इमसे पहले कि भाभी का मुह झुक्पर नीचे हो जाय, विनय ने भी उसे भरपूर दख लिया। वह मुह हँसता सा था, क्लेश से खिन्न नहीं था और यह भाभी की मानलिक मूर्ति जो उसके चित्ताश में यहा से वहा तक फैलकर उसमे गहरा मनस्ताप उपजा रही थी म्लानमुख थी। वह किसी तरह उसे प्रसन वदन देखना चाह रहा था, पर उसका यह प्रयास और यह इच्छा मिल्कुल विफल होरहो यो । अब उसने देख पायी भाभी की सचमुच की खिलती हुई यह मूर्ति तो उस बडा आह्वाटवार विस्मय हुआ। वह मा खड़ा हो गया, आगे बढ आया, जोर से बोला भाभी !" भाभी भी तनिक ठिठक गयी थी, और ठिक के बाद अब आगे बढ़ गुजरना होता है।
१७६ जनेद्र की कहानिया [चतुथ भाग] . 'भाभी" जाना चाहती थी। तभी उहाने जोर स कहा गया यह सम्बोधन सुना- वह ठहर गयी। कमरे की देहली पर हाथ से चौखट पकडे घूघट वाली भाभी के सामने वह दोबारा इतना ही-भाभी।" कह सका और रुककर खडा हो गया। धीरे स भाभी ने कहा, "मा जी से य' तुमने क्यो कहा? कोई जरूरत थी ?" भाभी की वाणी सुनकर आत्म-अभियोग की उसकी ग्लानि विषम नहीं रह गयी। उस वाणी म अभियोग लगाने जमी ध्वनि नहीं थी । बस्न दावेदार बनकर उस अभियुक्त बनाने वह नही आयी हैं। विनय ने कहा, "मुझे इसी बात का बडा सोच हो रहा है।" भाभी ने कहा, "मैंन तस्वीर ली भी तो उनसे कहने से क्या बनता है?" विनय "तस्वीर तुमने ली है?" भाभी 'क्या नही लूगी, जब चोरी करके तुम मेरी तस्वीर बनाते हो।' ओहो । यह बात है ।। ऐसी बात वह जानता तो क्या कभी किसी से कहता? ऐसी बात की खुशी म, किसी से कहकर, भला वह अपना फ्जूिन साझी बनाने वठता। ऐसी बढिया चोरी की बात का तो वह अपन मन म ही दुबकाय रखता । बोला, 'तो तुमन मुझे बताया क्यो नही ?" भाभी, 'हल्ला मचाकर तुमने जान तो लिया लेकिन यह ठीक नहीं है।' क्या ठीक नहीं है सो वह कुछ भी न समझ सका। तस्वीर ठीक नहीं है कि तस्वीर का बनना ठीक नहीं है या एकदम से वह खुद ही ठीक मही है । वह चुपचाप सहा रहा। शायद उस या जाय कि पया बात ठीक नहीं है। भाभी ने तस्वीर निकालकर देते हुए कहा 'लो।' और वह जाने यो तैयार हो गयी। विनय ने कहा 'तो ठीक क्या नहीं है?'
भाभी १७६ भाभी ने कहा, M भाभी ने क्षणेक ठहरकर कहा, मेरी तस्वीरें मत बनाया करो।" विनय ने पूछा, 'क्यों ?" "मैं ऐसी मोटी मोटी हूँ विनय ने कहा, "अभी तस्वीर पूरी पोडे ही हुई है ? और तुम दुवली भी नहीं हो।" भाभी, "नहीं, सुम तस्वीर मेरी मत बनाया करो।" विनय ने हंसकर कहा, "अच्छी बात है।" और भाभी चली गयी। ५ इस तस्वीर गली बात का आदि लेकर और और छोटी मोटी बातें घटने लगी जिन्होंने इन दोनों के बीच की दूरी को उड़ा दिया। भाभी को कोई दवर प्राप्त नहीं था और देवर स्त्री के जीवन में आवश्यक वस्तु है। एक देवर चाहिए, जिसको अवसर बनावर, हँसी-शेल-कूद और प्रमोद- विनोद की स्त्री को घपल-सुलभ आमोदात्मक वृत्तिया खिल-खुलकर, वृप्ति लाभ करें। पति के साथ पत्नी एक उत्तरदायिनी, भारवाहिनी, कतथ्य और अधिकारो को झझटो के बीच प्रतिष्ठित, धोर, गम्भीर गृहस्थिन है। जीवन का निद्वद आमोदमय अश पति के साथ पूर्ण आत्मलाभ नहीं पाता, इसलिए भारतीय गाहस्थ्य म देवर का एक विशिष्ट स्थान बन गया है । वह स्थान अपना अलग है। उसके बिना स्त्री के जीवन मे एक अभाव विद्यमान रहता ही है। भाभी ने मानसिक विश्व में खाली पड़े देवर के स्थान मे धीरे धीरे विनय का प्रवेश हो चला । उसको पाकर भाभी सब झझटें भूलकर, कभी- कभी बिल्कुल बच्चा बन जाती हैं, बच्चा, जो निद्वन्द्व है, जो बस खेलता हँसता है, रूठता और मनता है, जिसका रोना भी हंसने का एक प्रकार होता है और जिसका रूठना मन ने के लिए होता है, जो शुद्ध तलाल में वास करता है, जो मुक्त जीव की पूण-से पूर्ण प्रतिकृति है। ऐसा मौका जीवन में उन्होंने पाया है, जिसके लिए न जाने क्या भीतर से कब का अकुलाया बैठाया। सेकिन अभी धूषट बीच मे अटल रूप मे वतमान है।
१८० जनेद्र को कहानिया [चतुथ भाग] जब भाभी को उसने तस्वीर न बनाने का वानिक आश्वासन दिया था तभी उसने एक बहत स्थूलकायिक भाभी का वडा चित्र तयार करने का मनसबा बाध लिया था। अगले रोज से ही वह उसकी 'रफ रूप रेखा बनाने म लग गया। दफ्तर जाने से पहले पहले उसे खत्म कर लिया और उसी पिताब मे उसी स्थान पर रखकर चला गया। जब बडी शीघ्रता से बात मानकर विनय ने कह दिया कि वह नस्वीर नहीं खीचगा, तब क्या भाभी को पूरा चैन हो गया था? या कोई कह सकता है कि वह वैसा चैन चाहती हो यो देखें वह खोचते हैं या नही, बीचते हैं तो कैसी खीचते हैं ?'-~~उस समय के बाद कुछ ऐमे भाव से वह आतुर रहने लगी और मौका पाते हो अगले दिन विनय के कमरे में जा पहुंची। यहा मिल गया उह वही 'रफ' चित्र-एक पयाप्त से अधिक स्यूल महिला एक दूर खडे बच्चे को जो उहे चिढा रहा है कुछ हंसी में और कुछ शोध मे मारने को दोड जाना चाहती है, इस आपास म कमर कुछ- कुछ झुक गयी है, घुटने वल खा गए हैं, एक हाप जरा आगे को, एक घोडा पीछे को पड़ गया है, सब मिलाकर विलक्षण-सा हुलिया हो गया है। इसमें भूल नही हो सकती कि यह तस्वीर भाभी की है यद्यपि अत्यन्त अममान और अतिरजित है। भाभी ने चाहा हैंसना पर आया गुस्सा। यह आदमी ऐसी बात करेगा? मैं ऐसी हू ? मैं नहीं और लार पेसिल लेकर जोर से गाकर उस तस्वीर पर इस कोने से उस कोने तर एक लवीर स्वीच दी, फिर दूर के चौथे कोने को मिलाती हुई एक और लकीर धीची। फिर बीचो-बीच दे पाट के बिन्दु पर चौहाईनुमा एक सीधी। पिर सम्बाई-नुमा। फिर इस बिदु सो उसमे मिसाया उसको इममे । इस तरह एक पना लकीरों का जाल-सा उस पर सीपकर, जहाँ तस्वीर मा मुह पा वहा, वृत्ताकार पेसिस को जल्दी-जही बार-बार घुमाया । यह सब कामरने के बाद उसे वही रस दिया और घमी पापों। आपरदेसा विनय ने। उसने उमे कागज की तहाँ में मपेटा उसने कार एक रेसमी माल निवास पर सपेटा और वहाँ अपनी बीमती भाभी १८१ चीजे रखता था, वहा बड़ी सुरक्षा के साथ रख दिया। शाम को भाभी ने दो बात करने का अवसर निकाल लिया। कहा, मैंने कहा था, मेरी तस्वीर मत बनाना। फिर क्यो बनायो, और ऐसो खराब।" विनय ने कहा, तुमने ठीक ही किया जो उसे बिगाड़ दिया। मैंने अब फाटकर फेंक दिया है।" भाभी, मैं कोई ऐसी हूगी जैसी तुमने बनायी ? ऐसी होगी, तुम्हारी बहू । मैं तो बच्चो को नही मारती । वही आकर मारा करेगी और उस तरह से दौडा करगी।" विनय मेरी बहू ? मेरी बहू ऐसी हो तो फिर क्या कहना है । पर वहू मरे भाग्य मे नहीं।' भाभी, ' ऐसा नहीं कहा करते । राम करे, तुम्हारी बहू जल्दी आए और इससे भी मोटी आए।" विनय 'बहू आएगी तो तुम उसे थोडे ही देख सकोगी। तुम मुझसे धूघट करती हो, मैं कह दूगा, वह तुमसे घूघट करेगी । जिसे मैं नहीं दस सक्ता वह मेरी बहू को नहीं देख सकता।" भाभी इस बात पर घूघट मे से ही ऐसी हंसी कि विय घय हो गया। बोली 'कोई वह तुम्हारो ही बहू होगी, मेरी कुछ भी न होगी'' विनय ने कहा, कुछ भी कैसे होगी। घूघट खोल दोगी तो चाहे सब-कुछ बना लेना।" मैं कोई आपसे घूघा योडे ही करती है। घर का यही शील है करना पडता ही है।" विनय, तो मैं क्व कहता हू-नही। मैं तो यही कहता हूँ कि तुम मुझसे करोगी और मेरी बहू तुमसे करेगी।" भाभी, ' मैं भी देखनी हु, कैसे करती है।' विनय, 'मैं भी देखता हूँ, तुम कैसे नहीं करने देती हो।" भाभी, अच्छी बात है विनय, अच्छी बात है।' "भाभी, "यही सही।" भाभा 1 १८२ जैनेद्र की कहानिया [चतुथ माग] विनय "सही क्या । तुम बहुत रोगी तो मैं हाथ से तुम्हारा घूघट ऐसा उठा दूगा कि तुम देखती ही रह जाओगी।" भाभी इस उद्धत व्यक्ति की दुस्साहसिक वात पर मुस्कराती हुई लोट- कर चली गयी। 1 इस तरह चार साल निकल गये। विनय बाईस तेईस साल का होया। रामू बहकर पूरा बाबू रामप्रसाद हो गया, १३ माल से कम नही है और दुनिया मे विसी मे कम नहीं है। ऐसी बात करता है चटापट, कि खूब । अम्माजी को और भाभी जी को बडी-वडी वातें बताता और खूब शिक्षाए देता है । आठवें दर्जे म एक पढाई वी किताब है उपम बडी बातें लिख रखी हैं। उनका हिन्दी में अनुवाद कण्ठगत करके एम मौको पर मा जा को मुनाता है कि मा जी दग रह जाती है । और पदमा का रग खूब निखर आया है । वह एक्दम स ख मुदर लगने लग गयी है । अब वही साफ रहती है, तुतलाकर जरा भा नहीं बोलती हरदम चोटी कई रहता यहा-यहा मिट्टी में नहीं खेलती थी प्यारी लगती है। और इस परान माई विशेष बात नहीं हुई है। कोई और वालय नही जमा है न कोई प्राणी वम हआ है। इमे हम उल्लेखनीय बात नहीं कहत वि विनय इम घर का अय मा जसा हो गया है । सो खलार मता-बोलता है मिलता जुलना है। मुटुम्ब ५ दुख-सुर का शरीर है। यह सब छ ता धार वप र सहजीवी जीवन म हो ही जाना या लैविश जो नहीं होता था, वह नहीं हुआ। अपात पूषः नहीं -टा। वह भाभी ग या पार पह चुगा है कि भाभी अगर समझें मि उमन उनको नहीं देय मिला है मो गलत है। वह सब जानता है-सी है गमी नही कोई यात मुरतो है नहीं। फिर भी बहुत का पूपर आग रयार अपनी दृष्टि मा अवराध परना चाहता है तो उनी भनी। भाभी यह गुतरर मन में हमर भूपट पोप आग और मरमा मेतीहै.
भाभी " क्या हम कहें कि इस पर्दे ने इन दोनो मे एक दूसरे के प्रति निकट आने की इच्छा को, एक-दूसरे से परिचित हो जाने के लोभ को बढाने और वायम रखने मे कुछ विशेष विशेष सहायता पहुचायी। विनय ने अपनी निधि मे दो-एक वस्तु और मग्रह र वद्धि कर ली है। एक पोते कागज का टुक्डा है, जिसम दम विनय को लश्य परखे लिखा गया है कि वह वडा शतान है। हम बडा दिप करता है । हम यह अच्छा नहीं लगता । एक स्माल चोरी करके बिगर रख लिया गया है । एक दफे होली के दिन भाभी ने एक फूल दिया था। यह ऐमा था कि उने छूओ तो एक्दम ने हाथ में बहत में कांटे चुभ जाय । देयने म यह बडा लुभावना था। उसे भी बव मभालकर अपन योग म बट पर रख लिया है। भाभी ब्याह की बात को स्कर मे अब बग विटाती है। वय वि उमका न्याह अब होन वाला है। पहले जम विनम वह यी यात पर मुहार होर भाभी के माय बत मवात जयार कर लिया करना पा अब नहीं कर पाता । अब जल्दी भैप जाता है। यानि पाह मिप गातत्रीत की बात नहीं रह गया है वह मरमुच कुछ ही निाम TRA हो जाने वाला है और सच बात से वार न बदन मुघर नहीं टुना जाता। सोचता है वह वनवर जो अबोधा आयो उम प्न भाभी या नाप- पर यह गा-यह तुम्हारो है । म अब जाओ। अपनो की अपना छातीवहन बना लो। उसके जरिय भाभी मन म यह बोर निस्ट पहुच जायगा और उसकी मकामा मौसा निकाल नगा। मामी के दिल में जाने पग उठाह है । म विनय को बहू आगी उमर भी आप भगा के माय अपने हृदय में पाम विटा गा और मार सायेंगी। और उमाकरेंगी भी यूर । उस या और पा मजायेंगी मिलिय में भी स्पा दया गा। मगर पिर दिएर अमर म मुद आयेगी। करा यि बनने पिरते है । सब टोर हो जायेंगे। मोन-मन में पने दोगो। फिर भाभी को भूल जायेंगे। रिसन हात पर में निनिया यनत है पीर बोयो रे गुलाम ही हो जान । माहाना हाल होगा।रिमा भाभी,सोन भाभी।
१८४ जनेद्र की कहानिया [चतुप भाग यह सब सोचकर उहें कसकता-सा सुख होता है । जो जरा जरा लगता तो है, पर पर मजेदार भी बड़ा है। लेक्नि विधि किस किस के जी की रक्षा करकेागे चलेगी? भाभी के जी-के जी मे रह गयी। कठिन रोग-ग्रस्त होकर उहे पहाड जाना पड़ा। इसी बीच विनय का न्याह हो गया। बहू आयी । बडी सुदर, हममुख, कुछ पढी लिखी मो। मगलगान हो रह हैं वधाइया गायी जा रही हैं लेकिन इनमे क्या हो । मानो तो घर हैं नहीं । विनय या मन बोखला हो रहा है। विनय की बहुरिया को दखने को उत्सुकता है, जिसके बारे में उहान सुगलिया है बडी अच्छी है बढी जल्दी सफर के लायक स्वास्थ्य लाभ उन्हाने कर लिया, और घर आकर ही मानी। लग पर लेटी हैं। जसे शुभ्र सिक्ता विस्तार मे शीण-कटि सरित सोती परी हो। पिनप आवर चुपचाप पलग की पटिया पर हाथ रखकर धरती पर बैठ गया। मा जो पास ही बैठी थी पहले जाकर उनका आज चरणस्पश नही पिया बंठने बैठते ही उहें प्रणाम कर लिया। भाभा क मुह पर हलका वपहा पहा था। विनय ने कहा 'भाभी | कमी हो?" भाभी ने माख गोली और मिर का कपडा तनिक ठीक कर लिया। इतने म म यर गति म ठिठाती हुई विनय की दहू आयी। विनय ने कहा, 'भाभी दसो कोन या रही है।' भाभी क्षीण मुस्कराहट स हेमो और उठ बैठन की पेप्टा करने लगी। लगभग साप ही- मा जी बोली, लेटी रह लेटी रह । दिनप बोला हे हे उठो मत ।' वह दरवाज स सगार हो गही रही। आग नही आ गयी। मा जीनपहा "आजा बरी। भाभी न म स्वरमपहा, आप्रो।' पिनर न महा 'यह मामी है । इनर पर प्रो।'
बहू पैर छूना-जैसा करके पन में पायठे, सकुची र ठ गया। तभी नौकरानी ने आवाजमा जी - विनय ने कहा, "तुम कब से बैठी होगी, मोजी, अब जाती हो।" मा जी ने कहा, 'अभी आती है।" बाहर सज्ने पर.से झांककर नौकरानी से पूछा, "क्या है? नौकरानी ने जल्दी-जल्दी जीभ को कैचो चलाकर कितनी ही बातें एक मिनट मे कतर हाली। मा जो की समय में उनका चौपाई भी नहीं आया। इसी तरह इस दासी की और बह-बड न जारी रहे, इसलिए झल्लाती हुई मा जी स्वय नीचे चली गयीं। भाभी नै पायते बैठी हुई पदविष्टित बहू को इशारा किया कि उसे कपर पलग पर ही भाभी के पास आ बैठना चाहिए और विलय की ओर सकेत किया कि उन्हें और काम हो तो इस समय कर सकते हैं। विनय ने कहा, "तुम इन से बिलकुल नहीं बोल सकती हो, जब तक मैं तुमसे नहीं बोल लूगा। मैं तुम्हें देख सूगा, तब तुम इहे देख पायोगी।" इतना कहकर पलग पर पठे हुए भाभी के बायें हाथ को विनय ने पकड लिया। वह हाथ विनय को पकड में ज्योबा-त्यो टिका रहा। मामी ने कहा "मुये उठा दो।" विजय ने कह दिया कि उन्हें उठने का खयाल नही करना चाहिए । बिलकुल आराम से लेट रहना चाहिए। यह भी औषधि का प्रश है। मामी ने विनय को अपनी क्सम दिलायी। लाचार सहारा देकर उसे उठावर तनिया का सहारा लगाकर बैठा दिया। । के घूघट भाभी ने तनिक झुक्कर यह की बाह पकड कर उठाने की चेष्टा की। इने आशा समयकर वह स्वय उठकर पलग पर आ बैठी। उमे गोदी मे समेट लेने की चेष्टा ती करते हुए, बहू मे अपना घूघट डालकर भाभी ने उसे देखा। देखती रही, फिर झट वर का पुम्बन ले लिया। विनय ने कृताय भाव से यह सब देखा।
जनेद्र की कहानिया [चतुथ भाग] उन दोनो के अलग हो जाने पर विनय ने कहा, "भाभी को लेट जाने दो।' कहने के साथ ही, बिना कुछ प्रतीक्षा दिए उहें उसी तरह सहारे से लिटा दिया। मुह उनका अपनी तरफ रखा। विनय ने कहा 'भामी ।' मामी ने कहा, "इहें छोड जाओ। तुम जाओ।" विनय ने उत्तर मे कहा, 'अच्छा।" और बहुत धीरे से दोना हाया से घूघट उठाकर पीछे को पलट दिया। भाभी ने कुछ विरोध किया, ऐमा नही जान पडा। घूघट में से उनका हँसता हुआ क्षीण शीण मुख मानो आशीर्वाद देता हुआ प्रकट हो गया। विनय ने कहा, 'भाभी, नाराज तो नही हुइ ?" भामी केवल हंसती रही। ७ विनय ने पत्नी से कह दिया, देखो मेरी मा के बाद दूसरी तुम्हारे लिए बडी यह भाभी हैं। इनसे तुम हँस खुश भी सक्नी हो और इनसे बहुत-सी सीख भी सीम्ब सक्ती हो । इनसे जितनी अभि न होकर चलोगी उतना ही जीवन मे तुम्हारे मिठास आ जायगा?" लेकिन यह सब कुछ पत्नी को कहने-सुनने की जरूरत थी, ऐसा नहीं जान पडा। पत्नी ने तो आते ही देख लिया कि भाभी जैसे प्रेम से अपना लेनेवाली हैं, वैसी और कोई नहीं है और उनके अपनाने म बडप्पन का भाव बिलकुल नहीं है। उनसे मिलकर न रहा जायगा तो फिर किसस रहा जाय।। । वह आते ही अनायास बिलकुल भाभी की बन रही। यह नयी बहू भाभी के कारण युद पुश रहती है और भामो के भी खुश रहने का निमित्त बन गयी है। बहुत-कुछ इस वजह से कुछ कहना चाहिए विनय की सलग्न परिचर्या के कारण कुछ और वजहो से जिनम शायद डाक्टर की दवाई भी एक हो सकती है, भाभी चगी हो गया। उस समय के बाद इन दोनो बहुआ की चहचहाहट, ऊधम-दगा और हंसी का महकहा समय- समय सुनाई देने लगा। भाभी सारे तन-बदन भाभी १८७ से ऐसी उ मुक्त हैसी हंसती कि उसकी लहर लहराती लहराती सारे मकान मे गूज जाती। जब यह विनय के काना मे पहुचती ना वह ध य हो जाता, इस खुशी की फुहार मे मानो नहा जाता। और वह भी किसी तरह से कम जोर की हंसी न हंसती। घर सदा हसता रहता। ये दोनो खेलते ही थे, विनय भी वक्त निकालकर इनमे शामिल हो जाता था। मा दोना इस बात स बडी खुश थी। अब विनय को बडा अचरज था कि यह भाभी उससे कभी कैसे परदा कर पाती थी। विनय गिनगिजाकर और वक्त-पते की बात बताकर भाभी को सुनाता था कि कैस वह भाभी को लुके छिपे देख लिया करता था। एक द वाल सुखाने धूप में बैठी थी तुम्हे पता भी था कि मैं छत पर धूप में बैठा अखबार पढ़ रहा है। बाल तुम्हारे पीठ पर फैले थे, कुछ मुह के आगे आ रहे थे। तब मैंने खूब अच्छी तरह तुम्हें देख लिया था, लेकिन जो भरपर एक ही बार देखा, फिर ख्याल आ गया, फिर नहीं देखा। भाभी यह सुनकर कहती 'तुम बडे वैसे थे। मुझे क्या पता था, तुममे यह गुन भी थे। फिर वैसे ही देख लिया था तो पर्दा क्यो खुलवाया? मैं जानती तो कभी न खोलती।" विनय कहता "अब फिर कर लो। अब क्या बिगड़ गया भाभी खिलखिलाकर हम पडती। कहती "कर ही लूगी। नही रूगी तो गुजारा कैसे होगा।" ऐसे समय कभी विनय की पत्नी होती थी तो वह, नहीं तो विनय स्वय भाभी की घोती के सिर के पल्ले को मुह के आगे तक खोच देता। पहता, 'लो, अन तो हो गया। भाभी कहती, हो गया तो बस, मुझसे मत बोलना।" इतना कहकर वह बनकर मुह फेरपर बैठ जाती। जिमने पर्दा किया था उमीका लावार फिर घूघट को हाथ से उठाकर ऊपर सरका देना पडता। भाभी फिर सीधी होकर बैठ जाती । वहीं, बस चन नही पडा। अब अपने आप क्या उठाया?" इस तरह के अभिनय आये दिन होते रहते और घर को स्वग बनाये रखते। अलग रहत किसी को चन न था, मिल बैठते, ऊधम मस्तो शुरू हो " १८८ जनेद्र की कहानिया [चतुर्थ भाग] जाती, तब उन लोगा के जी मे जी आता। यह नहीं कि खटपट नहीं हो जाती थी। वासन न खटके तो बासन कसे? यह भी तो होता रहना चाहिए। पर खटपट से मिलन का मिठास और गहरा हो जाता था। एक रुठे नही तो दूसरे को मनाने का मौका से हाथ आये । और दो रोज अलग-अलग होकर दोनो के मुह 7 फूले रहें तो तीसरे रोज साथ बैठकर दोनो आसू से बरसा पायें। इसी तरह के आवतन प्रत्यावतन का नाम जीवन है। नहीं तो जहा गुदगुदी 'रेतीली' समतल धरती ही है लोग उस रेगिस्तान का ही क्यो न पसद करें, क्यो घास-पात स मैली-कुचली धरती मे और हल चलाकर उसे ऊबड़-खाबड करके अन्न का बीज छोडें । इन लोगो का क्या हरियाला जीवन है । कमा चुहल से भरा है। कहो मैला बादल नही है । चारो मार भविष्य मे जहा तक निगाह जाती है, हरियाली-ही-हरियाली है। इच्छा होती है कि यही हमारी कहानी सम्पूर्ण हो जाती । कहानी का रम, कहानी का प्राण जहा खिल उठा है वही हमारी कहानी का क्लेवर भी नष्ट हो जाता, आयु व्यतीत हो जाती । कैसा दुख है कि दुनिया में पुण्य-क्षय हो जाने पर रस चुक जान पर भी लोगों को अपना जीवन ढोना पडता है। विधाता के, ऐसे विधाता के वेचारा वहानी-लेषक भी अधीन है। हमारी वहानी मौत की कहानी नहीं है। क्या मौत के बिना कहानी हो सकती है ? मौत को विधाता ने बहुत महगा नहीं बनाया है। कहानी- लेखक भी इमको महगी नही बनाता। लेकिन हालत होती है जब मौत भी महगी होती है। जब मौत से भारी चीज दिल में वठ जाती है और उसको दिल म लिए लिए फिर- कर नादमी को जीता रहना पडता है। मैं कह चुका हू उस घर में कभी कभी रगड हो जाया करती थी। लोग गव बहुत निकट होकर मिलते हैं तब उनी स्वभाव विषमताए एक-दूसरे को स्मश करती हैं। उस समय तो उहें एक प्रकार का सुख भाभी १८६ होता है, जसे फोडे को हलके हलके छूने मे। जव और पास आने है नब स्वभाव की उभरी हुई विषमताए टकराती हैं । उस समय दातेदार पह्यिो की भाति एक-दूसरे को निभाकर, रल-मिलकर, एक-दूसरे पर निभर रहकर, चलन लायक अन्तर-सम्मिलन (Adjustment) उनमे क्सिी तरह नहीं हो जाय तो बड़ी गडबड होती है। वे मानो एक-दूसरे को काटने दौडती हैं, आपस में टकराकर एक-दूसरे को नष्ट करने की प्रवृत्ति होती है, टक्कर में चिनगारिया निक्लती हैं। ऐसे समय यदि मनुष्य की रीढ (Axle) अत्यन्त दृढ हो, वो वह इन टवकरो से डरकर पीछे नही हट जायगा अर्षात शत्रुता पैदा करके या और कारण से अपनी निकटता में विच्छेद नहीं डालेगा, बल्कि बहुत धीरज से काम लेगा। अन्त मे ऐसा समय आयेगा कि या तो वे विषमताए मिल (Adjust) बैठेंगी या रगडते रगहने विल्कुल नष्ट हो जायेंगी और भीतर मे सहज समान मनुष्यता प्रकट हो जायगी। लेकिन ऐसा होता नहीं है। जब ऐसा भीषण समय उपस्थित होता है, तब सधप से घबराकर मंत्री और प्रेम का सम्बध ही लोग एक-दूसरे से तोड लेते हैं, स्टे नही रहते। विनय एक दिन आता है तो देखता है, मकान जैसे सन्नाटा बीच रहा है। लोगो के चेहरे भारी-भारी हो रहे हैं। बच्चे खेल नही रहे हैं । सब सुन्न हालत मे हो रहा है। उसे मालूम हुआ कि आधा घण्टा हुआ घोर वाग्मुद मथकर चुका है। उसे और मालूम हुआ कि उसके पारम्भ से ही भाभी मर्श मे पडी हैं। ऐसी क्या बात हो गयी? क्या हुमा' इसका कारण उसने जाना तो काठमारा रह गया । नीचे से धरती विनय की पली ने अपने इस विश्वास का दो-एक से प्रकट किया कि उसके पति की नजर ठीक नहीं है और भाभी भी श्वी बात को लेकर मां जी ने घोर आपत्ति की है और विपुल कोला- हत मचाया है। विनय को मा ने भी उसरे उत्तर मे कराल तहिद-गर्वन किया है। सतर्जन-गजन में अनुसन्धान करने की आवश्यकता का किसी पक्ष खिसक गयी।
जैनेन्द्र की कहानिया [चतुप भाग] को ध्यान नहीं रह सका है। मूर्छा की बात जानकर उसने भाभी के पास दौड जाने का इरादा दिया था, लेकिन अब अपने इस काले मुह को लेकर क्या वह बाहर निक्ल सकेगा? वह अपने को कोठरी मे अच्छी तरह से बन्द कर बैठ रहा। रोया तो, पर रोने से क्या आता है ? और पत्नी पर रोष करने से भी क्या हाथ आता है? उसने अपने को पली की हालत मे डालकर सोचा कि क्या वह अपने सम्पूर्ण जीवन मे पत्नी के ध्यान को ऐमा रमाकर बैठ सका है कि सब कुछ, और सब कोई वहा से मिट जाय। वैवाहिक प्रेम का ऐसा ही विदेही मादश उसने अपनी कल्पना मे माना है। उस आदश के नीचे बैठकर, आज की घटना पर वह खूब रोया रोष तनिक भी किसी पर नहीं कर सका। अपने हीन जीवन को माभी की दष्टि से वही दूर ले जाकर ओझल बना लेगा। उसकी हीनता की कालिख को छाया भाभी के पास नहीं पहुचने पायेगी। अब वह भाभी की पदध्वनि से डरने लगा। कही उनके आने की सम्भावना होती तो रास्ते से छिटककर दूर भाग जाता । दुर्भाग्य से कभी सामने पड ही जाता तो गडकर नीचा सिर करवे ऐसा खडा हो जाता कि यही गहा ठूठ हो। एकाध बार चारो ओर से कमरे को बन्द करके खिडकी मे से मामी आती हो तो देखने के लिए इन्तजार किया है। पर उनके उपर से आने की आहट मिली कि साहस चुक जाता है और वह मुह छिपाकर नीचे को वैठ जाता है। उमी रोज से वह दूसरा मकान देख लेने के यत्न में है। पर शहर में मकान यो ही नहीं रखे होते। अव कभी-कभी भाभी की हंसी उस तक पहुंचती है होकर कानो की राह अमन की तरह उसे पीता रहता है। अब कब उसे यह वस्तु मिलेगी? और नही मिलेगी, जो साथ ले चलेगा, वही ले घलेगा । मानो इस भाव से वह मामी की मूली मटकी वाणी और भाभी बी हंसी को अपने भीतर सग्रह करता है। 'वह निमग्न भाभी 7 उसने एक बार भाभी को अब भी बडी हिम्मत फरके देख लिया है। जरा जरा देखा है । वह रूप हुत्पट पर, कैमरे के प्लेट की भाति अकित हो गया । वह वैसा ही सदा की भाति निर्विकार मुख है। मानो कोई हरी-सी वस्तु उठी थी, वह धनी हुई नो किसी ने उसे काला बता दिया, बैरलकिन अब वह उनके आकाश में धुल धुलाकर साफ हो गई है । कोई निशान नही छोड गयी। क्या विनय की यह धारणा मधुर है ? सत्य है क्या सच वह वस्तु भाभी के अन्दर में कोई अभाव, कोई दाग, दद की 'कोई जरा-सी जगह बनाकर नहीं छोड़ सकी, जहा कभी कभी स्मृति मटक्ती भटक्ती आ टकरे और वहा थोडी विचरने लग जाय ६ विनय ने दूसरा मकान किराये पर ले लिया। यहा चित्र बनाने में उसका अधिक समय जाने लगा। सौभाग्य कि एक धनी पडौसी का ध्यान उन चित्रो की ओर गया। उसने उहे बहुत सराहा । वह पम द का आदमी था। चित्रा का आशातीत मूल्य विनय को मिलने लगा। दुनिया की आखो में अब वह और हो गया । प्रसिद्ध हो गया है, पैसे वाला गिना जाता है । पैसेवाला है, इसमें सदेह नहीं, लेकिन पसेवाला-सा दीखता नही है । सब-कुछ उसने जमा कर छोडा है, समझता है वह मेरा नही है। फिर किसका है ? कहता है, एक का है। हम उसके मन की बात बता दें, तो वह उस सबको भाभी का मानता है। चित्रो का सब धन भाभी का है। भाभी के बिना वह चित्रकार हो सकता था, यह अकल्पनीय है। एक दिन उसने अखबार में देखा, एक रामप्रसाद बी० ए० में पास हुआ है। उसने शहर में बहुत बड़ी पार्टी की। रामप्रसाद भी उसमे आया। पार्टी के बाद रामू ने कहा, "अम्माजी की तो आपको खबर होगी" विनय ने कहा, "क्या रामू ने कहा, "उनका तो पिछले महीने ही स्वगवास हो गया। भाभी भी तब मे ऐसी रहती हैं।" विनय ने कहा, "अच्छा
१९२ जैनेन्द्र की कहानियां [चतुर्ष भाग]
"
रामू ने कहा, "मुझे नहीं मालूम था कि आप ही चित्रकार हैं।
नहीं तो मैं बुला ले जाता ।"
विजय ने कहा, "हा
राम ने कहा, "चलियेगा ?"
विनय ने पूछा, "कहाँ ?"
रामू, "माभी के पास नहीं घलियेगा -
विनय, "हा
रामू, "अभी तो आपको फुरसत नहीं होगी। आप कह तो मैं परसों
-
भाऊ"
विाय, "पमा कैसी है ?"
रामू, "उसकी शादी हो गयी है।"
विनय, "परसा तुम आओगे? तो कल भी माना, कल फिर पार्टी है.
जरूर आना। फिर परसो चलेंगे।"
"जरूर चलियेगा।"
विनय, "कल जहर आना।"
भाले रोज फिर पार्टी हुई। रामू ध्यान रखकर शरीक हुआ।
लेकिन परसो जब वह आया, तो विनय बाबू पे नहीं । जाने कहां पले
गये थे। चपरासी ने एक लिफाफा उसे दिया, जिसमे उसके नाम का
५०,००० रुपये का ड्राफ्ट पा।
वह निराश होकर लौट आया और भाभी के सामने विनय की
जगह उसका दिया ५०,०००) का कागज का टुकड़ा लाकर रख सका।
भाभी ने उसे लिया और तकिये के नीचे रख लिया।
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