Natya Sodh Sansthan, Kolkata
Sangit Puranamal Part 3
Front matter
Soort
Deut
uzle
**
1 , 4 :)
2
पुरनमलरा नग
सत्य वक्ता
- या या माशा
शिश राधाबाद श me
SSARI
స్థులు కనీస ధర కలకలం సంస్థకు సం బం అను పదము సంస్థకు అను
जिना मुहर की किताब खोरी ली समझी जायगी
SHV1,64
YA
B-70
AWST
AN
c
N.S.S.
Acc. No: 1988
Date 24 5.87
Item No. B
Don, by behce
B/H/70 old.
श्री श्याम देवाय नमः
सं० पूरनमल भक्ततीपरा भाग
--
माला चरण
दो०-प्रथम समिर नवरीश सुत, विषन विदारनहार ।
जिन की कृपा कटाक्ष से, होतं सकल भव पार ॥
•-होत सकल भव पार पान मन गवरि तनय का धरत।
हों सानन्द समाप्त कार्य सब कष्ट शम्भु सुत हरते ।।
करें भक्त की पक्ष सदा धन धान्य सम्पदा भरते ।
इन्दरमन मोबिन्ददास सुति गणेश की करते ॥
दो०-नमो निरजा के नन्दन । हरण अघ आनन्द कन्दन
अनुग्रह करिये स्वामी।
पूरण हो मन की इच्छा बर दीजै अन्तरयामी ॥
कबि का
दो०-सुन गुरु गोरख का जिकर, डरी सुन्दरा नार ।
दिल ही दिल में इस तरह, करने लमी विचार ||
सन्द्रादे का मन ही मन में
दो०-मो हो जो कह गये थे, काशो के महाराज ।
प्रभु कृपा से वह बचन, ठीक हुए हैं मोज ।।
०-ठीक हुए हैं भाज करी जगदीश महरबानी है।
गोरख गुरु को सुना बड़ा ज्ञानी ध्यानी दानी है ।
झांको कर नाव की करूनिज सफल जिन्दमानी है।
मुश्रूषा कर खूब मुरादें मांगू. मनमानी है।
रो०-ये पक्का पढ़ा पढ़ावा । नहीं समझे समझायो ।
क्यों नाहकबिदबढ़ाऊं।
एन तीसर
कर प्रसन्न गोरख गुरु से ही इस मांग कर लाऊं।
कविका
दो०-कर दिल ही दिल मशवरा, सुन्द्रादे सुकुमार ।
पूरनमल से रही वो, मीठे बचन उचार ।।
सुन्द्रादेका
दो०-गोरख के डर से मुझे, डरा न सक्त श्राप ।
मगर समझ कुछ होगई, मैं खुद ही चुपचाप ।।
चौ०-मैं खुद ही चुपचाप खैर ये वाद विवाद हटादो।
ठहरी कहां जमात नाथ की चल कर साथ दिखादो॥
झांकी बांकी गुरु अपने की श्री महाराज करा दो ।
पर पहूं अमले पिछले सब पाप मेरे छुड़वादो ॥
दौ०-ले व्यञ्जन निविधि मांति के । जिमावन हित जमात के
आप के साथ चलू नी ।
करि प्रसन्न सेवा से गुरु को मन माना वर लूंगी।
पूरनमल का
दो० -साथ हमारे में तेरा, चलना होय फिजूल ।
भिक्षा तेरे हाथ से, करें न गुरू कबूल ॥
चौ०-करें न गुरू कबूल भीख यह रूपाल इटादे दिल से ।
जाहिर हो रही साफ कम्बखत इत्या तेरी शकब से ॥
छिपै न गुरु से मेद विदित होजाय जोन के बल से ।
करना चाहै खुश उन.को क्यों खारिज हुई प्रकासे ।।
दौ०-गुरू मेरे का दरशन । न कर सक्ता पापी जन ।।
पाप तें कीना मारी।
लाखों. सन्तों के कटवाये सर पापिन इत्यारी ॥
सुन्द्रादेका
दो०-भिक्षा मेरे हाथ की, भमर गुरू ना खोइ ।
तो फिर क्यों मामन यां, तुम को दिया पटाद।
नौ.-फिर कर दिया पठाइ सखन ये नहीं पा भावे
बन सासरा
मिक्षा गर मेरे यहाँ से तुम अगर वहां ले जाते ॥
कुल जमात युत गुरू तुम्हारे बाते या रहिं रखते।
नहीं वहाना चले माप ये झूठ महा फरमाते ।
-ले ग्यञ्जन विविधि मांति के । जिमावन हित जमात के॥
आप के साथ चलूगी।
कर प्रसन्न सेवा से गुरु को मन माना पर लूगी।
पूरनमल का
दो०-मिक्षा करने यहां पर, धमे न मेजा नाथ ।
गुरु भइयों ने बल किया, रानी मेरे साथ ।।
चौ० - राना मेरे साथ छल किया मुझे फंसाना चाहा ।
वोली गोली मार यहाँ से मीख मनोना चाहा ॥
था मतलब उन का ये मेरा शीश कटाना चाहा ।
दुनियाँ से पूरन का नामो निशा मिटाना चाहा ।।
क०-गुरू का प्यार मेरे पर न मुरु महयों को माया हैं।
बहाना भीख का कर के मुझे यहाँ पर पठाया है।
न था पानाह उन की चाल से छल से रकावत से।
दिनी मतलब जो था उनका सो सब मर जान पाया है।
दो० -न मुरु ने मुझै पठावा । बिन कहे उन से आया ॥
खबर जो वह पा लेते।
भिक्षा लेने तेरे यहाँ पर कभी न माने देते ॥
मुन्द्रादे का
दो०-जोनी अमर जमात के, मानै तुम से बैर ।
तो अब उन की बान की, मती समझना खैर ॥
चौ०-मती समझना खैर वेर को सब को कड़ी सजा ।
छल फरेष का चल कर उन दुष्टों को मजा चखा है।
जितने हैं जमात में जोनी सब की मुला जादं ।
हुक्म करौ सो कर साथ सर के इरशाद बजा ॥
दौ०-ले ज्यान विविधि मांति के । जिमावन हित जमातको
परन तीसरा
४
आप के साथ चलूगी।
कर प्रसन्न सेवा से गुरु को मन माना बर लूंगी ।
पूरनमल का
दो०---तल कराने का उन्हें, मेरो नहीं विचार ।
नेको करते नेक जन, बदी करें बदकार ॥
चौ०-बदी करें बदकार बदी का बेशक फल पावेंगे ।
सींच करोल न बैठन को साया शीतल पावेंगे ।
वे गुनाह बे जुर्म किसो बेकस को कन्न पावेंगे ।
है ये नियम न्याय निधि का नहीं वह भी कल पावेंगे ।।
दो०- वही गर तरी इच्छा । गुरू दिम ले चल मिक्षा ॥
भक्ति युत करना भरजी
हो कबूल या नहीं अनारी रही नाथ की मरजी ॥
कवि का
दो०-पूरनमल के बचन सुन, सुन्द्रादे सुकुमार ।
आननकानन में तलब, कीए खिदमतमार ॥
चौ०-खिदमतगार बुलाइ स्पार सामान सकन करवाये ।
सुजला खुरमा खस्ता मठरी और सुहार सुहाये ॥
माहन माग इमरती बड्ड उत्तम सरिस बनाये ।
सुघड़ कचौरी पापड़ बढ़िया दाल सेव मन भाये ॥
भोम्हा-विविधि भांति की बनी मिठाई ताकी कुछ ना प
शुमार । बही पेड़ा शक्करपारे बरफी गुभियां कर वहाासोंठ
करिया सरस सुरक्षा कई किस्म के रखे प्रचार । साम रायते
दही बड़ा शुचि लुचई मार त्रिकौन मुहार ॥ बहुत जन्द फुरती
से करवायौ रानी सामान तयार । सवा तीन सौ बहनी वाले
बीने नकर कहार पुकार ॥ हुक्म सुनायौ तुरत फ्रोज को साजे
क्षत्री सात हजार । रानी सुन्द्रादे उत महलन रचिपचि बनी
करन सिंगार ।। कियों उबटनो न्हाय घोष के काढ़ लिये कही
से बार मतर फुलेख हार केशन में बई मौम की पटियां पार ।।
पूरन तीसरा . मांग सिंदर भाल पर बिंदी नयनन बालों सुरमा सार । खौरि बन्दनी बैना पहिनी नथ भलकारी लई लम्हार । चमकै चोप रची मुख वीरा दांतन मिस्त कर बहार। कहनकल झुरझुत्री झूमका बाले बाली बुन्दे डार । गुलोरन्द पचमनियों माता चम्पकली हसली और हा । बाजू बरा नौनमा जोशन छन कइन की अजब बार दसोड अरिषां अन्ना मुदरियां कनक पारसी जटित किनार। हाथ न हो हरी २ चुरियाँ मोरी २ वैर्या सुघड़ सुढार ॥ भन्दा कौवनी पहरी इटि में रही लपेटा मार । कड़े छ पाजेब तोड़िया बैरन झांझर की छनकार ।। अनवट बिछुआ नहिर्वा सांकर जिन की शोमा अधिक अपार । चटक चुंदरियाँ शिर पर अदा घायल भोट लभी इकसार। घूमघूमारौ दोमन पहनी औगियों पहनी बूटेदार । सजि नजि स्वार खड़े। सुन्द्रादे उछल अस्त्र पर हुई सवार दब घोड़ा के ऊपर झट चढ़ा लिया गन्न सरदार जित में पड़ी जमात नाथ की उत में चली वढाय तर !! सात हजार फौज मोर जात की सामग्रा ताके सङ्ग । यहाँका माछाह यहाँ पर अब चेजन का सुनौ बयान । बैठे जोर जमाल सकल मिल रहे खुशी से विजिया छान ॥ पी पी भाग रस चिलमें फूक मचायौ धुंआ धार । करें धौल वा में सालो देकर ह से अपार ।। मायो नशा मौन माज का सुरख है. ये सब के नैन । लकर- नाथ से पकड़नाथ तब ईस अर लागे ऐसे कैन । अकड़नाथ का दो०-जीरा लक्कड़नांथ तू , रही प्रकल का खान । हम सब के ऊपर तेश, है भारी अहसान ॥ चौ०-है भारी अहसान अकबर काई न तेरी सानी। खून निकाली अकल दिया मरबा पूरन अमिमानी ।। उस के रहते थार रुवार थी हम सब की जिंदमानी।
पूरन तीसरा
झगड़ा मिटा वही कटक दा करता रोज कहानी ॥
दौ०-मगर एक सन्शय हमको । सुनाऊँ सच्ची तुम को।
चुस्त चालाक बड़ा है।
वच पाया जिन्दा तो फिर वह झगड़ा कर खड़ा है।
लक्कड़नाथ का
दो०-अकड़नाथ भाई मेरे, छोड़ी रञ्ज महाल ।
जिंदा बच सक्ता न वह, है किस तरफ खयाल ।।
पौ०-करते ऐसा सवाल आप को है बिलकुल नादानी।
बीवत हो नहीं सन्त को बो मुन्द्रादे रानी ॥
है खू रेज़ सख्त दिल पापिन रहम न दिल में लानी ।
मरवा दिया होय कव का उस ने पूरनमल ज्ञानी ॥
दौ०-फिकर दिल से हटाइये । ख्याल भाई न लाइये ।।
चाल क्या चल सका है।
रिन्दों के फन्दों से अप क्या सहज निकल सका है ।।
कवि का
दो०-इधर इस तरह जोगिण, ग़प्पै रहे उड़ाय ।
मुन्द्राद का तब तलक, लश्कर पहुंचा पाय ।।
लक्कड़नाथ का
दो०-देखो २ तौ अरे, जरा इधर कर ज्यान ।
परव से भावै चना, ये कैसा तूफान ॥
थि०-दखौ २ कर के ध्यान । माई ये कैसा तूफान ।
वहाँ पर मया यकायक आन। उड़ती धूर २ धूर ॥
सोटामाथ का
पि.
o-तु तो हुआ नशे में चूर । जिस से उड़ती दीखै धर ।।
कर के सोच फिकर सब दर । बोनी राम १ राम ॥ .
विचौटानाथ का
पिक-जावै राम नाम सब मल । क्या त रहा गधा सा फूल ।
तमको भन्नत न नामाकूल । होजा चुप चुप चुप ।।
परनमा तीसरा लकड़नाषका वि.-मत कर नाली और गलौज । सारी भूल जाइना मौज । माई सुन्द्रादे की फौज । यहां से भान भाग भान । भंगोहानाथ का चि. हैं हैं ऐ मेरे भगवान । ये क्या आफत पहंची मान । घिर गए जाल के दरम्यान । जावें प्रान प्रान प्रान ॥ बिलौटानाथ का वि०-भाई वह परन मक्कार ! कह मया होगा मरती बार । है वहां साधू तीन हजार । सब को मार मार मार, ॥ भंगोटानाथ को वि०-देशक पुरन ही का काम । दीना बतला मेद तमाम || अब नहीं बचै हमारा नाम । जाबै जान जान जान ॥ लकड़नाथ का वि०-मानौ २ करौ न देर । करना ये बातें सब फेरे । धरना लेह सिपाही घेर । देंगे मार मार मार ॥ कवि का दो०-चेला नोरखनाथ के, दहशत दिन में मान । दण्ड कमएडल कोड सब, मंगे वचा कर जान।। १०-भगे बचा कर जान पड़े रहे कूडी और मझोटो। साक्री चिलम चीमटा झोली गुदड़ी कम्बल सोटा ।। डर के मारे कोई कोई तो फिर वहीं पर लोटा । निकल मया पेशाब मीन कितनों के भए लंमोटा ॥ -बैठ रहा कोई खटके । कोई भाड़ी में सटके ॥ चढ़ो ऊपर कोई बट के । कोई कूमा लट के ॥ खोह में छिपे सपट के। पूरनमल से सखुन सुन्दरा कहने लगी दफ्ट के॥ स न्द्रादे का हो.-पूरनमल तूने बली, चाल हमारे सात में पुरन तीसरा काई न दीखै वहां पर, बतला कहां जमात ॥ पूरनमल का दो०-चाल न कुछ मैंने चली, कही ठी दो बात । देख तुम्हारी फौज को, छिप मई सकल जमात ॥ चौ०-छिप नई सबल जमात पहाड़ों की खानों में जा के । थोड़ी देर पेश्तर यहाँ सच गएँ रहे उड़ा के ॥ अभी २ में गायब होगये गुरु भाई डर खाके । फकत रह गई कुटी गुरू की सो वह रही दिखाके । दौ०-छुट गए छक्का सब के ? झाड़ियों में जा दव के । कौन मरने का आहै। जब तक वहां पर रहै फ्रोज़ नहीं सूरत कोई दिखावै ॥ कवि का दो०-सुन कर पूरन बचन, मन में . गुस्मा स्वाय । सुन्द्रादे ने को, सीना हुकम सुनाथ ॥ सन्द्रादे को दो०-सुनों शूर सन ध्यान दे, करौ न पलकी देर । इस जङ्गल और खोर को, चौतरफा लो घेर ॥ चौ०-चौतरफा लो घेर फेर जानी पहाड़ पर चढ़ के। जो कोई सोधू मिलैं छिपा कहीं लाना उसे पकड़ के।। दान धौंस से काम लेउ जो आबै पेश अकड़ के। 'मारौ मती जान से कल लो मुझे खूब जकड़ के ।। दौ०-ले जङ्गल देखौ भाली । वक्त नाहक मत टाली खोज कर सबै निकाहो । बाकी रहै न एक जोगिया तीन हजार सम्हाली ।। कवि का दो -सुन्द्रादे का हुक्म समतनक न कीनी देर । जाल को चौतरफ से, जिया कटक ने घेर ।। चौ०-लिया कटक ने घेर फेर इत उत को शूर सिधारे ।
एन तीसरा
बोर मारियों से कुपों से साधू पकड़ निकारे ॥
बाकी छोड़ा एक न परे तीन हजार सम्हारे ।
गिरफ्तार कर ग्ब का लो रानी की नजर गुजारे ॥
दो०-देख रनी साधुन को । बुलाया दिम परन को il.
गशव गुस्सा कमाल कर ।
सगी राने सन्तों को यों भाखेताल लान कर ।।
सदादे का
दो०-पवा तुमको मालुम न था, जो है यहां का रूल ।
मेरे शहर की १६ में, साधू रहे न भूव ॥
०-साधू रहे न भूल भून कर अमर कई वहां पाने ।
वा कायदे हुक्म सरकारी सर अपना कटवावे ॥
उसी मुताविक तम सबको अब अस्त कराया जाये।
तीन हजार जोगियों में से एक न बचने पावे ।।
दो०-रही इरशाद हमारा । होय सर कलम तुम्हारा ।।
जो चाही खिसा पिलाद ।
जिससे मिलना चहौ उसे फौरन इस वक्त मिनादे।।
सोटानाथ का
दो०-हम सब जानी ने वतन, कीजै माफ हुजूर ।
हद आपकी में टिके, बेशक हुमा कसूर ॥
चौ०-वेशक हुमा कसर जो हम। सब भाए चले इपर को ।
हम में से भिक्षा करने नहीं कोई नया शहर को ।।
फिर क्यों कर सरकार करामौ कत्ल हमारे सरका।
माफी दो हम चले जांच नहीं आवें नजर फ्रजरको।।
छोड़ अब हमें दीजिये । न ज्यादा तङ्ग कीजिये ॥
चले वहाँ से जावें हम ।
कसम गुरूको इस जाल में कमी न फिर आवें हम ॥
सुदादे का
दो-पुनरिम हो के सरासर, भूट करो इजहार ।
पूरन तीसरा माफी कमी न हूँ तुम्हें, हो सब तुम मक्कार ।। चौ०-हो मारी मक्कार झूठ इजहार सुनाया तुम ने । किया जुर्म दर जुम खौफ दिल बीच न खाया तुमने । दे ताना भिक्षा को पूरन सन्त पठाचा तुम ने । जान सगसर अजल जाल वहाँ इसे पठाया तुम ने ॥ क०-दगा से सर कटाने को जिसे तुमने पठाया है। वही पूरन मए लश्कर लिवा यहां सझको नाया है। शकल में शान में रफ्तार में गुफ़्तार में यकता । एक दो की न दस की बात दल का दन बताया है । प्राज परताप परन के विना महनत परिश्रम के । इकट्ठ सर कटाने का ये मौका हाय पाया है ।। फंसाना और को चाहा फंसे खुद भाप फन्दे में । कजा का मौत का चक्कर सबों के सर पै छांया है। जो खोदै और का कुप्रा उसी को त्यार खाई। किसी शायर ने कवि ने ठोक यह मिसरो बनाया है। स्पार मरने को हो- जोऔ कराऊं कलम सर सब का । वही करने का ईश्वर ने मजा तुमका चखाया है। कधि का - दो०-सुन्द्रादे के सुन सस्वन, जोगी दहशत मान । करन लगे सब खुशामद, पूरन के हिंग मान।। जोगियों का दो० -पूरनमल हम सबों पर, कर भारी महसान। सुन्द्रादे खूरेज से, रचा हमारी जान ।। चौ०-है तेरे ख्त्यार सबों की जान बचादे भाई। इस जालिम के फन्दे से भाजाद करादे भाई ।। कर मिन्नत पर गौर कैद से हमें छुड़ादे भाई । ख तो हमारी का दिल से कुल खयाल हटादे मोई। दौ०-तेरे हम गुनहगार हैं। विज्ञाशक खतावार हैं । ये मासां हम पर कीजे ।
करें न बदी तुम्हारे सङ्ग फिर अब तो हड़वा दीजे ॥
पूरनमल का
दो०-कसर नहीं तुमने रखी, कुछ भी मेरे साथ ।
भेजा भरने का मुझे, मिल के कीनी घात ।।
चौ०-मिल के कीनी घात कहन का तान तमचा मारा ।
गुरु भाई होकर के मेरे सम में कपट विचारा ॥
सुन्द्रादे के हाथ कटाना चाहो
चाहो शीश हमारा ।
बच माया मैं साफ मनोरथ हुआ न सफल तुम्हारा।।
क०-वही सुन्द्रा है ये जो कत्ल फौरन सर कराती भी।
न जिन्दा छोड़ती थी सन्त को गर देख पाती थी।
गुरू दर्शन को अब वह ही मेरे हमराह भाई है।
सहित श्रद्धा जिमावन का विविध पकवान लाई है।
दो०-न मन में दहशत खामी । खुशी से भोजन पानी ॥
न कुछ मैं तुमसा हूंमा ।
करी बदी चाहे जैसी तुम मैं नहीं दगा करूमा ।
कविका
दो०-पूरनमल ने सबों को, करा दिया आजाद ।
चलो पास फिर गुरू के, हो तबियत में शाद ।
चौ०-हो तबियत में शाद साथ सुन्द्रादे को भी जीना।
वहां थी कुटी नाथ की वहां प्रस्थान दोउन ने कीना ॥
पहुंच गुरू के पास शीश रख चरण कमल में दीना ।
विसरा ध्यान तुरत गोरख कर तरफ इन्हों की चीन्हा ।।
दौ०-निरखि चेला पूरन का । प्रफुल्लित कीया मन का ॥
साथ रानी को देखा।
नगे पूछने पूरनमल से कर दिल बीच परेखा ।।
गोरखनाथ का
दो०-पूरनमल यह कौन है, औरत तेरे साथ ।
क्यों भाई मेरे कने, बता बात सच ठात ॥
परनमत तीसरा
पूरनमल का
दो०-शहर चीन की सुन्दरा, है यह श्री महाराज।
जाफत सकल जमात की, करना चाहे भोज ।।
गोरखनाथ का
दो०-ऋतल कराये हजारों, सांधू विना कसर ।
जाफत इस कम्बखत की, हमें नहीं मजूर ॥
चौ०-हमें नहीं मजूर जिवाफत कोई न इसकी पाये।
कहदो इस हरामजादी से चली यहां से जावै ॥
चांडाल पापिन इत्यारी शकल · न मम दिखावे ।
सुन २ इसका नाम गुजरती नफरत गुस्सा भाषे ।।
दौ०-साधुओं का मरवाये । रहम नहीं दिल में लावै ॥
पाप करती प्रति भारी।
भोजन करें हाथ इसके को कभी न मुनि तपधारा ॥
कधिका
दो०-क्रोधित गोरखनाथ को, लखि सुन्द्रा कर जोरि ।
शीश नाइ कर चरण में, बोली वचन निहोर ॥
सद्राद का
दो०-स्वामी मेरे से बना, बेशक भारी पाप ।
दृदय मेरे को हो रहा, महा घोर संताप ।।
11.-सन्ताप हो रहा स्वामी मेरे मनको । मैं भाई तुम
चरणन के इरशन को ।। महाराज कृपा मो पापिन पर कीजे ।
प्रायश्चित हो मेरे पाप का समय दान दी । मो दुर्मति
से दुष्कर्म हुए प्रभु भारी । विन खता हजारों मरवाए तपधारी।
महाराज ग्राद कर पाऊं महा कलेश । होष पुरा उस पंडितका
दीना जिन यह उपदेश ॥ वह ग्योतिष विद्या पढ़ काशी से
माया। उन मार्ग मुक्ति का स्वामी वही बतावा ॥ महाराज
कही साधुन को मरवामी । है प की उत्तम सब से तुम शीघ्र
मोच पानी ॥ यह कहन ठीक बों पंडित जी को मानी।
परन तीसरा
रवाये साधू करी बड़ी नादानी ॥ महाराज मिला नहिं भव
क कोई महन्त । हटा कुमारम से दिखलाता जो प्रभु मुझे
सुपन्य ॥ वह भाग मेरा जो हुआ भाषका माना । और
परन
मम ग्रह भिक्षो को जाना ॥ महाराज ले मिक्षा दर किया
मज्ञान । दरश कराया तुम चरणन का कर के कृपा महान ॥
इवचमा मेरा अपराध कीजिये स्वामी । सेवा अपनी में एक
बीजिये स्वापी ।। महाराज फूल फ मेट करी स्वीकार । कृपा
प्रापकी से होवै प्रभु मेरा बेड़ा पार ।।
दो०-सुन्द्रादे का प्रेम युत, भक्ती भाव निहार ।
स्वामी गोरखनाथ ने, करी मेट स्वीकार ।
वौ०-करी मेट स्वीकार शिष्य चौदह सा निकट बुलाए ।
जो थे गुप्त संत चौरह सौ सो भी सब प्रगटाए ।
विविधि भौति पकवान चीन बासी भातुर ले पाए।
सहित जमात नाथ को सुन्द्रा भोजन रुचिर जिमाये ॥
१०-हुमा पुरा भएडारा । करें सन जब २ काग ।
गुरू मोरख हरषाये।
मन्द्रादे रानी को खुश हो ऐसे बचन सुनाये ।।
गोरखनाथ का
दो०-सुन्द्रादे ऊपर तेरे, हुमा प्रसन्न महान ।
मन इच्छा पूरण करू', माँन १ बरदान ॥
-लखि भक्ति भाच तेरा, खुश हूं अपार बेटी।
स्था चाहती है पर तू, मुख से उचार बेटी ।
सन्द्रादे का
१०-कारित न मानने के, प्रभु ने किया है समको।
धन धाम राज्य वैभव, सब कुछ दिया है मुझको ।
गोरखनाथ का
क०-बेशक न मानने के, क्राषित किया है तुझको ।
पूरन सासरा नाजिम है कुछ न कुछ तो देना जरूर सझको । सुन्द्रादे का १०-देना जरूर है तो, मांगू नहीं मिलै फिर । दीजै बचन गुरूजी, हरगिज़ नहीं. टले फिर गोरखनाथ का 5. -दीना बचन गुरूजी, हरगिज़ नहीं टलेगा। माँगैगी जो त बेटी, फौरन वही मिलेगा ।। सुन्द्रादे का क०-दीना बचन गुरूजी, तो देर अब न कीज । निज शिष्य मन्त पुरस, बख्शिश में मु दीजै ।। गोरखनाथ का क०-चोखा हमारे सा में, कीना कमाल तु ने । जानो जिगर कलेजा, लीना निकाल तू ने । सुन्दादे का क०-कीनी प्रतिज्ञा जो अछ, स्वामी उसे निभायी। मत मोह जाल में फंस, निज सत्य का डिगाऔ।। गोरखनाथ का दो० ०-वचन कभी टारू नहीं, दीना पूरन तोय । लेकिन इसके साथ में, अनुचित कार्य न होय ॥ चौ.-अचित कार्य न होय शिष्य मम बाल बृह्म वारी है चनै न कभी. कुमार्ग धर्म धारी है सत धारी है ।। तू कामिन छल भरी मदन के मद में मतवारी है। रखै किस तरह चेना का सन्देह यही भारी है। दौ०-सुने तू परन चेला । न कर अब जरा झमेला ॥ साथ रानी के जाऔ। नथाराम द्विज कहैं इसे उत्तम उपदेश सुनायो । पूरनमल का दो०-जोनछ माज्ञा नाथ की, है समको स्वीकार। जाऊं इसके साथ मैं, करू नहीं इनकार ॥ - परन तीसरा कवि का दो . ॥ दो०-सुन्द्रादे मन मनन हो, ले पूरन का साथ चली अापने शहर को, मारग में बतरात ॥ o-मारम में बतरात जात हम २ कर सिकाती है। मार वान तान चश्मों के रानी मदमाती है । नाज अदा अन्दाज सन्न प्रन को दिखलाती है । कर बल फना अनेक जाल मनमथ का फैनाती है । •-महल अपने में भाई । न फली अङ्ग समाई । जिगर की घुण्डी खोली। पकर हाथ में होय सत्र न पान से ऐसे बोली ॥ सद्रादे को दो०-गोरख गुरु ने कर दिया, तुम्हें मेरे हमराह अब तो भानौ राज सुब, हो कर शाहन्शाह -होकर शाहन्शाह चीन का राज करौ चे खटके । बहुत रोज जञ्जाल जोग में जान २.मटके ।। करौ ऐश आराम यहां पर गुलन्दाम डद डट के । देखो दिलबर जरा इश्क बाज़ी के सुन्दर लटके ॥ दो -नम नहीं देर कीजिये । मुझे ऋतु दान दीजिये । घड़ी युग सम कटती है ! किया मदन ने जोर न तबियत डाटे से डटती है॥ पूरनमल का दो०-बस २ बस खामोश रह, रख जवान को थाम । हरमिज मेरे से नहीं, होगा ऐसा काम ॥ पौ०-होगा ऐमा काम न ये जिकरा जापान पर लाना । गुनन्दाम फेबो हराम का जिकर न मुझे सुनाना । काम हमारा है सब को मुक्तो का मार्ग बताना । जावें पार आप भव से मोरों को पार लगाना ।। दौ०-हुई रानी दीवानी । अकब कहाँ, तेरी मुलानी । काम के बस होता है।
पून तीसरा सो सम- जरा देर सुख कारण अपना धर्म कर्म लोती है ॥ सादे का दो०-तनक देर सुख के लिए, पावत कष्ट महान । तब मुश्किल से मिलत है, यह सुख रस की खान ।। बहरत-बड़ी मुश्किल से मिलता है ये सख सनम, इस के आगे कोई सुख सुहाता नहीं । भाग्यशाली ही भोगे हैं इस भोग को, कोई विन भोग आनन्द पाता नहीं ॥ मोम का जानी करते हैं जप तप भजन, त मले से मुझे क्यों बनाता नहीं।तेरी मिन्नत खुशामद कर हूं सनम, तो भी दिल में मेरा रहम लाता नहीं। पूरनमल का बहरत०-कैसे लाऊँ रहम तेरा दिल में बता, ऐसा जिकरी मुझे भव मुहाता नहीं । मैं बताता हूँ मारग तुझ मुक्ति का, म में तेरी कुछ भी प्रातो नहीं। मान भोगे हैं मोनी न जोनी जती, भोग कर जोग अपना डिमाता नहीं। तू हुई काम के बस फंस पाप में, तेरे संग में फंसा मुझ पै जोता नहीं। सद्राद का बहरत-मैं तुम्हें मांग कर गुरु से लाई वहाँ, अब हे कसे जोनी बतानौ सनम तुमको करनी पड़े मेरी राजी सभी, मत बहाने की बाते बनानौ सनम ॥ दो पटक भाड़ में ऐसा ज्ञानो घरम, रस की पाते हमें बस सुनामी सनम । चली लेटौ लिपट प्यार से सेज पर, मेरे दिल के दरद को मिटानो सनम ।। परनमल का दो०-अच्छा २ समझली, मन तेरे की बात। सुन्द्रादे तुझ से मेरी, पार नहीं बसिवात ॥ छ०-नहीं पार बसियावै मेरी गनी शरम की बात है । जोनी हूं मैं बस इस सवन तन मन मेरा पति है। कर नैन अपने बन्द तू इच्छा सकल परन कर। मत हो दुखो मत हो दुखो मैं पीर सब तेरो हर ॥
पुरन तीसग १७ कविका शे० -कीनी माँखे बन्द त्रिय, कहा सनम का मान । पूरनमल झट वहाँ से, होगया अन्तर ध्यान । -होकर अन्तर ध्यान, माया गुरु माया गुरु के पास में । चेला को पहचान, बोले मोरखनाथ घों ॥ गोरमनाथ का दो०-सुन्द्रादे को दे दिया, मैंने तुझको दास । छोर उसे क्यों आगया, फिर तू मेरे पास ।। -फिर त मेरे पास चला पाया नहीं कौल निभाया। चाह तेग में सन्द्रादे ने भारी दुक्ल उठाया । जैसे तैसे मुश्किल से पूरनमल तुझको पावा । रख जुदाई का फिर तने चेला उसे दिखाया ।। १०-मुनासिब पास मेरे अब तुझे परन न मोना था ।वहां रह के सद उपदेश रानी को सुनाना था । हजारों जोमियों में अत्न करवाया मा कटवाए । ज्ञान शिक्षा दे सुन्द्राद का व तुझको छुड़ाना था । वो तेरी चाह में दिलजान से मशगूल हती थी । तसन्ली उसको समझो के तुझ बेटा बंधाना था ।। दौ०-रहम लाना पच्छा है । न कलपाना अच्छा है। किसी को कलपाओगे । फल पानी कलपाने का नहीं तुम भी कल मोगे । पूरनमल का दो०-स्वामी प्रपनी टहल से, मुझ दास को निकाल । सोप अधरभिन को दिया, जिस वबाल में डा॥ •-किस नवाब में डाल दिया नित माफत सहनी परती। पाप कर्म से सुन्द्रादे गुरु तनक न मन में डरती ॥ साथ हमारे विषय भान की जिकर हमेशा करती सुन २ ये बातें रानी की नफरत म झ गुजरती । 3.-मुनासिब साथ ऐत्री के नहीं म भको पठाना था। बरस
पूरन तीसरा
कर दास अपने को कुमारम से बचाना था। जती था जन्म को
महाराज कुछ तो ख्याल लाना या । कर दिया साथ पापिन
में क्या प्राजमाना था ॥ नसीहत बहुत कुछ की और दिवा
उपदेश दुर्मति को । रंगी वह रंग रतिपति के कहा मेरा न
मानाथा ।।गुजारा था न वहां मेरा चला आयो इदे घोका।
न रह के पास रोनी के धरम अपना डिमाना था ।
दौ •-काम बस हुई दिवानी । नसीहत मेरी न मानी ।।
न हो वहां मेरी गुजर है।
सुन्दादे की गुरू तरफ मेरी को बुरी नजर है ॥
गोरखनाथ का
दो०-पूरनमल तू ने कुमर, किया न अच्छा काम ।
धोखा रानी को दिवा, होग बुरा अजाम ॥
चौ०-होय बुरा प्रजाम ख़्याल मन सुन्द्रादे लावैगी ।
दगा बाज छलिचा कपटी वह सभको बतलावैगी ।
तेरी जुदाई का दुस्ख पाके रानी मरजानी ।
जिन्दी रहे प्रधर्मिन मर सन्तों का कटवावेगी ।
दौ०-पास उस के ही जा तू । चिलम मत यहां लगातू॥
कष्ट उन भारी झेला।
सुन्द्रादे मरजाय दोष समजाय एम फिर चेला ।।
पूनमल का
दो०-अमर तुम्हें मंजूर था, हम कराना मोन ।
तो फिर स्वामी मापने, क्यों सिखलाया जोम ।।
पो०-सिखलाया गुरु जान पाप रानी मुझ से तकती है।
जोश जवानी में दीवानी ने लिहाज बहती है ॥
ख्वाहिश मेरे साथ वस्ल की सुन्द्रादे रखती है।
नहीं दास से इच्छा उसकी पूरी हो सकती है।
3.-नहीं गुरु कम है अपना ऐश मशरत उड़ाने का । गम
परन तासरा
महाराज सन्तों का भजन में लौ लगाने का स्थान हरि-
नाम को घरना वही हर बा बतलाया। मोम करना न हम
को मापने जिनहार बतलायो ।। सितम है जोग छुड़वा भोग
के फन्दे फंसाते हो । सुमारग से हटा स्वामी कुमारग में
चबाते हो॥
दो०-न जाऊं वहां भूल मैं । करू मरना कबूल मैं ॥
कृपा यह हम पर कीजै ।
यह माज्ञा महाराज दास अपने को पाप न दीजै ॥
कविका
दो०-पूरनपल मोरख दोऊ, रहे इधर बतराय ।
गनी सुन्द्रादे उधर, निरी महत गश खाय ॥
सोरठा-बांदी झटपट प्राइ, लीनी उसे उठाय कर ।
इत्र गुनाव सुचाइ, होश करा कहने जनी ॥
बांदी का
दो०-क्यों गश खा कर के निरी, कहिये आप हुजूर ।
मरी मार उफ सरद क्यों, बिगड़ गया सब नूर ॥
चौ०-बिगड़ गया सब नूर रोशनी क्यों चहरे पर कम है।
सरत पर छामई ऋदरत क्या ग़म रज प्राम है।
हाश हबास न ठोक भरौ सरकार प्राह थम २ है।
क्या दिल दर्द जर्द रङ्ग होमया चश्म प्रश्न से नम है।।
दौ०-हात दिन का बताइये । न बन्दो से छिपाइये ।।
हुई हालत खराब क्यों।
किस बाइस रोती हो होती हो ग़मगी जनाब क्यों ॥
सुन्द्रादे का
दो०-ऐ बांदी क्या बताऊं, दिल अपने का हाल ।
पूरनमल गायव हुआ, दे कर मुझ को चाल ।
सौ०-दे चाल पूरनमल मुझे यहाँ से रवाना होगया । अब मुझे
दिखदार का दुश्वार पाना होमयाथा यी कम्बतके भव सग्रव
पूरन तीसरा दिन गारत हुए । उम्मेद ही उम्मेद में उलटा जमाना होगवा॥ ये चाल या मुतलक नहीं दिलजान हो मुझ से जुदा । ऐ मेरे भगवान यह वैसा पिसाना होगया। सोचती थी रात दिन गुजरेगे प्रशस्त ऐश में । ऐश के बदले बहन मार बहाना होगया ॥ जान बिन अब जान दंगी ठान पिल दर- म्बान बी । बस बतम जग से मेरा अब मावदाना होमया ॥ वांदी का -पारक इश्क में इस कदर, हुई भाप सरकार । जान गमाऔ खामखां, करी न जरा विचार ॥ दा०-सबर कर दिल दरम्यान मना । प्यारी ठान न ऐसी ठानों, कहन सच मानी ।। वनों ही क्यों नादान मना ॥ सबर०॥ क्यो तू बृयाँ विकल होती है । पड़ी रोती है ॥ हुई ऐसी खमकान मैना | सब० ॥ जोनी किस के सगे बारी। हुए हैं प्यारी । काहे ,खोती हौ जान मना ॥ सपर० ॥ था बादमर वह जाली । तुम्हे बहकाली ॥ थी कर उस की पहचान मना ।। सबर कर दिल दरम्यान मना॥ सुन्द्रादे का दा०-कर मैं क्या पदवीर बाँदी । घोखा देके सिधारा। वो फूल हकारा ।।रना ऐसा वे पीर बाँकी । करू ॥ अब मैं कैसे मन समझाऊं । न उसको पाऊं मेरी ओछो तकदीर गौदी। करू. ॥ अच्छा नहीं उमर भर गैना । जहर खा सेना ॥ वही बहतर हमशीर बांदी ॥ करू ॥ गाली सब झगड़े निबटाऊं ! मैं जान गमाऊं ॥ मार नल में तलवार बाँदी॥ कर : बाँदी का दो०-बैठ महल चुपचाप अर, मान हमारी कैन । टलनी नहीं शुक्नी अमर, लाख जतन कर भैन || भजन-अब कुछ जतन बनै न मेरी मना । चाहे तजि दे पान खाय दे चाहै रो २ नैना । पूरनमल तो जन्म जती है भन
पूरन तीसरा
तुम्हारे फंद फसै ना । अब० । जो कुछ लिखा भाज तेरे में
वाहि कोई मेंट सके ना । पूरनमल संग वही न जूरी, कर तू
लाख उसय मिले ना मात्र भन्न खाउ जन पिथौ सार
कुछ इन बावन में है ना। मन में धोरज धार बइन तू, प्राण
तजै कोई काज सरै ना ।। अब ।। सुन्दर सुघड़ हसीन काई
वर देख सहेलो लेना । निर्मोही साधू के ऊपर, हरगिज मैना
अपने प्राण न देना ।। अब० ॥
सुन्द्रादे का
दा.-कैसे मान कहना बहना दिल को बंधै न सब्र करार ।
मैना विन उस पूरनमल के दिल को सवर बंधना । लेना समझ
सहेली सच अव मेरे प्राण बचना हूँ मरने का मैं तैयार ॥
कैसे मान करना बहना० ॥
बाँदी का
दा.-मानों २ राज दुलारी- क्यों तुम बनती हो नादान ।
ठानी ठान इस कदर मैना बनो इश्क दीवानी । रानी रुपवा
होय जहां में डाटौ जोश जवानी ।। क्या बनती हो पागल
खफकान । मानौं ।
सद्रादे का
दा०-मगर न मिले मेरा हमदम, मरने में नहीं कसर है।
मझे नहीं डर, रुसवाई का रखा हथेली सर है । अब क्या जीने
में है सार || कैसे० ॥
बाँदी का
दादग-सुन्द्रादे अब मिले न परन बेशक प्राण गमादे । ना
दे कोई भलाई माली दिल से ख्याल हटादे ॥ रुसवा होय
जहां दरम्यान ॥ मानों० ॥
सुन्द्रादे का
दादरा-जानै मति धायल को घायल दीगर क्या पहचान
ताने दे दे कर तू मुझ को बांदी लमी खिमाने । तेरा कहना
है बेकार ॥ कैसे.॥
वहरत-हो दिवानी जवानी में रानी मेरी; ऐपी टानी कि जिस
का ठिकाना नहीं।मानो मेरी कही ना अमानो बनौ, रुसवा दुनियां
में अच्छा कराना नहीं । चाहै फजीहत करौबा से भैना मरौ, ऐसी
बातों में कुछ हाथ पाना नहीं । जो गया सोनया पर वोभाकर
वहां, तेरे रजो मखम को मिटाना नहीं ।
स द्रादे का
बहरत-जो वे पाया नहीं तो ठिकाना नहीं, जो ममा नी
झूठा बहनिा नहीं रहूं ज़िन्दी तो मार्ग प्रसीत सहूं, मुझे दुनिया
साई कराना नहीं ।। तू तो कहती है मेरे भले की बहन, लेकिन
मान है ये दिल दिवाना नहीं। दिल की मानू तो होव फजीहत
मेरा, माऊं सुख नींद ऊकै जमाना नहीं ।
काब का
दो०-सुन्द्रादे की मात सुन, ग़म की भरी पुकार ।
आ बेटी के पास यों, करन लमी गुफ्तार ।।
माता का
दो०-क्या ग़म रंज सवार है, मुन्द्रादे सुकुमार ।
हालत तेरी निहार के, छूटा सब्र करार ॥
चौ०-छूटा सब करोर फिकर मेरे दिल का भारी है ।
रौनक बदन तेरे को बेटी बिगड़ गई सारी है।
हुण जद रङ्ग चहरे का उफ आह सदै जारी है।
कहदे दिल का हाल जगी क्या तुझको बीमारी है।
दौ०-तेरी हालत खराब है। न तन में जरा ताव है ।।
हाल सब मुझे बतारी।
का से और किस सबब लमी क्या बीमारी सुकुमारी ॥
सुन्द्रादे का
दो०-क्या बतलाऊं मैं तुझे, अपने दिल का हाल ।
चन्द रोग में लम मया, मुझ इश्क जजान।
मो. -लमा इश्क जबात मात महवाल सुनाऊं सारा । स्थानकोट नृप का है सुत पूरनमल फूल हमारा ॥ उस अनवर शम्श कमर से एक दिन हुभानजागा फंसी इश्क के फन्द उसी पर है दिल फिदा हमारा ॥ क०-देख उस गुल को फ्रिसाना होमवा । दिल मेरा बुलबुख दिवाना होमया ।। दिल दिया दिल्वर कियो दिल से उसै । दिन में दिलबर का ठिकाना होगया। घर चुकी उस का परन ये कर चुकी । ध्यान प्रीतम से लगाना होमवा ।। ये खबर पाई कि पति जोगी हुए । बस तभी से दुख उठाना होमया ॥कत्सा करवाये जो कपटी सन्त थे।एक दिन उन का भी ना होगया।। मान गोरखनाल से लाई महल । कस्द दिल हसरत मिटानो होमपा । चन्द दिन यहां पर रहा परन सनम । हा यकायक ही रवाना होगया|एक उस गुल के बिना बागे जहां। है खिजा एना जमाना होगा । मुझ मरीजे इश्क का मादर मेरी । बस खतम भव भाषदाना होगया ॥ माता का दो०-परे डाकिनी तनक सी, करै गज़ब की बात । दीवानी हो इश्क में, बकै न गैरत खात ॥ ला०लं०-करती बद गुफ्तार खौफ मदनामी का नहीं खाती है। इतराती है उसी वे पर अन्दर को जाती है । कहती कुम कखाम मेरे भागे तू नहीं शरमाती है । बौरानी है सुनाती मुभ को इरक कहानी है ॥ न कुछ वक्त में तुझ अनौती बेहा चढी अपानी है । मस्तानी है मिखमला पर होगई दिवानी है । हया शरम को छोड़ साधुओं को हा कन्य बनाती है। इसराती० ॥ सन्द्रादे को मा० .-आँखों में तसबीर उसी पनमल को लहगती है। समझाती ये नसीहत मुझ को नहीं सुहाती है ॥ विन उस हम- बम शम्श कमर के बंधै न दिल को सब्र करार । नजार न
भावे सब तरफ देखू उसे निहार निहार ॥ गमे जुदाई में दी.
यानी बना नया मुझ को दिलदार । हया शरम का न मोदर
मतलक दिल में किया विचार ॥ है वह स्यालकोट नृप का ,
सुत जोगी जिसै बताती है । समझाती० ॥
माताका
दो०-अरे छोकड़ी तनक सी, करती नद गुफ्तार ।
दिल दीना भिखममा को, सब कुल कान, बिसार !
बहरत. ऐ तनक सी ममी से गुजाग ग़जाब, क्वारेएन में ही
दिल को फंसाया तैने । तू जवानी में ऐसी दिवानी हुई, नीच
जोनी का हमदम बनाया तैने ! अब दई डोर मांगप की
सब शरम, भौ बुजुर्गों को बट्टा लगाया तैने । हुई पैटा तू ऐसी
मेरे बेहषा, हा जमाने में रुसवा करावा तैने ।।
संदरादे का
बहरत-ऐरी मादर तु जिस का कहै मिखमना, तुझे उस के
वतन की खबर ही नहीं। वो है राजा का सुत बृह्मचारी व्रती,
उस बशर की तू जाने क्रदर ही नहीं । मैंने देखे हैं लाखों दी
नर नौजना, प्राया ऐसा हसीं कोई नजर ही नहीं। जब से हमदम
हमागे दगा दे मया, तब से होता है दिल को सबर ही नहीं ।
माता का
बहरत-मुझ बड़ी बूढ़ी का भी न करती अदब, बेहवाई से हा
पेश भाने लगी। मो तनकसी अभी से करै है सितम, तू दुपहरी
में तारे खिलाने लगी। बे खतर शर्म सारी रखी ताक में, और
अंगूठे पे मुझ को खिलाने लगी। मेरे आगे त बकने लगी
वे परद, मौर चिरा चुटकियों से उड़ाने लगी !!.
सद्रादे का
बहरत०-मेरी रग २ में वह माहरू रम रहा, ना हटै एक भी पत्न
को दिल से सनम । उस की चाहत में मैया मैं मशगल हूं,
रुसवा पुराई का पुतला न ग़म ॥ जो मिलेगा मुम मेरा प्यारा
के पुरन माताबा -- ही तो गले पंचलाऊगी तेगे दुदम । बिना पूरन जिन्दनी, अम्मा तेरी कसम अम्मा तेरी कसम ॥ रत-तू नसीहत सुनै ना फजीहत करै, पब तुम सैर इसकी लागी मैं । क्या जवानी में ऐसी दिनानी हुई, सब नशा गठएडा करादंनी मैं । दं उता खाल बेंतों से सारी तेरी, को चाहत का तुझको चस्वा दगी मैं : सब मुहम्मन की बातें ना दंनी मैं, बेहया तेरे सर को उड़ा दमी मैं !! सद्राद का हरत-ले ले तेगे दुदम सर को करदे कलम, रहना जिन्दी मुझे श्री नवारा नहीं। जब निकल हाथ से गुल हजारा गया, दिले बबुल का है। फिर गुजारा नहीं ॥ मैं तो मरने को खुद देख पार हूँ, मैया धमकाना वाजिर तुम्हारा नहीं । मुझे मारेगो पा खुद ही मर जाउनी, जो मिलैना वा हमदम हमारा नहीं ।। द्वितीच मंजिल प्रारम्भ । कवि का दो०-सुन्द्रादे ने मात की, एक न मानी बात । परनमल की याद में, घरणि पछारें खात -खाती पछारे धरणि पर मन में रही घबराय के। नरमी कर के बहाना पहुंची वो ऊपर जाच के।जीने की तजि उम्मेद ने की जिगर में ठान के। ल पर महल से मिरी मांगन में पड़ी मान के ॥ सखि मृतक सुन्द्रा का महल में रुदन सबी मचा । महाराज गोरखनाथ उत निज शिष्य को समझा रहे ॥ गोरखनाथ का दो०-शौहरत हो रही शहर में, परनमल सज्ञान । तेरी जुदाई में तजे, सन्द्राद ने प्रान -नजि प्राण सुन्द्रांदे दिये तेरी जुदाई में कुमर । मरती न ना नारि पर रहना कहों पर तू पगा। वह पाप प्रति तुम %3D पूरन वीसरा में २६ को बना तू शिव इतना काम कर । उद्धार हो तेरा जमी वेटोतू तीरथ धाम कर ॥ दे २ के सद् उपदेश कर सन्सार का उपकार तू । जाना वतन अपने को भी रहना मगर हुशियार तू॥ माता पिता तेरे विकला हैं धीर उनका दीजियो । छूकर चरण कर दण्डवत जीवन सफल निज कीजियो । हो वश तेरा सन्सार सुत कर दिया तुझको अमर । रहना भजन में मनन चेला विचरना निर्भय निडर ।। पूनमल को दो०-जो कुछ माज्ञा माप की, है मुझको मंजूर । तीपात्रा करन को, बाऊँ गुरू जरूर ॥ ई-मेजो जहाँ मुझको गुरू, बेशक वहीं मैं जाऊंगा । स्वामी तुम्हारे पद कमल के फिर दरश कहां पाऊमा ।। कर तीर्थ जो माता पिता अपने के क.ष्ट छुहाऊमा । दीजै पता अपना बता स्वामी वहीं भा जाऊँमा गोरखनाथ का दो०-तीरथ राज प्रवाग को, यहाँ से करें पचान । माना निस्सन्देह वहां, पूरनमल सुज्ञान ॥ कविका दो०-पूरनमख वहां से चना, किये तीर्थ स्नान । घूमत २ नया वह, स्थानकोट दरम्यान ॥ ०-स्वासकोट दरम्यान जाप बस्ती को खूब निहारा । बाग़ नौलखा में प्रा फिर पुरन ने डेरा डारा ॥ मुस्खा चमन पड़ा राहत से हरा हो गवा सारा । काम चील चिमनादर उन्लू सब कर नये किनारा ।। क०-कृपा गुरु की से ने ये चेटक दिखाया है। जरा सी देर में वीरान का गुलशन बनाया है। शजर एखे पड़े थे कब न था वहां नाम सम्बो का । समर गुल वर्ग मय टहनी हरा करके दिखापा है। जहां उन्लू व चीजों के भयानक पूरनमल
परन तीसरा
शब्द होते थे। वहां तोता व कायज मादि को कलरव करावा
है॥ बने थे घोंसला चिमगादगे कामों के डालों पर । कायलों
ने उनीं डालों पै अपना घर बनाया है ॥ पड़े थे खार हर
तहते व पट्टो रौस के मन्दर । सन्ज मखमल का मोया प्रश
अब वहां पर विछाया है।
दौ०-खुशी माली का छाई । सुघड़ डाली सजमाई ।।
निकट जोनी के माया ।
रख डाली कर जोर सखुन माहो महताब सुनाया ।
महताव का
दो०-दरशन कर प्रभू मापके, मिट गए सकल विकार ।
महत का सूखा हुआ, किया चमन गुलजार ।।
चौ०-किया चमन गुलजार आपने अपनी महर नजर से।
हरे भरे गुज खिने अजब फल फूले फले शजर से।
अजमत भरे सिद्ध हो पूरे माना हुभा किधर से।
दाज आसन डाल यहाँ नौ लगा भवरि शङ्कर से ।।
दौ०-भजन चेटक दिखलाया। चमन गुलजोर बनायो ।
आप हो सत गुरु स्वामी ।
शौकत शान शकल परनमन को सी अन्तरयामी ।
पूरनमल का
दो०-माली के ये क्या करै, बेहूदी गुफ्तार ।
को पूरनमल कहाँ रहै, बक २ न कर गंवार ॥
चो०-चक २ न कर गंवार करें ये बातें वे मतलब है।
हम जोमी अवधत रहैं रमते क्या करें गजब है।
किम का था यह चमन सूख गया इसका कौन सबर है।
हरा भरा होमया समो ये क्या माजरा अजब है।
दो०-पान सत गुरु का धरते। हर जगह फिरें विचरते।।
लम ममता जि मन से।
.
एन तीसरा करें भजन सच्चिदानन्द का हो निधरक बन्धन से ।। मालो का दो. '-माफ करो मेरी खता, यानी जी महाराज । बेशक पूरे सन्त हो, आप गरीब निवाज़ ॥ -आप गरीब निवाज ख्याल टुरू मेरी बात पर लायें । शङ्खपती नृप गुलशन के मालिक महाराज कहामें । था परनमा जती पुत्र उन का मशहूर जहां में । मरवा दिया लिया शिर अपयश भूपति इस दुनिर्वा में। -बुढ़ापे में बरी दजो त्रिया नृप ने न मानी थी। भाप कम- जोर थे रानी जवानी में दिवानी थी। मेज दासी को दे धोखा महल पुरन लाया था । वम्ल चाहो था रानो ने न उसने मन डिमाया था ।। ना जल कर पापिनी ने पुत्र का पातक लगाया था । जती था बृह्मचारी था सा व्यभिचारी बनाया था । महीपति को ला महलों में अपना रङ्ग चढ़ा कर के । करा के करच पूरन का निशा दीना मिटा कर के ॥ हमारा चार था जिनरी ट्याल उसका ही भाषा है। भाप की शान शौकत देख कर सन्देह छाया है । ये था गुलज़ार गुलशन होमया वरवाद बस तब से। कदम पाये तुम्हारे प्रश हुआ मावाद बस तब से ।। पूरनमल का दो०-सुख अपना मरवा दिया, कहा नारि का मान । हम ऐसे के नगर में, करें नहीं जल पान ।। चौ०-करे नहीं जखपान नाम नृप के से घबराते हैं। नगर अधर्मी के में हम नहिं खाने को खाते हैं । हरा मा किस सबब चमन अफसोस बड़ा लाते हैं। तोहमत लगै खामखो का हम अमी चले जाते हैं। १०-विचरते हर जगह गोविंद का नित ध्यान धरते हैं। कन्द फल मल खाकर के यहां गुजरान करते हैं.॥ विषय मोनों से
परनं तीसरा
मन को खींच कर तृष्णा को कर वस में । चमा मन धारि
सप बोले पुरे करमों से डरते हैं । ऐशो प्रशरत जो हैं जन
में समझ मिथ्या रखे हमने । रहैं निर्भय न हम संसार
बन्धन में परते है।
माली का
दो०-श्रवण विनय मेरो धरौ, कहूँ दोऊ कर जोर ।
जाऔ यहां विराज प्रभु, मानों मोर निहोर ।।
चौ०-मानों मोर निहोर यहाँ प्रासन महाराज जगामौ ।
कर टहल तुम चरणों की हित चित से कहीं न जानौ ।।
लाऊ नृप को बोल उन्हें प्रभु सद उपदेश सुनायो ।
हरौ तिमिर अज्ञान ज्ञान रूपी रवि कमल खिलानी ।।
दौ०-अनुग्रह स्वामी कीजै । दरश भूपति को दीजै ।।
दुखिन के क्लेश मिटायो ।
घोर शोक में डूब रहे नृप उन को भाप बचाभौ ॥
पूरनमल का
दो०-माली तेरे बचन को, किया मैंने मजूर ।
मोलिक अपने का यहाँ, ना तू बोल जार ॥
चौ०-जा तू बोल जरूर ज्ञान हम उस को समभावेंगे ।
मैंटे सकस विकार मुक्ति का मारम बतलागे।
तेरे कहने से इक दो दिन यहां ठहर जावेगे ।
जावेंगे फिर प्रानराज श्री गङ्गा जी न्हावेंगे।
१०-काम सन्तों का है मालो भजन में लौ लगाने का । धर्म
शुभ कर्म तीरथ धाम कर प्राय बिताने का ॥ जो फंस माया के
बस ग्राफ्रिल हैं दुनियादार दुनिया में । फर्ज है ज्ञान शिक्षा दे
पेत उन का कराने का ॥ मोह मद में जो अन्धे हो भटकते हैं
कुमारन में लगा कर ज्ञान का अञ्जन स्वर्ग उन को दिखाने का।
कधि का
दो०-सुन कर पूरन के वचन, माजी मन हरखाव ।
पूग्न तीसरा
पहुंच कपारी नृपति से, बोला शीश नवाब ।।
मालोको
दो०-शीश नवा बिनती करूं, राजन पति महाराज ।
साधू एक मजमत भरा, माया स्वामी आज ।
पं०-माते हो उस के महोपति गुलजार गुलशन होमवा ।
नहीं खिजां का नामो निशां छविदार गुलशन होमया ।।
हैं शील सागर सन्त जी गुण पुञ्ज सुघड़ स्वरूप
तप तेज रख पर शांति नम्र स्वभाव छबी अनूप हैं ।।
कर खुशामद बैठाल गुलशन में उन्ह घाया हूँ मैं ।
चल कर कगै दरशन बुलाने आप को पाया हूँ मैं ॥
ศ
कवि का
दो०-माजी के सुन कर वचन, शङ्खपती भूपाल ।
ले कर सब को साथ में, मए चमन ततकाब ।।
चौ०-गए चमन ततकाल नृपति के हर्ष हृदय में छाया ।
नहीं खिजा का नाम नजर गुलजार गुलिस्तां आया।
तख्ते पट्टी रोस साफ सुथरी मो अभी बनाया |
बैठा देखि सन्त जी को चरणों में शीश नवाया ।।
दौ-जोर कर सन्मुख जाके । वैठि गए नृप हरषा के ||
भक्ति भद्धा उर छाई।
प्रति निहोर कर भूपति ने जामी को गिरा सुनाई।
शङ्खपति का
दो०-चरण परस विनती कर्क, योमराज सुखकन्द ।
दर्शन कर प्रभु श्राप के, हुये सर्व मानन्द ।।
छं०-सूखा चपन कीना हरा सतगुरु हौ परे सन्त ह
विपता हरी मा दास जी मेरे लिए भगवन्त हो ॥ आगम
विभाम स्वामी बाग मेरे कीजिये। धन धाम भोजन वस्त्र
इच्छा हो यहां से बीजिये ।। मन क्रम बचन से भाप की है
कार मैं निश दिना। तुम चरण रज को शीश निज स्वामी
पूरन तीसरा
११
निशि दिना । किस के हो बेटा शिष्य किन के और कहां
चान है। कब से औ किस कारण लमा स्वामी तुम्हें ये शान है।
पूरनमत का
दो०-जोगी होते बे वतन, कहीं न उन का ग्रोम ।
जिस जा तबियत लमबई, कर दिया वहीं प्रधाम।।
चौ .-कर दिया वहीं मुकाम जक्त में नहीं किसी से नाता।
राजपाट धन धाम कुटुम सब झूठा नृपति दिखाता ॥
माया के बस हो प्राणो अपना अपना बतलाता ।
जिस तन पर अभिमान करै वह भी तो साथ न जाता।
-इसी से छोड़ सब झमड़ा भजन ईश्वर का करते हैं।
लागि ससार धन को स्वेच्छा से विचरते हैं। समझ कर
के रस षटरस सवै सम दृष्टि से देखें । न कुछ धन धाम की
छा उदर भिक्षा से भरते हैं ॥ भोग को रोम सम जाने बसन
ष धार माभूषण । महीपों के ये प्यारे सन्त इन से मन में
रते हैं। योग पदवी डिगा कर के जो जग में जन्म लेते है।
होते हैं भूपति चक्र माया के में परते हैं। इसी कारण से
राजन विलक्षण योग की पदवी । विना धारण किये इस
| न भव सागर से तरते हैं।
०-परम पद पंथ सुहावन । वोन पदवी मन भावन ॥
यही निगमागम मावे ।
मनक्रम बचन सुश्रुषा कर भव प्रावामवन मिटावें ॥
शंखपति का
दो०-स्वामी सांची माप की, परमारय में प्रीति ।
सत्य कठिन है योग पद, गूढ ज्ञान मोतीत ।।
-गड ज्ञान नोटीत यथास्थ यहो योग के लक्षण ।
मुबम रीति से राज पोम पदवी का किया निरीषय ।।
पुरन तीसरा
त्राहिमाम योगेश पोप की पुनि २ करें प्रदक्षण ।
तुच्छ बुद्धि स्वामी हम जाने किमि तुम ज्ञान बिलक्षण।
दो०-माप प्रभु अन्तर्यामी । सिद्ध सत् गुरु ही स्वामी ।।
मेरो सन्ताप मिटायो।
सूखौ चमन मापने निज प्रजमत से हरौ बनायो ।
पूरनमल का
हो०-क्यों ये
गुलशन आप का, सूख मया भूपाल ।
कौन कष्ट तुम को कहो, अपने दिल का हाल ।।
शंखपति का
हो०-सबव बताने में प्रभो, पाऊं दुक्ख अनाष
योनी जी एम दास से, स्ना बड़ा अपरोध ।
छं०-अपराध प्रति हम से हुमा होता न मुझसे ब्यान जी । गनी
छल में पान के बन गया अज्ञान जी ।। प्राखों से
प्यारा पुत्र परनमन दियो मरवाय के । बस तभी से गुलशन
मषा महाराज ये मुरझाय के निर्दोष थो ज्ञानी था सुत मैं कह
निश्चित माप सेविन कुंवर पूरन के जलै निशि दिन ज्रिमर संतापसे।
गरनमल का
दो०-क्या होता अब ग़म किए, मन में तनक विचार ।
पैदा से ना पैद हो, है जग का व्यवहार ॥
शंखपति का
दो०-जिगर मेरे को सन्तजी, बंधै न सब करार ।
होता है कुछ भ्रम सुम, स्वामी तुम्हें निहार॥
बन्द-देखा है जब से भापको सन्देह है स्वामी सम। होता
नहीं दिल को सबस् प्रभु रज है भारी झप से मिलती
हुई सब स्वामी तुम्हारी शान है । चितवन हसन तनकी गठन
वैसी ही छवि मुसकान है।। दीजे मिटा भ्रम सन्त जी कोहना-
बत की नजर । बीसौ बिसेप रन हो तुमकर दियकाईने अमर।।
परन
परन तीसरा पूरनमल का दो -अचरज की सी वोत तुम, करते हो भूपाल । मर के को जिंदा हुमा, है किस ताफ खवाल। अन्द-मरवा दिया तुमने जिसे वह जी सके किस तौर से । क्यों माह बस अन्धे हुए सोचौ नृपति टुक गौर से ॥ पहले दिया मरवाह सुत भ पाल अब रोते हो क्यों । बैठो पर कर जिमर में अश्कों से मुंह धोते हो क्यों। अखपति का 10-माया है ईश्वर की प्रबल पाता न काई पार प्रभु । उत्पति नौ जन को बही पल में कर सहार प्रभु ॥ उस विश्वपति पी विश्नु की माया निराली है सभी । स्वाधीन है प्राधीन है इसके ही सब सन्सार प्रभु ॥चाहे जिसे राजा करै चाहे जिसे रख कर । चाहे जिसे मारे जिलावै उमी के अधिकार प्रभ । घ रेणुका माता का कीना क्रोध वश हो परशुराम । यमदग्नि बारा जिलाचा उसके लिहे दो बार प्रम । हरिचन्द सतधारी का मुत जिया नाम ने डस मर गया । जिंदा यो रोहिताश्व भी इन में तो करौ विचार प्रभु ॥ श्रीकृष्ण ने अपने गुरु के पुत्र ही दीना जिला । नृप मौरबाज ने सत्य हित हनि दयी रतन- इमार प्रभु महाराज वह भी जी पड़ा घटना हैं ऐसी बहुत सी। रन ही तुम बीसौ विसे मान न कहौ हजार प्रभु ॥ पूरनमल का 10-क्यों हो रहे बेहोश ऐसे होश में मामी नृपति । अवधूत नागी को न अपना पुत्र बतलामौ नृपति ।। जो ईश ने कायम केये हैं नियम इस सन्सार के । बिपरीत उसके हो न सक्ता क्स क्यों पानी नृपति। जी अमर देह अनित्य मानों सत्व री कहन को । मर्दा न जिन्दा हो सके क्यों चित्त भटकाकी पति ॥ लीजै मिटा भ्रम सब बुला बस्ती के वाशिदा सकता। एन हूं वो मैं संत हूं पहचान करवानी नृपति।।
परन तीसरा कविका दौ-योमी के सुन कर पचन, खुशी हुए सुलतान । कहन जगे इस तौर से, कुना पास दीवान । शंखपति का दो-तनक न करो अपार तुम, रूपेशाः दीवान । वाशिंदे सब शहर के, इकठे हों यहां पान ॥ कबि का दो०-माज्ञा पा दीवान भट, मया शहर दरम्यान । कोतवाल को बुखाक, समझाया कुल ग्यान।। क०-दरोगा ने शहर सारे में ये इतला करादी है। चलो सब बारा का नर नारि पिटवादी सनादी है। महल में जाके फुलन्दे बमम्वादे को समझाक । दोऊ ठार डोलों में दई गुल- शन को भिजवाके । हजारों नारि नर खुश हो चले वस्ती से माते हैं। दरश करते हैं साधू चरण में सर मुकाते हैं। धूम भारी हुई गुखशन में सब हम्ला मचाते हैं। तो कर हमा- मोश सब को सखुन पुनमल सुनाते हैं । पूनमल का दो०-जो इस दम मौजद हैं, छोटे बड़े तमाम । होकर के खायोश सब, बैठौ वा आराम ॥ मा०-बैठौ सुख से भाई मत धम मचानौ । क्यों धक्का एक्की कर तकलीफ उठायौ ॥ ऐ भाईयों सुनौ अब सकल लगा कर कान । सोधू हवा परनमत ह. करौ मेरी पहचान ॥ यह नपति तुम्हारा परन म में बतावै । मर कर को जिंदा हुमा इन समभावै ॥ रे भाइयों नृपति माषा बस है अज्ञान ! क्या कीनी पहचान कही जी स्पेशा दीवान ।। रूपेशा दीवान का सा-बो की मेंने पहचान सो अमो बताऊ । अपने मन की .
तुम से नहीं बात छिपाऊ॥ महाराज कुंवर पूरन की शौकत
शान । मिलती है आप से सकल सूरत मूरत मुसकान ॥कुल कतै
वजह रंग डा और चाल तुम्हारी । तन गठन हसन चितवन
बोली प्रति प्यारी।। महाराज चिबुक पर ऐसा ही ठीक निशान।
किये किसी ने अमर तुम्ही पूरन हौ की पहचान ।।
पूरनमल का
ला.-मालिक से क्यों दीवान खिलाफ कहोगे। जो कहा नृपति
ने बह ही पाप कहोगे ॥ दीवान मापने की झूठी पहचान ।
मरवा दिया पुत्र को क्यों भूपति ने करिये ध्यान ।। तस्कर था
या कामी कपटी व्यभिचारी। क्या करी बता दो पता हकीकत
सारी ॥ दीवान रहे सब उसे नेक बतबाह । फिर मामला पुत्र
को दीनो क्यों नृप ने मरवाह ।।
दीवान का
दो०-स्वामी बीती दास्तां, मत कहवाऔ भाप ।
अन्तरयामी हौ प्रभू, मेंटौ सर सन्ताप ॥
पूरनमल का
दो०-जो तुम को मालूम हो, कह दो सच दीवान ।
दोषी और निदोष की, कर अभी पहचान ।।
दीवाम का
दो०-अगर भाप की सन्त जी, इसी तरह है राय ।
तो मैं सारी ऊफ्रियत, आप को सुनाय ।।
क०-कुमर भूपाल का पूरन निहायत धर्म धोरी था । नेक
नीयत था ज्ञानी था जती था बृह्मचारी था । एक दिन रात
महीपति पर बड़े उत्साह का माया । जिकर जिस में लिखा
इक नृप मुता के वाह का मापा | मए भूपति स्वयम्बर को
व्याहि दृजी त्रिया लाये । एक घर के नई रानी ने दो पाते ही
करवाये ॥ निषा बुलवा वर पूरन को उस ने महल बांदी से।
॥ पछिये पता भागे का नगैगा सहन बांदी से ॥ पूरनमल का दो०-फूलम्दे और कुबर से, महलों के दरम्यान । क्या गुजरी थी दास्तां, कर अनुचरी वचान ॥ चांदी को दी.-जो सच २ पूछौ मुझ, यानी जी महाराज । तो मैं बीता हाल सब, कहूं भाप से आज ला-एक दिन सिंमार कर ये फुलन्दे रानी। रही झांक झरोखन से इत उत दोवानी।। महाराज उधर से परनमल सरदार । जाते थे बाग़ को लिषा रानी ने उन्हें निहार ॥ देख कर शान शौकत सुधि बुधि विसरानी । मुश्ताक हुई बेटे पर गे मस्तानी ॥ महाराज मैंने समझाई थी समझाई थी हरचन्द कहन मेरी सन्तजी न इन की पाई जरा पसन्द ॥ करने इन के से मैं गुलशन को धाई। प्रनमा को हमराह लिवा कर बाई ॥ महाराज बताई थी इन को बीमार । सुन कर पाया वह महतन में तनक न करी अवार || रानी ने की बेटा सन झटका पटकी । करने का मोम पूरनमल से इन हटकी। महा राज कुमर नीचे को कर के नैन । माता बगै माफ मुझ को यो लमा दमबदम कैन ।। मजबूर छोर वह फेंटा और कटारी। भम नया महल से परनमल बृह्मचारी ।। छन्द-रानी ने राजा को बुला घोखे का जाज विका दिया। परन किया जवरन जिना भूपति को यों समझा दिया । पूछा था मुझ से नृपति ने बातें बनो दीनी मैंने । जैसा कहा रानी ने हां में हां मिला दीनी मैंने ॥ रानी के.कहने का अजी विश्वास बिलकुल मिया । पूरन कुमर मरवा दिया अपयश जमत में का ला.-महाराज नहीं छोड़ा उस ने ईमान । कायम रहा घरम पर स्वामी परनमल सुज्ञान॥ मया ॥
पूरनमत का
०-क्या कहती ये अनुचरी, कर दिल अन्दर ख्याल ।
रानी त भी बता दे, सच्चा सच्चा हाल ॥
छन्द-देना बता सच होल बोली झूठ तो दुख पाइनो । अपयश
जमत में होषमा माखिर नरक को जाइगी ॥ तारीफ पूरन की
करें नर नारि सब इस नगर के । कहते हैं सच था हैं सभी ये
पक्षपाती कुमर के ।। नृप पुत्र को अशराफ नेक शरीफ बतलाते
हैं सब । उस की मुहब्बत यादगाी में ये दुख पाते हैं सब ॥
क्यों बन गई ऐसी निठुर गनी ये तैने क्या किया। कहते है
सब मौसी ने पातक लगा के मरवा दिया ।।
फुलन्दे का
दो :-मो पापिन से वन नका, स्वामी बड़ा अधर्म ।
बिना बता मरवा दिया, सुत को किया कुकर्म ॥
भजन-यों ही मरवायौ मैंने कुमर हजारी । वो ही मरवाची
बेटा को पाप कियो अति भारी । निर्दोषी को दोष समापी
ऊंच नीच मन नेक ना विचारी ॥ योही० ॥ हुई जवानी
में दीवानी सारी बुद्धि विसारी । सुत के ऊपर विच रिमाची
मो सम कौन अधरमिन नारी ॥ योही० ॥ कहन न टुक बांदी
की मानी समझा समझा हारी । धमकाई महसन वुलवायी
परनमल
सौ सुत ब्रह्मचारी ।। योही० ॥दिलबर दिलजानी का
सुत से अपनी जीम विमारी । ऊंची नजर करी नहीं जानें कहत
रखौ मोसे मौसी महतारी ॥ वोही० ॥ पतिवृत धर्म सन्त जी
सुत ने बरणों मेरे प्रमोरी । एक न मानी कहन पुत्र की इश्क
नशा में मैं तो मई मरवारी ॥योंही० ॥ जबरन छीन लई छपा
से फेंटा और कटारी । दे सबूत भूपति को झूठा सितम कराई
मैंने सुत्र की स्वारी ॥ योही० ।।
पूरनमल का क.-ये क्या किया निर्दोष को गनी ते दोष लमा दियो । घर- मात्मा को कर कपट पापात्मा जो बना दिया । बक्षवा महल छल फन्द से अनुिचित करी फरजन्द से। तु नहीं डरी गोविन्द से तैमें कुल का दाग लगा दिया ।। बांदी से कर त ने सन्हा भूपति को महलों में बना। वैसे तेरा होमा भला घोखे का जाल बिछा दिया। निर्दोष को रानी सता वा मिल नषा तुझ को बतो ॥ मरवा हियो उसै बेखता दुनिया से नाम मिटा दिषा । राजा बड़ा दुर्भाम था बेटा का दिल पर दाग था। जोगी का दिया चिराग था उस का भी तू ने ब झा दिवा ।। फूलन्दे का दो०-स्वामी दासी से बना, बेशक बड़ा कपर । अब मुझका ज्यादा प्रभो, करौ मती मजवर ॥ बहरत-जो थो होनासे होकर रहा सन्त जी, मैं चरण पाप के में झुकाती हूं सर । अपनी करतूति से खुद ही लाचार हूं, मैंने मरवा दिया हा हजारी कुमर ॥ मो अधरमिन ने कीना है अधरम बड़ा, सुत की नेकी में स्वागी न कुछ भी कसर । कैसे उद्धार हो मेरा इस पाप से, अब पताश्री जतन कर महर की नजर ॥ पूरनमल का बहरत-क्वों त रोती है होती है लाचार अब, ब्रह्मचारी को पहले सतावा तैने । त हुई पाप में लीन खुद पापिनी, धर्म धारी को पापी बनाया तेने ॥ क्या था मतलब तेरे दिल का दे सब बता, जो जती को महल में बुलाया तैने । तेरा उद्धार कर तुझ को वरदान दू, क्यों कि कुल हाल सच्चा बताया तैने । फुलन्दे का बहरत-इच्छा सन्तान की थी मुझे हे प्रमो, पुत्र होने का नृप से सहारा मया। माश परन हो पूरन अधरम धरम ना विचारा नवा ॥धचारी को महलों बुलाया से मन में समझ, किया
मैंने, तो भी निष्फल मनोरथ हमारा नया । हाय भाषा न का
भी मेरे सन्त जी, बे खता मारा परन दुवारा गया ।
पूरनमल का
बहरत०-ऐरी रानी वृयाँ रोवे हो २ विकल, काहे निष्फल मनो-
रथ तुम्हारा नपा । शान शौकत में पूरन से मिलता हुमा,
होगा बेटा हुकम हो हमारो मया। जा चली जा न करना त
अधरम कभी, तेरे दिख का हो दुख दूर साग गयो । जो मया
सो नया फिर के प्राया हुमा, बम में रानी न कोई निहाग मया।
इषि का
दो०-पूरनमल के वचन सुन, रानी परम हुबास ।
रूपेशाः प्रा सन्त से, करन लगे अरदास ।।
रूपशाः दीवान का
दो०-चरण कमन में प्रभू के, पुनि २ नाऊं माय ।
मेरी भी विपता हगै, सतगुरु दीनानाथ ॥
१०-हे सत्व सतगुरु सहत दुख सबका मिटाया मापने ।
रानी प्रधम पापिन को भी गम से छुटाया मापने ॥
यह पारा महत का पड़ा था सूख कर बरबाद हो ।
कर के दवा हे दयानिधि हरियल बनाया मापने ॥
कीजै अनुग्रह दास पर निज चरण का सेवक समझा।
मा दीन जन के दुख हरण कर सुख दिखाया मापने ॥
बन्ध्या है मेरी नारि सुत से नाथ प्रभु वंचित रखा ।
बेड़ा किनारे क्यों न सेवक का बनाषा मापने ॥
इस वृद्धपन में मेरी स्वामी बस वही अभिलाष है।
दीजै हम भी पुत्र सब का दुख नशाया आपने ॥
परनमल का
म.-परवान श्री भगवान का फौरन ही बेड़ा पार हो ।
पूरन तीसरा
मन्त्री तेरा भी इस अनम दुख से अनिस उद्धार हो ।
पहनिमल फल दीना मैंने दैना खिला निज नारि को।
हो गर्भ धारण त्रिया के अनुकूल जो करतार हो ।
रह धर्म पर भारूढ़ तू सन्तान से फूलै फल ।
निश्चय समझ मन में तेरे पैदा मुवन सुकुमार हो ।
चारों पदारथ जमत में पाना सुलभ है ऐ साचिन ।
काव इन्द्र कों गोविंद का जो निष्कपट प्राधार हो।
कविका
दे०-पूग्नमन सब को करे, या विधि सद उपदेश ।
तब मा अम्बादे कही, मन में पाय कलेश ॥
अम्वादे का
दो०-फूलन्दे गैर सचिव की, दर विपति प्रम कीन ।
मो दुलिया दुर्भाग्य की, खबर न स्वामी लीन :
खा००-दीन दुखित अन्धी का हीना जामी जी तुम ध्यान
बिसार । मुत वियोग में सहूं स्वामी मैं निशदिन कष्ट अपार ॥
करें न पापी प्राण हमारे भोरी दुक्ख उठाती हूं। बेकन होकर
हर घड़ी दृग से नीर बहाती हूं। बीते बारह सात रात दिन
मछली सी घबड़ाती है। तड़प २ कर धरणि पर पलट पछारे
खाती खाऊं जहरमले अपने में मरजाऊंगी मार कटोर। सुत०॥
पूरनमल का
बाल-हौना सो होगवा परी रानी क्या इन बातों में सार ।
क्यों रोती है व्यर्थ अब मन से झूठा मोह विशार ॥ जिस दम
मरा पूत उस दम ही क्यों नहिं तैने ममारे प्रान । दुख पाने
को ही थी जिंदो क्यों बतलो नादान, अब ये लोग दिखाने
को क्यों करती सुन का शोक महान । मुख से रहता नहीं कोई
पूरन तीसरा
१४
माई यह सच्ची ने मान । मरना क्या मासान समझ रक्खा
रानी मन मांहिं विचार ॥ क्यों.॥
अम्मादेको
सावं-स्वामी सत्व पचन कहते हो मरना नहीं सुनमासान।
मरजाती तो भोगता कौन कर्म फल दुक्ख महान ॥ पर्व जन्म
में किये पाप सो उदय हुए अब स्वामी मान । मिटै न हरनिज
संस.जी होनहार होती पलवान ॥ मांखों से दीखता न मुझको
हुई सब तरह मिट्टो छूवार ॥ सुतः ॥
पूरनमल का
मा०२०-अब मिलने का नहीं पुत्र पस्न तेरो कर मन में रूपाल।
मुहत होमई मरे उस को बीती हैं नारह साल ॥ जो बरदान
मांगना रानी मॉम दऊ तुझको ततकाल । दीन देख कर तेरे
ऊपर हित चित से हुमा दयाल ।। कुपो करें गोविंद प्रम तो
दऊँ दुक्ख तेरा सब टार ॥ क्यों० ॥
अम्बादे का
दो०-और न कुछ इच्छा प्रमा, पह पर दीजे माय ।
अन्धी से सूमत करो, दरश भापका होय ॥
कवि का
दो०-मातो के सुन कर रचन, परनमल ततकाल ।
सुमिर हदय गुरु देव को, दई विमति निकाल ।
परनमल का
दो०-पह विभूति एकान्त जा, नैन नमामी माघ ।
हो प्रकाश गुरु कृपा से, सब सन्ताप नशाय ॥
कवि का
दो०- सुन कर प्रश्न के वचन, अम्बादे हरषाय ।
आ विभूति एकान्त में, नैनन ई समाप ।।
छ०-लमते विमखुती स बये, दोक रन उजारा होगया ।
४२
परन तीसरा
sho
दीवन समापों का बों दुख दर सारा होगवा ।
हो मगन रानी सन्त के दरशन किये हैं मान के।
कहने बमी दुख पाय मत अपना लिया पहचान के।
अम्बाका
दो०-तू परनमल लास है, सिपो मैंने पहचान ।
रूप बनाया सन्त का, घोबा दीना मान ॥
ची-चोखा दोनो मान जांच मेरी में नहीं कसर
ज्यों को स्वों निशान तिल का बेटा तेरे मुखापर है।
सात बाद मिला तू मुत ईश्वर की महर नजर है।
बतखादे बौना तमको किसने कर दिया अमर है ।
क.-मया मारा तू जब से चैन इक पलक न पाया है।
वादगारी सेंरी में लाल दुख भारी उठावा है ।।
अश्किल से ये ईश्वर ने वक्त मुझको दिखाया है।
किया ग़म को रफै विड़ा हुमा बेटा मिलाया है।।
दौ०-अजब ईश्वर की माया । मेद उसका नहीं पाया ।
जिधर की फेर नकार दे।
राईको पर्वत करदे पर्वत को गई करदे ॥
परममस का
1-पर्वो माता.हुई बोवनी, दीना होश बिसार ।
परनमा मुख बताती, तू हमको हर पार ॥
चौ.-तू हमको हर बार पसाती है परनमा माता ।
मग माइन्सान न फिर वापिस दुनिया में माता।
माता पिता पुत्र भ्राता सब जग का झूठा नाता ।
माया केबस हा प्राणी अपना अपना बतलाता।
२०-हार इस मोह जाबका । हटा दिखावास को ।।
कहै क्या मेरा मेरा।
वो कुछ वेरा मा छ मेस है वहां रेन बसेरा ॥
भवादका दो०-मैं हरनिन मानूं नहीं, क्यों देता है चाल । छाती ठंडी कर मेरी, मोदी में प्रा खास ॥ म.-मो दुखिया को तू क्यों दुख दिखला है । कर तरस कन्ग नाह तरसाव है। मेरे बाब उठाये मैंने कष्ट महान । तब तेरी परत दिखलाई बेटा भी भगवान ॥ सौतिन बैरिन ने तुझे करा करवायी। लेकिन ईश्वर ने फिर तू कमर जिल्लायो । मेरे पुत्र मुनादे भर तू सारा हात । किसने और कैसे बिन्दा की पूरनमा पार॥ पूरनमल का खो.-हा राज करै बोनी को पुत्र बवाने । क्यों मात पिना मतलब तू हमें सतावै ॥ ऐरी रानी न मैं परनमल वेरा खोज। हं भवधूत पत जोगी का है किस वरफ बोल ॥ जम में हों सालों तेरे सुत की सानी । भ्रा के बस होकर क्यों कर तू बोरानी ॥ ऐरी रानी जिस दिना परन छोड़े पान । क्या कर नपा उस दिना तुमने सोच जिमर दरम्यान ॥ कवि का दो०-सुन कर परन बचन, रानी मसके कुछ दोऊ करन से, तनक न देरी कीन । चौ० -तनक भई ना देर धार पय प्रमटी दोऊ कुचन से। गिरी सन्त के मुख में देखें सब नर नारि मन से ।। यह चरित्र बखि पुरवासी सब मनन भये तन मन से। अम्मादे हो खुशी पुत्र को पकड़ा दोऊ करन से ।। दौ०-देख सुत को सुख पावै । न फूली मा समावै ॥ मधुर वानी रस सानी। चूमि कुमर की पेशानी बोली सम्मादे रानी ॥ भम्वाद का दो०-मो दुखिषा पर मात्र दिया है मनवान पात्र । के चतुर प्रवीन ।
पूरन तीसरा
पुनर्जन्म दे मिलापा, एम से मेरा लाल ॥
चौ०-मुझ से मेरा लाल मिलाया बिछुड़ा इमो दुबारा ।
इबत शोक सिंधु से फिर ईश्वर ने दिया सहारा ॥
बारह सास पिछारी मुख देखा सुत मैंने तुम्हारा ।
हुए दुक्ख सब दूर गड़ले जब से तुम्हें निहाग ॥
-हुमा जिन्दा तु कैसे । बना जोनी त कैसे ॥
हाल सब बाब सुनाना ।
कहैं इन्द्र मोविन्द मेरे दिल का सन्देह मिटोनी ॥
परममल का
दो०-करल कग फिकवा दिया, भूपति ने मैं मात ।
जिंदा कर संग ले नये, शुम को गोरखनाथ ॥
छन्द-महाराज मोरखनाथ ने मपा मुझे कीना अमर ।
मैंने सकल भ्रम बान देकर ज्ञान कर दीना अमर ॥
माया करन दरशन तेरे चरणों में सर नागा ई में ।
दुख दूर सब के होगये तीरथ करन जाता है मै ॥
अम्बादे का
ला०-यो दुखिया को क्यों फिर दुख दिखलाता है। मचा
को तड़फती छाड़ कहां जाता है। अब रही यही तुम कहीं न
जामौ छैया। मैया अपनी को धार बंधामी छवा ॥ मो दुखिया
को अब दुख न दिखामी छया । मैं बहुत रोचुकी है न
रुबाश्री छैया । यो हानाहक मुझ को सुत कलपाता है।
मैया को तहमती छोड़ कहाँ जाता हैं ।
परनमस का
मा०-भव नहीं कुपंथ में मात फंसा जाता है। ये पन्थ फकीरी
काम को माता है ॥ नहीं मोह रहा जम विथ्या पहचाना
प्रश्न तीसरा
॥ झूठे झमट में मन को भटकाना है। करके मन इन्द्री
मन पार जाना है। कुछ सार नहीं दुनियां का स्व छाना
॥ देखत का नाता तात भ्रातं माता है। ये पन्ध फकीरी
कवि का
दो०-परनमसा के सुन पचन, माता होइ अधीर ।
कान बगे तब शखपति, भर नैनों में नीर ।।
खपति का
दो०-पूरनमल सनाख तेरे, उठ न ऊंची नार ।
अपनी करनी पर कमर, हूं भारी बाजार ॥
चौ०-हूं भारी जाचार जिगर अपने शरमाऊं बेटा।
विन समझे तुझको मरवाया पब पबिताऊं बेटा॥
नहीं बोम के पोम उमर तुमको समझाऊ वेटा।
करी राज तुम राम भजन मैं ध्यान लगाऊ वेटा ।
ना.-कीना अनर्थ प्रति मैंने कुमर हजारी । बेखता कराई
लाल तुम्हारी स्वारी ॥ मेरे गल कटोचा व्यर्थ नबा तेरा।
ईश्वर के दरवार होय किस तरह भला मेरा ।।
छन्द-अव चैन नहीं चित को पड़ सब तौर मिट्टी ख्वार है।
अपयश हुमा जग में मेरा हा जिन्दमी विकार है।
रानी के बस फंस यह ग़जब बेटा मेरे से होगया।
सोचा न कुछ अनुचित उचित बस कोध के में मोनया ॥
बा.-अब खता हमारी दिन से कुमर विसारी । स्वान.
कोट का छैया राज सम्हारौ । मेरे बाल न कर पहली बातों
का प्रयोजन होना था सो हुमा हटादेो दिल से रञ्ज मलाला ॥
परनमलका
दोनदादाजी दिन पर मेरे, तनक न रजा मलाल ।
बीती बातों का नहीं, कीजै आप खचात ॥
-करो राप्रम दर शोक में क्यों लामो गोता है।
मोनो मुख से राज पिता रोने से क्या होता है।
रोना नाम करना उर भरना पबिताना थोता है।
होनहार पस हो प्राणी सुख दुक्ख मीज बोता है ।।
•-राज की म न इच्छा । क पर घर में मिला।
इक्मगुरुवर का पावा।
बाऊंना मैं वहीं माप का दर्शन करने वाला ॥
शापतिका
दो.-ठान न ऐसी ठानिये, बेटा प्राय प्रचार ।
मोनो पक्ष करमा सुख, भगवां वन उवार ॥
बन्द-मनवा उतारी वस्र पारी राज सी भङ्गार तन ।
रहतजिकीरी मेष पा कर बना पर बैठो सुवन ॥
है उमर तेरी बास बेटा अति कठिन पर पन्थ है।
बकि गए बहुत इस डमर में पाया परन्तु न अन्त है।
तेरे बिना मम धाम वैभव सब पड़े सूना नबर ।
है वही अफेला पुत्र दीपक भवन मेरे का कुमर ।।
प्रनमत को
दो -मैं हरगिजा राना नहीं, कही पाप हरचन्द ।
बन्धन प्रब सन्सार का, मेरी नहाँ पसन्द ।।
मजन-स भव सागर सन्सार से हो पार हमें जाना है। शान
पंच गुरु ने सिखवाया । सुखम मुक्ति का मार्ग बताथा ॥ मन
का सबसताप मिटावा ॥ नहीं रहा मोह परिवार से ॥ बन
ठा पापाना है। इस० ॥ राज पाट सग सम्पति नाना ।
है इस वन में स्वप्न समाना होता तन तजि सब को जाना।
पोपी वनक विचार से । मन पो ही भटकाना है । इस० ॥
सात मात दारा सुत प्राता । इदुर कबीला मा नातामा
परन तीसरा
समप कोई काम न भावा । बोले बो हरदम प्यार से। फिर
सब ने भव माना है। इस० ॥ न मैं मोह फन्दे में पाऊ।
पास गुरु अपने के बाऊ । जन से मावा गबन मिटाऊं।
जोबना के सर्वापार से ॥ मोय कि परम पाना है ।इस०॥
कविका
दो०-पूरनमल के मन बचन, पति मन पसाप ।
माह सर्द मर एक रम, विरामी गश खान
सोरठा-झटपट विषा उठाय; एएनमा ने पिता को ।
कान बनो सममाप, धीरज दे इस दौर से॥
पूरनमल का
•-अमर ठान ठानों पिता, मो न ऐसी मार।
दरश कराऊ गुरु का, मिट सकस सन्ताप ॥
सोरठा-मुनिये भी महागड, प्रांख पद सब कीजिये।
दरशन होंगे मात्र, तमें गुरु महाराज के
कषिका
दो०-माव पिता को चास पूरनमा मज्ञान ।
नेत्र बन्द करवाप के, होगया अन्तरपान ।।
बन्द-होवर के अन्तरम्यान गुरु के पास भट भाषा मर ।
कर दरश गोरखनाथ का मन मोहि हसाना मर ॥
देखा न मुत को किस इस रानी नृपति होने वाले।
एन कमर पग्न इमर विसाप कर रोने बने ॥
बपति का
दो०-पोखा
-पोखा रेनषा, परवा पांस पर।
कहाँ विषा त जाप कर, परनमय करणान्द ॥
बहरसा-दी करा पन्द माने पों की कमर, ज्वान गोरख
पुकारामा सेने। दीना धोखा न मन में विचारी एला,
पूरन तीसरा त हुमा, सुख दिखा बेटा फिर दुख दिखाया तैने । इस अनम शोक गागर से बेड़ा मेरा, ना किनारे से छीना लमाया तैने ।। अम्बादे का बहरत०-छैयो गैवा सी मैया विलकती तजी, हा तनक भी दया ना विचारी कुमर । दे के धोखो मया त कहां लादिले, क्यों पहब्बत कुटुम से विसारी कुमर ॥ जैसे तैसे व मुश्किल से छौना मैंने, तेरी परत दृगन से निहारी कुमर । तू चकाषक ही गावष यहाँ से हुमा, अब सबर कैसे लाऊ हजारी कुमर ॥ शबपति का बहरत०-अमागे का मन में तनक मी तरस, ने छौना पिरोना विचारा नहीं । अपने माता पिता का दुखोना हृदय, मेरे छैचा ये करतब तुम्हारा नहीं ॥ पाया तुझके निराशा से माशा हुई, समझा होगा जुदा अव दुलारा नहीं । त दगा दे गवा मुझे प रन कुंवर, रहा जोने का जग में सहाग नहीं । अम्बादे का बहरत-मैंने जाना कि भर दिन हमारे पि.रे, दुख टला मिला हमारा दुलारा मया । फिर पटक दुल के दुख में मुझे अब कुमर, त. बता कर किधर को किनारा मया ॥ मन करू वैसी बाऊ कहां मैं समा, हो जुदा मुझ से प्रायों का प्यारा गया । पिना परन के परन कर जिन्दनी; हो खतम भाव- दाना हमारा गया । कषिका दो०-हिस्सा सोषम में कहा, ये तमाम अहवाल । बाकी चौथे भाग में, देखौ मागे हाल ॥ पं०-मयाराम शर्मा गौर के श्याम प्रेस हाथरस में प्रिंटर व पववियर पं. राधावनम शर्मा गौड़ द्वारा द्रित।
संगीत महाभारत हिन्दी भूषण पण्डित जथाराम शर्मा गौरचित कौरव पांडव इत्पत्ति जरासिन्धु शिशुपाल वध द्रौपदी स्वयम्स औसर की बाजी उरबसी दरव द्रौपदी चीरन 'नकली द्रोपदी कीचक बध अभिमन्यु विवाह मचर्य को शना पहला मामा दूसरा काग পাৰ কৰা भगदत्त स्थ अभिमन्यु समर अभिमन्यु स्वर्गवाल স্মল প্রক্কি जयद्रथ बध द्रौण स्वर्ग हाल दुर्योधन बध द्रौपदी पुत्र पर शु फोलादी भीम भीष शरीर त्याग घोड़े की बारी ज्याला का जौहर सुधनक्षा संग्राम अरजुन का काम अहगेला खन चन्द्रहास, बीर घरमा संग्राम बिदुर तपस्या कृष्ण गोलोक गवन पाँडव सुरपुर गवन गोविन्द चमन तोताराम-कृत सङ्गीत देथा को थाह धांधू का ब्याह অষ্টাদ া আঃ कफजा बहरा ब्रह्मा का व्याह सुरजापति का भूला पुस्तक मिलने का पता-