Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Shrawak Ke Barah Vrat (12 Niyam Sahit)
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ॐ
श्रावक के बारह-व्रत
सम्बकत्व का स्वरूप।
तर (पान) का सा स्वाप है उनको इसी प्रकार जान
कार महा करना सम्बका है। मुख्य नत्व तीन :-देष, गुर और
धर्म।
देवनयरानु को हनने वाले, अठारह दोष रहित, सर्वश,
चीनराग, हितोपदेशक-अरिहन्त और अष्ट कर्मों का ज्ञेय
करके मोक्ष को प्राप्त हुए सिद्ध भगवान देव है।
गुरुतत्व-निर्मन्य ( परिग्रह रहित ) कनक कामिनी के त्यागी पंच
महामत..
भारक, पटकाय जीवों के रक्षक, सत्ताईम
गुणों से भूपित, वीतराग की प्रामानुसार चलने वाले
साधु, गुम।
धर्मवन----सर्वभाषित,, पयामया विनयभूलफ, जीवतत्त्व और
अजीवतत्त्य तथा पागा और
का भेदमान करने
वाला, मोन सत्त्व का प्रापक-शास्त्र, है।
.
(२)
प्रतिज्ञा
उपर नि अनुगार में देव गुरु और नमकी भला (
करूंगा। इनके सिवा किनी मरे गुरु और गर्म की मा
साधक व सच्चा नहीं मान गा ।
प्रागार
कदाचित् गना के ग्रामह में, मानि के बनाकार मे,
के प्रकोप से, माता पिता, अादि कुटुम्ब की नथा गुरु की
पालन निमित्त दुष्काल (विपत्ति पाने पर अथवा अटी
भटके निर्वाह निमित्त कुदेव कुगुम कुधर्म का दान-मान दे
तो मेरे यागार है इनके मिया किसी विशेष अवसर पर दुःख
की रक्षा निमित्त मंघ का कष्ट दूर करने निमित्त, धर्म की :
के लिए और लोक व्यवहार से कुदेव यादि का सम्मान क
तो इनका भी मेरे आगार है।
नियम
देवाराधना-सुख शान्ति में नित्य प्रति नमोकार मन्त्र व
) या श्रानुपूर्वी गिनू गा अथवा पांच पदों की
करूगा-अर्थात देवस्तुति करता रहूँगा।
१.अागार-इन कारणों से नियम भंग नहीं होगा।
श्रावक के
यारह मनु
गुरुयाराधना- जिम क्षेत्र में में रहता। इस सत्र में विराजमान
साधु माध्वी का प्रतिदिन दर्शन पगा। यदि
किमी विशेष कारा से दर्शन नहीं कर सफा
नोकिसी ? विगय आदि का त्याग करूगाचा
पिसी दूसरे नियम का पालन करगा शास्त्रा
नुसार गुरु भक्ति करता रहूंगा।
धर्माराधना- केवली भापित, अहिंसा म्यरूप, दयामय धर्म
को धर्म मानगा, और जिसमें हिंसा होती है
उसे धर्म नहीं मानूगा। देवी देवता, तीन सौ
तिरसठ . पाखंडी, युदर्शनी, पासव
श्रादर-सत्कार रुपया पसा यादि धर्म निमित्त
नहीं दंगा. यदि लोक व्यवहार से देना पड़े
तो उसे धर्म नहीं समगा। यन सकेगा जहाँ तक
योड़ा या बहुत जिनवाणी का पठन-मनन या
श्रवण करगा। नवतत्व चार निक्षेत्र, चार प्रमाण
सातनय सप्तभंग तथा जिन भापित शास्त्रों का
यथाविधि स्वाध्याय करने का प्रयत्न करा.
प्रत्यन और परोस प्रमाणों द्वारा तथा नयों द्वारा
पदायों के स्वरूप को जानने का प्रयत्न करगा।
ह
को चंदना
1
इस प्रकार मिथ्यात्व त्याग कर सम्यक गुमश्री
महाराज के समीप सम्यक्त्व
ग्रहण करता हूं।
--
दुग्ध-वृन-नवनीत (मक्खन) तेल-गुड़ादि पदार्थों का परित्याग करना
(१०)
श्रीरको बारह मन
।
यादि मिनभिनाने लगते। नया गन्दगी फैलती, जो गंगोपदि
का फोरगा वन जानी।
८ माह बहारी कटोर नाही रनी चाहियोंकि इसमें कोमल
जीव मर जान ।।
। गोरी गटर श्रादि में दट्टी पेशाय नहीं करना चाहिए.. गों
ऐसा करने से मम्धन जीवों की हिंमा होती है, और गर
वायु से शरीर में अनेक रोग उत्पन्न होते है।
१० याने पीने को वस्तुए रमचलित हो गई हों, गन्ध वर्ण बदल ग
हो चम्नु में लार पड़ गई हो. मालिमा नीलीया मलम श्रा
हो इत्यादि विपुल पीजों को खाने पीने के काम में :
लाना पालिए।
११ नालाब नदी गुण यादि में फूट कर या अन्दर घुम
बिना पने पानी से ग्नान नहीं करना चाहिए, क्योंकि
की गर्मी और पमीने में नया शरीर, थावात से घर
जलचर जीव मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं।
१. दीपक को खुला नहीं रखना चाहिए. जीयों की रस
लिए ढका रहना पाहिए श्री. उसको असावधानी
जलाना चाहिए।
--
१३. अपने वृद्ध पायों को अवाग नहीं किन देना पाहि
फि, इन पत्रों में बहुत बप तुम्हारी सेवा की, हर
घृत माता की तगा पालन करने योग्य है । इनक
के हाथ नहीं बचना चाहिए नया ऐसी जगह पर
बनना चाहिए, जहां में काट पाव।
कायत
१४ मेले, विवाहादि अवसर पर इक्का, गाड़ी आदि को शर्त
बद कर नहीं दौड़ाना चाहिए. ऐसा करने से घोड़े चैल
श्रादि के प्रारण चले जाते तथा मार्ग में कुत्ते, बालक
प्रादि दव फर मर जाते है।
१५ जिन वस्तुओं के निमित्त से पंचेन्द्रिय जीवों का घात होता
है ऐसो वस्तुओं, पंग्य बाली पोशाकों, कचकड़ा की चीजों
हाथी दांत वगैरह फी वस्तुओं को काम में नहीं लाना
चाहिए, क्योंकि इनसे हिंसा को उत्तेजना मिलती है।
१६ विरादरी आदि के जीमन में एक थाल में अनेक को मिलकर
भोजन नहीं करना चाहिए और जूठा नहीं डालना चाहिए ।
१ रात्रि को भ्रमण न करना च हिए क्योंकि ऐसा करने से
जीव हिंसा और व्यभिचार की संज्ञा बढ़ जाती है।
१८ हिंसक जाति को बंडा पाड़ा आदि पसु नहीं देने चाहिए।
१६ मृतक की राख और हड्डी ( फूल ) को नदी तालाब श्रादि
में नही डोलना चाहिए क्योंकि राख हट्टी. के खार से जल
में केस जीव भी मर जाते हैं।
२० जिससे किसी भी प्रकार की हानि होने की संभावना हो,
से किप्ती भो जहरीले पागल आदि जानवरों को प्रावक
न मारे न मराये और न मारने वाले को भला जाने। यदि
किसी की प्राणरक्षा के निमित्त उन्हें पकड़ कर या पकड़वा
कर, पीजरे में या शून्य घर में या एकान्त स्थान में छोड़ना
या छुड्याना पड़े तो दूसरी बात है।
१ किसी जीव का प्रागा बनाने मे लिए या फिगोमा
कार मनुष्य को शिक्षा दिलाने के लिए गदिका मूल यांना
अचानक विना विचारे बोलने नेहोशो से यदि मुझम असा
१ विना विचारे किसी को आघात पहुंचे, एसा वचन बोलना।
४ किसी को जान बूझ कर मूठा उपदश देना, खोटी सलाह देता
ये सत्याणुव्रत के पांच अतिचार है, इनको जान कर
(१४)
प्रागार
पढ़े तो इसका मेरे आगार है।
२ हास्य भय कोध आदि परिणाम से गजा की यात्रा
बोला जागे तो मेरे प्रागार।
अतिचार (दोष)
२ किसी की गुप्त वात प्रकट करना।
३ किसी स्त्री पुरुप का मामिर्क भेद प्रकाशित करना ।
५ झूठा लेख खत पत्रादि लिखना।
त्यागना चाहिए।
2008
.......
00000.00
1
..
न
श्रावक के बारह व्रत
(१५)
शिक्षा
.
:
...
१ जिस बात का पफा प्रमाण न हो ऐसी वात नहीं बोलनी
चाहिये।
२ युक्त अयुक्त का विचार किये बिना नहीं बोलना चाहिये ।
३ विशेष कारण विना ऐसा कटु वचन नहीं बोलना चाहिये
जिससे दूसरे के साथ बिगाड़ हो।
४ अपनी शक्ति का विचार न करके लम्बी चौड़ी बात नहीं करनी
चाहिये।
५ इतना हो वोलना चाहिये, जिसका पालन कर सकें अधिक
बोलने से प्रतिष्ठा: घटती है तथा लोगों का विश्वास उस पर
नहीं रहता है।
६ किसी को नुकसान पहुंचे, फजीता हो विरोध पढ़े ऐसी बात
नहीं बोलनी चाहिये।
७ कोई सलाह लेने श्रावे. उसको खोटी सलाह नहीं देनी चाहिये,
क्योंकि इसे विश्वासघात कहते हैं और विश्वासघात महा-
पाप है।
भले बुरे का विचार किये विना दूसरे को प्रसन्न करने के लिये
मृदुभापी नहीं बनना चाहिये।
, किसी को कुमार्ग से रोकने के लिये हितकामना से बोले गये
. : कटु वचन परिणाम में सुखदायी होने से यद्यपि निर्दोष है,
तथापि : दूनरे को . अग्राह्य होने से मौन रहना. अधिक
श्रेयस्कर है।
+----------
--
१० मिनी की निन्दानीं करनी नातिनीसार प्रतान
रानी मग या मामाका दाराने या
प्रयय करना नागिन्नु दकिंगार में जा पाठ पर
प्रस्ट नहीं करना ना।
पमान का हिना ने किया नही करनी
गा।
१२ धार्मिक कार्यों में लपट मति नहीं बोलना माना
१६ ममा में पंचावनी में या परिसरात मनुब माय पनी
मी महारानी करनीना।
१ रियों को पुस मामलों को नियोकमार कभी
हमीनान करनी चाहिं।
४. रिनीरमाय माकिनी कामवन्दना भी पटाना
पाहिले त्योफिहमी नजाक में कमी क्लेश हो जाता है,
'प्रया प्रेमवेप का रूप धार कर देता है।
१६ जहाँ तक बन सके, कम बोलने की प्रादन टालनी पाहिले.
हित मिन सत्य और भिववचन बोलने का अन्यान करना
१ निनो मुल्य १४ कारणों से मूल बोला जाता है-झोथ
२मान, : माया. लोभ. ५ राग, :.प. ८ हान्य - भर
ला. मीश, ११ हर्ष. १९ोक, १३ गई और
१४ वरत
वनिना।
१८ मूल से अनेक गुरु उत्पन्न होते हैं. मका को विश्वास
नहीं करता, एक मह से तय नद्गुण ढंक जाते हैं. एक
भटी बात को सित करने के लिय के लिए अनेक भू बोलने
पइते हैं. को लोग ग-पी, तवार, सच्चा उग, टत्यादि
श्रावक के बारह व्रत
नामों से पुकारते हैं । भूठ से कभी-कभी अकाल मृत्यु भी हा
जाती है और परभव में गूंगा वावेला कटुभायी तोतला दुर्गन्ध
मुख वाला और एकेन्द्रिय आदि होता है, ऐसा समझ कर झूठ
का त्याग करना चाहिए ।
PE यदि स्त्री कोई गुप्त बात अपने पति कहे तो पति को
चाहिये कि उसे प्रकाशित न करे, क्योंकि कभी-कभी गुप्त
वात के प्रकाशित हो जाने पर स्त्री आत्म हत्या तक कर
anin
लेती है!
२० प्रथम तो कोई गुप्त वात स्त्री' को कहनी ही नहीं चाहिए
यदि किसी खास कारण से कोई गुप्त वात स्त्री को कह दे तो
स्त्री को चाहिए कि उसको प्रकाशित न करे, क्योंकि कोई.
कोई वात ऐसी होती है कि जिसके प्रकाशित हो जाने से पति
के प्राण संकट में पड़ जाते हैं। इसी तरह मिन को भी चाहिए
कि मित्र की कोई गुप्त वात प्रगट न करें।
...
.
(१८)
श्रावक के बारह व्रत
तीसरे स्थूल अदत्तादान (चोरी) का त्याग
इन्य से--मैं ऐसी चोरी नहीं कांगा और न करवाऊंगा, जिससे
राज दएड या पंचों से अपमान हो।
क्षेत्र से-मैं मर्यादित क्षेत्र की
वस्तु
को स्वामी की यात्रा विना
ग्रहण नहीं करूंगा और न करवाऊंगा, जिससे राजा
द्वारा दण्ड था पंचों द्वारा दण्ड प्राप्त हो। मर्यादा से
बाहर समस्त प्रकार की चोरी का त्याग करता हूँ।
काल से--में जीवनपर्यन्त उक्त प्रकार की चोरी का त्याग करता हूँ।
भार से मैं मन वचन काय से उक्त प्रकार को चोरी न करूंगा
और न करवाऊंगा। इसके मुख्य निम्रोक्त पाँच भेद
१ किसी के मकान में खात (सेंध) लगा कर स्वामी की आज्ञा
विना कोई वस्तु लेना।
२ गांठ खोल कर स्वामी की आज्ञा बिना कोई चीज लेना।
३ ताले पर कुंजी लगा कर अथवा ताला तोड़ कर विना थाज्ञा
किसी की बस्तु लेना।
४ मार्ग में चलते हुए को लूटना।
५. कोई गिरी पड़ी वस्तु जिसका मालिक है, उसकी विना श्राशा
ग्रहण करना इत्यादि।
है
पाबंफ के बारह प्रत
(१६)
नियम
१ मैं नरुती चीज को असली कह कर नहीं बेचूंगा।
२ में रेल का टिकट और माल का किराया नहीं दिपाऊंगा।
३ में डण्डी मार कर कम नहीं तोलूगा और गंज आदि को
खिसका फर कम नहीं नापूगा । अर्थात हर एक प्रकार के
व्यापार में छल पूर्वक क्रिया नहीं करूंगा।
नागार
१ किसी सम्बन्धी मित्र या अपने पर विश्वास रखने वाले का घर
उसके पीछे खोल कर कोई चीज लेनी पड़े तो इसका मेरे भागार
है, किन्तु उसकी सूचना उसे तत्काल दूंगा।
२ कम मूल्य वाली कागज कलम सुपारी औषधि आदि वस्त
जिसका लेना व्यवहार में चोरी नहीं समझा जाता है, ग्वामी
की यात्रा विना लेना पड़े तो इसका मेरे पागार है।
३ मार्ग में गिरी भूली-भटकी वस्तु जिसके मालिक का निश्चय
नहीं है, उसको रखने का श्रागार है। यदि अधिक
मूल्य
की
वस्तु होगी तो उसका कुछ भाग परमार्थ में लगाऊंगा।
४ गड़ा पडा धन यदि हाथ लगे तो गज्य के कानून अनुसार
कागा जिस पर राजा का हक्क नहीं पहुंचता है, उस धन का
कुछ भाग परमार्थ कार्य में लगा कर शेष धन रस ने का.
श्रगार है।
..
(२०)
-
अतिवार (दोष)
-
१ चोरी की चीज व वर्गहना और दूनर ने वर्गवाना।
चारका नागकरने में सहायता देना और दिलाना।
३ सज विन्द बड़ा कार्य दाराव करना और करवाना।
४ तोलने के बाँट और नापने के गज वगैरह हीनाषिक रन्दन्त
और रखवाना।
५ अधिक मूल्य की वन्तु में कम मूल्य की वन्तु निताना और
चितवाना, अथवा दिवाई हुई वस्तु को न देकर दूसरी बन्द
देना या दिजाना
दे दयावान के पाँच निचार हैं. इनको जानकर त्वान,
करना चाहिये।
।
० त्यागकता
नोक-जिनको त्वांग द निनन में होनाविक करना हो
कार कोड़ी हुई जगह में कर सकते हैं।
शिक्षा..
१ चोरी दो तरह में होती है. एक तो चोर की भांति मालिक की
अनुपस्थिति में प्रश्वा मात्रिक को मानम न हो सके इस तरह
रात्रि भादि के समय सात लगाकर पा ताला छोड़ कर पोरी
की जाती है। दूसरी साइकारी ढंग से चोरी की जाती है. जो
मालिक के समय में नुन्न से अथवा यमाई से की जाती
सोनुल्म में होनी है उसपने दिन दहाड़े लूटना अफा
दालना कहते है और ठगाई से होने वाली पोरी न्यापारादिक
कार्यों में व्याप्त होने में साइकारी में गिनी जाती है।
असे पांच रुपये की वस्तु का मोल दस रपये फहना और
उसको बिल्कुल ठीक बता कर विचार भोजे मनुष्यों को ठग
कर द्रव्य पैदा करना यह भी एक प्रकार की चोरी है इसी
सरह हिसाय में मुलाकर झूठा शतनामा लिख कर अधिक
मेना, किसी की सरहद ६वाना घुस (रिश्वत ) लेना शादि
की भी पोरीही समझना चाहिए।
?
२ .यद्यपि इस ततीयगत में व्यार सम्बन्धी पोरी के सब नियम
नहीं आये हैं, तथापि गुग्णाभिलापी मानवों को विश्वासघात
शन:पट, नहीं करना चाहिये..। धर्म, भगवान आदि
की सौगन्य नहीं खाना चाहिये। छोटे बड़े सबके प्रति
... एक भाव रखना चाहिये यदि अधिक ही लेना हो साफ कह कर
लेना चाहिये ।
-
--
(२)
३ व्यापार में सनाई पोर प्रमाणिना ,
इससे प्रतिष्ठा होती, योर लाभ भी हम
लिये धर्म और सी की मिल के लिये गा माग भोर
प्रामाणिकता का व्यवहार करना
गये। यता और
अप्रमाणिकता से एक बार कदानित लाभ हो सकता है, किन्तु
पश्चात मातुग हो जाने पर धन पोर आम दोनों नाद है।
जाते हैं।
४ आदत या दलाली के धन्धे में दुसरे ने विश्वासपान समझ
कर जो चंस्तु सोपी हो या आर्डर दिया हो उसमें दलाली या
आदत के सिवा अधिक लालय करना विश्वासघाव है इस
लिये ऐसा नहीं करना चाहिये ।
।
चौथा स्थूल मैथुन त्याग-ब्रम्हचर्य व्रत
:0:
द्रव्य से--में पंचों की साक्षी पूर्वक विवाहिता स्वग्त्री (स्वपति )
के साथ एक मास में (
दिन के सिवा
मैथुनः सेवन नहीं करूंगा। देव देवी सम्बन्धी मैथुन
सेवन' का दो करण तीन योग से त्याग करता हूं,
अर्थात मन वचन कायं से न करूंगा और न
करवाऊंगा तथा मनुष्य मनुप्यनी तिथंच तिथंचनी
सम्बन्धी मैथुन सेवन का एक करण एक योग से
त्याग करता हूं, अर्थात काय से मैथुन सेवन नहीं
करुगा।
श्रावक के बारह व्रत.
(२३)
धोत्र से मर्यादित क्षेत्र में स्वदारसंतोप प्रत रक्खूगा, अर्थात
अपनी.पाणिगृहीता.स्त्री के सिवा. संव स्त्री का त्याग
करता हूँ, तथा मर्यादा के बाहर सब प्रकार के
मैथुनसेवन का उक प्रकार से त्याग करता हूँ।
काल से-जीवनपर्यन्त मैथुनसेवन का उत :प्रकार से त्याग
करता हूँ।
भाव से- उपर्युक्त करण और योग से मैथुनसेवन का त्याग
करता हूँ।
नियम
::::
५ मैं इतने ) वर्ष तक जब तक विद्या पढ़ता हूं पूरा
: ब्रह्मचर्य पालुगा, अर्थात् किसी प्रकार अपने वीर्य को नष्ट नहीं
करगा, क्योकि विद्या का लाभ ब्रह्मचारी को सहज में
होता है।
।
.
फगर
17
गानी i.. " मर्ग चार मकाने किस पंभिः
जीवों को मारमाना
३ अपनी मन्नान का शिकार वायायाम नहीं करना नाति
? परनील गाली गरमाय वन नावानना नायि।
: शिर कारण विमा वयानी परप का नहीं दान
पाक्षिदे।
: व्यभिचारी और विषयलाषी
को मंगान नहीं करनी
नापिये
विमापष्टि में नीमा पर पृमा कोर प्रम्प की परन्त्री
के यंगोपांग नह नहीं देना चाहिये।
८ परपुर या पानी मात्र विशेष काम्ग विना एकान्त
में नहीं जाना चाहिए।
१ विना कामात्रि में या असमय में जयंतहां नहीं भटकना
चाहिये।
१० पुस्प शो स्त्री नगृह में और निजयों को पुरुर मगृह में विशेष
कामा विना नहीं बैठना चाहिए।
११ पुस्य को पान्त्री के वियोने पर श्रीरात्री को परम्प के
विलीन पर नहीं चेना चाहिए।
१. जहां मी पुन्य का संघर्षरग (शारीर र्श ) होता होने
मलों में नहीं जाना चाहिए।
१. विषयलालमा का बढ़ाने वाले नाफ प्राति नहीं देखना
चाहिये।
१४ अंगार रस के गायन नहीं जाने चाहिये !
साबरू नारद मत.
(२)
.
--
१५. विषय वृत्ति पर प्राशन का करेली श्रीपधि का संवन
नहीं करना चाहिए।
१६ विकार की सन्न करने वाले यन्त्र माभूरा नहीं पहनने
गदिए।
१७ कामविकार जपन्न करने वाले स्त्री प्रादि के चित्र अपने
मकान में नहीं रखने चाहिए।
१८ स्त्रिों में राग बढ़ाने वाली कपः वार्ता नहीं करनी चाहिए।
१ शालत के नियम वाले को अष्टमी चतुर्दशी अमावस्या आदि
दिनों में अपनी सोने की शय्या दूर रखनी चाहिये,
और ती का पर्श नहीं होने देना चाहिर क्योकि निमित्त
मिलने पर व्रत भंग का पूरा भय रहना, तथा नियम थाले
दिनों में इन्द्रिय बलकारी भोजन नहीं करना चाहिये ।
२. एक बार मैथुन मेवन करने में एकन्द्रियहीन्द्रिय जीवों के
सिया की कभी नौलाख संक्षी पचेन्द्रिय गनुप्यों का भी
धान हो जाता है, जैसे अग्नि में 'तपाई गई लोहे की सलाई
बांग योनली ग बार में नली में पड़े हुए सब तिल जल जाते
है वैसे ही मंगोग करते समय योनि में जितने जीव हति
है; ये नब नष्ट हो जान है।
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निगमकामाई।
शा---गमत में Fitr
पपा मारमा
त्याग करना और गम माहर, में मन
परिमा का स्याग करता है। गली जमीन गत माग
बगी गुप गायली आदि यदि गाना पर तो पापा
नफ, अथवा गिरयी रखना पड़े तो
यीघा (
तक की मर्यादा करता हूं और
शंप का जीवन पर्यन्त त्यारा करताई।
वास्तु वत्यु-डकी जमीन घर दूकान वाल मिल कारखाने गोदाम
आदि के मकान नग (
) की मर्यादा
करता हूँ और इससे अधिक का जोवन-पर्यन्त त्याग
करता हूं।
(२) नायक के चार प्रत -- इसके हरण्य-पड़ी हुई या विना पनी हुई चांदी घर सर्च के लिए जीवन पर्यन्त तक घजन ( ) और व्यापार निमित्त एक वर्ष प्रनि वजन उपरान्त का त्याग करता है। सुवर्ण- घड़ा हुआ या विना घड़ा हुआ सोना जन्म पर्यन्त घर मार्ग के लिए वजन ( ) और व्यापार निमित्त एक वर्ष प्रति बजने ( अधिक का त्याग करता हूँ। ) इससे धन- मोहर गिनी रुपये पैसे आदि सिक्के तथा हीरा मोती माणिक आदि जवाहिरान घर खर्च के लिए रू० ( ) का जीवन पर्यन्त तक तथा व्यापार निमित्त एक वर्ष तक रु० ( ) का. इससे अधिक का त्याग करता हूं। घान्य- सब २१ प्रकार का धान्य घरखर्च के लिए एक वर्ष में मन ( ) और व्यापार निमित्त एक घप में मन ( ) और बाकी सब का त्योग करता हूं। द्विपद- नौकर चाफर ( दाम दासी ) एक वर्ष में नग ) तक की मर्यादा करता हूँ इससे अधिक का त्याग करता हूँ। चतुष्पद- गाय ( ) मैंस ( ) घोड़ा। ) ऊंट ) चैल ( ) बकरी ( ) भेड़ ( हाथी । का जीवन का पर्यन्त तक के लिए - परिमाण करता हूं, इससे ज्यादा त्याग करता हूं। (३०) Haram- भावक के बारह व्रत जीवन ) तक की मेज कु, कुप्प (कुविय) कांसा पीतल तॉवा लोहा श्रादि धातु पर्यन्त घर खर्च के लिये ( और व्यापार निमित्त एक वर्ष में क ( तक की मर्यादा करता हूं। सी सन्दुक श्रादि नये खरीदने पड़े तो... ( तक । रुई सूत ऊन कपास, कपासिया (विनौला) को व्यापार करना पड़े तो 6. ( ::.:.) तक- गाड़ी मोटर बम्गी तांगा आदि वाहन ( सवारी ) का रखना पड़े तो नग ( ) तक फपड़े तथा कुष्टे के व्यापार करने निमित्त 10 ( जीन मिल प्रेस आदि कारखाने रखने पड़े तो नग ( तक. किराना.श्रादि को व्यापार करना पड़े तो रू. ( मनिहारी सामान, कांच प्रादि का व्यापार करना पड़े तो रू० । ) तक. परचूनी व्यापार करना पड़े तो % ( ) तक का परिमाण करता हूं, इसके उपरांत सव का त्याग करता हूं। ) तक ) तक
सायक के वार मत
नियम.
..
१ में एक महीने से अधिक ऐसा अनाज नहा रायगा जिसमें धुना
लग सके ।
.
में इंजन में चलने वाले मिल आदि कारखाने नहीं रक्तुगा
क्योंकि मन में अन्य जीवों का धात हाता है, जिससे पार
पाप का बन्धनाता है।
श्रागार
+
मैंने जो दा मर्यादा को है, इसके सिवा यखशीश की चीज
नथा मांगती हुई चीज के बदले कोई चीज श्राजाय और वह विके
नहीं तय तक रखना पड़े, दयाप्टि से किसी द्विपद चतुष्पद का
राना पड़े, किसी सगे सम्बन्धी की जायदाद को व्यवस्था
करनी पड़े, किमी का ट्रस्टी होना पड़े, पंचायत के द्रव्यादि की
व्यवस्था करनी पड़े, फिमी निराधार की रक्षा करनी पड़े,
कम्पनी में भ ग रचना पड़, फिसो मिल प्रादि के शेअर
नारीदने पढ़े किम्मी योग्य व्यापार की दलाली करनी पड़े, नौकरी
करनी पई प्राजीविका का दूसरा साधन न मिलने पर योग्य
व्यापार करना पड़े तो मेरे श्यागार है चतुष्पद आदि का परिवार
वह तो उसको रखने का मेरे श्रागार है।
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...श्रावक के बारह व्रत.
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इच्छा बढ़ाने से बढ़ती है और घटाने से घटती है, ज्यों ज्यों
इच्छा बढ़ती है त्यो त्यो असन्तोष और अशान्ति भी बढ़ती
है, इस वास्तेःशांतिसुख के लिए इच्छा को घटाना चाहिए।
अपने कुटुम्ब के निर्वाह के साथ परमार्थ कार्य में लगा सकने
योग्य द्रव्य हो जाने के बाद अंधिक असन्तोपं नहीं रखना
चाहिए, अथवा चढ़ा हुश्रा द्रव्य परमार्थ कार्य में ही लेगाना
चाहिये।
ई. परमार्थ कार्य में द्रव्य खर्च करने की इच्छा से अनीति-
अन्याय पूर्वक द्रव्य पैदा नहीं करना चाहिए। किन्तुं न्याय
पूर्वक द्रव्य पैदा करना चाहिए।
४ कन्या बेच कर द्रव्य पैदा करने की इच्छा नहीं रखनी
चाहिये।
५ जाति कुल धर्म और समाज को कलंक लगे और राजा दंड
देसफ़े ऐसे कार्य करके धन: संचय करने की इच्छा नहीं
रखनी चाहिये। .
६ अपने ऊपर कुटुम्ब . के मनुष्यों का भार हो और निर्वाह योग्य
कोई साधनन हो ऐसी दशा में सन्तोष धारण कर या आलसी
aur
..
.
३. का 1.:: :: ::
में मो : पुस : .... Tits
ना की।
मानमा गति में माने जाने
साहिगे पनि न्यायाला EिTITE उमई
'पपेशा शशित होने पर भीरमाया नहीं करने वाली
पधिक हास्यपाल है। इसलिये शक्ति अनुसार परमार्थ में
द्रव्य लगा कर लादमी का महापयोग करना चाहिये।
६ दुसरे की सम्पत्ति देख कर मन में नहीं करनी चाहिये ।
१० कसाई खटीक श्रादिक र हिंसक मनुष्यों को धंधे के लिये
रुपये उधार नहीं देना चाहिए, अथवा उनके धन्धों को
उत्तेजना मिले ऐसा काम नहीं करना चाहिये।
१॥ धर्म प्राबर की रक्षा न हो ऐसे धन्धे व नौकरी नहीं करनी
चाहिये।
१२ किसी के उधार लिये हुए द्रव्य को पीछा नहीं देने की
इच्छा कभी न रखनी चाहिये।
१३ शक्ति से अधिक खर्च नहीं करना चाहिये और न कंजूसी ही
करनी चाहिये, लेकिन उत्तम कामों में यथाशक्ति अवश्य
सहायता करनी चाहिये।
।
.
सावफ के बारह
--.....
.
4
१४ धर्मार्थ निकालामा ल्य, घर, नहीं रखना चाहिये, किंतु
उसको धर्मार्थ नियत कर देना चाहिये या धर्म कार्य में सर्च
कर देना पाहिये । यदि धार्यि निकाले हुए द्रव्य का एक पैसा
भी घर में पाजाय तो घटी भारी जी को धका देना है।
१५ लक्ष्मी चंचल है, इसलिये इसका पभिमान नहीं करना चाहिये
r: किन्तु विनीन और विवेकी वन फरः लक्ष्मी का लाभ लेना
माहिये।
१६ इंजन से पलने वाले मिल प्रेस आदि कारखानों में असत्यात
प्रमजीवों को.हिंसा होती है इसलिये इनका त्याग करना
न पादिय इनके शेयर भी नहीं खरीदना चाहिये।
१७ व्यापार अपनी पूंजी पोर इसियत से अधिक नहीं करना
चाहिये।:.::
..
भाव से--एक करण तीन योग से अर्थात मन वचन काया से उक्त
स्टा दिशापरिमाण वत
करा
इन्य से अपने निवास मानो जालमार्ग गा साल मार्ग द्वारा
दिशाओं में जाना पहेली रार में (
) कोश पूरे में
कोश, पशिम में
) कोशक तथा पर्व तादि
के ऊपर मदना.पढ़े या हवाई जहाज से ऊचा जाना
पढ़े तो ( ) कोश तफ और कुए वावड़ी मौहरा
i...सान आदि
खान आदि में नीने उतरना पड़े तो।
तफ जा सगा। इससे आगे जाकर पांच आश्रव सेवन
करने का त्याग करता हूं।
क्षेत्र से- सम्पूर्ण लोक की दिशाओं की उक्त प्रकार से मर्यादा
फरता हूं और इसके उपरान्त का त्याग करता हूँ।
काल से-जन्मपर्यन्त उक्त प्रकार मर्यादा करता हूँ और शेष का
त्याग करता हूँ।
) गज
--
+
प्रकार की गई मर्यादा से अधिक न जाऊँगा।
से
पाचक के बारह व्रत
-
:-
भागार
...
-
तो मैंने दिशाओं की मर्यादा की है, इसके बाहर तार या पत्र
व्यवहार करना पड़े। माल मॅगानी या भेजना पड़े, 'गुमाश्ते या
वकील को भेजना पड़े तो मरे प्रांगार है Times
राना आदि की आज्ञा से अथवा आकस्मिकादेवीया घटना से की
गई मर्यादा का उल्लंघन हो जाय तो मेरे श्रागार है। श्री
३ यदि धर्म कार्यः निमित्त मर्यादा से बाहर जाना पड़े तो मेरे
आगार है!
र पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण इन चारों दिशात्रों की जो हद बांधी
उसके अन्दर की कोई जमीन यदि स्वभाविक ऊँची या नीची
हो और वहाँ पर जाना पड़े तो उसका मेरे अागार है।
।
teamand- सायकवानहन * गुलाब गोगरा पम्पा, पनी मावि त सपने को तम्बा श्रादित्य को दिन में जाति ( jain १० पहनने के याभूषणा की वानि . कीमत 70 ११ धूप करना पड़े तो यप में जानि ( ) वजन ( स .. १२ पीने की यग्नुं दूध रखी गाय शवन यादि को जाति । प्रतिदिन वजन . तका १३ ग्यान के लिये मिठाईयादि पदार्थों की जाति ( ' एक दिन में वजन ( तक । १४ चाँवल खिचड़ी थूली . श्रादि रांधन एक दिन में वजन .) तक। १५ अरहरः(तुचर ) उड़द मूंग मटर चने श्रादि की दाल की जाति ( .) एक दिन में वजन (.. :) तक १६ दूध दही घी तेल मीठा इस तरह विगय पाँच, प्रकार, का है, उसका प्रतिदिन वजन ( ) तक, मक्खन और महाविगय हैं. इनका त्याग करता हूँ, "श्रीपधि के लिए थागार है। १७ हरी शाक की नाति ( ') और सूखी शाक' की 'जाति (एक दिन में जाति ( 1) वजन ( । तक। • फल की जाति (. ) एक दिन में जाति ( बिजन( )तकमः । . शहद C । , . १२ भ है 1.: .. । : विन पावफ के बाहर हरी शाक फल प्रादि के नाम. है .. ...- - (निस यस्लु को सपना हो उस पर पनिमलता निशान कर देना चाहिए हरी शाक के नाम. १६. मोगरी ३ करेला २० बालोर की फली मिन्दी ६१ टीसी २२ टिटोरा ५. चयले की फली २३ करोक्ष ६ गवार की फनी २४ नीरा ७ नंगको फनी ८ मटर की फली २६ गुहा (मक संम की फली २६ हरी मिर की फली २८ ऑयला दि ११ मोठ की पली २६ लिमोला (वड़गुन्या ) १२ हरे चने (यूट, झोला) ३० कंटीला १३ लौकी (श्राल, लाउ, घिया ) ३१ दक्खिनी चटरा कीराली १४ सरयूना ३२ सरगवा की सींग (पान्ती) १५ काचरा (काचर) ३३ हरी जुवार १६ काचरी (छोटा कचर.) ३४ हरा वाजरा (सिहा) १७ तरबूज (कलिंदा, मतीरा.) ३५ खेजड़े की फली (सांगरी १७ घिया तरोई (गिल किया। (खोखा) . १० तुबर .
आइसका
1
न (इककड़ी
흝
१
५. तुती
४ चौत
?? निया
1% कमानी
5
न
नतीजे
--
फलों के नाम
..
21 आयफ बारामत हरे फलों का नाम खरचूना : मोठा नायू (मोसमी) कला २४ जामुन सफेद ५ गुलायजामुन २६ मामलगट्टा २३ तस्वृत (फलिदा. मतीय) . सिंघाड़े (सीघोदा) २६ नीयू छोटे (कागजी नीयू) ३० हरी बादाम ३. हामी कच्ची बुरमानी ६ नारंगी ७ संघ अनार (दादिम) 1 'यंगूर (द्राक्षा) .० सीताफल (सरीफा) २१. चकोतरा (पपनस विजोरा) १२ नासपाती १३ नारियल फल्चा (टाम) १४ थनन्नाम (अनारम) १५ फारण्य १६ पीटा, ईख (साठा) २७ पपीता (परंट फकड़ी)) १८ बेर या बोर १६ फालसा o खिरनी गवणा २१ गौदा (गुन्दी) २२सफरबन्द २३ जामुन काला ३३ विही (अमरुद) ४ लघवठ ३१ वेल फल ३६ राम फल ३७ लीची लीन् २८ मारमिरी ६ सहनूत ४० हरी खारक (खजूर) ४१ हरी सुपारी ४२ हरी इमली ४३ हरी सौंफ ४४ फपित्य (फैत-कबीट) ४५ टीवरू (तंदू) ४६ कसेरू .
श्रावक वादा
४७ नन्दा
४- पील
४६ बाल वनका
(जलोदिया)
५० सदा
५१ प्रतापी नींव (मलावी नींबू)
दातीन दांदन)
१ जुल की
२ नीन की
बारड़ी की
2 मुलेटी की
: कपास केमाई की
६ बड़की
जानन की
..
"
./.../...
रागत
नोट-बिनको उकत्याप नियन हीनाविक करना ही ऊपर
चौड़ी हुई जगह में कर सकते है।
makanan
४५
श्रावक के बारह नत
जाति (
) वार-दफे
:
अपर लिखे नामों में से जो मैंने मर्यादा की है इससे अधिक
का में त्याग करता हूँ।
(८ किसमिस ( दाख) बादाम पिश्ता चिरौंजी (चारौली) छुहारे
खुरवानी केला पिंडखजूर आदि मीठे फल की जाति (
एक दिन में वजन ( ) तक।
१६ भोजन एक दिन में वजन (
तक।
60 पीने के लिए पानी एक दिन में वजन (
तक।
२१ तांबूल (पान ) इलायची लोंग सुपारी जावित्री जायफल
आदि मुख को सुगंधित करने वाली वस्तु की जाति (
एक दिन में वजन ।
तक।
२२ वाहन चार प्रकार के होते है, चरने वाले, फिरने वाले तैरने
वाले और उड़ने वाले।
चरने वाले घोड़े ऊंट बैल होथी आदि सवारी एक दिन में
।
तक।
फिरने वाले वाहन गाड़ी मोटर लॉरी बग्घी ताँगा साईकल
वहेली रथ आदि एक दिन में ( ) तक।
तैरने वाले वाहन नाव स्टीमर जहाज आदि एक दिन में
तक:
उड़ने वाले वाहन हवाई जहाज वेलन आदि एक वर्ष में
) तक।
(!
شنبه بیش : شب نشین و تن تن
مسی و
تن
ت
साकारह इन
नियम
खेलना
क्योंकि फुला
1 मैं मन व्यसन ( मासभा, मद्यपाद, शुनगोड़ा जूया
वेश्यागमन, परीगमन, शिकार और चोरी ) का हग करता हूँ।
२. मैं हरे शाश के व्यापार तथा प्रचार पुरख्या बनाकर व्यापार
करने का त्याग करता है।
में पूल को शाक नहीं खागा,
में सजीव
रहते हैं।
४ मे बाजार का प्रचार नही खाऊँगा. और घर का बना हुश्री
- प्रचार भी अधिक काल का अर्थात दिन (
से ज्यादा
दिन का नही खाऊगा।
५ में कन्द मूल का भवण नहीं कराँगा, क्योंकि फन्द मूल में अनन्त
जीव होत है।
६ लोहार सुनार ठेठारा छोपानीलगर रंगरंज धोवी श्रादिका
धन्या न फगा। यदि इनकी बनाई हुई वस्तुएं वेचनी पड़े
तो उसका श्रागार है।
लनारा भदभूजा चूनीगर भटियारा प्रादि का काम न करूंगा
और करवाऊगा। घर खर्च के लिय छुट ।
में नाटक सरकस नट और वाजीगर का खेल ख्याल (रम्मत)
भांडचेष्टा गायन भादि करके या दूसरों से करा के प्राजीविका
नहीं करूंगा।
१ जैसे गोत्री आदि फूल ।
ਜੋ ਰੋ : : *
:= ਦੇ ਝ = = = = ਜ ਦ ਜੋ
।
*
}
ਸੋ ਸਵਾ - ਘ ਝ 3
{'
4.
४६
-भावक कबारहत्रत
आगार
0
अपने या किसी सम्बन्धी के बाल वच्चे आदि को नाक कान
विधाना पड़े तो श्रागार है।
जो मैंने पहनने ओदन बिछाने के कपड़े को मर्यादा की है, इसके
उपरांत किसी कपड़े का शरीर से स्पर्श हो जाय तो प्रागार
यद्यपि नशे की चीज शौक से न पीऊंगा, तथापि विशेष कारण
से यदि पीना पड़े तो श्रागार है।
४: जो मैंने हरी शाक फल आदि का त्याग किया है, उसमें से
भी यदि श्रोरधि आदि में जरूरत पड़े तो आगार है।
५ जो मैंन वाहन की मर्यादा की है, उसमें रेलगाड़ी ट्राम्ब पर
चढ़ने का आगोर है।
यदि त्याग की हुई वस्तु वा भूल से मिश्रण हो जावें, अन
जाने या उपयोग न रहने से वह वस्तु काम में आजादे,
लग्न व मृत्यु के समय या किसी उत्सव पर या दुष्काल
के समय, यदि त्याग की हुई वस्तु का इस्तेमाल करना
पड़े तो श्रागार है।
सूखी लकड़ी या सूखे घास का व्यापार करना पड़े तो
आगार है।
८ मिल प्रेस श्रादि में आने वाले सामान का व्यापार करना
: पड़े तो आगार है।
६ को मैंने जूते की मर्यादा की है, यदि जूता खो जाने पर फिर
पहनना पड़े तो आगार है।
--
:
निमार मा मामा पानी पर
१ मिम पिश यान का गागभिगाया, यात पूर्ण नाद
श्रनित नएता भी मामलm करना सवा
नयादा में अधिक मनिन यामा भाग परना।
६ मनित यम् मिली गित पातु का बादार करना ।
अयिधिपका ( भलीम श्रादि) का याहार करना।
५. जिम वन्नु म बान योग्य भाग थाहाहो मोर पकने योग्य
ये भोजन के पांन अनिवारपनको त्यागना चाहिये।
'-
.
লেনি।
दोप)
मगार मगा।
भोजन के पांच अतिचार.
अधर पर. एम. पदार्थ का याहार करना ।
. भाग अधिकतो, मी यन्तु का श्राहार करना।
.
श्रावक के बारह व्रत
। पन्द्रह कर्मादान की मर्यादा के अतिचार
इंगालकमः चना इंट कोवला कांच कुम्हार का वर्तन आदि
जो भट्टी. से पकाया जाता है उसका तथा इंजन से चलने
वाले कारखाने का तथा लोहार सुनार ठठारा (कसारा)
हलवाई भड़भूजा भटियारा रंगरेज धोवी और नियाग्गर
का काम काके : ग्राजीविका करने का त्यांग । यदि
इनकी बनाई हुई वस्तु बेचनी पड़े तो एक वर्ष में रुपिया
।) की मर्यादा, इससे ज्यादा का त्याग किन्त घर
का खर्च के लिए छूट।
का २ वनकर्भयन के हरे वृक्ष तथा प्रास कटवा के श्राजीविका
निमित्त बेचने का त्याग । यदि सूग्वों लकड़ी की व्यापार
करना पड़े तो एक वर्ष में 10
) का इसके उपरांत
कास्वाग।
१३ साड़ीकर्म गाडी इक्का वायी अदि वाहन बना के तथा
नील (गुली) आदि सड़ा कर बेचने का त्यागे।
४ भाड़ीकम -- ऊँट घोड़ा औलं आदि स जीवों के ऊपर
भार लाद के भाड़ा कमाने का तथा रथ गाडी बैल इक्का
बग्घी हल नहान वोट डोंगी मोटर लारी साइकल श्रादि
आजीविका के निमित्त भाड़े देने का त्याग। यदि अपने
सवारी के लिए घर में रक्खा हो या लेने (पायने) पेटै या
गया उसे भह देना पड़े तो बात दूसरी ।
५ में रुo (
? इसी वाणिज्य में कन्याविक्रय-पुत्रीविक्रय और पशुविक्रय
श्रादि ग्रहण किये जाते हैं क्योंकि केशवाणिज्य व्यापार का अर्थ
।
': कोमीक कोना र nt: rit.. -
जीनामा माईका गागरा
६ दंतगामिन-मामीरान रेशम से मालिकानगे सर से
*गापार करने का त्याग, यदि यागेका सोनमें (
मंजगादेका त्यागा
पोर मीप.शंग, मांगकालीन नाप
हिर नागादिक का नर्ग का सर्वशा त्याग।
७ लक्सवाणिज्य-लाग नपना मन मिल गागुन और शोरा नमक
पादि सारे पदार्थ का नये सर में व्यापार करने का त्याग, यदि
प्रांगे का हो तो वर्ष एक में 70 ( ) से ज्यादा का त्याग।
८ रसवाणिज्य-निकृष्ट रस-गधु (शहद) मद्य पी माखन प्रादि
बेचने का त्याग। उत्कृष्ट रस-दृध दही गुड़ शक्कर तेल आदि
फा व्यापार करना पड़े तो वर्ष एक में (
की
मर्यादा और इससे ज्यादे का त्याग ।
९ केशवाणिज्य-चमरी, गाय आदि पशुओं के केश तथा पत्तियों
के पांख तथा चमड़ा श्रादि के व्यापार करने का त्याग। यदि
उन आदि का व्यापार करना पड़े तो वर्ष एक में न
से ज्याद का त्याग!
)
.
ही यह है-केश वाले जी का व्यापार करना।
. मात्रका के बारह बन (५३ )... विषवाणिज्य-संखिया श्रादि विषैले पदार्थ को तथा जीव- घातक अस्त्र शस्त्र यादि का व्यापार करने का त्याग। इन में से यदि अफीम का तथा चाकू हुरी आदि छोटे-छोटे शस्त्रों से का व्यापार करना पड़े तो वप एक में है। ज्यादे का। ११ यंत्रपीड़नकर्म-चरखे मिल प्रेस कोल्टू चक्की पाणी आदि बंधा दोपजनक है, इसलिए नयेसर से इसका व्यापार करने का त्याग, यदि आगे का हो तो नग ( ) रु0 ( १२ निल्लंछणकर्म-वैल आदि को नपुसंक बनाने का, ऊँट बैल आदि को नाक छेदने का, भेड़ बकरी श्रादि के कान चीरने का व्यापार निमित्त त्याग। १३ दवाग्निकर्म-जंगल गांव घर गोदाम आदि में आग लगाने का त्याग। पति १४ सरदहतलाव-परिशोषणकर्म-झील, तालाब कुण्ड आदि को आजीविका निमित्त सुख ने का त्याग १५ असईजण-पोपण-आजीविका तथा शौक के लिए वैश्याओं का चरित्र त्रियों का पोपण करना, तथा कुत्ते विल्ली तीतर वाज आदि हिंसक प्राणियों को शिकार निमित्त पालन पोषण करने का त्याग तथा शौक के लिए रखने का त्याग दियादृष्टि सं यदि पालन करना पड़े तो दूसरी बात है व ।
नोकरी नि मंगा में पानीमा काम प्रालि
(2)
.....
merentnewa
14.मान
न में मिली हार दानापरी
मी मगांडा :मा. पराग कामागा
भाग गित गाना काम करना नापागार है।
यदि मागि
मं०
मिति
१० त्यागरा-
शिक्षा
..
क
१ रात्रि में या अन्धेरे में भोजन नहीं बनाना चाहिए, और न
फरना ही चाहिए, क्योंकि रात्रि और अन्धेरे में छोटे-छोटे जन्तु
नहीं दिखाई देते हैं, इसलिये उनकी रक्षा होना असंभव है। दिन
में सूक्ष्म जन्तु सूर्य की किरणों से पृथ्वी पर एफ जगह स्थिर रहते
है, और रात्रि में उड़ने लगते हैं, ये भोजन में गिर कर मृत्यु को
प्राप्त होते हैं। इसके सिवा किसी
नोट-निसको उक्त: त्याग व हिनाधिक करना होथे ऊपर छोड़ी
हुई जगह में कर सकते हैं।
दामा
बानी
वा
जिन
•-
चोई
-
प्रावक सेवाहर त्रत (५५) जहरीले.जानवर.में गिरने से शरीर को भारी हानि पहुंचती है। इसलिए रात्रि और अन्धेरे में मोनन नहीं बनाना पौरिये, और न करना ही चाहिये । जहाँ तक बन सके रात्रि में जल भी नहीं पोना चाहिये। . .. २ इलबाई. का धन्धा नहीं करना चाहिये, क्याफि इस धन्धे में शंदी चोटे माखो मर श्रादि जीवों का घात होता है। ३. गाड़ी बैल ...यादि पर अधिक भार नहीं लादना चाहिये.और न जगमी. पगु पर सवारी करनी चाहिये । तांगा आदि में मर्यादा से अधिक सवारी होने पर नहीं पढ़ना चाहिए । ४. परिमाण से अधिक भोजन नहीं करना चाहिये तथा वोर वार भोजन नहीं करना चाहिये । अनियमित भोजन करने से शरीर बिगड़ता है, पादत. खराव होती है, तथा अजीर्ण आदि अनेक रोगे उत्पन्न होते हैं। ५. अधिक समय का अचार मुरव्या और शर्वत काम में नहीं लाना चाहिये, क्योकि इनमें घस जीव उत्पन्न हो जाते है। ६ फूल की को शाफ कदापि नहीं खाना चाहिये, क्योकि फूल में अस जीव रहते है। e:अज्ञात (अजाना).फ्ल या अज्ञात: वस्तु के खाने से कभी कभी पड़ो भारी हानि पहुँचती है। इसलिये अनजानी बन्तु नहीं खानी चाहिये। जहां तक बन सके ऐसी विदेशी दवा नहीं खानी चाहिये, i जिसमें मद्य मांस की आशंका हो, तथा जिसमें रुधिर हड्डी का चूर्ण लगती हो ऐसी विदेशी शकर आदि भृष्टःकरने वाली चीजों को नहीं खाना चाहिये। -- - .-
....
५ कपागमाहान... मारामा
सोमालिक ! attry trainik l
हिमादान-... जीवों मार न
पाहा आदि मार्ग हा योगा, मा famistr
: ar, हमामापारासादा
निगमगाना गाnि
पापरमपिदेश-मिपापकर्म (गेली नाना मकान बनाने
प्रादि देश का पापकर्माना
मद का मांग करना।
*.
स
४ में विवाह आदि में आतिशबाजी न छोडूगा. नछुड्याऊगा
लायक के बारह.त.
...(...)-
नियम
में बिना प्रयोजन जमीन नहीं खोदूगा, पानी नहीं ढोलू गा,
अग्नि नहीं जलाऊँगा, पंखा आदि से हवा नहीं फेंरूंगा,
बनस्पतिनाछेदू गानाकाटूगा ।
जानबूझ कर दूसरों को खोटी,सलाहनही दूंगा।
मैं दुसरों को अन्याय मार्ग पर चलने का उपदेश नही दूांगा।
और न इसकी सम्मत्ति दूंगा।
HA
श्रागार
१ लोक व्यवहार से किसो का वियोग होने पर रुदन : रोना।
आदि.आर्तव्यान करना पड़े तो इसका मेरे आगार
२ मन बस में न रहने से अथवा कोमन स्वभाव होने से बिना
द्वप.द्धि के यदि प्रातरौद्रध्यान हो जाय तो बात अलग है।
३ उपयोग न रहने से तेल घी आदि के वर्तन उवाड़े रह जाय तो
बात अलग है।
४ चाकू छुरी सरौता वर्तन श्रादि वस्तुएं. किसी स्वअन सगा..
सम्बन्धी को देनी पड़े तो श्रागार है।
५ स्वजन के हितार्थ या अनुकम्पा के निमित्त किसी काम का
उपदेश या सम्मति देनी पड़े तो इसका मेरे आगार है।
( ६२ ।
भावक के बारह व्रत
अतिचार (दोष)
६ काम को उत्पन्न करने वाली कमाएं करना, भगवचन बोलना।
२ दूसरे को हंसाने के लिए भांडों की तरह हंसी मजाक करना
किसी की नकल करना।
३ हीन्ता से निरर्धक वोलता।
५ पूरी तरह काम देने वाले ऊखल मूसल तलवार त्रादि हमियर
गा मौजार बनाना।
उपयोग गा परिभोग में लाने वाली खाने पीने पहनने चापि की
वस्तुनों का अधिक मह करता।
च चना दण्ड के पांच भतिचार हैं, इत्तको त्यागना चाहिये।
ht
संभ
मिति
६० लागकर्ता-
-जिसको उक्त त्याग व निगम ने हीनाभिक करना हो ये पर
छोड़ी हुई जगह में कर सकते हैं।
गहिय
रहता
होली
गालिन
जीवन
कि
मानक के बारा, मत शिक्षा अयकों के समय इधर उधर को गर शप नही करना चाहिये। श्रात्मा के भारों को विगाहने वाली मार रस की, किस्से कहानियों की पुस्नमें नहीं पढ़नी चाहिए और न सुननी चाहिए वाश चौपड़ शतरंज आदि नही खेलना चाहिए । पतग उड़ाने. का व्यसन नहीं रखना चाहिए। क्योंकि दुर्लभ चिन्तामणि रन के समान पुगयोदय से प्राप्त हुए इस मनुष्य जन्म को ऐसे निरर्थक कामों में विताना भारी मूखता है, किन्तु फुर्सत के समय विद्वान पुम्पों की बड़ों की गंगति करनी चाहिए, समाज धर्म और देश की उन्नति के उत्तम काम करने चाहिए, चारित्र को निर्मल बानाने वाली आदर्श पुस्तकें पढ़नी या मुननी चाहिये या अन्य धार्मिक क्रियाएं करनी चाहिये। १ जव मनुप्य निठल्ला होता है, तब उसके मन-मानसरोवर में अनेक प्रकार के परे विचार प तरंगेंठा करती है जिस से उसका अधःपनन होता है, इसलिये श्रात्मा के शुभचिन्तको को चाहिये कि इन दुर्विचारो को. रोकने के लिये वेकार नही रहना चहिये, किन्तु आत्मा को उन्नत बनाने वाले काम करते रहना चाहिये। १३ होली या विवाहादि के समय कई स्त्री पुरुप निर्लज गीत गालियां गाते हैं, नथा. भगढ़ बचन बोलते हैं, ये काम मनुष्य जीवन को बिगाड़ने वाले हैं. इसलिये उत्तम मनुष्यों को चाहिये कि ऐसे कामों से दूर रहे और ऐसे पुरुषों की सँगति भी न करें। .
१२... )
PRAANAEnte
अग्नि की माता
दूसरों
) इसके
.
१ चालू रमाई करनी गाकरमानी पो तो एक दिन में नन्हे गग
) इनके पला जाति या मंका जीमनगा
रसोई में पति पारभ करना TANT मेरे आगार है।
२ दीपक पत्ती पादि करनी या करवानी पर तो एक दिन में नग
) दीवाली के मौके पर नग (
उपरांत उत्सव या राजा के दम से रोशनी करनी पड़े तो
उसका मेरे आगार है।
३ शौफ से या विवाहादि उत्सव पर आतिशबाजी तथा बारूद
आदि के फटाके वगैरह नहीं छोड़ने चाहिए क्योंकि इनसे प्रस
जीवों का भी घात होता है। यदिवाल बच्चों के निमित्त या
दीवाली के रिवाज के अनुसार कदाचि छोड़ने या छुड़वाने
पड़े तो उसका मेरे आगार है।
४ वीमार सौर (सुबाड़) या ठड के क रण सिगड़ी आदि जलानी
पड़े तो एक दिन में नग (
।
किसी कारण से धूनी श्रादि करनी पड़े तो एक दिन में
नग ( )।
६. धूप करना पड़े तो एक दिन में । ) रुपये भर ।
जलते हुए दीपक में तेल डालना या उसकी बत्ती बढ़ानी पड़े
तो वह एक ही दोपक गिना जाता है
मग
मान
भाव के वारह व्रत
(५)
मोमबत्ती या अगरबत्ती आदि लगानी पड़े तो एक दिन में नग
दियासलाई की पेंटी काम लानी पदे तो एक दिन में पेटी
नग ()
श्रागार
अग्नि को एक जगह से दूसरी जगह डालते. अग्नि लगने पर
या भौर किसी अवसर पर अग्नि चुझाते, किसी मामले पर
बन्दूक आदि चलाते. कारणवश से पेट आदि पर दाग श्रादि
देते, लोहार आदि के यहाँ काम
आदि के यहाँ काम करवाते अग्नि की हिंसा
-हातो. है उसका मेरे आगार
है
वायु की मर्यादा.
--
)
जिन उपकरणों से वायुकाय के जीवों की हिंसा होती है,
नको काम में लाना पड़े तो उसकी मर्यादा
ले की पालखी एक दिन में.. नग (
) छोटे बड़े पंखे नग..
.) ऊखल. मुसल-नग (
, चरखे नग (..
), सूप नग ( ), बुहाग-बुहारीनग़
हमामदस्ते ना ( -पलने मचली. नग
) खरल, सिल.. औरसिया, चकला बेलन नग(...)
हारमोनियम, पियानो, फ़ोनोग्राफ़, सारँगी तयला, श्रादि वादिन ..
नग, इनके उपरान्त का नियम । इतनी चीजों का ..
मान एक दिन का समझना चाहिए।
फालके नग (
-
at . का. *
५. * .. 14. दुर्गा
4.inा है।
वनम्पनि की मर्यादा
१ अपने लोग fem? भाग भो या ािन पर
मा कमिंग।
२ पाम सेना पर मी एक माल में गोली m{
६ गत, माहो मंगेगह में काटमा मोरना परमो एक दिन
में धीमा
४ शाक मुगाने लिए, अपार यरह के लिए धनपनि लेनी या
लियानी पदे या दानी मिदानी पर तो एक दिन में मन
)। इसमें जाति - जीमन, विवाह अदि की रसोई
वगैरह
का प्रागार।
५ अपार दालना पढ़े तो एक साल में मन (
६ शाक आदि सुखानी पड़े तो एक साल में मन (
७ अपनी वाड़ी आदि का शाक फल वगैरह तोड़ने तुड़वाने पड़े
तो एक दिन में मन ।।
(
।
।
श्रावक के बारह व्रत.
(5).
+ पोसना पीसाना दुलना दलवाना पड़े तो एक दिन में मन ( )।
६ भिगौना-भिगवाना पड़े, तो एक दिन में मन ( )।
१० सूप आदि से झटकना झटकवाना पड़े तो एक दिन में
मन
:
११ नाज आदि उफनना उफनाना पड़े तो एक दिन में मन
१२ श्रीफल आदि तोड़ना तुड़ाना पड़े तो एक दिन में नग
(
.
१३ सुपारी तोड़नी तुड़ानी पड़े एक दिन में सेर:(:)
१४. सचित्त जीरा आदि काम में लाना पड़े तो एक दिन में सेर
।
१५ अपने खेत या वाड़ी का नाज वगैरह काटना कटवाना पड़े
तो एक वरस में मन (ना)
::: 3yit: श्रागार
१. पृथ्वी, पानी, अग्नि का प्रारम्भ करते हिलते चलते मिहनतः
मजूरी करते, वस्तु को उठाते रखते, दुष्कालादि में शरीर.
का निर्वाह करते, सम्वन्धी आदि के कारण वनस्पति की
हिंसा करनी पड़े तो मेरे आगार है।
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८) श्रावक के बारह बन देशविरति के बारह व्रत निश्चय और व्यवहार से क्रमशः दिखलाते हैं। DIDI १ प्राणातिपात-विरमण व्रत । दूसरे जीव को अपने समान जानकर उसकी रक्षा करनी, उसे दुःख न देना-मारना नहीं, वह व्यवहार से प्राणातिपात-विरमण, अर्थात् अहिंसावत है। अपनी आत्मा कर्म के वश होकर दुःखी हो रही है. ऐसा जानकर उसे कर्मवन्धन से छुड़ाना, प्रात्म-गुणों (ज्ञान दर्शनादि भावप्राणों) की रक्षा करना और उनकी वृद्धि करना, यह निश्चय से प्राणातिपात विरमणं व्रत कहा जाता है। २ मृपावाद-विरमणव्रत । असत्य-झूठ वचन न वोलना, यह व्यवहार से मृपावाद- विरमण व्रत है। किसी भी पोरदलिक चीज को अपनी कहना, जीव को अजीव या अजीव को जीव करना सिधान्तो का भूल और निरपेक्ष या एकान्त अर्थ कहना, यह सब निश्चय-मृपावाद है, इन सब के त्याग को निश्चयमृपावाद-विरमण व्रत कहते हैं। अदत्तादान श्रादिक ब्रतों को तोड़ने से केवल चरित्र का ही भंग होता है, परन्तु इस व्रत का खण्डन करने से तो सम्यक्त्व शान और चरित्र इन तीनों का नाश होता है । इसी से सिद्धांत में कहा गया है कि जो साधु चतुर्थवत का करता है, वह प्रायश्चित लेकर हो सकता है। लेकिन जो साधु खएडन शुद्ध सिर्वात- श्रावक के बारह नंत ( १ ) . सूत्रों के अर्थ का मृपा उपदेश देकर इस बर को तोड़ता है. उसकी शुद्धि प्रालोचना-प्रायश्चित से भी नहीं हो सकती ! कारण यह कि जो अन्य व्रतों का खण्डन करता है, वह केवल अपनी हो श्रात्मा को मलिन करता है किन्त जो सिद्धान्तों का मपा-उपदेश देता है, वह दूसरे जीवों की आत्मा को भी मलीन करता है। इसलिये भव्य प्राणियों को उचित है कि वे ऐसे मिथ्योपदेश देने वाले, जो इस दुपम काल में दुग्वगर्भित वा मोहगर्भित गैराग्य को प्राप्त कर तृष्णा नदी में बहने हुए नजर आते हैं उनके सद्ग से अपने को बंचाये। .. - ३ श्रदत्तादान-विरमण प्रत परकीय चीज को उसके मालिक की बिना श्राज्ञा विना, अर्थात चोरी, धूर्तता, बदमाशी या चालाकी से दूसरे की चीज का ग्रहण करना अदत्तादान है और उससे त्याग को व्यवहार से अदत्तादानविरमण नत कहते हैं । निश्चय से अदत्तादान विरमण व्रत यह होता है कि पांचों इन्द्रियों के तईस विषय, पाठकों की वर्गणा आदि पर ( श्रात्म-भिन्न ) वस्तुओं के ग्रहण करने की इच्छा तक न काना । यहाँ पर कोई प्रश्न कर सकता है कि इंद्रियों को और कर्मों को ग्रहण करने की इच्छा करता ही कौन है ? इसका उत्तर यह है कि जो पुरुप वीतराा प्रभु के वचनों को ठीक ठीक नहीं समझता और पुण्य के हेतु-भून शुभ क्रियाएँ करता रहता है 'अात्मस्वरूप को बिना जाने पुण्य की इच्छा प्रायः
श्रावक के चारह न
(६०)
बहुत लोगों को हुप्पा करती है वे पुगय कर्म में जिसके ४२ भेद हैं
शीघ्र प्रवृत्ति भी करते हैं, यह पुराय की इच्छा करना अर्थात
वाभाव को प्रमीयम कर ग्रहण करना या अपना कर्त्तव्य
न समझ कर उसके फल की वांछा करना ही निश्चत अदत्तादान
है इसके त्याग को अर्थात निष्काम-धर्म को निश्चय से अदत्तादान
विरमण व्रत कहते हैं।
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४ मैथुन विरमण व्रत ।
स्त्री का त्याग करना पुनप के लिये और पुरूप का त्याग
करना स्त्री के लिये मैथुन-विरमण व्रत है। साधु को सर्वथा स्त्री
का त्याग होता हैं और गृहस्थ को अपनी स्त्री को छोड़कर अन्य
स्त्री का । इस त्याग को व्यवहार से मैथुन-विरमण व्रत कहते हैं,
और विपयों की अभिलापात्रों का-तृष्णा का त्याग करना,
निश्चय से मेंथुन-विरमण व्रत कहलाता है। प्रात्मा स्वगुण ज्ञान
श्रादिक को भोगी है, न कि परवस्तु-पौरिदलिक वर्णादिक का
पुरदल-स्कंध अनंत जीवों की जूठन है, ऐसे निश्चय-ज्ञान से अन्तर
दुलोलुपता क' त्यारा न य.र केवल बाहय विषयों का त्याग करने
पर भी मथुन-कर्म लगते हैं।
५ परिग्रह परिमाण मत ।
धन, धान्य दाम, दामी, चतुप्पर पशु घर, जमीन, यस
(१)
नापत्र वित
पार घाभरण के सह को परिषद करते हैं। माशु के लिये इन
सई चीजों का संपया क्या होता है श्री गृहस्थों को इन चीजों का
इच्छा परिणाम होता है यांत मिसको जितनी इला हो उसे
यादा का त्या हाना। उन गान फोम्यहार पनि
मागास प्रत बहन है, गगह शान, शानावरणीय मादि पाटों
कम शरि ददय आदि धारमा-भिन्न यन्तु को पाई जानकर
घोड़ना अधांत पावस्तु में मूा ममता का त्याग करना यह
चिरपरिग्रह परिमाण है।
६ दिशा-परिमाण प्रत।
पूर्व पश्चिम उत्तर क्षिण. ऊन और अतः (नीचे) की
दिशाओं में गमन-आगमन के लिये यमक हद बांधकर बाकी का
त्याग करना। जैसे कि पूर्व दिशा में मी काश तक मैं गमन श्राग
मन करूंगा, इससे आगे नहीं इसको व्यवहार दिशा परिणाम प्रत
कहते हैं। चारों गदि में भ्रमण करना यह कर्मों का फन है,
सुगति और दुर्गति में पहुँचाने वाले शुभाशुभ कर्म है, ऐसा जान कर
उदासीन रहना और मिद्ध-अवस्था की उपादेयता स्वीकार करना
निश्चय दिशा परिमाण प्रत कहलाता है।
७ भोग-उपभोगा-परिमाण।
भोजन आदि जो एक ही वार भोगने में आते हैं. उनको भोग
और वस्त्र वगैरह जो अनंक वार भोर में प्रावे हैं, उन्हें उपभोग
(१२) नवक के बारह व्रत . कहते हैं उनका परिमाण करना, अर्थात् इच्छा के अनुसार छून रखकर बाकी का त्याग करना यह व्यवहार से भोग उपभोग परि- माण व्रत कहलाता है । यद्यपि वयव्हार से कर्मों का कर्ता और भोक्ता जीव है तथापि निश्चय से कर्ता और भोक्ता कर्म हो है परन्तु आत्मा अज्ञानवश अनादि से पराभावों का भोगी होता हुआ पर वस्तुओं का ग्राहक और रक्षक भी हुआ, अर्थात् आत्मा की ज्ञायकता, ग्राहकता भोजकता और रक्षकता बिगड़ने से उपकी कतृता भी बिगड़ी। यही कारण है कि वह पर-भाव रङ्गो होता हुआ पाठों कर्मों का भी कर्ता हुआ है किन्तु वास्तव में अपने म्वभाव का ही कर्त्ता है परन्तु कारणों के आवृत होने से कार्य नहीं कर सकता है और विभावों को करता है, अज्ञानी जीव को उपयोग मिला है, परन्तु अशुद्ध उपयोग है, इसलिये वह भिन्न है। आत्मा ही जिन गुणों का अर्थात वाह्यरूप भावों का जिसमें भोगो भोग न हो कर्ता और भोक्ता है स्वरूप-अनुरागी परिणाम कों निश्चय से भोगीपभोग-परिणाम व्रत कहते हैं वह वह श्व । ८ अनर्थदण्ड-विरमण व्रत । बिना ही प्रयोजन के अपने को पाप- पर्यों में लगाना-हिंसादि अनर्थदण्ड है जैसे कोई आदमी हाथ में छड़ी लेकर सैर करने को बाँचे में जाता है, चलते चलते अपनी लकड़ी की धुमाता हुआ वृक्ष के पत्तों को विना ही प्रयोजन तोड़ता है, जिससे पत्तों को
श्रावक के बारह व्रत
दुःब यावत मरण होता है और इससे टस अादमी का कुछ भी
भी काम नहीं निकलता। ऐसे व्यर्थ पापों को छोड़ना, व्यवहार
अनर्थदण्ड-विरमण व्रत है। जीव मिथ्यात्व, अविरति. “फपाय,
योग आदि से शुभाशुभ कमों को वैध करता है कि सुख दुःख कारण
करता है जो कि सम्म टु व कारण होता हैं उन काँ के कारणों
से अपने को बचाना श्रथात उन कर्मों के कारणों का अपने पर
असर न होने देना ही निश्चय से अनर्थदण्ड विरमण व्रत है।
९ सामायिक व्रत
मन वच्न और कार्य के प्रारम्भों को छोड़ कर एकांत में
नियमानुसार बैठना या पुस्तकादि पढ़ना अथवा जप करना
व्यवहार सामायिक है। अपने ज्ञान दर्शन और चारित्र गुरण
की
। विचारणा करना और सर्व जीवों की सत्ता एक समान जान कर
सर्व जीवो के साथ समभाव रखना, निश्चय सामायिक प्रत।
--
१० देशायकाशिक त्रय
मन. वचन और काय के योगों को पूरा मार्ग में
बैठ कर धर्म ध्यान करना व्यवहार देशायfamiririt न
से रहो द्रव्यों को जान कर, पांच द्रव्यों को दो राय
का ही ध्यान करना निश्चय-ईशाययाशिफ प्रत ।
११ पीपध व्रत
चार या आठ प्रहर तक सब साया गर्मी का त्याग पार
--
भाचक
के;
बारह मत
(६४)
समता परिणाम से स्वाध्याय में प्रवृत्ति करना, व्यवहार पौषः
और अपने अात्मा को शानध्यान में पुष्ट करना, निश्च
पोपध व्रत कहलाता है।
१अतिथिसंविभाग व्रत ।
२
साधु
को
।
पोपध के पारने के ( समाप्ति के ) समय या सर्वाद
या साधार्मिक भाई को यथाशक्ति भोजनादि दान देना व्यवहार
से अतिथि विभाग व्रत है स्वजीव को, शिष्य को या गृहस्थ को
ज्ञान देना पढ़ाना सिद्धान्तों का श्रवण करना और कराना निश्चय
से अतिथिसँविभाग प्रत है।
ये बारह व्रत कहे गये। जो जीव इन व्रत को सम्यकत्व के
साथ निश्चय और व्यवहार से धारणा करें उस जीव को पंचम
गुण स्थान का अधिकारी या देशविरति श्रावक कहते हैं देश
अर्थात अंश से विरति त्याग देश-विरति का अर्थ है । सब
प्रकार के त्याग को सर्व-विरति कहते हैं। यह सर्व विरति साधु
को होती है साधु के पाँच महानत में इन बारह व्रतों का समा-
वेश हो जाता है। व्यवहार और निश्चय से पूर्वोक्त व्रतों
का पालन करना और ज्ञान ध्यान संवर तथा निर्जरा में आत्म
परिणाम को स्थिर करना ही निश्चित-चारिन है।
।। श्री श्रावक के व्रत समाप्त ।।
-कोन यांवत्त मरण होता है और इससे उस आदमी का कुछ भो
व्यवहार सामायिक है। अपने ज्ञान दर्शन और चारित्र गुण
(३)
श्रावक के बारह व्रत ..
मा काम नहीं निकलता। ऐसे व्यर्थ पापों को छोड़ना, व्यवहार
अनथदण्ड विरमण व्रत है। जीव मिथ्यात्व, अविरति फपाय,
योग आदि से शुभाशुभ कमों को बध करता है कि सुख दुःख कारण
. काता है लो कि सुख टुब कारण होता हैं उन कर्मों के कारणों
से अपने को बचाना अर्थात उन कर्मों के कारणों का अपने पर
असर न होने देना ही निश्चय से अनर्थदण्ड विरमण व्रत है।
.....९ सामायिक व्रत
मन करन और काय के प्रारम्भों को छोड़ कर एकांत में
नियमानुसार वैठना या पुस्तकादि पढ़ना अथवा जप करना
की
विचारणा करना और सर्व जीवों की सत्ता एक समान जान कर
सर्व जीवो के साथ समभाव रखना, निश्चय सामायिक व्रत है
१० देशावकाशिक बय
मन. वचन और काय के योगों को दूर कर एक स्थान में
बैठ कर धर्म ध्यान करना व्यवहार देशावकाशिक प्रत है। श्रुतज्ञान
से छहो द्रव्यों को जान कर, पांच द्रव्यों को छोड़ ज्ञानवंत जीव
का ही ध्यान करना निश्चय-देशाववाशिक व्रत हैं।
११ पौषध व्रत
'चार या आठ प्रहर तक सब सावद्य कर्मों का त्याग कर
: ::: . . . . .
मा ११.!, 121
बोना।
२
निविभाग
पो ( fati ) गमग या का
मा गामि गाईको गया मानमार
में निधिविभाग की कोशिश की मां को
न देना पड़ाना मित्रानो काम करना और कराना निय
में निधिविभागात।
गवाह त ग गये। जो जीवन रात को गम्गकन्य के
साथ निश्चग और जगनार में पारणा कर उस जीव को पंचम
गुग्ण स्थान का अधिकारी या देशविरति श्रावक कहते हैं देश
अर्थात अंश से विरनि त्याग देश-विरति का अर्थ है । सब
प्रकार के त्याग की मर्य-विरति कहते हैं। यह सर्व विरति साधु
को होनी है साधु के पाँच महासत में इन बारह व्रतों का समा-
वेश हो जाता है। व्यवहार और निश्चय से पूर्वोक्त
का पालन करना और ज्ञान ध्यान संवर तथा निर्जरा में आत्म
परिणाम को स्थिर करना ही निश्चित-चारित्र है।
।। श्री श्रावक के व्रत समाप्त ।।
व्रतों
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