Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Usha

Sharma,shri Girdher · 2011/01

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होलकर-हिन्दीयन्थमाला पुष्प १७ यां फविवरेण्य श्रीयुत नान्हालाल दलपतराम- (अनुपम-कल्पनागय भावपूर्ण गधकान्य) हिन्दीकार श्रीगिरिधरशर्माजी नवरत्न. प्रकाशक:- राव डाक्टर श्रीसरयूमसादजी बहादुर, मन्त्री “ मध्यभारतहिन्दीसाहित्यसमिति " तुकोगज-दोर - - पुस्तकमाप्तित्यान प्रकाशक, और- श्रीईश्वरशॉविद्यार्थी नवरत्न-सरस्वती-भवन, झालरापाटन राजपूताना प्रथमवार} ज्येष्ठ सवत् १९८१ {मूल्य १)

-
प्रकाशक
राव-भीसरयूमसावजी बहार,
मन्त्री " मध्यभारतहिन्दीसाहिस्पसमिति
तुकोगज-दोर.
NE
रा.चिंतामण सखाराम देवळे,
मुंबई वैभव प्रेस, सवर्स रोड,
गिरगांव-मुंबई

SHAH
ce-cre
4597ISSIS
समर्पण.
SABHASHA
EKASABSE
उन धन्यतम दम्पतियोंको
जिनके
नेद-सञ्चार, आदर्श
हैं,
उपा
सानन्द समर्पि है
HSANSAGSEart
गिरिधर
HABAR

दोशब्द. - Dereka न्हा नालाल दलपतराम भाईको नाम निर्देशकर बत- लाने की अब मेरे विचारमें कोई आवश्यकता नहीं। जिन्होंने आपके जयाजयन्त को एक बारभी ध्यान देकर पढा है वे सानन्दाश्चर्यचकित हुए है । उसी आकाशविहारी कविकी यह सुन्दर कृति हिन्दी जनताके सन्मुख उपस्थित है । जो इसे पढेगा अनुपम गयकायका आनन्द लूटेगा और ऐसी ऐसी प्रेरणायें पायगा कि उसका गृह संसार स्नेहके पीयूषसे भरा, अमर, आनन्दसरोवर होकर रहेगा। विशेष लिखने की मुझे आवश्यकता नहीं, हिन्दीजन रससिद्ध, पीयूषनिधि, कविकलाधर न्हानालालकी फलमकिरणावलीसे प्रकाशित इस स्नेहतरङ्गिणी उषामें अवगाहन कर आनन्द लूटे और मेरी त्रुटियोंको क्षमा करें, नवरत्न सरस्वती भवन झालरापाटन ज्ये २८स १९८१ गिरिधर.

प्रस्तावना. प्रकृति और पुरुषके एक अभ्यासीने गाया है कि 'नरनारी दो दीखते दिलकी डोरी एफ। यह होरी क्या है ? कैसी है ? किसकी है। ये सृजन-प्राचीन प्रश्न है । मनुष्यके हृदय और बुद्धिके जितने ही प्राचीन इनके गहनभेद हैं। विश्वतोमुखी विराटके मुखके आहे पड़े हुए किसीकिसी परदेको जैसे दार्शनिक या पैगम्बर खोलते है वैसे ही इस भनेक अगी महाप्रश्नकी भी किसीकिमी कलाको कवि या रसमीमांसक प्रगट करते है। रस, रसिकता और रसकी लीला सुन्दरी और सौन्दर्य, और प्रियजनकी प्रियतम भावनाके कोई अन्वेषण, सर्वदेशी या सर्वग्राही-परिपूर्ण न होंगे। वे सदा अपूर्ण ही रहेंगे और नये नये कलाविधायक उसे पूर्ण करनेकी कोशिश करतेही रहेंगे। चेतनशान रिपुल विज्ञानीजन जब नगीन रसमीमांसा रचेंगे और नायकनायका-भेदके रसशास्त्र के प्रकरण भविष्यमें फिर लिखे जायगे तव, खोपुस्य के रसपूर्ण गुरुत्वाकर्षणका महाप्रश्न नई रीतिसे ही अन चर्चा किया जायगा। जगतकी सय प्रजाओं के काव्य नाटक और उपन्यासोंके इस सर्वसचारी विषयके, जब कोई भविष्यतका वात्स्यायन, नवीन सूर लिखेगा तव मानवलाक में अद्भुत प्रकाश अवतीर्ण होंगे । हृदयकी स्थूल क्रियाओंके दर्शन जैसे परदेकी भोटसे ही होते हैं वैसेही हृदयकी सूक्ष्म कियाओंकेभी दर्शन पटकी ओटसे ही होते हैं। हृदयमन्दिरके रस और रहस्यके भेदी आन्तरिक पुजारियोंकी गोग्नवेल सदा पत्र- पुष्पसे हरीभरी घटती ही रहती है और रसदेवताकी उपासनाकी अनन्तशिख आरती के कितने ही दीपक इस पेलके प्रत्येक पानपर और प्रत्येक फूलपर प्रगट हाते हैं। अनादि-अनन्त सौदर्यपूजनकी भारती की एक ज्योति प्रकटानेका यह एक यल है। दिन और रातकी शाखायें गुय कर सघ्याकी छाया फैलाती है, वैसेही स्थूल और सूक्ष्मके जड और चेतनके किरण यूथ जहां गुपते है उस सान्भ्य देशकी यह फथा है । मात्माकी यह देवस्था नहीं है, देहकी यह स्थूल कया नहीं है, आरमा और देह उभयधारी मनुष्यजातिकी यह मानवकया है । कोई भीष्मकी यह व्रतकथा नहीं है, सकल ससारियोंकी गृहकथा है। जयाजयन्त नाटक किसी विरलमर आरमलमनिमम साधुका माध्वाश्रम था, यह सृजन-जूनी कथनी सब गृहस्थाश्रमियोंके लिये फुलबाडी है । और यह गद्यमयी कथना क्वल रेखाचित्र है, ध्वनिसूचन है, तीनिर्देश है । परन्तु व्यसना और ध्वनि रसमामांसाके चतुर मीमांसकों के लिये क्या कुछ कम है। इजिन्हें इस मद्धत नाटकको देखना हो वे राजपूतानाहिन्दीसमावे एकाशित हुए नाटक को हमने मगा मूल्य १॥) ईश्वरशर्मा नान्हालाल कवि दोशब्द. न्हा नालाल दलपतराम भाईको नाम निर्देशकर बत- लाने की अब मेरे विचारमें कोई आवश्यकता नहीं। जिन्होंने आपके जयाजयन्त को एक बारभी ध्यान देकर पढा है वे सानन्दाश्चर्यचकित हुए है । उसी आकाशविहारी कविकी यह सुन्दर कृति हिन्दी जनताके सन्मुख उपस्थित है । जो इसे पढेगा अनुपम गयकाव्यका आनन्द लूटेगा और ऐसी ऐसी प्रेरणायें पायगा कि उसका गृह संसार स्नेहके पीयूपसे भरा, अमर, आनन्दसरोबर होकर रहेगा । विशेष लिखने की मुझे आवश्यकता नहीं, हिन्दीजन रससिद्ध, पीयूषनिधि, कविकलाधर न्हानालालकी फलमकिरणावलीसे प्रकाशित इस स्नेहतरङ्गिणी उपामें अवगाहन कर आनन्द लूटे और मेरी बुटियों को क्षमा करें नवरत्न सरस्वती भवन झालरापाटन ज्येशु ८ स १९८१ गिरिधर. 1 - प्रस्तावना. प्रकृति और पुरुषके एक अभ्यासीने गाया है कि 'नरनारी दो दीखते दिलकी डोरी एक। यह डोरी क्या है ? कैसी है ? किसकी है। ये सजन-प्राचीन प्रश्न है । मनुष्यके हृदय और बुद्धि के जितने ही प्राचीन इनके गहनभेद हैं। विश्वतोमुखी विराटके मुखके आडे पड़े हुए किसीकिसी परदेको जैसे दार्शनिक या पैगम्बर खोलते है वैसे ही इस अनेक भगी महापनकी भी किसीकिसी कलाको कवि या रसमीमांसक प्रगट करते है । रस, रसिकता और रसकी लीला सुन्दरी और सौन्दर्य, भौर प्रियजनकी प्रियतम भावनाके कोई अन्वेषण, सर्वदेशी या सर्वप्राही परिपूर्ण न होंगे। वे सदा अपूर्ण ही रहेंगे और नये नये कलाविधायक उसे पूर्ण करनेकी कोशिश करतेही रहेंगे। चेतनशास्त्र के रिपुल विज्ञानीजन जय नवीन रसमीमांसा रचेंगे और नायकनायका-भेदके रसशास्त्र के प्रकरण भविष्यमें फिर लिये जायगे तब, खापुपके रसपूर्ण गुरुत्वाकर्षणका महाप्रश्न नई रीतिसे ही भर चर्चा किया जायगा। जगतकी सय प्रजाओं के काव्य नाटक और उपन्यासों के इस सर्वसवारी विषयके, जब कोई भविष्यतका वात्स्यायन, नवीन सूर लिखेगा तब मानवलाक में अद्भुत प्रकाश अवतीर्ण होंगे । हृदयकी स्थूल क्रियाओं के दर्शन जैसे परदेकी मोटसे ही होते हैं वैसेही हृदयकी सूक्ष्म कियाओं कभी दर्शन पटकी भोटसे ही होते हैं। हृदयमन्दिरके रसज्ञ और रहस्यके भेदी भान्तरिक पुजारियोंकी गोप्रवेल सदा पत्र पुष्पसे हरीमरी बढती ही रहती है और रसदेवताकी उपासनाकी अनन्तशिल भारती के कितने ही दीपक इस येलके प्रत्येक पानपर और प्रत्येक फूलपर प्रगट हाते हैं। अनादि-अनन्त सौदर्यपूजनकी आरती की एक ज्योति प्रकटाने का यह एक यल है। दिन और रातकी शाखायें गुथ कर सध्याकी छाया फैलाती है, वैसेही स्कूल और सूक्ष्मके जड और चेतनके किरण-यूथ जहां गुणते है उस साभ्य देशकी यह कया है । आत्माकी यह देवकथा नहीं है, देहकी यह स्थूल कथा नहीं है, आरमा और देह उभयधारी मनुष्यजातिको यह मानवकया है। कोई भीष्मकी यह व्रतकथा नहीं है, सफल ससारियोंकी गृहेकथा है। जयाजयन्त नाटक किसी विरलतर भारमलमनिमम साधुका साध्याश्रम था, यह सजन-जूनी कयनी सन गृहस्थाश्रमियों के लिये फुलवाडी है । और यह गद्यमयी कथना केवल रेखाचित्र है, धनिसूचन है, तर्जनीनिर्देश है । परन्तु व्यजना और पनि रसमीमांसाके चतुर मीमांसकों के लिये नान्हालाल कवि जिन्हें इस अद्भुत नाटकको देखना हो वे राजपूतानाहिन्दीसभासे पकाशित हुए नाटक को- मूल्य १) - क्या कुछ कम है।

(४) शरपूर्णिमाको एक रातको छह महीनेकी रासरात्रि करनेका कहा गया है उस मचामें इस बात का वर्णन है । देवभी इस ऋतुको चाहते हैं। लक्ष्मीजी के साप विष्णु भगवान् स्मित करते थे और उस स्मितमें से सृजन सरजे गये, उस स्मितकी और स्मित के सजनकी थी यह ऋतु । इस प्रस्तुमे पुछ-कुछ अजनवी नव-नव सृजन सरजे गये थे। मनुष्य जातिके मनुष्यत्वकी यह ऋतु थी। यह वह तु थी कि जो उदय हुए पाद कभी अस्त नहीं होता, जिसमें मानवपुष्प अद्भुत और अलौलिक रीतिसे खिलते हैं, जीवनकी वह अनन्त पन्त थी। जिस प्रस्तुमें देव पृथ्वीपर सेलनेको अवतीर्ण होते हैं यह वह प्रतु थी। आत्माक भानन्दसे आयुष्य भरमें यह एकही ऋतु अखड प्रकाशित होती है। प्रापर्य के यारह वर्षोंमें, ए ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारिगियो ! एकएक वर्षमें इस रामायणके एकएक कोडको पढना और विचारना, तुम्हें वही प्राप्त होगा कि जिसे तुम्ह खोजते हो।

उषा प्रकरण १ ला. - स रातको मुझे उसके प्रथम दर्शन हुए, मानो तारिकाओंसे घिरा हुआ चन्द्रमाही न हो। उस रातको मुझे जिन्दगीके भेदकी कुछ झाकी 'हुई, कुछ मुमुक्षुकी जिज्ञासा जागरित हुई, और कुछ जीवनके अमृतकी प्यास लगी । कितनीही बातें ऐसी होती है कि उन्हें भूलना सहज नहीं होता । उस घटनाको हुए एक चिरकाल व्यतीत हो गया है परन्तु ऐसा जान पडता है कि अभी हालही घटित न हुई हो । कालकी महानदी कितनीही बडी क्यों न हो तथापि उसके विशाल पाटको उल्लवन करनेके लिये स्मरणके पुलकी एक कमान बस है । गरमी बीत गई थी और बरसात पूरी पूरी बैठी न थी । वह एक ऐसा सधिका समय था कि जो-महा भाग्यके ज्वारके समान-मनुष्य जीवनमें किसी किसी समयही आता है । ग्रीष्मकी प्रचण्डता बीत गई थी। छायामेंमी उष्मामापकयन ११८ अश ताप नापता था । लोग कहते थे कि ऐसी प्रचण्ड गरमी पञ्चीस वर्षमें कमी न गिरी थी । मुझे जान पडता है कि मीष्मने चुन चुन कर तापको कहीं-न-कहीं इकट्ठा कर रखा था और उस रातको मेरे अन्त- र में भर दिया । वह देव हुताश तर था वैसाही आजभी प्रज्वलितही है। यदि किसीके पास अन्तरका उष्मामापक या हो तो आवे और मेरे अन्तरकी उष्माको नाप ले । सूर्यके ऐसे उसके नयनोंमेंसे वर प्रचण्ट सूर्यज्वाला प्रकट हुई और मेरे हृदयमें समा गई । मेरे अन्त करणके उषा । अग्निकुण्डमें इस आग्निहोत्रके देवाग्निको मैनेभी बड़े जतनसे रख छोडा है और आजभी उसका पूजन करता हू । परन्तु अभीतक पूरी पूरी बरसात प्रारम्भ न हुई थी। निरन्तरका साथी होनेपरभी ब्रह्मवियोगी ब्रह्माण्ड जब मूसलधार आसू बरसाता है वह बरसात अभीतक प्रारम्भ नहीं हुई थी। जगतकी जलनको दूर करने और ऊष्माके सन्तापको मिटाने योग्य एक दो पानी होगये थे। आषाढी बद्दलों की गाढताको देखकर लोगोंको सान्त्वना होगई थी कि आसमानमें जलगर्भका परिपाक होगया है। अचरजसे भरा हुआ जैसा वह मेरा दिन बीता था वैसेही अचरज भरी वह मेरी रात बीती। पूर्णिमाकी पिछली रात और प्रतिपदके प्रभातमें वह घटना हुई । गगनके परदे हटे और भीतरसे सौभाग्यगढ़ा मेरे जीवनमें बहने लगी। व्यालू करके मै नींदकी गोदमें सो गया और घडीभरके लिये जगत और जगतक जजालको भूल गया । विस्मरणकी काली चादर मैने ओढ ली। आकाशपर चाद अठखेलियां कर रहा था और चादनी छिटकी हुई थी । मैं उसे नहीं देखता परन्तु अनेक आखें उसे निहार रहीथीं और वन्दना कर रहीथीं । बद्दलकी-सी सीढियोंको चढते-चढते ब्रह्माण्डकी किलङ्गीके ऐसा चन्द्रमा पृथ्वीके माथे पर आगया। उस रातको बालिकाओका उत्सव था । जगतके सोजानेके बाद, रसजिज्ञासुलोचनोंको छोडकर और कोई न देसरहा हो ऐसे समय, नग- रकी बालिकाओंके कौमार-अभिलापका उदधि उछल रहाथा और उसकी हिलोरें चादनीकी समुज्ज्वल लहरियों से भी विशेष उजलीथीं । घर-घरकी बालिकाये नक्षत्रमहलके समान एकत्रित होकर गातीर्थी और गाती-गाती सादा नाच नाच रही थी, मानो संसारके उपवनकी लतायें झूला ही न झूल रही हों!

प्रकरण १ला ३ मैं तो उस समय निद्रा-मूर्छित था, परन्तु नगरका होंस भरा हुआ रसिक-यौवन जग रहाथा और कहीं कहीं थोडा थोडा रसकी बैठारोंसे छींटा जाता था। वालिकाओंकी मानो यह वसन्त पचमी थी, उनके उरमें और अगमें बसन्तकी बहार छारहीथी। वरसातके एक-दो झपाटीने पृथ्वीको और बाला ओंको भिगो दिया था । छोटे-छोटे नये अड्डर पृथ्वीके और उनके अन्तरमें फूट निकले थे। उनकी नाडियोंमे रसकी बारीकवारीक शिराओके सूक्ष्म-सक्ष्म स्पन्दन होते थे। आधीरात बीत जानेपर चादकी किरणें चुपचाप मेरे कमरे में आई और अमृताङ्गलियोंसे गुदगुदी चला चला कर मुझे जगाया । मैने अपनी अघसुली आखोंसे पहले गगन में पूर्णिमाके चन्द्रमाके दर्शन किये, मानो विश्वके सौभाग्यका अमृतथाल ही नहो । मानो रजनीके केश- कलापका मकुट-मणि हा नहो ! मानो संसार के जीवन का माधुर्य ही न हो ! आज कौमारोत्सव था और कुमारिकाके उज्ज्वल मुखके ऐसा उज्ज्वल चन्द्रमा आकाशकी अटारीपर सुहा रहा था। मै जगा तो दो-चार ओरसे कोयल और मैनाके टहुके आते हुए सुन पड़े । कहीं कहीं पर कोई फाख्ता (डेकछ ) भी बोलती थी। मै जगा और चादनी (छत) पर गया । देवोंके देवत्वके थालके ऐसा चाद चमक रहाथा । तेजके मुघाकुम्भके ऐसा वह गगनकी किसी अदृश्य शाखापर मृत्युलोक-निवासियोंके लिये लटक रहा था। नगरका स्त्री कौमार आजकी रात उसकी अमृतधाराओंको झेल झेल कर पान कर रहा था । देवलोकके इस दैवी मधुपर्कसे मधु टपक रहाथा और ससारी इस पचामृतसे अपने पाचों प्राणोंका पोषण करते थे।

8 उपा - गली-गलीसे गीतके आमन्त्रण आरहेथे परन्तु मैने उनका सत्कार न किया सोचा कि बालिकाओंकी कोमार बगीचीमें जाकर उन खिली हुई कलियोंको लज्जावन्तीकी भाति लज्जासे सङ्कुचित करना कोई धन्य काम नहीं है, खिली हुई कमलकी पंखडियोंके लिये घूघटका सम्पुर करनेका प्रसग लाना पाप है। परन्तु अनुभवने आगे चलकर सिखलाय' कि रसपूर्णिमामें प्रफुल्लित हुए कमुद कुछ उलूकोंकी छायासे याँही सकु- चित नहीं हो जाया करते। नन्हीं नन्ही नावोंके ऐसे बालाओंके प्रतिबिम्ब चादनीके जलमें तैरते फिरते थे। बालाओंके मधुर आमन्त्रण पीछे लौटाये परन्तु विधात्रीकी भाग्यघडीको किसने पीछी लौटाई है ? जन्म और मृत्युके क्षणको कोईक विरल महा- योगीको छोडकर जैसे और कोई नहीं टाल सकता वैसेही सौन्दर्य स्वयम्बर के मत्स्यवेधकी घडी भी टाले नहीं टलती । इस बातको कोई नहीं जानता कि जीवनवनमें भमते भमते कब वह घडी वाणकी तरह अन्तरके भी उडे-अन्तरमें प्राणोंके भी प्राणमें प्रवेश करती है और वहा पर चिरकालका निवास करती है। मै चादनीसे नहीं उतरा परन्तु आज मेरे लिये उसीकालका योग था । मैं चादनीमें ही था और मेरी छोटीसी चादनीका सरोवर चन्द्रिकाके जलसे छला छल भरा हुआ उभरा रहाथा । मेरे पैर उसमें बूडे हुए भीग गहन दडीके चक्करके ऐसाचाद लटकरहाथा मानो पूरब और पच्छिम के दो पलडे लगाकर कोई इस तुलामें जगतको तोल ही न रहा हो ! मेरे भाग्यका न जाने कोनसा पलडा इसमें झुकनेको था । आधीरात ढलगई थी, पिछली रातकी गाढी नींदमें मानवी जगतको सोया हुआ समझकर बडी बडी बालाओंका तारामडल इस समय गली- गली मुहल्ले मुहल्लेके चौकमें खेलनेके लिये निकल पड़ने लगा था।

प्रकरण १ ला नहीं हुए थे। मुद्रा एक मीनका राशिमडल आया । मीनके ऐसे चचल और लाज भरे नयन थे । वे चमकते हुए कभी नमते कभी फरकते और कभी हटजाते थे। मुखपर मधुर मुसक्यानकी ऊर्मिया उठती थीं । गीतमें माधुर्य था परन्तु कठमें लज्जाका रव था । पैरभी शरमाते-शरमाते सुस्सेके से उठते थे। कौमारके उछलते हुए झरने अभीतक बालाओंके अन्तरमें प्रकट चकोर थी और गति बाणके ऐसी थी परन्तु वाल- विहगिनीके प्रथमोड्डयन-की-सी पाँखें लज्जामयी थीं । चन्द्रिकामे तैरती- तैरती वे मधुर लज्जामरी मछलिया आई और चलीगई, अधखिली कलिका- ओंकी पसडियोंके समान कितनीही कुमारिकाओंने साडीको समेट रक्खा था। कौमार कहते जीवनका चौक, कमरा नहीं । खुले और निखालस दिलसे जो न खेल सके वह कौमारके चौकमें नहीं है परन्तु जीवनकी कोटरियोंमें है। कितनी ही बालायें बालक होती ही नहीं है-जन्म- प्रौढायें होती हैं। जगतकी कितनी ही ऐसी कौमारकी क्यारियोंमें लतायें या पौधे होत ही नहीं है परन्तु वृक्षही उगे हुए होते है । ये लज्जामन्थरगतिशालिनिया अदृश्य हुई और मै पृथ्वीपरसे आका- शकी ओर देखने लगा । वहाभी कितनी ही छोटी-छोटी तरिकायें लज्जाकी बारीक-बारीक साडिया ओढकर झीनी-झीनी दृष्टिसे जगतको देख रही थीं तेजस्वी ग्रह झलमला रहे थे और एक चद् आकाशभरको प्रकाशित कर रहा था। मुझे जान पडा कि रसके ब्रह्माण्डमें भी प्रत्येक आकाशके लिये एकही चन्द्र है-एकही अमृत ज्योति है। मैं अपने कमरेकी गुहामें गया, एक काव्य उठाया-खोला । परन्तु तुरन्त हृदयमें प्रश्न उठा कि चन्द्रमा सुन्दर है या कविता? मुझे ऐसा भास होने लगा कि मै उस सुधाकरकी अवगणना कररहाहू जिसके-आदि उपा कालके कवित्व निर्झरसे बहतेहुए-अमृतसे कविकुलका पोषण होता हुआ चला आया है। यदि कोई आपसे ऐसा कहे कि चन्द्रकी अपेक्षा चन्द्रकी कवितामें विशेष सौन्दर्य है तो इसे माननेके पहले किसी कविकोही यह बात पूछ देखना । प्रतिदिन पिये जाने परभी जिसका रस व्यतीत नहीं होता और प्राचीन कालसे परिचित होने परभी जो नितनई उमगके साथ पीनके अभिलाषियोंको अजली भर-भरके पिलाता है वह चन्द्रमातो ब्रह्मा- पडके आश्चर्यो में का एक महा आश्चर्य है । अधेरेको भी उजेला करता हुआ यह रजनीपति जगतकी अनुत पारस ज्योति है। चन्द्रकी एक- एक किरण सुन्दर काव्यसे भी महासुन्दर काव्य है । चन्द्रकी जितनी किरणें हैं उतने, चन्द्रविषयक काव्य-क्या अच्छे और क्या बुरे दोनों मिलकर-अभीतक जगतमें नहीं लिखे गये । चन्द्रके अमृतकी अपेक्षा चन्द्रकी कविताके अमृत उस दिन तो मुझे विशेष मधुर न जान पडे । परन्तु हृदयका चन्द्र उगे बाद सब चन्द्र फीके पडजाते है यह सीखना मेरे लिये बाकी था । पुस्तक के अक्षरोंको पढनेके लिये दीपक लगा रक्खाया परन्तु उस दीपक्की शिखाभी बाहरके प्रकाशको देसकर शरमाती हुई जान पडती थी । मुझे सकोच न था, मै पढ रहा था। मै जिसे और समय में पढ़ सकता था उसे ही उस समय पढ रहा था, और जिसे और समय में नहीं पढ़ सकता था उसे पढ़ नहीं रहा था । अनजान में ऐसी ही भूलें हो जाया करती है। चारेक बजे होंगे। चन्द्र नम रहा था और मेरे पर विशेष-विशेष चांदनी उिटकाता जा रहा था। मुझे मालूम न था कि चन्द्रको आज मेरे पर ही अभिषेक करना है। नहीं तो इस चन्द्रिका के अभिषेक का मैं और ही तरहसे आदर पूर्वक सत्कार करता । परन्तु मनुष्यकी कितनी एक भूलोंको परमेश्वर ही भग करता है। इस ब्राह्म मुहूर्त मे मोर और कोकिल बोल उठे प्रकरण १ ला ७ वनमे बोले मधुरव मोर, कोकिल रानी किलोल करे रे लाल' वर्षाऋतुके इस प्रारम्भ कालमें वन और नगरमें मयुर बोल रहे थे। परन्तु इस मयूर की केकावली और कोकिलकी किलोलता दूरदर चाद- नीम तिर आती हुई बालिकाओंके मुसमयूरकी मधुर आवाज थी। नगरकी सुषुप्त वनघटनामें इस माधुर्यका टहुका उड रहा था। पढ रहा था, उस कविताकी केकामे ये केका या किलोल न दिसलाई दिये । मै उठा, पुस्तक गिर गया और कृत्रिम दिया मी बुझ गया, मै चादनी पर गया और उस मयूरकी ओर आशाभरी दृष्टिसे निहारता हुआ सडा रहा मानो आकाशमें कोई आश्चर्यका उदय होनेवाला ही न हो। मयूर का शब्द अन्तर्हित होगया और शान्ति-जगतके जन्म पहले की शान्तिके ऐसी महागर्भवती शान्ति-फिर फैल गई । दिशाओंकी गुहा शब्द शून्यता सडी थी। चन्द्रमाकी किरने टेडी गिर रही थीं, वे ऐसी लगरही थीं मानो नयनों के कटाक्ष ही न लग रहे हों और उत्कण्ठा बढा रही थीं। नवीन नाटक का परदा जब उठनेको होता है तब दर्शक वृन्द में जैसी आतुरता होती है, सागर के क्षितिज पर घूमकर आनेपाली नौका को जिस उत्कठा से तट पर बैठकर प्रतीक्षा करने वाले देसते है, समाधि में से जगकर न जाने क्या अपूर्व ज्योति प्रकट करेंगे इस आश्चर्य भरी जिज्ञासा से मावुक शिष्यसघ नित्य समाधि में से जगते हुए योगि- राजको जिस प्रकार निहारते रहते हैं, मेरेभी माव वैसे ही होरहे थे। प्रियवरो । सूर्यका उदय देखने के लिये कभी गिरिके शिखर पर चढे हो ? उस समय कौतुक के हिचोलेसे आपका हृदय दोलायमान हो रहा था। उसी प्रकार मेरा एदय झूले पर चढा था। मेरे श्रवण सावधान थे, नयन मेरे चकोर थे। दिशाओंसे श्वासोच्यास ८ उपा सुनने को भी मैं तैयार था। परन्तु दिशाओंके समाधिस्थ होजाने से उनकी श्वसनक्रिया भी बन्द थी। सृष्टाने सारी सृष्टि बनाकर यदि सुन्दरी न बनाई होती तो ? सारे आकाश को बनाकर सूरज न बनाया होता तो परन्तु इसतरह के सारे प्रश्न आज तो व्यर्थ है। इतने में ही अनचीते एकाएक, मानों मेरे वामाग में से ही प्रवाह फूट निकला हो इसतरह, गान सुनाई दिया कोयल मेरे झरोखेसेही कूक उठी ! उत्साह का जोश और आदरके आमन्त्रण उस गानेमें अनुपमताके साथ भरेहुए थे। माधुर्य तो काव्योंमेंसे चुन चुनकर उस मुखमें रस दियाथा । मानो एक निर्झर ही न गर्जन कररहा हो ! इस प्रकार उसके कठसे ध्वनि निकल रहा था । मानो जगत की विजयदुन्दुभी ही न बज रही हो। जोश भरे कौमारके महाजल प्रपातके सगमोंको पाकर जलपूर्ण सरितायें बहती है और ससारके महासागरोंको भरती है । कोमल कौमारकी सरें इतनी जगतयात्रा नहीं साध सकतीं और कुमारिका, नदीके ऐसी स्थलमें ही थक कर रह जाती है जैसे दिशाए सकुचित होकर भीतर से सूर्य मडल प्रकटें और बादल फटकर भीतर से चमाचम करती हुई बिजलिया चमकें, वैसे ही परछा- इयोंको चीरती हुई वालायें चदिकामें आई । पूर्णिमाकी ज्योत्स्नाभरी रातमें जैसे कुमदनीकी कलिकायें विकसित रहती है। वैसेही इन बालाओं- के मुखके कुमुद चद्रिकामें विकस रहे थे । किरणके किरणसे धक्का खानेसे एक अदृश्य अनहद नादका रणकार उत्पन्न होता है वैसाही अदृश्यनाद मेरे अन्तरमें जागरित हुआ। हृदयकी घडीके मधुर रववाले टंकारफी ऐसी उनकी करतालिकाओं की सम्बादी और मीठी तालिया बज रही थीं। नयनके बाण दिशाओं को वीं जीतते हुए उड़ रहे ये। बदनके हाससे गगन की कौमुदीके हासभी लज्जित होतेथे । ।

प्रकरण १ला आखें मीं परन्तु अध खुली ही रहीं । मेरी पलकोंपर जान पडने लगा कि कुछ अद्भुत भार सा आ पड़ा है। स्वागत करू प्रिय आज घर आवोना। कौमारके सौभाग्योत्सबमें बालिकाये इस आमन्त्रणके गीतको गा रही थी स्वागत करू प्रिय आज घर आवोना. आगन भरू शुभ फूल घर आवोना' पूर्णिमाकी चादनीके चौकमें बालायें किसीको बुला रही थीं। नग- रकी गलिया सुनसान थीं परन्तु इस सुनसानमें भी चेतन चमत्कार दिखला रहाथा । जीवनके सर्वस्वको निमन्त्रण देती हुई वे बालिकायें उल्लसित हो रही थीं । उनकी नयनतारिकाओंमें से प्रकट होता हुआ रसचेतनका प्रकाश पूर्णिमाकोभी प्रकाशित कर रहा था। रसके आगनमें वे किस प्रियको निमनित कर रही थीं इसका उन्हें स्वय कुछ भान नहीं था। वे आकाशमें अलक्ष्य रूप से शब्दबाण छोड रही थीं। सारे जगत का सुन्दरी सघ और पुरुष परिवार आमन्त्रण के इस गीत को गा रहा है । वाचकगण ! आपने भी इस आमन्त्रण को सुना है न? देवाङ्गनाओंके विमान मानो अवनी में खेलनको न उतर आये हो इस प्रकार से उडती हुई साडियोंको ओढे हुए वे कुमारिकायें चली आरहीं थीं। गगाके मूलको खोजने बालेके समान मेरे नयन उस गीत-गगा के 'मूलको खोज रहे थे। सब तारिकाओंमें जैसे चन्द्रकला तुरत लक्ष्यमे आजाती है वैसेही वह सारे सखी मण्डलमें अग्रेसर जान पडती है।पुष्प वाटिकाओं में जैसे फवारा उछले वैसेही वह ससियोंके परिवारमें उछल रही थी । अध्व- युके मनोचार को जैसे बरनीके ब्राह्मण झेलें वैसेही उसके गीतमत्रको १० उषा सखिया झेल रहीं थीं । सखिसमुदाय में प्रभुकी प्रभाकला के ऐसी यह एक और अद्वितीय थी। रग विरगी बदलियोंसे घिराती हुई सूर्यप्रभा वर्षा की किसी साझमें प्रकाशित हो रहती है वसेही सखियोंकी बदलियोंसे उसका ज्योतिदेह घिराया हुआथा और इस घेरे से उसकी कातिकी कलिका कुछ और ही प्रकारसे खिल उठी थी। मेरे हृदयमें अचानक भूकम्प हो उठा । मेरे मनके महल गिरे तो नहीं परन्तु उनके युगयुग से बन्द हुए द्वार खुलगये, आगलें टूट गई और भीतर झंझावात बहने लगा। बिजलीको छूनेसे जैसे धका लगता है वैसेही उसके नयनोंके किरणोंके स्पर्श होते ही मेरे एक अद्भुत धक्का लगा। आकाशमें तेज रेखा खींचती हुई हवाइया चलें वैसेही मेरे हृदयाका- शमें हवाइया चली और तेज रखा सिची । वे सिहराशिकी तारिकायें थीं, प्रत्येक कुमारिका सिहीके ऐसे उत्साह मरे उमगी वेगसे पूर्ण थी । जैसे दीपकोंको दीपित करता हुआ छोटी छोटी नावोंका सघ सरिताके जलौघमें तिरता हुआ आवे वैसेही गलियों की सरिताके ज्योत्स्नाजल में तिरती आती हुई उन कुमारिकाओंकी नौकामें नयन-दीपक प्रदीप्त होरहे थे। वृक्ष और लताओंकी हरियाली में होकर जलपूर्ण स्वच्छ निरझर जैसे बाहर निकल आवे, उसी तरह सखियोंकी तरुलताओंकी हरियालीमें से बह उछल कर आगे आई हुई थी। कौतुकके झूलेपर झूलता हुआ म दर्शनमुग्ध होकर सता रहा और जिन्दगीके भेदकी अडा गुफाओंको देसता ही रहा । पृथ्वी फटजाय, भीतरसे प्राचीन मन्दिर प्रकट हो, और इस मन्दिर की देवियोंके बीचमें साक्षात् लक्ष्मीजी स्वय विराजमान हो रही हों, - ।

प्रकरण १ला इस तरह सखियोंकी देवियोंके बीचमें मुझे इन सौभाग्यलक्ष्मीजीके अन- चीतेही अद्भुत दर्शन हुए। आकागमें चन्द्रराज प्रफुल्ल वदनसे प्रकाशित हो रहा था । परन्तु पृथ्वी पर की उसके मुखकी कातिमयी कौमारकला मुझे विशेष मधुर और अमृतमयी जान पड़ी। कौमारके जोशकी उस रातको चारों ओर धारायें उड रही थी। उस धारावर्षा, मैनेभी स्नान किया और कौमारके फुवारे मेरेभी अगसे प्रकट होने लगे-चलने लगे। मेरी चादनीके नीचे सखी मण्डल आया, मानो जगतके सौन्दर्यकी सरितायें मेरे आगनमेंही न आगई हों। परन्तु उनमें मेरे ऐसे निश्चेतन को चेतन देनेवाली पुण्यप्रवाह भागीरथी तो एकही थी। बिना नोते हुए महमान हृदयमे आकर विराजमान हो जाते है क्या नोते हुए महमान वैसे प्रिय मालूम होते है ? सखिया मेरे द्वारपर आई, मानो मकल पारावार सहित पूर्णिमा मेरे आगनमेंही न आई हो। हमारे नेत्रोंका वाटक घडीकके लिये जम गया । मैं दिङ्मूढ हो खडा रहा । मानो मेरा चेतन चला गया हो, मानो इन्द्रिया सटक गई हों। मुझे दर्शन समाधि लग गई। सीमें जिस तरह नाचती हुई मूर्तिके दर्शन होते हैं वैसेही मेरे अन्तरको आरसीमें उसकी मूर्तिकी छायाके नृत्य नच रहे थे । उत्सव के दर्शन कितनी घडीके होते है ? मेरा भी ऐसाही हुआ । सौन्द- यके दर्शनसे किसको तृप्ति हुई है ? मै अतृप्तही रहा । गई, वे गई, शोभा और रसकी वायु-नौकायें वे सब गई । मानर- रूपधारिणी वे कोयले सौन्दर्यकी पासको फडफडाती हुई उड़ गई। ।

उपा चन्द्रिकाके एक सरोवरको उल्लघन कर अधेरेको बटाती हुई वे ज्योत्स्नाकी पुतलिया ज्योत्स्नामें मिलगई। चादनीपर मै अकेला रहा । पूर्णिमाकी चन्द्रिका मुझे अभिषिक्त कर रहीं थीं । आश्चर्य-आश्चर्यके झनकार वातावरणमेंसे झमझम करते हुए -मुझे सुनाई पडते थे। अन्तरिक्षमें उस तेजके पीछे उड रहे थे जो उनकी सौन्दर्य पाखों- मेंसे सिरे थे। दर्शन मू मेंसे मै जगा उस समय पूर्वमें उपाकी प्रथम छायाकी खिचने लगी थी। उसके अच्छे अच्छे रगकी छबिया चन्द्रिका प्रकट हो रही थीं। धीरे धीरे मेरी दर्शन मूर्छा उतरी, धीरे धीरे मेरी वृत्तिया समतोल पर आई । अन्तर के सरोवरके तूफान धीरेधीरे थमे और जलका झूला मन्द-मन्द लहरपर झूलने लगा। मेरे कमरेमें भी अधेरा नहीं था और हृदयके ऐसे सानन्दाश्चर्य प्रकाश -वहा पर प्रकट हो रहे थे। उस पूर्णिमा की ज्योत्स्नामयी रातकी उपाके समान ही मेरे जीव- नके आकाशमें उपाका उदय हुआ और प्राणोंमें प्रभात प्रकटा ।

प्रकरण २रा
प्रकरण २ रा.
खिलीहुई पखडियोके कमल
रन्तु वह कानथी?
यौवन का फव्वाराथी, चन्द्रिका का चन्दनप्रपात
थी, नगरकी वह एक बालेका थी।
किससे पूछु कि वह कौन थी ? उसका क्या
वर्णन करके पूछ्रे कि वह कौन थी ? चाँदनी से आई
और चाँदनीमें होकर गई चाँदनीकी पुतलीके ऐसी वह बाला कौन थी ?
पृथ्वीको फोड कर आकाशगगा उछले वैसे ही उछलती थी।
कोकिलसे भी मधुर और मदमरी उसकी आवाजथी । हरिणीसे भी
चपल उसकी आँखें थीं। तारिकाओंको पकडनेके लिये मानो कूद रही
हो इस तरह वह कूदती थी।
मेरा दिमाग सुन्न होगया । अनुत्तर प्रश्नके टकोरे गाजते रहें तब ऐसा
ही होता है । माथा दुखता हो और उसमें सटाके लगें, वैसे लगते हुए
एक ही प्रकारके सटाकेकी तरह यह प्रश्नका सटाका लग रहाथा कि वह
कौन थी ? इस प्रश्नका उत्तर न मिला और न उत्तरकी रीति ही मिली ।
गणितके किसी प्रश्नको हल करते करते कभी भूल गये हो ? कभी
ऐसा जान पडा है कि सोपरी में की आकिलका तैल बीत गया है और
मस्तिष्कका दीपक बुझगया है ? यदि हाँ तो मेरी स्थितिको समझ सकोगे ।
ऐसा होगया था कि अन्धकारके बनमें भूले पडगया हूँ और मार्गका
किरण भी दिखाई नहीं देता । अमूझन होती है क्या बला, सो मुझे उसी
समय जान पड़ा।

सपा - आसमानमें उडउड़कर पंसी जैसे तड़पता हुआ नीचे उतरता वैसे ही मेरी ऊमियाँ उड़तीथी और थक कर नीचे उतर आती थीं। मेरा शरीर ज्यादा गरम रहता था, परन्तु इसका भेद तो समझ पडता था । वह अपने नयनकी विजलीको मुझ में भर गई थी और मेरे शरीरमें इस बिजली की गरमी थी। किसी घटामें भूतका प्रतिबिम्ब देख पड़नेपर मनमें कौतुक जागरित होते है और अदृश्यके आकर्षण प्रवल होते है वैसे ही मेरे कौतुक जगे और अदृश्य मेरा आकर्षण करने लगा। इस अदृश्य के ही मुझे आमन्त्रण हो रहे थे। कविताकी कोई कल्पना उडती उडती आवे और पक्डनेको जाते पकड़में न आय, इस तरह उसकी मुझे कल्पनायें आती और अस्त हो जाती थीं। प्रभातमें छोडदिये हुए काव्यको लेकर मे दो पहरको पढने लगा। एक पद पठा, पाँच पद पढे, दस पदे, परन्तु ग्यारवें पदपर सायकालकी छाया सारे पृष्ठपर छागई । भरी दोपहरीमें मेरे अधेरा छागया और एक अक्षरभी नहीं पहचानमें आया। मैने सोचा कि रातके जागरणसे आँसें तिलमला गई होंगी । शीतल जलसे ऑखें छीट कर आया और फिर काव्य पठना प्रारम्भ किया । परम सौन्दर्यका वह काव्य था । एक देवकुमार और देवकुमारी की वह कथा थी । स्वयम्बरके भव्य वर्णनका अध्याय मैने सोल रक्खा था। वाचक ! सबके स्वयम्बरमें यह रस और यह कविता क्या नहीं होते। पाँच पद पढे, दस पद पढे, ग्यारवें पद पर एक छाया मेरे पुस्तक- पर फैल गई। अक्षर आपसमें घिलमिल होगये,और रोशनाईके ऋणकी जगह त्याही की रेलें होगई। काव्यके पृष्ठभरमें एक प्रतिबिम्ब तैरतासा जान पड़ा। .

प्रकरण २रा १५ मैंने देसा कि मेरे और विश्व के बीचमें एक छाया खडी है । यह फिसका प्रतिबिम्ब है ? इसके कोई घाट न था, कोई रूप न था और न कोई रग हीथा । घाटियोंमें, गुफाओंमें, और पर्वत शिखर पर कुछ मन्द मन्द धूमसा उडा करता है, उस तरहका कुछ था । न तेज न अ न्येरा, सायकालमें अन्धेरी फैलती है उसके टुकडेके ऐसा कुछ था । शब्दमूर्ति जिसकी नहीं बॅधी ऐसी भावनाके समान यह छाया तिरमि- राती थी । ज्ञेय अज्ञेय का प्रतिविम्ब आकाशम स्फुरण होता है, दार्श- निकके हृदयमें झमकता है, सूक्ष्म दर्शियोंकी दृष्टिमें मुस्कराता है, वैसा ही यह प्रतिबिम्ब मेरी पुतलियों के साम्हने मुस्कराता था । अग्नि जीवकी चिनगारी प्रकटती और शान होजाती है, सूक्ष्म सूक्ष्म तारिकाओं की झलमलाहटका तेजविन्दु दिसता-दिखता नहीं दिखाई देता । इसी प्रकारकी वह छाया प्रगटती और शान्त होती थी, दिखती-दिखती न दिखाई देती थी। वह थी ओर न थी । गहनताके वेगपूर्ण सब आकर्पोंसे वह मेरा आकर्पण करती थी। आज थक गया हूँ ऐसा मानकर इस देव कुमारीके स्वयपर सौभाग्य की विचार कल्पना करते-करते मने पुस्तकको बन्द कर दिया। फिरती-फिरती दृष्टि मेरे प्रियतम चित्रपर पड़ी। मेरी बहनने उस चित्रको बनाया था और मुझे वह बहुत ही प्रिय था। एक अद्भुत प्रभात के प्रभामहलकी अटारी परसे एक देवाङ्गना एक फूलका हार लेकर किसी धन्यभाग पृथ्वीवासी को पहनाने को उत्तर रही हो, इस दृश्य का यह चित्रथा । बहन कहती कि यह चित्र मेरी सौभाग्यरानी का है। पहरों-के-पहर इस चित्रका निरखना मुझे अच्छा लगता था । मुझे मालूम न था कि मेरे जीवनके प्रभात का यह चित्र था। ऑखें इस चित्र के साम्हने होती थीं तर कल्पनाफे किरण ब्रह्माण्ड भरमें घूमते थे और कुछ कुछ सृष्टियाँ रचते १६ उपा थे। आज मुझे देव प्रासाद दिखाई दिये, फूल माला देख पडी, परन्तु देवाइनाके मुखके दर्शन नहीं हुए। उसके मुख पर कुछ मदता थी. कुछ छाया थी । यह प्रतिबिम्ब किसका था। वारीकी बेलकी कॉपल की छाया होगी सोचकर बेल की नई कोपलें। मैने इकट्ठी करदी । तो भी परछाही तो उस देवाङ्गनाके मुखपर ज्यों- की त्यों ही थी। पहले के प्रकाश की अपेक्षा भी यह छाया मुझे विशेष अच्छी जान पडती थी और मेरा विशेष आमन्त्रण करती थी। कोई कहेगा कि यह क्या था । ऑसमें नींद की घुमेरी उभरा रही होगी और आती नींद की ये पर- छाइयाँ होंगी ऐसा सोचकर मैं पलङ्गपर सोनेको जापडा । परन्तु यह चमत्कार कैसा ? मेरे कमरे में तो यह चित्र एक ही था, और आज दिवालों पर ये अनेक चित्र कहाँ से ? किसके है ये चित्र ? सफेद और काले रेखाओं वाले मानो वह बद्दलों के ढेर ही न हों । बद्दलों के भेद समझ में ऑय तो इनके भी भेद जान पडें । पीपलके पत्तों पर चन्द्र की किरणें गिरें और पत्ती पत्ती पर दीपक लगावें, ऐसे ही मेरे कमरे के अश्वत्थ में दीपक की ज्योतिर्माला झबक रही थी । ये तो और कुछ नहीं वे परछाइयाँ ही थीं। परन्तु ऐसा कौतुकभी कभी देखा है कि वस्तु बिना ही प्रतिनिम्ब हो ? इस तरह मै उलझनमें पडा हुआ करवटें बदल रहा था कि मेरी बहन आई । सारी रातका उसे जागरण हुआ था। इससे कल्याण रिणके-से हाथ ऑखाको मल रहेथे और परम उल्लासकी वाग्धारा मुखमें से बरस रही थी। भाई, क्या कहू ' पूर्णिमा में उपा कैसा नाची! हम वसुओं की यह वसुन्धरा थी। इसे स्थाई चन्द्रिकाकी अञ्जलिया भरभरकर हमने न्हिलाई तव तेजतेजके समूहके ऐसा इसका रूप क्या खिला है । नयनकी पुत- लियाँ तो ऐमी थीं कि मानो पद्म का पसडिया है न प्रफुल्लित हों! + प्रकरण २रा १७ AAAA - " वह अब अच्छी तरह जागरित होगई थी और ऑसे मलना उसने वन्द करदिया था । बडे भारी आश्चर्य के साथ वह गाज उठी परंतु यह क्या ? उपाकी पुतिलयों की भाति तेरी भी पुतलियोंसे तेजके फवारे उछल रहे हैं | फूली हुई पत्तिया वाले मानो पद्म ही न हों तुझे भी पूर्णिमाको किसीने चन्द्रिकासे न्हिलाया है क्या ? ऑखमें भी अञ्जन आजासा जान पड़ता है। वह हँसती-हँसती चली गई पीछे से उसके हर्प के जल की तरगें मेरे कमरे में उछलती रहीं। परन्तु यह उपा कौन थी ? सुन्दरियों के सौन्दर्य नगर की सौन्दर्य देवी यह उघा है कोन ? जगतके दर्शनों मे के महा विकट प्रश्न की मॉति उस समय तो मेरा यह प्रश्न अनुत्तर हा रहा। वृक्ष शाखाओंमें बिजलीके चमकारे होते है वैसे ही मेरे देहकी शाखाओं में अद्भुत किरणों की चमचमाहट होती थी । शूलके शरका- सा एक विद्युन्द्राण तूंसाटे करता हुआ मेरे हृदय के पार होगया । मस्ति- कम जाकर यह बिजली का किरण फूला और पुष्प प्रकट हुए । मेरी निगाह दिवालोंपर पड़ी तो खिली हुई पंखडियों वाले पद्मोंकी माला सारे कमरेको सजाती हुई दीस पड़ी । नारीभ देखातो बेल की एका एक शासपर सिले हुए पद्म देखपडे । पुस्तकोंकी ओर देखा तो वहाँ भी वही खिले हुए कमलों की शिलशियाँ देस पड़ी। पदार्थ विज्ञानी कहते है कि जडमें भी चेतन किरणोंके विद्युत्कण ( Electrones ) उठते है और महा समर्थ सूक्ष्मदर्शक यत्र से देख पहने हे । इT विद्यु कणोंके पुष्प वनगये हो और जगह जगह प्रकट होगये हों इस तरह के खिली हुई पराडियों वाले पद्म जगह जगह मुझे देख पडते थे। कामन टूमन और जादू ये प्रतिबिध थे किसके । २ मैं मानता उपा , नहीं परन्तु आज तो जादूने मेरे कमरे मे प्रवेश कर अपना राज्य स्थापित करलिया। नजूमी, रमलवेत्ता, प्राणविनिमय तत्त्वज्ञ, ज्योतिषी,मन्त्राजी, योगकि याके पडित, अगम्यके यात्री, आन्तरिक रोगोंके वैद्य, ऐसे ऐसे ढोंगी नामोंको धारण करनेवाला एक आधुनिक ओझा मेरा मित्र था। इन अर्ध सत्योंकी अशास्त्रीय कल्पनाभूमि में न्याय और विवेक की शृसलाओं से रहित हो भमने का मुझे भी शोक था । सायकालको इसमित्रसे जादू- की बात कही और पूछा कि वस्तु बिनाके ये प्रतिबिम्ब कैसे है ? और खिले हुए पद्म कहाँ के है । उसने मेरी आखों की ओर देसा, अपनी इडा पिंगला सुपुम्णा परखी, आकाशपर एकनिगाह डाली और कहा, “देख" तेरी आखमें अन्धकारका नहीं, प्रकाशका पुष्प खिला है । एक पूतली थी दूसरी प्रकट हुई है। जिन्दगी के गुरुत्वाकर्षण के घृत दीपक है। त्राटक साधते समय जो श्याम बिन्दु होती है वह त्राटक सिद्विके समय पहले तेज बिन्दु और फिर तेज बिम्ब सम जगमगाने लगती है । ऐसेही तेरे भी यह किसी त्राटकके ही फमल है । दिव्य ददामि ते चक्षुः कह कर श्रीकृष्णचन्द्रने जो दृष्टि गण्डीवधन्वाको दीथी वही अदृश्यदर्शिनी दृष्टि हम सूक्ष्म विलासियोंके तो प्रकटी हुई होती है और आज तेरेभी प्रकट हुई । दोस्त ! अब तूभी चतुर न रहकर दिवानों की दुनियाँमें आया । तेरे नयनोंमें जो मूर्ति है उसी के ये प्रतिबिम्ब हैं। मुझे दिवाना होनाभी न था और न उसके लम्बे चौडे भाषणको ही सुनना था । नमस्कार करके मै अपने रास्ते लगा । मेरे मस्तिष्कम उसके शब्दका नाद होता रहा कि तेरे नयनोंमें जिसकी मूर्ति है उसीके यह प्रातिविन है। परतु वह प्रतिविम्ब तो मार्गपरभी गिरे हुए थे। चतुर होना या प्रकरण २रा दिवाना होना ये मनुष्यके अपने हाथ में है या सयोग बलके अधीन है ? उस दिन मुझे नगरके जनमार्ग खिली हुई पखड़ियों वाले कमलोंकी मालासे सजाये हुए जान पडे । परन्तु वह मूर्ति मेरे नयनोंमें थी या हृदयमें ? रातको दीप-दीप की ज्योतिमें खिली हुई पखडियों वाला पद्म खि- लता हुआ जान पडा । मैं नहीं तो मेरी ऑखें तो दीवानी होगई थीं। किसीसे कहभी नहीं सकता और कहूँ भी तो कहेंगे कि भाई ने भाग मसी है कि लाल-पीले दिखाई देते है।बहनसे पूछा कि दीपक की शिखा- शिखामें से सिली हुई पखडियोंके पद्म प्रकट हो रहे है यह क्या है ? तूफानी हास्यसे भरी हुई पलकों को नचाते-नचाते उसने कहा, ये तो उपाकी ऑखें है उपाकी । उसके मुखका वाग्बाण मेरे मर्मस्थानमें प्रवेश कर गया और साला। उसके तूफान मुझसे न सहे गये और मै वहाँ से चल दिया। परन्तु यह उपा है कौन ? उस पूर्णिमाकी पुतली की मेरे मनमें तालाबेली लगीथी और तनमें तनमनाहट होने लगी थी। चाँदनीमें की उस आनन्दमूर्ति की मोहनी मेरे स्मरणको बिलोये डालती थी। सिन्धुनदके मल खोजनेवाले मुसाफिर को जो आकर्षण खींचते हैं उससे भी अजब मेरे अज्ञेयके आकर्षण थे, क्योंकि मुझेतो जीवनके इस सिन्धुके मूल खोजने थे। अन्धेरी रातमें चकोर जैसे चन्द्रकी लो लगाये रहता है वैसे ही मैं अपनी ज्योत्स्नाकी लो लगाये हुए था । मेघवाली रातमें चढे हुए बदलोंमें बिजलीकी चमचमाट और लपलपाहट होवे और एक दूसरीको बैधती हुई विश्वके परदों पर सोने चॉदीके देवी भरतके ऐसी अद्भुत चित्र कामको प्रकटावे और मिटावे-वैसे ही उसकी २० उपा MAA NAN minAN Awamiram - स्मरणविजलीके तार मेरे दिलके परदॉपर भरत काम कर चमक रहे थे। परतु इस समय वह चमक की तेजलतायें आसपासके अन्धकारके महासागरको ही केवल सुदर्शनीय बनाती थीं। गन्धर्व नगर कभी देखे है । सन्ध्या की सन्धिके समय सोने चाँदीके बदलके महालय क्षितिज पर बनी हुई मणिमय अटारीया चाँदनीपर दैवी जरीनके इन्द्रध्वज फरकते हुए तो कभी देसे होंगे । ऐसे देवमहलोंकी दैव वीचियोंमें मै अपनी पूर्णिमाकी पुतलीको सोज न रहा होऊँ, ऐसा मुझे जान पडा। जगत के थाक से थककर रातको विश्रामके लिये सोया। इतने में ही वातावरण पर तैरता-तैरता सगीत का शब्द आया । दूर दूर चाँदनी के महलमें कोई गा रहाथा' जगतके चश्मे उलटे है चतुर दीवाने लगते है। पिया पीयूप जिनने वे चतुर दीवाने लगते है, जगतके चश्मे उलटे है, चतुर दीवाने लगते है। आगके चरणोंको मैने नहीं सुना, क्योंकि चितनके लिये इतना चरण ही बस था । इसचिन्तनके देशमें ही निद्राने मुझे आ घेरा । निद्रा में भी उस रातको मैने कुछ कुछ स्वाके बाग बगीचे देखे । इन सब बाग बगीचोंके वृक्ष वृक्षपर और प्रत्येक वृक्ष की शाखाशाखा पर सिली हुई पखाडियोंवाले पद्म ही झूल रहे थे। स्वमोंने निद्राको ठीक न आने दिया तो भी आँख खुली तब आकाश के चौकमे अभिनव रग खिल रहेथे ! मेरी मानसघटाके प्रश्न टकार का उत्तर ही न उदय हो रहा हो ! विधात्रीने विश्वके सौभाग्य का महा अथ ही न खोला हो । इस तरह का कुकुम और केसर के अक्षरों से प्राचीका महा पृष्ठ लिसा गया था। उसके विराट केवडे के सिरे पृी वासियोंके मकुट विन्दु तक सौरभ फैला रहे थे। कुछ ऐसा भास हो रहा था कि ।

प्रकरण २रा चौकमें मुझे ये गुलाबी साडीमें अघका और अध सुला सुवर्ण अङ्ग ही न हो! रजत स्वेत छाती मे बारीक बारीक जामूनिया रंग की रेखायें होरही थीं। वर्धा और प्रभाके देवपरिधान पहन कर आकाशके चौकमें आज उपा सडी हुई थी। मै उस दैवी चित्रको आनिमिष नेत्रसे निहारता हुआ खडा रहा। उपा की एक एक रेखामें सिली हुई साडियोंके पद्म शोभायमान होते हुए देस पडे मानो विश्वसुन्दरीकी सुली हुई वेणी की एक एक रडमें पुष्प न पिरोये हो आसपास प्रभातकी निर्मलता उड रही थी और प्रभातके ब्रह्म महलके पुण्य दर्शन बदलीकी भॉति जगतमें बरस कर आसमानको वधाती हुई और ब्रह्माडका अभिषेक करती-करती वह उपा अन्तरिक्षमें अन्तर्धान होगई, महाविराटमें समा गई, मेरी पूर्णिमाकी पुतली की तरह, दर्शन देकर अदृश्य होगई। फिर भी वही प्रश्न का टकोरा बजा कि वह कौन थी ? जीवनके इस विकट हिसाबकी कुजीको मैं खोज रहा था। प्रात कालकी केसरिया धूपकी उलटी सीधी रेखायें नगरके महोल्ले और गलियों म पड रहीं थीं और लोकसघ उस धूप छायाके रगोंको ओढ़ते पलटते जगतमें बहे जाते थे । ब्रह्माण्ड मन्दिरके शिसरकलशके ऐसे सूर्य भगवान जगतकी हवेलियोंके क्लश रूप होकर विराज रहे थे। इतनेमें पानी भरकर पनिहारी आई । प्रात कालके ऐसी उज्ज्वलता, प्रकाशके ऐसी निर्मलता, उसके चारों ओर फुर रही थी। लज्जाकी साडी- के ऐसी चोराहे की फुलबाडी में फुलगाडीके ऐसा उसका अन सबका- सब ढंका हुआ था केवल मख कमलके खुले हुए श्वेत गुलावी दिव्य हासका रगही देख पडता था । मस्तकपर जलके कुम्भका बेवडा उलक २२ उपा रहा था । बेवडेके जलमें और पीतलके कुम्भों में सूर्यतेजकी लहरें उछल रही थीं । जगतके पाप धोने को पवित्र पुण्यके जल ही न ला रही हो इस तरह वह सुन्दरी जगतके चौकमें अकेली जा रही थी, मानो गगनमें बहती हुई जलभरे बद्दलकी सुवर्ण नौका ही न आरही हो ! पृथ्वीको भी भारी पहना न चाहते हों इस तरह उसके मुकुमार पैर पड रहे थे। सन्ध्याके अद्भुत रगवाले निर्मल ईश्वरीय पुष्पोद्यान को आकाशकी क्यारियों में निरख कर जैसा नि स्वार्थ सहज आल्हाद प्रकट होता है, वैसाही निष्काम आल्हाद मुझे प्रकटा । आल्हाद में से आशा प्रकट हुई और आशावाले अन्तरमें साधन प्रकट हुए । पूर्णिमाकी पुतली कौन थी इस हिसाबके निकालनेकी कुजी मुझे मिल गई, अज्ञेयके मन्दिरका मार्ग मुझे देख पड़ा। मै भी जगतकी अटपटी धूप छायाकी पोशाकको पहनता-खोलता और फिर पीछी पहनता-पहनता नगरकी पगडडियोंपर होता हुआ चला। वह कुलयोगिनी पनिहारी जैसी एकदृष्टि थी वैसा ही मै भी एक- दृष्टि था । आशा की मूर्तिके अदृश्य आकर्षणके भारी पवन, खोजके साहसके महापायु मेरे जहाजके बर्दवान में भरे थे। नगर की हवेलियों को पार करता हुआ मैं नगर के बाहर गया । पानीके किनारे जैसे पछी पहुँच जाते है वैसे पनघट की पालपर जाकर मै भी खडा हो गया । पानीके किनारे जैसी जनकथा सुनाई देती है वैसी हाट बाट और हथाई आदि पर भी सुनाई नहीं देती । हमारे यहाँ बडकी एक पञ्चवटी थी और उसके एक और विशाल वापी थी। पचवटी की छाया में बैठकर नगरके बन्शीधर बासुरी बजाते थे और जमनाके ऐसी बावड़ी में से नगर की गोपियाँ पानी भरती थीं। पपैया जैसे बदलीके बरसनेकी वाट देखता हुआ पुकारता है वैसे ही मेरी रसबदली की बाट देखता हुआ मेरे उरका पपैया भी पुका- रता था।

प्रकरण रा २३ , अनुकरण या उपमायें क्या असल होते है ? असलके निर्देश करने के ये तो अधूरे साधन है। चाहे जितनी ही उपमायें क्यों न हूँ परतु जिसने उपाको देखा ही नहीं उसे मै क्योंकर उपाको दिखा सकता हूँ? आज मै तीन अवधान कर रहा था । एक तो पञ्चवटीके पत्ते गिनने का, दूसरा पनिहारियोंके दर्शन करनेका, और तीसरा पनिहारियोके वचन सुननेका । कितने ही अवधान अपने आप आ जाते है इसकी सास तो वाचक तू भी देखता है न ? इतनेमें एक बालमण्डलो खेलती-कूदती, दौडती-उछलती, हॅसती बोलती आई और गई, मानो बुल बुलके बच्चे ही नहों । नगरके फरि- श्ते ही न हों! प्रभात जम गया था। मेरी आतुरताके ऐसे धूपके तार तन रहे थे। तेजमें से ऊमाभी प्रकट होने लगी थी। परन्तु यह कौन ? नगरमें होकर आ रहीथी वहीं थी यह । वहीं मेरी पूर्णिमा की प्रमोद प्रतिमा, अन्तरमें की मेरी आशामूर्ति । पचवटी की बटजटाओंको पकड कर मै कॉपलों को गिन रहा था। सूर्योदय होनेसे कमलसम्पुट खिले उस तरह मेरा अन्तर प्रफुल्लित हो रहा था। परतु यही है वह ! हरिणीकी गतिसे आजमी वह आरही थी। सिही की भावना उसके चारों ओर उडती फिरती घूम रही थी । वाहु कमान के नीचे एक और अङ्गुलियों में दूसरा-इस तरह उसने जल घेवड़ेके दो कुभोंको फूलोंके दढेके समान लटका रक्से थे । चरण उठाससे उठ रहे थे। नयन तीनों लोक पर नजर डालतेथे और लोक लोकका माप करते ये । अनन्के बाणके समान भौंहों के श्याम कमान तान रसे थे। आसमानी पायरीपर उपा रगी ओढनीयी । भीतरसे केसरियाँ चोली उषा झलमला रही थी। मुखपर स्मित रेखा थी और फरकता हुआ अधर गीत गुन गुना रहा था । इस गीतके लयमें नृत्य करते हुएसे चरण चल रहे थे। आती हुई ऐसी मालूम हाती थी कि प्रभातकी तेजोमयी मति ही है । कौमान्की-शुद्धभपापविद्ध-निर्मलताही है । सानियोंका रस लावण्य ही है। कामिनियों की कविता की कमनीयता ही साक्षात् हो रही है ! मेरे अन्तरके पूर उसके चरणा में जा ठिले । मेरे चेतन उसके पदपड्कजमे जाकर फैल गये। मेरी आशा और प्रार्थना सुन्दरी देहमें प्रकट हुई मुझे देख पडीं। और वही खिली हुई पंखडियो वाले दो कमल, उसकी ओढनीमें, चोलीमें, वस्त्रमें, जैसे भरे थे वैसे ही उसके मुखपट पर भी गुंथे हुए थे वे ही सिली हुई पंखड़ियों वाले कमलके पुष्प-के पुष्प । मुझे जान पडा कि जगत का सारा-का-सारा सौन्दर्यधन मूर्तिमान होकर मेरी ओर आरहा है। वेलकी कोपलोंकी तरह उसका अग अग फरक रहा था । सरोवरकी लहरोके ऐसी उसकी साडीमें सलवट पड़ी हुई थीं । घटाके घेरके ऐसा उसकी घाघरीकी झुल का घेर था । चन्द्रमाके चिनके समान उसके मुख चन्द्र पर कुंकुमको बैदी सुहा रही थी। मध्य रातकी आकाश भगाके ऐसी उसके केशासनमें मांग की रेखा फैली थी । रजनीके घूघट हटाने पर प्रभातके विविध देववर्ण आकाशके मुसपर झिलमिलाते है वैसे ही देववर्ण उसके मुस मण्डल पै झलक रहे थे। देहकी पंखडि- योंपर उसके उरभावके मन्त्र लिखे हुए और इन पुण्यके मन्त्राक्षरोमे प्रमुताके ही पाठ थे। नगर की सौभाग्य देवीके ऐसी आशिष देती हुई वह आई और मेरे पास हाकर जल भग्नेको गई । जगतके गुरुत्वाकर्षणका मध्यबिन्दु ही न हो इस तरह सहज भावसे मेरे प्राणविनिमय कर, अपने प्राण बुनक से मेरे चेतनका आकर्षण कर लिया और उसे झोली में 1 प्रकरण २रा २५ XNX जादूगरी ग्स जोगन चलदी। सूर्य जिघर जिधर फिरे उधर उधर ही सूर्यमुसीके फूल फिर जाते है । मेरे नयनके फल मेरे सूर्यके पीछे पीछे फिरते थे। तो भी मै तो पञ्चवटीके पत्तेही गिन रहा था। दण्डकारण्यमें सीतामाता पानी भरने को सचार करे वैसेही वह हमारे नगरकी पञ्चवटीमें पानी भरनेको पधारी । पानीक तीरपर सखियोने उसे मार्ग देकर सत्कार दिया । पानी भर- नेको वह जलपर नमी ता जान पड़ा कि सागर पर नमा हुआ इन्द्र धनुष की लताका टुकडा ही न हो। कितनीही सखियोंके बेवड़े भर गये थे, कितनीकके भरा रहे थे, सब इसकी बाट देखती हुई सड़ी थीं । एक अधीरी ससी बोल उठी-उषा । तेरा रस बेवढा मराभी' सब सखियाँ हंस पड़ीं, मानो मोतियोंके थाल न बिखर गये हों। किसी महासत्यकी आकाशवाणी की गर्जनाके ऐसा वह एक बोल, वह एक शब्द ' उपा, मेरी अन्तर्गुहामें गाज उठा और जीवनकुजमें आदिसे अत तक व्याप्त होगया। पूर्णिमाको प्रकट हुई थी, प्रभातमें पधारी थी, बहनने परसी थी वहीं है यह उपा मेरे जीवनकी ज्योति । उपाने हँसकर कहा, नहीं, अभी मेरा रस वेवडा अधूरा है । झरते हुए जलके कणभी ऐसे मधुर नहीं होते ब्रह्माण्डभरमै माधुरीके सीत्कार सिरते फिरते हैं और नर नारियोंके कानमे कुछ मधुर मधुर फॅक मार जाते है, वैसीही एक अगम्यकी लहर आई और पुष्य की सुगन्धकी सी कुछ फूंक मेरे अन्तरमें फूंक गई। इसके बाद क्या हुआ सो मुझे कुछ मालूम नहीं है । ध्यानयोगमें योगीजन जैसे डूब जाते हे वैसेही मै कहीं डूब गया । जगा तो पञ्चवटी में मेरे सिरपर एक मैना बोल रही थी और उसके सिरपर मध्यान्ह का सूर्य तप रहा था। 1 उपा प्रकरण ३ रा. कुमारिकाओंका उद्यान पा के लिये उदय हुआ इतना पूज्य भाव परमेश्वरको छोडकर और किसीके लिये कभी मेरे हृदयमें उदित न हुआ। कन्याशिक्षण के रसमय क्रियाधर्ममें कभी आपको रस पड़ा है १ कर्मठोंके क्रियाकाण्डसे वेदान्त अलग है उतने ही अलग हमारे छोटेसे राज्यके आधिकारियोंके चेतन भाव कन्याशिक्षणसे अलग ही थे। एक चौमासे में हमारे नगरकी कन्याशाला की कार्यवाहीमें मुझे ऐसा रस पहा कि एक मखोली ने तो यहाँ तक कह डाला कि मै विधवा अध्या- पिका के साथ विवाह करनेवाला हूँ। कुमारिकाओंके शिक्षणका प्रश्न भविष्यकी प्रियतमाओंका प्रश्न है। वर्तमान और भावी प्रियतमोंके मनका महा प्रश्न है । नेत्रपल्लवी से पीतमप्रिया आपसमे एक दूसरेको पढाते है ऐसे ही अक्षरपल्लवी से भी पढाया करें तो इस प्रश्न के उत्तर कितने सुगम हो जावें? किसी नगर सेठी छोड दी हुई पुरानी फुलवाडी तो देखी होगी । फूलों के पौधोंकी जगह क्यारियोंमें घास उग रहा है । फलके वृक्षोंकी शाखायें कुम्हलाई हुई हैं । आधे पत्ते खिरे हुए हैं । सफाई का ठिकाना नहीं है। जगह जगह सूखे पत्ते और कचरा फैला हुआ है। इस तरह गंदगी और मैलेपन का भण्डार होनेपर भी गन्धवतीके रस गन्ध कहीं कहीं आ रहे हैं । कन्यापाठशाला भी मुझे ऐसी ही जान बढी । जैसा माली वैसी फुलवार्टी । अन्चल तो बालविधवा अध्यापिका ही घरके और लोक समाजके चावमें बढी हुई थी।

प्रकरण २रा । अर्ध शिक्षिता थी । इससे सौभाग्यके उत्साही उमग तेजकी जगह वैध- व्यकी निरुत्साही निराशाकी छाया शालामे उड रही थी। मास्तरानी- योंके थे वैसेही भमके वाले या गदे कपड़े विद्यार्थिनियोंके भी थे, क्योंकि भमकेको स्वच्छता समझी जाती थी और गदेपनको सादाई 1 ऐसा होनेपरभी तेजस्वी अगोंपर ये मैले कपडे सूर्य परके बादलके ऐसे सुहाते थे। तख्ते पर आधा हिसाब कर रक्खाथा । पट्टियों में लिखा हुआ ठीक न किया गया था । छोट २ चिउटों की लामके ऐसी परन्तु स्वच्छ अक्षर- मालाथी । वाक्यरचना पुरुषवर्ग की अपेक्षा सहज अच्छी थी। कचरेमें- मी कन्यारत्न खोजकर स्वीकार कर लेनेकी आज्ञा देने वाल महर्पिने इस भविष्यको देख कर ही तो आज्ञा न दी थी ? शालाके इस कचरेमें मी अनेक रल दमक रहेथे । और यह बातमी न थी कि शाला कभी स्वच्छ होती ही न हो। इनामके समारम्भके वार्षिक दिनको, राजेंद्रकी जन्म तिथिको मिठाई वटती तब, इस तरह साल मरमें चार पाँच वार्षिक पर्वोके महादिन को शालामें स्वच्छताका राज्य स्थापित होता था। इसका कारण यह था कि स्वच्छता नित्यकी आवश्यक वस्तु न समझी जाती थी एक श्रृंगार की सामनी मानी जातीथी। इस महर्पिकी आज्ञापाल मै अपने रत्नको खोजकर स्वीकार करनेको गया तब शालामें कन्यायें सुनहरी-रुपहरी भरतका काम कर रहीथीं कितनी ही Dथ रहीथीं। कितनी ही पुराने गीत गारहीं थीं । एक वर्गम वाचन चल रहाथा । पहिले दिन तो सन दर्जीमे घूम फिरकर एक दर्जा देस लिया। जाते ही अध्यापिका को दस रुपैये दिये और कहा, शालाके आसपासके ऊजड मैदानमें फुलबाढी बनवाना और कमरों में गुलदस्ते रसवाना । सब दों की पहली पाँच कन्याओंको क्यारी व फूलके पौधोंकी सम्भाल लेनेकी जिम्मेवरी देना। इससे ऊँचे नम्बरपर रहने को स्पर्धा भी जागरित होगी। - उपा. हिमाद्रिमालाके ऐसा बडा भारी ओर अचल मेरा सिद्धान्त था कि शालामें पढती हुई सरस्वतीको पुत्रियोंमें १५ गृहिणी धर्मको स्वीकारेगी, और इनमें भी १० टके गरीब या सामान्य स्थितिके वरको वरेंगी। इससे मैं चाहता था कि पाठशालामें बनावटी-दिखावटी अमीरी रग की खर्चीली शिक्षाकी बजाय कुटुम्बसेनाके गृहिणी धर्मका उच्च ज्ञान देने के लक्ष्यको साम्हने रसकर पाठशाला चलाई जाय । इस आकाक्षा के अनुकूल कुलधर्मकी पवित्रताके पाठ वहॉ पर सबको सिखाये जाते थे। उपा घरको चलायेगी तब केसे चलायेगी, कुलमन्दिरों को कैसे बना- येगी, इसकी तरगें मुझे बार बार आया करती थीं । आज तो यह कविता आस पास फैली हुई है और उपाके रस सुहावने गाहणी भाव के उद्यान में ही हम बसते है। इसके बाद नये रास सिखाये गये। अग अग के नये नृत्यमें कौमार की उर्मियों उछलने लगीं। इस समय ये बालायें तन्वनी बेलें न रहकर, चसन्तके अनिलमें झोले खाती हुई, मारियों से लचकी हुई आमकी रसवन्ती शाखाओं के सामान प्रफुल्लित हो उठीं । सबके अन्तर में रस तरग उछल रहे थे और अग अग पर मारियों प्रकट होती थीं। बेल की छटा और लचक के कारण पत्तोंके हिलनमें सहकारी शाखाओंकी रस मयी रेखाछटा तैर रही थी। सुन्दर कलाओंके शास्त्रमें लिखा कि सुन्दरता कुछ दुबला-पतलापन नहीं है किन्तु छटा आन्दोलन और तेजस्विता है । अश्वशालामें पानीदार चछरे ओर बछेरी होते हैं वैसेही कुमार ओर कुमारियोको भी पानीदार, सुन्दर, चेतनभरे, आत्मवान विकसित करने चाहिये। यही सारी पाठ- शालाओंको स्थापन करनेका हेतु है । सब शिक्षाओंका सिद्धान्त हे, लक्ष्य है।

प्रकरण २रा म जैसे सिखाता और सुधारता था वैसेही उस कन्यापाठशालामें सीखता और सुधरताभी था । फूलकी सडियों के ऐस स्वाभाविक हाव भाव और उपपरिमल मुझे वहा देख पडते थे । कुछके अन्तरमेंके अकरोंके किरण खुलते हुए मुझे वहाँपर दिखाई देते थे । लावण्य और लज्जा, रसिकता ओर विनय, उड़ उडू करती हुई वालबिहगीकी सुकुमार पखोंके ऐसे मुग्ध कौमारभाव का मै वहॉपर अनुभव करता था । नये रास सीख- कर जो कर बतायगी उसे मेरी माताकी ओरसे इनाम मिलेगा ऐसा सूचित करने के साथही मैंने भी क्तिनेही पुराने रास उतार लिये । कई एक पुराने अलकारोंमें होता है, कई एक पुराने रीति रिवाजोंमें होता है वैसे उन पुराने रासोंमें भी कई एकमें सुवर्ण सत्त्व था, निखालस सब-का- सन भरपूर सुवर्ण था। हृदयकी भरतीने बहुतही उछालाभरा-तूफान क्यिा इससे कुछ दिन मैंने वहाँका जाना बन्द कर दिया । परन्तु सुबह श्यामको पाठशालाके खुले हुए मैदानमें मै जाता और कुमारियोंके उद्यानको देख आता था। उपाके पौधेके साम्हने मेरे पैर रुक जाते थे गतिनल जाता रहता था। वह क्यारी उपाके दृदयकीही क्यारी न हो इसतरह दर्शन मुग्ध होकर मै उसे निहारता था । उसके अड्डरोंको मै इस तरह पपालता था कि मानो उपाके हृदयके अङ्कुर ही न हाँ। एक दिन विद्याधिकारी साहिब इन क्यारियों में मुझे मिले। इनकी आँखों में मद था, इनकी भोहों पर अधिकार छा रहा था । आदिव्यजन बढाकर कितनेही इन्हें विद्याधिकारी कहा करते थे क्योंकि विद्यापर इन्हें ऐसे ही भाव थे। इन्होंने मेरा उपकार मानकर कहा कि अच्छा उद्यान लगाया है । कितनोंकके शब्द नामिकी गभीरतासे निकलते हैं, कितनों- कके हृदय की लगन से प्रकट होते है, कितनोकके दिमागी बुद्धिसे झरते हैं, इनके शब्द मुसकी ताकमें से चले आते थे। मैने कहा, आज G ३२ उपा तो बीज बोने है, परिपाक तो परमेश्वर की कृपा पर निर्भर है । विद्या- धिकारी साहिब अपने आपको नास्तिक कहते थे और नास्तिक ही थे मी, इससे परमेश्वर का नाम सुनते ही छू न गये हों इस तरह साहेवजी फहकर चलते बने। जगतके अच्छे-से-अच्छे कवि दार्शनिक पैगम्बर वगेरा वगैरा केवल बीज ही बोते है। परन्तु इस अनन्तता की बुवाई की सिचाई और रखवाली आदि कर अनन्त पाक अनन्तता की अनन्त प्रजा पाती है। मुझ अल्प प्राणीके प्रयत्नों को तो आज ही की आशा थी। उषा दर्शन मेरे आत्मा का प्रथम अमिलाप था। उसकी कौमार मूर्तिके आदर मुझे स्पममे भी आमन्त्रण देते थे। मेरे आत्माका अद्वितीय अभिलाप और आशीर्वाद यह था कि मेरी उपाके ऐसी उपाय ससार के सब कुमागेको मिलें । उपा अद्वितीय थी इसी लिये मै अन्य कुमा- रियोंको उपाके ऐमी ही सजाने का प्रयत्न करता था। उस जगहिरव्यात शरत् पूर्णिमा की रातको श्रीकृष्णचन्द्रने राधिका जीको रास रमण कराया तत्र निज कृष्णारूप के गुणे कर करके गोपिका परिवारकी प्रत्येक रसकान्ता को रसमान्त समर्पित किया था, वैसे ही मै भी उपाकी सखी मूर्तियोंको घड घड कर प्रत्येक रसकुमार को रस कमारिया समर्पण करने का अभिलाषी था। कहाँ सूर्य और कहाँ उसकी किरण १ वहाँ श्रीकृष्णचन्द्र और कहा मै ? यह तो मै समझता था परन्तु परमार्थ की धुन में मेरी यही आशा थी । मेरे अन्तर में से निरन्तर ऐसे आशीर्वाद निकलते रहते थे-मुझे मिले ऐसा सबको मिलना । अक्षर का और वाचन का इनाम उपाने जब मुझसे लियाथा उस चिरस्मरणीय प्रसग को में अभी तक भूला नहीं हूँ। उस दिन प्रभात की शाला थी । रजत निर्मल प्रकाशमें सुनहरी धूप की जाजम पिछी नई थी। स्वच्छ और छटादार कुमारियोंके अनेक रंगी मयूर, कलाप मकरण ३ रा. . को इकठाकर और किलनी को सवारकर झुड-के झुड एकत्रित हो गये थे। अनेक के अक्षर भूमितिके छोटे छोटे चित्रोंके ऐसे बहुत ही सुन्दर थे। परतु उपाके अक्षर ! अध्यापिकाने कहा-ये तो मोती के दाने हैं। मयूरके देहके ऐसी ओढनी से हाथ बढाकर उषाने पाटी रक्खी तब कलापमें मोर पिच्छके चदुओंकी मालायें न गूथ रक्खी हों, इस तरह का मुझे मास हुआ । उसमें मैने विधात्री के लिखे हुए अपने भाग्याक्षरों को देखा । सब ने कहा इनाम उषाका है। और वाचन ! पृथ्वी लोककी बोलती हुई कोयलें तो आपने सुनी होंगी परन्तु यह तो देवलोककी कोयल बोल रही थी। मैने सिखाये थे वैसेही शुद्ध और पृथक् पृथक् वर्णोच्चार और शब्दोच्चार फई एक बालि- काओंने किये । कितने इनाम देंगे इस प्रकारकी चिंता हो रही थी कि उपाने वाचन प्रारम्भ किया। 'श प, लळ,' के उच्चारणमें भूल होना तो दूर रहा, उलटा कुछ ऐसा विशुद्ध सुकुमारत्व और माधुर्य यह वाला उच्चारणमें भर देती थी कि आश्चर्य । आश्चर्य !! सन्धियोंका ऐसा पदच्छेद करती थी कि अध्वर्यु को शरमा देवे । शारदा की वीणाके ऐसा कठ माधुर्य तो कई बार सुनाथाऔर कई एकोने सुना होगा, परन्तुये सो साक्षात् वागीश्वरी की वारधारा के लावण्य और लालित्य थे। सारगी के सवादी सरोद बहुतसीयों ने वाचनमें सुनाये, कितनीयोंने सितार की रणकती हुई गतें बजाई, कुछेकने पियानोंकी अलग अलग सुरमाला गजाई, परन्तु जलतरंगके न्यारे न्यारे मधुर मधुर बोल तो उपाने ही बोले। सब बालायें एक स्वरसे बोल उठीं कि वाचनका इनाम मी उपाका है। पाले हुए हरिण लजाते नहीं है, शकुन्तलाका मृग शरमाता न था, उषामी हँसती-खेलती आई । मृगी की सी विशाल ऑसं, मृगचर्मकी सी तेजोमयी ओढनी और हरिणी के ऐसे सुकुमार चरण थे। सूर्य किरणके ऐसे उसके पकिरण नृत्य करते आ रहे थे। आखें सुली हुई जगतके - उपा. तेज को इकट्ठा कर पी रही थीं। मुखपर उल्लास और आल्हाद था। वीराङ्गनाकी निर्भयता और ओज ललाटपर दमक रहा था । उषाके नेत्र न नमे परन्तु मेरे नम गये । जगदम्बाकीज्योतिज्वाला न झेली जा सकी। इनाम देते-देते फूलोंके पौधे की शाखाके समान मेरी अगुलियाँ धूज उठी | काव्यकला के मुकुटमणि जगद्विख्यात मेघदूत और अभिज्ञान शाकुन्तल इनाममें दिये । परतु इन सौन्दर्य चूडामणि काव्य युगल से भी विशेष सुन्दर रस काव्य तो मेरी उषा कुमारिका स्वय थी। ' देवको क्या अर्पण करें? देव मन्दिरमें देवके पास भेट रखते हैं । उसी भाव से मै उपाको इनाम दे रहा था। उपा स्वीकारती थी मै अनु- महमानता था। • उस दिन दो पहरको देह खडमें से हृदय देशको खोदकर आँखों के साम्हने रक्खा और पृथकूकरण करने को मैं बैठा । उपाके रसके निर्झर कहांसे प्रकटते थे ? उसके नयनमें थे या मुखमें ? उसकी छटामें थे या सौन्दर्य में ? उसके तेज स्वरूपमें थे या नृत्य-उल्लास-आल्हादमें उपाके आकर्षण कहाँसे आते थे ? उपाकी कौनसी विभूति मुझे न्योत रही थी? मुझे जान पडा कि मेरा श्रम मिथ्या है । आकाशके अग में की अनन्त कोटि चादनी में से रातके रस निर्झर बहते है, वैसे ही उपाकी आग कला के छिद्र छिद्र में से रसके झरण झरते हैं । विराटके अद्भुतत्वके पृथक्करणके उतनाही उपाके अद्भुतत्वका पृथक्करण कठिन है । सौन्दर्यके उपवनमें से ये ही पुष्प मुझे क्यो नोतता था ? कुमारि- काओंके उद्यानमें से उपा की ही रस सुगन्ध मेरा आदर क्यों करती थी ? मैने गहरी चिन्तना की और एक उत्तर मिला। सीता और द्रौपदी, तारा और दमयन्ती सहनशीलताकी क्षमया धरित्री-की जगन्य मूर्तिया है। जूलियट और शकुन्तला, लैला शीरीन और जुलेखा-शयनेषु रम्भा-की रसलोल मतिमायें हैं। .

मकरण ३ रा । . लोरा और बियट्रिस कविजनोंकी महा कल्पना की राजकुमारियाँ हैं। परन्तु उपा! सत्यलोकके परम सत्यके ऐसी उपा! पारिजातके पुष्पकी-सी उपा ! देवलोककी देवानगना थी, प्रकृति की प्रथम पुत्री थी । आकाशको भी अधर उठाकर मानो वह चलती थी । पृथ्वी की परिसीमायें भी मानो उसके मार्ग की रेखायें थीं। तारिकाओंके भी तेज के पार जाते हुए उसके दृष्टितेज मानो ब्रह्माण्डपर बिहार करते थे । कमलदलके ऐसे उसके पेरोंकी नृत्यगति वायुराजकी लहरियोंके ऐसी सरसर करती थी। उछलती हुई उसकी अङ्गधारायें ऐसी जान पड़ती थीं कि पृथ्वीके पुटोंको फोडकर पातालगगाकी रस धारायें ही न उछल रही हों ! जयके केतुसी, स्नेहकी लतासी, परम सत्यकी मानवी कलासी, उपा उल्लास करती थी। वह दीन हीन सहनशीलता न थी, वह विलासमयी खेलकी शुडिया न थी, वह कोहोरेकीसी केवल कल्पना न थी । वह आशा और उत्साह की, प्रेरणा और प्रतिमाकी तेज कलिका थी । वह रसिकता और आनन्दकी, कविता और सौन्दर्य की देवलतिका थी । वह सच्चिदानन्द की परम भावकला थी । जगतको सह लेनको नहीं, परतु जीतनेको, शोभानेको ही नहीं परन्तु सच्चा सिद्ध करनेको, कल्पित बनाने को नहीं परन्तु उसके परदोंके पीछे छुपी हुई गहन भेदावलीको सझने-समझानेको वह -जगतमें अवतरीथी। सौन्दर्यके उपवनमें कुमारिकाओंके उद्यानमें उषाका यह व्यक्तित्व था और यही मुझे आमन्त्रण दे रहाया । सौन्दर्योद्यानकी सब कलिकायें ऐसी ही खिलें तो मेरे अन्य प्रयत्न इसी ओर होते थे। प्रभु अपनी प्रभुतासे भक्तका आकर्षण करते हैं । इसी प्रकार उपाकी प्रभना मेरे भावका आकर्षण करती थी । प्रमुकी विभूतियोंका पार प्रमु- भक्तोंने पाया नहीं है, मैने भी उषाके विभुति मडलका पार नहीं पाया और न पाऊँगा ही । ब्रह्मके समान ब्रह्मकला उपाभी अनन्त ही है।

उषा. प्रमातकी उपाके रंगकी सितारोंसे गुथी हुई मखमली पट्टी मैने उस रोज खरीदी थी । इतिहास और भूगोलमें मानव जातिकी अद्भुत वार्ता और मानव जातिके महिमावाले मन्दिरोंकी मनोवेधक कथा-पहले नम्बरपर जो आवे उसे वह देनी थी। सूर्य और चन्द्र के समान जग- तके मार्गमें प्रकाश डालनेवाले नामी नामी स्त्री पुरुषोंकी भर्गगर्मित जीवन कथायें इस शालामें सिखाई जाने लगी थीं। यह इनाम भी उपाने जीता और उपारंगी पट्टीसे अपनी बेणी बाँधी । परीक्षक गणितकी कढी परीक्षा लेते थे । इससे यह विषय ठीक सिखाया जाता था। इससे पट्टी पहाड़े हिसाव सबको कंठ थे। परन्तु जिन्दगीके कठिन हिसाब कन्याओंको सिखाना बाकी था । अङ्कगणित और वस्तुगणितमें कितना भेद है यह तो हम सब जानते है न ? क्या जाने व्याकरणी ? वस्तुको क्या जाने व्याकरणी? इस सूत्रके सत्यका पालन करके शालाके अभ्यासक्रममें वस्तुज्ञान पर भार दिया जाता था। उपाका यह शुक्लपक्ष था। चन्द्रविम्ब कभी अपूर्ण नहीं प्रकाशित होता परन्तु शुक्ल पक्षमें चन्द्रकला प्रतिदिन विकसित होती है वैसे ही उपाकी रसकला बिकसती थी । वसन्तोत्सव वाले वसन्तचद्रिकाका जैसे सत्कार करते है वैसेही भावसे उपाकी चाँदनीका मै सत्कार करता था। उपा मेरे जीवनका शुक्ल पक्ष थी। कन्याओंकी शिक्षाका प्रश्न जैसे भविष्य की प्रियतमाओंका प्रश्न है वैसे ही भविष्यकी माताओं का भी प्रश्न है । अन्नपूर्णा की सब पुत्रियों भोज्येषु माता-सी विष्णुधर्म पालने वाली वैष्णविया है । इसलिये पाक- कला सिखाने का दिन भी पाठशाला ठहरवाया था। खोटे रुपये की भाति अनुकरण का ढोंग रखने वाली कितनी ही सेठोंकी सेठानिया भी पाठशालाको देखनेके लिये पधारती थीं। उन्हें यह पसन्द न आता.

प्रकरण ३ रा था। रसोइयों के भगजाने पर वर और बाल बच्चोंको स्वय कच्चे- पके परोसा करती थीं। इस बातको मूली नहीं तो भी गृहिणी धर्ममेंसे पाककलाका बहिष्कार करती थीं । दूध पिलाने के इतना ही भोजन करानेका भी कुदरती गृहिणीधर्म है । धायोंसे दूध पिलाने वाली और रसोइयोंसे भोजन बनवाने वाली इसे समझती न थीं। इनके जैसी केवल उपन्यास पढनेवालियोंकी यह पाठशाला न थी। इससे यहाँ तो भोजन करानेकी रसिक और नित्योपयोगी कलाओंकी शिक्षा कुमारिकाओंको दी जाती थी। बार त्योहार को स्वस्तिक पूरे जाते थे, चोक भरे जाते थे, मोर मैना आदिके माडने बनाये जाते थे, भाति भातिके रगों से चित्र चनाये जाते थे, चित्रविद्याका यह प्रारम्भिक सोपान था। कभी कमी भाति भाति की भोजनकी चीजों का प्रदर्शन भराता था । थोड़े समय में और थोडे व्ययसे कैसे रसाई को जासकती है इस बातके ग्रहशास्त्रीय सिद्धान्त सिखाये जाते थे। नित्य की चीजें पाठशालामें न राधकर प्रत्येक बालिका अपने घरपर राधे परोसे और नोट करके लावे ऐसी सूचना मैने की थी। अयापिकाने शिक्षाविभाग को लिखा, शिक्षा विभागने सब सूचनायें मनर करली और ऐसी अच्छी व्यावहरिक सूच- नायें देनेके लिये अध्यापिकाको धन्यवाद भी दिये। हमारी शाला गृहिणिया उत्पन्न करनेकी थी, कुछ पुतलियां बनाने की न थी। आरोग्य विद्याके और गृहवेयकके मूलतत्वोंकी प्रथम पुस्तक शालामें पढाई जाती थी परन्तु इन विषयों के पुस्तकी ज्ञानकी अपेक्षा अनुभव बडा गुरु है । इस वातका समझना बड़ा कठिनतासे सबके मनमें उतारा। भविष्यकी मातायें अपनी अपनी माताओंके हाथमेही कुछ शिक्षा पावे यह इष्ट ही है।

१३८ उपा. vavAMN धर्म सिखाना नहीं, परन्तु पलवाना प्रारम्भ किया। अयापिकाको व्यारयान देनेका शौक था यह वात मैने जानी थी। मेरे घरके पासको मन्दिरकी वृद्धा पुजारिनको दक्षिणा देकर अध्यापिकाको मन्दिर में नित्य कथा करनेको बुलाया । अध्यापिकाको द्रव्य भी प्राप्त हुआ और उसका उपदेश देनेका शौक भी निभा । समय बीतनेपर वह विधवा कथाके रंगमें रंगा गई । वैधव्यके दुखका दिलासा पाकर उसने सेविका व्रतका परमधर्म अङ्गीकार किया, शुद्ध और सञ्चा ब्रह्मसमर्पण लिया, और कुमारिकाओंके उद्यानकी वह अधिष्ठात्री सन्यासिनी-सी हो गई। इस तरह धर्म सिखानेके स्थानपर पलवानका सुभीता हो गया ! मुझे बार बार यह विचार आता था कि प्रियतमा कैसी चाहिये इसे प्रियतम समझते है, और इसी लिये कोई कोई पुरुष अपने अभिलाप और आदर्शके अनुकूल कन्यापाठशालाओंको सुधारनेका प्रयत्न करते है। इसी तरह प्रियतम कैसे चाहिये इस बातको प्रियतमायें ही समझती है । यदि उनमें से कोई अपने सुन्दर अभिलाप और आदर्शक अनुकुल कुमारशालाओंको सुधारें तो केसा अच्छा हो ' बछडोंके घेरके ऐसी कुमारशालायें, तो कितनी अच्छी सुजनताके मडप-की-सी हो जॉय? सुन्दर--से-सुन्दर महलके सौदर्य सुन्दरीकी सुन्दरताके साम्हने मंद पडते है । प्रियतमाके लिये प्रियतम अपनी पर्णकुटीर या प्रासादको निरन्तर क्यों न सजाया करे तो भी प्रियजनके योग्य आवास आज- तक किसीने सजा पाये है ? उषाके लिये यह सब मुझे अधूरा अधूरा लगता था। कुमारियों और उनके भाइयोंके लिये एक स्पर्धा खडी की थी। भूत- कालका इतिहास पढे और वर्तमानका बनता हुआ इतिहास जाने नहीं यह योग्य नहीं कहा जा सकता । अतएव आधुनिक विद्वानोके नये प्रकरण ३रा । नये प्रथ और वर्तमान समयके सच्चे झूटे चित्रोंके रेखाचिनके ऐसे वर्त- मानपन, जहाँ शक्य हुआ वहा, कुमारियोंके भाइयों के साथ पढनेकी व्यवस्था की गई । जहा ऐसा सम्भव न था वहा सखी मडलीमें पढनेकी तजवीज हुई । उपा अपने भाइयोंमें सदा वढकर रहती थी। हमारे नगरके एक ससार निरीक्षक और वस्तु विचारक मित्रने एक दफे मुझे कहाथा कि जगत मरके जवानोंको रसिकायें चाहिये गृहि- णिया नहीं, और इसके मुबूतमें उन्होंने सारी पृथ्वीके प्रेमभावके काल्यके भण्डार-के-भण्डार-को पेश किया। भावना देशमें या सिद्धान्त विवेकमें मेरे तो ऐसा रसिका और गृहिणीका भेदही न था । कारण कि मोरके अठोंको कुछ चित्रित करना नहीं पड़ता। इसी तरह रसिका यदि गृह देशमें रसकी बोवनी करे और उगावे तो गृहिणी हो सकती है ओर गृहिणी रसदेशमें गृहमावोंको प्रफुल्लित कर और मौराने दे तो रसिका कही जासकती है । मेरे तो आज उपा रसीली गृहलक्ष्मी है और कुल योगिनी रसिका है। चतुराईका सिद्धान्त और अपवादका अनुभव होनेपर मी इस विचारक मित्रके कथनमें सत्याश था । मुझे भी प्रथम दर्शनमें उपाकी रसिकताकी मोहिनी लगी थी, गृहिणी भावकी नहीं, प्रियतमाके गुणतत्वके प्रेमियोंको भी प्रियाओंके अगकी ओर अङ्गको शोभा देते हुए बवालङ्कारोंकी सुन्दरताके जाहूकी चटपटी लगजाती है । जबतक चतुरसे चतुर पुरुषका भी आकर्षण रगीन बारीक साहि- योंसे होता है तबतक मनुष्य जाति अपने आपको परख नहीं सकती। परन्तु इस पोतके मोहके कारणही कोई परछाईमेही फैलती हुई चाद- नीकी भातिवाली चूंदडीको ओढनेको नहीं लेता। काशीमें ताबे पीत- लपर ऐसेही चादी सोनेपर भी नकाशीका काम होता है। वैसेही हमारे नगरकी कन्या पाठशालामें ताबा पीतल और चादी सोना समी था। 1मै उनके मूलतत्त्वोंकी परिशुद्धि करके फिर उनपर भातिकी नक्काशी करना उपा. चाहता था। मुझे सिर्फ यह बात अच्छी न लगती थी कि केवल पतंगकी पाखें खोदी जावें। ऊपर बताये हुए कारणों से कुमारिकाओं के उद्यान में पुष्प खिले तब भूले पड़े हुए मरने-गूंथने के काम का पुनरुद्धार किया । गृह और प्रिय- जनको सजानेके पुष्पालङ्कार भरे-गूथे जाते थे परन्तु अवकाश के समय। कितनी ही बालाओंकी रसिकता उभराती आती थी और वेचित्र बनाती थीं और दो कुमारिया कविता भी रचती थीं । सुन्दरी की प्रधान भाव- नायें इस तरह शालामें रसपोषण पाती थीं। मूलाक्षरोंमें ये दो बालायें कविता रचती थीं परन्तु मै मानता था'-- इस शालाकी बहुतसी बालायें जीवनकी कविता रचेंगी । कितनी ही कुमारिया तो उस समय ही मूर्तिमंती कवितायें थीं । जगतमें का सुन्दर से-सुन्दर काव्य लीजिये, मेरी उषा उससे भी सुन्दर थी। उपाके अग अंगमें-से कविताके मार्मिक सन्देश, ध्वनि और व्यअना उड़ रहे थे मैं यह नहीं कहता हूँ कि दुनिया में उपाको छोडकर और कहीं सौन्दर्य है ही नहीं। परन्तु अन्य सुन्दरिया सौन्दर्यका अवतार थीं तो उषा स्वय सौन्दर्य ही थीं। जिस भावसे भक्तजन देव मन्दिर को जाते हैं उसी पुण्यभावसे मैं सदा कुमारियोंके उद्यान में जाता था। मेरी रसदेवीका सिहासन वहा था। उस रसदेवीके चरणों में मै धूप खेता था जिसकी सुगन्ध जगमें फैलती थी । जगतकी सारी सरितायें समुद्रमें गिरती है, मेरी सब भाव- नायें उस सौन्दर्यसागर उपाका अभिषेक करती थीं। कन्यापाठशाला इस तरह पुण्य मन्दिर बनी, काठकी या काचकी पुतलियोंकी जगह आत्मलक्ष्मी वाली बाल पुण्यमूर्तिया उसमें सुहा रही थीं । उपाके उर के पुण्य रग सारी शालामें उड रहे थे और सब कुमारिकाओंको बधाई दे रहे थे।

प्रकरण ३रा और पुरुष, लोकवन्ध समापति और उनकी धर्मपत्नी-सबकी रोक रक्खी हुई सानन्दाश्चर्यकी बदलिया उभरने लगी, और धन्यवादकी धाराओंके साथ तालियों की महागर्जना चोतरफ़ छागई । परन्तु ये सब कुछ होने पर भी मेरे जीवनका परमप्रसग यह नहीं था, इसके बादका था । गर्जन की धनघोरमें से कोई सूर्य किरण प्रकट हो इस तरह उपा की नयन-किरणें प्रकट हुई और मुझपर गिरी । अपने पर बरसते हुए धन्यवादोंको उपाने एक दृष्टिपातके द्वारा मुझपर बरसादिये । सद्भावमूर्ति सभाधशिने उपाको पुष्पमुकुट पिन्हाया था । उपाने उस पुष्पमुकुट के तेज मुकुट उतारकर वह तेजमुकुट दृष्टि-सेतु द्वारा मेरी ओर भेजा और मुझे पिन्हाया । दोनों हाथ जोडे सूर्यकमल की तरह वदन मण्डल नीचा किया और प्रणाम कर मुझे बघा लिया। मेरे जीवन की पुण्यक्षण तो यह थी। उस दिन हमारे नगरके नागरिकोंकी सभामें विजय डका बजा कि कुमारिकाओंके उद्यान में सर्वोत्तम कौमार पुष्प-उपा है ।

उपा. 4 लावनी गाई। इसके बाद, सुभटमणि जयमल और फत्ताकी वीर- वत्सल माता और यौवन श्री प्रज्वलित सिंही पत्नी, वीराङ्गनाओंके स्वकीय परिवार के साथ, जगत मरके सारे क्षत्रियवश विस्तारके परम तीर्थ गिरि चीतोडगढ परसे नगी तलवार लिये समराङ्गणमें उतर ही है-इस प्रका- रका नाट्यप्रयोग कुमारिकाओंने कर बताया । माथेपर मुकुट पहनकर करलतामें शमसेरको धारे हुए जगतको जीतनेके लिये आती हुई महा- माया सिहवाहिनी की तरह नवयौवना राजकुमारीके वीर वेशमें जब उपा पधारी तब सारा सभामण्डप धन्य धन्य के शब्दसे गूज उठा । इसके बाद नगरोद्धार और विश्वोद्धार का गान गाया गया और इनाम बाटा गया। छोटी छोटी बालाओंको पहले इनाम बाटे गये । किसीने एक लिया किसीने दो लिये । प्रेक्षकजन तालिया देते थे, कितनेही उत्तेजन और प्रोत्साहनकी तो कितनेही विवेक और शिष्टाचारकी । शुक्रकी कलाके ऐसी मेरी बहन आई और अपने इनाम लेगई । फिर अध्यापिकाने नाम पुकारा-' उपा' । बरसातकी धाराओंके समान सबकी दृष्टिया उपाके ऊपर पड़ी। उषा उठी मानो चन्द्रमा उगा । गगनमण्डलके मध्यमें आता जाय वैसे वैसे चादनी सिलती है, ऐसे ही ज्यों ज्यों उत्सव मण्ड- पके मध्यमें उपा आती गई त्यो त्यों उसकी तेजस्विता प्रकट होती गई- बढ़ती गई । उसे समाक्षोम नहीं हुआ। विश्व पर विभूति बरसाती हुई स्वय वागीश्वरी ही न आ रही हो इस तरह वह कुमारिका पधारी । ब्रह्मपुत्री विधात्री हो इस तरह उसने सर्वपूज्य दम्पतीके वारणे लिये । एक-दो-चार-दस इनाम नगरलक्ष्मीजीने प्रफुल्लमुखसे हसते-हंसते दिये और प्रसन्न मुखसे हसते-हसते उषाने लिये । उसने फिर एक बार वारणे लिये और कौमार सौन्दर्यका विजयकेतु जारहा हो इस तरह उडती ओढनी से पीछी पधारी । ज्यों ही वह लौटी कि रोक रक्खा हुआ बादल जैसे एकदम उमडे और गरजे वैसे ही सारे सभामण्डपके स्त्री प्रकरण ४ था M अब अब मेरे मन्दिर में प्रातःकालमें सूर्यतेज शोध आते है, और रातमें चन्द्रप्रकाश ज्यादा ठहरते है, मानों इन देवोंकी ओरसे भी उस जादूको अनुमोदन ही न मिल रहाहो! मैंने सोचा कि वायुराजने खिडकी दरवाजोंके पडदे उडादिये होंगे! सूर्यचन्द्र के जादू कम हुये इससे अनिल देवका भी आमन्त्रण किया गया। परन्तु झरोकेकी बेल सींचकर सवार रक्सी थी उसे देखू ही क्यों? कितनी ही बार मनुष्य कल्पना पहले कर लेता है और देखता है बादमें! मेरे कपड़ों की शोमामी बढचली। मैने तो उसे देखा न था परन्तु एक ने मजाक किया कि अब अब राजबाग में बहुत जाते हो इसलिये धरमें धोबी रक्खा है या क्या । तब मैंने देखा कि मेरे नित्यके वस्त्रों में मुघडता प्रगट हो रही है ! बहनसे पूछा तू उस्तरी करती है तो कहा नहीं, सूर्य की किरने कर जाती होंगी, नहीं तो क्या वस्त्र चमक सकते हैं ? भने कहा कि पागल हुई है या पागल समझती है ? तो बोली कि चतुर-सुजाना भी पागल होकर पगलापन किया करते हैं। अभी अभी वह ज्योतिषी के ऐसे और डेलफी की देवी के ऐसे उत्तर देती थी। सचमुच अब तो जादूके भेद गहरे और अगम्य जानपड़े। एक दिनतो हद होगई । मेरे जेवी रुमालमें, मेरी लिखनेकी टेबिलपर और मेरे सिरहाने मेंसे ऐसी मोगरेकी ताजा सुगन्ध फैलरही थी कि मानों वे फूलके पौधेही न हों। मैं चोंक पड़ा कि मेरे कमरेमें यह इत्र कैसा? बहनको इनका शौक लग गया होगा और उसके कपड़ोंके साथही मेरे कपड़े धुल होंगे ऐसा सोचकर मनको रोक लिया। परन्तु यह बाततो मै मूलही गया कि लिखनेकी टेविल कुछ कपड़ा न थी या घुलनेको न गई थी। कितने ही जल्दबाज कारणबादी ईस तरह अपने आपको धोका देते हैं।

उपा प्रकरण ४ था. चन्द्रिकाके मन्दिरमें. कु छ वर्षोंके पहले हमारे नगरके एक घरकी लकडीसे बनी हुई छत से दुअन्निया बरसती थीं, भोजन करनेके थाल एक स्वण्डसे दूसरे खण्ड में अधर उडते ये, थालों में से भोजनसामग्री उहजाती थी और चली आती थी। यह बनाव दिनके प्रकाश में बनता था और लोगों के समूह के समूह इस घटनाको आश्चर्य चकित नयनोंसे निरखते थे। मेरे घर में भी-ठीक इसी तरह के तो नहीं परन्तु कुछ कुछ ऐसे ही जादू होने लगे थे। और उन्हें मैंने पीछे से जाना कि ये वात्सल्यके जादू हैं । एक दिन सायकालको राजबागमें घूमकर आया तो कमरे कीछटा ही निलारी नजर आई । चीजें वे-की-वे थीं और जहॉ-की-तहा रक्खी थीं, परन्तु सब की-सब कुछ नवीन ही शोभा से शोभित होरही थीं। पयोधर की प्रथम पयोवर्षा के बाद धुले हुये वृक्षों की कुज जिस तरह नई शोभासे शोभित होती है इसी तरह मेरे कमरे की कुज स्वच्छ होकर शोभायमान होरही थी । कुछ समझ न पडा परन्तु सोचा कि नेत्रोंमें जो राजबागका तेज भरा है वही प्रतिबिम्बित होता होगा। दूसरे दिन मेरी पुस्तकें सुव्यवस्थित और निर्मल देख पड़ीं मुझे बड़ा अचम्भा हुआ । मैंने नोकरसे पूछा कि तूने जमाई है? तो कहा नहीं। भैने सोचा कि बहनने जमादी होगी. क्योंकि अक्षर जीवन महामन्थोंको तो हम निर्जीव समझते हैं न?

प्रकरण ४था ४५ अब अब मेरे मन्दिरमें प्रात कालमें सूर्यतेज शोध आते है, और रातमें चन्द्रप्रकाश ज्यादा ठहरते है, मानों इन देवोंकी ओरसे भी उस जादूको अनुमोदन ही न मिल रहाहो। मैंने सोचा कि वायुराजने खिडकी दरवाजोंके पडदे उहादिये होंगे ! सूर्यचन्द्रके जादू कम हुये इससे अनिल देवका मी आमन्त्रण किया गया ! परन्तु झरोकेकी बेल सींचकर सवार रक्खी थी उसे देखू ही क्यों? कितनी ही बार मनुष्य कल्पना पहले कर लेता है और देखता है बादमें मेरे कपड़ों की शोमामी बढचली। मैने तो उसे देखा न था परन्तु एक ने मजाक किया कि अब अब राजबाग में बहुत जाते हो इसलिये घरमें धोबी रक्खा है या क्या? तब मैंने देखा कि मेरे नित्यके वस्रों में सुघडता प्रगट हो रही है ! बहनसे पूछा तू उस्तरी करती है तो कहा नहीं, सूर्य की किरने कर जाती होंगी, नहीं तो क्या वस्त्र चमक सकते हैं ? मैंने कहा कि पागल हुई है या पागल समझती है ? तो बोली कि चतुर-सुजान मी पागल होकर पगलापन किया करते हैं। अभी अभी वह ज्योतिषी के ऐसे और डेलफी की देवी के ऐसे उत्तर देती थी। सचमुच अब तो जादूके भेद गहरे और अगम्य जानपड़े । एक दिनतो हद होगई । मेरे जेवी रुमालमें, मेरी लिखनेकी टेबिलपर और मेरे सिरहाने मेंसे ऐसी मोगरेकी ताजा सुगन्ध फेलरही थी कि मानों वे फूलके पौधेही न हों! मैंचोंक पडा कि मेरे कमरेमें यह इन कैसा? बहनको इनका शौक लग गया होगा और उसके कपडोंके साथही मेरे कपड़े धुल होंगे ऐसा सोचकर मनको रोक लिया। परन्तु यह बाततो मै भूलही गया कि लिखनेकी टेबिल कुछ कपडा न थी या धुलनेको न गई थी। कितने ही जल्दबाज कारणबादी ईस तरह अपने आपको धोका देते हैं।

उषा . . फिर एक दिन इस जादूका भेद टूटगयाऔर कामण टोमण करनेवाली वह जादूगरनी पकडमें आगई। दो पहरके समय मै अपने पिताकी दूकानपर जाया करता था और सीखा जा सके वह सीखता था। अनेक तरह की अस्थिर चित्तव्यग्रताके कारण जो होताथा करताथा । नवीन विद्यार्थी की भाति मै दूकानको जाताथा । परन्तु उस दिन राधिकाजीके वृन्दावनमें पधारनेका मन्दिरमें उत्सव था। पिताजी महाजन मण्डलमें पधारे और मै घर आया। लता- कुंजके पास वृषभानु दुलारीके स्तम्भित हुए थे वैसे ही गृहकुमकी देह लीमें ही मेरे भी पैर रुक गये। घरके चौकमें यह कौनथा ! मेरेही रुमालका घडी यह कौन कर रहा था। भर दोपहरीमें चौकमें चाद चल रहा था। बहनने कहा आज कितने ही मनुष्यभी अवलचंडेही होते हैं न ? मनकहता है चल, बहन कहती है आ तब मैं आखें नीची किये हुए अपने कमरेमें चला गया। मेरी बहन उपाके ही वर्ग की थी और उसकी सखी थी । उपा का नम्बर पहला और वहनका दूसरा था। उपा सूर्य निकालती तो बहन चन्द्रमा। उषा सुनहरी रगकी थी तो वहन रुपहरी रंग की । कन्या पाठशालामें उपा को इनाम मिलने लगे तबसे परस्परका सखीभाव बसन्तकी बहारके समान प्रफुल्लित हो गया। एक पुष्पलता दूसरी की महमानीमें न आई हो इस प्रकार उपा आज उसकी सखीके यहाँ पधारी थी! उपा इसतरह पधारी थी मानो जमना जीके यहाँ गगाजी न पधारी हों? वस्त्रोंकी घढी हो चुकी कि मेरी माताकी आज्ञाकी ध्वनि हुई । चन्द्री ! सायकालके लिये चावल वानो और मटकी में से दही निकालो।

प्रकरण ४ था n . । मेरी बहनका दुलारका नाम चन्द्रिका था। और मेरी माताका निय- म था कि वह छुट्टी के दिन बालिकों को खाली न बैठने देती थी। उसका विश्वास था कि सर्वथा काम न लेने से बच्चे आलसी होजाते है। अत एव सहले काम और पीछे खेलना । परन्तु क्या यह वही उषा है? वृक्षके लतापल्लव की जालियों में होकर कुजघटाके कलापीके कलाकलापको कोई देखे इसतरह मै अपने कमरेकी जालीमें से उषाकोदेख रहा था। वह तो शेरनी थी, यह तो गाय है; वह तो उत्साह और आल्हाद की स्वतन्त्रता थी, यह तो चतराई और सयानपनकी सुशीलता है, वह तो कौमारकी चपलताका विलोल लालित्य था, यह तो प्रौढाकी ज्योत्स्नाकी स्थिर गभीरता है । यह उषा वह थी भी या नहीं? ओवरकि परछानेमें बैठ कर शान्तिपूर्वक चावल बीनने वाली उपा वही थी, मानो किरणोंके कणोंमें-से-भी ककर न निकाल रही हो ! हरिणी आज घरमें हसी बन गई थी। परन्तु इसमें क्या कुछ आश्चर्य है' गृहभावना ही ऐसी होती है, लको गभीर और चचलको सयाने कर देती हाकुदरतमे क्या ऐसा होता हुआ दिखाई नहीं देता ? एक पैर में त्रिलोकगामिनी विराटकी बही बेटी विद्युल्लता जब गृहमान्दरके खड-खड में प्रकाश करती है तब चन्द्रि- काके ऐसी सयानी होकर निरतर कैसी शोभायमान होती है ? उपाकी ब्रह्माण्ड प्रकाशिनी और विश्वविहारिणी विद्युत् इससमय गृहमन्दिरमें ज्योत्नाके प्रकाशसे प्रकाशित हो रही थी । कौमारकी चचल दृष्टिमें जब मात्सल्य प्रकट होता है तब नयनपल्लवमें स्थिर प्रकाश प्रकट होते हैं । नगरके चौकमें धनगन करती हुई हरिणी के समान छलागें मरनेवाली वह उपा, आज गृहमन्दिरके,चाकमें गिन गिन कर हसीके समान पैर - तर- ४८ उपा. वाली यह उपा हो रही थी, मानो कमलकी पंखडियोंको बिखेर कर बीन ही न रही हो! सूर्यतेज छत और खुले हुए आंगने में ही प्रचण्डताके साथ प्रकट होते है।परन्तु परछानों (बरामदों) और घरों में तो उसकी सुकुमारता ही भासित होती है। गृहमन्दिरके बरामदे ग्रीष्ममें शीतल और शिशिरमें गरम हुआ करते हैं, प्रमु करे गृहमन्दिरके वे गृहभाव भी सदा ऐसे ही रहा करें। कितनी ही सुन्दरिया ऐसी होती हैं कि वे बाग-बगीचेमें, नगरचौकमें, उत्सव-मेलोंमें और विवाहार्दिक समारम्ममइपोंमे ही शोमा देती हैं घरमें नहीं,-घरकी देहलीके भीतर जातेही उनकी शोमाकी साडी मैली होजाती है और सौन्दर्यका रग फीका पड जाता है । परन्तु, फूलमें क्या और क्या फुलवाहियोंमें, उत्सव शृगारमें क्या और क्या नित्य वस्रोंमें और गृहभावमें क्या और क्या गृहकामोंमें-चन्द्रकी जैसे प्रत्येक कला सुन्दर है वैसेही-उपाके सौन्दर्यकी ये सब कलायें सुन्दर ही थीं । गृहमन्दिरके झरोकैमें स्यानपके समुद्रके ऐसी गृहदेवी-सी वह विराज रही थी । असुरों को जीतनेवाले विजयध्वजकी तरह जो जगतमें फरफरा रहाथा उस ओढनेकी गृहमान्दिरमें घड़ी की हुई थी। गगनके अन्धकार में भी जो प्रकाश फैला रहे थे वेही वीरत्व प्रवासे चलने वाले नयन-त्रिशूल, मन्दिरके सिहासन में नमकर झुक रहे थे। वन-वन सिंहवाहिनी के जो सिंह शार्दूल-विक्रीडित के खेल खेलते थे मन्दिरमें वे सुस्सेकीसी-सुशीलता धारे हुए छुपकर विराजमान हो रहे थे। जगदम्बाके ऐसी ही जगदम्बाकी कुमारिया भी है । उपाभी ऐसी ही थी। भरी हुई बदलिया बरसा करती हैं। वैसे ही आज धीर-गभीर उपा- में से वात्सल्यकी धारायें बरस रही थीं। कौशल्याके मन्दिरमे जान- कीजी पधारी हो इस तरह मेरी माताके वरामदेमें उपा की एक शिख. वाली ज्योति जगमगा रही थी।

प्रकरण ४ था यहा, गृह मन्दिरके चौकमें माताके प्रभकी फिर प्रतिध्वनि हुई -'चन्दी । माईको पूछ देख चाह कहा पियेगा-यहा कि वहा ?" और वहा' के भेद मुझे कब तक पालने होंगे! इच्छा यहाकी थी परन्तु पी 'वहीं' दूरसे चाहता था उसके पास न गया मेरे अन्तर की पसलियोंके सुल जाने के भयसे माकी कोठरी में न गया । चन्द्रिका को मैने 'नाही' करदी और नाही किये बाद अपने अविवेक और किसीके आशाभङ्ग के कारण पछताया । प्रायाश्चत्त ही न कर रहा होऊ मानो, इसतरह पीते पीते आधी चाह दुलकादी और अपशेष रही को पीने लगा, ऐसा जान पडा कि अमू- तका घूटही न हो' बहुत काम किया जाओ अब खेलो । उपा! आना हो।' माताकी फिर आज्ञा हुई । मेरे अन्त करणमें मानो हथौडा लगा । क्या उपा गई ? जीवन की छिनछिनमें जिसे जीवनकी तरह स्मरण किया करताथा वही, जब मन्दिरमें आई तब तो मै दर्शन करने न गया परन्तु उसे जाती हुई देखनेको मैं उठा । पश्चात्ताप भरीहुई निगाहसे भय खाते-साते देखा तो,-यह तो मेरी पडोसमें एक बीमार था उसे देखने के लिये मेरी माता गई है और उषा और चन्द्रिका तो चन्द्रिकाके मन्दिरम चढ़ आई। भरी सास- स-में-सास आई और भूकम्पके समान होने वाला मेरे शरी- रका भयकम्प भी धीमे-धीमे बन्द हुआ। इदयकी धडकनभी ठिकाने नेठी और मेरे जीव-म-जीव आया । आरती होनेके पहले परदे गिरते हैं उसी तरह गृहमन्दिरमें घोडी देर तो शान्ति के परदे गिरगये और फिर घटीके समान प्यानोकी छोटी-छोटी शब्दमाला चन्द्रिकाके मन्दिरसे सुनाई देनेलगी। उपाके उसदिनके वाचनके समान प्यानोका स्वरोच्चारण स्वच्छ मधुर और सुकुमारथा । चन्द्रिका गारही यी अत एव उपा ही तो वजा रही थी? - उपा " " सवि नटवर । वसन्त थे ये नाच रहा, नाचरहा जग नचा रहा, सखि नटवर वसन्त थै यै नाच रहा। प्यानो रमझमकी तरङ्गमाला मेरे कमरेमें और मेरे हृदयके कमरेमें गरजती हुई उछल रही थी मानो मैनायें उडती-उडती हुई आकर हृदयमें न कूज जाती हों! चन्द्रिकाने अश्रुमतीका वसतगीत जमाया:- 'कोयल मधुर मुरली धनी नाचे नटवर कान' उपा और चन्द्रिका दोनों खिलखिलाकर हंस पड़ीं, मानों सोनेचादीके सिक्केही न बिखर गये हों। गीतकी किलोलसेभी इन कल्लोलिानियोंकी हास्य-किलोल विशेष मधुभरी थीं । मुझे नचाती हुई सखिया कौतुकके कोनसे सकेत भायसे हँस पड़ी, यह उस समय तो मुझे न जानपडा परन्तु उपाने चन्द्रिकासे जो इतना कहा सो सुनाई दिया कि 'आओ मेरी कोयल रानी'! यह गीत यहींसे रुक गया और हास्यकी मौजेभी शान्त हो गई। गीतलहरें फिर चली । लहरों बिनाकी नदिया कहीं देखी है ? दो रस- सरिताओंका सङ्गम था फिर रसकी लहरें क्यों कर विराम पा सकती थीं। इस वक्त उषा गातीथी और चन्द्रिका बजाती थी। उषाने कृष्णचन्द्रकी बशीका गीत गाना प्रारम्भ किया और दैवी माधुर्यमयी बशीके समान कठसे ही गाया ॥ किनारे आज जमनाके बजे तेरी पिया बशी सुनाके बोल क्या क्या ये हरे तेरी हिया वसी धुमेरी आंसमें छाती भुलाती है विरसताको सरसजीवनके जलभीतर बुडाती है जिया बसी" मकरण ४ था ५१ आयुषभरमें एकही बार जो गर्जना होती है वही गर्जना आज हो रहीथी । जीवनके जलमें जो ब्रह्मवशी बोलती है उसके बोल आज सुनाई देरहेथे उषा उसी लयसे गारही थी। परन्तु विजलीका चमकता हुआ दिया एका एक बुझ जाय और मोग- राभी न रहे उसी तरह सगीतका प्रकाश बन्द होगया । प्यानोकी तर- एमाला एकाएक टूटगई । उपाकी देवी कोकिलके मधुरतम माधुर्यकी धारायें एका एक रुकगई। क्या हुआ सो उस समय तो मेरी समझमें नहीं आया। थोडी देरमें उडती विहगिनीके समान दौडती हुई चन्द्री मेरे कमरेमें आई और बोली 'भाई चल, प्यानोकी कल बिगड गई है सुधारदे ।' आवकारके आदर न मानेथे परन्तु आज्ञाको पाला ओर चन्द्रीके साथ मैंभी चन्द्रिकाके मन्दिरमें गया । आखिरकार मैं हारा और चन्द्रिका जीती परन्तु यह सब मुझे पीछे जान पडा। प्रियतमाकी सान्निध्यमुक्तिके प्रथमानुराग तो सब प्रियतमोंने अनुभव किये और जाने कौन कहेगा कि उसके वर्णन किये जा सकते है ? तू अनिरुद्ध हो या न हो, परन्तु तेरी उषाको तेरे स्वम आये और फिर तेरा झूला उसके रसभवनमें चला तब, क्या तू तन्द्रा-निद्राके समान रसघुमेरीमें नथा ? उपनिषद् कहती है कि ब्रह्मदर्शनसे परममौन प्राप्त होती है । यह हो या नहीं क्यों कि ब्रह्मदर्शन तो मुझे बिजलीकी झम- कके समान निमेषमानहीं हुए है परन्तु उषा दर्शनसे तो मुझे विचित्र आनन्दाश्चर्यसे भरे हुए मौनही प्राप्त हो गये थे। अविवेकीके समान मै विवेकवार्ता करनाभी भूल गया । चुपचाप गया, प्यानोकी कलपर उपाकी अगुलियो रक्खी थीं उनके विद्युदाणोंको उपा देखते-देखते चुपचाप फलको सुघारा और सिरोंके समान चुपचाप खड़ा रहा। 'मौन मौर्यस्य लक्षणम् । यह वाक्य-ऋचा सत्य होगी ? रसगङ्गाके किनारे खडा होकर मैं गङ्गाजल न पीता था । हृदय उमरा जाता था परन्तु बहता न था । आत्मा बोलता था परतु जीम खुलती न थी। चन्द्रिकाके मन्दिर में प्रवेश करते ही हमारी नयन-किरणें मिली और बोली थीं । मेग हृदय उछलता था वैसेही-भौरोंकी मालाके ऐसी उसकी भौहें, नाचती थीं और डक मारती थीं । पवन की लहर में उसकी एक लट उडरही थी मानो चन्द्रमापर सुरेखामयी बदलीकी किलगी ही न फरक रही हो। मेरी होशियारी, छटा, विवेक, सुजनता और सद्गृहीके सब अग न जाने किधर चले गये। सिंहको मन्त्रमुग्ध किया हो इस प्रकार मै दर्शन- मुग्ध हो खडा रहा । मैं स्वय अपनेको गूगा प्रतीत हुआ अतएव पीछा लौटने लगा। गहनताको वाणी प्रकट हुई हो इस प्रकार उपा बोली, बैठोगे नहीं ! इन शब्दोंमें प्रार्थना न होकर आज्ञा थी? मै बैठ गया । मेरे पसीना टपक पडा । नमते पहरकी कोमल उष्मावाली धूप उपाके अगपर गिर रही थी । उपा बैठी थी मानो गुलाबके फूलोंकी मालाका दंगही न लग रहा हो? चन्द्रिकाने कहा उपा गीत गा । वह गीत गा जिसे तू बनाती और मैं सीखती थी । तू गा मैं बजाती चन्द्रिकाकी अगुलिया नाचती हुई किरणों के समान प्यानोपर क्रीडा करने लगी । उपाने वातावरणसे आन्दोलन मचाया और वह गीत गाया . -

प्रकरण ४ था
५३
जिसे उपा और चन्द्रिका बनाती और सीखती थीं। इसका एक चरण
चन्द्रिकाने मुझसे भी सुधरवाया था।
अहो राज ! हमतो पछी है गरम देशके,
वहे हिममय वायु
वहा लवी ओछी आयु
राज ' हमतो पछी है गरम देशके,
अहो राज ! हमरे देशमें सूरज सोहते
मलाके सरिया है रग
भरे चित्तम उमग
राज। हमतो पछी है गरम देशके,
अहो राज । हमारी क्यारी में फूल लुगधदे
खिलें कलिया सुमधुर मधुर
ऐसे ही खिले मधुरतर उर
राज ! हम तो पछी है गरम देशके
अहो राज ! हमारी शितोष्ण हवा है उजली
उसमें तेजकी तरग
ऐसे आत्माके सग
राज हमतो पछी हे गरम देशके ।
वारीक गले से उपा गारही थी मानों उडी अतगुहा में से कोकिला
न'बोल रही हो । किसी को धीरे धीरे बजते हुए सितार के मृदुल
झकार अच्छे मालूम होते है, किसी को भास्कर की प्रभाकी अपेक्षा
चन्द्रराज की शीतल चद्रिका मली मालूम होती है, वैसे ही उपाने
मृदुमजुल स्वरकी लहरिया दैवी धीमी अनिललहरियोंके समान छेडीथी
और वे मुझे भली लगती थीं।
-

उपा मै तो गीत मुग्ध हो मोहमूर्छामे पड़ा हुआ अमृतके स्वमोंका अनुभव कर रहा था। और गीत पूरा होतेही उधाको खासी आई । घोटकर रक्खा हुआ स्वास चढा । चन्द्रिका पनिहारेपर पानी लेने गई तो कुजा दुल गया 'कुछ नहीं, भरलाती हूँ, कहकर मैनाके ऐसी किल्लोल करती उडी और चौकके पनिहारेपर पानीलेनेको चलदी। रसकी शाखापर पहिलीवार जोडीसे बैठे हो वे भाव तो याद हैं न ? हमारे आज वही समय था और सूर्य और चांद दोनों मानों सन्मुख ही ने आधिराजे हों। हमारे अङ्गोंमें विजलिया बहने लगी और कोयलोंके समान रोमराजि फरकने लगीं। उपाने पूछा क्या बोलोगे ही नहीं ? मै उठा-बैठा और न बोला । लजवन्तीकी खिली हुई पसड़िया छूतेही जैसे सकुचित हो जाती है वैसे ही मेरे हृदयकी खिली हुई पस- डिया थोड़ी देरके लिये तो सम्पुटित ही हो गई। आकाशकी गहनतासेभी गहरे मेरे भाव क्रीडा करते थे, अतएव इस हृदयाकाशकी गहराईमें शब्द समा जाताथा और उषा इस मौनकोही सुनती थी। एक मुग्धासे भी मैं विशेष मुग्ध था। यह वह समय था जब प्रभातके प्रकाश दिवस के महासागर से मिलते है । उपाके और मेरे उरके प्रकाशके महासागरों का सङ्गम होता हुआ मुझे जान पडा । क्षितिजपर अम्भोधिमें जैसे आकाश डूबता है इसतरह मेरा उरव्योम उपाके महाम्भोधिमें निमग्न होते हुए जान पड़ा! मेरे घरके समीपके मन्दिरमें उत्थापन की नोबत बजी और एक भक्तने भजन छेडा।

प्रकरण ४था
"आओ पीतम बात करें छिन
रहा न जाता है तुम्हारे विन
है एकान्त मनोरम है?
प्यारे ! जल्दी मन्दिर आइये जी!"
उत्थापन की इस नोबतने मुझे जगाया, भक्तके इस भजनने मुझे
प्रेरणा पिलाई और आत्मवान किया ।
मै जगा उठा और बरदान पाया।
इस भजनने हमारे अन्तरके परदे चीर डाले।
सिहासन पर देवीके समान उपा विराजमानर्थ । प्रेमबन्दना करने
को मैं उठा। मैं क्या करता इसकी तो मुझे आज भी खबर नहीं है,
परन्तु मुझे उठता देखकर उपाभी उठी और मेरे फैले हुए दोनों हाथोंको
उसने अपनी करलतामें झेल लिये । फूल की पसडियोंमें फूलकी पखडिया
गुथे इस तरह हमारे करतल गुथ गये । एक पुष्पकी सौरम में दूसरे पुष्प
की सौरभ मिलजाय इस तरह हमारे दृग्तेज परस्पर में मिलगये । उपा
खिलखिलाकर हँस पड़ी।
धवड धवड सीढिया चढ विजयका नकारा बजानेके समान चद्रिका
आई और खिलसिलाकर कलोल करती हुई हस पडी ।
चकित हो एक एक इनकी और तीक्ष्ण दृष्टिसे देखते हुए मैने
कहा उपा।
उपाके हास्यकी मौजें और उछल पडी। वह बोली उपाकी कुछ
उर्वशी नहीं होगई । यह रही उपा कुछ उड नहीं गई, चली नहीं गई।
बोलो चाहता हो वही सर्वस्व मागो या लेलो।
उपा और चन्द्रिकाको फिर हास्यका ज्वार चढ़ आया, टकोरेके
समान स्वच्छ शब्दसे चन्द्रिकाने कहा लोग कैसे ठगे जाते हैं ? भाई

उपा
"
साहिब तो योंही समझ रहे थे कि कोई जानता बूझता नहीं है । क्या ।
बोलें ? परन्तु एक समयसे उनके काम तो बोल रहे है।
मैने कहा तब तुम जानती हो।
मुझे पहला इनाम दिया और अगुलीके अड्कुर फरके उसी तिथिसे'
उषा बोल उठी।
मैने कहा. तब आजका नाटकी-
-यह तो चित्ररसाने अनिरुद्वका हिडोला उपा को
दिया । जगो अव स्वममें से और चलो रसके सत्यलोक में मेरे अनिरुद्ध
यों कहकर मुझे कुकुमके छींटों से छींट दिया ।
मेरी आखें सदा के लिये खुलगई और मेरे उत्थापन सदाके
-
उषाने कहा
लिये हुए।
उपा और चन्द्रिका को तो हास्य की उर्मियोंपर उर्मिया उठही रही
थीं। भरम फूट गया जानकर मैं भी खिलसिला कर हस पडा । उठा
और जल भरा मेघ तेजभरी बदली के पास जावे वैसे ही मै उपाके
पास गया । नवपल्लव में नवपल्लव मिलें इस तरह हमारे कर सम्पुट हुए ।
पुष्पहारमें पुष्पहार गुथे इस तरह हमारी करवल्लिया गुथ गई । चन्द्रि-
काने हमारे वारने लिये । हेतवात्सल्य और कुटुम्ब भावनाके
मधुर
और
सुकुमार प्रकाश मानो हमारे भावीको प्रकाशित ही न कर रहे हो इस
प्रकार उसके हास्यके अमृत प्रकाश हम पर प्रकाशित होने लगे।

प्रकरण ५वा भकरण ५ वां. वटमालिका यूयमें mera विश्वको अश्वत्थ कहा है, परतु बड क्हा होता तो रूपक क्या विशेष शोभा न पाता और क्या विशेष सत्य-प्रकाशक न होता? नगरके किनार बडकी पञ्चवटी थी और उस पञ्च- वटी में मीठेजलकी पातालतल-गहरी वापिका थी । नगरकी सन्नारिया उसका जल भर लेजाती थी और नगरके जनोंको पिलाती थीं। सुबह-सुबहके समय पञ्चवटीके जल-कूपपर तिरिया-राज्य जमता था, मुन्दरियोंकी प्रतिनिधिसभा भरती थी और नगरचर्चा होती थी। जल, जलके वेवढे ( दोहरा कुम्भ ) जलभरकर जेघड लेनेवाली पनिहारि- योंके विश्वरंगी वस्त्र और ब्रह्मरगी मुख, पञ्चवटी का घेरा और घेरमें हिलते-चमकते सघनधन रहे पत्रगुच्छ इन सब पर जब प्रभातका बाल- सूर्य प्रकाशित होता तब इन सबोंके अन्तर्भाव मभातके प्रकाशके समान लिखते- इस पञ्चवटी की साया नगरकी कुमारमडली मिलती थी । कुमार वटकी अट्टालिकाओंमें बैठते और वशी बजाते थे। कोई रामचन्द्रजी के समान सोहते थे तो कुछ लक्ष्मणजीके ऐसे विराजमान होते थे । अगद हनुमानजी, सुग्रीव जाम्बुपान -पपाके ऐसी वापिकाके तीर पर सुमेरुके ऐसे वटके शिसपर रामसेनाकी ऐसी-चीरसेनाभी वहा पर मिलती थी। सायकाल के किरण बडकी जालिया में प्रकाश पिरो रहे थे और तेजके प्रकट होते थे उपा. मुकुट और हार कुमार यौवन को पिन्हा रहे थे। उस समय पचवटी की अटारिया रसिकों की रसज्योति से झिलमिला रही थीं। वह एक यमका समय था और वह मुझे याद है । चन्द्रिका के मन्दिर पर उपा पधारी थी उसके कितने ही दिवसोंके बाद उस गहरी सांझकी पराई फैली थी। मै भी उस दिन मदोन्मत्त था परन्तु वह तो कुम्भस्थलों में से मद- विन्दु झरते हुए ही घरगया। उस दिन चन्द्रिकाके मन्दिरमें हमारे आन्तरिक अवरोधके परदे उठ गये थे। इसके बाद उपाके देहकी बहार कुछ निराली ही खिल उठी। हिमालयके हिम पिघलने पर नाडियों में रुधिरकी भरती उभरने लगी। उषा की बेलके पान पानपर मानों कलिया लगी हों, उषा की बिजलीके अवयव अवयव पर माना दीपक जगमगाने लगे हों । प्रियतमके प्रथम स्पर्शके बाद प्रियतमाफा जो रसविकास होता हे वही विकास उपाके स्थूल और सूक्ष्म ब्रह्माण्डमें होने लगा मानों केसर और कुकुमसे लिखा हुआ मेरा सौभाग्य प्रन्य ही न खुल रहा हो । अचानक वसन्त विश्वमें प्रकट हो, तरुलता कुसुमित होकर सौरम देने लगे, कुछ ऐसाही उघाके देहविश्वमें हुआ। लोक हितचिन्तक जननायक्की सूक्ष्म दृष्टिने कुमारिकाओंके उद्या- नको देख लिया,उन्होंने अपने खास हाथसे लिखा हुआएक कृपापत्र मेरे पिताजीको भेजा और नगर सभासे आज्ञापत्र दिलवाया कि इनामका सर्च नगर-भण्डारसे दिया जाया करेगा। इसके बाद उपाकी शालामं जाना मैंने बहुत कुछ कम कर दिया । ब्राह्मण-भावनावाले शारदा मन्दिरके उस नवीन आचार्यकी भी प्रतिष्ठा उडती खबरोंमें स्वब जमी थी अतएव मैने अपना कर्तव्य भार उतरा हुआ माना । हमारे प्रजा-प्रमुख कहते थे कि , प्रकरण ५वा । मनुष्य ऐसा समाजके नेताओंको तो श्रीकृष्णचन्द्रकी तरह सारथी धर्म पालना है, लगाम पर हाथ रखना है, दिशासूचन या गति प्रेरणा करना है बाकी कार्यकारी अश्वोंको तो अपने बलसेही दौडने देना चाहिये। इसके बाद उपा चन्द्रिकाके मन्दिरमें उत्सव-उत्सवपर आती थी और आती तभी सिल खिलाकर हँसती थी मानते है कि हृदय छुपा हुआ है वैसेही घदयके भाव भी छुपे रहते है । परन्तु उपा कहती कि प्रियतमाके लिये तो प्रियतमके हृदयको पढलेना ऐसा साफ है कि जैसा साफ खुले हुए ग्रन्थको पढलेना भी नहीं है । उपाके मुखकी पाटीपर उपाकी अतरूर्मियोंकी अक्षरमा- लाको मै भी अनायासही पढलेता था। हमें वे अखिया मिल गई थीं कि जो बे-लिखे अक्षरमत्र पढलेती है, हृदयके ताम्रपत्रोंको उकेल लेती है। अब मुझे यह समझ पड़ा कि मेरे कमरेमें जो प्रकाश और सौन्दर्य प्रकट हुए थे वह उषाके रसमय पदसचारसे प्रकट हुए थे। चद्रिकाने मुझे सिखाया था कि पियानोकी कल सहजमें कैसे बजाई जाती है। मैंने दोनोंको शास्त्रीय पद्धतिसे सिद्धकर बतलाया कि महामायाकी पुत्रियोंकी शिक्षाका महा प्रश्न उन दोनोंकी अपेक्षाही कम प्रिय था । मेरी समर्थ दलीलोंको सुनकर वे मुसकराती और मेरी गभीर मुसमुद्रा निरख निरसकर हँसती थीं । मैं समझता था-परन्तु बार बार भूल जाता था । वही चन्द्रिकाने मुझे दूसरे दिन समझाया कि दो कुमारिकायें कुमारको क्यों हॅसती थीं। कुमारका परमार्थभाव परमार्थ फलदाई था, परन्तु एक कुमारिकाकी ओरकी स्वार्थ भावनामेंसे जनमा था । जगत ठगा जाता है और चार नार स्वार्थको परमार्थ कहता है। मैं ठगान गया था परन्तु भूल गया था। परन्तु गगा-यमुनाके ऐसे, निष्पाप और विशुद्ध स्वार्थ परमार्यके निर्मल मूल क्या एक देवगिरिमें नहीं विराज रहे ! - उपा. , जब जब मिलते तब तब हमकर सम्पुटकी किलगी करते और कर- वल्लीके हार गूंथ कर आपसमें एक दूसरेका सत्कार करते थे । अगस्त्य महर्षिकी छोटीसी अजलि में आये हुए महासागरके किनारेपर खडा हुआ जलधि-जल-मुग्ध कोई जैसे जलकी ओर ही देखाकरे और विपुल जल वाली तरगमालाके ऊँडे ऊँडे भेदभवरोंकी गहन भूमिकाको निरखा करे वैसे ही हम एक दूसरे के नन्हे नन्हे नयनोंमें आये हुए महासागरके जल भेदकी भूल भुलैया में कुछ सोजते हुए भी जल मुग्ध हो खडे रहते थे । अंतमें उपा हस पडती थी और कमलकलिकाऑकीसी अँगुलियोंमें मेरी ठोडीको लेकर करती थी कि दीवाना, दीवाना, मेरा सदाका दीवाना। मैं कहता था कि दिवाने को भी स्याना बनाना, उपा । पछिनी सी इस तरह उषा आती और मेरे करकी टहनियोंपर झूलती गाती और पीछी उड जाती थी। मेरी टहनी टहनीपर नये अङ्कुर निकले और नये पान प्रकट हुए। सौन्दर्य पारसमणि होता है जो उसे छूता है उसे भी सुन्दर बनाता है । इसके बाद नगरके मार्गमें चलती हुई उपा ऐसी जान पडती थी कि घूघर मालका झनकार करती हुई धेनुपुत्री ही न जारही हो । नर नारि- याँका मारालोक परिवार उसे मार्ग देता था। एक मैं मिलता तब वह गर्दन झुकाती और गलेकी घूघरमाल जिस तरह कारण न करे उसतरह का कुछ कुछ रणकार करती थी। इसके बाद उपाकी माताने पुत्रीको पढाई पूर्ण होजाने की मिठाई बाटी और पाठशालामें चढा हुआ नव यौवनाका उफान देव मान्दरमें शान्त होगा ऐसा सोच कर वह उपा को अपने साथ देव मन्दिरको लेजाने लगी। मै भी देव दर्शनके लिये देव मन्दिरको जाने लगा।

मकरण ५वा मेरी माता ने समझा कि पिताकी तरह ही पुन भी धर्मात्मा होगा । एक पर्वके उत्सव पर उत्सवके वस्त्र पहने हुए उपा चन्द्रिकाके मन्दिरमें आई थी तब मैंने उसे सत्य बात कहदी।उपा क्या मन्दिरके सब सिहासनों पर देवी ही विराजमान हैं ? मुझे तो देवोंके मुख परमी देवीके ही दर्शन होते है। कुछ पूछा कि उपा हँसी । वह हँसती-हँसती उठी और मेरे बालोंमें अगुलिया टाल कर पपालने लगी मानो स्यानपका स्नेह ही न सींच रही हो! उपाने कहा, अन्तरमें वही आँसमें । चन्द्रीने कहाः तू देव दर्शन को जाता है या उपा दर्शनको ? कहने दे मासे । मैने कहा । कहना भले ही । मा तुझे कह रहीथी वह भी मैंने सुना है । ' चन्द्रीसी कन्या है और उघा सी बहू हो तो मै तो अपना ससार तिरकर कृतकृत्य होऊँ।' उषाने चन्द्रिकाको कहा इन्हें तो भीतोंको भेदकर सुनना आता है और मुदी हुई पलकों कोमी बेंधकर निरखना ।' चन्द्रीने उत्तर दिया तेरे देहकी सुवर्ण मजूपाके आत्माको जो उकेल सकता है उसे क्या क्या न आवेगा। मैने कहा किसने इस आत्माको नहीं उकेला और किसे क्या नहीं आता तुम्ह कहाँ कुछ कम हो ? तेजोवृन्द से पल्लेको उड़ाती हुई उपा आई । मै मुसकराते मुसकराते आदर देने को उठा । उपाने मेरे दोनों कानों की दोनों लोलें पकहीं और दबादी । मैंने गुलाव कलिकाके ऐसी उसकी नासिका को छुआ और मलदिया।

चन्द्रिका सिलसिला कर हँस पडी और बोली' सूब जोडी मिली है भाई-भोजाई की 1 कोई किसीसे उतर कर नहीं हैं । एकने एक के कान चींधे तो एकने एक का नाक नाथा । चन्द्रिका उपाको भाभी कहती सो उपाको वहुत ही पसन्द था । इस तरह रसवार्ता की कितनी ही तिथियोंके बीत जाने पर वह साझ आई थी। रस पीपीकर मै भी रसोन्मत्त हुआ था । वह तो सर्प ही था. अपर से सुन्दर परन्तु भीतर जहर भराथा। उसदिन हमारा 'छुआपाती पीपली, का खेल था। बसत में जैसे बनका यौवन उभरता है वैसे ही नगर का यौवन पचवटी में उभरा करता था। राजमहल की गजशालाका मुकना-हाथी मदोन्मत्त होकर जैसे झूमता झूमता चले वैसे ही उस श्यामको मै भी चलता था। मुझे उषाने नयनोंके प्याले भरभर कर मधुपान करायाथा और मुझे उसका विकट नशा चढा था । सूर्य ढलगया था, परन्तु लाल रंग बरसाते हुए कुछ ऐसा जान पड- ताया कि कुछ कुदसा न हो गया हो ! सब कुमार बसीधर बनकर आयेथे बंसीनाद से मानो ब्रह्माण्ड को ही जीतनेको न तैयार हुए हों। वह एक था जो कुमारपरिमण्डलमें रावणके ऐसा जान पड़ नागके खुले हुए फणके ऐसा उसका मुख-फण था । मदलोललोचन की पासोंके ऐसे उसके पलक उड रहे थे । उसकी निगाहमें जहरीले तीरथे । उसके कटाक्ष-पूर्णस्मित मे विषैले कटार थे। उसकी सल पड़ी हुई भवें कौचफलीके कामलेंकी सी थी । उसके शब्दोंके रणकारेमें विष- यवासना और कामलोलुपता थी । स्वयबरमें रावणके आने की मांति सज्जनों में वह दुर्जन आया था । उसके गाल परकी वज्रमुक्की और लला- टपत्र परका कालाचर्चाद जीते जी-कभी न भूला जायगा। था। 1 प्रकरण ५वा ६३ . मूर्तिमान पुरुषार्थके ऐसा नरपुगव यौवन भरा कुमार सघ इकट्ठा हुआ था। इसमें वही एक मदोन्मत्त साढ था । उसकी ऑखें ही फूल गई थीं। खेल जमा । दररन्तकी शाखा शाखापर पत्तोंके जाली झरोखोंमें शुकोंके समान कुमार चढ बैठे । शाखाओंके झूलोंपर कुमार झूल रहे थे । दाव वाला छूनेको आया कि तोतोंकी साकलें पकड पकडकर कुमार नीचे उतर जाते और दूसरे बडपर जा चढते थे । पचवटीके पत्तेभी खड सह करते हँसते थे मानो कौमारकी हवा उसेभी न लग गई हो। दाववाला मुझे पकडनेको आया । मै आगे और वह पीछे, इस तरह हम बड़की चोटी पर चढे । एक ताल भरका अन्तर रह गया था ओर मै पकडाही जाता । इतने ही दूसरे बडकी एक प्रचढ शाखा इस बडकी शासाओंमें गुथी हुई देख पडी । सब शाखाओंको मैने हिला देखा और इस वृक्षसेतुपर पैर रक्सा । कौमार वृन्द देखने लगा कि यह क्या करता है । मै उस सेतुपर सडा था और शिर-परकी एक शाखको पकडे हुए था । खेल खेलने वाले कुमारोंने बसिया छेडी और कहा, कालीनागके फनपर मानो श्रीकृष्णचन्द्र है ! सर्पने आखें नचाते हुए कहा परन्तु गोपराजों की गोपिकायें कहा है ? सर्पका ध्यान वातो में था। इतनेमें ही दाव वालेने हूँ कर कुदर्की लगाई, मानों हनुमान जीने सागर उलाघा । सर्प की शासापर उतरकर सर्पको डूलिया और अपना दाव सर्पपर डाल दिया । सपने कहा, आ मेरी गोपी ! सटाक करता हुआ चाबुकका सटाका पड़े इस तरह दाव वालके हायके तमाचे का फटाका पड़ा और सर्प बड परसे नीचे धूलमें लुड़क . .

उपा पड़ा। मजाकी सब-के-सब कह कहा लगाकर बोल उठे. देखो भैया देखो ! लम्बा चौडा रुई का बोरा लुडक गया ! फंस तो न गया ? सच मुच वह सर्प ही था । हृदयकी विशालता से हीन वह सिरोके सोटेके ऐसा चौडाई हीन केवल लम्बाई ही था । काम सूत्र में की विभगी रस मूर्तियों का अनुकरण करके वह अगमें तीन बल डाला करताथा । उमकी पुतीलयों में मोहपराधीनता के जादुई मंत्र चकचकाते थे । उलकी त्वचा तेजस्वी थी परन्तु उसके भीतर जहर भरा था । विषकी जगह अमृत होता तो उसका रूप देवके ऐसा दीख पड़ता। फिर खेल प्रारम्भ हुआ । कुमारोंने बसिया बजाई और कोयलें बुलाई। पचवटीकी वटघटाकी पत्ती पत्तीसे टकराता हुआ बसीका कोकिल-राग वटघटाकी सघनतामें छागया । रावण रामकोही खोजता था इसी तरह वह ( सर्प) मुझेही खोज रहा था । एक शाखासे दूसरी शाखापर और, एक पानके झरोखेसे दूसरे पानके झरोखेपर, घटाकी गहराईभे हम घूम रथे थे । दूसरे उस पर पत्ते डालते, टेंटोंकी गोलिया मारते, ललचाते, खिजाते, चिडाते, तकलीफ पहुंचाते, परन्तु नहीं । सर्प तो इसवक्त एकटक हो रहा था। अनेक शिख होकर उडनेवाले किरणके ऐसे उसके नयन इस समय एक ज्योति हो रहे थे । मुझे ध्यान आया कि इतनी एकाग्रताका योग्यबल सन्मार्गकी ओर लगाये तो शंतान न रहकर यह फरिश्ता न हो जाय? वटकी घटमालामें दोडते-कूदते एक छोटे खावडेकी ऐसी खाई आई। व्यायामशाला मुझे स्मरण हो आई । मैने व्यायामका प्रयोग किया । एक शासापर बैठकर कूदा, दूसरी शाखाको जा पकड़ी । उसपर अगको झुलाया और अगली शाखामें पैरॉकी बेडी जा डाली । इस तरह मैं ।

प्रकरण ५वा उस साईको पार कर गया और दूसरे किनारे दूर परे निश्चिन्त होकर बैठ गया। मानवजातिके वापदादे और बड़े बूढे पुच्छविलासी कपिवशके थे इसकी सास त्रेतायुगकी रामायण दे रही है, और कलियुगकी नई सास हम दे रहे थे। तो भी कितने ही लोग पूर्व क्था के सबूत मागते हे । फन-सी नाकको फुलाता और श्वासोच्छ्रास को उछालना हुआ-हापता हुआ नाग खाई के पास आया और रुक गया । खाई की चौडाई को ताका और पातालतककी उसकी गहराई निगाह की डोरी से नापी । पचवटी को जीतना हो इस तरह उसने धोती का कच्छ मारा । खाई की पालकी शार पर बेठा । ऊपर नीचे, आस-पास, वटघटाकी खिड- कियों में कुमारवृन्द दूर दूर खडा था और पत्र ध्वट की जाली में से उसके नयन देख रहे थे। वटके टीटे की एक हरी २ गोली अचानक आई और भंवरीके ऐसी उसकी नाकपर डक मार गई । कतराई दुई दृष्टि-कटारी सर्पने ऊपर फैकी और चारों ओर घटाघेरेमें कुमार ह्स पढे मानो हास्यके महावायुकी लहर ही न फैल गई हो । उसकी मवोंपर की रक्तरज्जू रुधिर मरने से फूली और उसके लोचन- में लोहूकी लालिमा छागई । सर्प ने सोचा कि खाई नहीं कूदी जाती इससे सव हस रहे हैं। उसके हृदय में हास्यके भी ढक लगे । जोश और उत्साहमें जो बात होजाती है वह उनके शात होजाने पर नहीं सिद्ध होती। चिन्तन और विचारणाके कितनी ही बार भार पडजाते है और इससे जो तीर लक्ष्यवेध करते वेही लक्ष्यसे नीचे पैरों में गिरजाते है । हास्यके डक लगने से सर्पको खिन्नता हुई और इससे उसकी आत्माके चापकी पिणछ ढीली पडगई । सर्प से लक्ष्यवेध नहीं हुआ । डुबकी लगाता हो इस तरह लम्बे हाथ कर उषा. कूदा परन्तु चूक गया । साम्हे की शाखा को अगुलियोंसे छुआ, कुछ देर हवा में रुका और फिर शिलाके ऐसा पड़ गया। मानो स्वर्ग से शैतान न गिर गया हो। पाप में पुण्यके ऐसा ही बल है परन्तु पुण्यके बाण लक्ष्यवेधी होते है और पापके तीर लक्ष्यवेधी नहीं होते। पापके तीर छुये-न छुये-होते है। पापके तीर भी आत्मभेदी होते तो आज जगत आत्महीनही होता । शैतानसे प्रभु जितना बड़ा है उतने ही बडे पापसे पुण्य हैं। खेल पूरा हुआ। जेबकी कोयलों के ऐसी बसिया सबने छेडी । पुरुषर्षमके ऐसी यौवन और पुरुषार्थ की बलमूर्तिया खड़ी थीं। एक ने कहा मेरी बंसी में कोई बोल रहा है ॥ दूसरने कहा मेरी बसी में कोई ठहर जाता है। तीसरे ने कहा मेरी चसी में उपाके गीत छेडता हूँ तो बसी बोलती ही नहीं-मधुर गान गाये ही नहीं जाते । पीपलके पानकी तरह सर्पके और मेरे कान फरके । सर्प ने कहा राधा कोतो कृष्णबसी ही नोता देती है। तेरी बसी तो वेसुरी है। जतर बजे और हरिणी आवे इस तरह, देख ! इस बसी की बुलाई उपा आवेगी अगका त्रिभग र उसने बंसीको अधर पर रक्खा | क्या मधुर उसका बोल था । बुल बुलसेभी धीमी, कोयलसेभी मीठी मानो विला. सके शीत्कारशब्दही न हो। पचवटीके पान-पानपर उसकी धुन छाने लगी। परन्तु यह कौनीवही है यह । सबके नयन उधरही लगे हुए थे, नगरके बाहर कुजमें शिवालय था । वहापर कुमारिकाओंके निज परिवारको लेकर साध्वी अध्यापिका दर्शनको जाती थी, मानो सौन्दर्यकी हरिणियोंका सघ ही न जारहा हो । सरिताओंकी लहरियोंके ऐसी उनकी पटलिया धीमे धीमे उछल रही थीं । जगतारण छोटी-छोटी नैयाओंके ऐसी पल्लेके बर्दवानको फहराती हुई श्यामाय वह रही थीं, । परन्तु कौमार- मकरण ५वा संघके अग्रभागमें कौन था ? यही थी वह, सौन्दर्य सेनाकी स्वामिनी । जगतको जीतनेके लिये कामदेवकी सेनाकी टुकडी निकली हो और उसकी अधिष्ठानी रतिरानी विजयपताका लिये आगे होले, इसी भाति युवतियोंकी अधिष्ठात्री उषा चल रही थी । पुष्प-धन्वाके धनुषके ऐसी पुष्पमालाकी बेल उसके ललाट देशपर लटक रही थी। सिर संवारा न था परन्तु खुली हुई बेणी की अलक-लट नागिनके ऐसी बल खाये हुए थी । सायकालमें सुनहली बदलियोंका सघ-परिवार जैसे आवे और चला जाय वैसे ही वे कुमारियॉ आई और पधार गई'। कुमार-हृदयों पर अलग अलग दश लगे और अलग अलग नशा हुआ । सर्प को उस अलकलट की नागन का जहर चहा और मुझे ? पुष्पलताकी पत्तिये का मद चढा । उस सपने कहा बन्दा झूठा पड नहीं सकता । कैसे न आवे ? विहशिनी-सी नगरकी घटाओं में उडती है वह कैसे उडती हुई न आवे? मेरी नाडिया टूटू-टूद होने लगी। मेरा श्वास गरम गरम निकलने लगा। मेरी भुजाओंमें ' वेग से खून उछलने लगा और मुझे जान पड़ने लगा कि मेरी भवें तनी जाती है । सर्प की वाग्धारा अविच्छिन्न बह रही थी । रस और विलास की जगह वह विषय की विपबाणी बरसा रहा था। कैसे न आवे ? बसी में फिर बुलाऊ तो मेरी हथेलीपर मैना की तरह उछलती हुई आ बैठे और गाती-गाती दाना चुगे । छूमतर मारू तो सीने से- उसके छूमतर फले और फटाकसे उसके दहने गालपर एक हथोडा पहा । वह मेरा मुका था। सारा कौमार मण्डल चौका । मेरी भवोंपर गुस्सा और नेत्राम कोप- ज्वाला कभी किसीने देखे न थे इससे सव आश्चर्यचकित हो एक टक । - उपा हो रहे । चारों ओर घेरा घालकर कुमार खडेथे, बीचोंबीच में और सर्प दोनों थे। विलासको इकठा कर रहा हो इस तरह बंसीके टुकडे करके उसने जेबमें रखली और छोटीसी गदाके ऐसी मुझी लेकर साम्हने आया, बाएं हाथकी मेरी दालथी और दाहिने हाथका विश्वकर्माक हथोडे-सा हथोड़ा था । उसके गदा प्रहारको अपनी ढालपर रोककर मैने उसके ललाटके कि बीचोंबीच वज्र हथोडा जमाया कि, उसके भालमें काला चॉद हो गया और नाकमेंसे लोहूकी धारा चलगई। कुमारोंने हम दोनोंको घेर लिया, कितनेही उसे एक ओर ले गये और उपचार करने लगे, और कितनों हीने मुझे रोका । मेरे बिखरे हुए बालोंको सवारते-सवारते एकने कहा-कि यह तो ब्राम्हण न रहकर रावण हुआ है। सौन्दर्यकी सात्विक पूजा होती है या अघोर पन्थी ? मेरी पुतलियोमें से आवेशक भाले छूट रहेथे उषाका कसूमा मुझे चढा था और ऐसा जान पड़ता था कि इस कसूमे के मैने केसरिया बाने ही न घार लिये हों। कुमार मण्डल बिसर रहा था सायकालको गोप मण्डल आवे और नगरके दरवाजेमें पहुचकर अलग अलग हो जाय से ही कुमार बिखर रहे थे जाते-जाते एकने कहा मासके भूखे राक्षस होतेहैं और भावके भूसे देव। दिवस अस्त हुआ और सायकालकी शीतलता फैली तब कहीं मेरे मदका उमराभी उतरा। मुझे वह यमका समय आजमी याद है। नशेबाज नहो उसे भी विश्वके चौकमें कभी कभी इसतरह का नशा चढ़ता है, प्रिया प्रेमकी रस-मुग्धताका उमरा इस तरह उछल पडता है। - प्रकरण ६ठा M MMM ANN vy- प्रकरण ६ ठा. जन्माएमी स थरामें परमात्मतत्व महोदधिका देहदेशमें जिस समय कृष्णारतार हुआथा उसी योग समय में हमार आत्मभावका भी देहभूमि में स्नेहाव- तार हुआ। जन्माष्टमी की आधी रात थी। चन्द्रमाकी नैया क्षितिज पर तैरती हुई आई थी । कृष्णमन्दिरकी पुष्पवाटिकामें देवमु- न्दरी सी उपाने और मैने, परस्परमें प्रथम प्रेमचुम्बन लिये मडपकी लताओंके मूल भिन्न होने पर भी हरियाली और कुसुम- राशि आपस में गुथ जाती है वैसे ही हमारे शरीरके द्वैत होने पर भी जीवनके परपुष्प उस समय प्रथित होगये थे । जगतके काव्यमें राधा- कृष्ण की रसीली जोडी कितनी ही रीतिसे अनुपम और अद्वितीय है । राधाकृष्णके कवित्व-मदिरमेंही हमारा भी स्नेहावतरण हुआ और रसमा. चकी कविता रचाई। त्रेता में सीताराम और द्वापर में राधाकृष्ण हुए थे, और ऐसा जान पड़ता था कि कलिमें उषा और में ही न हुए हो। वाचक, मुझे मूर्ख मान कर तू स्वय मूर्स न बनना तुझे क्या ऐसा न मालूम हुआ था? जयदेव को तो ऐसाही जान पड़ा था और उसने पद्मावती की रसलीला राधाजीके नामसे गीतगोविन्दमें गाई है। युग युग पहले श्रवणने पितृमक्ति कर नक्षत्र पद पाया था, उसी अवण नक्षनके भक्तिभावसे भरा हुआ महीना आया और ससारमें उपा - पुनर्जन्म के प्रोत्साहन की ऋतु बैठी। मन्दिर-मन्दिर पर मेले होने लगे और लोकसपकी जली-बली हुई वृत्तियां फिर अकुरती और अङ्कुराई हुई पनपती भी जान पड़ने लगी। वह नवीनजन्मका-सजीवनी मास था। ग्रीष्मकी ज्वाला को शान्त कर असाढ बरस गया था। धन की ग्रीष्मदग्ध वनस्पतिया नवजीवन पा रही थीं। सूसोंमें रससेचन हो रहा था । रसवालों में शाखायें फूट रही थीं। मेरी आयुष्यभर में न उगे थे वे अकुर उरमें और देहमें उगा कर आषाढ वरस गया था। इस सारे आपाढमें उपाने और मैंने मेघदूत पढा और आषाढीमावकी नपवर्षकी करिता जीवनमें छलकती हुई भर ली। आपाढस्य प्रथमदिवसे वाचक । प्रथम मेघदर्शन होनेपर तेरे भी एदयके महासागर में क्या तूफान नहीं उठे थे। और प्रियजन के पास प्रेमदूत तूने नहीं भेजा था ? काव्यों में कविजन स्वानुभव में सर्वानुभव के ही गान गाते है। वृक्ष वृक्ष पर पल्लव प्रकट हुए और हरियाली हंस रही थी भीतर से अनदीखी कोकिला कूकी । मेरे अन्तरकी लता पल्लवित हुई थी और भीतरसे पल्लवनिवासिनी कोकिला कूक रहीथी 'कुहू कुहू कुहू' मन्दिर मन्दिरमें मुझे उपाके दर्शन होते थे । श्रावण की भरी हुई बदलिया जैसी रसकी फूइया बरसाती है वैसीही अमृतकी फूइया उपा मुझपर बरसा जाती थी। सर्वदेवनमस्कारः केशवं मति गच्छति गानेवाली निकालवन्य आर्यकुलकी महाप्रजा धर्ममार्गमें विपुल उदारतावाली है। एक अभुकी अनेक कलाओंके स्तुतिगानोदाता वेदानुयायी देशमें सब देवोत्सवोंके अवसरपर लगभग सब सम्प्रदायोंके अनुयायी उत्सव मनानेवाले बनजाते हैं। एकही परब्रह्मके अनेक अवतारोंको माननेवाला लोक्समु- प्रकरण ६ठा. ७१ दाय विशिष्टरूपसे अनेक सम्प्रदायवाला होने पर भी तत्वत -एकमेवा- द्वितीयम्-का ही चिरकालसे उपासक है । सुबह, दोपहरको और सायकालमें दिन दिन, पहर पहर और घडी घडी-क्षणे क्षणे यशवता मुपैति -उस उपाकी अद्भुत रमयणीयताके कलावतार असख्य कलावतार एकही परम सौन्दर्यके कलावतार है । आर्यदेशमें सम्प्रदायोंके द्वीप नहीं है किन्तु एक अखड महासागरके ही सागरोपसागरके खडभेदके ऐसे आर्यधर्मके ये सम्प्रदाय उपसागर हैं । अनेक शाखाओंवाला एकही महाजलविस्तार फैला है । एकही मूलाधारके सृजन-प्राचीन जल-वेदा- म्बुनिधिक देवाम्बु-अनेकमहानदके नवनीरसे भरने उभरनेपर, घे सब उपसागरोंमें बहते हैं, भरतखडके सव सम्प्रदाय एकही देहके भिन्न भिन्न अवयव हैं, सबमें एकही जीवनरक्तका प्रवाह घूम रहा है । उपा और मै ऐसा ही मानते थे, सब सम्प्रदायी हो एकत्व भावी होते थे और इसीसे सब मन्दिरोंमें देवोंके और परस्परके पुण्यदर्शन करनेको जाया करते थे। पहिलीबार मैने उयाको फूलदिया। उसने उसे देवचरण पर चढा दिया। उस समय देवोंकी दिव्यता उघामूर्तिमें क्या प्रकट होरही ? परन्तु विषादके सूक्ष्म बदलका सूक्ष्म सूक्ष्म प्रतिबिम्ब मेरे मुखपर छाया डालकर उड गया और उपाने उसे देख लिया । सुन्दरीके सुन्दर नयन पुरुष नयनोंकी अपेक्षा सदा सूक्ष्मदर्शी होते है । इसके बाद उसने ऐसी भूल न की । मै देता वह लोक देवको नहीं परन्तु वह मेरी स्नेह देवीको चढाया करती थी, दूसरा मेला कल्याणचापके शिव मन्दिरका था । नगरके बाहर सरो- वर की कुजथी और कुंजमें सरोवरके किनारेपर वह मन्दिर था। मन्दि- रके घूमसकी सीढीपर फूलोंकी सही लेकर मैं सड़ा था और मन ही मन गुनगुना रहाथा 'मेहवा! मेरा तू बीर सरवर पूरों चढारे।' सीदियोंके ७२ उपा. पास मूरतके ऐसा खडा होकर मैं उपाकी वाट देख रहाथा । मुझे कभी कभी चिन्ता हो आतीथी कि इसीतरह जीवनभर मुझे उपाकी बाट देखना पडेगा। सरोवरमें जिसतरह तरन् उछल रहीथीं वैसेही उपाकी तरगे 'मेरे हृदय में उछल रहीथीं। कुंजमेंसे वह सहेलियाके सघमे आई मानो पुष्पवाटिका में कोई पुष्पलता ही नहो ।पुष्पके समान उसके अंग नृत्य करतेथे पुष्पवाटिकाकी उसकी साडीथी । पल्लोंको पखडिया मन्दिरके समीरमें धीमे धीमे हिल रहीथीं। कामधेनुझी नन्दिनीळे पदोंसे वह दवमन्दिकी सीढियोंपर चढी । मैंने उसे तीन गुलावकमल दिये कल्याणचापके लिये एक और दो गगा व उमाके लिये । उपाने तीनों गुलाबकमल स्मितपूर्ण प्रसन्न मुखसे सत्कार पूर्वक लिये, और एक एक फूलोंकी खल्ली मालिनसे भी ली। आम्रके सरोवरके ऐसे उपाके नयनोंमें जलवल्लीकी ऐसी उपाकी दृष्टि नृत्य करहीथी। उपा देवमडपमें गई मानो मेरे आत्मा की मूर्तिही सचार न कर रहीहो । मेरे प्रारब्धका भरापूरा थाल लेकर ही न आरही हो इसतरह वह आई और अन्तरमें खाली कर गई-हृदयमेंके हृदयतत्त्वको लियेजा- रही हो इस तरह वह सिधार गई । मालनके दिये हुए फूल और बीलपत्रोंसे उपाने कल्याणचापका अभिषेक किया मेरे टिये हुए कमलगुलाव! एक वेणीमें गूथा और दो कचुकीके कुम्भोंपर रक्खें । स्थूल और सहम-मेरे सारे शरीरमें फव्वारे छूटे और हर्षकी धारा बरस पडी। उपाकी नयनभृकुटीके कल्याणचापमेंसे उस पुण्यतिथिको तरगें उठीर्थी उसकी भरतिया मेरे जीवनभरमें उमराती चली आरही है। उपाने ऐसे प्रकरण ६वा wwwmarwari- बाण मारे कि उस बाणकी बाणगगा-रामसेतुके पास धनुषकोटके साम्हने उछलने पाली गगासे भी विशेष महाप्रमत्तगगा अभीतक मेरे हृदयमें उउल रही है । इसजीवनके झर सूख जायगे तोभी वह न सूरसेगी। श्रावणी पूर्णिमाके दिन लोगोंने प्रायश्चित्त किये, ऋषितर्पण कर पाप जलाये और फिर नये सिरसे पुण्यपापके बहीखाते लिखना शुरू किया। ब्राह्मणोंने शरदरक्षाके आशीर्वाद कह भाविकोंके रक्षा बाधी । सच्चे वर्ककी रासी लेकर चन्द्रिका आई । मै न समझा और हंस पड़ा ओर बोला भी कि इस शरदमें मेरी रक्षा हो इसतरहका रहा नहीं जान पडता । चन्द्रिका रूसी, तमकी और राखी फैक कर चलदी। फैकी हुई राखी मेरे बालोंमें गुथ गई मानो तारन्धको फोड कर सुवर्णके वृक्ष पर सुवर्ण- फल ही न उगाहो | मैंने पीछे पीछे जा बहनको दक्षिणा देकर मनाई परन्तु न मानी । मैने कहा तेरे हियेके हीरेकी राखी दे ला, मै उसे दे आऊ। वर हँस पडी, रोसके बादल विखर गये, और बोली देनेको आई तब तो अपने लिये मानली । जगतभी अजब स्वार्थी है? तेरी रक्षा तो यह रही, देख, बाच, भीतर लिखा है उषा । ममी ब्राह्मण बन कर गया, और चन्द्रिकाके बरे हुए वरके शरदरक्षा बाध आया। स्नेहके स्वयवर जीतने के पहले कितने कितने वेश धारने पड़ते है कैसे कैसे वेश मजने होते हैं ! परन्तु सव्यसाची भी ब्राह्मणके वेशमें स्वयवरको जीता था न। उस दिनसे हम आपसमें प्रसन्नचित्त रहते है, और दुनियाके देढ- अकलवाले जिसे कौमारकी भूलें या योवनकी उच्छिालता कहते है उसे हम आत्माके चेतन मानते है । यौवनकी आखसे यौवनकी परीक्षा होती हो तो कितनेही ज्यादा नापास की जगह क्या पास नहों ! चन्द्रिका और वह, उषा और म, हम सबने एक दूसरेको पास कर दिये थे।

उषा. आयुर्दा वोंदा तेजस्विता वल चौथ के दिन मेरे पानीसे दिलने भी बलधारा, और-पत्र पुष्प फल-उपाके चरणोंपर रक्से । उस साझको उषा पुष्पोंके पदालङ्कार पहन कर सखियोंमें धूम रहीथी । उपा मेरे मुखभाव वाच रही थी, परन्तु मेरे लोचन तो उसकी चरण वन्दना करते हुए पदपुष्पोंमेही रम रहे थे। नागपञ्चमीके दिन नगरजन नाग पूजनेको जारहे थे परन्तु मैंने तो नागनकी पूजा की। कोई उठे उससे पहले उठा और कोई बीने उससे पहले पुष्पोयानके सर्वोत्तम पुष्प बीन लिये । चन्द्रिकासे कहा कि सर्पकी पुष्पकचुकी गूथ दे । जिस नागनके अमृतदंश मुझे लगे थे उसके अधर- दशकी मुझे इच्छा---लालसा रहतीथी । उस उपा की सखी-नागनके ऐसी वेणीफे चढाने के लिये और बिलकी भाति ढक लेनेके लिये वह पुष्पकचुकी मैने भेजी। लोकोंने भयसे विषपूजा की और मैंने स्नेहसे अमृत पूजा ।उषाको जब कभी मै कुछ भेजता तब भीतर एकही शब्द लिखता था, 'नेह एकबार आकाशमें चन्द्र उगा हुआ था। उषाकी उस नागनको चन्द्रि- काने पकड़ रक्खा था और कमलकंठको नमाकर उस चन्द्रमुखीको चन्द्राभिमुखीकर उसे चन्द्रिका पिलाई थी। नीलकठी न कर अमृतकठी की थी और हृदयके आवेशसे चन्द्रामृतका अभिषेक किया था पुष्पपरि- धान भेजते हुए मुझे उस सखीलीलाके स्मरण और साथही अभिलाष जो किसीको भोजनकलाकी प्रदर्शिनी भरना हो तो वह श्रावणके कृष्णपक्षकी छठको घरघरकी भोज्य सामग्रीकी चीजें इकही करे । लोगोंको नित्यमोजन करानेवाली अन्नपूर्णायें उस दिनको भोजनकलाका उत्सव दिन समझती हैं । वर्षांकी सजीवन की हुई सब वनस्पतियोंको लालाकर और उनमें अधूरे रहे हुए स्वादको सब पूर्ण करती है। प्रकृतिकी रक्खी मकरण ६ ठा ७५ www हुई अपूर्णताको पूर्ण करती है। जैसे नयनेन्द्रियके उत्सव होते हैं वैसेही स्वादेन्द्रियके पर्वका वह दिन है । बच्चों को धवानेके ऐसीही उमग प्रिया- ओंको सदाही होती है कि अपने प्रियजनको खाना बनाकर खिलावें और इस उमगका व्रत उस दिन मनाया जाता है । उपाने दोबाने मुझे भी भेजे थे परन्तु वैष्णवोंके छप्पन भोगकी सामग्रीमें भी ये नहीं आते होंगे। तालसुर नवसवादसे सगीतशास्त्री नवसगीत भजन करते है वैसेही स्वादके भिन्नभिन्न रसोंके मिश्रणसे उपाने कुछ नवीनही सृजन किया था, और प्रकृतिकृत्य कर वह सृष्टिकी सहधर्मिणी सखी बनी थी । प्रकृतिके समान स्त्रिया तो सदा सृजन करनेवालीही न हैं ? कितनीही पाककलाकी पुस्तकें बनाती है परन्तु पाक नहीं बना सकती । उषाका हाल उलटाही था। वह विविध पाक पकान बनाती थी परन्तु पकान पुस्तकें नहीं । ब्रह्माकी पुत्रीकी भाति उपा नये नये स्वाद उत्पन्न करती थी और लक्ष्मीकी पुत्रीकी तरह उन्हें पोसती थी। स्वादके रसशास्त्रके मानो दो काव्यही रचकर उपाने मुझे भेजे थे। मैंने चखे और उनके रस बहनकोमी चखाये । नयनको दर्शनसे, श्रवणको गीतसे, रसनाको भोजनसे, त्वचाको स्पर्शसे, प्राणेन्द्रियको निजसुवासनासे इस तरह पचेंद्रियको पचामृतसे परितृप्त करती हैं उन सुन्दरियोंको सदा धन्य हो! पुरुषवर्ग 1 कहो धन्य हो! धन्य हो! सुन्दरी महल न होता तो निश्चन्द्र और निस्तारक रातके ऐसा जगत अन्धकारमयही होता या नहीं ? पाचों ज्ञानेन्द्रियोंके, रसशानसे रसशून्य और अतृप्त रहनेपर आत्मा तृपातुर रहकर सूखता और नवपठन भी न लगते । ज्ञानेन्द्रियोंको रसजलसे सींचकर आत्माको परितृप्त करता हुआ सोन्दर्यपरिवार जगतमें चिरजीव रहो! ऐसा करते-करते वह देवविख्यात जन्माष्टमी आई, जगत के परम ७६ उपा बसीघरकी जन्मतिथि आई। गोकुल, मथुरा या वृन्दावन में भी नहीं मनाया जाता ऐसा वह जन्मोत्सव हमारे रसनगरमें सालोसाल मनाया जाता है। इस वर्षकी जन्माष्टमी के ऐसी आद्य जन्माएमी एक ही होगी या श्रीकृष्ण के जीवन भर भी जन्माष्टमिया हों-तो-हाँ। दशहरे के दिन प्रात कालसे ही अश्व थनगन-थनगन नाचने लगते हे वैसे ही, प्रात कालसे मेरे मनका अन्व आज थन थना रहा था। चन्द्रोदयके पहले जैसे प्रकाश आसमानपर उहते है वैसे कृष्णचन्द्रके जन्मयोग के प्रकाश के फुवारे पहले से ही उड रहे थे और उसके छीटों से मै भी छींटा जा रहा था। उस दिन आकाश स्वच्छ था आर बरसात हो नहीं रही थी। आका- शके द्वार खल गये हों इसतरह बादल बिसर रहे थे। तो भी लोग मानते थे कि बादल बरसेगे । वृद्ध कहते थे कि कोई जन्माष्टमी बरसे बिना खाली नहीं जाती। पृथ्वी तृप्तिमें लहरा रही थी। भरे हुए खेतों में गोपी गोप कल्लोल गीत गा रहे थे। पन्दरह तिथियोंकीसी कृष्णचन्द्रकी पन्दरह जन्माष्टमिया उषा पर बरस चुकी थीं और इस रसवर्षासे उपाके आयुष्यकी एक एक कला का पोषण हुआ था। नास्तिक के ऐसा मै बाईस जन्माष्टमीओंमें उसके बाईस अवतार हुए थे परन्तु व्यर्थ । ये सब जन्माष्टमिया हमारे हुई थी या नहीं परन्तु यह जन्माष्टमी तो हमारे जीवन की जन्मा- एमी थी। इसी तिथिको हमारे अन्तराकाश में पृथ्वी के प्रकाश प्रकट हुए। किसी महाप्रसगके अनुकूल देव मुहूर्तका तिथियोग विश्व में जमे ऐसा कुछ लोक लोचनसे न देख पड़ता था परन्तु वातावरण में प्रतिबिम्ब से उहते हुए जान पड़ते थे। सूर्यपर चन्द्रका छाया पडती है। उस प्रकरण ६ठा wnNAM whR- ग्रहण के दिन दो पहरके समय आसमान जैसे देवदूतों के निम्न उडत हैं वैसे ही विश्व उस दो पहरीकी धूप में उड रहे थे। दो पहरी के तेज- सरोवर में तेजजलकी ऊर्मिया उठल रही थीं और स्त्रीपुरुषोंके हृदयकी नौकायें उस रसपूर में उछल रही थीं। जमनाके जल हिलें उस तरह भरे हुए आत्माके जल जनकुल में हिल रहेथे । अन्तरिक्ष में से जो कुछ उतरे उसे झेलने के लिये अन्तरकी घडिया उखड़कर पट फैला हुआ था। बुद्ध को बोधीसत्व उतरे वैसे हमारे जीवनसत्व उस तिथि को उतरे । प्रिय और पूज्य तिथिके आनेके पहले जैसे गृहागण बुहार झाडकर साफ किया जाय वैसेही स्वच्छ किया हुआ मुझे अपने अन्तरका चौक और जगत जान पडता था । आदरके स्वस्तिक उसमें बनाये गये थे। मुमुक्षुओंको ब्रह्मजन्मकी तिथि होती है वैसेही वह हमारे जीवन- जन्मकी तिथि थी। प्रातःकालमें श्रीमद्भागवतमें की जन्मस्तुति गाता हुआ मै उठा । चन्द्रिका गोपीगीत गा रही थी। माताजी मगलाके दर्शन करके आये थे। चन्द्रिकाके झरोकेके नीचसे प्रात कालिक कोकिलकीसी बसी बोलती बोलती चली गई। दातुन करते हुए चन्द्रिकासे मैंने कहा मैंने सुना है हो । वह कोकिला न थी । चन्द्रिकाने कहा नहीं, वह कोकिला न थी, कोकिल था- राधारानी न थी, मेरा कृष्णचन्द्र था । क्या भाईको राधाजी की लगन उस सारे दिन मुझे उषा की धुन रही । प्रभातमें पनघटपर उपाको हेरादा, वह वहाँ न थी 1 नगरके चौक उसके बिना सूने थे। कन्या पाठशालामें आज छुट्टी थी और सीखने के लिये नहीं परन्तु सिखानेके मिससे भी आज वहां उपाका आगमन नहीं था । उपाकी हवेलीके घर- उधा, - बार खिड़की दरवाजे सब निर्जन थे। यह आख अभीतक अटारीके नहा लगी थी जो जगतको प्रकाशित करनेवाली थी। उस कृष्णजन्माष्टमीके दिन मैने उपवास किया था। भगवानके परम भक्त सदाके उपवासीही होते है । उन्हें भक्तिके भोजनसे तृप्ति हो यह अशम्य है। वे तो ऐसेही उचारते हैं कि-तृप्तिर्हि नास्ति मेऽमृतम्- मुझे जान पड़ता है कि इसीसे उपाके अमृतकी मुझे आजतक-अबभी तृप्ति नहीं है। प्रियतमाके सयोग और वियोग दोनों प्रियतमको अतृप्तही रखते हैं। 'एकमें अमृतका आचमन या अजलि पीनेको मिलती है तो दूसरेमें अमृतसरोवरके केवल दर्शनही होते है या वे भी नहीं होते। परन्तु प्रिय- तमाके अमृतसे तृप्त हुआ प्रियतम न तो आजतक देखही पडा और न सुननेही आया । मै अपनी उपाका जीवनभरका प्यासाही हू । वाचक! और मुझे तो यहभी खातरी है कि तूमी अपनी उपासे तृप्त नहीं हो चुका; अच्छा तूही बता कि क्या मै गलत कह रहा हू ? उस दिन मुझे अपने स्थान मथुराके जैलके समान जान पडे । प्रार- ब्धका कंस खगलिये हुए सडाथा और उसकी छाया मेरे जीवनका वेध कर रही थी । उपासूनी दिशायें राधासूनी कुजगलीसी भासती थी। मुझे शून्यके स्वम आरहेथे । नगरके वैष्णवोंमें उत्सवका ज्वार चढरहथा परन्तु मेरे उरमें उपाका माटा आरहा था । मेरी वैष्णवी वृत्ति संकु- चित होगई थी। कृष्णजन्मके समय प्रकृति जिस प्रेमसे विव्हल उत्कठित और आतुर हुई खडी थी, उसी उत्कठा और आतुरताकी विव्हलता मेरे अन्तरको विलोये डालती थी। मुझे प्रसक्वेदनाकीसी वेदना हो रहीथी, मानो मेरे 'देहदेशमें उपाका अवतार होनेकोही न हो! रात पडी और भाविकभक्तोंकी भावनायें रात्रिविकासी कमल कुमुद की भाति प्रफुष्ठित हुई । परन्तु मेरी मावलताके पुष्प न खिले।

प्रकरण ६ठा मेरी आँखें विव्हल होकर किसी एकको सोज रही थीं कि जो आज 'मिलती नथी। अन्धकारकी भारी भारी झाडियोंकी गहरी घटायें जगतको दवाती हुई क्षितिजपर झुकी हुई थीं और भीतर आमिजीवके ऐसे तारे झल- मला रहेथे । ऑम्वापर पलकें गिरती है इसतरह रातका अधेर पिछोडा नगरपर पडगया था। कोई कहते हैं कि सृजनके पहले अन्धकार उडताथा और उस अन्धकारके उदर में विश्वगर्भ विराजमान था । जन्माष्टमीकी अधेरी रात भी काली साडीके घेरेकीसी जान पडती थी और भीतर सुन्दरीके सुन्दर देहकीसी सृष्टि-सुन्दरी शोमा देती थी। नगरके राजमार्ग सचेत हुए। धीरेधीरे दर्शनाभिलापियोंकी जलवि- न्दुकी धार बनी, धाराओंके निर्झर हुए, निर्झरके प्रपात हुए और प्रपा- तोंकी भी थोड़े समयमें खलखलाट करती हुई सरितायें हो गई । देव मन्दिरके मार्ग चेतनसे उभर रहेथे । उनके पैरोंके आसपास और ऊपर तिमिरकी सीढिया लगी हुई थीं परन्तु उस तमिस्राको धोनेके लिये ही प्रभुका अवतार होनेको था । मेरे हृदयकी तमिस्राको उपा घोवेगी याक्या? इस प्रश्नको पूछते-पूछते जिज्ञासु-अवस्थामें ही मैं दर्शन करनेको चला । परन्तु जिज्ञासु के लिये ज्ञान और मुमुक्षुके लिये मोक्ष क्या दुर्गम है । रातको राजमार्गकी नहरोंमें भक्तोंके पूर उभर रहेथे । मूर्तिमान भाव- की तरगे चलती हुई भासती थीं । मै भी अपने मनोमावकी मूर्तिके ऐसा इन लहरोंमें मिल गया । कोई कहोगे कि जगतभरके ज्योति हैं उन्हें कृष्ण क्यों कहे ? आत्माको देहके परिधान पिन्हाये और ब्रह्मको ब्रह्माण्डके परदोंमें रख छोडा उस महामाया की अकलित कला है । काले काचके फानूसमें अमृतदी- । उथा. पक रक्खे इसतरह जगज्योतिको श्यामरगमें रगा और स्नेहज्योतिको कामवर्ण दिया, इसीको कहते है-मम माया दुरत्यया । जगतको देखने वाली पुतलीभी प्रभुने श्यामरगकी ही की है। मन्दिरके द्वारपर उपा और उसका कुलमडल था । उनके दर्शन करता हुआ मैं देवके द्वारमें खडा रहा । मै लङ्काके उत्तर किनारेपर था और उषा कन्या कुमारीके दक्षिण किनारे पर विराजमान थी। सागरपरके रामसेतुके समान जनसागरपर हमारा दृष्टिसेतु बॅधा । उपाके नेत्रोंमें प्रभुके आगामी तेज अवतीर्ण हुएथे। ऐसा जानपड- ताथा कि मन्दिरकी दीपमालिकाके सब दीपकोंकी किरणें मानों इन पुत- लियामे ही इकही न होगई हों । मेघघटामेंसे बिजली चमके इसतरह इमका पलकोंकी बॉफनों से दृष्टि बिजली चमक रहीथी। लतामेंसे पुष्प खिरे, गोमडलसे धेनु बिछडे, इसतरह कुलमडलीसे एका एक उपा अलग पडगई और मानवजल प्रवाहमें खिंचती हुई उसकी नाव मेरे बरदान में आगई । हथेलीकी पत्तियोंसे मेरे अगुली विटपको दवा और मेरा सत्कार करते हुए बोली मेरे समस्त जीवन के कृष्णचन्द्र ! मैं चौका । इस रसबोल का रणकार कुछ अनेरा ही था। एक कलके धुभाने पर पानीकी नल शाखाओंमें सरोवरके जलपूर धगधगाने लगते हैं वैसे ही मेरी नाडियोंकी शाखाओंमें हृदयके रुधिरपूर गर्जने लगे। मुझे ऐसा जान पडा कि आजका सयोग ही अनोखा है। मनुष्य मेदिनीकी तरगमाला हमें मन्दिर चोकमें धकेलती हुई ले गई। सेवनासे सेवनी मिलाकर दो नावें महासागरके मोजोमें सञ्चार करे वैसेही हम जन सागरमें जारहे थें । अन्धेरे आसमानमें असख्य तारकावली तरवरती है वैसे ही मन्दिर चोकके सुले मडपमे भी अगणित दीपमालिकाकी शिसाए झलमला रही थी। वह दीपमालिका ऐसी अदभुत शुति दिखारही थी कि मन्दिरसुन्दरी प्रकरण ६ ठा के केशपाशमें हृदयदेशमें कटिप्रान्तमें और चरणोंमें प्रकाशमान लम्बेमोतियोंके शीसफूल नोसरहार क्षुद्रघन्टिका कटिमेखला और घुघ- रुवाले रमझोलही न पहनाये हों देवदार पर अभी परदे थे, दर्शन में अभी देर थी। मनुष्य जल की मोजें जहाँ उछल रही हों वहाँ एकस्थ रहना-लगर की बज्र खूटीके विनातो-अशक्य ही था। जन मोज में तैरते तैरते हम इस जलके किनारे के पास गये और किनारे पर उतर गये। वहाँपर तो नववर्षाके नीरसे साँचीहुई पुष्पप्रफुल्लित फूलवाडी थी फूलोंके पौधौपर फूल उभर रहेथे मानो गगनके तारे जगतमें न विसर गयेहों। फुवारोंकी जलधारायें उछल रहीथीं मानो पृथ्वीके हृदयके रस की धारायेही उछल न रही हों। शरदके स्वच्छ जलके समान उपाकी अखियाओंके तेज इस अन्धेरी रातमें भी पूर्ण निर्मल प्रकाश फैला रहेथे और शरद की चन्द्रिका के समान अमृतोज्ज्वल शोभा दे रहे थे। फूलवाढी की पसडियाँ जैसे पोढी हुई थीं वैसे ही हमारेभी दिल की पखडियाँ उस स्वच्छ वातावरण में नमी, ढली और घडी भरके लिए पोढ गई । उपाने कहा, आज सुबूसे मेरे उरमें वसी बज रही है । मैंने कहा, ये नेहके अनहद नाद है। चन्द्रके फिरने पर तेजोवर्तुल जैसे फिरता है वैसेही हमारी करमा- लाये एक दूसरेकी कटि मेखला बनकर लिपट गई । लता जैसे लतामें गये, और सखी सखीसे मिले वैसेही हमारे देहकी गूथन अविकारी और अन्यय थी। हमारी पलकें फरकती न थीं और एकभी रोमके किरणवाणम विषका विकार या दश न था । पृथ्वी पर खड़े होकर भी हम पृथ्वी को गये थे, पोखसे पास भिडाकर आत्मभूमि में उड रहे थे। परन्तु उस रातको तो हमारे देहमहलमें सूर्य उगे थे। ६ मल ૮૨ उपा ससार की फूक लग रही हो, दिशा दिशाकी सूचना हो रही हो, जग- त्प्रवाहका सीत्कार आरहा हो इस तरह उस समय एक हलकीसी वायुकी लहर आई और फूलोंके पौधे हिले। पृथ्वीके उरके परिमल सौरम फैला रहे हों, नयनोंके अमृत खुलते हों, देहमन्दार महकते हो इसतरह हिलते हुए पुष्प पौधोंकी कुसुम सुरभिने हमें बघाया और हमारे देह प्रासादकी खुली हुई खिडकियों के रसरगीले अन्तर सहमें वह जा उडी । देवालयमें धूप उढे वैसेही हमारी अन्तर गुहामें पृथ्वी के पुष्पोंके परिमल फैल गये । हमारी भी इस वसुन्धरा और गन्धवती के वसु और सुगन्ध पृथ्थीके परिमलोंने जागरित किये । निवास स्थानमें स्थिर रहे हुए आत्मदीपोंको इस परागलहरीने हिलाये । नहरों में पूर गरजे वैसे हमारी नाडियों में हृदयके पूर धबक्ने लगे। कुदरतके कितनेही बध इस क्षणों में टूटते हुए से जान पड़े। इतने में ही आरती की घटी बजी और त्रिलोकी पर जाहिर हुआ कि जगतके रसचन्द्र श्रीकृष्णचन्द्रका जन्मयोग फिर सालभर के बाद आया है । जन्मकी रातको जमनाका पूर उमडा था वैसाही भक्तोंका पूर आजभी उलटता था। उसी पलमें एक बदलीने जगतको अमृत छींटों से बधा लिया। उसी पलमें आकाशके महाजलमें तैरती-चलती चन्द्रमाकी नाव, श्रीबालकृष्णके ऐसे शशाङ्कको धारण किये हुए क्षितिज पर आ पहुची मानों ब्रह्मलोकमें से ब्रह्म ज्योतिको जगतमें न ला रही हो। इसी पलमे हमारे भी स्नेहज्योतिका जगमें अवतार हुआ । कटि- प्रान्त से हटकर मेरा हाथ उपाके केशपाश पर गया और नीचकी ओर पुष्पोंको देखती हुई उपाको उन्मुखी-चन्द्राभिमुखी कर चन्द्रस्थित श्रीकृष्णचन्द्र के दर्शन कराये और-चन्द्रिकाके रसाभिषेक की याद कर प्रकरण ६ ठा कर-इस ज्योत्स्नाकी अञ्जली अञ्जली से उपाके मुखचन्द्रको अभि- पिक्त किया। उपाने मेरी असियों में देखा शतदल कमलके ऐसा उसका मुख- कमल प्रफुल्लित हो रहा था और दिशादिशामें उसकी पॅखडियोंकी 'किरने फैल रही थीं। मेरा मुसारविन्द उसकी मिहमानी करनेको गया और कमलपत्रिका से पत्रिका चापी जाय उसतरह हमारे अधरोने एक दूसरेको चापा। प्रेमके प्रथम चुम्बनका अमृतप्याला दोएक घडी हमने सूब चूसचूस कर पिया । अहो । आयुप्यकी वह दिव्यपल ! रसचन्द्रिकामें झूमते-झूमते, सच्चिदानन्द के रसझूले पर झूलते-झूलने, हम जगतके रसानन्दकी आरा- धना कर रहे थे । ऐसा सुन्दर उस समयका हमारा घन्य जीवनयोग था। इस तरह गुथे हुए जीवन क्या कभी अलग हो सकते है ? सरोवरकी पालों को फोडकर जैसे जलका प्रवाह बहता है वैसे ही हमारे अधरकी पालों पर से परस्पर में प्रेम प्रवाह बह रहा था। हमारी करलता देहके रसाल पर लिपटी हुई थीं अतएव नयनोंको नमाकर बालमुकुन्दकी रसकलाको नमस्कार किये और उस रसमूर्तिको हृदयके सिहासन पर पधरा लिया । चन्द्रिका चमकने लगी। वह हमें तो ऐसी जान पड़ने लगी कि हमारे उरदेशों के राधाकृष्णकी रसचमक ही जगत भरमे न चमक रही हो। वाचक देहखोली के जीवों के अरसपरस बदलनेका तो तूने अनु- भव किया है न ? हमारे तो ऐसा ही हुआ था। मेरा जीवनज्योति उपाकी देहशाखामें जा बैठा और उपाका जीवनज्योति मेरी देहा शाखामें। उस प्रथम प्रेमचुम्बनकी पावन उिनमें हमें तो ऐसा ही भान हुआ। इस तरह हमारे तो प्रेम प्रभुका कामावतार हुआ। ।

- प्रकरण ७वा। शरद पूर्णिमा। ह रसीली रात आई कि जिस रातका मोह प्रभुको भी हुआ था, वह चांद उगा कि जिसे छह महीने तक प्रभुने आसमान पर रोक रक्सा था और असड अमृत झले थे। शरदपूर्णिमा जैसे सब पूर्णिमाओंकी रानी है वैसे ही, क्वल कुमारिकाओंकी कलिकाओं की ही नहीं, परतु पूर्णिमाओंकीसी सुन्दरियों की भी उषा सौन्दर्यरानी है। उसी रातको यह मेरी समझमें आया कि ससारजीवन के विलास और लीला, प्रकाश और सच्चिदानन्द है। आकाश और पृथ्वी के मैल धो धो कर वर्षा बीत गई थी । व्योम और वातावरण-उपाके अग और अम्बर के समान निर्मल और उज्ज्वल हो गये थे। उपाके अवयव अवयव पर प्रकट हुई किरणावली के ऐसी वनकी वनश्री प्रफुल्लित हो गई थी । अहमी के दिन देवीने असुर मारा था, और दशमी के दिन रघुवीर देवने राक्षसराजका वध किया था । समझे-बेसमझे लोकसपने इसके उत्सव किये । कोई कहोगे कि कितनी-कितनी मानव देविया और कितने कितने मानवदेव इन तिथियोंके दिन अपने हृदयमें के दैत्योंका सहार करते है ? लकाविजयके राम महोत्सवोंको पालती हुई राजाओंकी सवारिया राजनगरों में निकली परन्तु उषाके रसमहोत्सवकी राजसी सवारी की सजधज उस दिन अलौकिक ही थी।

प्रकरण ७वा rahenviron- -- इसके बाद शरदपूर्णिमाका सूर्य उगा, अस्त हुआ और साझ पडी, जगतके नयन आशा मरी दृष्टि से पूर्वकी ओर देख रहे थे । उस एक ही चन्द्रके दर्शनीका सवको अभिलाप था कि जो चन्द्र बारह महीने में एक ही बार दर्शन देता है। धीरे धीरे साझ पर रातके रंग चढने लगे, धीरे धीरे इस रातके रगमें तेज किरण प्रकट होने लगे। ऐसा आभास हुआ कि अन्धकार भी मानो उज्ज्वल ही न हो । सुन्दरिओके अगकीसी पृथ्वी भी तेजस्वी हुई । रसकी राजकुमारिका के ऐसी पूर्णिमाकी चन्द्रकला गगनके तरतपर आ बिराजी। उस रातको तेज-छाया के छज जगतमरमें उड़ रहे थे और पृथ्वी पर फैल रहे थे। जैसी जासमान के तख्त पर यह पूर्णिमा थी वैसी ही मेरे हृदयके सिंहासन पर उपा प्रकाशमान थी मानो मेरे जीवनकुजकी शरद चन्द्रिका ही न हो। देहके आयुष्य कितने वर्षके है इसका अडसट्टा में जानता हूँ । परन्तु यह तो कोई समझादो कि आत्माके आयुष्य कितने युगके है । मुझे ऐसा जान पडता है कि उस रातको जो शरद पूर्णिमा मेरे आत्मनह्माण्ड में उगी है वह तो युग युग तक तपेगी। नगरजनोने स्वच्छ श्वेत वस्त्र पहने थे मानो चादनीके ही वस्त्र न हों, मानो सबके प्रकटहुए पुग्योंके परिधान ही नहीं । मैं भी मलमलका एक कुर्ता पहनकर चादनी में निकल पडा सफेद किनारी की सफेद धोती थी मानो दूधकी किनार वाली ही धोती न हो। मुहल्लोमें भीडभाड़ थी । नगरके चौकमें लोकोंकी धामधूम थी। घरोंके द्वारों में लोगों में मेदिनी जमी थी । लोकों का महासागर तुफान पर था और अनेक उपसागरों में भरती पहुचती थी-उभरती थी। जगत के उपा AAAAM wwA wnnnrview . - सुभाग्यका सा चन्द्रिकाका महोदवि आसमानमें उठा । जैसे जैसे भरती जमती गई वैसे वैसे तूफान कम हुआ । चन्द्रिका और मानवोंके महासागर को बडी बडी तरङ्गों के आन्दोलन प्रारम्भ हुए। सृजन समय में पद्मके झूले पर जैसे ब्रह्माजी झुलते थे वैसे ही रसके झूले पर चन्द्र और मै आज झूल रहे थे और कुछ कुछ तेज सृष्टिकी रचना कर रहे थे। ' व्योम सुन्दरी के वदनमें से बरसते हुए स्मितके पीयूष-प्रकाश हमारे नगर पर गिर रहे थे। नव रात्री के गीत पूरे हो गये थे । दिन दिन चन्द्रमाकी एक एक कला वढती गई । प्रत्येक गतको चन्द्रिका की बहार विशेष विशेष खिलनी गई । लोगों के अन्तर का उभरा भी दिन प्रति दिन चढता गया । इस भरती के रसोत्सव का आज पर्व था। किस के हृदय में गोप गोपी के भाव नहीं है ? जल शून्य जमना नहीं है और न अमृतशून्य चन्द्र है । सुधाकर सुधा बरसाता है उस जगत में और निरन्तर बहती हुई रसयमुना के तौर पर बसनेवाले मधु- वनके सब नरनारी गोपगोपी ही है और रसके रास ही रचते है या रचना चाहते है। वृन्दावन की उस छह मासी पूर्णिमा की आज सुन्दर तिथि थी। कटोरे भरभर कर मानों चन्द्रिका का ही पान कर रहे हो इस तरह खीरका पान करते हुए नगरजनों को देखता हुआ मै ज्योत्स्ना के पूरमें बह रहा था । जगह जगह लोकोंने दीपमाला की थी किन्तु प्रकाश- हीन दीपशिखाये नीमकी पीली पीली पत्तियों सी जान पडती थीं। पूर्णिमाकी भी न्यूनता को पूर्ण करने वाले संसार में है सही? इतने में ही चांदनीमें तैरता हुआ रासके संगीत का शब्द दूरसे आया।

प्रकरण ७वा ८७ ? हरि वेणु बजाते है धनमें, वृन्दावन में हरि की बेणु वजी और गोपी सघको आमन्त्रण होने पर तनमनाट हुआ, इसीका गीत नगरकी नारियोंका समुदाय गा रहा था। लगी लगी तालाबेली मेरे तनमे । हरि वेणु वजाते हैं वनमे, शान्त सरोवर में ककरी के गिरने की माति मेरे अन्तर के जलमें करी गिरी और धीरे धीरे लहरें उठने लगीं । वेणुके टहुके जगे नहीं, वे तालाबेली के शब्द से भडक उठे । रोम रोम में ऊर्मिया उछलने लगी मानों पूछने लगी कि कहा है हमारा चन्द्रमा ? मेरा उदधि उपाके दर्शन के लिये गर्जना करने लगा। सौदर्यकी साडियों के ऐसा उन सखियों को पार कर मे उपाकी खोजमें निकला । पूर्णिमा का दूसरा प्रहर जमा । मध्यरात होने में अब भी विलम्ब था । कौन से रस चौकके रासमडल में उषा घूमती थी सो मै मैं उसी ओर चला । अन्तर तो पाखों पर सवार हो उपाकी परिक्रमा करता हुआ ही उड़ रहा था। पूर्ण कला के तेजवृन्द को फैलाकर तारिकाओंके वर्तुलवृन्द में चलती हुई चन्द्रज्योति तो आख भरकर कई बार देखी है न ? इनमें की सर्वोत्तम पूर्णिमा की याद करो तो उपाके सखी महल में का रस- वहन कुछ समझ पडेगा। इस चौक का नाम रतनचौक था । क्यों कि रतन हवेलियों में रतन के ऐसे सज्जन और रतनके ऐसी सन्नारिया रहती थीं। उनकी सद्भावनाओंके रतन वहा पर निरन्तर चमका करते थे। आज भी आखिया के रतन वहा पर अनुपम चमक दिखला रहे थे। इतने में ही एक चमत्कारी तमाशा आया । ऐसा जान पड़ता था कि पृथ्वी पृथ्वी के सूरज ही न हो! झूमरे लटक रहे थे और झूम में जानता था, उपा w hvnAAAAA Aware . के दीपकों के इतना रस दीपिकाओं की सी रसिकायें रास रम रही थीं सब सखिया बालमोंको सन्देश भेज रही थीं और सब अपनी अपनी दिशामें किरण फैला रही थीं। कुजलडीरी! सन्देश हमारा बालम को जा कहना री। अलबेलियों के अग अग से चिनगारिया उड़ रही थी और दिशा- दिशा में जा कर ज्वाला पैदा करती थीं। सबके दिलकी कुज विहगिया दृष्टि की पारख से उडती और रसि- काओं के रस सन्देश रसिक्वरों को सुना आती थीं। विव्हल पछिनी की-सी उपाकी दृष्टि उस जन घटा में व्यर्थ तडपती, उड उड कर पीछी लौटती और निराश हो देहकी शासा पर बैठती हुई मैने देखी । इतने में ही एक दूसरी सहेलीके चकोरकेसे लोचन अपने चन्द्रको खोजने के लिये उडे । इसी छिनमें उधाने मुझे निरख लिया। निरखा कि स्मितकी सौन्दर्य झलक से सत्कार किया । पाखों की सी पलकों को नमाकर नमन किया । उरके सन्देशको सुननेवाला सन्मुख खडा' ह इसका अनुभव होते ही आज का गीत निर्थक नहीं है-इस उल्लास के विलोल प्रकाश विकसित पुतलियों में चमकने लगे। इसके बाद क्या गीत गाया गया इसकी मुझे खबर नहीं है । मेरी इन्द्रिया नयन में आ बसी थीं ओर नयन उपामें जा बसे थे। उपा रासमटल घूमती थी वैसे ही नयन भी घूमर दे रहे थे । इस रातको मुझे एक प्रश्न उठा कि उज्ज्वल पूर्णिमा की रातको आस- मान के परिधान क्यों पिन्हाये गये है ? उषाके अग पर भी रात की- सी श्याम साडी थी और भीतर से सुनहरी-रूपहरी तारे झलमलाते थे। बीचमें चन्द्रमा के ऐसा मुखचन्द्र प्रकाशित हो रहा था । शरदपूर्णिमा प्रकरण ७वा wwwwwwwwwwA के गगन की ही मूरत पृथ्वीपटल पर घूम रही हो इस तरह उपा घूम रही थी। गहनता के आमरण जैसे उसक आत्मतत्व के थे वैसे ही उसके देहतत्व के भी थे। कुडके गहरे जलमें लहों उछल रही हों वैसे ही उसकी साडी में लहरें चल रही थीं। बीचमें हृदय देशको उपा रगी चोलीने झेल रस्सा था । भीतर कमल गुथे हुए थे । भवरे के ऐसा मेरा जीव इन कमलोंकी कालियों में बन्द हो रहा था। यह गीत पूर्ण हो गया उपा खडी हो रही तब कहीं मुझे जान पडा कि गीत पूरा हुआ। इतनेमें ही फिर रासका प्रारम्भ हुआ । गोपियों के गीत की धुन नगर की होलियों को पार करती हुई फैली मेरे मनमोहन महाराज मेरे महेलों आयोना । सब गोपियों ने इस बोल को बडी हाँस के साथ अला, मानो सबके निजी मनोभाव ही उच्चरित न हुए हों इस प्रकार अपनी प्रियतम दिशाओकी ओर सब सुन्दरियोंने मुस्कराते हुए मुखसे इस गीतका प्रत्युच्चारण ध्वनि किया । सागर में भरती आने पर तटके जहाज लिने लगे इस तरह प्रेक्षक वग के वर्तुल में भी हलचल मची। मब सुन्दरिया के मुखपर रसतेज प्रकट हुए, इसी प्रकट हुई । उपाके अधर पर स्मित और लाजकी लहरें आ रही थीं। गुरुकी दो तारिका. ओंके से उसके दोनों नयन उज्ज्वल और प्रफुल्ल थे। वाल सिरूकी सी वह पूर्ण शोमा के साथ एक बार मेरे साम्हने सढी रही । ताली देते हुए नमस्कार कर पलको की पत्तियों से मुझे न्योता । सारे जीवन के कुजमें और उसके मी अगले पार ये नयनों के निमत्रण मुझे याद रहेंगे।

उपा. MAAmarn m.nawmarware मै तो तरसूं तुम्हारे काज हसके बुलायो ना। रसालोद्यान के रसालोंकी घटाओंको पार करती हुई कोपलों की परिदेवना कूफ उडती है, वैसे ही रासवैतालिकों की ये ध्वनिया सहकार- केसे रसमधुर रसिकोंकी अन्तर्वटाओं को पार करती हुई चली । सबके हृदयकी मजरिया झोले पर चढ़ी। यौवन की ऊष्मा और अभिनव अमिलापों के रगमें रंगी हुई एक युवती ने यौवन की रेलपेल चलाई। दुनिया में कौन से प्यारे किस प्यारे के लिये नहीं तरसते ? प्रिय. तमा की आरजू कौन से प्रियतम को नहीं होती ? भूस और प्यास के समान यह भी आत्माकी-प्रकृतिजन्य-भूख और प्यास है । परन्तु जो अखड एक दृष्टि है, जो स्नेह समाधिस्थ है, वे योगसिद्धिको पाते हैं । गस रचती हुई रसिकाओंकी भौहों की काली मछलिया अन्तरिक्षके जलम किलोलें करने लगी और सब श्यामाओंने गीतकी प्रति- ध्वनि की मे तो तरतूं तुम्हारे काज हॅसके बुलावो ना। मधुरवा मधुरियों के मधुर सवादमें से भी मैने उपाके जल मधुर स्वरको पहचान लिया । द्रौपदीके स्वयवरमें स्वयवर स्तम्भके चारों ओर के कुंडमें घूमते हुए मत्स्य प्रतिबिम्बको देख मत्स्यनयन को बेचने पर गाडीवधन्वाने जैसे मत्स्यवेध कर पाया था वैसा ही कुछ मुझसे भी बन पडा । रासमें घूमते हुए उपाके नयनमीनकी पुतली में मेरा दृम्बाण जा लगा। एकाएक आख मिल गई । एक ही बाण मारा और वह जा लगा। स्वयवर में मैने अपनी द्रौपदी पाई परन्तु पाचों पाण्डवोंके ऐसे मेरे पाचों प्राण उस मेरी द्रौपदीके अधीन हो गये। रासका स्वयंवर था और उसमें स्थान स्थान पर प्रियतम प्रियाओं के मत्स्यवेध हो रहे थे। क्या नर और क्या नारी सब अपने अपने प्रियजन को आशा पूर्ण आखों से सोजते और पाते थे।

प्रकरण ७वा
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१
मनुष्योंके अच्छे और बुरे नाना प्रकार के लक्ष्य होते है । मोक्षके
समान स्नेहलीला भी इस जीवनका परम लक्ष्य है।
यह रास पूरा हुआ। देषिया दुर्गाके पास जावें वैसे सखिया उपाके
पास गई । बहुत कुछ अनुनय-विनय करने लगीं परन्तु उपाने उस प्रहर
में न गाया।
क्या युवा अकेले ही मससरे है ? युवतियांका मजाक तो ऐसा होता
है कि अग अग और रोम रोम में आत्माके अमृतसर बहा दे।
पीछे से रसचमत्कारसे चमकती हुई चन्द्रिका आई और बोली'
क्या सूर्यका पदसचार अभी नहीं हुआ? उपाका उदय होने में भी
देर होगी क्या ? उपा
उपाकी आखोसे त्रिशूल निकला, शब्द मुख मडप में ही समा गये,
सारा सखीवृन्द एक टक मेरी ओर देखता हुआ कहकहा लगाकर हँस
पडा मानों फूलों की झड ही न लगी हो ।
एक हँसोड सहेलीने कहा तब भलेही अब चन्द्रिका चमके ।
चन्द्रिकाने उत्तर दिया कि चन्द्रिका कब 'ना' करती है ? यह तो
आसमान को छाकर खडी है जहा-की-तहा। परन्तु देखना वह पूछे
उसके उत्तर देना भला।
क्षितिज के आस पास तारिकायें फिर जाय इस तरह सब ससी-
योंने पीछा घेरा घाला । चन्द्रिकाने वही अलबेली गीति छेडी जिसके
प्रश्नों को पूछ पूछ कर वह सदा उपाको तग किया करती थी ।
" सौभाग्यमूत्ति है क्या ये सजाई ? सहेली"
निजली जिस तरह क्षितिजाके उद्यान में उडती हुई प्रकाश करे वैसे
ही प्रश्न के साथ ही चन्द्रिकाकी दृष्टिसौदामिनी हंसती हँसती सहेलियों
की बगीचियों में उड़ने लगी और ससियों को रसप्रश्न पूछ पूछ कर
हंसाने लगी।

९२ उपा , गम्भीरा के मुस पर भी स्मित की रेखा प्रकट हुई। "खडी रहो तो छेडे दिलकी बातें, सहेली।" गथम कुदमें ही तारा सरिताके पूर्ण प्रवाह में तिरने और उउलने लगे वैसे ही रसिकायें रसप्रवाह में बहने और झूठने लगी । उपनिषद जिसे जगत्या जगत कहती है उसमें स्थिरचित्त और स्थिरपदसे कितने खडे रह सकते हैं ? अचल चौक कोई है ? पग्छाई भी न पी हों ऐसी कुमारिका भूमि कितनी है ? रूपकी कला बनाके चतुरा। कहा चली सहेली। छपिली ! ये छोगे मोहके क्या पहने ? सहेली। अभी तो वसन्तकी लहर पहिली आवे, सहेली। उरकी उमग से लो विश्वको बधावे, सहेली। है अभी तो देर, इतनी जल्दी ? सहेली। है ऐसे क्या काम ' जो इतनी गैली, सहेली। सरोवर के मीठे जलकी लहरों में जैसे पनिनिया उछलती और नमती है वैसे रसयुवती की देहवल्लिया रासमें धूमते हुए नमता और उछलती थीं । सरोवर में झोले खाते हुए कमल के ऐसे युवतियों के मुख कमल झोले खा रहे थे। चन्द्रिका के मुख और लोचन में से चिडियो के बच्चे से उडते थे और सहेलियों की हृदयघटा में 'ची ची' करते लोट आत थे। चन्दनचोपडे मनो कुकुम भरे, सहेली। गोरे गुलाव को यो मुख धरे सहेली ! कोपल की ओटमे तारिका झलके सहेली' पलको की पँडियों कीकिया मुळके, सहेली! फरफराते हुए सुकुमार नव पल्लवोंमें तेज किरण खेल करे और तिर- वरे वैसे नयननयन की कोपलों में से कीकियों के किरण निकलने मकरण ७वा A १ लगे । रसिकाओ के रस प्रवाह मे जोम जमा और रासके फिरने में भवर और चक्कर आने लगे। वायुकी लहरों के चलने पर बिखरी हुई गुलाबकी पत्तिया उछले और उडे वैसे सुन्दरियों के सौन्दर्यकी पत्तियोंकी ऐसी पद कोपलें सुकोमल नृत्य से किरणो के समान नच रही थीं। सरितामे पूर आज ये कैसा ? सहेली। वर्षाका जोर आज ये कैसा? सहेली अम्बुज अखियो में क्या अजन सारा, सहेली। भौहों के चाप में क्यों वाण धारा' सहेली। सूरजमाला चस्कर पर चढे इस तरहका रास घूम रहा था । उपाके - अगो पर चादनी छिटका रहाथा और देहकी चन्द्रिका के आसपास आसमानी साडी फरफरा रही थी । सरिताकी ऊर्मियों में तैरती हुई दीपनौकाये झिलमिलाहट करती हो इस तरह साडीकी ऊर्मियों में कामके तारे झिलमिलाहट कर रहे थे । कमल के फूलों पर गहरे कमल- पत्रों को ढाकने और फिर पुष्पों को दिखलाने के लिये उठाने से जैसी छटा देख पडे वहीं छटा उसके चरणारविन्दों पर घूमते हुए लॅहगे के घेर दिखला रहे थे । उसकी करलतायें रस लहरियों में नाच रही थीं मनो बसन्तकी अनिल लहरियों में लताय नाच रही थीं। हृदय के उल्लास को झेल रही हो इस तरह उसकी चोली नम रही थी। उसके अग- अग में वह अदभुत लावण्य प्रकाश पा रहा था कि जिसे स्त्री देहम देखने के लिये पुरुष नयन सृजन काल से ही तरसते रहते है । गगन के चन्द्रमा से जितने किरण फैलते थे उतने ही रसके निर्झर उपाके वदन से आज झर रहे थे। किसी महाकनिकी महाकल्पना कल्पे इस से भी विशेष सुन्दर उपा थी मानो परमात्मा के हृदय में की सौन्दर्यभावना मूर्तिमान हो कर पृथ्वी पर न अवतरी हो ।

उपा vvvvvvvvvvvvvvvvv vvvv wriwwe अध्यापिका जैसे बारी बारी से बालिकाओं को प्रश्न करती हो इ तरह चन्द्रिका मुस्कराती हुई और आखों के तूफानों के द्वारा सब सहे लियों पर बारी बारी से प्रश्नों के बाण छोडती थी और तग कर रहे थी । 'प्रेम की पसिनी' के उच्चारण के साथ ही भ्र चाप में से महाश छोडा और उपाके हृदय को बध दिया। अर्जुन का बाण कभी खाली गया है ? कुसुमशर कब निष्फल हु है । सुन्दरियों के शरभी शायद ही खाली जाते है बहुत करके सफर ही होते है। "पिया के पथकी ये दिवानी बाला, सहेली! अॅखियों उडती ये हियकी ज्याला, सहेली" सूर्य के आस पास पृथ्वी घूमती है उसी समय में वह अपनी धु पर भी घूमती है उसी तरह ये रासेश्वरी वालायें चकरास और धुर रास, और उसमेंभी अनेक गोल वर्तुलाकार रास रच रही थीं । मुझे त भगवानका वचन याद आया कि- ईश्वर सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ और पुतलियों को नचाने वाला नटेश जैसे अनेक प्रकार के माय के खेल खिलाता हे या जादूगर जैसे नाच नचाता है वैसे ही नाच नगरकी रसकी पूतलियाँ नच रही थीं। लताओं के ऐसी इनकी देहलतायें झूल रही थीं और प्रेक्षक वर्ग के नेत्रों और नेत्रोंमें वमने वाले आत्माओंको झूला रही थीं अगमें से इतनी ये आग उछले, सहेली। किसको दझायारे देख कौन-जले, सहेली। कभी दो वर्तुल और कभी सन्मुख तालिया देती हुई सहेलिया सन्मुख वाली रास गति से फिर रही थीं। सुकुमार तरुवर की शाखाओं . .

मकरण ७वा
के ऐसी ये कोमलागिया तरुणी तरुओंकी पल्लवकी पटलियों की
सन्मुख से रस तालिया लेती देती थी । कोई केश पास से सिसकती
हुई स्यालू की कोर को संवारती थी, कोई पल्लोकी उडती-हटती हुई
पाखोंको ठीक करती थीं । परन्तु पुप्पों के पौधों के परिमल पुप्पोंमें
से उडे इस तरह फूलके पौधों के ऐसी इन रसिकाओं के इस परिमल
नयन पुष्पोंमें हो उडते और फैलते थे।
आज वसन्तकी ये पाचे आई, सहेली!
इतनी उतावली हो तू कहा सिधाई । सहेली।
कोकिल बुलावेरी खडी रहना, सहेली'
दूर वह देश है री धीमे पग रसना, सहेली।
'कोकिल बुलावे' इस बोलके साथ ही करताली और पदके ठमके
के साथ पृथ्वी नृत्यपनि करने लगी। 'खडी रहना' कहने के साथ ही
सब रास रसीलिया सढी रही और सोने चादी के रगवाले देहके हिदोले
आगे जॉय और पीछे हटे इस प्रकार रसीलियाँके रसान्दोलन आगे बढते
और पीछे हटते थे, चढते थे और उतरते थे बैठते थे और सड़े होते
थे। घडी भर इसी पदकी रसधुन जमी परन्तु धीमी धीमी और कोकिल
मसुर कण्ठ ध्वनि से।
सन्ध्याकी चन्द्रिका रे क्या ज्योति झीनी ढोली, सहेली
उतरी है दर्शनको री क्या तारिका की टोली, सहेली!
फैलाये हैं फल क्या ससिने पथ मे, सहेली !
पूरे है स्वस्तिक क्या प्रेमके कन्तने, सहेली!
आनन्द से उज्ज्वल हैरी क्या जाओ रसघर, सहेली
सयानी सदा सोहनारी पिय नेट रसभर, सहेली'
रसिकाओका अन्तिम शब्द आसमान को पार कर अस्त होते हुए
किरण के ऐसा अस्त हो गया । गीतके विलास अस्त हुए परन्तु नृत्यको

- लीला तो और विशेष जमी। मन्दिर के रम मडपके घूमट में रंगी हुई रंग गोपियों के ऐसी ये रग सहेलिया मौन गीत गा रही थी, अग अग के अद्भुत रसनृत्य नाच रही थी, रासदढ के ऐसी करतालिया लगा नही थी । और हौस के हिन्दोले पर झूल रही थीं कटाक्ष के कामन, नखरोंकी रगबिरगी रल छाया के इन्द्ररग, ऊर्मिलाओं के अगके हाव- भाव की अमृत लहरे, विविध रंगी प्रकाश के समान आसमान पर उदित हो रहे । सलीला, भाव विलासकी सारी कविता इस रतनचोकमें उतर कर घुमर देती सी जान पडी । बड की बगीची के पत्ते पत्ते पर प्रकाश प्रकेटाता हुआ चन्द्र सहेलियों के मुख पत्र पर भी रस ज्योति प्रकट कर रहा था । मन्द मुसक्यान के मन्त्र पाश और नेत्र पल्लवीके जादूओं का विस्तार कर रसकी नजर बन्धी का खेल रासधारिणीयोंने प्रारम्भ किया था । विजलीकी लताके ऐसी उपाकी देह झूला झूल रही थी। सरोवर की एक एक लहरम चन्द्रविम्ब लहरावे इस तरह इस रतन चौक के सगेवरकी रसीलियों की वदनोर्मियों में चन्द्र के प्रतिबिम्ब फैल रहे थे । जगतका सारा-का-सारा सौन्दर्य ही मानो चढाई कर न आ- गया हो। आखिर पाल तूटे और जल झरजाय इस तरह रासमडलकी रगपाल तूट गई और रसतरग से उछलती हुई सुधाधारायें शान्त हुई और सुन्दरिया झरगई । लतायें फूल बरसावे इस तरह उनके हास्य के कुसुम पृथ्वी के पल्ले पर गिर रहे थे। इस शरद पूनम को मैंने जाना कि उषा मेरी आयुष्य लीलाका अमृत है। यह रास पूरा हुआ। कितनी ही सुन्दरिया श्रम उतारने को बैठी मानो नवरगी फूलोंकी भरी हुई छाबें ही न हों। थोड़ी देर के बाद दूसरा रास प्रारम्भ हुआ । परन्तु उसमें उपा घूम न रही थी । एक चबू- प्रकरण ७वा. Annnwww-MAAnam तरे का आश्रय लेकर बादल और चादनी की गूथी हुई बेलके ऐसी वह जरा झुकी हुई सडी थी । उसके आस पास सोनेकी बदलियों के ऐसी चारेक सखिया पास बैठी थीं। रतन चोक के एक कोने में एक पीपल का वृक्ष था उसकी शाखा- ओंकी जालियों में होकर चन्द्रतेजके फूलके ऐसे चादने पृथ्वी पर फैले हुए थे । इन्हें देखकर ऐसा जान पडता था कि घडीमर के लिये उपा यहा आनेको है और उसका सत्कार करने के लिये ही तो मानो चन्द्रमान ये चादनी के आदरपुष्प फैलाये है । पीपल के छायाजल के किनारे ही एक झरोका था और उस झरोके की छाया के कगुरे अश्वत्थ छाया के सरोवरजलपर पडते थे। उन छाया के कगुरोंमें सखियों के बीचमें उपा सडी थी मानो दुर्ग पर दुर्गा का विजयध्वज ही न हो। शरद पूनमकी रातमें चन्द्रिकाको छोडकर छायामें रहना किसको मला जान पडेगा' परन्तु उषा तो स्वय चन्द्र थी अतण्व उसके लिये चादनी में रहना क्या और चादनी में न रहना क्या ? और यह बात तो गुप्त नहीं है कि जहां देवी होगी वहीं उसके भक्तका सचार होगा। शरज्ज्योत्स्ना के अमृत को छोडकर मेरी स्नेहज्योत्स्ना के अमृत लिये उस यह के पासकी अश्वत्य की ऊडी और गहरी छाया मै भी पहुंच गया। रास चल रहा था। प्यारके बोल आसमान को भरते हुए नगर पर उड़ रहे थे। 'प्यारी सरद पूनमकी रातरे, चाँदनी चमक रही, प्यारी लगे पीतमकी वातरे, चादनी चमक रही, सबके मनमें जो कुछ था वही सब गारही थी। मैंने धीमेसे कहा, उपा! पीपलके पानों से वायु चलता था उससे भी धीमा मेरा शन्द था। ७ उषा. - उपाने न सुना, परन्तु सखियोंने सुन लिया । उषाके नयन पुरुष मेदिनीको परख रहे थे। सखियोंके कान शब्दोंके उत्सुक सप्तर्षि और आठवें धुवराजके ऐसे आठसोजदीपकोंके प्रकाशएकाएक मेरी ओर मुडे और मैं चौंका । दो पैर अश्वत्थ छायामें और हटगया कि इन सखीनयनोंके शोधनदीपक मुझे पहचान न सकें। परन्तु सुन्दरियोंके शोघनदीपकसे कौन छुपा रहसका है ? एक सखीने उपाको वृथायानसे जगाई और अश्वत्यके थडके पास दूसरा थड था उसे दिखाया। ससीकृत्यके समभाव और अनुकम्पा. को देख कर मेरी गई हुई हिम्मत पीछी लौट आई । मैने फिर कहा, उषा। क्षितिज पारसे भी धीरगम्भीर धन गर्जन होनेपर मयूर जैसे उत्कठित होता है वैसेही उपा उत्कण्ठित हुई, कलापको संवार कर तैयार हुई। अश्वत्थ की छाया की गहराई में गोर कर देखा । इस नजर की अनी में अन्तर प्रकट होरहा था। माथेके पल्लेको खींच कर उसने आधे कपोल ढके । उपाका हृदय उछल रहा था परन्तु चरण लजाते थे । सखिया अनुभवी और उससे बहादुर थी। आधी चादनी और आधी छाया में एक उल्लासिनी नवयौवना खडी थी। मगलकेसे उसके नेत्र चम चमा रहे थे। उसने उपाको धकेल कर कहा' देख उधर, बुला रहा है तुझे, जा। उसी समय झरोखेसे सखियोंके शिरपर पुष्पवृष्टि हुई और चारों सखियोंके सीने पर चार पुष्पमालायें आसमानसे गिरी । कलियुगमें भी आसामानसे बरसती हुई फल मालायें मैंने तो अपनी आँखोंसे देखी है। ध्रुव और प्रल्हादको प्रमु मिले थे वैसेही हम दोनों मिले । कौमारकी और यौवनकी हमारी सदमिलापोंका-आमोंके मोर आवें इसतरह-प्राकट्य हुआ और वे वाञ्छायें प्रफुल्लित हुई।

प्रकरण ७वा । १ मुमुक्षुके मोक्षके ऐसी उस समयमें केवल मोक्षकी घड़ी थी । रास घमही रहा था । अश्वत्थके पान पान पर प्रकाश करती रासरसीलियोंके गीतकी मगीतध्वनि फेल रही थी। भरभर अनन्तताके चोकरे चाँदनी चमक रही। मेरे पियूके हियके चोकरे चांदनी चमक रही । मझ आधीरात जम रही थी । देवोंके मुकुटके ऐसा माथेपर चन्द्र विराजमान था। ससारके वनकी कुजकुजमें उसके अमृतके पूर ठले हुए थे। वृन्दावनमें गोपी और कन्हैया जैसे मिले थे वैसेंही हम मिले । इक्त- नेमेही हमारे अश्वत्थछायाके सरोवर जलकी तीरपर होती हुई एक गोपी गाती हुई गोकुल छोड अपने वृन्दावनको गई कि कैसे रहना? कैसे रहना गोकुलमे कैसे रहना रे? उपाके हृदयमें भी इस भावका उमार था। पुष्यपसडियोंपर पॅखडीके ऐसी हमारी करताली हो रही थी। उसे दबाकर उषाने पूछा' पीहरके गोकुल कबतक रक्खोगे ? सुसरालका वृन्दावन कब दिखाओगे ? करमें कर गूथ कर मेरे मुख और नयनों को पढती हुई वह खड़ी रही। चन्द्रिका किरण फेंकती है और पृथ्वी झेल लेती है वैसे ही मैंने उपाकी अगुलियों और नयनोंकी किरणों को झेल लिये, मेरे कुमुदकी सब पंखडिया प्रफुल्लित हो गई । मैंने उत्तर दिया कि यह समय आया है तो वह समय भी कमी आवेगा, जीवन के सारे बन्दद्वार खुलेंगे। दुनिया से अलग अश्वत्यछाया का दीप था। उस दीपमें हम दोनों खड़े थे। उषाने फिर कहा मेरे अनिरुद्ध ! अब नित्य निन्य मुझे आपके स्वम आते है ।

१०० उपा स्वप्न संसारके तीरपर हम खड़े थे कई कई प्रकारके स्वम हम देखते और कई कई प्रकारके कल्पना करते थे। कविताके आकाश में पतग उडाकर कभी बिजली उतारी है ? कवि कविता रचता है वैसे ही हम भी उस समय जीवन की कविता रच रहे थे। ओ कल्पना के बालक ! जीवन की कविता तो तूने भी रची हैन ? इन स्वमोंकी ससार सृष्टि तो तूने भी सरजी है न ? हमारे कवित्व स्वा इनसे अनोखे न थे। मैने कहा वह चित्रलेखा न होती तो हमारा आजका यह स्वप्न भी सच्चा न होता। जीवन ही स्वम है, यह घड़ी भी स्वम है और मेरे कंधे पर यह तेरा मस्तकमुकुट---प्रफुल्लित कमल के ऐसा--विराज रहा है इतनेमें ही रास बन्द हुआ और एक रसरंगीली की आवाज आई कि उपा कहा है ' मध्य रात जमी है तो वह अपना पूनमका रास गावे । हमारे अगुलियों के दोर को तोड मेरे चन्द्रपुष्प और उरपुष्पको मसलती हुई उपा छायासरोवरमें से चन्द्रिका में और साथ ही सहेलियों में जा पहुंची। आसमान की अतल गभीरता देखी हो इस तरह मै तो आश्चर्य मुग्ध होकर खड़ा हो गया । मेरी ऐसी ही हालत हो रही थी मानो स्वर्गदर्शन कर के कोई मानव पृथ्वाक पटलपर आकर न खडा हो गया हो । जगत के और जीवन के भेदके परदे उठते-से जान पडे और जीवनके नाटक का महाप्रवेश होता हुआ भासमान हुआ। कोकिलाकी कूकही न उठी हो इसतरह मेरी कोकिलाको कूक उठी। ससिओंके आमन्त्रणको मान देकर उषाने रास छेडा- प्रकरण ७वा १०१ -- 'उगी कैसी शरदपूनम रूपवती चिराट आज रमणपै चढा रे लाल !" दूसरे रास सरिताकी लहरियोंके से थे परन्तु यह तो एसा जान पड़- ताथा कि मानो रससागरके बडेबडे मौज घूमते और विस्तार पाते हों। आसमानके चंदवेको छाकर यह कूक हो रही थी । विराट्रकी तरह उपाका अन्तर रमणपर चढा था। इसके कण्ठमें उल्लास था और अगघटा मदमाती झोले सारही थी। मेरे अन्तरकी गहराई में यह कूक जा बिराजी और अन्तरजलशायी विराट्को रमणपे चढा दिया मन्दराचलको डोरीसे खींचनेपर क्षीरसागरमें जो मन्थन हुआ था वैसाही मन्थन मेरे अन्तरके । सागरमें होने लगा। . चन्द्रकिरणकी कलिकाओंकीसी सुन्दरिया रासमें घूम रही थी । उपाके शन्द शब्दमें हृदयकी डोरीका धक्का लगता था । मुझसे यह हृदयमन्थन सहन न हो सका ।म चल पडा। उपाकी दूसरी कूक उठी, मेरी आत्माके महानुभाव अमिलापोंकाही जगतमें प्रतिध्वनि कर रही हो इसतरह चन्द्रिकाके जलमें तैरती प्रवाहित होती हुई आई। "लोक लोक गाजे गभीर रसताली विराट आज रमणपै चढारे लोल।" उस बालिकाने विराट को रमणपर ही चढाया था । ब्रह्मने ब्रह्माण्ड लीलाका विस्तार किया था उस अवसरकी कूक उपा लगा रही थी। मेरे भीतर और बाहरका सारा ब्रह्माण्डचक्र आज मुझे महाराममें फदी देता हुआसा जान पड़ा। गोपियोंके फूलनिकले हुए लहगोंके घेरके ऐसा चन्द्र और तारिकाओसे गया हुआ चन्द्रिकाका घेर मुझे गगनमें घूमता हुआ देख पडा। विराट की गहरी गमीर रसतालका अनहद नाद अव- १०२ उपा काशके महासागरका उल्लंगन कर लोकलोकमें फैलता हुआ जान पड़ा। रासमें घूमती दुई किसी रसिकाकीसी पृथ्वी भी घूमर देतीसी भासित हुई । उडते विमान में बैठा हुआ मनुष्य स्वयमी उडे इस तरह रमण पर चढे हुए विराटमें मै भी पंखेकी माति रगरमणपर चढा । मै कहा था, कहा जाता था, ये सब मेरे लिये शून्य था। विराट घूमता था, चन्द्रिका धूमती थी, मै घूमता था और रासमें उषा घूमती थी। मेरे लिये उस समय केवल यही एक परम सत्य था कि ब्रह्मरासमें ब्रह्माण्डका और ब्रह्मा- ण्डके बालकोंका निरन्तर घूमना हो रहा है। राधिकाजी और कृष्णचन्द्रने लीला की थी, महामाया और परवाह लीला करते हैं, वही परमजीवनरास मुझे और उपाको आयुष्यभर रचना चाहिये । यही मेरे अमर आत्माका उद्देश आदर्श लक्ष्य और मोक्ष था, यही हमारे रसजीवनकी कालातीत रसलीला थी।

प्रकरण८वा प्रकरण ८ वा। कृष्णपक्ष। का ल और दिशावाले इस जगतमें तो वियोग विनाके सयोग देखे नहीं, विरह बिनाके विहार सुने नहीं। दिनरातकी घटमाल जबतक फिर रही है तबतक प्रकाशके बाद अँधेरे होवेंगे ही। ब्रह्ममहलमें अनस्त तेजवाला जब वह ब्रह्म दिवस उगेगा तब रात्रिया सिकुड जायगी, कृष्णपक्षके अधेरे परदे इकठे हो जॉयगे और परमज्यो- तिके सागरजलही विस्तृत हो रहेंगे तभी सत् और चित्के परमानन्द प्रकटेंगे। मृत्युलोकमें भी इसकी आशा ही है। मानव अमर नहीं है । जन्म और मृत्युके सयोग और वियोग भी लगे हुए हैं। मनुष्य जातिके देहके पक्के रगके ऐसे ही है। मेरेभी ऐसाही हुआ । आशाको मै जीवनाधार मानता था परन्तु इति- हास तो निराशा के ही रचे जाने लगे। और किसके लिये ऐसा नहीं हुआ ? देखा है किसीने ऐसा मनुष्य कि जिसके अन्तरमेंसे विषादी वाफ न उठली हो ? या जिसके नय- नोंसे शोके आसू न टपके हो ? देखा हो तो बताओ, ओ दुनियाके समझदारो। ऐसा मनुष्य । विरहानलमें न जले हों वे भलेही सुखपूर्वक मेरी हँसी उडाना, परन्तु मेरे पर अनुकम्पा करना वे जिन्होंने इस आगके शोलों मरे मेखकी कफनी ओढी हो।

१०४ उपा. पृथ्वीका प्ररिक्रमण करनेवालोंको अनुभव होता है कि पृथ्वीका तल समभूमि नहीं है । दोदो-तीन तीन कोस ऊचे फैले हुए पर्वत, कोट और शिखरकागरे है। दोदो-तीनतीन कोस गहरी महाशागरकी विशाल परिखायें हैं । ऐसा होने पर भी रणशूर इन्हें उलाध जाते है, इन्हें तेर जाते हैं और जगत्के दुर्गपर जयध्वज रोपते है । दुनिया में के किसी अजित दुर्गको कोई वतावेगा? जीवन में बार बार नहीं आती ऐसी वह मेरी शरत्पूर्णिमाथी । उसके बाद के प्रभात से ही जगत में और मेरे जीवन में कृष्णपक्ष प्रारम्भ हुआ। तबतक तो हमारे सौभाग्यचन्द्रकी एक एक कला बढ रही थी। उसके बाद उसकी एक एक कला कम होने लगी। हमारे भाग्यके पोडपदलकमल की एक एक पखडी अब रोज रोज़ खिरने लगी। कमी न कुम्हलावें ऐसे पुष्प तो देववाटिकाके होते है। मानव स्वय कुम्हलता है उसकी वाटिकायें और वाटिकाओं के कुसुम भी कालकी लूमें क्योंन कुम्हलायगे ? प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्तमें मै जगता था आज ब्रह्ममुहूर्तमें मै सोया । मेरे जीवनकी गगानेही उलटा बहना प्रारम्भ किया। पूर्णिमाके दुसरे दिन मै कोई दस बजे उठा । माताने आरोग्यप्रश्न किया, आरोग्यप्रश्नके उत्तरमें लोकसंघ एक अर्थहीन शब्दका प्रयोग किया करते है। मैने भी साधी माताको उत्तर देते हुए उसी शब्दका प्रयोग किया ठीक है। शरीरकी थकावट तो मेरी उत्तर गई थी परन्तु मनको विश्राम न मिला था। परन्तु आरोग्यप्रश्न करनेवाले भी जब आरोग्यका प्रश्न करते है तब शरीरकाही तो आरोग्य पूछते हैं ? अन्तरके आरोग्यको पूछनेवाले कितने होते है ? जगतमें वैद्यरत्नोंने जो दुकानें खोली है वे भी तो शरीरके आरोग्यकी ही हैं। आत्माके आराग्यकी औषधियोंके सच्चे धन्वन्तरी कब अवतीर्ण होंगे। ए प्रभो।

प्रकरण८वा १०७ । मानवोंकी महापाठशाला में मानसशास्त्र विकसित होता है परन्तु मनके निदान, चिकित्सा, शस्त्रविद्या, ओषधिशास्त्र और आरोग्यसहिता हैं कहा? मनकी चरकाचार्या और शुश्रुताचार्या तो उपाकी वे अनुभवी सखिया थी कि जिन्होंने उषाको अश्वत्थ छाया में मेरे करमडलमें भेज दिया था। परन्तु इस छायाद्वीप में उपाके आने की घडी से ही हमारे कृष्णपक्ष का प्रारम्भ हो गया। लोक स्वय चाहते हैं और दूसरोंको चाहने नहीं देते, लोक स्वयं जो करते है वही दूसरे को क्यों नहीं करने देते ? इस अश्वत्थ के छायासरोवर के तट पर जो झरोका था उस पर उपाका बडा भाई और उसके तीन मित्र थे । चादनी ओढी हुई सहे- लियॉपर उन्होंने अन्तरके उमरके ऐसी पुष्पवृष्टि की थी। परन्तु उपापर जो मैंने अन्तर्दृष्टि की उसे वे देख करभी न देखे सके-उन्हें वह अन्ठी न लगी। स्वय उन्होंने नयनों से नयन मिलाये और हंसे-आठकी जगह सोलह आसें की परन्तु उपाने दो की जगह चार आखे की सो अच्छा न लगा। दूसरे दिन प्रातकाल में भाईने अपनी क्था न कही परन्तु बहनकी कहानी सुना दी । पिताको अपना या पुत्रका योवनयुग याद न आया केवल पुनी ही योवनदोपसे दूषित जान पड़ी। आधी बात कहने से पृथ्वीमें जितने अनर्थ होते हे उतने पूरी पात कहनेसे नहीं होते। इसमें भाईको पराये का पाप जान पहा, पिताको भूल जान पड़ी और माताको उठाउलापन जान पड़ा। ये सब होनेपर मी इस कृष्ण- पक्षकी प्रतिपदाको उपाको आज्ञा दी गई कि वह देवदर्शनको या घर से वहार जाया करे तब मा या बडी बहनके साथ जाया करे ।

१०६ उषा कितनीही आज्ञायें तो ऐसी होती है न कि जो तोडने के लिये ही दी जाती हैं ? लोग तोड़ देंगे ऐसा मान कर ही तो कितने ही खेतों की बाडे विशेष दृढ रची जाती है। उपा के आजतक नाथ न थी सो अब लगाई जाने लगी। परन्तु गाय या बठियाके कमी नाथ देखी या सुनी है ? प्रतिपदाकी साझको माताकी अगुली पकडे हुए-~-मानो संसारमें माता ही चलाती हो इसतरह----उपा देवदर्शन के लिये आई । मै देव- मन्दिरमें ही था और मैने धेनु और धेनवत्सा को मन्दिरकी सीढ़ियोंपर चढते हुए देखा। बछडी के नयन वछडी के चरणोंकी तरहही धेनुके पीछे ही चलते थे। परन्तु योवनके-और निर्दोष यौवनके कितनोंने और कितनी लगामें लगाई है ? देवदर्शनको उपा गई । वहां देवमूर्तिमें देव न देख पडे कि तुरन्त उसकी आखें झूलेपर चढी । देवमदिर के मठ का झोला खाकर मुझपर उतरीं। आज इनमें न था उल्लास और न था प्रोत्साहन केवल प्रभ और चिन्तनका भार विराज रहा था। बिजली की चमक के ऐसी वह छिनभर चमक कर रह गई । बादल कीसी पलकों में वह प्रकाश छुप गया। यौवन का झरा उछाले लेने लगे तब बड़ों को चाहिये कि उसमें निर्मली छोटे और उसे सरोवरकी और बहने दें। यह पातालारा सदा का सजीवन है और जगतके कल्याण के लिये जगके कल्याणनिधा- नको प्रकट करना है। मेरे और उषाके यौवनझर प्रकट हुए थे और उसके प्रपात गडगडा- ते थे। परन्तु ऊपर अंधेरे पक्षकी अधेरी छाया तिरमिराती थी। उपा गई और उसके व मेरे धीचमें अदृष्ट वातावरणके समान किसी के बिछाये हुए अन्तराय जान पढे।

प्रकरण८या १०७ ARRANA- . दूसरे दिन प्रातःकालमें नदी से न्हाआनेके बाद नेहमरा हाथ मेरे माथे पर फेरते-फेरते माताने कहा बेटा ! दुनियाके मुहपर भी कोई लगाम है ' जगत तो विल्कुल झूठा है । परन्तु किसीको हमारे पीछे घूमना चाहिये या हमें ही किसी के पीछे घूमना चाहिये ? मेरे कान्ह कुवरके लिये तो भावमयी राधा रानी लावेंगे-आसमानसे चन्द्रमाको पकड कर उतारेंगे। मैं तो सब छोकरियों के छकेले पनको जानती हूँ। मेरी माता उत्तर न मागा करती थी, आज्ञाही देती थी, अतएव मुझे कुछ कहना न था। कौन ब्राह्मण ऐसा है जो ब्रह्ममुहूर्तका भोगी होकर उपाके दर्शनका अभागी रहे ? मेरे भी ऐसा ही होताथा। जहा जाऊ वहा प्रकाशकी पुतली के ऐसी उपा साम्हने ही मिलती थी। दुहाई देकर होते हुए प्रभातोंको कितनोंने रोका है ? उस दिन प्रभातमें उपाके शिरपर मन्दिरके कलशके ऐसा जलका कुम्भ सुहा रहा था । परन्तु केशकलाप सवारा हुआ न होकर बिखर रहा था। तेज के पखे की ऐसी ओदनी के किनारे में से दो-एक काली लटें बाहर फरफरा रही थीं। पहले वह लीलामयी गति से रास्तेभर थनथनाती आतीजाती थी । विचारके भारसे रहित वह गति जाती रही, आज चिन्तनाकी परछाही उसके पैरोंमें पडती जान पडती थी। बडी बहन के साथही वह पानी भरकर गई। उसके दृष्टि किरणने मात्र पानी भरते मरते क्षितिज महल की यात्रा कर ली । खिरती तारिकाकी इस ज्योतिने मुझे छिन-आधी छिन तक दरस दिखाया । देखनेमें उपाआज्ञापालक पुत्री थी, कहागिरी कन्या थी। परन्तु माता पिता ऐसी आज्ञा क्यों देते होंगे जो पाली न जा सके। मनुष्य भूल जाते है कि पुरुष की देवी खी है और स्त्रीका देव पुरुष है । दुहाई के अन्तराय डालोगे तोभी उनके अन्तर एक दूसरेसे मिलेंगे, - ।

उपा Armnwuramm AA Arvi MNA उल्लसित होंगे और आपसमें पूजा करेगें। नरनारीके तत्त्व अन्योन्याश्रयी हैं। अन्योन्य के लिये है । इन लोहचम्बकोंको अलग रखनेसे आकर्षण अस्त न होगा । जब ये योग पायगा तभी स्थितिस्थापकता का साम्य और सौमनस्य सधेगा। जगतके बने और कल्पना किये सब इतिहास साख देते है कि वियोगसे योगकी वाञ्छा शान्त नहीं होती। यह एक सोता है कि जिसमेंसे अनेक निर्झर बहते हैं। ये सब निझर सागरमें जाकर सगम न पावें तबतक प्रवाह, प्रपात, नदी, नद, महानद आदि अनेक रूप लेकर उधरकी ओर ही बहेंगे जहा सवको जीवनके विश्राम मिलते है । जो जल सरोवरके ऐसे जगतके तटपर अकेले खडे है वे भी अन्तमें बाफ बनकर उड़ते है और जगतके शिखरपर सगम पाते है कि जहा से उनका जन्म हुआ था। स्त्रीपुरुष के अन्तरझरे कीभी कुछ ऐसी ही कथा हे । हमारा कृष्णपक्ष वढता ही गया। उषाके कपोलपरका गोदना प्रति- दिन विशेष विशेष काला होता गया । उसके मुस पर गोपीका रंग उड उड कर कृष्णका रग होने लगा। यह रग छाया मुझे कहती थी कि -गोपिका अपने कृष्णचिन्तनसे कृष्णमय होती थीं। मोर की क्लिङ्गी भी कभी गहरी हो जाती है। उपाकी मॅवोंके बीच का गोदना भी ऐसेही श्याम होनाथा । चन्द्रकी कलाभी दिन दिन कम होती गई और रातें अन्धेरी होती गई । सावनभादोंकी झडकी भाति आसोज में भी हमारे नेत्रोंसे कभी कभी झड लगती थी। उपाकी ओढनीके ऐसी बारीक और गोल रेखाकी काली लकीर पलकोंके चारों ओर बनती जाती थी। कृष्ण महाराजने राधाजीके मनो अपनेशी लोचन लगाना न प्रारम्भ किया हो। चन्द्रिका ने मेरे मुसपर के उचाटके शब्द पढ लिये थे । वह पूछा करती थी भैया क्या है ? मै कहता, योंही कुछ नहीं मेरे ऐसा तेरे न प्रकरण८वा mrNAWwinwww AM APAN होना| परन्तु वह समझ गई कि अन्तरकी आगके धुए की रज मेरे मुस पर फैलने लगी है। रात को मेरे हृदयमें भूकम्प के ऐसा कुछ होता था और बार बार मै नींदसे जग पडता था । ऑसें घूमती और सारे विश्व को घूमता हुआ देखती थीं। ऐसे करते-करते आसोज का कृष्णपक्ष बीता । कोई कहेगा कि प्रकृतिका रग कैसा है ? प्रमु कृष्ण रग में अवतीर्ण हुए थे और जगतके छत्रके-से बादलोंकाभी रग श्याम ही है। प्रकृति, अवतार लेकर परमात्मा प्रकृतिके रंग में ही रगाते है और आत्मा जन्म लेता है तब शरीरसे ही उसके दर्शन होते है । अन्तर में अग्नि प्रकट होता है तब वदनकी धूमरजसेही जाना जाता है । मुझे जान पडा कि मेरे हृदयके ऐसा ही ज्वालामुखी उपाके हृदय में भी धधक रहा है और उसके घूमकी रज हमारे मुखपन पर चढ रही है । इतना ही क्यों वहीं प्राकृत रगसे मुखको रग रही है । ये सब कुछ होने पर भी क्या यह नहीं जान पडता कि दिन और रात दोनों प्रकृति के बालक है ? राधा और कृष्ण दोनों प्राकृतिक रस- मूर्तिया है ? घोले पर काला करके वेदकचायें लिखी गई है, और जग- तका इतिहास सारा-कासारा ऐसे ही लिसा जायगा तेज और अन्ध- कार-दोनोंके क्या ये आधरग नहीं हैं ? इस एकादशीको मेरे लिये तो स्वर्गके द्वार खुले हुए नहीं ये देव- मदिरमें उपाके दर्शन नहीं हुए और देवीके बिना देवमन्दिर सूनेसे जान पडे । सुना कि उषाको ज्वर आगया है । चन्द्रिका एक दिन गा रही थी और उसके उसर्गात को बारवार गा कर मैं उसे चिहाता था। आज वह मुझे चिहाने को आई । वह अजीव चालसे चल कर मुझे बेहदतग करने को कहने लगी-तग करने लगी- उपा. - लकडी जल कोला भये कोलाजल मइ राख मे बिरहा ऐसी जली कोले रही न खाख हम दोनों भाई बहन दोनों को चिढाते थे परन्तु इकतारके दो तारोंके समान हमारे अनुकम्प थे। जिस आग से वह दाझी थी उसकी ज्वालाओंमें मैं आज जल रहा था-सिलग रहा था। दुनियाको चतुर कितनीही बार गाते है कि "दिलकी न कहना चाहिये दिलको न देना चाहिये परन्तु क्या इस प्रकार गान करनेवाले सच्चे है ? दिलके दिलाराम जगह जगह नहीं है, बाजार चौराहोंमें नहीं है । परन्तु जिस मनुष्यका "दिलाराम न हो उसके लिये इस प्रकारकी शङ्का करना कुछ अस्थानपर न होगा के उसके दिलभी है या नहीं। चन्द्रिका और मैं एक दूसरेको दिलासा देने वाले थे । सिंहबारस के दिन उपाका सिंह चित्रित करनेको चन्द्रिका उषाके घर गई । मैंने कहा कि सिहीको चित्रित करनेकी आवश्यकता चन्द्रिका बोल उठी कि लोकाचार है पालेबिना चल नहीं सकता । उषाका सिह बनाने को जाते हुए स्वय चन्द्रिका ही सिही बनकर लोटी । बात यह बनी कि उपाकी हवेलीपर जब चन्द्रिका गई तब उषाकी माता उपाके सिर- पर गुलाब जलके पोते रखती थी और इस बातका यनकर रही थी कि उधाके दिमागमें चढी हुई गरमी कम होकर थहाई आजाय । चन्द्रिका को देखतेही उपा बैठी हो गई और बातें करना शुरू किया माताने उसे नाही की परन्तु उसने कुछ परवा न की। हमारे घरकी बछडी भी 'कभी कभी तूफान मचाती है और माफी नहीं मानती । परिणामके 'निवारणके लिये कारणके निवारण करनेकी चतुराईसे उपाकी भाताने प्रकरण ८वा १११ चन्द्रिकासे कहा बेटा ! तू आती है और उषा पागलसी हो जाती है। तुझे क्या उषाको पागल करना है ' पागलपन घर कर बैठेगा तो? चन्द्रिका उठी । कुछ कुछ बातें करने के लिये गई थी वे सब-की-सव बातें उसने अन्तर-की-अन्तरमें रहने दी। वह पीछी लौटी । बाहर निक- लते-निकलते इस चिन्तनमूर्छित बाला के ठेस लगी । इतनेमें खिडकी से उषाके छोटे भाईने कहा सदाके लिये रहने को आओ तो मासे कहू । चन्द्रिकाके कानोंमें यह बात गई उसने ऊचे देखा । चन्द्रिका काही सिंह चित्रित हुआ और वह सिही के समान गरजी । लोचन और मुखसे माले मारती हुई बोली देखलेना तेरे यहासेही कोई मेरे माईके यहा सदा रहने के लिये आवेगा? इसी दिनसे चन्द्रिका और उषाके भाईमें आपसमें ममता की अटस पड गई । इस सग्राम के सेनानी थे और, और इस रणक्षेत्र के सुखदुःख भोगी थे मैं और उषा! विश्वव्यवस्थामें निर्मल न्याय है या नहीं' त्रयोदशीके लक्ष्मीपूजन में मैंने तो उषालक्ष्मी का पूजन किया और चाहा कि वह सदा घरवासा कर मेरे घरमें रहे । धूलि और वाफ के गुब्बार इस महीने में ज्योत्स्नाकी वर्षाको नहीं रोकते और न तिमिर- वर्षा कोही रोकते है । दूसरी ऋतुओंमें तेज और अन्धेरेके भी मैल चढे होते हैं। शरदस्तुमें जैसे तेज स्वच्छ श्वेत और निर्मल अवतीर्ण होते है वैसे ही अन्धकारमी बिल्कुल काले भवर उतरते हैं । पूर्णिमाके दिन अपूर्वतासे प्रकट हुआ मेरे एदयका प्रकाश अमाके दिन अपूर्वतासेही अस्त होगया। वर्षका अन्त आता गया वैसे वैसे कृष्णपक्षभी भीषण रूप धारण करतायगा । जाते-जाते वर्ष अन्धकारके भण्डार खोल कर ही न जारहा हो इसतरह रातें ज्यादा-से-ज्यादा घोर और अन्धेरी होती चली। - ११२ उपा ५ जगतभरके सारे-के-सारे पाप प्रकट होगये हों इसतरह तिमिरवन विक- राल और भयानक भासने लगा। चतुर्दशीके दिन दुनियाने हनुमानजीको सीरबड़ेका भोग दिया और प्रसाद लिया। परन्तु हनुमानजीकी वाक्पटुता, सेवा भक्ति, ब्रह्म- चर्य आदि गुणोंका प्रसाद लेन को जगत् कुछ बधा हुआ न था । वर्ष- मरकी अन्धेरी-से-अन्धेरी इस काजलके ऐसी काली रातको अन्धेरेके उपासकोंने अन्धकारके देवीदेवीकी उपासना की और मारणमन्त्र साधे। मैंने तो उस प्रकाशकी प्रार्थना की कि जो जगतमें आजभी अद्वि- तीय है। बहते हुए पानी के बहावमें तैरनेकोभी कला की आवश्यकता है फिर साम्हे पूरमें तैरनेको क्ला और वीरता दोनोंकी आवश्यकता हो तो कोई आश्चर्य नहीं । तेरना सीखे बाद बहुत करके पूरमें तैरनेकी ही मुझे कुटेव थी। भरे पूरमें मै कूदता साम्ही धारों चढता भवर्समें गोते लगाता और भवरों में जानेकी हिम्मत करता। जगत के सब योद्धाओकों ऐसे ही जग जीतने पड़ते है। व्यापारी लोगाने अपने सालभर के हिसाब किताव देखभाले और अपने हानिलाभ को जाना, परन्तु जिन्दजीके व्यापार का हिसाब किताब किसीने ही किया होगा मन्दिरों में उत्सव हुए । रामचन्द्र के अयोध्यानगरी में प्रवेश करने की वार्षिक तिथि सबने उत्साह पूर्वक मनाई । राम मन्दिरों में गाया गया कि- अवध में अनन्द मयो घर आये सीताराम" परन्तु मेरे विरह का वनवास तो अभी पूरा न हुआथा और अमावास्याये मासिक होती है परन्तु यह अमावास्या तो वार्षिक + प्रकरण८वा यी। बारहों कृष्णपक्षों के अन्धकारकी पूरहो इसतरह अन्धकार के बारहों मेष उस रात को उलटे थे।लोकमन्दिर और देव मन्दिरमें प्रकाशती हुई दीपमाला ऐसी जान पड़ती थी कि कहींपर अन्धेरे को उज्वल कररही हो ओर कहींपर अन्धेरेको दरसा रही हो । ताराओंके चारों ओर जैसे अम्र मते हैं वैसे ही दीपकोंके आसपास अन्धकार की झालरें झूम रहीयी, तेज और अन्धकारके नित्यसग्राममें आजकी रात को तो तेज- सेना हारती हुईसी जान पडती थी। मेरे अन्तरमें भी ऐसा ही कुछ था। आशा-निराशाके रणसग्राम में आशाका पराजय होता -सा जान पडा । निराशाके कृष्ण पक्षकी अन्तिम-महाघोर अन्धकारवाली अमावस्या विजयिनी होती हुई-सी जान पड़ी। एक रात मुझे जब ऐसी काली और लम्बी जान पड़ी तब जहा छहमहीने की अखड रातके अनन्त-से अन्धकारके महावन फैलते होंगे वहां क्या होता होगा ? आकाशके अन्तकी तरह रातके भी अन्त न मिले ऐसी स्थिति कल्पनामें ला सकते हो ? परन्तु वहां पर पो फटे और दिन उगे तब छहमहीने दिन भी तपता है इसके प्रकाश का अन्त भी दुर्गम लगता है ! नगरमें पटाखे छूट रहेथे । उस प्रयेक वन्दुककी गोली मेरे दयमें आकर लगती थी। टोटे की तोपें दिलके पहाडको पाती थी। कोई उटगी छछ्न्दर और बन्दर छोडताथा जो रस्तेचलनेवालों के पैरों में जाकर कुदाकूद मचा देते थे या हवालयोंके झगेंतोपर जा बैठते थे। मेरे मनके मर्कट और लोचनके उदरवारबार उडकर उपाके सरोसे पर उडकर जा बैठतेथे। अपने हृदयके महलमें रहनेवाली कोई कुमारिका राजमार्ग पर निकलती तोकितनेही तूफानी नवरगी महतावियों, उसाईयों, बिजली के तारों के ११४ उपा प्रकाश कर उनके जगमग करतेउजासमें दूरसेही सौन्दर्यज्योतिके दर्शन कर कराकर शरमानेके लिये प्रयत्न करते थे। लज्जाके बारीक धूपट, चन्द्रपुर चलती हुई हलकीसी बदलीके समान इन मुग्धाओंके वदनचन्द्रपर छाते और हट जाते थे। रसदर्शन की मेरी आकाक्षा पूर्ण होती हो तो मै अपनी दोनों आखोंकी रग बिरगी महत्ताबें रातभर जलाऊ, छिनछिनमें पलटते हुए प्रकाशकी रगत दिखाऊ और कल्पनाके इन्द्रचापकी छटा नगरभरमें फैलाऊ । मेरे हृदयमें इस प्रकार का उल्लास था परन्तु सानोमें क्री- चादी और हीरा माणिक की लताओंकीसी मेरी कल्पनालता अभीतो गहरे अधेरेमें ही चमझती और फूल छोडरही थी। लोक हवाइया चला रहेथे मानो आकाशमें प्रकाशकी कमी मान कर अन्धकारकी घटा को प्रकाशित करनेका यत्न ही न कर रहें हों ! मेरेभी शेखचिल्ली के ऐसे विचारोंकी हवाइया आत्माके आकाशके अंधेरेका प्रकाश करनेके लिये चलती थीं परतु व्यर्थ ! आदित्यावली जिसे प्रका- शित न करसकी उस आकाशको पृथ्वीसे भेजे गये क्षणिक दीपक क्या प्रकाशित करेंगे? नगरके सराफेके चौक में एक खड़ी हुई छोटीसी दीपमाला जल रही थी, इसके साम्हने चारोंओर की दुकानोंके जगमग करते हुए प्रकाशमी मन्द पडते थे मानो बिजलीका माणिकययंम नगरके बीचमें ही न गाड़ा हो! मुझे जान पडा कि उपाके एकएक अवयवमें ज्वाला प्रकटी है और नगरके नग (रत्न) के ऐसे सराफेके भरे चोकमें वह नगरके सारे महाजनों और सेठ सहकारोंको वोध देती हुई सौन्दर्यदेवी सहजभावमें प्रकट हुई अमिज्वालामें जलती, सती ही न हो रही हो ! उस मझरातको मेरी आंखोमें पूर उभर आया और नयनकी बदलीसे एफ सङ्घकी बरसी परन्तु इससे हृदयका मार हलकान हुआ। आंखों में प्रररण ८वा १६५ 'अधेरी छोई थी वह कुछ बुली, निराशायी पत्तिया कुछ कोमल हुई परन्तु कृष्ण पक्षका मेघाडम्बर दूरन हुआ। निद्रामें स्वममें भी इस सराफेके चौककी सो शिखावाली दीपमालि- काकी जलती हुई दीवट मुझे देख पडी ।पान से भी फूल विशेषऐस दूधिया 'फूलोंवालाझींझीका वृक्ष तो देखा हैन? इन पत्तोंकी बीडिया बना कर डाल डालपर औधी लटकादी और एकदम जलादी हों और इसतरह यह फूलाहुआ बालवृक्ष जल रहा हो इस प्रकार का मुझे स्वम हुआ फूलसिरिणीचकरीका छोटासा सरव आग्निके फूल बिखेर रहा हो इस प्रकार चिनगारियां उढतीं थीं और मुझे दझा रही थीं। आयुष्यकी ऐसी निराशाकी अमावास्या किसीकी भी न बीते । नवीन वर्षका प्रभात उगा, परन्तु वह कितनेके अन्तरमें ? पूर्वके महपमें रंगभरी उपा प्रकटी, परन्तु वह मेरी उपा न थी, और न मेरे लिये ही थी। वालक सर्वरस बेच रहे थे । बालक बालकके समान ही समझ सकते है न ? वस्तु विनाकी परछाई के ऐसे रीतिरिवाज अब हे किस कामके ? जीवरहित शवके ऐसे वे नहीं है ? प्रजाजन । देवहीन मन्दिरों में दर्शन करने जाओगे? परन्तु ससारजीवनकी यह मौत है या मूर्छा ! ससारकी मूर्छा होगी तो हट जायगी । देखो ! देखो' अब इसका कोई कोई अङ्ग हिल-सा रहा है। सब रस बिकते थे उस प्रभातमें मुझे एकभी रस नहीं मिलता था। रस विक्रते हुए मिलते होते तो जगत्में कोई भी रसका कगाल न रहता । लोक विकते हुए लेते है वे पुण्य नहीं लेते रसाभासके पाप टोटोंकी तोपें चला कर बच्चोंने जगत को जाहिर किया कि नये वर्ष का प्रभात हुआ है । देवमन्दिरों में मङ्गला आरातियोंकी इकठे करते हैं।

११६ उपा AAAAA ज्योति हुई। विश्वको बधाई देता हुआ वहा का घटारव का गुजार इस प्रमात को औरही मधुर भविष्य भाख रहाथा। उमग और उत्साह की प्रभाती गाती गाती मेरी माता उठी और चौक में दीपक रक्खे मानो नये वर्ष की ज्योति हमारे द्वारपर आज आ न बिराजी हो! परतु मेरे हृदय के चौक में तो न कोई बधाई की हवा आई और न उत्साहके प्रकाश प्रात काल में स्वच्छ वस्त्र पहन कर लोकसमूह धामधूम कर रहा था! कोई कोई साधुजनों ने अन्तर के वस्त्र भी धुले हुए और स्वच्छ सजे थे। परन्तु इस माशाभरे सौभाग्यरगी प्रभाप्रोज्वल प्रभातमेंभी मेरे अन्तरकी घटा तो न फटी ही और न हटी ही । मैंने तो इस कृष्णपक्ष की काली कबली ही ओढ रक्खी थी। चद्रिका घरघर मिठाई दे आई, भन्दिर मन्दिरके दर्शन कर आई और आकर मुझसे कहा वीर, आज के प्रभात के ऐसा तेरा भाग्य उज्ज्वल है। इस बैठते वर्षकी दो पहरी को मैंने उपाकी माताको अन्नकोट के दर्शन करनेको जाते हुए देखा किन्तु साथमें उपा न देखी। मुझे जान पड़ा कि यह कुटुम्ब कुटुम्बलक्ष्मीकोही न भूल आया हो। इसप्रकारके अपशकुनवाला मेरा नया वर्ष बैठा परन्तु शकुनावली के सूक्त, वेदसूक्तोंके समान, क्या सच्चेही हैं ? रातमें मैं हिंदलोट साट पर झोले खाता हुआ पड़ा था। अन्धकारकी हिंदलोट साटमें बाहर ब्रह्माण्ड झोले सा रहा था । हृदयमें इस कृष्णप- क्षकी तरढ़ें उछल रही थीं और जीम नाटकका यह गीत गुनगुना - 7 प्रकरण८वा ११७ 1 'झूले सम हे सखी हियामोरा झोले साय-साय, महासागर के बड़े बड़े मौजोंमें नाव झूले ऐसी मेरे हहयकी नाव हिलडुल रही थी। दूजके दिन प्रमातमें केशरकुकुम और अक्षतका थाल लेकर चन्द्रिका मेरे कमरेमें आई । मेरे तिलक किया और कहाः युगयुग पहले आजके दिन रघुकुलमानको राजसिंहासनपर पधरा कर शान्ता बहनने तिलक कियाथा । तेराभी सौभाग्य सूर्यवशियोके सूरजके समान ही तेजस्वी है। ऐसेही है-अरुणकीरेखाके ऐसे बहन के तिलक भाईके ललाटपर आजभी। भविष्यवाणी कहती हू तू मुझे अपनी पैगम्बरानी मानना भला ऐसे मधुर मधुर पैगम्बर और पैगम्बरानी ससार के सब सन्तानाका प्राप्त हो। परन्तु मेरी निराशाका कृष्णपक्ष एक पखवाडेका ही न था। इस अधकारके काले और अभेद्य परदे, आसमानके समान गहनताके रगसे रंगे हुए थे और सारी दिशाओंको रोक कर लटक रहे थे। इतने इतने विरहके युग विश्वमें व्यतीत हुए, और इतने इतने बिर- हीजन विराट के मडपमें फूले हुए कुम्हाला गये तोमी विरहकी उक्तियोंको अतिशयोक्ति माननेवाले मानवी अपतक मौजूद है ? सम्भव है कि उन्हें इसका अनुभवही न हुआ हो। या विरहके गहरे पानीमें दुबकी शियालेकी लम्बी रात आई। मेरे हृदयमेंभी बात उठी कि मैं अपने दयकी बातोंको लिखू । पहले-पहलका प्रेमपत्र लिखते लिखते मैने कितनोकतने कागज और कलम पलटे ? मैने पाचवीं कलम और छट्टे कागजपर उसे पूर्ण किया था। विरहसम्बन्धी पदयके उभरोंको लिसते हुएमी, ठीक ऐसी ही तो नहीं, परन्तु कुछ ऐसी ही मेरी हालत हुई थी। कागज और कलम लेकर बैठा तो पहला प्रभ तो यही उठा कि उपन्यास लिखू या काव्य जगत्के कवियोंकी जन्मपत्रियां मिलें तो देखना बहतोकी जन्मतिथिया विरहपक्षमें ही होती हैं। ही न लगाई हो ।

११८ - हमारे प्रेमविरहको अमर करनेकी लालसासे और जगतकी कवितामें इस ज्वालाकी लपटें यथार्थ रूपसे अभीतक अवतीर्ण नहीं हुई है इस अचलाचल मानता से मैने कविता लिखनेका निर्णय तो सुगमतासे. कर लिया । परन्तु महाकाय लिसना या सढ काव्य ? हाफिज की तरह, गजल की बुलबुल बुलवाऊ या अमरु के समान कोकिलकी सी मीठी मठिी अलग अलग कृक करू इसका निर्णय तो न उस समय हुआ और न अब ही होता है। हमारा प्रेमविरह अमर न रहा और इससे अमर हुवाभी नहीं । आज मै अपनी इस नोव पुस्तकको देखता हू तो मुझे-सच कहता हू आप हँसियेगा नहीं-ऐसा खियाल उठता है कि कुछ विधाताके ऐसेही विधान होंगे कि जगतका सर्वोत्तम काव्य-प्रेमकाव्य लिसनाबाकी रह जाय ! उपा कहती है कि जीवन ही सर्वोत्तम काव्य है यदि लिखना आता हो तो। परन्तु इस शियालेकी लम्बी विरहरजनियों में तो मै लिसेही जाता था नोंध कियेही जाता था रातोंकी रातें जगता हुआ कल्पनातरमोंके गर्दवचन, टपकाये ही जाता था, और दलपतरामकी अतिशयोक्ति गुन- गुनातागुनगुनाता सच्ची बनाये ही जाता था- लिखलिख कागज लेखिनी मेरी घिस घिस जाती है सारी। पृथ्वी चलती ही रहती है भै लिसताही रहता था अद्भुत आनन्द और आश्चर्य से चन्द्रिका बाचती थी । जहा न समझती वहा बुद्धि- प्रगल्भता, अगोचर गहनता और अद्भुतत्त्व मानती थी। कुछ समझान समझा उषाको पहुंचा देती थी । उषा आज कहती है कि हमारे दर्षि कृष्णपक्षमें यह प्रेमसन्देशही मेरा और उसकाभी जीवनचन्द था।

प्रकरण ९वा प्रकरण ९ वा चिरकालके भेट । ये भेद चिरकालके हे । देह और देही के इतने प्राचीन, सृष्टि और सृजनशक्ति के इतने गहन और सारे विश्वको गूथ रखने वाले महागुरु- त्वाकर्षण के इतने प्रबल और सर्व व्यापी ये नरनारीके गुरुत्वाकर्षण के मेद है। तत्वशोधक ब्रह्मके विषयमें 'नेति नेति' कह कर विरत हो जाते है। तत्व मीमासकों से तो ब्रह्मकी प्रत्येक ब्रह्मांडलीला भी 'नेति नेति' का ही उच्चारण करवाती है।आज तक कोई ऐसा विद्यावाचस्पति जनमा नहीं है कि जो ब्रह्मका या ब्रह्माण्डलीला का पूरे तोर पर वाणीसे वर्णन कर दे। मनुष्यजाति के जन्मके साथ ही जन्मे हुए इस भेद के इतिहास आसमान के गड्डेमें ऊडे-से-उडे गड हुए है। वेदकी ऋचायें प्रगट हुई तभी से-उससे पहले से ही इन भेदों को देखने और खोल्ने के लिये कविदार्शनिकों का यन हो रहा है । कोई समझाओगे कि ये भेद हैं क्या सब इसका अनुभव करते है परन्तु अनुभव मात्र क्या कभी वाणी में पूरे तोर पर वर्णन हुए है ? रसके ये आश्चर्य या ये आकर्षण, सौन्दर्य क पूज्यभाव या वत्सरता, रसोन्मत्तता या स्नेहावतार, आदर्शभावना के अगोचर ये नृत्य या आद- समावनामें निरन्तर रहते हुए ये करुण बीजाङ्गुर चद्रकी कलाओ के समान स्नेहकलाओंकी ये सब गहन भेदावली, क्या है ? इस स्नेहप्राप्तिके रसानन्द केसे हैं ? इन रसिक प्रश्नों के हार्दभेदी मर्मज्ञ उत्तर इतने सहज नहीं है! 7 उषा. बहुत आत्मा और परस्माके कोई नास्तिक कहते हैं कि स्नेह तो देहवासना है । मेरी इस स्नेहकथाको कोई बाचो तो बाचनेवाले महाशयो! बांचते बाचते विचारना । जगतके शंकर हो कि पार्वती-जो बाच रहे हो वहीं- बाच विचार कर कहो कि वह महाज्योति मुझ में या आपमें जब प्रकट हुई तब क्या केवल देहवासना थी? शवके स्नेह किसीको हुए है ! मिस- रके किसी मुसाफिर को शवका मोह हुआ होगा या शवके साथ उसने लग्न किया होगा एक दिन परम एकान्त था और वाचक आप और प्रियजन उस दिन परम एकान्तमें थे धेसेही उघा और मैं दोनों अकेले ही थे और एक दूसरेके नयनोंके अतल जलकी ओर देख रहेथे । इस गहराई की ऊडी-से-ऊडी गुहाओंको पारकर हम कुछ खोज रहे थे जो सों को मिला है । हमारे गुरुत्वाकर्षणका यह महायोग था परन्तु देहवास- नाकी तो इसमें गन्धभी न थी । देहयोगको ही स्नेह कहनेवाले स्नेहशास्त्रके चार्वाक क्या विप्रलम्मशृंगारकी ऋतुको या इस ऋतुके रसफल के ऐसे परम स्नेहकाव्योंको स्नेहहीन कहेंगे? सभोग शृङ्गारही क्या स्नेहका दिन है । और सब क्या अधेरी रातें ही हैं ? स्मरणके सगी क्या स्नेहयोगी नहीं। देह मिलो या न मिलो ऐसे उद्गाता क्या स्नेहके सद्भा नहीं ? सब अननके व्रती क्या अङ्गको ही चाहेंगे? अमूर्तकी पूजा क्या बिल्कुल खोटी है ! अनवतारी के उपासक क्या प्रमुके उपासक नहीं ? प्रियजन के महलकी बारी में जिस दिन तुझे प्रियवाचक । प्रिय- दर्शन हुए और दर्शनसमाधि लगी उस समय तुझे प्रिय-भावना हुई थी या बारीकी भावना देवमन्दिरमें इस सिंहासनपर जैसे देवमूर्ति विराजमान होती है वैसेही प्रियजनके देह-सिंहासनपर इस आत्मज्योतिका अखण्ड दीपक दमकता प्रकरण ९वा १२१ Mmmmm है । देवमदिरमें इस सिंहासनके दर्शन के लिये जाते हो या सिंहासन- वासी इस देवज्योतिक! मनुष्य यस्रोंसे जैसे देहको ढंकता है वैसेही सरजनहारने देहीको देहसे ढंका है। प्रियजन प्रियतमको चाहते हैं या प्रियतमके वस्त्रोंको' कौन कहेगा कि यह महावाञ्छा वस्त्रोंकी है ? कौन कहेगा कि प्रियजन प्रियतमके वस्त्रोंकी अवगणना करते हैं ! कोन कहेगा कि प्रियत- मके परिधान के पदत्रय रसरहस्यके गभीर मन्त्रनहीं सुनाते ? कौन कहेगा कि प्रियजन के परिधान के रंगरूप परिमलमें प्रियजन रससन्देश नहीं पढते विराट का वर्णन करते हुए द्वैपायन व्यासभगवानने गाया है कि- दिव्यमाल्याम्बरधर दिव्यगन्धानुलेपनम् सर्वाश्चर्यमय देवमनन्त विश्वतोमुखम् हा, प्रियतमके दिव्य अम्बर दिव्य मालायें और दिव्यगन्धलेपन' प्रिय- जनकी आसमें सब आश्चर्योसे भरे हुए हैं । परन्तु प्रियतम तो स्वय -विराट, अनन्त, विश्वतोमुख है । प्रियजन उसी देवकी वाछा करता है । कोई वस्त्रोंको नहीं चाहता, वस्त्रधारीको सब चाहते हैं कोई देह को नहीं चाहता देहधारीको सब चाहते हैं । अदृश्य या दृश्य रूपसे देव जहा पर न हो ऐसे देवशून्य मन्दिरमें देवमक्ति करने को कितने जाते हैं ? भक्त, मन्दिरके सौन्दर्यकी पूजा करते हैं या मन्दिरवासी देवके सौन्दर्यकी ? अन्नके बिना दिन व्यतीत हो सकते हैं, पानीके बिनामी घटे चल सकते हैं, श्वासोच्छ्वासके बिनाभी मिनटों तक रह सकते हैं परन्तु पदय- चेतनाके बिना पलक भरभी नहीं जी सकते, जीवनके समानही स्नेह- जीवनकी भी घटना है। हृदयचेतना ही उसका अमर चेतनतत्त्व है । परन्तु परमेश्वरने ही सृष्टिमें आत्माको शरीरविहीन न बनाया, और उसे देहीके लिये देहके आवरण अनावश्यक न जान पटे। जन्म- ।

१२२ उपा h ANA भरके लिये त्याज्य न भासित हुए-तभीसे जगतने ठहराया कि देही और देहका नित्य योगही जिन्दगी है और नित्य वियोगही मृत्यु। मानवलोकके लिये प्रभुको आवश्यक जाना पड़ा हुआ देहका अपरित्याग मनुष्यको आवश्यक लगा इसमे उसका क्या दोष ? सृजनपरपराकी महागगाको प्रमुने जबस शरीरके शिखरसे प्रकट की तभीसे उस पहाडके पत्थरभी पूजे जाने लगे । नया चेतन प्रकट करता हुआ ब्रह्माका सुजनस्रोत देहके सरोवरजलसे प्रभुने झरता हुआ बनाया तबसे गोमतीकी मिट्टीभी गोपीचन्दनके रूपमें वन्दना पाती हो गई। प्रमुने मनुष्यको लोचन दिये तभीसे उसे मूर्तिपूजक बना दिया, पृथ्वीवासी सब-के-सब केवल चेतनज्योति नहीं है और न केवल दिव्य- चक्षु ही है । सामान्य रीतिसे यदि मनुष्य स्थल-चेतन दोनोंका उपासक हो तो ये उसके आजन्म प्राकृतिक सगरगके शिक्षण और प्रतिकरण ही है। प्रकृतिके पटपर तेजछायाके रंग भर कर ब्रह्माण्डका महाकाव्य परब्रह्म भूति-अक्षरोंसे लिखा गया तभीसे मनुष्यों में मूर्तिपूजाका प्रारभ हुआ आर मनुष्य मूर्तिपूजक हो गया । जबतक भाव प्रदर्शनके लिये शब्दमाला आवश्यक है और शब्दमालाके लिये वर्ण मूर्तिया आवश्यक है, तबतक मनुष्य मूर्तिपूजक रहेगा। जबतक मनुष्यके आसें है तबतक वह चाहेगा कि अपनी भावना के प्रत्यक्ष दर्शन करे, और वह, क्या प्रभुभक्तिमें और क्या प्रेमभक्तिमें मूर्तिपूजा करेगा ही । पृथ्वीलोकमें मनुष्य के लिये अमूर्तपूजा और मूर्तिपूजा दोनों विधान है। मूर्तिपूजा की जड मनुष्याकी देवमदत्त आसमें है । मूर्तिपूजाके ए मूर्तिभंजको । मूर्तियोको तोडनेके पहले मनुष्योकी आखों को फोडो । मानवजातिकी आखे फूट जाने पर मूर्तिके दर्शन की लालसामी जगतसे उठ जायगी। .

प्रकरण ९वा १२३ Ame ~ और ऐसा समझकर ही, सयमचक्रवर्ती योगीन्द्र सूरदास महाराजने तेजमणिके ऐसी दोनो कीकियोंकाफोड दिया था कि आसोकों जगदर्श- नकी इच्छा ही न रहे ! पांच ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारा मनुष्यको ज्ञानकी प्राप्त होती है । अच्छा तो बतलाओगे कि कुछ लोग आखको झूटी क्यों कहते हो । नेत्रधर्म सन्चा है तो दर्शनव्यापारभी सञ्चा है, दर्शनव्यापार सञ्चा है तो मूर्ति- वाञ्छना भी सूची है। मूर्तिपूजाके मूल दर्शनेन्द्रियकी दर्शन भाव- नाम है । दर्शनेन्द्रियकी दर्शनमावना के इतने ही मूर्तिपूजाके भी आयुष्य है । प्रेमलक्षणाभक्तिके हम भक्तजनोंकी तो रसके रसिया दयाराम की भाति वाञ्छा और उपासना सब मूतिचन्द्रकी ही होती है। सभी ठोर हरि आपके मेरा प्रिय इक ठोर तुम रीझो लस चादनी मिल चन्द मनमोर उपा मेरे जीवनका चन्द्र था और इस चन्द्रके चन्द्रामृत की मुझे चाह थी । क्या स्नेहमे और क्या बद्माण्डमे-एकमेवाद्वितीय-ही परम सत्य है और चादनी के बदले चन्द्रपूजनके रसविधानों में यह महा- सिद्धान्तही चमकता है। अनेकपतिविधान मानने वाले तो अब कोई होगे तो ही होंगे परन्तु अनेकपनीविधानके मानने वाले तो अभी है। उपनिषद की हिमायत लेकर वे कहते है कि बाटनेसे कउ कभी नहीं होती और पूर्णमेसे पूर्ण लेनेसे पूर्णही शेष, रहता है। वे कहते है कि दाशरथी स्मृतिमें अनेकपनी विधान की परवानगी है ।सद्दाग्यसे इस स्मृतिके मुझे दर्शन नहीं हुए इसम मुझे तो ऐसा जान पडता है कि अनेकपतिविधानके समान अनेक पत्नीविधान है । एक स्थानपरएक समयमें एकही वस्तु रह सकती है और एककालमें एक वस्तु एक कोहीं दी जा सकती है। देयारियोंके वस्तुविचारके । - १२४ उपा येन्यायसिद्धान्त मुझे तो ठीक जान पड़ते है । एक होने परमी अन्य पति या पत्नी करने वाले स्नेह नहीं किन्तु किसी और ही वस्तुको देते लेते है सज्जनो क्या आपको ऐसा नहीं जान पडता' रसिकता के कलाविधायक गीतसे कानोंक द्वारा और चित्रसे नयनोंक द्वारा रसका उद्दीपन करते है। अमूर्तपूजाके पुजारी गानाचार्य सच्चे हैं और मृतिपूजाके पुजारी खोटे है ऐसा कहने वाला कोई रसमीमासक अभीतक पैदा नहीं हुआ ! और कौन कहेगा कि कारके उच्चारणकी वायु मूर्ति नहीं है ? भक्त ध्यानी जोगीजतीने प्रकारका भावोच्चारण कर वायमति रची इसी लिए क्या उसकी कार भावना को कोई असय कहेगा? कालीगेली उपाकी यह कविता लिखी इसीलिये मेरे उपाभाव सोटे यही बात है न ? वाचक तभी अपनी उषा की बात न कर, ओ ब्रह्म- कथाकार | तेरी ब्रह्मकथा को भी रोक दे, नहीं तो भावोञ्चारणसे वायु- मूर्तिया बन जॉयगी, बुद्धि बाहुल्य दिखलाते हमारे तरंगी मूर्तिभजक तुम्हारे हृदयभावोंको मिथ्या कहेंगे और वायमूर्तियोंको फोडने के लिये ये गदाधर गदायें उठावेंगे। परब्रह्मने प्रकृतिका स्वाग लिया तभीसे परब्रह्मकी मूर्ति रचाई ब्रह्मने ब्रह्माण्डधारा तमीसे यह अडमूर्ति अवतीर्ण हुई। निरखना न निरसना यह प्रत्येक के नेत्रधर्मका प्रश्न है। भक्तजनों की और योगीश्वरोंकी पञ्चेन्द्रिया प्रभुको चाहना करती हैं और स्नेहयोगीन्द्रोंकी पाचों इंद्रिया प्रियतमको चाहती है । प्रियतम के सौंदर्य के दर्शन नेत्र चाहते है, प्रियतम के गीतमाधुर्यकी कान को इच्छा होती है, प्रियतम के अधरामृतकी इच्छा जीभको होती हैं, प्राणे- द्रिय प्रियतम के परमोत्कृष्ट गन्धकी वाच्छा करती हैं, देह देहको चाहता है और आत्मा आत्मा को | यह पछिये कि कौन किसको नहीं चारता ! .

प्रकरण ९वा १२५ सब सबको चाहते हैं। मैं उपाका क्या नहीं चाहता? मेरा क्या, उषाके किसको नहीं चाहता १ मेरा सब उपा के सबको चाहता है। यह पूर्ण है, ये पूर्ण है और पूर्ण के पूर्ण में मिलने से सब पूर्ण है। वाचक । धैर्य जरा धैर्य रखना । अभीतक इस भेदकी मूल भुलैया का छोटासा भी खुलासा नहीं हुआ है । रसयात्रामें थाक तो नहीं लगी! गंगा उतर आये परन्तु महावन में तो अभी प्रवेश करना बाकी है। देह और देही की रसमीमासा का यह एक प्रकरण है, और उन दोनों से एक एक के कोट्यनुकोटि किरण के इतना भी लबा नहीं है । उषा को मेरी इदिया चाहती है या इन एकादशेन्द्रियों के द्वारा मेरा आत्मा ? इन्द्रिया स्वतन्त्र व्यक्तिया है या किसी स्वतत्र व्यक्तिकी साधक अङ्गुलियों के समान अनुचरिया' प्रियवाचक तेरे लोचन सदासर्वदा तेजस्वी रहियो और चश्मा लगा- नेकी नोवत न आइयो । परन्तु चश्मा लगानेवालोंके चश्मे जगतको देखते हैं या चश्मे के पीछेकी आखें ? अब एक पैर आगे बढ नित्य व्यवहारकी माषाके परदेको हटाकर आगे चल मनुष्यकी असिया या पुतली जगतको देखती है, या आख और पुतली के चश्मोंके द्वारा कोई चेतन ! उपाको मेरे चश्मे या आसे नहीं देखते हैं किन्तु इन दोनो में होकर आत्मा किरण देखते है । चेतनभूमिमें चेतनर्ति के -दिव्यरूपमें साकारके, बिजलीकी पाखे है और उन पांखोंके किरणपक्ष निजस्यूल में हो कर परस्थल और परस्थूलवासी चेतनको निरसते-जूते- अनुभव करते है । परस्थूलमें रोमराजिके समान प्रकट होते हुए चेतन- किरणके सन्देशों को निज चेतनराजके चरणों में ला रसते है वृति- यों के समान इन्द्रियामी आमाकी कलाये है, ससिया हैं, सीता करती है अपने लिये नहीं परन्तु चेतनके लिये । चदिका उपाको चाहती है सो मेरे लिये हो न १२६ उपा. unnarv NRN AMAAN AA इन्द्रियाँ देहके लिये नहीं चाहती और न देहमात्र को ही चाहती है। विद्यु कमलकी पंखड़ियों के समान प्रकटती और खिलती-फैलती प्रियजनकी इन्द्रिया प्रियतम के आसपास उडती हुई चेतन विजलीको चाहती है। प्रियतमके वस्त्रालडारकी लालसा रहती है वैसेंही प्रियतम के देहकी भी वाञ्छा है । परन्तु वनालडारके साथ उस वस्त्रवासी देह की, वैसेही देहके साथ देहनिवासी देहीकी भी परम वाञ्छा प्रियचेतन को होती है। उपाक दर्शनसे मेरे रोमरोम खडे होते है और इस रोमाञ्चको उपाके रोमाञ्चकी इच्छा होती है। परन्तु लोहचुम्बककी आकर्षणविद्युतसे जैसे लोहपत्तियोंकी रोममाला सड़ी होती है वैसेही उपाकी और मेरी खडी हुई रोमावलीभी चेतन भूमिके चैतन्याकर्षणकी किरणोंका ही अवतार है । नेत्र कुम्ममें से प्रकट हुई किरणें चन्द्रकुम्ममेकी सारी किर- णोंको चाहती है, वैसेही मेरी रोमावालीमें अवतीर्ण होती हुई चेतनकु- म्भकी किरणमाला, उषाकी रोमवालीमें जन्मान्तर पाती हुई उसकी चेतनकुमकी किरणावलीकी वाञ्छावाली है। पृथ्वीपर होती बरसात जैसे आसमानसे बरसती है वैसेही प्रियजन और प्रियतमको देहचम्बक विद्युतके परम धाम चैतन्यभूमिमें हैं । ब्रह्माण्डलीला परब्रम्हकी रमण- क्रीडा है वैसेही प्रियजनकी रसलीलामी रसचैतन्यकी रमणक्रीडा है। आत्मान रथिन विद्धि शरीर स्थमेव च, वाचक! बतलायगा कि रथके रणचक्र या रसचक्र रथके लिये है या रथीके लिये! उपा कहती है कि भोजनकी भूख और पानीकी प्यास जैसे लगती ह वैसेही उसे मेरी इच्छामी प्रकट होती है। अपने अनुमवसे मैं भी कहता हू कि उपाका कहना ठीक है। माताके हृदयात की म्यासको लेकर जैसे बच्चा पैदा होता है, वैसेही मनुष्यकी पह प्रियकं अमृतकी प्रकरण ९ वा. प्यास भी जन्मके समान ही प्राचीन है। बोये हुए वीज ऋतु घटनेसे समयपर अङ्कुरित होते है वैसेही आजन्म बोये हुए उस बीजके अङ्गुर भी समयपर ऋतु आये प्रकट होते हैं । पौधे जमते ह और मोर मोरते हैं । उपा कहती है कि हम मिलते हैं तब उसके अग अग की शाखाके गुच्छ गुच्छमें मंजरियो खिल उठती हैं । देहखड की सपाटीकी अनी अनी पर मेरे ज्वालामुखी घघकता है। इसीसे कहता हूं कि उपाका यह कहना महा अर्थवाली रसऋचा है। मेरे ज्वालायें प्रकट होती है तो कोमलाही उपाके ज्वालाके मोर प्रकट होते हैं, यह योग्यही है। वसन्त के आबपर मनरी प्रकट होती हैं वैसेही जीवन के वसन्त के आनेपर मानवरुधिर में की रसिकताके मनुष्यरसाल पर भी मअरिया प्रकट होती है। यौवनकी कीलें मनष्यके चहरेपर प्रकट होती हैं तब आयुष्यकी चसन्त बैठी जान पड़ती है। यह आयुष्यकी वसन्त ही प्रियतम की चाञ्छा की ऋतु है। वर्षाऋतु में जैसे पपीहा पी, पी, की पुकार मचाता है वसही मनुष्यका अन्तर्वामी विरहीष्मका स्नेहप्यासा पपीहा इस ऋतुराजमें पोपी की रटन लगाता है । सब कवियोंके गान इस रटनके अनुमान मात्र हैं। जमनाके किनारे कन्हैयाने बसी बजाकर उसमें इसी रटन की धुन जमाई थी। यह आत्माकी आरजू का घोल था। जीवनकी जमनाके गहरे जलमें आत्माकी वसी का यह शब्द गिराया । गोपके, गोपीकी ओरकी गोपभावनाके ये गीत थे । आत्माके समान ही सारी सद्भावनायेंमी अमर हैं और आरमाके समान ही नेह मावनायें भी अमर है । परब्रह्मको प्रकृति के लिये और विष्णु भगवानको महालक्ष्मीजीके लिये येही सनाव है कि जिनकी चिनगारिया प्रियजनों के ममन्दिरमें आजमी पूजी जाती हैं ।

उपा और स्नेह है क्या ? चोरी है, लूट है, दान है, या विजय है ? चोरे सो चोर, लूटे वह लुटेरा, मांगकर दान पाये वह भिखारी, अश्वमेध जीते वह चक्रवर्ती, यह तो शास्त्रमान्य प्राचीन सत्य है । इन्द्रने अहल्याका, सेकस्टसने ल्युक्रशियाका, तभग किया सो चोरी, रावणने सीताका, पेरिसने हेलनका हरण किया, वह लूटः ये सवही रसाभास है, अमृत नहीं, विष है, जीवन नहीं, खून हैं। शकुन्तलाके आश्रममें मृग मुगियों के शिकारकी मनाई है। परन्तु दुष्यन्त महाराजभी भिखारी थे, यह सौमाग्य की बात थी कि माँगेहुए रसदानको पागये । रसदेशके महावीरोंकी न इस प्रकारकी इच्छा होती है और न आशाही। ये वीर तो, रघुकुल- भानुराम और गाण्डीवधन्वा अर्जुन बने हुए अपनी रसेश्वरीके गुणकीर्तन मुन स्वयंवरमें सचार करते हैं, त्र्यवक के बाणको तोडकर या मत्स्यवेध करके पुरुषार्थ प्रगट करते है, स्वयवर जीतते हैं और अपनी सीता या द्रोपदी के द्वारा निजगुणवीरत्व को समर्पित की हुई विजयमालाको धारण करते हैं। रसका वीरकेसरी सुन्दरी के सौन्दर्य की चोरी नहीं चाहता, लूट नहीं चाहता, मीस नहीं चाहता'-प्रभु जैसे मक्तके चाहता है वैसेही स्वतन्त्र और स्वेच्छाजन्य सुन्दरी के द्वारा किये हुए सौन्दर्य के समर्पण चाहता है, अनके अभिषेकभी चाहता है और प्राणकी पुष्पवृष्टि भी चाहता है । " रसिकवर । आपही इसके योग्य हैं लीजिये इस फूल डालीके फूल"देह और देहीके इस प्रकारके उपहारकी प्रोमियों को परस्परमें पिपास होती है। जिस तरणनद्धासे योजनान्धाकी नावमें सान्तनु बैठे वैसीही रसश्रद्धा के समर्पणकी अपनी योजनगन्धासे सब- शान्तनु लालसा रखते हैं । जैसे बॉस और पतवार एक नाव में दो चलते हैं और गति एक सघती है वैसेही दो शरीर होनेपरभी जीवन एक होकर बहे यह रसिकोंकी रसभावना है । सरिता वेगसे सागरकी और बढे, सागर उछलका सरिताका सत्कार मधुर हो जाय और रसतरङ्गमें - प्रकरण ९वा रसतरह को मिलाकर दोनों एक हो जाँय इस अन्योन्य के हृदयाभि- नन्दन और रससत्कारको प्रेमके महावीर रसविजय कहते है । ये हैं स्नेह और येही हैं स्नेहके जीवन । प्रभुने प्रकृतिकी सूर्य किरणसे अर्चना की तीसे नारी-नरकी देवी है । प्रकृतिने प्रमुको पूर्णिमाका चद्र किया तमीसे नर है नारीका देव । स्त्री-पुरुष तो एक ही ब्रह्मलताके दो पुष्प है कौन किससे कम है और कौन किससे ज्यादा ? वाचक ! देतबाइसे चौकन्ना होता है । तब तो तू स्नेह मीमासा नहीं सीख सकता ' तू तुझेही चाहता है या निजकी उषाको तेरी उपा तुझे चाहती है या अपने आपको ' देतवाद को मिथ्या कहनेवाले साजन नहीं है । मैं उपाको चाहता हू और उपा मुझे । एकोह बहुस्याम् परमात्माने कहा तबसे द्विवचन ही क्या बहुवचनका जन्म हुआ है और यह बहुवचन जबतक ब्रह्मलीला बदन हो जायगी तबतक न मापा न्याक रणमेंसेही लोप होगा और न बह्माण्डके वस्तुव्याकरणमें से ही। बडका एक बडभी सच्चा, उसकी अनेक शाखायें भी सच्ची, उनकी टहनियाभी सजी, और उनके अन्कानेक पान भी सच्चे इन सबमें- माणस्य प्राण-के समान एक ही रस बहता है । यह बात जितनी सच्ची है उतनी ही सच्ची यहभी है कि एकरसके परम तत्त्वसे पोषित होते हुए अनेक रगरूपणा गरी व्यक्तिभावभी विलास करते हैं। अद्वैतभी सभा है और दैनभी । द्वैत सञ्चा न हो तो अदेत खोटा हो जाय, दैत के बिना अद्वैत किसका ? उपा कहती है कि रास रचते हुए उसके दोनों "त ताली बजाने को अपने आप आकृष्ट होते है, इसी मकार हमारे सारे जीवन के द्वैतभाव आपसमें अद्वैतभावसे आकृष्ट - होते हैं। परन्तु यह जीवनताली बजी या नहीं ? उस समय तो हमारे सारे- के सारे जीवनका यह महा प्रश्न था ।

उपा. श्रुतिवाक्यानुसरि एक और दोके भेद नहीं हैं परन्तु एक और बहुत को भेद है । ततः अनेकानेक वादही सञ्चा है । एक ज्योतिवाले अनेक तोरे गगन में प्रकाशित होते हैं। द्वित शब्दकी सिद्वि द्रुतमेही होती है और अद्वैत शब्दमेही देत शब्द मौजूद है । इसी तरह अद्वैत भावकी सिद्धिमी द्वैतमावमेंसे है और अद्वैत भावके भीतरभी द्वैतभाव लगा हुआ है। वाणी और अर्थ एक है या जुबे जुदे । जुदे होने परमी एक हैं और एक होने परभी जुदा हैं। उपाके और मेरे समान, प्रियतमा और प्रियतमके समान, राधा और कृष्गके समान । विसर्गकी दो बिन्दुओंका उच्चारण और स्टिरियसकोपकी दो तस- चीरोंका दृश्य एकही होता है इसीका नाम हे वैताद्वैतभाव । एक किरणमें सात रग और सात रगोंमें एक किरण एक ज्योतिमें अनेक किरण और अनेक किरणों में एक ज्योति इसीका नाम है अने- कानेक वाद । मैभी सञ्चा और उपाभी सच्ची तूभी सच्चा और तेरी उपाभी सच्ची । हम सब मृगजल नहीं हैं, या रातके स्वमतरग नहीं है। अनन्तके प्रकाशमय दिवसोंमें रहनेवाले अनन्तके कुमार और कुमा- रिया हैं । अनन्तके चौकमें क्रीडा करते हैं, अनन्तकी लीला रचते है। सब प्रियतम और प्रियतमायें अनन्तकी ही वंशज सन्तान है । सान्त है सो लीला है, अनन्तके रसजलकी ऊर्मिया है, रसजलके समान ही सञ्ची है। नरसीजीने गाया है कि ब्रह्म लटके करे ब्रह्मपास' हमें यह सञ्चा जान पड़ता है। उपाकी मुस्कराहट मुझे और मेरा मुस्कराना उषाको प्रेमके परम सत्योंके समान ब्रह्मके लटके ही जान पड़ते है । वाचंकातू हसता है कि पागलं कीसी बातें है । होंगी, तू सञ्चा होगा। मेही सञ्चा हूं ऐसा मैं भी नहीं कहता । परन्तु मेरु हिल जाय, ब्रह्माण्ड चल जाय, प्रकरण ९चा १३१ - MAAVA भी उपा तो सच्ची ही है । क्या तेरी भी उपा सञ्ची नहीं है । और क्या तेरी उषाभी ऐसाही नहीं कहती, पूछ देखना शङ्का होतो फिर एकबार, ऐसेही 'बझलटके' करके। और सौन्दर्य सौन्दर्य को बुलाता है, रसिकता रसिकताको आभ- न्त्रण देती है. अमौन्दर्यको नहीं, अरसिकता कोभी नहीं । कारण कि सौन्दर्य नीति और प्रभुता है, असौन्दर्य अनीति और अप्रभुता है । मन- ज्यकी प्रथम सहज वृत्ति पुण्यकी है, और द्वितीय विकृतवृत्ति पापकी । इसीसे प्रभुका पुण्यवाठक सौन्दर्याभिमुख हे असौन्दर्याभिमुख नहीं । और सौन्दर्य केवल सफेद रगही नहीं है भला ! ऐसा होता तो प्रभुका पूर्णावतार असुन्दर कहा जाता और रसमूर्ति राधिकाजी असौन्दर्यही उपासना करनेवाली कही जाती। प्रकृतिदेवीके महाप्रासादमें सुन्दरता नियम है, असुन्दरता अपवाद है। और अपवादोंमेंसे सिद्धान्त निकालनेका ठेका तो मृगजल और सर्परज्जुभ्रमके स्वप्नजालमें रमण करनेवाले मायावादी वेदान्ताचार्योंके लिये ही रहने दो । असुन्दर फूल या असुन्दर तारे कही देसे है ? पर- मात्मा परमसौन्दर्यनिधान है, इससे प्रभुके पुत्र और पुत्रिया सौन्दर्यके पुजारी और पुजारिने है । रसेशकी रससन्तानों को रससुन्दरताकी प्रम- ताके आकर्षण होते है। मनुष्य स्वभाव सुन्दर है क्या नर और क्या नारी ? बीजमें रस है उसका प्राकृतिक मूर्तस्वरूप पुष्प है । इसीतरह नर. नारीके अन्तग्में बसी हुई रसिकताका प्राकृतिक प्रतिमादर्शन ही सुन्द- रता है । रसके जमे हुए पुष्प ही सौन्दर्य है । इसी लिये सब रसिक सुन्दर होते है और सुन्दर सब रसिक होते है । प्रियजनके देह देहके सौन्दर्य को चाहते हैं और प्रियजनके आत्मा आत्माके सौन्दर्यको, मियका किसे नहीं चाहता ? प्रियका सारा सौन्दर्य प्रियके सौन्दर्यसर्वस्वको चाहता है। विश्वकी विकृतियोंको तूने देखा है। बलात्कारसे विधवा रही या यौवन- युगमें कुमारी रही को देख कर मुझे तो विश्वकी विकृति या विधाताकी विचित्रता याद आती है। मुझे तो ये कुसुमहीन कुसुमके पौधे जान पडते है। ऐसा मालूम होता है कि भरे ऋतुराजमें भी मोरहीन आम्रघटायें है। नैष्टिक ब्रह्मचारी या ब्रह्मचारिणिया पृथ्वीके चबूतरेपर ब्रह्मलताके ब्रह्मपुष्प है । स्मरणसगी विधुर या विधवा ससारके अधोर वनमें नेहके सन्तजन है । परन्तु सयोग बलात्कारकी विधवा या कुमारी नवयौवनायें तो वसन्तपूर्णिमा की धन्यतम चादनीमें प्रकट हुई होली की झालें जान पड़ती हैं । अपूर्ण लालसाओंकी चितायें लगती है। बाललग और प्रौढलग्न दोनो सोटे हैं। रसशास्त्रमें तो यौवनलम ही सच्चे है। ब्रह्माण्ड में दो प्रकारके महाबल है केन्द्रागामी और केन्द्रापगामी,इनमें एक कोटि देवकी हे दुसरी शैतानकी, एक तेजकी है दुसरी अन्धकारकी, एक जीवनकी है दुसरी मोतकी । एकका परिवार नेहवात्सल्यादि सम- न्वयी विभूतिया है दूसरी का ईविषादि कुसम्पी प्रवृत्तिया । सूर्यमा लाओंके और सारे विराटके चक्ररमण और धुरभ्रमण प्रकटे तमी से अहुरमज्द और अहरमनके, देव और दानवके महारास पैदा हुए है। नरनारी के महागुरुत्वाकर्षण केन्द्रगामी है अत एव वे दैवी है- अहुरमज्दके है । यही कारण है उनका यशोगान करते हुए इतना इतना समय व्यतीत होजाने पर भी कविगण न विरतही होते हैं और न पकते ही है। मेरे हृदयमें उठता है कि रातदिन और वहभी आयुष्यके अन्ततक प्रकरण ९वा १३३ AAAnnh उपाकी इस कथा को लिखेही जाऊ । परन्तु आम पर जितने मोर आते है उतनी कैरिया नहीं आती, और मनुष्य के अभिलाप होते है उतने फल नहीं हो पाते। पृथ्वीपर पहले पहल सूर्य उगा और मनुष्यने आश्चर्यचकित नयनासे इस मार्तण्डराजके दर्शन-प्रथम दर्शन किये उस समय उसकी जो दशा हुईथी वही दशा प्रियतम के प्रथम सौन्दर्यदर्शनसे प्रियजनकी होती है । सारे दिनभर कुतुकलोचनसे देसनेमें आया हुआ भास्कर रजनीके अवतीर्ण होनेसे अस्त हो और अन्धकारके बद्दलकी गुहामें प्रथम वार जा छुपे, और उस समय मानवी की आखें दिशादिशाकी झाडियोंमें उसे खोजती हुई भनें, इसी प्रकार के प्रियतम के प्रथम आकर्षण प्रियजनको भी सींचते है । प्रातःकालमें फिर सूर्योदय हो, अन्धकार हट जाय, पृथ्वीपर प्रकाश फैले और इस भास्कर के भर्गका पूज्य भाव प्रकट हो, इसी प्रकार के पूज्य भाव प्रियजनो को प्रियतमोंपर प्रकट होते है। प्रभातके अरुणोदय कीसी पूज्यभावकी कलिकाओं मेंसे प्रभातकी मधुशीतल प्रभासुधा-सी वत्सलताकी परिमल मयी पंखडिया खिलनी हैं और मध्यान्हके तपते हुए उन्हालेके दो पहर की ऐसी मदोन्मत्तता कामी उभार होता है। पूर्णिमाकी गतको इस सूर्यराजका मेहावताररूप चन्द्रराज रातभर प्रकाश करता यद्यपि उस सुधाकरमें शशक अङ्क चन्द्रक कान्तिपूर्ण मुखपर गोदनेके ऐसा विराजमान रहता है । इस पूर्णिमाकी रजनीमें चन्द्रिकाके ऐसी रस- लीला फूदी देती है, भावनाके नृत्य-ज्योत्साकी ऊर्मियोंके ऐसे सुललित लास्य करते हुए-हास करते हैं। परन्तु इस चाँदनीके महासागर केभी तल है अतल नहीं । ससारकी इस अपूर्णतामें बसी हुई परम करुणता कालावकाश भरमें फैली हुई रहती है ऐसी ही रसकी भेदावलीमी कुछ और ही है। जैसे सागर की तरहापलिया गिनी नहीं जा सकतीं वैसे - minAN ही रसकी भंडावलीकी परम्परायें भी ऐसी नहीं है जो गिनी जासकें। जीवन के सूर्य की और सूर्यतेजेकी यह गहन भेदावली है । परन्तु रसी- नन्द की भेदभूमिका तो सबसे विशेष गहनतम है। ऋषियोंने गाया है विरसो वै स. इस शाश्वत मोक्षभूमिके भेदमहल देवमणियोंसे चुने गये है और देवरत्नोंसे सजाये गये है। स्नेहकी समाधिकी कथा कहना अभी बाकी है। वाचक ! झुझला ता नहीं गया । प्रेमका पृथक् करण करना तो मुझे भी अच्छा नहीं लगता । परन्तु उपाकी पुण्य कथा कहते हुए तो मुझे हमेशा प्रमोदही प्रमोद होता है। क्या तुझे अपने प्रियतमके भावमे उडना भी थकाता है ? जाग्रत् स्वग्न तो सबने देखे है । खुली आखोंके साम्हने जगत को लोप होते हुए तो तूने भी अनुभव किया है । पलकें खुली हुई हो पुतलियोंके हीरे तेजस्वी हाँ और दृष्टिशक्ति विराम पा जाती है-सागरके भाटेकी भांति दृष्टिके ज्वारका माटा होकर किरणें अन्तरमें इकट्ठी हो जाया करती है- यह तो कुछ तुझसेभी छुपी हुई बात नहीं है । विचारके विमानपर आत्मा उड़ रहा हो तो स्थूलता हट जाती है, इन्द्रिया सुन हो जाती है और चेतनविद्युत् आत्माके ब्रह्ममहलमें जा सङ्कलित हो बिराज जाती है; इसमें तो तुने आश्चर्य या चमत्कार प्रतीत नहीं होते। तुझे कोई कोई समय जो सहजसाध्य है, वही योगशास्त्रके शास्त्र- विज्ञानियोंको यत्नसे सिद्ध हुआ है। नगरके भक्तजन जैसे देवमन्दिरमें उभराते हैं वैसेही देहनगरनिवासिनी इन्द्रिया और वृत्तिया आत्ममन्दि- रमे दोढी आती है। परन्तु महाभक्तोंका भक्तिभाव जैसे मन्दिरके शिख- राको छेद, आकाशको उलांघ, ब्रह्मलोकमें बिहार करता है वैसेही योगी- श्वरभी देहके दैवतको इकट्ठा कर चेतन विमानपर चढ मानवीके ससारमें, विश्वके अनन्त व्योम विस्तारमें, और परब्रझके ब्रह्मलोको उहते है। प्राणविनिमय परकार्यप्रवेश ब्रह्मसमाधि आदि आदि आत्माके उडानकी प्रक्रियाओंके पृथक् पृथक् पारिभाषिक नाम है । -- प्रकरण ९वा anAR स्नेहयोग स्नेहजीवन स्नेहसमाधि भी ऐसे ही है । स्थूलप्रवेशी किरणोंकी भाति प्रियतमचेतनके स्नेहकिरण प्रियजनचेतनकी स्नेहकिरणोंसे गुथे, दिलके तन्तु बुना कर एकदिलीकी डोरी बने, ये है स्नेहियोंका स्नेहयोग । उरके उभार रुधिरमे उभरे और लताओंकी पत्तियोंकी-सी गुयी हुई दो शरीरियोंकी शरीरपत्तिया ससारकी बगीचीमें एकही मडपमें शोमा दें, ये हैं स्नेहससारियोंके स्नेहजीवन । दृष्टिमें खडा होनेपरमी देहको न देखे, गुथी हुई शाखामें शाखाके ऐसे अग-अगमें गुथे हुए होने परमी अगमेंसे विराम पाये हुए चेतन--पृथ्वीपरसे आस- मान पर उडते हुए तेजबाणके ऐसे, स्नेहके अन्तरिक्षमें एक पसीकी दो पखिकी भाति दो होन परभी एकही पुण्य गति साधते हुए-परम रस- भूमिमही विहार करे' यह है मनुष्यकी स्नेहसमाधि । स्नेहके ये तीनों स्वरूप-योग, जीवन, और समाधि-पुण्य है, प्रभुता है, जगतका सौभाग्य है । ससारमन्दिरमेकी देवप्रतिमा है । ब्रह्माण्टमेंकी ब्राह्मी रसकला स्नेहबाणसे स्नेहीजनके हृदयोंको कौन नहीं बैध जानता कि स्नेह- योगके परकायप्रवेश अबभी समझाने पड़ें ? ब्राह्मी स्थितिके ब्रह्ममहलके ब्रह्मतेज कैसे है ? अग्निकी भाति जलाने वाले या अमृतकी तरह शीतल करनेवाले ? स्नेहमुक्तिकीभी परम- स्थितिका यही प्रमाण है । स्नेहके तेजसे पीयूप प्रस्रवित होता है । यह मदिराका नशा नहीं है, जहरकी मौत नहीं है ओर नहीं है अग्निकी झाल । स्नेहकी ब्राह्मी स्थिति प्रसन्नता है, सौमनस्य है, वत्सलता है, चित्तप्रसाद है । प्रेमके परम रसानन्द तो सच्चिदानन्दकी ही कला है। सृजनजूनी रसिकताकी इस भेदभूमिमें हम इसतरह खेलते थे। उपाकी कविता मुझे बुलवाती और मेरी कविता उपाको । इसतरह हमारे रसजविनका महाकाव्य रचाता था। है उपा. ओ सुखडेके लोभियो ! स्नेह केवल मुस नहीं है । नहीं तो विप्रलम्म शृगारका दुखयुग मेहथुग न कहा जाता। स्नेह यानी जीवनज्योति, सारे ससारका अमृतदीपक । आयुष्ययात्राकी यह प्रेरणा है, ब्रह्मधाम की पाखें है । नेह जन्मकी तिथिसे जीवनमें कविता का जन्म है । जो जीवनमें कविता न जन्मे तो समझना कि जीवनमें खेह ही पैदा न हुआ। इस स्नेहवर्षाके बरसते ही जीवन में उत्साह साहस वीरत्व आदि तत्वोंके फवारे उछलने लगते हैं। शरदके जलके ऐसे निर्मल और वेगवाले जीवनमें जलके पूर स्नेहकी ऋतुमें बहने लगते हैं। वाचक | इस चिरकालके भेदकी भूमिकाका एक परदाभी तेरे लिये खुला या नहीं ? इन शब्दोंमें तेरे आजके अनुभव नहीं केवल स्मरणभी होतो बस है स्मरण नहो और आशाही हो तोभी काफी है । पूर्वसे नहीं तो पश्चिमसे प्रतिबिम्ब पडते ही हैं, इसी तरह तेरे भूत कालकी नहीं तो तुझे अपनी भविष्यकी छाया देख पडना । उपा और मै उस समय तो इस भेद मूलमुलेयामें अलग २ममते थे और एक दूसरेको दूरसेही बुलाते थे । हम इस प्रेमके आमन्त्रणके गीत सुनते थे। कभी कभी कहींक रसजलकी तीर पर मिलते और प्रसन्न होते ये तोभी ये भेद हमारी समझमें बहुत कम आते थे। ऐसी ही कुछ अटपटी और गहन है नेहके सनातन भेदोंकी यह भूमिका । सरिता के दोतीरोंपर बैठे हुए चक्रवाक और चक्रवाकी रातमर एक दूसरेको पुकारते रहते हैं ऐसेही जीवनकी सरिताके दो तीरोंपर बैठे हुए मै और उपा अन्धकारमें एक दूसरेको पुकारते थे। समस्त जीवनकी यह पुकार थी आयुष्यभरके ये उच्चारण थे। अनन्तता आम्रोयानकी मानो दो कोकिलायेही न कूक रही हों। स्नेहश्वरके आशीर्वाद सबस्नेहके पछियोंपर उतरें! और सफल होवें।

प्रकरण १०या १३७ प्रकरण १० वा. सजीवन वाचक ! तू चमत्कार मानता है या क्या? मैने तो जीवनमें चमत्का- रोंको देखा है और उनका अनुभवभी किया है। होते होते बसन्त पाचें आई परन्तु मुझे मालूम होने लगा कि मेरे 'अन्तरकी वसन्त पीली लौटकर न आयगी । फूलोंके पौधोंपर कलिया लगी, कलिया खिलकर फूल हुए परन्तु मेरी आशाके फूलों के पौधोंपर न कलियाही लगी और न फल ही खिले। उपाके चौकमें गुलाबका बगीचा था। उस बगीचेकी एक एक क्यारी मानो फूलोकी आव बनी हुई थी। फुलवाडीमें फिरती हुई उपा फूले हुए गुलाबके पौधेके ऐसी प्रकाशमान जान पडती थी । उसके गोरे गौरे अङ्गपर गुलाबकी पखडिया खिल रही थीं। उसकी सफेद साडीमें गुलावी कसीदा था। उसकी वेणी सिलमे सितारे भरे गुलाबी मखमली फीते से वाधी हुई थी। उसके मुसपर दैवी गुलाव प्रकट होते थे। उपाके अवयव अवयवसे गुलाब का सौरभ जगतके बगीचे महक रहा था, मानो उपा गुलाबके फूलोंकी गुयी हुई पुतलीही न हो। और इस गुलाबकी पुतलीकै आम पास काटें थे। बीननेको जानेसे हमारे देशमें वसन्त जल्दी ही आती थी । बसन्त पञ्चमीको तो वगी- चिया फूलोंसे मरी हुई डालियों के समान लदपद हो जाती थीं। धनुर्मास बीत गया था। मगलाके दर्शन करनेको माताकी रजाई में लुकती-छुपती उपाजाती थी तब ऐसे दर्शन होते थे कि प्रौढ व्योमसुन्द- वे मेरे चुभते थे।

१३८ उपा. । रीके देहमें अरुणकी कुकुमरेखायें उछलती हुई शोभायमान न हो रही हो । देवदर्शनसे प्रफुल्लित हुए उषाके मुखपर अमृतके प्रकाश क्रीडा करने लगते थे । धनुर्मास मेंके उपाके ये दैवीरंग आज अनेक प्रकारसे प्रकाशित हुए ओप पाते थे। फव्वारों की धाराओंकि ऐसे, इन्द्रधनुषके उर्द्धरेख देव- किरणोंके ऐसे, आयुष्यके अद्भुत स्वर्गीयरग उपाके चारोंओर फिरते हुए झलमलाते थे। अंगमेंसे अमरतत्त्वकी मानो ऊर्मिया उछल रही थीं। रोम रोममेंसे आत्माके अमृतके झरोंके फव्वारे उडते थे। परन्तु गगन की अद्भुत सुन्दरता, दर्शन करनेके लिये है अपनी करनेके लिये नहीं, ऐसे ही उपाकी सौन्दर्यप्रभाकेमी मेरे तो दर्शन करना ही शेष रहा था। नगरमें विवाहोंकी ऋतु प्रारम्भ हुई। कितने ही बालक और बालि- कायें परणाई जाती थीं तो कई एक प्रोढ प्रोढाओंको न ब्याहते थे। कहींपर कुलसे कुलीनता का विवाह किया जाता था तो कहीं थैलीसे थैलिया व्याही जाती थी । यौवनसे सुन्दरताका विवाह तो कहीं-कहीं होता था। किसी प्रसगपर नरनारीके दैहिक गुरुत्वाकर्षणके परिणाममें नरनारीके प्राकृतिक स्थूल मूलतत्वोंका विवाह होता था। इन सबको लग्न मानकर जगतकी प्रजाओंकी तरह हमारा गृहससार सतुष्ट होता था । हारे हुएभी पग रोय कर कभी कभी जीत जाते है वैसे ही इन सासारिक विवाहोंमें भी कभी कभी अद्भुत दम्पती की जोडी जन्म पा जाती थी । परन्तु दुनियाके लगमढपोंमें प्रेमदेवकी प्रतिष्ठा तो कहीं-कहीं-विरल ही होती थी। एक समय सायमन्ध्याके समय मन्दिरकी चादन में उपा और मैं खेल रहेथे और धूमकेतु उगा था । उपा अपशकुन मानकर हरी, तोभी धूमकेतुके तेजकलाप की भव्य शोमा होनेस दर्शन मुग्ध हो कर खडी रही । उपाके माथे परसे मैने साडीको सिसका दिया। उपाके केशक- प्रकरण १०वा Mr - NAAM लापको सोल बालोंको बखेर दिये और उनमें सफेद फूलकि तारे गूथे । फिर मेने कहा उषा ! तेरे मुसके तेजचमके आसपास फिरती ईजैिसी यह फूलधारा बरसती है वैसीही धूमकेतुके तेजचकके आसपास उसकी तेजस्वी केशधारायें बरस रही है । उपा ! तूमी मेरा धूमकेतु है। मनुष्य बोलता है आसमान झेल लेता है और प्रारब्ध थोढी बहुत प्रतिध्वनि करता है । अपशकुन का बोल भूल कर भी कोई न बोलियो मन्दिरमें हम 'प्रेम प्रेम' खेलते तब किसी अदेखेको वह न सुहाता' था । म तो कहता कि स्त्रीपुरुष मिलकर जैसे भावके हिन्दोले पर चढते है वैसे रसझूले पर आत्मा न किसी देवमन्दिरमें झुलता है और न लोक मन्दिरमें ! आत्माकी सारी ये सारगिया गाज रही हो तब क्या पास पासके तार न कम्पेंगे? परन्तु हमारे हृदयके तारो को तो बीचमे अन्तर डालकर अलग किया गया था। - रगोको ओढे निराशाके अपने एकान्तवास को दूर रखकर एक दिन मैं नगरमें गया था। सूर्यतेजकी पृथक् पृथक रगप्रभासे सजी हुई रगीन बदलियों के ऐसी सुन्दरिया नगर के गगनकी गलीगली और चौक चौक्में घम रही थीं। ऐसा मालूम होता था कि मानो सध्या के भात भातिके सुवर्ण- चुन चुन कर कपडे गूथे गये हों और उन्हें ही कुलाङ्गनाओंने । शरीरकी शोम को छुपाते हुएमी सर्विशेष प्रकट करते सूक्ष्म परिधान, चन्द्रकलाको कुछ कुछ छुपाती दुई होने पर चमक प्रक- टाती हुई वारीक बदलियों की तरह उड़ रहेथे । नगरके चोकमें मानों बिजलियां चमक ही थीं। मै नगरमें वैसेही चला गया था। पैरोंको मैने आज्ञा न दी थी कि अमुक जगह जावें परन्तु चेतनकी वृत्तियोंका निरन्तर अनुसरण करने वाले पर बिना कहे ही अतर की एपणा को समझ गये हों इस प्रकार उपा. . उसी दिशा में गये । उपा जिस अटारी पर उगती थी उसीके नीचे मेरे पदहस मेरी देह को ले गये । देही तो सदा वायु और आकाशकी भांति वहीं बसता था। वहा तो बसन्तका बाग खिला हुआ था । सौन्दर्यके उस महलमें सुन्दर शङ्गारवाली सुन्दरिया लचक-नमकर रसान्दोलन करती हुई लताओंके ऐसी-आ जा कर रही थीं और वहा गीत गाये जा रहे थे। मेरी कर्णेन्द्रिय ने बलवान होकर सुना तो विवाहका गीत जान पड़ा। नगरकी अनेक हवेलियोंमें से सुनाई दिये थे वैसेही इस गतिके भी शब्द ये-वेही थे परन्तु इसके स्वरोंने मेरे आत्माको बिलो डाला. इस गोरस की छाछ कर नवनीत निकाल धूलमें मिला दिया । किसीने कहा कि उपा परनती है । उपा परनती है' इतनेही मन्द मन्द शब्दोंने कानोंके परदोंको चीर दिया, मर्मस्थानमें मौत के बाण मारे और आत्माको मूर्छित कर दिया। एक बटन दबातेही बिजली उछल कर महलोंके महलोंको तोड फोड कर उडा डालती है, वैसेही इन दो शब्दोंके कानोंपर पडते ही मेरा सारा-का-सारा चेतन चमक उठा और शान्तिके जहा महल थे वहापर गगापूरके तूफान उछल पडे। कृष्णपक्ष मिट-कर यह तो घोर अधेरी तमिस्रा साम्हने आखडी हुई। उपा कुमारीके कौमार को कोई छुवेगा ? इस निदोष और इस कि- सीके स्पर्शसे पतित न हुई कुमारी को कोई कुम्हलावेगा ! इस अद्भुत लोकोत्तर सौन्दर्यका कोई हरण करेगा ? इसके अगके 'अछूते दामन को कोई छुवेगा' इसको छुनेकी मेरी लालसा थी, इसको मैं कुम्हलाना चाहता था, इस सौन्दर्यकी अद्भुत सीताको हरनेके लिये मैं तडपता था, इस लोकपावन पल्लेको पकडनेको मैं निसासे भरता था. इन सब बा- प्रकरण १० वा ANWM तोंको मै भूल गया। किसीको मैंने राक्षस कहा, किसीको रावण बताया: परन्तु मेरे हृदयकी लङ्कामें रावण जी रहा था उसे तो मैंने देखा मी नहीं। जगत शोभन उस पियूषकी पखडी चन्द्रकलाको कोई राहु निगल जायगा, निलोकके सौन्दर्यका मुकुट उस गीतकी मधुरता मुझे कटु लगी । वे रूपवती अङ्गनायें मुझे विरूपा सूर्पनखा जान पडी । वह उज्वल प्रमात मुझे अमावास्याका अन्धकार प्रतीत हुआ। जगतका मेरा सुधारस फैल गया और विषवल्लिया जगह जगह उग निकलीं। जगत 'तू कडुबा है या मीठा १ तेजस्वी है या अँधेरा ? जगत यह मुझे बतला कि तेरा एकही प्राकृतिक रग किसने देखा है या कल्पना किया है ? सूर्यतेजसे भरा हुआ वह मेरा प्रभात था परन्तु वह सूर्य एकाएक अस्त हो गया, और मेरे जीवनकी घाटीम गहरा अन्धकार आ गिरा। इस अस्त होते हुए सूर्यकी किरन किरनमेंसे कौंचकी फलियोंके जीव उड आये, मुझे काटने लगे। उस दिन मैं नगरम भमा, जनसमाजके समूहमें फिरा परन्तु मैं कुछभी न देख सका। ऐसा हो गया कि मेरी आसान अन्धकारके चश्मे न पहने हो । मैं पुरजनों में आँखें खोले हुए फिर रहा था परन्तु देख कुछभी न पाता था। सुबहही नदीपर न्हानेको गया । नदीके मन्दमन्द बहते हुए पानीकी पखड़ियों में उपाको मन्दमन्द हसते और पानीमें बह जाते हुए देखा। मर्यकी किरणें जैसे जलकी लहरोंपर गिरती, चमकती और हँसती- सती बहतीं थीं, वैसेही प्रवाहमें वहती हुई उपा दिसाई दी। दरसे आते हुए जल छाती के पास आते कुछ देर ठहरते-खेलते और धीरे धीरे नाचते-नाचते दर-दर और उससेमी दूर चटे जाते थे, वैसे ही रपा उपा उसी दिशा में गये । उषा जिस अटारी पर उगती थी उसीके नीचे मेरे पदहस मेरीदिह को ले गये । देही तो सदा वायु और आकाशकी मांति वहीं बसता था। वहा तो बसन्तका बाग ग्विला हुआ था । सौन्दर्यके उस महलमें सुन्दर शङ्गारवाली सुन्दरिया लचक-नमकर रसान्दोलन करती हुई लताओंके ऐसी-आ जा कर रही थी और वहा गीत गाये जा रहे थे । मेरी कर्णेन्द्रिय ने बलवान होकर सुना तो विवाहका गीत जान पड़ा। नगरकी अनेक हवेलियोंमें से सुनाई दिये थे वैसेही इस गीतके भी शब्द ये-वहीं थे परन्तु इसके स्वरोंने मेरे आत्माको बिलो डाला. इस गोरस की छाछ कर नवनीत निकाल बूलमें मिला दिया । किसीने कहा कि उषा परनती है । 'उषा परनती है। इतनेही मन्द मन्द शब्दोंने कानोंके परदोंको चीर दिया, मर्मस्थानमें मौत के बाण मारे और आत्माको मूर्छित कर दिया। एक बटन दबातेही बिजली उछल कर महलोंके-महलोंको तोड फोड कर उडा डालती है, वैसेही इन दो शब्दोंके कानोंपर पडते ही मेरा सारा-का-सारा चेतन चमक उठा और शान्तिके जहा महल थे वहांपर गगापूरके तूफान उछल पड़े। कृष्णपक्ष मिट-कर यह तो घोर अधेरी तमिम्रा साम्हने आखडी हुई । उपा कुमारीके कौमार को कोई छुवेगा ? इस निदोष और इस कि- सीके स्पर्शसे पतित न हुई कुमारी को कोई कुम्हलावेगा ? इस अद्भुत लोकोत्तर सौन्दर्यका कोई हरण करेगा ? इसके अगके 'अछूते दामन' को कोई छुवेगा? इसको छुनेकी मेरी लालसा थी, इसको मैं कुम्हलाना चाहता था, इस सौन्दर्यकी अद्भुत सीताको हरनेके लिये मैं तडपता था, इस लोकपावन पल्लेको पकढनेको मै निसासे मरता था इन सब बा.

प्रकरण १. वां, १४१ । तोंको मैं भूल गया। किसीको मैंने राक्षस कहा, किसीको रावण बतायाः परन्तु मेरे एदयकी लङ्कामें रावण जी रहा था उसे तो मैंने देसामी नहीं। जगत शोमन उस पियूपकी पसडी चन्द्रकलाको कोई राहु निगल जायगा, त्रिलोकके सौन्दर्यका मुकुट उस गीतकी मधुरता मुन्ने कटु लगी । वे रूपवती अङ्गनायें मुझे विरूपा सूर्पनखा जान पडी । वह उज्वल प्रमात मुझे अमावास्याका अन्धकार प्रतीत हुआ । जगतका मेरा सुधारस फेल गया और विषवालिया जगह जगह उग निकली। जगत तू कडुबा है या मीठा ? तेजस्वी है या अँधेरा ? जगत । यह मुझे बतला कि तेरा एकही प्राकृतिक रग किसने देसा है या कल्पना किया है ? सूर्यतेजसे मरा हुआ वह मेरा प्रभात था परन्तु वह सूर्य एकाएक अस्त और मेरे जीवनकी घाटीमें गहरा अन्धकार आ गिरा। इस अस्त होते हुए सूर्यकी किरन किरनमेंसे कौचकी फलियोंके जीव उड़ आये, मुझे काटने लगे। उस दिन मैं नगरम भमा, जनसमाजके समूहम फिरा परन्तु मैं कुछभी न देख सका। ऐसा हो गया कि मेरी आसोंने अन्धकारके चश्मे न पहने हो । मैं पुरजनों में आँसे सोले हुए फिर रहा था परन्तु देख कुछभी हो गया, न पाता था। सुबहही नदीपर न्हानेको गया । नदीके मन्दमन्द बहते हुए पानीकी पसडियोंमें उपाको मन्दमन्द हसते और पानी में बह जाते हुए देखा। सूर्यकी किरणें जैसे जलकी लहरोंपर गिरती, चमकती और हँसती- हँसती बहतीं थीं, वैसेही प्रवाहमें बहती हुई उषा दिखाई दी। दूरसे आते हुए जल छाती पास आते कुछ देर ठहरते-खेलते और धीरे धीरे नाचते-नाचते दर-दूर और उससेभी दूर चले जाते थे, वैसे ही ग्षा - 1 १४२ भी दूर दूर और उससे भी दूर, जीवनके क्षितिजपर, और उससेभी परे जाती हुई देखी। शकरकी पुतली जैसे जलमें पिघल जाय वैसेही जलमें पिघलती हुई उषा जान पडी। त्वचाके छोटे छोटे सब छिद्र खुल गये और उसमें आत्माका सोता झरजातासा जान पड़ा। सब कोई कहते है कि भोजनके अमृतसे आत्माका पोषण होता है परन्तु उस दिन तो मुझे वह विष जान पड़ा और उस विषके खानेपरभी देह या देहीकी मृत्यु न हुई । मेरे उरका वैश्वानर अतृप्त था, इस अन्त- रके अमिंकुडकी ज्वाला बिना आहूतिके धकधका रही थी अतएव खाने- पीनेसे भी मेरी भूख प्यास शान्त न हुई । शान्ति, देहके पोषण करने में नहीं है आत्माके पोषण करनेमें है इतना उस समय ही मेरी समझमें आ गया होता यदि मेरी बुद्धि न मारी गई होती। दो पहर हुआ, मध्याह्नका सूर्य तपा, उपाकी और मेरीभी ज्वालायें जाग उठीं । जिन उसके अगों से शीतलता और मधुरता फैलती थी उन्हीं देवअङ्गोंमेंसे विराटकी महाज्वालायें उडती हुई जान पड़ीं। उसके ललाटमेंसे मध्याह्न आगके शोले मभक कर उठते हुए देख पड़े। वह एसी जान पड़ी कि सती चितापर चढ़ी हुई जल रही है । ऐसा जान पडा कि मध्याह्नके किरण किरणमें नया मध्याह्न प्रकट हो रहा है। ऐसा भान हुआ कि प्रचण्ड ब्रह्माण्डमें किसीने होली लगा दी और उसमें बह्माण्ड जल रहा है? अग्निकी बैठकके समान उषाकी आग्निमूर्ति आंखोंके साम्हने उछल रही थीं। दोपहरी ढल गई । मध्याह्नके बाद जगत की छायायें जैसे चढने लगी वैसेही मेरे अन्तरकी भी गमीर और गहरी छाया बढ़ गई । जगतमें जैसे तेजछायाकी अटपटी थी वैसेही अन्तरमें भी उपाचिन्तन और

प्रकरण १० वां
उषाकी अनासिद्धिकी घूपछायाकी अटपटी पड़ी थी । आशाभरे विश्वमें
वह निराशाकी साझ थी। तृप्तिवाले जगतमें वह अतृप्तिकी झाल थी
और झाल में भी उस महाघूमके वादलोंके पट थे।
नगरके बाहर बडका यूथ था और यूथमें अनन्त जलकी वापिका
थी । नरनारिया इस वापीका जल भर कर लाते है, नगरजन उसका
जल पीते हैं। नगरका यौवन प्रत्येक सायकाल को वहा बसी बजाता है।
उस साझको वहा गया परन्तु अपनी बसी भूल गया । यौवनके
देवके ऐसा एक कुमार वहा गीत गा रहा था ।
उसने गाया कि-
आशा भरा एक जवान आया बसी बजाई उसने सुनी परन्तु
अनसुनी करके चली गई।
दूसरे दिनभी वह जवान आया, और बसी बजाई उसने सुनी, मिठास
सी हँसी और गई।
तिसरे दिन वह जवान न आया, वहभी न आई । परन्तु ससारचक्र
चलता ही रहा।
एककी घसी और एक की मुस्कराहट दोनोंके अन्तरमें चिरजीव होकर
स्थापित
हुए, प्रतिष्ठा और पूजा पाये, या नहीं?"
मे गीतको न समझा और न उसके शब्दही याद है। उन दोनोंका
विवाह हुआ या नहीं? कोई कहेगा कि इनके सोभाग्यखिले या
स्मरण ही रहे।
जीवन कैसा है ? बसीके ऐसा नहीं है ? स्वर निकला, उड़ा और
धीमे २ जगतकी झाडियोंमें बहता-बहता अस्त हो गया । अकेला था
जोडेसे ? उत्तर दो ए जगतके लोको | अपना-अपना अलग-अलग उचर दो
जीवनके इस महा प्रश्नका
सोझकी शीतलता आई और गई । पश्चिम दिशाके तप्तलोहे के रंगके
ऐसे बादलों कीसी धक धकती आगकी भट्टियों मेरे अन्तरमेंमी जला गई।
.

१४४ उषा. सध्याके ताने-बाने गुथा गुथा कर रात पड़ी और मेरेमी जीवनका दिन अस्त हो गया । जिन्दगीका नाटक समाल होता हुआ जान पड़ा और. अखीरी काला परदा गिरा विश्वलीला का पार आया हुआ जानपड़ा और काले बादलोंकी अभेद्य झालरें चारों ओर लटक गई। परन्तु विश्वलीलाका पार नहीं है । दिन आँथा और रातका चंदवा तना । चॅदवे में असख्य चादनिया चमकती हुई प्रगट हुई । जग- तमसे तेज अस्त होताही नहीं है यह मुझे पीछेसे जान पडा । कहा जाता है पुरुष स्त्रीको बनाता है और स्त्री बनाती है पुरुषको । मुझे यह मालूम नहीं है कि मैंने ऐसा क्या बनाया जो उषामें न था परन्तु यह तो मुझे मालूम था कि उपाने मेरा प्रारब्ध लिखा था और चिरकालका लिखा था। मैं अपने प्रारब्धको पढता विचारता और अनु- भव करता हुआ पचवटीमें बैठा था। जगत पर रात जमती जाती थी। पश्चमीके चन्द्रमाके अस्त हुए बाद मोडी रातमें एक रथ पूर्वी ओरसे आया और पश्चिममें गया । सोनेकी शिखाओंके ऐसी चारों ओर मशालें चल रही थीं। हिरण्मयेन पात्रेण-वाली कचा मुझे याद आई । घूघरवाले बैल मतवाली चालसे चल रहे थे । रथचन्द्रके झाझर झमकते थे। रथपर ध्वजा थी परन्तु फरफरा न रही थी। उसकी पट- लिया सम्युटित होकर लटक रही थीं। छायाकी जानके ऐसा, भूतावलीकी सवारीके ऐसा रय अधेरे में हाकर आया था और अंधेरेमेही गया मी। रथके आसपास उषा पिताके पारिषय थे। मुझे मालूम हुआ कि उषाको मझरात में पग्नाकर पहुचानेको जा रहे है । स्य उषाके योग्यही था । सारा समारम्भ मेरे साम्हने आया तो एक नयन-खिले हुए कमलकी टूट पड़ी पखडीके एसा, सारे तारामण्डलमेंसे खिर पड़ी हुई प्रकरण १०वा १४५ एक तारिकाके एसा-रथमेंसे मैने देसा देखा न देखा। गिरती हुई बिजलीके ऐसी क्षणिक किरणरेखा बना कर वह अस्त हो गया। उस वसन्त पञ्चमीकी मझरातमें उपा मेरे जीवनमें सदाके लिये अस्त होती हुई जान पड़ी। नरके आत्मामें नारीकी भूख है, नारीके आत्मामें नरकी प्यास है। हमारे ये भूख प्यास शान्त न हुए थे। उषा उगी और हाथमें लेनेका प्रयत्न करते उर्वशीकी भाति आकाशमें उड गई-सी जान पड़ी। परन्तु मानवी ! तुझ में सुर और असुर दोनों है। उन्हें परखना और फिर, स्वागत करना या निकाल देना । पुरुषोत्तम का लीला विस्तार प्रकृतिसे है और प्रकृतिक सौभाग्यका विकास पुरुषोत्तम से है । नरनारीके परस्परके अन्तत-अखण्ड गुरुत्वाक- पणके भेद इसी प्रकार के है, प्राकृतिक हैं, चिरस्थायी है, निरवधि हैं, विश्वके नियोजनमें-विराट्के क्रीटनमें सर्वसंचारी हैं । उपाकी आखड- लियोंमें भी गुरुत्वाकर्षण था। मेरे जीवनके सबके-सब झरने इस सागर की ओर ही वहते थे । उपा! तू मेरा सागर है और मेरे जीवनकी नदियोंके अशेष जल तुझमेंही आकार विश्राम पॉयगे । परन्तु ओ मेरे सागर । तू है कहा ? किसकी अनलिमें समागया ? मेरी फुईयों या झरोंको तू न झेले तो मेरा पानी महाजगलीरणमें मैला होगा। अधेरी रातमें, स्मशानमें जैसे आग भडकती है वैसेही उस मझरातको मेरे आशाके स्मशानमें तरनोंकी झालें उटाता हुआ मैं पञ्चवटीमें । बैठा था। मैने ऐसा कम स्वीकार किया था कि कोई पर्वतराजके शिखर पर सहा होकर मिजलीको पकड़ने के लिये अन्तरिक्षमें छलाग न मारता हो। परन्तु आकाशके गुम्बजको तोड़कर अनन्तकी गहराईमें विद्युदाण उतर पड़े वैसे उपा! तू सिसकती-सिसकती सिसक गई,अनन्तमें उतर गई। अनेक रत्ने १० - १४४ उपा. AMANIm- सध्याके ताने-बाने गुथा गुथा कर रात पडी और मेरेभी जीवनका दिन अस्त हो गया । जिन्दगीका नाटक समाप्त होता हुआ जान पड़ा और अतीरी काला परदा गिरा विश्वलीला का पार आया हुआ जानपड़ा और काले बादलोंकी अभेद्य झालरें चारों ओर लटक गई। परन्तु विश्वलीलाका पार नहीं है । दिन ऑथा और रातका चेंदवा तना । चॅदवे में असख्य चादनिया चमकती हुई प्रगट हुई । जग- तमेंसे तेज अस्त होताही नहीं है यह मुझे पीछेसे जान पड़ा। कहा जाता है पुरुष स्त्रीको बनाता है और स्त्री बनाती है पुरुषको । मुझे यह मालूम नहीं है कि मैंने ऐसा क्या बनाया जो उपामें न था परन्तु यह तो मुझे मालूम था कि उपाने मेरा प्रारब्ध लिखा था और चिरकालका लिखा था। मैं अपने प्रारब्धको पढता विचारता और अनु- भव करता हुआ पचवटीमें बैठा था। जगत पर रात जमती जाती थी। पञ्चमीके चन्द्रमाके अस्त हुए बाद मोडी रातमें एक रथ पूर्वकी ओरसे आया और पश्चिममें गया । सोनेकी शिखाओंके ऐसी चारों ओर मशालें चल रही थीं। हिरण्मयेन पात्रेण वाली ऋचा मुझे याद आई । धूघरवाले बैल मतवाली चालसे चल रहे थे। रथचन्द्र के झाझर समकते थे। रथपर ध्वजा थी परन्तु फरफरा न रही थी। उसकी पट- लिया सम्पुटित होकर लटक रही थीं। छायाकी जानके ऐसा, भूतावलीकी सवारीके ऐसा रथ अधेरेमें हाकर आया था और अधेरे ही गया मी। रथके आसपास उषाके पिताके पारिपय थे। मुझे मालूम हुआ कि उषाको मझरात में परनाकर पहुंचानेको जा रहे है । रथ उपाके योग्यही था । सारा समारम्भ मेरे साम्हने आया तो एक नयन-खिले हुए कमलकी टूट पड़ी पसडीके एसा, 'सारे तारामण्डलमेंसे सिर पड़ी हुई ।

मकरण १० वा १४५ - एक तारिकाके एसा-रथमेंसे मैंने देखा देखा न देखा। गिरती हुई बिजलीके ऐसी क्षणिक किरणरेखा बना कर वह अस्त हो गया। उस वसन्त पञ्चमीकी मझरातमें उपा मेरे जीवनमें सदाके लिये अस्त होती हुई जान पडी। नरके आत्मामें नारीकी भूख है, नारीके आत्मामें नरकी प्यास है हमारे ये भूख प्यास शान्त न हुए थे। उपा उगी और हाथमें लेनेका प्रयत्न करते उर्वशीकी भाति आकाशमें उड़ गई-सी जान पड़ी। परन्तु मानवी ! तुझ में सुर और असुर दोनों है। उन्हें परसना और फिर, स्वागत करना या निकाल देना । पुरुषोत्तम का लीला विस्तार प्रकृतिसे है और प्रकृतिक सौभाग्यका विकास पुरुषोत्तम से है । नरनारीके परस्परके अन्तत-अखण्ड गुरुत्वाक- पणके भेद इसी प्रकार के है, प्राकृतिक है, चिरस्थायी है, निरवधि हैं, विश्वके नियोजनमें-विराट्के कीडनमें सर्वसंचारी है। उपाकी आखड- लियोंमें भी गुरुत्वाकर्षण था। मेरे जीवन के सबके-सब झरने इस सागर की ओर ही बहते थे । उपा! तू मेरा सागर है और मेरे जीवनकी नदियोंके अशेष जल तुझमेंही आकार विश्राम पाँयगे । परन्तु ओ मेरे सागर ! तू है कहा ? किसकी अनलिमें समागया ? मेरी फुईयों था झरोंको तू न झेले तो मेरा पानी महाजगलीरणमें मैला होगा। अधेरी रातमें, स्मशानमें जैसे आग मडकती है वैसेही उस मझरातको मेरे आशाके स्मशानमें तरङ्गोंकी झालें उडाता हुआ मैं पञ्चवटीमें बैठा था। मैने ऐसा क्रम स्वीकार किया था कि कोई पर्वतराजके शिखर पर खडा होकर बिजलीको पकड़ने के लिये अन्तरिक्षमें छलाग न मारता हो। परन्तु आकाशके गुम्बजको तोड़कर अनन्तकी गहराई में विद्युयाण उतर पड़े वैसे उपा! तू सिसकती-खिसकती खिसक गई, अनन्तमें उतर गई। अनेक रनोंके उपा सब कणों से भरी हुई ससारकी हवाईके ऐसी सू अन्तरिक्षमें उड़ी और आसमानमें समागई। पर्वतशृङ्गकी नोकपर किसी अकेले वृक्षकी भाति मै अकेला ही-गगनकी गहनतामें आख डालता हुआ और गगनकी गली गलीमें तुझे खोजता हुआ-खडा हू । वसन्त पचमीका यह आजका बीता हुआ दिन पीठा लौट कर आवेगा तो तूभी पीछी पधारेगी। परन्तु तोभी-तोमी उपानिराशाके तरगों में उछलती हुई अपनी किश्ती में मैं बाट देख रहा हू तेरी। रसविमानमें विगमन करती हुई तू चन्द्रलोकमें अमृतचन्द होकर जा बैठी होवे तो मै प्रमुसे प्रार्थना करूं कि वह मुझे पृथ्वीलोकमें अशान्त और हृदयमें जलता हुआ उदधि बनावे जिससे तु उगे कि मैं उछलूं । मेरे छोटे तुझे छून पायगे तथापि अय॑के जलकण तुझे समर्पित करूगा । मेरे तरंग तुझे झुलायगे नहीं किन्तु तेरी छायाको झेलकर ऊर्मिमालाके झूमें झुलाऊगा | तुझे देख देखकर तेरी पूर्णिमाको निहार निहार कर मेरा हृदय उछलेगा और तूफान मचावेगा । निराशाही मेरी आशा है, मृत्यु ही मेरा जीवन है तू नहीं है यही मेरे आत्माका अवलम्बन है। गई, तू गई, उपा | सदाके लिये गई मेरे जीवनमेंसे । परन्तु पृथ्वी परसे तो नहीं गई । तो ये मृत्युके एसे प्रलाप क्या है ? पर्वत पडगये तेरे और मेरे बीचमें, परन्तु तु चन्द्रलोकमेंभी न गई और सूर्यलोकमेंभी नहीं गई। पृथ्वीलोककी किसी बगीचीमें, किसी फुलवाडीमें टुहिया तू उडरही है। कल्याण हो तेरा, यहा कि वहा जहा हो वहा कल्याणि! तेरा कल्याण होवे मै भूखा हू परन्तु तुझे तृप्ति प्राप्त होये ! मैं अपूर्ण हू परन्तु तेरी सब कामनायें छलकती हुई परिपूर्ण होवें ! मेरे प्रारब्ध-कुकुमाक्षरोंसे तेरे द्वारा लिखाते हुए मेरे सौभाग्य-प्रारब्ध अधूरे-के-अधूरेही मिट गये, परन्तु तेरे तो सौभाग्य अमृतके अक्षरोंसे प्रकट हो ! नित्यतृप्त निराशाके महारणमें भले ही मै भटकू' आशा की हरीभरी आम्रवाटिकामें प्रेमकी टूही सदा - मकरण १०वा १४७ - । तू उडना उपा जबतक नरके अन्तरमें नारीपूजा है, जबतक पुरुषोत्तम प्रकृतिधारी है, तबतक, कालके अन्ततक, चन्द्र और जलधि सूर्य और सूर्यप्रमाके आयुष्यतक, ओ मेरी जीवनप्रमा! तुझे याद करूगा, पूजूगा और नेरी बाट देखूगा । आना, जगतमें नहीं तो अनन्तताके किसी तीर पर आना करमें नहीं तो उरमें आना, आना आयुष्यके उद्धारकी इस परम भूमिकामे । फूल कुम्हलाता है परन्तु सुवासना अनन्त में फैल- जाती है वैसीही तू है | आस्था है कि तू आवेगी। अधेरी रातकोमी भेदकर उपाका उदय होगा ऐसी परम श्रद्धा है। इसी अन्धश्रद्धामें उपा आयुष्य बितारहा हू । आना इस आयुष्यके किनारे, फिसी समय, किसी बेशमें, कुछ करती हुई । मै हू पर नहीं तू नहीं है पर है । यह 'नहीं, "ह से विशेष है। उपा! तू विशेष है तो मेरी अपूर्णताको पूर्ण करना! ब्रह्माण्डमें परब्रह्म अवतार लेते है वैसेही ओ परवाकी सौन्दर्यकला! मेरे जीवनमें त अवतीर्ण होना । पञ्चानिकी धूनी जगाकर योगी तप करनेको बैठा हो इस तरह उस रात मेरी पाचो इन्द्रिया जल रही थीं और मैं पञ्चागिके वीचमें तप करता हुआ बैठा था। और धुवाके समान इस तरहके गुब्बार मेरे अन्तरमेंसे निकल रहे थे। पेट * * वाचक ! अपरके ये अवतरण मेरी कविताकी नोंघनहीं के हैं। इन्हें पढ़े कर क्या तुझे ऐसा नहीं जान पडता कि प्रेमका परम महाकाव्य लिखा जाना बाकी ही रह गया है ! मेरा और तेरा भी! मुझे ऐसा मास होता था कि इस अघोर रातका प्रभात उगेगा ही नहीं, परन्तु प्रमातका उदय हुआ और बडाही अद्भुत हुआ। “नजाने जानकीजाने प्रभाते कि भविष्यति" इस पद्यार्द्धको लोग कलके अशुमके लिये आज व्यवहारमें लाते हैं। अकस्मात और १४८ उपा चमत्कार क्या अशुभ ही होते है ! ससारी इस बातको क्यों भूल जाते हैं कि गहन और अज्ञेय सब खराब ही नहीं हुआ करता? दूसरे दिनका प्रभात हुआ। मेरी खिडकीमें कोयल बोल रही थी, पलङ्गपर फूल बिखेरे हुए थे। प्रभातका प्रकाश खिलखिला रहाथा । वाता- चरणमें खेलती हुई बसन्तको मैंने देखा। वाचक । कभी तूने गोता लगाया है ? सरोवरमें स्नान करते हुए या नदीमें कूदते हुए कभी तो तु गहराई में गया होगा? जब जलके भीतरसे तू बाहर आया तब तुझे कैसा लगा था। ससारसमुद्रके महाजलमें उपाने और मैने पातालगामी गोता ही न खाया हो इस प्रकारका हमें पहले पहले मालूम हुआ। परन्तु मृत्युमें भी जीवन रक्खा गया है। दुनिया जिसे मृत्युका पान करना कहती है उसे अमर अमृतपान करना कहते है । इस प्रकार की घटना जिसने घडी है उस प्रमुको कितना कृपालु कहना चाहिये ? आज भी इस प्रसगके स्मरण जब जागरित होते है तब हम ऐसा भान हो जाता है कि ससारने तो हमें अधर फैंक दिये थे परन्तु उपाके पुण्यसे हमें अघर-के-अधर हरिके विमानोंने झेल लिया और हम उनमें सवार होकर अपने स्नेहस्वर्ग सिधारे । सन्त जन मोतीके गोतेखोरों की महिमा गाते है । हम भी स्नेहके गातखार होकर निपटे। अगाध अम्बोधिके अम्बुमें हम फैके गये, बचेंगे या नहीं इस आशा- को छोड दिया, परन्तु मोतियोंकी सींपोंको भर मर कर हम अपने उपव- नके किनारे पर आ लगे। मोतियोंके महासमुदमें प्रारब्धने हमें गोता खिलाया था। दूसरे दिनका प्रमात हुआ और सूर्यनारायणके उदय होनेके बाद मैं उठा ! उस समय पासके मन्दिरमें कोई तिथि पूछ रहा था। ज्योति- प्रकरण १० वा १४९ धीने उत्तर दिया वसन्त पञ्चमी । पूछने वालोंने फिर पूछा बसन्त पञ्चमी तो कल थी न ? ज्योतिषीने कहा दो पञ्चमी थी उदयात वसन्तपञ्चमी तो आज है। . । मुझे ऐसा मालूम हुआकि अमृतकी बरसात हुई। मेरे आत्मापर संजीवनके विन्दु गिरे और शवकी नाहियोंमें लोहू धबकने लगा। दो वसन्तपञ्चमी बताने वाले इस ज्योतिषीपर मै आफरीन हो गया। कोई ज्योतिषी-फरीस्ता आसमानसे आवे और कहे कि उपायें भी दो हैं ? मैने ताककर देखा तो वायुमें वसन्त थी, तेजमें बसन्त थी आकाशमें बसन्त थी, रास्तेपर आते जाते पुरजनोंके मुखपर बसन्त थी। प्रभात होता ही था कि उपा की माता आई और मुझे देख कर मेरी मातासे कहा कि मै तो देवके दर्शनको आई थी । उसके गये बाद मेरी माताने मेरे पिताको उपाके पिताके पास भेजा । वे वहा कौतुकके साथ गये और मुस्कराते हुए पीछे पधारे। उनके पधारते ही महोल्ठेमें और स्नेही सम्बन्धियोंमें शकर और गुड बाटनेके लिये मेरी माता बाहर चली। उत्थापन की दुदुभि बजे इस तरह धमधम करती हुई चन्द्रिका मेरे कमरे पर चढ आई । 'भाई दृजके दिन तिलक किया था और तूने माना न था। ले यह उपाका तिलक । तेरे ललाटमें जकड़ी हुई उपा सोकर कहा जायगी । तरे भविष्यमें उपा अस्त न होगी । मौर मैनही पुष्पोंसे बघाया था तब तो पडा पडा घोर रहा था।' चन्द्रिका का श्वास छातीमें माता न था' हर्ष तो उमर कर मेरे सारे कमरे में उछल रहा था। मैं कुछ न समझ सका । आश्चर्यचकित नयन ओर अचमेकी आवा- चसे मैने कहा, 'परन्तु चन्द्रिका ! कालसागर में वह सामान्य तो कठ इच गया । उपाके तो लग हो गये और वह ससुराल कोभी गई।'

उषा 'वह तो छाया उषा थी। उपाका विवाह तो आज होगा तेरे साथ और ससुराल कोमी आवेगी-तेरे घर । गई वह तो उपाकी अलाबला थी । मा से उपा की माता मिल गई है और पिताजी उपा के पितासे मिल आये है। 'आज चढना जान लेकर जगतको जीतने के लिये और जीत कर ले आना सुन्दरियोंकी सौन्दर्यरानीको' यों कह कर उसने धीमेसे मेरे कपोल पर चुटकी भर ली। फरिश्ता नहीं तो प्रभुकी फरिश्तन उतरी मेरी ब्रह्मलोकमेंसे और बोली कि वसन्तपश्चमी की तरह उपायें भी दो है। मैने इस देवी के पैर छूये और उसने मेरी बलैया ली। उस दिन उषाके पर फिर विवाहोत्सव हुआ और उषा के विजय- वाय बजे। अमृत के चौघटिये में हमारे घरभी नकारे बजने लगे। मेरी माता तो हर्षके मारे मुघमूल हो गई । तुरत उपाको नोता और स्नेहकी गोदमें बिठा कर शकर सिलाई और उसे सजाया । फिर मेरे मन्दिरमें कोटि कोटि भानुका उदय हुआ। मेरी दृष्टिकी किरण डोरीपर उषा आई और प्रकाश फैला दिया । उपाकी मागमें मैने नवरत्न का सीस फूल चढाया, उसके कठको करलताने बधाई दी, उसे एदयके राजसिंहासन पर विठाई और सौभाग्यदेशमें चुम्बनका विजय- चन्द्रक किया। उपाने कुछ कमी न रक्खी मेरे सारे मुखपर चुम्बनके पुष्प-ही-पुष्प-से बरसाने में लग गई । मैने भी उसके मस्तक पर, रस- मुकुट पहना रहा होऊ इस तरह सारे मस्तकपर, चुम्बन किये। मैने कहा दो बसन्तपश्चमी तो ज्योतिषी महाराज ले आते है, परन्तु दो उषा कौनसे ज्योतिषी महाराज लाये ? उपा! कलका स्वम था या माज का है।

प्रकरण १० वा १५१ AR उपाने मुखपर चुम्बन झेलते-झेलते कहा दोनों स्वप्न है । जिन्दगाही स्वप्न है, परन्तु वह मुझे तेरी रजाई में लेना है। लटके करती और सड सड हसती चन्द्रिका आई । पूरी तो नहीं परन्तु कुछ सज्जनता धार कर हम मर्यादा में आये। 'उपा तू मी अजब ही है हो।' चन्द्रिकाने उपोद्घात किया। तूने भी लक्ष्मी की लालसा खूब ही पूर्ण की । उसे लक्ष्मीकान्त पसन्द था, लक्ष्मी जब अपनी नन्दियालमें सरोवर पर पानी भरनेको जाती और लक्ष्मीकान्तको पानीमें तैरता हुआ देखती तमीसे वह उसकी निगाहों में समा गया था। परन्तु लक्ष्मी भी बहादुर निकली। चौरीमें कपती- कृपती आई परन्तु आनेके बाद शिलाके समान स्थिर होकर बैठी। तेरी माने भी इसे क्या न पहचाना?' चौरी से उठी तब तो पहचाना परन्तु पाणिग्रहण हो चुका था, भूल सुधारी नहीं जा सकती थी। लग्नमंडपमें से लक्ष्मीके लग्नसे निपट कर उतरे बाद मेरी माताने पिताको भी खबर की । कौतुक और खिजवाटके उभरे शान्त हो जाने के बाद पिताने लक्ष्मी के पिताकोमी समझाया,कनकपुरके नगरसेठका पुत्र जामाता के तोरपर किसे पसन्द न पड़ेगा । और लक्ष्मीकी समति के बिना यह सासारिक षड्यन्त्र रचा भी कैसे जा सकता है ? ऐसा समझ कर ससारके चतुर ये वृद्धजन हंस पडे और घडी भरके बादही शास्त्रीय स्वयम्बर विधानका अनुसरण करनेवाली इन पुत्रियोंकी, कुछ रमाते-शरमाते, प्रशसा भी करने लगे । लक्ष्मीके पिताने कलका सर्च देना चाहा परन्तु मेरे पिताने लेने की 'नाही' की और कहा कि लक्ष्मी भी उषाकी सहेली है, मेरे लिये उयाके ऐसी ही है। बरातके जाने के बाद दोनों वृद्धोंने नगरसेठसे बात की । लडकियों की ठगाईमें आजाने पर तीनों वृद्ध कुछ झेपे, परन्तु मूल सुधरने योग्य न होनेसे आश्चर्य चकित हो कर हँस पडे । नगरसेठने कहा 'ना, सेठानी - १५२ उपा कहती थी कि कन्या तो रूपकी डली है, चौकमें सब हुआ है, मै झरोखेकी जालियों मेंसे देख रही थी।' मैंने कहा: तूभी जबर्दस्त है उषा | दुनियाके उस्तादोंकोमी तूने मात किया। 'तब क्या एककी चूमी हुई दूसरेको विवाह सकती है।" उषाके इस सरल प्रश्नसे मै चौका और सारा ससार मुझे चौंकता सा जान पडा । इस प्रश्नमें मुझे कईएक सासारिक विधानोंके दुर्गम दुर्ग टूटते और प्रेमधर्मके परम मन्दिर बनते हुए देख पडे । मैने उत्तर दिया ना, उपा! दुनियाको यों नहीं छूया जा सकता परन्तु तेरा जीवन तो जयका है ही ! उपाने कहा तू रोज मुझे कहा करता था कि 'संसारको सहलेनेको नहीं, परन्तु उषा! तू जीतनेको जन्मी है।' मुझे फंसानेको ससारने जाल फैलाई थी । नित्यकी तेरी इस विरदावलीने मुझे जिताया। इस तेरी जयमन्त्रणामें से मेरे जयका जन्म हुआ। 'और उपा तूने क्या नहीं जीता' चन्द्रिका बोली । 'पाठशालामें भी तू रोज जीतती थी, बगीचे में जीतती थी, पनघट पर जीतती थी, और जीवनमेंमी जीत लिया मेरे वीरेको और देशभरमें वजा दिया विजयका डंका । माई और भाभी दोनों जयवाले होतो मेरे दोनों भतीजों के नाम जय विजय रक्खूगी। हमारे जीवनका प्याला अमृतसे भरा जाता था। हमारे चौकमें भी भेघाटम्बरके ऐसा चंदवा बॅधा । नीचे सुन्दरियोंकी बिजलिया चमकने लगी। परन्तु चन्द्रिकाकी चमक बड़ी ही अनोखी थी मानो इन्द्रधनुष्यकी लता ही न हो! चढते दिन बिंदोरी उपाके घर गई। नगर भरमें उपाकी चमक जयकथाके के बज रहे थे । इससे गली गली व चौक चौकमें प्रकरण १० वा १५३ किस वर के लिये संसार को उलट पुलट कर दिया उसे निहारने को नगर जनोंको झुड-के-झुड इकठे हो रहे थे । उस दिन मै तो ऐसा होरहा था मानो नगर का कौतुकहीं न होऊ। सजनसजानियोंके स्मितपरि- मलमें तैरता हुआ मै उपाकी हवेलीपर पहुचा । उपाकी माताने हँसते-हँसते आदर दिया और भोजाईने कुकुमाक्षत लगाते-लगाते कहा कि नित्य बाहरसे बुलाया करते थे अब घरमें आकर बुला जाया करना। महमान नहीं परन्तु राजरानी के तोर पर उषा उस रातको मेरे मन्दिर पर आई । रससौन्दर्यकी अधिष्ठात्रीकी, और हम दोनोंके सौभाग्यकी देवीकी उस रातको हमारे मन्दिरमें प्रतिष्ठा हुई । मेरे जीवनमें भी अनस्त उषा सदा के लिये उगी। सजीवनकी ऋतु देखी है ' कुम्हलाई हुई क्यारिया कैसी खिलती है। वसन्त ऋतुके प्रारम्भमें फूटते और प्रफुल्लित होते हुए फूलोंको पौधोंको तो देखा है न? हम भी कल कुम्हला गये थे परन्तु आज ऐसी सजीवनकी अतु बैठी कि अबतक वह तप रही है । जीवनभर की हमारी बसन्त उगी और नित्यनित्य हमारे कोपलें निकलती हैं । पसडिया खिलती है। आयुष्यका आम हमारा मोरोंसे लचक रहा-नमरहा है। उपाकी बाधी हुई सौभाग्यचडीके ऐसा, विविध पक्के रगोकी मातिसे शोभित हो रहा है । फुलवाडी के छायावाले मार्ग पर जैसे फूल फैले हुए होते हैं वैसेही हमारे जीवनपथ पर फूल बिछ रहे है। जीवन असत् नहीं है, सत् है। जीवन निद्रा या घुमेरी नहीं है परन्तु चित् है परम चेतना है । घडी भरका हास नहीं है, परन्तु आफू प्यका आनन्द है। इन सत्योंकी प्रतीति करानेके लिये इस वसन्तकी बसन्तपञ्चमीकी चन्द्रिकामें रसानन्द की रूपकला को धारण करने वाले सच्चिदानन्दजी मेरे मन्दिपर पधारे और मैंने उन्हें आत्माके रससिंहासन पर पधराया।

उपा सकल रसिकोंके रससिहासन पर ऐसी रसज्योति सदा सर्वदा झल- मलाती रहो। वैजयन्ती फूलमालाके समान मेरे कंठमें झूलते-झूलते उषाने कहा- वृन्दावनमें सूरत या झालरापाटनमें ही नहीं, परन्तु पृथ्वीके नगर नगर, रसके मंडपके ऐसा गोपीपुरा है, मेरे कान्हा | गोपी और कान्ह की कथा तो कृष्णावतारसे भी प्राचीन है, सृष्टिके इतनी ही प्राचीन है, सृजन-जूनी है। कुसुम और केसर के छीटोंसे छोटे हुए बसन्ती बागे सजकर बसन्त- मूर्तिके ऐसी उपा शोभा दे रही थी और कान्हगोपीकी तरह ही अमृत चन्द्रिका में जीवनवसन्तकी इस बसन्तपञ्चमीको हमने मनाया। बिदाई वाचक 'इस तरहका कुछ हमारी कथा का विस्तार है। तो अब बिदा? यह बात ऐसी है कि-यस्यान्त न ययु सुरासुरगणा-सब देशके सब भाषाओंके सब कविवरोंने ये गीत गाये है और गावेंगे परन्तु बात न पूरी हुई और न होवेगी। किसी किसीने इन गीतों को न गाने के सोगन्द ले लिये, उनमेंसे बहुतसों के ये सोगन्द बरफके महलोंकी माति पिघल गये । वाणीका पार नहीं है, वैसेही इस बातका मी पार नहीं है। तो अब बिदा? और इतनेमें भी तुझे कितनाएक क्या पागलपन न जान पडा। आज मैं पढता हूं तब मुझे भी जान पड़ता है। तू तो जिन्दगी भर चतुर ही रहा है न ? उपा कहती है कि आज हमारा शरज्जल है, नीतारे हुए और धीर गभीरः परन्तु अन्तरिक्षसे रसवर्षा होती थी और हमारी नाहित प्रकरण १०वा १५५ यमेिं पूर उछलते थे उस समय नाडिया पागल थीं या चतुर ? वाचक तूने अपनी लैला का मजनूपन किया हो तो हमें भी माफ करना । जब जब उपा इसे पढती है तब तन मीराका भजन गाती है कि 'गैला हम भले हुएरे हमने गैलामें गुण पाया' उपा कहती हैं कि कितने ही पागलपन में स्यानपन होता है । और सच कह वाचक ! यह तेरी बात है या मेरी ? तूने कुछ ऊडा देखा। देशदेशक देशियोंकी वनपरिधानकी विविधतामें मानवमूर्तिया भी विधविधी है ! और मानवमूर्तियोंमें उछलता हुआ चेतन क्या विविध का है ? एक आमकी कैरिया घाटमें छोटी बडी होंगी परन्तु गुणधर्म रसविभूतिसे पृथक् पथक् नहीं हो सकतीं। वाचक ! गहरी निगाह डाल कर देख ! पगडी टोपी या फैटा न निहार, परन्तु पगडी टोपी या फैटे के अन्दर जो शीर्षकुम्भ है उसे देख और कह वह अलग अलग है ? या उस शीर्षकुममें मस्तिष्क-चेतन अलग अलग है ? या बुद्धिकुमके मस्तिष्क व्यापार के धर्मकर्मके नियमसिद्धान्तोंका न्यायशासा, देशदेश, वेशवेश, या प्रजाप्रणालिकाके विचारसे अलग अलग है ? नहीं बुद्धिके न्यायशास्त्रकी भांति ही रसका न्यायशास्त्रमी सम्पूर्ण मानवजातिके लिये एकही है । इस वार्ता के प्रसग में नहीं तो क्या इसके प्रसगोंकी रसभावना में तेरी कथा नहीं है ? वेदान्त सच्चा हो या झूठा मै वेदान्त कथा समझानेको नहीं बैठा हू । परन्तु-अह ब्रह्मास्मि के साथ ही तत्त्व मसि-का वाक्य गुथा हुआ है, और उन दोनों से-सर्व सल्विद ब्रह्म का सर्वतोमुख महावाक्य सूर्यके पीछे तेज के ऐसा प्रकट है यह वेदान्ता- चार्योंका वचन है। रसके दर्शनमें इस वेदान्तवादकी श्रेणियों का ग्रन्थन कर । इन सूत्रोंमें जितना सत्य है उतना सत्य तुझे प्राप्त हो जायगा। इन सूत्रोंमें जितना असत्य है उतना तुझे असत्य मिल जायगा। परन्तु ।

उपा इन वेदान्तवाक्योंको रसशास्त्रमें गठित करके फिर कह कि यह कया मेरी है, तेरी है, या विश्वभर की है। जवाहिरातको खुला रख देनेसे रज चढती है, और कितनेही स्मरण तो जवाहिरों सेभी विशेष मूल्यवान होते है । प्रियस्मरणके उन परम पवित्र गएरे भढारोंके धनी वाचक | तू उन महारोंको न खोल, और मैं भी नहीं सोलता । उरमन्दिरके देहखहमें तो एक प्रियजन के ही प्रवेश करनेका अधिकार ह । स्नेहकुजकी इस घटामें तो केवल प्रियतम- काही ठिकाना है । अन्दर जा और पा जिससे सारा संसार कम है। देहिनां हि यथा देहे कौमार यौवन जरा, प्रमात मध्यान्ह और सध्याके समान जीवन के दिनके त्रिकाल श्रीकृष्णचन्द्रने गीता में बताये "है। कौमार जीवन की आशा है, अविकास है, कलिकासम्पुट है। जरा जीवन का विश्राम है, सूखापन है, जीर्णता है । जीवन के दिनका मध्यान्ह यौवन है, आयुष्यके चन्द्रकी पूर्णिमा यौवन है, ससारयात्रा के सवत्सरमें की सजिवनी वसन्त यौवन है ।इस अवस्थामें मनुष्य के आमों • पर मौर आते है और कोयलें बोलने लगती है। स्तूणा कुसुमाकर:- की मैंने यह कयनी कही है । वन में एक समय एक कोकिला इस कथा के काव्य गाती थी। मैंने कुछ समझे कुछ बे समझे-अधूरे समझे उस के शब्दोंको चुनचुन कर यह कथा कही है । कमिया जो कुछ हैं मेरी है और खूबिया उस कोकिला की है। खिलावे उसका सदाका यौवन है, न खिलावे उसका कौमार है और संभाल कर रखनेवाले का यौवन नित्य है । न समाले उसकी जरा है। उत्क्रान्तिवाद कहता है जिसे आवे उसका नित्यविकास है और नित्यविकास यह नित्ययौवन का लक्षण है । देवाङ्गनाओं को रसमी- मासक नित्ययौवना बतलाते हैं। पृथ्वीवासी देवाङ्गनाओं के लिये भी ऐसे विशेषण-क हदतक-क्या नहीं दिये जा सकते ? .

मकरण १०वा १७ वाचक ' तू सयोगी है या वियोगी । तू स्मितभोगी है या स्मितस्मर- णमोगी ? तू स्नेहयोगी तो है न ? इन धूनी का उपासक तो है न' उषा कहती है कि प्रिय जन के लिये सभोग और वियोग दोनों प्रिय-- तम के स्नेहयोग ही है, और यह बात उसकी सही है । तू विचार कर देख, तुझेभी ठीक जान पडेगी। रस सत्योंको जिस तरह उपा बतलाना जानती है मैं नहीं जानता । वह कहती है कि नित्यसयोग या नित्य वियोग किसी के कभी देखे भी गये है ? आस इस भव को देखेगी या परभव कोभी ? या सर भवोंको ? उपा कहती है कि सयोग और वियोग ये शब्द स्नेहियोंके देह को लक्ष्य कर कहे जाते हुए शब्द हैं आत्मापर नहीं है और इसी से चेतनसे स्थूल जितना गौण है उतनेही रसशास्त्रमें-उपा के रसशास्त्रमें वे गौण है । कोई कोई समय तो उपा इतना अद्भुत बोलती है कि साक्षात् स्नेहकी देवी स्नेहसूतकाही उच्चा- रण न कर रही हो ' उपा कहती है कि सयोग और वियोग गुणधर्मसे भिन्न नहीं है किन्तु परिणामधर्मसे भिन्न हैं । महासतीने आसमान में सूर्य को रोक दिया और महायोगीश्वरने चन्द्रमाको, परतु छह महिनेके लिये ही। इसके बाद ! इसके बादश्रीकृष्णचन्द्रकी भी रासपूर्णिमा अस्त हुई या तपी -आगमापायिनो नित्यास्तास्तितिक्षस्व भारत! गीता में ऐसा गान किये बाद गीताकार की वह पूर्णिमा नित्य कैसे निभ सकती थी ? उस पूर्णिमाका अस्त हुआ परतु रासपूर्णिमा के वे भाव क्या अस्त हुए ? वे भाव अस्त होकर चेतन का विरह हो जाय तब पूर्णिमा का अस्त होकर नित्यविरहकी अमावास्या उग सकती है। स्थूल और चेतन के विरहभेद को कालिदास समझता था, और इसी से दुष्यन्त और शकुन्तला के वियोग को केवल स्थूलवियोग न बना कर महाकविने चेतनवियोग की कल्पना की और इन स्नेहियोंकी स्नेहकथामें विचित्रतम करुणारस भर दिया प्रकृतिके महलमें और प्रकृतिके महल- उपा www mar इन वेदान्तवाक्योंको रसशास्त्रमें गठित करके फिर कह कि यह कथा मेरी है, तेरी है, या विश्वम्भर की है। जवाहिरातको खुला रख देनेसे रज चढती है, और कितनेही स्मरण तो जवाहिरों सेभी विशेष मूल्यवान होते है । मियस्मरणके उन परम पवित्र गहरे भडारोंके धनी वाचक ' तू उन मडारोंको न खोल, और मै भी नहीं खोलता । उरमन्दिरके देहखंडमें तो एक प्रियजन के ही प्रवेश करनेका अधिकार ह । स्नेहकुजकी इस घटामें तो केवल प्रियतम- काही ठिकाना है । अन्दर जा और पा जिससे सारा ससार कम है । देहिनां हि यथा देहे कौमार यौवन जरा, प्रमात मध्यान्ह और सध्याके समान जीवन के दिनके त्रिकाल श्रीकृष्णचन्द्रने गीता में बताये है। कौमार जीवन की आशा है, अविकास है, कलिकासम्पुट है। जरा जीवन का विश्राम है, सूखापन है, जीर्णता है । जीवन के दिनका मध्यान्ह योवन है, आयुष्यके चन्द्रकी पूर्णिमा यौवन है, ससारयात्रा के संवत्सरमें की सजिवनी वसन्त योवन है ।इस अवस्थामें मनुष्य के आमों पर मौर आते है और कोयलें बोलने लगती है। ऋतूणां कुसुमाफर:- की मैंने यह कथनी कही है । वन में एक समय एक कोकिला इस कथा के काव्य गाती थी। मैंने कुछ समझे कुछ बे समझे-अधूरे समझे "उस के शब्दोंको चुनचुन कर यह कथा कही है । कमिया जो कुछ है मेरी हैं और खूबिया उस कोकिला की हैं। खिलावे उसका सदाका यौवन है, न खिलावे उसका कौमार है और सँभाल कर रखनेवाले का यौवन नित्य है। न समाले उसकी जरा है । उत्कान्तिवाद कहता है जिसे आवे उसका नित्यविकास है और नित्यविकास यह नित्ययोवन का लक्षण है । देवाड़नाओं को रसमी- मासक नित्ययौवना बतलाते हैं। पृथ्वीवासी देवाङ्गनाओं के लिये भी ऐसे विशेषण-ठीक हदतक-क्या नहीं दिये जा सकते ?

विचितम करुणारस मर दिया प्रति महमें और प्रकृतिके महल वाचक तू संयोगी है या वियोगी तू स्मितमोगी है या स्मितस्मर- णमोगी ? तू स्नेहयोगी तो है न ? इन धूनी का उपासक तो हैन ? उषा कहती है कि प्रिय जन के लिये सभोग और वियोग दोनों प्रिय- जानती है मैं नहीं जानता । वह कहती है कि नित्यसयोग या नित्य वियोग किसी के कभी देखे भी गये है ? आस इस भव को देखेगी या परभव कोभी ? या सब भवोंको १ उपा कहती है कि सयाग और वियोग ये शब्द स्नेहियोंके देह को लक्ष्य कर कहे जाते हुए शब्द हैं आत्मापर नहीं है और इसी से चेतनसे स्थूल जितना गौण है उतनेही इतना अद्भुत वोलती है कि साक्षात् स्नेहकी देवी स्नेहसूत काही उच्चा- भिन्न नहीं है किन्तु परिणामधर्मसे भिन्न हैं। महासतीने आसमान में सूर्य को रोक दिया और महायोगीश्वरने चन्द्रमाको, परतु छह महिनेके लिये ही। इसके बाद । इसके बादश्रीकृष्णचन्द्रकी भी रासपूर्णिमा अस्त हुई या तपी -आगमापायिनो नित्यास्तास्तितिक्षस्व भारत! गीता में ऐसा गान किये वाद गीताकार की वह । वे भाव क्या अस्त हुए? भाव अस्त होकर चेतन का विरह हो जाय तब पूर्णिमा का अस्त होकर नित्यविरहकी अमावास्या उग सकती है ? स्यूल और चेतन के विरहभेद को कालिदास समझता था, और इसी से महाकविने चेतनवियोग की कल्पना की और इन स्नेहियोंकी स्नेहकथामें प्रकरण १० वा तम के स्नेहयोग ही है, और यह बात उसकी सही है । तू विचार कर देख, तुझे मी ठीक जान पडेगी। रस सत्योंको जिस तरह उपा बतलाना रसशास्त्र में निभ सकती थी? उस शकुन्तला नहपा के रसशास्त्रमें वे गौण है । कोई कोई समय तो उषा . । पूर्णिमा नित्य कैसे पूर्णिमाका अस्त हुआ परतु रासपूर्णिमा के के वियोग को केवल स्थूलवियोग न बना कर दुष्यन्त और , वासी आगमापायिन सर्वभूतसघमें मृत्यु के वियोगमी चेतन- वियोग नहीं है । प्रकृतिमन्दिर के नटनागर की नत्यलीला और देहके भावप्रदर्शन अनित्य है परन्तु इस रसीलामें की भावना और कविता, चेतनके बराबर ही नित्य है, अजो नित्यः शाश्वतोयं पुराणो- ब्रह्म है, और ऐसे आयुष्मान पिताके पुत्रपुत्रियोंके दीर्घ आयुष्य तो होवें-ही-होवें । परमात्त्व तत्वके बराबर आत्मतत्वके आयुष्य नभी हों परन्तु आत्मतत्वके जितने आयुष्य है उतने भाव और रसके आयुष्य तो है ही । अत एव स्थूलमे-देहके वियोग की स्नेहयोगी कुछ परवा नहीं करते । अनुभव से उपा कहती है कि हम में वियोगका होना शक्य नहीं है-सम्भव नहीं है। उपाका भाष्य सञ्चा है और समझ पड़ेगा, परन्तु देहके परे विचार करनेवाले को जितनी ऊंचाई पर चढ़ेंगे उतनीही दृष्टिकी विशालता मनुष्योंको प्राप्त होगी ही। और विचार कर देख वाचक । संयोगी या वियोगी, स्नेहयोगी की स्नेहसमाधिमें भावके भेद या रसके भेद कितने और कैसे है। किसी में भी स्नेहियोंके स्नेह कुछ ज्यादा कम है ? उपा मुझसे प्रतिदिन एक प्रश्न पूछती है कि मैने यह कथा लिसी है वैसे ही, कवि और आख्यायिकाकार स्नेहियोंके सवननके ही इतिहास क्यों लिखते हैं और लग्नके इतिहास क्यों नहीं लिखते ? उपाको सदा इस घातकी कमी जान पडती है । वह बारबार पूछती है कि कवियोंके भावे क्या सवनन ही स्नेह है ? क्या लम स्नेह नहीं है ? वाचक ! वाचक ! सच कह दूं ? हमारातो सदा का सवनन ही है। रोज हमारी आत्मा की एक एक पखडी सिलती है और कोटिदल आयुष्यके दिवसके ऐसी समुज्वल हो कर हँसती है । परन्तु उपा कहती है कविकुलकी प्रकरण १० वा १५९ भूल मैने इस कहानी के लिखने की है और उपाके इस आरोपके उत्त- रमें मुझसे कोई दलील वन नहीं पड़ती। ऐसा होने परमी कविवशक बचावके लिये मैं उषाको इस तरह कहता हूँ कि ब्रह्माण्डके ब्रह्ममुहूर्तमें ब्रह्मर्पियोंने वेदके कीर्तन किये थे फिर क्यों नहीं किये ! ब्रह्माके मुखके सृजनवेद हैं परन्तु विष्णु के मुखके पोषणवेद क्यों नहीं है ? ब्रह्मा और विष्णुको दलीलमें उतार तो लाया हू परन्तु उपाका कहना है सत्य । सवनन स्नेहका सृजन है और लग स्नेहका विकास है । उषाका आरोप यह है कि स्नेहके सृजनकी कथा सन कहते है परन्तु स्नेहके नित्यविकास की कथनी कोई क्यों नहीं कथता ? मैने उपासे प्रार्थनाकी है कि हमारी इस स्नेह कथाका उत्तर भाग वह लिखे । उपा कहती है कि लिखाना तो वर्तमान ही न है । वह तो भविष्यके सन्मुख परीक्षा देनेके समान है । वर्तमान से उपा लज्ना नहीं पाती परन्तु भविष्य से लजाती है। परन्तु नवोढाकी लज्जाबदलीके रैगमेंसे प्रौढाके पक्के रंग प्रकट होंगे तब, जगतका सौभाग्य होगा तो, हमारी सौभाग्यकथा उपाके हाथसे लिखी जायगी । तेरे समान ही मैं भी वाचक ! इस सौमा- ग्यग्रन्यको देखने के लिये उत्सुक है। हमारे उरमें, कुलमें, जीवनमें जो अद्भुत कविताके पुष्पोद्यान उपाने लगाये है उनके काव्य उषा लिखेगी तो देवों में गाये जाने वाली कविता दुनिया को पढ़ने को मिलेगी। तो अब समाप्त परन्तु ये कथनी कमी समाप्त हुई है या समाप्त होवेगी ? कवि व्यतीत हो जॉय और कविता लुप्त हो जावे, रसिकता सूख जाय और विश्व, सहराके रणकी भाति, रसजलहीन हो जलने लगे, और, मनुष्योंके हृदयके मधुपान मधुहीन होकर बन्द हो जॉय तक कहीं यह कथनी समाप्त हो जाय तो को जाने । इस नर नारी की कथा की समाप्तिका अभी तो मय नहीं है। चन्द्रकलाके एसी ?

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Usha

Author
Sharma,shri Girdher
Title
Usha
File name
Usha
Text
OCR done
Citation
1911
Published
2011/01
Publisher
Navratan Saraswati Bhawan Jhalrapatan
Language
Sanskrit
Pages
174
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546524
Barcode
4990010024991.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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